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Maalik Aur Majdur
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मालिक और मजदूर
[गों व अमीरों को समस्याओं के नियमों का समह]
लेषक
लियो दालस्टाय
श्री शोभा लाल गुप्त
नरयुग साहित्य सदन,
प्रकाशक
गोकुलदास धूत
नवयुग साहित्य सदन, इदोर
प्रथम संस्करण १६४५
मूल्य
सवारपया
विषय-सूची
विषय
पृष्ठ
१मानासमाज
যায
२
२ काम वा बग्यारा
३ एक भीषण अन्याय
४ जमीन का रिमाजन
५ मालिसे का क्तय
६ मजदूर क्या करें।
७ उद्धारका उपाय
२६
३४
८ मत्ता बनाम स्वतनवा
६ समाजवाद
२० अराजस्तावाद
११ तीन उपाय
६२
२०४
२०६
दो शब्द यह पुस्तिस रूमी महापुरुष टालगाय के युद्ध निराधा का समह है। महपि टालाप ने इन निराधों में हमारे वर्तमान समाज की अवस्या पर गहराई के साथ विचार किया है। 'मालिक और मजदूर' नाम से पाठक इस भ्रम में न पड़े कि इन निवधा में वारणानो म काम परो वाले श्रमजारियों और पूंजीपतियों की समस्या पर ही विचार किया गया है । सगार इस समय दा प्रधान श्रेणियों में विभाजित हो रहा है। एक भोर धनवान हैं तो दूसरी पार गरीय । हही को पाय से श्राप मालिक और मजदूर, शासक और शामित, अधिकार सम्पन और अधि कार शून्य, जमींदार और किमान व्यादि अनक नाम से पुकार सकते हैं। कल कारखानों में काम करने वाले श्रमजीरिया की मर या तो बहत बाड़ी है। श्राधुनिक युग व विविध अाविष्कार के बावजूद भी ग्राज अधिकाश मानर समाज कृषि पर जीवन रिका करता है, और य शहरों में नहीं, छादे घाटे दक्षातों में वमा हुश्रा है । इसलिए जब हम मानर समाज की समस्या पर विचार करते हैं तो हम इ7 देता में आमने सले असत्य श्रमजीवियों को दृघि से अभिल नहीं कर सकत । अत पाठक इन नियों को पढ़ते समय इस यात को ध्यान म रगे कि 'मालिक और मजदूर शो का उन बहुत यापक श्रथम प्रयोग किया गया है। यह निर्विवाद है कि थान का मात्र समाज वह नहा जो कि उसे होना चाहिए । उममें उत्पीड़न है, शोषण है, कलह है, सपप है, शान्ति है, मार कार है। सक्षेत्र में कई तो उनकी श्रथा पशु समाज से कुछ अच्छी नहीं, बरनर भले ही 1। यह क्या १ इसमा उत्तर भी सभी धार से एक ही मिलता है, कि कुछ लिया ने स्वाथ से प्रेरित हा कर ससार के मुख साधना को इथिया लिया है और मानव समाज म ऐसी प्रथालिस जारी कर दी है कि हरेक कर सपन जान के लिए कटार सघष करना पड़ता है पर मनुष्य अपने फलने फूलने के लिए अपने माई का, अपने पड़ोमा का गला गटन में भी मान नहीं करता । ऊपर से लगा कर नीचे तक यही चल रहा है। मितुम मम निबनो को मौत और नानां की चाला है। इसका परिणाम यह ना है कि गो भूत्वा की भरपा कराड़ों पर जा पहुंचा है और जिह भौतिक और प्रकार के समस्त साधन उपलब्ध है, उनकी गिता श्रगुलिया ना सक्ती है। इन बदमुनी भर लागा र प्रति बहजन समाज ' - दृष्टया में भयर असतापको ज्याला पाय घाय कर रहा है। स्थिति दिन प्रति दिन भयावह होता जा रहा है । यह अभ्यामारिक स्थिति कितने दिन काम रह सकता है। उसका बदलना हागा । रिन्तु प्रश्न य है कि उमामि प्रकार ला जाय । पाठकों को इस प्रश्न का उत्तर इन विधा में मिलेगा। श्राज तामानर समाज का श्रादरा, माना ममात्र मान लिए अनेक राम मनित हा चुर हैं । समाज वाट, पूजापान, अराजकनाराद, घमराद यानि अनेक वारी का नाम लिया जा सकता है। मर्पि गलयान हरक पाद का, हरेक रिचार का अपना माग पर क्या है और अपना विवेक बुद्धिा अनुमार निभर हा कर उनी राभियों का हमारे सामने प्रस्तुत किया है। वे किमावादक, अय समयक नहा 1 वे भूला धार्मिक अलपकरण पाले व्यक्नि थ, इसलिए धम माना पर हा उन्नाने अधिक जोर दिया है। मौतिक साधन नहीं, श्रायास्मिक कल्याए उनस लक्ष्य रहा। महर्षि यनाय न साधे-साद शद में मनुष्य के प्राचरण के लिए कुड मून उपस्थित कर दिये हैं। ने यह मानते हैं कि मारी बराची का यह है कि मनुष्य हम वर्ग नियम का भूल गया कि हमका दूसरा साथ ऐमा व्यपार नहीं करना चाहिए ना हम नहीं चाहत कि दूसरे हमारे माथ करें। जहाँ तक किसानों को ताकानि समम्मा का ताल्लुक टालाय ने या प्रतिमानित किया है कि समान पर व्यक्ति का अधि राना एक भीषण अपाय है | नमान मनु नौ ग्रामविका का ग्य माधन है और उमर कुद लोग हा मरलें तो यह स्वाभाविक ही है ग्राम लाग भूवा मरेंगे और गुलाम बन जान र लिए सिरा इंगि। मलिए गाय ने यह मुझाया है कि जमीन का इस प्रकार विमान या जाना चाहिए कि हर वह पक्ति आ उसक द्वारा मानापका पान प्रना चाहे, नमान स श्रावश्या माग प्रान कर मर । यति अमान का । प्रश्न हल हा जाय ता हमारे युग माप हा प्रश्न हल हो जाय, ममें शानदार भारन म पिजार देश लिए उसका महत्त्व और मा अधिक है। पाठक इन निया में भी देखें कि महर्षि गलग्गय की रिचार धारा मात्मा गाँधा कादिनारधारा मे पिनना मिलती-जुलता है गय तमान श्ररथा को ग्लन + लिए हिमामा उपायो का अरनबन । करने की सलाह नहीं देते। वे राज्य सत्ता को भी हिमा का ही प्रतीक मानते हैं, प्रत वे ऐसे समाज की कल्पना करत हैं निमम सत्ता जैसा काइ यतु न होगी और मनुष्य अपन लिए नहीं बल्कि सरके कल्याण की भावना से प्रेरित हार काम करेंगे दूसरे शन्दा म टालसाय को हम अराजकतावादी कह सक्न हैं, इस अन्तर छ माय कि ये अराजकता वादियों की भाति हिंसात्मक उपायां क उपासक नहा । श्रयाय और उत्पीड़न को रोक्ने का गलभाय ने एक ही माग बताया है और वह यह किश्श्रयाय शोर अत्याचार का शिकार, उत्पीडित जन समाज याय अत्याचार का सामादार न बने । बहुधा मनुष्य अपना आपत्तियां का स्यय हा कारण दुश्रा करता है । अन गलम्गय कहते हैं कि मनुष्य का अपने पाया पर सुद ही कुल्हाड़ी मारन का यह काय द करना चाहिए। जा लोग मानव समाज के लिए नगीन सगठन कायम करना चाहते है, उनका बात टालाय का ज्यादा अपाल नहीं करती उनकी यह मायता अवश्य सही प्रतीत होती है कि जब तक व्यक्ति श्रथवा व्यक्तियों का हदय परिवर्तन नहीं होता, कितना भी यादश समाज सगठन क्या न कायम किया जाय, अन्ततोगत्वा गलत हाथों में पड़ कर यह पुन भ्रष्ट हा जायगा । इसलिए टालस्य पदत है कि मनुष्य दूसरी का सुधारने का चिताबाह कर पहले खुद को सुधारने की चिन्ता करे । इसमें कोई शक नहीं कि किमी राग लिए राज्य उपचार की अपेता भीतर उपचार अधिक कारगर होता है। मितु साथ ही हम बाह्य उपचार की भी उपेना तो नहीं कर साने । मनुष्य का मातर मे यह नन को परणा मिल, इसके लिए हमका अनुकूल वातावरण मुलभ करना होगा, उसके माग की उन राधाशीश हगना पड़ेगा, जा ग्रान इस विषम ससार म पग पग पर उमका सामना करती है। श्राराा है म-पिगलम्गय के इन निरधा में पाटको पिचार और चिन्तन की प्रचुर सामना मिलगी और यनि उदान अपने जाग्न को साथ की धार समाई कर सब हित में लगा दिया तो वे भावा श्रादश समाज की नोंच डालगे और अपना तथा जगत दानो वा माथ साथ पल्याण कर सस्ग। नई दिल्ली शोभालाल गुप्त गाधा व्यती, १६४५ मालिक और मजदूर १. मानव समाज में शोषण मारा मावि ममान पशुया उस मुण्ड व समान है, जिसमें बैल गाय और बछडे सभी है, और जो तारा स पिर बाडे में अद है। चाहे बाहर सुदर हरा भरा चरागाह है और ग्वाय सामग्रा की बहुतायत है । पाडे के भीतर पशुश्रा के लिए पाने को कापी घास नहीं है। पलस्वरूप वाड़े में जो भा घास है उसको पाने के लिए वे पशु एक दूसरे पर हमला कर रहे हैं और एक दूसरे को पैर तले कुचल रहे हैं । पशुओं का मालिक भला और सदाशयी व्यक्ति है । उसे पशुश्रा की हालत देखकर बड़ा रज होता है। वह साचने लगता है कि पशुओं की हालत किस प्रकार सुधारी जाय । सोचते सोचते उसने गायां के रात के विश्राम के लिए हवा और नालीदार सुदर छप्पर वधवा दिये। उसने उना सींगारे सिरे मढया दिये ताकि वे जिदगा की लड़ाई में अपो सींग का उतनी भयपरता से प्रयोग न करें। उसो वृढे ला और गाय के लिए उन बाड़े के भातर एक और हद पदी बनादी, ताकि वे अपने बुढापे में जिदगी की लड़ाई से बच जाय और घास के लिए निश्चित हो जाय । चूकि दहा को मारा जा रहा था, वे भूप से मा मर रहे थे और उपयोगी पशु न बन पाते थे, इसलिए उसन ऐमी व्यवस्था कर दी कि उहें रोज सवेरे थोड़ा दूध पीते रे लिए मिल जाया परे। इस प्रकार, यद्यपि सब पहड़ों को कापी पापणन भी मिलता था तो भी उहें इतना जरूर मिल जाता था कि वे जीवित रह सकते थे। मतलब यह कि पशुओं के स्वामी ने उनकी हालत सुधारने पे लिए यथा शक्ति प्रयत्न क्यिा । पितु जर मैंने पशुओं ३ मालिक और मजदूर के मालिक से पूछा कि श्राप यह सोधी-सौ रात क्या नहीं करते किडे की हद-बी तोड़ कर पशुओं को बाहर निकाल दें, वो उसका उत्तर यह था कि यदि मैं ऐमा का ता फिर मुझे उनके दूध से जा हाप धो लेना पडेगा। काम का बटवारा मनुष्य जिम मकान म रहता है, वह अपने बाप नहा बन जाता, उसके चूल्हे म जो ईधन काम पाता है वह भी वहा अपने आप नहीं पहुँचता, न पानी अपन श्राप पाता है और न ही प्रकाश से टपक पड़ता है। उसका भोजन, उस कपड़े, उस जूते श्रादि तमाम चीजा को पुराने जमाने के लोगों ने ही तैयार नहीं दिया। श्राज मी उनको ऐसे आदमी तैयार कर रह हैं जो सैकहो और हजारा का तादाद में मर रहे हैं। वे रात-दिन परिश्रम परते हैं, किंतु यह अपने और अपने बचाये लिए काफी भाजन वन और रहने को स्थान नसीब नहा होता । सभी मनुष्यों को दरिद्रता से लड़ना पड़ता है। वे जागन-ग्राम म तो अधिक व्यस्त हैं, फिर भी उन माता पिता भाइ बहन और बाल बच्चे मौत के घाट उतर रहे हैं। उनकी हालत ग्न श्रादमिया के समान है जो टूटे हुए प्रथा अघट्टर जहाज म सरार हो और जिनो पाम सने पीने का बहुत थोड़ा सामान रच रहा हो। उनको परमामा ने या प्रति ने ऐसी दशा म डाल दिया है कि अपनी जरूरता के साथ बिना निरन्तर सपप दिये उनका काम नहीं चन मक्ता। यदि हम उना इस काम में बाधा डालें आया दूमरों व परिश्रम का इस तरह उपभोग करें ससे सवसाधारण को कोई लाभ नहीं पहुंच सक्ता, तो यह हमारे और उनके दोनों के लिए धाता सिद्ध होगा। पिर श्रधिकाश पदे लिग्वे लोग क्या खुद परिश्रम नए करने और चुर चाप दूसर की मेहनत हड़प लेते हैं जो उन स्तुर के जीवन निर्वाह लिए भारश्यक होती काम का बटवारा है ? क्या वे ऐसे जारन को सात्विक और उचित समझते हैं ? यदि फाइ मोची एसे जूते नावे जिनकी लोगों का जरत न हो और फिर यह है कि लोगों को उसका खाने का दना चाहिए तो यह एक अजीरात मालूम होगी। मितु हम उन सरकारी क्मचारियों, धर्मा- धिकारियों, पलानि, मिशान वैनायो श्रादि के लिए क्या पहनी सवसाधारण वे लिए कोई उपयोगा चीन पैटा नहा करते और न जिनके काम का किला को जरूरत है, मितु जो पिर भी काम के बटवारे के सिद्धान्त के नाम पर अच्छा पाना-पहनना मागते हैं। अपश्य ही काम का बटवारा हमशा स चला धाया है, किंतु वह ठीक तभी हो सस्ता है, जब हम विवेक और अन्त करण पूक्क उस करने का निणय कर | जो बग्वारा सब लोगों की बुद्धि और हृदय का मनर हो, यह सब से अच्छा बटवारा हागा, श्राम लोग उमी वटवारे को सही समझते हैं, निसा अनुमार किसी मनुष्य के किसा पास काम को दूमरे इतना जरूरी समझे कि वे उस बदले उम मनुष्य का गजी खुशी साना और करदा देने को तार हो जाय। किंतु जो मनुष्य पचपन से लगाकर तीस वर्ष का उम्र तर दूमर्ग की मेहनत पर जिदा रहता है और यह वादा करता है कि जब मैं अपनी पढाइ समाप्त कर लूगा तो कोई बहुत उपयोगी काम करू गा-हालागि पिता ने उसको ऐसा करने का नहीं कहा होता वह अपना शेष जोरन भी उसी प्रकार मिताता है और करता रहता है मै निकट भविष्य में कुछ-न-मुख जरूर का गा, कि यह मही उटस नी हो सकता। यह ता बलराना द्वारा दूसरा की मेहनत लेना शाप साने की इम निया का धमवाद "देवी निर्णय" दायनिक "जीवन की अनिवार्य श्ररस्था" और पाताल का विज्ञान "काम का बवारा" कहते हैं। काम का बरवारा माना समाज में हमेशा रहा है और आगे भी रहगा, किंतु मराल यह है कि हम वैमी व्यरस्था करें कि जिसमे यह वग्यारा ठक ठार हो जाय ।
मालिक और मजदूर लोग कहते हैं-युध मानमिक और प्राध्यामि श्रम करते हैं और कुछ शारीरिक श्रम करते है, क्या यह काम का सारा ही है । उनः श्रम का यह पचास मिशुल ठीक प्रतीत होता है, कितु है यह वास्तव म यही प्राचीन ग्लात्कार का नमूना 'तुम मुझे भाजन दा, परसदा और मरा सब तरह मेया चारीक क्योंकि तुम बचपन से ऐसा करने के अभ्यस्त हो और तुम्हारे लिए घह मानसिक काय का गा जिसका मुझ अभ्यास है। तुम मुझे शारीरिक भोजन दो और मैं उमर बदले म तुम्हें प्राध्यात्मिा भाजन दूगा!" य अयन सही प्रतीत होता है, किन्तु वास्तर म यह सही तमी हा सकत है जब सेवाश्री का यह आदान प्रदाा मेछापूक्क हा शरीर श्रम पर वानों का प्राध्यामिक भाजन पाने से पहले ही अपनी सेवायें देन लिए मजबूर नहाना पड़ता हा आध्यात्मिक भाजन देने वाला “यक्ति पहन है-"मैं यह भोजन तभी दे सस्ता हूँ जर तुम मुझको भाजन दो, वस्त्र दा और मरे पर का बड़ा कर हा पर ले जाया।" कितु शारीरिक भोजन भुलभ करोयाले यति को अपनी बार र विना विमा प्रकार की माग यि उपरात काम करना पड़ता है। उस श्राध्यामिक भोजर मिले या न मिले, शारीरिक भाजन देना हो दान है। यदि यह आदान प्रान स्वच्या वर दास दोनों पक्षों के लिए उमी शत मा समान ही । यद मच है कि मनुष्य लिए शारीरिव भाजन की भाति प्राध्यामिक भाजन भी आवश्यक होता है। द्वि- यक्ति अथवा कलाकार कहता है "हम मनुष्य को ग्राभ्यात्मिक भो द्वारा ती से कर सात है, गर वे हमारे लिए शारीरिक भाजन मुल करें।" नितु शारीरिक मानन दा गाला भी क्यान -"हम ग्राप लिए शारीरिक भोजन सुलभ करना शुरू करें, उसर पहले हमा श्राश स्मिन भाजन का जरूरत है, २२ ता यद हमको न मिलेगा, हम शरी श्रम नही कर सस्त। नाप कहेग-"लोग र लिए आयात्मिक भाजन तयार करने काम काटवारा लिए हमका किसान, लुहार, माची, बढई, राज श्रादि के परिश्रम की जरूरत है।" इसके जवाब में मजदूर भी यह कह सकता है-"मैं आपके लिए शारीरिक भोजन तैयार करने के लिए श्रम करू, उसके पहले मुझे श्राध्यामिक भोजन चाहिए। मुझे श्रम करने की शक्ति प्राप्त हो, इसके लिए मुझ धार्मिक शिक्षा, समतावादी समाज व्यवस्था, श्रम के साथ बुद्धि के सयोग और क्ला के सुग्व और अानन्द का जरूरत है। मेरे पास समय हां है कि मैं जीवन के अय के सम्बध म शिक्षा प्रणाली की खाज करू । श्राप मेरे लिए उसकी यरस्था कीजिए। "मरे पास सामाजिक जीवन क विधि विधान बनाने के लिए भी मय नहीं है, जिनसे कि न्याय की अवहेलना न हो । श्राप ही मेरे लिए का निमाण कीजिए, मेरे पास यत्न विद्या, प्रकृति विद्या, रसायन विद्या श्रादि को अध्ययन करने का समय नहीं हैं। मुझे ऐमी पुस्तकें दीजिए, जिनरे सहारे मैं अपने औजारों में, काम करने के तरीकों में, रहने के मकानों में और उनम रोशनी और गर्मा की व्यवस्था करने श्रादि कार्मा पसुधार र सा । का य, चिताला और सगीत म भी अपने आप काव्यम्त नहा रय सफ्ता । मुझे मनारजन और मुग्व की यह सब सामग्री जिए, जो जीवन के लिए श्रावश्यक है।" श्राप कहगे कि यदि मजदूर पेशा लोग श्राप के लिए जो श्रम करते यह न कर तो आप अपना महत्वपूर्ण और यावश्यक काम नहीं कर सक्ने। इस के जवाब में मजदूर मा यह कह सकता है-~-"यदि मरे विवेक और अन्त करण का जरूरता के मुताबिक मुझे धार्मिक पथ प्रदान न मिल, सरकार मरे लिए काम की गारन्टी न करे, मुम अपने अम को हल्का करने का ज्ञान न मिले और म क्ला का श्रानन्द न लूर सन् तो मैं हल जानने, कूड़ा कचरा दाने और घर की सफाइका अपना महत्व एग काम, ना श्राप काम जितना हा यावश्यक है, नहा कर सक् गा। र तक तो श्रापन प्राध्यामिक भाजन रूप म जो कुछ उपस्थित किया ६ मालिक और मजदूर है, यह न केवल मेरे लिए बिल्कुल निरथक है, नल्कि मैं नहीं समझ सकता कि वह और किमी के भी कुछ उपयोगी हो सकता और जन तक मुझे यह पोषण नहीं मिलेगा जो दूसरा के समाा मेरे लिए यावश्यक है, तब तक मैं आपके लिए शारीरिक भोजन पैदा नहीं कर सक्ता" यदि मजदूर ऐमा कई तो क्या हो । और यदि यह एसा कहे तो यह हसी की नहीं, बल्कि स्पष्ट न्याय की ही बात होगी । बौद्धिक परिश्रम परने वाले की अपेक्षा एक मजदूर का उक्त कथन कहाँ ज्यादा ठीक होगा। वारण, बौद्धिक श्रम करने वाले को श्रपेक्षा शरार श्रम करने वाले का काम ज्यादा जरूरा होता है। दूसरे बुद्धि के स्वामा को यादाशुदा याध्या मिक भोजन देने में कोई रुकावर नहीं हो सकता, जर कि मजदूर भोजन ६ अभाव म श्रम करने म असमय होता है। ऐसी दशा में यदि हमारे सामने उक्त प्रकार की सीधी सादा और "यायोचित माग रखी जाय, तो हम बौद्धिक श्रम करने वाले व्यक्ति उसका क्या जवाब देगे १ हम उस माग की क्मि प्रकार पूति करगे १ हम यह तक नहीं जानते कि मजदूरों की जरूरत क्या हैं । हम तो उनके रहन सदन के तरीका, उना विचारों और उनकी भाषा को भी भूल गए हैं। अज्ञान के यश होकर हमने अपना वह क्त्तव्य भुला दिया है, जिसे हमने अपने सिर पर लिया था। हम यह भी भूल गये हैं कि हमारा श्रम सिलिए हो रहा है और जिन लोगों की सेवा करने का हमने निश्चय किया था, उही को हमने अपने वैज्ञानिक और क्ला सम्मधी काया का लक्ष्य बना लिया है | हम अपनी ही प्रसनता और श्रानर के लिए उनका अ ययन करते हैं। हम यह बिल्कुल भूल गए हैं कि हमारा काम उनका अध्ययन और वणन करना नही, बन्चि, उाको सेवा करना है। अब हमको सावधान हो जाना चाहिए और गहराई के साथ प्रात्म निरीक्षण करना चाहिए । वस्तुत हम उन परडे पुजारियों के समान है, , एक मीपण अयाय जिनो दार्था म स्वग की कुजी का है, लेक्नि जानता खुद वर्ग में जाते हैं और न दूमरों को जान देते हैं। हम अपने ही माइयों का जीवन बात कर रहे हैं और फिर मा अपने आप को धर्मात्मा, दयालु, शिक्षित और पुण्यात्मा समझे हुए है। . एक भीषण अन्याय जन साधारण जिस मुख्य अ याय का शिकार है, वह राजनैतिक मुधारा द्वारा नहीं मिगया जा सकता। वह ग्रन्याय यह है कि जिस जमीन के टुकड़े पर मनुष्य पैदा होता है, उसरा यह इस्तेमाल नहीं कर सकता, हालाकि कुदरती तौर पर उसको यह इन हामिल होना चाहिए। इस अन्याय का जपन्यता और दुष्ता को समझने के लिए यह अनुभव करना ज़रूरी है कि भूस्वामिया की यार मे निरन्तर हान पाला मह अत्याचार जब तक रदन हागा, तब तक क्सिा मा रानतिर सुधार द्वारा जनता का नानादी नसीर नहीं हो सकता, उमा ल्याए नई दा सकता। जन जन-साधारण भूम्यामि को गुलामा से मुक हांगे, तभी राजनैतिक सुधार राजनीति के हा के पिलीने हाने की माय लोगों को श्राकाताओं के सच्चे द्योतक होंगे ली लोग अपने यक्तिगत उद्देश्यों की पूर्ति करना नहीं चाइने, बल्कि नाम जाता की सच्ची समा करना चाहते हैं, उनके सामने में इस निबध में यही रिचार परा करना चाहता हूँ। श्राप देहात को धार निकन जाइये और साई किसी से बात करके देख लीजिये। हरेक आपके सामन अपना निधनता का रोना रोयेगा। लोगों के पास पर भरन लिए धन का अभाव है और इसकी वजह यह है कि उनक पास कापी जमीन नहीं है । भूमि से वंचित कर दिये जादे कारण देहाता में क्तिना भयकर वनाही मची हुई है, यह या जान पर खुद र खुद ननर या जाता है। सवाल यह है कि उनको और उनके परिवारों का जिला मे रमवा जाय। और इस सबकी वजह है - मालिक और मजदूर जमान की समस्या । आप लोगों से उनकी दुरावस्या का कारण पूछिये और यह भी पूछिय कि उहें क्या चाहिए, तो उनकी पार स एक हो जवाब मिलेगा। वे ऐसा सोचने के लिए विवश हैं, क्योंकि निर्वाह योग्य भूमि की कमी की मुरय शिकायत के अलावा उहें महसूम करना पड़ता है कि वे भूम्यामियां और सेठ साहूकारों के गुलाम हैं। उनपर इसलिए श्राये दिन तुर्माने होते हैं, वे पिटते और अपमानित होते हैं कि कभी उनके मवेशी निकटरती भूलामो के बाडे में चले जाते हैं या वे वहासे घास का नाझा अथया लकड़ी का गट्टर जिसने पिना वे जिदा नहीं रह सकते, उठा लाते हैं। श्रत ग्राम लागt की दृष्टि से भूमि का सनाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। उनके आगे यह बिल्कुल स्पष्ट है कि कृषि पर निभर रहने वाली श्राबादी, जिसका तादाद बढता रहती है, उस अवस्था म जिन्दा नहीं रह सक्नी जर कि उसके पास बहुत थोड़ी जमीन हा, और उसे अपने अलावा उन तमाम परोपजीवियों का भरण पोपण करना पड़ता हो, जो उसके साथ नन्थी है और उसके चारा सोर रेंगते रहते हैं। हेनरी जाज ने अपने एक भाषण में कहा है-"मनुष्य क्या है ? सबसे पहले वह एक जानवर है, जमीन का जान पर है जो जमीन के गिना जिदा नहीं रह माता । मनुष्य जा कुछ पैदा करता है, वह जमीन स ही पैदा होता है । यदि हम गहराई से विचार करें तो हमका ज्ञात होगा कि तमाम उत्पादक श्रम तभा होता है जब जमीन को जोना बोया जाय, या जमीन से पैदा होने वाली सामग्री को ऐसे रूप म परिवर्तित किया जाय कि उससे मनुष्य की श्रावश्यक्ताए और इच्छाए पूरी हो सके ! यहाँ क्यों, सुद मनुष्य का शरार भी पृथ्वी से ही पैदा होता है। हम पृथ्वी के चटे है-खाक से पैदा हुए, रक म मिल जायगे। मनुष्य से श्राप धे सर चौज ले लीजिये जो जमीन से निकली हा ओर पिर रह जायगा सिप शरीर रहित यात्मा । इसलिए यदि ग्रापा किमा ऐसी जमीन पर कब्जा हो, जिमपर दूसरे मनुष्य का जीवन निभर हा तो ग्राप उस मनुष्य के क्षएक एक भीषण अयाय है मालिक बन जायगे और वह श्रापका गुलाम। जिस अमान पर मेरा जीवन निभर हा, उस जमान का मालिक अपने पशुओं की माति ही मुझका जीवन दान दे सकता है या मार सकता है। हम गुलामा की प्रथा को खम करन की चचा करते हैं, पर हमने गुलामी को उठाया कहा है ? हमन काल गुलामी क एक विकृत रूप का, दाम प्रथा को नष्ट किया है। किन्तु हमका एक और गहरी और प्रच्छन गुलामी को, ना यहीं ज्यादा घातक है, खत्म करना है। वह है प्रोद्यागिक गुलामी, जिसमें प्रानादी के नाम पर मनुष्य को प्राय गुलाम बना लिया जाता है।" अपने इसी भाषण के दूसरे हिस्से में हेनरी जाज न कहा है-"क्या अापने कमा इस बात को पिनियता और यहूदगो पर विचार किया है कि सारी मभ्य दुनिया म श्रमजानी वग सनम दरिद्र वग है? एक निए साचिए यति काइ समझदार अारमा पहले-पहल इस दुनिया म अावे और पार उमको यह पता कि हम इस दुनिया म किम तरह स रहते हैं, श्रीर मकान, माजन, कपड़े और हमारी जरूरत की अन्य चार्ज किस प्रकार श्रम द्वारा पैा होता है तो क्या वह यह खयाल न करगा कि श्रमजाना बढ़िया मकाना म रहते होंगे और श्रम क द्वारा जो भी उत्पादन हाना है, उमरा अधिकतर भाग उहें उपलध होता हागा। किन्नु चाहे श्राप उस व्यक्ति को लन्दन ले जाइये, चाहे पैरिस या यूयाक, वह यही देखेगा कि जिनको श्रमजीरा कहते हैं, वे सर से खरार घरा में रहते