Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Surya Purana

Gouttam,chamanlal · 2012/08

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निवेदन भारावर्ष के पौराणिक साहित्य की शृङ्खला बहुत लम्बी है । असा. रह पुराणो के पश्चात अठारह उरपुराण और अठारह लघुपुराणों की नामावली भी सुनने मे थाती हैं । यद्यपि यह साहित्य व्यवस्थित नही है, और बाजार में जमीन पर पुस्तक फैलाकर बेचने वालो के यहाँ पुरागो के नाम पर दो दो, चार-चार आने की ऐसी छोटी पुस्तकें भी विकती दिखाई पड़ती है, जिनसरी गिनती कमी प्रामाणिक अयवा पठनीय पुस्तकों में नहीं की जा सकती। ऐसी दुरानो पर हमो "सूर्य पुराण" धौर "गणेग पुराण" आदि पुस्तकें देवी हैं जिनकी पृष्ठ सपा घालीस पचास से अधिक नहीं होती। पर वास्तविक यात ऐनी नहीं है । उप पुराणों मे भी "देवी भागयत" और "हरिया पुराण" से ग्रन्व पाये जाते हैं, जो रितने ही महापुराणी में बड़े और विषय विवंचन की दृष्टि से उत्तम हैं। यह "मूर्य-गुगण" भी कापी या है, और विषय की प्रमयता तथा भाषा की एक रूपता ये पारण स्तिनी ही पौराणिक रचनामीनी अपेक्षा उच्च श्रेणी या माना ना गमला है। मिलान की रि यह पूर्णतया है और इसमे हर जगह गिरजी पी महानता का हो पपन दिया गया है । दमो अनुमार शिव ही परमय हैं और पार्यनी उनकी शरिन । मह दोनो पिर पापी मृष्टि स्पिति और प्रत्रय पररो है। नरे अतिरिका पला, वि. दल मादिगण भी है, पर ये सब नीर बनाये और नरीमति मे दो पग परने वाले हैं। अन्य देशा, जोग में निगम ने ये तो मांस याश्रित रहो, दुगरमा दा समानी रया को प्रापंरिया गरी हैं। वितु दे. मामा पापा हारयो मे गमाम नानास का पर उनसीपातिनिरोदाराहीसीत है। 'गर्म पुत' में कहा mar for भापान ने गदर नाम नारा गिरीको पनि यो मोरारी पूस पर एक कमर पम पर गरामrit यषि (कमल रपी नेत्र) निसार चढादी। तब शिवजी ने प्रसन्न होकर उनको सुदशा चक्क दिया। यह क्या हम एकाघ अन्य पुराण में भी पढ़ चुके हैं। पर सूर्य पुराण' मे सब से अधिक निन्दा की गई है वैष्णवो केचार आचार्यों में से एक 'माध्वाचार्य' की। सभवत उन्होने शंष सम्प्रदाय का विशेष विरोध किया होगा। इस लिये उनको पिसी विधा ब्राह्मणी का व्यभिचार से उत्पन्न पुत्र बतलाया है, और उनके जन्म का सम्बन्ध कामदेव के दहन की घटना से जोडा है। अर्थात कामदेव के किसी सह- योगी ने माध्वाचार्य के रूप में जन्म लेकर शिवजी से उस घटना का बदला लिया और उनकी निन्दा फैलाई। भक्ति-मार्ग प्राय वैष्णवो से सम्बन्धित माना जाता है । उत्तर भारत मे तो सूर, तुरासी, मीरा, चैतन्य मादि जितने भक्तो वा आवि- र्भाव हुआ है, वे सब विष्णु और उनके अवतारो-रामकृष्ण आदि के उपासक थे। पर 'सूर्य पुराण' म वैसा ही वर्णन शिव-भक्ति का किया गया है, और वह भी नारद तथा ब्रह्मा ने सम्बाद के रूप में जैसा वैष्णव पुराणो मे किया गया है । नारद के भक्ति विषयक प्रश्न करने पर ब्रह्मा जी ने कहा-"भगवान् शम्भु की भक्ति का योग देहधारियो के लिए बहुत ही दुर्लभ है । यदि किसी प्रकार वह भक्ति प्राप्त करती गई तो फिर उसके लिए कुछ भी पदाथ दुलभ नही रहता उस भक्ति के द्वारा ही इन्द्र और विष्णु का पद प्राप्त विया जा सकता है और मुझ ब्रह्मा का दर्जा भी प्राप्त कर लिया जाता है । शिव भाषन द्वारा मोक्ष प्राप्त होने म तो कोई सन्देह ही नही । जैसे अग्नि द्वारा ई धन भस्म हो जाता है उसी प्रकार अशुभ और शुभ कर्मो की राशि को भगवान् भव की भक्ति भस्म कर देती है । पर शिव मे ऐमी मति का स्थिर होना बड़ा कठिन है है न रद । ससार रूपी सर्प के मुख म स्थित देह धारियो को विमोचन कराने व ल महादेव ही है, ऐसा थुति प्रतिपादन करती है। श्री शिवजी के पचाक्षरी मन्त्र 'ॐनम शिवाय' की प्रशसा करते हुए कहा है कि 'शिवजी के मुख से सात परोह मन्त्र निफ्ले, पर वे सब मिल कर भी इस मन्त्र को सोलहवीं कला रे तुल्य नहीं हो सकते।" यलियुग-वर्णन भी पुराणो का एक लक्षण बन गया है। कदाचित ही कोई ऐमा पुराण होगा जिसमें कलियुगी भ्रष्टाचार, दुराचार आदि बा वर्णन हो । “सूर्य पुराण" के लेखक ने भी उम परम्परा का पालन दिया है पर अधिक आक्षेप वैष्णवो पर ही किया है- "कलियुग पूर्ण रह से व्याप्त हो जाने पर अधम नर मायावाद ही विया करेंगे। ये सर योग को निन्दा करने वाले होगे और अग्निहोत्र या विरोध करने लगेगे । जो नर पुराणो यो वेदान्त शास्त्र के समान पहने हैं वे नरकगामी हैं, वेवल देखने में ही मनुष्य हैं। उनसे अच्छे तो बौद्ध जैन और कापालिक ही है, जो मुले तौर पर वेदो को अप्रामाण्य रहते हैं, और हम भी उनको यह वारी समझकर उपेक्षा की दृष्टि में देखते हैं। वे तो वैदिर मतावलम्बी है ही नहीं। पर कोरेको को प्रमाण मानते हैं और साप ही बनीवर वादियो या सा व्यवहार करते हैं घोर पानी तो वे ही हैं ऐगे लोग सन्यानी या वेप पारण करन पर भी जीविका के लिए तरह-तरह के पये रिया परत हैं। इनमें रितने हो प्रच्छन्न धानिय (वाममार्गी) भी होते हैं। वे विगी मम्प्रदाप ये दानिक मिदान्ती को नहीं जानते, वे यस दाप दूहन के लिए ठासी दृष्टि में अन्य मय देवता है| (व्ययं) ही है तो वे पगे वेशी यो पढ़ते हैं और यो उन पर तसं पाते हैं। कलियुग मे गेमे विसी भी जानिये यति यो गर मुहारर और पापाय (भगया) यम्या पहिवार मठो का अधिनि बना दिया जायगा । इन "न तत्त्ववादियो" में वम पाच ही गुग हागे-मठो वा स्वामी यनना, मेया पता, पन-ममत, हासियों में गमन और प्या-भायना "ये सत्ययादी पता परते हैं कि यह पार ही परम मन्त्र है, बोरिवे गुरसय पोतो जानने नीं। जिगममा परियुग में पानी की उति ही उग ममप मोग गो प्रबार दम्भ पा मारा प्य बन आईगे।" 'ग पराकी गर गुम्प सिंग मार गिर विपनो माप में पन्य आरम्भ में ही 'पद्वारा पर गया है-"यह पुराण तभी वेदो के अर्थों को एक सग्रह स्वरूप है । शूली भगवान दाम्भु का रूप ही परम तत्व है। उसके द्वारा ही यह समस्त विश्व व्याप्त है और किसी के द्वारा नही-ऐमा श्रुति ने बत- लाया है। वही समस्त भूतो की आत्मा हैं और जगदम्बा उमा के साथ एक मात्र चैतन्य स्वता वाले हैं। केवल वे एक शिव ही अपनी लीला से घहुत रूपो मे शोभित हुआ करते हैं । वही स्त्रय ब्रह्मा विष्णु के रूप में देवो के मध्य विराजमान दिखाई दिया करते हैं । एक बार ब्रह्मा आदि देवो द्वारा भगवान् शार मे पूछ' गया कि हे देव । आप कौन हैं ? उस समय उन्होने कहा कि मैं एक ही हूँ थोर अन्य कोई भी नहीं है।" मादि भूत और लीला विग्रह महादेव से ही आदि-सर्ग-बाल मे ब्रह्मा विष्णु की उत्पत्ति हुई थी। उन्ही एक आदि कर्ता-ईश्वर परमात्मा को उनका ज्ञान रसने वाले वहुत प्रकार का कहते हैं। उन्ही वो इन्द्र तथा मित्र भी कहा जाता है-~-ऐसी थति है ।" इस वर्णन में प्रकट होता है कि 'सूर्य पुराण' के रचियता ने आधार ग्रहण किया है जो भारतीय तत्वज्ञान के मूल श्राधार उपनिषदो और गीना आदि में वर्णित है । उन्होन केवल राम या वृण वे बजाय यावर या नामोल्लेस कर दिया है । पर इस देश के मनीपी तो पहले ही कह सुके हैं कि योई मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु, महेग ही नही यदि ईसा, मूमा, मुहम्मद का नाम मेकर भी त्याग, तपस्या, परोपकार का सच्चा धार्मिक जीवा तीन करेगा तो वह अल में उस परमा.मा के निकट ही पहुंचेगा, जहाजाति, धर्म और नाम का कोई भेदभाव शेष नहीं रहता। यह विभिन्न देयताओं अथवा धर्म गुरुयो था नाम लेना तो देश, काल और मनुष्यो बी कम या अधिक विकसित मनोवृत्ति के पारण होता है। इसलिये " पराण" लेखक ने भगवान शिव को प्रधानता दी तो इसमें कोई मनोमिस्प नही है । शिवजी तो हमारे यहाँ त्याग, तपस्या कोर ममना गोवदे प्रतीर है. उनकी महिमा के सम्मुम कौन नतमस्तर न होगा। -प्रसार विषय सूची है .... ... ३७ ... ४२ ४८ .... .... ६६ ८३ ... १. नैमिपारण्य प्रासादि कथन २. शिव महिमा वर्णन ३. सुद्य म्नास्यान ४. वाराणसी महिम-कलियुग वर्णन ५. महादेव वर-प्रदान ६. वाराणसी लिंग महिम वर्णन ७. दक्षेश्वर माहात्म्य ८. जिलोचन माहात्य ६. शिव भक्त मह्मिा १०. सात्विक-राजस विघ्नादि कथन ११. हरोत्पत्यादि कथन १२. ब्रह्म पद्मयोनित्वादि क्थन १३. गौरी पृथक् शरीरत्वादि कथन १४. सुरासुर सृष्टयादि कथन १५ हिरण्याक्ष वघादिक क्थन १६. प्रह्लाद राज्यारोहण तथा इक्ष्वाकु का क्थन १७. शिव महिमा क्थन १८. कलि प्रवेशादि कथन १६. महेश-विष्णु तुल्यत्व करणादि कथन २०. विष्णु चक्र प्राप्त क्यन २१ शिव पूजा विधि २२. दुर्वा गणपति ग्रन क्थन २३. गिवालय परणादि कथन २४. सीरम द्र पाएत व्रत कथा .... .... ६२ १०५ ११० .... .... .... १५२ १५२ .... .... .... ११८ २०६ २१६ २२६ ... ... .... ३०२ ३१६ ... ... ... ... ३५३ ... .... २५ शिव माहात्म्य कथन २६ बरन्धती सावित्री सम्वाद् २७. सुदेव्युपाख्यान २८ रक्तासुर वध कथन २६. पार्वती प्रभाव कथन ३०. तिथिनिर्णयादि कथन ३१. मदन दहन ३२. महादेव घर प्रदान ३३. महेश्वर शान करन ३४. साम्ब विवाह मडए वर्णन ३५. कालाव्याद्यागमन क्थन ३६. साम्य विवाह दर्शन (१) ३७. साम्ब विवाह वर्णन (२) ३८. साध क्रीडादि वर्णन ३६ पावक स्तुत्पादि कथन ४०. परमेश्वर-मुर सम्यादादि कथन ४१. नारद-इन्द्र सम्वादादि कथन ४२. ब्रह्मा नारद तवादादिकपन ४३. पंचायर मन प्रभावादि पपन ४४. शिवाचन माहारम्यादि पपन ४५. महाकाल माहात्म्य वपन ४६. तिथि मुहूतं निर्णयादि कपन ४७. देवेन्द्र चरित दयन ४८. निरयादिप्रतिरावर वचन vt. पिषतीपं अपन .... ... ૪૨૪ ४३३ .... .... .... ४७२ 1001 ४७६ YSE ४६४ ...

सूर्यपुराणं
॥ नैमिषारण्य प्रशंसादिकथन ।
यस्याऽऽज्ञया जगत्स्रष्टा विरञ्चि पालको हरि ।
सहर्ता कालरुद्रार पो नमस्तस्मै पिनाकिने ॥१
तीर्थानामुत्तम तीर्थ क्षेत्राणा क्षेत्रमुत्तमम् ।
मुनीनामाश्रयो नित्य नैमिपारण्यमुत्तमम् ॥२
शौनकाद्या महात्मान' शिवभक्ता महौजस ।
दीघसत्र प्रकुर्वन्तम्तनेशानस्य तुष्टये ॥३
तस्भिन्स महाभागो मुनीना भाग्यगौरवात् ।
आजणाम मुनीन्द्रप्टु सूतः पौराणिकात्तम ॥४
तं दृष्ट्वा ते महात्मानो नमिपारण्यवासिनः ।
प्रहृष्टा प्रष्टुमुद्य वना पप्रच्छू रोमहर्पणम् ॥५
वथ भगवता पूर्वमादित्येनात्मरूपिणा।
पुराण कथित सौर तन्नो वक्तुमिहार्हसि ॥६
वृष्णद्वैपायनात्साक्षात्पूर्व हि विदित्त त्वया।
स्वत्तो नास्ति परा वक्ता पुराणाना महातप ।।७
जिनकी मात्रा में ब्रह्माजी इस जगह का गृजन करने वाले होते हैं
भगवान् विष्णु इस जगत् का पालन पिया करत है तथा पारद नाम
याले प्रभु रावरा महार किया परते हैं उन पिनारधारी प्रभु में
नि नमार है ॥१॥ ममम्न तोपों से उसम तीपं मय क्षेत्रों में
उत्तम नमिपारपर परम उनम यन है जो मुनिगणों का निरय हो
आयर स्पर रहा मरता है । महान् ओज में सम्पन्न गोना
महारा भएगर शिर रम पम और पाा पर भगवान शिव

१० ]
[ सूर्य पुराण
आत्म रूपी
की तुष्टि के लिये दीर्घ सत्र कर रहे थे ॥३॥ उस सत्र में मुनि मण्डल
के भाग्य के गौरव स महा भाग और पौराणिको में अत्युत्तम श्री सूतजी
मुनिया रे दान करने के लिये आ गये थे ॥४॥ उन नमिषारण्य मे
निवास करने वाले महात्माओ ने जब श्री सूतजी का दर्शन किया तो
परम प्रसन्न हुए और कुछ पूछने के लिये उत्सुक होकर श्री रोमहर्षण
जो उन्होंने पूछा ।।५॥ ऋपियो ने कहा- हे भगवान
वादित्य भगवान् न पहिले कैसे इस सौर पुराण का वर्णन किया था---
इसे थाप हम लोगों को बतान के लिये परम योग्य है ॥६॥ आपने तो
साक्षात् श्रीकृष्ण द्वैपायन जी से पहिले ही सब कुछ ज्ञान प्राप्त कर लिया
था । आप तो महान तपस्वी होने के साथ पुराणों के परम श्रेष्ठ वक्ता
भी हैं । आप से अधिक अन्य कोई भी वक्ता नहीं हैं ।।७।।
सन्त्यन्ये वहव शिष्या अपि तस्य महात्मनः ।
तथाऽपि शिष्यवात्सल्यात्व पुराणेषु योजित ॥८
यान्यन्यानि पुराणानि त्वयोक्तानि महामुने ।
अन ते पावंतीकान्तभवती भक्तियुत स्विदम् ।।
न यज्ञेनं तपोभिर्वा न दानेन व्रतस्तथा ।
शिवभक्तिमृते यस्मान्मुक्तिनास्तीति शुश्रुम ।।१०
देवोऽय भगवान्भानुरन्तर्यामी सनातन ।
यो यू ते सर्ववस्तूनां तत्त्व ज्ञात्वं व नान्यथा ॥११
अत श्रद्धा हि महती थोनु त्वद्वदनामृतम् ।
अस्माक वर्तते सूत रोमहर्पण सुयत ।।१२
नस्या मूर्य पर धाम प्रग्यजु सामरूपिणम् ।
निसत्य ग्रिजगद्योनि त्रिमार्ग च पितत्त्वगम् ॥१३
पुराण राप्रवक्ष्यामि सोर शिवयथाश्रयम् ।
यच्छ स्वा मनुग शीघ्र पापरसुवामुत्रनेत् ।।१४
उन महान मारमा वारे भगयात् पद प्यारा जो रेय भी महत
स्परपरि तो भी शिष्य परमपिट महोन से दान आपसे

नैमिपारण्य प्रश सादिकथन ] ही पुराणो मे योजित किया था ॥८॥ हे महामुने । यद्यनि अन्य जो भी पुराशो को आप ने कहा है किन्तु वे सब पार्वती के वान्त की भक्ति मे समर्थ नहीं हैं और यह सौर पुराण तो उनकी भक्ति से युक्त है । यत तप दान और तो से बिना भगवान् शिव की भक्ति के जीवों की मुक्ति नही हुआ करती है-ऐसा ही हम लोग सुन रहे हैं ॥१०॥ यह भगवान् भानुदेव अन्तर्यामी और सनातन हैं जो कि समस्त पस्तुओ पे तत्वो को जानकर ही योना करते हैं और कभी भी अन्यथा नही बोलते हैं ।।११। इसी कारण से आपरे मुख कमल के द्वारा इस अमृत के श्रवण करने की हे श्री मृत जी! हे रोमहपण जी! हम लोगो के हृदय मे बडी भारी श्रद्धा समुत्पन्न हो रही है क्योकि आप तो गुन्दर प्रतो को धारण करन वाले महा पुग्प हैं ॥१२॥ थी सूत जी ने ऋगु-यजु और साम वेद के स्वरूप धारण करने याल सीनो पालो मे सत्य स्वरूप बाले--तीना जगतो के ममुत्पण परन दे कारण-परमधाम- तीनो मागों वाने और तीनो तत्वो के माता भगवान सूर्य को नमस्कार करके भगवान् शिव की पथा या आश्रय स्प गूय पुगण वो मैं बतलाऊ गा जिस पुराण का थवण करवे मनुष्य इम सोर में बहुत ही शीघ पापो को कम्नु नी । परित्याग कर दिया करता है अर्थात् समस्न पापो के आवरण स विमुक्त हो जाता है ॥१३-१४॥ श्लोकद्वय पठेद्यातु श्लोक मेस्यापि वा। श्रद्धावान्पापकर्माऽपि स गन्छेत्सवितु पदम् ।।११ पौराणी वृत्तिमाश्रित्य य जीवन्ति द्विजातय । सन्मण्डल विनिभिद्य त-मायुग्प यन्ति ते ॥१६ वकना यत्र रवि मायाचना तम्घ गुतो मनु । माहात्म्य वध्यते पमोनम्स्यिग्मानधिय द्विना ॥१७ इद पुराण यकाव्य धामियामम् यथे। द्विजाय अयानाय गिगापियुद्धये ॥१८ मागीन्मनु गली वनं ने यो महानपा । गपदाचिन्महाभाग मगार वर्ग योग १२ ] [ स्य पुराण प्रतर्दनस्य नृपतेय ज्ञे विपुलदक्षिणे। तत्व विचारयामासु मिथो यस महर्पय ॥२० अशक्तास्ते महाभागा भृग्वाद्यास्तत्त्वनिर्णये । एर स्थितेप, विप्रेप मायया मोहितात्मसु ॥२१ इस सौर पुराण की इतनी बड़ी महिमा है कि जो काई भी इसके दो श्लोव अथवा केवल एक ही श्लोक का पाठ कर लिया करता है और परम श्रद्धा से युक्त होता है वह भने ही कितना ही पापो के कर्मों का करने वाला क्यो न हो इसके प्रभाव से सीघा पापो से मुक्त होकर भगवान सूर्य देव के पद को प्राप्त हो जाया करता है ॥१५॥ जो द्विजाति गण पुराण पाठो एव प्रवचनो की वृत्ति को धारण कर ये अपने जीवन का निर्वाह पिया करते हैं वे उसने मण्डल का भेदन करके उन सायुज्य की प्राप्ति किया करते हैं ॥१६॥ हे द्विजो जहा पर स्वय साक्षात् रविदेव वक्ता है और उसके श्रोता उनवे सुत मनु हैं उस भगवार शम्भु के माहात्म्य यो पहा जाता है क्योकि इससे अधिक अन्य कुछ भी नहीं है ।।१७। यह पुराण ऐसी उत्तमता और परम गोपनीयता में रखने वाला है कि इसका श्रवण किसी परम धार्मिक और किसी की भी असमान परने वाले ऐसे पुरुष को ही कराना चाहिए जो द्विज हो और परम श्रद्धालु एवं भगवान् शिव के चरणो में ही अपनी युद्धि को समर्पित कर देने वाला हो ॥१८।। मनु भगवान् सूर्य ये गुत जो महान तपस्वी हैं। वह महागण किसी समय में पामित्रा नामा यन मे गपे थे ॥१६॥ जहा पर विपुल दक्षिणा वाले प्रतदंन राजा के यज्ञ में महपि लोग परस्पर में तत्त्व या विचार कर रहे थे ॥२०॥ वे गव महाभाग भृगु आदि तत्व रे निर्णय करने में संगमर्ग हो रहे थे और वही र माया गे मोहित मारमा परने वाले मय वित्रगण हमी प्रसार गे समय में मग्न स्थित होकर चंठे थे। ॥२१॥ ग नयायिष्टनिरोप वागभूदागैरिणी। सप बुराम विप्रेन्द्रारतपो मानििनयहणम् ।।२२ । सूर्य पुराण विल्विष वाले हो गये हैं ।।२।। ये सब भी विश्व के अन्तर्यामी विभु मुझ परम देव का दर्शन प्राप्त करें ॥२८॥ इति दृष्ट्वा रवि साक्षात्प्रत्यक्ष पुरत स्थितम् । मेने कृतार्थमात्मान मनुवस्वतस्तदा ॥२६ आत्मन्यात्मानमाधाय सर्व भावन स यमी। स्तुति चकार स मनुमुनिभि सह स व्रत ॥३० नमो नमो वरेण्याय वरदायाशुमालिने । ज्योतिमय नमस्तुभ्यमनन्तायाजिताय ते ॥३१ त्रिलोकचक्षुपे तुभ्य त्रिगुणायामृताय च । नमो धर्माय हसाय जगज्जननहेतवे ।।३२ नरनारीशरीराय नमो मीडप्टमाय ते । प्रज्ञानायाखिलेशाय सप्नाव्वाय त्रिमूर्तये ॥३३ नमो व्याहृतिरूपाय ग्रिलक्षायाऽऽशुगामिने । हर्यश्वाय नमस्तुभ्य नमो हरितवाहवे ॥३४ एकलक्षविलक्षाय वहुलक्षाय दण्डिने । एकसस्थाद्विमस्थाय बहुसस्थाय ते नमः ॥३५ श्री सून जी ने कहा-उस समय में मैवस्वत मनु ने इम प्रकार में साक्षात् भगवान् रवि यह अपने मामने स्थित हुए प्रत्यक्ष रूप से दान दिया तो उन्होंने अपने आपको पूर्णतया वृतार्ग मान लिया पा ॥२६॥ उन मुमत मनु जो बहुत ही मयमी धे अपनी भारमा में भारमा मा आधान पसे मवंभोग में उन मर गुनियो के साथ सूर्य भगवान् मा स्तवन विमा पा॥३०॥ मनुजी ने कहा-वरदान प्रदान परने पा-अगु माली और वरेण्य थापरे लिये बारम्बार नमस्कार है। हे स्पोनिर्मप ! भगन्त एवं भजित आपसी मेया में नमस्कार है ॥३१॥ तीनो लोगों के घर स्वात्रिगुण और अमृन आपका मनिधि प्रणाम गरित है। इस मापूर्ण जगन् में जनन में पारण पमं प्रोरम मापो रिये नमसार है ॥३२॥ नर और नागे दोनों नैमिपारण्य प्रशसादिकथन ] के स्वरूप वाले मवके ईश-प्रज्ञान प सात अश्वो वाले-त्रिमूत्ति और भी ढुष्टम के लिये हम सबका नमसार है ॥३३॥ व्यातियो के स्वरूप वाले-आशुगमन करने वाले ग्रिलक्ष-हरित वाहुओ वाले और हर्यश्य आपके लिये नमस्वार है ॥३४॥ एक लक्ष विलक्ष बहुलक्ष-दण्डी-एक सस्थ द्विसस्थ और बहू मस्थ आपके लिये नमस्कार है ॥३५॥ शक्तित्रयाय शुक्लाय रवये परमेधिने । त्व शिवस्त्य हरिदेव त्व ब्रह्मा त्व दिवस्पति ।।३६ त्वमोकारो वाट्कारः स्वधा स्वाहा त्वमेव हि । स्वामृते परमात्मान न तत्पव्यामि देवतम् ।।३७ एव स्तुत्वा मनु प्राह भगवन्त प्रयोमयम् । मनिभि सह धर्मात्मा सम्यग्दर्शनकाह क्षिभिः ॥३८ कि तच्छे यस्कर तत्व वेदान्तेष प्रतिष्टितम् । कस्माद्विश्वमिद जात कस्मिन्वा लयमेप्यति ।।३६ फस्य ब्रह्मादयो देवा घरी तिन्ति सर्वदा । तदेकमथवाऽनेकमुभय वा पद प्रभो 10 वेन वा ज्ञायते सभ्यगमश्व तीतियत् जाते तस्मिस्तु फिरूप तम्य ज्ञान किमान्माम् ।।४१ नरितं तम्य किं तात कि तीथं तदधिष्टिनम् । चेपामनुग्रहम्तम्य नीय निवमना प्रभो ॥४२ लक्षण च पुराणाना बताना च क्रमो यथा । वर्णानामायाणा च वर्णाचारविधि कथम् ।।४३ श्राद्ध पय वा क्रियते प्रायश्चित्तविधिः कपम् । एतत्सर्वं हि भगवन्पृष्ट वक्तुमिहाहंसि ॥४ एवं मनोवंच. धुवा मगवान्भास्परो द्विजाः। यत्पृष्ट तोपेण वक्त ममुपचक्रमे ॥४५ तीन पतिशे याने-गुगतपरमेष्ठी और रविदेष मिये नमगार है। हे भगवत् | होशियार हरि है-याप हो गया। ।

[ सूय पुराण और आप ही दिवस्पति हैं ॥३६|| आप ही ओङ्कार हैं वपट्कार है और आप ही स्वाहा तथा स्वधा हैं। आपके बिना उन परम देवत परमात्मा को नहीं देख पाता हूँ ॥३७॥ इम रीति से मनु देव ने सूर्य देव का स्तधन करने जो कि भगवान् नयीमय हैं भलीभाति दर्शन का आकाक्षा रखने वाले मुनियो के ही साथ मे उन भगवान् कहा-॥३८॥ मनुदेव ने प्रार्थना की-हे भगवन् । वह कौनसा श्रेय करने वाला तत्व है जो कि वेदान्तो में प्रतिष्ठित है ? किस से यह इतना विशाल विश्व ममुत्पन हुआ है अथवा फिर अन्त मे मिस मे जाकर यह लय को प्राप्त हो जाया करता है ? ॥३६॥ ये समस्त ब्रह्मा आदि देवता सर्वदा क्सि के वश में स्थित रहा करते हैं । हे प्रभो । आप हम लोगो को कृपा करके यह बतलाइये कि वह तत्त्व एक है या अनेक या अनेक स्वरूप वाला है अथवा दोनो ही प्रकार का है ? ॥४०॥ यह अर्थ भलीभाति किसके द्वार, जाना जाया करता है और उसका ज्ञान हो जाने पर किस प्रकार का रूप होता है तथा उसका ज्ञान विस स्वरूप वाला है ? ॥४१॥ हे तात | उसका क्या चरित है और यौनमा तीर्थ उसम अधिष्ठित है ? हे प्रभो। और उम तीर्थ में निवास करने वाले किन ये उपर उनका अनुग्रह हुआ करता है ? ॥४२॥ पुराणो या बक्षण और यतो का क्रम तथा वर्णों का और बाश्रमो का वर्णाचार विधि पिस प्रकार की होती है ॥४३॥ हे भगवन् । बाद में किया जाता है तथा प्रायश्चित्तो पे करने या क्या विधान है ? हमारे पूछने का विषय है उन मवा आप वर्णन करने के लिये परम गुयोग्य महापुरष है ॥४ा है हिजो । इस प्रकार से इस घचन को भगवान् भास्कर ने श्रवण पिया पा और जो भी बुध उन मे पूछा गया पा रह सभी पपन करना उन ने आरम्भ पर दिया था ॥४॥ यह सभी

शिव महिमा वर्णन ]
॥ शिव महिम वर्णन ॥
शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि तत्वं यत्र प्रतिक्षितम् ।
पुराणेऽस्मिन्महाभाग सर्ववेदार्थसग्रहे ॥१
तत्तत्व यद्भगवतो रूपमीरास्य लिनः ।
विश्व तेनादिल व्याप्त नान्गेनेत्यत्रयीच्छुतिः॥२
स एवामा समस्ताना भूताना मनु नाधिप ।
चंतन्यम्पो भगवान्महादेवः सहोमया ॥३
एकोऽपि बहुधा भाति लीलया केयलः गिमः ।
ब्रह्मविष्ण्वादिपेण देव देवो महेश्वरः ॥४
पृप्टो ग्रहमादिभिर्देव : कस्त्व दयोति शकरः ।
अग्रवीदहमेव को नान्यः कश्चिदिति अनि. ॥५
मात्मभृतान्महादेवानीलाविग्रहरिणः ।
मादिसर्गे ममुह तो ब्रह्मविप्र मुत्तमो ॥६
तमेक परमारमानमादिक्रमोचरम् ।
प्राहुबहुविध मागमा इन्द्रगिसमिति अनि ॥3
श्री भानुदेय ने बह-पुत्र । जिसमें जो भी
उगरी भाना गा गुम मापान होरर धान करो। पर पुगण
महामार | ममी बेहोरे पापा एक गरमी
। भगवान पाओसी परम साव। रारामा
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समाया है मनु राति । वह सोको
मारमा मौरी उमा माप भगदान मार पंज
An in एक मानी मीरा पर
प्रायनों में मिल मा 1 पोर mar
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१८ ] [ मूर्गपुराण म उनसे उन्होने स्वय ही कहा था कि मैं एक ही हूँ और अन्य कोई भी नहीं है-ऐसा थुनि प्रतिपादन करती है ।।५।। आदि भूत और लीला से विग्रह तथा रूप के धारण करने वाले महादेव से ही जो आत्म भूत हैं, आदि सर्ग काल मे सुरो मे उत्तम ब्रह्मा और विष्णु ये दोनो समुत्पत हुए थे ॥६॥ उन्ही एक आदि कर्ता ईश्वर परमात्मा को उसके ज्ञान रखने वाले उनको बहुत प्रकार का कहते हैं। उन्ही को इन्द्र तथा मित्र भी कहा करते है-एसी श्रुति है ॥७॥ न तस्मादधिक कश्चिन्नाणीयानाप कश्चन । तेनेदमखिल पूर्ण शकरेण महात्मना ।। मुमुक्षुभि सदा ध्येय शिव एको निरञ्जन । सवमन्यत्परित्यज्य मुक्त एव विमुच्यते ॥६ धर्मार्थकाममोक्षाणा प्रायणे कारण परम् । शिवभक्ति सदा सत्य नान्यत्किचन भूतले ॥१० प्रिलोका सुखकामो यस्तेन पूज्य. सदाशिव । शिवभत्तिमते मौख्य कुत स्यीता दहिनाम् ।।११ शिवभरत्या धन विद्या यश शत्रुक्षयस्तथा । प्राप्यते विजय मर्व सत्यमतत्र संशय ।।१२ रोगक्षयम्तथाऽरोग्य यद्यद्धि मनसेच्चति । जनस्तत्सर्वमानोति वेदस्य वचन यथा ॥ १३ यदा ल नाटे धात्रा हि लिखित सौख्यमुत्तमम् । शिवभत्तो तदा वुद्धिीयते नान्यथा धवम् ।।१४ उनसे अधिप भी बाई नहीं है और उनसे अणीयान् बर्षा सूक्ष्म भी धोई नही है । उन्हीं महात्मा भगवान् शङ्कर ये द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व परिपूर्ण हो रहा है। तात्पर्य यह है कि इम विश्व म जो भी बुध जस-चेतन दियसाई दता है वह मभी उही वा स्वरूप है ॥८॥ जो मुनि बी अभिपापा रसा हा प्राणी हैं उनरे द्वारा एक निरजन भगवान् शिय का हो सदा ध्यान वरना पाहिय और अन्य सबका त्याग पर देना चाहिए। इससे जो मुल होता है यह भी विमुन । नाया परता हैपमं अपं-बाम और मोक्ष के प्रायण में मिव भगवान् शिवमहिमा वर्णनम् । ही परम कारण स्वरूप है। भगवान् शिवजी भक्ति सर्वदा सत्य है और इसके सिवाय भूतल मे अन्य कुछ भी नहीं है अर्थात् यही एक परमसार वस्तु है ॥१०।। जो इम त्रिलोकी में सुख की कामना करने चला है उमको सदा भगवान शिव की पूजा करनी ही चाहिए । भगवान् शिव को उपासना के विना सब देहधारियो को सुख कहाँ पर है अर्थात् सुस होशी नही सक्ता है ॥११॥ भगवान शिव की भक्ति के द्वारा ही धन- विद्या-यश-भत्र नाश-विजय सभी कुछ प्राप्त किया जाता है-यह सर्वथा सत्य है और इसमे लेशमात्र भी समय नही है ॥१२॥ रोगो का क्षय आरोग्य आदि जो-जो भी प्राणी मन से चाहा परता है मनुष्य उन सभी को प्राप्त कर लिया करता है-ऐमा ही वेद के वचन के द्वारा प्रतिपादित किया जाता है ।।१३।। जब ऐसी ही शिव भक्ति की महिमा है तो मनुष्य उसे क्यों नहीं किया परते हैं-इस मागवा का समाधान बताया जाता है कि यदि विधाता ने ललाट मे जिस समय में परमोत्तम सुख की प्राप्ति का उल्लेख कर दिया है तो ही मनुष्यो की बुद्धि में गिय की भक्ति समुत्पन्न हुआ करती है अन्यथा निश्चित रूप से रोमी बुद्धि ही नहीं हुआ करती है ॥१४॥ न तस्य कर्मकायं वा यन्धमुक्ती महेशितुः । आनन्दस्पया गोर्या मोडति स्म महेश्वरः ॥१५ अक्षर परम व्योम शव ज्योतिरनामयम् । यस्तन्न वेद किं वेदाह्मणस्य भविष्यति ।।१६ नान्यो वेद्य म्बय ज्योती म्द्र एको निरचनः । तस्मिज्जातेऽसिलं जातमिस्या देवादिनः ।।१७ अहं ब्रह्मा च विष्णन शकश्चान्ये दिवौकसः । अद्याप्युपाय विविधःभोदर्शनकाक्षिण ॥१८ न दाननं तपोभिवा नास्वमेयादिमिमंग । भक्त्यं धानयया राजजायते भगवाभिमायः ॥१६ यतो याची निवर्तन्ते अप्राप्य मनमा मह ।

२० [ सूर्य पुराण भर्गाद्विश्वस्य भरणाद्विश्वयोनेरुमापते ॥२० तस्य ज्ञानमयी शक्तिरव्यया गिरिजा शिवा। तया सह महादेव सृजत्यवति हन्ति च ॥२१ / उन महेश्वर भगवान् का न तो कर्म करने के योग्य है अर्थात् कोई भी कम नही करना है और न उनका नन्ध तथा मुक्ती ही है । महेश्वर भगवान् आनन्द म्वरूप वाली जगदम्बा गौरी के साथ क्रीडा क्यिा करते थे ॥१५॥ भगवान् शिव अक्षर-परम व्योम अन्तमय शैव ज्योति हैं। जो उनको नहीं जानता है उस ब्राह्मण या वेदो से क्या कल्याण होगा ॥१६इस लोक में अन्य कोई भी जानने के योग्य नहीं है। केवल ए स्वय ज्योति निरञ्जन रद्र भगवान ही जानने क योग्य तत्त्व हैं । वेदो के वाध करने वाले लोग यही कहते हैं कि उस ज्योति के शान प्राप्त हो जाने पर सभी कुछ का ज्ञान प्राप्त हो जाया करता है ।।१७। मैं ब्रह्मा-विष्णु इन्द्र तथा अन्य देवगण हूँ। आज भी विविध उपायो पे हर प्राणी भगवान् राम्भु के दर्शन की आवाहक्षा रखने वाले हैं ॥१॥ भगवान् शिव का ज्ञान हे राजन् ! केवल एर अनन्य भक्ति हा फरता है अन्य कोई भी हारे प्राप्त करने का नहीं है । दान- तप और अश्वमेध आदि बहे-य हे मस भी इसरे साधन नही हो मरते हैं ।।१६।। भग-विश्व के भरण विश्व को योनि और उमा के स्वामी भगवान शिव का स्थल है जहां पर मनके ही माय पाणी भी वित हो जाया करती हैं । मर्य यह है कि यहाँ मन-वाणी और बुद्धि विसी पो भी पहप नहीं है ॥२०॥ उनको मानमयी पक्ति अय्यया गिरिजा शिवा ही है। उमो ये माप महादेव जगन् पा गृजन-पालन और गहार लिया रते है । तारपर्य यह है कि विपी गतिही की महिमा से सभी पुपमा करना है ॥२१॥ भाचक्षते तपोभंदमज्ञान परमायंत । यभेद शिवयो मिसो वलिदाहय योरिय ॥२२ माया मा परमा नवितरसरा गिरिजाव्यया। मायाविश्वारमर्ग रम्नमाया गमती नयेत् ॥२३ .

