Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Kalu-khowmudi (purwardam)

Muni, Shri Chowthmalji · 2010/08

PDF Proofread

Front matter

प्रकाशक
आदर्श-साहित्य-संघ
सरदारशहर (राजस्थान)
82828
★ आत्म-शिक्षणमाला ★
प्रथमावृत्ति-१५००,
मूल्य-२
मुद्रक :
मदनकमार मेहता
रेफिल आर्ट प्रेस
(आदर्श-साहित्य-संघ द्वारा संचालित)
३१, बत्तल्ला स्ट्रीट, कलकत्ता

.
ग्रन्थानुक्रमः
१-प्रस्तावना
(अंग्रेजी, हिन्दी)
२-प्राग ज्ञातव्यम्
-जीवन-परिचय
(संस्कृत, हिन्दी)
४-प्रकाशकीयम्
५-विषयानुक्रमणिका
-मूल-ग्रन्थः
७-परिशिष्टम्

fa Sanskrit learning Sanskrithor, FOREWORD: This manual of Sanskrit giatnmer Kalukaum udi bears in its title the name of the eighth Acharya of the Terapanthi Şect of the Swetambara Jains Sri Sri Kaluramji Swami who was an eminent Sanskrit scholar trying incessantly, throughout his career as, the Supreme Head of religious order, to diffuse The Kaumudi' is an outcome of the Acharya's desire to bring Sanskrit grammar within the easy reach of the young learners Muni' Sri Chauthmalji the learned disciple of the Acharya first prepared a bigger work on grammar called Bhikshusabdanugasana which deals in a füll, manner with the linguistic phenomena of diverse nature observable in the vast compass of Sanskrit language "The present work is a later composition of the same author. Though abridged and rendered free from the intricacies and abstruseness generally associated with grammatical discussions, the work is complete in itself in every way: The lated knowledge to the specific work of simplifying the grammatical rules of Sanskrit and acquitted himself of the task creditäbly.

[6] + Both of his treatises, the Sabdanusasana and the Kaumudi have been in circulation in their manuscript forms for several years, and the Jain students have been studying them with profit. The smaller work Kaumudi is now being published by the Adarsha Sahitya Sangha for the benefit of a wider community of students with the hope that this new treatise on Sanskrit grammar will contribute to the easy diffusion of the language. .:There is a section of people among us who are for Sanskrit, but for Sanskrit without tears, without grammar. Acourse of Sanskrit study, contemplated in this mentality, if adopted, would make the founda. tion very weak and ineffective. Thorough mastery of a language presupposes a knowledge of the essentials of ifs grammar. It may not be advisable for every student of to-day to prosecute the study of grammar as 'assiduously as it was done in ancient India described in the accounts of the Chinese pilgrim I-tsing, but a good knowledge of the simple grammatical rules as set fortli in the Kalukaumudi is indispensable for understanding the structure of Sanskrit language The publication of a new Sanskrit grammar written in Sanskrit, and that too for meeting the practical requirements of the present generation of students, is certainly considered remarkable in these days, pointing, as it does, to the fact that Sanskrit is not "dead" like Latin and Greek. To draw an I-tsing by J. Takakasu, P. 175 [ 7 ] + analogy between Sanskrit and the classical languages of Europe is hardly fair. There are still in this country about 10,000 Pathasalas catering for lakhs of students solely devoted to the study of Sanskrit in its different branches, and thousands of people in India are still able to speak Sanskrit fluently. It is Sanskrit which even now has often to serve as a national language, forming the only means of communication of idea between people living as far apart as Bengal' is from Malabar or Bombay. It must be gratifying to all lovers of Sanskrit that devoted workers of the Terapanthi Jain order under the august and inspiring guidance of their ninth Acharya Sri Sri: Tulsiramji Swami are striving for the propagation of Sanskrit learning. They fully realise that the importance of Sanskrit does not lie only in its being tlie fountain-head of the regional languages of India, 'nor in its playing the role of a unifying force in the life of the nation throughout the ages, but also in its possessing a storé-house of knowledge and wisdom which alone can restore the religious and spiritual values to a world thrown out of gear by liatred, strife and violence ·Prof.-Durgamohan Bhattacharyya, M. A. Kavya-Sankhya-Puranatirtha. Lecturer, Calcutta, University and Head of the Department of Sanskrit. Scotish Church College, Calcutta.

*स्तावना कालुकौमुदी नामक यह संस्कृत-व्याकरण-पुस्तक जैन श्वेताम्बर तेरापन्वके अष्टम आचार्य श्री श्री कालूरामजी स्वामी, जो स्वयं संस्कृतके प्रौढ़ विद्वान् थे तथा जिन्होंने अपने आचार्य-कालमें अपने अनुयायियोंमें संस्कृत विद्याके प्रसारके लिए अनवरत. यल किया, के नाम पर है। प्राचार्यश्रीकी यह इच्छा थी कि कोई ऐसी कृति हो, जिससे नव शिक्षार्थी संस्कृत-व्याकरण सरलतासे अधिगत कर सके और यह कौमुदी उसी इच्छाका सुफल है । आचार्य श्रीके विद्वान् शिष्य मुनिश्री चौथमल्लजीने पहले व्याकरण शास्त्र पर भिक्षुशब्दानुशासन नामक विशाल ग्रन्थका प्रणयन किया, जो संस्कृत-भापाकी विशाल परिधिमें अवस्थित भाषा-विज्ञान-सम्बन्धी विविध पहलुओंका परिपूर्ण रूपमें विश्लेषण करता है। प्रस्तुत कृति (कौमुदी) उन्हींकी वादको रचना है। यद्यपि यह एक संक्षिप्त प्रक्रिया-ग्रन्य है और यह व्याकरण-सम्बन्धी विवेचन पूर्ण चर्चा में आम- तौरसे पाई जानेवाली गुत्थियों और उलझनोंसे उन्मुक्त है तथापि यह हर तरहसे मपने आपमें परिपूर्ण हैं। व्युत्पन्न लेखक, जो संस्कृत- * . * मूल अंग्रेजी प्रस्तावनाका हिन्दी अनुवाद ।

कि उसके व्याकरणका [ ९ ] व्याकरणकी विविध शाखाओंके पारगामी विद्वान् हैं, ने संस्कृत-व्याकरण के नियमोंको सरल बनाने के विलक्षण कार्य में अपने अर्जित पाण्डित्यका उपयोग किया है और उनको इस कार्य में गौरवपूर्ण सफलता मिली है। उनकी दोनों कृतियां--शब्दानुशासन और कौमुदी कई वर्षों से हस्तलिखित रूप में प्रचलित हैं और जैन-विद्यार्थी उनका अध्ययन कर लाभार्जन कर रहे हैं। इस संक्षिप्त पुस्तक---कालुकौमुदी का आदर्श-साहित्य-संघके द्वारा विद्यार्थीवर्गके लाभके लिए इस आशाके साथ कि संस्कृत- व्याकरण-विषयकः यह अभिनव - कृति. संस्कृत-भाषाके सरलतापूर्ण प्रसारमें योग दे सकेगी, प्रकाशन किया जा रहा है । कठिन परिश्रमसाध्य व्याकरणके बिना ही संस्कृतका अध्ययन हो-ऐसे विचार रखनेवाला एक संस्कृत-समर्थक वर्ग हमारेमें हैं। इस मनोवृत्तिके अनुसार आयोजित संस्कृतका अध्ययनक्रम यदि ग्रहण कर लिया जाय तो इससे संस्कृतकी नींव. दुर्वल और निःसार हो जायेगी। भाषा पर पूर्ण प्राधिपत्य पाने के लिए यह पूर्वापेक्षित है सारभूत ज्ञान किया जाय। आजके प्रत्येक विद्यार्थी के लिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह व्याकरणका उतने परिश्रमसे लम्बे समय तक अध्ययन करे जैसे कि प्राचीन भारतमें किया जाता था, जिसका चीनी यात्री इ-सिग* ने अपने संस्मरणोंमें उल्लेख किया है। परन्तु व्याकरण-सम्बन्धी सरल नियमोंका पर्याप्त , I-tsing by J:: Takakasu P. 175 ज्ञान, जैसा कि कालुकौमुदी में निहित है, संस्कृतका स्वरूप समझनेके लिए अनिवार्यतः अपेक्षित है। संस्कृत में लिखी हुई एक ऐसी नई संस्कृत-व्याकरण जो वर्तमान- कालीन छात्र-वर्गको व्यावहारिक आवश्यकताओंको पूर्ण करती है, को आजके समय प्रकाशन निश्चिततया प्रशंसनीय है एवं यह इस तथ्यको ओर संकेत करता है कि संस्कृत लैटिन और ग्रीककी तरह 'मृत-भाषा' नहीं है। संस्कृत और योरपकी प्राचीन भाषाओंमें समानता आंकना अन्यायपूर्ण होना। आज भी इस देशमें लगभग दश हजार ऐसी पछिशालाएं हैं, जिनमें लाखों विद्यार्थी संस्कृत-विद्याकी विविध शाखाओंके अध्ययन में सम्पूर्ण निरत होते हुए आश्रय पा रहे हैं और भारतवर्ष में सहनों ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो धारा-प्रवाह संस्कृत बोल सकते हैं। - संस्कृतकी ही यह विशेषता है कि वह आज भी दूरवर्ती लोगों-जैसे बंगाल, मलावार या बम्बईसे है, के विचारोंके आदान- प्रदानका साधन बनती हुई बहुधा एक राष्ट्रीय भापाका काम करती है ! समस्त संस्कृत-प्रेमियोंको यह जान कर हर्ष होगा कि तेरापन्थ- जैन-संधके कर्मठ कार्यकर्ता अपने नवम आचार्य श्री श्री तुलसीरामजी स्वामीके प्रतापपूर्ण एवं स्फूर्तिमय नेतृत्वमें संस्कृत-विद्याके प्रसारके लिए यत्नशील हैं। वे इसे पूर्णतया जानते हैं कि संस्कृतका महत्त्व केवलं इसीलिए नहीं कि वह भारत की प्रादेशिक भाषाओंका उद्गम है. और न इसीलिए है कि वह युग-युग पर्यन्त राष्ट्र के जीवन में ऐक्य-शक्तिका

[.. ११. ]
संचार करनेवाली है परन्तु इसलिए है कि उसमें ज्ञान तथा विचारोंकी
वह निधि है, जो द्वेष, संघर्ष और हिंसा द्वारा विशृंखलित संसारके
लिए धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्योंका पुनः संस्थापन कर सकती है।
(Sd.) प्रो० दुर्गामोहन भट्टाचार्य एम० ए०
काव्य-सांख्य-पुराण-तीर्थ
लेक्चरार--- कलकत्ता-विश्वविद्यालय
अध्यक्ष
संस्कृत-विभाग, स्कॉटिश चर्च कालेज,
कलकत्ता।

+ . प्राग ज्ञातव्यम् 'विद्ययामृतमश्नुते' इति सूक्तिनटी येषां हृदयाङ्गणे नरीनर्ति, ते विदुपां मौलिमणयः कलिकलहाऽहिकवलितानां पुंसां विद्याऽs- श्रितं पीयूपमेव प्राणरक्षणार्थं परमौषधं मन्यन्ते। यद्यपि सा विद्या केवलमर्थरूपैव, तथापि शब्दसमवेतत्वात् शब्देविना नाधिगम्यते, इति अर्थाथिभिरनभिलपिता अपि शब्दा इक्षुरसेच्छुभिरिक्षकाण्डा इव आश्रीयन्ते। तेपामर्थात्मकानां शब्दानां संग्रह एव ग्रन्थः, तस्येति ग्रन्थ- पाधोधेर्मन्थनेन विना न सुलभं विद्याऽमृतमिति शास्त्रसञ्चयो रत्न- राशिरिव सुरक्षाभाजनं भवति । एतां शास्त्रमञ्जूषापरित्रातामेव विद्यामधिकृत्य अनत्या; पण्डिताः सकलगुणमण्डिता भवन्तो नाना- देशानां गुरुपदमलञ्चकः। उक्तमपि- एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । खं खं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ देवदुर्विपाकेन यवनैराक्रान्तायाममुष्यामार्यमेदिन्यां संस्कृतिमपि निर्मूलत उन्मूलयितुं तैरतैरस्मत्पूर्वपुरुषोपार्जिता ग्रन्थकोटिः कपिभिः ".

कुसुममालेव दुरलावि। अन्तरिक्षे विलीनस्य तस्याऽगाधबोधो- दधेरर्धार्थ स्वकीयाऽश्रुश्रेणिमेव विसृजामः । तदनन्तरं राजलक्ष्मी परिणयद्भिगौरैरपि अस्मान् विद्यामातृ- विरहवह्निना दग्धुमस्माकं संस्कृतभाषा निराशापदे स्थापिता । स्तनन्धया अपि स्वजनन्याः स्तन्यपानतो विमुखतां लेभिमहे । अनाग्ला वयमागलमाङ्गलभाषागिलनाथं विवशा अभूम । काल- त्रयेऽपि मर्तुमनुचिताऽस्माकममरभाषा मृतेव घोषिता । विदेशिनो नरेशाः संस्कृतभाषाकामधेनुं पीयूषपयो दोहं दोहं स्वदेशं प्रेषया- मासुः। अद्यतनी स्थितिः गान्धिबुद्धया पञ्चत्वं प्राप्तेऽपि पारतन्त्र्ये पारे पारावारं गते- ध्वपि च गौरेषु गौरगिरा नाचावधि संस्कृतस्योरःस्थलावरोहतीति विस्मयमया भवामः । चतुर्दशविद्यानां चतुःषष्टिकलानाञ्च अस्म- द्भाषापुष्पवाटिकायामेव विश्रामोऽभूदिति सर्वथा सत्ये केऽपीतिहास- विदुरा न संशरते। व्याकरणस्य प्रयोजकत्वम् साहित्यस्वर्गस्य शब्दशास्त्रमेव सोपानपथमिति व्याकरणमत्या- दरणीयं वस्तु । अवैयाकरणा नैयायिका अपि यथा पशवस्तथा तृणव इति कथयन्तो न शोभन्ते । पूर्वप्रयोगानुसारीणीति व्याकर- णानि इति तेषां निष्प्रयोजनल्वमेव-स्वतः सिद्धस्य साहित्यस्य सिद्धरनावश्यकत्वादिति नोकनीयम् जगतःप्रवाहस्याऽनादित्वाद्धेतो - 1 १४ ] को हि वृक्षवीजयोरिव साहित्यव्याकरणयोरेकतस्याऽऽद्यत्वनिर्णया- र्थमव्यवस्थामालिङ्गत्। यादृशं सर्वरूपसम्पन्न गीर्वाणगिरो व्याकरणं लभ्यते नताशमन्यत्रेति संस्कृतस्याऽद्वितीयत्वं प्रतीयते । अस्य सूत्रचक्रव्यूह भेत्तुं कोऽप्यपशब्दसपन्नः समर्थो न भवतीति पाणिनिप्रभृतीन् को न पणायेत् । शाब्दिकानां स्मृतिः के के शाब्दिका अत्र अपारविद्यासिन्धुसेतुनिर्माणे नलनीला जाता इति तान् वयं नाम्ना संख्यातुमक्षमास्तथापि एकं पद्यमुपपद्य कांश्चिदेवं स्मरामः। यथा- इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशली शाकटायनः । पाणिन्यमरजैनेन्द्रा जयन्त्यष्टादिशाब्दिकाः ॥ सारस्वतकारेण अनुभूतिस्वरूपाचार्येणाऽपि “इन्द्रादयोऽपि यस्यान्तमिति" इन्द्रादय एव निरदेशिपत । एतेपु कः कतम समय मलस्करोतिस्म इति प्रश्न समाधातुं कोऽप्यतिहासिकः साहसं न सृजति। पूर्वपद्धतिमेव प्रपन्ना नवीनाः शाब्दिकाः सुगमशैलिसम्पन्नाः सन्तः स्वेन स्वेन यशसा जगद्धवलीकुर्वन्तीति न कश्चन सन्देहः । परिवर्तनस्य रूपरेखा 'इको यणचीति' प्राचीनपाणिनिप्रत्याहारगणनापरिश्रान्तचेता नवीनानुभूतिस्वरूषाचार्यरचितैः "इय' स्वरे, उवम्, मुरम्, लुलम्" इति सूत्रः सरलतामालम्ब्य को न शान्तिमाश्रयते । १-सिद्धान्त कौमुदी ६ । १ । ७७ । २-सारस्वत व्याकरणे सन्धिप्रकरणम् ।

[ १५. ] व्याकरणानां तुलनात्मकमध्ययनम् प्राचीनेषु अर्वाचीनेषु कतमो व्याकरणग्रन्थोऽत्युत्तम इति निन्दास्तुतिपूर्वक विवेचनन्त्वनुचितम्, स्वस्वदृष्टिकोणेन सर्वेषामेव ग्राह्यत्वात् । को हि चिनुयात् त्रिकटुगतानां शुण्ठीमरिचकृष्णा- नामन्यतमस्योत्तमत्वम् । तथापि व्याकृतय आरम्भे स्वल्पसलिला: सरित इव उत्तरोत्तरं वदन्ते इत्यत्र संशयो नावकाशं भजति । प्राच्यान् परिपूज्यानेव. मन्यामहे तथापि कविकुलकिरीक्य कालिदासस्य "पुराणमित्येव' न साधु सर्वम्” इति सुभाषितं स्मार स्मारं नवनवनिर्माणकुसुमैः साहित्योद्यानं विकसित दिदृक्षामः । साम्प्रतं पाणिनीयमेव पूजास्पदं प्राप्तमिति सर्वेषामेव विदुषां हर्षविषयः, किन्तु तत्प्राच्यत्वमेव पूजायां प्रमाणमिति नाङ्गीकुमः शाकटायत्तादीनां तत्पूर्वजातत्वात् । पाणिनिनाऽपि "लकः शाक- टायनस्यैव” । ३।४। १११ इति स्फुटमेव शाकटायनस्य पूर्वत्वं प्रकटितम् । अतः पाणिनेरविकलमेव सूत्रशृंखलं बुधजनमनो- मोहनाय अलम् । पाणिनीय हैमशब्दानुशासनश्च यद्यपि पाणिनीयस्य पाणिनिरेव प्राणाऽऽधारस्तथापि कतिपयैः कात्यायनबार्तिकः पतञ्जलिभाष्येन च विना नैतत्पूर्ति प्राप्नोतीति मुनित्रयविरचितमेव प्रतीयये । सिद्धान्तकौमुदीनिर्मात्रा भट्टोजि- दीक्षितेनाऽपि "मुनित्रयं नमस्कृत्य इत्यादिना एष एव पक्षः कक्षी- १-मालविकाग्निमित्रम । -- [ १६ ] कृतः । मुनित्रयेणव निष्पन्नमिति व्याकरणमाक्षिप्य हैमशब्दानु- शासनस्य विधाता. हेमचन्द्रः केनचित् कविनाऽमुना प्रकारेण स्तुतः। . .. किं स्तुमः शब्दपाथोधेहेमचन्द्रयतेर्मतिम् । एकेनाऽपि हि येनेटक् कृतं शब्दानुशासनम् ।। अध्ययन-परिपाटी व्याकरणाध्ययनं द्विविधम्-अष्टाध्यायीसूत्रक्रमेण, कौमुचाः सिद्धिक्रमेण च । एकस्तृतीचोऽपि क्रमो गौरगुरुप्रसादादवगतो यत्र सिद्धिमातुः कुक्षिमकाक्षित्वैव शब्दधातुरूपाऽपत्यानि कर्णवदुत्प- द्यन्ते । उपर्युक्त्योरुभयोरपि क्रमयोः कतरः कल्पतरुः कतरश्च किङ्किरात इति वितण्डादोर्दण्डखण्डितपाण्डित्यावयं स्याद्वादस्यैव शरणमाश्रित्य सुखं श्वसिमः। तृतीयक्रमानुगास्तु सूत्रक्रमहिमगिरे- गंभीरगुहागमनं विनैव विशुद्धसंस्कृतसोमस्य स्वरसं पातुमुद्घाटि- तानना भवन्तो लोकोपहृतामुपहासश्रियमेवाऽऽश्लिष्यन्ति । केचिद व्याकरणवकुण्ठत्योपकण्ठमपि नवाविष्कृतवस्तूनां संज्ञासुधासिद्धेर भावं दर्शयित्वा देवभाषां निन्दन्तो दितिसुतानपि अतिक्रामन्ति, ते धातुपाठत्य भास्वत इव प्रकाशे नवसंज्ञासृष्टिनिर्मातॄणां विधातृ- सहशानां विविधधातूनां दर्शनार्थ कथमुलूकायन्त इति महदाश्चर्यम् । विद्यायास्त्ररूप्यम् अध्ययनमध्यापनं निर्माणञ्च ति विद्यायास्त्रैरुप्यमिति निर्माणं विना न तस्याः सर्वतोमुखी सिद्धिस्ततो निर्माणनैरन्तर्यमपि महदा- [ १७ ] वश्यकं वर्तते । पूर्वकृतान्येव व्याकरणानि पर्याप्तानीति न सन्तोष: स्वागतमहति, अम्भसा सत्यप्यगाधेऽम्भोधौ जलाऽऽगमाऽनवरे- धात् । राष्ट्रभाषामणिमालाऽलंकृतायां हिन्द्यां क नग्नाय संस्कृताय सम्मानमिति विचारो न बुद्धिनिश्शेणिमारोहति, हिन्दीगङ्गायाः संस्कृतहिमवत एव प्रभवत्वात् । आत्मैव विशुद्धः सन् परमात्मा भवतीति व्याकृतिपरिष्कृता हिन्दी संस्कृतत्वमवाप्स्यतीति आशा न वारिबुद्बुदोपमा । भिक्षुशब्दानुशासनस्य निर्माणम् आंग्लयुगं भोजयुगे परिणमन् पुण्यपयसा पवित्रगानो जैन- श्वेताम्बरतेरापन्थाधिपः : कालुरामाऽऽचार्यो . निरस्ताऽज्ञानतृणे स्वसाधुसङ्घक्षेत्रे देवभाषाकल्पवल्ल्या बीजमवपत् । आयाससलिल- सिक्तायास्तस्याश्चिरकालेन तच्छिष्येण चौथमल्लमुनिना भिक्षु- शब्दानुशासनं नाम एकं मधुरं फलं प्राप्तं तदमरफलं गुरवे च निवेदितम् । तेनाऽपरिमितेन गुरुणा वितीर्यमाणेन अखण्डपाण्डित्यमादाय साधुसमुदाय उर्वीतलं ध्वस्तध्वान्तं करोति । भिक्षुशब्दानुशासनस्य क्रमपार्थक्यनिदर्शनम् यस्य च शब्दशास्त्रस्य त्रिवेण्यात्मके सूत्रप्रयागे पाणिनिसुरा- पगायाः कात्यायनकालिन्याः पतञ्जलिसरस्वत्याश्च पवित्रपाठपायो- भिरेकत्रैव स्नानं वितन्यते । यथा- : [ १८ ] पाणिनिः प्राह-शिल्पिनिष्बुन्' ३ । १ । १४५। कात्यायन: कथयति-नृतिखनिरञ्जिभ्य एव' भाष्यञ्च (पतञ्जलेः) भणति- 'नृतिखनिभ्यामेव ध्वुन्' उणादौ कनि पुंयोगेन रजकीति । भिक्षु- शब्दानुशासनं शास्ति-'नृतिखनिरञ्जिभ्यः शिल्पिन्यकट्' ।।१।७६ तथा च-पाणिनिः-गापोष्टक ३। २। ८ । कात्यायनः 'पिवतेः सुराशीध्वोरिति वाच्यम्' भिक्षुशब्दानुशासनम्-अनुप- सर्गाद गायष्टक् ।५।२।३। सुराशीध्योः पिवः । ५. १ २।४ । यस्मिंश्च कचित् सौगम्यं गम्यते । यथा-णत्वविधाने हेमचंद्रः पुरगादोनुपेक्ष्य केवलेन' वण इति निर्देशनैव णत्वं विदधाति । भिक्षुशब्दानुशासनेन पुरगामिश्रकासिध्रकासारिकाकोटरेभ्यो वनस्य । २।२।७२ इति बननकारत्य णत्वं विधाय सुगमताऽकारि । - एवमेव कचिद् यद् भिक्षुशब्दानुशासनं पाणिनीयहैमशब्दानु- शासनयोगणगृहितं गहनगगनायमाने द्वन्द्वसमासे पूर्व परं वा निपततां पतत्रिणामिव शब्दानां सूत्रसंग्रहेण सीमानं निर्धारयति । -बिम्बोष्ठादिपु वा' । ३११ । १६७, 'शकृन्मूत्रादिपु वा ३।१।१६६, 'न जायापत्यादिषु' ३। १ । १७१, 'गुणवृद्धयादियुवा' ३।१ । १७२, 'न शूद्राऽर्यादिपु' ३ । १ । १७४, 'नोदूखलमुसला- दिषु' ३ । १ । १७७, 'समीरणान्यादिषु वा' ३ । १११७८, 'न नर- नारायणादिषु' ३ । १ । १८०, 'वसन्तग्रीष्मादिषु वा' ३ । १ । १८३, यथा- टिप्पणम् १-कोटरमिश्रकसिघ्रकपुरंगसारिकस्य वणे । ३।२ । ७६ -सिद्धहमशब्दानुशासनम्

३
[ १९ ]
'न पाण्डुधृतराष्ट्रादिषु' ३। १ । १८४, 'भीमसेनार्जुनादिषु वा'
३।१।१८५, 'न पुष्यपुनर्वस्वादिषु' ३ । १ । १८६ ।
कालुकौमुदी
तदेव सफलतान्वेषकं भिक्षशब्दानुशासनं वुद्धिविकलेषु लोकेषु
प्रवेशमिच्छत् सीताभिलाषुकोऽनेकभटजटिले लङ्कापुरे प्रविविक्षुर्हनू-
मानिव स्वमेव कायं कालुकौमुदीमिषेण लघीयांसमकार्षीत् ।
सुरदेशेऽपि सुरभाषाप्रसाराय सुरेशस्य स्वीक्रियमाणे आमंत्रणे
कालुरामाचार्यः स्वपदव्यामभिषिक्तवान् स्वतुल्यतुलसीरामाचार्यम् ।
अगणितगुणविभूषितनवनवमाचाऽऽचार्यविभावसुविभासितायां
भारतभुवि गुर्वनुगृहीतसर्वसाधुसाध्वींसमधिकृतभारतीभाण्डागारात्
मिलिन्देनाऽरविन्दान्मरन्दविन्दुरिवसाधुशास्त्रधारणरीतिमनुल्लद्ध्यैव
सर्वसाधारणध्वान्तमपतु । कार्यकुशलेन । आदर्शसाहित्यसंघेन
कालुकौमुदी अवगता प्रकाशिता. च ।
सेयं कालुकौमुदी अदूषितं वैदुष्यं दर्शयन्ती छात्राणां हृदये
अहिंसा इव अपवर्गोदयं करिष्यतीतिः अनिशमाशास्महे ।
दीपावल्याम्, २००७
हांसी (पंजाब)
पं० रघुनन्दन शर्मा भिषगाचार्य:
अलीगढ़ान्तर्गतसोनामयीनिवासी

जीवन-परिचय: मुनिश्रीचौथमल्लस्वामीनां जन्म साहित्यसंस्कृतिकलानां कमनीये केन्द्र मालवप्रदेशे 'जाव'नाम्नि नगरे १९५० विक्रमादे कार्तिक- शुल्लप्रतिपदि 'चोरडिया'न्वयेऽभूत् । एतेषां पितुर्नाम 'श्रीप्यारचंद्र' महोदयो मातुश्च 'सुन्दरवाई' इत्यासीत् । कुले चैतेषां नैसर्गिकी धर्मनिष्ठा सहजा धर्मश्रद्धा च विलसति। तत्त्वज्ञाने चाप्येतेषां पारिवारिका जनाः प्रशस्यरुचिमत्त: समाजे प्रचुरप्रतिष्ठावन्तश्च. सन्ति । नगरसम्बन्धिपु समाजसम्बन्धिषु च समग्रघु कार्य- जातेषु तेषां ( पारिवारिकजनानां ) प्रामुख्यं विराजते । मुनिश्रीचौथल्लस्वामिषु शैशव एवं प्रखरप्रतिभाशालित्वं समु- ज्ज्वलायतिद्योतकलक्ष्मसाम्राज्यं च प्रकटितमासीत् । तस्मिन्नेव वयसि चैतेषां प्रकृष्टा धर्माभिरुचिः सर्वान् चमत्कृतानिव विधा- तिस्म । सांसारिकेपु पदार्थजातेषु पृथगजनोचितां सरसता सुखदतां रमणीयताञ्चाननुभवन्तोऽनभवन्तः स्वीयया धर्मनिष्ठा- नुरञ्जितया प्रकृत्या विराजमाना आसन् । प्रतिपलं प्रवर्धमानेयं धम भिरुचिश्चनं सीमानं सम्प्राप्तवती यदिमेऽसारमियं संसार परित्यज्य सन्यासत्रतं-भागवती दीक्षा ग्रहीतुं. स्वभव्यभावनां [ २१ ] प्रकटीचक्र: श्रुत्वैव चेमामाकस्मिकीमसंभाव्यां च स्वकुलनन्दन- गिरं हितैषिणः स्वजनाश्चमत्कृता विस्मयान्विता इव तस्थुरूचुश्च- भोः! सुकुमारेऽस्मिन् वयसि दीक्षा ! नैतत् कदापि संभवि । सांसारिकमोहवशात् पारिवारिकास्ते जना विविधैः प्रलोभनैः प्रकारैश्चैतान् स्वभव्यभावनाभावितपथाचालयितुं दूरीकतु च भृशमचेष्टन्त, साधुजीवनस्य कष्टसाध्यसाधनायाचित्रमप्युपस्थापित- वन्त एपामग्र किन्तु मनस्वी कार्यार्थी न गणयति सुखं न च दुःखमिति न्यायादेते स्वद्रढिष्ठनिश्चयोपरि हिमाद्रिरिव दृढ़तया तिष्ठन्तः स्वभव्यभावनायास्तिलमात्रमपि न विचेलुः । स्वकृता विविधाश्चेष्टां निष्फला विज्ञाय यदा तैः सांसारिक- हितकामुकौनीतं नायं बालः कदाचन गृहे ( गार्हस्थ्ये ) स्थास्यति, चेदयं बलादेनं गृहे रोv प्रयतिष्यामहे, शुभोदकं भविष्यतीति । तदा ते तत्समयनिराजमानांस्तपःपूतकायांरतेरापन्थसंघस्य सप्तमा- चार्यान् श्रीडालचन्द्रगणिवान् स्ववालस्य दीक्षाय प्रार्थयामासुः । पूज्यपादैराचार्यावय्य रेतेषां (श्री चौंथममल्लहाभागानाम् ) जीवनं निरीक्ष्य वैराग्भावञ्च परीक्ष्य योग्यत्वञ्चावंगत्यतेभ्यो दीक्षास्वोकृतिः प्रादायि । १६६५ विक्रमाब्दे चैत्रशुदशम्या राजस्थानप्रान्तान्तर्गतलाडनूनगर एतैर्दीक्षासंस्कारः पूज्यपादेभ्यः समलंम्भि। आधिक्येनतेषामध्ययनादिकं स्वनामधन्यानां विद्याविभूपितानां श्रीकालुरामाचार्य्यवाणां सेवायां समभूत् । एते जैनागमाति- रिक्त न्यायसाहित्यदर्शनव्याकरणकोशकाव्यादिविविधिशास्त्राणि - -- 1 २२ ] साङ्गोपाङ्गमधीत्य तत्तद्विपयेषु प्रौढं पाण्डित्यमलभन्त । व्याकरण- चैतेषां सर्वाधिकप्रियविपय आसीत् । एतैः पाणिनीयशाकटायन- हैमकलापसारस्वतसिद्धान्तचन्द्रिकामुग्धवोधसारकौमुदीजनेन्द्रादि- विविधव्याकरणानां गम्भीरं मननं सविवेचनमनुशीलनञ्च प्रकृत्या- गाधशब्दशाबपाथोनिधिरनायासेनव तीर्णः । पूज्यपादानांश्रीकालुरामाचार्य्यवराणामेपा, संप्रधारणाऽसीत- "संस्कृतभाषायाः कश्चन सरल: मुबोधः समयोपयोगी च व्याकरण- ग्रन्थश्चेत् स्यात् तर्हि संस्कृतशिक्षार्थिनां कृते महत् सोकय्यं सौविध्यञ्च समुपजायते”ति । यतो वर्तमानोपलभ्यमानेषु प्रचल- द्र पेषु च व्याकरणग्रन्येपु सारस्वतचन्द्रिकेऽधिकं संक्षिप्त, सिद्धांत- कौमुद्री च वार्तिकफलिकाद्याधिक्यवशाजटिला हेमशब्दानु- शासनस्य रचनापद्धतिश्च काठिन्यान्विता वरीवति । आचार्य्यवर्याणां विद्वद्वरिष्ठः सुशिष्यमुनिश्रीचौथमहस्वामिभिः स्वगुरुचरणानामुपयुक्तभावनायें सारूप्यं प्रादायि । एतैः १६८० विक्रमाब्दात् १६८८ यावन्नववत्सरपर्य्यन्तमहर्निशमनवरतञ्च परिश्रम्य तेरापन्थप्रवर्तकाद्याचार्याणामुषोवन्दनीयानां श्रीभिक्षु- गणिवाणां नामोपरि भिक्षुशब्दानुशासनं नाम सर्वांगसुन्दर- मभिनवव्याकरणं प्राणायि, यस्मिंश्चोणादिपाठधातुपाठन्यायदर्पणा- दीन्यपि साधु सन्निवेशितानि सन्ति । महति चास्मिन् कार्याऽ- लीगढ़ान्तर्गत--सोनामई-वास्तव्य-साहित्य--सेवि--आशुकविरत्न- पंडितरघुनन्दनशर्मायुर्वेदाचार्याणापि सुष्ठु सहयोगावितम् । भिक्षुशब्दानुशासनस्य विस्तृतत्वात् प्रारम्भिका: शिक्षार्थिनस्त- [ २३ ] तस्मादधिकलाभार्जनं कर्तुं नार्हन्तीति कृत्वैभिर्मुनिवय्यैः पूर्ण वर्ष परिश्रम्यास्यैव महाव्याकरणस्य स्वगुरुचरणानांश्रीकालुरामाचार्य- वराणां पावननाम्ना पवित्रीकृता कालुकौमुदी नाम संक्षिप्तप्रक्रिया प्राणायि । - कालुकौमुदी संक्षिप्ता सत्यप्येकं सागसम्पन्न परिपूर्णञ्च व्याकरणमस्ति। केवलमस्यैकस्यैव ग्रन्थस्याध्ययनेन संस्कृतव्याकरणस्य पर्याप्तबोधो लब्धुं शक्येतऽध्येतृभिः । तेरापन्थसंघे स्वरचनाकालत एवायं ग्रन्थः पठनपाठनयोः प्रयुज्यमानो विलसतितराम् । अस्या ध्ययनोपरमे भिक्षुशब्दानुशासनस्य पठनं चलति साधुसंघ । मुनिवर्याणां श्रीचौथमल्लस्वामिनां जीवने विद्वत्तातिरिक्तं सौम्यतासरलताभद्रतादिगुणनिचया अपि मूर्तिमत्तयेव राजन्ते । मुखमुद्रायाश्चैपां हार्दिक्यर्जुता स्पष्टतो निर्भरतीव । स्वदीक्षाकालत एवैत तत्तदाचार्यवराणां सेवायां स्थितेः सौभाग्यमाप्नुवन्तो विराजन्ते । प्रातस्मरणीयानां श्रीडालचन्द्रा- चार्यवाणां श्रीकालुरामाचार्य्यवाणाञ्चैभिस्तत्तत्स्वर्गारोहण- कालपर्यन्तमनवरतं सेवाऽकारि । सम्प्रति च तरुणतपस्विनां विश्व- वन्द्यानां श्रीतुलसीरामाचार्य्यवाणां सेवायां समर्पितमनोवपुषों विराजन्त एते। आत्मीययाऽगाधगुरुभक्त्या शासनसेवया च प्रसन्नीभूतैः पूज्यपादैः श्रीकालुरामाचार्य्यवय्ये रेते बहुशः पुरस्कृताः। प्रौढया विद्वत्तया, श्रद्धासुमण्डितया गुरुसेवया च सहैतेपत्कृष्टकवित्वं वक्त त्वञ्चापि सुतरां चकास्ति ।

[ २४ ] एतेषां ज्यायांसो भ्रातरः श्रीकुन्दनमल्लस्वामिनः सरलप्रकृति- सम्पन्ना योग्यविद्वांसस्तत्त्वविदश्च सन्त आसन् । तत्त्वज्ञानशिक्षणे च तेषां शैल्यतिसुरम्या सुरुचिपूर्णा चासीत् । मुनिश्रीकुन्दनमल्लस्वामिनः १६६२ विक्रमाब्दे पूज्यपादानां श्रीबालचन्द्राचार्यवाणां करकमलैदीक्षिता आसन्। तेषां लेखनकलासम्बन्धिदाक्ष्यं वस्तुतश्चमत्कार्यत्यद्भुतञ्चासीत् । स्वहस्तद्वारकैकपत्रे क्रमशः ७२०, १७००, २५००, श्लोका अलेखि यच लेखनकलायाः परमोत्कृष्टनिदर्शनमस्ति । प्रतिपत्रस्य विस्तारः ६३" x ४३" इति वर्तते । तेरापन्थशासने सर्वप्रथमं तैरेवेयत्सूक्ष्म- लेखनं प्राकारि। - अध्यात्मप्रेरकतया कुशललेखकतया च सह तेपत्तमचित्रकला- पाटवमपि शुशुभे। २००२ विक्रमाढ़े पौपकृष्णकादश्यां राजस्थानान्तर्गतमोमासर ग्रामे तेषां स्वर्गवासः सञ्जातः। तैर्यया निष्टयाऽनवरतजागरुकतया च सह या शासनसेवा सुविहिता साजुकृतियोग्याऽस्ति । खज्येष्ठधातेव मुनिश्रीचौथमल्लस्वामिनः तेरापन्थशासनस्य यां प्रशस्यां सेवां विदधति सा तेरापन्थस्येतिहासे सदा स्वर्णाक्षर- रङ्किता स्थास्यति । भिक्षुशब्दानुशासनकालुकौमुद्यौ व्याकरणजगति एतेषामद्भुते प्रदेये वर्तते। भारतीयवाङ्मयं आशंसोपचितहृदयं सदेतान् निनिमेषं समवलोकयते। . अलमिति विस्तरेण । कलिकाता आश्विनशुक्ल द्वितीयायाम् २००८, छगनलाल शास्त्री काव्यतीर्थः सा० रत्नम् जीवन-परिचय मुनिश्री चौथमल्लजीका जन्म साहित्य, कला व संस्कृतिके महान् केन्द्र मालव-प्रदेशमें-जावद नामक शहरमें संवत् १९५० कार्तिक शुक्ला १ को ओसवाल - चोड़रिया वंशमें हुआ। आपके पिताजीका नाम श्रीप्यारचन्दजी व माताजीका नामः श्रीसुन्दरबाई था। आपका परिवार धार्मिक निष्ठा व श्रद्धाके लिए सुप्रसिद्ध है। आपके परिवारके सदस्य तत्त्वज्ञान में भी अच्छी अभिरुचि रखनेवाले हैं। धर्मनिष्ठा के तत्त्वरुचिके अतिरिक्त आपके परिवार की समाजमें बड़ी अच्छी प्रतिष्ठा है। समाजके-शहरके प्रत्येक सार्वजनिक कार्यमें उनका मुख्य हाथ रहता है। बाल्यावस्थासे ही आप एक तीव्रबुद्धि व होनहार बालक थे धार्मिक बातोंकी ओर आपकी अधिक अभिरुचि थी। सांसारिक वस्तुओंमें आपको विशेष सरसता अनुभव नहीं होती थी। यह धार्मिक रुचि बढ़ते-बढ़ते इस सीमा तक पहुंच गई कि आपने इस असार संसारको छोड़ सन्यासव्रत-दीक्षा ग्रहण करनेकी इच्छा व्यक्त की। घरवालोंने जब अपने होनहार बालकके मुंहसे यह वात सुनी तो वे दंग रह गये। उन्होंने कहा-इस सुकुमार वय -- : [ २६ ] में दीक्षा ! यह कभी सम्भव नहीं होगा। उन्होंने इनको बहुत समझाया-बुझाया। साधु-जीवनकी कठिन साधनाका चित्र इनके सामने प्रस्तुत किया किन्तु-'मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखम् न च सुखम्'-आप अपने दृढ़ निश्चय पर अडिग रहे। जव अभि- भावकोंको यह विश्वास हो गया कि यह बालक घरमें नहीं रहेगा, और यदि वलात् इसे रफ्खा जायगा तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। तब तेरापन्थके तत्कालीन आचार्य श्रीडालगणी ( सप्तमाचार्य) के सन्मुख आपकी दीक्षाके लिए प्रार्थनाकी गई। आचार्यवरने आपके जीवनका निरीक्षण किया। आपके वैराग्य- भावका परीक्षण किया। आपको योग्य जान दीक्षाकी स्वीकृति प्रदान की। सम्वत् १९६५ चैत्र शुक्ला १० को लाडनूं-राजस्थानमें आपका दीक्षा-संस्कार सम्पन्न हुआ। आपका अध्ययन अधिकांशतः आचार्यश्री कालुगणीकी सेवा में सम्पन्न हुआ। आपने जैन आगमोंके अतिरिक्त साहित्य, न्याय, दर्शन, व्याकरण, कोश आदि विविध विषयोंका सांगोपांग अध्ययन किया। व्याकरण आपका सर्वाधिक प्रिय विषय रहा। आपने सारस्वत, सिद्धान्त-चन्द्रिका, पाणिनीय, शाकटायन, हैम, कलाप, मुग्धबोध, सारकौमुदी तथा जनेन्द्र आदि विभिन्न व्याकरणोंका गम्भीर मनन व विवेचनापूर्ण अनुशीलन किया । आचार्यश्री कालुगणीकी यह भावना थी कि संस्कृत-व्याकरण का एक समयोपयोगी सरल व सुबोध ग्रन्थ तैयार हो तो संस्कृतके विद्यार्थियोंके लिए बड़ी सुविधा हो सकती है। क्योंकि वर्तमानमें २७ गाभिक्षुगणीके उपलब्ध व्याकरणों में सारस्वत-चन्द्रिका अधिक संक्षिप्त है सिद्धान्तकौमुदी वार्तिक, फकिका आदिकी अधिकताके. कारण जटिल है। हैम-शब्दानुशासनकी रचना-पद्धति कठिन है। आचार्यश्रीके सुशिष्य विद्वद्वर मुनिश्री चौथमल्लजीने आपकी भावनाको साकार रूप दिया। आपने सम्बत् १९८० से १६८८. तक अहर्निश अनवरत परिश्रम करके तेरापन्थके प्रवर्तक आद्य साग-सुन्दर व्याकरणं तैयार किया, जिसमें उणादिपाठ, धातुपाठ तथा न्यायदर्पण आदिका भी सुन्दर समावेश है । इस महान कार्य में सोनामई-अलीगढ़निवासी आशुकविरत्न पं० रघुनन्दनजी शर्मा आयुर्वेदाचार्यका भी सहयोग रहा। भिक्षु-शब्दानुशासनके विस्तृत होनेके कारण प्रारम्भिक छात्र उससे अधिक लाभ नहीं उठा सकते, यह सोच आपने एक वर्षके अनवरत परिश्रमसे आचार्यश्री कालुगणीके नाम पर कालुकौमुदी नामक संक्षिप्त प्रक्रिया तैयार की। कालुकौमुदी एक संक्षिप्त पर अपनेआपमें परिपूर्ण व्याकरण है। केवल इस एक पुस्तकके पढ़नेसे संस्कृत-व्याकरणका सामान्यतः बोध हो सकता है। तेरापंथ-संघमें इसका पठन-पाठन इसके रचनाकालसे ही चालू है। इसके पठनके पश्चात् भिक्षु- शब्दानुशासनका अध्ययन चलता है। एक मंजे हुए विद्वान् होनेके साथ-साथ मुनिश्रीका जीवन सौम्यता, सरलता तथा भद्रताका साकार निदर्शन है। आपकी . प्रौढ़ विद्वान्, 1 २८ ] मुख-मुद्रासे आपके हृदयकी ऋजुता स्पष्टतः अनुमेय है। आपको अपने दीक्षाकालसे ही आचार्योंकी सेवामें रहनेका सौभाग्य प्राप्त होता आ रहा है। आपने सप्तमाचार्य श्री डालगणी व अष्टमाचार्य श्री कालुगणीकी उनके स्वर्गारोहण पर्यन्त सेवा की। वर्तमानमें आचार्यश्री तुलसीगणीकी सेवामें अपना तन-मन अर्पण किये हुए हैं। आपकी अट गुरुभक्ति व शासन-सेवासे प्रसन्न होकर आचार्यश्री कालुगणीने आपको विविधरूपमें पुरस्कृत किया। साथ-साथ आप उत्कृष्ट वक्ता तथा कवि भी हैं। आपके बड़े भाई मुनिश्री कुन्दनमलजी एक सरल प्रकृति योग्य विद्वान् व तत्त्वज्ञानी सन्त थे। तत्त्व-ज्ञान-शिक्षणकी उनकी शैली बहुत सुन्दर तथा सुरुचिपूर्ण थी। मुनिश्री कुन्दनमलजी सम्बत् १६६२ में सप्तमाचार्य श्री डाल- गणीके कर-कमलोंसे दीक्षित हुए थे। उनकी लेखन-कला-सम्बन्धी दक्षता वास्तबमें अनूठी थी। उन्होंने अपने हाथसे. एक-एक पत्र में क्रमशः ७००, १७०० तथा २५०० श्लोक लिंखे, जो लेखन- कलाके उत्कृट नमूने हैं। पत्रकी लम्बाई धा इञ्च व चौड़ाई ४१ इञ्च है। तेरापंथ-शासनमें सर्वप्रथम उन्होंने ही इतने सूक्ष्म पत्र लिखे। अध्यात्म-प्रेरक सन्त तथा कुशल लेखक होनेके साथ-साथ ये उत्तम चित्रकार भी थे। .

