Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Shri Navatatvaprakarnam Sumangallatikaya Samlkratam

Munishri, Dharamvijay · 2010/07

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Front matter

SHRAVA
PANENEMAMANANEAKNE
NIENBAKK
उद चरिकहर-टे दर्शन;
पूज्यपाद आचार्यमहाराज १००८ श्री वेजयमहनसूरीश्वर महाराजना दुपदेश आ ग्रन्थ
छपायवामांचे जणावेला बन्ने उदार सद्गृहस्थ तरफ आर्थक सहाय आपवामां आल छे, रे माटे
तेओने धन्यवाद अर्पण करवा हे ते वन्नेन अंतःकरण आभार मान ए छए।
रु० ३०० शहोरनिवासी • शाह वनमाळे कानना धर्मपत्न संतकवाई तरफ तेमगे पुत्र
व्हेन हरकर-जयविचारादे प्रकरण-छकर्मग्रन्थ वगेरे तत्त्वज्ञान अभ्यास होई धर्मरुचि
सम्पन्न छे, तेमणे पतारे व्हेन ललावटीना स्मरणा अर्पण कर्या छ ।
रु० ३०० वेरावल (आद) बंदर निवास शाह ललाधर लखम् चंद ले जे धर्मचुस्त जिनाज्ञापरायण
तेमज साधुओ यावच करनारा उदारमहाशय छे, तेमणे अर्पण कर्या छ ।
ले०
• क० जैनमोह
हनमाला कार्याधिकार
शाह लालचन्द नन्दलाल वर्कल
मान

卐 N S y U अमते -नन्दनाय सोनमः॥ 卐 A 卐 V 卐 COM करन्नु निन्दन - ज A A 卐 T 卐 N A श्रीमन्मुक्तिकमल जैनमोहनमालाना ३२ मा पुष्पतरीके सुमङ्गलाटीकासमलकृत श्रीनवतत्त्व प्रकरण नामना महत्वपूर्णग्रन्थनुं प्रकाशन करतां अमने अतीव हर्ष थाय छे. नवतत्त्व ए जैनदर्शननो पायो छे अने ए कारणथो ज भूमेकामां जणाव्या मुजब अनेक प्राज्ञमहओए ए नवतत्त्व उपर विशाल साहित्यतुं आयोजन कर्यु छ, यद्यपे भेन्न भन्न कर्ताओ तरफथी भन्न भन्न प्रणालेकामां उपनेबद्ध नवतत्त्वसाहित्य दृष्टगोचर, थाय छे तोपण ५९ गाथाओमा योजाएलु जे नवतत्त्वप्रकरण छे तेना अभ्यासनो प्रचार प्रायः सर्वत्र जोवामां आवे छे. ५९ गाथामां उपनिबद्ध ए नवतत्त्वप्रकरण उपर हेर्द-गुर्जर अनुवादो अनेक महाशयो तरफो तैयार अनेक संस्थाओ तरफथी ते अनुवादोतुं प्रकाशन थयुं छे. एम छतां गीर्वाण ( संस्कृत ) गरामां ए ५९ गाथाओ उपर विवे- चन करवान कोइ प्राज्ञमहाशय, ध्यान गयुं होय तेम जणायुं नको. T 卐 G 卐. A 卐 L 卐 A थइ 卐 V 卐 A ।

卐 N श्रीनवतत्त्व- प्रकाशकनु सुमङ्गलाः टीका. 卐 A 卐 V y A निवेदन ॥ ॥२॥ A 卐 T 卐 S y आ ग्रन्थमालाना उत्पादक आराध्यपाद आगमप्रज्ञ आचार्यमहाराज १००८ मद्विजयमहनसूरीश्वरना मुख्यशिष्य U प्रातःस्मरणीय उपाध्यायजी महाराज १००८ श्रीमतप्रताप विजय गणीवरना परमविनेय विद्वद्वर्य प्रवर्तकजी महाराजश्री धर्म- 卐 वेजय महाराजश्रीनुं आ नवतत्त्वप्रकरण उपर संस्कृत टीका लखवानुं ध्यान खेंचायुं, तेओश्रीना शिष्यरत्त्न तत्त्वजिज्ञासु मुनिवर्य श्री यशोविजयजी आ बावतमा विशेष प्रेरणा थवाथी टीका करवा सम्बन्धी निश्चय थयो, अने पूज्यपाद परमगुरुदेवनी आज्ञा 卐 मलतां ते मंगलकार्यनो प्रारंभ थयो, व्याकरण-साहित्य, जैन सिद्धान्त-न्याय विगेरे विषयोना सतत अभ्यासनी प्रवृत्तिमां पण आ टीकार्नु कार्य धीमेधीमे चालु रह्यं. जे आजे सम्पूर्ण थतुं होइ तत्त्वजिज्ञासु समाजना करकमलमां धरतां परम प्रमोद थाय छे. वर्द्धमानपुरी (वढवाण शहेर ) मां जैन जेवा उच्चकुलमां जन्म, बाल्यावस्थाथी ज धार्मिक संस्कारो, धर्मसंस्कारी मातानो योग, दश वर्पथी पंदर वर्पनी उमर पर्यंत अमदावाद शेठ चिमनलाल नगीनदास बोर्डीगमां व्यावहारिक-धार्मिक शिक्षण, पंदर वर्पनी उमरे पूज्यपाद गुरुमहाराजश्रीना योगथी चारित्र भावना, मता विगेरे वडील वर्गनी अनुकूलता पूर्वक चारित्र ग्रहण, साधु- G जीवनमां-व्याकरण-काव्य-कोष-सा हेत्य-न्याय-आगमो-प्रकरणो-कर्मग्रन्थ-कर्मप्रकृति प्रमुख शास्त्रोनुं सतत अध्ययन-अध्यापन, 卐 अखंड गुरुकुलवास, विनयसम्पन्नता, गुरुशुश्रूषा इत्यादिगुणोथी पालीताणामां प्रवर्तकपदार्पण विगेरे टीकाकार मुनिश्रीना जीवन प्रसङ्गो छे. गुरुकृपाथी प्राप्त थएल तत्त्वज्ञानना योगे तेओथी ६००० श्लोकप्रमाण आ टीका रचवामां सम्पूर्ण फतेहमंद थया जाणी अमो १ प्रवर्तकश्रीनां ससारी पू० माताजी छबलबाई पण धार्मिक शिक्षिका पद भोगवी दीक्षा ग्रहण करी. साध्वीजी कुशलश्रीजी नामे वर्तमानमा L आत्मश्रेयः साधी रहेल छे 卐 N ॐ 卐 A T A 卐 V 卐 A 卐 ॥२॥ . क卐ry चा N S 卐 A 卐 V 卐 M 卐 A 卐 A 卐 N १ अनुमोदन करीए छीए, अने समाजोपयोगी अन्यप्रन्थोनी रचना करी सुज्ञसमाजने समर्पण करवा पूर्वक तेओश्री जैन साहेत्यना गैरवमां वधारो करे तेम इच्छीए छीए । पूज्यप्रवर प्रत्यूषाभिस्मरणीय आचार्य महाराजश्री विजयमहनसूरीश्वरजी महाराज आ ग्रंथमालाना प्रोत्साहक छे, एटलं ज नहें परंतु ए माला ग्रन्थपुष्पोना संयोगथी सुवासनो विस्तार केम विशेष फेलावे ! तेनी हमेशां कालजी राखवा साथे नवीन नगेन जैन साहित्यना प्रकाशनमां अमने वारंवार प्रेरक थया छे. आज सुधी तेओश्रीनी सत्प्रेरणाथी ३२ पुष्पोर्नु आ माळामा अनुसन्धान थयु छे, तेमां पण श्रीविपाक सूत्र सटीक छाया-सहित प्रतिमा शतक सटीक, उपदेशपद महाग्रन्थ सटीक १४५०० श्लोक- प्रमाण, कर्मग्रन्थ १ थी ४ सटीक, अभिधान चिन्तामणि कोप रत्नप्रमाटीका समेत, श्रीमहाबोर चरेत्र, षट्वंशिकाचतुष्क प्रकरण सविवरण, श्रीलघुक्षेत्र समास सचित्र-संयत्र सविस्तरार्थ विगेरे अनेक सुविशाल सुगंधी मनमोहक ग्रन्थपुष्पोवडे मालाना सरभमां खास वैशिष्ट्य थयुं छे अने तेथीज जनसमाजनुं आकर्षण पण माला तरफ विशेप थवा पाम्युं छे. पूज्य आचार्यश्री अहर्निश आवा सत्प्रकाशनमां अमने विशेष प्रेरणा करे अने जैन साहित्यनी वेशालतामां वधारो करावे तेम इच्छीए छीए । पूज्य आचार्यश्रीना उपदेशथी वाजुना पृष्ठमां जणाव्या प्रमाणे जे जे महाशयोए आ ग्रन्थना प्रकाशनमा उदार आशयथी जे अमूल्य आर्थिक सहाय अर्पण करेल छे ते माटे अन्तःकरणथी ते ते महाशयोनो आभार मानीए छीए । आ दीका ग्रन्थना मुद्रक महोदय प्रेसना अधिपति शाह गुलावचन्द लल्लुभाइए निर्णयसागर प्रेस जेगे सुंदरकार्य पद्धतिथी अमने जे संतोप आग्यो छे ते पण प्रशं- सनीय छे. आ मालाना उत्तेजक-ग्रन्थप्रकाशनना प्रेरक पूज्य आचार्यश्री, ग्रन्थसंशोधक पूज्य उपाध्यायजी महाराजश्री तेमज टीकाकार 卐 T 卐 A ध G 卐 T ज V 卐 A 卐 L A 卐 A 卐 N S श्रीनवतत्त्व- प्रवर्तकश्रीनो उपकार मानवा साथे तेओश्रीना चरणारविन्दमां अनेकशः वन्दन करीए छीए । अन्तमां वाचकवृन्द आ टीका ग्रन्थ- साद्यन्त वाचन मनन अने निदिध्यासन करवा पूर्वक तत्त्वग्राहक बनवा माथे जैन जैनेतर जगत्मां तत्त्वज्ञाननो विशेप प्रचार करे एन अन्तिम अभिलाषा- प्रकाशकनुं निवेदन ।। A सुमङ्गला- टीका. V M ॥३॥ ) A 卐 T ध A श्रीमन् मुक्तिकमलजैनमोहन मन्दिर रावपुरा महाजनगली वडोदरा । श्रीनेमिजन्म कल्याणक संवत्. १९९०॥ नेवेदक, मोहनप्रताप नन्दचरणोपासक- लालचन्द. T 卐 L - 卐 A ६ प - S N 卐l अखिललन्धभृरे मद्गतमगणभृरे नमनमः । फ A ज V gi पूज्यपादप्रातःस्मरणीय जैनाचार्य १००८ श्रीमद्विजयमोहनसूरीश्वरसद्गुरुभ्यो । कि. आराध्यपादपाठकप्रवरोपाः १००८ श्रीमत्प्रतापविजयगणिगुरुवरेभ्यो A A 卐 T 卐 A 卐 T 'तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् '' तत्त्वज्ञानान्निश्रेयसाधेगमः' इत्या दे सुवेहितपुरुषोना वाक्योथो निश्चय छे, के अखल- विश्वमां 'तत्त्वज्ञान' ए परम उपादेय छे यथार्थ तत्त्वज्ञान एहेज सम्यक्त्वस्वरूप होइ परम्पराए आहेत तत्त्व मोक्षप्राप्तिनुं अवन्ध्यकारण छे. वेदान्त, वैद्ध सांख्य, वैशेषिक वेगेरे दर्शनो स्वस्वमन्तव्यानुसार सर्व श्रेष्ठता। भन्नभिन्नतत्त्वोना प्रतिपादक छे, परंतु शाश्वतप्रभावशाली अमेतगुणास्पद कालाबाधेित सनातन श्रीजैनदर्शनसम्बन्धी तत्त्वोनी अपेक्षाए ( तेमज ते ते तत्त्वोना लक्षणादे) वेचारतां पण ते ते दर्शना- न्तरीय तत्त्वो पूर्वापरविरोधी तेमज विसंवादी होवानुं अनुभवाय छे, ज्यारे अनन्तज्ञानी अरिहंतपरमात्माना सनातन जैनदर्शन- सम्बन्धी तत्त्वोमां तत्त्वर्नु यथार्थस्वरूप लक्षणगुणधर्मपर्यायोबडे पूर्वापर अविरोधेपणुं तेमज अविसंवादेपणुं नेष्पक्षपात देक कंवा इतर दार्शनिक विद्वानोने पण स्वीकारवू पडयुं छे अने पडे छे. आत्म वेचारणा-कर्म वेचारणा-पुद्गलादेद्रव्यो वेगेरे वेषयो जैनदर्शनमा जे विशिष्टपद्धतिथी आलेखवामां आव्या छे तेती पूर्वापर अविरोधेनी पद्धत अन्यदर्शनोमां अंशे पण दृष्टिगोचर थी नथी. 卐 G 卐 A 卐 L V 卐 卐 N N S 卐 श्रीनवतत्त्व- 卐 A भूमिका ॥ . सुमङ्गला- टीकाया- 卐 卐 V IM ? ॥ ४ ॥ 5 A 卐 T 卐 महानुभाव तीर्थकर भगवंतो ज्ञानावरणीयादिघातिकर्मोनो क्षय थवा साथे केवलज्ञाननी प्राप्तिपूर्वक देवनिर्मित समवसरणमां विराजमान थइ योजनगामिनी सुधास्यन्दिनी नयगर्भित देशना आपे छे ते अवसरे अनेकलब्धिसम्पन्न त्रिपदी उपर ज श्रीगणधरभगवंतो विनम्रभावे परमात्माने अंजलिसाथे प्रश्न करे छे के 'भगवन् ! कि तत्त्वम् ?' उत्तरमा सर्वतत्वोनो आधार। त्रिकाळज्ञानी परमात्मा जणावे छे के,-'उपन्नेह वा' पुनः गणधर महर्षि प्रश्न करे छ-'भगवन् ! के तत्त्वम् उत्तरमां सर्वज्ञ भगवान फरमावे छे,-' विगमेइ वा' एटलाथी सतुष्ट न थतां गणधरमहाराजा पुनः प्रश्न करे छे के ' भगवन् । कि तत्त्वम् ?' उत्तरमा लोकालोकावलोकी तीर्थंकरपरमात्मा कहे छे के,-'धुवेइ वा । त्रण वखत पुछायेला प्रश्नोना प्रत्युत्तरमा महानुभाव तीर्थकरपरमात्माना मुखारविंदमांथी उपलब्ध थयेल 'उपन्नेइ वा १ विगमेइ वा २ धुवेइ वा ३' ए त्रिपदी सर्वश्रुत वीज छे, वीजबुद्धिसम्पन्न महानुभाव गणधरमर्पिओए त्रिपदीस्वरूप शाश्वत बीजने पामी अर्थधी अनादिअनन्त अने सूत्रथी सादिसान्त द्वादशाङ्गीनी अन्तर्मुहूर्त्तमां रचना करे छे. पट्टपरम्परामां थयेल सुविहिगीतार्थमहर्पिओ ए ज द्वादशाङ्गीना अवलम्बनथी तत्त्वज्ञानथी भरपूर विविधग्रंथोनी रचना करी जैनशासननी लोकोत्तर ज्ञानसंबन्धी प्रभावना करवा समर्थ थया छ । तत्त्वज्ञानपरिपूर्ण जैनसिद्धान्त द्रव्यानुयोग-गणितानुयोग-चरणकरणानुयोग अने धर्मकथानुयोग ए चार विभागोमां विभक्त थयेलोछे। द्रव्यानुयोगमां-मुख्यत्त्वे पड्द्रव्यन प्रतिपादन होय छे, गणितानुयोग-जीवादिद्रव्योनी संख्या, चार अड्योग। परस्पर अल्पबहुत्त्व, कायस्थिति, भवस्थिति, संवेधादि, ज्योतिप्चक्रनो चार, द्वीपसमुद्र, नरकावासा विमानोनुं प्रमाण विगेरे विषयो दर्शावे छ । मुक्तिमार्ग, साधु-श्रावकधर्मनो आचार, क्रिया, शुभमार्गनी . A G ज 卐 T 卐 L A 卐 S N U 卐 N V A N T 卐 A प्रवृत्ति, अशुभमार्गनी निवृत्ति इत्यादि चरणकरणानुयोगना विषयो छे, ज्यारे महापुरुपोनी जीवनप्रणा लेका, तेमांथी झलकती उत्तमनीति, सदाचरण, पूर्वकालीन इतिहास, दीर्घदृष्टिए विचारतां पूर्वापरकालनो अनुभव, उपादेय प्रते आदरभाव, असदाचारेना चरित्रथी थती असदाचारप्रत्ये गर्दा ए विगैरे विषयो धर्मकथानुयोग शरीर छ । आगमोनी अपेक्षाए असूत्रकृताङ्गमां द्रव्यानुयोग प्रधान छे, श्रीआचाराङ्गमां चरणकरणानुयोग, जम्बूद्ध पप्रज्ञप्ति आदेमां 卐 गणेतानुयोग, अने ज्ञाताधर्मकथाङ्गादिमां धर्मकथानुयोग मुख्यपणे दृष्टिगोचर थाय छे । 卐 आ नवतत्त्व प्रकरण यद्यपि द्रव्यानुयोग प्रधान छे तो पण गणितानुयोग-चरणकरणानुयोग तथा धर्मकथानुयोगोना वर्णनमा 卐 ते अलग पडतुं नथी, जीवाजीवद्रव्योनुं स्वरूप द्रव्यानुयोगान्तर्गत छे, पद्रव्यो पैकी कालसम्बन्धी केटलाक 卐 नवतत्त्व प्रकरणमां विचारनो तेमज मोक्षतत्त्ववर्णन प्रसङ्गे आवता अल्पबहुत्त्वप्रमुखद्वारनो गणितानुयोगमा समावेश थाय छे, 卐 चारे अनुयोग संवरतत्त्वमां कहेवाता समेते, गुप्ति, दशविधयतिधर्म ए चरणकरणानुयोगना वेपयो छे, तेमज परीपह 卐 विगेरे वर्णनप्रसंगे कहेवामां आवतां महापुरुषोनां दृष्टान्तो ए धर्मकथानुयेगमां आवे छे. ए प्रमाणे चारे T अनुयोगची भरपूर होइ आ ग्रन्थ घणोज महत्त्वनो छ । सहआगमोमां शिरोमणे प माङ्ग भगवरी (व्याख्याप्रज्ञप्ति ) सूत्रमा स्थले स्थले साधुओना तत्त्वज्ञाननी परिपक्कता माटे ज v सिद्धवर्णन छे, परन्तु श्रावकोनी ज्ञानसमृद्धेनुं पण वर्णन करतां जणाववामां आवेला “ अभिगय वाजवा उवलद्धपुण्णपावा L आसवसंवरणिजर करियाहगरणबंधप्पमोक्खंकुसला इत्यादेपदोथी नवतत्त्वनी केटली महत्ता छे ते समजाइ आवे छे. 卐 A ॐ A A या N ॐ भूमिका ॥ , 1 卐 S 卐 श्रीनवतत्त्व- ते उपरांत श्रावकसमूहमां नवतत्त्वसंवन्धी केटलुं ज्ञान होवू जोइए ? ते पण परमात्मा महावीरदेवे उपर जणावेला महत्त्वपूर्ण- A सुमजला- पदो ख्यालमां आवी शके तेम छ । प्राचीन कालमां जैन ' अथवा 'आवक' उपनामने धारणकरवावालो U 卐 टीकाया- प्राचीन कालमां वर्ग पुन्योदयथी प्राप्त थयेल ए उपनामने सफल करवा माटे जीवाजीवादि नवतत्त्वना ज्ञाननी प्राप्ति माटे 卐 V ॥ ५॥ ॥ श्रावको ज्ञानसमृद्धि सतत उद्यमी हतो, ए तत्त्वज्ञानने ज परम उपादेय मानी तेमां आसक्त रहेनार हतो, अने एज तत्त्वज्ञाननी M A प्राप्तिना योगे आध्यात्मिक उन्नतिमां हमेशां ते वर्गमां तत्परता जोवामां आवती हती । परमकृपालु ॥ 卐 परमात्माने तेमज सूत्ररचयिता श्रीगणधरभगवंतोने पण ' अभिगयजीवाजीवा' इत्यादि पदोथी श्रावकोने सम्बोधवानो प्रसङ्ग ए A T कारणथीज प्राप्त थयेलो हतो । ज्यारे वर्तमानमां दु:पमकालना प्रभावे किंवा जीवोना बहुलकर्मपणाने अङ्गे अर्थकामनीज प्राप्तिमा ध अहर्निश आसक्त ( अमारो बन्धुवर्ग 1 ) 'श्रावक' अथवा 'जैन' कुलमां उत्पन्न थवा पूर्वक ए पुन्यलभ्य उपनामने प्राप्त करवा छतां N A श्रावक केंवा 'जैन' ए पदनो शुं अर्थ छे ? ए पदनी शुं महत्ता छे ? अथवा ए उपनामने धारण करनारनी शुं शुं फरजो छे ? तेनुं ॥ 卐 विस्मरण थवा साथे कर्त्तव्य भ्रष्ट थइ दुष्प्राप्य 'श्रावक' ना विरुदने सान्वर्थ करी शकतो नथी एमांशुं कारण छे? ते विचारवानी खास G जरुर छ । पांचदश घरनी श्रावकोनी वस्तीवाला नाना गामथी लइने विशाल वस्तीवाला मोटा शहेरोमां प्रायः प्रत्येकस्थले नानीमोटी 卐 धार्मिकपाठशालाओर्नु अस्तित्त्व अवश्य जोवामां-जाणवामां आवे छे, एम छतां जेवू लक्ष्य, जेपी कालजी अने जेवी तत्परता V व्यावहारिक केळवणी तरफ अपाय छे ते अपेक्षाए अमुक अंशे पण धार्मिकशिक्षण तरफ विद्यार्थिओ केंवा तेओना वालीओ तर- 卐 फथी लक्ष्य अपातुं होत, तत्परता उत्पन्न थइ होत | तो आजनो समाज धार्मिकतत्त्वज्ञानविहोणो निहाळवानो अवसर आव्यो छे ते L ? T A ॥५॥ A 5 A AL LE r ५ S U M V A 卐 N 卐 अवश्य न प्राप्त थात । गुजराती-इंग्लीश -प्राकृत-मेथेमेटिक्स (गणेत-बीजगणित-भूमेति ) इतिहास-भूगोळ । A विगेरे विषयोना अध्ययन माटे स्थले स्थले विद्यमान स्कुलो हाईस्कुलो तेमज कॉलेजोमा मातपितानी प्रेरणापूर्वक केवा प्रेरणाविना हजारोनी संख्यामां विद्यार्थिओ हसते चहेरे चाल्या जता प्रत्यक्ष जोइए छीए, ज्यारे आपणी आजनी धार्मेकपाठ -9 शालाओमां वे आंकडाथी वधीने त्रण आंकडाने संख्या भाग्येज होवा साथे संख्याने अपेक्षाए (पण ) हाजरीनुं अल्प- हाजरीना प्रमाणन्ने अपेक्षाए अभ्यासमां कीडीना वेगे वृद्धि (?) तेमज शेक्षकप्रमुखवडेलना वेन- प्रमाण, A. यनो लगमग अभाव वेगेरे वावतोनुं आन्तदृष्टियी अवलोकन करता कोइपण सुज्ञमानवने खेद थया सेवाय नहें रहे तेमां पण व्यावहारिकशिक्षणने तेमज वयो अमुक हद सुधीज धार्मिकअभ्यासनी परेपाटी चालु होवानुं अने ते व्यावहारेक 卐 N शिक्षणनी तेमज वयनी मनःकल्पितमर्यादानुं उल्लंघन थतां 'अमे इंग्लीशमेन थया!' अमे 'मोटा थया!' 'आ अवस्थामा पाठशालामां 卐 जq ए अमने शोभे नहें ' इत्यादि मनघडन्तकल्पनाओथी पोझीशनमा क्षति आववाना ओठा नीचे अथवा वर्तमानमां चालतो 卐 धार्मिकशिक्षणप्रणालिकानी नीरसताने अङ्गे केंवा ए वेपयमां विद्यार्थिओ साथे तेओना माबाप वेगेरे 卐 ज्ञानसमृद्धिसम्बन्धी वडिलोनी निरपेक्षवृत्तिना निमित्ते प्रथमावस्थामा चालु धार्मिकअभ्यासने अधवचीज प्रायः तिलांजले । आजना समाजन आपवानुं अनुभगेओथी अनुभव बहार नथी । ' व्यावहारेकशिक्षणनी आवश्यकता नथी 卐 परिस्थति। कोइपण विचारशीलव्यक्ति कहेज नहें, अने कोइ वेचार कर्या सेवाय कहे तो ते योग्य पण गणाय नहे. परंतु व्या० शिक्षण उपर धर्मश्रद्वा तेमज धर्माचरणथी वेमुख थवानो, वडेलोना वेनयथी पराङ्मुख थवानो 卐 T G A T A एम V L - A A au N S 卐 भूमिका ॥ 卐 M 盟 卐 A A N श्रीनवतत्त्व- तथा स्वतंत्रताना नामे स्वच्छन्दतानी वृद्धिपामवानो जे आक्षेप मुकवामां आवे छे ते आक्षेपने दूर करवा माटे व्या० शिक्षण साथे A सुमगला- धर्मश्रद्धा तेमज धर्माचरणना मैल कारणभूत धार्मिकशिक्षणनो अमुक अंशे सहयोग थवानी खास जरुरीयात छे । जे शिक्षण टीकाया- V प्रायः ऐहिकसुखनुं साधन छे ते शिक्षणतरफ विद्यार्थिओनो तेमज तेओना वालीओनो सम्पूर्ण ख्याल होवा साथे ते शिक्षण माटे तन मन अने धननो व्यय पण करवामां पाछी पानी थती नथी, ज्यारे ऐहिक तेमज आमुष्मिक सुखना साधनभूत धार्मिकतत्त्वज्ञान प्रत्ये केवल निरपेक्षदशा निहालवामां आवे छे. व्या० शिक्षणनी अपेक्षाए अमुक अंशे पण ए धार्मिकतत्त्वज्ञान तरफ लक्ष्य अपायुं होत, अने तन मन तेमज धननो सदुपयोग थवा साथे ते मार्गने उत्तेजन अपायुं होत तो आजनी प्रजा तत्त्वज्ञानथी वंचित रहेवा न T पामत । प्रतिदिन हास पामती तत्त्वविद्यानी प्रगतिमाटे आजने बाळ तेमज युवान प्रजामां धर्मतत्त्वोनी अभिरुचि विशेष थवा साथे 卐 प्रत्येक आत्मा तत्त्वज्ञाननो अंशे अंशे अधिकारी थाय ते माटे विद्यार्थिओए तेमज तेमना वालीओए खास अपेक्षा राखवानी जरुर छे, लाखो तेमज हजारोना खर्चे चालती धार्मिक अने सामाजिकसस्थाना कार्यवाहकोए तथा धार्मिक शिक्षकोए शिक्षणनी प्रणालिकामा धर्मनी जड रहे तेम पलटो करवानी आवश्यकता छे अने श्रीमन्तोए रात्रिदिवस अर्थकामनी प्रवृत्तिमांथी पण धर्मसाधनमाटे T अवसर काढी धर्मतत्त्वो जाणवा साथे तत्त्वज्ञाननी प्राप्तिना पंथे दानप्रवाह खुल्लो करवानुं कर्त्तव्य अवश्य ध्याननां राखवा लायक 卐 । ए प्रमाणे थशे तोज श्रमणभगवान् महाव रपरमात्माए सिद्धान्तोमां आपेला ' अभिगयजीवाजीवा इत्यादि श्रावकोना V विशेपणो यत्किचित् सान्वर्थ थइ शकशे । 卐 श्री जैनशासनमां नवतत्त्वोनुं प्रतिपादन करनारा अनेक आगमो तेमज सुविहितगीतार्थ पूर्वाचार्यविरचित सख्यावंध ग्रंथो A 卐 छे , ज G 卐 A 卐 L 卐 A 卐 ॥६॥ A - S N 卐 卐 | A 卐 , 卐 A ज M 卐 A 卐 N 卐 T विद्यमान छ । श्री समवायांगसूत्रना उपागभूत श्री प्रज्ञापनासूत्र ए नवतत्त्वना विषय उपरज रचायेलुं छे नशासनमां नवतत्त्व ए टीकाकारमहर्प श्रमलयगरि महाराजाना नीचे जणावाता शब्दोथी जाणे शकाय छे. साहित्य । तेओश्री टीकाना प्रारम्भमांज आ प्रमाणे उल्लेख करे छे के-' अस्यां प्रज्ञापनायां षट्त्रिंशत्पदानि, तत्र प्रज्ञापनाबहुवक्तव्यविशेपचरमपरेणामसंज्ञेषु पञ्चसु पदेषु जीवाजीवानां प्रज्ञापना । प्रयोगपदे क्रेयापदे चाश्रवस्य 'कायवाङ्मनःकर्मयोग आश्रव इति वचनात् । कर्मप्रकृतिपदे बन्धस्य प्ररूपणा । समुद्घातपदे केवलेसमुद्धा- तप्ररूपणायां संवरनिर्जरामोक्षाणां त्रयाणां, शेपेषु तु स्थानादिषु पदेपु क चेत्कस्यचिदिते । श्रमणभगवान् जगबन्धु श्रीमहारप्रभुना चरमोपदेशरूप अपृष्टव्याकरण श्रीउत्तराध्ययनसूत्रना मोक्षमार्गदर्शावनार अट्ठावीशमा मोक्षमार्गगति नामना अध्ययनमां पण आ नवतत्त्वोनो ज आ प्रमाणे उद्देश छे, " जीवा जीवा य बन्धो य, पुण्णं पावासवो तहा । संवरो णिज्जरामोक्खो सन्ते ए तहिया नव ॥ १ ॥ तहियाणं तु भावाणं सभावे उवएसणं । भावेण सद्दहंतस्स सम्मत्तं तं वियाहियं ।। २ ॥ तथा वाचक शरोमणि दशपूर्वधर भगवान् श्रीउमास्वातिवाचक निर्मित तत्त्वार्थाधिगमसूत्र पण ' तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् । जीवाऽजीवाश्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् ' इत्यादि सूत्रोथी जीवाजवादितत्त्वोना वर्णनने उद्देशीनेज रचायानुं सर्व कोइ साक्षरने जाण बहार नथी ज । ' पुण्यपापयोश्च बन्वेऽन्तर्भावान्न भेदेनोपादानम् ' पुण्यपापतत्त्वनो वन्धतत्त्वमा अन्तर्भाव होवाथी ते उभयतत्त्वोनी पृथक् गणना करी नथी, ए तत्त्वार्थवृत्तिकारमहर्पिना वाक्यथी तत्त्वार्थाधिगम- सूत्रमा आवता साततत्त्वो अने प्रस्तुत नवतत्त्वोनी सख्यामां यद्यपि वेपर्यय छतां अर्थापेक्षया विपर्यय नथी । ते उपरांत प्रशमरति परमात्मा G A . 卐 T 卐 V 卐 A 卐 L 卐 A 卐 A 卐 ज S N श्रीनवतत्त्व- भूमिका ॥ सुमजला- टीकायां- 卐 A 卐 V 卐 A 卐 卐 M ॥७॥ A प्रकरण, योगशास्त्रवृत्ति, धर्मरत्नप्रकरणवृत्ति, समयसार प्रकरण, तेमज त्रिपष्टिशलाकापुरुपचरित्र विगेरे धर्मकथानुयोगमा आवतो नवतत्त्व सम्बन्धी उपदेश इत्यादि ग्रन्थो नवतत्त्वनु विशिष्ट प्रतिपादन करनारा छ। ए प्रमाणे अनेकग्रन्थोमां नवतत्त्व सम्बधी साहित्य दृष्टिगोचर थाय छे तोपण तत्त्वोनो स्वतंत्र बोधलेवा माटे आ नवतत्त्व प्रकरण अति प्रसिद्ध तेमज घणुं उपयोगी छे. आ नवतत्त्व प्रकरण १४ गाथामां, २७ गाथामा ५९ गाथामां, १४० खास नवतत्त्वमुंज गाथामां, विगेरे अनेकप्रकारे भिन्न भिन्न चिरंतनाचार्योथी रचावेलुं जोवामां आवे छे. अने ते नवतत्त्व प्रतिपादन करनारा विषयक मूलगाथाओ उपर अनेक महापुरुपोए रचेली भाष्य, अवचूरि, संक्षिप्तटीका, वालाववोध, टब्बा तेमज ग्रन्थो। पद्यवन्ध विविधस्तवनोनी हारमाला दृष्टिगोचर थाय छे, जे नीचे आपेल लिस्टथी जणाइ आवे छे- न्वतत्त्व साहित्यप्रन्टन सूची. प्राकृतसंस्कृतसाहेत्य. प्राकृतसंस्कृतसाहेत्य. १ नवतत्त्वप्रकरणमूल ४ नवतत्त्वविचारसारोद्धार, गा० ८ २ नवतत्त्वविचार ५ नवतत्त्वमार प्रकरण (कुलक) ५ अंचल० श्रीजयशेखरसूरि ३ वृहन्नवतत्त्व ध T IN 卐 A ध G ग्रन्थकार. ग्रन्थकार. T २ भावसागर 卐 V ६ नवतत्त्वसार १ आ सूचि प्राचीनभंडारोना लीस्टो तेमज श्री जैनग्रन्यावलि आदिमा नवतत्त्व संवधी धएल उल्लेसोना आधारे मेळवीने आपेल छे A 卐 - N CS ८ " y ९ " (कुलक) " टबो 卐 A 卐 N । ७ नवतत्त्ववृत्ति ७ श्री अम्बप्रसाद सं. १२२० प्राकृतभाषासाहित्य A ८ श्री देवेन्द्रसूरि २० नवतत्त्व बालावबोध २० श्री सोमसुन्दरसूरि 卐 ९ श्री कुलमंडनसूरि शिष्य श्री हर्षवर्धनगणी १० १० श्री समयसुन्दरगणि २१ २१ श्री पार्श्वचन्द्र नीय 卐 ११ विवरण ११ श्री परमानन्दसूरि २२ २२ श्री मेरुतुगसूरिसन्ता- A १२ १२ श्री देवचन्द्रसूरि २३ २३ श्री मानविजयगणी 卐 १३ अवचूर्णे १३ श्री साधुरत्त्नसूरि २४ २४ श्री मणिरत्नसूरि T १४ १४ श्री मान वेजयगणे २५ भापासाहत्य तपोगच्छाचार्य श्री A १६ प्रक्षेपगा ११३ गाथा १६ २ वेजयने मेसूरि शेष्य २६ नवतत्त्व रास २६ श्री ऋषभदास नी ( अवचूर्ण) श्री वेजयोदयसूरि २७ श्री भावसागर T १७ नवतत्त्व प्रकरण १७ श्री देवगुप्तसूरि २८ २८ श्री सभाग्यसुन्दर 卐 २९ नवतत्त्व जोड १८ १८ श्री अभयदेवसूरे भाष्य २९ श्री विजयदानसूरे V वृत्ति १९ १९ श्री यशोदेवोपाध्याय ३० ३० श्री भाग्य वेजयजी स्तवन ध A 卐 १५ 卐 G 卐 A L " " 卐 A - क N S " " भूमिका ॥ , चोपाइ श्रीनवतत्त्व- 卐 A सुमजला- 卐 टीकायां- V ॥८॥卐 A 卐 " 卐 T ३१ ३१ श्री विवेकविजयजी ३६ नवतत्त्व छन्दोबद्ध भापा ३६ श्री ज्ञानसारमुनि ३२ ३२ श्री कमलशेखर सार ३३ ३३ श्री सौभाग्यसुन्दर ३८ समयसार प्रकरण ३४ श्री वर्धमानमुनि ३४ ३८ श्री देवानन्दसूरि ३५ ३५ श्री लुम्पकमुनि ३९ वृत्ति उपर जणावेल नवतत्त्वविषयक साहित्यनो नोंध जैनग्रन्थावली तेमज प्राचीन ग्रन्थ भंडारोनी सूचीना आधारे आपवामां आवेल छे. ए साहित्य पैकी श्री नवतत्त्व भाष्य सटीक श्री आत्मानन्द सभा ( भावनगर) तरफो प्रगट थएल वर्तमानमां प्रगट छे, ते उपरांत जैनग्रन्थप्रकाशक सभा ( अमदावाद ) तरफथी नवतत्त्व साहित्य सग्रह नामर्नु पुस्तक थएल नवतन्त्र वहार पाडवामां आवेल छे जेमां श्री उमास्वातिवाचक-जयशेखरसूरि विगैरे महापुरुपोए रचेला नवतत्त्व साहित्य । प्रकरणो, अवचूरि गुर्जरभापानुवाद तेमज स्तवनो विगेरेनो घणो संग्रह करवामां आव्यो छ । आ सिवाय स्थले स्थले खास प्रसिद्धि पामेल तेमज वर्तमानमां ज्या क्यां चालती धार्मिक पाठशालाओमां अभ्यास कराववामां आवतुं. ५९ ( अथवा ६० ) गाथाओनुं नवतत्त्व प्रकरण गुजराती तथा हिंदी भाषामा संक्षिप्त किंवा सविस्तृत अनुवाद साथे संख्यावंध संस्थाओ तरफथी वहार पाडवामां आवेलछे जेमां भीमसी माणेक, म्हेमाणा-यशोविजयजी जैनपाठशाला ( श्रेयस्कर मडल, ) श्री जैन ग्रन्थ प्रकाशक सभा तरफथी प्रगट थएला अनुवादो पाठ्यक्रम माटे घणा उपयोगी तेमज महत्त्वना छ । y A 卐 N 卐 G 卐 卐 A 卐 T V L '卐 A 卐 3 A 卐 ---- S N 卐 A 卐 U 卐 M V 卐 A 卐 A 'सुमङ्गलाट का समलङ्कृत आ नवतत्त्व प्रकरण पण हालमां वेशेप प्रसिद्ध अने पाठ्यक्रममां अतीव उपयोग ५९ गाथाओतुं रचायेल छ । प्रथम जणावी गया ते प्रमाणे आ प्रकरण उपर हिन्दी तेमज गुर्जर अनुवादो-विवेचनो अनेक विद्वानो तरफी लखायां छे, अने जुदे जुदे स्थलेथी प्रगट थयां छे, परंतु ५९ गाथाथी संकलित आ नवतत्त्व प्रकरण उपर गमे ते कारणे कोइपण प्राज्ञ पुरुष, संस्कृत भापामा टीका रचवानुं ध्यान खेंचायुं होय तेम मारा जाणवामां-जोवामां आवेल नथी, आ नवतत्त्व प्रकरण उपर संस्कृत भाषामां सरल टीका लखवी योग्य छे ए हेतुथी पूज्यपाद शासनप्रभावक गीतार्थप्रवर सञ्चारेत्र- चूडामणि आचार्य महाराज १००८ मद्विजयमोहनसूरीश्वर महाराजश्री तेमज तेओश्रीना परमविनेय अखंडगुरुकुल- वासी चरणगुणनिधि-म्हने रत्नत्रयीना प्रदाता पूज्यपाद पाठक प्रवर उपाध्यायजी महाराज १००८ मत्प्रतापविजयज गणे महाराजनी आज्ञानुसार तेमज बालमुनिश्री यशविजय ना खास आग्रहथी मारी अल्पबुद्धिनो विचार संस्कृत टीका रच- कर्या विनाज श्रीजिनेश्वर भगवंतना सिद्धान्तने अनुसरी आ नवतत्त्वप्रकरण जेवा गंभीर विपय । वार्ड प्रयोजन. उपर संस्कृत भाषामा टीका लखवानी मने अभिलाषा प्रगट थइ, अने पूज्य सद्गुरुकृपाए ते अभिलाषा आजे सपूर्ण थइ । आ नवतत्त्व प्रकरणना मूलकार कोण छे ? ते बावतमा घणो उहापोह थवा छतां विद्वद्वर्ग तरफथी कोइपण निर्णय आजसुधी थइ शक्यो नथी, तोपण-- " इय नवतत्तविवारो, अपमइनाणजाणणाहेउं । संखित्तो उद्धरिओ, लिहओ सिरिधम्मसूरहें ॥ १ ॥" 卐 T y A 卐 N G 监 T A 卐 卐 L ॐ A 卐 卐 S 卐 N श्रीनवतत्त्व. 卐 A 卐 टीकायां- V ॥ ९॥ ॐ A भूमिका ॥ मूलकार। A T 卐 A नवतत्त्व प्रकरणनी हस्तलिखित एक प्राचीन प्रतिमां उपर जणावेल ६० मी गाथा जोवामां आवती होइ आ प्रकरणना कती अमान् धर्मसूरीश्वर महाराज होय तेम मानी शकाय छे । ए धर्मसूरीश्वरजी महाराज क्या सैकामां नवतत्त्व प्रकरणना विद्यमान हता ते सवंधी कांइपण माहिती मळी नथी । वृत्ति अवचूर्णि-वालाववोधकारो आ गाथानो उल्लेख 卐 करता नथी एथी एम पण मानवाने कारण मळे छे के आमळ जणाववा प्रमाणे नवतत्त्वप्रकरणनी मूळ गाथाओ M तो २७ ज छे, अने ते सिवायनी गाथाओ घणी उपयोगी जाणी कोइ योग्य पुरुपे प्रक्षेप कर्यो होय तेमक कल्पी शकाय छे । ते २७ मूल गाथाओना प्रणेतानो समय तेरमा सैका पहेलानो होय तेम वृत्तिकार तेमज अवचूर्णिकारना ते ते प्रतिओना प्रान्तभागमा रहेल उल्लेखोथी सावीत थाय छे । वळी अन्य एक प्राचीन पुस्तकमां ' इति श्री वादिदेवसरि विरचितं नवतत्त्वप्रकरणम् ' ए प्रमाणे वाक्य जोवामां आवेल छे ते उपरथी-जे अपूर्व ग्रन्थमा रु निर्वाण सिद्ध माटे ४२००० श्लोकनी .N रचना हती ते स्याद्वाद रत्नाकर ग्रन्थना प्रणेता, सद्धराजनी सभामा कुमुद्चन्द्र जेवा दगम्बरवादीओनो पराजय करनार तेमज y परमार्हतपरनारी सहोदर कुमारपाल भूपाल प्रतिवोधक कलिकाल सर्वक्ष भगवान् हेमचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजना विद्यागुरु पूज्यप्रवर G भगवान् वाद देवसूरी महाराज आ प्रकरणना रचयिता होय तेम पण अनुमान थाय छे उपर जणावेल 'इय नव०' गाथा तेमज ॐ 'इति श्री वादिदेव० ' ए वन्ने उल्लेखोनी एक वाक्यता करवा माटे एम पण कल्पना करी शकाय के २७ गाथा रूप नवतत्त्व प्रकरणना कर्ता श्री वादिदेवसूरज महाराज होय, अने उपयोगी गाथाओना प्रक्षेपक श्र धर्मसूरि महाराजा होय ! 卐 प्रथम जणावी गया ते प्रमाणे आ नवतत्त्व प्रकरणनी मूलगाथाओ २७ होवी जोइए, अने ते ते विपयोने उपयोगी प्रासङ्गिक ज A 卐 T 卐 V 卐 A 卐 L ॥ ९॥ A S- 卐 N ध U क ध 1 A गाथाओनो प्रक्षेप करी एकंदर ५९ (अथवा ६०) गाथाओ थएली होती जोइए एम वृत्ति अवचूर्ण बालावबोध विगेरे उपरथी जोइ- जाणी शकाय छे । एकंदर नवतत्त्व प्रकरण उपर जुदा जुदा आचार्य तरफथी एटली भिन्न भिन्न रचनाओ करवामां आने छे के नवतत्त्वप्रकरणने मूलगाथाओ केटली 'ते संबंधी कोइ पण चोकस निर्णय उपर आवकुं मुश्केली भ{ छे, आत्मानन्दसभा-भावनगर तरफथी अमुकवर्षे पहेलां प्रगट थएल 'श्री नक्तत्त्व भाष्य-सटीक' ग्रन्थमा नवतत्त्वनी मूलगाथाओ १४ छे अने ते (त्या) प्रारभ्भमांज जुदी एक साथे आपवामां आवेल छे अने ते १४ गाथाना प्रणेता संबंधी श्री देवगुप्त रमहाराजाहुं नाम सर्वत्र प्रसिद्ध छ । आ उपरथी आपणे तो एटलोज सारांश खेंची अकीए छीए के नवतत्त्वनी गाथाओ १४ होय २७ होय ५९-६० होय के १४० होय ते विषय ( चर्चा ) वाजुमा राखीने नवतत्त्व वेपयो उपर मळी आवती संख्यावंध भिन्न भिन्न पूर्वाचार्य कृतेओ उपलब्ध थती होइ जैनशासनमा जीवाजीवादि नवतत्त्वोनुं प्रतिपादन अने ते प्रतेपादननु गैरव घणा विशेप प्रमाणमा रहेल छे । पुनरुक्ति तरीके कहीए के 'नवतत्त्वना प्रतिपादन उपर जैनदर्शन मंडाण छे' तो ते कथनमा अतिशयोक्तिने लेशपण अवकाश नथी । ५९ गाथाना आ नवतत्त्व प्रकरणमां १ थी ७ गाथामां जीवतत्त्व, ८ थी १४ गाथामां अजीवतत्त्व, १५ थी १७ गाथाओमां पुन्यतत्त्व, १८ थी २० गाथामां पापतत्त्व, २१ थी २४ गाथामां आश्रवतत्त्व, २५ थो ३३ गाथामां थाओमां तत्त्वोनी संवरतत्त्व, ३४ थी ३६ गाथामां निर्जरातत्त्व, ३७ थी ४२ गाथामां बन्धतत्त्व, ४३ 0 ५० गाथामां व्हॅचण | । मोक्षतत्त्व, अने ५१ थी ५९ गाथाओमां प्रकीर्णक अधिकार आपवामां आवेल छे विषयसम्बन्धी विशेष समज माटे सविस्तृत विषयानुक्रम स्वतंत्र आपवामां आवेल होवाशी अहें तद्विषयक विशेष 3 A ध N T । क G 卐 A 卐 L T 卐 V 9 S श्रीनवतत्त्व- < gZs भूमिका ॥ 卐 U 卐 M टीकायां- ॥ १०॥3 A 卐 A ज T उल्लेस करवो उचित धार्यो नथी। आ प्रकरण उपर श्री सुमङ्गला नामनी टीका करवा सम्बन्धी जे कार्य करवू एक प्रकारचें साहस तेमज बालचेष्टा छे एम म्हारा जाणवामां छता ' शुभे यथाशक्ति यतनीयम् ' न्यायने आधारे तेमन सस्कृतभापामां लखवाथी ते भापानुं तेमज तत्त्व- ज्ञानतुं परिशीलन थवाना उद्देशथी अने आ प्रमाणे लखवा माटे उम्मरमां बाल छतां बुद्धिमां अबाल तत्त्वजिज्ञासु मुनिवर्य श्री यशोविजयजीनी उदात्त प्रेरणा थवाथी पूज्य गुरुमहाराजनी आज्ञानुसार आ टीका लखवानुं म्हें म्हारा जीवनमा प्रथम मंगल कर्यु छे, अने ए प्राथमिक मङ्गलनी अपेक्षाए टीकार्नु ' सुमङ्गला' नाम पण अमुकअंशे सान्वर्थ छ । । टीकाग्रन्थमा स्थले स्थले आचारांग, सूयगडांग, श्री भगवतीजी , पन्नवणाजी-तत्त्वार्थसूत्रसटीक-योगशास्त्र नवतत्त्वभाष्य विगैरे अनेक ग्रन्थोना उपयोगी प्रमाणो आप्यां छे कोइ कोइ स्थाने ते ते सूत्रोना अखंडपाठो तेमज टीकाना पण जरुरी पाठो आपवा भूलायुं नथी । शक्य प्रयत्नो द्वारा ग्रन्थने जेटलो सुगम बनाववानो प्रयत्न थाय तेटलो कर्यो छे, विपयोनी स्पष्टता माटे योग्य प्रयास सेवायो छे अने उपयुक्त स्थाने यंत्रो तेमज आकृतिओ पण आपवामां आवेल छे, तोपण श्रुतनी अगाधता, विपयोनु गाम्भीर्य अने अतीन्द्रियपदार्थोनु दुरावगाहपणुं होवा साथे म्हारी अल्पमति, प्रमादपराधीनता, तेमज छद्मस्थपणुं ए सर्व हेतुओथी अनेक स्खलनाओ थवानी अवश्य सम्भावना छ । सज्जनोने आ स्खलनाओने सुधारवा तेमज मने जणाववा साग्रह सूचना छे. परमगुरुदेव शासनमान्य व्याख्यानविशारद आराध्यपाद आचार्यमहाराज श्रीमद् विजयमोहनसूरीश्वर महाराजे आ ग्रन्थ- साद्यंत अवलोकन करी अनेक स्खलनाओमांथी म्हारु संरक्षण कयुं छे, तेमज पूज्यगुरुदेव प्राप्तःस्मरणीय उपाध्यायजी महाराजश्री 卐 G A 卐 T 卐 A V 卐 L ॥ १.। 卐 A 卐 卐 A UC S 卐 M V ज A A 卐 प्रतापविजयजो गणीजी महाराजे आ ग्रन्थना लगभग बधा ग्रुफोना संशोधनमा सहाय करी म्हने सवेशेष उपकृत कर्ये छे, ते उपकृतिनुं U अनेकशः हुं संस्मरण करु छ । आगमोद्धारक परमगीतार्थ तत्त्ववेत्ता प्रत्यूषाभिस्मरणेय आचार्यमहाराजश्री सागरानंदसूरेश्वरी 卐 महाराजाने अमुक विपयो सम्बन्धी प्रश्नो पुछतां तेओश्रीए आपेल संतोषकारक प्रत्युत्तरो माटे पुनः पुनः ते पूज्यपादना चरणार- विन्दमां नमस्कार करुर्छ । म्हारा गुरुबन्धु मुनिश्री उदयविजय तेमज मुनेत्री भरतविजयनी आ कार्यने अङ्गे माराथी विशेष 卐 समय रोकी शकवामां समर्पण थयेली सहायने पण याद करवा भुलातुं नथी। प्रान्ते आ ग्रन्थथी जैन जैनेतर समाजमां जिनेश्वरभगवंतोए प्रतिपादन करेला जीवाजीवादेतत्त्वोनु ज्ञानविस्तार पामो ! अने तत्त्वज्ञानजन्य सम्यग्दर्शन-सम्यक्चारित्रादे गुणोनी प्राप्ति करी भव्यात्माओ आत्मकल्याणमां अभिमुख वनो एज अन्तम महेच्छा। 卐 ज्येष्ठशुक्ला १५-सं. १९९० ले:-श्रीगुरुचरणाब्जम कर 卐 राजनगर-अमदावाद. प्र. हुन धर्मविजय । N 卐 T 卐 A 卐 T 卐 V . A 1 卐 L 卐 A 卐 A US ofin N का श्रीनवतत्त्व- . POR ॐ विपयानु 卐 A 卐 V भ सुमङ्गला- टीकायां- x ........ र'........क्र....नः ॥ ११ ॥ -- 卐 T पत्र संख्या। 1 पत्र संख्या । ... -N. Erizone १ २ 卐 A 卐 T विषयनिर्देशः। १ टीकाकर्तृमङ्गलपीठिकादि २ जीवलक्षणम् ३ प्रत्येकतत्त्वस्य व्याख्या ४ संवरनिजरातत्त्वस्त्ररूपम् ५ वन्धमोक्षतत्त्वव्याख्या ६ मूर्ताऽमूर्त-हेयज्ञेयोपादेयविभागः ७ नवतत्त्वभेदप्रतिपादनम् S विषयनिर्देशः। ८ तत्त्वभेदेषु जीवाजीव-मूर्ताऽमूर्त-हेय- योपादेयविभागयन्त्रकम् ५ जीरभेटप्रज्ञापना १० जीयानां चतुर्दशभेटभिन्नत्त्वम् ११ मूमजीवानां स्वरूपम् १२ फन्दिगादिजीवानां व्यान्या १३ जीवलक्षणम् ३ om ४ । . 卐 ३ Aaen ६ 7 3 A' 卐 S 卐 N ध A २० 卐 U 卐 २० ११ १२ 卐 V २१ २१ २१ 卐 A 卐 A २२ १५ २३ N 卐 T १४ निखिलेष्वपि जीवेषु ज्ञानदर्शन- चारित्रादिगुणानां घटना १५ वीर्यस्वरूपम् १६ पर्याप्तिस्वरूपम् १७ बृहत्सग्रहणेतत्त्वार्थादिपु ग्रन्थेषु पर्याप्तयः १८ पर्याप्तिप्रारम्भकालो निष्ठाकालश्च १९ लब्धिकरणभेदाभ्यां पर्याप्ताऽपर्याप्त- स्वरूपम् २० पर्याप्तीनां के कार्य ? २१ इन्द्रियपश्चकव्याख्या २२ वाह्याऽभ्यन्तरभेदाभ्यामिन्द्रियप्रमाणम् २३ इन्द्रियाणां विपयाः २४ द्रव्यभावभेदाभ्यां मनः २५ वचनबलस्वरूपम् २६ कायवलप्रसङ्गप्राप्तशरीरपञ्चकव्याख्या २७ शरीरपञ्चकस्वामिनः २८ प्राणव्याख्यायामुच्चासः २९ आयुःस्वरूपम् ३० आयुषः सोपक्रमादिभेदाः ३१ सोपक्रमादेभेदभिन्नस्याऽऽयुषः कदा वन्धः ? ॥ अथाजीवतत्त्वम् १ अजीवतत्त्वस्य चतुर्दशभेदाः २ धर्माऽस्तिकायाऽधर्मास्तिकायनिरूपणम् ३ आकाशकालनिरूपणम् ४ स्कंधदेशप्रदेशस्वरूपम् ५ परमाणुनिरूपणम् ६ धर्माऽधर्मयोः स्वभावः २४ १६ १७ A २५ 卐 G 卐 A १७ 卐 T २६ २८ २९ ३० १८ १९ १९ 3 V 卐 L - 卐 A A S श्रीनवतत्त्व- 卐f y U ४७ ३१ ३२ विपयानु- ॥ क्रमः ॥ सुमजला- टीकाया 卐 M V ४८ ॥ १२ ॥ ४९ A ३३ ३४ ३६ ३६ ३८ ५४ ७ पुद्गललक्षणम् ८ शब्दस्य मूर्तत्त्वम् ९ अन्धकारव्याख्या १० उद्योत-प्रभा-छाया ऽऽतपादीनां पुद्गलत्त्वम् ११ वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शानां पुद्गलाविनाभावित्त्वम् १२ कालनिरूपणम् १३ समयाऽऽवालिकाप्रमुखव्यवहारकालव्याख्या १४ आरकपटूस्वरूपम् १५ पद्रव्येषु परिणामित्त्वादिद्वादशद्वाराणि १६ दशविधो जीवपरिणामः १७ प्रासङ्गिकं विस्तृतं लेश्यास्वरूपम् १८ दशविधोऽजीवपरिणामः १९ पट्सु द्रव्येषु मूर्तोऽमूर्तनित्याऽनित्यादिविभागः २० 'परिणामी' त्ति गाथायन्त्रकम् 卐 T 卐 A 卐 N २१ द्रव्यक्षेत्रकालभावगुणसंस्थानैः पद्व्याणि ॥ अथ पुन्यतत्त्वम् ३ ॥ १ पुन्यस्वरूपम् २ पुन्यवन्धस्य हेतवः ३ द्विचत्त्वारिश दप्रतिपादनम् ४ गत्यादिमार्गणासु पुन्यप्रकृतयः ॥ अथ पापतत्त्वम् ४ ॥ १ पापव्याख्या २ पापबन्धस्य हेतवः ३ तनमत्यादिज्ञानपञ्चकसंक्षिप्तस्वरूपम् ४ द्वयशीतिभेदप्रतिपादनम् ५ स्थावरदशकम् ६ मार्गणासु पापप्रकृतयः ३९ 卐 T ५७ ४१ ४३ A ५८ V ४६ ६१ ६२ L ४७ ॥ १२ 卐 A A या ue 卐 S N 卐 瑜 ७९ A ८० 卐 ८१ 卐 V M ८४ ६३ ६३ ६५ ६६ ६७ ६७ 卐 A A ८७ ८७ 卐 N 卐 T 卐 ४ पञ्चसमेतयः सोदाहरणाः ५ एषणासमितेरुत्पादनादेदोषवर्णनोपेता ६ एषणायामुदाहरणम् ७ द्वावेंशतः परीषहाः- ८ परीषहसहने कारणम् ९ उष्णपरीषहे उदाहरणम् १० गुणस्थानकेषु परीपहाः ११ परीपहयन्त्रकम् १२ दशवेधो यतिधर्मः १३ पञ्चवेधा क्षमा १४ सप्तदश वेधस्संयमः १५ द्वादशभावनाः १६ लोकभावनायां लोकस्वरूपम् १७ लोकाकृतेः ॥ अथ आश्रवतत्त्वम् ५ ॥ १ आश्रवस्वरूपम् २ शुभाऽशुभाश्रव ३ आशवतत्त्वे कषायाः ४ हसास्वरूपम् ऽव्रतानि ६ तुरीयमब्रह्मसंज्ञमव्रतम् ७ आश्रवतत्त्वे पञ्चदशयोगाः ८ त्रिविधो योगः ९ पञ्चवेशतिक्रया । अथ संवरतत्त्वम् ६॥ संवरस्वरूपम् २ आश्रवरोधहेतवः ३ देश-सर्वसंवरस्वरूपम् ७० ८८ ८८ 卐 G 卐 ७२ ८९ ९० ९१ ७६ 卐 T 卐 V ध A ७७ ९४ 卐 L 卐 A ७८ ९७ S प N 卐 A श्रीनवतत्त्व- ९७ ९८ - सुमङ्गला- टीकायां- ध V ॥ १३ ॥ y A ९९ १०१ १०३ १०३ T १८ घनीकृतो लोकस्सप्तरज्जुपरि मतः १९ पञ्चविध सामायिकादिचारित्रम् २० छेदोपस्थापनपरिहारविशुद्धिचारित्रे २१ सूक्ष्मसम्पराययथाख्यातचारित्रे २१ पुलाकबकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातकाः २२ सामायिकादिचारित्राणां गुणस्थानकानि ॥ अथ निर्जरातत्त्वम् ७ ॥ निर्जरास्वरूपम् २ प्रदेशोदयनिरूपणम् ३ सकामाऽकामभेदाभ्यां निर्जरा ४ बाह्यतपोभेदाः ५ पूर्वपक्षोत्तरपक्षाभ्यां वायतपस आवश्य- कत्त्वम् ६ आभ्यन्तरं तपः ७ प्रायश्चित्तभेदाः १११ विषयानु- ८ वैयावृत्यम् ११२ । क्रमः॥ 卐 ९ ध्यानभेदाः ११२ M १० रैश्च चतुर्विधमा ११३ ११ धर्मध्यानस्य चातुध्यम् ११३ A १२ मैत्र्यादिभावनाचतुष्कम् ११४ १३ धर्मध्यानस्य पिण्डस्थपदस्थादिभेदाः 3 ११५ IN १४ धर्मध्यानानुप्रवेशपरिकर्माणि भावनादेशकालासना- दीन ११६ १५ शुक्लस्योपक्रमस्तस्य भेदाश्च १६ ध्यानचतुष्कभेद-गुणस्थान-लेश्यादिप्रदर्शकयन्त्रम् ११८ । A ॥ अथ बन्धतत्त्वम् ८ । ) १ वन्धस्वरूपम् L २ बन्धप्रत्ययाः १२० 卐 १०५ १०५ १०६ १०७ 卐 A 卐 T 卐 V yog - r १०९ ११० १२० ) A ब me 卐 S - N J 卐 A U ध V 卐 A ३ गुणस्थानेषु बन्धप्रत्ययानां यन्त्रकम् ४ गुणस्थानेषु बन्धप्रत्ययाः ५ बन्धतत्त्वे औदारिकादिवर्गणाः ६ कर्मबन्धस्वरूपम् ७ प्रकृत्यादिवन्धः ८ पटप्रतिहारादिदृष्टान्तानि ९ मूलोत्तरप्रकृतिविधानम् १० उत्तरप्रकृतिभेदाः ११ सहेतुको ज्ञानावरणीयादिक्रमः १२ स्थितिबन्धनिरूपणमबाधार हितम् १३ जघन्य स्थतिबन्धः १४ स्थितिवन्धप्रत्ययाः १५ अनुभागबन्ध १६ करणाष्टकम् १७ प्रदेशबन्धः १२१ १२३ १२४ १२६ १२७ १२९ १३० १३१ १३६ १३६ १३८ १३९ १४० १४१ १४२ । अथ मेक्षतत्त्वम् ९॥ १ मोक्षतत्त्वे सत्पदादेद्वाराणे २ सत्पदद्वारम् ३ गत्यादेमार्गणाः ४ सम्यक्त्वमार्गणा ५ अपशमेका देसम्यक्त्वस्वरूपम् ६ सत्पदादेप्रत्येकद्वारैम क्षमतेपादनम् ७ मोक्षप्रतिपत्तिक्रमः T १४४ 卐 १४५ M १४६ ) १४८ A १४९ 卐 १५२ N १५७ ) G म A अथ प्रकलाधिकारः १० । 卐 A T १६० १ सम्यक्त्वस्य तत्त्वार्थश्रद्वानस्वरूपत्त्वम् २ सम्यग् दृष्टेः स्वरूपं, सम्यक्त्वजन्यलाभश्च ३ सोदाहरणाः सद्धभेदाश्च १६१ ध L V १६४ 卐 - + S N सूक्ष्म-शुद्धिपत्रकम् ॥ ॐ शुद्धिपत्रम्। U श्रीनवतस्व- A सुमङ्गला- 卐 २ १४ टीकायां | v २ ९ ॥ १४ ॥ ५१ १ १२ पत्रम् पृष्ठम्, पंक्तिः, अशुद्धम् , शुद्धम्। ३ १ ११ अविरोध., तस्मात् । अविरोध तथाहि- ४३ सव्वजीवाणपि अ ण अक्खरस्स अणतमो भागो णिच्चुग्घाडिओ, जइ पुण सोवि आव ४९ रिजा तेण जीवो अजीवत्तणं पाविजा इति । तस्मात् । २ वरीवर्तन्ते। वरीवृत्त्यन्ते । तत्र पुन्यपापतत्त्वयोश्शुभाऽ- तत्र पुन्यपापतत्त्वयो- ७२ शुभाश्रवरूपत्त्वात् । वन्धतत्त्वेऽन्तर्भावात् । ७३ ६ वरीवर्तते वरीवृत्त्यते A A २ १ ३ १ २ १४ वर्तते । १ ६ ७ N १ ។ तुल्याविति । द्वाप्यनागतातीतौ तुल्याविति । जीवप्रदेशानामसंख्येयलोका- जीवप्रदेशाना लोका- काशप्रदेशप्रमाणानाम् । काशप्रदेशप्रमाणानाम् भाविनीत्येयं भाविनीत्येव । तदौदारिकाजोपाजनाम । तद् वैक्रियाजोपालनाम। जीव सा सा । जीवस्तास्ता । योगसद्भावाद्रव्यतस्तु । योगादिसद्भावाहव्यतस्तु। वत्तते अभिगृहीतमिथ्यादर्शन दर्शन- अभिगृहीतमिथ्यादर्शन- प्रत्यायिकी। प्रत्यायिकी । शेषकाले चरणप्रतिपत्ते। शेषकाले देशचरणप्रतिपत्ते। इत्याभिलाषेण । इत्यभिलाषण । सहसारं यावत् । सहतारं यावत् । उच्छ्रयेन । उच्छयेण । सुख्येव सर्गस्स्यात् । मुख्येव सर्वस्स्यात् । अनन्तगुणा । अनन्तगुणा । गृहित गृहीत । 卐 ។ २ १ ७ १३ १३ ८ २ २ ११ 卐 T ध A 卐 T 卐 V 卐 A 卐 ११ २ १३ ७ २ १ A १९ २ ८ समापय्येव । समाप्य ९३ वरीवर्तते । वरीवृत्यते । चिन्तनात्मकव्यापारप्रवृत्त- चिन्तनीयानुगुणात्म- मनोयोगेन । व्यापारेण । ९८ परिश्रुत । परिसुत । १२५ अथवा द्वावप्यनागतातीती- अथवा शब्दव्युत्पत्त्या १२७ १ २ ॐ L ३४ १ १० १ १४ १ १० M १ १० ॥ १४ ॥ M 卐 A y ध या S N NA K4 卐 A आयरियनमुक्कारेण विजामंता य छ. सि 'ति । कि 卐 V |M जन्म-सिद्धक्षेत्र. 卐 दीक्षा-म्हेसाणा. सं. १९५७। A सं. १९३५॥ 卐 A 卐 T 卐 N स्फूर्जप्रौढगुणप्रसूनसुरभिप्रावासिताऽर्हद्वनो- य. सिद्धान्तविचारचारुचरितो व्याख्यानविकोविदः। श्रद्धाज्ञानविवेकशीलविलसत्सद्रत्नपाथोनिधि- स्तं श्रीमोहन रेराजमनघं वन्दे त्रिधा भक्तितः ॥ 卐 G A 卐 A 卐 T 卐 V पंन्यासपद-राजनगर. सं. १९७३। आचार्यपद-राजनगर. सं १९८०। L 卐 A 卐 A 卐 LG e 卐 N 卐 S m . 卐 A 卐 U 卐 V LI ॐ M 卐 A 卐 A ceCECCECODOGODDODO22000000000000002Doses 卐 T 卐 जन्म-वढवाणशहेर संवत १९६० A 卐 लघुदीक्षा-सांगणपुर (म्हेसाणा) 卐 N 卐 FoGOOTOOGO DOCTORSESSBSCLOSOIGSOREDGCROSECSDNESDODDEO उपस्थापना-वडोदरा. सं. १९७६. वैशाख शु. १॥ A - प्रवर्तकपद-सिद्धक्षेत्र पालीताणा संवत १९८७। संवत १९७६ माघ शु. ११ 卐 L V 卐 A 卐 A ए प्रवर्तक मुनि धर्मविजयी हरज.

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N 卐 A 卐 V ॥ ॐ नमोऽहत्परमेश्वराय । श्रीसिद्धार्थपार्थिवकुलगगनाङ्गणगभस्तिमालज्ञातनन्दन महानोरक्रमकमलाभ्यां नमनमः ॥ त्रिभुवनभर्तृश्रमजिनपतिगदितानवद्य निःश्रेयसाध्वप्रदर्शक-परमकारुणिक-नरवद्यचारित्रशालि- पूज्यपादारविन्द-१००८ जैनाचार्यमद्विजयमहनसूरीश्वरेभ्यो नमः ॥ 卐 U 3 M 卐 A ज T न्टवाकर सु-ङ्गलदेकर लंकर- 卐 A 卐 N 卐 A ॐ G 卐 A । शंखेश्वरपार्श्वनाथाय नमोनमः । ऐन्द्रालिमणताय दोषविगमान्निःशेषसत्संविदे, संसाराब्धिनिमजतामसुमतां पोतायमानाय च । कल्याणकनिकेतनाय जग वन्दारुकर्म च्छदे, त्रैलोक्यैकसुरद्रुमाय सततं स्टद्वदने ने नमः ॥१॥ सिद्धार्थप्रगुणद येतानन्दनं चारुतन्त्रं, आपत्कोटीवेघटनपटुं संपदाकृष्टिमन्त्रम् । श्रेयोवल्लवनजलधरं तत्त्व सधदीपं, भव्याऽजाऽर्क -धुमतिधवं नन्नमाम् श्वरम् २ १ अर्हते इत्यर्थः। 卐 T 卐 V 卐 A 卐 L 卐 卐 N 卐ru U 卐 मङ्गल- ॥१॥॥ A A T N ध नवतत्त्व वन्दारुजनमन्दारं वृन्दारकनिषेवितम् भव्याम्भोजवैवस्वन्तं, वन्देऽहं गणगौतमम् ॥ ३ । टीकाकार- A सुमङ्गला- एक सदयहृदयकान्तं पूज्यमानं सुभन्दै-ग्रंथितललितपर्वर्ण्य नं कवीन्द्रैः॥ टकायां- V जिनचरणसरोजे सर्वदैकाग्रचेत्तं, वेजयकमलसूर संस्तुवे तिपूर्वम् ॥ ४ ॥ MPठकाद. येनाऽज्ञानतमो ममेन्दुसदृशस्फूर्ज़त्सुबोधांऽशुभ-लस्तं यश्च विपश्चिर्दशनिकरेणाऽऽसंस्टुतः सद्धिया। 卐 बाल्येऽपि प्रजिगाय मोहनृपतिं कल्याणकल्पद्रुमं, भो भव्याःप्रणमन्टु तं बुधवरं सूरीश्वरं मेहनम्।५। 卐 क बुद्धिलेशो बिन्दुटुल्यः, केदं च शा जल शमानम् । 卐 तथाऽपि "तार्थगुरुप्रतापात् सुमङ्गलानावे सुस्थितोऽहम् ॥ १॥ 卐 इह है नारकतिर्यड्नरामरगतिस्कन्धस्य, गर्भनिषेककललार्बुदमांसपेश्यादिजन्मजरामरणशाखस्य, दारयाद्यनेकव्य- सनोपनिपातपत्रगहनस्य, प्रयविप्रयोगाऽप्रियसंप्रयोगाऽर्थनाशाऽनेकव्याधिशतपुष्पोपचतस्य, शाररमानसोपचितव्रतरदुः- - खोपन्पातफलस्य संसारतरोरून्मूलने रक्ष्णकुठारकल्पा अहमहमिकावनम्रनिःशेषसुराऽसुरनिकरा अमतपुण्यप्राग्भारा सकलजगजंतुजाताभिरैकान्तहितानुशासनखिभुवनभवनाभोगभा सिनः प्रध्वस्ताऽशस्ततिमिर नकराः सर्वज्ञ'देवाकरा जैनेन्द्र- A प्रवचने सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि अवन्ध्यमोक्षफलप्रापकत्वेन प्रोचुः । तत्रापि त्रकमध्ये तत्त्वार्थश्रद्धानात्मकं सम्यग् 卐 卐 १ जलधीनामीशः स्वयंभूरमण इति । ॥१॥ 卐 A T V L A 卐 A 卐 N 卐 U A V A A a दर्शनं प्रधानतया त एव तीर्थकरगणधरा उरसे चक्रुः, यतो नह सम्यग्दर्शनं विना ज्ञानचारित्रे स्वेष्टकार्य प्रसाधयतः, सम्यक्त्वमूलके एव ज्ञानचारित्रे मोक्षं प्रति अवन्ध्यकारणे, उक्तञ्चाहत्प्रवचनसंग्रहे तत्त्वार्थाधिगमसूत्रसम्बन्धकारिकायां परम- ॐ कारुणिकैः पाठकप्रवरैरुमास्वातम्ररिवरैः;-" सम्यग्दर्शनशुद्धं यो ज्ञानं विरतमेव चाप्नोति । दुःखनिमित्तमदं तेन सुलब्धं 卐 भवते जन्म ॥१॥" सम्यग्दर्शनस्य तत्त्वार्थश्रद्धानात्मकत्वात् कान तत्त्वाने किंनामधेयानि कंस्वरूपाणि च ? इत्यन्तै- 卐 ॐ वासजिज्ञासामाकलय्य तत्त्वप्रतिपादिकामिमां प्रथमां गाथां वस्तुसंकर्त्तनात्मकमङ्गलस्वरूपां च ग्रन्थकारस्तावदाह;- वाऽज्वापुण्णं, पवसवसंवरे र ने रण । बंधे मुक्रर तह, न्त्र हुंत नरह १ 3 टीका-'जीवेति'-जोवः, अज् वः, पुण्य, पापं, आश्रवः, संवरः, निर्जरा, बन्धः, मेक्षताने नवसंख्यात्मकानि, N तत्त्वानि ज्ञातव्यानि भवन्ति, हेयज्ञेयोपादेयतया वैविच्य निवृत्तिप्रवृत्तिरूपेण भजन यानि सुप्रसिद्धाने च जिनमते इते - 卐 गाथाक्षरार्थः ॥ अथ विस्तरेण प्रत्येकं तत्त्वं वित्रियते, तत्र तावदादौ वतत्त्वम् , ननु उव इति का पदार्थः ? इत्याशङ्कायामुच्यते, 'जोव प्राणधारणे' इति भवादिक धातुः, जति स्वस्वयग्यतया इन्द्रयप्रभृतिप्राणान् धारयन्तीति 卐 卐 जीवाः। प्राणाश्च द्रव्यभाव दाद् द्विधा, तत्र द्रव्यप्राणा-दशप्रकाराः पणिदिये'त्ति गाथायां वक्ष्यमाणाः भावसंज्ञकाःप्राणाश्चान- 卐 न्तज्ञानदर्शनचारित्रात्मकाश्चतुःप्रकाराः, तत्र ये संसारस्था जीवास्ते वक्ष्यमाणेन्द्रियादिप्राणान् यथायोगं विभ्रति, ये च दग्ध- अ सकलकर्मेन्धना अनन्ताप्रतिमज्ञानदर्शनशालिनो मुक्तिसख्यभाजस्सिद्धास्ते तु पूर्वोक्तान् चतुरो भावाभिधान् प्राणान् धार- यन्ति, इति प्राणधारणात्मकं जीवस्य लक्षणम् ॥ अथवा व्यवहारनयेन यस्तथाविधाऽध्यवसायवशतः शुभाऽशुभानां कर्मणां T A A T L V 'A S N नवतत्त्व- सुमङ्गला- टीकायां- 卐 A 卐 V जव- लक्षणम्. ॥ २ ॥ 卐 A y T 卐 A N 卐 कर्ता, तेषामेव सुकृतदुष्कृतानां फलमुपभोक्ता, कर्मानुसारेण नारकादिगतिपु संसर्चा, कर्मणामात्यन्तिकक्षयं विधाय परि- निर्वाता च स एव जीवो नान्यः । यदुक्तम्-" यः कर्त्ता कर्मभेदानां भोक्ता कर्मफलस्य च । संसद् परिनिर्वाता स ह्यात्मा 卐 नान्यलक्षण: " ॥ १॥ अथवा 'चैतन्यलक्षणो जीवः' इति वचनात् सुखदुःखाद्यनुभवज्ञानात्मको जीवः सश्शेमुष्वद्भि- स्सुतरां प्रत्यते । अथात्र कश्चदारेकते; ज्ञानरूपश्चैतन्यरूपो वा वश्चेत् अनवरतमेव कस्मात् सोऽर्थान् न पश्यति, 卐 जानानं हि ज्ञानमुच्यते, ज्ञानं च न जानेते विप्रतिपिद्धमिदम् , जयश्च ज्ञानरूपोऽतः सर्वदा तेन जानानेनैव भवितव्यम् A न कदाचिदन्यथा, विज्ञानात्मके जीरे कस्मात् पूर्वोपलब्धार्थविषय वस्मरणमविनष्टज्ञानस्य सतोऽस्य भवति ?, “के वा कारणमात्मनः अव्यक्तबोधत्त्वे, ज्ञानं नाऽव्यक्तमिष्यते, उपलब्धिस्वरूपत्वाच्च ज्ञानस्य, चैतन्यपर्यायज्ञानात्मकत्त्वादा- त्मनो न जातुचच्छङ्कतेन भवितव्यम् , लोकाऽलोकवनिःशेषद्रव्यपर्यायज्ञातृत्वेनाऽवश्यं भाव्यमात्मना प्रतिसमयमित । अत्रोच्यते-ज्ञानात्मत्वे सत्यपि वस्य सर्वस्मिन्नपि वस्तुनि न निरन्तरोपयोगप्रसङ्गः, कथं ? भवाद्भवान्तरं संसरणर्श लेऽ- यमात्मा कर्मवशात् प्रदेशाष्टकमपहाय सर्वप्रदेशेषु ज्वलनज्वालाकलापोपरिष्टाद्वर्त्तमानघटान्तर्गतरवच्चलः कृकलाशवत्स- ततमेवार्थान्तरेषु परणाई चिरेकस्मिन् द्रव्ये पर्याये वा कथमुपयुज्येत ?, स्वभावादेव च भवस्थजन्तूनां उपयोगस्थि- तिरन्तर्मुहूर्तप्रमाणोत्कृष्टतः, इत्यादिहेतुभ्य ज्ञानावारककर्मपटलाच्छादितवान्न सर्वदावैति चैतन्यलक्षणोऽप्ययं वः। 卐 यथा प्रकाशमयत्त्वेऽपि सविता नेविडधनघटा भभूतमूर्त्तिन प्रकाशते स्पष्टं तथाऽयमात्मेत्यवगन्तव्यम् । स्मृतिरपे अत एव नाऽवश्यंभावन जायरे तस्य कर्मावृतात्मनः, अव्यक्तबोध-संशयाऽ-सर्वद्रव्यपर्यायज्ञानानि च आवरण लज्ञाना- G T A 卐 V L ॐ ॥२॥ 卐 A A 卐 ॐ S 卐>卐z M 卐 A ध T N वरणकर्मसद्भावादम्युऐयानि, यदा च लब्धिरूपान्तःकरणे-न्द्रियऽऽभगकाऽनाभोगेकर्यसम्पन्नस्याऽऽत्मन र्यपर्याय- करणाडसारी क्षयोपशमस्संजायते तदा यथाक्षय पशमं ज्ञानमाविर्भवति, संक्लिष्टाध्यवसायेन क्षय पशमानुकूला- ज पगमे च पुनरपि तदेव ज्ञानावारकं कर्म आवृणोति सद्यस्तमात्मानम् , प्रागपाकर्णसेवालानामपामच्छत्त्वमिव, पुरुषका- रव्यापार विरामादनन्तरमेव शैवालपटलाने यथा पुनराच्छादयन्ति, यथा वा भस्मायनेकद्रव्य दृष्टविमलादर्शतलमागन्तु- क कश्यामिकामल'मसमाशुजायते, अथवा संमार्जन शुद्धप्रासादेऽपि प्रबलपवनद्धता रजांसि वातायनद्वारा समागत्य विशु- दुमी हयं कचवरसंपन्नं विदधते तथाऽस्यात्मनो रहुहुर्ज्ञानावरणजलधं निमजनेन्मजने कुर्दृतः स्पष्टः स्पष्टतरः स्पष्टतमः 卐 मल मसः मर्ल मसतरः मर्ल मसतमश्चः बोधः प्रादुरस्ति, शारदः शश्व यदा सर्वथा नरावरण ज्ञानावारकत्वादिधातिका- क्षया भवति तदा हस्तामलकवद् निःशेषद्रव्यपर्ययान् जानाति प्रत्येतव्यम् ॥ ननु नगदादिषु चेतनालक्षणवत्त्वं डीवस्य ध 卐 कथं जाघट है ? न दृश्यते तत्र चैतन्यलेशेऽपि, उच्यते-तत्रापि चेतनाऽवश्यंभावन अल्पांशतया, एतच्चारे वक्ष्याम 卐 वयं, तथापि यदि-निगदप्रभृतिष्वल्पचैतन्येषु स्तकतमऽपि ज्ञानांशे न स्यात्तदा जवा अश्वत्त्वं प्राप्नुयुः, एवं चाऽऽग- 卐 मविरेधः, तस्मात् चेतना लक्षण व इत सद्धम् । जीवस्य यल्लक्षणभेदाद्यात्मकं स्वरूपं तङ वतत्त्वम् । १ । 卐 द्रव्यभावप्राणधारणात्मकं कर्मकर्तृत्वादिक चेतनात्मकं यऊ वलक्षणमनुपदम्बेक्तं तद्यत्र न घटरे सज्वः धर्माऽध- ' v आकाशपुद्गलकालात्मके वक्ष्यमाणस्वरूपः ये जवन भवस अजीव इति नसमारे पर्युदास विडेयः, विद्रव्यापेक्षया- s भिन्नानामपि अज् वद्रव्याणां द्रव्यापेक्षया भिन्नत्त्वम् ॥ तस्य लक्षणप्रकारात्मक स्वरूपं तद वतत्त्वम् २। पुनात पवित्रीकरोति ज A G T A L A A का N S अनवतत्त्व- 3 A प्रत्येक- तत्त्वस्य V M व्याख्या. 卐 A T प्राणिनः पापपङ्कादिति पुण्यम् । यैः कर्मपुद्गलैजौवस्य सातानुभवः संजागते ते कर्माणवः द्रव्यपुण्यसंज्ञकाः, द्रव्यपुण्यनामक- सुमङ्गला कर्मोत्पत्तं हेतुभूता जीवस्य ये शुभाध्यवसायास्तद् भावपुण्यमुच्यते ॥ अथवा पुण्यानुवन्धि-पापानुवन्धनकाराभ्यां पुन्यं- र्टकायां द्वधा, तत्र पुन्यं भुजानस्य यन्नव्यं शुभकर्म वध्यते, यस्योदयेन च पुनः शार्लभद्र इव असुत्र सुखसंपत्तिं सम्यप्रकारेणानु- भूय पस्त्राऽप सुखमेव भुनक्ति तत्पुन्यानुवन्धिपुन्यं, अस्मिल्लोके ये दानशण्डा रिद्धिमन्तः परमपारगतप्रातत्रिकालाबाधित- ॥३॥॥ रंतरागधर्म सम्यक्पालयन्त इहभवे शान्तिसाम्राज्यमनुभवन्ति, धाराधनप्रभावाच्च पुनरागामभवे स्वर्गादिसुखं भोक्ष्यन्ते, अत्र पुन्यानुवन्धिपुन्यमेव कारणतां भजति, यत् कल शुभमनुष्यादेर्जीवस्य पूर्वभवपश्चितं कर्म मानुष्यत्त्वादिशुभभावानु- भवहेतुर्भवति, तदनन्तरं देवादिगतिपरम्पराकारणं च तत् पुन्यानुवन्धिपुन्यमुच्यते इति तात्पर्यार्थः, एतच ज्ञानपूर्वकनिनिंदा- नकुशलानुष्ठानाद् भवति ॥ यस्योदयेन च पुनः ब्रह्मदत्तचक्री इव अमुत्र भवे सुखमनुभूय परत्र नरकवतिर्यक्त्वादिकं अनु- 卐 भवति तत् पापानुबन्धिपुन्यम् । यथा आर्यजनपदेऽनार्यदेशे वा एतादृशोऽपि केचन व वर्तन्ते यदस्मिन् भवे जन्मान्तरोप- चितपुन्य पाकात्मकं लक्ष ललनापरिकलितं विषयसुखमनुबोभूयन्ते परं गर्वाध्मातमनसः त्रिपुट शुद्धदेवगुरुधर्ममश्रद्दधाना 卐 देवानांग्रियाः कृतघ्नास्सन्तस्ते दानशीलादिधादिकार्यमकुर्वाणा असदाचारप्रवृत्तत्तया हंसा-मृपावाद-स्तेय-परदारगामित्व- परिग्रहग्रहिलतया पापातिशयं चद्धा नरकादिभवेतीवशातनामनुभवन्त दर दृश्यन्ते ज्ञानिभिः, अत्र पापानुवन्धिपुन्यस्य हेतुता, अस्मन्नवतत्त्वप्रकरणे पुन्यानुवन्धिपुन्यमेव सुकृततया ज्ञेयम् , तस्य लक्षणप्रकाराभ्यां खरूपं तत्पुन्यतत्त्वमिति ॥३॥ अपगता y निरस्ता सुखानां प्राप्तिर्यत्र तत् पापं, यस्योदवेन बो दुःखदर्भाग्यादिकमनुभवन् दृश्यते तच्च पापस्य विलसितम् । तत्र 卐 N A G T V A 卐 L A A I 卐 N A M V A 卐 A N 卐 T जवस्य दुःखहेतुस्ता ये कर्मपरमाणवस्ते द्रव्यपापतयाऽभिध यन्ते, यच्च पुनरशुभकर्मण उत्पत्तं मलनिमित्तभूता ये संक्लि- ही याऽध्यवसायास्तद् भावपापमुच्यते, एतदपि पुण्यवत् पापाञ्बन्धि-पुन्याञ्बन्धिभेदाभ्यां द्वप्रकारम् । तत्र रे पूर्व विहिता:- शुभकर्मणा तत्कर्मफलं दासत्त्वादिकमुपभुजाना धीवरशवरादय इहभवे दुःखिता वलोक्यन्ते, परभऽपि मत्स्यकपोतप्रभृति- क्षुद्रजन्तुविधातोपात्ताशुभतमकाणो वचनाऽगोचरं दुःखमनुभवन्तो दृश्यन्तेतराम् , एतच्च पापाजुबन्धिपापमुक्तं मेधाविना पूर्वोपार्जितकर्मणाऽभियोग्यादिदुःखानुबद्धदेहमनसो दुःखेनाजस्रमनुतप्तचेतस्का अशरणास्सन्तोऽपि चेत से ये एवं चिन्तयन्ति 卐 यदस्माभिर्दुर्लभतरं नरभवमवाप्य कंचिदपि धर्माचरणं न विहितं, कृपालेशोऽपि न व्यधायक्षुद्रप्राणिष्वस्माभिरनेकपापाचरि- 卐 ताने अज्ञानत्न कृतान, अत एव्दान मवाच्यं दुःखं सह्यते परवद्भिरस्माभिः, इहभऽपि यदि करुणाविष्टचेतस्कतया वयं न कमपि यथाशक्ति सुकृतं विधास्यामो तरागप्रणतविशुद्धधर्मशरणं नाङ्ग करिष्यामस्तदा परत्रापि का गतिविन माम- कीना, इत्येवं मनसि निर्धार्य "सह कलेवरखेदमचिन्तयन् स्ववशता च पुनस्तव दुर्लभा, धनतरं च सहिष्यसि जीव रे परवशे च तत्र गुणोऽस्ति ते" ॥१॥ इति सूक्तोक्तमर्थं सफल कुर्वन्तः दरद्रश्राद्धचंडक शिकादिवत् भकर्मोपार्जनं कुर्वन्त तत् पुण्या- 卐 नुबन्धि पापम् । अस्मिन्प्रकरणे पुन्यानुबन्धिपापमेवोरर कर्त्तव्यम् , अस्य पापस्य स्वरूपं लक्षणभेदात्मकं तत्पापतत्वम् ॥४॥ आसमन्तात् सूयते गृह्यते कर्म यैस्ते आस्रवाः शुभाऽशुभकादानहेतवः । यथा वविधविवरशतसंकुलायां नावि वैवरेभ्य उदकं 卐 प्रविशति, जलाक्रान्ता च न का जलध निमज्जति, तथाश्रवविवरशतसंकुलोऽयमात्मा कर्मोदकभराक्रान्तस्सन् अपारसंसार- पारावारे त्रुडति । यया क्रिययाऽऽत्मप्रदेशेषु कर्मण आगमनं सा द्रव्याश्रवत्वेनाख्याता, कर्मोपार्जने हेतवो रागद्वेषात्मका 卐 ज A 卐 T 卐 V 卐 L A ध N Fo卐E अनवतत्त्व- A तत्त्वस्य सुमङ्गला- टकायां- 卐 व्याख्या. V M ॥४॥ ) A T N ये विशुद्धाऽविशुद्धाध्यवसाया जीवस्य ते भावाश्रवाः । अस्याश्रवतत्त्वस्य लक्षणभेदात्मकं स्वरूपं तदाश्रवतत्त्वम् ॥ ५॥ तथा प्रत्येक- संवृणोत्याच्छादयत्याश्रघद्वाराणि, अथवा संवियन्ते सम्यक्तया नवार्यन्ते समागच्छन्ति कर्माण यस्मात्स संवरः, तेषामा- 卐 श्रवाणां गुप्त्यादिभरोधः स संवर इत्यर्थः, तथाचोक्तम् । “आश्रवनिरोधः संवरः" ( तत्त्वा० अ. ९. सू. १)। तत्र जीवप्रदेशेषु कर्मण आगमनस्य यो निरोधः स द्रव्यसंवरः, कर्मण आगमनस्य निरोधे ये आत्मनो विशुद्ध-विशुद्धतर-विशु- 卐 द्धतमाऽध्यवसायाः स भावसंवरः, यदुक्तं योगशास्त्रेः-" सर्वेपामाश्रवाणां तु निरोधः संवरः स्मृतः। स पुनर्भयते द्वेधा द्रव्य- भावविभेदतः ॥१॥ यः कर्मपुद्गलादानच्छेदः स द्रव्यसंवरः । भवहेतुक्रियात्यागः स पुनर्भावसंवरः" ॥२॥ तस्य स्वरूपं त तत् संवरतत्त्वम् ॥६॥ नितरामतिशयेन यन्ते यन्ते कर्माणि यया सा निर्जरा, कर्मणां तु विपाकात् तपसा वा यः शाटः सा निर्जराऽथवा, सा सकामाऽकामभेदाभ्यां द्विधा, तत्र तरागपारगतगदितो जवुद्धिशालिगणधरगुम्फितःश्रीजिन- धर्म अवितथ एव इते मन्यमानस्य प्रज्ञावतस्सम्यग्दृष्टेः शुभ-शुभतर-शुभतमाध्यवसायेगे कर्मणां शादः सा सकामनिर्जरा। एकमपे जनागमाऽक्षरं वैपर त्येन श्रद्दधानस्य मिथ्यादृष्टेयः कर्मणां परिक्षयः सा अकाम निर्जरा अभिध्यते, उक्तञ्च;- y " संसारजभूतानां कर्मणां जरणादिह निर्जरा सा स्मृता द्वेधा सकामा कामवर्जिता ॥१॥ ज्ञेया सकामा यमनमका- मा वन्यदेहिनाम् " ॥ अस्मिन् प्रकरणे सम्यग्दृष्टेर्या सकामनिर्जरा सैव निर्जराटेन गणन् या, यतस्सम्यग्दृष्टिः शुभाध्य- पत वसायपरिणतस्सन् यावत् प्रमाणं कर्म परिशाटयति तत्प्रमाणात् नूतनकर्मवन्धमत्वाल्पतया वेदधात, अनेन क्रमेण १ ‘यमिनाम्' इत्यनेन सम्यग्दृष्टयोऽपि ग्राह्याः, न केवलं संयता एव, यतः सम्यग्दृष्टीनां सकामनिर्जरा सेद्धान्ते मुविख्याता। . ॥४॥ G ज A 卐 T A L. 卐 V 卐 A ज A ध । S 卐 N A V A A ज ध बहुनिर्जराऽल्पबन्धात्मन्न वस्य मोक्षाऽव :, मिथ्यादृष्टिश्च पुनः अल्पनिर्जरां बहुबन्धं च विधत्ते अत आत्यन्तिककर्म- क्ष्यावसरे नास्ति तस्य । पुनःसा निर्जरा द्रव्वभावदाद् द्विविधा, कर्मण आत्मप्रदेशेभ्यो यद्देशेन निर्जरणं सा द्रव्यनिर्जरा 卐 卐 निर्जरायां निमिर भूता आत्मने येऽच्छतमाध्यवसायाः सा भावनिर्जरा । अस्य लक्षणभेदात्मकं स्वरूपं न:रातत्वम् ॥७॥ मिथ्यादर्शनाऽविरतिकषाययोगैः शुभाऽशुभं कर्म बध्नाति इति बन्धः । पूर्वोक्तस्वरूपैरास्रवैः दररवद्वढ्ययःपिण्डवद्- ' 卐 वाऽऽत्मप्रदेशैः सह प्रकृत्यादिवशेषतो यः कर्मणां सम्बन्धः स बन्ध र्थः ॥ इदमत्र तात्पर्यम्-प्राग्वद्धं कर्म विपाक- दयप्राप्तं सत् तत्सामर्थ्यात्तथाविधाऽध्यवसायवशतः यदि वस्तथाविधवन्धनपरिणामपरिणतो भवति ततः कर्मवर्गणान्तः- 卐 卐 पातनो जवप्रदेशाऽवगाढाः पुद्गला अपि ज्ञानावर यादकर्मरूपतया परिणमन्टे, यदाहा-" चपरिणामहेऊ कम्मत्ता पुग्गला परिणमन्त । पोग्गलकम्मनिमित्तं जवऽव तहेव परिणमइ” । १॥ इत, अस्य लक्षण दात्मकं यत् स्वरूपं 卐 卐 तद् बन्धतत्त्वम् ॥८॥ तथा मक्षयति मेचयत बन्धदयदीरणासत्तागरेभ्योऽष्टकर्मभ्य विमति मक्षः कृत्स्नकर्मक्षयात् ज्ञानशमयदर्शनात्यन्तिकैकान्तिकाऽनाबाधनिरूपमसुखात्मके स्थाने आत्मनः अवस्थानं मोक्षः, तस्य मेक्षतत्त्वस्य लक्षण- 卐 भेदात्मकं स्वरूपं तन्मोक्षतत्त्वमिति ॥९॥ ज पूर्वव्याख्यातेष्वेषु नवतत्वेषु कियन्ति चस्वरूपाणि कियन्ति चावात्मकानि? इत जिज्ञासायां कि द्वत्रियरे, सार्ध 卐 v मूर्ताऽमूर्तविभागाः हेयज्ञेयोपादेयविभागा अपि तत्त्वनवकस्य ल्लिख्यन्ते । ज्चतत्त्वं ज्वेन युक्तत्त्वात् जेवस्वरूपमेव, संवर- L निर्जरामोक्षात्मकानि ण तत्वानि वगुणानां प्रकाशकरोन तान्यपि जीवात्मकानि । पुण्यपापाऽऽश्रवबन्धलक्षणानि चचारि 卐 T G A T 卐 A A N S M A A 卐 T N 卐 अनवतत्त्व- पुद्गलविकारात्मकानि अतोऽजीवत्त्वोपेतानि, अजोबतत्त्वं तु अजीवस्वरूपमेवेति जीबाजीवविभागः । मूर्ताऽसूर्तविपये जी इन्द्रि- मूर्ताऽमूर्त- A सुमङ्गला- यायतनयुक्तत्त्वान् मूर्च, अवस्तु मूर्ताऽमूर्तस्वरूपो यत्कतिपयधर्माऽधर्माधानि द्रव्याण्यमूनिमन्ति, पुद्गलाच मूर्तिमन्तः । हेयज्ञेयो- 卐 र्टकायां- पुण्य-पापाऽऽश्रव-बन्धलक्षणानि चचारि पुद्गलविकारात्मकत्वेन मूर्नानि, संघरनिर्जरामोक्षाश्च विपरिणामरूपत्वादमूर्ताः। ॐ पादेय इति मूर्ताऽमूर्तविभेदः । तत्त्वनवके जोवाजीव ज्ञेय, नह ज्वाऽजीवयोरादरत्याग भवतः । पापाऽऽश्रव-वन्धस्वरूपाणि विभाग, ॥५॥ ण तत्वानि आत्मगुणविघातकच्चाद्धेयान । संवर-निर्जरामोक्षाश्च जीवगुणप्रकाशकत्वादुपादेयाः, पुण्यस्य तु सुवर्णशृंखला- बन्धनस्वरूपत्वात् निश्चयनयेन मुसुक्षुणा त्याज्यमेव परं मोक्षमार्गगमन लस्य मुसुक्षो पथि पाथेयमिव हितकरचादुपादेयमपि ।। 卐 ननु नवतत्त्वेपु प्रथमं वतत्त्वं, द्विरं यमजीवतत्त्वं, तृरेयं पुण्यतत्त्वं इत्यादिकः क्रमो निर्हेतुकस्सहेतुको वा ? यदि सहेतु- कस्तदा को हेतुः ? उच्यते सकलतत्त्वावगन्ता, पुद्गलद्रव्याणामादाता आश्रवसंवरादिक्रियाविधाता जव एव, यावर्जवस्वy रूपं सम्यक्तया न ज्ञायते तावऊ वविरोधिनो वस्य-पुण्यपापाश्रवादीनां च नोपपत्तिस्तस्मादाद वतत्त्वम् । अवस्याऽमुत्र परत्र च गत्यागत्यादिकर्मसु अवस्वरूपाणां धर्माधर्माऽस्तिकायार्दनां साहाय्यमृते सामर्थ्य नास्ति तस्माद्वितीयम व- तत्त्वम् । कर्मस्वरूप पुन्यपापावजीवात्मकावेव तत्रापि पुन्यं शस्तमशस्तं च पापतत्त्वमिति क्रमशः तुत्यतुर्यो पुन्यपाएं ज 卐 ज्ञेय । पुन्यपापयोरपि शुभाऽशुभाश्रवं विना ग्रहणं न जाघीति ततः पञ्चममाश्रवतत्त्वम् । यत आश्रवेण कर्मवन्धो भवति ततः तन्निरोधकेन केनाऽपि तत्त्वेनाऽवश्यं भवितव्यम् , स च संवरः तच्च पष्ठं तत्त्वम् । संवरेण नवकर्मसंततिर्यथाऽवरुद्धा १ संसारिजीवापेक्षयेदम् , सिद्धजीवापेक्षया त्वमूर्त एव ।। ॥ ५। A T A L A 卐 A ॥

म S ज N ज A U V y A A 卐 T N तद्वत् पुराणकर्मक्षपकं कमपि तत्त्वं वर्त्तते, तच्च नर्जराख्यं सप्तमं तत्त्वम् । आश्रवेण गृह तानां कर्मण सूचकलापदृष्टान्रे- न बद्धस्पृष्टनिधत्तनिकाचनाप्रकारैरात्मनः साकं यावत्सम्बन्धे न स्यात् तावदुदयद्वारा तस्य फलमपि न संभनेत्, यच्च पुनर्ड वसम्बद्धप्राचे नकर्मविनाशकं निर्जरानामकं तत्त्वमस्ति तसादात्मना सह कर्मसंयोगकारण केनापि तन्देन भाव्यम्व, ध तच्च बन्धनामकमष्टमम् । यदा जन सह कर्मसम्बन्ध भवति तदा तस्य कर्मण आत्मप्रदेशेभ्यो मेक्षोऽपि संभावरे यः, । पुनमक्षस्य सर्वोत्कृष्टतया तदर्थमेव समस्तश्रुतप्रवृत्तिः अपस्फुर ते चातस्सर्वश्रेयसामास्पदं सकलमंगलमणिमाणिक्यमकराकरा- यमाणं मोक्षनाम्ना सुविख्यातं नवमं तत्त्वम् ।। ग्रन्थान्तरेषु तत्त्वसप्तकं श्रूयते यथा-"उवाज वाश्रवबन्धसंवरनिर्जरामक्षा- 卐 स्तत्वम् " इति ( तत्त्वा-अ. १. सू. ४) तत्कथं तचनवकं पुनः पुनः प्रस्तूयरे ? सत्यं, तत्वसाकं यदस्ति तत्र पुन्यपाप- तत्त्वयोश्शुभाऽशुभाश्रवरूपत्वात् आश्रवे तत्त्वे एव समाशे व्यधायि वाचकमुख्यैः, एवं च विवक्षया नवानामपि तत्त्वानां 卐 जीवाज वात्मकत्वात् जवाजोवलक्षणे तत्त्वद्विले निखिलानामपि तत्त्वानामन्तवेधानं संजायते, अतो पूर्वक्ताऽऽरेका न कर्तव्येति ॥ ननु ग्रन्थाद मध्ये ग्रन्थं ग्रन्थान्ते च ग्रन्थनिर्मातृभिविनव्यूहव्यपोहाऽर्थ शिप्यशिक्षा पूर्वपुरुषपरिपाट पालनार्थं च मङ्गलमवश्यमेव कर्त्तव्यं, तच्चास्मिन् नवतत्त्वप्रकरणे नाऽऽलोक्यते, तत्र के जम् ? उच्यते; नमस्काराऽऽदवस्तुसंकत- नात्मकान त्रिप्रकारकाणि मङ्गलानि तत्तद्ग्रन्थेषु सुतरां व्याख्यातानि, अस्मिन् ग्रन्यै नमस्काराऽऽर्शदाऽऽत्मले मंगले दृष्टिपथं नागच्छतः परं वस्तुसंकर्तनाख्यं तृतीयं मङ्गलमत्र वरवर्त्तते, ततेऽऽत्र मङ्गलाऽभावप्रकारका विनेयाऽऽशङ्काऽपास्ता 'नायवा' इतिपदेन नवतत्त्वानां स्वरूपमभिटेयम् । प्रयजनं तुवादितत्वानां ज्ञानं सुपरिज्ञाय हेयोपादेयेषु निवृत्तिप्रवृत्त 9 A 卐 3 T A V L + 卐 A A N S 卐 A 3 V 卐 A A T श्रीनवतत्त्व- 卐 विधाय मोक्षमा गमनमेव सुविदितम् । अभिटेयनवतत्त्वानां ग्रन्थस्य च वाच्यवाचकसम्बन्धो जन्यजनकसम्बन्धो वा, नव नवतत्त्व- सुमङ्गला तत्त्वस्वरूपं जिज्ञासुरत्राऽधकारी ति अनुवन्धचतुष्टयमपि व्याख्यातम् इति ॥ १ ॥ दप्रति- र्टकायां- अथ प्रतितत्त्वं कति दात्मक मति प्रदर्श्यते- Mपादनम्. ॥६॥ चउदस चउदस बाया-लोर । बासी य हुंति बायाला। सत्तावन्नं बारस, चउ नव भेया करणेसें ॥२ 卐 टीका-' चउदसे ' ति वतत्त्वस्य चतुर्दशभेदाः, अजीवतत्त्वमपि चतुर्दशभेदलक्षणं, द्विचत्वारिंशद्भेदाः पुन्यतत्त्वस्य, पापस्य द्वयर तः, आश्रवतत्त्वं द्वचत्वारिंशद्भेदात्मकं, संवरस्य सप्तपञ्चाशत् , निर्जराया द्वादश, बन्धस्य चत्वारो मोक्षस्य च नव भेदाः क्रमेणैपां ज्ञातव्याः। एवं सर्वसंख्यया पट्सप्तत्यधिकद्विशतभेदा नवानामपि तत्त्वानां समलितानां भवन्ति, तेषां म स्वरूपं प्रतितत्त्वं वस्तरेणाग्रे ग्रन्थकारस्स्वयमेव वक्ष्यति, तथापि प्रागुक्तप्रथमगाथाव्याख्यायां मूलतत्त्वानां यथा जीवाज 卐 A वमूर्ताऽमूर्तहेयज्ञेयोपादेयात्मकेषु सप्तविभागेपु भन्नता प्रदर्शिता तद्वत् तत्त्व दानामपि सप्तविभागेषु भन्नता प्राच्न- G गाथाभिर्यन्त्रेण च प्रदर्श्यते, तद्यथा-" धम्माऽधम्माऽऽगासा, तियतिय अद्धा अर्ज वदसगा य॥ सत्तावन्नं संवर निजर दुर्दैस प T मुत्ति नवंगा य ॥ १॥ अठास अरूवि हवइ, संपइ उ भणामि चेव रूणं ॥ परमाणुदेसपएसा, खंध चउ अ वरूणं ॥२॥ जीते दस चउ दु चउ, वार्स वायालहुंति चत्तारि ॥ सय अट्ठार रूट दुसयछसत्त नवतत्ते" ॥३॥ एतासां गमनिका- 卐 v धाऽस्तकायाऽधस्तिकायाऽऽकाशाऽस्तकायानामोवस्वरूपाणां स्कंधदेशप्रदेशाख्यविभागैर्नवझेदाः, अद्धा कालः स च प दशम इते दश दा अवस्य, सप्तपञ्चाशत् संवरस्य, द्वादश नर्जरायाः, मोक्षस्य च नवदाः मिलितास्सर्वसंख्ययाऽष्टा- A L A A 卐 卐 t- ध N A रीतिसंख्याका अमूर्तभेदाः सञ्जाताः। अथ मूर्त्ताः कतिभेदास्तदुच्यते, पुद्गलात्मकाः परमाणुप्रदेदादेशस्कन्धाश्चचारो- वस्य, चतुर्दशवस्य, द्वचत्वारिंशत् पुन्यस्य, यश ति पापस्य, द्वाचचा रंशदाश्रवस्य, चत्वारे बन्धस्य चेति सर्वसंख्या- गणनेन अष्टार त्यधिकशतं मूर्त दानां जातमिति ॥ स्थापना ॥ yoyyyz V तत्वनाम. 驗 A २७६ भेदेपु २७६ भेदेपु जीवाऽ-जीववि० मूर्ती -मूर्तवि० १४ १४ २७६ सेदेषु हेय- शेय उपादेयविभागः १४ --- manman. T - . ४२ . ८२ ० ८२ ० 卐 A जीवतत्त्वम् अजीवतत्त्वम् पुन्यतत्त्वम् पापतत्त्वम् आश्रवतत्त्वम् संवरतत्त्वम् निर्जरातत्त्वम् बन्धतत्त्वम् मोक्षतत्त्वम् ० ४२ ४२ . ४२ . . ५७ . ५७ . T १२ १२ HA 20 - . ८ . ४ ९२ - १८४ १८८-८८ १२८ २८ V 卐 A 凱A - A १२० 卐 卐 N S 卐 A वन्द- प्रज्ञापना. 卐 M ॥७॥ T श्रनवतत्त्व प्रारक्तगाथायां तत्त्वदप्रतिपादकायां जीवतत्त्वस्य संख्यातश्चतुर्दशभेदा उक्ताः, एतत्तु वकृतं परं वर्त्तन्ते जीवा सुमङ्गला- अन्यभेद भन्ना न वेते शंका व्युदासाथ ग्रन्थकारस्तावदाह; र्ट कायां- एगविह-दुव्हि-तिविहा, चउव्विहा पंच विहावा।च्यण तस इयरोहि, व्यगईकरणकाएहिं ॥३॥ टीका-"एगविहे" ति;-पूर्वव्याख्यातद्वितीयगाथायां प्रतिज्ञाता जवचतुर्दशभेदा अग्रे व्याख्यास्यन्ते, अस्यां तु जीवस्य A एकविधत्त्वं द्विविधत्वमित्यनेन प्रकारेणोल्लिख्यते, तद्यथा; सर्वे जीवा एकेन्द्रियादारभ्य पञ्चेन्द्रियपर्यन्ताश्चैतन्यात्मलेन लक्षणेन 卐 संगताः, यत एतादृङ्नास्ति कश्चिदप जो चोयश्चैतन्यवियुक्तोऽपि जवेत्याख्यां विभर्ति, लब्ध्यपर्याप्तसूक्ष्मैजेन्द्रियकोटपतितेऽपि जीवे चैतन्यस्य सूक्ष्मांशतया सर्वदा सद्भावो वर्रवर्तत इति अग्रे सर्व स्फुटं भविष्यति । यच पुनर्जीवस्य के लक्षणमित परिप्रश्ने सति 'चैतन्यलक्षणो जव' इति लक्षणस्वरूपनिश्चये जाते, यस्य वस्तुनो यल्लक्षणं तल्लक्षणाऽभावे तद्वस्तुनोऽप्यभाव इत ज्वतन्ययोरन्वयव्यतिरे कसम्बन्धात् चैतन्ययुक्तो जव इत्येकप्रकारः ॥ अथवा कर्मवशवत्तेनो ये संसारस्था जी- y वास्ते त्रसस्थावरदाभ्यां विभिन्नास्सन्ति, केचन त्रसनामकर्मोदयात्रसत्वं भजन्ति, अर्थात् त्रासभयोत्पादकस्थानेभ्यो त्वा स्वेच्छया स्थानात्स्थानान्तरं गन्तुं समर्थाः, कतिपयाश्च स्थावरनामोदयात् त्रासभयस्थानकमनुभवन्तोऽपि तत्स्थाना- 卐 स्वैरं गन्तुमसमर्थाः स्थावरत्वं भजन्ते, नास्त्येताकश्चिदपि जीवो यत्रसस्थावरभेदाभ्यां वहिर्भूतस्यात् ।। अथवा पुरुषवेद v स्त्रीवेदनपुंसकटेदात्मकेषु त्रिपु वभागेषु संसारिणो जोवा भन्नतामनुभवन्ति । तत्र ये दारान् प्रति खामिलापमाविर्भावयन्ति 卐 ते पुंवेदत्वं पिपुरति । ये च वा प्रतेपुरुपं स्वेच्छां दधति ते संवेदभावं भजन्ते। ये च प्रतिनरं प्रतिनारी च स्वान्वन्धं 卐 A 卐 N 卐 A T 卐 L ॥७ A y 卐 UE S N अथवा A 卐 V y A बध्नन्ति रे तु वृत याप्रकृतित्वमभवन्त । वेदत्रयवहित कर्माणुपरिकलितो न विद्यते कोऽपि जीवेऽस्मॅिल्लोले केचन जीवा देवगतिभाजः,चन मनुष्यगतिमनुभवन्तिः, केचन तिर्यग्गत्यां तिर्यक्त्वं भुजानाः, कतिपयाश्च खाऽशुभकर्मानु- सारेण नरकगत्यामवाच्याऽसह्यगाढदुःखोपेतं नारकपर्यायं बिभ्राणाश्चतुर्गतिविभागेन विभिन्नाः संसारणो जीवा वर्त्तन्रे इति ज्ञानना ज्ञानचक्षुपा दृश्यतेऽसाभिरपि जिनागमात् श्रूयते च ॥ अथरेन्द्रियविभागेन जवाः पञ्चधा विभक्ताः, कतिजवाः स्प- शनेन्द्रिययुक्ताः, कतपयाञ्च स्परनेन्द्रिय-रसनेन्द्रिययुगलं धारयन्तः, केचच स्पर्शन-रसन-घ्राणाख्यान चिन्द्रियाण विभ्राणाः, पूर्वोक्त मन्द्रियत्रिकं चक्षुरन्द्रयप्तं केचनादधन्तः, कतिपयाश्च जन्मान्तरे पार्जितशुभकर्मणो जागरूकत्लेन स्प- ध शन-रसन-घ्राण-चक्षुः-श्रोत्रनामकानि पञ्चान्यन्द्रियाणि विभ्रन्तः सुखं भुञ्जाना वा दृग्गोचरा भवन्ति ' अनन्तस ख्य- शालिनः कर्मकर्दमशोपणांशुमा लनः सिद्धान् वर्जयित्वा एलेन्द्रियादिपञ्चप्रकारताबहिर्वर्तनो अवस्य संभवोऽसंभाव्य एव । जत अथवाऽस्मजवलेले पृथळ त्वमनुभजमानाः केचन पृथ्ट कायकाः, अप्त्वं भुञ्जानाः केचनाप्कायकाः, अग्नित्वं केचना- ऽनुभवन्ति अत एवाऽग्नेकायिकाः, वायुस्वरूपमनुसरन्तो वायुकायिकाः, वनस्पतित्वं दधन्तः कति चद् वनस्पतिकायिकाः (एरे पश्चाऽपि प्रकाराः स्थावरान्तर्गताः) त्रसत्वं भजमानाः त्रसकायका इत्येवं पेढाऽपि संसारसमापन्नगा उवास्समाख्याताः पत ननु द्वर्तयगाथायां विस्य चतुर्दशझेदाः प्रतिज्ञाताः, अस्यां तु प्रकारान्तरेण वा व्यावर्णिताः, तत्कथं संभवति ? v सत्यं, पूर्वोक्तगाथायां रे जेवस्य चतुर्दशभेदा व्यावणेतास्तानग्रे मूलगाथया कथयिष्यन्ति ग्रन्थकर्तारः, अत्र तु रे अन्टे दा उक्तास्तत्र जवाश्चतुर्दशप्रकारा एवेति नश्चयाऽभावप्रतिपादनाथं ते भेदा अभ्यधायिषत । अन्यदपि एतद् ज्ञेयं यद् जवाः N T 卐 G ॐ A T L ज A ए 卐 卐 N ) S A U V A N श्रीनवतत्त्व । पूर्वोक्तप्रकारका एवेति न, प्रकारान्तरेण सप्तविधा अष्टविधा त्रिपठ्यधिकपश्चशतविधा अपि प्रज्ञापनादिग्रन्थेषु सुविख्याताः 卐 जीवस्य विस्तरभयादत्र न प्रतन्यते, तत एवावसेयाः ॥३॥ सुमङ्गला- चतुर्दश- फू टकायां- अथ 'यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायेनाद जवस्य चतुर्दशद भन्नत्वं प्रतिपादयति;- 卐 दानां व्या- एगिदिय सुहाम्यरा, सन्नियर पणिदिया य सबितिचउ।अपजत्ता पज्जत्ता, कमेण चउदसजिअहाणा ४ ॥८॥ 卐 卐 ख्यानम् टीका-'एगिंदयत्ति' 'एलेन्द्रियाः-सूक्ष्मेतराः,' सूक्ष्मैकेन्द्रिया बादरैकेन्द्रियाश्चेत्यर्थः, 'संई तरपञ्चेन्द्रियाश्च' 卐 संज्ञिपञ्चेन्द्रिया इतरशब्देनासंज्ञिपञ्चेन्द्रियाश्च, ‘स द्वत्रिचतुः'द्वन्द्रिय-कीन्द्रिय-चतुरिन्द्रयसहिताः पूर्वोक्ताश्चत्वारः सर्म- T लिताः सप्तभेदा भवन्ति, ते सप्तभेदा अपर्याप्तनामकर्मोदयेन अपर्याप्ताः, पर्याप्तनामकर्मोदयेन च पर्याप्ता इति पर्याप्ताऽ- पर्याप्तविभागेन क्रमेण चतुर्दशजीवस्थानानि भवन्तीति गाथाक्षरार्थः । व्यासार्थस्त्वयम्-अपर्याप्तसूक्ष्मैकेन्द्रियाः, अप- 卐 याप्तबादरैकेन्द्रियाः, पर्याप्तसूक्षकेन्द्रियाः, पर्याप्तवादरैकेन्द्रियाः, अपर्याप्त न्द्रियाः, पर्याप्तद्वीन्द्रियाः, अपर्याप्तत्रीन्द्रियाः, व पर्याप्त न्द्रियाः, अपर्याप्तचतुरिन्द्रियाः, पर्याप्तचतुरिन्द्रियाः, अपर्याप्ताऽसंज्ञिपञ्चेन्द्रियाः, पर्याप्ताऽसंज्ञिपञ्चेन्द्रियाः, अपर्याप्तसंज्ञि- 卐 T पञ्चेद्रियाः, पर्याप्तसंशिपञ्चेद्रियाश्चेति जचस्य चतुर्दशभेदाः । कर्मपरमाणुपरिकलिताः संसारस्थास्सर्वे जबा एपु चतुर्दशभेदेषु 卐ी अन्तर्गताः । चतुर्दश दवहिर्वर्ती नास्ति कोऽपि संसारे जीवः । तत्राग्रे वक्ष्यमाणस्वरूपाणां स्वयोग्यानां पर्याप्तीनां समापनं 卐 विनैव ये मरणशरणं गतवन्तस्तेऽपर्याप्ता इत्युच्यते, ये च स्वयोग्याः पर्याप्त समापय्यैव पञ्चत्त्वमश्नुवते ते पर्याप्ताः समाख्याताः॥ सूक्ष्मैकेन्द्रयादिजवानां स्वरूपंप्राज्ञपुरन्दरैजवाभिगमादिषु विस्तरेण प्रोक्तं तथाऽपि मन्दमत नामववोधाय संक्षेपत एवोल्लिख्यते A V L 蝠 A 7 क •~- -- S "N 卐 A 卐 A 卐 A 卐 किश्चित् : ये एलेन्द्रियजीवा समुदितास्सन्तोऽपि दृग्गेचरा न भवन्ति केवलं केवलज्ञानशालिनस्सर्वज्ञा एव सर्वपरिच्छेदात्मन केवलज्ञानेन तान् दृष्टुं सामर्थ्य भाजस्ते सूक्ष्मनामकर्मोदयात्सूक्ष्मा इति प्रोच्यन्ते । यद्यप्यत्र जीवश स्योरभिन्नत्वाडेवाः समुदिता इत्यदलेखि, परं तत्र सूक्ष्मैकेन्द्रिय वानां समुदितानि शरीराण्यपि दृष्टिपथं नायान्त त्यवगन्तव्यम् , अन्यथा सिद्धा- ऽवस्थापन्नेष्वपि अषु दोषप्रसङ्गः। एते सूक्ष्मैकेन्द्रियाः समग्रचतुर्दशरज्ज्वात्मले लोले अञ्जनचूर्ण पूर्ण सहद्गकवन्निरंतरं 卐 खचिताः, यावल्लोकैकप्रदेशोऽपि सूक्ष्म वविरहित न भवति, एपांजवानां सूक्ष्मनामकर्मोदयात्सूक्ष्मत्त्वमस्ति, अतएव केनापी- न्द्रियेणैतेषां सद्भावज्ञानं छद्मस्थानां न स्यात्, परं केवलाऽऽलोकाऽवलोकितसमस्तले कवनिपदार्थानामत न्द्रियज्ञानिनां न 卐 किश्चिदप्यगोचरम् , तैश्च केवलज्ञानेन सर्वमपि द्रव्यपर्यायजातमालोक्य तेषां सूक्ष्मवानामस्तित्वं प्रतिपादितम् , नहि रागद्वेप- मोहप्रभृतिप्रवलवै रेवारविजेतारः कदाप्यनृतं ब्रूयुः, अनृतभाषणहेतूनां रागद्वेपमोहानां सर्वथैव तेष्वभावत्वाद, अतएवाऽस्मा- 卐 दृशैरपि त्पां सूक्ष्मजीवानां सद्भावस्व कर्त्तव्य ॥ ननु सूक्ष्मार्थाः चर्मच भ्ां दुर्निर्रक्ष्यास्ते सूक्ष्मदर्शकयन्त्रेण कथं न दृश्यन्ते ? सत्यम् :-सूक्ष्मदर्शकयन्त्रं तु चक्षुपे स्साहाय्यकृत् , अत अन्याऽन्यस्थूलद्रव्याऽपेक्षया रे सूक्ष्मा न तु सूक्ष्मनाम- + दयात् सूक्ष्मास्ते तु सूक्ष्मदर्शकयन्त्रस्य साहाय्येनाधिकतेजोभ्यां च भ्यां विलोक्यन्ते परमे पां तु इन्द्रियात तविषयत्त्वात् न नेत्रगोचरत्वम्, वादरवायुरदृश्यमानोऽपि जागरूकस्पर्शनेन्द्रियद्वारा स्पष्ट विज्ञायतेऽस्तित्टेन, न च सूक्ष्मदर्शकयन्त्रेणालेक्यते, 卐 एवं सूक्ष्मदर्शकयन्त्रेणादृश्यमाना अपि एते सूक्ष्मर्ज वास्सद्भावतयररीकर्तव्याः॥ एषु सूक्ष्मसंज्ञकेषु जीषु ये पृथ्वी कायिका ये चाप्कायिकास्तेजस्कायिका वायुकायिकाश्च ते प्रत्येकमसंख्यातास्समुदिता अप्यसंख्याता,ये च सूक्ष्मवनस्पतिकायिकास् त्वनन्ताः, ' श्र T 卐 A N G T 卐 V L 卐 A ne E S L -- चर्दश- V M ॐ व्याख्या A . A अनन्तरमननम्नतिकायिकजीवानां शरीरमेकं भवति यत् मक्ष्मनिगोदनाना सूक्ष्मसाधारणशरीरनाम्ना सूक्ष्मानन्तकायनाम्ना गोपलक्ष्यने नारनामसंख्यातसूक्ष्मनिगोदानामेको गोलको भवति,तादृशा गोलकास्मिल्लोकेऽसंख्यातसंख्याकास्सन्ति, यदुक्तम् , टीकागां. गोला ग असंरिजा असंखनिगोगयो हवइ गोलो । इकिमि नगोए अणंतजीवा मुणेयवा" ॥१। तथा ये पृथ्वी-जला अनि-पायु-चनम्पत्यादयभक्षुरादीन्द्रियेणाभवमायान्ति ने निखिलाऽपे पृथ्वीका कादयो बादरा अवगन्तव्याः, तत्र पृथ- कायिका कायिकाऽनिकायिकवारकायिका जीनाः प्रत्येकमसंख्याताः, ये च बादखनस्पतिकायकास्तत्र कन्द-मूलाऽऽर्द्रक- करोगालादगःसाधारणशरीरिणोऽनन्ताः, येचाऽमनिम्बादयो वृक्षा ये च फल जायास्ते प्रत्येकगार रणोऽसंख्यातसंख्याकाः । तथा गंरा-कपर्दिका-चन्दनक-ऋमिप्रभृतयो जीवा द्वीन्द्रयमंजकाः, एते वादराः किन्तु न सूक्ष्मास्तथाविधसूक्ष्मनामकर्मोदया- भावात् । एवं गेन्द्रियचतु रेन्द्रियादयोऽपि वादरा एवाऽवगन्तव्याः। तेतु ई लका-पिपलिका-यूका-मटकघृतेलिकादय- पीन्द्रियाः, भ्रमर-वृधिक-मक्षिका-मशकादयश्चतुरिन्द्रियाचबोधव्याः, तथा पञ्चेन्द्रियेषु ये जननेजनकयोस्संयोगं विनैव तथा- निधनलादिमाधनेनोत्पद्यमाना मण्डक-मर्प-मत्स्यादयस्तिर्यक्पश्चेन्द्रियाः, मानां मलमूत्रादिचतुर्दशाऽशुचिस्थान पुत्पद्य- मानास्तम्छममनुष्यादयश्च ते सम्म छमपश्चेन्द्रियसंनका ज्ञेयाः, एकेन्द्रियादारभ्य सम्मूछिमपञ्चेन्द्रियपर्यन्ता निखिला अपि तथाप्रकारकविशिष्टमनोविज्ञानराहित्येन भूतभविष्यत्कालसत्कविचारणाशून्येनाऽसंज्ञिन उच्यन्ते ' तथा ये च ज्या v मा पेठसंयोगपूर्वकं गर्भाशये उत्पद्यन्ते ते गर्भजपञ्चेन्द्रियाः, पर्याप्तावस्थायामेते सर्वेऽपि अर्हताऽनागताद्धासत्कपरामशीत्मि- कदीर्घकालिक संज्ञायाः सद्भावेन संज्ञिपञ्चेन्द्रियाः प्रोच्यन्ते । एवं लेशतो जीवस्य स्वरूपं प्रदर्शतं, विस्तरस्तु जीवाभिगम- N है G 卐 A ध L + '९। 卐 A प है N 卐 S 卐 U r 卐 A V 卐 - प्रज्ञापना-लोकप्रकाशादिग्रन्थेभ्यस्समवसेयः। ४ । अवस्य चतुर्दशभेदानामतो व्याख्यायाथ वलक्षणं प्रतिपादयति;- नाणं च दंसणं चेव, चरित्तं च तवे तह" वीररं उवअंगो र, एरं वस्स लवणम् ५ व्याख्या;-' नाणं' त्ते, उवस्य चतुर्दशभेदास्तु वर्णताः, परमयं व इति ज्ञापकं जवस्य लक्षणवल्लक्षणं ) A किमित शङ्काव्यपहार्थ मेदाच्यते । पूर्वतावत् लक्षणस्य व्याख्या लक्ष्यते वस्त्वरेनेत लक्षणमथवाऽसाधारणधर्मो लक्षण- पद मित, अव्याप्त्यतिव्याप्त्यसंभवदोषाऽप्तं यल्लक्षणं तदेव लक्षणम् । यस्मिन् लक्षणे अव्याप्त्यादयः केचिदपि दोपास्तल्लक्षणं T लक्षणकव्यां न घटते, यथा 'गोः किल्लक्षणं?' इति गुरुणाड्युक्ताश्चत्वारोऽन्तेवासिन एवमूचुः, प्रथमस्तावत् गोः कपिलत्वं N ॐ लक्षणमाह, तत्राऽव्याप्तिदोपः, सितासितवर्णवर नां तत्राऽप्रवेशात् । द्वितीयस्त्वाह ' शृङ्गिवं गर्लक्षणम् , तत्राऽतिव्याप्तिर्म- ज हष्यादीनामपि तत्र प्रवेशात् , एकशफवत्त्वं गोर्लक्षणमिति तृतीयस्योक्त असंभवदोपदुष्टत्त्वं यतो गवामेकशफवत्वयाऽसंभवः, G ॐ चतुर्थस्त्वेवमुवाच, सास्नावत्त्वं च गोर्लक्षणम् , तत्र सिताऽसितकपिलादिवर्णभिन्नानां निखिलानामपि गवां समावेशात् । T गोव्यतिरिक्तोष्ट्रमहिष्यादीनां चाऽप्रवेशात् सर्वासामपि गवां सास्नायास्सद्भावत्वात् अव्याप्त्यतिव्याप्त्यसंभवदोषवर्जितं A 5 लक्षणवल्लक्षणं । तथाविधरणजन्यविशिष्टज्ञानरहितानांजनानां व्यवहितात न्द्रियगोचरपदार्थाचवेधामडमानमप्यावश्यकम्, यथा कश्चिन्नरः परे वहिमपश्यन् धूमदर्शनादनुमिति चिदधार यदत्र बहिना भाव्यम् , एवमनु यमानानां ज्ञानदर्शना- 卐 दिगुणानामाधारवत्त्वादधिकरणं च चनाऽऽधेयस्यासंभवत्वाद् ज्ञानादयो जवद्रव्याश्रिता गुणत्वाद् रूपवत् । न पृथ- V 卐r) A S 1 N जव- श्रीनवतत्त्व- सुमङ्गला- कायां- लक्षणम्. 卐 A 卐 V 卐 A 卐 T ॥ १० ॥ A 卐 S 卐 व्यादिभूताश्रिता ज्ञानादयो गुणाः, प्रत्येकं तेष्वनुपलभ्यमानत्वात् , यनैवं तन्नैवं यथा-सत्वक ठनत्वादि, भूतादिव्यति- U रिक्ता जीवद्रव्याश्रिता गुणाः भूताधनाश्रितत्वे सति साश्रितत्वात् , यनैवं तनैवम् । अनेनेत्थं निश्चितिः सज्जाता यज्ज्ञानादयो 卐 जवस्य लक्षणभूताः। एतेषां ज्ञानादिगुणानां सूक्ष्मनिगोदप्रभृतिषु निखिलेष्वपि जन्तुषु कया त्या सद्भावस्तत्परामृश्यते- अस्मिजग ते सर्वे पदार्थास्सामान्यधर्म-विशष्टधर्म पेताः, तत्रेदं कश्चिदथवाऽयं घटोऽयं पट इति किञ्चित्व घटत्व-पटत्व- 卐 विशिष्टो यः पदार्थधर्मः स सामान्यधर्मः, तत्रेदंकिश्चिदिति आकारवजेतं पदार्थभानं नैश्चयिकार्थाऽवग्रहप्राधान्येन दर्शन- मेव गण्यते, उपलक्षणाद् व्यंजनाऽवग्रह ईहा च दर्शनरूपेति । 'अयं घटः' इत्यत्र यद्यपि घटत्वविशिष्टनैश्चयिकाऽपायेन 卐 ज्ञानमेव, परं व्यावहारिकार्थाऽवग्रहाऽपेक्षया दर्शनत्वेनाऽप्युररी क्रियते । तथा अयं घट एव स च शुक्लादिवर्णोपेतस्सुवर्ण- मयः पाटलिपुत्रे निर्मित इत्याकारको विशिष्टधर्मोपेतो यो पदार्थावबोधस्तज्ज्ञानमुच्यते, एवं द्रव्यस्य सामान्याऽवबोधस्तद्दर्शनं, 卐 पदार्थविशष्टाऽवबोधात्मकञ्च ज्ञानम् । अथवा पदार्थसामान्यधर्मसत्कोपयोगस्तदर्शनं,पदार्थविशिष्टधर्मसत्कोपयोगस्तज्ज्ञानम् निराकारोपयोगात्मकं दर्शनं, साकारोपयोगात्मकञ्च ज्ञानं ते सर्वे समानार्थाः । इत्येवं दर्शनज्ञानगुणावात्मनो मुख्यधम्मौ । 卐 अल्पतया विशिष्टतया वैते गुणा वमृते नान्यत्र स्तः, प्राणिमात्रवर्तिन्या विज्ञानशक्त्यैवाऽयं जैव इत्युपलक्ष्यते । एते दर्शनज्ञाने लब्ध्यपर्याप्तसूक्ष्मैलेन्द्रियमाद कृत्वा पर्याप्तसंज्ञिपञ्चेन्द्रियं यावत् यथाक्षयोपशमं सकलेवपि जन्तुष्ववश्यं भवतः । न च पृर्खजलाऽग्निवायुप्रभृतिष्वेकेन्द्रियेषु प्रत्यक्षं विज्ञानशक्तेरपलभ्यमानत्वात्तस्या अभाव इति वाच्यम् । यथ- पध्यादि भमूर्छितमूर्तिमते मर्त्यस्याव्यक्तत्तन्यमस्त्येव, एवं ग्राग्भवोपाचनेविडकौषधिव्याहतचैतन्येष्वेलेन्द्रियादिष्वपि पत N A T A L 卐 V 卐 A 卐 ।१०॥ A M- S 卐 N A अव्यक्तविज्ञानशक्तिविद्यमानता वरवर्त, अयं चैतन्यांऽशोऽस्माभिः कम्मपाशावगुण्ठितः प्रत्यक्षं नानुभूयते परं केवल- ज्ञानबलावलोकितलोकत्रिकैस्सर्वज्ञपरमेश्वरैस्तेषु चैतन्यांऽशो प्रत्यक्षं दरीदृश्यते, आगमेऽप्युक्तं:-" सब्बजीवाणपि अणं अक्ख-ve रस्स अणंतमो भागो निच्चुग्याडिओ, जइ पुण सोऽवि आचरिजा तेणं जीवो अजीवत्तणं पाविजा" ।। तस्मात् प्रतिजीवं स्तोकतया 'वपुलतया सम्पूर्णतया वा ज्ञानदर्शनगुणाववश्यं भवत इति निश्चमचम् । तथाऽशेपछमस्थ वेषु पूर्व सामान्यबोधात्मको दर्शनोपयोगस्ततो विशिष्टावबोधस्वरूपो ज्ञानोपयोग उत्कृष्टतया प्रत्येकमन्तमुहर्चकालिका, क्षपित- घातिकर्मणां सर्वज्ञानां निःशेपदोषाप्तानां सद्धानाञ्च प्रथमो ज्ञानोपयोगस्ततो दर्शनोपयोगः प्रलेकं समयमात्रकालि- कश्चेति ॥ तथा ज्ञानेन वस्तुधर्म सम्यक्परिज्ञाय दर्शनेन च श्रद्धानं विधाय जेवाव-पुन्यपापाऽऽश्रयसंवरादिषु हेयोपा- देयात्मिका आत्मनो या प्रवृत्तिस्तदेव चारित्रम्, उक्तञ्च तत्वार्थभाष्ये 'विरति म जात्वाभ्युपेलाकरणं" अथवा महम- लपराजिता अत एव नानाविधवधवन्धना देशातनामनुभवन्त जन्तवस्तमपराधिनं मोहं विजेतुं मद्गुरूपदेशत लघुकर्माणस्सन्तः पञ्चमहाव्रतद्वादशाणुव्रताद्यात्मकं कवचं पिधाय दुर्जन्यमपि तं सुभटाग्रेसरं येन विशिष्टगुणेन पराजय्य केवललक्ष्म मनुभवन्ति तदेव चारित्रम् , चरति आत्मा मोक्षे गच्छति येन तचारित्रमिति हृदयम् । ज्ञानदर्शनवदिदं चारित्रमपि लब्ध्यपयोप्तसूक्ष्म- केन्द्रियप्रभृतिषु समग्रजीवेषु स्वस्वक्षयोपशममाश्रित्य अल्पांशतया वहंशतया वाऽवश्यं वद्यते, तत्राऽक्षपितमोहनीयकम्मणो जा रे छद्मस्थास्तेषामनन्ततमांशप्रमाणं चारित्रमस्ति, अयमनन्ततमांशेऽपि पृथक्पृथक् जीवानाश्रित्य तारतम्यभाग विद्यते, १ अर्श कुरादिदृष्टान्तजन्यानुमानेन तु अस्माभिरपि विज्ञायते ।। 卐 V 3 A 卐 T 卐 A 卐 T 卐 है A L Jitaraime24 卐 A 5 ए म N S । A 卐 U 卐 M 卐 जीवलक्षण प्रतिपादन A T यथा सूक्ष्म निगोदस्य प्रथमसमये यो चरित्रस्याऽनन्ततमांशस्तदपेक्षयाऽन्यसूक्ष्म निगोदस्यानन्ततमांशो ववक्षितसूक्ष्मनिगो- नवतत्त्व- दवस्य चारित्रांशाद्' अनन्तरणः, एवमन्यत्रापि यथायोगं भाव यम् । ये च पुनः क्षपितमोहन्यकर्माणः केवलिनस्सि- सुमङ्गला. काया- द्धाच तेषां संपूर्ण चारित्रं वर्त्तते, एवं सर्वजवानां चारित्रगुणयुक्तत्वात् , चारित्रस्य विना जीवमनन्याऽऽधारत्वात् चारित्रमप जीवस्य लक्षणम् ॥ न " सर्वे ज्वाश्चारित्रगुणोपेता" इति कथनं न सम्यग् जाघटीत, यतो देशविरतिनामकं पञ्चम- 卐 ॥११॥ गुणस्थानं यैरयावध नाऽलाभ ते मिथ्यादृष्टयोऽथवा सूक्ष्म नगोदप्रभृतिजीचा ये प्रत्याख्यानावरणाऽनन्तानुवन्धिस्वरूप सर्वघातकपायोदयवन्तस्तेषां जवानां चारित्रगुणयाविर्भावो लेशतोऽप्यसंभाव्य एव, यावत्कालं जोवा अनन्तानुबन्ध- कपायोदयभाजस्तावत्सम्यक्त्वमपि न लभन्ते तदा चारित्रस्य का वार्ता ? पुनर्यद सूक्ष्मनिगोदादयो मथ्यादृष्टयश्चाऽपि 卐 लेशतश्चारित्रगुणोपेतास्तर्ह देशविरत्याख्यपञ्चमगुणस्थानवर्तिनः श्राद्धा एव वरताऽविरताः कथमुच्यन्ते? हे भवदुक्क्या तु पञ्चमगुणस्थानपर्यन्तं सर्व वा देशतश्चारित्रगणस हतास्तसानिखिलजन्तुपु चारित्रं कथं संभवेत् ? सत्यं परं विचा- रर्ण यास्पदमेतत्, यतः सर्वघातिकपायोदयवतामपि जवानां कतचिच्चारित्रपर्याया अनावृता एव, यथा निन्डि- T घनघटावृतेऽति सचेतू रश्मयो न दृश्यन्ते परं रश्मिगताल्पप्रभायुक्तत्वात् तद्दिनेन सर्वथाऽन्धकारमयेन न भूयते, यदि 卐 देनस्यात्यल्पप्रभासङ्गतत्वं न स्यात्तदा दनत्रियामयोर्भेदोऽपि न भवेत् । एवं श्रद्धापूर्वको यमनियमव्रतादिग्रहणात्मके निवृत्तिप्रवृत्तिरूपो वा चरित्रगुणस्तेषु सूक्ष्मनिगोदप्रभृतिषु न वर वर्तते परमव्यक्ताऽतिस्तोककपायमन्दतात्मकं चरित्रं विद्यते एव, अनन्तानुबन्ध्यादिसर्वघातिकपायास्सर्वोत्कृष्टा भवेयुस्तथापि कतिपयचरित्रपर्यायाणां निरावरणीयत्वात् N 卐 G A 卐 V १ A S जत 卐>卐zy V 卐 A 2 प्रतिवमव्यक्तचारित्रं निःशङ्कम् । तदुक्तं श्रीकर्मप्रकृतिमहाशाहे-" वरियंतरायकेवलदसणमहरायणाणवरणाणं । असम- तपञ्जएसु सबदर उ विवागो" ॥१॥ अस्या गमनिका-र्यान्तराय-लेवलदर्शनावरणाऽष्टाविंशतिविधमोहन्यप - विधज्ञानावरणानां पञ्चत्रंशत्प्रकृतनां असमस्तपर्यावेषु सर्वद्रव्येषु सर्वज् वद्रव्येषु वपाकः । तथा है;-इमा र्यान्तरायादयः पञ्चत्रंशत् प्रकृतयो द्रव्यतस्सकलमपि चद्रव्यमुपनन्ति, पर्यायॉस्तु न सर्वानपि, यथा मेधैरतिनिचिततरैरप सर्वात्मनान्त- 卐 रतयोस्सूर्याचन्द्रमसोर्न तत्प्रभा सर्वथाऽपनेदं शक्यते, उक्तश्च-"रहुवे मेहसमुदए हेइ पहा चंदसराणं " ति, तथाऽत्राऽपि भावन्यमिति"। तथा इच्छाया निरोधस्तदेव नैश्चयिकं तपः, अथवा इच्छानिरेधस्य यदभ्यासात्मकं हेतुस्वरूपं चह्नस्वरूपं वा यदनशनादिस्वनं तदपि व्यवहारेण तपः प्रकर्त्यते, यद्वाऽष्टप्रकारकं कर्म वापयत तपः, उपोषणोनेदरताप्रभूति- व्यवहारतपस अभ्यासेनेच्छानिरोधात्मकं नैश्चयकं तपः प्राप्यते, अत एव व्यवहारतपो नैश्चयकतपसश्चिन्हमस्ति हेतु- 卐 स्वरूपं वा । यथा सर्वमिष्टान्नपानसामग्रीपरिकलितः कश्चित् परमार्हद्भक्तस्तां पुण्यलभ्यां सामग्र मविगणय्याऽऽचाम्लचतुर्थभक्त- 卐 पष्ठाष्टमादिप्रत्याख्यानं कुरुते तस्मादनुमितस्संजायते यदस्यात्मा इच्छानिरोधात्मकतपोरणोपेतः। अयं तपगुणस्सर्वज्ञस्य क्षपितमोहन्यर्यान्तरायकर्मणस्संपूर्णतया विद्यते, यतस्तपसः प्रादुर्भावो मेहन्यान्तरायक्षय-क्षयोपशमाभ्याम् 卐 अन्येषां तु निजनिजक्षयोपशमाड्सारेण न्यूनाधिकतया वर्चते, नड सर्वज्ञानां साकल्येन तपस आविर्भावस्तदा निःशेपैरपि वाले भरनाहारकै वितव्यम् । मैवम् , दग्धघातकर्मेन्धनास्सर्वज्ञा आहारमाहाराऽभिलापानाः सन्तो न गृह्णन्ति, अभि- ॐ लापोत्पादककर्मणस्तेषामभावार, देवलमदारकशरीरनिर्वाहा मेवाऽऽहारमादत्ते, देशनादिकमणि कायवलस्य पबृंहकत्वा- N T 卐 A 卐 T A 卐 L V y A >卐zy. S नवतत्त्व- फ्र U 卐 M A T N कायबलोपबृंहस्य चाहारपरतन्त्रत्वात् , न चैवमाहारमुपादीयमाने तपोगुणस्य हानिप्रसङ्गः, तपसस्तु इच्छानिरोधात्म- जवलक्षण केन लक्षणेन भूयमानत्वात्, व्याधिग्रस्तेन गृह्यमाणकटुक पधवत् इति । इत्थ मदं तपोऽपि ज्ञानचारित्रादिगुणवत्सूक्ष्म प्रतिपादनम् सुमङ्गला. निगोदादिष्वपि प्राग्व्यावर्णितयुक्त्याऽस्त्येव, तस्मादयं तपोगुणोपि जीवस्य लक्षणं, अवं विहाय न कुत्रचित्प्रवर्त्तते तपः ॥ कायां- तथा वर्यम प वस्य लक्षणम् , तत्र वि-विशेषेण ईरयति प्रेरयति आत्मानं तासु तासु क्रियासु तद् वीर्यमुच्यते, वीर्य, ॥ १२॥ उत्साहः, बलं, स्थाम, पराक्रमः, शक्ति रति पर्यायाः, इदं वर्य द्विधा, करणवर्य, लब्धियं च, तत्र मनोवाकायाऽऽलम्बनेन प्रवर्त्तमानं वर्य करणवर्यमुच्यते, ज्ञानदर्शनचारित्रोपयोगेषु प्रवर्त्तमानमात्मनस्वाभाविकं वर्य लब्धिर्वर्य कथ्यते । यद्वाऽऽ- त्मनि शक्तित्वेन सद्भूतं यद्वीर्यं तल्लब्धिय, तस्याश्शक्तेहेतुभूतं मनोवाकायात्मकं साधनं तत्करणवर्यम् । इदं करणर्य 卐 सकलसयोगसंसारिणां भवति, लब्धिर्वयं तु तरायस्य क्षयोपशममा श्रेत्य छद्मस्थर्जवानां न्यून-न्यूनतर-न्यूनतमा- अधिकाऽधिकतराऽधिकतमाद्यसंख्यप्रकारकं भवति, केवलिनां सिद्धिसंख्यशालिनां च वर्यान्तरायस्य समलक्षयेण संपूर्णतया लब्धिवीर्य विद्यते, इदं वर्य सूक्ष्मैकेन्द्रियजीवेऽपि अनन्ततमांशेन विद्यते, तस्मात् प्रतिजीवं ईर्यस्याऽल्पाऽधिकतया संपूर्ण- तया वाऽवश्यं सद्भावाद्वर्यस्य च जीवं विनाऽनन्याऽऽधारत्वाद् वर्यमपि वस्य लक्षणम् ॥ ननु पर्यायस्वरूपा शक्तिस्तु । पुद्गलेऽपि वलोक्यते, यतस्समयमात्रेण परमाणुः लोकान्वाल्लोकपर्यन्तं यावद्गन्तुं समर्थः, शक्तश्च वपर्यायतया समा- ख्याता, तत्कथं यं जोवस्यैव लक्षणम् ? उच्यते;-शक्तिस्तु केनापि प्रकोरण प्रतिद्रव्यं विद्यते, किश्चिदपि द्रव्यमेतादृङ् L 卐 नास्ति यस्मिन् कस्याश्चित्शक्तेरपि पर्युदासः । अत्र तु योग-उत्साह-पराक्रमात्मिका शक्तिरिष्यते, तथाविधायाश्च शक्तः पर- ॥ १२ ॥ A T A A ए - -- 卐 N S A U N. T N माणुष्वसंभवः, अतोर्य जीघस्यैव लक्षणं, न तु परमाण्वात्मकपुद्गलद्रव्यस्याऽपि ॥ तथोपयोगोऽपि जवस्य लक्षणत्वेन र व्याख्यातः, स च द्वादशधा, तद्यथा-पञ्चविधं ज्ञानं, त्रिविधमज्ञानं, चतुर्विधं दर्शन , तत्र पञ्चविधज्ञानत्रिप्रकारकाज्ञाना- म त्मकोऽष्टविधस्साकारोपयोगः, चतुर्वैधदर्शनात्मक निराकारोपयोगश्च एवं साकारनिराकारलक्षणेषु द्वादशसूपयोगेषु यथा- V संभव जवोऽवश्यं वर्तते, अयमुपयोगो 'वस्य मूलगुणवेनाऽऽख्यातः, यदा स उपयोगस्साकारादिविशेषणविशिष्टस्तदा ज्ञानं, निराकारविशेषणयुक्तस्तदा दर्शनमिति कथ्यते, इत्येवं लेशतः प्रदर्शितान ज्ञान-दर्शन-तप-र्य-उपयोगात्मकान - A वस्य लिङ्गानि सत्तापेक्षया निखिलेष्वपि जीवेषु संपूर्णतया वर्तन्ते, तथापि कर्मपरमाएपरिकरपरिकलितानां संसारिणां A 卐 तु अल्पाऽधिकतयाऽऽविर्भूतानि सन्ति, सिद्धानां साकल्येन प्रादुर्भूतानि भवन्ति ।। ५ ।। ध पूर्वप्रपञ्चितगाथया वस्य लक्षणं व्याख्याय या भर्जीवाः पर्याप्ता अपर्यप्ता बोच्यन्रे तत्पर्यास्वरूपप्रदर्शनपूर्चिकां, 5 'एनेन्द्रिया देवानां कतपर्याप्तयो वर्त्तन्ते ' तत्प्रतिपादिकां गाथामाह;- 卐 आहर-सरर-इंदिय, पज्जरी आणपाण-भस-कणे 卐 卐 चउ-पंच-पंच-छप्पिय, इग-विगलाऽ-सन्नि-सन्नणं 卐 टीका-'आहार' ति; घण्टालालान्यायेन मध्यवर्ती ‘पञ्जत' शब्द आहारादिपदैरानप्राणादिपदैश्च सह प्रत्येक 卐 सम्वन्धर्न यः, तद्यथा-आहारपर्याप्तिः, शरीरपर्याप्तिः, इन्द्रियपर्याप्तिः, आनप्राणपर्याप्तः, भाषापर्याप्तिः मनःपर्याप्तिश्च ननु फ्र पर्याप्तिशब्दस्य केऽर्थः ? इत्याशङ्कायामुच्यते-आयुपः क्षयानन्तरं विवक्षितभवान्निर्गत्य यस्मिन् भने जन्तुस्समुत्पद्यते तत्राऽऽ- A G T A - -- - V L ३ سہ A २ N y S 卐 A y V A A T अनवतत्त्व- भवपर्यन्तं जीवन निर्वाहार्थमाहारंग्रहणाद्या आवश्यकक्रियास्तेनाऽवश्यं वधेयाः, तत्तत् क्रियार्थं समुपजायमाना या शक्तिस्सैव 卐 पति- U सुमङ्गला- पर्याप्तिः । पुनर्जीवेषु याश्शक्तय उत्पद्यन्ते ता पुद्गलद्रव्योपचयस्याऽऽलम्बनेनैवोत्पद्यन्ते, यतस्संसारिवानां सर्वे पर स्वरूपर टकायां- पद्गलकव्यापाराः पुद्गलसंघातस्याऽलम्बनेनैव भवन्त, यद्यपि जवस्य शक्तिस्स्वतंत्राऽपरिमिता च, परं सा तु सद्विवधूत्सङ्ग- शालिनां सिद्धानामेव, अपगलिका च सा आत्मसाक्षात्कारस्वरूपा, भवस्थानां तु पंद्गलका, यदुक्तं कर्मप्रकृत-" द्रव्य- ॥ १३॥ नमत्तं हे संसारणांमुपजायते " अतस्तत्शक्त्युत्पत्तौ नमित्तभूतो यः पुद्गलोपचयस्सोऽपि कारणे कार्यस्य व्यपदेशेन y पर्याप्तित्वेन व्याख्यायते, अनेनैव हेतुना च पर्याप्तयोऽपि पुद्गलसंघातस्वरूपाः प्रोच्यन्ते ॥ तत्त्वार्थभाष्ये तु “ पर्याप्तिः क्रिया- * परिसमाप्तिरात्मनः" तत्तच्छक्त नि मे भूतपुद्गलसमूहसत्कक्रियाया या परिसमाप्तिस्सा पर्याप्तिरित्यर्थः । एवं शक्तिः, 卐 卐 शक्त हेतुभूतः पुद्गलोपचयः समाप्तिश्चेति पर्या शब्दस्य त्रयोऽर्थाः ॥ वृहत्संग्रहण्यादिग्रन्थेषु तु पर्याप्तिशब्दः सामर्थ्य- N विशेपार्थत्वेन व्याख्यातः, तच्च सामर्थ्य पुद्गलद्रव्योपचयजन्यम् । उत्पत्तिस्थानमागतेन जीवेन प्रथमसमयगृहीता ये पुद्ग- 卐 लास्तेपां तत्प्रथमसमयगृह तपुद्गलसम्बन्धेन तत्स्वरूपप्राप्तानां द्वितीयादिप्रतिसमयगृह्यमाणउद्गलानाञ्चाऽऽहारादिखरूपाणां खलरसादेपरणमने या शक्तिस्सा पर्याप्तिः, यथोदरवर्तिन्या तथाप्रकारकतैजसादपुद्गलशक्त्या गृह ताऽऽहारादिपुद्गलाः खलरसादिरूपतया परिणम्यन्ते, तथैव प्रथमसमयादिगृहतपुद्गलानां तथा वधा या शक्तिस्सैव पर्याप्तिरित्यर्थः ।। बृहत्संग्र- A १ प्रतिसमयमाहारग्रहणं, सप्तधातूनी रचना, इन्द्रियद्वारा स्वस्वविपयोपादानं, श्वासोश्वासग्रहणविसर्जनं, संभापणं, मान- 卐 सिकास्ता इति पटकार्याण्यवश्यं कर्त्तव्यानि इति ।। ॥ १३ ॥ A G T V L A Up A । वः पुद्गलसमूहाऽऽलम्बनसमुत्प- -- 卐 N y S 卐 卐 A 卐 V 卐 A ज हण्यां तु-" आहारसर रइंदिय-ऊसास वओ मणोऽभिनिवत्ति, हइ जओ दलियाओ करणं पइ सा उ पजर"। १॥ अस्था गमनका-" आहारशरीरेन्द्रयोच्छासवचोमनसामभि मभिनिवृतिर भनिष्पत्तिर्यते दलकादलभूतात् पुद्गलसमूहात्तस्य दले- कस्य स्वस्वविपरे परिणमनं प्रति यत् करणं शक्तरूपं सा पर्या:" इत्यनया व्याख्ययाऽऽहारादिपरिणमनक्रियायां करण- नाडी पर्याप्तिः प्रदर्शता ॥ अथ नामग्राहं पर्याप्तिर्व्याख्यायदे-तत्र वः पुद्गले पचयालम्बन्न समुत्पन्नया यया शक्त्या बाह्यमाहारमादाय खलरसरूपतया परिणमयति सा आहारपर्याप्तिः १, पुद्गले पचयाऽऽलम्बनसमुत्पन्नया यया शक्त्या जीव रर्स भूतमाहारं रसाऽसृङ्मांसमेदोऽस्थमजाशुक्रलक्षणसप्तधातुस्वरूपेण परिणमय्य शरीरं रचयति सा शरीरपर्या : २, पुद्गल- पचयालम्बनजन्टेन रेन सामर्थ्य विशेपेण रसादिसप्तधातुरूपतया परिणमितमाहारमिन्द्रयरूपतया परिणमयति सा इन्द्रिय- पर्याप्तिः ३, अयमर्थः प्रकारान्तरेणाप्यन्यत्रोक्तः, " पञ्चानामिन्द्रयाणां प्राय ग्यान् पुद्गलान् गृहीत्वाऽनाभेगनिर्वतिरेन hण तद्भावनयनशक्तः तान् पुद्गलान् इन्द्रियस्वरूपेण परिणमयितुं सामर्थ्य सा इन्द्रयपर्याप्तिः" । संग्रहण्यांतु " यया धातुरूपतया परिण मतादाहारादेकस्य द्वयेस्त्रयाणां चतुर्णा पश्चानां वेन्द्रियाणां प्राय ग्यानि द्रव्याण्युपादायैकद्व- व्यादीन्द्रियरूपतया परणमय्य स्वस्व विषयेषु परिज्ञानसमर्थे भवति सेन्द्रियपर्याप्तिः पन्नया यया शक्त्या पुनरुच्वासयोग्यपुद्गलानादायोच्छ्वासरूपतया परणमय्याऽऽलम्ब्य च मुञ्चति सा उच्छास पर्या : ४, विः पुद्गल नेचयाऽऽलम्बनसमुपजातेन येन शक्ति विशेष्ण भाषाप्रायोग्यपुद्गलानादाय भाषाटेन परिणमय्याऽऽलम्व्य च मुञ्चति सा भाषापर्याप्तिः ५ । वः पुद्गलोपनिचयजा जातया यया शक्त्या पुनर्मनोयोग्यपुद्गलद्रव्यानादाय मनस्त्वेन परिणम- 卐 T 卐 A N ॐ G T A 卐 V 卐 L y A भ an F u 55 cywny पर्याप्ति- स्वरूपम् V A 卐 अनवतत्त्व व्याऽऽलम्ब्य च विसृजति सा मनःपर्याप्तिः६॥ तत्त्वार्थभाष्ये वृत्त च-पर्याप्तिपञ्चकमङ्गीकृतं न पटकम् , मनःपर्याप्तेरिन्द्रियपर्या- सुमङ्गला- A प्त्यन्तर्गणनाच्यात् , इन्द्रियं बाह्यं करणं, मनस्त्वन्तःकरणमिति, व्याख्याऽपि प्रकारान्तरेणैव विहिता, तचैवम्।-(भाष्यम् )। 卐 टकायां- पर्याप्तिः पञ्चधा, तद्यथा-आहारपर्याप्तिः, शरीरपर्याप्तिः, इन्द्रियपर्याप्तिः, प्राणापानपर्याप्तिः, भापा- पर्याप्तरिति, पर्याप्तिः क्रियापरिसमाप्तिरात्मनः॥ व्याख्या॥पर्याप्तिः पञ्चविधेत्यादि, पर्याप्तिः पुद्गलरूपा-आत्मनः ॥ १४॥ ॥ कर्तुः करणविशेषः, येन करणविशेषेणाहारादिग्रहणसामर्थ्यमात्मनो निष्पद्यते तच करणं यैः पुद्गलैर्निर्वय॑ते ते पुद्गला आत्मनात्ता- स्तथाविधपरिणतिभाजः पर्याप्तशब्देनोच्यन्ते इति सामान्येनोद्दिष्टम् । पर्याप्ति नामग्राहं विशेपेण निर्दिदिक्षनाह-'तद्यथेत्यादि' ॐ आहारग्रहणसमर्थकरणपरिनिष्पत्तिराहारपर्याप्तिः, शरीरकरण निष्पत्तिः शरीरपर्याप्तिः, इन्द्रियकरणनिष्पत्तिरिन्द्रयपर्याप्तिः, प्राणापानावुच्छ्वासनिश्वास तद्योग्यकरणनिष्पत्तिः प्राणांपानपर्याप्तिः, भापायोग्यपुद्गलग्रहण( परिणमनालम्बन )विसर्ग- समर्थकरणनिष्पत्ति पापर्याप्तः, यथोक्तं-" आहारसरी रइंदिय, ऊसासवउमणोभिनिवत्ति । होइ जओ दलियाओ करणं पइ सा उ पन्जत्ति"॥१॥ इति शब्द इयत्ताप्रतिपादनार्थः ॥ ननु च पद् पर्याप्तयः पारमर्पप्रवचनप्रसिद्धाः कथं पञ्चसङ्ख्याका 卐 इति, उच्यते इन्द्रियपर्याप्तिग्रहणादिह मनःपर्याप्तेरपि ग्रहणमवसेयमतः पञ्चैवेति निश्चयः, ननु च शास्त्रकारेणाऽनिन्द्रियमुक्तं- 卐 मनः, कथमिन्द्रियग्रहणात् गृह प्यते तदित्युच्यते, यथा शब्दादिविपयग्राहीणि साक्षाचक्षुरादीनि, न तथा मनः, सुखादीनां पुनस्साक्षाग्राहकं मनोऽसंपूर्णमिन्द्रियमित्यनिन्द्रियमुक्तं, इन्द्रलिङ्गच्वानुभवात्तु भवत्येवेन्द्रियमिति ॥ तत्राहारपर्याप्तिनिरू- पणायाह; ( भाष्यम् ) शरीरेन्द्रियवाङ्मनःप्राणापानयोग्यदलिकद्रव्याहरणक्रियापरिसमातिराहारपर्याप्तिः 卐 A 卐 N T A ज T V y L ज ॥ १४ A 卐 पदा m --- S xmaren N U A M 卐 V A A N ॥ व्याख्या ॥ शरीरस्येन्द्रियाणां वाचो मनसः प्राणापानयश्चाऽऽगमप्रसिद्धवर्गणाक्रमेण यान योग्यान दलकद्रव्याण y तेषामाहरणक्रिया ग्रहणमादानं तस्याः परिसमाप्तिराहारपर्या: करण विशेषः, अत्र च मनोग्रहणात् परस्फुटमिन्द्रयग्रहणेन मनसोऽप्युपादानमिति ( भाष्यम् ) गृहीतस्य शरीरतया संस्थापनक्रियापरिसमाप्तः शर पर्याप्तिः, संस्थापनं 5 रचना घटनमित्यर्थः ॥ व्याख्या । सामान्टेन गृह तस्य योग्यपुद्गलसंघातस्य शरीरेपाङ्गतया संस्थापन क्रया विरचन- 卐 क्रिया तस्याः पर्याप्तिः शरीरपर्याप्तिः शरवर्गणायोग्यपुद्गलप्रतिनियता च रचना इत्यर्थः ॥ (भाष्यम् ) त्वगादीन्द्रियनि- 卐 वर्तन क्रियापरिसमाप्तिरिन्द्रियपर्याप्तिः ॥ व्याख्या॥ त्वगति स्पर्शनेन्द्रयं तदादीन्द्रयं स्पर्शन-रसन-प्राण-चक्षुः- में श्रोत्र-मनोलक्षणं तत्स्वरूपनिवर्तनक्रियापरिसमाप्तिरिन्द्रयपर्याप्तिः ।। (भाष्यम् ) प्राणापानक्रियायोग्यद्रव्यग्रहण(परि- णमनाऽऽलम्बन)निसर्गशक्तिनिवर्त्तनक्रियापरिसमाप्तिः प्राणापानपर्याप्तिः ॥ व्याख्या ।। प्राणापानावुच्छ्वास- नश्वास क्रियालक्षण, तयोर्वर्गणाक्रमेण योग्यद्रव्यग्रहणशक्तिः सामर्थ्य तन्निवर्त्तनक्रियासमा प्राणापानपर्याप्तिः। (भाष्यम्) भाषायोग्यद्रव्यग्रहण(परिणमनाऽऽलम्बन)निसर्गशक्ति निर्वर्त्तनक्रियापरिसमाप्तिर्भाषापर्याप्तिः ॥ व्या- ख्या ।। अत्रापि वर्गणाक्रमेणैव भाषायोग्यद्रव्याणां ग्रहणनिसगै, तद्विपया शक्तिः सामर्थ्य तन्निवर्त्तनक्रियापरिसमार्भािपा- । पर्याप्तिरिति ॥ ( भाष्यम् ) मनस्त्वयोग्यद्रव्यग्रहण (परिणमनाऽऽलम्बन)निसर्गशक्तिनिवर्त्तनक्रियापरिसमा- A 卐 卐. १ आहारशरीरेन्द्रियपर्याप्तिषु ग्रहणपरिणमनलक्षणक्रियाद्वयम् , प्राणापानभाषामनःपर्याप्तिषु च ग्रहणपरिणमनाऽऽलम्बननिसर्ग- लक्षणक्रिया चतुष्कं, यत्रनिसर्गस्तत्राऽऽलम्बनमावश्यकं, धन्वजीवाऽऽकर्पणादेवदिति ॥ 卐 卐 T 卐 G A L V A A LE, UC zy जी S A . V M ॥१५॥ T N 卐 प्तिर्मनपर्याप्तिरित्येके ॥ व्याख्या ॥ मनस्त्वयोग्यानि-मनोवर्गणायोग्यानि मनःपरिणामप्रत्यलानि यानि द्रव्याण नवतत्त्व- पर्या- तेपां ग्रहणनेसर्गसामर्थ्यस्य निर्वर्तनक्रियापरिसमाप्तिमनःपर्याप्तिरिति” श्री तत्त्वार्थवृत्तिः, अष्टमाध्यायः ॥ सुमङ्गला- स्वरूप 卐 टीकायां पूर्वोक्तपर्याप्तिपट्कमध्ये यस्य जीवस्य यति पर्याप्तयस्तासां पर्याप्त नां युगपदेव प्रारम्भो जायते, समाप्तिस्तु क्रमेण भवति । यत आहारार्दनां पानां पुद्गलाः क्रमशः सूक्ष्मसूक्ष्मतरसूक्ष्मतमपरिणामवन्तः, तच्चैवम्-आहारपर्याप्तेः शरीरपर्याप्तिस्सूक्ष्म- 卐 A पुद्गलद्रव्योपचयघटतत्त्वात् सूक्ष्मा, ततोऽन्द्रियपर्याप्तिस्वक्ष्मतरपुद्गलसमूहरचितश्चात् सूक्ष्मतरा, तस्या अपि विशेषसूक्ष्म- तरपुद्गलनिचयरचमात्मिका प्राणापानपर्याप्तिः सूक्ष्मतमा, एवमग्रेऽप परिभावन्यम् । यथा स्थूलसूत्रकर्तिका सूक्ष्मसूत्रकत- ॐ काऽपेक्षया झटिति सूत्रं कर्त्तयत, सूक्ष्मसूत्रकर्तिका सूक्ष्मतरसूत्रककापेक्षया ईघ्रं सूत्रं निम्ते एवमत्रापि द्रष्टव्यमिति तवार्थभाष्यवृत्तावुल्लिखितम् । एवमुपपातक्षेत्रमागतो जीवो युगपदेव खयोग्यपर्याप्तिरचनां प्रारभते, तत्राऽऽहारपर्याप्तिस्तु प्रथमे 卐 समये एव निष्ठामुपयाति शेपास्त्वन्तर्मुहूर्त्तमात्रकालेन समाप्तिं गच्छन्ति, तद्यथा-आहारपर्याप्तिः समाप्त्यनन्तरमन्तर्गहन शरीरपर्याप्तिर्नेष्ठामेते, शरीरपर्याप्त्यनन्तरमिन्द्रियपर्याप्तरन्तर्मुहूर्तेन पूर्णतां याति, ततोऽन्तहून प्राणापानपर्याप्तिः, ततो- ऽन्तर्मुहून भाषापर्याप्तः, तत भापापर्याप्तिसमाप्त्यनन्तरमन्तर्मुहूर्त्तमात्रकालेन मनःपर्याप्तः, सर्वासामपि समाप्तिकालोऽ- 卐 न्तर्मुहूर्तप्रमाणः॥ अयं पूर्वोक्तः क्रम अंदारकश राऽपेक्षया व्यावर्णितः, क्रियाऽऽहारकशरोरणां तु अंदारिकशरीरिवत् ai आहारपर्याप्तिः प्रथमे समये एव निष्ठा मयत्ति, ततोऽन्तर्मुहून शरोरपर्याप्तिः समाप्तिमेति, ततस्समयमात्रेणेन्द्रियपर्याप्तिस्त- 卐 तस्समयमात्रेण प्राणापानपर्याप्तिः, ततस्समयमात्रेण मनःपर्याप्तिः परिसमाप्तिं याति, श्री भगवत्याद तु देवानां भाषामनः- A । T A V L A । १५ ॐ A 卐 S N A 卐 U y 卐 V 卐 -- पर्याप्त्योः समकालम्व समाप्तिरभिहिता, अनया 'विवक्षया तयोरेकत्वमाश्रित्य सुराणां पञ्चपर्याप्तयो व्याख्याताः॥ आसां-पाना मध्ये एजेन्द्रियाणां प्रथमाश्चतस्रः पर्याप्तयो भवन्ति, वीन्द्रिय-न्द्रिय-चतुरन्द्रियलक्षणानां वकलेन्द्रियाणां मनःपर्याप्तं विना पञ्चपर्याप्तय वर्तन्ते, असंज्ञपञ्चेन्द्रियाणामी प , संज्ञपञ्चेन्द्रियाणां तु षट् पर्याप्तयस्सन्ति निज निज- भवयोग्यपर्याप्त समाप्तं वा ये हवाः पञ्चत्वं प्राप्नुवन्ति रे पर्याप्ताः, ये च स्वकीयभवप्राय ग्याः पार्न समापयन्ति, प्रागेवाऽऽयुषः क्षयेण मरणमघते रे अपर्याप्ताः ॥ इम पर्याप्ताऽपर्याप्तनामान टू द लब्धिकरणाभ्यां पुनद्वैप्रकारक, एव जवाः पर्याप्ताऽपर्याप्तापेक्षया चतुर्भेद भन्नास्सञ्जाताः, तद्यथा लब्ध्यपर्याप्ताः १ करणाऽपर्याप्ताः २ लब्धिपर्याप्ताः करणपर्याप्ताश्च ४ । तत्र से जवाः स्वयोग्यपर्याप्त नां समापनात् प्राग्वाऽवश्यं प्रियन्ते, न तु स्वयोग्यपाहस्समापयन्ति ते लब्ध्यपर्याप्तसंज्ञकाः, यथैलेन्द्रियाणां चतस्र भवप्राय ग्याः पर्याप्तयस्तत्र रे एकेन्द्रिया आहारशरेरेन्द्रियाख्यास्तिस्रः पयो- रिचयन्ति, परं प्राणापानपर्याप्तिसमापनात् प्रागेव पञ्चतामियन्ति रे लब्ध्यपर्याप्तका भाव या एवं वन्द्रियादेष्य- प्यूह्यम् ॥ रे च वाः पर्याप्तनामकम्मदटेन स्वयग्यपर्याप्त: समाप्ति व कालं कुर्वरे रे लब्धिपर्याप्ता उच्यन्ते यैः पुनर्जीवैः स्वयोग्यपर्याप्तयस्समाप्ते ताः रे करणपर्याप्ताः, अथवा मतान्तरेण इन्द्रियपश्सिमाप्त्यनन्तरं सर्वेऽपि करण- पर्याप्ताः। यैश्च जीवरद्यावधि निजभवप्राय ग्यपर्याप्तयस्समातें न ता इति वर्तमानकालाऽपेक्षया विचार्यमाणा वाः करणाऽपर्यप्ताः कथ्यन्ते । अस्मने भङ्गे लेवलं वर्तमानाऽवस्था एव द्रष्टव्या, भविष्यत्काले लब्धिपर्याप्ताः स्युः लब्ध्य- पर्याप्ता वा स्युर्नास्त तद्विचारणाऽत्र । 卐 A 卐 T 卐 A 卐 T N G y A 卐 L. 卐 V 卐 A 卐 N S 'नवतत्त्व- 卐 A पर्याप्ति- सुमङ्गला- टकायां- 卐 V स्वरूपम् ॥ । १६॥ ॥ 卐 U 卐 M ज A 卐 A 卐 | T 3 A अथ लब्ध्यपर्याप्तादिभेदचतुष्के परस्परं संवेधश्चन्त्यते तद्यथा यो लब्ध्यपर्याप्तः स करणपर्याप्तोऽपि भवति, यो लब्धि- पर्याप्तस्स करणपर्याप्तः करणाऽपर्याप्तोऽपि वर्त्तते, यः करणपर्याप्तस्स लब्धिपर्याप्त एव भवति, यः करणाऽपर्याप्तः स लब्धि- पर्याप्तो लब्ध्यपर्याप्तो वा विद्यते, एवं परस्परं संवेधो विचार यः॥ अथ प्रतिभेदं कालमानमाह; लब्ध्यपर्याप्तस्य भवप्रथमसमयादारभ्याऽन्तर्मुहूर्त्तप्रमाणं कालमानमुक्तं, यतो लब्ध्यपर्या- प्तस्यान्तर्मुहूर्तादधिकमायुरेव नास्ति । लब्धिपर्याप्तस्य तु भवप्रथमसमयादारभ्याऽऽभवपर्यन्तं यावनिजाऽऽयुपस्समापनं तावत्प्रमाणं कालमानम् । करणाऽपर्याप्तस्य तु भवप्रथमसमवादारभ्याऽन्तर्मुहूर्त यावत् कालप्रमाणं, यतस्ततोऽनन्तरं लब्धि- पर्याप्तो भवति लब्ध्यपर्याप्तो वा । करणपर्याप्तस्यत्वन्तर्मुहूर्त्तन्यून निजायुपस्समाप्तिपर्यन्तं कालप्रमाणम् ।। ये चवा लब्ध्यपर्याप्तास्तेऽपि आहार-शरीरे-न्द्रियलक्षणास्तस्रः पर्याप्ती समापय्यैव कालं विदधति । यतो भवाद्भवा- न्तरं जगमिषयोर्जवाः पारभविकमायुरबद्धान भवान्तरं संक्रामन्त, आयुर्वन्धश्चेन्द्रियपर्याप्तिपरिसमाप्तिमृते न भवत्येवेति ।। ननु कति वाः पूर्वोक्तप्रकारेण खयोग्यपर्याप्तभिरपर्याप्ता एव म्रियन्ते, केचन च निजप्रायोग्यपर्याप्त: समाप्त- चा प्रेयन्ते, तत्र को हेतुः ?; उच्यते-यैौर्गतजन्मने पर्याप्तनामकर्म उपार्जेतं ते तु पर्याप्तनामकम्मोदयेन वयोग्यपर्या- प्टनां नष्ठां विदधति, यैश्च वर्गतजन्मनि अपर्याप्तनामकर्म बद्धं ते निजभवप्रायोग्यपर्याप्तीनां समाप्ति न कुर्वन्ति ।। १. अस्यां संवेधचिन्ताया स्वस्वयोग्यनिखिलपर्याप्तिपरिसमाप्तिलक्षणं करणपर्याप्तत्त्वमवसेयम्, न तु इन्द्रियपर्याप्तिसमाप्तिलक्षणं मतान्तरीयमिति । N ॐ G 卐 T 'A V 卐 L 卐 A ।१६। ध A ॐ S ज 卐 Z ? 卐 A V 卐 卐 A ननु पर्याप्तलब्धिरपर्याप्तलब्धिर्वा कथं नामकर्मजन्या मन्तव्या यस्मात् पर्याप्त नां पूर्णताचामपूर्णतायां वा दीर्घ- मल्पं वाऽऽयुरेव नमित्तं, दी चायुष सति पर्याप्नां समाप्तिर्भावन', अल्पे च सति समाप्त्यभावः, ततः किं नामकर्म- प्रभवा पर्याप्तिसमाप्तिरुत दीर्घाऽल्पायुर्जन्या ? सत्यम् , पक्षिणामुड्डयने यथा पवमानः, चक्षुषां दर्शनक्रियायां यथा प्रकाशः, मत्स्यानाञ्च तरण क्रियायां यथा जलमवश्यं साहाय्यकृत् परं पक्षिचक्षुःप्रभृटीनां स्वशक्त्या विना वाय्वादेसद्भावेऽी उड्डयनादिक्रिया न संभवन्ति, एवं पर्याप्तीनां पूर्णतायामपूर्णतायां वा आयुरप सहकारिकारणस्नेरी क्रयते, परं प्राधा- न्येन तु पर्याप्तापर्याप्तनामकर्मण एव नमित्ते स्त इति ॥ अथ समाप्त गताः पर्याप्तयः कं कार्य विदधत इत परिप्रश्ने उत्तररुच्यते-व आहारपप्तिलक्षणया शक्त्या प्रतिसमयमाहारग्रहणात्मकां क्रियां कुरुतेऽथवा गृहतमाहारं खलरसादि- सप्तधातुरूपतया परिणमयति, शर पर्याप्तेः समाप्त्या तजन्यसामर्थ्य विशेषेण काययोगात्मकां चेष्टां कत्तुं धावनवल्गनादि क्रियायां, लेमाहारेण कवलाऽऽहारेण वाऽऽत्तान् पुद्गलान् शर्ररतया परिणमयितुश्च जीवस्समर्थो भवति, इन्द्रियपप्ति- पूर्णताजन्यशक्तिविशेषेण इन्द्रियद्वारा इन्द्रयमोचरं तं तं वषयं बुध्यते डवः, प्राणाऽपानपर्याप्त्यापर्याप्तो जवः प्राणाऽ- पानयो ग्यदलिकानादाय तान् दलिकान् प्राणाऽपानतया परिणमच्याऽवलम्ब्य चोच्छ्वासनिश्वासत्वेनत्पादयति, तथा भाषा- पर्याप्तिपर्याप्तेषु डीवेषु भाषणात्मकं वाग्बलमुत्पद्यते। मनःपर्याप्तपरिनिष्ठया च जीवश्चिन्तनात्मकं मनेबलं ग्रामीति ६॥ इत्येवं प्राक्तनगाथायां पर्याप्तिपद्कस्वरूपं कस्य विस्य कतिपर्याप्त्य भवन्ति चेति व्याख्यायाऽस्सां गाथायां वस्य बाह्यलक्षणात्मकान् पूर्वोक्तपर्याप्तिभिश्च निष्पन्नान् प्राणान् व्याचख्यासुराहा 卐 N 卐 T G 卐 A 卐 y A 卐 T ध V 卐 A L 卐 A ए - S N 卐 卐 A श्रीनवतत्त्व सुमङ्गला- टकायां- इन्द्रिय- स्वरूप । 卐 ध V ॥ १७॥ A 卐 T पणिदियत्तिबलूसा-साऊद पाण चउ सग अट्ठ इगदुत्चिउरेंदणं, असन्निसन्त्रीण नव दसय ७ व्याख्या-'पणिंदय'त्ति पञ्चेन्द्रियाण स्पर्शन-रसन-प्राण-चक्षुः श्रोत्रलक्षणानि, 'तिबल' इति श्रीणि बलानि मनोवल-वाग्वल-कायबलस्वरूपाणि, उच्छ्रासः, आयुश्चेति दश प्राणाः संसारोदरवर्तववाह्यलक्षणात्मकाः, तेषु च यथासंख्यं चत्त्वारः पट् सप्त अष्ट प्राणाः क्रमेणैकेन्द्रियद्वीन्द्रियोन्द्रियचतुरिन्द्रियाणां भवन्ति, असंज्ञि-संज्ञपञ्चेन्द्रियाणाञ्च क्रमेण नव दश च प्राणा वर्तन्ते इति गाथाक्षरार्थः॥ विस्तरार्थस्त्वयम् :-" इन्द्रियमिन्द्रलिङ्गमिन्द्रदृष्टमिन्द्रसृष्टमिन्द्रजुष्टमिन्द्रदत्तमिति वा" ( पाणि० अ. ५. पा. सू. ९३ ) इति सूत्रेण इन्दनादिन्द्र आत्मा तस्य लॉ करणेन कर्तुरडमानादिन्द्रयशब्दनिष्पत्तिः। आत्सनो विज्ञानोत्पत्त यान प्रकृष्टरुपकारकाणि तान्येवेन्द्रियाणि, तान च स्पर्शन-रसना-प्राण-चक्षुः-श्रोत्रलक्षणानि पञ्चधा, तान्यपि द्रव्य- भाव दाभ्यां द्वधा, तत्र द्रव्येन्द्रियं निर्वृत्युपकरण दाद् द्विविधं, पुनरपि नित्तराभ्यन्तरवाह्यदाद् द्विधा । तत्र कर्मणा निवर्त्यत इति निर्वृत्तिः, उत्सेधाङ्गुलाऽसंख्येयभागप्रमितानां शुद्धानामात्मप्रदेशानां प्रतिनियतचक्षुरादीन्द्रियसंस्थानेनाऽ- वस्थता याऽऽभ्यन्तरा स्वस्व विपयज्ञानसमर्था कृत्तिः सा आभ्यन्तरनिर्वृत्तिद्रव्येन्द्रियमित्युच्यते । तेष्वात्मप्रदेशेषु वर्धकीसं- स्थान् येन पुद्गल विपकिना निर्माणनाम्ना आरचित अङ्गोपाङ्गनाम्ना च निष्पादित इन्द्रियव्यपदेशभाक् कर्णशप्कुल्यादि- विशेपो यः प्रतिनियतसंस्थानस्तद्वानिवृत्तिद्रव्येन्द्रियमुच्यते आभ्यन्तरवाह्यभेदभिन्नायास्तस्या एव निवृत्तेर्येनोपकारो विधी:- यते तदुपकरणम् । तच्चोपकरणमिन्द्रियकार्यजनकं, तदुपकरणमप्याभ्यन्तरबाबदाद् द्विप्रकारकं, तत्राऽभ्यन्तरोपकरणेन्द्रियं y A ज N 卐 卐 A ॐ T 卐 V 卐 L 卐 . ॥ १७॥ ॥