हैं।" सर दशा में यही हाल है। बालसा लाग भय राजमहलों में रहते हैं और श्रमजीया अधरे और गदे घरा में। हनगे जान आगे रहने है---"यह सब क्तिना विचित्र मामना है, जरा साचिए ता, हम सम्भरत दरिद्रता का युग कहते हैं और यह उचिन ही है कि हम ऐमा । प्रवृति श्रम का और सिप श्रम का दान देती है, किसी भी चाज का पैदा करने के लिए मानव श्रम का पहले श्रावश्यकता होता है। जो मनुथ इमानदारी से और मली Pin मालिक और मजदूर करता है वह धनपान होना चाहिए और जो ऐसा नहा करता वह गरीन होना चाहिए । किन्तु हमने प्रकृति के क्रम को ऐसा बदल दिया है कि हम श्रम करने वाला को दरिद्र समझने लगे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हम श्रम करने वाला को मजबूर करते हैं कि वे उन लोगों का कुछ दे जो श्रम करने का इजाजत देते हैं। श्राप किमी से कोर, कुर्ता या मकान सरोदते हैं तो आप उन चीजों के विरता को श्रम का उपहार देते हैं, ऐसी चीज का मूल्य देते हैं जो उसने पैदा की है या पैदा करने वाले से ली है। किन्तु जर ग्राप किसी श्रादमी को जमीन के बदले कुल देते हैं, तो आप उसको किम चीज का बनला देते हैं। अाप उमको ऐमी चीज का बदला देते हैं जिसको क्सिी यादमी ने पैदा नहीं किया जा मनुष्य के पैदा होने से पहले भी थी अथवा जिसका मूल्य उसने व्यक्तिगत रूप से स्थापित नहीं किया, बल्कि उस समाज ने किया जिस श्राप भी अग हैं। यही कारण है कि जिसने जमान हस्तगत कर ली पोर उस पर कजा जमा लिया, वह धनवान है और जो जमान को जातता-मोता है या जमीन की पैदावार से चाजे ननाता है, गरीन है। हम अावश्यक्ता से अधिक उत्पत्ति का रोना रोते हैं, किन्तु जब लोगा की जरूरतें ही पूरी नहीं होती, तब यावश्यकता से अधिक उत्पत्ति या सवाल ही कहा पैदा होता है। जिन चीजों के लिए यह कहा जाता है कि वे श्रावश्यक्ता से अधिक पैदा हुइ है, उनका बहुत लोगों को जरूरत रहती है। यह चाजे उनको क्या नहा मिला १ इसलिए कि उनका परीदने के लिए उन पाम साधन नहीं हैं, यह बात नहीं है कि उनका उन चाजा की जरूरत ही न हो। और उनक पास उन चीजों को परोन्न + साधन क्यों नहीं है । वे बहुत थोड़ा कमाते हैं । जन लोगों को श्रोसत आमदनी एक या डेढ पाना रोज हो, तो ज्यादा मात्रा में चीजे नहाँ बची जा सकती। तो मनुष्य इतनी कम मजदूरी पर काम करने के लिए क्या विवश एक भीपण अन्याय हाते हैं ? इसलिए कि यदि वे ज्यारा मजदूरी मागें तो ऐसे वकार लोगों को बहुतायत है जा उनकी जगह काम करने का तैयार हो जायग। वकारी की इस भाड़ को वजह से हा ऐमा तात्र प्रतिस्पर्दा हानी है कि मजदूरी की दर घट कर अल्पतम रह गई है। क्या कारण है कि लोगों को काम नहीं मिलता ? क्या आपने विचार क्यिा है कि लोगों का काम न पा सक्ना कितना अजाव गात है १ श्रादम का-प्रारम्भिा पुरुष का काम पाने में काइ मुश्किल न हुइ और न रापिन्सन कसा का हुइ । काम तलाश करन का उनके सामने सवाल ही न था। यदि मनुष्यों का काम देने वाला न मिले, ता वे अपने आप काम पर क्यों नहीं लग जाते । मिफ इसलिए कि उनका उम तत्व से यचित पर दिया गया है, जिस पर कि मानव श्रम किया जा सकता है। मनुष्या मजदरा पाने र लिए एक दूसर के साथ प्रतिस्पद्धा करनी पड़ती है, क्योंकि उनका अपने-अापको काम म लगाने के प्राकृतिक साधनों से वचित कर दिया गया है, उनका इश्वर वे राज्य म का ऐमा जमान का टुकड़ा नही मिल सकता कि जिममा वे उपनाग में ला सा और उस बदले उई दूमर आदमा का कुछ न देना पड़े। 'मनुष्य परमात्मा स प्राथना करते हैं कि उनका गरीवी का अन्त हा, मिन्नु दरिद्रता इश्वरा निया की वजह स पैदा नहीं होती, एमा कहना घार नास्तिकता है । उसमा जम हाना है उस अयाय में स, ना एक मनुष्य दूसर मनुष्यों के साथ करता है। कल्पना काजिए, यदि परमात्मा श्रापकी प्रायना मुनल तो यह उसका पूरा किस प्रकार करेगा, नब तक कि वह अपने नियमा में परिवतन नहीं करता। साचिए---परमात्मा हमका ऐमा काइ वस्तु नहीं देता जिसमी गाना हम दोलत म करते हैं। वह हमको कवल वचा माल देता है, दोलन पैदा करने के लिए मनुष्य का उसका उपयोग करना पड़ता है। क्या वह हममा कन्चा माल कापी मान में नहीं दे रहा । और यह हममा जादा माना में भी देन लगे तो यह दरिद्रता का अन्त कस करेगा ! कल्पना काजिए, हमारा प्राथनाया १० । मालिक और मजदूर के जवाब म वह सूय की शक्ति को या धरती के गुण को नढ़ादे व पौधों म ज्यादा पैदावार की शक्ति भर दे या पशुओं को ज्यादा तादाद में अपना सतान बढ़ाने के लिए समय ना दे, तो इसका लाभ किसका मिलेगा ? ऐसे देश को सामने रसकर उत्तर दाजिए जहा नमीन पर चद यक्तियों का एकाधिकार हो--अधिकाश सभ्य देशा म यहाँ यवस्था है। सिफ भू स्वामियों को। और यदि खुद परमात्मा भी हमारी प्राथना का मुनकर स्वग से वह सर चार्जे मेज दे जिनकी मनुष्या की जरूरत है, तो उनका लाभ कौन उठावेगा । भूस्वामी। वे उन सब चीजों पर अधिकार जमा लेंगे और जिन लोगों के पास जमीन न होगी, उनका काम करने के लिए मजबूर करगे। वे उन चीजों का वेचना शुरू कर दगे, यहा तक कि भूमि रहित लोगों को उन चीजों का सरोदने के लिए अपने उदन के कपडे भी उतार देने पड़ेंगे। तब नतीजा यह होगा कि एक योर वे भूखों मरो लगगे और दूसरी तरफ उन चीजों का ढेर लग जायगा और भूस्वामा शिकायत करने लगगे कि पैदावार प्रापश्यक्ता से बढ़ गई है। मेरा करने का यह प्राशय नहीं है कि इस मौलिक अयाय का मिा देने के शद हमारे लिए कुछ करने धरने का शप नहा रह जायगा। म जो कहना चाहता हू वह तो यह है कि तमाम सामाजिक प्रश्ना क मूल म हमारी जमीन की यवस्था मुरय है । मैं यह कहना चाहता हूँ ! श्राप जो चाहे कीजिए, चाहे जैसा सुधार कीजिए, जा यापक दरिद्रता फैला हुइ है उमे श्राप तपतक नहा मिग सकते, जातक कि श्राप उस तप का, जिम से मनुष्यों को जिला रहना है, चद यत्तियो की निजा जायदाद ननी रहने देते हैं। सरकार का मुधार काजिए, रैक्स घग कर कम स कम कर दाजिए, रेल को सड़क पनाइय, सहयोग समितिया ग्वालिए, मुनाप का मालिका पार मजदूरी में चार दीजिए, पर इस सबका नतीजा क्या होगा ? यही कि जमीन की कीमत बढ़ जायगी। क्या तमाम सुवारी का यही नतीजा नहीं होता कि जमीन का मूल्य बढ जाता है-वह मूल्य, जो कुछ लोग जाने का अधिकार पाने के लिए दूसरों को देते हैं।
२३ एक भीषण अन्याय मनुष्य मक्षण, मानव बलिदान, धार्मिक यभिचार, कमजोर लड़के लड़कियां का हत्या, यूना प्रतिशाध, सारी को सारी स्तिया का सहार, सायालयों का उत्पीड़न, अग्निदाह, काई आजी और गुलामी यह सर प्रयाय पहले रह चुकी हैं। जितु यदि हम इन भयकर प्रथा और रिवाजो का पार कर चुक है तो हमसे यह सिद्ध नहीं होता कि अब मी ऐसी प्रथाय और रिज जारी 3.1 हैं जा जामा विवेक और अन्त वरण वाला य लिए 37 पुराना प्रधान व समान ही घृणास्स है जिनकी कि दुस्मृति मात्र पर शेष रह गई है। मनुष्य का सफलता का माग असाम है और हर एतिहासिक काल में ऐम अविश्वास, भ्रम और हानिकर रिवाज रहे हैं, जिनका मान पीछे छोड़ जाता है और जी भूतकाल की चाजे । चुकती है। कुछ उप्रथाश्रा का मुदूर भरिग्य व तुहरे में हम दशन हाता है, और कुछ समान काल म मौजूर होती है, जिनका मिगना हमारी जिन्दगी का सपान न जाता है। स युग की जिन प्रयाग्रा को हम मिगना है, उनम मृयु और अन्य टएका तथा “यभिचार, मासादार और सैनिश्चाट का समावेश किया जा सस्ता है। इसी प्रकार जमान पर यतिगा अधिकार ऐसी कुप्रथा है, निसें मिगना भी उन बुराइयों का भात हा जरूरी है। जितु नाग परम्परागत अध्याय को एक-म या सहप लागा द्वारा उनको हानिया ममझ लेने के पोरा होनबाई देते हैं ये शाग रहते हैं, रक्ते हैं, पाच हरत हैं और पिर अानादी का भार लम्स छग मारते हैं। हम इस निया की प्रसार चेद से तुलना कर सस्ते हैं । भूमि पर मे यक्तिगत अधिकार उटाणे ये सम्म में भी यही होगा। भूमि पर व्यक्तिगत अधिकार को बुराई और अयार को मोर हजार पर पहले अवतारी पुष्पो ने ध्यान दिलाया है और यारोप र प्रगतिशील विचारय श्रममर इसका बुराइ को यत्तात पाये हैं। प्रास की रार क्रान्नि में जिहोने प्रमुग भाग लिया था, उन्हान गाम तौर पर इसका च्यान কি । তম বা খো ম স্মৃতি হ লা স্ত্রী সুহি १४ मालिश और मजदूर अबाधित भूमि पर धनिका के कजा जमा लेने तथा शिक्षा के विस्तार के कारण यह अयाय इतना स्पष्ट हो गया है कि प्रगतिशील लोग ही नहीं, बहुत साधारण लोग भी उसको देखने और महमम करने लगे हैं। वितु जो लोग जमीनों की मिल्कियत मे लाभ उठाते हैं--खुद मालिक भी और वे भी जिन स्वाथ इस प्रथा के साथ उघ गये हैं-मौजूदा "यवस्था व इतने शादी हो गये हैं और उससे इतने लम्बे अम तक लाभ उठा चुके हैं कि उह इसका ययाय मालूम ही नहीं हाता और वे सत्य को अपने श्राप से और दूसरों की नजरों से छिपाने की हर कोशिश करने हैं, दवाते हैं। मत्य अधिकाधिक स्पष्ट रूप म प्रकार हो रहा है, किंतु वे उसे विकृत करने का कोशिश करत हैं, दनाते हैं और यदि इसम उ है सफलता नहीं मिलती तो वे उसको चुप करन की काशिश करते हैं। गत शतादी के अनार में इग्लैण्ड म हेनरी जाज नाम के महापुरुष पैठा हुए थे । उहाँ ने भूमि पर यक्तिगत अधिकार की प्रथा के अ याय और गुल्म को प्रकट करने और प्रचलित शासन प्रणालियों के अधीन उमको मिगन के उपाय सुभाने के लिए भारी मानसिक श्रम किया । उहाँ ने, अपने मन्त य का इस जोर और पता + साथ प्रकट किया है कि कोई भी निष्पक्ष यक्ति उमसे सहमत हुए बिना न रहेगा। उसे स्वीकार करना पडेगा कि जन तक यह मौलिक ग्रयाय नहीं मिगया जायगा, लोगों की अवस्था स तापजनक न होगी और यह भी कि हेनरी जाज ने जो उपाय मुझाये हैं, वे युक्तिमगत, यायपूर्ण और “यावहारिक हैं । कितु हुया क्या ? खुद इग्लैण्ड म और ग्रायलण्ड में भी, जना कि भूमि पर “यक्तिगत अधिकार की बुराई नग्न-रूप में विद्यमान थी, अधिकाश प्रभावशाली और पढे लिसे लाग हेनरी जान की शिनाया के विरुद्ध हो गये। जिन लोगों ने पहले सहमति प्रकर की वे भी बाद म खिलाफ हो गये। इम प्रसर जमीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत की प्रथा की रक्षा करने में जिनका स्वाथ था, उनके सामूहिक प्रयत्न से हेनरी जाज की शिक्षायें अज्ञात ननी हुई हैं और ज्या ज्या समय बीतता जाता है, उनकी तरफ एक भीषण अध्याय १५ भोर भी कम से कम ध्यान दिया जाता है। अधिकाश शिक्षित कहलाने वाले लोग उनसे सिम नाम से ही जानते हैं। किन्तु जमीन निजी सम्पत्ति नहीं हो सकती, यह मर आधुनिक जीवन वाम्यति अनुभवों से इतना स्पष्ट हा चुका है कि उम व्यवस्था का, जिसमें जमान पर व्यक्तिगत स्वामित्व स्वीकार किया जाता है, शायम रखने का एक हा माग है और वह यह कि उसके बार में सोचा ही न जाय, सत्य की अवहेलना की जाय और अर ध्यान बटाने वाल मामला में अपने ग्राप का व्यस्त रवा नाय । अाज माप देश में यही पिया जा रहा है। यारोप और अमरिका में रामनैतिक कार का लोगों का मलाई व लिए हर किम्म कामों की ओर ध्यान देते हैं। अायात निर्यात पर, उपनिवेश, श्राय कर, पौजा और समुद्री बजट, समाजराना असेम्बलिया, सर और महा सर, ममापनियों के निवाचन, कुटनीतिक सम्बध नाति मे विषय हैं, जिन पर उनका ध्यान लगा रहता है। मिा एक विषय ऐमा है जिसको वे नहीं छून श्रौर पर यह है कि तमाम मनुष्यों का जमार का उपयोग करने का जो अधिकार छिन गया है, उमा पुन वायम किया बाय । रिना इसरे लोगों की हालत नहा सुघर सरनी। यपि गजनैतिक कायकना यह महस्य किये गिना नहीं रह साने विनोया गिक और सैनिक मगढ़ा में वे जो कुर कर रहे हैं, उमसे राष्ट्रो की शति काम ही शो वाला है। सिमी आगे की रात पर विचार ना करत भोर तात्कालिक उम्र ग्राग मिस मुगा देते हैं। ये मे चार में कम हुए हैं कि जिससे शहर निकलो का काइ गला नहा है और मान! वे अप आपका उस बाद मर निलस्म में मुला गरें । याराए और अमेरिका के राजनैतिक कायकनाश्री का यह क्षणिक अशान दयाजना है। किंतु इसका कारण यह है कि इन मावाशे लोग गला राने पर इतनी दूर जा चुके हैं कि उनमें से अधिकार जमीन स जुना हा चुरे हैं, वे अपना प्राति या ता पारपाना में या खेती मालिक और मजदूर पर मजदूरी करके कमाते हैं । इसलिए यह समझा जा सकता है कि योरोप और अमेरिका के गजनीतिज्ञ को लोगों की अवस्था सुधारने के लिए अायात नियात पर, उपनिवेश और कम्पनियां का निर्माण प्रारि मुरय जरिये प्रतीत होर है। वितु जिन देशा म अस्सी नम्बे प्रतिशत थानादी खेती पर निभर करती हो और जहा लाग एक ही बात की माग परते हो, कि उहें खेती करत का मौका दिया जाय, चहा स्वस्त और ही किसी चीज की जरूरत है। यारोप और श्रमरिका के लोगों की हालत उम मनुष्य जैसी है, जो एक रास्ते पर चुत दूर निकल चुका है। शुरू म उस उस रास्ते का सही समझा था। अब यद्यपि वह या ज्या, श्रागे बढता है, अपने लक्ष्य से दूर हरता जाता है, फिर भी उसे अपनी भून स्वीकार करते म भर मालूम होता है । कि तु जो देश चौराहे पर खड़े हैं, उहे तो सीधा रास्ता पकड़ना चाहिए । लागा की भलाई का दम भरने वाले क्या कहते है १ वे दारा करते है कि समाचार पत्रों को स्वाधीनता दी जाय, धार्मिक महिष्णुता बरती जाय, श्रमजीवी सपा का ग्राजादी दी जाय, अायात-निर्यात पर लगाये नाय, सशत दगड दिये जाय, धर्म सस्थानों को राज्य सस्था से जुदा किया नाय, श्रम के साधनों को भविष्य में राष्ट्र की सम्पत्ति बनाया जाय, सहयोग सस्थाये ग्वाली जाय, और सब से पहले प्रतिनिधि शासन कायम किया जाय, जैमा कि यारोप और अमेरिका के देश म एक असें से कायम है। वितु यह प्रतिनिधि शासन ग्राज तक न तो मन रोगा की रामबाण दवा भूमि समस्या को हल कर सका है और न उसको ठीक रूप म ही सामने रख सका है। लोगों ने गाया में एक मुह को बाड़े म बद कर दिया है । नर दूध पर वे जावित रहते हैं । गायों ने बाडे में जो भी घाम था, उसको खा डाला है या पैरों तले दि डाला है । वे भूसां मरती हैं और उन्होंने एक दूसरे की पूछा का भी चवा डाला है । वे बाड़े से बाहर निकल कर श्रागे चगगाह में जाने की जी तोड़ कोशिश कर रहा हैं । मितु जो लोग । एक भीपण अन्याय इन गाय के दूध पर जिदा रहते हैं, उहाने गडे के चारों ओर खेतों में रग और तम्बाद के पौधे लगा दिये हैं । उहोंने फूला की क्यारिया लगाइ हैं, घुड़दौड़ का मैदान बनाया है, उगीचा लगाया है और टेनिस खेलने का चौक बनाया है। कहाँ गाय इन चीजों को खराब न कर द, इसलिए वे उह बाडे से बाहर नहीं निकलने देते, कितु गायें रामती है और दुबली हो रही हैं । लोगों को डर पैदा हो गया है कि उहे दूध मिलना बाद हो जायगा । इसलिए वे गायां की दशा सुधारने के लिए तरह तरह के उपाय करते हैं । वे उनके लिए छप्पर डलपाते हैं, गीले ब्रुश से गायों के बटन को रगडवाते हैं सींगों को सोने से मढवाते है और दूध निकालने के समय को बदलते हैं । वे बूढी और बीमार गायों को देश रेख और चिकित्सा की चिन्ता करते हैं, वे दूध निकालने के नये और सुधरे हुए तरीका का याविष्कार करते हैं और आशा करते हैं कि बाडे म उदाने एक ग्वाम किम्म का जो अमाधारण पोषक घास लगाया है, वर खून उगेगा। वे इन और दूसरी अनेक बातों के बारे में चर्चा करते हैं, कि तु वह बात नहीं करते जो खुद उनके और गायों के लिए हितावह है कि बाडे की दीवार को तोड़ डालें और गायों को आजाद कर दें, ताकि वे अपने चार श्रोर पैले हुए विस्तृत चरागाहा का श्रानद लूट सके । लोगों का यह व्यवहार युक्ति सगत नहीं है । किन्तु उसका एक कारण है । बाडे के चारों ओर उहाने जो चीज सही की हैं, उनका मोह वे नहीं छोड़ सस्ते । कितु उन लोगों के लिए क्या कहा जाय, जिहोंने अपने बाडे के चारों ओर कुछ नहीं लगाया है, रितु फिर भी प्रथम श्रेणी के लोगों की नकल करके अपनी गायों रसते हैं और दाना यह करते हैं कि वे ऐसा गायों के हित के लिए करते हैं। कितु हम यही कर रहे हैं। हम उन लोगा के लिए जा जमीन के अभाव से निरन्तर पाहित हैं, हर किस्म की पश्चिमी सस्थायों की व्यवस्था करते है, पर मुरप बात को भूल जाते हैं जिसकी लागा का ग्वास जरूरत है। व- यह कि जमीन पर से व्यक्तिगत स्वामित्व का पात्मा फिया जाय नाडे में बद मालिक और मजदूर और उम पर हरेक का समान अधिकार कायम किया जाय । यह समझ म श्राने योग्य बात है कि यारोप के जो लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अपने ही देशवासिया के श्रम पर जीवन निर्वाह नहीं करते, कि तु जिनकी रोटी कारखाना के माल के बदले में उपनिवेश के मजदूर कमाते हैं और जो उहें खिलाने और पापण करने वाले मजदूरी की मेहनत और पीड़ा को नहीं देसते, वे भावी समाजवादी सगठन का दाचा गड़ा कर सक्ते हैं, जिसके लिए कि वे मानर समाज को तयार करने का दावा करते हैं और शा त चित्त से चुनार भाग्दोलना, दलगत सघों, धारा सभात्रा के बाद विवादा, मनिमडला की स्थापना और उत्थापना और समय गुजारने पे श्यय विविध कार्यों म, जि है ये विज्ञान और क्ला का नाम देते हैं, यस्त रहते हैं। योरोप के हा परापजीविया का पोपण परी वाले असली लोग हिंदुस्तान, अफीका और प्रास्ट्रेलिया क वे मजदूर हैं जि हे वे नहा देश पाते। कि जिन देशा में पास कार उपनिवेश नहीं हैं और जदा लागा को अपनी रोटी कमाने के लिए घोर कष्ट सहना पड़ता है, वहा हम अपनी अ यायपूण अवस्था का बोझ दूरवर्ता उपनिवेशा पर नहा डाल सक्ते । हमारा पाप सदा हमारी भासा सामने रहता है। जो लाग हमारा पोषण परते हैं, हम उनकी जरूरता को नहीं समझत। हम न उनकी पुकार मुनते हैं और न उसका काइ उत्तर ही देने का प्रसन करत हैं। इसके विपरीत हम उनकी सेवा करने के नाम पर यारोपीय ढग पर समाजवादी सगठन कायम करने की तैयारी करते हैं और इस बीच ऐसे कामों म समय गवात है कि जिन से दमाग मनोरजन हो और ध्यान रहे । हम दावा ता यह करते हैं कि हमारा उद्देश्य लागा की भलाइ पाना है, किन्तु हम पर यह रहे है कि लोगों के रक्त की अतिम बूद भी चूस लेते हैं, ताकि वे हम परोपनीया का पोषण कर सकें। लोगों की भलाई के लिए हम पुस्तकों पर से प्रतिर ५ हटवाने। स्वेच्छाचारितापूण निपासना को रद्द करवाने, सर जगह प्राथमिक श्रार क भीषण अन्याय पिम्पल खुलपाने, अस्पतालों की संख्या बढवाने, टेक्सों की बकाया मा करवान, कार गाना को क्डी देख भाल करवाने नीर घायल मजदूरा का मुशावजा दिलाने, जमान की पैमायश रयाने, जमान गरीदने के लिए पियको से किसानों की सहायता दिलवाने यादि कामों की कोशिश करते हैं। पर एक बार कल्पना कीजिए लाग्यो लागों मारपणो की । वृद्ध स्त्री पुष्प और सच्चे अभार के मारे मर रहे हैं। शक्ति म अधिक काम परने और पयाम भोजन न मिलने के कारण मरो बाला की सरया कम नहीं है। कल्पना काजिए कि जमान के अभाव में देहान T लागों को किम कदर गुलामी और अपमानों का शिकार होना पड़ रहा है, उनकी शति का दुरुपयोग हो रहा है और उई अनावश्यक मुमो, झेलनी पड़ रही हैं । ऐसी दशा म यह स्पy है कि यति लोगों की मेगा का नाम लेनेगला ये सब उद्योग सफल हो जाय तो मी यह सागर में एक हिंदु दे बराबर ही होगा। लोगों की मनाई का दम भरने वाले लोगों में कुछ ऐसे भी हैं, जो गुण और परिमाण दोनों की दृष्टि से महत्व हाल परित्तनों की योजना करते हैं। और इस बात की तनिक भी परवाह नहीं करते कि लाखा मनटूर जमोन पर भूम्यामियों के कन्जा जमा लने के कारण गुलामी में सड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, उनमें से कुछ अागे बढे चढे सुधारक यह पमद करेंग कि लोगों को मुमोचते और बढ़ जाय ताकि अपने पुराने देहाती जारन वे वाले कारयानों का मुधरा हुमा जीरन ग्रहण करने के लिए विवश होना पडे । ऐसे लोगो को विचार होनता प्राश्नयजनक है। वे अपने दिमाग से कुछ साच नहीं सकते बल्लि पश्चिम का अधानुकरण परना चाहते हैं। उनो हृदय की कोरता और नियता और भी श्राश्चयजनक है। एक समय था जर परमात्मा के नाम पर मनुष्यों का लावा की तादाद में मारा गया, सताया गया, पासी पर लटकाया गया, और क्ल २० मालिक और मजदूर किया गया। अब हम अपने रड़पन के अभिमान म उन कामाको करने वाला का घृणा की नजर से देखते हैं। कि तु हम गलती पर हैं। वैसे लोग यान भी हमारे बीच म मौजूद हैं। अतर केल इतना ही है कि पुराने जमाने के लोगों ने यह काम परमात्मा और उसकी सच्ची सेवा के नाम पर क्येि, और अब लोगों क म पर और उनकी सच्ची सेवा के लिए किये जाते हैं। पुराने लोगों में कुछ ऐसे भी थे जो यादम रसाह और दृढतापूरक विश्वास करते थ कि उहे सत्य का ज्ञान है। उनम कुछ कुछ ऐसे भी थे जा दम्भी य और परमात्मा की सेवा करने के बहाने अपना स्वाथ मिल कर रहे थे। जनता उही का अनुमरण करती थी जा सन से अधिक सासी होते थे। ग्रब जो लोग जनता की सेवा के नाम पर बुरा कर रहे हैं, उनम भी ऐसे अामी है जो क्रत है कि सिफ उनका हो सत्य का पता । उहे मालूम है कि कौन दम्भी है और जनता क्या चाहती है , परमात्मा की सेना ने ठेकेदारा ने धम के गम पर अनथ क्यिा, किन्तु जनता के सेवको अपने वैज्ञानिक सिद्धान+ नाम पर यदि कम हानि की है तो इसका कारण यह है कि उ अभी काफी समय नहीं मिला । कि तु उनके सिर पर लोगा म कटुता और पूर पैलाने या नोझ ता लद चुका है। दोनों प्रकार की हलचलो की विशेषताए एक सी है। पहले तो परमात्मा के और जनता के इन सेक्का में से अधिकाश का जीवन सयमहीन और परान है । उहें अपने पद का इतना श्रभिमान है कि वे सयम की आवश्यकता ही नहीं समझते। दूसरी विश पता यह है कि जिनकी वे सेवा करना चाहते हैं, उनरे प्रति उनकी काई दिलचस्पी, झुकाव या प्रेम नहीं है। दर असल पुराो धम धजिया को न परमात्मा से प्रेम था और नवे उस साथ एकात्म्य स्थापित करना चाहते यावे न तो परमात्मा को जानते थे और न जानना चाहते थे । से जन सेवको का है। उनके लिए जनता की हैसियत एक पताका से अधिक नगें। जनता से प्रेम करना या मिलना तुलना तो दूर रहा, वे उसे जानते ही नहीं। वे तो उसका घृणा, यही हाल बहुत एक भीषण अन्याय उपना और भय की दृष्टि से देते हैं। उनसे तासरी विशेषता यह है कि यदारि वे एक ही परमात्मा अयवा एक ही जनता की सेवा में लगे हुए हैं, किन्तु उनमें न क्वन सरा व साधनों क सबध में हा मत मे है, बल्कि ना लोग उनसे सहमत नहीं होते, उनके कामों को वे गलत और हानिकारक समझते हैं और उनको दवाने की पुकार मचाते हैं । पनत्वरूप पुराने जमाने म लाग जित जना निये जाते थे और सैकड़ों की तादाद में एक माय मौत के घाट उतार दिये जाते य और प्रवासा, फैद और हत्या का जोर है । और आखिरी, किन्नु मुख्य विशेषता दानों को यह है कि वे यह बिल्कुल नहीं जानते कि