[२९ ]
उनका स्वर्गवास संवत् २००२ पौष कृष्णा ११ को मोमासर
राजस्थान) में हुआ।
उन्होंने आजीवन जिस निष्ठा व सतत चेष्टाके साथ शासन
की सेवा की, वह वास्तवमें अनुकरणीय है।
अपने ज्येष्ठ भ्राताकी तरह मुनिश्री चौथमल्लजी शासनकी जो
प्रशंसनीय सेवा कर रहे हैं, वह तेरापंथके इतिहासमें स्वर्णाक्षरोंमें
अङ्कित रहेगी।
भिक्षु-शब्दानुशासन तथा कालुकौमुदी व्याकरण-जगतके लिए
आपकी अनूठी देन है। भारतीय वाङ्मयको आपसे बहुत
बड़ी आशाएं हैं।
दीपावली, सं० २००७,
हाँसी-(पंजाब)
छगनलाल शास्त्री
काव्यतीर्थ, साहित्यरत्न

. प्रकाशकीयम् पुरातनं भारतीय वाङ्मयं वाहुल्येन संस्कृतभाषानिवद्ध मिति केपामपि विदुपामदृष्टिगोचरं नास्ति । अतएव भारतीयसंस्कृत्या ज्ञानायाऽनुशीलनाय च गीर्वाणवाण्या अध्ययनं सुतरामपेक्षित वरीवति । तहते संस्कृत्या हृदयं स्पष्मपि दुःशकम् । गीर्वाणवाणी च प्रचुरश्रमसमयसाध्यकठिनव्याकरणपरिज्ञानसापेक्षेति सुस्पष्टं तज्ज्ञानां विदुषाम् । इमां कठिनतां दुरूहताचापाकतु प्रौढवैया- करणर्मुनिश्रीचौथमल्लस्वामिभिः स्वगुरुचरणानां तेरापन्थाष्टमा- चार्याणां श्रीकालुरामगणिवर्याणां पूतनाम्ना पवित्रीकृतं भिक्षु- शब्दानुशासनप्रक्रियारूपं 'काल-कौमुदी' नामाभिनवं व्याकरण- मध्येतृ णां सौविध्याय सौकाय च प्राणायि यत् संक्षिप्तं सदपि स्वस्मिन्नेकं परिपूर्ण व्याकरणमस्ति । तत्रादर्शसाहित्यसंघनाडात्म- शिक्षणमालायाः पष्टपुष्परूपेण प्रकाश्यं नीयते । अन्थस्यास्यास्य सुसम्पादने प्रौढसाहित्यिक शुकविरत्नपण्डित रघुनन्दनशम्मायुर्वेदाचार्येण बहु सहयोगायितं तत्कृते चादर्श- साहित्यसंघः पण्डितवरिष्टायाऽस्मै शतशः साधुवादान् समर्पयन् परां मुदमनुभवति ।

[३१] कलिकाता विश्वविद्यालयप्रक्त्रा स्कॉटिशचर्चकालेजीयसंस्कृत- विभागाध्यक्षेन महायानसूत्र (बौद्धदर्शन.) मुक्ताफलच्छोन्दोग्य- मन्त्रभाष्यादिविविधग्रन्थसम्पादकेन सुप्रसिद्धविदुषा श्रीदुर्गामोहन- भट्टाचार्य एम० ए० सांख्यकाव्यपुराणतीर्थेन व्याकरणजगदपूर्व- ग्रन्थस्यास्य विद्वत्तापूर्णप्रस्तावनालेखनद्वारा या सहृदयता प्रादर्शि, तत्कृत आदर्शसाहित्यसंघः सहर्षमाभार प्रदर्शयति। संस्कृताध्येतारो ग्रन्थादस्मात् संस्कृतव्याकरणाध्ययने सौगम्येन सारल्येन च सफलतां लप्स्यन्त इत्याशास्महे । प्रकाशनमन्त्री 1

"
६
-
-
'कालुकोमुदी' आत्मशिक्षणमालायाः पष्ठं पुष्पं वरिवर्ति,
यस्योश्यञ्च विलसति सरलेन स्वल्पश्रमसाध्येन च विधिना
संस्कृतव्याकरणज्ञापनद्वारा
भारतीयवाङ्मयप्रवेशपथदर्शनम्
कौमुद्या अस्याः सुशृङ्खलिते प्रकाशने चूरू ( राजस्थानः) वास्तव्या-
उनन्यसाहित्यप्रेमिश्रीहनूतमलसुरानामहोदयेन स्वदिवंगतपितृ-
चरणानां श्रीमुन्नालालमहोदयानां स्मृतौ नैतिकसहयोगेन सहाऽर्थिक
योग प्रदाय या सांस्कृतिकी साहित्यिकी च सुरुचिः प्रकटीकृता,
सा सर्वेषां कृतेऽनुकृतियोग्याऽस्ति । आदर्शसाहित्यसंघ एतत्कृते
तं प्रति सहर्षमाभार प्रकटी करोति ।
प्रकाशनमन्त्री

कालुकौमुदीपूर्वाधस्थविषयानुक्रमः क्रमाङ्कः पृष्ठम् १३ १७ ७ २१ विषयः संज्ञाप्रकरणम् सन्धिप्रकरणम् ... क-स्वरसन्धिः ख-प्रकृतिभावः. ग-हस-सन्धिः घ-विसर्ग-सन्धिः स्यादिप्रकरणम् क-स्वरान्तपुल्लिङ्गाः ख-स्वरान्तस्त्रीलिङ्गाः ग-स्वरान्तनपुंसकलिङ्गाः घ-हसान्तपुलिंगाः -हसान्तस्त्रीलिङ्गाः च-हसान्तनपुंसकलिङ्गाः छ-अलिङ्गौयुष्मदस्मच्छब्दो अव्ययप्रकरणम् स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् कारकप्रकरणम् समासप्रकरणम् क-अव्ययीभावः ३६ ५२ ४ ० [ . ३४. ] क्रमाङ्कः ८१ ६१ - विषयः पृष्ठम् ख-तत्पुरुषः ग-बहुव्रीहिः ८८ घ-द्वन्द्वः ङ-अलुक्समासः ६३ च-समासाश्रयविधिः ६४ तद्धितप्रकरणम् क-अपत्याधिकारः ६८ ख-रक्ताद्यर्थाधिकारः १०२ ग-शेषाधिकारः १०५ घ-इकणधिकारः ११० हु-यादिप्रत्ययाधिकारः च-भावकर्मार्थी ११३ छ-क्षेत्राद्यर्थकाः ११५ ज-मत्वर्थीयाः ११८ झ-स्वार्थिकाः १२० दिस्तप्रक्रिया. १२६ परिशिष्टम् (क) सूत्राणामकारादिवर्णानुक्रमसूची . १३३ (ख) शुद्धिपत्रम् १७२ ★कालुकौमुदी .

No text on this page.

no भक्तः . फलमासन्नं, क्रियते भगवत्प्रसादमासाद्य । श्रुतिरिति चरितार्थेयं, कालुकौमुद्यु पागता हस्ते ॥१॥ श्रीकालोः सा फलदा, शुभहक् श्लाघ्या हि केन सद्विधिना। औदार्य यस्या इति, मम हस्ते लसति कौमुदी रम्या ॥२॥ -मुनिः चौथमल्लः aarch and --

No text on this page.

ॐ नमः सिद्ध भ्यः * श्रीमत्कालु गुरुं नत्या, भिक्षुशब्दानुशासनम् । कृत्वा तत्र प्रवेशाय, क्रियते कालुकौमुदी ॥१॥ संज्ञा-प्रकरणम् (१) ॐ॥ १।१।१। ओमित्येतदक्षरम्, अर्हदशरोयांचार्योपाध्यायमुनीनामाद्याक्षरहां, मङ्गलार्थ ग्रन्थस्यादी प्रणिधेयम् । (२.) सिद्धिरनेकान्तात् ॥ १।१ । २ । नित्याऽनित्यांचने क: अन्तः स्वभावो. यस्मिन् सोऽयमनेकान्तः, तस्मात् प्रकृतीनां शब्दानां सिद्धिनिष्पत्तितिव्या। (३) अइउन्मूल-एऐओऔ-हयवरल-जणनङम-झढधघभ-जडद- गव-खफछठथ-चटतकप-शषसः॥ १।१।४। प्रत्याहारसूत्रमेतद् असादिसंज्ञार्थम्, अत्र स्पष्टतार्थ स्वराणां सन्धि- रविवक्षितः । हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः । (४) आद्यन्ताभ्यां प्रत्याहारे ।। १ । १।५। प्रत्याहारे गृह्यमाणा वर्णा आद्यन्ताभ्यां सह. गृह्यन्ते । यथा- " कालुकौमुदी-पूर्वा अलप्रत्याहारे अइउऋलएऐओौहयदरल इति । झभप्रत्याहारे झड- घघभ इति । एवं सर्वत्र । (५) औदन्ताः स्वराः ॥ १।१।६। अकाराचा प्रौकारान्ता वर्णाः स्वरसंज्ञका: स्युः। (६) एकद्वित्रिमात्रा ह्रस्वदीर्घप्लुताः ।। १ । ११७ । मात्रा कालविशेपः । एकद्वित्र्युच्चारणमात्रा प्रौदन्ताः स्वराः क्रमेण हस्वदीघंप्लुतसंज्ञकाः स्युः । एकमात्रो ह्रस्वः, अ इ उ ऋ ल इति । द्विमानो दीर्घः, आ ई ऊ ऋ ल ए ऐ ओ औ इति । विमात्र: प्लुतः, आ ३ ई ३ ऊ ३ इत्यादि । व्यञ्जनं त्वर्षमात्रिकम् । (७) अवर्जा नामिनः ।। १।१।८॥ अवर्णवर्जाः स्वरा नामिसंज्ञकाः स्युः । (८) लदन्ताः समानाः ॥ १।१।६। लृदन्ताः स्वराः समानसंज्ञकाः स्युः । - (६) एऐओऔ संध्यक्षराणि ॥ १।१ । १० । एते स्वराः संध्यक्षरसंज्ञकाः स्युः । (१०) अं अनुस्वारः ॥ १।१ । ११ । अंइति अनुस्वारसंज्ञक: स्यात्, अकार उच्चारणार्थः । (११) अः विसर्गः ॥ १।१ । १२ । अः इति विसर्गसंज्ञकः स्यात् । (१२) हखो लघुः ।। १ । १ । १३ । ह्रस्वा लघुसंज्ञक: स्यात् । (१३) संयोगे गुरुः ॥ १।१ । १४ । ..

संज्ञा-प्रकरणम् संयोगे परे हवो गुरुसंज्ञक: स्यात् । (१४) दीर्घः ॥ १।१ । १५ । दी? गुरुसंज्ञकः स्यात् । (१५) कुचुटुतुपु वर्गाः ॥ १।१ । १६ । एते वर्गसंज्ञकाः स्युः, कु इति कखगघङ, चु इति चछजझञ। एवं सर्वत्र। (१६) स्वरानन्तरिता हसाः संयोगः ॥ १।१ । १७ । स्वरैरनन्तरिता अव्यवहिता हसा: संयोगसंज्ञकाः स्युः । (१७) तुल्यस्थानाऽभ्यन्तरप्रयत्नः सवर्णः॥१।१ । १८ । तुल्यौ स्थानाभ्यन्तरप्रयत्नौ येषां ते परस्परं सवर्णसंज्ञकाः स्युः । स्थानं कण्ठादि । अष्टौ स्थानानि वर्णाना-मुरः कण्ठः शिरस्तथा । जिह्वामूलं च दन्ताश्च, नासिकोष्ठौ च तालु च ॥१॥ तत्र अकुहविसर्गाः कण्ठ्याः, इत्यशास्तालव्याः, ऋटुरषा मूर्धन्याः, लतुलसा दन्त्याः, उपूपध्मानीया ओष्ठ्याः, एदैतौ कण्ठतालव्यौ, ओदौतौ कण्ठोष्ठ्यौ, वकारो दन्तोष्ठ्यः, जिह्वामूलीयो जिह्वयः, अनुस्वारी नासिक्यः, ञणनङमाः स्वस्थाननासिकास्थानाः। वर्गपञ्चमान्तस्थ- युक्तो हकार उरस्यः । आभ्यन्तरप्रयत्नश्चतुर्विधः-स्पृष्टः, ईषत्स्पृष्टः, विवृतः, ईषद्वि- वृतश्च । तत्र वार्याः स्पृष्टाः, यरलवा ईषत्स्पृष्टाः, स्वरा विवृताः, शवसहा ईपद्विवृताः । इति जिह्वामूलीयः, ( प इति उपध्मा- नीयः कपावुच्चारणार्थो । यरलवा अन्तःस्था: । शपसहा ऊष्माणः ।

'। ८ 4 ए मोत्. अर्; इत्येते गुणसंज्ञकाः स्युः । कालुकौमुदी पूर्वा अकारस्त्रिविधः--उदात्तानुदात्तस्वरितभेदात् । प्रत्येक सानुना- सिकनिरनुनासिकभेदात् पोढा । एते ह्रस्वस्य भेदाः । एवं दीर्घप्लुतयो- रपि । तथा चाष्टादशभेदा अवर्णस्य ज्ञातव्याः । एवमिवादीनामपि । सन्ध्यक्षराणां ह्रस्वा न सन्तीति तेषां द्वादशभेदाः । वयों वपर्येण सवर्णः; हस्वदीर्घप्लुतभेदाः सवर्णाः । यवला द्विवा-सानुनासिका निरनुनासि- काश्च । मित्रवदागमः, शत्रुवदादेशः । वर्णग्रहणे सवर्णग्रहणम् । कार- ग्रहणे केवल ग्रहणम् । तपरकरणं तावन्मात्रार्थम् । (१८) अन्त्यस्वरादिष्टिः ।। १ । १ । ३४ । अन्त्यस्वरप्रभृतिवर्णष्टिसंज्ञक: स्यात् । (.१६) अन्त्यात् पूर्व उपधा ॥ १ ॥ १ ॥ ३५ ॥ अन्त्याद् वर्णात्पूर्वो यो वर्णः स उपधासंज्ञकः स्यात् । (२०) आदैढौदारो वृद्धिः ॥ १।१।३६ । आत्, ऐत्, त्रौत्, आर् इत्येते वृद्धिसंज्ञकाः स्युः । (२१) एदोदरो गुणः ।। १ । १३७ । (२२) सितिबादिविभक्तिः ।। १ । १ । २१ । स्यादयस्तिवादयश्च प्रत्यया विभक्तिसंज्ञकाः स्युः (२३) तदन्तं पदम् ।। १ । १ । २२ । स्वावन्तं तिवाद्यन्तं च शब्दरूपं पदसंज्ञं स्यात् । (२४.) कार्यायेत् ॥ १।११३८ । कस्मैचित् कार्याय निर्दिप्टो वर्ण इत्संज्ञक: स्यात् । (२५) तस्य लोपः॥ १।१ । ३६ ।

संज्ञा-प्रकरणम्
-10
यस्येत्संज्ञा तस्य लोपः स्यात् ।
(२६) चादयो निपातः ॥ १।१ । ४० ।
चादिगणो निपातसंज्ञः स्यात् । च, बा, ह, अह, एव,' एवम्,
नूनम्, शश्वत्, कच्चित् हन्त,१०
माङ्, न, नम्, स्वधा,
स्वाहा, अलम्, हि,५ अथ
११
मा,
19.
अन्वयसमा हारेतरेतरंयोगसमुच्चयेषु ।
२-वा-विकल्पोपमानयोः ।
३-ह-अवधारणपादपूरणयोः ।
४-अह-निर्देशविनियोगकिलार्थेषु ।
-एव-अवधारणपृथक्त्वपरिमाणेषु ।
एवम्-उपमानोपदेशप्रश्नावधारणप्रतिज्ञानेषु ।
-नूनम्-तार्थनिश्चययोः ।
- शश्वत्-नित्यपुन:पुनरर्थयोः
९- कच्चित्-इष्टप्रश्ने ।
१०–हन्त-प्रीतिविषादसंप्रतिदानेषु ।
११-मा, माङ्, न,
नएते निषेधे ।
१२-स्वधा-पितृबलौ।
१३-स्वाहा--हविने ।
१४-- अलम-भूषणपर्याप्तवारणेपु
२५-हि-हितांवधारणयोः ।
१६-अथ-मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्न कात्स्न्येषु ।

.
-
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
ओम्,' अथो, नो, भोस्, भगोस्, अघोस् अघो, हंहो, हो, अहो,
आहो, उताहो, हा,' ही, हे, है, अयि, अररे, अरे, ननु, उम्, कम्,
किम्,° चिद्, उत, बत, इव,
नु, कच्चन, किमुत, किल,
१-ओम्-ब्रह्माभ्यादानाप्रतिश्रवणाभिमुखीकरणेषु ।
२-अथो-अन्वादेशादी।
३-तो-निषेधे।
४-भोस्, भगोस्, अघोस्, अघो, हहो, हो, अहो, आहो, उताहो, हे,
है, अयि, अररे, अरे-एते सर्वेऽपि सम्बोधने ।
५-हा-विपादशून्यकीर्तिपु ।
६-ही-विस्मये।
-ननु-विरोधोक्त्यन्वयादिषु ।
८--उन-अस्तिसत्वररोषोवितषु ।
कम्-उदकसुखाकाशेषु ।
१०-किम्-प्रश्नवितर्कयोः
११-चिद्-प्रश्नावधारणयोः ।
१२-उत-विकल्पे।
१३---वत- खेदानुकम्पासन्तोपविस्मयामन्त्रणेषु ।
१४---इव-उपमावधारणयोः ।
१५-जु-वितर्कपादपूरणयोः ।
१६.--कच्चन-इष्टप्रश्ने ।
१७--किमुत-विकल्पे।
१८---किल-संप्रश्नवार्तयोः ।

संज्ञा-प्रकरणम्
११
नवा,' खलु, यदा, जातु, यदि, यथा, तथा, पुरा, दिष्ट्या, स्म,
इति, सह, अमा; साकम्,१३ सार्धम्, अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ,
ऋ, लु, ल., ए, ऐ, ओ, औ, प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्,
दुस्, दुर्, वि, प्राङ्, नि, अधि, प्रति, परि, उप, अति, अपि, अभि, सु,
उद् इत्यादि । सूत्रे बहुवचनादाकृतिगणोऽयम् ।
(२७) प्रादिरुपसर्गः क्रियायोगे ॥ १।१।४१ ।
चाद्यन्तर्गणः प्रादिः क्रियायोगे. उपसर्गसंज्ञः स्यात् ।
७.
-नवा-विभाषायाम् ।
-खलु-निषेधवाक्यालङ्कारजिज्ञासानुनयार्थेषु ।
३-यदा-देशाद्यधिकरण।
४--जातु-अवधारणपादपूरणयोः ।
५. यदि-पक्षान्तरे।
६यथायोग्यतावीप्सार्थानतिवृत्तिसादृश्ये ।
-तथा-साम्ये।
८-दिष्ट्या-प्रतिसेवनसभाजनप्रतिलोम्येषु ।
-स्म-प्रतीतपादपूरणयोः ।
१०-इति-पुराश्रुतौ।
११-सह-तुल्ययोगविद्यमानयोः ।
१२-अमा-सहार्थसमीपयोः ।
१३--साकम्-साधम्-द्वावपि सहार्थे ।
१४---अ, आ"एते. चतुर्दशापि पादपूरणभर्त्सनामन्त्रणनिषेधेषु ।

१२
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
(२८) लोकात् ॥ १।१।३।
उक्तातिरिक्तानां संज्ञानां ..न्यायानां च सिद्धिः शास्त्रप्रवृत्तये
लोकाद् वेदितव्या।
--
इति संज्ञा-प्रकरणम्

सन्धि-प्रकरणम् अथ स्वर-सन्धिः दाधि आनय इत्यवस्थायाम्- (२६) इवर्णादीनां स्वरे यंवरलाः॥ १।२। १ । इवर्णोवर्णऋवर्णलवर्णानां स्थाने स्वरे परे यथासंख्यं य, व, र, ल इत्येते आदेशाः स्युः । इति इकारस्य यत्त्वे । (३०) अदीर्घादवसांनैकहसयोः ॥ १।३ । २७ । अदीर्घात स्वरात् परो रेफजितो यसोऽनुद्विर्वा स्यात् अवसाने एक- हसे च परे। इति धस्य द्वित्वे । (३१) झवे जवा झसानाम् ॥ १.१३।४३ । झसानां झबे परे जबाः स्युः । इति पूर्वधस्य दत्त्वे च । स्वरहीनं परेण संयोज्यम् । दद्धयानयः । पक्षे दध्यानय' । एवं गौरी+अत्र= गौर्यत्र । जलतुम्विकान्यायेन रेफस्योर्ध्वगमनम् । मधु+अत्र मध्वत्र, पितृ अर्थः -पित्रर्थः, लु+अनुवन्धः= लनुवन्धः ।

१४ कालुकौमुदी-पूर्वार्ध 1 (३२). ह्रस्वोऽपदे वा ॥ १।२।२। इवर्णादीनां ह्रस्वो वा स्यात् स्वरे परे न चैकपदे.। नदि एपा, दधि अत्र, मधु अत्र, कर्तृ इदम् । पक्षे नोपा इत्यादि । हस्वस्यापि हस्वः पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्तेः । ह्रस्वविधानसामर्थ्याच्च कार्यान्तरं न स्यात् । अपदे इति किम्- नद्यौ, वध्वौ, नधुदकम् , वध्वाननम् । (३३) एदैतोरयायौ ॥ १।२।३। एकारैकारयोः स्थाने स्वरे परे यथासंख्यम् अय्, माय इत्यादेशौ स्याताम् । ने+अनम्= नयनम्, नै+अक:= नायकः । (३४) ओदौतोरवावौ ॥ १।२।४। बोकारोकारयोः स्थाने स्वरे पर यथासंख्यम् अब, आव इत्यादेशौ स्याताम् । भो+अनम्= भवनम्, पौ+अकः पावकः । (३५) स्वरे वाऽसन्धिश्च ।। १।३। ५३ । अवर्ण-भो-भगो-अघोश्यः परयोः पदान्ते वर्तमानयोर्यकारवकार- योर्लोपो वा स्यात् स्वरे परे न च सन्धिः । त आगताः, तयागताः, तस्मा इदम्, तस्मायिदम्, पट इह, पटविह, ता इमो, ताविमौ । (३६) समानानां सवर्णे दीर्घः सहः ॥ १।२। १२ । समानसंज्ञकानां वर्णानां सवर्णे परे परेण सह दीर्घः स्यात् । दण्डानम्, श्रीशः, भानूदयः, होतृ कारः । (३७) मृलवर्णों वा ॥ १।१ । १६ । ऋलुवा परस्परं सवर्णो वा स्तः । होत+लकारः होतृ कारः । (३८) अवर्णस्येवर्णादावेदोदरलः ॥ १।२ । १३.। अवर्णस्य स्थाने इवर्ण, उवर्ण, ऋवर्ण, लुवर्ण इत्येतेपु परेषु परेण -

--
सन्धि-प्रकरणम्
१५
संह यथासंख्यम् एत्, ओत्, अर्, अल् इत्येते आदेशाः स्युः। जिनेन्द्रः,
गङ्गेयम्, नवोदकम्, रमोपमा, जिनद्धिः ।
(३६) झसानां झसे सवर्णे ॥ १।३। ६३ ।
हसात् परेषां झसानां लोपो वा स्यात् सवर्णे झसे । जिनधिः,
तवल्कारः ।
(४०) एदेतोरेत् ॥ १।२।१६ ।
अवर्णस्य एकारे ऐकारे च परे परेण सह ऐकारः स्यात् । तवषा,
जिनैश्वर्यम् ।
(४१) ओदौतोरौत् ॥ १।२ । २२ ।
अवर्णस्य प्रकारे ओकारे च परें परेण सह औकारः स्यात् ।
श्रमणोघः, चैत्रौत्कण्ठ्यम् ।
(४२) मृणेप्रवसनकम्बलदशार्णवत्सरवत्सतरस्यार् ॥१।२।१४
प्रादीनामवर्णस्य ऋणे परे परेण सह आर् स्यात् । प्रार्णम्, वसना-
र्णम्, कम्वलार्णम्, दशाणम्, ऋणार्णम्, वत्सरार्णम्, वत्सतरार्णम् ।
(४३.) मृत्युपसर्गस्य ॥ १।२ । १६ ।
उपसर्गस्यावर्णस्य ऋकारादौ धातौ परे परेण सह आर् स्यात् ।
प्रार्छति ।
(४४) एदोतोऽतः पदान्ते ॥१।२ । ३२ ।
एदोभ्यां परस्यातो लोप: स्यात् पदान्ते । तेऽत्र, पटोऽत्र ।
(४५) गवः स्वरेऽनक्षे ।।१।२।७।
गोशब्दस्य गव इत्यादेशों वा स्यात् अक्षवजिते स्वरे परे पदान्ते ।
(४६) षष्ठ्यान्त्यस्य ।। ८।४ । १२३ ।

। १६ कालुकौमुदी-पूर्वा सूत्रे पष्ठ्या निर्दिष्टं यत्कार्यमुच्यते. तत्तस्य अन्त्यस्य वर्णस्य स्यात् न तु सर्वस्य । इत्योकारस्यैव प्रादेशे प्राप्ते । (४७) शिदनेकवर्णः सर्वस्य ।। ८ । ४ । १२४ । शिदादेशः अनेकवर्णादेशश्च पष्ठ्या निर्दिष्टस्य सर्वस्य स्थाने स्यात् । गवाग्रम्, गवाजिनम् । पक्षे-गोऽग्नम्, गोऽजिनम् । अनक्षे इति किम्-गोऽक्षम् । (४८) इन्द्र ॥१॥ २॥ ८ ॥ गोशब्दस्य गवादेशो नित्यं स्यादिन्द्र परे । गवेन्द्रः । (४६) एदोतोरुपसर्गस्य लोपः॥ १।२।२६ । उपसर्गस्यावर्णस्य लोप: स्यात् धातोरेदोतोः परयोः । प्रेजते, उपो- पति। (५०) नैत्येधत्योः ॥ १।२ । २७ । उपसर्गस्यावर्णस्य लोपो न स्यात् एत्येधत्योः परयोः । उपति, उपैधते । (५१) एवेऽनवधारणे ॥ १।२ । २६ । अवर्णस्य लोपः स्यात् अनवधारणेऽर्थे एवे परे। अद्येव. गच्छ । अवधारणे त्वद्यैव । (५२) ओष्ठौत्वोः समासे वा ।। १ । २ । ३१ । अवर्णस्य लोपो वा स्यात् समासे प्रोष्ठौत्वोः परयोः । विम्बोष्ठी, विम्वौष्ठो, स्थूलोतुः, स्थूलौतुः (५३) शकादीनां टेरन्थ्वादिषु ॥ १।२।११। शकादीनां टेलोपः स्यात् अन्ध्वादिषु परेषु । --

सन्धि-प्रकरणम्
१७
शकन्धुः, कर्कन्धुः, कुलटा, हलीषा, लाङ्गलीषा, मनीषा।
इति स्वर-सन्धिः
अथ प्रकृतिभावः
(५४) असंधिरदसोमुमी ॥ १।२ । ३५
अदस् शब्दसम्बन्धिनी मु, मी इत्येतो असंधी स्याताम् । अमुमु ईचा,
अंमी अश्वाः।
(५५) ईदूदेद् द्विवचनं स्वरे ॥ १। २ । ३६ ।
ईत् ऊत् एत् इत्येतदन्तं द्विवचनान्तं स्वरे परे असंधि स्यात् ।
मुनी एतौ, साधू इमो, माले आनयं, पचेते अत्र।
(५६) मणीवादीनां वा ॥ १।२।३७ ।
मणीवादीनां द्विवचनमसंधि वा स्यात् । मणी इव, मणीव, दंपती
इव, दंपतीव ।
(५७) ओन्निपातः ॥ १।२।३८ ।
ओदन्तो निपातः असंधिः स्यात् । अहो अत्र, उताहो अत्र ।
(५८) धावोदितौ ॥ १।२ । ४२ ।
घिविषये दन्तः इतौ परेऽसंधिवा स्यात् । साधो इति, साविति ।
इति प्रकृतिभावः
अथ हस-सन्धिः
(५६) झसा.जवाः ।। २।१ । १०८।
पदान्ते वर्तमाना झसा जवाः स्युः। वाक्+ईश: वागीशः, पट्+
अनस्पडन।

१८ कालुकौमुदी-पूर्वार्ध (६०) मे जवा अमावा पदान्ते ॥ १।३।१। पदान्ते वर्तमाना जवा जमे परे जमा वा स्युः । एतन्मुरारिः, एतद् मुरारिः, वाङ् मधुरा, वाग् मधुरा । पदान्ते इति किम्- विद्मः। (६१) प्रत्यये ॥ १।३।२। पदान्ते वर्तमाना जवा नित्यं जमाः स्युः प्रत्यये जमे परे । पण्णाम्, वाङ्मयम् । (६२) जवाद्धो भभाः ॥ १।३।४। पदान्ते स्थिताज्जबात्परस्य हकारस्य झभा वा स्युः। प्रासन्न- वात् यद्वर्गगो जवस्तद्वर्गगो झभः स्यात् । तद्धितम्, तहितम्, वाग्धरिः, वाम्हरिः। (६३) स्तोःश्चुभिःश्चुः॥ १।३।। शकारचवर्गाभ्यां योगे सकारतवर्गयोः स्थाने शकारचवर्गो स्तः । यथासंख्यमनुदेशः समानाम् । सकारस्य शकारः, तवर्गस्य चवर्गः। करशेते, तच्चित्रम्, भवाज शेते । (६४) शात् ।। १।३।।। शकारात्परस्य तवर्गस्य चुत्वं न स्यात् । प्रश्नः, विश्नः । (६५) ष्टुभिः ष्टुः ।। १।३।६। यकारटवर्गाभ्यां योगे. सकारतवर्गयोः स्याने पकारंटवर्गों स्तः । कप्पष्ठः, तट्टीकते, ईट्टे । (६६) न पदान्ताट्टोरनाम्नवतिनगरीणाम् ॥ १।३।७। पदान्ते वर्तमानाट्टवर्गापरयोः सकारतवर्गयोः पकारटवर्गों न स्तः ।

सन्धि-प्रकरणम्
१९
नाम्नवतिनगरीणां तु स्यादेव । षड् नयनम् , षटु सीदन्ति । अनाम्-
नवतिनगरीणामिति किम्-षण्णाम्, षण्णवतिः, षण्ण गर्यः ।
(६७.) तोः पि ॥ १।३।८।
षकारे परे तवर्गस्य टुत्वं न स्यात् । भवान् षष्ठः ।
(६८) लि लः॥ १।३। १० ।
तवर्गस्य लकारे परे लकारः स्यात् । तल्लुनाति, विद्वालि लखति,
नकारस्य सानुनासिको लकारः ।
(६६) उदःस्थास्तम्भोः सः॥ १।३ । ६४ ।
उदः परयोः स्थास्तम्भोः सस्य लोप: स्यात् । उत्थानम्, उत्तम्भनम् ।
(७०) आद्यन्तौ टिकतौ ॥ १।१ । ६२ ।
टिकितौ यस्योक्तौ तस्य क्रमादाद्यन्ताववयवौ स्तः ।
(७१) शे चग्वा नोऽश्चे ॥ १।३ । २१ ।
नान्तस्य. पदस्य शे परे चगागमो वा स्यात् न तु श्चे. परे । भवान
च शूरः, भवान, शूरः । · अश्चे इति किम्-भवान् श्च्योतति ।
(७२) खसे चपा झथानाम् ॥ १।३। ४० ।
झथानां खसे परे चपाः स्युः। तत् शान्तिः, तच् शान्तिः ।
(७३) चपाच्छश्छोऽमे वा ॥ १।३।३।
पदान्ते वर्तमानाच्चपात् परस्य शकारस्य छो वा स्यात् अमे परे ।
तच्छान्तिः, वाक् शूरः, वाक् छूरः । अमे इति किम्-वाक् श्च्योतति ।
(७४) पनो ह्रस्वाद् द्विः स्वरे ॥ १।३ । २२ ।
हस्वात् परे पदान्ते. स्थिता. कारण कारनकारा द्विः स्यः स्वरे
परे । प्रत्यङ्दिम्, सुगणिह, कुर्वन्नास्ते ।

२० कालुकौमुदी-पूर्वार्धे (७५) स्वरात् ।। १।३।२५। स्वरात्परश्छकारो द्विः स्यात् । तवच्छत्रम्, इच्छति. हीच्छति । (७६) अनाङ्माङो दीर्घाद् वा छः॥ १।३।२३ । आङ्माङ्वजिताद्दीर्घात् पदान्तात् परदछकारो द्विर्वा स्यात् । लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मीछाया, वधूच्छत्रम्, वधूछ्वम् । अनाङ्माङ इति किम्-आच्छादयति, माच्छिदत् । पूर्वेण नित्यमेव । (७७) मोऽनुस्वारयमौ हसे सवर्णी ।। १।३। १८ । पदान्ते मकारस्य हसे परे अनुस्वारयमौ हसस्यैव सवर्णो पर्याय स्त: । त्वं करोसि, त्वङ्करोसि, त्वं चरसि, त्वञ्चरसि; त्वं पचसि, त्वम्पचसि, संवत्सरः, संवत्सरः। . हसे इति किम-किमय। (७८) सम्राट् ॥ १।३।२०। समो मस्यानुस्वाराभावे सम्राट् इति निपात्यते।. सम्राट भरतः । (७६) नां झपे भमः सवर्णोऽपदान्ते ॥ १।३।३४ । अपदान्ते मकारनकारयोः स्थाने झपे परे झपस्यैव सवर्णो मोऽनु- गन्ता, शङ्किता, अञ्चिता, नन्दिता, कम्पिता। झपे इति किम् - गम्यते, हन्यते । अपदान्ते इति किम्--भवान् करोति । (८०) हशसेऽनुस्वारः ॥ १।३ । ३५ । अपदान्ते मकारनकारयोः स्थाने हकारे शसे च परेऽनुस्वारोऽन- स्यात् । स्वन ड्वां हि, यशांसि, पुंसि । अपदान्ते इति किम्-~भवान स्यात् । साधुः। (८१) नोऽप्रशानःसक्छतेऽमपरेऽनुनासिकञ्चवा ।। १ । ३ । १३ । अम्परे 'छते प्रशावजितस्य नान्तस्य पदस्यः सगागमः स्यात्

सन्धि-प्रकरणम्
२१
तस्याऽनुनासिकश्च वा । भवस्तिनोति, भवांस्तनोति । अप्रशान इति
किम्-प्रशान् तनोति ।
इति हस-सन्धिः
अर्थ विसर्गसन्धिः
।
(८२) विसर्गस्य संश्यते ॥ १।३।४४ ।
विसर्गस्य सकारादेशः स्यात् । छते परे। कस्तरति; कश्चरति,
कष्टीकते। छते इति किम्-कः करोति, कः पचति ।
(८३) वा शसें ॥ १ ॥ ३ ॥ ४५
शसे परे विसर्गस्य सो वा स्यात् । शुद्धस्साधुः, शुद्धः साधुः,
पुत्रश्शेते, पुत्रःशेते।
(८४) अतोऽत्युः ।। १ । ३।४६ ।
अकारात्परस्य विसर्गस्य उकारादेशः स्यात् अकारे परे। कोऽत्र,
जिनोऽर्यः । अत इति किम्-देवा अत्र।
(८५) हवे ॥ १।३।५०।
अंकारात्परस्य विसर्गस्य उकारादेशः स्यात् हब परे। जिनो
वन्यः, धर्मो जयति।
(८६) अवर्णभोभगोअघोभ्यो लोपः।। १.३१५१
अवर्णादिभ्यः परस्य विसर्गस्य लोपः स्यात् हबे परे।
गच्छन्ति, भों गच्छसि, भगो हससि, अघो यासि । एते आमन्त्रणार्थाः
सकारान्ता अव्ययाः । हबे इति किम्-कुमाराः क्रीडन्ति ।
श्रमणा.