शिवमहिमावर्णनम् ] [ २१ स्वात्मन्यवस्थित देव विश्वश्यापिनमीश्वरम् । भक्त्या परमया राजञात्वा पार्श विमुच्यते ॥२४ सकलं तस्य भासव भाति नान्येन श करः । तस्मिन्प्रकाशमाने हि नव भान्त्यनलादयः ।।२५ तास्मिन्महेश्वरे गूढे विद्याविद्ये क्षराक्षरे। विधातरि जगन्नाथे विश्व भाति न वस्तुतः ॥२६ तास्मिन्महेश्वरे विश्वमोत प्रोत न संशय. । तरिमझातेऽखिल. पाशं मुच्यते मनुजेश्वर. ॥२७ ब्रह्मविष्ण्वादयो देवा मुनयो मनवस्तथा । सर्वे क्रीडनकास्तस्य देवदेवस्य शूलिनः ॥२८ जो अक्ष पुरुप हैं वे ही उन दोनो वा भेद बतलाया करते हैं शिव और उमा दो भिन्न गतिया हैं परमार्य रूप से शिव और मिवा का भेद नहीं होता है-यह परम सिद्ध मिदान्त है जैसे बग्नि और मे कोई भेद नही हुआ करता है क्योकि जो अग्नि है वह दाहक भी है ॥२२॥ उमा सादात् माया स्वरूपिणी हैं। वही परमायक्ति है । वह यक्षरा अव्यया गिरिजा हैं। द माया विश्व मरूप वाने हैं । उनका ज्ञान प्राप्त पर प्राणी अमृती हो जाया मरता है ॥२३॥ हे राजन् ! अपनी ही यात्मा के अन्दर अन्तर्यामी के म्वरूप से विद्यमान है अनि बहुत ही निकटतम है। विश्व में भी सर्वत्र व्यापी है ऐगे देव ईश्वर हैं । उनका ज्ञान परमोघट भक्ति के ही दाग होता है योर उसको पावर यम को पागो से छुटकारा पा जापा करता है ॥२४॥ उनकी दीप्ति रो इस सबका भान होता है अन्य में दाग यह मागित नहीं हुआ वगता है मे ही भगवान शहर है। उनके प्रपाममान हो? पर तेजस्वी भी परम तेजः सम्पन्न अग्नि आरिछ भी प्रभाग नही समते है ? अर्षा हम तेज में गामने सभी अन्य तेज मिर्गना में हो जाया करते हैं ॥२५॥ उन परम गृह-विद्या धोr अविधा या-सर एवं अक्षर जगन् । यामी गार प्रमुगे २२ ] [ सूर्य पुराण वास्तविक्ता से यह विश्व भान नही किया करता है ॥२६॥ उस विश्वेश्वर मे महेश्वर मे यह मम्पूर्ण विश्व ओत-प्रोत है-इसमें कुछ भी सशय नही है। उन प्रभु का ज्ञान हो जाने पर मनुज समस्त पाशो से विमुक्त हो जाया करता है ॥२७॥ उन्ही देवो के भी देव भगवान् शूली के ये सब ब्रह्मा-विष्णु आदि समस्त देवगण-मुनिमण्डल तथा मनु प्रभृति सब विलौने हैं ॥२८॥ स एवं को न चानेको न द्विरूप कदाचन । तस्याऽऽज्ञयाऽखिल विश्व वर्तते तन्नियन्त्रितम् ॥ आदिसर्गे महादेवो ब्रह्माणममृजत्प्रभुः । दक्षिणाङ्गाद्विरूपाक्ष सृष्टयर्थ लीलया किल ॥३० तस्मै वेदान्पुराणानि दत्तवानग्रजन्मने। वासुदेव जगद्योनि सत्व द्रिक्त सनातनम् ॥३१ असृजत्पालनार्थ च वामभागान्हेश्वरः । हृदयात्काल रुद्रारय जगत्सहारकारकम् ।।३२ असजद्योगिना ध्येयो निर्गुणस्तु स्वय शिवः । विश्व तस्माद्धि सभ्त तस्मिस्तिष्ठति श करे ॥३३ लयमप्यति तच प्रयम तत्स्बलीलया। स एवाऽऽत्मा महादेव सर्वेपाम व देहिनाम् ॥३४ ज्ञानेन भक्तियुक्तेन ज्ञातव्यः परमेश्वरः । न पश्यामि महादेवादधिक देवतान्तरम् ।।३५ ये प्रभु सर्वदा एक ही हैं और कभी भी दो रूप वाले नहीं हैं और घे अनेक नही हैं। उनकी आमा मे यह गम्पूर्ण विश्व उनके ही द्वारा नियन्धित रहा करता है । २६॥ मगं ये आदि काल मे प्रभु ने ब्रह्माजी पा गृजन किया था। उग समय में विरूपाक्षा प्रभु ने लीला में ही मृष्टि की रचना वरने के लिये अपने दाहिने अजसे इनमा गृजन रिया पा॥१०॥ पिर उनको जोशि अग्रजामा पे सब देदो को और पुराणो वो प्रभु ने दे दिया था। इमरे सनार रपा को हुई पुष्टि के शिवमहिमा वर्णनम् ] पालन करने के लिय सत्त्वादिक्त जगत् की योनि-सनातन वासुदेव की रचना की थी ॥३१॥ महेश्वर भगवान् ने विष्णु भगवान् की रचना अपने वाये भाग मे की थी और आपने हृदय के भाग स काल रुद्र नाम वाले देव की रचना की थी जो इस जगत् के सहार को करने वाले हैं ॥३२॥ योगियो के ध्यान करने के योग्य निगुण शिव भगवान् ने स्वय विश्व का सृजन दिया था तथा उन्ही से यह समुत्पन्न हुआ था उसी मे शङ्कर स्थित भी रहा करते हैं ॥३३॥ ये तीनो उनको हो लीला से उन्ही में लय को प्राप्त हो जायेंगे। वे ही महादेव सब देह- धारियो की आत्मा हैं। वे परमेश्वर भक्ति से युक्त ज्ञान के द्वारा ही जानने के योग्य होते हैं । मैं तो महादेव भगवान् से अधिक अन्य किसी भी देवता को नहीं देखता हूँ ॥३४-३५।। वेदा अपि तमेवार्थ माहु. स्वायभुवेऽन्तरे । य प्रपश्यन्ति विद्वासो योगिन क्षपिताशया । नियभ्य करणग्राम स एवाऽऽत्मा महेश्वर. ॥३६ ग्राविष्ण्विन्द्रचन्द्राद्या यस्य देवस्य विकरा । यस्य प्रसादाज्जीवन्ति स देव पार्वतीपति ॥३७ न जानि पर भाव यस्य ब्रह्मादय सुरा । अद्यापि न वय विन स देवखिपुरान्तक ॥३८ श ण्वन्तु देवता सर्वा मत्यमस्मद्वच परम् । नास्ति रद्रान्महादेवादधिष देवत परम् ।।३६ न यया वमरोमाणि श.नन शरामस्तवे। न यथास्ति वियत्पुष्प तया नास्ति हरातारम् ।।४० शिवभक्तिमृते यस्तु मुसमाप्तुमिहेच्छति । अजागलम्तनादेश स दुग्ध पातुमिच्छति ॥४१ महादेव विजानीयादहमम्मोति पण्डिा । अन्यक्मिस्मादप्यस्ति तथ्य मुविनिये ॥४२ रवासम्मुर अन्तर में वैर भी उसी को ही जयरे सम बदमारे २४ ] [ सौरपुराण हैं । वेदों ने कहा था-भपित आशय वाले विद्वान् योगिगण जिराको देखा करते हैं और अपनी सब इन्द्रियों को नियमित कर लिया करते है वह ही महेश्वर भगवान् आत्मा हैं ॥३६॥ जिन देवेश्वर प्रभु के ब्रह्मा-विष्णु इन्द्र और चन्द्र प्रभृति समस्त देवगण frकर हैं और जिनके ही प्रसाद से ये सब जीवित रहा करते हैं वह पार्वती के पति महादेव ही स्वोपरि देवेश्वर हैं ॥३७॥ ब्रह्मादि देवगण भी जिसके प्रभाव को नहीं जानते हैं और अभो नक भी हम लोग भी उनके स्वर को नही समझा करते हैं वही देव त्रिपुरासुर के अन्त करने वाले हैं ॥३८॥ सब देवगण अब हमारा यह परम सत्य वचन श्रवण कर लेवें कि महादेव भगवान् रुद्र से अधिक अन्य कोई भी परम देव नहीं है और वही सर्वोपरि विराजमान् देव हैं ॥१६॥ जिस तरह से कर्म के रोम नहीं होते हैं और शश (वरगोश) के मस्तक में सीग नहीं रहा करते है तथा जैसे आकाश में पुष्प नहीं होते हैं तात्पर्य यह है कि ये उपयुक्त तीनो बातें असम्भव है ठीक उसी भानि यह भी सत्य है कि हर भग- • " वान् से पर कोई देवता नही है 130। जो पुरुप भगवान् शिव की भक्ति के बिना ही इस लोक मे सुख प्राप्त करने की इच्छा किया करता है उसकी यह इच्छा भी इसी तरह से समझना चाहिए जिस तरह से अजा के गले में होने वाले स्तन से कोई दूध पीने की इच्छा किया करते हो क्योकि गले के स्तन से दूध कभी निकलता नहीं है और ऐसी इच्छा करना निरर्थक ही होती है। वैसे ही शिव भक्ति के बिना सुख भी नहीं पाया जा सकता है ॥४१॥ मैं पण्डित हूँ-अर्थात् ज्ञाता हूँ- इस भावना से महादेव प्रभु का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । मुक्ति के लिये इसका ज्ञान करना परमावश्यक है कि अन्य भी कुछ उनके थतिरिक्त है क्या ॥४२॥ ब्राह्मी नारायणी रौद्री पूजयित्वा महेश्वरीम् । यत्प्रपश्यन्ति योगीन्द्रास्तद्विद्याच्छाकर गदम् ॥४३॥ क्रमाच्चक्राणि चक्रम्य शहिन्यामुपरि स्थितम् । यदभिव्यज्यते ज्योतिस्ताद्विद्याच्छाकर पदम् ।।४४ शिवमहिमावर्णनम् । [ २१ देवयानपय हित्वा पितृयाण तथोत्तरम् । गगनाद्यो रव, सूक्ष्मः शकरस्य स वाचकः ।।४।। विश्वतश्चक्षुरीशानस्त्रिशूली विश्वतोमुख. । जनकः सर्वभूतानामेक एव महेश्वर. ॥४६॥ वालाग्रमात्र हृत्पद्मे स्थित देवमुमापतिम् । येऽनुपश्यन्ति विद्वासरतेषा शान्तिहि शाश्वती ॥४॥ पृथिव्या तिष्ठति विभुः पृथिवी वेत्ति नैव तम् । रूप च पृथिवी यस्य तस्मै भूम्यात्मने नमः॥४८॥ अप्सु तिष्टति नैबाजारत विदु परमेश्वरम् । आपो रूप च यस्यैव नमस्तस्मै जलात्मने ॥४६।। ग्राह्मी-नारायणी-रौद्री महेश्वरी शक्ति को पूत्र करके योगीन्द्र लोग जिसको देखा करते हैं उसी पदरो सदर यह जान लेना चाहिए ॥४३॥ कम मे चक चक्रमण करके शतिनी के ऊपर स्थित जो ज्योति अभिव्यक्त होती है। उसी को शङ्कर भगवान् का पद (स्थान) समझना चाहिए ॥४४॥ देवयान पप का त्याग करपे उत्तर में पितृयाण है। यहा पर गगन से जो मूक्ष्म रव होता है वही भगवान् गदर का वाचक है ॥४५॥ विश्व तपादा ईशान-विमूली विश्वतोमुर और समस्त भूतो के जनक एक ही भगवान महेश्वर हैं ।।४६॥ हृदय रूपी वमल में बालरे अप्रभाग पे परिमाण वाले उमापति देव स्थित रहा करते हैं। जो विद्वान लोग उनका दमन किया करते हैं उनको शाश्वती शान्ती हुआ करती है ।।४।। विभु इसी पृथ्वी पर स्थित रहा बरते है विन्तु यह पृथ्वी उनको नहीं जानती है। जिसका पर प्वी रूप है उन भूम्पारमा निये नममार है, राये जलों में भर गमवास्थित रहा करने शिम जो उन परमे- स्वर यो नहीं पहचान है। ये बाप (अप) मिना स्वप है उन जलारमा प्रभु से लिये नमामार है । यौनी तिरपमेयारमा त वेति पदाचन । अग्नी का भवेटरय तरगं यापारमने नम || २६ ] [ सूर्य पुराण तिष्ठत्यजल यो वायो न वायुर्वेत्ति तं परम् । वायुयंस्य भवेदूप तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥५॥ व्योमिन तिष्ठति यो नित्य व्योम वेति न ते हरम् । व्योम यस्य भवेद्र प तस्मै व्योमात्मने नमः ॥५२॥ सूर्य तिष्टति यो देवो न सूर्यो वेत्ति शकरम् । . यस्य सूर्यो भवेद्र प तस्मै सूर्यात्मने नम ॥५३॥. यश्चन्द्र तिष्ठति विभुश्चन्द्रो वेत्ति • शाश्वतम् । चन्द्रो यस्य भवेद्र प तस्मै चन्द्रात्मने नमः ॥५४॥ यजर्माने तिष्ठति यो न त वेत्ति कदाचन । यजमानोऽपि यद्रूप यजमानात्मने नमः ।।५।। त्वत्तो वयं समुद्भ तास्त्वय्येव विलयस्तथा । प्रमाणपदमारूढास्त्वत्प्रसादाबृपध्वज ।।६।। एव वेदस्तुति श्रुत्वा भगवानिगरिजापति । प्रत्यक्ष समभूत्तेपा वेदाना मनुजाधिप ॥५७।। सूर्यकोटिप्रतीकाशः सहस्राश. सहस्रपात् । सहस्रशीर्षा पुरुष सूर्यसोमाग्निलोचन ॥५॥ स्थूलात्स्थूलतर. स्थूल सूक्ष्मात्सूक्ष्मत्तरः परः । वेदानुवाच भगवान्देवदेवो महेश्वर 11५६|| जो अभेयात्मा अग्नि में विराजमान रहा करते हैं और वह अग्नि उनका ज्ञान ही नहीं रखता है। उन अग्नि के स्वरूप वाले प्रभु अन्यात्मा के लिये नमस्कार है ॥५०॥ जो निरन्तर वायु मे स्थित रहा करते है उन परमेश्वर को यह वायु नहीं जानता है । वायु जिनका रूप होता है उन वाय्वात्मा के लिये नमस्कार है ॥५१॥ जो नित्य ही व्योम मे रहा, करते हैं और उन हरको यह व्योम नहीं जानता है । यह व्योग उनका रूप होता है उन व्योगात्मा प्रभु के लिये नमस्कार है ॥५२॥ जो देवेश्वर सूर्य मण्डल मे विद्यमान रहा करते है किन्तु सूर्य देव म्वप उन शङ्कर भगवान् का ज्ञान नही रखते है । सूर्य जिनका रूप होते हैं उन सूर्यात्मा शिवमहिमावर्णनम् ] [-२७ प्रभु के लिये नमस्कार है ॥५३॥ जो चन्द्रमा में स्थित रहते हैं और चन्द्र उन शाश्वत प्रभुको नही पहिचानते हैं रिन्तु चन्द्रमा जिनका रूप है उन चन्द्रात्मा प्रभु की सेवा मे हमारा प्रणाम है ॥५४॥ वे यजमान ही एक मे भी विराजमान रहा करते हैं किन्तु यजमान को उनकी स्थिति का ज्ञान नही होता है वह यजमान भी उनका ही एक स्वरूप होता है अतः उस यजमानात्मा प्रभु के लिये हमारा प्रणाम है ॥५५॥ हे वृप ध्वज ! हम लोग सव आप समुद्धत हुए है और आप मे ही विलय को प्राप्त होंगे। आपके ही प्रसाद मे हम सब प्रमाण पद पर समारूढ हुए हैं ॥५६॥ भगवान् भानु देव ने कहा-इस प्रकार से वेदो के द्वारा की हुई स्तुति का श्रवण करके भगवान् गिरिजा के स्वामी हेमनु जाधिय ! फिर उन वेदो के सामने प्रत्यक्ष हो गये थे ॥५७।। करोडो मूर्यों के सामान दीप्ति वाले–सहन नेत्रो से पुक्त महरू चरणों से समन्वित-सहन शीर्षों से सम्पन्न पुरुष थे जिनके सूर्य और चन्द्र एव अग्नि लोचन थे 1५८॥ वे म्यूल से भी अधिक म्थूल थे तथा सूक्ष्म से भी अधिक सूक्ष्म देवो के भी देव भगवान् महेश्वर वेदो से बोले-५६।। मत्प्रमादाद्भविष्यध्व हे वेदा लोकपूजिता. । युप्मानाश्रित्य विप्रेन्द्राः कर्भ कुर्वन्ति नान्यया ॥६०।। -ये युष्मान्समतिक्रम्य यत्किचित्कर्म कुर्वते । निष्फले तद्भवेत्कर्म तेषा युप्मदैवज्ञया ॥६१।। नित्य नैमित्तिक काम्य यच्चान्यन्मोक्षसाधनम् । युप्मद्वचो नान्यदिति मत्वा धोरो न शोचति ॥२॥ ये व युष्माननादृत्य शास्त्र कुर्वन्ति मानवाः। निरये ते विपच्यन्ते यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥६३|| श्रेयसे विपु लोकेपुन वेदादधिक परम् । विद्यते नात सदेह इति दत्तो वरो मया ॥६॥ युष्मत्कृतं परं स्तोत्र ये पठिप्यन्ति वै द्विजाः । तेपामध्ययन पुण्य मत्प्रसादाद्भविष्यति ॥६॥ * [ २६ * सुयुम्नाख्यान ] प्रत्यक्ष सर्वभूतानामज्ञाना तद्विार्यय । विश्वमायाविधातार द्विरष्टादशरूपिणम् ।।३।। भक्तिग्राह्य महादेव जानीयात्मनि सस्थितम् । आत्मभूते महादेवे योगिध्येये सनातने ॥४॥ भक्तिमास्थाय परमा वर निर्वाणमाप्नुहि । तीर्थयात्रा यहुविधा यज्ञाश्च विविधा कृता ॥५॥ येपा जन्मसहस्रपु तेपा भक्तिभवेच्छिवे । अक्षय परमो धर्मो भक्तिलेगेन जायते ।।६।। नास्ति तम्मात्यरो धर्म इत्याहुर्वेदवादिन । धर्मों बहुविध प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्वदशिमि ॥७॥ - श्री भानु देव ने कहा- जो यह ईश्वर का तेज है वह सर्वच गमन करने वाला है और यदि परम पद प्राप्त करने की इच्छा है तो वेवल उनकी ही शरणागति म चले जाओ॥१॥ वह ही समस्त भूतों म स्थित है । वह ज्ञानमय और तम से परे हैं-अक्षर-निर्गुण-शुद्ध- आनन्द और यह परम अन्यय है ॥२॥ वह ईश्वरीय तेज समस्त भूतो को प्रत्यक्ष है किन्तु जो अन्न पुग्प हैं उनको उससे विपर्यय होता है अर्थात् उनको प्रत्यक्ष नही होता है । वे विश्व की माया के विधाता और छत्तीस स्वरूप वाले हैं ॥३॥ श्रीमहादेव भक्ति के द्वारा ग्रहण कारने के योग्य हैं और उनको अपनी आत्मा मे ही सस्थित समय लेना चाहिए। वह आत्मा के मी आत्म दे भी आत्मभूत है और सना- नन तथा योगियो के द्वारा ध्यान करने के योग्य महादेव हैं ॥४॥ परम भक्ति में समास्थित होकर परम निर्माण को प्राप्त करो। अनेक प्रकार की तीयों की यात्रा और बहुत तरह के यज्ञ किये हैं ॥५॥ ये जीवजन सहसों जन्म धारण कर लेते हैं तब वहीं भगवान् शिव के चरणों में मक्ति उत्पन्न हुआ करती है । भगवान शिव की भक्ति के लेश मात्र मे ही परम अक्षय धर्म होता है ॥६॥ वेदों का कथन करने वाले जाता ३० -- [ सूर्य पुराण पुरुप यही कहते है कि शिव से पर कोई भी धर्म नहीं है। तत्व दर्शी मुनियो के द्वारा बहुत प्रकार का धर्म बतलाया गया है ॥७॥ सत्राक्षय परो धर्म शिवधर्म सनातन । यज्ञात्तीर्थाजपाद्दानाद्धर्म स्याद्वहुसाधन ॥८॥ साधनप्रार्थनावलेश परसपत्तिदुखद 1 य पुन शिवधर्मस्तु न सावनमपेक्षते ॥६।। सचित जन्मासाहस्त्र. पाप मेरूपम यदि । करोति भस्मसाच्छक्ति शभोरमिततेजस ॥१०॥ कुर्वन्नपि सदा पाप सकृदेवाच येच्छिवम् । लिप्यते न स पापेन याति माहेश्वर पदम् ।।११।। ये स्मरन्ति महादेव यदि पापरता अपि । ते विज्ञ या महात्मान इति सत्य ब्रवीम्यहम् ।।१२।। नामानि च महेशस्य गृणस्त्यज्ञानतोऽपि वा। तेषामपि शिवो मुक्ति ददाति किमत परम् ।।१३।। अत्राह सप्रवक्ष्यामि कथा पापप्रणाशनीम् । पायकल्लसमुद्भता ब्रह्मणा समुदीरिताम् ॥१४॥ भगवान् शिवजी भक्ति मे अक्षय पर धर्म है और शिवधम्म सना तन अर्थात् 'सर्वदा चले आने वाला है ! यन मे-तीर्थ से–जय से और दान से बहुत साधनो पाला धर्म होता है | वह धर्म साधनो और प्रार्थनाओ के क्लेश वाला होता है तथा पराई सम्पत्ति के दु ख का देने घाला हुआ करता है । जो यह शिवभक्ति रूप धर्म है वह किसी भी साधन की अपेक्षा नहीं रक्खा करता है ॥६॥ यदि सहस्रो जन्मो मे सज्जित किया हुआ पाप मेरु पर्वत के समान है तो उसको भी परि- मित सेज वाले भगवान शम्भु की शक्ति भस्म कर दिया करती है ।।१०।। मनुष्य सदा पापो को करता हुआ भी यदि एक वार भी भगवान् शम्भु की अर्चना करता है तो यह पाप से कभी भी लिप्त नहीं हुआ करता है शिवार्चन की ऐसी ही महिमा है और अन्त मे महेश्वर के पद को प्राप्त

सुद्य म्नारयान ]
[ ३१
किया करता है ॥११॥ यदि अहर्निश पापो म रति रखने वाले भी
पुरुष हैं वे भी महा देव का स्मरण किया करते हैं तो उनको महान्
आत्मा वाले ही समझना चाहिए-यह मैं सर्व पर सत्य कह रहा हूँ
॥१२॥ यदि कोई अज्ञान से भी महेश्वर भगवान के नामो का कीर्तन
करते हैं तो उनको भी परम दयालु भगवान शिव मुक्ति दे दिया करते
करते हैं इससे अधिक और क्या हो सकता है ॥१३॥ यहाँ पर मैं एक
पापो का विनाश कर देने वाली कथा बतलाऊ गा जो पाग्रकल्प मे
समुत्पन्न हुई थी और ब्रह्मा जी द्वारा कही गयी थी ॥१४॥
श्रद्धया परया राजशृणु त्व गदतो मम ।
वक्ष्येऽह त प्रणम्याऽऽदावीश भुवननायकम ।।१५॥
मासीदाद्ये कृतयुगे सप्तद्वीपैकराड्बली।
। इन्द्रा म्न इति ख्यातो राजा परमधार्मिक ||१६||
पूवो महाभाग सुद्य म्न इति विश्रुत ।
ऐश्वयेरखिलै ति यथा दिवि शचीपति ।१७॥
प्रतिष्ठानपुरे रम्ये गङ्गातीरे मनोरमे ।
तत्र स्थित्वाऽखिला पृथ्वी तस्मिन्राजनि शासति ॥१८॥
कदाचित्तत्र भगवास्तृणाबिन्दुर्महामुनि ।
आजगाम स त द्रष्टु सुधू म्न प्रियदर्शनम् ॥१६॥
तमायान्त मुनि दृष्टवा राजा रुद्राचं ने रत ।
उदास्यार्चा महावाहुरुत्थाय च कृताञ्जलि ॥२०॥
यथावदभिवाद्याथ ददावासनमुत्तमम् ।
यथावन्मधुपर्कादि तस्मी सर्व न्यवेदयत् ॥२१॥
हे राजन् । परमानित श्रद्धा से उसका आय क्षमण करो। मैं उस-
को बतलाता हूँ। मैं प्रारम्भ में समस्त भुवनो के नामक ईश उनको
प्रणाम करके उस कथा का वर्णन करुगा ।१शा सबसे आदि मे होने
वान कृत युग में सातों दीपो के एक छत्र राजा तया वलवान् और
परम धामिक इ7 पुम्न नाम वाला राजा प्रसिद्ध ४ा था ॥१॥

[ शिव पुराण
1
उसका एक पुत्र था जिसका नाम सुध न प्रसिद्ध था। वह महान भाग्य
वाला सम्पूर्ण ऐश्वयों स दिबिलोक म इद्र के ही ममान शोभित होता
था ॥१७॥ गङ्गा के तट पर परम मनोरम एव अत्यधिक सुरम्य पति-
छान पुर मे वह राजा रहा करता था और समस्त पृथ्वी का वही पर
स्थिर होकर शासन किया करता था ॥१८|| दहा पर किसी समय में
महामुनि भगयान तृण बिन्दु उस सुद्युम्न में मिलने के लिये समागत
हुए थे। सुध न परम प्रिय दशन था ॥१६॥ राजा उस समय में भग
पान् रुद्र के मन मे तिरत था। उस समय में समागत मुनि को देखकर
महावाहुओ वाले राजा ने अर्चा को उदासित करके उठ गया और हाथो
को जोडकर खडा हो गया था ॥२०॥ यथावर मुनि को अभिवादन
करके इसके अनन्तर उसने मुनि के बैठने के लिये उत्तम आसन दिया
था। तथा विनि विधान के साथ मधुपक आदि सभी पूजनीय चार
उनकी सेवा म समर्पित किये थे ।।२।।
अद्य धन्य कृतार्थोऽस्मि सफल जीवित मम ।
भगवानागतो यस्मात्मा द्रष्टु मुनिसत्तम ।।२२।।
किमथ मतो ब्रह्मन्कृयकृत्योऽस्मि सुनत।
विशेषाच्छकरे भक्तो न दुलमिहास्ति ते ॥२३॥
सुद्य म्नस्य वच श्रुत्वा मुनिराह महामना ।
शिवभक्त्यमृतास्वादपरानन्दकानभर ॥२४॥
राजन्यदुक्त भवता तत्तथैव न सशय ।
तथाऽपि चरित धुत्वा तवाह विस्मयान्वित ॥२५॥
प्रष्ट समागतो राजजन्मनस्तव गौरवम् ।
कथयस्व महाबाहो श्रोतु कोतूहल हि मे ॥२६॥
जन्मन्यहमतीतेऽस्मिन्पराधोऽह गोमतीतटे।
देवतानामह द्वेष्टा सर्वेपा प्राणिनामपि ॥२७॥
सुव्याडिरितिनामाऽह ख्यातोऽह व्याधारामुने :
न कश्चिद्धर्मलेशोऽस्ति पापकर्मस्वह रत ॥२८॥

सुधम्नास्यान ] 1 ३३ राजा ने कहा हे मुनि श्रेष्ठ ! आज मैं परम धन्य एव कृतार्थ होगया हूँ और मेरा यह जीवन भी आज सफल होगया है क्योंकि आप स्वय कृपा करके मुझे दर्शन देने के लिये मेरे घर पर पधारे हैं ॥२२॥ हे ब्रह्मन् ! आप तो परम सुमुत हैं। आप यहाँ किस प्रयोजन से पधारे हैं ? मैं तो परम कृतकृत्य हो गया हूं। आप तो विशेष रूप से भगवान् शङ्कर के भक्त हैं। आपको इम लोक मे कुछ भी दुर्लभ वस्तु नहीं है ॥२३॥ श्री भानुदेव ने कहा-~सुद्य म्न राजा के इस वचन का श्रवण करके महामना मुनि ने कहा जो कि मुनि भगवान् शिव की भक्ति रूपी अमृत के आस्वाद्र मे परमाधिक आनन्द में निमग्न हो रहे थे ॥२४॥ तृरण विन्दु ने कहा है राजन् ! आपने जो कुछ भी कहा है वह वस्तुत. वैसा ही है और इमम कुछ भी सशय नहीं है तो भी मैंने आपके चरित का श्रवण रिया था तो मुझे परम विस्मय हो गया था ॥२५॥ हे राजन् ! मैं आपके जन्म का गौरव पूछने के ही लिये यहाँ पर आया हूँ। हे महावाहो ! आप उसे मेरे सामने कहिये क्योकि मेरे हृदय में उसके श्रवण करने का वडा भारी कोतूहल उत्पन्न हो रहा है ॥२६॥ राजा सुद्युम्न ने कहा-हे मुनिवर ! मैं अपने प्रथम जन्म मे गोमती के तट पर एक व्याध था। मैं सभी देवों का द्वपी था और सभी प्राणियो के साथ भी सदा द्वेषभाव रक्खा करता था ॥२७॥ हे मुने ! मेरा नाम 'सुव्यादि" या और मैं व्याघो का राजा प्रसिद्ध हो रहा था। मेरे अन्दर उस व्याध जीवन मे धर्म का तो लेशमात्र भी नही था तथा मैं रातदिन पाप पूर्ण कर्मों में ही निरत रहा करता या ॥२८॥ मया ये निहिता मार्गे तेा सख्या न विद्यते । परस्व यदपहृत तत्पाप पर्वतोपमम् ।।२९ एव बहुतिथे काले गते-ह पञ्चदा गतः । धम राजस्य पुरतो नातोह यमकिंकरः॥३० मा इप्टवाड्याववीधर्मश्चित्तगुप्त विचारकम् ।।

३४ ] । सूर्यपुराण किमनेन कृतो धर्म लेशोऽस्ति वद सुव्रत ।।३१ अनेन यत्कृत पुण्य मया वक्तु न शक्यते । जानाति भगवानेको विश्वव्यापी महेश्वरः ॥३२ इद पुण्यमिति ज्ञात्वा कृतनानेन यद्यपि । आहर प्रहरेत्यादि नामसकीर्तन च यत् ॥३३ करोति तेन पुण्येन दुष्कृत भस्मसारकृतम् । पापलेशोऽपि नास्तास्ति इति मे निश्चिता मतिः ॥३४ मैंने उस समय मे मार्ग मे जिनका वध किया था दे अगणित प्राणी थे और उनकी सख्या पुछ भी नहीं बतलायी जा सकती है। दूसरो का धन जो मैंने अपहरण किया था वह पाप भी साधारण नहीं था प्रत्युत एक पर्वत के ही समान महान था ॥२६) इस प्रकार से बहुत-समय व्यतीत हो जाने पर मैं मृत्युगत हो गया था। यम किकरो के द्वारा मुझे धर्मराज के समक्ष में प्राप्त किया गया था।३०। मुझको देलकर धर्म- राज ने पाप-पुण्यो के लेखा-जोला करने वाले चित्रगुप्त से कहा- हे सुवन ! यह बतलाओ कि इसने क्या किया है? क्या इसके जीवन मे धर्म का भी थोड़ा बहुत लेश है ? ॥३१।। चित्रगुप्त ने कहा-इसने जो पुण्य किया है वह ऐसा है कि मेरे द्वारा कहा नहीं जा सकता है। उसको विश्व में व्याप्त रहने वाले एक भगवान् महेश्वर ही जानते हैं ।।३२॥ यद्यपि यह कोई पुण्य का कार्य है---यह जानकर इसने नहीं किया था। यह सदा 'आहर'-'प्रहर' इत्यादि नामो का सकीर्तन किया करता था। इन दोनो शब्दो के कथन का अर्थ अपहरण करो और मार डालो-यही होता था किन्तु उन दोनो शब्दो में "हर" का नाम है ।।३३॥ उसी पुण्य से जो भी कुछ इसके जीवन मे दुष्कृत थे वे सब भस्म हो गये थे। अब इसमे पाप का लेशमान भी शेष नहीं रह गया है-मेरे बुद्धि तो यही निश्चय करती है ॥३४॥ तस्य तद्वतन श्रुत्वा चित्रगुप्तस्य धीमत । सुव्याडि पूजयामास यथावद्विधिपूर्वकम् ॥३५ सुद्य म्नाख्यान ] [ ३५ एतस्मिन्नन्तरे तत्र विमान सार्वकामिकम् । सूर्यायुतप्रतीकाश दिव्यस्त्रीभिविराजितम् ॥३६ देवदूत समानीतमारुह्य मुनिपु गव । धर्मराजमनुज्ञाप्य गतोऽहममरावतीम् ॥३७ तत्र भुक्त्वा महाभोगान्युगानामयुत तत । गतोऽस्मि ब्रह्ममदन ब्रह्मणान्ह प्रपूजित ॥३८ तमाह कल्पपयन्त भोगान्भुक्त्वा यथेप्सितान् । ततस्तु कर्मण शेप भोक्नुमत्र महीतले ॥३६ इन्द्रद्य म्नस्य राज कुले जातोऽस्मि सव्रत । स्मरामि पूर्विका जाति प्रमादाच्छूलिनो मुने ॥४० ईश्वरे सहसा भक्तिर्मम त्रिदशपूजिते । जानाति को महेशम्य माहात्म्य परमात्मन ॥४१ यस्य नाम्न फलमिदमज्ञानोच्चारणादपि । ज्ञात्वा य कीतं येच्छभो मान्यमिततेजस ।। मुक्ति करतल तस्य स्थिति मुनयो जगु ॥४२ गजा सुद्य म्न ने कहा-धीमान चित्रगुप्त के इस वचन को सुनकर धर्मराज ने उस सुव्यादि का विधि पूर्वक यथावत् पूजन किया था ॥३॥ इसी बीच में वहाँ पर सब कामनाओ के पूर्ण करने वाला एक विमान आ गया था जो दश हजार सूर्यों के समान दीप्तिमान और दिव्य स्त्रिपो से समन्दित था ॥३६॥ उस विमान को देवदूत वहां लाये थे और उनके द्वारा मुझसे कहा गया था कि हे मुनिष्ठ । इस पर समारूढ होइये। मैं भी मुनि श्रेष्ठ । उस पर चढकर तथा धर्मराज की आज्ञा प्राप्त करके अमरावती मे चला गया था ॥३७॥ फिर वहाँ पर दश सहस्र युगो तक मैंने महान् भोगा का उपभोग क्यिा था और इसके उपरान्त मैं ब्रह्माजी के सदन म चला गया जहां पर ब्रह्माजी के द्वारा मेरी पूजा की गयी थी ॥३८॥ वहाँ पर मैं एक कल्प तक ययेमित भोगो का उपभोग करके इसके पश्चात् गेप कर्म का फल भोगने के लिये इस

[ सूर्यपुराण
महीतल मे आगया हूँ ॥३६॥ हे सुप्रत । यहाँ पर मैं राजपि इन्द्र धम्न
कुल मे समुत्पन्न हुआ हूं। हे मुने । मैं अभी भी भगवान शूली के
प्रभाव से अपनी पहिली जाति का स्मरण करता हूँ। अर्थात् भगवान
शङ्कर का ही यह प्रभाव है जिससे अपनी प्रथम जन्म की बात अभी
तक याद है ।।४०॥ देवो के द्वारा समर्थित ईश्वर मे मेरी सहसा भक्ति
है । परमात्मा महेश के माहारम्य को कौन जानता है । अर्थात कोई भी
नहीं जानता है ।॥४१॥ जिन भगवान् शङ्कर के नाम का यह फल है
जो कि बिना ही ज्ञान के उच्चारण करने ही प्राप्त होगया है । को
मनुष्य उनके नाम के माहात्म्य को जानकर अमित तेज वाले शम्भु के
नामो का कीर्तन करता है उसके तो हाथ मे ही मुक्ति स्थित रहा
करती है--ऐमा मुनियो ने बतलाया है ॥४२॥
इति सर्वमशेपेण चरित तस्य धीमत्त ।
सुध म्नस्य मुनि श्रुत्वा विस्मितोऽभूपुनः 11४३
समालिङ्ग य महात्मान सुद्य म्न राजपुगवम् ।
राजन्स्त्रमाश्रपद यामीत्युक्त्वा जगाम स ॥४४
एतत्ते चरित राजन्सुद्य म्नस्य महात्मन ।
कथित प पठेद्भत्तया ब्रह्मलोक स गच्छति ॥४५
भानुदेव ने कहा-परम बुद्धिमन उस सुद्य म्न के सम्पूर्ण परित
को पूर्ण रूप से सुनकर मुनि बारम्बार विस्मित होगये थे ॥४३॥ उस
मुनि ने महात्मा श्रेष्ठ राजा सुद्य म्न का भलीभांति आलिङ्गन किया
भौर फिर कहा-हे राजन
अब मैं अपने आश्रम को जाता है इतना
कहकर वह वहाँ से चले गये ।।४४॥ हे राजन् । यह महान आत्मा वाले
सुधम्न का परित आपले वतला दिया है। जो मनुष्य इसको भक्ति
की भावना से पढता है वह सोपा ब्रह्मनो मे गमन किया करता
है ॥४५॥

वाराणसी महिम-कलियुग वर्णन ] [ ३७ ॥ वाराणसी महिम-कलियुग वर्णन ॥ राज्ञ. सकाशात्स मुनिर्गत्या किं कृतवान्पुनः । तस्याऽश्रमस्य किं नाम भगवन् हि मे प्रभो ॥१ रेवातीरे महत्पुण्य जालेश्वरमिति स्मृतम् । माधम तृणबिन्दोस्गु मुनिसिद्धनिपेविनम् ॥२ गत्वा तत्र मुनिश्रेष्ठो भवभावसमन्वित. । शिवलिङ्ग प्रतिष्ठाप्य तीर्थयात्रा चकार स. ॥३ कानि तीर्थानि गुह्यानि येषु सनिहितः शिवः । न हि मे तानि भगवन्नन्यान्यपि च तत्त्वतः ॥४ तीर्थानामुत्तम तीर्थ क्षेत्राणा क्षेत्रमुत्तमम् । वाराणसीतिनगरी प्रिया देवस्य शूलिनः ॥५ यत्र विश्वेश्वरो देवः सर्वेषामिह देहिनाम् । ददाति तारक ज्ञान ससासन्मोचक परम् ॥६ गङ्गा ब्रह्ममयी यत्र मूर्तिश्चोत्तरवाहिनी । सही सर्वपापाना दृष्टा स्पृष्टा नमस्कृता ।।७।। मनुजी ने कहा-हे भगवन् ! हे प्रभो ! अब कृपा करके मुझे यह बतलाइये कि वह मुनि उस राजा सुद्युम्न के समीप से जाकर फिर उन्होंने क्या किया था और उनके आश्रम का क्या नाम है ॥१॥ भानुदेव ने कहा-रेवा नदी के तट पर महान् पुण्यमय एवं पवित्र जालेश्वर नाम से कहा गया है वह तृण बिन्दु मुनि का आश्रम है जो मुनियो और सिद्धो के द्वारा सेवित है अर्थात् मुनि और सिद्ध यहा पर निवास किया करते हैं ॥२॥ वह मुनियो मे थेष्ट वहाँ पर जाकर भगवान् भव (शङ्कर) के भाव से परिपूर्ण होगया था। और वहाँ पर एक शिव लिङ्ग की प्रतिष्ठा को पो और इसके पश्चात् उसने तीर्थयात्रा की थी ॥३॥ मनुजी ने कहा-वे कोन २ से तीर्थ है जिनमें भगवान् सिव सन्निहित रहा करते हैं और जो तीर्थ परमगुह्य हैं। हे भगवन् !

३८ ] [ सूर्यपुराण आप उनको मुझे बतलाइये और जो अन्य तीर्थ हो उनको भी तात्विक रूप से बतलाइये ॥४॥ भानुदेव ने कहा-समस्त तीथों मे उत्तम तीर्थ भोर सब क्षेत्रो मे अत्युतम क्षेत्र वाराणसी-इस नाम वालो नगरी है जो भगवान् शूली देव की परम प्रिया है । श। जहां पर विश्वेश्वर देव हैं जो यहाँ पर सभी देहयारियो को मसार से मोचन कराने वाला तारक ममज्ञ तथा ज्ञान प्रदान किया करते हैं ॥६॥ जिसमे ब्रह्ममयो गङ्गा की उत्तर की ओर वहन करने वाली विद्यमान है जिसका इष्ट किया जाने पर व्यथा स्पर्श मात्र और नमस्कार की हुई होने पर वह समस्त मनुष्यो के पापो का संहार करने वाली होती है ।।७।। नास्ति गङ्गासम तीर्थ वाराणस्या विशेषतः । तत्रापि मणिकाख्यं तीर्थ विश्वेश्वरप्रियम् ॥८॥ तस्मिस्ती) नरः स्नात्वा पातकी वाऽप्यपातकी। दृष्ट्वा विश्वेश्वर देव मुक्ति भाग्जायते नर. 16 विश्वेश्वरस्य माहात्म्य प्रदुक्त ब्रह्ममूनुना। तदहं सप्रवक्ष्यामि व्यासायमिततेजसे ।।१० घोर कलियुगौं प्राप्य कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । कि तच्छ यस्करमिति हृदि कृत्वा जगाम सः ।।११ नन्दीश्वरस्य यः शिष्यो योगिनामग्रणीः स्वयम् । सनत्कुमारो भगवान्यवाभरते हिमवग्दिरौ ॥१२ नानादेवगणाकीणे यक्षगन्धर्वसेविते । सिद्धचारणकूष्माण्डरप्सरौभिश्च सकुले ॥१३ गङ्गा मन्दाकिनी या राजते दुःखहारिणी। शोभिता हेमकमलेपुप्परल्यै मनोहरः॥१४ तस्याऽऽश्रममनुप्राप्य पाराशर्यो महामुनिः । अभिरच यथान्याय तस्यान उपदिश्य ॥१५ प्रतान्जलिपुटो भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥१६ ।

वाराणमी महिम-वलियुग वर्णन 1 [ ३६ भागीरथी के तुल्य अन्य कोई भी तीर्थ नहीं है ओर विशेष रूप से वागणमी मे तो यह गङ्गा ही सर्वोत्तम तीर्थ है । और उम गङ्गा तट मे भी नो मणिकर्ण नाम वाला घाट है वह तो भगवान् विश्वेश्वर का परम प्रिय तीर्थ ॥८॥ उम तीर्थ मे मनुष्य स्नान करके चाहे वह महायात की ही क्यों न हो अथवा अयातको हो भगवान विश्वेश्वर का दर्शन प्राप्त करके मुक्ति का प्राप्त करने का सच्चा अधिकारी हो जाया करता है अर्थात् उस मनुष्य की निश्चय ही मुक्ति हो जाती है ॥९॥ अपरमित ते नधारी भगवान् व्यासजी को ब्रह्माजी के पुत्र ने भगवान् विश्वेश्वर का जो महात्म्य कहा है उसी को मैं आपको बतलाऊ गा ।।१०।। इस महान घोर कलियुग प्राप्त करके श्रीकृष्ण द्वैपायन प्रभु इस ससार मे क्या श्रेय का सम्पादन करने वाली है-यह आपन मन मे विचार करके ही वहा पर वे गये थे ॥११॥ जो नन्दीश्वर के शिष्य हैं और स्वय योगियो में सबसे अग्रणी अर्थात् परम प्रधान हैं ऐसे सनत्कु- मार भगवान हिमवान् गिरियद जहां पर विराजमान रहा करते है।।१२।। वह हिमालय पर्वत का स्थान अनेक देवो के समुदाय के है तथा यक्षो और गन्धर्वो के द्वारा सेवित रहा करता है एव बड़े बड़े सिद्ध चारण और कूप्माण्डो से तया अनेक अप्सराओ से घिरा हुआ रहा करता है ॥१३॥ जहा पर मन्दाविनी गङ्गा विराजमान रहती हैं जो समस्त दुखो का हरण कर देने वाली हैं । उस गङ्गा में हम कमल तथा अन्य विविध प्रकार के अत्युत्तम पुष्प विकसित होकर उसकी सोमा की वृद्धि किया करते हैं ॥१४॥ उसके आश्रम मे पराभर मुनि के पुत्र व्यास देव जी मुनि प्राप्त हो गये थे। वहा पहुंचकर उन्होंने यथोचित रूप से सनत्कुमारजी का अभिवादन किया था और फिर उही के सामने उप- विष्ट हो गये थे ।।१५ । व्यास देवजी ने अपने दोनों हाथो को जोडकर उस समय में वह वाक्य कहा था ॥१६॥ प्राप्त कलियुग घोर पुष्यमार्गवहिप्कृतम् । पासण्डाचारनिरत म्लेच्छान्ध्रजनसमुलम् ॥१७ द्वारा समावीर्ण ४. ] ( सूर्यपुराण अधार्मिका क रसत्त्वा ह्यनाचारालमेधसः । तस्मिन्युगे भविष्यन्ति ब्राह्मणाः शूद्रपाजकाः ॥१८ स्नानं देवार्चनं दानं होमं च पितृतर्पणम् । स्वाध्याय न करिष्यन्ति ब्राह्मणा हि कलो युगे ॥१६ न पठन्ति तथा वेदाञ्श्रेयसे ब्राह्मणाघमाः। प्रतिग्रहार्थ वेदांश्च पठिप्यन्ति कलौ युगे ।।२० पुरुषोत्तममाश्रित्य शिवनिन्दारता द्विजाः । कलौ युगे भविष्यन्ति तेषां वाता न माधवः ॥२१ स्वां स्वा वृत्ति परित्यज्य परवृत्त्युपजीवकाः। ब्राह्मणाद्या भविष्यन्ति सप्राप्ते तु कलौ युगे ॥२२ श्री व्यास देव जी ने कहा-हे भगवान् ! यह महान् घोर कलि- युग प्राप्त हो गया है जिसमे पुण्य का मार्ग एकदम दूर हो गया है और सर्वत्र पाखण्ड पूर्ण आचार लोग किया करते है तथा सर्वत्र म्लेच्छो के समान ही आन्धुजन हो गये हैं और सब स्थल इन्हीं से घिरे हुए हैं ॥१७॥ इस युग में बाह्मण लोग भी शूद्रो को भजन कराने वाले हो जायेंगे यह ऐमा ही घोर युग है कि उसमे लोग अधार्मिक-महान् क्रूर- आधार से रहित तथा अत्यल्प मेघा पाने हो जायगे ॥१८|| इस कलियुग मे ब्राह्मण गण स्नान देवो का अभ्यचर्म-दान-होम और पितृगणों का भी तर्पण नहीं किया करेंगे और न वेदों का स्वाध्याय ही करेंगे ऐसे ही अनाचारी विष हो जायगे ॥१९॥ ये अधम ब्राह्मण अपने श्रेय का सम्पादन करने के लिये भी वेदो का पठन पाठन नहीं किया करेंगे और इस घोर बलिपुग में केवल दान ग्रहण करने के ही लिए वेर्दो अध्ययन किया करेंगे ॥२०॥ भगवान् पुरुषोत्तम का समाश्रय ग्रहण करने भगवान शिव की निन्दा परने मे निरत रहेगे ऐसे द्विज इस कलियुग में समुत्पन्न होगे जिनका भाग माश्व भी नहीं किया करते हैं ॥२१॥ विप्रगण अपनी र वृत्ति या परित्याग करदेंगे और दूसरे वर्णों की वृत्ति से उपजीवित रहने वाले हो वाराणसी महिम कलियुगवर्णन ! जायेंगे। इस महान् घोर कलियुग के आने पर सभी ब्राह्मण आदि वर्ण ऐसे ही अपने २ कर्मों का त्याग करेंगे- ऐसे ही हो जायगे ॥२२॥ एतान्पापरतान्दृष्ट्वा राजानश्चाविचारका । भविष्यन्ति कलौ प्राप्ते वृथा जात्यभिमानिन ॥२३ उच्चासनगता शूद्रा दृष्ट्वा च ब्राह्मणास्तदा । न चलन्त्यल्पमतयः सप्राप्ते तु कलो युगे ॥२४ कापायिणश्च निग्रंथा नानाः कापालिकास्तथा । बौद्धा वैशेपिका जैना भविष्यन्ति कलौ युगे ॥२५ तपोयज्ञफलाना तु विक्रेतारो द्विजाधमा । यतयश्च भविष्यन्ति शतशोऽय सहस्त्रश ॥२६ विनिन्दन्ति महादेव संसारान्मोचक परम् । तद्भक्ताश्च महात्मना ब्राह्मणाश्च कलौ युगे ॥२७ ताडयन्ति दुरात्मानो ब्राह्मणा-राजसवका । न निवारयते राजा तान्दृष्ट्वाऽपि क्लो युगे ॥२८ एव घोरे कलियुगे किं तच्छे यस्वर द्विज । ब्रूहि तद्भगवन्मह्य ससारान्मोचक परम् ॥२६ राजा लोग भी केवल अपनी जाति का वृथा अभिमान रखने ही वाले हो जायेगे और इन सवको पाप कर्मों में रत देखकर भी कोई विचार नहीं किया करेंगे ॥२३॥ यह कलियुग प्राप्त हो जायगा तो उस मै शूद्र लोग ब्राह्मणो को देखकर भी कचे आसनो पर बैठे रहा करेंगे तथा अपने आसन से बिल्कुल भी ये अल्प मति वाले शूद्र जरा भी नहीं हटा करेंगे ॥२४॥ कलियुग मे पाय वर्ण के वस्त्रो को धारण करने चालेनिन्यि अर्थात् ज्ञान शून्य-नग्न-कापालिक स्वप्परधारी-बौद्ध और वैशेषिक अनेक सम्प्रदायो वाले समुत्पन्न हो जायगे ॥२॥ अघम द्विज अपना तप और यज्ञो के फल को बेच देने वाले हो जायेगे तथा कलियुग में संक्डों और सहस्रो हो यति होकर भ्रमण करते हुए सर्वत्र [ सूर्यपुराण 1 दिखलाई देंगे ।।२६।। इस संसार से मोचन कर दने वाले भगवान् महा- देव जी की विशेष निन्दा पिया परेंगे। नियुग में ऐसे ही लोग हो जायगे कि महात्माओ और उनके भक्तो तथा ग्रामगो को भी निन्दा किया करेंगे ।॥२७॥ दुष्ट आत्मा वाले राजा के सेवागण ब्राह्मणो को ताडित किया करते हैं । इस कलियुग का ऐसा ही प्रभाव होगा कि राजा लोग विप्रो को सताने वाले अपने दुष्ट सेवको को देखकर भी उन्हे इस दुष्ट कर्म के करने से नहीं हटाया करेंगे ॥२८॥ हे द्विज । आप अब यही बतलाइये कि जब ऐसा महान् घोर कलियुग होगा तो उस समय मे श्रेय करने वाला क्या होगा? हे भगवन् । इस संसार से छुटकारा दिलाने वाला क्या साधन होगा-यह हमको आप बतला दीजिए कि प्राणियों का कल्याण होवे ॥२६॥ ॥ महादेव वर-प्रदान ॥ गच्छ वाराणसी व्यास यन विश्वेश्वर शिव । न तत्र युगधर्मोऽस्ति नैव लग्ना वसुधरा ॥१ विश्वेश्वरस्य याल्लिङ्ग ज्योतिलिङ्ग तदुच्यते । यास्मिन्हष्टे क्षणाज्जन्तु स सार न पुनर्विशेत् ॥२ गत्वा पश्य पर लिङ्ग तत्र सत्यवतीसुत । प्राप्स्यसे परमा मुक्ति देवैरपि सुदुर्लभाम् ॥३ स्नात्वा गङ्गाजले पुण्ये पश्य विश्वेश्वर परम् । स दास्यति पर ज्ञान येन मुक्तो भविष्यसि ।।४ दृष्ट्वा विश्वेश्वर देव यावत्तिष्ठति (स्यास्यसि) तत्क्षणात् । आगमिष्यन्ति मुनयस्त्वा द्रष्टु सर्व एव ते ॥५ विश्वेश्वरस्य माहात्म्य प्रक्ष्यन्ति त्वा महामुने । ब्रूहि मदचनात्रोपा ज्ञान माहेश्वर परम् ॥६ महादेव वर-प्रदान ] [ ४३ एव सत्यवतीसूनुस्तन्माहात्म्यमशेपत । सनत्कुमारास्वगुरो श्रुत्वा माहेश्वराग्नणी ॥७ प्रणिपत्य गुरु भक्त्या रुद्र ब्रह्मादिसेवितम् । सशिप्य प्रययो शीघ्र व्यासो वाराणसी प्रति 10 श्री सनत्कुमारजी ने कहा- हे व्यास देव । आप अब वाराणसी पुरी म चने जाइये जहाँ पर माक्षात् विश्वेश्वर शिव स्वय विराजमान रहा करते हैं । यहा पर इस कलियुग का धर्म सर्वथा नहीं है और न यह वसुन्धरा भी लग्ना है ॥१॥ भगवान् विश्वेम्बर का वहा पर लिङ्ग है वह ज्योति लिङ्ग कहा जाता है । जिमके एक वार दर्शन मात्र कर लेने पर क्षणभार मे ही प्राणी फिर इस ससार में जन्म ग्रहण नहीं किया करता हैं ॥२॥ हे सत्यवती के पुत्र | आप वहा पर गमन करके उस ज्योतिलिङ्ग वा दर्शन करी । आप वहा पर परमोत्तम मुक्ति को प्राप्ति पर लेंगे जोवि देवगणो को भी महान दुर्नभ होती है ॥ ॥ वहाँ पर वारारणसी पुरी में भागीरथी गङ्गा के परम पुण्यमय जल म स्नान करने परम विश्वेश्वर प्रभु का दर्शन करो। वे स्यय ही आपको परम मान बा उपदेश करेंगे जिससे आप मुक्त हो जायगे ॥४॥ भगवान विश्व स्वर देव या दर्शन करके जितनी देर भी आप वहा पर ठहरेंगे तो उसी समय मे सभी मुनिगण आपका दर्शन करने के लिए वहा पर आ जायगे । ॥ हे महा मुने | वे सब मुनिगण आपम भगवान विश्वेश्वर का माहात्म्य पूगे तो आप उस समय म मेरे बचन जो उन्ही के द्वारा उनको भगवान का परम माहेश्वर ज्ञान प्रदान कर देना ॥६॥ इम प्रकार मे सत्यवतो के पुत्र ने उनके माहात्म्य को पूर्ण रूप से महेश्वर देव के भक्तो मे अग्रणी ने अपने गुरुदेव सनत्कुमार जी से धवण दिया था। पिर प्यामजी ने अपने गुरुदेव से भक्ति पूर्वक प्रणाम किया था। और ब्रह्मादि देवो के दाग मेयित घो रद्रदेव को भी प्रणाम किया पा और इसके मालर मार देश भर नियों के माहित ही कारमली को घने गये पे का । सूर्य पुराण गत्वा वाराणसी व्यास सिर्षिमुनिसेविताम् । अकरोकि तदाचक्ष्व भगवान्वश्वपूजित मा सप्राप्य काशी धर्मात्मा कृष्णद्वैपायनो मुनि । स्नात्वा यथावज्जाह्नव्या तपयित्वा सुरान्पितन् ।।१० ययौ विश्वेश्वर द्रष्टु ज्योतिलिङ्गमनामयम् । सपूज्य सवभावेन दण्डवत्प्रणिपत्य च ॥११ देवस्य दक्षिणा मूर्तावुपविश्य महामुनि । पश्यन्विश्वेश्वर लिङ्ग जपन्वै शतरुद्रियम् ।।१२ क्षणाल्लिङ्गात्पर ज्योतिराविर्भूत निरञ्जनम् । सूक्ष्मात्सूक्ष्म च परममानन्द तमस परम् ॥१३ आदिमध्यान्तरहित सूयकोटिसमप्रभम् । यत्त-माहेश्वर ज्योतिर्वेदान्तेषु प्रतिष्ठितम् ॥१४ श्री मनुदेव ने कहा- हे भगवान | आप तो सम्पूण विश्व के द्वारा पूजित हैं अब मुझको यह बतला दीजिए कि व्यास देवजी ने सिद्ध ऋषि और मुनिगण से सेवित वाराणसी पुरी मे पहुंचकर फिर वा किया था ? ॥६॥ श्री भानुदेव ने कहा-श्री कृष्ण द्वैपायन परम महान आत्मा वाले मुनि जो बहुत ही अधिक धर्मात्मा थे वाराणसी पुरी मे पहुच गये और उहोंने भगवती जा हवी देवी के पवित्र जल में विधि पूर्वक स्नान किया और देवो का तथा पितृगणों का तर्पण वहा पर सविधि किया था ॥१०॥ इसके उपरान्त के अनमय ज्योति लिङ्ग भगवान् विश्वेश्वर के दर्शन करने के लिये गये थे । वहाँ पर सर्व भाव से उनवा भली भांति बम्य चन किया था और उनको प्रणाम किया या जोकि भूमि पर एक ददा के ही समान गिर कर साप्टाग प्रणाम किया था ||११|| फिर देव की दक्षिणा की थी और वहा पर मुनि उपविष्ट हो गये थे। मूत्ति के सामने ही दक्षिण भाग में बैठकर उन्होने विश्वेश्वर प्रभु के ज्योति लिङ्ग का दर्शन करते हुए और शत रुद्रिय का जाप करते हुए ध्यानमान हो गये थे । एक ही क्षण में उमशिव लिङ्ग से एक निरज्जन ज्योति का आवि- महादेव वर-प्रदान ] [ ४५ भाव हुआ था यो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म परम मानन्द स्वरूप और तम से परे यो ॥१३॥ वह ज्याति मादि-मध्य और अन्त से रहित तथा करोडो सूर्या के समान प्रभा से युक्त थी। वह महेश्वर प्रभु की ज्योति वेदान्तो में प्रतिष्ठित है ॥१४॥ दर्मनात्तस्य च मुने पाराशर्यस्य धीमत । दिव्य माहेश्वर ज्ञानमुद्भ त केवल शिवम् ॥१५ मेने कृतार्थमात्मामाम दु खत्रयविजितम् । अद्वयं निर्गुण शान्त जीवन्मुक्तस्तदा मुनि ॥१६ अहो विश्वेश्वरो देव क्थ कर्वा न सेव्यते । यस्मिन्दृष्टे क्षणाज मुदित मम निर्मलम् ॥१७ नमो भगवते तुभ्य विश्वनाथाय शूलिने । पिनाकिने जगत विश्वमायाप्रवतिने। ॥१८ दुविज्ञेयाप्रमेयाय परमानन्द रूपिणे । भक्तिप्रियाय सूक्ष्माय पावंतोशाय ते नमः ।।१६ नमो जगत्प्रतिष्टाय जगज्जननहेतवे । सहों ऋग्यजु सामान्य तत्प्रवतिने ॥२० जानाति वस्त्वा विश्वेश तत्त्वतो माहशो जन। वेदा अपि न जानन्ति साङ्गोपनिपदक्रमाः ॥२१ उम परम दिव्य ज्योति के दर्शन करने से परासर के पुष बुद्धिमान उन मुनि को परम दिव्य माहेश्वर शान उत्पन्न हुआ पा जो येवल गिव पा॥१५॥ उस समय म मुनि देव ने अपने आपको परम कृतार्प एवं तीनो प्रकार के दुखों से रहित माना था मुनि अन्य निज योर पान्त ज्योति पा दर्शन करके जीवन मुक्त हो गये थे ॥१६॥ मोहो । यह भगवान विश्वेश्वर देव की महिमा का माहुन है । बया कारण है रि रिम प्रसार रोपिनो द्वारा इना गेवन नहीं दिया जाता है । अभिप्राय यही है जिससे शेया गभी कोपरती पाहिए को भी नहीं रहे हैं [ सूर्यपुराण चे महान् मूर्ख हैं । जिनका इतना प्रवल प्रभाव है कि दर्शन करने पर एक ही क्षण भर में मुझे परम निर्मल ज्ञान उत्पन्न हो गया है ॥१७॥ भगवान विश्वनाथ शूल धारी आप के लिए मेरा प्रणाम है । आप पिनाक घनुप के धारण करने वाले-जगत के कर्ता और विश्व की माया के प्रवृत्त करने वाले प्रभु की सेवा मे मेरा नमस्कार समर्पित है ।।१८। जो बहुत ही कठिनाई से जानने के योग्य है- अप्रमेय है और परमानन्द रूप वाले हैं तथा भक्ति से प्यार करने वाले और परम सूक्ष्म हैं ऐसे पार्वती के ईश के लिये नमस्कार है ।।१६।। जो इस जगत की प्रतिष्ठा है और जगत के जन्म देने के हेतु हैं तथा इसका सहार करने वाले हैं और प्राकृ- यजुर्वेद और साम वेद की मूत्ति है तथा उनको प्रवृत्त कराने वाले है उनके लिए नमस्कार है ॥२०॥ हे विश्वनाथ ! तात्यिक रूप से मुझे जैसा कौन मनुष्य आपको जानता है जबकि साङ्ग और उपनिपदो से युवत साक्षात् वेद भी आपको नहीं जान पाते है ॥२१॥ अथ तस्मिन्महादेवे परज्योतिषि विश्वभुक् । शूलपाणिरमेयांत्मा प्रादुरासीदृपध्वज. ॥२२ ततस्तमब्रवाद्वाक्यं कारुण्याच्दुभया गिरा। वर वरय दास्यामि यत्ते मनास रोचते ।।२३ भगवत्कृतकृत्योऽस्मि दर्शनात्तव शंकर । जात त्वद्विपय शान देवानामपि दुर्लभम् ॥२४ भक्ति परे भगवति त्वय्येवाव्यभिचारिणीम् । देहि में देवदेवेश नान्यदिष्ट वर मम ॥२५ एवमस्त्विति देवेशो ध्यासायामिततेजसे। वर दत्त्वा मुनीन्द्राय क्षणादन्तहितोऽभवत् ।।२६ तस्मान्द्यासात्परो नान्यः शिवभक्तो जगन्धये । कृष्णो वा देवकीसूरजुंनो वा महामतिः ॥२७ एवं हराल्लब्धवरः कृष्णद्वैपापनः प्रभुः । तत्र यानि न लिङ्गानि तानि इष्टु यमो मुनिः ॥२८