जिनको वे मेवा करना चाहते हैं, उसको मया क्या है। परमात्मा ने प्रत्यक्ष और स्वरूप में बताया है कि मनुष्य अपने पड़ौसिरों से प्रेम पर और सरा के प्रति वैसा व्यरहार करके जैसा कि वे दमरों में अपने लिए अपक्षा करते हैं, उसकी सेना करें। किन्तु उहाने परमात्मा की मेवा का यह तरीका नहीं अपनाया। वे तो बिल्कुल सरी ही बात चाहते हैं जा उन्होन अपने दिमाग से पैदा को है और उसी का परमासा का श्रादेश बतात है। जनता क सेवक मी एमा हो करते हैं । लाग क्या करते और चाहते हैं, इसका उहें कुछ पता ही नर्ग। वे लागा की सवा के लिए एसा काम करते हैं, जिसकी लोगों को न तो इच्छा होता है और न कल्पना हो। वे अपन हो गन्ते में लोगों की सेश करते हैं, किन्तु यह काम करने की कोशिश ना करते जिसको लोग चगवर चाहते रहते है। समाज व्यवस्था में थी जगह एक परिवर्तन निहायत जरूरी है। उसके बिना मनुष्य जाग्न में एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। इस परिवतन को आवश्यक्ता हर वह अादमा समझना है जो पूर्वाग्रह का शिकार नहीं है। यह स्मिी एक देश का नहा, बल्कि सारी दुनिया का साल है। मनुष्य जाति के इस युग के तमाम कटौ या उसके साथ सम्बध है। जो लोग मजदूरी पर रोता का काम करते हैं, उनमें से श्रधिकाश शमीन पर व्यक्तिगत मिस्कियत को स्वीकार नहीं करते। ये 1 २२ मालिक और मजदूर इस प्राचान बुराई को मियने की माग करते रहते हैं। कितु इस श्लोर पिसी का ध्यान नहीं है । इस उल्टी गगा का कारण क्या है ? जो लोग भले, दयालु और समझदार हैं-सरकारी और गैर सरकारी सभी वर्गों म ऐसे लोग होते हैं---और जो लोगों का हित चाहते हैं, वे लोगों की एकमान जरूरत को क्या नहीं समझते, जिसके लिए कि वे निरन्तर कोशिश करते रहते हैं और जिसरे अभाव में वे बराबर कर उठाते हैं । इसके बजाय वे बहुत सी ऐसी बातां पर क्या शक्ति खच करते हैं, जिनसे लोगों का तन तक कोई भला नहीं हो सकता, जब तक कि लोग जिस बात को चाहते हैं, वह पूरा नहा हो जाती है सरकारी और गर सरकारी दोनों ही किस्म की जनता के इन सेवकों का हाल उस व्यक्ति के समान है जो कीचड़ म पसे हुए पोडे की महायना तो करना चाहता है, किंतु गाड़ी म बैठा रहता है और बोझ को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह धरता है तथा समझता है कि में घोड़े की हालत का सुधार रहा हूँ। ऐसा क्या ? हमारे जमाने के लोग, जो अच्छी तरह और मुख पूर्वक रह सकते हैं, बुरी तरह और कए पृथक क्या जी रहे हैं ? इसका कारण यह है कि हम लोग म धामिक भावना का अभाव है। धम के बिना मनुष्य यायोचित जीवन नहीं बिता सकता। और दूसरों के लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है, क्या श्रावश्यक और क्या अनावश्यक है यह तो वह और भी कम जान सकता है । यही कारण है कि नमाने व जन सेवक लोगो के जीवन और जरूरतो को इतना गलत समझे हुए हैं। उनके लिए बहुत सी बातें चाहते हैं, किन्तु उस वात को भूले हुए हैं जिसका कि उहें जरूरत है। धम के बिना मनुष्यां को वस्तुत प्रेम नहीं किया जा सकता। और चिना प्रेम के यह नहीं जाना जा सकता कि लोगों को क्या चाहिए, कम चाहिए या अधिक चाहिए। जो धार्मिक वृत्ति के नहीं है और इसलिए वस्तुत प्रेम नहीं करते, वही लोगों की पीड़ा के मुख्य कारण को भुलाकर नगण्य और महत्त्वहीन मुधारा की ओर ध्यान दे सक्ते हैं, जो लोगो का पर भीषण अन्याय २३ मदद करना चाहते हैं, वही खुद एक हर तक उनरेश के कारण उन जाते हैं। ऐस ही पति लागा में मारा मुरदे सम्बध में उन्म सिद्धान्ता का प्रतिपादन कर सकते हैं। वे लोगो समान क्ष्ो की धार मान न देंगे, जिनके तलाल दूर होने की प्रापश्यकता है और ना दूर किये जा सकते है। यह ता पैसा हो गत हुइ कि किसी ने एक भूखे श्रा-मी से उसका मान छीन लिया और बाद में उससे उपदेश देने लगा कि भविन्य में व भाजन से पा सबगा। वह यह नगरी नहीं समझता कि उसने जा भाजन छान लिया है, उसमें से भूम्बे को कुछ हिम्मा दे दे। सौभाग्यरा महान लगायकारो ग्रान्दालन उन पराप आविया क रन पर सफल नहीं हुआ करते, बा लागों का रह चूस पर जिला रहने है। ऐसे अान्दालना का श्रेय उन लगन वाले, सी और महान् धार्मिक पुरुषों को होता है, जो अपने स्थाप, अहकार या महत्याकाना मारपाल नापते और न नहरों परिणाम की चिन्ता करते हैं। हे ता परमात्मा 7 पागे अपने मानव-पत्तयों का हिसाब दना होता है। ऐसे हा व्यक्ति अपने मूक और दृढ कार्यों द्वारा मनुष्य जाति का आगे ले जाते हैं। वे लागा को अश्या मुधाग्न लिए, इधर उधर व काम करके दुमका निगाह में ऊचा उठने से चेण नहीं करने, बल्कि वेश्वराय नियम और अपने अत करण अनुसार चलन की काशिरा करत है श्रार इस प्रयास में भारत उनका भाग्यों के सामने इश्वराय नियम की सर से बड़ा अवहेलना उपस्थित हानी है और वे अपनी और दूमरों को मुक्ति के उपाय करते है। इरला व महापुरुष मेजिना ने कहा है कि समाजन्यथा में बडे मुशार मान धार्मिक अगलना ६ दाग ही हात है। जमीन पर व्यक्ति गत मिल्किात रूपी पार का अन्त मो धर्म मावना बागृत होने पर हा होगा। इसका अन्त राजनेतिक मुधारों, समानारी व्यरत्यायों अपना मालिक और मादूर क्रान्ति द्वारा न होगा। दान की रकमा से अथवा सरकारी भोजनालयां से भी यह नहीं होगा । इस प्रकार के ऊपरी उपायों से समस्या के मध्य विदु पर से ध्यान हट जाता है और उसा हल होने म बाधा पैदा हो जाती है। न तो स्वाभाविक बलिदानों की जरूरत है और न लोगा का चिता करने की जरूरत । आवश्यकता सिफ यह है कि जो लोग यह पाप कर रहे है या उसम हिस्सा ले रहे हैं, उह उसका मान हो जाय और उससे छुटकारा पाने की उनम इच्छा जागृत हो जाय । जिस प्रकार सत्य को भल श्रादमा हमेशा समझते आये हैं, उसका सर मनुष्य समझ ले कि जमीन किसी को यक्तिगत मिल्कियत नहीं हो सक्ती, और जिनको उसका जरूरत है, उनको उससे वनित रसना पाप है । अपने भरण पोषण के लिए जिह जमीन की जरूरत है, उनको उससे वचित रसने म लागा को शम महसूस होनी चाहिए । जरूरत मद लागा को जमीन से वचित रसने के काय म सहयोग देने वालों को भा शम श्रानी चाहिए । जमीन का स्वामी होना और दूसरों क श्रम से लाभ उठाना शम की बात होनी चाहिए क्याकि दूसर लोग तभी काम करने को विवश हाते हैं जब उन को जमीन पर उन उचित अधिकार से वचित कर दिया जाता है। दास प्रथा के सम्बध म क्या हुया १ भूम्नामिया को खुद लजा अाने लगी, अन्याय पूर्ण और निन् यी साना पर अमल करने म सरकार को शम महसूस होने लगी और जो दास प्रथा के शिकार थ, खुद उनको भी अनुभव होने लगा कि उनके साथ य याय हो रहा है । भूस्वामी प्रथा कसम्म ध म भी यही हाने वाला है। और यह किसी एक वग 4 लिए ही ना, बल्कि सत्र वर्गों के लिए और एक देश में सब वर्गों के लिए हो नहीं, बल्कि सारा मानव जाति के लिए श्रावश्यक है। हेनरी जाज न लिया है--समाज यवस्था मशार मचाने और चिल्लाने, शिकायत करने और निदा करने, पार्टिया बनाने अथवा प्रान्तिया करने से सुधार नहा होता, वह होता है भावना को जागृति और विचारों की प्रगति से 1 जब तक विचार ठीक न होगा, तबतक सही काम नहीं एक भीषण अन्याय हा सकता और जब पिचार ठीक होगा तो काम मा ठाक होगा। 'हरेक व्यक्ति और मानव सगठन जो समाज का हालन सुधारना चाहता है उसक लिए बड़ा नाम है शिक्षा प्रसार का, विचारों के प्रमार का। इस काय में हरेक विचारशाल अादमी मदद दे सकता है। यह पहले खुद अपने विचारों को शुद्ध वनावे और पिर अपने सम्पक में पान वाला के विचारों का शुद्ध कर । यह बिल्कुल टाक है, किन्तु उस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए रिचार के अलावा धामिक मापना की मा नम्रत है-जिसके फलस्वरूप गत राताना में गुलामों के मालिका ने यह महसूम दिया कि वे गलती पर हैं और खुद व्यक्तिगत हानि और बबाल उठार मी उदाने उम पाप से पाया छुड़ाया जा उनका सना रहा था। यदि नमीन को मुक्त करने का बड़ा काय सिद्ध होता है तो भूस्वामिया में वैसी हा भावना जाग्रत हानी चाहिए और इस हर तक बागन हानी चाहिए कि लाग उस पार से मुक्त हाने के लिए, जिम वे शिकार थ, और हैं, सब कुछ कुबान करने को तैयार हो जाय। एक और मकड़ा, हजारों और लाखा एकड़ जमीन पर स्वामत्व भागा, जमान का व्यवसाय करना और मोटारी से इस या उम तरी से लाभ उठाना, लागा को मनाकर एश्वय्य का जीरन तिाना और प्रन्याय से प्राप्त असाधारण मुविधाया का छाड़ने के लिए तैयार न हाना और दूसरा पार सभासमिनिया में लागा की हालत मुधारने के बारे म ननाय करना न चल अच्छा नहीं है पल्कि हानिकारक ओर भयकर है और सामाय मिक और इमानदारी के प्रतिकुल है। जा लोग भूमि से यचित हैं, उनसे हालन मुधारने प चनुराद पूण उपाय पालने की जरूरत न-1, किन्तु वचित करने वाला का यह समझना चाहिए कि वे पाप कर रहे हैं। उहें हर जाग्वम उठाकर उससे विरत होना चाहिए । हरेक व्यक्ति का एमा नैतिक काम मानर समाज की इस समस्या को हल करेगा। रूम में गुलामा का उद्धार जार के द्वारा नहीं मालिक और मजदूर सावजनिक श्रथमा राष्ट्रीय कामों के लिए खच किया जाय और दूसरे तमाम टैक्सों की वसूली चाद कर दी जाय। इसका परिणाम यह होगा कि कोई भी भूस्वामी चाहे जितनी जमीन अपने अधिकार म रस सकेगा, रितु उसके बदले म उसे काफ। रकम सरकार को देनी पडेगी, यदि जमीन की दर पाच रुपया नीया हो तो दो हजार बीघा जमीन के लिए. भूस्वामी को दस हजार रुपया वार्षिक देना पड़ेगा और इतनी बड़ी रकम दे सकना उसके लिए श्रामान न होगा। देहातों में रहने वाले किसान कम पच पर अपनी यावश्यकतानुसार जमीन पा सकेंगे। इसके अलावा उह और कोई टैक्स न देना पडेगा और वे देशी और विदेशी तमाम माल निना कोई कर चुकाये वरीद सकेंगे। शहरा में मालिक मकानों और कारखाना के मालिक बने रह सकते है, कितु उनका अपनी जमीन का निर्दिश दर सावजनिक काप में भरते रहना होगा। इस यवस्था के निम्नलिखित लाभ हांगे- १ काइ भी यक्ति अपने उपयोग के लिए जमीन प्रास करने से पचित न रहेगा। २ ऐसे श्रालसी लोगों का अस्तित्व मिट जायगा जा जमीन पर जा जमाये हुए हैं और उसको उपयोग में लाने की इजाजत देने के बदले दूमरों को काम करने के लिए मजबूर करते हैं | ३ जमीन उन लोगों के अधिकार म होगा, जो उमको काम म लगे। उनके अधिकार म नहीं जो खुद उसका उपभोग नहीं करने । ४ चूकि जमीन पर श्रम करने वाला को जमीन मिल जायगी इसलिए वे कारखाना और पैक्ट्रिया म मनदूर बनकर अथवा शहरां म नौकर वनकर काम न करेंगे और देहातों में बस जायगे । ५ मिला, पंकरिया, कारखानों में निरीक्षकों और टैक्स वसूल करने वालों की कोई जरूरत न रह नायगा, सिर्फ जमीन का टैक्स वसूल करने घालों की जरूरत पड़ेगी, और जमीन चुराइ नहीं जा सकती और उसपर मालिकों का कर्तव्य २६ टेक्स वमल करना सबसे सरल है। ६ सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगा कि श्रम न करने वाले दूसरों के श्रम से नाजायज लाभ उठाने के पाप से बच जायगे। इस पाप के वे नहुधा अपराधी नगं होते स्याकि पचपन से ही उहे श्रालस्य का पाठ पढाया जाता है और वे काम करना जानते ही नही। वे उम बडे पाप से भी रच जायगे जो उन्हें अपने पाप-कम का समर्थन करने के लिए झूठ बोलर करना पड़ता है। श्रमिकों का भी श्रम न करने गलों से ईर्मा करते, उनकी निगा करने और मरने कटने के लिए उद्यत हा जागेका लोभ और पाप न करना पड़ेगा और इस प्रकार मनुष्या मनुष्या में निग्रह का एक बड़ा कारण नष्ट हो जायगा। हमने दी मालिकों का कर्तव्य साल तक दुकाल पीड़िता को सहायता पहुंचाने का काम किया । उमक फलस्वरूप हमारा पुराना विश्वास बिल्कुल दृढ हो गया कि मनुष्यों के अधिकाश प्रभागा और दरिद्रता एव उनसे सलग्न पीड़ा और शोक का जम हमसे पृथक क्सिी असाधारण और क्षणिक कारण से नहीं हुआ है। उनके मूल में सामान्य स्थायीकारण हैं जो हम पर श्राधार रखते हैं। हम पढे लिखे लोगों का गरीब सीधे सादे श्रमिका के प्रति जो अधार्मिक और मातृत्व विरोधी सम्बन्ध रहा है, वही सारी बुराइयों की जड़ है। जिस दुख और अमाय का उहें निरतर सामना परना पड़ता है और उसके पलस्वरूप इहै जिस कटुता और कष्ट सहन पा मार्ग दार होना पड़ता है, वे पिछले दो सालों में और ज्यादा स्पण हो गए थे। यदि इस वप हमको अभाव, शीत ग्रोर भूस की चचा नहीं सुनाई देती, हजारों लोग अति परिश्रम से थक कर नहीं मर रहे और श्रध मरे वृद्ध और बालक नती दिखाई देते तो इसका यह मतलब नहीं कि ऐसा मागे होगा ही नहीं होगा सिर्फ यही कि हम ऐसे दृश्यों को न ३० मालिक और मजदूर देखेंगे, हम उन्हें भुला देंगे और अपने दिल में यकीन कर लेंगे कि उनका अस्तित्व ही नहीं है और यदि है तो वह अनिपाय है और उसका कोई इलाज नहा हो सकता । कि तु यह मन समभावन ठीक नहीं । यह बिल्कुल सम्भव है कि उक्त दृश्यां का नामो-निशान मिटा दिया जाय। उनका अस्तित्व नहीं रहना चाहिए । समय या रहा है जबकि दुखदाई दृश्य मिट जायगे और वह समय शिक्ट है। हमको मजदूर वर्गों की नजर से मधु का प्याला कितनी ही अच्छी तरह छिपा हुआ क्या न प्रतात हा, श्रम ५ भार से कुचले गये और अधपेट मजदूरी के बीच यपनी मौज शौक की जिदगी का समधन परन के लिए हमारे बहाने चाहे जितने चतुराईपृण, प्राचीन और सवमा य क्या न हो, जनता और हमारे सम्मधों पर अधिकाधिक रोशनी पड़ रही है और हमारी हालत शीघ्र ही उस अपराधी की भाति भयावह और लज्जाजनक हो जायगी जो अचानक दिन निकलने पर ही पकड़ लिया जाता है । एक “यापारी मजदूरों को निकम्मा और हानिकर माल देता है और उसकी अधिक से अधिक कीमत वसूल करते यी कोशिश करता है अथवा मान लीजिए अछा उपयोगी माल देता है। वह कह सस्ता है कि यह सपा यापार कर लागा की आवश्यक्ता पूर्ण करता है । कपड़ा, दपण, मिगरेट अथरा शगम बनाने वाला मा कह सकता है कि वह मजदूरों को काम देकर उनका पर भरता है अथवा एक सरकारी क्मचारी अधपेर रहने वाले लोगों से प्राप्त रकम म से हजारों रुपया वेतन लेकर भी यह मान सकता है कि वह लोगों की भलाई के लिए काम करता है । अपना एक भूस्वामी अपने किसान का जीवन मजदूरी भी न देकर कह सकता है कि वह ग्वती व तरीको में सुधार करके देहाती जनता को खुशहाली बढा रहा है। किंतु अब, जब कि लोग रोटी के अभाव म भूपो मर रहे हैं और दूसरी तरफ भूस्वामियों के सैकड़ों बीघा खेता में शराब पाने के लिए बालू बोये गए हैं, उपरोक्त गते नहीं कही जा सकती। जब कि हम ऐमे लोगों से पिरे हुए हैं जो भोजन के अभाव ।
मालिकों का कर्तव्य ३१ में श्रीर काम की अधिकता के मारण मर रहे हैं। हम यह अनुभव दिये रिना नहीं रह सकते कि हम मजदूरा के श्रम से उत्पन सामना का जा उपयोग करते हैं, उसके फलस्वप एक बार मनदुरा का रारी के लाले पड़ जाते हैं और दूसरी ओर उनपर काम का वाम इतना बढ़ जाता है कि उनको क्मर ताडे डाल रहा है। भाग-बगाचा, मला मदिर धोर शिकारगाहा जैसे उड्डल मुपापभोग की रातें छाई देता भी शराब का हर गिलास, शक्कर मश्वन शोर मास का प्रत्येक वए लाग का थाला में से प्राता है और जितना ही हम इन वस्तुया का उपयोग करते हैं उतना ही मजदूरी का भार रद जाता है। मुझे याद है कि अमाल पड़ने से कर वा पहले चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्रेग से एक नीजगा विद्वान देदात में मुझ से मिलने आया था । वह रहा नोतिमान था । हम एक किसान का घर देगने गर जा दूसरो को अपक्षा पुशहाल था। हमने देगा कि उम घर में भी घर की मालिटन को अपनी शक्ति से अधिक काम करना पड़ता है, वह असमय हा वृक्ष हो गई है और पदे पुराने कपडे पहो है, एक बीमार बालर है लो पड़ा पड़ा बुरी तरह चिल्ला रहा है, एक दुरला पाला पड़ा और उसलाही मा बध हैं, गगा और नमी है, दुर्गधित यायु पैली हुइ है और घर का मालिक किसान चिन्तामन्त और निराशा में हरा या है। मुझे याद हैमबर हम उस किसान का भांगड़ा से बाहर निकले ता मेरा साया मुभ से कुल दो लगा। इतो म अचाक उसकी यानाज बन्द हो गई और वह पर। वह कुछ महीना मान्को और पासमा में रह पा था। यहा वह कोलार की सड़या पर घूमा था, सजी धजी दुकानें देग चुका था । वा मान भी एक मे एक शानदार ५---- श्रजापर घर, पुस्तरालय, राजमहल श्रादिका इमारते एक दम भव्य या इस सोनार उसने पहली बार उनको देगा जो यह सारा ऐश्वर्य मुलम घरते हैं। उनकी हालत देखकर वह दग रह गया। वह समझता था कि मेरे देश में अपेक्षारत यामागे है, शिक्षा सार्वत्रिम है, हर आदमी ३२ मालिक और मजदूर शिक्षितों की श्रेणी में प्रवेश कर सकता है-सुसोपभोग परिश्रम का उचित पुरस्कार है और मानव जीवन को नए नहीं करता । म उसमा यह रपाल सही नहीं मानता । लगा पीढी दर पीढ़ा कोयलों की मानों को खादा है । उसी कोयले से हमारे मुग्योपभोग की अधिकतर सामग्री पैदा होती है। योरोप वाला को इस बात का भी क्या पता कि उपनिवेशों में दूसरी जातिया के लाग उनकी सनक की पृति करने के लिए मरत खपते रहते हैं १ कितु जो देश उपनिवेशो पर जीवित नहीं रहते, वे ऐमा नहीं समझ सक्ते । वहा यह बात बिल्कुल स्पष्ट होती है कि उस देश के धनिकों का सुग्गोपभोग अपने देशवासिया के दु सो और अभावा के लिए जिम्मेदार है। हम यह अनुभव क्येि पिना नही रह सकन कि हमारे अाराम और सुग्वोपभोग की सातिर अनेक मनुष्यों के जीवन नष्ट हो जाते हैं। सूरज निकल चुका है । प्रकट को हम नहीं छिपा सक्ते । हम सरकार वी अोट म लोगों पर शासन करने की जरूरत + नाम पर, रिशा अथवा क्ला (जो लोग के लिए श्रावश्यक समझे जाते हैं), के नाम पर अथवा सम्पत्ति के पवित्र अधिकारों की रक्षा और अपने पूर्वजों की परम्पराश्रा की रक्षा के नाम पर सत्य पर पर्दा नहीं डाल सक्ते । सुरज निकल चुका है और ये पारदर्शा परदे कोई गत किसी से छिपी नहीं रख सक्ते । हरेक प्रादमी अब यह समझता है और जानता है कि जो लोग सरकारी नौकरी करते हैं, यह लोगों की सेवा करो लिए नहीं, (क्योकि लोगों ने उसे सेवा करने के लिए कर कहा था 1) बल्कि वेतन पाने के लिए करते हैं और जो विज्ञान और क्ला के क्षेत्र में लगे हुए हैं, वे भी लागों को प्रकाश देने के लिए नहीं, बल्कि तनमाहाँ और पे शनों के लिए लगे हुए हैं । और जो लोगों को भूमि से वचित रखते हैं, वे कि ही पविन अधिकारी को कायम रखने के लिए ऐसा नहीं करते । उनका उद्देश्य होता है अपनी श्रामन्नी बढाना, ताकि वे अपनी मन मानी इच्छाओं की पूर्ति कर सकें। इस मत्य को छिपाना और झूट यालना अब सम्भव -- मालिकावतंय ३३ नहा रह गया है। शासक व धनिको और श्रम न गवालो के लिए अर काल दो ही मार्ग रह गम है । एक मार्ग तो यह है कि वे न स्वन धर्म को असली श्रयों में हिनाअलि दे दें, बल्कि मानमता, याय और इस प्रकार ने तमाम सद्गुणा का ताक में रख और साम मा हरे-हमारे ये विशेषाधिकार है, और कुछ भी क्यो नही हम उनकी रक्षा करेंगे। जो भा हम को उनसे रचित करना चाहेगा, उससे हम से लड़ना हारा ताक्न हमारे हाथ म है। पांसी तख्ते, जलपान, अदालने, पुलिम सभी हमारे अधिकार में हैं।" दूसरा माग यह है कि हम अपना अपराध साकार कर लें, झूठ बालना छोड़ दें, पश्चाताप करें और लागा का सहायता करें-~~याय शा से नहीं जैसा कि हम करते श्राये है अथात् नागों को दुख और का पहुंचा कर जा लाग्यो रुपया इकरा किया जाता है उममें से हजार 1 हजार पचं कर देते हैं, बल्कि प्रमिश और हमारे बीच जा अप्राकृतिर दीवार पढ़ी है उसो तार टालें और क्चल शा में ही नहीं, बल्कि यन्तुत उनसे अपना भार स्वाधार पर लें। हम अपने जीवन कम का बल दें, अपनी मुविधामा और सिपाधिकारी को तिलानि दे दें और उसके बाद जनता के ममरत खडे हा और श्राम लागा साय शामन, विज्ञान और समता 4 वरदानों को प्राप्त परें, जिनको कि हम बिना उनसरी इन्दा नाने बाहर से देन को कोशिश परत पाये हैं। हम चौराह पर पडे हैं और हमको पसना करना है कि हम का किम रास्ते पर चलना है। पहले माग का अथ यह है कि हम सारे लिए असपका अपनाने हैं, हमको यह निरतर हर बना रहता है कि कहा हमारे असत्य का पर्दा प्राश न हो जाय ! उस दशा में यह महम्म हाता है कि प्रागे-पाले एक न एक दिन हमको उस स्थान से अलग कर दिया जायगा, जिससे कि हम इस कदर चिरटे हुए हैं। दूसरे मार्ग का अर्थ यह है कि हम स्वैन्यापूस उप रात को सोभार करलें जिसका हम दार वरते आये हैं और जो ३४ मालिक और मजदूर हमारा हृदय और विवेक चाहता आया है तथा उमपर अमल शुरू करद, क्योकि यह यागे पाछे होकर रहना है। यदि हम पुर न करगे तो दूसरे लोगों के इस शक्ति-सयास में ही वतमान ससार व क्प्टा का श्रत निहित है। हम वास्तरिक धम को अपनावे और जा असत्य है उसका त्याग कर, तभी मुक्ति सम्भव है। मज़दूर क्या करे ? मैं अन अधिक दिन जाने वाला नहीं है और मरा + पहले में मजदूरा को बता देना चाहता हूँ कि मेंन उनकी पद्दलित अवस्था के सम्म ध में क्या सोचा है, और वे किन उपायों द्वारा अपो को आजाद कर सकते हैं। शायट जो कुछ मैने सोचा है (मेंने बहुत साचा है) वह मजदूरी के लिए उपयोगी साबित हो जाय । सम्भवत में यह रूस में श्रमनीया का लक्ष्य में रसार लिम्व रहा ह, कारण, मैं उहीं कबीच म रहता हू पोर दूसरे देश मजदूरा की अपत्ता उह ज्यादा अच्छी तरह जानता है। किंतु मुझे श्राशा है कि मेरे कुछ विचार अय देशा प मजदूरी के लिए मा बेकार साचित न हाँग । श्रमजीविषा, तुमको अपनी तमाम जिदगी क्यार परिश्रम करते हुए गरीची म गुजारनी पड़ती है पौर दूमरी थोर ऐसे लोग हैं जो बिल्कुल काम नहीं करते एव तुम जो कुछ पैदा करते हो, उससे लाभ उठाते हैं। तुम उन लोगों के गुलाम हो । कितु जा सहृदय और समझदार व्यक्ति हैं उनको यह शान हो चुका है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। पर इसमा उपाय क्या है ? पहला मरल और स्वाभाविक उपाय ता यह प्रतीत होता है कि जो लोग तुम्हार श्रम का प्रचित लाभ उठाते हैं, उनसे वह जरदस्ती छीन लिया जाय। पुराने जमाने से लोगों को यही उपाय सूझना पाया है। अति प्राचीन काल म राम के गुलामों ने और मध्य युग में जर्मनी तथा फास के किसान ने और टेंका रासिन के समय पदूर क्या करें? ३५ स्मी लोगों ने इसी उपाय का पालम्पन किया था। अयाय पीड़ित श्रमजीविया को सबसे पहले यही उपाय ननर श्राता है। रितु उमसे न चल उद्दश्य का मिद्धि ही नहा होती, बल्कि उनकी हालत मुधरने 7 जाय और ज्याला विगढ़ जाती है। पुराने जमाने म जन मरकारा की ताकत याजकल की जितनी सगठित न थी, ऐस विद्रोह के सफल होने की अाशा की जा सक्ती थी। क्ति अाज राज्य सस्था 7 पास करोड़ों रुपये, रेल, तार, पुलिस, सैनिक मौजूद हैं। ग्राज तो विद्राला का परिणाम यह निम्लता है कि