२२
कालुकौमुदी-पूर्वा
(८७) यो विसर्गस्य ॥ १।३।५४ ।
अवर्णादिभ्यः परस्य विसर्गस्य यः स्यात् स्वरे परे। स्वरे
वाऽसन्धिश्चेति-देवा इह, देवायिह, भो एहि, भोयेहि, भगो अत्र,
भगोयत्र, अघो इहि, अघोयिहि ।
(८८) सोऽहः ।।२।१ । १०५ ।
अहन्शब्दस्य सकारोऽन्तादेशः स्यात् पदान्ते ।
(८६) सोविसर्गः॥२।१।१०३ ।
सकाररेफयोविसर्गादेशः स्यात् पदान्ते । - अहो राजते, अहो
रूपम् ।
(६०) रोऽरस्यादिभे ॥२।१ । १०६ ।
अहन्शब्दस्य रेफोऽन्तादेशः स्यात् रेफस्यादिभवजिते परे पदान्ते ।
नोविसर्ग:इति विसर्गे।
(६१) रः ॥ १।३।५६ ।
रेफप्रकृतिकस्य विसर्गस्य रेफः स्यात् अबे परे । अहरहः, अहर्गणः,
महर्भवः, प्रातरत्र, अन्तर्गतः । रेफप्रकृतिकस्येति किम्-देवो गतः ।
(१२) वाऽपत्यादयः ॥ १।३।५७ ।
अहर्पत्यादयः शब्दाः कृतरकारान्ता वा निपात्यन्ते । अहर्गतिः,
अहः पतिः, गीपतिः, गी: पतिः, वूर्पतिः, धूः पतिः ।
(६३) नामिनो रोऽवे ॥ १।३। ५५ ।
नामिनः परस्य विसर्गस्य रेफः स्यात् अवे परे। मुनिरत्र, सांघु-
वंदति । नामिन इति किम्-चैनो गच्छति । अवे इति किम्-
मुनिः शेते।

सन्धि-प्रकरणम् २३ (६४) रो रि लोपो दीर्घश्चादिदुतः ॥१।३ । ३६ । रेफस्य रेफे परे लोप: स्यात् अकारेकारोकाराणां दीर्घश्च । पुना रमते, प्राता रौति, नीरक्तम्, दूरक्तम् । (६५) सैषाद्धसे लोपः॥१।३। ६० । संषाभ्यां परस्य विसर्गस्य लोपः स्यात् हसे परे । स याति, एष गच्छति । - हसे इति किम्-सोऽत्र । (६६) नागनसमासे ।।१।३।.६१ । अकि ना समासे च सैषाभ्यां परस्य विसर्गस्य लोपो न स्यात् हसे परे। सको राजा, एषको मन्त्री, असो याति, अनेषो गच्छति । (६७) तदः से स्वरे पादपूरणं चेत् ॥ १।३। ६५ । तदः परस्य सेर्लोप: स्यात् स्वरे परे पादश्चेल्लोपे पूर्येत । सैष दाशरथी रामः, सैष राजा युधिष्ठिरः । सष को महात्यागी, सैष भीमो महाबलः ॥ १॥ पादपूरणं चेदिति किम-स एष भरतो राजा। सन्धिरेक पदे. नित्यो, नित्यो धातूपसर्गयोः । नित्यः समासे वाक्ये तु, स विवक्षामपेक्षते ॥ १॥ । : इति सन्धि-प्रकरणे विसर्ग-सन्धिः इति सन्धि-प्रकरणम् ।

. स्यादि-प्रकरणम् अथ खरान्ताः पुल्लिँङ्गाः (१८) अर्थवद्धातुविभक्तिवाक्यं नाम ॥ १।१।३१ । धातुविभक्तिवाक्यवर्जितम् अर्थदच्छब्दरूपं नामसंज्ञं स्यात् । नाम्नः पराः स्यादयः सप्तःविभक्तयः स्युः । (88) सि औ जस्-अम् औ शस्-टा भ्यां भिस्-डे भ्यां भ्यस्- ङसि भ्यां भ्यस्-ङस् ओस् आम्-डि ओस् सुपां त्रीणि त्रीणि प्रथमादिः ।।१।४।१। स्यादीनां त्रीणि त्रीणि वचनानि यथासंख्यं प्रथमादिसंज्ञानि स्युः । (१००) एकद्विवहुषु ॥ १।४।२। स्यादीनां त्रीणि त्रीणि वचनान्युक्तानि, तान्येकत्वद्वित्त्वबहुत्त्वेष्व- र्येषु यथाक्रमं स्युः। तत्र प्रथमाया एकवचने-जिन+सि इति स्थिते, इकार उच्चारणार्थः, सोविसर्गः, जिनः। द्विवचने-जिन+जिन+औ इति स्थिते । (१०१) स्यादावसंरव्येयः॥३।१।१३५ । सर्वस्मिन् स्यादौ समानानां तुल्यरूपाणां सहोक्तो गम्यमानायाम् -

त्यादि-प्रकरणम्
२५
-
एकशेषः स्यात् । संख्येयवाचिशब्दरूपं वर्जयित्वा । जिनौ । असंख्येय
इति किम्-एकश्च एकश्च । बहुवचने-जसो जकार एदोज्जसीति
विशेषणार्थः ।
(१०२ ) अदेतोरपदान्तेऽतः ।। २।१।३१ ।
अपदान्ते स्थितस्य प्रकारस्य लोप: स्यादकारे एकारे च परे । इति
अकास्य लोपे प्राप्ते।
(१०३) अतो जस्भ्यांये ॥ १।४।८।
नाम्नोऽकारस्य आकारादेशः स्यात् जस्, भ्याम्, य इत्येतेषु परेषु ।
"
..
जिनाः।
.
(१०४.) समानादमः॥ १।४। ७१ ।
समानात् परस्यामोऽकारस्य लोप: स्यात् । जिनम्, जिनौ । शसः
शकारः शसोऽतेति विशेषणार्थः ।
(१०५) शसोऽता दीर्घः सश्च नः पुंसि ॥१।४। ७२ ।
शंसोऽकारेण सह समानस्य दीर्घः स्यात् तत्सन्नियोगे पुल्लिङ्गविषये
शसः सकारस्य नकारादेशश्च । जिनान् ।
(१०६) टेनः ।। १।४। १५ ।
अकारात्परष्टा इनः स्यात् । जिनेन, जिनाभ्याम् ।
(१०७) भिस् ऐस्॥ १।४।।
अकारात्परस्य भिस ऐसादेश: स्यात् । अनेकवर्णत्वात् सर्वस्य ।
जिनः ।
(१०८.) डेयः॥ १।४।१६ ।
अकारात्परो यः स्यात् । जिनाय, जिनाभ्याम्

२६
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
(१०६) एवंहुस्भे ॥ १ । ४ ११ ॥
अकारस्य एकारः स्यात् वह्वर्थे सकारे भकारे च परे । जिनेभ्यः ।
(११०) ङसिराद् ।। १।४।१३ ।
अकारात्परो सिराद् स्यात् । जिनाद् ।
( १११ ) वावसाने ॥ १।३।४१ ।
अवसाने झथानां चपा वा स्युः । जिनात्, जिनाभ्याम्, जिनेभ्यः ।
(११२) डस् स्यः ॥ १।४।१४ ।
अकारात्परो ङस् स्यः स्यात् । जिनस्य ।
( ११३) ओसि ॥ १।४। १२ ।
अकारस्य ओसि परे एत्वं स्यात् । जिनयोः ।
(११४) ह्रस्वापश्च ।। १।४।३७।
हस्वान्तादावन्तान्नित्यस्त्रीदूदन्ताच्च परस्यामो नुडागम: स्यात् ।
(११५) नुट्यतिसृचतस्रोः ॥ १ । ४ । ७३ ।
नुटि परे समानस्य दीर्घः स्यात् तिसृचतसृशब्दी वर्जयित्वा । जिना-
नाम्, जिने, जिनयोः । सुपः पकारो न र: सुपीति विशेषणार्थ ।
(११६ ) किलादेकपदेऽपदान्ते कृतस्य सस्य ।।२।२ १४ ।
कवर्गादिलाच्च परस्याऽपदान्ते वर्तमानस्य कृतस्य सस्य
स्यादेकपदे । जिनेषु ।
(११७ ) सिधिरामन्त्रणे ॥ १.१। ५६ ।
आमन्त्रणेऽर्थे सिधिसंज्ञः स्यात् ।
( ११८) अदेतोध्यमोर्लोपः ॥ १.१.४ । ६६ ।
अकारान्तादेकारान्ताच्च परस्य घेस्तदादेशस्यामश्च लोप: स्यात् ।
पः

२७ * , सर्वो। सर्वाद धिः स्मैः स्यात् । सर्वस्मै, सर्वाभ्याम् , स्यादि प्रकरणम् हे जिन, हे जिनौ, हे जिनाः। एवं वीररामकृष्णदेवादयः । सर्वादीनां तु विशेषः । सर्व, विश्व, उभ, उभयट, अन्य, अन्यतर, इतर, उतर, डतम, त्वत्, त्व, नेम, समसिमौ सर्वार्थों, पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराध- राणि दिग्देशकालेषु, स्वमज्ञातिधनाख्यायाम, अन्तरमपुरिबहिोंगे परि- धाने च, त्यद्, तद् यद् अदत्, इदम् एतद्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम् इत्यसंज्ञायां सर्वादिः । एते सर्वादयस्त्रिलिङ्गाः। सर्वः, (११६) जस इश् ॥ १।४। १६ । सर्वादरकारान्त सम्वन्धिनों जस इश् स्यात् । शकारः सर्वादेशार्थः । सर्व सर्वम्, सर्वो, सर्वान् । (१२०.) एकपदे रपमृवर्णान्नो णो ऽपदान्ते ।।२।२। ६६ । रेफषकारऋवणेभ्यः परस्य नस्य णः स्यादेकपदे न तु पदान्ते । (१२१.) अवकुप्वनुस्वारविसर्गजिह्वामूलीयोपध्मानीयैरन्तरेऽपि ।। २।२। ७०। इत्येतैर्व्यवधानेऽपि रेफषकारऋवर्णेभ्यः परस्य नस्य ण: स्यात् । सर्वेण, सर्वाभ्याम्, सर्वैः । ( १२२) सर्वाः स्मैः ॥ १।४ । १७ । सर्वेभ्यः। (१२३.) ङसिङयोः स्मास्मिनौ ॥ १।४। १८ । सर्वादेरकारान्तसम्बन्धिनोङसिङयोर्यथासंख्यं स्मास्मिनी स्तः । सर्वस्मात्, सर्वाभ्याम्, सर्वेभ्यः, सर्वस्य, सर्वयोः ।

२८
कालुकौमुदी-पूर्वा
(१२४) अवर्णस्यामः सुट् ॥ १।३ । २३ ।
अवर्णान्तसदिः सम्बन्धिन आमः सुडागमः स्यात् । सर्वेषाम्,
सर्वस्मिन्, सर्वयोः, सर्वेषु, हे सर्व, हे सर्वो, हे सर्वे ।, असंज्ञायामिति
किम्-सर्वो नाम कश्चित्, तस्मै सर्वाय । एवं विश्वादयोऽप्यका-
रान्ताः । उभशब्दो नित्यं द्विवचनान्तः । उभौ, उभौ, उभाभ्याम् उभा-
भ्याम्, उभाभ्याम्, उभयोः, उभयोः । डतरडतमौ प्रत्ययो, तदन्ताः शब्दा
ग्राह्याः । कतरः, कतरौ, कतरे; कतमः, कतमौ, कतमे ।
(१२५) पूर्वादिभ्यो नवभ्यः इशस्मास्मिनः ॥ १।४ । २२ ।
पूर्वादिभ्यो नवभ्यः यथास्थानमुक्ता इशस्मास्मिन इत्यादेशा वा
स्युः । पूर्वे, पूर्वाः, पूर्वस्मात, पूर्वात्, पूर्वस्मिन्, पूर्वे । शेषं सर्ववत् ।
एवं परादयः ।
(१२६ ) द्वन्द्व न सर्वादिः ॥.१ । ४ । २४ ।
द्वन्द्वसमासे सर्वादीनां सर्वादिसंज्ञा न स्यात् । पूर्वापराय, पूर्वापरा-
धराणाम् ।
(.१२७) द्वन्द्व ॥ १।४। २१ ।
द्वन्द्वसमासे सर्वादेरकारान्तसम्बन्धिनो. जस इश् वा स्यात् । पूर्वा-
परे, पूर्वापराः, वर्णाश्रमेतरे, वर्णाश्रमेतराः ।
(१२८) नेमाल्पप्रथमचरमतयड्यर्थकतिपयानांवा॥१।४।२०।
एप िजस इश्वा स्यात् । नेमे, नेमाः। शेषं सर्ववत् । अल्पे,
अल्पाः । शेपं जिनवत् । तयडयटौ प्रत्ययो, तदन्ताः शब्दा ग्राह्याः ।
द्वितये, द्वितयाः, द्वये, द्वयाः ।
1

स्यादि-प्रकरणम् २९ (१२६) डिति तीयस्य वा ॥ १।४।२६ । तीयप्रत्ययान्तस्य डिति परे सर्वादिसंज्ञा वा स्यात् । द्वितीयस्मै, द्वितीयाय, द्वितीयस्मात्, द्वितीयात्, द्वितीयस्मिन्, द्वितीये। शेषं जिनवत् । (१३०) मासनिशासनस्य शसादौ वा लोपः ॥२।१२३ । एषामन्त्यस्य लोपो वा स्यात् शसादौ । मासः मासाः । (१३१ ) नाम सिदयहसे ।।१।१ । २३ । सिति यकारवजिते हसादौ च प्रत्यये परे पूर्व नाम पदसंज्ञं स्यात् । माभ्याम्, माभिः, मासे, माभ्याम, माभ्यः, मासः, माभ्याम्, माभ्यः, मातः, मासोः, मासाम्, मासि, मासोः, मास्सु । पक्षे जिनंवत् । (१३२) शिस्थुट् ॥ १ १। ५४ । जस्शसादेशः शिस्थुट्संज्ञकः स्यात् । (१३३.) पुंस्त्रियोः स्यमौजस् ।। १।१ । ५५ । पुल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्गे च सि, नो, जस्, अम्, औ इत्येते प्रत्य- यास्थुट्संज्ञकाः स्युः । (१३४ ) अनोऽतोऽवमयुक्तात् ॥ २ ॥ १॥ २८ ॥ वकारमकारान्तसंयोगवर्जितात् परस्य अनोऽतो लोप: स्यात् ईपि ड्वजिते स्यादिस्वरे च परे। पास्नः; अास्ना। (१३५.) नाम्नो नोऽनङ्गः ॥२।१ । १२१ । अहन् शब्दजितस्य नाम्नो नस्य लोप: स्यात् पदान्ते, स च स्यादि- विधावसिद्धः । आसभ्याम्, आसभिः । न लोपस्याऽसिद्धत्वान्न स्यादि- कार्यम् ।

३० कालुकौमुदी-पूर्वा -- (१३६ ) वेङयोः ॥ २॥ १।२६ । वकारमकारान्त संयोगवजितात्. परस्यानोऽतो लोपो वा स्यात् ई, डि इत्येतयोः परयोः । आस्नि, आसनि । ६ १३७ ) पादन्तनासिकाहृदयासृज्यूषोदकदोर्यकृच्छकृत्पृतनासा- नूनां पद्दन्नोदसन्यूषन्नुदन्दोपन्यकशकम्पुतनवः ।। २॥१॥ २४॥ पादादीनां यथासंख्यं पदादय आदेशा वा स्युः शसादी पादस्य. पद् । पदः, पदा, पद्भ्याम्, पद्भिः, पत्सु । दन्तस्य-दत् । दतः, दता । यूपस्य-यूषन् । अवकुप्वनुस्वारेति णत्वे । (१३८) णषमसिद्ध परे स्यादिविधौ च ।। २ । १ । ११ । इतः परकार्ये कर्तव्ये पूर्वस्मिश्च स्यादिविधौ विधातव्ये णकारप- कारौ असिद्धौ स्याताम् । इति णत्वस्याऽसिद्धत्वादनोऽतोऽवमयुक्तादि त्यकारलोपः । यूष्णः, यूष्णा, यूपभिः । पक्षे जिनवत् । पदादयः पृथक्- शब्दा इत्येके । सोमपाः; सोमपी, सोमपाः, सोमपाम्, सोमपौ । (१३६ ) आतोऽनापो लोपः स्वरे ।। २ । १ । २५ । आवजितस्य आकारस्य लोप: स्यात् शसादौ स्वरे परे । सोमपः, सोमपा, सोमपाभ्यामित्यादि । एवं विश्वपा, शङ्खध्मा, हाहा. इत्या- दयः । मुनिः। (१४०) इदुतोऽस्त्रेरौरीदत् ॥ १।४।४१ । इदुद्भ्यां पर औः ईदूतौ स्तः स्त्रिशब्दं वर्जयित्वा । मुनी । अस्त्रः इति किम्-सुस्त्रियौ पुरुषो। .

स्यादि-प्रकरणम्
३१
(१४१.) एदोजसि ॥ १।४।४३ ।
इदुतोरेदोतौ स्तः जसि परे । मुनयः । मुनिम्, मुनी, मुनीन् ।
(१४२.) टा नाः पुंसिः॥१.१४ १४२ ।
इदुद्भ्यां परष्टा नाः स्यात् पुल्लिङ्गविषये। मुनिना। मुनि-
भ्याम्, मुनिभिः ।
(१४३) डित्यदिति ॥ १।४।४४ ।
इदुतोरेदोतौ स्तः अदिति डिति परे। मुनये । मुनिभ्याम् । मुनिभ्यः ।
(१४४.) एदोतो ङसिङसोरतः॥ १।४६७० ।
एदोद्भ्यां परस्य ङसिङसोरकारस्य लोप: स्यात् । मुनेः । मुनि-
भ्याम्, मुनिभ्यः, मुनेः, मुत्योः, मुनीनाम् ।
(१४५) डेडौंः ॥ १। ४ । ४५ ।
इदुद्भ्यां परस्य अॅडौँ: स्यात् ।
(१४६) डिति टेः ॥ ८।४। ८४ ।
डिति परे टेर्लोप: स्यात् । मुनौ । मुन्योः, मुनिषु ।
(१४७) हस्वस्य गुणो धिनाः ।।१।४ । ३६ ।
हस्वस्य धिना सह गुण: स्यात् । हे मुने, हे मुनी, हे. मुनयः ।
एवमग्निगिरिरविक विप्रभृतयः ।
(१४८) मृदुशनस्पुरुदंशोऽनेहसश्च सेरघेहः ।। १।४। ८६ ।
ऋकारान्तात् उशनस, पुरुदंशस्, अनेहस् .. इत्येतेभ्यः इकारान्तात्
सखिशब्दाच्च परस्य धिवजितस्य सेर्डाः स्यात् । सखा।
(१४६ ) ऐः सख्युरितोऽशि धौ ।। १ । ४ । ८५ ।
इकारान्तस्य .. सखिशब्दस्य शिवजिते धिवजिते च थुटि परे
.
.

कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
ऐकारादेशः स्यात् । सखायौ, सखायः । हे सखे, हे.सखायौ, हे सखायः,
सखायम्, सखायौ, सखीन् । टा ना: पुंसीति प्राप्ते ।
(१५०) न टा नाः ।।१।४।४८
इदन्ताभ्यां केवलसखिपतिभ्यां परष्टा ना न स्यात् 1: सख्या ।
ङित्वदितीति प्राप्ते ।
(१५१) ङित्येत् ॥ १।४।४६ ।
: इदन्तयोः केवलसखिपत्योङिति परे एकारो न स्यात् । सख्ये ।
इसि इवर्णस्य यत्त्वे कृते।
(१५२ ) खितिखीतीयाद् ङसिङसोरत उः।।१।४।५० ।
खितिखोतीसम्बन्धिनो यकारात्परयोसिडसोरकारस्य उकार:
स्यात् । सख्युः, सल्युः ।
(१५३ ) केवलसखिपतेरौः ॥ १।४।४७ ।
इदन्ताभ्यां केवलसखिपतिभ्यां परस्य रोः स्यात् । सख्यौ । शेषं
मुनिवत् । पतिः पती, पतयः, पत्या, पत्ये, पत्युः २, पत्यौ। केवलेति
विशेषणात् समासे तु मुनिदत् । भूपतिः, भूपती, भूपतयः इत्यादि ।
एवं सुसखा, सुसखायो, सुसखायः, सुसखायम्, सुसखायौ । शेष मुनिवत् ।
(१५४ ) आद्वष्टेरः ॥२।१।७७ ।
द्विपर्यन्तानां त्यदादीनां टेरकारादेशः स्यात् स्यादौ परेः। द्वौ, दो,
द्वाभ्याम् ३, द्वयोः २। त्रयः, त्रीन्, त्रिभिः, त्रिभ्यः २।
(१५५) संख्यायास्त्रेस्त्रयो नुटि ॥ १।४।३
संख्यावाचित्रिशब्दस्य त्रयः इत्यादेशः स्यात् नुटि परे । त्रयाणाम्,
त्रिषु । कतिशब्दो नित्यं वहुवचनान्त: ।
।

.
।
स्यादि-प्रकरणम्
(१५६ ) जस्शसोर्डतिष्णो लुक् ॥ १।४।४।
इतिप्रत्ययान्तात् पकारान्तात् नकारान्ताच्च संख्यावाचिनः परयो-
जसथासोलुक स्यात् । लोपेनैव सिद्धं लुग्विधान स्थानिवद्भावबाधना-
धम् । तेन एदोजसीति एत्वं न । कति, कति, कतिभिः, कतिभ्यः,
कतिभ्यः, कतीनाम्, कतिपु । नयतीति नियःक्विपि-- क्विवन्ताः शब्दा
धातुत्वं नोशान्ति नामत्वं च प्रतिपद्यन्ते । नीः ।
( १५७ ) धातोरिवर्णावर्णयोरियुवौ खरे प्रत्यये ।। २ । १ । १३ ।
धातोरिवोंवर्णयोः स्वरादी प्रत्यये परे इयुवी स्तः । नियो, नियः,
नियम्, नियः, निया, निये, नियः २ ।
( १५८) निय आम् ।। १।४।४६ ।
नीशब्दात्परस्य रामादेशः
स्यात् । नियाम् । सेनानीः ।
( १५६ ) किप्समासस्याऽसुधियस्तौ ॥२ । १ । २१ ।
विवप्प्रत्ययान्तेनैव यः समासस्तत्सम्बन्धिनो धातोरिवर्णोवर्णयोः
स्याने तो यकारवकारी इयुवोर पवादौ स्तः स्वरादौ स्यादौ परे न तु
सुधियः । सेनान्यो, सेनान्यः । विप्समासस्येति किम्---परमनियो,
परमनियः । असुधिय इति किम्-सुधियो, सुधियः। एवं ग्रामणी-
प्रभृतयः । यवक्रीः।
(१६०) संयोगात् ॥२।१।१५ ।
पातोरेव संयोगात्परयोर्धातोरिवर्णोवर्णयोरियुवौ य्वोरपवादौ स्तः
स्वरादी प्रत्यये परे । यवनियो; यवक्रियः इत्यादि । धातोरेव संयोगवि.
शेपणानेह--उन्न्यो, उन्न्य: । साधुः, साधू, साधवः, साधुम्, साधू,
साधून्, साधुना, साधुभ्याम्, साधुभिः, साधवें, साधोः २, साध्वोः,
.
--

३४ कालुकौमुदी-पूर्वार्धे साधूनाम्, साधौ, साधुपु, हे साधो । एवं भिक्षुभानुविष्णुवायुप्रभृतयः । (१६१ ) क्रोष्टुस्तृजवत् पुंस्यधौ ॥ १।४। ८७ । कोष्टशब्दस्य तृच्प्रत्ययान्तवद्रूपं स्यात् विवजिते थुटि परे पुल्लिङ्ग- विषये । ऋदुशनसिति सेडाः । क्रोष्टा । (१६२) तृस्वसृनप्तनेष्टुत्वष्टृक्षतहोतृपोतृप्रशास्तृ णामार ।। १।४।५४॥ तृच्तृन्प्रत्ययान्तस्य स्वत्रादीनां च ऋकारस्य पार् स्यात् थुटि परे । क्रोष्टारी, कोष्टारः, कोष्टारम्, कोष्टून् । ( १६३ ) टादौ स्वरे वा॥१॥ ४ ॥ ८८ । क्रोष्टुशब्दस्य तृवद्रूपं वा स्यात् स्वरादौ टादौ परे पुंसि । क्रोष्ट्रा, क्रोष्टुना, क्रोष्टुभ्याम्, क्रोष्टभिः, क्रोष्टे, क्रोष्टवे । (१६४ ) अतो डुः ॥ १।४ । ५१ । ऋदन्तात्परस्य ङसिङसोरकारस्य डुः स्यात् । क्रोष्टुः २, क्रोष्टो: २, क्रोष्ट्रोः, क्रोष्ट्वोः । कृताकृतप्रसङ्गो नित्यः, नित्यत्वात् पूर्वमेव नुदि कृते-क्रोष्ट्रनाम् । (१६५ ) अझै ।। १ । ४ । ५२ । ऋकारस्य अर् स्यात् ङौ परे । क्रोष्टरि, कोष्टी, कोष्टषु । तृज्वभावाऽभावात्-हे क्रोष्टो, हे कोष्टारी, हे कोष्टारः। खलपूः, खलप्वी, खलप्वः, सेनानीवत् । एवमुल्लूसुल्वादयः । वभूः (१६६) वर्षापुनह नकारागुवः ।। २ । १ । २२ । वादिभ्यः परस्यैव भुव उकारस्य वकारः स्यात् नान्येभ्यः स्वरादौ स्यादौ परें। वर्पाभ्वौ, वश्विः । एवं पुनवा, पुनर्वः। वर्षादिभ्य ..धौ

स्यादि-प्रकरणम्
३५
एवेति नियमान्नेह-स्वयंभुवी, स्वयंभुवः । पिता ।
(१६७.) थुटि ।। १।४।५३ ।
ऋकारस्य अर् स्यात् थुटि परे । पितरौ, पितरः, पितरम्, पितृ न,
पित्रा, पित्रे, पितुः, २, पित्रोः २, पितृ णाम, पितरि, पितृषु, हे
पितः । एवं जामातृभ्रात्रादयः । ना, नरौ, नरः ।
(१६८) नुर्वा ॥ १।४।७४ ।
नृशब्दस्य दीर्घो वा स्यान्नुटि परे। नृणाम्, नृणाम् । कर्ता ।
तृस्वनिति आर् । कर्तारौ, कर्तारः । एवं नत्रादयः ।
(१६६) रायो हसे ॥१।४।७।
रैशब्दस्य आकारोऽन्तादेशः स्यात् हसादौ स्यादौ परे । राः, रायो,
रायः, राभ्याम्, रासु।
(१७०) ओत औः ।। १।४। ८३ ।
ओकारस्य औकार: स्यात् थुटि परे। गौः, गावो, गावः ।
( १७१ ) आ अम्शसोऽता ॥ १।४। ८४ ।
प्रोकारस्य अम्शसोऽकारेण सह आ: स्यात् । गाम्, गावो, गाः,
गवा, गवे, गोः २, गवोः, गवाम्, गवि, गोषु । ग्लौः, ग्लावौ, ग्लाव:
इत्यादि।
इति स्वरान्ताः पुल्लिङ्गाः ।
अथ स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः
(१७२) आपः॥ १।४।२८ ।
आवन्तात् परस्य सेर्लोपः स्यात् । सीता ।
-
-

कालुकौमुदी-पूर्वार्धे (१७३) औरिः॥ १।४। ३२ । आवन्तात्पर औः इ: स्यात् । · सीते, तीताः, सीताम्, सीते, सीताः। १७४) एर्धिटौस्सु ॥ १।४।३१ । आवन्तस्य ए: स्यात् धि, टा, ओस् इत्येतेषु परेषु । सीतया, सीता- भ्याम्, सीताभिः। ( १७५) डितां ययास्यास्यामः ॥१।४।२६ । आबन्तात्परेषां 'डितां स्थाने ये, यास्, यास्, याम् इत्येते आदेशाः स्युः। सीताय, सीतायाः २, सीतयोः २, सीतानाम्, सीतायाम्, सीतासु, हे सीने, हे सीते; हे सीताः । एवं सुभद्रागङ्गाशालामालारमाश्रद्धामेधा- दुर्गादयः । ( १७६.) नित्यदिद्विस्वराऽम्वार्थानां ह्रस्वः ॥ १।४।४० । नित्यं दैदासादयं प्रादेशा येभ्यस्तेषां द्विस्वराऽम्बार्थानां च धिना सह हस्व: स्यात् । हे अम्ब, हे अवक, हे अल्ल.। शेष सीतावत् । सर्वा, सर्वे, सर्वाः। डिति ये इत्यांद्यादेशेषु कृतेषु । (१७७) सर्वादेर्यस्य सुडापोऽञ्च ।। १ । ४ । ३० । सर्वादिसम्बन्धिन पाबन्तात् परस्य हितां यकारस्य सुडागमः स्यात् तद्योगे आपोऽकारादेशश्च । सर्वस्य, सर्वस्या: २, सर्वासाम्, सर्वस्याम् । शेपं सीतावत् । एवं विश्वादयोऽप्यावन्ताः। डिति तीयस्य वेति- द्वितीयस्य, द्वितीयाय, द्वितीयस्याः २, द्वितीयायाः २, द्वितीयस्याम्, द्वितीयायाम । शेपं सीतावत् । जरा ।

स्यादि-प्रकरणम् (१७८.) जराया.जरस्वा ॥२॥ १॥ ८६ । जराशब्दस्य जरस् इत्यादेशो वा स्यात् स्वरादौ स्यादी परे । जरतो, जरे, जरसः, जराः, जरसम्, जराम्, जरसा.. जरया इत्यादि । निशा; निशे, निशाः, निशाम्, निशे, शसादी वान्तलोपे निशः, निशाः, निशा, निशया। (१७६) शराजभ्राज्यसृजमृध्रस्त्रश्च्परिब्राजांषः ॥२।१।११७ शान्तस्यः राजादीनां च षोऽन्तादेशः स्यात् झसे पदान्ते च । षस्य झसा जवा इति डत्वे--निड्भ्याम्, निभिः, निट्सु। पक्षे सीतावत् । नासिकाया:-नस् । नसः, नासिकाः, नसा, नासिकया, नोभ्याम्, नासिकाभ्याम् । पृतनायाः पृत् । पृतः, पृता, पृद्भ्याम्, पृत्सु । बुद्धिः, बुद्धी, बुद्धयः, बुद्धिम्, बुद्धी, बुद्धीः, बुद्धया, बुद्धिभ्याम्, बुद्धिभिः । (: १८०.) स्त्रीदुद्भ्यां ङितां दैदासदासदामो वा ॥१।४।३३ । स्त्रीलिङ्गाभ्यामिदुद्भ्यां परेषां ङितां स्थाने दै, दास्, दास्, दाम् इत्येते आदेशा वा स्युः । -दकारो ङित्यदितीति. विशेषणार्थः । बुद्ध्यै, बुद्धये, बुद्धयाः २, बुद्धः २, बुद्धीनाम्, बुद्धयाम्, बुद्धौ, बुद्धयोः, बुद्धिषु, हे बुद्धे, हे बुद्धी; हे. बुद्धयः । एवं मतिधृतिकीर्तिकान्तिप्रभृतयः । द्वेरत्त्वे सत्याप् । द्वे, द्वे, द्वाभ्याम् ३, द्वयोः २ । (१८१ ) त्रिचतुरः स्त्रियां तिसृचतस्मृ स्यादौ ॥२ । १ । ८७ स्त्रियां वर्तमानयोस्त्रिचतुरोः तिसृ, चतसृ इत्यादेशौ स्तः स्यादौ परे (१८२) तो रः, स्वरेऽनि ।।.२ । १ । ८८.! तिस, चतस इत्येतयों ऋतो रेफादेशः स्यात् स्यादौ स्वरे परे नका- -

३८
कालुकौमुदी-पूर्वा
रविषयादन्यत्र । तिस्रः २, तिसृभिः; तिसृभ्यः २, तिसृषु। अनीति
किम्-तिसृणाम् ।
(१८३ ) हसेपः सेोपः ॥ १।४।२७ ।
हसान्तादीवन्ताच्च परस्य सेर्लोप: स्यात् । नदी, नद्यौ, नद्यः,
नदीम्, नदीः, नद्या, नदीभ्याम्, नदीभिः ।
(१८४ ) नित्यत्रीदूतः ।। १ । ३ । ३४ ।
नित्यस्त्रीलिङ्गाभ्यामीद्भ्यां परेषां ङितां स्थान दें, दास्, दास,
दाम् इत्येते आदेशाः स्युः। नद्यै, नद्याः२, नद्योः, नदीनाम्, नद्याम्, हे
नदि।
( १८५) स्त्रियाम् ॥ १।४।८६ ।
स्त्रियां वर्तमानः क्रोष्टशब्दस्तृजवत् स्यात् । ऋकारान्तत्वात् नृतो
स्वन्नादेरिति वक्ष्यमाणसूत्रेण ईपू । क्रोष्ट्री, क्रोष्ट्रयौ । एवं कुमारीगौरी
वहुधेयस्यादयः । स्त्री।
(१८६) स्त्रियाः ।।२।१।१७ ।
स्त्रीशब्दस्येवर्णस्य इयादेशः स्यात् स्वरादौ प्रत्यये परे। स्त्रियो
स्त्रियः।
(१८७) वाम् शसि ॥२।१ । १८ ।
स्त्रीशब्दस्येवर्णस्य इयादेशो वा स्यात् अंमि शसि च. परे। स्त्रियम्,
स्त्रीम्, स्त्रियः, स्त्री:, स्त्रिया, स्त्रिय, स्त्रिया: २, स्त्रियोः २। आमि
तु इयः प्रागेव नुट् । स्त्रीणाम्, स्त्रियाम्, स्त्रीषु, हे स्त्रि। इतीवन्ताः ।
लक्ष्मीशब्दस्य अनीवन्तत्वान्न सिलोपः। लक्ष्मीः । शेपं नदीवत् ।
अवीलक्ष्मीतरीतन्त्री - श्रीह्रीधीनामुणादितः ।
।

३९ स्यादि-प्रकरणम् अपि स्त्रीलिङ्गवृत्तीनां, सिलोपो न कदाचन ॥ १ ॥ श्रीः; थियौ, श्रियः, श्रियम्, श्रियः । (१८८.) वेयुवोऽस्त्रियाः ॥ १।४ । ३५ । इयुव्स्थानिनौ यो नित्यस्त्रीलिङ्गस्य ईदूतौ तदन्तात् परेषां ङितां स्थाने दे, दास्, दास्, दाम् इत्येते आदेशा वा स्युः स्त्रीशब्दं वर्जयित्वा । श्रिय, श्रिये, श्रियाः, श्रियः, श्रियाः, श्रियः । (१८६) नुडामः ॥ १।४।३६ इयवस्थानिनौ यो नित्यस्त्रीलिङ्गस्य ईदूतौ तदन्तात् परस्यामो नुटु वा स्यात् स्त्रीशब्दं वर्जयित्वा । श्रीणाम्, श्रियाम्, श्रियि, श्रियाम्, हे श्रीः । एवं सुधीहीधीप्रभृतयः । सुधीः, सुधियौ, सुधियः । धेनुर्बुद्धि- वत् । धेनुः, धेनू, धेनवः, हे धेनो । एवं चञ्चुरज्जुप्रभृतयः । भ्रूः । (१६०.) नुभ्र वोः ॥२।१।१६ । संयोगात्परस्य नुप्रत्ययस्य भ्रूशब्दस्य चोवर्णस्य उवादेशः स्यात् स्वरादी प्रत्यये परे । ध्रुवौ, भ्रवः। शेषं श्रीवत् साध्यम् । स्वयंभूः पुंवत् । वधूजम्वादयो नदीवत् । खलपूः पुंवत् । स्वस्रादिभ्यो नेप् । स्वसा, स्वसारौ। शसि - स्वस: । स्वसः। शेष कर्तृवत् । शसि-मातृ : । शेष पितृवत् । रैः पुंवत् । नौग्लौंवत् । इति स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः। अथ स्वरान्ता नपुंसकलिङ्गाः (१६१.) अतोऽम् ।। २ । १ । ४ । अकारान्तनपुंसकसम्वन्धिनोः स्यमोरमादेशः स्यात् । रत्नम् । माता, मातरौ।

पुनरपि रत्नम्, रत्ने, रत्नानि । शष जिनवत् । एवं वनवनम कालुकौमुदी-पूर्वा (१९२) ईरौः॥२।१।६। नपुंसकसम्बन्धी औः ईः स्यात् । रत्ने । (१९३) जसंशसोः शिः।।२।१।७। नपुंसकसम्बन्धिनोर्जस् शसो: शिः स्यात् । (१६४) नुम् हेझसातः शौ ।।२।१।८ हकारान्तस्य झसान्तस्य अकारान्तस्यं च नपुंसकस्य नुमागमः स्वात् शौ परे। (१६५) मिदन्त्यस्वरात्परः ॥ १।१ । ६३ । मिदागमः प्रत्ययो वा अन्त्यस्वरात्परः स्यात् । (१९६) नोपधाया नुटि चाधौ दीर्घः ॥ १।४ । ६३ । नान्तस्योपघाया दीर्घः स्यान्नुटि चिजिते युटि च परे । रत्नानि, कमलादयः। सर्वम्, सर्वे, सर्वाणि । पुनस्तद्वत् । हे सर्व, हे सर्वे, हे सर्वाणि । शेपं पुंवत् । एवं विश्वादयोऽकारान्ताः । (१९७) दुशन्यादेरनेकतरस्य पञ्चकस्य ।। २।१।५। नपुंसकानामन्यान्यतरेतरडतरडतमानां पञ्चकानां स्यमोर्दुशादेशः स्यात् एकतरं वर्जयित्वा । उकार उच्चारणार्थः । अन्यद्, अन्यत्, अन्ये, बन्यानि । सम्बोधने तु ध्यादेशस्य अम एव लोपत्वात् दुशो लोपो न.। हे अन्यद् । अनेकतरस्येति किम्-एकतरम् । शेषं सर्ववत् । (१९८) नपुंसके ।।२।३।११३ । नपुंसके वर्तमानस्य नाम्नो हस्व: स्यात् । सोमपम्, सोमपे, सोम- पानि ।

स्यादि-प्रकरणम्
४१
(१६६ ) नपुंसकस्य स्यमोलृक् ।। २१ । १ ।
नपुंसकस्य स्यमोलक स्यात् । वारि ।
(२००.) नामिनः स्वरेऽनामि ॥ २॥ १। १० ।
नाम्यन्तस्य नपुंसकस्य नुमागमः स्यात् आम्वजिते स्वरे परे ।
वारिणी, वारीणि, पुनस्तद्वत् । वारिणा, वारिणे, वारिण: २, वारिणोः
२; वारीणाम्, वारिणि, वारिषु ।
(२०१ ) नामिनो लोपः ।।२।१।३ ।
नाम्यन्तस्य नपुंसकस्य स्यमोर्लोपो वा स्यात्। लोपे स्थानिवद्भावात्
हस्वस्य गुणो धिनेति गुणः । हे वारे । पक्षे लुक्, लुकि न स्थानिवद्-
भावः । हे वारि, हे वारिणी, हे वारीणि । हसादौ तु मुनिवत् रूपाणि ।
(२०२ ) अञ्चास्थिदधिसक्थ्यक्ष्णां टादौ ॥२ । १ । ११ ।
एपां नपुंसकानां नुमागमः स्यात् इकारस्य चाकारः टादौ स्वरे
परे । दधना, दध्ने, दनः २, दध्नोः २, दध्नाम्, दधिन, दधनि, शेष
वारिवत् । एवमस्थिसक्थ्यक्षिप्रभृतयः । ग्रामणि ।
(२०३ ) भाषितपुंस्कन पुंवद्वा ।।२।१ । १२ ।
नाम्यन्तं भाषितपुंस्कं नपुंसक पुंवद्वा स्यात् । टादौ स्वरे परे ।
'ग्रामण्या, ग्रामणिना, ग्रामण्ये, ग्रामणिने । यवक्रिया, यवक्रिणा इत्यादि।
मधु, मधुनी, मधूनि, पुनस्तद्वत्, मधुना, मधुने, हे मघो, हे मधु, धात,
धातृणी, धात्रा, धातृणा, हे धातः, हे धातृ । एवं ज्ञातृकादयः ।
इति स्वरान्ता नपुंसकलिङ्गाः।
यन्निमित्तमुपादाय, पुंसि शब्दः प्रवर्तते ।
नपुंसके तदेव स्या-दुक्तपुंस्कं तदुच्यते ।।

४२. कालुकौमुदी-पूर्वार्ध अथ हसान्ताः पुल्लिँङ्गाः (२०४ ) अनडुहः ।। १।४ । ७६ । अनडु शब्दस्य आमागम: स्यात् थुटि परे । (२०५) सौ नुम् ।। १।४। ८० । अनडु शब्दस्य नुमागमः स्यात् सौ परे। (२०६ ) संयोगस्य ॥२।१ । ११६ । संयोगान्तस्य लोप: स्यात् पदान्ते स च परे स्यादिविधौ च पूर्व- स्मिन्नसिद्धः। अनड्वान्, अनड्वाही, अनड्वाहः, अनड्वाहम्, अनड्वाही, अनडुहः, अनडुहा। ( २०७ ) कस्तत्र सध्वंस्नं सनडुहां दः ।।२।१।६६ । एपा दोन्तादेशः स्यात् पदान्ते । अनडुद्भ्याम् , अनडुद्भिः अनडुत्सु । ( २०८) उभयोर्धावम् ।। १।४।८१ । चतुरनडुहोरमागम: स्यात् धौ परे । हे अनड्वन् । (२०६.) होढों झसपदान्तयोः ।। २११ । ११२ । हस्य डः स्यात् कसे प्रत्यये. पदान्ते. च । मधुलिट्, मधुलिड्, मधु- लिहौ, मधुलिहः, मधुलिड्भ्याम्, मधुलिट्सु । (२१०) भ्वाद देघः ॥२॥ १॥ ११३ । दकारादेर्धातोर्हस्य धः स्यात् झसे पदान्ते च । (२२१ ) आदिडवानां झभान्तस्यैकस्वरस्य ढभाः स्वोः प्रत्यययोश्च ॥२१:१। २०६। एकस्वरस्य झभान्तस्य वातुरूपाऽवयवस्यादिडवानां ढभाः स्युः

---
(२१२ ॥
स्यादि-प्रकरणम्
पदान्ते स्ध्वोश्च परयोः । गोधुक, गोधुग, गोदुही, गोदुहः, गोधुग्भ्याम् ।
कषसंयोगे क्षः । गोधुक्षु ।
एषां हस्य घो वा स्यात् झसे पदान्ते च । पक्ष ढत्त्वम् । ध्रुक, ध्रुम्,
ध्रुट्, ध्रु, ध्रुग्भ्याम्, ध्रुड्भ्याम्, ध्रुक्षु, ध्रुट्सु । एवं मुहणुष्णि हाम् ।
(२१३) सहेः साङः ।। २ । २ । ३८ ।
सारूपस्य सहेः सस्य षः स्यात् । तुराबाट, तुरापाड्, तुरासाही,
तुरासाहः, तुरांषाड्भ्यामित्यादि ।
(२१४) चतुर आम् ।। १।४।७८ ।
चतुर अामागमः स्यात् थुटि परे । चत्वारः, चतुरः, चतुभिः, चतुर्यः २ ।
(२१५) संख्यायाणः ॥ १।४ । ३८.।
रकारषकारनकारान्तसंख्यासम्बन्धिन आमो नुट् स्यात् । चतुर्णाम् ।
(२१६) न रः सुपि ॥२।१ । १०४ ।
रेफान्तस्य विसर्गों न स्यात् सुपि परे। चतुषु । राजा, राजानी,
राजानः, राजानम्, राजानी। उपधालोपे नस्य चुत्वे जन्मसंयोगे च
राज्ञः, राज्ञा, राजभ्याम्, राजभिः, राज्ञे, राज्ञः २, राज्ञोः २, राज्ञाम्,
राज्ञि, राजनि; राजसु।
(२१७) न धौ ।। २ । १ । १२२ ।
नाम्नो नस्य लोपो न स्यात् धौ परे । हे राजन् । यज्वा, यज्वानी।
अनोऽतोऽवमयुक्तादित्यनोऽतो लोपो न । यज्वनः, यज्वना । आत्मा,
आत्मानौ, गात्मनः, आत्मना। सुधर्मा, सुधारणा, सुधर्माणः इत्यादि।
श्वा, श्वानी, श्वानः, श्वानम्, श्वानी।
--

४४
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे.
(२१८) श्वन युवन्मघोनामीपत्याद्यथुटि व उः॥२।१।२६।
एपां सस्वरवकार उ: स्यात् ईपि थुड्वजिते स्यादिस्वरे च परे ।
शुनः, शुना, श्वभ्याम्, स्वभिः। एवं युवा, युवानी, यूनः, यूना, मघवा,
मघवानी, मघोनः, मघोना ।
( २१६ ) पथिन्मथिनृभुक्षामितोऽत् ।। १ । ४ । ७५ ।
एपामिकारस्य प्रकार: स्यात् थुटि परे ।
(२२०) थो नुट् ।। १ । ४ । ७६ ।
पध्यादीनां थस्य नुडागमः स्यात् थुटि परे ।
(२२१ ) आः सौ ।।१।४। ७७ :
पथ्यादीनामाकारोऽन्तादेश; स्यात् सौ परे । पन्थाः, पन्थानी,
पन्थानः, पन्थानम्, पन्थानौ।
(२२२ ) पथिन्मथिनूभुक्षां टेर्लोपः ।। २ । १ । २७ ।
एपां टेर्लोप: स्यात् ईपि थुड्वजिते स्यादिस्वरे च परे । पथः, पथा,
पथिम्यामित्यादि। एवं मन्थाः, ऋभुक्षा: !
(२२३ ) इन्हन्पूपन्नयम्णां सौ च ॥ ११४ । ६८ !
इनन्तस्य हनादीनां चोपधाया दीर्घः स्यात् शौ घिजिते सौ च परे
नान्यत्र । दण्डी, दण्डिनौ, दण्डिनः, हे दण्डिन् । एवं मुसलिन्, हलिन्,
यशस्विन् प्रभृतयः । वृत्रहा ।
(२२४ ) क्वेकस्वरवतः ।। २ । २।८४ ।
पूर्वपदस्थानिमित्तात्परस्य कवर्गवत एकस्वरवतश्चोत्तरंपदस्य
नामान्तस्य नुमागमस्यः स्यादेश्च नस्य णः स्यात् ।
वृत्रहणौ,
वृयणः ।

स्यादि-प्रकरणम् ४५ (२२५) हनो होनः ॥२।१।३८ । हन्तेह्न इति रूपस्य धनादेशः स्यात् । (२२६) हनो घेन ।।२।२ । १०४ । हन्धातोर्नस्य कारेणान्तरे णो न स्यात् । वृत्रघ्नः, वृत्रघ्ना, वृत्र- हभ्यामित्यादि । एवं पूषन्, अर्थ मन् इत्यादि । पञ्च, पञ्च, पञ्चभिः, • पञ्चभ्यः २, पञ्चानाम्, पञ्चसु । एवं सप्तन्, नवन्, दशन् प्रभृतयः । ( २२७ ) वाष्टन आः स्यादौ ॥१।४।६। अष्टन्शब्दस्य आकारोऽन्तादेशो वा स्यात् स्यादौ परे । (२२८) औशष्टः ।।१।४।५। अष्टाशब्दात्परयोर्जस्शसोः औशादेशः स्यात् । अष्टौ २, अष्टाभिः, अष्टाभ्यः २, अष्टानाम्, अष्टासुः । पक्षे अष्ट २ । शेषं पञ्चवत् । (२२६ ) मो नो वमोश्चः।।२। १ । १८ । धातोर्मस्य नः स्यात् वमयोः परयोः पदान्ते च स च परेऽसिद्धः । प्रशान् । असिद्धत्वानस्य लोपो न । प्रशामौ, प्रशान्भ्याम्, प्रशान्सु । (२३०) किमः कः॥२।११ ७६ । किम: कः स्यात् स्यादौ । कः, को, के । शेषं सर्ववत् । (२३१.) सावयं पुंसि ।।२।१।७३ । इदमोऽयम् स्यात् सौ परे पुंसि । अयम् । (२३२) दोमः स्यादौ ।।२।१।७५ । इदमो दस्य मः स्यात् स्यादौ । इमो, इमे, इमम्, इमो, इमान् । (२३३) अनष्टौ सोः ॥ २११। ७२ । अग्रहितस्येदमः अनादेशः स्यात् टोसोः परयो: । अनेन । अनक । अनन

४६
कालुकौमुदी-पूर्वा
इति किम्--इमकेन ।
( २३४ ) अनकः ॥ २ ॥ ११७१॥
अग्रहितस्येदमः प्रशादेशः स्यात् : हसादौ स्यादौ। आभ्याम् ।
अनक इति किम्-इमकाभ्याम् ।
(२३५) इदमदसोऽक्येव ।। १ । ४ । १० ।
एतयोरक्येव सति भिस ऐस् स्यात् नान्यथा। एभिः। अकि तु
इमकः । अस्म, अस्मात्, अस्य, अनयोः, एषाम्, अस्मिन्, एषु ।
(२३६) इदमः ॥२।१। ६६ ।
इदमः एनदादेशः स्यात् अन्वादेशे द्वितीयायां टायामोसि च परें।
कथितानुकथनमन्वादेशः । एनम्, एनौ, एनान्, एनेन, एनयो: २ । यथा
अनेनावश्यकमधीतमेनं व्याकरणमध्यापय । तत्त्वभुत्, तत्त्वमुद्, तत्त्व-
बुधौ, तत्त्वभुद्भ्याम्, तत्त्वभुत्सु। सम्राट्, सम्राजौ, सम्माजः, सम्राड्-
भ्याम्, सम्राट् ।
(२३७) वसुराटोः ॥ ३।२।८३ ।
विश्वस्य दीर्घः स्यात् वसुराटोः परयोः। विश्वाराट्, विश्वाराड्,
विश्वराजौ, विश्वाराड्भ्याम्, विश्वाराट्सु ।
(२३८) स्कोः संयोगाद्योर्लोपः ॥२॥ १ ॥ ११८ ।
संयोगाद्योः *सकारककारयोर्लोपः स्यात् झसे पदान्ते च । वृक्षवृट्,
वृक्षवृड्, वृक्षवृश्चौ, वृक्षवृड्भ्याम् इत्यादि ।
(२३६ ) तः सौ सः ॥२।१।७८ ।
* नकारजावनुस्वार-जमो . घाती. झसे परे।
सकारजः शकारश्चे-पट्टिवर्गस्तवर्गजः ॥ १ ॥