महादेव वर-प्रदान ]
[ ४७
श्री भानु देव ने कहा-इसके अनन्तर उस ज्योति में जो परम
दिव्य महादेव जी की थी इस विश्व का भोग करने वाले वृपमध्वज.
अभेय यात्मा वाले सुनपाणि प्रभु प्रादुर्भूत हुए थे ॥३२॥ इसके पश्चात्
परम करुणा पूर्ण वाणी के द्वारा भगवान विश्वनाथ ने उम मुनि व्यास
देव से कहा था कि तुम वरदान माग लो 1 मैं वही हूगा जो भी तुम्हारे
मन मे हो ॥२३।। श्री व्यास देव जी ने कहा-हे भगवान ' हे शङ्कर !
आपके चरणो के दर्शन प्राप्त करके मैं तो कृत कृत्य हो गया है। मुझे
आपके विषय का ज्ञान भी प्राप्त हो गया है जोकि देवा को भी परम
दुर्लभ होता है ॥२४॥ सबमे पर भगवान आपरे चारणो मे ही अव्यभि-
चारिणी भक्ति होवे-ह देव देवेश्वर । मुझे यही एक वरदान आप
प्रदान करिए । इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वरदान प्राप्त करने की
मेरी इच्छा ही नहीं है ।।२५।। भानुदेव ने कहा-फिर देवेश्वर ने ऐसा
हो होगा-यह उन अमित तेज से युक्त व्यास देव को वर दे दिया था
जोषि व्यास देव महामुनीन्द्र थे और फिर एक ही क्षण म भगवान
शङ्कर अन्तहित हो गये थे ॥२६॥ तौना लोगो म उन थी च्याम देव जी
से अधिक अन्य कोई भी शिव वा भवन नही है। अथवा देवसी दवी
मे पुत्र श्रीकृष्ण या महा मतिमान् अर्जुन है। इस तरह से धोरण
हुँ पायन प्रभु ने श्री हर से वर प्राप्त कर लिया था और फिर वहा पर
जो भी भगवान शिव के लिङ्ग विराजमान पे उनके दर्शन करले में
लिए ये मुनि परे गये थे ॥२७॥२८॥

४८ ] [ सूर्यपुराण ॥ वाराणसी लिंग महिम वर्णन ॥ कानि दिव्यानि लिङ्गानि यानि द्रष्टुं ययौ मुनिः । आचक्ष्व तानि नः सूत माहात्म्य चापि कृत्स्नशः ॥१ यदुक्त भानुना पूर्व मनवे मुनिसत्तमाः। तदेव कथयिष्यामि शृणुध्व गदतो मम ॥२ आग्नेय्यामविमुक्तस्य वापी व लोक्यविधता । यत्र सनिहितो देवो नित्य विश्वेश्वरः शिवः ॥३ यत्र स्नानं द्विजष्ठा देवानामपि दुर्लभम् । भक्त्या यस्तज्जल पोतं ते रुद्रा एव भूतले ॥४ तेषा लिङ्गानि जायन्ते हृदये त्रीणि सुव्रताः । दुर्लभं तज्जल तस्मात्तिष्ठत्येव हि मुद्रितम् ॥५ तत्र सत्यवतीसूनुः स्नात्वा चैव यथाविधि । अविमुक्तेश्वरं दृष्ट्वा लागलीशं ततो ययौ ॥६ तत्र ब्रह्मादयो देवाः सेवन्ते शूलपाणिनम् । तस्य दर्शनमात्रेण ज्ञान पाशुपत भवेत् ।।७ ऋपियों ने कहा- कोन-कौन से शिवलिङ्ग दिव्य हैं जिनका दर्शन प्राप्त करने के लिये व्यास मुनि गये थे? हे सूतजी ! उनको आप हमको बतलाइये और उन का पूर्ण माहात्म्य भी कहिए ॥१॥ श्री सूत. जी ने कहा- हे मुनि श्रेप्टो ! पहिले मनुजी को भानुदेव ने जो कहकर बताया था । वही मैं आपको बतलाऊंगा। मुझसे आप श्रवण करिए ॥२॥ आग्नेयी विदिशा मे एक अविमुक्त नी लोको मे परम प्रसिद्ध वाणी है जहा पर विश्वेश्वर देव शिव नित्य ही सनिहित रहा करते हैं ॥३॥ द्विज श्रेष्ठो ! जहाँ पर स्नान करने की बहुत बड़ी महिमा है जो स्नान देवो को भी परम दुर्लभ हुआ करता है । जिन्होने भक्ति से उस जन का पान किया था वे रुद्र भूतल मे ही विद्यमान हैं ॥४॥ हे सुव्रतो ! उनके हृदय में तीन लिङ्ग उत्पन्न होने हैं । वह जल बहुत ही दुर्लभ है । इसी

वाराणसी लिङ्ग महिम वर्णन ]
[४६
कारण से वह मुद्रित स्थित रहा करता है ॥५॥ वहाँ पर उस जल में
विधि-विधान के साथ सत्यवनी के पुत्र श्री व्यास देव जी ने स्नान किया
था। फिर वहा अविमुक्तेश्वर प्रभु का उन्होंने दर्शन किया था तथा
इसके पश्चात लागलीरा के समीप में वहाँ से वे चले गये थे ॥६॥ वहा
'पर ब्रह्मा आदि देवगण भगवान शूलपाणि को सेवा किया करते है।
उनके दर्शन को ऐसी महिमा है कि केवल उनके दर्शन भर ही से पाशु.
पत ज्ञान का उदय हो जाया करता है itsul
जगाम स मुनिः पश्चाद्रष्टुव तारकेश्वरम् ।
यनान्तकाले भगवाज्ञान तत्सप्रयच्छति ||
ययानेन देवस्य स्थापित लिङ्गमुत्तमम् ।
यस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्या व्य रोहति ।।
तदृष्ट्वा परम लिङ्ग व्यास सत्यवतीसुतः ।
यो शुक्र श्वर द्रष्ट सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥१.
आराध्य मुनिना यत्र शुक्रणामिततेजसा ।
प्राप्ता सजीवनी विद्या सुराणामपि दुलभा ॥११
देवस्य वह्निदिग्भागे कूपस्तिष्ठति शोभनः ।
स्नान ताश्वमेयस्य फल यति सोभनम् ॥१२
तस्मिन्कूपे मुनिः स्नात्वा दृष्ट्वा मुझेश्वर शिवम् ।
ब्रह्मेश्वर ययौ द्रष्ट तत्र ब्रह्मा विराट् स्वयम् ॥१३
तपस्तप्तवा महाघोर प्रीतये पावंतीपतेः ।
ब्रह्मत्व प्राप्तवान्ब्रह्मा योग चान्ये महर्षयः ।।१४
इसके पश्यात वे महामुनि भगवान तारकेश्वर प्रभु के दर्शन करने
के लिये चले गये थे जहाँ पर भगवान् अन्न पाल में अपना मान प्रदान
frया करते हैं 11८1। जहाँ पर होइनने देवर के एक उत्तम सिंह
को स्थापना की यो।मिरे र दान कर लेने से ही बहा हत्या के
मा.शे. A. करने. मा.प.
परमोसम गिहरा पर फिर ममम्त मिदियों को प्रदान करने

५० ] [ सूर्यपुराण वाले भगवान शुक्र श्वर का दर्शन प्राप्त करने के लिये वहां से गमन किया था ॥१०॥ जहां पर अपरिमित तेज वाले शुक्र देवाचार्य मुनि ने आराधना की थी और भगवान शिव के प्रसाद से सजीवनी विद्या को प्राप्त किया था जो विद्या सुरो को भी परम दुर्लभ है ।।११॥ देवेश्वर के अग्नि कोण के भाग मे एक परम सुन्दर कूप विद्यमान है । वहाँ पर स्नान करने से वह कूप अश्वमेघ महायज्ञ का परम शोभन फल प्रदान किया करता है ।।१२।। उस कूप मे मुनिवर व्यासजी ने स्नान किया था और शुक्र श्वर शिव का दर्शन भी किया था। इसके पश्चात् वे ब्रह्मेश्वर प्रभु के दर्शन करने के लिये चले गये थे वहाँ पर विराट् ब्रह्माजी स्वयं ही विराजमान रहा करते है ॥१३॥ वहां पर ब्रह्माजी ने पार्वती के स्वामी भगवान् शिव को प्रीति प्राप्त करने के लिये महान घोर तप किया था जिसके प्रभाव से ब्रह्माजी ने ब्रह्मत्व प्राप्त कर लिया था और अन्य महषियो ने योग की प्राप्ति कर ली थी ॥१४॥ दर्शनात्तस्य लिङ्गस्य सर्वयज्ञफल लभेत् । पुनर्जगाम भगवानोकारेश्वरमव्ययम् ।।१५ स्मरणाद्यस्य लिङ्गस्य मुच्यते सर्वपातकैः । यत्र साक्षाच्छिवः सूक्ष्मो नित्य तिष्ठति वै द्विजाः ॥१६ अनुग्रहाय लोक्ता पशुपाशविमोचक । यत्र पाशुपताः सिद्धा ओकारेश्वरमीश्वरम् ॥१७ सपूज्य परमां सिद्धि प्राप्तवन्तो द्विजोत्तमाः। कृष्णपक्षे चतुर्दश्या तस्मिल्लिङ्ग उपोषितः ।।१८ यदि जागरण पुर्यात्परा सिद्धिमवाप्नुयात् । सतः सत्यवतीसूनुः कृत्तिवासेश्वर ययौ ॥१६ उपासते महादेव यत्र ब्रह्मादयः सुरा। मुनयः शसितारमानो रुद्रजाप्यपरायणाः ॥२० कृत्तिवासेम्वरे लिङ्ग लोला (ना,श्च बहवो द्विजाः । देवस्य पूर्वदिग्भागे हसतीर्थ महत्सरः ।।२१ 50625 परवार सत्यवती वाराणसी लिङ्ग महिम वर्णन ! उस शिवलिङ्ग का ऐसा अभूतपूर्व प्रभाव है कि उसके दर्शन से प्राणी सभी प्रकार के यनो के करने का पुण्य फल प्राप्त कर लिया करता है। फिर भगवान् व्याम देव अव्यय ओङ्कारेश्वर के समीप में चले गये थे ॥१॥ जिस लिन के स्मरण कर लेने भर से ही मनुष्य समस्त प्रकार के महा- पालको से छुटकारा पा जाया करता है । हे दिगो । जहाँ पर मूक्ष्म स्वरूप वाले भगवान् शिव साक्षात् नित्य ही स्थित रहा करते हैं ॥१६॥ पशुपाश के विमोचन करने वाले प्रभु ने लोको पर अनुग्रह के लिये ही ऐसा किया है। जहां पर सिद्ध पाशुपत ईश्वर पोद्वारेश्वर का मली भांति पूजन करके हे द्विजोत्तमो | उत्तम सिद्धि को प्राप्त कर चुके है। मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन मे उपापित होकर उस लिङ्ग के समीप में स्थित रहे ।।१७-१८॥ यदि उम दिन रात्रि जागरण करे तो परमोत्तम सिद्धि को प्राप्त कर लिया करता है। इसके के पुन श्री व्यास देवजी कृत्तिवासेश्वर बी के स्थान गमन कर गये थे ॥१६जहां पर ब्रह्मा आदि देवगण मगवान् महादेव जी की उपासना किया करते हैं । दासित यात्गा वाले मुनिगण रद मन्म के जप मे पायण रहा करते हैं ॥२०॥ है द्विजगण | कृत्तिवासेश्वर लिङ्ग मे बहुत से लोन हैं। देवेश्वर के पूर्व दिशा के भाग मे हम तीर्थ नाम वाला एक महान सरोदर है ॥२१॥ स्नात्वा सत्र महादेव कृत्तिवासेश्वर शिवम् । ये द्रक्ष्यन्ति महात्मानस्ते वै ब्रह्मादिवन्दिता ।।२२ सकृत्पश्यति यो भवःया कृत्तिवासेश्वर विभुम् । न पतत्येव ससारे रुद्र एव न ससय ॥२३ हमतीर्थे नर स्नात्वा कृत्तिरासेश्वर विभुम् । मपूज्य परया भक्त्या कृत्तिकासेश्वर शिवम् ॥२४ न पतत्येव ससारे जानकार्या विचारणा। ययो रत्नेश्वर द्रष्ट मोक्षो यत्र प्रतिष्ठिन ॥२५ ५२ ] [ सूर्यपुराण दर्शनात्तस्य लिङ्गस्य फल वक्तुं न शक्यते । सर्वस्मादधिको योगो वेदविद्भिनिपेव्यते ॥२६ योध्य पाशुपतो योगः पशुपाशविमोचक । वदिशभि. सभ्य कृते पाशुपते द्विजाः ॥२७ रत्नेश्वरे तदा ज्योतिदर्शनान्मनुजोत्तमः । रत्नेश्वर तु सपूज्य पाराशर्यो महामुनिः ।।२८ उस सरोवर में स्नान करके कृत्तिवासेश्वर महादेव शिव का जो दर्शन करेंगे वे महान आत्मा वाले लोग ब्रह्मा आदि देवो के भी पूजित हो जाया करते हैं ॥२२॥ कृत्तिवासेश्वर विभु को जो केवल एक बार भी दर्शन करते हैं और भक्ति की भावना से उनका अवलोकन किया 'करते हैं वे फिर कभी भी इस संसार मे आकर जन्म ग्रहण नहीं किया करते हैं वे तो साक्षात् रुद्र का ही स्वरूप प्राप्त कर लिया करते हैं-इस मे लेशमात्र भी सशय नहीं है ॥२३॥ उस हसतीर्थ मे मनुष्य स्नान कर के कृत्तिवासेश्वर प्रभु का पराभक्ति से अभ्यर्चन करता है तो फिर वह इस संसार में कभी पतन प्राप्त ही नहीं किया करता है-यह पर्वषा सत्य है और इसमें कुछ भी विचार नहीं करना चाहिए । फिर व्यास देव ने रलेश्वर भगवान का दर्शन प्राप्त करने के लिये वहां से चले गये थे जहाँ पर मोक्ष को प्राप्त कर लेना तो प्रतिष्ठित ही होता है ॥२४-२५॥ उस लिङ्ग के दर्शन प्राप्त करने से जो भी पुण्य-फल प्राप्त होता है वह से कहा ही नहीं जा सकता है। सब से अधिक योग तो वेदो के वेता लोगो के ही द्वारा निघोषित किया जाया करता है ॥२६॥ जो यह पाशुपत योग है वह पशुपारा का विमोचन करने वाला होता है । हे द्विजो! बारह वर्ष तक इस पाशुपत योग को भली भांति कर लेने पर उस समय में रत्नेश्वर में ज्योति आविर्भूत होती है । मनुजोत्तम उसका दर्शन करने से श्रेय प्राप्त किया करता है । रलेश्वर प्रभु का भली भांति पूजन करके पराशर मुनि के पुत्र महामुनि व्यासदेव मागे की ओर बढ़ गये थे ॥२७-२८॥ तो मुख

वागणसी लिङ्ग महिम वर्णन ]
द्रष्ट, देवाधिोवेश वृद्धकालेश्वर ययौ।
तस्मिलिङ्ग महादेव सदा तिष्ठति लीलया ॥२९
अनुग्रहाय लोकानामुमया सह विश्वभुक् ।
पृथिव्या यानि लिङ्गगनि सन्ति दिव्यानि वै द्विजाः ॥३०
वृद्धकालेश्वरे दृष्टे दृष्टान्येव न सशय ।
देवस्य पूर्वदिग्भागे कूपो मुनिनिपेवित ॥३१
पूरित पुण्यसलिलदेवदेवेन शभुना ।
य पोत तस्य सलिल प्राकृतश्चुलु वयम् ।।३२
प्रकृतिर्मुच्यते नेभ्यो मुक्तात्मानो भवन्ति ते ।
तर द्वैरायनो विप्रा स्नान कृत्वा समाहितः ॥३३
वृद्धकालेश्वर लिङ्ग सपूज्य च ततो ययौ।
मन्दाविनीतटे रम्ये मुनिसिद्धनिषेविते ॥३४
मध्यमेश्वरनामान मोक्षलिङ्गमनुत्तमम् ।
यत्र ब्रह्मादयो देवा मुनय सनकादय ॥३५
फिर वे वहाँ मे देवाधिदेव श्री वृद्ध गनेश्वर प्रभु का दर्शन करने
के लिये गये थे। उम लिङ्ग म महादेव मर्वदा ही लीला से समवस्थित
रहा करते हैं ॥२६॥ समस्त लोको के ऊपर अपना परम अनुग्रह करने
पे लिये विश्व का भोग करने प्रभु जगदम्मा उमादेवी ने साथ ही यहाँ
पर स्थित रहते हैं। हे हिजो । इम पृथ्वी पर जितने भी दिव्य शिव
निग उन मब दर्शन घेवल एक पृर पालेश्वर के दांन पर लेने
पर ही हो जाया करते है-इममें माय नहीं है। देवेश्वर में पूर्व दिशा
के भाग मे ए प मुनिगरे द्वारा निषेवित है ॥३०-३१॥ देवो भी
देव भगवान शम्भु दे ग वह पुष्प जली दाग पूरित कर दिया
गया था। जिन सापारण मनुष्यो न उममा नीन घुल्तु जना पान
रिया प्राति उनसे मुन हो जाग करती है और वे मुक्तारमा हो जाया
गरने है। विनरे । वही परायन मुनि ने म्नान लिया था और
गमाहित हो गये ॥१.२ रिर र सोमर ाि भनी

१४ ] [ मूर्यपुराण मांति पूजन किया था और वहाँ से भी गमन करके चले गये । मन्दा- किनी के तट पर परम रम्य स्थल है जो मुनि और सिद्धो के द्वारा सेवित है। वहाँ पर मध्यमेश्वर नाम वाले परमोत्तम मोक्ष लिङ्ग विराजमान हैं जहाँ पर ब्रह्मा आदि देव और सनकादि मुनिगण वहाँ पर भगवान की सेवा के लिये रहा करते हैं ॥३४-३५॥ उपासते पर लिङ्ग शिवदर्शनकाक्षिण. । मन्दाकिन्यां मुनिः स्नात्वा दृष्ट्वा वै मध्यमेश्वरम् ॥३६ घण्टाकर्णहदे स्नात्वा लिङ्ग तद्विमलं शिवम् । प्रतिष्ठाप्य मुनिथेष्ठो सुब्धवान्नानमुत्तममू ॥३॥ घण्टाकणंहदे तत्र दृष्ट्वा व्यासेश्वर शिवम् । यत्र यत्र मृतो वाऽपि वाराणस्या मृतो भवेत् ॥३८ तत. सत्यवतीसूनुः कपीश्वरमीश्वरम् । द्रष्टुं जगाम विप्रेन्द्रा लिङ्ग तत्पारमेश्वरम् ॥३६ पिशाचमोचनं नाम तत्र तीर्थमनुत्तमम् । रुद्रलोकम्य सोपानमिति प्राह महामुनिः ।।४० ये द्रक्ष्यन्ति कपर्दीशं कृतार्थास्ते न संशयः। मानुषी तनुमाश्रित्य रुद्रा एव न सशयः ।।४१ तस्मिस्तीर्थे मुनि' स्नात्वा सतर्य च सुरान्पितॄन् । कपर्दीश्वरमीशानं सपूज्य प्रययौ मुनिः ।।४२ वे सभी भगवान शिव को दर्शनाकाक्षा रखने वाले होकर हो उनकी उपासना किया करते हैं। व्यास मुनि ने भी मन्दाकिनी मे स्नान करके मध्यमेश्वर प्रभु का दर्शन किया था ॥३६॥ फिर घण्टापर्ण हद मे स्नान करके वहाँ पर विमल शिव लिङ्ग की प्रतिष्ठा करके ये मुनि ने उत्तम मान का लाभ लिया था । जहाँ-जहां पर भी मृत्यु को प्राप्त होने वाला मनुष्य वाराणसी में ही मृत हुआ करता है ॥३७-३८॥ हे विप्रेन्द्रो ! इसके अनन्तर सत्यवती के पुत्र महामुनि ईश्वर कपाश्वर का दर्शन प्राह करने के लिये उस पारमेश्वर लिङ्ग के समीप गे गये थे। वहाँ पर

दक्षेश्वर माहात्म्प ]
[ ५५
पिशाच मोचन नामक एक उत्तम तीथं है। महामुनि ने यही कहा था
यह तीर्थ रुद्र लोक मे पहुंचने का सोरान है । जो कपर्दीश्वर प्रभु का
दर्शन करेंगे वे निश्चित रूप से कृतार्थ हो जाया करते हैं-- इसमे सशम
विल्कुल भी नहीं है। वे लोग मानुपी शरीर को आश्रय लेते हुए भी
साक्षात् रुद्र ही होते हैं-इसमे विश्चिमात्र भी संगय नहीं होता है ।
उस तीर्थ मे मुनीन्द्र ने स्नान किया था और फिर सुरो तथा पितृगणों
का तर्पण किया था। इसके अनन्तर कपर्दीश्वर का भली भांति किया
और फिर वहा से प्रस्थान कर गये थे १३६-४०.४१-४२॥
॥दक्षेश्वर माहात्म्य ॥
पुनर्जगाम भगवान्कृष्णद्वैपायन प्रभुः ।
द्र दक्षेश्वर देव भताना सिद्धिदायकम् ।।१
यच्छिवावज्ञया पाप जात दक्षप्रजापतेः ।
तस्य पापस्य मोक्षाय तस्मिंलिङ्ग द्विजोत्तमा ॥२
आराध्य देवदेवेश यहून्यन्दशतानि ।
तस्य प्रसन्नो भगवान्देवदेव. सहोमया ॥३
ददी माहेश्वर योग तस्मै दक्षाय धीमते ।
लध्धा त परम योग तस्मिलिग लय गतः ॥४
ततः प्रभृति तल्लिङ्ग योगिभिः मेव्यते द्विजाः ।
योग ददाति मयंपा देवो दक्षेश्वर. शिवः ॥५
गद्गाया प्रयत. स्नात्वा दृष्ट्वा दक्षेश्वर शिवम् ।
प्राप्नोति परम योगमिति दैपायनोऽब्रवीत् ॥
स्नात्या सत्यवतीमनुगंझाया प्रयतो द्विजाः ।
घट्वा दोपवर देय यो पमानिनोचनम् ॥७
भी मुतजी ने कहा-फिर भगवान कृष्ण पायन प्रभु दक्षेश्वर देव
पासनाने सिये येथे जोरि अपने मोरीसिटकोनसान

[ सूर्य पुराण करने वाले है ॥१॥ दक्ष प्रजापति को भगवान शिव की आज्ञा से जो पाप हुआ था । हे द्विजोत्तमो । उस पाप से मोक्ष पाने के लिये उस लिङ्ग मे देव देवेश्वर को बहुत-मे संकडो वर्षों तक आराधना करके उन की उपासना की। फिर देवो के देव उमादेवी के साथ प्रमन हो गये ये ॥२-३॥ फिर भगवान ने प्रपन होकर उस धीमान दक्ष के लिये माहेश्वर योग प्रदान कर दिया था। उम परमोत्तम योग को प्राप्त करके यह उसी लिङ्ग मे लय को प्राप्त हो गया था ॥४॥ हे द्विजो । तभी से लेकर योगियो के द्वारा उम लिङ्ग की सेवा की जाया करती है और वे देव दक्षेश्वर शिव सभी को वह योग दिया करते हैं ॥५द्वैपायन मुनि ने यह कहा है कि भागीरथी गङ्गा मै प्रपत होकर स्नान करे और फिर दक्षेश्वर भगवान् शिव का दर्शन करके परम योग को प्राप्त कर लिया करता है ।।६॥ हे द्विजगण । सत्यवती के पुन व्याम देव ने प्रभत होकर गङ्गा मे स्नान दिया था और इसके पश्च त् दक्षेश्वर देव का दर्शन किया और इसके पीछे वे त्रिलोचन प्रभु के स्थान पर चले गये थे ॥७॥ हेतुना केन दक्षस्य निन्दाऽभूच्छाकरी पुरा । कारण वद तत्सूत श्रोतु वाञ्छा प्रवर्तते ।। आमीहह्ममुतो दक्ष पुन प्राचेतसोऽभवत् । शप्तो देवेन रुद्रण क्रोधाच्छभारेवज्ञया ।। वैर निधाय मनसि श भुना सह सुव्रता । दक्ष प्राचेतसो यजमकरोज्जाह्नवीतटे १० तस्मिन्यजे सम हूता इन्द्राद्या देवतागणा । ऋषयो मुनय सिद्धा राजान प्रथितौजस ॥११ ब्रह्मा च विष्णुना सार्धमाहूनम्तेन धीमता। देवान्सर्वांश्च भागार्थमाहूतान्यासमव ॥१२ दृष्ट्वा शिवेन रहितान्दक्ष प्रस्येवमग्रीन् । अहो दक्ष महामूढ दुर्बुद्ध किं कृत त्वया । देवा सर्वे ममाहूना भवरेण विना क्थम् ॥१३ दक्षेश्वरमाहात्म्य ] अन्त्यर्यामी स विश्वेशः सर्वेपामेव देहिनाम् । भोक्ता म सर्वयज्ञानां शङ्करः परमार्थतः ।।१४ ऋपियो ने कहा~पूर्व काल में किम हेतु से दक्ष प्रजापति को शङ्कर भगवान को निन्दा हुई थी। है मूत ! उस कारण को बतलाने को कृम करिए उसके श्रवण करने की हमारी बडी प्रबल इच्छा है। HEIt थी मूतजी ने कहा-दक्ष ब्रह्माजी का पुत्र था और फिर यह प्राचैतस हो गया था। गम्भु की अवज्ञा के होने से क्रौर से रुद्र देव ने उम दक्ष को शाप दे दिया था 18 हे मुनो ! शम्भु भगवान के माप मन मे वैर रम्पकर पायेतस दक्ष ने जाह्नवी के तट पर यज्ञ किया था॥१०॥ उस यज्ञ में इन्द्र आदि देवतागण सब बुलाये गये थे और ममम्त पि. गया-मुनिगण-मिद्ध और प्रपित ओज वाले राजा लोग भी बुलाये गये थे ॥११॥ उम धीमान ने भगवान विष्णु के साथ ब्रह्माजी भी बुलाये गये थे । ५ मम्भव ब्रह्माजी ने ममस्त देवी को अपना भाग ग्रहण करने के लिये बुलाया था। जब उन देवो को गिव मे रहित उन्होंने देखा था तो प्रह्माजी दस में यह बोले-१२॥ श्री ब्रह्माजी ने कहा- अहो' दर । तुम महान् मूद हो तेरी बहन ही दुष्ट युधि है। यह तूने क्या पिण है। बिना भगवान पर ये ममम्ल देवगण क्यो चुनाये गये हैं यह विश्वन अन्तर्यामी है जो मभी देहपारियों से अन्दर विरामान रहा करते हैं । यह मय यो के भोग करने वाले पामापं में भगवान पर हो होते हैं ॥१॥ एते च मुनयः मयें तय माहारयकारिणः । न जानन्ति पर भाव महादेवस्य मुनिन. ॥१५ एते नदेया प्रमाया आगतापामागिनः। सम्मायामोहिना: गर्व न मानन्ति पिनाकिनम् ॥१६ यम्य पादरज पलिवरयं प्रातानहम् । नामिपि गदा मनां पर निगपरः ॥१॥ १ [ মুঘল यस्य वामाङ्गजो विष्णुदक्षिणाङ्गाद्भवाम्यहम् । यस्याऽज्ञाऽखिल विश्वं सूर्यो भ्रमति सर्वदा ॥१८ चन्द्रश्च तारकाश्च व ग्रहाश्च भुवनानि च । धर्माधर्मव्यवस्था च वर्णाश्चवाश्रमाणि च ॥१६ तिष्ठन्ति शासनात्तस्य देवदेवस्य शूलिन । सा च शक्ति परा गौरी स्वेछाविप्रचारिणी ॥२० तव पुत्रीति दुर्बुद्ध मन्यसे तमसाऽवृत । करता जानाति विश्वेशीमीश्वराधशरीरिणीम् ॥२१ ये सब मुनिगण तुम्हारी सहायता करने वाले हैं और शूली महा- देव का जो परम भाव है उसको नही जानते हैं। ये इन्द्र आदि देवगण यज्ञ के भाग ग्रहण करने वाले यहाँ पर आ गये है। ये सभी उनकी माया से मोहित हुए है और इनमे विसी को भी भगवान पिनाकी की महिमा का विञ्चि मात्र भी ज्ञान नहीं है। जिसके चरणो से स्पर्श की हुई रज के छू लेने मात्र से मैंने ब्रह्मत्व को प्राप्त किया है । शार्ङ्ग धनुष के धारण करने वाले भगवान विष्णु के द्वारा भी उनके चरणा की रज को सदा शिर के द्वारा धारण किया जाया करती है तो भला बताइये शिव से पर अन्य कौन है ॥१६॥१७॥ जिनके बाम अङ्ग से भगवान विष्णु समुत्पन्न हुए है और दक्षिण अङ्ग से मैं पंदा हुआ है और जिसकी आज्ञा शिरोधार्य कर सूर्य देव सर्वदा सम्पूर्ण विश्व में भ्रमण किया वरत हैं । उसी देवो के देव भगवान शूली वे शासन से ये सब च द्र. तारा ग्रह और भुवन धर्म और अधर्म की व्यवस्था मव वर्ण तथा समस्त आश्रम स्थित रहा वरते हैं । और वह गौरी स्वेच्छा विग्रह पा पारण वरन वाली उनकी ही परा शक्ति स्वरुपा है ॥१८॥२०॥ हे दुष्ट बुद्धि वाले । तू तप से ही ममावृत होकर उसको अपनी पुत्री समझ रहा है । कोन है जो उम विश्व को स्वामिनो और महेश्वर में अर्व शरीर को पारण पग्ने पालो को जानता है अर्थात गसा कोई भी नहीं है।॥२१॥ ।

दोश्वर माहात्म्य । [ ६१ अनान ही है और तुम्हारे विनाश का कारण है जोकि किसी विशेष हेतु से ही तुमको हो गया है-ऐमा ही मुझे निश्चित रूप से प्रतीत हो रहा है ॥३१॥३२॥ इस प्रकार से दधीचि मुनि के बधन का श्रवण करने विचक्षण दक्ष ने सब शक्र आदि देवो की सन्निधि मे ही दधीचि मुनि से है विप्रो । कहा था ॥३३॥ दक्ष ने कहा-हे द्विजोत्तम | मैं नारायण भगवान से अन्य किसी भी देव को नहीं देखता हू । शिव ही सब वस्तुओ के कारण नहीं है-ऐसा मुझे निश्चय है ॥३४॥ केवल एक नारायण ही सबके कारण है और भगवान विष्णु से अन्य कोई भी कारण नहीं हैं-ऐसा भ्रति प्रतिपादन करती है । उमा देवी के साथ जो देव है वहीं बुधी के द्वारा सोम ऐमा कहा जाता है भगवान विष्णु कभी वही कारण है-ऐसा दधीचि ने कहा था ॥३५॥ तस्माद्य सर्वदेवानामधिकश्चन्द्रशेखरः। इज्यते सर्वयज्ञपु कथ दक्ष न पूज्यते ॥६६ यज्ञस्य पालको विष्णुरिति यनिश्चित त्वया । भविष्यत्यन्यथैवाऽऽशु पश्यत कमलापतेः ॥३७ एते च ब्राह्मणाः सर्वे ये द्विपन्ति महेश्वरम् । भवन्तु वेदवाह्यस्ते तमोपहतचेतसः ||३८ पापण्डाचारनिरता सर्वे निरयगामिन । फलो युगे तु सप्राप्ने दरिद्रा शूद्रयाजका: ।।३६ सर्वस्मादधिको रुद्र पशुपाशविमोचय । पराड मुखस्तु युप्माक मा भूदिज्याकरी गतिः ।।४० इति शपवा ययौ विप्रो दधीचिमुनिपुङ्गवः । स्वायम मुनिभिजुष्टमोकार नर्मदातटे ॥४१ एतस्मिन्नन्सरे गौरी परव्योमास्मिका शिवा । दक्षयज्ञस्य वृत्तात्त श्रवा देवगाव ॥४२ प्राह विश्वाधिक न्द्र प्रणताति प्रमजनम् । निरीक्ष्यमाप विशो परामविग्रहम् ।।४ ६२ ] [ सूर्यपुराण दधीचि ने कहा- भगवान् शिव तो सभी पशो में यजन किये जाया करते हैं । हे दक्ष ! तुम्हारे द्वारा उनका मजन फिर क्यों नही किया जा रहा है ? ॥३६॥ यह तुम्हारा जो निश्चित है कि यज्ञ के पालक भगवान विष्णु है यह बात भी अभी शीघ्र पमलापति के देखते देखते अन्यथा ही हुई जाती है ॥३७॥ और ये सब ब्राह्मण जो महेश्वर भग- वान से कैप किया करते हैं वे मद तम से उपहत वित्त वाले वेद वाह्म हो जायगे ॥३८॥ ये सब पापण से पूर्ण आधार मे ही निरत हैं और नरको के गमन करने वाले ही हैं तथा कलियुग के सम्प्राप्त होने पर ये शूद्रो को थजन कराने वाले हरिद्र हो जायगे ॥३६॥ सबसे अधिक भग- वान रुद्र देव ही हैं जो पशु पालो के विमोचन करने वाले हैं । जो पराड, मुख आप जैसे हैं आपको इच्छा करने वाली गति कमी नहीं होगी ॥४०॥ वे मुनियों में महान श्रेष्ठ दोचि विप्र-इस प्रकार से माप देकर वहाँ से चले गये थे । और नर्भदा के तट पर मुनियो के द्वारा सेवित मोद्धार को जयते हुए अपने आश्रम को वे चले गये ॥४१॥ इसी बीप मे पर ध्योमात्यिका शिवा गौरी ने देव भूपि के मुख मे दक्ष केयज्ञ का वृत्तान्त सुन लिया था और विश्वाधिक रुद्र देव से जोकि प्रगती के आत्तियो का भङ्ग करने वाले हैं। परमानन्द स्वरूप विग्रह वाले हैं और सभी पुष देखने वाले हैं देवेशो ने कहा-॥४२॥४३॥ । - योऽय प्राचेतसो दक्ष. पिता मे पूर्वजन्मनि । आवामवज्ञाय कय यज्ञ कतु प्रवक्रमे ४ देवाः सर्वे समाहूता विष्णुना सह शंकर । आदित्या वसको रद्राः साध्याश्च व मरुदग्णाः ॥४५ पयो मुनयः शिद्धा देतया दानपात्र ये। राजानश्च महाभागा गन्याः किनरास्तया ture अवमारारिणस्तस्य या शीघ्र पिनासप। तेन मे जायते प्रीतिरतुला मतावत्सल ४० दोश्वर माहात्म्य ] [ ६३ एव देव्या वत्र श्रु त्वा देवदेव पिनाकधृत् । असृजत्तत्क्षणाच्छंभुर्वीरभद्र महाबलम् ॥४८|| सहस्रसिंहवदन प्रलयाग्निसमप्रभम् । सहस्रबाहु जटिल दुष्टाना च भयकरम् ।।४६ श्री देवी ने कहा-जो यह प्राचेतस दक्ष है वह मेरे पूर्व जन्म मे पिता था । वह हम दोनो की अवज्ञा करके कैसे यज्ञ करने में संलग्न हो गया है ॥४॥हे शङ्कर विष्णु देव के साथ अन्य सभी देवो को बुलाया है जिनम अब आदित्य है वमुगण रदुगणसाध्य तथा भरुद्रण भी है। ऋषि-मुनि-सिद्ध-सिद्ध हैतेय और दानव भी हैं । सव मही भाग नृप हैं तथा गन्धर्व और विनर भी हैं ॥४५॥४६॥ ह भक्त वत्सले । उस अवज्ञा करने वाले के यज्ञ को आप बहुत ही शीघ्र विनष्ट कर दवें । इससे मुझे बहुत अधिक प्रीति होगी ॥४७॥ इस तरह से कहे हुए देवी के वचनो को सुनकर दवा के देव पिनाकधारी प्रभु ने उसी क्षण में शम्भू न महान बलवान् वीरभद्र का मुजन दिया था। उसका बदन एक सहस्र सिंहों क महान था और प्रलय काल वी अग्नि के समान प्रभा से युक्त था । एक सहन उमको बाहुएं थी मस्तक पर जटाए थी तथा वह वीरभद्र दुष्टो के लिये महान भयङ्कर या ॥४॥४६॥ भक्ताना वरद देव सूर्यसोमाग्निलोचनम् । उमाकोपोद्भवा देवी भद्रकाली भयकरी ॥५० अन्याश्च देव्यो रद्राश्च शतगा रोमसभवा । भद्रकाल्या सह तदा वीरभद्रो महाबल ॥५१ प्रहितो देवदेवेन दक्षयज्ञजिघासया। गत्वा स यन दक्षम्य मम्मसादकरोद्विजा ॥५२ दक्षस्सदद् त कर्म दृष्ट्वाऽय भयविह्वल । गतस्नच्छरण शोघ्र वीरमद्रस्य मूलिन ॥१३ उवाच वीरभद्रस्त दक्ष प्राचेतस द्विजा । तस्य पापविगोशाय बारुण्यामृतवारिधि ॥१४ ६४ । [ सूर्य पुराण गच्छ वाराणसी दक्ष सर्वपापप्रणाशिनीम् । अनुग्रहार्थ लोकाना या तिष्ठति शकर. ॥५५ अनुग्रहाद्भगवतो देवदेवस्य शूलिनः । अनेनव शरीरेण तप मोक्ष गमिष्यसि ॥५६ वह वीर भद्र शिव भवतो को वरदान देने वाला और सूर्य तथा और अग्नि के समान नेत्रो पाला देव था | उमा देवी के कोप से समुत्पन्न देवी महेश्वरी भद्र काली थी जो बहुत ही अधिक भयङ्करी थी ॥५०॥ अन्य भी बहुत सी देवियो और रोमो से समुत्पन्न सैकड़ो ही गद्र थे उस समय मे भद्रयाली के साथ महान वल वाले वीर भदु को दक्षा के यश को विध्यस करने की इच्छा से देवो के देव ने वहा पर भेजा था। हे द्विजो ! उस वीरभद्र ने वहा पहुंचकर दक्ष के यज्ञ को भस्मी भूत कर दिया था ॥५१॥५२॥ प्रजापति दक्ष ने उरा अत्यन्त अखत कर्म को देखा तो वह भय से विह्वल हो गया था। वह शीघ्र ही शूली वीरभद्र के शरणागति में प्राप्त हो गया था । हे द्विजो । वीरभद्र ने प्राचेतस दक्ष से कहा था जो वीरभद्र उसके पापो का विमोचन करने के लिए हम करुणामृत के सागर के समान ही हो गये थे॥५३॥५४।। वीरभद्र ने कहा है दक्षी अब आप सब पापो के विनाश करने वाली वाराणसी मे शीघ्र चले जाइये जहा पर लोको के ऊपर अनुग्रह करने के लिये शङ्कर भगवान स्वय विराजमान रहा करते है ॥५५॥ देवो के भी देव शूली भगवान के अनुग्रह से इसी शरीर से तेरा मोक्ष वहा पहुंचने पर हो जायेगा ॥५६॥ वीरभद्रस्य वचन श्रुत्वा दक्षो महामतिः । गत्वा वाराणसी शीघ्र सर्वसङ्गविवर्जितः ॥५७ प्रतिष्ठाप्य महालिङ्ग गङ्गातीरे मनोरमे। आराध्य परया भक्त्या तस्मिल्लिङ्ग लय गत ॥५८ दक्षेश्वरस्य माहात्म्य कथित मुनिपुङ्गवाः। त्रिलोचनस्य माहात्म्य साप्रत वय॑ते मया 16

त्रिलोचन माहात्म्य ]
[ ६५
श्री सूनबी ने कहा-महामति मान दक्ष ने वीर भद्रग वचन सुन.
कर वह सव सङ्गा से रहित होकर शीघ्र ही वाराणमी पुरी मे चना
गया था। वहां पर परम मनारम गङ्ग के तट पर एक महालिङ्ग की
प्रतिष्ठा की थी। यहां पर परम भविन से आराधना करके वह उसी
लिङ्ग मे लीन हो गया था ॥५७॥५८।। हे मुनि थेठो । मैंने यह दक्षेश्वर
प्रभु का माहात्म्य आपके सामने वर्णित कर दिया है। अब अगे मेरे
द्वारा भगवान् रिलोचन के माहात्म्य का वर्शन किया जाता है ॥५॥
॥ त्रिलोचन
माहात्म्य ॥
ग्रिलोचनात्पर लिङ्ग वाराणस्या न दृश्यते ।
सदा मनिहितो नित्य यस्मिंलिङ्ग शिव स्थित ॥१
यानि स्थितानि लिङ्गानि वाराणस्या द्विजोत्तमा ।
दृष्ट न्येव भवन्त्येव दृप्टे लिङ्ग निलोचने ॥२
अरस्यातानि पापानि ज्ञानतोजानतोऽपि था।
कृतानि नाशयत्येव देवदेवत्रिलोचन ॥३
मायापाोन वद्धाना सर्वपा प्राणिनामपि ।
मुक्ति ददाति परमा देवदेवत्रिलोचन ॥४
पश्चिमाभिमुस लिङ्ग सर्पमेपलमण्डितम् ।
तम्य दर्शनमात्रेण कोनिलिङ्गाचंन फनम् ॥
प्रिलोचन मुगपूज्य कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।
ययो कामेश्वर द्रष्टु मिद्धलिङ्गमनुत्तमम् ॥६
ददो दुर्वाससे यत्र देवदेवो महत्वर ।
प्रमनो विविधा मिद्धि मनपामपि दुर्लभा
श्री मूतत्री ने कहा-इस वाराणमी पुगे में भगवान पे बिलोवन
मिन मे महान अन्य कोई भी लिङ्ग नहीं है जो यहां पर दिपलाई देता
हो। बिग सिन मे सदा ही भगमन मित्र स्थित रहा परते है॥१॥

