Sanmati Library, Jaipur
Shri Jain Vrat Katha Sangrah
Front matter
एकापक- मूलबाद किसनदास कापडिया मा तपादक दिगम्बर जैन व प्रकाशक जनमित्र या मालिक, दिगम्बर जैन पुस्तकाम, पदावादी-सूरत। चन्द फिसलदास काविस "जैनविजय" प्रेस, सपाटवा बस्ता तासपालाको पोल स्त।
سے प्रस्तावना। Coxv! हमारे धर्ममें अनेक भकारके व्रत करनेका कहा गया है तथा उन सब व्रतोकी विधि व उसके करनेसे क्या फल मिलता है,उसको बतानेवाली उन व्रतोंकी कथाएं प्रचलित हैं, परंतु वे एकसाथ न मिलनेसे वही अमुविधा थी जिसको दिर करनेके लिये हमने ७ वर्ष हुए गुजराती, हिन्दी व मराठी भाषाकी गद्य अथवा पद्य कथाए संग्रहित करके सरल हिन्दी भाषामें पं. दीपचंदजी वर्णीसे लिखवाकर प्रकट की थीं, वह विक जानेपर उसमें फिर उन्होंसे आवश्यक संशोधन कराकर इसकी यह दूसरी आवृत्ति प्रकट की जाती है । इसमें कुल ३० कयाओंका संग्रह हो सका है। यदि और मी कथाएं मिल सकेंगी तो आगामी आनिमें वे भी सम्मिलित की जायगी । विलकुल निखार्य वृत्तिसे ऐसे कई अन्योंका संपादन करनेवाले पं० दीपचंदनी वर्मीका उपकार हम कभी नहीं भूल सकते । हरएक भाई र बहिन समयानुसार कोई न कोई व्रत करते ही रहते हैं तब उस व्रतकी कयाका पाठ अवश्य २ करनेकी आवश्यकता होती है इसलिये इस ग्रन्थकी एक २ प्रति हरएक मंदिर व गृहमें होने की आवश्यकता है। आता है यह कथा-अन्य व्रतादि करनेवालों तथा सामान्य स्वाध्याय करनेवालोंको भी बहुत उपयोगी होगा। - वीर सं० २४५२ वैशाख मुदी १५ चंदावाडी-सूरत। जैनजाति सेवा- मूलचन्द किसनदास कापडिया 1.
कथानुक्रमणिका। श्रम सं० नाम कवा पृष्ठ १ पीठिना ५४ २ रत्नत्रय व्रत कथा -- 1 ७१ ७४ पृष्ठ क्रम स० नाम कया १/१७ जिनरात्रि व्रत कथा ८१८ जिनगुणसम्पत्ति व्रत कथा १३ | १९ मेघमाला व्रत कया १८/२० श्री लब्धिविधान व्रत म्या २६ २१ मौन एकादशी व्रत क्या २८ २२ गल्डपचमी व्रत कथा ३१ २३ द्वादशी व्रत कथा ३२ / २४ अनत व्रत कथा ३३ २६ अष्टादिका (नन्दीश्वर) व्रत कथा ६६।२६ रविवंत ( आदित्यवार ) ३९/२७ पुष्पांजलि व्रत कथा ४१ २८ वारहसौ चौंतीस व्रतकी क्या १३ २९ औषधिदानकी कथा ३० परधन लोम रखनेवालेकी कथा १८३१ पच परमेष्ठीकी आरती 1.5 - ७६ ३ दशलक्षण नत क्या ४ . पोडसकारण बन कया ५ श्रुतस्कप ब्रत कथा ६ त्रिलोकतीज व्रत कथा मुकुटसप्तमी व्रत क्या अक्षयफल दशमी व्रत कथा 'श्रवण द्वादशी व्रत का १. रोहिणी व्रत कथा ११ आकाश पचमी व्रत कथा १२ कोकिला पचमी व्रत कथा १३ चन्दनषष्ठी व्रत कथा १४ निर्दोषसप्तमी व्रत कथा १५ निसल अष्टमी व्रत कमा १६ सुगधदश्चमी व्रत कथा ७८ ६ (९ ९२ २४ ५१ ।
अ. नमः सिद्धेभ्यः । कयास प0000000०००००००००००००००००००००००००००००० जैन व्रत कथासंग्रह। 00000000000000000000000 पीठिका। प्रणमि देव अहतको गुरु निर्ग्रन्थ मनाय, नमि जिनवाणी व्रत कथा कहू स्वपर सुखदाय || अनन्तानन्त आकाश (अलोकाकाश) के ठीक मध्यभागमे ३४३ वन राज प्रमाण क्षेत्रफलबाला अनादिनिधन यह पुरुषाकार लोकाकाश है जो कि तीन प्रकारके वातबलयो अर्थात् वायु (घनोदपि, घन और तनुवातवलय) मे. घिरा हुआ अपने ही आधार आप स्थित है। यह लोकाका ऊन्यमय, और अधोलोक, इस प्रकार तीन भागोमें बटा हुआ है। इस (लोकाकाग) के पीच । ४ राज ऊची और १ राज चौडी लम्बी चौकोर स्तभवत् , एक त्रस नाही है। अर्थात् इसके बाहर जरा जीव (टो इन्द्रिय तीन इन्द्रिय चार इन्द्रिय और पाच इन्द्रिय जीव ) नहीं रहते है । परन्तु एकेन्द्रिय जीव स्थावर निगोट तो समम्न लोकाकाशमें उस नाडी और उसमे पाहर भी वातवलयों पर्यंत रहते हैं। इस बस नाडीके ऊर्च भागमें सबसे ऊपर तनु वातवलयके अतम समस्त कर्मोसे रहित, अनन्तदर्शन, ज्ञान, मुख ओर पीयर्यादि अनत गुणोके धारी, अपनी अपनी अगा- हनाको लिये हुए अनन्त सिद्ध भगवान् विराजमान है । उसमे नीचे अहमिन्द्रोका निवास है, और फिर सोलह स्वर्गौके * यह पीठिका आदिमे अत तक प्रत्येक कथाके आरममें पढ़ना चाहिये । अर्थात् इसे पढ़ने के पश्चात् ही कथाका प्रारभ करना चाहिये।
जिनवत ॥४॥ कया लिये इन प्रचलित है, अर्थात् वहाँकै जीव मनुष्यादि, अपनी सम्पूर्ण आयु विषय भोगो ही में बिताया करते हैं । ये भोग भूमियां उत्तम मध्यम और जघन्य ३ प्रकारकी होती हैं और उनकी क्रमसे तीन, दो और एक पल्यकी वही बड़ी आयु होती है। आहार बहुत कम होता है । वे सब समान (राजा प्रजाके भेद रहित) होते हैं। उनको सब प्रकारकी भोग सामग्री कल्पवृक्षों द्वारा प्राप्त होती है, इसलिये वे व्यापार बंधा आदिकी झंझटसे बचे रहते है। इस प्रकार वे (वहांके जीव) आयु पूर्ण कर मद कपायोंके कारण देव गतिको प्राप्त होते हैं। भरत और ऐरावत क्षेत्रोंके आर्य खडोमें उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी (कल्प काल) के उ. काल (सुखमा मुखमा,मुखमा, मुखमा दुखमा, दुखमा मुखमा, दुखमा, और दुखमा दुखमा) की प्रवर्ति सो इनमें भी प्रथमके तीन कालोमें तो भोग भूमिकी ही रीति प्रचलित रहती है, शेष तीन काल कर्मभूमिके होते है, इस- इन शेष कालोम चौया (दुखमा सुखमा) काल है, जिसमें वेशठ शलाका आदि महा पुरुष उत्पन्न होते है । पाचवें और छठवे कालम क्रमसे आयु: काय, बल, वीर्य घट जाता है और इसलिये इन कालोमें कोई भी जीव मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता है। विदेह क्षेत्रोमें ऐसी कालचक्रकी फिरन नहीं होती है। वहा तो सदैव चौया काल रहता है और कममे कम २० तथा अधिकसे अधिक १६० श्री तीर्थंकर भगवान तथा अनेको सामान्यकेवली और मुनि श्रावक आदि विद्यमान रस्ते हैं और इसलिये सदेव ही मोल मार्गका उपदेश व साधन रहनेसे जीव मोक्ष प्राप्त करते रहते हैं। जिन क्षेत्रोमें रहकर जीन आत्म-धर्मको प्राप्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं, अथवा जिनमें मनुष्य आसि, मसि, ऋषि, वाणिज्य, शिल्प व विवादि द्वारा आजीविका करके जीवन निर्वाह करते हैं, वे कर्मभूमि कहलाते हैं । उस मनुष्य क्षेत्रो म य जो जम्बूद्वीप है उसके बीचोबीच गुदर्शन मेरु नामका स्तभाकार एकलाख योजन ऊचा परित है । इस पर्वनपर सोलह अकृत्रिम जिन मंदिर है। यह वही पर्वत है, कि जिरा पर भगवानका जन्माभिषेक इन्द्रादि देवो द्वारा किया जाता है। इसके सिवाय पति और भी दण्डाकार (भीतके समान) इस द्वीपम है, जिनके कारण यह द्वीप सात क्षेत्रोम पेंट गया है।ये पर्वत सुदर्शन मेरूके उत्तर और दक्षिण दिशायें आडे पूर्वसे पश्चिम तक समुद्रसे मिले हुए है । इन सात क्षेत्रोमें से दाक्षिणकी ओरसे सबके अतके क्षेत्रको भरतक्षेत्र कहते है। इस भरतक्षेत्रमे भी बीचम विजयाई पर्वत पड जानेसे यह दो भागोम बट जाता है । और उनकी ओर जो हिमवन पर्वतपर पद्मद्वद है, उसमे गगा और सिंधु दो माहा नदिया कयास है परतु जनत्रत निकलकर विजयाई पर्वतको भेदती हुई पूर्व और पश्चिममे बहती हुई दक्षिण समुद्रम मिलती है । इसमे भरनक्षेत्रके खड हो जाते हैं, इन वडोम मे सबसे दक्षिणका बीच वाला यह आर्य खड कहाता है और शेष : मलेच्छ रखड कहाते है। इसी आर्य खडमें तीर्थंकगदि महापुरुष उत्पन्न होने हैं। यही आर्य खड कहाता है। इसी आर्य खडम मगध नामका एक प्रदेश है, जिसे आजकल विहारमात कहते है। इस मगधदेशमें राजगृही नामकी एक बहुत मनोहर नगरी है। और इस नगरीके समीप विपुलाचल, उदयाचल आदि पच पहाडिया है तथा पहाडियोके नीच कितनेक उष्ण जलके कुड बने हैं। इन पहाडियो व अग्नीफे कारण नगरकी शोभा विभेप बढ़ गई है। यद्यपि काल दोपमे अब यह नगर उजाड हो रहा उसके आसपासके चिह्न देखनेमे प्रकट होता है कि किसी समय यह नगर अपश्य ही पहुत उन्नत होगा। आजसे २५२४ वर्ष पहिले गतिम ( चौपीस) तीर्थकर श्री कर्द्धमान स्वामीके समयमें इस नगरम महामडलेश्वर महागजा श्रेणिक राज्य करता था। यह राजा बड़ा प्रतापी न्यायी और प्रजापालक था । यह अपनी फुगार अस्थाम प्रोपार्जित कर्मके उदयसे अपने पिता द्वारा देशसे निकाला गया था और भ्रमण करते हुए एक पौद्ध सा के उपदेशसे नौद्धमतको स्वीकार कर चुका था। वह बहुत काल तक पौद्ध मतावलवी ही रहा । जब यह श्रेणिककुमार निज गहु तथा बुद्धिवलसे विदेशोंमें भ्रमण करके बहुत विभूति व ऐश्वर्य सहित म्वदेशको लौग, तो वहाके निवासियोंने इन अपना राजा मनाना स्वीकार किया। उस समय इनके पिता उपश्रेणिक गजाका स्वर्गवास हो चुका था, और इनके एक भाई चिलातक नामके अपने पिता द्वारा प्रदत्त राज्य करते थे। इनके राज्य कार्यमें अनभिन्न होने तथा प्रजापर अत्याचार करनेके कारण प्रजा उनसे अप्रसन्न हो गई थी, इसीसे सब प्रजाने मिलकर इन्हें राज्य न्युत कर दिया था। ठीक है. राजा प्रजापर अत्याचार नही कर सकता है, वह एक प्रकारसे प्रजाका रक्षक (नौकर) ही होता है, क्योकि प्रजाके द्वारा ही राजाको ४ द्रव्य मिलता है, अर्थात् उसकी जीविका प्रजाके आश्रित है, इसलिये वह प्रजापर नीतिपूर्वक शासन कर सकता है न कि स्वेच्छाचारी होकर अन्याय कर मक्का है। उसका कर्त्तव्य है कि वह प्रजाकी भलाई के लिये सतत प्रयत्न करे तया उसकी यथासाध्य रक्षा व उन्नतिका उपाय करना रहे, तभी वह राजा कइल्पनेके योग्य हो सकता है और मजा भी तभी उसकी जनवत ॥८॥ रतनयतका दाता सम्यक् रत्नत्रय, गुरू शास्त्र जिनराय । कर प्रणाम वर्ण कथा, रत्नपय सुस्वदाय ॥ १ ॥ सम्यम्दर्शन ज्ञान व्रत, इन विन मुक्ति न होय | तासो प्रथमहि रत्नत्रय, कथा सुनो मविलोय ॥ २ ॥ जम्बू द्वीपके विदेहक्षेत्रमें एक कहा नामका देश और वीतशोकपुर नामका नगर है । वहां एक अत्यन्त पुण्यवान वैश्रवण नामका राजा रहता था, जो कि पुत्रवत् अपनी प्रजाका पालन करता था। एक दिन वह (वैश्रवण) राजा वसन्तऋतुम क्रीडाके निमित्त सानन्द उद्यानमें यत्र तत्र विचर रहा था कि इतने हीमें उसकी दृष्टि एक शिलापर विराजमान यानस्य श्री मुनिराज पर पडी। सो तुरते ही उर्पित होकर वह राजा श्री मुनिराजके समीप आया और विनययुक्त नमस्कार करके बैठ गया । मुनिराज जब न्यान कर चुके, तो उहोने धर्मत्रद्धि कहकर आगी- वर्वाद दिया और इसप्रकार धर्मोपदेश देने लगे- यह जीव अनादिकालसे मोह कर्मवश मिथ्या श्रद्धान, ज्ञान और आचरण करता हुआ पुनः पुनः कर्म बंध करता ससारमे जन्म मरणादि अनेक प्रकार दुखोंको भोगता है। इसलिये जय तक इस रत्नत्रय ( जो कि आत्माका निज स्वभाव है ) की प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक यह ( जीव ) दुःखोसे छूटकर निराकुलता स्वरूप सन्चे मुख व शातिको प्राप्त नहीं हो सकता जो कि वास्तवमें इस जीवका हितकारी है। इसी लिये भगवानने “सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्ष- मार्गः" अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यकचारित्रको मोक्षमार्ग कहा है और सच्चा मुख मोक्ष अवस्था हीमें मिलता है, इसलिये मोक्षमार्गमें प्रवृत्ति करना मुमुसु जीवोंका परम कर्त्तव्य है । (१) पुदलादि परद्रव्योसे भिन्न, निज स्वरूपका श्रद्धान ( खानुभव ) तथा उसके कारण स्वरूप सप्त तत्वो और ससार्थ देव गुरु व शास्त्रका श्रद्धान होना सो सम्यग्दर्शन है। यह सम्यग्दर्शन अष्ट अग सहित और २० मल दोष रहित धारण करना चाहिये । अर्यात् जिन भगवानके कहे हुए वचनामें गका नहीं करना, ससारके विपयोकी अभिलापा न करना, मुनि आदि साधर्मियोंके मलीन गरीरको देखकर ग्लानि न करना, देव धर्म गुरुकी व सत्यार्थ तत्वोकी यथार्थ पहिचान जैनव्रत करना । अर्थात् कुगुरू ( रागी द्वेपी मेषी परिग्रही साधु व गृहस्य) कुदेव ( रागी देषी भवकर देव ) कुम्म (हिसा पोषक क्रियायें ) की प्रशसा मी न करना , धर्मपर लगते हुए मिथ्या आक्षेपोंको दूर करना और अपनी बाई परनिंदा का साग करना । सम्यक् श्रद्धान और चारित्रसे हिंगते हुए प्राणियोको धर्मोपदेश तथा द्रव्यादि देकर किसी प्रकार स्थिर करना । धर्म और धर्मात्माओमें निष्कपट भावसे प्रेम करना और सर्वोपरि सर्व हितकारी श्री दिगम्बर जैनाचार्यों द्वारा वताये हुचे श्री पवित्र जिनधर्मका यथार्य प्रभाव सर्वोपरि प्रकट कर देना येही अष्ट अग है। इनमे विपरीत शमादि आठ दोप, जाति, कुल, वैल, ऐश्वर्य, धैन, प. विधा और वप इन आठके आश्रित हो गर्व करना सो आठ मदा कुगुरू, कुदेव, कधर्म और कुगुरु सेवक, कुदेव आराधक तथा कुधर्म धारक, ये 3 अनायतन और लोर्कमृद्धता ( देखादेखी बिना हिता- हितका विचार किये प्रवर्तना ) देवमूढता (लौकिक चमत्कारोंके कारण लोममें फंसकर रागी द्वेषी देवीको पूजना) और पाखडि मदता (कुलिंगी उग आटवरघारी गुरुओंकी सेवा करना ) इस प्रकार ये पच्चीस सम्यक्त्तके दूपण है । इनसे सम्यक्त्वका एकदेश यात होता है इसलिये इन्हें त्याग देना चाहिये। (२) पढाकि यथार्य स्वरूपको सशय, विपर्यय व अनभ्यवसाय आदि टोपोसे रहित जानना सो सम्यग्ज्ञान है। (२) आत्माकी निज परणति ( जो वीतराग रूप है) में ही रमण करना, अर्थात् रागदेषादि विभाव भावो तया क्रोधादि कपायोसे आत्माको अलग करने व बचाने के लिये व्रत, सयम, तपादिक करना सो सम्यकचारित्र है। इस प्रकार उस रत्नत्रय रूप मोक्षमार्गको समझकर और उसे स्वशक्ति अनुसार धारण करके, जो कोई भव्य जीव आद्य तपाचरण धारण करता है वही सने (मोसके) मुखको प्राप्त होता है। इसप्रकार रत्नत्रयका स्वरूप कह कर अव वाह्य व्रत पालनेकी विधि कहते हैं। माटो, माय, और चैत्र मासके शुक पक्षमें; तेरस, चौदन, और पूनम इस प्रकार तीन दिन यह व्रत किया जाता है और १२को वतकी धारणा तथा प्रतिपदाको पारणा किया जाता है, अर्थात् १ को श्री जिन भगवानकी पूजनाभिषेक करके एकाशन (एकभुक्त) करे और फिर मध्यान्हकालकी सामायिक करके उसी समयसे चारो मकारके (खाद्य, स्वाथ, लेख मनबत कथा संक- उत्तम नाथ ! यह तो हमने सुना, अब कृपा करके हमको ऐसा मार्ग बताइये कि जिससे इस पराधीन स्त्री पर्याय तथा जन्म मरणा- दिके दुःखोसे छुटकारा मिले। तब श्री गुरु बोले बालिकाओ! सुनो। यह जीव अनादिकालसे मोह भावको प्राप्त हुआ, विपरीत आचरण करके ज्ञानावरणादि अष्टकर्मोको बांधता है और फिर पराधीन हुवा संसारमै नाना प्रकारके दुःख भोगता है। मुख यथार्यमें कहीं बाहरसे नहीं आता है न कोई भिन्न पदार्थ ही है, किन्तु वह (मुख) अपने निकट ही आत्मामें, अपने ही आत्माका स्वभाव है, सो जय तीव्र मोहका उदय होता उस समय यह जीव अपने उत्तमसमादि गुणोंका ( जो यथार्थमें सुख शांति स्वरूप ही है ) भूल कर इनसे विपरीत क्रोधाधि भावोको प्राप्त होता है और इस प्रकार स्वपरकी हिंसा करता है। सो कदाचित् यह अपने स्वरूपका विचार करके अपने चित्तको उत्तमक्षमादि गुणोसे रंजित करे, तो निःसदेइ इस भव और परभवमें मुख भोग कर परम पद (मोक्ष) को भी प्राप्त कर सकता है। स्त्री पर्यायसे छटना तो कठिन ही क्या है ? इसलिये पुत्रियो ! तुम मन, वचन, कायसे दशलक्षण रूप धर्मको धारण करके यथाशक्ति व्रत पालो, तो निःसन्देह मन वांछित (उत्तम) फल पाओगी। भगवान्ने 'उत्तमक्षमामार्दवार्जवससशौचसंयमतपस्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणिधर्मः' अर्थात् उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सय, उत्तम गांच, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य, और उत्तम ब्रह्मचर्य इस प्रकार ये धर्मके दशलक्षण बताये है। ये वास्तवमें आत्माके ही निजमाव हैं, जो कि क्रोधादि कपायोसे ढंक रहे हैं। उत्तम समा, क्रोधके उपशम, क्षयोपशम वा क्षय होनेसे प्रगट होती है इसी प्रकार उत्तम मार्दव, मानके उपशम क्षयोपशम व आयसे होता है। उत्तम आर्जव, मायाके नाश होनेसे होता है । सस मिथ्यात्व (मोह) के नाशसे होता है। शौच, लोभके नाशसे होता है। संयम, विषयानुराग कम वा नाश होने से होता है। तप, इच्छाओको रोकने (मन वश करने) से होता है । त्याग, ममत्व (राग) भाव कम वा नाश करनेसे होता है । आकिंचन्य, निष्पृहतासे उत्पन्न होता है और ब्रह्मचर्य, काम विकार तथा उसके कारणोंको छोड़नेसे उत्पन्न होता है। इस प्रकार ये दशो धर्म अपने प्रतिघातक दोपोके Nirl पग रोने पर ले जाते हैं।
कयास sho जैनव्रत (१) क्षमावान् पाणी कदापि किसी जीवसे वैर विरोध नहीं करता है और न किसीको बुरा भला कहता है । ॥ १३ ॥ किन्तु दूसरोंके द्वारा अपने ऊपर लगाये हुये दोषोको सुनकर अथवा आये हुये उपद्रवों पर भी विचलित चित्त नहीं है और उन दुःख देनेवाले जीवोपर उल्टा करुणा भाव करके क्षमा कर देता है तथा अपने द्वारा किये हुये अपराधोकी क्षमा मांग लेता है। इस प्रकार यह क्षमावान पुरुष सदा निर हुआ, अपना जीवन मुखशातिमय बनाता (२) इसी प्रकार मार्दव धर्मवारी नरके समा तो होती है किन्तु जाति, कुल, ऐश्वर्य, विद्या, तप और रूपादि समस्त प्रकारके मदोके नाश होनेसे विनयभाव प्रकट होता है, अर्थात् वह प्राणी अपनेसे बड़ोंमें भक्ति व विनयभाव रखता है और छोटोंमें करुणा व नम्रभाव रखता है, सबसे ययायोग्य मिष्टवचन बोलता है और कभी भी किसीमें कठिन शब्दोंका प्रयोग नहीं करता है। इसीसे यह मिष्ट भापी विनयी पुरुष सर्वप्रिय होता है। और किसीसे द्वेष न होनेसे सानन्द जीवनयात्रा करता है। (३) आर्जव धर्मधारी पुरुष, क्षमा और मार्दव धर्म पूर्वक ही आर्जवधर्म (सरलता) को धारण करता है । इसके जो कुछ वात मनमें होती है, सो ही वचनसे कहता और कही वातको पूरी करता है । इसप्रकार यह सरल परिणामी पुरुष निष्कपट होने के कारण निश्चित तया मुखी होता है। (४) सत्यवान पुरुष सदैव जो वात जैसी है। अयवा वह जैसी उसे जानता व समझता है, वैसी ही करता है। अन्यथा नहीं कहता, कहे हुये वचनोंको नहीं बदलता और न कभी किसीको हानि व दुःख पहुंचानेवाले चानेवाले बचन बोलता है । वह तो सदैव अपने वचनो पर दृढ रहता है । इसके उत्तम, क्षमा, मार्दव, आर्जव ये तीनों धर्म अवश्य ही पुरुष अन्यया प्रतापी न होनेसे सबका विश्वासपात्र होता है और संसारमें सन्मान व मुखको प्राप्त होता है। (द) पोचवान नर उपर्युक्त चारो धर्मोको पालता हुआ अपने आत्माको लोभसे वर्चाता है और जो पूर्वक उद्योग करनेसे उसके क्षयोपशमके अनुसार उसे प्राप्त होते हैं वह उसीमें संतोष करता है और परधन हरण करनेके भाव इसके नहीं होते हैं । यदि जमकर्मके उद्घपसे इसे किसी प्रकारका कमी घाय हो जाय अथवा और किसी प्रकार इसका द्रव्य चला जाय, तो भी यह दुखी नहीं होता और अपने कर्मोका बिपाक समझकर धैर्य धारण यह न्याय- मनात मयार ॥१४॥ करता है परंतु अपने घाटेकी पूर्तिके लिये कमी किसी दूसरेको शनि पहुंचानेकी चेष्टा नहीं करता है। इसको तृष्णा न होनेके कारण सदा आनंद रहता है और इसीलिये कभी किसीसे ठगाया भी नहीं जाता है। (६) संयमी पुरुष भी उक्त पांचों व्रतोंको पालता हुआ अपनी इंद्रियोंको उनके विषयोंसे रोकता है। ऐसी अव- स्यामें इसे कोई पदार्थ इष्ट व अनिष्ट मतीत नहीं होते हैं, क्योंकि विषयानुरागताके ही कारण अपने ग्रहण योग्य पदार्थ इष्ट और आरोचक व ग्रहण न करने योग्य अनिष्ट माने जाते हैं, सो इष्टानिष्ट कल्पना न रहनेके कारण उनमें हेयोपादेय- कल्पना भी नहीं रहती है। तब समभाव होता है इसीसे यह समरसी आनदको प्राप्त करता है। (७) तपस्वी पुरुष इंद्रियोंको वश करता हुवा भी मनको पूर्ण रीतिसे वश करता है और उसे यत्र तत्र दौड़नेसे रोकता है। किसी प्रकारकी इच्छा नही उत्पन्न होने देता है। जब इच्छा ही नहीं रहती तो आकुलता किस वातकी ? यह अपने ऊपर आने वाले सब प्रकारके उपसर्गोको धीरतापूर्वक सहन करने में उद्यमी व समर्थ होता है। वास्तवमें ऐसा कोई मी मुर नर वा पशु संसारमें नहीं जन्मा है, जो इस परम तपस्वीको उसके न्यानसे किंचिन्मात्र मी डिगा सके । इसलिये ही इस महापुरुपके एकाग्रचिंतानिरोध रूप धर्म व शुल न्यान होता है, जिससे यह अनादिसे लगे हुवे कठिन कर्मोको अल्प समयमै नाश करके सच्चे मुखोंका अनुभव करता है। (८) खागी पुरुषके उक्त सातों व्रत तो होते ही हैं किन्तु इस पुरुषका आत्मा बहुत उदार हो जाता है । यह अपने आत्मासे रागद्वेषादि भावोंको दूर करने तथा स्व पर उपकारके निमित्त आहारादि चारों दान देता है और दान देकर अपने आपको धन्य व स्व सम्पचिको सफल हुई समझता है । यह कदापि स्वप्नमें भी अपनी ख्याति व यश नहीं चाहता और न दान देकर उसे स्मरण रखता अथवा कभी किसी पर प्रगट ही करता है । वास्तवमै दान देकर भूल जाना ही दानीका स्वभाव होता है इससे यह पुरुष सदा प्रसन्न चित्त रहता है और मृत्युका समय उपस्थित होनेपर भी निरा- कुल रहता है। इसका चित्त धनादिकमें फसकर आर्त रौद्र रूप कभी नहीं होता और उसका आत्मा सद्गतिको प्राप्त होता है। (९) आकिंचन्य-बाह्य आभ्यतर समस्त प्रकारके परिग्रहोंसे ममत्व भावोंको छोड़ देने वाला पुरुष सदैव निर्भय रहता है। उसे न कुछ सम्हालना और न रक्षा करना पड़ती है। यहांतक कि वह अपने शरीर तकसे निस्पृह रहता है, तब कयासक जैनात ऐसे महापुरुषको कौन पदार्थ आकुलित कर सकता है, क्योंकि वह अपने आत्माके सिवाय समस्त पदार्थीको और शुद्ध चैतन्य ॥ १५॥ ऐसे मावोंके सिवाय समस्त पर मावों वा विभावोंको हेय अर्थात् साज्य समझता है। इसीसे इसके कुछ भी ममत्व शेष नहीं रह जाता और समय समय असल्यात व अनन्तगुणी कर्मोकी निर्जरा होती रहती है। इसीसे यह सुखी रहता है। (१०) ब्रह्मचर्यधारी महा बलवान योद्धा सदेव उक्त ना प्रतोको धारण करता हुवा, निरतर अपने आत्माम ही रमण करता है। वह वाम स्त्री आदिसे विरक्त रहता है. उसकी दृष्टिमें सब जीव संसारके समान प्रतीत होते हैं और मी पुरुष व नपुसकादिको वेद कर्मकी उपाधि जानता है। वह सोचता है कि यह देह हाड, मांस, मल, मूत्र, रुधिर, पीव आदि पहा अपवित्र व दुर्गधित पदार्थोका थैला है। बाहर सब ओरसे चर्मकी बारीक चादरमें लिपटा हुवा होने के कारण ही यह गगी जीवोंको मुशायना सा लगता है। यदि यह चामकी चादर हटा दी जाय अथवा वृद्धावस्था आ जाय तो फिर इसकी ओर देखनेको भी जी न चाहे । इखादि, पेमे घृणित शरीरमें क्रीडा करना क्या है ? मानो मिष्टा (मल) के कीट (कीडा) वत् उसमें अपने आपको फसाकर चतुर्गतिके दुखोमें डालना है । इस प्रकार यह सुभट कामके दुर्जय किलेको तोडकर अपने अनन्त मुखमई आत्मामें ही विहार करता है। ऐसे महा पुरुषका आदर सब जगह होता है और तब कोई भी कार्य ससारमें ऐसा नहीं रह जाता है, कि जिसे वह अखड ब्रह्मचारी न कर सके। तात्पर्य-वह सब कुछ करनेको समय होता है। इस प्रकार उन दश धोका संक्षिप्त स्वरूप कहा सो तुमको निरतर इन धर्मोको अपनी शक्ति अनुसार धारण करना चाहिये। अब इस दशलक्षण व्रतकी विधि कहते हैं। भादों, माघ, और चैत्र मासके शुक्ल पक्षमें पचमीसे चतुर्दशी तक दश दिन पर्यन्त यह व्रत किया जाता है । दशों दिन त्रिकाल सामायिक, प्रतिक्रमण, वदना, पूजन, आभिषेक, स्तवन, स्वाध्याय तथा धर्मचर्चा आदि करे और क्रममे पचमीको "ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमसमा धर्मादाय नमः" इस मंत्रका १०८ वार, एक एक समय, इस प्रकार दिनमें ३२४ वार तीन काल सामायिकके समय जाप्य करे और इस उत्तम क्षमा गुणकी पासिके लिये भावना भावे तथा उसके स्वरूपका वारवार चितवन करे । इसी प्रकार छठमीको “ॐ ही अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तममार्दव धर्माङ्गाय नमः" का जाप कर भावना भावे, फिर सप्तमीको ॐ हीं अईन्मुखकमलसमुद्रताय उत्तम आर्जव धर्माङ्गाय नमः, कयास " तप सांग " त्रयोदशीको " " मनत्रत अष्टमीको में ही अर्हन्मुखकमलसमुद्रताय उत्तमसिस धर्माशाय नमः, नवमीको, ॐ ही अहन्मुख० उत्तम शौच धर्मादाय नमः ॥१६॥ ४ दशमीको संयम एकादशीको दादशीको आकिंचन्य , चतुर्दशीको ब्रह्मचर्य , इसादि मंत्रोका जाप करके भावना भावे । समस्त दिन स्वान्याय पूजादि धर्म कार्योंमें विताये, रात्रिको जागरण मजन करे, सब प्रकारकी रागद्वेप व क्रोधादि कषाय तथा इन्द्रिय विषयोंको बढानेवाली विकथाओंका तथा व्यापारादि समस्त प्रकारके आरंभोंका सर्वथा साग करे। दशो दिन यथाशक्ति भोपध (उपवास) वेला, तेला आदि करे अथवा ऐसी शक्ति न हो तो एकाशना, ऊनोदर तथा रस साग करके करे, परंतु कामोत्तेजक, सचिक्कण, मिष्ट, गरिष्ट ( भारी ) और स्वादिष्ट भोजनोंका त्याग करे तथा अपना शरीर स्वच्छ खादीके सादे कपडोसे ही के । वढियां वढ़ियां वस्त्रालंकार न घारण करे और रेशम ऊन तथा फेन्सी परदेशी व मिलोंके बने वख तो छुबे भी नहीं, क्योंकि ये अनन्त जीवोके घातसे बनते हैं और कामादिक विकारोंको बढ़ानेवाले होते हैं। इसमकार यह व्रत दश वर्ष तक पालन करके पश्चात् उत्साहसहित उद्यापन करे, अर्थात्-सत्र चमरादि मगलद्रव्य, जपमाला, कलश, शास्त्रादि धर्मोपकरण मयेक दश दश श्री मंदिरजीयें पधराना चाहिये तथा पूजा विधानादि महोत्सव करना चाहिये । दुःखित भुखितोंको भोजनादि दान देना चाहिये, वाचनालय, विद्यालय, छात्रालय, औषधालय, अनाथालय, पुस्तकालय, तथा दीन पाणी रक्षक संस्थाए आदि स्थापित करना चाहिये । यदि इस प्रकार द्रव्य खर्च करनेमें असमर्थ हो तो, शक्ति प्रमाण प्रभावनागको बढानेवाला उत्सव करे अथवा सर्वथा असमर्थ हो तो द्विगुणित वर्षों प्रमाण (२० वर्ष) व्रत करे । इस व्रतका फल स्वर्ग तथा मोक्ष मुखकी प्राप्ति होना है। यह उपदेश व व्रतकी विधि सुन उन चारो कन्याओंने मुनिराजकी साली पूर्वक इस व्रतको स्वीकार किया और निज निज वरोको गई । पश्चात् दश वर्ष तक उन्होंने यथाविधेि प्रत पालकर उद्यापन किया, सो उत्तम क्षमादि धर्मोका अभ्यास हो जानेसे उन चारों कन्याओंका जीवन मुख और शांतिमय हो गया। वे चारों कन्याये इस प्रकार सर्व स्त्री- समाजमें मान्य हो गड । पश्चात् वे अपनी आयु पूर्ण कर अंत समय समाधिमरण करके महाशुक्र नामक दश। स्वर्गमें V॥२६॥ -
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कयास
बनव्रत
अमरगिरि, अमरचूल, देवममु, और पद्मसारथी नामके महेद्धिक देव हुए । वहा पर अनेक प्रकार मुख भोगने और अकृत्रिम
जिन चैत्सालयोकी भक्ति वंदना करते हुए अपनी आयु पूर्ण कर वहां चये सो जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमं मालवा पातके
उज्जैन नगरमें मूलभद्र राजाके घर लक्ष्मीमती नामकी रानीके गर्भसे पूर्णकुमार, देवकुमार, गुणचन्द्र, और पद्मकुमार नामके
रूपवान व गुणवान पुत्र हुए और भलेषकार वाल्यकाल व्यतीत करके कुमारकालम सब प्रकारकी विधागोमे निपुण हुए।
पश्चात् इन चारोका व्याइ, नंदननगरके राजा इण तथा उनकी पत्नी तिलकमुदरीके गर्भमे उत्पन्न कलावती,
ब्राह्मी, इदुगानी, और का नामकी चार अत्यन्त रूपवान नया गुणवान कन्याओके साथ हुआ, और ये दम्पत्ति प्रेमपूर्वक
कालक्षेप करने लगे।
एक दिन राजा मूलभद्रने आकाराम पादलोको विखरे हुए देखकर ससारके पिनाशीक स्वरुपका चितान किया
और द्वादशानुप्रेक्षा भाई । पश्चात् ज्येष्ठ पुत्रको राज्य भार सौप कर आप पम्म दिगम्बर मुनि होगये ।
इन चारो पुत्रोने यथायोग्य प्रजाका पालन व मनुष्योचित भोग भोगकर कार्ड एक कारण पाकर जिनेवरी दिशा
ली, और महान तपश्चरण करके केवलज्ञानको प्राप्त हो, अनेक देशोम विहार करके बमोपदेश दिया ।
फिर शेष अघातिया कौको भी नाशकर आयुके अतम गोग निरोध करके परमपद (मोव) को प्राप्त होगये ।
• इस प्रकार उक्त चारो कन्याओने विधि पूर्वक इरा बनको धारण करके चीगि खेटकर स्वर्ग तथा मनुष्य
गतिके मुख भोगकर मोक्षपट प्राप्त किया। इसी प्रकार जो और भव्यजीव मन, वचन, कागने इस व्रतको पालन करेंगे
वे भी उत्तमोत्तम मुखोको प्राप्त होगे।
मृगांफलेखादि कन्याए, दगलक्षण व्रतधार । ' दीप' लहो निर्माण पह, बन्द पारवार ॥ १ ॥
M॥ १७॥
जनन
Y
॥१८॥
कथा स०
शकारभात |
पा. । कारण भावना, गोमा चित्तवार । कर तिन पदकी बदना, ममा मुख कार || १ ||
जम्बूद्वीप र वन्धी भरतक्षेत्र के गगध ( विहार ) मातमें राजगृही नगर है। वहां का राजा हेगप्रभु और रानी
विजयावती थी। कागजाके यहाँ महाजर्मा नामका नौकर था और उसकी नीता नाम प्रियपदा था। इस मियादाके
गर्भसे कालमरती की एक अत्यन्त कुरुपा कन्या उत्पन्न हुई कि जिसे देखकर मातापितादि सभी राजनो तकको
घृणा होती थी।
एक दिन मतिसागर नामक चारणमुनि आकाशमार्गमे गयन करते हुए इस नगर आये, सो उस महागाने
अनन्त भक्ति सहित श्री मुनिको पड़गाहकर विधिपूर्वक आहार दिया और उनसे धर्मोपदेश सुना। पश्चात् जुगल कर
जोडदार विनययुक्त हो पछा-हे नाथ ! यह गरी कालभैरवी नामकी कन्या किस पाए को उज्यमे ऐसी और
सुलक्षणी उत्पन्न हु है, सो कृपाकर कहिये ? ता अवविज्ञानके पारी श्री मुनिराज फहने लगे, उत्स! सुनो--
उज्जैन नगरीग एक महीपाल नामका राजा और उसको वेगावनी नामकी रानी थी। उस रानीसे विशालाको
नामकी एक अत्यन्त ब्रुन्दर रूपवान कन्या थी जो कि बहुत रूपवान होने कारण बहुत अभिगानिनी थी और इसी
र मदमे उसने एक सदगुण न सीखा । यथार्थ है अहंकारी (मानी ) नरोको दिया नहीं आती है।
एक दिन वह कन्या अपनी चित्रसारीये बैठी हुई दर्पण अपना मुग्य देख रही थी कि, इतनेम ज्ञानर्य नाके
महातपस्वी श्री मुनिराज उसके घरसे आहार लेकर पाहर निकले । सो इस अनान-कन्याने स्पो मदमे मुनिको देख कर
खिडकीसे मुनिके ऊपर थूक दिया, और बहुत हर्पित हुई ।
परतु पृथ्वीके समान क्षमावान श्री मुनिराज तो अपनी नीची दृष्टि किये हुए ही चले गये, यह देखकर राज-
पुरोहित इस कन्याका उन्मत्तपना देखकर उसपर बहुत क्रोधित हुआ, और तुरन्त ही प्रामुक जलसे श्री मुनिराजका शरीर
प्रक्षालन करके बहुत भक्तिसे वैग्यासत्य कर स्तुति की। यह देखकर बद कन्या बहुत लज्जित हुई, और अपने किये हुए १५ ॥१८॥
1 कथास जैनव्रत ॥ १९॥ व नीच कृत्य पर पश्चाताप करके श्री मुनिके पास गई और नमस्कार करके अपने अपराधकी क्षमा मागी। श्री मुनिगजने उसको धर्मलाभ कह कर उपदेश दिया, पश्चात् वह कन्या महांसे मरकर तेरे घर यह कालभः । नामकी कन्या हुई है। उसने जो पूर्वजन्ममें मुनिकी निंदा व उपसर्ग करके जो घोर पाप किया है उसीके फलसे यह ऐसी कुरूपा हुई है । क्योकि पूर्व सचित कर्मोका फल भोगे विना छुटकारा नही होता है । इसलिये अब उसे समभावोमे भोगना ही कर्तव्य है और आगेको ऐसे कर्म न बधे ऐसा समीचीन उपाय करना योग्य है । अब पुनः वह महागा बोला. हे प्रभो ! आपही कृपा कर कोई ऐसा उपाय बताइये, कि जिससे यह कन्या अब इस दुःखसे लटकर सम्यक मुखोको प्राप्त होवे । तर श्री मुनिगन पोले. वत्स ! सुनोः- संसारम मनुष्योंके लिये कोई भी कार्य असान्य नहीं है सो भला गह कितनासा दुःख है ? जिन धर्मके मेपनले तो अनादिकालसे लगे हुए जन्म मरणादि दुःख भी छूट कर सच्चे मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है और दुःखोके छटनकी तो बात ही क्या है ? वे तो सहज हीमें छूट जाते हैं । इसलिये यदि यह कन्या पोडशकारण भावना भावे, और व्रत पाले, तो अल्पकालमें ही स्त्रीलिंग छेद कर ही मोझ सुखको पावेगी । तब वह महाशा पोला, हे स्वामी ! इस व्रतकी कौन कौन भावनार्य है और विधि क्या है ? सो कृपा कर कहिये । तब मुनिराजने उन जिनापुओको निम्न प्रकार पोडशकारण बनका स्वरूप और विधि जाई । वे कहने लगे कि:- (१) ससारमें जीवका शत्रु मिथ्यात्व और मिन सम्यक्त्व है। इसलिये मनुष्यका कर्तव्य है कि सबसे प्रथम मिथ्यात्व ( अतल श्रद्धान या विपरीत श्रद्धान ) को वमन (त्याग) करके सम्यक्त्वरूपी अमृतका पान कर। सत्यार्थ (जिन) देव, सच्चे (निग्रन्य) गुरू और सन्चे (जिन भापित) धर्मपर श्रद्धा (विश्यास) लारें । पश्चात् सप्त तत्वा तथा पुण्य पापका स्वरूप जानकर इनकी श्रद्धा करके अपने आत्माको पर पदार्थोसे भिन्न अनुभव करें और इनके सिवाय अन्य मिथ्या देव गुरू व धर्मको दूर ही इस प्रकार छोड दें जैसे तोता अवसर पाकर पिंजरेसे निकल भागता है । पेमे सम्यक्त्री पुरुषोके मशम ( मंढकपाय स्वरूप समभात्र अर्थात् सुख व दुःखम समुद्र सरीखा गंभीर रहना, बबराना नही ) सप्रेस ( वर्मानुराग-सासारिक विषयोसे विरक्त हो, धर्म और धर्मायतनोम प्रेम बढाना ), अनुकम्पा (करूणा-दुःखी जीवोपर
जैनवत
॥२०॥
ज्याम
"
.