स्यादि-प्रकरणम् ४७ .... द्विपर्यन्तानां त्यदादीनां तस्य सः स्यात् सौ परे। स्यः, त्यौ, त्ये, सः, तो, ते, यः, यो, ये, एषः, एतौ, एते । ( २४०) एनत्त्यदादेरेतदो द्वितीयाटौस्वसमासान्ते ॥२।१। ६८ । त्यदादेरेतदो द्वितीयायां टायामोसि च परे एनदादेशः स्यात् अन्वा- देशे न तु समासान्ते । एनम्, एनौ, एनान्, एनेन, एनयोः, एनयोः । असमासान्ते इति किम्-अथो परमैतं पश्य ।। सुशी लौ एतौ, एनौ गुरुवो मानयन्ति । अग्निमत्, अग्निमद्, अग्निमथौ, अग्निमद्भ्याम्, अग्निमत्सु । प्रत्यञ्चतीति क्विपि कृते । ( २४१) अनिदितो हसस्योपधाया नोलोपः पिङति॥४।२। ३६ । हसान्तस्य अनिदितो धातोरुपधाया नस्य लोप: स्यात् विङति परे. (२४२) अचः॥ १।४।५६ । लुप्तनकारस्याऽञ्चतेर्नुमागम: स्यात् थुटि परे । (२४३) अञ्चुयुजिक ञ्चां नो ङः॥२॥ १। १०२ । एपां. नस्य ङः स्यात् पदान्ते । प्रत्यङ्, प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः, प्रत्य- ञ्चम्, प्रत्यञ्चौ। (२४४ ) अचेः पूर्वदीर्घश्चाऽबिक्यथुटि यस्वरे ॥ २ । १ ३२ । लुप्तनकारस्याऽञ्चतेरकारस्य लोप: स्यात् पूर्वस्य च दीर्घः जिक्य- थुड़वजिते. यकारे स्वरे च परे । प्रतीचः, प्रतीचा। (२४५).चजोः कगौ ॥ २ । १ । ११६ । चजोः कगौ स्तः झसे पदान्ते च । प्रत्यग्भ्याम्, प्रत्यक्ष । तिर्यङ्, १ तिर्यञ्चौ।

४८ कालुकीमुदी-पूर्वार्ध (२४६) तिर्यचस्तिरश्चः ॥२॥ १॥ ३४ । तिर्यचस्तिरश्चादेशः स्यात् जिवयथुड्वजिते यकारे स्वरे च परे । अकार उच्चारणार्थः । तिरश्चः, तिरश्चा, तिर्यग्भ्याम् । (२४७ ) अद्रयचो वा ।। २ । १ । ८५ । *पदव्यशब्दस्य दस्य मो वा स्यात् । (२४८) मादुवर्णोऽनु ॥ २॥ १ ॥ ८१ । अदसो मात्परस्य वर्णमात्रस्य उवर्ण आसन्नः स्यात् अनु कार्यान्तरस्य पश्चात् । हस्वस्य ह्रस्वः, दीर्घस्य दीर्घः इत्यर्थः । . अमुमुयङ्, अमुमुयञ्चौ, अमुमुईचा, अमुमुयग्भ्याम् । पक्षे-अदद्रयङ्, अदव्यञ्ची, अदद्रयग्भ्याम् इत्यादि । जलमुक्, जलमुचौ, जलमुग्भ्याम् । मरुत्, मरुद्भ्याम् । काष्ठचित्, काष्ठचित्सु । ऋदित् महच्छब्दः । (२४६.) उदितो नुम् ॥ १।४।५८ । उकारानुवन्धस्य ऋकारानुवन्धस्य च नमागम: स्यात् थुटि परे । (२५०)न्स्महतः ।। १।४। ६४ । न्सन्तस्य महत् शब्दस्य चोपधाया दीर्घः स्यात् धिवजिते थुटि परे महान्, महान्तौ, महान्तः, हे महन् । उदित् भवच्छब्दस्य । अमुमञ्चतीतिविग्रहे' अदस्-अञ्च्' इत्यवस्थायां 'सर्वादिविश्वग्दे- वानां टेरद्रयंञ्चती क्वावि' त्यादिना अदसष्टेरद्रयादेशे-अदद्रंयच् । • परतः केचिदिच्छन्ति, केचिदिच्छन्ति पूर्वतः । उभयोः केचिदिच्छन्ति, केचिदिच्छन्ति नोभयोः ।। अदमुयङ्, अदमुयञ्यौ, अदमुयग्भ्याम् । अमुद्रया, अमुद्रघञ्चौ, अमुद्रयग्भ्याम् इत्यादीन्यपि मतान्तरे ।

.. स्यादि-प्रकरणम् ४९ (२५१ ) अत्वसोरभ्वादेः सौ ॥ १।४।६७। भ्वादिजितस्य अत्वन्तस्य असन्तस्य चोपधाया दीर्घः स्यात् अधी सौ परे। भवान, भवन्तौ, हे भवन् । शत्रन्तस्य तु अत्वन्तत्वाभावान दीर्घः । भवन्, भवन्तौ, भवन्तः ।. धीमान्, धीमन्तो, हे वीमन् । (२५२) दिशूहशूस्पृशमश्दधृषष्णिहस्रजस्विजां गः।।२।१।१०० । एषां गोऽन्तादेशः स्यात् पदान्ते । तादृग्, तादृशौ, तादृशः, ताद- रभ्याम्; तादृक्षु । एवं यादृगादयः । विट, विड्, विशौ, विड्म्याम्, विट्सु । रत्नमुट्, रत्नमुड्, रत्नमुषौ, रत्नमुड्भ्याम् । षट्, षड्, षड्भिः, षड्भ्यः २, षण्णाम्, षट्सु । ( २५३) इसुस् सजुषाम् ।।२।१।१०७ । एषां रेफान्तादेशः स्यात् पदान्ते । रेफविधानं दीर्घार्थम् । (२५४.) पदान्ते ॥२। १ । ६५ । पातोरिकारोकारयोः दीर्घः स्यात् पदान्ते वर्तमानयोः रेफवकारयोः परयोः । सजूः, सजुषी, सजूभ्याम् । . (२५५) नुम् विसर्गशसान्तरेऽपि ॥२।२ । १५ । नुमादिना व्यवधानेऽपि क्विलात्परस्य कृतस्य सस्य ष: स्यात् । सजूःषु । णषमसिद्धमिति षत्वस्यासिद्धत्वात् इसुस् लक्षणो रः । पिपठी:, पिपठिपौ, पिपठीाम्, पिपठी:षु । दोषशब्दस्य पत्वस्यासिद्धत्वात, स्रोविसर्गः । दोः, दोषौ, दोषः । शंसादौ दोपन् वा । दोषः, दोष्णः, दोषा, दोष्णा, दोभ्याम्, दोषभ्याम्, दोःषु, दोष्पु, दोपसु । (२५६) पुंसोः पुमन्सः ।। १ । ४ । ५७ । पुस्शब्दस्य पुमन्स इत्यादेशः स्यात् थुटि परे। अकार उच्चार-

५०
कालुकौमुदी-पूर्वाधं
णार्थः । पुमान, पुमांसी, पुमांमः, हे पुमन्, पुमसो, पुंसद, पुंसा, पुभ्याम्,
पुसे, पुंसः, पुंसि, पुंसु । क्वसोरुदित्वानुम् । विद्वान्, विद्वांसी, विद्वांसा,
हे विद्वन्, विद्वांसम्, विद्वांसो।
(२५७.) कस उप मतौ च ॥ २॥ १ ॥ ३५
अवस उम् स्यात् मनौ जिक्ययुड्वजिते यकारे स्वरे च परे।
विदुपः, विदुषा, विद्वद्भ्याम्, विदुपे,विदुपः, विदुपोः, विदुपाम्, विदुपि,
विवसु । चन्द्रमाः, चन्द्रमती, चन्द्रमोभ्याम्, बन्द्रमसः, चन्द्रमसि,
चन्द्रम्:सु, हे.चन्द्रमः ।
(२५८) अदसो दः सैस्तु डौः ।।२।१ । ७६ ।
नदसो दस्य सौ परे स: स्यात् सेस्नु हौः । असौ । आरित्यत्वे कृते ।
( २५६) दोमोऽवर्णस्य ।।२।१॥ ८४ ।
अवन्तिस्य अदसो दस्य म: स्यात् । अमू ।
(२६०) एरीहुत्वे ।। २ । १।८३ ।
अदसो मात्पर एकारः इ: स्यात् बहुत्वे । अमी, अमुम, अमू,
मसून् । इनांदेशे प्राप्ते ।
(२६१) प्रागिनात् ॥२।१। ८२ ।
अदसो माइपरस्य वर्गमात्रस्य इनादेशात् प्रागैव उ: स्यात् । अमुना,
अमूभ्याम्, अमीभिः, अमुष्म, अमूभ्याम् अमीभ्यः, अमुष्मात्, अमुषय,
अमुयोः २, बमीपाम्, अमुष्मिन्, अमीषु ।
इति हसान्ताः पुल्लिङ्गाः ।

स्यादि प्रकरणम्- ५१ अथ हसान्ताः स्त्रीलिङ्गा (२६२) नहो धः॥२। १ । ११५ ।। नहीं हस्य ध: स्यात् झसे प्रत्यय पदान्ते च । उपनिद, उपानहीं, मानदयाम्, उपानत्सु। दिशदृशित्यादिना गत्वे-उठिणंग्, उष्णि- ग्भ्याम् । गी: गिरौ, गिरः, गीमि, गीर्षु । एवं पुर्धरादयः । चतस्र, चतसृणाम् । का, के, काः । सर्वावत् । (२६३) इयं स्त्रियांम् ।।१।७४ । इदम इयमित्यादेशः स्यात् स्त्रियाँ सौ परे। इयम्, इमे, इमाः इमाम्, इमे, झ्माः, अनया, आभ्याम्', आभिः, अस्य, अस्याः २, अनयों: २, आसाम्, अस्याम्, प्रासु। अन्वादेशे-एनाम्, एते, एनाः, एनयों, एनयोः २। समिद्, समित्, समिधी, समिद्भ्याम्, समित्सु । ककुंब्, ककुप, ककुभी, ककुभ्याम्, कंकुप्सु । स्रक, संजी, स्रग्भ्याम्, स्रक्षु। स्था, त्ये, त्याः। एवं तद्, यद्, एतद् । वाक्, वाची, वाग्भ्याम्, वाहूं। त्वक, त्वको । ऋक्, ऋचौ। अम्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । (२६४) अपः ॥ १।४।६५। अपशब्दस्योपघाया दीर्घः स्यात् धिवजिते थुटि परे। आपः, अंप (२६५.) भिदपाम् ।। २।१।१०। अपशब्दस्य भकारे परे दंकारादेशः स्यात् ।" अद्भिः, अद्भ्यः २, अपाम्, अप्सु । दिक्, दिशौ, दिशः, दिग्भ्याम्, दिक्षु । आशी., आशिषी, आशीभ्याम् । असो, अमू, अमः, अमूम्, अमू, अमः, अमुया, अमूभ्याम् अमूभिः, अमुष्य, अमुष्याः २, अमुयोः २; अभूषाम्, अमुष्याम्, अमप। इति हसान्ताः स्त्रीलिङ्गाः

५२
कालुकौमुदी-पूर्वा
•
अथ हसान्ता नपुंसकलिङ्गाः
वाः, वारी, वारि, वााम्, वार्षु । चत्वारि २, अहः, अह्नी,
अहनी, अहानि, पुनस्तद्वत्, अह्ना, अहोभ्याम् अह्न, बह्नः २, अह्नोः
२, अह्नाम्, अह्नि, अहनि, अहःसु, हे अहः । नाम, नाम्नी, नामनी,
नानानि ।
(२६६) नपुंसके वा ॥२॥ १ । १२३ ।
नपुंसके वर्तमानस्य नाम्नो नस्य लोपो वा स्यात् वौ परे । हे नाम,
हे नामन् । ब्रह्म, ब्रह्मणी, ब्रह्माणि । एवं वर्मन्, चर्मन्, कर्मन्,
धन्वनादयः । दण्डि, दण्डिनी, दण्डीनि, हे दण्डि, हे दण्डिन् । स्रग्वि,
तग्विणी, नग्वीणि । किम्, के, कानि । इदम्, इमे, इमानि ।
अन्वादेशे-एनत्, एने, एनानि । त्यद्, त्ये, त्यानि, तत्, ते, तानि ।
यत् ये, यानि । एतद्, एते, एतानि । जगत्, जगती, जगन्ति । महत्,
महती, महान्ति । तुदत् ।
(२६७ ) अवर्णादनः शतुर्वेपोः ॥ १।४। ६१ ।
नावजितादवरात्परस्य शतुर्नुम् वा स्यात् ईकारे ईपि च परे ।
तुदन्ती, तुदती, तुदन्ति । पचत् ।
(२६८) अव्यनः॥ १।४। ६२
अन् यन् इत्येताभ्यां परस्य शतुर्नुम् नित्यं स्यात् ईकारे ईपि च
परे । पचन्ती, पचन्ति ।
(२६६) भ्वादेरिदुतोदी?ऊर्हसे ।।२।१।६४।
घातोरिकारोकारयोः दीर्घः स्यात् रेफवकारयोर्हसपरयोः । दीव्यत्,
.

स्यादि-प्रकरणम्
५३
.
दीव्यन्ती, दीव्यन्ति । धनुः धनुषी, धनषि, धनुषा, धनुाम् ।
एवं चक्षुर्ह विरादयः ।. पयः, पयसी, पयांसि । यशः, यशसी, यशांसि ।
वचः, वचसी, वजांसि । अदः, अमू, अमूनि । नामिनः स्वरे नामीति
नुम्--अमुना।
इति स्यादिप्रकरणे हसान्ता नपुंसकलिङ्गाः
इति स्यादिप्रकरणम्

अथालिङ्गौ युष्मदस्मच्छब्दी
.
युष्मदस्मदोः सिना सह क्रमेण त्वम्, अहम् इत्यादेशौ स्तः तो .
(२७९ ) त्वमहं सिनाऽकः प्राक् च ।। २। १ । ४५
चाकः प्रागेव । त्वम्, अहम् । अकः प्रागिति किम्-त्वकम्, अहंकम् ।
(२७२.) मान्तयोयुवावौ द्वित्त्वे ।। २।१।४३ ।
द्वयर्थवाचिनो युष्मदस्मदोर्मकारपर्यन्तयोर्युव, भाव इत्यादेशी स्त:-
स्यादी। अदेतोरपदान्तेऽतः इत्यकारलोपः।
(२७२ ) युष्मदस्मदोर्लोपः स्यादौ ॥ २॥ १-१.१५ ।
अनयोरन्तस्य लोपः स्यात् स्यादौ ।
( २७३.) आमौः ॥२॥ १।४६ ।
युष्मदस्मदश्यां पर औ: आम् स्मात् । युवाम्, आवाम् । मान्तयो-
रिति किमक युवकाम्, भावकाम् । अव साको माभूत् ।
(२७४) यूर्य वयं जसा ।।२।११४६ ।
युष्मदस्मदोर्जसा सह यूयम्, वयम् इत्यादेशौं स्त: तो चाकः प्रागेव
यूयम्, वयम् । अक: प्रागिति किम्-यूयकम्; वयकम् ।

५५ -- युष्मदस्मत्प्रकरणम् (२७५) त्वमौ प्रत्ययोत्तरपदे चैकत्वे ॥२।१।४४ । मकारपर्यन्तयोयुष्मदस्मदोस्त्व,म इत्यादेशौ स्तः एकत्वे गम्ये स्यादौ प्रत्यये उत्तरपदे च । अन्त्यस्य दस्य लोपे प्राप्ते । (२७६ ) आ अम्हसयोः॥२१॥ ५४॥ बुष्मदस्मदोराकारादेशः स्यात् अमि हसादौ च स्यादौ परे । त्वाम्, माम्, युवाम्, आवाम् । (२७७.)शसो नश् ॥ २॥ १। ५० । युष्मदस्मद्भ्यां परस्य शसो नशादेशः स्यात् । अकार उच्चार- गार्थः। युष्मान्, अस्मान् । (२७८.) टाङयोसि यः॥२।१।५५ । युष्मदस्मदोर्यकारादेशः स्यात् टा, डि, प्रोस् इत्येतेषु परेषु । त्वया, मया, युवाभ्याम्, आवाभ्याम्, युष्माभिः, अस्माभिः । (२७६) तुभ्यं मह्य ङया ॥२।१।४७ । युष्मदस्मदोङया सह तुभ्यम्, मह्यम् इत्यादेशौ स्तः प्राक् वाकः । तुभ्यम, मह्यम् । अक: प्रागिति किम्-तुभ्यकमः, मह्यकम् । युवाभ्याम, आवाभ्याम् । (२८०) भ्यसोऽभ्यम् ॥ २॥ १। ५२ । युष्मदस्मद्भ्यां परस्य : भ्यसः अभ्यम् स्यात् । युष्मभ्यम् । अस्मभ्यम । (२८१) डसिभ्यसोरद् ॥२।१ । ५१ । युष्मदस्मद्भ्यां परस्य ङसेस्तत्सहचरितपञ्चम्या भ्यसश्च स्थाने अदादेशः स्यात् । त्वद्, मद्, युवाभ्याम, आवाभ्याम , युष्मद्, अस्मद् ।

५६
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
(२८२ ) तव मम ङसा.॥२।४।४८ ।
युष्मदस्मदोर्डसा सह तव, मम इत्यादेशौ स्तः प्राक् चाकः । तव,
मम । अक: प्रागिति किम -तवक, ममक, युवयोः आवयोः ।
(२८३.) आम आकम् ॥ २॥ १। ५३ ।
युष्मदस्मद्भ्यां परस्य आमः आकम् स्यात् । युष्माकम, अस्मा-
कम, त्वयि, मयि, युवयोः, आवयोः, युष्मासु, अस्मासु ।
(२८४ ) सविशेषणमेकाख्यातं वाक्यम् ॥ १।१ । ३० ।
विशेषणेन सहितमेकमेवाख्यातं वाक्यसंशं स्यात् ।
(२८५) पदादेकवाक्ये द्वितीयाचतुर्थीषष्ठीभिर्वस्नसौ बहुत्वे वा
॥२।१।५६।
एकवाक्य पदात्परयोंयुष्मदस्मदोद्वितीयाचतुर्थीषष्ठीसहितयोर्वस्-
नसादेशी वा स्तः बहुत्वे । धर्मो वः युष्मान् वा रक्षतु, धर्मो नः अस्मान्
वा रक्षतु, ज्ञानं वः युष्मभ्यं वा दीयते, ज्ञानं नः अस्मभ्यं वा दीयते,
शीलं वः युष्माकं वा स्वम्, शीलं नः अस्माकं वा स्वम् पदादिति किम्
---युष्मान् अस्मान् वा धर्मो रक्षतु । एकवाक्ये इति किम्-प्रोदनं
पचत-युष्माकं भविष्यति ।
(२८६) वाम् नौ द्वित्त्वे ॥२।१। ५७ ।
स्पष्टम् । धर्मो वां युवां वा रक्षतु, धर्मो नौ भावां वा रक्षतु,
ज्ञानं वां युवाभ्यां वा दीयते, ज्ञानं नी आवाभ्यां वा दीयते, शीलं वां
युवयोः वा स्वम्, शीलं नौ: आवयोः वा स्वम् ।
(२८७) ते मे उंडसा ॥२॥ १ ॥ ५८ ।
पदादेकवाक्ये डेङसासहितयोर्युष्मदस्मदोस्ते, मे इत्यादेशो वा

युप्मदस्मत्प्रकरणम् ५७ स्तः । ज्ञानं ते तुभ्यं वा दीयते, ज्ञानं मे मह्यं वा दीयते, शीलं ते तव वा स्वम्, शीलं मे मम वा स्वम् । (२८८) त्वामामा ।।२।१।५६ । पदादेकवाक्ये अमासहितयोर्युष्मदस्मदोस्त्वा, मा इत्यादेशौ. वा स्तः। धर्मस्त्वा त्वां वा रक्षतु, धर्मो मा मां वा रक्षतु । (२८६ ) नित्यमन्वादेशे ॥२॥१। ६६ । पदात्परयोर्युष्मदस्मदोर्वस्नसादयोऽन्वादेशे नित्यं स्युः। यूयं सुशीला अथो वो गुरवो मानयन्ति । वयं विनीता अत उपाध्याया नो मानयन्तिः। (२६०) न पादाद्योः ॥२।१। ६३ । पदात्परयोः पादस्यादिभूतयोर्युष्मदस्मदोर्वस्नसादयो न स्युः । वीरो विश्वेश्वरो देवो, युष्माकं भवतारकः । स एव नाथो भगवान्, अस्माकं पापनाशनः ॥ १ ॥ पादाद्योरिति किम्, पातु वो देशनाकाले, जैनेन्द्र वचनामृतम् । ( २६१) चवाहाऽहैवयोगे॥२॥ १ । ६४ । चादिभिर्योगे युष्मदस्मदोर्यदुक्तं तन्न स्यात्- आवयोर्युवयोश्चेशो; वेशो . हेशस्तथैव च । महेश आवयोरेव, वीरो मामेव 'रक्षतु ॥१॥ t- इति युष्मदस्मत्-प्रकरणम् अथ अव्यय-प्रकरणम् (२६२) निपातस्वरादयोऽव्ययम् ॥ १।१।४८॥ निपाताश्चादयः स्वरादयश्च शब्दा अव्ययसंज्ञका: स्युः स्वर अन्तर्, श्रत्, प्रातर्, पुनर्, सत्यम्, नक्तम्, अस्तम्, दिवा, दोषा, ह्यस्, श्वस्, शम्, भृशम्, सपदि, आशु, शीघ्रम्, झटिति, तूर्णम्, स्वस्ति, समया, अन्तरा, वहिस्, अघस्, अद्धा, ऋतम्, सत्यम्, मुघा, मृपा, वृथा, मिथ्या, मियों, मिथस्, अनिशम्, मुहुस्, अभीक्ष्णम्, उच्चस्, नीचस्, शनस्, अवश्यम्, पृथक्, धिक्, मनाक्, ईपत्, तूष्णीम्, प्रकामम्, मरम्, वरम्, परम्, भारात्, तिरस्, नमस्, भूयस्, प्रायस्, स्वयम्, अतीव, सुष्यु, दुष्ठु, ऋते, साक्षात्, विना, नाना, सहसा, युगपत्, आविस्, प्रादुस्, अकस्मात्, अस्ति; नास्ति, अस्तु इत्यादि । (२६३) क्त्वाकृन्मान्तम् ।। १।१ ४६। क्त्वाप्रत्ययः मान्ताश्च कृत्प्रत्यया अव्ययसंज्ञकाः स्युः । कृत्वा, प्रकृत्य, कर्तुम्; हर्तुम्, स्मारस्मारम् । तसादिप्रत्ययान्ताश्च अव्यय- संज्ञकाः स्युः । ततः, तत्र, इह, कुह, क्व, कदा; एतर्हि, अधुना, इदानीम्, यथा, कथम्, पञ्चधा, एकघा, पञ्चकृत्वः, द्विः, सकृत्, शुक्लीकरोति, अग्निसाकरोति, बहुशो ददाति, मुनि वत्, उच्चस्तराम् इत्यादि ।

अव्यय-प्रकरणम् ५९ - (२६४) अव्ययस्य ।।३।२।७। अव्ययसम्बन्धिविभक्तेलृक् स्यात् । उक्तं च- सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु, सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु, यन्न व्यति तदव्ययम् ॥ १॥ इत्यव्ययप्रकरणम् अथ स्त्री-प्रत्यय-प्रकरणम् (२६५) आवतः स्त्रियाम् ।। २ । ३ । १ । स्त्रियां वर्तमानादकारान्तान्नाम्नः आप् प्रत्ययः स्यात् । सीता, सर्वा, माला, शाला, गंगा। (२६६) अजादेः॥२।३।२। अजादिभ्यः स्त्रियामाप् स्यात् । वायकवावनार्थम् । अजा, एडका, अश्वा, कोकिला, चटका, मूषिका, वाला, वत्सा, मन्दा, ज्येष्ठा: कनिष्ठा, मध्यमा। (२६७) अत इदनित्काप्ययत्तङ्क्षिपकादीनाम् ॥ २।३। ६५ । यदादिवर्जितस्य नाम्नोऽकारस्य इकार: स्यात् अनित् कापि परे । कारिका, पाचिका, पाठिका, सर्विका, मुण्डिका। अत इति किम् - शोका, नौका। कापीति किम -कारकः । . निद्वर्जनं किम् - जीवका । यदादिवर्जनं किम्-यका, सका, क्षिपका, कन्यका, चटका इत्यादि। (२६८) ह्रस्वश्वाभाषितपुंस्कात् ।। २।३ । १०४ । अनापितपुंस्कशब्दात्परस्यापः इकारो इस्वश्च वा स्यात् अनित् .

स्त्री-प्रत्यय-प्रकरणम् . . कापि परे । गङ्गिका, गङ्गका, गङ्गाका, खट्विका, खट्वका, खट्वाका अभाषितपुंस्कादिति किम् -सविका। (२६६) नृतोऽस्वस्त्रादेः ॥२।३।७। नकारान्तात् ऋकारान्ताच्च स्वस्रादिवर्जितात् स्त्रियामीप् स्यात् । दण्डिनी, शुनी, की, ही । अस्वस्रादेरिति किम -स्वसा। स्वस्रादयो यथा- स्वसा तिस्रश्चतस्रश्च, ननान्दा दुहिता तथा । याता मातेति सप्तव, स्वस्रादय उदाहृता ॥ १॥ (३००) उदितोऽधातोः ॥२।३।८। धातुवजितादुकारानुबंधात् ऋकारानुबंधाच्च स्त्रियामीप् स्यात् । भवती, गोमती, विदुषी। पचन्ती, पठन्ती। (३०१ ) मनो डाब् वा ॥२ । ३।४। मन्नन्तात् स्त्रियां डाप् वा स्यात् । सीमा, सीमे, सीमाः । (३०२) अनो बहुव्रीहेः ॥२।३।५।। अन्नन्तात् बहुव्रीहेः स्त्रियां डाप् वा स्यात् । सुपर्वा, सुपर्वे, सुपर्वाः । पक्षे नान्तत्वादीपि प्राप्ते । (३०३) ताभ्यां नेप॥२।३।६। मन्नन्तादन्नन्ताच्च बहुव्रीहेः स्त्रियामीप् न स्यात् । सीमा, सीमानी, सीमानः । “सुपर्वा, सुपर्वाणो, सुपर्वाणः । (३०४) उपधालोपिनो वा ॥२।३। १४ । उपधालोपिनः अनन्ताद् बहुव्रीहेः स्त्रियामीप् वा स्यात् । पक्ष डाविकल्पोऽपि । बहुराज्ञी, बहुराज्यौ, बहुराज्यः । वहुराजा,

कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
बहुराजे, बहुराजाः। बहुराजा, वहुराजानौ, वहुराजानः ।
(३०५) अञ्चः ॥२।३।६।
अञ्चूत्तरपदात् स्त्रियामीप स्यात् । प्राची, प्रतीची।
(३०६) मुख्यात् षिट्टिदणज्नस्नभयेकणीकणकरपः ॥२॥३।२०।
षानुवन्धाट्टानुबन्धात् प्रणादिप्रत्ययान्ताच्च . मुख्यात् स्त्रियामीप्
स्यात् ।
(३०७ ) ईप्यतः॥८।४।७२ ।
अतो लोप: स्यात् ईपि परे। वराकी, कुरुचरी; औपगवी, वैदी ।
मुख्यादिति किम्-बहुवराका नगरी ।
(३०८) गौरादिभ्यः ।।२।३। २७ ।
गौरादिभ्यः स्त्रियामीप् स्यात् । गौरी, नदी, शवली, गवयी,
हयी, अनडुही, अनड्वाही ।
(३०६) मत्स्यस्य यः॥ ८।४।७३।
मत्स्यस्य यस्य लोपः स्यादीपि । गौरादित्वादाप् । मत्सी ।
(३१०) हसात्तद्धितस्य ।। ८१४।७४।
हसात्परस्य तद्धितयस्य लोपः स्यादीपि । मनुषी ।
(३११) वयस्यचरमेत्तः।।२।३।२५ ।
अचरमे वयसि वर्तमानादकारान्तात् स्त्रियामीप् स्यात् । कुमारी,
किशोरी, तरुणी । अचरमे इति किम्-वृद्धा, स्थविरा।
(३१२) शोणादेः॥ २॥३॥ ३४।
शोणादिभ्य ईप वा स्यात् स्त्रियाम् । शोणी, शोणा, चण्डी,

1. त्रिलोकी।
क्षुभ्नादीनां.नस्य णो न स्यात् । इति ।
स्त्री-प्रत्यय-प्रकरणम्
(३१३.) जातेरयोपधनित्यस्त्रीशूद्रात् ॥ २॥ ३ ॥ ३६ ।
*जातिवाचिनोऽकारान्तात् स्त्रियामीप् स्यात् न चत्तयो पधनित्य-
स्त्रीजातिवाची शूद्रशब्दो वा स्यात् । मृगी, हंसी, ब्राह्मणी, नाडायनी,
कठी। योपधादिवर्जनं किम्-क्षत्रिया; वैश्या, मक्षिका, यूकी, शूद्रा ।
अतः इति किम्-आखुः।
(३१४) द्विगोः समाहारात् ।। २ । ३। ४१ ।
समाहारद्विगोरदन्तात् स्त्रियामीप : स्यात् । पञ्चानामजानां
(३१५.) भर्तु योगादपालकान्तात् ।। २।३।५१ ॥
भर्तृ योगादकारान्तात् स्त्रियामीप् स्यात् न तु पालकान्तात् ।
गणकी, गोपी । पाल कान्तात्त गोपालिका।
(३१६) इन्द्रवरुणभवशवरुद्रमृडानामानुक् च ।। २।३ । ५५ ।
एभ्यः स्त्रियामीप् स्यात् भतृ योगेः प्रानुगागमश्चैषाम् । इन्द्राणी,
वरुणानी, भवानी, शर्वाणी, रुद्राणी, मृडानी । ...
(३१७) मातुलाचार्योपाध्यायाद् वा ॥ २ ॥ ३।५६ ।
एभ्यः स्त्रियामीप् स्यात् भर्तृ योगे आनुगागमश्च वा । मातुलानी,
मांतुली।
(३१८) क्षुभ्नादीनाम् ।।२।२। १०६ ।
आचार्टी, उपाध्यायानी, उपाध्यायी।
* आकृतिग्रहणा. जाति-लिङ्गानां च न :सर्वभाक् ।
सकृदाख्यातनिर्याह्या, गोत्रं च. चरणः सह ॥ १॥

Fr
६४
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
(३१६) आर्यक्षत्रियाद् वा ॥ २।३।६०।
प्राभ्यां स्त्रियामीप् वा स्यात् तद्योगे आनुगागमश्च । आर्याणी,
आर्या, क्षत्रियाणी; क्षत्रियाः ।
(३२०) असहनन्विद्यमानपूर्वपदात् स्वाङ्गादक्रोडादिभ्यः
।।२।३।४५।
सहना विद्यमानवजितपूर्वपदं यत् स्वाङ्ग* तदन्तात्: क्रोडादि-
वर्जितादकारान्तात् स्त्रियामीप् वा स्यात् । पीनस्तनी, पीनस्तना,
अतिकेशी, अतिकेशा। असहनभित्यादि किम्-सहकेशा, यकेशा,
विद्यमानकेशा । अक्रोडादिभ्य इति : किम् -कल्याणकोडा, सुभगा,
भव्यभाला, दीर्घवाला,
(३२१) नासिकोदरौष्ठजवादन्तकर्णशृङ्गाङ्गगात्रकण्ठात्
॥२॥३।४६।
असहादिपूर्वपदेभ्य , एभ्यः । स्वाङ्गेभ्यः : स्त्रियामीप. वा स्यात् ।
सुनासिकी, सुनासिका, कृशोदरी, कृशोदरा, विम्बोष्ठी, बिम्बोष्ठेत्यादि।
सहादिपूर्वात्तु सहनासिकेत्यादि । पूर्वेगव सिद्ध नियमार्थ तेन सुललाटा
इत्यादी वहुस्वरान। कल्याणगुल्फा इत्यादी संयोगोपघात ।
(३२२) पुच्छात् ।। २।३।४८ ।
असहादिपूर्वात् पुच्छशब्दात् स्त्रियामीप वा स्यात् । दीर्घपुच्छी,
दीर्घपुच्छा, सुपुच्छी, सुपुच्छा । .. सहादिपूर्वोत्त--सपुच्छा, अपुच्छा
इत्यादि ।
* अद्रव मूर्तिमत्स्वाङ्ग प्राणिस्यमविकारजम् ।
च्युतं च प्राणिनस्तत्त-निभं च प्रतिमादिपु ।। १ ।।

स्त्री-प्रत्यय-प्रकरणम्
६५.
(३२३) कबरमणिविषशरादेः ॥२ । ३।४६ ।
कबरादिपूर्वात् पुच्छात् स्त्रियामीप् स्यात् । कबरपुच्छी, मणिपुच्छी,
विषपुच्छी, शरपुच्छी।
(३२४) इतोऽत्तयर्थाद्वा ।। २ । ३ । ७५ ।
क्त्यर्थप्रत्ययान्तवजितादिकारान्तान्नाम्नः स्त्रियामीप् वा स्यात् ।
रात्री, रात्रिः, धूली, धूलि:; भूमी, भूमिः । अक्त्यर्थादिति किम्-कृतिः,
अजननि:
(३२५) नारी सखी ॥२ । ३ । ७४ ।
इत्येतो ईवन्तौं निपात्यते। नारी, सखी ।
(३२६) सपल्यादौ ॥२ । ३ । ७६ ।
सपत्न्यादिषु पतिशब्दात् स्त्रियामीप् स्यात् नोऽन्तादेशश्च । समानः
पतिर्यस्याः सपत्नी, एकपत्नी, वीरपत्नी ।
( ३२७) उतो गुणादखरुसंयोगोपधात् ।।२।३। ७८ ।
खरुशब्दवर्जितात् संयोगोपवर्जिताच्च उकारान्तात् गुणवाचिनः
स्त्रियामीप् वा स्यात् । पट्वी, पटुः, साध्वी, साधुः, लघ्वी, लघुः,
मृद्वी, मृदुः । गुणादिति - किम्-आखुःस्त्री। अखरुसंयोगोपधादिति
किम्-खरुरियं ब्राह्मणी, पाण्डुरियं भूमिः ।।
(३२८) यूनस्तिः ॥२। ३ । ८६ ।।
युवन् शब्दात् स्त्रियां तिःप्रत्ययः स्यात् । युवतिः ।
इति स्त्री-प्रत्यय-प्रकरणम्
* सत्त्वे निविशतेऽपति, पृथग् जातिषु दृश्यते ।
आधेयश्चाक्रियाजश्च, सोऽसत्त्वप्रकृतिर्गुणः ।। १॥
.
..

अथ कारक-प्रकरणम्
(३२६) क्रियानिमित्त कारकम् ।।२।४।१।
क्रियाया निमित्तं कर्नादि कारकसं स्यात् ।
(३३०.) स्वतन्त्रः कर्ता ।। २।४।२।
यः क्रियासिद्धौ प्राधान्येनं विवक्ष्यते स कारकः कर्तृ संज्ञः स्यात् ।
(३३१) नाम्नःप्रथमा ॥२।४।४४।
नाम्नः प्रथमा विभक्तिः स्यात् । जिनः, श्रीः, ज्ञानम्, द्रोणः,
खारी, माढकम्, एकः, द्वौ, बहवः ।
(३३२) आमन्त्रणे ॥ २।४।४५।
आमन्त्रणमभिमुखीकरणम् । आमन्त्रणेऽर्थे नाम्नः प्रथमा विभक्तिः
स्यात् । है जिन, है जिनौ, हे जिनाः ।
(३३३) कर्तुाप्यं कर्म ॥२।४।३।
का क्रियया यद् व्याप्तुमिप्यते, तद् व्याप्यं कारक कर्मसंज्ञं स्यात्।
(३३४) गौणात् ।। २।४।४६ ।
अधिकारसूत्रमेतत् । त्यादिभिरनवतो गौणः । अग्रे वक्ष्यमाणा
द्वितीयादयो विभक्तयो गीणानाम्न एव स्युरिति वेदितव्यम् ।

कारक-प्रकरणम् (३३५) कर्मणि द्वितीया ॥२।४।४७ । कर्मणि कारके गौणानाम्नो द्वितीया विभक्तिः स्यात् । .. कटं करोति, काष्ठं दहति, कूपं पश्यति । गौणादिति किम्-घट: क्रियते, कृष्णेन कंसो हतः। (३३६ ) क्रियाविशेषणात् ॥२।४।४८ । क्रियाविशेषणानाम्नो द्वितीया विभक्तिः स्यात् । मन्दं गच्छति, मृदु पचति । (३३७) स्मृत्यर्थदयेशां वा ॥२।४।४। एषां व्याप्यं कर्मसंज्ञ वा स्यात् । पक्षे शेषषष्ठी। मातुः स्मरति, मातरं स्मरति, सपिषो दयते, सपिर्दयते, लोकानामीष्टे, लोकानीष्टे । (३३८) अधेशीस्थासामाधारः ।।२।४ । १४ । अधेः परेषामेषामाधारः कर्मसंज्ञः स्यात् । नाममधिशेते, अधि- तिष्ठति, अध्यास्ते वा मुनिः। अधेरिति किम्-शयने शेते । (३३६) अन्वध्याभ्यो वसः।।२।४ । १५ । अन्वादिपूर्वकस्य वसतेराधारः कर्मसंज्ञः स्यात् । ग्राममनुवसति, अधिवसति, आवसति वा साधुः ।, (३४०) उपान्निवासे ॥२।४।१६ निवासेऽर्थे उपात्परस्य वसतेराधारः कर्मसंज्ञः स्यात् ।, ग्राममुप- वसति, निवासं करोतीत्यर्थः । निवासे इति किम्----वने उपवसति, उपवासं करोतीत्यर्थः । (३४१) दुहाद्यर्थानामविवक्षितम् ॥ २।४ । १६ । दुहादीनां तदर्थानाञ्च धातूनां योगें अविवक्षितं. कारक सम्बन्धो -

'६८
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
वा कर्मसंज्ञं स्यात् । : गां दोग्चि, त्रावयति, क्षारयति वा पय इत्यादि ।
दुहिः पचिचिरूधी च दण्डिः,
: पृच्छिम थिचिजिशास्मुषश्च ।
नीकृष्वहिह निति चाप्यमीषा-
मर्थे गताः स्युर्युगकर्मयुक्ताः ।। १ ।।
(३४२) गतिवोधाहारशब्दार्थाऽकर्मणाम् ।। २।४ । २१ ।
गत्याद्यर्थानामकर्मणाञ्च घातूनामजिन्नवस्थायां यः कर्ता स जो
सति कर्मसंज्ञः स्यात् । गच्छति मंत्री ग्रामम्, गमयति मंत्रं ग्रामम्,
बुध्यते शिष्यो धर्मम्, बोधयति शिष्यं धर्म म्, भुङ्क्ते शिशुरोदनम्,
जयति शिशुमोदनम्, जल्पति मंत्री मन्त्रम्, जल्पयति मैत्रं मन्त्रम्,
आस्ते मंत्रः, ग्रासयति मंत्रं चैत्रः । गत्यर्थादीनामिति किम्---पचति
प्रोदनं चैत्रः, पाचयति प्रोदनं चत्रेण मैत्रः ।
(३४३) न नीखाद्यदिह्वाशब्दायक्रन्दाम् ॥ २॥ ४ । २६ ।
एपामजिनः कर्ता औ कर्मसंज्ञो न स्यात् । नाययति भारं भृत्येन,
खादयति अन्नं मंत्रेण, आदयत्ति अपूपं पुत्रेण, ह्वाययति, शब्दाययति,
ऋन्दयति वा मैत्रं चैत्रेण ।
(३४४) निकषासमयाहाधिगन्तरान्तरेणातियेनतेनैः ।।
२।४।४६)
एभिर्युक्तानाम्नो द्वितीया स्यात् । निकषा ग्रामम्, समया पर्वतम्,
हा चैत्रन्, घिक मिथ्यादृष्टिम्, अन्तरा निषधं नीलवन्तं च मेरुः,
जिनदर्शनमन्तरेण किम्, अतिकुरुन् पाण्डुसेना; येन तेन वा पश्चिमां
गतः।

"
कारक-प्रकरणम्
६९
(३४५) सर्वोभयाभिपरिभिस्तसन्तैः ॥२।४।०।
एभिस्तसन्तर्मुक्तानाम्नो द्वितीया स्यात् । सर्वतः; उभयतः, अभितः,
परितो वा ग्राम पर्वताः।
(३४६) उपर्यधोऽधिभित्त्वेि ।। २।४। ५१ ।
एभिद्विरुक्तैर्युक्तानाम्नो द्वितीया स्यात् ।। उपर्युपरि नामम्,
अधोऽधो नामम्, अध्यधि ग्रामम् ।
(३४७) उपेन चोत्कृष्ट ॥२।४। ५५ ।
उत्कृष्टेऽर्थे वर्तमानादुपेन अनुना च युक्तानाम्नो द्वितीया स्यात् ।
उपसर्वशं शूराः, अन्वाचार्य साधवः, तस्माद्धीना इत्यर्थः ।
(३४८). कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे॥२।४।५६ ।
काले अध्वनि च वर्तमानानाम्नो द्वितीया स्यात् अत्यन्तसंयोगे
मासमधीते, क्रोशं. पर्वतः ।
(३४६ ) अपवर्गे तृतीया ॥२।४।५७ ।
अपवर्गः फलप्राप्तिः । कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे तृतीया स्यात्
अपवर्मे। मासेनावश्यकमधीतम्, क्रोशेन शाकुन्तलमधीतम् । ' अपवर्ग
इति किम्-मासमधीतो नायातः ।
(३५०) कर्तृ साधनहेत्वित्थंभूतलक्षणेषुः ।। २।४।५८ ।
एष्वर्थेषु वर्तमानानाम्नस्तृतीया स्यात् । चत्रेण कृतम्,
लुनाति, दानेन कीर्तिः । केनचिद् विशेषेण भूत:--प्राप्तः इत्थंभूतः ।
कमण्डलुना छात्रमद्राक्षीत् ।
(३५१) सहाथै ॥२।४।५६ ।
सहार्थे गम्य नाम्नस्तृतीया स्यात् । शिष्येण सह, साकम्, समम्,
, दात्रेण