-- 卐 S 卐 N 卐 卐 U V M 卐 T चक्षुषः कृष्णशुक्लमण्डलं, बाह्यमुपकरणेन्द्रियं पत्रपक्ष्मद्वयादि इयम् । एवं शेरेष्वपि संभावन्यम् । सत्यामपि बाह्याऽऽभ्यन्तर- A दभिन्नायां नवृत्त उपकरणेन्द्रियस्य पघातान्न वो द्रष्टुं पारयति ।। भादेन्द्रियमपि लब्ध्युपयोगदाद् द्वधा, तत्र ज्ञानदर्श- ज नावरणक्षयोपशमानुसार न्द्रिगद्वारा स्वस्वविपयग्राहिण या शक्तिस्तल्लब्धिद्रव्येन्द्रिय मेति कथ्यते, तथा डीव इन्द्रियद्वारा स्वस्वविषयग्रहणक्रयायां प्रवर्त्तते तदुपयोगभावेन्द्रियमुच्यते । पूर्वोक्ता ज्ञानदर्शनाऽऽवरणक्षय पशमानुसारिणी लब्धिस्तु 卐 प्रतिजतेषु युगपदेव प्रवर्त्तते, परं विषयाऽववेधरूप व्यापारस्तु प्रतिसमयमेनैवेन्द्रियेण भवति, अत उपयोगाऽपेक्षया एके A जग्यो विवक्षितैलेन्द्रियोपयोगवानेव वर्त्तते, अथवा ज्ञानदर्शनाऽऽवरणक्षय पशमलक्षणा लब्धिस्तु सर्वेष्वप्येकेन्द्रियप्रभृतिपुतेषु 2 वर्त्तते, परं द्रन्टेन्द्रियं कस्यचिदेकं, कस्यचिच्च द्वे, इर जारिनामकर्मानुसारेण भवरे, अते लछन्द्रियापेक्षया सर्वे उवा पञ्चेन्द्रियल ब्धिऽभाजः। द्रव्येन्द्रियाऽपेक्षया एजेन्द्रिया द्वन्द्रयास्त्रीन्द्रियाश्चतुरिन्द्रियाः पञ्चेन्द्रियाश्च, उपयगेन्द्रियाऽपेक्षया ज वेकेन्द्रियाश्च भवन्ति ॥ अथेन्द्रियाणां स्थानं कुत्र कुत्र विद्यते तच्चिन्त्यरेः-तत्र स्पर्शनेन्द्रियस्थानं सकलं शरीरं, सस्मिन् देहे बाह्यभागोऽभ्यन्तरभागश्वाऽऽभ्यन्तरस्पर्शनेन्द्रियपुद्गलयुक्ताऽऽत्मप्रदेशाप्तो भवतीत्यर्थः ॥ तथा मुखे वाह्यन्त न्द्रियस्व- प रूपाया जिह्वा दृश्यते तस्यां जिह्वायामुपरष्टादधस्ताचाऽऽभ्यन्तररसनेन्द्रियपुद्गलयुक्ताऽऽत्मप्रदेशैरुपेतमङ्गुलस्यासंख्यातभाग- 卐 प्रमाणस्थूलमेकं प्रतरं (प्रस्तटं वा) वर्तते, अनेनैव प्रतरखरूपेन्द्रियद्वारा वे मधुरतिक्तादिरसं ज्ञाई समर्थों भवति । तथा नासिकायामुपरिवत्तसुपरभागेङ्गुलाऽसंख्टेयभागमात्रस्थूलमाभ्यन्तरघ्राणेन्द्रियपुद्गलयुक्ताऽऽत्मप्रदेशैस्सहितं स्थानं वर्त्तते रेन स्थानविशेषेण गंध विषयं ग्रह'तुमलंभवति जीवः 맑 तथा चक्षुप क नकान्तः अङ्गुलाऽसंख्येयभागपरिमिताऽऽभ्यन्तर . N A G T A V L A A S S 卐 5 N 卐 A ज V ध इन्द्रिय- U स्क्रूपम् । M A A T N श्रीनवतत्त्व चक्षुरिन्द्रयपुद्गलयुक्ताऽऽत्मप्रदेशैस्सहिता या आकृतिर स्त तचक्षु रन्द्रियस्थानं, कर्न निकायां सत्यामपि तस्या अभावे नहि सुमङ्गला द्रष्टुं शक्तो भवति जीवः ।। तथा कर्णपर्पटिकायामन्तःसुपिरभागेङ्गुलाऽसंख्येयभागप्रमाणाऽऽभ्यन्तरश्रोत्रेन्द्रियपुद्गलयुक्ताऽऽ- कायां रमप्रदेशैरुपेता या आकृतिवर्तते तच्च श्रोत्रेन्द्रियस्थानम् , अनेन्च स्थानेन जवश्शब्दादिकं शृणोति, इत्येवं बाह्यतो दृश्य- मानानि त्वम्-जिह्वा-नासिका-चक्षुः-श्रोत्राणि स्वयं-इन्द्रियस्वरूपाणि न, किन्तु पूर्वोक्ततत्तदाभ्यन्तरेन्द्रियाधाररूपाति ॥ १८॥ 9 विज्ञेयम् ॥ अथ बाह्याऽऽभ्यन्तरभेद भेन्नानां पश्चानामपन्द्रियाणामाकृतिरुच्यते;-तत्र पूर्वमाभ्यन्तरेन्द्रियाऽऽकृतिः कथ्यतेः- नज नेजशरीरप्रमाणाऽऽकारवत्वान्नानासंस्थाना स्पर्शनेन्द्रियाऽऽकृतिः, रसनेन्द्रियाऽऽकृतिः क्षुरप्रसंस्थाना, घ्राणेन्द्रियं कल- म्बुकापुप्पसंस्थानम् , चक्षुरन्द्रियं मसूराकारकं, श्रोत्रेन्द्रियं तु कदम्बपुप्पाकारकं भवति । एता आकृतय आभ्यन्तरेन्द्रयाणां ज्ञेयाः, ताश्च सर्व वेपु समानाः ॥ बाह्येन्द्रियाणां तु भिन्नभिन्न प्रकारकाणि संस्थानान्यवगन्तव्यानि ॥ इदा माभ्यन्तरेन्द्रियाणां दीर्घत्त्वं-पृथुचं स्थूलत्यश्च लिख्यते, तद्यथाः-स्वस्वशर रममाणायता, पृथुत्वेनाऽपि स्वशर्रys रप्रमाणाङ्गुलाऽसंख्येयभागमात्रस्थूला स्पर्शनेन्द्रियाऽऽकृतिः । तथा दीर्घत्वेन पृथुत्वेन चाङ्गुलपृथक्त्वप्रमाणाऽगुलाऽसं- T ख्वेयभागस्थूला रसनेन्द्रियाऽऽकृतिः। प्राणेन्द्रियाकृतिश्च दीर्घत्येन पृथुत्वेन स्थूलटेन चाऽङ्गुलाऽसंख्येयभागपरिमिता । A यह एवं चक्षुःश्रवणेन्द्रियाऋतिरपे अङ्गुलाऽसंख्येयभागप्रमाणा दीर्घत्त्व-पृथुत्च-स्थूलत्वैश्च वर्तते इति । अधुनेन्द्रियाणां विषयाः v विषयग्रहणञ्च क्षेत्रं प्रदश्यते । द्रव्यवर्तिनः स्निग्ध-रुक्ष-शत-ऊण-मृदु-कर्कश-गुरु-लघुलक्षणा अष्टसंख्याकाः स्पशाः 卐 स्पर्शने न्द्रयगोचरा भवन्ति, तान् स्पर्शानुत्कृष्टतो नवयोजनेभ्य आगतान् द्रव्यान्तरैरप्रतिहतशक्तिकान् जानाति न परतोऽ- जी A L । १८ . A A le N 卐 A y V 卐 A T N प्यागतान् । परत आगतानां मन्दपरिणामवत्त्वात् ॥ पदार्थवर्तनस्तिक्त-कटु-कपाया-ऽऽम्ल-मधुरलक्षणाः पञ्चरसा रसनेन्द्रियविषया वर्तन्ते, तेऽपि उत्कर्पतो नवयोजनेभ्य आगता एव विज्ञायन्ते न परत आगताः । पुद्गलस्थत सुगन्ध- दुर्गन्धलक्षण गन्ध घ्राणेन्द्रियगोचरी, तावपि उत्कर्पतो नवयोजनेभ्य आगतादेव परिच्छिते। तथा पुद्गलव तैनश्शुक्ल- कृष्णरक्तादयो वर्णाः पुद्गलस्थितप्रति नियतसंस्थानानि च चक्षुरिन्द्रियस्य विषयत्वेनेरी क्रियन्ते, चक्षुरन्द्रयमुत्कर्पतः सातिरेकाद् योजनशतसहस्रादारभ्य कटकुट्यादि भरव्यवहितानस्पृष्टान् दूरस्थितान् अभाखरपुद्गलान् पश्यति, भास्वरचन्द्र- सूर्यादयस्तु अनेकलक्षयोजनादपि दृश्यन्ते ॥ तथा सचित्ताऽचित्तमिश्रभेदभिन्नारशब्दाः श्रोत्रेन्द्रियगचराः, ते च शब्दा 卐 उत्कर्पतो द्वादशयोजनेभ्य आगताश्च श्रूयन्ते न परतस्समागताः, परत आगतानां पां मन्दपरिणामवत्वात् , तथाहि;-परत आगताः खलु ते शब्दपुद्गलास्तथास्वाभाव्यान्मन्दपरिणामास्तथोपजायन्ते येन स्वविपयं श्रेत्रज्ञानं नोत्पादयितुईश्वराः, श्रोत्रेन्द्रियस्याऽपि च तथाविधमद्भुततरं बलं न विद्यते येन परतोऽप्यागतान् शब्दान् शृणुयादिति ।। जघन्यविषयग्रहणक्षेत्रं ॐ तु नयनवजश्रेत्रार्दनां प्राप्तविषयपरिच्छेदकत्त्वात् अङ्गुलाऽसंख्येयभागपरिमितं, ततोऽङ्गुलाऽसंख्येयभागादप्यागतं शब्दा- 'दद्रव्यं परिच्छिद्यते, नयनञ्चाऽप्राप्तकारीति तद् जघन्यतोऽङ्गुलसंख्येयभागादव्यवहितं परच्छिनत्ति; अयमत्राऽऽशयः;- क जघन्यतोङ्गुलसंख्येयभागमात्रे व्यवस्थितं पश्यति न तु तत|क्तरम् । प्रतिप्राणिप्रसिद्धश्चायमर्थः, तथा च नातिसन्निकृष्ट- A मञ्जनरजोमलादिकं च : पश्यत, उक्तञ्च;-"अवरमसंखेजंगुलभागतो नयणवजाणं । संखेजंगुलभाग नयणस्स" इति ।। । १ पुष्कराधक्षेत्रवर्त्तमनुष्यापेक्षयेदम् । 卐 ज A G T 卐 V L A A AP E

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नवतत्त्व
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जवतत्ते
सुमङ्गला-
कायां-
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प्राणव्या-
ख्यायां
॥१९॥
मनवलम्।।
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अस्मल्लोले कर्णेन्द्रयसंख्या सर्वाल्पा, ततश्चतुरेन्द्रियसंख्या विशेषाधिका, ततो घ्राणेन्द्रियसंख्या विशेषाधिका, तत रसने-
न्द्रियसंख्या विशेषाधिका, ततोऽपि स्पर्शनेन्द्रियसंख्याऽनन्तगुणा इति ॥ पुनर्ये सज्ञिवास्ते तु इन्द्रियेण तत्तद्विपयं गृह चा
मनोद्वारा एव विषयस्वरूपं जानन्ति, परं मनस्साहाय्यं विना संज्ञिज्वानां केवलेनेन्द्रियेणैव विषयावबोधे न संजायते ।
इतरेपामसंज्ञनां तु मनसस्साहाय्यं विनैव केवलमिन्द्रियद्वारा एच विषयज्ञानं सजायत इत न्द्रियस्वरूपम् ॥
अथ मनोवलनामा पष्ठः प्राणो व्याख्यायते येन द्रव्यविशेषेण संज्ञि वाश्चिन्तनात्मकं व्यापार का प्रभवन्ति तन्मन
उच्यते, एतन्मनो मनोवर्गणागतपुद्गलद्रव्यैर्नष्पद्यते, पुनरेतन्मनो गर्भजानाम पपातिकदेवनारकाणाञ्च वर्त्तते नान्येपाम् ।
एतच्च मनो द्रव्यभावदात् द्वविधम् ॥ तत्र मनःपर्याप्तनामकर्मोदयेन काययोगद्वारा मनोयोग्यपुद्गलद्रव्यान् आदाय
चन्तनात्मकव्यापारप्रवृत्तमनोयोगेन तान् मनोयोग्यपुद्गलद्रव्यान् चिन्तन-मननव्यापारसाधनतया परिणमय्याऽवलम्ब्य च
विसृजति ते पुद्गला एव द्रव्यमनस्त्वेन प्रोच्यन्ते, तथा चोक्तंभनन्द्यध्ययनचूणौ;-मणपञ्जतिनामकम्मोदयतो जोग्गे मणोदने
घेत्तुं मणचेण परिणामिया दव्वा दबमणो भन्नइ"त्ति ॥ द्रव्यमनोरूपपुद्गलसमूहस्साऽऽलम्मेन वस्य यश्चिन्तनात्मको व्या-
पारस्तद् भावमनः कथ्यते, तदुक्तं श्रीनन्धध्ययनचूण-" मणदव्वालंबणो वस्स मणवावारो भावमणो भन्नइ " ति ॥
अतो द्रव्यमनसा विना विशिष्टभावमनो न घटते, भावमनसा विना द्रव्यमनस्तु केवलिनां घटते ॥ दगम्बरास्त्वेतत् पूर्वोक्तं
द्रव्यमनः अष्टदलपद्माकारकं हृदयस्थं मन्यन्ते, परं तन्न सम्नम् । यत एकदेशस्थमनःकरणेन सर्वात्मप्रदेशेपूपयोगप्रवृत्तिर्न
संभवते, उपयोगप्रवृत्तिस्तु सर्वाऽऽत्मप्रदेशेषु विलोक्यते, ततो मनसः एकदेशस्थितिकल्पनाऽकल्पन्या, यच पुनः
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॥१९॥

卐 S ध N 卐 A 卐C) 卐 ध A y । 卐 सुखदुःखाद्यनुभवलक्षणं मनोज्ञानं सर्वाऽऽत्मप्रदेशेषु संजायते, यच्च सर्वबाह्याऽऽभ्यन्तरदेहव्या पस्पर्शनेन्द्रोण सर्वप्रदेशेषु स्पर्शज्ञानं प्रादुर्भवति तदपि सर्वात्मप्रदेशव्यापिना मनसा वना न संजाघटीति, तसान्मनस एकदेशस्थितिकल्पनमयुक्तम् ।। द्रव्य-भावात्मकस्य द्वप्रकारकस्यापि मनसो व्यापारस्तन्मनोवलम् ॥ अथ सप्तमो वचनवलाऽऽख्यः प्राणः;-भापापर्याप्तनामकर्मोदयेन काययोगद्वारा भाषाप्राय ग्यपुद्गलद्रव्यान् आदाय 卐 भापात्त्वेन परिणमय्याऽवलम्ब्य च वाग्योगेन या विसर्जनशक्तिस्तद्वचनवलमुच्यते, अथवा शब्दोचारणलक्षणा विस्य या शक्तिस्तदपि वागवलं प्रकर्त्यते । इयं पूर्वोक्तस्वरूपा भापा विभापात्त्वेन भण्यते, अज वद्रव्योत्पन्ना अव्यक्तशब्दलक्षणा भाषा अविभाषात्वेन कथ्यते । द्विप्रकारकाऽयं भाषा पुद्गलद्रव्यसंघातनिष्पन्ना । तार्किंकास्तु शब्दं नभोगुणटेन ख्या- पयन्ति तन्न युक्तम् , यतो वायुना ऊह्यमाना, धूम्र इव संह्रियमाणा, जलमिव द्वारं प्रति अनुस्रियमाणा, वायुरिव गुहादिपु प्रतिस्खल्यमाना विविधक्रियालक्षणा भापा प्रत्यक्षमनुभूयते, विशिष्टाः क्रियाश्च विना पुद्गलद्रव्यं न भवन्ति, अत एव भाषा पुद्गलद्रव्यनिष्पन्ना मूर्तिमती च, नभस्त्वक्रियममूर्तञ्च, ततो द्विधाऽपि भापापुद्गलविकारजा, परं न नभोगुणरूपा। प्रथमे समये जीवो भाषापुद्गलानादत्ते, द्वितीये च समये तान् भापायोग्यपुद्गलान् भापास्न परिणमय्याऽवलम्ब्य च विसृजते, एवञ्च एकसमयात्मिका भाषायाः स्थितिः, सततभाषणात्मकप्रवाहापेक्षया तूत्कस्तोऽन्तर्मुहूर्त यावदपि स्थितिः । पुनर्जीव यद्दि- गसन्मुख वक्ति तस्यां दिशि स्थिता अन्टे श्रवणलब्धिभा वास्तां वक्तमुखनिसृतां मूलभाषां शृण्वन्ति, मूलभापापुद्गलेश्च वासितामपि शृण्वन्ति, परं शेषासु दिक्षु स्थिता वा मूलभापापुद्गलद्रव्वासितामेव भाषां शृण्वन्ति न मलाम् एरे भाषा- 卐 N T G 卐 A 卐 T ज L V म 卐 A an S अनवतत्त्व- सुमङ्गला- टकायां- 卐zyy V ॥२०॥ 卐 A 卐 T 卐 A N 卐 पुद्गला वक्तमुखमाद कृत्वा लोकान्तं यावत् स्पृशन्ति इति ज्वभापास्वरूपम् ॥ अजीवभापास्वरूपं तु पुद्गलपरिणामव्या जवतत्त्टे ख्याऽवसरे व्याख्यास्यामो वयमित वचनवलसंज्ञकः सप्तमः प्राणः॥ 卐 प्राणव्या- अथ कायवलं वर्ण्यते;-शर रद्वारा वस्तुग्रहणविसर्जनाद्यात्मको जवस्य व्यापारः, अथवा शरीरस्य या शक्तस्तत् M ख्यायां कायबलमुच्यते, तच्च शरेरमैदारक- क्रिया-ऽऽहारक-तैजस-कार्मणदेन पञ्चधा । तदारकशरीरप्रायोग्यपुद्गलद्रव्यै- 卐 बलम्॥ नॆष्पन्नमदारकश रम् , अथवा रसाऽसृङ्मांसमेदोऽस्थिमजाशुक्रलक्षणसप्तधातुभिनिष्पन्नं यच्छरीरं तदंदारिकम् अथवा तीर्थकर-गणधर-चक्र-वासुदेवप्रभृत् नामुदारगुणवतां महात्मनां यच्छररं तद दारिकमुच्यते । विविधप्रकारकाः क्रियाः कर्तुं 卐 समर्थं यच्छद्रं तद्वै क्रय, यतोऽनेन शरीरेण वः कदाचिद् गगनगाम् कदाचिच भूगाम भवति, एको भवति अनेऽपि भवन्ति, गुरुर्भवति लघुरप भवति, महान् भवते, अल्पोऽपि भवति, दृश्यो भवते अदृश्येनाऽपि भूयते इत्यादिका नाना 卐 प्रकारकाः क्रया अनेन शरीरेण कर्तुं प्रभवति वः अथवा वैक्रियप्रायोग्यपुद्गलद्रव्यनिष्पन्नं यच्छरं तद्वैक्रियमुच्यते ॥ तथाविधाऽऽहारकलब्धिभाक् चतुर्दशपूर्ववित् संयम प्रमत्तगुणस्थानवत् परमपारमैश्वर्योपेत तीर्थकरादीनां प्रभुत्त्वं द्रष्टुं 卐 सूक्ष्मार्थविचारणाऽवाप्तसंदेहदोला धरूढस्य मनसस्समाधं विधातुं वा तथाप्रकारकाऽऽहारकशरीरप्रायोग्यपुद्गलद्रव्युनूतन यच्छोरं विरचय्य तर्थकरसम् पे प्रेषयति तदाहारकशरीरम् ॥ जग्धाहारस पाचकं तेजोलेश्या-३ तलेश्यानिमित्तं वा जसy शरीरप्रायोग्यपुद्गलद्रव्यनिष्पन्नं यच्छरीरं तत्तैजसनाम । मतिज्ञानावरण याद्यष्टपञ्चाशदधिकशतकर्मप्रकृतीनां पिण्डाऽऽत्मकं यच्छरेरं तत्कार्मणशररं, एतत् कार्मणशरीरमात्मानमन्यवपुश्चतुष्कञ्चोत्पादयति, भवाद् भवान्तरं गच्छतो जीवस्य साहाय्य- ॐ ॥२०॥ G 卐 T 卐 A L A A 卐 卐 पह ) < y 卐 卐 > 卐 ८ T -- N A M A N 卐 卐 उत्पत्तिप्रथमसमये आहारग्रहणक्रियायां हेतुत्त्वमपि भजते ॥ शरपञ्चकमध्ये अंदारकशरारं शेषशुरेरचतुष्काऽक्षया 0 स्थूलपुद्गलद्रव्यैर्नेष्पन्नम् । वैक्रियशनरं ततः सूक्ष्मपुद्गलद्रव्य ष्पन्नम् । तत आहारकशरीरं सूक्ष्मतरपुद्गलद्रव्यस्सञ्जातं, ततेऽपि 卐 रैजसशरीरं सूक्ष्मतमपुद्गलद्रव्यैर्नेष्पद्यते, ततोऽपि कार्मणशररस्यावसूक्ष्मतमपुद्गलद्रव्यैर्निष्पत्तिश्च सिद्धान्रे सुख्याता अथ कस्मन् शरीरे कति परमाणवस्तचिन्त्यते-अंदारकशरीरमत्यल्पपरमाणु भर्नष्पन्नम् , वैक्रियं च ततोऽसंख्येयगुणपर- ॐ माणुपरिकलितम्, ततोऽप्याहारकशूररमसंख्यरणपरमाणुभिस्संजायते, ततोऽपि तैजसशरीरमनन्तगुणपरमाए भनष्पद्यते, 卐 A ततोऽप्यनन्तगुणपरमाण्वात्मकं कार्मणशरं च भवति ॥ अथैतेषां शरीराणां स्वामिनः प्रेच्यन्ते- ध अंदारकशरीरं एकेन्द्रियगतसूक्ष्म नेगेदादिसर्वतरश्चां नःशेषमनुष्याणाञ्च विद्यते, वैक्रियशरं सर्वदेवनारकाणां वैक्रय- - | लब्धिमतां गर्भजमनुजानां गर्भजतिरथां च वर्तते, कपाश्चद् बादरवायुकायिकानाम पे वैक्रियं शुरैरं भवति, आहारक- फूड शरं तु आहारकलब्धिभाजां चतुर्दशपूर्व विदां संयतानामेव नान्येषां वर्त्तते, आमुक्तेः सर्वे जवाः जसकार्मणशरीरभाज- A स्सर्वदैव लभ्यन्ते ॥ अथदारकादिशरेरप्रमाणं;-अदारिकशरीरं (प्रत्येकवनस्पतिशरीरापेक्षया) सहस्रयजनप्रमाणे- G क्रियं तु चतुरङ्गुलाधिकैकलक्षयोजनपरिमितं, आहारकशरीरमेकहस्तप्रमाणं, तैजसकार्मणे तु चर्तुदशरज्वात्मकल क- T प्रमाणे भवतः, एतच्चोत्कृष्टतो विज्ञेयं, जघन्यतस्तु अदारकमङ्गुलाऽसंख्येयभागप्रमाणं, वैक्रियमप अङ्गुलाऽसंख्येयभाग- ॐ परि मतं, उत्तरवैक्रियाऽक्षया त्वङ्गलसंख्येयभागो विडेयः, आहारकशरीरं बद्धरुष्टिकहस्तमितं, रैजसकाणे अङ्गलाऽ- १ अनेनेत्थं न ज्ञेयं यत् सर्वे जीवा मुक्तिगामिनः, ये भव्या मुक्तिगामिनस्तेषामामुक्तेः, अन्येषां तु सदैव इति । 卐 L A A 卐 H 卐 S N 卐 U जवतरते प्राणव्या- ख्यायां उच्छासः। ध A 期 संख्येयभागप्रमाणोच्चे भवतः। इत शरीरस्वरूपस्य दिङ्मात्रमिदम्, विस्तरस्तु प्रज्ञापना-तत्त्वार्थ-लोकप्रकाशादिभ्योऽ- श्रीनवतत्त- A वसेयः ॥ पूर्वोक्तपञ्चशरेरद्वारा जवस्य यो व्यापारः स कायबलनामाऽष्टमः प्राणः॥ सुमङ्गला. उच्छासनामकर्मोदयतः उच्छ्वासपर्याप्त्या पर्याप्तो जीवः काययोगेन उच्चासयोग्यपुद्गलद्रव्यानादाय उच्छासतया परिण- दीकायां । मव्याऽवलम्ब्य च मुञ्चति स उच्छ्वाससंज्ञको नवमः प्राणः । उच्छासनामकम्मे दयेन जव उच्छ्वासलब्धं प्राप्नोति, उच्छ्वास- ॥ २१॥ पर्याप्त्या तु उच्छ्वासयोग्यपुद्गलद्रव्यानादाय उच्चासत्त्वेन परिणमयितुं समर्थों भवति । सत्यामपि उच्छासलब्ध पर्याप्सिज- न्यसामर्थ्य वना परिणमनाऽऽलम्बनादिपु प्रवृत्तिर्न ह भवति । बाणप्रक्षेपविद्यायां नष्णातोऽपि धनुर्ग्रहणादिव्यापारमृते बाणप्र- 卐 क्षेपशक्तं न सफलां करोति, एवमत्रापि उच्छ्वासपर्याप्तिजन्यशक्तिमन्तरेण केवलयोच्छ्वासलब्ध्या कार्य न सिद्ध्यति । अयम्- T च्वासो वाह्याऽभ्यन्तरभेदभिन्नः, ये एकेन्द्रियद्वी न्द्रया विना घ्राणेन्द्रियमुच्चसन्ति निःश्वसन्ति स आभ्यन्तर उच्छ्वासः, ये च पिरोलिकादयसै न्द्रिया भ्रमरादयश्चतु रीन्द्रिया मडजप्रभृतिपञ्चेन्द्रियाश्च नासिकया उच्छसन्तो निःश्वसन्तो वा दृश्यन्ते तेपां य उच्छ्वासः स बाह्यः । अयच्छ्वासः पुद्गलविकारजः, अतिसूक्ष्मपरिणामवत्वान्नेन्द्रियप्रत्यक्षः परमवश्यं ज्ञानगोचरः॥ 卐 T येन प्राणविशेषेण प्रतिनियतभवे नियतकालपर्यन्तं यदवसानं तदायुः, अथवा परभवे एव वं प्रतत्य उदयमेत ब आयुः, एतदायुः पुद्गलद्रव्यनिचयात्मकं येन पुद्गलद्रव्यनिचयोदयेन उचो विते । एतच द्विधा द्रव्यायुः कालायुश्च, आयु:- V कर्मणो ये पुद्गलास्तद् द्रव्यायुः, तैलाभावे दीपो यथा न प्रकाशते तद्वदायुपः पुद्गलानामभाटे प्रतिनियतभवे के वितुं न शक्नोति । आयुःकर्मपुद्गलानां साहाय्येन नियतकालपर्यन्तं यावऊ वेन ऊ व्यते स जीवनकालः कालायुर्नाम्ना ग्रेच्यते, N A 卐 G 卐 L २१ A A ज N 卐 A ! S ॐ U ॥ ११ 卐 A 卐 T वक्ष्यमाणप्रकारेण द्रव्यायुपस्समाप्तिमन्तरेण कदाचदपि वो मरणं नावामोति, परं कालायुस्तु यद्यपवर्तीयं वद्यते तदा नेयतकालसमाप्तेः प्रागेव वो मरणमश्नुते, यद्यायुरनपर्वतर्न यं तर्हि नियतकालसमाप्त्यनन्तरमेव पञ्चवमानो अथाऽपवर्त्तन्याऽनपवर्त्तन्यायुषोः स्वरूपं लिख्यते तत्र पूर्वस्मिन् भवे जोवेन तथाविधाऽध्यवसायैरायुषः स्थितिर्विव- क्षितकालप्रमाणा एतादृश् शिथिला बद्धा येन शस्त्राद्युपघातप्रसङ्गे सति पूभववद्धाया आयुषः स्थितेः समापनात् प्रागेव मरणमश्नुते, तथाप्रकारकं यदायुस्तदपवर्तन यमुच्यते, तथा च मन्द्रं प्रवचनम् :-" अपवत्तणिजमेयं आउं अहवा असेस , कम्मपि । वंधसमए वि वद्धं सढिलं चय तं जहाजोगं" ॥१॥ तथा प्राग्भवे ज वेन तथा प्रकारैरध्यवसायैरायुः कर्मणः A स्थितिरेतादृर्श निविडा बद्धा येन शस्त्राद्युपघातप्रसङ्गेऽपि प्राग्जन्मोपात्ता स्थितिः समयमात्रेणाऽपि न्ना न भवति, एतादृग् । यदायुस्तदनपवर्त्तनीयम् । तथाचेक्तं;-"जं पुण गाढनिकायण बंधेण पुब्वमेव कल बद्धं । तं होइ अणपवतणजुग्गं कम्मवेयणि- N अफलं"॥१॥ इति पूर्वोक्तस्वरूपे अपवर्तन् याऽनपवर्तन ये आयुष्ट कालायुप एव भेद भवतः, न तु द्रव्यायुषः, यथा सुदीर्घ- मपि कालायुरपवर्तनयं सत् स्वल्पमपि भवति, एवं द्रव्यायुर्न भवत्येव, द्रव्यायुपः समाप्त्यननन्तरमेव जीवः पञ्चत्वं ग्रामोति । ननु आयुपः कर्मत्त्वात् तस्य च पुद्गलात्मकत्वादायुरपि पुद्गलस्वरूपम् , स्थतिरपि आयुःपुद्गलानामेव, तते. निखि- लानामायुःपुद्गलानां क्षयेऽपि विवक्षिता स्थितिर्न समाप्ता इत्येतत्कथं ? सत्यम् , उच्यते;-यथा प्रदीपस्य वर्तिकायां बृहत्यां A कृतायामन्तर्वर्तस्नेहस्य शंघेण क्षये जाते प्रदीपे निर्विण्णे सत्येवमुच्यते यदयं प्रदीपोऽल्पकालमेवाऽज्वलन, तद्वदायुष । निखिलपुद्गलानां वक्ष्यमाणोपक्रमैः शीघेण क्षये सति कालाऽयुपेऽपवर्तन यत्त्वादपूर्णकालेऽपि जन्तूनां मरणं दृष्टिगचरं भवति, 卐 卐 A G 卐 T - V L ध A A N नवतत्त्व- सुमङ्गला- टकायां- 卐 A 卐 V ॥२२॥ ॐ A 卐 T 卐 ॐ S यत आयुःपुद्गलद्रव्यसद्भावे एव जवो वतुं शक्नोति नान्यथा । अथवा शतहस्तपरिमिता दर्घा रज्जुरेकपर्यन्तादग्धा 卐 जवतो U सर्त क्रमशः अतिविलम्वेनाग्निना दह्यते, सा एव कुण्डलं कृता दग्धा सर्त तूर्णमेव भससाद् भवति, एवमायुःपुद्गलानां प्राणव्या- क्रमेण क्षये संजायमाने यावत् परिमितमायुः तावत् कालपर्यन्तं ओवेन जीव्यते, परं यदि प्रतिसमयं विशेषविशेषतरपुद्गलक्षय- M ख्याया लक्षणा उपक्रमप्रभवा परिपार्ट स्यात्तदा तु अन्तर्मुहूर्त्तमात्रेणापि कालेन निःशेपपुद्गलानां क्षये सति आयुपस्समाप्तिः ग्रं ॐ मायुः। संजायते ॥ शस्त्रा देवाह्यनि मत्तेन यस्यायुषः क्षयः स्यात् तत् सोपक्रममायुः, अथवाऽऽयुषः समाप्त्यनेहसि यत्र किञ्चिदपि A बाह्यं निमित्तं भवेत् तत् सोपक्रमसंज्ञकमायुः । यस्यायुषः समाप्तिकाले बाब निमिचं न कश्चिदपि प्रतिभाति, परमायुः- क्षय एव यत्र कारणं तन्निरुपक्रमाख्यमायुः । उक्तस्वरूपमनपवर्तन यमायुः सोपक्रमनिरुपक्रमभेदभिन्नम् । अपवनय सोपक्रममेव । आयुःक्षयहेतव उपक्रमा अध्यवसान-निमिच-आहार-वेदना-पराधात-स्पर्श-श्वासोच्छ्वासप्रकारैः सप्तविधाः, तथा चाहुः श्रीपूज्या:;-" अज्झवसाणनिमिचे आहारे व्यणा पराघाए । फासे आणापाणु सत्चविहं झिज्झए आऊ"॥१॥ सोपक्रममायुष्कं दनयार्चस्य मूच्छतो जन्तोः। बन्धप्रायोग्याभ्यां विगच्छति स्नेहरक्ष्याभ्याम् ॥१॥ निरुपक्रमं तु न तथा- ऽऽयुष्कं दृढसंहितं यदिष्टं तत् । नन्वग्न्याद्यैरनुपक्रम्यं कंकटुकमपरान्नम् ॥ २ ॥ आयुष्कस्याऽवयवा बन्धनमुक्ता जटन्ति ते । तस्मात् । आर्द्राद् वस्त्राद्यद्वत् प्रशोष्यमाणाजलावयवाः ॥३॥ प्राणाऽऽहार निरोधाऽध्यवसायनिमित्तवेदनाघाताः। स्पर्श- वायुभेंदे, सप्तैते हेतवः प्रोक्ताः॥ ४ ॥ 卐 नड आयुषः क्षये उपक्रमा हेतुत्व्न व्याख्याताः, एरध्यवसानाद्यैरुपक्रमैरायुः त्वरितं क्षयं यथा प्रामति, तथाऽऽयुपो । २२॥ y N A T A V 卐 A 卐 L A 卐 A U 卐 V M A A y T N JG 卐 वृद्ध हेतवो वर्तन्ते न वा ? अत्रोच्यते, यथे पक्रमाः खलु आयुषः क्षरे निमित्त भूता वर्त्तन्रे एवमायुषे वृद्ध उपाया न विद्यन्तै, गतजन्मनि यदायुर्यस्थितिपरि मतं बद्धं तत् समयमात्रेणाऽपि कालेनाऽनुत्तरर्यशालिनदीर्थकरा अपि वर्षयतुं 卐 न सामर्थ्यभाजः । यद्यप्युद्वर्त्तनाकरणेन यथा ज्ञानाऽऽवारकादिकर्मणां स्थितिरसयोवृद्धिः संजायरे एवमायुःकर्मणऽपि- स्थितिरसे वृद्धिमत भवतः परं सा वृद्धिर्बन्धं यावदेव प्रवर्त्तरे न परतः, तथा चोक्तं शवशर्मसूरिमतल्लिकाभिः कर्म- ज प्रकृत उद्वर्त्तनाकरणे ' आवन्धाउवट्टइ' ति ॥ ननु अपवन याऽनपवन यदलक्षणतारतम्येन आयुर्वध्यते तत्र के हेतुः ? उच्यते, आयुर्वन्धाऽवसरे यदि आयुर्वन्धप्राय ग्यास्तथाविधवाऽध्यवसाया भव्युस्तदा रैस्वाऽध्यवसायैर्हता आयुःकमपुद्गलाः केषुचिद् आत्मप्र- देशेषु अति पण्डिता भवन्ति, अतः स आयुःकर्म पिण्ड उपक्रमरभेद्योऽस्ति एतत्प्रकारकं यदायुस्तदनपवर्जन्यम् । आयुर्व- 卐 न्धकाले यदे मन्दाध्यवसायाः स्युस्तदा रैर्मन्दपरिणापात्ता आयुःकर्मपुद्गलास्सर्वाऽऽत्मप्रदेशेषु अतिविरलतया विभिन्ना भवन्ति, तस्मात् ते पुद्गला उपक्रमसाध्याः पण्डितत्त्वाऽभावात् एतदपवन्यमायुः । अयमर्थः श्री तत्त्वार्थवृत्त वस्तरेण 卐 अपश्चितः, जिज्ञासुभिः शेमुवद्भिस्ततऽवले कन्यः । पूर्वोक्तनिरुपक्रमानपवर्त्तन्य-सपेक्रमानपवर्त्तन्य-सपक्रमापवर्जन्य लक्षणेषु त्रप्रकारेष्वायुःषु के जवा कस्मन्नायुषि वर्तन्ते तच्चिन्त्यते-सर्वे देवाः सर्वे नारका असंख्टेयवर्षायुष्का युगलिकति- 卐 यमनुष्या बलदेवा वासुदेवाश्चक्रवर्त्तने गणधरास्त थंकराश्चरमशर रिणश्च निरुपक्रमाऽनपवर्त्तन्यप्रकारकायुभाजे भवन्ति, शेषाश्च प्रकारकायुष्मन्त भवन्ति, यदुक्तं;-" उत्तमचरमसररा सुरनेरइआ असंखनरतिरआ हुंति निरुवकमाओ दुहावि- a A G 3 T 卐 V 卐 A L A an . प 卐 S N जवतत्त्व- समाप्तिः॥ y 卐 श्रीनवतत्त्व- A सुमङ्गला- 卐 टकायां- 卐 ॥२३॥ A ज T 卐 A 卐 T A 卐 N सेसा मुणेयव्वा" ॥ १॥ के जीवाः कदाऽऽयुर्वन्धं कुर्वन्तति परिप्रश्ने उत्तरमाह;-नारका देवा असंख्यवर्पायुष्कतिर्यङ्- 卐 मनुष्याश्च विद्यमानायुषष्पण्मासाऽवशेपे पारभविकमायुर्वघ्नन्ति । निरुपक्रमायुष्मन्तः पृथ्व-अप्-तेजो-बायु-वनस्पतिकायिका 0 दीन्द्रियोन्द्रियचतुरिन्द्रियाः पञ्चेन्द्रियाश्च स्वायुपसिभागाऽवशेषे सति आगामिभवायुर्वन्धं विदधति । सोपक्रमायुष्कास्तु सर्वेऽपि निजनिजायुपस्त्रिभागाऽवशेपे नवमभागाऽवशेपे सप्तविंशतितमभागाऽवशेषे एकाशीतितमभागाऽवशेपे अन्तर्मुहर्चाऽवशेष वा पारम विकमायुर्वघ्नन्ति । उक्तञ्च-" बंधंति देवनारय-असंखनरतिरि छमाससेसा उ । परभविया उ सेसा निरुवक्कमत्ति- भागसेसा उ ॥ १ ॥ सोवकमाउया पुण सेसतिभागे अहव नवभागे । सत्तावीस इने वा अन्तमुहुत्तंतिमे वावि" ॥२॥ इत्यायुर्नामको दशमः प्राणो व्याख्यातः, एवञ्च " पणिदिय" ति गाथाऽपि व्याख्याता । इति वतत्त्वम् ।। व्याख्यातं जीवतत्त्वं, लेशतस्लुमन्दधिया मयका । तेनाऽस्तु भव्यसंघो ज्ञानात्मकजीवतत्त्वयुतः ॥ १॥ इति संविज्ञशाखीय-विद्ववृंदावतंस-कुमतध्वान्ततरण-मुनिचक्रचूडामणि-तपागच्छगगनदिनमणि 卐 मन्मुक्तिविजय अपरनाममूलचन्दजी गणिपादपद्मचंचरीक-सर्वज्ञशासनगभस्तिमाल-निरवद्य- चारत्रशाले-तपागच्छाचार्यपुरंदर-श्रीमद्विजयकमलसूरीश्वरपट्टोदयाद्रिसहस्रांशु-अमेयप्रभाब- प्रवचनप्रवीणचेतस्काऽनवद्यसंयमसेवाहेबाक-व्याख्याप्रज्ञाऽऽचार्यवर्यश्रीमद्विजयमोहनसूरीश्वर- वनेयरत्न-गीतार्थवर-पाठकवरोपाध्यायपदालङ्कृत्त-श्रीमत्प्रतापविजयगणिशिष्याणुप्रवर्तक- धर्मविजयविरचितायां नवतत्त्वप्रकरणस्य सुमनलाटीकायां जीवतत्त्वं समाप्तम् ॥ A V 卐 A ॥ २३ । ए 卐 N 院 S 卐 卐 U A 卐 卐 V 卐 ॐ॥ 卐 A A N अथ ऽजत्त्व ध 卐 T 卐 ज्ञानाऽऽवारककर्मसंक्षयजनुर्येषामनन्ताऽमलं, ज्ञानं दर्शनरोधकृद्ध्यपचयाऽवस्थेन सद्दर्शनम् 卐 A दुर्जय्यं दुरतं च मोहनृपतिं जित्त्वाऽऽपि यैरक्षयं, चारित्रश्च भवान्तकृच्छिववरं सिद्धास्सदा पान्तु वः ।। G 卐 पूर्वोक्तगाथासप्तलेन जीवतत्त्वं व्याख्याय “ यथेद्देशं निर्देश" इति न्यारेनाऽधुनाजवतत्त्वं व्याचिख्यासुराचार्य- 1 पुरन्दरः प्रथमं तावदर्जवतत्त्वस्य चतुर्दशभेदप्रतिपादिकामिमां गाथामाह;- ॐ धम्मऽधम्माऽऽगास, र रिर र तहेव अद्धर । -देस् पएस्, परम्णु अर्ज उदस्ह ६ ॥ व्याख्या-'धम्म इत्यादि धारयति गतिपरिणतान् वपुद्गलॉस्तत्स्वभाव इहै धर्मः। अस्तयः प्रदेशास्तेषां कायः 卐 A V L -- 卐 A A , el N S 卐 अवतो चतुर्दश दाः M A 卐 A 卐 नवतत्त्व- A सङ्घातोऽस्तिकायः, धर्मश्चासावस्तिकायो धाऽस्तिकायो, तद्विप तोऽधाऽस्तिकायः, आकाशाऽस्तिकायः प्रततः, एते सुमङ्गला- y त्रयोऽपि त्रित्रिभेदाः, यथा धर्माऽस्तिकायस्कंधः, धर्मास्तिकायदेशः, धर्माऽस्तिकायप्रदेशः, तत्र सकलदेशप्रदेशानुगतसमान- कायां v परिणामवद् द्रव्यं धर्माऽस्तिकायस्कंधः, तस्यैव बुद्धिकल्पितो देशो व्यादिप्रदेशात्मको भागो धर्मास्तकायदेशः, तस्यैव प्रदेशो ॥ २४॥ निर्विभागभागो धर्मास्तिकायप्रदेशः। अयं देशप्रदेशादिको विभागः कदाचन्नार्ततकालेऽभवत् , न च वर्तमानकालेऽपि वर- वर्त्तते, न चाऽऽगामिकाले वर्वत्यंति, केवलं शेष्यबुद्धिवैशद्यार्थमेव मतकल्पनापरिकल्पतो देशप्रदेशादिको वभागः समव- 卐 सेयः। एवमधर्माऽस्तकायाऽऽकाशाऽस्तकाययोरप ण ण दानि समवगन्तव्याने । तद्यथा-अधाऽस्तिकायस्कन्धः, T अधर्मास्तिकायदेशः, अधाऽस्तिकायप्रदेशः; आकाशाऽस्तिकायस्कंधः, आकाशाऽस्तिकायदेशः, आकाशाऽस्तिकाय- 卐 प्रदेश इति त्रयाणां नवदाः सजाताः। तथैव अद्धा कालः तस्य च अतीताऽनागतयोर्वेनष्टाऽत्पन्नत्त्वेनाऽसत्त्वाद् वर्त्त- मानसमयलक्षणमेकविधत्त्वमेव, न सन्ति तस्य प्रभेदाः॥ "पुग्गला चउहे" त्यादि वक्ष्यमाणमत्रापि सम्बध्यते, ततः पुद्गलानां 卐 चत्त्वारो भेदाः स्युः, तद्यथा-स्कंधो देशः प्रदेशः परमाणुश्च, तत्र व्यणुकादयः क्रमेण एकाणुकादिवृद्ध्या अनन्ताणुकाऽव- साना अनन्तसंख्याकाः स्कन्धाः, तेष्व्व स्कन्धेषु कल्पिता व्यणुकत्र्यणुकादयः कयन्तो भागा देशा उच्यन्ते, रेष्टेव स्कन्टेषु 卐 देशेषु वा कल्पतास्तेषां नर्वभागा भागाः प्रदेशाः कथ्यन्ते, परमाणवस्तु पुनः स्कन्धेषु देशेषु वा असंबद्धाः स्कंधादिका- रणरूपा अवसूक्ष्मा नर्वभागभागा ज्ञातव्याः । इत्येवं सर्व मलने वस्य चतुर्दशदा भवन्तीति गाथाक्षरार्थः॥ 卐 व्यासार्थस्त्वयम् :-अस्मिल्लेले पद्रव्याणि वर्तन्ते, ये केचन जगति पदार्था दृष्टिपथं समायान्ति केचित्तु चक्षुर्गोच- 卐 N A G T 卐 A V A 卐 L 卐 A २४ 卐 卐 N A ज M V 卐 A A 卐 रातीतत्त्वान्न चाक्षुषविषया भवन्ति ते सर्वेऽप पड्द्रव्यान्तर्गताः। तत्र द्रव्यपदकमध्ये स्थानात् स्थानान्तरं गमनरीला जेवas पुद्गलाः, इतरे नियतस्थानशालिनः, तत्र जीवो यावत्कालं संसारे पर्यटति तावत्पर्यन्तं स्वकीयभवे अंदारकवैक्रियादि- शरीरालम्बनेन भवाद्भवान्तरं गच्छन् कार्मणशर राऽऽलम्बनेन च गमन क्रियां कुरुते, यदा निर्मलध्यानाऽग्निदग्धकर्मे- न्धनो भवति वस्तदा तु खस्वभावादेव स्वाऽवगाढाऽऽकाशप्रदेशेभ्यः प्रदेशान्तरमस्पृशन् पूर्वप्रयोगाद-सङ्गत्वाद्-बन्ध- 卐 च्छेदा-त्तथागतिपरिणामाच सिद्धिस्थानं गच्छति ॥ पुद्गला अप स्वस्वभावतया जीवस्य प्रेरणया वा गमनक्रियामाजस्सन्ति, एवमनया नेत्या जीवपुद्गलानां गतिः प्रवर्तते, परं तस्यां गमनक्रियायामन्यद्रव्यस्याऽपेक्षाऽऽवश्यकी, यव्यसाहाय्टेन 卐 गतिपरिणामवतां वपुद्गलानां गमनक्रिया भवति तद् धर्माऽस्तिकायनामकं द्रव्यम् । उड्डयनसामर्थ्यभार विहंग उड्डयन- शक्तिसद्भावेऽपि वायुना वना न विहायसा गन्तुं शक्नोते, तरणक्रियासाम संपन्नोऽ िमत्स्यो जलं विना न तरणक्रिया- 卐 कुशलतां भजति, आकर्णदीर्घाऽऽयतलोचनेनापि पुंसा प्रकाशमन्तरेण घटपटादेपदार्था न दृश्यन्ते, एवमेव गमनशक्ति- मन्तोऽपि वपुद्गला धाऽस्तिकायं विरहय्य स्थानात्स्थानान्तरं गन्तुं न सामर्थ्यभाजो भवन्ति अस्य धाऽस्तिकायस्य 卐 निम्भिाज्यभागरूपाऽसंख्येयाः प्रदेशाः सर्वे च रे शृङ्खलावयवा इव परस्परं सम्बद्धा वर्तन्ते, अनेन धस्तिकायसंज्ञक- द्रव्येण चतुर्दशरज्जुपरिमितः समस्तलोक व्याप्तः, अतस्तस्य संस्थानमपि लोकसंस्थानवत् कटिन्यस्तहस्तपादप्रसारित- 卐 पुरुषवद्वा शाखसंस्थानं वद्यते ॥ इह लेने ऐतव्यम्कमेवाऽमूर्तञ्च, भाषेच्छासमनःप्रभृतिप्राय ग्यपुद्गलद्रव्यादानं धमस्तिकायं विना गमनक्रियाऽसम्भवे न संजाघर्ट त, तसाङवस्य गमनाऽऽगमनादिचेष्टासु भाषाप्रभृतयोग्यपुद्गल- 卐 N T 卐 G 卐 A A T L V 卐 A ५ A प ट S नवतत्त्व- 卐zy卐> सुमङ्गला- टीकायां- काय- ॥२५॥ A A T N 卐 द्रव्यग्रहणात्मकचलनक्रियासु च धमस्तिकाय उपकारकत्वेन व्यवस्थितः, उक्तञ्च लोकप्रकाशेः-"जीवानामेव चेष्टासु गमना अवतत्त्वे U गमनादिषु । भाषामनोवचःकाययोगादिष्वेति हेतुताम् " ॥१॥ धम्मास्ति- ध जवपुद्गलानां स्थिरीकरणे यदुपकारिद्रव्यं तदधाऽस्तिकायसंझं, गतिसाहाय्यकधाऽस्तिकायगुणापेक्षया विपरीतः स्थितिसाहाय्यकरणः स अधर्मः, तस्य अस्तिकायः प्रदेशसमूहः सोऽधर्मास्तिकायः ॥ गतिपरिणामपरिणता वपुद्गला y निरूपणम् यथा धर्माऽस्तिकायाऽऽख्योपकारिद्रव्यसाहाय्येन गमनक्रियाकुशलास्संञ्जायन्ते तद्वत् स्थितिपरिणामपरिणतानां जयपुद्ग- लानां स्थतिरधस्तिकायसंज्ञकोपकारिद्रव्यसाचव्याद्भवत त्यर्थः। मार्गजन्यपरिश्रमपरिश्रान्तः पथिकः परिश्रमनिवा- 卐 रणार्थं पृथिर्व रुहः छायां दृष्ट्वा यथा स्थितिं कुरुते, उड्डीयमानस्य विहङ्गमस्य भूर्वृक्षो गिरि शेखरं च स्थित निमित्ततया । यथा भवति, एवं स्थितिप रेणामपरिणतानां जवानां स्थितावधाऽस्तिकायः कारणत्त्वेन समाख्यातः, यद्यस्मिल्लोके अध- 卐 मास्तिकायस्याऽभावस्स्यात् तदा विपुद्गलानां गमनमेव प्रवर्तेत । उक्तञ्च लोकप्रकाशे-" अयं निपदनस्थान-शय- नाऽऽलम्बनादिपु । प्रयाति हेतुतां चित्तस्थैर्यादि स्थरतासु च"॥१॥ अत्र प्रेरकचोदयति;-ननु धाऽस्तिकायाऽधाऽस्ति- 卐ा कायाऽऽकाशाऽस्तिकायकालसंज्ञकानि चत्वारि द्रव्याण्य पे स्थिराण्येव, तत्रापि स्थित्युपकारिणाऽधाऽस्तिकायेन भवि- तव्यम् , ततो विपुद्गलानामेवाऽधाऽस्तकायः स्थितिहेतुरिति कमर्थमुच्यते ? अत्रोच्यते-धाऽस्तिकायादि द्रव्यचतुष्कं }y त्वनादिकालतः स्वस्वभावादेव स्थितिपरिणामेन स्थितं, तस्य धादिद्रव्यचतुष्कस्य न कदाचनाऽपि गतिपरिणामः संभवति । गतिपरिणामाऽभावे गमन निवृत्तिलक्षणस्थितिपरिणामस्य कुतः कल्पना ? यतोऽधाऽस्तिकायः स्थितावुप- ॥ २५॥ 卐 A G 卐 T 卐 L 卐 A 卐 S y N 卐 A 卐 U ज 卐 V 卐 卐 A . हकस्स्यात् । यानि द्रव्याणि स्वस्वभावतयैवाऽनादिकालतः स्थितिपरिणामपरिणतानि तत्र स्थितावन्यद्रव्यस्यापेक्षा न वर्त्तते । यान गमनस्थितिरूपोभयपरिणामवन्ति तानि द्रव्याणि गमनस्थितिकर्मणि सापेक्षा ति । एत द्वावपि धर्माऽस्ति- कायाऽधर्मास्तिकाय चतुर्दशरज्जुप्रमाणपरि रेमित समसंस्थान समसंख्याकप्रदेश गमनसाहाय्यकस्थितिसाहाव्यकलक्षण मध्येदुग्धं शर्करावदन्योऽन्यप्रविष्ट च वर्तेते ॥२॥ धाऽस्तिकायादिद्रव्याणामवगाहप्रदायकमाधारभूतं यद्र्व्यं तदाकाशाऽस्तिकायसंज्ञकं प्रोच्यते, अस्मिन्नाकाशाऽ- स्तिकायाऽऽद्वे द्रव्ये निखिलान द्रव्यान्तराण्यवगाहमादायाऽऽधाराऽऽध्यतया स्थितानि, आकाशास्तिकायाख्यं द्रव्यमा- धारत्वेन स्थितं, आकाशद्रव्यव्यतिरिक्तानि पञ्चद्रव्याण्याधेयतया व्यवस्थितान्त्यर्थः। यद्याऽऽकाशाऽस्तिकायस्थाऽभावो भवेत्तदा स्थानाऽभावे धाऽस्तिकायादिद्रव्याणां कुत्र स्थिीतः स्यात् ? तसात् सर्वत्र सकलद्रव्याणामवगाहदानलक्षण आकाशाऽस्तकायोऽप्यस्त्येवेत निश्चप्रचम् , अनुभवसिद्धञ्चैतद्, अदृश्यमानाऽऽकाशे काष्ठस्त कलकानां शतं सहस्त्रं वा मात त्यत्र सर्वत्र आकाशस्य सद्भाव एवजम् । यथा धर्माऽधम्मौ असंख्यप्रदेशात्मक लोकाकाशं व्याप्य व्यवस्थित वैशाख- संस्थान तथाऽयमाकाशास्तिकायऽप्यनन्तप्रदेशात्मकोऽनन्तयोजनप्रमाणाऽपारक्षेत्रं व्याप्य व्यवस्थितो लोहगलकसंस्थानः अयमाकाशो लोकाऽऽकाशाऽलोकाऽऽकाशाभ्यां द्विधा विभक्तः, तत्र यावत्परिमिते आकाशे धर्माऽधम्म जीवपुद्गलाश्च वर्त्तन्ते तावत्प्रमाणश्चतुर्दशरज्जुमानो लोकाकाशोऽलोकाऽऽकाशाऽप्क्षयाऽनन्तगुणहनः, अन्यः सर्वोऽप्यलोकाऽऽकाशो धमादद्रव्यैर्वप्रमुक्तो लोकाकाशाऽपेक्षयाऽनन्तगुणाधिकः । लोकाकाशस्य संस्थानञ्च धर्माऽधर्मद्रव्यसंस्थानवद् वैशाख- N T ज G 卐 A 卐 A T 卐 L 卐 卐 ॐ A ज N थत्तीवतवे S 卐 अजीवतत्त्वे ध कालद्रव्य- M निरूपणम्। 卐 A 卐 N T Hap A संस्थान विज्ञेयम् ॥ प्रार-प्रती-कवेर त्यादयो दशोऽपि आकाशाऽस्तिकायस्य विभागाऽऽत्मिकाः, परं नतु नैयायिका सुमङ्गला- ड यथा दङनामकं कल्पनाकल्पितं नूतनद्रव्यं मन्यन्ते तद्वद् द्रव्यान्तरम् । आकाश वभागेनैव दै शकपरत्त्वाऽपरत्त्वादिव्यवहारः काय- v सञ्जायते, यतो लक्षयोजनप्रमाणोच्चे मेरुगर अधस्तादाराभ्य सहस्रयोजनोपर सुमध्यभागे गोस्तनाऽऽकारा उपर्यधोव्यव- स्थताश्चत्त्वारश्चत्वारः संसलता अप्टै रुचकप्रदेशाः, तत्रतः प्रत्येकं दक्षु क्रमशो द्वाभ्यां द्वाभ्यां प्रदेशाभ्यां वृद्धिमती ॥२६॥ A प्रत्येकं देनर्गच्छते, चतस्रो विदेशोऽपि त्रुटितमुक्ताहारखदेकैकाऽऽकाशप्रदेशाऽऽत्मिकास्तत एव निर्गच्छन्ति । स्थापना;- वि-दिशा--वि ॥ धर्माऽस्तिकायाऽधर्मास्तिकाययोर्यथा प्रज्ञापरिकल्पताः स्कंधदेशप्रदेशात्मका विभागाः प्रोक्तास्तथा- ऽऽकाशाऽस्तिकायस्याऽपि त एव विभागाः स्कंधदेशप्रदेशस्वरूपा बोद्धव्याः॥३॥ 卐 अथ कालार्थवाचको गाथास्थोद्धाशब्दो व्याख्यायते । अद्धा-कालः-अनेहाः-समय इति पर्यायाः। 卐 वि-दिशा-वि कालो निश्चयव्यवहारभेदाभ्यां द्विविधः, तत्र वर्त्तनादिपर्यायस्वरूपो नैश्चयिकः, ज्योतिष्चक्रस्य भ्रमणजन्यो यः समयाऽऽव लकामुहूर्तादलक्षणः कालः स च व्यावहारिकः । वस्तुतस्त्वयं कालो न परमाणुसमुदा- याऽऽत्मकः, लन्तु सर्वद्रव्येषु वर्तनादिपर्यायाणां सर्वदा सद्भावादुपचारेण काले द्रव्यत्त्वेनच्यते, कालस्य द्रव्यत्त्वसम्बन्धि- व्याख्यानं ग्रन्थान्तरेषु विस्तरेण प्रपञ्चितं, ग्रन्थगैरव भिया दङ्मात्रमत्र प्रदर्श्यते । तद्यथा-वर्तना-क्रिया-परिणाम-परत्वाऽ- 卐 परवलक्षणो नैश्चयिककालः, तत्र सा देसान्तसाधनन्ताऽनादेसान्ताऽनायनन्तदभिन्तेषु चतुःप्रकारेष्वेकेनापि केनचित् ००००००/- OBOOOOO b००3003००८ ०००००० ००००० ०००००० ००००००४ A G T 卐. V A - A L ॥ २६॥ 卐 -- Xx N in U 卐 M V T 卐 प्रकारेण द्रव्याणां वर्त्तनं वर्तना, इयं वर्त्तना प्रतिसमयं परिवर्तनात्मका, अतो विवक्षितैकवर्तना द्वसमयं यावदप स्थिते पड न कुरुते, अतो या वर्तनायाः परावृत्तिः सा पर्यायत्त्वेनाऽभिधीयत इति वर्त्तनापर्यायः, उक्तञ्च;-" द्रव्याणां सा देसान्ताद- दैः स्थत्यां चतुर्भिद । यलेन चित्प्रकारेण वर्त्तनं वर्त्तना है सा ॥ १॥ प्रयोगपरिणामविश्रसापरिणामाभ्यां जायमाना 卐 न नत्त्व-प्राचीनत्त्वलक्षणा या परिणतः स परिणामः कथ्यते । कञ्चदपि द्रव्यं न सर्वदैव नूतनं जणं वा भवितुमर्हति । A वस्तुपु या नूतनवडणवधर्मयोः परावृत्तिः स पर्यायः, अत्र नूतनशब्दान्मलादिरहित पशब्दान्मलतः पदार्थों ys न ग्राह्यः, किन्तु अभिनवपयायोपेतं तन्नवं, पुराणपर्यायस हतं तङर्णद्रव्यमुच्यते । कालले नेऽप्युक्तम् -" द्रव्याणां या परिणतिः प्रयोगविस्रसादिजा । नवत्त्व र्णताया च परिणामः स-कीर्तितः" ॥१॥ अथवा द्रव्यस्य द्रव्यगुणस्य च ध यः स्वभावः स परिणामः, तचक्तं तत्त्वार्थभाष्ट" धर्मादीनां द्रव्याणां यथेक्तानां च गुणानां स्वभावः स्वतत्त्वं पर- A णामः, अयं परिणामः सादिपरिणामाऽनादिपरिणामभेदाभ्यां द्विधा विभक्तः, तत्र धाऽस्तिकायाऽधाऽस्तिकायाऽऽका- 卐 शास्तिकायज्वाश्चेति चत्वारि द्रव्याण्यमूर्तान्यनादिपरिणामभाजि, यतस्तेषां पूर्वोक्तानां चतुर्णा द्रव्याणां गतिसाहाय्यकत्व- T स्थितिसाहाय्यकत्त्वाऽवगाहदायकत्त्वचेतनावत्वादिगुणास्पु तेषु द्रव्येषु न कदाचिदमुकस्मिन् काले समुत्पन्नाः, किन्त्व- ' नादकालात् सजाता अनन्तकालं यावच्च स्थास्यन्ति, इत्यतस्तान द्रव्याणि अनाद्यनन्तपरिणामभाञ्ज कथितानि । पुद्गलv द्रव्यं ड सादपरिणामभाक्, यतः पुद्गलस्य स्पर्शपरिणामा रसपरिणामा वर्णपरिणामादयस्सर्वेऽपि न नैरन्तर्येण तिष्ठन्ति परंतु परावृत्ति भजन्ते, अतो यदा शुक्लवर्णस्य लवर्णतया परावर्त्तनं जातं तदा तस्य लवर्णस्यादिः, शुक्लवर्णस्य चान्तः, 卐 N 卐 G 卐 A 卐>卐र ज L 卐 A ध EU N 卐y (- 卐 A नवतत्त्व- सुमङ्गला- र्टकायां- अजवतत्वे ॐ कालद्रव्य- M नरूपणम् 卐 V ॥ २७॥ A HA + 卐 T 贸 A इत्येवं सादिसान्तपरिणामवन्ति पुद्गलद्रव्याणि । ननु यथा पुद्गल स्थितानां वर्णादीनां परावृत्तिधर्मयुक्तत्वात् पुद्गलद्रव्यं साद परिणामोपेतं व्याख्यातं, एवं जीवस्य लक्षणत्वेन व्याख्यातानासुपयोगानामपि परावृत्तिस्सिद्धान्ते समाख्याता, तर्ह कथं जीवद्रव्यमनादिपरिणामवत् ?, सत्यं, उपयोगानां परावर्तनमस्माभिरप्यवश्यमाद्रियते, उपयोगस्वभावाऽपेक्षया व- द्रव्यं सादिपरणामभाग्, न तत्र काऽप्यारेका, पूर्व यजीवद्रव्यमनादिपरिणामोपेतत्वेन व्याख्यातं तत्तु चेतनापेक्षयैव सम- भहतं, न चेतनायाः परावृत्तिः केपाश्चिदरोष्टेति, यच चैतन्ये व्यक्ताऽव्यक्तत्वं न्यूनाधिकत्त्वञ्च दृश्यते तदपि कर्मावरण- परतन्त्रम् , सत्ताऽपेक्षया तु सूक्ष्म निगोदादारभ्य पञ्चेन्द्रियं यावत् सर्वे जीवा समानाऽनन्तचैतन्यभाज इत्यलमतिचर्चया चर्चा भलापुस्तु प्रज्ञावद्भः श्रीमदर्हत्प्रवचनसंग्रहात् तत्त्वार्थाधिगमसूत्रात् तत्तदन्वेषणीयं, असाकं प्रयासस्त्वस्मादृशां मन्दमे- धाविनामवबधायेति ॥ अतकाले सजाता अनागतकाले भविष्यन्त्यो वर्तमानकाले भवन्त्यश्च या या द्रव्याणां चेष्टाः स स क्रियापर्याय इति लोकप्रकाशाऽनुसारेण, तत्त्वार्थाऽसारेण तु क्रियाशब्देन गतिर्व्याख्याता सा च गतिस्त्रविधा, प्रयोगगतिः विश्रसागतिः मिश्रा च, तत्र परप्रयोगजन्या प्रयोगगतिः, स्वस्वभावत्वेन सजाता विश्रसागतिः, उभयाभ्यां समु- त्पन्ना च मेश्रागतिः, अत्र गतशब्देन स्वस्वप्रवृत गमन मत्यर्थतया पूर्वोक्तार्थेन सहाऽविरोधः ।। यरयाऽऽश्रयेण द्रव्येषु पूर्वभावित्त्वपश्चाद्भावित्वयोर्व्यपदेशः स परत्वाऽपरत्वपर्यायः, स च त्रिधा-प्रशंसाकृत-क्षेत्रकृत- कालकृतभेदैश्च, तत्र ज्ञानं धर्मथ परः, अज्ञानमधर्मश्चाऽपर इत्यात्मको व्यपदेशः स प्रशंसाकृतः । एकस्यां दिशिस्थितयोः पदार्थयोर्यः पदार्थो दूरवर्ती स परः,समीपवर्ती सोऽपर इति लक्षणो व्यपदेशः रा क्षेत्रकृतः,चतुर्वापिंकवालाऽपेक्षया पञ्चवा पिंको बालः ॥ N F 卐 G 卐 卐 T A V 卐 A L ध A ॥२७॥ ne S 卐 N ॥ A 卐 V A परः, पञ्चवार्षिकाऽपेक्षया चतुर्वार्षिकश्चाऽपर इत्यात्मको व्यपदेशः कालकृतः, इति त्रिभिः प्रकारैः परत्वाऽपरत्त्वपर्याय सुवि- ज्ञेय ॥ इत्येवं वर्तनादिपर्यायाः कालस्योपकारकत्त्वेन समाख्याताः, यदवादिपत प्रढविज्ञानविभासनभास्कराः अमदुमा- स्वातिसूरयः " वर्त्तना परिणामः क्रियापरत्त्वाऽपरत्त्वे च कालस्य ( तत्त्वा० अ-५-सू-२२) परवाऽपरत्त्वपर्यायेषु प्रशं- साकृत-क्षेत्रकृत-कालकृतलक्षणेषु प्रशंसाकृत-क्षेत्रकृते परत्त्वाऽपरत्वे वर्जयित्वा कालकृतं परत्त्वाऽपरत्वमेवाच कालस्योपका- 卐 रकं विज्ञेयम् । तथा चाहुः-"तदेवं प्रशंसाकृतक्षेत्रकृते परत्त्वाऽपरत्वे वर्जयित्वा वर्तनादीन कालकृतानि कालस्योपकारः ( तत्त्वा० भा० अ-५-सू-२२)। अथवा ऋजुसूत्रनयाऽपेक्षयाऽतीतस्य विनष्टत्त्वेनाऽनागतस्य चाऽनुत्पन्नत्वेन वर्तमानक- 卐 समयाऽऽत्मको नैश्चयिकः कालः, यदुक्तम्-“वर्तमानः पुनर्वर्तमानैकसमयात्मकः। अस नैश्चयिकः सोऽप्यन्यस्तु व्यावहा- रिकः" ॥१॥ इति नैश्चयककालस्वरूपम् ॥व्यवहारकालस्तु 'समयावल मुहुत्ता' इति वक्ष्यमाणगाथया विस्तरेणाग्रे व्याख्यास्यते।। अथ स्कंधदेशप्रदेशादिशब्दानां व्याख्या चैतन्यते;-तत्र स्कन्दन्ते-शुष्यन्ति पुद्गलविचटनेन, यन्ते-पुष्यन्ति । पुद्गलचटनेनेति स्कन्धाः, अनया व्याख्यया एव प्राक्तनमह पंभिः धर्माऽस्तिकाया देशाश्वतद्रव्येषु स्कन्धदेशप्रदेशादिव्य- 卐 वहारो नोरर कृतः, तेषु पुद्गलविचटनचटनयोरभावत्वात् केचन विद्वांसस्तु 'कस्यचिदपि द्रव्यस्याऽनेकपरमाणुसमुदाया- ऽऽत्मको योऽखण्डो विभागः स स्कन्ध' इति मन्यन्ते, अनेन व्याख्यानेन धाऽस्तिकायादिष्वपि स्कंध-देश-प्रभृतिव्यवहार-. 卐 प्रवृत्तिर्दर दृश्यते, यथा चतुर्दशरज्जुप्रमाणो वज्राकारे यो धाऽस्तिकायः स धर्मास्तिकायस्कन्धः, एवं चतुर्दशरज्जु- परिमितो वज्राकारको योऽधाऽस्तिकायः सोऽधम्माऽस्तिकायस्कन्धः, अनन्तयोजनप्रमाणोप्तो धनगलकाकारो य आका- 卐 N 卐 T 卐 G A 卐 T L 卐 V A 卐 A 卐 N S U A N 卐 श्रीनवतत्व- A शाऽस्तिकायः स आकाशाऽस्तिकायस्कन्धः, जघन्येनाऽङ्गुलाऽसंख्येयभागप्रमाण उत्कृप्टेन चतुर्दशरज्जुप्रमाणोऽसंख्येयप्रदे- अवतत्व सुमङ्गला गात्मको यो जोवः स वस्कन्धः (अजवतत्त्वव्याख्याप्रसङ्गे नास्ति वस्कन्धव्याख्यानप्रयोजनं तथापि प्रसङ्गत उक्तम्) स्कंधदेश- र्टकायां- v द्विप्रदेशात्मक स्त्रप्रदेशात्मकस्संख्यप्रदेशात्मकोऽसंख्येयप्रदेशाऽऽत्मको यावदनन्तप्रदेशाऽऽत्मको यः पुद्गलविभागः स पुद्ग प्रदेशादि- 3 लाऽस्तकायस्कन्धः । पुनरेषु पुद्गलस्कन्धेषु विवक्षिकस्कन्धस्य द्व विभाग यदा विहेत तदा द्वावपि स्कन्धे व्यपदि- निरूपण । २८॥ A श्येते, यथा कश्चित् काष्ठस्तम्भः द्विधाविभक्तस्तदा द्वयोरपि विभागयोः स्कंधसंज्ञा, पुनस्तयोरेव द्वयोर्विभागयोर्यदि चत्वारो 9 भागा वहताश्चेत्तदा चतुर्णामपे स्कन्धसंज्ञा सञ्जायते, यतः पुद्गलद्रव्येषु स्कंधदेशयोर्व्यपदेश आपेक्षिक स्तः, न तथा ) T धर्माऽधर्माऽऽकाशद्रव्येषु, यते तेषु देशकल्पना लेवलं वुद्धिज'या, न कदाचिदपि प्रज्ञापरिकल्पितो देशः स्कंधात् पृथग्- ॐ भूत्वा स्वयं स्कंधसंज्ञां भुनक्तीति ॥ 卐 स्कंधाऽपेक्षया तस्यैव स्कंधस्य यो न्यूनो न्यूनतमो वा विभागस्स देशः, देशः खण्डो विभाग इत्येकार्थाः, यथाऽक्षतान्म- G फ्र क्तिका विभिन्नो यो वभागः सोऽखण्डमुक्ताफलाऽपेक्षया देश उच्यते, पुनर्यदा महत्या श्शलायाः खण्डः शिलापेक्षया देश 卐 T उच्यते, एवमेकसात् प्रतिविशिष्टात् स्कंधाद् भेदेन सञ्जातः से प्रतिबद्धदेशः, पुनः स्कंधादभिन्नः तस्मिन्नेव स्कन्धे लेवलं 5 प्रज्ञापरिकल्पतो यो वभागविशेषः स प्रतिबद्धदेशोऽभिध्यते । अयं वभागात्मको देश एकप्रदेशन्यूनाऽनन्तप्रदेशात्मकाद्) 卐 १. सूक्ष्मवादरभेदभिन्नपृथिवीकायिकादेरपेक्षयेदं ज्ञेयम् । २. केवलिसमुद्घाताऽपेक्षयेदम् ॥ 卐 ॥ २८ । A V L A an UE S 'N 卐 卐 A विभागादारभ्य द्विप्रदेशात्मक विभाग यावद्भवति, यथाऽनन्तप्रदेशात्मने स्कन्टे एकप्रदेशोनलक्षण ये विभागः स देशः, U द्वप्रदेशोनोऽपि देशः, त्रिभिः प्रदेशैनः सोऽप देशः, एवं तावद्वक्तव्यं यावजघन्य विभागात्मको द्वप्रदेशलक्षणो देश ॐ भवते । धाऽस्तिकायो यद्यप्यखण्डस्कन्धः, तथाऽप्यखण्डाऽऽकाशस्य यथा घटाकाशः पटाकाशो मठाकाश इत्यादि भेदाः M घटायुपाधिवशतः सञ्जायन्ते, तद्वद्धाऽस्तिकायस्याऽपि कल्पनापरिक ल्पता देशप्रदेशप्रभृतयो भागा उपजायन्ते, एवमध- A ऽस्तिकायेऽप्यूह्यम् ॥ स्कंधलग्नो परमाणुः स प्रदेशः, प्रकर्षतया देशः प्रदेश इत्यर्थः, नान्यो प्रदेशान्यून विभाग केवलिभgs रपे दृष्टः, तत्राऽनादिकालतो धाऽस्तकायस्याऽसंख्येयाऽणव एकत्र पिण्डताः सम्भूय तिष्ठन्त, अतस्तस्याऽणवः प्रदेशा y T उच्यन्ते, एवमेवाऽधाऽऽकाशवद्रव्याणामपे प्रदेशा ज्ञातव्याः, तथा द्विप्रदेशस्कंधादारभ्याऽनन्तप्रदेशस्कंधं यावर् N ॐ सर्वेष्वपि स्कंटेषु रेऽणवः सन्ति ते सर्वे प्रदेशनाम्ना उच्यन्ते स्कंधादप्रतिवद्धः पृथग्-भन्नो योऽपुः स परमाणुः, परम ॥ उत्कृष्टोऽणुः स परमाणुः, ववक्षितस्य यस्य परमाणे रथ पुनर्भागो न भवितुमर्ह त। प्रदेशपरमाण्योमध्येऽयमेव वशेषः, प्रदेशः व ड स्कंधाद भन्नस्तव स्कंधे प्रतिबद्धः, परमाणुस्तु स्कंधाद् भन्नः स्कंटे प्रतिबद्धः, क्षेत्रं तु द्वयोर तुल्यं, यावत्परिमिते क्षेत्रे 卐 प्रदेशेन स्थयते तावत्परिमिरे क्षेत्रे परमापुरपे तष्ठति ॥ धमऽधाऽऽकाशाऽस्तकायानां वस्य च यथा स्कंध-देश- A 卐 प्रदेशात्मका भेदाः प्रज्ञया परिकल्पितास्तथा परमाणुनामक दो न परिकल्प्यते, यतः परमाणुस्तु स उच्यते यः स्कंधाद्व- 卐 v भिन्नः, नह उक्तस्वरूपेभ्यो धर्माऽधादिभ्योऽणुः पृथग् भवति, अतः परमाण्वाऽऽख्यः प्रदो न जायते तेषाम् मुद्गल- न द्रव्यं तु वस्तुतः परमाण्यात्मकमेव, स्कंध-देश-प्रदेशास्तु तस्य परमाणे रेव विकाराः । द्रव्यषङ्कमध्ये वपुद्गलद्रव्ये विभा- 卐 A 卐 A 11 卐 S A T NE वखभाववर , तत्र देवत्व-मडजत्त्व-नरकत्वादये जीवस्य वभावाः, स्कन्धदेशादयः पुगलस्य च, तसात्तत्त्वतः परमाणुस्वरूप- नवतत्त्व- मेव पुदलद्रव्यम् , स्कंधादयस्तूपचारतः पुद्गलाऽभिधानाः। नर परमाणुप्रदेशयोर्यदाक्षेत्रं समं तदा द्वयरेकमेव नाम रक्षितव्यम्? क कमर्थं नामाऽन्तरम् ? उच्यते-प्रदेशपरमाणू तुल्यक्षेत्रण, परं स्कंधदेशाभ्यां भन्नः स परमाणुः, ताभ्याम भन्नः स प्रदेश इत कायां- भिन्नाऽ भन्नपेक्षया नामाऽन्तरम् । यथा काचित् पटगृहे तिष्ठर सरी कन्यासंज्ञया व्यपदिश्यते, सैव श्वसुरगृहे सते ॥ २९॥ 卐 वधूनाम्ना प्रचख्यते, वसादृश्रेऽपि स्थानभेदार संज्ञाम्दो दृश्यते एवमत्राऽप्यवरेयम् । अयं परमाणुः क्ष्णशरूण न छिद्यते, जातवेदसा न दह्यते, अम्भसा न क्लद्यते,केनचित् पुद्गलान्तरेण न प्रतिहन्यते च। यद्यपि पर्वतजलाऽग्निपु परमाणघा- ताऽभावात् परमाणुरप्रतिहतगतिरुच्यते, तथापि त्रधा प्रतिधात् भवति,तत्र विमात्र स्निग्धरूक्षत्त्वेन परमाणोरन्यपरमाणुना सह सम्बन्धाद् बन्धनपरिणामप्रतिघाट भवति, अलोके धाऽस्तिकायस्याऽभावत्वेन गमनक्रयायामुपकारकाऽसम्भवात् परमाणु- 卐 लॊकान्ते प्रतिहन्यते, स उपकाराऽभावप्रतिघारे उच्यते, तथा विस्रसापरिणामपरिणतः कश्चत् परमापुरत्यन्तघ्रगत्या- गच्छन् तादृग्वेगवता आगच्छता केनचिदन्यतरपरमाणुना प्रतिस्खल्यते, स वेगप्रतिघातत्वेन प्रेच्यते, एवं ववक्षिक स्मन् परमाणे प्रतिघातित्त्वा प्रतिधातित्त्वे वर्तेते, परं स्लदृष्टया परमाणुरप्रतिघातत्त्वेनैवोच्यते ॥ अयं परमाणुरेकाकाशप्रदेशाऽवगार्ह अस्ति, पूर्वोक्तस्वरूपाः परमाणवः संख्याता असंख्याता अनन्ता वा सूक्ष्मपरिणामप- जो रिणता एकत्र सम्मलेतास्सन्ति तदा चर्मचक्षुपामगोचरा भवन्ति, अचित्तमहास्कन्धादिवत् , यदा ते एव अनन्ताः सन्त एकत्र सम्भय बादरपरिणामस्कन्धत्त्वेन संभवन्ति तदा केचन स्कंधा दृष्टिपथं समायान्त, एप सूक्ष्मपरणामो बादरपरिणामो 卐 U अजीवतर 卐 परमाए- M स्वरूपर 卐 A 卐 N ध G प A 卐 L A T V ॐ ॥२९॥ A 卐 पद 卐 S N 卐 A 卐 M A T वा न परमाणुषु गुणतयाऽवतष्ठति, परं यदा परमाणूनां स्कंधो भवति तदा एकतरः परिणामः स्वयमुपजायत इति परमाणु- स्वरूपं लेशतो प्रदर्शतम् , दिङमात्रमेतत् , विशेषमधिजिगांसवः पढतमान् ग्रन्थान्तरान् विलोकयन्तु ।। ८॥ अवस्य चतुर्दशभेदानुक्त्वा द्रव्यष टूमध्ये कतिद्रव्याण्यवस्वरूपाण ? प्रत्येकद्रव्यस्य च का स्वभाव इत्याविर्भ- ज वयमाह- धम्माऽधम्मा पुग्गल, नह काले पंच हुंति अज्जीवा। च्लणसहावे धम्मो, थिरसंठणे अहम्मोर ९ 卐 टीका;-'धम्म' इति, धर्माऽस्तिकायः, अधर्मास्तिकायः, पुद्गलाऽस्तिकायः, नभ आकाशः तस्याऽस्तिकायः कालश्चेति पञ्चद्रव्याण्यजीवस्वरूपाणि चद्रव्येण सह पड् भवन्ति । पूर्वोक्ताजवपञ्चकमध्ये विना उदलद्रव्यं चत्वारे ' द्रव्याण्यमूर्तान नष्क्रियाणि च, पुद्गलद्रव्यं तु रूप, रूपं 'रूपस्पर्शादिसन्निवेशो मृतिः' इति वचनात्, तदेषामस्ती A. रूपणः, पामेव रूपादिमत्त्वात् , रूपग्रहणं गन्धादनामुपलक्षणम् , तद्व्यतिरेण तस्याऽसम्भवात् अनन्ताऽनन्तपरमाणु- म प्रचयरूपाः स्तम्भकुम्भादयस्स्कन्धाश्चर्मचक्षुाद्याः, अचित्तमहास्कन्धादयस्तु चर्मचक्षुषा न दृश्यन्ते एक वस्य यावन्तः प्रदेशास्तावन्तः प्रदेशा धर्माधर्माऽस्तिकाययोः प्रत्येकं वर्त्तन्ते । आकाशोऽनन्ताऽनन्तप्रदेशात्मको लोकाऽले कव्या च, पुद्गला पुनरनन्ता लेकव्यापन एव, कालस्तु तत्त्वते वर्तमानसमयरूप एव, अतो न देशप्रदेशकल्पना तस्य ।। गाथापश्चार्धेनाऽथ धम्मोऽधम्मयोलेक्षणमाह-' चलण सहावो धम्मो' इत्यादि, गतिपरिणामपरिणतानां वपुद्गलानां 卐 卐 A 卐 N y G 卐 A T ध 蝠 V L A A .

ka IN S 4 A मा श्रीनगन गमनक्रियागां साहाय्यको धर्माऽस्तिकायः, एवमेव स्थितिपरिणामभाजां वपुद्गलानां स्थतिकर्मणि साहाय्यकऽधाऽ- गुमाला स्तिकायः । एतं हि धर्माऽधी मनुजादीनां प्रयत्नादप्रयत्नाद्वा गत स्थतिपरिणामपरिणतानां पदार्थानां लोले गति- दीकाया स्थिनिहेतू, अलोके पुनरनयोरभावात् सिद्धानामिन्द्रा देदेवानामपि गतिस्थित न स्यातामित्यनयोस्सामान्टेनाऽस्तत्त्व- ख्यापनम् । अत्र कश्चिदारेकां कुरुते-ननु जीवपुद्गलेपु गतिस्थितिशक्तेरभावः ? यत एवमुच्यते यदेत धर्माऽधम्मच्चि ॥३०॥ A चपुद्गलानां गति स्थित कारयतः ? उच्यते, स्वं मन्येथाः, यतो न धर्माऽधम्मौ उंचपुद्गलानां हस्ताद्यवयवं धृत्त्वा असह्य गति स्थत निर्वर्तयतः, जीवपुद्गलास्वयमेव गतिस्थितिसामर्थ्यभाजः, किन्तु पूर्वोत्तर त्या उड्डयनशक्तभाजो वहङ्गमस्य वायुः, तरणकुशलानां मत्स्यानामुदकं, आकर्णायतलोचनानामपि पुंसां दर्शनक्रियायां यथा पुष्पदन्तयः प्रकाश उपकारकस्तथाऽत्राप्य वगन्तव्यम् । कस्मॅिवेदपि कर्मण कारणचतुष्कमपेक्षितम् , उपादानकारणं १ अक्षाकारणं २ नमत्तकारणं ३ असाधारण- कारणञ्च ४ । कुंभकारो घटं निर्मिते तत्र मृत्तिका उपादानकारणम् , दण्डचक्रादिनिमित्तकारणं, चक्रभ्रमणमसाधारणकारण Is आकाशाद्यपेक्षाकारणम् , एवमेतावप धर्माऽधम्मौ वपुद्गलानां गतस्थितिकर्मण्यपेक्षाकारणत्त्वेन समाख्यात । ९॥ एवं धर्माऽमयोः स्वभावं कथयित्त्वाऽऽकाशाऽस्तिकायस्य स्वभावं पुद्गलस्य दचतुष्टयञ्च व्याचख्यासुराचार्य गाथान्तरमाहा v अवगाहे आगासं, पुग्गलजीवाण पुग्गला चउहा खंधादेसपएसा, परमाणु चेव नाय १० ॐ टीका-अवगाहन्ते गमनाऽऽगमनं कुर्वन्त वपुद्गलादीनि यत्र सेऽवगाह अवकाश आकाश इत्यनर्थन्तरम् । पुद्गलडी- 卐 अर्डवतत्त्वे U धर्मा- 卐 धर्मय M ॐ स्वभाव- A रूपणम् 卐 N G या TI - 卐 A 卐 L 卐 A ३० A -- 卐 A 卐 V ध A T वानामवगाहदानस्वभाव आकाशः, स च लोकाऽलोकप्रमाणपरिमितः स्कंध-देश-प्रदेशदभिन्नः प्रागल्यावर्णितस्वरूप धर्माधर्मजोवपुद्गलानामवगाहप्रदायको ज्ञातव्यः ।। ' पुग्गला नउहा' इत्यादि, पूरणगलनधर्माणः पुद्गलाः, इदं पुद्गल- द्रव्यं चतुर्भेदभिन्नं, तद्यथा-स्कन्धः, देशः, प्रदेशः, परमाणुच, एतेषां भेदानां व्याख्या 'धम्माऽधम्म' इति गाथायामनु- पदमेवोक्ता तथाऽपि प्रसङ्गतोऽत्रापि लेशतः प्रदर्यन्ते, चतुर्दशरज्जुपरि मते कटविन्यस्तकरशाखापाकारे वैशाखसंस्था- येऽस्मॅल्लोकेजनपेटायामजनमेव सर्वत्र पुद्गला निचिताः, तत्र केचित् पुद्गलाः परमाणुस्वरूपा नर्वेभाज्यभागलक्षणाः, केचिद् व्यादिपरमाणुमिलनाद् द्विप्रदेशिस्कन्धस्वरूपाः, त्रिभिः परमाणु भनष्पन्नासिप्रदेगिम्कन्धाः, एवं चतुःप्रदेगिनः पञ्चप्रदेशिनः शतप्रदेशिनः सहस्रप्रदेशिनः संख्यप्रदे शनोऽसंख्यप्रदेशिनोऽनन्तप्रदेशनः स्कन्धाः मुधिया बनेयाः। परमाणनां परस्परसंयोगायः स्कंधः सञ्जायते तत्र संयोगे मुख्यवृत्त्या परमाणुवर्तिनी स्निग्धता रुक्षता च हेतुः, यत उक्तं पूज्यपादारविन्दः श्रीमद्भिरुमाखातिसूरिप्रकाण्डैस्तत्वार्थसूत्रे पञ्चमाध्याये:-" स्निग्धरूक्षवाद्न्धः," इयं निग्धता स्क्षता वा कियत्प्रमाणा सात्, समाना अल्पा उताऽधिका, आधिक्यञ्चाऽल्पता कसा इते विशेषाधिगमस्तत्त्वार्थटीकातोऽवसेयः, मन्दमतीनां बोधायाऽयं प्रयासः, यदि वस्तरस्स्यात्तदा प्रयासवैफल्यं भवेत् ।। उक्तलक्षणेपु स्कंधेपु कस्यचिदेशस्य कल्पनाऽथवा विवक्षित- स्कंधादमुकविभागस्य ततो भेदः स देशः, तेष्वेव स्कन्धेषु देशेषु वा सम्बद्धो निर्वभाज्यभागलक्षणो यो विभागः स प्रदेश इति पुद्गलस्य चत्वारो भेदाः । नन्वजोवद्रव्याणां लक्षणव्यावर्णनप्रसङ्गे पुद्गलभेदकथनमयुक्तम् ? सत्यं, धर्माऽ- धाऽऽकाशद्रव्याणां तु दाः पूर्व व्याख्याताः परं पुद्गलस्य भेदाः प्राङ्नोक्ता अत इदानीं कथनं नाऽयुक्त, पुद्गलस्य A Zogy- T V AVM . ६ A A y 卐 N 卐 S A U V M A A N श्रीनवतत्त्व लक्षणं तु ' सबंधयारे' ते गाथायां, कालस्य च ' समयावर्ल मुहुत्ते' ति गाथायामग्रे स्फुटतया वक्ष्यमाणं तथाप्यत्राति अवतारे सुमङ्गला संक्षेपेण लख्यते; वर्णगन्धरसस्पर्शशब्दान्धकाराऽऽदिलक्षणाः पुद्गलाः, ताऽऽतपवर्षा देहेतुश्च काल इति ॥ १० ॥ 卐 शब्दादि- 卐 र्ट कायां पुद्गलस्य दचतुष्कमभिधाय पुद्गललक्षणमाह;- ॥३१॥॥ सबंधयार उज्जअ, पभाछ या तवेहिरा । वण्णगंधरस फासा, पुग्गलणं टु लक्खणं ११ 卐 स्वरूप टीका;- सइंधयारे' 'त-शब्दान्धकारोद्योतप्रभाछायाऽऽतपवर्णगन्धरसस्पर्शाः पुद्गलानां परिणामाः पुद्गलद्रव्यस्य 5 लक्षणवेन व्याख्यायन्ते, एभश्शब्दादेभिः पुद्गलद्रव्यं लक्ष्यते, तस्मादेरे पुद्गलस्य लक्षणभृता इत गाथाक्षरार्थः ॥ ॐ T अथ शब्दादयः प्रत्येकं संक्षेपतो व्याख्यायन्ते । तत्र शब्दो-नादो-ध्वनः-स्वर इत्यादयस्समानार्थाः, अयं शब्दः व सचित्ताऽचित्त मिश्रभेदात्रिधा, तत्र वेन मुखद्वारोच्चार्यमाणः शब्दः सचित्तः, द्वयोरश्मनोः परस्परं प्रतिस्खलनाद् A यो जायते सोऽचत्तः, जेवप्रयत्नेन वाद्यमानस्य मृदङ्गादेर्यः शब्दः स मश्रा, अथवा शुभाशुभदाभ्यां व्यक्ताऽव्यक्त - 5 दाभ्यां वा द्वप्रकारकश्शब्दः, यं शब्दं श्रुत्वा कर्णयोराहादस्सज्जायते स शुभः राजहंसशुक पकमयाद नाभिव, यश्च कर्णकटुः ॥ T खरोष्ट्रादनामिव सोऽशुभः । द्वन्द्रयप्रभृटीनां तैर्यपञ्चेन्द्रियपर्यन्तानां यश्श्ब्दस्तत्र व्यक्ताऽक्षराणामभावादव्यक्तः, मष्यादीनां शब्दस्य तु व्यक्ताऽक्षरात्मकत्वाद् व्यक्त इति भेदप्रभेदाः स्वप्रज्ञयाऽवगन्तव्याः। उक्तप्रकारलेषु शब्देषु कश्चि- १ कीरभारण्डादीन् वर्जयित्त्वेदं ज्ञेयं, यतस्ते स्पष्टाऽक्षरा वाचं ब्रुवते ॥ । ३१। 卐 G A V L A - 卐 A का S 卐 N 卐 U ज V 卐 A A 卐 दप शब्दोऽष्टस्पर्शबादरपरिणामपुद्गलस्कंधादुत्पद्यते । शब्दः स्वयं तु चतुःस्पर पुद्गलस्कंधोऽस्त, अष्टस्पर्शवादरपरिणामि- पुद्गलस्कंधेभ्यः तथाप्रकारकज्वप्रयत्न अथवा रेष्वष्टस्पर्शिस्कंधेषु तथास्वाभाव्याद्वकारात् तेष्व्व स्कंटेष्ववगाढा भाषा- वर्गणापुद्गलाः शब्दत्त्वपरीणामं संप्राप्योच्छलन्त । सा भाषावर्गणा चतुःस्पर्शिपुद्गलस्कन्धलक्षणा, जोव अंदारकवैक्रया- ऽऽरहाकशररैश्शब्दमुत्पादयति, न पुनस्तैजसकार्मणशरीराभ्यामुत्पादयतुं समर्थः, पुनर्ने वाऽश्मभ्योऽी परस्पराऽऽस्फा- लनायः शब्दस्सञ्जायते सोऽपि निर्जीवदारकदेहजन्य एव 'वइयः॥ न्यायिकास्तु शब्दमाकाशगुणवेन मन्यन्ते तथा च ख्यापयन्ति, पुनराकाशस्खाऽमूर्तत्वादाकाशगुणभूतं शब्दमप्यतत्वेन वर्णयन्त, परं तन्न सनं युक्क्यसंगतत्त्वाद प्रत्यक्षबाधकचाच, तचैवम् ;-शब्द नाऽऽकाशगुणो नाऽप्यतः, मूर्त्तता च शब्दस्योच्चधनिःस्वनेन सिंहदेडतादिना अन्टेन केनचिदप्युकै शब्देन जायमानात् कर्णानां वधरत्त्वात् सुप्रता, न चामतभूतेन शब्देनाऽऽस्फाल्यमान श्रवण बधिरत्वमापनपद्येते, उच्चैश्शब्देन कदाच भतिकगृहाण्यप व पतामाप्नुवन्त कदाचद् गिरिशिखरणामपि नपतनं शाहे श्रूयते, नाऽमूर्तशब्दस्यैतावरी शक्तः कल्प्यन्ते मेधाविभिः, अन्यच्च पाश्चात्त्यज्ञानिकसशोधनानुसारेण 'वायर- लेस-टेलिग्राफ-टेलिफोन-रेडिय-फेनोग्राफ' संज्ञलेषु यंत्रेषु शब्दस्य ग्राह्यत्त्वं प्रत्यक्षमनुबोभूयते, न च मूर्तिमतां पुद्गलाना- मन्तरेणाऽमानामाकाशधार्दनां ग्रहणं संभाव्यते, तसात् शब्दः पुद्गलगुण मूर्तश्च । तत्त्वार्थवृत्तावपि चेतं;-शब्दः पुद्गलद्रव्यपरणामः, तत्परिणामता चाऽस्य मूत्तेत्त्वात् , त्वेता च द्रव्यान्तरविक्रयाऽऽपादनसामोत् पिप्पलाऽदिवर, ताज्यमानपटहस्थकलेचादेप्रकम्पनात् , तथा शङ्खादिशब्दानामत्प्रिवृद्धानां श्रवणबधिर करणसामर्थ्य, नाऽऽकाशादाव- N T 卐 G A T y A 卐 L 3 V 卐 ॐ A A N S श्रीनवतत्त्व A अवत शब्दादि- ॐ v 卐 टीकाय- • ॥३२॥ खरूपः। A 卐 T रेऽस्ति, तथा प्र िपयायित्त्वात् पर्वतप्रतिहताऽश्मवत् , द्वाराऽनुविधायित्वादातपवत् , संहारसामर्थ्यादगुरुधूपवत् , वायुना प्रेर्यमाणत्त्वात् तृणपर्णा देवत् , सर्वदग्ग्राह्यत्त्वात् प्रर्द पवत् , अभिभवन यत्वात् तारासमूहा दिवत् , अभिभावुकत्वात् सवितृम- ण्डलप्रकाशवत् , महता हे शब्देनाऽल्पोऽभभूयते शब्द इत प्रततम् , तस्मात् पुद्गलपरिणामः शब्दः" इति । शब्दस्याऽऽ- काशरणवाभावे-पुद्गलपरिणामचे वा विशेष जिज्ञासुभिस्तत्त्वार्थसूत्रस्थं वादस्थलं वल कन्यम् ॥ अंधकारः, तमः, तमसः, तिमिरमित पर्यायाः, अंधं करोती त्यन्धकारः, यथाकुड्याद्यावरणेन व्यवहितं वस्तु विशिष्टज्ञमन्त- रेण जोन न दृश्यते तथाऽन्धकाराऽऽवृतमपि पदार्थमाश्रवणदीर्घनेत्रऽपि दृष्टुं न पारयति, अतोऽन्धकारः पुद्गलपरिणामः, उक्तञ्चाऽन्यत्र:-" तमस्तावत्पुद्गलपरिणामो दृष्टिप्रतिवन्धकारत्वात् कुड्या देवदावारकत्वात् पटा देवत् " ॥ ननु च द्रव्यगुण- कर्मनिष्पत्तिवैधाद् भावाऽभावस्तमः, यदि चेदं द्रव्यं भवेत् तदाऽनित्यत्त्वाद् घटादिद्रव्यवन्निष्पद्येत, न च द्रव्यवन्निष्पद्यते, अमूर्त्तत्वादस्पर्शत्वात् प्रकाश विरोधादणु भरकृतत्त्वाच, नाऽपि गुणः, गुणेन चाऽऽधारवत्त्वेनाऽवश्यं भाव्यं, अस्याऽऽधाराऽप- लब्धस्तु सुप्ररता प्रकाशविरोधाच, काऽप न भवति, तदाऽऽश्रयाऽपलब्धेः सयेगविभागसंस्काराऽहेतृत्त्वात् , अतस्तेजसे यत्राऽभावस्तत्र तमः, तथा तेजसो द्रव्यान्तराऽऽवरणाच तमो भवति, अत्रोच्यते-व्यवधानक्रियासामर्थ्यत् कुड्यावत्तमः पगलम् , अमूर्त्तत्त्वाऽस्पर्शत्वपरमाण्वकृतत्वान्यसिद्धान, मूर्त्तत्त्वादियोगात्तमसः, सत्यप च मूर्तचादिमत्त्वे न स्पर्शादयोऽ- सदाद भलक्ष्यन्ते, तमसस्तथाविधपरणतिभाक्त्वात् , वातायनदृश्यरेणुस्पर्शा देवत् , यत्तूक्तं प्रकाशविरोधादिति न कल कश्चत्कार्यद्रव्यं तैजरेन प्रकाशेन विरुध्यते, तमस्तु प्रकाशविरोधे तसान्न पृथिव्यादि कार्य तम इत्येतदक्तम् , तेजःप्रका- 卐 A 卐 N 卐 G T A 卐 L 卐 V 卐 A 卐 । ३२॥ ॐ A NE M 卐 ध A A शयेरेकत्वाऽभ्युपगमाजलद्रव्यं च वरेधक मत्य सिद्धार्थरैव, स्वादारेका निरन्तरं धारं वर्षत बलाहले प्रदपेऽलन्दकाद- व्यवस्थाप्तिः प्रद्यतत एव बहः, यदि च विरोधः नि बहः प्रकाशे विभाव्येत जलपात्नाऽपन्तत्त्वादिति, अत्रेच्यते; 卐 v प्रादीपाः पुद्गलास्ताथात्म्यमपरित्यजन्तो निःसृताः तथाविधतासुदबिन्दुसम्पर्क द्वजहते, तत्समकालं चाऽपरे प्रदीपशिखया विकर्णाः कृशापुद्गलास्तमाकाशमश्नुवरे, न च ते जलपाटेन चध्यापयितुं शक्याः, परिणामवैचित्र्यादडवानलाऽवयवा हरेति, साद्वादिनां च किञ्चिद्व्यं केनचित्सह विरुध्यते दध्यादि रैलादिना न तु गुडदिना, न च वञ्चिन्न वरुध्यते तैलं दध्यादिना, न च तस्य द्रव्यता हातुं पार्यते, अतः परेण तिक्रमविशेषात्तथाविधं परणाममपहाय पुद्गलाः परिणामान्तरेण 卐 वर्त्तन्ते, पृथिव्यादिपरमाणुजातिनियमचाऽसद्धः, सर्वेषां स्पर्श सति रूपदिमत्त्वात् , गुणक्रिययश्च द्रव्यपरिणाममात्रत्वात् तदाऽऽधाराऽनुपलब्ध्याद्यप्य सिद्ध मति ॥ 卐 चन्द्र-ग्रह-नक्षत्र-तारक-रत्न-खद्योतप्रभृतीनां यः तः प्रकाशः स उद्योतः, जातवेदस य उष्णस्वरूपः प्रकाशः स उद्योतत्त्वेन न भण्यते । अयमुद्योतश्चन्द्रादीनां विमानशरीरप्रभृतिभ्यः प्रतिसमयं निर्गच्छन् पुद्गलप्रवाहाऽऽत्मकोऽस्ति । वर्तमान- कालेऽपि यथा इलेक्टु काख्यविद्युत्प्रर्दभ्यो निर्गच्छन् रश्मिसमूहः प्रत्यक्षं दृष्टिपथमायात, एवमुद्यतोऽपि पुद्गलप्रवाहाऽऽत्मकः प्रतिसमयं तत्तद्विमान्भ्यो नर्गच्छति, तथा चोक्तं तत्त्वार्थवृत्त 卐 उद्यतश्च चन्द्रिकादिरालादकत्त्वाजलवत् प्रकाशकत्त्वादग्नि- v वद् , तथा अनुष्णाऽई तत्त्वात् पद्मरागोपलादीनाम् , अतो मूर्त्तद्रव्यविकार उद्योतः” इति ।। सूर्याचन्द्रमसोस्तथाप्रकारकाs- 卐 न्यतेजस्विपुद्गलानाञ्च प्रकाशर श्मभ्यो नर्गच्छन् योऽन्य उपप्रकाशः सा प्रत्युच्यते, यतोऽप्रकाशस्थानवर्तन्यप- श्र N T ज G A A T L 卐 A 卐 ) 卐 S N नक्तत्त्व उमङ्ला- काय- ॥ A 卐 V ॥ A अजीवतत्त शब्दादि- 1 ३३॥ 卐 स्वरूप A - T घटपटादिद्रव्याणि सुखेन दृश्यन्ते, इयं प्रभाऽप प्रकाशपुद्गलेभ्यो विरलतया निझरन् पुगलसम्हाऽऽत्मिका, प्रकाशपुद्ग- लेभ्यो यदि वरलतया प्रभापुद्गला न निर्गच्छेयुस्तदा प्रकाश स्थतान द्रव्याणि लोकयितुं शक्यन्ते, परं प्रकाशस्थानादन्य- अवत' ने द्रव्याणि न विले क्यन्ते, पुनः प्रभायाः पुद्गलस्वरूपत्त्वं न स्यात्तदा यत्र सूर्याचन्द्रमसोर्ग्रहनक्षत्रादनामंशवो न प्रवेशन्त तत्र गृहादस्थानेषु नरन्तरं गाढतिमिरया न्शयैव भाव्यम् , न चैवं भवति, तसात्तेषां प्रकाशपुद्गलानां ये रश्मिलक्षणः प्रकाशस्तस्मात् प्रकाशाद् ये निशाऽभावस्वरूपोऽन्धकाराऽभावस्वरूप वा य उपप्रकाशः सा प्रत्युच्यते । पुष्पदन्तयोः प्रकाशे आतपद्योतलक्षणे आदर्शे जलाद्यच्छद्रव्येषु च दृश्यमानं यत् पुद्गलप्रतिविम्बं तच्छायास्वरूपम् । सचित्रमण्डलायथा पुद्गलपरिणामात्मको रश्मिप्रवाहे नसृजति तथा बादरपरिणामिपुद्गलस्कंटेभ्योऽपि प्रतिसमयं 'फुवारा' ऽऽख्यजलनिर्झर इव तदाऽऽकारकसूक्ष्मस्कंधसमुदायो नर्गच्छते, प्रतिसमयं पुद्गलस्कंटेभ्यो नर्गच्छन् स सूक्ष्मस्कंधसमुदायो दवाकरप्रभृनां प्रकाशे कृष्णवर्णतया पेण्डितो भवति, यत्समुदायो लोले 'छाया' इति नाम्नेच्यते । स एव वादरपरि- णामपुद्गलस्कंधेभ्य उत्पन्नः सूक्ष्मस्कंधसमुदाय आदर्शजलादिनर्मलवस्तूनामाश्रयं संप्राप्य यादृग्वादरपरिणामिपुद्गल- स्कंधस्वरूपं साक्षात्ताहगेव तेषु रेष्वत्यच्छद्रव्येषु दर दृश्यते यल्लोले प्रतिबिम्बनाम्ना संकाय॑ते, अतश्छायाऽपि पुद्गलपर- णामरूपा एव । वर्तमानसमयेऽt आङ्गलदेर्या फोटोग्राफसंज्ञका प्रतिकृतिन तर्निस्सारिता ऽपि छायायाः पुद्ग- लत्वं प्रत्यक्ष करोते । छायायाश्च पुद्गलटे मद्भर्मलय गरिसरपुरंदरैः प्रज्ञापनोपाटकायामुल्टेखो व्यधाय स रैवम्- अथ कमात्मकं प्रतिबिम्ब ? उच्यरे छायापुद्गलाऽऽत्मकं, तथा हे सर्व न्द्रियकं वस्तु स्लं चयापचयधर्म रश्मवच, 卐 A 卐 N 卐 - - 卐 T y A V L ॥३३॥ 卐 A 卐 Inurl ध A 'S 3 N 卐 A V N 3 रश्मय इत छायाहुद्गला व्यव हियन्रे ते च छायापुद्गलाः प्रत्यक्षत एव सद्धाः, सर्वस्याऽी स्थूलवस्तुनः छाया अध्यक्षतः A. प्रतिप्राण पतेः, अन्यच्च यदि स्थूलवस्तु व्यवहिततया दूरस्थततया वा नाऽऽदर्शाऽऽदिष्ववगादरश्मिर्भवत, तते न तत्र sh दृश्यते, तस्मादवर यरे सन्त छायापुद्गला इत । २ च छायापुद्गलास्तत्तसामरवशाद् वैचित्रपरिणमनस्वभावास्तथा है;- रे छाया पुद्गला दवा वस्तुन्यभास्वरे प्रतिगताः सन्तः स्वसम्बन्धिद्रव्याकारमा बभ्राणाः श्यामरूपतया परणमन्तै नेश तु कृष्णाऽऽभाः, एतच्च प्रसरत देवसे सूर्यकर निकरे नश तु चन्द्रोद्यते प्रत्यक्षत एव सद्धम् , त एव छायापरमाणव 卐 A आदर्शादिभास्वरद्रव्यप्रतिगताः सन्तः स्वसम्बन्धिद्रव्याकारमादधाना यादृग्वर्णः स्वसम्बधन द्रले कृष्यो लः सेतः A स्तो वा तदाभाः परणमन्रे, एतदप्यादर्शाऽऽदिष्वध्यक्षतस्सद्धम्” इति ॥ तत्त्वार्थवृतावप्युक्तम्-" कथं पुनर्दण- ही तलादपु प्रतिविम्ब मुखादीनां सम्मुखमेव छायाऽऽकारेण परिणमते, न पराङ्मुखं, कथं वा कठिनमादर्शमण्डलं प्रतिभिद्य - मुखतो निर्गताः पुद्गलाः प्रतिबिम्बमाजिहत इत, यत्तावदुच्यते सम्मुखमेव प्रतिबिम्बमुदेति नान्यते मुखमिति तत्र परि- 卐 णामः स तादृशः पुद्गलानाम्, न हे तद्विषयः पर्यनुयगः कर्तुं शक्यः, को हि नामाऽभिदध्यात् प्रेक्षापूर्वकारे पयः किमिति Fi दध्यादत्तेन परिणम तृणगोभक्ष्यादय वा दरादित्तेनेति, क्रमत्र युक्त्या, तथा है तं पश्याम न च दृष्टः कञ्चदनुपप- 卐 नम् , उपहास्यश्चैवमाचक्षाणो भवति, केन हेतुना वा चक्षू रूपं गृह्णाति, तस्मान्न परिणामः पर्यनुयगार्हः, रेषामपि न परिणामस्तेषामपि मुखाद्याश्रित्याऽनेक कारणं प्रतिबिम्बोत्पादः सप्रतिघस्नाऽऽकारेण भवति नाऽन्टनेत तुल्यः पर्यनुयेगे विधेयः, प्रतिभेदः पुनः कठिनशिलातलपरिश्रुतजलेनाऽयस्पिण्डेऽग्निपुद्गलप्रदेशेन शरेरात् प्रस्टेदवारिलेशनिर्गमन्न व्याख्येयः 卐 G A T । L 卐 A । N S U 卐 नवतस्व- A सुमङ्गला.) टीकार्य- v 卐 ॥ ३४॥ A M T N प्रतिबिम्बोदयः शुच दृर्पणेऽन्यत्र वा, अतश्छायादयः पुद्गलपरिणतिविशेषाः" इति अवतत्रे दवाकर विमानादुत्पद्यमानो य उष्णप्रकाशः स आतपः, सूर्यस्य वेमानं स्वतः तं, तथापि वक्ष्यमाणस्वरूपस्याऽऽत शब्दादि पनामकर्मण उदयेन वमानस्थानां पृथि कायिक वानां प्रकाश उष्ण स्वरूपो भवति य आतप आतापो वा उच्यते । 卐 अयमातपः सूर्येन्द्रस्य न विद्यते कन्तु आतपनामकम्मेदयभाजां बादरपृथि कायकजीवानां पिण्डात्मकस्य सूर्यविमानस्य । स्वरूपम्। उष्णप्रकाशाऽऽत्मकोऽयमातपः सूर्यविमानस्थपृथि का यकजीवानां पुद्गलस्वरूपेभ्य अंदारकशरीरेभ्यः पुद्गलप्रवाहस्वरूप- 卐 तया नर्गच्छति, तस्माद्यत आतप उत्पद्यते स पुद्गलः आतपोऽपि पुद्गललक्षणः, यादृक्कार्य यत्स्वरूपं च कारणं कार्यमपि तादृक् तत्स्वरूपमेव, ततस्सध्यति आतपस्य पुद्गलत्त्वम् ॥ यदुक्तं “आतपोऽपि तापकत्वात् स्वेदहेतुत्वादुष्णत्त्वादग्निवत् 卐 पुद्गलपरिणामजः"॥ वोऽपि पुद्गलस्य लक्षणम् । पुद्गलद्रव्यं विरहय्य न वर्णादयोऽवतिष्ठन्ते, वर्णश्च कृष्ण-ल-रक्त-पत-श्वेतदभिन्नः, 3 पञ्चवर्णव्यतिरिक्ताऽन्ये वर्णाः पूर्वोक्तपञ्चवर्णाऽन्यतरयोद्भादिकयोर्वणर्यो मिलन्न सञ्जायन्ते, अतस्ते वर्णास्सानिपातिका 0 उच्यन्ते । आधुनिकदैज्ञानिकास्तु रक्त-ति-+लाऽऽख्यान् न् वर्णानेव मुख्यतयाऽन्यॉश्च वर्णान् सान्निपातिकतया व्याचक्षन्ते, परं तत् सर्वज्ञाऽऽगम विरोध, तस्मादुपेक्षितव्यम् ॥ एते वर्णादयो न द्रव्यस्वरूपाः केन्तु पुद्गलद्रव्यवर्त्तिर- A णलक्षणाः, वर्णरसादीनां मूर्त्तद्रव्याऽऽधारत्त्वात् मूर्त्तत्त्वं स्फुटं यतो धर्माऽधाऽऽकाशप्रभृतेद्रव्यपङ्के रकं पुद्गलद्रव्यं मूर्ति- ही १ जीवद्रव्यस्याऽमूर्त्तत्त्वं तु तस्य शुद्धस्वरूपाऽपेक्षया ज्ञेयम् ॥ ।३४॥ 卐 卐 A 卐 T 卐 V -- L A A 卐 ue 卐 M 卐 A मदन्यानि सर्वाण्यप्यमूर्त्तानि, वर्णादयश्चेन्द्रियादिकरणैस्तेषु तेषु पुद्गलद्रव्येषु प्रत्यक्षरुपलभ्यन्तै, अतः कारणात्तान् वर्णादन ys पुद्गलस्य लक्षणटेन बुधा जगदुः। पुद्गलद्रव्यस्थितः कृष्णवर्णाद्यात्मको गुण एकगुणाधिको द्वगुणाऽधिकत्रिगुणाऽधिकv संख्यगुणाऽधिकोऽसंख्यगुणाऽधिकोऽनन्तगुणाधिक इत्याद्यनन्तभेदभन्नः, अल्पाऽधकतारतम्टेनाऽनन्तभेदयुक्त इत्यर्थः ? ' तथाहिः-लोकवर्ति ने खलपरमाणुपु परमाणुसमूहजन्यद्विप्रदे शस्कंधप्रभृत्यनन्तप्रदेशस्कन्धपर्यन्तेषु च वर्णास्तिष्ठन्ति, तत्र A जगति ये के चत्परमाणवस्तेषु प्रतिपरमाणु वर्णपञ्चकमध्यादेकतमो वर्णोऽवश्यं भवति, यस्मिन् परमाण विवक्षितसमटे ये वर्णों ड दृष्टः स वर्णे नैरन्तर्येण न भवति, कालाऽन्तरेण वर्णाऽन्तरत्वं नियमेनोपजायते, जघन्यतः समयाऽन्तरे उत्कृष्टस्त्वसंख्यसम- याऽनन्तरं वर्णस्य परिवर्तनं सञ्जायते, अनेनेदमपि वैज्ञायते यत् प्रतिपरमाणु प्रकटतयैलेन वर्णेन भूयते, परं सत्ताऽपेक्षया 卐 तु पञ्चभिरपि वस्तत्र स्थीयतेः स्कन्टेषु तु निश्चयनटेन पञ्चवर्णास्सम्भवन्त, व्यवहारेण यस्य वर्णस्य बाहुल्यं तद्वर्णवान् स स्कन्धः प्रोच्यत इति ॥ 卐 घाणेन्द्रियगोचरो यो गन्धः सेऽपि पुद्गलस्य लक्षणतया व्याख्यातः, यते नहे धर्माऽधादिष्वमूर्त्तद्रव्येषु तस्य T सम्भवः, पुद्गलं वहाय नाऽन्यत्र गन्धस्य सद्भावः, एतादृक् पुद्गलद्रव्यमपि न विद्यते यत्र गन्धस्याऽभावत्वं स्यात्, तत 卐 गन्धः पुद्गलस्य लक्षणम् । अयं गन्धो द्वधा-जनानामानन्दप्रदः सुगन्धः, विप्रियश्च दुर्गन्धः, प्रतिपरमाणु प्रकटतया द्वयोर्गन्धयोर्मध्ये एकतरो भवति, सत्तापक्षया तु द्वावपि, कालाऽन्तरे तयोः परावर्त्तनं जायते, यदा सुगन्धस्याऽऽविर्भावस्तदा 95 दुर्गन्धस्य तेरोभावः, यदा दुर्गन्धस्याऽऽविर्भावस्तदा सुगन्धस्य तरोभावत्वमवसेयं, स्कंधेषु समकालं द्वावपि स्तः, यस्य T 卐 N 卐 G 卐 A A . L V 卐 A A ए 卐 - का N ज S 卐 A ॐ अवतत्रे 卐 V शब्दाद- पुद्गल- ॐ स्वरूपम 1 A T 卐yz卐o卐y-) नवतत्त्व वाहुल्यं तद्गन्धवान् स्कन्धो निगद्यते, एवं वर्णस्वरूपमिव निःशेष विज्ञेयम् ॥ सुमला- रसनेन्द्रियगोचर स्तिक्त-कट्वाऽऽम्ल-कपाय-मधुरादि भन्नो यो रसः सोऽपि पुद्गलस्य लक्षणत्त्वेनरीक्रियते लब्धवर्णैः, 'कायां पुद्गलद्रव्यं वरहय्याऽन्यत्र द्रव्येष्वस्य रसस्याऽसम्भवः एव । परमाण स्पष्टतयैके रसः सत्ताऽपेक्षया तु रसपञ्चकमपि, स्कंटेषु 卐 तु पश्चानाम पे निश्चयेन सम्भवः, यस्याऽऽधिक्यं तस्य प्राधान्यं वध्यम् । द्वगुणाधिकत्त्व-संख्टेयगुणाधिकत्त्वा-ऽसंख्टेयगुणा- । ३५॥ ऽधेकत्त्वाऽनन्तगुणाधिकत्त्वहनचादितारतम्यं तु सर्वेष्वप स्कन्टेषु वर्णरसगन्धस्पर्शाऽक्षयां स्वधिया ॥ स्पर्शनेन्द्रियग्राह्यो यो विषयः स स्पर्शाऽभिधानः, स च शतोष्ण-स्निग्धरूक्ष-गुरुलघु-मृदुकर्कशदैरष्टप्रकारः, अभी ताऽऽदयस्स्पर्शा धर्माऽस्तकायाऽऽदिपु द्रव्येषु न भवन्ति, अमूर्तत्त्वात्तेपां, स्पर्शाश्च गुणाः, गुणत्न साऽऽधारेणैव भवितव्यं की ततः पुद्गलद्रव्यमेव पामधिकरणं, ते च स्पर्शादयस्तस्य पुद्गलद्रव्यस्य लक्षणभूताः, यतो नहे पुद्गलद्रव्यं वरहय्याऽन्यत्र तेषां स्थतिः। प्रतिपरमाणु समकालं तोष्ण-स्निग्धरूक्षस्पर्शेभ्यः परस्पराविरोधिन स्पर्शी भवतः । यथा तस्निग्ध, . A तरूक्ष, उष्ण स्नग्ध, उष्णरूक्ष वा, भन्नभिन्नकालाऽपेक्षया सत्ताऽपेक्षया वा शीतोष्ण स्नग्धरूक्षाख्याश्चत्वारेऽप स्पर्शाः ई सम्भवन्ति । तथा चेक्तं तत्त्वार्थर्ट कायां-" अष्टविधः स्पर्शे भगवद्भक्तः स्कन्टेपु यथासम्भवं, परमाणुपु पुनश्चतु- धः स्पर्शे नाऽन्यः, स च शेतोष्णस्निग्धरूक्षाख्यः, तत्राऽप्येकपरमाण परस्पराऽविरोधिद्वयं समस्त" इति । बृहच्छतके तु लछुमृदुस्पर्शावपे परमाण अपरावृत्तिभावेनाऽवस्थित इत्टुक्तं, अतस्तेषां मते परमाणुषु युगपच्चतुर्णामपि स्पर्शानां संभवः । सञ्जातः, सत्ताऽपेक्षया योग्यतया वा पट् स्पर्शा अपि । तथा अंदारकवर्गणार्वाग् त्र्यणुका दस्कंधेपु समकालं चत्वारः स्पर्शाः, 卐 ॥३५ । V A 卐 face S ध N U M A A N sah तत अदारिक क्रियाऽऽहारकवर्गणायोग्यपुद्गलस्कंधेष्वष्टस्पर्शाः सम्भवन्ति, ततोऽप्यग्रवर्त्तिन्यस्तैजस-भाषा-ऽऽनप्राण-मन:- A कार्मणवर्गणाश्चतुःस्पर्शाऽऽत्मिकाः सूक्ष्मपरिणामपरिणताश्चेति । इत्येवं लेशतो व्याख्याताश्शब्दाऽन्धकारोद्यतप्रभाछायाऽऽतपाः 95 पुद्गल विकाराऽऽत्मका वर्णरसगन्धस्पर्शाश्च पुद्गल स्थितगुणस्वरूपा भाव याः॥११॥ 卐 एवं पुद्गलस्य विकाराऽऽत्मकं गुणाऽऽत्मकञ्चलक्षणं प्रतिपाद्याऽथ कालस्य भेदाऽत्मकं लक्षणं द्वाभ्यां गाथाभ्यां प्रदर्श्य- 卐 卐 एगाको डसतसट्टि, लक्ख हुत्तरी सहस्सार।दयसर सोल हेया, आवलिय इगमुहुत्तम १२ ॥ टीका;-' एगे' त्ति-एकाकोर्ट सप्तपष्टिलेक्षाः सप्तसप्ततिसहस्रा द्वे शरे पेडशाधिक संख्याका आवलय एकस्मिन् 卐 मुहूर्ने सञ्जायन्ते ॥ १२॥ 卐 समयाऽऽवलीमुहुत्त, दीह पक्खा र मस वरिस र भणिओ पलिया सगर, उसप्पिणि प्पिणि कलो 卐 टीका-'समरे ' ति–समयः परमनिकृष्टकालः, पुद्गलेषु यथा परमाणु निर्विभाज्यविभागखरूपस्तथा कालद्रव्छे सम- T योऽपि निभाज्यभागाऽऽत्मकः, समयाना स्त सूक्ष्मः कालः, असंख्यैः समयैरेकाऽऽवलिका, षट्प शिदधिकद्विशताऽऽवल- A a काभिरेकः क्षुल्लकभवः, पत्रंशदधिकपञ्चशतपञ्चषष्टिसहस्रक्षुल्लकभवैरेकं मुहूर्त घटिकाद्वयप्रमाणं, त्रिंशद्भिर्मुहूतैर्दिवसः, प - V दशभिर्दनैरेकः पक्षः, द्वाभ्यां पक्षाभ्यां मासः, द्वादश भासवर्षः, असंख्यवर्षात्मकं पल्यो पमं, दशकेटाकेटीपल्ये पमैरेकं सागरे- - 卐 T - G A N S ॐ अवतत्रे कालव- र्णनम् ॥ A 卐 अनवतत्त्व A पमम् , दशकोटाकोर्ट सागरोपमपरिमिता एका उत्सर्पिण, उत्सपिंग तुल्यास्त्ववसपि, एषः सर्वेऽपि कालः सूर्यगतिक्रियापरि- सुमङ्गला- च्छिन्नो ज्ञातव्य इति संक्षेपार्थः।। व्यासाऽर्थस्त्वयम्-कालो निश्चयव्यवहारभेदाभ्यां द्विविधस्तत्र वर्तनादिपर्यायलक्षणो वर्त्त- र्टकायां- v मानसमयमात्रप्रमाणो वा नैश्चयकः कालः प्राग्व्यावर्णतस्वरूपः, समयाऽऽवलिकामुहूर्तादभेदभन्नो व्यवहारकालः पुष्पदन्त- ड योनॆयतया गत्या परिभ्यते, यतो दिवस-तिथि-मास-वर्षाद नामुत्पत्तिोतिष्चक्रस्य परिभ्रमणेनैव सञ्जायते, तत्र यस्य |३६॥ कालस्याऽथ विभागो न भवेदेतागत्यन्तसूक्ष्मकालः स समयः, यथा कश्चद्वर्यवान युवा नशतभल्लस्य तीक्ष्णधारया कम- 卐 लानां शतं युगपदेव छनत्त, तत्र छेदनसमये पत्रात् पत्रान्तरं गच्छतो भल्लस्याऽसंख्यातसमयाः संजायन्त इति ज्ञानना दृष्टम् । T र्योदग्रो जीवस्त्वेवं मनसि हायरे यन्मया क्षणमात्रेणैतत् कमलानां शतं छन्नं, परं तत्राऽपि पूर्वतर त्याऽसंख्यातसमयाऽऽत्मकः ys कालो भवति । यद्वा कस्यचिऊतमस्य वाससो वेदारणे तन्तोस्तन्त्वान्तरस्य यद् वेदारणं तत्राऽप्यसंख्यातसमया भवन्ति, निम्भिाज्यभागलक्षणः परमनिकृष्टः कालः स समयनाम्ना सर्वज्ञसमरे निगद्यत इति तत्त्वम् । पूर्वोक्तस्वरूपैरसंख्यातसमरै- पु रेका आवलका नष्पद्यते, एकस्यामावलिकायामसंख्यातसमयास्संभवन्तीत्यर्थः, केपाञ्चित्सूक्ष्मनिगोदवानामायुः पद्- T पञ्चाशदधिकशतद्वयाऽऽवलिकाप्रमाणं, तस्मात् स क्षुल्लकभव इति प्रोच्यते, ले कवर्तिवानामायुः क्षुल्लकभवान्न्यूनं न विद्यते । फू ४४४६३७७३आवलकानामेक प्राणोऽथवा श्वासोच्छासो निष्पद्यते, अत्र निरामयस्य यूनः पुरुषस्य यः श्वासोच्छ्वासः स v प्राणत्त्वेन विज्ञेयः, सामयस्य तु नियतत्त्वाऽभावान्न गण्यते, तथा चोक्तं;-"हट्ठस्स अणवगल्लस्स, निरुव कट्ठस्स जंतुणो एगे ys ऊसासनीसासे एस पाणुत्ति वुच्चइ " ॥१॥ सप्तभिः प्राणैरेकस्स्तोकः, सप्तभिस्स्तोकैरेको लवः, लवानां सप्तसप्तत्या एको मुहूर्त्तः, 卐 A 卐 N y G A 卐 L ३६ A 卐 卐 A 卐 N क 卐 A 卐 V 卐 A 卐 । 卐 A एकस्मिन् श्वासोच्छ्वासरूपे प्राणे साधिकसप्तदशक्षुल्लकभवानां नष्पत्तिः, एक स्मन् मुहूरे तु षट्त्रंशदधिकपञ्चशताऽतिरक्तप - पष्टिसहस्रसंख्याकाः (६५५३६) क्षुल्लंकभवा भवन्ति, तथा च प्रत्यपाद बृहत्संग्रहण्या-" पणसट्ठिसहस्सपणसय छरसा इगमुहूत्तखुड्डभवा । आवलयाणं दोसय छपन्ना इग खुड्डमवे" ॥ १ ॥ पुनर्नवसमयादारभ्य समयन्यूनमुहूर्तयावत् सर्वोऽपि कालोऽन्तर्मुहूर्ताऽभिधानः, अतोऽन्तहूर्त्तमप्यसंख्यप्रकार, नवसमयपरिमितं जघन्यं, दशसमयादारभ्य द्वसमये नमुहूर्त यावन् मध्यमं, समयोनरहूर्तप्रमाणमुत्कृष्टम् ॥ पुनरिंदं मुहूर्त चन्द्रमुहूर्त्त-सूर्यमुहूर्त्तभेदाभ्यां द्वधा, लोले तु त्रंशन्मुहूर्तात्मक 'देवस इत यव्यवहियते तत्र चान्द्रमुहूतैरेव व्यवहारः, निश्चिन्टूनसार्धत्रयोदश (१३६) चान्द्राहूत्तैरेकं सूर्यमुहूर्त नष्पद्यते, अन्न सूर्यमुहूर्तेण लोले व्यवहारो न प्रचलते । शद्भिश्चान्द्रमुहूत्तरेको देवसः सञ्जायते, सोऽी चान्द्र दिवस- सरदेवसदाभ्यां 'द्वविधः, तत्र 'त्रंशन्मुहूर्त्तप्रमाणः पष्टिघटिकापरिमितो वा देवसः स सूर्य देवसाऽऽख्यः, कञ्चदधिक सार्धे नत्रंशन्मुहूर्तप्रमाणा चन्द्रकलानां हानिवृद्धिभ्यामुत्पद्यमाना या तिथिः स चान्द्रदिवसः, लोके सूर्यदिवसोऽहोरात्र- नाम्ना चान्द्रदिवसश्च तिथित्त्वेन भण्यते । एकस्मिन् पक्षे पञ्चदशदिनानि पञ्चदशनिशाश्च भवन्ति, पूर्वव्यावतस्वरूः पञ्चदशदिरेकः सूर्यपक्षः, पञ्चदशतिथिभिश्चैकश्चान्द्रपक्षः, लोकैस्तु चान्द्रपक्षेनैव व्यवहारो वैधयते । द्वाभ्यां पक्षाभ्यामे- को मासः, सोऽपि पञ्चविधस्तद्यथा-शद्भरहोरात्ररेक ऋतुमासोऽथवाऽपरनाम्ना कर्ममासः, २९६३ अहोरात्राणामेक- चान्द्रमासः, २७३४ अहोरात्राणामेके नक्षत्रमासः, ३११२४ अहोरात्राणामेकोऽभिवर्धेतमासः, सार्ध त्रंशदहेरात्राणामेका सूर्यमासः, ले कैस्तु २९६३ अहेरात्राणां संपूर्ण त्रंशत्तिथिस्वरूपे यश्चान्द्रमासस्तेनैव व्यवद्रियरे, तथा षड्भिर्मासैरेकं सूर्या- 卐 'N T 卐 G A T 卐 V 卐 L 卐 A प ध A एन 20 N 卐 S 卐 नवतत्त्व- अवतत्त्टे सुमङ्गला- टीकायां- A 卐 V 卐 A 卐 नम् ॥३७॥ 11 T 卐 A ऽयणं, तदप व्यर्श त्यधिकशताऽहोरात्रप्रमाणं, सूर्यायणं दक्षिणायनोत्तरायणात्मकभेदाभ्यां द्वधा विभक्तम् । चान्द्रायणं 5 १३६ अहोरात्राणां भवति, परं लोकव्यवहारे चान्द्रायणस्य न विद्यते प्रयोजनम् , सूर्यायणमेव व्यावहारिकम् । तथा द्वादशभास्रेकः संवत्सरः, सोऽप मासम्दवत् पञ्चधा, तद्यथा;-३६० अहोरात्राणामेकः ऋडसंवत्सरः कर्मसंवत्सरो वा, ३६६ अहोरात्राणामेकः सरसंवत्सरः, ३५४३३ अहोरात्राणाम्कश्चान्द्रसंवत्सरः, ३२७६ अहोरात्राणामेक नक्षत्रसंवत्सरः, ३८४६३ अहोरात्राणामेकोऽभवर्धतमाससंवत्सरः। तथा पञ्चभिः सरवरेकं युगं, चतुर तलक्षसंवत्सरैरेकं पूर्वाङ्ग, चतुर- तेलक्षपूर्वाङ्गैः (७०५६०००००००००० सरसंवत्सरैः) एकं पूर्व, चटर तिलक्षपूरेकं त्रुटिताङ्गम् , एतत्प्रमाणमायुरा- सत् युगादिजनेशस्य । चतुरर तलक्षत्रुटताङ्गैरेकं त्रुटितं, इत्येवमडडाङ्गाऽ-डडाऽ-ववाङ्गाऽ-चव-हुहुकाङ्ग-हुहुक- उत्पलाङ्ग-उत्पल-पद्माङ्ग-पद्म-नलिताङ्ग नलिन-अर्थनिपुराङ्ग अर्थनपुर-अयुताङ्ग-अयुत-नयुताङ्ग-नयुत-प्रयुताङ्ग-प्रयुत -चूलकाङ्ग-चूलिका-प्रहेलिकाङ्ग-प्रहेलिका इते सर्वसंख्याः पूर्वपूर्वसंख्याऽपेक्षया चतुर तेलक्षणता देयाः, सिद्धान्तत्पर्यन्ता संख्यामर्यादा प्रदर्शता, इतोऽग्रवर्त्तिन्यः संख्याः पल्य पमसागरेपमाघभिधाः, ताश्च पल्यस्य पमानेन प्रद- यन्टे, तक्कैवम्-धान्यपल्यवत्पल्यस्तेनोपमा यस्य कालप्रमाणस्य तद् पल्योपमम् , तनिधा-उद्धारपल्योपमम् , अद्वापल्योपमम् , क्षेत्रपल्योपमञ्च, तत्र वालाग्राणां तत्खण्डानां वा प्रतिसमयमुद्धरणउद्धारस्तद्विषयं तत्प्रधानं वा पल्योपमसुद्धारपल्यापमं १। अद्धा कालः स च प्रस्तावाद्वालाग्राणां तत्खण्डानां वेद्धरणे प्रत्येकं वर्षशतलक्षणस्तत्प्रधानमद्धापल्योपमम् २ । क्षेत्रमा- क शप्रदेशरूपं तत्प्रधानं क्षेत्रपल्योपमम् ३ । पुनरेकैकं द्वधा, बादरं सूक्ष्म तत्राऽऽयामविस्तराभ्यामवगाहेन चोत्सेधा- ज T 卐 A 卐 N y G 3 A 卐 L y A V 3 A ॥३७॥ 卐 arr!