मजदूरी को और भी सताया जाता है और पाँमी क तग्ता तक पर चढा दिया जाता है एक मजदूरी पर मुफ्तसारा की मत्ता और भी स्थायी हो जाती है। मजदूरा, हिंसा का मुकाबला हिसा स करने की कोशिश करते तुम रही काम करते हो जा रस्सी से जकड़ा हुया अादमी रस्मी को सींच पर करता है । ऐमा पर 7 यह रस्सी की गाठा को और भी अधिक कम देता है । जा चीज तुमसे जलप्यक छीन ली गई है, उसको बल प्रयोग द्वारा प्राप्त करने की कोशिश का भी वी नतीजा हागा अर्थात् तुम्हारे उधन और मजबूत हा जायगे। श्रर यह मर है कि मार कार का उपाय अपने उद्देश्य म सफल ना हाता, बल्कि उससे मजदूरों को दशा सुधरने के बजाय निगढ़ जाती है । इसलिए, हाल म मजदूरी के उद्धार + लिए श्रमजीपियां के हितचितम ने ग्रथना हिनामिना करने का दारा करने वाला एक नया उपाय खोज निकाला है। इसका मुख्य ग्राशय यह है कि तमाम श्रमजीरिया का अपनी जमीनों से हाथ धा लेना पडेगा और वे कार साना में मजदूरी करने लगेंगे। इस मिद्धान्त र अनुसार यह उतना ही निश्नित है, जितना कि निश्चित समय पर पूर्व म सूय का उज्य होना। पिर यह श्रमजीवी अपने सगठन कायम करेंगे, प्रदशन करेंगे श्रोर धारा सभाया में अपने पक्षमातिया का चुनकर भेजेंगे और अग्नी हालत मुधारते जायगे, या तक कि अन्त में तमाम मिलों और कार मालिक और मजदूर सानों तथा जमीन सहित उत्पत्ति के तमाम साधना पर कब्जा जम लेंगे। इसके बाद वे बिल्कुल अाजाद योर सुग्नी हा जायगे । यदापि य सिद्धा त अस्प है मनमाना कल्पनायो ग्रौर परस्पर निराधी गातो र भरा पड़ा है और बिल्कुल मूखतापृण है तो भी इधर उसमा अधिका धिक प्रचार हो रहा है। यह सिद्धात उन देश में ही नहीं माना ज रहा है जहा अधिक्तर आबादी कइ पाढियां स खेता को छोड़ चुकी है गल्कि उन देशा म भी माना जा रहा है वहा मनदूरो न अभा भूमि क छाड़ने की कल्पना भी नहीं की है। इस शिक्षा का पहला तकाना यह है कि देहात के श्रमजोनी खेत सम्बधी विविध पधा के परम्परागत, स्वास्थ्यकर और मुम्बी वातावरण में एक ही प्रकार क जीवन नाशक काम करने लगें । देहात में मजदू एक तरह की बाजादा अनुभव करता है और प्राय अपनी सारी श्राव श्यक्तायें अपन प्रम से पूरी कर लेता है । उसक मुकाबले में कारपान म मजदूर मालिक पर पूरी तरह निभर हो जाता है । ऐसी दशा म जिन दशा में श्रमजीवी खेतों पर निर्गद कर रहे हैं यह शिक्षा सफल : होनी चाहिए। मितु स्म जैसे देशों म भी, जहा १८ प्रतिशत भागादी सेता पर जोवन निवाह करती है, शेप दा प्रतिशत श्रमजावी, जो खेती का धध छोड़ चुके हैं, इस शिक्षा के प्रचार का बड़ो तत्परता के साथ ग्रहण कर लेते हैं । यह इमलिए होता है कि खेती को छोड़ने वाला श्रमजीर्व अनजाने शहर और कारखाना की जिलगा के प्रलोभनों में पस जाता है । और समाजवादी शिक्षा दन प्रलोभनों की यायोचितता का समयन परतो है । यह अावश्यस्तायों की वृद्धि का मनुष्य के विकास का चिह्न मानता है। ये श्रमजीवी समाजवाट की शिक्षा की अधूरी राता का अडे उत्साह व साथ अपने साथियों में प्रचार करते हैं। इस प्रचार व पलस्वरूप और अपनी जरूरतों को बढ़ा लेने के कारण वे अपने का प्रगतिशील मजदूर क्या करें। सुधार और देहाती किमान से ऊचा समझने लगते हैं। किन्तु देहातों क श्रमजोरियां को सब कायम करने, जुलूम निकालने, अपन पक्ष के प्रतिनिधि धारा सभा में भेजने यादि कार्यों से, जिन द्वारा कारखाना मजदूर अपना गिरा हुइ हालत का सुधारने की चेष्टा करते हैं, काद सास रिलचसा नहीं होता। देहातो व श्रममारियों के लिए यह बिल्कुल नारा नहा कि उनस मजदूरी बढाइ जाय अथवा काम के घरटे कम रिये जाय । उहें तो करल एक ही चीज की जरूरत है और यह समान है। समी जगह उना पास इतना कम जमान रह गई है कि वे उससे अपने परिवार का भरए फोपए नहीं कर सात स्न्तुि श्रमजावियां की इस सर से बड़ा जरूरत सम्बध में समाजवादी शिक्षा मौन है। समाजवादी पहित कहत है कि पहले खानों और कल-कारखाना को हाय म लेना चाहिए और बाद में जमीन का समाजवादियों को शिक्षा १ अनुमार अमीन पर अधिकार प्राप्त करने के पहले मजाविर्या को मिला और कन शरानों पर अधिकार पाने के लिए पूजीपतियाँ से मगहना चाहिए | जर वे इसमें सफल हो जायगे, तभी ये जमीन पर मी मना कर सकेंग। मनुष्यों को जमान को जरूरत है, किन्तु उहे कहा यह जाता है कि अमान को प्राप्त करना है तो पहले उसे शाददा। इमरे बाद समाजवादी पैगम्बरों द्वारा यताय हुए पचादा हग से मिला और कारमानों के अलावा जिनसे उई जरूरत नहा है, जमान मी उहे मिल आयगा । य९ गत उन तगों को याद दिलाती है आ कुछ सूदग्वार वाम में लात है। श्राप एक सूदरसार से एक हजार रुपया मागत है। श्रापका मि रूपये का जमरत है, किन्तु सूट तार श्राप में रहता है कि मैं आपरा एक हजार म्पपा तभी दे सकता हूं, जर आप चार हजार रुपये की ऐसा चाज भी मुझ स लें, निनी श्रार को बरत नहीं है । इसी प्रकार समाजरादी पहल ता इस सपथा गलत निणय पर पहुंचे फि मिल प्रया कारपाने को पानि जमीन भी श्रम का एक साधन है और पिर मजदूर्ग - ३८ मालिक और मजदूर को सलाह देने लगे कि जमीन को छोड़ दो, हालाकि जमीन क श्रभार म हा घेक्ट पा रहे हैं और उन कारखाना पर कब्जा प्राप्त करने की कोशिश करा, जो तापे, व दूक, मुगधित इत्र, सागुन दपण आदि विविध प्रकार की विलासिता की सामग्री उत्पन्न करते हैं । और जब श्रमजानी यह सामग्री बनाने म दक्षता प्राप्त कर लेंगे और खेता का काम भूल चुकेंगे ता उई जमान पर भी अधिकार करने के लिए कहा नायगा। सेता सुग्गी और स्वतन मानव जीवन का एक मुरष साधन रही है पार ग्रागे भी रहेगी। इस बात का तमाम मनुष्य जानते आये हैं और जानते हैं और इसालिए उन्हाने हमेशा कृषि द्वारा जानन निर्वाह करने का काशश का है और आगे भी करते रहगे। जिस प्रकार मछला पानी निना जिला नहा रह सकती उसी प्रकार मनुष्य सेती बिना जिदाना रह सकता। किंतु समाजवादी शिक्षा में कहा जेता है कि मनुष्यों के मुख के लिए यह जरूरी नहा है कि वे वनस्पति गत और पशुयां के बीच जीवन यापन करें और अपने कपि सम्म धा श्रम द्वारा ही प्राय अपनी तमाम पारश्यक जरूरतें पूरी कर लिया करें। इसके लिए ता उह कारवाना क व द्रस्थानों म रहना चाहिए, जहा की हवा सदा दूपित बनी रहती है। उ ह अपनी जरूरतें बराबर नढाते जाना चालिए और यह रूरतें तभी पूरी हो सकती हैं जर कारखाना म पिचाररहित श्रम क्यिा नाय। और श्रमजीको कारसा के जीवन र जाल म फंसकर हम समाजादी शिक्षा को सच मान लेते हैं । ५ वाम के घना और मजदूरी प्राप्त करने के लिए पूजीपतियाँ क माथ कठोर लहाई लड़न म अपनी तमाम तात्त सच कर देते हैं और मममन लगते हैं कि वे बहुत मल्वपूण काय कर रह हैं । नितु उन श्रमजाचियाँ क लिए ना जमीन से तुरा पर निगए हैं एक ही बात जरूरी है। उहं अपनी तमाम शतिया ऐमा काइ साधन टू दने में सच करनी चाहिए कि व पुन सेता कर म और प्रकृति काच नैसगिर जापन पिता सक। पितु समाजवादी मजदूर क्या करें? कहते हैं कि यदि यह सच भी हो कि प्रकृति की गोद में रहना कारमानों जीरन से अन्दा है तो मा कारमानों में काम करने वाला को तादाद इतनी बढ़ चुका है, 'पौर कृषि जीवन को छोडे उहें इतना अधिक समय हो चुका है कि यर वे खेती का आश्रय नहीं ले सकते ! कारण, यदि वे वेती करने के लिए लौट जायगे तो अपारण कारताना म पैदा होने वाली चीजों की माना घट जायगी और यह चीजे ही देश का सपत्ति होता है। इसके अतिरिक यदि ऐसा न हो तो भी इतनी जमीन नहीं मिल सकेगी कि किस पर कारखाना के तमाम मजदूर काम कर सकें और उनका भरण पोषण हो जाय। पर यह सही नहीं है कि काररसानों के मजदूरा के खेती को अपना लेने से देश का सम्पत्ति कम हो जायगी। कारण, खेती करने वाले श्रम जीरो अपना कुछ समय घर पर अथवा कारस्थानों में जाकर चीले बनाने म लगा सस्ते हैं । रितु यदि इस परिवतन से एक बार बार और हानिकर चीनों का उत्पत्ति कम हो जाय, जो कि कारशनों में बड़ी तेजी के साथ हो रही है तथा पारश्यक वस्तुओं का वतमान अत्यधिक उत्पादन उदहा जाय और दूसरा पार धनाज, खजी, फ्ल और घरेलू पशु की उत्पत्ति प्रद जाय तो इससे राष्ट्र की सम्पत्ति पिसी प्रकार कम न होगा चल्कि पद पड़ेगा। और यह दलील भी सही नहीं है कि कारखानों में श्रमजीरिया के लिए. पान जमान न मिल सकेगी। अधिकाश देश में भूस्वामिया के कने म जो जमान है, वह तमाम श्रमजीवियों के लिए पर्याप्त होगी। यदि रोती श्राधुनिक ढग से की जाय, अथवा कम से कम उसी दग से का जाय, निस दग से कि एक हजार वर्ष पहले चीन म की जाती था। इस प्रश्न में दिलचस्सा रपन वाले लोगो को भोपारिन की Con. quest of Br«ade ak Field Factories & Workshop इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद मडल ने 'रोटी का सवाल' नाम . में किया है।
४० मालिक और मजदूर नामक पुस्तकें पढ़नी चाहिए । उहं तर ज्ञात हो जायगा कि मला प्रकार सेती करने पर सेती की पैदावार क्तिनी बढाई जा सकती है और उतनी ही जमीन से क्तिने अधिक श्रादमिया का भरण-पोषण हो सकता है। धनवान भूस्वामिया को जमीन की उत्पादन शक्ति बढ़ाने की काइ जरूरत नहीं मालूम पड़ती । कारण, उहं निना काइ कष्ट दिय जमान से काफी याय मिल जाती है। किन्तु छोटे किसानों को यदि अपनी कमाई का सारा भाग भूस्वामियों का न देना पड़े तो वे सेती के सुधरे हुए तरीका को जरूर अपनायेंगे। यह कहा जाता है कि इतना जमीन नहीं है कि उसपर सर श्रमजीना काम कर सकें। इसलिए उन जमीन के लिए झगड़ा करना फिजूल है, जिसका भूस्वामिया ने दना रक्सा है । यह दलील उस मालिक मान की दलील जैमी ही है जिसके पास एक साली मकान पड़ा है, मितु वह लोगा की भीड़ को श्राधी और वर्षा म शीत से बचने के लिए उसम इसलिए नहा घुसने देना कि उस मकान म सन लागो का समावेश नहा हो सकता । पहली बात तो यह है कि जो लोग मकान में दाखिल हाना चाहते हैं उहें दाखिल हाने देना चाहिए और फिर देखना चाहिए कि वे सब उसमें स्थान पा सस्ते हैं अथवा नहा। और यदि सर म्यान न पा सो तो जो पा सकते हो उ ह ही स्थान क्या न दिया जाय १ जमीन चार म भी यही बात है । जो लोग जमीन मागने हैं, उनको भूस्वामियां को जमीन दी जानी चाहिए। और तब यह देस लिया जायगा कि वह कापी होगी अथवा नहीं। इसके अलावा यह नात मी करीब-करीन गलत है कि कारखाना म काम करने वाले मजदूरों के लिए जमीन कामान होगी। यदि कारसानो के मजदूरों का गुजारा अभी ग्यरादे हुए अन पर होता है तो सरां का पैदा क्यिा हुया श्रन परीन के बजाय वे स्वय ही अपा लिए श्रावश्यक अन्न पैना क्या न करें, चाहे जमीन उहे हिदुस्तान, अजगइन, ग्रार लिया अथवा साइबीरिया-यहीं भी मिले। इसलिए वे सब दलील प्राधार रहित है जिनम कहा जाता है कि मजदूर क्या करें? कारपाने के मजदूर खेती का श्राश्रय नहा ले सक्ते या उहं नहीं लेना चाहिए। इसके विपरीत यह परिवतन सब साधारण के लिए हानिकर हाने र बजाय लाभदायक हा हागा और निस्म देह मारत और अय देशाम आये दिन पड़न वाले अकाला का सात्मा हो जायगा, जो इस चात को बड़ी अच्छी तरह सिद्ध करते हैं कि जमान का मौजूदा ग्यारा गलत है। यह सच है कि जिन देश में क्ल कारसाना का रहास तौर पर विकास हो चुका है जैसा कि इग्लैण्ड, बलजियम और अमरिका क कुछ राज्य में दिखाई देता है, वहा श्रमजीवियां का जावन इतना बिगड़ गया है कि अब उनके लिए खेती को अपना सक्ना बहुत कटिन प्रतान होता है। किन्तु इस कठिनाई से यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे मेती का अपना ही नहा सरत। इसके लिए ता सब से पहले यह जरूरी है कि श्रमजीवी इस परिवतन का अपने लिए लाभदायक समझे और यह न मान बैठें, जैसा कि समाजादी सिद्धान्त उह सिग्वाता है, कि कार सानों की गुलामी शाश्वत और अपरिपतनीय अवस्था है, जिसमें मुधार किया जा सकता है, पर जो खम नहीं की जा सकती । इसके विपरात उहें खेती अपनाने यावश्यर साधना की खोज करनी चाहिए। इस प्रकार जा श्रमजावी सेती करना छोड़कर कारखानों में मजदूरी करने लगे हैं, उनका श्रमजीवी सपा, हड़तालों और पहली मई का झएडे लेकर सड़क पर बच्चा जैस प्रदशन करने की जरूरत नहीं । उहें तो सिर्फ एक ही बात की आवश्यक्ता है और वह यह कि विम प्रकार उनका कारखाना की गुलामी से छुटकारा मिले और वे खेती पर गुजर बसर करने लगे। इसमें बाधक हैं वे भूस्वामी, जा स्वय काम नहीं करते, पर जिहाने बड़ी मात्रा में जमीन को हड़प रखा है । श्रमजीवियों का यह जमीन दिलवा देने की अपने शासकों से प्रायना और माग करनी चाहिए । इसमें वे किसी बाह्य यन्तु की माग न करेंगे, जिस पर उनमा अधिकार न हो। जमीन पर रहने और उससे अपना भरण-पोषण करने मालिक और मजदूर का यय प्राणिया की भाति उनका भी बिल्कुल स्पष्ट और अमर्यादित अधिकार है । इस लिए उहं दूसगं से अनुमति लेने की यावश्यकता नहीं होनी चाहिए । उहें अपने इमी अधिकार की माग करना है। जमीन पर यक्तिगत मिल्कियत को खत्म करना अनिवाय हो गया है, कारण इस प्रथा का अ याय, उसकी तक हानता और नित्यता बहुत स्पष्ट हो चुकी है । सबाल सिप यही है कि उसका सत्म किस प्रकार किया जाय ? कम और अय देशां में गुलामा को प्रथा का अन्त सरकारी याशा यों द्वारा किया गया । ऐसा प्रतीत होता है कि भूमि पर यक्तिगत मिल्फियत का अंत भी सरकारी प्राज्ञा द्वारा ही होगा। रितु शासन तन ऐसी याज्ञायें क्वचित ही दिया करते हैं । शासन तनो म ऐस लोगो का बोल बाला होता है जो दूसरे लोगों के श्रम पर जावन बसर करते हैं और जमीन पर 'यक्तिगत मिल्कियत के द्वारा वैसा जीवन विताना सरसे अधिक श्रासान होता है। इसलिए केवल शासक और भूस्वामी ही इस मुधार का विरोध नहाँ करगे बल्कि वे लोग भी करेंगे जो शासन अथवा भूस्लामीवाद र अग नहीं है लेकिन फिर भी धनवानों की सेवा करते हैं । ऐसे सरकारी कमचारी, कलाकार और वैज्ञानिक जमीन पर यक्तिगत स्वामित्व का पन लिए लाभदायक समझते हुए उसका समयन करेंगे अथवा कम जरूरी बुराइयों का विरोध करेंगे, किन्तु इस बड़ी समस्या का स्पश तक न करेंगे। अधिकाश खाते पीते लाग जान बूझ कर न सही तो कम से कम सस्कार वश यह महसूस करते हैं कि उनकी मुविधाजनक अवस्था का श्राधार भूस्वामीवाद है । यही कारण है कि धारा मभाया में लोगों की भलाई की चिता का दिपावा किया जाता है। उनकी कयित मलाई के नाम पर कानून बनाये जाते हैं और चर्चायें की जाती हैं । कितु जमीन पर यक्तिगत स्वामित्व की प्रथा का श्रत करने का जिन भी नहीं किया जाता जो कि लोगों की भलाई के लिए नितात यावश्यक है। इमलिए जमान पर यक्तिगत स्वामित्व की समस्या को हल करने के ४३ मजदूर क्या करें। निए सब से पहले यह ग्रापश्यक है कि उसके सम्बध में जान जूझ कर जो मौन साध लिया गया है उसे भग किया जाय । यह अवस्था उन देशा म है नदा मना का एक माग घाग समाया के हाथ में है। किन्नु जिन देशों में मारी मत्ता राजा 7 हाथ में हा, बहा जमान पर व्यक्तिगत मिल्कियत उटाने का आशा निक्ल सपने का और मा कम सम्भावना समझनी चाहिए। रामाया क हाथ में मी सत्ता नाम के लिए हा हाता है । दरअसल यह उन लोगों में हाथ म हाता है जो राजा सम्बधा और निकटवर्ती होते हैं । ये लोग राजा को अपनी इच्छानुसार नचाते हैं । इनक अधिकार में बहुत सारा जमान होती है. और यति राजा चाहे तो भी उस जमान का नर हाया से नहीं निकाल सकता। इसलिए यद्द अाशा परना कि शासन तत्र जमान का भूम्यामियो के हाथों से छान लेगा, दुराशा मात्र है । ग्ल प्रयाग द्वारा मा ऐसा नहीं दिया जा सकता, कारण, सत्ता हमेशा उन लोगों क हायों में रहा है और रहेगी जिन का कि समान पर पहल से अधिकार चला पाना हो । ममानवानिया का यानना य अनुसार जमान का वापसा की प्रतीक्षा करना भी मूग्खतापूर्ण होगा । यह भविष्य की प्राशा पर उत्तम जारन की परिस्थितियों को छाड़कर बुरा परिस्थितियां का अपनाने के मुदृश हागा । हरेक समझदार श्रारमी यह समझता है इस यातना से श्रमजापिया को मुक्ति तो मिलती नहीं, उल्टे वे मालिकों क और मा ज्यान गुलाम रन जात हैं और ग्रागे कायम हान वाले कारग्वानां क सवालमा के गुलाम बनने को तयार हाते रहते हैं । प्रतिनिधि शासन अथवा गजायों से मा भूम्यामानाद के श्रत का याशा नहीं की जा सकती । राजानों के निकटयती लोगों के अधिकार म पड़ा-बद्री नागार होती हैं। ये लोग स्मिानों की भलाई के लिए चिन्ता मले हा प्रकट करें, पर वे उई जमीन हगिज न मांगे कारण, वे जानत है कि जमीन पर स्वामित्र कायम रमे बिना वे अपनी मुविधाजनक स्थिति अर्थात् विना श्रम स्येि दूसरों की मेहनत से लाम उगन की स्थिति कायम न प सकेंगे। तो पिर अमजारिस को उस ।
४४ मालिक और मजदूर अत्याचार से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए जिससे वे इस समय शिकार बने हुए हैं। शुरू में तो ऐसा प्रतीत होता है कि इस स्थिति का कोई इलाज ही नहीं है और मजदूर इतने जाड़ चुर है कि वे अाजार नहीं हो सकत, कितु यह कारा खयाल है । मजदूरों को क्वल अपने पर हाने वाले अत्याचारों के कारणों पर गहगह से विचार करने की जरूरत है, उहें ज्ञात होगा कि मार कार, समानवाद, अथवा सरकार पर थोथी यारााय बाधने के अला। उनके पास अपना आजादी हासिल करने का एक और उपाय है जो अचूक है और जिसे कोई नाधा नहीं पहुंचा सकता । यह उपाय हमेशा उनके हाथों म रहा है और अब भी है। वस्तुत मजदूरी का भयर दुरवस्था का एक ही कारण है और वह यह है कि जिस जमीन की उहें जरूरत है, उस पर भूस्वामियाँ ने क जा कर रखा है । रितु प्रश्न यह है कि भूस्वामी दम जमीन को अपने अधिकार म क्योंकर रखे हुए हैं १ पहली बात तो यह है कि यदि मजदूर इस जमीन का उपयोग करने की कोशिश करें तो राज्य की पौनें उहें ऐसा न करने टेंगी, मजदूरों का मार पीट कर हकाल दिया जायगा और जमीन पुन भूस्वामियों को सौप दी जायगी। और इन पौजा म श्रमजावी ही ता होत हैं । इस प्रकार सुद श्रमजीवी ही भूस्वामियों को उस जमीन पर अपना अधिकार बनाये रखने क लिए समथ बनाते हैं जो यायत उनकी नहीं है, बलि सब की है । यही नहीं, श्रमजारी उस जमीन पर खेती करते हैं और भूस्वामियों को लगान देकर उनका उस पर अधिकार कायम रसते हैं । श्रमजावियां को यह बद कर देना चाहिए । पिर भूस्वामियों के लिए उस जमीन पर कजा रसना न केवल व्यथ बल्कि असम्भव हो चायगा और जमीन सर की सम्पत्ति बन जायगी। वितु यह सम्भव है कि उस दशा म भस्वामी श्रमजावियों के बजाय मशीनों से काम लेने लग जाय और खेती के बजाय पशुपालन और जगलात का काम शुरू कर दें, पर उनका काम मजदूरों के बिना नहीं चल मक्ता और वे चाहें ।
मजदूर क्या करें? या न चाहे, उहे क्रमरा अपनी जमीने बाद देनी पड़ेगी । इस प्रकार, श्रमजीरियों के लिए गुलामी से आजाद होने का उपाय पल यह है कि वे भूमि पर व्यतिगत मिलियत का अपराध समझो लगे और उस तान को सहयोग न दें जो मजदूरों का जमान से वचित करती है और न भूवामियों के सेन मजदूर बनें और न ही उनका जमीन को लगान पर जाते थ। यह दलील दी जा सस्ती है कि यह उपाय तमी पारगर हो सकता है जब दुनिया भर में प्रमजीवी सहयोग कर रोत पनदूर उनने यथा अमान लगान पर लने मे इकार करते वितु यह नहीं हो सकता। यदि कुछ मजदूर ऐसा करेंगे तो दूसरे मजदूर, दूसरी जातियों के मनदर इस बात को जरूरी न समझेगे और भूस्वामी जमीनों पर यथावत अपना अधिकार कायम राण सकेंगे। इस प्रकार जो श्रमजारी असहयाग करगे, वे अकारण प्राप्य मुनि भाओं मे वनित हो जायगे और मजदूरों का हालत में कुछ सुधार न होगा। अगर मेरा प्राशय हलाल मे हाना तो यह दलाल बिल्कुल सही होती। पर मैं हड़ताल का पता नहाँ पर कर रहा हूँ । श्रमजोर अत्याचारी सत्ता से सहयोग करना, ग्वेन मजदूरी करना अथवा लगान पर वेत लेना सिप इसलिए प्रदान करें कि यह शनें उन लिए हानिकर है और उनका गुलाम बनाने वाला है, बल्कि यह समझे कि जिस प्रकार हत्या, चोरी और डकैतो प्रारि दुष्कों मे दूर रहना और उनमें किसी प्रकार हिस्सा न लेना उनका क्तव्य है, उसी प्रकार उपरात कायों में भाग लेना मा धुरा काम है जिससे हर शादमा का बचना चाहिए । यदि श्रमजीवी गहराई के साथ साचें कि श्रमजावियो का श्रम न करने वाला की नमीना पर काम करने का क्या अथ होता है ता उन्हें मार निरिंगद रूप से शात दा जायगा कि जमीन पर व्यक्तिगत स्वामित्व के अन्याय में हिस्सा लना और उसे कायम रखना उरा वाम है । लमान पर भूस्वामियों के अधिकार का कायम रखने का परिणाम यह होता है कि लावा मनुष्य, वृद्ध, स्त्री पुरुष और उच्चे गरीनी और कष्ट का जीवन बिताते हैं । उ मालिक और मजदूर अध पेर रहा पड़ता है अत्यधिक श्रम करना पड़ता है और अकाल मौत के मुंह म चला जाना पड़ता है । यह सब इसलिए हाता है कि जमीन पर भूस्वामियों न क जा जमा रखा है। यदि जमान पर भूस्वामियों का अधिकार हाने के दुष्परिणाम इतो भयकर है और इसमें कोई शक नहीं कि है तो जमीन पर यक्तिगत स्वामित्व कायम रखने में सहयोग देना और उसका समथन करना स्पप्रत पाप है, जिससे हर “यक्ति का बचना चाहिए। करोड़ों मनुष्य सूदगोरा, श्रावारागर्दी, याततायीपन, चोरी, हत्या श्रादि माता का पाप कर्म समझते हैं और उनस दूर रहते हैं । जमीन की यतिगत मिल्कियत + सम्म व में श्रमजीवियों को भा यही चाहिए । इस प्रकार का मिल्कियत की श्रयायता वे खुद जानते हैं और उसका बुरी और निदय नात समझते हैं। तर वे उसम शरीक क्यों हाते हैं और क्यों उममा समयन करते हैं ? में हड़ताल की सलाह नहीं देता में तो चाहता हूं कि जमीन पर यतिगत मिल्कियत म भाग लोक पापकम को माफ मा महसूम किया जाय योर फ्लस्वरूप उससे विरत हुया राय। यह सच है कि इस प्रकार के असहयोग से एक ही समस्या का हल करन म रिलचम्पी रसन वाले तमाम लोगों में वह तात्कालिक एक्ता नहीं होता जा हड़ताल से होता है श्रीर इमलिए सपल हड़ताल जो पूण निश्चित परिणाम निकलते हैं, चे इस असहयोग व नहीं निकल सक्ते। पर उस द्वारा हडताल की अपेक्षा का ज्यादा मनबूत पार स्थायी एस्ता उत्पन्न होती है । हड़ताल 4 दिनों की अस्वाभाविक एकता हरताल का उद्देश्य पूरा होते ही सत्म हो जाती है किंतु समान काय की एक्ता अश्या विचारों को समानता से उत्य र एकता टूटने के बजाय उरार शक्तिशाली होती रहती है और अधिकाधिक लोग उसमें शामिल होते रहते हैं। यदि हड़ताल के बयान से नहा, नल्कि जमीन पर यक्तिगत म्यामित्व में भाग लेने का पाप समभ कर श्रमजीवी श्रमदयोग करें तो उसका मा यही परिणाम निकलना चाहिए और निक्ल सकता है। बहुत सम्भव है कि श्रमजीवी भूस्वामियों की मजदूर क्या पर? मिल्लियत में सहयोग देने के प्रयाय को समझ जाय, फिर भी उनम से बहुत थाडे उनकी जमीनों पर मजदूरी करने या उनका लगान पर लेने से इन्कार कर सकें ! कितु बा ऐमा करेंग, ये केवल स्थानीय अथवा तात्कालिक कारण से न करेंगे, बल्कि यह समझ कर करेंगे कि क्या उचित है और क्या अनुचित । य सर लोग के लिए हर समय तय रूप होगा। इसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि उनके क्थन और अाचरण से जो मजदुर अमान पर यक्तिगत मिल्कियत के अध्याय और उससे पैदा होने वाले दुष्परिणामा को समझते जायगे, उनकी तादाद निरन्तर बढ़ती जायगी। यह ठीक ठाक बता सकना सम्भव है कि यदि श्रमजीवी जमीन की व्यक्तिगत मिल्कियत म सहयाग देने को पार समझने लगता उसके पसम्पाप समाज के सगठन में परिपतन हो यह निश्चित है कि परिवर्तन होंगे, योर नितनी हा उक्त अनुभूति विस्तृत हागी, उतन ही ये महत्वपूर्ण हागे । कम से कम यह हो सकता है कि कुछ श्रमजीवी भूस्या मिया के लिए काम न करें अथवा उनको जमीन लगान पर न लें और भूस्वामी यह समझने लगे कि जमीन का अपने अधिकार म रसना लाभ दायक नहीं रहा । उस दशा म या तो वे ऐसी व्यवस्था मनर कर सस्ते हैं जो उन श्रमजीवियों क लिए लाभदायक हो, अथवा वे अपने स्वामित्व को मिल्न ही छाई दे सकते हैं । अथा यह भी हो सना है कि सेना मैं जा श्रमजीवी हैं, वे जमान को यक्तिगत मिल्कियत 4 अयाय को समझ कर देहात के श्रमजोत्री भाइयों का दाने के काय म सहयाग देश ই থিক্কাঙ্কি রক্ষা বে আম গীর সুষ একাং ৰাৰ মূত্যাদি। की जागीर का बचाव न करने लिए पिश हा जाप और तमाम नमीन यानाद हो जाय । अन म यह भी मम्भर है कि सरकार जमान को बतर करने की अनिवायता का समझ र श्रमजीविया की विजय हाने र पहले ही एक प्राशा जारी का कानून द्वारा जमीन की व्यक्ति गा मिल्कियत सत्म कर दे।