७०.
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
.
सार्धम् वा गतो गुरुः।
(३५२) येनाङ्गिविकारः ।।२।४। ६०।
येन विकृतेनाङ्गेनाङ्गिनो विकारो लक्ष्यते ततस्तृतीया स्यात् ।
अक्षणा काणः,
पादेन खञ्जः ।
(३५३ ) निषेधार्थकृताद्यः॥२।४।६१ ।
निषेधार्थः कृतादिभिर्युक्तानाम्नस्तृतीया स्यात् । कृतं तेन, अलं
श्रमेण, कि गतेन ।
(३५४) प्रकृत्याद्य आख्यायाम् ।।२।४।२६ ।
प्रकृत्यादयः शब्दाः साधनसंज्ञकाः स्युः आख्यायां गम्यमानायाम्
साधनत्वात् तृतीया । प्रकृत्या चारुः, प्रायेण धार्मिकः, नाम्ना चैत्रः,
जात्या क्षत्रियः, वर्णेन गौरः।
(३५५) कर्मक्रियाभिप्रेयो दानपात्रम् ।। २।४ । ३२ ।
कर्मणा क्रियया वा यभिप्रेयते स कारकः दानपात्रसंज्ञः स्यात् ।
(३५६ ) दानपाने चतुर्थी ।। २।४। ६३ ।
दानपात्रसंज्ञकान्नाम्नश्चतुर्थी स्यात् । साधुभ्यो भिक्षां ददाति.
गुरवे कार्य निवेदयति । दानपात्रे इति किम्-रजकस्य वस्त्रं ददाति
(३५७) रुच्यर्थानां प्रीयमाणः ।। २।४।३३ ।
रुच्यर्थवातूंना योगे प्रीयमाणो योऽर्थस्तत्कारकं दानपात्रसंज्ञं स्यात् ।
मैत्राय रोचते मोदकः, चैत्राय स्वदते दधि ।
(३५८.) श्लाघन, स्थाशपां ज्ञीप्स्यमानः।।२।४। ३४।
ज्ञीप्स्यमानो ज्ञापयितुमिष्यमाणः । श्लाघादीनां धातूनां . योगे
ज्ञोप्स्यमानो योऽर्थस्तत्कारकं दानपात्रसंज्ञ स्यात् । गुरवे श्लाघते,

कारक-प्रकरणम् हते, तिष्ठते, शपते वा। गुरुं ज्ञापयतीत्यर्थः। (३५६) दुहेासूयार्थानां यं प्रतिकोपः॥२।४ । ३७ । क्रुधाद्यर्थानां धातूनां : योगे यं प्रति कोपस्तत्कारकं दानपात्रसंज्ञं स्यात् । मैत्राय क्रुध्यति, द्रुह्यति, ईमंति, असूयति वा चैत्रः । (३६०) तादथें ।।२।४।६४। तादर्से सम्बन्धविशेषद्योत्ये. चतुर्थी स्यात् । घटाय मृत्तिका, कुण्डलाय हिरण्यम्, यूपाय दारु । (३६१.) समर्थार्थनमःस्वस्तिस्वाहास्वधावषड्भिः ॥२।४। ६७ । एभिर्युक्तानाम्नश्चतुर्थी स्यात् । समर्थोऽलं शक्तः: क्षमः प्रभु मल्लो मल्लाय।। नमो जिनेन्द्राय, स्वस्ति पूज्याय, स्वाहा अग्नये, स्वधा पितृभ्यः, वपड् इन्द्रायः। उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्वली-- यसीति नमस्करोति जिनान् । (३६२.) गतेरप्राप्ते वा ।। २।४। ७० । गतेरप्राप्ते कर्मणि चतुर्थी वा स्यात् । गतिः पादविहरणम् । ग्राम ग्रांमाय वा गच्छति, नगरं नगराय वा व्रजति । गतेरिति किम्-आदित्यं पश्यति । अप्राप्तः इति किम्-ग्रामं गतः । (३६३.) हितसुखाभ्याम् ॥ २।४। ७२ । आभ्यां. योगे चतुर्थी वा स्यात् । पक्षे शेषषष्ठी । नामाय ग्रामस्यः वा हितं सुखं वा। (३६४) अपायेऽवधिरपादानम् ॥ २॥ ४।४२। अपायो विश्लेषस्तत्र योऽवधिविवक्षित: तत्कारकमपादानसंज्ञ. स्यात् ।

७२ कालकौमुदी-पूर्वार्ध (३६५) पञ्चम्यपादाने ।। २।४।७५ । अपादाने वर्तमानानाम्नः पंचमी स्यात् । ग्रामादायाति, धावतोऽ- श्वात्पतति, चोरेभ्यो विभेति, यवेभ्यो गां निषेधयति, कूपादन्धं वारयति, अधर्माद् जुगुप्सते, धर्मात् प्रमाद्यति, उपाध्यायादन्तर्धत्ते, अध्ययनात् पराजयते । (३६६) प्रभृत्यन्यार्थारादिशब्दैः ॥२।४। ८१ । एभिर्युक्तानाम्नः पंचमी: स्यात् । कार्तिक्या: प्रभृति, आरभ्य ग्रीष्मात्, अन्यो मंत्रात, भिन्नश्चैत्रात् । आराद् दूरसमोपयो:-आरात् ग्रामात्, पूर्वो ग्रीष्माद् वसन्तः, पश्चिमो रामात् युधिष्ठिरः । (३६७ ) पर्यपाभ्यां वर्जने ॥ २।४। ७६ । ग्राभ्यां युक्तात् वर्जनेऽर्थे वर्तमानानाम्नः पंचमी स्यात् । परि त्रिगर्तेभ्यः अपत्रिगर्तेभ्यो वा वृष्टो मेघः, त्रिगत मुक्त्वा इत्यर्थः । (३६८) आङावधौं ॥ २१४ । ७७ । *आङा युक्तादवधौ वर्तमानानाम्नः पंचमी स्यात् । आबालेभ्यो जिनभक्तिः। (३६६) आख्यातर्युपयोगे ॥२।४।७८ । माख्याता. वक्ता । नियमपूर्वकविद्याध्ययनमुपयोगः । आख्यात- वाचिनो नाम्नः पञ्चमी स्यात् उपयोगविषये 1 उपाध्यायादधीते शिष्यः। उपयोगे इति किम्-नटस्य गाथां शृणोति । ईपदर्थे क्रियायोगे; मर्यादाभिविधौ च यः । एतमातं तिं विद्या- क्यिस्मरणयोरङित् ।।१।।

कारक-प्रकरणम् ७३ ( ३७० ) दूरान्तिकार्थवहिभिः ।।२।४। ८४ । एभियोगे नाम्नः पञ्चमी स्यात् । पक्षे षष्ठी । दूरम्, विप्रकृष्टम्, अन्तिकम्, सन्निकृष्टम्, बहिर्वा ग्रामात् ग्रामस्य वा । (३७१) शेषे ॥२।४।८७ । कर्मादिभ्योऽन्यः स्वस्वामिभावादिसम्बन्धः शेषः । तत्र वर्तमाना- नाम्नः षष्ठी स्यात् । राज्ञः पुरुषः, गुरूणां वचनं पथ्यम् । ( ३७२ ) कर्तृकर्मणोः कृति ॥ २।४ । ८६ । कृत्प्रत्यययोगे कर्तरि कर्मणि च षष्ठी स्यात् । चैत्रस्य भोजनम्, मैत्रस्य पठनम्, विश्वस्य ज्ञाता, तीर्थस्य कर्ता, यवानां लावकः, भोजकः। (३७३ ) उभयप्राप्तौ कर्तरि वा ॥२।४।६० । उभयोः कर्तृ कर्मणोः प्राप्तियस्मिन् कृति तत्र कर्तरि षष्ठी वा स्यात् । शब्दानामनुशासनमाचार्येणाचार्यस्य वा। (३७४ ) तृन्नुदन्ताव्ययकस्वानशतृक्तवतुकिखलानाम् ॥ २।४।६५॥ तन्नादिप्रत्ययसम्बन्धिनोः कर्तृकर्मणोः प्राप्ता षष्ठी न स्यात् । वदिता जनापवादान्, जिनं दिदृक्षुः, शत्रून जिष्णुः, कटं कृत्वा, भोक्तुम्, तपः तेपिवान्, शास्त्र विद्वान्, घटं चक्राणः, पटं कुर्वन्, कटं कृतवान्, कटं चक्रिः, सुकरो घटस्त्वया। कारकषष्ठयाः प्रतिषेधोऽयम् । सम्बन्धे तु षष्ठी स्यादेव । शत्रोजिष्णुः, चैत्रस्य कुर्वन् किङ्कर इत्यर्थः । (३७५.) अकमेरुकस्य ॥२।४।६६ कमिवर्जितस्य उकप्रत्ययान्तस्य योगे. कर्मणि षष्ठी न स्यात् । कृत्वा, ओदनं

७४
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
...
18
भोगानभिलाषुकः। अकमेरिति किम्-दास्याः कामुकः ।
(३७६ ) द्विषः शतुर्वा ।।२।४।६8 ।
शतृप्रत्ययान्तस्य द्विष्धातोः कर्मणि षष्ठी वा स्यात् । चौरस्य
चौरं वा द्विपन् ।
(३७७ ) क्तस्य वर्तमानाधारयोः ।। २।४।१००।
वर्तमान आधारे चैव विहितस्य क्तस्य कर्तृकर्मणोः पष्ठी स्यात्
नान्यत्र । : राज्ञां मतः, इदमेषां शयितम् । वर्तमानाधारयोरिति किम्
--कुलालेन घटः कृतः।
(३७८) भावे वा॥२।४।१०१ ।
भावे विहितस्य क्तस्य कर्तरि षष्ठी वा स्यात् । छात्रस्य छात्रेण
वा हसितम् ।
(३७६ ) कृत्यानां कर्तरि वा ।।२।४।६३ ।
कृत्यप्रत्ययानां प्रयोगे कर्तरि पष्ठी वा स्यात् । पक्षे तृतीया ।
कर्तव्यः, करणीयः; कृत्यः, कार्यो वा उद्यमो भवतः भवता वा।
(३८०) आधारे सप्तमी ।।२।४। १०२ ।
आधारे वर्तमानान्नाम्नः सप्तमी स्यात् । स च षोढा- औपश्लेषिकः,
सामीप्यकः, अतिव्यापकः, वैषयिकः, नैमित्तिकः, औपचारिकश्च ।
कटे शेते, वटे गावः, तिलेषु तैलम्, दिवि देवाः, युद्ध सन्नह्यते, अङ्ग ल्यग्ने
करिशतम् ।
(३८१) यस्य भावेन भावलक्षणम् ।।४।२।१०६ ।
भावः क्रिया। यस्य क्रियया अन्या क्रिया लक्ष्यते ततः सप्तमी
वर्षति देवे चंत्रो गतः, गोप दुह्यमानासु पागतः ।
स्यात् ।

कारक-प्रकरणम्
७५.
.
(३८२) षष्ठयनादरे ॥ २।४ । १११ ।
अनादरयुक्ते . भावलक्षणे वर्तमानान्नाम्नः षष्ठी वा स्यात् ।
पक्षे पूर्वेण सप्तमी रुदति रुदतो वा प्रावाजीत् ।
(३८३) निमित्तात्कर्मसंयुक्तात् ॥ २।४ । १०८ ।
कर्मसंयुक्तानिमित्तान्नाम्नः . सप्तमी स्यात् ।
चर्मणि द्वीपिनं हन्ति, दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम् ।
केशेषु चमरी हन्ति, सीम्नि पुष्कलको हतः ।। १ ।।
कर्म संयुक्तादिति 'किम्-वेतनेन धान्यं लुनाति ।
(३८४) साध्वसाधुभ्याम् ॥२।४। १०५ ।
आभ्यां युक्तान्नाम्नः सप्तमी स्यात् । साधुमैत्रो मातरि, असाधु-
मौतुले।
(३८५) निर्धारणेऽविभागे सप्तमी च ॥२।४। ११२
निर्धारणे वर्तमानानाम्नः षष्ठीसप्तम्यौ स्तः अविभागे गम्यमाने ।
नृ णां नषु वा क्षत्रियः शूरः, गवां गोषु वा कृष्णा बहुक्षीरा, गच्छतां
गच्छत्सु वा धावन्तः शीघ्रतमाः । अविभागे इति किम्-माथुरा:
पाटलिपुत्रकेभ्य आढयतराः ।
(३८६) स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैर्वा
॥२।४।११३॥
एभियुक्तानाम्नः सप्तमी वा स्यात् । पक्षे शेपषष्ठी। गवां
गोषु वा स्वामी, ईश्वरः, अधिपतिः, दायादः, साक्षी,प्रतिभूः, प्रसूतो वा ।
(३८७) तुल्यार्थस्तृतीयाषष्टयौ ।। २।४।१२२ ।
जिनेन जिनस्य वा तुल्यः, समः, सदृशो वा कालुरामाचार्यः

७
.
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
( ३८८) ऋते द्वितीयापञ्चम्यौ ।।२।४। १२४ ।
ऋते वर्जनार्थकमव्ययम् । तद्योगे नाम्नो द्वितीयापञ्चम्यौ स्तः ।
ऋते धर्म धर्माद् वा कुतः सुखम् ।
(३८६ ) विना तृतीया च ।। २।४। १२५ ।
विना शब्देन युक्तानाम्नस्तृतीया द्वितीयापञ्चम्यौ च स्याताम् ।
विना पापेन पापं पापाद् वा सर्व फलति ।
(३६०) दूरान्तिकार्थादसत्त्वात्सप्तमी ताश्च ।।२।४ । १२६ ।
दूरान्तिकार्थादसत्त्ववाचिनः सप्तमी . द्वितीयातृतीयापञ्चम्यश्च
स्यः। दूरे, दूरम् , दूरेण, दूरात वा ग्रामात् ग्रामस्य वा वसति । एवं
विप्रष्टात्, अन्तिकात्, सन्निकृष्टादपि ।
(३६१ ) हेत्वर्थस्तृतीयाद्याः ।। २।४ । १२७ ।
हेतुनिमित्तम् ।' तदर्थैः शब्दर्युक्तात् तैरेव समानाधिकरणात् 'नाम्न-
स्तृतीयाद्या विभक्तयः स्युः। धनेन हेतुना, धनाय हेतवे, धनाद्धेतोः,
धनस्य हेतोः, धने हेतौ वा वसति । एवं निमित्तकारणप्रयोजनादयः
प्रयोक्तव्याः।
(३६२) सर्वादेश्च सर्वाः॥२४ । १२८ ।
हेत्वथैर्युक्तात् तैरेव समानाधिकरणात् सर्वादेनम्निः सर्वा विभक्तय:
स्युः। को हेतुः, कं हेतुम्, केन हेतुना, कस्मै हेतवे, कस्माद्धेतोः, कस्य
हेतोः, कस्मिन् हेतो वा वसति । एवं निमित्तादीनां योगेऽपि ।
कर्ता कर्म तथा चोक्तं, सावनं तु तृतीयकम् ।
दानपात्रमपादान-माधारकारकाणि पट् ॥ १॥

अथ समास-प्रकरणम् समासेषु अव्ययीभावः (.३६३) नाम नाम्नैकाक्षं समासो बहुलम् ।। ३ । १ । १६ । नाम नाम्ना सहकार्ये सति *बहुलं समस्यते । स च समाससंज्ञकः स्यात् । स चतुर्धाः अव्ययीभावतत्पुरुषवहुव्रीहिद्वन्द्वभेदात् । द्विगुकर्म- धारयो तत्पुरुषभेदावेव । (३६४) अव्ययं कारकसमीपसमृद्धयसंप्रत्यर्थाभावाऽत्ययाऽसंपत्ति- ख्यातिपश्चाद्योग्यतावीप्सापदार्थानतिवृत्तिसादृश्यसदृशयौगपद्या- नुपूर्व्यसंपत्तिसाकल्यान्तेपु पूर्वार्थे ।। ३। १ । २३ । कारकाद्यर्थेषु यदव्ययं तन्नाम्ना सह ऐकायें सति पूर्वपदार्थे समस्यते सोऽव्ययीभावसमासः स्यात् । स्त्री+सुप्+अघि इत्यलौकिके विग्रहवाक्ये सप्तम्यर्थद्योतकर्माध अव्ययं स्त्रीनाम्ना सह समस्तम् । (३६५) समासप्रत्यययोः ।। ३।२।६। * क्वचित् प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्तिः, क्वचिद् विभापा क्वचिदन्यदेव । विविधान बहुधा समीक्ष्य, चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति ।। १ ।।

७८
कालुकौमुदी-पूर्वा
.
समासे सति प्रत्यये च परे विभक्तेलक स्यात् । इति विभक्ते कि
सति स्त्री अधि इति स्थिते ।
(३६६ ) प्रथमोक्तं प्राक् ॥३।१ । १५६ ।
अत्र समासमाने सूत्रे प्रथमान्तपदेन यदुक्तं तत्प्राक् प्रयोक्तव्यम्
अव्ययीभावजिन्नन्ते, कृत्यक्तानखलन्तकम् ।
त्वाद्यन्तंत्वमभिव्याप्य, भावे द्वन्द्वकता तथा ।। १ ॥
इति लिङ्गानुशासनात् नपुंसकत्वम् । नपुंसके इति ह्रस्वे-अधिस्त्रि!
(३६७) अनतो लुक् ॥ ३।२।५।
अव्ययीभावात् । स्यादेर्लुक् स्यात् न त्वदन्तात् । इति सर्वत्र
समानरूपाणि। एवं कुमार्यामिति-अधिकुमारि ।
समीपे-कुम्भस्य समीपमिति विग्रहे।
(३६८) अव्ययीभावस्यातोऽमपञ्चम्याः॥ ३ । २ । २
अदन्ताव्ययीभावात् स्यादेरमादेशः स्यात्. - पञ्चमी त्यक्त्वा ।
उपकुम्भं तिष्ठति, पश्यति देहि वा सर्वत्राऽम् । अपञ्चम्या इति
किम्-उपकुम्भात् ।
(३६६) वा तृतीयासप्तम्योः ॥३।२।३।
अदन्ताव्ययो भावात् तृतीयासप्तम्योरमादेशो वा स्यात् । उपकुम्भम्
उपकुम्भेन वा कृतम् । उपकुम्भम्, उपकुम्भे वा स्थितम् ।' एवं
मद्राणां समृद्धिः सुमद्रम्, निद्रा सम्प्रति न युज्यते इत्यंतिनिद्रम्, मक्षिका-
जामभावो. निर्मक्षिकम् । अत्ययो विनाशः । हिमस्य अत्ययः
अतिहिमम्, यवनानामसंपत्तिर्यवनम्, भिक्षोः ख्यातिरितिभिक्षु, जिनस्य
पश्चात् अनुजिनम्, रूपस्य योग्यम् अनुरूपं चेष्टते । वहूनां सजातीयानां
..
।

समास-प्रकरणम् ७९ क्रियादिना साकल्येन व्याप्तुमिच्छा वीप्सा। अर्थमथं प्रति प्रत्यर्थम् । शक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति । (४००) अकालेऽव्ययीभावे ॥ ३।२। १२७ । अव्ययीभावे सहस्य सादेशः स्यात् अकालवाचिन्युत्तरपदे । शीलस्य सादृश्यं सशीलमनयोः, व्रतेन सदृशमिति सव्रतम्, चक्रेण सह गदां घेहीति सचक्रम, ज्येष्ठस्यानुक्रमेण इति अनुज्येष्ठम्, क्षत्राणां संपत्तिरिति सक्षत्रम्, सतृणमभ्यवहरति, न किञ्चित्त्यजतीत्यर्थः, सपिण्डषणमधीते, पिण्डेषणापर्यन्तमधीते इत्यर्थः । (४०१) यथाऽसादृश्ये ।।३।१ । २४ । असादृश्येऽर्थे यथा इत्यव्ययं समस्यते सोऽव्ययीभावसमासः स्यात् । यथावृद्धमर्चय, ये ये वृद्धास्तानित्यर्थः। असादृश्ये इति किम्-यथा ऋषभस्तथा वीरः। (४०२) शरदादेरव्ययीभावात् ॥ ८।३। २७ । शरदाद्यन्तादव्ययीभावाट्टः समासान्तः स्यात् । ' उपशरदम्, उप- त्यदम् । अव्ययीभावस्य नपुंसकलिङ्गत्वाट्टान्तस्य स्त्रियां वृत्तिर्न । (४०३) जरायां जरश्च ॥८।३।२६। जराशब्दान्तादव्ययीभावाट्टः स्यात् जराया जरसादेशंश्च । उपजर- सम्, प्रतिजरसम् । . राज्ञः समीपमित्यत्र तु- (४०४) अनः ॥ ८।३।३१ । अन्नन्तादव्ययीभावाट्टः स्यात् । (४०५.) वृत्त्यन्तः ।।१।१।२६ । वृत्तिः पदसमुदायसमासादिरूपा । तस्या अन्तः पदसंज्ञो न स्यात् ।

८० स्यात् । कालुकौमुदी-पूर्वार्ध अन्तर्वतिन्या. विभक्तेः स्थानिवद्भावेन उभयत्र पदत्वे प्राप्ते अन्त्यस्य निषेधार्थ वचनम् । (४०६.) नोऽपदस्य तद्धिते ॥८१४। ६२ । अपदस्य नान्तस्य टेर्लोप: स्यात् तद्धिते। उपराजम्, उपतक्षम्, प्रत्यात्मम् । इत्यव्ययीभावः अथ तत्पुरुषः (४०७) श्रितादिभिः ।। ३ । १ । ४५. द्वितीयान्तं नाम धितादिभिः सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः जिनं श्रित:-जिनश्रितः । एवं संसारातीतः, नरकपतितः, ग्रामगतः, नरकगामीत्यादिः। पक्षे वाक्यमेव । (४०८) ऊनार्थपूर्वादिभिः॥३।१।५० । तृतीयान्तं नाम अनाथैः पूर्वादिभिश्च सह वा समस्यते स तत्पुरुष- समासः स्यात् । मासेनोनम्-मासोनम, मासविकलम्, मासपूर्वः, वाग्निपुणः, धान्यार्थः इत्यादि। (४०६ ) कर्तृसाधने कृता ।। ३१.१॥ ५२ । कतरि सावने च यत्तृतीयान्तं नाम तत् कृदन्तेन सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् । आत्मना कृतम्-आत्मकृतम्, अहिदष्टः, नखभिन्नः, परशुच्छिन्नः। (४१०) तुम्क्त्वाक्तवतुभिः॥३॥१॥ ५५ ॥ तृतीयान्तं नाम एभिः सह न समस्यते । पूर्वापवादः । परशुना छेत्तुम्, परशुना छित्त्वा, दात्रेण लूनवान्

८१
.
समास-प्रकरणम्
(४११ ) चतुर्थी प्रकृत्या ।।३।१ । ५६ ।
चतुर्थ्यन्तं नाम प्रकृतिवाचिना सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः
स्यात् । प्रकृतिर्मूलकारणम् । “घटाय मृत्तिका-घटमृत्तिका। एवं
कुण्डलहिरण्यम्, यू पदारु ।
(४१२) हितादिभिः ॥३। १ । ५७ ।
चतुर्यन्तं नाम हितादिभिः सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः
स्यात् । साधुभ्यो हितम्-साधुहितम्, श्राद्धसुखम् भूतवलिरित्यादि ।
(४१३) पञ्चमी भयादिभिः ।।३।१।६०।
पञ्चम्यन्तं नाम भयादिभिः सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः
स्यात् । व्याघ्राद् · भयम्-व्याघ्रभयम्, वृकभीतिः, ग्रामनिर्गतः,
चक्रमुक्तः।
(४१४ ) षष्ठययत्नाच्छेषे ।।३।१। ६३ ।
शेषे या षष्ठी तदन्तं नाम नाम्ना सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः
न चेत् स शेषो यत्नाद् विहितः स्यात् । राज्ञः पुरुषः-
राजपुरुषः, गवां क्षीरम्-गोक्षीरम् ।
अयत्नादिति किम्-मातु:
स्मारकः । शेषे इति किम्-रुदतः प्रवजितः, नराणां क्षत्रियः शूरः ।
(४१५) कृति ॥३।१। ६४।
कृत्प्रत्ययनिमित्ता या षष्ठी तदन्तं नाम नाम्ना सह वा समस्यते
स तत्पुरुषसमासः स्यात् । सिद्धसेनस्य कृति:-सिद्धसेनकृतिः,
गणधरोक्तिः, पलाशशातनः ।
(४१६) पूरणशतृशानाव्ययतृप्ताथैः ॥३।१।७४ ।
एभिः सह षष्ठयन्तं नाम न समस्यते । तीर्थङ्कराणां षोडशः शान्तिः;
स्यात् ।

८२
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
नाम
चैत्रस्य पठन्, मैत्रस्य पचमानः, चैत्रस्य कृत्वा, फलानां तृप्तः, सुहितो
वा। सर्वत्र सम्बन्चे पष्ठी ।
(४१७) सप्तमी शौण्डादिभिः ॥ ३ । १ । ७७ ।
सप्तम्यन्तं शौण्डादिभिः सह वा समस्यते स तत्पुरुपसमासः
स्यात् । प्रक्षेषु शौण्ड:-अक्षशौण्डः, शिरःशेखरः, हस्तकटक इत्यादि ।
(४१८) काकादिभिः क्षेपे ॥३।११ ७८ ।
तीर्थे काक इव तीर्थकाकः । एवं तीर्थवायसः, तीर्थश्वा । उपमया
चात्र क्षेपो गम्यते । क्षेप इति किम्-तीर्थे काकस्तिष्ठति ।
(४१६ ) सिंहादिभिः पूजायाम् ।। ३। १ । ७६ ।
समरे सिंह इव-समरसिंहः, रणव्याघ्रः, कलिगौतमः ।
(४२०) नञ्तत्पुरुषः॥३। १ ३४ ।
नमिति नाम्ना सह समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् ।
(४२१) नात् ।। ३।२।१७।
नन प्रकारादेशः स्यात् उत्तरपदे । - न ब्राह्मण:-अब्राह्मण:
असााधः, अहिंसा, असत्यम् ।
(४२२.) अन् स्वरे ॥३।२।१०१ ।
नजित्यस्य अनादेशः स्यात् स्वरादावुत्तरपदे । न अश्व:-अनश्वः
अनजः अनन्तः।
(४२३) नखादयः ॥३।२.१००।
नखादयः शब्दा अकृतनाकाराद्यादेशा- निपात्यन्ते । नास्य खं
विद्यते इति नखः, न गच्छतीति नगः । एवं नकुलः, नपुंसकः नक्षत्रम्
नक्रः, नाकः, नग्नः इत्यादि ।

• . समास-प्रकरणम् ८३ (४२४) सप्तम्युक्त कृता ।। ३ । १ । १८ । कृत्प्रत्ययविधायके सूत्रे सप्तम्यन्तेन यदुक्तं तत्सप्तम्युक्तम् । सप्तम्युक्तं नाम कृदन्तेन सह नित्यं समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् । कुम्भं करोतीति कुम्भकारः, शरलावः । (४२५) ऊर्याद्यनुकरणोपसर्गच्चिडाचो गतिर्धातोः प्राक् च ॥३।१।१। ऊर्यादयः शब्दा गतिसंज्ञकाः स्युः धातोश्च प्रागेवं प्रयुज्यन्ते । (४२६) गतिः॥३।१। ८७ । गतिसंज्ञक नाम नाम्ना सह नित्यं समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् । विहारः, प्रहारः, व्याघ्रः । (४२७) कुः पापाल्पयोनित्यम् ।।३।१।८६ । पापे अल्पे चार्थे कुरिति नित्यं समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् । कुत्सितो ब्राह्मण:-कुब्राह्मणः । (४२८) कोः कत्तत्पुरुषे ॥३।२। १०२ । स्वरादावुत्तरपदे परे कुशब्दस्य कदादेशः स्यात्तत्पुरुषे । कुत्सित- मन्नम्-कदन्नम्, कदश्वः । (४२६) अल्पे ॥३। २ । १०६ अल्पेऽर्थे कुशब्दस्य कादेशः स्यादुत्तरपदे परे। . ईषन् मधुरम् - कामधुरम् । (४३०) पुरुषे वा ॥ ३।२।१०७ । कुत्सितः पुरुषः-कापुरुषः, कुपुरुषः । (४३१ ) कवोश्चोष्णे ॥३।२।१०८ । - ८४ कालुकौमुदी-पूर्षि कुशब्दस्य कव, का इत्यादेशौ वा स्तः उधणे परे। पक्षे यथा- प्राप्तम् । ईपदुष्णम् कवोष्णम्, कोष्णम्, कदुष्णम् । (४३२) प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया ।।३।१।१२। प्रादयः शब्दा गताद्यर्थे प्रथमान्तेन सह समस्यन्ते स तत्पुरुषसमासः स्यात् । प्रगत: आचार्य:-प्राचार्यः, संगतोऽर्थः-समर्थः, विद्धः पक्षः विपक्षः, प्रत्यर्थी पक्ष:-प्रतिपक्ष: इत्यादि । (४३३ ) असादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया ।। ३।२।१३। अतिक्रान्त: खटवामिति विग्रहे । (४३४) अन्यार्थे स्त्रीप्रत्ययगोरन्त्यस्याऽकियोऽनंशिसमासेयोबहु- ब्रीहौ ।।२।३ । ११५॥ अन्यार्थे वर्तमानस्य अन्त्यस्य स्त्रीप्रत्ययस्य गोशब्दस्य च ह्रस्वादेशः स्यात् । न तु क्विवन्तस्य न. चेदंशिसमासान्त ईयस्वन्तबहुव्रीह्यन्तो वा स्यात् । अतिखट्वः । एवमतिमालः, अतिगङ्गः, प्रतिगतोऽक्षम्-प्रत्यक्षः इत्यादि। (४३५) अवादयः क्रुष्टाद्यर्थ तृतीयया ॥ ३॥ १॥ १४॥ अवक्रुष्टम् .. कोकिलया-अवकोकिलम्, अनुगतमर्थन--अन्वर्थम्, संगतमक्षेण-समक्षम्, वियुक्तमर्थेन व्यर्थम् इत्यादि। (४३६.) पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्यां ।। ३.। १।१५। परिग्लानोऽध्ययनाय-पर्यध्ययनः, अलंकुमार्य अलंकुमारिः इत्यादि। (४३७) निरादयों गताद्यर्थे पञ्चम्या ।। ३।१।१६। निर्गतः कौशाम्व्या:-निष्कौशाम्बिः, अपगतः शाखाया:-अपशाखः, उत्क्रान्तं कुलात-उत्कुलम् । एवमुच्छृङ्खलादयः । .

समास-प्रकरणम् ८५ (४३८) पूर्वापराधरोत्तरमभिन्नेनांशिना ।।३।१ । ३५ । पूर्वादयः शब्दा अभिन्ननाशिना सह वा समस्यन्ते तत्पुरुषश्च समासः स्यात् । पूर्वः कायस्य-पूर्वकायः । एवमपरकायः, अधरकायः, उत्तर- कायः । . अभिन्नेनेति किम्-पूर्वश्छात्राणाम् । (४३६ ) अधं समेंऽशे वा॥३ । १।३७ । समांशवाच्यर्धशब्दो वा समस्यते समासश्च प्राग्वत् । अधं पिप्पल्याः -अर्धपिप्पली । पक्षे पिप्पल्यमिति षष्ठीसमासोऽपि । समेंऽशे इति किम्-ग्रामाधः। (४४०) सायाहादयः॥३१॥ ३६ । एते , कृततत्पुरुषसमासा' निपात्यन्ते । ; सायमह्नः, सायाह्नः, मध्याह्नः, मध्यरात्र.इत्यादि। (४४१) विशेषणं विशेष्येण तुल्यार्थे कर्मधारयश्च ॥३॥ १ ॥१०॥ विशेषणवाचि नाम विशेष्यवाचिनाम्ना सह तुल्यार्थे वा समस्यते स कर्मधारयः तत्पुरुषश्च समासः स्यात् । नीलं च तद् उत्पलं च नीलो- त्पलम् । एवं रक्तकम्बलः । (४४२.) पुंवत् कर्मधारये॥३॥ २॥ ६१ । भाषितपुंस्कानूङः स्त्रियाः पुंवत् स्यात् कर्मधारये । एका शाटी, एकशाटी, रक्तलता, ब्राह्मणभार्या, चन्द्रमुखभार्या । (४४३.) अच्चेस्तुल्यार्थजातीययोः॥३।२ । ७१ । ... अच्व्यन्तस्य महच्छब्दस्य डा इत्यादेशः: स्यात् तुल्यार्थे जातीयतत्यये, च परे । महावीर, महापुरुषः, महादेवः । अच्वेरितिः किम्- अमहान्महान्भूतो महद्भूतश्चन्द्रमाः । महादेवः । म कालुकौमुदी-पूर्वा (४४४) शाकपार्थिवादीनां मध्यमपदलोपश्च ॥३।१ । ११० एपा मध्यमपदस्य लोपः स्यात् कर्मधारयश्च समासः । शाकप्रियः पार्थिवः-शाकपार्थिवः, देवानां पूजको ब्राह्मणः-देवब्राह्मणः । (४४५) कुत्सितानि कुत्सनैरपापाद्यः॥३।११ १०२ । कुत्सितवाचि नाम पापादिवजितैः कुत्सनवाचिभिः सह तुल्यार्थे वा समस्यते कर्मधारयश्च समासः स्यात् । मुनिश्चासौ धूर्तश्च-मुनिधूर्तः, क्षत्रियभीरुः, वैयाकरणखसूचिः । अपापाद्यैरिति किम्-पापवैयाकरणः, दुष्टामात्यः, क्षुद्रतापसः । (४४६) उपमानानि सामान्यैः।। ।१।१०३। उपमानोपमेययोः साधारणो धर्मः सामान्यम् । उपमानवाचि नाम सामान्यवाचिभिर्नामभिः सह वा समस्यते समासश्च पूर्ववत् । घन इव श्यामः-धनश्यामः, मृगचपला। सामान्य रितिः किम्-अग्निरिव माणवकः। (४४७ ) उपमेयानि व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे ॥३।१।१०४। पुरुषो व्याघ्र इव-पुरुषव्याघ्रः, पुरुषसिंहः, पुरुपवृषभः । सामा- न्याप्रयोगे इति किम्-पुरुषो व्याघ्र इव शूरः । (४४८) अधिकं च तद्धितोत्तरपदसमाहारेषु ॥३।१ । १२३ । तद्धितविषये.. उत्तरपदे च परतः समाहारे च वाच्ये अधिकशब्दो दिक्संख्ये च तुल्यार्थे वा समस्यन्ते समासश्च प्राग्वत्' । . अधिकया षष्ट्या क्रीतः अधिकपाष्टिकः। पूर्वस्यां शालायां भवः पौर्वशालः । (४४६) संख्यापूर्वो द्विगुश्च ॥ ३ । १ । १२४ । पूर्वसूत्रोक्तः संख्यापूर्वः समासः द्विगुसंज्ञकोऽपि स्यात् । पञ्चसु समास-प्रकरणम् ८७ ." । . कपालेषु संस्कृतः पञ्चकपाल:* । अधिकं धनं प्रियं यस्य सः अधिक- धनप्रियः । एवं पूर्वराष्ट्रप्रियः । पञ्चग्रामधनः । अनेकस्य कथंचिदेकत्वं समाहारः । समाहारे दिगधिको न संभवतः । पञ्चानां पात्राणां समा- हारः पञ्चपात्रम् । (४५०) सखेष्टः ।।८।३।६। सखिशब्दान्तात्तत्पुरुषाट्टः स्यात् । (४५१) इवर्णावर्णस्य ॥ ८।४।७१ । इवर्णस्य अवर्णस्य चाऽपदसंज्ञकस्य लोपः स्यात् तद्धिते परे । राज- सखः, महासखः, पञ्चसखः । (४५२) राज्ञोऽस्त्रियाम् ॥ ८।३।७। राजनशब्दान्तात् तत्पुरुषात् टः स्यात् न तु स्त्रियाम् । देवराजः, महाराजः । अस्त्रियामिति किम्-महाराज्ञी.। (४५३ ) किं क्षेपे ॥३।१ । ११४। किम् शब्दस्तुल्यार्थे नाम्ना सह समस्यते क्षेपे तत्पुरुषकर्मधारयश्च समासः स्यात् । को राजा इति विग्रहे-समासान्ते टे प्राप्ते । (४५४) न किमः क्षेपे ॥ ८।३।२। क्षेपे वर्तमानात् किम्शब्दात परः समासान्तो न स्यात् । किं राजा यो न. रक्षति । एवं किं. सखा योऽभिद्रुह्यति.।, क्षेपे इति किम- केषां राजा किंराजः, किसखः । (४५५) नमस्तत्पुरुषात् ॥ ८।३।५। * 'संस्कृते भक्ष्ये' इत्यण, तस्य . द्विगोरनपत्ये यस्वरादेलुलुंगद्विरिति लुक च।

८८.
कालुकौमुदी-पूर्षेि
नत्र पूर्वात् तत्पुरुषात् समासान्तो न स्यात् । न राजा-अराजा,
असखा।
(४५६ ) अहः ॥ ८।३।८।
अहन् शब्दान्तात् तत्पुरुषात् टः स्यात् । परमाहः, उत्तमाहः ।
(४५७ ) साशसंख्याव्ययात् ॥ ८।३।१०।
एभ्यः परो यः अहन् शब्दस्तदन्तात् तत्पुरुषात् ट: स्यात् तस्य च
अह्लादेशः ।
(४५८) अतोऽहस्य ॥२।२। ७७ ।
अदन्तात् पूर्वपदस्थात् निमित्तात्परस्य अह्रस्य नस्य णः स्यात् ।
सर्वाः, पूर्वाह्नः।
(४५६) साशसंख्यातपुण्यवर्षादीर्घाच्च रात्रः ॥ ८॥३॥ ५५ ।
एभ्यः संख्याव्ययेभ्यश्च परो यो रात्रिशब्दस्तदन्तात् तत्पुरुषात् अः
सर्वरात्रः, पूर्वरात्रः, अपररात्रः, संख्यातरात्रः, पुण्यरात्रः,
वर्षीरात्रः, दीर्घरात्रः, द्विरात्रः, अति रात्रः ।
इति तत्पुरुषः
अथ बहुव्रीहिः
(४६०) तुल्यार्थं चानेकं च ॥३। १ । १२८ ।
एकमनेकं च तुल्यार्थं नाम अव्ययं च नाम्ना सह द्वितीयाद्यन्यार्थे
समस्यते स च बहुव्रीहिसमासः स्यात् । आरूढो वानरोः यमिति
विग्रहे।
(४६१) शेषे ।।३।१ । १६८ ।
प्रहरणादन्यत्र शेषः। शेषे बहुव्रीहिसमासे. क्तप्रत्ययान्तं नाम
स्यात् ।

समास:प्रकरणम ८९ प्राग्निपतति । : आरूढवानरो वृक्षः, ऊढो रथो येन स ऊढरथोऽनड्वान्, उपहृतो बलियंस्मः स उपहृत बलिम्रक्षः, भीताः शत्रवो यस्मात् स भीत- शत्रुनृपः ।। चित्रा गावो यस्येति विग्रहे । (४६२) विशेषणम् ॥ ३। १ । १६१ । बहुव्रीहिसमासे विशेषणं प्राग निपतति । (४६३ ) पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङः स्त्रियास्तुल्यार्थे स्त्रियाम् ॥३।२।४८। भाषितपुंस्कात्परस्य ऊवर्जितस्त्रीप्रत्ययस्य पुंवत् स्यात् तुल्यार्थे स्त्रीलिङ्गे परे । 'अन्यार्थे स्त्रीप्रत्यय' इत्यादिना गोशब्दस्य हस्वे, सन्ध्यक्षराणां हस्वादेशे स्थानसाम्यादिदुतौ। चित्रगुः । एवं दर्शनीयभार्यः, पटुभार्यः, शोभनभार्यः, वीराः पुरुषाः सन्ति यस्मिन् स वीरपुरुषो ग्रामः । अनेक च-आरूढा बहवो वानरा यं स.आरूढबहुवानर इत्यादि । अव्ययम्- उच्चर्मुखमस्य स उच्चर्मुखः। एवं नीचर्मुखः । (४६४) हंसगमनादयः॥३।१ । १२६ । हंसगमनादयः . शब्दा. बहुव्रीहिसमासान्ता निपात्यन्ते। हंसस्य गमनमिव गमनं यस्याः सा हंसगमना। एवं चन्द्रवदना, उष्ट्रमुखः, वृषस्कन्धः इत्यादि। (४६५) तेन सहः ।।३।१ । १३० । सहेति नाम तृतीयान्तेन सह वा समस्यते अन्यार्थे स च बहुव्रीहि स्यात् । (४६६) सहस्य सो वा बहुव्रीहौ ।। ३।२ । १२४ । -

.९०
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
उत्तरपदे परे बहुव्रीही तहस्य सादेशो वा स्यात् । - सह पुत्रेणेति
सहपुत्रः सपुत्रो वा, सघनः, सहधनः, समदः सहमदः ।
(४६७) सर्वादिश्च बहुव्रीहौ ।। ३ । १ । १६० ।
बहुव्रीहिसमासे : सर्वादिः संख्या च प्राग्निपतति । सर्वशुक्लः,
विश्वमित्रः, चतुर्हस्वः, पञ्चदीर्घः ।
(४६८) सप्तम्यन्तम् ।। ३ । १ । १६३ ।
बहुव्रीहिसमासे सप्तम्यन्तं प्राग्निपतति । हंसगमनादित्वात् समासः
कण्ठेकालः, उदरेमणिः, उरसिलोमा । अत्र सप्तम्या अलुक!
(४६६) नेन्द्वादिभ्यः ।।३।१। १६५ ।
बहुव्रीहिसमासे इन्द्रादिभ्यः सप्तम्यन्तं प्राग् न निपतति । - इन्दुः
माली यस्य स इन्दुमौलि:, शशिशेखरः, पद्महस्तः ।
(४७०) ग्रहरणेभ्यः ॥३।१ । १६६।
प्रहरणवाचिभ्य: सप्तम्यन्तं प्राग् न. :निपतति । , दण्डपाणिः,
चक्रपाणिः, वज्रपाणिः, धनुर्हस्तः ।
(४७१ ) स्वाङ्गादीपो जातेश्चामानिनि ॥३।२। ६० ।
स्वाङ्गात् परस्येपः जातेश्च स्त्रियाः प्राप्तः पुंवन्न स्यात् अमानिन्यु-
त्तरपदे । चन्द्रमुखीभार्यः, दीर्घकेशीभार्यः, ब्राह्मणी भार्यः, शूद्राभायः ।
अमानिनीति किम्-दीर्घकेशमानिनी ।
(४७२) द्विपदाद्धर्मादन् ।।८।३।७४ ।
धर्मशब्दान्तात् द्विपदाद्. बहुव्रीहेरन् स्यात् । सुधर्मा, कल्याणवर्मा ।
द्विपदादिति किम्-परमत्वधर्मः ।
(४७३.) उपसर्गात् ।।८।३.१ ८५।।

समास-प्रकरणम् ।
९१
उपसर्गात्परस्य नासिकाया बहुव्रीही नस इत्यादेशः स्यात् । प्रगता
नासिका अस्येति अनेन नसादेशे।
(४७४) नसस्य ॥२॥२ । ७५ ।
पूर्वपदस्थान्निमित्तात्परस्य नसस्य नस्य णः स्यात् । प्रणसंमुखम्,
निर्णसं मुखम् ।
..
(४७५) जायाया जानिः ॥ ८।३। ८८ ।
जायाशब्दस्य बडुब्रोही जानिरादेशः स्यात् । युवजानिः ।
(४७६ ) सुहृदुह दौ मित्रामित्रयोः ।। ८ । ३ । १०४ ।
सुहृन्मित्रम्, दुर्ह दमित्र: ।। . अन्यत्र सुहृदयो मुनिः ।
(४७७.) स्त्रियामिनः ।। ८।३ । १०८ ।
इन्नन्ताद् बहुव्रीहेः कप स्यात् स्त्रियाम् ।. बहुदण्डिका सेना,
बहुस्वामिका पुरी।
(४७८.) न्नित्यदितः ॥ ८।३ । १०६ ।
ऋकारान्तान्नित्यं दिदादेशो यस्मात्तदन्ताच्च बहुव्रीहे: कप् स्यात् ।
बहुकर्तृकः। बह्वयः कुमार्यो यस्य इत्यत्र तु-
(४७६ ) ईबादीदूतां के ।। २ । ३ । १०६ ।
एषां ह्रस्वः स्यात् कप्रत्यये परे । इतीपो ह्रस्वे प्राप्ते ।
(४८०) न कपि ॥२।३ । ११० ।
पूर्वेण प्राप्तो ह्रस्वो न स्यात्. कपि. परे। बहुकुमारीकः ।
इति बहुव्रीहिः
अथ द्वन्द्वः
(४८१) चार्थे द्वन्द्वः सहोक्तौ ॥ ३। १ । १३३ ।