S 卐 N 卐 A 卐 V U 3 A 卐 A 卐 T नच ऽङ्गुल नष्पकयेजनप्रमाणो वृत्तत्चाच परिधिना कञ्चन्यूनषड्भागाऽधकय जनत्रयमानः पल्य हुण्डरे शरस एकाला द्वाभ्यामह भ्यां यावदुत्कप्तस्सप्तभिरहरा प्ररूढाने यान वालाग्राण हैः प्रचय वेशेषानिन्डितरमाकर्ण तथा भ्रयरे यथा तान वालाग्राण वह्निर्न दहत, वायु पहरते, जलं न कोथय त, : समरे समरे एकैकवालाग्राऽपहारेण यावता कालेन स पल्यः सकलऽी सर्वाऽऽत्मना नलैंपे भवति, तावान् कालः संख्टेयसमयमानो बादरसुद्धारपल्य पमम् , एतेषां च दशके टिकोट्यो बादरमुद्धारसागरेपमम् , महत्त्वात् सागरेण समुद्रेणपमा यस्टे ते कृत्त्वा, बादरे च प्ररू परे सूक्ष्मं सुखा- ऽवयं स्यादित बादरेद्धारपल्ये पमसागरोपमयेर्नेरूपणं, न पुनरनयोर्नरूपणेऽन्यद्विशिष्टफलमस्त, एवं चादरेष्वद्धा-क्षेत्र- पल्योपमसागरोपमेष्वी वक्तव्यम् । तथा एकैकस्य वालाऽग्रस्याऽसंख्येयान खण्डान कृत्वा पूर्ववत्पल्ये भ्रयते, खण्डाने द्रव्यतः प्रत्येकमत्यन्ताच्छलोचनछद्मस्थ यदव सूक्ष्मं पुद्गलद्रव्यं चक्षुषा पश्यते तदसंख्येयभागमात्राणि, क्षेत्र- तस्तु सूक्ष्मपनकशरीरं यावत क्षेत्रेऽवगाहते ऽसंख्टेयगुणान, बादरपर्याप्तपृथि कायकशरेरदुल्यात वृद्धाः, प्रतिसमयमेकैकखण्डाऽपहारेण सकले निर्लेपनाकालः संख्टेयवर्षकोटप्रमाणः सूक्ष्मद्धारपल्य पम, तद्दशकेट के व्यः सूक्ष्मद्धा- रसागरे पमम् , आभ्या सूक्ष्मद्धारपल्य पमसागरेपमाभ्यां द्वीपाः समुद्राश्च यन्रे तथा वर्षशरे वशरेऽतिक्रान्ते पूर्वोक्त- पल्यादेकवालाग्राऽपहारेण नर्लेपकालः संख्टेयवपकेटमान बादरमद्धापल्य पमं, तद्दशकर्ट के व्ये बादरमद्धासागरे पमम् । तथैव वर्षशतेन वशतेन एलैकवालाऽग्राऽसंख्टेयतमखण्डाऽपहारेण निर्लेपनाकालऽसंख्यातवर्षकेटमानः सूक्ष्ममद्धापल्या पर्म, तद्दशकेट के व्यस्वक्ष्ममद्धासागरेपमम् , तद्दशकेट के व्योऽवसपी, एतावत्प्रमाणा उत्सण्यपि, उत्सर्पिण्यवसण्योदय रेक 卐 A T A 卐 L 卐 V ॐ A A

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कालचक्रं, अनन्तानि कालचक्राण्येकः पुद्गलपरावः, अनन्ताः पुद्गलपरावर्ता अर्तताद्धा, तथैवाऽनागताऽद्धाऽपे। आभ्यां च
सूक्ष्माद्धापल्योपमसागरोपमाभ्यां सुरनौरकनर तिरश्चां कर्मस्थतर्भवस्थितिः काय स्थितिश्च यते । तथा प्राग्वत् पल्याद्वाला-
अस्पृष्टनभ प्रदेशानां प्रतिसमय कैकाऽपहारेण( स्पृष्टनभ प्रदेश निर्लेपनाकालोऽसंख्टेयेत्सपिण्यवसमानो बादरं
क्षेत्रपल्योपम, तद्दशकेट कोट्यो बादरं क्षेत्रसागरेपमं, तथैवाऽसंख्यातखण्ड कृतवालाग्रैः स्पृष्टानामस्पृष्टानां च नभ-प्रदेशानां
प्रतिसमयमेकैकाऽपहारेण निलेपनकालो बादरासंख्टयगुणकालप्रमाणं सूक्ष्मत्रपल्योपमम् , प्राग्वत् तद्दशकोर्ट कोव्यः सूक्ष्म-
क्षेत्रसागरेपमञ्च, एताभ्यां सूक्ष्मक्षेत्रपल्योपमसागरोपमाभ्यां प्राय दृष्टिवादे प्रमाणचिन्तायां प्रयजनं सकृदेव नाऽन्य-
रेति ॥ इति पल्योपमसागरेपमस्वरूपम् ॥ उक्तस्वरूपैर्दशकोटाकर्ट सूक्ष्माद्धासागरोपमैरेका उत्स पै", तावत्प्रमाणा चैकाऽ-
वस, एकैकस्याउत्सर्पेण्यामवसर्पण्याञ्च पडारकाः सन्ति, तत्रादावसण्यां तावत् ग्रथमः सुमसुमनामक आरकचतु:-
केटाकोर्ट सागरोपमप्रमाणः, सुपमाख्यो द्वियाऽऽरकः त्रिकोटाकोट सागरप्रमाणः, सुपमदुःपमाहस्तृत याऽऽरको द्विकोटा-
कोर्ट सागरोपममानः, दुःपमसुपमसंज्ञश्चतुर्थाऽऽरको द्विचत्वारिंशद्वासहस्रन्यूनैकक टाकोट'सागरे पममानः, दुःपमनामा पञ्च-
माऽऽरक एकविंशतिवर्षसहस्रपरिमितः, पष्ठो दुःपमदुःपमनामाऽो तावद्वर्षप्रमाणः, एवमुत्सण्यामपि आरकपटकं वइयं,
नवरं तत्र व्युत्क्रमेण आरका भवन्ति, यथा प्रथमो दुःपमदुःपमः, द्वत यो दुःपम इत्यादि । उत्सर्प कालः श्रमेधाss-
एर्बलादिभिः क्रमेण वर्धमानः, अवसणकालश्च रेख लक्ष मेधाऽऽयुर्बलादेभः क्रमेण हयमानः । उत्सर्पण्यवस-
समुदायाऽऽत्मको वंशतिकोटाकोर्ट सागरोपमप्रमाणः कालः कालचक्राभिधानः सिद्धान्त प्रोच्यते । गाथाऽन्तती यः
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॥ ३८॥

wi" - ने A M A 卐 V 卐 A 卐 T N कालशन्दस्तेन कालचक्रम् इत्यर्थों गृह्यते, समयपर्ययः कालोऽपि गृह्यते च । ऽऽचार्यपुरंदमचन्द्रपादैः- U 'कालो द्वविधोऽवसण्युत्स विभेदतः । सागरके टेकेट नां वेंशत्या स समाप्यते ॥१॥ अवसण्यां षडरा, उत्स- पेंण्यां त एव विपरताः । एवं द्वादशभररैवेवरे कालचक्र मदम् ॥ २॥ तत्रैकान्तसुपमारश्चतस्रः कोटिकटयः । साग- राणां सुपमा तु तस्रस्तूत्के टेकोटयः ॥३। सुषमदुःषमा रे द्वे, दुःषमसुषमा पुनः। सैका सहस्रैर्वाणां द्वचत्वारेंशतोनिता ॥ ४ ॥ अथ दुःपकविंशतिरन्दसहस्राणि तावर तु स्यात् । एकान्तदुःषमाऽप ह्येतत्संख्याः परेऽपि चपरताः । ५। प्रथमेऽरत्रये मस्त्रिव्येकपल्य चिताः । त्रिलेकगव्यूत्युच्छायास्त्रिद्व्येकदिनभोजनाः । ६ ॥ कल्पद्रुफलसंतुष्टाश्चतुर्थे त्वरले नराः । पूर्वक ट्यायुषः पञ्चधनुःशतसमुछयाः ॥७॥ पञ्चमे तु वर्षशतायुषः सप्तकरोच्छयाः । पुनः षोडशाब्दारषो हस्तसमुछ्याः ॥८॥ एकान्तदुःखप्रचिता उत्सण्यामादृशाः। पश्चानुपूर्व्या वैज्ञेया अरेषु बिल पदस्वपि ॥९।" इति । 卐 अथवाऽतताऽनागतवर्तमान दैत्रविधोऽपि कालः, तत्राप्तताऽनागतावनन्तसमयाऽऽत्मक, वर्तमानस्त्वेकसमयाऽऽत्मकः, a अंतकालाऽपेक्षयाऽनागतकाल ऽनन्तगुणः, अथवा द्वावप्यनागताऽन्त तुल्यावित मतव्ययमपि भिन्न भिन्नयुक्त्या सम्यग् भाति, तत्त्वं तु वलिगम्यम् ।। उक्तस्वरूपोऽयं व्यावहारिककालोऽमूर्तः सार्धद्वयद्वीपाऽन्तर्वर्त एच, यतो न सार्धद्वयीपबहिर्भूतं ज्योतिष्चक्रं भ्रमणा- त्मिकां गतिक्रियां कुरुते, कालस्य समयाऽन्तर्मुहूर्तादेपरिवर्त्तनं तु ज्येतिष्चक्रभ्रमणपरेच्छन्नम् , तस्मात् सार्धद्वयव पब- हिर्वत्पु द्वैपसमुद्रेषु मास-संवत्सरा-ऽयन-युगादिव्यवहारो न प्रचलति, यत्र कुत्रचिदिवसस्तत्र नैरन्तर्येण देवसः, यत्र म 卐 A 卐 A T L 卐 V 卐 A - A 卐 Fi त N S नवताव अनवतत्व A 卐 V ॥३९॥ ॐ A T N रात्रिस्तत्र रात्ररेव, ततः सर्वपसमुद्रेषु देवलोषु स नरकपृर्थापु इत्यादिस्थानेषु आयुःप्रभृतिर्यः सर्टव्यवहारे भवति अवतरते स सार्धद्वय पान्तर्वत्तेपुष्पदन्तयोः परिभ्रमणस्वरूपया ग । एव प्रचलत, उक्तच;-" लेगाऽणुभजप यं जइसचकं भणंति 卐 द्रव्याण टीकायां- अरिहंता । सवे कालविस्सा जस्स गइवरेसनिप्फन्ना" ॥१॥॥१३॥ परिणाम- त्रयोदशगाथा भगवद्रव्यस्य पञ्चाज वद्रव्याणाश्च पृथक् पृथक् स्वरूपं व्याख्यायेदा मध्येद्रव्यपद्कं के द्रव्यं पर- 卐 वाद णामित्वादिभिः कर्तभिः पर्यायैर्युक्त मत प्रश्नावऽकाशं मन से निर्धार्य तस्य समाध्यर्थमम वक्ष्यमाणां गाथामाचार्य आह;- A वर्णनम् ॐ परणामे-व-मुत्तं, सपएसा-एग खित्त-किराय निर-कारण- त्ता, सगय-इयर अप्पवेसे १४ ॥ 卐 टीका;-'परिणाम', ' त्यादिः द्रव्यषद्कमध्ये निखिलानि द्रव्याणि परस्परं समानधर्मणि उताऽन्यथा ?इते विटेच यदं परिणामत्यार्दन सप्रतिपक्षान द्वादश द्वाराणि प्रोच्यन्ते, तद्यथा-पद्सु द्रव्येषु कत द्रव्याण परिणाम न, कत चाऽपरि- 卐 णान? (१)कते ज्वाऽऽत्मकाने कते चावलक्षणाने ?(२) काने मूतने कान्यमूर्तान?(३) काने द्रव्याणि सप्र- देशाने कान च प्रदेशवजेतान्यखण्डस्कंधाऽऽत्मकान ? (४) कते द्रव्याण एकत्त्वसंख्याभाञ्ज कत चाऽन्कत्त्वसंख्य- 卐 पेतान ? (५) षट्सु द्रव्येषु कते द्रव्याणि क्षेत्रस्वरूपाणि (आधारस्वरूपाण) कते च क्षेत्रलक्षणान (आधेयाऽऽत्मकान) 卐 १ (६) कते सक्रयाणि कत चाऽक्रयाणि ? (७) कति नित्यानि कत चाऽनित्यान ? (८) कत द्रव्याणि द्रव्यान्त- 卐 राण क्रियाऽन्तराण' कारणस्वरूपाणि, कते च कारणत्त्वरहताने ? (९) कते द्रव्याणि कर्तृलक्षणाने कते च कर्तृत्व ॥३९ । A G T A V A N 卐 A 卐 MI A ज A 卐 T वयुतान(१०) द्रव्यषट्के कर द्रव्याणे सर्दव्यानि कते च देशव्याने? (११) कते च सप्रदे शत्त्वोऐताने कति चाऽप्रदेशत्त्वधर्मरक्तान? (१२) इंते द्रव्याणां परस्परेण साधर्म्यमवगन्दमयं गाथा प्रर्क सेता ॥ अथैरेषां द्रव्य- सत्कपरिणामित्त्वाऽपरिणामित्त्वप्रभृत नामड्योगाद्वाराणां विवरणं लख्यते, पूर्व तावत्परिणामशब्दो वैवियते-परणमन- मवस्थाविशेषादवस्थाऽन्तरगमनं परणामः, त द्रव्याऽस्तकनयमन परणमनं नाम यत्कथञ्चित् सदैवेत्तरपर्यायरूपं धर्मान्तरमधिगच्छति, नच पूर्वपर्यायस्य सर्वथाऽवस्थानं नाप्टेकान्टेन बनाशः, उक्त प्रज्ञापनाटकाय-"परिणाम ह्यर्था- न्तरगमनं न च सर्वथा व्यवस्थानम् । न च सथा वनाशः परिणामस्तद्वदामिष्टः ॥१ । पर्ययाऽस्तिकनयमन पुनः परणमनं पूर्वसत्पर्यायाऽरेक्षया वनाश उत्तरेण चाऽसता पयरेण प्रादुर्भावः, तथाचा व नयमधिकृत्याऽन्योक्तम्:- " सत्पर्यायेण विनाशः प्रादुर्भावोऽसद्भावपर्ययतः । द्रव्याणां परिणामः प्रोक्त खलु पर्ययनयस्य" । १॥ स च जवपर- णामा वपरिणामाभ्यां द्वविधः, द्रव्येषु षट्स वात्मकं जीवद्रव्यं, अन्यान्य वस्वरूपाणि, अवाऽऽत्मनेषु द्रन्टेषु केवलं पुद्गलद्रव्यमेव परिणाम, इतराण्यशेषाण्यी अज्वरूपाणि धमऽधर्मादीन परिणाम अवस्थाऽन्तरगमनाऽभावाद, १ एतेषां धाऽधर्मादीनां यदपरिणामित्वं प्रत्यपादि तन्निश्चयनयापेक्षया, अन्यथाऽऽपेक्षिकं तु तेषामपि परिणामित्वं, यथा कश्चिन्ना कस्मॅिश्चिद्विवक्षितस्थाने स्थितः तदा तत्रस्थानि धाऽधमऽऽकाशद्रव्याण तत्पुरुपवेशि नि, 'तत्पुरुष वेशेष्टत्वं' स एव परिणामो धर्मादीनाम् । यदा स नरस्तत उत्थाय अन्यत्रोप वेष्टस्तदा वेवक्षतधाऽधाऽऽकाशदेशस्तत्पुरुषविशष्टपरिणाम- राहित्यात् तत्पुरुषविशिष्टत्त्वपर्याय वेयुतः, यत्र च तेन पुरुषेणोपवि स धर्मादीनां देशस्तत्पुरुष वेशेष्टः स एव परिणामः, परिणा- 卐 N 卐 वयुतान 卐 A 卐 T A . 卐 L V ध A 卐 क A 卐 卐 S N ज नवतत्त्व- A सुमङ्गला. र्टकायां- v । ४०॥ 卐 A 卐 T 卐 A N एवञ्च द्रव्यपट्कमध्ये वपुद्गलद्रव्ये परिणामिन, तत्र विपरिणामो दश वधः, पुद्गलपरिणामोऽपि दश विधश्च, तत्राऽऽद अवतन्दै जीवपरिणामो व्याख्यायते,स चैवम्-गतिपरिणामः १ इन्द्रियपरिणामः २ कषायपरिणामः ३ लेश्यापरिणामः ४ योगपर दशब्धि णामः ५ उपयोगपरिणामः ६ ज्ञानपरिणामः ७ दर्शनपरिणामः ८ चारित्रपरिणामः ९ वेदपरिणामः १० । तत्र गम्यते प्राप्यते व- रैयिकादिगतिनामकर्मोदयेनेत गतिः, रैयकत्व-तर्यकत्व-मनुजत्त्व-देवत्त्वपर्यायपरिणतः, गतिरेव परिणामे गतिपरिणामः, ह परीणामः जवस्तं गत्यात्मक परिणामं धर्मान्तरं भजते, यथा कश्चिन्मनुजो वर्तमानाऽवस्थायां मजगतिपर्यायपरिणतः, समारे तु निजायुपि यदा देवत्वेनोत्पन्नस्तदा मनुजपर्यायस्य वनाशः, देवपर्यायस्य चोत्पादः, आत्मद्रव्यस्य च |व्यमिति स गति- परिणामो वस्योच्यते । तथा इन्दति आवारककर्मण क्षयेणाऽनन्तज्ञानदर्शनचा स्त्रयस्वरूपं परमैश्वर्य प्रामरीति इन्द्र आत्मा, तस्येदमन्द्रयं प्राग्व्यावर्णितस्वरूपं, पञ्चविधमिन्द्रियं वेनाऽवाप्यते अत इन्द्रियपरिणामोऽपि जीवपरिणामः, यथै- 卐 केन्द्रयत्त्वपरिणामभाक् कश्चदेलेन्द्रियो निजाऽऽसुपस्समाप्त द्वीन्द्रियत्वेनोऽत्पन्नस्तदा एजेन्द्रियसंज्ञपरिणामस्य विनाशः, द्वीन्द्रियाख्यपर्यायस्योत्पत्तिरात्मनश्च हुवता, एवमग्रेऽपि स्वम पिकयोहम् ।। कपन्त हिंसन्ति परस्परं प्राणिनोऽस्म- निति कपः संसारस्तमयन्ते गमयन्त प्रापयन्त कषाया वक्ष्यमाणस्वरूपाः, कषाय एव परिणामः कपायपरिणाम:, तत्तत्कषायमोहन योदयवर्तिना जवेन तत्तत्कषायोऽनुभूयत इति कषायोऽपि वपरिणामः, यथा धकपायोदयवर्ती 卐 मश्च अवस्थान्तरगमनपरिच्छिन्नः, तच्चाऽत्र प्रत्यक्षमनुवोभूयते, अतस्तेपामपि धाऽधाऽऽकाशद्रव्याणामापेक्षिकं परिणामित्त्वं निर्वाधमिति । अनया रीत्या ' घटाकाशः 'मठाकोशः' इत्यादावपि विज्ञेयम् ॥ 卐 G T A ध V L -- A A 5 + । १ N V A N पत 卐 A वोऽन्तर्मुहूर्तानन्तरं मानकषायोदयवान् सातस्तदा धकषायाऽऽत्मकपरिणामस्य नवृत्तानकषायपरणामस्य चत्पत्तिः । ys आत्मनश्च ध्वत्त्वम् । 'लष्यते श्लष्यते आत्मा कर्मणा सहानरे ते लेश्या, येगाऽन्तर्गतकृष्णादिद्रव्यसाचव्यादात्मनः पु परिणाम विशेपो लेश्या, उक्तश्च-'कृष्णादिद्रव्यसाचिव्यात्परिणाम य आत्मनः स्फटकस्टेव तत्राऽयं लेश्याशब्दः प्रवर्तते ॥ ननु कानि कृष्णाद न द्रव्याणि? उच्यते, इह योगे सत लेश्या भवति, येगाऽभावे च न भवति, तते योगेन सहाऽन्वयव्य- ए 卐 तिरेकदर्शनात् योगनि मेत्ता लेटे नियते, सर्वत्राऽपि तन्निमितत्वनिश्चयस्याऽन्वयव्यतिरेकदर्शनमूलत्वात् , योगनिमित्त-. A तायामपि विकल्पद्वयमवंतरत- के योगाऽन्तर्गतद्रव्यरूपा, येगनिमित्तकद्रव्यरूपा वा ? तत्र न तावद्यगनिमित्तकर्मद्रव्य- 卐 T रूपा, विकल्पद्वयाऽनतिक्रमात् , तथाह:-योगनिमित्तकद्रव्यरूपा सरी घातिकमद्रव्यरूपा अघतिकर्मद्रव्यरूपा वा ? न तावद्धतिकर्मद्रव्यरूपा, रेषामभाऽप सय गकेवलिन लेश्यायाः सद्भावात् , नाण्यघातिकर्मरूपा, तत्सद्भाऽपि अयेगे- लेवलिन लेश्याया अभावांत, : पारेशेष्याद् ये गाऽन्तर्गतद्रव्यरूपा प्रत्येया, तानि च ये गान्तर्गतानि द्रव्याणि यावत्क- 卐 पायांस्तावत्तेपामप्युदयोपबृंहकाण भवन्ति, दृष्ट येगाऽन्तर्गतानां द्रव्याणां कषायदयपबृंहणसामर्थ्यम्, यथा पत्तद्रव्यस्य, ) तथाहि-पित्तप्रकोपं वशेषादुपलक्ष्यरे महान् प्रवर्धमानः केपः, अन्यच्च बाह्यान्य पे द्रव्याणि कर्मणासुदयक्षय पशमाऽऽदहेतव- 卐 उपलभ्यन्तै, यथा ब्राह्मयषधिर्ज्ञानावरणक्षय पशमस्य, सुरापानं ज्ञानावरणदयस्य, कथमन्यथा युक्तायुक्तविकविकल पजा- यते, दधिभोजनं निद्रारूपदर्शनावरणोदयस्य, तक ये गद्रव्याणि न भवन्ति ? अप भवन्टव योगाऽन्तर्गतद्रव्याणि । 卐 तेन यः स्थतिपाकविशेषो लेश्यावशादुपयरे शास्त्रान्तरे स सम्यगुपपन्नः, यतः स्थतिपाको नामाऽनुभाग उच्यते, तस्य पुन A L V A A 卐 एन n- - 9 N D भनवतत्त्व- 卐 A 卐 V U टीकायां- इति M ॥४१॥ A A 卐 T N निमित्तं कषायोदयाऽन्तर्गतकृष्णादिलेश्या परिणामाः, ते च परमार्थतः कषायस्वरूपा एव, तदन्तर्गतत्वात् , केवलं 1 अडीवतत्त्टे योगाऽन्तर्गतद्रव्य सहकारीकारणभेद चिन्याभ्य ते कृष्णादि दैभिन्नास्तारतम्यम्देन वचत्राश्चोपजायन्ते, रेन यद् लेश्या- भगवता कर्मप्रकृतिकृता शवशाऽऽचार्येण शतकाऽऽख्ये ग्रन्थेऽभहतं " ठेइ अणुभागं कसायओ कुणइ परिणाम- तदपे सीनमेव, कृष्णादिलेश्यापरणामानामप कषायोदयाऽन्तर्गतानां कपायरूपत्त्वात् , रेन यदुच्यते कैश्चिद्- योगपरिणामत्त्वे लेश्यानां "जोगापय डिपएसं ठइ अणुभागं कसायओ कुणइ" इति वचनात् प्रकृतिप्रदेशवन्धहेतुत्त्वमेव स्यान्न कर्म स्थतिहेतुत्वमिति, तदपि न समोच्नं, यथोक्तभावार्थापरज्ञाना, अपि च न लेश्याः स्थितिहेतवः, केंड कपायाः, लेश्यास्ट कषायोदयाऽन्तर्गता अनुभागहेतवः, अत एव च " स्थतिपाकविशेषस्तस्य भवति लेश्याविशेषण" इत्य- त्रानुभागप्रतिपत्त्यर्थं पाकग्रहणं, एतच सुनिश्चतं कर्मप्रकृति कादिषु, ततः सिद्धान्तपरिज्ञानमपि न सम्यक्तेपामस्त, यदप्युक्तं-कर्मनष्यन्द लेश्या, निष्यन्दरूपटे है यावत्कषायोदयस्तावन्निष्यन्दस्याऽी सद्भावात् कर्मस्थतिहेतुत्त्वमी क १ कषायोदयसहचारिणः कृष्णादिलेश्यापरिणामा अनुभागबन्धहेतव इत्यर्थः । 卐 १ कर्मप्रकृत बन्धनकरणे ' एकेक्कम्मि कसायोदयम्मि' इतिगाथाटीकायाम्:--एकैकस्मिन् कपायोदये स्थितिस्थाननिवन्ध- नभूते नानाजीवाऽपेक्षयाऽनुभागबन्धाऽध्यवसायस्थानानि कृष्णादिलेश्यापरिणामविशेषरूपाणि “ सकपायोदया है कृष्णादिलेश्यापरे- 卐 णामविशेषा अनुभाग बन्धहेतव " इतिवचनात् असंख्येया लोका भवन्ति असंख्येयलोकाऽऽकाशप्रदेशप्रमाणानि भवन्तीत्यर्थः कर्म- प्रकृति-मलयगिरीयवृत्तिर्मुद्रिता-गाथा-५२-पत्र ४० ne i A G T i V i A L A 卐 S ॐ N A ध V A N युज्यरे एवेत्यादि तदप्यश्लील, लेश्यानामटुभागबन्धहेटतया स्थतिबन्धहेटुत्त्वाऽयोगाद, अन्यच्च-कर्मनिष्यन्दः किं कर्मकल्क कर्मसारः ? न तावत्कर्मकल्कः, तस्यासारतया उत्कृष्टाऽभागवन्धहेतुत्वाउपपत्तिप्रसक्तेः, कल्के है असारे भवति, असारश्च कथमुत्कृष्टानुभागबन्धहेतुः ? अत्र च उत्कृष्टानुभागबन्धहेतवोऽी भवन्त अथ कर्मसार इत पक्षस्त हैं कस्य 필 कर्मणः सार इति वाच्यं ? यथायोगमष्टानामति चेदष्टानामपे कर्मणां शारे वेपाका वर्ण्यन्ते, न च कस्यापि कर्मणे । लेश्याऽऽत्मके विपाक उपदर्शतः, ततः कथं कर्मसारपक्षो जाघट त ? तस्मात् पूर्वोक्त एव पक्षः श्रेयान् इत्यङ्ग कर्त्तव्यः, की पूज्यहरेभद्रसर भर प तत्र तत्र तथैवाङ्ग कृतत्त्वादेिते॥ यथा सप्तधातुव्यतिरिक्ता वातपित्तकफात्मिकाऽऽहारपरिणतिरुपजायरे A तद्वन्मने वाकाययेगपरिणामव्यतिरिक्ता लेश्यालक्षणा ये गद्रव्यपरिणतिर प सञ्जायते, नर सिद्धान्ते यगद्रव्याणां येगत्रय- 卐 परिणामवल्लेश्यापरिणामः कथं नेक्त इते चेद् वातपित्तकफलक्षणाऽऽहारपरिणतेरवश्यंभावेऽपि गृह ताऽऽहारस्य सप्त- 卐 धातत्त्वेन परिणाम एव लेवलं शारु यथा श्रूयते तथाना लेश्यालक्षणय गपरिणामसद्भाऽी गृह तमनवाकाययेग- द्रव्याणां मनवाकाययोगत्वेन एव परिणामः सिद्धान्रे पियरे, नचात्र काचिदनुपपत्तिः, एव योगान्तर्गतद्रव्यत्त्वमपि लेश्यानां सम्यगुपपद्यत इति मे मतः, तत्त्वं केवलगम्यमिति ॥ कृष्णाददभिन्नायामस्यां कस्याञ्चल्लेश्यायां वर्तमान व विवक्षितलेश्यातो लेश्यान्तरं गच्छति तदा विवक्षितलेश्यापरणामस्य विनाशः, अन्यतरलेश्यापरिणामस्य चोत्पादः, जवस्य च चत्वमते । यगस्तत्त्वत अंदारिका दशरेरसंये गसमुत्थ आत्मपरिणामविशेषव्यापारः, तद्यथा; अंदारका दशवर- क्तस्याऽऽत्मने परेणतिविशेषः काययगः, तथदारक क्रयाहारकशरीरव्यापाराहृतवागद्रव्यसमूहसाचिच्याउ चव्या- 1 ज 卐 T 卐 A 卐 T 卐 V G A । 卐 A A ܥܘܡܪܐ 卐 N S 卐 M परिणामि- - T N अवतस्ते भनवतत्त्व A पारो वाग्योगः, तथंदारक क्रेयाहारकशरव्यापाराहृतमनोद्रव्यसमूहसाचिव्या वव्यापारो मनोयोगः, स च योगस्त्रिविधः, U सुमङ्गला- gs मनोवाकायलक्षणभेदात् , विमृते न कश्चिदपि द्रव्यं मनोवाकाययोगवत् , अतोऽयमपि योगपरिणामो जीवपरिणामः । संज्ञ- ) द्रव्यानां र्टकायां- v पञ्चेन्द्रियादिपु केपुचिङीवस्थानेषु त्रयाणामपि योगानां सत्ताऽपेक्षया सद्भावेऽपि विवक्षिताऽनेहसि त्रयाणां योगानां समys कालं व्यापाराऽपेक्षयाऽभावात् एक एवाऽन्यतमः कश्चिद् योग चर्र वर्त्तते, यदाऽन्तहर्ताद्यनन्तरं योगपरावृत्तिस्सज्जायते तदा ' वाद- ॥४२॥ A पूर्वर त्या योगपरिणामस्य विनाशत्पाद आत्मनश्च |व्यं स्वयमेव परभाव यम् ॥ उपयुज्यते सामान्यतया विशेषतया A स्वरूपम् । वा वस्तुतत्त्वपरिज्ञानाऽर्थमित्युपयोगः, स च द्वादशप्रकारकः प्राग्व्याख्यातस्वरूपः, उपयोगपरिणामऽपि 5वं विहाय न 卐 नचिह्नव्येणोररोक्रियते ततः सोऽपि वप रणामः, परिणामित्वं चास्य मतिज्ञानोपयोगनो श्रुतज्ञानोपयोगं गतस्याऽत्मनो 5 मतज्ञानोपयोगश्रुतज्ञानोपयोगाऽऽत्मनां यथासंख्यं विनाशोत्पादवत्वाऽपेक्षया विज्ञेयम् । ज्ञायते वस्तुतचं परिच्छिद्यतेऽनेन तज्ज्ञानं मत्यादभेदभिन्नं पञ्चप्रकारकमष्टकारकं वा, ज्ञानमेवपरिणामो ज्ञानपरिणामः, सोऽपि वं विनाऽनन्याऽऽधारत्वात् जोवपरिणामः, ज्ञानोपयोगयो दत्त्वं प्राग् व्यावर्णेतमतो नात्र स्पष्ट कुर्मो वयम् , परिणामित्वं च मतिज्ञानश्रुतज्ञानवतः ध सम्यग्दृष्टेजीवस्य मथ्यात्वयोगात् मत्यज्ञानं श्रुताऽज्ञानं जायते तदा अथवा घातिकर्मक्षपणाऽनन्तरं केवलज्ञान- 卐 5 स्योत्पादे ‘नट्ठम्म छाउमथिए नाणे' इति वचनात् मतिज्ञानश्रुतज्ञानयोर्विनाशे च जाते वनाशोत्पादध्रुवत्व-- 卐 १ मत्यज्ञान-श्रुताऽज्ञान-विभङ्गज्ञानात्मकाऽज्ञानत्रिकप्रक्षेपादष्टकं ज्ञानस्य । A G T A V L ॐ ॥४२॥ A 卐 卐 IY 卐 A 卐 卐 सुज्ञेयम् । दृश्यते सामान्यतया वस्तुतत्त्वाऽवबोधो जायते येन तद्दर्शनं, चक्षुर्दर्शनाऽचक्षुर्दर्शनाऽवधिदर्शनकेवलदर्शन दैव- तुधम् , ज्ञानपरिणामवदयं दर्शनपरिणामोऽपि जीवपरिणामः, टेष्टेव दृश्यमानचात्तस्य, परीणामत्पादनाशव- ध त्वानि च पूर्ववद् बोध्यान, । चर्यते गम्यते सर्वकर्मक्षयं विधाय महानन्दस्थानखरूपं मोक्षं प्रति ऐन तच्चारित्रम् , तच सामायिकाददैः पञ्चविधं वक्ष्यमाणस्वरूपं, अस्य चारित्रस्याऽऽत्मनो गुणत्त्वात् वपरिणामत्त्वं सुख्यातम् । सामायिक- 卐 चारित्रः छेदोपस्थापन यचारित्रो वा परिहार विशुद्धिसंज्ञकं चारित्रं सूक्ष्मसंपरायं यथाख्यातं वाऽवामोत, अथवा अपशमिका सूक्ष्मसंपरायाद् यथाख्याताद् वा पतित्वा छेदोपस्थापन्य सामायिकं संयम वा याति तदा त्पां चारित्राणामुत्पाद विनाशारे- 卐 क्षया आत्मनश्च ध्रुवतया परिणामित्त्वं चिन्त्यम् । वेद्यतेऽनुभूयते कामाऽऽसक्तित्त्वं रेन स वेदः पुंवेद-उद-नपुंसकव्दात्मकर- दैविप्रकारकः, अमुं वेदं वा एवाऽनुभवन्ति, ना वा अतस्सोऽपि जवपरिणामः, विवक्षितवेदोदयात् वेदोदयाऽन्तरमुप- जायते तदा परिणामित्त्वमुत्पत्तिविनाश, व्यापेक्षिकमिति ॥ दशविध ऽप्ययं परिणामः कर्मोपाधिजन्यस्वरूपः प्रायोगिको न तु जीवस्य स्वस्वभावजः, अत एव पूर्वोक्तदश विधजीवपरिणामाऽपेक्षया सिद्धानामपगतकर्माप्रपञ्चानामपरिणामित्वं सुतरां E प्रत्यते । ननु सद्धानामपि प्रतिसमयं ज्ञानोपयोगदर्शनोपयोगयोः परावृत्तिस्सञ्जायते, यतो यस्मिन् समये ववक्षितसिद्धः लेवलज्ञानोपयोगपरिणतः तत्समयाऽनन्तरं तस्य विवक्षित सिद्धस्य केवलदर्शनोपयोगपरिणतत्त्वात् अवस्थाऽन्तरं जातं, 卐 १ परिणामित्त्वविपये यया रीत्या परिणामित्वं उदलेखि तयैव रीत्या तद् भवतीत्येवं न विज्ञेयं, प्रकाराऽन्तरैरपि परिणामित्त्वं भावयितुं शक्यते, ग्रन्थगौरवभयान्निखिलप्रकाराणां नाऽत्र प्रदर्शनं कृतं, शेमुपीवद्भिस्स्वधिया परिभावोयम् ॥ 卐 A 卐 N A T 卐 G A T ज L V 卐 A >y ८ ue चा 卐 N S 卐 U नवतत्त्व- A सुमला ई.कायां- अजवतरटे जैव- परिणाम- वर्णनम् V M 卐 ॥४३॥ ॥ A 卐 T परिणामश्च अवस्थाऽन्तरास्लिक्षणः, अत्राऽपि केवलज्ञानोपयोगाऽऽत्मकस्य पूर्वपरिणामस्य विनाशः, केवलदर्शनोपयोगपरि- णामस्य चोत्पादः, आत्मनश्च ध्रुवत्त्व मिति सद्धस्याऽपि परिणामित्त्वं संघटते, परिणामित्त्वं च भवद्भिः कर्मपाधिजन्यं व्याख्या- यते, कात्र समाधत्तिः ? उच्यते-सिद्धानामुपयोगाऽपेक्षया या परावृत्तिर्जायते सा न कर्मपाधिजन्या, वस्याऽनन्तज्ञानाऽन- न्तदर्शन गुणभूत , एतयोरुपयोगप्रवर्त्तनं प्रतिसमयमित वस्य स्वभावो न तु परभावः, यदाऽयं वः कर्मप्रपञ्चपरिकलित आरीत्तदा न प्रतिसमयापयोगपरावृत्तिरभूत नाप्यनन्तज्ञानदर्शने चावरभूताम्, सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राऽऽत्मकरत्नत्रय्या- राधनपूर्वक कर्मक्षयो यदा सजातस्तदा प्रादुर्भूताचेतावनन्तज्ञानदर्शनलक्षणावात्मरण, ततोऽन परावृत्तिस्स्वभावजा न तु कर्मजन्या । अपि चाऽस्मिन् प्रकरणे यत् परिणामित्त्वं तच्च दश विधं, यदि सिद्धानां ज्ञानदर्शनोपयोगपरावृत्त्यपेक्षया परिणा- मत्त्वं गण्यते तदा उपयोगलक्षणमेकविधमेव परिणामित्वम् , ततोऽपि पूर्वव्याख्यातं दश वधं परिणामित्त्वं अत्र न घटत इति । उक्तो ज्वपरिणामः ॥ अथाजवपरिणामः-स च दशविधः पुद्गलपरिणामाऽऽत्मकः, तद्यथा-बंधनपरिणामः १ गत- परिणामः २ संस्थानपरिणामः ३ दपरिणामः ४, वर्णपरिणामः ५ गन्धपरिणामः ६ रसपरिणामः ७ स्पर्शपरिणामः ८ अगुरुलछुपरिणामः ९ शब्दपरिणामः १० । तत्र तावदाद बन्धनपरिणामो व्याख्यायते, स चैवम् समगुणस्निग्धस्य परमाण्यादेः समगुण स्नग्धेन परमाण्यादिना सह सम्बन्धो न भवति, तथा समगुणरूक्षस्याऽप परमाण्यादेः समगुणरूक्षेण परमावादिना सह सम्बन्धो न भवति, किन्तु यदि स्नग्धः स्निग्धेन रूक्षः रूक्षेण सह वपमगुणो भवति तदा विपममात्रत्त्वात्तेषां परस्परं सम्बन्धः। अयं बन्धनपरिणामोज वपरिणामः यतो न जवप्रदेशानामसंख्येयलोकाऽऽकाशप्रदेशप्रमाणानां बन्धनपरिणाम उप- N G 卐 y A ज T 卐 V 卐 ध L. ॥४३॥ A A 卐 S N U A 卐 M ॥ स्थापना- चित्रम् ॥ V आत्मप्रदेश श्रेणयः 卐 A .. A जायते कदाचिदपि तेषां पृथक्त्वाऽऽभावात् । नड यदा क्रियल ब्धिना आहारकलब्धिना वा क्रियशनेराणि अने- 卐 कसंख्यात्मकानि आहारकशनरं वा विकुळते तदा एक चस्याऽपि विभिन्नानि शरीराणि प्रत्यक्षरुपलभ्यन्तै, * शरेराणां विभिन्नत्वे च आत्मप्रदेशानां सुतरां वभिन्नचं, कथरच्यरे आत्मप्रदेशानां पृथक्त्वाऽभावत्वमिति, #वम् , 卐 यतो वै क्रियादिलब्धिविरचितशराणां पृथक्त्वेऽपि नात्म- प्रदेशानां पृथक्त्वम् , यत्र मूल(भवधारणय)शरीरं तत नत्य मूलशरराऽवगाहप्रमाणा तस्यैव जीवस्य आत्मप्रदे- शश्रेणय विकुर्वतशरीराणि यावदनुगच्छन्ति, आत्मप्रदे- 卐 शानां संकेचविकासात्मकत्त्वातदनुपपन्न, तस्मान्नाऽऽ- त्मप्रदेशानां पृथक्त्वमपि वपृथक्त्त्वमेति ॥ गतिपर- 卐 णाम द्विविधः, स्पृशद्गतिपरिणामऽस्पृशद तपरिणामथ, तत्र द्रव्यान्तरं स्पृशते ये गतिपरिणामः स स्पृशगतपरि- आत्मप्रदेश श्रेणयः आत्मप्रदेश श्रेणयः N मूल- शरीरम् । R વિશ્વત शरीरं T G A 1 માત્મપ્રદેરી श्रेणयः 卐 A T L V विकृत शरीरं 卐 A A गा। N S अजवतत्वे U निवतत्त्व- सुमला- र्टकायां- 卐 A 卐 V पुदल- M 卐 परिणाम- ॐ वर्णनम् ॥४४॥ A T णामः, यथा ठिक रिका जले तथाप्रयत्नेन प्रक्षिप्ता सती जलस्याऽपान्तराले जलं स्पृशन्ती गच्छति, वालजनप्रसिद्धमेतत् तथाऽस्पृशतो गतिपरिणामोऽस्पृशद्गतिपरिणामः, यद्व्यं न लेनाऽपि सहाऽपान्तराले संस्पर्शनमनुभवति तद्व्यस्याऽस्पृ- शद्दतपरिणामः ॥ पुद्गलद्रव्याणां पारिमण्डल्यादिसंस्थानपञ्चकमध्ये केनाऽपि संस्थानेन वरचनं स संस्थानपरिणामः । स्कंधा- ऽवस्थानेनाऽवस्थितानां पुद्गलद्रव्याणां यो दः स दपरिणामः । पुद्गलद्रव्येषु पञ्चप्रकारकवर्णानामुत्पत्तिः स वर्णपरिणामः। पुद्गलेषु गन्धस्योत्पत्तिः स गन्धपरिणामः । तेष्वेव पुद्गलेषु पञ्चप्रकाराणां रसानामुत्पत्तिः स रसपरिणामः । पुद्गलेष्वष्टप्रकार- कस्य स्पर्शस्योत्पादः स स्पर्शपरिणामः । पुद्गलपरमाणुपु गुरुत्व-लघुत्त्व-गुरुलघुत्त्व-अगुरुलघुचानामुत्पत्तिः सोऽगुरुलछुप- रिणामः । पुद्गलेषु तेन तेन प्रकारेण शब्दानामुत्पत्तिः स शब्दपरिणामः । इत्युक्तप्रकारेण पुद्गलद्रव्यं दशविटः परिणामैयुक्त- चात् परिणाम, अन्याने चत्वार्यप्य चद्रव्याणि परिणामवर्जितानि । अतः पट्सु द्रव्येषु द्रव्ययुग्मं विपुद्गलाऽऽत्मकं परिणामि, शेपं धर्माऽधाऽऽकाशकाललक्षणं द्रव्यचतुष्कमपरिणामि ॥ पद् द्रव्येषु एकं जीवद्रव्यं जीवस्वरूपं, शेषाणि पञ्चाप्यवस्वरूपाणि ॥ मूर्त्तत्त्वपरीक्षायां पुद्गलद्रव्यमेकं मूतमत् , शेपाणि पश्चाऽप्यमूर्चान, वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शा यस्मिन् विद्यन्ते तन्मूर्त, तेषां वर्णगन्धादीनां यस्मन्नभावस्तदमूर्तम् । सप्रदेशि-अप्रदेशिनोः परिप्रश्ने धाऽस्तिकायाऽधाऽस्तिकायाऽऽकाशाऽस्तिकाय वाऽस्तिकायपुद्गलाऽस्तिकायाऽऽत्म- काने पञ्चद्रव्याणि प्रदेशसमूहोपेतान, अवशिष्टं कालद्रव्यं प्रदेशवर्जितं, अस्तिकायत्त्वाऽभावात् । पसु द्रव्येषु एकत्त्वाऽन्कत्त्व- १ जीवस्तु स्वस्वरूपाऽपेक्षयाऽमूर्त इत्यत्र स्वस्वरूपं चिन्तितमस्मिन् मूर्ताऽमूर्तविपये । 卐 N 卐त A 卐 T 卐 V 卐 A ॐ 1 L 卐 A 卐 卐 ॥४४॥ A 卐 - S N A V A 卐 योरनुयोगे धर्माऽधाऽऽकाशास्तिकायानां प्रत्येकमेकैकत्वम् , पुद्गलानामानन्त्यं सुवेख्यातमतो पुद्गलद्रव्यमानन्त्यभाक्, । लोके काष्ठपुस्तादीन्यनन्तान पुद्गलद्रव्याणि, जीवद्रव्याण्यष्यनन्तान, पृथि कायिकादीनामसंख्यातत्वेऽपि नेगोदवः- 卐 जीवानामानन्त्यात् । कालस्तु अनन्तत्त्वोपेतः, ( अटीताऽनागतकालाऽपेक्षया ) अनन्तसमयाऽऽत्मकत्वात्तस्य । द्रव्यषले कति द्रव्याणि क्षेत्रमिवाऽऽधारभूतानि ? कति च वीजमिवाऽऽधेयतया स्थतान ? इति चिन्तायां केवलमाका- 1) शास्तिकायाख्यं द्रव्यं क्षेत्रमिवाऽऽधारभूतं, अन्याने पञ्चाऽपि आधेयतया स्थितानि । अयमत्राऽऽशयः;-आकाशं विरहय्य शेषाणि पश्चापि द्रव्याणि अवगाहदानस्वभावे आकाशे आधेयतया स्थितानि, तत आकाशः क्षेत्रं, शेषाण क्षेत्र णि ॥ द्रव्येषु ॐ सक्रियाऽ क्रियद्रव्यचिन्तायां यद् द्रव्यं गत्यादिक्रियोपेतं तत् सक्रिय, अन्यदक्रिय, द्रव्येषु षट्सु वपुद्गलाऽऽस्टे द्रव्ये सक्रिये, गत्यादिक्रियाकर्तृलक्षणत्वात्तयोः, शेषाणि निष्क्रियाणि धर्माऽधाऽऽदीनि चत्वार । नित्यानित्ययोः परिप्रश्ने यद् द्रव्यं 卐 नैरन्तर्येण एकस्यामवस्थायामेव वर्तते तन्नित्यं अन्यदनित्यं, षट्सु द्रव्येषु व्यवहारनयमङ्गीकृत्य जीवपुद्गले अनित्ये, यतो जोवः स्वकर्माऽनुसारतो गत्या गत्यन्तरं परिभ्राम्यति, देवपर्यायं वहाय मनुजपर्यायं विभर्ति, मनुजत्त्वं च त्यक्त्वा तिर्यक्त्वं 卐 दधाति, इत्थं पर्यायनयापेक्षयेदमनित्यत्त्वं, द्रव्यास्तिकनयापेक्षं तु वोऽपि नित्य एव । एवं पुद्गलद्रव्यमपि परमाणुचं वर्ज- येत्वा स्कन्धत्वमादत्ते, लिवर्णाऽऽत्मकं पर्यायमुज्झित्त्वा शुक्लवर्णपर्यायमङ्गीकुरुते, अत एतदपि पुद्गलद्रव्यं पर्यायनयाऽपेक्ष- 卐 यानित्यम् । निश्चयनयेन तु षड् द्रव्याण्यपि नित्यानि अनित्यनि च, तद्यथा;-धर्माऽस्तिकायद्रव्यं अमूर्त्तत्वाऽ-चेतनत्त्वा- । क्रियत्त्व-गतिसहायकत्वादिगुणैनित्यं, देश-प्रदेशा-गुरुलघुपर्यायैरनित्य । अधर्माऽस्तिकायद्रव्यममूर्त्तत्वा-क्रियत्त्वा- ) T G 卐 A A T T y V ध A N S नवतत्व- 卐 A 卐 V अवतन्द द्रव्यपके नित्याs- कायां- 卐 M 1॥४५॥ ध नेत्य- A T ऽचेतनत्त्व-स्थतिसहायकत्वादिभिर्नत्यं, देश-प्रदेशाऽ-गुरुलघुपर्यायैरनित्यम् । एवमाकाशद्रोऽपि योज्यम् । नवरं गतिस्थिति- सहायकत्वस्थानेऽवगाहदायकत्त्वं ज्ञेयम् । तथा कालद्रव्यं अमूर्त्तत्वा-ऽचेतनत्वाऽक्रियत्वैवर्तनादिलक्षणैश्च नित्यं, अर्तताऽना- गत-वर्तमानाऽपेक्षयाऽनित्यम् । तथा चद्रव्यं ज्ञान-दर्शन-चारित्र-चर्याद्यैर्गुणैरमूर्त्तवादिभिः पर्यायैश्च नित्यं, देवत्व-मनु- जत्वादिभिरनित्यं । पुद्गलद्रव्यमपि मूर्तत्त्वाऽचेतनत्त्वादिभिर्नित्यं, परमाणुत्त्व-स्कंधत्त्वाऽऽदिभिः पर्यायैरनित्यम् ॥ ननु सद्धावस्था समापन्ना वा सिद्धत्त्वमाश्रित्य नत्या आहोश्चिदनित्याः? उच्यते-अनित्या इति, यतो यन्नित्यं तन्नियमादनाद्यनन्तं स्यात् सिद्धत्वं तु नैवम् , अदम्पयं-सद्धजवानां वत्त्वं तु पूर्वोत्तर त्या नित्यं सद्धत्त्वं तु न तथाप्रकारं, यतो विवक्षितकाले सिद्धत्वस्योत्पादः, सिद्धिशिला तु शाश्वत ॥ ननु जिनविम्ब-जिनचैत्य-सुमेरुप्रभृत नि यानि यानि लोले शाश्वतान वस्तून तान नित्यानि उताऽनित्यानि ? अत्राऽऽह-जगत्यां ये रे शाश्वताः पदार्थास्ते आकारमात्रण प्रमाणमात्रेण वा नित्यानि, यतस्तेषामाकारे प्रमाणे वा कालाऽन्तरेऽपि न तारतम्यं स्यात्, परं पुद्गलद्रव्यमाश्रित्यानित्यान, यतः कारणात् प्रतिसमयं तेभ्यः शाश्वतद्रव्येभ्योऽनन्ताः पुद्गलपरमाणवः पृथक् भवन्ति, अनन्ताश्च तत्र गत्त्वा सम्मिलन्ति, अत आकारे न भिन्नता, परं पुद्गलद्रव्याणां नैरन्तणाऽवस्थानस्याऽभावः, आकारः शाश्वतः पुद्गलद्रव्यं तत्रस्थमशाश्वतमेवेत्यर्थः । द्रव्येषु पद्सु कतमद् द्रव्यं कारणात्मकं, कतमच कारणतावर्जितमित्यनुयोगे इदं ज्ञेयम्-यद् द्रव्यं द्रव्यान्तराणां कार्येष्प- युज्यते तत् कारणखभावाऽऽत्मकं, यच्च द्रव्याऽन्तरक्रियासु कारणत्त्वेन नोपयुज्यते तत् कारणताऽपेतम् । विना वद्रव्यं धर्माऽधर्माऽऽकाशदिद्रव्यपञ्चकं कारणत्त्वोपेतं, उवद्रव्यं त्वकारणाऽऽत्मकं, यतो धर्माऽस्तिकायो वपुद्गलानां गति- A विभागः ज N 卐 A T A V ज L 卐 A 卐 A 卐 ॥४५॥ Inre/ S N 卐 A M V A A परणामपरिणतानां गमनक्रियायापकारकः, अधर्माऽस्तिकायः स्थितिपरिणामपरिणतानां वपुद्गलानां स्थत्युपकारकः, आकाशास्तिकायो उ वपुद्गलानामवगाहदायकत्त्वेनोपकारकः, पुद्गला स्तकायो वस्य शरेर-वाङ्-मनः-प्राणापान-सुख- 卐 दुःख-जीवित-मरणादिषूपकारकः, कालद्रव्यं तु वस्य वर्तनादिपर्यायेषूपयुज्यते, उक्तञ्च विविधज्ञानवितरणकल्पशखि- कल्पः मद्भिरुमाखातेसूरप्रकाण्डैस्तत्त्वार्थसत्रे-"गतिस्थित्युपग्रहो धर्माऽधर्मयोरुपकारः (त०५-१७)" " आकाश- 卐 साऽवगाहः ( त०५-१८)"" शरेरवाङ्मनःप्राणाऽपानाः पुद्गलानां ( त०५-१९)"" (त०५-२०) "" वर्त्तना परिणामः क्रियापरत्त्वाऽपरत्वे च कालस्य ( त०५-२२)" इत्यादि ॥ एवमुक्तप्रकारेण उव- द्रव्यं प्रति पश्चापि धर्माद ने द्रव्याण उपकारकतेन कारणद्रव्याण, जीवद्रव्यं तु द्रव्यान्तरं प्रत उपकारत्त्वाऽभाववद् अतोऽकारणद्रव्यम् । ननु बद्रव्यं प्रति यथाऽन्याने द्रव्याण्युपकारका णि एवं पुद्गलद्रव्यं प्रत्यप्युकारकाण दृश्यन्तै, अते जीवद्रव्यमेव पुद्गलद्रव्यमपि कारणतावर्जितं भवेदिते ? कथं जीवद्रव्यमेकमेव तादृक् प्रतिपाद्यरे ? सत्यं, पुद्गलद्रव्यं प्रति A विद्रव्यमिव द्रव्याऽन्तराण्युपयुज्यन्ते परं पुद्गलद्रव्यं स्वयमपि जीवद्रव्यरुपकुरुते, अकारणद्रव्यं तु तत्प्रोच्यते यत् स्वयं द्रव्याऽन्तरं प्रत्यनुपकारकं सत् स्वं प्रति द्रव्याऽन्तराणि उपकारकाणि भवेयुः, जीवद्रव्यं वेतत्स्वरूपं, न तु पुद्गलद्रव्यं, यतः पुद्गलाऽस्तिकार्य प्रति अन्यान द्रव्याण्युपकारकाणि सन्त्यपि जीवद्रव्यं प्रति स्वस्य पग्राहकत्वेन तस्याऽकारणद्रव्यर्च परor भावन्त्यम् । ननु धमऽिधर्माद न द्रव्याणि द्रव्याऽन्तरं प्रति यथेपकारकाण, एवं जीवद्रव्यं किञ्चिद्व्यं प्रति उपग्रहकारकमस्ति न वा ? उच्यते--" परस्परोपग्रहो जवानाम् ” इति तत्त्वार्थस्त्रोक्त्यनुसारेण डीवद्रव्यं चद्रव्यं 卐 y N T 卐 G ज A T L 卐 A A - N A M A 卐 S 3 नवतत्त्व प्रति अस्त्युपकारकं परस्पराऽपेक्षया, परं कारणादिद्वाराणां परप्रत्ययकत्त्वान्नास्त्यत्र विरोधः ॥ अथ षट्सु द्रव्येषु अजवतत्वे उमाला- कतिसंख्यानि द्रव्याणि कर्तृलक्षणानि कति चाऽकर्तृण ते चन्तायां यद् द्रव्यं द्रव्यान्तरस्य क्रियां प्रति अधिकारवत् द्रव्यपक टकायां- v तत् कर्तृत्त्वोपेतं, यच्च द्रव्यान्तरस्य क्रियां प्रत्यनधकारि तत् कर्तृत्त्ववियुतम् । " क्रियां करोतत कर्ता " इति कर्तृत्वादि- 3 सामान्यशब्दव्युत्पत्यनुसारेण तु यद्यपि पण्णामपि द्रव्याणां कर्तृत्त्वं, तथाऽप्यस्मिन् प्रकरणे सर्वेषां द्रव्यान्तराणां खा- भागः।। A मेत्त्वेनोपभोक्तृ तत् कर्तृलक्षणम् । पसु द्रव्येषु धर्माधर्मादिद्रव्याणां गतिसाहाय्यकादिगुणानामुपभोक्ता जीवः, ततो वि- 5 द्रव्यं कर्तृत्वोपेतम् , द्रव्यान्तराणि कर्तृत्ववर्जितान्त्यर्थः॥ द्रव्येषु सर्वव्यापित्त्वदेशव्यापित्त्वविचारणायां यद् द्रव्यं सर्वाऽव- | गाहं व्यामोति तत् सर्वव्यापि, यच्चाऽवगाहस्यैकदेशं व्याप्य तिष्ठते तद् देशव्यापि, आकाशाऽस्तिकायं वरहय्य चत्वारोऽप्य- N स्तिकायाचतुर्दशरज्जुपरिमितलोकाऽऽकाशं व्याप्य स्थिता अतस्तानि चत्वार्य द्रव्याणि देशव्यान, कालोऽपि सार्धद्वय- ॥ पान्तत्त्विाद् देशव्यागे, आकाशद्रव्यं सर्वव्यापित्त्वात् सर्वव्यापि, इत्थं द्रव्यपदकमध्ये आकाशद्रव्यमृरे शेषाणि पश्चाऽपि देशव्यापनि, आकाशस्तु सर्वव्या ॥ सप्रवेशवाऽप्रवेशित्त्वयोरयोगे-विवक्षितद्रव्यस्य द्रव्यान्तरतया यत् परिणमनं स 卐 प्रवेशः, सोऽस्यास् ति तत् सप्रवेशद्रव्यं, यच्च कदाचिदपि द्रव्यान्तरत्वेन न परिणमते परं स्वरूपतयैव तिष्ठति तदप्रदेशद्रव्यं, धर्माऽधादिषु पद्सु द्रव्येषु सर्वाण्यपि अप्रवेशिद्रव्याणि यतो न विवक्षितद्रव्यं स्वरूपं त्यक्त्वा द्रव्यान्तरतया परिणमरे । 卐 इत्येवं संक्षेपतः ' परिणा' त गाथायामुक्तानि द्वाराणि विवृतान, विशेषस्तु प्रज्ञापनादिमहाशास्त्रसमूहाद्विले कन्यः॥ 卐 ॥४६॥ A G T A V 卐 L A 卐 A S N ध U A द्रव्यनामानि 卐 ध y or धर्माऽस्तिकायः . ० A २ अधर्माऽस्तिकायः १ १ . १ 卐 A 卐 N 卐 T 'परिणामी'ति गाथायन्त्रकम् ; आकाशाऽस्तकायः or १ . r- --- -- ४ फ्र A १ १ . . ० १ १ on or १ १ 卐 T , w काल: ० ० ० ० ov जीवाऽस्तिकायः १ 卐 G ५ पुद्गलाऽस्तिकायः ज A 卐 इदानीं द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव-गुणा-ऽऽकारलक्षणेद्वारैः कश्चद्विशिष्टतया पड् द्रव्याणि विवियन्ते, तद्यथा-धर्माऽस्ति- L कायो द्रव्यत एकः, क्षेत्रतोलोकाऽऽकाश( चतुर्दशरज्जु )प्रमाणः, कालतोऽनाद्यनन्तः, भावतो वर्णगन्धरसस्पर्शर हतः, ॐ 卐 V 3 A ज an को N 卐 S 卐 V T N भनवतत्त्व- 4 गुणतो गतिसाहाय्यकः, संस्थानतो वज्रसंस्थान यः॥१॥ अधाऽस्तकायो द्रव्यत एकः, क्षेत्रतो लोकाऽऽकाशप्रमाणः, 卐 पद्रव्य कालतोऽनाद्यनन्तः, भावतो वर्णगन्धरसस्पर्शवियुतः, गुणतस्थितिसाहाय्यकः, संस्थानतो वजसंस्थान यः ॥२॥ आका- सुमाला- स्वरूप कायं- ॐ शाऽस्तकायो द्रव्यत एकः, क्षेत्रतो लोकाऽल कमानः, कालतोऽनाद्यनन्तः, भावते वर्णगन्धरसस्पर्शवर्जितः, गुणतोऽवगाह- दायकः, संस्थानतो गोलाकारकः ॥३॥जवाऽस्तिकायो द्रव्यतोऽनन्तस्वरूपः, क्षेत्रत एकं जवमाश्रित्य जघन्यतयाऽङ्गुलाऽ- । ४७॥ ॐ संख्येयभागः, उत्कृष्टस्त्वनेकान् वान् एकं वा विमाश्रित्य लोकाऽऽकाशप्रमाणः, कालतोऽनाद्यनन्तः, भावतो वर्णगन्धरस- A स्पर्शरहितः, गुणतो ज्ञानदर्शनादरणोपेतः, आकृत्या देहाकारकः, ससुद्घाताऽपेक्षया लोकाऽऽकारको वा ॥४॥ पुद्गलाऽस्तिकाये A ॐ द्रव्यतोऽनन्तसंख्याऽऽत्मकः, क्षेत्रतो ले काऽऽकाशपरी मतो न खलपुद्गलद्रव्यजाताऽपेक्षया, परमाण्वपेक्षया सूक्ष्मपरिणामपर- णताऽनन्तप्रदे शस्कंधाऽपेक्षया वा एकाऽऽकाशप्रदेशावगाहः, कालतनाद्यनन्तः, भावतो वर्णगन्धरसस्पर्शाापेतः, गुणतः पूरण- फू गलनस्वभावः, संस्थानत्त्वेन-दीर्घ-चतुरस्र-व्यस्र-वर्तुल-परिमण्डलादिसंस्थान यः॥५॥ कालो द्रव्यत एकः क्षेत्रतः सार्धद्वयद्वीप- A प्रमाणः, कालतोऽनाद्यनन्तः, भावतो वर्णादवेयुक्तः, आकृत्या अवक्तव्यः॥६ । इत्येवं व्याख्याता अज् वतत्त्वस्य चतुर्दशभेदाः। G ॐ प्रकाराऽन्तरेणाजीवस्य मूर्ताऽमूर्तविभागेन, द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव-गुण दैवर्णगन्धरसस्पर्शसंस्थानदैश्च पट्यधिकपञ्चशत- 5 T प्रदा भवन्ति, तेषां वर्णनं ग्रन्थविस्तरभयादव न लख्यते, ग्रन्थान्तरेषु सुप्रतीतं, जिज्ञासुभिश्च तत्रतो विलोकनीयम् ॥१५॥ 卐 व्याख्यायावतत्त्वं, मेदन दैर्यन्मयोपात्तम् । तेनाऽस्तुश्रमणसङ्घो, जोवाजोवत्त्व विज्ञानयुतः॥१॥ 卐 इत्याराध्यपादाचार्यवर्यश्रीमद्विजयमोहनसूरीश्वर विनेयावतंसोपाध्यायप्रवरश्रीप्रतापविजयजीगणिचरणाजचञ्चरीक- 卐 प्रवर्तकश्रीधर्मविजयविरचितायां श्रीनवतत्त्वप्रकरणसुमङ्गलाटीकायां द्वितीयमजीवतत्त्वं समाप्तम् ॥ A V L ॐ ॥४७ A 卐 A 5 卐 N 卐 A manthin 卐 M 卐 V 卐 A उथ मून्यत्तन के A 卐 T 卐 卐 N प A ऽचारपरायणः समुदित भव्याऽब्जबधार्यमा, दुर्जय्योऽपि जित जितेशहरेधात्राद्यन्तरारः स्मरः। ॐ येन मास्तमशेषवाद्यहिकुलं स्थाद्वादसोपर्णिना, सोऽयं सार्वजनिशं प्रकुरुतां सूरशसङ्घस्सदा । १। d एवं जोवा चतत्त्वयोस्सम्यग् विवरणं विधायाऽथ तृतीय क्रमायातं पुन्यतत्त्वं व्याचिख्यासुराचार्यस्तावादाद द्विच- | चारशसंख्याकपुन्यभेदमध्ये सप्तदशभेदाननया गाथया विवृण ति;- 卐 साउगेय मणुदुग-सुरदुगपंचिदिजइ पणदेहा अइतितणुणुवंग, अइम्स्टर संठग १६ टका; सातवेदनयं कर्म, उच्चैर्गोत्रं मनुजद्विकं मनुजगतिमनुजानुपूर्वीलक्षणं सुरद्विकं देवगतिदेवाऽपू स्वरूपं, 卐 卐 L V A - ज S 卐 न्यतत्वे पुन्य- 卐 ॥ स्वरूपम्। 卐 ॥४८॥ ध T A अनवतत्त्व- पञ्चेन्द्रियजातेः, पञ्चशर्र राणि अंदारिकवैक्रियाऽऽहारकतैजसकार्मणरूपाणि, आदिभूतानां त्रयाणां शरैराणामंदारिक- सुमङ्गला- बैंक्रियाऽऽहारकाऽऽत्मनामङ्गोपाङ्गानि, वक्ष्यमाणसंहननपट्कमध्ये प्रथमसंहननं वज्रर्षभनाराचनामकं, एवं वक्ष्यमाणसंस्थान- टीकायां- v पद्कमध्ये समचतुरखाऽऽख्यं प्रथमसंस्थानं, इत्येतासां सप्तदशप्रकृर नां शुभविपाकवचात् पुन्यप्रकृतयः प्र य॑न्त इते गाथाऽक्षरार्थः ॥ व्यासार्थस्त्वयम् । इहलोले मिथ्यात्वाऽविरतप्रमादकपाययोगाऽऽत्मकैः कर्मवन्धहेतु भरुपात्तकणिो जवाः प्रदेशोदयद्वारा वपाकोदयेन वोपा कर्म यदानुभवन्ति तदाऽभूयमानशुभाऽशुभकर्मणामनुसारेण वा अपि तथा वधशुभाऽशुभाऽध्यवसायवन्तस्सन्तः पुनः स्वाऽवगाढाऽऽकाशप्रदेशवार्त्तिकार्मणवर्गणापुद्गलान् सर्वाऽऽत्मप्रदेशैर्गृहीत्वा- कर्मतया तान् परिणमय्य शुभाऽशुभपरिणामाऽनुसारेण स्थितिरसे तेषु कर्मपुद्गलेषु ग्रहणसमयेनैवोत्पाद्य झरनरवद् वह्वय- 卐 यः पिण्डवद्वाऽऽत्मप्रदेशानामभेदाऽऽत्मकं सम्बन्धं कुर्वन्ति । तत् कर्म घाति-अघातिभेदाभ्यां द्ववेध, यत् कर्म A ज्ञानाऽनन्तचारित्राऽनन्तर्याऽऽत्मकमात्मगुणं सर्वथा देशेन वा हन्ति तत् पति, यवं न तदधाति । वक्ष्यमाणकाऽ- 卐 टकमध्ये ज्ञानाऽऽवारकदर्शनाऽऽवरणीयमोहन्याऽन्तरायलक्षणानि चत्त्वारि कर्माणि ज्ञानादिगुणानां घातकत्वाद् घारीन, अज्ञानाद्यशुभविपाकजनकत्त्वादशुभानि । वेद य-आयु-नाम-गोत्राऽऽख्यानि चत्वारे अघातीनि कर्माणि सुखदुःख- प्रभृतिशुभाऽशुभविपाकजनकत्वात् शुभाऽशुभस्वरूपाणि । एवं घात-अघातिनोर्मध्ये यान्यशुभानि कर्माणि ताः पापप्रv कृतयः, याने च शुभानि कर्माणि ताश्च पुन्यप्रकृतयः। पुन्यं नाम पुनाति आत्मानं पवित्र करोत ति पुन्यम् ॥ अशुभकर्म- 卐 पांशुपांशुल आत्मा यैः कर्मभिः क्रमशः शुभं कर्म अर्जयत्वा पकि भवति, क्रमेण च सत्तागतकर्मप्रदेशान् आत्मप्रदेशेभ्यः 卐 N अनन्तy 卐 G ज A 卐 L A 卐 ॥४८॥ 卐 N 卐 卐 A ॐ M 卐 V 卐 A ॐ A परिशाटयन् शिवसुखभाक् च भवति तान कर्माणि पुन्यसंज्ञकानि, तैः पुन्यसंज्ञककर्मभिर्जयो यत् शुभं कर्म बन्नति तत्क- स्माऽपि पुन्यनाम्ना उच्यते, एवं पुन्यं कारणकार्यभेदाभ्यां क्रयाफलभेदाभ्यां वा द्विविधं, तत्र यैः सुपात्रदानादिभिः कारणैः क्रियाभिर्वा शुभविपाकजनकं पुन्यं कर्म उपार्जयति तत् पुन्यस्य कारणं क्रिया वा प्रोच्यते, यच्च सातोदयादिस्वरूपेणोपभुज्यते वैस्तत् पुन्यस्य कार्य फलं वोच्यते । केपाञ्चिन्मतेन पापमेवैकं कर्म न तु पुन्यकर्म विद्यते, २ च दार्शनिका एवमाहुः " पापमेवैकमस्ति न पुण्यं, तदेव पापं उत्तमामवस्थामनुप्राप्तं नारकभवायाऽलं अपयमाणं तु तर्यनराऽमरभवायेति, तद- त्यन्तक्षयाच मोक्ष इति, यथाऽत्यन्ताऽपथ्याऽऽहारसेवनात्परममनारोग्यं, तस्यैव किञ्चित्किञ्चिदपकर्पादारोग्यसुखम् , अशेषाऽऽ- हारपरित्यागान्मृतिकल्पो मोक्ष इति " एतत्सर्वमप्ययुक्तं स्वमन् पिकाविजृम्भितं, यतो न तावत्पापमेवाऽपरीयमानं सुखका- रणं तस्य दुःखहेतुत्वेनेष्टत्त्वात् , विषस्याणुरपि किं कदाचित् पीयूपाय भवति ? एवं स्वल्पस्याऽपि पापस्य स्वल्पदुःक्खनिर्व- कत्वमनिवार्यम् , तथा चाप यसो लोहपिण्डादपुरपि लोहमय एव घटो भवति न तु सवर्णः, तस्मादस्ति सुखजनकं पुन्या- ख्यं कर्म इति॥ अथ पुन्यवन्धस्य हेतवो व्याख्यायन्ते, तत्र मुख्यवृत्त्या तु मनोवाकायानां यो शुभव्यापारः स पुन्यवन्धस्य हेतुः, तथा- ऽप्यत्र किश्चिद् विविच्य प्रदृश्यते-सुपात्रेभ्यः तीर्थकरगणधराऽचार्यस्थविरमुनिभ्योऽन्नप्रदानं १ सुपात्रेभ्यो निरवद्यवसते- तरणम् २ सुपात्रेभ्यो वाससां प्रदानम् ३ सुपात्रेभ्यो निर्दुष्टप्राशुकजलप्रदानम् ४ सुपात्रेभ्यः संस्तारकस्य प्रदानम् ५ मनसः शुभसंकल्पः ६ वाचः शुभव्यापारः ७ कायस्य शुभव्यापारः ८ जिनेश्वरयतिप्रभृतीनां नमनवंदनपूजनादीनि ९ इत्येतानि ज N 卐 T 卐 } A . 卐 G 卐 T A - V 卐 L 卐 A 卐 LA ९ 卐 卐 ।