दया भाव करके उनकी यथाशक्ति महायता करना) और नालिाय (श्रना-पा भी नामर या न मा. नो भी
अपने निर्णय किये हुए सन्मागम दृढ रहना ) ये चार गुणा गगट हो जाने दो किली प्रकार का भय र निता न्या
नहीं कर सकती है। ये पीर वीर सदा प्रसन्नचित्त दी रहने उ. कभी किणी नीकी उन्न प्रबल इच्छा नहीं होती. नारे
वे चारित्रमोह कपके उदयम प्रत न भी ग्रन्ण कर सकें तो भी प्रत ओर मनी नागी जनोग उनकी आमा भक्ति व महानु-
मनि नपदय कहती है जो कि मोक्ष मार्गकी प्रथम सोपान ( गीी पनि टन मी २. परमगामे रग्नि और
अष्ट अग मदिन धारण करे. इसके बिना ज्ञान नार नाति ना निकर (मिपा) । यही दर्शन दिया नामकी
प्रथम भावना है।
() जीव (मनुष्य) जो समाग्म साझी ष्टिसे उतर जाता है. उसका प्रशन कारण काल मकार (मान) है।
कदाचिन बह मानी अपनी समयम भले ही अगन आपको का मानं परतु या कोपा गदिक गिर पर बैठ जानेमे
गगडपती होसकता है ? कभी नही २ । किन्तु सब ही पाणी उससे बगारी करने है। गौर कदाचित उसके पूर्व गुण्यो-
दयमे उसे कोई कुछ न भी कर सके, नो भी पर किसी के मनको पहल नहीं सकता है ' सत्य है । जो ऊपर को देखकर
चलता है. पद, अवश्य ही नीचे गिग्ना है । पेमे पानी पुरुषको कभी को. पिया मिद नही होनी : पयोहि पिणा पिनपये
आती है। मानी पुरुष वित्नमें गढ़ा ग्वेदित रहना है, क्योंकि वह सदा समर्म सन्मान वाला है. भार पेमा होना असमव ।।
इसलिये निरतर सपको अपने पड़ोम सदा विनय, समान (गवरीयालो ) पुरुषोम प्रेम जोर जोगेम कम्णा भाषसे ।
प्रवर्तना चाहिये । सदा अपने दोपोको स्वीकार करने के लिये सापमानता प्रांक नात्पर रहना चाहिये। और दोप बनाने
वाले मज्जनका बहुत उपकार मानना चाहिये, क्याकि जो मानी गुरुप अपन दोपोको चीकार नहीं करता. उसके दोप
निरतर बढते ही जाते है और इसीलिये वह कभी उनसे मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये दर्शन, ज्ञान. नागि, तप भोर
उपचार इन पांच प्रकारकी पिनयाका वास्तविक स्वस्प विचार कर पिनयपूर्वक प्रातन करना. सो पिनय सम्पन्नता नामकी
भावना है।
(३) विना मर्यादा अर्थात् प्रतिज्ञाके मन वश नहीं होता, जैसा कि पिना लगाम (पाग-गम ) पोडा या पिना
१ ॥२०॥
- नामा मनवत अंकुनके हाथी, इसलिये आवश्यक है कि मन व इंद्रियोको वश करनेके लिये कुछ प्रतिवारूपी अंकुश पासमें रखना चाहिये। यथा अहिंसा ( किसी भी जीवको अथवा अपने भी द्रव्य तथा भाव प्राणोका घात न करना अर्थात् ऊहे न सताना न मारना), सूय ( यवार्य वचन बोलना, जो किसीको भी पीडाजनक न हो), अचौर्य ( विना दिये हुए परवस्तुका ग्रहण न करना ), ब्रह्मचर्य ( स्वीमात्रका अथवा स्त्रदार विना अन्य स्त्रियोंके साथ विषय ( मेथुन सेवन ) का त्याग) और स्वपर आत्माओको विषय कपाय उत्पन्न करानेवाले वाह्य अभ्यतर परिग्रहोका साग या प्रमाण ( सम्पूर्ण परिग्रहोंका त्याग या अपनी योग्यता या शक्ति अनुसार आवश्यक वस्तुओका प्रमाण करके अन्य समत्त पदार्थोसे ममत्वभाव साग करना, इसे लोमको रोकना भी कहते हैं ) इस प्रकार ये पाच मन और इनकी रक्षार्थ समशीलो (३ गुणवतो और ४ शिक्षावतों) का भी पालन करे तथा उक्त शील और व्रतोंके अतीचारो ( टोपों) को भी पचाये । इन नतोके निदोप पालन करनेसे न राज्यदड कभी होता है और न पचदण्ड ही होता है और ऐसा व्रती पुरुष अपने सदाचारये सवका आदर्श बन जाता है। इसके विरुद्ध कदाचारी जनोको इस भवम और परभवमें भी अनेक प्रकार दण्ड व दुख सहने पडते हैं, ऐसा विचार करके इन बतोमें निरतर दृढ होना चाहिए । यह शीलवतेप्वनतिचार मावना है। (४) मिथ्यालके उदयसे हिताहितका स्वरूप विना जाने ये ससारी जीव सदैव अपने लिये सुख प्राप्तिकी इच्छासे विपरीत ही मार्ग ग्रहण कर लेता है, जिससे मुख मिलना तो दूर रहो किंतु उल्ा दुःखका साम्दना करना पड़ता है। इसलिये निरतर ज्ञान सम्पादन करना परमावश्यक है; क्योंकि जहां चर्म चक्षु काम नहीं दे सकते हैं वहां ज्ञानचक्षु ही काम देते हैं। ज्ञानी पुरुष ने टीन होनेपर भी अज्ञानी आखपालेमे अच्छा है। अज्ञानी न तो लौकिक कार्यो हीमें सफल मनोरथ होते हैं, और न पारलौकिक ही कुछ माधन कर सकते हैं। वे ठौर ठौर उगाये जाते है, और अपमानित होते हैं ! इसलिये ज्ञान उपार्जन करला जावश्यक है। ऐसा विचार करके निस्तर विद्याभ्यास करना, व कगना सो अमीक्ष्ण- ज्ञानोपयोग नामकी भावना है। (२) उन संसारी जीवोंमसे प्रत्येक जीवके पिपयानुरागता इतनी बढ़ी हुई है कि कटाचित् इसको तीन लोककी समस्त सम्पत्ति मोगनेको मिल जाय तो भी उसकी इन्छाके असख्यातये भागकी पूर्ति न हो, सो जीव तो संसारमै अनन्तानन्त जैनव्रत ॥२२॥ कथा हैं, और लोकके पदार्थ जितने हे उतने ही हैं, सो जब सभी जीवोकी अभिलापा ऐसी ही पढ़ी हुई है, तब यह लोककी सागग्री किस किसको कितने कितने अशोमे पूर्ति कर सकती है ? अर्थात् किसीको नहीं। ऐसा विचारकर उत्तम पुरुप अपनी इद्रियोंको विषयोसे रोककर मनको धर्मभ्यानमे लगा देते है । इसीको संवेग भावना कहते हैं । (६) जबतक मनुष्य किसी भी पदार्थमें ममत्व, अर्थात् यह वस्तु मेरी है ऐसा भाव रखता है, तब तक वह कभी सुखी नहीं हो सकता है, क्योकि पदार्थोका स्वभाव नाशवान है, जो उत्पन्न हुए सो नियमसे नाश होगे, और जो मिले है, विछुड़ेंगे इसलिये जो कोई इन पदार्थोको (जो उसे पूर्व पुण्योदयसे प्राप्त हुए हैं) अपने आप ही उनको छोड़ जानेसे पहिले ही छोड देवे, ताकि वे ( पदार्थ ) उसे न छोड़ने पावे, तो निःसंदेह दुःख आनेका असर ही न आवेगा । पेसा विचार करके जो आहार, औपत्र, शास्त्र (विद्या) और अभय इन चार प्रकारके दानोको मुनि, आजिका, श्रावक श्राविकावो (चार संघो) में भक्तिसे तथा दीन दुखी नर पशुवोको करुणा भावोसे देता है तथा अन्य ययावश्यक कार्यों (पर्य प्रभावना व परोपकार) में द्रव्य खर्च करता है उसे ही दान या शक्तितस्याग नामकी भावना कहते है। (७) यह जीव स्व स्वरूपको मुला हुवा इस घृणित देहमें ममत्व करके इसके पोषणार्थ नाना प्रकारके पाप करता है, तो भी यह शरीर स्थिर नहीं रहता, दिनोदिन सेवा और सम्हाल करते २ क्षीण होता जाता है और एक दिन आयुकी स्थिति पूर्ण होते ही छोड़ देता है, सो ऐसे नागवत और घृणित शरीरमं ममत्व ( राग ) न करके वास्तविक सच्चे मुखकी प्राप्तिके अर्थ इसको लगाना (उर्लाग करना) चाहिये ताकि इसका जो जीवके साथ अनन्तानन्त वार संयोग वियोग हुआ करता है, सो फिर ऐसा वियोग हो, कि फिर कभी भी सयोग न हो सके अर्थात् मोक्षपदकी प्राप्त हो जाये । इसम यही सार है क्योंकि स्वर्ग नर्क वा पशु पर्यायमे तो सम्यक और उत्तम तपश्चरण पूर्ण हो ही नही सकता है, इसलिये यही मनुष्यजन्मम श्रेष्ठ अवसर प्राप्त हुवा है ऐसा समझकर अपनी शक्ति व द्रव्य क्षेत्र काल भावोको विचार करके अनशन, ऊनोदर, व्रतपरिसरम्यान, रसपरियाग, विविक्त शन्याशन और कायक्लेश ये 3 बाय और प्रायश्चित्त, विनय, बैय्याटत्य, स्वाध्याय, व्युतसर्ग और न्यान ये छः अभ्यंतर इस प्रकार बारह तपोंमें प्रवृत्ति करना सो सातवी शक्तितस्तप नामकी भावना कहाती है। ॥२ जेनवत (८) जीव मानके कल्याण करनेवालेसम्यक पर्मकी पत्ति धर्मात्माओंसे होती है और धर्मात्मात्रामे मोत्तम सम्पा १॥२३॥ रत्नत्रयो पारी परम दिगम्बर साधु है इसलिये साधु वर्गोपर आए हुए उपमागाको गयासमय दर करना, सो साधु समापि नामकी भावना है। (२) साधु समूह तथा अन्य सामीजनोंके शरीरम किमी पकारकी रोगाडिक व्याधि आ जानेसे उनके परिणागोम शिथिलता व प्रमाद आ जाना सभा हे उपलिये साधर्मी ( मान व गृहस्थ ) जनो की भक्ति भावसे उनको दर्शन तथा चारिसमे स्थिर रखने तथा दीन दुःखी जीवों को प्रर्य मार्गमें लगाकर उनके दुभव पर जाने के लिये उनकी प्रेमा, नया उप- नार करनेको वेन्याटाकरण भावना जाते . । (१०) पईन्न भागवारके द्वारा ही मोक्षमार्गका उपदेश मिला है. क्याकि वे पपु केवट करने ही नहीं है किन्तु लय मोक्षके सन्निकट पहुंच गये है इसलिये उनके गुणोम अनुगग सारना. उनकी भक्तिगीत पूजन स्तवन नया न्यान करना सो अनक्ति भावना है। (22) निना मुल्के नव शालनी गति नहीं होनी टपलिये स. निग्ये भारगिणी उगनेश । रामः गानायक दीक्षा मिताकि देकर निदाप पर्ष मार्ग पर नाले और नलजाले गाचार्ग माराम भणी या अनुराग अपना जोगाचार्गनिक काम माग । (१२) अल्पणा जाति म जाप जानता, गुरुपो. बागाने डा.77 कर पगा जाती। गलिग समता, गाण श्री ऊपा म म . gain in यो पर भुतमार। नारा नाया। (१२) सदा महत नगमान गुरु को गि, गिव्या का नाम गो. नीमा निकाग गन्तु स्वरुपको परालालाला श्री जैन जानोज पल पाटनादि नवान जन्ना, गो THE नाम गाला है। ४) या मन कायफी शुभाशुभ किया भाको योग पाने । सदी योगोंके ग्राम गुमायु की मात्रा होता है इसलिये गदि ये अनश्रा के द्वार ( योग ) रोक दिये गाय, नो गार (जागर दि) को माना है और सपर - - जैनवत ॥२४॥ करनेका उत्तमोत्तम उपाय सामायिक प्रतिक्रमण आदि पडावश्यक हैं, इसलिये उन्हें निस प्रतिपालन करना चाहिये । पन्नासन या अर्द्धासनसे नैठकर सीधे नीचेको हाथ छोडकर, खड़े होकर मन वचन कायके समान व्यापारोको रोककर, चित्तको एकाग्र करके एक ज्ञेय (आत्मा) में स्थिर करना सो समभावरूप सामायिक है। अपने किये हुए दोपोको स्मरण करके उनपर पश्चात्ताप करना और उनको मिथ्या करने के लिये प्रयत्न करना सो प्रतिक्रमण है। आगेक लिये टोप न होने देनेके लिये यथाशक्ति नियम करना (टोपीका साग करना) सो मसाल्यौन है। तीर्थकरादि अर्हत आदि पंच परमे- टिगो तश चौबीस तीर्थकरोके गुण कीर्तन करना मो स्तवन है । मन, बच, काय शुद्ध करके चारो दिशाओमें चार शिगे- नति और प्रत्येक दिशाम तीन तीन आति पेसे बारह आवत करके पूर्व या उत्तर दिशाम अष्टांग नमस्कार करना तथा एक तीर्थकरकी स्तुति करना सो बदनों है। और किसी समय विशेषका प्रमाण करके उतने समय तक एकासनसे स्थिर रदना तथा उतने समयको भीतर गरीरमे मोह छोड देना और उसपर आए हुए समस्त उपसर्ग व परीपडोको सम भावोसे सहन करना सो कायोर्सग है। इस प्रकार विचार कर उन छडो आवश्यकोमें जो सावधान होकर प्रवर्तन करता है सो परम संवरका कारण आवश्यकापरिहाणी नामकी भावना है। (१५) काल दोपसे अथवा उपदेशक अभादसे ससारी जीवोके द्वारा सख धर्मपर अनेको आक्षेप होने के कारण उसका लोप सा हो जाता है। धर्मके लोप होनेमे जीप भी धर्मरहित होकर संसारमे नाना मकारके दुःखाको प्राप्त होते हैं। इसलिये ऐसे २ समयोमें येन केन प्रकारेण समस्त जीवोपर सत्य ( जिन ) धर्मका प्रभार प्रगट कर देना, सो ही मार्ग प्रभावना है और यह प्रभावना जिन धर्मके उपदेशोके प्रचार करने, शास्त्रोके प्रकाशन व प्रसारणसे, शास्त्रोंके अध्ययन वा अ यापन करने करानेसे, विद्वानोकी सभाय कराने, अपने आप सदाचरण पालने, लोकोपकारी कार्य करने, दान देने, सघ निकालने व विद्यामंदिरोकी स्थापना व प्रतिष्ठादि करने, सब व्गवहार करने, सयम नियम न तपादिक करनेसे होती है, ऐसा समझकर यथाशक्ति प्रमावनोत्पादक कार्योम प्रवर्तना सो मार्गप्रभावना नामकी भावना है। (१६) संसारमें रहते हुए जीयोको परस्परकी महायता व उपकारकी आवश्यकता रहती है, ऐसी अवस्थामें यदि निष्कपट भायले अथवा प्रेमपूर्वक सहायता न की जाय, तो परस्पर यथार्थ लाभ पहुंचना दुर्लभ ही है, इतना ही नहीं किन्तु कया संव 42 परस्परके विरोधसे अनेकानेक हानिया व दुःख होना सभव है । जैसे हो भी रहे हैं । इसलिये यह परमावश्यक कर्तव्य है कि प्राणी परस्पर (गायका अपने बछडे पर जैसा निष्कपट और प्रगाढ प्रेम होता है वैसा ही ) निष्कपट प्रेम करें। विशेष- कर साघमियोके संग तो कृत्रिम प्रेम कमी न करें । ऐसा विचार कर जो सामियो तथा प्राणी मात्रसे अपना निष्कपट व्यवहार रखते हैं उमे प्रवचनवात्सल्य नामकी भावना कहते है। इन भावनाओंको यदि ये केवली या श्रुतकेवली पादमुलके निकट अंतःकरणसे चितवन की जाय तथा तदनुसार प्रवर्तन किया जाय तो इनका फल तीर्थंकर नामकर्मके आश्रवका कारण है। आचार्य महाराज इस प्रकार भावनाओका स्वरूप कहकर अब व्रतकी विधि कहते हैं। कि मादो, माघ और चैत्र (गुजराती श्रावण, पौप और फाल्गुण) वदी १ से कुंवार फागुन और वैशाख वदी १ ( गुजराती मादो, माय, चैत्र वदी १ तक ( एक वर्षमं तीन पार ) पूरे एक एक मास तक प्रत करना चाहिये । इन दिनों में तेला, वेला आदि उपवास करे अथवा नीरस वा एक आदि दो तीन रस त्यागकर ऊनोदर पूर्वक अतिथि या दीन दुःखी नर वा पशुवोंको भोजनादि दान देकर एक मुक्त करे; अजन, मजन, वखालकार विशेष पारण न करे; शील- व्रत ( ब्रह्मचर्य ) ररवे, नित्य पोडशकारण भावना भावे और यत्र बनाकर पूजाभिषेक करे, त्रिकाल सामायिक करे और (ॐ ही दर्शनविशुद्धि, विनयसम्पन्नता, शीलवतेप्वनतिचार, अभीक्षणज्ञानोपयोग, सवेग, शक्तितस्त्याग, शक्तितस्तप, साघुसमाधि, वैग्याटत्यकरण, अहतमक्ति, आचार्यभक्ति, उपाध्यायमक्ति, प्रवचनभक्ति, आवश्यकापरिदाणि, मार्गप्रभावना, प्रवचनवात्सल्यादि पोडशकारणेभ्यो नमः ) इस महामंत्रका दिनम तीन वार १०८ एकसौ आठ आठ जाप करे । इस प्रकार इस व्रतको उत्कृष्ट सोलह वर्ष, मन्यम ५ अयवा दो वर्ष और जपन्य ? वर्ष करक यथाशक्ति उद्यापन करे । अर्थात् सोलह २ उपकर्ण श्री मंदिरजीम भेट दे और शास्त्र व विवादान करे, शास्त्र भडार खोले, सरस्वती मदिर बनावे, पवित्र जिन धर्मका उपदेश करे और करावे, इसादि । यदि द्रव्य खर्च करनेकी शक्ति न हो तो द्विगुणित व्रत करे । इस प्रकार पिरानके मुखमे व्रतकी विधि सुनकर कालमेरवी नामकी उस ब्राह्मण कन्याने पोडशकारण प्रत खीकार करके उत्कृष्ट र रीनिसे पालन किया, भावना भाई और विपि पूर्वक उद्यापन किया। पीछे वह आयुके अनमे समाधिमरण द्वारा वी लिंग १
जैनवत
कथा संर
॥ २६॥ ४ छेटकर सोलहम ( अन्युत ) स्वांग देव हुई। वहांसे गाईस सागर आउ पूर्ण कर वह देश, जम्बूद्वीपके विदेहक्षेत्र सम्बन्धी
अमरावती देशके गंधो नगरमें राजा श्रीमदिरकी रानी महादेवीके सीयंधर नामका तीर्थकर पुत्र हुआ सो योग्य अवस्थाको
प्राप्त होकर राज्योचित सुख भोग जिनेश्वरी दीक्षा ली, और घोर तपश्चरणकर केवलज्ञान प्राप्त करके बहुत जीवोको धर्मो-
पदेश दिया । तथा आयुके अंतमें समस्त अघाति कर्मोका भी नाश कर निर्वाणपत्र प्राप्त किया । इस प्रकार इस व्रतको
धारण करनेसे कालभैरवी नामकी ब्राह्मण कन्याने सुर और नरभवोके मुखोको भोगकर अक्षय अविनाशी स्वाधीन मोदश
मुखोंको प्राप्त कर लिया तो जो अन्य भव्य जीव इस व्रतको पालन करेंगे उनको भी अवश्य ही उत्तम फलकी प्राप्ति होगी।
षोडस कारण व्रत घरो, कालभैरवी सार । सुरनरके सुख "दीप" लह, लहो मोक्ष अविकार ॥ १ ॥
श्रुतस्कंध व्रत कथा।
श्रुतम्कघ बन्दू सदा, मन वच शीश नवाय । ना प्रसाद विद्या लह, कुहू कथा सुखदाय ॥ १ ॥
जम्बूद्वीपके मरतक्षेत्रमै एक अंग नामका देश है, उसके पाटलीपुत्र ( पटना ) नगरम राजा चन्द्ररुचिकी पट्टरानी
चन्द्रप्रभाके श्रुतशालनी नामकी एक असन्त रूपवान कन्या थी सो राजाने इस कन्याको जिनमती नामकी आर्या (गुरानी)
के पास पढनेको वैाई जिससे वह थोड़े ही दिनोमें, विद्यामें निपुण होर्ग: । एक दिन इस कन्याने अपनी ही बुद्धिसे
चौकीपर श्रुतस्कंघ महल बनाया । इसे देखकर गुरानीको आश्चर्य हुआ और कन्याकी बहुत प्रशंसा की तथा समझा
अब यह कन्या विद्यामें निपुण हो चुकी है, इसलिये उसे सहयू राजाके पाम-अपने घर-जानेकी आज्ञा दी। राजा कन्याको
विदुषी देखकर बहुत हर्पित हुआ और गुरानीकी भूरि भूरि स्तुति की तथा उचित पुरस्कार भी ( मेंट) दिया ।
एक दिन इसी नगरके उद्यानमें श्री वर्द्धमान मुनि आये । यह समाचार सुनकर राजा, अपने परिवार तथा पुर-
जनो सहित उत्साहसे बदनाको गया और भक्तिपूर्वक बढना करके मुनिचरणोके निकट पैठा। मुनिराजने धर्मदि कह
कर धर्मका स्वरूप समझाया। जिसे सुनकर लोगोंने यथाशक्ति व्रतादिक लिये। पश्चात राजाने कन्याकी ओर देखकर
पूछा हे ऋषिराज ! यह कन्या किस पुण्यसे ऐसी रूपवान और विदुपी हुई है ? तब मुनिश्री पोले:-
0॥२६॥
- मैनवत ॥ २७॥ इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह सम्बन्धी पुष्कलावती देशम पुण्डरीकनी नगरी है। वहाका राजा गुणभद्र और रानी , कथा सत्र गुणवती थी । सो एक समय ये राजा रानी सपरिवार श्री सीमधर स्वामीकी पदनाको गये और यथायोग्य भक्ति वंदना करके नर कोठेमें बैठे । पश्चात सप्त तत्व और पुण्य पापका खरूप मुनकर श्री गुरुसे पुछा हे प्रभु, कृपाकर श्रुतस्कंध प्रतका क्या स्वरूप है ? सो समझाइये । तब गणपर महाराजने कहा कि श्री जिनेंद्र भगवानकी दिव्यन्वनि सातिशय निरक्षरी (वाणी ) मेघकी गर्जनाके समान ॐकार रूप भव्यजीवोके हितार्थ उनके पुण्यक अतिशयके कारण और भगवानके वचन वर्गणाके उदयसे खिरती है । इसे सर्व सभाजन अपनी २ भापावोंमे समझ लेने हैं। इसी वाणीको चार ज्ञानवारी गणनायक मुनिने अल्पज्ञानी जी के सम्बोपनार्थ ( आचाराग, मुत्रकृताग, स्थानाग, समवायांग, व्याख्याप्रबप्ति, ज्ञातृकयाग, उपासका- यनाग, अंतकद्दशाग, अनुत्तरोपपादकदशांग, मनव्याकरणांग, मूत्र विपाकांग और दृष्टिप्रवादाग) इस प्रकार द्वान्गाग रूपसे कयन की । फिर इन्हीके आधारसे और और मुनियोने भी भेदाभेद पूर्वक देश भाषाओमें कथन की है। यह जिनेन्द्रवाणी समस्त लोकालोकके स्वरूप और त्रिकालवर्ती पदायोंको प्रदर्शित करनेवाली समस्त माणियोंके हितरूप मिथ्या मतोकी उत्थापक, पूर्ण परके विरोधोसे रहित अनुपमेय है, सो जो भव्य जीव इस वाणीको सुनकर हदयस्थ करता अथवा उसकी भावना मा कर व्रत सयम धारण करता है, वह भी अनेक शास्त्रोंका पारगामी होजाता है। इसकी व्रतकी विति इस मकार है कि, भादो मासमें निस श्री जिन चैत्यालयमें श्रुतस्कप मंडल मांडकर श्रुतस्कर पूजन विधान करे और एक मासमें उत्कृष्ट १६ मध्यम 10 और जघन्य आठ उपवास करे । पारणाके दिन यथाशक्ति नीरस व एक दो आदि रस छोडकर एक मुक्त करे। इस प्रकार यह व्रत वारह वर्ष तक अथवा पाच वर्ष तक करे । पीछे उद्यापन करे । पारह बारह उपकरण घंटा झालर, पूजाके वासन, सत्र, चमर, चंदोवा, चौकी, चेष्टनादि मदिरमें भेट करे, शास्त्र लिखाकर जिनालयमें पधरावे तथा आवकोको भेंट देवे और शास्त्रमंडारोकी सम्हाल करे, नवीन सरस्वती मान पनावे, सर्व साधारण जनोको श्री जिनवाणीका उपदेश करे और करावे । इस प्रकार यह व्रत पारण करनेसे अनुरूममे केवलजानकी प्राप्ति होकर सिद्ध- पद प्राप्त होता है। जाप्य नित्य दिनमें तीन बार जपे-" ॐ ही श्री जिनमुरतोद्भूतस्याद्वादनयगर्मितद्वादशांगश्रुतज्ञानेभ्यो नमः ॥ २५ जैनवत ॥२८॥ कयास और भावना भावे । इस प्रकार राजा गुणभद्र और गुणवती रानीने नतकी विधि गुनकर भार सहित धारण किया और भावना भाई । सो अत समय समाधिमरण कर अच्युतस्वर्गमे इन्द्र इन्द्राणी हुए, बहामे रानीका जीव (इन्द्रानी) चय कर यह तेरे श्रुतशालनी नामकी कन्या हुई है। इस प्रकार गुरुमुरयमे भान्तर गुनकर उस कन्याने पुनः श्रुतस्माध बत गगा क्रिया पोर नादिगो पावसे विषय कपायोको अनिणय मह किये, पश्चात अत समयमं समापिसे मरण कर, श्री लिगको रेदार महमिन्द्र पद प्राप्त किया और वहाके गनुपम मुत्त्व भोगकर अपर पिढेर कुमुदवनी देशके अशोक- पुरमै पञ्जनाभ राजाफी परानी जितपशाके गर्भसे नय या नाम नीर्थकर हुय।। माथ ही चक्रर्वत ओर कामदेव पढको भी मुशोभित किया । बहुत समय तक नीतिप्रति वजा पालन किया । पश्चात एक दिन न्द्र धनुपको आकागमें विलीन होते देखकर पैराग्य उत्पन्न हुमा, सो अनित्य, अगरण, रासार, एकत्व. अन्यत्व, अशुचित्व. आश्रय, सवर, निर्जरा. लोक गोधिदुर्लभ और वर्म, उन पैगायको दृढ करनेवाली चारह भावनाओका चिनान कर दीक्षा ग्रहण की. और कितनेक काल तक उत्कृष्ट सयम पालकर शुक्ल यानके योगसे केवलज्ञान प्राप्त किया नप टेगोने समागरणकी रचना की । इस प्रकार अनेक देशोर्म पिहार करके भव्य जीयोको वस्तु स्वरूपका उपदेश किया और आयुके अत समयम अघाति कर्मोको नाश करके अविनाशी सिद्धपद प्राप्त किया । इस प्रकार और भी जो नरनारी भार सहित इस व्रतको पालन करेंगे तो आश्य ही उत्तम पदको प्राप्त होगे। श्रुतशालिनि कन्या, किया श्रुतस्कध व्रत सार । दीप कर्म सर नाशके, लगे मोक्ष सुखकार ।। ICC त्रिलोक तीज कहा। वदो श्री जिनदेव पद, बन्दु गुरु चरणार | बन्दू माता सरस्वती, कथा कह हितकार ॥ जम्बूद्वीपके भरतक्षेन सम्बन्धी कुरुजागलदेशमें हस्तनागपुर नामका एक अति रमणीक नगर है । वहाका राजा कामदुक और रानी कमललोचना थी और उनके विशाखदत्त नाम पुत्र था । उस राजाके घरदत्त नामका एक मत्री था। ५ ॥२८॥ ।
- कपा- ।" जिसकी विशालाक्षी पत्नीसे विजयसुंदरी नामकी एक कन्या बहुत सुंदर थी। जिसका पाणिग्रहण राजपुत्र विशारखदत्तने मैनवत किया था। कितनेकै दिन बाद राजा कामदुककी मृत्यु होनेपर युवराज विशाखदत्त राजा हुआ। ॥२९॥ एक दिन राजा अपने पिताके वियोगसे व्याकुल हुआ उदास बैठा था कि उसी समय उस ओर विहार करते हुए श्री ज्ञानसागर नामके मुनिवर आये, राजाने उनको भक्तिपूर्वक नमस्कार करके उच्चासन दिया, तब मुनिने धर्मदृद्धिकर आशीप दी और इस प्रकार सम्बोपन करने लगे:- राजा ! मुनो यह काल (मृत्यु), मुर (देव), नर, पशु आदि किसीको भी नही छोडता है। संसार जो उत्पन्न होता है सो नियमसे नाश होता है। ऐसी विनाशीक वस्तुके सयोग वियोगमें हर्प विषाद ही क्या ? यह तो पक्षियोके समान रैन (रोत्रि) बसेरा है । जहाजमें देश देशातरके अनेक लोग आ मिलते हैं परन्तु अवधि पूरी होनेपर सव अपनेर देशको चले जाते है। इसी प्रकार ये जीव एक कुल (वश-परिवार) में अनेक गतियोसे आ आकर एकत्र होते हैं और अपनी २ भायु पूर्णफर सचित कर्मानुसार यथायोग्य गतियोको चले जाते हैं । किसीकी भी यह सामर्थ्य नहीं है, कि एक क्षण मात्र मी आयुको गढ़ा सके । यदि ऐसा होता, तो बडे बडे तीर्थकर चक्रवर्ती आदि पुरुपोको क्यों कोई मरने देता। मृत्युसे यद्यपि वियोग जतित दुःख अवश्य ही मोहके यश मालूम होता है तथापि उपकार भी बहुत होता है। यदि । होती, तो रोगी रोगसे मुक्त न होता, ससारी कभी सिद्ध न हो सकता, जो जिम दशाम होता उसीमें रहा आता, इसलिए यह मृत्यु उपकारी भी है, ऐसा समझकर शोक तजो । इस शोकमे (आत्तयानमे ) अशुभ कर्मोका वा होता जिरासे अनेको जन्मांतों तक रोना पटता है रोना बहुत दुखदाई है। गुनिके उपदेशमे राजाको कुछ पेर्य पमा।ये शोक तजकर प्रजापालनमें तत्पर हुए, और मुनिराज भी विहार कर गये । एक दिन रानीने समभपण अर्जिकाके दर्शन करके पूछा-माताजी, मेरे योग्य कोई व्रत पताइये जिससे मेरी चिंता दूर होवे और जन्म मुधरे। तव आर्यिकाजीने कहा, तुम त्रैलोक्य तीज व्रत करो। भादो मुदी ३ को उपवास करके तीन चौवीसी तीर्थकरोके ७२ कोठेका मंडल मांडकर तीन चौवीसी पूजा विधान करो और तीनो काल १०८ आठ - - जनान मि या से SE गार (ॐ मी भूत वीमान भरियामागचा विपनि नीयो यो नमः । १. को in it.: 1. धर्म यानभं कार पिना, उस पर नान TT TRIारपीट शान र मास दिगुणित या मार रोग रोटीन मी नेपाल ना.समातीन मास महारापान मा को नौक शाक उपकणे तीन २ श्री मंदिग्गम भरा गो साप्रामा मारिया पति मार गनीने उनकी निषि गुनार विकास कारण किया TR भाप गारिमाण गोरगी नागि बेदकर देर । म नाना प्रकार दोनित गर भोग, नया शापिम जिन गायीतरी पटना गादि करने हो । पानम ममय पिनाया ! पचास से कर मार देगो रुचनपुर नगगे गागिर पोरगानीमा गचनाक मगर नामका प्रति समान ना गुणरान एर सो पागना दिन प्राने मिना गरिन इन- हिाको गया था. किर गरम दिगम्बर मुनिको नगर एमे मो या रोगरा. तो मुनिशी रहना कर. पार निकर पंदा और पाने कगार परको देखकर मुने गोर को पानात श्रीगुर ने गो-पन्म' नाम: जीव जनादि कार्य मोगादि रोग लिग की. गौर या जाने गो. जिम मया मिशिम यमो सो ग कोन कोन कर्म उद्धरण पाते हैं. तो कारण या प्राणी कभी की भी शिरको मात्र दोष है। इस गमग जो तुने गट मोट सा है इसका कारण किसके नीगरे भाय न मनाएक. गस PिITी भागिन्दरी नापकी गनी थी, नो तुने मयमभूषण मिशन मोन गो गो का नया निमो. भारत वीलिंग द गिमें देय होगा. गार गारे TIP या गगा पिगरक भूमाल नामका पुत्र हुआ है और तर समभपण गायिकाका जीव कामे गगारिमग्ण कप, म्यगम देव न सा पाने गरकर या में मनु आ '. मो कोई एक कारण पा दिया लेकर पिहार करना सपा । : एरिये तुरोगा नेडो. कारण या गोरे. म ' या मोह महादुमका देनेवाला यागने गोग - य मा सुमगनको गाण उपा मा. गोर गर्ने इस मगाको विना- म्प जानकर तत्कार जिने परी दीना वारण की । फिनना कारना. नोर नपशरण कगं सतानको प्राव टोकर मोसपट प्राप्त किया । इस प्रकार विजय गुन्दरी गनीने योग्य तीज ग्राको पातार दो भोर मनुष्गो गाम मुयोको + .