। सूय पुराण हे द्विजोत्तमो ! वाराणसी पुरी मे जो अन्य जितने भी शिव के लिङ्ग विराजमान हैं उन सबका दर्शन केवल एक ही त्रिलोचन लिङ्ग के दशन करने पर ही होजाया करते हैं ॥२॥ देवो के देव भगवान त्रिलोचन जितने भी परम हैं उन सवरा तुरल नाश कर दिया करते हैं चाहे वे असख्यात और ज्ञान से अथवा अज्ञान से किसी भी तरह से किये गये हो। देव देव त्रिलोचन प्रमु माया के पाश से बद्ध समस्त प्राणियो को परम मुक्ति प्रदान कर दिया करते है ॥३॥४॥ पश्चिम दिशा की ओर मुख वाले--सघों की मेखला से मण्डित वह लिङ्ग है । उस लिङ्ग के दर्शन मात्र से ही कोरिलिङ्गो के अर्चन कर फल प्राप्त हो जाया करता है ॥५॥ श्री कृष्ण द्वै यापन मुनि ने त्रिलोचन प्रभु का पूजन भली भाति दिया था और इसके पक्षात् कामेश्वर सब लिङ्गो मे उतम लिङ्ग के दर्शन प्राप्त करने के लिए वहाँ से आगे गमन कर गये थे ॥६॥ जहाँ पर देवो के देव महेश्वर ने प्रसन्न होकर अनेक सिद्धियां दुर्वासा मुनि को प्रदान की थी जो देवो को भी परम दुर्लभ होती हैं ।।७।। अन्यश्चापि वरो दत्तो देवदेवेन शूलिना। कृताना क्रियमाणाना सर्वेपा तपसामपि । क्रोधो नाशकर प्रोक्तो ह्यन्यथैव मुनेऽस्तु ते । तस्य दक्षिणदिग्भागे कामकुण्डमिति स्मृतम् ॥६ तम स्नात्वा नरो भक्त्या दृष्ट्वा कामेश्वर शिपम् । ब्रह्महत्यादिभि पापमुक्तो याति परा गतिम् ॥१० अन्यान्यपि च निङ्गानि वाराणस्या स्थितान्यपि । सख्यामपि न जानाति या देवश्चतुर्मुख ।।११ को वा वदति माहाम्ममृते देवान्महेश्वराद । नन्दीश्वरो वा जानाति प्रसादाग्दिरिजापते ॥१२ अथ सत्यवतीसूनुर्द्रप्टु देवी शिया पराम् । विशालाक्षी दिनयेष्ठा यय सनिहिता शिवा १३ निलोचन माहात्म्य } ता दृष्ट्वा विधिद्भक्त्या मपूज्य च महामुनि । परानन्दात्मिका गौरी स्तुति मत्वा चकार स ।।१४ देव देव शूनी ने अन्य भो वरदान दिया था जो किये हैं और जो भी इस समय म क्येि जा रह हैं उन सब तपो का नाश करने वाला क्रोव होता है ऐसा कह गया है। अतएव मुनिवर बापका यह सव किया हुआ ता व्यर्थ ही हो जाया करताहै क्यो कि आप मे बडा मारी उग्र कोच विद्यमान है। इसलिये उसके दक्षिण दिशा के बोर एक काम कुण्ड नाम वाला सरोवर कहा जाता है विद्यमान है l उस कुण्ड म मनुष्य भक्तिभाव से स्नान करने और कामेश्वर प्रभु शिव का दर्शन करके ब्रह्म हत्या आदि महा मातको से भी मुक्त हो जाया करता है तथा परमगति को प्राप्त कर लेता १०॥ इनके अतिरिक्तअन्य भी शिवलिङ्ग वाराणसी मे स्थित हैं उन सबकी सस्या को चतुर्मुख देव भी नही जानते हैं इतनी अधिक सन्या है ॥११॥ उन सब सबवे माहात्म्य को महेश्वर देव के विना अन्य कौन कह सकता है अर्थात किमी में भी ऐसी सामयं नहीं है । वन एक नन्दीश्व रही गिरिजा पति की कृपा से उसको जानता है ।।१२। इसके अनन्तर गत्ययती ये पुत्र पराशिवा देवी का दर्शन करने के लिये गये थे जहा पर है द्विजी मे परम प्ठो । विशालाक्षी शिवा स्वय सम्मिहित रहा करती है । यही मुनि ने सनवा दर्शन परके भती भांति से उनका सम्यर्चन किया पा तथा गौरी को परानन्दात्मिण मान पर उन महा मुनि ने उनका स्तवन भी किया था ॥१३॥१४॥ विशालाक्षि नमस्तुभ्य परब्रह्मास्मिये गिवे । स्वमेव माता सर्वेषा ग्रह्मादीनां दिगोसाम् ॥१५ इच्छाशक्ति क्रियाशक्ति नमवितास्वमेव हि। ज्वी कुण्डलिनी मूदमा योगसिद्धिप्रदायिनी १६ स्वाहा स्वधा महाविद्या मेधा लदमी. सरस्वती। गती दाक्षायणी विद्या सर्वशक्तिमयी शिवा ॥१७

[ सूर्य पुराण
अपर्णा चेकपर्णा च तथा चकपाटला।
उमा हैमवती चापि कल्याणी चैव मातृका ॥१८
ख्याति. प्रजा महाभागा लोके गौरीति विश्व ता।
गणाम्विका महादेवी नन्दिनी जातवेदसी 11
सावित्री वरदा पुण्या पावनी लोकविश्रुता।
आयती निमती रौद्री दुर्गा भद्रा प्रमाथिनी ॥२०॥
कालरात्री महामाया रेवती भूतनायिका ।
गौतमी कौशिकी चाय चण्डी कात्यायनी सती ।।
श्री व्यासदेव जी ने कहा था-हे विशाल नेत्रों वाली भगवती!
आपको मेरा प्रणाम है । हे शिव ! आप तो परब्रह्म के हो स्वरूप वाली
है। ब्रह्मा आदि समस्त देवो की भाप ही माता है ।१५। इच्छा शक्ति-
ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति बाप ही तो है ! आप ऋज्वी सूक्ष्मा
कुण्डलिनी हैं जो योग की सिद्धियो को प्रदान करने वाली होती है।
।१६। स्वाहा स्वधा-महाविद्या-मेधा लक्ष्मी-सरस्वती सती दाक्षायणी-रावं
शक्तिमयी शिवा-अपO-एक पर्णा-ऐक पाटला-उमा-हेमवती-कल्याणी-
मातृका आप ही हैं ।१७-१८१ ख्याति प्रज्ञा-महाभागा और लोक में
प्रसिद्ध गोरी भी आप ही हैं । गाम्बिका-महादेवो नन्दनी-जात वेदसी-
सावित्री-वरदा-पुण्या पावनी-लोकविश्रता-आयती-नियती-रोटी-दुर्गा भद्रा-
प्रमाथिनी-कालरात्री महामाया रेवती-भूतनायिका गौतमी-कोशिकी-आर्मा.
चण्डी-कत्यायनी-सती भी आप हो है अर्थात ये सब आपके हो मिग्न हा
हैं ।१६-२०-२॥
वृपध्वजा शूलधरा परमा ब्रह्मचारिणी।
महेन्द्रोपेन्द्रमाता च पार्वती सिंहवाहना ।२२।
एवं स्तुवा विशालाक्षी दिव्यरेतः मुनामभिः ।
कृतकृत्योऽमवव्यासो धाराणस्या द्विजोत्तमाः १२३॥
याराणस्या विशालाक्षी गगर विश्वेश्वरः शिवः ।
भक्ति पगुस्ती ता दुर्लभ हि तुष्टपम् ॥२॥

शिवभक्त महिमा ] य पश्यति विशालाक्षी स्नात्व गङ्गाम्भसि द्विजाः । अश्वमेघसहस्रस्य फलमाप्नोत्यनुत्तमम् ।२। वाराणस्यास्नु माहात्म्यमिति किचिन्मयोदितम् । य पठेच्छणुपाद्वाऽपि यानि माहेश्वरं पदम् ॥२६॥ वृषध्वजा-शूनधरा-परमा-ग्रह्मचारिणी महेन्द्रोपेन्द्रमाना-पार्वती- सिंहवाहनामी आप ही है। इस प्रकार से उम विशालाक्षी का दिव्य गुदर नामो के द्वारा स्तवन करके व्यासदेव है द्विजो । उस वाराणसी पुरी में कृतकृत्य हो गये थे ।२२ २३। वाराणमी पुगे म ये चार वस्तुऐ बहुत ही दुर्नभ हैं जो अन्यत्र कही भी प्राप्त नही हो मस्ती है--एक तो विशालाक्षी देवी-दुमरी भागीरथी गङ्गा-तीमरी विश्वेश्वर गिर और चतुर्थ पशुपति भगवान् में भक्ति ।२४४ हे द्विजो ' जो पुरुष गङ्गा के परम पावन जल म अवगाहन करके विशालाक्षी भगवती जगदम्वा का दगंन किया करता है वह एक सहस्र वश्वमघ यज्ञो के पुण्य फर को उत्तम रूप से प्राप्त कर दिया करता है।०५१ वाराणसी पुरी का माहारम्य यहुन विशाल है । मैंने तो यहाँ पर कुछ योटा सा ही बता दिया है। जो भी हम माहात्म्य का श्रवण करता है अथवा इमको पढता है वह मीषा महेवार नगवान् के पर को प्राप्त पिया करना है ।२६॥ । शिव भक्त महिमा । अन्यतमिद वश्ये गाणुन मुनिपुङ्गवा । निवेन दथित मामात्म्वय मन्दाय पृन्यो । रेवदेव महादेव शमातगेघर । भर्ग विश्वेश्वरेशान पाण्यामृतवारिधे ।। पस्य प्रसीदति क्षिण केन वा मायने भवान् । योगरवद्विषय को या ज्ञान त्वद्विपय व रिम् ।। गमेननगतादेव पुत्रस्नेहालगोहि मे ।।

{ सूर्य पुराण मद्भक्त सर्वदा स्कन्द मत्प्रियो न गुणाधिक । सर्वाशी सर्वभक्षी वा सर्वाचारविलोपक १५॥ मरूपरो वङ्मन् कार्यमुक्त एव न संशय । नाह प्रसन्नस्तपमा न दानेन न चेज्यया ॥६॥ तुष्टोऽह भक्तिले शेन मित्र यच्छे पर पदम् । विपुण्ड्रधारी सतत शान्तो रुद्राक्षाण 151 निर्दम्भ सत्यसकल्पो भक्त स्यादुत्तमो मम । मूर्यवह्नीन्दुभक्तानामुत्तमो वैष्णव पर 1-1 श्री सूतजी ने कहा- मुनिथ रो। मैं अब एव अन्य वन के विषय में बतलाऊंगा। आप लोग उसका श्रवण करिए सेनानी स्कन्द पे पूछने पर उनको साक्षात भगवान शिव ने ही स्त्रय इमको रहा है ।। स्कन्दजी ने वहा-हे देवो के मी देव । आप तो महान देव हैं और आपने चन्द्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया है। हे भर्ग | आप इस विश्व के ईश्वर के भी ईशान हैं तथा यरुणारूपी अमृत वे महासागर है ।। आप पा कर यही बतलाइये कि आप किस के कार बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं और जिसके द्वारा आपका ज्ञान प्राप्त किया जाता है ? आपके विषय का योग क्या है और आपमे सम्बन्ध रखने वाला ज्ञान क्या होता है ? ॥३॥ हे महादेव । यही सब कुछ आ मुझे अपना पुर समवार म्नेहपूर्वक बनाने की कृपा कीजिये ।४। ईश्वर ने कहा है स्कन्द । मेरा भक्त सवंदा मेरा हृदय हुआ परता है। कोई गुणों में अधिक हो पह मेरा प्रिय नहीं होता है चाहे सभी बुध का अगर बग्ने वाला हो, भले ही सर्व भी हो और सभी आधारोपा विनाम ही पपा न करने वाला हो विन्तु मन-वाणी और दारीर से मुसमे ही परायण रहने पाता हो तो यह निश्चय हो मुक्त हो जाया करता है-~~इममे पुष भी संशय नही है। मैं अधिक तपश्चर्या में-दान से सपा ज्या भी प्रसन्न नहीं हुआ करता है। मैं तो पेवा भक्ति ये मात्र से हो सन्तुष्ट हा जागा मरता और उस अपने मत्त यो गीघ्र ही परम पद प्रदान शिव भक्त महिमा ] नाति व गुह । कर दिया करता हूँ। जो त्रिपुण्डू को धारण करने वाला हो, निरन्तर शान्त रहता हो और रुद्राक्ष का कण रखता हो -तथा दम्भ से रहित और सत्य सङ्कल्प हो वही मेरा उत्तम भक्त होता है । सूर्य-अग्नि-चन्द्र- इनके भक्तो मे दंष्णव पद एव उत्तम होता है ।५।१६।७।। वणवाना सहस्रम्य शिवभक्तो विशिष्यते । यदि पापरत कर स्वाश्रमाचारजितः IIE मम भक्तो यदि भवेत्पूज्यो मान्य स एव हि । येऽपि दम्भ श्रमाश्रित्य भक्तानामुगजीविका ॥१०॥ मसारात्तेऽपि मुच्यते किं पुनर्मत्सग जना । मद्भक्ताना च माहात्म्य को वा जानाति तत्वत ॥११॥ जानेह त्व च जानासि नन्दो मार्गस्थो वाऽप्यमार्गस्थो मूखी वा पण्डितोऽपि वा ।१२। मम भक्तो यदि भवेत्सर्वस्मादधिको हि स । भक्त प्रियो मे सतत यया त्व कोचमूदन ।१३॥ तस्मात्तत्पूजनाद्वत्स पूजितोह न ममयः । मद्भवत द्वेष्टि यो मोहात्म मा देष्टि सनातनम् ॥१४॥ सहयों वंवो से निवभन्न विशिष्ट होता है। यदि पापो में रत हो-कूर हा और अपने आश्रम के आचार से भी वपित हो यदि वह मेरा भक्त है तो वह परम पूज्य और मान्य ही हुआ करता है। जा भी पुछ लोग दम्ग का सहारा लेकर माता के उपजीविका होते हैं ये भी दम मनार से मुक्त हो जाया करत हैं फिर जो मेरे ही पानाचन मे तस्पर रहा परते हैं उनकी ता बात ही क्या है। मेर जो भक्त है उनस माहारभ्य को तारिवर रूप से कौन जानता है अदि कोई भी नहीं जाना परता है । में बनता हूँ और तुम जानने हो-नन्दी भपा गृह जानता है । मार्ग में स्थित अथवा अमागं म रहने वाला हो- पण्डिा हो या मूर्ष हो ।१२। यदि यह मेरा ना है तो गवगे अपिल FIR है | पेग भा गुभ माही पारा हारा है महेवा वानन्दा ! वह ७२J । सूर्य पुराण तुम मेरे प्यारे हो ।१३। हे वत्स । इसीलिए उस मेरे भक्त के पूजनार्चन से मैं ही साक्षात पूजा गया होता हूँ--इससे कुछ भी सशय नहीं है। जो मोह के कारण से मेरे भक्त से द्वैप करता है वह मुझ रानातन से ही ढेप क्यिा करता हैं क्योंकि मेरे भक्त बहुत ही प्रिय और प्राणों के समान होते हैं ।१४ त पूजयति यो भक्त्या स मा पूजितवान्गुह । भक्तिरष्टविधा स्कन्द सर्वशस्त्र पु पठ्यते ॥१५॥ तामह कथयिष्यामि भक्ति भवविनाशिनीम् । मद्भक्तजनवात्सल्य पूजायाश्चानुमोदनम् ॥१६॥ स्वयमभ्यर्चन भक्त्या ममाथें चाङ्गवेष्टितम् । मत्कथाश्रवणे भक्ति स्वरनेवाङ्गविक्रिया ॥१॥ ममानुस्मरण नित्य गश्च मा नोपजीवति । भक्तिरविधा ह्या गस्मिल्लेशोऽपि वर्तते ॥१८॥ म विग्रेन्द्रो मुनि श्रीमान्स यति स च पण्डित । तस्मै दान सदा देय तस्माद्राहा पहानन ॥१६॥ सकुदम्पर्चयेन्मा यो भतिलेशसमन्वित । स महापातकमुक्तो मम लोके महीयते ॥२०॥ म्वहस्ताहृतपुपाणि मादिश्न प्रयच्छति। तदान मर्यदानानामतम रिपक्ष्यने 1२१॥ है गुह जो मेरे भक्त की पूजा करता है उगो भनिमार से मेरा ही पूजन दिया हुआ मयपना चाहिए । सन्द । वह भति आइत की होती है जो नि मभी शाळा म पती गयी है । मैं पर उगी गधा वा विशाग रन वामी मति रे विषय में लगाता है। मेरे भक्तजनों में कार वात्सल्य अनि हादिक्ष अनुराग पूजा राममो. सावरला-रवप भी भक्ति में पान करना-मेर सिंग पेनि- मेरो बारे प्रयन करने में महिमा-रने और अनी विधिया का होगा-मंग ही निरप स्मरण | भोर को पुको शिवभक्त महिमा ] उपजीवित रहता है-यही आठ प्रकार की भक्ति होती है जिसमे इस भक्ति का लेशमात्र भी विद्यमान है वही विप्रेद्र-मुनि, श्रीमान् यति और वह ही पण्डित है। उसको ही सदा दान देना चाहिये । हे पडानन ! उससे ग्रहण करना चाहिए ।१६।।१७।।१11१६३ जो मुझको एक बार ही अभ्ययित कर देता है वह भक्ति के लश मे युक्त होता है। वह महान् पातको से मुक्त होकर मेरे लोक में ही प्रतिष्ठिन हुआ करता है। अपने हाथ से लाये हुए वुमुमो को जो मेरा उद्देश्य करके समर्पित किया करता है वह दान अन्य मभी दानो से उत्तम परिपठित दिया जाना है ।२०।।२१। मय भक्ति सदा कार्या भवपाशविमोचनी । भक्तिगम्यस्त्वह वत्स मम योगो हि दुर्लभ ॥२२॥ योगात्मजायते ज्ञान योगो मय्येकचित्तना । जन स्वरूपमेव स्थाचिद्र पमजमव्ययम् ।२३। आनन्दमजर शुद्धमज्ञानेन तिरोहितम् । वेदान्त राक्यत्रोधेन तच्चाज्ञान निवर्तते ।२४। ज्ञान नैनाऽमनो धर्मो न गुणो वा कवचन । ज्ञानस्वरूपमे मा नित्य मगर शिव ॥२॥ अहमात्मा समस्ताना भूताना परमेश्वर । एक एव पदार्यञ्च परिपनो मयि पण्मुस ।२६॥ अटेनमेक परममात्मानं ज्ञानविग्रहम् । नानारमान प्रपश्यन्ति मायया मोहिना जना ॥२७॥ नासद पा न सदूपा माया नवोभयात्मिका । सदमद्भ्यामन्यरूपा मिध्याभूना सनातना (२८१ हे वम ' मेरी भक्ति सदा ही करनी चाहिये क्योति यह भव ये पानी का विनाम कर देने वाली होती है। मैं भक्ति में ही द्वारा गम्य होता है और मेरा योग तो अरपन्त दुर्लभ होता है ।२२॥ योग मे भान सपन हो जाता है और यह योग मुनम एष रिता का होना ही ! ७४ ] [ मूर्य पुराण होता है । शान तो मेग स्वरुप ही होता है जो चिद्रूप अर्थात् ज्ञान के स्वरूप वाला-अध्यय-आनन्द अजर-और शुद्ध है जो कि अज्ञान के द्वारा हो तिरोहित (छिपा हुआ) रहा करता है । वेदान्त के वाक्यो के अक्वोध होने से वह अज्ञान निवृत्त होना है ।२३।।२४। ज्ञान आत्मा का धर्म और कोई गुण नहीं है प्रन्युत यह आत्मा ज्ञान स्वरूप वाला ही होता है-वह नित्य है - सर्वगत और शिव है ।२५। मै ही समस्त भूतो का आत्मा एव परमेश्वर हूँ हे पण्मुष ! और एक ही पदार्थ मुझमें सल्पित है ।२६। माया से मोहित जन अद्वत-एक-ज्ञान के निग्रह वाले परमात्मा को अनेक आत्माओ वाला देखा परते हैं ।२७। मेरी माया न सद् प वाली है और न असद्ध रूप वाली है तथा वह माया उभयात्मिका भी नहीं हैं। वह मेरी माया सद् और असद से अन्य ही स्वरूप पाली होली है तथा मिथ्याभूतो है और सनातना भी है अर्थात् सर्वदा से चली आने वाली है ।२८। विज्ञानमेवमखिल विश्वाकारमबुद्धयः । पश्यन्ति ज्ञानिनस्त्वेकमात्मरूपमिदं जगत् ।२६॥ अहमात्मा विभुः सुतः स्फटिकोपलसनिभः । उपाधिरहितः शान्तः स्वयज्योतिः प्रकाशक. १३०॥ आत्मन्येवाखिल भाति शुति कारजत यथा । शुक्तितत्वपरिज्ञानात्तन्नाशस्तद्वदात्मनि ।३।। फर्तृत्व नैव भोवतृत्वमात्तनोऽस्ति कदाचन । अहङ्काराविवेकेन कर्तृत्वमिति निश्चितम् ॥३२ आत्मनो नित्यमुक्तस्य निविभागस्य पण्मुख । नवास्ति किंचित व्यमित्याहुर्वेदवादिनः ॥३३॥ कर्तृत्व करणस्यैव नाश्त्मनोऽस्ति हि तत्त्वत । न तेन लिप्यते ह्यात्मा पुण्यापुण्याख्यकर्मणा ॥३४॥ जो बुद्धि से रहित होते हैं वे समस्त विश्व के आकार वाला विज्ञान को ही देखा परो हैं और जो ज्ञानी होते हैं वे इस जगत को एक ही ..

शिवभक्त महिमा ] [ ७५ आत्मरूप देखते हैं ।२६। मैं आत्मा हूँ-एक हूँ-विभु-शुद्ध-स्फटिर के समान हूं-उपाधि से रहित-शान्त स्वय ज्योति और प्रशाशक हू ।३०॥ जिस तरह से सीप मे रजत (चाँदी) का अम उसके चरूचिक्य के कारण मे हो जाया करता है वैसे ही यह सम्पूर्ण आत्मा मे ही विभात हुआ करता है । जब शुक्ति के तत्त्व का परिज्ञान हो जाता है तो वह रजत का भ्रम दूर हो जाया करता है उसी तरह से तत्वज्ञान हाने से उमी पी भांति आत्मा में उमका नाश हो जाया करता है ।३१। इस आत्मा में कभी भी न तो क्त्त त्व होता है अर्थात यह किसी भी वर्म का कर्ता नहीं होता है और भौक्तत्व इग आत्मा मे होता है अर्थात् यह किसी भी कर्म का जव वर्ता सी नहीं है तो भोगने वाला भी नही हुआ करता है । यह वत्त व आरपा में अहवार और अविवेक से ही हुआ करता है - यही निश्चित है ।३२॥ हे करमुखयह विभाग से रहित है- नित्य मुक्त है, इसको कुछ भी वर्तव्य नहीं होता है ऐमा ही वेदो के भाता पुष्प रहा करते हैं ॥३३॥ सात्विा म्प मे अत्मा वो पत्त त्व और करणरव युछ भी नही होता है जो कुद भी कर्म हाना है उमगे यह आरमा-यम भी लिन नहीं हुआ करता है चाह वह वमं पुष्प पम्प हो । रिमी भी प्रसार के कम से आस्मा तिन नहीं होती हैं ॥३४॥ युदधादयो गुणा मर्ने यभूगुम्देरहति । अमाराच्च मूढमाणि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च ॥ ३५ मूक्ष्मेभ्य पञ्च भूतानि नेभ्य म्यूनमिद जगन् । चतुर्विशरमव्यक्त पुग्प पञ्चविंगर ॥ ३६ न तम्यायं करण कियाम्प च विद्यते । बागानास वित मर्वमान्मन्गेनि च ध्रुनि ॥3 इति मतिपय गान कथित तव पुत्र ॥ ३८ युधि आदि ग राय गुण हैं। यदि मे अरकार हना या और ना सार में गूभम सन्मात्रायें होती हैं और प्रिया हुआ पानी ॥ उही गुम तन्मात्रामा से पार नही है और उनी पर. भूषा मया मां स्पा नगा उगम हा पता है । असा गोला है और पाया यह या 1 सूर्य पुराण ७६ परता है। मन बुद्धि अहङ्कार-पांच तन्माना-पञ्चभूत-पारद इन्द्रियाँ ये २४ हुए ।३। उनको न तो कार्य है और न करण है और न वह किया रूप ही है, अपने ही अज्ञान से ये मव आत्मा में कहे गये है-- ऐसी श्रुनि है ।३७५ यही मेरे से सम्बन्ध रखने वाला ज्ञान है । हे पुत्र वही मैंने आपको बतला दिया है ।३८॥ भूतकार्यमिद देहमापद्रोगाकुल परम् । विषय पीड्यते देव सुखदु ग्वात्तकै सदा ॥१ अभिभूतो यदा योगी दु खैरव्यात्ममभने । किमुपाय तदा तस्य यदा नै भौतिकस्य च ॥२ व ह्याधिदविास्यापि योगससिद्धये प्रभो । यातनायोपसर्गाणा प्रसादाद्योगिना वद ॥३ सात्विका राजसा विघ्नास्तामसास्त्विह योगिनाम् । योगनासारा सर्वे भवन्ति भवतामपि ।।४ प्रातिभाश्रवणावात दर्शनास्वादवेदना । उपसर्गा भवन्त्येते सात्त्विवास्तु पडेव हि ॥५ दरिद्रोऽहमह चाऽऽन्य शूरोऽह दूर्वलस्तया । मूर्खाऽह च सुविद्वांश्च सुस्पोऽहमरूपवान् ॥६ दीताह पणश्चाह सुखी भोग्यहमेव च । अकुलीन कुलीनश्च कण्टक कण्टकोज्झित ॥७ श्री स्कन्द देवजी ने वहा-यह देह तो भूतो वा ही कार्य है और आपत्ति तथा रोगो मे परम व्या रहा करता है। यह दारीर विषयों के द्वारा जो मुख-दुख स्वरुप सदा पीडित रहा करता है ॥१॥ जिम समय में अध्यातन सम्भव दुखा से योगी सदा अभिभूत रहा करता है उस समय में जबकि ऐसी परिस्थिति हो तो इस भौतिक का श्या उपाय है । हे प्रभो अधि दैविकी भी योग की सरिद्धि के लिये बतलाइए। योगियों को उपसगों को यातना के लिये भी प्रसन्नता से बतलाइये।३। श्री ईश्वर ने कहा- यहाँ पर योगियों के विन सात्विक-राजस और नामस हा परते है । ये सभी आपसे योग शिव भक्त महिमा ] ७७ . के पास करने वाल होते है ।४। सास्त्विक उपसर्ग के वल छ ही हुआ करते हैं जो प्रातिभ-श्रवण-वार्ता-दर्मन-आस्वाद वेदन्त सून है ।। मैं दरिद्र हूँ और मैं शूर वीर हूं और दुर्वल हूं-मैं मूर्ख हूँ और बडा विद्वान् हूं-मैं सुन्दर रूप वाला हूँ और अरूप वाला हूँ -दाता हूं और कृष्ण हूं-मैं सुखी और भोगी हूँ--अकुलीन हूँ और कुलीन हूँ -कण्टक और कप्टकोझित हूँ ॥६॥७॥ मदीय सर्वमेतद्धि वस्त्वित्यादिप्रजल्पनम् । अहकारमय किचिद्यत्तत्कुत्स्न हि राजमम् ।। अन्धत्व चव वाधिय पन त्व दूष्टरोगता । शिरोरोगो ज्वर शूलयममूर्छाभ्रमादय ६ राजसास्तामसा सर्वे तमोहकारसयुता । व्याधयो मिश्रभावेन पीडयन्तीह देहिनम् ॥१० केवल जायभावेन मूढत्व मोहन तथा । अज्ञानत्व च मूकत्वमित्याद्यास्तामसा स्मृता ॥११ गुह्यका यातुधानाश्च विनरोरगराक्षसा । देवदानवरौद्राश्च दैत्या मातरजा गणा ।।१२ तामसास्तु ग्रहा भूता वायुभूता नर सदा। पीडयन्तीह विघ्ना हि योगाभ्यासरत ग्रहै ॥१३ एवमाद्य पसर्गाणां वारणाय च धारणाम् । वक्ष्यामि विधिया वत्स योगिना सिद्धिहेतवे ।।१४ यह समस्त वस्तु जान म ही हैं-इत्यादि प्रजल्पन जो बुध भी अहङ्कार से परिपूर्ण है वह समूग राजस अर्थात् रजोगुण से युक्त हैं। अन्यापन-वधिरता-पगलापन होना दुष्ट रोग का हो जाना. सिर मे रोग-ज्वर-गूल-राजयक्ष्मा- मूर्धा-भ्रम प्रभूति य सब तम और अहवार से युक्त राजस तथा तामम हैं । ये व्यापियां मिथ भाव में देह घारी पो पीडा दिया करती हैं 1ि१०1 वेयर जाध्य भाव ग मूढता तया मोह का होना-ज्ञान होना और मूा होगा शादि मव तामरा [ सूर्य पुराण पहे गये है "११1 गुममा पातुपा- विनर-उरग-राशमदेव-दानव-रौद्र- दैत्य और सप्तक्ग गुण-ग्रहभूत तथा वायुभूत तामस हैं जो मनुष्य को सदा ग्रहों के द्वारा जो योग के अभ्यास में रत है उसको पीडा दिया परते हैं और ये सभी विघ्न होते हैं ।१२।१३। इस प्रसार के उपसर्गो के निवारण करने के लिये हे वत्स योगियो की सिद्धि के लिये विविध प्रकार की धारणा को मैं बतलाता ह ।१४। . । सात्विक-राजस विघ्नादि कथन । त्वगादिसप्तधातूनामेकोभूत विचिन्तयेत् । प्रणव कण्ठनासाग्रे सवीज वह्निदीपितम् ॥१५ वारणेषु च सर्वेषु उपसर्गेपु योगवित् । एतदेव चरेन्नित्यमुपसदियो ययु ॥१६ पित्तरोगाभिभूतो वा योगी योगपरायण । ध्यानमेतत्प्रकुर्वीत तथाऽन्यच्छणु पुत्रक ॥१७ सुवृत्त चोडुनाथस्य चाक्षर तन चिन्तयेत् । सुधाभिलषित ध्यारे त्स्वस्य मूनि शिवात्मकम् ।।१८ प्रविश्य ब्रह्मरन्छोण देहं निवाणज स्मरेत् । शीतलेन मुगन्ध्रन हत्तत्त्व चापि तेन वै ।। १६ पंत्ति काश्चोपसर्गाश्च भानुना तिमिर यथा । विपज्वरजराद्याश्च नश्यन्त्यभ्यासतो ध्रुवम् ।। २० नाशयेदधता योगी दिव्यदृष्टि प्रजायते । उत्क्षिप्यापानमन्य च चन्द्रदेवत्यया पिवेत् ।। २१ त्वक आदि जो शरीर मे सात धातुयें है वे सभी एकीभूत है- पा विचिन्तन करना चाहिए और कण्ठनासाग्र मे वीज के सहित मदीपित प्रणव है। योग के सना पुरुष यो सभी उपसों में वरण रने में यही नित्य चरण करना चाहिए तो रामी असर्ग आदि पले

सात्त्विक-राजस विघ्नादि क्थन ]
७६
जाते है ।११।१६॥ अथवा कोई योगाभ्यास में तत्पर पुरप जो योगी है
पित्त के रोग से अभिभूत न होवे तो उसको ध्यान करना चाहिए । हे
पुत्र । तथा अन्य भी श्रवण करो ।१७। यहाँ पर उडुनाथ के सुवृत्त अक्षर
का चिन्तन करना चाहिए । सुघा से अभिलापित शिवात्मर का अपने
मूर्धा मे ध्यान करें ।१८। ब्रह्मरन्ध्र के द्वारा प्रवेश करके देह को निर्वा-
णज म्मरण करें और उसके द्वारा शीतल सुगन्ध से हत्तत्त्व का भी
स्मरण करे ।१६। पतिक जो उपसर्ग हैं और विष ज्वर जरा आदि है
वे सव योग के अभ्यास से भानु के द्वारा अन्धकार के ही समान
निश्चय ही नष्ट हो जाया करते है ।२०। योगो अन्यता का विनाम
कर दिया करता है और दिव्य दृष्टि हो जाया करती हैं। अपान का
और अन्य का उत्प करके चन्द्र देवत्यया से पान करना चाहिए ।२१॥
पीत्वा पार्थिवतत्त्वेन स्तम्भ वायोविनाशयेत् ।
पुष्टिरेवातुला तस्य स्थिरत्व रजहीनता ॥ २२
हृत्तत्त्व च सुपीताभममरत्व तया स्मरन् ।
श्रोत्रमाकाशवाय्वोश्च अनरत्व विचिन्तयत् ॥ २३
मोचयेत्त पुनर्वायु वधिरत्वविनाशनम् ।
शृणोति तूरर्ते सर्व श्रुतधारी भवेत्सदा ॥ २४
वियन्मयोऽय मचारी सतताभ्यासयोगत ।
सरोज रसनाया च तद्दष्टार मणिकम् ॥ २५
स्मृत्वा मध्ये पुनायेच्तुकवर्णा म्वरस्वतीम् ।
जडत्व च शिरोरोग मुखरोगान्विनाशयेत् ।। २६
प्रना चर्व स्मृतिमंधा कवित्व पुलिरत्तमा ।
स्तम्भन दुष्टमत्त्वाना सर्ववायूञ्जयत्सदा ।। २७
हत्मरोजगत देवमष्टादशभुजयुतम् ।
नीलारण महाकाय विहवचन्द्रगटाघरम् ॥ २८
पार्थिव तत्त्व के द्वारा पान सर यायु का जो स्तम्म है उसका
विनाम पर देना चाहिए । उग नगर पुष्टि हो गती और उसको

[ सूर्य पुराण
स्थिरता तथा रोग हीनता भी हुआ करती है ।२२१ और गुपीताम
हत्तत्व का तथा अमरत्व का स्मरण करता हुआ पात्र और आगाश
वायु की एकता का विन्तन गरे ।२३। फिर उस वायु का मोचन करे
तो वधिरता का विनाश हो जाया करता है । वह पुरष सदा भूतधारी
होता है और दूर से ही सभी कुछ वा श्रवण कर लिया करता है ।२४)
निरन्तर अभ्यास के योग से यह वियन्मय समरण करने वाला सरोज
को रसना म कणिका व सहित उसके दृष्य स्मरण करके पुन ध्यान
परे शिशुस्न वर्ण वाली सरस्वती देवी है। वह जडता सिरपा रोग
और सुख के रोगो या विनाश कर दिया करता है ।२५।२६। इस
इस प्रकार से प्रजा-स्मृति मेवा-ववित्य और उत्तम बुद्धि-दुष्ट मत्वा का
स्तम्भन हो जाता है और सदा सव वायुओ को जीत लेवे (२७। अठा-
रह भ जाआ से युक्त देव को हृदय रूपी कमल मे स्थित का स्मरण करे
जो नील और अरुण वण वाले हैं-- महाद परम विज्ञान विग्रह से युक्त
हैं तथा तीन नेत्रा से मयुक्त एव जटाओ म चन्द्रमा को धारण किये हुए
हैं ।२१
सिंहचर्माम्बर भीम सर्वाभरणभूषितम् ।
भुजङ्गहाराभरण सवकवर्णनूपुरम् ॥ २६
ज्वालामालाकुल दीप्त भाभासितदिगाननम् ।
अभेद्य विजय रौद्रमक्षोभ्य निदशेश्वरम् ।। ३०
कपालमालिन चोग्र भीम दष्ट्राकरालितम् ।
अस्त्रौद्यग्रकर देवममोघैर्वह्निकारणं ।। ३१
स्मरणाद्यजनाच्च व तेजतिघ्ननाशनम् ।
मूल सुन्दरवजे पुदण्डकार्मुकशक्त्यसि ॥ ३२
पद्मान्ते दक्षिणे भागेऽविनाश परमेमेश्वरम् ।
परिघध्वजखट्वाङ्गरक श च धनुर्गदाम् ॥ ३३
ज्वालाननेन पामेन बामभागभयप्रदम् ।
अनेन ध्यानयोगेन मर्वविघ्नालिवारयेत् ॥ ३४

८२ ]
सूर्यपुराण
५
ईश्वर चिन्तयेत्स्यारणु ज्ञानमानन्दविग्रहम् ।
उभावपि रिथरीकृत्य योगी मोक्षाय कल्पते ॥ ३६
वाह्य चित्त समारोप्य वायो परमकारयत् ।
ततो द्वाराणि सयभ्य ब्रह्मरन्ध्र लय गत.॥ ४०
लक्षमाधाय तत्रैव योजयेन्मय पण्मुख ।
घृत घृतेष्वेव यथा नियुक्त प्रयाति चक्यादविशेषभावम् ।
तर्थव लीनो न भवेत्स भूय परे चतुर्थेत्वनया च युक्त्या १४१
जो योग का ज्ञाता है और योग से युक्त आत्मा वाला है यह परम
निर्वाण को प्राप्त किया पारता है। पत्र मे आदित्य मण्डल को और
फिर सौम्य पावक को तथा हृदय रूपी गुहा मे आवास करने वाले आत्मा
का महामुनि को चिन्तन करना चाहिए और इसके अनन्तर सुनिमल-
परम शान्त-ईश देव का ध्यान करना चाहिए ॥३६॥३७॥ सम्पूर्ण इस
जगत को व्याप्त करके समवास्थित और काल तथा अपाल से विजित
विपद्देश मे अथवा हृदय रूपी चुभन में विराजमान ईश्वर का योग के
शाताओ मे अष्ट योगी आनन्द ये विग्रह वाले स्याण्ड जान स्वरूप ईश्वर
या चिन्तन रे। दोनो को स्थिर करने योगी मोक्ष को प्राप्त पिया
करता है । ॥३८॥३॥ वायु के बाप में वित्त को समारोपित परके
परम परे । इसके पश्चात द्वारी का रायम परके ब्रह्म सत्र में लप सो
प्राप्त हो जाता है हे पण्मुख । वही पर ना पा मापान करके मुग
योजित परे । पूर जमे वृत में मिल जाता है उसी गीति ऐक्र हो जाने
गे नियुक्त होार अविरोप भाव को प्राप्त किया करता है। उसी माति
से इसो युक्ति के द्वारा पुनः चतुषं परमे यह सीन हो जाया करता है
॥४०॥४१॥

हर तात्यादि कयन ]
[ ८३
.
॥हरोत्पत्त्यादि कथन ।
ततः सस भगवान्देवोऽसावन्त्मनः सुतान् ।
सनातन च सनक सनन्दनमथापि च ॥१
शभु सनत्कुमार च पञ्चं तान्पमसभवः ।
न सृष्टौ दधिरे बुद्धि शिवकध्यानतत्पराः ॥१
मृष्टौ तेवनपेक्षेपु मोहाविष्टः प्रजापतिः ।
तपस्तताप परम न किचित्प्रत्यपद्यत ॥३
गते वहुतिथे काले समभूत्क्रोधमूछितः ।
प्राणात्मकः ममुद्भ तो ललाटाहह्मणो हरः ।।४
केनापि हेतुना विप्राः सूर्यकोटिसमप्रभः ।
निश्चक्राम ततो भित्त्वा भाल भगवतो विधेः ॥५
रोदयित्वाऽब्जजन्मान तस्माद् द्र इति स्मृतः ।
अन्यानि सप्त नामानि श णुध्व मुनिपु गवाः ॥६
भवः शर्वस्तयेशानः शशू ना पतिरेव च ।
भीमश्नोग्रो महादेव इति नामानि सत्तमाः ॥७
श्री मूतजी ने कहा-इसके अनन्तर भगवान् इन देव ने अयवो पुत्रों
का सृजन किया था | सनातन सनक-सनन्दन और शम्भु सनत्कुमार इन
पाचो को पद्म सम्भव ब्रह्माजी ने समुत्पन्न किया था। ये सबके सब एक
मान भगवान शिव के ध्यान मे ही तत्पर रहा करते थे और इन्होंने
सृष्टि की रचना करने में अपने बुद्धि को नही लगाया था ||१||२|| सृष्टि
की रचना करने के कार्य में वे जब सबके सब अनपेक्ष हो गये थे तो
प्रजापति मोह से एक दम माविष्ट हो गये थे। फिर उन्होंने परम घोर
तपश्चर्या की थी और फिर उनको कुछ भी ध्यान नहीं रहा था ।।३।।
जब बहुत काल व्यतीत हो गया तो ब्रह्मा जी क्रोध से मूच्छित हो गये
थे। उसी समय में उनके ललाट मे प्राणात्मक हर समुद्रस हो गये थे
॥४॥ हे विप्रो । किसी भी हेतु रो करोड़ो सूर्यों के समान प्रभा व ले
--

[ सूर्य पुराण वे भगवान विधि के भाल का भेदन करके निकले थे ॥५॥ अग्र जामो के वे रोदन परते हुए निकले थे इसी कारण से उनको रुद्र कहा गया है । हे मुनि पुङ्को अन्य जो सात नाम है । उनको भी आप श्रवण कीजिये ॥६॥ हे सत्तमो ! उनके ये मात नाम है-भव-शव-ईशान- पशुपति-भीम-उन और महादेव ॥७॥ भूमिरापोऽनलो वायु?म सूर्यश्च चन्द्रमाः । अष्टमी दीक्षितस्तत्र मूतिरीशस्य श लिनः ॥८ याभिव्यप्तिमिद विश्व विश्वस्यास्य जगन्मयः । तेन विश्वेश्वरो देव इति नाम्ना शिव स्मृतः ॥६ प्रजा सृजेति निर्दिष्टश्चन्द्रमोलिविरञ्चिना । सस मनमा रुद्रानात्मतुल्यान्महेश्वर. ।।१० नीलकण्ठात्रिनेत्रांश्च जटाम कुटमण्डितान् । वृपध्वजान्वीतरागाजरामरणवर्जितान् ।।११ सर्वज्ञाशतकोटीस्तान्सर्वानुग्राहिणः परान् । दृष्ट्वा तान्विविधान्रुद्रान्विरञ्चिः प्राह शकरम् ॥१२ जरामरणनिर्मुक्तामीदृशी मा सृजः प्रजाम् । सृजस्थान्या सुरेशान प्रजा मृत्युसमन्विनाम् ॥१३ ब्रह्माण मनवीच्छभुनास्ति मे तादृशी प्रजा। ततः प्रमृति विश्वात्मा न प्रासूत शमा प्रजाः ॥१४ ईशानी की आठ मूर्तियाँ है -भूमि-जल- अतल-वायु--- व्योम-मूर्य-चन्द्रमा और बाठची मूत्ति दीक्षित है। जिन आठ मूर्तियो के द्वारा इस विश्व का जगन्मय विश्व व्याप्त है । इसीसे विश्वे. स्वर देव "शिव"--इस नाम से कहे गये हैं SITE विरग्जि ने चन्द्र मौलिगकर भगयान से निर्देश दिया था रितुप प्रजा या गृनन को। उम समय में महेश्वर भगवान ने अपने ही समान रखोया मनगे गृजन दिया था। ये सबरे सब नीले वठों वाले-तीन नेत्रों में धारमने सारे और सुपुती तिर - aurtan और जरा तथा मृत्यु से यजित थे ॥११॥ वे सर्वश गायकोटि-ग पर हरोत्पत्त्यादि कथन ] [ ५ अनुग्रह करने वाले और पर थे। उन सब विविध प्रकार के रुद्रो को देखकर ब्रह्माजी ने भगवान शङ्कर से कहा था ॥१२॥ जो मजा जरा और मरण मे रहित हो ऐसी प्रजा का सृजन मत करो। हे सुरेशान । अन्य ऐसी प्रजा की रचना करो जो मृत्यु से समान्वित हो ॥१.|| शम्भू भगवान् ने ब्रह्माजी से कहा- मेरो प्रजा उस प्रकार की नहीं है । तब से लेकर विश्वात्मा ने फिर शुभ प्रजा को प्रसूत नही किया था ॥१४॥ रुद्ररात्मसमद्भत क्रीडायुक्तस्तदाऽभवत् । स्थाणुवन्निश्चलो यस्मास्थित स्थाणुरिति स्मृतः।।१५ ज्ञान वैराग्यमश्वयं तप सत्य क्षमा धृति । द्रष्तृत्वमात्मसवोधो ह्यधिष्ठातृत्वमेव च ॥१६ अव्ययानि दशैतानि नित्य तिष्ठन्ति शकरे । स एव भगवानीशो विश्वेशो नीललोहितः ।।१७ ततस्तमाह भगवान्ब्रह्मा सवीक्ष्य शकरम् । अनुगृह्य यथा मा त्व पुरत्वे दत्तवान्वरम् ॥१८ अद्य तत्सफल जात चिन्तित यन्मयेप्सितम् । एव विश्वेश्वर शभु समाभाष्य चतुर्मुख ॥ स्त्रोत्रेणानेन तुष्टाव शिरस्याधाय चाञ्जलिम् ।।१६ नमस्तेऽस्तु महादेव नमस्ते परमेश्वर । नम शिवाय रेवाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे ॥२० नमोऽस्तु तु महेशान नम शान्ताय हेतवे। प्रधानपुरुषशाय योगाधिपतये नमः ॥२१ उम समय मे भगवान् शम्भु अपनी आत्मा से समुत्पन रुद्रो के साय क्रीडा युक्त हो गये वे स्थाणु के समान एक्दम निश्चल थे इसी कारण से उनको स्थाण -- इस नाम से कहा गया है ।।१५।। शात. वैराग्य-ऐश्वर्य-तप-सत्य-क्षमा-ति-दृप्तृत्व-आत्म सबोध -~-अधिष्ठातृत्व-ये दश अव्यय हैं जो भगवान् शङ्कर मे नित्य ही स्थित रहा करते हैं । वह ही भगवान ईश विश्व के ईश और नील । सूर्यपुराण लोहित है ।।१६।१७। इसके पश्चात् भगवान ब्रह्माजी ने उन शहर को देखकर उनसे कहा था । तुम मुझ पर अनुग्रह करके ऐसा करो। मैंने पुषत्व होने मे तुमने वरदान मुझको दिया था । अर्थात् मैं तुम्हारा पुत्र. होऊँगा-ऐसा कृपा करके मुझे वरदान प्रदान किया था। आज वह वरदान सफल हो गया है और जो मैंने सोचा था वह मेरा अभीष्ट मनोरथ पूर्ण हो गया है। इस प्रकार से विश्वेश्वर शम्भु भगवान तुर्मुख ने कहकर अपने मस्तक पर दोनो हाथी को जोडते हुए रसकर इस निम्नलिखित स्रोत्र के द्वारा उनका स्तवन किया था- ॥१८॥१६॥ श्री ब्रह्माजी ने कहा-हे महा देव ! आपकी सेवा में मेरा नमस्वार अर्पित है। हे परमेश्वर । आपके लिये मेरा प्रणाम है। शिव देव के लिये और ब्रह्म के रूप वाने आपके लिए मेरा नमस्कार है ॥२०॥ हे महेशान ! आपको मेरा प्रणाम है । परमशान्त स्वरूप और हेतु रूप आपके लिए मेरा प्रणाम है । बार प्रधान- पुरुष के ईश है और योग के अधिपति हैं । ऐसे आपके लिए मेरा बारम्बार नमसार है॥२१॥ नम. कालाय रुद्राय महागासाय शूलिने । नम पिनाकहस्ताय विनेयाय नमो नमः ॥२२ नमनिमर्तये तुभ्य ब्रह्मणो जनकाय च । ब्रह्मविद्याधिपतये ब्रह्मविद्याप्रदायिने ।।२३ नमो वेदरहस्याय कालकालाय ते नमः। वेदान्तमारमाराय नमो वेदात्ममर्तये ।।२४ नम शदाय युद्धाय योगिना गुरवे नमः। प्रहोणशोक विविधभूतं. परिवृताय ते ॥३५ नमो ब्रह्मण्यदेवाय यह्माधिपतये नम. । सम्बकाय च देवाय नमस्ते परमेष्टिने ॥२६ नमो दिग्वाससे तुभ्प नमो मुण्डाय अनादिमलहीनाय ज्ञानगम्याय ते नमः ॥२७ दण्डिने ।