IN, 卐 N S 卐 卐 A पुन्यतत्त्वे नवतत्त्व सुमङ्गला- र्टकायां- पुन्यबन्ध- स्य हेतवः) M ध V 卐 A ॥४९॥ ॥ A नव पुन्यबन्धस्य हेतुत्वेनोदाहृतान, तथा चोक्तं श्रीमत्स्थानाङ्गसूत्रे-"णव विधे-पुण्णे-अन्नपुन्ने १ पाणपुरे २ वस्थपुन्ने ३ लेणपुन्ने ४ सयणपुन्ने ५ मणपुन्ने ६ वतपुन्ने ७ कायपुन्ने ८ नमोक्कार पुन्ने"९॥अन्यैरपि प्रत्यपादि-अन्नं पानं च वस्त्रं च, आलयः शय- नासनम् । शुश्रूपा वन्दनं तुष्टिः पुन्यं नवविधं स्मृतम् ॥१॥ अथ पात्राऽपात्र विचारणा विध्यते-र्थकरगणधरा मोक्षमार्गा- नुयायिनो मुनयश्च सुपात्रत्त्वेनोक्ताः, देशविरतिवन्तो गृहस्थाः सम्यग्दृष्टयश्च पात्रतया समाख्याताः, द नमनस्काः करुणायोग्या अङ्गोपाङ्गविर्ह नापि पात्रत्त्वेनोदाहियन्ते, शेपाः सर्वे अपात्रत्वेनोच्यन्ते । तत्रापि सुपात्राय धर्मबुद्ध्या प्राशुकमशनादिकं प्रददतो भाबुकस्याऽशुभकर्मणो महतो निर्जरा महान् पुन्यबन्धश्च । देश विरतसम्यग्दृष्टिश्रावकेभ्योऽन्नादिकं वितरतो सुनिदानाऽपे- क्षया अल्पपुन्यवन्धनिर्जरे च भवतः । अङ्गादिह नेभ्योऽथवा तथाप्रकारेभ्यो दनाद्यवस्थां प्राहेभ्योऽनुकम्पायुद्ध्या दानं ददा- तुर्गृहस्थदानाऽपेक्षयाऽपि अल्पतरपुन्यवन्धो भवति । यद्वा यः कश्चदपि मम गृहाङ्गणे समायायात् तस्मै यद्यहं न किञ्चि- दपि प्रदास्यामि तदा ममाऽऽर्हतधर्मस्य लघुता भाचिन् त्येयं मनसि नर्धार्य दानं ददाति तदपि अल्पतरपुन्यबन्धहेतुत्वेन जायते । श्रानकपोतप्रभृतिपशुपक्षणामभयदानेऽन्नादिदाने वा तेषां पात्रत्त्वाऽभावेऽप करुणायास्सद्भावादवश्यं पुन्यबन्धः । तथा गेहं प्रति समागतानां सत्यस्याद्वादमतपराङ्मुखानां वामणकापालिकतापसानां ' इमे अपि धर्मभाजः' यद्वा ' एभ्यो वयं दानं वितरिष्यामस्तदा पुन्यवन्धो भाव ' इतिधिया दानं न प्रदेयं, परं जनमतप्रोक्ताऽवितथधर्मभाजां श्राद्धानां द्वारा- ण्यभङ्गानि, मम द्वारि समागतो न कश्चिदपि निराशो भूत्वा प्रतिगच्छेत् , यदि सोऽन्नादिकमगृह चैव प्रतिव्रजिष्यति तदा ममाऽवितथनेन्द्रधर्मस्य जुगुप्सा भविष्यति, अथवा मम दाक्षिण्यगुणेऽपि न्यूनत्वं स्यादित्यात्मिकां बुद्धिं विधाय तेभ्यो 卐 T 卐 A 卐 N G 卐 T V 卐 L 卐 A ॥४९॥ A 卐 S N 卐 U A M V प A जनधर्मविमुखेभ्योऽपि यथाशक्ति अशनादिकं प्रदातव्यं, एव स्वकीयदानगुणस्य पहणा धर्मस्य प्रभावना च संजायेत । पारगतविशुद्धधर्मस्य महमानं दृष्ट्वा केचित्तं धर्ममपि प्रपद्येरन् । तथा च भगवन्तस्र्थकरा अपि त्रिभुवनैकनाथा प्रचित्र- जिपवः सांवत्सरिकमनुकम्पया प्रयच्छन्त्येव दानम् , उक्तञ्च-"सब्वे हें पि जिणे हैं दुजयजियरागदोसमोहे हैं । सत्ताएकंप- ण दाणं न कहेंचि पडि सद्धम् " ॥१॥ इति । केचिच वाविप्रकूपतटाका देवधाने सुपात्रदानादिवत् पुन्यबन्धं मन्यन्रे यतस्तेषु तेषु स्थानेषु बहवः प्राणिनस्तृपाकुलास्सन्तस्समागत्य कणेहत्य पयःपानेन गतपिपासास्संजायन्ते सुखञ्चानुभवन्ति, तथा केचन क्षेत्रादिषु तेषु तेषु प्रदेशेष्वधिकप्ररोहाऽऽशया दावानलं प्रज्वालयन्ति गवाद्यर्थ च तानि क्षेत्राणि रक्षयन्ति, कैश्चित्तु सत्राऽऽगारमसंयतपोपकं पुन्यवन्धस्याऽऽशंसया निमयते । एतत्सर्वमपि वचाराऽऽस्पदम्, वस्तुतस्त्वेपः पात्राऽपात्रविचारः धर्ममार्गमनाबाध्य तय॑ इति । एवं पूर्वोक्तप्रकारेण पुन्यबन्धस्य हेतून् प्रदर्य अधुना यैर्द्विचत्वारिंशत्प्रकारैस्तत् पुन्य कर्म रनुभूयते ते प्रकाराः क्रमशो लिख्यन्ते-तत्र यदुदयादारोग्यविषय पभोगादिजनितमाह्लादलक्षणं सातं वेद्यते तत् सात वेदन यम् ॥ १॥ यदुदयादुत्तमजातिकुलबलतपोरूपैश्वर्यश्रुतसत्काराऽभ्युत्थानाऽऽसनप्रदानाञ्जलिप्रग्रहादिसंभवस्तदुचैगोत्रम् ॥२॥ गम्यते तथाविधकर्मसचिजीवैः प्राप्यत इति गतिः, नारकत्त्वादिपर्यायपरिणतः, ततो यया गतिनामकर्मप्रकृत्या मनुजगतित्त्वं लभते तन्मनुष्यगतनामकर्म ॥३ । विग्रहगत्या भवान्तरोत्पत्तिस्थानं गच्छतो जवस्याऽनुशेणिनियता गम- नपरिपाट आहुपूर्वी, ययाऽऽनुपूर्वनामकर्मप्रकृत्या मजगतिबद्धायुजवेऽन्यत्र गच्छन् मनुष्यगतावान् यते सा मडजाऽऽनु पूर्वं । तयोर्मनुजगतिमनुजाऽऽनुपूद्वेकं मनुजद्विकम् ॥ ४ ॥ एवं सुरद्विकं सुरगतिसुराऽऽनुपूर्वलक्षणं ज्ञेयं तद्यथा-रेन 卐 T 卐 A N 卐 G 卐 T 卐 L V ज A 卐 A S S Z 卐 A पुन्यतो पुन्यमेद- ध M प्रति- 卐 पादनम्। 卐 A 卐 T फोनवतत्व गतिनामकर्मणा तथाप्रकारककर्मसचिवेजीदेवगतिचं लभ्यते सा देवगतिः ॥ ५॥ न चाऽऽनुपू/नामकर्मणा सुरगति- सुमङ्गला- बद्धायुर्जीवोऽन्यत्र गच्छन् सुरगतावागेयते सा सुराऽऽनुपूढीं॥६॥ एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रियादीनां एकेन्द्रियद्वीन्द्रियशब्दप्रवृत्तिनि- बन्धनंतथाविधसमानपरिणतिलक्षणं सामान्य जातिः, तद्विपाकोदयवेद्या कर्मप्रकतिर पजातिः, अयमत्र पूर्वाचार्याणामाशयः- काय- ४ द्रव्यरूपमिन्द्रियमकोपाङ्गनामकर्मणा इन्द्रियपर्याप्तिजनकपर्याप्तनामकर्मणा चासिद्धम् , आवरूप (भावेन्द्रियं) ॥५०॥ न्द्रियाऽऽचरणक्षयोपशमसामर्थ्यात् सिद्धम् “क्षायोपशमिका न्द्रियाणि" इति वचनात् , यत्पुनरेकेन्द्रियादिशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं सामान्यं तदन्याऽसाध्यत्त्वाजातिनामनिवन्धनमिति । ततो यया जातिलामकर्मप्रकृत्या जीवस्य पञ्चेन्द्रियत्त्वं स्यात् सा पञ्चेन्द्रि- 卐 यजातिः॥७॥अथाऽष्टममदारकशरीरनामकर्म, तत्र शीयते इति शरीरम्, तीर्थकरवादिलाभाऽपेक्षया उदारैः पुद्गलर्निष्पन्नम- 卐 दारिक, अंदारिकश्च तच्छर रमदारकशरीरम् , यदुदयादौदारिकरारीरयोग्यान् पुद्गलानादायदारिकशरीरतया परिणमयति परि- णमय्य च जीवप्रदेशैः सहाऽन्योऽन्यानुगमरूपतया सम्बन्धयति तददारिकशरीरनाम॥८॥विक्रियया निष्पन्नं वैक्रिय, वैक्रियञ्च तच्छरीरं क्रियशरीरं, यदुदयाद्वैक्रियशरीरयोग्यान् वैक्रियवर्गणागतद्लानादाय वैक्रियशनरखेन परिणामयति, परिणराय्य चाऽऽ- त्मनदेशैः सहाऽन्योऽन्यानुगमस्वरूपेण सम्बन्धयति तद्वैक्रियशरीरनामकर्म ।। ९॥ यदुदयादाहारकशरीरयोग्यान् आहारकवर्ग- 卐 गागतपुद्गलानादाय आहारकशरोरतया परिणमयति, परिणमय्य च जवप्रदेशैः सहाऽन्योऽन्यानुगमरूपतया सम्बन्धयति तदा- हारकशरीरनामकर्म ॥१०॥ यदुदयात्तैजसशरीरयोग्यान् तैजसवर्गणागतपुद्गलानादाय तैजसशरीरतया परिणमयति; परिणमय्य च जीवप्रदे: सहाऽन्योऽनुगमात्मकमभेदं सम्बन्धं करोति तत्तैजसशरीरनामकर्म ॥ ११ । यदुदयात्कार्मणशरीरयोग्यान् 卐 A 卐 T A 卐 - L ॥ ५० 卐 A A । ue ॐ N । A M V ननु A A कार्मणवर्गणान्तःपातिपुद्गलस्कंधानादाय कार्मणशरोरतया परिणमयति परिणमय्य चाऽऽत्मप्रदेशैः सहाऽन्योऽन्याऽनुगमात्मक- 0 मभन्न सम्बन्धं वेदधाति तत् कार्मणशरीरनाम ॥१२॥ एतानि प्राङ् निर्देष्टानि पञ्च शरीरनामकर्माणि पुन्यसंज्ञकानि, कि 卐 卐 तत्तच्छरीरनामकर्मजन्यं अंदयिकभावफलस्वरूपं अंदारकादिशरीरमपि पुन्यसंज्ञकं भवति, पुन्यसंज्ञककर्मणः कार्यत्वात् ।। औदारिकादिनामकर्मचतुष्कस्य भवतु पुन्यसंज्ञा शुभविपाकजनकत्त्वात्तेपां, परं कार्मणशरीरनाम काऽपि पुन्यसञ्ज्ञकं 卐 卐 कथं प्रतिपाद्यते, यत एतत्तु भवभ्रमणस्य प्रधानं निमित्तं ? उच्यते-सत्यं : सर्वाणि पौगलिकसुखानि दुःखानि वा कार्मणश- रीरनामकर्मप्रभवाणि, एवं सत्यपि यदत्र कार्मणशरीरनामकर्म पुन्यसंज्ञकत्त्वेन प्रोचुः प्रावचनिकास्तत्र पद्गलिकसुखेषु 卐 卐 कार्मणशरीरस्य प्राधान्यं विवक्षितं, नास्त्यन्या काऽप्युपपत्तिः ॥ अङ्गान्यष्टै शिरःप्रभृतीनि, उक्तञ्च;-" सीसमुरोयरपिटि दो N फू बाहू ऊरुया य अटुंगा” । तदवयवभूतान्यङ्गुलादीनि चोपाङ्गानि, शेषाणि तु तत्प्रत्यवयवभूतान्यङ्गुलिपर्वरेखाद नि अङ्गो- 卐 पाङ्गानि । ततोऽङ्गानि चोपाङ्गानि चाङ्गोपाङ्गानि, अङ्गोपाङ्गानि चाङ्गोपाङ्गानि चाङ्गोपाङ्गानि, (सरूपाणामेकशेष एकविभक्त १-२-६४-पा० ) इत्येकशेपः । तन्निमित्तं कर्माऽङ्गोपाङ्गं, तत्रिधा-औदारिकाङ्गोपाङ्गं, वैक्रियाङ्गोपाइं, आहारकाङ्गोपाऊं, 卐 T। तत्र यदुदयाददारिकशरेरत्त्वेन परिणतानां पुद्गलानामङ्गोपाङ्गविभागपरिणतिरुपजायते तदै दारिकाङ्गोपाङ्गनाम । यदुदयाद्वै- A क्रियशरीरत्वेन परिणतानां पुद्गलानामङ्गोपाङ्गविभागपरिणाम उपजायते तददारिकाङ्गोपाङ्गनाम् । यदुदयादाहारकशरीरत्वेन निष्पन्नानां पुद्गलानामङ्गोपाङ्ग विभागपरिणाम उपजायत इति आहारकाङ्गोपाङ्गनाम । तैजसकार्मणवपुपोस्तु आत्मप्रदेशतुल्य- संस्थानत्त्वात्तयो स्त्यङ्गोपाङ्गसम्भवः । अत्र तनुषश्चकमध्ये यानि औदारिकवैक्रियाऽऽहारकाणि त्रीणि वधूपि तान्यङ्गोपाङ्गो- T A L V A 卐 LS 卐 N नवतत्त्व 卐 A सुमङ्गला- 卐 टीकायां- V ॥५१॥ ॥ A ॐ S 卐 पुन्यत 卐 पुन्यम्द- M प्रति- 卐 पादनम् A 卐 N पेतान्येवाऽन्यत्र एकेन्द्रियशरीराण, नतु एकेन्द्रियाऽन्तर्गत वनस्पतिकायिकतरुप्रभृतिषु शाखा-प्रशाखा-पुष्प-फल-पत्र- किसलयादीनामवयवत्त्वेन सुविख्यातानां सद्भावात् कथमुच्यते अन्यत्रैलेन्द्रियशरीराण्यङ्गोपाङ्गानि ? सत्यम् , यद्यपि लोके ते शाखाप्रशाखादयोऽवयवत्वेन व्यवह्रियन्ते, परं तन्न सह चीनम् । यतस्तेषु तेषु शाखाप्रशाखासुमनोदलेपु प्रतिशाख प्रतिप्रशाख प्रतिपुष्पं प्रतिपत्रं च भन्नो वः, न तु ते विवक्षितवृक्षजीवस्याऽवय भूताः, अत एकेन्द्रियेप्वदारिकनामकर्मसद्भावे सत्यपि अङ्गोपाङ्गनामकर्मणोऽभावाद् अवयटीभूतानामङ्गोपाङ्गानामसम्भवः सुसाध्यः । एकेन्द्रियव्यतिरिक्तपु शेपेपु भवस्थ- जीवेषु औदारिकवैक्रियनामकर्मप्रभृतिकर्मसद्भावेऽपि यद्यङ्गोपाङ्गनामकर्म न भवेत्तदा तु तेपामपि संसरणश लानां संसा- रिजवानामेकेन्द्रिय ववदङ्गोपाङ्गाऽभावः स्यादित, प्रत्यक्षाश्चाऽवयवा मनुष्यप्रभृतिषु दरोदृश्यन्त इत्यलमतिचर्चया अथ पोडशं वर्षभनाराचाऽऽख्यं शुभं कर्म विबियते, तत्र संहननं नामाऽस्थिरचनाविशेषः, तच्च-वर्पभनाराच-ऋपभना- राच-नाराचा-ऽर्धनाराच-कलिका-सेवार्तभेदैः पोढा, मध्येसंहननपदकं प्रथममेव शुभं शेषाण्यशुभानि, पुन्यतत्त्वव्याख्या- प्रसङ्गात् प्रथमं वर्षभनाराचमेवात्र व्यावय॑ते;-अस्मिन् ' वर्षभनाराच ' इति पदे त्रयः शब्दाः, वजूं ऋपभो नाराचश्च, तत्र वर्जू कालिका, ऋषभः परिवेष्टनपट्टः, नाराचाभयतो मर्कटवन्धः। एतानि कलिकापरिवेष्टनपट्टनाराचाऽऽख्यानि त्रीण्यपि रचनाविशेपाणि यस्मिन्नस्थ्नि समुदितानि सन्ति, साऽस्थिरचना वर्षभनाराचाऽऽख्या कथ्यते, ततश्च द्वयोरस्थ्नोरुभयतो मर्कटबन्धेन बद्धयोः पट्टाकृतिना तृतयेनाऽस्थ्ना परिवेष्टितयोरुपर तदस्थित्रयभेदिक लकारूपवजूनामकमस्थि यत्र भवति तद् वर्षभनाराचसंज्ञमाचं संहननम् ॥ १६ ॥ अथ सप्तदशं समचतुरस्रसंस्थानं, तत्र संस्थानमाकार विशेषः संगृहीत- T 卐 A T 卐 A V L 卐 ॥ ५१ । । 卐 A 卐 S 卐 N 卐 U 卐 A 卐 V M 卐 A संघातितवद्धष्वंदारिकादिपुद्गलेपु यदुदयाद् भवति तत्संस्थाननाम, तच्च पोढा, समचतुरखें, न्यग्रोधपरिमण्डलं, साद, वामनं कुब्ज हुण्डं चेति, तत्र समचतुरस्रमेकमेव भविपाकजनकत्त्वाच्छुभ, अन्येषां त्वशुभविपाकजनकत्वादशुभत्त्वमिते । समाः सामुद्रिकशास्त्रोक्तप्रमाणलक्षणाऽविसंवादिन्यश्चतस्रोऽस्रयश्चतुर्दैग्भागोपलक्षिताः शरीराऽवयवा यस्य तत् समचतुरस्रम् । येन नामकर्मणा एतादृक् समचतुरस्रसंस्थानं सञ्जायरे तत् समचतुरस्रसंस्थाननामकर्म अथवा ये उचा-आत्माङ्गुलगण- नयाऽष्टोत्तरशताङ्गुलप्रमितास्तेऽपि समचतुरस्रसंस्थान याः। सुरनरपतिनताऽङ्ग्रयस्तै प्रवर्तकतर्थंकराः समे देवाश्चैतत्संस्थान- भाजस्स्युः, शेषजीवाऽपेक्षरैतत्संस्थानं भाज्यम् ॥ १७ ॥ १५ ॥ वन्नचउ उरुलहु-परघा उस्सास अयवुज्जोरं । भखगइ निमिण तसदस, सुरनरतिरिआउतित्त्थयरं १६ टीका;-प्राक्तनगाथायां पुन्यतत्वस्य सप्तदशप्रकृती संख्यायाऽथाऽनया गाथयाऽवशिष्टाः काश्चिद् व्याख्यायन्ते । तत्राद वर्णचतुष्कं वर्षगन्धरसस्पर्शाऽऽत्मकं ब्रूते, यद्यपि वर्णचतुष्कं नामकर्मण उत्तरप्रकृतिभूतं शुभाशुभलक्षणं चतुर्वैप टभेदात्मकं क्रमशः कर्मग्रन्थाद व्याख्यातं, तथाऽप्यस्मिन्प्रकरणे पुन्यपापतत्त्वयोरुभयत्रापि अविवक्षितोत्तरदं तदेव वर्णच- तुष्कमुक्तं तत्र ग्रन्थकर्तुर्वेवक्षैव-कारणम् । नन्वेकस्य वर्ष चतुष्कस्य पुन्यपाषयरुभयत्र कथं विन्यास इत चेत्शुभाऽशुभत्त्वाऽक्षया वैज्ञेयमित । वर्णनामकाऽपि पञ्चधा, तत्र श्वेतरक्तरीतलक्षणास्त्रयो वर्णाः शुभाः,लकृष्ण द्वचाऽशुभ । 'यस्त गन्ध अर्दने' 卐 A 卐 N 卐 G ॐ T 卐 A 卐 卐 T A 卐 L 卐 V 卐 A A 卐 卐 N S. 卐 A पुन्यतते- M ॥५२॥ A N 卐 नवतत्त्व गंन्ध्यते आघ्रायत इति गन्धः, स द्विधा, सुरभिगन्धो दुरभिगन्धश्च, तन्निवन्धनं गन्धनामकाऽपि द्विविधं, तत्र सुरभिगन्धः सुमङ्गला- शुभ इतरथा शुभः । ( 'रस' आस्वादनस्नेहनयोः) रस्यते आस्वाद्यते इति रसः, स च पञ्चविधः तिक्तकडकपायाऽऽम्लमधुर पुन्यद- टीकायां- v भेदात् , तन्निवन्धनं रसनामाऽपि पञ्चधा, तत्र कपायाऽऽम्लमधुररसाच शुभाः, अन्यौ तिक्तकटू त्त्वशुभ । “छुप स्पृश संस्परें प्रति- स्पृश्यत इति स्पर्शः, स च कर्कशमृदुगुरुलघुरूक्षस्निग्ध तोप्णभेदादष्टधा, तन्निवन्धनं स्पर्शनामाऽप्यष्टधा, तत्र मृदुलघुस्निग्धो- 卐 卐 पादनम् ष्णाऽऽत्मकाश्चत्वारो भेदाः शुभाः, अन्ये परिपन्थिनश्चत्वारोऽशुभाश्च। इत्येवं शुभाऽशुभवर्ण वंशतिमध्ये शुक्लाद्या एकादश वर्णग- 卐 न्धरसस्पर्शाः शुभकाऽन्तःपातिनः, अन्ये नेलवर्णाद्याः सप्ताऽशुभवर्णचतुष्काऽन्तर्गता इति । तत्र यदुढयाजीवानां शरीरेषु । ॐ T: शुक्लादयो वर्णा मरालवलाकादीनामिव प्रादुर्भवन्ति तद् वर्णनामकर्म, पुन्यप्रकृतित्त्वादाह्लादजनकत्त्वाच शुभम् ॥ १८॥ एवमग्रेऽपि भावनेयम् , यदुदयाजन्तूनां शरोरेपु सुरभिगन्ध उपजायते कमलानामिव तद् गन्धनामकर्म ॥१९॥ यदुदयात्स- 卐 वानां शरीरेषु मधुरादयो रसा संजायन्ते सहकारफलादीनामिव तद् रसनामकर्म ॥ २० ॥ यदुदयात् प्राणिनां वपुष्पु स्नि- ग्धगद्वादयस्पर्शा उपजायन्ते कुवलयकेसराणामिव तत् स्पर्शनामकर्म ॥ २१ ॥ यदुदयाद् जोवानां शरीराणि न गुरूणि 卐 T नाऽपि च लघूनि नापि गुरुलघूनि किन्त्वगुरुलघुपरिणामपरिणतान भवन्ति तदगुरुल नामकर्म ॥ २२ ॥ यदुदयादोज- 卐 स्वी भवति दर्शनमात्रेण वाक् सप्ठवेन वा महासभागतः सन् सभ्यानामपि त्रासमुत्पादयति, प्रतिवादिनश्च प्रतिभा प्रतिहन्ति तत्पराघातनाम ॥२३॥ यदुदयादुश्वासनिश्वासलब्धिस्संजायते तदुश्वासनाम ॥२४॥ यदुदयाजन्तुशरीराणि स्वरूपेणाऽनुष्णा- L 卐 न्यपि उष्णप्रकाशलक्षणमातपं विकुर्वन्ति तदातपनाम, तदातपनामविपाकश्च भानुमण्डलगतभूकायिकेवेव न वह्न, प्रवचने प्रति- 卐 ॥ ५२॥ G V का N S 卐 U A 卐 卐 M 卐 A 窮 N ध G 卐 रोधात् , तत्रोष्णाचमुष्णस्पर्शोदयात् प्रकाशत्त्वमुत्कटलोहितनामोदयाच्चेष्यरे । २५॥ यदुदयाजन्तुगात्राणि अनुष्णप्रकाशरूपमुद्योतं कुर्वन्त यथा यतिदेवोत्तरक्रियचन्द्रग्रहनक्षत्रतारा विमानरत्न पधयस्तदुद्योतनाम ॥ २६ ॥ 'सुभखगइ ' ति गमनं गतिः, खे वहायसा गतिः खगतिः, शुभा चास शुभखगतिः, नारकादिगतिव्युदासाय खेति विशेषणम् , खरोष्ट्रवर्ति अशुभगतिवं वारणाय शुभेत पदं, यदुदयाद् हंसगजवृषभार्द नामिव प्रशस्ता गतिर्भवति तत् शुभखगतिनामकर्म, तच शुभं सुविपाकरूपत्वात् । २७॥ 'निमिण' त्त, यदुदयाजन्तुशर रेष्वङ्गप्रत्यङ्गानां प्रतिनियतस्थानवर्त्तता भवति तन्निर्माणनाम सूत्रधारकल्पं, तदभावे हि तद्- भृतककल्पैरङ्गोपाङ्गनामादिभिर्तितानाम पे शिरउराद नां स्थानप्रवृत्तेरनियमस्स्यात् ॥ २८ ॥ "तसदस" त्ति, गाथायां त्वग्रे वक्ष्यमाणमपि असदशकं प्रसङ्गादव विवियते, तचैवम् :-"तस बायरपजत्तं पत्तेयथिरं सुभं च सुभगं च ।सुस्सर आइजजसं तसाइदसगं इमं होई" ॥१॥ तत्र त्रसन्ति उष्णाघभितप्ताः स्थानात् स्थानाऽन्तरं गच्छन् ति त्रसाः, परिस्पष्टसुखदुःखेच्छाप्र- द्वेषादिलिङ्गात्रसनामकर्मोदयात्रसाः, तद्विपाकवेद्या कर्मप्रकृतिरपि बसनाम ॥२९॥ यदुदयाजचानां चक्षुधिशर रवलक्षणं चादरत्त्वं भवति तदादरनाम, बादरपृथिव्यादेरेकैकशररस्य चक्षुर्ग्राह्यत्वाऽभावेऽपि बादरचपरिणामविशेषाद् बहूनां समुदाये चक्षुपा ग्रहणं भवति ॥ ३० ॥ यदुदयात् स्वयोग्यपर्याप्तिनिर्वर्तनसमर्थो भवति तत्यर्याप्तनाम । ३१ ॥ यदुदयात्प्रति वं भिन्नशरीरमुपजायते तर प्रत्येकनाम, ननु कपिथाऽश्वस्थालुप्रभृतनां मूलस्कन्धत्त्वक्शाखादयः प्रत्येकमसंख्येय वात्मकाः प्रवचने प्रोच्यन्ते, मूलादयश्च देवदत्तशरीरवद् अखण्डकशरीरा उपलभ्यन्त इति तत्कथं तेषां प्रत्येकशन रत्वम् । प्रति वं - शरीरभेदाऽभावादिति चेन्मैवं मंस्थाः, तन्मूलादिष्वसंख्येयानामपि जवानां पृथक् पृथक् शरीराऽभ्युपगमात् , केवलं श्लेषद्रव्य- T ध T 卐 V 卐 A ज A 卐 L 卐 A - N S 卐 A टकायां । पुन्यतत्व- 卐. दप्रति- M पादनम् 卐 A T मेश्रितसकलसर्पपवर्तिकावत् प्रबलरागद्वेपोपचतवैचित्रप्रत्येकनामकर्मपुद्गलोदयात्तेषां परस्पर विमिश्रशर रसंभवः ॥ ३२ ॥ सुमङ्गला- 卐 यदुदयाच्छरोऽस्थिदन्तादनां शरेरावयवानां स्थरता स्यात् तत्स्थिरनाम ॥ ३३ ॥ यदुदयान्नाभेरुपरितना अवयवाः शोभना जायन्ते तच्छुभनाम ॥ ३४ ॥ यदुदयादनुपकृदपि सर्वस्य मनः प्रियो भवति तत् संभाग्यनाम ॥ ३५ ॥ यदुदया- अवस्वरः श्रोतर तिहेतुर्भवति तत्सुस्वरनाम ॥ ३६॥ यदुदयाल्लोको यत्तदपि वचनं प्रमाणीकरोति, दर्शनसमनन्तरमेव चाऽभ्यु- ॥ ५३॥ 卐 स्थानाद्याचरत तदादेयनाम ॥ ३७ ॥ तपाशर्यत्यागादिना समुपार्जेतेन यशसा कर्त्तनं यशःकर्तः, यद्वा यशः सामान्येन 卐 ख्यातिः, की तेर्गुणोर्कनरूपा प्रशंसा, अथवा " एकदिग्गामिन कर्तिः सर्वदिग्गामुकं यशः, दानपुन्यभवाकीर्तः पराक्र मकृतं यशः" ॥ १॥ ते यशकत यदुदयाद् भवतस्तद्यशःकीर्त्तिर्नाम ॥ ३८ ॥ इति त्रसदशकम् ॥ 卐 यदुदयाद्देवभवनिवासहेतुकमायुः प्राप्यते तद्देवायुः ॥ ३९ ॥ यदुदयान्मडजभवनिवासहेतुकमायुरखाप्यते तन्मनुष्यायुः ॥ ४० ॥ यदुदयात्तिर्यक्त्वपर्यायकारणमायुलभ्यते तत्तर्यञ्चायुः ॥ ४१ ॥ एतानिण्यप्यायूपि शुभानि शुभविपाकप्रदायक- त्वात्तेषां, ननु युक्तमुक्तं देवमनुजायु पुन्यसंज्ञके शुभाह्लादजनकत्त्वात् पौगलिकसुखप्रधानत्वात् पुन्यकारणवाद्वा तयोः, परं तर्यगायुः कथं शुभं ? तत्तु क्षुत्पिपासासहनताडनतर्जनछेदनभेदनप्रभृतदुःखबहुलत्त्वादशुभं प्रत्यक्षमेच पश्यामो वयम् अन्यत्र 卐 क्वचित् कदाचित् कथञ्चित् पार्थिवपरायत्तानां हस्त्यश्वराजहंसशुकपिकानाम् , उच्यते यद्यपि तिर्यश्चस्तिर्यगायुर्भाजोऽनेकv वधदुःखाने पराई नास्सन्तो नितरां सहन्ते जन्मान्तरेऽविचारितकर्मविपाकास्सहसाकृतकणिस्तथाऽपि न तेषामायुरुभ- 卐 मुच्यते, यतो दुःखमभवन्तोऽपि ते स्वायुषस्समाप्तिपर्यन्तं जजिरे पवे न कदाचनाऽपि मृत्यु सम्हन्ते नारकवद्, प्रत्यक्षतद् 卐 N 卐 A T प V ध L A प 'A 卐 N S A 卐 V 卐 A यतः प्रगृह्यमाणा मत्कुणादयो प्रधावन्त, नारकास्तु प्रतिक्षणमेतदेवेहन्रे कदा वयं (क्षेत्रजनित-परस्परोदरत-संक्लष्टासुरेदरे- तत्रिविध ) दुःखतापान् मोक्ष्यामहे, कदाऽस्माकं मरणं समायायात् येन गत्यन्तरं गत्वा सुखमाज भवामः । ननु यथा देवमनु- जाटुभ्यं सह देवमनुजगर देवमनुजानुपूव्यौ च पुन्यप्रकृतावन्तर्गण्टेते, तथा तिर्यगायुपा सह तिर्यग्गतिस्तर्यगारपूर्व च पुन्यप्रकृतिमध्ये कथं न पठ्यते ? उच्यते-यानि कर्माणि विशुद्धाऽध्यवसायैर्वध्यन्ते शुभविपाको नाऽनुभूयन्ते च तान्टेव पुन्यकाणि, यान च संक्लिष्टाऽध्यवसायैरात्मसक्रियन्तेऽनुभूयन्ते चाऽशुभविपाकत्वेन तान्यशुभात प्रवदन्त प्रवचने प- निषद्वेदिनः । यदुक्तं शतले-"वायालंप पसस्था वसोहपुणमुक्कडस्स जोवस्स बार इमप्पसथाइत्थुकडसंकिलठस्स १ ४१ ॥ यदुदयादप्टंमहाप्रातिहार्याधतिशयाः प्रादुर्भवन्ति तर्थकरनाम ४२ ॥ १६ ॥ तसबररपज्जत्तं पत्र थिरं सुभं च सुभगं च । सुस्सर अइज्जजसं, तस इदसम् इमं होइ १७' टीका; व्याख्यातार्था ॥१७॥ इत्येवं समासतः पुन्यतत्त्वस्य द्विचत्वारिंशद् भेदाः समाख्याताः, त्पांमध्ये नारकादिपु चतसृपु गतिषु कस्यां गत के दास्सन्ति तान् पृथक्कृत्याह;-नरकगत तावत् सातवेदन यं-पञ्चेन्द्रियजातिः-चैक्रियद्विकं- तैजसनाम-कार्मणनाम-वर्णादचतुष्कं अगुरुलघुनाम-पराघातनाम-उच्छ्वासनाम-निर्माणनाम-त्रसनाम-बादरनाम-पर्याप्त- १-अशोकवृक्षः सुरपुष्पवृष्टेर्द्विव्यध्वनिश्चामरमासनञ्च । भामण्डलं दुंदुभरातपत्रं सत्प्रातिहार्याणि जिनेश्वराणाम् ॥ १ ॥ २-जिनेश्वराणां जन्मदीक्षाकल्याणकाद नरकगत्यामपि क्षणं सातवेदनेयस्यानुभवः सञ्जायते ॥ ३-यद्यपि नारकाणां प्रायोऽशुभवर्णचतुष्कं उदयव द्वेद्यते स्थूलदृष्ट्या, सूक्ष्मदृष्ट्या त्वल्पांशेन शुभवर्णा देचतुष्कस्याऽपे सद्भावोऽस्त । 卐 M 卐 A 卐 N T 卐 卐 A T 卐 A 卐 L 卐 V 卐 卐 A व N S 卐 A ध V -- T श्रीनवतत्त्व नाम-प्रत्येकनाम-स्थिरनाम-शुभनाम-चेत्येतानि शुभकर्माणि उदयापेक्षया वर्तन्त इति सर्वविदां सिद्धान्ते प्रोक्तम् । तिर्य- पुन्यतत्त्व- ग्गत तु मनुष्यत्रिक-देवत्रिका-ऽऽहारद्विक-जिननामसंज्ञकानि नवसंख्याकानि वर्जयित्वा शेषाणि त्रयस्त्रिंशत् तत्र विद्यन्ते ।। स्योपसं- सुमङ्गला. देवत्रिकतर्यगायुरातपाऽऽख्यानि पञ्च वर्जयित्वा सप्तत्रिंशन्मनुजगत्यामुदयेन वैद्यन्ते । मजत्रिकतिर्यगायुरदारिकद्विकाऽs- टीकायां- हारः॥ तपाऽऽहारकद्विकजिननामविकलानि द्वात्रिंशत्शुभकमणि देवैरनुभूयन्ते देवगत ॥ इन्द्रियमार्गणायां पुनरेकेन्द्रियजात सात- M । ५४ ॥ 5 वेदनीयदारिकाङ्ग-तैजस-कार्मण-दै क्रियाङ्ग-वर्णा दचतुष्काऽगुरुलघु-पराघातोच्छ्वासाऽऽतपोद्योत-निर्माण-वादर-प्रत्येक- A स्थिर-शुभ-यश कीर्तितिर्यगायुस्स्वरूपाणि द्वाविंशतिसंख्याकानि पुन्यकर्माणि वर्त्तन्ते । सातवेदीयंदारिकद्विक-तैजस- A कार्मण-वर्णादिचतुष्काऽगुरुलघु-पराघातोच्चासोद्योत-निर्माण-तिर्यगायुस्त्रस-चादर-पर्याप्त प्रत्येक स्थर-शुभ-यश कीर्ति- रूपा द्वावेंशतशुभप्रकतयो न्द्रयजात जीरनुभूयन्ते । त्रीन्द्रय-चतुरन्द्रियजातावप्येवमेव ज्ञातव्यम् । आतपं विहायैकच- N - वारंशत् पञ्चेन्द्रियजात ज्ञेयम् । एवं काययोगादिमार्गणास्वपि स्वयमेवोह्यम् ॥ इति पुन्यतत्त्वम् ।। 卐 पुन्याख्यतत्त्वव्याख्यानादधिगतञ्च यन्मया पुन्यम् ॥ पुन्यानुवन्धिपुन्यार्जनपरायणो भवतु भव्यौधः॥१॥ 卐 इत्याराध्यपादाऽऽचार्यवर्यश्रीमद्विजयमोहनसूरीश्वरविनेयावतंसोपाध्यायपदालतश्रीमत्प्रतापविजयगणिचरणाजचञ्चरीकप्रवर्तक- श्रीधर्मविजयाविरचितायां श्रीनवतत्त्वप्रकरणस्य सुमङ्गलाटीकायां तृतीयं पुन्यतत्त्वं समाप्तम् ॥ 卐 १--आहारकद्विकस्योदयस्तु चतुर्दशपूर्वविदां सयतमनुजानामेव नान्येषाम्॥२-आतपस्योदयस्तु बादरपर्याप्तपृथिवीकायिकेष्वेव नान्यत्रेति।। ॥ ५४॥ 卐 A G T A 卐 V L A A 卐 卐 S 卐 N 卐 A 卐 M 卐 V tional अथ चतुर्थ एप्रन ध A 卐 A 卐 T N G अङ्गोपाङ्गमयं जिनागमवरं येऽध्यापयन्तो दा, सिद्धान्तोदधिपारगाश्च समुपास्यन्ते वनेयैस्सदा । 卐 मोक्षावाप्तिसुलक्षणोक्तिपटवो विज्ञानसत्संपदा- धारा वेजयन्तु पाठकवरा भव्यौघनन्दप्रदाः॥१॥ 卐 द्वचत्वारिंशद्भेदाऽऽत्मकं पुन्यतत्त्वं व्याख्याय क्रमाऽऽयातं व्यरतिभेदाऽऽत्मकं पापतत्त्वं व्याचख्यासुः सूत्रकार है A गाथाऽऽत्मकं सूत्रं सूत्रयति;- ध ॐ नणंतर दसगं, नवीए न असरच्छत्तं थवरदस्चरर तिरं, कसरपणीस्तरीय दुगं १८ व्याख्या-'नाणंतरायं' इत्यादि ज्ञानावरणप, अंतरायपञ्चकं च भयमिलने दश, द्वर यस्य दर्शनावरण् यस्य निद्रा- 卐 देदयुता नवप्रकाराः, चैगोत्रम्, अशातावेदन्यं, मिथ्यात्वं, नामकान्तर्वत्तेस्थावरदशकं, नरकगति-नरकायु-नरका- उपूर्वीरूपं नरकत्रिकं, अनन्तानुवन्धि-अप्रत्याख्यान-प्रत्याख्यान-सनलनदात्मका हास्यपदक-दत्रिकप्ता कषायस्य प ॐ A T L V - 卐 १० A N - S ॐनवतत्व- A पापतत्रे U सुमङ्गला- र्टकायां- 卐 पापबन्ध- हेतवः ॥ ५५॥ 卐 A T 卐 गतिप्रकारा मोहनीयकर्मगताः, तिर्यग्गति-तिर्यगानुपूर्वीरूपं तिर्यग्द्वकं चेत्येते द्विपष्टिभेदाः विशेषतऽग्रे व्याख्यास्यमानाः दुक्खानुभवहेतुत्त्वात् पापप्रकृतित्वेन गण्यन्त इति गाथाक्षरार्थः॥ 卐 भावार्थस्त्वयम् -पाशयति गुण्डयत्यात्मानं पातयति चात्मन आनन्दरसं शोपयति क्षपयरीति वा पापम् । अस्मिन् संसारे संसारोदरवर्तनां जन्तूनां समयप्रमाणोऽपि कालो एतादृङ्नास्ति यस्मिन् समरेऽयं जीवः कर्मवन्धं न विदध्यात् । “जाव णं एस वे एयइ वेयइ चलइ फंदइ घट्टइ निप्पंदइ तं तं भावं परिणमइ ताव णं अठविहबंधए वा सत्तविहवंधए वा छविहवंधए वा एगविहबंधए वा नो णं अबंधए" इत्यागमः। ततः प्रतिसमयं पारम्पर्येण मोक्षमार्गकारणैश्शुभाध्यवसायै वेन पुन्यं वध्यते, संसारवृद्धिने मत्तकैस्संक्लेशजनितैरशुभाऽध्यवसायैश्च प्राणिनः पापं संचिन्वन्ति । विगतरागद्वेपसर्वज्ञपुरुषप्रणीतप्रवचनानुसा- N रण्या दृष्ट्या सामान्यतः शुभमनोवाकाययोगमाज जन्तवो यद्यपि आह्लादप्रदं शुभं कर्म अर्जयन्ति, तथापि पुन्यतत्वविवy रणप्रसङ्गे पात्रदानादयो हेतवः सविशेषतो यथा प्रतिपादितास्तद्वद् दुष्टमनोवाकाययोगेषु अशुभकर्मबन्धन निबन्धनभूतेषु सत्स्वपि विशेपपापबन्धहेतवो नामग्राहं प्रदर्श्यन्तेः-प्राणातिपातः १, मृपावादः२, अदत्तादानं ३, मैथुनं ४, परिग्रहः ५, अप्रश- स्तक्रोधः ६, अप्रशस्तमानं ७, अप्रशस्ता माया ८, अप्रशस्तलोभः ९, अप्रशस्तरागः१०, अप्रशस्तद्वेपः ११, अग्रशस्तक्लेशः १२, अभ्याख्यानम् १३, पैशुन्यम् १४, रत्यर १५, परपरिवादः १६, मायामृपावादः १७, मिथ्यात्वशल्यम् १८ इति ॥ तथा 3 चोक्तं श्रीव्याख्याप्रज्ञप्त-कहन्नं भंते वा गरुयत्तं हवमागच्छंति ? गोयमा: पाणाइवाएणं, मुसावाएणं, जाव मिच्छादसण सल्लेणं, एवं खलु गोयमा ! वा गरुयत्तं हवमागच्छंत । कहन्नं भंते ? वा लहुयत्तं हवमागच्छंत? गोयमा पाणाइवायर- 卐 G T A V L । ५५॥ A 卐 A 卐 卐 N S ज U ज A 卐 V 卐 A ज A मणेणं जाव मिच्छादसणसल्लरमणेणं, एवं खलु गोयमा जंवा लहुयत्तं हवमागच्छति । इत्येवमप्रशस्ताशयेन सेव्यमानाः याप- स्थानका ज्ञानाऽऽवरणादिपापप्रकृतीनां बन्धहेतव उक्ताः, कतिपयेषु रागादिषु पापस्थानकेषु सेव्यमानेषु प्रशस्ताशयेन पुन्य- बन्धोऽपि भवति, यथा देवगुरुधर्मेषु यो रागः स प्रशस्तः, कञ्चनका मन्यादिपु योऽभिष्वङ्गः सोऽप्रशस्तः, प्रशस्ताऽप्रशस्तयो- ईयोरप्यभावः स मोक्षो मोक्षहेतुर्वा । क्रोधादिकपायाणां प्रशस्तताऽप्रशस्तता च श्राद्धप्रतिक्रमणसूत्रवृत्तावप्येवम भिहिता, सा चैवम्-क्रोधोऽप्रशस्तः कलहाद, यतः-" दूमेइ जणं तावेइ निअतणुं नेइ दुग्गई विद्धि । कोवो जलणोत्व जए कमणथं जं न पावेइ" ॥१॥ प्रशस्तश्च दुर्नि तपरिजनशिक्षायां यथा श्रीकालकसूरेः प्रमत्त शिष्याणां सुप्तानां त्यागरूपः, तेत लसुत- मन्त्रिप्रबोधार्थं पोट्टिलादेवदर्शतनृपक्रोधवद्वा, यतः 'लालजंते दोसा ता डिजंते गुणा बहु हुंति । गयवसभतुरंगाण व तो होज सुसिक्खपरिवारो' ॥१॥ अप्रशस्तो मानो नमनार्हेष्वपि गुर्वादिष्वनम्रता सर्वानिष्टहेतुः, यतः 'नासेइ सुर्य विणयं च दूसइ हणइ धम्मकामथे । गवगिरि सिंगलग्गो नरो न रोएइ पिउणोवि' ॥१॥ प्रशस्तस्तु वकृतसत्यप्रतिज्ञाया आजन्मन- हो मन्त्र्युदयननिर्यापनार्थं कारितयतिवेशवण्ठादिवत् , यतः लजा गुण घजननी जनरीमिवार्या-मत्यन्तशुद्धहृदयामनु- वर्तमानाः। तेजस्विनः सुखमसूनपि संत्यजन्ति, सत्यस्थितिव्यसनिनो न पुनः प्रतिज्ञाम् ॥१॥ आपत्स्वदीनवृत्तिता च हरिश्चन्द्रादेव, यतः-'विपद्युच्चैः स्टेयं पदमनुविधेयं च महतां, प्रिया न्याय्यावृत्तिमलिनमसुभङ्गेऽप्यसुकरम् । असन्त नाभ्यर्थाः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः, सतां फेनोद्दिष्टं विपममसिधाराव्रतमिदम् ॥१॥ अप्रशस्ता माया यद्व्यादिका- सया परवञ्चना बणजामिन्द्रजालिकादीनां वा, प्रशस्ता तु व्याधानां मृगापलपने व्याधिमतां कटु पधादिपाने दक्षेपस्थि- N T श्र A G 卐 T 卐 L V 卐 A ॐ A UE . 卐 N S 卐 U पापतत्से ध A 卐 V 卐 पापबन्ध- हेतवः । । N नवतत्त्व- तस्य विघ्नकर पत्रादनां पुरः कुस्वमो मया दृष्टोऽल्पाऽऽयुष्कसूचक इत्यादिका स्वपरहितहेतुः स्वपितुः सम्यग् यत्याचारग्रह- णार्थ आर्यरक्षितप्रयुक्तमायेव, यतः- अमाय्येव हि भावेन माय्येव न भवेत् क्वचित् । पश्येत् स्वपरयोर्यत्र सानुबन्धं हि- उमङ्गला- टीकायां तोदयम् ॥ १॥ अप्रशस्तो लोभो धनधान्यादौ मूर्छा यतः- वंचइ मत्तकलत्तं, नविक्खइ पिअरमाइसयणे अ। मारेइ बंधवेवि हु पुरिसो जो होइ धणलद्धो ॥ १ ॥ प्रशस्तश्च ज्ञानदर्शनचारित्रविनययावृत्य शिष्यसंग्रहाद नानाश्रुतार्थसंग्राहको- ॥५६॥ 4 मास्वातिवाचकवत् , एवं योगेष्व प अप्रशस्तं मन आर्तरेद्रध्यानयोः, प्रशस्तं तु धर्मशुक्लध्यानयोः, बागप्रशस्ता च रोऽयम् , A जारोऽयमित्यादि पापमर्ग, प्रशस्ता तु धर्ममर्य देवगुरुवर्णनाद, कायोऽप्रशस्तो चेपयाताधारोवाहेवाकः, प्रशस्तस्तु धर्म- । ॐ कृत्योद्युक्तः" । इत्येवं कपाययोगार्द नां शस्ताऽशस्तत्त्वे जनागमाडसारेण सम्यविचारणीये शेपुर वद्भिः। यद्यपि मोक्ष- मा कचित्तानां भव्यात्मनां शस्ताऽशस्तयोर्द्विविधयोरपि कपाययोगयोस्त्याग एव प्रधानतमः, तथापि तामुच्चकक्षामारुरुक्षुणां sh पूर्व तावत् प्रशस्तकपाययोगैरप्रशस्तकपाययोगाः प्रतिक्षणं सावधान भूय सुतरां वर्जयितव्याः, प्रान्ते च श्रेणिमारुख द्वयरप उदयाऽभावस्स्वयमेव सञ्जायत इति ॥ 卐 अथ पूर्वेक्तरप्टादशप्रकारैस्समुपार्जितमशुभं कर्म यैव्य तप्रकारैर्जीवनोपभुज्यते ते प्रकाराः क्रमशः प्रदर्श्यन्ते । 'नाणं- तराय' इत्यादि, तत्र 'एकदेशग्रहणात् समुदायस्यापि ग्रहणम् ' इति न्यायेन ' नाणं ' इत्यादिना पञ्चविधं ज्ञानावरण यं- 卐 पञ्चविधज्ञानस्य स्वरूपं न विज्ञायते तावत् पञ्चप्रकारकज्ञानावर यस्याऽशुभकर्मणोऽपि स्वरूपं सम्यग्ज्ञातुं न पार्यते, ततः पूर्वं तावल्लेशत ज्ञानस्वरूपमालिख्यते-ज्ञायते वस्तुपरिछिद्यतेऽन्न विशिष्टतयेति ज्ञानम् , सामान्यविशेपा- 卐 A G - T A ज्ञेयम् । यावत् 卐 L V ॥ ५६ ॥ 卐 A 卐 卐 N A 卐 V A 卐 卐 ऽऽत्मले वस्तुनि विशेषग्रहणाऽऽत्मको बोध इत्यर्थः । मननं मतिः परिच्छेदः, ज्ञप्तिानं वस्तुस्वरूपावधारणम् , तते ज्ञानशब्दो U सामान्यज्ञानवाचकः सन् इन्द्रियाऽनिन्द्रियनिमित्तोपजातया मत्या सामानाधिकरणतया विशिष्यते, मतिश्च सा ज्ञानं मतिज्ञानम्, ज इन्द्रयमनोनिमित्तो योग्यदेशाऽवस्थितवस्टविषयः स्फुटप्रतिभासरूप बोध विशेष इत्यर्थः । तच्च श्रोत्रेन्द्रियव्यतिरिक्तं चक्षुरा- N दीन्द्रियाऽनक्षरोपलब्धिर्या तन्मतिज्ञानम् ॥ श्रूयते तदिति श्रुतमित्यस्मिन् पक्षे शब्दमात्रं गृह्यते, तच्चाऽनिष्टं, चक्षुरादिभ्योऽपि 5 श्रुतज्ञानस्योपजायमानत्वात् , श्रवणं श्रुतिः इत्यस्मिन् पक्षे ज्ञानविशेष उच्यते, स एव च ग्राह्यः श्रुतमित्यन्न, कीदृशः स श्रुतविशेष इति चेदुच्यते-शब्दमाकर्णयतो भाषमाणस्य, पुस्तकादिन्यस्तं वा चक्षुपा पश्यतः, घ्राणस्पर्शनादिभिर्व अक्षराण्यु- 卐 पलभमानस्य यद्विज्ञानं तत् श्रुतमुच्यते, श्रुतं च तद् ज्ञानं श्रुतज्ञानम् , अभिलापप्लावितार्थग्रहणहेतुरुपलब्धिविशेषः, एवमाकारं वस्तु घटशब्दाभिलाप्यं जलधारणाद्यर्थक्रियासमर्थमित्यादिरूपतया प्रधान कृतत्रिकालसाधारणसमानपरिणामः शब्दार्थपर्या- । ज 3 लोचनानुसारी इन्द्रियमनोनिमित्तोऽवगमविशेष इत्यर्थः ॥ अवशब्दोऽधः शब्दार्थेऽवधानादवधिः ज्ञानं परिच्छेदः, एतदुक्तं A भवति, अधोविस्तृतविषयमनुत्तरोपपातकादीनां ज्ञानमवधिज्ञानं, यतो वहुत्त्वं च विषयस्योररकृत्यैवं व्युत्पत्तिः, अन्यथा- y के तिर्यगूर्ध्व वा परिच्छन्दानस्यावधिव्यपदेशो न स्यात् , अथवा अवधिर्यादा, अमूर्त्तद्रव्यपरिहारेण मूर्तद्रव्य नबन्धनत्त्वादेव तस्यावधिज्ञानत्त्वम् , तच चतसृष्वपि गतिषु वर्तमानानां जन्तूनामिन्द्रयनिरपेक्षं मनःप्रणिधान र्यकं प्रतिविशिष्टक्षयोपशम- 卐 जनमत्तं पुद्गलपरिच्छेद देवमनुजतिर्यङ्नारकलक्षणे गतिचतुष्पि जायमानमवधिज्ञानमिति, अवधिश्च तज्ज्ञानश्चेत्यवधि- ज्ञानम् ।। अथ चतुर्थ मनःपर्याय(पर्यव)ज्ञान, परिः सवतो भावे, अवनमवः, मनसि मनसो वा पर्यवः सर्वतस्तत्परिच्छेद इत्यर्थः, 卐 T G A T L V A पत 卐 N ट卐 नवतत्व सुमङ्गला- र्टकायां- 卐 A ध V ज A पापत पञ्चज्ञान वर्णनम् ॥ ५७॥ 卐 T मनःपर्यवश्च स ज्ञानं मनःपर्यवज्ञानं, यद्वा मनःपर्यायज्ञानम् । तत्र संज्ञमिर्जीवैः काययोगेन गृहितानि मन यायोग्यवर्गणा- द्रव्याणि चिन्तयवस्तु चिन्तनव्यापृतेन मनोयोगेन मनस्त्वेन परिणमय्याऽऽलम्ब्यमानानि मनांसीत्युच्यन्ते, तेषां मनसां। 卐 पर्यायाश्चिन्तनानुगताः परिणामा मनःपर्यायास्तेषु तेषां वा सम्बन्धिज्ञानं मनःपर्यायज्ञानम् , यद्वा आत्मभिर्वस्तुचिन्तने व्या- पारतानि मनांसि पर्येत अवगच्छति मनःपर्यायम् । अयमत्राशयः, मनो द्विविधं द्रव्यमनो भावमनश्च, तत्र द्रव्यमनो मनोवर्गणा, भावमनस्तु ता एव वर्गणा वेन गृहीताः सत्यो मन्यमानाश्चिन्त्यमाना भावमनोऽभिधीयते, तत्रेह भावमनः परिगृह्यते, तस्य भावमनसः पर्यायास्ते चैवंविधाः, यदा कश्चिदेवं चिन्तयेत् के स्वभाव आत्मा ? ज्ञानस्वरूपोऽमूर्तः, कर्मणां 卐 कर्ता सुखादीनामनुभोक्ता इत्यादयो ज्ञेयविपयाऽध्यवसायाः परगतास्तेषु तेषां वा यज्ज्ञानं तन्मनःपर्यायज्ञानम् । तानेव मन:- पर्यायान् परमार्थतः समवबुध्यते, बाह्यॉस्त्वनुमानादेवेत्यस तन्मनःपर्यायज्ञानम् ॥ केवलं सम्पूर्णज्ञेयं तस्य तस्मिन् वा सकल- 卐 ज्ञेये यज्ज्ञानं तत्केवलज्ञानम् , सर्वद्रव्यपर्यायपरिच्छेदीति भावः, अथवा केवलमेकं मत्यादिज्ञानरहितमात्यन्तिकज्ञानावरण- 1 क्षयप्रभवं, 'नढम्म छाउमथिए नाणे' इति वचनात् । अत्राह; यदि मत्यादीनि ज्ञानानि खर्क यस्त्रयाऽऽवरणक्षयोपशम- सद्भावेऽपि प्रादुर्भवन्ति, ततो नःशेषतः स्वयाऽऽबरणक्षये सविशेषेण भवेयुश्चारित्रपरिणामवत् , कथं क्षायिकज्ञानस्याऽऽ- विर्भावे तेषां मत्याद नामभावः प्रोच्यते ? भाष्यकारोऽप्याहुः-'आवरणदेसविगमे, जाई विजंति मइसुयाणि । आवरण ! सबविगमे कह ताइ न हुँत वस्स?॥१॥ इति । उच्यते-इह यथा सहस्रभानोरतिसमुन्नतघनाघनपटलान्तरितस्याऽपान्त- रालाऽवस्थितकटकुड्याद्यावरणविवरप्रविष्टप्रकाशो घटपटार्द नि प्रकाशयति, तथा केवलज्ञानावरणावृतस्य केवलज्ञानस्याऽपान्त- * N A G 卐 T 卐 V 卐 A L --- ॥ ५७ A --- N S 卐 A 卐 V 卐 A 卐 T 卐 रालाऽवस्थितमतिज्ञानावरणादिक्षयोपशमरूपविवर निर्गतप्रकाशे जीवादन् प्रकाशयति, स च तथा प्रकाशयन् मतिज्ञानम- U त्यादिलक्षणं तत्तत्क्षयोपशमानुरूपमभिधानसुद्धहति, तते यथा सकलधनपटलकटकुट्याद्यावरणापगमे स तथाविधः प्रकाशः 卐 सहस्रभानोरस्पष्टरूयो न भवति किन्तु सर्वात्मना स्फुटरूपऽन्य एव, तथैहाप सकललेवलज्ञानावरणमतिज्ञानाद्यावरणब्लिरे न तथाविधो मतिज्ञानादिसंज्ञितः केवलज्ञानस्य प्रकाशो भवति, किन्तु सर्वात्मना यथावस्थितं वस्ट परिच्छन्दन् परस्फुट- रूपोऽन्य एवेत्यदोषः उक्तश्च श्रीपूज्यैः ‘कटविवरागय करणा मेहंत रीयस्स जह दिणेसस्स । ते कडमेहावगमे न हुँति ! जह तह इमाईप'। १॥ अन्यैरपि न्यगादि-" मल विद्धमोर्च्यक्तिर्यथानेकप्रकारतः । कर्मविद्धाऽऽत्मविज्ञप्तिस्तथान्का- 卐 कारतः ।१॥ यथा जात्यस्य रत्नस्य निःशेपमलहानितः। स्फुटैकरूपाभिव्यक्तिर्विज्ञप्तिस्तद्वदात्मनः"। २॥ अन्टे पुनराहु, सन्टेव मतिज्ञानादीन्यपि सयोगिवल्याद, केवलमफलत्वात् सन्त्यपि तदानीं न चिवक्ष्यन्ते, यथा सूर्यदटे नक्षत्राद नि, 卐 उक्तञ्च-' अने आभिनिवोहियनाणाईणि वि जिणस्स विजंति । अफलाणि य सूरुदरे जहेव नक्खत्तमाइणि ' ॥१ असाधारणं वा लेवलमनन्यसदृशचात् , अनन्तं वा केवलं ज्ञेयानन्तत्त्वात् अपर्यवसितानन्तकालावस्थायित्वाद्वा, निळघातं वा केवलं लोऽलोके वा क्वापि व्याघाताऽभावात् , केवलञ्च तज्ज्ञानं केवलज्ञानं यथावस्थितसमस्तभूतभवद्भाविभावस्वभावाऽव- भासि ज्ञानमिति भावना ॥ एतेषां मतिज्ञानार्दनां यद् यदावरणं तत्तद् तज्ज्ञानावरणसंज्ञकम् । यथा इन्द्रियानिन्द्रियजन्यं परेक्षमक्षरलब्धिरूपं मति- ज्ञानं, तह नाऽऽवियते तन्मतिज्ञानावरणम् ॥१॥ इन्द्रयानिन्द्रियजन्यं परेक्षमर्थेपलब्धिरूपं ज्ञानमथवा द्वादशाङ्गी रूपं यच्छा- ॐ N 卐 A G T A 卐 L 卐 A R- - S 卐 U 皖N盟A蝠 नवतत्त्व उमङ्गला- टीकायां- V ॥ ५८॥ ) A वा 卐 T स्त्रज्ञानं तच्छ्रुतज्ञानं, तद्येनाप्रियते तच्छ्रुतज्ञानावरणम् ॥ २॥ इन्द्रियनोइन्द्रियनिरपेक्षं मूर्त्तद्रव्य विषयमात्मप्रत्यक्षं यज्ज्ञानं पापतते तदवधिसंज्ञक, तद्येनाऽऽत्रियते तदवधिज्ञानावर यम् ॥ ३॥ इन्द्रियनोइन्द्रियनिरपेक्षं संज्ञपञ्चेन्द्रियजोवमनोगतभावज्ञापक दप्रति- मात्मप्रत्यक्षं यज्ज्ञानं तन्मनःपर्यायज्ञानम् , तद्येनाच्छाद्यते तन्मनःपर्यवज्ञानावरण यम् ॥ ४ ॥ मनइन्द्रयनिरपेक्षं लोकालो- . पादनम् कवर्निनिःशेपद्रव्यपर्यायप्रदर्शकमात्मप्रत्यक्षं सम्पूर्णमनन्तं यज्ज्ञानं तत्केवलज्ञानम् , तद्येनाब्रियते तत्केवलज्ञानावारकं कर्म 卐 ॥ ५॥ यदुदयादातव्यनिरवद्यद्रव्यसत्तायामपि गुणवत्पात्रदानफलज्ञोऽपि सम्यग्भावे विद्यमानेऽपि दातुं न शक्नोति तदानान्त- रायम् ६ । यदनुभवाच सत्यप देये प्रसिद्धाद प दातुर्याञ्चाकुशलोपि न लभते तल्लाभान्तरायम् ७ । भोग्यसुपभोग्यं विद्य- 卐 मानमनुपहताङ्गोऽपि यदुदयान समर्थे भवति भोक्तुमुपभोक्त्तुं तद्भोगान्तरायमुपभोगान्तरायंच क्रमेण बोध्यम् ८-९।यदुदयाद- N नुपहत नाङ्गोऽप कार्यावसरे शक्तिविकलो भवति तद्वीर्यान्तरायम् ॥१०॥ इत्येवं ज्ञानावरणपञ्चकमन्तरायपञ्चकञ्च विवृतम् । y अथ दर्शनावरणनवकमशुभप्रकृतिभूतं व्याख्यायते;-' नव वए' त्ति, चक्षुपा सामान्यग्राह बोधश्चक्षुर्दर्शनं, तल्लब्धि- वघातकं चक्षुर्दर्शनावरणम्, यदुदयादन्धत्त्वं नेत्ररोगत्वं वा जायते तच्चक्षुर्दर्शनावरणमित्यर्थः ११ । चक्षुर्वर्जशेपेन्द्रियचतुष्केन 卐 मनसा च स्पर्शनाद्यात्मकः सामान्यबोधस्तदचक्षुदर्शनम् , तल्लब्धिविघातकमचक्षुदर्शनावरणम् , यदुदयाद् बधिरत्वादयो दोषाः प्रादुर्भवन्ति तदचक्षुर्दर्शनावरणमित्यर्थः १२ । तथाऽवधिना रूपिमर्यादया दर्शनं सामान्यबोधस्तदवधिदर्शनम् , तस्याऽऽवरण- 卐 मवधिदर्शनावरणम् , यदुदयान्मूर्त्तद्रव्याणामात्मप्रत्यक्षस्सामान्याऽर्थग्राहको बोधो न भवति तद्वधिदर्शनावरणमित्यर्थः १३ । यदुदयात् समस्तलोकाऽलोकवर्तनां मूर्ताऽमूर्त्तद्रव्याणामात्मप्रत्यक्षेन सामान्यात्मकेन बधेन भूयते तत्केवलदर्शनम् , तस्या- 卐 ॥५८॥ - A 卐 T A V L 卐 A A 卐 का 卐 N S । A 卐 V 卐 卐 T 卐 ऽऽवरणं केवलदर्शनावरण मति १४ । एतद्दर्शनावरणचतुष्कं दर्शनलब्धिलाभ मूलत एव हन्ति । 'द्रा' कुत्सायां गतं, नयतं द्रात कुत्सितत्त्वमविस्पष्टत्त्वं गच्छति चैतन्यमनरे ति निद्रा, सुखप्रबधा स्वापाऽवस्था नख- च्छे टिकामात्रेणाऽपि प्रबोधो भवति तद्विपाकव्या कर्मप्रकृतिरपि निद्राख्यया व्यपदिश्यते १५। तथा निद्रातिशायरी निद्रा नद्रा, शाकपार्थेवत्त्वान्मध्यम पदलो समासः, सा पुनर्दुःखप्रबंधा स्वापाऽवस्था, तस्यां ह्यत्यर्थमस्फुटतरभूतचैतन्य- चाहुःखेन बहुभिघलनादिभिः प्रबधो भवति, अतः सुखप्रबोधनिद्रापेक्षया अस्या अतिशायिन् त्वं तद्विपाकव्या कर्मप्रकृति- A कार्यद्वारेण नद्रानद्रेत्युच्यते १६ । उपविष्ट ऊर्ध्वस्थितो वा प्रचलत्यस्यां स्वापाऽवस्थायामिति प्रचला, सा हे उपविष्ट- स्योर्ध्व स्थतस्य वा घूर्णमानस्य स्वप्तुर्भवति, तथाविधविपाकवेद्या कर्मप्रकृतिरपि प्रचलेत्युच्यते १७ तथैव प्रचलाऽदिशा- 1 यिनी प्रचलामचला, सा ह चंक्रमणादिकुवत: स्वप्तुर्भवत्यतः स्थानस्थितस्वतृभवां प्रचलामपेक्ष्यातिशायिनी, तद्विपाकव्या 卐 कर्मप्रकृतिरपि प्रचलाप्रचला, १८ । स्त्याना बहुत्वेन संघातमापन्ना, गृद्धिरभिकासा जागृदवस्थाऽध्यवसितार्थसाधनपिया व यस्यां स्वापाऽवस्थायां सा स्त्यानगृद्धिः, तस्यां हे सत्यां जागृदवस्थाऽध्यवसितमर्थ साधयति, स्त्याना वा पिण्ड भूता 卐 ऋद्धिरात्मशक्तिरूपाऽस्यामिति स्त्यानर्द्धिरित्युच्यते, तद्भावे हे स्वप्तुः केशवार्धवलसदृश शक्तिराविर्भवति, अथवा स्त्याना जडभूता चैतन्यर्द्धिरस्यामिति स्त्यानार्द्धः, अस्यां निद्रायां धूर्णिते जन्तुर्जागृजन इव गृहान्तर्गमनाऽऽगमनं ध कुरुते, आपण थ्यां गत्वा क्रय विक्रयं करोति, वनान्तर्वनपशुभिस्सह युद्धादिकं विदधाति, मतङ्गजानां दन्तादि निष्कास्या- ऽऽनयति च । अस्यां निद्रायां नद्रितः प्रथमसंहननोप्तश्चेत्तदा केशवाऽपेक्षयार्धवल द यदि प्रथमवर्जसंहनन प्ते भरे- 卐 卐 A 卐 T A V L 卐 A N S 卐 , 卐 नवतत्वा A सुमङ्गला- 卐 काय- V ॥ ५९॥ 卐 A ध T पापतत्त्वे- दप्रति- पादनम् . तदा सामान्यशक्ततः सप्ताष्टगुणं सामर्थ्य स्यात् , प्रसिद्धयाऽयमर्थ सद्धान्ते-'भिक्षार्थमन्यग्रामं गतस्य क्षुल्लकस्याऽऽगच्छतो न्यग्रोधशाखायां शरः स्खलितम् , ततस्तेन रुप्टेन रात्रावेतन्निद्रोदये सा वटशाखा भक्त्वा प्रतिश्रयद्वारि प्रक्षिप्ता' इत्याधुदाह- रणेभ्य इति १९ । इत्येवं निद्रापञ्चकं दर्शनाऽऽवरणक्षयोपशमाल्लब्धाऽऽत्मलाभानां दर्शनलनामाचारकत्वात् पापप्रकृतित्वेन व्याख्यातम् , अन्यथा निद्रावस्थायामात्मा त्वात्मानं सुखितो मन्यते ॥ येन कर्मणा न चकुले जन्म स्यात्तन्नीचगोत्रम् २० । यस्योदयेन दुःखपरम्परा लभ्यते नारकादिभवेष्विव तदसातवेद- नयम् २१ । 'अदेवे देवबुद्धिर्या गुरुध गुरै च या । अधर्मे धर्मबुद्धिश्च मिथ्यात्त्वं तन्निगद्यते ॥ १ ॥ इतिलक्षणं मिथ्या- चमोहनेयम् २२ । स्थावरदशकमग्रे व्याख्यास्यते ३२ । यया वो नरके प्रयाति सा नरकगतिः ३३ । येन कर्मणा वो नरले तिष्ठति स्वायुपस्समाप्तिं यावत्तन्नरकायुः ३४ । यया कर्मप्रकृत्या वो बलान्नरके नीयते या नरकाऽऽनुपूर्व । ३५ । कपायाः पञ्चविंशतिः, ते चैवं पोडशकपाया नवनोकपायाश्च, कपायाश्चतुःप्रकाराः क्रोधमानमायालोभभेदात् , प्रत्येकं पुन- चतुर्धा, चतुर्वेधत्त्वं चैपामनन्ताऽनुवन्धि-अप्रत्याख्यान-प्रत्याख्यान सबलनभेदैर्ज्ञातव्यम् । तत्र येऽनन्तसंसारमूलकारण- मिथ्यात्वोदयाक्षेपित्त्वादनन्तभवानुवन्धरला यथासंख्यं पर्वतरेखाशैलस्तम्भवंर्श मूल मरागसमानास्तेऽनन्तानुवन्धिको- धादय आजन्मावधिभाविनो नरकगतिप्रदायिनस्सम्यक्त्वपातनो ज्ञेयाः। ये च नमोऽल्पार्थत्त्वादल्पमपि प्रत्याख्यानमावृण्वन्ति यथाक्रमं पृथिव रेखा-अस्थि-मेपश्रृङ्ग-कर्दमरागतुल्यारतेऽप्रत्याख्यानाः क्रोधादयो वर्पावधिभाविनस्तिर्यग्गतिदायिनो देश- विरतघातिनः। तथा ये प्रत्याख्यानं सर्व वरत्याख्यमावृण्वन्ति क्रमेण रेणुरेखा-काष्ठ-गोमूत्रिका-खञ्जनरागसमानाः प्रत्या- 卐 A 卐 N, प 卐 A 卐 T y V ज A क L. ।'५९॥ Iman- ज S N 卐 A V ज M 卐 A 卐 N ख्यानाऽऽवरणाः के पादय मासचतुष्टयभाविनो मनुष्यगतिदायनस्साधुधर्मघातिनः । ये पुनस्सवलयन्ट पद्द पयन्ति चारि- त्रिणमपि क्रमश जलरेखा-तिनिशलता-अवलेखा-हरदारागसमानास्ते सज्वलनक्रोधादयः पक्षावधय देवगतिप्रदा यथा- ख्यातचास्त्रिघातनः, एवं क्रोधादयः प्रत्येकं चतुर्भेदाः पोडशाऽभूवन् । ५१ । नोकपाया नव-हास्यादिपकव्दत्रयरूपा, तत्र हास्यपदकं हास्य रति-अरत-शोक-भय-जुगुप्सालक्षणं ज्ञातव्यम् , तत्र येन सनिमित्तं निमित्तं वा हास्यं स्यात्तद् हास्यम्- 卐 हन्त्यम् ५२ । येन कर्मणा मन हरेषु शब्दरूपादिपदार्थेषु रागस्स्यातद्रतिमहनी यम् ५३ । येन कर्मणा पुनरमनोज्ञेषु शब्दा- 'दिपुद्वेगस्स्यात्तदर तिमोहन्यम् ५४ । येनाऽभीष्टवियोगादिदुःखं धियते तच्छे कमोहनीयम् ५५ । येन कर्मणा जीवानां नाना- 3 विधैमित्तैर्भयमुत्पद्यते तद्भयमोहन यम् ५६ । यस्य दयेन बभत्सवस्तुदर्शनेन नन्दादिकं करोति तज्जुगुप्सामोहन्यम् ५७ । अथ वेदत्रयं पुरुपन्द-रु वेद-नपुंसकन्दाऽत्मक, तत्र यस्योदरेन पुंसः श्लेष्मोदयादम्लाभिलापवत् स्त्रियं प्रत्यभिलापः स पुरुष- 卐 वेदस्तुणदाहतुल्यः ५८ । येनोदितेन स्त्रियाः पित्तदये मधुराभिलापबत् पुरुष प्रत्यभिलापः स स्त्रीन्दः कर पदाहतुल्यः ५९ A रेनोदितेन कर्मणा षण्डकस्य पित्तश्लेष्मदरे मजिकाऽभिलाषवत् पुंस्त्रीविषयेऽभिलापस्स्यात् स नपुंसकटेद नगरदाहतुल्यः ६० एवं पडशकषायैर्नवनोकपायैः कषायपञ्चविंशतिर्विवृता । तिर्यद्विकं तिर्यम्गतितिर्यगानुपूर्वरूपम् , ऐन कर्मणा तिर्य- T रगत गम्यते तत्तिर्यग्गतिनाम ६१ । रेन तिर्यग्गत बलानी यते सा तिर्यगानुपूर्व ।। ६२ ।। 卐 इत्येवं पापतत्त्वस्य व्यशति देषु द्विषष्टिर्भेदाः प्रकीर्तिताः, अथ शेपदान् विवरिपुराहः- बतिच्उज इओ,कुख्गइ उन्ध्य हुंरि पवस्स अप्पसत्त्थं वाणघउ, अपढम्स्टर संठ २२ 5 T 卐 A V L ज A 51 S N अनवतत्त्व- 卐 A 卐 V टीकायां- । ६०॥ 卐 A A T टीका-'इग' ति- यया एकेन्द्रयो द्वीन्द्रियरून्द्रयश्चतुरिन्द्रियो वेति व्यपदेशमश्नुते वः सा सा एकेन्द्रियादि- U पापतत्त्वे- जातयः, एलेन्द्रयादयश्चैक द्वित्रिचतुः संख्यस्पर्शन-रसन-प्राण-चक्षुःस्वरूपेन्द्रियक्रमवृद्धिभाजो विज्ञेयाः ६३-६४-६५-६६। ' भेदप्रति- यदुदयेन खरोष्ट्रार्दनामिवाऽप्रशस्तगमनमङ्गिनामुपजायते सा कुत्सिता खगतिरप्रशस्तविहायोगतिरत्यर्थः, विहाय पर्याय पादनम् वाचकखशब्दश्च नामकर्म प्रथमप्रकृतिव्यवच्छेदार्थः, अन्यथा कुगतिरित्युक्ते नरकगत्यादिभवगतेरपि प्रत तस्स्यात् । ६७ । पूज यद्वशेन स्वशरीरावयवैरेव प्रतिजिह्वा-गलवृन्दलम्बक-चरदन्तादिभिः स्वशरीरान्तर्वर्द्धमानैरुपहन्यते च्यिते तदुपघात नाम, ६८ । ' हुँत पावस्स ' अर्म पूर्वक्ता दा नखिला अपि पापस्याऽशुभकर्मणो भवन्ति । 'हुंत पावस्स' इति पदं डमरूकमणि- 卐 न्यायेन गाथापूर्वा यथा युक्तं तथा गाथापश्चार्धेऽपि योज्यम् । वक्ष्यमाणा अग्रशस्तवर्णादयोऽपि पापभेदा एवेत्यर्थः । प्रश- N स्यते स्तूयते तत्प्रशस्तं, न तथाऽप्रशस्तमशोभनमिति यावत् , यस्योदयेन वस्यौदारका दशनीरं कृष्ण लवर्णवद्भवति काक- कोकिलादनां यथा तदप्रशस्तवर्णनाम ६९ । यदुदयेन वस्य दारिका दशरीरं दुर्गन्ध भवति लशुनदिनामिव तदप्रशस्त- गन्धनाम ७० । यदुदयेन जीवस्य दारिका दशरं तिक्तकटुकरसभाग भवति यथा निम्बमरिचार्द नां तदप्रशस्तरसनाम ७१ । यदुदयेनाऽऽत्मन अंदारिका दशरीरं तकर्कशगुरुरूक्षस्पर्शभाग् भवति क्रमशो जलवृक्षपर्णविशेषपारगरेणूनामिव तदप्रशस्त- A स्पर्शनाम ७२। 'अपसत्त्थं वण्णचउ अपढमसंघयण संठाणा' प्रथम संहननं प्रथमञ्च संस्थानं वर्जयित्वा शेपाणि पञ्चसं- 卐 हननान पञ्चसंस्थानानि च पापप्रकृतिमध्ये ज्ञातव्यान, प्रथमसंहननं प्रथमसंस्थानञ्च पुण्यप्रकृतिमध्ये प्रागेव व्याख्यातम् । अन्तिमसंहननपञ्चकं च ऋषभनाराच-नाराचाऽ-र्धनाराच-कलका-स्वाभिधम् । तत्र ऋषभः परिवेष्टनपट्टः, नाराच उभयतो ॥६० 卐 G 卐 T 卐 V L ध A A ॐ 卐 N 卐 A U 卐 V 卐 A A 卐 T मर्कटबन्धः, यस्मिन्नस्थिसंधावुभयते मर्बटबन्ध मर्कटबन्धस्य परिष्टाच पट्टः स्यात्तद् ऋषभनाराचम् , अन्टे वज्रनाराच मेदं व्यपदिशन्त, तन्मतेन भवर्जमर्कटबन्धबद्धास्थ्नरन्तः क लकैवाऽत्र भवति, वज्रशब्दस्य कैलिकापर्यायत्वात् ७३ 'वज्र- भिवहनमुभयतो मर्कटबन्धयुक्तं तृतीयं संहननं नाराचम् ७४ । यत्रैकपाधै मर्कटबन्धोऽपरपार्श्वे च क लेका तदर्धनाराचम् । ७५ । यत्राऽस्थीनि क लकामात्रबद्धान स्युस्तत् क लकाख्यम् । ७६ यत्र पुनरस्थ न पृथक् पृथक् स्थितान परस्परं संलगानि भवति तत् स्वां ऋतं आगतं निपातनात्स्वार्तम् । ७७ । एवं पञ्चसंख्यानि संस्थानान द्वर याद न यथाक्रमं न्य- 卐 ग्रोधपरिमंडल-सादि-वामन-कुब्ज-हुण्डान । तत्र न्यग्रोधवट इव परिमंडलं न्यग्रोधपरिमंडलम्, यथा न्यग्रोध उपर सम्पूर्णाऽ- वयवोऽधस्तनभागे तु न तथा, तद्वदेदमपि ना पर विस्तरबहुलं सम्पूर्णलक्षणादिभाग, अधस्तु न तथा ७८ 'साद ति' 卐 आदिरिहोत्रेधाऽऽख्यो नारधस्तनो देहभागस्टेन यथेक्तलक्षणप्रमाणभाजा सह यद्वर्त्तते तत्सादिः ७९ कुब्जसंस्थानं । 卐 यत्र पाणिपाद शरेवादिकं प्रमाणलक्षण पेतम्, उरउदरादि च प्रमाणलक्षणाभ्यां हनं तत् कुब्जम् ८० । तद्विपरतं वामनसंस्थानम् , यत्र उरउदरप्रभृतिप्रमाणलक्षणयुक्तं पाणिपाद शरेयवाद च प्रमाणलक्षणरहितं तद् वामन मत्यर्थः ॥ ८१॥ सर्वाऽवयवैरशुभ हुंडसंस्थानम् ।। ८२ ।। १९ ।। 卐 प्रारक्तं व्यर्श त दगतं स्थावरदशकमथ विवियते-- शवरसुहुमअपजं, सहारणम् थरम्सुभदुभग दुसरण इज्जज्सं, थरद विटजत्थं २० टीका-तिष्ठंत उष्णादितप्ता अप तत्परिहाराऽसमर्था भवन्ति रे स्थावराः, यद्विपा : थव्यालेन्द्रियस्थावरकारे ध G A 'A T 卐 卐 V L 卐 A ११ A y 1 N का S 卐 A नवतत्त्व- सुमङ्गला- र्टकायां- पापतत्त्वे स्थावर- V 卐 M दशकम् ॥ ॥६१॥ A 卐 A T कायभाजः समाविशन्त, तत्स्थावरनाम ॥१॥ यत्प्रभावाच सर्वलोकव्यापिसूक्ष्मपृथिव्यादिजीवेषु जीवास्समुत्पद्यन्ते येन र्जबाश्चर्मचक्षुपामदृश्या भवन्ति यथा निगोदादयस्तत् सूक्ष्मनाम ॥ २॥ यदुदयादाहारपर्याप्त्यादिपूर्वोक्ताः पर्याप्तय एकेन्द्रियादिवानां यथास्वं विकला अपरिपूर्णा भवन्ति यथा सर्वकालं लब्ध्यपर्याप्तानां तदपर्याप्तनाम ॥३॥ यत्सामर्थ्यादन- न्तानां जवानां साधारणमेकं शरीरं भवति यथा कंदाद्यनन्तकायिकानां तत्साधारणनाम ॥४॥ येनजवानां भ्रूजिह्वष्ठादना- मवयवानामस्थिरत्वं स्यात्तद स्थरनाम ॥५॥ यदुदयेन नाभेरधः पादादयोऽशुभावयवास्सन्ति तदशुभम् , पादादिभिस्स्पृष्टो है परो रुष्यतीति तेषामछुभत्वम् ॥६॥ यदुद्यादृष्टमात्रोऽपि प्राण सर्वेषाद्वेगजनकस्स्यात्तदुर्भगनाम, असुभगनामेति यावत् ॥ ७॥ येन जवानां खरोष्ट्रार्दनामिवाऽमनोज्ञः स्वरः स्यात्तदुःस्वरनाम ॥ ८॥ यदुदयाद्युक्तियुक्तमपि वाणः परिहार्य- वचनोऽग्राह्यवचनो भवति तदनादेयनाम ॥९॥ यदुदयाज्ज्ञान विज्ञानदानाऽऽदगुणयुतस्याऽपि न यश प्रादुर्भवतः प्रत्युताऽश्लाध्यता संजायते तदयश-कीर्तिनाम ॥ १०॥ इत्येवं स्थावरदशकं पुण्यतयोक्तत्रसदशकाद् विपरीतार्थ भावन यम् ॥ व्याख्याता व्यतिपापप्रकृतयः। तासां मध्ये देवनारकादिषु चतसृपु गतिपु कस्यां गत कति प्रकृतय उदय- वत्यो भवन्त ? एलेन्द्रियादिजातिपञ्चकमध्ये कस्यां च जात कते प्रकृतय उदयवत्यो वर्त्तन्ते तस्याऽयं संक्षेपः- देवगत-स्थावर-सूक्ष्म-साधारणा-ऽपर्याप्त-नरकत्रिक नपुंसकटेद-तिर्यद्विक-एकेन्द्रिया दजातिचतुष्क-ऋषभनाराचप्रभृति- संहननपञ्चक-न्यग्रोधादिसंस्थानपञ्चका-प्रशस्तविहायोगति-दुःस्वर-चैर्गोत्रलक्षणसप्तविंशतिप्रकृतिवर्जाः पञ्चपञ्चाशत् प्रक- तयः स्त्यानचित्रिकर्ह नाश्च पुनर्वैपञ्चाशत् प्रकृतय उदयत्वेन वरं वर्त्तन्ते ॥ स्थावर-सूक्ष्मा-ऽपर्याप्त साधारण प्रथमवर्जसंह- 卐 N A G T - 卐 A 卐 V 卐 L 卐 A 卐 A 卐 卐 N 卐 S ध ज A 卐 V 卐 M A 卐 A y T ननप -मध्यसंस्थानचतुष्क-एकेन्द्रियादिजातिचतुष्क-पुंद-रु वेद-तर्यद्विकस्वरूपकविंशतिप्रकृतिवर्जा एकपष्टिपाप- प्रकर्नरकगत नारका पालेनाऽनुभवन्ति, स्त्यान त्रिकस्याऽध्रुव दयित्वात् त्रिकर्ह नाश्च पुनरष्टपञ्चाशदपि वज्ञेयाः। स्थावर-सूक्ष्म-साधारणैकेन्द्रियादिजातिचतुष्क-तर्यग्द्वक-नरकत्रिकाऽऽत्मकद्वादशप्रकृतिर्ह नाः सप्ततिप्रकृतये मजग- त्यासुदयन मरजैरनुभूयन्ते । नरकत्रिकवर्जा एकोनाशीतिपापप्रकृतयस्तिर्यग्गताबुदयतयाऽभूयन्रे दुःस्वर-नर- कत्रिक-पुरुषव्द-सुवेद-दीन्द्रयजाति-न्द्रयजाति-चतुरन्द्रयजाति-अप्रशस्तविहाय गति-अन्तिमसंहननपञ्चक-मध्य- संस्थानचतुष्काऽऽत्मकैकोनविंशतिवर्जास्त्रिषष्टिप्रकृतय एकेन्दियजातादयत्वेन वर्त्तन्ते एवं इन्द्रियकीन्द्रियचतुरन्द्रय- जातावपि विज्ञेयम् । केवलं हयमानैक नविंशतिप्रकृतिषु एलेन्द्रियजात्याः स्थाने यथाक्रम द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरेन्द्रय- जातयो वक्तव्याः। पञ्चेन्द्रियजात्यां पुनरेन्द्रियादिजातचतुष्क-सूक्ष्म-साधारण-स्थावरलक्षणाः सप्त प्रकृतीर्जयित्वा शेषाः पञ्चसप्ततिप्रकृतय उदयवत्यो भवन्ति, एवं काययेगादिमार्गणास्वपि स्वयमभ्यूह्यम् । इते पापतत्त्वम् । हुई यतत्त्वव्याख्यान्ने पात्तं यन्मया सुकृतम् । पापं धूय रेन व्रजन्तु शवधाम्नि द्विांसः ।१॥ इत्याराध्यपादाऽचार्यवर्य मद्विजयमोहनसूर श्वर विन्यावतंस पाध्यायपदालङ्कृत मत्प्रतापविजय- गणिशिष्याणुप्रवर्तक निश् धर्मविजयविरचेतायां नवतत्त्वप्रकरणसुमङ्गला कायां दुरीयं पापतत्त्वं समाप्तम् N 卐 है G 卐 T A 卐 V ज L ॐ A 卐 - क N 卐 S नवतत्त्व A पञ्चमाऽऽ- 卐 U 卐 श्रवतत्त्व- स्थ अत्त प्रारम्भः॥ 卐 टीकाय V ॥ ६२॥॥ A ज T Byहान 卐 A N 卐 A G 卐 T 卐 V श्र A 卐 न्थ्यं प्रति प्रस्थितांश्च विरतान् सत्त्वानुकम्पाऽमृषाऽ-स्तेयब्रह्मसुतोषपेपणरतान् सद्ध्यानसंपगतान् । योगातीतपदाभिलाषकुशलान् योगत्रयाराधकान् नव्यानपिबधिरत्नसुनिन् ध्यायाम योगेश्वरान १ उचाऽ-व-पुन्य-पापाख्यान चत्वार तत्वनि व्याख्यातानि, अथाऽनन्तरव्यावर्णतपुन्यपापयः शुभाऽशुभाऽऽ- श्रवस्वरूपत्वादुद्देशक्रमाऽऽयातमाश्रवतचं विवियते, तवादावाश्रवतत्त्वस्य द्वचत्वारंशद्भेदप्रतिपादिका ममा गाथामाह- इन्दय काय अहर-जेगा पंच चउ पंच तेपिण कम्। करिया पण सं, इमा उ त) अणुकमस' २१ । ट -आ अभिविधिना श्रवते कर्म रेभ्यस्ते आश्रवा इन्द्रयादयः, अथवा आश्रूयते आगम्यते आयते इति यावद- नेन करूंदकं जवतडारेविवेत्याश्रवः, यथा पार्थ धिमध्यवर्चसच्छिद्रा नजलेनाऽऽपूर्यते जलाऽऽक्रान्ता नमजति चाऽ- 卐 ॥ ६२ । A US 卐卐z - V 卐 A ध A 卐 T धस्सलेले, एवमेन्द्रियाद्याश्रवच्छिद्रसंपन्नो जीवपेतः प्रतिसमयं कर्मजलेनाऽऽपूर्यरे दुरन्तसंसारपारावारे नमजते चेति भावार्थः । इदं वक्ष्यमाणखरूपमाश्रवतत्वं द्विचत्वारिंशद्भेदाऽऽत्मकं तथापि विवक्षया पञ्चप्रकारं त्रिप्रकारं वा ग्रन्थान्तरेषु विवृतं, तथा च तद्रन्थः " पंचविहो पनत्तो, जिणेहैं इह अण्ह अणादी हंसामसमदत्तं अबंभपरेग्गह चेव ॥१॥ (प्रश्नव्या० गाथा-२ ) कायवाङ्मनःकर्मयोगः" स आश्रवः शुभः पुन्यस्य, अशुभः पापस्य " ( तत्त्वा अ० ६-मू० १-२-३-४)। परमार्हतपरनारसहोदरकुमारपालमहीपालप्रतिवधककलकाल- सर्वज्ञाऽऽचाय मद्धेमचन्द्रसूरपादैरपि येगशासे न्यगादि:-" मनोकाकायकर्माणि योगाः कर्म शुभाऽशुभम् । यदाश्रवन्ति जन्तूनामाश्रवास्टेन कर्तताः" ॥१॥ इत्येवमाश्रवस्य ववक्षया भिन्न भिन्नभेदाः सञ्जायन्हें, तथापि तेषु भेदप्रदेषु पूर्व- क्तानां मनवाकाययोगानां शुभाऽशुभत्त्वमेव शुभाऽशुभकर्मवन्धे निमित्तत्वम् । मैत्र्यादिभावनाभाविताऽन्तःकरणः सद्वेद्य- सम्यक्त्व-हास्य-रत-पुरुषब्द-शुभाऽऽयु-नाम-गोत्रलक्षणं शुभं कर्म सञ्चिनुरे स एवाऽन्य वा विषयकषायकलुषित चेतस्को ज्ञानावरण याद्यशुभं कर्म चेतनोत, उक्तं चाचार्यहेमचन्द्रमतल्लिकाभिः;-' मैत्र्यादवासितं चेतः कर्म सूरे उभाऽऽत्मकं । कपाय विषयाऽऽक्रान्तं वितनोत्यशुभं पुनः' ।१॥ द्वादशाङ्गस्वरूपप्रवचनस्याऽविरे वेन विद्यमानं जैन्द्रमवि- तथं वचो ब्रुवाणः शुभं कर्म अर्जयति, तदेव प्रवचन विरोधि वचे भाषमाणः अशुभं कर्म बध्नाति, तथा चक्तं-'शुभाज- नाय नर्मेथ्यं श्रुतज्ञानाऽऽश्रितं वचः। विपरतं पुनयिमशुभाजनहेत?' ॥१॥ एवं काययोगेऽप्यूह्यम् , तवं-कायेत्सर्गाद्य- वस्थायामसचेष्टार हेरेन काययोगेन जन्तुः सवेद्यादिपूर्वव्याख्यातं सत्कर्म चनुरे स एवाऽन्यो वाऽऽत्मा महारम्भणा N 卐 G A 卐 T 卐 . V 卐 A प N 卐 A 卐ध न उमङ्गला- टीकायां- V A T प्राणिव्यापादकेनाऽशुभकाययोगेनाऽसद्वेद्यादिपापकर्म बनाते, न्यगाद च-" शरीरेण सुगुप्तेन शरीरे चिनुते शुभम् आश्रवतर सततारम्भणा जन्तुघातकेनाऽशुभं पुनः" ॥१॥न शुभाऽशुभयगाः सदसत्कर्मणां कारणत्वेन सञ्जायन्ते परं ते शुभाऽशुभ- आश्रवणा योगाः केन हेतुना शुभाऽशुभत्वमाभजन्ति ' उच्यते-यदाऽऽत्मा पूर्वपात्तरागद्वेपस्नेहलेशाऽवल डसकलाऽऽत्मप्रदेशो 卐 M शुभाऽशुभ- भवते तदा येष्वाकाशदेशेष्ववगाढस्तेष्वेव व्यवस्थितान् कार्मणशरीरयोग्याननेकरूपान् पुद्गलान् स्कन्ध भूतानाहारवदात्मन 卐 त्वम् परिणामयति सम्बन्धयत ति, ततस्तानध्यवसाय विशेषाज्ज्ञानादीनां गुणानामावरणतया विभजते हंसः क्षरोदके यथा, यथा वाऽऽहारकाले परिणति वशेपक्रमवशादाहर्ता रसखलतया परिणतमानयत्यनाभोगवर्यसामर्थ्यात् , एवमहाप्यध्यवसायवि- शेषात् केञ्चिज् ज्ञानावर यतया कश्चिद्दर्शनाऽऽच्छादकत्वेनाऽपरं सुखदुःखाभवनयोग्यतया परश्च दर्शनचरणव्यामोह- कारितयाऽन्यन्नारकतिर्यमण्याऽमराऽऽयुष्केनाऽन्यद्गतिजातिशर राधाकारेणाऽपरमुच्चर्न चगोत्राऽनुभावेनाऽन्यद्दानाद्यन्तरा- यकारतया व्यवस्थापयति, तत्र प्रशस्तकार्येपु नयुक्तैरध्यवसायैरुपात्ताने शुभफलप्रदान कर्माणि शुभानि, पां कर्म- 15 गारपचरे निमित् भूता मनेवाकाययोगा अपि शस्ताः। अप्रशस्तकापूपयुक्तैः प्रविचारैरुपचितानि अशस्तफलदान 卐 कमणि पापसंज्ञकान, तेषु कारणिका मनोवाकाययोगा अप्यसन्तः इति कृतं प्रसङ्गेनेति । अथ सूत्रोक्तगाथा वित्रियते-तत्रे- न्द्रियस्वरूपं जीवतत्त्वे 'पणिदिय' ति गाथायां सविस्तरं अपश्चितं, तथाऽपि स्थानाऽशून्यार्थ नामतो लख्यते;-स्पृश्यते ध स्वविषयः स्पर्शलक्षणोऽनेनेति स्पर्शनं त्व गन्द्रियम् । रस्यते आस्वाद्यते रसोऽनयेति रसना-जिह्वेन्द्रियम् । प्रायते गन्धोऽनेनेति घाणम्-नासिलेन्द्रियम् । चक्षुलचनम्-चक्षुरिन्द्रयम् , श्रूयते आकर्ण्यते शब्दोऽनेनेति श्रोत्रम्-श्रवणेन्द्रियम् । 卐 ॥ ६३ A G T -- 卐 A L A 卐 A ni ofU au N 卐 A 卐 V 5GES 卐 A 卐 T अत्राऽऽह-एतैः पूर्वप्रपश्चिरैरिन्द्रियैः कर्मवन्धः कथं स्याद्यत एतानि आश्रवतचे प्रकर्तिताः ? उच्यते-शीतोष्ण- स्निग्धरूक्ष-मृदुकर्कश-गुरुलघुप्रकारोऽष्टविधः स्पर्शः स्पर्शनेन्द्रियस्य विषयः, तत्राऽनुकुलमुष्ण-स्निग्ध-मृदादिलक्षणं स्पर्श प्राप्य तुष्यति, प्रतिकूलं शोतादिकं च लब्ध्वा रुप्यति, तोपरोपं च काऽऽश्रवस्याऽनन्यहेतू , अतोऽनुकलप्रतिकलस्पर्शर्यत् कर्म बध्यते स स्पर्शनेन्द्रियाऽऽश्रवः । अम्ल-मधुर-तिक्त-कपाय-कटुलक्षणः पञ्चभेदभिन्नो रसो रमनेन्द्रियगोचरः, तत्र मधु- रादि रसं संप्राप्य तुष्टिः, तिक्तादिकं चाऽऽखाद्य द्वेषः सुप्रतीतः, एवं रसनेन्द्रियविषयशुभाऽशुभरमाऽऽस्तादजन्य- रागद्वेष रसनेन्द्रियाऽऽश्रय ॥ सुरभिदुर भगन्ध घ्राणेन्द्रियगोचर, सुरभिगन्धमाघ्राय प्रीतिः, दुरभिगन्ध प्रति चानीतिः, इति प्रीत्य- प्रीतिजन्य घाणेन्द्रियाऽऽश्रव । रक्त-ति-श्वेत-नल-कृष्णाऽऽत्मकं पञ्चप्रकारकं रूपं चक्षुरिन्द्रियविपर्य, तत्र मनोज्नुकूलं रूपं दृष्ट्वा रागः, मनः प्रतिकूलं च क्ष्य द्वेपः, इति रागद्वेष चक्षुरिन्द्रियस्याऽऽथय । सचिनाऽचित्तमिश्रभेदभिन्नः गन्दः श्रवणे- न्द्रियगोचरः, तत्र मनोहराणां तुर्याणां शब्दं श्रुत्वा रतिः, खरोप्दादीनां शब्दं निशन्य चाऽरतिः, शब्दमाश्रित्योत्पन्ने रत्यरती च श्रवणेन्द्रियस्याऽऽश्रय ॥ इत्येव मन्द्रियपञ्चकस्य त्रयोविंशतिसंख्याकाः स्पादिविषया अनुकूलप्रतिकुलतयाऽऽसेव्यमाना रागद्वेपोत्पादकत्वेन आश्रवास्समाख्याताः । यद्यपि निखिलाऽऽश्रबहेतवः समारपारावारपर्यटने प्रधानकारणास्तथापि केचना- ऽऽश्रवाः प्रशस्तभान्नाऽऽसेव्यमानाः पुन्यवन्धं विदधति, अग्रगस्ताशयेन च पापवन्धं वितन्वन्ति, यथा यः कचिल्लष्कर्मा चक्षुभ्यां प्रशमरस नेमग्नं दृष्टियुग्मप्रसन्नं सुराऽसुरनिकरनिपेव्यमाणं त्रिजगत्पूज्यं साक्षात् तीर्थकरभगवन्तं तेषामभावे प्रति- निधितुल्यां तन्मूर्ति वा दृष्ट्वा जातसंवेगः सन्नात्मानन्दमनुभवति, यश्च ताभ्यामेवाक्षिभ्यां ललितललनाङ्गप्रत्यङ्गदर्शनचेनस्कम्सन 卐 dea . ज T ध V 卐 A प A पर 卐 S N नवतत्त्व- A आश्रवतते आश्रवणा શુમાસુ- ॐ V र्टकायां- ॥६४॥ 卐 चम A T N 卐 मन से दुष्प्रापान महोदधिकल्लोलकल्पान् मृगतृष्णासमान् मनोरथान् चन्तयित्वा स्वस्थ संसाराऽनुषङ्गित्वं ख्यापयति तयोर्य- थासंख्यं आश्रवस्य शुभाऽशुभत्त्वं विज्ञेयम् । विविधरसाऽऽस्वादमुग्धः कश्चिद् वरसभोजनं लब्ध्वा खन्नमनस्कतया सूदं 卐 गृहभायां वा वरसभापया विसंवदति यष्टिमुष्टिप्रहारं वा कुरुते, साधुः साधुकल्पः श्राद्धो वा सरसं वरसं वा भुञ्जानः ' अरसं विरसं वाव सुइयं वा असुइयं । उल्लं वा जइ वा सुकं मंथु कुम्मास भोयणं' ॥१॥ इति दशवैकालेकोक्तां गाथामस्मरन् पुद्गलपरिणाममवधारयन् धर्मसाधकत्वेन च शरीरस्य पोष्यत्वं वचारयन् न रुष्यति नाऽपि तुष्यति तत्राऽपि क्रमेण शुभाऽ- शुभत्त्वमवयोध्यम् , एवं स्पर्शनादिष्वप्यूह्यम् । इति रागद्वेषाभ्यामारेव्यमानानामनुकूलप्रतिकूलस्पर्शादिविपयानां विपादपि कप्टतरं फलमभ्यूह्य मन्न्द्र नेगदितसुविशुद्धधर्मभावनाभावितात्मना येन प्रकारेणेन्द्रियाऽऽअवनिरोधस्स्यात्तथा प्रयतित- व्यम् , यतः पुन्योदयलभ्यं पञ्चेन्द्रियत्वमहत्प्रतविशुद्धधर्माराधने नियुज्येत तदा स्वर्गाऽपवर्ग प्राप्तिः, अन्यथाऽतीच ! 卐 विपयाऽऽसक्ततया इष्टाऽ नेष्ट वेषयग्रहणपरित्यागगृद्धो भवेत् तदा नारकतिर्यग्यो नषु दुरन्तदुःखावाप्तिरपे सुलभा । पञ्चेन्द्रियपटुतायाः फलमाश्रवनिरोधः न तु विपयादिषु लोलुपत्वमिति परभावीयं जैनेन्द्रवाक्यानुसारितया, उक्तञ्च;- 卐 "आपदां कथितः पन्थाः, इन्द्रियाणामसंयमः। तज्जयः सम्पदा मार्ग येनेष्टं तेन गम्यतां । १॥ इन्द्रयाण्येव तत्सर्व, यत्वर्गनारकायुभ । निगृह तविसृष्टानि खर्गाय नरकाय च " ॥२॥ 卐 क्रोध-मान-माया-लोभसंज्ञकाः कपाया कश्रिवाः, क्रोधाद्याश्चत्वारः पापतत्त्वेऽनन्तानुवन्ध्यप्रत्याख्यानावरण- प्रत्याख्यानावरणसवलनभेदैः स्तरां ववृतास्तथाऽप लेशतोत्र स्थानाशून्यार्थ प्रदर्श्यन्ते, क्रोधोत, मानो नम्रताऽ- 卐 卐 T V L ॥६४ 卐 A 卐 A पद N 卐 A 卐 V A A N 卐 भावत्वं, माया कापट्यं, लोभस्संतपराहत्यम् अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानावरणप्रत्याख्यानावरणसञ्चलनद भन्ना अी U क्रोधादिकषायाः पुनरेकैकश्चतुःप्रकाराः, तद्यथा-अनन्तानुवन्ध्यनन्तानुवन्धिक्रोधः १, अप्रत्याख्यानावरणाऽनन्तानुबन्ध- 卐 क्रोधः २, प्रत्याख्यानावरणाऽनन्तानुवन्धिक्रोधः ३, सद्ध्वलनाऽनन्तानुवन्धिक्रोधः ४, तत्र येऽनन्ताबन्धक्रधः स्वस्वरू- पेणाऽतिशयेनोग्रः स प्रथमप्रकारकः, यश्च स्वरूपेण मन्दपरिणामवान् स द्वर यद भन्नः, यस्तु स्वरूपेण मन्दतरः स तुरीयः, ॐ यश्च पुनः स्वरूपतया मन्दतमपरिणामात्मकः स सद्ध्वलनाऽनन्तानुबन्धि धंश्चतुर्थः एवं शेषेषु मानमायाप्रभृतेरेदप्रदेषु स्वधिया परिभाव यम् उक्तरूपाः कषायाः प्रशस्ताऽऽशयेनारेव्यमानाः शुभाश्रवाणां हेतुत्वं भजन्ति, अशस्ताऽऽशयेन 卐 चाऽशुभाऽऽश्रवाणां कारणतां बभ्रत, यथा जगदनुग्रहवि विहितानेकग्रन्थसन्दर्भक लकालसर्पज्ञश्रीहेमचन्द्रसू रचरणपङ्कजचञ्चर- कायमाणपरमार्हतपरना सहोदरकुमारपालाऽवन् पाल विहितं स्वमग पत्यण राजस्य रसनाऽऽकर्षण भव यद्वा संयमघण्टापथ- 卐 भ्रष्टमन्त्वासिनं प्रति चरित्रराजमार्गे स्थापयितुं गुरेः केप इव जनाऽऽज्ञानुसारसाधुसा श्रावकश्राविकासमूहाऽऽत्मकस्य करमहतस्य श्रमणसंघभट्टारकस्य नष्पारसंसार सन्धूत्तारणतरी कल्पस्य जैनेन्द्रप्रवचनस्य चोड्डाहकारेणं यथेच्छमुत्सू- ध त्रप्रलाप्नं प्रति वा यस्य कस्यचित् पारगताऽऽज्ञापर्वणहृदयस्य सम्यग्दृष्टेभव्याऽऽत्मनः केपेद्भवस्स्यात्तत्र शुभाश्रवः नई A मातृपित्रादयः पुत्रभार्यादिस्वजनाय कुप्यन्ति तत्र प्रशस्ताऽऽश्रवोऽप्रशस्ताऽऽश्रव वा ? उच्यते-जनन्जनकादयः स्वार्थ- 卐 परायणास्सन्त इमे यद सुशिक्षिता भायतय भन्युस्तदा वार्धक्ट वयं पुत्रकलत्रादिभः पालिताः सुखंभाजस्स्याम इति बुद्ध्या 'कुप्यन्ति तदा त्वप्रशस्ताश्रयः, यदि रे जनकादये निःस्वार्थस्सन्त एवं वचारयेयुर्य द में स्वजनास्तत्त्वाऽवबुद्धा 卐 T G A 卐 T L 卐 V 卐 A A 卐 पत -- N 卐 S नवतत्त्व सुमङ्गला- y A 卐 आश्रवत कषायाः कायां- v --- iM ॥६५॥ 卐 A 卐 T अभविष्यन् तदा सम्यग्दर्शनादिरत्नत्रय्याराधनपुरस्सरं दुरन्तसंसारपाशमुक्ताः स्युरित शेसुष्या जायमानं शक्षणं शुभाऽऽ- श्रवस्य हेतुः, संसार निमित्तं जायमानं ताडनतर्जनादि अप्रशस्तं, अनन्तरतया-परम्परतया वा मोक्षाऽवाप्त्यर्थं जायमानं शक्षणं शुभाश्रवतया विज्ञेयम् । अनया रीत्या मानमायादिष्वपि प्रशस्ताऽप्रशस्तत्वं स्वमनीपयोा, तद्यथा-स्वकुलप्रशंसा- यामप्रशस्तता मानस्य, देवगुरुधर्मश्रेष्ठतासत्कं मानञ्च प्रशस्तम् । धनस्वजननिमित्ता माया अशरता, प्रव्रज्यादिधर्मार्थ वध्यमाना च शुभा । अर्थकामाऽवाप्त्यर्थं प्रवर्धमानो लोभोऽसत् , ज्ञानदर्शनचरित्रार्थमेधमानश्च सन्निति सम्यक्सिद्धा- न्तानुसारेण्या दृष्टया तय॑म् । अनेन नैवं विज्ञेयं यत् प्रशस्तकपाय उपादेयः, यतो मुसुक्षुणा तु सोऽपि त्याज्य एव, केवलं कर्मसत्तापरायत्ता जन्तवः प्रायशोऽप्रशस्तकषायोदयवन्त दृश्यन्तेऽस्मल्लोके, तसात्तमप्रशस्तं त्यक्त्वा अयं तावदुपादेयो यावत्सूक्ष्मसंपरायणस्थानं, अनन्तरमयमप स्वयमेव विनङ्ख्यत त्यलं विस्तरेण ॥ अथाऽवतान-अवतं नाम व्रतस्याऽभावोऽवतं, व्रतञ्च " हिंसाऽनृतस्ते- याऽब्रह्मपरिग्रहेभ्यो चरतिव्रतम् " तद्विपरीतञ्चाऽव्रतं, तच्च प्राणातिपातमृपावादाऽदत्तादानमैथुनपरिग्रहभेदात् पञ्चधा, तत्र प्राणानामन्द्रियादिद्रव्यप्राणानामतिपातो वयोगः प्राणातिपातः, ननु सूक्ष्मवादरादिजवानां यथायोगं लोके सर्वत्र सद्भावाद् हंसानिवृत्तानां विरतानामपि हंसाप्रसङ्गः, हिंसावताञ्च मोक्षप्राप्तिः सुदुर्लभा :, सत्य-भवता वरतानां संयतानां हिंसाप्रसङ्ग आसादतः, परं हंसा' इति शब्दस्य कोऽर्थः ? तं सावधान भूय श्रुणुत, प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हंसा" इति तत्त्वार्थवचनात् प्रमादादनुपयोगाजायमाना हंसा सैव हंसात्वेनोच्यते, अनेनोपयोगवता अप्रमत्तेन भवि- 卐 N G T 卐 V 卐 A 卐 卐 L ६५ 卐y ri S 卐 N ॐ A 卐 A 卐 तव्यतातियोगेनाऽवश्यंभाविन मण्डूक प्रभृतिषुद्रजन्तुजातविराधना स्यात्तथाऽपि तत्राऽनाश्रवः, उक्तञ्चः-" उच्चालियम्मि पाए इरियासमियस्य संकमट्ठाए । वावजेज कुलिड्स मरज तं जोगमासेजा । १॥ न य तस्स तन्निमित्तो बंधो सुहुमो व देसिओ समए । अणवज्जो उवओगेण सबभावेण सो जम्हा " ॥२॥ अत्र हिंसायां चतुर्भङ्गाः, यथा-द्रव्यतो हंसा 卐 M भावतो न, १ भावतो हंसा न द्रव्यतः २, द्रव्यभावाभ्यामहंसा ३, द्रव्यभावाभ्यामुभयत हंसा ४, तत्राऽऽद्य भङ्ग अप्रमत्तगुणस्थानकादारभ्य सयोगलेवलिगुणस्थानं यावत् , यतोऽप्रमत्तत्त्वान्न भावतः योगसद्भावाद्र्व्यतस्तु स्यादेव हिंसा, 卐 A द्वितीयभङ्गकस्तु सर्पबुद्ध्या रज्जुमभघातयतः, शैले'करणसमापन्नास्सिद्धाश्च द्रव्यभावाभ्यामहिंसका अतस्ते तृत्यभङ्गवर्तिनः, चतु* तु हंसाध्यवसाययुक्तानां प्राणवधकानां निषादपुलिन्दप्रभृत नामन्तर्भावः । इयमेव चतुर्भङ्ग सोदाहरणं पुनर्भाव- 卐 यामः-तत्र तावत् कश्चदल्पका द्रव्य हिंसां कृत्वाऽपि न नारकादिदुःखभाग भवति, द्रव्यहिंसां प्राणातिपातरूपां तु विदधाति । पर सुकुमारहृदयत्वेन तथाविधदुष्टाऽध्यवसायाऽभावात् पीडोत्पादने सत्यप न तथाविधकर्मबन्ध भवति येन तत्फलभाजा । y भूयेत, द्वादशगुणस्थानवतिसाधुवत् , स ह सकलमोहन यक्षयजनित िववितरशुभाऽध्यवसाययोगवान् पथि गमाऽऽगमं- : 卐 कुर्वाणः स्वाञ्बन्धराहिलेन पादोत्क्षेपे तत्संयोगद्रव्यक्षेत्रकालभावसम्बन्ध्यवश्यं भावभावस्वभावेन बद्धनकाचितमरणाद कपोतशावकादीन् अथवा पक्ष्ममेपोन्मेषेण वा शरीराऽवष्टम्झेन वायुकाय वान् हिनस्ति, तथापि तस्य प्रथमसमयबद्धा 3 द्वरे यसमरे वेदिता तृतीयसमय निर्णा इपिथिक्या न हंसाफललवभाक्त्वम् , सदुपयोगरूपेण तथैवाऽसद्भूत- L त्वादकलन् यत्वात् , तदुक्तं भगवत्यां;-" अणगारस्स णं भरे : भावियप्पण पुर) जुगमायाए हाए रयं रयमाणस्स T 卐 A 卐 T V 卐 卐 A A NC N S y A नवतत्त्व- सुमङ्गाला- टीकायां- v आश्रवतत्त्वे हंसा- M स्वरूपम् A A T N 卐 पायस्स अहे कुक्कुडपोए वा वट्टपोए वा कुलिंगपोए वा परिआवंजेजा, तस्स णं इरेयाव हया ने संपराइया, जस्स णं । कोहमाणमायालोमा सवस्था वुच्छिन्ना तस्स णं इरयाव हया हवइ" त्त अयं प्रथम भङ्गः । द्रव्य हेंसायाः प्राणादित्याग- पत रूपाया अकारकोऽी कठोरहृदयप्रादुर्भूतरद्रध्यानपरायणो सद्धिया रज्जुमानन् द्वितीयभगवत, तन्दुलमत्स्यवत् । अयं च तन्दुलमत्स्यो नवमासान् गर्भ स्थत्वा निष्क्रमणाऽनन्तरमन्तहूर्त्तमायुरिति वृद्धसंप्रदायः, सर्वे गर्भजतियचो गजमनुष्य- 卐 वदति वचनात् , स च महामत्स्यमुखे गतप्रत्यागतं कुर्वाणान् मध्यमत्स्यान् दृष्ट्वा स्वमनसि ' यद्यहमेपो द्रव्यमहाकाय- स्स्यां तदा सर्वानभक्ष्यम् ,' इति वचारणया संक्लिष्टचित्तप्रादुर्भूतरद्रध्यानसहचारिणीं भाव हंसां विधाय सप्तमनरकफलवान् ध भवते इत द्वित्यो भङ्गः । तृत्यभगवनशैलेश करणसमापन्नाः सिद्धाश्च, तेषां येगाऽभावाद् द्रव्यभावाभ्यामप्यहिंसक- त्वमित । तथाविधदुष्टाऽध्यवसायोपपन्नेन केन चढप्रहारा देनेव कठोरहृदयभावेन विध्यमाना हंसा द्रव्यभावाभ्याभयतो 卐 हिंसा चतुर्थभशान्तःपातन । अत्र हंसातात्पर्यप्रतिपादकाश्च श्लोकाः- कठोरहृदयत्वेन हंसा हेयेति सोच्यते । देहनाशो भवेत् 'डा या तां हंसां प्रचक्षते ॥१॥ दुक्खोत्पत्तिर्मनाक्लेशः, तत्पर्यायस्य च क्षयः । यस्याः स्यात् तत्प्रयत्नेन हंसा हेया विपश्चिता ॥२॥प्राण प्रमादतः कुर्यात् यत् प्राणव्यपरेपणम्। A सा हंसा जगदे प्राजं संसारभूरुहः । ३॥ नित्याऽनित्ये ततो जीवे परिणामे वियुज्यते । हिंसा कायवियोगेन डाऽतः 卐 पापकारणम् ॥ ४॥ शरेर प्रियतां मा वा ध्रुवं हंसा प्रमादिनां । सा प्राणव्यपरोपेऽी प्रमादरहितस न ॥ ५॥ अविधा- याऽप है हिंसां हैंसाफलभाजनं भवत्येकः कृत्वाऽप्यपरो हैंसां हंसाफलभाजनं न स्यात् । ६॥ एकस्याऽल्पा हंसा 3 A 卐 T G V L 卐 A । ६६। A 卐 ) N 卐 A 卐cy ज V 卐 A 卐 A ॥ 卐 T ददाति काले तथा फलमनल्पम् । अन्यस्य महा हिंसा स्वल्पफला भवति परिणाम ॥७॥ एकस्यैव सत्वस्य देशति फलं स्व मन्दमन्यस्य । भवति सहकारिणाम पि हंसा वैचित्र्यमत्र फलकाले ॥८॥ प्रागेव फलत हंसा (१) क्रियमाणा फलति (२) फलति च कृतार्था (३)। आरब्धा चाऽप्यकृता (४) फलत हंसानुभावेन ॥९॥ एकः करे त हिंसां, भवन्ति फलभोगिन- स्तथा बहवः । वहयो विदधत हंसा हंसाफलभुगू भवत्येकः ॥ १० ॥ कस्याऽपि दिशति हंसा हंसाफलमेकमेव फलकाले। अन्यस्य सैव हंसा दशत्यहिंसा फलं विपुलम् ॥ ११ ॥ हंसाफलमपरस्य तु ददात्यहिंसा फलं तु परिणामे । इतरस्य पुनहिंसा दिशत्यहिंसा फलं नाऽन्यत् ॥ १२ ॥ इति हंसाभिधानं प्रथममवतम् ।। अथ द्वितयं मृपावादसंज्ञकमव्रतमाह;-मृपावादो नामाऽसत्योक्तः, यद्वस्तु येन स्वरूपेण वद्यते तत्तथैव वक्तव्यमित्युत्सर्गः, अनेन चौरं प्रत्ययं चरः, काणमभिलक्ष्यायं काण इत्येवं न वक्तव्यम प्रयत्वात्तस्य, एवं सत्यमपि अहितं चेत्तदप्यसत्यमेव, यथा मृगयुभिः पृष्टस्यारण्ये मृगान् दृष्टवतो मया मृगा दृष्टा इति तजन्तुघातहेतुत्वान्न तथ्यम् । उक्त कलकालसर्वज्ञैराचार्यहेमचन्द्र- पुरन्दरैयोगशास्त्रे;-" प्रियं पथ्यं वचस्तथ्यं सूनृतव्रतमुच्यते । तत्तथ्यमपि नो तथ्यमप्रियं चाऽहितञ्च यत्" ॥ १। अतथ्यं बचः प्राप' हास्य-लोभ-भय-क्रोधात्मकैश्चतुर्भिः कारणैब्रूते, यथा हसन् हे मिथ्या ब्रूयात् , लोभपरवशश्चार्थाऽऽकासया भयातः प्राणादिरक्षणेच्छया क्रुद्धः क्रोधतरलतमनस्कतया मिथ्या ब्रूयादिति । एतचाऽसत्यं चतुध-भूतनिह्नवः अभूतद्भा- वनं, अर्थान्तरं, गेंहीं च तत्र च भूतनिन्हवो यथा-नास्त्यात्मा, नास्ति पुण्यं, नास्ति पापं चेत्यादि । अभूतद्भावनं यथा सर्वगत आत्मा श्यामाकतन्दुलमात्र वा । अर्थन्तरं यथा गामश्वमभिदधतः । गह विधा, एका सावधव्यापारप्रवर्तन यथा N ध G A A 卐 T 卐 V ध A 卐 卐 L १२ A ILE S 卐 N आश्रव- तोड- व्रतानि॥ A *नवतत्त्व- सुमङ्गला- टीकायां- 卐 V ॥ ६७॥ 卐 卐 A 卐 N A क्षेत्रं कृपेत्यादि । द्वया अप्रिया, काणं काणमिति वदतः। तृया आक्रोशरूपा, यथा अरे : वान्ध कनेय : इत्यादि । इत्येवं मृपावादनामकं द्वित्यमत्रतं सेवमानस्य काण्याश्रवन्ति अतस्तदप्याश्रवत्वेन समाख्यातम् ॥ क्लिष्टाशयपूर्वकमत- थ्यवचनमाश्रवत्वेनाऽऽस्तां, प्रामादिकमप्यज्ञानसंशयादजनितवचनं कश्रिवहेतुभूतं, यतो मुमुक्षवोऽज्ञानजन्यां वा प्रामा- 'दकामपि मृषोक्तं न युवते, यदाहुमहर्पयो दशकालिके-" अइअम्मि य कालम्म पच्छुपन्नमणागए । जमई तु न जाणेजा एवमेअंत णो वए ॥१॥ अइअम्मि य काल म्म पच्चुपण्णमणागए । जत्थ संका भवे तं तु एवमेअंति णो वए ॥२॥ अड्अम्मि य कालम्मि पच्चुपण्णमणागए। नस्संकियं भवे जं तु एवमेअंत निदसे" ॥३॥ इति द्वितीयमव्रतम् ॥ अधुना तृतीयमव्रतं प्रतन्यते-चित्तस्वामिना अदत्तस्य वित्तस्याऽऽदानं तत्स्तेयनामकं तृत यमव्रतम् । तच्च स्वामिजीव- तीर्थकरगुर्वदत्तभेदेन चतुर्विधम् । तत्र स्वाम्यदत्तं तृणोपलकाष्ठादिकं तत्स्वामिना यददत्तम् , जीवादत्तं यत्स्वामिना दत्तमपि जीवेनाऽदत्तं यथा प्रव्रज्यापरिणामविकलो माता पितृभ्यां पुत्रादिप्रुभ्यो दीयते । रर्थकराऽदत्तं यतीर्थकरैः प्रतिषिद्धमाधाकर्म- कादि गृह्यते । गुर्वदत्तं नाम स्वामिना दत्तमाधाकमकादिदोषरहितं गुरूननुज्ञाप्य यद् गृह्यते भक्ष्यते । पथि गच्छतो वाह- नादेभ्रष्ट, क्वापि विस्मृतं स्वामिना यन्न स्मार्यते, क्वापि नष्टं स्वामिना यन्न ज्ञायते, स्वामिपार्थे यदवस्थितं, स्थापितं न्यार कृतं इत्यादिप्रकारकं परकीयं द्रव्यं गृण्हतोऽदत्तादानदोपापत्तिः, संक्लिष्टाऽध्यवसायजनकत्वादिदमप्यवतम् ॥ इति तृतीयम् ॥ तुर्य त्वब्रह्मसंज्ञकमव्रतम्-ब्रह्मणि मोक्षे चरति येन व्रतेन सर्वथारु सङ्गत्यागात्मन तद् ब्रह्मचर्य, तस्याऽभावः स्वीष्वभिष्वङ्ग- लक्षणस्तदब्रह्मचर्य, तच्चाऽष्टादशधा, तकैवम् ; क्रियशरीरवत्यो देवाङ्गनास्ताभिस्सह मनसा वाचा कायेन च त्रिभिः प्रकारै- 卐 T ॐ G 卐 T A ध V ॥६७ ॥ ॐ A 卐 म ॥ N S 卐 y 卐 M V A A T ध मैथुनसेवनं, अन्यैश्च कारापणं, स्वमानानामन्येषामडमेदन मते त्रयस्त्रिभिणता नव, एवं औदारकाङ्गवरी भर्मानुरभि- स्तर्य भश्व सह पूर्वोक्तरीत्या मनवाकार मैथुनकरणं कारापणमन्येषां चाटुमोदन मिति त्रयस्त्रिभिर्गुणताश्च जाता नव, उभयः समलनेऽष्टादश प्रकाराः, इत्येवमब्रह्मत्यागात्मकं ब्रह्मचर्यमप्यष्टादशभेद भिन्नम् , उक्त ,-"दिव्यात्कामरतिरुखात् त्रविधं त्रिविधेन विरतिरति नवकम् ॥ अदारिकादरी तथा तद् ब्रह्माष्टादशविकल्पम्" ॥१॥ 卐 "प्राणसन्देह जननं, परमं वैरकारणम्, ले कद्वय विरुद्ध पररु गमनं त्यजेत् ॥ १ सर्वस्वहरणं वन्धं शरीरावय- वच्छिदाम् । मृतश्च नरकं घोरं लभते पारदारकः ॥२॥ नासक्त्या रेवन्या है स्वदारा अप्युपासकैः आकरः सर्व- पापानां के पुनः परये पितः" ॥ ३ । इत्यादिप्रवचनप्रसिद्धाऽब्रह्मदुष्टत्वेन संक्लिष्टसंक्लिष्टतरसंक्लिष्टतमाऽध्यवसायत्पादकत्से- नाऽब्रह्मचर्यस्याव्रतत्त्वे आश्रवस्वरूपे सुविख्याते सत्य रूपर पहपराजिताः कामाऽऽसक्तित्त्वं भजमाना भवसमुद्रनिस्तार- 卐 तर कल्पजैनेन्द्रप्रवचनपतपराङ्मुखा एके बद्ध विशेषा नाथवा दमण्डलप्रविष्टा बद्धविशेपा वा एवमूचुः;-प्रयादर्शनमेवाऽस्तु, कमन्यैर्दर्शनान्तरैः । प्राप्यरे रेन निर्वाणं सरागेणाऽपि चेतसा । १ जैनमार्गविद्वेष्णिस्ते एवं प्रज्ञापयन्ति;--"जहा गंडं a पिलागं वा, पर पिलेज हुत्तगं । एवं वन्नवणस्थिसु दोसो तस्थ को सिया ॥२ । जहा मंधादए नाम थिमिश्र भुंजरी दगं । एवं चिन्नवाणिस्थिसु देसो तत्स्थ कओ , सिया ॥३॥ जहा विहंगमा पंगा, थिमि झुंजरी दगं एवं वनवणस्थिसु देसो तत्थ को सिया । ३ एवरे उपासस्था मिच्छ द्दछि अणारया अज्झववन्ना कामेहें पूयणा इव तरुणए " ॥ ४ ॥ एतासा मयं गमनिका-रेन प्रकारेण कश्चगण्ड पुरुषे गण्डं स स्थितं टिकं वा 卐 卐 N 卐 A 卐 A T V 卐 L ध A

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शीनवतत्त्व-
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सुमङ्गला-
टीकायां-
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व्रतानि
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॥ ६८॥
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तज्जातीयकमेव तदाकूतोपशमनार्थ पूयरुधिरादिकं निर्माल्य मुहूर्त्तमानं सुखितो भवति न च दोपेणाऽनुपज्यते एवमत्रापि
युवत प्रार्थनायां रम सम्बन्धे गण्डपरपीडनकल्पे दोपस्तत्र कुतस्स्यात् ? न तावता क्लेदाऽपगममात्रेण दोपो भवेदिति ॥१॥
स्यात्तत्र दोपो यदि काचित् डिा भवेत् , न चासाविहाऽस्तीति दृष्टान्तेन दर्शयति;-यथा मेपः 'तिमतं' अनालोडयन्नुदकं पिवति,
आत्मानं ठीणयति, न च तथाऽन्येषां कञ्चनोपघातं विधत्ते, एवमत्रापि सम्बन्धे न काचिदन्यस्य पिडा, आत्मनश्च
प्रोणनम् , अतः कुतस्तत्र दोपस्स्यात् ॥२॥ दृष्टान्तान्तरं भावयति यथा पक्षिणी कपिजला साऽऽकाशे एव वर्तमाना निभृत-
मुदकमापिवति, एवमत्राऽपिदर्भप्रदानपूर्वेकया क्रययाऽरक्तविष्टस्य पुत्राद्यर्थ र सम्बन्धं कुबतोऽपि कपिजला इव न तस्य दोपः॥
गण्डपंडनतुल्यं स्त्री परिभोगं मन्यमानाः, तथैडक दकपानसदृशं परम्डानुत्पादकत्वेन परात्मनोश्च सुखोत्पादकत्वेन किल मैथुन
जायते इत्यध्यवसायिनः, तथा कपिजलोदकपानं यथा तडागोदकाऽसंस्पर्शन किल भवति, एवमरक्तद्विष्टतया दर्भाधुत्तारणात्
रुगात्राऽसंस्पर्शेन पुत्रार्थन कामार्थ ऋतुकालाभिगामितया शास्त्रोक्तविधानेन जायमाने मैथुनेऽपि न दोप इत्येवं मन्तारस्ते पूर्व-
पक्षिणः स्वपक्षदृढ करणार्थं पुनरूच्र्यद्-“धर्मार्थं पुत्रकामस्य, स्वदारेष्वधिकारिणः । ऋतुकाले विधानेन दोपस्तत्र न विद्यते"
॥१॥ अत्रोच्यते पारमप्रवचनप्रणैरुत्तरपक्षकारैः-" जह णाम मंडलग्गेण सिरं छेत्तूणं कस्सइ मणुसे । अच्छेन्ज पराहुत्ते
के णाम ततो ण घिप्पेजा ? ॥१॥ जह वा विसगण्डूसं कोइ घेत्तूण नाम तुण्हिको । अण्णेण अदीसंतो के नाम ततो नव
मरेज्जा ? ॥ २ ॥ जह नाम सिरघराओ, कोइ स्यणाणि णाम घेत्तूणं । अच्छेज पराहुत्तो, के नाम ततो न घेप्पेजा ?"
॥३॥ गाथात्रिकस्य गमनिका;-यथा नाम कश्चिन्मण्डलागेण कस्यचिच्छिरः छित्त्वा पराङ्मुखस्तिष्ठेत् , किमेतावतोदार्सन-
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॥ ६८ ॥

N U 卐 A 卐 V A A भावाऽवलम्बनेन नाऽपराध भनेत् ॥ १॥ तथा यथा कश्चद्विषगण्डूषं त्वा नाम तूष्ण भावं भजेत् , अन्टेन चाऽदृश्य- 卐 मानोऽस के नाम अन्याऽदर्शनान्न निटेत ? ॥२॥ तथा यथा कश्चित् श्रीगृहाद्भाण्डागाराद् रत्नानि महार्धाण गृहीचा पराङ्मुखस्तिष्ठेत् , 'कमेतावताऽसन गृोरे ति? ॥३॥अत्र च यथा कश्चित् शठतयाऽज्ञतया वा शिरच्छेदविपगण्डूपरत्नाऽपहा- . राख्ये सत्यपि दोषत्रये माध्यस्थमवलम्बते, न च तस्य तदवलम्बनेऽपि निदुष्टत्त्वमिति, एवमत्राप्यवश्यं भाविरागकार्ये सदोषा- M ऽऽस्पदे संसारवर्धने मैथुने कुतो निर्दोषता ?, उक्त ,-"प्राणिनां बाधकञ्चैतत् शास्त्रे तं महर्षिभिः । नलिकातप्तकणकान- देशज्ञाततस्तथा ॥१॥ मूलश्चैतधर्मस्य भवभावप्रवर्धनम् । तस्माद्विषान्नवत्याज्यमिदं पापमनिच्छता ॥ २ । इति चतुर्थम् अथ पञ्चममवतं वव्रियते; सर्वभावेषु द्रव्यक्षेत्रकालभावरूपेषु या मूर्छा तत् परग्रहसंज्ञकं पञ्चममव्रतम् , न जन्मान्तरो- पार्जितदुष्कर्मप्रभावाद्ये दारिद्रयभाजस्ते तु सर्वदैव परिग्रहनामकाव्रतविरहिताः, द्रव्याद्यभारे कुतस्तेषां मूर्छा ? सत्यं, द्रव्याद्यभावेऽप मूर्छा विद्यते, यतो दुर्भगोदयान्निष्किञ्चनास्ते, न तु त्याज्यबुद्धिसमलताः, असत्यपि धने धनगर्द्धवते राजगृहनगरद्रमकस्यैव चित्तसंक्लेशो दुर्गतिपातनिवन्धनं भवति, सत्यपि वा द्रव्यक्षेत्रकालभावलक्षणे सामग्रीविशेषे तृष्णाकृष्णा हनिरुपद्रवमनसां प्रशमसुखप्राप्त्या चित्तविप्लवाऽभावः, अत एव धर्मोपकरणधारिणां यत नां शरीरे उपकरणे च नि- ममत्वानामपरिग्रहत्त्वम् , यदाहः यद्वत्तुरगः सत्स्वप्याभरणभूषणेष्वन भषक्तः । तद्वदुपग्रहवानपि न सङ्गरुपयाति नम्रन्थः ॥१॥ यथा च धर्मोपकरणवतामपि मूर्छार हतानां मुनीनां न परिग्रहग्रहत्त्वदोषस्तथा वतिन्नामपि गुरूपदिष्टधर्मोपकरणधा- 卐 रिण नां रत्नत्रयवर्तनां, तेन तासां धर्मोपकरणपरिग्रहमात्रेण मोक्षापवादः प्रलापमात्रम् ॥ जिनेन्द्रप्रवचने तु“ मुच्छापरिग्गहे 卐 卐 T N A 卐 卐 V L 卐 A A एन S N 卐 U 卐 नवतत्त्व- सुमङ्गला- र्ट काय- A आश्रव- तो : व्रतान " ज V -- 蝠 ॥ ६९॥ A T बुत्तो" इति वचनाद्वखपात्राद्युपकरणधारिणां संयतानां निष्परिग्रहत्त्वं, दुर्भगानां तु वस्त्राद्यभाऽी मूर्छायास्सद्भावात् सप- रग्रहत्त्वम् , उक्तश्च कलिकालसर्वज्ञैराचार्यहेमचन्द्रपुरन्दरैः-" सर्वभावेषु मूर्छायास्त्यागस्स्यादपरिग्रहः । यदसत्स्वपि जायेत मूर्च्छया चित्त विप्लवः ॥१॥ यथा निरवधिधनधान्यादभराक्रान्तः पोतः समुद्रे मजति, तथैवाऽपरिमितपरिग्रहः प्राण नरकाद निमजत, यदाहुः;-" महारंभयाए महापरिग्गहयाए कुणिमाऽऽहारेणं पश्चिदियवहेणं वा नरयाउयं अजंति " तथा 'बह्वारम्भपरिग्रहत्त्वञ्च नारकस्याऽऽयुपः' इति, यस्मादेवं तस्मान्मुमुक्षुणा धनधान्यादिरूपो मूर्छारूपो वा परिग्रहस्त्याज्य एव ॥ ननु जनभवन विधानादिलक्षणः परिग्रहस्य गुणः शाहे सुविख्यातः, कथं तस्य दुष्टत्त्वमव्रतत्त्वञ्च वर्ण्यते ? उच्यते-यश्च जनप्रासादनिर्माणादिस्वरूपः परिग्रहस्य गुणः प्रवचने व्यावर्ण्यते स न गुणः, केन्ट परिग्रहस्य सदुपयेगप्रख्यापनं न तु तदर्थमेव परिग्रहधारणं श्रेयः । यदाहु-धर्मार्थं यस्य चित्तेहा तस्याऽनीहा गर यर । प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ॥१॥ कंचणमणिसोवाणं थंभसहस्सोसियं सुवण्णतलं, जो कारज जणहरं तओ वि तवसंजमो अहेओ॥१॥द्रव्यक्षेत्रकालभावेषु मूर्छया चित्तविप्लवस्य प्रशमस ख्यविपर्यासात्मकस्य जायमानत्वात् चित्तविप्लवश्वाऽऽश्रवहेतुत्वात् परिग्रहसंज्ञकमप्यव्रतम्व ॥ अथ' क्रमाऽऽगतं योगं त्रिप्रकारकं प्रभेदतः पञ्चदशप्रकारकं वा व्याख्यायते-तत्र युज्यते क्रियासु व्यापार्यते अथवा साम्परायापथकर्मणा सह सम्बध्यते आत्मा अन्नेति येगः, अयं मुख्यत्वेन मनोवाकास्त्रिभेदोऽप्य- वान्तरेण पञ्चदशप्रकारोऽपि ग्रन्थान्तरेषु सुतरां व्याख्यातः, तचैवम्-सत्यमनोयोगः, सन्तः पदार्थास्तेपु यथावस्थितवस्ट- खरूप चिन्तनेन साधु सत्यं, अस्ति वः सदसद्रूपो देहमात्रव्या त्या दरूपतया यथावस्थितवस्तुचिन्तनपरं, सत्यं च. 卐 A 卐 T 卐 N 卐 G 卐 A ॐ V L । ६९ 卐 A 卐 卐 A ज S 卐 卐<卐卐zy 卐 M 卐 A A तन्मनश्च सत्यमनः तस्य येगे व्यापारः सत्यमनोयेगः, अथवा सन्त मुनयस्तेषु मुक्तिप्रापकत्त्वेन साधु इति सत्यमनयोगः ॥१॥ असत्यमनोयोगः-सत्यविपर तमसत्यं, यथा नास्त व एकान्तसद्रूपे वेत्यादिकुविकल्पनपरं, असत्य तन्मनश्च तस्य योगेऽसत्यमनोयोगः । २॥ सत्यमृषामनोयेगः-सत्यासत्ये यथा धवखदरपलाशादि श्रेषु बहुष्वाम्रवृक्षेषु आम्र- वनमेवेदमित वकल्पनपरं मनः, तत्र है आम्रवृक्षबाहुल्यसद्भावात् सत्यता, अन्येषामपि धवखदिरादीनां सद्भावादसत्यता, व्यवहारनयमतापेक्षया चैवमुच्यते, परमार्थतः पुनरिदमसत्यम्, यथोक्ताम्रबाहुल्यधवखदिराल्पत्त्वचिन्तनाभावात् ॥ ३ ॥ असत्याऽमृषामनोयोग इति, यन्न सत्यं नाऽपि मृषा तदसत्याऽमृपा, इह विप्रतिपत्त सत्यां वस्तुप्रतिष्ठाशया सर्वज्ञमताऽनुसारेण विकल्प्यते, यथा अस्ति जीवः सदसदूप इति तत्कल सत्यं परिभाषितमाराधकत्त्वाद, यत्पुनर्विप्रतिपत्त सत्यां यद्वस्तुप्रतिष्ठा- शयाऽपि सर्वज्ञमतोतर्ण चकल्प्यते यथा नास्ति जव एकान्त नित्य वा इत्यादि तदसत्यं वराधकत्त्वात् , यत्पुनर्दस्तुप्रतिष्ठा- सामन्तरेण स्वरूपमात्रपर्यालोचनपरं यथा देवदत्ताद् घट आनेतन्य गर्याचन येत्याद चिन्तनपरं तदसत्याऽमृपा, इदं है स्वरूपमात्रपर्यालोचनपरत्वान्न यथोक्तलक्षणं सत्यं नापि मृपा, एतदप व्यवहारनयमतापेक्षया दृष्टव्यमन्यथा यद्विप्रतारण- बुद्धिपूर्वकं तदसत्येऽन्तर्भवति, अन्यस्य तु सत्येऽन्तर्भावः तच्च तन्मनश्च असत्याऽमृषा मनः, तस्य यगो व्यापारोऽसत्याऽमृषा- मन योगः ॥ ४ ॥ वाग्योगोऽपि मनोय गवच्चतुर्धा, तद्यथा-सत्यवाग्य गः १ असत्यवाग्यगः २ सत्याऽमृपावाग्यगः ३ असत्यामृषावाग्योगः ४, एते च सत्यवाग्योगादयः सत्यमने योगप्रभृतवद्भाव या इति ॥ अंदारककाययोगः, अंदारिक- शब्दार्थो जीवतत्त्वे प्राणव्याख्याप्रसङ्गे सुतरां व्याख्यातः , अंदारिकमेव शरीरं तदेव पुद्गलस्कन्धसमुदायरूपत्त्वादावाल्यात् 卐 T 卐 A N 卐 G 卐 A T - 卐 卐 V L 卐 A 卐 A ne N 3 S A निवतत्व- इमाला- टीकायां- 卐 U आश्रयत पञ्चदश- येगाः॥ 卐 M 卐 । ७०॥ A A 卐 T प्रतेसमयमुपगेयमानत्त्वाच काय अंदारिकशरेरकायः, तस्य योगो व्यापारे धावनवल्गनाद्यात्मक औदारिकशरी रकाययोगः, अयञ्च तिरथो मनुष्यस्य च पर्याप्तस्य २ अंदारिकमिश्रकाययोगः;-अंदारकं च तन्मिश्रं चेतिअंदारकमिश्र, केन सह मश्रित 'मति चेत् ? उच्यते, कार्मणेन, तथा चोक्तं नियुक्तिकारेण:-'जोएण कम्मएणं आहारेइ अणंतरंजावो । तेण परं मरणं जाव सर्र रस्स निप्फत् ॥ १॥ नड मश्रत्त्वमुभयनिष्ठं, तथाह;-यथा अंदारकं कामणेन मिश्रं तथा कार्मणमपि अंदारेक्षण मिश्रं ततः कस्माददारिकमिश्रमेव तदुच्यते न कार्मणमिश्रमिति ? उच्यते-इह व्यपदेशः स प्रवर्तन् यो येन विवक्षितार्थप्रति- पत्तिर्नष्प्रतिपक्षा श्रोतॄणामुपजायते, अन्यथा संदेहाऽऽपत्तितो चवक्षितार्था प्रतिपत्त्या न तेषामुपकारः कृतस्स्यादिति, कार्मणञ्च शरीरमासंसारम विच्छेदेनाऽवस्थितत्त्वात् सकलेष्वपि शर्ररेपु सम्भवति ततः कार्मणमिश्रमित्युक्ते न ज्ञायते के तिर्यङ्मनु- ष्याणां अपर्याप्ताऽवस्थायां तद्विवक्षितमुत देवनारकाणामिति ? तत उत्पत्तिमाश्रित्य दारिकस्य प्रधानत्त्वात् कादाचित्कत्त्वाच निष्प्रतिपक्षविवक्षितार्थप्रतिपत्त्यर्थमंदारिद्रण व्यपदिश्यते अंदारिक मश्रमित । तथा यददारिकशरीरो वैक्रियल ब्धिसम्पन्नो मनुष्य स्तर्यपञ्चेन्द्रियः पर्याप्तवादरवायुकायको वा चैक्रियं करोति तदा कलंदारकशरीरप्रयोगे एव वर्तमानः प्रदेशान् वक्षिप्य वैक्रियशरीरयोग्यान् पुद्गलानुपादाय वैक्रयशर पर्याप्त्या यावन्न समाप्तिस्पगच्छते तावत् यद्यपि वैक्रयेण मिश्रता अंदा- रिकस्य भयनिष्ठा तथाप्यदारकस्य प्रारम्भकतया प्रधानत्त्वात्तेन व्यपदेश अंदारक मिश्रमिति, न वैक्रियेणेति । तथा यदा कश्चदाहारकलब्धिमान् पूर्वधरः संशय वेनिवृत्त्यर्थं त्रभुवनभर्तृसमवसरणदर्शनार्थ वाऽऽहारकशरं करेत तदा अंदारक- शरीरप्रयोग एव वर्तमानः प्रदेशान् विक्षिप्य आहारकशरीरयोग्यान् पुद्गलापादाय आहारकशर्र रपयत्या यावन्न पर्याप्तिर- N A G T 卐 卐 V 卐 L 卐 A । ७० ॥ 卐 A क ध 4+ N A M. A 卐 V 卐 A ध T 卐 पगच्छति तावत् यद्यप्याहारलेण मिश्रत्वमदारकस्योभयनिष्ठं तथाप्य दारिकस्यारम्भकतया प्रधानमत तेन व्यपदेशप्रवृत्तिर- दारक मिश्रमिति, नत्वाहारकमिश्रत्त्वमिति, एवं पूर्वोक्तप्रकारत्ररेणाप्यदारिकमिश्रकाययोगः ।२ । वैक्रयकाययगे वैक्रिय- 卐 शरीरपर्याप्या पर्याप्तानां देवनारकाणां वैक्रियल ब्धमतां (वैक्रियरचनावस्थायां ) तिर्यङ्मनुजबादरवायुकायकाना ॥३॥ वैक्रियमिश्रकाययोगो देवनारकाणामपर्याप्ताऽवस्थायां, मिश्रता च तदानीं कार्मणेन सह वेदितव्या, तथा यदा मनुष्य स्तर्यक्- पञ्चेन्द्रियो बादरवायुकायिको वा वै क्रयशरीरीभूत्वा कृतकाय वैक्रियं परजह पुरैदारिले प्रवेष्टुं यतते तदा केल वैक्रय- शरीरबलेनदारिकोपादानाय प्रवर्त्तत इति वैक्रियस्य प्राधान्यात्तेन व्यपदेशो नैदारिकेणेति वैक्रिय मिश्रमिति । ४ ॥ तथाऽऽ- हारककाययोग आहारकशरीरपर्याप्या पर्याप्तस्य ॥ ५ । आहारकमिश्रकाययोग आहारकादंदारिकं प्रविशतः, अत्रैदम्पयं- यदा आहारकशरीरभूत्वा कृतकार्यः पुनरप्यदारिकं गृह्णाति तदा यद्यपि मिश्रत्त्वमुभयनिष्ठं तथाप्यौदारले प्रदेश आहारक- बलेनेत्याहारकस्य प्रधानत्त्वात्तेन व्यपदेशो नैदारिलेणाऽऽहारकमिश्रमि ते ॥६॥ एतच्च सिद्धान्ताभिप्रायेणोक्तं, काग्रन्थिकाः पुनर्वै क्रयस्य प्रारम्भकाले परित्यागकाले च वैक्रियमिश्रम् , आहारकशर रस्य प्रारम्भकाले परित्यागकाले चाऽऽहारक मश्र, नत्रकस्यामप्यवस्थायामदारिकमिश्रमिति प्रतिपन्नाः, (तैजस ) कार्मणकाययोगो वग्रहगत ससुद्धाताऽवस्थायां वा सयेग- केवलेनस्तृत यचतुर्थपञ्चमसमटेषु, इह तैजसं कार्मणेन सहाऽव्यभिचार ते युगपत्तैजसकार्मणग्रहणम् ॥ ७ ॥ 卐 इत्येवं प्रसङ्गतः पञ्चदशभेदभन्ने योगो लेशतः प्रदर्शतः, अस्मिन्नाश्रवतत्त्वप्रकरणे त्रिप्रकारके योग व्यावतः, यतो द्वचत्वारिंशद्धेदेषु योगस्य त्रयो दा एवान्तर्गणता, पञ्चदशगणनायां तु संख्याव्यभिचारस्स्यात्, तद्यगत्रिकं नामतः 卐 N G A A T L 卐 V 卐 A 3 ध N 卐 S 卐 A आश्रवतत्त्वे योगाः 卐 A T प्रदर्श्यते, तद्यथा-मनःपर्याप्तनामकर्मोदयेन काययोगद्वारा मनःप्रायोग्यपुद्गलद्रव्यानादाय मनस्त्वेन परिणमय्याऽवलम्ब्य नवतत्व च यद्विसर्जनं तदात्मको यो व्यापारः स मनोयोगः, अत्र मनोयग्यद्रव्यग्रहणक्रियायां काययोगः, परिणमनाऽऽलम्बनयोर्मनो- माला योग इत्यवगन्तव्यम् । भाषापर्याप्तनामकम्मोदयेन काययोगद्वारा भाषा प्रायोग्यपुद्गलद्रव्यानादाय भाषात्वेन परिणमय्या- ऽवलम्ब्य च विसृजत त्यात्मको व्यापारः स वचनयोगः, ॥ अदारिकादिशरीरैर्जीवानां गमनाऽऽगमनाद्यात्मको यो व्यापारः ॥७१॥ 卐 स काययोगः । इत्येवं पूर्वेक्तैर्मनोवाकायैर्विध यमाना चिन्तनभाषणकरणात्मका शुभाऽशुभा या क्रया सा शुभाऽशुभ- संज्ञयोराश्रवयोनि मत्ता । पूर्वोक्तेषु योगेषु कस्यापि योगस्य जघन्यतः समयप्रमाणा स्थितिस्तते योगपरावृत्तिर्जायते, उत्कृष्टतस्तु अन्तर्मुहूर्त्तमात्रा स्थितिस्ततोऽवश्यमेव योगपरावर्त्तनं संजायते । योगानामाश्रवतत्त्वे नास्ति किञ्चिद्वाधकं प्रमाणं, यावद्योगास्तावदवश्यं कर्मवन्धः, कषायसहचरितयोगाः साम्परायिकवन्धहेतवः, कषायरहितास्तु ईपिथिककर्मवन्धनिमित्ताः, a यदाऽयोगित्वं तदा कर्मवन्धाऽभावः इति योगस्वरूपम् , तेषु व्याख्यातेषु 'इंदियकसाय' इति गाथाऽपि व्याख्याता। केवलं गाथायामुक्तं 'करियाओ पणसं ' इत्यादिपदं निर्व्याख्यातं, तदनमगाथाभिः क्रियाणां नामग्राहं व्याख्यायते- 卐 T काइय अहिंगरणिया, पाउसिया पारितावणे करिया।पाणाइवाय रंभिय, परिग्गहिया मरवत्तिया।२२। 3 मच्छादसणवर्त, अपचक्खाप य दिट्ठि पुट्ठि य। पाडुपिय सामंत-वर्ण अ नेसत्त्व साहत्थी।२३॥ Y आणवणि अिरणिया,अणभोगा अणवकंखपाइया।अन्न पओगसमुदा-ण पिज दोसेरिगवहिया।२४। 卐 A 卐 N 卐 G A A L ॥ ७१ A ध A 卐 卐 N U A V A N 卐 व्याख्या करणं क्रिया, कर्मवन्धनिबन्धनचेष्टा इत्यर्थः, तासां च पञ्चवेंशतिः 'काइय' इत, कायेन देहेन नवृत्ता ही कायिक, तद्यथा-सा चास क्रिया कायर्क क्रिया, सा च द्विप्रकारा, अनुपरतकायिक अनुपयुक्तकायिक च, तत्र अनुपरतh कायिक नाम या प्रदुष्टमिथ्यादृष्टयादेर्वाङ्मनोनिरपेक्षा पराभिभवाऽऽत्मककायोद्यमक्रिया, अस्याश्च स्वार्म अविरतमिथ्याह- 卐 ट्यादिः। अपयुक्तकायक्रिया तु प्रमत्तसंयतस्य सुबहुप्रकाराऽनेककर्त्तव्यतारूपा दुष्प्रयोगकायक्रिया, अस्याश्च स्वा अनुपयु- 5 तसंयतः॥१॥अधिक्रियते नियुज्यते नरकादिपु प्राप्यतेऽनेनेत्यधिकरणं, परेपघातिकूटगलपाशादिद्रव्यजातम् , रेन नवत्ताऽऽ- धिकरणिक, सा च संयोजननिर्वर्तनभेदाभ्यां द्विधा, संयोजनाऽऽधिकरणिक, निवर्त्तनाऽऽधिकरणिक चेत्यर्थः, तत्र संयोजन 卐 विषगरहलकूटधनुयंत्राऽ सरट्यादीनां सम्बन्धनम् , तद्विद्यते यस्यां क्रियायां सा संयोजनाऽऽधिकरणिक । निवर्त्तनं तुमूलोत्तरर- णदाविधा, तत्र मूलगुणनिर्वर्त्तनं पञ्चानामदारकादशीराणां मूलतो निष्पादन, उत्तरगुणनिर्वर्तनं पाणिपादाद्यवयवकर- 3 णम्, अथवाऽसिशक्तित मरादीनामादित एव करणं मूलगुण निर्वर्त्तनं, पामेव पानोज्वल करणं परिवारादिसम्पादनमुत्तरगुणनि- वर्त्तनम् , तद्विद्यते यस्यां क्रियायां सा नवर्त्तनाधिकरणकं । तेषु खड्गादिषु मूलगुणोत्तरगुणनिवर्त्तनाभ्यां निष्पन्षु मुष्ट्यादीनां E (त्सरुप्रभृतना) संयजनं यस्यां क्रयायां विद्यते साऽपि संयोजनाऽऽधिकरणकै एषा क्रिया नवमरणस्थानकं यावद्विद्यरे 卐 ॥२ । देऽजी वा प्रदपकरणं प्रादोषिर्क, सा च चावविपयरटेन द्वविधा, तत्र पुत्रकलत्रादिस्वजनपरजनविषया 卐 वप्रादोषिर्क , अवसादो पिर्क तु क्रधेत्पत्तिनिमित्तभूतस्थाएकण्टकदृषच्छकलशर्करादिगोचरे , एषाऽप नवमगुण- ध स्थानकं यावत् ॥ ३ परतापनिक द्वधा, स्वपारितापनिक परपरितापनिक च, तत्र स्वहस्तेन परहस्टेन वा पुत्रकलत्रा- T G A T L V A A का N न. S A U . नवतच- उमला- टकायां- V M ७२॥ 卐 A A T N दिवियोगदुःखभारति डेतस्याऽऽत्मनस्ताडन शरःस्फोटनादिना स्वपारितापनिकी, आह-एवं सति लेचाऽकरणतपोऽनुष्ठा- आश्रवतो नाऽकरणप्रसङ्गः, यथायोग स्वपराऽसातवेदनाहेतुत्वात् , तदयुक्तं विपाक हतत्त्वेन चिकित्साकरणवत् , लोचकरणादेरसात क्रिया: वेदनाहेतुत्वाऽयोगात्, अशक्यतपोनुष्ठानप्रतिषेधाच्च, उक्तच " सो हु तवो कायवो जेण मणो मङ्गुलंन चंतेइ । जेण न इंदय- 5 हा जेण य जोगा न हायंत"॥१॥ तथा " कायो न केवलमयं परिपालन्यो-मृष्टै रसै बहुविधैर्न च लाल यः । 'चित्तेन्द्रियाणि न चरन्ति यथोत्पथेषु वश्यान येन च तथाऽऽचरितं जनानाम् " ॥१॥ इति । पुत्र शिष्यादिताडनादिना तु ध परपारिताप नर्क, एपा द्विविधाऽपि वादरकपायजन्यत्त्वादनिवृत्तिवादररणस्थानं यावद्विद्यते ॥ ५॥ प्राणानामतिपातः प्राणा- तिपातस्तेन नवत्ता प्राणातिपातक, वतनाशिन त्यर्थः, सा च द्विधा-स्वप्राणातिपातक, परप्राणातपातिक च, तत्राऽऽद्या- गरिशिखरप्रपातजलज्वलनप्रवेशशस्त्रपाटनप्रभृतेः स्वपरहस्ताभ्यामात्मविषयकरणकारणे, अत एव कारणाद्भगवद्भिरकालम- रणं प्रति पद्धम् । द्वितीया तु मोहलोभक्रोधाविष्टैः परस्य स्वपरहस्तप्राणच्यावन मिति । एपाऽसंयतानामेव अतः पञ्चमगुण- स्थानपर्यन्तभावन ॥५॥ आरम्भाजाता आरम्भिकी, सा च द्विविधा-तत्र चैतन्योपेत वघातात्मिका क्रिया सा बार- म्भिक, चित्रप्रभृतिपु नि मतचैतन्यवियुक्तस्थापनाज वघातात्मिका या क्रिया सा अजीवार म्भकी, प्रमादजन्यत्त्वादेपा पष्ठगुण- - पर्यंतभावन ॥ ६ ॥ धनधान्यसंग्रहलक्षणपरिग्रहादागता पारग्राहिर्क , सा च पूर्ववविधा-जवपारग्राहिक अज्वपार हिकी च, तत्र प्रथमा धान्य-पशु-प्रेष्यप्रभृतिपु संग्रहस्वरूपा विपारिग्राहिक, धनालंकारवासीगृहादिपु ममत्त्वलक्षणा अव- पारग्राहिकी, एषा परिग्रहप्रसक्तानां प्रजायते, अतो पञ्चमदेशविरतिगुणस्थानकपर्यन्तं वत्तते ॥ ७ ॥ मायाप्रत्ययक क्रिया ॥७२ । 卐 A T A - 卐 V L 卐>卐 A 卐 N A V A 卐 T अधिका यथा N 卐 द्विविधा:-आत्मभाववञ्चनता परभावव च, तत्राऽऽत्मभावव आत्म्यं भावं नगहत, नकृतिमान् ऋजुभावं U दर्शयति, संयमा देशथले करणस्फटाटोपं प्रदर्शयति, परभाववश्वनता च तत्तदाचरत टेन परे वयरे कूटलेखकरणा- 卐 देभेः, एपा सप्तमरणस्थानपर्यन्तवत्तेन, अप्रमत्तस्य कथमितिचेदुच्यते-प्रवचनोड्डाहछादनार्थ वल्लीकरणसरुद्देशादिष्वप्र- M मत्तस्यापि भवति ॥ ८ ॥ २२ ॥ मथ्यात्त्वं विपरीतवस्तुश्रद्धानं कारणं यस्य स मिथ्यात्त्वप्रत्ययकः स व्यापारेऽस्त्यस्यां सा 卐 मथ्यादर्शनप्रत्ययक, सा द्विधा-अनभिगृह तमिथ्यादर्शनप्रत्ययक-अभिगृहीतमिथ्यादर्शनदर्शनप्रत्ययक, तत्राऽऽद्याऽसं- शिनां संज्ञेनामपि यैर्न किञ्चित् कुरी र्थकमतं प्रतिपन्नं; अभिगृहीत मिथ्यादर्शनप्रत्यय च द्वधा-हीनातिरिक्तदर्शने तव्यति- 卐 रक्तदर्शने च, है ना यथा अङ्गुष्ठपमात्र आत्मा यवमात्रः श्यामाकतन्दुलमात्रो वालाग्रमात्रः परमाणुमात्र पश्चधनुःशतिक आत्मा सर्वगतोऽकर्ता अचेतनः, एवं हनातेरक्तदर्शनं, तद्व्यतिरिक्तदर्शनं, एषा क्रिया सम्यक्त्वमहोदयवर्ज- 卐 दर्शनपद्कदयेन जायरे अतस्तृत यगुणस्थानं यावद्विद्यरे ९॥ अग्रत्याख्यानक्रिया द्विधा-वाप्रत्याख्यानक्रया अजवाऽप्रत्याख्यान क्रया, न केपुचजीव देषु वा क्रमश वर तिरस्टीत उसे अप क्रिो विहेरे, संसारचक्रे परिभ्रम- 卐 ताऽसुमता अताऽनन्तभोपु यानि वधूपि व्युत्सृष्टान याने च शस्त्रास्त्रप्रभृटी नि स्वपयोगार्थ निर्मितानि रेष व शस्त्रा- दीनां नपूर्वकत्यागे न स्याद्यद तदा तत्तत्कलेवरशस्त्रादिभिजयमाना हेसा अस्मिञ्जन्मन्यपि कम्बन्धाय भवति, तते 卐 वर तेवनिताऽऽ लिङ्गन त्सुकैस्टे सर्वेऽपि व्युत्सृष्टव्याः, पुनर्ये पदार्थास्स्वप्नेऽप्युपमेगादिषु नेपयुज्यन्रे रेषामप्राप्यार्थन यावभपरित्यागस्तावदवश्यमनयाऽप्रत्याख्यानक्रियया कर्मबन्धः, तत मुक्त्य भलापुलैरिवद्भिभव्यम् । एषा अप्रत्याख्या- 卐 ध A G T A V L १३ A A क एड N S नवतत्त्व- 卐 A 卐 सुमङ्गला- टकायां- आश्रवत क्रियाः । ७३॥ y U 卐 M 卐 A 卐 N A 卐 T 卐 A नक्रिया अविरतजन्यचाचतुर्थगुणपर्यन्तवर्तिन ॥१०॥ दृष्टिजा द्विविधा, जीवदृष्टिजा अजीवदृष्टिजा च, जीवदृष्टिजा तुरङ्ग- स्यन्दनप्रभृतीनां चक्षुर्दर्शनप्रत्ययाय गच्छते, अञ्चदृष्टिजा चित्रकादनाम् , एषा सकपायचक्षुरिन्द्रियवतां विद्यते दशम- गुणस्थानं यावत् ॥ ११॥ स्पर्शनाऽऽत्मिका स्पृष्टिजा-सा च द्विविधा जीवस्पृष्टिजा अवस्पृष्टिजा च, तत्र जीवस्पृष्टिजा स्त्रियं पुरुष नपुंसक वा रागात्संघट्टयाँ त, अज्वस्पृष्टिजा मृगलोमादेवस्त्रजातं मक्तकादिरत्नजातं रागादकारणात्संघट्टयतीति, सरागजन्यत्त्वादेषा सूक्ष्मसम्परायं यावत् ॥१२॥ कश्चिदन्यं प्रत्य कर्मवन्ध जायते यया सा पातीत्यक द्विधा- वप्राती- त्यक अवप्रात्त्यर्क च, तत्र जवं प्रत्य ये बन्धः सा वप्रात्यर्क, अवं प्रत्य यो बन्धः साऽजीवनातीत्यकी, एपा दशमं गुणस्थानं यावत् ॥ १३ ॥ सामन्त पनिपातकं च द्वविधा, जवसामन्त पनिपातिक अवसामन्तोपनिपातिक च, तत्राऽऽद्या यथा एकश्च षण्डस्तं जनो यथा यथा प्रलोकते प्रशंसतच तथा तथा स हर्प गच्छ ते, अज् वानपि स्थकर्दिन, अथवा सामन्त पनिपातर्क द्वधा-देशसामन्तोपनिपातर्क सर्वसामन्तोपनिपातिक च, अथवा प्रमत्तसंयतानामन्नपानं अनाच्छादितं सत्संपातिमाः सत्त्वा आसमन्ताद् वेनश्यते । एपा आरम्भजन्यत्त्वात्पञ्चमगुणस्थानं यावत् ॥१४॥ नै शस्त्रक क्रिया द्वविधा ज्वशस्त्रिक अज्वनैःशस्त्रक च, वनैःशस्त्रक यथा राजादिसंदेशाद्यत्रादिभिरुदकस्य कूपादहिनिसर्जनम् , १ अथवा पृष्टिजा सा द्विविधा-जीवानिकी अजीवप्राभिकीच, जीवप्राभिकी या जीवाधिकार पृच्छति रागेण वा द्वेषण वा, अजीवाधिकारं वा पृच्छत्यजीवप्राश्निकी ॥ २ नानाविधनाट्या(सीनेमा)ख्यप्रयोगेपु एपा सामन्तोप नेपातिकी क्रिया प्रेक्षकाणां नाट्यादिक तुककर्तृणां च जायते ॥ G 卐 T 卐 卐 V ज L क A 卐 ॥ ७३ ।'

S 20 N 卐 U A 卐 V 卐 A A के अवनैःशस्त्रकं यथा पाषाणकाण्डाद ने गफणधडरादिर्नेसृज्यन्ते, अथवा गुर्वाद नामेषा एवं-शष्ट पुत्रे वा योटे सत्यप तस्य नसर्जनं सा वनैःशस्त्रकी, भिक्षायामेष यायां सत्यामपि तस्याः परष्ठापनं सावनशस्त्रिक, एपा देशa चरतें यावत् ॥ १५॥ स्वाहस्तक क्रया द्वविधा विस्वाहस्तक अजीवस्वाहस्तकं च, तत्र वस्वाहस्तिक यकी देन (सप्पदिना) जीवं मारयते, अवस्वाहस्तक यथाऽस्यादिभिर्जवं मारयति, अथवा जवस्वाहस्तिक यशवं स्वहस्तेन ताडयते, अवस्वाहस्तक अवं स्वहस्तेन ताडयते वस्त्रं पात्रं वा । एषा पञ्चमगुणस्थानकं यावत् ॥ १६ ॥ आज्ञापनिक क्रया द्वविधा; वाज्ञापनिक अवाऽऽज्ञापनिक च,तत्राऽऽद्या-उवमाज्ञापयत तवाऽऽज्ञापनिक, अवमाज्ञापयत् त्य- 卐 वाज्ञापनिक यथा जादूगराऽऽख्यानाम् , अथवा वाव देनाप्यानयनिक धा, तत्र जीवस्याऽऽनयन उवाऽऽनय- निर्क, अवस्याऽऽनयने अज्वाऽऽनयनिक एपा पञ्चमगुणस्थानं यावत्, न चारित्रणां वद्यते । १७॥ विदारणिक अवाजववपयत्वेन द्विप्रकारा, तत्र ज्वं चदारयतिवविदारणकी, अचं विदारयतत्य वविदारणकी, अथवा जवमवं वाऽऽभापपु वळणान द्वैभाषिक वा वदारयति, अप विधत्त इति भणितं भवति, अथवा 'वं चारयति असद्भिररेदृशस्तादृशस्त्वमिति, अजवं वा विप्रतारणबुद्ध्या भणति, ईदृशमेतदिति, निष्कलंकेषु कलङ्कारपणादिना नेपा- चमित्रस्थान यानां गुह्यवार्ताप्रस्फेटनादिना वा, एषा क्रया आश्रवरूपवादवश्यं कर्मबन्धविधा, बादरकपायदयाख्यन- 卐 वमगुणस्थानपर्यन्तव चेयम् ॥ १८ । अनाभगप्रत्ययक क्रिया द्वेधा, अनाभेगाऽऽदानजा, अनाभगनिक्षेपजा, तत्राऽनाभगेज्ञानमहुपये गित्वं वा, आदानं ग्रहणं, निक्षेपणं स्थापनं, तद्ग्रहणमनाभग्न यस्यां सा अनाभोगाऽऽदानजा 3 卐 N T A 卐 G 卐 A 卐 L T V 卐 A A 卐 N 卐: S 卐 A आश्रवतत्रे उमङ्गला- काय- 卐 U 卐 V क्रिया: । M 卐 A 卐 द्रव्याणां निक्षेपणमनाभोगेन यस्यां सा अनाभोगनिक्षेपजा, अथवाऽनाभोगक्रिया द्वविधा, आदाननिक्षेपानामोगक्रिया, उत्क्रमणानाभोगक्रिया च, तत्राऽऽदान नेक्षेपानाभोगक्रिया रजोहरणेनाप्रमार्ण्य पात्र वराद नामादानं निक्षेपं वा करोति, उत्क्रमणानाभोगक्रिया लवनप्लवनधावनासम्क्ष्यगमनागमनादेका, एपा सकपायाणां ज्ञानावरण योदयजन्या, अतो दशम- गुणस्थानं यावत् ॥ १९ ॥ अनवकासाप्रत्ययक द्विधा, ऐहलं. ककानवकालापत्य यकी, पारल केकानवकासाप्रत्ययिक च, तत्र प्रथमा लोकविरुद्धाने चर्याद न करोति यैर्वधवन्धनानि इहैव प्रामोति, परलोकानवकाशाप्रत्ययक छ हेसार्दनि कर्माणि कुर्वन् परलोकं नावकाक्षरे, एपा वादरकपायोदयप्रत्यया नवमगुणस्थानकं यावद् वतिन ॥२०॥ प्रयोगक्रिया त्रविधा, तद्यथा-मनःप्रयोगक्रिया, वाक्प्रयोगक्रिया, कायप्रयोगक्रिया च, तत्र मनःप्रयेगक्रेया आ- तरद्रध्यायिन अनिय मेतमनस्का इति, वाक्प्रयोगे वाग्योगो यस्र्थकरैः सावद्यादिर्ग हैतस्तं स्वेच्छया भायते, कायप्रयोगक्रिया कायेन प्रमत्तस्य गमनाऽगमनाकुञ्चनप्रसारणादचेष्टा कायस्य, एपा शुभाशुभसावद्ययोगवतां पञ्चमरणस्था- नपर्यन्तवर्तिनां भवति, नागेतनगुणस्थानभावनामिति ॥ २१ ॥ समग्रमुपादानं समुदानं, समुदायोऽष्टकमणि, तेषां यये- पादानं क्रियरे सा समुदानक्रिया, सा च द्विधा प्रज्ञप्ता, देशोपघातसादान क्रेया, सपघातसमुदान क्रिया, तत्र देशोपयातेन समुदान क्रया कश्चत् कस्यचिदिन्द्रियदेशोपघातं करते, सर्वेपघातसमुदान क्रिया सर्वप्रकारेणेन्द्रियविनाशं करोत, एषा पञ्चमगुणस्थानकं यावद्विद्यते ॥ २२ ॥ प्रेमप्रत्ययिक द्विविधा, मायानिश्रिता, लोभनिश्रिता च, अथवा तद्वचनमु- दाहरते येन परस्य रागो भवति, एपा लोभेदयजन्यवाद्दशमगुणस्थानकं यावद्भाविने । २३ ॥ द्वेषप्रत्ययिर्क, N ७४॥ 卐 A फ T 卐 A 卐 T 卐 V 卐 A 卐 1 卐 G श्र धा L ॥ ७४।