मार यह कि कई तरह से परिवतन हो सकते ५ मालिक और मजदूर हैं और हांगे और पहले से उनसे ठीक ठीक नहीं बताया जा सकता। कितु एक बात निश्चित है और वह यह कि परमात्मा की इच्छा अथवा अपने श्रत करण र अनुमार इस सम्मध में जो भी काम सच्चाई साथ क्यिा जायगा, उसका परिणाम निकले बिना नहीं रहेगा। जिस समय लागों के सामने ऐसा कोई काम करने का अवसर श्राता है जो बहुमत को पस द नहीं होता तो बहुवा वे कर देते हैं-"सन लोगों के प्रागे हम श्रोले क्या कर सकते हैं " ऐसे लोग समझते हैं कि काइ काम तभी सफल हो सकता है जब सब लोग या क्म-से कम बहुत से लाग उसमें साथ हों, कि तु वे यह भूल जाते हैं कि बहुत लोगों की जरूरत ता बुरे काम के लिए पहा करती है । सत्काय के लिए तो अकेला श्रादमा भी काफी होता है । कारण, परमात्मा सदा सत्कम करने वाले का साथ देता है । और जिसके साथ परमात्मा होगा उसके साथ आगे पीछे तमाम आदमी हो जायगे । हर हालत में श्रमजीवियों की स्थिति में सुधार तभी होगा जब वे परमात्मा की इच्छा और अपन श्रत करण के अनुमार अधिकाधिक चलेंगे और पहले की अपेक्षा नैतिकता का अधिकाधिक पालन करेंगे। उत्पादन व समस्त साधनों को समाज की सम्पत्ति बनाने से पहले ही जा शिक्षा मजदूरों को उन कारखानों का, जहा ये काम करते हैं, मालिक चना देने की अाशा दिलाती है, वह न केवल इस स्वण नियम के विरुद्ध है कि हमको दूसरों के साथ वैसा याहार करना चाहिए, जैसा कि हम चाहते हैं कि दूसरे हमारे साश करें, बल्कि निश्चित रूप से अनैतिक है। मजदूरों का सैनिकों का हैसियत से बल प्रयोग करना, खेत मजदूरी करना अथा लगान पर जमीन जातना और इस प्रकार जमीन की यक्तिगत मिल्कियत का समथन करना उतना ही उम नियम विरुद्ध है। क्योंकि जो लोग ऐसा करते हैं, उनसे अवस्था क्षणिक तौर पर भले ही मुधर जाय, किन्तु श्रय श्रमजीवियां की दशा इसके फलस्वरूप और भी ज्यादा खराब हो जाती है।
मजदूर क्या करें? ४६ प्रत्यक्ष ग्ल-प्रयोग, समाजवादी हलचल और अपने लाभ की रातिर व्यक्तिश भूम्यामित्यपाद का समथन-श्रमजीनियों के यह सारे उपाय अभी तक इस लिए सफल नहीं हुए कि वे नैतिक नियम के इस मौलिक तत्व र अनुकुल नहीं हैं कि हम दूमरा के साथ वैसा ही बर्ताव परे जैसा हम चाहते हैं कि दूसरे हमारे साथ कर । मजदूरा का गुलामी स मुक्ति दिलाने क लिए रियात्मक प्रयत्न उतना श्रावश्यक नहीं है, जितना कि यह जरूरी है कि वे पाप से अलग रहें, सिप इस लिए कि ऐसा करना उचित और नैतिक है, अर्थात् परमामा का मी का अनु सरण किया जाय। गरीबो उमी समाज में कायम रह सकती है, जहा लोग पारस्परिक सरप व जगली सनून का प्राय लेत हो । पिन्तु धम प्राण समान म गरीबी नहीं हो सस्ती । जब लोग अपने पास जा कुछ है, उसका अापस में बार लेंगे तो वह हमेशा सभी की जरूरतों को पूरा करने के लिए कामी हागा और कुछ बच भी रहेगा। एक समय का जिन है कि जन इमा ममाह उपदेश दे रह य ता धाताया का भून लग पाई। ईसा ममाह का मालूम हुया कि कुछ लागा क पास खाने का मामान मौजूद है। उन्दान सर श्राताना का गानाकार बनाकर बैठ जान का श्रादेश दिरा और जिनके पास साय-सामग्रा थी, उनका कहा कि वे एक सिर से उस अपन पड़ोसियों का तरफ बढाना शुरू करें और इस प्रकार जन एक का पर मर जाय वा वह बची हुइ मामग्रा अपन पड़ोसी की तरफ बढ़ा दे। इस प्रकार जब यह चकर पूरा हुआ ता न चल सर का पेट भर गया, बल्कि बहुत मारो मामा बच रहा । मानर-समाज म नत्र मनुष्य एमा करेंगे ता गरीची भाग जायगा थोर उम म रहन वाले मनुष्यों का भूम्बामिया का जमोन किराये पर लेन अथवा उनकी मजदूरी करने की जरूरत न पडेगी । यह कोई कारण नही हो सकता कि चूकि हम गरीब है, इसलिए हम एमा काइ काम करें बा हमारे दूसरे भाइयों के लिए हानिकर हो ।
मालिक और मजदूर यति इस समय श्रमजीवी भूस्वामियों की मजदूरी करते हैं या उनकी नमीन लगान पर लेते है तो कारण यह है कि वे अभी इमको पाप नहीं समझते और न यह समझते हैं कि इस प्रकार वे खुद अपना और अपो भाइयों का कितना उड़ा नुक्सान करते हैं । लोगों का ज्यों-ज्यों पता चलेगा कि जमीन की यक्तिगत मिल्कियत के साथ सहयोग करने के क्या परिणाम होते हैं और वे इसको जितना अच्छी तरह समझेगे, त्यो त्यो स्वभारत श्रम न करने वाला का दाव श्रमजाचियों पर कम होता जायगा। श्रमजीवियां की दशा सुधारने का एक मात्र निर्विवाद उपाय यह है कि जमीन को भूस्वामियों के कब्जे से छुड़वाया जाय, और यह उपाय परमात्मा की मर्ना के अनुकूल है । यदि श्रमजीन उनको दगाने वाली शक्ति को सहयोग न दें और न भुस्वामियों की मजदूरी करें और न उनकी जमीन लगान पर लें तो जमीन मुक्त हो सकती है । श्रमजीरिया का यह जानना चाहिए कि भूस्वामियों के कने से जमीन का छुड़वाना उनके हित के लिए जरूरी है और यह तभी सम्भव हो सस्ता है जब वे अपो भाइयां के प्रति हिंसा करना, भूस्वामियों की मजदूरी करना और उनकी जमीन लगान पर लेना रद कर दें। इसके अलाना श्रमजीरियों को पहले से यह भी जान लेना चाहिए कि जर जमीन भूस्वामियों के अधिकार से मुक्त हो जायगी तो वे उसकी व्यवस्था मि प्रकार करेंगे श्रमजीवियां में उसको क्मि प्रकार बारेंगे। बहुत से लोग समझते हैं कि एक बार जमीन श्रम न करने वालों के हाथों से छुड़वा लेने के बाद सारा मामला ठीक हो जायगा । मितु यह ठीक नहीं है। यह कहना सरल है कि मन करने वाला से जमीन ले ली जाय और श्रमजीरियों को दे दी जाय । किन्तु यह किस प्रकार क्यिा जाय कि श्रयाय न हो, और धनवानों को फिर पड़ी गड़ा जागीरें सरीद कर मजदूरों को गुलाम नना का मौसन मिले। हम में से कुछ का सयाल है कि मजदूरों अथवा जनसमुदायां को मजदूर क्या करें? अपना इच्छानुसार चाहे जहा जमीन जानने अोर होने का अधिकार हाना चाहिए । पुराने नमाने में ऐसा ही होता था। क्तुि यह वदा सम्भव हो सकता है जहा याबारी कम हा, जमान को बाहुल्यता हो और यह एक हो किम की हो । पर जहा यानादी इतनी अधिक हा कि जमीन से उसका भरण पापण न हो सके और जहा जमीन दमिमों की हो, या जमान में अंगारे का दूसरा तराश टू ढना होगा। क्या यादमिया की नादाद के दिमार से उसका नाग जाय कितु ऐमा करने से जमान उनको भा मिल जायगी, जो खेती करना नहीं जानते और श्रम न करने वाले लोग उस धनवाना रे हाथ रहन रख देंगे या बेच देंगे श्रोर पिर ऐसे लोगों का एक पग पर दी जायगा जो श्रम तो मरेगा नहीं और बड़ा रहा नागारों का मालिरसन जायगा। तो क्या श्रम न करने वालों को जमीन बेचने अपना रदन रखन मे रोक दिया जार ? उस अवस्था में उन लाया की जमीन आ उसे जातना नहाँ चाहते या जात नही सक्ते, वकार पड़ा रहेगी। दमो पलाया मनुष्यों की तादाद के दिमार में जमीन का टवारा करने मे विभिन सिम्म को जमीन किस मार रार पट सकगा। उपजाऊ, अजर, रेती और दलाल वाला समा सरदे की जमीन दातो है। शहर को जमीन का मकडा रुपया बीया पेला हा रा है और दूर देहातों की जमीन से कुछ प्रामदनी नहीं होता। तामीन किस प्रकार की जाय कि वह श्रम न करने वाला भने में पुन न जा सके तथा किसी भी हिता को नुवमान न पहुंने और न ही frमी प्रकार ने मनमद और झगडे उठ बिड हो। इस समस्या को हल करने के लिए अनेक लागा न अपना दिमाग पपाया है और प्रमजीनिश में जमीन को ने की अनेक याजनाय तैयार की गई है। समाज सगग्न की कथित साम्यवादी योजनाया अलावा, जिनक अनुसार जमीन सार्वजनिक सम्पत्ति समझी जाता है और येता सम्मिलित रूप से का जाता है, मेरी जानकारी में निम्न याजनायें और हैं एक योजना स्वाग्लैंड के रहने वाले विनियम भागिलगी का है।
मालिक और मजदूर यह १८-चौं शतालीम हुआ था। श्रागिलपी का कथन है कि प्रत्येक मनुष्य जमान पर पैदा हुया है और इसलिए उसका यह शिविवाद श्रधिकार है कि उस पर वह रहे और उसकी पैदावार से अपना भरण पोपण करे । थाड़े से लोग जमान के बडे-बडे टुरड़ों का पक्तिगत सम्पत्ति बनाकर इस अधिकार का मर्यादित नहीं कर सकते और इसलिए हर मनुष्य का अपने हिस्से की जमीन पर अबाधित अधिकार होना चाहिए। और यदि किसी के मन म उसके हिस्से से अधिक जमीन है और उससे Tद लाभ उठाता है और उम अतिरिक्त जमान १ असला मालिक को उन पेश नहीं करते तो उसको इम अतिरिक्त कमीन के उपयोग के लिए राज्य को टैक्स अदा करना चाहिए। थामस स्पेस नामक एक दूसरे अमेज ने कुछ असें पीछे जमीन की समस्या का इस प्रकार हल किया कि तमाम जमीन का जिला की मम्पत्ति बना दिया जाय और ये जिले अपनी इच्छानुमार उसका बरवारा करदें । इस प्रकार जमीन की "यक्तिगत मिलियत को उसने सवथा निषिद्ध करार दिया । मि. स्पेस ने इस समय में सन् १७८८ की एक घटना का जिन किया है जो उसर दृष्टिकोण का बड़ा उत्तम उदाहरण है। यह लिरसता है- 'मैं जगल में असरार बीन रहा था कि जगलात अपसर श्राया और पूछने लगा कि मैं क्या कर रहा हूँ। मी जराब पिया कि मैं असरोर बीन रहा हूँ।" इसपर उसे बड़ा श्राश्चय हुया और यह करने लगा कि ऐसा करने और कहने का तुम्हें साहस क्योर हुआ ! मैंन कहा-"म ऐमा क्या न कर । यदि पिसी बदर या गिलहरी ने अखरोट खाये होते तो तुमने एतराज क्यिा होता है तो क्या मैं उन जानवरी से भो गया-बीता हूँ अपरा मेरा कम अधिकार है । लेकिन तुम हो कौन, जो इस प्रकार मेरे काम में बाधा डाल रहे हो" उसने कहा- मैं तुम्हें यह उस समय बताऊगा, जब तुम दूसरों की मीमा में श्रनधिकार दारिल हाने के जुम में पकडे जायागे।"
मजदूर क्या करें। मैंने कहा--"ठीक है, किन्तु जिस जगह किमी आदमी ने न पड़ लगाय और न नमान का जोता-बोया, उसमें याना अनधिकार प्रवेश से हो सकता है । यह असराट प्रति ने अपने बार पैदा किये है, मनुष्या और जानवरा-दोन र पाप के लिए बनाये गए हैं और इसलिए वे सर की सम्पत्ति है। उसने कहा- मैं तुमस कहा है यह जगल सावजनिक नहीं है। यह पारलैण्ड उमराव का जागीर है।" मैंन कहा--"या। उमराव महादय को मेरा सलाम ! पर प्रकृति मुझमें और उनमें काइ मद नहा करती। प्रति के दरबार में तो यह नियम है कि जा पहल आवे सो पहले पाये। इसलिए यदि उमराव महादय को अवरोट चाहिए ता उहें श्रागे से जरा जल्दी आना चाहिए।" अन्त में स्पन्स ने कहा है कि जिस देश में उसका अखरोट बनने का अधिकार नहा, यदि उस देश की रक्षा करने के लिए मुझ से कहा जाय ता में बन्दूक कटू गा और वहगा कि पार्टलैण्ड क उमरार और उनके जैसे लोग हा उस लिए लदा देश के मालक होने का दावा करते हैं। "रिवेक का युग' ( The Age of Reason) और 'मनुष्य के अधिकार' (The Rights of man) नामक पुस्तका क सुप्रसिद्ध लेखक थामस पेन ने भी इसी प्रकार इस समस्या का हल किया है। उनकी याजना को विशेषता यह है कि उन्होंने भूमि पर व्यक्तिगत मिल्कियत का श्रन्त परने के लिए उत्तराधिकार की प्रथा को मिटा देने का प्रस्ताव किया है ताकि एक मालिक क मरने के बाद उसकी जमीन सावजनिक सम्पत्ति हो जाय। धामम पन के बाद गत शतान्दि में पट्रिक एडपड इव ने इस बारे में विचार स्यिा और लिया। उसी योजना यह था कि जमान का मूल्य दावार मे रहता है-~-एक तो जमीन की खुट हैसियत होती है और दूगर उसपर श्रम किया जाना है। भम के पलस्वरूप जमीन की जा कीमत अननी है, उनपर व्यक्तियों का अधिकार हो सकता है । इसके मालिक और मजदूर विपरीत जमीन की स्वत जो कीमत होती है, वह तमाम राष्ट्र की सम्पत्ति समझी जानी चाहिए और इसलिए उस पर अाज ग्ल की तरह यस्तियों का अधिकार नहीं हो सकता । यह तो सारे राष्ट्र की सम्पत्ति होनी चाहिए। इस से मिलती जुलती योजना जापान की भूमि उद्धारक संस्था की है । उसका सार यह है कि प्रत्येक मनुष्य का अपने हिस्से की जमान पर अधिकार होना चाहिए, बशर्ते कि वह उस लिए एक निश्चित टैक्स देता हो और इमलिए वह अपने हिस्से से अधिक जमीन अपने अधि कार म रखने वालों से माग कर सकता है कि उसको अपने हिस्से का जमीन सांपी जाय। कितु व्यक्तिश मैं हेनरी जान की योजना को श्राय सर याजनायो से अधिक न्यायपूर्ण, लाभकारी और ‘यावहारिक समझता हू । सक्षेप में इस योजना को यों प्रक्ट किया जा सकता है। कल्पना करो कि अमुक प्रदेश में तमाम जमीन दो भू मामियां के अधिकार में है । उनमें से एक धनवान है और विदेश में रहता है और दूसरा गरीन है और घर पर रह कर रोती राड़ी करता है | और सौ किसान ऐसे हैं जिनके हिस्से में थोड़ी याही जमीन पाई है। इसके अलावा इस प्रदेश म मजदूरी करने वाले लोग और कारीगर व्यापारी, राज्य कमचारी श्रादि सकड़ा लोग ऐसे रहते हैं, जिनके पास कोई जमीन नहीं है । कल्पना करा कि इस प्रदेश के तमाम लाग फैमला करते हैं कि जमीन सावजनिक सम्पत्ति होनी चाहिए। उस दशा म उसका बवारा कैसे करेंगे। जिनके अधिकार म जमीन है, उनसे जमीन लेकर हरेक को अपनी मर्जा के मुताबिक जमीन का उपयोग करने देना यावहारिक न होगा, क्यों कि उस दशा में एक ही जमीन को कई लाग एक माथ लेना चाहेंगे और पलस्वरूप आपस के अन्य झगडे उठ खडे होंगे। सर लोग मिल कर खेती करें और बाद म पैदावार का बग्वारा करलें, यह सुविधाजनक न होगा, क्योंकि कुछ के पास हल, बैल, गाड़े आदि होंगे और कुछ बिल्कुल कोरे होंगे । इसके अलावा कुछ लोगों को खेती का अनुभव और मजदूर क्या करें। शान मा न होगा। मनुष्या की सख्या र अनुमार सर जीन का बारना त कठिन होगा। यदि जमान को इस प्रकार सटा जाय कि गल्छा, साधारण श्रीर जर भूमि पर हिम्मा में हरेज का मिल जाय वा नमीन के बहुत छाटे बाट टुक्डे हो जायगे। इस यलाना इस प्रकार का सारा पनर से खाला न होगा। कारण, जो काम न करना चाहगे या अत्यधिक गगन होगे, रुपये की खातिर अपना जमीन धनवानां य हाय बच देंगे और फिर बड़े बडे जर्मा दार और ताल्लुकेदार पैदा हो जायगे । इस लिए दस प्रदेश लोग निएय करते हैं कि जमान का उनी लागों के अधिकार में रहने दिया वाय निना अधिकार में बह चली आरही है और यह तय किया जाय कि भूम्यामा राष्ट्राग कार में एक निश्चित राम दिया और जो उम नमान की आमनी के अनुसार हा। यह रकम जमीन पर की गई मेहनन के अनुसार नहीं, बल्कि जमान को अपनी हैसियत के अनुसार निर्धारित का जाय । इस प्रकार जो प्रामदनी होती है, इससे वे श्रापम में किन्तु भू-स्वामिया मे इस प्रकार करवा दस्ट्ठा करना और उसको मर लोगों में बराबर गटना पचादा काम है। पिर सर लाग सावजनिक श्रावसकताया अर्थात् स्कूला, मदिरा, आग बुझाने व इजिना, ग्याला, समका का मरम्मत श्राटि लिए टैक्स देत है और यह रूपया सार जनिक श्राश्यकताना का पूर्ति के लिए कार नहीं होता, इसलिए इस प्रदेश क निरासियों ने मिला लिया कि जमीन का आमदनी का रुपया रकट्टा करने और उसकी बराबर वान्न क रजाय तथा सिर उसका कुर हिस्सा टक्यो क प म यसूल करने क चाय जमाने की ग्रामदनी साव. जनिक यारश्यकताया की पूर्ति के लिएसच की जाय। यह व्यवस्था करने बाद उस प्रदेश में लाग अधिक भूमि रखने वालों में अधिक और कम मूमि रखने वाला से कम पैसा मागते हैं, और कुछ लोग जिनके पाम कुछ जमीन नहीं है, उ नहीं माने। और उहे उन मुविधाओं मालिक और मजदूर का लाभ उठाने देते हैं जो जमीन के लगान की रसम से सुलम की गई है। इस व्यवस्था का यह नतीजा होता है कि जा भू स्वामा अपनी जमान पर नहीं रहता और उससे बहुत थोड़ा पैदा करता है, जमीन को अपने कब्जे में रखना लाभदायक नहीं समझता और उससे इस्तीफा दे देता है। इसर विपरीत दूसरा भूस्वामा, जो अच्छा किसान भी है, अपनी जमीन का कुछ हिस्सा छाहता है और अपने पास उतनी ही जमान रखता है जितनी से यह टैक्स की रकम से कुछ अधिक पैदा कर सरे । जिन किसानों के पास थोड़ा जमीन है, जिनके पास काम करने वाले ज्यादा और जमीन कम है और जिनके पास जमीन नहीं है, पर जो सेती बाडी द्वारा अपना भरण-पोपण करना चाहत हैं, वे सन भू स्वामियों द्वारा छाड़ी हुई जमान ल लेते हैं। इस प्रकार इस योजना के अनुसार इस प्रदेश के तमाम लागा को जमीन पर रहने और उससे भरण पापण प्राप्त करने का श्रवमर मिल जाता है और तमाम जमीन उन लोगा के अधिकार में चली जाती है जो सेती करना पसंद करते हैं और उसके द्वारा अधिक उत्पादन र साने हैं। इसर अलावा सावजनिक सस्थानों की अवस्था मुखर जाती है, कारण सावजनिक श्रावश्यक्तायों के लिए पहले से अधिक रुपया मिलने लगता है। और सब से बड़ी बात यह होती है कि भूमि-अधिकार सम्बधी यह परिवतन निना किसी लड़ाइ झगडे और सून-सरात्री के हो जाता है, नमीन को वे लोग स्वत छोड़ देते हैं जो उसको मुनाफे के साथ जात-वो नहा सक्ते । यह है हेनरी जान की योजना, जिसका विभिन्न देश अथवा सारी दुनिया अपना सकती है। अब में सक्षप में अपने कथन को दुहराता हूँ। मरी श्रमजीवियों को सन्नाह है कि तुम पहले सपनो श्रावश्यकता को साफ साफ समभा और जिसकी तुमको यावश्यकता नहीं है, उसके लिए परेशानी मत उटायो। तुमको एक ही चीन की पारश्यक्ता है और वह है स्वतन जमीन जिसपर तुम रह सका और अपना मरण पापण कर सको।
मजदूर क्या करें? दूसर, मेरा सलाह यह है कि तुम साफ-साफ समझ ला मि किन साधना से तुमका अपना जमीन की जरूरत पूरी करना है । दगा फ्माद फरक, परमात्मा तुमको उमसे चार-प्रदशन कर के, हड़ताल करक, पारा समायों में समाजरादी प्रतिनिधि भेर करक तुम अपना उद्देश्य सिद्ध नहीं कर सकते। यह तभी सफल होगा, जब तुम, जिम चुरा काय समझते हा, उममें सहयोग न टा, अथात् तुम हिंसा में सहयोग देकर या भूम्यामियों के ग्वेना पर मजदूरी कर क या उनक पेत लगान पर लेकर नमान को व्यक्तिगत मिल्मियत व अन्याय का समथन न करा। तीसरी सलाह मेरी यह है कि तुम पहले से ही माच ला कि जब अमान स्वतत्र होगी तो तुम उसका किस प्रकार बांटागे। इस पर टाम टीक विचार करने के लिए तुम को यह समझना चाहिए कि जिस जमान का भूम्यामी छाड़ेंगे, यह तुम्हारी हा जायगी । तुममा ता यह समझ लेना है कि नमान का उपयाग तभी पायपृण हो सकता है और वह सन मनुष्यों में निष्पत राति से बारा जा सस्ती है जब जमान पर पिसी एक व्यक्ति का अधिकार न स्वासर क्यिा जाय, चाहे वह एक गन टुकड़ा हा क्यों न हो । सूरज का गरमी और हवा की भाति जमीन को मी सब मनुष्यों की सम्पत्ति मानने र बाद ही तुम गिना ग्मिी मेद मार क न्याय पूपक दमीन को विद्यमान यातनाया अथवा क्सिी नई योजना के अनु- सार सर लोगा में बाट सदागे। चोथा बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है । मेरो तुमको सलाह है कि अपनी जरूरतों का पूरी करने के लिए दगा, प्रान्तिया और समाजवादी इलचला द्वारा शासक पग से लदाइ मत ठाना, बल्कि अपने जीवन को मुधारो । लोगों की हालत इसलिए बुरी है कि वे बुरा तरह जीवन गिनाते हैं। और मनुष्णा व लिए इससे बढ़कर हानिकर और काइ विचार नहीं हो सकता कि उनकी दुरवस्था के कारण वे खुद नहीं है, बल्कि बाहरी परिस्थितिया है । यदि मनुष्य यया मनुष्य समाज यह समझता है कि पाह्य परिस्थिनिया उसके कष्टों के लिए जिम्मेदार हैं और उन परि मालिक और मजदूर स्थितियां को उदलने की चेय करता है तो उसके कर्ण में श्रीर पृद्धि ही हानी है । कि तु यदि वह अपने अन्तर की ओर मुड़ता है और अपने कों के कारण का अपने और अपने जीवन के भीतर खोजता है तो शीघ्र इन कारणों का पता लग जायगा और वे स्वयमेव मिट जायगे। "पहल तू ईश्वर के राज्य और सत्य की सोन कर, शेप सब अपने श्राप हा जायगा।” (बादनिल ) यह मानव जीवन का मूल नियम है चुरा जोरन बितायो, ईश्वर की इच्छा विरुद्ध, और तुम हजार कोशिश करो अपनी अवस्था सुधारने की काई नतीजा नहीं निफ्लेगा । सद् जावन पिताश्रो, नैतिकता का पयाल रखो और ईश्वर का इच्छा का अनुसरण करा और सुग्न की फाइ चिन्ता न करा, वह तुमका अपने आप प्राप्त हो जायगा और यह इस तरह होगा कि निसकी तुमने कल्पना भी न की हागा । यह बड़ा स्वाभाविक और श्रासान मालूम पड़ता है कि हम दर्वाजे को ताड़ कर भीतर घुस जाय, जिसके मातर हमारे मन का स्वग बमा है । यह इसलिए भी हमको आवश्यक मालूम होता है कि हमारे पीछे लोगों की भीड़ जमा है जा हमको दबाये जा रही है और दाजे की सार धकेल रही है । कितु दर्वाजे का ताड़ने की हम जितना हा कोशिश करते हैं, उतना ही हमारे लिए उसके भीतर घुमना कठिन होता जाता है। दाजे के द्वार सामने नहीं, हमारी अपनी पार हैं। श्रत सुख की खोज में मनुष्य का नाहरी परिस्थितियों को सुधारने को चिन्ता न करके खुद को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए । यदि यह बुराई कर रहा है तो उस उससे चिरत होना चाहिए और यदि यह भलाई नहीं कर रहा तो उसे करना शुरू कर देना चाहिए । सच्चे सुस के तमाम दाज हमेशा मनुष्य के अतर को श्रोर ही खुला करते हैं। यदि तुम यह समझ लेते हो कि तुम्हारी वास्तविक भलाइ के लिए तुम को इश्वरीय नियम के अनुसार प्राचरण करना है, भाई चारे का जीयन रिताना है, दूसरों क साथ वैसा ही याहार करना है जैसा तुम अपने साथ चाहते हो-और जिम प्रश में तुम इस तथ्य को समझोगे .