कपा सं० भोगकर निर्वाण पद प्राप्त किया। सो पदि ओर मी भव्य जीव श्रद्धा सहित व्रत पाले तो वे भी ऐसी उत्तम गतिको प्राप्त होवेंगे। विजयसुन्दरी व्रत कियो, तीन त्रिलोक महान । सुरनरके सुखभोगके, 'दीपा लही निवान ॥१॥ जैनबत मुकुटसमीकत कथा। पच परमपद पन प्रणमि, सारदमात नमाम । मुकुटमप्तमी व्रत कथा, मापर ह बनाय ॥ जम्वद्रोपके कुरुजांगल देशमे मस्तिनापुर नगर है। यहाके राजा विजयसेनकी रानी विजयावतीके मुकुटशेसरी और विरिशेखरी नामकी दो कन्याए थी. इन दोनो बहिनोंमें परस्पर ऐसी मीति थी कि एक दुसरीके विना क्षणभर भी नहीं रह सक्ती थीं निदान राजाने वे दोनो कन्याएं अयो याके राजपुत्र तिलकमणिको ब्याह दीं। एक दिन बुद्धिसागर और मुबुद्धिसागर नासके दो चारणऋपि आहारके निमित्त नगरमें आये। सो राजाने उन विधिपूर्वक पढगाहकर आगेर दिया और धर्मोपदेश श्रवण करनेके अनन्तर राजाने पूछा हे नाथ ! मेरी इन दोनो पुति- योमें परस्पर इतना प्रेम विशेष डोनेका कारण क्या है ? 1 श्री सपिराज वोले-उसी नगरम पनद्रन नामका एक मेठ था, उसके जिनमती नामकी एक कन्या थी और वही एक मालीकी वनसती कन्या भी थी सो इन दोनो कन्याओने मुनिके द्वारा बर्योपदेश सुनकर मुफुटसशमी व्रत ग्रहण किया था। एक समय ये दोनो कन्याम् उद्यानमें खेल रही थी (मनोरजन कर रही थीं कि दाह सर्पने काट खाया सो नवकारमत्रका आराधन करके देवी हुई और महासे चयकर तुम्हारी पुत्री हुई हैं। सो इनका यह स्नेह भवानरसे चला आ रहा है। इस प्रकार मान्तरकी कथा मुनकर दोनो कन्याओने प्रथम श्रापकके पच अणुनत, तीन गुणवह और चार शिलाव इस प्रकार वारह त लिए और पुनः मुकुट सप्तमी व्रत मी वारण किया । सो प्रतिवर्ष आपण मुदी मममीको प्रोपर करती और "ॐ ही श्रीष्टपभनीयकरेभ्यो नमः इस मत्रका जाप्य करती, तया अष्ट द्रव्यसै श्री जिनालयमं जाकर मार सहित जिनन्द्रकी पूजा करती । इस प्रकार यह व्रत उन्होंने सात वर्ष तक विधिपूर्वक किया । पश्चात् विधिपूर्वक उद्यापन करके सात सात उपकर्ण जिनालयों में किये।
मैनवत उस प्रकार उन्होने व्रत पूर्ण किया और अंतमें समाधिमरण करके सोलहवें सर्गमें स्त्रीलिंग छेदकर इन्द्र और प्रत्येन्द्र ॥३२॥ हुई । वहां पर देवोचित मुख भोगे और धर्म यानमें विशेष समय बिताया । पश्चात् वहांसे चयकर वे दोनो इन्द्र प्रत्येन्द्र मनुष्य होकर कर्म काटके मोक्ष जावेंगे । इस प्रकार सेठकी तथा मालीकी कन्याओने व्रत (मुकुटसप्तमी) पालकर स्वर्गोके मुख भोगे अब वहासे त्रयकर मनुष्य हो मोल जावेंगे । वन्य है ! जो और भव्य जीव भाव सहित व्रत धारण करें, भी इसी प्रकार मुखोको प्राप्त होवेंगे। श्रेष्ठी अरु /माली सुता, मुकुट सातमव्रत धार । मये इन्द्र प्रत्येन्द्र द्वय, अरु हुई है भवपार ॥ १ ॥ 33HERE अक्षयकलदशमी व्रत कथा। ॐकार इदय धरूं, सरस्वतिको शिर नाय । अक्षयदशमी व्रत कथा, भाषा कहू बनाय ॥ १ ॥ इसी राजमही नगरंम मेघनाद नामके राजाके रानी पृथ्वीदेवी असन्तरूप और शीलवान थी परन्तु कोई पूर्व पापके उदयसे पुरावेहीन होने से सदा दुःखी रहती थी। एक दिन अति आतुर हो कहने लगी; हे भर्तार ! क्या कमी मै कुलमण्डन स्वरूप पालकको अपनी गोदमें खिलाऊँगी ? क्या कभी ऐसा शुभोदय होगा, कि जब मै भी पुत्रवती कहाऊँगी अहा देखो ! संसारमें स्त्रियोंको पुत्रकी कितनी अभिलाषा होती है। वे इस ही इच्छासे दिनरात व्याकुल रहती अनेको उपचार करती और कितनी ही तो ( जिन्हें धर्मका ज्ञान नहीं है ) अपना कुलाचरण भी छोड कर धर्म तकसे गिर जाती है यह सुनकर राजाने रानीसे कहा प्रिये ! चिंता न करो, पुण्यके उदयमे सब कुछ होता है। हम लोगोने पूर्व जन्मोंमें कोई ऐसा ही कर्म किया होगा कि जिसके कारण निःसन्तान हो रहे हैं। इस प्रकार के राजा रानी परस्पर धैर्य वयाते काल क्षेप करते थे। एक दिन उनके शुभोदयसे श्री शुभंकर नाम मुनिराजका शुभागमन हुआ, सो राजा रानी उनके दर्शनार्य गये। बदना करनेके अनन्तर धर्म श्रवण करके रागाने पूछा-हे प्रभु ! आप त्रिकालज्ञानी आपको सब पदार्थ दर्पणवत् प्रतिभासित होते हैं, सो कृपा कर यह बताइये कि किस कारणसे मेरे घर पुत्र नहीं होता है ? ।।३२.
कया। जैनवत चिंता बढती जाती थी। एक दिन वे राजा रानी उम प्रकार चिंता कर रहे थे, कि इस कुल्पा कन्याका पाणिग्रहण फोन करेगा ? कि-पुण्य योगमे उन्हें वनमाली द्वारा यह समाचार मिला कि ज्वान्ये वणोत्तम नाम यती वर देशदेशानगेम विहार करते हुए आये हैं । सो राजा उत्साह सहित स्वजन और पुरजनोको साग लेकर श्रीगुरुकी पदनाके लिये उनमें गया और तीन प्रदक्षिणा देकर प्रभुको नमस्कार करके यथायोग्य स्थानमें नेटा । श्रीगुरुने धर्मदृद्धि कहकर आशीर्वाद दिया और मुनि श्रापकके धर्मका उपदेश देकर निश्चय और व्यवहार रत्न- यसमका स्वरूप समझाया। पश्चात् गजागे नत मस्तक हो पूछा हे प्रभो ! यह मेरी पुत्री किस पाके उन्नयने ऐसी कुरूषा हुई है ? तब श्रीगुमने कहा कि अवन्ती देशमे पाडलपुर नाम नगर था। वहास गना सग्राममल, और रानी पगुन्धरा थी। उसी नगरमें देवशर्म नाम पुरोहित और उसकी कालमुरी नाम सी थी। इस ब्राह्मणके असन्त रूपान एक कपिला नामकी कन्या थी । एक दिन यह कपिला कुमारी अपनी सखियोके साथ अठखेलियां करती हुई वनक्रीडाके लिये नगरके वाहर गई, सो वहा श्री परम दिगम्बर साधुको देखकर उनकी अत्यन्त निंदा की और घृणाकी दृष्टिमे वह सखियोसे कहने लगी देखो री बहिनो, यह कैसा निर्लज्ज पापी पुरुष है कि पशुके समान नग्न फिग करता है और अपना अद्र स्त्रियोको दिखाता है। लोगोंको ठगनेके लिये लयन करके बनमें बैठा रहता है, अथवा कमी कभी ऐसा ही नांगा वनमे वस्तीमें फिरता रहता है, धिक्कार है इसके नरजन्म पानेको । इसादि अनेको कुवचन कहकर मुनिके मस्तक पर धूल डाल दी, और यूक भी दिया। सो अनेको उपसर्ग आनेपर भी श्री मुनिराज तो न्यानसे किचिन्मात्र भी विचलित न हुए और समभावोसे उपसर्ग जीतकर केवलज्ञान प्राप्त कर परम पदको प्राप्त हुए, परन्तु वह कपिला जिसने मदोन्मत्त होकर श्री योगिराजको उपसर्ग किया था, मरकर प्रथम नरकमें गई । वहासे निकलकर गयी हुई, फिर डायिनी, फिर विल्ली, फिर नागिनी फिर चाडालनी हुई और वहांसे मरकर तुम्हारे घर पुत्री हुई है। सो हे राजा ! इस प्रकार मुनि निंदाके पापसे इसकी यह दुर्गति हुई। १ -- जनत्रत कयास तम श्री गुरुने भवांतरकी कथा विचारकर कहा-पे राजा ! पूर्व जन्मम, टस तुम्हारी। गनीने मुनि दानमे अन्तगय किया था। इसी कारणमे तुम्हारे पुनका अन्तराय हो रहा है। तब राजाने कडा प्रभु, कृपया कोई यत्न पताइये. फि जिससे इस पापकर्मका अन्त आते। यह मुनकर श्री मुनिराज पोले । वन्स, तुम अक्षय (फल) दशमीका बन करो । श्रावण मुदि १० को प्रोपप करके श्री जिनमदिरमें जाकर मार सहित पूजन विधान करो. पंचामृताभिषेक करो और "ॐ नमो स्पभाय " इस मनका जाप्य करो । यह व्रत दश वर्पतक करके उद्यापन करो, दग दश उपकर्ण श्री मदिरजीग भेट करो, दश भाव दिखा- कर साघमियोको भंट करो ओर भी दीन दुःखी जीवोपर दया दान करो, विद्यादान देयो. अनाथोकी रक्षा करो जिससे शीन ही पापका नाग हो सातिशय पुण्य लाभ हो इसादि पिपि मुनकर राजा गनी आप गोर विधिपूर्वक प्रत पालन करके उद्यापन किया। सो प्रतके गाहात्म्य तथा पूर्व पापके क्षय होनेसे राजाको सात पुन और पाच कन्याए दुई । इस प्रकार कितनेक कालतक राजा दया धर्मको पालन करते हुए मनुष्योचित मुख भोगते रहे । पश्चात् समापियरण करके पहिले वर्गमें देव हुए और हामे चयकर मनुष्य भर लेकर मोदा पद प्राप्त किया । इस प्रकार और भी अन्य जीव यदि श्रद्धासहित उन पालेंगे तो उन्हें भी उत्तमोत्तम मुग्योंकी प्राप्ति होगी। अक्षय दशमी व्रत यफी, मेघनाद नृपसार । 'दीप' लही पचम गती, नम प्रियोग सम्हार ।। -23- श्रावण द्वादशीव्रत कथा । प्रणम् श्री अर्हन्त पद, प्रणम सारद माय । श्रावण द्वादशिव्रत स्था, यह भय हितदाय || मालया पानी पद्मावतीपुर नाम एक नगर या । वहाका गजा नरबमा भोर रानी जगालमा यी । उनके भीलवती नागकी एक अति कुरूपा, कानी, कुाडी कन्या उत्पन्न हुई । ज्यो। यह कन्या बड़ी होती थी सो मातापिताको ॥३३] कयास जनत्रत राजाने वह भवान्तरका वृतांत सुनकर पूछा, हे नाय ! इसका यह पाप केसे छुने सो कपा कर कहिये ? तब स्वामीने कहा-राजा ! सुनो, ससारम ऐसा कौनसा कार्य है कि जिसका उपाय न हो । यदि मनुष्य अपने पूर्व कर्मोकी आलोचना निंदा व गर्दा करके आगेको उन पापामे पगठमुख होकर पुनः न करनेकी प्रतिज्ञा करें और पूर्व पापोकी निर्जराय प्रवादिक करे तो पापोंसे छट सकता है। इसलिये यदि यह पुत्री सम्यक्षपूर्वक श्रावण शुक्ल द्वादशी व्रतको धारण करे तो इस कष्टसे हट सकती है। इस व्रतकी विधि निम्न प्रकार है कि श्रारण मुढी एकादशीको प्रातःकाल स्नानादि करके श्री जिन पूजन करे और पश्चात् भोजन करके सामायिकके समय द्वादशी व्रतके उपासकी धारणा (नियम) करे । इसी समयमे अपना काल धर्म न्यानमें बिताये और द्वादशीको भी नियमानुसार उठकर निस क्रियामे निवृत्त हो श्रीजिनमदिरम जाकर उत्साह सहित । पचामुतमे अभिषेक पूर्वक अष्टद्रव्योंसे पूजन करे । अर्थात् पाठ और मत्रोको स्पष्ट दोलकर मामुक अष्टद्रव्ये चढारे और णमोकार मंत्र (३५ असर) का पुपोद्वारा १०८ बार जाप्य करे । सामायिक स्वा यायादि प्रम न्यानो काल रितारें। फिर त्रयोदशीको इसी प्रकार अभिषेक पूर्वक पूजनादि करनेके पश्चात् किमी अतिथि का दीन दुरवीको भोजन दान करके आप मोजन करें। इस प्रकार एक वर्षमें एकबार करे । सो बारह वर्ष तक करे । पश्चात उत्साह सहित उद्यापन करे । अर्थात् चारमुखी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करावे अयमा जहा मदिर हो वहा चार महान ग्रन्थ लिखाकर जिनालयम पधरावे, वेष्टन चौकी उन चमरादि उपकरण चढावे, परोपकारमें द्रव्य खर्च करे, व्यापार रहिनीको व्यापारार्थ पूजी लगा देवे, पठनाभिलापियोको छात्रयत्ति देकर पहनेको भेजे, रोगीको ओपधि, निःसहाय दीनोको अन्न वस्त्र ओपयादि देवे, भयभीत जीयोको मय रहित करे मरतेको यचावे उयादि । और यदि उद्यापनकी शक्ति न हो तो दना प्रत करे । इस व्रतके फलमे यह तेरी कन्या यहांसे मरण करके तेरे ही घर अर्ककेतु नाम पुत्र होगा, और उससे छोटा चन्द्रकेतु होगा, सो चन्द्रकेतु युद्धमें मरकर पीछे अर्ककेतुका पुत्र होगा। पश्चात् अर्क केतु किननेक काल राज्य करके अतमें माना सहित जिनदिक्षा लेगा सो समापि करके पारहव स्वर्गमें महदिक देव होगा और फिर मनुष्य भर लेकर तपके योगसे केवलनानको प्राप्त हो मोलपट प्राप्त करेगा। इसकी माना विजयाल्लमा प्रथम स्वर्गम देगी होगी । चन्द्रकेतुका जीव जैनवत कथासं० . वन्दू भी अवसर पाकर सिद्धपदको प्राप्त करेगा। इस प्रकार राजा व्रतकी विधि और उसका फल मुनकर घर आया और यथाविवि कन्याने प्रत पालन करके श्री गुरुके कथनानुसार उत्तमोत्तम फल प्राप्त किये । इस प्रकार और भी जो स्त्री पुरुष श्रद्धासहित इस व्रतको पालन करेंगे वे भी इसी प्रकार उत्तम शाल पांगे। आवण द्वादशि व्रत त्यिो, शीलमती चितधार । किये अष्ट विधि नष्ट सर, लह्यो सिद्धपद सार ।। BEE अइ रोहही शत कथा। श्री अर्हन्त पद, मन वच शीश नमार । कडू रोगो बन गया, दुग दरिद्र नग जाय ।। अब देशम चम्पायुरी नाम नगरीका स्वामी मघवा नाम राजा था, उसकी परमसुन्दरी लक्ष्मीमती नामकी रानी थी । उसके सात गुणवान पुरा और एक रोहिणी नायकी कन्या थी। एक समय रानाने नियित्तनानीने पूछा कि मेरी पुीका वर कौन होगा ? ना निमित्तज्ञानीने विचार कर कहा, कि हस्तिनापुरका राजा वीतशोक और उसकी गनी विद्यु- स्त्रवाका पुत्र प्रयोक तरी पुत्रीका पाणिग्रहण करेगा। यह मुनकर राजाने स्वयपर मण्डप रचाया और सब देशोके राजकुमागेको आमरण पत्र भेजे । जन नियत समय पर राजकुमारगण एकत्रित हुए तो कन्या रोहिणी एक मुन्दर पुष्पमाल लिये हुए सभाम आई. और सब राजकुमारोका परिचय पानेके अनन्तर अन्तम राजकुमार अशोकके गलेमें वरमाला डाल दी। गंजकुमार अशोक रोहिणीको पाणिग्रहण कर घर ले आया और कितनेक काल तक सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। एक समय हस्तिनापुरके वनमे श्री चारण मुनिराज आये। यह समाचार मुनकर गजा निज प्रिया सहित श्री गुरुकी बदनाको गया और तीन प्रदक्षिणा दे दण्डवत् करके बैठ गया । पश्चात् श्री गुरुके मुखसे तत्वोपदेश सुनकर राजा हर्षित मन हो पूछने लगा-स्वामी मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्यो है ? नव श्रीगुरुने कहा, मुनो, इसी नगरमें वस्तुपाल नामका राजा था, और उसका पनमित्र नामका मित्र था। इस ?