होत्पत्त्यादि कयन ] [ -७ नमस्ताराय तीर्थाय नमो योगद्धिहेतवे । नमो धर्माधिगम्याय योगगम्याय ते नमः ॥२८ कालस्वरूप-रुद्र-महाग्रास तथा शूलधारी आपके लिए मेरा नमस्कार है । पिनाक धनुप को हाथ मे धारण करने वाले त्रिनेत्र मे लिए मेरा नमस्कार है और वारम्बार प्रणाम है ॥२२॥ त्रिमूत्ति आपके लिये मेरा नमस्कार है । ब्रह्मा के जनक आपके लिए मेरा प्रणाम है। ब्रह्म विद्या के अधिपति और ब्रह्म विद्या के प्रदान करने वाले के लिए मेरा प्रणाम है ॥२३॥ वेदो के रहस्य स्वरूप और काल के भी काल आपके लिए नमस्कार है । आप वेदान्त के सार के भी सार हैं तथा वेदो की आत्म मूत्ति हैं ऐसे आपके लिये मेरा नमस्कार है ॥२४॥ शुद्ध-बुद्ध और योगियो के गुरुदेव आपकी सेवा मे मेरा प्रमाण सरित है प्रहीण योक वाले अनेक भूतो के द्वारा परिवृत आप के लिए मेरा नमस्कार है। ब्रह्मण्य देव तथा ब्रह्म के अधिपति आपको मेरा प्रणाम है। त्र्यम्बक देव परमेष्ठी आपके लिए मेरा प्रणाम है ।।२।।२६॥ दिगम्बर (नग्न) आपको प्रणाम है । मुण्ड और दण्डी, आपके लिए नमस्कार है । अनादि मल से हीन तथा ज्ञान जानने के योग्य आपके लिये नमस्कार है ॥२५॥२६॥२७॥ तार और तीर्थ के लिए तथा योग की द्धि के हेतु-धर्म से अधिगमन परने के योग्य और योगगम्य आपको नमस्कार है ॥२८॥ नमरते निष्प्रपञ्चाय निराभासाय ते नम । ब्रह्मणे विश्वरूपाय नमस्ने परमात्मने ॥२६ स्वयैव सष्टमखित स्वय्येव सक्ल स्थितम् । त्वया सहियते विश्व प्रधानाग्य जगन्मय ॥३० त्वमीश्वरो महादेव पर ब्रह्म महेश्वर । परमेष्ठी शिव शान्त पुरपो निष्कलो हर ॥३१ त्वमक्षर पर ज्योतिरोकार परमेश्वर । त्वमेव पुरुपोऽनन्त प्रधान प्रतिस्तथा ॥३२ ८८ ] [ सूर्यपुराण भूमिरापोऽनलो वायुयोमाहंकार एव च । यस्य रूप नमस्यामि भवन्तं ब्रह्मसज्ञितम् ॥३३ यस्य द्यौरभवन्मूर्धा पादौ पृथ्वी दिशो भुजाः । आकाश मुदर तस्मै विराजे प्रणमाम्यहम् ।।३४ सतापयति यो नित्यं स्वभामिर्भासयन्दिा । ब्रह्मतेजोमय विश्व तस्मै सूर्यात्मने नम ।।३५ अपक्ष से रहित नापको नमस्कार है और निराभास आरके लिपे प्रणाम है। विश्व रूप ब्रहा परमात्मा के लिये नमस्कार है ॥२६॥ है गन्मय ! आपने ही इम सम्पूर्ण विश्व की रचना की है और आपमे हो 'यह समस्न विश्व स्थित रहा करता है। आपके द्वारा इस विश्व का सहार किया जाता है जो कि प्रधानास्य है । ३०॥ आपही महादेव हैं- ईश्वर है-परम ब्रह्म और महेश्वर हैं । आपही परमेष्ठी-शान्त-शिव- पुरुष-निष्कल और हर है ॥३॥ माप अक्षर---परम ज्योति-ओङ्कार और परमेश्वर हैं। आपही पुरुष है जोकि अनन्त है-~या आपही प्रधान प्रकृति हैं ॥३२॥ आपही भूमि-जल अनल-वायु व्योम और अहङ्कार हैं । आप ब्रह्म की संज्ञा वाले है जिनके 6 को मैं नमस्कार करूंगा ।।३३।। जिसका मू(यो हुआ था-पृथ्वी चरण हुए और दिशाएँ भुजाऐ थी । आकाश जिसका उदय है उस विराट के लिए मैं प्रणाम करता हूँ॥३४॥ जो अपनी दीप्नियो के द्वारा समस्त दिशाओ को भासित करते नित्य ही संतप्त किया करते हैं और ब्रह्म ने जो भय विश्व हैं उन आप सूर्यात्मा के लिए मेरा नमस्कार है ।।३।। हत्य वहति यो नित्य रौद्री तेजोमयी तनुः । कव्य पितृगणाना च तस्मै वह्नयात्मने नमः ।। ३६ आप्याययति यो नित्य स्वधाम्ना सकलं जगत् । पीयते देवतासघंस्तस्मै चन्द्रात्मने नमः ।। ३७ विभत्यापभूतानि योऽन्तश्चराति सर्वदा। शक्तिर्माहेश्वरी तुभ्य तम्म वाग्वात्मने नम

हरोत्पत्त्यादि कथन )
उस वद्धि
सृजत्यशेपमेवेद यः म्वकर्मानुस्पतः ।
स्वात्मन्यवस्थितम्तस्मं चतुर्वक्त्रात्मने नमः ॥ ३६
यः शेते शेषशयने विश्वमावृत्य मायया ।
आत्मानुभूतियोगेन तस्मै विश्वात्मने नमः ॥ ४०
विति शिरमा नित्यं द्विमप्तभुवनात्मकम् ।
ब्रह्माण्ड योऽखिलाधारं तस्मै शेषात्मने नमः ।। ४१
यः परान्ते परानन्दं पीत्वा दिव्यकमाक्षिणम् ।
नृत्यत्यनन्तमहिमा तस्मै रुद्रात्मने नमः ॥ ४२
जो नित्य ही हव्य का हवन किया करते हैं वही तेजोमयी रोद्री
तनु है और पितृगणो के लिये कष्ट का वहन किया करते
स्प के लिये प्रणाम है ॥३६॥ जो इस सम्पूर्ण जगत् को नित्य ही अपने
धाम के द्वारा आप्यायित क्यिा करते हैं और देवता सध्यो के द्वारा
देत्य किया करते हैं। उन आप चन्द्रात्मक के लिये मैरा नमस्कार है ।
१३. जो सब भूतो का मरण किया करते हैं और जो सर्वदा अन्त करण
मे अन्तर्यामी रूप मे चरण किया करते हैं ऐसी जो महेश्वर शक्ति है
उन वायु के स्वरूप वाले आपके लिये मेरा नमस्कार है ।३८! जो
अपने २ वर्मों के अनुरूप ही इस सम्पूर्ण विश्व का सृजन क्यिा करते
हैं । और स्वात्मा में ही अवस्थित है उन चार मुखो वाले के स्वरूप
घारी आपको मेरा नमस्कार ममपित है।३६ जो अपनी माया के द्वारा
इस ममस्त विश्व को ममावृत करके शेप की शय्या पर क्षीर सागर मे
चयन किया करते हैं और आत्मानुभूति के योग के द्वारा ही मोते रहा
करते हैं उन विश्वात्मा आपके लिये मेरा प्रणाम है ॥४०॥ इन चौदह
भ वनो को जो अपने शिर पर नित्य ही धारण किया करते हैं जो यह
सवका आधार ब्रह्माण्ड है उसे आप धारण कर के विराजमान हैं उन
शेषात्मा आपके लिये मेरा प्रणाम समर्पित है ॥४१॥ जो परान्तमे
दिध्यकमाघी परानन्द का मान करके अनन्न महिमा वाले नृत्य किया
करते हैं उनके न्द्रामा आपके लिये मेरा नमसार है ॥४२॥

६०
{ सूर्य पुराण
योऽन्तरा सर्वभूताना नियन्ता तिष्ठतीश्वर ।
त सर्वसाक्षिण देव नमस्ते परमात्मने ॥ ४३
यस्य केशेषु जीमूता नद्य सर्वाङ्गसधिपु।
कुक्षी समुद्राश्चत्वारस्तस्मै व्योमात्मने नम' ।। ४४
य विनिद्रा यतश्वासा सतुष्टा समदर्शिन ।
ज्योति पश्यन्ति युश्शानास्तस्मै योगात्मने नम ॥ ४५
यस्य भासा विभातीद तदह तमस परम् ।
तत्त्व सदा निराकार चिद्रप पारमेश्वरम् ॥ ४६
यया सतरते माया योगी सक्षीणकल्मप ।
अपरान्तामपर्यन्ता तस्मै विद्यात्मने नम
नित्यानन्द निराधार निष्फल परम शिवम् ।
प्रपद्ये परमात्मान भवन्त परमेश्वरम् ।। ४८
एव स्तुत्वा महादेव ब्रह्मा तद्भावभावित ।
प्रालि प्रणतस्तस्थौ गृणन्ब्रह्म सनातनम् ॥ ४६
जो समस्त प्राणियों के अन्दर नियन्ता होकर ईश्वर समावस्थित
रहा करते है उही सबके साक्षी रूपी देव परमात्मा के लिये नमस्कार
है ॥४३॥ जिनके कशा मे मेघ है और जिसकी सब सघियो मे नदियो
हैं जिसकी कुक्षि मे य चारो समुद्र विद्यमान रहा करते हैं उन व्योमात्मा
आपके लिये मेरा प्रणाम है ।।४४॥ जिस ज्योनि को जगत निद्रा वाले-
यतश्वासो वाले सन्तुष्ट और समदर्शी युञ्जान होकर अर्थात योगाम्थास
करते हुए देखा करते हैं उन योगात्मा आप लिये मेरा नमस्कार है।
11४५ जिसकी दीप्ति से यह सम्पूण विकसित हुआ करता है उस तममे
परे- निराकर तत्त्व को जो सदा चिद्र प पारमेश्वर है। जिसके द्वारा
योगी सक्षीणक मप वाला माया का सतरण किया करता है जो कि
माया अपरान्ता और अपर्यास्ता है उस विधात्मा के लिये मेरा प्रणाम
है ॥४६॥४७॥ नित्य ही आनन्द स्वरूप निराधार निप्कन परम पर
मात्मा आप परमेश्वर शिव की मशरणागति में जाता हू ।।४। इस

हरोत्पत्यादि क्थन ] ६१ प्रकार में उनके ही भाव मे भावित होन वारे ब्रह्माजी ने महादेवजी की स्तुति करके सनातन ब्रह्म को ग्रहण करते हुए प्रणत और प्रन्जलि होकर वही पर स्थित हो गये थे ।।४।। ततस्तस्य महादेवो नित्ययोगमनुत्तमम् । ऐश्वर्य ब्रह्ममद्भाने वैराग्य च ददौ हर ॥ ५० कराभ्या मुशुभाम्या च उपस्पृश्य महेश्वर । व्याजहार महादेव सोऽनुग्रह्य पितामहम् ।। ५१ यत्त्वयाऽभ्यथितो ब्रह्मन्पुरत्वेऽह मया कृतम् । स्वमिदानी ममाऽऽदेशात्सृजम्ब विवधा प्रजा ॥ ५२ निधा भिन्नोऽस्म्यह ब्रह्मन्ब्रह्मविषाहरास्यया । मगरक्षालयगुनगुणोऽह न सशय ॥ ५३ मत्व ममग्रत पुत्र मृष्टिहेतोविनिर्मित । ममैव दक्षिणादगाद्वामाङ्गात्पुरुषोत्तम ॥ ५४ ममैव हृदयादुद्र सजात कामस्पवृक् । ब्रह्मविपणुहराख्याना य पर परमेश्वर ॥ ५५ इमरे पश्चात हर महादेवजी म उनको नित्य एव परमोतम योग- ऐश्वर्य और ब्रह्मसद्भाव वैराग्य प्रदान किया का ॥५० 1 महेश्वर प्रभ, ने अपने परमभ परा मे उन ब्रह्माजी का उपस्पा किया था और उनने परम अनुग्रह करके ही पितामह से महादेवजी ने कहा था । हे ब्रह्मन् । जो आपन मेरी अभ्यर्थना की थी। वहीं मैंने उनके पुत्र होने के रूप म उपस्थित होन का कार्य किया है। अब आप मेरे आदेश से विविध भाति की प्रजा का मृजन करिए । ५१६५२॥ है ब्रह्मन् ' मैं तीन प्रकार म ब्रह्मा विष्णु और हर इन नामा स भिन्न २ स्वरूप वाला हा गया है । सगं रक्षा और लय के गुणा में युक्त होना हुआ भी मैं निर्गुण ही हू-इमम तनिक भी सशय नही है ॥५३॥ वह आप मेरे आगे पुत्र में जा मृष्टि की रचना करने के ही लिये निर्मित किये गये हो आप मरे ही दक्षिण अङ्ग मे ममुतन्न हुए हैं और मेरे वाम अङ्ग म ६२ [ सूर्य पुराण पुरपोत्तम हुए है। मेरे ही हृदय से रुद्र उत्पन्न हुए हैं जो काम रूप को धारण करने वाले है। ब्रह्मा-विष्णु और हर नामा वाला मे जो पर है वह परमेश्वर है ॥५४॥५५॥ त महान्त महादेव ब्रह्मानन्ति सूरय । एव ब्रह्माणमाभाप्य दत्त्वा च विविधान्वरान् ।। ५६ अन्तहितो महादेव पश्यत पद्मजन्मन । अनुग्रहात्ततस्तस्य तस्माज्ज्ञानोदयो भवेत् ।। ५७ ततश्च पाशविच्छित्ति शिव एव भवेत्तत । नश्यन्ति व्याधयस्तस्य गलगण्डग्रहादय ५८ ऐहिकी लभते सिद्धि चिरजीवित्वमेव च । सर्वपापविनिर्मुक्त शिवलोके महीयते ॥ ५६ हे ब्रह्मा । उन महान महादेव को सूरिगण जानते हैं। इस रीति से ब्रह्माजी से कहकर और अनेक वरदान देकर पधजन्मा ब्रह्माजी के देखते हुए महादेवजी अन्तनि हो गये थे। इसके अनन्तर उनके ही अग्रह से उन ब्रह्माजी के हृदय मे ज्ञान का उदय हो गया था। और इसके पश्च त शिा हो पाशविच्छिति हो गये थे। उसकी सब गलगण्ड ग्रहादि याधियां नष्ट हो जाती है ऐहिकी सिद्धि को प्राप्त करता है और चिरजीवित्व भी प्राप्त किया करता है । वह सब पार्षों मे छुट- कारा पाकर अन्त मे शिवलोक मे अधीष्ठित हुया करता है ।।५६।१५६ । - ॥ ब्रह्म पद्मयोनित्वादि कथन । कथ स भगवाञ्मभु सर्वस्याऽद्योऽपि सन्विभु । चतुर्मुखम्य पुनत्वमगमत्केन हेतुना ॥ १ दक्षिणाङ्गमको ब्रह्मा महादेवस्थ भूलिन । कय तत्पद्ययोनित्व विरवेरिति नो बद ॥२ ब्रह्म पद्मयोनित्वादि कथन ] ३ आसीदेकार्णवे घोरे नटे व सचाराचरे। देवाश्च दानवाश्चैव मुनयो मनवस्तथा ॥ ३ निविद्यन्ते तदा तस्मिन्सजाते प्रतिसचरे । नारायणो महायोगी शेते तस्मिस्तमोमये ॥ ४ योगनिद्रा समासाद्य शेपाशियने द्विजा । उद्भ त पङ्कज तस्य नाभौ भगवतो हरे ॥५ दिव्यगन्धसमोपेत शतयोजनविस्तृतम् । तम्यैव शयनस्थस्य दिव्य वर्षशत मतम् ॥ ६ ब्रह्मा जगाम त देश यत्राऽऽस्ते पुरुषोत्तम । समुत्थाप्य च त ब्रह्मा करेण मधुसूदनम् ॥ मायया मोहितो ब्रह्मा तमुवाच सुरेश्वरम् ॥ ७ यपियो ने कहा- हे भगवान् | यह भगवाव सम्भ, जब सबके आदि म रहने वाले विभु है तो वे किस कारण से ब्रह्माजी के पुत्रत्त्व को प्राप्त हुए थे ॥१॥ शूली महादेवजी के दक्षिण अङ्ग से समुत्पन्न होत वाले ब्रह्माजी हैं तो विरञ्चि से पद्म से समुत्पन्न होना कैसे हो गया या- यह सब हमारे सामने आप वणित कीजिए ॥२॥ श्री सूत ने पहा- जव यहा पर एकार्णव ही या अर्थात् केवल एक समुद्र था और वह भी परम धौर रूप वाला था सभी चर और अचर नष्ट हो गये थे। उस समय में उस प्रति सजट के हो जाने पर कोई भी विद्यमान नही रहा या न तो कोई देव ही थे-न दानव थे-न मुनिगण थे और न मनु गण थे। उम तमोमय पाल में केवल एक महायोगी भगवान् नारायण ही गयन किया करते हैं ॥३॥४॥ है द्विजो । शेष नाग की शय्या पर योग निद्रा से प्राप्त होकर वे भगवान् नारायण शयन कर रहे थे। उनकी नाभि में एक पद्म उत्पन्न हुआ था और वे भगवान् श्री हरि थे ॥५॥ वह पद माधारण पय नहीं था । वह तो परम दिव्य गन्ध मे मुक्त था और गौ योजन में विस्तार मे युत था। इस प्रकार शयन में स्थित उनको दिध्य सौ वर्ष व्यतीत हो गय यं ॥६॥ ब्रह्माजी उस देश में गये १४ - , । सूर्य पुराण थे जहा पर परम पुरुषोत्तप्र शयन किये हुए थे । ब्रह्माजी न कर के द्वारा उन मधुसूदन को उठाया था और माया से मोहित होकर ब्रह्माजी ने उन सुरेश्वर प्रग से कहा था ॥७॥ अस्मिन्नेकार्णवे घोरे शेते कोऽत्र भवानहो । बहोत्युक्त ऽब्रवीद्विष्णुब्रह्माण तेजसा निधि ॥८ न जानासि कथ मूढ मामन्तर्यामिण विभुम् । सर्वस्याऽऽद्य सुरथेष्ट जानीहोत्यब्रवीद्विभु ॥६ एवमुक्त्वा पुनश्चक्री जानापि पितामहम् । को भवानिति त प्राह ब्रह्मा हरिमथाब्रवीत् ॥ १० अह वै सर्वभूतानामाद्य सर्वजगत्पति । ब्रह्माण मा पर देव जानीहि पुरुपपंभ ।। ११ चराचरात्मक विश्व मयि निष्ठति सर्वदा । मय्येव विलयश्चान्ते पुनरेव न सराय ॥ १२ एक पितामहेनोक्तो भगवान्कमलापति । प्रविष्टो ब्रह्मणो देह तय लोकान्ददर्श स’ ॥ १३ विस्मित कमलाकान्तो निर्गतश्च विथेमुखात् । सहस्रशीर्षा पुरप पुनर्बह्माणमब्रवीत् ॥ १४ इस परम घोर एकार्णय मे जो आप शयन पर रहे हैं ये आप कौन हैं--यह यतलाओ-ऐसा कहने पर तेजो के निधि भावान विष्णु ने ब्रह्माजी मे वहा या-हे मूड क्या तुम नही जानते हो और तुम मुसरो क्यो नही जानते हो मैं तो रावरा अन्तर्यामी और मि.ह में तो सभी का आदमुरी म श्रेष्ठ है। विम ने यहा-अन्या, अभी मुसी जान लो इस प्रसार मे बहार फिर चक्री भगवान में जानते भी पितामह से पूछा था कि आप वान है । इमरे उत्तर म ब्रह्मा जी ने श्रीहरि से पहा पा ॥१०॥ मैं मर भूना मा आउ है और हम गमस्त जात पा स्वामी । हे पुषिो में परम यफ मुभलो ग्रह्मा गमलो जोरि परग देव है ॥११॥ यह गपूर्ण पर-अगगरमा विश्व 1 ब्रह्म पद्मयोनित्वादि कथन ] मुझमें ही स्थित रहा करता है और अन्त मे मुझमे हो पिलय को प्राप्त हो जाया करता है इसमे कुछ भी सराय नहीं है ।।१२॥ इस प्रकार से पितामह के द्वारा भगवान् कमलापति से कहा गया था तो उस समय में दे ब्रह्माजी के देह म प्रविष्ट हो गये थे और वहा पर सभी लोगो को देखा था। कमलाकान्त विष्णु यह देखकर बहुत ही विस्मित हो गये थे और फिर वे विधाता के मुख से वाहिर निकल गये थे। सहस्त्र शीर्यो वाले पुरुप फिर ब्रह्माजी से बोले ।।१३॥१४॥ विधो त्वमपि मद्देह प्रविश्यासु विलोकथ । चराचरात्मकाँल्लोकान्सदेवासुरमानुपान् ॥ १५. ततो विरिञ्चिभगवानुदरै कमलापते । प्रविश्य भूवनान्सन्दृिष्ट्वाऽभूद्विस्मितो विधि ॥ १६ नापश्यन्निर्गमद्वारे पिहितानि च चकिणा। ततोऽमी नाभिपद्मस्य नालमार्गमविन्दत ॥ १७ तेन मार्गेण निर्गत्य ब्रह्मा ब्रह्मविदा वर । रेजे पङ्कजमध्यस्थो देवदेव पितामह ॥ १८ तमब्रवीग्ददापाणिब्रह्माणममिता ति । लीलार्थमेतत्सक्ल पितामह कृत मया ॥ १६ न मात्सर्यात्सुरश्रेष्ठ द्वाररोघो मया कृत । त्वमेव जगतो मान्य सर्वम्याऽऽद्य पितामहः ।। २० पुनत्वे त्वामह याचे देहि मे कमलासन । पद्मयोनिरिति रयाति मत्प्रितार्थ गमिप्यसि ।। २१ हे ब्रह्मन् । आप भी मरे देह म प्रविष्ट होकर पीछको देखिए। जहा पर चग चरात्मर सब लोक् विद्यमान हैं जिनम सभी देव-असुर और मनुष्य हैं ॥१३॥ इमके अनन्तर फिर भगवान् कमलापति के उदर में प्रवेश करके उन्होंने समस्त भ वना को दवा या मो ब्रह्माजी को अत्यधिक विस्मय उहाल हो गया था ।१६) भगवा चक्रीने सभी द्वारो को बन्द कर दिया था अनाव ब्रह्माजी को अपने प्राहिर निकलने । सूर्य पुराण का कोई भी द्वार ही नहीं मिला था। तब वे नाभि पद्म के नाल पर प्रास हो गये थे ।।१७॥ ब्रह्म के ज्ञाताओ मे परम श्रेष्ठ ब्रह्माजी उसी मार्ग से बाहिर निकल कर आये थे और देवो के देव ब्रह्माजी उस कमल के मध्य में स्थिर होकर परम शोभित थे ॥१॥ अपरिमित धु ति वाले गदापाणि ने उन ब्रह्माजो से कहा था -हे पितामह । लीला के ही लिये मैंने यह सभी कुछ किया है ॥१६॥ मैंने किसी मत्म- रता की भावना से द्वारो का अवरोध नही किया था। आप ही जगत् वे मान्य सबके आदि में होने वाले पितामह है ॥२०॥ हे कमलासन ! मैं आपसे याचना करता हूं कि आप पुत्रत्व मे प्राप्त हो वही मुझे दीजिए। मेरे प्रिय के लिये आप पद्य योनि हैं -इरा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जायेंग ॥२१॥ तत स्वयंभूविश्वादिश्चक्रिणे वरमुत्तमम् । दत्त्वा प्रहर्षमगमत्सर्गभूतात्मको विभु ।। २२ ततस्तमप्रवद्विष्णु नाऽऽवाभ्यां विद्यते परम् । त्वन्मय मन्मय सम्मेका मूर्तियिा स्थिता ॥ २३ एा निगदितो विष्णुब्रह्मणा परमेष्ठिना। विरचय प्रतिज्ञा ते निष्फलव भविष्यति ।। २४ किं न पश्यसि विश्व शे स्वयज्योति सनातनम् । सर्वात्मकमुमाकान्तमना दिनिधन परम् ।। २५ गच्छावाभ्या पर देवमधिक शरग विद्यो। एका हरेनिगदित थ त्वा ब्रह्मा तमब्रवीत् ।। २६ आवाभ्यामधिक कश्चिद्विद्य तेति मुघा हरे । मापसे निद्रयाऽऽविष्ठस्त्यज मोह महामते ।। २७ इसपे पश्चात् विश्व ये आदि स्वयम्भू ने भगवान पत्रो को यह उत्तम परदान दिया था और सर्वभूतात्म विभु परम प्रहपं यो माग होगये थे ॥२२॥ इसके अनन्तर पिर ग्रट्माजी ने भगवान विष्णु से पहा पा दोनोर पर कोई भी विद्यमान नहीं है। गया और मन्मय - ब्रह्म पायोनित्वादि क्थन । अर्थात् तुम्हारे स्वरूप म रहन वाली और मेरे रूप म रहने वाली सब एक ही मूत्ति हैं केवल दो स्पा में ही स्थित रहा करती हैं ।।२३।। पर- मेष्ठी ब्रह्माजी के द्वारा जब भगवान विष्ण से इस प्रकार से कहा गया तो भगवान विष्णु ने कहा है विरज्जे । यह तो आपकी प्रतिज्ञा निप्पन ही हो जायेगी ॥३४॥ क्या आप स्वय ज्योति समातन विश्व के ईश को नहीं देख रहे हैं। वे सत्रकी यात्मा-उमादेवी के स्वामी अनादि निधन और परम है ॥२शा है विवे । अब आप हम दोना से पर अधिक देह की शरण म गमन करो। इस प्रीति से भगवान् श्री हरि के कयन वा श्रवण कर ब्रह्माजी ने उनम कहा-॥२६॥ हम दोनों से भी कोई अधिक विधमान है ह हरे । यह तो सर्वथा मिथ्या ही हैं । हे महामते । आप निद्रा से आविष्ट हार हो एसा कह रहे हैं । आप इस मोह का त्याग कर दीजिए ॥२७॥ मेव विधे यदज्ञात्वा परे भाव महेश्वरे । अस्तीति नान्यथाऽह ते ब्रवीमि कमलासन ॥ २८ मोहितात्मा न सदेहो मायया परमेष्ठिन । मायो विश्वात्मको रुद्रो मायाशक्तिस्तु शाकरी ॥ २६ यस्मात्सर्वमिद ब्रह्मन्विष्णुरुद्र न्द्रपूर्वकम् । महाभूतेन्द्रियै मन प्रथम सप्रसूयते ।। ३० पश्वर्येण सपन्नो नाम्ना सर्वेश्वर स्वयम् । पा, मुक्षुभिध्येय शभुराकागमध्यग ॥ ३१ योऽग्रे त्वां विदधे पुत्र नव वेदाश्च दत्तवान् । यत्प्रमादात्वया लब्ध प्राजापत्यमिद पदम् ॥ ३२ एको बहूना जन्तूना निष्क्रियाणा च सत्क्रिया । य एक बहुधा वीज परोति स महेश्वर ।। ३३ जीरेभिरिमाल्लोमान्मनको य ईगते । य एको भगवान्द्रो न द्वितीयोऽम्नि पश्चन ॥ ३४ १८] [ सूर्य पुराण सदा जनाना हृदये सैनिवितोऽपि य परै । अलक्ष्यो लक्षयन्विश्वमधितिष्ठति सर्नदा ॥ ३५ भगवान् विष्णु ने कहा-हे विधे । ऐसा मन कहे महेश्वर मे परम भाव को आप जानते नही है। हे कमलासन । हम दोना से भी पर कोई देवेश्वर है-यह मैं आपको अन्यथा अर्थात् मिथ्या नही बोल रहा हूँ।२८! आप परमेष्ठी को माया से मोहित आत्मा वाले है अतएव आप उनके स्वरूप को नहीं जानते है किन्तु मेरे इस कथन में बिल्कुल भी सन्देह नहीं है। विश्वात्मक रुद्रयार्थ हैं अर्थात माया वाले है और माया शक्ति ही शाङ्करी है ॥२६।। जिनसे यह सम्पूर्ण विश्व समुत्पन हुआ है हे ब्रह्मन् । उही से विष्णु-रुद्र और इन्द्र आदि महाभून और सव इन्द्रियो से प्रयम ही सम्प्रसूत हुआ करते हैं ॥३०।। वे सभी प्रकार से ऐश्वय से सम्पत हैं और उनका स्वय सर्वेश्वर है। वे सभी मुमुधुओ के द्वारा ध्यान करने के योग्य हैं ऐसे वे आकाश के मध्य मे गमन करने वाले शम्भु देव हैं ॥३१॥ जिन्होने अपने आपको पुत्र बनाया था और आपको वेदो का ज्ञान प्रदान दिया था । यह प्रजापत्यके पद को भी उन्ही के प्रमाद से आपने प्राप्त किया है ।।३२।। जो एप ही बहुत से जन्तुओ को मस्क्रियाओ का करने वाला है । जो एक ही है और वहुन प्रकार के बीज को किया करता है वही महेश्वर है।३३। इन जीवो से इन समस्तलोको का वह एक ही शासन परने वाला ईश है । वे ही एक भगवान न्द्र हैं और दूसरा कोई भी नही है ॥३४॥ सर्वदा मनुष्यो हृदयो म सन्निविष्ट भी हैं तथापि वह दूमरे के द्वारा अलक्ष्य रहा करते है और रवय वे सम्पूर्ण विश्व को देखते हुए ही अविष्ठित रहा करते हैं ।।३५॥ यस्तु कालात्मयुक्तानि कारणान्यपि लीलया। अनन्तशक्तिरेकात्मा भगवानपितिष्ठति ॥३६ यस्य शभो परा गावितर्भावगम्या मनोहरा । निर्गुणा स्वगुणरेव निगूढा निपला शिवा ।।३५ ब्रह्म पद्मयोनित्वादि कथन ] एप देवो महादेवो विज्ञ य. सर्वदा जनै । न तस्य परम किंचित्पद समधिगम्यते ॥३८ अयमादिरनाद्यन्तः स्वभावादेव निर्मल.। अनन्तः परिपूर्णश्च स्वेच्छाधीनश्चराचरः ॥३६ उत्तरोत्तरभूतानामुत्तरश्च निरुत्तरः । अनन्तमहिमा भूमिरपरिच्छिन्नवभरः ॥४० अनेन चित्रकृत्येन प्रथम मृज्यते जगत् । अन्तकाले पुनश्चेदस्मिन्प्रलयमेष्यति ॥४१ दृश्यश्च पतितै ढेडुंजनैरपि कुत्सितः । भनरन्तर्वहिश्चापि पूज्य. सभाव्य एव च ।।४२ जो कालात्मक कारणो को भी, अपनी लोला ये अधिक न रहा करते हैं क्योकि वे अनन्त शक्ति वाले और एकात्मा भगवान् हैं ॥३६॥ जिन भगवान शम्भू भी शक्ति पर है । वह भाव गम्या एव परम मनोहरा है । शम्भु देव की वह शक्ति निगुगा है और अपने ही गुणो के द्वारा वह निगूणा है-विष्कला एव शिवा है 11३७॥ यही देव महादेव है जो सदा जनो के द्वारा जानने के योग्य हैं । उनका जो कुछ परम पद है वह समधिगत नहीं किया जाया करता है ॥३८॥ यह मादि हैं और मादि अन्त से रहित हैं तथा स्वभाव से ही परम निर्मल हैं। वे भगवान् शम्भू अनन्त-परिपूर्ण-स्वैच्छा के अधीन रहने वाले तथा चराचर स्वरूप हैं ॥३६॥ उत्तरोत्तर भूतो का उत्तर एव निरुत्तर हैं । वे अनन्त महिमा को भूमि हैं तथा यपरिच्दन वैभव वाले हैं ॥४०॥ विचित्र कृत्यो वाले इनके ही द्वारा यह जगत सर्वप्रथम मृजित हुआ करता है और अन्त वाल जब उपस्थिन होता है तो उस समय में यह सम्पूर्ण जगत् इसी में प्रलय को प्राप्त हो जाया करता है ।।४१॥ जो पनित-मूड कुस्मित और दुर्जन हैं तथा मेरे भक्ति हैं उनके द्वारा वे दृश्य भी होते हैं- पूज्य एवं सम्भाव्य हुआ करते हैं ॥४२॥ तदीय विविध रूप स्थूल सूक्ष्म ततः परम् । अस्मदायः सुरेश्य स्यूल मूक्ष्म तु योगिभिः ॥४३

[ सूर्यपुराण
तत पर तु यन्नित्य ज्ञानमान्दमव्ययम् ।
तनिष्टस्तत्पर भक्त श्यते व्रतमास्थिते । ४४
बहुनाऽत्र किमुक न ब्रह्म-सर्वेश्वरे शिवे ।
भक्तिरेव सदा कार्या यया युक्तो विमुच्यते ।।४५
प्रसादादेव सा भक्ति प्रसादो भविनसभेव ।
यथेहाइकुरतो वीज वीजतो वा यथावर ॥४६
तस्य प्रसादलेशेन पशौ पाशपरिक्षय ।
तस्मात्पशुपति शभु परावस्त्वस्मदादय ॥४७
सपा मुक्तिद शभुस्तेपा मावानुरूपत ।
गर्भस्थो मुच्यते कश्चिज्जायमानस्तथा पर ॥४८
बालो वा तरुणो वाऽथ वृद्धो वा मुच्यते पर ।
तियग्योनिगत कश्चिन्मुन्यले नारकी पर 158
उन भगवान शम्भू क अनम रूप है । वे स्थूल भी हैं -सूम भी
हैं--और उससे भी पर रूप पाने हैं । अस्मादादि के द्वारा जा सुर हैं
स्थूल रूप ही दृश्य है । जा सूक्ष्म उनका रूप है वह तो यागियो के द्वारा
ही दखन के योग्य होता है ॥४३॥ उनसे भी पर जो नित्य ज्ञान और
आनन्द एव अव्यय उनका रूप है वह तो उनम ही परायण एवं शम्भु
म हद निष्ठा रखने चार और व्रतों में समास्थित भक्ता के द्वारा ही
दिखाई दिया करता है ॥४४॥ हे बहान् । यहा पर यहून अधिर पहने
स क्या लाग है । सर्वेश्वर भगवान् शिव म ही सदा भक्ति करनी
चाहिए जिसके द्वारा मुक्त मनुष्य इस भव बन्धन म विमुक्त हो जाया
परता है ।।४।। वह भगना गम्भु की भक्ति उना प्रमाद म हो हुआ
फरती है और उनका प्रमाद भक्ति स हुआ करता है जिम तरह से बीज
म पर हुआ करता है और उस अबुर म फिर चोर उसन हा
परता है ॥४६॥ उनके प्रमाद के ला मात्र में हो या में पारामा
परिक्षय हो जाता है । इमाम भगवान गम्भ पशु पनि कहे जाते है और
अगदाहि गण सर पाई ॥४॥ उनो भाव। वे अनुरूप भगवान शम्भु

ब्रह्म पद्मनोनित्वा द कथन ] --- सबको मुक्ति प्रदान करने वाले हैं । कोई तो गर्भ में स्थित रहते हुए ही मुक्त हो जाया करता है तथा कोई ज्वयमान होकर के मुक्त हो जाता है । चाहे बाल हो-तरुण हो अथवा वृद्ध हो सभी मुक्त हो जाया करते है। कोई शम्भु के प्रसाद से तिर्ययोनि में रहने वाला भी मुक्त हो जाता है और जो गरको होता है यह भक्ति के प्रभाव से मुक्ति प्राप्त कर लिया करता है ॥४८॥४६॥ अपरस्तूदरप्राप्तो मुच्यते स्वपदक्षयात् । करिनाक्षाणपदो भूत्वा पुनरावत्यं मुच्यते 118 कश्चिद्ध्वंगतस्तस्मिन्स्थित्वा स्थित्वा विमुच्यते तस्मान्नेकप्रकारेण नराणा मुक्तिरिष्यते ॥५६ ज्ञानभावानुरूपेण प्रसादेनैव निर्वृति । त्वमेका भगवन्मूर्तिरन्या नारायणी परा ।।५२ रौद्री तृतीया कथिता जगत्सहारकारिणी। एतासा प्रेरक शभु स्वे स्वे कार्ये चतुर्मुख ॥५३ निर्गुणोऽपि गुणाध्यक्षः स्वतन्त्रैश्वर्यविग्रहः । तमीश्वर महादेव न पश्यसि कथ विधे ॥५४ दिव्य ददामि ते चक्षुर्णेन पश्यसि त शिवम् । विष्णोभंगवतो ब्रह्मा दिव्य चक्षुरवाप्य तु ॥५५ अपश्यत्स महादेव प्रत्यक्ष पुरतः स्थितम् । ब्रह्मा लब्ध्वा पर ज्ञानमंश्वर निगुण परम् ।।५६ दूसरा उदर में प्राप्त ही स्वपद के क्षय से मुक्त हो जाता है और कोई क्षीणपद होकर पुन आवृत्ति करके अर्थात् जन्म ग्रहण करके मुक्त हो जाया करता है ॥५०॥ कोई ऊर्ध्वगत उसमे स्थित-स्थित रहता ही हुमा विमुक्त हो जाया करता है । इस कारण से नरो की जो मुक्ति होती है अनेक प्रकार से होती है तात्पर्य यह है कि मुक्ति के प्राप्त करने का एक ही नहीं अनेक मार्ग होते हैं ।।५१॥ ज्ञान के भाव के अनु- रूप सारे है।लित होता है। भगवान को भूतिमा अनक है- १०२ ] [ सूर्यपुराण । भन्यापरा नारायणी मूत्ति है-तीसरी रोद्री कही गयी है जो इस जगत् के सहार के करने वाली है । हे चतुमुंख । इन सबको प्रेरणा देने वाले अपने अपने कार्य मे भगदान शम्भु ही हैं । ॥५२॥५३॥ वे स्वय गुणो से रहित है तथापि गुणो के अध्यक्ष है और स्वतनत्त ऐश्वर्य के विग्रह वाले है । है विधे । उन ईश्वर महादेव को आप क्यो नही देखते हैं। ॥५४॥ अब मैं आपको दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ जिससे आप उन भगवान शिवको देख लेंगे। भगवान् विष्णु से ब्रह्माजी ने दिव्य चक्ष की प्राप्ति करके उन्होने फिर प्रत्यक्ष रूप में अपने ही समक्ष मे स्थित महा देवजी का साक्षात् दर्शन प्राप्त किया था ब्रह्माजी ने परम ज्ञान का लाभ प्राप्त किया था और परम निर्गुण ऐश्वयं को प्राप्त किया था ॥५५॥५६॥ तमेव शरण गत्वा सस्तूय विविध स्तवै । प्रीतो भूत्वा महादेवश्चतु वमथाब्रवीत् ॥५७ स्तोत्र बहुविधर्भक्त्या तापितोऽह विधे त्वया । मुक्तो भविष्यासि क्षिप्र मत्समश्च न सशय ॥५८ मपंव सृष्ट सृष्टयर्थ त्वमेव च जनार्दन । वर ददामि ते ब्रह्मत्वरयस्व यथेप्सित्तम् ।।५६ एव शभोनिगदित थत्वा चव पितामह । विष्णु निरीक्षक्ष पुरत स्थितमाह महेश्वरम् ॥६० भगवन्देवदेश सर्वज्ञ गिरिजापते । स्वामेव पुमिच्छामि त्वया वा महश सुतम् । ६१ त्वमायामोहित शभो न वेनि त्वा पर शिवम् । नमामि तव पादाब्ज योगिना भवभेषजम् ॥६२ थला विरञ्च वंचन देवदेव पिनाक्पृक् । ब्रह्माणमतवीतुम ममालोक्याथ चाक्रणम् ॥६३ तय ना ब्रह्माजी उन्ही की शरणागति में प्राप्त हो गये थे और फिर उन्होंने श्री महादेवजी की अनेक स्तको के द्वारा स्तुति की थी। इस पर

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ब्रह्म पायोनित्वादि क्यन
महादेवजी परम प्रसन हो गये और ब्रह्माजी से बोले-॥५७॥ ईश्वर ने
कहा-है विधे | आपने बहुत से लोत्रो के द्वारा स्तुति करके और
भक्ति की भावना मुझसे तोपित कर दिया है। अब आप शीघ्र ही
विमुक्त हो जायगे और मेरे ही समान भी हो जायगे--इसम तनिक
भी मशय नहीं है ॥५८|| मैंने ही इस विश्व को मृष्टि के लिए आपका
मूजन frया है हे ब्रह्मन् । मैं वरदान देता ह आपका जो भी अभीष्ट
हो उसे और वरदान प्राप्त कर लीजिए ॥५६॥ पितामह ने इस प्रकार
का क्थन शम्भु भगवान का श्रवण करके और सामने विष्णु देखकर
आगे स्थित महेश्वर से कहा है ।।६०॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे भगवान्
देवदेवेश । आप गिरजा वे स्वामी और सर्वज्ञ हैं। मैं तो अपना पुत्र
चाहता हूँ अथवा आपके ही समान मेरे सुत होवे ॥६१॥ हे शम्भो । मैं
तो आपकी माया से मोहित हो रहा हूँ अतएव आप परात्पर शिव को
मे नही जानता हू । मैं आपके चरण कमलो मे नमस्कार करता हू जो
आपका पादपद्य योगियो के ससार का भेषज है ॥२॥ पिनाकधारी
देवदेवमें विरब्जि के बचन को सुनकर इसके अनभार चक्री को देखकर
पुत्र ब्रह्मा जी से कहा-||६३॥
प्रार्थित यत्त्वया ब्रह्म स्तस्करिष्यामि पुनक ।
अहमशेन भविता पुवस्तव पितामह ।।६४
ज्ञान मद्विपय क्षिप्र भविष्यति तवानघ ।
सृज त्व मत्प्रसादेन चराचरमिद जगत् ।।६५
एष योगीश्वर शाी ममैवाशो न सशय ।
साहाय्ये भविता ब्रह्मन्ममाऽऽदेशात्तवानप ॥६६
एव दत्त्वा वर शभुव्र झणे द्विजसत्तमा ।
अथाब्रवीद्ध पीकेश प्राञ्जलि पुरतः स्थितम् ।।६७
वर वरय दास्यामि तव नारायणाव्यय ।
नाऽऽवाभ्या विद्यते भेदो मच्छक्तिस्त्व न सशय ॥६८
स्वामय मन्मय सर्वमव्यक्त पुरुषात्मकम् ।
ज्ञानज्ञयात्मक विश्व त्वन्मय मन्मय हरे ॥६६

[ सूर्य पुराण - ज्ञाताह ज्ञानरूपस्त्व मन्नाऽह त्व मतिहरे । प्रकृतिस्त्व सुरश्रेष्ठ पुरुषोऽह न सशय ७० हे पुत्र ब्रह्मन् । आपने जो प्रार्थना की है उसे हे पुन । मे करूगा । हे पितामह । मैं अपने अश से तुम्हारा पुत्र बनूगा । हे अमध। गेरे विषय मे तुमको बहुत ही शीघ्र ज्ञान होगा । मेरे प्रमाद से अब आप इम चराचर जगत् का मृजन करो ॥६४॥६५॥ यह जो योगीश्वर शाक घारी है यह भी मेरा ही एक अश है-इममें सशय नहीं है । हे ब्रह्मन् आप तो निरुपाय है । यह भी मेरे आदेश से आपकी महायता म होगे ॥६६।। इस तरह से शम्भु भगवार ने हे द्विजोत्तमो । ब्रह्माजी को वर- दान देकर उसके पश्चात् अपने सामने म हो स्थिन ऋपीवेश से शरभु ने कहा -हे अब्धय नारायण । आपभी वरदान मांग लीजिए। मैं आप को भी दूगा । हम दोनो मे कोई भेद नहीं है । आप भी मेरी ही शक्ति है-इममे सशय नही है । यह पुरुषात्मक अध्यका त्वन्मय और सब- मामय ही है अर्थात तुम्हारा और मेरा ही स्वरूप है । हे हरे। यह विश्व मान ये द्वारा ही जैमात्मन है जोवि त्वन्मय और मन्मय है मैं तो शाता हू और आप ज्ञान रूप हैं । ह हरे। मैं तो माता हू और मति हैं। हे मुरथेप्ट । आप प्रति हैं और में पुरुप हू-इसम सराय नहीं है ॥६॥८॥६६॥७॥ रव चन्द्रमा अह सयंः शर्वरी त्वमह दिनम् । त्वमेव माया विश्वस्य मायाह परमा विभो ।।७१ एव सभोग थत्वा वासुदेवो निरज्जन । अग्रवीत्परमात्मान महादेव द्विजोत्तमा ॥७२ निश्चला त्वयि में भक्तिभवत्वव्यभिचारिणी। वर शिमग्योभंगपत्करोमि सुरपूजिन ॥७॥ एपस्त्वित्ययाHICT समालिजय च मामिण पालगैतममागादित्युवायाऽन्तहितो हर. 11७४

गौरी पृथप शरीरस्वादि क्थन ]
[ १०५
अभवहह्मण पुत्रो यथा देवस्त्रिलोचन ।
तथा सर्वमशेपेण कथित मुनिपुगवा ७५
माप च द हैं तो मैं सूर्य ह । आप रात्रि हैं और मैं दिन हु । आपही
इस विश्व की गाया हैं और मैं परमा विभो माया हू || ७१॥ निरचत
वासुदेव इस प्रकार के दाम्मु के वचन का श्रवण पर है द्विजोत्तमो ।
परमात्मा महादेवजी में वे बोले-~||७२।। भगवान् विष्णु ने कहा है
भगवान आपम मेरी यव्यभिचारिणी भक्ति होवे । हे सूर पूजित ।
इसके अतिरिक्त अन्य वरा को प्राप्त पर मैं करू गा 11७३|| इसने
अनन्तर ऐसा ही होवे-यह इतना कहार शाम भगवान् का उन्होंने
लङ्गन किया था और कहा था कि मेरे आदेश से इम समस्त विश्व
का आप परिपालन करिए । इसना कहकर भगवाद हर वही पर बनर्धा
न हो गये थे ॥७॥ किस तरह से त्रिलोनन देव ब्रह्माजी के पुत्र हुए
थे वह राय पूर्ण रूप से है मुनि श्रेया ' मैंने वगित कर दिया है ।।५।।
। गौरो
पृथक
शरीरत्वादि कथन ।।
वथ भगवती गौरी शकरार्धशरीरिणी।
परब्रह्मास्तिका नित्या परमाऽभागमध्यगा ।।?
सवशक्तिमयी शान्ता निर्गणा निरुपद्रवा ।
आदिमध्यान्तरहिता सर्वोपाधिविवजिता ॥२
स्वभाभिपियन्तीद विश्वमेतत्सुरेश्वरी ।
नित्यानन्दा निरासवा निविभागा निरञ्जना ॥३
पृषकशरीरमकरोकथ सा परमेश्वरी।
वय तच्छोतुमिच्छाम मूत वक्तुमिहार्हसि ॥४
विश्वेश्वरान्महादेवाहर लम्या पितामह ।
प्रजा ससर्ज भगवान्न व्यबर्धन्त ता प्रजागर