A 卐 V 卐 A सा द्वविधा, क्रोध नैश्रिता माननश्रता च, क्रोधनश्रता आत्मना कुप्यते परस्य क्रधं वत्पादयति, निश्रता स्वयं माद्यत, परस्य वा मानमुत्पादयति, एपा नवमगुणस्थानकं यावद्वर्त्तरे ।२४ । ईयपथिक क्रिया द्विविधा-क्रयमाणा वेद्यमाना च, तत्राप्रमत्तसंयतस्यतरागच्छद्मस्थस्य लेवलिनो वाऽऽक्तं गच्छत आयुक्तं तेष्ठत आयुक्तं . निदत आयुक्तं त्वग्वर्त्तयत आयुक्तं सुञ्जानस्याऽऽयुक्तं भाषमाणस्याऽऽयुक्तं पात्रं कम्बलं पादप्रच्छनंच गृह्णत निक्षपत 卐 वा यावच्चक्षुःपक्ष्मनिपातमपि कुर्वत या सूक्ष्मा क्रया क्रयमाणा ईर्यापथक, या च प्रथमे समरे बद्धा सई द्वरैय- A समये वेद्यमाना सा द्विरया, योगप्रत्ययत्त्वादेषा सयोगगुणस्थानं यावद् । २५ ॥ एताः पञ्चवेंशतिक्रियाः। नन्वाश्रवाणां द्वचत्वारेंशदात्मका संख्या प्रेक्ता, सा कथं घटरे ? यतः नेपा द्वाराण परस्परमनुप्रदेशः प्रत्यक्षमेव दृग्गोचरे भवति, N योन्द्रियमध्ये च स्पर्शनेन्द्रिये दृष्टिस्पृष्टिक्रययोरेन्तर्भवतः, तद्व्यतिरेलेण च :स्पर्शनयोद्यमानयरप आश्रवत्त्वाऽयेगा। यह कपायचतुष्टयं तु प्रेमप्रत्ययद्वेषप्रत्यय क्रिययोरन्तर्भवति, मायाले भकषायद्वयस्य प्रेमत्त्वात् , क्रोधमानयश्च द्वेषत्त्वादिति, तथाऽव- तपञ्चकस्यापि सामान्यरूपतयाऽप्रत्याख्यानक्रियायामन्तर्भावः, विशेषरूपतया वाद्याऽव्रतस्य प्राणतिपातक्रियायाम, पञ्चमस्य च परिग्रहक्रियायामनुप्रदेशः, क्रयाणां चेतासां यथक्तपदेष्यप्रदेशः। एवं क्रयाणामपि परस्परानुप्रदेशे वक्तव्यः । तथा यगत्र- यस्यापि मध्ये कायर्क क्रियायां काययोगस्य, प्रयोग क्रियाया शेपद्वयस्येति, एव द्विचत्वारिंशत्संख्या घटते, निमत्रप्रति- चधानं ? उच्यते, एवं परस्परान्तर्भावसम्भवेऽपि विशेषण् यार्थभेदनानात्वाऽपेक्षया शष्यबुद्धिवैशद्यार्थमाश्रयझेदानां परस्पराऽसं- L कीचं परिभावन्यं, तथा ह-यदुक्तं च स्पर्शनेन्द्रयय दृष्टिस्पृष्टिक्रियाऽन्तर्भावः, तत्र चक्षुःस्पर्शनयोरेन्द्रयत्त्वकृते ये 卐 T ध A G T 卐 V धन A 卐 卐 卐 N S आश्रव- . U 卐 नवतत्त्व- विशेषः स न दृष्टिस्पृष्टिक्रियाभ्यां गम्यते, नाऽपि दृष्टिस्पृष्टिक्रयाकृतो विशेषश्चक्षुःस्पर्शनेन्द्रियाम्यां प्रतीयत इति वैशेपप्रति- सुमङ्गला- पत्यर्थ दानामभिधानमेवमन्यन्नाऽपि भावना कार्येति ॥ इत्याश्रवतत्वम् ॥ 卐 टीकायां आश्रवभेदानुत्त्वा मय पलब्धेन शुभेन शस्तेन । पिहिताश्रवद्वारेऽस्तु निराश्रवो जन्दुसङ्घातः ॥१॥ ॥ ७५॥ इत्याराध्यपादाऽऽचार्यवर्यश्रीमद्विजयमोहनसूरीश्वरविनेयावतंसोपाध्यायपदालङ्कृतश्रीमत्प्रतापवेजयगणिचरणाञ्जचञ्चरीकप्रवर्तक श्रीधर्म वेजयविरचितायां श्रीनवतत्त्वप्रकरणस्य सुमङ्गलाटीकायां पंचमं आश्रवतत्त्वं समाप्तम् ॥ समार A T N A 卐 G ज 'A ज T - V ध L 卐 । ७५ ध A 卐 an 卐 N S ट 卐 A y अथवा रत्न 4 V 卐 A A 卐 T y ज N श्रेया सदनं क्षय पशमजं कल्याणवल्ली घनं । संग खाऽऽयलक्षणभरं मूलं परम् । क्षाऽवाप्तिरपार्धपुद्गलपरावर्ताऽऽख्यकालेन च । यस्मात्तं दधतां सुदर्शनवरं भव्या गुणाऽलिङ्गतम् । इदा माश्रवप्रतिपक्षभूतं क्रमाऽऽयातं संवरतत्त्वं विवरिषुः सूत्रं गाथाऽऽत्मकं मूलत्तरदप्रतिपादकं ग्रथनाति- समिईत्तिपरिसह-जइध्म् भावणा चरितार पण दुसदसबर-पंचभए हैं स्गन २५ टीकाः-ईभाषेषणाऽऽदाननिक्षेपोत्सर्गरूपाः प समितयः, पापव्यापारेभ्य मनवाकायगपनान्मनेवाकायगुस्या, मार्गाऽच्यवननिर्जरार्थ पढिव्या वक्ष्यमाणा द्वा३शतिः परपहाः, क्षान्त्यादिके दशन्धि यरिधर्मः, अनित्याऽऽद्या द्वादशभावनाः, सामायिकाद्यानि पञ्चप्रकाराणि चरित्रात्टेरे क्रमशःप -त्र-द्वाविंशति-दश-द्वादश-पञ्चदैः सप्तपश्चाशन संवरस्य भेदा भवन्त गाथाऽक्षरार्थः। व्यासाऽस्त्वयम् :-अन्कनरनार पुत्रकलत्रपरिवारसंपत्समलंकृतसप्तभूमिकहाले- 卐 G ध 卐 T V L 卐 A ध A N 卐 S e अनवतत्त्व A सुमला- र्ट काय- v D ।७६॥ ) A T 卐 A 卐 परिक लेते विपुलधनधान्यक्रयाणकप्रभृतिव्यापारशतसंकुले कस्मॅश्चिन्महानगरे गच्छदागच्छदनेकशकटघटकपादसंघटन स्थ- संवरतत्ते- U तपांशुपांशुलचतुष्पथवर्त्यनावृतवे वेधवातायनश्माऽन्तः प्रविशति यथा रजापुञ्जः, पहितेषु च द्वारेषु प्रासादस्यान्त- 卐 संवर- धूलाकरेण न प्रविश्यते, सम्मार्जन शुद्धाऽपगतरजस्त्वात् प्रासादेन च शुद्धेन भ्यते, यथा वा स्थगितसर्वद्वारत्त्वान् नरुद्धन- M स्वरूप रप्रवेशे कस्मॅिश्चिन्महासरस पायं नदाघार्कप्रचण्डांशुभिः शुष्यते, यथा वा नानाविधच्छद्रशतसंकुलप्रवहणं च्छद्रप्रविष्टो- 卐 दकपूरपूरैतं नमजत्यन्तम्होदध न च पारयतुं शक्यते प्रवहणोपविष्टजनपरिकर, यदा च संरुद्धच्छद्रत्वानच्छद्रं भवति A यानपात्रं तदाऽडकूले मरुते पारावारं पारयति नजाऽवगाहाऽवगाढनरनार नकर स्वयमपि सुखेन संतरत, तथा यावत्कालमयं 卐 वो मिथ्यात्वाऽविरतप्रभृत्याश्रवच्छिद्रसंकुलत्त्वात् प्रतिसमयं समावर्जितकर्मस ललभारभरतो न तावत्कालं संसारपाथेधि- N निर्जयते मुल्लच यदं समर्थो भवति, यदा च नराश्रवत्त्वेन संरुद्धकर्मनरे भवत्ययं वः प्रारपात्तं च काम्भः तपःप्रभृतिना 卐 तदाऽऽश्रवद्वाराणां संवृतत्त्वान्नूतनकम्मदकाऽनागमेन प्रारपाज॑तस्य च तपःकृशाउना प्रतेक्षणं दंदह्यमानत्वात् G प्रान्ते नेष्कर्माऽयमात्मा सद्ध शलायामच्छस्फटेकाऽऽत्मिकायामक्षय्यसुखभाग् भवति, तस्माद्भवावं तर्पणा भव्यसं- 卐 दोहेन प्रत्यहं संवृत्न भवितव्यम् , यावान् संवरस्तावान् कमगमस्य रेधः, यावान् रेधस्तावन्मुक्तस्साम्प्यम् ॥ उक्तञ्च;- A "यथा चतुष्पथस्थस्य बहुद्वारस्य देश्मनः । अनावृतेषु द्वारेषु रजः प्रविशते ध्रुवम् ॥१॥ प्रविष्टं स्नेहयोगाच तन्मयतेन 卐 वध्यते । न वेशेन च बटेत द्वारेषु स्थगते ६॥२॥ यथा वा सरसि क्वाडी, सदिशेजलम् । कृरे रन्ध्रपिधाने न स्त'कमपे तद्विशेट् ॥ ३॥ योगादिष्वाश्रवद्वारेष्वेवं रुद्धेषु सर्वतः कर्मद्रव्यप्रदेशे नवे संवरशालिने । ४ । 3 ७६ T V L y A श्र A एन 卐Cy. - - 卐 A 卐 V 卐 A न मिथ्या- ननु संवर इत कः पदार्थः १ उच्यते-यैस्संसारजभूतं काष्टकमासूयरे समादीयरे रोपां कर्मप्रदेशीथ्यात्मकान शुभाशुभलक्षणयगेन्द्रयकषायाव्रतक्रियाण त्रपञ्चचतुःप वर्विशतभेदस्वरूपाणां प्राक्यपश्चितानामाश्रवाणां ये नरेधे निवारणं स्थगनं स संवरः, उक्त मदर्हत्प्रवचनसंग्रहे तत्वाधिगमसूत्रे 'आश्रवनरेधः संवरः' (अ०९ सू.१) स च सर्वदेशदाद् द्वविधः, यदा योगादिनिखिलानामाश्रवाणां निरोधस्तदाऽयोग्यवस्थायां सर्वसंवरः शेषकाले चरण- प्रतिपत्तेरारभ्य देशसंवरपरिणतिभागात्मा भवति, तद्यथा-यदाऽऽत्मा करणत्रिकपूर्वकं सम्यग्दर्शनं संप्रामोति तदा चतुर्थगु- णस्थानकादारभ्याऽग्रेतन्षु गुणस्थानलेषु मिथ्यात्वस्य दयापेक्षयाऽभावात् न मिथ्यावनिमित्तः कर्मवन्धः, त्वप्रतिपक्षभूतसम्यगदर्शनाऽपेक्षः एकदेश्यः संवर। यदा च चरणप्रतिपविभागात्मा भवति तदा तस्य वरतत्त्वावरत- हेतुककागमनिरोधेन द्वहेतुको देशसंवरः । यदा प्रमादत्यागेनाऽप्रमत्तो जायत आत्मा तदान मप्रमत्तगुणस्थानकादारभ्य सम्यग्दर्शनसंयमाप्रमत्ततालक्षणखिहेतुके देशसंवरः । यदा च क्षपकरेण्यन्तताऽऽत्मा सूक्ष्मसंपरायाऽवस्थायां कपायमहं समूलकापं नहत्य णमोहस्थानमवामोत, अथव पशमश्रेण्यन्तर्गतऽयं वोनिवृत्तिवादराद चारित्रमोहसुपशमय्य प्रशा- न्तमोहगुणस्थानकादं चतुर्हेतुको देशसंवरः, यदा च सय ग्यन्ताऽवस्थायां सूक्ष्मवादरान् त्रविधान् योगनिरुध्य अयोग्यवस्था गच्छत्ययं जवस्तदा निःशेषाणामप्याश्रवाणां निरधात् सम्यक्त्वविरतिप्रमादाऽभावत्व नष्कपायित्त्वाऽय गित्त्वलक्षणः प हेटुकस्सर्वसंवरः । तथाचोक्तं; गुणस्थानेषु यो यः स्यात् संवरः स स उच्यते मिथ्यात्वाऽनुदयादुत्त-रेषु मथ्यात्वसंवरः ।१॥ तथा देशविरत्याद स्यादविरत संवरः अप्रमत्तसंयताद प्रमादसंवरे मतः । २ ।। प्रशान्तक्ष्णमहार्द भरे 卐 A 卐 N T ज A G 卐 T A 卐 L V 卐 A A 卐 P N 卐 S नवतत्व- A सुमाला- V 卐 हेतवः A T N 5 कपायसंवरः । अयोगाऽऽख्यत्वलन सम्पूर्ण येगसंवरः । ३॥ • स्वरतटे अत्राऽऽह, यदि 'आश्रवनिरोधस्संवर' इत्युक्तं परं केन पायेनेन्द्रयकपायाऽव्रतयोगक्रियालक्षणानामाश्रवाणामुक्तस्वरूपाणां U आश्रवरेध- 卐 टकाय निरोधः कर्त्तव्यः ? उच्यते, तत्तदाश्रवप्रतिपक्षाऽऽस्वन्न संवरस्संजायते, उक्तञ्च-"रेन येन ह्युपायेन रुध्यते ये य आश्रवः तस्य तस्य नेरोधाय स स योज्यो मभिः" ॥१॥ तच्चैवम् ;-इन्द्रयोन्मादेन कृतरेकान् आपातरम्यरटेन परिणामदा- ॥ ७७ ॥ 5 रुणत्वेन च पसन्नभान् विषयान्नन्द्रियजयलक्षणेनाऽखण्डेन संयमेन नराकुर्यात् । क्रोधं प्रतिपक्षभूतया क्षमया, मानं . मृदुभावेन, मायां ऋजुत्त्वेन, लोभं संतोषाऽऽत्मिकया हया संवरार्थं कृतोद्यम आत्मा निराकुर्यात् । सावद्ययोगानां त्यागे- A 卐 नाऽवतलक्षणामविरत प्रतकुर्यात् , मनोवाकायरक्षणलक्षणाभिस्तिसृभिर्गुप्ति भर्मन वाकायव्यापारलक्षणान् योगान् संवृणुयात्, मद्यपयकपायनिद्राविकथालक्षणं पञ्चविधमथवाऽज्ञानसंशयविपर्ययरागद्वेपस्मृतिभ्रंशधाऽनादरयोगदुष्प्रणिधानरूपतयाऽष्ट- वधं प्रमादं तच तिपक्षभूतेनाऽप्रमादेन साधयेत् । संवरनमित्तं प्रयत्नवानात्मा संसार सन्धुमुत्तिर्मुसुमुक्षुम्सन् सद्दर्शनेन मथ्या- दर्शनं, चेतसः स्थैर्यलक्षणेन धर्मशुक्लध्यानेनाऽऽतरोद्रध्यानं वजरेत । यदवादपत विचारचतुर्मुखपरनार सहेदरकुमारपालक्ष्मा- 卐 पालप्रतिबोधकक लकालसर्वज्ञभगवद्धेमचन्द्रसूरपादा योगशासे- क्षमयामृदुभावेन ऋजुत्त्वेनाऽप्यन् हया । क्रोधं मानं तथा ॥ मायां लोभं रुन्ध्याद् यथाक्रमम् ॥ १॥ असंयमकृतोत्सेकान् वैषयान् विपसंनभान् । नराकुर्यादखण्डेन संयमेन महामतिः A 卐 ॥ २ ॥ तसृभिर्गुप्तभियगान् प्रमादं चाऽप्रमादतः । सावधये गहान्नाऽविर ते चाऽ साधयेत् ॥ ३ ॥ सद्दर्शन्न मिथ्यात्वं 卐 इ भस्थैर्येण चेतसः । विजयेतातरंद्रे च संवरार्थ कृतोद्यमः । ४ । अयं संवरश्च पुनद्रव्यभावभेदाभ्यां द्वविधः, कर्मपुद्गला- - 卐 A G T ॥ V 1 99 A A ॐ CATEL [ue 卐 S - N U A . V A A N 9 नामाश्रवद्वारेणाऽऽदानं तस्य यच्छेदः स द्रव्याणां संवरत्वाद्रव्यसंवरः, आत्मव्यापारलक्षणानां संसारकारणभूतानां क्रियाणां में यस्त्यागः स भावसंवरः। नन्वाश्रवस्य द्विचत्वारेशद्भेदाः प्रज्ञापिताः, संवरस्य सप्तपञ्चाशद्भेदाः प्रतिपाद्यन्ते, तत्कथं सम्यग् की जाघट त, यत उच्यते 'आश्रवनिरोधस्संवरः' आश्रवश्व च्छद्राऽऽत्मकः, संवरश्च स्थगनलक्षणः, यावन्त च्छद्राणि तावन्त्व स्थगनान, ततो द्वयोरप्याश्रवसंवरयोस्तुल्यभेदैर्भवितव्यम् , सत्यम् , संवरस्य ये सप्तपञ्चाशद्भेदाः अरू पितास्तत्रग्रन्थकर्तुराचा- M a यस्य ववक्षैव कारणम् , कतिचि दानां तत्र तत्राऽन्तर्भावात् । 卐 अत्राह-यदि सकलाश्रवद्वारस्थगनलक्षणः संवरस्ततः सर्वकर्मानिमित्ताश्रवच्छिद्रसंधुवूर्पा कतिपयपुरुषसाध्यैव प्रसजति, 卐 अशेषस्य परिस्पंदस्य नराचिकीर्षचादतः समचतुरस्रसंस्थान-वजर्षभनाराचसंहननादभाजामाहतपराक्रमाणां कणि निर्ज- जपतां परिपूर्ण शक्तिकानां परस्पंदखभावये गत्रयनिग्रहः प्रागुपचितकर्मक्षयश्च शक्तिसाध्यः, न पुनरैदंयुनपुरुषाणां यथोक्त- 卐 संवराभावादित, उच्यते, संवरद्वैविध्ये सति सर्वसंवराऽभावस्सांप्रतिकानां, देशसंवरस्तु सामायिकादचारित्रवतामप, सत्यप - परस्पंदवत्वे विदिततत्त्वानां संसारजलधेरुत्तरतुम भवाञ्छता रेषां प्रधानसंवराऽभावेऽपि न्यस्तसमस्तप्रमादस्थानानां देशसंवर-d E स्समस्त्येति । यद्यस्मन् भवे देशसंवरसमाराधनं स्यात्तदाऽसुत्रसर्वसंवराराधनमवश्यमुदयमेष्यति, कर्मक्षरेण महानन्दपदही- प्राप्तिरपि भाविन, यः कश्चिद्देवानांप्रिये रागद्वेषान्तरारि निषूदकपारगतप्रवचन विध्वंसको वावदूकाधुनिक एवं जल्पेत यन्नास्ति A 卐 सामायिका दचारित्रम स्मन् करालकलकाले दुःषमाभिधाने ये क्षेचन सर्व वरति कुन्त न चरे सम्यग्पालयितुं शक्नुवन्ति, लेचिच्च शिष्यमहमुग्धाः स्नेहवशानुदन्तम पितृकलत्रप्रभृतिस्वजनादिकमनादृत्य बालानपि मूढमरेन् प्रवाजयन्ति, बालाश्च 卐 T A T V L A A N S अनवतत्त्व , A सुमङ्गला- कायां- 卐 V 卐 卐 संवरतदे U देशसर्व- 卐 संवर- 卐 स्वरूप A • ७८॥ T संयमप्रतिपत्त के जान रन् , कथं च क्रीडाप्रमत्ताःसन्तस्ते पटुकायान् संरक्षेः' तन्निरवशेषमपि तेष प्रल पितं मिथ्यात्वमूढ- चेतस्कत्त्वादज्ञानविजृम्भितम्, पूर्वप्रीतपञ्चसूत्र-जनप्रवचनोपनिषद्वेदिह रभद्रसूरपुंगवत-पञ्चवस्तुकपश्चाशकाष्टकप्रक- रणादमहाग्रन्थेषु तथा तथा सम्यग् प्रतेपादनात् , युक्तियुक्तत्त्वाच्च, जिज्ञासुभिस्तत्रतो लोक यम्, वेस्तरभयादत्र न प्रपश्च्यते, देशसंयमेन च कश्च लाभस्संजायते तदर्हत्प्रवचनसंग्राहक मदुमास्वातिप्रकाण्डप्रतितत्त्वार्थभाष्योक्ताऽन्तमाऽऽला- पकेन सम्यकपरिभावन्यं ..क्षुभिर्भव्याऽऽत्मभिः। तद्यथा-'यस्त्विदान सम्यग्दर्शनज्ञानचरणसंपन्ने भक्षुमक्षाय घटमानः कालसंहननायुपादल्पशक्तः कर्मणां चाऽतेगुरुत्वादकृतार्थ एवोपरमति स संधमादनां सर्वर्थ सिद्धान्तानां कल्पवमान- वेशेषाणामन्यतम् देवतये पपद्यते, तत्र खकृतकर्मफलमनुभूय स्थतिक्षयात्प्रच्युतो देशजातिकुल लवद्याविनयविभव विषय- वस्तरविभूतियुक्तेषु मनुष्येषु प्रत्याया तिमवाप्य पुनः सम्यग्दर्शनादिविशुद्धबोधमवाऽऽप्नति, अन्न सुखपरम्परायुक्तेन कुश- लाऽभ्यासाऽनुबन्धक्रमेण परं त्रिर्जनवा सिध्यते' तत्त्वार्थभाष्यम् अ०-१० । अनेनैतनिक यते यत्सम्यग्दृष्टिनाऽऽत्म- हताऽऽका क्षणा सुरक्षुणा सर्वदा ससंवरेणैव भवितव्यमित्यलं प्रसङ्गेन, अथ प्रकृतमनुसरामः । 'समई ' इत्यादिगाथार्थ स्तु व्याख्यातस्सुगमश्चेति ॥ २५ ॥ अथेय समित्यादिखरूपञ्च ववक्षुराचार्य गाथां नवधनाति;- इरिया भासेसणादाणे, उच्चारे सम्ई अ मणगरि वयत्ति, कारगुत्ति तहेव य २६ टीका-'इरया' इत्यादि-'द्वन्द्वान् श्रूयमाणं पदं प्रत्येकं सम्बध्यत' इते न्यायेत्यादिपदैस्सह समितिपदं यज्यम् , N 卐 A 卐 T 卐 V 卐 A फ्र G 卐 3 L 卐 A ॥ ७८ ॥ पद S 卐 A ॐ V A 卐 A 卐 T 卐 तद्यथा-ईसमितिः, भाषांसमितिः, एषणांसमितिः, 'पदैकदेशात्पदसमुदायस्यापि ग्रहणम् ' इत्यथवा 'भमे भीमसेन इति न्यायेन गाथान्तर्वादानशब्देन आदान निक्षेपणासमितिया, उत्सर्गसमितिः, तथा मने गुप्तिर्वचनंगीः कार्यरतिर- त्यष्टं प्रवचनमातर इति गाथार्थः, ॥ व्यासाऽस्त्वयम् । तत्र संपूर्वस्य 'इण्' गतावत्यस्य क्तिन्प्रत्ययाऽन्तस्य समित- भवते, सम् एकभावेनेतिः समितिः, शभकाग्रपरिणामच्ष्टा इत्यर्थः, ईर्यायां समितिय समितिः, स्थशकटयानवाहनाऽऽ- क्रान्तेषु मार्गेषु सूर्यरश्मिप्रतापितेषु प्रासुकविविक्तेषु पथिषु युगमात्रदृष्टिना भूत्वा गमनाऽऽगमनं कर्त्तव्यमित्यर्थः, उक्तं चागमे-" पुरओ जुगमायाए ऐहमाणो महीं चरे । वजतो यह रियाई पाणे य दगमट्टियं । १॥ ओवायं विसमं खाएं विजलं परिवजए । संकमेण न गच्छेज्जा विजमाणे परकमे" ॥ २ । अथवाऽऽगमाऽनुसारिणी गतिरर्यासमितिः, अयम-सस्थावरजन्तुजाताऽभयदानद क्षितस्याऽऽवश्यले प्रयेजने गच्छतो मुजन्तुरक्षानिमित्तं स्वशरीररक्षानिमित्तं च पादाऽग्रादारभ्य युगमात्रक्षेत्रं यावनिरीक्ष्य ईरणय गतिस्तस्यां समितिः शोभनैकाग्रपरिणामचेष्टा ईर्यासमितिः, तथाचोक्तं योगशास-' लोकाऽतिवाहिरे मार्गे चुम्बिते भास्वदंशुभिः । जन्तुरक्षाऽर्थ- मालोक्य गतिरर्या मता सताम् । १॥ एवंविधोपयोगवते व्रजतो मुनेः कथञ्चित्प्राणिवटेऽपि प्राणिवधपापं न भवति, N A G - A 卐 T 卐 V १ पुरतो युगमात्रया प्रेक्षमाणो मही चरेत् । वर्जयन् वीजहरितानि प्राणान् च दकमृत्तिकान् ॥ १ ॥ २ अवपातं विपमं स्थाणुं विजलं परिवर्जयेत् । संक्रमेण न गच्छेत् वेद्यमाने पराक्रमे ॥ २ ॥ 卐 L 卐 y A १४ A ध -- 卐 iz S. ज S नवतत्त्व- U कायां- संवरतत्त्वे भाषा- समितिः V M ॥७९॥ A 卐 T N यदाह-" उच्चालियम्मि पाए, इरियासमियस्स संकमट्ठाए । वावजेज कुलिंग मरिज तं जगमासज॥१॥ न ये तस्स तन्नि- 卐 मत्तो बंधो सुहुमोवि देसिओ समए । अणवजो उवओगेण सबभावेण सो जम्हा ।। २ । तथा-जैअदु व मरदु व वो अज- 卐 दाचारस्स नेच्छओ हंसा । पयदस्स णस्थिबंधो हंसा मत्तेण समिदस्स" ॥३॥ईर्यासमित्यामुदाहरणं यथा-एकः साधुरी- सिमित्या युक्तः, तस्य प्रभावात् शक्रस्यासनं चलतं, शक्रकृतां प्रशंसां सेढुमसमर्थः कश्चिन्मिथ्यादृष्टिदेवस्तत्रागत्य तं साधुसुपद्रोतुं परिते मण्डूकिका विकुरुते, पृष्ठतश्च हस्तनं कुरुते, तथा स साधुर्गते न भनत्ति, हस्तिनोत्क्षिप्य पत्तिऽपि 卐 शरीरमस्पृहयमाणः स्वपातजन्यमण्डू किका वराधनार्थं पश्चात्तापं विधत्त इत॥ 卐 अथ भाषासमितिः;-हेतमिताऽसंदिग्धाऽनवद्यार्थ नेयतभाषणं भाषासमितिः, आत्मने परस च हतमायत्यामुपकारकं स्वल्पम बहुप्रयजनसाधकमर्थवर्ष प्रतिपत्त न संदेहकार वाक्यशुद्ध्यध्ययनप्रतिपादितधूर्त्तकारकक्रव्यादचरचार्वाकादि- भाषितलक्षणदोपवर्जितं सुखवसनाच्छादिताऽऽस्यस्य यद् भाषणं सा भाषास मतिरत्यर्थः॥ आह च; त्यक्ताऽनृता देदोष 卐 सत्यमसत्याऽनृतं च नरवद्यम् । सूत्राच्या ये वदतो भाषासमितवते साधः ।१॥ कलकालसर्वहैरप.प्रत्यपादि-अवद्य- त्यागतः सर्वजन्नं मतभाषणं । प्रिया वाचंयमानां सा भाषासमितिरुच्यते ॥१॥ तथा च सद्धान्ते;-महुरं नउणं थोवं १ उच्चालिते पादे ईयासमितस्य संक्रमार्थम् । व्यापद्येत कुलिङ्गी म्रियेत तं योगमासाद्य ॥ १॥ न च तस्य तन्निमित्तो y बंधः सूक्ष्मोऽपि दर्शतसमये । अनवद्य उपयोगेन सर्वभावेन स यस्मात् ॥ २ ॥ जोवतु वा म्रियतां वाजेनोऽसदाचारस्य निश्चयतो हेसा । प्रयतस्य नास्ति बन्धो हिंसामात्रेण समितस्य ॥ ३ ॥ 卐 G T A V L y A 5 ॥७९॥ A 11 re S -- ज N 卐 A 卐 V 卐 A U 卐 M ध A ॐ T कजावडियं अगव्वियमटुच्छं । पुच मइसंकलयं भगंत जं धम्मसंजुत्तं ॥१। जाय सच्चा न वत्तहा सच्चा मेसा य जा मुसा । जाय बुद्धे हे णाइण्णा ण तं भासेज पन्नवं ॥१॥ भाषासमित्यां दृष्टान्तः-कश्चनिग्रन्थः साधुः भक्षार्थ नगरर सति बहिः कटके हिण्डमानः लेनचित्, कयन्तोऽश्वा हस्तिनस्तथा निचये दारुधान्यानाम् ? नरेंण्णा अनिम्ण्णिा नागरिका इत ? इदं ब्रूत यूयम् , समितः स आह-स्वाध्यायध्यानयोगव्या क्षप्ता वयमित न जानमः, पुनः पृष्टः, हण्ड- माना नैव प्रेक्षध्वम् ? नैव श्रुणुथ कथं ? तदा ब्रीति-" बहु सुणेइ करे हैं, बहु अच्छे हैं पिच्छइ न य दर्से सुयं भक्रू अक्खाउमरिहई "॥१॥ अथैषणासमितिः-एषणासमिति म गेचरगत्न सुन्निा सम्यरुपयुक्तेन नवकर्ट परशुद्धं ग्राह्यर, अथवा अन्नपान- रजहरणपात्र वरादीनां धर्मसाधनानामाश्रयस्य चद्गमत्पादषणादपवर्जनमेपणासमितिः, अन्नमशनखाद्यस्वायदं, पानमारनालतन्दुलक्षालनादि, तथा रजहरणमुखवसनचोलपट्टकादिचीवरपात्रप्रमुखः स्थविरकल्पयग्यश्चतुर्दशविधो जनक- ल्पकयोग्यश्च द्वादश वधः अधिक उपधिः, आर्यकाय ग्यश्च पञ्चविंशतिविधोऽप्युपधिरुद्गमादिदपरहितः साक्षात् पारम्पण वा श्रुतचरणधर्मसाधकोन , नह अधिकरजहरणाद्यन्तरेण अपग्रहिकप्ठफलकाद्यन्तरेण च वर्षासु हेमन्तरम- यसरी जलकणिकाकूलायामनूपभूम'महाव्रतसंरक्षणं कत्तुं शक्यम् , नह पात्रान्तरेण च महाव्रतसंरक्षणं कर्तुं क्षमम् आश्रयः शय्या वसतिरत पर्यायाः, सारी उद्गमादिदोषरहत्व परभोग्या, उक्त ;-" उत्पादन द्गमैषण-धूमाझारप्रमाणकारणतः संयोज पेंडं शेधयतामेषणासमितिः"॥१॥ तत्र पेडशाऽऽधाकम्मदय उद्गमदोषाः, पेडशैव धान्यादय उत्पादनादेषाः, 卐 N 卐 G A ज T 卐 A 卐 L V 卐 A A प N S 卐 A 卐 卐 卐 संवरतत्त्वे एषणा- समिरे। 卐 A M 卐 A T 卐 भनवतत्त्व दशैपणादोपाः शङ्कितादयः॥ एते च संक्षेपतो लेख्यन्ते;-आधाय चकल्प्य यतिं मनसे कृत्वा सचित्तस्याचित्रीकरणम- चित्तस्य वा पाको नरुक्तादाधाकर्म॥१॥ उद्देशः साध्वर्थं संकल्पःस प्रयोजनमस्य अद्देशकं यत्पूर्वकृतमोदनमोदकक्षोदादि टीकायां- v तत्साधूद्देशेन दध्यादिना गुडपालेन च संस्कुर्वतो भवति ॥२॥ आधार्मिकावयवसं मश्रं शुद्धमपि यत्तत्पूतिकर्म शुचद्र- व्यमिवाऽशुचद्रव्यमिश्रितम् ॥ ३॥ यदात्मार्थ साध्वर्थ चादित एव मिश्रं पच्यते तन्मश्रम् ॥ ४॥ साधुयाचितस्य दरादेः ॥८॥ पृथक्कृत्य स्वभाजने स्थापनं स्थापना ॥५॥ कालान्तरे भाविन विवाहादेरिदानीं सन्निहिताः साधवः सन्ति तेषामत्युपयोगे भवत्विति 卐 बुद्ध्या इदान मेव करणं समयपरिभापया प्राभृतिका, सन्निकृष्टस्य ववाहादेः कालान्तरे साधुसमागमनं सञ्चिन्त्यो- त्कर्पणं ( विलम्वेन करणं) वा ॥ ६॥ यदन्धकारव्यवस्थितस्य द्रव्यस्य वह्निप्रर्द पमण्यादिना भित्त्यपनयनेन वा बहिनि- ss कास्य द्रव्यधारणेन वा प्रगटकरणं तत्प्रादुष्करणम् । ७ । यत्साध्वर्थ मूल्टन क्रयरे तत्क्रतम् । ८ । यत्साध्वर्थमन्नादि A उद्धारले गृह त्वा दीयते तत्प्रामित्यकम् । ९ । स्वद्रव्यमर्पयत्त्वा परद्रव्यं तत्सदृशं गृह वा यई यरे तत्परिवर्तेतम् । १० । गृहग्रामादेः साध्वर्थ यदान्तं तदभ्याहृतम् । ११ । कुतुपादिस्थस्य घृतादेर्दानार्थं यद् मृत्तिकाद्यपनयनं तदुद्भिन्नम् १२ । T यदुपरिभूमिकातः शिक्यादे मगृहाता आकृष्य साधुभ्ये दानं तन्मालापहृतम् । १३ । यदाच्छिद्य परर्कयं हठात् गृह चा स्वाम् प्रभुश्चरो वा ददाति तदाच्छेद्यम् । १४ । यद् गोष्ठे भक्ताद सर्वैरदत्तमनमतं वा एकः कश्चित् साधुभ्यं ददात तदनसृष्टम् । १५ । स्वार्थमधिश्रयणे सत साधुसमागमश्रवणात्तदर्थ पुनर्यों धान्यादिवापः सोऽध्यवपूरकः । १६ । एते 卐 पोडशद्गमदेषा गृहस्थप्रभवाः॥ N G 卐 A V L A 卐 ॥ ८० । 卐 A * ... 卐 A U 卐 V 卐 M 卐 A A 卐 T अथ साधुप्रभवा उत्पादनादेषास्ते चाऽs बालस्य रमजनमण्डनक्रडनाङ्कारपणकर्मकारण्यः प धान्यः, एतासां कर्म भिक्षार्थ कुर्वतो मुन्र्धारिण्डः १। मथः सन्देशकथनं दूतचं तत्कुबतो भिक्षार्थ दुण्डिः २। अर्हताऽनागतवर्तमानकालेषु लाभाऽलाभादिकथनं निमित्तं तद्भक्षार्थ कुर्वतो निमित्तपिण्डः ३ । जातिकुलग- णकर्म शल्पादिप्रधान्भ्य आत्मनस्तत्तद्गुणचाऽऽरपणं भक्षार्थमाजवपिण्डः ४ । श्रमणबामणक्षपणाऽतिथिश्वानादिभक्तानां पुरतः पण्डार्थमात्मानं तत्तद्भक्तं दर्शयतो व पकरिण्डः ५ । चमनविरेचनव स्तकादकारयते द्य पज्याद सूचयतो वा पण्डार्थ चिकित्सापिण्डः ६ । विद्यातपःप्रभावज्ञापनं राजपूजा दख्यापनं क्रोधफलदर्शनं वा भिक्षार्थ कुर्वतः क्रोधपिण्डः ७ । लब्धिप्रशंसोत्तानस्य परेणोत्साहितस्यावमतस्य वा गृहस्थाभिमानमुत्पादयतो मानपिण्डः ८ । नानावेषभाषापरिवर्तनं भिक्षार्थ कुर्वतो मायापिण्डः ९। अतिलोभाद्भिक्षार्थं पर्यटतो लोभपिण्डः १० । पूर्वसंस्तवं जन- जनकादिद्वारेण पश्चात्संस्तवं श्वश्रूश्वशुरादिद्वारेणाऽऽत्मपरिचयाऽनुरूपं सम्बन्धं भिक्षार्थ घटयतः पूर्वपश्चात्संस्तवपिण्डः ११ ॥ विद्यां मन्त्रं चूर्ण योगं च भिक्षार्थ प्रयुञ्जानस्य चत्वारो विद्यादि पण्डाः १२-१३-१४-१५ । ( मन्त्रजापहोमादिसाध्या देवताधिष्ठाना वा विद्या, पाठमात्रप्रसिद्धः पुरुषाधिष्ठानो वा मन्त्रः, चूर्णान नयनाञ्जनादीन्यन्तर्दानादिफलानि, पाद- प्रलेपादयः सभाग्यदर्भाग्यकरा योगाः।) गर्भस्तम्भगर्भाधानप्रसवस्नपनकमूलरक्षावन्धनादि भिक्षार्थं कुर्वतो मूलपिण्डः १६॥ गृहमेधिसाधूभयप्रभवा एषणादोपा दश, तद्यथा-आधाकर्मिमकादिशङ्काकलुप्तो यदन्नाद्यादत्ते तच्छङ्कतं यं च देपं शंकते तमापद्यते १ । पृथिव्युदकवनस्पतिभिः सचिरैरचित्तैरपि मध्वादिभिर्गहितैराश्लिष्टं यदन्नादि तन्प्रक्षितम् २। पृथि- G 卐 A 卐 T 卐 卐 L V 卐 卐 A A 卐 卐 - 卐 का N S A 卐 U 卐 टकाय- संवरतले एषणा- समितिः - ॐ T नवतत्व ब्दुदकलेजोवारवनस्पति त्रसेषु च यदन्नाधचित्तमा स्थापितं तन्निक्षिप्तम् ३ । सचित्तेन फलादिना स्थगितं तत् पिहितं ४ । दानभाजनस्थयोग्यं सचित्तेषु पृथिव्यादिषु नक्षिप्य तेन भाजन्न ददतः संहृतम् ५। वालवृद्धपण्डकवेपमानज्वरितान्ध- मत्तोन्मत्तच्छिन्नकरचरण निगडितपादुकारूढकण्डकपेषकभर्जककर्तकले ठकटींखक पजकदलकव्यालडकभेजकषद्कायविराधका दातृत्टेन प्रतिषिद्धाः, या च से वेलामासवर्त गृहं तवाला बालवत्सा वा साऽपि प्रतिपद्धा, एभ्य अन्नाद गृह तुं साधोन ॥ ८१॥ ) कल्पते ६ । देयद्रव्यं खण्डाद सचित्तेन धान्यकणादना मिश्रं ददत उन्मश्रम् ७। देयद्रव्यं मिश्रमचित्तटेनाऽपरिण- A मनादपरिणतम् ८ । वसादना संसृष्टेन हस्न पात्रेण वा ददतोऽन्नादि लिप्तम् ९ । घृतादि च्छईयन् यद्ददाति तच्छदितं, छ?माने घृताद तत्रस्थस्याऽऽगन्तुकस्य वा सर्वस्य जन्त मधुविन्दाहरणेन वैराधना सम्भवात् । १० । एपणायामुदाहरणम्-यथा मागपु जनपदेपु नन्दनामग्रामः, तत्रको धगूजातीय गैतमाख्यश्चक्रकरः, तस्य च 卐 धारण भार्या, कदाचिच तस्या गर्भ जातः, पाण्मासले च गर्ने धगजाये मृतः, गर्भकाले पूर्णे सा धगूजा या धार पुत्रं प्रसूतवटी, मातुलेन संवर्धनं कृतं कर्माकरणमपि शेक्षितम् । विवाह वचारणायां केनचत्कारणेन नवेण नन्दिवर्धना- Eassचार्यणां सकाशे नष्कान्तः, क्रमेण पष्ठाऽष्टक्षपको जातः इमं चाऽभिग्रहं गृहाति, प्रत्यहं मया वालग्लानादीनां वैयावृत्त्य कर्त्तव्यं, ईवश्रद्धः स प्रतिज्ञातं तत् करोत, शक्रेणाऽपि सुधर्मायां प्रशंसतः, तयशंसामश्रद्दधानः कश्चिद्देवपाशः परक्षार्थ भुवसूर्य द्वे श्रमणरूपे बैकुर्व्य तं पर क्षेरे, द्वयोर्मध्ये एक अतिसारव्या धग्रस्तोऽटव्यां स्थितः, द्विग्यस्तं ग्लान यावृत्त्यकरं 卐 श्रमणं प्रतिगत्त्वाऽऽह ' कश्चदेके ग्लानश्रमणः पतितः, यो यावृत्यं श्रद्दधात सक्षपत्तिष्ठतु । षष्ठोपवासपारणकार्थाऽऽनी- A 卐 N 卐 G 卐 A 卐 L T A | । ८१ । 3 A ध । a S N U A । M V A N 卐 ताऽऽहारं भरघरेन टेन श्रुतमा रभसेच्थाय भणतं लेन कार्य मेरे ? अभ्यागतःस कृत्रमश्रमणेर-पानकद्रव्यप्रयजनं विद्यते, पानकार्थ नरेऽस्मिन् स मायादेवश्रमणः सर्वत्राऽनेषण प्रकुरुरे । पश्चाल्लब्धं प्रासुकजलं, अडुकम्पया चरतं 卐 गतः सेऽतिसारग्रस्तेन परुषनिष्ठुरवाक्टेराक्रुष्टः, ' हे मन्दभाग्य : वृश्चैव त्वं यावृत्त्यकरऽहमेत स्वं ख्यापयस, अन्यथा y कथं भुक्तलोलुपस्त्वमेतावता विलम्बेन समायातः, स नन्दिष्णस्तां परुषगरं क्षिमिव मन्यमानः तस्य चरणगतः क्षमयति पत अचमललिप्तं तस्य वपुः प्रक्षाल्य शरीरस्वास्थ्याय वसतिमागन्तुमुक्ते सति रेनक्तम् ' नाऽहं शक्न म बजितुम् ' तदा 卐 A नन्दिष्णेन पृष्ठावारेहणार्थमुक्ते आरूढऽयं श्रमणशठस्तस्य देहस्य परष्टाद् वेष्ठां कुरुते परमामशुचिदुर्गन्धां वैकुरुरे ‘घिर- 卐 उण्डित' इत्यादिकां परुषां च गिरं संगेरते, सोऽपि क्षमा नधाने नैर्न गणयत परुषगरं नाऽपि दूषयति तं गन्धं केवलं की चन्दनमिव मन्यमानः पैनःपुन्टेन क्षामयन् कथ ऽस्य साधः समाधिस्स्यादित चिन्तापरे चभूव । एवं बहुवेधप्रकारैरपि 卐 पदा क्षोभायटुं न शक्त तदा प्रत्यक्ष भूय पुनः पुनर भष्टुवन्त स्वस्थानं जग्मतुः । गुरुभिरपि स नन्दिपेण धन्य इत स्तुतः यथा न नैवल्लङ्घतैषणा तथैव एषणायां यत् भर्यरतव्यम् ॥ 卐 अथाऽऽदान नेक्षेपसमितं भावयति;-रजहरणपात्रच्वरादीनां ठफलकादना ऽऽवश्यकाऽर्थ निरीक्ष्य प्रमृज्य चाऽऽदानं क्षेपणमेरे आदान निक्षेपणासमितिः रजोहरणासनवसनपात्रफलकप्रमुखः पूर्वोक्तश्चतुर्दशविधे द्वादशविधः 卐 ) पञ्चवेंशतवधे वा क्रमशः स्थविरकल्प-जिनकल्प-आरंकायोग्य वा नखलेऽप्युपधिश्चक्षुषा संक्ष्य रजहरणादना उपयोगपूर्वकं प्रतिलिख्य पभोक्तव्यः, यदि उपयोगाऽभाव दुष्ट पयगे वा भन्ट् तदा सम्यक् प्रलेखना न स्यात्, श्र 卐 T G A A T L A A C >卐zE S यदाहा 卐 संवरतत्वे ॐ निगुप्तः 卐 T भनवतत्त्व पडिलेहणं कुणतो महो कहं कुणइ जणवयकहं वा । देइ पञ्चक्खाणं वाएइ सयं पडिच्छइ वा ॥१॥ पुढचे सुमङ्गला- आउकाए तेऊवाऊ वणस्सइतसाणं । पडिलेहणा पमत्तो छण्हंपि विराहगो भणिओ ॥२॥ संक्षित-प्रतिलिखितभूमं यदाददीत र्ट कायां- स्थापयेद्वा तदादाननिक्षेपसमितिरित्यर्थः, *मोभमसेन इति न्यायादादानसमितिरपे । ॥८२॥ 卐 अधुनोत्सर्गसमितिः-स्थडिले स्थावरजङ्गमजन्टजातवजेते निरेक्ष्य प्रमृज्य च स्त्रपुरीपादीनामुत्सर्ग उत्सर्गसमितिः, रखनासिकासञ्चार कफा, मूत्रं, मलः, अन्यदपि परिष्ठापनायोग्यं वस्त्रपात्रभक्तपानादि तत्त्रसस्थावर जन्तुविवर्जिते 卐 जगत तले उपयोगपूर्वकं साधुर्यदुत्सृजेत् सोत्सर्गसमितिः । उक्तञ्चः कफमूत्रमलप्रायं निर्जन्तुजगत तले। यत्नाद्यदुत्सृजेत् साधुः सोत्सर्गसमितर्भवेत् " ॥१॥ अस्सामुदाहरणं धर्मरुचेरनगारस्य प्रसिद्धम् । एवं साधोर्यतमानस्याऽप्रमत्तयोगस्य समितस्य च सतो मिथ्यात्वाविरतप्रत्ययं कर्म नरुद्धं भवते ॥ अथ गुप्तित्रिकमध्ये मनोर तिमाह-इह मनोरतिनिधा-आर्तध्यानरद्रध्यानानुवन्धिकल्पनाजालवियोगः प्रथमा, शाखा- उसारिणी 卐 परलोकसाधिका धर्मध्यानानुवन्धिी माध्यस्थ्यपरिणतितिया, कुशलाऽकुशलमनोवृत्तनिरोधेन योगनिरोधा- वस्थाभाविन्यात्मारामता वृत्या । मनोगुप्त्याउदाहरणं-जिनदासश्रावकः श्रेष्ठिसुतः, स यानशालायां सर्वरात्रिकी प्रतिमा 卐 प्रतिपन्नः, अल्ट्रामिका तस्य भार्या कलकयुक्तं पर्यहं गृह वा तत्राऽऽयाता सती तस्यैव पादस्योपरि मञ्चकपादं स्थापयित्वा केनचिदुष्टजारेण सहाऽनाचारमाचरन्ती चिरकालं तत्र स्थिता, कलकटुक्तेन मञ्चकपादेन जिनदासस्य पाद विद्धः, विपुलश्न 卐 शेणतं निसृतं तथापि तां वेदनां सम्यगध्यासयते, न च व्यली कं दृष्ट्वापि निश्चलमनसस्तस्य ध्याने मने दुष्कृतं समुत्पन्नम् । 卐 N A G T 卐 V L A ॐ ।८२॥ 卐 प 卐 A 卐 V 卐cy A 卐 A 卐 T N एवं मनेगुप्तिः कर्त्तव्या। अथ वागुप्तिः-मुखनयनभूविकाराङ्गुल्याच्छोटनादिकान संज्ञानामर्थसूचिकानां चेष्टानां लेष्ठत्क्षेपहुंकारप्रभृतीनां निखिलानामपि प्रवृत्र नां परित्यागपूर्वकं यन्मनं सा वाग्गुप्तिः। संज्ञादिना हे प्रयजनं सूचयतो मनं नष्फलमेवेत्येका वाग्गुप्तिः । वाचनपृच्छनपृष्टव्याकरणादिषु लोकाऽऽगमविरोध्न मुखवस्त्रिकाच्छादितवक्त्रस्य भाषमाणस्याऽपि यद् वानियन्त्रण सा द्विर्त या वाग्गुप्तिः । आभ्यां भेदाभ्यां वाग्गुप्तेः सर्वथा वानरेधः सम्यग् भाषणं च प्रतिपादितं भवति, भाषासमत तु सम्यग् वाक्प्रवृत्तरेवेति वाग्र प्तिभाषासमित्योर्भेदः ॥ आह च;-" समिओ नयमा गुत्तो गुत्ते 卐 समियत्तणमि भयणिजो । कुसलवयमुइरंतो जं वइगुत्ते वे समिअ वि" ॥१ । वाग्गुप्त्यां दृष्टान्तः- केचन साधवः स्वजनान् प्रतिबोधयितुं गच्छन्तः पथि चरैर्हताः, साधून् दृष्ट्वा चराधिपतिना कञ्चदन्यं मा कथ इते विमोचिताः 卐 अरे चलन्ति, स्वजना अप विवाहादिकार्यार्थ ग्रामान्तरं व्रजन्तः सम्मुखं मलिताः, ततस्ते साधवः स्वजनैः सह प्रतिनिवृत्ताः, पुनः पथि चरैः स्वजना लुण्टिताः, पूर्वरुक्तान् साधून दृष्ट्वा परस्परं कथयन्ति, इमे त एव साधवो रे अस्माभिर्युक्ताः, म पां वचनं श्रुत्वा स्वजनाः साधून आहुः, यदि भवद्भः पश्यतेहरा दृष्टास्तदा कथं वयं न बोधिताः इत्युक्त्वा च्छुरिकां गृह त्वा स्वस्तन कर्त्तयतुमारब्धा रेषां साधूनां जनन 'कथं स्तन च्छन त्स' इत चराधिन पृष्टा उवाच-एष 卐 साधुर्मया दुर्जन्मजातो यतो दृष्टमप्यनिष्टमस्मान् न ब ति, तदा साधवः साधुधर्म प्ररूपयन्ति, ततः स्रैर सर्वः थे मुक्तः, एवं वाप्तिः कार्या ॥ 卐 卐 A 卐 T A V L 卐 A A ध 卐 - S भीनवतत्त्व 卐yz! 卐 संवरतले उमाला- टीकायां- V काय- 卐 1 गुतिः ॥८३॥ ॥ A 卐 T - अथ कायगुप्तिः-देवमठजतिर्यकृतोपसर्गपर पहप्रसङ्गेषु अथवोपसर्गपर पहाऽभावेऽप साधेः शरीरनरपेक्षतालक्षण- स्त्यागः येगनिरोधं कुर्चतः वलिनः सर्वथा शरीरचेष्टापरिहारो वा कायरगिद्यते । निशाप्रथमयामेऽतिक्रान्ते गुरूनापृच्छय प्रमाणयुक्तायां वसत संवक्ष्य प्रमृज्य च भूमं संस्तरणत्तरपट्टकद्वय वराऽऽत्मकं संस्तारकमार्य ऊर्ध्वमधश्च कार्य सपादं मुखवस्त्रकारजोहरणाभ्यां प्रमृज्य अनुज्ञापतसंस्तारकाऽवस्थानः पठितपञ्चनमस्कारसामायिकसूत्रः कृतवामवाहूपधान आकुञ्चितजाकः कुक्कुट व द्वयति प्रसारितजको वा प्रमार्जितक्षो तलन्यस्तचरणो वा भूयः संकोच- समरे प्रमार्जितसंदंशक उद्वर्त्तनाकाले च मुखवस्त्रकाप्रमृष्टकायो नात्यन्त निद्रोऽन्यत्रग्लानाऽध्वश्रान्तवृद्धादेः रात्रावेव न दवा आगमोक्तं नद्राकालं यावत् शर्यत । आसनं यत्र प्रदेशे चिर्कप्तं तं चक्षुषा निरीक्ष्य प्रमृज्य च रजोहरणेन बहेर्नपद्यामारीयोपविशेत् , उपविष्टोऽपि आकुञ्चनप्रसारणादि तथैव कुर्बत वर्षादिषु च प्ठफलकाद- पूक्तयैव सामाचार्योपविशेत् । दृण्डाद्युपकरणविपरे से नक्षेपाऽऽदाने ते अप प्रत्यरेक्ष्य प्रमृज्य च विधेरे । आवश्यकप्रयोजनवतः साधोः पुरस्तायुगमात्रप्रदेशसन्निवेशितदृष्टेरप्रमत्तस्य त्रसस्थावरभूतानि संरक्षतोऽत्वरया पदन्या- ससमाचरतो यत् प्रशस्तं गमनं, प्रत्यवेक्षितप्रमार्जितप्रदेश विषयमूर्ध्वस्थ लक्षणमवष्टम्भादिस्थानं, एतासु पूवर्णितासु शयनाऽऽसनादेचेष्टासु यः स्वच्छन्दचेष्टापर हारः सा अपरा कायगुप्तिः, उक्तञ्च "शयनाऽऽसननिक्षेपाऽऽदानचङ्गमणेषु च । स्थानेषु चेष्टानियमः कायगुप्तिस्तु सा परा"॥१॥ उदाहरणश्चास्याम्-अध्वप्रपन्नकः साधुः आवासिते सार्थे न लभरे कचिद स्थण्डिलं, कथमपि एकः पादो प्रतेष्ठत एतावन्मानं स्थण्डिलं लब्धं तत्र स्थितैकपादः सर्वां रात्र तत्र स्थितः, न A 卐द卐z.yog) T V L A ८३ ए 卐 A 卐 N -- 3 A 卐cy - - 卐 A A स्थापितं किञ्चिदस्थण्डिले, एवं भव्यात्मना गरेन भवितव्यम् ॥ एताः पञ्चसमितयः तस्रो गुप्तयश्च जैनेन्द्रप्रवचने प्रवचनमातृत्त्वेन प्रख्याप्यन्ते प्रवचनोपनिषद्वेदिभिः, यथा माता पुत्रं असते, सर्वोपद्रव निवारणेन पोषणेन च वृद्धिनयनपूर्वकं परिपालनं पुत्रस्य प्रकुरुते, पुत्रस्य मलक्लिन्नवपुः क्षालयति च तद्वदेताः प्रवचनमातरः साधूनां चारित्रगात्रं प्रसवते, जनितं चारित्रगानं उपद्रवनिवारणेन पपणेन च वृद्धं नयन्ति ज अतिचारमलिनं च गात्रं संशेधयन्ति च, तथाचाहुर्हेमचन्द्रसूरपादा:.-" एताश्चारित्रगात्रस्य जननात् परिपालनात् संशेधनाच्च साधूनां मातरोष्ट प्रर्कर्तिताः"। १॥२६ । 卐 अथ पर पहा:- खुहा प्वासा सीउलं, दंसऽच्लऽरइर से चरन्सिीहिरज ,उबेर वहज रण २७ A. अलभरोगतणफास, म्लसबरपरसह अण्णण सम्त्तं, ई बावसं परसह 卐 टीका; नर पर सह ' इति का पदार्थः ? उच्यते, परिसरात इति पर पहः “ कृत्यल्युटे बहुलर" इतिकरणाधि करणाभ्यामन्यत्राऽी कर्मण घ प्रत्ययः, र्थ परिसह्यत इति जिज्ञासायां तत्त्वार्थश्रद्धानादिलक्षणान्निवरेार्गान् शो मा प्रच्यष्म है इत ज्ञानावरणादिकर्मक्षपणार्थ सिद्धिप्रस्थानप्राप्तिकारणहेतवः परिपेढव्या द्रव्यक्षेत्रकालभावाऽक्षयेत्य- वगन्तव्यम् । उक्त अत्तराध्ययनद्वितीयाऽध्ययन-" अंमे आउसंरेणं भगवया एव मक्खायं, इह खलु बासं पर सहा ज 卐 N T G प A T V L A A ज...

जा S N U अनवतच- A सुमहला- टीकायां- v संवरतत्वे पर पहा॥ y M ॥८४॥ A A T समणेणं भगवया महाई रेणं कासवेणं पवेइया, जे भक्खू सुच्चा नचा निच्चा अभिभूय भक्खायरियाए परवयंतो पुट्ठो नो विहनिजा" इति, तथा चाऽर्हत्प्रवचनसनहे तत्त्वार्थाधिगमसूत्रे-" मार्गाऽच्यवननिर्जरार्थं परिपोढव्याः परीपहाः" इति । एते च द्वाविंशतिसंख्याकाः प्रत्येकं व्याख्यायन्ते-अत्र सर्वेपु पर पहेपु पूर्व क्षुधया निर्देशः, सर्वेषु क्षुधाया दुस्सहचात् । क्षुद्वेदनामुदितामशेपवेदनातिशायनीं जठरान्त्रविदाहिनीं सम्यग्विषहमाणस्याऽऽगमविहितेनाऽन्धसा क्षुधां शमयतोऽनेपण यञ्च परिहरतः क्षुत्परीपहजयो भवति, अनेपण यग्रहणे तु वैजतस्स्यात्क्षुत्पर पहेणेते प्रथमः १। एवं 'पपासापर पहोऽपि द्रष्टव्यः २ ।'-उण्हं त र्शतपर पह उष्णपर पहश्च, तत्र तिपर पहो यथा महत्यपि ईते पतिते उपवसनः परित्राणवर्जेतो नाऽकल्प्यानि वासांस परगृहयात् परिभुक्षेत वा, नाऽपि ईताऽऽत्र्तेऽग्निं ज्वालयेत्, अन्यज्वालित वा नाऽऽसेवयेत् , एवमनुतिष्ठता र्शतपर पहजयः कृतो भवति ३। उष्णपरतप्तोऽपि न जलावगाहनस्नानव्यज- नवातादि वाञ्छयेत् , नैवाऽऽतपत्रााष्णत्राणायाऽऽदर्दत, उष्णमापतितं सम्यक् सहेत, एवमडतष्ठतेष्णपर पहजयः कृतो भवति । 'दंसा चेलारइथिओ' इत्येकपदं कृतद्वन्दं बहुवचनान्तम् , तत्र 'दंसा' इति दंशमशकपरे पहः, दंशमशकादिना दश्यमानस्याऽपि तत्स्थानापगमनेच्छा तदपनयनाय धूमादियत्नस्तन्निवारणाय व्यजनादिधारणं वा यस्य नास्ति तस्य तत्पर पहजयो बोद्धव्यः ५ । 'अचेला' इत्यचेलपर पहः नाग्न्यमप्युच्यते तत्त्वार्थद, स च न निरुपकरणतैव दगम्बरभ तिका देवत्, किन्त्वाऽऽगमाभिहितप्रमाणकल्पादिधारणेऽप निष्परग्रहत्त्वान्निष्परग्रहत्त्वं तच्च मूर्छाऽभावात् तदुक्तं;-'जंपि-वत्थं व पायं वा, कंबलं पायपुच्छणं । तंप संजमलजट्ठा धारते परहरंत य॥१॥ न सो परग्गहो 卐 N 卐 G A -- , A 卐 V जत L 卐 A 卐 ॥८४ A an N 卐 A 卐 V ॥ A A कुत्तो, नायपुत्तेण ताइणा । सुच्छा परेग्गहे उत्तो, ईइ वुत्तं महेसिणा' ॥२॥ इति, चेलं च वस्त्रं, तेन ईर्णजीर्णेनाऽपि सता अकल्पनीयवस्त्रमनभिलपतोऽचेलपर पहः, न च भिक्षुरमहा_णि ण्डतानि जीर्णानि च वासांसि धारयन् दैन्यं गच्छेत् , तथा चाऽऽगमः,-'परिजुण्णेहिं वरथेहैं, होक्खामित्ति अचेलए । अदुवा सचेलए होक्खं इति भिकरू न चतए' ॥१॥ ६ । ' अरइ' इति अरतिपर पहः-अयं च यस्य विहरतस्तिष्ठतो वा संयमेरतिरपी तिरुत्पद्यते तस्य तां सम्यगधिपह- माणस्य ' इह खलु भो पवइएणं उप्पन्नदृक्खेणं संजमे अरइसमावन्नचित्तेणं ओहाणुप्पेहणा अणोहाइएणं एव हयरस्सिगयंकुसपोयपडागाभूयाई इमाइं अट्ठारसठाणाई सम्मं संपडिले हयवाई भवंति' इत्यागमोक्तर त्याऽष्टादशस्थानानु- चिन्तनापरस्य मन्तव्यः, उत्पन्नाऽरतिनाऽपि संसारस्वभावमालोच्य सम्यग् धारामतेनैव भवितव्यमात्म हताशंसना ७ । 'इत्थओ' इति कै पर पहः-स्त्रीणामङ्गप्रत्यङ्गसंस्थानहसितललितनयनविभ्रमादिचेष्टां न चन्तयेत् , न जातुचिच्चक्षुरपि मोक्षमार्गार्गलासु तासु कामबुद्ध्या निवेशयेदिति रूपर पहजयः कृते भवति ८ । ' चरिया' इति चरणं चर्या, तत्पर पहो वजेतालयस्य ग्रामनगरादिष्वनियतवसतेर्निर्ममत्त्वस्य मासकल्पादिचरणमाचरतो भवति ९ । 'निसीहिया' निपदन्त्यस्या- मिति नषद्या स्थानं 6 पशुपण्डकविवर्जेतं, तत्पर षहस्तत्र तिष्ठत इष्टानिष्टोपसर्गसम्भवेऽपि अविचलितचित्तस्य ज्ञेयः १०॥ से ' इति, शेरतेऽस्यामित शय्या संस्तारको वसतिर्वा, तत्र संस्तारके मृदुकठिनादिभेदेनोच्चावचे बसत च पांशूत्करप्रचुराऽप्रचुरशिशिरघम्म पतापजनिकायामनुद्विग्नमानसस्य सतः शय्यापर पहः ११ 'अक सवहजायणा' इति आक्रशश्च वधश्च याचना चेति द्वन्द्वे आक्रोशवधयाचना इति बहुवचनान्तं पदं पर पहत्रयसूचकम् , तत्राऽऽक्रोशोऽनिष्टवचनम् , 卐 T 卐 A N G 卐 T - 卐 L V 卐 卐 १५ Mai N का S 卐 अनवतत्त्व A 卐 U सुमङ्गला- टकायां- संवरतत्वे पर पहाः। 卐 V M ॥८५॥ A T 卐 A 卐 T 卐 V 卐 A 卐 तद्यदि सत्यं कः कोपः, शक्षयति है मामयमुपकारी, न पुनरेवं करिष्यामि, असत्यं चेत् सुतरां कोपेनकर्त्तव्य इत्येवमनुचिन्तयत आक्रोशपर पहः १२ । वधस्ताडनं पाणितलादिभिः, तदधिपहनं कुर्वतोऽन्यदिदमात्मनः शरीरमवश्यतया विध्वंसते एव, आत्मा तु न शक्य एव वध्वंसयतुम् , अतः स्वकृतकर्मफलमिदमित बुद्ध्या वधपर पहः १३ । याचनं मार्गणं, भिधोहे वस्त्रपात्रान्नपानप्रतिश्रयादि परतो लब्धव्यं निखिलम्व, शार्ल नतया च न याञ्चां प्रत्याद्रियते, साधुना तु प्रागल्भ्यभाजा सञ्जाते कार्य स्वधर्मकायपरिपालनाय याचनमवश्यं कार्यमिति, एवमडतिष्ठता याश्चापर पहजयः कृतो भवति १४ । 'अलाभरोगतणफासा' इत, इदमपि प्राग्वत् कृतद्वन्द्वं बहुवचनान्तं परेपहत्रयावेदकम्, तत्राऽलाभोऽप्राप्तिः, याचतेऽपि, वस्तूनि परेणादत्ते ' वहुं परघरे अस्थि विविहं खाइमं साइमं । न तत्थ पंडिओ कुप्रे इच्छादिज परो न वा' ॥१॥ इति सिद्धान्तवचनानुस्मृत्या विषादमगच्छतोऽलाभपर पहः १५। रोगो ज्वरातिसारकासश्वासादिस्तस्य प्रादुर्भावे सत्यपि न गच्छनिर्गतश्चकित्सायां प्रवर्तते, गच्छवासनस्त्वल्पबहुत्त्वालोचनया सम्यक् सहन्ते प्रवचनोक्तविधिना च प्रक्रियामाच- रन्तीति, एवमनुतिष्ठता रोगपर पहजयः कृतो भवते १६ । अशुपेरतृणस्य दर्भादेः परभोगोऽनुज्ञातो गच्छनिर्गतानां गच्छनिवासिनाच, तत्र येषां नष्पन्नानां शयनमडज्ञातं ते तान् दर्भान् भूमावास्य संस्तारकोत्तरपट्टक चदर्भाणामुपरे विधाय शेरते, चरापहृतोपकरणो वा प्रतनुसंस्तारकोत्तरपट्टकावत्यन्तजपचात् , तथापि तं परुपकुशदर्भादितणस्पर्श सम्यक सहेत १७ । ' मलसक्कारपीसह ' इत, मलश्च सत्कारश्च मलसत्कार तै च तै परिपह्यमाणत्वात् परसह च मलसत्कारपरोपह वहुवयणेण इत लक्षणेन बहुवचनान्तता, तत्र मलपर पहो नाम यस्य स्वेदवारसम्पर्काद्रजापुञ्जः 卐 A 卐 N 卐 G 卐 A 卐 L दुवयणं ॥ ८५।' A N 卐. A U 卐 V 卐 A A 卐 T शरीरे सञ्चित्य कठभूतो ग्रोष्मोष्मसंपातजनतधर्मजलार्द्रतेच्छलहुर्गन्धोऽप नवेगाऽऽपादन्न स्नानाभलापमुत्पादयते तस्य ज्ञेयः १८ । भक्तलोकोपपादितवस्त्रपात्रानपानादिसत्कारस्यापि न मानोद्वहनं, नाऽपि विपक्षे विषादकरणं यस्य तस्य सत्कारपर पहः १९ । 'पण्णा' इति प्रज्ञायतेऽनयेति प्रज्ञा बुद्ध्यतिशयः, तत्प्राप्तऽपि ये न गर्वसुद्वहरे, नापि प्रज्ञाविरहितो न कञ्चजानेऽहं महामूर्खः सर्वपराभूतः' इति परतापमुपयाते तस्य प्रज्ञापर पहः २० ।' अण्णाणसम्मत्तं' इति, अज्ञान सम्यक्त्वञ्चाऽज्ञानसम्यक्त्वं समाहारत्त्वादेकवचनम् , तत्राज्ञानं ज्ञानविपक्षः, ज्ञान चतुर्दशपूर्वण्टेकादशाङ्गाने चेपाङ्गादि- समन्विताने, तत्पारगतः समस्तश्रुतेदधपारदृष्टाऽहमित यो गर्व नेद्वहरे, नाप्यागमपरिज्ञान विकले 'धिङ् मां नरक्षरकु क्षम्' इत विणेदति, केवलं ज्ञानावरणक्षयोपशमदयविजृम्भितमेतदत स्वकृतकर्मफलोपभोगात्तपोऽनुष्ठानाछेदमपगच्छत? यः परिभावयति तस्याऽज्ञानपर पहः २१ । सम्यक्त्वपर पहः-देवतादसान्निध्याऽभापि दर्शनाऽन्तरेयर्बुदर्शनाद वा दृष्टिसम्मोहमडगच्छतो वेडेय इति । अत्र केचिदमं सम्यक्त्वपर पहं 'असम्यक्त्वपर पहं' चाहुः, रे च एवं व्यावयन्ति- सर्वपापस्थानेभ्यो वरतः प्रकृष्टतपेऽनुष्ठार्य नस्सङ्गश्चाहं तथापि धर्माधर्मात्मदेवनारकादिभावाने दे, अतो मृषासमस्त- मेत देत्यसम्यक्त्वपर पहः, तत्रैवमालोचरेत्-धाऽधम्म पुण्यपापलक्षण यदि कर्मरूपं पुद्गलाऽऽत्मक ततस्तयः कार्यदर्शनामानसमधिगम्यत्वम् , अथ क्षमाक्रधादक धर्माऽधम् ततस्स्वानुभवत्वादात्मपरिणामरूपत्वात् प्रत्यक्षविरेधः, देवास्त्वत्यन्तसुखाऽऽसक्तत्त्वान्मनुजलेले कार्याऽभावाहुःपमानुभावाच न दर्शनगोचरमायान्ति, नारकास्तु टीबदनाऽऽर्ताः पूर्वकृतकम्मदय निगडबन्धनवर कृतत्वादस्वतन्त्राः कथमायान्तीत्येवमालचयतेऽसम्यक्त्वपरेषहजये भवते २२ । 卐 A 卐 N ध G 卐 A 卐 T 卐 V y L 卐 A A 卐 N नवतत्त्व- 卐 A 卐 सुमङ्गला- टीकायां- संवरतत्ते पर पहाः 卐 V 卐 M ॥८६॥ A 卐 A T नर पर पहसहने त्वात्मनि दुःखं सजायते, कथं ज्ञानपूर्वकमात्मा दुःखदध पातनीयः, यथा पराऽऽत्मा दयन् यस्तथा स्वाऽऽत्माऽप, क्षुधालुरशनाऽलामे आर्तध्यानोपगतः कर्मवन्धं वेदध्यात् कर्मवन्धश्च संसारवृद्धिकारणं, एवं सर्वत्राऽपि द्रष्टव्यम्, ततः किमर्थं पर पहसहनं संवरत्त्वेन जायते ? सत्यम् , उच्यते-दुःखपूर्णेऽस्मिन् भवोदध न कुत्रचिदपि सातं विद्यते, कञ्चद पे सुखं स्यात् तत् संवरप्रधाने धर्मे एव, यद्यप्यनादिवासना संस्कारसङ्गतोऽयं जीवो मेरुगिरिसन्निभं संयम- भारं वोढुं न शक्न त, तथा ज्ञाततत्त्व एवं ध्यायति यत् संयमपरिपालनसंगतमल्पं दुःक्खं महते फलाय यावदपवर्गलाभा- यापि भवति, परखशेनानेन वात्मना नरकतिर्यग्गतिषु असह्याऽवर्णन्याऽश्राव्यदुक्खानि सोढानि, तत्पाचे कियदिदं दुःक्वं, अन्यच्च स्वाध नत्वेन दुःरकसहनं दुःरकमेव नास्त, यथाऽऽपणिकायां व्यापारकुशला वणिजो व्यापार नियुक्ताः सन्तोऽर्थलाभाना बुभुक्षादिकं मनागपि न गणयन्त, तथा मोक्षकामा भव्याऽऽत्मानः सम्यग्दर्शनादिरत्नत्रयीमाराधयन्तः संयमसेवानुगतं लोचाधष्ठानप्रभृतिकं पर पहदुःखं कर्मनेञ्जराकारणत्वेन मत्वा मनसि न धारयन्ति, इष्टनगरं प्राप्तुकामः कश्चित्पान्थोऽध्वपरिश्रान्तः पथे एवं चन्तयेदहो अहमध्वश्रान्तो न शक्नोमि पदमप्यने गन्तुमिति तत्रैवाधितिष्ठेत् ततः स्वेप्सतस्थानाऽवश्विञ्चतो भवेत् , तद्वन् मुक्तिपुरी प्राप्तुकामोऽयं सम्यग्दृष्टिः संवरनिमित्तं पर पहादिदुःरकाऽऽक्रान्तमना नाग्रेतनगुणस्थानश्रेणिमधिरोढुं यतरे तदा कथं लोकाग्रवत्तेसिद्धिसंधं संप्राप्नुयात् , तस्मात् कर्मक्षयकारणत्त्वेन मन्यमानो भव्याऽऽत्मा आगमानुसारेण पर पहादिसहने सम्यग् यतते, एवञ्चाऽऽराधको भूत्वा स्वर्गाऽपवर्गसुखभाग् भवति, यस्तु नैवं स संसारमहोदधै नमजते । मदुत्तराध्ययनादिष्पत्रविपये प्रतिपर पहं वालावबोधाय दृष्टान्तानि भावितानि, विस्तरभयात् N A G 卐 T 卐 V 卐 A 卐 A 卐 IL ॥८६॥ 卐 A प N 卐 U ध A M 卐 V A 卐 A सर्वाणे न प्रदर्श्यन्तै, तथाप प्रसङ्गाशून्यार्थम्कं भावयामस्तच्चैवम् ।-" तगरा नगर्यामहमित्राचार्यपाछे मतापितृभ्यां सहाहन्नकपुत्रः प्रबजितः, पित्रा सर्ववैयावृत्यकरणेनेतस्ततः परभ्रम्य भव्य भक्षाभोजनसंपादनेन स बालेऽत्यन्तं सुरू कृतः, ज उपविष्ट एव भुंक्ते, कदापि भक्षायै न भ्रमति, तद्भिक्षार्थ स्वभिक्षार्थ पितुरेव भ्रमणात् , अन्यदा पतर मृते साधुभिः प्रेरितः स बालो रेष्ममारे भिक्षार्थं गतः, तापाऽभिभूतः प्रोत्तुङ्गगृहच्छायायामुपविशति, पुनस्तत उत्तिष्ठति शनैश्शनैर्याति, एवं 卐 कुर्वन्तमतिसुकुमारं तमर्हन्नकं कुमारं रूपेण कन्दर्पावतारं दृष्ट्वा काचेत् प्रोषितवणग्भार्या तमाकार्य गृहे स्थापितवती, तया सह वेषयाऽऽसक्तोऽभूत् , अथ तन्माता सा पुत्रमेहेन अथिलभूय अरे : अर्हन्नक : २ इत नर्घोषयन्ती चतुष्पथा दषु भ्रमत, एकदा गवाक्षस्थेनार्हन्नलेन सञ्जातर्दनाऽवस्था माता दृष्टा, सञ्जाताऽन्तःसंवेगो गवाक्षादुत्त्र्य पादयोः पतिचा N मातरमेवाऽऽह-हे मातः : सोऽहमर्हन्नक इति तद्वचश्रवणात्स्वस्थचित्ता माता तमेवमाह-वत्स : भव्यकुलजातस्य तव ' केयमवस्था ? स प्राह-मातश्चारित्रं पालयतुं न शक्नोमि, सा पाह-तर्ह अनशनं कुरु, मातृवचसा तप्तशिलायां सुप्त्वा पादपो- G गमनं चकार, सम्यगुष्णपर पहं विषय समाधिभाग देवत्वं प्राप्तवान् " । एवमर्हन्नन यदा परीपहः सोढस्तदा सुखभाग् ) जातः, तत एते द्वाविंशति रति न न्यूनाधिका धर्मविघ्नहेतवः संवरफलमभिसमीक्ष्याऽऽसमंतात् परिषोढव्या इति । 卐 न पां कर्मणामुदयेन प्रादुर्भवन्त त्याह-ज्ञानावरणीयवेद यदर्शनचारित्रमोहन यान्तरायकर्मणामुदयादेते प्रादुर्भ- वन्त, तत्र प्रज्ञाज्ञानपर पह ज्ञानावरणीयोदरेन भवतः, प्रज्ञाज्ञाने ज्ञानावरणक्षय पशमजन्ये, ज्ञानावरणक्षयोपशमश्च ज्ञाना- 卐 T 卐 A 卐 T A 卐 V L 卐 A A L 卐 M ध S N संवरतले पर पहाः। M - A A T N श्र वरणोदये सत्येव लभ्यते । दर्शनमोहन योदयप्रभवः सम्यक्त्वपर पहः, अन्तरायोदयजन्योऽलाभपरीपहः । अचेलारतिस्त्रीनि- नवतत्त्व- A पद्याऽऽक्रोशयाचनासत्कारादयः सप्तपर पहाश्चारित्रमोहोदयप्रभवाः । नाग्न्याऽपरपर्यायाऽचेलपरीपहो जुगुप्सोदयात् , अरत्यु- सुमङ्गला- दयादरतः, वेदोदयात् रु पर पहः, भयोदयान्निषद्यापरीपहः, क्रोधोदयादाक्रोशः, मानोदयाद्याञ्चापरे पहः, लोभोदयात्स- टकायां- v त्कारपरोपहः, शेपाः क्षुत्पपासाश्तोष्णदंशचर्याशय्यावधरोगतृणस्पर्शमलसंज्ञा एकादश परीपहा वेद यजन्या इत । 卐 ॥८७॥ अथ क स्मन् गुणस्थानले के कते च परोपहाः संभवन्तीत्येतदाहः क्षुधा-पिपासा-ई तोष्ण-दंश-चर्या-शय्या- मल-वध-रंग-तृण-स्पर्शाऽऽख्या एकादशपरे पहाः प्रथमगुणस्थानकादारभ्य त्रयोदशं गुणस्थानं यावत् , प्रज्ञाऽज्ञानाऽलाभ- 卐 पर पहाः प्रथमाद् द्वादशगुणस्थानकं यावत् , आक्रोश-अरत-ह-नैपेधिर्क-अचेल-याचना-सत्कारपरे पहाः प्रथमादानवमं , गुणस्थानकं (यावत्), सम्यक्त्वपर पहस्तु सप्तमं गुणस्थानं यावत् , । अत्र सर्वत्र प्रथमं गुणस्थानकमाद कृतं तथा द चिन्त्यं, पर पहसहनं तु वरतानामेव सद्धान्ते प्रर्क तं, यतोऽग्रे यदा वक्ष्यामः कति संवरभेदाः कस्यां गत ? तदा नारकदेवतिर्यक्षु ॥ सर्वत्र पर पहरेदाः प्रतिपद्धाः, तस्माद्यदनोल्लिखितं तत् सकामाऽकामाऽपेक्षया ज्ञेयं, सकामाऽपेक्षया तु चिरतानामेव तत्सहनं विज्ञेयमिति । अथ समकालमेकं जवमाश्रित्य कत पर पहा इति चिन्तायां तोष्णयोश्चर्या निपद्ययोश्च युगपदभावात् यथासंभवं तत्र तत्र गुणस्थाने वंशत्याद्या ज्ञेया । इति परे पहाः संक्षेपतो वार्णताः, वस्तरादिना तु यथायोगं अंतत्त्वार्थभाष्यादयः A 卐 प्रोढतमा ग्रन्था वलोकन्या इति॥ १ 'एकादयो भाज्या युगपदेकोनविंशतिः' इति श्रीतत्त्वार्थवचनात् समकालमेकोनविंशतिरपि विज्ञेया इति । 卐 प A G T V L ॥८७ A ॐ ue 卐 Ou S N । परीषहयन्त्रकम् । 卐 U 卐 गुणस्थान. कस्य कर्मण उदयेन, वेदनीय १ । । १ . १. 卐 A 卐 V 卐 A ज T 卐 A कस्य कर्मण उदयेन, चा० मोहनीय वेदनीय चा० मोहनीय. लाभान्तराय. वेदनीय. गुणस्थान. ...९ . .१३ .९ १.... .१२ १३ oM १... "..." १... ध A 卐 N "...." १ परीषहनामानि, १. क्षुधा प० २. पिपासा प० ३. शीत प० ४. उष्ण प० ५ दंश प० ६. अचेल प० ७. अरति प० ८. स्त्री प० ९. चा प० १०. निषद्या प० ११. शय्या प० ... परीपहनामानि, १२. आक्रोश प० १३. वध प० १४. याचना प० १५. अलाभ प० १६. रोग प० १७. तृणस्पर्श प० १८. मल प० १९. सत्कार प० २०. प्रज्ञा प० २१. अज्ञान प० २२. सम्यक्त्व प० चा० मोहनीय ..९ १.. ......" .९ •.".. ) G १ वेदनीय. १३ १. चा० मोहनीय. ..९ शानावरणस्यक्षयोपशमः १.. १२ शानावरणस्योदयः १...... ..१२ दर्शनमोहनीय १.........७ 卐 T चा० मोहनीय. 卐 A वेदनीय. १.... १३ 卐 L अथ क्रमप्राप्तान् यतिधानाह:- श्र V 卐 A 卐 ॐ A [UG N 卐 S 卐 A 卐 V 卐 U 卐 संवरतत्त्वे परिषहाः॥ A T शनवतत्व खंट मद्दव उज्जव, मु तव संजमे अबद्धः । स सेअं अकिंचणंच, बंभं च जइ धम्मो॥२९॥ टीका;- खंत ' इति, तत्र शान्तिः क्षमा क्रोधजयः, स चोपशमेन स्यात्. १, मृदो वो मार्दवमहंकारपरिहारः २, टकायां ऋजोर्भाव आर्जवं मायापरित्यागः ३, लोभपरिहारो नलेभता मुक्त्यपरपर्याया ४, तपो वाह्याऽभ्यंतरभेदैादशधा ५, संयमः henga सप्तदशभेदभन्नः प्राणातपातादिविरमणरूपः ६, सयो वेभ्यो हेतं सत्यम् सर्व वेषु सुखकारिवचनं ७, शैचमदत्ता- दानपरिहारः ८, अकिञ्चनत्त्वं, न वद्यरे कंचन यस्य सोऽकञ्चनः, अकिञ्चनस्य भावोऽकिञ्चनत्त्वं सर्वपरिग्रहत्यागः ९, ब्रह्म अंदारक क्रियसम्बन्धमैथुनपरिहारः १०, इते दशविधो यतिधर्मः, यतिना मुनिना संवरार्थं धार्यत इति यतेधर्म, 卐 इत गाथासंक्षेपार्थः॥ व्यासार्थस्त्वयम्-गाथायां 'जइधम्मो' इति यतिपदेन अगारिधर्मव्यवच्छेदः, क्षमाप्रधानाः सकल- मदस्थान निग्रहकारिणः शाठ्यरहिताः संतोषाऽमृततृप्ताः सत्यवादिनः संयमिनस्तपस्विन यथावत्सूत्रार्थप्रदातारः कनकादिकिञ्चन- 卐 रहता नवविध स्परई लतं बभ्राणा यतय एव संभवन्ति न चगारणः, देशतोऽगारिणामपि क्षमादय दृश्यन्ते, परं यथा धूनां न तथाऽगारणामिति इयम् । एप च क्षमा दसमुदायः संवरं धारयत ते, संवरार्थश्च यतिना धार्यत इति धम्म वा, एतावन्त यतैर्धाङ्गानि तन्निष्पादितश्च यतिधर्म इते । तत्र क्षमा ततिक्षा सहष्णुत्त्वं क्रधनग्रहः इत्यनान्तरम् , कथञ्च 卐 क्षमितव्य मेते चेदुच्यते:-परैः प्रयुक्तस्य क्रोधनिमित्तस्याऽऽत्मनि भावचिन्तनादभावचन्तनाद्वा क्षमितव्यम्, भावचिन्तना तावद् यिन्ते मयटेरे दोषाः, किमत्राऽस मिथ्यावर क्षमितव्यम् , अभावचिन्तनादपि क्षमितव्यं, नैते विद्यन्ते मयि दोषा 卐 यानज्ञानादस ब्रत क्षमतव्यम् । के क्रधदोपचिन्तनाच्च क्षमितव्यम् , क्रुद्धस्य हि वद्वेपाऽऽसादनस्मृतिभ्रंशत्रतलोपा- 卐 A 卐 N y G 卐 A V 卐 L A ॥ ८८॥ ध 卐 A ut N S प 卐 V A दयो दे भवन्त, तथाह-क्रुद्धः कषायपरिणते विद्वे सन् कर्म बटे, परं वाऽभत्रं व्यापादयते अतः प्राणाति- पातनिवृत्तिव्रतलोपस्स्यात्, गुरूनधिक्षिपेदतो निर्वाणसाधनानां ज्ञानार्दनां परहागिरवश्यंभावि, के पाकुलो वा भ्रष्टस्मृतिक मृषाऽपि भागेत, विस्मृतप्रव्रज्याप्रतिपत्तिः परेणादत्तमप्याददीत, द्वेषात् परपाखण्डिन पु ब्रह्मव्रतभङ्गमष्यादेत, तथा प्रद्विष्टः सहायबुद्ध्या गृहस्थेष्वावरतेषु मूर्छामप कुर्याद् , क्रोणोत्तररणपरिक्षयोऽपि स्यात् , इत्येतान् दोषान् परिभाव्य क्षमितव्यमित। नि स्वकृतकर्मफलाभ्यागमऽयं मम, नमित्तमात्रं पर इति क्षमतव्यम् , जन्मान्तरे पात्तस्य कर्मण यदा विपाकस्तदाऽऽ- क्रशते ताडयति परः, स तु नमित्तमात्रं कम्मदयस्य, यस्माद्रव्यक्षेत्रकालभवभावाऽपेक्षः कर्मणासुदयो भगवद्भराख्यातः, स्वकृत कर्म भोक्तव्यमवश्यंतया काचितं तपसा वा क्षपण्यमित क्षमतव्यम्। क्षमाया गुणाननायासादीन् ध्यात्त्वा क्षमितव्यम्, तचैवम् :-प्रद्विष्टस्तु प्रहरणसहायाऽन्वेषणसंरम्भादेशाऽऽरुणले चनस्दद्रवप्रवाहप्रहारवेदनाऽऽत्मकाऽऽयासजन्य कर्म प्रकृष्टतया बघ्नादि, संसारगहनाटव्यां संबंभ्रमति, क्षमाप्रधानस्य पूर्वोक्तलक्षणस्याऽऽयासस्य विरहात स्वस्थेन भूयते, आयासनमित्तककर्मराहत्यं संक्लिष्टचित्ताऽभावः भध्यानाऽऽध्यवसायित्व स्तिमितप्रसन्नान्तरात्मत्त्वादय गुणाःप्रादुर्भवन्ति, ततः क्षमितव्यमिति निष्कर्षः । इयं क्षमा पञ्चविधा-सापराधिनम 'अयं मम उपकार, इति क्षमते सा उपकारक्षमा १, भाविनमपायं वचिन्त्य शक्त्यभावाच्च या क्षमा सा अपकारक्षमा २, दुः लकः कर्मनिबन्धन कोप इति चिन्तापरा क्षमा चपाकक्षमा ३, स्वगर्हावचनश्रवणेनाऽपि न खिद्यते न च कस्मैचिदपि द्रुह्यत ति वचनक्षमा ४, पर नकारसामर्थ्यसद्भा- देऽपि 'क्षमा एव आत्मधर्म' इति बुद्धिपरा या सा धर्मक्षमा ५, सैव यद्यपि गरेयर तथा कचित् कदाचित् थश्चित ॐ A 卐 N T 3 A G 卐 T A V है L 卐 A A ध प L- --- an S 卐 N 卐 A 卐 V अनवतत्त्व- समगला- काय- 9 संवरतत्टे दशन्धि यते- धर्म: । ८९॥ A N 卐 A 卐 T 卐 A 卐 T पूर्व काश्चतस्रोऽष्टुपादेया इति १॥ अथ मार्दवं, तत्र मृदो वो मावं, अभ्युत्थानाऽऽसनदानाजलिप्रग्रहयथार्ह विनयकरणलक्षणन्चैर्वर्त्तनम् , गर्वरूपचित्त- परिणामस्य चपर्ययोऽत्सेकश्च, तन्माईवस्य लक्षणम् , उ ञ्च तत्त्वार्थभाष्ये व॒त्यनुत्स्क मार्दवलक्षणम् , मृदुभावो । मृदुकर्म मदनग्रहो मान विधातश्चेति पर्यायाः। तत्र मानस्येमान्यष्टै स्थानानि भवन्ति, तद्यथा-जातिः कुलं रूपं ऐश्वर्य विज्ञानं श्रुतं लाभो हीर्यश्चेति, 'एभर्जात्यादिभिरष्टाभिर्मदस्थामत्तः पराऽऽत्मनिन्दाप्रशंसाऽभिरतस्वाऽहंकारोपहतमतिरिहाऽमुत्र चाऽशुभफलं कम्मपचिनोति' इत्युपदिश्यमानोऽपि मत्तःश्रेयोन प्रतिपद्यते, तस्मादेषां मदस्थानानां निग्रहो माईवं धर्म इति २। संप्रत्यार्जवमभिधीयते-कायवाङ्मनसां शाख्यचिरहतत्त्वं मायाप्रतिपक्षभूतं अजुभावः ऋजुकर्म आर्जवं भावदोपव- 卐 र्जनमत्येकार्थकाः, माया तु कपटपटुप्रच्छादितकायत्त्वात् सर्वाभिशंक यः, 'भावदोपयुक्तो है छमनिकृतिसंयुत 卐 इहामुत्र च दुःरकफलकमकुशलं कर्म बनाते' इत्युपदिश्यमानोऽपि माया' मुक्त्यसाधारणकारणसम्यग्दर्शनादिश्रेयो न श्रद्धत्ते, तस्मादार्जवं धर्म इत ३॥ 卐 तथा मोचनं वाद्याऽभ्यन्तरग्रन्थत्यजनं मुक्तिः, मुक्तिले भपरित्यागः परिग्रहपहिलताऽभावादयः पर्यायाः, वाह्याऽभ्यन्तरो- पधिशर रानपानाद्याश्रयो परिष्वङ्गजन्यभावदोपपरित्यागो मुक्तिः, तथाविधमुक्ति विकलः परिग्रहपहिलस्तु इहाऽमुत्र च दुःरकफलकमकुशलं कर्म सश्चिन्वन् सम्यगुपदिश्यमानोऽप न श्रेयरे यतते, एवञ्च न धर्मः, तस्मान्मुक्तियतिधर्मः, एवं स्वधिया सर्वत्रोह्यम् ४ ॥ 卐 G V L ॥ ८९ श्र A 卐 En N 卐 卐 A V 卐 A तथा तपोधर्मो बाह्याऽभ्यन्तरभेदाद् द्विविधः, मेद तु पुरस्ताद् वयेरे नेर्जराप्रसङ्गे तत्र तप रे तपः 'कर्तर्यसुन्,' शररेन्द्रियतापनात् कर्मनिर्दहनाच्च तपोऽनशनाद, प्रकीर्णक तपोऽनेकविधम् , तद्यथा-यववज्रमध्ये चन्द्रप्रतमे वे, कनकरत्नमुक्तावल्यस्तित्रः, संहविक्री डटे द्वे, सप्तसप्तमिकाद्याः प्रतिमाश्चतस्त्रः, भद्रोत्तरमाचाम्लं वर्धमानं सर्वतभद्रम- त्यादि, तथा द्वादशभिक्षुप्रतिमा मासिकाद्या आसप्तमा सक्याः सप्त, सप्तरात्रिकयास्तस्रः, अहोरात्रिर्क रात्रिक चेत्यादि ५ । तथा मनोवाकायानां प्रवचनप्रतिविधिना संयमनं संयमः, एवं चन्तयितव्यमेवं वक्तव्यमेवश्च गन्तव्यमेवं स्थातव्यमिति नियमनं, स च सप्तदश वधः, यदाह वाचकरख्यः,-' पञ्चाऽऽश्रवाद्विरमणं, पञ्चेन्द्रियनिग्रहः कपायजयः दण्डत्रयविरतिश्चेति संयमः सप्तदशभेदः ॥१ । अथवाऽन्यथा सप्तदशविधत्त्वम्-पृथं कायसंयमः, अप्कायसंयमः, तेजःकायसंयमः, वायुकाय- संयमः, वनस्पतिकायसंयमः, द्वीन्द्रियसंयमः, बीन्द्रयसंयमः, चतुरिन्द्रियसंयमः, पञ्चेन्द्रियसंयमः, प्रेक्ष्यसंयमः, उपेक्ष् संयमः, प्रमार्जनसंयमः, अप्रमार्जनासंयमः, मनःसंयमः, वासंयमः, कार्यसंयमः, अजवकायसंयमशेति, तत्र पृथि कायकानांवानां मनोवाकायकृतकारितानुमतिभिः संघट्टपरितापव्यापादनवजनं पृथ्ट कायसंयमः, एवमप्कायसंयमादयोऽप यावत् पञ्चेन्द्रिय- संयम इति । चक्षुषा नर्जवस्थंडिलाद्यवलोक्य स्थानाद्यासेवनं प्रेक्ष्यसंयमः, व्यापार्यान् साध्वादीन् प्रवचनविहितासु क्रियार व्यापारयतोऽव्यापार्यान् गृहस्थादींश्च संयमव्यापारेष्वव्यापारयत उपेक्षमाणस्यदासन्यं भजतः संयमो भवतीति उपेक्ष्यसंयमः, व्यापार्याऽव्यापार्यसंयमो वाऽपराभिधानः, प्रमार्जनाप्रमार्जनासंयम च स्थंडिलाऽस्थंडिलाभ्यामस्थण्डिलस्थण्डिलयोस्सं- क्रामतो रजोहरणेन चरण सागारिकाऽसद्भावसद्भावे प्रमार्जनाऽप्रमार्जन समाचरत बेद्धव्य, मनसेभिद्रहाऽभिमानादि- 卐 N 卐 A 卐 N T G A 卐 卐 T 卐 L V 卐 A 5.

卐zy S A 卐 U 卐 संवरतत्त्वे दशन्धिो कायां- v ध धर्मः A A 卐 नवतत्त्व- नेवर्तनं धर्मध्यानादिप्रवर्तनश्च मनःसंयमः, एवं वाकायसंयमावपि दुष्टाऽदुष्ट निवृत्तिप्रवृत्तिभ्यां वाच्य, अजीवकायसंयम सुमङ्गला इत्युपकरणसंयमः, स च पुस्तका दिः, तत्र यदा ग्रहणधारणाशक्तिसंपद्धाजोऽभूवन् दीर्घायवश्चासन् सुनयस्तदा नार्सत् प्रयोजन 卐 पुस्तकः, दुःपमानुभावात्तु परिर्हणे ग्रहणधारणादिभिरस्ति नियुक्त्यादिपुस्तकग्रहणाऽज्ञा, इत्येवं यथाकालमपेक्ष्याऽसंयमस्स- यमो वा भवति सोऽवकायसंयम उपकरणसंयमो वा, इति संयमधर्मस्सप्तदशविधः । अत्र तपश्च संयमश्च तपस्संयम इत । ९०॥ 卐 कृतद्वन्द्वे ऐकपद्यं ज्ञेयमित, 'बोद्धव्वे ' इति बोद्धव्य विज्ञेयाचित्यर्थः ॥ 3 तथा सन्तो सुनयः पदार्था वा रेभ्यो हतं सत्यम् , सति वा विद्यमानेऽर्थे भवं वचस्सत्यम् । तदपि चतुर्विधम् , यथोक्तं T वाचकमुख्येन 'अविसंवादनयेगः, कायमनोवागजिह्मता च । सत्यं चतुर्विधं तच, जिनवरमतेऽस्ति नान्यत्र' ॥१॥ न च 卐 विद्यमानाऽर्थगोचरतया लुब्धकाय मृगाऽऽख्यानमपि सत्यमित वाच्यं, तस्याऽनेकधाऽध्या सतस्य विद्यमानत्वेन ववक्षणात्, समोहतमित्यात्मकां व्युत्पत्तिमनुसृत्य सर्वत्र चन्त्यमिति, उक्तञ्च भाष्टो-" तदनृतमपरुपमपिशुनमनसभ्यमचपलमना 卐 लमविरलमसंभ्रान्तं मधुरमभिजातमसंदिग्धं स्फुटमैदार्ययुक्तमग्राम्यपदार्था भव्याहारम भरमरागद्वेषयुक्तं सूत्रमार्गानुसारप्रवृ- चार्थमय॑मर्थिजनभावग्रहणसमर्थमात्मपराग्राहकं निरुपधं देशकालोपपन्नमनवद्यमर्हच्छासनप्रशस्तं यतं मितं याचनं पृच्छनं प्रश्नव्याकरणम् " इत सत्यं धर्मः। 卐 १ अविमर्दकरम्, आश्वेवप्रस्तुतार्थपरिसमाप्तिकारि इत्यर्थः । २ गणधरादिग्रथितं सूत्रं तस्य यो मार्ग उत्सर्गापवादलक्षण इति । ३ अन्येन पृष्टः प्रवचनाऽविरुद्धं व्याकरोति ॥ ज N A G T 卐 A 卐 V ॥ ९० 卐 A 卐 卐 N ॐ U 卐 A 卐 ज V 卐 卐 A 卐 'शैचम् ' इति, शुचिर्नर्मलः, निष्कल्मषः, तद्भावः शैचम् , तच्च द्रव्यभाव दाविधा-तत्र द्रव्यशचं प्रासुकैष यजला- दिना शरीरगतमहाव्रणप्रक्षालनाद, भावशचं तु मनोनिरभिष्वगता धर्मसाधनरजहरणमुखवत्रिकाचे लपट्टकपात्रादिष्वप्य- नासक्तिरि तात्पर्यम् । 'अकिचण' इति नास्य चनमस्ट त्यकिञ्चनः, तस्य भाव आकिञ्चन्यम्, शरीरधम्मपकरणादिषु नर्ममत्त्वम् , तत्र शरीरमाश्रयमात्रमात्मनो यदा कदाचिद्यत्र कुत्रचित्त्यजन्यं चेदमशुचित्वङ्मांसाऽस्थिपञ्जरं च केवलं धर्मसाधनचेष्टायाः संयमभरक्षमायाः साहायले वर्तते तदिदं शकटाक्ष इवोपाञ्जनेनाऽऽहारादिनोपष्टम्भन्यम्, नत्त्ववयवसन्निवेशशोभायं ममात्रा- यमादर इते बुद्ध्या परिपाल्यमानेत्र मूर्छाऽभावत्वम् , धर्मोपकरणेऽपि रजोहरणादै प्राणिरक्षाहेतुप्रमार्जनादिक्रियासाधने धार्यमाणेऽपि निर्ममत्त्वं प्रतम् । 'वंभं ' इति ब्रह्म ब्रह्मचर्य मैथुनवर्जन मतियावत् , यद्यपि मनोज्ञाऽमनोज्ञविषयरागविरागत्यागे ब्रह्मचर्य, बृहत्त्वादात्मा ब्रह्मा, तस्य वृत्तिरात्मने ब्रह्मचर्यमाख्यातं, ब्रह्मणि चरणमात्मारामत्त्वमरक्तद्विष्टाऽऽत्मनि व्यवस्थानमिति वचनात् , तथापि मैथुन- वर्जनमेव प्रधानत्त्वेन ब्रह्मचर्यम्, तत्परिपालनाय भगवद्भर्वसतिकथानिषद्येन्द्रियकुड्यंतरपूर्वक्रीडितप्रर्ण ताऽऽहारातिमात्र- भोजनविभूषणाऽऽख्याप्तिनवकप्रतिपादनाद् गुरुकुलवासनियमनाचेति, तथा च भाष्यम्-व्रतपरिपालनाय ज्ञानाऽभिवृद्धरे कपायपरिपाकाय च गुरुकुलवासो ब्रह्मचर्यमस्वातन्त्र्यं गुर्वर्धनत्त्वं गुरुनिर्देशस्थायित्त्वमित्यर्थ " ब्रह्मचर्यार्थ गुरुकुलवासो- ऽवश्यमुपादेयः, यतो 'नाणस्स होइ भाग, थिरयरओ देसणे चरित्ते य । धन्ना आवकहाए गुरुकुलवासं न वन्ति' ।१। N T ज G A 卐 A T 卐 L V 卐 A 卐 A १६ 卐 UC N au S नवतत्त्व- A संवरतरते U द्वादश V M भावनाः for 45 N गुरुविरहितस्य है परिणाम चिच्याद्वकथादिदोषादसजनसम्पर्कात् सद्य एव मोक्षमार्गाद् भ्रंशः स्यात् , तस्मादाना- सुमला 'णताद् गुरुकुलवासः श्रेयः, गुरुकुलवासेन वा स्वतंत्र कृतस्य ज्ञानदर्शनचरणव्रतभावनागुप्त्यादिपरिवृद्धिः, अत एव साधोर्द्वि- ज काय- 卐 संगृहीतत्वमाचार्योपाध्यायाभ्यां नम्रन्थ्यास्तु प्रवर्तन संगृहीतत्त्वं चेत्यलमति विस्तरेण । इतिदशविधो यतिधर्मः ॥२९॥ साम्प्रतं गाथासुगलेन क्रमप्राप्ता भावना नामग्राहमाचष्टे:- ॥ ९१॥ 卐 A पढममणिकमसरणं, संसार एगया य अण्णत्तं। असुइत्तंआसव, संवरे य तह णिज्जरा नवमी॥३१॥ A लोगसहवो बही, य दुल्लहाधम्मस्स साहगा अरिहा । एयाओ भावणाओ भावेयहा परणं॥३२॥ . टीका;-' पढम' इत, गाथाक्षरार्थस्सुगमः । ननु भावनेते शब्दस्य कोऽर्थः ? उच्यते;-इष्टवियोगाऽनिष्टसंयोगाद- 卐 प्रसङ्गेषु मा भूत् आत्मनि दस्थ्यमिति चित्त स्थर करणार्थ भाव्यन्ते अप्रेक्ष्यन्त इत भावना अडप्रेक्षा इत्यर्थः । तत्र शरे- रशय्याऽऽसनवस्वाद ने बाह्याऽभ्यंतराणि द्रव्याणि सर्वसंयोगाश्चाऽनित्याः, “ तडित्तरल वितं, क्षणदृष्टं यवनं, जरारोगभ- 卐 गुरं शरीरं, सन्ध्यारागाऽस्थरं रूपम् , वियोगपर्यवसानाः क्षणमात्ररमणया इष्टसंयोगाः, कुशाग्रोदकविन्दुचञ्चला लक्ष्म्यः 卐 एवं चन्तयत आत्मनस्तेषु बाह्याऽभ्यन्तरसंयोगेष्व भष्वङ्गो न भवति, तद्वियोगजं दुःक्खमपि न स्यादेत प्रथमाऽनित्यभावना १ । शाररमानसाऽनेकदुःक्खदंदह्यमानस्य प्राणिसार्थस्य शरण भयाऽपहार स्थानं तदभावोऽशरणता, यथा निराश्रये जनवि- 卐 卐 रहते वनस्थल तले बलवता क्षुधालुनाऽऽ मिषैषिणा 'संहेनाऽभ्याहतस्य मृगशिशोः शरणं न उद्यते एवं जन्मजरामरणव्याधि- 卐 A G T A V L । ९१।। A 卐 A 卐 S 卐 N U A - V A A N के प्रयविप्रयोगाऽप्रियसंप्रयोगेप्सिताऽलाभदारयदर्भाग्यदर्मनस्यमरणादिसरटेन दुक्खेनाऽभ्याहतस्य जन्तोस्संसारेऽर्हन्तमृरे । शरणं न विद्यते किञ्चिदिते चन्तयेत् , एव नत्यमशरणोऽस्त चिन्तयतो नित्यो द्विग्नस्य भव्याऽत्मनः सांसारलेषु 卐 भावेष्व भष्वङ्गो न भवति, अर्हच्छासनमेव परं शरण मेत्यशरणभावना २॥'संसारो' इति, संसरणं संसारः, संसरन्त वा पर्यटन्ति अनादिकर्मसन्तानतन्तुसङ्घातबद्धा जन्तवो नारकतिर्यङनराऽमरपर्यायर स्मनित संसारः, तत्स्वरूपपर्यालोचनम्- 卐 अनाद संसारे नरकतर्यग्यो नमनुष्याऽमरभवग्रहणेषु चक्रवत् परावर्त्तमानस्य जन्तोः सर्वे एव स्वजनाः परजना वा, नह स्वजनपरजनयोर्व्यवस्था विद्यते, माता है भूत्वा भग भार्या दुहिता च भवते, भग भूत्वा माता भार्या दुहिता च भवते, भार्या भूत्वा माता दुहिता भगिन च भवति, दुहिता भूत्वा माता भार्य भगिन च भवति, तथा पता भूत्वा भ्राता पुत्रः 卐 पंत्रश्च भवति, पुत्रो भूत्वा पता भ्राता पत्रश्च भवति, पत्रे भूत्वा पिता भ्राता पुत्रश्च भवति । भर्ता भूत्वा दासो भवति, a दासो भूत्वा भर्ती भवते । शत्रुर्भूत्वा मित्रं भवते, मित्रं भूत्वा शत्रुर्भवति पुमान् भूत्वा स भवति नपुंसक , 卐 पुमान् नपुंसक भवति, नपुंसक भूत्वा स पुमॉश्च भवत एवं चतुर तय निप्रमुखशतसहरुषु रागद्वेपमहाभभूतै- ॐ जन्तुभिरनिवृत्तविषयतृष्णैरन्योऽन्यभक्षणाऽभयातवधवन्धाभियगाऽऽक्रशादिजनतान तीव्राण दुःक्खानि प्राप्यन्ते, 卐 अहो द्वन्द्वाऽऽरामः कष्टस्वभावः संसार इति चन्तयेट्, 'समस्तले काऽऽकाशेऽपि नानारूः स्वकर्मतः।वालाग्रमप तन्नास्ति A Ehi यन्न स्पृष्टं शरीरभिः'।१ इत ध्यानपरस्य संसारभयो द्वग्नस्य नदे भवति, नण्णश्च संसाराहाणाय घटत इति है १ द्वन्द्वेषु शीतोष्णसुखदुःखादिरूपेष्वारमणं यस्मिन्नेति । 卐 T भूत्त्वा G A L V A A R ए 卐 N या श्र A 50) V A T भनवतत्त्व तृतीया संसारभावना ॥ ३ ॥ संवरतत्त्वे 卐 'एगया य' इति एकता, एकोऽसहायस्तद्भाव एकता, एक एवाऽहं न मे कश्चित्स्वः परो वा विद्यते, एक एवाहं जाये, द्वादश टीकायां- एक एवाहं मेटे, न मे कश्चित्खजनसंज्ञः परजनसंज्ञो वा व्याधिजरामरणाद ने दुक्खान्यपहरति प्रत्यंशहारी वा भवति, एक m भावनाः॥ ॥९२ ॥ एवाऽहं स्वकृतकर्मफलमभवाम् ति चन्तयेत् , एवं ह्यस्य चिन्तयतः स्वजनसंज्ञलेयु स्नेहानुरागप्रतिबन्धो न भवति परसंज्ञकेषु . . च न द्वेपाऽनुबन्धः, ततो नःसङ्गतामभ्युपगतो मोक्षायैव यतत इत्येकत्त्वाऽनुप्रेक्षा उक्तञ्च;-एकः पापात् पतति नरले , A यात पुन्यात् स्वरेकः,पुन्यापुन्यप्रचय विगमान् मोक्षमेकः प्रयात। एवं ज्ञाचा चिरमवितयां नर्ममत्वस्य हेतो-रेकचाख्यामवि- 卐 हतधियो भावनां भावयन्तु॥१॥३॥ 'अन्नत्तं' इति, अन्योभिन्नस्तद्भावोऽन्यत्त्वम् , तदन्यत्त्वभावना, शरेव्यतिरेकेणात्मानमनु- N चन्तयेत् , अन्यच्छर रमन्योऽहम् , इन्द्रियगोचरं शरमीन्द्रियोऽहम् , अनित्यं शरीरं नित्योऽहम्, अझं शरीरं ज्ञोऽहम् ,आद्यन्त- वच्छर रमनाद्यनन्तोऽहम् , यहूने च मे शररशतसहस्राण्यत तानि संसारे परिभ्रमतः, स एवायमहमन्यस्तेभ्य इत्यनुचिन्तयेत्, a 卐 एवं हे चिन्तयतः शरीरप्रतिवन्धो न भवतीत अन्यश्च शररान्नित्य ऽहमिति निःश्रेयस् संघटत इत्यन्यत्त्वाऽनुप्रेक्षा तथा क चोक्तम्-- ममेतिमतिमाश्रिताः परतरेऽपि वस्तुन्यहो, निवध्य दधतेतरां स्वमिह कोशकारा इव । विविच्य तदिदं मुहुर्वतथ- 卐 भावनावर्जनाद् , भजेत ममताच्छिदे सततमन्यत्त्वभावनाम् ॥ १॥ ४ ॥ 'असुइत्तं' इति शुचि मलरहितं न शुचि अशुचे, ध तद्भावोऽशुचित्वम् , तचैवम्-अशुचि खल्विदं शरमिति चिन्तयेत् , तत्र तावच्छशेरस्याऽऽद्यं कारणं शुक्रं शोणितं च, तदुभय- मत्यन्ताऽशुचि, तद्यथा-कवलाऽऽहारो हि ग्रस्तमात्र एव श्लेष्माशयं प्राप्य श्लेष्मणा द्रवकृतोऽत्यन्ताऽशुचेर्भवति, ततः पित्ता ॥ ९२॥ A T - V A 卐 ज N ॥ A U 卐 M V 卐 A त N T शयं प्राप्य पच्यमानोऽम्ल कृतोऽशुचिरेवभवति, पक्को वाय्वाशयं प्राप्य वायुना विभज्यते पृथक् खलारसः, खलान् मूत्रपुरे पादये मलाः प्रादुर्भवन्त, रसाच्छोणितं, शोणितान्मांस, मांसान्मेदः, मेदसोऽस्टीन, अस्थिभ्यो मजा, मजाभ्यश्च शुक्रं परिणम त, 卐 सर्व चैतत् श्लेष्मादिशुक्रान्तमशुचिर्भवति, एतेषामशुचिद्रव्याणां पदं कायः, ततः तस्मिन् काटेऽशुचित्त्वस्य को विवादः पुरु- पाणां नेत्रे-श्रोत्र-नासा-मुख-पायू-पस्थेभ्यो नवभ्यः स्रणां तु पयोधरयुगलयोनिसहरेभ्यो द्वादशभ्यः स्रोतोभ्यो निरन्तर- 卐 मामगध रसः स्यन्दते, एतादृशेऽप कारे यः शचसङ्कल्पः स लेवलं मोह विजृम्भितम् , स्नानानुलेपनधूपप्रघर्पवासयुक्ति- A माल्यादिभिरपि अस्य शरीरस्याऽशुचित्त्वमशक्यप्रत कारं खलु, सुरभिद्रव्याण्यपि अशुचिशरीरसम्पर्कादुर्गन्ध नि जायन्ते, तस्मादशुचि शरीरमति चन्तयतो भव्याऽऽत्मनः शरीरनवेदो भवति, निर्वेण्णश्च शरीरप्रहाणाय घटत इत्यशुचित्त्वभावना उक्तञ्च;-शरीरकस्यैवमर्शचभावना मदाऽभिमानस्मरसाददायिनम् । भावयन् नर्ममता महाभरं वोढुं दृढस्स्याद् बहु, नोदितेन कम् ॥१॥६॥ 'आसव' इति, आश्रूयते कम्र्मोपार्दयते रेन स आश्रय । इन्द्रियादिप्राग्व्याख्यातस्वरूपः, 'आसव' इति विभक्तिको निर्देशः । इहाऽमुत्राऽपाययुक्तान् महानदीस्रोत वेगतीक्ष्णान् अकुशलाऽऽगमकुशल निर्गमद्वारभूतानन्द्रि- 卐 यादीनाश्रवान् वस्याऽऽत्मधनलुम्पकत्वेन चिन्तयेत् , तद्यथा; स्पार्शनेन्द्रियप्रसक्तचित्तः सिद्धोऽनेकविद्याबलसंपन्नेऽप्याका- A शगोऽष्टाङ्गमहानिमित्तपारगो गार्ग्यः सत्य कनिधनं जगाम । तथा स्पर्शनमैथुनसुखप्रसङ्गाहितगर्भाऽश्वतर प्रसवकाले प्रसवि- 卐 तुमशक्नुवन्त तीवदुःक्खाभिहताऽवशा मरणमभ्युपैति । स्वेच्छाविहारिण मदोत्कटा वलवन्तो हस्तिनोऽपि हस्तिवन्धकषु स्परीनेन्द्रियप्रसक्तचेतस्का ग्रहणमुपगच्छन्ति रेवाणि दुःक्खान्यनुभवन्त च, एवं सर्वे एव स्पर्शनेन्द्रियाऽऽसक्ता इहामुत्र च 卐 A T ॐ V L ॐ A A 卐 ज H 卐 N 卐 S संवरतत्त्वे A भावना: V । A वनपातमृच्छन्ति । तथा रसनेन्द्रिप्रसक्ताः मांसपेश् लुब्धश्टेनवत् बडिशाऽ मपगृद्धमत्स्यवद् हेमन्तोद्भवतघीभूतघृतकुम्भ- श्रीनवतत्त्व- प्रवेष्टम्पकवद् विनिपातं प्रयान्ति । तथा घ्राणेन्द्रियप्रसक्ता अपधिगन्धलुब्धपन्नगवत् पुष्पपरागरक्तमधुकरवनिधनं यान्ति । सुमहला- तथा चक्षुरन्द्रयप्रसक्ताः दर्शनप्रसङ्गादर्जुनकचरवद् दीपाऽऽलोकलोलपतङ्गव द्विनिपातमृच्छन्ति । तथा श्रोत्रेन्द्रियप्रसक्ता टीकायां- तिसंगतध्वनिलोलमृगवद् वनपातं गच्छन्ति । एवं हे चिन्तयन्नास्रवनिरोधाय घटत इत्यास्रवाऽनुप्रेक्षा । उक्तञ्च;- ॥ ९३ 'मनोवाकायकर्माणि योगाः कर्मशुभाऽशुभम् । यदाश्रवन्ति जन्तूनामाश्रवास्तेन कीर्तिताः' ॥१॥७॥' संवरो' इति व्याख्यायमानलक्षणो जन्मजरामरणक्लेशादेनिवन्धनपापपटलोपार्जननिवारणहेतुध्ययमानः संवरः, सर्वे ह्येते आस्रवदे पाः a संवृताऽऽत्मनो न भवन्तत चन्तयेत् , एवञ्च संवरायैव मतिर्घटत इति संवरभावना, उक्तश्च;-' एवमाश्रवनिरोधकारणं संवरः प्रकटतः प्रपञ्चतः । भावनागणशरोमणिस्त्वयं भाव य इह भव्यजन्तु भेः' ॥१॥८॥' तह णिजराणवम्' इति तथा नर्जरा नवम भावना, द्वादशभावनानां मध्ये संवरभावनां यावदष्टभावनाः प्राक् प्रर्क तैता इयश्च नवम् निर्जरा A भावनेत्यर्थः । निर्जरा वेदना वपाक इति पर्यायाः, तत्र निर्जरणं निर्जरा आत्मप्रदेशेभ्योऽभूतरसकर्मपुद्गलपरिशाटः, सा निर्जरा द्वेधा, सकामनिर्जरा अकामनिर्जरा च, तत्र निर्जरा मे भूयाद्' इत्या भलाण युक्ता सकामा, न पुनरिहले कपरलोक- फलादिकामेन युक्ता, तस्याः ‘नो इह ले गट्टयाए तवम हिट्ठजा' इत्यादिना न पद्धत्त्वात् , सा च सकामनिर्जरा यतीनां ज्ञेया, ते हे निर्जरापरमकारणं तपः कक्षार्थ तप्यन्ते । अन्या टु कर्मक्षयलक्षणफलनिरपेक्षा अकामनिर्जरा यतिव्यति- रक्तानां नरकतिर्यङ्मनुष्याऽमराणां विज्ञेया । अस्मन् भावनाप्रकरणे तु सकामनिर्जरा गुणतोऽनुचिन्तनीया, एवमनु- 卐 ज M 卐 A 卐 N पत T ~ y . T A L । ९३ A A 卐 एन N U 卐 A 卐 V 卐 A ॐ A 卐 T चन्तयन् कर्म नर्जरणायैव घटत इत नवम् निर्जराऽनुप्रेक्षा । ९. । 'लोगसहावे ' इति लोक्यरे दृश्यरे लेवलज्ञानचक्षुषा रेर्थकरा देभरते लोकः पश्चाऽस्तकायाऽऽत्मकः । तदुक्तं:- 'धदिनां वृत्तिद्रव्याणां यत्र भवत तत्क्षेत्रम् । रैन्टस्सह लोकस्तद्विपरतं हलेकाऽऽख्यम् ' ॥१॥ कटस्थकरशाख- संस्थान उत्पत्तिस्थितिव्ययाऽऽत्मक प ऽस्तकायमय ऊर्ध्वाध स्तर्यग्दभिन्नश्चतुर्दशरज्जुप्रमाण लोकः । तत्र किञ्चिदूनस- तरज्जुप्रमाण ऊर्ध्वलोकः, कश्चित्साधिकसप्तरज्जुमानोऽधोलोकः, अष्टादशय जनप्रमित स्तर्यग्ले कः, मल्लकसमुद्काकृति- रूप्रलोकः, अधोमुखमल्लकसंस्थानोऽधो लेकः, स्थालाऽऽकारस्तिग्लेकः, इह चाऽधस्तयर्गले कव्यवस्था मेरुमध्यगते- ोऽधोऽष्टरुचकप्रदेशापेक्षया बेद्धव्या, यदाहुः अट्ठपएसरुयगे तिरियले गम्मि मज्झयारं म । एस पहवे दिसाणं, एसेव भने अणु दिसाणं " ॥१॥ तत्र रुचकादुपरि अधश्च नव नव योजनशतानि तिर्यग्लोक इत्युत्स्टेऽष्टादशयजनप्रमाणः, तिर्यग्लोकादधो नवयोजनशतेनसप्तरज्जुप्रमाणोऽधो लोकः, तत्र रत्नप्रभाशर्कराप्रभावालुकाप्रभापङ्कप्रभाधूमप्रभातम प्रभा- तमस्तमप्रभाख्यगोत्राऽभिधानाः घा-वंशा-रैलाञ्जना-रष्टा-मघा-माधवरी-संज्ञाः सप्तपृथिव्यः घनदधिधनवात- तनवाताऽऽकाशवलयपरिवेष्टिताः । तत्र रत्नप्रभायां पृथिव्यामरी तसहस्राधिकय जनलक्षवाहल्यायामुपधश्च योजनसहस्रं रक्त्वा मध्येऽष्टसप्ततिसहस्राऽधले योजनलझे भवनपरी नां भवनानि, रे चाऽसुर-नाग-वद्युत्-सुर्पर्णाऽग्ने-वार्त-स्तैनते- दध-द्वीप-देकमाराः चूडामणि-फणि-वज्र-गरुड-घटाऽश्व-वर्षमान मकर-सिंह-हस्त-चन्हाः दक्षिणेत्तरदग्व्यवस्थिताः प्रतिनिकायदक्षिणोत्तरदिग्विभागमाश्रित्य इन्द्रद्वयापेक्षया इन्द्रविंशतिस्वामित्त्वसमलंकृताश्चेति अस्याम्व रत्नप्रभायारुप- 卐 N 卐 - 卐 A 卐 T 卐 L V 卐 A A 卐 पड़ 卐 S 卐z N अनवतत्त्व- A सुमङ्गला- कायां- v । ९४॥ ॐ A 卐 T 卐 A 卐 T श्र V 卐 A 卐 रतनयोजनसहस्रस्याध उपर च योजनशतं मुक्त्वा मध्येऽष्टासु योजनशतेष्वष्टविधानां पिशाचभूतयक्षराक्षसकिन्नरकिम्पुरुषम- 0 संवरतत्रे होरगगन्धर्वाणां कदम्बवृक्षसुलसवृक्षवटवृक्षखट्वाङ्गाऽशोकवृक्षचम्पकवृक्षनागवृक्षतुम्बरुवृक्षचन्हानां तर्यग्लोकवासनां व्यन्तराणां y लोक- नगराणि, तेष्वपि दक्षिणोत्तरदग्व्यवस्थितेषु कै द्वाविन्द्र सर्वसंख्यया पोडश । रत्नप्रभायामेव प्रथमस्य शतस्याध उपरे M भावना । च दशदश योजनान मुक्त्वा मध्येऽर्शत योजनेषु ' अणपन्निअ पणपन्निअ' प्रभृतयस्तथैव दक्षिणोत्तर दिग्व्यवस्थिता अष्ट 卐 व्यन्तरनिकायाः, तथैव द्वै द्वाविन्द्र । तथा रत्नप्रभायाः पृथिव्याः समलादुपरि सप्तसु नवत्यधिःपु योजनशतेषु ज्योतिषामधस्तलप्रदेशः, तदुपरि दशयोजनेषु 卐 सूर्यः, तदुपर्य तियोजनेषु चन्द्रः तदुपरि वंशतियोजनेषु तारा ग्रहाश्च, एवमयं ज्योतिलको दशोत्तरं योजनशतं वाहल्येन, एकादशभिजनशतैरेक वंशत्युत्तरैर्जम्बूद्वीपस्थमेरुमस्पृशन् सर्वासु दिक्षु मण्डलकया व्यवस्थितं ज्योतिश्चक्रं ववज भ्राम्यति, 卐 लोकान्तं च एकादशभिर्यजनशतैरेकादशोत्तरैरस्पृशन् मण्डलकया तिष्ठति । अत्र सपर कल स्वातिनक्षत्रम् , सर्वेषामधो भरणनक्षत्रम् , सर्वदक्षिणो मूलः सर्वोत्तरश्वा चः। तत्र जम्बूद्वीपे व चन्द्र सूर्यो, लवणसमुद्रे चत्वारश्चन्द्राः सूर्याच, धातर्क- 卐 खण्डे द्वादशचन्द्राः सूर्याश्च, कालोदे द्वचचारशचन्द्रा सूर्याश्च, पुष्करवरार्धे द्वासप्ततिश्चन्द्राः सूर्याच, एवं मनुष्यलोके द्वात्रिंशं- चन्द्रशतं सूर्यशतं च भवति, अष्टाशेतिम्रहाः अष्टाविंशतिर्नक्षत्राणि पटूपष्टिसहस्राणि नवशतोत्तरपञ्चसप्तत्यधिकान कोटाकोट प्रमा- 卐 णानि तारकाणि कैकस्य चन्द्रमसः परिग्रहः। तत्र एकषष्टिभाग कृतस्य योजनस्य पद्पश्चाशद्भागा आयामविष्कम्भाभ्यां १ मेरुमध्यगताष्टरुचकप्रदेशाऽपराभिधानसमभूतला पृथ्वी तदेव समतलम् ॥ ॥ ९४॥ G L - A प ue N ज A V A N T चन्द्रविमानम् , अष्टचत्वा रेशद्भागाः सूर्यविमानं, ग्रहाणामधयोजनं, नक्षत्राणां गव्यूतं, आयुषा सत्कृष्टायास्ताराया अर्धक्रोशः, 0 सर्वजघन्यायाः पञ्चधनु शतानि, बाहल्यं तु सर्वेषामायामस्यार्धम् । एते च पञ्चचत्वारिंशल्लक्षयेजनप्रमिरे मनुष्यक्षेत्रे भवन्ति । ध 卐 चन्द्रादेवमानवाहनाने च पुरतः सेंहाः, दक्षिणतो गजाः, अपरतो वृपभाः, उत्तरतोऽश्वाः रे चाऽभियोगिकदेवाश्चन्द्र-M सूर्ययोः प्रत्येकं पोडशसहस्राणि भवन्त, ग्रहाणामष्ट, नक्षत्राणां चचार, तारकाणां द्वे,रेच स्वयमेव प्रवृत्तगत नामपि चन्द्रा- 卐 卐 दनामाभियोग्यकर्मवशात्तत्रोपतिष्ठन्त । माड्योत्तरातू परतः पश्चाशता योजनसहरैः परस्परमन्तरताः सूर्यान्तरताश्चन्द्राः A चन्द्रान्तरताः सूर्याः मनुष्यक्षे यचन्द्रसूर्यप्रमाणादर्धप्रमाणा यथोत्तरं क्षेत्रपरिधिवृद्धधा संख्यया वर्धमानाः शुभलेश्या 卐 ग्रहनक्षत्रतारापरिवारा घण्टाकारा असंख्येया आस्वयंभूरमणाल्लक्षयोजनान्तरताभिः पङ्क्तिभिस्तिष्ठन् ति । 卐 मध्यलोले तु जम्बूद्वीपलवणादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्रा असख्याता द्विरणद्वगुण विस्ताराः पूर्वपूर्वपरिक्षे पणो वलया- कृतयः।प्रथमो जम्बूद्वीपः, अन्त्यः स्वयम्भूरमणसमुद्रः, जम्बूद्वीपमध्ये मेरुः काञ्चनस्थालमिव वृत्तो योजनसहस्रमधे धरणितलम- 卐 वगाढो, नवनवतियोजनसहस्रमुच्छूतो दशयोजनसहस्राणि सातिरेकनवत्यधिकानि कन्दे विस्तृतो, धरणितले दशयजनसहस्राणि y वस्तृतः उपर योजनसहस्रविस्तृतः, त्रिकाण्डः, त्रिलोकव्यवस्थितः, चतुर्भिवनैद्रशालनन्दनसमनसपाण्डुकैः परिवृतः। 卐 तत्र शुद्धपृथिव्युपलवज्रशराबहुलं योजनसहस्रमेकं प्रथमं काण्डं, द्वयं त्रिषष्टियोजनसहस्राणि रजतजातरूपाङ्कस्फटिक- 3 v बहुलं, तृतीयं षट्त्रिंशद्योजनसहस्राणि जाम्बूनदबहुलं, वैडूर्यबहुलाऽस्य चूलिका चत्वारिंशद्योजनान उच्छुटण, मूले द्वादश विष्कम्मेण, मध्येऽष्ट, उपरे चत्वारि त । मेरोमूलभूम वलयाकृत भद्रशालवनं, भद्रशालवनात् पञ्चभ्यो येजनश- 卐 G A A T L A A 卐 प * y S yzy A U T N नवतर तेभ्य ऊर्ध्व पञ्चयोजनशतविस्तार मेखलायां वलयाकृति नन्दनवनं, ततः सार्धद्विपष्टियोजनसहरुभ्य ऊवं द्वित्यमेखलायां ध संवरत पञ्चयोजनशतविस्तारं वलयाकृति सैमनसं वनं, ततोऽपि पटूत्रंशद्योजनसहस्रेभ्य ऊर्ध्व तृर्त यमेखलायां चतुर्नवत्यधिकचतु- लक- 3 卐 टकाय- यजनशतविस्तारं वलयाकृति मेरोः शरस पाण्डकवनम् ॥ जम्बूद्वीपे सप्तवर्षाण, तत्र दक्षणतो भरतक्षेत्र, तदुत्तरतो हैमवतं, ततोऽपि हरिवर्ष, ततोऽप वैदेहाः ततोऽपि M भावना ॥९५॥ रम्यक् क्षेत्रम्, ततोऽपि हैरण्यवतं, ततोऽप्रैरावतमिते । क्षेत्र विभागकारणस्तु हमवन्महाहिमवन्निपधनीलरुक्मिशखरणो 卐 वर्पधरपर्वताः । तत्र भरते गङ्गासिन्धू महानद्य, हैमवते रोहितांशारोहिते, हरवर्षे हरिकान्ताहरते, महाविदेहे शताश तोदे, A रम्यके नार नरकान्ते, हैरण्यवते सुवर्णकूलारूप्यकूले, ऐरवते रक्तारक्तोदे । प्रथमाः पूर्वगा द्विरीयाः पश्चिमगाः, तत्र चतुर्दश- नर्दसहस्रपरवृते प्रत्येकं गङ्गासिन्धू, यथोत्तरं द्वगुणनर्दपरिवरे द्वे द्वे नद्य शतार तोदाभ्यामक, रेतु प्रत्येकं द्वात्रिंशत्सa हस्राधिकपश्चलक्षनदी परिवृते । उत्तरास्तु दक्षिणाभिस्तुल्याः। भरतक्षेत्रं विष्कम्भतः पञ्चयजनशतानि पर्खेिशान एकोन- वंशतिभाग कृतस्य योजनस्य षड्भागाः, तद्विगुणविष्कम्भा यथोत्तरं वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः । उत्तरा दक्षिणतुल्याः । 卐 जम्बूद्वीपस्य प्राकारभूता वज्रमर अष्टयोजनोच्छाया जगत, द्वादशयजनान्यस्या मूले वष्कम्भः, मध्येऽप्टै योजनानि, 卐 उपरि चत्वार योजनान, तदुपरि द्वगन्यूत्युच्छायो जालकटको विद्याधरक्रडास्थानम् । तस्याप्युपरि पद्मवरवेदिका देवभोग- 卐 भूमिः । अस्याश्च जगत्याः पूर्वादिषु दिक्षु विजयवैजयन्तजयन्ताऽपराजिताऽऽख्यान चत्वार द्वाराणि ॥ 卐 तथा जम्बूद्वीपपरिक्षेप तवगुणविस्तारः योजनसहस्रावगाढो मध्ये दशसहस्रविस्तारे पोडशयोजनसहस्रोच्छायशेखरो 卐 ॥ ९५॥ A G T V L A A 卐 - 卐 卐 N U A V A N लवणोदः समुद्रः। लवणोदधिपरिक्षेप तद्विरणो धातकखण्डः धातकखण्डपरिक्ष अष्टय जनलक्षविष्कम्भः कालेदः समुद्रः। कालोदपरिक्षेपी तद्विगुणविस्तारः पुष्करवरद्वीपः, तदर्थं यावन्मानुपं क्षेत्रम् । ततः परं मालपोत्तरो नाम पर्वते मानुपले कपरिक्षे महानगरपाकारवृत्तः पुष्करवर पार्धवनिविष्टः चनमयः सप्तदशयोजनशतान्येकवेंशत्युच्छुितः चत्वार येजनशतानि शाने क्रोशं चाधो धरणितलमवगाढो योजनसहस्रं द्वाशमधस्ता द्वस्तृतः सहयजनशतानि त्रय वंशानि मटे चत्वार M योजनशतानि चतुर्विंशान्युपरे । न कदाचिदसात्परत मनुष्या जायन्ते प्रयन् वा । येऽपि चारणविद्याधर प्राप्ता मनुष्या- ज स्तमुल्लङ्घ्य परतोगतास्तेऽपि तत्र न प्रयन्ते । अतएव माडपोत्तर इत्युच्यते । न च तत्परो वादराऽग्निमेघविद्युन्नद कालपरिदे- पादयः । मानुषोत्तरादाक् पुनर्जन्मतो मनुष्या पञ्चचत्वारिंशत्क्षेत्रेषु सान्तरद्वीपेषु भवन्ति, संहरणविद्यायिगात्तु सर्वेष्वर्ट- तृतीयेषु पेषु समेादेशिखरेषु समुद्रद्वये चेति ॥ मानुषोत्तरात्परतस्तु पुष्करवरद्वीपस्यार्घ द्वियम् पुष्करवरद्वी पात् परतस्तत्परिक्षेद्वपद्विगुण विस्तारः पुष्करोदः 卐 समुद्रः, ततो वारुणवर पसरुद्र, क्षरवरद्वीपसमुद्र, घृतवरद्वीपसमुद्र, इक्षुवरद्वीपसमुद्र च भवतः। अष्टम नन्दीश्वरद्वीपः, स च चतुरश्तलक्षोप्तत्रिषष्टिक व्यधिकयोजनकोटेशतप्रमाणवलयविष्कम्भो विविधविन्यासद्यानवान् देवलोकप्रतिस्पर्द्ध है जनेन्द्रपूजाव्यापृतदेवसंपाततिरुचिरः स्वेच्छावि विधक्रियादेवसंभेगरम्यः। नन्दीश्वरद्वी परिक्ष नन्दीश्वरः समुद्रः, ततः परम- रुणो द्वीपः अरुणोदः समुद्रः, ततऽरुणवरे ईपः, अरुणवरः समुद्रः, ततोऽरुणभासो द्वीपः, अरुणभासः समुद्रः, ततः कुण्डले 卐 द्वीपः कुण्डलोदः समुद्रः, ततो रुचके द्वीपः, रुचकः समुद्रा, एवं प्रशस्तनामाने द्वगुणमाना हूँ पसमुद्राः, अन्त्यः भरमणः T G 卐 A 卐 T , A ॐ V L ॐ A A 窮 S 卐zy भनवतत्व- U संवरतत्रे लोक- A 卐 सुमङ्गला- र्टकायां- भावना १९६॥ 卐 A Y N समुद्रः ॥ तथा जम्बूद्वीपे जघन्येन चत्वारस्तीर्थकृतः चक्रवर्त्तनो बलदेवा वासुदेवाश्च सदा भवन्ति । उत्कर्षेण चतुस्त्रिंशजनाः त्रंशच्च चक्रणः । धातक खण्डे पुष्करार्धे च द्वगुणाः॥ 卐 तर्यग्लोकाचं नवयोजनशतोनसप्तरज्जुप्रमाण ऊर्वलोकः । तत्र सधर्मेशानसनत्कुमारमहेन्द्रब्रह्मलोकलान्तकमहाँशुक्र सहस्रारानंतीणतारणाच्युता द्वादश कल्पाः, तदुपर नव ग्रैवेयकाः, तदुपर विजयजयन्तजयन्तापराजितान विमानान 卐 प्राक्क्रमात्, मध्ये सर्वार्थ सिद्धम् । तदुपरि द्वादशयोजनेषु पञ्चचत्वारिंशद्योजनलक्षायामविष्कम्भा ईपत्प्रागभारा नाम पृथ, सा सिद्धशला, ततोऽप्युपर गव्यूतत्रयादूचं चतुर्थगव्यूतपष्ठभागे आलोकान्तात् सद्धाः। तत्र धरणतलात् समभागात् सधर्मेशान ध यावत् सार्धरज्जुः । सनत्कुमारमाहेन्द्र यावत् सार्धं रज्जुद्वयं, सहस्रारं यावत् पञ्च रजवः, अच्युतं यावत् पटू रज्जवः, लोकान्तं यावत् सप्तरजवः ।। तत्र प्रथम कल्प धनोदधिप्रतिष्ठान , तदुपरित्रयो वायुप्रतिष्ठानाः, ततः परं त्रयो घनोदधिधनवातप्रति- 卐 ष्ठानाः, तदुपर्याकाशप्रतिष्ठानाः ॥ एवमयमधस्तिर्यगूलभेदो लोकः, अस्य च मध्ये रज्जुप्रमाणाऽऽयामविष्कम्भा ऊधिश्चतु- देशरज्वात्मिका सनाड, बसाः स्थावराश्च वा अत्र भवन्त कृत्वा, सनाड्या बहिः स्थावरा एच वा भवन्तीति । 3 चतुर्दशरज्जुप्रमाणोऽयं लोकः उच्छुयेन विज्ञेयः, अन्यथा अधस्तादेशोनसप्तरज्जुविस्तरः, तिर्यग्लोकमध्ये एकरज्जुविस्तरः, A ब्रह्मलोकमध्ये पश्चरज्जुवस्टणः उपरि तु लोकान्ते एकरज्जुविस्तृतः, शेपस्थानेष्वनियतविस्तरः, अयं लोकः मतिपरिकल्पनया 卐 घनक्रियते तदा आयामविष्कम्भवाहल्यैः सप्तरज्जुप्रमाणः । कथं च धनो विधयते इति जज्ञासा लोकप्रकाशशतकादिभ्यः पूर- पीया । अत्र तु प्रसङ्गसङ्गतराकृतय एव प्रदर्श्यन्ते, ताश्चेमाः- ध G 3 A 卐 T V १९६॥ 卐 A ध A LUG

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卐 S N घनीकृतो लोकः सर्वतः सप्तरज्जुपरिमितः ॥ संवरतत्रे धनीकृतोर्चलोका सप्तरज्जू- च्छितत्रिरज्जुविस्तृतः॥ घनीकृतोऽधोलोकस्सप्तरज्जू- च्छ्रितश्चतूरज्जुविस्तृतः ॥ U A अनवतत्त्व- सुमङ्गला- ई.काया- लेक- ध ध २ १ ac १ ३ ३ भावना -- > २ २ २ ॥ ९७॥ - A A ३ ३ ३ ४ ४ ४ - .... T 卐 A 卐 T ६ ६ N प G ॐ A ज --- ६ २ y अयं लोक उक्तस्वरूपो न लेनाऽप प्रकृत श्वर विष्णुब्रह्मपुरुषप्रभृत नामन्यतमेन वेहितः । प्रकृतेरचेतनत्त्वात् कर्तृत्वाड- पपत्तेः, ईश्वरादीनां च न कर्तृवं प्रयोजनाऽभावात् । क्रीडा प्रयोजनमत चेन्न, क्रीडायाः कुमारकाणामिव रागिणामेव संभ- ज ॥ ९७ A 卐 y 卐 N 卐 A M V फ़त A A वात् , क्रीडासाध्यायाश्च तेस्तेषां शाश्वतकत्त्वात् , क्रीडानिमित्तायां तु तं तेषां पूर्वमनुप्तप्रसङ्गः । कृपया प्रवृत्तिरोतेचेत् संख्येव सर्गस्स्यात् न दुःखी, कर्माऽपेक्षः सुखदुःखमयः सर्ग इति चेत् तर्हि कमैव कारणमस्तु, कक्षित्वे टेपां स्वात- व्यविधातः । कर्मजन्ये न भावानां वैचित्र्ये किमीश्वरादिभिः प्रयोजनम् ? अथ प्रयोजनमन्तरेणैव रेषां सर्गक्रमस्तदयुक्तं, न बालोऽपि प्रयोजनमन्तरेण किश्चित्करत, तस्मान्न केनचिदयं लोको निष्पादित इति । न च केनचदयं धियते, शेषकूर्म- वराहादयस्तस्य धारका इति चेत्तेषामपि के धारक मेति वाच्यं, आकाशमिति चेत् तस्याऽपि के धारकं ? स्वप्रतिष्ठभेद- मित चेत् लोकोऽपि तथाऽस्तु एवं च सत केनचदत्पादितत्त्वात्स्वयं सिद्धः, केनचदधृतत्त्वान्नराधारः, आकाशे एव प्रति- ष्ठित इत्यर्थः ॥ नह लोकभावनाया भावनात्वं कथं भवेत् ? उच्यते, इतोऽी निर्ममत्वं स्यात् तद्यथा-" खहेत च- झावे, मनो रज्यन्गुहुर्मुहुः । लोकभावनयाऽत्यर्थं विप्रर्कर्ण वध्यते ॥१॥ भूद्वीपसागराने धर्मध्यानस्य गोचरः इत्युक्तं ध्यानशतके नरें तल्लोकभावनाम् ॥ २॥ जनोक्ते लोकरूपे च संवादिनि विनश्चरे । अरीन्द्ररे मक्षमार्गेऽथाधत्ते प्रत्ययं जनः ॥३॥ लोस्वभावभावना ॥ १० ॥ ' 'बोर्ह दुल्लहा' इति, बोपिः प्रेत्य जनधाऽवाह, दुर्लभा दुष्प्रापा, अनादै संसारे नरकादेषु तेषु भवग्रहणेष्वनन्त- कृत्त्वः परिवर्त्तमानस्य जन्तो िवेधदुःखाभिहतस्य मिथ्यादर्शनाद्युपहतमरेनिदर्शनावरणमोहान्तरायोदया भभूतस्य सम्यग्द- र्शनादिविरद्धो बोोर्दुर्लभे सर्वत त्यनुचन्तयेत् । एवं ह्यस्य बोधिदुर्लभत्त्वमचिन्तयते बेधे प्राप्य प्रमाद न भवतीति बोधिदुर्लभत्त्वानुप्रेक्षा ॥११॥ 'N T 卐 G 卐 A ज L T V 9 卐 ज A *A 卐 ए 20 S N 'संवरतत्रे नवतत्व- A 卐 V 卐 U 卐 M टीकाय- सामाच- कादि चारित्रम्॥ । ९८॥ ॐ A A T 'धम्मस्स साहगा अरहा' दुर्गतिपतितप्राणिसार्थस्य समुद्धरणात्सुगतिस्थापनाच धर्मः श्रुतचरित्रभेदभिन्नः, तस्य साधको निष्पादकः कथको वेति, स च ' अर्हन् ' इति अष्टमहाप्रतिहार्यपूजायाः सुरासुरेन्द्र विरचिताया अर्हत्त्वादर्हन्, स चोपलक्षणं गणधरार्दनाम् , यदुक्तं “तित्थयरगणहरो, केवलव्य पत्तेयबुद्धपुव्वधरो । पंचविहायारघरो दुल्लंभो आयरियओवि" ॥१॥ अहो सम्यग्दर्शनद्वारः पञ्चमहाव्रतसाधनः द्वादशाङ्गोपदिष्टतत्त्वो गुप्त्यादिवशुद्धव्यवस्थानः संसारनिर्वाहको निःश्रेयसपापको धर्म भगवता परमणाऽर्हता व्याख्यातः स्वयमनुष्ठितश्चेत्येवमचिन्तयेत् । एवं हे चिन्तयतोऽस्य धर्मबहुमानं तदनुष्ठाने च व्यवस्थानं जायते इति द्वादर भावना ॥१२॥'एयाओ भावणाओ, भावेयवा पयत्तेणं' इति, एता अनन्तरोदितस्वरूपा अनित्यादिभावना मोक्षमार्गाभलाषुकै व्यात्मभिः प्रमादा दिदस्युपरिहारेण भावितव्या आत्मनि ध्येयविपर कर्तव्या इत्यर्थः ॥३०-३१॥ भावना वर्णयित्त्वाऽथ क्रमागत सामायिका ददभिन्नं चारित्रद्वारं गाथायुगलेन चैवर्णयपुः सूत्रकारगाथायुगलमुपनिवनाति- सामाइयत्त्थपढम, छेओवट्ठावणं भवे बीअं। परिहारविसुद्ध अं, सुहुमं तह संपरायं च ॥ ३२ ॥ तत्ते अअहक्खायं, खायं सहमि जीवलगम्मि।चरिऊण सुन्हिया, वच्चंति अयरामरं ठाणं ॥३३ । टीका-प्रथमं सामायिकचारित्रम्, द्विरयं छेदोपस्थापनीयम् , तृतीयं परिहार विशुद्धिकं, तथा चतुर्थं सूक्ष्मसंपराय- चारित्रम् । ततो यदाराध्य सुविहिताः साधवोऽजरामरं मोक्षं स्थानं गच्छन्ति तत् सर्ववलोले प्रसिद्धः यथाख्यातचारित्रं पश्चममति गाथाद्वयाऽक्षरार्थः ॥ च्यासार्थस्त्वेवर-समानां ज्ञानदर्शनचारित्राणामायो लाभः समायः, समाय एव सामा- N A G 卐 T 卐 V 卐 A 卐 L 卐 A । ९८॥ y ए N 卐 A 卐C) V 卐 A यिक, विनयादेराकृतिगणत्वात् खार्थे इकण प्रत्ययः । यद्वा समो रागद्वेषविप्रमुक्तो यः सर्वभूतान्यात्मवत् पश्यते, आये लाभः प्राप्तिरते पर्यायाः, समस्यायः समायः, समो हे प्रतिक्षणमपूर्ज्ञानदर्शनचरणपर्याभवाट भ्रमणसंक्लेशविच्छेदकै रु- पमसुखहेतु भरधःकृतचिन्तामणिकामधेनुकल्पद्रुमोपमैयुज्यते, समाय एव सामायिक मूलगुणानामाधारभूतं सर्वसावद्य- विरतरूपं चारित्रं । यदाह वाचकमुख्यः, 'सामायिकं गुणानामाधारः खमेव सर्वभावानाम् । नहे सामायिकहनाश्चरणादि- गुणन्विता येन ॥१॥ तस्माजगाद भगवान् , सामायिकमेव नरुपमोपायम् । शार रमानसानेकदुःखनाशस्य मेक्षस्य' ॥२॥ यद्यपि च सर्वमए चारित्रमविशेषतः सामायिकं तथापि छेदादिविशेषैशेष्यमाणमर्थतः शब्दान्तरतश्च नानात्वं भजते । प्रथमं पुनरविशेषणात् सामान्यशद्ध एवाऽवतिष्ठते 'सामायिक मति' । तच सामायिकं द्विधा इत्त्वरं यावत्कथिकं च, तत्त्वरं भाविव्यपदेशान्तरत्वादत्त्वरं स्वल्पकालं, तच प्रथमचरमर्थकरन्थे भरतैरवटेषु यावदद्यापि शैक्षस्य महाव्रतानि नारोप्यन्तै तावद्वज्ञेयम् । आत्मनः कथां यावदास्ते यावत्कथं यावङवमित्यर्थः । यावत्कथमेव यावत्कथकं एतच्च भरतैरवतेपु प्रथम- चरमवर्जमध्यमद्वाविंशतिर्थकरतीर्थान्तर्गतसाधूनां महाविदेहर्थकरसुनां चावसेयम् , तेषामुपस्थापनाया अभावात् , उक्तञ्च- सबमिणं सामाइय छयाइ वसे सियं पुण वभिन्नं अविसेसं सामाइयचियमिह सामन्त सन्नाए ॥१। सावज- जोगविरइत्त तत्थ सामाइयं दुहा तं च । इत्तरमावकहं त य पढमंतिमजिणाणं ॥ २ ॥ तित्थेसु अणारोवियवयस्स सेहस्स थोवकार्लयं । रेसाणमावक हेयं तत्सु विदेहयाणं च ॥३॥" ननु च इत्त्वरमपि सामायिक ' करोमि भदन्त ? सामा- येकं ' यावर्जवम्' इत्येवं यावदायुस्तावत् कृतं, तत उपस्थापना काले तत् परित्यजतः कथं न प्रतिज्ञाभङ्गः ? उच्यते, क A ध N T 卐 G A 卐 T A 卐 V 卐 L 卐 A 卐 A 卐 ज N -- S 卐 A 卐 संवरतले सामाय- कादि 卐 V ' चारित्रम् A A T ननु प्रागेवोक्त-सर्वमेवेदं चारित्रमविशेषतः सामायिक, सर्वत्राऽपि सर्वसावद्ययोगविर तेसद्धावाद, केवलं छेदादिविशुद्धिविशेषै- अनवतत्त्व- शेष्यमाणमर्थतः शद्धान्तरता नानात्वं भजते, ततो यथा यावत्कथकं सामायिकं छेद पस्थापनं च परमविशुद्धिविशेषरूप- सुमङ्गला. सूक्ष्मसंपरायपरिहारविशुद्धिप्रभृतिचारितावाप्ती न भङ्गमास्कन्दत, तथेचरमपि सामायिक विशुद्धिविशेषरूपछेदोपस्थापना- टीकायां- वाप्त निधिमेव, यदि ह प्रवज्यापारल्यागः सातर्हि तद्भङ्गमापद्यते, न तस्यैव विशुद्धिवेशेपावाप्त, उक्तन-उनिक्ख- ॥ ९९ ॥ मओ भङ्गो जो पुण तं चिय करेइ तुवरं । सजावेत्तविसिलु सुहुमंप व तस्स को भङ्गो" ॥१॥ 'छेओवट्ठावणं इत, तत्र पूर्वगवन्य छेडेन उपस्थापना महाव्रतेष्वारोपणं यत्र चारित्रे तच्छेदोपस्थापनं भरतैरवत- 卐 प्रथमचरमर्थकरर्थ एव नान्यत्र । तच द्विधा-सातिचारं निरतचारं च, तवानतिचारमित्त्वरसामायिकस्य शैक्षकस्य यदारो- प्यते, स्र्थान्तरं वा संक्रामतः साधोर्गथा, श्रीपार्श्वनाथरार्द्धमानखासिथ संक्रामतः पञ्चयामधर्मप्रतिज्ञा, सातिचारं पुनर्यन्मूलगुणघातिनः पुनर्बतोचारणम् उक्तञ्च " रोहस्स निरहयारं तिथंतरसंक्रम्व तं होजा । मूलगुणघाइयो साइयारमु- भयं च ठयकप्पे" ॥१॥' उभयं च ' इति सातिचारं नरतिचारं स्थितफल्प इति प्रथमपश्चिमतीर्थकरर्थकाल इत्यर्थः ॥ 卐 'परहारविसुद्धय' इति-तत्र परहरणं परिहारस्तपोविशेषस्तेन वैकुदिर्य स्मँधारने तत् परिहार विधादिकं, तच 卐 द्विधा निर्विशमानकं निर्विष्टकायिकञ्च, तत्र निर्विशमानका विवक्षितचास्त्रिासेवकाः, निर्विष्टकायिका आसेवितविवक्षितचारित्र- कायकाः, तदव्यतिरेकाचास्त्रमपि एवमुच्यते । इह नवको गणः, तकः कल्पस्थितो वाचनाचार्य गुरुकल्पः, चत्वारो 3 नमानकास्तपःप्रपन्नाश्चत्वारश्चानुचारिणो यावृत्यकरकल्पा, यद्यपि सर्वेऽपि श्रुतातिशयसंपूर्णास्तथाप तथा कल्पचा- A yzy卐卐 T V L ॥ ९९. A A ध 卐 - S M A 卐द卐 卐 N तेषामेकः कश्चत् कल्पस्थितऽवस्थाप्यते, अयमेव च रेषां परहारकाणामत्रकल्पे कचित् स्ख लेतादे प्रायश्चित्तं दातुं प्रमाणं, 1. यत् प्रायश्चित्तमस ददात त!ढव्यमिति भावः, एवमनुपरिहारिकाणामप्यपराधपदमापन्नानागयमेव विद्वान् प्रायश्चित्त- U 卐 पाने प्रमाणम् , यदुक्तं बृहत्कल्पमाष्ट;-" पमाणं कप्पट्टिओ तत्थववहारं ववहरत्तिए । अपरिहारियाणं प पमाणं हेइ से । पिऊ"॥१॥ अत्र ॥१॥ अत्र " व्यवहारं " प्रायश्चित्तं ' व्यवहत्तुं' दातुमिति भावः । नर्वेशमानकानां पाऽयं तपोविशेषः, श्रीप्म- झाले जघन्यमध्यमोत्कृष्टं चतुर्थपष्ठाष्टमभक्तलक्षणम् , पारणले चाऽचाम्लं, शिशिरे पष्ठाऽष्टमदशमभक्तरूपं जघन्यमध्यमो- टं तपः, पारणले चाऽऽचाम्लं, वर्षास अष्टमदशमद्वादशभक्तस्वरूपं तपो जघन्यमध्यमोत्कृष्टतया विज्ञेयम् , पारणके त्वाचा- म्लमेव, उत्साहाय्यकारिणश्चानुपरिहारिणो नियताऽऽचाम्लभक्ताः, कल्पस्थितो वाचनाचार्योऽपि नियताऽऽचाम्लभ एव । का क्यं च मासान् कृत्त्वा परिहारिणोऽनुपरिहारित्वं प्रतिपद्यन्ते, अनुपरिहारिणश्च परिहारिणो भवन्ति, तेऽपि पण्मासांस्तत्तपे विदधति । पश्चात्कल्पस्थित एकाक्येव पण्मासावधिकं तत्तपः प्रतिपद्यते, तस्य च शेपाऽटकमध्यादेव एकः कल्पस्थितो भवति, ध अन्ये निशेषा एको वा अनुपरिहारित्वं प्रतिपद्यते ॥ अथैते परिहार शुद्धिकाः कस्मिन् क्षेत्रे काले वा भवन्ति ? उच्यते, 卐 इह क्षेत्रादिनिरूपणार्थ वंशतिद्वाराणि, तद्यथा-क्षेत्रद्वार, कालद्वारं, चारित्रद्वारं, स्थद्वारं, पर्यायद्वारं, आगर्मद्वारं, वेदार, कल्पद्वारं, लिङ्गद्वारं, लेश्याद्वारं, ध्यान्द्वारं, गणद्वार, अभ्य॒िहद्वारं, प्रज्याद्वारं, मुंडापनद्वारं, प्रायश्चित्तविधिद्वार, 卐 कारणद्वार, नियतकर्मद्वार, भिक्षाद्वारं, वन्धद्वारं च । तत्र क्षेत्रद्वारे द्विधा मार्गणा-जन्मतो सद्भावतश्च, यत्र क्षेत्रे जातस्तत्र जन्मतो मागणा यत्र च कल्पे स्थितो वर्त्तरे तत्र सद्भावतः। तत्र जन्मतः सद्भावतश्च पञ्चसु भरतेषु पञ्चस्वतेषु न तु ॐ 卐 N G A D L . A A 卐 ក N 卐 S 卐 A 卐 संवरतत्रे सामाय- कादि चारित्रम् ॥ V M A 卐 A T 卐 नवतत्त्व. महाविदेहेषु, न चैतेषु संहरणमस्ति येन जनकल्पका इव संहरणतः सर्वासु कर्म मिष्वकर्मभूमिषु वा प्राप्येरन् । गुमला- कालद्वारे-अवसपिण्यां तृतये चतुर्थे वारले जन्म, सद्भावः पञ्चमेऽपि, उत्सण्यां द्विर्तये तर ये चतुर्थे वा जन्म, सद्भावः 卐 टीकायां पुनस्तृतये चतुर्थे वा, नोत्सपिण्यवसपी रूपे चतुर्थारकप्रविभागे काले न सम्भवन्ति, महाविदेहे तेषामसम्भवात् । चारित्रद्वारे-संयमद्वारेण मार्गणा, तत्र सामायिकस्य छेदोपस्थापनस्य च चारित्रस्य यान जघन्यानि संयमस्थानानि ।१००॥ ॐ तान परस्परं तुल्यान, समानपरिणामत्त्वात् , ततोऽसंख्येयलोकाकाशप्रदेशप्रमाणानि संयमस्थानान्यतिक्रम्योचं यान 卐 संयमस्थानाने तानि परिहार विशुद्धियोग्यान, तान्यपि च केवलिप्रज्ञया परिभाव्यमानाने असंख्येयलोकाकाशप्रदेशप्रमा- णानि, तान प्रथमद्वितीयचरित्राऽविरोध नि तेष्वपि सम्भवात् । उक्तञ्च तुल्ला जहन्नठाणे संजमठाणाइ पढमविइयाणं । 卐 तत्तो असंखलोए गंतुं परहारयट्ठाणा ॥९॥ तेचे असंखा लोगा अविरुद्धा चेव पढम याणं । उवरेंपि तो असंखा, संजमठाणाउ दुहंपि" ॥२॥ अत्र 'उबरंप' इति द्विरीयगाथार्द्धन परिहारविशुद्धियोग्यसंयमस्थानेभ्य ऊर्ध्वमपि 卐 याने संयमस्थानानि तेषां योग्यता प्रतिपादिता, तत्र परिहारविशुद्धिककल्पप्रतिपत्तिः स्वर्क येष्वेव संयमस्थानेषु वर्त्तमानस्य भवति न शेपेषु, यदा त्वरीतनयमधिकृत्य पूर्वप्रतिपन्नो ववक्ष्यते तदा शेषेष्वपि संयमस्थानेषु भवति, परिहार विशुद्धक- धन कल्पसमाप्त्यनन्तरमन्येष्वपि च चारित्रेषु सम्भवात् , तेष्वपि च वर्त्तमानस्यातीतनयमपेक्ष्य पूर्वप्रतिपन्नत्वात् । उक्तञ्च- सट्ठाणे पडिवत्त अन्नेसु वि हुन्ज पुवपडिवन्नो । तेसु वि वटुंतो सो तीयनयं पप्प बुचईउ ॥ १॥ तीर्थद्वारे परहारविशुद्धको नयतत प्रवर्त्तमान एव भवति, न तूच्छेदेऽनुत्पत्यां वा तदभावे जातस्मरणादना । पर्यायद्वारे-पर्यायो - A 卐 T 卐 V 卐 L A ॥१००। 3 A 卐 प N - - N 卐 U A N V 卐 द्वधा-गृहस्थपर्यायो यतपर्यायश्च, एकैकऽपि द्वप्रकारः, जघन्य उत्कृष्टश्च, तत्र गृहस्थपर्याये जघन्यत एक नत्रंशद्वर्षाणि यतिपर्ययो वेंशतः, द्वावपि चोत्कृष्टतो देशोनपूर्वकोट प्रमाण । आगमद्वारे; अपूर्वागमं स नाऽधीते, यस्मात्तं कल्पमधिकृत्य 卐 प्रगृह तो चतयोगाराधनत एव स कृतकृत्यतां भजते, पूर्वा तं तु वेश्रोत सकाक्षयनिमित्तं नित्यमेवैकाग्रमनाः सम्यक् प्रायोऽss नुस्मरते। दद्वारे-प्रवृत्तिकाले नपुंसकवेदःपुरुषवेदे वा भवेत् , न रू वेदः, स्त्रयाः परिहारविशुद्धिककल्पप्रतिपत्त्यसम्भवात् । अतिनयमधिकृत्य पुनः प्रतिपन्नश्चिन्त्यमानः सवेदो भवेदवेद वा, तत्र सवेदःणिपतिपत्त्यभावे उपशमश्रेणिपतिपत्त वा क्षपक णिप्रतिपत्त ववेद' इति । कल्पद्वारे स्थतकल्प एवायं, नास्थितकल्पे 'ठइकप्पम्म व नियमा" इाते वचनात् , 卐 तत्राचेलक्यादिषु दशखपि स्थानेषु रे स्थिताः साधवस्तत्कल्पः स्थितकल्प उच्यते, ये पुनश्चतुर्पु शय्यातर पण्डादिष्वस्थतेषु कल्पेषु स्थताः शेषेषु चाऽऽचेलक्यादिषु षट्स्वस्थिताः तत्कल्पोऽस्थितकल्पः । लिङ्गद्वारे-नियमतो द्विविधेऽपि लिङ्गे भवति, तद्यथाद्रव्यलिङ्गे भावलिङ्गे च, एकेनाऽपि विना विवक्षितकल्पोचतसामाचार्ययोगात् । लेश्याद्वारे-तेजःप्रभृतिकासूत्तरासु तसृषु विशुद्धासु लेश्यासु परिहारविशुद्धिकं कल्पं प्रतिपद्यते, पूर्वप्रतिपन्नः पुनःसर्वास्वपि कथञ्चिद्भवते, तत्रातरास्वविशुद्धलेश्यार 卐 नात्यन्तसंक्लिष्टासु वर्त्तरे, तथाभूतासु वर्तमानो न प्रभूतं कालमवतिष्ठते, के स्तोकं, यतः स्वर्यवशाज्झटत्येव ताभ्यो- 卐 व्यावर्त्तते, अथ प्रथमत एव कथं प्रवर्त्तते १ कर्मवशात् । ध्यानद्वारे-धर्मध्यानेन प्रवर्त्तमानेन परिहारविशुद्धिकं कल्पं प्रतिपद्यते, पूर्वप्रतिपन्नः पुनरातरद्रयोर पे भवति, केवलं प्रायेण निरबन्धः। गणद्वारे-जघन्यतस्त्रयो गणाः प्रतिपद्यन्ते, उत्कर्षतः ys शतसङ्ख्याः । पूर्वप्रतिपन्ना जघन्यत उत्कर्षतो वा शतशः । पुरुषगणनया जघन्यतः प्रतिपद्यमानाः सप्तविंशतिः, उत्कतिः 卐 A 卐 N A T G A 卐 A T ज L V ज A 卐 A चा N an S भनवतच- उमङ्गला- टकायां- संवरतत्ते परिहार- विशुद्धि- पारित्रम् । १ - ॥१०॥ . 卐 सहस्रं । पूर्वप्रतेपन्नाः पुनर्जघन्यतः शतशः उत्कर्पतः सहस्रशः। अन्यच्च यदा पूर्वप्रतिपन्नः कल्पमध्यादेको निर्गच्छति अन्यः प्रविशति तदोनप्रक्षेपे प्रतिपत्तै कदाचिदेकोऽपि भवति पृथक्त्वं वा । अभिग्रहद्वारे-अभिग्रहाश्चतुर्विधाः, तद्यथा- द्रव्या भग्रहाः क्षेत्राभिग्रहाः काला भेग्रहाः भावभिग्रहाश्च विचित्रा भवन्ति, तत्र परिहारविशुद्धिकस्येसेऽभिग्रहान भवन्ति, यस्मादे- परेच कल्प एव यथोदितरूपोऽभिग्रहो वर्त्तते । प्रव्रज्याद्वारे-नासावन्यं प्रवाजयति कल्पस्थितिरेप इति कृत्वा । उक्तञ्च पञ्चाइए न एसो अन्नं कप्पट्टिइत्ति काऊणं' । उपदेशं युनर्यथाशक्ति प्रयच्छति मुंडापनद्वारेऽपि नासावन्यं मुण्डापयति, : अथ -त्रिज्याऽनन्तरं नयमतो मुण्डनमित प्रव्रज्यातहणे व तद्गृह तमिति निमर्थ पृथगूद्वारं? तदयुक्तं, प्रव्रज्याऽनन्तरं निय- तो मुंडनस्याऽसंभवात् , अयोग्यस्य कथञ्चिद्दत्तायाम पिप्रवज्यायां पुनरयोग्यतापरिज्ञाने मुंडनायोगादतः पृथगदं द्वारमिति । नायश्चित्त वधिद्वारे-मनसाऽप सूक्ष्ममप्यतिचारमापनस्य नियमतश्चतुर्गरुकं प्रायश्चित्तमस्य, यत एप कल्प एकाग्रताप्रधानस्त- सरसङ्गे गुरुतरो दोप इति । कारणद्वारे कारणं नामालम्बनं तत्पुनः सुपरिशुद्धं ज्ञानादिकं तचास्य न विद्यते येन तदाश्रित्याऽ- पवादपदविता स्यात् , एप हे सर्वत्र नरपेक्षः क्लिप्टकर्मक्षयनिमित्तं प्रारब्धमेव स्वं कल्पं यथोक्तविधिना समापयन्महात्मा वर्तते । निष्प्रतिकर्मताद्वारे-एप महात्मा नष्प्रतिकर्मशररोऽक्षिमलादिकमपि कदाचिन्नापनयति, न च प्राणान्तिकेऽपि व्यसने सापतिते द्वतीयपदं सेवते । भिक्षाद्वारे-भक्षाविहारक्रमश्चास्य तृतीयस्यां परुष्यां भवति, शेषार च पैरुप कायत्सर्गः, निद्राऽप चाऽस्य अल्पाद्रष्टव्या, यदि पुनः कथमपि जवावलमस्य परिक्षणं भवति तथाप्येकोऽविहरनपि महाभागोन द्विरीय- पदमापद्यते, किन्तु तच यथाकल्पमा ययोगान् वैदधात । एरे च परिहारविशुद्धिका द्विविधाः, तद्यथा-इत्त्वरा y A 卐 N ध T " Pr 卐 A V L ॥१०१॥ A A 卐 卐 S N U A V A A N hi यावत्काथकाच, तत्र से कल्पसमाप्त्यनन्तरमेव कल्पं गच्छं वा सम्पयास्यन्ति रे इत्वराः, ये पुनः कल्पसमाप्त्यनन्तरमव्यव- 卐 धानेन जिनकल्पं प्रतिपत्स्यन्ते रे यावत्कथिकाः। उक्तञ्च ' इत्तरियथैरकप्पे जिणकप्पे आवक हेयत्ति' । अत्र स्थविरक- ल्पग्रहणमुपलक्षणं स्वे कल्पे वेत द्रष्टव्यम् । तत्रेचराणां कल्पप्रभावाद्देवमनुष्यतर्यग्योनिककृता उपसर्गा सद्योघातिन 5 आतङ्का अतीव विषयाश्च वेदना न प्रादुःपन्त, यावत्कथिकानां संभवेयुरपि, ते हि जिनकल्पं प्रतिपत्स्यमाना जिनकल्पभाव- M 95 मनुविदधति, जनकल्पकानां चोपसर्गादयः संभवन्तीति । उक्तश्च-' इत्तरीयाणुवसग्गा आयका वेयणा न हवंते । आवक हयाण भइया' इति । 卐 'सुहुमं तह संपरायं च ' इत, तत्र संगरैति पर्यटति संसारमनेनेति संपरायः क्रोधादिकपायः, सूक्ष्मो लेभंशमात्राव- 卐 शेषतया सम्परायो यत्र तत्समसंपरायम् । इदमपि ससंक्लिश्यमानक वशुद्ध्यमानकन्दावधा, तत्रोपशमश्रेणं प्रच्यवमा- 卐 नस्य संक्लिश्यमानकं, रेणिमारोहतो वशुद्धयमानकम् । 卐 तत्तो य अहक्खायं खायं सर्वम जीवलोगम्मि' इत, ततः सूक्ष्मसंपरायचारित्रानन्तरं सर्वस्मिङवले के अक- 卐 卐 पायत्त्वेन ख्यातं प्रसिद्ध अथाख्यातं चारित्रं भवति, अथ शब्दोज याथातथ्ये, आङ् अभिविध, आसमन्ताद्याथा- तथ्टेन ख्यातं कषायोदयाऽभावतो नर तचारत्त्वात् पारमार्थिकरूपेण ख्यातमथाख्यातमिति । 'जं चरिऊण सुबिहिया- 卐 वचंत अयरामरं ठाणं' इति यदथाख्यातचारित्रं चरवा एकाग्रप्रणिधान्नाराध्य सुविहिताः सम्यग्दर्शनज्ञानचरणाराध- नपरा जनाज्ञानुयायिनोऽजरामरं जन्मजरामरणव जैतं महानन्दपदं व्रजन्ति गच्छदं त्यर्थः एतदी उपशामकक्षपकापेक्षया 卐 卐 - T G A - + T L V A A ज ध N ध S 卐 संवरत यथा- 卐 M ख्यात- ॐ चारित्रम् ॥ A A T 卐 नवतत्त्व- A द्विविधं, उपशमश्रेणी प्रपन्नस्योपशान्तमोहगुणस्थानकवर्तिनः सर्वथा कपायाणासुपशान्तत्त्वादुदयाभावादान्तर्मुहूर्त स्थतिक- उमगला- 卐 मथाख्यातचरित्रम् । क्षपकश्रेणिं प्रतिपन्नस्य क्षीणमोहादिगुणस्थानकवर्तिनः कषायाणां सर्वथा दणत्वादुदयाभावाजघन्यत टकायं- V आन्तर्मुहूर्त स्थतिकार्ल नमुत्कृष्टतश्च देशोनपूर्वकोटप्रमाणमथाख्यातचरित्रं भवति, अत्र द्वि विधेऽप चारित्रे कपायाणामनुदया- १०२॥ ॥ दथाख्यातत्वं भवति, परं प्रथमं कषायोदयाऽपेतमप सत् सत्तायां कषायाणामस्तित्त्वात् रेणिप्रतिपातकालेऽधस्तन्यगुण- स्थानेषु उपशमक्रमेण कषायाणामुदयात् प्रतिपात, द्वितीयञ्चायतपात, कपायाणां सर्वथा क्षणवादप्रतिपाताच्च क्षपकश्रेणित y इत । अथवोपशान्तमोह-६ णमोहगुणस्थानयोः छद्मस्थत्त्वात् तत्रस्थं अथाख्यातचारित्रं छद्मस्थाऽथाख्यातचरित्रम् , सयोगि- केवल्ययोगवल्यवस्थायां तु केवलियथाख्यातचारित्रमित द्वैविध्यमपि । ननु 'जं चरऊण सुविहिया वचंत अयरामरं 卐 ठाणं' इत्यनेन तु प्राग्व्यावणेतस्वरूपाणां सामायिकादिचारित्राणां वैफल्यं प्रजायते, पुनरैदंयुनमुनवराणां तत्तत्सामा य- कादिचारित्राचरणसंगतलोच-विहारादिकष्टानुष्ठानमपि नष्फलत्वं याति, यतः कालमहिम्नैव परिहार विशुद्धिक-सूक्ष्मसंपराय- अथाख्यातसंज्ञकाः संयमभेदाः साप्रतं न वर्त्तन्ते, साधवश्व मोक्षार्थ यतन्ते, मोक्षश्च प्रागुक्तरेत्या अथाख्यातचरित्रसाध्यः, तस्य च दुःपमारकदोपात् सांप्रतमभावः, ततः कथंकारमैदंयुग्नमुन्नां सामायिकादिनां सफलत्त्वं सङ्गच्छते ? अत्रोच्यते- 卐 यद्यपि मोक्षावाप्तिस्तु दणकषायाथाख्यातचारित्रेणैव, नाप्युपशान्तकपायाथाख्यातसंयमेन तथापि सामायिकादचारित्राणा- v मात्मगुणप्रासादारोहणे सोपानकल्पत्त्वान्न तेषां निष्फलत्वम् , यथा सर्वथा प्रासादधिरोहणं तु नःशेषसोपानमालाधिरोहणेन जायते, परं सर्वसोपानाधिरोहणसामथ्यऽभावे यावन्ति सोपानान्यधिरूढानि तावन्ति मूलसंख्याते ईनानि भवन्ति, एव- 卐 N A 3 G T A 卐 L ध A ॥१०२॥ A 卐 S N 卐 U A जी 卐 y A 卐 T मत्रापि द्रष्टव्यम् , यावानात्मगुणाविर्भावो जातस्तावानधिरोहणाऽऽयासस्सफल एव, सिद्धान्तेऽपि सामायिकादीनां संयमानां प्राप्तिः प्रायः क्रमश एव प्रतिपादिता, यतो मथ्यादृष्टयोऽपि केचन अन्तर्मुहूर्ताऽनन्तरं मोक्ष प्रतिपद्यन्ते तेऽपि क्षायोपशमिक- भावयुक्तसामायिकचारित्रावाप्त्यनन्तरं क्रमशः सूक्ष्मसंपरायमथाख्यातसंयमं प्राप्नुवन्ति, एत्न पखण्डाधिपभरतचक्रीदृष्टान्त- प्रतिपादनपुरस्सरं सामायिकादीनां निरुपयोगचं प्रजल्पतां वावदूकानां महामोहावर्त्तगर्तपतितानामज्ञाततत्त्वानां मतमपास्तं द्रष्टव्यमिति । चिरंतनाचार्यवरैरपि मेधाऽऽयुर्बलवैभवादिभिः समन्तात् परिर्ह यमाणेऽस्मिन् दुःपमाभिधाने करालकाले बाहुल्येन बकुशकुशीलसंज्ञकं चारित्रं प्रतिपादितं, सेवासंहननोपेतत्त्वात् सांप्रतकालीनसाधूनां, कुतस्सूक्ष्मसंपरायादीनां सम्भावनाऽपि । अत्र प्रसङ्गसङ्गतेः पुलाकबकुशादीनां नामग्राहं लेशतो वर्णनं लख्यते-पुलाको बकुशः कुर्शलो निम्रन्थः स्नातक इत्येते पञ्च निर्ग्रन्थविशेषा भवन्ति । तत्र धर्मेपकरणादृते परित्यक्तवाद्याऽभ्यन्तरोपधयो निर्ग्रन्था इति निर्ग्रन्थसामान्यलक्षणं, अथ प्रत्येकमुच्यते-जिनोक्तादागमात् सततमप्रतिपातिनो ज्ञानानुसारेण क्रियाऽनुष्ठायनो लब्धिमुपज वन्तो निन्थपुलाकाः, बकुशः शवलः कर्बुर इत्यर्थः, शरीरोपकरणविभूपावर्तितया शुद्ध्यशुद्धिव्यतिकीर्णचरण इति, मोहन्यक्षयं प्रति प्रस्थिताः शरीरो- पकरणविभूपाऽनुवर्तिनः निर्ग्रन्थवकुशाः, तत्र शरीरे करचरणवदनप्रक्षालनमक्षिकर्णनासिकाद्यवयवेभ्यो विदूषिकामलाद्यपनयनं दन्तधावनलक्षणं केशसंस्कारं च देहविभूषार्थमाचरन्तः शरीरवकुशाः, उपकरणवकुशास्तु अकाल एव प्रक्षालितचोलपट्टकान्तर- कल्पादिचोक्षवासः प्रयाः पात्रदण्डकाद्यपि तैलमात्रयोज्ज्वल कृत्य विभूपार्थमनुवर्तमाना विभ्रति, उभरेऽपि च ऋद्धियशस्कामाः, तत्र ऋद्धिं प्रभूतवस्त्रपात्रादिकां ख्यातं च गुणवन्तो विशष्टाः साधव इत्यादिप्रवादरुपां कामयन्ते, सातगरवमाश्रिताः नात- 卐 A 卐 N G A 卐 T A 卐 L V 卐 A १८ A 卐 卐 S N 卐 भनवतत्त्व- 卐 A संवरतत्त्वे पसंहारः उमाला- 卐 टकायां- V ॥१०३॥ 卐 A ॐ T वाहोरात्राऽभ्यन्तरानुष्ठेयासु क्रियास्वभ्युद्यताः सर्वदेशच्छेदा ितचारजनितशबलत्वेन युक्ता इत्यादिस्वरूपा नर्ग्रन्थबकुशाः । तथा कुत्सितं उत्तरगुणप्रतिषेवया सवलनकपायोदरेन वा दूपतत्त्वात् शलं अष्टादश लाङ्गसहस्रझेदं यस्य स कुशल इति, एतेऽप द्विविधाः, प्रतिसेवनाकुशलाः कपायकुर लाच, तत्र रे नैर्ग्रन्थ्यं प्रति प्रस्थिता अनियतेन्द्रियाः कथञ्चित् कञ्चि- देवोत्तररणेषु पण्ड वशुद्धसमितभावनातपःप्रतिमाभिग्रहादिषु चराधयन्तः सर्वज्ञाज्ञोल्लङ्घनमाचरन्त ते प्रतिसेवनाकुशलाः, येषां तु संयतानाम पे सतां कथञ्चित्सङ्ख्वलनकपाया उदर्यन्ते ते कपायकुर लाइत । निर्गतो ग्रन्थान्मोहन्याख्यात् नम्रन्थः ६णकषाय उपशान्तकषायो वा, तिरागच्छद्मस्था योगसंयमलक्षणेर्यापथप्राप्तास्ते नम्रन्था इत्यर्थः । क्षालितसकलपतिकर्म- मलपटलत्त्वात् स्नात इव स्नातः स एव स्नातकः, सयोगाः शैलेश प्रतिपन्नाश्च लेवलिनस्नातका इत्यर्थः। उक्तस्वरूपाणां सामायिका दचारित्राणां कयन्त गुणस्थानकाने तत्प्रदश्यते-सामायिकचारित्रं प्रमत्तगुणस्थानका- दारभ्य चतुर्दशगुणस्थानं यावत् , छेदोपस्थापन यं प्रमत्ताऽप्रमत्तगुणस्थानसङ्गतं, परिहार विशुद्धिकमपि तथा, सूक्ष्मसंपरायाऽऽ- ख्य सूक्ष्मसंपरायगुणस्थानवनि, अथाख्यातं उपशान्तमोहादिषु चतुर्पु गुणस्थानलेषु वर्त्तत इत॥ कालपरिमाणं तु तत्तच्चारित्र- व्याख्याप्रसङ्गे प्रायः प्रदर्शतमेवातो भूयो न लख्यते ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ एवं संवरतत्त्वस्य सप्तपञ्चाशझेदान् संक्षेपतो वर्ण य- त्वा गत्यादिमार्गणासु कयन्तो भेदा इति दग्दर्शनं वधीयते-तत्राद नरकगत्यां समिति-गुप्ति-पर पह-यतिधर्म-चारित्रा- णामभावात् लेवलमनित्यादिद्वादशभावनाखरूपसंवरभेदाः पाश्चित्सम्यग्दृष्टिनारकाणां वर्तन्ते नाऽन्ये, यतो समित्यादय भेदाः सर्वविरतस्वाईनाः, न च नरकगत्यां सर्ववरतिरते समित्यादीनां तत्राऽभावः ॥ तिर्यग्गतावपि तथैव द्वादशभेदाः, 卐 A 卐 N 卐 A ज T 卐 G 卐 A 卐 ज V 卐 A ॥१०३। 卐 एत स 卐 N S 卐 卐 A 卐 V A यद्यपि अत्र देशविरः सद्भावादपेक्षया समित्याद्यन्तर्गता भेदाः केचिदागच्छन्त परं विरटेरल्पत्त्वादत्र न विवक्षिता इति देवगत तथैव द्वादशभावनाझेदाः। महजगत्त्यां सर्वरतिसद्भावात् सप्तपञ्चाशदपि घटन्ते॥ एकेन्द्रियमार्गणा संवरमेदशून्या, यतो देशसर्वसंयमाऽभावात् , समित्यादयो मैदास्ट न सन्त, परं मन योगाऽभावाद् भावना अपे न वर्तन्त इति । एवं द्वन्द्रय-न्द्रिय-चतुरन्द्रयमार्गणास्वप्ह्यम् । पश्चेन्द्रियमार्गणायां गर्भजमजमाश्रित्य पञ्चाशदपि ॥ कायमार्गणा- श्रत्य पृथ्व्यप्तेजोवायुवनस्पतिमार्गणास्टेलेन्द्रियवत् , जसकायमार्गणायां पञ्चेन्द्रियमार्गणावत् सप्तपश्चाशदत, एव- मन्यास्वप मार्गणार स्वधिया परभावन्यमित संवरतत्त्वं समाप्तम् । महानन्दपदाऽवाह-निमित्तसंवरसुभेदव्याख्यातः । सद्योऽस्तु श्रमणसङ्घ संवरवरभक्तहेवाकः । १। इति संविशशाखीय-विद्वद्धृन्दावतंस-कुमतध्वान्ततरण-मुनिचक्रचूडामणि-तपागच्छगगन देनमणे-श्रीमन्-मुक्तिविजय (अपरनाम मूलचन्दजी ) गणिपादपद्मचञ्चरीक-सर्वशशासनगभस्तमाल-निरवद्यचारित्रशाल-तपागच्छाचार्यपुरन्दरश्रीमद्विजयकमलसू- रीश्वरपट्टोदयाद्रसहस्रांशु-अप्रमेयप्रभावप्रवचनप्रवीणचेतस्काऽनवद्यसंयमसेवाहेवाक-व्याख्याप्रशाऽऽचार्यवर्यश्रीमद्विजय- मोहनसूरीश्वर वनेयरत्न-गोतार्थवर-पाठकप्रवरोपाध्यायपदाऽलङ्कृतश्रीमत्प्रतापविजयगण शिष्याणुप्रवर्तकमुनिश्री- धर्मविजयविरचितायां नवतत्त्वप्रकरणस्य सुमङ्गलाटीकायां षष्ठं संवरतत्त्वं समाप्तम् ।। 卐 A 卐 N 卐 T श्र A 卐 卐 T 卐 V 卐 A 卐 L N 卐 A ज S > 卐z卐 卐 U नर्जरा- नवतत्त्व- तच्च- 卐 卐 V अथ निज M प्रारम्भः॥ ॥१०४॥ A 卐 T र्टकायां- Cre 卐 A ज्ञानं मोहमहान्धकारलहर संहारसूर्योदयः, ज्ञानं दुर्जयकर्मकुजरघटापश्चत्त्वपञ्चाननः॥ 卐 जवावविवेक विस्तरविधौ ज्ञानं परं लोचनं, मत्यादिप्रविभेदपञ्चकयुतं ज्ञानं समाराध्यताम् ॥१॥ N नूतनकागम निरोधलक्षणं सप्तपश्चाशद्भेदभिन्नं संवरतत्त्वं समाख्याय क्रमाऽऽयातं पुरातनकर्मक्षय पायभूतं निर्जरातत्त्वं ॥ A व्याचिख्यासुराचार्यों नर्जराभेदमात्रप्रतिपादिकां 'बन्धाऽविनाभाविन निर्जरा' इति विज्ञायाऽवसरसङ्गतं अग्रे वक्ष्यमाणस्वरूपं ज प्रकृतिस्थितिरसप्रदेशाऽऽत्मकचतुर्भेदभिन्नं वन्धतत्त्वं च प्रतिपादयन्ती गाथां रचयति:- ध T बारसविहं तवो न-जरा य बन्धो चउविगप्पो य। पयइ ठेइ अणुभाग-पएसभेएहिं नायव्वो ३४॥ 卐 १ ग्रन्थप्रणालिसरक्षणार्थमयं क्रम उपादत्तः, अन्यथा ' अणसणमुणोयरिया, पायच्छित्तं विणओ' इति गाथाद्वयव्याख्याना- नन्तरमियं गाथा व्याख्येया इति ॥ 卐 卐 A V L ॥१०४॥ A A ए us । NI 卐 A टी V 卐 卐 T N 卐 -'बारसविहं 'त्ति-निर्जरा द्वादशवधा, सा च तपोलक्षणा 'अणसणमूणोयरिया' 'पायच्छित्तं वणओ' इत्यादि गाथाभ्यां वक्ष्यमाणस्वरूपा, बद्धानामेव कर्मापुद्गलानां निर्जरा आत्मप्रदेशेभ्यः परिशाटो नत्त्ववद्धानामति कशे बन्धः 卐 के वकल्पक इति शष्यपरिप्रश्नसमाधानार्थमाह-'बन्धो चउविगप्पो य'त्ति, आत्मप्रदेशैस्सह मिथ्यात्वादिनिमित्तोपात्तानां कर्मपरमाणूनां वरनीरवद् वह्नययःपिण्डवद्वाऽदलक्षणसम्बन्धो बन्धः, स च चचारो विकल्पाः प्रकारा यस्येति चतुर्विकल्पः 卐 चतुर्भेदभिन्नः, के च ते चतुर्भेदा इत्याह-'पयइ' इत्यादि, प्रकृति-स्थति-अनुभाग-प्रदेशभेदैस्स बन्ध ज्ञातव्य इति गाथाऽ- A क्षरार्थः ॥ विस्तरार्थस्त्वयम् ;-निर्जरा नाम अनुभूतरसकर्मपुद्गलानामात्मप्रदेशेभ्यः क्रमेण परिशाटः, अयं च द्विधा भवति विपाकोदयतः प्रदेशोदयतश्च, तत्र विपाकोदयो रसोदयोऽनुभागोदय इति पर्यायाः, विपाकोदयो नाम मिथ्यात्वादिभिर्बन्धहेतु- भिरुपचितानां बन्धकालसहचारिकषायलेश्याविशेषनियमितजघन्योत्कृष्ट स्थतिटीवमन्दानुभावानां योगानुसारसंगृहीतप्रदेशानां 卐 दररवदात्मसात्कृतानां कर्मपुद्गलानां स्वाभाविकेनाऽऽवाधाकालक्षयेणोदरणाकरणेन वोदयावलिकाप्रविष्टानां रसोदयपूर्व- G कानुभवनं विपाकोदयः। प्रदेशोदयः स्तिबुकसङ्क्रमाऽपरपर्यायः-मन्दोदय इत्यर्थः । अनुदयप्राप्तायाः कर्मप्रकृतेर्यत्कर्मदलकं 卐 सजातीयप्रकृतावुदयप्राप्तायां समानकाल स्थित सङ्गमयति सङ्क्रमय्य चाड्भवति स प्रदेशाऽभवः, यथा मनुजगताबुदयप्राप्तायां A शेष गतित्रयं, एकेन्द्रियजात शेषजातिचतुष्टयमित्यादि । ननु मउजगरेकेन्द्रियजातेश्च यदा विपाकेदयस्तदा शेपस्य गतित्र- 卐 यस्य जातिचतुष्टयस्य च प्रदेशोदय उक्त इति ज्ञातं परं तस्यैव गतित्रयस्य जातिचतुष्टयस्य च तदा कथं न विपाकोदयः ? इति चेदुच्यते;-वपाकोदयो द्विधा निरुध्यते, भवप्रत्ययतो गुणप्रत्ययतश्च, भवप्रत्ययतो यथा मनुजगत्यां विपाकेदयवत्याम- 卐 卐 卐 T 卐 L 卐 A A y