कथास जैनात घनमित्रके एक दुर्गा कन्या उत्पन्न हुई । सो इस कन्याको देखकर माता पिता निरंतर चिंतापान रढते. कि इस कन्याको कौन बनेगा ? पश्चात जब वह कन्या सयानी हुई तो वनमिनने उसका व्याह धनका लोभ देकर एक श्रीपेण नामके लडके (जो कि उसके मित्र सुमित्रका पुन था) से कर दिया। वह सुमित्रका पुन श्रीपेण असन्त न्यमनासक्त था । एक समय वह जुआम अपना सब पन हार गया। तब चोरी करनेको किसीके घरमे घुसा । उसे यमदड नाम कोटपालने पकड लिया, और दृढ वधनसे वाध दिया। इसी कटिन अप सस्य धनमित्रने श्रीपेणमे अपनी पुत्रीसे व्याह करनेका वचन ले लिया था। इसीलिये श्रीपेणने उससे व्याह तो कर लिया परन्तु यह खत्रीके गरीरकी असन्त दुगैपिसे पीडित होकर एक ही मासमें उसे परित्याग करके देशातरको चला गया । निदान यह दुर्गधा असन्त व्याकुल हुई और अपने पूर्व पापोका फल भोगने लगी। एक समय अमृतसेन नामके मुनिराज इसी नगरसे वनमे विहार करते हुए आये। यह जानकर सकल नगरलोक चंदनाको गये और घनमिन भी अपनी दुर्गधा कन्या सहित पदनाको गया । सो धर्मोपदेश सुनने के अनन्तर जा उसने अपनी पुत्री के नमान्तर पूछे तब श्रीगुरुने कहाः- सोरठ देशंग गिरनार पर्वतके निकट एक नगर है । वहा भूपाल नाम राजा राज्य करता था। उसके सिंधुमती नामी रानी थी। एक सगय वसंतमतुंम राजा रानी सहित वनक्रीडाको चला सो मार्गम श्री मुनिराजको देखकर राजाने रानीसे कहा कि तुम घर जा कर श्रीगुरुको आहारकी विधि लगायो । राजाज्ञासे यद्यपि रानी घर तो आई । तथापि वनक्रीडा सगय पियोग जनित सतापसे तप्त उरा रानीने इस रियोगका सम्पूर्ण अपराध मुनिराजके माथे मढ दिया और जप ये आहारको चल्तीग आये तो पडगाह कर उन्हें कडमी तूंवीका आहार दिया, जिससे मुनिके शरीरम अत्यन्त वेदना उत्पन्न हो गई, और उन्होंने तत्काल प्राण त्याग कर दिये । नगरके लोग यह वार्ता सुनकर आये, और मुनिराजके मृतक शरीरकी अंतिम क्रिया कर रानीके रा दुष्कृत्यकी निंदा करते हुए निज निज स्थानको चले गये। राजाको भी इस दुष्कृत्यकी खबर लग गई सो उन्होने रानीको तुरन्त ही नगर बाहर निकाल दिया। इस पापसे रानीके शरीरमें उसी जन्मम कोड़ उत्पन्न होगया जिसमे शरीर गल गलकर गिरने लगा तथा शीत उष्ण जैनात कयास - । मृय पामकी बदनाम उमीन करने लगा। इस प्रकार र रोद गाने पर नप नई पारी गारन, नादन, रेदन, मेदन. नगेनादि, जोगनोर दास भोगे । टने निकाल कर गारक पेन्यं नारिया प्रार स या नेरे घर दुग म मन्या ।। यह पाटलान सुनकर निमित्रने पठाई नाथ' कोई न पिपानादि यम काय पनागा निगमे यह पातक दर । ता म्वामीन कहा कि यम्यान मन्ति गेटणीन गान की मात पनिमाग गली नाम सानिग दिन गये, उस दिन नाग प्रकार नागरका सागर भांग श्री जिन नयाग गाकर गान मारेत गोर पर व्यतीत कर, पर्यात सामाविकमा पार. 'पिया ना अभिपेकाटिम काकीतारे और नाति पगुमान दान करे। इस प्रकार या उन ५ पप गौर, गाय ना करे। पात यापन करे । अर्थात अ. समर, जा. पाटग गादिपकरण मदिरंग चां, मापुजना प नापी नया पिशापियाको गान दी। एन दो, गागं मार हान दा नो नो दन्य पर्च करने की शक्ति न हो नोदना मन करे। दुगवाने मुनिो मुगम उनकी शिति मुनार श्रतापफ उसे धारण कर पारन लिया भोर गारु अतम गन्याप गरिन मरण कर प्रथम म्यगम देगी । पढामे मार माया गनाकी पुरी गोर नर्ग परमप्रिया भी मुई है. इस प्रकार गनीक मवान्नर मुनकर गनाने जाने भवान्तर पृटं। ना मागीने कहा- प्रथम भाम भीर या ने मुनिगमको गोर उपगण किया, सोन बनामे मकर पाक फारमे माता न गया । पसे नेनीम मागरा भोगकर निकया । मो अनेक कुयोनियोम भ्रमण रुग्ना हुआ नने पर पणिके पर जन्म रिया 1 मो अयन्न गणिन गीर गाया। बेग दुर्ग- बिक गारे पाम न भान नेले धे। ना तने मुनिगर्जक उपदेशमे रोग्णी वन किया. उगो फलमे न मर्ग दा हुआ गोर फिर पाये चयकर विद क्षेत्रम कीनि चपनी हुआ । वामे दिया ले तप कर दोन्ट मा और पर वर्गमे आकरत अगोफ नामका गना हुआ। गजा गोफ यह तान्त सुनकर पर भागा और कुछ कालना मानन्द गाय भोगा. पपात एक दिन यहां मामुप्रय भगवान का समामग्न बाया सुनकर गना पन्द्रनाको गया और धर्मोपदेश मनकर गरान्त गाय को प्राप्त हो - कया नैनवत श्री जिन दिक्षा ली । रोहणी रानीने भी दीक्षा ग्रहण की । सो राजा अशोकने तो उसी भवमें शुक्ल न्यानसे घाति कर्मोका नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया और मोक्ष गये और रोहणी आर्या भी समापिमरण कर स्त्रीलिंग डेढ स्वर्गमें देव हुई, अब वह देव वहांसे चयकर मोझपद प्राप्त करेगा। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहणी, रोहणीवतके प्रभावसे स्वर्गादिकके मुख भोगकर मोक्षको प्राप्त हुए व होगे । इसी प्रकार अन्य भव्य जीव भी जो श्रद्धा सहित व्रत पालेंगे ये भी उत्तमोत्तम मुख पायंगे। व्रत रोहिणि रोहनि क्रियो, अरु अशोक भूपाल । स्वर्गमोक्ष सपति लही, 'दीप' नवावत भाल ॥ आकाश पंचमी वत द्वादमागवाणी नमू, धरू हृदय शुभ व्यान । कथाऽऽकाश पचमि तनी, कहू खपर हिन जान ।। आर्यखंडके सोरठ देशमें तिलकपुर नामका एक विशाल नगर या । वहां महीपाल नामका राजा और विचक्षणा नाम गनी थी । उसी नगरम भद्रशाह नामका व्यापारी रहता था.। उसकी नन्दा नाम स्त्रीमे विशाला नामकी पुती उत्पन्न । यद्यपि वह कन्या अत्यन्त रूपवान थी, तथापि इसके मुखपर सफेट कोह होजानेसे सारी मुन्दरता नष्ट होगई थी। इसलिये उसके माता पिता तथा वह कन्या स्वयम् भी रोया करते थे, परन्तु कर्मोसे क्या पश है ? निदान माताके उपदेगमे पुत्री धर्मभ्यानमें रत रहने लगी, जिससे कुछ दुःख कम हुआ। एक दिन एक वैग आया और उसने सिद्धचक्रकी आराधना करके औपधि दी। जिससे उस कन्याका रोग दूर होगया। तब उस भद्रशाहने अपनी कन्या उसी वैद्यको व्याह दी । पश्चात् यह पिंगल पैद्य उस विशाला नामी वणिक पुत्री के साथ कितने ही दिन पीछे देशाटन करता हुआ चित्तोडगढकी ओर आया । वडापर भीलोने उसे मारकर सब धनं लट लिया। निदान विशाला यशामे पति और द्रव्य रहित हुई नगरके जिनालयमें र्ग, और जिनराजके दर्शन करके वहा तिप्ले हुए श्रीगुरुको नमस्कार करके बोली । प्रभु मै अनाथनी हु, मेरा। सर्वस्य खो गया-पति भी मारा गया और द्रव्य लुर गया। अब मुझे कुछ नी मझता है कि क्या करूं, कृषा कर कुछ कल्याणका मार्ग बता ये? गा नित ० तर मुनिराजन कटा-'पेटी ' एनो यत्र जप सदा पने ही प्रांत कोका गुभाशुभ र भोगना । 7 प्रथम 17 यम । कथाम जन्मम इसी नगग्म वेश्या गीत पान तो दी थी. परतु गापन पियाम भी निपुण थी । एक मका नोमदन नाम मुनिराज यहा आये । यह सुनकर नगर लोग पानाजो गये गोर बहा उन्माहम उनमा किया। मां जैसे नया मामा उन्ट्रको अजा नहीं लगाना । उमी गार पुत्र मियानी विपी लोगाने मुनिमे वादविवाद किया नमार का वेश्या (तुझे ही) तो मुनिक पाम ठगने के लिये (भट करने को भेना सो तने गुण वी नगि फयामा मा प्रकार ग्विापा, शरीरका भी आलिंगन किया. परंतु जैसे मगर पर फकने गरका कुछ विगाना ही नी कि कहने पाले. दीका र ? विगाड होता है । उसी मकार मुनिगज नो पार गरवन स्पिर रहे. और न दार मान कर गेट मा । गमे उन पित्याची आर्थियोंको पटा नाय हवा. भोर तुगे भी बहुत पश्चाताप दमा । मन्नमें तुझे कोट गोगया, यो दुःयिा गा- स्गम मर कर न चोथे नर्क गई । बनामे प्राकर न यो पणिकके पुर पुत्री हुई है. यहां भी नुरे मफेड कोद "आमा मो पिंगल पवने तुने अन्दा किया और उसी नेरा पाणिग्रहण भी हमआया । पश्चात पूर्ण पापके उदयमे गोगने उमे गार डाला, और न उनमे बचकर यहा ना ना ?। अ यदि न कुछ माचरण पारण करेगी. नो गीतकी स पापसे सटेगी इसलिये मासे प्रथम त सम्वादशेनको पीकार कर अर्थात श्री अनि दा, निग्रंन्यगुर और द पाप जिन भगवान के कार हुए मंशावके मिसाय अन्य मिल्या देव गुरु गोर को ओड. जीपातिक मात तत्वों का अद्वान कर भोर सम्पादी- के निम्नाकित आदि माठ अगोका पालन कर्फ उसक २५ मल-टोपोको त्यागार, तर निर्मट मन्यादर्शन सोगा। न । प्रकार सम्यन्य पूर्ण श्रापकके गहिया, गन्य, गग्नेय, जन्मवर्ग और परिगहनमाण प्रादि १२ उताको पालन करने तुग आकाम पचमी उतको भी पालन कर । यह गत भादा मुद्री ५ को किया जाना है। इस दिन चार प्रकारका आहार त्यागकर उपाय पारण करे, और अष्टमकारकी द्रव्यसे श्री जिनालयमं जाकर भगवान की भभिषेक पूर्वक पूजन करे । पञ्चान गनिक समय गुले मैदानमा उत ( आगासी) पर बैठकर भजन पूर्वक जागरण करे । तथा वहां भी सिंहासन रखकर श्री चोवीस तीर्थरुनी प्रनिगा स्थापन करे, और प्रत्येक पहरमें अभिषेक पूर्वक पूजन करे, गौर यदि उस समय उम म्यानपा पाम आदिके कारण " ॥४० कयास मैनवत ॥४॥ कितने ही उपसर्ग आयें तो सब सहन करे परन्तु स्यानको न छोडे । तीनो समय महामंत्र नवकारके १०८ जाप करे, इस प्रकार ५ वर्ष तक करे। जब व्रत पूरा हो जावे तो उत्साह सहित उद्यापन करे। छत्र, चमर, सिंहासन, तोरण, पूजनके वर्तन आदि प्रत्येक ५ पांच नग मंदिरमें भेंट करे और कपमे कम पाच शास्त्र पघराये। चार प्रकारके संघको आवश्यक्तानुसार चारों प्रकारके दान देये, और मी प्रभावना विशेष करे । इस प्रकारसे विशाला कन्याने श्रद्धा पूर्वक वारह व्रत स्वीकार किये और इस आकाशपंचमी व्रतको भी विपि सहित पालन किया। पश्चात् समांघिमरण कर यह चौथे स्वर्गमें मणिभद्र नामका देव हुआ। वहा उसने देवागनावो सहित क्रीडा करते हुए अनेक तीर्थोके दर्शन पूजा बहना तया समोशरण आदिकी बदना की। इस प्रकार सात सागरकी आयु पूर्ण कर एजेन नगरमें प्रियंगुठन्दर नाम गजाके यहा तारामती नाम रानीमे सदानद नाम पुत्र हुआ । सो कितनेक काल राज्योचित मुख भोगे । पश्चात् एक दिन नगर बाहर वनमें मुनिराजके दर्शन कर और उनके मुखसे ससारसे पार उतारनेवाले धर्मका उपदेश मुनकर उसने वैराग्यको प्राप्त होकर जिन दीक्षा अंगीकार की। और शुरुन्यानके वलसे केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष पद माप्त किया। इस प्रकार विशाला नामकी वणिक कन्याने व्रतके प्रभावसे सर्ग और मोसका पद प्राप्त किया, तो यदि श्रद्धा सहित अन्य जीव व्रत पालेंगे तो क्यो नही उत्तम मुखोको प्राप्त होगे ? अवश्य होगे। सुता विशाला वणिक व्रत, आकाशपचमी पाल | स्वर्ग मोक्ष सम्पति लही, 'दीप' नमावत माल ॥ कोकिला पंचमीत कथा । ॐकार वाणी नमू , स्याहाद मयसार । ना प्रसाद सन्मति मिले, कथा कहू सुखकार ॥ कुरुजांगल देशमें गगा नदीके किनारे राजनगर है, वहाका राजा वीरसेन न्यायपरायण और धर्मात्मा था। इसी नगरम दो पणिक श्रेष्ठि रहते थे। एकका नाम धनपाल और दूसरेका नाम जिनभक्त था। पनपाल सेठ के
नव्रत
कयासः
॥४२॥
धनमती नामकी सेठानीसे घनभद्र नामका पुन उत्पन्न हुआ और जिनभक्त मेउके घर जिनमती नामकी कन्या उत्पन्न
सो कर्मयोगसे इन दोनो वर कन्या (पनभद्र और जिनमति ) का पाणिग्रहण सस्कार भी हो गया। ता जिनमती पतिके
साथ समुराल गई और गृहस्योंकी रीतिके अनुसार अपने पतिके साथ नाना प्रकारके मुख भोगने लगी परतु पूर्वकर्म
सयोगसे जिनमति और उसकी सामुमें अनबनाव सा रहने लगा । कुछ कालके अनतर पनपाल सेठ कालवा हुआ। तब
जिनमतीने सामुमे कहा-माताजी ! पतिका क्रिया कर्म कीजिए और ढानादिक शुभ कर्म करिए। इस पर सामने ध्यान नहीं
दिया किन्तु उल्ला उमने वहसे रिस करके पूजा होम आदिका सामान जो बहने इकट्ठा कर रखा था रानिको उठकर भक्षण
कर लिया सो तिल आदि पदायाँके भक्षण करनेमे उसे अजीर्ण होगया और वह उटीरणा मरणसे मरकर अपने ही
घरमें कोकिला (गृहगोपा) दुई । जिनमति अपने पति घनमढ़ सहित मुखसे कालक्षेप करने लगी। उसकी सानु जो कोकिला
हुई थी, सो हर समय अपने पूर्व वैरके कारण जिनमतिके ऊपर बीट (मल) कर दिया करे । इस कारण जिनपति बहुत
दुःखित रहने लगी। एक दिन भाग्योदयसे श्री मुनिराज विहार करते हुए वहां आ गये. सो जिनमति स्नानकर पवित्र
वस्त्र पहिर श्री गुरुके दर्शनको गई। और भक्ति पूर्वक स्तुति वंदना करके शाति पर्वक. सयार्थ देवगुरुधर्मका व्यारम्यान
मुना । पश्चात् नत मस्तक होकर पोली:-हे प्रभु! यह कोकिला नामका न जाने कौन दुष्ट जीवधारी है, जो हमको निश-
दिन दुःख देता है । तब श्री गुरुने कहा, यह तेरी सामु धनमतीका जीव है। इसने पूर्वभवमें पूजा होम आदिका सामान
नैवेद्य तिल आदि भक्षण किया जिससे यह अजीण रोगसे आयुकी उदीरणा कर मरी और कोकिला हुई है। सो उसी
भवके वैरके कारण यह तुझे कष्ट पहुंचाती है ।
तब जिनमतिने कहा-खामीजी यह पाप कैसे घट सकता है ?
श्री मुनिराजने उत्तर दिया-बेटी ! ससारमें कुछ भी कठिन नहीं है । यथार्थमे सब काम परिश्रमसे सरल होजाते
हैं। तुम अर्हतदेव, निर्ग्रन्थ गुरु और दयामई धर्मपर श्रद्धा रखकर, कोकिला पचमी व्रत पालन करो तो निःसन्देह यह
उपद्रव दूर हो जायगा । इसके लिये तुम आपाढ वदी पचमीसे ५ मास तक प्रत्येक कृष्ण पक्षकी ५ को, इस प्रकार एक
वर्षकी पाच पांच पचमी पांच वर्षों तक करो । अर्थात् इन दिनोमें मोसह पारण कर अभिपेकपूर्वक जिन पूजा करो और धर्म
॥४२॥
कया। मैनवत - भ्यानमें धारणा पारणा सहित सोलह पहर व्यतीत करो। मुपात्रोमें भक्ति दीन दुग्वी जीवोंको करुणा पूर्वक दान देवो पश्चात् उद्यापन करो। पांच जिनविम्ब पधराओ । पांच शास्त्र लिखाओ, पाच वर्णका पंच परमेष्टीका मण्डल मांड कर श्री जिन पूजा विधान करो। पांच प्रकारका पकान बना कर चार सघको भोजन कराओ । पांच गागर पच प्रकारके मेवोंसे भर कर श्रावकोंको भेट दो । पाच वजा चैयालयमें चढायो। पाच चदेवा. पाच अचार, पांच छत्र, पांच चमर आदि पाच पाच उपकरण बनवाकर मदिरमें भेंट चढ़ावो । विद्यालय बनवाबो, श्राविकाशालाएं खोलो, रोगी जीवोके रोग निवारणार्य औपयालय नियत करो इस प्रकार शक्ति प्रमाण चतुविवि दान शालाए खोलकर स्वपर हित करो। तथा श्रद्धा सहित व्रत उपवास करो। यह सुनकर जिनपतिने मुनिको नमस्कार करके व्रत लिया। और उसकी सास जो कोकिला यी, उसने भी अपने मवान्तरकी कया गुरुमुखसे सुनकर अपनी आत्म निन्दा की और शुभ भावोसे मरकर स्वर्गमें देगी ई । जिनमती और धनभद्र मी व्रतके प्रभावसे स्वर्गम देव हुए । अब महामे आकर विदेह क्षेत्रमें जन्म लेकर मोक्ष गाउँगे । इस प्रकार जिनमती और धनभद्रने कोकिला पचमी बन पालन कर उत्तम गतिका बंध किया। जो अन्य नरनारी प्रतकर में तो क्यो न उत्तम पदको प्राप्त होगे ? अवश्य ही होवेंगे। धनमद्र अरु जिनमती, कोकिल पचमी सार । कियो व्रत्य शुभ वध कर, जासे मुक्ति मझार ॥ 99333EELER चंदनष्ठी व्रत कथा। देव नमो अहंत नित, वीतराग विज्ञान । चदनपष्टी व्रत कथा, कह म्वपरहित जान ।। काशी देशमे बनारस नामका प्रसिद्ध नगर है जिसको वाईसमें तीर्थकर श्री पार्श्वनाथ भरावानने अपने जन्म धारण करने कर पवित्र किया था, उसी नगरम किसी समय एक मुरसेन नामका राजा राज्य करता था। उसकी रानीका नाम पद्मिनी था। एक दिन वह राजा समामे बैठा था, कि वनपालने आकर उ ऋतुवोके फलफूल लाकर राजाको भट किये । राजा इस शुम भेंटसे केवली मगवानका शुभागमन जानकर, स्त्रजन और पुरजनो सहित वदनाको गया और -
जनात
॥४४॥
कयास
भक्तिपूर्वक प्रदक्षिणा दे नमस्कार करके बैठ गया। श्री मुनिराजने प्रथम ही मुनिधर्मका वर्णन करके पश्चात् श्रापक धर्मका
वर्णन किया । उसमें भी सबसे प्रथम सब चौंका मूल सम्यग्दर्शनका उपदेश किया कि वस्तु स्वरूपका यथार्थ श्रद्धान हुए
विना सब ज्ञान और चारित्र निष्फल है और यह वस्तु स्वल्पका श्रद्धान सतार्थ टेप (अढत), ससार्थ गुरु (निर्गन्य) और
दयाम (जिन प्रणीत) धर्मसे ही होता है, अतएव प्रथम ही इनका परीक्षापूर्वक श्रद्धान होना आवश्यक है। तत्पश्चात् अहिंसा,
सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और परिग्रह खाग ये पांच बत एकदेश पालन करे तथा इन्हीके यथोचित पालनार्थ सप्त शीलो
(तीन गुणव्रत व चार शिक्षात्रतों) का भी पालन करे इत्यादि उपदेश दिया तप राजाने हाथ जोडकर पूछा-हे प्रभु !
रानीके प्रति मेरा अधिक स्नेह होनेका क्या कारण है ? यह सुनकर श्री गुरुने कहा-
राजा ! सुनो, अवतीदेशमें एक उज्जैन नामका नगर है, वहा पीरसेन नाम राजा और उसकी रानी वीरमती थी।
इसी नगरम जिनदत्त नामक एक मेठके उसकी जवानी काम गेठानीले ईश्वरचन्द्र नामका पुत्र भी या जो कि अपनी
मामाकी पुत्री चन्दनाका पाणिग्रहण कर मुखमे काटक्षेप करना था। एक समय सेठ जिनदास और सेठानी जयावती
कारण पाकर दिगम्बरी दीक्षा ग्रहणकर मुनि हो गये । और तपके माहात्म्यसे अपनी २ आयु पूर्ण कर स्वर्गमें देय
और पिताका पद प्राप्त करके इश्वरचन्द्र सेठ भी चदना सहित मुखमे रहने लगा। एक दिन अतिमुक्तक नामके
मुनिराज मासोपवासके अनतर नगरमे पारणा निमित्त आए सो दृश्वरचन्द्रने भक्ति सहित मुनिको पहगाह कर अपनी स्त्रीसे
कहा कि श्री गुरुको आहार देओ तब चन्दना बोली-स्वामी ! मै महतुपती हूं कैसे आहार दं? ईश्वरचन्द्रने कहा कि गुपचुप
रहो डल्ला मत करो । गुरुजी मासोपवासी हैं, इसलिये शीघ्र पारणा कराओ ।
चन्दनाने पतिके कयनानुसार मुनिराजको आहार दे दिया सो श्री मुनिराज तो आहार करके बनम चले गये।
और यहा तीन ही दिन पश्चात् इस गुप्त पापके उदय होनेसे पति पलि दोनाके शरीरमें गलित कुष्ट होगया सो अत्यन्त
दुःखी हुए और कष्टसे दिन विताने लगे । एक दिन भाग्योदयसे श्रीभद्र मुनिराज सघ सहित उद्यानमें पदारे सो नगरके
लोक वंदनाको गये, और ईश्वरचन्द्र भी अपनी भार्या सह वदनाको गया सो भक्तिपूर्वक नमस्कार कर बैठा और " ॥४४॥
जैनवत कवासं० है धर्मोपदेश सुना । पश्चात् पूछने लगा-हे दीनदयाल ! हमारे यह कौन पापका उदय आया है कि जिससे यह विथा उत्पन्न हुई है ? तब मुनिराजने कहा, कि तुमने गुप्त कपट कर पात्रदानके लोभसे अतिमुक्तक स्वामीको ऋतुपती होनेकी अवस्यामें मी आहार पान व मन वचन काय शुद्ध हे कहकर आहार दिया है। अर्थात् तुमने अपवित्रको मी पवित्र कहकर चारि- का अपवाद किया है सो इसी पापके कारणसे यह असाता वेदनी कर्म उदय आया है। यह सुनकर उक्त दम्पनि ( सेठ सेठानी) ने अपने अज्ञान कृत्यपर बहुत पश्चात्ताप किया और पूछा-प्रभु ! अब कोई उपाय इस पापसे मुक्त होनेका बता- ईये ? तब श्री गुरुने कहा-हे भद्र सुनो ! मानो पदी पष्टी (गुजराती श्रावण वदी ६) को चारो प्रकारके आहारका त्याग करके उपवास वारण करो तथा जिनालयमे जाकर पचामृतसे अभिषेक पूर्वक पूजन करो अर्थात् छः प्रकारके उत्तम और प्रामुक फली सहित अष्ट द्रव्यमे छा अष्टक चढायो, अर्थात् छः पूजा करो । एक सौ आठ १०८ वार नमोकार मंत्रका फलो व फूलों द्वारा जाप करो, चारो सघको चार प्रकारका दान देयो । इस प्रकार व्रत करो, तीनो काल सामायिक व्रत, अभि- पेक, पूजन करो, रात्रिको मननपूर्वक जागरण करो, घरके आरम्भ व विषय कपायोका उपवासके दिन और रात्रिभर आठ पहर तथा धारणा पारणाके दिन ४ नार पहर गेने गोला पहरो ना त्याग करो। इस प्रकार छः पप तक यह बन करो । पश्चात् उद्यापन करो । अर्थात् जहा जिनमदिर न हो. वहा पहा छ जिनालय बनवाबो, छ जिन विम्ब पधरावो, छः जिन मदिरोंका जीर्णोद्धार करायो । छः शास्त्रोका मकागन कगे। उ सब प्रकारके उपकरण पहिरोमें चढावो । यः मनोंको भोजन करायो । चार प्रकारले (आहार औपर शाख और अभयदान) दान देवो । इस प्रकार दम्पतिने व्रतकी निधि मुन मुनिराजकी सामीपर्पक जन ग्रहण करके विपि महित पालन किया । कुछ दिनों अशुभ कर्मकी निर्जग होने से उनका शरीर बिलकुल निरोग होगया और आयुके अन्तम सन्यास हरण करके वे दम्पति स्वर्गम रत्नचूल और रत्नमाला नामके देन देवी हुए। सो नहुत काल तक सुख भोगते और नदीवर आदि अकृतिम चैत्यालयोकी पूजा बंदना करते काल क्षेप करते रहे । अन्तम आयु पूर्ण कर वडामे चयकर तुम राजा हुए हो, और वह रत्नमाला देवी तुम्हारी पट्टरानी पद्मिनी हुई है। सो यह तुग दोनोका पूर्व भवोंका सम्बन्ध होनेसे ही प्रेम विशेष हुवा है। यह वार्ता मुनकर राजाको भत्र भोगोसे वैराग्य उत्पन्न हुआ, सो उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्रको राज्य देकर जैनन्नत कथा ॥ ४६॥ आप दीक्षा ले ली और घोर तपश्चरण किया । और तपके प्रभावसे थोड़े ही कालमें केवलझान प्राप्त करके वे सिद्ध पढको प्राप्त हुए। और रानी पद्मिनीके जीवने भी दीक्षा ली, सो वह भी तपके प्रभावसे स्त्रीलिंग छेदकर सोलहवें स्वर्गमें देव दुमा। वहांसे चय मनुष्य भव लेकर मोक्ष पद प्राप्त करेगा। इस प्रकार ईश्वरचंद्र सेठ और चन्दना सेठानीने इस चन्दन पष्ठी व्रतके प्रभावसे नरमुरके सुख भोगकर मोक्षपद प्राप्त किया व करेंगे । और जो कोई नरनारी व्रत पालेंगे, वे भी अवश्य उत्तम पद पायेंगे। चन्दन पष्ठी व्रत थकी. ईश्वरचन्द्र सुजान । अरु तिस नारी चन्दना, पायो सु ख महान ॥ निदान सक्षमी वक्त कथा। सहित आठ अरु वीस गुण, नमू साधु निर्ग्रन्थ । सप्तमी व्रत निर्दोषकी, कथा कह गुण ग्रन्थ ॥ मगध देशके पाटलीपुत्र ( पटना ) नगरमें पृथ्वीपाल राजा राज्य करता था। उसकी रानीका नाम मदनावती था। इसी नगरमें अहदास नामका एक सेठ रहता था जिसकी लक्ष्मीमती नामकी स्त्री थी और एक दूसरा सेठ धनपति जिसकी स्त्रीका नाम नदनी था, रहना था । नदनी सेठानीके मुरारी नामका एक पुत्र था सो सांपके काटनेसे मर गया, इसलिए नंदनी तथा उसके घरके लोग अत्यन्त करुणाजनक विलाप करते थे अर्थात सब ही भोकम निमग्न थे। नंदनी तो बहुत ही शोकाकुल रहती थी, उसे ज्यो ज्यो कोई समझाता था सो सो अधिकाधिक शोक करती थी। एक दिन नंदनीके रुदन (जिसमें पुत्रके गुणगान करती हुई रोती थी) को सुनकर लक्ष्मीमती सेठानीने समझा कि नदनीके घर गायन हो रहा है । तब वह सोचने लगी कि नन्दनीके घर तो कोई मंगल कार्य नही हे. अर्थात् व्याह व पुत्र जन्मादि उत्सव तो कुछ भी नही है तब किस कारण गायन हो रहा है ? अच्छा, चलकर पूछ तो सही कि क्या बात है ? ऐसा विचार कर लक्ष्मीमती सहज स्वभावसे हंसती हुई नदनीके घर गई और नंदनीसे इंसते हंसते पूछा ऐ बहिन ! तुम्हारे घर कोई मंगल कार्य है ऐसा तो सुना ही नहीं गया, तब यह गायन किसलिये होता रहता है । कृपया बताओ?
नव्रत
तव नंदनी रिस करके बोली-अरी बाई ! तुझे हंसीकी पडी है और मुझपर तो दुःखका पहाड़ टूट पड़ा है। मेरा |M कयास०
॥४७॥ कुलका दीपक, प्यारा, आंखोंका तारा पुत्र सर्पके काटनेसे मर गया है, इसीसे मेरी नीद और भूख प्यास सब चली गई
है, मुझे संसार अंघेरा लगता है। दुःखियाने दुःख रोया मुखियाने हंस दिया । मुझे रोना आता है और तुझे हंसना
आता है । जा, जा ! अपने घर एक दिन तुझे भी अतुल दुःख आवेगा, तब जानेगी कि दसरेका दुःख कैसा होता है ?
इसपर लक्ष्मीमती अपने घर चली गई और नंदनीने उससे निष्कारण वैर कर सांप मंगाया और एक
घड़ेमें धरवाकर लक्ष्मीमतीके घर भिजवा दिया, और कहला दिया कि इस घडेमें मुन्दर हार गक्खा है सो तुम पहिरो।
नंदनीका अभिप्राय था कि जब लक्ष्मीमनी पड़ेम हाथ डालेगी तो साप इसे काटेगा और यह दुखियोकी हँसी
करनेका फल पावेगी।
जब दासी लक्ष्मीमतीके घर वह विपले सापका घडा लेकर गई, और यथायोग्य मुश्नपाके वचन कर कह घडा
भेंट कर दिया, तब लक्ष्मीमतीने दासीको तो पारितोपक देकर विदा किया, और आपने घडेको उघाड कर उसेमेसे हार
निकाल कर पहिर लिया (लक्ष्मीमतीके पुण्यके प्रभावसे सांपका हार हो गया है) और हर्ष सहित जिनालयको बंदना
निमित्त गई । सो मदनावती रानीने उसे देख लिया और राजासे लक्ष्मीमतीके जैसा हार मगा देनेके लिए इट करने लगी।
इस पर राजाने अईदास सेठको बुलाकर कहा-हे सेठ ! जैसा हार तुम्हारी सेठानीका है वैसा ही रानीके लिए
वनवा दो, और जो द्रव्य लगे सो भण्डारसे ले जाओ। तब अहंदास श्रेष्ठिने सेठानीसे लेकर वही हार राजाको दिया।
सो राजाके हाथमें पहुंचते ही हारका पुनः सर्प हो गया इस प्रकार वह सांप अर्हदासके हाथमे हार और राजाके हाथमें साप
जाता था। यह देखकर राजा व समाजन सभी आश्चर्ययुक्त हो हारका वृतान्त पूछने लगे; परन्तु सेठ कुछ भी कारण
न बता सका।
भाग्योदयसे वहां मुनि सघ आया सो राजा और मजा सभी वदनाको गये। पढना कर धर्मोपदेश मुना और
अन्नमें राजाने वह हार और सांपवाली आश्चर्यकी वात पूछी । तब मुनिराजने कहा-हे राजा ! इस मेटने पूर्व भवमें निर्दोप
सातमका व्रत किया है उसीके पुण्य फलमे यह सांपका हार बन जाता है ।
॥४॥