[ सूर्यपुराण दुखितोऽभूत्तदा ब्रह्मा प्रजा दृष्टवा तु दुर्बला । नेऽकृताथमात्सान प्रादुर्भूतस्ततो हर ॥६ ब्रह्माणमब्रवीच्छभुतिं त्वदु खकारणम् । सर्वत शर्मणे यत्र भविष्यति तवानघ ७ मपियो ने कहा- भगवती गौरी शङ्गर भगवान की अर्ध शरीरिणी कैसे हुई थी? वह तो परम ब्रह्मात्मिका नित्या और परमाकाश के मध्य मे रहने वाली है । वह सर्वशक्ति मयो-शान्ता-निर्गुणा और निरूप द्रवा है । वह आदि मध्य और अन्त से रहिता हैं तथा सब प्रकार की उपाधियो से रहिता है ॥१॥२॥ वह सुरेश्वरी इस सम्पूर्ण विश्व को अपनी विभाओ से भासिक किया करती हैं। वह नित्य ही आनन्द स्वरूपिणी निरातका निविभागा और निरग्जता हैं ॥३॥ उस परमेश्वरी ने कैसे पृथक् शरीर को दिया था ? हम यही श्रवण करने की इच्छाएं रखते हैं । हे सूतजी यह बताने को परम सुयोग्य है ॥४॥ सूतजी ने कहा-पितामह ने विश्व के ईश्वर महादेव जी से वर प्राप्त पर भगवान् परमेष्ठी ने प्रजा का सृजन किया था किन्तु वजित नही हुई थी ॥५॥ उस समय में ब्रह्माजी बहुत ही दुखित हुए थे जब कि उन्होंने अपनी रची हुई प्रजा को दुर्वल देखा था। तब उन्होंने अपने आपको असफल ही समझ लिया था उसी समय म भगवान् हर प्रादुर्भूत हो गये थे ॥६॥ भगवान् शम्भु ने ब्रह्माजी से कहा था कि हमने तुम्हारे दुख पा कारण जान लिया है । हे अनघ । सभी ओर से यहाँ पर आपके कल्याण के लिए होगा ॥७॥ क्रियता वै तथेत्युक्त्वा कतुं समुपचक्रो। अर्धनारोश्वरो देव स्वय विश्वेश्वर शिव ।। नारीभागान्महादेव मसज पृथगीश्वरीम् । ब्रह्मास्मिा परा शक्ति कोटिवालाभामुराम IME न तस्या विद्यते जन्म जातेति विल भाति या। पर भाव न जानन्ति यस्था ग्रह्मादय मुरा ॥१० गोरी पृषक दारोग्वादि कथन ] [१०७ यस्यास्तु शक्तिभिर्वाच्या ब्रह्माण्डाना च कोटयः । भतुरङ्गाद्विभक्तेव दृष्टा साऽय विराञ्चना ॥११ बब्रवीत्प्राचलिभूत्वा विश्वेश्वरी पितामह ॥१२ त्या नमामि शिवा शान्नीमोश्वरा,शरीरिणीम् । बनाद्यनन्नविभवा मूलप्रकृतिमीश्वरीम् ॥१३ जन्ममृत्युजरातीता जन्ममृत्युजरापहाम् । क्षेयज्ञशक्तिनिलया परमाकासमध्यगाम् ॥१४ बरो उस प्रकार से कहार करना आरम्म कर दिया था। विश्वेश्वर शिव देव स्वय अयं नारीश्वर हो गये ॥८॥ नारी भाग से महादेव ने ईश्वरी का पृथक सृजन किया था जो ब्रह्मास्मिका-करोडों वाल सूर्या के समान भासुरा पराशक्ति थी 18II उसका जन्म नहीं है जोकि अमुत्पन हुई-एसी प्रनील ही होती है। जिसके परम भाव को ब्रह्मा आदिक सुर भी नहीं जानते हैं ॥१०॥ जिसकी शक्तियो से करोडो ब्रह्माण्डो को कहना चाहिए विरजि ने मर्ता के अङ्ग मे विभक्ता होती हुई है । उसको देखा था ॥११॥ पितामह ने प्राज्जति होकर विश्वेश्वरी मे वहा था ॥१२॥ श्री ब्रह्माजी ने कहा-ईश्वर के अघ शरीर वाली- शान्ता--शिवा आपको मैं नमसार करता है। आप अनाद्यन्त विभव- वाली--मूल प्रकृति और ईश्वरी हैं । आप जन्म मृत्यु और जरा से परे हैं और प्राणियों के जन्म-मृत्यु और जर का अपहरण करने वाली है। क्षेवन शक्ति की निलया है नथा आप परमाकाश के मध्य में गमन परने वाली अर्यान् स्थित रहने वाली हैं ॥१३॥१४॥ ब्रह्मेन्द्र विष्णुनमितानष्टमूत्यंगिनीमजाम् । प्रधानपुरपातीता सावित्री वेदमातरम् ।। १५ ऋग्यजु मामनिलयामृज्वी कुण्डलिनी पराम् । विश्वेश्वरी विश्वमयो विश्वेश्वरपतिव्रताम् ।। १६ विश्वसहारकरणी विश्वमायाप्रवर्तिनीम् । मर्गम्यित्यन्तपरिणी व्यक्ताव्यस्तम्यापिणीम् ।।

१०८ ] [ सूर्य पुराण पाहि मां देवदेवेशि शरणागतवत्सले । नान्या गतिमहेशानि मम लोक्यवन्दिते ॥ १७ त्य माता मम कल्याणि पिता सर्वेश्वर शिव । सृष्टोऽह त्रिपुरघ्नेन सृष्ट्यर्थ शकरप्रिय ॥ १६ विविधाश्च प्रजा सृटा न वृद्धिमुपयान्ति ता । तत पर प्रजा सर्वा मैयुनप्रभवा क्लि ।। २० सवर्धयितुमिच्छामि कृत्वा सृष्टिमत परम् । शक्तीना खलु सर्वासा त्वत्त सृष्टि प्रवर्तते ॥ २१ आप ब्रहमा इन्द्र और विष्ण, वे द्वारा वन्दिता है तथा अष्टमूर्ति भगवान् शिवकी अङ्गिनी और अजा हैं । आप प्रधान पुरुष स भी अतीत्य हैं और वेदी की माता आप सावित्री हैं १५॥ मग्वेद-यजुवेद और सामवेद इनका आप निलया है । आप अज्वी पर कुण्डलिनी हैं । आप इस विश्वको ईश्वरी है- विश्वमयी और विश्वेश्वर प्रभ की पलौदता हैं ऐसी आपको मैं प्रणाम परता हूँ।१६। आप विश्व का महार करने वाली हैं तथा विश्य पी माया पा प्रवर्तन करने वाली है । आप सगं और स्थिति एव अन्त में परने वाली हैं। तथा व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप वाली हैं ।१६। हे गरणागता पर प्यार करन वाली। ह देव देवेश्वरी । मेरी रमा करो। हे गेलोर द्वारा वन्दिते ह महेगानि । मेरी अन्य काई भी गति नही है। पत्यागि | आप मगे माता है और मेरे पिता गर्वेश्वर शिर है। है पर प्रिय । त्रिमुरारिने मुझे गृष्टि करने में लिय ही गृष्ट किया है। मैंने अनय प्रसार पी प्रजाना या गृजन पिया है. वितु वृद्धि या प्राप्त नही होती है । इसर पश्चात् गभी प्रजा मंथन स गमु- साई थी।१८।१६॥२०॥ मग आग मृष्टि राम वर्ग मग्न की रमा परला है। समस्त मतियागी गृष्टि तो आप गे ही प्रत्त हाती ११२१॥ नव गृष्ट त्वया पूर्व गतीना मल गिये । मा देहिना देय गय सिप्रदायिनी ॥ २२

गोरी पृयक् शरीरत्वादि कथन ]
1१०३
त्वमेव नात्र सदेहस्तस्मात्त्व वरदा भव ।
मम पृष्ठिविव द्धयर्थममेनकेन आश्चते ॥ २३
मम पुतस्य दक्षस्य पुनी भवं शुचिस्मिते ।
माथिता ही तदा देवी ब्रह्मणा मुनिपु गवा ॥ २४
एका शक्ति ध्रुवोमव्यात्मसर्जात्मसमप्रभाम् ।
आह ता प्रहसन्प्रेक्ष्य देवी विश्वेश्वरी हर ॥ २५
ब्रह्मणो वचनावि कुरु तस्य ययेप्सितम् ।
आदाय शिरसा शभोराना सा नरमेश्वरी ।। २६
अमवादुहिता स्वेच्छया ब्रह्मरूपिणी ।
पुनराधा पग शक्ति शमाह ममाविशत् ।। २७
अर्धनारीश्वरो देवो विमातीति हि न थुति ।
तत प्रभृति विप्रेन्द्रा मैयुनप्रभवा प्रजा ॥२८
एव व सथिता विद्या देव्या मभूतिम्त्तमः ।
पठेद्य शृणुयादा पि सततिस्तम्य वर्धते ॥ २६
हगि ' अपने पूर्व में शक्तिया वे युन या मृजन दिया था।
हदि गद ददरिया को अत्यहीनि वे प्रदान करने वाली है।
साभारही हैं मम वृद भी सन्देह नहीं है। हमारण में वरदान
दन बाली हो । भासा मा म मरी गृष्टि शिधन करणे
निए हे चिम्मने ' मर पुत्र प्रजापति दक्ष की आप पो होस।।
मुपवा ' उग गमम म प्रहमासी नारा देवी की प्रार्थना की
गयी थी ।२०१२४. उस ८0 न अपने ही ममान प्रभावशाली पनि
राम पिया र मध्य स मृष्ट पिया पा और उग देवो को दगार
माnिा हर यारे । बिहह्माजी र वाग उना
आभी पति उमपूमर दो। भगवान् गम्भी आनाग
रिगे और मारपर परमायरा बम पनी माग
होनीपुरी हाई की। यह भासा गरि गार गाम
बम गमावि "हो २१५२॥ या मारीपर
-

.१० ]
[ सूर्य पुराण
गोभित होत है-यह हमारी श्रुति है तभी से आरम्भ करके हे
वप्रेन्द्र । मैथुन के द्वारा उत्पन्न होने वाली प्रजा हुई थी ।२८ हे
विप्रो' इस प्रकार से आप सबके सामने मैंने देवी की उत्तमा सभूति का
वर्णन कर दिया है । जो इसको पढे या सुनेगा उसकी सन्नाति की वृद्धि
होगी ।२६
॥ सुरासुर सृष्टयादि कथन ॥
स्वयभुवा समादिष्ट पूर्व दक्ष प्रजापति ।
प्रजा सृजेति सर्गादो ससर्ज च सुरासुरान् ॥ १
प्रजापतेर्वीरणस्य कन्याऽसिक्रीति विश्रुता ।
पटि दक्षोऽसृजत्कन्या असिकन्या व प्रजापति ॥२
ददी च दश धर्माय कश्यपाय योदश ।
सप्तविंशतिं सोमाय चतस्त्रोऽरिटनेमिने ॥३
द्वे चैव वहुपुत्राय द्वे दृशाश्वाय धीमते।
द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वद्ददौ दक्ष प्रजाति ॥ ४
साध्या विश्वा च सकल्पा मुहूर्ता च ह्यरुन्धती।
मरुत्वती वसुर्भानुर्लम्बा जामीति ता दश ॥ ५
धर्मस्य पत्नयत्त्वेतास्तासा सततिरुच्यते ।
साध्या वभूवु साध्याया विश्वाया विश्वदेवता ॥६
सरल्पायास्तु सकल्पो मुहूर्तास्तु मुहूर्तजा ।
अरुन्धत्यास्वरुन्धत्या नरस्वत्या मरुत्वत ।
थी मूतजी ने कहा-स्वयम्भू भगवान् म सबसे पूर्व में दक्ष प्रजा•
पति को समादिष्ट किया था । मर्ग के आदि म यही आदेश दिया था
प्रिजा पा गृजन परो और सुरा तथा अगुरो या गृजा पिया था ।।
जापति दीरण की एक कन्या असिन्नी थी और इगी नाम स वह

मुरासुर मृदयादि कयन ] विधुत थी। प्रजापति दक्ष ने असिन्की में पप्टि कन्याओ का मृजन किया था। दश तो धर्म के लिये दे दी थी और तेरह कश्यप के लिये दी थी। मत्ताईस मोम को दी थी और चार आरिप्ट नेमि को प्रदान की थी ।२।३। दो बहु पुन को और दो धीमान कृशाश्य को प्रदान की थी। उसी भांति दक्ष प्रजापति ने दो अङ्गिरा मुनि को प्रदान की थी।४। वे दश ये थी-साध्या-विश्वा-सकल्पा-मुहर्ता-अरन्यती-मरत्वती- वसु-भानु-लम्वा-जामी ।श धर्म की ये दा पलिया थी अब उनकी सन्तनि बतलायी जाती हैं | साध्या में साध्यगण समुत्तन्न हुए थे और विश्वा में विश्व देवता उत्पन्न हुए थे ।६। मद्वल्पा से सङ्कल्प उत्पन्न हुअ और मुहत्तं मुहर्ता से सम.म्पन्न हुए थे । अन्यतो मे अरुन्धत्य और मरत्वती मे मरू त्वत् हुये थे ॥७॥ वमोस्तु घसव प्रोक्ता भानोस्तै भानव स्मृता । लम्बाया घोपनामानो नागवीथीस्तु जामिजा ॥८ ज्योतिप्मन्तस्त्रयो देवा व्यापका सर्वतोदिशम् । वसवम्ने समास्याता मर्वभूतहितैषिण ॥ आपो नलम्च मोमश्च ध्र वश्ववानिलोऽनल । प्रत्यूपश्च प्रभासच यमवोरटी प्रीतिता ॥१० भ्र वस्य पुत्र पाल म्यात्मवं लोकभयङ्कर । विश्वरर्मा प्रभामम्य धर्मम्यंपा तु माति ॥ ११ अदितिश्च दितिश्चैव दनुरित्यपरा मता। अरिष्टा सुरसा प्रोक्ता स्वधा मुरभिरेव च ॥ १२ बिनता च तथा नाना कद्र क्रोधवगा विरा। मुनेच पत्नयम्त्वेता श्यपम्य दिजोतमा ॥ १३ अर्धाता भगारवटा मित्रोग्य वरणोज्यमा। शिवरदानमविता पूपा गुमान्यिपणुरेव च। १८ तुपिता नाम ते पूर्ण पाशुपम्यान्तरं मनो। आदिन्या अदिने पत्रा प्रोना गैवम्वनन्तरं ।।१५ ११२ [ सूर्य पुराण वसु से वसुगण हुए तथा भान से भानव उत्पन्न हुए बतलाये गये है । लम्बामे घोप नाम वाले तथा जामि से नागवीयो हुए । तीनो देव ज्योतिष्मान् है और सब दिशाओ मे व्यापक है । जो वसुगण समा- ख्यात हुए हैं वे समस्त प्राणियो के हितैपी है। आप-बल-सोम-ध्र व- अनिल-अनल- प्रत्यूप-प्रभास-ये ही आठ वसुगण कहे गये है ।६।१०। नव का पुन काल है जो सभी लोगो को भय करने वाला है। प्रभास का पुत्र विश्वकर्मा है--यही कर्म की स-नतियाँ है ।११।। आदिति दिति और अपरा दनु मानी गयी हैं। अरिष्टा सुरसा-स्वधा-मुरभि- विनता-ताधा-क्द्र-क्रोधवशा-विरा कश्यप म नि की ये हे द्विजोत्तमो । पत्निया थी १२ 1१३। असु-धाता-भग-स्वष्ठा-मित्र-वरुण-अर्थमा विव- स्वान्-सविता-पूपा-अ शुमान् और विष्णु हैं। तुपिता नाम वाने वे है जो पूर्व म चरक्ष प मनु में अन्नर मे थे ।१४। आदित्य अदिति ने पुत्र है जो वैवस्वमम्यन्तर म कहे गये हैं १५) पुनद्वय दिति सूते कश्यपान्मुनिपु गवात् । हिरण्यकशिपु त्वेक हिरण्याक्षमनन्तरम् ।। १६ हिरण्यकशिपुर्योऽसौ ब्रह्मणो वरदर्पित । शक्राद्या देवता सर्वास्तेन दैत्येन वाघिता ।। १७ ब्रह्माण शरण गत्वा प्रोचु प्राञ्जलय सुरा । देवदेव जगन्नाथ चतुर्मुख सुगेत्तम । १८ हिरण्यनेन देत्येन शस्त्राम्न सूदिता वयम् । दाराश्चापहृतास्तेन वजादीन्यायुधानि च ॥ १६ यायम्बास्मान् यनरताधारण नान्यदस्ति न । एव मुरंनिगदित श्रुत्या व पितामह ॥ २० देवं मह ययौ तूर्ण ययाऽस्ते विष्णुरव्यय । सस्तूय विविध स्तोरवीत्वमलामन ॥२१ दिति । दो पुत्र प्रस्त पिय प जो दिमु पुगंध पश्यप से सम- थे। एक तो हिरण्यपालि था । और दूसरा हिरमार था।

सुरासुर स ट्यादि कथन ]
[ ११३
1१६) जो यह हिरण्याशिपु था वह ब्रह्माजी के वरदान से हपित हो
गया था। शक्र आदि देवता उस दैत्य ने वाधित कर दिये थे ।१७१
सव सुरगण हाथ जोडकर ब्रह्माजी की शरणागति मे पहुचकर बोले-~-
देवी ने कहा-हे देवो के देव | आप तो जगत् के नाथ हैं । है
चतुर्मुस ! आप सब सुरो मे श्रेष्ठ हैं ।१८। हिरण्यकशिपु दैत्यने शरुज
असजो द्वारा हम सबको सूचित कर दिया है। उसने हमारी स्त्रियों
का हरण कर लिया है और वच आदि सब आयुध भी छीन लिये हैं।
(१९। इस भय से परम रस्त हैं हमारी आप रक्षा कीजिए। हमारा
आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी रक्षा करने वाला नही है। इस प्रकार
से सुरो के द्वारा कथित को श्रवण कर पितामह उन समस्त देवगणो के
साय शीघ्र ही वहां पर गये जहां पर अव्यय भगवान् विष्ण विराजमान
थे। अनेक स्त्रिया के द्वारा सस्तयन करके वसलासन ने कहा-२१२१॥
हिरण्यकशिपुर्देव मद्वरेणातिगवित ।
बाधते सकलान्देवान्मुनीन्निधूतकल्मपान ।। २२
यस्त हनिप्यति क्षिप्र न त पश्यामि माधव ।
त्वमेव हन्ता तस्येति मत्वा वयमुपागता ॥२३
हन्तुमर्हसि त शीघ्र देवाना कार्यसिद्धये ।
श्रुत्वा नारायणो वाक्यमोरित त्रिदिवौकसाम् ॥ २४
नरस्यातिनु कृत्वा सिंहस्यातनु तथा।
नृसिंहम्पी भगवान्हिरण्यकशिपो पुरे ॥ २५
आविर्गभूय भगवान्देवो नारायण प्रभु 1
मुश्चन्नाद महापोरनमुराणा भयङ्करम् ।। २६
हिरण्यरशिपुदृष्ट्वा सिंहमतिभीपणम् ।
यपाय प्रेपयामास प्रहादादीन्महामुरान् ।। २७
प्रहादश्चानुहादरच महादो हाद एव च ।
हिरण शिपो पुत्राश्चत्वार प्रथितोजग ॥ २८
श्री प्रहमानी ने कहा है देव हिरण्याशिपु मेरे द्वारा पान

११४ ] [ सूर्य पुराण प्राप्त कर अत्यन्त गर्वित हो गया है वह समस्त देवो को बाधा देता है और जो निर्धू तकल्मप मुनिगण हैं उनको भी सताता है ।२२, हे माधव जो कोई उसको शीघ्र ही मार देगा ऐसा अन्य कोई भी मैं नही देख रहा हूँ । वेवल आप ही उसके दमन करने वाले है-यही समझकर हम सब आपकी समाधि मे उपस्थित हुए हैं ।२३। देवो के कार्य की सिद्धि के लिये आप उसका शीघ्र ही दमन करने में समर्थ होते हैं । देो की कथित उस बात का श्रवण करके भगवान नारायण ने आधा शरीर नर का तथा आधा सिंह का शरीर धारण किया और नरसिंह रूपी भगवार हिरकाशिपु के नगर मे आविभूति हो गये थे। वे साक्षात् भगवान् देव नारायण प्रभु, ही थे। उन्होंने महान् घोर नाद किया था जो सभी असुगे को अत्यन्त भयकर प्रतीत हो रहा था । हिरण्ययाशिपु ने अत्यन्त भीपण भगवान नृसिंह को देना था। हिरण्य- काशिपु के चार पुत्र थे जिनक नाम प्रह्लाद-अनुह्लाद-सह्लाद और हाद थे। ये सभी प्रथित ओज वाले थे ।२४। नरमिहेन ते सार्थ युयुधुर्दानवास्तदा । प्रह्लाद प्राहिणोहाहामन्त्र त नरवे सरिम् ।।२९ वैष्णवाचमनुहाद कौमार च तथाऽनर । प्राहिणोद्माद आग्नेय तथा चान्ये महासुरा ॥३० चत्वार्यत्राणि समाप भगवन्त नृकेसरिम् । वभूवस्तानि भग्नानि यथा वच्चाहता द्रमा ॥३१ गृहोत्वा चतुः पुत्रान्हस्ताभ्यो नरकेसार । चिक्षेप गगनाद्ध मौ गृहीत्वैव पुन पुन. ॥३२ एव तान्यथितान्दृष्ट्वा हिरण्यकशिपु स्यम् । जाज्वल्पमान कोपेन ययो यत्र नृपरि ॥३३ विनिवृत्तोज्य सङ्ग्रामात्प्रह्लादो दैत्यराट् तत । भात्वा तु भगवद्भाव नृमिहम्यामितीजम । ध्यात्वा नारायण देव वारयामास दानवान् ।।३४

सुरामुर सृष्टयादि कथन ]
[ ११५
एप नारायणो योगी परमात्मा सनातनः ।
ध्यातव्यो न तु योद्धव्यो भवद्भिरिति निश्चितमू ॥३५
पुनोदितमनादृत्य हिरण्यकशिपुः पुनः ।
युयुधे हरिणा साधं यावद्वर्षशतत्रयम् ॥३६
अथ विश्वात्मको विष्णुः क्रोधसरक्तलोचनः ।
नखंविदारयामास हिरण्यकशिपु तदा ॥३॥
उस समय में भगवान् नरसिंह के साथ उन दानवो ने युद्ध किया
था। प्रह्लाद गे उन नरकेशरी प्रभु पर ब्रह्म अस्त्र का प्रहार किया
था ॥२६॥ अनुहार ने वैष्णवास्त्र का प्रक्षेप किया था तथा दूसरे ने
कोमार अस्त्र चलाया था। हाद ने आग्नेय अस्त्र पलाया था और अन्य
असुरो ने जो बडे महान् थे दूसरे २ अम्लो से प्रहार किया था |॥३०॥
ये चारो अस्त्र भगवान नरसिंह जी के पास पहुंच कर सब के सब भग्न
हो गये थे जैसे वन से दू महत हो जाया करते हैं ॥३१॥ नरकेशरी ने
उन चारो पुत्रो को हायो से पकड लिया था और उनको ले लेकर
बारम्बार आगरा से भूमि में गिरा दिया था। इस प्रकार से उन अपने
पुत्री को व्यषित देखकर हिरण्यकशिपु स्वय ठोध से जाज्वल्यमान होकर
वहां पर पहुंच गया था जहाँ पर भगवान नृसिंह देव विराजमान थे।
॥३२-३३॥ फिर दैत्यराट् प्रसाद सग्राम से विनिवृज हो गया पा क्यो
कि उसने अपरिमित ओज वाले भगवान नृसिंह जी का भगवद्भाव जीत
लिया था। नारायणदेव का ध्यान करके उसने दानवो वो निवारित
किया था |३४ उसने सब दानवों से कहा था कि यह परमात्मा सनातन
योगी नारायण हैं । इनका ध्यान परना चाहिये और इनमे आपको युद्ध
नहीं करना चाहिए यह निश्चित बात ३५। इम पुत्र के पपन का
निरादर करके हिण्यागिपु ने पुन हरिभगवान के माय तीन सौ वर्ष
सक पोर युद्ध किया था ।३। इसके अगलर पिस्वारमक भगवान् विष्णु
ने शोध से लान नेत्र बनाार उमी ममप में अपने परमानी से
हिए वशयलको विदीर्ण कर दिया था ॥३॥

-
[ सर्यपुराण
॥ हिरण्याक्ष बधादिक कथन ॥
हते हिरण्यकशिपो प्रह्लादो दैत्यसत्तमः ।
हिरण्याक्ष महावाह राज्ये समभियोजयत् (१) |
सोऽपि देवानरणे जित्वा स्वर्गात व पलायिता ।
हिरण्याक्षे महादेव तासाभराध्य चान्तकम् ॥२
लेभे पुत्र महाबाहु सर्वामरनिषूदनम् ।
हिरण्याक्षभयाद्देवा शाङ्गिण शरण गताः ॥३
दृष्ट्वाऽथ भगवान्देवान्हिरण्याक्षवधाय वै।
वाराह रूपमास्थाय हिरण्याक्षो निपूदितः ।।४
हते तस्मिहिरण्याक्षे प्रह्लादो वैष्णवाग्रणी ।
पक्या तु तामसी बृत्ति स्वकीय राज्य मास्थित ॥५
तत कदाचिदैवाना माझ्या मोहितोऽभवत् ।
कवन ब्राह्मण दृष्ट्वा कृशाङ्ग गृहमागतम् ॥६
अवज्ञामकरोत्य शप्तस्तेनाग्रजन्मना ।
बल यस्य समाश्रित्य दत्य मामवमन्यसे ।।७
श्री मूतजी ने कहा-हिरण्यकशिपु वे निहत हो जाने पर दैत्यो मे
श्रेष्ठ प्रहलाद राज्य पर महाबाहु हिरण्याक्ष को समभियोजित किया
था। उसने भी देवो वो रण मे जीतकर उनको स्पर्ग से भगा दिया
था। हिरण्याक्ष ने अन्ता महादेवजी को तपस्या के द्वारा आराधना कर
के सब दवो को मार देने वाले महाबाहु पुत्र को प्राप्त दिया था।
हिरण्याक्ष के भय से ममम्त देवगण भगवान् शानी के कारण में प्राप्त
हुए थे ॥२-३॥ भगवान ने हिरण्याक्ष ये वध के लिये मगागत दवो को
देगार वाराह का स्वरूप धारण करके उग हिरण्याक्ष को भगवान्
ने
मार दिया था | उम हिरण्याक्ष के मारे जाने पर प्णवों में अपगी
प्रहलाद ने ताममी वृत्ति का त्याग कर दिया था और अपने राज्यासन
पर समरियल हो गया रामरे पश्चात् रिमी समय में देवों की
मापा से यह मोहित हो गया था। पिी अङ्ग वाले घर मे आये

हिरण्याक्ष बरादिक कयन ]
हुए ब्राह्मण को देखकर दैत्य ने उसकी अवज्ञा कर दी थी। फिर उस
प्राह्मण न उसका भाप दे दिया था-हे दैत्य | जिसके बल का समाथय
परके तू मेरा अपमान कर रहा है ।।६-७॥
भत्तिविनश्यतु क्षिप्र तव देवे जनार्दने ।
इति वा ययौ वित्र स्वाश्रम मुनिपुङ्गवा ॥
अथ दत्यपतियुद्धमकरोद्विष्णुना सह ।
पितुर्वधमनुस्मृत्य देवाश्चान्ये विनिजिता ॥६
अनुग्रहाद्भगवत पूर्वस्मात्यराट् पुन ।
त्यस्त्वा मायामय सर्व शाङ्गिण शरण ययौ ॥१.
अभिपिच्पान्धक राज्ये योगक्तोऽभवत्स्वयम् ।
अय देवो महादेव शरण्य सर्वदेहिनाम् ॥११
केनापि हेतुना भिक्षामकरोह्राह्मण सह ।
सस्थाप्य मन्दरे देवी गिरिजा गिरिजापति ॥१२
सनारायणकान्देवानकरोत्यागाशिव।
स्त्रीरूपधारिणो देवा सेवन्ते पार्वती तदा ॥१३
सस्याप्य नन्दिप्रमुखानसख्यातान्गणेश्वरान् ।
भैरव च समादिश्य नन्दिन द्वारदेशत ॥१४
उन देव जनार्दन मे तेरो भकि बहुत ही गोघ्र नष्ट हो जायगी-
इस प्रकार से माप देकर वह विप्र है मुनि पो अपने आश्रम में
चला गया था 110 इमो अननर दैत्यपति ने भगवान् विष्णु से ही
साप युद्ध पिया था। उसने अपने पिता के दप का अनुसरण दिया था
और सब देवा को भी विनिजित पर दिया या भगवान् के पहिने
अनुग्रह मे पुन देरपराट् ने मद मायामय वा स्याग पर दिया था और
पह भावान शाों को शरण म घना गया पा101 राम्यामन पर
अपापा अमिर से स्वप योग मे युक्त हो गण पा। इमरे
अननर देव महादेव गभी देहपारियों के सरप्य है ॥१॥ रिमी हेतु
उही पाह्मणों के सप मिनारन पिया पा घोर गिरिजापति ने देवी

[ सूर्य पुराण गिरिजा को एक मन्दिर मे मस्थापित कर दिया था ॥१२॥ शिव ने नारा- यण के सहित सब देवो को पार्श्ववर्ती कर दिया था। सब देवाण सती का रूप धारण करने वाले होकर सदा पार्वती की सेवा करते थे ।१३॥ वहाँ पर नन्दी प्रमुख असरूप गणो को और गणेश्वरो को सस्थापित करा दिया था और मैग्व को भी आदेश दे दिया था तथा द्वारदेश पर नन्दी को नियुक्त कर दिया था ॥१४॥ एतस्मिन्नन्तरे प्रातो मन्दर चान्धकासुरः। आहतुकामः शर्वाणी त दृष्ट्वा कालभैरवः ॥१५॥ ताडयामास शूलेन पपात भुवि मूच्छित । पुनरूत्थाय वेगेन गदामादाय दैत्यराट् ॥१६॥ भैरव ताडयामास तथा चान्यानाणेश्वरान् । दृष्ट्वा तदद्भत युद्ध विष्णु नवमर्दन. ॥१७॥ अमृजच्छक्तयो दिव्यास्ताभिदैत्य पराजित । ततो बघाय भगवान्रुद्रो मन्दरपर्वतम् ॥१८॥ प्राप्तो यत्र स्थिता देवी देव सह गणेश्वरैः। दृष्ट्वा विश्वेश्वर देवी शीघ्र परमया मुद्रा ।१९। ननाम शिरसा भक्त्या भर्तुश्वरणपङ्कजम् । प्रणम्य दण्डवद्विष्णु यद्वृत्त तन्न्यवेदयत् ॥२०॥ श्रत्वा तदिस्मितो भूत्वा देव्या सह वरासने । उपविष्टस्तदा सर्वे देवा. प्राजलय तास्थित ॥२१॥ इसी बीच में वह अन्धकार सुर मन्दरगिरि पर प्राप्त हो गया था। यह पर्याणी का माहरण करना चाहता था। उमको काल भैरव ने देख लिया था। ॥१५॥ भैरव ने शूल से हत दिया था और वह मूर्थिन होकर भूमि पर गिर गया था। फिर वह दैत्यराट् बठे वेग से उठकर गटा लेकर बारमा करने के लिये माया पा ॥१६॥ उसने गदा मे भैरप पर तथा अन्य गणेश्यगे पर प्रहार पिया या! उस अमुर युद्ध को देयक र दामकोई मदन करने वाले विधन ने दिप्प लियो पा १२० ] [ सूर्य पुराण करिए जिससे यह दैत्य मर जावे इस प्रकार के श्रीहरि को वचन का श्रवण करके भगवान् क्षङ्कर ने काल भैरव को उस वलवान दैत्य के वध के लिये भेजा था। इसके पश्चात् वह काल भैरव प्रभु शम्भु शिव की आज्ञा का परिपालन करके सहसा शूल को ग्रहण करके दैत्य के युद्ध मे पहुंच गये थे । शून के अग्रभाग से उसका निर्मदन करके अपनी आत्म- लीला से वे नृत्य करने लगे थे । झूल के अग्रभाग मे उस दैत्य के स्थापित करने पर ब्रह्माद्य मुनिगण ने उम समय मे अनेक स्तोत्रो के द्वारा स्तवन किया था और उस समय में सब लोक परम प्रसन्न हो गये थे। ।२२। मे ॥२७॥ नमामि मू| भगवन्तमेक समाहिता य विदुरीशतत्त्वम् । पुरातनं पुण्यमनन्तरूप काल कविं योगवियोगहेतुम् ।२८) दैप्ट्राकराल दिवि नृत्यमान हुताशवक्त्रं ज्वलनार्करूपम् । सहस्रपादाक्षिशिरोभियुक्त भवन्तमेक प्रणमामि रुद्रम् २६॥ जयादिदेवामरपूजिताडघ्र विभागहीनामलतत्त्वरूपम् । त्वमग्निरेको बहुधा विभज्यसे वाद्यादिभेदरखिलात्मरूप १३० त्वामेकमाहु पुरुप पुराणमादित्यवर्ण तमसः परस्ताद । त्व पश्यमीद परिपास्यजसं त्वमन्तको योगिगणाभिजुः ३१ एकान्तरात्मा बहुधा निविष्टो देहेषु देहादिविशेषहीनः । स्वमात्मतत्त्व परमार्थशब्द भवन्तमाहु. शिवमेव केचित् ।३२ त्वमक्षर ब्रह्म पर पवित्रमानन्दरूप प्रणवाभिधानम् । स्वमीश्वरो वेदविदेपु सिद्धः स्वायभुवोऽशेपविशेपहीनः ।३३। त्वमिन्द्ररूपो वरुणोऽग्निरूपो हसः प्राणो मृत्युरप्राधियज्ञः । प्रजापतिभंगवानेकरूपो नीलग्रीवस्तूयसे वेदविद्भिः ॥३४॥ नारायणस्त्व जगतामनादिः पितामहस्त्व प्रपिताममन । वेदान्तगुह्योपनिपत्सु गीतः समाशिवस्व परमेश्वरोऽसि ॥३५॥ अन्धक ने कहा-मैं एक भगवान वो नमस्कार करता हूँ जिनसे परम समादिन होकर लोग ईश तस्य को जान पाते हैं। आप परम पुरा- हिरण्याक्ष बघादिक कथन ] [ १२१ तन-पुण्य स्वरूप-अनन्त रूप वाले-काल रवि और योग तथा वियोग के हेतु है ॥२८ । देष्ट्रा से कराल-दिवलोक मे नृत्य करते हुए--अग्नि को मुख में धारण करने वाले-ज्वलन (अग्नि के स्वरूप दाले-सहस्रशिर. माक्षि पादो से युवत आप एक न्द्र भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ :२९ हे जय आदि देव और असरो के द्वारा पूजित चरण वाले ' आप विभाग म होन अमल तत्व रूप वाले हैं । आपको एक ही पुराण पुरप-आदित्य पे समान वणं वाले और तम में परे रहते है। आप इसको निरन्तर देगा करते हैं और परिपालन किया परते हैं। आप ही अन्तर हैं और योगी गणो के द्वारा सेवित है ॥३०॥३१।। आप एक ही अन्तरात्मा है और बहुत से स्पो मे विनिविष्ट हैं। देहो मे रहते हुये भी आप देहादि विशेषता मे रहिन हैं आप ही बारम तत्व है-आप पर- मार्थ पर हैं। कुछ लोग अपनो ही शिव ही कहा करते हैं ॥३२॥ आप अक्षर परम ब्रह्म है -आप परम पवित्र और आनन्द स्वरूप है तथा प्रणय के नाम वाले हैं। बाप ईश्वर हैं जो वेदो के वेत्ता है उनमें आप मि है। आप स्वायम्भुय और समस्त विशेषताओं से होन हैं ॥३३॥ आप इन्द्र रूप है-वरण-अग्नि भी आपके ही रूप है। प्रापग-प्राण- मृत्यु और अन्माधिया है। आप प्रजापति गगवान् बनेर रूपो माले, थापनानी पीया वाने है तथा वेदो के मातामा द्वारा आपा मम्नवन रिया जाया करता है ॥३४॥ जपतो से अनादि आप ही नारायण है। रही तिा पह और प्रपितामह है। आपको येदान्न और गोपनीय उपनिषदों में गाया है। आप सदा शिव और परमेश्वर है ॥५॥ नमः परस्तात्तम परस्मै परात्मो परापरासराय। त्रिमूर्यतीताय निरञ्जन य सहनापन्यामनसेम्पिाय ॥३॥ त्रिमूरे नगाराममूनये जगनियामाय जगन्मपाय । नमो मताटासिलोपनाय नमो जनाना हदि गस्थिताय 19 फपीटहाराय नमः गुम्य नीन्द्रमिनासिगदान। ऐपंगारिपसायनम रापमयोदया। .

१२२ ] [ सर्यपुराण सहसचन्द्रार्क पमूहमूर्तये नमोऽग्निचन्द्रार्कत्रिलोचनाय । नमोऽस्तुते सोमायनमध्यमाय नमोऽस्तु देवाय हिरण्यबाहवे.३६ नम्गेऽतिगुह्याय गुहानराय वेदान्तविज्ञान विनिश्चिताय । त्रिकालहीनामलधामधाम्ने नमो महेशाय नमः शिवाय ॥५० स्तनानेन भगवान्प्रीतो भूत्वाऽथ भैरवः । अवरोह्य व शूलाग्रादुवाच परमेश्वरः ॥४१॥ त्वयाऽह स्तोश्वर्येण तोपितो दैत्यपुङ्गव् । प्रीतोऽस्मि तव दास्यामि गाणपत्य हि दुर्लभम् ॥४॥ तमसे भी पर-परम स्वरूप वाले-परमात्मा पञ्चपरातराय-- त्रिमूर्ति में भी अतीत--निरन्नन और सहस्र शक्तियों से आमन पर सम्थित आपके लिये मेरा नमस्कार है ॥३६॥ त्रिमूत्ति-अनन्त परात्म- मूर्ति-जगत् के निवास-जगन्मय ललाट मे अपित नेत्र वाले के लिये नमस्कार है और जनो के हृदय में मस्थित के लिये नमस्कार है ॥३७ । सांगजी के हार पहिनने वाले आपके लिये प्रणाम है। आपके चरण यमलों को मुनीन्द्र और सिद्ध सरित रिया करते हैं ऐश्वर्य और धर्म के आसन पर समस्थित आपके लिये नमस्कार है और परान्त एवं मन के उत्पन्न करने वाले आपो नमनार है ॥३८॥ एक सहस चन्द्र और मूर्य के समूह के समान देदीप्यमान मूनि वाले और अग्नि तथा चन्द्र एव मूपं ये नेत्रो बारे आपकी सेवामे नमवार है । सोमायन मध्यम के लिये नमस्कार है । देव हिरण्य वाहु के लिये प्रणाम है ॥३६॥ अत्यन्त गुह्य-गृहाल राय और वेदान के विज्ञान के द्वारा निश्चित होने पाने के लिए नमसार है । तीनो यानो में हीन एव ममल थाम के तेम पारेरे लिये प्रणाम है । महेश के लिये एव गिय के लिये नमस्कार है ॥४०॥ इस प्रकार की मम्नुति से भगवान भैरव प्रसन्न होपर उन्होंने घून अप्रमाग मे नीचे उस दरपणे उतार पर परमेश्वर ने महा-है दायों में पारदम स्तोत्रा में परम धेचये द्वारा तुमने मुमो

१२४ ]
[ सूर्य पुराण
T
अनन्तर भैरव ने उनका दर्शन करके वड़े ही आनन्द से उसका परिप्वजन
किया था ।४८। फिर उन भैरव और शाों की एक ही मूत्ति हो गई
थी जो कालाग्नि भैरव है वे ही स्वय नृहरि है ।४६|
भगवान्तृहरिर्योऽसौ स एव किल भैरव. ।
नृहरे पूजनान्सून प्रीतो भवति भैरवः ॥ ५०
पूजनाद्भरवस्यय नृहरिः पूजितो भवेत् ।
ये पश्यन्ति तयोर्भेदं मायया मोहिता जनाः ।। ५१
निरये ते विपच्यन्ते मावदाभूतसप्लवम् ।। ५२
तस्मात्पूज्या सदा मूर्ती रुद्रनारायणात्मिका।
प्रीता भूत्वा भगवती भवत्यज्ञानहारिणी ॥ ५३
एव सक्षेपत. प्रोक्तो मयाऽन्धकवधो द्विजा.।
प्रादुर्भावो भैरवस्य तस्य चैव पराक्रम. ॥ ५४
इम यः पटतेऽध्यायं महादेवस्य सनिधी।
सर्वपापविनिमुक्तः शिवस्यानुचरो भवेत् ।। ५५
जो भगवान नृहरि हैं वह ही काल भैरव हैं। नृहरि भगवान के
अभ्यर्धन करने से भगवान् म रव भी निश्चय ही प्रमन्न हो जाया
करते हैं क्योंकि दोनो में कोई भेद ही नहीं है ।५०। भैरव के पूजन मे
भी भगवान नृहरि पूजित हो जाया करते हैं। जो लोग उन दोनी में
कोई भेद देपा करते हैं वे माया से मोहिन ही मनुष्य हुआ करते हैं ।
१५१॥ वे मनुष्य नरक मे यातनाओ का विपाग भोगा करते हैं जब तक
भूत मपृव होता है नरक मे ही पडे रहा करते हैं ।५२। इस कारण से
सर्वदा रुद्र नारायणात्मिका मूति का पूजन करना चाहिए । भगवती
परम प्रसन्न होर अज्ञान के हरण करने वाली हो जाती है ।५३॥ हे
द्विजो । इस प्रकार से मैंने यह अन्धक या वध परम सोप मे ही बता
दिया है । भैरव का प्रादुर्भाव होना उसी का पराक्रम है अर्थात् उम
देश्य के पराक्रम के पारण हो भगवान भैरव या प्रादुर्भाव हुमा पा
अन्यथा नहीं होता। इस अध्याय पो जो भगवान् महादेवजी पी

प्रह्लाद राज्यारोहण तथा दृक्ष्वाकु व श कथन ] [ १२५ सन्निधि में बैठकर जा पढा करता है वह सभी पापा निनिमुक्त होकर अन्त मे भगवान् शिव का ही अनुचर हो जाया करता है ॥५५॥ ॥ प्रह्लाद राज्यारोहण तथा दृक्ष्वाकु वंश कथन । हिरण्यकशिपो पुन प्रह्लादो दैत्यसतम । अन्धके निहते दैत्ये तत्र राज्ये स्थित स्वयम् ॥ १ कत्वा म सुचिर काल राज्य परमधार्मिक । राज्य विरक्तो मतिमाञ्क्षमादिगुणसयुत ॥ २ राज्ये मतिमता श्रष्ठो भिपिच्य विरोचनम् । तपोवन गत सोऽय वासुदेवपरायण ॥ ३ विरोचनश्च निहतो देवदेवेन चक्रिणा। बलिस्तस्याभवत्पुत्रो दैत्यो धर्मपरायण ॥ ४ वद्ध्वा नीत स पाताल देवदेवेन चक्रिणा। वाणासुरस्तस्य सुतो भक्तो विश्वेश्वरे शिवे १५ दत्त भगवता तम्म गाणपत्भमनुत्तमम् । तारश्च शम्बरश्च व कपिल शड्वरस्तथा ।। ६ स्वर्भानुर्वृ पपर्वा च वाणस्यते सुता द्विजा । कश्यपात्सुरसा जने खेचरामुनिपु गवा ॥७ श्री सूतजी ने कहा-हिरण्यकशिपु का पुत्र दैत्य यंप्ठ प्रहलाद अन्धक दैत्य के निाहत हो जाने पर वहाँ राज्यासन पर स्वय ही स्थित हो गया 11 उम परम धार्मिक ने बहुत समय तक राज्य का शासन घरके वह मतिमान राजशामन करने से विरक्त हो गया था और शम आदि गुणा से युक्त बन गया था ।२. पिर उस राज्यासन पर मतिमानो मे परम श्रेष्ठ प्रहलाद ने विरोचन वो अमिमित्त कर दिया था और यह स्वय भगवान् वासुदेव की भक्ति म परायण होरर तपोवन में बना

१२६ ]
[ सूर्य पुराण
गया था।३। देवो के देव भगवान ने विरोचन को निहित कर
दिया था। उसका पुत्र वलि धर्मपरायण दैत्य हुआ था । देवदेय भगवान्
चक्रधारी न उसको भी बांधकर पाताल मे पहुचा दिया था। उसका
पुत्र वाणासुर हुआ था जो भगवान् विश्वेश्वर शिन का परम भक्त था।
भगवान ने परमोत्तम गणपत्य यह प्रदान कर दिया था। हे द्विजो।
वाणासुर के तार शम्बर-कपिल शङ्कर स्वर्भानु वृषपर्वो ये इतने पुत्र हुए
थे । हे मुनि पुङ्गवो । सुरसा न कश्यप मुनि से खेचरो का जन्म दिया
था ।४।५।६७
अनन्ताद्या याद्रवेया बलिनो बलवत्तरा ।
गन्धर्वाञ्जनयामास तथाऽरिष्टा तु कश्यपात् ।। ८
विनता जनयामास विरयाती गरडारुणौ ।
पश्वादीन्स्थावरान्ताश्च तथाऽन्यान्सुपुवुद्धिजा ॥६
स्थावराञ्चङ्गमाश्च व समुत्पाद्याथ कश्यप ।
पुन सतानवृद्धयर्थ तताप परम तप ॥१०
तपःप्रभावात्सभूतौ वत्सरश्चासित सुतो।
नैध वो वत्सराज्जातो रैम्यश्च व महामति ॥ ११
सुमेधा सुपुवे पुनान्नैध्र वान्नुण्डपायिन ।
असितादेकपर्णांया समभूद्देवलो मुनि ॥ १२
आराध्य देवल शभु परा सिद्धिमवाप्तवान् ।
शाण्डिल्यो देवलाजात एतेऽपत्यास्तु काश्यपा ।। १३
तृणबिन्दुस्तु राजर्षि कन्यामिलविलाभिधाम् ।
पुलस्त्याय ददौ तस्या विश्रवा समजायत ॥ १४
ये पाय अनन्ताय है ये बलपारी और विप बलवान्
अरिष्टा नाम वाली पत्नी ने कश्यप ऋपि से गन्पर्वो को मम तान्न
किया था 11 विनता ने परम विख्यात गट और अरण इन दोनोयो
जन्म ग्रहण पराया या । हे हिजो पगुआ से आरम्भ परे स्थावरा
में भन्न तर और अन्यो यो भी प्रमून दिया था I मश्यप म.नि ने
-