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निर्जरातत्त्वे
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॥१०५॥
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न्यगतित्रयस्य वैपाकोदयमाश्रित्य रोधः, न चैक स्मन् भने द्वयोर्गत्योर्वेपाक दोन भवितव्यमिति, एवमेलेन्द्रियजालंदा
विपाकोदयस्तदा शेषजतिचतुष्टयस्य चेपाकोदयमपेक्ष्य रोधः। गुणप्रत्ययते यथा-क्षयोपशमसम्यक्त्वावस्थायां मथ्याचमो-
होयस्य वपाकोदयमडलक्ष्य रोधः। उभयत्राऽपि यस्य वपाकोदयस्तं वनाऽन्येषां प्रदेशोदयः। असत्कल्पनया यथा शतस-
मयप्रमाणाया मजगते.पाकोदयो वर्त्तते, अत्र यदोदयावलिकाप्रथमसमयवर्त्तिकणिवो वपाकोदयमायान्ति तदा तत्स-
मकालमेव सत्तायां गतस्य वपाकोदयकालमप्राप्तस्यावशेषस्य गतित्रयस्याऽपि प्रथमसमयगता कर्माणवः स्वानुभागमप्रदर्य
पूर्वेक्तवपाकोदयवन्मनुजगतिप्रथमसमयगतकर्माणुभिस्सहोदयमायान्ति, अतस्तेषां त्रयाणां प्रदेशोदयो मजगतेश्च विपाको
दयः, एवमन्यत्राप्यूह्यम् । एतेन सङ्क्रमादिभिः पतगृहप्रकृतिसमानपरिणामानन्तरं सङ्कमावलिकामतत्य यथा सङ्क्रान्तप्रकृरीना-
मुदयो बन्धान्यरूपेण सज्जायते न तथा प्रदेशोदयावस्थायाम् । न च क्षयोपशमसम्यक्त्वावस्थायां मिथ्यात्त्वमोहन्यस्य यत्र
प्रदेशोदयस्तत्र सर्वस्वघात्यगुणघातनस्वभावानां मिथ्यात्वमोहन यसघातिरसस्पर्धकानां प्रदेशोदयेऽपि कथं जनाज्ञारुचि-
वादिसम्यक्त्वगुणानामाविर्भाव इति वाच्यम् , तेषां सर्वघातिरसस्पर्धकप्रदेशानामध्यवसाय विशेपेण मनाग्मन्दाजुभाईकृतविर-
लवेद्यमानदेशघातिरसस्पर्धकेष्वन्तःप्रवेशितानां यथास्थितस्वबलप्रकटनासमर्थत्वात् सम्यक्त्वगुणाविर्भाव न काचिद्विप्रतिपत्तिः,
प्रदेशोदयेन सह तद्गतरसस्य वेदनेऽी रसस्य सूक्ष्मत्त्वात् , भक्षितैलाफलस्य कदल्यादेवकाराऽभाववदिति । गुणसङ्कमादिभेः
सङ्क्रम्यमाणाः कर्मपरमाणवः सर्वथा यथा पर ( पतद्ग्रह ) प्रकृतितया परिणमय्य पर (पतद्ग्रह) प्रकृतिव्यपदेशमश्नुवते,
न तथा स्तबुकसंक्रमेण सङ्क्रान्ताः कर्माणवः सर्वथा परप्रकृतिटन व्यपदिश्यन्ते, केन्तु स्वव्यपदेशं रक्षित्वैव प्रागेवेदयवर-
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॥१०५॥

S 卐 N 3 A 卐 V ध U ध A 卐 T स्वजारीयप्रकृतेः स्थत्या समानां स्थितें विधाय तत्सम स्थतिकायाः स्वजात्यपरप्रकरेः विपाकेदरेन सह पमुज्यन्रे केचित्तु प्रदेशोदयमापन्नेषु कर्मसु केवलं प्रदेशानासुदय इति प्रदेशेदय इति विग्रहमाश्रित्य रसाभावं मन्यन्ते परमसतं तद् प्रदेशे- दयावस्थायामपि रससद्भावोऽवश्यं विद्यते, अन्यथा क्षयोपशमसम्यक्त्वाऽवस्थायां मिथ्यात्त्वमोहन्यस्य प्रदेशेदयः, सम्यक्त्व- मोहन्यस्य च विपाकोदयः कथं संघटते ? न च सम्यक्त्वमहिन्यस्य चपाकेदयान् मथ्यात्वमहन्यस्य प्रदेशदयो भन्न- काल नः, यदा सम्यक्त्वमोहन्यस्य वपाकोदयः तदैव मथ्यात्त्वमोहन्यस्य प्रदेशदयः, तस्यां चाऽवस्थायां रसो वेद्यते "तं कालं की यठई, तहाणुभागेण देसघाइत्थ । सम्मत्तं समिस्सं मच्छत्तं सव्वघाई" ॥१॥ इति कर्मप्रकृतिवचनात् । यत्- स्वरूपेण या प्रकृतिद्धा तत्स्वरूपेण स्वविपाकमप्रदर्य उदयवत्या समानकाल स्थतिकया प्रकृत्या सह यद्वेदनं स प्रदेशेदय इत्याशयः, अत्र बहुचर्चा, परमप्रस्तुतत्त्वाद् विस्तरभयाच न चर्च्यते, जिज्ञासुभिः कर्मप्रकृतपञ्चसङ्ग्रहादय विलकन्याः। अथ प्रकृतम स्रयते-एवं पूर्वोक्तर त्या प्रदेशोदय विपाक दयाभ्यां जायामाना निर्जरा सकामाऽकामदाभ्यां द्विविधा, यद्यप्युभयत्र कर्मपरिशाटस्तथापि वक्ष्यमाणत्या कारणभेदात् कार्य दो ज्ञेयः। तत्र सह कामेन वर्तत इत सकामा, 'अनेनाऽनुष्ठानेन तपसा वा मे कर्मक्षयो झ्याद्' इतिलक्षणाऽभलापा यस्यां सा सकामा सम्यग्दृष्टिदेशविरतसर्ववर- तादीनाम् । अकामा तु कर्मक्षयलक्षणफल निरपेक्षा सम्यग्दृष्टिव्यतिरिक्तानामेकेन्द्रियाद नां विडेया, तथाह;-एजेन्द्रियाः पृथिव्यादयो वनस्पतिपर्यन्ताः २तष्णवर्षाजलाग्निशस्त्राद्यभिघातच्छेदभेदादिनाऽसद्धेद्यं कर्मानुभूय नरसं कर्म स्वाऽऽ- त्मप्रदेशेभ्यः परिशाटयन्ति, विकलेन्द्रियाच क्षुत् पिपासा तोष्णादिभिः पञ्चेन्द्रियतिर्य च छेद ददाहशस्त्रादिभिः, नारकाच 卐 N 卐 A G 卐 卐 T A V L 卐 卐 A +13 क S N 卐 A सकामा- 卐 V M 卐 राचम् ॥ A A T N 卐 शेनवतत्त्व- त्रिविधया वेदनया, मनुष्याच क्षुत्पिपासाव्याधिदारियादिना, देवाश्च पराभियोगकिल्विपत्वादिनाऽसवेद्यं कर्माऽनुभूय स्वप्रदे- निर्जरा- सुमङ्गला देशेभ्यः परिशाटयन्ति, इत्येषामकामनिर्जरा, निर्जरायां सत्यामपि निर्जरायाः परम्परस्य मोक्षफलस्य नावाप्तिरित्यकामा । 卐 टकाय इयमेव द्वभेद भन्ना निर्जरा तत्त्वार्थादिपु संज्ञान्तरेण व्याख्याता, तद्यथा-अबुद्धिपूर्वा कुशलमूला च, तत्र बुद्धिः कर्म शाट कामनिर्ज- याीत्येवंलक्षणा पूर्वा आदं यस्यामिति बुद्धिपूर्वा, न बुद्धिपूर्वा अबुद्धिपूर्वो, इयमबुद्धिपूर्वो नरकादिपु कर्मपरिशाटलक्षणा- ॥१०६॥ निर्जराऽवद्यतोऽनुचिन्तन् या, नह तादृशा निर्जरया मोक्षः शक्योऽधगन्तुमिति, यस्मादुपभुज्याऽपि तत् कर्मफलं पुनर्वन्ध- कत्त्वात् पुनः संसृतावेव भ्रमितव्यम् । यतोऽवुद्धिपूर्टिकायां नर्जरायां नहि नारकादिभिः तपः पर पहजयोवा मन पत इति। 卐 शाटयामि तपसा पर पहजयेण वेत्यात्मिका बुद्धिः पूर्वा यस्यां सा कुशलमूलाभिधाना, कुशलं क्रमेण महानन्दपदप्राप्ति- 卐 लक्षणं मूलं यस्या इत्यर्थः, सा च कुशलमूलाभिधाना शुभाडवन्धन निरनुवन्धिन वा, यतस्तादृशो वपाकः शुभमनुवध्नाति 卐 निर्जरां च विधत्ते, शुभाऽनुवन्धश्च अमरेपु तावदिन्द्रसामानिका दिप्राप्तिलक्षणः, मनुजेषु च चक्रवर्तेबलदेवमहामण्डलिका द- पदानि लब्ध्वा पुन्यानुवन्धिपुन्यत्वात् पारम्पर्येण मुक्तलाभस्वरूपः तपःपर पहजयकृतो वपाकः सकलकर्मक्षयलक्षणः निर- 卐 T नुवन्धत्त्वात् साक्षान्मोक्षायैव जायते । ननु च यदि बुद्धिपूर्वा शुभाबन्धन निर्जरा देवादिफलप्रदायिी तत आगमेन सह 卐 विरोधः 'नो इह लोगट्टियाए तवम हटेजा ' इत्यादि दशवैका लकवचनप्रामाण्यात्, भण्यते, नैवं, यतो न मुसुक्षुणा देवा 卐 दिफलमिष्टं, स ह तु मोक्षार्थमेव घटते, यदन्तरालिकं फलं देवत्वाद तदानुपङ्गिकम् इक्षुवनसेले तृणादिसेकवत, मनीपितं L 卐 तु तेन तपःपरेपहजयाभ्यां मोक्षः प्राप्य इति । ननु सकामाऽकामझेदाभ्यां क्षयमुपगतानां कर्मणां सत्यपि बन्धसादृश्टे ॥१०६॥ A G A /.../ Fu N 卐 A V . S निवतत्त्व 'मलेकं द्वारम् । तथा 'द्रव्यप्रमाणं' द्रव्याणां प्रस्तुतानां सिद्धाख्यानामेव प्रमाणं प्रमितिः तद् द्वितीयं द्वारम् 'चः' प मेक्षतर U एमाला- सत्पदाद- 卐 समुच्चरे, तथा 'क्षेनं.' इति, गाथानुकूल्यार्थमनुस्वारस्य लोपः, 'टुक्षि निवासे' इतिवचनात् क्षयन्ति निवसन्त्यवगाहन्ते 卐 र्टकायं विद्रव्याणि यत्रेत क्षेत्रमाकाशम् , तच्च प्रस्तावात्सिद्धावगाहरूपं वाच्यम् , इदं तृतीयं द्वारम् । 'फुसणा य' इति स्पर्शना, द्वाराणि । M 'चः' समुच्चरे, सिद्धानां स्पर्शना वाच्येति चतुर्थम् क्षेत्रस्पर्शनयोश्चाऽयं विशेषः-यदवगाढं तत्क्षेत्रम् , यच्चानवगाढमपि स्पृष्टं 卐 १४४॥ 卐 A तत्र स्पर्शना तथा च परमाणुक्षेत्रस्पर्शनाविपये नियुक्तकृतोक्तं-" एगपएसोगाढं सत्तपएसा य से फुसणा" इति । काल: A 卐 साद्यपर्यवसितरूपः सिद्धानां वक्ष्यमाण इति पञ्चमं द्वारम् अन्तरं, व्यवधानं, तच्च सिद्धानामस्ति नास्ति त प्ररूपर्णयं 卐 T तत्पष्ठम् । ततो भागद्वार सप्तम, कतिथे भागे शेपजवानां सद्धा इति तथा भावः क्षायिकादिः, तन्मध्ये कस्मिन् भावे N ज सिद्धा इत्यष्टमं द्वारम् 'अल्पबहुत्त्वं चैव' पुंस्त्रं नपुंसकसिद्धापेक्षया तेपामल्पबहुत्त्वं चिन्त्यमिति नवममनुयोगद्वारमति । 卐 अत्राऽयमाशयः-' चउदसचउदस ' इति द्विदीयगाथायां ' नव या कमेणेसं ' इति प्रत न मोक्षस्य नव भेदा उक्ताः, G म यथा वाजवादितत्त्वानां चतुर्दशप्रमुखा भेदाः प्राक् प्रतिपादितास्तथा न इमे नव दा दत्त्वेन युक्ताः, अन त्वनुयोग- एक T द्वाराण्येव भेदा विज्ञेया इति । न केवलं मोक्षस्यैमान्यनुयोगद्वाराणि, केन्तु यस्य कस्यचिदपि सद्भूतपदार्थस्यानन्तरोक्तान सत्पदादिद्वाराणि व्याख्याङ्गानि । यथा शङ्करे पर:-के मेक्षेऽस्ति नास्ति वा ? यतोऽर्थापेक्षयाऽविद्यमाना अपि 卐 v शशविषाणवन्ध्यापुत्राकाशपुष्पप्रमुखाः शब्दा लेने प्रवर्त्तमाना दृष्टाः, वाच्यापेक्षया सद्भूता अप घटपटाद्याः शब्दाः १४४॥ प्र प्रवर्त्तमाना दृश्यन्ते, तत्किमयं मोक्षशब्दः सत्यर्थे उतासति प्रवृत्तः ? इत प्रश्नयते । आचार्य आह-अस्त मोक्षः शुद्धपदत्त्वा- - A A L A A 卐 卐 HEAm/ प N 卐 S ॐ A U ontenses.०ERSERea 0.90940 కాంత చటం y V 卐 A 卐 T स्थ नक्षत्त्व 卐 M 卐 A 卐 N . A यद्भावाऽमयनाशनं भवतरुच्छेदासिधारानिभम् , यच्चाऽशेपहर्षकदोषदमनं कामार्तिखेदापहम् । 卐 यस्माल्लब्धिनिधानसिद्धिवनिता आयान्ति स्वैरं वरा-स्तीर्थशैर्विहितं स्वयं निगदितं संराध्यतां तत्तपः॥१॥ वन्धविधानाऽनन्तरं 'मोक्खो कम्माभावो'' कृत्स्नकर्मक्षयान्मोक्षः' इत्यादिवचनाद् बद्धस्य कर्मणः सर्वथा क्षयः स 9 एव मोक्षः, इत्यतो निखिलसम्यग्दृष्टिसाध्यत्त्वाच सन्तिम मोक्षतत्त्वं वक्तुकामो ग्रन्थकारस्तद्विषयकनवानुयोगद्वार- T प्रतिपादिकां गाथामाह;- संतपयपरूवणया, दापमाणं च खित्त फुसणा य । काले अंतरभागो भाटे अप्पाबहु चेव ॥४३॥ टीका;-'संतपयपरूवणया' इति, सत्पदनरूपणमेव सत्पदप्ररूपणा, गत्यादिमार्गणाद्वारेपु सिद्धानां सत्तानिरूपण- 卐 卐 A V L - A A 卐 N 卐 S 卐 बन्धतत्त्दै U प्रदेश- 卐 च समर्थिरे समाप्तं वन्धत्तत्त्वम् ४२ । संख्याय बन्धतत्त्वं यदर्जितं भं मया तेन बन्धविधं विज्ञायाऽवन्धके भवतु भव्यधः। १॥ 卐 卐 बनवतत्त्व- A y र्टकायां- v 卐 १४३ A 卐 T 卐 A 卐 N 卐 G A इत्याराध्यपादाऽऽचार्यवय॑श्रीमद्विजयमोहनसूरीश्वरविनेयावतंसपाठकप्रवरोपाध्यायपदालङ्कृतश्रीमत्प्रताप- विजयगणिवरन्तिपत्प्रवर्तकमुनिश्रीधर्मविजयविरचितायां नवतत्त्वसुमङ्गलायामष्टमं बन्धतत्त्वं समाप्तम् ॥ A y T 3 L 卐 V ॥१४३), 1 A 卐 A म 卐 S. A U M - A A T एकैको ह्यात्मप्रदेशोऽनन्ताऽनन्तैः कर्मप्रदेशैर्बद्ध इत ७। 'अनन्ताऽनन्तप्रदेशाः' इति, अनन्ते राशं भूयोऽनन्तपुद्गलप्रक्षेपा- 卐 s दथवाऽनन्तराशिभूयोऽप्यनन्तेन गुणितोऽनन्तानन्त इते व्यपदेशम चुरे, रे चात्मन एकैकस्मिन् प्रदेशे ज्ञानावरणादिपुद्गला । अनन्तानन्तप्रदेशाः स्कन्धाः कर्मवर्गणायोग्या वध्यन्ते, अयोग्यास्तु नबन्धमुपयात ते ८ । प्रदेशवन्धविपयकोऽन्योऽप्यनुयोगो 卐 कर्मग्रन्थकर्मप्रकृत्यादिषु दृश्यते, तस्यायं संक्षेपः-इहाष्टविधवन्धकेन जन्तुना यदेनाध्यवसायेन विचित्रतागर्भेण गृहं तं दलिक तस्याप्ट भागा भवन्ति, सप्तविधवन्धकस्य सप्तभागाः, पवधवन्धकस्य षड्भागाः, एकविधवन्धकस्यैको भागः । तत्र यदा- 卐 卐 ऽऽयुर्वन्धकालेऽष्टविधवन्धको जन्तुर्भवति तदा शेषकर्म स्थत्यपेक्षयाऽऽयुपोऽल्पस्थितित्त्वेन गृहं तस्य तस्यानन्तस्कंधात्मककर्मद्रव्य स्यांशः सर्वस्ते कः, ततो नाम्नि गोत्रे च तुल्यस्थितित्त्वेन स्वस्थाने द्वयोरपि समो भागः, आयुष्कभागाऽपेक्षया विशेपाधिकः । 卐 ततो ज्ञानावरणदर्शनावरणाऽन्तरायाणां तुल्य स्थितिकत्त्वात् स्वस्थाने त्रयाणामपि समोऽशः, नामगोत्रापेक्षया विशेषाधिकः, ज्ञानदर्शनावरणान्तरायापेक्षया मोहन विशेषाधिकः, ततो दन्यस्य सर्वतो विशेपाधिकः । वेद यस्य कर्मणः स्थित्या 卐 卐 अल्पोऽपि भागस्य यत्सर्वतो विशेषाधिकत्वं तत्र के जमित चेदुच्यते-सुखदुःरकजननस्वभावं वेदनयं कर्म, तद्भावपरिण- ताश्च पुद्गलाः स्वभावात्प्रचुरा एव सन्तः स्वकार्य सुखदुःरकरूपं व्यक्त कत्तुं समर्थाः, शेषकर्मपुद्गलाः पुनः स्वल्पा अपि 卐 स्वकार्य निष्पादयन्ति । दृश्यन्तै च पुद्गलानां स्वकार्यजननेऽल्पबहुत्वकृतं सामर्थ्यवैचित्र्यं, यथा स्वल्पमपि वषं मारणादिकार्य 卐 v साधयति, लेष्टुकादिकं तु प्रचुरमित्येव महाप उपनयः कार्यः, वेद यमृते शेषाणामाटुष्कादीनां स्थित्यनुसारेण । भागस्य हनाधिक्यं विज्ञेयम् उत्तरप्रकृतनां भामस्य है नाधिक्यमन्यतोऽवस्यमिति । इत प्रदेशवन्धस्य संक्षेपः, तस्मन् 卐 N A G T A - 卐 A A 卐 शंनवतत्त्व- 卐>卐z! बन्धतन्द प्रदेश- र्टकायां- M बन्धः । V १४२ A ॐ A 卐 T y S ए सर्वदिक्प्रदेशैरिति ? २ सेपि बन्धः कं सर्ववानां तुल्यः आहोस्विन कुतश्चिनिमित्तादतुल्यः १३। कंगुणाः केवलाः, U पुद्गला बन्धास्पदं भवन्ति ? ४ । यत्र चाकाशदेशे व्यवस्थिताः पुद्गलास्तत्रैवावगाढा ये जवप्रदेशाः कं तेषामेव पुद्गलानां y तत्र बन्धः, आहोस्विईवप्रदेशावगाढगगनदेशव्यतिरिक्तप्रदेशवर्तिनेऽपि वध्यन्तै १५ किंवा स्थितिपरिणता वध्यन्ते अथवा गतिपरिणताः १६ रेच कमात्मना सम्प्रदेशेषु अथैकदेशे श्लष्यन्ति ? ७। स्कंधा वा के संख्येयाऽसंख्येयाऽनन्त- 卐 प्रदेशा बध्यन्तै, उत्ताऽनन्ताऽनन्तप्रदेशा इति ? ८ । एषामष्टानां प्रश्नानां पूर्वक्तसूत्रस्य अष्टावयवानाश्रित्य निराकाङ्क्षक- रणर, तद्यथा;-' नामप्रत्ययाः' इति, ज्ञानावरणाद्यन्तरायपर्यवसानानामन्वर्थसंज्ञानां कर्मणां कारणानि पुद्गला भवन्त्यर्थः, अथवा ' कंप्रत्यया' इति विग्रहे येगा अंदारिकादिशरीरनामकर्मलक्षणास्तन्निमित्ताः पुद्गला बन्धमायान्ति, 4 अथवंदारिका दवन्धननामनिमित्ताः पुद्गला वन्धमायान्तीति १। 'सर्वतः' इत, सर्वा दिक्षु आत्मावधिकासु व्यवस्थितान् पुद्गलानादत्ते अथवा सर्वत इतिः सर्वैरात्मप्रदेशैः गलान् गृहाति २ । 'योगविशेषात् ' इत, नापि सर्वेषां बन्धकानां सम्बन्ध- स्तुल्यः, कुतः १ येगविशेषात् , आत्मना युज्यत इति येगः, कायादेचेष्टा, योगानां विशेषः तीमन्दादिको दस्तस्मात्तुल्य- 卐 बन्धाऽभाव इति ३ । ' सूक्ष्माः' इत, सूक्ष्मपरिणतिरूपाः कर्मवर्गणायोग्या एव वध्यन्ते, न वादरपरिणतिभाजः, ४ । एकक्षेत्रावग : ' इति, एकस्मिन्नभिके क्षेत्रे वप्रदेशैस्सह रेऽवगाढास्ते बध्यन्ते, च वर्तमानास्ते रागादिस्नेहगुणये- गादात्मनि लगन्ति, न क्षेत्रान्तरावगाढा इति ५। 'स्थताः' इत, स्थितिपरिणामपरिणताः स्थिता एव वध्यन्ते, न गति- परिणताः, है. गतिपरिणामविशेषानात्मनि लिप्यन्त इति ६ 'सर्वात्मप्रदेशेषु' इति, सर्वप्रकृतिपुद्गलाः सर्वात्मप्रदेशेषु बध्यन्रे, 卐 G A A - 卐 T - L 卐 V ॥१४२॥ ani A एड N S y A 卐 V U + M ज A 卐 T बन्धमायान्त तासामपि तथास्वाभाव्यात् जघन्यतेऽपि द्विस्थानक एव रसो वन्धमायाति, नैकस्थानक इत। पुना y रसमधिकृत्य द्विविधाः प्रकृतयः, घातिन्यः, अघातिन्यश्च । धातिन प्वपि सर्वघातित्त्वदेशघातत्त्वापेक्षया द्वविधत्त्वम् , तत्र याः प्रकृतयः स्वविपयं कास्न्यैन घ्नन्ति ताः सर्वघातिन्यः केवल द्विकमाद्यद्वादशकपाया मथ्यात्त्वं निद्रापञ्चकञ्चेति ॥ चेंशतिः। एता हि प्रकृतयो यथायगमात्मघात्यं गणं सम्यक्त्वं ज्ञानं दर्शनं चारित्रं वा सर्वात्मना घातयन् त। स्वविपर्य देशतोः घ्नन्ति ता देशघातिन्यः ज्ञानावरणचतुष्कदर्शनावरणत्रिक( सम्यक्त्वमिश्रमोहन्य )सञ्ज्वलनचतुष्कहास्यादिपटक . वेदत्रिकाऽन्तरायपञ्चकलक्षणाः पञ्चविंशतिप्रकृतयः। शेषा अघातन्यः । अघातिन नामपि तासां सर्वदेशघातिप्रकृतिसम्प- A कत्तिद्रसविपाकोपदर्शकत्त्वं भवर ते । अत्र सर्वघातिनां देशघातिनां वा प्रकृत नां यानि चतुःस्थानकरसानि त्रिस्थानक- रसानि वा स्पर्धकान तानि नियमतः सर्वघात न भवन्ति, द्वस्थानकरसान तु सर्वघातिन्नां सर्वघातिन्येव, देशघातिनां N तु कानचित्सर्वघा न कानिचिद्देशधारीत्येवं मिश्राणि, एकस्थानकरसानि च देशघातिन्नामेव भवन्ति, तानि च 卐 देशघातिन्येव । अत्रानुभागवन्धे वपुद्गलभवक्षेत्रविपाकादिकमधिकृत्यान्योऽपि विशेपोस्ति, 'दङमात्रमत्र दर्शतं, विस्तरस्तु बन्धशतकादिभ्योऽवरेयः॥ 卐 अथ प्रदेशबन्धस्संक्षेपतो भाव्यते, तस्मन् विपये तत्वार्थाधिगमसूत्रे " नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेपात् सूक्ष्मैक- A क्षेत्रावगाढस्थताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः (अ० ८, सूत्र २५)" इति सूत्रं, तत्राष्टं प्रश्नाः कस्य प्रत्ययाः कारण भी भूताः के प्रत्यया वा पुद्गला वध्यन्ते ? इत्येक प्रश्नः १ । वोऽपि तान् वध्नानः पुद्गलान् कमेन दिक्प्रदेशेन बध्नात्युत y A G 卐 T y V L ज A A UE 卐 N S नवतत्त्व- 卐 A U करणा- - 卐 र्टकायां- v M 卐 १४१ A A 3 ॐ T N दिरसा इह यथोत्तरमनन्तगुणा द्रष्टव्याः अत्र च मतिश्रुतावधिमनःपर्यायज्ञानावरणानि चक्षुरचक्षुरवधिदर्शनावरणानि 5 चन्धतद पुरुपवेदश्चत्त्वारः सज्वलनाः प वधमन्तरायं चेति सप्तदशप्रकृतय एकद्वित्रिचतु:स्थानकपरिणताः प्राप्यन्द्र बन्धमधिकृत्य । तत्र यावन्न श्रेणिप्रतिपत्तिस्तावदासां सप्दशप्रकृतीनां यथाध्यवसायं द्विस्थानकस्य त्रस्थानकस्य चतुःस्थानकस्य वा 卐 ष्टकम् । रसस्य बन्धः । श्रेणिप्र पत्तं त्वनिवृत्तिवादराद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेषु तदनन्तरमेतासामशुभत्वादत्यन्तविशुद्धाध्यव- साययेगेनैकस्थानकस्यैव रसस्य बन्ध इत्येता वन्धमधिकृत्य चतुःस्थानपरिणताः प्राप्यन्ते शेषास्तु शुभा अशुभा वा 卐 द्वस्थानकरसास्त्रिस्थानकरसाश्चतु:स्थानकरसाश्च प्राप्यन्तै, न तु कदाचनाप्येकस्थानकरसाः। यत उक्तानां सप्तदशव्यतिरिक्तानां हास्याद्यानामशुभप्रकृत नामकस्थानकरसवन्धयोग्या शुद्धरपूर्वकरणप्रमत्ताप्रमत्तानां न भवति, यदा त्वेकस्थानकरसवन्धये ग्या . परमप्रकर्षप्राप्ता शुद्धिरनिवृतिबादराद्धायाः संख्येयेभ्यो भागेभ्यः परत जायते तदा वन्धमेव न ता आयान्त न तासामेकस्थानके रसः । न च यथा श्रेण्यारोहेनिवृतिबादराद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गरेषु परतोऽतिविशुद्धत्त्वान्मतिज्ञानावर- 卐 णादीनाम्कस्थानकरसवन्धस्तथा क्षपकश्रेण्यारोहे सूक्ष्मसम्परायस्य चरमद्विचरमसमयादिषु वर्तमानस्यातीय विशुद्धत्त्वात् केवलद्विकस्य सम्भवद्वन्धस्यै थानकरसबन्धसम्भवः कथं न भवरी ते शङ्कीय, स्वल्पस्यापि लेवलद्विकरसस्य सर्वघातित्वात 卐 सर्वघातनां च जघन्यपदेऽपि द्विस्थानकरसस्यैव सम्भवात् । शुभानामपि प्रकटीनां मथ्यादृष्टिः संक्लिष्ट कस्थानकरसं 卐 बध्नाति, मनाग्विशुध्यमान एव तद्वन्धसम्भवात् , अतिसक्लिष्टे मिथ्यादृष्टं तद्वन्धासम्भवात् , संक्लेशोत्करें च शुभप्रकृना- मेकस्थानकरसवन्धसम्भावनानवकाशात् । यास्त्वतिसंक्लिष्टेऽपि मध्यादृष्टं नरकगतिप्रायोग्या क्रियरैजसाद्याः भप्रकृतये ॥१४१ 卐 G 卐 A . T D L V ne A A ज N फ्र S y A U 卐 V 骗 A 卐 T ग्रहणसम एव तेषां लेश्यासहचरितकापायिणाध्यवसायेन सर्वस्योऽप्यनन्तगुणा रसाविभागा आपद्यन्ते, ज्ञानावार- कत्त्वादि विचित्रस्वभावता च, अचिन्त्यत्त्वाजोवान पुद्गलानां च शक्तेः, न चैतदनुपपन्नं, तथा दर्शनात् , यथा शुष्कतृणादि । परमाणवोऽत्यन्तन रसा अपि गवादिभर्हताः सन्ते विशष्ट रादिरसरूपतया सप्तधातुरूपतया च परिणम्यन्त इत्येतदुक्तं प्रायः M इहानुभागवन्धाध्यवसायस्थानानां भाऽशुभ दाभ्यां संक्लिश्यमानविशुध्यमानभेदाभ्यां वा द्विविधत्त्वं, तत्र शुभैः हर- खंडरसोपममाहादजनकमनुभागं कर्मपुद्गलानामाधत्ते, नंबघोषातर्क रसोपमं चाऽशुमैः । ते च भा अशुभा वा अभाग- A बन्धाध्यवसायाः प्रत्येकमसंख्येयलोकाकाशप्रदेशप्रमाणाः, केवलं क्षपकश्रेण्यारोहण निवन्धनभूतानुभागवन्धाध्यवसायस्थानाऽपे- क्षया भाऽनुभागवन्धाध्यवसायस्थानानामाधिक्यं, यतो यानेवानुभागवन्धाध्यवसायान् क्रमशः स्थापितान् संक्लिश्यमानः क्रमेणाधोऽध आस्कन्दत, तानेव विशुद्ध्यमानः क्रेमणोर्योर्ध्वमारोहति, ततो यथा प्रासादादवतरतो यावन्ति सोपानस्थानान भवन्ति तावन्त्येवारोहतोऽपि, तथात्रापि यावन्त एव संक्लश्यमानस्याऽशुभाध्यवसायास्तावन्त एव विशुध्यमानस्यापि शुभाध्यवसायाः, केवलं क्षपके रेष्वध्यवसारेषु वत्तमानः क्षपकश्रेणिमारोहति तेभ्यः पुनर्न नवर्तते, तस्य प्रतिपाताऽभावात् , अतस्तदपेक्षया विशेषाधिकाः शुभाध्यवसायाः। अनुभागवन्धाध्यवसायस्थानकैरुत्पाद्यमानो रसो यद्यप्यनन्तभेद भिन्न- स्तथापि स्पष्टार्थ विभागचतुष्ये तस्योपन्यासस्तद्यथा-एकस्थानको द्विस्थानक स्वस्थानकश्चतुःस्थानक इति । तत्र स्वाभाविको 卐 यो रसः सैकस्थानकः, द्वयोः कर्षयोरावर्तितयोर्य एकः कऽवशिष्यते तदुपमो द्वस्थानकः, त्रयाणां कर्षाणामावनितानां य एकः कर्पोऽवशिष्यते तदुपमस्वस्थानकः, चतुर्णा कर्षाणामावर्त्तने कृते सत्युद्धरिककर्पोपमश्चतुःस्थानकः। एकस्थानका- N 卐 A G A 卐 T 卐 V 卐 A 卐 L A S N U भनवतत्त्व- 卐 A वन्धतस्द- नुभाग- चन्धः॥ y र्टकाय- V - ।१४० 卐 A y T निखिलैरप हैरध्यवसायस्थानैरेका स्थितिनवर्त्यत इत्यर्थः : समयाधिका-जघन्यां स्थितिं यानि निर्वतयन्ति तान्यप्य- संख्टेयलोकाकाशप्रदेशतुल्यानि, नेवलं पूर्वेभ्यो विशेषाधिकानि। एवं यावदुत्कृष्टस्थितिबन्धनिर्वकान तान्यपि असंख्येय- लोकाकाशप्रदेशप्रमाणान अध्यवसायस्थानानि भवन्तीत्यर्थः इति संक्षेपतः स्थितिवन्धः । यद्यपि ग्रन्थकारमहर्षिभिर्मुलगाथाभिर्यथा प्रकृतिबन्धस्थितिबन्ध भावित न तथाऽनुभागप्रदेशवन्ध, तथापि वन्धत- त्वविवरणप्रसङ्ग तयरपि वर्णनं दातुं समुचितमित्यवसरसङ्गतिन्यायेन तयोरनुभागप्रदेशवन्धय रपि संक्षपो भाव्यते;- इह गरापारसंसारसरत्पतिमध्यविपरिवर्त रागादिसचिवे जन्तुरभव्यानन्तगुणसिद्धानन्तभागकल्पैः परमाणुभि- नष्पन्नान् कर्मस्कन्धान प्रतिसमयं गृह्णाति, यथा च योगानुसारबध्यमानकर्मस्कन्धेषु तत्समयवर्तिस्थितिबन्धाध्यवसायस्थानः स्थितिप्रमाणं निर्वय॑ते वेन तथा तत्समयवर्ति लेश्यासहचारिकपायदयरूपानुभागवन्धाध्यवसायस्थानैध्यमानकर्मस्कंधेषु शुभाशुभविपाकेत्पादकरसांशा अपि उत्पाद्यन्ते तत्रैकस्मिन् कर्मस्कन्धे प्रतिपरमाणु यः सर्वजघन्यो रसः सोऽपि केवलिप्रज्ञया छिद्यमानः बल सर्वजटेभ्योऽनन्तगुणान् सभागान् प्रयच्छति, अन्यस्तु कर्मपरमाणुस्तानविभागानेकाधिकान् प्रयच्छते, अपरस्तु तानपि व्यधिकान्, अन्यस्तु तानपि व्यधिकान्-, अन्यस्तु तानपि चतुरधिकान्, इत्यादि वृद्ध्या तावन्यं यावदन्त्य उत्कृष्टः कर्मपरमाणुमौलराशेरनन्तरणानप रसाविभागान् प्रयच्छति । इयमत्र भावना;-इह पूर्व कर्मप्रायोग्यवर्गणाऽन्तःपातिनः सन्तः कर्मपरमाणवोन तथाविधविशष्टरसता आर रन्, किन्तु प्राय नरसा एकस्वरूपाश्च, यदा तु जैदेन गृह्यन्ते तदान १ पुगलवर्तवर्णगन्धरसापेक्ष्या नात्र नीरसत्त्वं, केन्तु शुभाशुभविपाकजनकरसापेक्षया गैरसत्त्वं भावनेयम् । A 卐 N 卐 G 卐 A - फू A 卐 T 卐 L 卐 V फू ॥१४॥ . A स S 卐 A U 卐 V A 卐 A 卐 T 卐 A प्रकृतनामेव वर्धते, शुभानां तु परिर्ह यत एव, कषायमन्दतया तु भप्रकृत नाम्वानुभागो वर्धतेऽशुभप्रहरी नां तु है यत इति न कषायमनुवर्ततेऽनुभागः, स्थितयस्तु भानामशुभानां च प्रकृतीनां कषायवृद्ध नियमाद्वर्धन्ते तदपचये वपच्यन्त इत्येकान्तेन कषायान्वयव्यतिरेकानुसारित्वादशुभा एवेत । यदि वा यथा यथा शुभप्रकृश्नां स्थतिर्वर्धते तथा तथा शुभानुभागस्तत्संवट हयते, परिगालितररेक्षुयप्टिकल्पानि शुभकर्माणि भवन्तत्यर्थः । अशुभप्रकृर्तनां तु स्थितिवृद्धाव- M भरसोऽपि तत्सम्बन्ध वर्धत एवेत्यतोऽपि कारणात् स्थर्तनामेवाशुभत्वं, तवृद्धेः शुभानुभागक्षयहेतुत्वादशुभानुभागवृद्धिहेतु- 卐 त्वाचेति । ननूक्तरूपेण ज्येष्ठा स्थतिः संक्लेशेन वध्यते, जघन्या तु कंप्रत्यया ? उच्यते, जघन्या पुनः कपायापचयरूपया विशुद्धया बध्यते, इदमुक्तं भवति-इह ये ये विवक्षितमूलोत्तरप्रकृनां बन्धकास्तेषां मध्ये यो यः सर्वोत्कृष्ट विशुद्धियुक्तः स 卐 तत्तद्विवक्षितकर्म स्थति जघन्यां बध्नाति भावः । अयं पूर्वक्तः प्रकारो नरामरतिर्यगायूंप वर्जयित्वा विज्ञेयः, यतस्तेषां N त्रयाणामायुषां स्थतिः शुभैव भवति, विशुद्धिलक्षणस्य तस्य कारणस्य शुभत्वात् , मनुष्यतिर्यगायुपोर्ह वृद्धिस्नपल्योपमावसाना, 4 देवायुषस्तु वृद्धिस्त्रयस्त्रंशत्सागरोपमावसानाऽपि शुभा, विशुद्धिरूपकारणत्वात्तस्या इति । अथवा प्रस्तुतायुष्कस्थितिवृद्ध रसोऽपि वर्धते स च शुभः सुखजनकत्त्वात् , इत्यतोऽपि प्रस्तुतायुष्कस्थितेः शुभत्त्वं, तवृद्धेः शुभरसवृद्धिहेतुत्त्वात् । किं च . नरामरतिर्यगायुर्लक्षणं प्रकृतित्रयं मुक्त्वा शेषप्रकृनां प्रकृष्टसंक्लेश विशुद्धिभ्यां स्थित्युपचयापचय द्रष्टव्य, प्रस्तुतायुस्त्रयस्य तु तद्वन्धलेषु सर्वत्कृष्टविशुद्धिरुत्कृष्टस्थितिवन्धं करोति, सर्वसंक्लिष्टस्तु सर्वजघन्यमित विपरीतं द्रष्टव्यमिति ॥ इह ज्ञानावरणादिकर्मणः सर्वजघन्याया अपि स्थतेर्निर्वतकानि असंख्येयले काकाशप्रदेशप्रमाणान्यध्ववसायस्थानानि, 3 .. A ध 卐 T 卐 V 卐 A nan L A 卐 S नवतच- 卐 U A 卐 V बन्धतच्दै स्थितिबन्ध 卐 टकायां- M प्रत्ययाः। 卐 १३९॥ A y A y T हे स्वस्वत्कृष्टस्थिमथ्यात्वस्योत्कृष्टया स्थित्या भागे हुरे सत यल्लभ्यते तत्पल्योपमासंख्येयभागह न सत् जघन्यस्थितिपरिमाणमवरेयर तथा च प्रज्ञापनपाङ्गे-'इस्थिव्यस्स पुच्छा, गो०. जहन्नेणं सागरेवमस्स दिवई सत्तभाग पलितवमस्स असंखइजेण भागेण ऊणयं, उक्कोरेणं पण्णरससागरेवमकर्ड कोर्ड तो पण्णरस वा ताई अबाहा' इत्यादि । ननु 'जेगा पय डिपएसं ' इति वचनाद्यथा प्रकृतिप्रदेशवन्ध योगप्रत्यय तथा प्राक् जघन्योत्कृष्ट दभिन्न- स्थितिबन्धः किंप्रत्यय ? इति चेदुच्यते-सवेपि स्थितिवन्धः संक्लेश( कपायोदय )प्रत्ययः, तत्र नरामरतिर्यगा—पि वजयित्वा शेषाणां निखिलानामपि शुभाऽशुभानां प्रकृर्तनामुत्कृष्टस्थितिवन्धे उत्कृष्टसंक्लेशः कारणम् , क्रमेण च हयमाने संक्लेशे स्थितिबन्धोऽपि न्यूने न्यूनतरो न्यूनतमश्च भवति, यदुक्तं शतकाख्ये पश्चमकर्मग्रन्थे * मद्देवेन्द्रसूरशेखरः- 'सबाण से जिठिइ असुहा जं साइसंबिलेरणं । इयरा विसोहिओ पुण नरअमर रिआउं ॥१॥ वृहच्छतळेऽपि ज्येष्ठ- स्थितिबन्धप्रस्ताने तथैवक्तं ' उक्कोससंकिलेसेणं ईस अहमज्झिम्णा ।' ततश्चायं प्रस्तुतार्थः, सर्वासामपि प्रकृर नां ज्येष्ठा स्थतिरत्यन्तसंक्लेश( कपायोदय )जन्या, अत एव सा अशुभा, अशुभातिशयकषायोदयरूपकारणजन्यत्वात् । एतदुक्तं भवति:-सर्वासामपि भाऽशुभानां प्रकृरीनां स्थितयः संक्लेशवृद्ध वर्द्धन्ते तदपचये च हयन्त इत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां संक्लेश( कषायदय )मेव स्थतयनुवर्त्तन्त इत्यशुभा अशुभकारणनिष्पन्नत्वात् , अशुभवृक्षाशुभफलवत् । नन्वेवं तर्हि ठइ अणुभागं यओ कुणइ ' इति वचनाद/भागेऽी कषायप्रत्यय एव, ततेऽयमप्यशुभकारणत्त्वादशुभ एव प्रामेत, अथ च शुभप्रकृरनामस शुभ एटेष्यत इति, वमभिप्रायापरिज्ञानात् , यतः सत्यप है कषायजन्यत्टे कषायवृद्धावनुभागोऽशुभ- N ॐ . A y T 卐 V . 卐 G 卐 A 卐 L 卐 A 卐 ॥१३९॥ A N 卐 S 卐 U 卐 M A ज A 卐 भागहन जघन्या स्थितिः, अबाधाकालेऽन्तर्मुहर्त्तः, यतस्तस्य चैक्रियपट्कस्य जघन्यस्थितिबन्धका असंज्ञिपश्चेन्द्रियास्तेच A. जघन्यां स्थितिमेतावर मेव वध्नन्ति, न न्यूनां । तदुक्तं-“वेउवियछके तं सहस्सताडियं जं असण्णिणो ते से । पलियासंखंसूर्ण 卐 ठिइ अवाहूणियनिसेगो ॥१॥" आहारकशर राऽऽहारकाङ्गोपाङ्गतीर्थंकरनाम्नां योत्कृष्टा स्थतिः प्रायुक्ताऽन्तःसागरोपम V कोटीकोर्टप्रमाणा सा संख्येयगुणहना जघन्या स्थितिर्भवत, सारि चान्तःसागरोपमकोर्ट कोटीप्रमाणेच, अवाधा त्वन्तर्मुहू- 卐 तम् , यशर्कर्जघन्या स्थितिरष्ट मुहर्ताः, अवाधात्वन्तर्मुहूर्त्तकालीना । गोत्रकर्मणि चैगोत्रस्य सागरोपमस्य व सप्तभाग जघन्या स्थितिरन्तर्मुहूर्तमवाधा, उच्चगत्रस्य चाष्ट मुहर्ताः, अबाधा अन्तर्मुहुर्तप्रमाणा । इति जघन्यस्थितिबन्धः । 卐 अत्र पञ्चसंग्रहप्रज्ञापनादिग्रन्थेषु जघन्य स्थितिबन्धे विञ्चिन्मतान्तरम् , यतोऽत्र प्राग्व्याख्याते जघन्यस्थितिवन्धे T कर्मकल्मपविवेकप्रवणैः श्रीमच्छवशर्मसरिखरैः कर्मप्रकृत्यां यदुक्तं ' वग्गुक्कोस ठिईणं' इत्यादि, तस्याधारण जघन्यस्थिति- 卐 वन्धः प्रदर्शितः, तत्र ज्ञानावरणप्रकृतिसमुदायो ज्ञानावरण यवर्गः। दर्शनावरणप्रकृतिसमुदायो दर्शनावर यवर्गः। वेद य- प्रकृतिसमुदायो वेदन्यवर्गः । दर्शनमोहनीयप्रकृतिसमुदायो दर्शनमोहन्यवर्गः, चारित्रमोहन्यप्रकृतिसमुदायश्चरित्रमो- यवर्गः, नोकपायमोहन्यप्रकृतिसमुदायो नोकषायमोहन यवर्गः। नामप्रकृतिसमुदायो नामवर्गः। गोत्रप्रकृतिसमुदायो गोत्र- वर्ग: । अन्तरायप्रकृतिसमुदायोऽन्तरायवर्गः। एतेषां वर्गाणां याऽऽतयात्मीयोत्कृष्टा स्थिति स्त्रंशत्सागरोपमकोर्ट कोट्या- 卐 दिलक्षणा, तस्या मथ्यात्त्वस्योत्कृष्टया स्थत्या सप्ततिसागरोपमकोटीकोर्ट लक्षणया भागे हते सति यल्लभ्यते तत्पल्योपमासं- V ख्येयभागन्दूनं सदुक्तशेषाणां प्रकृनां जघन्यस्थितेः परमाणमवसेयमिति । एतन्मतानुसारेणात्र जघन्या स्थतिर्भाविता । 卐 A . 卐 N 卐 G A T A L . 卐 A an S N नवतत्त्व- 卐 A टकायां- 卐 V 卐 बन्धत U जघन्यो- 卐 त्कृष्टा- 卐 स्थितिः॥ A 卐 N 卐 १३८ 卐 A 卐 गाथायां जघन्यस्थितिबन्ध मूलप्रकृतिमाश्रित्य प्रदर्शितः अथोत्तरप्रकृतिमाश्रित्य जघन्य स्थितिबन्धः प्रदी; पञ्चानां ज्ञानावरणप्रकृतनां चक्षुरचक्षुरवधिलेवलदर्शनलक्षणदर्शनावरणचतुष्कस्य पञ्चानां चान्तरायप्रकृर्तनां जघन्या स्थितिरन्तर्मुः हूर्त्तकालः, अबाधाप्यन्तर्मुहूर्तमेव । दर्शनावरणे निद्रापञ्चकस्य जघन्या स्थितिः सागरोपमस्य त्रयः भागाः (१) पल्यो- पमासंख्टेयभागेन न्यूनाः वेदनीये सातवेदन्यस्य जघन्या स्थितिादश मुहूर्ताः, अन्तमुहूर्त्तश्चावाधाकालः । इह कापा- यिक्या एव स्थितेर्जघन्यत्त्वप्रतिपादनमभिप्रेतं, अतो द्वादश मुहूर्ता इत्युक्तं, अन्यथा सातवेदन् यस्य जघन्या स्थितिः समयद्वयमात्रापि सयोगिवल्याद प्राप्यते । अशाताटेदन यस्य जघन्या स्थितिः सागरोपमस्य त्रयः सप्तभागाः पल्ये पमा- संख्येयभागहनाः मोहन्यप्रकतेः पल्यपमासंख्येयभागहीनः एकस्सागरोपमः, सचलनवर्जानां द्वादशकपायाणां चत्वारः सप्तभागाः पल्योपमासंख्टेयभागहनाः। पुरुपवेदवर्जानामष्टानां नोकपायाणां सागरोपमस्य द्वैः सप्तभाग पल्यासंख्येय- भागहन । संज्वलनक्रेधस्य भासद्वयं, सवलनमानस्य मासः, सञ्जवलनमायाया अर्धमासः, सवलनलोभस्यान्तमुहर्त्त जघन्या स्थितिः, अबाधा सर्वेषामन्तर्मुहूर्त्तम् । पुंवेदस्य जघन्यास्थितिरष्टै वर्षाणि, अबाधा अन्तर्मुहूर्त्तकालः । देवनारका- युषां जघन्या स्थितिर्दश वर्षसहस्राणि, अबाधा अन्तर्मुहर्त्तम् , जघन्यायुःस्थितिरुत्कृष्टाऽऽवाधासंज्ञकभङ्गापेक्षया पूर्वकोटिनि- भागोऽप तिर्यग्मनुष्यायुषां जघन्या स्थितिः क्षुल्लकभवग्रहणम् , अबाधा अन्तर्मुहूर्त्तकालः । देवद्विकनरकद्विकवैक्रिय- द्विकाहारकद्वकयशा रीर्थकरवशेषनामप्रकृरीनां सागरोपमस्य दूसप्तभाग जघन्या स्थितिः, देवगतिदेवानुपूर्व नरकगतिनरकानुपूर्वी क्रयशरीरक्रियाङ्गोपाङ्गलक्षणस्य वैक्रियपदकस्य द् सप्तभाग सहस्रगुणित (२०००) पल्योपमासंख्येय T . 卐 A y T 卐 V 卐 A 卐 L 卐 ॥१३८॥ A 卐 A US N S म A 卐 परा स्थितिः वर्पसहस्रद्वयं चावाधा ॥ आयुःकर्मणि देवायुषः परा स्थितिस्त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि, अबाधायां पूर्वकोटित्रिभाग उत्कर्पण, जघन्यावाधा त्वन्त- मुहर्त्तम् , यत आयुपोऽवाधायां चतुर्भङ्गाः, उत्कृष्टा स्थितिरुत्कृष्टावाधा, उत्कृष्टास्थितिघन्यावाधा, जघन्यास्थितिरुत्कृष्टावाधा, जघन्या स्थितिश्च जघन्यावाधा । तत्र पूर्वकोट्यायुष्को मनुष्यः त्रिभागावशेपे आयुपि आगामिदेवभवायुपमुत्कृष्टस्थितिकं यदा बध्नाति तदा प्रथमो भङ्गः, स एव जघन्यमध्यमायुष्को वा मनुजोऽन्तर्मुहविशेपे आयुपि आगामिदेवभवायुषमुत्कृष्एस्थितिक वध्नाति तदा द्वितीयो भङ्गः । पूर्वकोट्यायुष्को मनुजो यदा पूर्वकोटित्रिभागावशेपे नजायुपि दशसहस्रप्रमाणं जघन्यस्थितिक देवायुर्वघ्नीते तदा देवायुपमपेक्ष्य तृतीयो भङ्गः । जघन्यायुष्क ऽन्तर्मुहर्तावशेपे निजायुपि दशवर्पसहस्रमानं देवायुपं वध्नाति तदा जघन्यस्थिति धन्यावाधासंज्ञकश्चतुर्थे भगकः । एवं शेषाणामप्यायुपामवाधाविपयः स्वधिया परिभावन यः । मनुजा- सुपः परास्थिति त्रिपल्योपममाना, तिर्यगायुपोऽप्येवमेव, नारकायुपस्त्रयस्त्रिंशत् सागरोपमाणि । इत्युत्कृष्ट स्थतिवन्धः॥४०॥४१॥ उत्कृष्ट स्थितिवन्धानन्तरं जघन्यस्थितिवन्धं भावयति;- वारस मुहुत्त जह वेयणिए अट्ट नाम गेएसु । सेसाणंतमुहुत्तं एवं बंधढिईमाणं ॥ ४२ । टीका;-'बारस' इति, द्वादशमुहर्तानि जघन्या स्थितिः, कस्य कर्मणः ? वेदनीयस्य शातावेदनीयस्येत्यर्थः । अष्टं मुहूर्तान नामगोत्रयोजघन्या स्थितिः, शेषाणां ज्ञानावरणदर्शनावरणमोहनीयाऽऽयुरन्तरायाणां जघन्या स्थितिरन्तर्मुहूर्तमित। 'एय' इत, एतत् प्राग् नाणेत्यादिगाथाद्वये व्याख्यातमिदं च जधन्योत्कृष्टभेदभिन्न कर्मणां बन्धस्थितिमानम् । अस्यां U 卐 M 卐 A 卐 N 卐 G 卐 A 卐 T 卐 A 卐 T पी V 卐 A 卐 4 4 卐 L 卐 A ।

S N 卐 S नवतत्त्व- ॐ A 卐 U 卐 M + 卐 टकाय- बन्धतट जघन्य- त्कृष्टा- स्थितिः १३७ 卐 A A 卐 T रायमाश्रित्य मूलत्तरप्रकृतिषु स्थितिबन्धः समानः, वेदरे तावदसद्वेद्यस्य त्रंशत्सागरोपमकोर्ट कोट्यः परा स्थितिः, सद्वेद्यस्य पञ्चदश सागरोपमकेटकट्य उत्कृष्टा स्थितिः, पञ्चदशवर्षशतान्यवाधा नामप्रकृतीनां तावत् मनुष्यगतिमनुजा- नुपूव्यरेत्कृष्टः स्थितिवन्धः प दश सागरे पमकोर्ट को : प दशवर्षशतान्यवाधा। नरंकगतिनरकोडपूर्वीतियग्गतितिर्यगा- तुपूय॒जेन्द्रियजातिपद्रियजातितैजसकामदारिकवैक्रियशर रैदारकोंगोपाङ्गवैक्रियाङ्गपाङ्गवर्णगन्धरसस्पर्शागुरुलघूपात पघात श्वासातपद्यतीप्रशस्तविहायोगतित्रसँस्थावरवादरपर्या" त्येकौस्थिराशुभर्भगदुःस्वरानादेययार्यशार्क निर्माणलक्ष- णानां पञ्चत्रिंशत्प्रकृतीनां वंशतिसागरोपमकोर्ट कोट्यः परास्थितिः, वंशतिवर्षशतानि चावाधाकालः । देवगतिदेवानुपूर्व- समचतुरस्रसंस्थानवर्षभनाराचसंहननप्रशस्तविहाय गतिस्थिरशुभसुभगसुस्वरादेययशर्तिलक्षणानाम्कादश प्रकृतीनां दश सागरोपमकेटके : दशवर्षशतान्यबाधा च । न्यग्रोधसंस्थानवज्रनाराचसंहननयोदश सागरोपमकोर्ट को : परा स्थितिः, द्वादशवर्षशतान्यबाधा । साचिसंस्थाननाराचसंहननयोरुत्कृष्टा चतुर्दश सागरोपमकोटीको : स्थितिः, चतुर्दश वर्षशतान्य- बाधा। जसंस्थानार्धनाराचसंहननयोरुत्कृष्टा स्थितिः पोडशसागरोपमकोर्ट कोट्यः, पोडशवर्षशतान्यवाधा । वामनसंस्थान- कलकासंहननर्द्वन्द्रिय न्द्रयचतुरिन्द्रियजा 'नां सूक्ष्मापर्याप्तस रणनाम्नां चोत्कृष्टा स्थितिरष्टादशसागरोपमकोर्ट कोव्यः अष्टादशवर्णशतान्यवाधा, सेवार्तसंहननहुंडकसंस्थानयोशितिसागरोपमकोर्ट को : परा स्थितिः, वर्षसहस्रद्वयं चाबाधा- । आहारकशर राहारकाङ्गोपाङ्गीर्थकरनाम्नामुत्कृष्टा स्थितिरन्तस्सागरोपमकोर्ट कोटिप्रमाणा, अबाधा चन्तर्मुहूर्त्तम् । गोत्रकर्मणि उच्चैगोत्रस्य दशसागरोपमकोर्ट केट्यः, दशवर्षशतान्यबाधा । चैर्गोत्रस्य वंशतिसागरोपमकोटीकोट्यः 卐 N म G 卐 A T 卐 A 3 L - V ॥ ॥१३७ A A' UE S 卐 U 卐 y A 卐 V 卐 A 卐 T 卐 A 卐 A सहस्रत्रितयं चाऽऽवाधाकालः, बाधा( निषेक )कालस्तु वर्षसहस्र त्रितयन्यूनत्रंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः, यत्प्रभृति ज्ञानावरण यादिकर्म उदयाव लेकाप्रविष्टं यावच्च नःशेषमुपक्ष्णं तावद् भवति, तच्च बन्धकालादारभ्य त्रिषु वर्पसहस्रेष्व- रेतेषु उदयाव लेकां प्रविशति सामान्यतः, स खल्ववाधाकालो यतस्तत्कर्म नानुभूयते तावन्तं कालमिति । एवं सर्वत्राप्य- धाकालविपये स्वधिया परभाव यम् इदमत्र हृदयम् :-इह द्विधा स्थितिः, कर्मरूपतावस्थानलक्षणाऽनुभवप्रायोग्या च । कर्मरूपतावस्थानलक्षणामेव स्थितिमधिकृत्य जघन्योत्कृष्टप्रमाणाभिधानमिदमवगन्तव्यम् । अनुभवप्रायोग्या पुनरवाधाका- लहना। येपांच कर्मणां यावत्यः सागरोपमकोर्ट कोट्यस्तेषांतावन्ति वर्षशतान्यवाधाकालः। तथा मोहन्यस्य सप्ततिसागरोपम- कोर्ट कोट्य उत्कृष्टा स्थितिः, इदं च दर्शनमोहन यमाश्रित्य विज्ञेयमन्यथा चारित्रमोहन यस्य चत्वारिंशत्सागरोपकोर्ट कोट्यः, उभयोरपि दर्शनचारित्रमोहयोः क्रमेण सप्तसहस्रचस्सहस्रवाण्यवाधाकालः। नामगोत्रयोशितिसागरोपमकोर्ट कोट्यः, वर्पस- हस्रद्वयं चावाधाकालः । आयुषः त्रयस्त्रिंशत् सागरोपमाणि पूर्वकोर्ट विभागाऽभ्यधिकान, पूर्वकोटीत्रिभागश्चाबाधाकालः। मूलप्रकृतीनामुत्कृष्टः स्थितिवन्ध उक्तः, इदानमुत्तरप्रकृतिमाश्रित्य सैव उत्कृष्टवन्धो भाव्यते; तत्र ज्ञानावरणदर्शनावरणान्त- १ ननु शेपकर्मणामुत्कृष्टा स्थितिरवाधासहितैव सूत्रकारेण गणिता, कथमायुपोऽवाधा स्थितेर्भिन्ना प्रदश्यते ? सत्यम् ! सर्वत्र प्रायो ग्रन्थकारमहरेवंभूतैव विवक्षा दृश्यते, यथा 'त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुष्कस्य ' ( तत्त्वा० अध्या० ८-सू-१८) ' तेत्तीसुदही सुरनारयाउ सेसाउ पल्लतिगं' ( कर्मप्रकृतिः गाथा ७३) तथापि तत्र तत्र टीकाकारपूज्यैरुत्कृष्टस्थित्या अवाघा पृथगुक्तेति नास्ति काचिद्विप्रतिपत्तिः ॥ N 卐 T 卐 V 卐 A 卐 L 卐 A 3 A y 卐 N 卐 S वन्धत नवतत्त्व- 卐 A . U उत्तर- प्रकृति- 卐 V M र्टकायां- ॐ दाः १३६। 卐 A A N T नरकगत्यादीनि नामान्युदयमायान्तीति आयुरनन्तरं नामग्रहणम् , नामकर्मोदये च नियमादुच्चा चान्यतरगोत्रकर्मविपाकोदयेन भवितव्यमतो नामग्रहणानन्तरं गेत्रग्रहणम् गेत्रोदये चोच्चैः कुलोत्पन्नस्य प्रायो दानलाभान्तरायादिक्षयोपशमो भवति, 卐 राजप्रभृतीनां प्राचुर्येण दानलाभादिदर्शनात्, *चैः-कुलोत्पन्नस्य प्रायो दानलाभाधन्तरायोदयो भवति-चजात नां तथा- दर्शनात, तत एतदर्थप्रतिपत्त्यर्थ गोत्रानन्तरमन्तरायग्रहणमिति ॥ ३९ ॥ प्रकृतिबन्धनिरूपणं विधाय अथ स्थितिबन्धनिरूपणप्रसङ्गे प्रागुत्कृष्टस्थितिबन्धं निरूपयति;- नणे अदंरुणवरणे, र पिए चेव अंतराए ।टीकेड केड, अपरणं ठिइ उक्कोसा। ४.॥ सित्तर केडर्ड मोहर्णए वस गएर तिरसं अयराइं, आउट्ठइ ध उकोसा। ४१॥ टीका;-पदैकदेशात्पदसमुदायस्या ग्रहणमत न्यायेन ' नाणे' इति पदेन ज्ञानावर यस्य ग्रहणम् , अयमर्थः- ज्ञानावरणस्य दर्शनावरणस्य देदन यस्य अंतरायस्य च कर्मणः उत्कृष्टा स्थितिः त्रंशत्कोर्ट कोटीसागरप्रमाणा, मोहन यस्य । सप्ततिकोर्ट कोर्टसागरप्रमाणा, मोहन्यस्य वंशतिकोर्टकर्टसागरप्रमाणा, आयुषश्चोत्कृष्टा स्थितिः त्रयस्त्रिंशत्सागरमाना । इत थाद्वयाक्षरार्थः विस्तरार्थस्त्वयम् -आत्मना ( ) परगृह तस्य कर्मपुद्गलराशेरात्मप्रदेशेष्ववस्थानं स्थतिः, A विवक्षितबध्यमानलतामाश्रित्य बन्धकालमादं कृत्वा यावत्कालं संक्रमद्वर्त्तनापवर्तनादव्याघाताऽभावे विवक्षितलतागतं 卐 दलेकमशेष नणं भवति तावत्कार्ल ना तल्लतायाः स्थितिरत तात्पर्यम् । सा च जघन्योत्कृष्टभेदाभ्यां द्विविधा, । तावदाद उत्कृष्टां स्थितिमाह;-ज्ञानावरणदर्शनावरणटेदन यान्तरायाणामुत्कृ स्थिति स्त्रंशत्सागरोपमकोर्ट कोट्यः, वर्ष- 卐 卐 A 卐 T 卐 V ॥१३६॥ - NE A A S 卐 A 卐 U 卐 卐 A V y A 卐 T 卐 ne प्रकृतिबन्ध व्याख्यातः। ननु प्रथमं ज्ञानावरणं द्वितीयं दर्शनावरणं यावदप्टममन्तरायमितिक्रमस्सहेतुक उत निटक ? उच्यते-यद्यपि बन्धकालचिन्तामाश्रित्य तु प्रागुक्तरीत्या समकमेव सप्तानामष्टानां वा कर्मणां वन्धः नतु प्राग ज्ञानावरणं ततो दर्शनावरण- मन्तिममन्तरायश्चेति, तथापि सिद्धान्तसिद्धक्रमसाधनायेयं परिपार्ट सहेतुका विधयते । तत्र ज्ञानदर्शने वस्य स्वतत्त्व- भूते, तयोरभावे जवत्त्वस्यैवायोगात् , तयोर्ज्ञानदर्शनयोरपि च मध्ये ज्ञानं प्रधान, ज्ञानोपयोगयुक्तस्यैव लब्धिप्राप्तेमक्षावा- मेश्च, सकलशास्त्रादिविचारप्रवृत्तिरपि ज्ञानाधना एव ततो ज्ञानं प्रधानं तदावारकं च ज्ञानावरणं कर्म यतस्तत्प्रथममुक्तं, तदनन्तरं च दर्शनावरणं, ज्ञानोपयोगाच्युतस्य दर्शनोपयोगेऽवस्थानात्, एते च ज्ञानदर्शनावरणे स्वविपाकमुपदर्शयत यथायोगमवश्यं सुखदुःखरूपवेदनीयकर्मविपाकोदयनिमित्ते भवतः, तथाहि-ज्ञानावरणमुपचयोत्कर्षप्राप्तं विपाकतोऽनुभवन् सूक्ष्मसूक्ष्मतरवस्तुविचाराऽसमर्थमात्मानं जानानः खिद्यते भूरिलोकः, ज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमात् पाटवोपेतश्च सूक्ष्मतराणि वस्तूनि निजग्रज्ञयाभिजानानः बहुजनातिशायिनमात्मानं पश्यन् सुखं वेदयते । तथातिनिविडदर्शनावरणोदये जात्यन्धादि- रनुभवति दुःखसन्दोहं वचनगोचरातिक्रान्तम् । दर्शनावरणक्षयोपशमसष्ठवपरिकलितश्च स्पष्टचक्षुरायुपेतो यथावद्वस्तुनिकुरम्ब सम्यगवलोकमानो वेदयतेऽमन्दमानन्दसन्दोहं, तत एतदर्थप्रतिपत्त्यर्थ दर्शनावरणानन्तरं वेदनीयग्रहणम् । वेदनीयं च सुखदुखे ज- नयति, सुखदुःखावाप्त चावश्यं संसारिणां रागद्वेषतच मोहन यहेतुकाविति वेदयानन्तरं मोहन यम्। मोहन यमूढाच जन्तवो वहारम्भपरिग्रहप्रभृतिकर्मादानासक्ता नरकाद्यायुष्कमारचयन्ति तते मोहन यानन्तरमायुग्रहणम् । नरकाद्यायुष्कोदये चावश्यं N A G 卐 T 卐 A 卐 V 卐 A ध 卐 L 卐 A y 141- UE S बन्धत नवतत्त्व- U A उत्तर- प्रकृति- " M - V दाः 卐 A A - N र्थकरगतदुर्भगत्त्वं निमित्तं, कंतु तद्गतमिथ्यात्वदोष एटेत्यवध्यं यदुदयाल्लोके यत्तदपि वचनं प्रमाण करोति दर्शनसम- नन्तरमेव चाभ्युत्थानाद्याचरति तदादेयनाम १७। तद्विपरीतमनादेयनाम, यदुदयादुपपन्नमप छुवाण नेपादेयवचनो 卐 टकायां भव , नाप्यभ्युत्थानादिय ग्यः १८ तपःशर्यत्यागादिना समुपार्जेतेन यशसा कर्त्तनं यशःकीर्तिः, यद्वा यशः सामा- न्येन ख्यातिः, क तेर्गुणोत्कीर्तनरूपा प्रशंसा, अथवा ' एकदिग्गामिन कतिः सर्वदिग्गामुकं यशः दानपुण्यभवा कतिः ११३५॥ ॐ पराक्रमकृतं यशः ॥१॥' हे यशर्त यदुदयाद्भवतस्तद्यशः तिनाम १९ । तद्विपरंतमयशःकर्चिनामयदुदया न्मध्यस्थस्यापि जनस्याप्रशस्य भवति २० । उक्ताः सप्रतिपक्षाः प्रत्येकप्रकृतयः । y अत्र त्रसादयो दश प्रकृतयखसादिदशकं, स्थावरादयश्च दश स्थावरादिदशकमिति संज्ञा ग्राह्या । गोत्रस्य द्वे उत्तर- प्रकृत-उच्चैोत्रं, नचैोत्रं च । यदुदयादुत्तमजातिकुलवलतपोरूपैश्वर्यश्रुतसत्काराभ्युत्थानासनप्रदानाञ्जलिप्रग्रहादिसम्भ- 卐 वस्तदुच्चगेत्रम् । यदुदयात् नानादिसंपन्नोऽपि निन्दा लभते हनजात्यादिसंभवां तक चैगंत्रम् । अन्तरायस्य दानलाभभोगोपभोगन्तिरायझेदात् पञ्चत्तरप्रकृतयः, तत्र यदुदयात् सति वभरे समागते च गुणवति 卐 पात्रे दत्तमस्मै महाफलमिति जानमपि दातुं नोत्सहते तद्दानान्तरायं । यदुदयाद्दातुहे विद्यमानमपि देयं गुणवानपि याच- मानोऽपि न लभते तल्लाभान्तरायं । यदुदयाद्विशिष्टाहारादिप्राप्तावप्यसति च प्रत्याख्यानादिपरिणामे र्पण्यानोत्सहते भोक्टं 卐 तद्भोगान्तरायं । एवमुपभोगान्तरायमप भावन्य, नवरं भोगोपभोगयोरयं विशेषः-सकृद्धज्यत इति भोगः, पुनःपुनरुपभुज्यत इत्पभोगः। यदुदयात्सत्यपि रुज शरीरे यवनेऽप वर्तमानोऽल्पप्राणो भवति तर्यान्तरायं । इत्येवं मूलोत्तर दतः T G A A T 卐 ॥१३५ V 20 A 卐 A प A S 卐 U 卐 卐 V 卐 A 卐 T 卐 A 卐 T y V स्थावरा भवन्ति २। यदुदयावानां चक्षुग्राह्यशरीरवलक्षणं बादरत्वं भवति तद्वादरनाम, पृथेच्यादेरेकैकशररस्य चक्षुर्ग्राह्यच्चा- भावेऽपि बादरत्त्वपरिणामविशेषादहूनां समुदाये चक्षुषा ग्रहणं भवति ३ । तद्विपरंतं सूक्ष्मनाम, यदुदयादहूनां समुदिता- नामपि जन्तुशर्र राणां चक्षुाद्यता न भवति । यदुदयात्स्वयोग्यपर्याप्तिनिवर्त्तनसमर्थो भवति तत्पर्याप्तनाम ५। तद्विपरंतमपर्याप्त- नाम, यदुदयात्स्वयोग्यपर्याप्तिनिर्वर्तनसमर्थो न भवति ६। यदुदयात्प्रतिजवं भिन्नशरमुपजायते तत्प्रत्येकनाम, ननु कपित्थाश्व- स्थपीलुप्रभृतिनां मूलस्कंधत्वकछाखादयः प्रत्येकमसंख्येयवाःप्रवचने नोच्यन्ते, मूलादयश्च देवदत्तशरीरवदखण्डैकशरीराकारा उपलभ्यन्त इति कथं तेषां प्रत्येकशरीरत्त्वं ? प्रतिर्जवं शररभेदाऽभावात् , इतिचेन्मैवं, तन्मूलादिष्वसङ्खयेयानाम प जवानां भिन्न- भिन्नशर राभ्युपगमात्, केवलं श्लेपद्रव्य मिश्रितसकलसर्पपवर्तिवत्प्रवलरागद्वेपोपचितवचत्रप्रत्येकनामकर्मपुद्गलोदयातेपां परस्परविमिश्रशरीरसंभवात् ७। यदुदयादनन्तानांजवानामेकं शरीरं भवति तत्साधारणनाम ८। यदुदयाच्छिरोऽस्थदन्तार्दनां शरीरावयवानां स्थिरता भवति तत् स्थिरनाम ९ । तद्विपरीतम स्थिरनाम, यदुदयाजिह्वादनां शररावयवानामस्थिरता १० । यदुदयान्नाभेरुपरितनाअवयवाः शुभा जायन्ते तच्छुभनाम, ११। तद्विपतमशुभनाम, यदुदयानारधस्तनाः पादादयोऽवयवा अशुभा भवन्ति, तथाहिः-शिरसा स्पृष्टस्तुष्यति मनुष्यः पादेन तु रुष्यति, कामिन्याः पादस्पर्शेन च यस्तोपः स मोहन- वन्धनो न तु वास्तव इति न तेन व्यभिचारः १२ । यदुदयाजीवस्वरः श्रोवृप्रतिहेतुर्भवति तत्सुस्वरनामा, १३ । तद्विपरीतं दुःस्वरनाम, यदुदयात्स्वरः श्रोतॄणाम तिहेतुर्भवति १४ । यदुदयादनुपकृद पै सर्वस्य मनःप्रियो भवति तत्सुभगनाम १५ तद्विपरतं दुर्भगनाम, यदुदयादुपकारकृदप जनस्य द्वेष्यो भवति १६ । यच्च तीर्थकरोऽप्यभव्यानां द्वेष्यो भवति तत्र न 卐 A 卐 N G y L 卐 A 卐 A ant

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* १३४
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ताश्च सप्रतिपक्षा अप्रतिपक्षाचे द्विविधाः । तत्र पूर्वमल्पवक्तव्यत्वादप्रतिपक्षा उच्यन्ते, ताश्चागुरुलघूपघातपराघातोच्छा-
सातपेद्योतनिर्माणतीर्थकरनाम दादष्ट । तत्र यदुदयात्प्राणिनां शरीराणि न गुरूणि न लघूनि नपि गुरुलघूनि के
चगुरुलछुपरिणामपरिणतानि भवन्ति तदगुरुलघुन १। यदुदयात्स्वशरीरावयवैरेव प्रतिजिह्वागलवृन्दलम्बकचौरदन्तदि-
भिर्जन्तुरुपहन्यरे स्वयंकृतद्धन्धनभैरवप्रपातादिभिर्वा तदुपघातनाम २। यदुदयादोजर दर्शनमात्रेण वाक्सष्ठवेन
महासभागतः सभ्यानामपि त्रासमुत्पादयति प्रतिवादिनश्च तमां प्रतिहन्ति तत्पराधातनाम ३। यदुद्यादुच्छासनिःश्वास-
लब्धिरुपजायरे तदुच्छ्वासनाम ४ यदुदयाजन्तुशरं राणि स्वरूपेणानुष्णान्यप्युष्णप्रकाशलक्षणमातपं कुर्वन्त तदातपनाम ५,
तद्वि श्च भानुमण्डलगतभूकायिठेव, न वह्नि, प्रवचने निषेधात्, तत्रोष्णवमुष्णस्पर्शदयादुत्कटलोहितवर्णनामोदयाच
प्रकाशकत्व मिष्यत इति । यदुदयाजन्तुशरीराण्यनुष्णप्रकाशरूपमुद्योतं कुर्वन्ति यथा यतिदेवेत्तरवैक्रियचन्द्रग्रहनक्षत्रतारावि-
मानरत्नषधयस्तदुद्योतनाम ६ । यदुदयाजन्तुशर्ररेष्वङ्गप्रत्यङ्गानां प्रतिनियतस्थानवर्तिता भवति तन्निर्माणनाम सूत्रधार-
कल्पं, तदभावे हि तभृतककल्पैरङ्ग पाङ्नामादिभिर्तितानामपि शरउरउदरार्दनां स्थानप्रवृत्तेरनियमस्स्याद् ७ ।
यदुदयादष्टमहाप्रतिहार्याधतिशयाः प्रादुर्भवन्ति तर र्थकरनाम ८ । उक्ता अप्रतिपक्षाः प्रत्येकप्रकृतयः । अथ सप्रतिपक्षा
उच्यन्ते, श्च त्रसबादरपर्याप्रत्येकस्थिरशुभसुस्वरसुभगादेययशयः स्थावरसूक्ष्मापर्याप्तसाधारणास्थिराशुभदुस्वरदुर्भ-
गानादेयायशार्क रूपप्रतिपक्षसहिता वंशतिः । तत्र त्रसन्टुष्णाद्यभितप्ताः स्थानान्तरं गच्छन् त सा ईन्द्रयादयः,
तद्विपाकव्द्या कर्मप्रकृतिरपत्रसनाम १ । तद्विपरंतं स्थावरनाम, यदुदयादुष्णाद्यभिताड स्थानपरिहारासमर्थाः पृथिव्यादयः
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॥१३४॥

S 卐 A 卐 V ध A M '' A यत्र शिरोऽवं । हस्तपादादिकं च यथोक्तप्रमाणलक्षणोपेतं उरउदरादि च मडमं तत्कुब्ज ३७ । यत्र पुनरुरउदरादि प्रमाणल- क्षणोपेतं हस्तपादादिकं च ईनं तद्वामनं ३८ । यत्र तु सर्वेऽप्यवयवाः प्रमाणलक्षणपरेभ्रष्टास्तत् हुंडं ३९ । वर्ण्यरेऽलंक्रियते शरीरमनेनेति वर्णः, स च पञ्चधा-श्वेत तरक्तनलकृष्णदाद तन्निवन्धनं नामापि पञ्चधा । तत्र यदुदयाजन्तूनां शरीरे श्वेतवर्णः प्रादुर्भवेद यथा वलाकार्दनां तच्श्वेतवर्णनाम, एवमी भाव यम् ४४ । 'वस्तगंधअर्दने ' गन्ध्यरे आघायते इति गन्धः, स द्विधा-सुरभिगन्धे दुरभिगन्धश्च, तन्निवन्धनं नामापि द्विधा । तत्र यदुदयाजन्तूनां शरीरेषु सुरभिगन्ध उपजायरे यथा शतपत्रादनां तत्सुर भगन्धनाम ४५, एतद्विपरतं दुर भगन्धनाम भावन्यं ४६ । ' रस आस्वादनस्नेहनयोः' रस्यते आस्वाद्यते इन रसः, स च पञ्चधा;--तिक्तकटुकपायाम्लमधुरभेदात्, तिन्निवन्धनं नामापि पञ्चधा । तत्र यदुदया- जन्तूनां शरीरेषु तिक्तो रसो भवति यथा मरिचार्द नां तत्तिक्तरसनाम । एवमग्रेऽपि भावन्यम् ५१ । 'छुप स्पृश संस्पर्श' स्पृश्यते इति स्पर्शः, स च कर्कशमृदुल गुरुस्निग्धरूक्ष तोप्ण दादष्टप्रकारः, तन्निवन्धनं स्पर्शनामाप्यष्टभेदं । तत्र यदु- दयाजन्तूनां शरीरेषु पाषाणाद नामिव कार्कश्यं भवति तत्कर्कशस्पर्शनाम । एवमग्रेऽपि भावन यम् ५९ । विग्रहेण भवान्त- रेत्पत्तिस्थानं गच्छतो चिस्यानुश्रेणिनेयता गमनपरिपाट्यानुपूर्व, तद्वपाकवेद्या कर्मप्रकृतिरप्यानुपूर्व, सा चतुर्धा; नरक- गत्यानुपूर्व तिर्यग्गत्यानुपूर्व मनुष्यगत्यानुपूर्व देवगत्यानुपूर्व चेति ६३ । विहायसा गतिर्षिहायोगतिः, प्रथमप्रकृतिव्यव- च्छेदाय वहायसेत विशेषणं सा प्रशस्ता प्रशस्ता हंसगजवृषभार्दन, अप्रशस्ता खरोष्ट्रमहिपादनां तद्विपाकवेद्या कम्प्रकृ- तिर द्विप्रकारा वहायगतिः ६५ उक्ताः पिण्डप्रकृतयः, एतासां चावान्तरभेदाः पञ्चपष्टिः। अथ प्रत्येकप्रकृतयो वक्तव्याः, 卐 T 卐 A 卐 T 卐 V 卐 A N A L A 卐 . N निवतत्त्व- वन्धत उत्तर- र्टकायं- 卐 A 卐 V 卐 A 卐 T M प्रकृतयः। 卐zyyy c卐y संचातननामकर्मसिद्धिरिति संप्रदायाभिप्रायस्यैव युक्तत्त्वात् २७ संहननं नामास्थिरचनाविशेषः, तत् पेढा-वज्रर्षभनाराचं ऋषभनाराचं नाराचं अर्द्धनाराचं कलिका सेवा च वजं कलिका, ऋषभः परिवेष्टनपट्टः, नाराचमुभयत मल्टवन्धः, व द्वयरस्थ्नोरुभयते मर्कटबन्धेन बद्धयोः पट्टाकृतिना तृतयेनास्थ्ना परिवेष्टितयेरुपरि तदस्थित्रयदि कलिकाख्य- वज्रनामकमस्थि यत्र भवति तद्वज्रर्पभनाराचसंज्ञमाद्यं संहननं २८, यत्पुनः कलिकारहितं तदृषभनाराचं द्विर्तयं, २९ । यत्रास्थ्न मर्कटवन्ध एव वलस्तन्नाराचसंज्ञं तृतीय, ३०। यत्र पुनरेकपाधै मर्कटवन्ध द्विर्तयपार्श्वे च क लकाबन्धस्तदर्धनाराचं चतुर्थ, ३१ यत्रास्थीनि कालिकामात्रबद्धान्येव भवन्ति तत्कालिकाख्यं प , ३२, यत्र पुनः परस्परं पर्यन्तस्पर्शमात्रलक्षणां स्वामागतान्यस्थ नि भवन्ति नित्यमेव स्नेहाऽभ्यङ्गादिरूपां स्वां प्रच्छन्त वा तत्सेवात ख्यं , ३३ । एतनिवन्धनं संहनननामकर्माऽपि षोढा । संस्थानमाकारविशेषः सगृह तसङ्घातितबद्धेष्वदारकादिपुद्गलेषु यदुदयाद्भवति तत्संस्थाननाम, एवमग्रेऽपि भावन्यं । समाः सामुद्रिकशास्त्रक्तप्रमाणलक्षणविसंवादिन्यश्चतस्रऽस्रयश्चतुर्दिग्भागेपलक्षिताः शरीरावयवा यस्य तत्समचतुरस्र, ३४ । रुपरि सम्पूर्णप्रमाणत्त्वादधस्त्वतथाचादुपर संपूर्णप्रमाणाधोर्ह नन्यग्रोधवत् परिमंडलं यस्य तन्न्यग्रोधपरिमंडलं ३५ । आदिरहस्धाख्यो नारधस्तने देहभागे गृह्यते, : सह आदिना मेरधस्तनभागेन यथोक्तप्रमाणलक्षणेन वर्तत इति साद, शेषणाऽन्यथाऽनुपपत्त्या वेश र्थलाभः । अपरे सात पठन्ति, तत्र सात समयविदः शाल्मल तरुमाचक्षते, : साव यत्संस्थानं तत्सचि, यथा शाल्मलं तरोः स्कन्धकाण्डमतिपुष्टं उपर च न तदटुरूपा महाविशालता तद्वदस्याप संस्थानस्याधोभागः परिपूर्ण भवति उपरभागस्टुन तथेति भावः ३६ । १३३ G A 卐 T 卐 A 卐 L V ॥१३३॥ 卐 A A 卐 S A ) V 卐 U 卐 卐 A 卐 T 卐 A पञ्चधा ९ । शीर्यत इति शरीरं, तच्च पञ्चधा-अंदारकं वैक्रिय आहारकं तैजसं कार्मणं च, तद्विप वेद्यं कर्मापि शरीरनाम - पञ्चधा । यदुदयादौदारिकशरीरये ग्यान् पुद्गलानादाय दारकशरीररूपतया परिणमयति, परिणमय्य च विप्रदेशैः सहान्यो- न्यानुगमरूपतया संवन्धयति तदौदारिकशरीरनाम एवं शेषशरीरनामान्यपि भावनीयान १४ । अङ्गान्यष्टं शिरःप्रभृत नि । उक्तञ्च समुरोयर पढें दो वाहू ऊरुया य अटुंगा' । तदवयवभूतान्यङ्गुल्यादन्युपाङ्गान। शेषाणि तु तत्प्रत्यवयव- भूतान्यगुलपर्वरेखादीन्यङ्गोपाङ्गानि । ततोऽङ्गानि चोपाङ्गानि चाङ्गोपाङ्गानि, अङ्गोपाङ्गानि चाङ्गोपाङ्गानि चाङ्गोपाङ्गानि सरूपाणामेकशेषः' इत्येकशेषः, तनिमित्तं कमङ्गोपाङ्गं तनिधा, अंदारिकाङ्गोपाङ्गं, वैक्रियाङ्गोपाङ्गं आहारकाङ्गोपाङ्गं च । तत्र यदुदयाददारकशर रत्वेन परिणतानां पुद्गलानामङ्गोपाङ्गविभागपरिणतिरुपजायते तददारिकाङ्गोपाङ्गनाम, एवं वैक्रियाऽऽहारकाङ्गोपाङ्गनाम् अपि भावन्ये । तेजसकार्मणयोस्तु जीवप्रदेशसमानसंस्थानत्वान्नास्त्यङ्गोपाङ्गसम्भवः१७ । वध्यतेऽनेनेति वन्धन, यदुदयाददारिकपुद्गलानां गृहं तानां गृह्यमाणानां च परस्परमेकत्वमुपजायते काष्ठद्वयस्येव जतुस- म्बन्धात् , तच्चौदारिकवन्धनादिभेदेन पञ्चप्रकार २२। सङ्घात्यन्ते गृहीत्वा पिण्ड क्रयन्ते औदारिकादेपुद्गला येन तत्संघातनं, तदप्य दारिकसङ्घातनादिभेदेन पञ्चविधं । अथ कोऽस्य व्यापारः ? पुगलसंहतिमात्रमित चेन्न, पुद्गलसंहतिमात्रस्य ग्रहण- मात्रादेव सिद्धत्त्वात् तत्र संघातननामकर्मणोऽनुपयेगाद्, अंदारिकादिशरीररचनानुका रसङ्घातविशेषस्तद्व्यापार इति संप्रदायमतं, तदपि न, तन्तुसंहतेः पट इवंदारिकादिवर्गणाप्रभवपुद्गलसंहतेरेवंदारकशरीराद हेतुत्वात् तत्राधिकविशेषाना- श्रयणादिति चेत्सत्यं, प्रतिनियतप्रमाणेदारिकादिशरीररचनार्थ संहतिविशेषस्यावश्याश्रय यत्त्वात्तनिमित्ततारतम्यभागितया 卐 A 卐 N 卐 G 卐 A 卐 T 卐 V L 卐 A 卐 A N थेनवतत्त्व- सुमला- टकायां- 卐 A 卐 बन्धतद उत्तर- प्रकृत- भेदाः॥ M V - 卐 १३२ A A 卐 T y S दीर्घ निःश्वसिति तच्छे कमोहन्यं, २३ । यदुदयात्सनिमित्तमनिमित्तं वा स्वसङ्कल्पतो विभेति तद्भयमोहन यं, २४ । यदुदयाच्छुभमशुभं वा वस्तु जुगुप्सते तज्जुगुप्सामहर्नयं २५ । वेदत्रिकं हटेदः पुरुषवेदो नपुंसकवेदश्च । तत्र यदुदये स्त्रयाः । पुंस्यभिलापः पित्तोदरे मधुराभिलाषवत् स स्त्र वेदः, २६ । यदुदयात्पुंसः स्त्रयामभिलाषः श्लेष्मोदयादम्लाभिलापवत् स 卐 पुरुषवेदः, २७ । यदुदयात्स्त्रीपुंसयोरुपर्यभिलापः पित्तश्लेष्मोदये मजिका भलाषवत् स नपुंसकवेदः २८ । एते षोडश कषाया नव च नोकषायाश्चारित्रमोहसंज्ञाः॥ सुरायुनरायुस्तर्यगायुनराकायुश्चेति चतस्र आयुषः प्रकृतयः । अथ नामकर्मण उत्तरदानाह- चतुर्दशपण्डप्रकृतयोऽष्टाप्रतिपक्षाः प्रत्येकप्रकृतयवसदशकं स्थावरदशकं चेति द्विचत्वारिंशन्मूलनामप्रकृतयः । तत्र गति- जातशरैराङ्गोपाङ्गबन्धनसङ्घातसंहननसंस्थानवर्णगन्धरसस्पर्शानुपूर्वी विहायोगतयश्चतुर्दश पिण्डप्रकृतयः। पिण्डत्त्वं अवान्तरभेदy युक्तत्त्वं, तत्र गम्यते तथाविधकर्मसचिवैर्ज वैः प्राप्यत इति गतिः नारकत्त्वादिपर्यायपरिणतः, सा चतुर्धा नरकगतिस्तिर्यग्ग- तिर्मनुष्यगतिर्देवगतिश्च, तद्विपाकवेद्या कर्मप्रकृतिरप गतिः, साप चतुर्दा । एकेन्द्रियार्दनामेकेन्द्रियादिशब्दप्रवृत्तिनिवन्धनं 卐 तथाविधसमानपरिणतिलक्षणं सामान्य जातिः, तद्विपाकवेद्या कर्मप्रकृतिरपि जातः । अयमत्र पूर्वसूरणामभिप्रायः-द्रव्यरूप- मिन्द्रियमङ्गोपाङ्गनामेन्द्रियपर्याप्तिसामर्थ्यात्सिद्धं, भावरूपं तु स्पर्शनार्दन्द्रियावरणक्षयोपशमसामर्थ्यात् 'क्षायोपशमिकान 卐 न्द्रियाणि' इति वचनात् । यत्पुनरेनेन्द्रियादिशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं सामान्यं तदन्याऽसाध्यत्त्वाजातिनामनिवन्धनमिति, जातिः -एकेन्द्रयजातीन्द्रियजतिरन्द्रियजातिश्चतुरिन्द्रयजातिः पन्द्रयजातिश्चेति । तद्वपाकवेद्यं जातिनामकर्माप N - 卐 A 卐 T A L 卐 V ॥१३२॥ प 卐 A 444 -India- N MATHA- S 卐 U A M A A मेहनेयं विधा, तत्र यदुदया िजनप्रणिततत्त्वाथद्धानं तन्मिध्याचं । यदुदयाजिनप्रतितत्त्वं न सम्यक् श्रद्धत्ते नापि निन्दत तत् सम्यग्मिथ्यात्वं । यदुदयवशाजिनप्रणीततत्वं सम्यक् श्रद्धत्ते तत् सम्यक्त्वम् ३ । कपायनोकपायभेदाभ्यां चारित्रमोहनीयं 'द्वधा, तत्र पोडश कपायभेदाः, कपस्य संसारस्यायोलाभो येभ्यस्ते कपायाः क्रोधमानमायालोभाः, ते च प्रत्येकमनन्तानुबन्ध्य- प्रत्याख्यानावरणप्रत्याख्यानावरणसंज्वलनभेदाचतुर्धा, तत्रानन्तं संसारमनुवघ्नन्तीत्येवं ला अनन्तानुवन्धिनः, एपांच संयो- जना इति द्वितीयमप्यस्ति नाम संयोज्यन्ते सम्बध्यन्तेऽनन्तर्भवै जन्तवो यस्ते संयोजना इति व्युत्पत्तेः ७। न विद्यते स्वल्पमपि प्रत्याख्यानं येपामुदयात्तेऽप्रत्याख्यानाः ११ । प्रत्याख्यानं सर्वविरतिरूपमावियते यैस्त प्रत्याख्यानावरणाः १५ । पर पहो- पसर्गनिपाते सति चारित्रिणमपि सं ईपज्ज्वलयन्तीति संज्वलनाः ११ । नोकपाया इत्यत्र नोशब्दः साहचर्ये, ततः कपायैः सहचारिणः सहवर्तिनो ये ते नोकपायाः, कैः कपायः सहचारिण इति चेदाद्यदिशभिः। तथाहि नायेपु द्वादशसु कपायेषु ६ णेपु नोकपाया अवतिष्ठन्ते, तदनन्तरमेव तेपामपि क्षपणाय क्षपकस्य प्रवृत्तेः । यद्वैते समुजृम्भमाणा अवश्यं कपायाऽई- पयन्ति ततः कपायसहचारिणः उक्तञ्च,-'कपायसहवर्तत्त्वात्कपायप्रेरणादपि । हास्यादिनवकस्योक्ता नोकपायकपायता ॥ १॥ ते च नोकपाया नव, हास्यादिपदकं वेदत्रिकञ्च। तत्र हास्यादिपदकं हास्यरत्यरतिभयशोकजुगुप्सालक्षणं । तत्र यदुदया- सनिमित्तमनिमित्तं वा हसति तद्धास्यमेहनीयम् २० । यदुदयावाह्याभ्यन्तरेषु वस्तुपु प्रीतितिद्रतिमोहन्यं २१ । यदुदया- तेवतिस्तदरतिमहनीयं, २२ । प्रत्यप्रती साताऽसातात्मके एवेति वेदनीयकर्मणैवानयोरन्यथासिद्धिरिति नाशङ्कनीय, तदुपर्नतसुखदुःखहेतुसंनिधानेऽपि चित्ताऽन्यथाभावस्यैतद्ध्यापारत्वात् , यदुदयात् प्रियविप्रयोगादावाक्रन्दति भूठे लुठति 卐 N 卐 G 卐 A 卐 L T A A म एन S N 卐 U वन्धत बनवतत्त्व- 卐 A 卐 V M उत्तर- प्रकृति- भेदाः। काय- 3 . A ।१३१ A 卐 A 卐 T N एतच्च सर्वधारीत ५ अथ नवविधं दर्शनावरणं, तद्यथा-सर्वम्वेन्द्रियं सामान्यविशेषवेधस्वभावस्याऽऽत्मनः करणद्वारं, पश्यत्यनेनेति चक्षुः, तद्वारकं च सामान्यमात्रोपलम्भनमात्मपरिणतिरूपं चक्षुर्दर्शनं, तल्लब्धिघाति चक्षुर्दर्शनावरणम् १। शेषेन्द्रियमनोविषयमविशि- एमचक्षुर्दर्शनं, तल्लन्धिघाति अचक्षुर्दर्शनावरणम् २ । अवधिरेव दर्शनमवधिदर्शनम् , तदावरणमवधिदर्शनावरणम् ३ । लेवलमेव दर्शनं केवलदर्शनं, तदावरणं केवलदर्शनावरणम् ४ । 'द्रा' कुत्सायां, नयतं द्राति अविस्पष्टतया कुत्सितत्त्वं गच्छति चैतन्यं यस्यां स्वापावस्थायां सा निद्रा, नखच्छोटिकामात्रसाध्यप्रयोध्यस्वापावस्थेत्यर्थः ५ । निद्रातोऽतिशायिन नद्रा निद्रानिद्रा, मध्यमपदलेप समासः, तस्या ह्यत्यन्तमस्फुट भूतं चैतन्यं बहुभिर्यनैः प्रबोधमुपयाति ६ । उपविष्ट ऊर्ध्वस्थितो वा प्रचलति घूर्णते यस्यां स्वापावस्थायां सा प्रचला ७ । प्रचलातोऽतिशायिन प्रचला प्रचलाप्रचला, इयं हि चङ्क्रमणादि कुर्वतोऽप्युदयमागच्छतीति प्रचलातोऽस्या अतिशय चं, ८ । स्त्याना पिण्डीस्ता ऋद्धिरात्मशक्तिरूपा यस्यां स्वापावस्थायां सा स्त्यानः, तद्भावे हि प्रथमसंहननस्यार्धचक्रवर्धवलसदृर्श शक्तिरुपजायते ९ अत्र निद्रादयः समधिगताया एव दर्शनलब्धेरुपघाते वर्तन्ते, दर्शनावरणचतुष्टयं तु उद्गमोच्छे दित्वात्सम्लघातं दर्शनलब्धि हन्टीति बहुश्रुतवचनम् । तथा च प्राप्तस्य दर्शनस्य नाशकत्वेनाध्याप्तस्य च प्रतिबन्धकत्त्वेन नवानामपि प्रकृर्तनां दर्शनावरणत्वं परिभाषितं भवति ॥ वेदनीयस्य द्वे प्रक, सातमसातं च, तत्र यदुदयादारोग्यविषयोपभोगादिजनितमालादलक्षणं सातं वेद्यते तत्सातवेदनीयम् । तद्विपरीतमसात- वेदन्यम् २ । दर्शनमोहन्य-चरित्रमोहन यभेदाभ्यां मोहन्यं द्वविधं, तत्र मथ्यात्व-सम्यग्मिथ्यात्त्व-सम्यक्त्वभेदैर्दर्शन- 卐 A A T 卐 L 卐 A 卐 卐 V 卐 A ॥१३१ ।

S •卐z U ॥ A 卐 卐 in 卐 A 卐 A 卐 T N ज्ञानावरणं, श्रुतज्ञानावरणं, अवधिज्ञानावरणं, मनःपर्ययज्ञानावरणं, केवलज्ञानावरणं। तत्राऽऽत्मनो ज्ञस्वभावस्य प्रकाशरूपस्य ज्ञानावरणक्षयोपशमक्षयसमुद्भवाः प्रकाशविशेपा मतिज्ञानादिव्यपदेश्या बहुविकल्पाः। तत्र च ज्ञानावरणस्य स्वस्थाने यावन्तो विकल्पाः सम्भवन्ति ते सर्वे ज्ञानावरणेनैव ग्राह्या । विकल्पाश्चमे-इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तत्त्वादवग्रहादयो भतिज्ञानस्य, अङ्गा- नङ्गविकल्पाः श्रुतज्ञानस्य, भवक्षयोपशमजप्रतिपात्यादिविकल्पाश्चावधिज्ञानस्य, ऋजुविपुलमति विकल्प मनःपर्यायज्ञानस्य, सयोगाऽयोगस्थादिविकल्पाः केवलज्ञानस्येति । तत्रेन्द्रियनिमित्तं श्रोत्रादिपञ्चकसमुद्भवं क्षयोपशमजं ज्ञानं योग्यदेशावस्थितस्व- विपयग्राहि, अनिन्द्रियं तु मनोवृत्तिरोघज्ञानञ्च, तदेतन्मतिज्ञानं चतुरष्टाविंशतिद्वात्रिंशत्पत्रिंशदुत्तरत्रिशतभेदमाब्रियते येन तन्मतिज्ञानावरणम् देशघाति लोचनपटलवच्चन्द्रप्रकाशाऽभ्रादिवद् वा १। तथा श्रोत्रेन्द्रियलब्धिः श्रुतं शेपेन्द्रियमनोविज्ञानश्च श्रुतग्रन्थानुसारि स्वार्थाभिधानप्रत्यलं श्रुतज्ञानं, तदनेकदमाचक्षते प्रवचनाभिज्ञाः । यथाह बृहत्कल;- जावंति अकराई, अस्करसंजोग जत्तिया लोए। एवइआ पगडीओ, सुयनाणे हों त नायव्वा' ॥१॥ तस्यावरणं श्रुतज्ञानावरणम् , एतदपि देशघातीत २ । अन्तर्गतबहुतरपुद्गलद्रव्यावधानादवधिः, पुद्गलद्रव्यमर्यादयैव वाऽऽत्मजःक्षयोपशमजः प्रकाशाविर्भावो वाऽवधिरिन्द्रियनिरपेक्षः साक्षात् ज्ञेयग्राह लोकाकाशप्रदेशमानप्रकृतिभेदः, तदावरणमवधिज्ञानावरणम् , इदमपि देशघात्येव ३। तथा मनुष्यक्षेत्राऽन्तर्वतिसंज्ञिपञ्चेन्द्रियगृह तचिन्तितमनोद्रव्यपर्यायान् निमित्तीकृत्य पल्योपमाऽसंख्येयभागावच्छिन्नभूतभ- विष्यत्सम्बन्धिसामान्यविशेषग्राह. आत्मनो यः प्रतिभासस्तन्मनःपर्यायज्ञानं, तस्यावरणं मनःपर्यायज्ञानावरणं, एतदपि देशधाति ४ । समस्तावरणक्षयाविर्भूतमात्मप्रकाशतत्त्वमशेषद्रव्यपर्यायग्राहि केवलज्ञानं, तदाच्छादनकृत् केवलज्ञानावरणं - A - . 卐 T 4. 卐 G 3 A 卐 L 卐 A 卐 V 卐 द धा N y S 卐 वन्धत मूलत्तर- प्रकृति- विधानम् ॥ 卐 M V 卐 A A . 卐 ॐनवतत्त्व- 卐 दर्शन ज्ञानदर्शने तयोरावरणं ज्ञानदर्शनावरणं, ज्ञानावरणं दर्शनावरणं चेत्यर्थः । तथा वेद्यरे सुखदुःखरूपतयाऽनुभूयरे A यत्तवेद्यम् , चेदयमित्यर्थः, यद्यपि सर्व कर्म व्धरे तथापि पंकजादिशब्दवद्वेद्यशब्दस्य रूढ वषयत्वात्साताऽसातरूपमेव कर्म 卐 र्टकायं देद्यमित्युच्यते न शेषम् । तथा मोहयति जानानमपि प्राणिनं सदसद्विदेकविकलं करोतीति मोहः, लिहादित्वादचप्रत्ययः, मेहन्यमित्यर्थः। तथा एति गच्छत्यनेन गत्यन्तरमित्यायुः, यद्वा एति आगच्छति प्रतिवन्धकतां स्वकृतकर्मावाप्तनरकाद- १३०॥ दुर्गनिर्गन्तुमनसेऽपि जन्तरित्यायुः उभयत्रापि उणादिको णुस् प्रत्ययः, यद्वाऽऽयाति भवाद्भवान्तरं संक्रामतां जन्तूनां विरेनेदयमागच्छति, पृषेदरादित्त्वाच्छन्दसिद्धिः, यद्यपि च सर्व कर्मोदयमायात तथाप्यस्त्यायुपो विशेषः यतः शेष कर्म 卐 बद्धं सद् किंचित्तस्मिन्नेव भने उदयमायात, निश्चित्तु प्रदेशोयभुक्तं जन्मान्तरेऽपि स्वविपाकत उदयं नाया त्येवेत्युभयत्रापि व्यभिचारः, आयुषि त्वयं नास्ति, बद्धस्य तस्मिन्नेव भवेऽटेदनात् , जन्मान्तरसङ्क्रान्त तु स्वविपाकतोऽवश्यं वेदनादिति 卐 विशिष्टस्यैवोदयागमनस्य ववक्षितत्त्वातस्य चायुष्येव सद्भावात्तस्यैवैतन्नाम, अथवा आयान्त्युपभोगाय तस्मिन्नुदिते सति तद्भवप्राय ग्याणि सर्वाण्यपि शेषकात्यायुः । तथा नामयति तजातिप्रभृतिपर्यायानुभवनं प्रति प्रवणयति व मिति 卐 T नाम तथा 'गु' शब्दे, गूयरे शब्द्यते उच्चाववैः शब्दैरात्मा यस्मात्तद्गत्रम् । तथा विशेषेण हन्यन्ते दानादिलब्धयो विनाश्यन्तेऽन्नेति ' स्थास्नायुधिव्याधिहनिभ्यः कः' इति कप्रत्यये विनमन्तरायम् । 'चः' समुच्चये । ' पणनवदुअर्टस' 卐 इत्यादि, द्वन्द्वगर्भ बहुई हसमासः भावार्थः पुनरयम् :-पञ्च' ज्ञानावरणम् , नवविधं दर्शनावरणम् , द्विविधं वेद्यं, अष्टावेंशतिविधो मोहः, चतुर्वधमायुः,त्र्युत्तरशतविधं नाम, द्विविधं गोत्रं प विधं विनमिति । तत्र प ज्ञानावरणं,यथा मति- T N A 编 G y A - V ॥१३०॥ A an S 卐 A ॥ V 卐 A 卐 T M A अत गेत्रकर्म कुम्भकारकल्पम् । दारिद्यभाद्विजा वचः श्रुत्वा प्रसन्नेन नृपतिना विताईदानार्थमादेशे दत्तेऽपि कार्पयंदोपाकुलो भाण्डागारिकस्तस्मै U द्विजाय न किञ्चित्प्रयच्छति तथा योग्यसामई सद्भावेऽपि दानं दातुमादाट वा अन्तरायोदयभागयं जवो न शक्नोति तस्मा- भाण्डागारिककल्पमन्तरायकर्म इति ॥ ३८ । अथ प्रकृतिवन्धं विधानतो भावयति;- 卐 इह नाणदंसणावरणव्यमहाउनामगोयाणि विरच पण नव दुअट्ठीस चउतिसयदुपण वहं ॥३९॥ टका;-' इह ' इति अस्मन् बन्धप्रकरणे प्रकृतिवन्धो मूलभेदाऽपेक्षयाऽष्टविधः, उत्तरदाऽपेक्षया अष्टापञ्चाशदधि- कशतप्रकार इत्युपरिष्टाद्विज्ञेयम् , ते च मूलोत्तरदाः कनामानः कस्य मूलभेदस्य कतिसंख्याका उत्तरदा इत्यनया गाथया प्रदर्श्यते । तत्रादं मूलभेदान्नामग्राहमाह;-' नाणदंसणावरणवेयमोहाउनामगोयाणि वग्धं च' इति, अत्राऽऽवरण- शब्दस्योभयत्र सम्बन्धात् ज्ञानावरणदर्शनावरणे, ज्ञानावरणञ्च दर्शनावरणञ्च वेद्यश्च मोहश्च आयुश्च नाम च गोत्रश्चेति ज्ञानावरणदर्शनावरणवेद्यमोहायुर्नामगोत्रार्णत द्वन्द्वः । तत्र ज्ञायते परछद्यते वस्त्वनेनेति ज्ञानं, ज्ञप्तिर्वा ज्ञानम् , सामान्य विशेषाऽऽत्मके वस्तुनि विशेषग्रहणात्मके बोध इत्यर्थः । तथा दृश्यतेऽनेनेति दर्शनं, दृष्टिर्वा दर्शनं, सामान्य विशेषा- त्मने वस्तुनि सामान्यग्रहणात्मक बोधः । आत्रियते आच्छाद्यतेऽनेनेत्यावरणं, यद्वाऽऽवृणोत्याच्छादयति 'रम्यादिभ्यः कर्नर, इत्यनटि प्रत्यये आवरणं, मिथ्याच्चादिसचिव वव्यापाराहृतकर्मवर्गणाऽन्तःपाती विशिष्टपुद्गलसमूहः । ततो ज्ञानञ्च N 卐 A G T A L 卐 V 卐 A 卐 A एन . N नवतत्त्व- U र्टकायां- 卐 A 卐 V 卐 A 卐 T १२९ A N नरदेवदर्शनाभिलाप कश्चिन्मनुजे राजभुवनद्वारिसमागतोऽपि प्रतीहारेण निपिद्धः सन् दर्शनेच्छायां सत्यामपे बन्यताले तल्लाभवञ्चितो भवति, एवं चत्रविचित्रपदार्थालोकनसुगंधिद्रव्याघ्राणनसंतिप्रमुखध्वनिश्रवणादीन्यभिलपन्नपि चक्षुरचक्षदर्श- नावरणसंज्ञककर्मोदयावाप्ताऽन्धत्त्ववधिरत्वादकः स्वाभिलापापूरणेऽसमर्थों भवति तस्माद्दर्शनावरणं प्रतीहारकल्पम् ॥ ar: पटप्रतिहा- मधुलिप्तासिधारा मुखे प्रक्षिप्ता सत यावत्कालं मध्वंशस्तावत्स्वादातिशयं प्रयच्छति, किन्त्वनन्तरं जिह्वाच्छेदं विधचे M' रादिदृष्टा- न्तानि ।। तद्वद् यावत्सातदयस्तावत्सुखानुभवस्स्यादनन्तरमशातोदयेनाजुभविपाकोदय भवर्त त्यतो वेदयं मधुलिप्तासितुल्यम् ।। मदिरापानमत्ते मातृकलत्रादिविवेकविकलस्सञ्जायते तथा मोहन्यकम्मोदयवानात्मा श्रद्धामूलकं हेयोपादेयनिवृत्तिप्र- वृत्तिलक्षणं विवेकं न सञ्जारे ततो मदिरापानोपमं मेहन्यम् । निगडनिक्षिप्तकरचरणो नरे यथापराधं यावद्दण्डकालस्तावन्न निगडान्मुच्यते, एवं यावद्विवक्षितभवायुरुदयस्तावत्तद्ध- वान्मोक्तुं नाहॊ भवत त्यायुर्निगडसंनिभम् । विचित्रचित्रपरिकर्मकुशल यथाचातुर्य शुकपिकनरामरादीनां चित्राणि रचयति तथा तत्तन्नामकर्मोदरेन कश्चिदात्मा 卐ी चन्नारक: श्चद्देवः कश्चन्नरः श्चिदेन्द्रियः कश्चित्पञ्चेन्द्रियः कश्चित्सुसंस्थानः कश्चिद्वामनो जायते, तस्मान्नामकर्म चित्रकारकल्पम् । 卐 कुलालनिष्पन्नानां घटानां समटेऽपि एकस्मिन् घटे इक्षुरसाद्यानि प्यानि भ्रियन्ते, एकस्मॅिश्च मदिराप्रमुखमादक- L द्रव्याण "क्षप्यन्ते, एवमात्मत्त्वे समानेऽपि उच्चैर्गेत्रोदयेन प्रशस्यकुले समुत्पत्तिः, गोत्रोदरेन च निन्धकुले उपपातः, ॥१२९॥ y 1A ध G A A 卐 T 卐 V 卐 A 卐 N S U 卐 A y V M - A A 卐 - T N 卐 A मेव कापायिक सलेश्य यं परिगृह्यते, तस्यैव वन्धादिहेतुच्यादिति ॥ अपि च उपादानं तु यथायगं कर्मस्कन्धानामेव जायते 卐 परमुपादयमानकर्मस्कन्धेषु तत्समयवर्तकपायोदयलेश्यानुसारिण जघन्योत्कृष्ट वमन्दस्थितिरसावुत्पद्येते, प्रागुक्तरीत्या च स्थितिरसप्रदेशानां समुदायः प्रकृतिबन्ध इत्युक्तं, केवलं वाचः क्रमवर्तत्त्वात् प्राक् प्रकृतिवन्धः पश्चात्स्थतिवन्ध इत्यादि- क्रमेण प्रतिपादनं जायत इति ॥ ३९ ॥ योगकषायानुसारवध्यमानकर्मणां कथंभूता प्रकृतिरति दृष्टान्तेन भावयति- 卐 पडपडिहारऽसिमज्ज-हडचित्तकुलालभंडगारणं जह एएसिं भावा, कम्माणऽवि जाण तह भावा॥३६॥ टीका;-पटप्रतिहारासिमद्य निगडचित्रकारकुलालकपाध्यक्षानां यथा तत्र तत्र तत्तच्चेष्टितं विज्ञायते तथा कर्मणामपि क्रमशः पटप्रतीहारादीनां चेष्टितत्त्वमिव विविधाश्चेष्टाः प्रकृतित्त्वेनानुभूयन्त इति गाथासंक्षेपार्थः । अत्रायमाशयः- 卐 आकर्णायतनिर्मलतरनेत्रोऽपि घट्टपटाच्छादितदृष्टिकस्सन् सन्मुखवर्तिनोऽपि पदार्थान् द्रष्टुं न पारयति, किश्चित्तनुपटच्छन्नचक्षुष्कः व पदार्थगोचरमीपदाभासं जनयति, प्रतनुपटावृतलोचनः पूर्वापेक्षया विशेष पश्यति, विगतसमूलपटाद्यावरणच्चादच्छलोचनः 卐 स्पष्टां दृष्टिमर्यादां साध्नोति, एवं निविडनि विडतरनिविडतमज्ञानावरणावृतात्मा ज्ञानमयत्त्वेऽप्यात्मनोऽनन्तज्ञानांशमृते विवेकादिविकलस्सन् किश्चिर्डवाजीवादिपदार्थविज्ञाने न समर्थों भवति, जाते च ज्ञानावरणीयस्य क्षयोपशमे क्षयोपशमानुसारी 卐 स्पष्टः स्पष्टतरः स्पष्टतमो बोधस्सञ्जायते, यदा चाऽशेषज्ञानावरणीयस्यापगमस्तदा लोकालोकवय॑शेपमपि हस्तामलकवत् आत्मगचरं जायत इत्यत ज्ञानावरणस्य पटौपम्यमिति । y A 卐 A 卐 T 卐 V प A 卐

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१२८॥
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तद्वन्धनम् । सङ्क्रम्यन्तेऽन्यकर्मरूपतया व्यवस्थिताः प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशा अन्यकर्मरूपतया व्यवस्थाप्यन्ते येन तत्सङ्क्रमणम्।
तद्भेदावेव उद्वर्तनाऽपवर्त्तने, ते च कर्मणां स्थित्यभागाश्रये, तत्रोद्वारे प्रभूटी क्रियेते स्थित्यनुभाग यया वीर्यपरिणत्या
सा उद्वर्त्तना अपवते इस क्रियेत स्थित्यनुभाग यया साऽपवर्त्तना। उदीयतेऽनुदयप्राप्तं कर्मदलिकमुदयावलिकायां पश्यते
यया सा उदीरणा उपशम्यते उदयोदीरणानिधत्तिनिकाचनाकरणाऽयोग्यत्वेन व्यवस्थाप्यते यया सा उपशमना। निधीयते
उद्वर्त्तनाऽपवर्त्तनाऽन्यशेपकरणाऽयोग्यवेन व्यवस्थाप्यते कर्म यया सा निधत्तिः। पृपोदरादित्वादिष्टरूपसिद्धिः। 'कच बन्धने'
नितरां कच्यते स्वयमेव बन्धमायाति तथाविधसंक्लष्टाऽध्यवसायस्य जीवस्य कर्म तत्प्रयुके जीव एव तथानुकूल्टन भवनादित
प्रयोक्तृव्यापारे णिङ् प्रत्ययः, तते निकाच्यरे सकलकरणाऽयोग्यत्त्वेनाऽवश्यदेद्यतया व्यवस्थाप्यते कर्म जीन यया सा
निकाचना, अथवा 'कच बन्धने' इति चरादिकेऽप्यस्त ति तस्टेदं रूपम् । १॥" करण सलेश्यवर्यम् , स एवाऽध्यवसायः।
नचागबन्धस्ततो सङ्क्रमः पश्चादुद्वर्त्तनेति क्रमेण करणप्रवृत्तिर्वाच्या, यतो यदा वन्धस्तत्समकालमेव सञ्जमादीनि करणादीन
यथायोगं प्रवर्त्तन्ते, केवलं यदा बन्धस्य विवक्षा तदा तन्निमित्तकोऽध्यवसायः वन्धनकरणनाम्ना प्रोच्यते, यदा संक्रमस्य
विवक्षा तदा सैवाऽध्यवसायः सङ्कमकरणसंज्ञयोच्यते, यथैकः पुरुषः पुत्रापेक्षया पिता भवति,कान्तापेक्षया पतिर्भवति, अम्बा-
पेक्षया पुत्रो भवति, भात्रपेक्षया भ्रातापि भवति । यतो द्विविधं हि वीर्य, छाअस्थिकं कैवलिकं च, उभयमपि प्रत्येकमकपायि
सलेश्यं च भवति, तत्र छामस्थिकमकपायि सलेश्यम्पशान्तक्षीणमोहानां, नैवलिकं च सलेश्यं सयोगिकेवलिनां, अयोग-
वलिनां सिद्धाना बैवलिकमप्यलेश्यं भवति । सूक्ष्मसम्परायान्तानां छामसि सलेश्यं कापायकंर्यच भव , अत्र विद-
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॥१२८॥