जैनव्रत ॥४८॥ और तो बात ही क्या है इस व्रतके फलसे स्वर्ग और अनुक्रमसे मोक्षपद भी माप्त होता है, और उस व्रतकी विधि इस प्रकार है । सो मुनोः- भादों मुदी ७ को आवश्यक वस्त्रादि पग्निह रखकर शेष समस्त आरम्भ व परिग्रहका साग करके श्री जिन मंदिरमें जावे और प्रभुका अभिषेक आरम्भ करे । अर्थात् वहांपर दृषका कुण्ड भरके उसमें प्रतिमा स्थापन करे और पचामृतका स्नान करा करनेके पश्चात् अष्ट द्रव्यसे भाव सहित पूजन करे। त्रिकाल सामायिक करे और और स्वाध्याय करे। इस प्रकार दिन रात धर्म ध्यान में वितावे । पश्चात् दूसरे दिन हपौत्सव सहित जिनदेवका पूजन अर्चन करके अतिथिको भोजन करा कर और दीन दुखियोको यथावश्यक दान देकर आप भोजन करे । इस प्रकार सात वर्ष नक यह व्रत करके पश्चात् विधि पूर्वक उद्यापन करे और यदि उद्यापनकी शक्ति न हो, तो दने वर्षों तक व्रत करे। उद्यापन इस प्रकार करे-चारह प्रकारका पक्वान्न, और बारह प्रकारके फल, तथा मेवा आवकोको वाटे । बारह बारह कलश, झारी, झालर, चदेवा आदि समस्त उपकरण जिन मदिरमें चढावे। बारह शास्त्र लिखाकर पररावे और चतुर्विधि दान करे। राजाने यह सब बत विधान मुनकर खशक्ति अनुसार श्रद्धा सहित इस व्रतको पालन किया और अन्तमें आयु पूर्णकर (समाधिमरण कर) सातवें स्वर्गमें देव हुआ। और भी जो भव्य जीव श्रद्धा सहित इस व्रतको पालेंगे तो वे भी उत्तमोत्तम मुखोको प्राप्त होंगे। नरपति पृथ्वीपाल अरु, अरहदास गुणवान । व्रत सातम निर्दोष कर, लहो स्वर्ग सुख दान ॥ निसल्ल अष्टमी व्रत कथा। वन्दु नेमि जिनेन्द्र पद, वाईसवें अवतार । कथा निसल्ल आठम तनी, कहू सु खदातार ॥ भरतक्षेत्रके आर्यखण्डमें सोरठ नामका देश है (वर्तमान में इसे काठियावाड़ कहते हैं ) इस देशमें द्वारका नामकी मुन्दर नगरी है, यहीं पर श्री नेमिनाथ पाटसवें तीर्थकरका जन्म हुआ था। जिस समय भगवान नेमिनाय दिक्षा लेकर मैनवत . गिरनार पर्वतपर तपश्चरण करते थे और द्वारकामें श्री कृष्णचन्द्रजी नवम नारायण राज्य करते थे। ये त्रिखण्डी नारायण कयास ॥४९॥ थे। इनकी मुख्य पट्टरानी ससमामा थी सो ससमामाके द्वारा एक बार नारदका अपमान हुआ, इस पर नारदने क्रोपवश दण्ड देनेके अभिप्रायसे रुक्मिणि नामकी एक राजकन्यासे नारायणका विवाह कराकर सरमामाके सिरपर सौतका वास करा दिया। निःसन्देह सौतका खियोको बहुत बड़ा दुःख होता है। एक समय जब भगवान नेमिनाथको केवलज्ञान प्रगट होगया तो श्रीकृष्ण रानियो और पुरजनो सठित बदनाको गये और बंदना करके धर्मोपदेश नुननेके अनन्तर रक्मिणि नामकी रानीके भवान्तर पूछे । तव भगवानने कहा कि मगर देशमें राजग्रही नगर है वहाँपर रूप और यौवनके मदसे पूर्ण एक लक्ष्मीमती नामकी बामणी रहती थी। एक दिन एक मुनिराज क्षीण शरीर दिगम्बर मुद्रायुक्त आहारके निमित्त इस नगरंम पधारे । उन्हें देखकर इस ग्रामणीने उनकी बहुत निंदा की और दुर्वचन कड़कर ऊपर थूक दिया । मुनि निंदाके कारणसे इसको तियेच आयुका बन्च होगया और उसी जन्मम उसको कोड आदि अनेक व्याधिया भी उत्पन्न हो गई पश्चात् वह आयुके अन्तमै असन्त कष्टसे मरकर वह भस हुई। फिर मरकर मुकरी दुई, फिर कुत्ती हुई, फिर धीवरनी हुई । सो मछली मार मारकर आजीविका करती हुई जीवनकाल पूरा करने लगी। एक दिन वटा तले श्रीमुनि यान लगाये तिष्ठे थे कि वह कुरूपा ओर दुष्ट चित्ता धीवरी जाल लिए। वहां आई और मछली पकडनेके लिए जाल नदीमें डाला । यह देखकर श्री गुरुने उसे उस दुष्ट कार्यसे रोका और उसके भवान्तर मुनाकर कहा कि त पूर्व पापके फलमे ऐसी दुःखी हुई है और अब भी जो पाप करेगी तो तेरी असन्त दुर्गति होगी। इस वीपरीको मुनि द्वारा अपने भवान्तर मुनकर मूळ आगई। पश्चात् सचेत हो प्रार्थना करने लगी- नाय ! इस पापसे घटनेका कोई उपाय हो तो बवाइए । तव श्री गुरुने दया करके उसे सम्यग्दर्शन पूर्वक श्रापकके पाच अणुनतो (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य परिग्रहप्रमाण) का उपदेश दिया । अष्ट मूल गुण (पंच उदम्बर और तीन मकारोका त्याग करना) धारण कराये, ४॥ १९ ॥ VI और आहारदान देवे । इस प्रकार यह व्रत सोलह वर्ष तक करके उग्रचार प्रकारके सबको ओपधि , शास्त्र , अमय किया इस प्रकार वह धीरी श्रावकके व्रत ब्रहण करके आयुके अन्तम ममापिमरण का दक्षिण देव ने सारा नगरसे नदष्टिके यहा नंदा सेठानी के लक्ष्मीनती नामकी कन्या मुई । सो यद्यपि वह कन्या रुपवा तो थी तथा अशुभ आचरमाके कारण सभी उसकी निंदा करते थे। एक समय उसी नगरके बनम नंद मुनि पधारे। सब लोग मुनिकी नाशो गये। राजा आदि सभी जनोने स्तुति दनाकर पो देश सुना । पश्चात् नंद श्रेष्ठिने पूछा-दे प्रभो ! यह मेरी कन्या उत्तम रूपवान होकर भी क्यो अशुभ लसणोंसे युक्त है जिसमे सभी इसकी निंदा करते है तप श्री गुरुने कहा कि इसने पूर्व जन्मोमें मुनिकी निंदा की थी जिससे यह भैस, मुकरी ककरी, वीवरी आदि हुई। घीपरीके भवमें मुनिके उपदेशसे पंथाणुव्रत धारण करके सन्याससे मरी सो नेरे घर पुत्री हुई है। अभी इसके पूर्ण असाता कर्मका विलकुल क्षय न होनेसे ही ऐसी अवस्था हुई है सो यदि यह सम्यक्त्वपूर्वक निःसल्य अष्टमी व्रत पाले तो निःसन्देह इस पापसे छूट जावेगी । इस व्रतकी विधि इस प्रकार है:- भादों मुदी अष्टमीको चारो प्रकारके आहारोका साग करके श्री जिनालयमं जाकर प्रत्येक पहरमे अभिषेक पूर्वक पूजन करे । त्रिकाल सामायिक और स्वाध्याय करे और रात्रिको जिन भजन करते हुवे जागरण करे । पश्चात् नवमीको चढावे, अभिषेक पूर्वक विधान पूजन करे, कमसे कम सोलह श्रावकोको मिष्टान्न भोजन प्रेमयुक्त हो करावे । दुखित भुखि- तको करुणायुक्त दान देवे और चारो प्रकारके संघम वात्सल्य भाव प्रकट करे । यदि उद्यापनकी शक्ति न होवे तो दना व्रत पाले। इस प्रकार उस श्रेष्ठि कन्याने विधि मुनकर यह व्रत वारण किया और विधियुक्त पालन भी किया, श्रावकके बारह व्रत अगीकार किये तया सम्यग्दर्शन जो कि सब व्रतो ओर वर्मोका मूल है, धारण किया । व्रत पूर्ण होने पर उद्यापन किया और अंत समयमें गीलश्री आर्यिकाके उपदेशसे चार प्रकारके आहारोको त्याग, तथा आर्त रौद्र भावोंको छोडकर समाधि मरण किया सो सोलहवें स्वर्गमें देवी हुई । वडापर पचपन पल्य (५५) क्क नानामकारके मुख्य ॥५० भोगे और आयु पूर्णकर वहांसे चयी सो यह भीष्म राजाके यहा क्मिणि नामको कन्या हुई है। अत्र अनुक्रमसे खी लिंग , कथासे. ननव्रत ॥५१॥ छेदकर परम पदको प्राप्त करेगी। इस प्रकार रानी रुक्मिणि अपने भवांतर मुनकर ससार देह भोगोसे विरक्त हो, सहर्प राजमतीके निकट गई और दीक्षा लेकर तपश्चरण करने लगी । सो वह अत समय सन्यास मरण कर स्वर्गमे देव हुई वहांसे आकर मनुष्य मव ले मोल जावेगी । इस प्रकार रुक्मिणिने व्रतके फलसे अपने पूर्व भवोके समस्त पापोको नागकर उत्तम पद प्राप्त किया और भी जो भव्य जीव श्रद्धा सहित व्रत पालेंगे, वे इसी प्रकार उत्तमोत्तम मुखाको प्राप्त करेंगे। निसलाटमी व्रत थकी, लक्ष्मीमति त्रियसार । सकल पापको नाशकर, पायो सुख अविकार ॥ 10. सुमंघदशमी प्रत कथा । वीतरागके पढ़ प्रणमि, प्रणमि जिनेश्वर वान । कथा सुगन्ध दशमी तनी, कह परम सुख दान ।। जम्बूद्वीपके विजयार्द्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें शिव मदिर नामका एक नगर है। वहांका राजा प्रियकर और रानी मनोरमा यी सो अपने धन यौवन आदिके ऐश्वर्य, मदोन्मत्त हुए जीवनके दिन पूरे करते थे। धर्म किसे कहते थे यह उन्हें मालूम ही न था। एक समय मुगुप्त नामके मुनिराज कुश शरीर दिगम्बर मुद्रायुक्त आहारके निमित्त यस्तीम आए सो उन्हें देखकर रानीने अत्यन्त घृणा पूर्वक उनकी निंदा की और पानकी पीक मुनिपर यूक दी । सो मुनि तो अतराय होने के कारण विना ही आहार लिए पीछे वनमें चले गए और कर्मोकी विचित्रतापर विचार कर समभाव वारणकर व्यानमें निमग्न हो गए। परंतु थोडे दिन पश्चात् रानी मरकर गधी हुई, फिर मरकर मुकरी हुई, फिर कूकरी हुई, फिर वहांसे परकर मगध देशके वसततिलक नगरमें विजयसेन राजाकी रानी चित्रलेखाके दुर्गमा नामकी कन्या हुई । सो इसके भरीरमे असन्त्र दुर्गध निकला करती थी।
जनत्रत कया एक समय राजा अपनी सभामें बैठा था कि वनपालने आकर समाचार दिया कि हे राजन् ! आपके नगरके वनमे सागरसेन नामके मुनिराज चतुर्विधि संघ सहित पधारे ह । यह समाचार मुनकर राजा प्रजा सहित वंदनाको गया और भक्ति पूर्वक नत मस्तक हो राजाने स्तुति वंदना की । पश्चात् मुनि तथा श्रावकके धोका उपदेश मुनकर सबने यथाशक्ति व्रतादिक लिये। किसीने केवल सम्यक्त्व ही अंगीकार किया । इस प्रकार उपदेश सुननेके अनन्तर राजाने नत्रतापूर्वक पूछा-डे नाथ ! यह मेरी कन्या दुर्गधा किस पापके उदयमे ऐसी हुई है सो कृपा कर कहिये ? तब श्री गुरुने उसके पूर्व भवोका समस्त वृत्तान्त मुनिकी निंदादिका कह सुनाया जिसको सुनकर राजा और उस कन्या सगीको पश्चात्ताप हुआ। निदान राजाने पूछा-भो । इस पापसे छूटनेका कौनसा उपाय है ? तप श्री गुरुने कहाः- समस्त वर्गोका मूल सम्यग्दर्शन है सो अहंत देव, निर्धन्य गुरु और जिनभापित धर्मम श्रद्धा करके उनके सियाग अन्य रागी वेपी देव, भेषीगुरु और हिंसामय वर्मको परियाग कर अहिंसा, सख, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और परिग्रह प्रमाण इन पांच बतोको अङ्गीकार करे और मुगन्ध दशमीका व्रत पालन करे जिससे अशुभ कर्मका क्षय होवे । इस व्रतकी विधि इस प्रकार है कि भादो मुदी दशमीके दिन चारो प्रकारके आहारको त्यागकर समस्त गृधरम्मका त्याग करे और परि- ग्रहका भी प्रमाण कर जिनालयमें जाकर श्री जिनेन्द्रकी भाव सहित अभिषेक पूर्वक पूजा करे। सामायिक स्वाध्याय करे। धर्म कथाके सिवाय अन्य विकथाओका साग करे । रात्रिमे भजन पूर्वक जागरण करे। पश्चात् दूसरे दिन चौवीस तीर्थक- रोकी अभिषेक पूर्वक पूजा करके अतिथियो (मुनि च श्रावक) को भोजन कराकर आप पारणा करे। चारो प्रकारका दान देवे । इस प्रकार दश वर्ष तक यह व्रत पालनकर पश्चात् उद्यापन करे । अर्थात् चमर, क्षत्र, घण्टा, झारी, वजा आदि दश दश उपकरण जिन मंदिरोमें भेट देवे और दश दश प्रकारके श्रीफल आदि फल दश घर श्रावकोको वदि, यदि उद्यापनकी शक्ति न होये, तो दुना व्रत करे। उत्तम व्रत उपवास करनेसे, मध्यम कांजी आहार और जवन्य एकासन करनेसे होता है। इस प्रकार राजा प्रजा सपने व्रतकी विधि मुनकर अनुमोदना की और स्वस्थानको गये। दुर्गंधा कन्याने मन वचन कायसे सम्यक्त्व पूर्वक व्रतको पालन किया । एक समय दशवें तीर्थकर शीतलनाथ भगवानके कल्याणकके समय, कथाम जैनवत देव तथा इन्द्रोका आगमन देखकर उस दुर्गवा कन्याने निदान किया कि मेरा जन्म स्वर्गमें होवे सो निदानके प्रभाव से वह राजकन्या स्वर्गमें अप्सरा हुई और उसका पिता राजा मरकर दसवें स्वर्गमें देव हुआ। यह दुर्गधा राजकन्या अप्सराके भवसे आकर मगध देशके पृथ्वीतिलक नमरमें राजा महिपालकी रानी मदनमुन्दरीके मदनावती नामकी कन्या दुई, सो असन्त रूपपान और सुगधित शरीर हुई । और कौशाम्बी नगरीके राजा अरिदमनके पुत्र पुरुषोत्तमके साथ इस मदनाव- तीका व्याड हुआ । इस प्रकार ये दम्पति मुखपूर्वक कालसेप करने लगे। एक समय उनमें मुगुप्ताचार्य नामके आचार्य संघ सहित आये । सो वह राजकुमार पुरुषोत्तम अपनी स्त्री सहित वंदनाको गया तथा और भी नगरके लोग पदभाको गये सो स्तुति नमस्कार आदि करनेके अनन्तर श्री गुरुके मुखमे जीवादि तत्वोका उपदेश मुना । पश्चात् पुरुषोत्तमने पूछा, हे स्वामी ! मेरी यह मदनावती वी किस कारणसे ऐसी रूपान और अति मुगधित गरीरी है ? तब श्री गुरुने मदनावतीके पूर्व भवान्तर कहे और मुगध दशमीकै यतका माहात्म्य बताया सो पुरुषोत्तम ओर मदनापती दोनो भवान्तरकी कथा मुनकर संसार देह भोगासे विरक्त हो, दीया लेकर तपश्चरण करने लगे। इस प्रकार तपश्चरणके प्रमावसे मदनापती वी लिंग छेदकर सोलहवें स्वर्गमे देव हुई । वहां पाईस सागर मुखसे आयु पूर्ण करके अंत समय चयकर मगर देशके पमुंगरा नगरीमें मकरकेतु राजाके यहा देवी पहरानीके कनककेतु नामका घुन्दर गुणवान पुत्र हुआ। पिताके दीक्षा ले जाने पर कितेक काल राज्य करके वह भी अपने पुत्र मकर चजको राज्य दे दीक्षा लेकर तपश्चरण करने और देश विदेशोम विहार करके अनेक भव्य जीवोंको धर्मके मार्गम लगाने लगे। इस प्रकार कितनेक कालमें कनककेतु मुनिनाशको केवलज्ञान हुआ और बहुत कालतक उपदेशरूपी अमृत- की दृष्टि करके शेष अघाति कर्मोको नाश कर परम पढ गोसको प्राप्त हुए । इस प्रकार मुगंध दशमीका बन पालकर दुर्गना भी अनुक्रमसे मोलको प्राप्त हुई तो और भव्यजीव यदि प्रत पाले तो अवश्य ही उत्तमोत्तम मुखौंको पाव । सुगय दशनी व्रत कियो, दुगंधाने सार । मुरनरके मुख भोगके, अनुक्रम मई मापार ॥ DEEEEE
जनवत
॥५४॥
-
जितरादित कथा।
बन्दू ऋषम निनेन्द्र पद, माथ नाय हित हेत । कया कहू जिनरात्री व्रत, अभर अमर पढ देत ॥
जब तीसरे कालका अत आया, तय क्रमसे कर्मभूमि प्रगट हुई और कल्पदृस भी मद पड गये, ऐसे समयमें
भोग भूमिके भोले जीव भूख प्यास आदि अनेक प्रकारके दुखोसे पीडित होने लगे। तब कर्ममृमिकी रीतियें बतानेवाले
१४ कुलकर (मनु) उत्पन्न हुए। उन्हीयं से १४ वें मनु श्री नाभिराजा हुए। नाभिराजाके मरुदेवी नाम शुम लक्षणा रानी |
यी ! इनके पूर्व पुग्योदयसे तीर्थंकर पदधारी पुत्र रूपमनाथका जन्म हुआ। ये ऋपमनाथ प्रथम तीर्थंकर थे, इसीसे
आदिनाथ भी कहते है।
आदिनाथने नन्दा मुनन्दा नामकी दो स्त्रियोंसे व्याह किया और उनसे मरत, बाहुबलि आदि १०० पुत्र
तथा ब्राह्मी और मुन्दरी दो कन्याए हुई । सो कन्याएं कुमार कालहीमें दीक्षा लेकर तप करने लगीं। इस प्रकार
ऋषभदेवने बहुत काल तक राज्य किया। जब आयुका केवल चौरासीवा भाग अर्थात् १ लाख पूर्व शेष रह गया, तब
इन्द्रने प्रभुको वैराग्यका निमित्त लगाया अर्थात् एक नीलाजना नामकी अप्सरा जिसकी आयु अल्प समय ( कुछ मिनटो
ही ) की रह गई थी, प्रमुके सन्मुख नृस करनेको भेज दी। सो नृत्य करते करते वह अप्सरा वहांसे विलय होगई और
उसी क्षण, उसी पलमें दूसरी वैसी ही अप्सरा आकर नृत्य करने लगी। इस वातको सिवाय प्रमुके और समाजन कोई
भी जान न सके, परन्तु प्रमु तो तीन ज्ञान संयुक्त थे सो तुरन्त ही उन्होने जान लिया।
आप संसारको क्षणभगुर जानकर द्वादशानुमेलामोका चितवन करने लगे उसी समय लौकातिक देव आए,
और प्रभुके वैराग्य भावोकी सराहना करके उन्हें वैराग्यम स्तुति पूर्वक दृढ करके चले गये । पश्चात् इन्द्रादि देवों व नरे-
उत्साहपूर्वक तप कल्याणकका समारोह किया । भगवान् ऋषभनाथने सिद्धोको नमस्कार करके स्वय दिगम्बर दीक्षा
ली और भक्तिवश उनके सग ४००० राजाओने भी देखादेखी दीक्षा ले ली। सो दुर्द्धर तप करनेको असमर्थ होकर
नाना प्रकारके भेष धारण कर ३४३ पाखण्डमत चला दिए। इन दीक्षा लेनेवालोमें भरतजीका पुत्र मारीच भी था। सो
जब भगवानको केवलज्ञान हुआ और भरतजी उस समय बदनाको गए और वदना करके मनुष्योके कोठे गणा) में ॥५॥
'/ बैठकर वर्मोपदेश सुनने लगे। धर्मोपदेश सुननेके अनन्तर भरतजीने पूछा-हे ऋपिनाथ ! हमारे वंशमें और भी कोई आपके जेसा धर्मतीर्थका प्रवर्तक अथमा चक्रवर्ती होगा। तब प्रभुने कहा कि मारीचका जीव नारायण होकर फिर तीर्थकर भी होगा ) मारीच समवशरणमें ही बैठा था, सो यह बात सुनकर हर्पोन्मत्त हो दीक्षा त्याग करके वह अनेक मकारके पाप कर्मोमें प्रवृत्त होगया, और पचाग्नि नप कर अन्त समय माण डोडकर पांचवें स्वर्गमें देव हुआ। वहासे मिथ्यात्व अवस्थांम माण छोडकर अनेक त्रस स्थावर योनियोंम जन्म मरण करनेके अनन्तर राज्यगृही नगरीके राजा विश्वभूतिकी रानी जयतिके विश्वनंदि नामका पुत्र हुआ । एक समय विश्वभूति राजा कोई निमित्त पाकर वैराग्यको प्राप्त हो गये और अपने पुत्रको बालक जानकर अपने लघु भ्राता विशाखभृतिको राज्य और अपने पुत्र विश्वनदिको 'युवराज पद देकर आप दीक्षा लेकर तप करने लगे। युवराज विश्वनंदिने अपने मनोरजनार्थ एक बाग तैयार कराया, सो नित्य प्रति अपना चित्त रंजन किया करना था। वर्तमान राजा विशाखनदिने वाग देखकर अत्यन्त आश्चर्य किया। और इससे उसको विश्वनदिपरसे ट्रेप बुद्धि उत्पन्न हो गई । इसलिए उसने विश्वनदिको किसी प्रकार देशसे निकाल देनेका दृढ निश्चय कर लिया और इसलिये उसने युवराजको आज्ञा दी, कि तुम अमुक अमुक देश साधन करनेके लिए जाओ । युवराज विश्वनंदि राजाज्ञासे देश साधनेको गया, और उनकी क्रीडा करनेका जो पाग था सो राजाने स्वपुरको दे दिया। कितनेक काल बाद जब युवराज देश क्शकर लौटा तो अपनी क्रीडा करनेका बाग अपने काकाके पुत्रके हाथम गया जानकर कुपित हो उसे मारनेके लिए चला । सो वह विशाखमृतिका पुत्र भयके मारे वृक्षपर चढ़ गया। विश्वनदिने उस दृतको ही उखाड दिया । यह देखकर वह राजपुत्र युरराजके चरणोंमें मस्तक झुकाकर क्षमा मागने लगा। युवराजने अपने भाईको क्षमा करके उठाया, और आप संसारको असार जानकर काका सहित दीक्षा ले गया । काका विशावभूति बारह प्रकार दुर्द्धर तप करके दर्शन स्वर्गमें देव हुआ। युवराज विचनदि अनेक प्रकारके दुद्धर तप करते हुए मासोपवासके अनन्तर भिक्षात अर्थ नगरम पपारे, सो किसी पशुने उन्हें अपने सींगोमे प्रहारकर भूमिपर गिरा दिया । इस समय राजा विशालनेदि अपने महलोम पैठा यह --- ५५ जैनात कय सत्र वात देख रहा था, सो अविचारी मुनिका उपहास करने कहने लगा कि वह सा पल भर कहां गया ? इत्यादि ? मुनिराज विगाग्वनदि राजाके वचन सुनकर और अन्नगय जानके वनमें चले गये और उन्होंने निदान करके आयुके अन्तमें प्राण छोडकर दशव स्वर्गमे देव पद प्राप्त किया । कुछ काल पाद विशाग्वनदि भी दीक्षा ले. तप कर दशवे स्वर्गम देव हुआ। मो ये दोनों देव देवोचित मुख भोगने लगे मोर अन्त समय वहांमे चयकर विशाखभनिका जीव, सोरम्य देश पोदनपुर नगरीके प्रजापति राजाकी रानी जयावनी के बलभद्र पदपारी पुत्र हुआ और उसी गजाकी मृगावती गनीके गर्भसे विश्वनंदिका जीव दश वर्गमे चयकर विष्ट नामका नारायण पदधारी पुत्र हुआ । सो स्यनृपुरका राजा ज्वलन- जटीकी प्रभारती नामकी कन्याक साथ नारायणका व्याह हुआ। सो विशासनटिका जीव जो विजयाई गिरिका राजा अश्वग्रीव प्रतिनारायण हुआ था. उक्त व्याहका समाचार सुनकर बहुत कुपित हुआ और बोला कि क्या ज्वलननटीकी कन्या त्रिपृष्ट जेसा रक ब्याह सकता है ? चलो, इस दुष्टको इसकी इस धृष्टताका फल नसा, यह विचारकर तुरन्त ही ससन्य विपृष्ट राजा (जो कि होनहार नारायण ये) पर जा चहा और घोर संग्राम आरम्भ कर दिया। जिसमे पृथ्वीपर हाहाकार मच गया परन्तु अन्यायका फल कभी अच्छा नहीं हुआ न होगा। अन्तमें निपष्ट नारायणकी ही विजय और अश्वग्रीव अपने कियेका फल पाकर विशेष दुःस भोगनेको नर्कम चला गया । क्या कोई किसीकी मांग या विवा- हित स्त्रीको ले सकता या लेकर मुखी हो सकता है ? देखो, परखीकी उच्छा मात्रसे अवग्रीव प्रतिहर विष्ट द्वारा हता गया और निपृष्टको नारायण पदका उदय हुआ सो सम्पूर्ण तीन सण्ड, बिना ही प्रयास विपृष्टके हाथ आगये । यथार्थ पुण्यसे क्या नहीं हो सकता है । इस प्रकार कितनेक फालतक विपष्ट नारायणने संसारके विविध प्रकार मुख भोगे, और अन्त समय रौद्रभ्यानसे मरणकर सातवे नर्क गया । ३३ सागरतक और दुख भोगकर निकला सो सिंह हुआ। वहा अनेक जीवोंको मार मार साये जिसमे घोर हिंसाके कारण मर कर पुनः प्रथम नरकम गया। यहांसे निकलकर पुनः सिंह हुआ । सो चारण मुनि अमितकीर्तिने उमे वर्मोपदेश देकर सम्बोधन किया। उस समय मुनिकी शातमुद्रा और सरल उपदेशका उस सिंह पर बहुत बड़ा प्रभाव पडा । उसने हिंसा त्याग दी और अनशन व्रत पारण करके फाल्गुन वदी चतुर्दशीको प्राण त्यागकर प्रथम स्वर्गमं हरिवन नामका देव हुआ । बढ देव पुण्यके प्रभावसे अनेक प्रकारके मुख भोगता कया उपवास और निरंतर धर्म सेवन करता हुआ वहांसे चयकर धातकीखण्ड द्वीपके मुमेरुगिरिकी पूर्व दिशाम सीता नदीके किनारे मैनवत उत्तर दिशामें जो कशावती देश है सो उस देशकी हेमप्रभ नगरीम कनकप्रभु नाम राजाकी कनकमाला पटरानीके गर्भसे ॥७॥ हेमन्वज नामका पुत्र हुआ । यह हेमध्वज राजा एक समय अकृत्रिम चैत्यालयोकी बढना करनेको गया था सो वहाँ एक अकृत्रिम जिन चैत्यालयमें श्री मुवत नामके मुनिराजका दर्शन होगया । यह उनकी पंदना स्तुतिकर वर्म श्रवण करने के अनन्तर अपने भवान्तर पूछने लगा- तब श्री गुरुने कहा कि तू इससे तीसरे भवमें सिंह था सो मुनिके उपदेशसे हिंसा त्याग कर जिनरात्रि व्रत धारण किया और अनशन तपके प्रभावसे प्रयम स्वर्गमें देव हुआ । अप वहांसे चयकर त हेमध्वज नामका राजा हुआ है यह मुनकर राजाने व्रतकी विधि पूछी । तब श्री गुरुने बताया कि फागुन वदी १४ (गुजराती माह वदी १४) को श्री जिनालयमें जावे और पंचामृत अभिषेक पूर्वक अष्ट द्रव्यसे भगवानकी विकाल पूजन सामायिक और स्वाध्याय करे । रात्रिको मी धर्म यान पूर्वक भजन व जागरण करे । दूसरे दिन अतिथिको भोजन कराकर आप भोजन करे, सुपात्रोको चार प्रकारका दान देवे । इस प्रकार, १४ वर्ष यह व्रत करके पश्चात् उद्यापन करे। अतीत, अनागत और वर्तमान चौवीसीका विधान (पाठ) रचावे । चौदह महान् ग्रन्थ (शास्त्र) मदिरोमें पधरावे तया अन्य उपकरण सब चौदह २ मदिरोमें भेंट करे । कमसे कम चौदह श्रावक और चौदह श्राविकाओको श्रद्धा व भक्ति पूर्वक सादर मिष्टान्नादि मोजन करावे । नवीन वस्त्र पहिरावे । कुमकुमका तिलक कर उनका मले प्रकार सन्मान । चौदह रिजौरा देवे, चतुर्विधि दानशालाएं खोले इत्यादि उत्सव करे और जो शक्ति न होवे तो दना व्रत करे । इस प्रकार राजा हेम वजने व्रतकी विधि सुनकर भक्ति भावसे व्रत धारण किया और उसे यथाविधि पालन भी किया। फिर अन्त समयमें जिन दीक्षा लेकर बारह प्रकारके तप करते हुए आयु पूर्ण कर आठवे स्वगमे देव हुआ। वहासे चयकर अवन्ती देशकी उज्जैन नगरी वज्रसेन राजाकी सुशीला रानीके हरिषेण नामका पुत्र हुआ योग्य वय होनेपर पंचाणुव्रत पालन करते हुए कितनेक काल तक राज्य किया । पश्चात् दीक्षा ले उग्र तपकर सन्यास ।
मैनवतः
T-
पूर्वक प्राण त्यागकर दशवें स्वर्गमे देव हुआ। वहासे चयकर जम्बूद्वीपके पूर्व विदेड कशावती देश्की क्षेम री नगरीमें धनञ्जय
राजाकी प्रमावती पहरानीमे प्रियमित्र नामका पुत्र हुआ । सो पुण्य फल चक्रपति पद को प्राप्त हो पद खण्डका राज्य कर
अनेक सुख भोगे । पुन जिनरात्रि व्रत किया और अन्त समय क्षेमंकर स्वामी के निकट दीक्षा लेकर दुर्धर तप किया सो
अन्तमें आयु पूर्णकर बारहवें सहस्रार स्वर्गम मुर्यप्रभु देव हुआ। वहांमै चयका भरतक्षेत्रके श्वेत क्षत्रपुर नगरके राजा ।।
नदिवर्धनकी वीरमती रानीके श्री नंदन नामका पुत्र हुआ सो प्रियंकरा नाम गजकन्यासे व्याह कर सानन्द म्हने लगा।
पुनः जिनरात्रि व्रत किया और कितेक काल राज्य कर अन्तम पुत्रको राज्य देकर आपने महानत 'पारण किया, और
सोलह कारण भावना भाइ, जिससे तीर्थकर नाम कर्म प्रकृतिका बन्धकर प्राण त्याग सोलहवें पुप्पोत्तर विमानमें
देव हुआ। फिर बडामे चयकर भरतक्षेत्रके आर्यखण्ड मगर देशकी कुन्डलपुर नगरीके राजा सिद्धार्थकी रानी
त्रिशलादेवीके पचकल्याणकोके घारी श्री वर्द्धमान नामके चौवीसवें तीर्थकर हुए । प्रभुका जन्म चैत्र मुठी त्रयोदशीको
हुआ था। आपने कुमार अवस्थामें ही मार्गशीर्ष वदी दशमीको दीसा पारण कर ली और गारह वर्षके घोर तपश्चरण
करनेके अनतर वेशाख मुदी १० को केवलज्ञान प्राप्त किया और अनेक देशोमें बिहारकर धर्मोपदेश दे भव्य जीवोको
कल्याणके मांगमें लगाया। श्री वीरप्रभुने ३० वर्ष तक मेद भाव रहित समस्त नर पशु और देवो अर्थात् जीव मानको
कल्याणका उपदेश किया । पश्चात् कार्तिक कृष्णा अमावास्याको प्रातःकाल पावापुरीके वनसे शेप अवाति कोको भी नाश
करके परम पद (मोक्षको ) प्राप्त किया। इस प्रकार इस व्रतके प्रभावसे सिंह भी अनेक उत्तम उत्तम भव लेकर अंतिम
तीर्थकर हो लोकपृज्य सिद्धपदको प्राप्त हुआ सो यदि अन्य भव्य जीव भाव सहित पालन करें तो अवश्य ही उत्तम
फलको प्राप्त होवें।
।
पलन कर निन रात्रि व्रत, सिंह महा दुठ नीव । अनुक्रम तीर्थकर मयो पायो मोक्ष सदीव ॥
॥५८॥
बवत कथा ० जिनगुण सम्पत्ति वह कथा। वन्दू आदि मिनेन्द्र पद, मन वच शीश नवाय। जिनगुण सम्पत्ति व्रत कथा, कह भव्य सुखदाय ।। धातकीखंड द्वीपके पूर्व मेरु सम्बन्धी अपर विदेह क्षेत्रमें गापिल देश और पाटलीपुर नामका नगर है। वहा नागदत्त नामका एक सेठ और उसकी सुमति नामकी सेठानी रहती थी सो निधन होनेके कारण अयन्त पीडित चित्त रहते और बनसे लकड़ीका भारा लाकर बेचते। इस प्रकार उदर-पूर्ति करते थे। एक दिन वह मुमति सेठानी भूख प्यासकी वेदनासे व्याकुल होकर एक दृसके नीचे थक कर बैठी थी- कि इतने ही में क्या देखती है। कि बहुतसे नर नारी अष्ट प्रकारकी पूजनकी द्रव्य लिये हुवे बडे उत्साहसे हर्ष सहित कहीं जा रहे हैं । वव सुमतिने साश्चर्य उन आगन्तुकोंसे पूछा, क्यो माई आप लोग कहा जा रहे हैं और यह काहेका उत्सव है ? तब उत्तर मिला कि अवर तिलक पर्वतपर पिहताश्रव नामके केवली भगवान पधारे हैं। हम लोग सत्र उन्हींकी वंदनाके लिए जा रहे हैं और यह अष्ट प्रकारकी द्रव्य पूजार्थ लिए जाने है। मुमति सेठानी यह शुभ समाचार सुनकर सहर्ष सब लोगोके साथ ही साथ प्रभुकी बढनाके निमित्त चल दी। इस प्रकार जब सब लोग पिहताश्रव स्वामीके निकट पहुंचे तो मन वचन कायसे भक्ति पूर्वक भगवानकी वंदना पूजा की और फिर एकाग्र चिचकर धर्मोपदेश मुननेके लिये बैठ गये। स्वामीने देवपूजा, गुरुसेवा, स्वान्याय, संयम, तप और दान इन गृहस्थके पद कर्मोंका उपदेश किया । पश्चात् अहिंसा, सर, अचौर्य, ब्रह्मचर्य ( स्वदारसन्तोष ) और परिग्रह प्रमाण इन पचाणुव्रतों तथा इनके रक्षक ४ शिक्षात्रत और ३ गुणवत इन सातशीलो ऐसे बारह व्रतोका उपदेश किया और सबसे प्रथम कर्तव्य सम्यग्दर्शनका स्वरूप समझाया। इस प्रकार उपदेश मुनकर नरनारी अपने २ स्यानको पीछे लौटे । तव मुमति सेठानी जो अत्यन्त दरिद्रतासे पीड़ित थी । अवसर पाकर श्री भगवानसे अपने दुःखकी वार्ता कहने लगी । हे स्वामी ! हे दीनबन्धु, दयासागर भगवन् ! मै अवला दरिद्रतासे पीडित होकर नितान्त व्याकुल हुई कष्ट पा रही है। कौन कारणसे सपत्ति ( लक्ष्मी ) मुझसे दूर रहती है और वह कैसे मुझे मिले, कि जिससे मेरा दुःख दूर होकर मेरी प्रवृत्ति भी दाम प्रजादि रुप हो । किसी कविने ३
कया
मैनाव ठीक ही कहा है कि " भूखे पेट भक्ति नहीं होय, गर्माधर्म न मुझे कोय ।" इसी कहावतके अनुसार जब सब लोग पर्मो-
॥ ६ ॥ पदेश सुन रहे थे, तब वह दरिना मुमति मेदानी अपने दारिद्रय रूपी तत्वके विचारमं ही निमग्न थी, तो कि अवसर
मिलते ही झटसे कह सुनाया।
स्वायीने जिनकी दृष्टिम राजा और एक समान है. उस सेठानी के चित्तको शीतल और प्रसन्न करनेवाले बलोग
इस प्रकार समयाया।
ऐ बेटी मुमति ! मुन ! पलासकूद नाम नगरमे दिनिलह नाम ग्रागपति रहता था। उसकी भार्या मुमति और पुनी
वनश्री रूप योपन सपन्ना थी। एक समय घनश्री पाच सात सस्यियोको लेकर पनकीडाके लिए नगरके उद्यानम गह
जहापर एक दशके नीचे समाविगुप्त नामके मुनिराज यान कर रहे थे। सो यह मदोन्मत्त रनश्री मुनिराजको देखकर
निन्दायुक्त वचन कहने लगी और घृणाकर श्री मुनिराजो कार कुंग छोड दिये, इसगे मुनिराजको बडा उपसर्ग हुआ.
परन्तु वे पीरपीर जिनगुरु अपने व्यानसे किंचित्मात्र भी युत न हुए।
परन्तु उस महापापके कारण वह पनश्री मरकर सिंहनी हुई भोर सिंहनी मरकर तू नहीन दरिटा नारी. उत्पन्न
हुई है। सो जो कोई मूढ़ नग्नारी श्रीगुम्को उपसर्ग करते हैं वे ऐसी ही नया इससे भी नीच गतिको प्राप्त होते हैं।
सुमनि सेठानी अपने पूर्व भवान्तर सुनकर बहुत दुःखी हुई और पश्चाताप करके रोने लगी। पश्चात कुछ पैर्य
पर कर हाथ जोडके पूछने लगी-हे स्वामी ! मेरा यह महापाप किस प्रकार छटेगा ?