उद्धारका उपाय और समझने के बाद उस पर ग्राचरण करोगे, उसी अश में तुमको वह सुख प्राप्त नगा, जिसकी तुम कामना करते हो और तुम्हारी गुलामी का मात्मा हो जायगा। "तुम सत्य को पहचाना और वही तुम का मुक्ति देगा।" उद्धार का उपाय दूसरा से जिम व्यवहार का अाशा रखते हो, वहाँ तुम उनके साथ भी परा, क्योंकि कानून और ईश्वर का यही अादेश है। -बाइबिल "अात्मन प्रतिकूलानि न परेपा समाचरेत् ।" दुनिया में श्रमजाविया की सख्या एक अरव से भी अधिक है। खान पाने का तमाम सामग्री और मसार की समस्त चाजें, जिनपर मनुष्यों का जावन निमर है और जिनसे लोग अमार बने हुए हैं, श्रमजावी पता परते हैं । किन्तु वे जो कुछ पैदा करते हैं उसका लाभ वे स्वय नहा उगत, राज्यकर्ता और वनवान उसका पायदा उठाते हैं । इसके विपरीत भमनीची हमशा रारीरी, प्रशान और गुलामा के शिकार बने रहते हैं। और उनको उन्दा लागा क हाा अनादर सहन करना पड़ता है, जिनके लिए वे भाजन, वस्त्र और अन्य सुप-साधन सुलभ करते हैं । अमीन श्रमजारियों के हाथ से छीनकर उन लोगों की सम्पत्ति मानी जाती है ना उसपर श्रम नहीं करते । इसका नतीजा यह होता है कि स्वेती परने वाला को अपना पेट भरने के लिए जमीन के कथित मालिसा की हर अाज्ञा का पालन करना पड़ता है । यदि श्रमजीया नमान का छाड़कर भाकरी करता है या किसी मिल अथवा कारखाने म काम करने लगता है तो वह अन्य धनानां का गुलाम बन जाता है । उसको जिदगी भर दस, बारह, चौदह अथा इससे भी अधिक घण्टे प्रतिदिन काम करना पड़ता है । यह काम उसके लिए अपरिचित, नीरस, क्यर और बहुधा ६० मालिक और मजदूर स्वास्थ्य और जीवन के लिए हानिकर होता है। यदि उसकी खेती करने की सुविधा मिल जाती है अथवा पेट भरने लायक काम मिल जाता है तो उसको टैक्स देने पड़ते हैं। इसके अलावा कुछ देशा म उसको या तो तीन चार या पाच साल तक फौज में नौकरी करनी पड़ती है या पौज के खच के लिए टैक्स देने पढ़ते हैं। यदि यह रिना कर दिये जमीन को उपयोग में लाने की कोशिश करे, हड़ताल करे, या दूसरे श्रमनावियों को अपने स्थान पर काम करने से राके, या टैक्स देने से इन्कार करे तो उसे राज्य की सारी ताक्त का सामना करना पड़ता है। यह घायल होता है, मारा जाता है और पहले की भाति काम करने और टैक्स देने के लिए विवश होता है। इस प्रकार दुनिया में सबर श्रमजीवी मनुष्यों का-सा नहीं, बल्कि बामा ढाने वाले पगुनों का सा जीवन यतीत करते हैं। उनका जीवन भर वह काम करना पड़ता है, जिसकी उनको नहीं, बल्कि उनके उत्पीड़को का श्रावश्यक्ता होती है और बदले में उनसे इतना माजन वस्त्र मिल अनवरत काम करते रहें। इसके विपरीत श्रमजीपियों पर शासन करने वाले लोगों का एक अल्प समुदाय, जो उनके उत्पादन लाभ उठाता है, श्रालस्य और भोग विलास का जीवन बिताता है और क्रामा क परिश्रम का बेकार और श्रनीतिपूर्वक बर्बाद करता है। मास्का में द्वितीय निकालस राज्याभिषेक के समय लोगों को शरार और लड्डू बाटे गए । जहा ये चीजें नारी जा रही थी, लोगों की जबदस्त भीड़ जमा हो गई । पीछे वालों ने भागे वाला का और उनसे पीछे वालों ने उनको धक्का देना और कुचलना शुरू किया। किसी ने यह नहीं देखा कि श्रागे क्या हो रहा है । चलाना ने फमजारों को एक श्रोर धकेल दिया और रलवान भी भीड़ की गर्मो और वायु की कमी मारे दम घुर कर जमीन पर गिर पड़े और पीछे वालों द्वारा कुचल दिये गए, क्योंकि उनकी भी उनसे पोछे वाले धकेन रहे थे और वे रुक नहीं सकते थे। इस प्रकार कई हजार प्रादमी, जिनमें वृढ़े और जगन, स्त्री जाता है कि उद्धार का उपाय ११ और पुण्य समी थे, मौत दे ग्रास बन गए। बद यह मारा काएट समापन हो गया ता लोग दलान करने लगे कि टमुक लिए दगा कौन ! कुछ ने पुलिस का शापा बनाया और कुछ ने बार का अपराधी बताया, जिसने ऐसे मूचनापण मावन का श्रापालन किया । फिन्तु मच गत यह है कि टाप म्वय उन लागा का या जादा चार लड्या और शराब का एक एक बानन अपने पड़ोसियों से पहले पाने का ग्वातिर दूसरे लागा का जरा मा पाल किरविना आगे नपट पडे और धक्का मुकमी रक उहं कुचल डाला। प्रमतारा जगत में भी कग टाक यही बात नहा हा रहा है । वे रास्ति हान, पलित और गुलाम ठिप इसलिए हो रहे हैं कि नगर लाम के लिए वे अपने और अपने भाइयों का जीवन नाट कर देते हैं। श्रमजाना भूम्यामियां, शासकों और कारमाना क मानिकों का शिग वत करते हैं । किन्तु भूस्वामियों द्वारा जमान का शापण, शासन द्वारा टेक्सा का वसूली, कारखाना के मालिका द्वारा श्रमजीपिका का शापण और फौजा द्वारा हडताना का दमन तमा सम्मन होता है जब श्रमजानी र उन सबका मदद पहुँचाने हैं और जिन बातों का वे शिकायत करते हैं उनका वे स्वय करा हैं। य िक भूमामा खुर म्वेता न करक हजारा एक बमान से लाभ उठाता है तो इसका कारण यह है कि अमनागी अग ही लाम की गातिर उस मम्बामा का काम करत हैं, उसर पहरे बार, क्लर्क और प्राधक बनते हैं। इसी प्रकार राय-तत्र उनसे टैक्स तमा वसूल कर पाता है जब वे तनख्वाहों के लाम में प्राकर, जिनरा रकम उन पास से ही जमा होती है, पटेल, पटयारी, पुलिस क मिाहा, श्रावकारी और कम्य्म के कर्मचारा उनते हैं और इस प्रसर वहा काम करन में मदद देते हैं, जिमका हें शिकायत होता है। श्रमजवा दम बान का मी शिकायत करते हैं कि कारखाना के मालिक उनको मनरी कम कर देते हैं और उन्हें ज्यादा से ज्याग घण्टे काम करने के लिए मजबूर करते हैं, किन्तु यह मी तमी सम्मन हाता है बर मनापी ग्राम ६२ मालिक और मजदूर में प्रतिस्पद्धा कर के खुद ही अपनी मजदूरी घग लेते हैं और गोदाम रक्षक, निरोक्षक, पहरेदार और मुरय क्मचारी की हैसियत से कारखाना के मालिका के नौकर बन जाते हैं। वे अपने मालिका के लाभ के लिए अपने साथियों को हर तरह सताते हैं, उनकी तलाशिया लेते हैं, उनपर जुर्मान करते हैं। श्रमजीविया को शिकायत है कि यदि वे उस जमीन पर जो खुर उनकी है कब्जा करने की कोशिश करते हैं, या वे टैक्स नहीं देत या हड़ताल करते हैं तो उनर यिमद्ध पोजें भेज दी जाती हैं। किन्तु दन पोजा में सैनिक वही श्रमजीवी होते हैं जो यक्तिगत लाम का सातिर या दण्ड क भय से मेना म भर्ती होते हैं और अपने अन्त वरण और ईश्वरीय नियम के विपरीत यह शपथ लेते हैं कि वे उन सब को मारेंग, जिनको मारने की उहे याज्ञा दी जायगी। इस प्रकार अपनी मारी मुसीनता के लिए श्रमजीवी स्वय ही जिम्मेदार हैं। जरूरत सिफ इस बात की है कि वे अपने उत्पीड़कों की सहायता करना ट पर दे और उन तमाम कष्ट स्वयमेव समाप्त हो जायगे। तब वे ऐसे काम क्या करते हैं, जो उनको जर्नाद कर देते हैं ? दो हजार वप पृय एक महापुरुष 1 लोगों को इस ईश्वरीय नियम का उपदेश दिया था कि-"मनुष्य को दूमरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, जैसा कि वह चाहता है कि दुसरे उसके माथ परें ।" इसको हम समाचरण का नियम भी कह सकते हैं। चीनी महापुरुष कफ्यूशस ने इसी नियम को या कहा है-'दूसरों के साथ यह व्यवहार न करा जो तुम नहीं चाहते कि दूमरे लाग तुम्हारे माय करें ।' यह नियम सरल और हरेक मनुष्य की समझ में श्राने योग्य है और स्पात उसके द्वारा मनुष्य का मब से अधिक हित हो सकता है। गौर इसलिए इस नियम का ज्ञान होते ही मनुष्यों को यथासम्भर तुरन्त उस पर अमल शुरू कर देना चाहिए और भावी पाढ़ी को उसका शिक्षा देन और उसका पालन करवाने म अपनी समस्त शक्ति खच कर देना चाहिए ।
उद्वारका उपाय ६३ मनुष्यों का बहुत पहले से इस नियम का पालन शुरू कर देना चाहिए था । कारण, कन्फ्यूशस और बुद्ध, यहृदी धर्माचाय हिलेल और ईमाने प्राय एक ही समय में इसका उपदेश दिया था। खास कर साइ जगत के लिए तो इसका पालन करना ग्रासश्यक था, क्योंकि वह बाइबिल को अपना धम प्रय साकार करता है जिसमें कहा गया है कि यह नियम सब निया का सार है, अर्थात् उसम वह सर शिक्षा भरी पड़ी है जो मनुष्य के लिए यावश्यक हो सकती है। कितु हजारा प बीत जाने पर भी मनुष्यां ने न तो स्वय इस नियम का पालन किया पोर न अपनी सतान को उसकी शिक्षा दी । अधिकतर मनुष्य तो इस नियम को जानते ही नर्ग, और यदि जानते भी हैं तो उसका अनावश्यक और अव्यावहारिक समझते हैं । शुरू म यह बात अजीब सी मालूम देती है । किंतु जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि इस नियम का पता लगाने के पहले लोग किम प्रकार रहते थे और उस दशा म वे क्तिने असे तक रहे और यह नियम अाधुनिक मनुष्य जीवन से कितना भिन है, तो हम यह समझने दम नियम का पालन क्या नहीं हुआ। बात यह हुई कि मनुष्य का दम नियम का पता न था कि सन लोगा के लिए हरेक प्रादमी का दूसरा के साथ चैमा ही व्यवहार करना चाहिए, जैमा यह दूसरों से अपेक्षा रखता है और इसलिए हरेक श्रादमी ने अपने लाभ को चातिर दूसरे मनुष्या पर अधिक से अधिक सना प्राप्त करने की काशिरा को और यह सत्ता प्राप्त करने के बाद बिना स्मिी राक गेफ ने उससे लाभ उठाने के लिए उसको अपने से अधिक उलगनों के अधीन हो जाना पड़ा और उनकी सहायता करनी पड़ी। इसी प्रकार इन बलवान व्यक्तियों को अपने से अधिक बलवान व्यक्तियां की शरण म जाना पड़ा। इस प्रकार जो समाज सम अाचरण परिचित नहा होता, अर्थात् टूमरों के साथ वैसा ही यहार करना, जैसा कि हम लगते हैं कल्याण इस नियम ६४ मालिक और मजदूर चाहते हैं कि दूसरे लाग हमारे साथ करें, उसमें हमेशा मट्टीमा लाग यारी श्रादगिया पर शासन किया करते हैं । और इस लिए यह समझ में श्रा नाता है कि जन मनुष्यों को इस नियम का शन कराया गणता ये मुट्ठी भर लोग, जो शेष समाज पर अधिकारारूद थे, न केवल पर इस नियम को मानने को तैयार नहीं हुए बल्कि उनका यह भी गयारा न हुया कि उनके प्रधानस्य इस नियम को जाने और उस पर अमन करें। अधिकारारूढ मुद्रा भर लोग जानते थे और अच्छी तरह जानते हैं कि उसकी मत्ता का अाधारी इस बात पर है कि उनो अधीनम्य लाग निरन्तर आपस में लड़ते रहे और एक दूसरे का गुलाम गाने की कोशिश करते रहे। शोर इसलिए उदोने हमेशा इस साल का प्रयत्न पिया कि अधीनस्थ लोगों को इस नियम का पता न चले और अब भी उनकी यही कोशिश रहती है। वे इस नियम का मार नहीं करते, क्योंकि यह इतना स्पष्ट और सरल है कि उससे इन्कार नाया जा सकता है किन्तु वे अन्य सैक्दो नियमा को सामने रखते हैं श्रीर कहते हैं कि ये नियम सम श्राचरण नियम से अधिक महत्वपूण भोर माननीय है। इस प्रकार वे इस नियम पर पर्ग द्वालने है। धमाचाय धम का नाम लेकर सैंड्रा प्रकार के विधान करते हैं जिनस मम याचरण इस नियम से काद मेल हा ठता | TET वे सबसे अधिक महत्वपूर्ण ईश्वरीय नियम सतात है और कहते हैं कि यदि उनम पालन न किया गया तो अनन्त काल तक नरक भोगना पड़ेगा। शासर लाग धर्माचार्यों की शिक्षा का उपयोग करते हैं । उसके श्राधार पर राजकीय नियम का निर्माण करते है जो सम आचरण के शियम के सवथा प्रतिकून हाते हैं । वेदन नियमों का डरडे के जार पालन परवाते हैं। दम बाद पढ़े लिखों और धनवानों की एक श्रेणी होती है। इस श्रेणी के लोग न इश्वर का मानते हैं और नक्सिी इश्वरीय नियम को। वे कहते है कि संसार में यदि कुछ है ता विज्ञान और उसके नियम, जिनकी पढ़े लिखे लोग पोज करते हैं और जिाको केरल धनिक जानडे उद्धार का उपाय हैं। वे कहते हैं कि सर लागों के हित के लिए यह आवश्यक है कि लोग उन जैसा श्रालसी जीवन रिता यानी स्चूला में जाय, व्याख्यान सुनें, नाटक सिनेमा देखें, समाश्रों में जाय प्रादि-श्रादि । उनका कहना है कि हमने उपरान्त उन सब कर्ण का स्वयमेव अन्त हो जायगा, जिनसे श्रमजीवी आज पीड़ित है। इन लोगों में से कोई मा उस स्वर्ण नियम का सएडन नहीं करता, किन्नु साथ साथ वे इतने धार्मिक, राजकीय और वैज्ञानिक नियम भागे भर देते हैं कि उना बाच वह सरल स्पा और सप मुलम इश्वरीय- नियम, जिम पालन स अधिकाश मनुष्या के कष्टों का अन्त हो सकता है, न काल अगोचर कि लुप्त हो जाता है । या कारण है उस याश्चयजनक स्थिति का, जिसमें श्रमजीवी शासको और धनिकों द्वारा पीढा टर-पोटी पद्दलित होते रहने पर भी अपने और अपन दूसरे भाइयों का जीवन गार करते रहते हैं, अपने उद्धार के लिए अत्यन्त पेचाता, चतुराईपण और विविध उपायों का अवलम्बन करते है अर्थात् प्राथनायें करते हैं, देवताओं के भट पूजा चढाते हैं, राजकीय नियमों का सिर झुका कर पालन करते हैं, सभायें करते हैं, सस्थायें बनाने हैं, अमजीवी संघ कायम करते हैं, हड़ताल करते हैं और कान्तिया पाते हैं। मितु वे उम एक मार उपाय का यानी इश्वरीय नियम का पदारा नहीं लेते जा निश्चय ही उनके समस्त क्यों को दूर कर सकता है । जो लोग धार्मिक, राजनैतिक और वैज्ञानिक टलाला के जाल के अग्यस्त हैं, वे कहंगे-"किनु क्या यह सम्भव है कि दम सरल और सदिम फ्थन में तमाम ईश्वरीय नियम और मनुष्य के नीचन का पय मन भरा पड़ा है।" यह लोग समझ बैठे हैं कि इश्वराय नियम और मनुष्य जावन का पथ प्रदशन पेचीदा मिद्धान्तों में निहित होना चाहिए और इसलिए वह इतने सनित और सरल क्थन में प्रक्ट नहीं किया नामकता। यह सच है कि सम अाचरण का यह नियम बहुत सक्षिप्त और मालिक और मजदूर सरल है, किन्तु उसकी सदिप्तता और सरलता ही यह सिद्ध करती है कि निर्विवाद, शाश्वन, सत्य और न्यायपूर्ण नियम है। यह नियम समस्त मानर समाज के हजारों वर्षों के अनुभव का निचोड़ है, वह किमी एक सम्प्रदाय, राज्य अपरा विशनवादी दल के मस्तिष्क को उपज नहीं है। सृष्टि श्रारम्भ विषयक धार्मिक कल्पाना और धारा समाना, सर्वोपरि सत्ता, दगड, सम्पत्ति और मूल्य का सिद्धान्त, विज्ञान का वर्गीकरण श्रादि आदि विषयों की चर्चाश्राम बड़ी गम्भीरता और बुद्धिमत्ता हो सस्ती है, रितु उनका उपयोग सिप मुद्रा भर लागों के लिए है । इसके विपरीत यह नियम, कि दूसरा के साथ वैसा ही व्यवहार करा जैसा कि तुम दूसरा से अपने लिए चाहते हो, सव सुलभ है और जाति, धर्म, शिक्षा और उसका उस पर कोई असर नहीं पड़ता। इसा अलाया जा धार्मिक, राजनैतिक और वैशानिए दलीलें एक समय और एक स्थान में सही मानी जाती हैं, वही दूसरे समय और दूसरे स्थान पर गलत मानी जाती हैं । किन्तु सम याचरण का यह नियम सवत्र सही माना जाता है और उसको एक बार समझ लेन चाली । लिए कभी गलत नहीं हो सकता। कितु इस नियम म और श्रय नियमा म मुरय श्रतर और खास लाभ यह है कि धार्मिक, राजनैनिक और वैज्ञानिक नियम मनुष्यों को मन्तोष नहीं देत और न डाका हित माधन कर मक्ते हैं । यही नहीं, उनसे बहुधा भारा शत्रुता और मुमीत पैदा हा जाती है। कितु दूसरों साथ वैसा ही यवहार करना, जैमा कि दूसरों से हम अपो लिए चादते हैं या दूसरों के साथ वैसा व्यवहार न करना, जैसा हम अपने लिए न चाहत~-यदि इस नियम को हम स्वीकार कर लें तो उससे सद्भावना और हित साधन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। और इसलिए इस नियम के परिणाम बेहद लाभकारा और विविध होगे। उससे मनुष्यों व तमाम पारस्परिक सम्बध निर्धारित हो जायगे और सपत्र विद्वेष और सपए के स्थान पर सद्भावना और सेवा उद्धार का उपाय का राज्य हो जायगा। यदि लोग उस माया जाल से मुक्त हो जाय, जिसने नका दृधि से इम नियम का दिया हुआ है, उसकी अनिवायता को चीर करलें और जीवन में उस पर ग्राचरण करें तो एक नये ही ज्ञान का नम हा जाय, जो सवसाधारण की सम्पत्ति होगा और दुनिया में मर से अधिक महत्वपूर्ण होगा। यह विज्ञान रतायेगा कि इस नियम आधार पर किम प्रकार विभिन व्यक्तियाँ एव व्यक्तियों और समाज के तमाम समपों का अन्त पिया जा सकता है। और यदि इस नवीन विज्ञान का नाम और विकाम हो जाय और जिस प्रकार आज कल हानिकर अध बश्वामों ओर बहुधा वकार या हानिकर विद्वानों को शिक्षा दी जाती है, बमा प्रकार उसकी भी तमाम जनता और नाला को शिक्षा दी जाय । मनुष्य का सारा जीवन ही बदल जायगा और साथ ही उस कामय नानापण का भी अत हो जायगा, जिमका अधिकाश मानर समाज याज शिकार बना हुआ है। बाहारन की परम्परा का यह दावा है कि समाचरण का नियम कर हाने से बहुत पग्ले परमात्मा ने मनुष्यों के लिए अपना कानून नाया। इस कानून में यह आदेश भी शामिल था कि "क्सिी को मारो नत " यह श्रादेश अपने ग्रारम्म काल में सम याचरण के नियम के नमान ही महत्व पूर्ण और परिणामकारा था, रितु उसकी भी वही दशा , जो पिछले नियम की। यापि लोगा ने उसका प्रत्यक्ष रीति से नए-न नहीं किया, रितु पिछले नियम की भाँति वह भी अन्य विधि गानों के जमघट में लुप्त हो गया, और यह विधि विधान माना जीवन । प्रखएडनीयता के नियम जितने हा या उमसे भी अधिक महत्वपूर्ण मझे जाने लगे। यदि केवल यही एक आदेश हुया होता कि-'तू मी का न मार' तो मनुष्यों को मानना पड़ता कि यह नियम अपरि बननीय और अनिवार्य है और उमको जगह और काइ नहीं ले सकता। यदि मनुष्य केवल इसी इश्वरीय नियम को स्वापार कर लें और उसका बड़ाई के साथ पालन करे, कम से कम उतनी कदाई के साथ, जितनी 'मालिक और मजदूर । चाहे सैंकड़ों, हजारों साथियों का अनिष्ट ही क्या न होता हो, वह ६६ प्रतिशत उस मौके का लाभ उठाये बिना न रहेगा अथवा उसका क्सिा पूजीपति के यहा रहे वेतन पर नौकरी मिल जाय, श्रथवा वह जमीन खरीद ले या मजदूरी के जरिये किसी व्यवसाय का संगठन पर सम तो वह बिना किसी हिचकिचाहट + यह काम करने का उपन हा जायगा और मालिक की हैसियत से अपने विशेष अधिकारी का जमजात भूस्वामियों और पूजीपतियों से भी ज्यादा चारा व साथ समथन करेगा। और हिंसा के काम में सहयोग देने की बात तो न क्वल नैतिक दृष्टि स गलत है बल्कि श्रमजीवियां और उनके साथियों के लिए अत्यन्त घातक है । श्रमजावियों की गुलामी का मूल आधार यही है । किन्तु इस विषय में काई चिन्ता नहीं करता और इस बात को बिल्कुल सामाग्य समझता है। ऐसी अवस्था में जहा मनुष्यां का यह हाल हो, क्या वतमान से भिन किसी मानव समाज की रचना की जा सकती है ? श्रमजीवी अपनी दुदशा के लिए भूत्वामियों, पूजापतिया और शासका की लोभवृत्ति और निदयता को उत्तरदायी ठहराते हैं, कितु उनमें से सब अथवा प्राय सय, जिनका ईश्वर और इश्वरीय नियम म काई विश्वास नहीं है, इसी प्रकार छोटे कि तु असपल रूप में भूस्वामी, पूजीपति और शासक हैं। एक देहाती लड़का श्राजीविका की तलाश में शहर में अपने एक मित्र के पास श्राता है। एक बड़े सेठ क यहा काचरान की जगह खाली होती है। लड़का कहता है कि वह उस जगह प्रचलित दर से कम वेतन लेकर काम करने को तैयार है । उसे नौकरी मिल जाती है, किंतु दूसरे दिन वह सुनता है कि इस जगह पहले एक बुड्ढा काचवान काम करता था जो श्रम बकार हो गया है और उसके सामने पट का सवाल पैदा हो गया है। लड़के का बुड्ढे की हालत पर पड़ा सेद हाता है और यह अपनी नौकरी से इस्तीफा दे देता है । कारण जा, बर्ताव उसे अपने लिए पसद न हो, यह दूसरा के साथ वही बताव क्या करता ? दूसरा उदाहरण एक बड़े परिवार वाले किमान का है। वह एक उद्धार का उपाय घनिक और कस कर काम लेने वाले भूस्वामी के यहा अच्छे वेतन पर प्रबधक बन जाता है। इस प्रकार अपने परिवार के भरण-पोषण की चिन्ता से यह मुक्त हा जाता है और सताय की सास लेता है। कि तु ज्यो हो वह काम महालता है, उमको देहातियों पर जुर्माने करने पड़ते हैं। कारण उनके मवेशी जमादार के बारे में घुस गये थे। उसे जमींदार के जगल से ई धन लाने वाली औरतों को गिरफ्तार करना पड़ता है। उसे मजदूरी की मजदूरिया घटानी पड़ती हैं और क्स कर अधिक से अधिक काम लेना पड़ता है। उसका अन्त करण उसको यह सब कुछ करने का गवाही नहीं दता । वह अपने परिवार क कहने सुनने की कोई परवाह नहीं करता और नौकरी छोड़ देता है और स्म श्रामदनी वाले और रिसा साम में लग जाता है। तीसरा उदाहरण एक सैनिक का है। अपनी कम्पनी के साथ मजदूर्ग के विद्राह को दराने के लिए उसको लाया गया है और गाली चलाने का हुक्म दिया गया है। वह ऐमा करने से इकार कर देता है और सब प्रकार का उत्पीड़न महने के लिए उद्यत हो जाता है। यह मर लोग ऐसा इसलिए करते हैं कि उनको उस बुराई का पता हाता है जो उहें दूसरों के प्रति करनी होती है । उनका दिल उनको कह देता है कि यह काम इश्वर के नियम के विरुद्ध होगा। उन्हें वह काम न करना चाहिए जो वे अपने लिए नहीं चाहते । किन्तु यदि कोई श्रमजीवी यह नहीं जानता कि यह किमी काम की मजदुरी सस्ती कर के दूसरे मजदूरों को नुक्सान पहुंचा रहा है तो इस से उम पराइ की मात्रा कम नहीं हो जाती, जो वह अपने साथियों की कर डालता है। और यदि कोइ श्रमजीवी मालिकों की तरफ हो जाता है और अपन साथिया र नुकमान को देखता या महसूस नहीं करता, तो भी अनित्र तो अनिष्ट हो रहेगा ! जो मनुष्य सेना में भर्ती होता है और जरत पड़ने पर अपने भाइयों को मारने के लिए उद्यत होता है, वह भी अनिय ही करता है । सेना में भर्ता हाते समय चाहे उमका यह न मामलू मालिक और मजदूर पड़े कि उसे कहा और किस का मारना पडेगा, पर यह यह ता समझ हो सकता है कि गोली चलाना और सगीन भांकना उसका काम होगा। अत्याचार और बधन से छुटकारा पाने के लिए अमजोरियों का अपने भीतर यह धार्मिक भावना पैदा करना चाहिए अपन माइया की हालत बिगाड़ने वाला कार्य करने से रोकती है, चाहे हालत बिगाती हुई भले ही न दिखाई दे। उनको धार्मिक शपथ ले लेनी चाहिए कि (१) यदि सम्भव हो तो वे पूजीपतियों के अधीन काम न करेंगे। (२) प्रचलित से क्म मजदूरी पर काम न परेंगे। (३) पू जीपतियों की यार मिल कर और उनके हितों का पोपण करके अपनी अवस्था न सुधारेंगे और राजकीय बल प्रयोग में किसी प्रकार सहयोग न देंगे। अपने कार्यों के प्रति इस प्रकार की धार्मिकवृत्ति रसकर फे श्रमजीवी अत्याचारों से छुटकारा पा सकते हैं। यदि श्रमजीवी लोभ अथवा भय के वशीभूत होकर संगठित हत्याकारी दल म शामिल होता है, अपने यक्तिगत लाभ की सातिर जान बूझकर अपने से ज्यादा जरूरतमद श्रमिक + पेट पर लात मारता है, वेतन की सातिर अत्याचार करने वालों के पक्ष में हो जाता है और उनक कामों में सहयोग देता है, और उसकी अन्तर अात्मा इसके लिए उसका नहीं सोचती तो उसको किसी को दोप देने का काई अधिकार नहीं। अपनी स्थिति के लिए यह स्वय जिम्मेदार है । यह या तो पद्दलित हो सकता है या पीड़क । इसोप्रलाप तीसरी स्थिति नहीं हो सकती। इश्वर और ईश्वरीय नियम में श्रद्धा न हुई तो मनुष्य अपने अल्प जीवन में अधिक से अधिक सुत्र प्राप्त करने का प्रयत्न करेगा चाहे इसका परिणाम दूसरों के लिए कैसा भी क्यों न हो। और जब लोग अपनी अपनी चिंता फरेंगे, अपना ही अधिक से अधिक मुग्व गोजेंगे, और दूसरों पर पड़ने वाले ननी का कुछ पयाल न करेंगे तो समाज सगठन का कैसा भी रूप क्यों न हो, अनिवायत मनुष्यों का ऐसा समूह अस्तित्व में थायेगा, जिसमें चोटी पर होंगे मुट्ठी भर शासक लोग और नीचे हांगे असाय पलित !