A U - * M A सायरूपकारणस्यकविधत्त्वेन एकमेव कार्य सम्पद्यत इति वाच्यम् , यते मनोवाकायाऽन्यतमयोगेन प्रकृतिप्रदेशबन्ध, कपायेण च स्थित्यनुभागवन्धाविति यद्यपि वस्तुतत्त्वम् . जोगा पयडिपएसं ठिइ अणुभागं कसायओ कुणइ ' ति वचनात् तथापि र तत्तक्षयोपशमवतीनामुदयवतीनाञ्च शरीर(योग)कपायप्रभृतिप्रकृतीनां समकालमेवोदयात् क्षयोपशमात् अध्यवसायस्य च 卐 तत्तत्प्रकृतिक्षयोपशमोढयनिष्पन्नवाद् विचित्राऽध्यवसायेन विचित्रकार्यनिष्पत्तिरिति निर्वाधम् । यथा चित्रविचित्रमटूर शिशोः 5 निष्पत्तं चक्षुर्गोचराततमपि गर्भवीजस्यैव वैचित्र्यं प्रतयते तथा समकालमेव प्रकृत्यादिविचित्रवन्धेषु अध्यवसायवैचत्र्य सुतरां . A. विज्ञायते । न च केवलमेकविधाऽध्यवसायेन प्रकृत्यादिवन्धचतुष्कमपि तु सङ्कमोद्वर्त्तनाऽपवर्त्तनोदरणार्दन्यपि तेनैवाध्यवसायेन प्रवर्त्तन्ते, सङ्क्रमादयश्च करणविशेषाः, यदुक्तम् ;-वंधण संकमणुवट्टणा य अवचट्टणा उदीरणया । उवसामणा नहत णिकायणा च त्ति करणाई ।। १ ।। अस्याश्चेयं गमनिका-बध्यते चप्रदेशैः सहाऽन्योऽन्यानुगतीक्रियतेऽटप्रकारं कर्म येन विशेपेण y १ अनुभागवन्धो यद्यपि कपायोदयप्रत्ययिकस्तथापि लेश्यासहचरितकपायोदयोऽनुभागवन्धहेतुरिति विज्ञेयम् । यतो भिन्नभिन्नजीवानां स्थितिवन्धस्य साम्येऽपि अनुभागस्य तीव्र-तीव्रतर-मन्द-मन्दतरापेक्षया तारतम्यं प्रतीयते, अनेनैव च एकस्मिन् 卐 卐 स्थितिबन्धाऽध्यवसायस्थानेऽनुभागवन्धाऽध्यवसायस्थानानामसंख्येयलोकाकाशप्रदेशतुल्यत्त्वं युक्तिसङ्गतमिति ॥ तथा चोक्तं,-स्थिति- पाकविशेषस्तस्य भवति लेश्याविशेषेणेति ॥ 卐 २ अत्र शरीरशब्देनोपलक्षणाद्वाड्मनसी अपि स्वीकर्त्तव्य इति ॥ ३ 'वीर्यविशेपेण' इत्यनेन न केवलं योगवाच्यं वीर्यं गृहीतव्यं किन्तु सलेश्यादिविशेषणविशिष्टं विज्ञेयं ॥ T N G A A T y L V A A 卐 卐 N S बनवतत्त्व- A 卐 U 卐 M वन्धतटे प्रकृत्यादि- वन्धः॥ र्टकायां- V १२७ A A 卐 T रसाकारेण याऽनुभूयमानाऽवस्था सोऽनुभागवन्धेऽनुभाववन्ध रसबन्ध वा । प्रकृतिस्थितिरसविवक्षानिरपेक्षदलिकसंख्याषा- धान्टेनैव कर्मपुद्गलानां यग्रहणं स प्रदेशबन्ध इति ॥ इद प्रकृतिस्थितिरसप्रदेशबन्धानां स्वरूपं मोदकदृष्टान्तेन भावनीयम् , यथा वातविनाशिद्रव्यत्पन्ने मेदकः प्रकृत्या बातमुपशमय , पित्तेपशमकद्रव्यनिर्वृत्तः पित्तम् , कफापहारिद्रव्यसमुद्भूतः कफमित्येवं स्वभावा प्रकृतिः स्थितिस्तु तस्यैव कस्यचिद्दिनम्कं, अपरस्य तु दिनद्वयं एवं यावत् कस्यचिन्मासादिकमपि भवति, ततः परं विनाशादिति । रसः पुनः स्निग्धमधुरादिरूपः तस्यैव कस्यचिदेकगुणोऽपरस्य द्विगुणोऽन्यस्य त्रिगुण इत्यादिकः प्रदेशाश्च कणिकादिरूपास्तस्यैव कस्यचिदेकप्रसृतिप्रमाणाः, अन्यस्य तु प्रसृतिद्वयप्रमाणा यावदपरस्य सेतिका- दप्रमाणाः। एवं कमणेऽपि कस्यचिज्ज्ञानाच्छादनस्वभावा प्रकृतिः, अपरस्य दर्शनावरणरूपा, अन्यस्याऽऽह्लादादिप्रदानलक्षणा, कस्यचित्सम्यग्दर्शनविघातजननस्वभावेत्यादि । स्थतिश्च तस्यैव कस्यचित्रिंशत्सागरोपमकोर्ट कोर्ट रूपा, अपरस्य तु सप्तति- सागरेपमकेट कोर्टलक्षणेत्यादि । रसस्त्वनुभागानुभावशब्दवाच्यस्तस्यै थानक द्विस्थानकत्रिस्थानकादिरूपः । प्रदेशा अल्पवहुतरबहुतमादिरूपा इत ॥ नन्द्रकाध्यवसायविशेषेण प्रकृत्यादयश्चत्त्वारो बन्धा युगपदेव सञ्जायन्त आहोश्चित् प्राक् प्रकृतिवन्धस्ततः स्थितिवन्ध इति सम्पद्यन्तै ? यौगपद्येन बन्ध इति चेत् कथम्काध्यवसायलक्षणेन कारणेन कार्यरूपाः प्रकृत्यादयश्चत्वारो बन्धाः? यदि क्रमेणेत द्वितीय भङ्ग उररक्रियते तदा प्रकृत्यादिषु प्रत्येकबन्धेषु भन्नभिन्नाध्यवसायानां कारणत्वं सम्पन्पोत, न चैवं प्रतिपाद्यते, किमत्र प्रतिविधानम् ? उच्यते-एकाध्यवसायविशेषेण युगपदेव प्रकृत्यादनां बन्धस्सञ्जायते, न काध्यव- 卐 A 卐 N 卐 G 卐 A T L V ॥१२७॥ y A 卐 A N . S A V 卐 U 卐 M 卐 A ज A 卐 T क्षयेण वोपजायमाना क्षायोपशमिका क्षायिका वार्यलब्धिस्समानरूपा सर्वाऽऽत्मप्रदेशेषु ततो यदा यदा प्रतिसमयं कर्मपुद्ग- लानां ग्रहणमात्मप्रदेशस्स्यात्तदा तदा एकस्यां प्रतोलिकायां निवसतां समकालमेव विवाहादिकार्यप्रसक्तानां शतानां गृहमेधिनां यथा स्वस्य अनन्तरपरम्परसम्बद्धत्वेनाऽन्येषामपि उपग्राहकत्त्वं दृश्यते तद्वदनन्तरपरम्परतया निखिलानामात्मप्रदेशानां रवाऽत्म- प्रदेशार्थमन्यात्मप्रदेशार्थं च अल्पाधिकतया व्यापार उपजायत इति । अयं च विषयः कर्मप्रकृति-पञ्चसंग्रह-शतकप्रकरणादिषु विस्तरेण प्रपञ्चितस्ततो द्रष्टव्यः। एवञ्च रागद्वेपस्नेहलेशावलढसकलात्मप्रदेशो जीवो वद्धोदितमिथ्यात्वादिभिर्हेतुभिर्येष्वा- काशनदेशेष्ववगाढस्तेष्वेवावस्थितान् कार्मणविग्रहयोग्यान् पुद्गलस्कन्धानादाय प्रकृतिस्थितिरसतया तान् यत्परिणमते स प्रकृ- त्यादिवन्ध इति निष्कर्षः। स च प्रकृत्यादि दैश्चतुर्विधः प्रकृतिवन्धः, स्थितिवन्धः, अनुभागवन्धः, प्रदेशवन्धश्च। तत्र स्थ- त्यनुभागप्रदेशवन्धानां यः समुदायः स प्रकृतिवन्धः, “प्रकृतिः समुदायः स्याद्" इतिवचनात् । रक्तद्विष्टेनाऽऽत्मना स्वाऽव- गादाऽऽकाशप्रदेशवर्तिकार्मणस्कन्धा यदा उपादीयन्ते अध्यवसायविशेषाच्चाऽऽत्मसात्क्रियन्ते तदा हंसः रोदके इव अथवा गचर्विततृणकवलानां दुग्धसहितसप्तधातुतया परिणमनमिव एकसमयगृहितकार्मणस्कन्धानां मध्ये केचन ज्ञानावरणीयतया लेचिद्दर्शनाच्छादकत्वेनाऽपरे सुखदुःखानुभवयोग्यतया परे च दर्शनचरणव्यामोहकारितयाऽन्द्र नारकतिर्यङ्मानुष्याऽमरा- ऽऽयुष्केनाऽन्ये गतिशरीराद्याकारेणाऽपरे उच्चन्चगोत्रानुभावेनाऽन्ये दानाद्यन्तरायकारितया यद् व्यवस्थाप्यन्ते स प्रकृति- बन्धः । ज्ञानावरण यादिप्रकारतया प्रविभक्तानां कर्मस्कन्धानामध्यवसायविशेषादेव जघन्यमध्यमोत्कृष्टस्थितिकालनियमनं स स्थितिबन्धः । नियमित स्थतिकानां स्वस्वपाककाले परिपाकमुपगतानां कर्मस्कन्धानां घृतई रके शातकीरससदृशशुभाऽशुभ- N 卐 A 卐 T 卐 V 卐 A y A 卐 L 卐 A २२ - e 卐 N S M V A A y नवतत्त्व- 卐 अष्टस्पर्शाश्च एवं क्रियाहारकशरीरप्रायोग्या अपि वर्गणा द्रष्टव्याः तैजसशरीरप्रायोग्या वर्गणाः पञ्चवर्णा द्वगन्धाः A U बन्धतले सुमङ्गला- y पञ्चरसाश्चतुःस्पर्शाः, तत्र मृदुलघुरूप टू स्पर्शाववस्थित, अन्य तु द्वै स्पशौं स्निग्धोष्ण स्निग्धरत वा, रूक्षत वा, एवं ड कर्मवन्ध- टकायां भाषा प्राणापानमनःकर्मप्रायोग्या अपि वर्गणा द्रष्टच्याः। तथदारिकवर्गणाः प्रदेशार्थतया सर्वस्तोकाः, ताभ्यो वैक्रियशरीरमा- स्वरूपम्। यग्या वर्गणा अनन्तगुणाः, ताभ्य आहारकशरीरसायोग्या वर्गणा अनन्तगुणाः, ताभ्योऽपि तैजसशरीरप्रायोग्यवर्गणा अनन्त- १२६ 卐 卐 गुणाः, एवं भाषाप्राणापानमनःकर्मप्रायोग्या अपि वर्गणा यथोत्तरमनन्तगुणा वाच्या इति॥(मलयगिरया कर्मप्रकृतिवृत्तिः)। 卐 ननूक्तप्रकारेण चतुर्दशरज्जुपरिमिते लोले कार्मणपुद्गलानां यदा सर्वत्र सद्भावः प्रतिपादितस्तदा कान् कर्मयेग्यपुद्गलान् ' T कुत्र स्थित जव उपादत्ते ? आत्मनोऽचिन्त्यशक्तिकत्वादिति चेदुच्यते;-यथा जातवेदाः स्वसम्बद्धानन्धनान्येव दहति N 卐 नत्वसम्बद्धानि तथाऽयमात्माऽपि येष्वाकाशप्रदेशेष्ववगाढस्तत्र वर्तमानानेव कर्मयोग्यपुद्गलानादत्ते नत्त्वनन्तरपरम्परप्रदेशाऽव- गाढानिति 'एगपएसोगाढं नियसव्वपएसओ गहेइ जिओ' इति वचनात् । अस्या गमनिका;-एकस्मिन्प्रदेशेऽवगाढमेक- G 卐 प्रदेशावगाढं येष्वाकाशप्रदेशेषु जबोऽवगाढस्तेष्वेव यत्कर्मपुद्गलद्रव्यं तद्रागादिस्नेहगुणयोगादात्मनि लगति' ॥ ननु कर्म- T ग्रहणं यदा च सञ्जायते तदा लोकाकाशप्रदेशपरिमिताऽऽत्मप्रदेशैनिखिलैरेव कर्तृभूतैः कर्मग्रहणं जायत उत न्टनैरिति? उच्यते;- A 8 शूलाऽवयवानामिव सर्वात्मप्रदेशानां सम्बद्धत्त्वादेकस्मिन्नात्मप्रदेशे क्षेत्रावगाढग्रहणप्रायोग्यद्रव्यग्रहणाय व्याप्रिय- माणे सर्वेऽप्यात्मप्रदेशा अनन्तरपरम्परतया तद्रव्यग्रहणाय व्याप्रियन्ते यथा हस्ताग्रेण स्मश्चद्राह्ये घटादिके गृह्यमाणे L 卐 मणिबन्धकूर्परांसादयोऽपि तद्हणायानन्तरपरम्परतया व्याप्रियन्ते । यतो र्यान्तरायस्य देशक्षयेण (क्षयोपशमेन) सर्व- ॥१२६॥ A A A, תל S V ' वर्गणापेक्षया चैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा जघन्या ग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कंधरूपा द्वितीयाऽग्रहण- A प्रायोग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा अग्रहणप्रायोग्या वर्गणास्तावद्वक्तव्या यावदुत्कृष्टाऽग्रहणप्रायोग्या वर्गणा ॥ भवति, जघन्यायाश्चोत्कृष्टाऽनन्तगुणा, गुणकारश्चाऽभव्याऽनन्तगुणसिद्धाऽनन्तभागकल्पराशिप्रमाणो द्रष्टव्यः । ततोऽग्रहणणा- योग्योत्कृष्टवर्गणापेक्षया एकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा मनायायोग्या जघन्या वर्गणा, इह यानि पुद्गलद्रव्याणि जन्तवः सत्यादि- M ॐ मनोरूपतया परिणमय्यालम्व्य च विसृजन्ति तानि मनःप्राय ग्या वर्गणा । ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्विर्ट या मन:- A प्रायेग्या वर्गणा, एवम्कैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा मनःप्रायोग्या वर्गणास्तावद्वाच्या यावत्दुत्कृष्टा मनःप्रायोग्या वर्गणा भवति, A ध जघन्याश्चोत्कृष्टा विशेषाधिका, विशेषश्च तस्या एव जघन्याया वर्गणाया अनन्ततमो भागः । तत उत्कृष्टमनःप्रायोग्यवर्गणा- पेक्षया एकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा वर्गणा जघन्याऽग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्वितयाऽग्रहणमा- N ॐ योग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्वधिकस्कंधरूपा अग्रहणप्रायोग्या वर्गणास्तावद्वाच्या यावदुत्कृष्टाऽग्रहणप्राय ग्या वर्गणा, जघ- न्यायाश्चेत्कृष्टाऽनन्तगुणा, गुणकारश्चाऽभव्याऽनन्तगुणसिद्धाऽनन्तभागकल्पराशिप्रमाणो द्रष्टव्यः । ततोऽग्रहणप्रायोग्योत्कृष्ट- 6 ॐ वर्गणापेक्षयैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा कर्मप्रायोग्या जघन्या वर्गणा, तते द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्विया कर्मप्रायोग्या ' वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपाः कर्मप्रायोग्या वर्गणास्तावद्वाच्या यावदुत्कृष्टा कर्मप्रायोग्या वर्गणा भवति जघन्या- 卐 याश्चोत्कृष्टा विशेषाधिका, विशेषश्च तस्या एव जघन्याया वर्गणाया अनन्ततमो भागः । इदान मेतासामेवंदारिकादप्रायोग्य- . वर्गणानां वर्णादि निरूप्यते;-तत्रंदारिकशरीरप्रायोग्या वर्गणा अनन्ताऽनन्तपरमाण्वात्मकाः पञ्चवर्णा द्विगन्धाः पञ्चरसा पत T A T A L - A A 卐 卐 N S चन्धतच्दै पुगल- वर्गणाः॥ V A N *नवतत्त्व.झ शरीरप्रायोग्यत्कृष्टवर्गणापेक्षया चैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा जघन्याग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, ततो द्विपरमावधिकस्कंधरूपा ध A द्वतीयाग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, एवम्कैकपरमाण्वधिकस्कंधरूपा अग्रहणप्रायोग्या वर्गणास्तावद्वक्तव्या यावदुत्कृष्टाऽग्रहणप्रा- U 卐 र्टकायां- ॐ योग्या वर्गणा, जघन्यायाश्चोत्कृष्टाऽनन्तगुणा, गुणकारश्वाऽभव्यानन्तगुणसिद्धाऽनन्तभागकल्पराशिप्रमाणो द्रष्टव्यः। अग्रहण- प्रायोग्यत्कृष्टवर्गणापेक्षया चैकपरमाण्वधिकस्कंधरूपा जघन्या भाषाप्रायोग्या वर्गणा, यानि पुद्गलद्रव्याणि गृह वा जन्तवः M १२५ 9 सत्यादिभापारूपतया परणमय्यालम्ब्य च विसृजन्ति तानि भाषाप्रायोग्या वर्गणा, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्वितीया ) भापाप्रायोग्या वर्गणा; एवमेकैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा भाषाप्रायोग्यास्तावद्वक्तव्या यावदुत्कृष्टा भाषाप्रायोग्या वर्गणा A भवति, जघन्यायाथोत्कृष्टा विशेषाधिका, विशेषश्च तस्या एव जघन्याया वर्गणाया अनन्ततमो भागः । उत्कृष्टभापाप्रायोग्य- T वर्गणापेक्षया चैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा जघन्याग्रहणमायग्या वर्गणा, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्वितीयाग्रहण- ॐ प्रायोग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्वधिकस्कंधरूपा अग्रहणप्रायोग्या वर्गणास्तावद्वक्तव्या यावदुत्कृष्टाऽग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, 卐 जघन्यायाश्चेत्कृष्टाऽनन्तगुणा, गुणकारश्चाऽभव्याऽनन्तगुणसिद्धाऽनन्तभागकल्पराशिप्रमाणो द्रष्टव्यः । अग्रहणप्रायोग्योत्कृष्ट- ॐ वर्गणापेक्षया चैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा जघन्या प्राणापानयोग्या वर्गणा, यानि पुद्गलद्रव्याणि गृहीचा जन्तवः प्राणा- 卐 पानरूपतया परिणमय्यालम्ब्य च विसृजन्ति तानि प्राणापानयोग्या वर्गणा, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्वितीया प्राणा- ॐ पानयोग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमावधिकस्कन्धरूपाः प्राणापानयोग्या वर्गणास्तावद्वक्तव्या यावदुत्कृष्टा प्राणापानयोग्या के V वर्गणा भवति, जघन्यायाश्चोत्कृष्टा विशेषाधिका, विशेषश्च तस्या एव जघन्याया अनन्ततमो भागः। प्राणापानयोग्योत्कृष्ट- 卐. 卐 G A ~ A T L ॥१२५ A A 卐 na 卐 क S A 卐 A वर्गणाया उत्कृष्टा विशेषाधिकाः, विशेषश्च तस्या एव जघन्याया वर्गणाया अनन्ततमो भागः। वैक्रियशररोत्कृष्टवर्गणाऽपेक्षया पर चैकपरमावधिकस्कन्धरूपा जघन्याऽग्रहणमायग्या वर्गणा, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्वितीयाऽग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, v एवमेकैकपरमावधिकस्कन्धरूपा अग्रहणप्रायोग्या वर्गणास्तावद्वक्तव्या यावदुत्कृष्टाऽग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, जघन्यायाश्चोत्कृष्टा ॐ अनन्तरणा, गुणकारश्वाऽभव्याऽनन्तगुणसिद्धानन्तभागकल्पराशिप्रमाणो द्रष्टव्यः । तत उत्कृष्टाग्रहणप्रायोग्यवर्गणापेक्षया ) एकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा वर्गणा आहारकशरीरप्रायोग्या जघन्या वर्गणा, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्विरया आहारक- A 3 शरैरविपये ग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा आहारकशर रविपये ग्रहणप्रायोग्या वर्गणास्तावद्वाच्या ] T यावदुत्कृष्टा ग्रहणप्रायोग्या वर्गणा भवति, जघन्यायाश्च वर्गणाया उत्कृष्टा विशेषाधिका, विशेषश्च तस्या एव जघन्याया s वर्गणाया अनन्ततमो भागः । आहारकशरस्त्रायोग्योत्कृष्टवर्गणापेक्षया चैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपाऽग्रहणप्रायोग्या जघन्या y वर्गणा, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्वयाऽग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्वधिकस्कंधरूपा अग्रहणप्रायोग्या G ) वर्गणास्तावद्वक्तव्या यावदुत्कृष्टाऽग्रहणप्रायोग्या वर्गणा भवति, जघन्यायाश्चोत्कृष्टाऽनन्तगुणाः गुणकारस्थाऽभव्याऽनन्तगु- ' 1 णसिद्धाऽनन्तभागकल्पराशिप्रमाणो द्रष्टव्यः । आहारकशरैराग्रहणप्रायोग्योत्कृष्टवर्गणापेक्षया चैकपरमाण्वधिकस्कन्ध- A gs रूपा वर्गणा तैजसशरी रसायोग्या जघन्या वर्गणा भवति, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्वित्या तैजसशरी- v रप्रायोग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपास्तैजसशरीरविपये ग्रहणप्रायोग्यवर्गणास्तावद्वक्तव्या यावदुत्कृष्टा L ys ग्रहणप्रायोग्या वर्गणा भवति, जघन्यायाश्चोत्कृष्टा विशेषाधिका, विशेषश्च तस्या एव जघन्याया अनन्ततमोभागः, जस- N 1 A 卐 A S N , नवतत्त्वy A इमङ्गला- ए र्टकायां- V १२४। 卐 A 卐 T 卐 A 卐 T 卐 V 卐 卐 वृद्धानामसंख्येया वर्गणाः, अनन्तपरमाणुनिष्पन्नस्कन्धानामनन्ता वर्गणाः, अनन्तानन्तप्रादेशिकस्कन्धानामनन्तानन्तवर्गणाः, U चन्धतत्रे सर्वा अप्येता अल्पपरमाणुमयत्त्वेन स्थूलपरिणामतया च स्वभावत्वार्डवानां ग्रहे न समागच्छन्ति यतः सर्वा अप्येता ) पुद्गल- वर्गणाः अग्रहणप्राय ग्या इत्युच्यन्ते एताश्च सर्वाः समतिक्रम्य अभव्यानन्तगुणैः सिद्धानन्तभागवर्तिभिः परमाणुभि- वर्गणाः॥ निष्पः स्कंधैरारब्धा ग्रहणप्रायेग्या जघन्यदारकवर्गणा, तत एकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्वितीया ग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, ' द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा तृतीया ग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा वर्गणास्तावद्वाच्या यावदुत्कृष्टा A अंदारिकशररग्रहणप्रायोग्या वर्गणा भवति, जघन्यायाश्च वर्गणायाः सकाशादुत्कृ वर्गणा विशेषाधिका, विशेषश्च तस्या ए एव जघन्याया वर्गणाया अनन्ततमो भागः औदारिकशरीरग्रहणमायग्यत्कृष्टवर्गणापेक्षया चैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा- N वर्गणाऽग्रहणप्रायोग्या सा जघन्या, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कंधरूपा द्विरीयाग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्वधिक- स्कन्धरूपा वर्गणास्तावद्वाच्या यावदुत्कृष्टा ग्रहणप्रायोग्या वर्गणा भवति, जघन्यायाश्च वर्गणायाः सकाशादुत्कृष्टा वर्गणा G अनन्तगुणा । गुणकारश्वाऽभव्यानन्तरणसिद्धानन्तभागकल्पराशिप्रमाणो द्रष्टव्यः। एतासां चाग्रहणप्राय ग्यता अंदारिकं प्रति प्रभूतपरमाणु नष्पन्नत्त्वात् सूक्ष्मपरिणामत्वाच्च देदितव्या । हैक्रयं प्रति पुनः स्वल्पपरमाण्वात्मकत्त्वात् स्थूलपरिणामत्त्वाच्चाऽ- A वस्या एवात्तस्त्रापि भावना कार्या अग्रहणप्रायोग्यत्कृष्टवर्गणापेक्षया चैकपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा वर्गणा वैक्रियशरीरप्रा- योग्या जघन्या वर्गणा, ततो द्विपरमाण्वधिकस्कन्धरूपा द्वरीया दै क्रयशररस्य ग्रहणप्रायोग्या वर्गणा, एवमेकैकपरमाण्व- L कस्कन्धरूपा वर्गणा वैक्रियशर रविषरे ग्रहणप्राय ग्यास्तावद्वक्तव्या यावदुत्कृष्टा ग्रहणप्रायोग्या वर्गणा भवति, जघन्यायाश्च प १२४॥

הל S U -- ? - - M A 卐 पुद्गलजालश्लेषणमादानं, स्हाभ्यक्तवपुपे रजेलगनवदेति । तथा चोक्तम् ;-'सकपायत्त्वार्जचः कर्मणो येग्यान् . A पुद्गलानादत्ते' (तत्त्वा०, अ०८, सू०२)। नन्वने वक्ष्यमाणप्रकारेण कर्मप्रदेशाऽऽदानं मनोवाकायाऽन्यतमयोगसाध्यं, 卐 तत् कथं 'सकपायचाईवः कर्मणो येग्यान् पुद्गलानादत्ते' इत्युक्तम् ? सत्यम् । बन्धो द्विविधः, साम्परायिकबन्धः, V 卐 ईयोपथिकबन्धश्च, यद्यपि कर्मप्रदेशादानं 'जोगा पय डिपएसं ' इति वचनाद् योगसाध्यं तथापि सूक्ष्मसंपरायगुणस्थानं 卐 यावत् कषायसहचरिता येगाः कर्मप्रदेशग्रहणं विदधति, सकपाययोगेनात्ता कर्मप्रदेशा एव आत्मप्रदेशैस्सह संश्लेपमुपयान्ति, न तु केवलयोगेनोपात्ताः, यत उपशान्तमोहई णमोहसयोगिवलिगुणेषु केवलं योगप्रत्ययतो यो वन्धो द्विसामयिकः सैव A 4 ईयपथिकः, तस्य 'वन्ध' इति संज्ञायां सत्यामपि वन्धशब्दस्य न चरितार्थत्वम् , आत्मप्रदेशैस्सह क्षरन रखदभेदसम्बन्धा- ऽभावात् , सम्मृष्टभित्तिप्रक्षिप्तवालुकासमुदायवदिति । अतः 'सकपायत्त्वावः कर्मणो येग्यान् पुद्गलानादत्ते' इति सत्यम् : 卐 यदाह वाचकमुख्यः;- 'स्नेहाऽभ्यक्तशरीरस्य, रेणुना श्लिष्यते यथा गात्रम् । रागद्वेपक्लिन्नस्य कर्मबन्धो भवत्येव ॥१॥ 卐 ननु 'कर्मणो योग्याने ' इतिपदेन अन्येऽपि कर्मणोऽयोग्याः पुद्गलाः सन्तीति ज्ञायते, तत्र योग्याऽयोग्यस्वरूपं विभावयितुं 卐 प्रसङ्गसङ्गत्या किश्चिद् वर्गणास्वरूपमुल्लिख्यते;-इह समस्तलोकाकाशप्रदेशेषु ये केचन एकाकिनः परमाणवो विद्यन्ते, तत्समुदायसजातीयवादेका वर्गणा, वर्गणा नाम सजायानां समुदायः, एवं द्विप्रादेशिकानामनन्तानामपि स्कन्धानां सजा- 卐 तयचाद्वितीया वर्गणा, त्रिप्रादेशिकानामनन्तानामपि स्कन्धानां सजातीयत्त्वात्तृत या वर्गणा, एवमेकैकपरमाणुवृझ्या संख्ये- यप्रादेशिकानामनन्तानामपि स्कन्धानां सजातीयसमुदायरूपाः संख्याता वर्गणाः, असंख्यातप्रादेशिकस्कन्धानामेकैकपरमाणु- 卐 卐 T . N A - G T A V L A A 卐 Z नवतत्त्व- 卐 A 卐 U 卐 M गुणेषुबन्ध- र्टकायां- V १२३ 卐 A A प्रत्ययाः N T अपूर्वकरणे सैव चतुर्वंशतिक्रियद्विकरहता द्वाविंशतिबन्धहेतवः । अनिवृत्तिबादरसंपरायगुणस्थानके पूर्वोक्ता बन्धतरद द्वाविंशतिबन्धहेतवे हास्यरत्यरतशे कभयजुगुप्सालक्षणहास्यषट्कर हताः षोडशबन्धप्रत्यया भवन्ति । त एच पोडशबन्ध- प्रत्ययाः ह पुनपुंसकलक्षणव्दत्रिकसज्वलनशेधमानमायारूपसवलनत्रिकाभ्यां वर्जिता दश बन्धहेतवः सूक्ष्मसम्परायाख्ये प्रत्ययाः॥ दश गुणस्थानले वर्तन्ते । क्षणमह उपशान्तमहे च त एव दश लेभं विना नव बन्धप्रत्ययाः । मनोयोगचतुष्कवाग्य- गचतुष्कदारिककाययोगलक्षणा ये नव बन्धहेतवः क्षणमह उपशान्तमोहे च भवन्ति तेभ्यो मध्यममनोयोगद्वकमध्यमवा- 卐 ग्यगद्वकलक्षणाश्चत्त्वारे हेतव अपसारयतव्याः, कार्मणदारकमिथच प्रक्षिप्तव्य, अतः सयोगिचलिन तदारकं सयग्यवस्थायामदारिकमश्रकामणकाययेगवलिससुद्धातावस्थायाम् , " मिश्रदारिकयोक्ता सप्तमषष्ठद्वित 卐 रेषु कार्मणशरीरय चतुर्थले पंच तुरीरे च"।१ । इति वचनाद प्रथमान्तममनोयोग भगवतोऽनुत्तरसुरादिभि- मनसा पृष्टस्य मनस्व देशनाद, प्रथमान्तमवाग्येगे देशनादिप्रसङ्गे, अयोगलेवलिन न श्चिद्वन्धहेतुर्योगस्याऽपि 5 व्यवच्छिन्नत्त्वादित । एवम्पपदिरे वस्तरेण बन्धहेत इयमाशङ्का स्याद् यद्, थममूर्तस्याऽऽत्मनो हस्ताद्यसम्भने सति आदानशक्तिविरहात् कर्मग्रहणमित ? उच्यते-प्रक्रियाऽनभिज्ञस्य ताव देयमेवाऽयग्याऽऽशङ्का, यतः कथममर्त्तत्त्वमभ्युपेतमात्मनः कर्म वसम्ब- 卐 वस्यानादत्त्वादेकचपरिणामे सति ईरोदकवन्त आत्मा एव कांग्रहणे व्याप्रियते नत्त्वमूर्तः, न च बाह्यहस्तादकरणव्या- ऽऽदेयं घटा देवत् 'पद्गलमा सद्, किन्त्वध्यवसाय विशेषाद् रागद्वेषमोहपरिणामाऽभ्यञ्जनलक्षणादात्मनः कर्मयोग्य ॥१२३ 卐 G A A T חב L V A S । A क U S A A 卐 N 卐 卐 卐 ध A धन ०० ० ० ० ० ० . . ० . . ० ० M M or or 40 or . orovovovodorovoMor . . . ० on om 10 o or or . M or M . M Orow or Mor Movor or ० . . M OMoNovvvv Moror. or . ovor ovvvv voMor om M OM or Dr or or or m oM . oror or or Moov vodoo OM or १ ovovovovovo ONOM OM Moro rowonNovod Movro . oM , 10 or M or or or or 10 १ or १ OM स्त्रीवेदः नपुंसकवेदः सत्यमनोयोगः असत्यमनोयोगः सत्यासत्यमनोयोगः असत्याऽमृषामनोयोगः सत्यवाग्योगः असत्यवाग्योगः सत्यासत्यवाग्योगः असत्याऽमृपावाग्योगः औदारिककाययोगः औदा०मिश्रकाययोगः वैक्रियकाययोगः वैक्रियमिथकाययोगः आहारककाययोगः आहारकमिश्रकाययोगः कार्मणकाययोगः " : योगः ४२ ४९. 608 28 ५३ म 8 ध A Z ब > 卐 y. T की A द ॐ - 卐 ध V 卐 নম্বর बन्ध- M प्रत्ययाः ।१२२॥ . 卐 5 卐 y G. 卐 ८ z 卐 卐 A धन ध - ० ० ० ० . . . ० ० ० ० ० . . ० . . ० ० ० ० ० . ० ० ܘ ܘ ܘ Oor or are . • ovovwoovovovoMonovov . ० Movxvor or Morovood . ० ० ० ० ovovor or or or ovow ovoM ow ०. Movor orrowowow or ovovor ovovv MOM.oroMovor or odorovor or or oroMovor or or १ १ १ OM or १ OM OM OM OM on OM OM OM M ovor on Monor or or or or or or or oroMorow or or on or on or on or on or on or on or oran on or on मानम् मानम् लोभः मानम् प्रत्याख्या० क्रोधः लोभः सज्वलन क्रोधः लोभः रतः अरतिः भयम् शोकः जुगुप्सा पुंवेद. (नोकषाय) हास्यम् " A " r कषाय: २३ २४ ૨૬ ३० ३२ ३३ ३५ ३७ ३८ ३९ 08 卐 卐 A ध ॐ A 卐 > V. T ॐ 卐 y fo 卐 A मैनवतत्त्व- टकायं- १२२ --- + N 卐 S . 卐 A श्र 卐 U 10 ० ० ० . १ १ १ or ० १० १ . अविरतिः . १ १ १ १ o . मनोऽविरतिः स्पर्शनेन्द्रियाऽविर० रसनेन्द्रियाऽविर० घ्राणेन्द्रियाऽविर० चक्षुरन्द्रियाऽविर० श्रोत्रेन्द्रियाऽविर० पृथिवीकायाऽविर० अप्कायाऽविर० तेजस्कायाऽविर० वायुकायाऽविर० वनस्पतिकायाऽविर० वसकायाऽविर० . M क A 卐 A 卐 T . . Movor or Mor MovMOMovi w or on an on or one on or on or on १ . . or १३ १ १४ LAZ or १ १ . . or . F G १ 필 १८ ० क्रोधः 0 y A ध T 卐 V प A ० ० ० A ० ० ० .. - २० orovorovo ० . मानम् माया लोभः अप्रत्या० क्रोधः ૨૧ २२ Mor or or ० ० . . . >y Fare १ +16 ܟ ܝ - १२१ र्टकायां- बनवतत्त्व- < 卐.८卐 फ्रज < 卐>yz A ne मिथ्यात्वम् मूलबन्धहेत. अनाभोगिकमि० सांशयिक मे० आभिनवेशिकम० अनाभिग्रहिकमिथ्या० आभिग्रहिक मथ्या० उत्तरबन्धहेतवः ५७ M મિથ્યાત્વગુણ ० ० ० सास्वादनमुण० ४३ ० ० ० ० मिश्रगुण० अविरतसम्य० गुण રાવિરતિપાળ गुणस्थ नेषु बन्ध्प्रटरनं रन्नकम् । ० ४६ ३९ २६ २४ प्रमत्तगुण० अप्रमत्तगुण० अपूर्वकरणगुण २२ १६ નિવૃત્તિવાળ सूक्ष्मसम्परायगुण० उपशान्तमोह० G ક્ષીપમોદકુળ અવિવાહિગુણ સોવિહિપુણ૦ ० 卐 yrus y卐zy 卐 卐cy ११२१ N प्रत्ययाः। वन्ध- बन्धत 141 --- N S U 卐 नान्यस्रीति वचनात् सास्वादने मिथ्याचपञ्चकेन बिना पंचाशद्वन्धहेतवे भवन्ति । अंदारकमिश्रवैक्रयमिश्रकार्मणाऽनन्तानु- 卐 A 卐 बन्धिचतुष्कं विना मश्रे त्रिचत्वारिंशद्वन्धहेतव उक्ताः, 'न सम्ममिच्छो कुणइ कालं' इति वचनात् सम्यग्मिथ्यादृष्टेः परलोकग- V V मनाभावादंदारिकमिश्रवैक्रयमिश्रकार्मणयोगानामसम्भवः, अनन्तावन्ध्युदयस्य चाऽस्य निषिद्धत्वादनन्तानुवन्धिचतुष्टयञ्च M 卐 पु नास्ति, अतः पूर्वोक्तपञ्चाशत्संख्यायाः सप्तानामपहारः । अविरतसम्यग्दृष्टं तस्य परलोकगमनसम्भवात् पूर्वापनीतमंदारक- A मेश्रवैक्रिय मिश्रकार्मणलक्षणत्रिकं त्रिचत्वारिंशति पुनःप्रक्षिप्यते, अतः पट्चत्त्वा रेशद्वन्धप्रत्ययाः।देशविरते एकोनचत्वारिंशद्ध- A ॐ न्धहेतवः, तत्कथमित्याह-वग्रहगतावपर्याप्ताऽवस्थायाञ्च देशविरटेरभावात्कार्मणदारिकमिश्रद्वयं न सम्भवति, वसाऽसंय- माद्विरतत्वात्रसाविरतिर्न जाघर्ट त । ननु त्रसासंयमात् सङ्कल्पजादेवास विरतो न वारम्भजादप तत्कथमस त्रसाऽवरतिः N ' सर्वाप्यपनयते ? सत्यं, किन्तु गृहिणामशक्यपरिहारत्वेन सत्यप्यारम्भजा त्रसाऽविरतिर्न विवक्षिरेत्यदोपः, बृहच्छतकेऽप्ये- वमेव परिभावितमिति । तथाऽप्रत्याख्यानावरणोदयस्य निषिद्धत्त्वादस्मिन् गुणस्थानले प्रत्याख्यानावरणचतुष्टयं न घटां । प्राञ्चति, तत एते सप्त पूर्वोक्तायाः षट्चत्त्वारिंशतेऽपन यन्त इति देशविर एकोनचत्वारिंशद्वन्धहेतवः । तथा प्रमत्ते पड्वंशतिवन्धहेतवः, इदमत्र हृदयम्-प्रमत्तगुणस्थाने एकादशधाऽविरतिः प्रत्याख्यानावरपाचतुष्टयञ्च न सम्भवति, आहारक- 卐 द्वकं च भवति, ततः पूर्वोक्ताया एकोनचत्वारिंशतः पञ्चदशलेऽपन्ते द्वके च तत्र न 'प्रमत्ते पड्वंशतिबन्धप्रत्ययास्सञ्जायy न्ते। तथाऽप्रमत्तस्य लब्ध्यनुपर्जवनेनाहारक मश्रवै क्रियमिश्रलक्षणद्वकरहेता सैवषड्विंशतिश्चतुर्विंशतिर्वन्धहेतवोऽप्रमत्ते भवन्ति । 卐 y T A T A V L २१ A A S N बन्धन- 卐 त्ययाः 卐द卐 N नवतत्त्व- 卐 卐 अभिग्रहेणेदमेव दर्शनं शोभनं नान्यदित्येवंरूपेण कुदर्शनविषयेण निवृत्तमाभिग्रहिकं यदशाबोटिका ददर्शनानामन्यतमं गृह्णात बन्धत A U एमला तद्विपरतमनाभिग्रहिकं, यदशात्सर्वाण्यपि दर्शनानि शोभनान्त्येवम्पन्माध्यस्थ्यमुपजायते । आभिनिवेशिकं यदभिनिवेशेन 卐 टकायां नेवृत्तं यथा गोष्ठामाहिलानाम् । सांशयिकं यत्संशयेन निर्वृत्तं यदशाद्भगवदहदुपदिष्टेष्वपिजवाजवादितत्त्वेषु संशय उपजायते ॐ यथा न जाने किमिदं भगवदुक्तं धर्माऽस्तकायादि सत्यमुताऽन्यथेति अनाभोगं यदनाभोगेन निर्वृत्तं तच्चैकेन्द्रियादीनमित॥ ge १२० A हिंसाद्यव्रतेभ्यो मनेवाकायैः कृतकारतानुम भिर्यद्विरमणं सा वरतिः, न विरतिः अविरतिः, असंयम इति यावत् । सा चाऽविरति y दिशप्रकारा, तद्यथा-मनः पञ्चेन्द्रियाच,तेषां षण्णांस्वस्वविषये प्रवर्त्तमानानामनियमनम् , तथा पृथिव्याजोवायुवनस्पतित्रस- रूपाणां षट्प्रकारकवानां हिंसा। कषाय-नोकपायभेदाभ्यां कपायः पञ्चविंशतिविधः,तत्र कषायोऽनन्तानुवन्ध्यप्रत्याख्यानावरos णीयप्रत्याख्यानावरणीयसवलनभेदभिन्नः क्रोधमानमायालोभलक्षणः षोडशप्रकारः, वेिदपुरुषवेदनपुंसकवेदहास्यरत्यरति- A शोकभयजुगुप्सारूपो नोकषायो नवधा कषायसहचरितवादुपचारेण कपाय इत्युच्यते। मनोवाकायच्यापारलक्षणो योगः, सच s पञ्चदशविधस्तद्यथा;-सत्यमनोयोगः, असत्यमनोयोगः, सत्यासत्यमनोयोगः, असत्याऽमृपामनोयोगश्च, सत्यवाग्योगः, अस- T त्यवाग्योगः, सत्यासत्यवाग्योगः, असत्यामृपावाग्योगः, अंदारककाययोगः, अंदारकमिश्रकाययोगः, वैक्रियकाययोगः, पु वैक्रयमिश्रकाययोगः, आहारककाययोगः, आहारकमिश्रकाययोगः, कार्मणयोगश्चेति पञ्चदशविधो योगः। सर्वे मिलिताश्च सप्त- पञ्चाशद्वन्धप्रत्ययाः। एते च प्रत्ययाश्चतुर्दशसु गुणस्थानेषु न सर्वे सर्वत्र भवन्ति किन्तु केचिदेव क्वचिद्भवन्तीति तद्भाच्यते । मथ्यादृष्टावाहारकाहारकमिश्रलक्षणद्विकोनाः प पञ्चाशद्वन्धहेतवो भवन्त, आहारकद्विकवर्जनं तु 'संयमवतां तदुदयो । ॥१२०॥ T " G V A A N 卐 A U - 卐 M 卐 A ॥ A 卐 T 卐 . पयइ सहावो वुत्ते, ठई कालावहारणं। अणुभागो रस ये, पएस दलसंचओ ॥३९ । टीका;-'पयइ ' इति, प्रकृतिः स्वभावस्स्यात् , स्थितिः कालनियमनम् , अनुभागो रसो ज्ञेयः, प्रदेशो दलसञ्च- यस्स्यादिति गाथाक्षरार्थः ॥ विस्तरार्थस्त्वयम्:-चन्धो नाम कार्मणवर्गणाऽन्तःपातिकर्मपुद्गलानामात्मनदेशानाञ्च क्षीरनीरव- द्वययापिण्डवद्वाऽन्योऽन्याऽनुगमात्मकोऽभेदलक्षणो यः सम्बन्धः स वन्धः । ननूक्तलक्षणस्सम्बन्धः कं सप्रत्यय उताऽग्र- त्ययः ? इति चेदुच्यते; नाकारणा कार्यनिष्पत्तिरिति न्यायाद् यथा दीजादिकारणादकुरकार्यस्य प्रसवो दृष्टस्तद्वद्वक्ष्यमाण- मिथ्यादर्शनादिकारणादुक्तलक्षणवन्धकार्य सञ्जायते । मिथ्यादर्शनम् , अविरतिः, कपायाः, योगाश्चेति चतुर्विधवन्धप्रत्ययैरष्ट- विधस्सप्तविधप्पविध एकविधवन्धो वा भवति । यद्यपि 'मिथ्यादर्शनाऽविरतिप्रमादकपाययोगा बन्धहेतवः' इति तत्त्वार्थ- वचनात् प्रमादापेक्षया वन्धप्रत्ययस्य पञ्चविधत्त्वम् , तथापि 'इन्द्रियदोपान्मोक्षमार्गादरशैथिल्यम् , अथवा प्रचुरकर्मेन्धनप्र- भवनिरन्तराऽविध्यातशारीरमानसाऽनेकदुःखहुतवहज्वालाकलापपरीतमशेषमेव संसारवासगृहं पश्यन् तन्मध्यवर्त्यपि सति च तन्निर्गमनोपाये वीतरागप्रणीतधर्मचिन्तामण यतो विचित्रकर्मोदयसाचिव्यजनितात्परिणामविशेपादपश्यन्निव तद्भयमविगणय्य विशिष्टपरलोकक्रियाविमुख एवाऽऽस्तेवः स खलु प्रमादः, किंवा विकथादिव्यग्रचेतस्कत्व-स्मृतिभ्रंशच्च-आगमविहितक्रिया- नुष्ठानेष्वनुत्साहत्त्व-दुष्टयोगप्रणिधानच्वादिलक्षणः प्रमादः' इति प्रमादस्य व्याख्यया कपाययोगेष्वन्तर्भावत्वात्प्रमादस्य वन्ध- प्रत्ययस्य चातुर्वध्ये पञ्चविधत्त्वे वा न कश्चिद्विसंवादः । पूर्वोक्ता मिथ्यादर्शनादयः प्रत्ययाः पुनरनेकभेदभिन्नाः, तद्यथा;-तत्र मिथ्यादर्शनं तत्त्वार्थाऽश्रद्धानलक्षणं, एतच्चाऽऽभिग्रहिकाऽऽनाभग्रहिकाऽऽभिनिवेशिकसांशयिकाऽनाभोगिकप्रकारैः पञ्चविधम् । N 卐 G 卐 T A 卐 卐 L 卐 A A nic 6 श्रीनवतत्त्व- 卐, । बन्धतत्व- U प्रारम्भः 卐 . A स IM टकाय- प 卐 V 卐 A अथ बन्धन A N 卐 G 卐 T 卐 A 卐 T 卐 V A यज्ज्ञानस्य फलं महोदयपदावाप्तावलं कारणं, यस्याऽऽराधनतः प्रयान्ति निखिला देषा असत्कर्मजाः । यचाशेषभवाटरीभ्रमणसंक्लेशार्दितानां नृणां, वश्रामप्रदपादपं च चरणं भरः समाराध्यताम् ॥१॥ फ्रज मे तत्टे लक्षणभेदाभ्यां निर्जरां व्याख्याय 'वन्धाऽविनाभाविने निर्जरा' इति विज्ञायोद्देशकमायातमष्टमं बन्धतत्त्वं प्रक्रमते, निर्जराप्रारम्भ 'बारसविहं ' इत गाथायां 'बंधो चउविगप्पो य, पयइट्ठइ अणुभाग-पएसमेए हैं नायवो' इते पदेन प्रकृति स्थित्यनुभावप्रदेशभेदैर्बन्धश्चतुर्विकल्पो ज्ञातव्य इत्युक्तम् । अथ कॅलक्षणा प्रकृतिः केंलक्षणा स्थतिः । केंस्वरूपोऽनु : केरूपाश्च प्रदेशा इत प्रतिपिपादयिषुराचार्यः सूत्रं नम्तेि- 卐 L ॥११९॥ - A 卐 A पत । Ni 卐 S ॥ U 卐 и 卐 A किं पुनरस्त्र पृथगुपादानम् ' सत्यम् , सेोऽतिचारविशुद्ध्यर्थ उक्तः, अयं तु सामान्येन निर्जरार्थ इत्यपनरुत्यम् ॥ इत प. पइविधमाभ्यन्तरं तपः । एतदाभ्यन्तरं तपः संवरचादभिनवकर्मोपचयप्रतिषेधकं, निर्जरणफलत्वात् कर्म नर्जरकम् पारम्पर्येण । चभिनवकोपचयप्रतिषेधकत्त्व-पूर्वपचितकर्मनिर्जरकत्वाभ्यां मोक्षप्रदमिति समाप्तं निर्जरातत्त्वम् ।। ज व्याख्याय निर्जराख्यं तत्त्वञ्च यथामति प्रापि यत्पुन्यं । रैनास्तु भव्यसन्दोहस्सकामनिर्जराप्रवणः ॥१॥ 卐 Cate.incardionakcisakeeiods cleadedosdecisiodestisatacharactetestsoteokaddardsalickedis इत्यायध्यपादाचार्य_श्रीमद्विजयमोहनसूरीश्वरविनेयावतंसोपाध्यायपदालङ्कृतश्रीमत्प्रतापविजयगणिचरणाज- 卐 चञ्चरीकप्रवर्तकमुनिश्रीधर्मविजयविरचितायां श्रीनवतत्त्वप्रकरणसुमनलाटीकायां निर्जरातत्त्वं समाप्तम् ॥ PERIES ರ್ದಲ್ಲಿ ತನನ್ನವಳ್ಳಿತಟ್ಟುತಿನ 卐 A T N Holestern A G T A y ३ 卐 L 卐 卐 A N S नवतत्त्व- 卐 A ५ . १२ र्टकायं- V ધર્મધ્યાનમ आज्ञविचयः अपायविचयः विपाकविचयः संस्थानविचयः તીવમખ્વાવિવાર पीतपशुललेश्या પ્રતિવમશ્રિત્યાન્ત- मुहर्तम् , भेदसमुदा- યાત્રિત્ય શોના पूर्वकोटिः। आनन्तर्यपारम्पयी- જ્યાં સ્વપ- प्राप्तिः॥ नेभरातच्दै U ध्यान- प M चतुष्का 卐 यन्त्रकम् । A विनयदानानि च ॥ " ક્ષપોપરા નિધિમાખ્યામ मकैकान्य-शपजीपादिपदार्थश्र- तरोणसधान, जिनसाधुगुणो- મારા સ્તન, પરોલ- ११८॥卐 . " A ८ .१२ ज T N शुलव्यानम् - ८ ...१२ पृथक्त्ववितर्कसविचारम् एकत्त्ववितर्कमविचारम् सूक्ष्म क्रयमप्रतिपति व्युच्छिन्नक्रियमनिवर्ति विशुद्धपीतप- अन्तर्मुहर्त्तम् अशुक्ललेश्याः शुक्ललेश्या अन्तर्मुहूर्तम् पञ्चहस्वाक्षर- | प्रमाणकालः। मोक्षः। स्वर्गः। 卐 १३ केवलज्ञानम् । अयोगित्त्वम्। G A १४ 卐 T 卐 V अथ व्युत्सर्गः:-व्युत्सर्जन्यस्य परित्यागो व्युत्सर्गः। स द्विविधः; बाह्य आभ्यन्तरश्च, तत्र वाह्य द्वादशादिभेदभन्न- स्य पधेरतिरिक्तस्य, अन्षयस्य संसक्तस्य वाऽनपानादेस्त्यागः। आभ्यन्तरः संसारपरिभ्रमणहेतूनां क्रोधादिकपायाणां मृत्युकाले शरस्य च मनवाक्कायैः कृतकारताऽनुमतिभिश्च परित्याग इति । नटु व्युत्सर्गः प्रायश्चित्त दमध्ये उक्तत्त्वात् y A 卐 L 卐 A । ११८॥ या > <y-y 卐 ->) 卐 धz VI AI - रौद्रध्यानम् - આર્તધ્યાનમ્ - संरक्षणानुवन्धि स्तेयानुवन्धि मृपानुवन्धि हिंसानुवन्धि निदाना (अग्रशौचा) त० रोगचिन्तार्त० अनिष्टसम्प्रयोगात० इष्टवियोगात० भेदाभिधानानि १ ..६ गुणस्थानानि " અતિસંદિપોત-| મનતિ દિવા- नीलकणलेश्याः पोतनीलकृष्णलेश्या: लेश्याः ॥ ध्यानचतुष्कभेद-रणस्थान-लेश्यादिप्रदर्शकयन्त्रकम् ॥ कैवल्यावाप्तिरयोगिचार्दनि शुक्लध्यानस्य लगाते ध्यानविचारस्य संक्षेपः। विस्तरस्तु ध्यानशतक-तत्वार्थादिभ्योऽवसेयः॥ अभव्यापेक्षया अनाद्यनन्तः, भव्यापेक्ष- याऽनादिसान्त., आन्तमोहतिकश्च आत्तरोद्रापेक्षः। कालप्रमाणं नरकगतिः। तिर्थगतिः। ध्यानफलम् હિંસાદ્રિતાવાને करतलविन्यस्तव- वानन्द.,अधर्म धर्म વૃદ્ધિ પ્રવોથનું વન-બન્નવસ્ત્રપન- વિન્દ્ર,મહામોહનદા તિરાવ્યોષાર- મૃતત્ત્વથાના સીનિશ્વાસાના भावत्वादि च॥ लिङ्गानि 卐 卐ryyy zy A ycy S N नवतत्त्व- M र्टकाय- ।११७ A A 卐 योगस्यापि निरुद्धवादस पूर्वोक्तऽर्थे विरुध्यते, कथं तत्र ध्यानशब्दवाच्यता? इत्यत्राह;-यथा कुलालचक्रं भ्रमणनिमित्त- 5 निर्जरात A दण्डादेरभावेऽपि पूर्वाऽभ्यासाद्धाम्यति, तथा मनःप्रभृतिसयोगोपरमेऽपि अयोगने ध्यानं भवति, तथा यद्यपि द्रव्यतो योगा 卐 न सन्ति तथापि ज वोपयोगरूपभावमनःसद्भावादयोगिने ध्यानम् । यद्वा ध्यानकार्यस्य कर्मनिर्जरणस्य हेतोः हेतुत्वाद्ध्यानं, 卐 ध्यानम् । यथा पुत्रकार्यकरणादपुत्रेऽपि पुत्र उच्यते, भवति ह्यस्य भवोपग्राहकर्मनिर्जरा । अथवा शब्दार्थबहुत्त्वाद्ध्यानं, यथा हरि- शब्दस्यानमर्कटादयो बहवोऽर्थाः, एवं ध्यानशब्दस्यापि, तथाह:-"ध्य चिन्तायां, ध्य काययोगनिरोधे, ध्य अयोगितऽपि 5 " वदन्ति हि:-" निपातश्चोपसर्गाश्च धातवश्चेति ते त्रयः । अनेकार्थाः स्मृताः सर्वे पाठस्तेषां निदर्शनम् " ॥ १॥ इति । है जिनागमाद्वाऽयोगिनोऽप ध्यान, यदाहः-"आगमञ्चोपपत्तिश्च सम्पूर्ण दृष्टिलक्षणं। अतन्द्रियाणामर्थानां सद्भावप्रतिपत्तये "|१| आद्यं शुक्लध्यानं अपूर्वकरणगुणस्थानकमाद कृत्वा क्षणमोहं यावत् भवति, द्वितीय क्षीणमोहगुणस्थाने वर्त्तते, 'पूर्वविदः' N 5 (त.९.४०) इति सूत्रभाष्यवृत्तिप्रामाण्येन उपशान्तमहक्षणमोहयोरुभयस्यापि तच्च पूर्वविद एव न तु एकादशाङ्गविद इति। A द्वरीयदादनु तृतीयादाक् केवलज्ञानं सञ्जायते, तृतीयं सूक्ष्मक्रियमप्रतिपाति योगनिरोधकालनं, तच्च आयुर्वेदयार्दनां व ॐ विषमस्थितिसत्ताकस्य केवलिनः वलसमुद्धाताऽनन्तरं जायते। चतुर्थ तु शैलेशीकरणावस्थायां पञ्चहस्वाक्षरकालमिति ॥ 5 लेश्याश्चात्र विशुद्धपोतपद्मशुक्लाऽऽख्या अवगन्तव्याः तत्राप्यन्त्यदद्वये शुक्लेव । क्षपकोपशामकैकान्यतरश्रेणिसमारोहः, A 卐 ५- पूर्वविदः' इति तत्त्वार्थसूत्रवृत्तौ अनुवृत्तस्य — उपशान्तक्षीणकषाययोश्च' इतिपदस्य तात्पर्य धर्मध्यानगुणस्थानचिन्तावद् गणमुख्यध्यानविषयमाश्रित्य मुख्यध्यानगोचरमवगन्तव्यमन्यथाऽत्रापि गुणस्थानप्रभृतिग्रन्थोक्तयो विरुध्येरन्निति ॥ ॥११७n 卐 卐 T T 1 L A 卐 A 卐 S A U. V M A A N , 卐 卐 भावाच्च कथं ध्यानचं ? उच्यते;-अर्थादिसङ्क्रान्तिसटेऽपि एकद्रव्यविषयटे मनःस्थैर्यसम्भवाद्ध्यानचमविरुद्धम् । अथ 卐 द्वितीय;-एकत्वं नानात्वाऽभावः, वितर्कः श्रुतं, अविचारं अर्थव्यञ्जनयोगसङ्क्रान्तिराहित्यम् ॥ पूर्वविदां पूर्वगतश्रुतानुसारेणे- ॥ तरेषां पूर्वभिन्नश्रुतानुसारेण अर्थव्यञ्जनयोगेष्वसङ्क्रमणरूपमेकपर्यायविषयं यद्ध्यानं तदेकत्ववितर्कमविचारम् । आधभेदे तावत् 卐 卐 एकद्रव्यवर्तविविधपर्यायगोचरं योगादिसङ्क्रमणोपेतं श्रुतानुसारि ध्यानमुक्तं, अस्मिन् तु विशुद्ध्यवाप्तस्थैर्यगुणयोगेन एक- द्रव्यवर्तविवक्षितैकपर्यायविपयं योगादिसङ्कान्तवर्जितं श्रुतानुसारिध्यानमुक्तमतो प्रथमभेदाऽपेक्षयाऽस्य हैशष्यमित । 卐 मोक्षगमनप्रत्यासन्नकाले सयोगवलिनो योगनिरोधावस्थायां सूक्ष्मवादरमनोयोगवाग्योगद्वयनिरुद्धे सति सूक्ष्मपरिस्पन्द- फ्री लक्षणोच्चासनिःश्वासादिका यत्र क्रिया तत् सूक्ष्मनियं, ततः प्रतिपातस्याऽभावादप्रतिपात चेति सूक्ष्मक्रियमप्रतिपातिसंज्ञ 卐 卐 तृतीयं शुक्लध्यानम् ॥ द्वितीयभेदाऽपेक्षया गुणस्थानविशुद्धियोगनिरोधाऽप्रतिपातत्त्वादिभिरस्य वैशिष्ट्यम् । मेरुगिरिवदकम्प- यस्य शैलेश्करणसम्पन्नस्याऽयोगिनो यक्ष्यानं तत्तुरी यमुत्सन्नक्रियमप्रतिपाति परमशुक्लश्चैतत् ।। भेदचतुष्केऽस्मिन्नयं विशेषः, 6 卐 आद्यं पृथक्त्ववितर्क सविचारं मनःप्रभृत्येकयोगभाजां योगत्रयभाजां वा, तच्च भङ्गिकश्रुतपाठकानां भवति । अपरमेकत्त्व व- ज तर्कमविचारं मनःप्रभृत्यन्यतरैकयोगानां, योगान्तरे सङ्कमाऽभावात् । तृतीयं सूक्ष्मक्रियमनिवर्चि तत् सूक्ष्मे काययोगे, न तु 卐 यगान्तरे । चतुर्थ व्युपरतक्रियमप्रतिपति शैलेशगतानामयोगिकेवलिनां भवति ॥ ननु मनःस्थैर्यलक्षणं ध्यानं, शुक्लध्यानो- 卐 परितनभेदद्वये च मनसोऽभावः, अमनस्कत्वात्लेवलिनः कथं ध्यानं भवति ? उच्यते-यथा छद्मस्थस्य मनःस्थिरं सत् ध्यानं y भण्यते तथा केवलिनोऽपि सुनिश्चलः कायो योगत्त्वाऽव्यभिचाराद् ध्यानशब्दाभिधेयो भवति । ननु चतुर्थे शुक्लध्याने कायy T N A T A m V L A A LE S S N निर्जरातरटे 卐 A U V नवतच- ध्यानमप्रमत्तसंयतगुणस्थानकमाद कृत्वा ईणमोहं यावत् सम्भवति, न तु ततो क् ध्यानयोग्यविशुद्धिपर्युदासात् । अग्रे तु उमङ्गला- विशद्धेरुत्कर्षात् वक्ष्यमाणशुक्लध्यानान्तर्भाव इति । निसर्गाऽधिगमाभ्यामशेषजीवादपदार्थश्रद्धानं जिनसाधुगुणोत्कीर्तनं 卐 टंकायां प्रशंसाविनयदानानि च धर्मध्यानलिङ्गानि । आनन्तर्यपारम्पर्याभ्यां स्वर्गापवर्गप्राप्तिश्च फलम् ॥ अथ शुक्लस्योपक्रमः-तत्र पृथक्त्ववितर्कसविचारं प्रथम, एकत्त्ववितळमविचारं द्वितीयं, सूक्ष्मक्रियमप्रतिपाति तृतीयं, प उत्सन्नक्रियमनिवर्त त चतुर्थ शुक्लध्यानमिति । तत्र पृथक्त्वं नानात्वं, वितर्कः श्रुतं, विचारोऽर्थव्यंजनयोगसङ्क्रान्तिरित पृथक्त्ववितर्कसविचारं, परमाण्वाद एकस्मिन् द्रव्ये उत्पादस्थितिव्ययमूर्त्तत्वाऽमृर्त्तवानां पर्यायाणां द्रव्यार्थिकपर्याया- 卐 'थिंकादिभि विधनयैः पूर्वविदां पूगतश्रुतानुसारेणेतरेषामन्यथा अर्थव्यञ्जनयोगान्तरसङ्कमणयुक्तं यदडचिन्तनं तदाद्यं शुक्ल- मिति । अस्मिन्नावदे परमाण्यायेकद्रव्यवतेभिन्नभिन्नपर्यायानाश्रित्य पृथक्त्वं, पूर्वगतपूर्व भन्नान्यतरश्रुतानुसारित्वात् सवि- के तर्खत्वं, अर्थदर्थान्तरे शब्दाच्छब्दान्तरे विवक्षितमनःप्रभृतियोगाद्वागादियगे सङ्क्रमणस्य च जायमानचात् सविचारत्वम् । A एवं त्रीण्यपि विशेषणानि स्वधिया परिभाव यान नर अर्थव्यंजनयोगान्तरेषु सङ्क्रमणसम्भवात् कथं मनःस्थैर्य ? तद- 卐 १ सालम्बननिरालम्बनर्गणमुख्यधर्मध्यानमाश्रित्यैतदप्रमत्तगुणस्थानकं भाव्यमन्यथा “ आर्तरौद्रं भवेदत्र मन्दं धर्व मध्यमम् । षट्कर्मप्रतिमाश्राद्ध-व्रतपालनसम्भवम् ॥ १॥ अस्तित्त्वानोकपायाणामत्रातस्यैव मुख्यता। आज्ञाद्यालम्वनोपेतधर्म- ध्यानस्य गौणता ॥ २ ॥ यावत्प्रमादसंयुक्तस्तावत्तस्य न तेष्ठति । धर्मध्यानं निरालम्वमित्यूचुर्जिनभास्कराः ॥३॥” इत्यादिगुणस्था- नकक्रमारोहग्रन्थोक्तयः कथं संगच्छेरन् ' इति स्वधिया समाधेयम् ।। 卐 ज M ध्यानम्। 卐 A 卐 N . 卐 G A T A । T १ ॥११६। V L 卐 A - A ३ N S A U - V A A 卐 'नेमेपदृशा ध्यायन् रूपस्थध्यानवान् भवेत् " ॥ ३॥ निरञ्जननिराकारचिदानन्दरूपस्याऽमूर्तस्य परमात्मनो यद्रूपवर्जितं . ध्यानं तद्रूपात तम् , आह च;-" अमूर्तस्य चिदानन्दरूपस्य परमात्मनः । निरञ्जनस्य सद्धस्य ध्यानं स्याद्रूपवर्जतम् " ॥ १॥ अस्य चतुर्थभेदस्य रूपात तत्त्वात् शुक्लध्यानान्तर्वर्त्तत्वमपि मन्यते ध्यानको विदैः ।। इत्येवं लेशतः प्रदर्शतं भिन्न- भिन्नप्रकारेधर्मध्यानं, विस्तरस्तु योगशास्त्रादाववलोकन य इति ॥ 卐 धर्मध्यानानुप्रवेशपरिकणि भावनादेशकालासनार्दन, तत्र ज्ञानदर्शनचारित्राऽऽख्या भावनाश्च तिस्रः । ज्ञाने नित्या- 卐 । स्यासान्मनसः तत्रैव प्रणिधानमवगतगुणसारश्च निश्चलमतिरनायासेनैवं धर्म्य ध्यायति । तथा विगतशङ्कादिशल्यः प्रशमसं- T वेगनिर्वेदानुकम्पाऽऽस्तिक्यस्थैर्यप्रभावनायतनाभक्तियुक्तोऽसम्मूढचेता दर्शनभावनया विमलीकृतमतिरस्खलितमेव धर्म्य 卐 ध्यायति । तथा चरणभावनाधिष्ठितः कण्यिपराणि नादत्ते, पुरातननिर्जरणं वा शुभानि सञ्चिनुते ततश्चायत्नेनैव धर्मध्यायी भवति तथा जगत्कायस्वभावालोचनात् सुविदितजगत्स्वभावो निःसङ्गो निर्भयो विरागो वैराग्यभावनावष्टब्धचेता लीलयैव ॥ धर्मध्यार्य भवति । देशोऽपि सीपशुपण्डकलक्षणकण्टकवर्जितो ध्यानयोग्यः, त्यादीनां सद्भावे विघ्नसम्भवात् । कालोऽपि 卐 यस्मिन्नेव काले मनसः समाधिरुत्पद्यते स एव ध्यानकालः । आसनं ध्यानयोग्यकायाऽवस्था विशेषः । यदुक्तम् समाधिर्ध्यानरय, कायावस्था जितासनम् । शुचिर्नष्कण्टको देशास्ते च सीपशुपण्डकाः "॥१॥ 'भावनादेशकालास- 卐 नादीनि' इत्यत्रादिशब्दादालम्बनानि वाचनापृच्छनापरिवर्तनचिन्तनानि सामायिकाऽऽवश्यकानि च ग्राह्यानि । इत्यादि- 卐 भिस्साधनेमध्यानं वृद्धिं प्राप्नोति । तीव्रमन्दादिभेदाः पीतपद्मशुक्लाऽऽख्या लेश्या अस्मिन् ध्याने वर्तन्ते । एतच्च धर्म- 卐 卐 N ॐ A G T काल: A V L A A LA LE N S 卐 U निर्जरातरम धर्मध्या- V M नम् । A A 卐 y ईनवतत्त्व अभक्ष्यभक्षणाऽपेयपानाऽगम्यगमनमुनिवालखीभ्रूणघातादीनि क्रूरतमकर्माणि कुत्सु चतुस्त्रिंशदतिशययुक्तदेवाधिदेवानां A गुरुयोग्यानुष्ठानाराधनपरगुरुणां च निन्दाकारिषु सदोषमप्यात्मानं शंसन्त त्येवंशीलेषु पुष्करावर्त्तवारिभिर्मुद्गशैलेष्विव देशना- र्टकायां भिम॒दूकर्तुमशक्येषु योपेक्षा तन्माध्यस्थ्यमिति ॥ तथा चोक्तम् :-क्रूरकर्मसु निःशकं देवतागुरुनिन्दिषु । आत्मशंसिपु योपेक्षा तन्माध्यस्थ्यमुदीरितम् " ।१ । आभिमैत्रीप्रमदकारुण्यमाध्यस्थ्यभावनाभिरात्मानं भावयन्महामतिः त्रुटितामपि विशुद्ध- ।११५ 卐 ध्यानसंतत संधत्ते अतस्तासां धर्मध्यानस्योपकारकत्वाद्धर्मध्यानान्तर्गतत्वमिति ।। अथवा ध्येयभेदाऽपेक्षया पिण्डस्थ-पदस्थ-रूपस्थ-रूपातीताभिधं धर्मध्यानं चतुर्विधम् । तत्र सचेतनजिनपिण्डं 卐 भावजिनशरीरमाश्रित्य यद्ध्यानं तत्पिण्डस्थम् , पिण्डं शरीरं तत्र तिष्ठत ति पिण्डस्थं ध्येयमिति योगशास्त्रवचनात् , अथवा पिण्डं ध्यातृदेहं तत्रस्थं पिण्डस्थध्यानमिति, येन स्वशरीरवर्तिपार्थिव-आग्नेर्य-मारुत-वारुणी-तत्रभूसंज्ञकपञ्चधारणापूर्वक 卐 A यद्ध्यानं तत्पिण्डस्थमिति । “ नमो अरिहंताणं " इतिध्येयपदानामथवा पदशब्देन कैवल्यादिपदं तत्र तिष्ठन्तीति पद- स्थास्तीर्थकरगणधरमुनयस्तेषां ध्यानमथवा पदशब्देनाऽऽगमपदानि तेषां ध्यानं विचारणमिति पदस्थध्यानम् । उक्तञ्च यत्पदान पवित्राणि समालम्व्य विधीयते । तत्पदस्थं समाख्यातं ध्यानं सिद्धान्तपारगैः " ॥१॥ तथा रागद्वपादि- महामोह विकारैरकलङ्कितं प्रशमरसनिमग्नं योगमुद्रामनोरममन्यतीर्थकैरपरिज्ञातं जिनेन्द्रप्रतिमाऽप्रतिमरूपं ध्यायन रूपस्थ- 卐 ध्यानवान् भन्त् । तथा चोक्तं;-रागद्वेषमहामोहविकारैरकलङ्कतम् । शान्तं कान्तं मनोहारि सर्वलक्षणलक्षितम् ॥ १ ॥ तीर्थे कैरपरिज्ञातं योगमुद्रामनोरमम् । अक्ष्णोरमन्दमानन्दनिःस्यन्दं दददद्भुतम् ॥२॥ जिनेन्द्रप्रतिमारूपमपि नर्मलमानसः । T N G 卐 T A V L ॥११५॥ A A yz S A: U 卐 V 卐 A 窮 M । 卐 A 卐 T कोऽपि दुःखितः । मुच्यतां जगदप्येषा मतिमै निगद्यते" ।१॥ प्राणिवधादिदोपनिवृत्तानां वस्तुतत्त्वाऽवलोकना ज्ञानक्रियालक्षणोभयमोक्षाङ्गप्रवृत्तानां मुनिपुङ्गवानां क्षायोपशमिकादिभावाऽऽपन्न्पु शमदमौचित्यगायधैर्यादिगुणेषु के वा तथाविधगुणाधारसत्त्वेषु विनयप्रयोगवन्दनस्तुतिवर्णवादवैयावृत्यकरणादिभिः सर्वेन्द्रियाभिव्यक्तः पक्षपातरूपो यो मनःप्रहर्षः स प्रमोदा, तद्ध्यानपरा भावना प्रमोदभावनेति ॥ उक्तञ्च, “अपास्ताशेपदोपाणां, वस्तुतत्वावलोगिनां । गुणेषु पक्षपातो यः स प्रमोदः प्रकीर्तितः" ॥ २ ॥ मतिश्रुताऽज्ञानविभङ्गज्ञानवलेन प्रवर्तितकुशास्त्रेषु स्वयं नष्टेषु परानपि नाशयत्सु अत एव दयापात्रत्वाद्दीनेपु " अहो कुशास्त्रप्रणेतारस्तपस्विनो यदि कुमार्गप्रणयनान्मोच्येरन्, ततो वरम् यतस्त्रभुवनगुरुभगवान प उन्मार्गदेशनात् सागरोपमकोटाकोटियावद्भवे भ्रान्तस्तत्काऽन्येषां स्वपापप्रतीकारं कर्तुमशक्नुवतां गतिः" ? इत्येवं प्रति- कारपरा बुद्धिः, कञ्च नवनवविपयार्जनपूर्वार्जितपरिभेगजनिततृष्णाग्निना दंदह्यमाना हताहितप्राप्तिपरहारविपरीतवृत्तयोऽर्था- जनरक्षणव्ययनाशपीडावन्तोऽनन्तभवाऽनुभूतेप्वपि विपयेष्वसंतृप्तमनसो विषयार्जनभोगतरलहृदयाः कथं नाम प्रशमाऽमृत- पुष्करावर्त्तमेघधारया गीतरागदशां नेतुं शक्या इति परोपकारपरा मतिः, किञ्च विविधभयहेतुभ्यो भीतमनसो वालवृद्धादयः कथं नामैकान्तिकाऽऽत्यन्तिकभयवियोगभाजन् करिष्यन्त इत लक्षणो मानसिकपरिणामः, तथा स्वधनदारपुत्रादिवियोगमु- त्प्रेक्षमाणा मारणान्तिकी पीडामनुभवन्तो मृत्युमुखमधिशयिताः सकलभयरहितेन पारमेश्वरवचनामृतेन सिक्ताः कथमजरामरी- करिष्यन्ते' इत्येवं पूर्वोक्तविविधप्रतिकारपरा या बुद्धिर्न तु साक्षात् प्रतिकार एव, सर्वेष्वशक्यप्रतिकारत्त्वात् , सा कारुण्य- भावना ॥ तथा चोक्तं योगशास्खे:-"दनेष्वापु भीतेषु याचमानेषु जीवितम् । प्रतिकारपरा वुद्धिः कारुण्यमभिध्यते" ॥१॥ N 卐 G 卐 A 卐 T 卐 V 卐 A 卐 A L २० y A f ज S N नर्जरातद मैत्र्यादे- भावना। M A A N 卐 नवतस्व- फ्रज A प्रशस्ताऽप्रशस्तदेहादिनिर्वृतः, गेत्रादुच्चनचकुलोपपत्तिः, अन्तरायादलाभादिः, एवं कर्मविपाकचिन्तापरस्याऽऽश्रवनिरोधार्थ U उमङ्गला- पर यत्प्रणिधानं तत्तुरीयं धर्मध्यानमित ३ अथ चतुर्थ संस्थानविचयसंज्ञकं धर्मध्यानमुच्यते। संस्थानं आकारविशेषो लोकस्य 卐 काय- V. द्रव्याणां च । तत्र लोकेऽधोलोकस्तावदधेमुखमल्लकसंस्थानः, स्थालाकृतिस्तिर्यग्लोकः, ऊर्ध्वलोको मल्लकसंपुटाकारकः । तत्रापि तिर्यग्लोको ज्योतिय॑न्तराकुलः। जम्बूद्वीपं विहायाऽसंख्येया द्वीपसमुद्रा वलयाकृतयः । धर्माऽधाऽऽकाशपुद्गलनी- ११४। 卐 वास्तिकाया अनादिनिधनसन्निवेशभाजो व्योमप्रतिष्ठाः। धर्माऽधम्मौ लोकाकार गतिस्थितिहेतू , आकाशमवगाहलक्षण- मयोगोलसंस्थान , पुद्गलद्रव्यं शरीरादिकार्य नानासंस्थानं, व उपयोगलक्षणोऽनादिनिधनः शरीरादर्थान्तरभूतो रूपः 卐 कर्मणां कर्ता उपभेक्ता शरीराकृतिः । इत्थं संस्थानाद्यन्वेषणपरं यत्प्रणिधानं तत्संस्थानविचयाऽऽख्यं चतुर्थ धर्मध्यानमिति॥ संस्थानाद्यन्वेषणे को लाभः ? इत्युच्यते;-पदार्थवर्तिगुणसंस्थानादिस्वरूपपरज्ञानात् तत्त्वावबोधः तत्त्वावबोधाच क्रियानुष्ठानं, y तदनुष्ठानान्मोक्षावाप्तिरिति ॥ 卐 आज्ञावचयादिभेदैर्यथा धर्मध्यानस्य चातुर्वेध्यं तद्वत् प्रकारान्तरेण मैत्र्यादिभावनाप्रकारैः पिण्डस्थादिध्येयप्रकारैश्च । T धर्मध्यानं चतुर्वधम् । तद्यथा-उपकार्यनुपकारी वा' चिदप जन्तुर्दुःखनिवन्धनाने पापनि मा कार्षद, मा च भूत् A कोऽपि दुःखितः; देवमानुपतिर्यनारकपर्यायाऽऽपन्नं सकलमपि जगन्मोक्षमवाप्नुयादिति ध्यानपरायणा भावना मै शब्देन । निगद्यते, नहि कस्यचिदेकस्य मित्रं मत्रशब्देनोच्यते, व्याघ्रादेरपि स्वापत्याद मैदर्शनात् , तस्मादशेषसत्त्व विषया मैः । 'यस्यां विद्यते सा मैत्रीभावना कषायोपशमक्षयफललक्षणेति । यदुक्तं योगशास्त्रे-" मा कार्य कोऽपि पापान, मा च भूत् T G A ॥११४॥ V 卐 卐 A S A V A A ए निपुणजनविज्ञेयां द्रव्यपर्यायप्रपञ्चवतीं "इच्चेइयं दुवालसंगं गणि"डगं न कयाइ णास्" इत्यादिवचनादनाद्यनिधनां द्वाद- शाङ्गी सूत्रतोऽर्थतश्च सावरणज्ञानचात् प्रज्ञायाः परिदुर्बलत्वात् कदाचिन्न जानाति तथाप्येवं विचिनुयाद्यदवितथवादिनः क्षीण- U ध रागद्वेपमेहाः सर्वज्ञा नाऽन्यथाव्यवस्थितमन्यथा भापन्तेऽनृतकारणाऽभावात् , यदुक्तं;"तरागा हि सर्वज्ञा मिथ्या न त्रुवते ) क्वचित् । यस्मात्तस्माद्वचस्तेषां तत्थ्यं भूतार्थदर्शनम् " ॥ अतः सत्यमिदं शासनमनेकदुःखगहनात् संसारसागरादुत्तारकमि- M 卐 त्याज्ञायां यत्प्रणिधानं तदाज्ञाविचयाऽऽख्यधर्मध्यानम् १॥ अपायाः विपदः, शाररमानसानि दुःखान, तेपां विचयोऽन्वेपणं, 卐 कथं वा अपायवहुलाः प्रभवन्तीति तदपायविचयाख्यं द्वितीयं धर्मध्यानम् । अयमत्र भावः,-रागद्वेपाऽऽकुलितचेतोवृत्तयः सत्त्वा मूलोत्तरप्रकृतिविभागभिन्नकर्मोदयजन्यजन्मजरामरणार्णवभ्रमणपरिखेदितान्तरात्मानः सांसारिकसुखप्रपञ्चेष्ववितृप्तमानसाः ॥ कायेन्द्रियादिवास्वप्रवाहेषु वर्चमाना मिथ्याचाज्ञानविरतिपरिणतिभिः परिणताः पर्याप्तं कर्मजालमादाय नरकादिगतिपु N 卐 दुरन्तं दर्घरात्रमपायैर्युज्यन्ते । केचिदिहाऽपि कृतवैरानुबन्धाः परस्परमाक्रोशवधवन्धाद्यपायभाजो दृश्यन्ते क्लश्यन्ते चेत्यतः 5 प्रत्यवायग्रायेऽस्मिन् संसारेऽत्यन्तोद्वेगाय यत्प्रणिधानं सोऽपायविचयाऽऽख्यो भेद इति २ । त्यं धर्मध्यानं विपाकविचया- 4 卐 ख्यमुच्यतेः, विविधो विशिष्टो वा पाको विपाकः-अनुभावः रसानुभव इत्यर्थः । कर्मणां विपाकस्य नरकतिर्यमनुष्यामरभवेषु है विचयोऽनुचिन्तनमिति विपाकविचयः । ज्ञानावरणादिकमष्टप्रकारं कर्म प्रकृतिस्थित्यनुभावप्रदेशमेदमिष्टानिष्ट विपाकपरिणामं A 3 जघन्यमध्यमोत्कृष्टस्थितिक विविधविपाकम् । तद्यथा;-ज्ञानावरणाद् दुर्मेधस्त्वम् , दर्शनावरणाच्चक्षुरादिवैकल्यं निद्रायुद्भवश्च, 卐 असद्वेद्याद् दुःखं, सद्वेद्यात्सुखानुभवः, मोहनीयाद्विपरीतग्राहिता चारित्रविनिवृत्तिश्च, आयुपोऽनेकभवप्रादुर्भावः, नाम्नः 卐 卐 T A T L A 卐 A N fi w $ नवतत्त्व- 卐 A 卐 निर्जरातत्व धर्म- ध्यानम् । र्टकायं- v ११३ 卐 A कृष्णलेश्या यायि, वक्ष्यमाणद्रध्यानाऽपेक्षया मन्दसंक्लेशमिति ॥ तिर्यग् गतिश्चास्य फलम् ।। अथ रौद्रम् -तच्चतुर्विधम् , हंसानुबन्धि, मृषाऽनुवन्धि, स्तेयानुवन्धि, संरक्षणाऽनुबन्धि च । तत्र वधवन्धनादिप्रकारैः सत्त्वान् हिनस्ति पीडामुत्पादयति हिंसार्थ प्रायः सततं प्रणिधत्त इत्येवं शलं तद्धिंसानुबन्धि १ । पिशुनाऽसभ्याऽसद्भूतादिवचन- प्रकारैर्मषाअसत्यमनुबध्नाति मृषानुवन्धि २ विक्रोधाद्याकुलतया स्तेयं चरकर्म तस्मिन् सततं येन प्रवृत्तिस्तत्स्तेया- नुवन्धि ३ विषमिव यान्ति विसर्पन्ति परिभुज्यमाना इति विषयाः, पृषोदरादित्वात् शब्दनिष्पत्तिः । अथवा 'पिञ्' बन्धने (पा० धा०१४७८) भोक्तारं विशेषेण विविध्न वा सिन्वन्ति बन्नति विषयाः शब्दादयः, तत्साधनानि च चेतनाऽचेत- नव्यामिश्रवस्तूनि विषयशब्दवाच्यानि विषीदन्ति वा प्राणिनो येषु परिभुञ्जानास्ते विषयाः। यथोक्तं प्रशमरतो;-" यद्यपि निष्व्यमाणा, मनसः परितुष्टिकारका विषयाः। किम्पाकफलादनवद्, भवन्ति पश्चादतिदुरन्ताः"॥१॥ विपयसाधनधन- धान्यादिसंरक्षणप्रणिधानलक्षणं संरक्षणानुवन्धि रैद्रध्यानमिति । हिंसादिसावद्यकार्येष्वानन्दः अधर्मे धर्मबुद्धिः प्रचण्डक्रोधा- विष्टत्त्वं महामोहामिभूतत्त्वं ववधविषयकसंक्लिष्टाऽध्यवसायित्त्वं पश्चात्तापाऽभावत्वमित्यादिलक्षणैरयं रंद्रध्यानानुगत इति लक्ष्यते। अ इक्लिष्टकृष्णन् लकापोतलेश्यानुयायि रैद्रम् । एतच्चाविरतदेशविरतयोरेव नान्येषामग्रगुणस्थानवर्तिनामित ॥ प्रायेण नरकगतिफलप्रदं रैद्रध्यानम् ॥ अथ धर्मध्यानम्-एतच्च आज्ञाविचय-अपायविचय-विपाकविचय-संस्थानविचयदाचतुधम् । तत्राज्ञा सर्वज्ञप्रर्णत : तामाज्ञामित्थं विचिनुयात् पर्यालोचरेता-पूर्वापरविशुद्धामतिनिपुणामशेष वकायहितामनवद्यां महार्था महानुभावां 卐 M y A 卐 N T 卐 A 卐 G 卐 A 卐 L T 卐 V 3 'A ॥११३॥ 卐 A 卐 al N S A V - A आत्मैव रुद्र इत्यर्थः । धर्मः क्षमादलक्षणस्तसादनपेतं धर्म्यम् । शुक्त शुचि नर्मलं सकलकर्मक्षयहेतुत्वादिति । शुग्वा y दुःखमष्टप्रकारं कर्म तां च शुचं लमयति ग्लपयति निरस्यर्तत शुक्लम् । यद्यप्यत्र धर्म्यशुक्के एव निर्जरानिमित्तत्त्वान् 卐 मक्षहेतू तथापि प्रसङ्गसङ्गत्या आर्तरंद्रे अपि किञ्चिद्विविच्यते- y 卐 तत्राऽऽर्त चतुर्वेघ-इष्टविग्रयोगाऽनिष्टसम्प्रयोगरोगचिन्तानिदानदैः। तत्र मनोज्ञविपयाणां विप्रयोगे कथं नु नाम पर तैर्मनोज्ञविपर्यस्सह भूयोऽपि मम सम्प्रयोगस्यादिति चिन्तालक्षणमिष्टविप्रयोगार्तध्यानम् १ । अमनोज्ञानां शब्दादिविषयाणां A 3 सम्प्रयोगे सति तेपामनिष्टशब्दादिविपयाणां विप्रयोगार्थमात्मनः प्रणिधानविशेषः केनोपायेनाम्पा वियोगस्स्यादित्येकतान- मनोनिवेशनलक्षणोऽनिष्टसम्प्रयोगसंज्ञको द्वित्यो मेदः २ । प्रकुपितपवमानपित्तश्लेष्मसन्निपातनिमित्तैरुपजातायाः शूलशिर:- N gs कम्पज्वराक्षिश्रवणदशनादिकाया वेदनाया विप्रणाशाय यदात्मनः प्रणिधानं तद्रोगचिन्ताऽऽर्तध्यानम् ३ । 'निदायते लूयते 卐 लुप्यते येनात्महितमैकान्तिकात्यन्तिकानाबाधसुखलक्षणं तन्निदान मिति । निपूर्वाद् दातेर्लवनार्थस्य ल्युटि रूपम् । मोक्षफल- ज प्रापकाणां स्वानुष्ठिततपश्चरणादिगुणानामैहिकाऽमुष्मिकप गलिकविपयप्रभृतिसुखलिप्सया विषयसुखगृद्धानां कामोपहतचि- 卐 त्तानां स्वाभीप्सितविपयाद्यर्थं यत्प्रणिधानं तन्निदानार्तध्यानमिति चतुर्थः प्रकारः ४ ॥ चतुःप्रकारकस्याप्येतस्यार्तध्यानस्य 卐 शोकार्दनि लक्षणानि भवन्ति, यैः करतलविन्यस्तवदनक्रन्दनविलपनहाहेतिशब्दोच्चारणदीर्घनिश्वासप्रमुखलक्षणैराव॑ध्यारी अयमिति लक्ष्यते । एतच्चार्तध्यानमविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानां क्रमेण मन्दमन्दतरमन्दतमपरिणामवद्भवति, नत्त्वप्रमत्त- 卐 संयतादीनां तथाविधविशुद्धिस्थानसम्पर्कादार्तध्यानयोग्यसड्लशपरिमाणाऽभावादिति, पुनरेतदातं नातिसंक्लिष्टकापोतनील- 卐 A T A V L A A y N S नवतत्व- 卐 A - उमङ्गला- र्टकायां- 卐 V M कम् ॥ ।११२।) A A 卐 T रुपग्रहः श्रूषा भैषजक्रिया कान्ताररोगोपसर्गेषु परिपालनमेवमादि वैयावृत्त्यम् ।। ' निर्जरातरटे U तथा स्वाध्यायः-सुष्ठु मर्यादया कालव्लापरिहारेण पैरुष्यपेक्षया वाऽध्ययनं स्वाध्यायः, स च वाचना-प्रच्छना- म ध्यानचतु- ऽनुप्रेक्षा-ऽऽम्नाय-धर्मोपदेशभेदात् पश्चविधः । तत्र वाचनं शिष्याध्यापनं । प्रच्छनं ग्रन्थार्थयोः सन्देहच्छेदाय निश्चितार्थ- प्रसाधनाय वा परानुयोगः । अनुप्रेक्षा ग्रन्थार्थयोरेव मनसाऽभ्यासः । आम्नायो घपविशुद्धं परिवर्तनं णनं रूपादानमिति 卐 यावत् । धर्मोपदेशोऽर्थोपदेशो व्याख्यानमनुयोगो वर्णन मिति यावत् । अथ ध्यानम् ;-ध्यातिानमन्तर्मुहूर्त्तकालप्रमाणं चित्तस्थिरतालक्षणम् । चित्त मर्कटवञ्चपलं, तस्य कस्मिंश्चिदप्येक 卐 स्मन् ध्येयविषये स्थापनं तद्धयानं, एतच्च छद्मस्थविषयं, केवलनां पुनर्वाक्काययोगनिरोध एव ध्यानम् , तेषां मनसोऽभावात् , नावाप्तवलस्य मनोव्यापारः समस्त, सकलकरणग्रामनिरपेक्षत्त्वादिति । उक्त ;-" अंतोमुहूत्तमित्तं चित्तावस्थाणमेगवत्थु- म्म छउमथाणं झाणं जोगनिरोहो जिणाणं तु"॥१॥ अत्र च ध्याता संसार्यात्मा, ध्यानस्वरूपं चलचित्तनिरोधपूर्वकैक- विषयस्थैर्यापादनलक्षणं, कालतः छमस्थानाश्रत्य मुहूर्त्तमात्रं, ध्येयप्रकारास्त्वमनोज्ञमनोज्ञविषयसंप्रयोगविप्रये गादयः । इत 卐 सामान्यत उद्दिष्टं, अथ भेदप्रभेदैः प्रदर्श्यते, तद्यथा;-ध्यानं चतुर्विध आरंद्रधर्म्यशुक्लदैः। तत्र ऋतशब्दो दुःखपर्यायवा- A च्यायते, अर्न्तर्गमिक्रियापरिस्पन्दिनो निष्ठाप्रत्ययान्तः, तस्मादागतार्थे तद्भुतप्रत्ययो णित, आत दुःखभवं दुःखानुबन्धि- 卐 चेत, तथा चाऽमनोज्ञविषयसम्प्रयोगो दुःखम् , वेदना च नेत्रशिरोदशनादिका दुःखमेव, तथा मनोज्ञविषयविप्रयोगो । ॥११२॥ दुःखमेटेत्युपपन्नः प्रत्ययार्थः। तथा रेदयत्यपरानित रुद्रे दुःखस्य हेतुः तेन कृतं तत्कर्म वारे, प्राणिवधबन्धादपरिणत 卐 A y T L 卐 V 卐 N 卐 S M 卐 A 卐 V 卐 A 卐 T 卐 A 卐 T 卐 V A अथ यावृत्त्यम्;-व्यावृत्तः प्रवचनोदितक्रियानुष्ठानलक्षणव्यापारप्रवृत्तः तस्य भावः कर्म वा वैयावृत्यम् व्याधिप- पहायुपनिपाते तत्प्रट कारस्तदानुकूल्यानुष्ठानं चेत्यर्थः। तचाऽऽचार्यो-पाध्याय-स्थविर-तपस्वि-शैक्ष-लान-साधर्मिक- U कुल-गण-सङ्घलक्षणविषयमदेन दशधा, आचार्यवैयावृत्त्यम् , उपाध्यायवैयावृत्यम् , यावत् सङ्घयावृत्त्यमिति । तत्र स्वय- 9 माचरत परॉश्चाचारयति, आचर्यते रेव्यत इति वाऽऽचार्यः। स च पञ्चधा-प्रव्राजकाचार्यः, दिगाचार्यः, उद्देशकाचार्य समुद्देशानुज्ञाचार्यः, आम्नायार्थवाचकाचार्य इति । तत्र सामायिकवतादेरारोपयता प्रव्राजकाचार्यः, सचित्ताचित्तमिश्रवस्त्व- 9 नुज्ञा देगाचार्यः, प्रथमत एव श्रुतमुद्दिशति यः स उद्देशाचार्यः उद्देष्टूगुर्वभावे तदेव श्रुतं समुद्दिशत्यनुजानते वा यः स समुद्देशाऽनुज्ञाचार्यः, आम्नायमुत्सर्गापवादलक्षणमर्थ वक्त यः स प्रवचनार्थकथनेनानुग्राहकोऽक्षनिषद्याद्यनुज्ञा आचार- 卐 गोचरविषयस्य स्वाध्यायस्य वाचकत्त्वेन वा आम्नायार्थवाचकाचार्यः । आचार्याल्लब्धाऽनुज्ञाः साधव उपसम पेऽधीयतेऽस्मा- दित्युपाध्यायः। स्थविरो वृद्धः, स श्रुत-पर्याय-वयो दाद त्रिविधः श्रुतस्थविरः समवायाङ्गं यावदध्येता, पर्यायस्थविरो यस्य दक्षतस्य वंशत्याद न वर्षाणि, वयःस्थविरः सप्तत्यादिवर्षजवितः । विकृष्टं दशमादि कश्चिन्यूनषण्मासान्तं तपः कुर्व- स्तपस्ट । अचिरप्रवजितः शिक्षाहः शैक्षः। रोगादिक्लिप्टशर्ररो ग्लानः । साधर्मकाः समानधर्मिणो द्वादशविधसम्भोगवन्तश्च । बहूनां गच्छानामेकजातयानां समूहः कुलं चन्द्रादे। गच्छस्त्वेकाचार्य प्रणेयः साधुसमूहः । कुलसमुदायो गणः कोटिका दः । 卐 सङ्घः साधुसाई श्रावकश्राविकासमुदायः, परमार्थतस्तु ये ज्ञानदर्शनचरणगुणेषु व्यवस्थितास्तेषां समुदाय एव सद्यो न तु नाममात्राणां श्रमणादीनामित । एषां पूर्वक्तानामाचार्यार्दनां अन्नपानवस्त्रपात्रप्रतिश्रय ठफलकसंस्तारकादिभिर्धर्मसाधन- N G A L ܝܢ 卐 A 卐 A S M 卐 A अनवतत्त्व- 卐 ईनकरणमलपूरणानि क्रियन्टे, च . तु शल्यकर्षणमर्दनमलपूरणरुधिरगालनानि वेदनापहारार्थ क्रियन्तै, पञ्चमे तु गाढ फ्र A तरावगाढशल्यद्धरणादि, ततो गमनादिचेष्टा निवार्यते, षष्ठे हितमितभेज्यभोजन भोजने वा शल्योद्धारानन्तरं भवति, सप्तमे U निर्जरात 卐 र्टकाय- शल्यद्धारानन्तरं भवति, सप्तमे शल्येद्धारानन्तरं यावच्छल्येन मांसादिदृषितं तावत् छिद्यरे, गोनसभक्षिताद पादव- विनयः॥ V के वा पूर्वोक्तक्रियाभिरडपशमा शेषाङ्गरक्षणार्थ अस्थ्ना सहाङ्गच्छेद वियरे । एवं द्रव्यव्रणदृष्टान्न मूले त्तरगुणरूपस्य १११ चारित्रपुरुषस्यापराधरूपो व्रण आलोचनादिना छेदान्तेन प्रायश्चित्तविधिना शोधनय इति ॥ एतद्दशविधमपि प्रायश्चित्वं देशं 5 कालं शक्तिं संहननं संयम विराधनां च कायेन्द्रियजातिगुणोत्कर्षकृतां च प्राप्य विशुध्यर्थ दयते आचर्यरे च । प्रायश्चित्त- A 卐 फलं प्रमाददषव्युदासभावप्रसादनैः शल्यानवस्थाव्यावृत्तिमर्यादात्यागसंयमदायराधनादिकं समवसेयम् । उक्तञ्च; 卐 पावं छंदइ जम्हा, पायच्छित्तं त भण्णई तेणं' पाएण वावि चित्तं, सेहयति रेण पच्छित्तं ॥२॥ प अथ वनयमाह;-विनयते क्षिप्यतेऽष्टप्रकारकं कर्मानेनेति विनयः, स चतुर्धा;-ज्ञानदर्शनचारित्रोपचारभेदात् , तत्र फ सबहुमानं ज्ञानग्रहणाऽभ्यासाद ज्ञानविनयः। सामायिकादं लोकबिन्दुसारपर्यन्रे श्रुते भगवत्प्रकाशितपदार्थाऽन्यथाचाs- 卐 सम्भवात् नशङ्कतत्त्वादिना तत्त्वार्थश्रद्धा दर्शनविनयः। सामायिकादिचारित्रस्वरूपश्रद्धानपूर्वकं अनुष्ठानविधिना च प्ररूपण- 卐 मित्टेष चारित्रचिनयः चारित्रवतश्चारित्रे समाहतचित्तरेत्यर्थः। सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रादिगुणाधिोपु आचार्यादिषु प्रत्यक्षेषु ! सत्सु अभ्युत्थानाऽभिगमनाऽञ्जलिकरणादि उपचार विनयः, परोक्षेष्वपि कायवाङ्मनेभिरञ्जलकरणगुणसंकर्तनानुस्मरणादि- 卐 रुपचार विनय इति ॥ ॥१११ ! 卐 T -- N A G T A V L M A A y A 'S 卐 V U 卐 M A A 卐 T 卐 A उपयुक्तेन गतार्थेन गृहतं प्राक् पश्चादवगतमशुद्धं विकाहमिति ४॥ व्युत्सगन्पयादिषु त्यक्तेषु गमनागमनसावद्यस्वप्न- दर्शननं सन्तरणोचारप्रश्रवणेषु च व शष्टप्रणिधानपूर्वकः कायवाङ्मनोव्यापारत्यागः । तथाविधदोषसद्भावे आलोचनायां दश- विंशतिसंख्याकलोकोद्योतकरप्रमुखकायोत्सर्गप्रदानं चत्तविशुद्ध्यर्थमिति भावः ५॥ तपस्तु छेदग्रन्थाङसारेण जतकल्पानुसारेण 3 वा येन केनचित्तपसा विशुद्धिर्भवति तत्तद्देयमारवनयं च ६॥ छेदस्तपसा दुर्दमस्याहोरात्रपञ्चकादिना क्रमेण श्रमणपर्यायच्छेदनम् ७ ॥ मूलं महाव्रतानां मूलत आरोपणं ८ ॥ तथा अवस्थाप्यत इत्यवस्थाप्यस्तन्निपेधादनवस्थाप्यस्तस्य भावोऽनवस्थाप्यता, 卐 दुष्टतरपरिणामस्य अकृततपोविशेषस्य व्रतानामारोपणम् येन पुनस्साधर्मिकादिस्तेयपहारादिप्रतिरोवितेन उत्थापनाया अप्ययोग्यः किञ्चित्कालं न व्रतेषु स्थाप्यते यावन्नाद्यापि प्रतिविशिष्टं तपश्चरणं भवति, पश्चाच चीर्णतपस्तदोषात् परतो व्रतेपु 卐 स्थाप्यत इति विशिष्टकालं यावदुपस्थापयिटुमयोग्यत्त्वादनवस्थाप्य इत्यर्थः। परस्परेण पुरुपयोर्वेदविकारकरणं, पञ्चमनिद्रावश- वर्तित्वम्, कषायतो वषयतश्च क्रमेण राजवधराजदारस्चाप्रमुखदुष्टातिकरणं, स्र्थकराद्याशातनाकरणं चेत्यादिदुष्टतमपरिणामे 卐 सति समयोक्तेन चतुर्थादिना तपसा पण्मासादिना द्वादशवर्षान्तेन कालेन अतिचारपारं गच्छति, ततश्चाऽतिचारपारगम- 卐 नाऽनन्तरं राजप्रतिबोधादिप्रवचनप्रभावनातः प्रव्राज्यरे नान्यथेति पाराश्चितप्रायश्चितम् । तत्त्वार्थाद अनवस्थाप्यपाराञ्चित- योरेकविपयत्त्वेन संख्यातत्त्वादालोचनादिनवम्दाः प्रायश्चित्तस्य । एतच छेदपर्यन्तं प्रायश्चितं व्रणचिकित्सातुल्यं पूर्वसरि- 卐 भर भिहितं, तत्र तनुरक्ष्णमुखो रुधिरमप्राप्तस्त्वग्लग्नः शल्यो देहादुध्रियते, न तत्र व्रणस्य मर्दनं वियते शल्याल्पत्वेन । वणस्याल्पत्त्वात्, द्वरी ये तु लग्नोद्धृतशल्ये मर्दनं क्रयते न तु कर्णमलेन पूर्यते, तरीरे तु दूरतरगतशल्ले शल्योद्धारम- 卐 N T 卐 V 卐 A 卐 A प N U बनवतत्व- सुमहला- र्टकायां- 卐 A 卐 V 卐 A A 卐 S प्यच्छित्तं विणओ, देयावर तहेव ज्झाओ। झाणं उस्सग्गो वि अ, भतरओ तवो हेइ ॥३६॥ 卐 निर्जरातरी टीका;-'पायच्छित्तं ' इति, प्रायश्चित्त, विनयः, यावृत्त्य, तथा स्वाध्यायः, ध्यानं उत्सर्गश्चेति, पदभिन्न प्रायश्चित्त- 卐 आभ्यन्तरं तपो भवतीति गाथाक्षरार्थः । अथ प्रत्येकं व्याख्यायते;-मूलोत्तरगुणेषु स्वल्पोऽप्यतिचारो चित्तं मलिनयत ति भेदाः॥ तत्प्रकाशनाय तच्छुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तम् , प्रकर्षण अयते गच्छत्यस्मादाचारधर्म इति प्रायो मुनिलेकः, तेन विचिन्त्यते 卐 स्मर्यटेतिचारविशुद्ध्यर्थमिति निरुक्तात् प्रायश्चित्तमनुष्ठानविशेषः । अथवा प्रायो बाहुल्येन ब्रतातिक्रमं चेतस सञ्जानते चेतश्च न 'पुनराचरतीत्यतः प्रायश्चित्तम् , अथवा प्रायोऽपराध उच्यते स रेन चेतति विशुध्यति तत् प्रायश्चित्तम् ) 'चितः संज्ञान विशुद्धयोः' इति वचनात् । तच्च दशविधम्:-आलोचनम् , प्रतिक्रमणम् , मिश्रम् , विवेकः, व्युत्सर्गः, तपः, N , मूलम् , अनवस्थाप्यता, पाराश्चिकमिति तत्रालोचनं गुरोः पुरतः स्वापराधस्य प्रकटनम् , तच्चाऽऽसेवनानुले म्येन प्राय- श्चित्तानुलोम्टेन च, आरेवनानुलोम्यं रेन क्रमेणातिचार आसेन्तिस्तेनैव क्रमेण गुरोः पुरतः प्रकटनम् , प्रायश्चित्तानुलोम्यं च गतार्थस्य शिष्यस्य भवति, स हि पञ्चक-दशक-पञ्चदशकक्रमेण प्रायश्चित्तान गुरुलध्वपराधानुरूपाणि विज्ञाय 卐 योऽपराधो गुरुस्तं तं प्रथममाले चयति, पश्चाल्लघु लछुतरं च १॥ अतिचाराभिमुख्यपरिहारेण प्रतीपं क्रमणमपसरणं प्रतिक्रमणं, मथ्यादुष्कृतसंयुक्तेन पश्चात्तापेन 'पुनरेवं न करिष्यामि' इति प्रत्याख्यानम् २ ।। प्राग्व्याख्यातमालोचनं प्रतिक्रमणञ्चेतदुभयं 卐 यत्र तन्मिभं, प्रागाले चनं पश्चाद्गुरुसन्दिष्टस्य प्रतिक्रमणम् एतच्चे भयं प्रायश्चित्तं सम्भ्रमभयातुरापत्सहसाऽनाभोगानात्मवश- गतस्य दुष्टचिन्तितभापणचेष्टावतश्च विहितम् ३॥ सम्प्रति वटेकप्रायश्चित्तावसरः-एष विवेकः संसक्तानपानोपकरणादिषु भवते, ॥११०॥ - 3 T ध A फ्री T . G A L V ज N 卐 S 'A 卐 U M 卐 A 卐 T 卐 A - तपश्च, तत्र प्रणिधानादिगमनमन्तरेण कर्मक्षयः स्थितिक्षयात् , ज्ञानावारकदर्शनावारकान्तरायकर्मणां त्रंशत्सागरोपमकोर्ट- कोट्यः, महर्न यस्य सप्ततिकोटीकोट्य, नामगोत्रयोविंशतिसागरोपमकोर्ट कोट्यः, आयुपस्त्रयस्त्रंशत्सागरोपमाणेति स्थितिप्रमाणं जैनागमे सुविख्यातं, तत्तत्कर्मणां प्रणिधानमन्तरेण स्थितिक्षयात्कर्मविनाशः स्फुटमिदं । तथा अपरं कर्मक्षपणार्थमर्हता . दर्शतं तपः, तच द्विविधं, आभ्यन्तरं वायं च, एकैकं चाऽपि पड्दम् , लोने परसमटेषु च प्रथितं यत्तद्वाद्यं तपः । अभ्यन्तरमप्रथितं कुशलजनेनैव तु ग्राह्यम् । तथा उभयमप्येतदागोपालाङ्गनादिप्रसिद्धमशुभकर्मक्षपणकारीति । रात्रावभोजनं ॥ चैकभोजनं निष्प्रतिक्रियत्त्वं च रोमनखधारणं वृक्षमूलरासनादिकरणं भिक्षार्थमप्रतिवद्धमटनमाजवितात् भूकाष्ठशय्यासेवन- A मित्येवमादयः कायस्य क्लेशाः प्रसह्यन्ते ननु सर्वैरपि पापण्डभिः । कायक्लेशस्य गुणाः प्रभावना ध्यानदायश्च । ततश्चैवं- प्रमाणयतो मायासूनवीयस्य ‘आर्हतानामात्मसंतापनाद्युपक्रमविशेपवैयर्थ्यम् ' इत लोकविरोधिन प्रतिज्ञा । लोले चविगानते ऽनशनादितपः प्रसिद्धं कर्मक्षयकृत् , तदप वानस्य परिस्फुट एव लोकविरोधः । कालविशेपाश्रयणेन न रुजस्याऽपि . अशनप्रतिषेधवृक्षमुलासेविवादिकायक्लेशलक्षणं तपः स्वागमेऽभ्युपेतमिति, अतस्तपोऽकिञ्चित्करमिति स्वागमविरोधः । तथा सर्वज्ञप्रणतागमानुसारिलोचमण्ड्यातापनादिकः कायक्लेशः प्रतिविशिष्टेष्टफलः आगमचोदितत्त्वे सति कायक्लेशत्त्वाद् वृक्षमूलासेवित्त्वनिष्प्रतिक्रियादिवत् । अपि च सोपक्रमनिरुपक्रम दभिन्नकर्मणां मध्ये करणसाध्यसोपक्रमकर्मणां प्रणि- 卐 धानलक्षणेन तपसा क्षयोऽपि साध्यः, कैश्चित्तु ' तवसा निकाइयाणं पि' इति वचनानिरुपक्रमाणामपि क्षय इष्ट इत्यनेन तपसः साफल्यं सिध्यतत्यलमतचर्चया ॥ अथाऽभ्यन्तरं तपो व्याचष्टे:- 卐 N . G 卐 T 卐 V A L 卐 A A הל 卐 z! S बनवतत्त्व- A 卐 U रातत्टे बाह्यतपो भेदाः टकायां- V M 1 १०९। 卐 A -5 इत्थं पट्प्रकारं बाह्यं तपः वाद्यत्वञ्च वाह्यद्रव्यापेक्षत्त्वात् , परप्रत्यक्षत्वात् , कुतीर्थिकैर्गृहस्थैश्च कार्यवादिति । ननु किं पुनरितो बाह्यतपसः फलमवाप्यत इत्युच्यते-अस्मात् पड्विधादपि वाह्यात्तपसः सङ्गत्यागः शरीरलाघवं इन्द्रिय- विजयः संयमरक्षणं कर्मनिर्जरा चेत्यनेकविधं फलमासाद्यते । तत्र निःसङ्गत्वं बाह्याऽभ्यन्तरोपधिवनभिष्वङ्गो नर्ममता। प्रतिदिनमतिमात्राहारोपयोगात् प्रणीताहारोपयोगाच शरीरस्य गैरवं, ततश्च भासकल्पविहारित्त्वायोग्यता, तद्वर्जनात्तु शक- टाभ्यञ्जनवदुपयोगाद् वा शरीरलाघवमुपजायते, ततश्चाष्प्रर्ण तशरीरस्योन्मादानुद्रेकादिन्द्रियविजयः, भक्तपानार्थमहिण्डमा- नस्य चर्याजनितजन्तूपरोधाऽभावात् संयमरक्षणं निःसङ्गादिगुणये गादशनादितपोनुतिष्ठतः शुभध्यानव्यवस्थितस्य कर्म- निर्जरणमवश्यं भवतीति वाहतपोऽपि मुमुक्षुभिः कर्त्तव्य इति ॥ अत्र चिन्महान्धतमस मायासून या एवमाचक्षते-यदातापन शरेलुश्चनाऽनशनादिकायक्लेशोपक्रमेण न कर्मवि- च्छेदो भवति, युक्त्या चैनमर्थ प्रसाधयन्ति, ते चैवमाहुः- आतापनशिरोलुश्चनप्रमुखकायक्लेशोपक्रमेण पूर्ववद्धं कर्म उदयप्राप्तं सत् कायक्लेशद्वारा यदि क्षयमाप्नोति तदाऽऽताप- नादियत्नो व्यर्थः, यते यत्कर्मबद्धं तत्प्रयत्नेन विनापि पाककाले स्वानुभवं प्रदर्शयिष्यति तथास्वाभाव्यात्कर्मणः, अथवा बद्धकर्मोदयाऽभावस्तदा कस्य कर्मणः क्षयार्थ अनशनप्रमुखकायक्लेशसमारम्भः ? सति कर्मणि तस्य क्षयः संभाव्यः, न च वाच्यं विजायकर्मक्षपणार्थ आतापनाशुपक्रम इति, यतोऽनुभूयमानस्यैव क्षयो नेतरस्य, तस्मादातापना- ऽनशनशिरोलुश्चनप्रभृतिकायक्लेशप्रक्रमस्य व्यर्थ्यमिति ॥ अत्रोच्यते-द्विविधः कर्मपरिपाकहेतुर्भगवद्भक्तः, स्थितिक्षयः ज A 卐 N T 卐 A ध T 卐 V 卐 G 卐 A 1 न ॥१०९॥ A A 卐 A ध 卐 S 卐 U ध M A 卐 T विलोकनवत् प्रत्याख्टेयाः, इत्थं च रसपरित्यागलक्षणं वैशिष्टं तपः॥४ ।। अथ कायक्लेशः, कायः शरैरं तस्य क्लेशो वाधन मत्यर्थः । संसार्यवस्थायां कायाऽऽत्मनोरम्दोऽन्योऽन्यानुगतत्त्वात्तयोः रोदकादेरिव, अतः कायवाधायामात्मनो वाधाऽवश्यंभावन', एकत्त्वपरिणतेश्च विना संसार्यात्मनः सुखदुःखाभाव एव स्यातु, एवमात्मनः कायद्वारेण क्लेशोत्पत्तिरिति कायक्लेशः, आगमानुसारिण सम्यक्क्लेशोत्पत्तिनिर्जरारी न्याय्या, तथा चोक्तं दशवै- कालके-'देहदुक्खं महप्फलम्' इति । स च कायक्लेश आगरेऽन्कप्रकारेणोपन्यस्तो वैशष्टाऽऽसनकरणेनाप्रतिकर्मशरीरच- केशोल्लुञ्चनादिना । ननु पर पहेभ्यः कोऽस्य विशेषः ? उच्यते; स्वकृतक्लेशानुभवरूपःकायक्लेशः, पर पहास्तु स्वपरकृतक्लेश- रूपा इति विशेषः ॥५॥ सम्यक् प्रकारेण लयते यते ज्ञानदर्शनचरित्रगुणेष्वात्माऽनयेति संर्लनता, सा चेन्द्रिय-कषाय-योग-विविक्तचर्या- भेदाच्चतुर्विधा, तत्र प्राप्तेष्विन्द्रियविषयेषु अरक्तद्वष्टेन भवितव्यमिति इन्द्रियसंर्लनता। क्रोधस्य तावदुदयनिरेधः प्राप्तोदयस्य च वैफल्यापादनम् , एवं शेपकषायाणामपति कपायसर्लनता । तथा अकुशलमनोनिरोधः, कुशलचित्तोर्दरणं वा, एवं वागप वाच्या, कायव्यापारस्तु समुत्पन्नप्रयोजनस्य यत्नवतः संलनताव्यपदेशमश्नुते, विना टु प्रयोजनेन निश्चलासनमेव य इति योगसंलनता एकान्तेऽनावाधेससक्ते व पशुपण्डकवर्जि शून्यागारदेवकुलसभापर्वतगुहादीनामन्यतमस्मिन् स्थानेऽवस्थान विविक्तचर्यासंर्लनतेति । सान्तःकरणानन्द्रयाणि संयम्य क्रोधा देकदम्बकं निरुध्य समाध्यर्थं वैविक्तं शय्यासनमासेवमानस्य संलीनता भवति तात्पर्थः ॥६ । 卐 A 卐 N 卐 卐 A 卐 T 卐 V ॥ A L १९ 卐 A an 卐 S N निर्जरात U A बायतपे- प्राण- भेदाः॥ M N . बनवतव- हमङ्गला- र्टकायां- 卐 V १०८ । ) A ॐ T 卐 A 3 T 卐 V 卐 त्यागः । तत्र मद्यं गंडपिष्टद्राक्षाखर्जुरादिद्रव्यसम्भारोपजातमदसामर्थ्य विषगरादेवजवमस्वतन्त्रं करो , अस्वतत्रश्च तद्वशः कार्याकार्यविवेकशून्यो भ्रष्टस्मृतिसंस्कारो गर्हितमाचरत, अतस्सर्वथा तत्परित्यागः। मांसं तु प्राणिशरीरावयवः, व्यपरोपणमन्तरेण दुष्प्रापम् , प्राणातिपातश्च स्वशरीरसम्भूतदुःखानुमानेन न शक्यः ज्ञेन कर्तु, स्वयं न करो अन्येन कार्यत इत्येतदपि न, कुर्वन् न चाऽनुमोदन्यः, एवं कृतकारितानुमतिभिः परिहारः सर्वथा क्षोरुपदिष्टः शासनप्रणायना 卐 सर्वज्ञेनेति । अथ यत् कृतकारितानुमतिपरिशुद्धमोदनादिवत् तत् किमिति न वर्ण्यते ? तदपि गार्थ्यपरिहारार्थ यतयः परिहर- न्त्येव द्रव्यादिचतुष्टयापेक्षाः, ननु चैवमोदनादयोऽपि गाय॑परिहारणा त्याज्याः ? नैतदेवम् , मांसरसो हे सर्वरसातिशारी 卐 वृष्यतमश्च किल, तत्र चाऽवश्यंभावि गाय॑म् , न चैवमोदनादयः। ननु च क्षरदधिघृतादयोऽपि रसा वृष्या एवेति, उच्यते- तेऽपि हि क्षोः सर्वदा नैवानुज्ञाता भगवद्भिः, यदा कदाप्यनुज्ञातास्तदाऽपि मात्रया तप्तायोभाजनप्रक्षिप्तघृतादिविन्दुक्षयवन्न चरणबाधायै प्रत्यलाः, लोकविरुद्धमपि मांशाशित्त्वमतो सर्वथा हेयमिति । मधु त्रिप्रकारम् ;-माक्षिकं कै चिकं भ्रामरं च, एत- दपि प्राण्युपघातनिष्पन्नमेवेति परिहार्यम् । गोमहिष्यजाऽविकानां नवन्तं चतुर्धा, स चापि वृष्यो रस इति परिहार्यः । दुग्ध- विकृतिः प प्रकारा गोमहिष्यजाविकोष्ट्रणाम् । दधिविकृतिः करभ वर्जानां चतुःप्रकारा । घृतविकृतिर्दधिविकृतिवच्चतुर्वैव । रैल विकृतिरपि चतुर्विधा, तिलाऽतस सिद्धार्थककुसुम्भकाख्यानि तैलानि । इक्षुविकाराऽऽत्मिका च गुडविकृतिः । अवगायक- वकृतिरपूपादिका आदिग्रहणात् घृताद्यवगाहनिष्पन्नान दश प्रमुखद्रव्याणि ज्ञेयानि । एताः पूर्वक्ता नखिला अपि विकृ- तयश्चित्तविकारहेतुभूतत्त्वान्न सर्वदाऽभ्यवहार्याः, विकारजनकत्त्वाद्वकृतय इत्यन्वर्थसंज्ञा तासां, अतो मुमुक्षुणा ललनाङ्गप्रत्यङ्ग- G A ॥१०८॥ A wka. --- A 卐 S U फू A 卐 V ॥ A ध T 卐 M तस्य भक्तप्रत्याख्यानमनशनमिति ॥ ऊनमवममुदरं यस्य स ऊनोदरस्तस्य भाव अनोदर्यम् , तच्च चतुर्दा-अल्पाहारनोदर्यम् , उपाधौनोदर्यम् , अधौनोदर्यम् , प्रमाणप्राप्तात् किञ्चिदूननोदर्यम् च, तत्र पुंसामाहारः द्वात्रिंशत्कवलप्रमाणः, कवलश्चेत्कृष्टापकृष्ट वर्जयित्वा मध्यम इह गृह्यते, 卐 स चाऽवकृतस्वखविवरप्रमाणः । तत्र कवलाऽष्टकाऽभ्यवहारेऽल्पाहारनोदर्य्यम् , अर्धस्य सम्पमुपार्ध द्वादशकवलाः, यतः कवलचतुष्टयप्रक्षेपात् सम्पूर्णमधं भवति, ततो द्वादशकवला उपाधौनोदर्यम् , पोडशकवला अधौनोदर्यम् , प्रमाणप्राप्त आहारो के द्वात्रंशत्कवलाः स चैकादिकवलैरूनश्चतुर्विंशतिकवलान् यावत् प्रमाणप्राप्तात् किञ्चिदूननेदर्यम् , चतुर्दिधेऽप्यस्मिन् एकैकक- A वलहान्न बहू स्थानान जायन्ते, सर्वाणि चारन्यनोदय॑विशेषाः। ये पतस्त्वष्टाविंशतकवलाहारप्रमाणम् , यदाह;- 卐 बरसं खलु कवला आहारे कुच्छपूर) भणिओ। पुरिसस्स महलआए अट्ठासं भने कवला' ॥१॥ तस्या अप पुरुषानुसारेण न्यूनाहारादिकं भावयम् ॥२॥ 卐 तथा वरे यया सा वृत्तिः-भैक्षं तस्याः संक्षेपः परिगणनं वा, आगमविहित ऽभिग्रह दत्तिप्रमुख भिक्षाणां परिगण- नमत्यर्थः, एतच्च दत्तपरमाणरूपं एकद्वेन्याद्यगारनियमो रथ्याग्रामार्धग्रामनियमच, द्रव्यक्षेत्रकालभावाभिग्रहाणाम- वान्तभवः ॥३॥ तथा रस्यन्तै स्वाद्यन्तेऽतिशय्नेत रसाः, रेषां त्यागे रसत्यागः, अथवा रसानां मटुप्लोपाद् विशेष्टरसवतां घृष्याणां विकारहेतूनां एव विकृतिशब्दवाच्यानां मद्यमांसमधुनवरतानां दुग्धदधिघृतलगडावगाडादनां च त्यागे वर्जन ॥ - . N 卐 T G A V L - 卐 A y A N S 卐 U 卐 बनवतत्त्व- A एमाला- र्टकायां- v 卐 ।१०७। A निर्जरातन्दै बाह्यतपे- भेदाः। है A T अथ प्रतिज्ञातद्वादशविधतपलक्षणां निर्जरां विधानतो वक्तुकामसूत्रकारः प्रथमं बाह्यतपोभेदानाचष्टेः- अणसणमूणेयरिअ, वित्तिसंख्वणं रसचाओ। कायकिलेसो संल-णय य बज्झो तवो होई॥३५॥ टीका:-'अणसण' इत्यादि, अनशनं ऊनोदरिका वृत्तिसंक्षेपो रसत्यागः कायक्लेशः संलनता चेत्येताः षड् वाह्यतपो- दा भवन्तीत्यर्थः । अथ प्रत्येक व्याख्यायते-अशनमाहारस्तत्परित्यागोऽनशनम् , तद् द्विधा इत्त्वरं यावई विकं च । इत्त्वरं नमस्कारसहितादि श्रीमन्महावरतीर्थे षण्मासपर्यन्तम् , नाभेयतीर्थे तु संवत्सरपर्यन्तम् , मध्यद्वाविंशतितीर्थकर र्थेषु त्वष्ट मासान् यावत् । यावर्ड विकं तु पादपोपगमनेङ्गिन भक्तप्रत्याख्यान दात् त्रिविधम् । तत्र पादपोगमनं द्विधा-सव्या- घातमन्याघातं च, तत्र सतेऽप्यायुपः समुपजातव्याधिविधुरेणोत्पन्नमहावेदनेन वा देहना यदुत्क्रान्तिः क्रियते तत् सव्या- घातम् नाघातं प्रव्रज्या शिक्षापदादक्रमेण जराजर्जरितविग्रहः करोति यदुपहितचतुर्विधाऽऽहारप्रत्याख्यानो निर्जन्तुकं स्थण्डिलमाश्रित्य पादप इवैन पार्श्वेन नपत्याऽपरिस्पन्दस्तावदास्ते प्रशस्तध्यानव्यापृतान्तःकरणो यावदुत्क्रान्ताः प्राणाः, तदेतत् पादपंगमनाऽऽख्यं द्विविधमनशनम् । इङ्गिर श्रुतविहितक्रियाविशेषस्तद्विशिष्टं मरण मङ्गिनमरणम् , अयं हि प्रवज्यादि- प्रतिपत्तिक्रमेणैवासुपः परहाणमवगम्य आत्तनिपकरणः स्थावरजङ्गामविवर्जेतस्थण्डिलशार एकार्क कृतचतुम्धिाहार- उष्णं उष्णाच्छायां सङ्क्रामन् सचेष्टः सम्यग्ज्ञानपरायणः प्राणान् जहाति, एतदेगिन् मरणमपरिकर्म- पूर्वकं भवति । यस्तु गच्छमध्यवर्ती समाश्रितमृदुसंस्तारकः समुत्सृष्टशररेपकरणममत्त्व स्वविधं चतुधं वाऽऽहार प्रत्याख्याय स्वयम्वोद्ग्रा हतनमस्कारः सम्पवर्तसाधुदत्तनमस्कारे उद्वर्त्तनपरिवर्तनादिकुर्वाणः समाधिना कालं करत, N 卐 A 卐 卐 G 卐 A 贸 L T प्रत्याख्य: V ॥१०७॥ A 卐卐 卐 S V . A 卐 N y 卐 कथं द्विधा परिपाकः ? यत उक्तरीत्या समानकालवद्धानां समस्थितिरसानां कर्माणूनामपि द्वधा परिपाकवत्त्वं समाप्नोति U तत्कथं ? , सत्यं, यद्यपि बन्धसादृश्यं तथाप विषाकभेदे न चरोधः, यथा वृक्षैकशाखानिष्पन्नानां फलानं द्विधा पाको 卐 दृष्टः, पलालच्छन्नानां फलानां यथा घपाकत्त्वं न तथा वृक्षस्थानां दृश्यते, एवं सङ्कमोद्वर्तनापवर्त्तनोदीरणादिकरणसाध्यानां M कर्मपरमाणूनां द्विविधे पाके न विरोध इति । 卐 卐 अथ गाथापदानि वित्रियन्ते,-'वारसविहं तवो निजरा' इत्यादि, द्वादशविधं तपो निर्जरा, वक्ष्यमाणपट्पड्भेदभिन्नवा- ह्याऽभ्यन्तरतपसा निजरा भवतीत्यर्थः । ननु 'चउदस चउदस' इति गाथायां निर्जरा द्वादशभेदभिन्नोक्ता, अत्र या द्वादश- 卐 भेदसंख्या सा तपसो न तु निर्जरायाः, अस्तु सकामाऽकामभेदाभ्यां पूर्वोक्तप्रकारेण द्विविधत्त्वं तस्याः, कथं द्वादशविधावच्छि- नत्वं ?, उच्यते; यद्यपि द्वादशभेदास्तु तपसस्तथाऽपि निखिलास्ते तपोभेदाः (सकाम) निर्जरायां हेतुत्त्वेन भवन्ति, अतः ज कारणे कार्यारोपाद् ये तपोभेदास्त एव निर्जरायाः, नाव काचिद्विप्रतिपत्तिः, घृतमायुरित्यादि दर्शनात् । अथ 'वारसविहं ' इति प्रकृतगाथाऽनन्तरं 'अणसणमूणोअरिया' 'पायच्छित्तं विणओ' इति गाथाद्वयं व्याख्याय - T वक्ष्यमाणवन्धतत्त्वसम्बन्धं प्रदर्शयितुं प्रस्तुतगाथायां निर्जरालक्षणेन साकमेव बन्धतत्त्वमपि विधानतः सूत्रकारः प्रतिपाद- यति, तच्चैवम् :-'वन्धो चउविगप्पो य, पयडिठिइ अणुभागो पएसमेएहिं नायब्वो' इति, बन्धो वक्ष्यमाणस्वरूपश्चतु कल्पः 卐 प्रकृति-स्थित्यनुभाग-प्रदेशभैदैश्चतुःप्रकार इत्यर्थः । किंस्वरूपो बन्धः, कंलक्षणाश्च तस्य प्रकृतिवन्धादिभेदा इत्यादि । निखिलमग्रे वक्ष्याम इति ॥ 卐 T - A yz卐o卐卐-ध - A -- S A N 卐 U 卐 A M V A 卐 A 卐 T N दाप्त पदेशाचेत्यादिवक्ष्यमाणर त्या नवानामप्यत्यगद्वाराणां व्याख्यानं कर्त्तव्यमिति मदुमास्वातिवाचकवरेण्यैरपि तत्त्वा- र्थसूत्रे तद्भाष्ये चैवं न्यगादि-'सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुदैश्च' (१-८) सत्, संख्या, क्षेत्रं, स्पर्शनं, कालः, अन्तरं, भावः, अल्पबहुत्त्वमित्येतै सद्भूतप्ररूपणादिभिरष्टा भरनुयोगद्वारैः सर्वभावानां विकल्पशो विस्तराधिगम भवति । कथमिति चेदुच्यते-सत् , सम्यग्दर्शनं किमस्ति नास्ति ? अस्टीत्यु- 卐 च्यते । क्वास्टीति चेत् , उच्यते-अवे तावन्नास्ति, जी बेषु तु भाज्यम् । तद्यथा-गरीन्द्रियकाययोग- कषायवेदलेश्यासम्यक्त्वज्ञानदर्शनचारित्राहारे पयोगेषु त्रयोदशस्वनुयोगद्वारेषु यथासम्भवं सद्भूतप्ररू- कर्तव्येति (त० भाष्यम् . अ. १. सू०८)। एवं मैक्षविषया प्ररूपणा नव भरनुयोगद्वारैः कर्त्तव्ये ।।४३ अथ प्रत्येकमनुयोगद्वारमधिकृत्य मेक्षतत्त्वं वियरे- 卐 सुद्धपरत्ता, वजंतं खकुसुम जंतं खकुसुम न असंतं मुक्खत्ति परं तस्स उ, परूण गणाईहिं। ४४ टीका;-'संत' इति, अ त सन् तस्य भावः सत्ता, कस्य ? मोक्षपदवाच्यस्य, कस्मात् ? शुद्धपदत्त्वात् मक्षस्टे ति, शुद्ध तत्पदं शुद्धपदं तस्य भावः तस्मादसंयुक्तपदत्वादसमस्तपदचादित्यर्थः । इदमत्र हृदयं-इह याने घटपटादीनि शुद्धपदान A तत्तत्पदवाच्यान्यप्यवश्यं भवन्ति, यथा पृथुबुध्नाकृतिर्जलधारणादिक्रियासमर्थः द्रव्यविशेषे घटपदवाच्यः, एवमन्येष्वपि । १ तत्त्वार्थे यदष्टानुयोगद्वाराणि तत्र भागद्वारस्य संख्यायामन्तर्भावो विज्ञायते । 卐 卐 A G T L V । ॐ A २५ A 卐 तत्व- 2卐द卐 卐C卐८ मक्षतते V 卐 A 卐 T 卐 A शुद्धपदेषु वेज्ञेयम् । यान चाऽन्यपदसंयोगात्समस्तपदान खपुष्पशशविपाणवन्ध्यापुत्रराजपुरुषप्रमुखानि तत्तत्पदवाच्यान विकल्पेन भवन्ति । समस्तपदेषु खपदवाच्यमवगाहप्रदस्वभावमाकाशं वर्तते, पुष्पपदवाच्यं च सुगन्धरणमयं कुसुमं भवति, परं खस्य पुष्पस्य च यदा राजपुरुषा दिवल्लक्षणया समास विध्यरे तदा खपुष्प मितिपदस्य वाच्याऽभावः न च खपुष्पमित्यखण्डपदस्याऽवयवभूतयोः खपुष्पयोर्वाच्यसद्भावेऽवय वनः खपुष्पमितपदस्याऽपि वाच्येन भवितव्यमित शङ्कन्यम् , यते ' राजपुरुष' इत्याद्यखण्डपदेषु राजवैशष्टः पुरुष इत राजपदस्य पुरुषपदे विशेषणात्मकलक्षणया सम्यगर्थसङ्गतर्भवति, परं खपुष्पमत्यादिपदेषु खे जातं पुष्पं खस्य पुष्पं वेत चाहे विशेषणात्मकलक्षणाया अभावादर्थसाङ्गत्याभावः । न चाऽवयविनोऽर्थसङ्गत्रभावादवयवभूतयोः खपुष्पयोरप नार्थसङ्गतिरत वाच्यम् यतोऽवयवभूतयोर पे खपुष्पयोः 'राजन् ङस् पुरुष इत्याचल कक विग्रहवाक्यवत् ङस् पुष्प' ' इत्यत्र 'सुपे घाटप्रातिपदिकयः' (पा० अ० २, पा० ४, सू० ७१.) इत सूत्रेण सत्यपि लुकि पदसंज्ञा स्थानिवद्भावो भवत्येव, अन्यथा ' राजपुरुषः' इत्याद ‘नलेपः प्रतिपदिकान्तस्य' इत्यन्न नलोपो न स्यात्, अत्र तु समासापेक्षया पदले सत्यपि लक्षणाया अभावाद्वाच्याऽभाव इत। तस्मादवयविने वाच्याऽभाटेऽपि पुष्पयोरवयवभूतयः पृथक् पृथक् पदसंज्ञायाः सद्भावात् तत्पदवाच्यसद्भावे न काचद्विप्रतिपत्तिः एवं शशविषाणवन्ध्यापुत्रप्रभृतिशब्देष्वपि वेडेयम् । राज- पुरुषाचार्य शष्यादिषु शब्देषु समासस्य सद्भाऽपि पूर्वोक्तप्रकारेणार्थसङ्गटेस्सद्भावात् तत्तत्पदवाच्यान्यपि भवन्त समस्तपदेषु विकल्पेन वाच्यसद्भावः । अमेवाऽर्थ सूत्रकारमहर्षिर्गाथायां प्रदर्शयति-' मुक्खत्त पयं' इत, मोक्ष इति पदं सत्पद । द्वारम् 卐 A 卐 N 卐 G 卐 A 卐 L 卐 ॥१४५ A' T V A 卐 lame.