तप भगवान ने कहा कि जो न सम्यग्दर्शनपूर्वक जिनगुन सम्पत्ति मत पालन करे तो तेरा दुःख दूर होकर मन-
वाछित कार्य सिद्ध होगा।
व्रतकी विधि इस प्रकार है कि प्रथम ही सोलहकारण भावनाएं जो तीर्थंकर प्रकृतिके आश्रयका कारण है, उनके
१६, पच परमेष्टीके पांच, अष्ट प्रातिहार्यके ८ और ३४ अतिशयोके ३४ इस प्रकार कुल ६३ उपवास वा मोपा करे । और
इन उपवासके दिनोसें समस्त गृहारभको त्याग कर श्री जिनेन्द्र भगवानका अभिषेक और पूजन विधान करे, दिनम तीन
चार सामायिक वा लान्याय करे और उद्यापनकी शक्ति न होवे तो दूना नत करे । उपापनकी पिपि निम्न प्रकार है-
॥१०॥
क्याम मैनात ।६१॥ आम, जाम, केला, नारंगी, विजौरा, श्रीफल, अखरोट, खारक, बादाम, द्रास इसादि प्रत्येक प्रकारके ६३ वेशठ फल और भांति भांतिके उत्तम पक्वान्नो सहित अष्ट द्रव्यसे भगवानका महाभिषेक पूर्वक पूजन करे और जिनालयमें चन्दोवा, चचर, छन, झालर घटादि उपकरण मेंट करे तया वेशठ ६३ गन्य लिखाकर श्रावक श्राविकाओंमें ज्ञानावरण कर्मके क्षय होनेके लिये पाट व जिनालयके सरस्वती भडारोमें ग्रन्थ पधरावे । खूब उत्सव करे, अतिथियोको भोजन देवे र दीन दुःखीका यथासभव दुःख दूर करे इसादि। मुमति सेठानी इस मकार व्रतकी विधि मुनकर घर आई और श्रद्धा सहित व्रत पालन करके शाक्ति अनुसार उद्यापन मी किया सो आयुके अतमें सन्यास मरण करके दूसरे स्वर्गमें ललिताग देवकी पटरानी देवी हुई। पुण्यके प्रभावसे वह स्वयप्रभा देवी नाना प्रकारके सुखोको भोगती हुई । पश्चात आयु पूर्ण कर वहासे चयकर इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विटेड सम्बन्धी पुष्कलावती देशकी पुण्डरीकनी नगरीमें यज्ञदत्त चक्रवतिके लक्ष्मीमती नामकी रानीके गर्भसे श्रीमती नामकी पुत्री हुई सो बजजय राजाके साथ व्याही गई। एक दिन ये दम्पति वनक्रीडाको गये थे मो वहा सर्प सरोवरके तटपर आये हुवे चारण मुनिको आहारदान दिया और मुनिदानके प्रभावसे ये दम्पति भोगभूमिमें उत्पन्न हुए। फिर वहांसे चयकर श्रीमतीके जीवने जम्बूद्वीपमें अवतार लेकर आर्यिका के व्रत धारण किये और सन्यास पूर्वक मरण कर स्त्रीलिंग छेद दूसरे स्वर्गमदेव हुआ। फिर महासे चयकर जम्यू दीपके पूर्व विदेह वत्सकावती देशकी मुसीमा नगरीमें सुबुधि नाम राजाकी मनोरमा रानीके केशव नाम पुरा हुना मो उसने बहुत कालवक अपने पिता द्वारा प्रदत्त राज्यमुख न्याय नीतिपूर्वक मोगे। पश्चात कारण पाय पैराग्यको प्राप्त हुआ और सीमधर स्वागीके निकट जिन दीक्षा धारण करके दुर्द्धर नपश्चरण किया । सो तपके प्रभावसे सन्यास मरणकर सोलहवें स्वर्गमें देव हुआ। वहांसे बावीस सागरकी आयु सुखसे पूर्ण करके चया सो जम्बूद्वीपके विदेह क्षेत्रमें पुष्कलावती देशकी पुण्डरी- कनी नगरीमें कुवेरढत्व सेठकी अनन्तगती सेठानीके बनदेन नामका पुर (चक्रवर्तीका भण्डारी) हुआ। एक दिन वह वनदेव चक्रवर्ती के साथ मुनिराजकी बदनाको गया सो स्वामीका उपदेश मुनकर उसने वैराग्यको प्राप्त होकर जिन दीक्षा धारण की और तप करके सन्यास मरण कर सर्वार्थसिद्धिम अहमिन्द्र हुआ।
--- जैनवत ६२॥ कम फिर वहांसे चयकर भरतक्षेत्रके कुरुजांगल देशकी इस्तिनागपुर नगरीमें श्रेयांस नामका राजा हुआ, सो कित- नेक काल राज्यसुख भोगे । पश्चात् श्री ऋषभदेव भगवानको आहारदान दिया, जिसके कारण दानियोंमें प्रसिद्ध प्रथम दानवीर कहलाया, जिसकी कया आजतक प्रख्यात है और लोग उस दानके दिन (वैसाख मुदी ३) को अक्षय तृतीया व आखातीज कहते और उत्सव मनाते है, क्योंकि सबसे प्रथम दानकी प्रथा इन्हीके द्वारा प्रचलित हुई है। पश्चात् वे प्रसिद्ध दानी राजा श्रेयांस भगवान ऋषभदेवके मुखसे धर्मोपदेश सुनकर जिन दीक्षा लेकर तप करने लगे और आपने शुक्लन्यानके प्रभावसे केवलज्ञानको प्राप्त होकर मोक्षपद प्राप्त किया। इस प्रकार मुमति नामकी दरिद्रा सेठानीने जिनगुण सम्पत्ति व्रत सम्यग्दर्शन सहित पालनकर अनुक्रमसे मोक्षपद प्राप्त किया तो और भव्य जीव यदि पालें तो क्यो नहीं उत्तम फल पावेंगे ? अवश्य ही पायेंगे । जिनगुण सम्पति व्रत करो, सुमति वणिक वरनार । नर सुरके सुख भोगकर, फेर हुई भवपार ॥ ? मेघमालावत कथा। महावीर पद प्रणमि कर, गौतम गुरु सिर नाय । कथा मेघमाला तनी, कह सबहिं सुखदाय ।। वत्स देश कौशाम्बीपुरीमें जय राजा भूपाल राज्य करते थे तब वहांपर एक वत्सराज नामका श्रेष्ठी (सेठ) और उसकी सेठानी पद्मश्री नामकी रहती थी । सो पूर्व कृत अशुभ कर्मके उदयसे उस सेठके घरैम दरिद्रताका वास रहा करता था । इसपर भी उसके सोलह (१६) पुत्र और बारह (१२) कन्याएं थी। गरीवीकी अवस्थामें इतने वालबच्चोका लालन पालन करना और गृहस्थीका खर्च चलाना कैसा कठिन हो जाता इसका अनुभव उन्हींको होता है, जिन्हें कभी ऐसा प्रसङ्ग आया हो या जिन्होंने अपने आसपास रहनेवाले दीन दुःखियोकी ओर कभी अपनी दृष्टि डाली हो । परम स्लेड करनेवाले माता पिता ही ऐसे समयमें अपने प्यारे बालकोंको अनुचित और कठोर शब्दोमें केवल सम्बोपन ही नहीं करने लगते हैं किन्तु उन्हें 'विना मूल्य या मूल्यमें येच तक देते है। प्राणासे प्यारी सन्तान कि जिसके लिये संसारके अनेकानेक मनुष्य लालयित रहते हैं और अनेक यंत्र मंत्रादि कराया , - ॥६२॥ - । - जैनव्रत ! .. करते हैं, हाय ! उस दरिद्रावस्था में वह भी माररूप हो पड़ती है। वत्सराज सेठ निरतर इसी चिंतामें चिंतित रहता । जब वे बालक क्षुधातुर होकर मातासे भोजन मांगते तो माता कठोरतासे कह देती-जावो मरो, लपने करो, चाहे भीख मांगो, तुम्हारे लिए मै कहांसे भोजन द् ? यहां क्या रखा है जो दे दूं? सो वे नन्हें २ वालक झिडकी खाकर जब पिताके पास आते, तब वहां भी निराशा ही पल्ले पड़ती। हाय ! उस समयका करुणाक्रटन किसके हृदयको विदीर्ण नहीं कर देता है ! एक दिन भाग्योदयसे एक चारणऋद्धियारी मुनि वहां आये। उन्हें देखकर वत्सराज सेठने मकि सहित पड़गाहा और घरमें जो लखा मूखा भोजन शुद्धतासे तैयार किया गया था । सो भक्ति सहित मुनिराजको दिया। मुनिराज उस भक्तिपूर्वक दिये हुए स्वाद रहित भोजनको लेकर वनकी ओर सिधार गये। तत्पश्चात् सेठ भी भोजन करके जहां श्री मुनिराज पधारे, वहा खोजते खोजते पहुंचा और भक्तिपूर्वक वढना करके वेठा । श्री गुरुने इमे सम्यक्त्वादि धर्मका उपदेश दिया। पश्चात सेठने पूछा हे दयानिधि ! मेरे दरिद्रता होनेका कारण क्या है ? और अब यह कैसे दूर हो सक्ती है ? तव श्री गुरु गोले ऐ वत्स मुनो ! कौसल देशकी अयोध्या नगरीमें देवदत्त नामके मेठकी देवदत्ता नामकी सेठानी रहती थी। वह धन कण और रूप लावण्य कर संयुक्त तो थी परतु कृपण होने के कारण दान धर्ममे धन लगाना तो दूर ही रहे किन्तु वह उल्य दुसरे का धन हरण करनेको तत्पर रहती थी। एक दिन कहींसे एक गृहसागी ब्रह्मचारी जो अत्यन्त क्षीण शरीरी था सो भोजनके निमित्त उसके घर आगया । उसे देख सेठानीने अनेक दुर्वचन कहकर निकाल दिया । वह कपणा कहने लगी अरे जा २ यहासे निकल यहा तो घरक बच्चे भखो मर रहे हैं, कह तो दान कहासे कर । जो चाहे सो यहा ही चला आता है । इतने हीमें उसका स्वामी सेठ भी आगया और उसने भी अपनी स्त्रीकी हॉमें हां मिला दी। निदान कुछेक दिनोंमें वही हुवा-जैसी मनसा वैसी दशा हो गई । अर्थात् उनका सत्र बन चला गया और वे यथार्थमें भूखो मरने लगे । अति तीव्र पापका फल कभी कभी प्रत्यक्ष भी दीख जाता है।
अनमत ॥३४॥ क वे सेठ सेठानी आतंभ्यानसे मरे सो एक ब्राह्मणके घर महिष ( भैस ) के पुत्र (पाड़ा-पाड़ी) हुए । सो वहां भी कयास भूख प्यासकी वेदनासे पीड़ित हो पानी पीनेके लिये एक सरोपरम घुसे थे कि कीच ( कांदा ) में फस गये और जब तडफड़ा कर मरणोन्मुख हो रहे थे कि उसी समय किसी दयालु श्रावकने आकर उन्हें णमोकार मन सुनाया और मिष्ट शब्दोमें सम्बोधन किया सो वे पाडा पाही बहासे परकर णमोकार मंत्रके प्रभावसे तुम मनुष्य भवको प्राप्त तो हुवे, परन्तु पूर्व संचित पाप कर्मोंका शेषाश रह जानेसे अब तक दरिद्रताने तुम्हारा पीछा नहीं छोडा है । ऐ वत्स ! यह ढान न देने और यति आदि महात्माओसे घृणा करनेका फल है। इसलिये प्रत्येक गृहस्यको सदैव यथाशक्ति दान धर्ममें अवश्य ही मवर्तना चाहिये । अब तुम सखार्य देव अहेत, गुरु निग्रन्य और दयामयी धर्ममें श्रद्धान करो और श्रद्धापूर्वक मेघमाला व्रतको पालन करो तो सब प्रकार इस लोक और परलोक सम्बन्धी मुखोको प्राप्त होवोगे । यह व्रत भादों सुदी प्रतिपदासे लेकर आश्विन मुदी प्रतिपदा तक प्रति वर्ष एक २ मास करके पांच वर्पतक किया जाता है अर्थात् मादों मुदी पडिमासे आसोज सुदी पड़िया तक (एक मास) श्री जिनालयके आंगण (चौक) में सिंहासनादि स्थापन करे और उस पर श्री जिनविंव स्थापन करके महाभिषेक और पूजन नित्य प्रति करे, श्वेत वख पहिरे, श्वेत ही चंदोवा बंधाये, मेघधाराके समान १००८ कलशोसे महाभिषेक करके पश्चात पूजा करे । पंच परमेष्टीका १०८ बार जाप करे, पश्चात् संगीत पूर्वक जागरण भजन इसादि करे। भूपिशयन व ब्रह्मचर्य व्रत पालन करे। यथाशक्ति चारो प्रकारका दान देवे, हिंसादि पंच पापोंका त्याग करे तथा एक मास पर्यन्त ब्रह्मचर्य पूर्वक ( एक मुक्ति ) उपवास, वेला, तेला आदि शक्तिममाण करे । निम्तर पद रसीव्रत पाले अर्थात् निस एक रस छोड़कर भोजन करे । इस प्रकार जा पांच वर्ष पूर्ण हो जावें तत्र शक्ति प्रमाण भाव सहित उद्यापन करे अर्थात पाच जिनपिम्बोकी प्रतिष्ठा करावे, पांच महान् ग्रन्थ लिखावे, पाच प्रकारका पक्वान्न बनाकर पाच वर श्रावकोके देवे। पांच २ घटा, झालर, चदोवा, चौकी, चमर छत्र, अछार आदि उपकरण देवे । पाच श्रावको (विद्यार्थियो) को भोजन करावे, सरस्वतीभवन बनाये, पाठशाला चलावे इसादि और अनेको प्रमावना बढ़ाने वाले कार्य करे।
।
इस प्रकार व्रतकी विधि सुनकर मेठ सेठानीने श्रद्धा पूर्वक इस व्रतको पालन किया सो व्रतके प्रभाव से उनका
मैनवत
सब दारिद्रय दूर हो गया और वें स्त्री पुरुष मुखमे काल व्यतीत करते हुए आयुके अतर्भ सन्यास पूर्वक मरण कर दूसरे कयास
॥ ३५॥ स्वर्गमें देव हुए । फिर वहासे चयकर वे पोदनपुरमें विजयभद्र नामके राजा और विजयावती नामकी रानी हुए से
पुण्यके प्रभाव से धन धान्य पुत्र पौत्रादि सम्पत्तिके अधिकारी हुए।
आयुके अंतिम भाग ( वृद्धावस्था ) में दोनो राजा और रानी अपने पुनको राज्यका अधिकार देकर आप
जिनेश्वरी दीक्षा ले तप करने लंगे, सो तपके प्रभावसे आयु पूर्ण कर राजा तो सर्वार्थसिद्धि विमानमें अहमिंद्र हुआ और
रानी भी स्त्री लिंग छेदकर सोलहवें स्वर्गम महद्धिक देव हुई । वहासे चयकर ये दोनो माणी मोक्षका पद प्राप्त करेंगे।
इस प्रकार मेघमाला व्रतके प्रभावसे देवदत्त और देवदत्ता नामक कृपण मेठ और सेठानी भी मोक्षपद पावेंगे सो
यदि और नर नारी श्रद्धा सहित व्रत पालें तो अवश्य ही उत्तम फल पावें ।
मेघमाला व्रत धारकर, सेठ सिठानी सार | लो स्वर्ग अरु लहेंगे, मोक्ष सुख अधिकार ।।
अथ श्री लधिविधान त कया।
प्रथम नमू जिन वीर पद, पुनि गुरु गौतम पाय | लब्धि विधान कथा कह, शारद होहु सहाय॥
काशी देशम वाराणसी नामकी नगरीका महा प्रतापी विपसेन राजा था । उसकी रानीका नाम विशालनयना
या । एक दिन राजाने कोतुकपूर्ण हृदयसे नाटकका खेल करवाया । नाटककार पात्रोने राजाकी प्रसन्नतार्थ अनेक प्रकार
गीत नृस, हाव भाव, विभ्रमादि पूर्वक नाटकका खेल खेलना आरंभ कर दिया, सो राजा रानी और सब पुरजन अपने
योग्य आसनों पर बैठ कर सईप वह अभिनय देखने लगे।
उन नाटककार पात्रोके विविध मेप और हाव भावोंमें रानीका चित्त चंचल हो उठा और वह चमरी और रंगी'
नामकी अपनी दो सखियो सहित घरसे निकल पड़ी.। तथा कुसंगमें पड़कर अपना शील धर्म रूपी भूषण खो बैठी। वह
ग्रामो ग्राम भ्रमण करती हुई वेश्या कर्म करने लगी। जीवोंके भाव तथा कर्मोंकी गति विचित्र है । देखो, रानी रनवासके
॥५५॥
मैनव्रत मुख छोड़ कर गली गलीकी कुत्ती होगई । सत्य है उन नाटकोसे कितने वर नहीं उजड़े । रानी जैसेकी यह दशा हुई तो कयास अन्य जनोका कहना ही क्या है। राजा भी अपनी प्रियतमाके वियोगजनित दुःखको न सह सकनेके कारण पुत्रको राज्य देकर वनमें चला गया और इष्ट वियोग ( आत यान ) से मरकर हाथी हुआ, सो वनमें भटकते २ एक समय किसी पुण्य सयोगसे श्री मुनि- राजका दर्शन होगया ओर वर्म-चोप भी मिला, जिससे वह हाथी सम्यक्त्वको प्राप्त करके अणुव्रत पालन करने लगा। और आयुके अतम चया, सो पाटलीपुत्र नगरमें महीचन्द्र नामका राजा हुआ। यह महीचन्द्र राजा एक दिन वन क्रीडाको गया था। इसके पुण्योदयसे वहा (उद्यानमें ) श्री मुनि- राजके दर्शन होगये । तव सविनय साष्टांग नमस्कार करके राजा धर्मश्रवणकी इच्छासे वहां बैठ गया। इतने में कानी, कुबड़ी और कोटी ऐसी तीन कन्या असन्त दुःखित हुई वहा आई । उन्हें देख कर राजा महीचन्द्रको मोह उत्पन्न हुआ, तब राजाने श्री गुरुसे अपने मोड उत्पन्न होनेका कारण पूछा-तब श्री गुरुने इनके भशन्तरका सम्बन्ध कह सुनाया। कि:-हे राजन्! तू अवसे तीसरे मवमें बनारसका राजा विश्वसेन था और रानी तेरी विशालनयना थी, सो नाटकका अभिनय देखते हुए नाटककार पात्रोके हावभावोसे चंचलचित्त होकर तेरी रानी अपनी रंगी और चमरी नामकी दो दासियो सहित निकल कर कुपथ गामिनी होगई । सो वे तीनो वेश्या कर्म करती हुई एक समय किसी राजाके पास कुछ याचनाको जा रही थीं कि, रास्ते परम दिगम्बर मुनिराजको देखकर अपने कार्य के साधनमें अपशुकन मानने लगी और रात्रि समय मुनिराजके पास आकर अपने घृणित स्वभावानुसार हाव भाव दिखाने और मुनिराजके यानमें विन्न करने लगी, परंतु जैसे कोई धूल फेंककर सूर्यको मलीन नहीं कर सकता है उसी प्रकारसे वे कुलटाएं श्रीमुनिराजको किंचित् मी न्यानमे न चला सकीं । सत्य है क्या प्रलयकी पवन कभी अचल मुमेरुको चला सकती है ? स्त्री चरित्रके साथ साथ स्त्रियोंकी प्यारी रात्रि मी पूर्ण दुई । प्रातःकाल हुआ। सूर्य उदय होते ही वे दुष्टनी विफल मनोरय होकर वहासे चली गई और यहा मुनिराजके निश्चल ब्यानके कारण देवोंने जय जयकार शब्द पचाश्चर्य किए।
निव्रत कयास ६७॥ निदान ये तीनों मुनिको उपसर्ग करनेके कारण गलित कोहको प्राप्त हुई रूप कला, सौन्दर्य सब नष्ट होगया, और आयुके अन्तमें मरकर पांचवें नरक गई । बहुत काल तक वहांके दुःख भोगकर उज्जयनीके पास ग्रामपलास नामके एक गृहस्थकी ये पुत्रिया हुई है, सो छोटी अवस्थामें माता पिता मर गए । पूर्व पापके कारण ये तीनो प्रथम तो कुरूपा, कानी, कुवड़ी, कोढ़ी और तीस पर भी भंड वचन बोलनेवाली हैं इसीलिये ग्रामसे बाहर निकाल दी गई हैं सो वहांसे भटकती हुई यहां आई हैं और तु अपनी पटरानीके वियोगसे दुःखित होकर मरा सो हायी हुआ । श्रीमुनिराजके उपदेशसे सम्यक्त्व सहित पंचाणुव्रत पालन करके मग सो वर्गमें देव हुआ और देवपर्यायमे आकर यहा महीचन्द्र नामक राजा हुआ है । सो इनका तेरा पूर्व जन्मोंका सम्बन्ध होनेसे तुझे यह मोड हुआ है। तब राजाने कहा-महाराज ! क्या कोई उपाय पेसा है कि जिससे ये कन्याएं पापसे छूट ? तब श्रीगुरुने कहा, राजन् ! सुनो यदि ये श्रद्धापूर्वक लब्धिविधान व्रत पालें, तो सहज २ इस पापसे छुटकारा पायेंगी। इस व्रतकी विधि इस प्रकार है:- भादों, माघ और चैत्र मुदी एकमसे तीज तक ( तीन दिन ) एक वर्षम ऐसे ५ वर्ष या ३ वर्ष तक करें पश्चात उद्यापन करें अथवा दुगुणा व्रत करें। व्रतके दिनोंमें या तो तेला करें या एकातर उपवास करें या एकासना ही निस करें और महावीरस्वामीकी प्रतिमाका पंचामृताभिषेक पूर्वक पूजनार्चन करें। तीनो काल सामायिक करें "ॐ ही महावीर स्वामिने नमः " यह जाप करें। जागरण और भजन करें। उद्यापनकी विधि-जय प्रत पूर्ण हो जावे, तब सकल सबको भोजन करावे, चार सघमें चार प्रकारका दान करें, शास्त्रोंका प्रचार करें, पूजन के उपकरण व शास्त्र श्री जिनालयम पधरावे इयादि। इस प्रकार व्रतकी विधि और फल सुनकर उन तीनों कन्याओने राजाकी सहायतासे व्रतपालन किया है और समाधिमरण कर पांचवें स्वर्ग देव दुई । राजा महीचन्द्र भी दीक्षा यर तप करके स्वर्ग गया। विशालनयना नाम रानीका जीव जो देव हुआ था, सो मगध देशके वाडव नगरमें काश्यप गोत्रीय सांडिल्य नाम ब्राह्मणकी सांडिल्या वीके गौतम नामका पुत्र हुआ । चमरी व रंगीके जीव भी देव पर्यायमें चयकर मनुष्य हो तपकर उत्तम गतिको प्राप्त हुए। व ..
जैनवत जब श्री महावीर भगवानको केवलज्ञान हुआ, परन्तु वाणी नही खिरी इसका कारण इन्द्रने जाना, कि गणघर कथा सं० ॥८॥ विना वाणी नही खिरती है सो इन्द्र गौतम ब्राह्मणके पास "त्रैकाल्यं द्रव्यपट्कं” इसादि नवीन श्लोक बनाकर साधारण भेपमें गया और उसका अर्थ पूछा । जय गौतम उसके अर्थ लगानेमें गड़बहाया तब इन्द्र उसे भगवानके समवशरणमें ले आया, सो मानस्थंभ देखते ही गौतमका मान मग हो गया और प्रभुके सन्मुख जाकर नमस्कार करके दीक्षा ली। सो जिनकथित चारित्रके प्रमावसे उसे चारो ज्ञान हो गये, और वह भगवानके गणधरोंमें प्रथम गणधर हुए । कितनेक काल जीवोको सम्बोधन किया और महावीर प्रभुके पश्चात् केवलज्ञान प्राप्त करके निर्वाण पदको प्राप्त हुआ। उन गौतम स्वामीको इमारा नमस्कार हो। लब्धि विधान व्रत फल थकी, विशालनयना नार । गणघर हो लह मोक्षपद, किये कर्म सव क्षार ॥ TOBEEEER मौन एकादशी व्रत कथा। घाति घात केवल उहो, लहो चतुष्क अनत । सरल मोक्ष मग जिन फियो, बन्दू सो अर्हत ।। जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें कौगंल्य देश है । उसमें यमुना नदीके तट पर कोशांनी नामकी नगरी है, इसी नगरमें परम पूज्प छठवें तीर्थंकर श्री पद्मममुका जन्म कल्याणक हुआ था । एक समय इसी नगरमें हरिवाहन नामका राजा और उसकी शशिप्रभा पट्टरानी थी। राजपुत्रका नाम मुकोशल था। यह राजकुमार सर्व विद्या और कलाओमें निपुण होनेपर भी निरंतर खेल तमाशों आदि क्रीड़ाओंमें निमग्न रहता था, और राजकाजकी ओर विल्कुल भी ज्यान न देता था इसलिये राजाको निरंतर चिंता रहने लगी कि राजपुत्र राज्य कार्यमें योग नहीं देता है, तब भविष्यम कार्य कैसे चलेगा। एक समय भाग्योदयसे सोमप्रभु नामके महा मुनिराज संघ सहित विहार करते हुए इसी नगरके उद्यानमें पधारे। राजाने वनमाली द्वारा ये शुभ समाचार सुनकर पुरवासियो सहित हर्पित होकर श्री गुरुके दर्शनोको प्रयाण किया। और वहां पहुचकर भक्तिभावसे बदना स्तुति करके धर्मश्रवणकी इच्छासे नतमस्तक होकर बैठ गया। श्री गुरुने प्रथम मिथ्या- तके जुड़ानेवाले और संसारमे भय उत्पन्न करानेवाले ऐनै मोक्षमार्गका व्याख्यान सुनाया । मुनि और श्रावकके धर्मोको कया जैनव्रत पृथक २ करके समझाया और यह भी बताया, कि यह श्रावक धर्म मी मुनिधर्मका कारण है और मुनिधर्म सामान मोक्षका कारण है, इमलिये आवक धर्मको भी परम्परा मोलका कारण समझना चाहिए। यथार्थम तो भव्य जीवोंको मुनिधर्म ही पारण करना चाहिए, परन्तु यदि शक्तिहीनताके कारण एकाएक मुनियम न धारण कर सके, तो कमसे कम प्रतिमारूप श्रावकका यमं ही धारण करें । और निरतर अपने भावोको बढ़ाता और शरीरादि इन्द्रियो तथा मनको वश करता जावे, तब ही अभीष्ट सुखको प्राप्त हो सकता है। श्रावक धर्म केवल अभ्यास ही के लिये है । इसलिए इसीमें रजायमान होकर इति नहीं कर देना चाहिये, किन्तु मुनि वर्मकी भावना भाते हुवे उसके लिये तत्पर रहना चाहिये । राजाने उपदेश सुनकर स्वशक्ति अनुसार व्रत धारण किया और विशेष बातोंका श्रद्धान किया । पश्चात् अव- सर देखकर पूछने लगा-हे नाथ ! मेरा पुत्र विद्यादिमें निपुण होनेपर भी वालक्रीड़ाओमें ही अनुरक्त रहता है और राज्यभोगमें कुछ भी नहीं समझता है इसकी चिंता है कि भविष्यमें राज्यस्थिति कैसे रहेगी? राजाका प्रश्न सुनकर श्रीगुरुने कहा-उसी देशके कूट नाम नगरमें राजा रणसिंह और उसकी त्रिलोचना नामकी रानी थी। इसी नगरम एक कुणवी रहता था। उसकी पुती तुगभद्रा थी। इस माग्यहीन कन्याके पापोदयमे शैशव अत्र- स्थामें ही माता पिता आदि बन्धु वाधव सब कालवश हो गए और यह अनायिनी अकेली अन पत्रसे वंचित हुई, जंठन पर गुजर करती समय बिताने लगी। बह जब आठ वर्षकी हुई, तो एक दिन घास काटनेको बनमें गई थी कि वहा पिहताश्रव मुनिराजके दर्शन हो गा । यह वालिका भी और लोगोके समान लोगोके समान श्री गुरुको नमल्लार करके धर्मश्रवण करने लगी परन्तु भूरवकी वेदनासे व्याकुल हुई, इसके कुछ भी समझ नहीं आता था तब इस दुःखित कन्याने दुःश्वसे कातर होकर पूछा-हे दयानिधान गुरुदेव ! मै जन्मकी अनायिनी अन्न वस्त्र तकका कष्ट पा रही हू, इसलिए कृपाकर ऐसा कोई उपाय बताइए कि जिसमें, मेरा दुःख दूर होवे । तब श्री गुमने कहा- पुत्री ! यह सब तेरे पूर्व जन्मके पापका फल है, अब तु श्री जिनेन्द्रदेश, निग्रेय गुरु, और दयामई धर्म पर श्रद्धा करके मावसहित मौन एकादशीव्रतको पालन कर जिससे तेरे पापका क्षय होवे और ससारका अत आवे । सुन ! इस नतकी विधि इस प्रकार है:- IN कयास मैनवत पौप वढी एकादशीको सोलह पहरका उपवास कर, और ये सोलहो पहर जिनालयमें धर्म कथा तथा पुजाभिषे- ॥ ७० ॥ १५ भिपेकादि धर्म-यानमें व्यतीत कर तीनों काल सामायिक कर, सोलडो पहर मौनसे रह, अर्थात् मुंहसे न वोल, हाथ नाक आख आदिसे सकेत भी न कर, इस मकार जब सोलह पहर होजावे, तब द्वादशीके दोपहरको पूजाभिषेक करके सामायिक वा स्वाध्याय कर और फिर अतिथि (मुनि, गृहत्यागी) श्रावक तया साधर्मी गृहस्थ व दीन दुःखित मुखितको मोजन कराकर आप पारणा कर, जो कोई व्रती पुरुष हो उनको नारियल या खारक वढाम आदि बांट । इस प्रकार ग्यारह वर्ष तक यह व्रत करके फिर उद्यापन कर और जो उद्यापनकी शक्ति न होवे तो दूना व्रत कर । उद्यापन विधि इस प्रकार है कि आवश्यकता होवे तो श्री जिनमदिर बनवावे, २४ महाराजकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करके पधरावे, घटा झालर, चौकी, चन्दोवा, क्षत्र, चमर, शास्त्रादि २४ चौवीस जिनालयोंमें पधरावे, शास्त्र मंडारकी स्थापना करे, ग्रन्थ वितीर्ण करे, विद्या- थियोंको भोजन करावे, यया आवश्यक सधको जिमावे । नारियल आदि फल साधर्मियोंको वांटे, महापूजा विधान करे, दुःखी अपाहिजोको भोजन वस्त्र औषधि आदि दान करे । भयभीत जीवोको अभयदान देवे, इत्यादि विधि मुन उस दरिद्र कन्याने भावसहित व्रत पालन किया और अन्त समय सन्यास सहित णमोकार मत्रका स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर तेरे घर यह पुत्र हुआ है। यह पुत्र चर्म शरीरी है, इसीसे राज्य भोगमें इसका चित्त नहीं लगता है, यह बहुत ही थोडे समय घर रहेगा राजा इस प्रकार श्रीगुरुके मुखसे अपने पुत्रका वृत्तांत मुनकर घर आया। ससार, देह, भोगोसे विरक्त होकर उसने अपने पुत्रको राज्यतिलक किया पश्चात् पिद्दताश्रव आचार्यके पास दीक्षा लेली, इसके साथ और भी बहुत राजाओंने दीक्षा ली। और राजा मुकोमल राज्य करने लगा। सो यह अल्पसंसारी राजनीतिकी कुटिलताको न जानता हुआ मुखपूर्वक कालक्षेप करने लगा। एक समय मतिसागर नाम भडारीने श्रुतसागर नाम मत्रीसे मंत्र किया कि राजा राजनीतिसे अनभिन्न हैं, इसलिये इसे कैद करके मैं तुम्हें राजा बनाये देता है। और मै मत्री होकर रहूगा । परन्तु यह वार्ता मतिसागरके पुत्र और गजाके बालसखा द्वारा राजाके कान तक पहुंच गई । राजाने मतिसागरको उस कुटिलता व धृष्टताके वढले अपमान सहित देशसे निकाल दिया। और श्रुतसागरको राज्यमार सौंपकर आप अपने पिताके पास गए और दीक्षा ले ली।