९२ कालुकौमुदी-पूर्वार्ध .. . । सहोक्तिविपये चार्थे वर्तमानं नाम नाम्ना सह वा समस्यते स च द्वन्द्वसमासः स्यात् । समुच्चयान्वाचयेतरेतरयोगसमाहाराश्चार्याः । तत्र परस्परनिरपेक्षस्याऽनेकस्य क्रियाकारकादेरेकस्मिन्नन्दयः समुच्चयः । चैत्रः पचति पठति च, चैत्रो मैत्रश्च पठति । समुच्चयेः एवान्यतरस्य गौणत्वेऽन्वाचयः। वटो ! भिक्षामट गां चानय । मिलितानामन्वय, इतरेतरयोगः। चैत्रश्च मैत्रश्च चैत्रमैत्री गच्छतः । संहतिः समाहारः । समाहारे एकवद्भावः। घवश्च खदिरश्च पलाशश्च घवखदिरपलाशं तिष्ठति । अत्राद्ययोः सहोक्त्यभावात् समासो न । (४८२) द्वन्द्व लवक्षरमेकम् ॥३१ । १६८ । द्वन्द्वे लध्वक्षरं नाम प्राग निपतति यत्र चानेकं तत्रैकमेव । तिल- मापौ, घटशवपटाः, पटशङ्खघटाः । (४८३) इदुदन्तमसखि ।। ३ । १ । १७० । पतिसुतौ, पटुगुप्तौ। असखीति किम्-सुतसखायौ । (४८४) स्वराद्यदन्तम् ॥३१ १ । १७३ ! अश्वखरौ, इन्द्रचन्द्रौ। (४८५) अल्पस्वरम् ।।३।१ । १७६। घवखदिरो, वागर्यो। (४८६) अर्चितम् ।।३।१।१७६ । देवदैत्यो, मातापितरौ। (४८७ ) मासर्तुभ्रातृनक्षत्राण्यानुपूय॑ण ।।३।१ । १८२ । इत्येतद्वाचिशब्दरूपमानुपुर्येण ण प्राग् निपतति द्वन्द्वे फाल्गुनचत्रौं, हेमन्तवसन्ती, बलदेववासुदेवो, कृत्तिकारोहिण्यो । - समास-प्रकरणम् ९३. । (४८८) वर्णाः ॥३। १ । १८७। . द्वन्द्वे वर्णवाचीन्यानु पूर्येण प्राग् निपतन्ति । ब्राह्मणक्षत्रियौ, विट्शूद्रो। . पूर्वोक्तानां पूर्वनिपातः क्वचिद्वाः। गुणवृद्धी, वृद्धिगुणौ, धर्मार्थो, अर्थधर्मों; समीरणाग्नी, अग्निसमीरणी, वसन्तग्रीष्मी, ग्रीष्म- वसन्ती, भीमसेनार्जुनौ, अर्जुन भीमसेनौ । क्वचिन्न-जायापती, जंपती, दंपती, भार्यापती, पुत्रपती, शूद्रार्यों, उलू खलमूसले, : नरनारायणौ, पाण्डुधृतराष्ट्री, पुष्यपुनर्वसू । (४८६) नित्यवैरिणाम् ॥ ३.। १ । १५२ । एषां. द्वन्द्व एकत्वं स्यात् ।। . 'अहिनकुलम्, अश्वमहिषम्, मार्जार- मूषकम् । (४६०) विरोधिनामद्रव्याणाम् ।। ३ । १ । १६० । अद्रव्यवृत्तीनां विरोधिवाचिनां द्वन्द्वमेकत्वं वा स्यात् । सुखदुःखम्, सुखदुःखे, लाभालाभम्, लाभालाभो। विरोधिनामिति किम्-काम- कोधौ। अद्रव्याणामिति किम्-शीतोष्णे जले । (४६१) आ द्वन्द्व ॥३।२।३६ । विद्यायोनिसम्बन्धिनामृकारान्तानां द्वन्द्वे उत्तरपदे परे आकारादेशः स्यात् । होतापोतारो, मातापितरौ । (४६२) पुत्रे ॥३।२।४०. मातापुत्री, पितापुत्री। इति द्वन्द्वः अथ अलुक-समासः (४६३.) आत्मनः पूरणे ॥३१२१ १४ ।.. ।

१४ कालुकौमुदी-पूर्वार्थे आत्मनः परस्य तृतीयाया लुग् न स्यात् पूरणप्रत्ययान्तै परे । 'अात्मनाचतुर्थः, प्रात्मनापष्ठः । पूर्वादित्वात् समासः । (४६४) परात्मभ्यां चतुर्थ्याः ।। ३ २ । १७ । माभ्यां परस्याश्चतुर्थ या लुग्. न स्यात् संज्ञायामुत्तरपदे परे । परस्मैपदम्, आत्मनेपदम् । · हितादित्वात्समासः । (४६५) मूर्खे देवानां प्रियः ।। ३.। २।३४ । अन्यत्र देवप्रियः। (४६६) अमूर्धमस्तकात्स्वाङ्गादकामे ॥ ३ ॥२॥२१ । मूर्धमस्तकवजिताददन्तात् हसान्ताच्च स्वाङ्गवाचिनः परस्याः सप्तम्या लुग् न स्यात् कामवजिते उत्तर पदे परे । कण्ठेकाल:, उदरे- मणिः, शिरतिशिखः । अमूर्धमस्तकादिति किम्--मूर्धशिख:, . मस्तक- शिखः । अकाम इति किम्-मुखे कामोऽस्य मुखकामः । (४६७) तत्पुरुपे कृति ।। ३ । २ । २२ । अदन्तात् हसान्ताच्च परस्याः सप्तम्या लुग् न स्यात् कृदन्ते उत्तरपदे तत्पुरुषसमासे । स्तम्बरमः, कर्णजपः इत्यलुक्समासः अथ समासाश्रयविधिः (४६८)ईपः ।। ३ । २। ६५ । तरादिपु परेषु भाषितपुंस्कात्परस्येपो ह्रस्वः स्यात् तुल्यार्थे । गौरितरा, कुमारिकल्पाः। । * तरतमल्पकल्पचेलड्ब्रुवगोत्रमतहत इति तरादिः समास-प्रकरणम् ९५ . (४६६ ) घञ्युपसर्गस्य बहुलम् ।। ३ । २ । ८७ । घनन्ते उत्तरपदे उपसर्गस्य बहुलं दीर्घः स्यात् । नीमेदः, नीवारः, प्रावारः, प्रासादः, प्रोकारः। · क्वचिद्वा-परिणामः, . परीणामः । क्वचिन्न-प्रतापः, प्रभावः ।। (५००) एकादशषोडशषोडषोढाषड्ढाः ॥३।२।१४। एते कृतसमासा निपात्यन्ते। एकोत्तरा दश, एकं च दश च वा एकादश, षोडश | एवं षड् दन्ता अस्य षोडन्, षड्भिः प्रकारैः षोढा षड्ढा वा। (५०१ ) द्वित्यष्टानां द्वात्रयोऽष्टाः प्राक् शतादनशीति बहुव्रीही ॥३।२।६५। द्वयादीनां द्वादय आदेशाः स्यः प्राक् शतात् संख्यायामुत्तरपदे अशीति बहुव्रीहिसमासविषयं चोत्तरपदं वर्जयित्वा। द्वाभ्यामधिका दश, द्वौ च दश चेति वा द्वादश । .. एवं त्रयोदश, अष्टादश । प्राक् शतादिति किम् --द्विशतम् । अनशीति बहुत्रीहाविति किम्-द्वयशीतिः, द्वौ वा त्रयो वा द्वित्राः। (५०२) चत्वारिंशदादौ वा ॥ ३,२।६६। द्वाचत्वारिंशत्, द्विचत्वारिंशत्, त्रयश्चत्वारिंशत्,. त्रिचत्वारिंशत्, अष्टाचत्वारिंशत्, अष्टचत्वारिंशत् । (५०३) खित्यनव्ययस्वरान्तारुषां मुम् ह्रस्वश्च ॥३।२ । १३६ । अव्ययजितस्वरान्तस्य अरुषश्च मुमागमः स्यात् यथाप्राप्तहस्वश्च खिदन्ते परे। कालिमन्या, हरिणिमन्या; : मेघंकरः, : प्रियंवदः, अरंतुदः ।

९६...
कालुकौमुदी-पूर्षि
(५०४) कृत्येऽवश्यमो लोपः ।। ३ । २ । १४७ ।
कृत्यप्रत्ययान्ते परे अवश्यमो लोपः स्यात् । अवश्य कार्य स्तुत्यं
देयं कर्तव्यं करणीयं वा । · कृत्ये इति किम्- वश्यंलावकः ।
(५०५) समो हितततयोर्वा ।। ३।२ । १४८ ।
सहितम्, संहितम्, सततम्, सन्ततम् ।
(५०६) काममनसोस्तुमश्च ॥३।२।१४६ ।
कर्तुकामः, हर्तुमनाः, सकामः, समनाः ।
(५०७ ) अन्यस्य दुगीयकारके ॥ ३।२। १५५ ।
ईयप्रत्यये कारकशब्दे च परे अन्यस्य दुगांगमः स्यात् । अन्यस्य
कारक:-अन्यत्कारक:।
(५०८) अर्थे वा ॥ ३।२। १५७ ।
अन्यदर्थः, अन्यार्थः।
(५०६) गृहक्षेषु ॥ ३ । २ । १३३ ।
दृगादिपु परेषु समानस्य सः स्यात् । सदृक्, सदृशः, सदृक्षः ।
(५१०) अन्यत्यदादेराः ।। ३।२। १३४ ।
अन्यस्य त्यदादेश्च आकारादेशः स्यात् दृगादिषुः परेषु । अन्यादृक्,
अन्यादृशः, अन्यादृक्षः । एवं तादृक्, यादृक्, त्वादृक्, मादृक्, भवादृक् ।
अदसोऽनेनात्वे मादुवर्णोऽनु इति दीर्घ ऊकारे च । अमूदृक् ।
(५११) किमिदमोः कीशीशौ ।। ३।२। १३५ ।
अनयो गादिषु परेषु कीशीशौ स्तः। कीदृक् कीदृशः, कीदृक्षः ।
ईदृक, ईदृशः, ईदृक्षः।
(५१२.) तस्करादयश्चोरादिषु ॥३। २ । १५६ ।

समास-प्रकरणम् ९७ । एते. चोरादिष्वर्थेषु निपात्यन्ते । तस्करश्चोरः, वृहस्पतिर्देवता । अन्यत्र तत्करः, वृहत्पतिः । (५१३.) पृषोदरादयः॥ ३।२।१५८ । पृषोदरादयः शब्दा निपातनात् सिध्यन्ति । · पृषदुदरे अस्य- पृषोदरः, जीवनस्य मूतः-जीमूतः, वारिणो वाहक:-बलाहकः, मह्यां रौतीति मयूरः, हिनस्तीति सिंहः, भ्रमन् रीतीति भ्रमरः । वर्णगिमो . वर्णविपर्ययश्च, द्वो चापरी वर्णविकारनाशौ । धातोस्तदर्थातिशयन योग- स्तदुच्यते पञ्चविधं निरुक्तम् ॥ १ ॥ वर्णागमाद्ः भवेद्धसः, सिंहो वर्णविपर्ययात् । गूढोत्मा वर्णविकृते-वर्णनाशात् पृषोदरः ॥ २ ॥ वर्णनाशविकाराभ्यां - धातोरतिशयेन यः । योगस्तदुच्यते । प्राज्ञ-मयूरभ्रमरादिषु ॥ ३॥ इति समासेषु समासाश्रयविधिः इति समास-प्रकरणम् . अथ तद्धित-प्रकरणम् तद्धितेषु अपत्याधिकारः (५१४) तद्धिताः ।। ६।२।१। इतो वक्ष्यमाणाः प्रत्ययास्तद्धितसंज्ञकाः स्युः । (५१५) प्राग्दीव्यतेरण।।६।२। १४ । तेन दीव्यतीत्यतः प्राग अण् अधिक्रियते । (५१६ ) तस्यापत्ये ॥६।२। ३१ ! षष्ठ्यन्तानाम्नोऽपत्येऽर्थः अरणादयः प्रत्ययाः स्युः। भानोः अपत्य- मिति. विग्रहें। (५१७) उवर्णस्यास्वयंभुवोऽव् ॥ ८॥४। ६६ । स्वयंभूवजितस्योवर्णान्तस्य अपदस्य तद्धिते परे अव् स्यात् । भानवः। दशरथस्यापत्यम् । (५१८) अत इञ्॥ ६।२।३४ अदन्तात् पष्ठयन्तादपत्यार्थे इन स्यात् (५१६) वृद्धिः स्वराणामादेणिति तद्धिते ।। ८।४।१।

तद्धित-प्रकरणम् .९९. परे। . स्वराणां मध्ये आदिस्वरस्य वृद्धिः स्यात् भिति णिति च तद्धिते दाशरथिः। (५२०) शिवादेरण।।६।२।४२ । शवः, प्रौष्ठः । (५२१) ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यः ।। ६।२४४। ऋष्यादिवाचिभ्योऽपत्ये अण् स्यात् । वाशिष्ठः, श्वाफलक वासुदेवः, नाकुलः । (५२२) कन्यायाः कनीनश्च ।। ६ । २। ४६ । कन्याया अपत्यम्-कानीनः व्यासः कर्णो वा। (५२३ ) गोत्रे बिदादेः पौत्रादौ ॥६।२। ५६ । बिदादिभ्यों गोत्रे पौवादावपत्ये अञ स्यात् । बिदस्य पौवाद्य- पत्यम्-बंदः, काश्यपः (५२४.) गर्गादेयम् ॥ ६।२। ५७ । गोत्रे एव । गायः, वात्स्यः । (५२५) यमनोऽश्यापर्णान्तगोपवनादेः॥ ६ । २ । १३६ । गोत्रेऽर्थे बहुत्वे वर्तमानयोः या, अन इत्येतयोर्लुक् स्यात् अस्त्रियां न तु श्यापर्णान्तगोपवनादिभ्यः । गर्गाः, बिदाः। गोपवना- दिविदाद्यन्तर्गणस्तद्वर्जनान्नेह-गौपवनाः, श्यापर्णाः । अस्त्रियामिति किम्-गार्यः स्त्रियः। (५२६) नडादिभ्य आयनण्॥६।२। ६८ नाडायनः, चारायणः । सर्वत्र अनन्तरापत्ये तु इनोव। बैदिः, गागिः, नाडिः।

१००
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
(५२७) द्विस्वरादनद्याः ॥ ६॥२॥ ८६ ।
द्विस्वरात् स्त्रीप्रत्ययान्तादनद्यर्थादपत्ये एयण् स्यात् । दात्तेयः,
गौप्तेयः।
अनद्या इति किम्-सैप्रः।
(५२८ ) क्षुद्राभ्यो वा ।। ६ । २.१ १०४ ।
अङ्गहीनाः शीलहीना वा स्त्रियः क्षुद्राः । ताभ्योऽपत्ये . एरण वा
स्यात् । पक्षे पूर्वेण एयण-काणेरः, काणेयः, दासेरः, दासेयः ।
(५२६) स्वसुरीयः ॥६।२।१०६ ।
स्वतीयः ।
(५३०) भ्रातुय॑श्च ॥ ६।२।१०७ ।
चादीयः। भ्रातृव्यः, भ्रात्रीयः ।
(५३१.) श्वशुराद्यः ॥ ६१२ । ११४ ।
श्वर्यः ।
(५३२.) राज्ञो जातौ॥ ६।१ । ११५ ।
राजन् शब्दादपत्येऽर्थे : यः स्याज्जाती। नो.. पदस्थति: टेलोपे
प्राप्ते।
(५३३.) अनोऽध्य ये ॥८॥४। ५२ ।
अन्नन्तस्य टेलोपो न स्यात् ट्यजिते ये परे । राजन्यः। अन्यत्र
*राजनः।
(५३४) क्षत्रादियः॥६।२।११६ ।
जातादेव.। क्षत्रियो जातिश्चेत् । क्षाविरन्यः ।
(५३५.) मनोर्याणौ पुक् च ।। ६ । २।११७ ।
* अणीति टिलोपो न ।

तद्धित प्रकरणम् मनुशब्दादपत्ये याणी स्तः अस्य षुगागमश्च जाती। मनुष्यः, मानुषः ।. जाताविति किम्-मानवः । (५३६.) इतोऽनिनः ॥६॥२॥१०॥ इनान्तजितात् द्विस्वरादिदन्तात् अपत्ये एयण स्यात् । नाभेयः, आहेयः । इत इति किम्-दाक्षिः । (५३७ ) कुलादीनः ॥ ६॥ २॥ ११६ । कुलादपत्ये ईनः स्यात् । कुलीनः, राजकुलीनः । (५३८) दुष्कुलादेयण ॥ ६ । २ । १२२ । अस्मादपत्ये एयण् . वा स्यात् ।। , पक्षे ईनः । दौष्कुलेयः दुष्कुलीनः। (५३६) प्राग्वतोऽग्निकलेरेयण ॥ ६॥ २॥ २७ ॥ वतः प्राग येऽस्तेिषु अग्निकलिभ्यामेयण स्यात् । अग्नेरपत्यम्- आग्नेयः, कालेयः। (५४०.) स्त्रीपुंसाभ्यां ननौ ॥ ६।२।२८ । प्राग्वतोऽर्थे आभ्यां न स्ननो स्तः । स्त्रिया अपत्यम्-स्त्रणः, '. पौंस्नः। (५४१) गोः स्वरे यः॥ ६।२।३० । गोशब्दात् स्वरादितद्धितप्रसङ्गे यः स्यात् । (५४२).येऽयकिः॥ १।२।५ यविजिते ये प्रत्यये परे मोकारौकारयोः अव, पाव इत्यादेशो. ..स्तः। गोरपत्यम्-गव्यः । इति-अपत्याधिकारः।

॥६।३।१३।। १०२ कालुकौमुदी-पूर्वार्ष अथ रक्ताद्यर्थाधिकारः (५४३) तेन रक्ते रागात् ।। ६।३। १ । रज्यतेऽनेनेति रागः । तृतीयान्तात् रागवाचिनो रक्तेऽर्थे अणादयः स्युः । कुसुम्भन रक्तम्-कौसुम्भम्, हारिद्रम्, कौङ्क मम् । रागादिति किम्-देवदत्तेन रक्तम् । (५४४ ) तस्य समूहे ।। ६।३ । १० । षष्ठयन्तात् समूहेऽर्थे अणादयः स्युः। . काकानां समूहः-काकम्, वाकम्, शौकम्, यौवतम्; स्त्रंणम्, पौंस्नम्, गव्यम् । (५४५) गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्रराजराजन्यराजपुत्रवत्साजमनुष्यवृद्धादकम् गोत्रप्रत्ययान्तात् उक्षादेश्च तस्य समूहे अका स्यात् (५४६ ) तद्धितेऽनातियस्वरे ॥ ८॥४.१ ७८ ॥ हसात्परस्याऽपत्ययकारस्य लोप: स्यात् यकारे आवजिते स्वरे च तद्धिते। गर्गाणां समूहः - गार्गकम्, प्रोक्षकम्, औष्ट्रकम्, औरंभ्रकम्, राजकम् । (५४७) राजन्यमनुष्ययूनामके ।। ८।४। ५१ ! एषां प्राप्तो लोपो न स्यात् अके परे । राजन्य कम्; राजपुत्रकम्, वात्सकम्, आजकम्, मानुष्यकम्, वार्षकम् । (५४८) कवचिहस्त्यचित्ताच्चेकण् ।। ६।३।१५ । कवचिन्, हस्तिन् इत्येताभ्यामचित्तवाचिभ्यःकेदाराच्च समूहे इकण स्यात् ।। कवचिनां समूहः--कावचिकम्, हास्तिकम्, आपूपिकम्, केदारिकम् ।

तद्धित-प्रकरणम्
(५४६) धेनोरननः ।। ६ । ३। १६ ।
अनञ पूर्वाद्धेनुशब्दात्समूहे इकण स्यात्
(५५०) भृवर्णोवर्णेसुर्दोभ्य इकस्येतः ॥ ८।४। ८० ।
ऋवर्ण, उवर्ण, इस्, उस्, इत्येतदन्तात् दोष्शब्दाच्च परस्य
इकस्यकारस्य लोपः स्यात् । धेनूनां समूहः-धनुकम् ।
(५५१ ) अश्वादीयों वा ॥६।३। २० ।
अश्वीयः । पक्षे अण्-आश्वम् ।
(५५२) ग्रामजनबन्धुगजसहायेभ्यस्तल् ॥ ६ । ३ । २६ ।
ग्रामता, जनता, बन्धुता, गजता, सहायता।
लित्वात्
स्त्रीत्वम् ।
(५५३) विकारे ।। ६ । ३। ३३ ।
षष्ठयन्तात् विकारेऽर्थे यथाविहितः प्रत्ययः स्यात् । सुवर्णस्य
विकारः-सौवणं कुण्डलम् ।
(५५४) पितृमातृभ्यां व्यडुलौ भ्रातरि ॥६।३।३०।
प्राभ्यां भ्रात्रर्थे व्यडुलौ स्तः। पितुर्धाता-पितृव्यः, मातुर्धाता-
मातुलः।
(५५५) पित्रो महट् ॥ ६।३।३१ ।
आभ्यां पितृमात्रोरर्थयो महट् स्यात् । पितुः पिता माता वा-
पितामहः, पितामही, मातुः पिता माता वा-मातामहः, मातामही
(५५६) गाः पुरीषे॥६।३। ५२ ।
गोशब्दात् पुरीषेऽर्थे मयट् स्यात् । गोः पुरीषम् --गोमयम् ।
(५५७) पुरुषात कृतहितवधविकारसमहेष्वेयन ।। ६।३.६४।
-

१०४
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
-
"
पुरुषेण कृतः-पौरुषेयो ग्रन्थः, पुरुपाय हितम्--पौरुषेयं पश्यम्,
पुरुषाणां वधः, विकारः, समूहो वा-पोल्पेयः ।
(५५८) निष्फले तिलात् पिचपेजो ॥६।३।६५।
निष्फलस्तिल:-तिलपिञ्जः, तिलपेजः।
(५५६) सास्य देवता.॥ ६।३।६६।
प्रथमान्तात् पष्ठ्यर्थे यथाविहितः प्रत्ययः स्यात् यत्प्रथमान्तं देवता
चेत् स्यात् । जिनो देवताऽस्य स जनः । एवं शैवः, बौद्धः, आग्नेयः !
(५६०) ऋतुवायुपित्रुषसो यः ॥ ६।३। ७३ ।
ऋतुर्देवता अस्य---ऋतव्यम्, वायव्यम् ।
(५६१) मृतो रस्तद्धिते थे ।। १।२। ३३ ।
ऋतो रेफादेशः स्यात् तद्धिते ये परे। पित्र्यम्, उपस्यम्
(५६२.) तद्वत्त्यधीते ॥ ६।३। ८५।
द्वितीयान्तात् वेत्ति, अधीते इत्यर्थयोर्यथाविहितः प्रत्यय: स्यात् । सूत्रं
वेत्त्यधीते वा-सौत्रः, व्याकरणं वेत्त्यधोते वेत्यत्रादिस्वरस्य वृद्धिप्रसङ्गे
( ५६३.) संधिय्वोरैडोट् च ।। ८।४।२३ ।
संघिजाभ्यां यकारवकाराभ्यां परस्यादिस्वरस्य प्राप्ता वृद्धिर्न
स्यात् किन्तु तयोः ऐट्, औट इत्याग़मी स्तः । वैयाकरणः ।
(५६४) न्यायादेरिकण् ।। ६।३।८६ ।
नयायिकः, नैमित्तिकः, मौहूर्तिकः ।
(५६५) तेन छन्ने रथे ॥६।३। ६६
तृतीयान्तात् छन्ने रयेऽर्थे यथाविहितः प्रत्यय: स्यात् ।। वस्त्रेण
छन्नो रथः-वास्त्रः, काम्बलः ।

तद्धित-प्रकरणम्
१०५
.
(५६६.) अणि ॥८।४। ५३ ।
अन्नन्तस्य टेर्लोपो न स्यात् तद्धिते, अणि परे। चर्मणा छन्नो
रथ:-चार्मणः।
(५६७ ) संस्कृते भक्ष्ये ।। ६ । ३ । १०७ ।
सप्तम्यन्तात् संस्कृते भक्ष्ये अण् स्यात् ।
(५६८) द्विगोरनपत्ये यस्वरादेलुंगद्विः ।। ६ । २.। २६ ।
अपत्यादिन्यस्मिन् प्राग दीव्यतीयेऽर्थे उत्पन्नस्य द्विगो: परस्य
यकारादे: स्वरादेश्च प्रत्ययस्य सकृल्लुग् भवति । पञ्चसु कपालेषु,
संस्कृत:-पञ्चकपालः ।
इति रक्ताद्यर्थाधिकारः।
अथ शेषाधिकारः
(५६६) शेषे ॥६।४।१॥
उक्तादन्यः शेषः।
अत ऊध्वं
यान् प्रत्ययान् वक्ष्यामस्ते शेषेऽर्थ
वेदितव्याः।
(५७०) राष्ट्रादियः॥ ६ । ४।२।
राष्ट्र जातः, भवः, क्रीतः, कुशलो वा-- राष्ट्रियः ।
(५७१) ग्रामादीनञ् च ॥६।४।५।
अस्माच्छेषेऽर्थे ईनन चाद्यश्च प्रत्ययौ स्तः । , ग्रामीणः, ग्राम्यः ।
(५७२ ) नद्यादेरेयण ।। ६।४।।
नादेयः, माहेयः।
(५७३ ) कामेहत्रतसस्त्यप् ॥ ६ । ४ । १५ ।

कालुकौमुदी-पूर्वार्धे एभ्यः शेषेऽर्थे त्यप् स्यात् । क्वत्यः, अमात्यः, इहत्यः, कुत्रत्यः, यत्रत्यः, कुतस्त्यः, ततस्त्यः । (५७४ ) दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यण ।। ६।४।१०। दाक्षिणात्यः, पाश्चात्त्यः, पौरस्त्यः । (५७५) णोऽरण्यात् ।। ६। ४ । २१ । आरण्या:पशवः । (५७६ ) भवतोरिकणीयसौ ॥ ६।४।३० । भवत् शब्दात् शेपेऽर्थे इकणीयसौ स्तः । (५७७ ) तोऽशश्वदकस्मात् ।। ८।४। ८१ । शश्वदकस्मार्जितात् तान्तात्परस्य इक इकारस्य लोप: स्यात् । भवतः इदम्-भावत्कम्, भवदीयम् । सकारो नामसिदय हसे इति पद- स्वार्थः। (५७८) परजनराज्ञोऽकीयः॥ ६।४ । ३१ । परकीयः, जनकीयः, राजकीयः । (५७६) संज्ञावृद्ध वा ।।६।२।६। या संज्ञा व्यवहाराय नियुज्यते सा वृद्धसंज्ञा वा स्यात् । (५८०) त्यदादिः ॥ ६।२।१०।' त्यदादिगणो वृद्धसंज्ञः स्यात् । (५८१) वृद्धादीयः॥ ६।४। ३२ । वृद्धसंजकाच्छेपेऽर्थे. ईय: स्यात् । चैत्रीयः, मंत्रीयः, तदीयः यदीयः। (५८२ ) महादिभ्यः ॥ ६।४। ६५ ।

तद्धित-प्रकरणम् १०७ " . गहीयः । अन्यस्य दुगागमे अन्यदीयः, स्वकात--स्वकीयः, देवकात् -देवकीयः। (५८३) वा युष्मदस्मदोऽञीननौ युष्माकास्माकौ च ॥६४६) युष्मदस्मद्भ्यां शेषेऽर्थे अञीननौ वा स्तः, अनयोर्युष्माक; अस्माक इत्यादेशौ च । युवयोर्युष्माकं वा इदम्---यौष्माकम्, यौष्माकी णम् पक्षे युष्मदीयम् । आस्माकम्, प्रास्माकीनम्, अस्मदीयम् । (५८४ ) तवकममकावेकत्वे ।। ६ । ४ । ७० । एकत्वे अधीनबौ वा स्तः अनयोस्तवकममकौ च । तावकम्, ताव- कीनम् । पक्षे त्वदीयम् । मामकम्, मामकीनम्, मदीयम् । (५८५) अन्तादिमध्यान्मः ॥ ६ । ४ । ७६.। अन्तमः, आदिमः, मध्यमः। (५८६) पश्चादग्रान्तादिमः॥ ६।४ । ७८ । : . एभ्यः शेषेऽर्थे इमः स्यात् । (५८७) अनाराच्छश्वत्पृथगोऽव्ययस्य ।। ८।४। ६६ । आरादिवजितस्य अव्ययस्य टेर्लोपः स्यात् तद्धिते परे। पश्चिमः, अग्रिमः, अन्तिमः। (५८८) वर्षाकालेभ्य इकण् ॥ ६ । ४ । ८१ ।। वार्षिकः, मासिकः, सांवत्सरिकः, देवसिकः । (५८६ ) ऋतुनक्षत्रसंध्यादेरण् ॥ ६ । ४ । ८६ । एभ्यः शेषेऽर्थे अण स्यात् । पूर्वापवादः । ग्रीष्मे भवः-ष्मः, वासन्तः। (५६०.) तिष्यपुष्ययोनक्षत्रेऽणि ॥ ८।४। ७६ ।

. १०८ कालुकोमुदी-पूर्वार्धे नक्षत्रवाचिनोरनयोर्यस्य लोपः स्यात् अणि परे । तिष्ये भवः-तषः, पौषः, सन्ध्यायां भवः-सान्ध्यः । (५६१) तत्र जाते॥७॥१।१। सप्तम्यन्ताज्जातेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । त्रुघ्ने जातः-स्रोघ्नः, माथुरः, आग्नेयः, कालेयः, स्त्रणः, पौंस्नः, राष्ट्रियः, ग्रामीणः, ग्राम्यः । (५६२ ) कृतलब्धक्रीतसंभूतेषु ।। ७ । १ ॥१७ सप्तम्यन्तात् कृतादिष्वर्थेषु यथाविहिता: प्रत्ययाः स्युः । स्रुघ्ने कृतो, लब्धः, क्रोतः, संभूतो वा-स्रोन इत्यादि । (५६३) कुशले ॥७।१।१८। स्रुघ्ने कुशलं:-स्रोघ्नः, माथुरः । (५६४) भवे ॥७।३। ३१ । त्रुघ्ने भवः-लौघ्नः, माथुरः । (५६५) दिगादेयः ॥ ७ । १ । ३२ । दिशि भवो-दिश्यः, वर्यः, आद्यः, अन्त्यः । (५६६) शरीरावयवात् ।। ७ । १।३३। दन्ते भवः-दन्त्यः, कर्ण्यः, प्रोष्ठ्यः, मुख्यः मूर्धन्यः । (५६७) दृतिकुक्षिकलशिवस्त्यहेरेयण ।। ७११ । ३५ ॥ दार्तेयं जलम्, कौक्षयों व्याधिः, कालशेयं मूत्रम्, आहेयं विपम् । (५६८) मध्यादिनण्णेया मुम् चास्य ।। ७ । १।४८। अस्मात् भवेऽर्थे दिनण, ण, ईय इत्येते प्रत्ययाः स्युः, अस्य मुमाग- मश्च । मध्ये भवः-माध्यन्दिनः; माध्यमः, माध्यमीयः । तक्रम्, वास्तेयं

तद्धित प्रकरणम्
(५६६) ईयो मत्वर्थजिह्वामूलाङ्गुलिभ्यश्च ।। ७।१।४६ ।
एभ्यो मध्यशब्दाच्च भवेऽर्थे ईयः स्यात् । मत्वर्थीयः, जिह्वामूलीयः,
अङ्गलीयः, मध्यीयः।
(६००) वर्गान्तात् ॥ ७.१.१ । २० ।
कवर्गीयः, पवर्गीयः ।
(६०१ ) प्रभवति ॥ ७ ॥ १ । ६६ ।
पञ्चम्यन्तात् प्रभवतीत्यर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । ... हिमवतः
प्रभवतीति हैमवतो गंगा।
(६०२) अधिकृत्य कृते गन्थे ।।७।१।७४।
द्वितीयान्तात् अधिकृत्यः कृते ग्रन्थेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः ।
सुभद्रामधिकृत्य कृतो ग्रन्थः- सौभद्रः, सौतारः, भाद्रः ।
(: ६०३.) तेन प्रोक्त ॥७।१।६१.।
तृतीयान्तात् प्रोक्तेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । गणधरेणः प्रोक्तम्
-गाणधरं द्वादशाङ्गम् ।
(६०४) कृते ।।७।१।१०६ ।
शिवेन कृतो ग्रन्थः-शवः, सिद्धसेनीयः स्तवः, इष्टकाभिः कृतः
प्रासाद:-ऐष्टकः ।
(६०५) तस्येदम् ॥ ७ ॥ १ ॥ ११२
षष्ठ्यन्तादिदमर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः। भक्षवम्, सोध्नम्
माथुरम्, आग्नेयम्, स्त्रणम्, पौंस्तम्, गव्यम्, नादेयम्, स्वस्येदम् -
सौवम्, दैवम् ।
इति शेषाधिकारः

११०
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
अथ इकणधिकारः
(६०६) इकण् ।। ७.१२।१।
इत इकणधिकारो वेदितव्यः ।
(६०७) तेन दीव्यतिखनतिजयतिजितेषु ।। ७।२।२।
तृतीयान्ताद्दीव्यत्यादिष्वर्थेषु इकण् स्यात् । अक्षर्दीव्यति-आक्षिकः,
कुद्दालेन खनति-कौद्दालिकः, अक्षर्जयति-आक्षिकः, अजितम्-
आक्षिकम् ।
(६०८) संस्कृते॥७।२।८।
दना संस्कृतम्-दाधिकम्
(६०६ ) तरति ॥७१२।१०।
गोपुच्छेन तरतिः-गोपुच्छिकः मोडुपिकः ।
(६१०) नौ द्विस्वरांदिकः ॥ ७।२।११।
नाविकः, बाहुकः ।
(६११) चरति ।।७।२। १२ ।
हस्तिना चरति हास्तिकः, शाकटिकः ।
(६१२:) पादेरिकट ।। ७।२। १३ ।
पण चरति-पपिकः, पपिकी, अश्विकः, रथिकः ।
(६१३) पक्षिमत्स्यमृगाख्येभ्यो हन्ति ॥ ७१.२ । ३८ ।
आख्यशब्देन स्वरूपस्य पर्यायाणां विशेपाणां च ग्रहणम् । द्विती-
यान्तेभ्यः पक्ष्यादिवाचिभ्यो हन्तीत्यर्थे इकण् स्यात् । पक्षिणो हन्ति--
* येन पीठेन पङ्गवश्चरन्ति स पर्पः ।

४
तृतीयान्तान्मूल्यवाचिनः जीतेऽर्थ यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः।
तद्धित-प्रकरणम्
पाक्षिकः, शाकुनिकः, मात्स्यिकः, मैनिकः, मागिकः, हारिणिकः ।
(६१४ ) धर्माधर्माभ्यां चरति ॥ ७।२।४३ ।
धम चरति-धार्मिकः, पार्मिकः ।
(६१५) निकटादिपु वसति ।। ७।२। ८२।
एभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यो वसतीत्यर्थे इकण् स्यात् । निकटे वसति-
नकटिको भिक्षुः, वाक्षमूलिकः, श्माशानिकः ।
(६१६ ) सतीर्थ्यः॥७।२।८३ ।
समाने तीर्थं वसतीति सतीयः।
(६१७ ) मूल्यैः क्रीते ॥७।२। १०५ ।
प्रस्थेन क्रीतम्-प्रास्थिकम्, साप्ततिकम् ।
(६१८.) अर्हति ॥ ७।२ । १३२ ।
द्वितीयान्तादहतीत्यर्थे यथोक्तं प्रत्ययः स्यात् । छत्रमहंति-छात्रिकः,
चामरिकः, वास्त्रिकः।
(६१६ ) शोभते ॥७
तृतीयान्तात् शोभते इत्यर्थे. इकण स्यात् । आचार्येण शोभते-
आचायिकः, शीलेन शोभते-शलिकी सीता।
इति-इकणधिकारः
अथ यादिप्रत्ययाधिकार:
(६२० ) तत्र साधौ ।। ७।३। १५ ।
तत्रेति सप्तम्यन्तात् साधावणे यः स्यात् । कर्मणि साधुः कर्मण्यः,
सभायां सभ्यः
७।२ । १७३।

११२ कालुकौमुदी-पूर्षि (६२१) पर्षदो ण्यणौ ॥ ७॥ ३॥ १८ ॥ पर्षदि साधुः-पार्षद्यः, पार्षदः । (६२२) कथादेरिकण् ॥ ७१३ । २१ । कथायां साधु:-काथिकः, वैकथिकः । (६२३) तस्मै हिते ॥ ७।३।३५ । चतुर्यन्तात् हितेऽर्ये ईयः स्यात् । वत्साय हितः-वात्सीयः, पित्रीयः, मात्रीयः, गव्यम्, स्वस्मै हितम्-स्वीयम् । (६२४) शरीरावयवाद्यः॥७॥३॥ ३७॥ दन्त्यम्, कर्ण्यम् । (६२५) अजाविभ्यां थ्यः॥ ७।३।३६ । अजेभ्यो हितम्-अजथ्यम्, अविथ्यम् । नामग्रहणे लिङ्गविशिष्ट- स्यापि ग्रहणात् अजाभ्यो हितमित्यत्र तु । (६२६) मानिक्यङ्कच्तस्त्रतरतमचरट्कल्पदेश्यरूपपाशयेथट्थट्- तिथटप्लुक्षु॥३।२।४६ । मानिनि क्यादि च परे भाषितपुंस्कादनूङः स्त्रियाः पुंवत् स्यात् । अजथ्यम् । इति यादिप्रत्ययाधिकारः। अथ भावकर्मार्थाः (६२७) तस्याहे क्रियायां वत् ॥ ७॥ ३५२ । पष्ठचन्तादर्हेऽर्थे वतु स्यात् अर्ह चेत् क्रिया स्यात् । साधोरह साघुवत् वृत्तमस्य साधोः । (६२८) स्यादेरिवे ।। ७।३। ५३ ।

तद्धित प्रकरणम् ११३ स्याद्यन्तादिवाणे वत् स्यात् तच्चेत् सादृश्यक्रियाविषयः स्यात् अश्ववद् धावति चैत्रः, देववत् पश्यति मुनिम् । (६२६) तत्र ॥७।३। ५४ । संप्तम्यन्तादिवार्थे वत् स्यात् । मथुरायामिव-मथुरावत् पाटलिपुत्रे प्रासादाः । . (६३०) तस्य ॥७।३। ५५ । षष्ठयन्तादिवार्थे वत् स्यात् । चैत्रस्येव-चैत्रवत् मैत्रस्य गावः । (६३१) भावे त्वतलौ ।। ७।३ । ५६ । षष्ठ्यन्ताद् भावेऽर्थे त्वतली स्तः। शब्दस्यार्थे प्रवृत्तिहेतुर्गुणो भावः । गोशब्दस्य भाव:-गोत्वम्, गोता, शुक्लत्वम्, शुक्लता, कारक- त्वम्, कारकता, दण्डित्वम्, दण्डिता । (६३२) पृथ्वादेरिमन् वा ॥ ७।३। ५६ । एभ्यो भावेऽर्थे इमन् वा स्यात् । (६३.३.) पृथुमृदुभृशकशदृढपरिवृढस्य ऋतो रः ॥८।४।४६ । एषामृकारस्य रेफः स्यात् इमनिजीष्ठेयस्सु च परेषु । (६३४) टेः ॥ ८।४।४४ टेर्लोप: स्यात् इमनिजीष्ठेयस्सु च परेषु । पृथोर्भावः-प्रथिमा । पक्षे यथाप्राप्त. पृथुत्वम्, पृथुता । एवं प्रदिमा, मृदुत्वम्, मृदुता। प्रियस्य भाव इत्यत्र तु। (६३५) प्रियस्थिरस्फिरोरुगुरुबहुलतृप्रदीर्घहस्ववृद्धवृन्दारकाणामि- मन्यपि प्रस्थस्फवरगरवंहवपद्राघहसवर्षवृन्दाः ।। ८।४।३८ । प्रियादीनां यथासंख्यं प्रादयः आदेशाः स्युः यथासंभवमिमनिजी-

११४
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
ष्ठेयस्सु च परेषु । इति प्रादेशे, टेरिति टेलोपे प्राप्ते ।
(६३६) नैकस्वरस्य ॥ ८।४।४५ ।
एकस्वरस्य टेर्लोपो न स्यात् इमनादिषु परेषु । प्रेमा, स्थिरस्य
स्थेमा, उरोर्वरिमा, गुरोर्गरिमा, बहुलस्य बंहिमा, तृप्रस्य त्रपिमा,
दीर्घस्य द्राघिमा, हस्वस्य हसिमा, वृद्धस्य वर्षिमा, वृन्दारकस्य वृन्दिमा ।
(६३७ ) भूलॊपश्चेवर्णस्य ॥ ८।४।४१ ।
वहोरीयसौ इमनि च परे भूरादेशः स्यात् अनयोरिवर्णस्य लोपश्च
भूमा।
(६३८) वर्णदृढादिभ्यष्टयण च ।। ७।३। ६० ।
वर्णवाचिभ्यो दृढादिभ्यश्च भावे ट्यण् इमन् च प्रत्ययौ वा स्याताम् ।
शौक्लयम्, शुक्लिमा, शुक्लत्वम्, शुक्लता, कार्ड ण्यम्, कृष्णिमा,
कृष्णत्वम्, कृष्णता, दाढयम्, ढिमा,दृढत्वम्, दृढता, वैमत्यम्, विमतिमा,
विमतित्वम्, विमतिता इत्यादि ।
(६३६) पतिराजान्तगुणाङ्गराजादिभ्यः कर्मणि च ।।७।३।६१।
एभ्यः कर्मणि भावे च ट्यण् स्यात् । अघिपतेः कर्म भावो वा-
आधिपत्यम्, नारपत्यम्, आधिराज्यम्, यौवराज्यम्, मौढयम्, वैदुष्यम्,
राज्यम्, काव्यम्. वाणिज्यम् इत्यादि ।
(६४०) सखिदूतवणिग्भ्यो यः ।।७।३। ६४।
सख्युः कर्म भावो वा-सख्यम्, दूत्यम्, वणिज्यम् ।
(६४१) युवादेरण ।।७।३। ६८ ।
यौवनम्, स्थाविरम् ।
(६४२) लघुपूर्वाद् य्वृवर्णात् ।। ७।३।७२ ।

तद्धित-प्रकरणम् ११५ लध्वक्षरपूर्वादिवन्तिाद् उवर्णान्ताद् ऋवर्णान्ताच्च कर्मणि भावे चाण् स्यात् । मुनेः कर्म भावो वा-मौनम्, पाटवम्, पत्रम् । अधिकार- त्वात् पक्षे सर्वत्र त्वतलौ। (६४३) ऋत्विरभ्य ईयः॥७॥३॥ ७७। मैत्रावरुणस्य कर्म भावो. वा-मैत्रावरुणीयम् । (६४४.) ब्रह्मणस्त्वः ७।३ । ७८ । पूर्वापवादः । ब्रह्मणो भावः कर्म वा-ब्रह्मत्वम् । इति भावकर्मार्थाः .. अथ क्षेत्राद्यर्थकाः (६४५.) क्षेत्रे शाकटशाकिनौ ।। ७ । ३ । ७६ । इथूणां क्षेत्रम् --इक्षुशाकटम्, शाकशाकिनम् । (६४६) तेन वित्त चञ्चुचणौ ।। ७।४ । १६ । तृतीयान्ताद्वित्तेऽर्थे चञ्चुचणी स्तः। विद्यया वित्तो ज्ञात:-विद्या- चञ्चुः, विद्याचणः। (६४७) अवेः संघातविस्तारयोः कटपटौ ॥ ७ । ४ । २५ । यथासंख्यं कटपटौ स्याताम् । अवीनां संघात:- अविकटः, अवीनां विस्तार:-अविपटः। (६४८) तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतः ॥ ७।४।३१ । प्रथमान्तेभ्यस्तारकादिभ्यः षष्ठ्यर्थे इतः स्यात् तत् प्रथमान्तं सञ्जातं चेत् स्यात् । तारकाः सञ्जाता अस्य-तारकित नभः, पुष्पित- स्तरुः, बुभुक्षितः, पिपासितः ।