S N au U. A 3 卐 卐 A 卐 शुद्धपदत्वात् वाच्यवद्विद्यते, परं 'खकुसुमद्य न असंत' खपुष्पमिव न वाच्याऽभाववादित। एवं मक्षपदवाच्यस्य सत्तानिश्चरे जारे शिष्यः प्रश्नयति यदे मेक्षपदवाच्यस्य पूर्वोक्तप्रकारेण सत्ता प्रर्त यरे तर्हे सत्तासद्भावः १ उच्यते-' तस्स उ परूवणा मग्गणाईहें ' गत्यादिमार्गणाद्वारेण तस्य मेक्षस्य प्ररूपणा कर्तव्येति ॥४४॥ एतदेव प्रदर्शनार्थ मार्गणा वक्तुं प्रक्रमते- गइइंदेरे कए, जोए देए सयनणे २ । संजम्दस्णलेस, भवस्म्स स्न्न हरे ४५ टीका;-गम्यते तथाविधकर्म सचिवैः प्राप्यत इति गति रकत्वादिपर्ययपरिणतः इन्दनादिन्द्र आत्मा ज्ञानेश्वर्य- योगात् तस्येदमिन्द्रियं । तते गतिश्चेन्द्रियं चाऽनयोस्समाहारः गरीन्द्रयं तस्मिन् गरे न्द्रटे, एवमन्यत्राऽपि यथायगं समाहारद्वन्द्वः कार्यः 'चः' समुच्चरे रेयरे यथाय गमदारका दमार्गणागफ्रुपचयं यत इति कायः। युज्यते धावनवल्गनादचेष्टास्वात्मान्ते येगः । देद्योऽनुभूयते इन्द्रयेद्भुतं सुखमरेत न्दः। कष्यन्ते हेस्यन्रे परस्परमस्मिन् प्राणिन इत कपः संसारः, कपमयन्रे गच्छन्त्ये भर्जन्तव इत कपायाः, यद्वा कपस्याये लाभे रेभ्यस्ते कषायाः ज्ञप्तिान, यद्वा ज्ञायते परिच्छिद्यरे वस्त्वनेनेति ज्ञानं समान्यविशेषात्मने वस्तुनि शेषग्रहणात्मके वेध इत्यर्थः । संयमनं सम्यरुपरमणं सावधय गादिति संयमः, यद्वा संयम्यरे नियम्यत आत्मा पापव्यापारसंभारादनेरेति संयमः, यदि चा शेभना यमाः प्राणातपातानृतभाषणादत्तादानाब्रह्मपरिग्रहन्दिरमणलक्षणा अस्मिन्निति संयमश्चारित्रर । दृश्यते विलक्यरे वस्त्वनेने त दर्शनं, यद्वा दृष्टिदशनं सामान्य विशेषात्मले वस्तुनि सामान्यात्मक वेध इत्यर्थः लिश्यरे श्लश्यरे कर्मणा T ज A A T L V म A A म पत N है S 卐 A ) V 卐 यावत् । मक्षत गत्यादि- मार्गणाः A 卐 A T नवतत्व सहात्माऽनयेति लेश्या । भवति परमपदयोग्यतामासादयत ति भव्यः सिद्धिगमनयोग्यः । 'सम्म त्ति' सम्यक्शब्दः सुमाला प्रशंसार्थोऽविरुद्धार्थे वा सम्यग्ज वस्तद्भावः सम्यक्त्वं प्रशस्तो मोक्षाऽविरोध वा प्रशमसंवेगादलक्षण आत्मधर्म इति टीकायां- यदाहुः भद्रवाहुस्वामिपादाः-'सेय सम्मत्ते पसत्त्थसंमत्तमोहप यकम्माणुवेयणोवसमखयसमुत्स्थ पसम- संवेगाइलिंगे सुहे आयपरिणामे ।' इत्यादि । संज्ञानं संज्ञा भूतभवद्भावभावस्वभावपर्यालोचनं सा वद्यते येषां ते संज्ञिनः, ॥१४६॥ विशेष्टस्मरणादिरूपमनोविज्ञानस हरेन्द्रयपञ्चकसमन्विता इत्यर्थः । ओजआहारलोमाहारकवलाहाराणामन्यतममाहारमाहा- रयत त्याहारकः, ओजआहारार्दनां लक्षण मदं-" सर रेणोयाहारो, तयाइ फासेण लेम आहारो। परकेवाहारो पुण कावलिओ होइ नायब्बो ॥१॥ इति मूलभूताने चतुर्दशमार्गणास्थानानि ॥ ध इदान मेतेपामेव मूलमार्गणास्थानानामुत्तरभेदा भाव्यन्ते-तत्र सुरनरतर्यङ्नरकगतिभेदैर्गतश्चतुर्धा । तत्र सुष्टु राजन्ते इति यदि वा सुष्टु राजन्त ददति प्रणतान प्सितार्थ लवणाधिपसुस्थित इव लवणजलध मार्ग जनार्दनस्येति सुराः, यद्वा 'सुर' ऐश्वर्यदीप्त्योः ' सुरन्त विशष्टमैश्वर्यमभवन्ति दिव्याभरणसंभारसमृद्ध्या सहजनिजशरीरकान्त्या च दप्यन्त इति सुराः, सुरेषु विषये गतिः सुरगतिः१ । नृणन्त विवेकमासाद्य नयधर्मपरा भवन्तीति नरा मनुष्यास्तेषु विपो गतिर्नरगतिः २ । 'तर 卐 प्राकृतत्त्वात्तिरोऽञ्चन्ति गच्छन्ति तिर्यश्चः, व्युत्पत्तिनिमित्तश्चैतत् , प्रवृचिनिमित्तं तु तिर्यग्गतिनाम, एते चैकेन्द्रियादयः, v ततस्तर्यक्षु विषये गति स्तर्यग्गतिः ३ । नराउपलक्षणत्वात्तिरथोऽपि प्रभूतपापकारिणः कायन्दैवाहयन्ट वेति नरका नरका- 5. वासास्तत्रोत्पन्ना जन्तवोऽपि नरकाः, तेषु वेषये गतिर्नरकगतिः ४ एलेन्द्रियद्वीन्द्रिय न्द्रयचतुरेन्द्रयपञ्चेन्द्रियम्दै- N A 卐 G T ॐ L A ।१४६ A 卐 卐 पत U 卐 A V ध A 卐 卐 रेन्द्रियमार्गणा पञ्चविधेति । पृथ्ट कायाप्कायतेजस्कायवायुकायवनस्पतिकायत्रसकायदात्कायमार्गणा पड्विधा । योगमार्गणा त्रिविधा, तथाहि-मनयोगः, वचनयोगः, तडयोगः। तत्र तनुयोगेन मनःप्रायोग्यवर्गणाभ्यो गृहीचा मनेयोगेन मनस्त्वेन परिणतानि वस्तुचिन्ताप्रवर्चका न द्रव्याणि मन इत्युच्यन्ते, तेन मनसा सहकारीकारणभूतेन येगो मनोयगः, मनोविपयो यो योगो मनोयोगः । उच्यत इति वचनं भाषापरिणामापन्नपुद्गलद्रव्यसमूह इत्यर्थः, तेन वचनेन सहकारिकारण- 卐 A भूतेन योगो वचनयोगः, वचनविषयो वा योगो वचनयोगः । तनोति विस्तारयत्यात्मप्रदेशानस्यामित तनुरदारिकादिशरैरं, तया सहकारीकारणभूतया योगस्तनुयोगः तनुविपयो वा योगस्तनुयोग इति । वेदमार्गणा पुत्रनपुंसक दैखिविधा, तत्र T पुंसः स्त्रियं प्रत्यभिलाषः पुंवेदः, स्त्रियः पुरुष प्रत्यभिलापः सीवेदः, नपुंसकस्य हे पुरुष प्रत्यभिलापो नपुंसकवेद इत। कषाय- मार्गणा चतुर्भेद भन्ना, तथाह-क्रोधोऽप्रीतिलक्षणः, मानो नम्रताऽभावस्वभावः, माया आर्जवराहित्यात्मिका, लोभस्संतोषाऽ- भावस्वरूपः। ज्ञानमार्गणा पञ्चज्ञानव्यज्ञान विधानेनाष्टविधा-तत्र पञ्चज्ञानस्वरूपं पापतत्त्वे किञ्चित्प्रतिपादितम् , तक्तान 卐 मतश्रुतावधिज्ञानान्येव मिथ्यात्त्वपङ्ककलुषिततया यथाक्रमं मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभंगज्ञानव्यपदेशभांजि भवन्ति । उक्त च-'आयत्रयमज्ञानमपि भवति मिथ्यात्वसंयुक्तमिति। विपरेतो भंगः परिच्छित्तप्रकारो यस्मिंस्तद्विभङ्गः, विपर्यस्तमवधिज्ञानं 卐 विभङ्गज्ञानरच्यत इत्यर्थः। एतेऽष्टाव प ज्ञानाऽज्ञानानि साकाराणि । तथाहि-सामान्यविशेषात्मकं हि सकलं ज्ञेयं वस्तु, कथमिति v चेदुच्यते, दूरादेव हि शालतमालतालवकुलाशोकचंपककदंबजंबुर्निवादिविशिष्टव्यक्तरूपतयानवधारितं तरुनिकरमवलोकयतः सामान्येन वृक्षमात्रप्रतिजनकं यदपरिस्फुटं कमपि रूपं चकास्ति तत्सामान्यरूपमनाकारं दर्शनमुच्यते, 'निशेपे विशे- A 卐 G 卐 A T ध L 卐 A 卐 A पत N S ॥ भनवतत्त्व- 卐 U सुमाला- र्टकायां- 卐 V मक्षतते गत्यादि- मारणाः 卐 ॥१४७॥ ॥ A 卐 T पाणां ग्रहो दर्शनमुच्यते' इति वचनप्रामाण्यात् । यत्पुनस्तस्यैव नकटीभूतस्य तालतमालशालदिव्यक्तिरूपतयावधारित तमेव मह रुहसमूहमुत्पश्यतो विशिष्टव्यक्तिप्रती तिजनक परिस्फुट रूपमामा ति तद्वशेषरूपं साकारं ज्ञानमप्रमेयप्रभावपरमेश्वर- प्रवचनपणचेतस्काः प्रतेपादयन्ति, सह वैशिष्टाकारेण वर्तत इति कृत्वा । वक्ष्यमाणानि चक्षुरादिदर्शनाने विशिष्टाकार- प्रतेत्यभावादनाकाराणि, तदेवं प्रतिप्राणि प्रसिद्धप्रमाणाबाधितप्रती तिवशात् सर्वमपि वस्तुजातं सामान्य विशेषरूपद्वयात्मकं भावन यमिति । इदानीं संयममार्गणा, सा च सामायिकछेदोपरथाप्यपरिहार विशुद्धिकसूक्ष्मसम्पराययथाख्यातदेशविरत्यविरति- प्रकारैस्सप्तधा, तत्र सामायिकादि यथाख्यातान्तं चारित्रं संवरतत्वे सम्यग्भावितं । देशविरत्यविरत चाधुना भाव्यते-देशे संकल्पतो नरपराधत्रसवधविषये चरतविरमण यस्यां सा देशविरतः, तद्वान् देशविरतः, स च सम्यद्गर्शनयुत एकाएव्रतदिधार । गुव्रतधारी तावद्वाच्यो यावच्चरमऽनुमतिमात्र परिपूर्णद्वादशव्रतधार प्रत्याख्यातसकलसावद्यकर्मा केवलममतिमात्रप्रति- स्वकः । अनुमतिर प त्रेधा-प्रतिसेवनामतः प्रतिश्रवणामतः संवासाउमतिश्च । तत्र यः स्वयं परैर्वा कृतं पापं श्लाघते सावद्यारम्भनिष्पादितं वाऽशनायुपभुङ्क्ते तस्य प्रतिसेवनामुमतिः। यदा तु पुत्रादिभिः कृतं पापं श्रुणोते श्रुत्वा चाऽनुमन्यरे न च प्रतिषेध ते तदा प्रतिश्रवणानुमतिः। यदा तु सावद्यारम्भप्रवृत्तेपु पुत्रादिपु लेवलं ममचमात्रयुक्तो भवति नान्यत् । नत्प्र- तिश्रुणोते श्लाघते वा तदा संवासानुमतः। तत्र यः संवासानुमतिमात्रमेव सेवते स चरमो देशविरतः, स च सर्वश्रावकाण मध्ये गुणोत्तमः । यस्तु संवासानुमतेर प वरतो भवति स यतिरित्युच्यत इति। न विद्यते विरतिः पूर्वेक्ता देशसर्वभेदभन्ना यस्य सोऽविरतिस्तद्गतस्संयमोऽप्यविरतिसंयम इति सप्तधा संयममार्गणा ॥ अथ दर्शनमार्गणा, सा च चतुर्वधा पूर्वव्याख्यातचक्षुदर्श- 卐 A 卐 N A G 卐 T A 卐 V 卐 L ॥१४७ se A 卐 A 卐 N 卐त A ..... V A 卐 A 卐 T 卐 N नाञ्चक्षुर्दर्शनाऽवधिदर्शनलेवलदर्शनम्दैः लेश्या मार्गणा कृष्णनीलकापततेज पद्मशुक्लम्दैः षड्विधा,षड्वधत्त्वं चासां जम्बूफल- भक्षकग्रामलुण्टकष्टपुरुषदृष्टान्ताभ्य भावितम्। भव्योहुक्तगमनाऽर्हः, इतरोऽभव्यः कदाचनाऽपि सेद्धगमनाऽनहः,तयर्मार्गणा भव्यमार्गणा । सम्यक्त्वमार्गणा षड्वधा अपशमिकक्षाय पश मिकक्षायक मिश्रसास्वादन मिथ्यात्वप्रकारैः । तत्स्वरूपं चेद- सम्यक्त्वं दर्शनमहर्न यस्य सर्वोपशमनेन देश पशमनपर्यायक्षय पशम्न क्षरेण च पशमिकक्षाये पशमिकक्षाथिकसंझंक्रमण || सञ्जायते । इह सर्वोपशमना मेहस्यैव, शेषाणां ' देशोपशमना भवति । तत्र गराऽपारसंसारसागरमध्यमध्यास ने जन्तु मथ्यात्प्रत्ययमनन्तान् पुद्गलपरावर्तान् यावदनन्तदुः लक्षाण्यभूय कथमपि तथा भव्यत्त्वपरिपाकवशतो गिरिसरदु- 卐 पलघोलनाकल्प्नाऽनाभोग्न पञ्चेन्द्रियत्त्वसंज्ञित्वलब्धिपर्याप्तत्त्वरूपेण दयिकभाववर्तलब्धित्रिलेण युक्तः, पूर्वमपि करणकालाद् अन्तर हूर्त कालं यावत्प्रति मयमनन्तगुणवृद्ध वशुद्ध्या व ध्यम । ग्रन्थिकसत्वानामभव्यसिद्धिकानां शोधिमतिक्रम्य y वर्तमानः, तथा साकारोपयोगे विशुद्धलेश्यायां च वर्तमानः, तथाऽऽयुर्वर्जानां स नां कर्मणां स्थितिमन्तःसागरेपमकटा- कोटप्रमाणां कृत्त्वाऽ भानां कर्मणामनुभागं चतु:स्थानकं सन्तं द्विस्थानकं कुर्वन् भानां च कर्मणां द्वस्थानकं सन्तमनुभागं 卐 चतुःस्थानकं कुर्वाणः, तथा बध्यमानप्रक"नां स्थितिमन्तःसागरोपमकोटाके टेप्रमाणामेव बध्नन्नाधिका, तथा स्थतिबन्छे पूणे सत्यन्यं स्थितिबन्धं प्राक्तनस्थितिबन्धापेक्षया पल्योपमसङ्ख्येयभागन्यूनं कुर्वन् तसिन्नपि पूर्णे सत्यन्यं स्थितिबन्धं 3 पल्योपमसंख्टेयभागन्यूनं कुर्डन् , एवमन्यमन्यं स्थितिवन्धं पूर्वापेक्षया पल्योपमसंख्येयभागन्यूनं कुर्वन् , अशुभानां च प्रकृरीनां वध्यमानानामनुभागं द्विस्थानकं बध्नस्तमपि तिसमयमनन्तगुणहीनं शुभानां च चतुःस्थानकं बघ्नस्तमपि प्रति- 卐 G A T 卐 V L 3 A A an S V 卐 मक्षतत्वे समयक्त्व- मार्गणाः । म समयमनन्तगुणवृद्ध, करणकालात्पूर्वमन्तर्मुहूर्त याबददृशे तकर्तव्यताव्यापृतो भूचा परिणामविशेपलक्षणं यथाप्रवृत्तं करोति, नवतत्त्व- ततोऽपूर्वकरण, ततोऽप्यनिवृत्तिकरणं, एतानि च त्रीण्यपि करणाने प्रत्येकमान्तमाहूर्त्तकानि, करणत्रयकालोऽप्यन्तर्मुहूर्तप्रमाण सुमङ्गला- धन एव, एतत्करणत्रयनिष्पादनक्रमादनन्तरं चतुर्थीमुपशान्ताद्धां लभते साऽपि चान्तौहूतिर्क द्रष्टव्या। यथाप्रवृत्तापूर्वकरणयोर- ई कायां- ध्यवसाय स्थानानि प्रतिसमयं नानाजीवाना श्रत्यासंख्येयलोकाकाशप्रदेशप्रमाणान, समये समयेऽनन्तगुणविशुद्ध्या करणसमाप्ति ॥१४८॥ ॐ यावत् प्रवर्धमानानि, अपि च यथाप्रवृत्तकरणप्रथमसमये नानाजवाऽपेक्षया यान्यसंख्येयलोकाकाशप्रदेशतुल्यान्यध्यवसाय- स्थानानि तदपेक्षया द्वरी यसमरे विशेषाधिकानि, ततोऽपि तृत यसमये विशेषाधिकान, एवं यथाप्रवृत्तचरमसमयं याव- 5 द्वाच्यम् । एवमेवाऽपूर्वकरणेऽपि द्रष्टव्यम् । अमून च यथाप्रवृत्तापूर्वकरणसम्बन्धोन्यध्यवसायस्थानानि स्थाप्यमानान T विषमचतुरस्र क्षेत्रमास्तृणन्ति, तयोरुप निवृत्तिकरणाध्यवसायस्थानानि मुक्तावर्ल संस्थानानि स्थाप्याने उपर्युपरि चामन्यनुचिन्त्यमानानि अनन्तगुणवृद्ध्या वर्द्धमानान्यवगन्तव्यानि 'तर्यक् च षट्स्थानपतितानि । स्थापना चेयम् :- 卐 A 卐 N A 00 -: 卐 T 卐 G अन्त० एवमग्रेऽपि। अन्तमुहर्तम् नानि। संस्था- विषमसम० 000000000000 卐 V 卐 A अन्त० अन्तरकरणम् । A विषमसम० संस्थानानि । मुक्तावलीसंस्थानानि 卐 L १ यथाप्रवृतक०। २ अपूर्वकरणम् । ।१४८॥ ॐ ३ अनिवृत्तिकरणम्। ४ उपशान्ताद्धा। सास्वा० A y ध卐z 卐 M V 卐 A 卐 A अस्मिन् यथाप्रवृत्तकरणे स्थतिघातरसघातगुणश्रेणगुणसंक्रमा न प्रवर्तन्ते, लेवलमुक्तरूपा विशुद्धरेव प्रतिसमयमनन्तगुण- वृद्धिमती वर्त्तते, अत्र स्थितो यानि चाप्रशस्तान कर्माणि बध्नाति तेषामनुभागं द्विस्थानकं बध्नात, यानि च शुभान वध्नाति तेषामनुभाग चतुःस्थानकं । स्थितिवन्धेऽपि च पूर्णे पूर्णे सत्यन्यं स्थितिबन्धं पल्योपमसंख्येयभागहनं करोति, अस्य यथाप्रवृत्तस्य पूर्वप्रवृत्तमिति द्वितीयं नाम, शेपकरणाभ्यां पूर्व प्रवृत्तत्त्वात् । एतदवस्थां यावदनाभोगतोऽभव्या अप्यने- कशः पूर्वक्तर त्या कर्म स्थतिहासं कृत्वा आगच्छन्ति परमपूर्वकरणे जायमानस्थितिरसघातादिभिर्निविडां रागद्वेषग्रन्थि न भिन्दन्त, यतस्तेषां ग्रन्थिभेदयोग्याध्यवसायराहित्यं विद्यते, अत एव दर्शनमोहन्यस्य सर्वोपशमनाया अभावान्न पशमिक- सम्यक्त्वोपलम्भस्तेपाम् । तत्रैव च संख्टे यमसंख्येयं वा कालं यावत्तिष्ठन्ति, तत्र स्थितः कश्चिदभव्यः चक्रिप्रमुखैनैव्यमाण संयमगुणाभिरामं तपस्विनं महर्प दृष्ट्वा 'अहमर्प दृशं नेपथ्यं परिधायैतादृशं सन्मानं लभ्यम्' इत्यै हकसत्काराभिलापेप- पन्नो द्रव्यचारित्रं प्रतिपद्य प्रतिलेखनाऽऽवश्यकादिक्रयानुष्ठानं सम्यग् विधत्ते, द्रव्यचारित्रमहिम्ना च स्वायुषः समाप्तेनैवमं ग्रैवेयकं यावदुत्पद्यते, उक्तञ्च पञ्चाशकमहाशास्त्रे-'सबजयाणं जम्हा सुत्ते गेविजगेसु उववाओ। भणिओ जिणे, सो न य लैंगं मोत्तुं जओ भणियं ॥१॥ जे सणवावन्ना लंगग्गहणं करंत सामन्ने । रेसं पि य उववाओ उक्कोस जाव गेविजा ॥२॥' अपि च कश्चिदभव्याः श्रुतसामायिकलाभं समापन्नाः तत्रस्था एव नवमं पूर्व यावत् शब्दतोऽधयते श्रुतम् तथा चोक्तं-' तत्त्थंकराइपूअं दणण्णेण वाचे कजेण सुयसामाइयलाहो होज अभवस्स गठिम्म ॥१॥'' चउदस दस य अभिने नयमा सम्मं तु सेसए भयणा' इत्यादि । पूर्वलब्ध्यभावे तेपामभव्यानां श्रुतमपि द्रव्यश्रुतमिति ग्रन्थिदेशं N 卐 T . 卐 G 卐 A T , L 卐 V 卐 A 卐 N S संनवतत्त्व 卐 A V A T समापन्नाः केचन भव्या अपि रागादिरपुभिः पराजिताः सन्तस्ततः पुनः प्रतिनिवृत्त्योत्कृष्टस्थितिवन्धका भवन्ति, केचिदव- माला- स्थितपरिणामा अपूर्वकरणयोग्यविशुद्धयभावात् तत्रैवानियतकालं तिष्ठन्ति, येषाञ्चेत्कृष्टतोऽपार्धपुद्गलपरावर्चाद्धायां नियमेन टीकाय- मोक्षस्ते पूर्वोक्तनिखिल स्थतिलाघवादिक्रयाकलापसमापन्नास्तथाभव्यत्त्वपरिपाकवशतो वक्ष्यमाणाऽपूर्वकरणवर्तस्थितिधात- रसघातादि भरद्यावधि संसारचक्रेऽभिन्नपूर्वां रागद्वेपनि वडग्रन्थ भिवानिवृत्तावन्तर्मुहूर्त विश्रम्य पशमिकसम्यक्त्वलाभ- ॥१४९॥ ; मनुयते । त्रयः पुरुषा यथेष्टनगरं सम्प्राप्टकामा विवक्षितस्थलानिर्गता अध्वने श्वापदस्टेनदिव्याकुलाटर्व निवासैश्चरैलुं- ण्टितास्सन्तस्तेषां मध्यादेकस्त्रासभयात्पलायितः, अपरश्चरहस्ते पतितः, अन्यस्तु स्वभुजबलतिशयेन लुण्टाकान्निर्जित्येष्टनगरं प्राप्तः, तथाऽत्रापि द्रष्टान्तोपनयेनावगन्तव्यमिति । अपि च मलातिशयक्लिन्नवासस क व घृतविन्द्वादिजन्यमालिन्यं तव- 'शः क्षारादिसाम योगतः प्रक्षालनप्रयासमृते यथा नविचति तथा पूर्वक्तलक्षणां यथाप्रवृत्तकरणयोग्यां विशुद्धमृरे यथोक्तग्रन्थिस्थानस्याऽपि न प्रादुर्भावः, कुतस्तावत्तद्भेदकथा ? इति । अथापूर्वकरणम्-अपूर्वान्यभिनवाने करणानि परणा- 卐 मान स्थितिघातरसघातणगुरेणिस्थितिवन्धादनां नवर्त्तकानि यस्मिस्तदपूर्वकरणमिति गुण निष्पन्नवचनम् । अत्राप्ययमाशयः- अत्र हे स्थतिघाते रसघातो गुणश्रेणिः स्थितिबन्धाद्धेत्येताश्चतस्रः क्रयास्समकमेव प्रवर्तन्ते । 'स्थतिघातो नाम-स्थिति- 卐 सत्कर्मणोऽग्रिमभागादुत्कर्षत उदधिपृथक्त्वं-प्रभूतशतसागरोपमशतप्रमाणं जघन्येन च पल्योपमसंख्येयभागमात्रं स्थिति- कण्डकमुत्करत, उत्कर्य च याः स्थिरी रधो न खण्डयति तत्र तद्दलकं प्रक्षपति, अन्तर्मुहूर्तेन च कालेन तत्स्थिति- कण्डकमुर्कयते । उक्तञ्च-" उक्कोसेण बहुसागराणि इयरेण पल्लसंखंसं । 'ठइअग्गाउ घायइ अंतमुहुत्तेण ठेइकंडं ॥१॥" ज मोक्षतत्त्दै सम्यक्त्व- 卐 | स्वरूप 卐 A 卐 N 卐 G 卐 A 卐 L ॥१४९॥ T - V A A ज S ध N 卐 卐 A म -- V A A ततः पुनरप्यधस्तात्पल्योपमसंख्येयभागमात्र स्थतिकण्डकमन्तर्मुहूर्तेन कालेनोत्करत प्रारक्तरेत्यैव च नक्षिपत, एवमपू- करणाद्वायां प्रभूतानि स्थितिखण्डसहस्राणि व्यतिक्रामन्ति, इत्त्थञ्चापूर्वकरणस्याद्यसमरे यत् स्थतिसत्कर्माऽऽत्तत्तस्यै- वाऽन्त्यसमये संख्येयगुणर्हनं जातं, स एव स्थितिघातः । अथ रसधातः- स्थितघातार्थमुत्करतो जघन्य उत्कृष्ट यः स्थितिखण्डस्तन्मध्यवर्तदलिकगतानुभागसत्कर्मणामनन्ततमं भागं मुक्त्वा शेषाननन्तान् भागानडभागस्याऽन्तमुहूर्तेन कालेन नःशेषानपि वनाशयति, ततो भूयेऽपि तस्य मुक्तस्याऽनन्ततमस्य भागस्यानन्ततमं भ मुक्त्वा शेषानडभागभागा- नन्तर्मुहूर्तेन कालेन नाशयति, एवमरकान्यउभागखण्डसहस्राण्टेकस्मिन् स्थितिखण्डे व्यतिक्रामन्त, एवं प्रतिस्थतिखण्डं बेहेयं, एतादृशैः सहस्रैः स्थतिखण्डैरपूर्वकरणं परसमापयति । अधुना गुणरेणिः-यत् स्थतिकण्डकं घातयते तन्म- ध्याद्दलिकाने गृहीचोदयसमयादारभ्याऽन्तर्मुहूर्त्तचरमसमयं यावत्प्रतिसमयमसंख्टेयरणनया निक्षपति, एष प्रथमसमयगृ- हतदलिकनिक्षेपविधिः, एवमेव द्विरयादिसमयगृह तानामपि दलकानां नक्षेपविधिद्रष्टव्यः । के च गुणश्रेणिरचनाय प्रथमसमयादारभ्य गुणश्रेणिचरमसमयं यावद् गृह्यमाणं दलकं यथेत्तरमसंख्येयगुणं द्रष्टव्यम् इहाऽन्तर्मुहूर्तप्र हूर्तप्रमाणे नेक्षेपकालो दलरचनाहरूपगुणश्रेणिकालश्चापूर्वकरणानिवृत्तिकरणाद्धाद्विकात् किञ्चिदधिक द्रष्टव्यः, तावत्कालमध्ये चाऽध- स्तनाऽधस्तने दयक्षणे वेदनतः ६णे शेषक्षणेषु दलकं रचयति, न पुनरुपरि गुणणं वर्धयति । अथ स्थितिबन्धाद्धा भण्यते-अपूर्वकरणस्य प्रथमसमरे यः स्थतिवन्धस्तदपेक्षया द्वटरे समरे पल्योपमसंख्टेयभागहनो भवति, एवमग्रेऽपि भावन्यम् । स्थतिघातस्थितिबन्धयेश्वं सुगपदेवारब्धयर्युगपदेव परनिष्ठा भवति, तथा च स्थितिबन्धाद्धा कालतः 卐 N 卐 T G A y T 卐 L V A A पक्ष S 卐 मक्षत टकायां- v 卐 सम्यक्त्व- स्वरूपम् । A 卐 A T भनवतत्त्व संख्यया च स्थि तेघाततुल्या प्रवर्त्तते । सुमङ्गला- 卐 अथाऽ निवृत्तकरणम्-यथाऽपूर्वकरणप्रथमसमयादारभ्य स्थतिघातादयो युगपत्प्रवर्त्तमाना उक्ताः, एवमनिवृत्तिकरणेऽपि वक्तव्यम् । इदं च पुनरस्मिन् करणे वैशिष्ट्यम्-अनिवृत्तिकरणस्य प्रथमसमये ये वृत्ता ये वर्त्तन्ते ये च वर्तष्यन्ते तेषां सर्वेषामप्यन्यू- ॥१५०॥ नाधिकत्त्वेन समा विशोधिः, द्वि यसमयेऽपि वृत्तवर्तमानवतिष्यमाणानां समा चशोधिः, प्रथमसमयभाचिविशोध्यपेक्षया त्वनन्तगुणा, एवमनिवृत्तिकरणचरमसमयं यावद्वाच्यं । तदेवम स्मन् करणे प्रविष्टानांवानां तुल्यकालानामध्यवसायानां मिथो 5 नवृत्तिस्तिर्यक्षस्थानपतितवैषम्यलक्षणा नास्त त्यनिवृत्तिकरणमिति नाम । यद्वा निवृत्तिनिवर्तनमितपक्षे आसम्यक्त्वला- भादत्राऽऽगतो वो न नवर्त्तत इत्यनिवृत्तिकरणम् । ऊर्ध्वमु चत्राध्यवसायस्थानानामन्तगुणवृद्धिः सर्वेषु समयेषु विद्यते । अनिवृत्तिकरणाद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेषु एक स्मॅश्च संख्येयतमे भागे शेपेऽवतिष्ठति मिथ्यावस्याऽन्तरकरणं करोति, अंतरकरणं नामोदयक्षणादुपरि मिथ्यात्व स्थितिमन्तर्मुहूर्तमानामतिक्रम्योपरितनी च वष्कम्भयित्वा मध्टोऽन्तर्मुहूर्त्तमानं तत्प्रदेशवेद्यदलिकाऽभावकरणम् , तन्निष्पादनकालोऽप्यन्तरकरणकाल एव यथा तन्तुसंयोजनादिकालः पटकरणकालः । अन्तरकरणयोग्यस्थितेमध्यात् कर्मपरमाण्वाऽऽत्मकं दलकं गृहीत्वा गृहीचा प्रथम स्थित प्रक्षिपति उपर द्वियस्थित च, 卐 एवं प्रतिसमयं तावत्प्रक्षिपति यावदन्तरकरणदलकं सकलमपि ई यते, अन्तर्मुहूर्तेन च कालेन सकलतद्दलकक्षय इति । v इहान्तरकरणादधस्तन प्रथमा स्थित रत्युच्यते, उपरितन्तु द्वितीया। तत्र प्रथम स्थित वर्तमान उदीरणाप्रयोगेण प्रथमस्थिति- ध सत्कं उदयावलिव हेर्भूतं दलिकं समाकृष्य यदुदयसमये प्रक्षिपति सेर्दरणा, यत्तु द्वरं यस्थितेः सकाशादुर्दरणाप्रयोगेण समा- N G T A 卐 L A 1१५० 卐 A - N" 卐 ज 卐 M V y 卐 A कृष्योदये प्रक्षपति स आगालः, उदरणाया एव वैशेषप्रतिपत्त्यर्थमागाल इति संज्ञा पूर्वसूरिभिरुच्यते उदयोदरणाभ्यां च प्रथमस्थितिमनुभवस्तावद्गच्छति यावत् प्रथमस्थित्रावलिकाद्विकं शेष तिष्ठति, तस्मिश्च स्थरे आगाल निवर्त्तते, ततः परं केवलै- बोदरणा प्रवर्त्तते, साऽपि तावद्यावदावलिकाशेष न भवति, तस्यां च शेभूतायामुदरणापि शान्ता भवति, ततः केवलेनै- चोदयेन तामावलकामडभवति, तस्यां चापगतायामुदयोऽपि मिथ्यात्वस्य नवर्तते, तद्दलिकाभावात् , ततो मिथ्यात्वोदयनि- वृत्तावुपशमाद्धायां प्रविशति, तस्यां चे पशमाद्धायां प्रविष्टस्य सतः प्रथमसमय एव मे क्षटजम पश मकं सम्यक्त्वमुपजायते । यथा हे वनदावानलः पूर्वदग्न्धनमूपरं वा देशमवाप्य विध्यायति तथा मथ्यात्ववेदनवनदवेऽप्यन्तरकरणमवाप्य विध्यायति, अन्तरकरणप्रथमसमटे एव मिथ्यात्वदलेकन्दनाऽभावादपश मकसम्यक्त्वमवामोति एवं यथाप्रवृत्ताऽपूर्वकरणाऽनवृत्तिक- रणक्रमजन्य अपूर्व करणारब्धस्थतिघातादिमि न्थभेदसम्भवम पशमिकसम्यक्त्वं प्रपञ्चितम् । अस्मॅिश्च सम्यक्त्रे लभ्यमाने कश्चित् सम्यक्त्वेन समं देशविर ते सर्वविरत वा प्रतिपद्यते। यदा च चारित्रमोहनी यस्य सूक्ष्मसम्परायान्रे सपशमना भवति तदाऽपि यदि चतुर्थपञ्चमषष्ठसप्तमाऽन्यतररणस्थाने दर्शनमहस्य सपशमनायां जातायामुपशमसम्यक्त्वयुक्त उपशमशेणं सम्पद्यते तत्रापि यदपशमिकसम्यक्त्वं तत् श्रेणिगतम् । उभयदभिन्नमदमासंसारं पञ्चवारं जायते, अन्तमुहूत्तेश्च काल: अथ क्षाय पश मकम्-यस्मिन् समयेऽयं व अपशमिकसम्यग्दृष्टिर्मवति तस्मिन् समये (निश्चयनयेन प्रथमस्थि- तिचरमसमये) द्विर यस्थितिगत दलिकमभाग देन त्रधा करोति, भ्रमर्द्धविशुद्धमविशुद्धं चेति, तत्र शुद्धं सम्यक्त्वमोह- नयं, देशघात देशवातिरसप्तत्त्वाद्, अर्धविशुद्धं सम्यमिथ्यात्वं, अशुद्धं च मिथ्यात्वं, एतदुभयमप सघात N T 驗 A G 卐 A T 卐 L 卐 卐 V ज A 卐 २६ A S मक्षतते सम्यक्तन- M मार्गणा। 卐 नवतत्व A 卐 र्टकायां- V ॥१५१॥ ) A 卐 T 卐 सर्वघातिरसान्वितत्वात् । यदा चौपशमिकाद्धा परिसमाप्ता भवति तदाऽध्यवसायानुरूपः पूक्तत्रिपुंजमध्यादेकस्य पुञ्जस्योदयो भवति, यदि शुद्धाञ्जस्योदयस्त हैं क्षायोपश मकसम्यक्त्वम् , 'मश्रस्य चोदये मिश्रसम्यक्त्वम् , अशुद्धस्य चेदये मिथ्यात्वम् । अत्र तु क्षयोपशमप्रक्रमः, उदितस्य मिथ्यात्वमेहस्य क्षयेऽनुदितस्य चोपशमो यस्यामवस्थायां तत्क्षाय पश- मिकम् । नन्वं पशमिकेऽपि उदितस्य क्षयेऽनुदितस्य चोपशमे क्षयोपशम पशमयोरुभयोरपि तुल्यत्वे कथं देन प्रति- पाद्यते? सत्यम्, भेदसद्भारे भेदो न तु भेदाभाडे, यत अपशमिकसम्यक्त दर्शनमोहत्रितयस्याऽपि प्रदेश विपाकाभ्या- मुदयाऽभावत्वं, क्षायोपशमले तु य उपशमस्तस्य विष्कम्भितेदयत्त्वात् सम्यक्त्वमहन्यस्य विपाकदयो मिथ्यात्व- मिश्रमहन्ययोश्च प्रदेशोदयः । अपि चेदं क्षायोपशमिकं जघन्यतोऽन्त:हूर्त्तकालीनरुत्कृष्टतच पक्षष्टिः सागरोपमाणि असंख्टेयशश्च सम्प्राप्यते, अपशमकं पुनरासंसारं पञ्चकृत्त्वस्सम्पद्यरे आन्तमौहूर्तिकञ्च, कमदयजन्यपरिणामराहित्याद- पशमिकमात्मपरिणतिमत् , क्षायोपशमकं टु पगलिक कर्मेदयजन्यपरिणामात्मकत्वात्तस्टेति । अथ क्षायिकम्-दर्शनमोहत्रितयाऽनन्तावन्धिचतुष्टयलक्षणदर्शनसप्तकस्य क्षयादस्य प्रादुर्भावः । अस्य प्रस्थापकः क्षयोपशमसम्यग्दृष्टश्चतुर्थपञ्चमषष्ठसप्तमगुणस्थानकाऽन्यतरगुणस्थानव मनुष्य एव, निष्ठापकस्तु चतुर्गतिक ऽपि भवति । यद्यायुःकर्मणः बन्धात् प्राग्व क्षायिकस्य लाभस्त हैं नयमात्तद्भः एव मोक्षः । यद्यायुर्वन्धानन्तरं सम्यक्त्वावाप्तिस्तदा देवनरकासुपोरन्यतरस्य बन्टे सति तुट्टीयभरे, असंख्येयवर्षायुष्कनरतिर्यगायुपोरेकतरस्य वन्धसद्भारे चतुर्थे भवे मोक्षः। इद ऽऽत्मपरिणाम कर्मक्षयसंभवात्मिकाध्यक्साययुक्तवादते । 卐 N 卐 G A 卐 T 卐 V 卐 A L 卐 A 卐 A ॥१५१॥ 卐 चित्तपुरुपस्तद्वमनकाले क्षरानरसमास्वादयति तथात्रापि गुणस्थाने मथ्यावाभिमुखतया सम्यक्त्वस्य पर व्यल कचित्त S 卐 N 卐 A 卐 U 卐 ८ V 卐 A 卐 A अधुना मेश्रस्य प्रक्रमः-त्रयाणां पुञ्जानां मध्ये येऽसावर्धविशुद्धः पुञ्जः स उच्यते, सम्यग्मिथ्यात्त्व मत्यर्थः एतदुदयात् किल प्राण जनप्रतिं तत्त्वं न सम्यक् श्रद्दधाति नापि नन्दत । उक्त बृहच्छतकचूर्णी-" जहा नालिबेर- दववासिस्स अइच्छुहियस्स वि पुरिसस्स इत्थ ओयणाइए अणेगहा विढइए तस्स आहारस्स उवरें न रुइ न य नंदा जेण कारणेणं सो अयणाइओ आहारे न कयाइ देठे नाव सुओ, एवं संमामिच्छ ठस्स व वाइपयथाणं उवर न रुइ न य नंदा" इत्यादि सम्प्रति सास्वादनम् सम्यक्त्वलक्षणरसास्वादन्न सह वर्तत इते सास्वादनम् । यथा हि भुक्तक्षरानविषयव्यलक- पुरुषस्य सम्यवरुद्वमतस्तद्रसास्वादे भवतीतदं सास्वादनाच्यते । यद्वा सासादनं सहासादन्न वर्त्तन इति सासादनम् । अयमर्थः-अपशमिकसम्यक्त्वाद्धायां जघन्यतः समयमात्रशेषायामुत्कर्षतः पडाव लकाशेषायां कश्चिदासादनं गच्छेत्, सासादनभावं प्रतिपद्येत । सति यस्मिन् परमानन्दरूपानन्तसुखदे यसतरु जभूतो ग्रन्थिसम्भव पशमिकसम्यक्व- लामेऽपगच्छति, आसादनभावानन्तरं नियमान् थ्यात्वं प्रतिपद्यते "मथ्यात्वं व्याख्यातपूर्वमिति गता सम्यक्त्वमार्गणा ॥ १२ । तथा 'सन' इति, वैशष्टस्मरणादिरूपमने विज्ञानभाक् इतरेऽसंई सर्वेऽप्रेकेन्द्रियादिः १३ म प्रक्षेपाहाराणामन्यतममाहारमाहारयतत्याहारकः, इतरेऽनाहारके विग्रहगत्या दिगतः एरे सर्वेऽपि संलता द्वषष्टि- 卐 N 卐 T G A 卐 A प T 卐 अजलो ॐ L 卐 A 卐 卐 A S 卐 A V A T 卐 *नवतत्व- 卐 दाश्चतुर्दशमलमार्गणास्थानानां चटुरादिसंख्याका अवान्तरभेदा ज्ञातव्याः । अत्र गाथा-चउ पण छ तय तिय चउ अड मक्षतत्वे U सग चउ छच्च दु छग दो दुन्नि । गइयाइमग्गणाणं इय उत्तरम्य वास? ॥ २ ॥ इत्युक्ता गत्या दमार्गणाः ॥ ४५ ॥ ys उत्तरमार्ग- टकायां- अथ अपश्चितमार्गणासु कस्यां कस्यां मार्गणायां मोक्षस्तत्प्रतपिपादयपुराह- ॥१५२॥॥ नरगइपणि दतस भव--सन्नि अहक्खायखइयसम्मते ।मुक्खणाहारकेवल--दसणनाणे न सेसे ॥४॥ मक्षः॥ टका- नरगइ ' इति, मनुष्यगति-पश्चेन्द्रियजाति-त्रस-भव्य-संज्ञ-यथाख्यात-क्षायिकसम्यक्त्वेषु मोक्षः, 卐 घण्टालालान्यायेन देहर्लपकन्यारेन वा मोक्षपदस्योभयत्र पूर्वार्धे उत्तरार्धे च सम्बन्धात् आहार-केवलज्ञान-फेवलदनेषु च मोक्षः, न शेपासु मार्गणासु इति गाथाक्षरार्थः। अथ विस्तरार्थः-अस्मिन् सिद्धव्याख्यान हूँ नय विज्ञेय', पूर्वभावप्रजा- पन्यः प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयश्च, पूर्वमततं भावं प्रज्ञापयर्तति पूर्वभावप्रज्ञापन्यः। प्रत्युत्पन्नं वर्तमान भा प्रज्ञापयतीति A प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापर्नयः। नैगमादिप्रसिद्धनयेभ्यश्च नेम व्यतिरिक्त, एतेषामेव वाचे युक्तिभेदेन ग्रहणम् । तत्र नैगमसङ्क- ग्रहव्यवहाराः सर्वकालार्थग्राहित्त्वात् पूर्वभावप्रज्ञापन यशब्दयाच्याः । ऋजुसूत्र-शब्द-समभिरुदैवम्भूतास्तु वर्तमानकालार्थ- प्रतिग्राहित्वात् प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापन यशब्दवाच्या विज्ञेयाः। अत्र तु पूर्वभावप्रज्ञापनीयो नय एवोरी कृतः। तद्यथा- गतिमार्गणामाश्रित्य कस्यां गत मेक्षः १ इति चेन्नरगत्यां न शेपासु रुरनारकतिर्यक्ष गतिघु, तत्र मोक्षसामीविरहात् । एवं सर्वत्र वैज्ञेयम् । जातिमार्गणायां पञ्चेन्द्रियजात्यां, बसमार्गणायां सच्चे, भव्यमार्गणायां भव्यचे, संज्ञिमार्गणायां संजिवे. 5 यथाख्यातचारित्रे च संयममार्गणायां, सम्यक्त्यमार्गणायां क्षायिकसम्यक्तने, आहारमार्गणायामनाहारकचे अयोग्यवस्था ॥१५२॥ G T V A 卐 -- ध A 卐C卐 V A - 卐 A प T यामाहारस्याऽभावात् , ज्ञानमार्गणायां लेवलज्ञाने, दर्शनमार्गणायां लेवलदर्शने मेक्षः। एता पूर्वेक्तास्व मेक्षे न शेपासूक्तव्यतिरिक्तदास्विति ॥ ४६ ॥ एवं मार्गणाद्वारेषु मोक्षसद्भावप्रतिपादनलक्षणं सत्पदम योगद्वारं वाख्याय सम्प्रत द्रव्यप्रमाणक्षेत्रसंज्ञकावड्योग- द्वारावनया गाथया व्याचिख्यासुराह- 卐 दव्वपमाणे सिद्धाणं, वदव्वाणि हुंतिऽणंतणि लेग्स असंखिज्जे, भागे इलेर स है।४७॥ टीका-'दव्वपमाणे' इति, द्रव्याणां प्रमाणं द्रव्यप्रमाणं तस्मिन् द्रव्यप्रमाणे सिद्धाख्यप्रस्तुतद्रव्यपरिगणने चिन्त्यमाने 卐 कियन्तः सिद्धाः ? इत्याह-अनन्तान सिद्धीवद्रव्याण भवन्ति, संख्याताऽसंख्याताऽनन्तलक्षणसंख्यानां मध्येऽनन्त- N संख्याप्रमितानि सिद्धबद्रव्याणे सन्ति, तत्रापि परत्तयुक्तादिभेदभिन्न यन्नवप्रकारमनन्तं तस्मिन् मध्यमयुक्तानन्तसंज्ञोप- 卐 लक्षितायां पञ्चमाऽनन्तसंख्यायां न कदाचनापि व्यभिचारः, उक्तञ्च-'जइआइ होइ पुर जणाण मग्गंम उत्तरं तइया । इक्कस्स गोयस्सऽणंतभागोय सिद्धिगओ ॥ १ ॥ अस्या अयमर्थ:-जैनेन्द्रमार्गे यदा कदापि सिद्धजीव- 卐 द्रव्यसंख्यागोचरः प्रश्नः स्यात्तदा अयमुत्तरो यदेक स्मन् नगदे येऽनन्तसंख्यापरिगणिता जीवा वर्तन्ते रेषां मध्या- दनन्ततमांशे यानि उवद्रव्याणि तावत्संख्याकानि मेरे जीवद्रव्याणि भवतीत्यर्थः । ननु भरतैरावतक्षेत्राऽपेक्षया उत्सर्पपर्तयारलेऽवसर्प चतुर्थारले च महाविदेहापेक्षया विरहकालानपेक्षं प्रत्यहं मेक्षमार्गस्य प्रवृत्तत्त्वात् L कथमनन्तसंख्यायां निगदस्याऽनन्तभागस्वरूपायां न व्यभिचारः ? न च पाण्मासिक उत्कृष्टो मोक्षविरहकालन 卐 卐 A G A 卐 T 卐 V 卐 3 A A ម ज N न्या SI A द्रव्यप्रमा- V M A A T N नवतत्त्व 卐 वैभावनय, यतो चरहकालानन्तरमप सततं मेक्षगमनप्रवृतिसद्भावः प्रतिपाद्यते । सत्यं, यद्यपि प्रतिसमय मोक्षतरटे सुमङ्गला विरहकालानन्तरं वा वा मोक्षं प्रयान्ति तथापि मध्यमयुक्तानन्तसंज्ञकं यत् पञ्चमानन्तकं तस्याऽनन्तभेदभिन्नत्वान 卐 कायां- तदनन्तसंख्यायां व्यभिचारः, प्रतिसमयं वाहिन रेणुपुञ्जपूरिताऽप तथाप्रमाणोप्तजलधिमर्यादावन । अपि च 'पूर्व णद्वारम् अनन्तसंख्या भन्नसंख्याकाः सिद्धा आसन् ' एतदपि वक्तुं न शक्यते, यतःप्रवाहापेक्षया सिद्धानामनादिचं, यदि प्राक् ॥१५३॥ सद्धर्जवा असंख्यातसंख्याका भवेटुस्त! ततेऽपि प्राक् सिद्धाऽभावः प्रतिपद्यरे, न चैवं प्रतिपन्नमतोऽनन्तसंख्या का अव्यभिचारिणति । सम्प्रति भागद्वारं-एकसिद्धवाः सर्वसिद्धर्जवा वाले कस्याऽसंख्येयतमेभागेऽवतिष्ठन्रे । यते जघन्यतः 卐 सिद्धस्याऽवगाहना अष्टाङ्गुलााधिकैकरनिप्रमाणा, न च द्विरत्नशनरप्रमाणान्यूनावगाहनायुक्तो मेक्षं प्रपद्यते, मोक्षगम- धा 卐 नकाले च भवे हिशर रावगाहनायास्तृयो भागस्संकोचापपद्यते, उक्तञ्च-"एगा य होइ रयण अद्वेव य अगुलेहें साहिया। एसा खलु सेद्धाणं जहन्न ओगाहणा भणिया ॥१॥ उत्कृष्टतस्तु तृयभागाधेकत्रय वंशदुत्तरत्रिशतध- G 卐 नुःपरिमिता सद्धावगाहना, यतः पञ्चशतधनुरुच्छ्रितो मुक्तिमुपपद्यते न ततोऽप्यधिकः, तुरी'यभागस्तु पूर्ववत्संकोचवशान्यूनो जी भवति, तथा चक्त-"तन्निसया तितसा धणुत्तिभागो य कोस छ भागो। जं परमगाहणाय तं रे कोसस्स छन्भागो ॥२॥ एचमेकसिद्धावगाहनापेक्षया जघन्योत्कृष्टाभ्यां लोकस्याऽसंख्येयतमे भागेऽवतिष्ठन्द्र सिद्धाः। निखिलसिद्धावगाहनामाश्रित्य चाऽऽयामविष्कम्भाभ्यां पञ्चचत्त्वा रेशल्लक्षयोजनप्रमित क्षेत्रम् , उच्छ्येण तु योजनस्य चतुर्विशतेतमो भागः क्रोशस्य हो 卐 भागो वा त्रभागाधिकत्रय वेशदुत्तरत्रिशतधनुः प्रमाण इते यावत् । एषोऽपि सर्वसद्धापेक्षोऽवगाहो लोकस्याऽसंख्येयभा ॥१५३॥ ध A T AL L A S N 卐 U 卐 卐 A 卐 V गाऽवच्छिन्नः । सिद्धाश्च निश्शेषा अप्वुपरिष्टादले काकाशप्रदेशैस्स्पृष्टाः समश्रेणिगताः, अधस्ताद्यथावगाहरुच्चावचा अति क्षेत्रद्वारम् । स्थापना- ४७ अधुना स्पर्शनाद्वारम्- पुसणा अहिर कालो, इगसिद्ध पडुच्चसइअणंत । पडिक याऽभ वओ, द्धणं अंतर नर ४८ ' इति । स्पर्शना अधिका, अवगाहनापेक्षया स्पर्शना अधिकेत्यर्थः ननु स्पर्शनावगाहनयोः कः प्रतिविशेषः । येनाऽवगाहनातः स्पर्शनाया आधिक्यमुच्यते ? सत्यं, अवगाहना तु निजावगाहव्याप्तिलक्षणा, यत्र यत्रावगाह- स्तत्राऽऽत्मप्रदेशा नयमेन भवन्ति, यत्राऽऽत्मप्रदेशास्तत्र अवगाहनाऽपि भवत्येव, स्पर्शनायां न तथाचम् , आत्मप्रदेशावगा- ढभिन्नाकाशप्रदेशानामाकाशप्रदेशस्थितपुद्गलादीनां च समन्ततः स्पर्शनायाः सद्भावात् । अथ कालद्वारम्-' इगसिद्ध पडुच्च साइओणंतो' इति, एक सिद्धं प्रत्य कालस्य साधनन्तत्वम्, यदा च विविक्षित वस्य सिद्धत्वं समुपजातं तदा सादिः, अथ न कदाचिदपि ततः तस्य प्रच्युतिरित्यनन्तत्त्वम् । अनेक सिद्धाऽपेक्षया अनाद्यनन्तत्त्वं, तच्च यथावसरं प्राक् परिभावित- 'मतिनाव वतन्यते । गतं कालद्वारं, सम्प्रतिरन्तरद्वारम्-' पडिवायाऽभावाओ सिद्धाणं अंतरं नथि' इति प्रतिपाताऽ- भावात् सद्धानामन्तरं नास्ति, क्षय पशमग्रमुखसम्यक्त्वलाभानन्तरं मिथ्यात्वदयाप्क्षे थ्यात्त्वप्राप्तिपूर्वकः सम्यक्त्वभ्रंशे भवति, अथ तद्भशाऽनन्तरं पुनर्जघन्यत उत्कृष्टतश्च कियत्कालानन्तरं तत्सम्यक्वगुणलाभः १ इति यत् कालनियमनं तदन्त- 卐 A 卐 N A 卐 T 卐 G A 卐 A 卐 T 卐 卐 L V 卐 A 卐 A UC N S y - मोक्षतटे भागभाव- द्वार। 卐 नवतत्त्व- उमगला- 卐 टीकायां- V ॥१५४॥卐 A 卐 T 3 A A रमित, तद्गुणनाशाऽनन्तरं पुनस्तद्गुणावाप्त जघन्योत्कृष्ट दाभ्यां यावान् कालस्तदन्तरमित्यर्थः । सिद्धभगवतां सिद्धच्च न प्रतिपाति, 'सिवमयलमरुअमणंतमक्खयमव्वावाहमपुणरावित्ति इत्यत्र अणंतादिपाठदर्शनात् , यदा च सिद्धत्त्वस्य प्राप्तिस्तदा सादिः, प्राप्त्यनन्तरं प्रच्युत्यभाव इति साधनन्ता स्थितिः सिद्धानां, सा च प्राक् प्रतिपन्नैव, अतः सिद्धानामन्तरं नास्तोतिगम्यते । अनेन ' स्वस्वर्थनिकारं दृष्ट्वा तीथोंद्धारकरणार्थं पुनरपि लोले समागच्छन्ति सिद्धाः' इत्येवं प्रतिपन्नानां मतं रागद्वेपप्रमुखबहुदोपदुपितत्त्वादपास्तं द्रष्टव्यम् ॥ ४८ ।। अन्तरद्वारानन्तरं भागभावद्वार प्रतिपिपादयिपुराह- सव्वजीयाणमणते भागे है तेसिं दंसणं नाणं । खइए भाव परिणामिए अपुण होइ जीवत्तं॥४९ ट'का-'सब्बयाणं' इति, ते प्रागुक्तस्वरूपाः सिद्धाः सर्व वानामनन्ततमे भागे विद्यन्ते, अत्राऽयमाशयः-चतुर्दश- रज्जुपरि मते लोके या जवसंख्या मध्यमाऽनन्ताऽनन्तसंज्ञकाप्टमाऽनन्तप्रमाणा तदपेक्षया सिद्धाः कतिथे भागे वर्तन्त इति शष्याशकां मनसि निधाय उक्तं-ते सर्वे निखिला अपि सिद्धा न तु द्वित्राः पञ्चपा या सर्व वानामनन्ततमे भागेऽवतिष्ठन्त इति । ननु क्षेत्रद्वारभागद्वारयोः कः प्रतिविशेप इति चेदुच्यते-क्षेत्रद्वारं तु लोकाकाशाऽपेक्षम् , भागद्वारं सकल बराशिनिश्रितमिति वशिष्टो भेदः, तात्पर्य तु सिद्धाः पञ्चमाऽनन्तसंख्यानमिताः, सर्वांचा अष्टमाऽनन्तसंख्यापरिकलेताः, अतः सिद्धापेक्षया अनन्तगुणाः, सर्व वाऽपेक्षया सिद्धा अनन्ततमभागाऽवच्छिन्ना इति भागद्वारम् । सम्प्रति भावद्वारम्- नड भाव इति कः पदार्थ ? इति चेत् प्रथमं भावानां संक्षेपतो निरूपणं विध्यते-अपशमिकः, क्षायिकः, क्षायोपशमका, Gi T . ॐ V सर्वज वा अनन्तगुणाः, L y । १५४ा A 卐 卐 A 卐 A T ज अंदयिकः, पारिणामिकश्चेति पञ्चभावाः । विशिष्टहेतुभिः स्वतो वा जवानां तत्तपद्रूतया भवनानि भवन्त्येभिरूपशमादिभिः A पर्यायैरिति वा भावाः, भवनं भावस्तेन तेन पर्यायेणाऽऽत्मलाभ इत्यर्थः । तत्र पशमनमुपशमः कर्मणोऽदयलक्षणावस्था 卐 v भस्मपटलाऽवच्छन्नाग्निवत् , सः प्रयोजनमस्येत्य पशमिकस्टेन वा निवृत्तः अपशमिकश्चास भाव अपशमिकभावः, कर्मण ss उपशमाद् यद् दर्शनं चरणं वा श्रद्धानलक्षणं विर तिलक्षणं वा तथोद्भवति तदपशभिकशब्देनेच्यते, एवमग्रेऽपि भाव्यम् । क्षयः कर्मणेऽत्यन्तोच्छेदः, स एव तेन वा निवृत्तः क्षायिकः । क्षय पशमाभ्यां निवृत्तः क्षाय पशमिकः दरवध्याताव- च्छन्नज्वलनवत् । यदुदयावलिकाप्रविष्टं तत् क्ष्णं शेषमनुद्रेकक्षयावस्थम् , इमामुभर्य मवस्थामाश्रित्य क्षाये पशमिकः प्रजायरे ननु चाऽयमेवपशमकान्न भद्यते यतस्तत्राप्युदितं ६णमनुदितं चेपशान्तमिति । अत्रेच्यते-क्षयोपशमे ह्युदयेऽप्यस्ति, ॐ प्रदेशतया कर्मणो व्दनानुज्ञानात् , नत्त्वसावुदयो विधातायेति, अड्भाववेदनाऽभावात् , उपशमे तुप्रदेशकर्माऽपि नाड्भवति मना- गपि नोदयोऽयं विशेष इति यावत् । आगमश्चायम्-से णूणं भंते णेरइयस्स वा तिरक्खजोणियस्स वा मणुसस्स वाजे कडे कम्मे पस्थिणं तस्स अटेइत्ता मोरक हंता गोयमा?सेकेणठेणं भंते : एवं बुच्चइ ? एवं खलु गोयमा 'मए दुविहे कम्मे पन्नत्ते, तंजहा- पदेसकम्मे अणुभावकम्मे य, तत्स्थ णं जं तं पएसकम्मं तं न्यमा एइ, तत्थ णं जं तं अभावकम्मं तं अच्छेगइयं एइ अस्थेगइयं नो वेएइ, गायमेयं अरहता विण्णायम्यं अरहता-अयं इमं कम्मं अज्झोवगमियाए व्यणाए दस्सति, अयं जीरे इमं कम उवक्कमियाए वेयणाए वेदिस्सत अहाकम्मं अहाकरणं जहा जहा तं भगवया दटुं तहा तहा परिण- मिस्सतीति, से रेणं अटेणं गोयमा : एवं वुच्चति" अतऽस्त विशेष अपशमिकक्षाये पश मिकयोरिति उदयः शुभा- ज N A । 卐 A V 卐 L 卐 A A ॐ प दशावरातस NI त. ॥ A 卐 V मक्षतत्टे भाव- M द्वारम A T N *नवतत्त्व शुभप्रकृर्तनां विपाकतोऽनुभवनं स एव तेन वा निर्वृत्त अयिका । परिसमन्तानमनं इवानाम चानां च बचादे- स्वभावानुभवनं प्रति पह्न भवनं परिणामः, स एव तेन वा निवृत्तः पारणामिकः । तत्र पशमिकस्य व दी, अपशमिक- टीकायां- सम्यक्त्वं अपशमिकचारित्रञ्च, द्वावपि दर्शनचारित्रमोहन्यकर्म पशमसंभवावित । क्षायिके भावे नव भेदा भवन्ति, केवल- ज्ञानवलदर्शनक्षायिकसम्यक्त्वयथाख्यातचारित्रदानादेषश्चलब्धयः क्रमेण केवलज्ञानावर यकेवलदर्शनावरण यदर्शन- ॥१५५॥ 5 मोहचारित्रमोहान्तरायपञ्चकक्षयजन्याः । तुरीये क्षायोपशमले भावेऽष्टादशम्दा मत्श्रुिताऽवधिमनःपर्यायाऽऽत्मकज्ञान- चतुष्टयमत्यज्ञानश्रुताऽज्ञानविभंगज्ञानरूपाऽज्ञानत्रिकच रचक्षुरवधिदर्शनलक्षणदर्शनत्रिकस्वरूपा दशोपयगाः दानलाभभोगो- A इते । नड दानादिलन्धयः पूर्व क्षायिकभाववतन्य उक्ताः, इह तु क्षायोपशमिक्य इति कथं न विरोधः? नैतदेवम् , 2 अभिप्रायापरिज्ञानात् । इह दानदिलब्धयो द्विविधा भवन्त्यन्तरायकर्मणः क्षयसंभविन्यः क्षयोपशमसंभविन्यश्च, तत्र 卐 च याः क्षायिक्यः पूर्वमुक्तास्ताः क्षयसंभूतत्त्वेन लेवलिन एव, याः पुनरिह क्षायोपशमिकान्तर्गता उच्यन्ते ताः क्षयो- a पशमसंभूताश्छद्मस्थानामेव । सम्यक्त्वसर्वविरती अपि क्षायोपशमके अत्र ग्राह्ये, ते च क्षयोपशमोद्भवत्वेन प्रस्तुतभावे एव 卐 वर्त्तते । देश विरतिरप्यप्रत्याख्यानावरणक्षयोपशमजत्वेन क्षायोपशमके वर्त्तते एवेति भावः ॥ अज्ञानं, असिद्धत्वं, असंयमः, जलेश्याः कृष्णलकापोततेजःपद्मशुक्लभेदात् षट्, कपायाः क्रोधमानमायालोभाख्याश्चत्वारः, गतिर्नरकतिर्यकमनुष्यसुरग- 卐 तभेदाचतुर्दा, वेदाः स्त्रीपुंनपुंसकाख्यास्त्रयः, मिथ्यात्वमित्येते एकत्रंशति भेदास्तुर्ये अदयेके भावे भवन्ति । अत्राऽयं ज A G T A V L ॥१५५॥ A A S . A M A 卐 N 5 भावार्थः-इहासदध्यवसायात्मकं सज्ज्ञानमप्यज्ञानं, तच्च मिथ्यात्वोदयजमेव । यदभ्यधायि–'जह दुव्वयणमवयणं कुच्छिय- संलं असीलमसईए । भन्नइ तह नाणं पिहु मिच्छ हट्ठस्स अन्नाणं ॥१॥' असिद्धत्त्वमपि सिद्धत्त्वाऽभावरूपमष्टप्रकारकम- 55 दयजमेव । असंयमोऽविरतत्त्वं, तदपि प्रत्याख्यानावरणोदयाजायते लेश्यास्तु या मते कपायनिष्यन्द लेश्या तन्मतेन ॐ V कपायमोहन योदयजत्त्वाददयिक्यः, यन्मतेन तु योगपरिणामो लेश्या तदभिप्रायेण ये गत्रयजनककम दयप्रभवाः, येषां त्वष्ट- ध कर्मपरिणामो लेश्यास्तन्मत्न संसारित्त्वाऽसिद्धत्त्ववदष्टप्रकारकर्मदयजा इति । कपायाः क्रेधमानमायाले भरूपा मोहन्य- 卐 A कर्मोदयादेव भवन्ति । इह गतयो ग नामकर्मदयादेव नारकत्वतियक्त्वमनुजचदेवत्वलक्षणपर्याया जायन्त इति ॐ वेदाः रु पुनपुंसकाख्या नोकपायमोहन योदयादेव जायमानाः स्पष्टमंदयिका एवेति मेथ्यात्वमप्यतत्त्वश्रद्धानरूपं मथ्या- T त्वमोहन योदयजमेरेत्यदयिक प्रतिमत । ननु नद्रापंचकसातादिवेदन्यहास्यरत्यरतिप्रभृतयः प्रभूततरभावा अन्टेऽपि 卐 E कमेंदयजन्याः सन्ति तत् निमित्येतावन्त एरै निर्दिष्टाः ? सत्यम् , उपलक्षणवादन्टेऽपि द्रष्टव्याः, नेवलं पूर्वशा प्राय एतावन्त एव निर्दिष्टा दृश्यन्त इत्यत्राप्येतावन्त एवासाभिः प्रदर्शिताः तथा भव्यत्त्वमभव्यत्वं जवत्त्वमित्येते त्रयो 9 भेदाः पारणामिले भाडे भवन्ति । तदेवं द्विभेद अपशमिक भावः, नवभेदः क्षायिका, अष्टादशभेदः क्षाय पशमिकः, 卐 एकविंशतिभेद अदयिकः, त्रिभेदः पारिणामिकः । सर्वेऽपि भावप दास्त्रिपंचाशदित। एषां भावानां मध्ये सिद्धाः a कस्मिन् कस्मन् भावे वर्तन्ते तदुच्यते-'तेसिं दसणं नाणं खइए भावे परिणामिए अपुण होइ जीवत्तं' रेषां सद्धानां दर्शनं । निं उपलक्षणात् सम्यक्त्वं चास्त्रं र्य क्षायले भारे सन्ति, अयमर्थः--ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयदर्शनमहचारित्र- 卐 卐 N G A A T L V A A LS - N S V मल्पब- A A y T N 卐 अनवतत्त्व मोहान्तरायक्षयप्रभवचादेतानि शानदर्शनसम्यक्त्वचारित्राणि क्षायिकानि भवतीत्यर्थः । न च शेप भवोपना हिकर्म- मोक्षत सुमला- सिद्धाना- 卐 क्षयोद्भूतत्त्वात् अनन्तसुखाऽक्षयस्थितिप्रमुखाणां गुणानाम पक्षायिकत्त्वं वाच्यमिति, क्षायिकत्वेऽपि तेषां क्षायिकव्यवहाराऽभा- 卐 काय वात् । जीवत्वं च पुनस्तेपां सिद्धवधूत्सङ्गशालनां मुक्तानां पारिणामिके अनादिपारिणामिले भावे भवतीति भावद्वारम् ॥ ४९ । ॥१५६॥ अथाल्पबहुत्त्वद्वारं वेवरिपुर्गाथां निबध्नात- 卐 ) हुत्वम् ।। थोवा नपुंससिद्धा, थीनरसिद्धा कमेण संखरणा। इअमुक्खतत्तएं, नवतत्ता लेसो भणिया । ५० टीका-'थोवा' इति, नपुंसकलिङ्गसिद्धा सर्वस्तोकाः, लिङ्गसिद्धाः पुरुपलिङ्गसिद्धाश्च क्रमेण संख्यगुणाः, इदमत्र ) हृदयम्-एकसमय उत्कृष्टतो नपुंसकलिङ्गे वर्तमाना दश सिद्ध्यन्ति, रुलिङ्गे वर्तमानास्ततो द्वगुणा वंशतिरेत्यर्थः, पुरुष- लगोपेताश्चाऽष्टाधिकशतसंख्याका एकस्मिन् समये सिद्ध्यन् त्युत्तरोत्तरं संख्यातगुणत्त्वमविरुद्धम् । न च लिङ्गसद्भावे कथं ' मोक्षावाप्तिरित शङ्कयं, वेदोदयलक्षण लङ्गस्य अनिवृत्तिबादरान्टे व्यवच्छेदेऽी लिङ्गाकृतेरयोगगुणस्थानकं यावत् सद्भा- पृह वात् । नड नपुंसकानां कर्मक्षयलक्षणो मोक्षः कथमवाप्यते ? नपुंसकानां मोक्षावाप्त प्रतिषेधश्च सिद्धान्ते श्रूयते, सत्यम्- 1 पोडशभेदभिन्नानां निखिलानामप नपुंसकानां न प्रतिषेधः किन्तु तेषु ये दश भेदा जातिनपुंसकानां तेषां निषेधः, A % न तु षड्दभिन्नानां कृत्रिमनपुंसकानामिति । जातिनपुंसकानां बमोहोदयसद्भावत्वात् सर्वविरतेरप्यसम्भवः, ' v कुतो मोक्षस्य कथा ? कुत्रमानां तु मंत्र पधिमहर्पिदेवादिशापनिमित्तोपहतवेदानां न जातिनपुंसकानामिव नगरदाह- 卐 तुल्यो वेदोदयः, केवलं लेनाऽपि पूर्वोक्तकारणेन पुरुपवेदस्योपहतत्त्वात् पुरुपदेदे दयाऽभावेनैव ते नपुंसकाः प्रोच्यन्ते, 卐 ॥१५६ A G L A A ज - 卐 U A 卐 V 卐 A A वेदोदयस्तु तेषां पुरुषवेदोदयाऽपेक्षयाऽपि मन्दः, अतः कृत्रिमाणां सर्व वरतिपूर्वकमोक्षावाप्त न किञ्चिदविरुद्धम् । एतच्च विशेषतो निशथादिभ्योऽबसेयमिति । एवं सत्पदप्ररूपणा-द्रव्यप्रमाण-क्षेत्र-स्पर्शना-कालाऽन्तर-भाग-भावा-ऽल्पवहुत्त्व- 卐 द्वारैस्संक्षेपतो मोक्षतचं व्याख्यायाधुनोपसंहरन्नाह 'इअ मुक्खतत्तमेअं' इति, एतन्मोक्षतत्त्वमिति, न च पूर्वक्तद्वारैरेव मोक्षस्य व्याख्येति विज्ञेयं, अन्येऽपि मोक्षव्याख्याप्रकारास्सन्त्येव । प्राग्व्यावर्णितोऽनुयोगश्च मोक्षसद्भावप्रतिपादनपरः, 卐 परं मोक्षस्य के लक्षणं ? कथञ्च तस्याऽवाप्तिरत्येतन्निखिलमपि उपरीष्टाद्विज्ञेयमतः संक्षेपतो विभाव्यते किश्चिद्-' मोक्ख कम्माऽभावो' 'कृत्स्नकर्मक्षयान्मोक्षः' इत्यादिवचनात् कर्मणां नखिलानां योऽभावस्स मोक्षः । न च प्रतिसमयं कर्मण उदयाऽविनाभावित्वादुदयसहचारिसकामाकामनिर्जरापूर्वककर्मक्षयमाश्रित्य सर्वेष्वपि सत्त्वेषु मोक्षेऽस्टेति वाच्यम् , यत उक्तप्रकारेण तत्तत्कर्मक्षयसद्भावेऽपि अन्येषां प्रभूततरकर्मस्कन्धानां बध्यमानत्त्वान्न मोक्षो सकलेष्वपि वेषु अते निख- लानां कर्मणां प्रध्वंसाऽभावः स मोक्षः । नन्वनेकेषु शास्त्रेषु जीवकर्मणोरनादिसंयोगः प्रतिपादितः, कथमना देसंयोगवतोस्त- यो वयोग आत्यन्तिकः? सत्यं, यथा श्वनोपलयोरनादिसंयोगे सत्यपि खानिबहिःकर्षण-सुवर्णकारादिप्रयुक्तज्वलितज्वलa नादिभिः प्रयोगैः सुवर्णादुपलस्य वियोगो आवालजनप्रसिद्धस्तथा भव्यजीवानामपि अव्यवहारराशेर्व्यवहारराशावागतानां सवर्णकारोपमशुद्धगुर्वादिसंयोगावाप्तसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रज्वलितज्वलनानां कर्मण आत्यन्तिकक्ष न काचि द्विप्रतिपत्तिरिति । एवंभूतश्च मोक्षः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रसाध्यः। तत्पत्तिपत्तिक्रमस्याऽयं संक्षेपः-प्राग्व्याख्यातप्रक्रमेण क्षायोपेशमिक- १ सैद्धान्तिककामप्रन्थिकमतेनानादिमिथ्यादृष्टेरौपशमिकक्षायोपशमिकसम्यक्त्वान्यतरसम्यक्त्वयोः प्रथमलाभापेक्षया सत्यपि y 卐 N T 卐 G A A T L ज A २७ 卐 S 卐zE A मोक्षतत्वे मोक्षप्रति- पत्तिक्रमः 卐 V ज A T सम्यक्त्वपूर्वकं क्षायिकसम्यक्त्वमुपलभ्य शतसहस्रपृथक्त्वसागरोपमैलघुभूतासु कर्मस्थितिषु क्रमेण देशसर्वविरतिलाभमुपगम्य नवतत्व- क्षायिकभावापन्नं यथाख्यातचारित्रं संप्राप्तुकामोऽल्पतरकर्मा क्षेपकश्रेण समारभते । तत्राऽपूर्वकरणसंज्ञकाष्टममुणस्थाने सुमङ्गला- 卐 र्टकायां- स्थितिघातरसघातगुणश्रेणिगुणसङ्कमादिभिर्विशिष्ट क्रियासम्भारस्समुपजाताऽजेयशक्तिकोऽनिवृत्तिबादराख्यनवमगुणस्थाने नपुं- सकवेदत्री दाऽप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानावरणकपायाष्टक'दहास्यपदकसवलनक्रोधसज्वलनमानसज्वलनमायावादरसवल- नलोभाख्यकमम्रकृतीनां क्रमेणाऽन्तर्मुहूर्त्तान्तः क्षयं विधाय सूक्ष्मसम्पराय पाढे दशमे गुणस्थानके लिट्टिकृतसूक्ष्मलोभमपि समूलकाषं हत्वा क्षपकानामुपशान्तमोहस्य गुणस्य प्रयोजनाऽभावात् क्षणमोहगुणे अन्तर्मुहूर्त यावत् विश्राम्यति । 5 क्षीणमोहान्त्यसमयेऽव शष्टानां ज्ञानदर्शनावरणान्तरायाणां त्रयाणां घातकर्मणां क्षये समुपजाते त्रयोदशगुणस्थानकायसमये केवलज्ञानं केवलदर्शनं च सामान्य विशेषाभ्यां समस्तले कालोकविषयावभासकं संग्रामोति । उक्तश्च वाचककुलकिर टै- 卐 रुमास्वा तपूज्यैः;-" मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच जेवलम् "। यैश्चाईदादेविंशतिस्थानकपदाराधनतस्तुर यभने A. तर्थकरनामप्रकृतिर्नकाचिता तेषां केवलज्ञानदर्शनप्राप्तिसमकालमेव करनाम्नो विपाकोदयो सञ्जायते, तत्प्रभावाच कृतार्थेऽपि सन् सुरासुरविरचितसमवसरणे चिराजमानो योजनगामिन भव्यनिवह पकारिणों सुधास्यन्दिनीं पञ्चत्रंशत्गुणो- पसेवितां देशनां प्रदत्ते, चतुर्वेशदतिशयाश्च प्रादुर्भवन्ति । रेर्थकरश्च गणधरादिस्थापनापूर्वकं चतुर्वेधसङ्घलक्षणं इथं 卐 विसंवादे क्षायिकावाप्तिस्तु क्षयोपशमपूर्विकैवेत्युभयोरपि संमतम् । २ क्षपकणिस्वरूपं तु सविस्तरं शतकादिभ्योऽवसेयं, अत्र वंगुलिनिर्देशमात्रमिति । y N G T V क L 卐 ॥१५७ A A 卐 F S 卐 N U A V A ॐ प्रवर्तयति,-तदेव च तीर्थकरनामकर्म विपाकस्य फलं, यदुक्तम् :-"र्थप्रवर्त्तनफलं यत्प्रोक्तं कर्म त्र्थकरनाम तस्योदयात्कृतार्थोऽप्यहँस्टीर्थ प्रवर्तयति । १॥ तत्स्वाभाव्यादेव हि, प्रकाशयति भास्करो यथा लोकं । प्रवर्तनाय, a प्रवर्त्तते रर्थकर एवम् ॥२॥" यैश्च रेर्थकरलब्धिर्नाटतत्यभटे निकाचिता रे सामान्यलेवलित्वेन केवलज्ञानादि- . लन्धिपभुञ्जानाः सवर्णसहस्रपत्रकमलादिषु निषण्णा देशनादिकं विदधते लेवलज्ञानकेवलदर्शनप्रमुखलब्धन भयत्र 5 साम्येपि आईश्वर्यादिपु महदन्तरं कोटिध्वजेभ्यकोटिध्वजभूपयोरिवेति जघन्यत अन्तर्राहूर्त्तमुत्कृष्टत देशनां पूर्वकेटें यावत्तत्र स्थिचा भवोपग्राहिकर्मणां मध्ये आयुष्यस्थितेवेंदन्यप्रमुखक स्थश्च पम्यं स्यात्तदा तत्सम् करणार्थमष्टसामयिकं A केवलिसमुद्घातमुपक्रमरे । केवलिसमुद्धातप्रथमसमये स्वशरेरादात्मप्रदेशान् वहनिष्कास्य आयामविष्कम्भाभ्यां स्वशर्न रप्रमाणमुच्चत्त्वेन च चतुर्दशरज्जुपरी मतं दंडाकारतया रचयति, द्वित् टेसमटे पूर्वापरायतलकप्रमाणं कपाटमात्मप्रदेशानां N a वदधात, तृतरे उत्तरदक्षिणायतलोकप्रमाणं कपाट ( मन्थानं ) विरचयत, चतुर्थे समरे अन्तरपूरणं विधत्ते, पञ्चमे समरे अन्तरदेशं रिक्त करते, उत्तरदक्षिणायतकपाटाकाराऽऽत्मप्रदेशानां संकेचः, G पूर्वपरायतकपाटस्य रिक्त भवनं, अष्टमे च समरे दण्डाकारगतात्मप्रदेशानामपि संकेचा स्वस्थानावस्थानमिति 卐 एवं पूर्वक्तप्रकारेण केवल भगवान् स्वात्मप्रदेशानां चतुर्भेस्समयैः प्रसारणप्रयोगात् वेपमस्थितिकान् कर्मलेशान् A 卐 सम् कृत्य अभिहेतर त्या चतुर्भिस्समयैर्निवतरे यदाह वाचकमुख्यः;-' दण्डं प्रथमे समटे कपाटमथ चेत्तरे तथा समये 5 मन्थानमथ तृतरे लोकव्या चतुर्थे तु । १ संहरर पञ्चमे त्वन्तराणि मन्थानमथ पुनः षष्ठे सस्मले तु कपाटं, 卐 T A में क्षणे T L V A N नवतत्त्व- 卐 A 卐 सुमङ्गला- कायां- मोक्षतते तत्प्रति- ध V M पत्तिक्रमः। ॥१५८॥ ) A 卐 T 卐 A संहरति ततोऽष्टमे दण्डम् ॥ २॥' केवल ससुद्धातञ्च कुर्वाणः प्रथमाऽन्तिमसमययोरैदारकयोगी स्यात् , द्विपट्सप्तम- केषु तु अंदारकमिश्रकाययो भवेत् , तृतीयचतुर्थपञ्चमेषु च केवलं कार्मणकाययोग, तत्र च तृर्तयचतुर्थ- पञ्चमसमयेष्वनाहारकस्स्यात् । यदाह-'अंदारिकप्रयोक्ता, प्रथमाटमसमययोरसाविष्टः। मिदारिकयोक्ता सप्तमषष्ठद्वि- रीयेषु ॥ १॥ कार्मणशरीरयोक्ता चतुर्थके पञ्चमे तर ये च । समयत्रये च तस्मिन् भवत्यनाहारको नियमात् ॥ २॥ केवलिससुद्धाताऽनन्तरं शैलेश करणं सम्प्राप्तुकामः सयोगगुणान्तिमान्तर्मुहूर्चे योगनिरोधार्थ यतते-तत्र पूर्व तावत् बादरे काययोगे स्थित्वा वादर वाङ्मनोयोग सूक्ष्मत्वं नयति, ततः सूक्ष्मे वाग्यगे क्षणं स्थत्वा चादरं काययोग सूक्ष्मत्त्वं प्राप- यति, अनन्तरं पुनः सूक्ष्मकाययोगे क्षणं स्थितें विधाय सूक्ष्म वाङ्मनोयोग नरुणद्धि, पश्चात् स्वयमेव सज्जातं सूक्ष्मकाय- योगनिरोधमतीत्य शैलेश्यवस्था प्रामोति । शैलेश्युपान्त्यसमये देहपञ्चकवन्धनपञ्चकसंघातनपञ्चकाङ्गोपाङ्गत्रिकसंस्थानपद्कव- र्णपंचकरसपंचकसंहननपटकस्पर्शाप्टकगन्धद्वकन्चैर्गोत्राऽनादेयदुर्भगागुरुलघूपधातपराघात निर्माणापर्याप्च्छ्वासाऽयशःकर्ति- विहायोगतिद्विकशुभाशुभ स्थराऽस्थिरदेवगतिदेवानुपूर्वीप्रत्येकसुस्वरदुःस्वरकतरवेद्यलक्षणा द्वासप्ततिः कर्मप्रकृतयः क्षय- मुपयान्ति, अन्त्ये च समवे एकतरवेद्यादेयपर्याप्तत्रसवादरमडण्यापुमनुष्यगतिमनुष्याडपूर्व सभाग्योचैर्गत्रपञ्चेन्द्रियजाति- रर्थकरनामरूपाणां त्रयोदशानां प्रकृरनां क्षये जाते भवोपग्राहिकर्मणामपि चिच्छेदाल्लब्धसिद्धत्त्वपर्यायो विगतजातिजरा- मरणश्चद्रूपो भगवान् प्रदेशान्तरं समयान्तरं चास्पृशन् तव समये लोकान्तवर्ती सिद्ध शलां समुपयाति । पञ्चास्ति- कायसमुदायाऽऽत्मकलोकस्याग्रभागे ईपत्प्रागभारा नाम्ने तु हनशकलोज्वला उत्तानच्छत्रकाकृतिर्वसुधाऽस्ति, तस्याश्चोपरि 卐 A 卐 N y G T A V 卐 L ।१५८ 卐 A 卐 5 A - IN 卐 A M V A 卐 A ॐ 卐 योजनमेकं लोकः, तस्याऽधस्तनक्रोशत्रयं हित्त्वा तुरंयक्रोशस्य उपरितने षष्ठभागे त्रयस्त्रिंशदुत्तरधनुस्त्रश सम्मिरे धनुस्त्रि- U भागाधिले यो लोकान्तशब्दस्य सैद्धान्तिकोपचारस्तत्र मुक्तात्मा ब्रजति न परतः, परतो धर्मास्तिकायस्य गतिसहायकस्याऽ- 卐 भावात् । ननु क्षपितनिरवशेषकर्मराशेर्नरस्तकायवाङ्मनोयोगस्य कथं लोकान्तप्राप्तिर्भवति ? योगाऽभावादक्रियत्वादात्मन इति चेदुच्यते;-यथा हस्तदण्डचक्रसंयोगात् पुरुषप्रयत्नतश्चाविद्धं कुलालचक्रं पुरुषप्रयत्नहस्तदण्डचक्रसंयोगेषूपरतेष्वपि 卐 पूर्वप्रयोगाद् भ्रमत्येव प्रयत्नजन्यसंस्कारपरिक्षयं यावत् , एवं शैलेश्यवस्थायां जनितो यः पूर्वप्रयोगस्स एव क्षणे कर्मण्यी लोकान्तगमनहेतुर्भवति । अथवा पुद्गलानां जवानां च गतिमत्त्वमुक्तं, नान्येषां द्रव्याणाम् । तत्राधेगरवधर्माणः पुद्गलाः, न ऊर्ध्वगरवधर्माणो जवाः । यथा सत्स्वपि प्रयोगादेषु गतिकारणेषु जातिनियमेनाधस्तिर्यगूज़ च खाभाविक्यो लोष्ठ- N वाय्वनां गतयो दृष्टास्तथा कर्मसङ्गवि नर्मुक्तस्य ऊर्ध्वगैरखादूर्ध्वमेव सिध्यमानगतिर्भवति, संसारणां तु कर्मसङ्गादध- 卐 स्तर्यगूर्ध्वञ्चति । अथवा यथा बीजकोशबन्धनच्छेदादेरण्डवीजादीनां गतिदृष्टा तथा कर्मवन्धनच्छेदात् सिध्यमानगतिरा- लोकान्तमविरुद्धा । अथवा सर्वकर्मविनिर्मुक्तस्यास्य विगतयोगस्यापि तथैव गतिपरिणामो भवति येन लोकान्तं याबदेलेनैव समयेन ब्रजति । उक्तं च- पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाद्वन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच तद्गतिः' तत्त्वा० अ० १० सू-६ , तथा च तदनन्तरमेवोर्ध्व-मालोकान्तात् स गच्छति । पूर्वप्रयोगासङ्गत्व-वन्धच्छेदोर्ध्वगरवैः ॥ १ । कुलालचक्रदोलाया- मिष चाऽपि यथेष्यते । पूर्वप्रयोगात् कर्मेह तथा सिद्धगतिः स्मृता ॥ २॥ मृल्लेपसङ्गनिमें क्षाद् यथा दृष्टाऽप्स्वलादुनः । कर्मसङ्ग वेनिमोक्षात् तथा सिद्धिगतिः स्मृता ॥ ३॥ एरण्डयंत्रपेडासु बन्धच्छेदाद् यथागतिः । कर्मबन्धनविच्छेदात् ] T G 卐 A 卐 A T - L * ॐ V 卐 A A पन ue N S A V A ज अनवतत्व- सिद्धस्याऽपि तथेष्यते ॥ ४ ॥ ऊर्ध्वगरवधर्माणो जीवा इति जिनोत्तमैः । अधोगरवधर्माणः पुद्गला इति नोदितम् ॥ ५ ॥ 卐 मोक्षतरे सुमङ्गला- यथाध स्तर्यगूल च लोष्ठवाय्वग्निर्वतयः । स्वभावतः प्रवर्त्तन्ते, तथोर्च गतिरात्मनाम् ॥ ६॥' इत्यादि । एवं ज्ञानदर्शन उपसंहार: ॥ टीकायां- चरणखभाव ऊर्ध्वगरवधर्माऽप्यं चोऽविधकर्ममृत्तिकोपरागरक्तो मृत्तिकालिप्ताऽलावु इव संसारमहार्णवे निमग्नी रागद्वेप- तरंगसंततिप्रयुक्तश्चाधस्तर्यगूचं गत्या गत्यन्तरं परिभ्रमन् तथाभव्यच्चपरिपाकवशंगतः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रविशुद्ध- M ॥१५९॥ 5 बारवेगासेकापगतकाप्टकमृत्तिकालेपो विगतमृदावरणालावुवदूर्ध्वगरवधर्मात् संसारमहोदःपरस्ताद्वर्त्तमानं लेकान्तं ब्रजन् । साधनन्तकालं यावत् शिववधूत्सङ्गसेवाहेवाको भवतीति मोक्षतत्त्वम् । एतदेवोपसंहारेण भावितं 'इय मुस्कतत्तमेयं एतन्मोक्ष- A तत्त्वमिति । गते च मोक्षतत्त्वे जीवा वपुन्यपापाश्रवसंवरनिर्जरावन्धमोक्षाख्यान नवान्यपि तत्त्वानि यथामति प्रतिपादितान- | त्येतत्प्रदर्शयितुमाह ' नवतत्ता लेसओ भणया' इति, प्राग्वर्णितस्वरूपाणि नवतचानि 'प्राकृतवशाल्लिङ्गविपरिणामः' है लेशतः संक्षेपतो भणितानि आगमानुसारेण प्रतिपादितान्त्यर्थः ॥ इति मेक्षतत्त्वम् ।। y 卐 उक्त्वा मोक्षं तत्त्वं यदलाभ में मयाल्पमतिन तेन वजन्तु मोक्षं भव्याः प्रक्ष्णकम शाः ॥१॥ ध इत्याराध्यपादाऽऽचार्यवर्यश्रीमद्विजयमोहनसूरीश्वरविनेयावतंसोपाध्यायपदालड्कृतश्रीमत्प्रतापविजयगणिवरचरणाज- 卐 चञ्चरीकप्रवर्तकमुनिश्रीधर्मविजयविरचितायां श्रीनवतत्त्वसुमङ्गलाटीकायां नवमं मोक्षतत्त्वं समाप्तम् ॥ , N A G T V 卐 A L ॥१५९॥ 卐 A au S क N 卐 ॥ A V 卐 A T 卐 卐 अथ एकीककरः 卐 A अर्हत्सिद्धमुनीशपाठकयति-श्रद्धानज्ञानव्रतं, संयुक्तं तपसा च यन्नवपदं श्रीसिद्धचक्राऽभिधम् । 卐 यस्मिन् द्वित्रिचतुर्विधा च त्रितर यत्सेवयावाप शं, अंश पालनरेश्वरस्समदनस्तस्मात्तदाराध्यताम् ।। N एवं जीवाजवादीनि नवान्यपि तच्चानि व्याख्याय संप्रति तत्वावधस्य कं फलमि प्रदर्शयिपया आह- 卐 卐 A जवाइनवपयो जो जाणइ तस्स हइ सम्त्तं । भावेण सद्दहंतो अयाणमणेऽवि सम्रं । ५१ 卐 टीका;- जीवाइनवपयत्त्थे ' इत, वादनवपदार्थान् जीवाज वपुन्यपापाऽऽश्रवसंवरनिर्जराबंधमोक्षनाम्ने नवपदार्थान् यो जानाति लक्षणविधानाभ्यां तत्तत्तत्चस्वतत्त्वमवगच्छति तत्त्वावबोधसंपन्नाऽऽत्मा भवतीत्यर्थः तस्य सम्यक्त्वं 9 निःश्रेयसतरु जं प्रशमसंवेगनिदाऽकम्पाऽऽस्तिक्यानुगम्यं स्यादिति । ननु पाञ्चिन् माषतुपप्रमुखाणां ज्ञानावारककम - 9 ' मुनीश' इति शब्देन मुनीनामीश आचार्यो विज्ञेयः । 卐 ॐ G V L १ n- LC N s S IA V सम्यक्त्वस्य तत्त्वार्थ- 卐 M श्रद्धा- 卐 तत्वम् A T अनवतत्वः दयवतां तत्त्वज्ञानाऽभावेऽपि शमसंवेगादिलक्षणैः सम्यक्त्वादिलाभाः सिद्धान्ते श्रूयन्तेऽतः कथं प्रतिपाद्यते वादेपदार्थान् जानाति तस्य सम्यक्त्वं स्यादित्यत आह-'भावेण सदहंतो अयाणमाणेऽवि सम्मत्तं ' इति, ज्ञानावर येदयात्तत्त्वज्ञानाऽभा- कायां वेऽपि तत्वभूतान् पदार्थानजानन्नपि भावेनाऽऽत्माभिप्रायेण न तु वाक्सौष्ठवमात्रेण तत्त्वानि श्रद्दधान आवारककमेंदयात् प्रज्ञाया बैकल्येऽपि 'जं जिणेहें पन्नत्तं तमेव निस्सं सचं ' इति प्रतिपद्यमानः सम्यक्त्वमर्जयति । अनेनैतद्विज्ञायते यत् ॥१६०॥y श्रुतमधीयानस्याऽध्ययनादिकारणात् क्वचिदधिगमसम्यग्दर्शनलाभः, क्वचिच्च सम्यक्त्वलाभाचत्वावबोधः । न च प्रथमपक्षे 卐 सम्यक्त्वलाभात् प्रागज्ञानभावमाश्रित्य नाऽज्ञानात्सम्यक्त्वमिति वाच्यम् , यतस्सत्यपि सम्यक्त्वप्राग्भाविन्यज्ञाने तथाविधत- त्ववेदिगुर्वादिप्रबोधाद्यथावस्थतवस्तु विज्ञानसामार्थ्यात्तदुपग्रहसम्यक्त्वावाप्त न काचिद्विप्रतिपत्तिः यतस्तत्र नाऽज्ञानजन्यं 卐 सम्यग्दर्शनमिति विज्ञेयं, सम्यग्दर्शनं तु गुर्वादिप्रबोधायाप्तयथार्थवस्तुपरिज्ञानप्रभवदर्शनमोहन योपशमक्षयनिमित्तैरेव प्रजायत इति । द्विर्तयपक्षोऽपि श्रेयान् यतो बुद्धिमान्यायथावस्थतपरिज्ञान विरहितोऽपि तत्वार्थश्रद्धानात् सम्यक्त्वलामं समश्नुते, अत एवोमास्वातिवाचकवरेण्यैरभि हेतं 'तचाऽर्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्' इति । ननु निखिलपदार्थानां यथार्थतत्त्वा- वबोधो ज्ञानावरण यक्षयक्षय पशमसमुत्थः, यथावस्थतवस्तुश्रद्धानलक्षणं सम्यक्त्वं च दर्शनमहोपशमक्षयक्षयोपशमप्रभवं, तत्कथं ज्ञानावारकक्षयादिजन्यं तत्वविज्ञानं श्रद्धानलक्षणसम्यग्दर्शनावाप्त कारणतां विभत ? तजात्यकारणस्यैव तत्तद्गुणावाप्त सामर्थ्य न हु जात्यस्ये ते चेत् ? सत्यं, ज्ञानावारकक्षयक्षयोपशमोद्भवं तत्व विज्ञानं यद्यपि वैजात्यकारणटेन 卐 न साक्षात् सम्यक्त्वोपलब्ध हेतुस्तथापि तत्त्वविज्ञानजन्यदर्शनमोहानन्तानुवन्धिक्षयोपशमादिभिः पारम्पर्येण सम्यम्- A 卐 N ध G T 卐 V ज L A ॥१६० 卐 卐 A au 卐 A V A N. T दर्शनावाप्त पारम्यर्येण हेतुत्वे तत्त्वविज्ञानस्य न किञ्चिदविरुद्धम् । वस्तुतस्तु यथाभूततत्त्वार्थश्रद्धानस्याऽपायरूपत्त्वा- U दपायस्य च मतिज्ञानस्य भेदत्त्वान्मतिज्ञानावरणीयक्षयोपशमक्षयरूपमेव सम्यक्त्वम् , दर्शनमोहोपशमादयस्तु मतिज्ञाना- 卐 वरणीयक्षयोपशमक्षयप्रभवापायरूपसम्यक्त्वस्य प्रकाशकाः, अनेन सम्यक्त्वस्यान्तरङ्गं कारणं मतिज्ञानावरणीयक्षयोपशमादिर्न तु दर्शनमोहोपशमादयः, दर्शनमोहोदयस्तु श्रद्धानलक्षणसम्यक्त्वजनकमतिज्ञानावरणीयादिक्षयोपशमभावमाश्रित्य प्रतिबन्ध- 卐 कतामेति ततः कारणस्य कारणे कार्योपचारात् दर्शनमोहोदय एव सम्यक्त्वगुणस्य प्रतिवन्धकतयोर क्रियते, अनयाऽपेक्षया च सम्यक्त्वस्य त्रैविध्यमन्यथा मतिज्ञानावरण यस्य कर्मण उपशमाऽभावाद पशमिकसम्यक्त्व देनाऽपि न भवितव्यमिति । अनेनाऽभिप्रायेणैव मेधाविमूर्धन्यैर्भाष्यकारभगवद्भिरुमास्वातिवाचकैस्तत्त्वार्थभाष्ये भाष्यकाराऽभिप्रायं यथार्थमनुसरद्भिः श्रीसिद्धसेनसूरिप्रकाण्डैस्तट्ट कायां चैवं प्रत्यपादि, तद्यथा-भाष्यम्-सम्यग्दर्शनं केन भवति ? । निसर्गादधिगमाद्वा भवतीत्यु- 卐 क्तम् (१-३)। तत्र निसर्गः पूर्वोक्तः। अधिगमस्तु सम्यग्व्यायामः । उभयमपि तदावरप यस्य कर्मणः क्षयेणोपशमेन क्षयोपशमाभ्यामिति । (सूत्र ७. अ. १) 卐 टीकैकदेशः–'तदावरण य' इत्यादि तस्य रूचिलक्षणस्य ज्ञानस्य यदावरप यकं तत् तदावरणीयं, आवरण यशब्दाच्च नियते ज्ञानम् , तदन्यत्र हि ज्ञानदर्शनावरणीयवर्जिरे कर्मणि नावरण यव्यवहारः प्राय इति । के पुनस्तदावरण यम् मतिज्ञानाद्यावरणीयम् , अनन्तानुवन्ध्यादि च निमित्ततया आवरण यम्, यतस्तस्मिन्नुपशान्तेऽनन्तानुबन्ध्यादिकर्मणि तत् मतिज्ञानावरणीयं क्षयोपशमावस्थां भजते, एतावता तदावरणीयं भण्यते । Xxxxx। ननु च ज्ञानावरणीयस्योपशमो नास्ति, 卐 卐 G 卐 T A V 卐 . [ue N S नवतत्त्व- सम्यगू दृष्टेस्स्व- रूपम् 卐 - कायां- V ।१६१॥ध A 卐 T 卐 A चया तन्निरूपितं ज्ञानावरणमस्यावरणमिति, तत् कथमेतत् ? । उच्यते सत्यमेतदेवं, किन्तु मोहन योपशमादस्य ज्ञानावरणस्य क्षयः क्षयोपशमो वा भवते, ततः क्षयात् क्षयोपशमाच्च सम्यग्दर्शन मिति xxxx॥५१॥ अथ केल्लक्षणं सम्यक्त्वं ? कदर्श वा मतः सम्यग्दर्शनिन इति प्रदर्शयति- सव्वाइ जिणेसरभासियाई वयणइ नन्नहा हुंति। इअबुद्ध जस्स म्णे, सम्मत्तं नि लं तस्स ।५२ का;-सहाइ ' इति, 'सर्वाणि जिनेश्वरभापितानि वचनान नाऽन्यथा भवन्ति' इति यस्य मनसि बुद्धिस्तस्य निश्चलं सम्यक्त्वं स्यादति । अत्र सर्वाणि जिनेश्वरभाषिताति कथनेन एकादिवचनमृते निखिलमपि जिनेश्वरभाषितं मन्यमानानां जमालिप्रभृतिनिह्नवानां मिथ्यादृष्टित्वं प्रदर्श्यते, यत एकादिवचनगोचरो प्रत्ययः जिनेश्वराणां रागद्वेपमोहान्त- रारिनिदकानां सर्वज्ञचविपरे बाधकः । जिनेश्वरास्तु गर्भत एव मतिश्रुतावधिलब्धिसंपन्ना जन्मानन्तरं गृहवासादि यथायोगमनुसरन्तः स्वयंवुद्धा अपि स्वोचिताचारपरिपालनार्थ समागतैलोकान्तिकदेवैः प्रतिबोधितास्सन्तो जन्मजरामरणार्त- मशरणं जगजन्तुजातमुद्ध“कामाः समृद्ध राज्यादिवैभवं तृणवदपहायैकान्तिकाऽऽत्यन्तिकशमावाप्त्यर्थं प्रवज्यामङ्गी कुर्वते, तदैव च विपुलमतिविशिष्टं चतुर्थ मनःपर्यायमुपलभन्ते । अनन्तरं सम्यक्त्वज्ञानचारित्रसंवराराधनकतत्परा ईर्यादिसमितिसम्पन्नाः पश्चाचाराचरणप्रयता उपसर्गपर पहादिसेनां निर्जित्य क्षपकश्रेणिसमारूढाः सूक्ष्मसम्पराये मेहन् यमुन्मूल्य द्वादशगुणान्ने प्रक्षणावशेषघातिकर्माणः स्वस्वछद्मस्थकालमतिगमय्य त्रयोदशगुणाद्यसमये केवलज्ञानं केवलदर्शनं च संप्राप्नुवन्ति, तत एव 'विगतरागद्वेषाज्ञानाः देवनिर्मितसमवसरणविराजमानाः सुरासुरनृतिर्यपर्पत्सेव्यमाना यथावस्थितवस्तुतचावबोधिन देशनां 卐 N A G T ज A V 卐 L 卐 A ॥१६॥ A 卐 S N 卐 卐 卐 M 卐 A V 卐 प्रददते न ततो क् । उक्तश्च;-'सम्यक्त्वज्ञानचारित्र-संवरतपःसमाधिबलयुक्तः । मोहाद नि निहत्याऽशुभानि चच्चारि कर्माणि ॥१॥ केवलमधिगम्य विभुः स्वयमेव ज्ञानदर्शनमनन्तं । लोकहिताय कृतार्थेऽपि देशयामास तीर्थमिदम् ॥ २॥' अयथार्थप्रतिपादनकारणानि रागद्वेषाऽज्ञानानि, ज्ञानावरण यादिनिखिलघातिकर्मक्षयान्न जिनेश्वराणां विपरीतार्थप्रतिपाद- नसम्भवः, तथाप्रतिपादनहेतूनां क्षयात् , नाऽकारणा च कार्यनिष्पत्ति रति न्यायात् । तथा चोक्तं-तरागा हि सर्वज्ञा मिथ्या न दुवते क्वचित् । यस्मात्तस्माद्वचस्तेषां तथ्य भूतार्थदर्शनम् ॥१॥' अत एकमपि सार्वज्ञं वचनममन्यमानः सर्वदे भगवत्य- प्रत्ययमुत्पादयति, तथाभूतश्च सन् मिथ्याचपङ्कपङ्किलमात्मानं विधत्ते, एकस्मिन्नपि प्रवचनार्थेऽभिनिवेशेनाऽसद्भुतश्रद्धाने तदितरमकलसद्भूतार्थश्रद्धानस्याऽप्यश्रद्धानकल्पत्त्यात् । तस्मात् सर्वाणि जिनेश्वरभाषिताति गदितं । न चाऽनेन व्याख्यानेन जैनेन्द्रवचनानुरागिणोऽपि प्रवचनपरिज्ञान विकलस्य गुरुनियोगायत्तस्य वायस्य कस्यचित् सम्यक्त्वाभावो प्रज्ञापनीयः, यतो ज्ञानावरणीयोदयसान्निध्यमात्रादुपजायमानाऽज्ञानायत्तं प्रवचनपरिज्ञानवैकल्यं गुरुनियोगजनितः प्रवचनार्थसंशयो वान सम्य- वप्रतिबन्धायालम् । तथा चोक्तं श्रीमच्छिवशर्मसूरिशेखरः कर्मप्रकृत्यां;-' सम्मदिठी णियमा उवइठं पवयणं तु सद्दहइ सदहइ असम्भावं अजाणमाणो गुरुणिओगा ॥१॥' अस्याथेयं गमनिका-सम्यग्दृष्टिींवो गुरुभिरुपदिष्टं प्रवचनं नियमाद्यथावत् अद्वत्त एव । तुरेवकाराथों भिन्नक्रमश्च । यः पुनः सम्यग्दृष्टिरप्यसद्भावमसद्भूतं प्रवचनं श्रद्दधाति सेऽवश्यम- जानन् स्वयं परिज्ञानविकलः सन् यद्वा गरोस्तथाविधसम्यकपरिज्ञानविकलस्य मिथ्यादृष्टेवा जमालिप्रख्यस्य नियोगादाज्ञापा- 卐 T N G A 卐 A T 卐 L 卐 V ) A A ए ध N S नवतत्व V N ध रतत्र्यात्, नान्यथा । अत्र च साहजिकमज्ञानं ज्ञानावरणविपाकोदयसान्निध्यमात्रादुपजायमानं न सम्यक्त्वप्रतिबन्धकं । सम्यक्त्वा- सुमाला गुरुनयोगजनितं तु मध्यस्थस्य विनेयस्य नानामतदर्शिनो मिथ्याचप्रदेशोदयमहिम्ना विप्रतिपत्त्युपनीतप्रवचनार्थसंशयरूपं वाप्त को 卐 卐 र्ट कायां सम्यक्त्वप्रतिबन्धाभिमुखमपि तमेव सच्चमित्याद्यालम्बनरूपोत्तेजकप्रभावान्न सम्यक्त्वं प्रतिबद्धुमलमित्यज्ञानाद्गुरुनियोगाद्वा- M लाभः? ॥ ॥१६२॥ ॐ ऽसद्भूतार्थश्रद्धानेऽपि भावतो जिनाज्ञाप्रामाण्याभ्युपगन्तुर्न शुभात्मपरिणामरूपसम्यक्त्वोपघात इत भावन्यं । एतेन ॥ यदुच्यते केनचित् परपक्षनिश्रितस्य सर्वथा सम्यक्त्वं न भवत्येवेति तदपास्तं द्रष्टव्यं, अनभिनिविष्टस्य मिथ्यादृष्टिनिश्रयाऽपि धड तदुपनीतासद्भतार्थश्रद्धानस्यास्वारसिकत्वेन स्वारसिकजिनवचनश्रद्धानाविरोधित्त्वात् । अभिनिविष्टस्य तु स्वपक्षपतितस्य परपक्षपतितस्य वा मिथ्यादृष्टिचानपायादित्यलं प्रपश्चेन ॥ ५२ ॥ 卐 अथ सम्यक्त्वगुणावाप्त को लाभः ? तत् प्रदिदर्शयिपयाह- अंतोमुहत्तमित्तं- फासियं हुज्ज जेहि सम्मत्तं । तोर्स अवड्डपुग्गल-परियहो च्व संसारो ॥५॥ टीका-' अन्तमुहूर्त्तमात्रमपि ' इत्यादि, आस्तां तावन्मुहूर्तप्रहरदिवसपक्षमासवर्षादिकालीनं सम्यक्त्वं भवक्षयाय 卐 परं अन्तर्मुहूर्त्तमात्रकालमपि ' येषां' भव्यानां यथाप्रवृत्ताऽपूर्वकरणाऽनिवृत्तिकरणावाप्ताऽन्तरकरणावस्थानां 'सम्यक्त्वम् ' औ- पशमिकादिभेदभिन्नं तत्त्वार्थश्रद्धानलक्षणं ' स्पर्शितं असंख्येयप्रदेशात्मकर्जवस्य प्रत्यात्मप्रदेशं मिथ्यात्त्वमोहनीयाऽनन्तानु- y वन्धिचतुष्टयोपशमाद्यवाप्ततत्त्वश्रद्धानं स्यात् तेपामुत्कृष्टतोऽप्यपापुद्गलपरावर्त्तप्रमाणावशेष एव संसारः, न ततोऽधिकः । ॥१६२ - A T V A ya y 卐 卐 A 卐 V चित्तु सम्यक्त्वगुणावायनन्तरं जातोपशमसंवेगादिगुणाढ्याः शघ्रमेव सर्वविरतिप्रतिपत्तिपुरःस्सरं क्षपकश्रेणिसमारूढाः केवललक्ष्म मनुभवन्ति, केचन संख्येयमसंख्येयं वा कालं संसारेऽतिगमयन्ति, चिच्च अपार्द्धपुद्गलपरावर्ताख्याऽनन्तकालमति- क्रम्यावश्यं मोक्षमभ्युपेयन्ति । अत्राऽयमाशयः-सम्यक्त्वलाभानन्तरं मिथ्यात्त्वोदयहेतुके प्रतिपाते सत्यपि नाऽनादिमि- थ्यादृष्टिबदुत्कृष्ट स्थितिवन्धं सप्ततिकोटीकोटिसागरोपमलक्षणं विधत्ते मिथ्यादृष्टिः, सकृत् सम्यक्त्वलाभात् तथाविधवकपायो- दयाऽभावात् । अनेनैव हेतुना चतुर्विधभङ्गापनमिथ्यात्त्वस्य सादिसान्तसंज्ञकश्चतुर्थो भङ्ग उत्कृष्टतोऽपार्धपुद्गलपरावर्तप्रमाणः प्रदर्शितः, सकृत् सम्यक्त्वप्रतिपत्त्यनन्तरमुत्कृष्टतोऽप्येतावता कालेन पुनः सम्यक्त्वाऽवाप्तेः सकृदाविद्धमणिवदिते । ५३ ।। अनन्तरगाथायामुद्दिष्टं पुद्गलपरावर्तपदं लक्ष्य कृत्य तत्स्वरूपं प्रतिपिपादयिषुराह- उस्सप्पिण् अणंता, पुग्गलपरिअट्ट) मुण्यव्यो । तेणंतऽतीअद्धा, अणागरद्धा अणंतरणा ॥५४ टका-'उस्सप्पिण' इति, उत्सर्पिण्युपलक्षणादवसर्पिणी च प्राक् ' समयावलं 'त्ति गाथायां उक्तस्वरूपा, ताभिरुत्स- पेण्यवसर्पिण भिरनन्तसङ्ख्याकाभिरेकः पुद्गलपरावर्ती भवतीति ज्ञातव्यम् । पुद्गलानामदारिकादिवर्गणागतानां निखिलाना- मपि परावर्त अंदारका दशरीरतया गृहीत्वा मोचनलक्षणं परिवर्त्तनं यस्मिन् काले स एतावान् कालः पुद्गलपरावतीऽऽख्यः । यद्यपि क्षेत्रादिविषयस्य पुद्गलपरावर्तरूपोऽन्वर्थो न घटां प्राञ्चति तथाप्यन्यथा व्युत्पादितस्यापि शब्दस्यान्यथा गशब्दवत् प्रवृ- त्तिदर्शनात् समयप्रसिद्धमर्थ विपर्य करोरी त न कश्चिद्देष इति । स च पुद्गलपरावर्तो द्रव्यक्षेत्रकालभाव दैश्चतुर्दा । एकैकः पुनः सूक्ष्मवादरभेदाभ्यां द्वविधः, तथाहि;-बादरद्रव्यपुद्गलपरावतः१, सूक्ष्मद्रव्यपुद्गलपरावतः२, बादरक्षेत्रपुद्गलपरावर्त्तः३, सूक्ष्म- 卐 M 卐 A 卐 N 卐 A T 卐 - 卐 A 卐 T A L V ज A ध A २८ 1 ប្រជុំ N S नवतत्व सुमङ्गला- कायां- 卐 A 卐 V 卐 A प्रा० पुदलपरा- वत्त M 卐 स्वरूपम् । ॥१६३॥ T क्षेत्रपुद्गलपरावतः४, बादरकालपुद्गलपरावर्त्तः५, सूक्ष्मकालपुद्गलपरावतः६, बादरभावपुद्गलपरावतः७, सूक्ष्मभावपुद्गलपरावर्त्तश्च ८। तत्र संसारकान्तारे पर्यटन्नेक योऽनेकैर्भवग्रहणैः सकललोकवर्तनः सर्वानपि पुद्गलान् यावता कालेन औदारिकशरीर- वैक्रियशन रजसशरीरभापाप्राणापानमनःकार्मणशरीरलक्षणपदार्थसप्तकभावेन यथास्वं परिणमय्य मुञ्चति स तावत्प्रमाणः कालो द्रव्यतो बादरः पुद्गलपरावत भवति । सप्तानामंदारिकवैक्रियतैजसभाषाप्राणापानमनःकार्मणमध्यादन्यतरेण पुनरेलेन केनचिदंदारिकादिना पूर्वप्रदर्शितप्रकारेण सकललोकवर्तिपुद्गलानां अंदारिकादिशर रतया गृहीचा मोचने सूक्ष्मद्रव्यपुद्गल- परावतें भवति । विवक्षितदारकादिभेदाविशेषैः शेषैः पड्भिर्भेदैः परिणमिता अपि न गृह्यन्त इति । उभय देऽपि आहारक- शरीरं न ग्राह्य, कादाचित्कत्त्यातल्लाभस्येत । एत्त्वाचार्या एवं द्रव्यपुद्गलपरावर्तस्वरूपं प्रतिपादयन्ति, तथाहि-यदेको जयोऽ- नेकैर्भवग्रहणैरदारकशरोरवैक्रियशर रतैजसशर्र स्कार्मणशर रचतुष्टयरूपतया यथास्वंसकललोकवर्तनः सर्वान् पुद्गलान् परिण- मय्य मुञ्चति तदा बादरो द्रव्यपुद्गलपरावर्तो भवति । यदा पुनरैदारिकादिचतुष्टयमध्यादेन जेनचिच्छर रेण सर्वपुद्गलान् परिणमय्य मुञ्चति शेपशरीरपरिणमितास्तु पुद्गला न गृह्यन्ते एव तदा सूक्ष्मो द्रव्यपुद्गलपरावर्तो भवतीति । यदाऽनन्तभवभ्रम- गर लो जन्तुरनन्तरेषु व्यवहितेषु चाऽपराऽपराऽऽकाशप्रदेशेषु श्रियमाणः सर्वानपि चर्तुदशरवात्मकलोकाकाशप्रदेशान् मरणेन स्पृशति तदा वादरक्षेत्रपुद्गलपरावर्ती भवति। रोष्वाकाशप्रदेशेष्ववगाढो जन्तुरेकदा मृतस्तेभ्योऽनन्तरव्यवस्थितेष्वेव नमःप्रदेशे- वन्यदापि यदि म्रियतेऽपरस्यां लायां तेपामप्यनन्तरव्यवस्थितेष्वाकाशप्रदेशेष्वन्यस्यां वेलायां रेपामप्यनन्तरव्यवस्थिते- प्वाकाशप्रदेशेवन्यस्यां बेलायां तेषामग्यनन्तरेष्वन्येष्वेवं तावन्नेयं यावदित्थमपरापरेषु नैरन्तर्यव्यवस्थितेषु नभःप्रदेशेषु क्रमेण N A 卐 G ध 卐 T 卐 V L . A 卐 ॥१६३॥ ध 卐 N 卐 S 卐 U A 卐 V 卐 A A को म्रियमाणो जन्तुः सर्वानपि लोकाकाशप्रदेशान् स्पृशति, रे चापरप्रदेशवृद्धिरहिताः पूर्वावगाढा एव दूरव्यवस्थिता वाऽऽकाशप्र- देशा मरणेन स्पृष्टास्ते च न गण्यन्ते तदा सूक्ष्म क्षेत्रपुद्गलपरावतः। कालतस्तु यदेत्सपिण्यवसयि समयेषु सर्वेष्वपि क्रमेणin क्रमेण चानन्तानन्दैर्भवैरेको जन्तुZतो भवति तदा बादरकालपुद्गलपरावर्ती भवति । केवलं रेषु समटेष्टेकदा मृतोऽन्यदापि यदि तेष्वेव समयेषु म्रियते तदा ते न गण्यन्ते, यदा पुनरेकद्वितयादिसमयक्रममुल्लंघ्या प अपूर्वेषु समयेषु नियरे तदा 卐 व्यवहिता अपि समया गण्यन्त इति । सूक्ष्मस्तु कालपुद्गलपरावर्त्तस्तदा भवति यदोत्सर्पण्या अवसण्या प्रथमसमये चिन्म- तस्ततः पुनरपि समयोन वेंशतकोटी कोटी भरतक्रान्ताभर्भूयोऽपि स एव जन्तुः कालान्तरेण तस्या एव द्वित यसमये म्रियते पुनरपि कदाचित्तथव ताभिरतिक्रान्ताभिस्तस्या एव तृतीयसमये, एवं चतुर्थपञ्चमषष्ठा देसमयक्रमेणानन्ताऽनन्तभावत्सर्वे- ऽप्युत्सर्पेण्यवसण्य शतिसागरेपमकोर्ट केटमानयोः समया मरणेन व्याप्ता भवन्ति । रे' तु प्रथमादिसमयक्रम- 卐 ध्य व्यवहितसमयाः पूर्वस्पृष्टा वा मरणेन व्याप्तास्ते तु न गृह्यन्रे एटेत । अथ भावतः पुद्गलपरावर्त्त उच्यते- अनुभागवन्धाध्यवसायस्थानान मन्दप्रवृद्धतरादिभेदेनाऽसंख्येयले काकाशप्रदेशप्रमाणानि वर्त्तन्ते तते यदैककस्मिन्नडभा- गबन्धाध्यवसायस्थाने क्रमेणोत्क्रमेण च प्रयमाणेन जन्तुनाऽसंख्टेयलकाकाशप्रदेशप्रमाणानि सर्वाण्यपि ता स्पृष्टान भवन्ति तदा बादरो भावपुद्गलपरावर्तों भवति, अत्रापि यदध्यवसायस्थानमेकदा मरणेन स्पृष्टं तदेवाऽन्यदापि यदि 2 स्पृशति तदा तन्न गण्यते, अपूर्व तु दूरव्यवहितमपि स्पृष्टं गण्यते । सूक्ष्मस्तु क्रमेण चन्त्यस्तद्यथा-इह किलाडुभागबन्धाध्य- वसायस्थानानि वध्यमानकर्मपुद्गलेषु तादृशानुभागपलिच्छेदनिर्तकाने असंख्येयले काकाशप्रदेशप्रमाणानि मन्दप्रवृद्ध- 卐 N T T 卐 L V ध " N Sh S 卐 A *नवतत्व समगला- 卐 U कायां- V ॥१६४॥ A 卐 T 卐 A N प्रवृद्धतरादिभेदतो वर्तन्ते, तत्र च सर्वस्तोकानुभागपलिच्छेदजनके कपायोदये वर्तमानः कश्चिजन्तुर्मृतः, ततः कदाचित् प्रकर्णा० पुनरपि तस्मादनन्तरव्यवस्थिते द्वित्येऽनुभागवन्धाध्यवसायस्थाने विशेषाधिकाउभागपलिच्छेदजनले वर्तमानो मृतः, पुनरपि 卐 सिद्ध- तस्मात् कदाचिद्विशेषाधिकानुभागपलिच्छेदजनके तृतीये मृतः, एवं क्रमेण क्रमेण विशेषाधिकाङभागपलिच्छेदजनकाध्य- . M मेदाः । वसायस्थानलेषु वर्तमानस मरणं तावद्वाच्यं यावत्सर्वेत्कृष्टानुभागवन्धाध्यवसायस्थाने म्रियमाणेन जन्तुनाऽनन्ताऽनन्तैमरणैः सर्वाण्यपि स्पृष्टानि भवन्ति, अत्राऽपि प्राग्वद् व्यवहितानि पूर्वस्पृष्टानि च न गण्यन्त इति सूक्ष्मो भावपुद्गलपरावर्तः । अत्र प्रमाणविपये सर्वत्र सूक्ष्मा एव कर्त्तव्या न बादरा इति ॥ इत्येवं व्याख्यातस्वरूपद्रव्यादिसूक्ष्मपुद्गलपरावर्ता अनन्तसं- 卐 ख्याका व्यतिक्रान्तास्सन्तऽतीताद्धा भवति, ततोऽप्यनन्तगुणाऽनागताद्धा । लेचित्तु अस्तानागताद्धयोरनन्तशब्दसाम्यात्तु- ल्यत्त्वमपि प्रतिपादयन्ति तदपि नाऽस चेनमपेक्षयेति ॥ ५४॥ अथाऽनन्तपुद्गलपरावर्त्तकालं यावत् संसारे भ्रान्त्वाऽपि सम्यग्दर्शनादिसाधनेन सिद्धिमुपगताः सिद्धा कति वेधाः ? तत्प्रदिदर्शयिषयाऽऽह- 卐 जण अजिण तित्थऽतिस्था, गहि अन्न सलिंग थी नर नपुंसा । पत्त्य सयंबुद्धा, वुद्धबोहय सिद्धणिका य । ५५॥ y टीका-'जण' इत, जिनसिद्धाजिनसिद्ध-तीर्थसिद्धाऽतीर्थ सिद्ध-गृहलेङ्गसिद्धाऽन्यलिङ्गसिद्धस्वलिङ्गसिद्ध-लि- ।१६४॥ G T A 卐 V 卐 L ॥

Y N 卐 S 卐 U A 卐 V 卐 A 卐 M 卐 A 卐 T सिद्धपुरुषलिङ्ग सद्धनपुंसकलिङ्ग सद्ध-प्रत्येकबुद्ध सिद्धस्वयंबुद्धसिद्धबुद्धबोधित सद्ध-एकसिद्धानेकसिद्धभेदैः सिद्धाः पञ्चदश- विधा इति । वस्तुतस्तु सिद्धा न पञ्चदशविधाः कन्तु द्वमेदभिन्नास्त्रिभेदभिन्ना वा । तद्यथा-सिद्धा द्वविधाः, जिनसद्धा अजिनसिद्धाश्च, यद्वा सिद्धास्टर्थात सिद्धभेदाभ्यां द्विविधाः, अथवा एकसिद्धाऽनेकसिद्धभेदाभ्यां सिद्धा द्विविधाः । अथवा सद्धास्त्रिविधाः, गृहिलिङ्ग सद्धाः, अन्यलिङ्गसद्धाः, स्वलिङ्गसिद्धाश्च, यद्वा र लिङ्गसिद्धपुरुषलिङ्ग सद्धनपुंसकलिङ्गसि- द्धभेदैत्रैविध्यं परिभावन यम्, अथवा प्रत्येकबुद्ध सिद्धबुद्धबोधित सद्धस्वयंबुद्धसिद्ध दैस्त्रिभेदभिन्नत्त्वमवगन्तव्यम् उक्तानां भन्नभिन्नापेक्षया द्विझेदानां त्रिभेदानां वा मध्ये निखिलानामपि सिद्धानामन्तर्भाव इत्यर्थः। नन्वस्तु द्विभेद भन्नत्वं त्रिभेद- भन्नत्वं वा परं क्षपितकर्माष्टकानां तुल्यानन्तज्ञानदर्शनादिगुणानां सद्धानां कथं भेदत्त्वं प्रतिपाद्यते ? भेदत्त्वं तु कर्मोदयजन्यं, तस्य च तेषां सर्वथाऽभावात् कथं भेदः इति चेदुच्यते-न सिद्धत्त्वावाप्यनन्तरं तेषां भेदः प्रतिपाद्यते, रे च जिनसिद्धाजिन- सिद्धादिभेदाः प्रारक्तास्ते निखिला अपि भवस्थावस्थामाश्रित्योपचारेण प्रोक्ता इति । यथा निखिला अपि सिद्धाः द्विभेद भिन्नाः, तद्यथा जिनसिद्धाः, अजिनसिद्धाश्थ, तत्र जिनस्तीर्थकरः, तीर्थकरनामविपाकोदयानुभूतीर्थकरसमृद्धयः सन्तो ये शिवंगता रे जिनसिद्धाः, ये च सामान्यलेवलित्त्वमभूय सिद्धत्त्वं प्राप्तास्तेऽजिन सिद्धाः । तीर्थकरास्टीर्थ प्रवर्त्तयन्ति, तदनन्तर ये सिद्धिमुपगतास्ते तीर्थसिद्धाः, ये च तीर्थस्थापनायाः प्रागेव महानन्दपदवी मितास्तेऽर्थसिद्धाः । गृहस्थावस्थायामेव जन्मान्त- राराधितसर्ववरतिसामर्थ्यादवाप्तवलज्ञानदर्शना अल्पायुष्कास्सन्तोऽन्तर्मुहूर्त्तान्तमक्षं सम्प्राप्तास्ते गृहिलिङ्गसिद्धाः तापसाद्य- न्यलिङ्गव्यवस्थिता अपि तथाविधसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रयोगतः केवलज्ञानदर्शनावाप्तिपूर्वकं क्षीणाऽष्टकर्माणो ये क्तं जग्मुस्ते- N 卐 G A 卐 T 卐 卐 V L 卐 A 卐 A N 卐卐 A । ध, प्रर्कण. सिद्धा- भेदाः V 卐 M श्री A T y ऽन्य लङ्गसद्धाः। उक्तञ्च-'सेयंवरो य बुद्ध य आसंवरे य अहव अन्नो वा। समभावभाअप्पा लहइ सुरकं न संदेहो ।१॥ नवत इम गृहेलेङ्गान्य लिङ्ग सद्ध केवलज्ञानप्राप्त्यनन्तरं यद्यल्पायुष्क स्यातां तदैव ते गृहिलङ्गाऽन्य लङ्गसद्धाववगन्तव्य, अन्यथा काय- दर्घाटुप सते केवलज्ञानल ब्धिसमनन्तरमेव देवताप्रदत्तमुनिटेपाटकाराट् स्वलिङ्गसद्धचं तयः । रजोहरणप्रमुखस्वलिङ्गस- द्भावे ये शवं सम्प्रातास्ते स्वलिङ्ग सद्धाः। रे स्त्र लिङ्गे वर्तमानाः सिध्यन्ति रेस लङ्ग सिद्धाः। ये पुरुषलिङ्गे वर्तमानाः सद्ध्यन्ति रे ॥१६५॥ % पुरुषलिङ्गसिद्धाः।रेचन पुंसकलिङ्गेवर्तमानाः कर्माष्टकक्षयं कुर्वन्ति रे नपुंसकलिङ्गसिद्धाः। अत्र लङ्गेन सर्वत्राऽऽकृतिरवगन्तव्या, वेदोदयात्मक लेङ्गस्य च निवृत्तिबादरे व्यवच्छिन्नत्वात् । सन्ध्याऽभ्ररागप्रभृत्येकं नमित्तं दृष्ट्वा जातसंवेगास्तत्कालमेवेपल- ॐ ब्धकेवलज्ञानदर्शनारे सिद्धिं यान्ति ते प्रत्येकबुद्धसिद्धाः, टे च गुरूपदेशादि तथाविधनमित्तमृते जन्मान्तराराधित धिप्रभावादि- हजन्मन्युषजातवैराग्या अवाप्तलेवलज्ञानादिलब्धयश्च शिवापयान्ति, अथवा करास्ते स्वयम्वुद्धसिद्धाः, तथाविधनुर्वायुपदेशेन प्रतिबुद्धास्सन्तः केवलज्ञानाद्युपलब्धिपूर्वकं मक्षं ये व्रजन्ति रे बुद्धबोधित सिद्धाः । प्रत्येकबुद्धस्वयंवुद्धयोध्युपधिश्रुतने- पथ्यकृतो विशेषस्तद्यथा-स्वयम्बुद्धा बाह्यनिमित्तमन्तरेणैव बोधिं प्राप्नुवन्ति, प्रत्येकबुद्धास्तु बाह्यं कञ्चित्सन्ध्याभ्ररागप्रमुखं निमित्तमाश्रित्य बोधं लभन्ते, एकाकिनैव च वहरन्ति । स्वयम्बुद्धानां पात्रप्रमुखो द्वादशवध उपधिः, प्रत्येकबुद्धानां टु जघन्यतो द्विविध उत्कृष्टतो विना प्रावरणं नवविध उपधिः। स्वयम्बुद्धानां यदि श्रुतज्ञानं स्यात्तदा पूर्वाधतं स्याद- 卐 न्यथा न स्यात् । यदि पूर्वाधतं श्रुतं स्यात्तदा सुनिनेपथ्यं देवस्तं समर्पयत, अथवा गुरोः पार्थे गत्वा तन्नेपथ्यमङ्ग कुरुते, स्वैर वेहरणेच्छायां स्वैरं विहरत अथवा गच्छान्तर्गतो गच्छेव सह विहरति । पूर्वाधोतश्रुताऽभावे तु गुरोः पार्श्वे गदैव 卐 N A G T 卐 A V L A ॥१६५। 卐 प ध S N 卐 U A A A 5 साधुवेषं स कुरुरै गच्छेन सहैव विहरते । प्रत्येकबुद्धानां तु जघन्यत एकादशाङ्गप्रमाणमुत्कृष्टत देशोनदशपूर्वप्रमाणं श्रुतं स्यादित । स्वयम्सुद्धा देवताप्तिं गुरुप्रदत्तं वा साधुनेपथ्यं कुर्वन्ति, प्रत्येकबुद्धास्तु देवताप्रदत्तमेवाङकुर्वन्रेत्यादिवेस्तरो श्रनन्द सूत्रणें-प्रज्ञापनावृत्तितोऽवसेयः ॥ रे कस्मन्समये एका केन एव मक्षं गताः परं न तत्समकालमन्यः कश्च- न्मुक्तमुपगत इत्येकसिद्धाः। तथैक स्मन् समये रे जघन्यते द्वावुत्कृष्टतऽष्टाधिकशतसंख्याकाः शिवं गतास्तेऽनेक सद्धाः । ॐ अत्राऽयं नियमस्तद्यथा-ययेकमाद कृत्वा द्वात्रंशत्संख्यां यावत् प्रतिसमय उवा सर्दै गच्छन्त तर्हे उत्कृष्टतेऽष्टसमयान् यावद् गच्छन्त, नवमे समरे त्ववश्यमन्तरं जायते । यत्रंशत्संख्यामादौ कृत्त्वाऽष्टचत्वारेंशत्संख्यां यावत् सिद्ध यान्त ॐ तदा सप्त समयं यावदनन्तरं नियमेन विरहः । अष्टचत्वारंशतः षष्टिं यावत् षट्सामयिकऽविरहते मोक्षगमनकालः, तते T विरहः। एकषष्टित द्वासप्तते यावत् पञ्चसामयिक नैरन्तर्येण क्तिगमनानेहाः ततेोऽवश्यमन्तरमुपजायरे त्रिसस्तमाद कृत्वा चतुर तिं यावच्चतुःसामयिक मेक्षगमनाद्धाऽविर हता, तते व्याघातः पञ्चाश त्याः पण्णवते यावद् त्रसामयिकः A कालोऽनन्तरमन्तरमुपजायते । षण्णवतिसंख्याया व्युत्तरशतं यावद्विसामयिक्यद्धा, ततो वरहः त्र्युत्तरशतसंख्यामाद कृत्वा अष्टाधिकशतसंख्याका एकं समयं यावत् सद्धमुपयान्ति, द्विरी ये समयेऽवश्यं विरहः। इत्येवं सद्धविशेषाः सम्यगवन्तव्याः T प्रतिसिद्धं च षड्भेदास्संगच्छन्ते तद्यथा-रजिनेश्वर जनसिद्धः, स एव रेर्थ सिद्ध, स एव स्वलिङ्ग सिद्धः, स एव पुरुष- लिङ्गसिद्धः, स एव स्वयम्बुद्धसिद्धः, स एव एकसिद्धः मरुदेवा च अजिनसिद्धा, सैवाऽतीर्थसिद्धा, सैव गृहिलङ्गसिद्धा, V. सैव सीलिङ्गसिद्धा, स्व स्वयम्बुद्ध सिद्धा, सैव चैकसिद्धेत्येवमन्यत्राऽपि स्वधिया परिभाव यर ।। ५५ ।। 卐 N 卐 ध L 卐 A N Cs up नवतत्व 驗 A 卐 V र्टकायां- प्रकीर्णा० 卐 सोदाह- M रणाः सिद्ध- 卐 दाः। 卐 ॥१६६॥ अथ प्रागुक्तानेव सिद्धझेदान् दृष्टान्तैर्भावयति- 'जणसिद्धा अरिहंता,अजिणसिद्धा यपुंडरियपमुहा।गणहरि तित्त्थसिद्धा,अतित्थसिद्धायमरुदेवी।५६ टीका-"जिणसिद्धा" इति, अनन्तरगाथायां व्याख्यातस्वरूपा जिनसिद्धार्थकरसिद्धा अर्हन्त एव भवन्ति, तेषामेव जिननामविपाकोदयसम्मवात् । पुण्डरीकाखा अजिनसिद्धा अतीर्थकरसिद्धास्सन्ति, जिननामरसोदयाभावात् । गणधारिण- स्तीर्थसिद्धाः, तेर्थस्थापनानन्तरं मोक्षगमनात्तेषाम् । अतीर्थ सिद्धा च मरुदेवा, यतो भगवता ऋषभदेवेन विहितायास्तीर्थ- स्थापनाया प्रागेव तस्या मोक्षं गमनात् । तद्व्यतिकरश्वायम्-यदा च भगवता केवलज्ञानमुपलब्धं तदेन्द्रादयोऽसंख्यदेवाः केवलमहिमानं कर्त्तमुपागताः समवसरणप्रमुखदिव्यर्द्धं कुर्वाणा समवसरणे चिराजिते भगवति तत्रस्था एव प्रभुदेशनां शृण्वन्ति । भरतोऽपि प्रभोः केवलज्ञानोपलब्धि श्रुत्वा निरन्तरमुपालम्मं प्रददतीं पुत्रवियोगेन रुदन्तीमत एव पटलावृतचक्षुष्का मरुदेवां हस्तिस्कन्धे संस्थाप्य प्रभुं वन्दनाथं चलितः, दूरत एव दिव्यध्वनिं श्रुत्वा प्रमोदभरमेदुरा उल्लसितहृदया मरुदेवा मनस्येवं ध्यायते यत्पुत्रवियोगेन रुदन्त्या मम चक्षुष अपहनतेजसी जाते, प्रत्यहं पुत्रचिन्ताभराक्रान्ता सत यदाऽऽर्त- ध्यानोपगता तदा पुत्रस्तु सुरासुरनिकरनिपेव्यमाण इदृशमृद्धिमुपभुञ्जानोऽपि सुखादिसन्देशवार्तामपि न प्रेषयति । धगिममेकपाक्षिकं स्नेहमिति विरक्ता भध्यानपरा घातकर्मक्षयावाप्तवलज्ञानदर्शना तत्रैव हस्तस्कंन्ध सिद्धिं जगाम । रेर्थस्थापनायाः प्रागेव तस्या मोक्षगमनात् साऽतीर्थ सद्धेति ॥ ५६ ॥ १ ननु तीर्थस्थापनायाः प्राक् तीर्थव्यवच्छेदाऽनन्तरश्च ये मोक्षमुपयान्ति तेपां सर्वेपामप्यतीर्थसिद्धत्त्वेऽतीर्थसिद्धत्त्वं द्विविधं, 卐 T 卐 A N 卐 G T 卐 A 卐 V 卐 A L 卐 A 7 - S 卐 N 卐 A V N T गहिलिङ्गसिद्धभरह, वल्कलदरीर अन्नलिंगम्मि । ॐ साहू सलिङ्गसिद्धा, थी सद्धा चंदणा पमुह । ५७ 卐 M टीका-'गिहिलिंगसिद्धभरहो' इति, गृहिलिहसिद्ध भरतचक्र, यतः श्रूयते यदादर्शभुवनेऽनित्यभावनां भावयतस्तस्य केवलज्ञानमुत्पेदे । यद्यप्यत्र सिद्धत्वमाश्रित्त्यैव जन सिद्धादिभेदा विवक्षितास्तथाप्यत्र भरतचक्रवर्तिदृष्टान्ते केवलोत्पादविवक्षया : A. गृहिलिङ्गत्वमुक्तं तत्र लेवलिन वश्यं सद्धर्भविटेत तस्य गृहिलिङ्गसिद्धत्वं प्रतिपन्नमन्यथा लेवलप्राप्यनन्तरं देवताप्रदत्त- A a साधुवेशोपलब्धिपूर्वकस्तस्य 'बहारो भव्यप्रतिबोधनं च चरतानुयोगे प्रतिपादितमिति । वल्कल चिर अन्य लङ्गे सिद्धः, स च प्रसन्नचन्द्रराज_ता तापसस्वपितुः पार्थे परिवसन् वृक्षत्त्वगादिप्रावरणेन गुणनिष्पन्ननामा एकदा स्वपितुस्तु 5 दृष्ट्वाजातजातिस्मृतिर्जन्मान्तराराधितसंयमप्रभावादवाप्तकेवलस्तल्लिङ्गे वर्तमान एव मक्षं ययावत तस्याऽन्यलिङ्गसिद्धत्व मिति 卐 तथाऽऽद्यगणधरेणेन्द्रभूतनाऽक्षणमहानसलब्ध्या परमानेन भेजतानां सा सहस्रसङ्ख्याकानां तापसानामप्यन्यलिङ्ग सेद्ध- d ) वमन्यलिङ्गे एव तेषां केवलोत्पत्तेः । तथा ' साहू सलिङ्गसिद्धा' साधवश्च गृह तरजहरणमुखवस्त्रका दिसाधुलिङ्गा मुनयः - केवलज्ञानावाप्तिपूर्वकं शिवं यान्ति तदा ते स्वलिङ्गसिद्धाः । रु लिङ्गसिद्धाश्चन्दनाप्रमुखाः, चन्दना च महारप्रभः प्रथमा 卐 मरुदेवा च यथा तीर्थस्थापनायाः प्राक् शिवं गता तथा तीर्थविच्छेदाऽनन्तरं केचिन्मुक्तिमियन्ति न वेते चेदुच्यते-तीर्थविच्छेदाऽनन्तर- 卐 मपि जातजातिस्मृतयः केचन जीवा मोक्षं व्रजन्ति, तेपाश्चातीर्थसिद्धत्वं प्रज्ञापनायां प्रतेपादितमिति । 卐 A A V L A A टा N S 卐 A 卐 प्रर्क० सोदाहर- णाः सिद्ध- दाः। V A 卐 A T अनवतत्त्व- सा प्रसिद्धवृत्तान्तेति न वितन्यते ॥ ५७ ॥ सुमङ्गला- पुंसिद्धा गोयमाइ गांगेयाइ नपुंसया सिद्धा । पत्तेयसयंबुद्धा, भणिया करकंडुकविलाइ ॥ ५८ ॥ 卐 टीकायां- टीका-' पुंसिद्धा' इति, पुरुषलिङ्गसिद्धा गैतमगणधरादयोऽन्येऽपि ये पुल्लिङ्गे वर्तमानाः सिद्धिरुपगताः। गांगेया- दयश्च नपुंसकलिङ्गसिद्धाः, 'गांगेय' इति नाम्ना भष्मपितामह उपलक्ष्य परं पाण्डवचरित्रादिपु भीष्मपितामहस्याऽच्युत- ॥१६७॥ ॥ देवलोके गतर्वर्णितेति न तस्यात्र परिग्रहः, यश्च भगवत्यां भंगजाला दिप्रश्नयिता गाङ्गेयस्तस्य नपुंसकसिद्धत्त्वं न तत्रोद्दिष्टं, तस्मात् कस्य गाङ्गेयस्यात्र परिग्रहस्तत् कोविदकुलालङ्कारैश्चन्त्यम् । प्रत्येकबुद्धाः स्वयम्बुद्धाश्च क्रमेण करकंडुक पलादयो भणिता व्यावर्णिता इति । तत्र प्रत्येकवुद्धस्य करकण्डोवृत्तान्तश्चायम्-चम्पानगर्या दधिवाहनो राजा चेटकराज्ञः पुत्र्याः स्वपत्न्याश्च पद्मावत्या दोहदपूरणार्थं तां हस्तिस्कन्धे निवेश्य वने जगाम, तत्र पर्जन्यधारोच्छलितभूमिगन्धात् पलायमानं 卐 मत्तेभं दृष्ट्वा काश्चद्वटवृक्षशाखामाश्रित्याऽनन्तरं स्वपुर्यां समागतः, राई च वटवृक्षशाखामलग्ना सर तृपाएँ हस्तिनि कस्मॅिश्चित् सरस नवेशिते हस्तिस्कन्धादुत्तीर्णा सरस्तीरे यावत्सागारिकमनशनमङ्ग कृत्य स्थिता तावद्वनवासिना 卐 पितृव्येण तापसेन नगरी प्रापिता निण्णिा च सती विनागर्भकथामन्यां निखिलां स्ववार्तामार्याय निवेद्य दीक्षा जग्राह । क्रमेण समागरे प्रसवसमये रह से स्वगुव्र्यै नखिलं व्यतिकरं कथितवत सुश्राद्धप्रमुखसाहाय्येन पद्मावत' साध्वी पुत्र सुषुवे। पुत्रश्च पितृसंज्ञतां मुद्रिकां परिधाय रत्नकम्बलावृतं श्मशाने मुमोच, अनन्तरं कश्च तं गृह्णात द्रष्टुं यावद्रहसि स्थिता तावत् स्मशानरक्षकस्तं पुत्रं गृह चा स्वभार्यायै समर्पयामास । 卐 : सा पद्मावत चाण्डालं तमनुसृत्य तस्य गृहं ज्ञात्वा 卐 N A 卐 G T 卐 V L ॥१६७ 卐 A A 卐 S 卐 N ज U ज A V , 卐 A A 卐 पश्चादुपाश्रयमागत्य स्वस्वामिन्यै ' मृताऽपत्यं सुषुटे' इति मृषा व्यतिकरं वभाषे, प्रत्यह यत्र पुत्रस्तत्र गत्वा 'अवकर्णक' इत चाण्डालेन संज्ञतं तं स्ववालं रमयति । य वने च पुत्रे वयस्यैः सह क्रीडापरो यदा जयति तदा दण्डं याचते, 'कं दण्डं प्रयच्छामः, इति वयस्यैः प्रश्निते " मम देहे कण्डूः समागच्छति ततो भवद्भिः स्वहस्रैर्मम देहः कण्डूयतव्यः" इति थरे वयस्यैस्तस्य 'करकंडु' इति चक्रे । स चैकदा कस्यचिद्दण्डस्य प्रभावाद्राज्यं लब्धवानन्यान् पार्थेवान् ॐ स्वायर कुर्वाणः स्वपतरं दधिवाहन स्वाध्नं कर्तुं चम्पां परदेष्ट्याऽस्थात्, महत्समराङ्गण बभूव, एतद् ज्ञात्वा पद्मावरे तत्राऽऽगत्य पितरं पुत्र खिलं वृत्तान्तमचोकथत् , दधिवाहनेन राज्ञा पुत्रं राज्ये नवश्य प्रव्रज्या परगृहीता करकंडुश्च कदाचिदेकं सन्दर्या तशयितं पुष्टं वृषभवत्सं गेपाटले दृष्ट्वा 'अयं वत्सः स्वमाटुर्निखिलेन पयसा अन्यासामपि गवां पयसा पुष्टिं नेतव्यः' इति गोपमादिदेश, पार्थिवादेशानुसार प्रत्यह सञ्जारे स वत्सः पुष्टो बल वर्दै जातः, राजा च तं दृष्ट्वा 55 हर्षायदे, कतिपयसंवत्सरानन्तरं जराजर्जरं तमेव बल वदं दृष्ट्वा ' गोप्न मदाज्ञानुसारं न रक्ष्यतेऽयम् ' इति पृष्टेन गोपेन A यथावद्वयतिकरे उक्ते सत करकण्डुस्स्वचित्ते चिन्तयामास 'यदद्यपर्यन्तं पयःप्रमुखस्वादुपेयैः पेषितायाः कायाया इयमवस्था? 9 वरसावसाना खलु निखिलाः पद्गलकभावाः' इत्यादि भावयन् लेचं कृत्वा देवताप्रदत्तमुनिटेषग्रहणपूकां दीक्षां गृहीत्वा T प्रत्येकबुद्धश्च सञ्जातः, क्रोण पृथतले विहरन्नवाप्तवलालोकः स्वायुषः क्षये मेक्षं यय । एवं द्विसुख-नमिराजप्रमुखाणां प्रत्येकबुद्धानां चरतान्युत्तराध्ययनतो विभावन्याति । तथा कश्चिदप बाह्यं निमित्तादिकमरे ये बोधिलाभपूर्वकमवाप्तवले मोक्षं प्रयाति स कपल इव स्वयम्बुद्ध सिद्धाः 卐 N T 卐 G - 卐 A 卐 L V 卐 A N S नवतत्त्व- 卐 A 卐 U उमङ्गला- टीकायां- प्रकीर्णा० सोदाहर- णाः सिद्ध- भेदाः। V ॥१६८॥ 卐 A कपिलकेवलिकथानकश्चेद-कशाम्ब्यां जितशत्रुराज्ञः पुरोहितस्य काश्यपाभिधानस्य कपिलनामा पुत्रः पूर्वाणितज्ञानावर यो- दयादज्ञान सञ्जातः, 'पतुरखसानाऽनन्तरं तस्य जडत्त्वात् पितृपरम्पराऽऽयातं तं वर्जयित्त्वाऽन्यः पुरोहितः पार्थिवेन विहितः, अतो मात्रोफ्लम्भितो मातुः प्रेरणया श्रावस्त्यामिन्द्रदत्तस्य वनस्य पार्श्वेऽध्ययनार्थं जग्मिवान् । तत्र कस्यचिच्छेष्ठिनो दास्या सह संलग्न एकदा निर्धनचान्महोत्सवप्रसङ्गावाप्तशोकार्ता तां संक्ष्य कपिलः शोकनिमित्तं पप्रच्छ । दार्स दारयहेतुं कथयि- यित्वा वित्तप्राप्त्युपायं दर्शयामास-'यदत्रत्यो धनश्रेष्ठ आश्र्वचसा प्रातः प्रबोधयित्रे मापद्वयप्रमाणं हिरण्यं प्रयच्छति एतच्छ्रुत्वा ' अन्यः कश्चिन्मत्तः प्राङ् मा तत्र गच्छे दिति धिया मध्यरात्रं तत्र गन्तुं निसृतोऽध्वन्यारक्षकैर्धतः प्रत्युपे पार्थि- वस्य सनीडे नतः। कपिलेन यथार्थे वृत्तान्ते निवेदिते हृष्टो राजा उवाच यथेप्सितं माय इति श्रुत्वाऽऽलोच्य मार्गयिष्यात्युक्त्वाऽशोकवाटिकायामालोचनार्थं गतश्चिन्तयति किं मार्गयामीति, द्विमापसुवर्ण याचे ? न, एतावताऽल्पेन किय दिनानि यास्यन्ति ? निष्काणां शतं सहस्रं वा याचे ? न, अनेनाऽपि किं ? लक्षं कोटिं वा निष्काणां वा मार्गयामि ? न, राज्यं याचे इत्येवं लोभाऽभिवृद्धोऽग्रे वर्धमानो लघुकर्मत्त्वाद्विचारयामास यदहो द्विमापात् कियत्पर्यन्तं यावदहं गतवान् । निर्मर्यादः खलु लोभ इति वैराग्याजातजातिस्मृतिः ईघ्रमेव लोचपुरस्सरं देवतार्पितवेषं गृह चा पर्थिवस्य पार्थे समागत्य 'धर्मलाभोऽस्तु' इत्युवाच, किञ्चिन्तितमिति राज्ञा पृष्टे, लोभस्य निरवधिकत्त्वं विचिन्त्येदं संतोपव्रतं मया गृहतम्' इति जगाद । क्रमेण च ततो वहरन् घातिकर्मक्षयादवाप्तकेवलज्ञानदर्शनो राजगृहाऽटव्यां बलभद्रादिस्तेनानां पञ्चशतीं प्रतिधार्थ यय', स्तै रुक्तं ' नृत्यं जानेहि ' तदा ओमित्युक्त्वा 'अधुठे असासयम्मि ' इत्यादिपदोच्चारपूर्वकं नृत्यमारे क्रमेण 卐 M 卐 A 卐 N ) T 卐 A 卐 G ॐ 1. T A 卐 V L 卐 A ॥१६८॥ A 卐 and S -- -- M. 卐 N ज 卐 निखिला अपि प्रतिबुद्धाः । क्षीणाऽष्टकर्मा कपिलश्च मेक्षं यय इति स्वयम्बुद्धसिद्धक पलवलकथानकम् । A अथाऽवशेषान् सद्धम्दानाह- 卐 卐 v तह बुद्धबोहररुब हरा इगसमय इगसिद्धाय । इगसम्रेऽवे अणेगा, सि तेऽण्ग सिद्धार्थ ५९ का-'तह' इति, तथा बुद्धबोधित सिद्धा गुरुबोधिताः, गुरूपदेशेन प्रबुद्धा रे मेक्षं ययावत रे बुद्धबोधित सिद्धा ) फ्र जम्बूस्वामिप्रमुखाः । एक स्मन् समये रे एकत्त्वसंख्यायुक्तास्ते एक सिद्धाः थेट रस्वामिन इव एकस्मिन् समये रे । अनेकवसंख्यायुताः सध्यन्त रे अनेक सद्धाः ऋषभदेवाद्या इति । गाथायां अन्तिमेन 'सिद्धपदेन अन्त्यमङ्गलमाचष्टे ) ग्रन्थकारः। इत्येवं सद्धभेदा लेशत व्याख्याताः। Pr ज 卐 समाप्तश्च प्रककाधकारः तस्मॅश्च समाते सम्पूर्ण ऽयं ग्रन्थः। शवमस्तु सर्वजगतः परतनिरता भवन्तु भूतगणाः दोषाः प्रयान्तु नाशं सर्वत्र सुखी भवन्तु ले काः । १॥ 卐 A N T rammam DI run Primmersion Gmainam mom G A 卐 A T १ कासुचित् प्रतिषु पष्टितमा गाथा दृश्यते, तत्र कचिदियम्-' जइआइ होइ पुच्छा, जिणाण मग्गम्मि उत्तरं तइया । इकस्स निगोयस्सऽणतभागो य सिद्धि गओ ॥६० ॥ कचिच्चेयम्-'इय नवतत्तवियारो, अप्पमइनाणजाणणाहेउं । संखत्तो उद्धरेओ, लेहिओ सिरिधम्मसूरि हें ॥ ६०॥' इत्युभयथापि दर्शनं जायत इति । उभयोरपि गाथार्थस्सुगमः ॥ 卐 L V 卐 A २९ N नवतत्व टीकाकार प्रशस्तिः॥ A । अ टीकाकर्तृप्रशस्तिः । 卐 卐 कायां- V । १६९॥ ॥ १ ॥ 卐 A 卐 A ॥ २ ॥ 卐 T ज्ञात्त्वा जीवानजीवान् सहजगुणयुतान् द्रव्यपर्यायभिन्नान् , तत्त्वं यः सददर्श प्रवरगणभृते वीतरागो जिनेशः । श्रेयःश्रीकन्दकल्पः शतमखसुनुतो ध्वान्तविध्वंसहंसो-लोकाऽलोकावलोकी त्रिभुवनमहतः पातु वो बरदेवः श्रीमई रजिनेश्वराद्रिप्रभवा प्रत्यस्तिकायं गता, उत्पादाऽव्ययध्रौव्यलक्षणसरित् पर्यायसत्सम्मिता । जाता सङ्गतियोगतो गणभृतां या द्वादशाङ्गाऽऽत्मिका, जीयात् सा च मुनीशमौलिमुकुटश्रीगतमाद्य गणः सुधर्मा जम्मूञ्च प्रभवगणिशय्यम्भवबुधौ, यशे भद्रः सम्मतिविजयसुधीश्रीयकसखौ। श्रीयकसखः स्थूलभद्रः श्रुताब्धेः पारं ये समधिगतवन्तो जितमदा, अशेपास्तेऽन्येपि श्रुतजलधयः पान्तु कुशलम् क्रमेण पट्टे मणिरत्नसूरे-ज॑ज्ञे जगचन्द्रगुरुगरीयान् । यस्मै तपस्याप्रयताय दत्ते तपेत्य भेख्यां नृपमण्डलेशः पट्टावल्या क्रमेण प्रवरगणधरो हरसूरर्बभूव, चक्रे येनाऽन्तरात्माऽपि परमसदयो हंस्रभूपस्य भूयः । तत्पट्टे रेनसूरिस्तदनु सविजयो देवसूरः प्रजातः, तत्पद्वैरावतेन्द्रो विबुधगणनतः संहसूरः श्रिये वः श्रीमत्सत्यमुनीश्वरस्तदनुगः करमौने जनस्तत्पट्टोत्तमपद्मरूप वेजयाः कर्तश्च कस्तूरकः । जातो धीरगोरधीमनिमणिस्तरपट्टरस्नाकरे सच्छिष्योऽजने ये गबुद्धिविजयः कल्याणवारांनिधिः प G A ।। ४ ॥ T A ॥ ५ ॥ 卐 V 卐 L ॥ ॥१६९।। ॥ ६॥ A 卐 ज N S ॥ A 卐 U ॥ ८ ॥ 卐 V 卐 A 卐 T ज A शिष्याश्च वेदसङ्ख्याकास्तेषां भूरिगुणोत्तमाः। गुरुश्बुद्धिविजयानामात्मध्यानसुधाभुजाम् तत्राद्यो मुक्तिजियो द्वितीयो वृद्धसंज्ञकः । तृतीयो तविजयस्तुर्य आनन्दसंज्ञकः तेषां चतुर्णामपि सार्वभ मो गणी गुरुश्री विजयाऽन्तमुक्तिः। गच्छाधिपो यो विजितान्तरारेः, कुवादिघूकाऽर्क नेभः श्रेये वः ॥ ९॥ वैराग्यं विमलं शमोऽतिविशदः शास्त्रज्ञता चाऽद्भुता, सेद्धान्तैकरूचिर्मनोहरतरा भव्योपकारः परः । चारित्रं त्रिजगत्यनुत्तरतमं संभाग्यभाग्यं परं, येषां ते तपगच्छपाश्च गणेनो क्तिप्रदाः पान्तु वः ॥ १०॥ विजयकमलसूरी नुरेतस्य पट्टे, प्रवचनपरितोपं यो वेधत्ते सदैव । जलधिरिवगभीरश्शान्तमुद्राभिरम्यो जयतु जगति धीमान् ब्रह्मचारेप्रकाण्डः ॥ ११ ॥ आचारपञ्चकसमाचरणप्रोणाः, सर्वज्ञशासनधुरैकधुरन्धरा ये । तेषां च सूरिकमलाख्यमुनीश्वराणां जाताः सुजातविनया बहवो विनेयाः ॥ १२ ॥ स्फूर्जत्प्रौढगुणप्रसूनसुरभिप्रावासिताऽहंद्वनो-यः सिद्धान्तविचारचारुचरितो व्याख्यान वेत्कोविदः । श्रद्धाज्ञानविवेकशीलविलसत्सद्रत्नपाथोनिधिः-स श्रमोहन रराड् विजयताम् तत्पट्टभानुप्रभः ॥ १३ ॥ भव्याली प्रतिबोधिता जिनवरोद्दिष्टार्थवाग्भिश्च यैः-सिद्धान्तार्णवगाहनैकरसिको यो लब्धवर्णैः स्तुतः। यस्मै सूरिपदं वितीर्य सुतरां प्रस्थानकल्पैर्युतम् , तोषं प्राप महोत्सवेन समकं मसूरीश्वरः ॥ १४ ॥ तत्पट्टोदयशैलभानुरमलः सिद्धान्तपाथोनेधिः, सद्वैराग्यसुसेवधेश्च वसतिर्यस्याऽस्त पार्श्वे गुरोः । 卐 A 卐 N 卐 i T 卐 A 卐 V 卐 A 9 L 卐 A N S नवतत्त्व- 卐 A -- सुमङ्गला- टीकायां- । V ॥१७०॥ A 卐 T 卐 संविजैकशिरोमणिर्बुधवरैः संसेव्यमानक्रमो, धीमान्' पाठकसत्प्रतापविजयो जीयान् मदीयो गुरुः ॥ १५॥ टीकाकार तेषां पाठकविदुपां परमगुरूणाञ्च सूरिविबुधानाम् । प्रभावतो व्यलेखि, टीकेयं सुमङ्गलानाम्न ॥ १६ ॥ प्रशस्तिः। 卐 यद्यपि तत्त्वगभीरे, जिनमते नास्ति मेऽतिनैपुण्यम् । न्यायं तथापि श्रुत्वा ' शुभे यथाशक्तियतनीयम् ॥ १७ ॥ M एवञ्चाऽभ्यर्थनया परमविनेयस्य श्रीयशोविजयस्य । टीका गुरुप्रसादात् व्यरचि मया मन्दमतिकेन ॥ १८ ॥ 卐 सशोधितः श्रुतज्ञैस्तथापि छद्मस्थजन्यदोपस्स्यात् । सशोध्यश्च सुधीभिरिति याचे धर्मविजयोऽहम् ॥ १९ ॥ नवतत्त्वानां टीकां रचयित्त्वा जिनमतानुसारेण । यदर्जितं च सुकृतं तेनाऽस्तु तत्त्ववित्सद्धः ॥२०॥ 卐 नभोनिधिब्रह्मसुंगुप्तिचन्द्र-प्रमेयसख्ये नृपविक्रमाव्दे । समापितेयश्च सुमङ्गलाख्या, धर्माय धर्मेण तु पट्सहस्री ॥ २१ ॥ IN जम्बूद्वीपारविन्दे सुरगिरिकलिका भ्राम्यतः पुष्पदन्त, यावद्यावञ्च धत्ते लवणजलनिधिर्वेलवारिप्रवाहम् । यावन्नन्दीश्वरेपु जिनवरप्रतिमाः शाश्वतेषु गृहेषु,विद्यन्ते तावदेपा विजयतु सुतरां मङ्गलाख्या सुटका इति संविज्ञशाखीय-विद्वद्वृन्दावतंस-कुमतध्वान्ततरणि-मुनिचक्रचूडामणि-तपागच्छगगन दिनमणि श्रीमन्मुक्तिविजय अपरनाम मूलचन्दजी गणिपादपद्मचञ्चरीक-सर्वशशासनाङ्गणगभस्तिमालि निरवद्यचारित्रशाल-तपागच्छाचार्य पुरन्दर-श्रीमद्विजयकमलसूरीश्वरपट्टोदयाद्रिसहस्रांशु-अमेयप्रभावप्रवचनप्रवीणचेतस्काऽनवद्यसंयमसेवाहेवाक- व्याख्याप्रज्ञाऽऽचार्यवर्य श्रीमद्विजयमोहनसूरीश्वर विनेयावतंस-गीतार्थवर-पाठकप्रवरोपाध्यायपदालत 卐 श्रीमत्प्रतापविजयगणिशिष्याणुप्रवर्तक-श्रीधर्मविजयविरचितायां श्रीनवतत्त्वप्रकरण-सुमङ्गलाटीकायां L प्रकीर्णकाधिकारः समाप्तः । तस्मिश्च समाप्ते समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥ श्रीरस्तु ॥ 卐 ।१७०॥ A A ॥ २२ ॥ . 卐 T A 卐 V 卐 A 4 卐 十

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Shri Navatatvaprakarnam Sumangallatikaya Samlkratam

Author
Munishri, Dharamvijay
Title
Shri Navatatvaprakarnam Sumangallatikaya Samlkratam
File name
Shri Navatatvaprakarnam Sumangallatikaya Samlkratam
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2010/07
Publisher
Bhavnagar, Shri Manmuktikamaljain Mohanmala Karyadhikari Vakil Nandlal Lalchand
Language
Sanskrit
Pages
376
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327662
Barcode
99999990003247.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
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Shri Navatatvaprakarnam Sumangallatikaya Samlkratam