जैनवत कपा वह मतिसागर भारी भ्रमण करते हुए दुःखसे ( आर्तभावोसे ) मरणकर सिंह हुआ, सो वनमें विकराल रूप धारण किये अनेक जीवोंका घात करता हुआ विचरता था, कि उसी वन विहार करते हुए वे हरिवाहन और सकौशल स्वामी आ पहुचे । सिंहने इन्हें देखकर पूर्व पैरके कारण कोधित होकर शरीरको विदीर्ण कर दिया। वे मुनिराज उपसर्ग जानकर निश्चल हो शुक्र यानको धारणकर आत्मामें निमग्न हो गये तब सिंह मी उपशांत होकर वहांसे चला गया और वे मुनि अन्तकृत केवली होकर सिद्ध पदको माप्त हुए और वह सिंह मुनि हयाके कारण मरकर नरकम घोर दुःख भोग- नेको चला गया। निःसन्देह मागी अपने ही किये हुए शुभाशुभ कर्मोका फल सुख व दुःख भोगा करते हैं। इस प्रकार दरिद्रा कन्याने भी मौन एकादशी व्रत श्रद्धा व भक्ति पूर्वक पालन किया जिसके फलसे वह सुकौशल स्वामी होकर सकल कर्मोका क्षय कर सिद्धपदको प्राप्त हुई। और जो भव्य जीव ज्ञान व श्रद्धान पूर्वक पालें, तो अवश्य ही उत्तमोत्तम मुखोंको पावेगे तुगभद्र कन्या कियो, मौन व्रत चित्त घार । पायो अविचल सिद्धपद, किये कर्म सब छार ।। गरुड पंचमी व्रत कथा। वीतराग पद बदके, गुरु निम्रन्थ मनाय । गरुड़ पचमो व्रत कथा कडू, सबहिं सुखदाय ॥ जम्बद्रीप सम्बन्धी मरतक्षेत्रके विजयार्य पर्वतकी दक्षिण दिशामे रत्नपुर नामका नगर है। वहां गरुड नामका विद्याधर राजा अपनी गरुडा नामकी रानी सहित सानन्द राज्य करता था। यह राजा अति श्रद्धा और भक्ति पूर्वक सदैव अकृत्रिम चैत्यालयोकी पूजा बंदना करता था। एक दिन मार्गमें इसके पूर्वभक्के वैरीने अपना बदला लेनेके हेतु इसकी विद्या ठीन ली और इमे भूमिपर गिरा दिया। सो वह राजा अपने स्थानको जानेमें असमर्थ हुआ, उद्यानमें भ्रमण करता था कि सौभाग्यसे उसे परमगुरु निग्रन्थका अचानक दर्शन हो गया, राजा श्री गुरुको देखकर गद्गद् होकर विनय सहित नमस्कार कर पूछने लगा- प्रभु! मैं मदभागी विद्याविहीन हुआ भटक रहा हूं । कृपा करके मुझे कोई ऐसा यत्न बताइये कि जिससे पुनः विद्या प्राप्त कर स्वस्थान तक जा सकूँ। ॥७१ अनवत ॥७२॥ यह मुनकर श्री गुरुने कहा-डे भद्र, धर्मके प्रसादमे सब काम स्वयमेव सिद्ध होते हैं। कहा है। धर्म करत ससार मुख, पर्म करत निर्वाण । धर्म पथ साघे विना नर तियेच समान " इसलिये तू सम्यक्त्व सहित “गरुड पचमी व्रत" पालन कर इसमे परणेन्द्र व पद्मावती प्रसन्न होकर तेरी मनोकामना पूर्ण करगे। देखो इसका फल इस प्रकार है- मालव देशमें चिंच नामका एक ग्राम है, वहा नागगौड नामी एक मनुष्य रहता था। उसकी खीका नाम कमला- वती था। उसके मंडावल, परवेल, राम, सोम ओर भीम ऐसे ५ पुत्र और चारित्रमती नायेकी एक कन्या थीमा नागगौडने अपनी चारित्रमती कन्याको तव ग्रामके पनदत्त गौडके पुत्र मनोरमणके साथ ब्याह दी । ये दोनों नवदम्पति मुखसे रहने, लगे। कितनेक दिन पश्चात् इनके शाति नामका एक पालक हुआ । एक दिन मुगुप्त नायके मुनि चर्या (भिक्षा) के हेतु नगरमें पधारे, उन्ह देखकर चारित्रमतीको असानंद हुआ और भक्तिपूर्वक पडगाड कर प्रामुक भोजनपान कराया, मुनि- राजने भोजनके अनन्तर " अक्षय निधि " यह शब्द कहे । इतने हीमें एक आदमीने आकर चारिनमतीको उसके पिताके पीमार होने की खबर दी। यह सुनकर चारित्रमतीने श्री गुरुसे पूछा-हे नाथ, मेरे पिताको कौनसी व्याधि हुई है ? तर श्री गुमने कहा, पुत्री ! तेरे वापके खेतमें एक बडका आइ था, उसके नीचे एक सापकी बांची थी, उस वावीमें एक पार्ष- नाथ और दूसरी नेमिनाथ स्वामीकी प्रतिमा थी जिनकी पूजा हमेशः मवनवासी देव करते थे। सो तेरे वापने उस आडको कटवाकर वादीको नष्ट कराया है। इससे उन भवनवासी देवाने क्रोधित होकर विपैली दृष्टिसे नेरे पिताको देखा है। और इसीसे वह मूर्छित हो गया है। तब चारित्रमतीने पूछा-हे नाथ, अब क्या यत्न करना चाहिये जिससे पिताजीको आराम मिले । तब श्री गुरुने कहा-पुत्री, तू श्रद्धापूर्वक गरुड पचमी व्रत पालन कर इससे तेरे पिताकी मूळ दूर होकर वह । स्वस्य हो जावेगा। इस प्रतकी विधि इस प्रकार है कि श्रावण सुदी पचमीको उपवास करना, तीनो सन्यामें सामायिक करना. मन्दिरमें जाकर श्री जिनेन्द्रका अभिषेक पूजन करना, फिर होम (हवन) करना, देवल (मन्दिर) मे वादी बनाना, उसमें ध, घी, मिश्री, पाणी, कमल, काकडी तथा फूल आदि दालना, अढत प्रभुके ५ अष्टक चढाना, ५ माला "ॐ अभ्यो नमः" इस मत्रको जपना, समल-गान-भजन जागरण करना, आरती करेंना, आगीर्वाद बोलना । इस प्रकार पांच वर्ष तक मैनवत ॥७३॥ क्या सर ६ यह व्रत पालना, पश्चात् उद्यापन करना, यदि उद्यापनकी शक्ति न होवे तो द्विगुणित (दूना) व्रत करना, उद्यापनकी विधि इस प्रकार है कि-आरती, थाली, कलश, धूपदान, चमर, चंदोवा, अछार, शास्त्र आदि उपकरण पांच पांच लाकर जिना- लयम भेट देवे । और समादान (दीवी ), घंटा, पानीके लिये घडा, झारी, मदिरमें परावे व अष्ट द्रव्यसे भाव सहित अभिषेक पूर्वक पूजन करे। पांच श्रावक तथा श्राविकाओंको मोजन करावे तथा दुःखित भुक्षितको करुणाबुद्धिसे आहारादि चारो प्रकारके दान देवे। चारित्रमतीने नमस्कार कर उक्त व्रत ग्रहण किया । पश्चात् श्रीगुरुने कहा-पुत्री यह व्रत तू अपने पीहर (पितृगृह) में जाकर करना और गंधोदक अपने पिताके गलेमें लगाना, इसमे वह मूर्छा रहित होजायगा। और श्रावण मुढी ५ के दूसरे दिन श्रावण मुदी ६ को नेमनाथ स्वामीका व्रत है । सो उस दिन अर्हत भगवानके छः अष्टक और छः माला जपना, पूजन अभिषेक करना, हवन करना और पूजनादिके पश्चात् ककडी, नारियल आदि शुभ फल प्रत्येक छ। छः लेकर छ: सौभाग्यवती स्त्रियोंको देना । पश्चाद इसका मी उद्यापन करना अथवा दुना व्रत करना । इस प्रकार दोनो व्रत ग्रहण कर चारित्रमती अपने पिताके घर गई और ययाविधि व्रत पालन किया तथा अपने पिताको गंधोदक लगाया जिसे वह मु रहित हो स्वस्य हो गया। यह चर्चा सब नगरमें फैल गई और इस प्रकार यह गरुड ( नाग) पचमीके व्रतका चार संसारमें हुआ। कुछ दिन बाद चारित्रमती घर ( स्वसुर गृह) जाने लगी, परंतु पिताके आग्रहसे और ठहर गई । एक दिन वह चारित्रमती अपने वापके खेतमें निर्मल सरोवर पर जाकर पूजा करने लगी। इसी बीचमें वे ही मुनिराज जिन्होंने व्रत दिया था वहा भ्रमण करते हुए आ पहुंचे। उन्हें देख कर चारित्रमतीने नमस्कार वंदना की और विनम्र हो धर्म श्रवणकी इच्छासे वहीं पैठ गई । धर्मोपदेश मुननेके अनन्तर चारित्रमतीने अपने घरकी कुशल पूछी । तब श्री मुनिने अवधिज्ञानसे विचार कर कहा-बेटी तेरे पुत्रको तेरी सौकीने नदीमें डाल दिया है । सो यदि तू श्रावण मुदी ६ का व्रत पालन करेगी, तो तेरे पुत्रको पद्मावती देवी लाकर तुझे देवेगी । यह सुनकर चारित्रमती घर आई और मन वचन कायसे छठका व्रत पालन किया। इससे कुछ दिन
जनत्रत
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कयासः
पश्चात् उसका पुत्र उसे मिल गया। इस प्रकार चारित्रमतीने मन वचन कायमे न पालन किये और विपि सहित उद्यापन
किये, पश्चात् पर्मन्यान करती हुई अन्नमें सन्यासमे मरण कर बढ वी लिंग के.कर स्वर्गम देव हुई, वहासे आकर राज-
पुत्र हुई । पश्चात् राजपुत्र भी कारण पाकर पैराग्यको प्राप्त हुआ और दीया लेकर शुरुभ्यानके बलमे केवलज्ञान प्राप्त
कर मोक्षपद प्राप्त किया। इस प्रकार व्रतका फल मुनकर गरुड़ विद्यापग्ने मन वचन कायसे व्रत पालन किया जिसमे
उसे पुनः विद्या सिद्ध हो गई और वह बहुन काल तक मनुष्योचित मुख भोग कर अतर्फे वैराग्यको माप्त हो गया और
ले तप करने लगा। पश्चात, शुरुन्यानके वलसे केवलज्ञान प्राप्त कर सिद्ध पट पाया । इस प्रकार यदि अन्य भव्य
जीव भी श्रा सहित व्रत पालन करेंगे. तो अवश्य ही उत्तम फल पावगे ।
गरुड और चारित्रमती, अहि पचमि व्रत पाल । लहो शुद्ध शिन पद सही, तिनहिं नम तिहु काल ।
द्वादशी व्रत कथा।
नमों सारदा पद कमल, स्याद्वाद मय सार | ना प्रसाद द्वादशि कया, कह भव्य हितकार ॥
मालवा प्रदेशमें पद्मावतीपुर था । जहा नरब्रह्मा राजा अपनी विजयावती रानी सहित राज्य करता था। इस
राजाके एक कुवही कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम शीलावती पडा । एक दिन शीलावतीको रोती हुई देखकर राजा
रानीको असन्त दुःख हुआ क अनेक प्रकारकी चिंता करने लगे। किसी दिन भाग्योदयसे उसी नगरमें श्रपणोत्तम नामक
मुनिराज विहार करते हुए आये। यह सुनकर राजा अति प्रसन्न हो नगरके लोगो सहित वंदनाको गया। स्तुति वदनाके
अनन्तर धर्मोपदेश श्रवण किया । पश्चात् अवसर पाकर राजाने पूछा-प्रभु मेरी पुनी शीलावतीको कौन पापके उदयसे
यइ दुःख प्राप्त हुआ है । तब श्री गुरुने अवधिज्ञानमे विचार कर कहा । ऐ राजा, मुनो-अवन्तीदेशमें आडलपुर नगर
है, वहां राजपुरोहित देशवर्मा और उसकी कालमुरी नामकी ब्राह्मणी रहती थी। इस व्रात्मणके कपिला नामकी कन्या थी।
एक दिन यह कन्या सखियो सहित वनक्रीडा निमित्त उपवनमें गई और वहा आमके दृसके नीचे परम दिगंबर ऋषिराजको
कायोत्सर्ग न्यान करते हुए देखा । सो अपने रूपादिके मदसे मदोन्मत्त उस कन्याने मुनिकी बहुत निंदा की । कुत्सित
॥७॥
मैनवत कयास । शब्द भी कहने लगी कि यह नंगा ढोंगी और अत्यन्त कामाशक्त व्यभिचारी है। यह स्त्रियोको अपना गुप्त अङ्ग दिख- लाता फिरता है, यह लज्जा रहित हुआ कभी वन और कभी वस्तीमें भटकता फिरता है । लघने करके अपनेको महात्मा बताता है इत्यादि । निंदा करते हुए मुनिराजपस् मिट्टी धूल आदि डाली, मस्तकपर थूका तथा और भी बहुत उपसर्ग किया। सो मुनि तो उपसर्ग जीतकर शुक्लध्यानके योगसे केवलज्ञान प्राप्तकर मोसको प्राप्त हुए और वह कन्या मरकर पहिले नमें गई, वहां बहुत दुःख भोगे, वहांसे निकल कर गधी हुई, फिर मुकरी हुई, फिर हथनी हुई, फिर विल्ली हुई, फिर नागनी हुई, फिर चाहालके घर कन्या हुई और वहांसे आकर अब यह तुम्हारे घर पुत्री हुई है। इस प्रकार पुत्रीके भवां- तरकी कथा सुनकर राजाने कहा । प्रमु इस पापके निवारण करनेके लिये कोई धर्मका अवलम्बन बताइये । तब श्री गुरुने कहा कि यदि यह द्वादशीका व्रत करे, तो पापका नाश होकर परम सुखको प्राप्त हो । इस व्रतकी विधि इस प्रकार है, कि मादों सुदी १२ के दिन उपवास करे और सम्पूर्ण दिन पर्म यानमें वितावे, तीनो काल सामायिक करे, जिन मंदिरमें जाकर भेदीके सन्मुख पंच रंगोसे तन्दुल रंगकर साथिया काडे, तथा मंडल बनावे । उसपर सिंहासन रख चतुर्मुखी जिन विम्ब पधरावे, फिर पंचामृताभिषेक करे, अष्ट द्रन्यसे पूजन करे। भजन और जागरण कर स्वच्छ और सुगन्धी पुष्पोंसे जाप देवे । फिर जलमे परिपूर्ण कलश लेकर उसपर नारियल रक्खे तथा नवीन कपड़ेसे ढांककर एक रकावीमें अर्घ्य सहित लेकर तीन प्रदक्षिणा देवे । धूप खेवे, कथा मुने । इस प्रकार श्रद्धायुक्त बारह वर्ष तक व्रत पाले । फिर उद्यापन करे । अर्थात नवीन चार प्रतिमा पधरावे जयवा चार महान शास्त्र लिखाकर जिनालयमें पथरावे । कलश, छत्र, चमर, शारी, दर्पण आदि अष्ट मंगल द्रव्य तथा अन्य आवश्यक उपकरण मदिरमें भेट देवे । चार प्रकारके सघको भक्ति युक्त दीन दुखियोंको करुणाभावसे चारों प्रकारके दान देवे, जिसे उद्यापनकी शक्ति न होवे, तो दना व्रत करना चाहिये । प्रकार व्रतकी विधि कहकर श्री गुरुने कहा-हे राजा ! तुम्हारी पुत्री शीलावतीके अर्ककेतु और चन्द्रकेतु नामके दो होंगे। इनमेंसे अर्ककेतु निज बाहुबलसे सग्राममें अनेक राजाओको जीतकर प्रख्यात राजा होगा, पश्चात् संसार भोगोंसे विरक्त हो जिन दीक्षा लेकर परम तप करेगा । उसके साथ उसकी माता शीलावती भी दीक्षा लेगी और आयुके अतमें समाधिमरण कर स्त्रीलिंग छेदकर बारहवें स्वर्गमें देश होगी । वहासे आकर छत्रपती राजा होगी। फिर दीक्षा लेकर कथा सं० --- मैनवत केवलज्ञान प्राप्तकर मोक्ष जावेगी । अर्ककेतु और चन्द्रकेतु भी मोल जावेंगे। यह समाचार सुनकर राजाने मुनिको नमस्कार ॥७६॥ किया और श्रद्धापूर्वक व्रतकी विधि मुनकर घर आया। मुनिराजके कहे प्रमाण व्रत पालन तथा उद्यापन विधिपूर्वक किया जिससे भवातरोके पापोंका नाश हुआ। इस प्रकार द्वादशीके व्रतका माहात्म्य है, जो कोई भव्य जीव श्रद्धा और भक्तियुक्त व्रत करेंगे और कथा सुनगे उनको अक्षय पुण्य और मुखकी प्राप्ति होगी। इस प्रकार द्वादशि कथा, पूरण मई सुस्वकार | व्रत फल शीलावति लियो, अक्षय सुख भडार ॥ 333JEEEEE अछ अनंतवत कथा। नमों अनत अनत गुण, नायक श्री तीर्थच । कहु अनत व्रतकी कथा, दीजे बुद्धि जिनेश ।। इसी जम्बूद्वीपके आर्यखंडमं कौशल देश है। उसमें अयोध्या नगरीके पास पाखंड नाम ग्राम था। उस ग्राममें सोमशा नामका एक अति दरिद्र ब्राह्मण अपनी सोमा नामकी स्त्री और बहुतसी पुत्रियो सहित रहता था। वह (ब्राह्मण) विद्याहीन और दरिद्र होने के कारण भिक्षा माग कर उदर पोषण करता था, तो भी भरपेट खानेको न पाता तब एक दिन अपनी स्वीकी सम्पतिसे उसने सह कुटुम्ब विदेशको प्रस्थान किया । चलते समय मार्गमें शुभ शकुन हुए, अर्थात् सौभाग्यवती स्त्रियां सन्मुख मिलीं । कुछ और आगे चला तो क्या देखता है, कि हजारो नरनारी किसी स्थानको जा रहे हैं, पडनेसे विदित हुआ कि वे सब अनंतनाथ भगवानके समोशरणमें वंदनाके लिये जारहे है। यह जानकर वह ब्राह्मण मी उनके पीछे हो लिया और समोशरणमें गया । वहा प्रभुकी वदना कर तीन प्रदक्षिणा दी और नर कोठेमें यथास्थान जा बैठा । समवशरणर्मे दिव्यध्वनि चुनकर उसे सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हुई । पश्चात् चारित्रका कथन सुनकर उसने जुआ, मांस, मद्य, वेश्यासेवन, शिकार, चोरी और परस्त्रीसेवन ये सात व्यसन साग किये । पच उदम्पर और तीन मकार साग ये अष्ट मूलगुण भी धारण किये। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और अतिशय लोम इन पच पापोका एक देश त्याग रूप अणुव्रत और तीन गुणव्रत और चार शिक्षाबत भी ग्रहण किये । इस प्रकार सम्यत्र सहित वारह लिये । पश्चात कहने लगा-हे नाथ ! मेरी दरिद्रता किस प्रकारसे मिटे सो कृपा करके कहिये । तब भगवानने उसे जैनवत ||७७॥ अनन्त चौदशका व्रत करनेको कहा । व्रतकी विधि इस प्रकार है कि भादों मुदी ११-१२ और १३ को एकासना करे । अर्थात एकासनसे मौन साहित स्वादरहित प्रामुफ भोजन करे, सात प्रकार गृहस्थोंके अन्तराय पाले, पश्चात् चतुर्दशीकै दिन उपवास करे, चारों दिन ब्रह्मचर्य रखे, भूमिपर शयन करे, व्यापार आदि ग्रहारम्भ न करे, मोहादि रागद्वेप तथा कोष मान माया लोम हास्यादिक कपायोंको छोडे, सोना, चांदी या रेशम मत आदिका अनन्त बनाकर, इसमें प्रत्येक गांठपर १४ गुणोंका चितवन करके १४ गांठ लगाना । प्रथम गांठपर ऋषभनाथ भगवानसे अनन्तनाथ मगवान तक १४ तीर्थकरोका नाम उच्चारण करे । दूसरी गाठपर सिद्ध परमेष्ठीके १४ गुण चिंतयन करे। तीसरी पर १४ मुनि जो मति श्रुत अवधि ज्ञान युक्त हो गये हैं उनका नाम उच्चारण करे । चौथीपर केवली भगवानके १५ अतिशय केवलज्ञान कृत स्मरण करे । पांचवी पर जिनराणीमें जो १४ पूर्व हैं उनका चितवन करे । छठवीं पर चौदह गुणस्थानोंका विचार करे। सातवी पर चौदह मार्गणाओंका सख्प विचारे। आठवीं पर १४ जीवसमासोंका विचार करे। नवमीं पर गङ्गा आदि १४ नदियोंका नामोच्चारण करे। दशमीपर तीन लोक जो १४ राज प्रमाण ऊँचा है उसका विचार करे। ग्यारहवीं पर चक्रपीके चौडद रत्नोंका चिंतपन करे। पारहवी पर चौदह स्वर ( अक्षर ) चितवन करे। तेरहवीं पर चौदह तिथियोंका विचार करे । चौदहवीं गाटपर मुनिके मुख्य १४ दोप टालकर जो आहार लेते हैं उनका विचार करे। इस प्रकार १४ गाठ लगाकर मेकके ऊपर स्थापित प्रतिमाके सन्मुख इस अनन्तको रखकर अभिषेक करे । अनन्तनाथ मभुका पूजन करे। फिर नीचे लिखा पत्र १०८ बार जपे। मंत्र-ॐ नमो अईने भगवते अणतो अनन्त मिझझ राम्मे भगवतो महविनझा, ॐ महा विझ्झा अनंतानंत केवलीय अनत केवलणाणे, अनंत केवल दमणे, अणु पुज वासणे, अनंते अनतागम केलि स्वाहा (१) अथवा छोटा मंत्र जपे। मत्र-ॐ ही अह हंसः अनतकेवलिने नमः (२) इस प्रकार चारो दिन अभिषेक, जप और जागरण भजन पूजादि करे । फिर पूनमके दिने उस अनंतको दाहिनी भुजा पर या गलेमें बांधे । पश्चात् उत्तम, मन्यम या जघन्य पात्रों से जो समयपर मिल सके आहार आदि दान देकर आप पारणा करे । इस प्रकार १४ वर्ष तक करे । पश्चात उद्यापन करे । १४ प्रकारके उपकरण मंदिरमे देवे, जैसे शास्त्र, मैनवत चमर, क्षत्र, चौकी आदि. चार प्रकार संघको आमंत्रण करके धर्मको प्रभावना करे। यदि उद्यापनकी शक्ति न होवे तो दना : बत करे । इस प्रकार श्री मुखसे व्रतकी विधि और उत्तम फल सुनकर उस ब्राह्मणने स्त्री सहित यह व्रत लिया और मी बहुत लोगोंने यह व्रत लिया । पश्चात् नमस्कार करके वह ब्राह्मण अपने नाममें आया और भाव सहित १४ वर्ष व्रतको विधियुक्त पालन करके उद्यापन किया। इसमे दिनों दिन उसकी बढ़ती होने लगी । इसके साथ रहनेसे और भी बहुत लोग धर्म मार्गमे लग गये, क्योंकि लोग जव उसकी इस मकार बढती देखकर उससे इसका कारण पूछते तो वह अनंत व्रत आदि व्रतोकी महिमा और जिनमापित धर्मके स्वरूपका कथन कह सुनाता, इससे बहुत लोगोंकी श्रद्धा उसपर हो जाती और वे उसे गुरू मानने लगते । इस प्रकार वह ब्राह्मण मले प्रकार सांसारिक मुखोंको भोग कर अंतमें सन्याससे मरण कर स्वर्गमें देव हुआ। उसकी स्त्री मी समाधिसे पर कर उसी स्वर्गमें उसीकी देवी दुई । अपनी पूर्व पर्या- यका अवधिसे विचार धर्म यान सेवन करके वहांसे चये सो वह ब्राह्मणका जीव अनतवीर्य नामका राजा हुआ और और ब्राह्मणी उसकी पट्टरानी हुई । ये दोनों दीक्षा लेकर अनंतवीर्य तो इसी भवसे मोक्षको प्राप्त हुए और श्रीमती खी लिंग छेदकर अच्युत स्वर्गमें देव हुई । वहांसे चयकर मध्य लोकमें मनुष्यभव धारण कर संयम ले मोक्ष जावेगी । इस प्रकार एक दरिद्र ब्राह्मण और ब्राह्मणी अनंत व्रत पालकर सद्गतिको पाकर उत्तमोत्तम गतिको प्राप्त हुए। यदि अन्य भव्य जीव पालेंगे, तो वे भी सद्गति पावेंगे। सोमशर्म सोमा सहित, अनत चौदश व्रतपाल | लहो स्वर्ग अरु मोक्ष पद, ते बन्दू त्रैकाल ।। अप अष्टान्हिका (नदीबर) व्रत कथा । बन्दो पाचो परमगुरु, चौबीसों निनराज । अष्टान्हिक व्रतकी कह, कया सबहि सुखकान ॥ जम्बुद्वीपके मरतक्षेत्र सम्बन्धी आर्यखण्डमें अयोध्या नामका एक सुन्दर नगर है। वहाँ हरिसेन नामका चक्र- वर्ती राजा अपनी गवर्वश्री नामकी पट्टरानी सहित न्यायपूर्वक राज्य करता या। एक दिन वसन्त ऋतुमें राजा नगरजनो तथा अपनी १६००० रानियों सहित वन क्रीडाके लिये गया। वहा निरापद स्थानमें एक स्फटिक शिलापर असन्त क्षीण- -- नवव ॥७९ J शीरी महा तपस्वी परम दिगम्बर अरिंजय और अमितंजय नामके चारण मुनियोको ध्यानास्ट देखा। सो राजा भक्ति कयास पूर्वक निज वाहनसे उत्तर कर पट्टरानी आदि समस्त जनों सडित श्री मुनियोंके निकट बैठ गया और सविनय नमस्कार धर्मका स्वरूप मुननेकी अभिलाषा प्रगट करता हुआ । मुनिराज जब ध्यान कर चुके तो धर्मदृद्धि दी, और पश्चात् धर्मोपदेश करने लगे। मुनिराज बोले-राजा! मुनो, संसारम कितनेक लोग, गगादि नदियोंमें नहानेको, कोई कंदमूलादि भक्षणको, कोई पर्वतसे पडनेमें, कोई गयामें श्राद्धादि पिंड दान करनेमें, कोई ब्रह्मा, विष्णु, शिवाटिककी पूजा करनेमें वा भैरो मवानी, काली आदि देवियोंकी उपासनाम ही धर्म मानते हैं अथवा नवग्रहादिकोके जप कराने और मस्तसांडों सदृश कुतपन्धियों आदिको दान देनेचं कल्याण होना समझते हैं, परन्तु यह सब धर्म नहीं है और न इससे आत्मडित होता है किन्तु केवल मिथ्यातकी वृद्धि होकर, अनन्त संसारका कारण वथ ही होता है, इसलिये परम पवित्र अहिंसा (दयामई ) धर्मको धारण कर जो समस्त जीवोको मुखदाई है और नियन्य मुनि (जो संसारके विषयभोगोसे विरक्त ज्ञान भ्यान तपमें लवलीन हैं किसी प्रकारका परिग्रह ( आडवर ) नहीं रखते हैं और सबको हितकारी उपदेश देते हैं) को सुरु मानकर उनकी सेवा वैयास्त कर, जन्म मरण, रोग शोक, भय, परिग्रह, धुघा, तृपा, उपसर्ग आदि सम्पूर्ण दोषोसे रहित वीतराग देवका आराधन कर । जीवादि सत्रोंका ययार्य प्रदान करके निजात्म तत्वको पहिचान, यही सम्यग्दर्शन है, ऐसे सम्यग्दर्शन तथा ज्ञानपूर्वक सम्यक चारित्रको धारण कर यही मोत (कल्याण) का मार्ग है। सातों व्यसनका साग, अष्ट मूलगुण पारण, पंचाणवत पालन इत्यादि गृहस्योंका चारित्र है और सर्व प्रकार आरंभ परिजइसे रहित द्वादन प्रकारका तप करना, पच महाव्रत, पंच समिति, तीन गुप्ति आदिका धारण करना सो अट्ठाइस मूल गुणों सहित मुनियोका धर्म है ( चारित्र है ) । इस प्रकार धर्मोपदेश सुनकर राजाने पूछा-प्रभो, मैने ऐसा कौन पुण्य किया है। जिससे यह इतनी बड़ी विभूति मुझे प्राप्त हुई है। तत्र श्री गुरुने कहा कि इसी अयोध्या नगरीमें कुवेरदत्त नामका वैश्य और उसकी सुन्दरी नामकी पत्नी रहती थी, उसके गर्भमे श्रीवर्मा, जयकीर्ति और जयचद ये तीन पुत्र (ए । सो श्रीधर्माने एक दिन मुनिराजको बदना करके आठ दिनका नदीवर प्रत लिया, और उसे बहुत काल, तक पपारिरि पालन कर आयुके प्रतमें सन्यास परण किया जिसमे प्रथम स्वर्गमें मरिदिक देय हुआ, वहा असरयात वर्णी मैनवत ॥८॥ देवोचित मुख भोगकर आयु पूर्ण कर चया सो उसी अयोन्यानगरीन्यायी और ससप्रियाराजा चक्रवाहुकी रानी विमला देवीके गर्भसे व हरिसेन नामका पुत्र हुआ है । और तेरे नंदीश्वर बतके प्रभावमे यह नव निधि, चौदह रत्न, छयानवे इजार रानी, आदि चक्रवैतिकी विभूति और यह छः खंड का राज्य प्राप्त हुआ है । और तेरे दोनो भाई। जयकीर्ति और जयचन्द्र मी श्री धर्म गुरुके पाससे श्रावकके वारह व्रतो सहित उक्त नंदीश्वर व्रत पाल कर आयुके अंतमें समाधिमरण करके स्वर्गमें महेदिक देव हुए थे सो वहांसे चय कर वे हस्तिनापुरम विमल नामा वैश्यकी साची सती लक्ष्मीमतिके गर्भसे अरिंजय और अमितजय नामके दोनो पुत्र हुए सो वे दोनों भाई बम ही हैं। हमको पिताजीने जैन उपा-यायके पास चारो अनुयोग आदि सम्पूर्ण शास्त्र पढाये और अध्ययन कर चुकनेके अनन्तर कुमार काल बीतने पर हम लोगोके, व्याडकी तैयारी करने लगे, परन्तु हम लोगोने व्याहको पन समझकर स्वीकार नहीं किया और बाह्याभ्यंतर परिग्रहको खाँग करके श्री गुरुके निकट दीक्षा ग्रहण की। सो तपके प्रभावसे यह चारण ऋद्धि प्राप्त हुई है। यह सुनकर राजा बोला; हे प्रभु ! मुझे भी कोई ववका उपदेश करो, तब श्री गुरुंने कहा कि तुम नंदीवर व्रत पालो और श्री सिद्धचक्रकी पूजा करो। इस व्रतकी विधि इस प्रकार है सो मुनो- इस जम्बुद्वीपके आसपास लवण समुद्रादि असंख्यात समुद्र और धातकी खंडादि असतात द्वीप, एक दूसरेको चूड़ीके आकार धेरै हुए दूने दुने विस्तारको लिए हैं। उन सब द्वीपोंमें जम्बूद्वीप नामिवत् सबके मन्य है, सो जम्बूद्वीपको आदि लेकर, जो घातकीखंड, पुष्करखर, वारुणीवर, क्षीरवर, घृतवर, इभुवर और नंदीश्वर ये आठ द्वीप हैं उनमें आठवें नंदीश्वर द्वीपमें प्रत्येक दिशामें एक अंजनगिरि, चार दधिमुख और आठ रतिकर इस प्रकार १३ तेरह पर्वत हैं। चारो दिशाओंके मिलकर सत्र ५० पर्वत हुए। इन प्रत्येक पर्वतोपर अनादिनिधन ( साचते ) अकृत्रिम जिन भवन हैं और प्रत्येक मंदिरमें १०८ जिन विम्ब अतिशययुक्त विराजमान हैं, ये जिन विम्ब ५०० धनुष ऊँची हैं। वहां इन्द्रादि देव जाकर निस प्रति भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं, परन्तु मनुष्यका गमन नहीं होता, इसलिये मनुष्य उन चैत्यालयोकी भावना अपने र स्थानीय चैत्यालयोमें ही भाते हैं और नंदीश्वर द्वीपका मण्डल माडकर वर्षमै तीनवार (कार्तिक, फाल्गुण और अपाढ़ मासके शुक्ल पक्षोम अष्टमीसे पूनम तक) आठ आठ दिन पजनाभिक करने me hी 1400 मैनवत कयास करते हैं, अर्थात् मुदी साप्तमसे धारणा करनेके लिये नहाकर प्रथम जिनेन्द्रदेवका अभिषेक पूजा करे फिर गुरुके पास अथवा गुरु न मिले तो जिन किंवके सन्मुख खडे होकर व्रतका नियम करे। सातमने पडिमा तक ब्रह्मचर्य रक्खे। सातमको एकाशन करे, भूमिपर शयन करे, सचित्त पदार्थो का साग करे । आठमको उपवास करे. गत्रि जागरण करे, जिनमें मडल मांडकर अष्ट द्रव्योसे पूजा और अभिषेक करे, पचमेरुकी स्थापना कर पूजा करे. चौबीस तीर्थंकरोकी पूजा जयमाल एढे. नदीवर व्रतकी कथा सुने और 'ॐ ही नदीश्वरसज्ञाय नमः' इस मत्रकी १०८ जाप करे । आठमके उपवाससे ५० दश लाख उपवासोका फल मिलता है। नवमीको सब क्रिया आठमके समान ही करना, केवल 'ॐ ही अष्ट महाविभूतिसजाय नमः' इस मत्रकी १०८ जाप करे और दोपहर पश्चात् पारणा करे । इस दिन दश हजार उपवासोंका फल होता है। दशमीके दिन भी सब क्रिया आठमके समान ही करे, केवल 'ॐ ही निलोकसागरसंज्ञाय नमः' इस मंत्रका जाप १०८ करे और केवल पानी और भात खावे । इस दिन व्रतका फल साठ लाख उपवासके समान होता है। ग्यारसके दिन भी सब क्रिया आठमके समान करे, सिद्धचक्रकी त्रिकाल पूजा करे और 'ॐ श्री चतुर्मुखसज्ञाय नमः' इस मंजका १०८ वार जाप करे और ऊनोदर ( अल्प भोजन ) करे । इस दिनके व्रतसे ५० लाख उपवासका फल होता है। वारसको भी सब क्रिया ग्यारसके ही समान करे और 'ॐ हीं पच महालक्षण सज्ञाय नमः । इस पत्रका १०८ जाप करे तथा एकासन करे, इस दिनके व्रतसे ८४ लाख उपवासोका फलहोता है, तेरसके दिन मी सर्व क्रिया वारसके ही समान करे केवल ॐ ही स्वर्गसोपानसज्ञाय नमः' इस मत्रका १०८ बार जाप करे और इमली और भातका भोजन करे । उस दिन व्रतसे ४० लाख उपवासका फल मिलता है । चौदशके दिन सब क्रिया ऊपर के समान ही करे और 'ॐ की श्री सिद्धच काय नम इस मनका १०८ जाप करे तथा त्रण (मुखा) साग यदि शुद्ध हो तो उसके साथ अथग पानीके साथ मात स्वाये दिन व्रतका फल १ करोड़ उपवासका होता है । पुनमके दिन सा क्रिया ऊपरके ही समान करे, केवल 'ॐ इन्द्र- वज संज्ञाय नमः' इस मत्रका १०८ जाप करे तथा चार प्रकार आहारका साग करे, अनशन व्रत करे । इस दिनके व्रतका फल तीन करोड़ पाच लाख उपवासके जितना फल होता है । पश्चात् पडिमाके दिन पूजनादि क्रियाके अनन्तर घर आकर चार प्रकार संघको चार प्रकारका दान करके पीछे आप पारणा करे।