कालुकौमुदी-पूर्वा
(६४६) प्रमाणान्मात्रट् ॥ ७१४।३३ ।
प्रथमान्तात् प्रमाणवाचिनः षष्ट्यर्थे मात्रट् स्यात् । जानुनी प्रमा-
णमस्य-जानुमात्रं जलम्, जानुमात्री परिखा, रज्जुमात्री भूमिः ।
(६५० ) ऊध्वं दन्नड्वयसटौ।।७।४। ३५।।
ऊर्ध्वप्रमाणवाचिनो दघ्नद्वयसटौ वा स्तः । ऊरुःप्रमाणमस्य-ऊरु-
दघ्नम्, ऊरद्वयसम्, ऊरमानं वा जलम् । ऊर्ध्वमिति किम् --रज्जुमात्री
भूमिः ।
(६५१) इदं किमोऽतुरिकिय चास्य ।। ७।४।४१ ।
आभ्यां मानवृत्तिभ्यां मेयेऽर्थे अतुः स्यात् अनयोरिकियादेशौ च ।
इदं मानमस्य-इयान् पट: । किं मानमस्य-कियान् पटः ।
(६५२ ) यत्तदेतदो डावट च ।। ७ । ४.१ ४२ ।
एभ्यः प्रथमान्तेभ्यो मानवृत्तिभ्यः षष्ठ्यर्थे अतुः स्यात् तस्य च
डावडागमः। यत्तदेतद्वा प्रमाणमस्य- यावान्, तावान्, एतावान वा पटः ।
(६५३ ) यत्तत्किमः संख्याया डतिर्वा ।। ७।४।४३।
संख्यारूपमानवृत्तिभ्यो यदादिभ्यः प्रथमान्तेभ्यः षष्ठ्यर्थे उतिर्वा
स्यात् । या, सा, का संख्या मानमेपाम्-वति, तति, कति । पक्षे यावन्तः,
तावन्तः; कियन्तः।
(६५४). अवयवात्तयः ।।७।४।४४।
संख्यावाचिनः प्रथमान्तादवयवे वर्तमानात् षष्ठ्यर्थे तयट् स्यात् ।
(६५५) हस्वान्नामिनस्ते ॥ २॥२॥३६।
हस्वान्नामिनः परस्य सस्य पः स्यात् तादौ तद्धिते । चत्वारोऽवयवा
अस्य स चतुष्टंकः, एवं पञ्चतयो यमः दशतयोधर्मः, द्वादशतयःसिद्धान्तः
-

तद्धित-प्रकरणम्
(.६५६) द्वित्रिभ्यामयड्वा ।। ७।४।४५॥
द्वौ अवयवी अस्य-द्वयम्, द्वितयं वा तपः, त्रयम्, त्रितयं वा जगत् ।
(६५७) संख्यापूरणे डट् ।। ७।४।४८।
संख्यावाचिनः संख्या पूर्यते येनेत्यर्थे डट् स्यात् । एकादशानां पूरण:
-एकादशः, द्वादशः, त्रयोदशी, चतुर्दशी।
(६५८) विशत्यादेर्वा तमट् ।। ७।४।४६ ।
विंशतेः पूरण:-विंशतितमः । पक्षे डटि।
(६५६) विंशतेस्तेडिति ॥ ८।४। ६८ ।
विशतेस्तेर्लोप: स्यात् डिति तद्धिते । विंशः, त्रिंशत्तमः, त्रिंशः ।
(६६०) नोमट् ॥ ७.१४ । ५२ ।
असंख्यादेर्नान्तसंख्यायाः संख्यापूरणे मट् स्यात् । पञ्चमः, सप्तमः,
अष्टमः, नवमः, दशमः । असंख्यादेरिति किम्-एकादशः, द्वादशः ।
(६६१) द्वस्तीयः॥ ७॥४॥५५ ।
द्वितीयः।
(६६२ ) तेस्तु च ॥ ७॥ ४॥ ५६ ।
तृतीयः ।
(६६३) चतुरो येयौ च लोपश्च ॥७।४। ५७ ।
तुर्यः, तुरीयः।
(६६४.) षट्कतिकतिपयाच्च थट् ॥ ७।४।५८।
एभ्यश्चतुर्शब्दाच्च संख्या पूरणे थट् स्यात् । नामंसिदयहसे इति
पदत्वे प्राप्ते।
(६६५.) थेटिः ।। १ १।२८।।

११८ कालुकौमुदी-पूर्षि थटि परे पूर्व नाम पदसंज्ञं न स्यात् । पदत्वाभावाज्जवो न । षष्ठः, षष्ठी, कतियः, कतिपयथः, चतुर्थः, चतुर्थी, अत्र विसर्गों नं । इति क्षेत्राद्यर्थकाः। on अथ मत्वर्थीयाः (६६६) तदस्यास्मिन्नस्तीति मतुः।। ८ । १।१। प्रथमान्तात् षष्ठ्यर्थे सप्तम्यर्थे वा मतुः स्यात् प्रथमान्तं तच्चेद- स्तीति स्यात् । 'गावोऽस्य सन्तीति गोमान्, तरवो यस्मिन् सन्तीति तरुमान् । (६६७) मावर्णान्तोपधातुः ।। ८।१।२। मान्तात् मोपंधात् अवर्णान्तादवर्णोपघाच्चास्त्यर्थे वतुः स्यात् । किंवान्, लक्ष्मीवान्, ज्ञानवान्, 'विद्यावान् । यशस्-वत् इत्यत्र नाम सिदयेति पदत्वाद् विसर्गे प्राप्ते । (६६८) नस्ते मत्वर्थे ॥ १।१।२६ सान्तं तान्तञ्च नाम मत्वर्थे परे पदसंज्ञं न स्यात् । यशस्वान्, भास्वान् । (६६६) झपात् ॥ ८॥ १।३। झपान्तोदस्त्यर्थे वतुः स्यात् । तडित्वान्, मरुत्वान् । अत्रापि पद- त्वप्रतिपेघाद् जवत्वं न । (६७० ) अस्तपोमायामेधास्रजो विन् वा ।। ८।१।६। असन्तेभ्यस्तपसादिभ्यश्च मत्वर्थे विन् वा स्यात् । यशस्वी; तपस्वी, मायावी, मेधावी, त्रग्वी । पक्षे यशस्वानित्यादि । ..

तद्धित-प्रकरणम् (६७१) नावादेरिकः ॥ ८॥ १ ॥ १० ॥ इको वा स्यात् । नाविकः, नौमान् । (६७२.) शिखादिभ्य इन् ॥ ८।१।११ । इन् वा स्यात् । शिखी, शिखावान्, माली, मालावान् । (६७३) व्रीह्यादिभ्यस्तौ ॥८।१ । १२ । ताविति इकेनौ वा स्याताम् । व्रीहिकः, बीही, ब्रीहिमान्, मायिकः मायी, मायावान् । (६७४) अतोऽनेकस्वरात् ।। ८ । १ । १३ । अकारान्तादनेकस्वरात् मत्वर्थे इकेनौ वा स्तः । दण्डिकः, दण्डी, दण्डवान्, छत्रिकः, छत्री, छत्रवान् । अतः इति किम्-मालावान् । अनेकस्वरादिति किम्-खवान् । (६७५) न द्रव्यादिभ्यः ।। ८।४। १८ । द्रव्यादिभ्यो. मत्वर्थे इकेनौ. न स्तः । द्रव्यवान्, धान्यवान्, पुण्यवान् । (६७६) वातातीसारपिशाचानां कुक् च ।।८।१।२८ । एभ्यो. मत्वर्थे इन् स्यात् एषां कुगागमश्च । वातको, अतिसारकी, पिशाचकी। (६७७) सुखादेः ॥ ८॥ १।३० । सुखादिभ्यो मत्वर्थे इन्नेव स्यात् । सुखो, दुःखी (६७८) वाच आलाटौ॥८॥ १।४६ । वाचो मत्वर्थ मालाटौ स्तः क्षेपे । “वाचालः, वाचाटः । (६७६) दन्तादुन्नतात् ।।८।१।५६ । ..

१२०
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
अस्मात डुरः स्यात् मत्वर्थे । उन्नता दन्ता अस्य-दन्तुरः । अन्यत्र
दन्तवान् ।
(६८०.) कृपाहृदयाद्वालुः ॥ ८॥ १।७४।
कृपालुः, हृदयालुः । पक्षे कृपावान्, हृदयवानित्यादि ।
(६८१) स्वामिन्नीशे॥ ८१ १.८० ।
निपात्यते । स्वामी ईशश्चत् । अन्यत्र स्ववान् ।
इति मत्वर्थीयाः।
अथ स्वार्थिकाः
(६८२) विनयादिभ्य इकण ।। ७।४। ८४ ।
एभ्यः स्वार्थे इकण स्यात् । विनय एव वैनयिकम्, सामयिकम् ।
(६८३) प्रज्ञादिभ्यः ।। ७।४। ८८ ।
एभ्यः स्वार्थे अण् स्यात् । प्रज्ञ एवं प्राज्ञः; वणिगेव वाणिजः
(६८४) भेपजादिभ्यों यण् ।। ७।४। ६४ ।
भेषजमेव भैपज्यम्, आनन्त्यम् ।
(६८५) चतुर्वर्णादिभ्यष्टयण ॥ ७।४।१५।
चातुर्वर्ण्यन्, सामीप्यम्, माणिक्यम् ।
(६८६) देवात्तल् ।।७।४।६६ ।
देव एव देवता। लित्वात् स्त्रीत्वम् ।
(६८७) मृदस्तिकः ।। ७।४।६७
मृदेव मृत्तिका।
(६८८) वर्णाव्ययात् स्वरूपे कारः ।।७।४।६६ ।

तद्धित प्रकरणम्
१२१
एभ्यः स्वरूपार्थवृत्तिभ्यः कारः स्यात् । अकारः; ककारः, ओङ्कारः
नमस्कारः, चकारः ।
(६८६) रादेफो वा ॥ ७।४।१०० ।
रेफः, रकारः।
(६६०) नामरूपभागेभ्यो धेयः ।।७।४।१०१ ।
नामधेयम्, रूपधेयम्, भागधेयम् ।
(६६१) मादिभ्यो यः।। ७।४ । १०२ ।
मत एव मयः, सूर्यः ।
(६६२) नवादीनतनत्नञ्च नू चास्य ।। ७ । ४ । १०३ ।
नवात्
स्वार्थे ईन, तन, न, य इत्येते प्रत्ययाः स्युः नवस्य नू इत्या-
देशश्च । * नवीनम, नूतनम्, नूत्नम्, नव्यम् ।
(६६३) प्रकारे जातीयः॥ ८॥ १।१२।
प्रथमान्तात् षष्ठ्यर्थे जातीयः स्यात् तत्प्रथमान्तं प्रकारश्चेत् स्यात् ।
पटुः प्रकारोऽस्य-पटुजातीयः, मृदुजातीयः ।
(६६४) जातीयदेशीययोः ॥ ३।२। ६२ ।
भाषितपुंस्कादनूङः स्त्रियाः पुंवत् स्यादनयोः परयोः । पट्वी
प्रकारोऽस्या:---पटुजातीया ।
(६६५) भूतपूर्व चरट् ॥ ६ । १ । ६५ ।
भूतपूर्व आढयः-प्राढयचरः, आढयचरी।
(६६६) अहीयरुहोऽपादाने ।। ८।१ । १०५
अपादाने विहितपञ्चम्यन्तात् तसुः स्यात् तदपादानं हीयरहो:
* उवर्णस्यास्वयंभुवोऽव् ।

१२२
कालुकौमुदी-पूर्वा
सम्बन्धि न चेत् । ग्रामत आगच्छति, चोरतो विभेति । अहीयरहोरिति
किम्-सार्थाद्धीनः, पर्वतादवरोहति ।
(६६७) किमद्वयादिसर्वाद्यवैपुल्यवहोस्तस् ।। ८१ १ १ १०६ ।
एभ्यः पञ्चम्यन्तेभ्यस्तस् स्यात् ।
कस्मादिति किम् - तस्!
(६६८) इतोऽतः कुतः ॥८॥१।१०७ ।
एते तसन्ता.निपात्या: । निपातनात् कुतः । सर्वस्मादिति-सर्वतः,
विश्वतः।
(६६६ ) तसादिः स्यादिवत् ॥ ८1१ । १२१ ।
तसादयः यापर्यन्ता: प्रत्ययाः स्यादिवत् स्युः। स्यादित्वाट्टेरत्वम् ।
तस्मादिति-ततः, यतः, अस्मात्- इतः, एतस्मात्-अतः, वहुभ्यः-
बहुतः। वहोर्वेपुल्यप्रतिषेधः किम्-बहोः सूपात् ।
(७००) सप्तम्याः॥८ 1 ११०।
किमादिभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यस्त्रः स्यात् ।
(७०१) कुत्रात्रककुहेह॥८।१।१११ ।
एते बान्ता निपात्याः । कस्मिन्--कुत्र,क्व,कुह, सर्वस्मिन् -- सर्वत्र,
तत्र, यत्र, एतस्मिन्-अत्र, अस्मिन्-इह ।
(७०२) किमन्यैकसर्वयत्तदः काले दा ॥ ८।१ । ११२ ।
एभ्य: सप्तम्यन्तेभ्यः कालेऽर्थे दा स्यात् । बापवादः । । कस्मिन्
काले-कदा, अन्यदा, एकदा, सर्वदा, यदा, तदा ।
(७०३) सदाऽधुनेदानीं तदानीमेतर्हि ।। ८ | १ | ११३ ।
कालेऽर्थे एते निपात्याः । सर्वस्मिन् काले-सदा, अस्मिन् काले-
अधुना, इदानीम्, एतहि, तस्मिन् काले-तदानीम् ।
।

तद्धित-प्रकरणम् १२३ - (७०४ ) प्रकारे था॥ ८।१ । ११६ । सर्वेण प्रकारेण-सर्वथा, यथा, तथा, अन्यथाः। (७०५) कथमित्थम् ।।८।१। १२० । एतो प्रकारे निपात्यते । केन प्रकारेण-कथम्, अनेन प्रकारेण- इत्थम् । (७०६) संख्याया धा ॥८।१ । १२२ । संख्यायाः प्रकारेऽर्थे धा स्यात् । एकधा, द्विधा, विधा, पञ्चधा । षोढा-षड्ढा इति तु निपातनात् । (७०७) डत्यतुसंख्यावत् ।। १।१।५७ । डत्यन्तमत्वन्तञ्च नाम संख्यावत् स्यात् । कतिधा, कियद्धा, यतिधा, यावद्धा। (७०८) विचाले च ॥८।१ । १२३ । द्रव्यस्य संख्यान्तरापादनं विचालस्तत्र प्रकारे च संख्याया धा स्यात् । · एक राशि पञ्चधा कुरु.। (७०६) वैकाद् ध्यमुञ् ॥ ८।१ । १२४ । एकशब्दात् प्रकारे विचाले च ध्यमुज् वा स्यात् । एकेन प्रकारेण- ऐकध्यमेकधा वा भुङ्क्ते । अनेकमेकं करोति-ऐकध्यमेकधा वा करोति । (७१०) द्विवर्धमुन्धौ ।।८।१ । १२५ । आभ्यां प्रकारे विचाले च धमुधौ वा स्तः। द्वैधम्, धम्, द्वेधा, वेषा।पक्षे-द्विधा, विधा। (७११) वारे कृत्वस् ।।८।१।१२७ . १२४ कालुकौमुदी-पूर्वा संख्याया वारे कृत्वस् स्यात् । पञ्चवारं भुङ्क्ते-पञ्चकृत्वो भुङ्क्ते । एवं पट्कृत्वः, सप्तकृत्वः । (०१२ ) द्वित्रिचतुभ्यः सुच् ॥ ८.1 ११ १२८ । द्विवारमिति--द्विर्भुङ्क्ते त्रिभुङ्क्ते, चतुर्भुङ्क्ते । (७१३) एकात् सकृचास्य ॥ ८॥ १ । १२६ । वारे सुच् स्यात् अस्य च सकृदादेशः। संयोगस्येति सलोपे एकवारमिति -सकृद् भुकते। (७१४ ) प्रकृष्टे तमः ।। ८१२।१। नाम्नः प्रकृष्टेऽर्थे तमः स्यात् । अयमेषां प्रकृष्ट: शुक्ल:- शुक्लतमः, साधकतमः, कारकतमः। (७१५) द्वयोविभज्ये च तरः।। ८।२।२। द्वयोः प्रकृष्टे विभज्ये प्रकृष्टे च नाम्नस्तरः स्यात् । अयमनयोः प्रकृष्टः पटुः-पटुतरः, पाचकतरः, सांकाश्यकेभ्यः पाटलिपुत्रका: आढय- तराः, अभिरूपतराः। (७२६) त्यादिकिमेदव्ययेभ्यस्ताभ्यामामद्रव्ये ।।८।२।४। त्याद्यन्त, किम्, एदन्त, अव्ययः इत्येतेभ्यः पराभ्यां तमतराभ्यामाम् स्यात्. अद्रव्ये ।. . पचतितमाम्, पचतितराम्, किन्तमाम्, किन्तराम्, अग्रेतमाम, अग्रेतराम, उच्चस्तमाम्, उच्चस्तराम् । एभ्य इति किम् । शीघ्रतरं गच्छति। अद्रव्य इति किम्-किन्तरं दारु । (७१७) गुणाङ्गादिष्ठेयसू तदर्थे वाः।। ८१२१.५॥ गुणाङ्गे वर्तमानात् तमतरार्थे इष्ठेयसू प्रत्ययौ वा स्तः । तमार्थे इष्ठः, टेरिति टेर्लोपेपटिष्ठः, पटुतमः । तरार्थे ईयसुः -पटीयान्, पटुतरः ।

-- तद्धित-प्रकरणम् १.२५ (.७१८) बहोलींष्ठे भूय् ।। ८।४।४० । बहोभीष्ठयोः परयोः भूय इत्यादेशः स्यात् । भूयिष्ठः । भूर्लोप- श्चेति ईयसो-भूयान्। (७१६) प्रशस्यस्य श्रः ।।८।४।३४। प्रशस्यशब्दस्य श्रादेशः स्यात् भीष्ठेयस्सु परतः । श्रेष्ठः, श्रेयान् । (७२०) वृद्धस्य च ज्यः ।।८।४। ३५:। वृद्धस्य प्रशस्यस्य च ज़्यादेशः स्यात् भीष्ठेयस्सुः परतः । ज्येष्ठः । (७२१) ज्यायान् ।। ८।४। ३६ । ईयसौ वृद्धप्रशस्ययोः ज्यादेशे ज्यायान् इतिः निपात्यते । ज्यायान्, ज्यायसी। (७२२.) युवाल्पयोः कन् वा ॥ ८१४ । ३३ । अनयोः कनादेशो वा स्यात् जीष्ठेयस्सु परतः । .. अतिशयेन युवा अल्पो वा--कनिष्ठः, कनीयान् । पक्षे- (७२३) स्थूलदूरयुवक्षिप्रक्षुद्राणां यलादेर्नामिनो गुणश्च ॥८।४।४२ एषामिपनि भीष्ठेयस्सु च परेषुः यलादेरवयवस्य : लोपो नामिनश्च गुणः स्यात् । · यविष्ठः,': यवीयान्, अल्पिष्ठः, अल्पीयान्, ' गरिष्ठः, गरीयान् । (७२४.) त्यादेश्च प्रशंसायां रूपः।। ८।२।६। त्याद्यन्तात् नाम्नश्च प्रशंसायां रूपः स्यात् । प्रशस्तं पचति-पचति- रूपम्, पश्यतिरूपम्, प्रशस्तो वयाकरणः-वैयाकरणरूपः, नैयायिकरूपः । (७२५) अतमादेरीपदसमाप्त कल्पदेश्यदेशीयाः॥ ८॥२१७ कालुकौमुदी-पूर्वाध तमाद्यन्तवर्जितात् त्याद्यन्तात् नाम्नश्च: ईपदसमाप्तेऽर्थे कल्प, देश्य, देशीय इत्येते. प्रत्ययाः स्युः ईपदसमाप्त पचति-पचतिकल्पम्, पचतिदेश्यम्, पचतिदेशीयम् । एवं पटुकल्पः, पटुदेश्यः, पटुदेशीयः । (७२६) नाम्नः प्राग बहुर्वा ।। ८१२।८। ईषदसमाप्तेऽर्थे नाम्नः प्राग् बहुप्रत्ययो वा स्यात् । ईपदसमाप्तः पटुः-बहुपटुः, बहुभुक्तम् । (७२७) पाशः क्षेपे ॥ ८।२।११। कुत्सितो वैयाकरण:-वैयाकरणपाशः। एवं याज्ञिकपाशः । (७२८) वह्वल्पार्थात् कारकादिष्टानिष्ट शस् ।।८।१ । १२ । कारकवाचिभ्यां वह्वल्पाभ्यां यथासंख्यमिष्टेऽनिष्टे च शस्प्रत्ययः स्यात् । वहृभ्यो ददाति-बहुशो ददाति । बहुपु वसति-बहुशो वसति । एवमल्पशो ददाति, अल्पशो वसति । कारकादिति किम्-बहूनां स्वामी। (७२६) प्रकृते मयट् ।। ८ १२ । १५ । प्राचुर्येण प्राधान्येन वा कृतम्-प्रकृतम् । प्रकृतेऽर्थे वर्तमानात् नाम्नो मयट् स्यात् । प्रचुरमन्नम्-अन्नमयम्,प्रधानं घृतम्-घृतमयम्, दघिमयम् । (७३०) अस्मिन् ॥ ८।२।१६। प्रकृतेऽर्थे वर्तमानात् नाम्नः सप्तम्यर्थे मयट् स्यात् । अन्नं प्रकृत- मस्मिन्- अन्नमयं भोजनम्, अपूपमयं पर्व। (७३१) अभूततद्भावे कृभ्वस्तिभ्यां कर्मकर्तृभ्यां च्चिः ।८।२।१८। कर्मार्थात् करोतिना योगे काच्च भ्वस्तिभ्यां योगे अभूततद्भावे- ऽर्थ विप्रत्ययः स्यात्

तद्धित-प्रकरणम्
१२७.
-
(७३२) ईश्च्वाववर्णस्याऽनव्ययस्य ॥४।१ । ६० ।
अव्ययवजितस्य अवर्णान्तस्य ईः स्यात् च्वौ परे ।
(७३३) वेर्लोपः॥४।४।४८ ।
विप्रत्ययस्य लोप: स्यात् सर्वत्र । अशुक्लं शुक्लं करोति--शुक्ली-
करोति पटम्, शुक्लीभवति, शुक्लीस्यात् वस्त्रम् ।
(७३४ ) च्वियग्यफ्यादादियक्येषु ॥४।१ । ५१ । ..
च्व्यादिषु परेषु पूर्वस्य दीर्घः स्यात् । शुचीकरोति, शुचीभवति,
पटूकरोति, पटूभवति ।
(७३५) काय साद्वा ॥ ८।२ । २२।।
कात्स्न्ये गम्ये च्व्यर्थे सात्प्रत्ययो वा स्यात् ।
(७३६ ) सात्सुगोः ॥२ । २ ६७ ।
सात्प्रत्ययस्य सुगागमस्य च सस्य प्राप्तं . षत्वं न स्यात् । . सर्व
काष्ठमनग्निमग्निं करोति-अग्निसात् करोति, अग्निसाद् भवति स्याद्वा ।
(७३७) प्राग्यावात् कच् ॥ ८॥२१४२ ।
यावशब्दात् प्राग येऽर्थास्तेषु कजधिकारो वेदितव्यः ।
(७३८) कुत्सिताल्पाज्ञातेषु ॥ ८॥ २॥ ४७ ।
कुत्सितोऽल्पोऽज्ञातो वाऽश्वः---अश्वकः । एवं घृतकम्, तैलकम् ।
(.७३६.) ह्रस्वे ॥८॥२॥ ६०।
हस्वः पट:-पटकः, वृक्षकः ।
(७४० ) त्यादिसर्वादेरक् प्राक्टेः ॥ ८॥२॥ ४३।
कचोऽपवादः । कुत्सितमल्पमज्ञातं पचति--पचतकि, सर्वकः;
विश्वक:-
--

१२८
कालकौमुदी-पूर्वार्ध
(७४१) युष्मदस्मदोरनोत्सभादेः स्यादेः ॥ ८१२।४४ ।
अनयोः परस्य. ओकारसकारभकारादिवजितस्य स्यादेष्टेः प्रागक
स्यात् । त्वयका, मयका, युष्माककम्, अस्माकंकम् । अनोत्सभादेरिति
किम्-युवकयोः, युष्मकासु, युवकाभ्याम् ।
(७४२ ) वैकाद् द्वयोनिर्धार्य डतरः ।। ८।२।६६
एकतरो भवतोः पटुः। पक्षे एककः । द्वयोरिति किम्-एको-
ऽस्मिन् ग्रामे राजा। निर्धायें इति किम् -एकोऽनयोमियोः स्वामी ।
(७४३) यत्तत्किमन्येभ्यः ॥ ८।२। ७ ।
यतरो भवतोः पटुः ततर आगच्छतु, कतरोऽन्यतरो वा. भवतोः
पटुः।
(७४४) बहूनां प्रश्ने डतमश्च वा ॥८१२।६८।
यदादिभ्यो बहूनां मध्ये निर्येऽर्थे प्रश्नविपये डतमडेतरौ वा स्तः ।
यतमो यतरो वा भवतां पटुः ततमः ततरो वा आगच्छतु, कतमः, कतरः,
अन्यतमः, अन्यतरः । पक्षे यकः, सकः, ककः, अन्यकः ।
(७४५) यावादिभ्यः कः ।।८।२ । ७२ ।
एभ्यः स्वार्थे कः स्यात् । याव एव यावकः, मणिकः, भिक्षुकः
इति स्वार्थिकाः । इति तद्धितेषु स्वार्थिकाः।
इति तद्धिताः

अथ द्विरुक्तप्रक्रिया (७४६) भृशाभीक्ष्ण्यसातत्यवीप्सासु द्विः प्राक् तमादेः ॥ ८॥४॥८५ क्रियायाः साकल्यं भृशार्थः । पौनःपुन्यमाभीक्ष्ण्यम् । क्रियान्तरैर- व्यवधानं सातत्यम् । व्याप्तुमिच्छा वीप्सा। भृशादिष्वर्थेषु यत्पदं वाक्यं वा तत् तमादिप्रत्ययेभ्यः प्रागेव द्विः स्यात् । लुनीहि लुनीहि इत्येवायं लुनाति, भोज भोज़ ब्रजति, पचति पचति, वृक्षं वृक्ष सिञ्चति । प्राक् तमादेरिति किम्-पचति पचतितमाम्, पचति पचतितराम् । (७४७) सम्भ्रमे यावद्वोधम् ॥ ८।४।६३ । सम्भ्रमे द्योत्ये यत्पदं वाक्यं वा यावद्वोधं द्विः स्यात् । सर्पः ३, बुध्यस्व.३.. (७४८) अधोऽध्युपरि सामीप्ये ॥ ८।४।१४। अघस्, अधि, उपरि इत्येतानि द्विः स्युः सामीप्ये गम्ये । अघोऽधो ग्रामम्-ग्रामस्य अघस्तात् समीपदेश इत्यर्थः । अध्यधि ग्रामम्, उपर्यु- परि ग्रामम् ।' सामीप्ये इति किम्-अधः पन्नगाः, उपरि चन्द्रमाः ।

१३० कालुकौमुदी-पूर्वाध (७४६ ) आधिक्यानुपूय॑ ।।८।४।६६ । आधिक्ये प्रानु पूर्ये च शब्दरूपं द्विः स्यात् । नमो नमः-अधिक नम इत्यर्थः । ज्येष्ठज्येष्ठमनुप्रवेशय-प्रानुपूर्येणेत्यर्थः । (७५०) प्रोपोत्समः पादपूरणे ॥८।४। ६५ । एते उपसर्गा द्विः स्युः तेन चेत् पादः पूर्येत। प्रप्रशान्तकपायाग्ने-रुपोपप्लववजितम् । उदुज्ज्वलं तपो यस्य, संसंश्रयत तं जिनम् ॥१॥ पादपूरणे इति किम्-प्रणम्य सच्छासनवर्षमानम् । (७५१ ) द्वन्द्व वा ॥ ८।४।१० द्विरुक्तस्य द्विशब्दस्य द्वन्द्वमिति वीप्सायां वा निपात्यते । द्वन्द्व द्वौ द्वौ वा तिष्ठतः, द्वन्द्वं युद्धं द्वयोर्द्वयोर्युद्धं वा प्रवर्तते, द्वन्द्वं द्वाभ्यां द्वाभ्यां वा कृतम् । द्वन्द्वः समासः, द्वन्द्वः कलहः, द्वन्द्वं युद्धमिति तु शब्दान्तरम् । इति द्विरुक्तप्रक्रिया इति श्रीमत्तेरापन्थगणगगनाङ्गण-गगनमणि-सकलस्वपरसमय- पारावारपारीण-सार्वसार्वज्ञशासनसार्वभौम-कोविदकुलालङ्कार-तीर्थ- चूडामणि-विश्वविजय-श्रीमत्कालुरामाचार्यचरणाम्भोजचञ्चरीकाय- माणान्तेवासिमुनिचौथमल्लविरचितायां कालुकौमुद्यां पूर्वाधं समाप्तम्।

परिशिष्टम् १ .

कालुकौमुदीपूर्वार्धस्थसूत्राणामकारादिवर्णानुक्रमसूची
अ
सूत्राङ्कः
सूत्रम्
३ अइउऋलएऐ० ॥ १।१।४।
१० अं अनुस्वारः॥ १ ॥ १।११ ।
११ अः विसर्गः ॥१११ । १२ ।
३७५ अकमेरुकस्य ॥२।४।६६ ।
४००. अकालेऽव्ययीभावे ॥३।२। १२७ ।
२४२. अचः।।१।४।५६।
२४४ अचेः पूर्वदीर्घश्वा० ॥२॥ १।३२ ।
२०२ अच्चास्थिदधिसक्थ्य० ॥२.११ ११ ।
४४३ अन्वेस्तुल्यार्थजाती० ॥ ३।२।७१ ।
२६६ अजादेः ॥२।३।२।
६२५. अजाविभ्यां थ्यः ।।७।३। ३६ ।
३०५: अञ्चः ॥२।३।।
२४३ अञ्चुयुजिल्चा नो० ॥ २॥ १ ॥ १०२ ।

* .
१३४
कालुकौमुदी-पूर्वा
।
सूत्राङ्कः सूत्रम्
५६६ अणि ।। ८।४। ५३ ।
५१८ अत इञ् दा२।३४॥
२६७ अत इदनिकाप्य० ॥२।३।१५।
७२५ अतमादेरीषद् ॥ ८॥२।७।
१०३ अतो जस्भ्यांये ।। १।४।८।
८४. अतोऽत्युः ।। १ । ३।४६ ।
६७४ अतोऽनेकस्वरात् ।। ८। १ । १३ ।
१६१ अतोऽम् ।।२।१।४।
४५८ अतोऽहस्य ।।२।२।७७ ॥
४३३ अत्यादयः कान्ताद्य० ।।३।११६३ ।
२५१ अत्वसोरभ्वादेः सौ॥१।४।६७
२४७. अदद्रयचो. वा।।२।१।८५।
२५८ अदसो दः सेस्तु डौः ।।२।१।७६ ।
३०. अदी_दवसानै० ॥ १।३।२७।।
११८ अदेतोध्यमोर्लोपः ॥ १।४।६६।
१०२. अदेतोरपदान्ते०॥ २१ ॥ ३१॥
४४८ अधिकं च तद्धितो।। ३.१ ११ १२३
६०२ अधिकृत्य कृते ग्र० ।।७।१।७४।
३३८ अधेः शीजस्थासामा० ॥२॥ ४ ॥१४॥
७४८ अधोऽध्युपरि सामी० ।। ८1४1:६४।
४०४: अनः॥८॥३॥ ३१॥

१३५
५०७ अंन्यस्य दुगीयका०।।
२१५१।
परिशिष्टम्
सूत्राङ्क: सुत्रम्
२३४ अनकः ॥२।१। ७१.।
२०४ : अनडुहः ॥ १।४। ७६ ।
३६७ अनतो लुक् ।। ३।२।५।
२३३, अनष्टौसोः॥२॥ १।७२ ।
७६ अनाङ्माङो दीर्घाद्वा० ।। १ । ३ । २३ ।
२४१. अनिदितो हसस्यो० ॥ ४।२। ३६
५८७. अनाराच्छश्वत् पृथ० ॥८।४।६६।
५३३ अनोऽव्ये ये॥८।४।५२ ।
१३४ अनोऽतोऽवमयुक्तात् ।।२।१।२८ ।
३०२ अनो बहुव्रीहेः ॥२ । ३।५।...
५८५ अन्तादिमध्यान्मः ॥६।४। ७६ :
१८ अन्त्यस्वरादिष्टिः ॥ १।१ । ३४॥
१६ अन्त्यात् पूर्व उपधा ॥ १।१३५॥
५१० अन्यत्यदादेराः॥३।२। १३४।
४३४ अन्यार्थे स्त्रीप्रत्यय० ॥२॥३॥ ११५ ।
३३६ अन्वध्याभ्यो वसः ॥ २।४ । १५ ।
४२२. अन् स्वरे ।।३।२। १०१ ।
२६४ अपः ॥ १।४। ६५।
३४६. अपवर्गे तृतीया ।।२।४ । ५७ ।
३६४ अपायेऽवधिरपा० ॥२।४। ४२ ।

अहति ।। ७।२।१३२ । कालुकौमुदी-पूर्वा सूत्राङ्कः सूत्रम् २६८ अव् यनः ॥ १।४। ६२. ७३१ अभूततद्भावेकृ० ॥ ८।२। १८ । ४६६ अमूर्धमस्तकात्स्वा० ॥ ३॥ २॥ २१ । १६५ अडझे ॥ १।४१५२ ४८६ अर्चितम् ॥ ३ । १ । १७६ । १८ अर्थवदधातुविभ० ॥१।१।३१ । ५०८ अर्थे वा ।। ३। २ । १५७ । ४३६ अर्ध समेंऽशे वा ।।३।१।३७ । ४८५ अल्पस्वरम् ।। ३। १ । १७६ । ४२६. अल्पे ॥३।२।१०६। १२१. अवकुप्वनुस्वार० ॥२।२।७० । ६५४ अवयवात्तयट् ।।७।४।४४ । ७ अवर्जा नामिनः ॥ १।१।८। ८६ अवर्णभोभगोअ० ॥ १।३।५१ । १२४ अवर्णस्यामः सुट् ॥ १।३ । २३ । ३८. अवर्णस्येवर्णादा० ।। १ । २ । १३ । २६७. अवर्णादनः शतु०॥ १।४। ६१ । ४३५ अवादयः ऋष्टाद्य० ॥३।१।६४। ६४७ : अवेः संघातविस्ता०॥७॥४॥ २५ ॥ ३६४ अव्ययं कारकस० ॥ ३॥ १। २३ ।

१३.७
१ । २५।
परिशिष्टम्
सूत्राङ्क: सूत्रम्
२६४. अव्ययस्य ॥ ३ । २।७।
३६८ अव्ययीभावस्यातो० ॥ ३।२।२।
५५१ अश्वादीयो वा ।। ६।३।२०।
५४ असन्धिरदसोंमु० ।। १ ।२। ३५ ।
३२० असहनविद्यमा० ॥२।३।४५।
६७०. अस्तपोमायामेधा०॥ ८।१।।
७३० अस्मिन् ॥ ८।२। १६ ।
६६६ अहीयरुहोऽपादाने ।। ८ । १ । १०५
४५६ अह्नः ॥ ८।३।८।
आ..
१७१ आ अम् शसोऽता ॥ १।४। ८४ ।
२७६ आ अम्हसयोः ।।२।१।५४ ।
२२१. आः सौ॥ १।४। ७७ ।
३६६ आख्यातर्युपयोगें।। २ । ४ । ७८ ।
३६८ आङावधौ ।।२।४। ७७
४६३ आत्मनः पूरणे ।। ३।२।१४।
२११ आदिडबानां झमा० ॥ २ । १ । १०६ ।
२०. आदैदौदारो वृद्धिः ।। १ । ३ । ३६
आद्यन्ताभ्यां प्रत्याहा०॥ १११।५।
३
30

१३८
कालुकौमुदी-पूर्वाधं
सूनाङ्कः सूत्रम्
७० आद्यन्तौ टिकतौ ॥ १।१। ६२ ।
४६१ आद्वन्द्व ॥३।२।३१।
१५४. आद्वष्टेरः ।।२।१।७७ ।
३८० आधारे सप्तमी ।।२।४।१०२ ।
७४६ आधिक्यानुपू] ॥ ८।४।६६ ।
१७२ आपः॥ १।४।२८।
२६५ आवतः स्त्रियाम् ।। २।३.१.१ ।
२८३ आम आकम् ।।२।१।५३ ।
३३२ आमन्त्रणे ।।२।४।४५।
२७३. आमौः ॥२।१।४६ ।
३१६ आर्यक्षत्रियाद्वा ॥२।३ । ६० ।
hur
६०६. इकण् ।।७।२। १ ।
३२४ इतोऽक्त्यर्थाद्वा ।। २।३ । ७५ ।
६६८ इतोऽतःकुतः ॥ ८॥ १ ॥ १०७ ।
५३६ इतोऽनिनः॥६।२।१०।
६५१ इदं किमोऽतुरिकिय० ॥ ७।४। ४१ ।
२३६ इदमः।।२।१। ६६ ।
२३५ इदमदसोऽक्येव ॥१।४।१०।
१४०. इदुतोऽस्त्रेरौरीदूत् ॥ १।४। ४१ ।

परिशिष्टम् १३९ -- सूत्राङ्कः सूत्रम् ४८३ : इदुदन्तमसखि ॥ ३ । १ । १७० । ३१६ इन्द्रवरुणभव०॥२॥३॥ ५५ ॥ ४८ इन्द्र ॥१।२।८। २२३ इन्हन्पूषन्नयम्णां०॥ १।४।६८। २६३ इयं स्त्रियाम् ।। २।१।७४ । २६ ‘इवर्णादीनां स्वरे० ॥ १।२।१। ४५१ इवर्णावर्णस्य ॥ ८।४।७१। २५३ इसुस्सजुषाम् ।।२।१ । १०७ । chy ५५ ईदूदेद् द्विवचनं० ॥ १।२ । ३६ । ४६८ ईपः॥ ३।२। ६५ । ३०७. ईप्यतः॥८।४। ७२ । ४७६. ईबादीदूतां के.॥२। ३ । १०६ । १६२ ईरौः ।।२।१।६। ५६६ ईयो मत्वर्थजिह्वा० ॥ ७॥ १।४६ । ७३२ ईश्च्वाववर्णस्यान०॥४।१। ६० । उ ३२७ - उतोगुणादुखरु० ॥२।३ । ७८ । ६६ - उदःस्थास्तम्भोः सः॥ १।३। ६४ ।

४।१६।..
१४०
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
सूत्राङ्क: सूत्रम्
३०० . उदितोऽधातोः ।। २।३।८।।
२४६ . उदितो नुम् ॥ १।४।५८ ।
३०४ उपधालोपिनो वा ।। २।३ । १४ ।
४४६ उपमानानि सामा०॥३।११ १०३ ।
४४७. उपमेयानि व्याघ्रा० ॥ ३॥ १.१ १०४ ।
३४६ उपर्यधोऽधिभि०ि ।। २।४ । ५१ ।
४७३ उपसर्गात् ।। ८१३१.८५.
३४७ उपेन चोत्कृष्टे ।। २।४। ५५ ।
३७३ उभयप्राप्ती कर्त० ।।२।४।१०।
२०८ उभयोर्धावम् ।। १।४।८१
५१७ : उवर्णस्याऽस्वयंभु०॥८।४। ६६ ।
ऊ
४०८ ऊनार्थपूर्वादिभिः ।।३।१।५० ।
६५० · ऊवं दप्नंड्वयंस० ॥ ७।४ । ३५ ।
४२५ ऊर्याद्यनुकरणो० ॥३।१।१।
ऋ
३७ ऋलवौँ वा ॥ १ ॥ १ । १६ ।
४२ मृणे प्रवसनक० ॥ १.१ २ । १४ ।

परिशिष्टम्
१४१
सूत्राङ्कः सूत्रम्,
५८६ ऋतुनक्षत्रसन्ध्या०॥६।४। ८६ ।
५६० । ऋतुवायुपित्रुप० ॥ ६ । ३ । ७३ ।
३८८ मृते द्वितीयापञ्च० ॥२।४। १२४ ।
१६४ ऋतो डुः ॥ १। ४ ५१ ।
१८२ ऋतो र स्वरेऽनि ।। २.। १। ८८ ।
५६१ ऋतो रस्तद्धिते ये ॥ १ ॥ २ ३३ ।
४३ मृत्युपसर्गस्य ॥ १।२ । १६ ।
६४३ मृत्विग्भ्य ईयः॥ ७।३ । ७७ ।
१४८. मृदुशनस्पुरुदं० ॥ १।४ । ८६ ।
४७८. ऋन्नित्यदितः ।।८।३ । १०६ ।
५५० वर्णोवर्णेसुर्दो० ॥ ८।४। ८० ।
५२१. भृष्यन्धकवृष्णिकु० ॥ ६ । २ । ४४।
ल
लदन्ताः समानाः॥ १।१।।
एऐओऔ संध्यक्ष०॥ १।१।१०।
एकद्वित्रिमात्रा ह०॥ १।१।७।
१०० एकद्विवहुषु ॥ १ ॥ ४॥२।
१२० एकपदेरष्वर्णा० ॥२.१ २ । ६६ ।
६.