प्रह्लाद राज्यारोहग तथा दृक्ष्वाकु व श कथन ] [ १२७ स्थावरो को और जगमो को मम त्वन्न करके पुन सन्तानो की वृद्धि के निरे परम तपश्चर्या की थी 1१०1 जप तप के प्रभाव से वत्सर और असित य दो पत्र उत्पन्न हुए थे । वत्सर से नैध्र व उत्पन्न हुआ था और महामति रम्य पैदा हुआ था ।११। नैध्रव मे सुमेचा ने कुण्डपाभी पुत्रा को सम सन्द किया था। एकपर्णा के आसत्र से देवन मनि समु- त्पन्न थे १२. देवल ने दाम्भु को समार/धना करके परम सिद्धि प्रान की थी । देवल से शाण्डिल्य उत्पन्न हुए। ये कश्यप की सन्तनिया हैं तृणबिन्दु राजर्षि ने इलविला नाम वाली कन्या को पुलस्त्य मुनि को प्रदान कर दी थी उसी से विधवा समुत्पन्न हुआ था ।१३॥१४॥ पुप्पोत्कटा तथा वाका कैकसी देवणिनी। चतस्र पत्नयस्तस्य पौलस्त्यस्य महात्मन ॥ १५ कुवेरो देववणिन्या कैवस्या रावणस्तथा। कुम्भकर्ण शूपणखा तथैव च विभीषण ॥ १६ पुप्पोत्कटायामभवस्नय पुनाश्च कन्यका । महोदर प्रहस्तश्च महापार्श्वस्तथाऽपर ।। १७ तथा कुम्मनग्वी कन्या तरय विश्रवसो द्विजा । निशिरा दूषणश्चैव विद्य जिह्वो महावल ॥ १८ वाकायामभवनपुत्रा राक्षसा क्रूरकर्मिण । भूता मृगा पिशाचाश्च सर्वे वे दष्ट्रिणस्तथा ।। १६ पौलस्त्या इति ते सर्वे मरीचे, कश्यप सुत । भृगो सकाशादभवच्छुक्रो दैत्यगुरुमहानू ।। २० प्राप्ता सजीविनी विद्या येन शुक्रेण धीमता । महादेव समाराध्य पुरा वदरिकाश्रमे ॥ २१ महात्मा प्रलस्त्य को चार पत्नियां हुई थी। एक का नाम पुप्पो स्परा था- दूसरी याका थी-कैक्सी और देव वणिनी थी । देवगिनी पत्नी के उदर मे कुवेर पंदा हुए और करसी के गर्भ से रावण उत्पन्न हुआ या तथा साय हो छोटे भाई कुम्भकर्ण और विर्भापण हुए और १२८ ॥ [ सूर्य पुराण एक वहिन शूर्पणखा हुई थी ११५२१६१ पुष्पोत्कर में तीन पुत्र और कन्या हुई थी। उनके नाम ये है-महोदर-प्रहस्त और महापागे । 'उस विश्रवा कुम्भनखी एक कन्या भी हुई थी। गकामे विशिरा दूपण- 'गिद्य जिह्व-महावल ये पुत्र सम्पन्न हुए थे जो क्रूर कर्मों के करने वाले राक्षस थे । भूत-मृग और पिशाच ये सभी देष्ट्रापारी थे ।१७।१८। ११९। सभी पौलस्त्य हैं और मरीचिका कश्यप पुत्र थ। । भ.गु के सकाम से महान् दत्य गुरू शुक्र हुए थे ।२० जिरा परम श्रीगार शुक्र ने सजी. विनी विद्या प्राप्त करली थी और पहिले बदरिका श्रम मे शुक्राचार्य ने श्री महादेवजी की समाराधना करके ही सजीविनी विद्या उनके प्रसाद से प्राप्त करली थी।२१॥ जरामरणनिमुक्तो वचकायो महा मुनिः । योगाचार्य इति ख्यातः प्रसादान्दिरिजापतेः ॥ २२ अनसूया तु सुपुवे नमत्पुयत्रय द्विजा. । दत्तात्रेय चन्द्रमसं तथा दूर्वासमं मुनिम् ।। २३ आत्रेया इति ते ख्याता निरपत्यस्तथा ऋतु । वसिष्ठाय ददौ कन्या नारदो मुनिपुंगवा. ॥ २४ अरुन्धतोमरल्धत्या शक्तिर्नाम वभूव ह। शक्तः पराशरस्तस्मात्प्णदं पायनो मुनि. ॥ २५ वैपायनाच्छुको जज्ञे पञ्च पुत्राः शूकस्य ते । भूरिश्रवा. प्रभु शंभुः कृष्णो गौरश्च पञ्चमः ॥ २६ कन्या कीतिमती नाम वगा एते प्रकीर्तिता. । कश्यपाददितिर्लभ भास्कर तेजमाऽधिकम् ॥ २७ सज्ञा राजी प्रभा छाया भानो र्याः स्मृतास्त्विमाः । गूते मून्मिनु संज्ञा यम्य वंशेऽभवन्नृपाः ॥ २८ भगवान गिरिजापति के प्रगाद में यह महामनि जरा (दमा)भोर मरण निमुंफ होार ययाय हो गये थे नया योगानार्यागमा हए ।२२ को ' प्रनगृपा ने कम में सीन पुगेको प्रापिपा प्रह्लाद राज्यारोहण तथा दृक्ष्वाकु वंश कथन ] [ १२६ था। वे तीनो दत्तात्रय-चन्द्रमा और दुर्वामा मनि थे ।२३। ये सब आनेय-इस नाम से ही स्यात हुए थे और ऋतुम नि अपत्य (सन्तान) से ही वही रह गये थे । हे म निपुङ्गवो ! नारदजी ने वसिष्ठजी के लिये कन्या प्रदान करदी थी ।२४। उस कन्या का नाम अरन्यती था । उस अरन्धती मे शक्ति नाम वाला हुआ था। शक्ति से पराशर हुए तथा उन पराशर म नि से कृष्णद्वैपायन म नि ने जन्म ग्रहण किया था ।२५॥ द्वैपायन मुनि से शुरु समुत्पन्न हुए थे और उन शुग मुनि के पाच पुत्रो ने जन्म ग्रहण किया था। उन पाचो के नाम -भूरिंथवा-प्रभु गम्मु कृष्ण और पाचवा गौर था ।२६। एक कन्या थी जिसका नाम कीतिमती था ये सव वश कीत्तिन कर दिये गये हैं । कश्यप मुनि से अदिति ने तेज से अत्यधिक तेजस्वी भास्कर को प्राप्त दिया था ।२७। स ज्ञा-राजी-प्रभाऔर छाया ये भानु देव की भार्या ये कही गयी । सज्ञा ने सूर्य देव से मनु को प्रमूत किया था जिमके वश में नप हुए थे ।२८। यम च यमुना चैव राज्ञी रेवन्तमेव च । प्रभा प्रभातमादित्याच्छाया सावर्णिमेव च ।। २६ शनि च तपती चैव विष्टि चैव यथाऋयम् । इक्ष्वाकुर्नभरश्च व घृष्ट. शर्यातिरेव च ।। ३० नरिप्यन्तश्च नाभागो शरिष्ठ. करुपस्तथा । वृपध्वजो महातेजा नव वैवस्वता समा ॥ ३१ इला ज्येष्ठा वरिष्ठा च कन्या एतास्त्रय (1) स्मृताः। इक्ष्वाकौश्चभवत्पुत्रो विकुक्षिरिति विश्रुतः ॥३२॥ तस्य पुत्रशत त्वासोककुत्स्थो ज्येष्ठ ईरित । तस्मात्सुयोधनो जज्ञे पृथुस्तस्य सुतोऽभवत् ॥३३॥ विश्वकस्तस्य पुत्रो भूद्दमस्तस्य वै सुत. । तरमाच्छातिरभवा वनावश्च तत्सुत 13४|| श्रावम्तिस्तम्य पुत्रोऽभूच्छावस्ती येन निर्मिता । तस्मात्क्वलय. ख्यातो घुन्धुमारिस्ततोऽभवत् ।।३।।

एक सौ
१३०
[ सूर्य पुराण
राजीमार्या ने यम को और यमुना को जन्म दिया था और रेवन्त
को भी उत्पन्न किया था। प्रभाभार्या ने सूर्य देव से प्रभात को तथा
छायाभार्या ने सावणि को समुत्पन्न किया था ।२६। शनि को तपती का
और विष्टि को यथाक्रम से उत्पन किया था। इश्वाकु-नाभाग घूप्ट-
शर्याति-नरिप्यन्त-द्वारप्ट-करप वृषध्वज महातेजा ये नो सम वस्वन
हैं ।३०।३१। इला ज्येष्ठा वरिष्ठा ये तीन कन्यायें बतायी गयी है।
राजा इक्ष्वाकु का विकुश्चि नाम वाला विधुत पुन हुआ था।३२। उसके
पुत्र
थे। उनमे ककुत्स्थ सबसे बडा कहा गया है । उस ककुत्स्थ
से मुयोधन उत्पन्न हुआ था और उस सुयोधन का पुत्र पृथु हुआ था
1३३। उसका पुन विश्वक और विश्वक का पत्र दमक उत्पन्न हुआ
था। उससे शर्याति हुआ और इसका पुत्र भुवनाश्व हुआ था । युवनाश्व
का पुत्र श्रावस्ति तथा इसके द्वारा ही श्रावस्ती पुरी की रचना की
गयी थी। उममे कुवलय को उत्पत्ति हुई थी जोइसी नाम से रयात था
इसके पश्चात धुन्धुमारि समुलन्न हुआ था।३४॥३॥
धुन्धुमारेस्त्रय पुना दृढावाद्या महौजस ।
दृढाश्वस्य च दायादो हरिश्चन्द्रस्ततोऽभवत् ॥३६।।
रोहितम्तम्य पुनोऽभूद्रोहितस्यापि तत्सुत ।
धुन्धुम्तम्मादभूत्पुमो धुन्धो पुनो वभूवतु ॥३७॥
सुदेवो विजयश्चैव कुरको विजयात्स्मृत ।
योज्य पुरकाज्जज्ञे तस्माद्वाहुरभूत्सुत ॥३८॥
सगरम्तम्य पुनोऽभूत्पौयस्तस्याशुमान्म्मृत्त ।
तम्य पुत्रो दिनीपस्तु तस्माज्जज्ञे भगीरथ ॥३६॥
प्रोतोन्भूत्तपमा शभुदंदी वरमनुत्तमम् ।
गना वभार गिरगा रक्षार्थ जगता हर ॥४॥
दगायुताना वर्षाणि द्विगहय शतद्वयम् ।
महादेवादर लब्ध्या राज्य कृत्वा भगीरथ ॥४१॥

प्रल्लाद राज्यारोहण तथा इक्ष्वाकु व श वयन ] [ १३१ विरक्ती राज्यभोगेभ्यो विश्व मत्वेन्द्रजातवत् । जावाल समनुप्राप्य यत्तज्ज्ञान शिवात्मकम् ॥४२!! धुन्युमारि व तीन पुत्र हुए थे जो दृढावाद्य महान् ओज वाते थे । दृढाश्व का दाय ग्रहण करन वाला फिर हरिश्चन्द्र उत्पन्न हुआ था ।३६ उस हरिश्चन्द्र का पुन रोहित हुआ था। रोहिताश्व का पुत्र धन्यु था । उस घन्ध के दो पुत्र उत्पन्न हुए थे। उनका नाम सुदव और विजय था। विजय स कुरुक उत्पन्न हुआ था । इमवा पत्र वृव हुआ था और उसका पुत्र वा उत्पन्न हुआ था ।३७३८। बाहु का पुत्र सागर पैदा हुआ था और उसका पौन अशुभान हुआ था । इस अशुभान का पन राजा दिलीप था । इस दिलीप मे भागीरथ ने जन्म ग्रहण किया था। भगवान् गम्भु भागीरथ की तपस्या से प्रसन हो गय थे और उसको उत्तम वरदान प्रदान किया था। भगवान् हर ने जगता की रक्षा करने के लिये अपन सिर पर गङ्गा को धारण किया था ।३६।४।। एक लाख दो सहल दो सौ व ता महादेवजी वरदान प्राप्तकर भगी- रथ न राज्य किया था ।४१। राज्य के भोगा से विरक्त हार इस विश्व को महेन्द्र के जाल के ही समान जावाल समनुप्राप्त करके जो शिवा- त्मव ज्ञान था उगी को प्राप्त किया था ।४२। मुनेरनुग्रहालध्वा परा सिद्धि गतो नृप । श्रुतस्तस्याभवत्पुनो नाभागस्तत्सुतोऽभस्वत् ॥४३॥ सिन्धुद्वीपस्ततो जज्ञे अयुतायुस्ततोऽभवत् । ऋतुपर्णस्तु तत्पुत्र सुधामा तत्सुतोऽभवत् ।।४४।। यस्मै दत्त भगवता गाणपत्यमनुत्तमम् । मल्मापपादस्तत्पुत्र क्षेत्रजस्तत्सुतोऽश्मक ॥४॥ सपेर्वासिष्ठाद्विनन्द्रान्नकुलस्तत्सुत्तोऽभवत् । गवुलस्याभवत्पुनो नाम्ना यतरथो नृप ॥४६॥ अभूदिलविलस्तस्माद्वृद्धशर्मा ततोऽभवत् । तस्माद्विश्वसहो नाम सट्वाङ्गम्तत्सुतोऽभवत् ।।४७॥

१३२ ] [ सूर्य पुराण परा दीर्घबाहुस्ततो जज्ञे रघुम्तस्याभवत्सुत । रघोर जैस्तु विख्यातो राजा दशरथस्तत ॥४८|| तस्य पुत्राश्च चत्वारो धर्मज्ञा लोक विश्रुता । रामोऽथ भरतश्चैव तृतीयो लक्ष्मण स्मृत ॥४६॥ मुनिवर के अनुग्रह से इम ज्ञान की प्राप्ति करक नृप ने सिद्धि प्राप्त करली थी। इसका पुग श्रुत हुआ था और इसका पुत्र नाभाग उत्पन्न हुआ था ।४३। उससे फिर सिन्धु द्वीप समुत्पन्न हुआ था। इससे अयुनायु ने जन्म प्राप्त किया था। अयुतायु का पुत्र ऋतुपर्ण हुआ था ।४४। जिसके लिय भगवान ने उत्तम गाणपत्य पद प्रदान किया था। इसका पुग मापप द हुआ था। उसका पुश क्षेशज अश्मक हुआ था ।४५। हे विप्रेन्द्रो मषि वसिष्ठ से नकुल उनका पुत्र हुआ था । नकुल का शतरथ नाम से विश्रुत नृप पुष उत्पन्न हुआ था ।४६। उमसे इलविल उत्पन्न हुआ था तथा इसका भी पुष वृद्धशर्मा उत्पन्न हुआ था । वृद्धशर्मा का पुत्र विश्वसह और इसका पुत्र खटवाङ्ग हुआ था ।४७। इससे दीर्यवाहुनने जन्म प्राप्त पिया था और दीर्घबाहु या पुत्र रघु हुआ था। रघु का पुत्र तो परम विख्यात है जिसना रामा दशरथ पुत्र प म प्रमूत हुए थे 1४८. उन महाराज दशरथ के चार ही पुत्र हुए थे जो परम धर्मज्ञ और लोको मे प्रसिद्ध थे। राम भरत और तीसरा सदमण थे ।४६। चतुर्थश्चैव शत्रुघ्नो रामो नारायणः स्वयम् । धमन सत्यसकल्पो महादेवपरायण ॥५० सीता तस्याभवद्भार्या पार्वत्यशसमुद्भवा । जनकेन पुरा गौरी तपमा तोपिता यत ।।५१ जनकाय ददो शभु प्रीतो धनुरनुत्तमम् । तदनुर्भलयामाम जनक्स्य गृहे स्थितम् ॥५२ दृष्ट्वा पराक्रम तस्त्र रामम्प गुणगालिन । जन प्रददौ तस्मै सीता ब्रह्मविदा वर ॥५३ पित्रा वृतोऽभिऐकाय गमो राज्यम्य वं यदा । वारयामास वेयी तव राश. प्रिया वधू ।।५४ प्रह्लाद राज्यारोहण तथा इक्ष्वाकु कथन ] राजस्त्वया वरो दत्त पूवमेव यत प्रभो। राजान मत्सुन तस्माद्भरत कर्तुमर्हसि ॥५५ इति तस्या व थत्वा राज्ये तमभिपिच्च स प्रपयामास त राम वन प्रति सलक्ष्मणम् ॥५६ चौथे पुत्र शन न थे । श्रीराम तो स्वय नारायण थे। जो धर्मज्ञ- सत्य साल वाले~ महादेव जी की भक्ति में परायण थे ॥५०॥ सीता उनकी भार्या थी जो माक्षान् पार्वतीजी के अा मे ही समुत्पन हुई थी क्योकि महाराज जनक ने तपस्या के द्वारा गौरीदेवी को सन्तुष्ट किया था । भगवान् शम्भु ने जनक नृप के लिये परम प्रसन्न होकर उत्तम घनुप दिया था । जनक के घर में स्थित उसी धनुष को श्रीराम ने तोड दिया था । गुणशाली श्रीराम के पराक्रम को देखार, महाराज 'जनक नै जोकि ब्रह्म वेत्ताओम परम श्रष्ठ थे उन श्रीराम के लिए सीता को देदिया था ॥५१॥५२॥५३॥ जिस समय में राज्य के अभि- पेक के लिए थीराम का निश्चय किया था उस समय में राजा की प्यारी वधू केक्यी ने वारण कर दिया था। उसने राजा से कहा था-हे प्रभो! हे राजन् ! आपने पहिले ही क्याकि मुझे वरदान दिया है । अतएव मेरे पुत्र को ही आप राजा बनाने के लिये मामर्थ हैं। उसके इस वचन को सुनकर राज्य में उसका अभिपक उसने कर दिमा था। फिर राजा ने श्रीराम को वन मे लक्ष्मण के सहित भेज दिया था ॥५१॥१२॥५३॥ ५४॥५५॥५६॥ वन गत्वा निवसतो भायां दृष्ट्वास्थ राक्षस । रावणो नाम पौलस्त्यो नीत्वा लड्डा पुनर्गयो ।।५७ अदृष्ट्वा ता तत सीता दुखितौ रामलक्ष्मणौ। मम्य वानरराजेन गत्वा दाशरथी द्विजा ॥५६ सुग्रीवम्य सपा वीरो हनुमानाम वानर । गवाऽथ रावणपुरीमपश्यजनकात्मजाम् ॥५६ अथ पूर्णेक्षणा सीतामिन्दीवरनिमाननाम् । विश्वासार्थ ददौ तस्यै रामस्यवान लीयकम् ॥६० १३४ ] [ सूर्य पुराण दृष्ट्वाऽड गुलीयक सीता प्रहृष्टा च तदाऽभवत् । समाश्वास्य तत सीता प्रययौ राघवान्तिकम् ।।६१ रामस्तमागतं दृष्ट्वा प्रहर्पोरफुललोचन । श्रु त्वा तद्वचनावृत्त युद्धाप कृतनिश्चय ॥६२ सेतु कृत्वाऽथ रक्षोभियुद्ध कृत्वा महामना । निहत्य रावण रामो भ्रातृभि सह सुमत ॥६३ बन मे जाकर निवास करने वाले श्री राम की भार्या को देखकर राक्षम रावण ने नोकि पौलस्य था लङ्का मे ले जाकर गमन किया था ॥५७।। उस सीता को वहा पर न देखकर राम और लक्ष्मण दोना बहुत ही दुखित हुए थे। हे द्विजो ! उन दशग्ध में पुनो ने राजा सुग्रीव के साथ मुख्य अर्थात् मित्रता की थी ।।५८॥ उम वानर राज मुग्रीव का एक सखा परम वीर हनुमान् नाम का वानर था । वह हनुमान् रावण की पुरी लगा में गया था और वहां पर उसने जन कात्मजा को देखा था ॥५६॥ वह जनक वी आत्मजा अथ ओ से परिपूर्ण नेमो वाली थी और इन्द्रीं घर के समान उसका मुख था। हनुमान ने जानी जी को विश्वास दिलाने के लिये कि मैं श्रीराम वा ही एक मेवक हू और उन्हीने मुझको भेजा है उन जानकी के लिये श्रीराम के द्वारा ही हुई अगूठी दी थी।॥६१॥ उस समय मे उम अ गुतीयक को देखार जानकी परम प्रसन्न हुई थी। वह हनुमान सीताजी को भली भाति समाश्वासन देकर पुन श्री राघवेन्द्रजी के ममीप मे वापिस आगये थे ॥६॥ श्रीराम ने हनुमान को भानरी जी की मूनना लेकर वापिस आया हुआ जव देगा था तो प्रसन्नता मे उनके नेत्र मिल गये थे। हनुमान ये मुग मे सम्पूर्ण लष्का का वृत्तान्त श्रवण करके उन्होंने के लिये निश्चय कर लिया था कि रावण के माय अब यर ही करना होगा ॥६२॥ फिर महार मन वाले श्रीराम ने राक्षमो माय युद्ध करने तथा समुद्र में मेतु बौधार तथा रावण को मारकर श्रीराम ने जो मुवन घे उस जानकी को भायो वे माप यारिस प्रह द गज्यारोहण तथा दृक्ष्वाकु कथन ] [ १३५ ले आकर अपने पास समवस्थित कर दिया था जोकि अबतक लङ्का मे अशोक वाटिका में स्थित रहा करती थी ॥६॥ आनयामास ता सीतामशोकवनमध्यगाम् । प्रतिमाप्य महादेव सेतुमध्येऽथ राघव ६४ लन्यवान्परमा भक्ति शिवे शिवपराक्रमः। रामेश्वर इति र यातो महादेव पिनाकधृक् ।।६५ तस्य दशनमात्रेण ब्रह्महत्या व्यपोहति । अभिक्तिस्ततो राज्ये रामो राजीवलोचन ॥६६ पालयन्यवी सर्वा धर्मेण मुनिपु गवा । अयज वदेवेशमश्वमेधेन शकरम् ॥६७ तस्य प्रसादा स्वपद प्राप्तवानथ राघव । एव सक्षेपत प्रोक्त रामस्य चरित मया ॥६- इद विस्तरतो विप्रा प्रोक्त पाल्मीविना पुन । कुशश्च को लवश्चात्य पुत्री गमस्य मुक्तौ ।।६६ श्री गधव ने सीता जी को अशोक वाटिका से लाकर वहा पर सेतु के मध्य में श्री महादेव की प्रतिष्ठा की थी १६४॥ श्री शिर के परा- कम मे युक्त श्रीराम ने भगवान् शिव में परमाधिक भक्ति को प्राप्त दिया था। वे श्री महादेव मिनाक घनुप के धारण करने वाले श्रीरामे- श्वर महादेव के ही नाम से प्रसिद्ध हो गये थे ॥६॥ उन श्रीरामेश्वर महादेव जी के केवल दर्शन ही कर लेने भरमे ब्रह्म हत्या से छुटकारा पा जाया करता है। इसके पक्षात् श्रीराम का राज्यामन पर अभिषेक किया गया था और फिर राजीव के समान नयो वाले श्रीराम ने धर्म के साथ हे मुनि पुरजो । सम्पूर्ण पृथ्वी का पालम किया था तथा भा. थान पर का बम्वमेघ यज्ञ के द्वारा यजन किया था ॥६६/६७॥ उन्ही के प्रसाद से श्रीराघवेन्द्र प्रभु ने पद को प्राप्त किया था। इस प्रसार मे मैने म्ह श्रीराम का चरित बहुत ही गले मेशिन नगा दिया है। फिर वाल्मीकि मुनि ने इसी श्रीराम के चरित्र को बहुत

[ सूर्यपुराण
विस्तार के साथ कहा था । श्रीराम के दो परम सुव्रत पुत्र हुए थे।
एक का नाम कुश था और दूसरे का नाम लब था । ये ही दोनो ही
लव कुश के नामो से प्रसिद्ध थे ॥६॥६६॥
सत्यसन्धौ महावीयौं महादेवपरायणौ ।
अतिथिश्च कुशाज्जज्ञे निपधस्तत्सुतोऽभवत् ।।
नलस्तस्याभवत्सुनो नमस्तस्याभवप्सुन 11७.
ततश्चन्द्रावलीकश्च नारापीडस्तनोऽभवत् ।
ततश्चन्द्रगिरि म भानुजित्तत्मुतोऽभवत् ॥७१
एते सर्वे नृपा प्रोक्ता इक्ष्वाकुकुलसभवा ।
धर्मात्मानो महामत्त्वा कीर्तिमन्तो दृढव्रता ॥७२
इम य पटते नित्यमिक्ष्वाकोर्वश मुत्तमम् ।
मर्वपापविनिर्मुक्त सूर्य लोवे महीयते ॥७३
ये दोनो भाई लव और कुश परम सत्य प्रतिज्ञा वाले थे- महान्
वीर्य-पराक्रम से युक्त थे-और श्री महादेव जी भक्ति भाव में पग-
यण थे। कुश मे अतियि नाम वाले पुत्र ने जन्म ग्रहण किया था और
उम अतिथि का पुत्र निषध नाम वाला समुत्पन हुआ था। इसका पुत्र
नल हुआ था तया उस नल के नभ नाम वाले पुत्र ने जन्म ग्रहण किया
था । फिर इसके चन्द्राव लोक हुआ था । चन्द्रावलोव के पुत्र का नाम
सारापोह हुआ था। फिर उससे चन्द्रगिरि ने जन्म प्राप्त किया था
और इमरे पुत्र का नाम भानुजिन था। ये सभी ना जो मेरे द्वारा
यतलाये गये हैं वे गय इक्ष्वाकु राजा के बुल में ही जन्म लेने वाले हुए
पे। ये गमी परमात्मा और महान् सरव वाले थे तथा कीति से युक्त
एव रद पत वाले हुए थे ॥७॥७९॥७२॥ स महाराज के
उत्तम काको जो भी कोई पुराप नित्य ही पढ़ा करता वह मभी प्रकार
ये महान् पातयो से निमुंपन हो जाया करता है और अन्त में गूर्य लोक
में प्रतिशित हुआ करता है ॥७३॥

शिव महिमादि कथन ] [ १६७ ॥ शिव महिमादि कथन ॥ चतुवपि च वेदेषु पुराणेषु च सर्वश । श्रीमहेगात्परो देवो न समानोऽस्ति कश्चन ।।१ ब्रह्मा विष्णुर्वलाराति सर्वे यस्य वशे स्थिताः । उत्पत्ति. सर्वदेवाना स एव व्येय उन्यते ॥२ नास्ति शभो परो धर्मो नाम्त्यर्थ शकरात्पर । शिवन्यत्सुग्व नास्ति मोक्षो नैव हरात्पर ॥३ यदा चर्मवदाकाश वेष्टमिप्यन्ति मानवाः । तदा शिवमविज्ञाय दु खस्यान्तो भविष्यति ॥४ सप्तृत्व ब्रह्मगो येन ध्येयत्व येन शाङ्गिण । विष्णुत्व येन शक्रम्य तस्मादन्य परो न हि ॥५ केचिल्लोका महेशान त्यक्त्वा शकिकरा । तय किं कारण सूत वद सशयनाशक ॥६ अन्तकाले स्मरन्त्येव प्रायेण गरुडध्वजम् । विद्यमाने शिवे विष्णो प्रमोथीपार्वतीपती॥७ श्री मूलजी ने कहा-चारो वेदों में और पुराणों में सर्वत्र श्रीमहेग मे पर अन्य कोई भी देव नहीं है और न उनके समान ही कोई देवता है ।।१।। ब्रह्मा विष्णु और दलाराति सभी जिनके वश में स्थित रहा करते हैं और समय देवो की वही उत्पत्ति है और वही सवये ध्येय हे जापा करते हैं ॥२॥ शम्भु भगवान से पर कोई धर्म नहीं है न गइर से पर मोई अयं ही है। भगवान शिव से अन्य कोई भी गुख नही है और न हर से पर कोई मोक्ष हो होना है ॥३॥ जिस समय में धर्म के सहा आवास को मानव टिन कर लिया करते हैं उम समय में शिव को न जानकर दुःस का अन्त होगा III जिगने ब्रह्मा का मृप्टत्व- सागरा प्येषत्व और बिस्व कार प्राप्त हुआ है तथा पर को विष्णत्व मिला है उम शम्भु मे पर अन्य कोई भी नहीं है ॥५॥ पियों १३८ ] । सूर्यपुराण + - ने कहा-~-कुछ लोग महेश भगवान को त्याग करके . केशव भगवान् के हो निडर हाते है हे सूत जी | आप तो सशय के विनाश करने वाले है। यह बतलाइये कि वहां पर क्या कारण होता है ॥६॥ अन्तकाल मे प्राय करके लोग भगवान् गरुड ध्वज का ही स्मरण किया करते हैं जबकि श्री पर्वती के पति भगवान् शम्भु प्रभु विष्णु के आगे विद्यमान रहने पर ऐसा क्यों होता है 111) यदा यदा प्रसन्नोभूतिद्भक्तिभावेन धूर्जटिः । विष्णुनाराधितो भवत्या तदाऽसौ दत्तवान्वरान् । ८ त्वत पर प्रभु नैव प्रायेण ज्ञानस्यति स्फुटम् । विरला केचिदेतद्वै निष्ठा वेत्स्यन्ति तत्वत ।। हेनुना तेन विप्रेन्द्रा शिव जानन्ति केचन । प्रायेण विष्णुनामानि गुणन्ति वरदानत ॥१० विष्णो स्मरणमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत् । शभुपाद एवैप नास्ति कार्या विचारणा ॥११ य शभु तत्त्वतो वेत्ति स तु नारायण म्वयम् । यस्तु नारायण वेत्ति स शक्रो विवुधेश्वर ॥१२ य इन्द्र वेत्ति देवेश लाकपालो जलाधिप । एव सर्वाल्लोकपालाप्लानाति स इहामर ।।१३ देवाजानाति यष्टपान्स ऋपिर्वेदवित्स्वयम् । ऋपीन्यो वेत्ति सम्यक्त्वात्स एवं ब्राह्मणोत्तम ॥१४ श्री सूतजी ने कहा-जब जव भववान् घुजटि भक्ति भाव मे प्रसप्त हो जाते हैं और विष्णु ने भक्ति भावाम उनकी आराधना की थी उस समय मे इ होने विष्णु को वरदान दिया था ॥३॥ आपसे पर प्रमु प्राय परवे स्फुट रूप से नही जाने जायगे । कोई विरले ही तात्विक रूप से निष्ठा का मान प्राप्त करेंगे ।।९। हे विप्रेन्दो ! इसी हुनु मे पुष हो लोग भगवान् शिव का ज्ञान प्राप्त किया करते हैं। प्राय करके विष्ण वे लामो योनी वरदान से लोग ग्रहण करते हैं ॥१०॥ भगवान तिष्णु शिव महिमादि क्थन । [ १३६ 1 के नाम का स्मरण मात्र म ही ममान पापो का क्षय हो जाया करता हैरह भी भगवान् गम्भु वा ही प्रमाद है-इसमे कुछ भी विचार नहीं करना चाहिए ॥११॥ जो गिव यो तात्विक रूप से जानता है वह तो स्वय नगगयण ही हैं । जो नारायण को जानता है वह देवो का स्वामी दशक ही हैं ॥१२ । जो देवश इन्द्र को जानता है वह लोक माल जलाधिय हैं । इस प्रकार में मर सोकाला को जानता है वह यहाँ अमर है ॥१३॥ जो यजन करने के योग्य दवो का ज्ञान रखता है वह वदा के ज्ञाता स्वय ऋपि हैं । जो भली भांति स पिया को जानता ३ वह ही उत्तम कोटि का ब्राह्मण है ॥१४॥ सर्वदेवमय विप्र यो जानाति स वेदवित् । रहम्य वेत्ति वेदस्य म एव हरवल्लभ ॥१५ जन्मादिकारण शभु विष्णु ब्रह्मादिपूर्वजम् । न जानन्ति महामृर्वा विष्णमायाविमोहिता ॥१६ आमीत्प्रतनो नाम राजा परमधामिर । मातीपपति पृथ्वीप्रभुरेक प्रतापवान् ।।१७ मूर पुण्यमनिभोगी दाता वेदार्थाला । रक्षिता राव से तूना ब्रह्मण्यो ब्राह्मणप्रिय १% तस्य राज्ये यदा देवा गन्ति हवित्तमम् । न पापण्डी ना बौद्धम्तम्प राज्येऽमवज्जन ॥१६ पदाति स पुरी त्यक वा कोडाय' निर्गतो वहि । तदा ददर्श क्षाण राजा यिम्मयमागत २० पृष्ट पल्व पुतो पान कि काय घ तवेपितम् । पुष वाम्यमि तत्म रिजातीयो भवद ॥

१४० ] [ सूर्य पुराण और विष्णु की माया से विमोहित ही हो जाया करते है ॥१६॥ एक प्रतर्दन मध्य वाला परम धार्मिक था वह सातो द्वीपो का स्वामी प्रताप वाला तथा पृथ्वी का एक ही प्रभु था ॥१७॥ वह शूरवीर पुण्यमति वाला भोगी वाला-वेदो के अर्थों का प्रतिपालन करने वाला सभी सेतुओ की रक्षा करने वाला-परम ब्रह्मण्य और ब्राह्मणो से प्यार करने वाला था ॥१८॥ उमके राज्य मे देवगण सदा ही उत्तम हवि को ग्रहण किया करते थे । न तो वह पापण्ड वाला था और न बौद्ध था। उसके राज्य में ऐसा कोई अन्य मनुण्य भी नहीं था ॥१६॥ किसी समय मे वह अपनी नगरी नगरी को छोडकर क्रीडा करने के लिये बाहिर निर्गत हो गया था। उस समय मे उसने क्षयण अर्थात् यौद्ध सन्यासी को देखा था। उसे देखकर उसको बहुत अधिक विस्मय हुआ था ॥२०॥ उसके द्वारा उस क्षपणक से पूछा गया था कि वह कौन है और कहाँ को जा रहा था, एव उसका वहाँ क्या कार्य था तथा उसका ईमित क्या था ? वह अब कहाँ को जायगा और उसकी जाति क्या है-राजा ने उससे यह भी कहा था कि आप यह सभी बातें बतलाइये ॥२१॥ राजन्वणिगह शान्तो यति. शीलवत स्थित.। मदीयाञ्चलसलग्नाः सन्त्यत्र वणिज. परे ।।२२ को धर्म किं नु तत्र स्व ज्ञायते केन वक्ति कः । अय पन्था. कथ प्राप्त. कस्मान्न प्रकटो भवान् ।।२३ अहिसा परमो धर्मस्तत्तत्व यत्तनोदम. । बुध्यते योद्धजनाम्या वक्ता तस्य जिनो मतः ॥२४ वेदवेदाङ्गवेत्तारो याज्ञिका वैष्णवा द्विजाः । माहेश्वरा महापूज्या न व्यतोह भयान्नुप ॥२५ ततो राजा परा चिन्ता प्राप्तो दुखितमानमः । घिग्राज्य मम दुयुंदेदवाहोऽस्ति मत्पुरे ।.२६ एत हन्मि यदा पाप तदेतन्मानिनी प्रजा । कगिपति शान्तारमा हतो राज्ञा युयुदिना ॥२७ शिव महिमादिक कथन ] [ १४१ एत स्मन्निहते किस्याद्भवन्ति बहवस्तथा । दयाशब्द पुरस्कृत्य ह्यधर्मो विचरिष्यति ॥२८ क्षपणा न कहा-हे राजन् ! मैं वणिक हूँ, परम शान्त मति हू और शील व्रत म स्थित रहने वाला हूँ तथा मेर अज्जल मे रहने वाले दूसरे पणिह भी हैं ॥२२॥ राजा ने कहा-तुम्हारा धर्म क्या है और उस धर्म में क्या व ते हैं? क्या आप जाने जाते हैं किमके द्वारा कौन बोलता है ? यह मार्ग कैसे प्राप्त हुआ था और किस कारण से प्रकट नही हुय ये ॥२३॥ क्षपणक न कहा-अहिंमा ही मेरा परम धर्म है । तनुका दमन जो है वही परम तत्त्व है । बौद्ध और जैना के द्वारा ही जाना जाता है । उसका वक्ता जिन भगवान ही माने गये हैं ॥२४॥ नृप । यहाँ पर वेदो और वेदाङ्गो के वेता-यानिक और वैष्णव द्विज हैं महेश्वर का पूजय महापूज्य हैं । भय से ही मैं ध्यता नहीं हुआ हू।२५॥ सूतजी ने कहा-इसके पश्चात् राजा को बहुत अधिक चिन्ता हुई थी और उसका मन अत्यन्त दुखित हो गया था । मेरे जैसे राजा के राज्य को धिकार है कि दुर्बुद्धि मेरे पुर मे एक यह वेद वाह्य पुरुष विद्यमान है ।।२६।। इसरो में जब मारता हूं तो यह भी पाप होना है और तव यह मानिनी प्रजा कहेगी कि वृद्धि राजा ने एक परम शान्त क्षपणन को मार दिया है ॥२७॥ इसके मार डालने पर क्या होगा तथा बहुत हो जाते हैं । दया शब्द को आगे करके अधर्म विचरण करेगा ॥२८॥ वेदवाह्या प्रजा राजा शासितु व शक्यते । तदा तत्पापभागी स्यादिश्याह भगवान्मनु ।।२६ त्यवत्वा राज्य तपस्तेपे ततो राजा प्रतर्दन । सावित्री मनसा ध्यात्वा नित्यमेकानमानस: 10 तत कतिपयाहोमिला प्रत्यक्षता गत । महना तपसा तुष्ट इ. वचनमब्रवीत् ॥३॥ पुत्र प्राप्तोऽस्मि गतोष वर वरग सुस्त । बय स्व विद्यमे चित्त राज्य त्यक्त बनम्त्वया ।

7 १४२ ] [ मयं पुराण वेदा प्रमाण व येव जानात्येव च यत्प्रजा। शङ्कामान भवेन्नं च वेदप्रामाण्यगोचरम् ॥३३ इति याचे वर देव किमन्येव वरेण मे। याचे निष्कण्टक राज्य सनद्वोपावनीपनि ॥३४ वेदो से वाह्य जब सब प्रना हो जायेगी तो राजा के द्वारा शासन नहीं की जा सकती है । उस समय मे उसके पाप का भागी होता है- एसा भगवान् मनु ने कहा है ॥२६॥ सूतजी ने कहा- इसके पश्च त राजा प्रतदन ने राज्य को त्याग करके तपस्या करने लगा था। उसने सावित्री देवी का मन से ध्यान करके वह नित्य ही एकाग्न मन वाला रहता था । ३०१ इसके अन तर कुछ दिनों के बाद ब्रह्माजी प्रत्यक्ष को प्राप्त हो गये थे। ब्रह्माजी महान तप से परम सन्तुष्ट हो गये थ और यह वचन उमसे बोले-ब्रह्माजी ने कहा-हे पुत्र । हे सुव्रत | मैं परम सतुष्ट हो गया हूँ तुम वरदान माग लो। तुम राज्य मे क्यो खेद को प्राप्त कर रहे हो? चित्त में खिलता का क्या कारण है ? आपने राज्य का परित्याग क्यो पर दिया है ? ॥३१-३२॥ राजा ने कहा-वेद प्रमाण को बतलाता है और उसकी प्रजा सब जानती ही है । वेद ही प्रमाण का गोचर है और उसमे शङ्कामात्र भी नही होती है ॥३३॥ हे देव । मैं यही वरदान चाहता हू । मुझे अ य वरदान से कुछ भी प्रयोजन नहीं है । मैं तो सातो द्वीपो की भूमिका स्वामी अपना निष्कण्ट क शूय चाहता हूं यही आप से मैं याचना करता हूँ॥३४॥ एवमस्त्विति सप्रोच्य ब्रह्मान्तर्धानमाययो। प्रतदनोऽपि राजपि सतुष्ट पृथिवीपति ॥ ५ तत प्रभृति तद्राज्ये सर्वो धमों व्यवस्थित । वेदवेदाङ्गवेत्तारो ब्राह्मणा गसितव्रता ॥३६ अग्निहोत्रादि यज्ञाश्च यतयो ब्रह्मचारिण । शेवा नानाविधा पुष्पा वैष्णवा शुभलक्षणा ॥३७ तस्य राज्यो महापुण्येन पापण्डोन हेतुपी। वर्णाश्रमाचारवता क्रिया सर्वास्तदा भवन् ॥३८ . शिव महिमादिक कथन । उत्सवा विष्णुभक्तानां शिवाजा गृहे गृहे । मर्वे देशमानयन्ति न कविदेटि मानवः ॥३६ तवेदान्तमीमामाव्यापानि गृहे गृहे । वेदनिर्घोपवद्राज्य यज्ञस्तन्मा. स्थले स्थले ।।४० अनेक भोगसयुक्ता हृष्टाः पुष्टाः स्त्रियः गती. 1 रक्षन्ति पतय. पुण्या यथा वृद्धपुरस्कृता. ।।४१ सूतजी न कहा-"ऐमा ही होगा"---यह कह कर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये थे । प्रतर्दन राजा भी पृथिवी पति परम सन्तुष्ट मन्तुष्ट हो गया या ॥३५॥ तव मे ही आरम्भ करके उसके राज्य में मब धर्म व्यवस्थित हो गया था । सब ब्राह्मण वेद वेदाङ्गो के ज्ञाना और मशित नो वाले थे। पति और ब्रह्मचारी अग्निहोयो को करते थे तथा यज्ञ होते थे। संव भी अनेक प्रकार के एव पुष्पाप थे और वैष्णव शुभ नक्षणी बाले है ।।६३-३७॥ उसके महान पुण्य राज्य में कोई भी पापण्डी और हेतु को नहीं था। उस समय में वर्गों और आश्रमो वाली वो सभी नियाऐ होती थी॥३८॥ विषणु के भक्तो के उत्मय होते पे तथा पर घर मे गिव की पूजा हुआ करती थी। मभी लोग देवो को मानते थे और मनुप्य रिसी मे भी टेप नही किया करता था ३६) पर-पर मे तक- वेदान्त-मीमामा के व्याग्यान हुआ करते थे। उमका राज्य वेदो २ निषोंप वाला था और ग्धतरयल में यज्ञों के म्नम्म बने हुये ये ॥४॥ बनेा भोगी मे मयुक्त हुष्ट और पुष्ट स्त्रियो मम सनी थी। जिम प्रकार वृद पुरएन होते हैं वैसे ही पुण्य पनि लोग उनी रसारिया वरती म एव हतिथे काले गते ये दत्पदानवाः। पापिष्ठा होनकर्मागो म्लेच्छाम्नेपि दिय गताः ॥४२ येया तु मतति गुद वेदमाग हि मायने । ते मर्वे नरकासुस्त्या प्राणा एवामरावनीम् ।।४३ मयंत्र तुनगीवर यंा हरिपूजनम् ।

१४४ ] { सूर्य पुराण बिल्वदलस्नु सर्वत्र पूज्यते गिरिजापतिः ॥४४ कथ तेपा तु पितरो नरके निवसन्ति हि। तस्मिन्राज्ये समागत्य किं कुर्यु यमकिकराः ॥४५ शृणुध्वभृपयः सर्वे यदामीत्परमाद्भतम् । स्वर्गगामिषु सर्वेषु व्यापाररहिते यमे ॥४६ पूजिताः सर्वलोकेषु सर्वे वा बभूविरे । तदाऽमो धर्मरागत्वा शनोक महामनाः । उवाच सर्वदेवाना पुरत: प्राञ्जलिः स्थितः ॥४७ सूतजी ने कहा- इस प्रकार से बहुत सा काल व्यतीत हो जाने पर जो भी दैत्य दानव थे वे महा पापिष्ठ-हीन कर्मों वाले और म्लेच्छ थे वे भी स्वर्गलोक को चले गये थे ।।४२॥ जिनकी मन्तति शुद्ध थी यह वेदमणि को मानती थी। वे सब उनके पूर्वज जो नरको मे यातनाएं भोग रहे थे वे नरको को सन्तति के पुण्य प्रभाव से परित्याग करके ऐरावती में प्राप्त हो गये थे ॥४॥ उस राज्य मे सभी जगह तुलसी के वृक्ष लगे हुए थे तथा सर्वत्र श्रीहरि का पूजन होता था । सर्वत्र वित्व पत्रो के द्वारा भगवान गिरिजा के पति का पूजन किया जाता था ।४४॥ फिर उनके पितर चाहे वे कैसे भी पापी क्यो न हो, कसे तरको मे निवास कर सकते हैं क्योकि उनकी सन्तति पूजा परायण थी। उसके राज्य में आकर विचारे यम के दूत क्या करेंगे क्योकि वहाँ ऐसा कोई था ही नहीं जिसे वे ले जाकर दण्ड देवें ।४५] सूतजी ने कहा-ऋषि. गण सब श्रवण करें जो वहां पर परम अद्भव हुआ था। सभी के स्वर्ग में गमन करने वाले हो जाने पर यमराज तो सर्वथा व्यापार से रहित ही हो गये थे।४६॥ सब लोको मे पूजित होकर सभी देव हो गये थे। उस समय मे धर्मराज तहामना शक्रलोक मे गया था और हाथ जोडकर सभी देवो के सामने स्थित होकर कहने लगा था ।।४७॥ चतुरशीतिलक्षाणा जीवाना या स्थितिः सदा ।।४८ तां नामधुना वेनि यदि देवः प्रमरपरवान् ।

शिव महिमादिक कथन ] 1 १४५ यस्या कोटादियोनो या स्थितो जीवोऽतिपापवान् ॥४६ नरके सयमिन्या वा तत्पुत्रेण म उद्धृत । थाद्धदेवार्चनादीनि करोति श्रुतिनिश्चयः ।।५० अस्माक हीनजीवाना को विशेपो यदा श्रुतिः । प्रमाणयति तत्त्वेन वय देवा यदाना ॥५१ पुरोहित तव प्रजा शोभना प्रतिभाति मे। पूर्व चावोद्धादिमार्गा मदर्शितास्त्वया ॥५२ तेन मार्गेण विभ्रान्ता वेदमार्गवहिष्कृता । देयाश्च दानवाश्चैव तथा कुरु द्विजोत्तम ॥५३ न चार्वाको नवबौद्धो न जनो यवनोऽपि वा । कापालिक कोलिको वा तस्मिन्राज्ये विशेत्क्वचित् ॥५४ वेदा प्रमाणमित्येव मन्यमाना प्रजा शुभा। पथ सा चाल्यते तात न शक्य हि शुभाऽधुना ।। विधिदत्तवरस्याह मुच्छेत्तु शक्तिमान्कथम् ॥५५॥ यम ने कहा-चौरामी सास जीबो की जो स्थिति सदा थी मैं उसको इम समय में विनष्ट हुई ही समझता है यदि देव प्रमाण वाले हैं। जिम पोटादि योनियो मे अत्यन्त पार वाला जो जीव स्थित रहा करता है ॥४८॥४६।। नरक मे अथवा सयमिनी में वह जव होता है तो यह के द्वारा ही उदन कर दिया जाता है। वह याद और दे बार्चन आदि किया करता है। इसका ही ऐमा प्रभाव होता है-ऐसा नि वा विशेष निश्चय है ।५०। इन्द्र देव ने कहा-जब श्रुति हो ऐगा प्रतिपादन करती है तो हम जैसे हीन जीयो मे क्या विपना है। हम देवा तो उसकी आज्ञा से ही तात्त्विाप में प्रमाण लिया करते हैं ॥५१॥ हे पुरोहित ! तुम्हारी प्रशा परम शोभना मुझे प्रतीत होती है fr आपने पूर्व में ही पार्शनि और बौद्ध आदिमागं मे गहारित पर दिप थे ॥५२॥ उग मार्ग में विधान (ए मोग येसे के मार्ग में बहिष्मत हो गये थे। है हिमोसम ! देव और दानव मभी वादि उसके पुत्र १४६ । { सूर्य पुराण करो ॥५३॥ गुरुजी ने कहा- उसके राज्य में चरर्वाक बौद्ध जैन यवन- का पालिक-कौलिक कोई भी कही पर भी कभी भी प्रवेश नहीं करता है । वहाँ की परम शुभ प्रजा वेद ही प्रमाण हैं-ऐमा मानने वाली है । हे तात! वे लोग से विचलित किये जा सकते है। ऐसा किया नहीं जा सकता है । वह इस समय मे सारी प्रजा परम शुभ है १५४) विधाता के द्वारा दिये हुए वरदान को मैं उच्छेदन करने में विस तरह से शक्तिशाली हो सकता हूँ।५५ दैत्याना दानवानां च दुर्दर्शाना भवो यदा ।५६। तदा शुक्रः स्वय तेषा कृपया सोद्यमो भवेत् । तस्मात्त्व विप्रशार्दुल स्मादस्मानुपेक्षसे १५७ असाध्य तव कि मान्य वय त्वच्छरण गताः । अस्माकं दुर्जनाः सर्वे वेदकर्मरता कृताः ॥५८ तेपा व्यामोहनाय त्व कुरु यत्न कृपानिधे । देवाना रक्षमा चंब दैत्याना पापकर्मणाम् ॥५१ एव ब्रुवत्सु देवेषु वृहस्पतिरुदारधी । उपाय चिन्तयामास सृष्ट सरक्षणाय च ॥६० शृण्वन्तु त्रिदशा. सर्वे ममोपाय वदाम्यहम् । देवः कश्चिद्यदि भवरकपटी वैष्णवः स्वयम् ॥६१ शङ्खचक्रासिनतनुस्तुलसीकाष्ठभूषितः । ऊध्वपुण्ड्र च विभ्राणो हरिनामाक्षर जपन् ।।६२ देवतामानिन्दी च चकृत्वा मतिमीश्वरे । शिवद्वेष्टा महापापप्प्रेरकः शिवनिन्दक ॥६३ इन्द्र आदि ने कहा- जब दैत्यो को दानवो को और बुरी दशा वालो को भव होता है ।५६। दैत्याचार्य शुक म्वय ही कृपा करके उनके कल्याणार्थ उद्यमी होगे । इमसे हे विप्रशार्दुल | आप हमको विस कारण मे उपेक्षित कर रहे हैं ।५७ हे मान्यवर J आपके लिये क्या कार्य अगाध्य है । हम सब लोग आपये पारण में प्राप्त हुए हैं। ममे जो

शिव महिमादिक क्यन ]
।
भी दुर्जन हैं व सव वेदमार्ग मे रति रखने वाले दिये गये हैं ।५८१ हे
पानिधे । उनले चमोदन करने के लिय आप यत्न वरिये जो भी दत्य
हैं-राक्षस हैं देव हैं और पाप कर्म करने वाले हैं उाका व्यमोदन करने
का प्रयल परिय 1481 मूतजी ने कहा-इस प्रकार से देवाचे बोलने
पर उदार युद्धि वाले वृहस्पति जी ने सृष्टि के सरक्षण के लिये कोई
उपचार सोचा था ।६०। गुरगी ने कहा है विहशो । मेर उपाय को
आप सब लोग श्रमण वीजिय । मैं आपका बतलाता हूँ। कोई देय यदि
पपरी होता है और स्वय वैष्णवभो कपटी होता है। चाहे वह सब-चक्र
से अथित तनुवाला हो और तुलमी वाट से भी भूपित हो-ऊध्वपुण्ड
को धारण करने वाला हो थीहरि के नाम को जाप रहा हो-देवता
मात्र की निन्दा करन वाला हा और ईश्वर मे मनिन करक शिवना
पी हो तो वह महा पाप का प्रेरय गिव निन्दर हुमा परता है ।६१॥
से ।६३ ।
दम्भेन यदि तद्राज्ये शिवनिन्दा ना भवेत् ।
तदा तत्पूर्वजा सर्वे नरक यान्ति दारणम् ॥६४
ततो देवेप सर्वेषु न पश्चिदवदत्तथा।
पथयन्ति स्म चान्योन्य नेतत्वमास्ति गुन्दरम् ॥६५
परवाण्डाल शिव यामाधारण्येन विष्णुना ।
यस्य प्रमादा पुण्ठ प्राप्नवानीहा पदम् ॥६६
तत विनरम हय प्रावाचेद मनीति ।
याहि किनर मायावी भूत्वा त्य प्णवो भुवम् ॥६.
तत्र गत्या जगान्गर्यान्य हि यो:स्ति शिवो महान् ।
एप एव महाविनापो ध्येय क्या ॥६८
पूर्व प्रच्छाम्पंग स्थित्या मार्ग प्रशां।
पन पनजना एव मविपनि गरेलुगा IIE
वै. प्रमानामि पर वस्तिव्य या गा।
पर स्वैरो महाधिल गियासुम्य सिर .