सत्ता नाम स्वतंत्रता ७३ सत्ता बनाम स्वतत्रता मावि शैली ने लिया है "समार में सब से घातक भूल यह हुई कि राजनाति और नीति शास्त्र का अलग अलग समझा गया।" श्रमजाया क्या करें"शीपक विध में मैंन अपनी यह सम्मति मकर का है कि यदि श्रमजारा अपो कष्टों का अन्त चाहते हैं ता यह आरश्यक है कि वे अपना वतमान जीवन कम ल दे अर्थात् अपनी व्यक्तिगत मनाई की खातिर अपने पड़ोसियों ने माय सप न करें, और बाइबिल के इस नियम का अनुसरण कर कि मनुष्या का दूसरों के साथ वैमा हा बर्ताव करना चाहिए बैसा वह दूसरों से अपने लिए चाहता है । जैसा कि मुझ प्राशा थी, अत्यन्त विरघा विचार रखने वाले लोगों ने एक ही स्वर से मेरे प्रस्तान की निन्दा की है । लोग करते हैं "मरा प्रस्ताव अलौकिक है, अयापहारिक है । जो लोग अत्याचार श्रोर हिंसा के शिकार हो रहे है, वे जब तक धमात्मा न बन जाय तर तक उनका मुक्ति के लिए प्रतीक्षा करते रहना वतमान बुराइ को स्वीकार करना और निप्रिय वन कर यठ रहना होगा।" इसलिए मैं यहा याडे-से में यह बता देना चाहता हूं कि मैं उस प्रस्ताव को इतना अव्यावहारिक क्या नहीं मानता जितना जि यह प्रतात हाता है, बल्कि मेरी राय में वनमान समाज व्यवस्था को सुधारने के लिए. वैज्ञानिको ने का उपाय मुझाये हैं, उन सब की अपेक्षा मेरे प्रस्तार पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। मेरा कहना ग्वामतौर पर उन लोगा के लिए है जो इमानदारी से, रामों में नहीं बल्कि काय म्प में, अपने पड़ौसियों की सेवा करना चाहते हैं । मामानिक आरन के आदश, जामनुष्यों को प्रवृत्तिया का पथ प्रशन करते हैं, बदलते रहते हैं और के साथ माना जापन का व्याया- म मी चलता रहता है। एक जमाने में सामाजिक जीवन का श्रादश पण 'पापिक सतरता' या। इसके अनुसार माना नानि का एक मालिक और मजदूर भाग दूसरे भाग को अपना यश चलते निगलने की कोशिश करता था। यहा निगलने शद का उपयोग यथाथ और अलकारिक दोनों ही रूप में क्यिा गया है। इसके बाद ऐमा नमाना श्राया बर एक अादमी की सत्ता सामाजिक श्रादश न गया और लाग अपने शासकों के प्रति श्रादर प्रकट करने लगे और न येवल स्वेच्छापृषक रल्कि उत्साहपूर्वक उनके अधीन हो गए । रोम और मिश्र के इतिहास इस उदाहरण हैं। इसके बाद लोगो ने जीरन उस मगठन का अपना वादश माना जिमसे सत्ता को सत्ता की खातिर नहीं, बल्कि मनु या के जीवन के उत्तम सगठन के लिए श्रावश्यक समझा गया । इस श्रादश को पूर्ति के लिए एक समय विश्व-व्यापी एक-तत्री राज्य स्थापित करने का उद्योग हुआ, पिर विभिन्न एक-तत्री राज्यों को एक सूत्र म थापद रमने और उनका पथ प्रदशन करने के लिए विश्व यापी धामिक सत्ता का प्रादुर्भाव हुआ। इसके बाद प्रतिनिधि शासन के श्रादश का नम हुआ और फिर प्रजा तर का। प्रजातन में कर्णसार्वत्रिक मताधिकार था और कहीं नहीं । श्राज क्ल यह माना जाता है कि उम श्रादरा की पूर्ति ऐसे श्राधिक सगठन द्वारा हो सकती है जिसमें श्रम के समस्त साधन व्यक्तिा की सम्पत्ति हाने के बजाय सारे राष्ट्र की मम्पत्ति हा । यह आदश एक सरे से कितने ही भिन व्यों न हो, उनको जीवन में कार्य रूप देने के लिए हमेशा सत्ता का श्रावश्यक समझा गया । सत्ता से मतलब दबाने वाली सत्ता से, जो मनुष्यों को स्थापित कानूनों को मानने के लिए बाध्य करती है । श्राज भी यही समझा जाता है। यह समझा जाता है कि सवमाधारण का अधिक से अधिक हित. साधन करने के लिए कुल ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है, जिनके हाथ म सत्ता साप दी जाय और ना ऐमा सगठन कायम करके बनाये रखें जिसमें नागरिकों को अपने काम, अपनी स्वतता और अपने जीवन पर दूसरों की ओर से प्रारमण होने का कम से कम ग्वतरा हो। चीनी शिक्षा के अनुमार यह काम कुछ धर्मात्मा यक्तियों को और यारोपीर सत्ता घनाम स्वतंत्रता शिक्षा के अनुसार प्रजा द्वारा अभिषिक्त या निर्वाचित व्यक्तियों को सापना चाहिए । ना वतमान राजकीय संगठन को मानव जारन के लिए श्रावश्यक समझते हैं, न काल वे, बल्कि मान्तिकारी और समानचादी, जा यद्यपि वर्तमान राजकीय संगठन में परिवर्तन का जरूरत महसम करते हैं, फिर मी सत्ता को समाज व्यवस्था के लिए पारश्यक समभन हैं | पोर इस सत्ता का अर्थ है कि कुछ लोगों को स्थापित कानूनों का पालन करवाने के लिए दूसरों को बाध्य करने का अधिकार हो । प्राचीन काल से लगार आजतक यही स्थिति रही है। किन्तु जिन लोगों को सत्ता के सहारे कुछ नियम मानने के लिए बाध्य किया गया उन्होंने उन नियमों को सदा हो सर्वोत्तम नहीं सममा और इसलिए वे पहुधा सत्ताधीशों के विरुद्ध उठ खडे हुए, उहें पदच्युत कर दिया और पुरानी व्यवस्था पे स्थान पर नई व्यवस्था कायम की जा उनके मतानुसार सवमाधारण के लिए पहले से अधिक हितार थी। किन्तु जिनके हाथ में मा सत्ता गई, उनका सत्ता ने दिमाग खरान र रिया और इसलिए उन्होंन सर्वसाधारण के लिए नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत लाम के लिए उस सत्ता का प्रयोग किया। इस प्रकार नइ सत्ता हमेशा पुराना जैसा हो रही और वह्या पहले से भी अधिक अयायपूण मिद्ध हुई । यह तो उस अवस्था की वात हुइ जन स्थापित सत्ता के विरुद्ध विद्राह करने वाले उसे परास्त करने म कामयाब हुए। किंतु जन स्यापित सत्ता को विजय प्राप्त हुई तो उसने श्रात्म-रक्षा की भावना स मत्त हारर हमला अपनी रक्षा के साधनों को बढ़ाया और वह अपने नागरिकों की स्वतनता के लिए पहले से भी अधिक हानिकारक बन ग । भून और वतमान काल में हमेशा ऐसा ही होता आया है । १६वी गनान्दि में यारप में जा कुछ हुआ, यह इस सम्बध में खासतौर पर शिक्षाप्रद है । इस शतादि के पूर्वाद्ध में अन्तिया अधिकारात सफल हुई 1 किन्नु पुरानो की जगह लेने वाले नये सत्ताधीशों, नेपालियन प्रथम, चान्स दमा, नेपानियन द्विनीय ने नागरिकों की ग्राजाटी में वृद्धि हाँ ८० मालिक और मजदूर हुकूमत चले । ऐसी दशा म स्वत पता नहीं हो सकती और कुछ लाग मानव जाति के शेष भाग को सताते रहेंगे। इसलिए सत्ता कान अपनाया जाय ! कि तु यह काय किस प्रकार सम्पादित किया जाय और उसके बाद फैसी व्यवस्था की जाय कि मनुष्य पुन वापस में एक दूसरे के साथ नग्न हिंसा या यवहार न करने लगे। समी अराजकतावादी इस प्रश्न का एक स्वर से यही उत्तर देते हैं कि यदि वास्तव में सत्तारहित समाज स्थापित करना हो तो यह बलप्रयोग द्वारा न होना चाहिए नल्कि लोगों में यह भावना जाग्रत होनी चाहिए कि वह निरपक और बुरी वन्तु है । सत्तारहित समाज यवस्था क्सि प्रकार स्थापित की जाय, इस सरे म पराजिकतावादियों की मिन भिन्न सम्मतिया है। मि० गॉडपिन नामक अमेज और माउन्न नामक प्रामिसी विचारको ने प्रथम प्रश्न के उत्तर में लिया है कि सत्ता-रहित समाज की स्थापना के लिए लागा में ज्ञान का उदय हाना काफी होगा। उनके मना नुसार चूकि मत्ता सारजनिक हित श्रीर याय पर प्रारमण करती है, इसलिए यदि लोग) में यह विचार पैलाया जाय कि सावनिक हित और न्याय की रक्षा सत्तारहित समाज म ही हो सकता है ता सत्ता खुद ब खुद मिट जायगी। दूसरा प्रश्न यह है कि सत्ता के रिना मरीन समाज की यवस्था स्मि प्रकार मुरक्षित रहेगी। इस सम्बर में दाना ही रिचारका का कथन है कि जो लोग सवसाधारण के हित और याय की भावना स प्रेरित होंगे, वे स्वभावत सत्र से अधिक विवेस्पूण और उपयुक्त समाज ययस्था स्थापित कर लेंगे। दूसरी पार बुमानिन और प्रोगकिन जैसे अराजक्तावादी हैं, जो यद्यपि यह स्वाकार करते हैं कि सवसाधारण को सत्ता की हानियां का ज्ञान होना चाहिए और यह कि सत्ता के होते हुए मानव उनति नहीं हो सस्तो तथापि वे सत्तारहित समाज की स्थापना के लिए हिंसात्मक काति का होना सम्भव ही नहीं, श्रावश्यक भी समझते हैं और उसके लिए तयारी करते को लोगों को सलाह देते हैं। दूसरे प्रश्न का वे यो -- मत्ता बनाम स्तप्रता ८१ उत्तर देते हैं कि जब राज्य सगटन और सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार न रहेगा ता लोग स्वभावत विवेक पृण, स्वतन और लाभदायक समाज व्यवस्था कायम कर लेंगे। माक्म एनर नामक जमन और मि० टपर नामक अमेरिकन पिचारका का भी एक ही मत है । वे मानते हैं कि यदि लोग यह समझ लें कि प्रत्येक यति का व्यक्तिगत स्याथ ही मनुष्या के कार्यों का बिल्कुल पयाप्त और उचित पथ प्रशंक है और कपल मत्ता ही मानव जीवन के मुख्य अंग य पृण विकास में नाधक होती है तो सत्ता अपने श्राप मिट जोगी। कारण, उस अवस्था में न काइ उसको स्वीकार करेगा श्रोन उसमें विरमा ही लेगा। और नत्र लाग मत्ता का श्रावश्यकता न समझेंगे और उमके सम्बध में जो अध रिश्याम है, उससे मुक्त हा जायगे और चल अपने व्यक्तिगत हिता काही विचार करेंगे ता घे अपने श्राप ऐम! ममाज व्यरस्या कायम कर लेंगे ना हरेक के लिए मर से अधिक पयात और लामदायक होगी। ये मन क्थन सही है कि यदि सत्ता हित समाज की स्थापना करनी है ता बल प्रयाग द्वारा नहीं हो सकती। कारण, जामत्ता-मत्ता का मिटायेगी, व सत्ता नो रहेगी हो । सत्ता तो तभी मिट सकती है जब लोग इस सत्य का अनुभव पर नि सत्ता यमर पार हानिकर वस्नु है और इसलिए लाग न ता उमका स्वीकार करें और न उममें हिम्मा लें । यह निरिंगट सत्य है । लोगों में विकरण शान का उत्य हाने पर ही मत्ता मिट मक्ता है । मितु यह ज्ञान हो कैसा । अराजकतावादियां का विश्वास है कि सावजनिक हित, न्याय, उनति अपना मनुष्या 7 व्यक्तिगत म्बापों पर उममा अाधार हाना चाहिए । फिन्तु यह सर रातें न केवल परमार एक दूसरे विरुद्ध है, बल्कि उनके समय में लागो की कसनारे भी नही मित्र हैं। इमलिए यह नहीं माना वा सकता कि बालग प्रारम में ही एक मत नहीं है, और दिन बातों के आधार पर वे मनन निराध करते हैं, उनके पारे में उनकी मिन मिन घारपायें , ana मालिक और मजदूर उत्तर है कि आप यह कैस नानते है कि जो उपाय श्रापको सब से अधिक उपयोगी और व्यावहारिक प्रतीत होता है, उसी के द्वारा आपका लोगों की सेना करनी है । श्राप जो कुछ कहते हैं, उसका तात्पय यह है कि श्राप यह निणय पर चुरे है कि हम इसाई धम के द्वारा मानव समाज की सेना नहा कर सकते और वास्तविक सेवा राजनैतिक कार्यों द्वारा ही हो सकती है, जिसकी शोर श्राप श्रावर्पित है। सब राजनैतिक पुरुष ऐसा ही सोचते हैं और वे सर एक दूसरे से मत भेद रसते हैं और इस लिए सर सही नहीं हो सस्ते। बहुत अच्छा होता यदि हरेक मनुष्य अपनी इच्छानुसार दूसरा की सेवा कर पाता, कितु यात ऐमी नहीं है। मनुष्यों की सेवा करने और उनको अवधा मुधारने का क्यन्न एक ही मार्ग है और यह यह कि उस पर अमल किया जाय जिसके अनुसार मनुष्य का अपने को सुधारने पा प्रान्तरिक प्रयत्न करना पड़ता है। यक्ति तभी सम्पूर्णता प्राप्त करेगा, जब यह मनुष्यों से परहेज न करता हुथा हमेशा स्वाभाविक रूप से उनक बीच रहेगा और उनके साथ अधिक अच्छे और अधिकाधिक प्रेमपूर्ण सम्बध स्थापित करेगा। मनुष्यों में प्रेमपूण सम्पध स्थापित होने पर उनकी सामान्य अवस्था मुधरे बिना नहीं रह सकती। हा, यह हो सकता है कि मनुष्य को यह पता न हो कि इस मुधार का रूप क्या होगा। यह सच है कि राजकीय प्रवृत्तियां अर्यात् धारा सभाश्री अथवा हिसात्मक शान्तिकारी प्रवृत्तियों द्वारा संवा करने में हम जो परिणाम लाना चादते हैं, उनको हम पहले से ही सोच लेते हैं। साथ ही हम अानन्द दायक और विलासितापूण जीवन की तमाम सुविधाया से लाभ उठा सकते हैं, ऊचा पद प्राप्त कर सकते हैं, लोगों से प्रशसा पा सकते हैं और नहा नाम कमा सकते हैं। जो लाग एसे कामों में पढ़ते हैं, उहें कमी कमा कण मी उठाना पड़ता है। हर किस्म के सघप में ऐसे कर सहन की सम्भावना रहती है, पर सफलता की सम्भावना से उसकी क्षति पूर्ति हो जाती है । सैनिक कार्यो म कष्ट भेलने और मौत तक की सम्भावना - सत्ता मनाम पतनता रहती है, किन्तु उनको वही लोग पसद करते हैं जिनमें बहुन ११ नैतिकता हाता है और जो स्वार्थमय जीवन यतीत करते हैं | Pr विपरीत प्रथम तो धार्मिक प्रवृत्ति का परिणाम हमसा प्रतीत नहीं I दूसरे जब हम उसमा श्राश्रय लेते हैं तो हमको बाह्य सफलता पा मा चाहना पड़ता है। उसके द्वारा न केवल उच्च पद और रयाति ही ना मिलता, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से निम्नतम दर्जा मिलता है। फेल निरादर और शिदा का पात्र बनना पड़ता है, बल्कि अत्यन्त निदय उत्पादन और मृत्यु तक का सामना करना पड़ता है। इस युग में जब घम विरोधी काय करने के लिए लोगों को पशु-बल द्वारा नाघ्य रिया जाता है, धार्मिक काय करना महा कठिन है, कि तु धार्मिक कार्यों द्वारा ही मनुष्य को वास्तविक स्वतनता का भान होता है और यह निश्चय होता है कि वह अपने कर्त य का पालन कर रहा है। फलस्वरूप इस प्रकार की प्रवृत्ति ही वास्तव म परिणामकारी होती है। वह न केवल अपना मोत्तम उद्देश्य ही सफल करती है, बल्कि संयोगवश और अत्यन्त सा भाषिक एव सोधे सादे दग से वे परिणाम भी ला देता है जिनके लिए समाज सुधारक इतने अस्वाभाविक उपाय करते रहते हैं। इस प्रकार मनुष्यों की सेवा करने का एक ही माग है। यह यह कि मनुष्य सद्जोवन बितावे । यह उपाय काल्पनिक उपाय नहीं है, बसा घे लोग समझते हैं, जिनको इससे लाभ नहीं पहुंचता । हा, इसक अनि रिक्त जो उपाय है, वे सभी काल्पनिक हैं । उनके द्वारा ने लग बाटा को एक मात्र सहा रास्ते से हरा कर गलत रास्ते मग्नदन । x x मालिक और मजदूर म से अकुर, अकुर म से पत्तिया और पत्तियां म से टहनिया निकल क वृक्ष नहीं बन जाता । हम जमीन म टहनिया गाड़ सकते हैं और वे कुE काल के लिए जगल का दृश्य उपस्थित कर देंगा, किन्तु यह श्राखि हागा कारा दृश्य ही। अति शीघ्र उत्तम समाज व्यवस्था कायम करने : सम्बध म भी यही बात है। हम उत्तम यवस्था का दिग्पा कर सक- हैं, किनु ऐसे दिसावों से ता सच्ची यवस्था कायम होने की सम्भावन कम ही होती है। प्रथम ता नहा उत्तम "यवस्था न हो, वहा उत्तम व्यवस्था का चित्र बना कर लागा का धासा दिया जाता है, दूसर उत्तम व्यवस्था के य रूप सत्ता द्वारा बनते हैं और सत्ता शासक और शासि दाना का पतित कर देती है और इसलिए सच्चा व्यवस्था कायम हाने के सम्भावना पार भी कम हो जाती है। अत श्रादश को शीघ्र सिद्ध करने के प्रयत्न पिपल ही जात हैं और सिद्धि य मार्ग म बाधक भी बन जाते हैं। हिसा-रहित मुयवस्थित समाज की स्थापना-मानव जाति का यह श्रादर्श जल्दी सिद्ध होगा या देर में, यह इस पर नभर करता है कि कर जनता के शासक जो ईमानदारी के साथ लोगों की सेवा करना चाहते हैं. यह समझेंगे कि उना मौजूदा काय ही सर से श्राधक मनुष्यों को उनक उद्देश्य की सिद्धि से दूर फेंक रहे हैं । वे पुराने अधविश्वास का कायम रवकर, सन धर्मों को ठुकरा कर और लोगों को राज्य सत्ता, शान्ति श्रथवा समाजवाद की उपासना करना सिपला कर उस उद्देश्य का सिद्ध करन की अाशा नहीं कर सकते | जा लोग सच्चाई के साथ अपने पड़ौसिया की सेवा करना चाहते हैं, यदि वे क्वल इतना समझ लें कि राज्य सत्ता क समयकों और क्रान्तिकारियां क तमाम साधन कितने निप्पल होते हैं, और यह कि लोगों को उनर कण से मुक्ति दिलाने का एक ही माग है और वह यह कि वे स्वाथमय जावन को तिलाजलि दे दें और भाइचारे का जीवन निताने लगे 1-अाज की तरह अपने पड़ोसियों पर बलप्रयोग करने की सम्भावना और यौचित्य को स्वीकार न करें और न अपने यक्तिगत उद्देश्यों का पूर्ति र लिए उस बल प्रयोग म काइ भाग न, बल्कि इसके सत्ता बनाम सतप्रता विपरात जीवन में इस मूलभूत और सर्वश्रेष्ठ नियम का पालन करें कि दमका दुसरा के साथ वैसा ही वर्ताव करना चाहिए जैसा हम दूसरा मे प्रान लिए अपक्षा पते है तो आज की विवेवरहित और निदय बचन व्यवस्था का पड़ी जल्दी अन्त हो जायगा और उसक स्थान पर लगा के नये सम्कारों अनुसार नई व्यवस्था कायम हो जायगी। जरा ता विचार काजिए, जिस राज्य-मम्था की उपयोगिता नष्ट हा चुका है, उसकी सेवा करने और प्रान्ति से उसको रना करने में कितनी अधिक मौद्धिक शक्तियां का व्यय किया जा रहा है प्रान्ति के प्रयत्ना पील और राज्य-सत्ता के साथ असम्भर लड़ाई लड़ने में कितना युवकाचित और उत्साहयुक्त प्रयत्न क्यिा जा रहा है, असम्भर समाजवादी स्वप्ना को चरितार्थ करने के लिए कितनी शक्ति सच की जा रही है। जो लोग इम प्रसार कार अपनी शक्तियों को सच कर रहे हैं ओर बहुधा अपने पड़ौसिया का हानि पहुँचा बैठते हैं, यदि वे अपना शक्तियां को ग्राम विकास य निमित्त लगावें, जिसपे द्वारा कि रनम समाज व्यवस्था कायम हो सकती है, तो क्तिना अच्छा हा।
मालिक और मजदूर और यह यह कि मनुष्य खुद अच्छा जीवन बितावे | इसलिए जो लोग मनुष्य समाज में उत्तम व्यस्था कायम करने म सहायक बनना चाहते हैं, उहे ग्राम विकास के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। उहें नाइबिल की इस शिक्षा को चरितार्थ करना चाहिए कि- "अपने परम पिता परमात्मा ५ समान पूण बनो।" . समाजवाद ग्लिासता को छोड़ देना चाहिए । जब तक धन, बल और याविष्कारों का प्रयोग अनावश्यक माता के लिए किया जाता रहेगा तब तक कुछ न होगा। और यह जानने के लिए कि जनसाधारण के लिए क्या श्रावश्यक है, हमको हर वस्तु की परीक्षा कर लेना चाहिए । मुख्य वात यह है कि निदेय विषमता यों का, जो हमारे लिए अमि शाप रूप है, सहन करो के बजाय हमको अपनी सभ्यता के समस्त सुधार को छोड़ने के लिए तैयार होजाना चाहिए। यदि मैं वास्तव में अपने भाइ से प्रेम करता हूँ तो जिम समय वह घर गार विहीन हो, मैं उसका श्राश्रय देने के लिए अपनी वैठक साली कर देने में सकाच न करूगा । कितु अभी स्थिति यह है कि हम यह कहते तो हैं कि हम अपने भाई को श्राश्रय देना चाहते हैं, किंतु इसी शत पर कि पाने जाने वालों क लिए हमारी बैठक साली रहे। हमको यह निणय कर लेना चाहिए कि हमको किसकी पूजा करनी है--परमात्मा की या शैतान की। दानों की एक साथ पूना नहीं की जा सकती। यदि हमको परमात्मा की पूजा करनी है तो हम को भाग रिलास और सभ्यता का मोह छोड़ना होगा । हम उनको फिर अपना सकते हैं, कि तु तभी जन सवसाधारण समान रूप से उनका लाभ उठा मकें। सबसे अधिक लाभदायक सामाजिक व्यवस्था, चाहे वह श्रार्थिक हो श्रथवा अय प्रकार को, या होगी, जिसमें हरेक यक्ति दूसरों के मले का ममाजवाद १३ । चार AVM और दुले दिल में उसक लिए अपना हिरा वव करगा। कि सब का सहा मनाचि हो दाहक अधिक से अधिक मना हा या है। सारित मदने हानिकर मनव मान आर्थिक अथवा प्रकार का यह है बिमने प्रत्यक परि चन अपने ही लिए घर हर है, अाना हो चिन्ता रखता है और अन हा निर मानर मता पनि मन सा ऐसा हा करने लगे और कम-न-कम कुद्रों का मा लन्न न हा, जिनमें लग एक नर के लिए अन्य करते हैं, ता मरा मरान है कि मनुष्य बारित नगर माना। परन्तु लगा का दूसर्य यहित माधन कान का इतना निला नरी है। इस राित हरेक व्यक्ति दूसरों का नुकसान पहुना कर मा अपना हा কি ঘন বুনন ও জায়িয় না। লিখাৰী নিৰ है कि मनुजारन में अति शानिन दबाता है। और तत्र मामवन एक भागमा सर पर अधिर बना लता है और उनसे अपने लिए वाम गुना है। परिणाम यह निकलता है कि लाम-दित निगन श्रम ल अधिक लामगर प्रम दाने लगता है। किन्तु मनुष्या र ऐमे सगठना में रिपनना पार उत्पीड़न का नाम दाता है। मनिए लाग समानता स्थापित करने पार मनुष्यों को पानाही लिान 7 प्रयन कर रहे हैं। वे सहा ममितियां आदि का स्याना कत हैं और राजनैतिक अधिकारों के लिए लड़त हैं। ममानता स्थारित करन का हमेशा बद परिणाम निकलता है कि काम की नुमान पहुँचना हैं। वरावर-गबर वेतन न के लिए मष्ट श्रमिक नितम भनि क बगबर ला दिलाया जाता है। उपयाग का बाबा का इस तरद चरमारा किरा जाता है कि एक का दूसरे में अधिक या अच्छा ना ना मिलनों अमीन के बारे में मा यहा हो रहा है। यहा कारण है कि समान धाटे-छोटे टुकड़ों में बता जा रहा है, असमी के लिए हानिकर है। गजनेनिक अधिकारी द्वारा उपहन से मुक्त होने की कोशिश के फ्लपम्प लोगों में पहले से भी अधिक उनेजना और दुमार फैल रहे है। 1 मालिक और मजदूर इस प्रकार समानता स्थापित करने और उत्पीड़न से मुक्ति पाने के प्रयत्न हो रहे हैं, जो अभी तक सफल नहीं हुए हैं । दूसरी ओर एक व्यक्ति क अधिक से अधिक जनसरया पर आधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है । श्रम का जितना ही पेन्द्रीकरण होता है, उतना ही यह लाभदायक बन जाता है। कितु साथ ही विषमता भी उतनी ही चुमने वाली और श्रमदनीय कायम हो जाती है । तो फिर ऐसी दशा में क्या किया जाय । व्यक्तिगत श्रम लाम रहित होता है, फद्रित श्रम अधिक लाभदायक होता है। किन्तु उसके साथ विषमता और उत्पीड़न मा कम भयकर नहीं होते। समाजवादी समस्त सम्पत्ति को राष्ट्र की, माननता को सम्पत्ति बना कर असमानता और उत्पीड़न का अन्त करना चाहते हैं जिससे कि केन्द्रीभूत सघ स्वय मानव समाज बन जाय । पहले तो मानव समाज ही नहा, विभिन्न राष्ट्र भी इसकी श्रावश्यक्ता को स्वीकार नहीं करते । दूसरे जहा सब लोग अपने अपने हिता के लिए प्रयत्नशील हाँ उस मानव समाज म ऐसे व्यक्ति कहो मिलगे जा निस्वाथ भाव से मानर मम्पत्ति की व्यवस्था करें और अपनी सत्ता द्वारा अनुचित लाभ न उठावे अथवा दुनिया म पुन असमानता और उत्पीड़न को जम न दें। श्रत माता के सम्मुख यह समस्या नग्न रूप में उपस्थित है या तो द्रित थम द्वारा प्राप्त प्रगति को छोड़ा जाय-समानता म बाधा पहुंचने देने अथवा उत्पीड़न को महन करने के बजाय पाछे की ओर भी भले ही हर लिया जाय या यह स्वीकार कर लिया जाय कि असमानता और उत्पीड़न ता रहेंगे ही, जर लकड़ी को चरा पाड़ा आयगा ता खप्पचे उड़ेंगी ही, उत्पीड़ित लोगों का अस्तित्व रहेगा ही और सघष करना मानव समाज का नियम है । कुछ लाग यास्तर में ऐमा मानते भी है, किन्तु साथ ही साथ अधिकार रहित लोगों की चीप पुकार, पीड़िता क अन्दा और अन्याय पर अद हो उठने वाले लोगों की सत्य और शुम नाम पर, जिसको हमारा समाज देवन नाम के लिए ही स्वी कार करता है भानाज तीब से तीव होती जा रही है। श्रादरा समाजवाद ६५ असम्भव बात है, कम परतु यह बात एक बच्चे की ममझ में मी या सक्ती है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति सव साधारण के हित माधन की चिता करे और हरेक की एक कुटुम्ब के सदस्य की हैमियत से योग्य व्यवस्था का जाय ता सब का सब से अधिक हित साधन हो मस्ता है। पर चूकि ऐमा होता नहीं है, हरेक के दिल म नैठा नहीं जा सकता, और सबको समझा माना भी कम उस लिए बहुत लम्बा समय चाहिए, इसलिए एक ही माग रह जाता है। यह यह कि श्रम को केंद्रित किया जाय, जो कि कुछ लोगों के सवसाधारण पर प्राधिपत्य होने के कारण सम्भव हो रहा है और साथ ही नगे भूग्वों की दृष्टि से धनवानों के राग रंग की दिपाया जाय ताकि वे उस पर आक्रमण न कर सके, और उत्पी दिता को महायता पहुंचाइ जाय । श्राज यही हो रहा है, किंतु पूजी का केन्द्रीकरण मा बढता जा रहा है और असमानता तथा उत्पीड़न भी बढ़ते जा रहे हैं और अधिक कठोर हो रहे हैं । इसके माथ ही वस्तु स्थिति का शान भी -यापक हो रहा है और श्रममानता और उत्पीड़न को नि यता उत्पीड़कों और उत्पीड़ितों तानो पर ही अधिकाधिक प्रकट हानी जा रही है। इस दिशा में और भागे पढना असम्भर होता जा रहा है, इमलिए जा लोग गोड़ा सोचते हैं श्रोग् तक्युक्त परिणामों को नहीं देखने, यह काल्प निक उपाय मुझाते हैं कि ज्यादा हित माधन करने के लिए लोग का महयोग की अावश्यक्ता का मान कराया जाय, किन्तु यह वकार यात है। यदि अपना अधिकाधिक हित माधन करना ही उद्देश्य हा ता पूजी पाली समाज सगठन में प्रत्येक व्यक्ति उसे मिद कर सकता है, और इसलिए ऐसे प्रयत्ना का परिणाम वार्ता के अतिरिक्त कुछ नहीं निकलता। सब लोगों के लिए अत्यन्त लाभकारी संगठन तर तक कायम नहीं जा सकता, जन तक प्रत्येक श्रादमी का उद्देश्य भौतिक हित सा तभी सम्मव हागा जब सब लोग उस प्यावं वरना रहेगा | वह सद करने का प्रयत्न करेंगे जो मौतिक मुख से बिल्कुल अलग है श्री मालिक और मजदूर इस प्रकार समानता स्थापित करने और उत्पीड़न से मुक्ति पाने के प्रयत्न हो रहे हैं, जो अभी तक सफल नहीं हुए हैं। दूसरी ओर एक व्यक्ति का अधिक से अधिक जनसरया पर श्राधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है । श्रम का जितना ही पंद्रीररण होता है, उतना ही यह लाभगयक अन जाता है। पितु साय हो विषमता भी उतनी हो चुमने वाली और असहनीय कायम हो जाती है । ता पिर ऐमी दशा में क्या किया जाय ? व्यक्तिगत श्रम लाम रहित हाता है, फद्रित श्रम अधिक लाभदायक होता है। कि उसके साथ विषमता और उत्पीड़न मा कम भयकर नहीं होते। समाजवादी समस्त सम्पत्ति का राष्ट्र की, मानवता को सम्पत्ति बना कर असमानता और उत्पीड़न का अन्त करना चाहते हैं जिससे कि केद्रीभून सघ स्वय माना समाज बन जाय । पहले तो मानव समान ही नहीं, विभिन्न राष्ट्र भो इसकी श्रावश्यक्ता का स्वीकार नहीं करत 1 दूसरे जहा सब लोग अपने अपने हिता के लिए प्रयत्नशील हो उस मानक समाज में ऐसे व्यक्ति को मिलेंग जो निस्वाथ भाव से मानन मम्पत्ति की व्यवस्था कर और अपना सत्ता द्वारा अनुचित लाम न उठावे अथवा दुनिया म पुन असमानता और उनाइन का ज म न दें ? श्रत मानपता के सम्मुस यह समस्या नग्न रूपम उपस्थित है या तो केन्द्रित थम द्वारा प्राप्त प्रगति को छोड़ा जाय--समानता में बाधा पहुचने देने अथवा उत्पीड़न का सहन करने के बजाय पाछे की पार भी भले ही हट लिया जाय या यह स्वीकार कर लिया जाय कि असमानता और उत्पीड़न ता रहेंगे ही, अब लकी को चाग पाड़ा जायगा ता सप्पचे उहेंगी ही, उत्पीड़ित लोगों का अस्तित्व रहेगा ही और सघप करना मानव समाज का नियम है। कुछ लोग वास्लप में ऐमा मानते भी हैं, किन्तु साथ ही साथ अधिकार रन्ति लोगों की चीख पुकार, पीड़ितों के अन्दन और अयाय पर कुछ हो उठने वाले लोगों की सत्य और शुम आदश के नाम पर, जिसका हमारा समाज केवल नाम के लिए ही स्वी कार करता है, अाराज तीन से तीव्र होती जा रही है।