१४२
कालुकौमुदी-पूर्वा
सूत्राङ्क: सूत्रम्
७१३. एकात्सकृचास्य ।।८।१।१२६ ।
५०० एकादशषोडश० ॥ ३।२।१४।
३३ एदैतोरयायौ ॥ १।२।३।
४० एदेतोरत् ।। १ । २ । १६ ।।
१४१ एदोजसि ॥ १।४।४३ ।
१४४ एदोतो ङसिङसो० ॥ १।४। ७० ।
४४ एदोतोऽतः पदान्ते ॥ १।२ । ३२ ।
४६. एदोतोरुपसर्गस्य ॥ १।२।२६।
२१. एदोदरो गुणः ॥ १।१ । ३७ ।
२४० एनत्त्यदादेरेत० ॥२।१ । ६८ ।
२६० एरीबहुत्वे ॥२।१। ८३ ।
१७४. एपिटौस्सु ॥ १।४।३१ ।
१०६ एबहुस्भे ॥ १।४।११।
५१ एवेऽनवधारणे ॥ १।२।२६ ।
ऐ
१४६ . ऐः सख्युरितोऽशिधौ ॥ १।४। ८५।
ओ
१७० ओत औः ॥ १।४।८३ ।
३४ ओदौतोरवाचौः।। १ ।२।४।

परिशिष्टम्
१४३
सूत्राङ्कः सूत्रम्
४१. ओदौतोरौत् ॥ १।२ । २२ ।
५७ ओन्निपातः॥ १।२ । ३८।
ओम् ॥ १।१।१।
५२ ओष्ठौत्वोः समासे वा ॥१।२। ३१ ।
११३ ओसि ॥ १।४ १२ ।
औ
औदन्ताः स्वराः ॥ १।१।६
१७३ औरिः॥१। ४ । ३२।
२२८. औशष्टः ॥ १।४।५।
क.
७०५ - कथमित्थम् ।। ८ । १ । १२० ।
६२२. कथादेरिकण् ।। ७।३।२१ ।
५२२. कन्यायाः कनीनश्च ॥ ६ । २।४६ ।
३२३ कबरमणिविष० ॥२।३। ४६ ।
३३३ कर्तुाप्यं कर्म ।। २ । ४ । ३ ।
३७२ कतृकर्मणोः कृति ॥२।४।८६ ।
३५० कर्तृ साधनहेत्वि० ॥२।४ । ५८ ।
४०६ कर्तृ साधने कृता ।। ३।१।१२।
३५५ कर्मक्रियाभिप्रेयो० ॥२। ४ । ३२.।

१४४
कालकौमुदी-पूर्वा
।
सूत्रात सूत्रम्
३३५ कर्मणि द्वितीया ।। २।४।४७ ।
५४८ कवचिहस्त्यचित्ता० ॥ ६।३।१५।
४३१. कवञ्चोष्णे ॥३।२। १०८ ।
४१८ काकादिभिः क्षेपे ।।३। १ । ७८ ।
५०६ काममनसोस्तुमः ॥ ३.। २ । १४६ ।
७३५ का] साद्वा ॥ ८॥ २ । २२ ।
२४ कार्यायेत् ॥ १ ॥ १।३८ ।
३४८. कालाध्यनोरंत्यन्त०॥२।४। ५६ ।
४५३ कि क्षेपे. ।। ३ । १ । ११४ ।
२३० किमः कः ।।२।१।७६ ।
६६७ किमद्वयादिसर्वाद्य० ॥८।१ । १०६ ।
७०२ किमन्यैकसर्वय० ॥ ८ ॥ १।११२ ।
५११ किमिदमोः कीशीशौ ।।३।२ । १३५ ।
४२७. कुः पापाल्पयोनित्यम् ॥ ३॥ १। ८६ ।
१५. कुचुटुतुपु वर्गाः ।। १।१।१६।
७०१ कुत्रानककुहेह ।। ८ । १ । १११ ।
४४५ कुत्सितानि कुत्सनै० ॥३।१ । १०२ ।
७३८ कुत्सिताल्पाज्ञातेपु ।। ८१२ । ४७ ।
५३७ कुलादीनः॥६।२।११६ ।
५६३. कुशले ।।७।१।१८।
५१२ कृतलब्धक्रीतसं० ॥ ७॥ १।१७।

परिशिष्टम् VM सूत्राङ्क: सूत्रम् ४१५ कृति ॥३।१।६४। ६०४ ते ॥ ७१ १०६ । ३७६ 'कृत्यानां कर्तरिवा॥२।४।१३। ५०४ कृत्येऽवश्यमो लोपः ॥ ३।२।१४७) ६८० कृपाहृदयाद्वालुः ॥८-१.७४।-- १५३ केवलसखिपतेरौः ॥ १४ ॥ ४५ ॥ ४२८ कोः कत्तत्पुरुषे ।।३।२। १०२। ३७७ तस्य वर्तमानाधा० ॥२।४। १००। २६३ वाकृन्मान्तम् ॥ २॥ ११:४६। ३२६ क्रियानिमित्तं कार० ॥२१.४३.१) ३३६ क्रियाविशेषणात् ।। २१४॥ ४८) ३५६ ऋगुहेासूयार्था ॥२४॥३७॥ १६१ : क्रोष्टु स्तृजवत् पुंस्यधौ ॥ १।४।८५ २५७. कस उष्मतौ च ॥२॥ १। ३७ ॥ २०७ कस्स्स्र सूध्वंस्भ्रसनडु० ॥ २ ॥ १ ॥६६। ५७३ कामेहत्रतसस्त्यप् ॥ ६॥ ४ ॥ १५ ॥ १५६ किप्समासस्यासुधि० ॥२.१ ॥२१॥ ११६ किलादेकपदेऽप०॥२॥२॥१४॥ २२४. के कस्वरवतः ।।२।२।८४ ५३४ क्षत्रादियः ।।६।२।११६ ५२८. क्षुद्राभ्यो वा ।। ६।२।१०३

१५२. खितिखींतीयाद् ङसि०॥ १।४।५०।
कालुकौमुदी-पूर्षि
सूत्रम्
३१८ हुभ्नादीनाम् ।। २।२। १०६ ।
६४५ क्षेत्रे शाकटशाकि० ।।७।३।७६ ।
ख
७२: खसे चपा झथानाम् ॥ १।३।४०।
५०३ खित्यनव्ययस्वरा० ।। ३।२।१३६ ।
... .. ग
४२६ गतिः॥ ३१.१.१ ८७।
३४२ गतिवोधाहारश० ।।२।४।२१ ॥
३६२ गतेरप्राप्त वा ॥२।४।७।
५२४ गर्गादेर्यम् ॥ ६.। २।५७ ।
४५ गवः स्वरेऽनक्षे॥ १।२।७।
५८२ गहादिभ्यः।। ६।४। ६५ ।
७१७ गुणाङ्गादिष्ठ यसू० ।। ८।२।।
५५६ गोः पुरीपे ।। ६।३। ५२ ।
५४१ गोः स्वरे यः।। ६।२।३० ।
५२३. गोत्रे विदादेः पौत्रा०॥ ६।२।५६।
५४५ गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्ररा०॥ ६।३ । १३ ।
३३४. गौणात् ॥ २।४।४६.
३०८. गौरादिभ्यः।।२।३ । २७ ।

परिशिष्टम् १७ सूत्राङ्कः सूत्रम् ५५२ ग्रामजनबन्धुग०॥ ६॥ ३ ॥२६॥ ५७१. ग्रामादीनञ् च ।। ६।४।५। घ. ४६६ घञ्युपसर्गस्य ब० ॥३।२। ८७ । १२३. डसिंङयोः स्मास्मिनौ ॥ १।४।२८ २८१ ङसिभ्यसोरः ।।२।१।१।।.. ११०. ङसिराद् ॥ १।४।१३।। ११२ डस् स्यः ।।१।४।१४॥ १७५ ङिता यैयास्यास्यामः ॥१।४।२६ । १२६ डिति तीयस्य वा ॥ १।४।२६।। १४३ ङित्यदिति ॥ १।४।४४।.. १५१. डित्येत् ॥ १।४।४६। १४५ डेडौंः ॥ १।४।४५॥ १०८ डेयः ॥ १।४।१६। ७४. णुनो ह्रस्वाद् द्विः स्वरे ॥१॥३.१ २२ । च २४५ चजोः कगौ.॥२।१।११६ । २६४ चतुर आम्॥ १।४। ७८

..
४७५: जायाया जानिः ।। ८।३।
कालकोमुंदी-पूर्वा
सूत्रम्
६३ चतुरो येयौ च लो० ॥ ७॥ ४.१५७।
१११ चतुर्थी प्रकृत्यां ।। ३।३।५६ ।
६८५ चतुर्वर्णादिभ्यष्टयण ।। ७।४। ६५ ।
५०२ चत्वारिंशदादौ वा ।। ३।२।६६ ।
७३ चपाच्छश्छोऽमे वा ॥ १।३।३।
६११ चरति ।।७।२ । १२ ।
२६१ चवाहाहैवयोगे॥२।१ । ६४।
२६ . चादयो निपातः ।।१।१।४।।
४८१ चार्थे द्वन्द्वः सहोक्तौ ।। ३ । १ । १३३ ।
७३४ चियग्यङ्ग्यादादिय० ।।४।११५१: ।
६२ जवादो झभाः ।। १ । ३।४।
४०३. जराया जरस् च ।।८।३। २६ ।
१७८ जराया जरस् वाः।।२।१।८६।
११६ जस इश्।। १।४।१६।।
१६३ जस्शसोः शिः ॥२॥१७
१५६ जस्शसोडतिष्णोलुकः।। १।४।४।
६६४ जातीयदेशीययोः ।। ३।२। ६२ ।
३१३ जातेरयोपधनि० ।। २।३।३६ ।
७२१. ज्यायान् ।। ८।४।३६ ।

परिशिष्टम् । १४९ सूत्राङ्कः सूत्रम् झं ६६६ झपात् ॥ ८ ॥ १ ॥३॥ ३१ झवे जवा झसानाम् ॥ १।३।४३ । ५६ झसा जबाः॥२।१।१०८। ३६ सानां झसे सब० ॥ १।३।। ६३ । अं ६० बमे जबा आमा वा ॥ १।३।१। 'ट. २७८ दाङयोसिं यः॥२१॥ ५५ ॥ १६३, दादौ स्वरे वा ॥२॥४।८८i १४२ टा नाः पुंसि ॥१।४। ४२ । : ६३४ टेः ।।८।४।४४। १०६ टेनः ॥ १।४।१५। ड ७०७ . डत्यतु संख्यावत् ॥ १।१।५७। १४६ डिति टेः॥८॥४॥ ८४ । १३८. णषमसिद्धं परे० ॥ २ ॥ १।६१ ५७५ : णोऽरण्यात् ।। ६।४।२१ ।

१५० कालुकौमुदी-पूर्वा सूत्राङ्कः सूत्रम् त २३६ तः सौ सः।।२।११७८॥ ४६७ तत्पुरुष कृति ॥ ३॥ २१ २२ । ६२६ तत्र ।।७।३।५४ । ५६१ तन जाते ॥ ७११ । १। ६२० तत्र साधौ ।। ७।३। १५ । १७. तदः सेः स्वरे पाद०॥ १।३ । ६५ २३. तदन्तं पदम् ।। १ । १ । २२ । ६४८ तदस्य संजातं ता०॥७१४।३१.! ६६६ तदस्यास्मिन्नस्तीतिः ॥ ८॥११॥ ५६२ तद्वत्त्यधीते ।। ६।३। ८५ । ५१४: तद्धिताः ॥ ६।२।१। ५४६ तद्धितेऽनातियस्व०॥ ८।४।७८ । ६०६ तरति ॥ ७१२।१०। ५८४. तवकममकावे०॥ ६।४। ७०। २८२ तवमम डसा ॥२।४।४८॥ ६६६ तसादिः स्यादिवत् ॥ ८॥ १ । १२१ ॥ ५१२ तस्करादयश्चोरा०॥३।२ । १५६ । ६२३ तस्मै हिते।। ७।३।३५ । ६३० तस्य ।।७।३।५५ । २५ तस्य लोपः ॥ १ ॥ १. २६ ।

परिशिष्टम् सूत्राङ्कः सूत्रम् ५४४ तस्य समूहे ॥ ६॥ ३॥ १०॥ ५१६ . तस्यापत्ये ।। ६ । २ । ३१ । ६२७ तस्याहे क्रियायां वत् ।। ७।३।१२। ... ६०५ तस्येदम् ।। ७।१।११२ । ३६०. तादर्थ्ये ।। २।४। ६४ । ३०३ ताभ्यां नेप् ।। २ । ३।६। २४६ तिर्यचस्तिरश्चः ।। २ । १ १ ३४। ५६० तिष्यपुष्ययोर्नक्ष० ॥ ८।४। ७६.! २७६. तुभ्यंमद्य डया ॥२॥ १।४७ । ४१० तुम्क्त्वाक्तवतुभिः ॥ ३॥ १॥ ५५॥ १७. तुल्यस्थानाभ्यन्तर० ।। १।१।१८ । ४६० तुल्यार्थं चानेकञ्च ।। ३ । १.१ १२८६ :: ३८७. 'तुल्याङ्कृस्तृतीयाद्याः ॥२। ४ ।.१२२ । ३७४ . तृन्नुदन्ताव्ययक० ।।२।४। ६५. १६२ तृस्वसृनप्तनेष्ट० ।। १ । ४।५४ । ५६५ तेन छन्ने रथे ।।६।३ । ६६ । ६०७. तेन दीव्यतिखन० ।। ७।२।२। ६०३ तेन.प्रोक्त ॥७१।६१ । ५४३. तेन रक्त रागात् ॥ ६।३।१ ६४६ तेन वित्ते चञ्चुच० ।।,७१४१ १६ ! ४६५ तेन सहः॥ ३॥ १ ॥ १३०१ १५२ कालुकौमुदी-पूर्वा सूत्राङ्कः सूत्रम् २८७. ते मे उडसा ॥२॥१॥८॥ ५७७ तोऽशश्वदकस्मात् ॥ ८।४। ८१ । ६७ तो पि ॥ १।३।८॥ ५८० त्यदादिः ॥ ६॥ २॥ १० ॥ ७१६ त्यादिकिमेदव्यये॥८१२।४। ७४० त्यादिसर्वादेरक् प्रा० ।।८।२।४३ । ७२४ त्यादेश्च प्रशंसायां॥८॥२॥ १८१ त्रिचतुरः स्त्रियां ति० ॥२।१ । ८७ । ६६२ नेस्तृ च ॥७॥४॥५६ । २७० त्वमहं सिनाकः प्रा० ॥२॥ १॥ ४५ ॥ २७५ त्वमौ प्रत्ययोत्तर० ।।२।१।४४ । २८८. त्वामामा ॥२॥ १। ५६ । थ ६६५ थटि॥ ११॥ २८ ॥ १६७ थुटि ॥ १।४।५३ । २२० थो नुट् ॥ १।४।७६ । द ५७४ दक्षिणापश्चात्पुरु०॥६।४।१०। ६७६ दन्तादुन्नतात् ।। ८1१1 ५६ । ३५६ दानपात्रे चतुर्थी ।। २।४। ६३ । ५६५ दिगादेयः॥ ७११ । ३२ ।

परिशिष्टम्
! -
सूत्राङ्कः सूत्रम्
२५२ दिशूशस्पृश्मृश्दधृपु० ॥ २ ॥ १ । १०० ।
१४ दीर्घः ।। १ । १ | १५॥
१६७ दुशन्यादेरनेक० ।।२।१।५।
५३८ दुष्कुलादेयम् ॥ ६॥ २ । १२२ ।
३४१ दुहाद्यर्थानामवि० ॥२॥ ४ । १६ ।
३७० दूरान्तिकार्थवहि० ।। २।४।८४ ।
३६० दूरान्तिकार्थादस० ॥ २।४ । १२६ ।
५०६ ग्क्षेषु ।। ३।२ । १३३ ।
५६७. दृतिकुक्षिकलशि० ।। ७।१।३५॥
६८६ देवात्तल् ॥ ७१४१६६।
२३२ दोमः स्यादौ ॥२।१।७५ ।
२५६ दोमोऽवर्णस्य ॥ २ ॥ १। ८४ ।
२१२ द्रुमुहष्णुष्णिहां वा ।।२।१ । ११४ ।
७५१: द्वन्द्व वा ॥ ८।४।१०।
१२७ द्वन्द्व ।।१।४।२१ ।
१२६. द्वन्द्व न सर्वादिः॥१।४।२४।।
४८२ द्वन्द्व लघ्वक्षरमे० ॥ ३।१।१६८।।
७१५ द्वयोविभज्ये च तरः ।। ८।२।२।
३१४ द्विगोः समाहारात् ।। २ । ३ । ४१।।
५६८. द्विगोरनपत्ये य०॥ ६।२।२६।।
७१२ द्वित्रिचतुर्व्यः सुच् ॥ ८॥ १ ॥ १२८ ।

...४२३ नखादयः ।।३।२। १००.1
१५४
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
सूत्राङ्कः सूत्रम्
६५६ द्वित्रिभ्यामयड्वा ।।७।४।४५ ।
७१० द्विर्धमुन्धौ ॥८।१। १२५ ।
५०१ द्वित्यष्टानां द्वात्रयो० ॥३।२।६५।
४७२ द्विपदाद्धर्मादन् ।। ८।३।७४ ।
३७६ द्विषः शतुर्वा ॥२।४।६६ ।
५२७ - द्विस्वरादनद्याः॥ ६।२। ८६ ।।
६६१. द्वस्तीयः ।।७।४। ५५ !
ध
६१४. धर्माधर्माभ्यां चर० ।। ७१.२॥ ४३
१५७ धातोरिवर्णोवर्णः ॥ २ ॥ ११ १३ ।
५८ धावोदितौ ॥ १।२। ४२ ।
५४६ धेनोरनमः ॥ ६।३१६ ।।
...न
४८० न कपि ॥२।३। ११० ॥
४५४ न किमः क्षेपे ॥ ८।३।२।
४२१. ननत् ।।३।२।६७ !
४५५. नमस्तत्पुरुषात् ।। ८।३।५।
४२० नञ्तत्पुरुषः ।।३।१३४।
१५० नटा नाः।। १।४।४८।
२२६ नडादिभ्य आयनम् ।। ६।२।६८।

परिशिष्टम्
१५५
सूत्राङ्कः सूत्रम्
५७२ नद्यादेरेयण ।। ६ । ४ । । ।
६७५ न द्रव्यादिभ्यः ।।८।४।१८.।
२१७ न धौ ।।२।१ । १२२ ।।
३४३ ननीखाद्यदिहाशब्दा० ।। २।४ । २६ ।
६६ न पदान्ताट्टोरना०॥ १।३।७।
२६० न पादाद्योः ।।२।१।६३ ।
१६६ नपुंसकस्य स्यमो० ॥२।१।१।
१६८ नपुंसके ॥२।३। ११३ ।
२६६ नपुंसके वा ॥२।१।१२३ ।
२१६ नरः सुपि ॥२॥ ११.१०४।
६६२ . नवादीनतनलं० ।। ७।४ । १.०३ ।
४७४ नसस्य ॥२॥२॥ ७५
६६८ नस्ते मत्वर्थे ॥ १ ॥ १।२६ ।
२६२ नहो धः ।।२। १.। ११५ ।
६६. नाग्नञ् समासे ॥१.१३। ६१ ॥
३६३ नाम नाम्नैकार्थं स०॥३।१।१६।।
६६० नामरूपभागेभ्यो।७।४।१०१।।
१३१. नाम सिदयहसे॥ १।१।२३।।
२००. नामिनः स्वरेऽनामि ।। २।१।१०
१३ नामिनो रोऽवे ॥ १।३।५५॥
२०१. नामिनो लोपः।।२।१।३।।

१५६ कालुकौमुदी-पूर्वा सूबाङ्कः सूत्रम् ३३१ नाम्नः प्रथमा ॥२४।४४। ७२६ नाम्नः प्राग बहु ॥ ८॥२८॥ १३५ नाम्नो नोऽनह्नः ।।२। १ । १२१ । ६७१ नावादेरिकः ॥ ८॥ १।१०। ३२५ नारी सखी॥ नारी सखी ।। २।३।७४। ३२१ नासिकोदरौष्ठज० ॥२।३।४६। ६१५. निकटादिषु वसति ॥ ७ ॥२॥ ८२ । ३४४ निकषासमयाहा०॥२।४।४६ । १७६ नित्यदिद्विस्वराम्बा०॥ १।४।४। २८६ नित्यमन्वादेशे ।।२।१। ६६ । ४८६ नित्यवैरिणाम् ॥३॥ १ ॥ १५२ । १८४ नित्यत्रीदूतः॥ १।३।३४ । २६२ निपातस्वरादयो ०॥ १ ॥ १॥४८॥ ३८३ निमित्तात्कर्मसंयु० ॥२।४ । १०८।। १५८. निय आम्॥ १।४।४६ ४३७ निरादयो गताद्य० ॥३॥ १। ६६ । ३८५ निर्धारणेऽविभागे०॥ २१४१ ११२ । ३५३ निषेधार्थकृताधः :॥२॥ ४॥ ६१। ५५८ निष्फले तिलात् पिञ्ज० ।। ६।३। ६५ । ११५. नुट्यतिसृचतस्रोः॥ १।४।७३। १८६ नुडामः ।। १।४।३६ १ परिशिष्टम् १५७ सूत्राङ्कः सुत्रम् १६० नुभ्रुवोः ॥२।१ । १६ । २५५ नुम् विसर्गशसान्तः ॥२१२ १.१५ ॥ १६४ नुम् हझसातः सौ ॥२॥ १॥ ८॥ १६८ नुर्वा ॥ १।४।७४। २६६ नृतोऽस्वस्रादेः ।।२।३।७। ४६६ नेन्द्वादिभ्यः ॥३।१ । १६५ । १२८ नेमाल्पप्रथमच०॥ १।४।२०। ६३६ नैकस्वरस्यः॥ ८।४। ४५ ५० नैत्येधत्योः ॥ १ ॥ २.। २७ । । ४०६ नोऽपदस्य तद्धिते ॥ ८।४। ६२ । १६६ नोपधाया तुटि चा० ॥ १।४। ६३ । ८१ - नोऽप्रशानः सक् छते ॥ १।३ । १३ । ६६० नो मट् ।। ७१४।५२ । ६१० नौ द्विस्वरादिकः ॥७॥२॥ ११ ॥ ५६४ न्यायादेरिकण ।। ६ । ३। ८६ । २५० स्महतः।।१।४। ६४। प ६१३ : पक्षिमत्स्यमृगाख्ये० ॥७॥२॥३८ । ४१३ , पञ्चमी भयादिभिः॥३॥ १ ॥ ६०.. ३६५ पञ्चम्यपादाने ।।२।४।७५ । ६३६ पतिराजान्तगुणा० ।। ७ । ३.। ६१ ।

५५५, पित्रोर्डामहट्॥६।३।२ कालुकौमुदी-पूर्वा सूनाङ्कः सूत्रम् २१६ पथिन्मथिनूभुक्षा० ॥११४१७५ । २२२ पथिन्मथिनूभुक्षां० ॥२।१।२७ । २८५ पदादेकवाक्ये द्वि०॥२॥११५६ । २५४ पदान्ते ॥२।१।१५। . ५७८ परजनराज्ञोऽकीयः॥६।४।३१ । ४६४ परात्मभ्यां चतुर्थ्याः॥३।२। १७ । ६१२. पर्यादेरिकट ॥ ७१२ १३ । ३६७ पर्यपाभ्यां वर्जने ।। २।४ । ७६ । ४३६ पर्यादयो ग्लानाद्य० ॥३।१।६५ । ६२१ पर्षदो ण्यणौ ॥७।३।१८ । ५८६ पश्चादग्रान्तादिमः ॥ ६।४।७८ ॥ १३७ पाददन्तनासिका० ॥ २॥ १॥ २४ ॥ ७२।७ पाशः क्षेपे ।। ८।२। ११ । ५५४ पितृमातृभ्यां व्यडु०॥ ६।३। ३० । ४४२. पुंवत् कर्मधारये ॥३।२। ६१ । ४६३ पुंवद् भापितपुंस्का०॥३।२।४८ । २५६. पुंसोः पुमन्सः॥ १।४।५७। १३३ पुंखियोः स्यमौजस् ॥ १।११५५ ३२२. - पुच्छात् ।।२।३।४८। ४१२ पुत्रे ।। ३।२।४०। 3.

परिशिष्टम् . सूत्राङ्कः सूत्रम् ५५७. पुरुषात् कृतहित० ॥६।३। ६४। ४३० पुरुष वा ।।३।२। १०७ । ४१६ पूरणशतशाना० ॥३।१।७४ । १२५ पूर्वादिभ्यो नवभ्य० ॥ १। ४ । २२ । ४३८. पूर्वापराधरोत्तर० ॥३।१ । ३५। ६३३. पृथुमृदुभृशंकृ०॥८।४।४६ । ६३२ पृथ्वादेरिमन् वा ॥ ७॥ ३॥ ५६ । ५१३. पृषोदरादयः ॥ ३ । २ । १५८ । ६६३ प्रकारे जातीयः ।। ८११।१२। ७०४, प्रकारे था॥ ८।१ । ११६ । ७२६ 'प्रकृते मयट् ॥ ८॥ २॥ १५॥ ३५४ प्रकृत्यादय आख्या०॥२।४।२६ | ७१४ प्रकृष्टे.तमः॥८।२।१। ६८३ प्रज्ञादिभ्यः।।७।४।८८ । ६१ 'प्रत्यये ॥ १॥ ३ ॥ २॥ ३६६ प्रथमोक्त प्राक् ॥ ३ ॥ १।१६५ । ६०१ प्रभवति ।। ७।१। ६६ । ३६६ प्रभृत्यन्यारादि० ॥ २।४ । ८१ । ६४६ प्रमाणान्मात्रट ।। ७।४। ३३ । ७१६ प्रशस्यस्य श्रः॥८।४।३४। ४७०. प्रहरणेभ्यः॥३।१।१६६।

१६० कालुकोनुदो-पुर्याय सूत्राः सूत्रम् २६१ प्रागिनात् ।।२।१।८२ । ५१५ प्राग्दीव्यतेरण ।। ६।२।१४ | ७३७ प्राग्यावाल्कच्॥ ८.१२॥४२ ५३६ प्रावतोऽग्निकलेरे० ॥ ६।२ । २७ । ४३२ प्रादयो गताद्यर्थः ॥ १।१२ २७ प्रादिरूपसर्गः क्रि० ।। १।११४१ ! ६३५ प्रियस्थिरस्फिरोरु०॥ ८॥४॥ ३८॥ ७५० प्रोपोत्समः पादपू० ।। ८।४। ६५ । ब ७४४ बहूनां प्रश्ने इत० ।। ८१२॥ ६८ । ७१८ बहोनीष्ठे भूय् ॥८१४|४० । ७२८ वह्वल्पार्थात्कारका०॥८॥१॥ १२ ॥ ६४४ ब्रह्मणस्त्वः ।। ७।३ । ७८ । भः ३१५ भर्तृ योगादपाल० ॥ २।३१ ५१ ५७६ भवतोरिकणीय० ॥ ६।४।३०। ५६४ भवे ।।७।१।३१ । ६३१. भावे त्वतलौ ।। ७।३।५६ । ३७८ भावे वा ॥ २१४।१०१ ।। २०३ भाषितपुरकं पुव० ॥२॥१। १२ ।

परिशिष्टम् सूत्राङ्कः सूत्रम् २६५ भि दुपाम् ॥२।१।१०। १०७ भिस ऐस् ॥ १।४।६। ६६५ भूतपूर्व चरट् ॥ ६ । १ । ६५ । ६३७ · भूलॊपश्चेवर्णस्य ॥ ८ । ४ । ४१ । ७४६. भृशाभीक्ष्ण्यसातत्य० ॥८।४।८५। ६८४ भेषजादिभ्यो यण ।। ७।४ । ६४| २८० भ्यसोऽभ्यम् ।। २ । १ । ५२। ५३० भ्रातुय॑श्च ।। ६ । २ । १०७ । २६६. वादेरिदुतोर्दीर्घो० ॥ २॥ १।१४। २१० भ्वादेर्दादेषः ।। २। १ । ११३ । म. मणीवादीनां वा १ । २। ३७ । ३०६ मत्स्यस्य यः ।।८।४।७३ । ५६८ मध्यादिनण्णेया०॥ ७ ॥ १.१ ४८ । ३०१ : मनो डाब वा ॥२॥३।४। ५३५ मनोर्याणौ पुक् च ॥ ६ । २ । ११७ ॥ ६६१ मर्तादिभ्यो यः ।।७।४।१०२ । ३१७ मातुलाचार्योपाध्या० ॥२।३।५६ ॥ २४८. मादुवर्णोऽनुः ॥२।१ । ८१।। ६२६ मानिफ्यङ्कच्तत्रत० ॥ ३:१२॥४६॥ २७१. मान्तयोर्युवावौ द्वि० ।।२।१।४३ । ॥ .

कालुकौमुदी-पूर्वाध
'।
७७
सूत्राङ्कः सूत्रम्
६६७ मावर्णान्तोपधाद्व० ।। ८1१।२।
१३० मासनिशासनस्य० ॥२।१ । २३ ।
४८७ मासर्तुभ्रातृनक्ष० ॥३।१ । १८२ ।
१६५ मिदन्त्यस्वरात्परः ।। १ । १। ६३ ।
३०६ मुख्यात्पिट्टिदणनम् ॥ २।३ । २० ।
४६५ मूर्ख देवानांप्रियः ।। ३ । २ । ३४ ।
६१७. मूल्यैः क्रीते ॥ ७॥२१०५ ।
६८७ - मृदस्तिकः ॥ ७१४।६७ ।
मोऽनुस्वारयमौ ह० ॥ १।३। १८ ।
२२६ मो नो वमोश्च ।।२।१।१८
नां झसे यमः सव०॥ १।३।३४ ।
य
५२५- यमनोऽश्यापर्णान्त०॥६।२ । १३६ ।
६५३ यत्तत्किमः संख्याया० ।।७।४। ४३।
७४३. यत्तत्किमन्येभ्यः ।।८।२।६७।
६५२ यत्तदेतदो डावट् ॥७।४।४२ ।
४०१ यथाऽसादृश्ये ।।३।१।२४।
३८२ यस्य भावेन भाव० ॥४।२।१०६
७४५ यावादिभ्यः कः॥ ८।२। ७२ ।
६४१ युवादेरणं ।। ७ । ३। ६८ ।
७२२ युवाल्पयोः कन् वा ॥ ८१४।३३।
७६

: परिशिष्टम्
१६३
सूत्राङ्क सूत्रम्
७४१ युष्मदस्मदोरनो० ॥ ८।२ । ४४ ।
२७२ युष्मदस्मदोर्लोपः० ।।२।१ । ४१ ।
३२८ यूनस्तिः ।। २।३ । ८६ ।
२७४. यूयं वयं जसा ।।२।१।४६ ।
३५२ येनाङ्गिविकारः ॥२।४। ६० ।
५४२ येऽयकि ॥ १।२।५।
८७ यो विसर्गस्य ॥ १।३।५४ ।
र
६१ रः॥ १।३।५६ ।
५४७ राजन्यमनुष्ययू०॥८।४। ५१
५३२ राज्ञो जातौ ॥ ६ । १ । ११५ ।
४५२ राज्ञोऽस्त्रियाम् ॥ ८।३।७।
६८६ रादेफो वा ।। ७।४।१००।
१६६ रायो हसे ॥ १।४।७।
५७० राष्ट्रादियः॥ ६।४।२।
३५७ रुच्यर्थानां प्रीयमा० ॥२।४।३३।
है रोऽरस्यादिभे ॥२॥ १।१०६ ।
१४ रो रि लोपो दीर्घश्चा० ॥ १।३। ३६ ।
६४२ लघुपूर्वाद् य्वर्णात् ।। ७। ३ । ७२ ।

कालुकौमुदी पूर्षि
सूत्राङ्कः सूत्रम्
६८ लि लः ॥ १।३ । १० ।
२८ लोकात् ।।१।१।३।
च
३११ वयस्यचरमेऽतः ॥ २॥ ३ । २५ ।
६०० वर्गान्तात् ।। ७।१।५० ।
६३८ वर्णढादिभ्यष्ट्यण ।। ७।३। ६० ।
४८८ वर्णाः ।।३।१ । १८७ ।
६८८ वर्णाव्ययात्स्वरूपे० ॥ ७।४। ६६ ।
५८८ वर्षाकालेभ्य इकण ॥ ६४।६१ ।
१६६ वर्षापुनई नकारा० ॥२ । १ । २२
२३७ वसुराटोः॥३।२।८३।
६७८ वाच आलाटौ ॥ ८॥ १॥ ४६ ।
६७६ वातातीसारपिशा०॥ ८ ॥ १. २८ !
३६६ वा तृतीयासप्तन्योः ।। ३ । २।३।
२८६ वाम्नौ द्वित्वे ।।२।१ । ५७ !
१८७ वामशसि ।। २ । १ । १८ ।
५८३ वा युष्मदस्मदोऽत्री० ॥ ६ । ४१.६
७११ वारे कृत्वस्!।। ८१ १ १ १२७ ।
१११ वावसाने ॥ १।३।४१ ।
८३ वा शसे ।। १ । ३।४५
२२७. वाष्टन आः स्यादौ ।।.११ ४।६।

१६५ ७१२ वैकाद् द्वयोनिर्धायः॥ ८।२। ६६ । परिशिष्टम् सूत्राङ्कः सुत्रम् १२ वाहपंत्यादयः॥१॥३१५७ । ६५६ विंशतेस्तेडिति ॥८।४।६८ । ६५८ विंशत्यादेर्वा तमत् ।। ७।४।४६ । ५५३ विकारे ॥ ६।३।३३। ७०८ विचाले च ॥८।१ । १२३ । : .. .. .. ६८२ विनयादिभ्य इकण ॥ ७ । ४ । ८४ । ३८६ : विना तृतीया च ।। २।४। १२५ ॥ ४४० · विरोधिनामद्रव्या० ।। ३ । १ । १६० । .. ४४१ विशेषणं विशष्ये।। ३ । १ । १.०० । ४६२ विशेषणम् ।।३।१ । १६१। .८२ विसर्गस्य सश्छते ॥ १।३। ४४। ४०५ वृत्यन्तः।।११। २६ । ७२० वृद्धस्य च ज्यः।।८।४ । ३५॥ ५८२ वृद्धादीयः ।। ६ । ४] ३२ : ५१६. वृद्धिः स्वराणामादे० ॥ ४॥ ४॥ १.१. १३६ वेङयोः ॥२॥ १ ॥ २६॥ १८८ वेयुवोऽस्त्रियाः ॥ ११.४॥ ३५॥ ७३३ वेर्लोपः ॥ ४।४। ४८। ७०६ वैकाद् ध्यमुम् ।।८।१ । १२४ । ६७३ ब्रीह्यादिभ्यस्तौ ।।८।१ । १२ ।

॥२४।८७
कालुकौमुदी-पूर्षि
सूत्राङ्कः सूत्रम्
श.
५३ शकादीनां टेरन्थ्वा० ॥ १। २। ११ ।
४०२ शरदादेव्ययीभावात् ॥ ८।३ । २७ ।
१७६ शराजभ्राज्यसृमृध्रस्ज्० ॥२।१।११७ ।
५६६. शरीरावयवात् ।।७।१ । ३३ ।
६२४ शरीरावयवाद्यः॥७।३। ३७ ।
१०५ शसोऽता दीर्वः सश्च० ॥ १।४।७२ ।
२७७ शसो नश् ।।२।१। ५०।
४४४ शाकपार्थिवादीनां० ॥३।१ । ११०
३४ शात् ।। १।३।।
६७२ शिखादिभ्य इन् ।।८।१ । ११ ।
शिदनेकवर्णः स०॥ ८१४ । १२४ ।
५२० शिवादेरण।। ६।२।४२।
१३२ शिस्थुः ।। १ । १।५४ ।
७१. शे चग्वा नोश्चे॥ १।३। २१ ।
शेष ॥३॥ १॥ १६८।
५६६ शेपे॥ ६।४।१।
३१२ शोणादेः ।। २ । ३ । ३४ ।
६१६. शोभते ॥ ७॥ २ ॥ १७३ ।
४०७ श्रितादिभिः॥३।१।४५।
३७१ शेपे

परिशिष्टम्
१६७
सूत्राङ्क: सूत्रम्
३५८ श्लाघह्न स्थाशपां ज्ञी० ॥२।४ । ३४।
२१८ श्वन् युवन्मघोनामी० ॥२।१।२६ ।
५३१ श्वशुराद्यः ।। ६ । २ । ११४ ।
ष
६६४ षट्कतिकतिपया०॥७।४।५८
३८२ षड्यनादरे ॥२।४। १११ ।
४१४ षष्ठ्ययत्नाच्छषे ॥३।१।६३
४६ षष्ठ्यान्त्यस्य ॥८।४।१२३ ।
६५ ष्टुभिःष्टुः ॥ १।३। ६ ।
.
६५७ संख्यापूरणे डट् ।। ७।४ । ४८ ।
४४६ संख्यापूर्वो द्विगुश्च ॥ ३ । १ । १२४ ।
७०६ संख्याया धा॥८।१ । १२२ ।
२१५ संख्याया णः ॥ १। ४ । ३८।
१५५. संख्यायास्त्रेस्त्रयो नु० ॥१।४।३।
५७६ संज्ञा वृद्धं वा॥६।२।६।
५६३ सन्धिय्वोरैडौट च ॥ ८।४। २३ ।
७४७. संभ्रमे यावद्वोधम् ॥ ८।४।६३ ।
२०६ संयोगस्य ।।२।१ । ११६ ।
१६० संयोगात् ।।२। १.। १५ ।

१६८ कालुकौमुदी-पूर्वा सूत्राङ्कः सूत्रम् १३ संयोगे गुरुः ॥ १।१ । १४ । ६०८ संस्कृते ।।७।२।८। ५६७ संस्कृते भक्ष्ये ॥६।३। १०७ । ६४० सखिदूतवणिग्भ्यो० ।। ७।३। ६४ । ४५० सखेष्टः ।।८।३।६। ६१६ सतीर्थ्यः ॥ ७।२। ८३ । ७०३ सदाधुनेदानी त०॥ ८।१ । ११३ । ३२६ सपल्यादौ ।। २ । ३ । ६६ । ४१७ सप्तमी शौण्डादिभिः॥ ३॥ १।७७। ४६८...सप्तम्यन्तम् ।।३।१।६३ । ७०० सप्तम्याः ॥८॥ १।११० । ४२४. सप्तम्युक्त कृता॥३।१।१८। ३६१ समर्थार्थनमस्व०॥२॥४॥ ६७ । ३६ समानानां सवर्णः ॥ १।२ । १२ । १०४. समानादमः॥ १।४। ७१ 1.. ३६५ समासप्रत्यययोः ।।३।२।६। ५०५ समो हितततयोर्वा ॥३।२ । १४८ । ७८ सम्राट् ॥ १।३ । २० । ४५६ साशसंख्यातपु० ॥ ८।३। ५५ । ४५७ साशसंख्याव्ययात् ॥ ८॥ ३॥ १०॥ ४६७. सर्वादिश्च बहुव्री० ॥ ३॥ १ । १६० ।

११७ ।
परिशिष्टम्
सूत्राङ्कः सूत्रम्
१२२ सर्वादेः स्मैः ।। १।४। १७ ।
१७७. सर्वादेर्यस्य सुडा० ॥ १।४।३०। ।
३६२ · सर्वादेश्च सर्वाः ।। २।४ । १२८ ।
३४५. सर्वोभयाभिपरि० ।।२।४ । ५० ।
२८४. सविशेषणमेका०॥ १।१ । ३० ।
४६६ सहस्य सो वा बहु० ।। ३ । २ । १२४ । .
३५१ सहार्थे ।। २।४ । ५६ ।
२१३. सहेः साडः ॥२।२।३८ ।
७३६. सासुगोः ।। २।२। ६७ ।
३८४. साध्वसाधुभ्याम् ।।२।४ । १०५।
४४०. सायाह्नादयः॥ ३ । १। ३६ ।
२३१ सावयं पुंसि ।। २ । १ । ७३ ।
५५६ सास्य देवता ।। ६ । ३ । ६६ ।
88 सि औ जस्-अम् औ शस्-टा० ॥ १।४।१।
४१६. सिंहादिभिः पूजायाम् ।। ३ । ११ ७६ ।
२२. सितिवादिविभक्तिः ।। १ । १ । २१ ।
सिद्धिरनेकान्तात् ॥ १ । १।२।
सिधिरामन्त्रणे ॥ १।१।५६ ।
६७७ सुखादेः ॥ ८ ! १ । ३० ।
४७६ः सुहृदुहृदौ मित्रा०॥८।३। १०४ ।
१५. सैपाद्धसे लोपः ॥ १।३। ६० ।
.
.
२

१७०
कालुकौमुदी-पूर्वाध
८८
सूत्राः सूत्रम्
सोहः ॥२॥ १ । १०५।
२०५ सौ नुम् ।। १।४। ८० ।
२३८ लोः संयोगाद्योर्लोपः ॥ २।१।११८ ।
६३ स्तोः श्चुभिः श्चुः । १।३।५।
१८६ स्त्रियाः ।।२।१।१७।
१८५. लियाम् ।। १।४। ८६ ।
४७७ लियामिनः ।।८।३: १०८ ।
१८० स्त्रोदुद्भयां ङितां दै दास्० ।। १ । ४ । ३३ ।
५४० स्त्रीपुंसाभ्यां ननौ ॥ ६।२ । २८ ।
७२३ स्थूरदूरसुवक्षि० ।। ८१४ । ४२ ।
३३७ स्मृत्यर्थदयेशां वा ।।२।४।४।
१०१ स्यादावसंख्येयः॥३। १ । १३५ ।
८९ लोविसर्गः ।। २ । १ १ १०३ ।
६२८. त्यादेवि ।। ७।३। ५३ ।
३३० वतन्त्रः कर्ता ।। २।४।२।
७५ वरात् ।। १।३।२५।'
४८४ वराद्यदन्तम् ।। ३। १. १७३।
१६ स्वरानन्तरिता ह० ।। १।१ । १७ ।
३५. स्वरे वाऽसन्धिश्च ॥ १।३१ ५३ ।
५२६ त्वसुरीयः ॥ ६॥२॥ १०६।
४७१. स्वामादीपो जातेश्वा० ॥३।२।१०।

परिशिष्टम्
१७१
.
सूत्राङ्क: सूत्रम्
६८१ स्वासिन्नीशे ।। ८ । १ । ८० ।
३८६ स्वामीश्वराधिपतिः ॥ २।४ । ११३ । :
ह
४६४: हंसगमनादयः ।। ३। १ । १२६ ।
२२६ हनो घेन ।।२।२ । १०४ ।
२२५ हनो होन्नः ।। २ । १।३८ ।
८५. . हवे ॥ १।३।५०। :
८०. हशसेऽनुस्वारः ।। १ । ३ । ३५ ।
३१० हसात्तद्धितस्य ।। ८।४।७४ ।
१८३ हसेपः सेर्लोपः ॥ १।४।२७ ।
३६३. हितसुखाभ्याम् ।।.२.१.४।७२ ।
४१२ हितादिभिः ॥ ३।१।५७ ।
३६१ हेत्वर्थस्तृतीयाद्याः ।। २।४। १२७ ।
२०६ हो ढो झसंपदान्तयोः ।। २ । १ । ११२ ।
२६८ ह्रस्वश्चाभाषितपुं० ॥२ । ३ । १०४ ।
१४७ ह्रस्वस्य गुणो धिना ॥ १।४। ३६ ।
६५५ हवानाम्नस्ते ।। २ । २ । ३६ ।
११४ ह्रस्वापश्च ।। १।४। ३७॥
७३६ हस्खे ॥ ८।२।६०।
३२. हस्वोऽपदे वा ॥ १।२।२।
१२. हस्खो लघुः ॥ १।१ । १३ ।
इति परिशिष्टम्

शुद्धिपत्रम् पृष्ठम् पंक्तिः ७ २२ अशुद्धम् अन्तःस्याः अन्वयसमाहारेतरेतर- योगसमुच्चयेषु ९ टिप्पण १ शुद्धम् अन्तस्याः समुच्चयान्वाचये- तरेतरयोगसमाहारेषु संह है विद्वन् इति १४ सहः ५० ६ विद्वन् इति स्यांदिप्रकरणे इति स्यादिप्रकरणम् इति युष्मदस्मत- प्रकरणम् इति स्यादिप्रकरण युष्मदस्मच्छब्दी इति स्यादिप्रकरणम् उदाहृताः रूपं ८ ६७ ९. २ ७८ उदाहृता कूपं शूराः पञ्चमी स्यात् देहि वा बहुव्रीहि गाः पुरीपे भवत् शब्दात् माध्यमीयः ८९ १२ सुराः पञ्चमी वा स्यात देहि स्वामी वा:: वहुव्रीहिः गोः पुरीपे भवतुशब्दात् मध्यमीयः २० १०६ १०८ २२

No text on this page.

Kalu-khowmudi (purwardam)

Author
Muni, Shri Chowthmalji
Title
Kalu-khowmudi (purwardam)
File name
Kalu-khowmudi (purwardam)
Text
OCR done
Citation
1973
Published
2010/08
Publisher
Sardarshahar, Adarsh-sahitya-sangh
Language
Sanskrit
Pages
205
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
326410
Barcode
99999990002399.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
rfVJgmGvWMB
Download PDF

Kalu-khowmudi (purwardam)