M I जैनवत ||८२॥ कयासं० कोई इस तको नीन वर्ष तक करता है उसे स्वर्ग सुख मिलता है। पीछे कितनेक भवमे नियमसे मोक्ष पद पाता है और जो पाच वर्ष करता है वह उत्तमोत्तम मुख भोगकर सातने भर मोदा जाता है तथा जो सात वर्ष ए आठ वर्ष तक प्रत करता है वह द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाकी योग्यतापूर्वक उसी भवसे भी मोक्ष होता है । इस व्रतको अनन्तीय और अपगजितने किया, सो वे दोनो चक्रवर्ती हुए। और विजयकुमार इस उनके प्रभापसे चक्रवर्तीका सेनापति हुआ । जरासिंधुने पूर्व जन्मम यह गत किया. जिससे वह प्रति नारायण हुआ । जयकुमार मुलोचनाने प्रत किया जिससे वह अवविज्ञानी होकर ऋपमनाथ भगवानका ७२ वा गणधर हुआ और उसी भवमें मोक्ष गये । मृलोचना भी आर्यिकाके व्रत यर कर स्त्रीलिंग छेद स्वर्गमें यहद्धिक देव हुई । श्रीपालका भी उसमे कोढ गया और उमी भवसे मोक्ष भी हुआ । अधिक कहा तक कहा जाय, इस व्रतकी महिमा कोटि जीभमे भी नहीं कही जासक्ती है। इस प्रकार तीन, पांच या सात (आठ) वर्ष इस व्रतको करके उद्यापन करे, आवश्यकता हो तो नवीन जिनालय बनाये, सब संघको तथा विद्यार्थी जनौको मिष्टान्न भोजन करावे, चौपीस तीर्थकरोंकी प्रतिमा पधरावे, शांति बन आदि शुभ कार्य करे, प्रतिष्ठा कराने, पाठशाला बनावे, ग्रन्थोंका जीर्णोद्धार करे और प्रत्येक प्रकारके उपकरण आठ आठ मंदिरजीमें भेट करे इस प्रकार उत्साहसे उद्यापन करे । जो उयापनकी शक्ति न हो तो दुना मत करे इसादि। इस प्रकार राजा हरिसे- नने व्रतकी विधि और फल मुनकर मुनिराजको नमस्कार किया और घर आकर कितनेक वर्षांतक ययाविधि बन पालन करके पश्चात् संसार भोगोसे विरक्त होकर जिन दीक्षा ले ली, सो तपके प्रभाव । शुरुयानके चलमे चार घातिया कर्मीका नाश करके केवलज्ञान प्राप्त किया और अनेक देशीम विहार कर भव्य जीयोको ससारमे पार होनेवाले सच्चे जिन-मार्गम लगाया । पश्चात् आयुके अतमें शेष कर्मीको नाशकर सिद्ध पद पाया । इस प्रकार यदि अन्य भव्य जीप भी उस व्रतका पाउन करेंगे तो ये उत्तमोत्तम सुखोको अपने अपने भागोके अनुसार उत्तम गतियों को प्राप्त होगे। तात्पर्य, व्रतका फल तत्र ही होता है, ना कि मिथ्यात्व तथा क्रोध मान पाया और लोभ आदि कपाय तथा मोहको मद किया जाय । इस लिये इस बात पर विशेष व्यान देना चाहिये। नदीश्वर व्रत फल लियो, श्री हरिसेन नरेश | कर्मनाश शिवपुर गयो, बन्दू चरण हमेश ।। १॥८२॥ JEER - कथा सं० जैनव्रत ॥८३॥ V । रविवत कथा (आदित्यकार वह कथा) काशी देशकी बनारस नगरीका राजा महीपाल अत्यन्त प्रजा वत्सल और न्यायी था। उसी नगरसे मनिसागर नामका एक सेठ और गुणमुदरी नामकी उसकी ती थी। इस मेटके पूर्व घुग्योदयसे उत्तमोत्तम गुणवान तथा रूपवान सात पुत्र उत्पन्न हुए | उनमें छका तो विवाह हो गया था, केवल लघुपुत्र गुण पर ही कुवारे थे। सो गुणधर किसी दिन वनमें क्रीडा करते विचर रहे थे कि उनको गुणसागर मुनिके दर्शन हो गये । वहा मुनिराजका आगमन सुनकर और भी बहुत लोग वंढनार्थ वनम आये थे और सब स्तुति वदना करके यथास्थान बैठे। श्री मुनिराज उनको धर्मवृद्धि कह कर अहिंसादि धर्मोंका उपदेश करने लगे । जब उपदेश हो चुका तर साहूकार की बी गुणमुद्ररी पोली-स्वामी, मुझे कोई बत दीजिये । तब मुनिराजने उसे पांच अणुव्रत गीन गुणत्रत और चार शिक्षारतका उपदेश दिया ओर सम्यक्त्वका स्वरूप समझाया और पीछेसे कहा बेटी ! तू आदित्यवारका व्रत पाल । मुन, उम बनकी विधि इस प्रकार है कि अपाढ मासके पसमें प्रथम रविवार से लेकर नव रविवारों तक यह व्रत करना चाहिये । प्रसेक रविवारके दिन उपवास करना या विना नमक (मीठा ) के अलोना भोजन एकपार (एकासना ) करना। पार्श्वनाथ भगवानकी पूजा अभिषेक करना । घरके सब आरम्भका साग कर विषय और कषाय भायोको दूर करना, ब्रह्मचर्यसे रहना । रात्रि जागरण भजनादि करना और 'ॐ ही अहै श्री पार्श्वनाथाय नमः' इस मका १०८ बार जाप करना । इस प्रकार नव वर्ष तक यह व्रत करके पश्चात् उद्यापन करना । प्रथम वर्ष ना उपवारा करना, दूसरे वर्ष नमक विना भात और पानी खाना, तीजे वर्ष नमक विना दाल भात खाना, चौथे वर्ष बिना नमककी खिचडी खाना, पाचों वर्प विना नमककी रोटी खाना, छठे वर्ष बिना नमक दही भात खाना, सात वर्ष तथा आठमे वर्ष नगक पिना सूगकी दाल और रोटी खाना, और नवमें वर्ष एक बारका परोसा हुआ (एकाना) नपक विना मोजन करना फिर दूसरेवार नहीं लेना और थालीमें जूठ भी नहीं छोड़ना । नवधा भक्ति कर मुनिराजको भोजन कराना और नत्र वर्ष पूर्ण होनेपर उद्यापन करना। सो नव नव उपकरण मदिरोर्मे चहाना. नव शास्त्र लिखाना, नव श्रापकोको भोजन कगना, ना नव पाल नव घर श्रावकोको पाटना. समोशरणका पाठ पढना, पूजन विधान करना इसादि । इस प्रकार गुणमुन्दरी प्रत लेकर घर M८३ ।
जैनत्रत ॥४॥ । क्या नाई, और सब कया परके लोगो को कर गुनाई । पपा बोने सुन का रस की पन निदा की। असलिये उसी दिनने उनके परम इन्द्रिताका वास होगया. सर लोग भूपा मग्न ग. नर मेटके गातो गुन गाह करके प्रदेशको निकले। मो साकेत नगरीम ( अयोन्या) जिनदत्त मेटक पर नाफर ना तरी करने लगे गोर नेट नेटानी बनान्म दी गई। काक पान पनारममै कोई अपितानी मुनि पयार को दरिलाये पीडित मंट नेटानी भी हिनाको ग. गोर दीन मापसे पृटने लगे-टे नाय ! या कारण हे ' कि हम लोग ये रक होगये ? मुनिगान गा.वि. तुमने मुनि पान सीयतकी निंदा की हे उमीमे वा दशा हुई हैं। यदि तुम पुनः अन्दा गहिन को रूगेनो तुम्हारी बोर्ड गम्पत्ति तुम्हें फिर मिलेगी । सेठ सेठानीने मुनिको नमस्कार करके पुनः प्रा लिया. गार अदा मरिन पाल्न किरा. जिसमें उनको फिरसे पन पान्यादिकी भली भाति होने लगी। परन्तु उनके साना पुरा माऊनपुरी कठिन मतरी करके पट पाल्न थे । एक दिन उस भ्राना गणार नये गाव काटनेको गया था, मो शीनामे गहा पारकर पर चग पाया गौर भिया (दलद) वही भूल पाया. पर मार जाने भावजसे भोज मागा । ता पर गोली लागनी ! तुम हसिया नृत आय हो. मोजली गरले. नागो पी गोपन करना. अन्यथा हसिया कोर्ट ले जायगा तो सब काम भरत जायगा, पिना द्रव्य नया दांनठा से भोगा' यह गुस्कार गुणभद्र तुरन ही पुनः नये गये, नो देखा कि हसियापर परा मार्ग मानिएमा । यह देख वे बहुन दुग्ची हो कि दातडा विना लिये तो भोजन नही मिला और माता मिल्ना कठिन होगया है। तब चे विनीत भापसे मीक पीनराग प्रभुकी स्तुनि काने में । मो उनके एकाग्रचित्तम स्तुति करने के भरण पर- नेन्द्रका आसन हिला, उसने समझा कि अमुक स्थानमें पार्थना निन्द्र भक्तको कष्ट हो रा है। तब करुणा कर पद्मावती देवीको आज्ञा की कि तुम जाकर प्रभुमक्त गुणपरका दान निशाण कगे । यह सुनकर पानी देशी तरत वहा पहुची, और गुणधग्मे बोली, दे पुन तुम भय मत करो । यस सोने का दानदा. और यह स्तनका भार तय यह है रत्नमर्ड पार्श्वनाथ प्रभुकी किंग भी ले जायो, सो भक्ति भागमे पूजा करना, इसमे तुम्हारा ढान्य शोफ दर लोगा। गुणपर दीद्वारा मदन द्रव्य और जिन बिंव लेकर घर भाये । नो प्रथम तो उनके भाई यह देखकर डरे. किरही कर V जैनवत ॥८५॥ कथासंभ तो नहीं लाया है, क्योंकि ऐसा कौनसा पाप है जो भूखा नहीं करता है, परंतु पीछे गुणधरके मुखसे सव वृत्तान्त सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और भूरि भरि प्रवासा करने लगे। इस प्रकार दिनो दिन उनका कष्ट दूर होने लगा और थोड़े ही दिनोंमें वे बहुत धनी हो गये । पश्चात् उन्होने एक बडा जिन मदिर बननाया, प्रतिष्ठा कर्राई, चतुर्विध सबको ( चारो प्रकारका) यथायोग्य दान दिया । घडी प्रभावना की । जब यह सब वार्ता गजाने मुनी, तब उन्होने गुणधरको बुलाकर सप वृत्तान्त पून्छा, और असन्त प्रसन्न हो अपनी परम सुन्दरी कन्या गुणधरको व्याह दी, तथा बहुतसा दान दहेज दिया। इस प्रकार वे बहुत वर्षों तक सातो भाई राज्य मान होकर सानन्द वही रहे, पश्चात् माता पिताका स्मरण करके अपने घर आये, और माता पितासे मिले। पश्चात् बहुत काल तक मनुष्योचित मुख भोगकर सन्यास पूर्वक मरण कर यथायोग्य स्वर्गादि गतिको प्राप्त हुए और गुणधर उससे तीसरे भव मोस गये । इस प्रकार इस प्रतके प्रभावमे मतिसागर मेटका दरिद्र दूर हुआ, और उत्तमोत्तम मुख मोगकर उत्तम उत्तम गतियोको प्राप्त हुए । जो और भव्य जीव श्रद्धा सहित बारह व्रतों पूर्वक इस व्रतको पालन करेंगे, वे भी उत्तम गति पावेंगे। यह विधि रविव्रत फल लियो, मतिसागर गुणवान । दुःख दारिद्र मशो सकल, अन्त लहो निरवान ।। ফুচক্র চলতি ক্ষুদ। नमों मिद्ध परमात्मा. सकल सिद्धि दातार । पुप्पाजलि व्रतकी कथा, कह भव्य सुखकार ॥ जम्बूद्वीपके पूर्व विदेहम सीता नदीके दक्षिण तटपर मंगलावती देशमै रत्नसंचयपुर नामका एक नगर है। वहाका राजा बत्रमेन अपनी जयावती सनी सहित सानन्द राज्य करता था, परन्तु घरमे पुत्र न होने के कारण उदास रहता था। यो एक दिन वह राजा जा रानी सहित जिन मदिरम दर्शन करनेको गया, तो वहां उसने तानसागर मुनिराजको बैठे देखा, और भक्ति सहित उनकी पूजा वदना करके वर्मोपदेश मुना। पश्चात् अवसर पाकर विनय सहित गजाने पूछा, हे प्रभु हमारी रानीके पुत्र न होनेसे यह अत्यन्त दुःखित ।
रहती है, सो क्या इसके कोई पुन होगा ? तब मुनिराजने विचार कर कहा, राजा चिंता न करो. इसके अत्यन्त प्रभाव- शाली पुन होगा, जो चक्रवर्ती पढ प्राप्त करेगा। यह मुनकर राजा रानी हर्पित होकर घर आये मुखसे रहने लगे, पश्चात् कुछ दिनोके रानीको शुभ स्वप्न और एक देव स्वर्गसे रानीके गर्भमें आया और नव मास पूर्ण होनेपर रत्नशेखर नामधारी सुन्दर पुत्र हुआ। एक रत्नशेखर अपने मित्रोके साथ जब क्रीड़ा कर रहा था तब इसे आकाशमार्गसे जाते हुए मेघवाहन नामके विद्याधरने देखा सो देखते ही प्रेममे विश्वल होकर नीचे आया और राजपुत्रको अपना परिचय देकर उसका मित्र बन गया । ठीक है "पुण्यसे क्या नही होता है।" पश्चात् राजपुत्रने भी उसे अपना परिचय देकर मेरु पर्वतकी पदना करनेकी इच्छा प्रगट की। तव मेघवाहन बोला, हे कुमार ! इमारे विमानमें बैठ कर चलों, परन्तु रत्नशेखरने यह स्वीकार नहीं किया और कहा कि मुझे ही विमान रचनाकी विधि वा मंत्र प्रताओ । सो विद्याधरने ऐसा ही किया तव कुमारने मित्र विद्याधरकी सहायतासे ५०० विद्याएं साधीं पञ्चात् मेघवाहनादि मित्रो सहित ढाई द्वीपके समस्त जिन मंदिरोकी वदनार्थ प्रस्थान किया । सो विजया पर्वतके सिद्धकूट चैयालयमें पूजा स्तवन करके रंग मडपमें बैठा था, कि इतनेमें दक्षिण श्रेणी स्थनूपुर नगरकी राजकन्या मदनमंजूषा भी दर्शनार्थ सखियो सहित बड़ा आई, और रत्नशेखरको देखकर मोहित हो गई, परंतु लज्जावश कुछ कह न सकी, और वेदित चित्त होकर घर लौट गई । राजा रानीने उसके खेदका कारण जानकर स्वयवर मडप रचा, और सब राजपुत्रोको आमत्रण दिया, सो शुभ तिथिम बहुतसे राजपुत्र वहां आये, और रत्नशेखर भी आया । जप कन्या वरमाला लेकर आई तो उसने रत्नशेखरके ही कंठम वह वरमाला डाली। इसपर विद्याधर राजा बहुत विगडे कि यह विद्यापरकी कन्या है भूमिगोचरीको नहीं व्याह सक्ती है परन्तु रत्नशेखरने उनको युद्धके लिये तत्पर देख सबको थोड़ी, जीतकर यथास्थान विदा कर दिया । इनका पराक्रम देखकर बहुतसे राजा इनके आज्ञाकारी हुए, और वही शुभोदयसे चक्ररत्नकी प्राप्ति भी ई, तर छाहो खण्डोंको वश करके व कुमार चक्रवर्ति पदसे भूपित होकर निज नगरम आये और पितादि गुरुजनोसे मिलकर आनन्दसे राज्य करने लगे। ॥
मनवत ॥८७|| कयास एक दिन राजा रत्नशेखर माता पिता सहित मुदर्शनमेरुकी बदनाको गये थे सो वहा भाग्योदयसे दो चारण मुनियोको देखकर भक्तिपूर्वक बंदना स्तुति कर धर्मोपदेन सुना और अवसर पाकर अपने भवांतरोका कयन पूछा तथा यह मी पूजा, कि मदनमनपा और मेघवाहनका मुझपर असन्त प्रेम क्यो है ? तर श्री मुनिने कहा-राजा सुनो ! इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र आर्यखण्डमें मृणालपुर नामका एक नगर है, वहा राजा जितारि और रानी कनकावती मुरवसे राज्य करते थे। इसी नगरमें श्रुतकीर्ति नाम ब्राह्मण और उसकी बन्धुमती नामकी स्त्री रहती थी। इसके प्रभावती नामकी एक पुत्री थी जिसने जैन गुरुके पास शिक्षा पाई थी। एक दिन ब्राह्मण सपत्नीक वन क्रीडाको गया था, सो वहापर उसकी स्त्रीको सांपने काटा, और वह मर गई । तव ब्राह्मण असन्त शोकसे विव्हल हो गया, और उदास रहने लगा। यह समाचार पाकर उसकी पुत्री प्रभावती वहां आई और अनेक प्रकारसे पिताको सम्बोधन करके वोली पिताजी मसारका स्वरूप ऐसा ही है। इसम इष्ट वियोग अनिष्ट संयोग प्रायः हुआ ही करते हैं । यह इष्टानिष्ट कल्पना मोह भावोसे होती है, यथार्थमें न कुछ इष्ट है न अनिष्ट है । इसलिये शोकका साग करो। पश्चात् प्रभावतीने अपने पिताको जैन गुरुके पास सम्बोधन कराकर दीक्षा दिला दी। सो ब्राह्मणने प्रारम्भम तपश्चरण किया, परन्तु पश्चात् चारित्रभ्रष्ट होकर यत्र मंत्र तंत्रादिके ( व्यर्थके अगड़ो ) में फंस गया। विद्याके योगसे नई वस्ती बसाकर उसमें घर माडकर रहने लगा और विपयाशक्त हो स्वच्छत प्रवर्तने लगा। तय पुनः प्रभावती उसे संबोधन करनेके लिये वहा गई और कहा, पिताजी, जिन दीक्षा लेकर इस प्रकार प्रवर्तना अच्छा नहीं है। इससे इस लोकमें निंदा और परलोकमै दुःख सहना पडेंगे । यह सुनकर ब्राह्मण कुपित हुआ और उसे वनमे अकेली छोड़ दी। सो जहा प्रभावती नमस्कार मत्र जपती हुई वनमें बैठी थी, वहा पनदेवी आई और पूछा वेदी तूं क्या चाहती है ? तव प्रभावतीने कैलाशयात्रा करनेकी उच्छा प्रगट की । यह सुनकर देवीने उसे कैलाशपर पहुचा दिया। प्रभावती वहां भादो मुदी पाचमके दिन पहुंची थी, और उस दिन पुष्पांजलि व्रत था, इसलिये स्वर्ग तथा पातालवासी देव भी वहा पूजन वंदनादिके लिये आये थे। सो पद्मावतीदेवीने प्रभावतीका परिचय पाकर कहा-बेटी व पुष्पांजलि व्रतकर इसमे तेरा सर दुःख दूर होगा।
जनवते 11८८|| इस व्रतकी विधि इस प्रकार है कि भादो मुदी ५ से १ तक पांच दिन तक नित्य प्रति पंच मेरुकी स्थापना करके चौवीस कयास तीर्थंकरोंकी अष्ट द्रव्यसे पूजाभिषेक करे, पांच अष्टक तथा पांच जयमाल पढे और 'ॐ हीं पंचमेरु सम्बन्धी अस्सी जिना- लयेभ्यो नम' इस मंत्रका १०८ बार जाप करे, पांचमका उपवास करे, और शेष दिनोमें रस सागकर उनोदर भोजन करे। रातिको भजन जागरण करे, विषय कपायोको घटावे, ब्रह्मचर्य रखे और यरका आरम्भ सागे । इस प्रकार पांचवर्ष तक व्रत करके फिर उद्यापन करे, सो प्रत्येक प्रकारके उपकरण पांच पांच जिनालयमें भेट देवे, पाच शास्त्र पधरावे, पांच श्रावकोको भोजन करावे, चारो प्रकारके दान देवे, इसादि । यदि उद्यापन करनेकी शक्ति न होवे तो दना व्रत करे । इस प्रकार प्रशवतीने व्रतकी विपि सुनकर सहर्ष स्वीकार किया, और उसे यथाविधि ५ वर्ष तक पालन किया तथा उद्यापन भी किया इससे उसे बहुत शाति हुई । पश्चात् पद्मावतीदेवीने उसे विमानमें बैठाकर उसके नगर मृणालपुर, पहुंचा दिया। वहा पहुंचकर प्रभावतीने स्वयंप्रभु गुरुके पास दीक्षा ली, और तप करने लगी, सो तपके प्रभावसे उसकी बहुत प्रशंसा फैली। यह प्रशसा उसके पितामे सहन नही हुई, और उसने उसे दुःख देनेको विद्याएं भेजी । सो विद्याए नडुत उपसर्ग करने लगी, परन्तु प्रभावती रंच मात्र भी नहीं डिगी और अन्तम समाधिमरण करके अच्युत स्वर्गमें देव उसका नाम पद्मनाम हुआ। इसी बीचमै मृणालपुरकी एक रुक्मणी नामकी श्राविका मरकर उसी देवकी देवी हुई । सो वे दोनो मुख पूर्वक कालक्षेप करने लगे । एक दिन उस पानाभ देवने विचारा, कि हमारा पूर्वजन्मका पिता मिथ्यात्वमें पड़ा है उसे सम्बो- वन करना चाहिये । यह विचार कर उसके पास गया और अपना सब वृतान्त कहा । सो सुनकर वह बहुत लज्जित हुआ, सव प्रपंच छोड़कर शांत चित्त हुआ। पश्चात जिनोक्त तपश्चरण किया, और समाधिसे मरण कर स्वर्गमें प्रभासदेव हुआ। सो वह पचनाभदेव स्वर्गमे चयकर तू रत्नशेखर चनयति हुआ है, और पद्मनाभकी देवी तेरी मदनमजूपा नामकी पटरानी हुई है। तथा प्रभासदेव वहांसे चयकर यह तेरा मित्र मेघवाहन विद्याधर हुआ है। सो हे राजा ! तुने पूर्वजन्ममें युष्णजलि व्रत किया जिसके फलसे स्वर्गके मुख भोगकर यहा चक्रपति हुआ है, और ये दोनो भी तैरे पूर्व जन्मके सम्बन्धी हैं । इससे इनका तुझपर परम सेट है। ॥ ८॥ ITI कयास. ॥८९॥ यह सुनकर राजाने पुष्पांजलि व्रत धारण किया और यात्रा करके घर आया। विधि सहित व्रत किया, पश्चात् बहुत काल तक राज्य करके संसारसे विरक्त होकर निन पुत्रको राज्यमार सौंपकर जिन दीक्षा ले ली और घोर तप करके केवलनान प्राप्त किया तथा अनेक भव्य जीवोंको धर्मोपदेश दिया । पश्चात् ग्रेप कर्मोको नाश करके मोक्ष पद प्राप्त किया। मदनमजूपाने मी दीक्षा ले ली सो तपकर सोलहवें स्वर्गमें देव हुई । मेववाहन आदि अन्य राजा मी ययायोग्य गतियोंको प्राप्त हुए, इस प्रकार और भी भव्य जीव श्रद्धा भक्ति सहित बत पालें तथा कपायोको कुश करेंगे वे भी उत्त- मोचम पदको प्राप्त होंगे। पुष्पाजलि व्रत पालकर, प्रभावती गुणमाल । लहो सिद्ध पद अन्तमें, नमों त्रियोग सम्हाल ॥ कारह सौ चौतीस तशी कथा। बन्दु आदि जिनेन्द्र पद, मन बच तन सिर नाय । बारह सौ चौतीस व्रत, क्या कहू सुखदाय ॥ मगध देशमें राजगृही नगरका स्वामी राजा श्रेणिक न्याय पूर्वक राजशासन करता था। इसकी परम सुन्दरी और जिनधर्मपरायणा श्रीमती चेलना पट्टरानी यी सो जब विपुलाचल पर महावीर भगवानका समोशरण आया तब राजा प्रजा सहित वेदनाको गया और वेदना स्तुति करके मनुष्योंकी समामें बैठकर धर्मोपदेश सुनने लगा। पश्चात् राजाने पूछा-दे प्रमो ! पोड़स कारण व्रतसे तो तीर्थंकर पद मिलता ही है। परतु क्या अन्य प्रकार भी मिल सकता है सो कृपा- कर कहिये ? तब गौतम स्वामीने कहा राजन मुनो-जम्बुद्वीपके आसपास लवण समुद्र है सो इस जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रके आर्यखंडमें अवंती देश है। वहां उज्जैनी नगरी है, वहां हेमवर्मा राजा अपनी शिवनन्दरी रानी सहित राज्य करता था । एक दिन राजा वनक्रीड़ा करनेको वनमें गया था, और वहां चारण मुनियोंको देखकर नमस्कार किया तथा मनमें समता मात्र घरकर विनय सहित पूछने लगा, भगवन् कृपा करके यह वताइये कि मै किस प्रकार तीर्थंकर पद प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करु ? तव श्री गुरुने कहा, राजन् ! तुम वारह सौ चौतीस व्रत करो । यह व्रत भादो मुदी प्रतिपदा १ से प्रारम्भ होता है, इसमें १२३४ उपवास तथा एकाशन करना चाहिये, यह व्रत दश वर्ष और साढे तीन माइमें पूरा होता है और जनमत Is/ कया एकान्तर करे तो ५ वर्ष पौने दो मासमें ही पूर्ण हो जाता है। व्रतके दिन रस खागकर व नीरस भोजन करे, आरंभ परिग्रहका साग कर -क्ति और पूजामें निमग्न रहे और 'ॐ ही असियाउसा चारित्र शुद्धि व्रतेभ्यो नमः' इस मत्रका १०८ जाप करे । जब व्रत पूरा हो जावे, तत्र उद्यापन करे । झारी, थाली, कलश आदि उपकरण चैयालयमें मेंट करे, चौसठ ग्रन्थ पपरावे । चार प्रकारका दान करे, तथा १२३४ लाडू श्रावकोके घर वाटे, पाठशालादि स्थापन करे, इत्यादि । और यदि उद्यापनकी शक्ति न होवे तो दना व्रत करे । इस प्रकार राजाने व्रतकी विधि सुनकर उसे यथाविधि पालन किया, उद्यापन भी किया, अन्तम समाधि मरण करके अच्युत स्वर्गमें देव हुआ। वहांसे चयकर वह विदेह क्षेत्रकी विजया पुरीमें बनजय 'राजाके यहां चन्द्रभानु प्रभु नामका तीर्थंकर पदघारी पुत्र हुआ। उसके गर्मा दिक पांच कल्याणक हुए । इस प्रकार राजा हेमवर्मा स्वर्गके मुख मोगकर तीर्थंकर पद प्राप्त मोगकर तीर्थंकर पद प्राप्त करके इस व्रतके प्रभावसे मोक्ष गया । इसलिये हे राजा श्रेणिक ! तीर्थंकर पद पाप्त करनेके लिये यह व्रत भी एक साधन है। यह सुनकर राजा श्रेणिकने भी श्रद्धा सहित इस व्रतको धारण किया और पोडस कारण भावनाएं मी भाई सो तीर्यकर प्रकृतिका वन्ध किया । अब आगामी चौवीसीमें वे प्रथम तीर्थंकर होकर मोक्ष जावेंगे। इस प्रकार और मी जो भव्य जीव इस व्रतका पालन करेंगे वे भी उत्तमोत्तम मुखोको पाकर मोक्ष पद प्राप्त करेंगे। बारह सौ चौतीस व्रत, हेमवर्म नृपपाल । नर सुरके सुख भोगकर, लही मुक्ति गुणमाल ॥ 3333€€€ औषधि दान कया। जन्म जरा अरु मरणके, रोग रहित जिन देव । औषधि दान तनी क्या, कहू करू तिन सेव ।। सोरठ देनमें द्वारका नगरी है। वहां नव नारायण श्री कृष्णचन्द्र राज्य करते थे। इनके सत्यभामा तथा रुक्मणी आदि सोलह हजार रानिया थी जो कि परस्पर वहिन भावसे (प्रेम पूर्वक ) रहती थी। श्री कृष्णराय प्रजापालन और नीति न्यायादि कार्योंमें सम्पन्न थे । एक दिन ये श्री कृष्णजी खजनो सहित श्री नेमिनाय प्रमुकी वदनाको जारहे थे कि मार्गमें एक मुनि अत्यन्त क्षीण शरीरी व्यानस्य खे रे ज मैनवत -- । साथवाले वैद्यसे कहा कि तुम रोगका निदान करके उत्तम प्रासुक औषध तैयार करो जो कि श्री मुनिरायको आहारके कयासंग साथ दी जाय, जिससे रोग मिटकर उनके रत्नत्रयकी वृद्धि हो । वैद्यने राजाकी आज्ञा प्रमाण औपघि तैयार की और जब श्री मुनिराज चर्याको निकले तो कृष्णरायने विधि पूर्वक पड़गाह कर नवधा भक्ति सहित श्री मुनिरायको भोजनके साथ, औपथि युक्त तग्यार किये हुए लड्डका आहार दिया, जिससे कृष्णरायके घर पचाश्चर्य हुए और औषधिका निमित्त पाकर मुनिराजका रोग भी उपशम हुआ। श्री कृष्णजीने औपपि दानके प्रभावसे ( वात्सल्य मावके कारण) तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध किया । किसी एक दिन श्री कृष्णराय पुनः मुनि दर्शनको गए सो भाग्यवशाल वे ही मुनि एक शिलापर न्यानस्थ दिखाई दिये । तब भक्ति सहित वदना करके राजाने मुनिराजके शरीरकी कुशल पुछी । तब शरीरसे सर्वथा निष्षेम उन मुनिराजने कहा-राजन् ! शरीर तो क्षणभगुर है, इसकी कुशल अकुशलता ही क्या ? ज्ञानी पुरुप इसे पर वस्तु जानकर इसमें ममत्व भाव नहीं रखते हैं । नाशवान देह तो किसी दिन निश्चयसे नष्ट होये ही गी और यह आत्मा तो अविनाशी टकोत्कीर्ण स्वभाव से ज्ञाता दृष्टा है। सो उसको पुद्गलादि पर पदार्थ कुछ भी बाधा नहीं पहुंचा सक्ते है इयादि । इस प्रकार मुनिराजके वचनोसे राजाको बहुत आनन्द हुआ परन्तु वह वैद्य जिसने औपधि बनाई थी, अपनी प्रशंसा न सुनकर तथा औपधि प्रयोगपर उपेक्षा भाव देखकर कुपित हुआ ओर मुनिकी कृतानी आदि शब्दोमें निंदा करने लगा। इससे तिर्यच आयुका बन्ध करके उसी वनमें बन्दर (कपि) दुआ सो एक दिन जब कि वह पन्दर (वैद्यका जीव) वनमें एक वृक्षसे उछल कर दूसरेपर और दूसरेसे तीसरे वृक्षपर जा रहा था, तब पानके वेगसे उस दृसकी एक डाली जिसके नीचे मुनिराज बैठे ये टूटकर उनपर पड़ी और उससे एक बहा घाव सुनिके शरीरमें हो गया, जिससे रक्त बहने लगा। यह देखकर वह बन्दर कौतुकाश वहा आया और देखा कि मुनिराजके ऊपर टक्षकी एक बड़ी डाल गिर पड़ी है और उससे घाव होकर लोह वह रहा है । मुनिको देखकर बन्दरको जाति स्मरण होगया जिससे उसने जाना कि पूर्वभव में वैद्य था, और मैंने इन्ही मुनिराजकी औपधि की थी परन्तु उनके मुखसे अपनी प्रशंसा न सुनकर मैने मान कपायवश उनकी निंदा की + थी जिससे कि मैं चन्दरकी योनिको प्राप्त हुआ हूँ। "
जैनव्रत
॥१२॥
यह विचार कर उस चन्दरने तुरन्त ही मुनिराजके ऊपरसे ज्यो खों करके वह उसकी डाली अलग कर दी। कयास
और जडीबूटी (औषधि) लाकर मुनिके घावपर लगाई, जिससे मुनिराजको आराम हुआ ।
पश्चात् मुनिराजने उसे धर्मोपदेश दिया और अणुव्रत गद्दण कराये सो उसने व्रत पूर्वक आयुके अन्तमें सात
दिन पहिले सन्यास धारण किया, सो प्राण त्यागकर सौ पर्म स्वर्गमें देव हुआ।
इस प्रकार औपपि दानके प्रभावसे श्रीकृष्णने तीर्थकर प्रति वापी और बन्दर भी अणुव्रत ग्रहण कर स्वर्ग
गया । यदि अन्य भव्य जीव इसी प्रकार आहार, औपपि, अभय और विद्यादानमें प्ररत होगे तो अवश्य ही उत्तमोत्तम
मुखोको प्राप्त करेंगे।
औषधिदान प्रभावये, श्री कृष्ण नरराय । अरु कपि पायो विमल सुख, देहु सनहि मन लाय ॥
परुन लो खनेकाडेही कथा ।
वीतरागके पद नमू, नमू गुरु निर्ग्रन्थ । ना प्रसाद सव लोभ नश, मिले मुक्तिका पन्थ ||
कंपिला नगरीगे रत्तपम राजा राज्य करता था उसकी रानी पियुतप्रभा थी। इसी नगरमें जिनदत्त और पिण्याक-
गघ नामके दो साकार थे। जिनदत्त तो पर्यात्मा और उदारचित्त था. परतु पिण्याकगय पड़ा लोभी और पापी था,
इसकी वी भी इसीके सयान थी।
एक समय राजाने नगरमें तालाव खोदनेकी आज्ञा की सो तालाब खुदने लगा । जब कुछ गहरा खुदा
उसमें से बहुतसे सोनेके खम्भे निकले, जो मिट्टीमें दबे रहने के कारण मैले हो रहे थे और लोहे के समान प्रतीत होते थे।
सो मजूर लोग उन्हें उठाकर बेचने ले गये । एक खम्मा इनमका सेठ जिनदत्तने भी लिया और जब पीछे
जांच की तो सोनेका निकला, परंतु मूल्य लोहेका दिया था, तप शेष द्रव्य को अपनी न समझ कर उसने धर्म कार्योंमें
लगा दी। इस प्रकार वह पर धनमे निवृत्त लोभ होकर सानन्द रहने लगा।
॥२२॥
। परतु पिण्याकगध जिसने बहुतसे खम्मे लोहेकी कीमतमें ले रखे ये और सोनेके जानता मी या उसने जैनवत । द्रव्यमें मोहित होकर उनको सचित कर रखे। ॥९३ ॥ एक दिन राजा तालाव देखनेको गया और एक खम्मा और भी पड़ा देखा सो जाच करने पर सोनेका प्रतीत इसके पीछे और भी खुदाया तो वही एक पेटी जिसमें ताम्रपत्र था निकली । उस ताम्रौ १०० खम्भोंकी वात लिखी थी। तब राजाने शेष खम्भोंकी तलाश की तो मालूम हुआ कि एक खम्भा तो जिनदत्त सेठने मोल लिया है, और ९८ पिण्याकगन्धने लिये है। राजाने दोनो सेठोको बुलवाया सो जिनदत्त सेठने तो स्वीकार कर लिया और उस खम्भेसे उत्पन्न द्रव्यका हिसाव राजाको दिखाकर निर्दोपरीत्या तुटकारा पागया । इतना ही नहीं राजाने उसकी सचाईसे प्रसन्न होकर उसकी प्रशसा की और परितोपिक भी दिया । परन्तु पिण्याकगन्यने स्वीकार नहीं किया, इससे राजाने उसके घरका सा द्रव्य लुटवा लिया । वे ९८ सोनेके खम्मे जो लोहेकी कीमतपे लिये ये सो तो गये ही, परन्तु साथमें और भी ३२ करोड रुपयोंकी सम्पत्ति भी गई। पिण्याकगन्य इस दुःखको सहन करनेमें असमर्थ था इसलिये उसने अपने पाव पर पत्थर पटक कर आत्मघात कर प्राण छोडे और मरकर रौद्रभ्यानसे छठवें नर्कमें गया। जिनदत्त सेठ यह चरित्र देखकर विरक्त होगया आर तपकर आयुके अन्तमें समापिसे मरण करके स्वर्गमें देव हुआ । वास्तवमें लोभ बुरी वस्तु है और तो क्या दशम गुणस्थानका अव्यक्त लोभका उदय भी श्रेणी नहीं चढ़ने देता है। और उपशम हुआ भी उपशांत गोही मुनिको ११ वें गुणस्थानसे प्रथम गिरा देता है। कविने कहा भी है "लोभ पापका बाप बखाना" इसी लोमसे ससघोष भी मरकर राजाके भण्डारका साप हुआ था। और भी जो इस प्रकारका पाप करता है उसे परभवमें तो दुःख होता ही है परन्तु इस भरमें भी राजा व पंचोंसे दडित होता है व दुःख पाता है, अपनी प्रतीति खो बैठता है, इसलिये पर यनका लोभ लागनेसे भी निशंकता और मुत्र होता है। पिण्याकगन्ध नरकहिँ गयो, परधन लोभ पसाय । स्वर्ग गये जिनदत्तनी परधन लोभ नशाय ॥ INVI , जगमता पद परमष्टाका आरता। १९४॥ राग गौरी। पच परमगुरु भाये, मो मन पंच परमपद भाये। जिन याये पाप नशाये, मो मन पच परमगुरु भाये ।। शुल यान घर धाति कर्म हर केवलज्ञान उपाये । वीतराग गुण छयालिस वारी हित उपदेश सुनाये ।। मो मन० ॥ १॥ नाश अघाति भये अविनाशी, निर्मल सिद्ध कहाये । लोक शिखरंपर जाय विराजे आवागमन नशाये ॥ मो मन० ॥ २ ॥ 'छत्तिस गुणके वारी मुनिवर सकल सपके राये । दीक्षा शिक्षा दायक गुरु आचार्य परमेष्ठी कहाये। मो मन पच० ॥ ३ ॥ न्यारह अङ्ग, 'चतुर्दा पुरच, पाठ पढत वर्षाये । पढत पढावत ज्ञान वदावर्ते उपाध्याय गुण गाये ।। मो मन० ॥ ४ ॥ आठ वीस गुणधारी स्वामी परम दिगम्बर काये। आप तर पर तारन हारे, साधु परमेष्टी मनाये ॥ मो मन० ॥५॥ ऐसे पच परम पद जो भवि न्याचे मन वच काये। मत्र भवके तिन पाप 'दीपचन्द' क्षणमें जात नशाये ॥ ॥ मो मन पंच परम पद माये ॥६॥ समान
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