पद्रकरण मा बढ़ता जा रहा है और असमानता तथा उत्पीड़न भी चिनि का ज्ञान भी व्यापक हो रहा है और सममानता और उत्पीड़न की बा लोग गोड़ा सोचते हैं और तयुक्त परिणामों को नहीं देखते, यह काल्प निक उपाय मुझाते है कि ज्याठा हित साधन करने के लिए लोगों का सकता, जन तक प्रत्येक श्रादमी का उद्देश्य भौतिक हित साधन रना रगा । यह ता तभी सम्भरहागा जब सब लोग उस ध्येय को वानी समाज संगठन में प्रत्येक व्यक्ति उसे सिद्ध कर सकता है, और मिद करने का प्रयत्न करेंगे जो भौतिक सुख से बिल्कुल अलग है समानवाद ६५ परतु यह बात एक बच्चे की समझ में भी या सक्ती है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति सब साधारण के हित-साधन की चिता करे और हरेक की एक कुटुम्ब क सदस्य की हैसियत से याग्य व्यवस्था को जाय तो सब का मन से अधिक हित साधन हो सस्ता है। पर चू कि ऐमा होता नहीं है, हरेक दिल में बेटा नहीं जा सकता, और सबको समझा सकना भी अमामव बात है, कम से कम उसके लिए बहुत लम्बा समय चाहिए, इसलिए एक ही माग रह जाता है। यह यह कि श्रम को वेद्रित किया माय, जो कि कुछ लोगों क सर्वमाधारण पर श्राधिपत्य होने ५ कारण उभव हा रहा है और साथ ही नगे भूपों की दृघि से धनवानों के राग रंगको विशया जाय ताकि वे उस पर यात्रमण न कर सके, और उत्पी दिनों को महायना पहुंचाई जाय ! श्राज यही हो रहा है, कि तु पू जी का बढ़ने जा रहे हैं और अधिक कटोर हो रहे हैं । इसके साथ ही वस्तु नियता उत्पीडको और उत्पीड़ितों दोनों पर ही अधिकाधिक प्रकट हाती जा रही है। इस दिशा में और श्रागे पढना असम्भव होता जा रहा है, इसलिए हयाग की आवश्यक्ता या मान कराया जाय, किंतु यह वकार बात । यदि अपना अधिकाधिक हित माधन करना ही उद्देश्य हो तो पू जी इसलिए ऐम प्रयत्नों का परिणाम बातों के अतिरिक्त कुछ नहीं निकलता। सब लोगों के लिए अत्यत लाभकारी सगठन तर तक कायम ना मालिक और मजदूर इस प्रकार समानता स्थापित करने और उत्पीड़न से मुक्ति पाने य प्रयत्न हो रहे हैं, जो अभी तक सफल नहीं हुए हैं। दूसरी बार एक व्यक्ति का अधिक से अधिक जनमरपा पर श्राधिपत्य बढता ही जा रहा है। श्रम का जितना ही पन्द्राकरण होता है, उतना ही वह लाभदायक बन जाता है। नितु माथ ही विषमता भी उतना ही चुमने वाली और श्वसहनीय कायम हो जाती है । तो फिर ऐसी दशा में क्या किया जाय । “यक्तिगत श्रम लाभ रहित होता है, वेद्रित श्रम अधिक लाभदायक हाता है। किंतु उमा साथ विषमता और उत्पीड़न मा कम भयर नहीं होते । समाजवादी समस्त सम्पत्ति को राष्ट्र का, मानवता की सम्पत्ति बना कर असमानता और उत्पीड़न का श्रन्त करना चाहते हैं जिससे कि रेद्रीभूत सघ स्त्रय मानव समाज बन जाय । पहले तो मानव समाज ही नहा, विभिन्न राष्ट्र भी इसकी श्रावश्यक्ता को स्वीकार नहीं करते । दूसरे जहा सब लोग अपने अपने हिता के लिए प्रयत्नशील हां उस माना ममाज में एमे यक्ति को मिलग जो निस्वार्थ भाव से मानव सम्पत्ति की यवस्था करें और अपना सत्ता द्वारा अनुचित लाभ न उठावे अथरा दुनिया म पुन असमानता और उत्साहन को जाम न दें ? श्रत मानता के सम्मुस यह समस्या नग्न रूप में उपस्थित हे या तो द्रित श्रम द्वारा प्राप्त प्रगति को छोड़ा जाय-समानता म बाधा पहुंचने देन अथवा उत्पादन का सहन करन के बजाय पाछे की बार भी भले ही हर लिया जाय या यह स्वीकार कर लिया जाय कि असमानता और उत्साहन तो रहेंगे ही, जब लकड़ी का चीरा पादा जायगा ता सप्पचे उड़ेंगी हा, उत्पीड़ित लोगो का अस्तित्व रहेगा ही और सअप परना मानव समाज का नियम है । कुछ लोग वास्तव में एसा मानते भी हैं, किन्तु साथ ही साथ अधिकार रन्ति लोगों की चीख पुवार, पीड़ितों के मदन और अपाय पर ऋद्ध हो उठने वाले लोगों की सत्य और शुभ बादश के नाम पर, जिसका हमारा समाज क्वल नाम के लिए ही स्वी कार करता है अागज तीन से तीव होती जा रही है।
समानवाद ६५ पर तु यह बात एक बच्चे की समझ में भी आ सकती है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति सव साधारण के हित माधन की चिता करे और हरेक की एक कुटुम्ब के सदस्य की हैसियत से योग्य ययस्था का जाय तो सब का सब से अधिक हित साधन हो मकता है। पर चू कि ऐमा होता नहीं है, हरेक के दिल में बैठा नहीं आ सकता, और सबको समझा सकना भी असम्भर बात है, कम से कम उसके लिए बहुत लम्बा समय चाहिए, इसलिए एक ही माग रह जाता है। वह यह कि श्रम को द्रित किया जाय, जो कि कुछ लोगा क सवसाधारण पर ग्राधिपत्य होने के कारण सम्भव हो रहा है और साथ ही नगे भूगों की दृष्टि से धनवाना के राग रग को छिपाया जाय ताकि वे उस पर अाक्रमण न कर सकें, और उत्पी हितों को सहायता पहुंचाई जाय । श्राज यी हो रहा है, कि तु पू जी का के द्राकरण मा बढ़ता जा रहा है और, असमानता तथा उत्पीड़न भी चढ़ते जा रहे हैं और अधिक कठोर हो रहे हैं । इसके साथ ही वस्तु स्थिति का जान भी-यापक हो रहा है और अममानता और उत्पीड़न की निपता उत्पीड़कों और उत्पीड़ितों दोनों पर ही अधिकाधिक प्रकर होती । इस दिशा में और आगे बढना असम्भव होता जा रहा है, इसलिए जा लोग थोड़ा सोचते हैं और तक्युक्त परिणामां को नहीं देसते, यह काल्प निक उपाय सुझाते हैं कि ज्यादा हित साधन करने के लिए लोगों को सहयोग की अावश्यक्ता का मान कराया जाय, कितु यह बेकार चात है। यदि अपना अधिकाधिक गित साधन करना ही उद्देश्य हो ता पुजी वाटी समाज सगठन में प्रत्येक यस्ति उसे सिद्ध कर सकता है, और इमलिए ऐसे प्रयत्नों का परिणाम बातों में अतिरिक्त कुछ नहीं निकलता। सब लोगों के लिए अत्यन्त लाभकारी सगठन तर तक कायम नहीं हो सकता, जब तक प्रत्येक श्रादमी का उद्देश्य भौतिक हित साधन करना रहेगा । वह तो तभी सम्भर होगा जब सब लोग उम ध्येय को सिद्ध करने का प्रयत्न करेंगे जो भौतिक मुख से बिल्कुल अलग है और मालिक और मजदूर जन हरेक यक्ति दिल से यह क्हेगा-"धय हैं वे, जो गरीय हैं, धय है के, जो श्रासू बहात है और धय हैं वे, जो सताये जाते हैं। जब प्रत्येक यक्ति भौतिक नहीं, बल्कि श्रा यात्मिक कल्याण की कामना करेगा- और यह हमेशा लिान द्वारा अक्ति होता है तभी सन लागों का अधिक से अधिक कल्याण हो सक्गा । यह सीधा सा उदारण लाजिए । लोग एक साथ रहते हैं । यदि वे नियमित रूप से मपाई र, अपनी समाइ खुर करें तो सावजनिक सफाई के लिए हरेक को नहुत थोड़ा श्रम करना पडे । किनु यदि हरेक श्रादमी अपना सफाई का काम दूमरों पर छाड़ दे ता जा उस स्थान को स्वच्छ रगना चाहे यह क्या करेगा । उसका सरका काम खुद करना पड़ेगा और गदगी म लिपटना होगा । यदि यह ऐसा न करे, क्वल अपना ही काम करे तो उसका उद्देश्य पूरा न होगा । अवश्य ही यह आसानी के माथ दूसरों का अाशा दे मरता है, रितु उनमें कोई ऐसा नहीं है जा श्राशा दे सरे । एमो दशा म एक ही माग रह जाता है ग्रोर वह यह कि वह दूसरों के लिए काम करे । श्रोर वस्तुत जिस दुनिया म सब लाग अपनी अपनी चि ता करत हाँ, य* असम्भव है कि दूसरों का थोड़ा-सा काम कर देने से काम चल जाय । उसमें तो यादमो का अपने का सशृणत समर्पित कर देना चाहिए । धम भावना से प्रकाशित अंत करण नीक यही परन का श्रादेश देता है। क्या कारण है निता राजसीय बल प्रयोग द्वारा और न कान्ति और राजकीय माम्यवाद द्वारा और न ही इमाई समाजवादिया द्वारा प्रचारित माधना से अर्थात् लोगां में यह अधिकाधिक प्रचार किया जाय कि यह व्यवस्था अधिक लाभदायक होगा-या पर स्वग की स्थापना होती है ? जर तक मनुष्य का उद्देश्य अपने व्यक्तिगत जीवन का कल्याण रहता है तब तक काई भी उसको नहीं रोक सकता कि उसको अप याय्य हिम्सा मिल चुका है और आगे उसे अपना सघष बाद भर देना चाहिए अथवा मनुष्यों को ऐमी मागों मे आगे न बढना चाहिए। ।
समानवाड जो सब लागा के कल्याण के लिए आवश्यक हों । कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता, पारण पग्ल तो मालूम करना हा असम्भर होगा कि कौन सी जगह पहुंचने के बाद पूरा याय हो गया-मनुष्य हमेशा अपनी ग्रावश्यक्ताओं को यदा-चढाकर बतायगे और दूसरे यदि उचित जरूरता को मालूम करना सम्म मा दो तो मनुप जो उचित है केरन उसी के लिए माग परा नर्गर सकता, क्योंकि उनना टमे मिलेगा ही नदावह उससे कहाँ कम पा मरेगा । समाज में दूसरे लाग की जरूरत याय य श्राधार पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लाम में पयाल से निश्चिन होंगी, उम अवस्था में यह प्रस है कि हरेक प्रथक व्यक्ति को श्रावश्यक्तायो को पूर्ति न्याय्य मागां की अपना प्रतिरक्षा और सपप के द्वारा अधिक हो सकेगा। ऐसा इस समय हा भा रहा है। न्यायपूण स्थति कायम रन के लिए, जब कि लोग यतिगत हित भाधन के लिए दा सचेष्ट है, एमे लागा की कसरत गी जो यह निश्चय कर सके कि स्पायन हरेक हिस्से में कितनी सामारिक बन्नुए पानी শাহি। ইদ বাবাৰ লয় যা মী স্মাৰখানা গো লা লা কী अपने न्याय हिस्से से अधिक न लने दें। मान भी ऐसे लोग है और पहले भी हुए हैं जिन्होंने यह क्त्तय अपने सिर पर लिया है। ये और कारनमें हमारे शासक हैं। रितु अभी तक न तो सल्तनतों में और न प्रजातनाम ऐसे व्यक्ति पाये गये पिहोंने वस्तुमा की मात्रा निधारित हरने और उनका लागा में रितरित करने म अपने और अपने साथिया लिए सामा का उल्लभन न किया और इस प्रकार उस काम को न विगाडा हा जिम करने का मार दूसरों ने उनका सोश या अथवा जा मार स्वय उन्हाने अपने सिर पर लिया था। इसलिए इस साधन को समी लाग श्रसन्नोएजनक मानने लगे हैं। किन्नु अर कुछ लोग य करते हैं कि पतमान राज्यसगठनों व बजाय दूसरा विस्मय संगठन प्रायम किये लाय, जो मुररत प्राधिक मामला या नियत्रण करें। यह सगटन इस बात को स्वीकार करें कि समल सम्पत्ति और मीन सावनित है।
। मालिक और मजदूर ६८ माय परते ये मनुष्य के श्रम के यवस्था करेंगे और उस प्रम के अनुमार अथवा जैसा कि कुछ कहते हैं उनकी आवश्यक्ताश्रो के अनुमार भौतिक सुख साधना का विभाजन करेंगे। दम प्रकार के संगठन कायम करने के सभी प्रयत्न ग्रन तक निपल रहे हैं । वितु इन प्रयागा य चिना भा या विश्वास के साथ का जा सकता है कि यक्तिगत हित साधन के लिए प्रयत्नशील मानव समाज म इस प्रकार म सगठन नहीं उन सस्त । कारण जो लोग ग्रार्थिक मामला की देखभाल करगे उनम से नहुत से ऐसे ग्रामी हांगे, जिहें अपने व्यक्तिगत पिता की चिन्ता होगी और एमे ही लागा से वास्ता भी पडेगा, इसलिए नइ प्रार्थिक यवस्था स्थापित करने और उसे जारा रखने का ने अनिगायत पुराने शासकों की भाति अपना यक्तिगत हित माधन करेंगे और इस प्रकार उस काय वा असली उद्देश्य ही नष्ट पर दंगे, जो कि उना सिपुद किया गया है। कुछ लोग रहेंगे-“ऐसे प्रारमिया को चुना, ना बुद्विमान और शुद्ध दृदय हो।" कि तु जो बुद्धिमान और शुद्ध हृदय हागे वही तो बुद्धिमान और शुरु हृदय यक्तिया का चुनाव करेंगे। अोर यदि सभी बुद्धिमान और शुद्ध दृटर वाले हाँ, तो स्मिी सगटन को यावश्यक्ता ही न रह जायगी । इमलिए नातिकारी समानराठी जा कुछ कहत है, उसकी अशक्यता का व स्वय भी स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि उनका सिद्धान्त सामाविक है और सफल नहा हुया । यन इमाइ समाजवाद को शिक्षा का लोजिए । उमा मुग्प अस्त्र या है कि लागा प प्रत करण का प्रभावित करने के लिए उनम प्रचार किया नाय । किनु यह शिक्षा तभी मफल हो मक्ती है जन सत्र लाग सामुदायिक श्रम व पाय का माफ साफ समझ ल पार यह अनुभूति सब लोगों का माथ साथ हा जाय । मितु जैसा कि प्रकट है दोनाम से एक भी बात नहीं हा मक्ती, इसलिए यह प्राथिक सगठन जा प्रतिस्पर्धा और समप पर लिप मानुगयिक हिता पर निभर हा, पाय रुपम 1 समानवार परिणत नहीं हो सकता। श्रत जब ता मनुष्या का उद्देश्य यक्तिगत हितसाधन रहेगा, तर तक वनमान की अपक्षा उत्तम सगटन कापमान हो सकेगा। ईसाइ समाजराटा जा लाग प्रचार करते हैं वे यह भूल करते हैं कि अपने धर्म शास्त्र से सरल मार्वजनिम कल्याण के व्यावहारिक परिणाम काली लत हैं, किंतु उन धमशाना या सही है। तामिप यह माता है कि अम्प माग मा है। य धम शास्न नापन का माग बताते हैं और इ७ माग पर चलने मे भोतिक मुत्र प्राप्ति भी हा जाती है । भौतिक मुग मिलता अश्य है कि लक्ष्यर हनन है। यति इन धमशास्त्रों का उद्देश भी िमुग्यही हाता यह भौतिक मुग्व नही मिल मस्ता। उनका लक्ष्य ता अधिक ऊचा और दूरवता है। यह भौतिक मुल पर लिभर न करता । श्रात्मा का मुक्ति अधात मानन शरीर में ओतत्व निहित है, उमा मुतिय उद्देश्य है । “यक्तिगत जीवन का याग करन मे हा यह मुक्ति मिलती है। दूमर शग म भौतिक सुग्यो वा स्याग करना चालिए और अपने पड़ोमिया के दित माधन । लिए सचेष्ट हाना चाहिए । म प द्वारा इस रश्य को सिद्ध करना चादिए। ऐसे प्रपल के पलम्बाप हो मनुष्य मयोगवश म लोगो का सर्वश्रादित सिद्ध कर मोगा अर्थात् पृथ्वी पर मग ३) स्थापना कर मोगा। पतिहित माधन की चणा सेन नो व्यक्ति का और न मार्वजनिक हित सिद्ध गा| गाम विस्मृति की काशिश से व्यक्तिगत और सार्यजनिक दोन प्रकार के हित मपान दांग । x सिद्धान्त मानव समाज का साटन तीन प्रकार मे हो साता है। प्रथम तो यह कि मरठ, इश्वर मत व्यक्ति लागो क लिए. ऐसा मानन बनाये जिससे मानव समान का अधिक में श्रधिर कल्याण हा सये और अधिकारी इस कानून का लोगों से पालन करायें। यह उपाय काम में लाया जा चुका है। उसका परिणाम यह निकला कि कानून का पालन x मालिक और मजदूर कराने वाले अधिकारियों ने अपनी सत्ता का दुरुपयोग किया और कानून की अवहेलना की । ऐमा केरन उ हाने ही नगं क्यिा, बल्कि उनके सह योगियों ने भी किया, जिनकी तादाद काफी होती है। इसके बाद दूसरी योजना सामने आई। इसम अधिकारियां की कोई आवश्यक्ता नदा समझी गई और यह कहा गया कि जन हरेक व्यक्ति अपने अपने हित की चिंता करेगा तो न्याय की स्थापना हो जायगी। मितु यह योजना भी दो कारण से सफल न हुई। पहला कारण यह कि सत्ता को कायम रखा गया और लोग यह समझते रहे कि उसका कायम रसना पडेगा । कारण उत्तीहन फिर भी जारी रहेगा हा, और सरकार डार का पड़ने में अपनी सत्ता का उपयोग न करेगा और न डायू हा डकैती स विरत होगा । जहा अधिकारिया का अस्तित्व होना है अपने अपने हितों के लिए लड़ने वाले लोगों की अवस्था समान नहीं होती केवल यी नहा कि कुछ लोग दूसरों की अपेक्षा अधिक रलवान हाने हैं, बल्कि लोग अपने को बलवान बनाने के लिए सत्ता की मदद भी ले लेते हैं । दूसरे जहा सच लोग अपने अपने हितो निए सघप करते हैं, एक आदमी को जरा सी भी सुविधा मिल जाती है तो वह उससे कई गुना लाभ उठा सकता है और पलत अममानता का उत्तन होना अनिकाय हो जाता है। एस तीसरा सिद्धात और रह जाता है । यह यह कि मनुष्य दूसरों के हितों की चिंता वरना लाभदायक समझने लगेंगे और उस दिशा म प्रयत्नशील होंगे। ईसाई धर्म का यही मिद्धात है। पहली बात तो यह कि इस सिद्धात पर अमल हाने 7 माग में काई बाह्य अडचन पैदा नहीं होता । चाहे सर पार, पुजी वगैरा और सारी की सास वतमान यवस्था रह या न रहे, जिग घड़ी मनुष्यों की जायन १ पना ऐमी हो जागी, उसा घड़ा यह उद्देश्य सिद्ध हो जायगा । दूसरे इस उदेश्य की सिद्धि के लिए कोई खास समय की आवश्यक्ता रहा । कारण हर १६ यक्ति को इस जीवन पल्सना को अपना लेगा, और दूसरों का हित साधन करने में अपने यो लगा देगा, पद उमी क्षण से मावजनिक हित सिद्ध करने लगेगा। तोमरे भमाजवाद x X मानव जीया रे इनिदास शुरू से ही यह रात होता आइ है। x ममाजवादी करते है-"मति गौर सभ्यता की जो सामना हम का मिली हुई है, उसका छोहना हमारे लिए आवश्यक नहीं है। यह भी भारश्यक नहीं है कि हम प्रसस्त जन समुदाय का मतह पर पहुंच जाय। हम तो यह चाहते हैं कि जो लोग सासारिक सुप साधना से थकित है, उनको अपनी सतह पा ले थायें और सभ्यता और संस्कृति के घरदानों में उनका भी साझीगर अनावें । निशान की सहायता से हम यह काय सम्पादित कर सक्त है। विज्ञान हमारा प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का माग बताता है। उस द्वारा हम प्रकृति का उत्पादन शक्ति को बहुत पढ़ा सकते हैं। विद्युत के जोर से हम नियामरा प्रपात और नदियों तथा वायु की शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं । सूप अपना काम करेगा और सर लागों लिए सत्र चीना की बहुतायत होगी। अाज ता मानन समाज के एक त योडे हिस्से को, जा रधिकागद है, सभ्यता के लाभ सुलभ है और शेष भाग उनसे रचित है। सुस- साधना का बढाया और वे सर के लिए सुलभ हो जायगे। किन्तु मच यह है कि अधिकार समान व्यक्ति अनन्त काल से अपनी अवश्य पतानों की पूर्ति ही नहीं कर रहे, बल्कि जा कुल वै प्रात पर सपने है, सरको हल्प पर जाते हैं, जिसकी उहजरूरत भी नहीं होना इमलिए मुख सामरी म चार जिनो वृद्धि क्यान हो जाय, अधिकारारूद व्यक्ति उस सबका ६६प कर जायगे। कार भी यक्ति श्रावश्यक वस्तुया का एक सीमा में भीतर ही उपयाग कर सकता है, कितु माग बिलास की काई सीमा नहीं होती। हजारी मन अनाज घोड़ा और कुत्ता के लिए काम म लिपा पा सकता है, लामा एकर जमीन मगाचे लगाये जा सकते है और इस प्रकार की भोक बात को ना मरता है। भाजयी मीरदा है । इस प्रकार जातक उच वर्गा ये हाय रे राता है और पे अतिरिक्त सम्पत्ति को माग विलास १०. मालिक और मजदूर पर खच करन की इच्छा रखते है तर तक शक्ति और सम्पत्ति की मात्रा चाहे कितनी ही क्या न बढ जाय, निम्न गा के सुप साधनों म रत्ता भर वृद्धि न होगी। इसर विपरीत उत्पादन शक्ति के बढने और प्रकृति पर प्रभुत्व स्थापित होने के फलस्वरूप उच्च वगा को, अधिकारारूद्ध प्यक्तिया को और भी सत्ता प्राप्त हो जाती है जिमा द्वारा वे श्रमजावी वर्गों को अपनी सत्ता के अधीन रख सकते हैं। और निम्न-वग धनवाना से सम्पत्ति का हिस्मा रान क लिए जितन प्रयत्न करते हैं मातिया, हड़ताले श्रादि-उतना ही सधप बढ़ता है और सपप से सम्पत्ति का नाश होता है । लड़ने वाले दल कहते हैं-यदि हम को मुग्व मामग्री नहा मिलती तो दूसरा को क्या मिले। दुनिया म सुरय सामग्री की नटी बहाने के लिए, जिससे हरेक को उसका हिम्सा प्राप्त हो सके, प्रकृति पर विजय प्राप्त करना और भौतिक सम्पत्ति को बढाना ठीक वैसा ही जुद्धिरहित काय है, जैसा कि एक खुले मकान को गम करने क लिए चूल्हे में अधाधु ध लम्डी जलाना । श्याप चाहे जितनी बाग जलाइये, ठण्डी हवा गम होकर ऊपर उठ जायगी और उसका स्थान ठण्डी हवा ले लेगी और इस प्रकार मकान में समान रूप म गा न फैल सकगी । यह स्थिति तब तक रहेगी, जबतक ठएडी हवाका ग्राना और गम हया का गहर निक्लना रद नहीं होगा। अब तक जो तान उपाय सूचित किये गये हैं वे सब इतने मूगता पृण है कि यह कहना कठिन है कि उनम सब स अधिक मूररतापृण उपाय कौन सा है। पहला उपाय प्रातिकारियां का है। वे उच्च वगा को मिा हा डालना चाहते हैं जो कि सारी सम्पत्ति का चर कर जाते हैं। यह ता एमा बात हुइ कि जिस चिमनी से गमां बाहर निकल रही हो, उस चिमनी को ही तोड़ डाला जाय और यह पाशा की जाय कि जब चिमनी न होगी ता गमा भी बाहर न निक्लेगी। पर यदि प्रसाद वगी रहा ता चिमना का जगह जा सूरास हो अयगा, उससे गर्मा ज्या को त्या निम्नती रहेगी। । ।
समानमान इसा तरद जब तक मत्ता अपशिष्ट रहेगा, सपत्ति भा अधिकार सपन यक्तियां रे पास गता रहेगा। टूसरा मान पिलहम मर ने ग्रा-मारा । उमने वतमान व्यवस्था की कायम रण्वत हुए उच वर्गों व पाम केंद्रित धन का थाड़ा मा भाग लेकर दरिद्रता र असाम गत में दाना । यह ता ऐमा बात हुई कि कोई व्यक्ति चिमना के मिरे पर, नाम गनी निकल रही है, पखे लगा दे योर उनको महायना मे गम हमा का नोचे ठएडा मर” ता पहुचाने रा प्ररत्न करे। सष्ट है मिया माय मठिन पीर बेकार है, कारण गर्मी नाचे से कार का जाता है और काइ उमका नाचे को पार धनन का चाह नितना प्रयत्न क्या न करे, उस ज्यादा दूर नाचे नहीं धकेल मस्ता, वह एक गम कार का यार - यायेगा गोर दम प्रसार सारा प्रयन निरथ जायगा। तीमरा और अन्तिम उपाय यह है जिसमा ग्रासल अमेरिका में विशेष रूप स प्रचार किया जा रहा है। इसका पागप य है कि जीरन के प्रतिपद्यात्मा और प्रतिवादी ग्राधार र सजाय साम्यवादी सिद्धान्त काम्पापना की जाय, लाग संगठन यार म पाग 7 मिझात काधार पर काम कर । शब्द ग्रार साय टानो स मयाग को शिक्षा दी जाय । इमर समथक कहते हैं कि प्रतिम्पर्धा, व्यक्तिवाद और सबध से शक्ति पौर नथाप मपत्ति का पड़ा क्षय हो रहा है । इमको अपेक्षा सहयोग क सिद्धान द्वारा कहा अधिक लाभ उठाया जा सकता है। अथात् हरेक व्यक्ति मामुलारिक हित के लिए काय करे पोर बाद उसको सामुदायिक सम्पत्ति का अपना हिस्सा मिन जाय । यह वात हरेक व्यक्ति के लिए पहल मे अधिक लाभकर मिद्ध होगी। यह सब को ढिया घाम है, रितु इसका निकृष्ट पहनू मी है। य: यह कि प्रथम तो यह कौन जाता है कि जब सम्पत्ति का समान विभाजन होगा तो हरेक व्यक्ति का हिसा क्या हागा । इस शलाका हरेक व्यक्ति का हिम्मा नाइ जि, an श्राज क्न जैमा जिन्दगी बिता रहे हैं, उसका देते हुए यह हिस्सा मालिक और मजदूर x है, बलि उनके विपय म कुछ मुनना तक नहीं चान्ते । x x स्थायी प्राति तो केवल एक ही हो साती है और वह है नैतिक अर्थात् मनुष्य की यात्मा का पुनरुद्धार हो । यद कानि किम प्रकार हो ? क्सिा को शात नगें कि मानव समाज म यह प्राति किम प्रकार होगा, कितु प्रत्येक मनुष्य दम का अपने भीतर स्पात अनुभव करता है। पर विचिन नात तो यह है कि इस दुनिया म हरक मानव ममाज को बालने क विषय म तो माचता है, कि तु खुद अपने का बदलन + रे म कुछ नहा सोचता। लोगों ने गुलामी की प्रथा का मिरा दिया और अपने घर में गुलाम रखना भी च द कर दिया, रितु अपना अमीराना रन महन नहीं छोड़ा। उहं सर भी दिन म कई बार अपने कपडे बदलने की प्रारश्यकता पड़ता है, एक र बजाय उ है अपने रहन के लिए मदम कमरे चाहिए उ है नित्य प्रति पाच पाना से भरे था। चालिए, मार पोर फिटन चाहिए यादि यादि । और ये सब भाग स्लिाम की सामग्री कहाँ से पाये यदि मनुष्य कारग्वाना म गुलामा को भाति काम न करें। यह स्पष्ट सत्य है, कितु कोई इमो देखता नहा |
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19040- सस्ता साहित्य मडलकी कुछ -- , Q1CIIS AUSSIDIISIPIISAISAUQUC १-सक्षिप्त अात्मकथा (गाधीजी) २-मेरा कहानी (जराहरलाल नेरू) ३-रोटीका सवाल (कापाटकिन) ४-यापू (घनश्यामदास रिडला) ५-डायरी कुछ पने (,) ६-गाधी विचार दाहन (किशोरलाल घ० मश ७-काद (मनाहर लपत दिवाण) ८--सतवाणी (वियोगी हरि) E-बुद्धवाणी ( १०-दुसी दुनिया (चक्रयता राजगोपालाचाय) ११-मेरी मुक्ति की कहानी (टाल्स्याय) १२--हमारे गावोंकी कहानी (स्व० रामदाम १३--पूर्वा और पश्चिमी दशन (डॉ. देवराज) १४-लहसड़ाती दुनिया (जवाहरलाल नेहरू) १५--विनोबार विचार १६--प्रेममें भगवान (टाल्स्टॉय) १७-विजयनगर सामाज्यका इतिहास (वासुदेव १८-जमनालालजी (घनश्यामदास निहला) नवजीरनमाला-गीताबोध ), मगलप्रमात मामसेवा ।) सर्वोदय दा पाते, भजनावली 12), विविध-रचना मक कायक्रम-कुछ सुमार) साहकार, शास्त्रमा बुद्धिवाद सा मोट-~१)देकर 'महल' ग्राहक बननेसेम्पया ~ ,
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