१४८ ]
[ सूर्य पुराण
यदि उसके राज्य में दम्भ से शिव को निन्दा की हुई होती है।
तब उसके समस्त पूर्वज दारुण नरक मे जाया करते हैं ।६४। इसके
अनन्तर सब देवो मे कोई भी ऐसा नहीं बोलता या ।
सब अन्योन्य
से कहते थे कि यह कर्म सुन्दर नही है ॥६५॥ साधारण्य विष्णु के समान
कोन सा चाण्डाल है जो भगवान् शिव को बतलाता है। जिसके प्रसाद
से वैकुण्ठ में ऐसा पद प्राप्त किया है ।६६। स्तजी ने कहा-इसके
अनन्तर किन्नर को बुलाकर शचीपति ने कहा- हे विनर ! तुम
मायावी होकर विष्णु भगवान की भूमि को चले जाओ ।६६। वहा
पहुच कर सब मनुष्यो से वोलो · महान् शिव कौन है ? एक ही महा
विष्णु हैं। अन्य कोई भी कभी ध्येय नही है ।६८1 पूर्व मे प्रच्छन्न रूप
से स्थित होकर मार्ग को दिखलाओ। धीरे-धीरे जन इस प्रकार से हैतुक
हो जायेंगे ।६६। आपको मदा यहो वोलना चाहिये कि वेद ही प्रमाण
है परन्तु एक महा विष्णु ही है । शिव तो उनका किंकर ही है ।७०।
प्रेरितोऽसो बलात्तेन भीतोऽगच्छच्छणैः शनैः ।
दाम्भिक रूपमास्थाय यथा साधु वदेजन ॥७१
मर्ववैष्ण वचिह्नानि धृत्वा भ्राम्यति तत्पुरे ।
शिष्यान्करोति तत्पूर्व वदेन्मान्यो न शङ्कर. ॥७२
क्वचिद्वदति न ध्येयो न मुख्य इति च क्वचित् ।
क्वचिदुत्कृष्ट जीवोऽय कचिच्छीविष्णुकिंकरः ।।३
इति नानाविधा बुद्धिनराणा भेदिता यदा ।
तदा शिष्य परिवृतो राजगेह विशत्यपि ॥७४
चालितो राजलोकोऽपि विरुद्ध नैव दृश्यते ।
विष्णुभक्तो महाशान्तो वेदवेदाङ्गपारवान् । ७५
उपायनान्यनेकानि हयाश्च स्यन्दनान्वसु ।
लोका सर्वे ददत्येव गुप्त पाप न दृश्यते ॥७६
सूत जी ने कहा-उसके द्वारा प्रेरित हुआ वल पूर्वक वह भेजा
। डरते हुए धीरे-धीरे वहां गया था उगने दाम्भिक स्वरूप धारण

शिव महिपादित कथन ) [ १४: पर गया था। जिससे मनुष्य उसको साधु बहें।७१। समस्त वंष्णव पे निलो पो धारण र उमो पुर मे धारण करता था । पहिने उन सोनिय करता है फिर कहता है frगर मान्य नहीं है ।७२। पही तो वह रहता है कि शिव ध्यान करने के योग्य नहीं हैं । और वह पही भी मुख्य नहीं है । कही पर वह पहता था शिव एक उत्कृष्ट श्रेणी का जीव है और कही पर रहा करता था वह श्री विष्णु का सिर है 1७३। जब हम प्रकार से अनेर प्रसार को मनुष्यो की बुद्धि को मोहिन वरदी थी नब वह शिष्या से परिवृत होर राज गृह में मी प्रवेश करता था ५४१ राज लोक भी उमने बालित कर दिया है और विरुद्ध नहीं दिखलाई देता था। विष्णु का भक्त मह नृशान्त और वेद- वेदाङ्ग के पार वाला था ७५॥ अनेक उपायन अश्व-रप-बमु सभी लोर दिया ही वरने हैं और गुप्त पाप नही दिखलाई देता है ।७५ एकस्मिन्ममये विश्रा एकादश्यामुपोपिता । जना प्रातश्च कणि नमस्सतुंगता शुभा ॥७७ तत्रोपविष्ट गिप्पै स्वैन स्वीयेन तेजसा । न कचिन्मन्यते विप्र यो भस्माद्वितभालवान् ॥७८ एतस्मिन्नन्नरे राजा प्राप्नवाश्रीप्रतर्दन । वृतो बहुविधविन कुशहस्तै शुचिव्रत ॥७६ त्रिपुण्डधारिण केचिर्ध्वपुण्डधरास्तथा । पठन शिवसूक्तानि विष्णुसूक्तानि चापरे ॥५० एतैर्बहुविधविवृतो राजोपविश्य स । उवाच वचन युक्त कोमलाक्षरसयुतम् ॥८१ स्वामिन्नागतवान्साक्षाद्भगवा-हरिपार्षद । वेद पठसि विष्णोश्च भक्तस्तद्वेषधार्यपि ॥२ सूजी ने कहा- हे विप्रो । एक समय मे एकादशी में उपोषित मनुष्य धात काल को शुभ लोग चक्रमणि को नमसार करने के लिये गये थे १७७। वहाँ पर बैठा हुआ वह अपने शिष्यो से वरिवृत अपने तेज से १५० ] { सूर्य पुराण पिसी भी निपुको नहीं मानता है जो दि भस्म से अङ्कित ललाट वाना था ।७८। इसी बीच में श्री प्रतर्दन राजा वहा पर प्राप्त हो गया था। यह राजा हाथो मे कुशा लिये हुए सुचित वाले बहुत से विप्रो मे घिरा हुआ था ।७६। उनमे कुछ विपुण्डधारी ने और बुध ऊर्जा पुण्ड धारण करने वाले थे। वे सब शिव सूक्तो को याद कर रहे थे तथा दूसरे विष्णु सुत्तो को पढ रहे थे 1८०। इन बहुत सी तरह के विर्षों से परिवृत वह राजा वहाँ पर उपनिष्ट हो गया था। फिर राजा ने कोमल अक्षरो से समन्वित युक्त वचन कहा था ८११ है स्वामिन ' यह माक्षात् भगवान् का हरिपार्पद ममागत हुआ है वेद का पाठ करता है विष्ण, या भत्ता है और उनके ही वेप को धारण करने वाला भी है ।१२। वेद एव पर श्रेयो वेदार्थादधिक न हि । प्रमाण वेद एवैको विष्णुवाक्थु तिरेव च ।।८।। राजन्वेदार्थविज्ञाने वहवो मोहिता जना । शिवपूजारता सन्तो नानादैवतपूजका ||८४।। एको विष्णुर्न द्वितीयो ध्येय किं त्वितरै सुरै । कर च क्रूरकर्माण शकर मन्यते कथम् ॥८५|| त्वदीया ब्राह्मणा एते ऊर्ध्वपुण्डाङ्किता शुभा । तान्दृष्ट्वा प्रीतिरत्यर्थ जायते नृपसत्तम ॥६॥ एते त्रिपुण्डभाला ये कररुद्राक्षमालिन । पठन्त शिवसुक्तानि दृष्ट्वा दज्र पतेद्दिव ॥७॥ दर्भत्योपग्रह कोऽय किं वा भस्माङ्गधारणम् । रुद्राक्षा का च को रुद्र कानि सूक्तानि तस्य च | विष्णरेक परो ध्येयो नान्यो देव कदाचन । तदीयायुचिह्नानि पूज्यो वै वैष्णव सदा ।।८।। पैणप्वाभास ने कहा-वेद ही परमय है और अन्य कुछ भी आर्य से अधिक नहीं है। एक वेद ही प्रमाण है । यह विष्णु वा धन तथा श्रुति है ।१३। राजन् । वेदो के अर्थ के विज्ञान में बहुत से ए गिन महिमादिका क्यन ] [ १५१ जन मोहित हो रहे हैं । पुछ गिद वी पूजा में रत है और नाना देवी है।८४ारी विष्ण भावात् ध्येय हैं दूसरा कोई भी ज्यान करने याम्य नहीं है। फिर इतर मुरी से क्या प्रयोजन है। महान क्रूर और हर ही कर्मों में करने वान शङ्कर पो को मानते हैं ।।५। ये राव ऊर्ग से अक्ति आपके ही विप्न हैं जो शुभ हैं हे नृप श्रेष्ठ । उनसे देगार मुझे अत्यन्त ही प्रीति होती है। जो ये रिप ण्ड भाल वाले हैं और हाथ में न्द्राज की माला धारी हैं जो पि शिव मूक्त का पाट कर रहे हैं उनको देवार दिन लो मे बच गिरता है १८६८७) धर्म का उपग्रह यह क्या है अथवा अङ्ग मे भस्म का धारण करना भी कश हैं । रद्राक्षा कोन है और रुद्र कौन है और उमक सूक्त क्या हैं 100 एव विष्ण, ही पग्म देह है । अन्य कभी भी कोई देश है ही नही । उमर य आयुधा के चिह्न है । अतएव वैष्णव जल सदा ही पूजने के योग्य हैं । अनादिना प्रमागोन वेदेन् प्रोच्यते शिन । विष्णोरप्यधिको विप्र मपूज्यो न क्थ भवेत् ॥६॥ शिवादिषु पुराणे तु प्रोच्यते शङ्करो महान् । सर्वासु स्मृतिषु ब्रह्मशिवाचारेषु सर्वत ॥१॥ नानागमेपु पुण्येषु प्रोच्यते ह्यज ईश्वर । कठोर वाक्यमेतत्ते भाति चेतमि मेऽशनि ॥२॥ नैकाग्रमनसस्ते तु येऽर्वयन्तीह घूर्जटिम् । श्मशानवासी दिग्वासा ब्रह्ममस्तकधृग्भव ॥६३|| सर्पहार क्थ सेव्यो विषधारी जटाधर तम्माद्विप्णु सदा सेव्य मुन्दर कमलापति ॥६४|| नानारूपाणि रुद्रस्य के जानन्ति नराधमा । त्व वैष्णव इवाभासि वेदार्थ नैव वेत्सि रे ॥६॥ चिन्तयित्वा ततो राजा विदुपो ब्राह्मणोत्तमान् । आहूय निर्णय चास्य करिष्यामीति तत्त्वत ||६|| १५२ ] । सूर्य पुराण राजा ने कहा-अनादि प्रमाण वाले वेद वे द्वारा भगवान् शिव कहे जाया करते है । हे विपुर भगवान शिव तो विष्णु मे भी अधिक पूजा के योग्य होते हैं फिर ऐसा क्यो नही होना चाहिए 180 शिवे मादिक पुण्यो मे भगवान् गकर महान् कहे जाते है । सय स्मृतियो मे हे ब्रह्मा ' सभी गिवानारो में और नाना आगनो मे और प्रण्यग्रन्थो मे अज ईश्वर बताये गये हैं। आपका यह वाक्प अत्यन्त ही कटोर प्रतीन होता है और मेरे चित्त म एक वच्च के समान ही आघात पहुचा रहा है ।।१।१२। वैष्णयामास ने कहा- वे एवापानमन वाो नहीं है जो धूर्जाटिका अर्चन क्यिा करते हैं भव श्मशान में निवास करने वाले दिगम्बर (नग्न) और ब्रह्म मरवत को धारण करने वाले है वे सो पा हार पहिनने वाले हैं विषधारी और जदा रसने वाले हैं ऐसे गिव मा सेवन यपो करना नाहिए । कमला ये स्वामी विष्ण, परम सुन्दर हैं 18३।६४। राजा न पग-भगरात् रुद्र के अनेक स्वरूप हैं पौन अघम नर उनको जानत हैं । तुम वैष्णव ये ममान हो भागित हो रहे हो विन्तु अरे । तुम वदो के अर्थ का नही जानते हो । मूतजी ने कहा- इनरे अनन्नर राजा ने चिन्तन फरक उजम विद्वार ग्राहाण यो बुर हा IT नाज तात्तिा य में इस बाा का निर्गय में बागा । । कलि प्रवेशादि कथन । गृह गत्वा म्पिगे भूत्वा यावदादयते द्विजान् । तावदेव पति पापो ब्राह्मणेपु विवेग ह ॥१॥ पनिद्राजानमाश्रित्य यूते नाहगमेव हि । अन्योन्यामपंपोगण गण्डयन्ति परम्परम् ॥ मोभायाधिता निचिद्ययावादिन । यो यथा पनि तागिरयचियोनिरे ॥

वलि प्रवेशादि क्यन ] 11 इति कोलाहले वृत्ते याजचेतसि निर्णये । जाते लोके नास्तिकता वसव प्रतिपेदिरे ॥४॥ राजा वेत्ति महामूर्ख न तु मायाविन द्विजम् । लोके तु भ्रान्तिमापन्ने राजा चिन्तापरोऽभवत् ॥५॥ ईश्वर हन्ति दुष्टात्मा बध्योऽय मम शास्त्रत । पर तु लोको ब्रह्मघ्न मिथ्या मा तु वदिष्यति ।।६।। मृतजी ने कहा-~-गृह म जाकर स्थिर होकर जब तक द्विजा का आह्वदन करता है तभी तक पापी कलि थे ब्राह्मणा म प्रवेश कर लिया था ।। कोई राजा क पास आकर वैसा ही वालता था और अन्योय अमर्ष के योग म परस्पर म एक दूसरे की बात का खन्डन कर रहे थे। कुछ लोग मूकीभाव का ही आथय लकर स्थित थे और कुछ कुछ यथाय याद करने वान थे । जो जैसा वहता था वह उस प्रकार का था । और कुछ इस प्रकार मे कह रह थे ।३। इस तरह से महान् कोलाहल के हो जाने पर गजा के चित्त म निणय के होने पर लोक म बहुन से नास्तिकता के भाव को प्राप्त हो गय थे 1४1 राजा मायावी द्विज को महामूख नहीं जानता है । लोक के इस प्रकार मे भ्रान्ति म प्राप्त हो जाने पर राजा अत्यत ही चिन्ता परायण हो गया था। यह दुष्टात्मा ईश्वर का हवन करता है। शास्त्र के अनुसार इसका मुझको वध कर देना चाहिए किन्तु लोक मुझको ब्राह्मण के हनन करन वाना मिथ्या ही बहगा ।६। एतस्मिन्समय प्राप्त लोकपूवपितामहा । म्वर्गान्द्रट्वा ह्यनेकानि नरकाणि प्रपेदिरे |७|| र पा पुनाश्व पौनाश्च प्रतिपौनाम्नयापरे । मातामहादिवर्गाश्च सखिसबन्धिवान्धवा ॥८॥ शिवावगणनोद्भ तपातका यमलोकगा सुत भस्मता यात मद्यादङ्गोदक यथा ॥l १५४ ] । सूर्य पुराण एतस्मिन्नेव काले तु कमलादयगम । सुप्त आक्रन्दमकरोच्छोणितौघपरिप्लुत ॥१०॥ लक्ष्मीदृष्ट्वाऽथ तद्रूप विह्वल भयविह्वला । प्राप्ताऽऽश्चर्य महाधोर रुरोद भृश खिता ॥११।। वेदान्तवेद्य पुरुषेश्वर देवदेव त्रैलोक्यनाथ किमिद त्वयि दृश्यतेऽद्य । आकारमात्ररहित पुरुष पुराण स्त्वय्येव विश्वमिह रज्जुभुजगमानम् ॥१२॥ शैला पतन्ति जलधिर्मरुतामुपैति सूर्यादयो हतरुच पृयिवो पराणु । भूतानि चाच्युत विभो विलय प्रयान्ति त्वद्रोममानमपि नैव चलेक्षणार्धम् ॥१३॥ श्री सूतजी ने कहा- इस समय के प्राम होने पर लोक पूर्व पिता- मह स्वर्ग से भ्रष्ट हुए अनेको नरको मे प्राप्त हो गये थे ७। जिनके पुत्र-पौत्र-प्रति पौन तथा दूमरे मातामह वर्ग वाले सखा सम्बन्धी और वान्यव भगवान् शिव को अवगणना से उद्भत पातक वाले हो गये थे वे सव यमलोक मे गये थे। उनका मभी सुकृत भस्मी भूत हो गया था जमे मद्य से गगो वा जल भी अपवित्र हो जाया करता है ISIRL इमी वाल म यमता का हृदय गम मुप्त होता हुआ शोणित के ओघ से परि- प्लत हुआ आक्रन्द करता था। लक्ष्मी ने विह्ना उस स्प यो देखा तो वह भय मे विहला हो गयी थी । उनको महान् आश्चर्य प्राप्त हो गया था और वह अत्यन्न दुखित होकर होकर दिन करने लगी थी ।१०। ।११। लक्ष्मी देवी ने कहा-हे वेदान्त के द्वारा जानने के योग्य | हे के ईसा आप देवो भी देव है। है नोवय ये नाथ । आज ३ यह क्या दिखलाई दे रहा है। आपतो आवार मात्र मे रहित पुराण पुरुष हैं । आप मे ही यह विश्व गरजुभुजङ्ग मार स्थित है।

कलि प्रवेशादि क्यन ]
। १५५
गेल जलाधि म गिरते हैं और जलाधि अली को प्राप्त होता है । सूर्य
आदि सब क्षीण कान्ति वाले हो गये हैं-पृथिवी पराण हो गई । हे
अच्युत ' हे विमो । भूत मव विलय को प्राप्त हो रहे हैं . आपया रोम
मात्र भी आधे क्षण तक नहीं चरता है।१२।१३॥
उपत त्वया तदपि धिम तथव किंतु
मत्स्वामिनोवगणना न हि शक्यते मे।
कृ वाऽपि पूज्यतममूर्मिम गिरीश
नो मन्यते तदिह वज्रमम ममैव ।।१४
सर्वान्मा सर्वरित्र्ता वना धर्ताऽयय प्रभु ।
त्व साक्षी सर्व लोकाना त्वत्त परतरोऽस्ति क ॥१५
अस्ति सर्व वरारोहे माग तत्तथ्यमेव हि ।
श्रीमहेशवरारच मदीय न हि किंचन १६
एक मृजति भूतानि मत्समानि कियन्त्यपि ।
तत्तत्व वेभ्यह देवि मदीया वेचनापरे ॥१७
वेदवेदाङ्गवतणा सहस्राण्यग्रजन्मनाम् ।
हननान्मुच्यत जीवो न तु श्रीशिवहे ननात् ॥2-
गुर्वङ्गनागमनकृत्मदा मद्यनिषेवक ।
ब्राह्मणस्वर्णहारी च कदाचिन्मुच्यत जन ॥१९
स्त्रीघ्नो गोघ्नो नृपघ्नश्च तथा विश्वासघातक ।
कृष्नो नास्तिको लुब्ध कदाचिन्मुच्यते जन ॥२०
न तु श्रीरुद्रमामान्यदर्शी मुन्येत बन्धनात् ।
विरञ्चिविष्णु शकेभ्य सर्वोत्कृष्ट न जायते ॥२१
विष्ण ना यदि वा तुल्य मुच्यन्ते नव जन्तव ।
स्वामी मदीय श्रीकण्ठस्तग्य दासोऽस्मि सर्वदा ॥२२
श्री नारायण ने कहा-हे लक्ष्मी । नुमने जो कुछ कहा है वह ठीक
वमा ही है किन्तु मेरे स्वामी को अवगणना मुझ से सही नहीं जाती है।
इन भगवान् गिरीम को पूज्यतम मूत्ति बाल करके भी जो इनका मान

? १५६ ] [ सूर्यपुराण नही किया करता है वह मुझे वज्र के ही समान आघात करने वाला होता है ।।१४।। लक्ष्मी देवी ने कहा-~-आप तो सर्वात्मा है सबके ज्ञाता हैं—सबके का है—वक्ता-धर्ता-अव्यय और प्रभु हैं। आप सभी लोका के साक्षी हैं । आप से भी पर तर कौन है ? ॥१५॥ श्री नारायण ने कहा-हे. वरारोहे | सबही है मेरे विषय मे जो कुछ तुमने कहा वह सब ही तथ्य ही है । मैं ने भी महेश से ही वरदान प्राप्त किया है और मेरा अपना वास्तव मे कुछ भी नहीं है ।।१६। वे एक ही ऐसे शक्तिशाली महा पुरुप है जो एक अकेले ही मेरे ममान कितने ही भूतो का सृजन किया करते हैं हे देवि! उस तत्व को जानता हूं और जो मेरे कुछ दूसरे हैं वे जानते है ॥१७॥ वेद वेदाङ्गो के ज्ञाता सहस्रो विप्रो के दमन से जो महा पाप होता है उससे भी जीव मुक्त हो जाया करता है किन्तु श्री शिव को अवहे ननाकर ने से जो पाप होता है उससे छुटकारा कभी नही होता है ॥१॥ गुरु शय्या पर गमन करने वाना और सदा मदिरा के सेवन करने वाला और ब्राह्मण के स्वर्ण का हरण करने वाला जन भी कदाचित मुक्ति पा सकता है स्त्री का हन्ता-गो का दमन करने वाला नृप को मारने वाला तथा विश्वाम का घात करने वाला-कृत को न मानने वाला-ईश्वर को सत्ता को नहीं मानने वाला और तुच्छजन शायद कभी मुक्त हो सकता है किन्तु भगवान् रुद्र को सामान्य समयने वाला मनुष्य पाप वे बघन से भी मुक्त नहीं होता है । जो यह कहते है कि शिव ब्रह्मा विष्णु इन्द्र से सर्वोत्कृष्ट नही है । यदि यह भी कहे कि ये विष्णु के तुल्य ही है उस पाप से भी जन्तु मुक्त नहीं होते हैं। मेरे स्वामा श्रीगण्ड हैं और म सर्वदा उनका दास ही हू ॥९॥२०॥२१॥२२॥ गच्छामस्तय वैकुण्ठ यत्र स्वाम्यस्ति ते विभो। पलासपर्वने रम्ये प्रणमाम सदाशिवम् ।।२३ तरस्न गहडारूढी गत्वा नासपर्वतम् । नानाविध स्तोत्रपदं सतुष्ट चक्रनु क्षणात् ।।२४ तनो ब्रह्मादया देवा सिक्षास्तमाता गिरी। रद्र कौतूहनप्रेमु सस्तै परिवारित ॥५५ कलि प्रवेशादि कथन ] [ १५७ भवानीसहितस्तत्र गतो यत्र प्रतर्दन. । मर्वश्वविमानाना मध्ये तिष्ठति शकर ॥२६ क्थयन्तु कथ द्य ते मिविता. सर्वनिर्जरा । कि कार्य किमपूर्ण वा राजा चिन्तातुर क्थम् ।।२७ श्री लक्ष्मी देवी ने कहा है विभो ! हे वकुण्ड ! चलो वहां पर ही गमन परो जहाँ पर आपके स्वामी विराजमान रहते हैं। परम भ्य कैलास पर्वत पर हम लोग सदा शिव प्रभु को चलकर प्रणाम करें॥२३॥ श्री मूगजी ने कहा- इसके उपग-त वे दोनो गरड पर समारुद्ध होकर लाम पर्वत पर गये थे और वहीं पर अनेक प्रकार के लोगो के द्वारा स्वय न करके क्षण भरमे उनको सन्तुष्ट कर दिया था ॥२४॥ इसके अनन्तर ब्रह्मा यादि देव और मिट गण भी उस गिरि पर वहां समागत हो गये थे। यौतूहल को देखने की इच्छा वाले भगवान रुद्र देव उन सबके द्वारा परिवारित कर लिये गये थे ॥२५॥ भवानी के सहित भगवान, शम्भु वहाँ पर गये जहाँ राजा प्रतर्दन विद्यमान था। सव देवो के विमानों के मध्य मे भगवान् रुद्र विराजमान पे ॥२६॥ श्रीमहेश ने पहा--आप लोग मत्र बसाइये कि किस कारण से ये मब निजर (देव) मम्मिलित होकर समागत हुए हैं ? ऐमा क्या कार्य है और क्या कोई अपूर्व वात है ? राजा चिन्ता मे आतुर वो हैं ॥२७॥ स्वामिन्प्रतर्दनो राजा विविलधवरोम्भवत् । वेदमागंश्वका चस्प तस्य प्रवर्तक २० मृष्टिरक्षार्थमम्माभि कपट कृनमीश्वर । सर्वधातुश्च भवतो हेलन कारित सुरं. ६ तत्दामस्व महादेव निरोध्य प्रतित.। कल्पितो गेष्णवास्माभिम्नव निन्दाारायण. ॥३० एतस्मिन्नेव पाले तु राजा वृत्तानमेयिवान् । तीन पग ममादाय हनवारि ऋघा ।।३१ .

१५८ ] [ मूर्य पुराण तत्पक्षपातिनो ये च तेषा शीर्पापि कयरात् । पृथक्कतानि पश्वाद्या हता अश्वा अनेकश ॥३२ न त वारयते कश्चिद्राजान पुण्यचेतसम् । महादेवेन शमित क्रोधस्तस्य महात्मन ॥३३ ततः कोलाहले शान्ते नदी कौतुकपूर्वकम् । युयोज हयशी तच्छरीराणि पृथक्पृथक् ॥३४ शीर्षाणि हयगात्रौश्च सम्यक्सयोज्य बुद्धिमान् । उवाच वचन तथ्य देवससदि शुद्धगी ॥३५ येन वक्त्रेण गिरिशो हेलितरतन्मुख हयः । मुद्राधारणगण हेलितस्तत्तनुई य. ॥३६ देवो ने कहा-हे स्वामिन । राजा प्रतर्दन विधाता से वरदान प्राप्त करने वाला था। वह वेद के मार्ग वा प्रवर्तक था ॥२८॥ सृष्टि की रक्षा के लिए हम सबने हे ईश्वर | वपट किया था। सुरो ने सर्व घाता आपकी अवहेलना कराई थी ।।२६॥ हे महादेव। उसको अब आप क्षमा घर दीजिए। यह विनार ही उसका प्रवर्तक है। हमने इमरो वैष्णव रूप वाला कल्पित कर दिया था यह आपकी निन्दा मे तत्पर हो गया था ॥३०॥ सूत जी ने कहा-इसी वाल में राजा ने वृत्तान्त प्राप्त पर लिया था और तीन सङ्ग हाथ में लेकर प्रोध से उस विप्नर यो भी मार डाला था।३१। उसके पक्षपात करने वाले जो भी उनके शीपों को पन्धरा से पृथक कर दिये गये थे । पशु आदि अनेव अश्व मारे गये थे ॥३२॥उस युग्म चित्त बाले राजा कोषोई भी निवारित नहीं परता है उस महान् आत्मा याने बायोप महादेव जी ने ही दामित किया था ॥३३॥ गरे अनन्ता कोलाहल में पान्त हो जाने पर नन्दी ने पौतुम पूर्वक हमसे गोर्ष में पृथर, २ सप्लीमो मानिन पर दिया पा ॥३४॥ युधि माने शीपोमो अश्य ये गानों में भी भांनि गपोजिा र पुर पापी कारे देवो को मगन में तच वयम frयापा। बिग मुग कलि प्रवेशादि कथन ] [ १५६ गिरिश थे और हेलित उनका मुख देय या। मुद्रा धारण के गर्व से उसके शरीर वाला हेलित हुआ था ॥३१॥६॥ जात तदधुना तथ्य राजपों राज्यकर्तरि । भविष्य कययिष्यामि तन्छुगुव समाहिता ॥३७ घारे कलियुगे प्राप्त म्लेच्छप्तेि भुवनले । सर्वाचारपरिभ्रष्टा भविष्यन्ति नराधमा. ॥३८ तदाऽऽन्ध्रीदेशमध्ये तु दाक्षिणात्यो भविष्यति । ब्राह्मणो दुभग कश्चि द्विधवाब्राह्मणीरत ॥३६ तस्य पापिष्ठविप्रस्य व्यभिचारात्मुतोऽनघ । भविष्यति गुणान्वेषी देवादध्ययनात्सुकः ।।४० पद्मपादुरुमाचार्य वर वेदान्तवादिनम् । अद्वैतागमवोद्धार प्रणम्य प्रार्थयिष्यति ।।४१ विप्रोह मधु शर्माऽस्मि स्वामिन्मा पाठ्य प्रभो। वेदान्तशास्त्रसर्व च मह्य पाठय भो गुरो ॥४२ श्री ब्रह्माजी ने कहा था-जो राज्य पती राजपि ये विषय में जोनध्य था वह अब तर बता दिया गया है। आगे जोगविष्य है उसका वर्णन पर गा| आप लोग परम सावधान होरर उसरा धरण परिए ॥३७॥ पोर पलियुग में प्राप्त होने पर इस मूमण्डल मेट्रो द्वारा प्यार हो जाने पर अपम नर सभी प्रकार ये अन्द आचरणी में परि- प्रष्ट हो जाणे ॥३८॥ उग ममप मे आनन देश मध्य में शिवार होगा । भोई दुभंग बाह्मा विषवा बालगी म नि राने वाला होगा ! उम महान् पापिष्ट विधा समिधार से अनप गुन होगा यो गुणों का अन्यपगने वाला और देव वग अम्ययन गे में गमुगुर होगा Pron यह परम अंसाना पारी पसगा पापा से माताको सारा नाम से प्रापना करेगा हामिद प्रभो । म गर्मा माग या विमुगार ! सम्पूर्ण देशमुसो mmu १६० ] G { सूर्य पुराण आचार्य करुणामतिविनियेन परिप्लुप्नम् । करिष्यति च शिष्याणामग्रण्य प्रेमवत्सल ॥४३ ततो दिने दिने भक्ति करिष्यति यया यथा । गुरुर्भवति सनुष्ट सर्वा विद्या प्रयच्छति ।।४४ एकदा गुरुणा दृष्ट स्नानसध्यादिका क्रिया। अकृत्वा भोतनप्रेप्मुर्भविष्यति निराह्निक ॥४५ पृष्टोऽसौ गुरुणा तथ्य गोलको हि वदिष्यति । धर्म साधारणो नाथ कृतोऽय केन कुप्यसि ॥४६ ततो वक्ष्यत्यथाऽऽचाय कस्ते तात प्रसूश्च का । ततो मे ब्राह्मण स्वामि-ब्राह्मणी च प्रसूमम ॥४७ वद मातामह कस्ते येन प्राप्ना प्रमूरतव । को विधि कुत्र वा दत्ता तथ्य शीघ्र वदान्यथा ॥४८ भस्मसात्वा करिष्यामि हीन ब्राह्मणवच सा । इत्येव कथिते सर्व कथयिष्यति तत्त्वत ॥e प्रेम वत्सल आचार्य करुणा की मूर्ति थे विनय स परिल्पुत उसको शिष्यो मे सबका अग्रणी उसको कर देंगे ॥४३॥ इसके पश्चात् दिन-दिन मे जैसे २ वह भक्तिभार करेगा गुरुदेव परम सन्तुष्ट होकर अपनी विधा उसको दे देते हैं ।।४४।। एक बार गुरुवर ने उसको देखा था कि वह स्नान-सध्योपासना आदि कुछ भी किया न करके हो निराह्निक वह भोजन का प्रेप्म हो जायगा ।।४।। गुरु जी ने उससे यथार्थ बात पूछी थी तो वह गोलक कहेगा । हे नाय | धम तो साधारण है वह पर लिया गया है फिर किस कारण से कुपित हो रहे हैं ।।४६।। इसके पश्चात् आचार्य उससे वहगे-तेरी माता कौन है और तेरा पिता कौन है । इसके अनन्तर उसने कहा था-हे स्वामिन | मेरे तात ब्राह्मण ये और मेरी माता भी ब्राह्मणी थी। फिर गुरुजी ने पूछा पा-तेरा माता- मह कौन था जिससे तेरो माता प्राप्त हुई थी? क्या विधि से विवाह हुमा पा । वहा पर उसको दिया गया था~यह सब नष्प टी २ बल प्रवेशादि कथन ] [ १६१ बतलाओ अन्यथा अर्थात सही-सही न बतलाने पर मैं तुझको भस्म कर दूगा क्योकि तू ब्राह्मण के वचंस से हीन है । इस प्रकार से कहने पर यह सब बुध तात्विक रूप से यह देगा ॥४९॥ शाप दाम्पत्यथाऽचार्य सिद्धान्तो मा स्फुरत्यलम् । सिद्धान्ते जडता तेऽस्तु परमद्वैतदर्शने १५० कथ त्वदीया सेवा मे निष्फला स्याद्वद प्रभो। इत्यादिपनिवेद यदा स्वेप करिष्यति ।।५१ पश्चाग्ददिप्यति स्वामी पूर्वपक्षोऽस्तु ते दृढ । सिद्धान्ते सर्वथैवान्ध्य मम वाक्य न चात्यथा ॥५२ मधुना तेन शास्त्राणा पूर्वपक्षो विलोक्ति । भविष्यति च वेदान्तमन्यथा क्तु मुद्यत ॥५३ यथा यथा कलेदं वा प्रचार. सावष्यति । तथा तथा यमुन्माग शिवद्वेष्टुभविष्यति ॥५४ पूर्व तु द्राविडा(शास्फटिकतिलङ्गयो । मानगोदावरीतीरे प्रमृतोऽय भविष्यति ॥५५ पूणे गलियुगे प्राप्त मावि बलिष्यति । मायावादमसच्चस्त्र पदिप्यन्ति नराधमा ॥१६ सय अनन्तर वह आचार्य शाप द देगे यह शास्त्र जो तूने पढ़ लिया है उसका गिद्धान्त तुमको पूर्ण रूप से स्पुरित न ही होगा। परम देत दान में सिद्धान्त में तुम जाता होवेगो ॥५॥ जब यह शिष्य जिरा रामय में प्रार्थना करेगा कि हे प्रभो । आपको इतने दिशता की हुई मेरी सेवा निप्पल पंग हो जायगी- यह तो आप मुझे यमला दीजिए। स्यादि प्रकार का यहुत-मा निद करेगा तो पीद स्वामी पीदि महेंगे तेरा पूर्व पातो गुरद रेगा परम्नु nिers मय पता ही रहेगी मोहि मेरे पुग से निरमा प्रा यावर मपया नहीं होगा। बात रोमार मेने देदिया है यह असत्य नहीं होगा ॥१२॥ उम मधु न पानी का पूर्व पापा और वेशार को अपपा परने के लिये

१६२ ]
[ सूर्यपुराण
वह उद्यत हो जायगा ॥५३॥ हे देवो जैसे जैसे कलिका प्रचार होगा
वैसे वैसे ही यह शिव के द्वष्ठा का उन्मण होगा ॥५४॥ सब से पूर्व मे
यह द्रविड देश मे होगा और वहा से फिर यह कर्णाटक और कलिङ्ग
देशो म होगा तथा शनै शनै गोदावरी ने तट पर यह प्रसृत हो जायगा
॥५५।। कलियुग के पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाने पर यह आर्यावर्त मे
चलेगा । अधम नर मायावाद असत् शास्त्र को ही बोला करेंगे ।। ५६।।
तेपा दर्शनमात्रेण सचैल स्नानमाचरेत् ।
भद्रात्व च यथा विष्टे राहो स्वर्भानुना यथा ॥५७
हरित्व च यथाऽनेके तथं ते तत्त्ववादिन ।
योगनिन्दापरा नित्यमग्निहोत्रस्य निन्दका ॥५८
वेदान्तसममित्याहु पुराणानि च ये नरा ।
केवल वेपमात्रेण नरा नरवगामिण ॥५६
सभापणे कृते येपा पतेच्च ब्रह्मवचस ।
वर बौद्धस्तथा जैन कापालिसमतोऽपि वा ।।६०
व्यक्त वदति वेदानामप्रामाण्य तु तैः किमु ।
वेदप्रामाण्यवत्कृत्वाऽभिमानी न च वैदिक ॥६१
ईश्वर वचनाद्वक्ति पर चानीश्वर सल ।
एव जाते तन सर्वे यथागतमितो गता ।
प्रतदंनो.पि राजपि कृत्वा राज्यमकण्टकम् ॥६२
देहान्ते मुक्तिमापन परामद तलक्षणाम् ।
तत पर भविष्यन्ति तम्य शिष्या आपश ।।६३
उनके अर्थात् ऐसे अधम मनुष्यो के दान मात्र से ही वस्त्रों के
सहित स्नान करना चाहिए बर्यान् दर्शा करने के समय में जो भी यस्त्र
पहिने हुए हो उन सवा हो सहित स्नान करे । पिटि को जैसी भद्रात्व
होती है और राह पो स्वर्भानुता होती है वैसे ही हरिय है इस प्रकार
में असम की संभार मारो गालामनिवासरत में
पराण होगे तया रिप हो लग्निहोत्र की निदा परी वाले हो जायगे

कलि प्रवेशादि कथन ] [ १६३ ॥५७॥ ५८।। जो नर पुराणे को वेदान्त शास्त्र के ही समान कहते है वे केवल वेप मात्र से ही नर हैं और नरको मे गमन करने वाले होते हैं ॥५६॥ जिनके साथ सम्भपाण करने से ही मनुष्य ब्रह्म व चंस से पतित हो जाया करता है । इनसे अच्छा नो बौद्ध-जन अथवा धापालिस ही माना गया है । तात्पर्य यह है कि यह ता वौद्धादि से ही गया चीता है ॥६०॥ जो खुल तौर पर वेदो का अप्रामाण्य कहता है उनमे क्या है । यह अभिमान ही रखने वाला है और वास्तव में वैदिक नहीं है यह वेदा को प्रामाण्य की तरह पहा करता है । यह ईयर वो वचन से ही कहता है और खल स्वय बनीश्वर अर्थात् ईश्वर का नहीं मानन वाला हाता है ।।६१।। श्री सूतजी ने कहा- इम प्रकार सहान पर सब जहां से आय थे चले गये थे। राजपि प्रतदने भी अपने राज्य को निप्पण्टक बनारर उसका भोग करता था। जब उस देह का अन्त हो गया तो वह उसी समय म पर अवत लक्षणो वाली मुक्ति को प्राप्त हो गया था। इसमे पानात उमरे अनेक शिप्य हागे ॥६२॥६६॥ गन्यासिवेपमात्रेण कुर्वाणा जीविता निजाम् । राजसेवा प्रणा प्रच्छन्ना यौलिया अपि ॥६४ अगम्यागभने सत्ता अभक्ष्यस्य च भक्षणे । अपेयनिरता पेचिनानाभोगममाकुला ॥६५ यानारूढा मदा राजसेवाया तत्परा अपि । सवैतनिन्दारिता प्रच्दन ग्रन्यगौरवाः ।।६६ अन्यदानसिद्धान्त नैव जानन्ति तत्त्वत । तक्ष दोपम्य बुद्धया वै पठिप्यन्नि क्लो युगे ॥६७ अन्यदेवतमानानि यदि हेगानि तत्स्यम् । वेद पठन्लि पापिष्ठाः रथ तक वदन्ति हि ॥६८ मीमासागास्यगद्ग्रन्यानालोपत्र च पुन पुन । पूर्व प ग पा ग्रहीप्यन्ति गग गरा. ॥६६ [ सूर्यपुराण स्वकीय न वदिष्यन्ति यतो नास्ति प्रमाकरम् । हसान्परमहसाश्च निन्दिप्यन्ति च जारजाः ॥७ केवल सन्यासियो के वेप मात्र से यह रहा करते है और अपनी जीविका किया करते है । ये राज सेवा करने वाले प्रच्छन्न कौतिक भी होते हैं ॥ ४॥ ये सव जो गमन करने के योग्य स्त्री नही है उसमें भी आसक्त रहते हैं और अभक्ष्य पदार्थों के भक्षण करने में निरत रहा करते हैं । जो पेय पदार्थ नही है उसका पान किया करते हैं और कुछ तो अनेक प्रकार के भोगो मे सलग्न रहा करते हैं ।।६।। ये सदा यानो में समारूढ रहकर भ्रमण किया करते हैं तया राज-- सेवा में भी तत्पर रहते हैं । ये अद्वैव वाद की सदा निन्दा करने मे ही निरत हो हैं और छिपे हुए अन्थो को गौरव वाले होते हैं ॥६६॥ ये लोग अन्य दर्शनो के तात्विव रूप से नही जानते हैं। उनमे केवल दोष देखने की ही बुद्धि से कलियुग में पढा करेंगे ॥६७॥ अन्य देवो के नाम यदि देय ही हैं तो षयो पापिष्ठ लोग वेद को पढ़ते हैं और क्यो तकं को कहा करते हैं ? ॥६॥ मीमामा शास्त्र के सह ग्रन्यो को देखकर वारम्बार सबके पूर्व पक्षो को ही ग्रहण भत्सरता के साथ करेंगे ॥६६॥ और अपना सिद्धान्त पुछ भी नहीं बतायगै क्योकि प्रमा के करने वाला ज्ञात हो उन्हें नही होता है । ये जार से समुत्पन्न हुए लोग हसो की निन्दा करेंगे ॥७॥ जातमात्र नर कचिन्मुण्डयित्वा मठाधिपम् । फापायवस्त्रमाण परिप्यन्ति नराधमा. ॥७१ माठापत्य च सेवा च धनसग्रह एव च । दासीगमनमोर्या च पञ्चपा तत्त्ववादिन. ॥७२ सराारस्तत्वमित्येव पर ते तत्ववादिनः । मायाविलसित विश्वामिति मायंकवादिनः ॥७३ शुद्ध तत्य न जानन्ति सि सन्द पदानित: शब्दमासण ते जाताः काली हा तत्त्ववादिन. १७४ कनि प्रवेशादि कयन ] मठ भविष्यति यदा विप्रा पापाना प्रभव कलो। तथा तथा भविष्यन्ति ह्य दीच्या दम्भवैष्णवा ॥७५ निवसामान्यवक्तार शिवसामान्यदर्शिनम् । दृष्ट्वा स्नायात्सलः सञ्यिवसामान्यसङ्गितम् ॥७६ मधुदर्शितमार्गेण पापिष्ठा वणवाः क्लो। भावष्यन्ति तनो म्लेच्छाः शूद्रा यूथवहिप्यता ॥७७ तस्माच्छणुध्य विप्रन्द्रा माहात्म्य पार्वतीपते । भक्ति तस्य सदा कर्तु मुद्यता भवत ध्रुवम् ॥७% जातमात्र किमी मनुष्य को मुण्डित कराकर अधम मनुष्य पापाय वस्त्र मात्र पहिनाकर उमको मठ का म्वामी कर दिया करेंगे ।७१। वा अधिपति बनना-मेवा वरना धन का संग्रह करना दासियो का गमन वरना और ईर्ष्या की भावना रमना-ये ही वे पांच प्रकार के तत्त्वों ने वादी होते हैं ।७२। यह ससार ही परम तत्व है- ऐमा ही ये तत्त्ववादी यहा परते हैं अर्थात समझो हैं। यह माया वा ही पिलाम है ऐमा माया के ही वादी यहा परते हैं ।७३॥ ये गर लोग शुद्ध तत्त्व को तो विलुन भी जानते नहीं हैं और इग विश्य को ही तत्व यहा बरते हैं । ये लोग शब्द मात्र से ही उत्पन्न हुए हैं । कलियुग में हा । यहे मेद पी बात है कि ये लोग तत्त्ववादी बने हुए हैं 100 हे विनो' जिस समय म यरिया में पापो की उत्पत्ति होगी तो थेगे- से ही उतर म दम्भ ये द्वारा अपना आरम्वर नापे हुए बंगय हो जायेंगे ।७५। भगवान शिव को एर मामान्य देव योरने वाने भगवान् शम्भु वो माघारण देव देगने वाले मनुष्य को नया गदाशिव गोगामार बहने वाले रे सनी को देगार भी वात्री माहित सापरला पाहिए 13 मपराग प्रति मार्ग में पतिया में यणय महान पापिय हा जायेंगे। इसके बार मेन्द-: और गे बपित हॉग । समलिए हे विदो पानी र पनि कामदारम्स पुग्प यूप महेन-विष्णु तुल्यत्व करणादि क्थन ] [ १६७ मा परी दाम हैं और उन्ही की अनुकम्पा ने युक्त हैं ।। यथार्थ स्प सति स्मृनि और पुरागा वा यही सिद्धान है । इन्द्र और उपेन्द्र आदि सब भगवान् महेश क ही लिहर हैं ।६। वेदान के द्वारा जानने योग्य पार्वती रमण ईरान को जो जानता है वही कुण्ठ ममस्त देह धारियो के दु य वा हनन करने वाला है ।। दीकुण्ठ मन्यते सम्यगोगन म पुग्दर । य इन्द्र मन्यते मनस्वामिन स पिर्मत 1 स्वर्ग लोक समाप्नोति मुन्याज्ञाप्रतिपालक । अद्वैत शिवमीशानमज्ञात्वा नव मुच्यते ॥६॥ घोरे पलियुगे प्राप्ते थोशवरपराड् मृया । भविष्यन्ति नराम्तव्यमिति द्वं पायनोप्रवीत् ॥१०॥ रद्रक्रोधाग्निनिर्दय मन्मये तस्य भार्थया। रत्या विलपिते तस्य ससायोऽप्यतिद् खिता ॥११॥ वमन्तादय आगत्य तामूवु पि विधीयते । मनोगितु गमोरावा नैरवा(का)रण ।।१।। मन्येत घातर मौके पूज्यो भवेदयम् । तथा विघ्न प्रानव्यो येन केनापि हेतुना ॥१३॥ जम्यापपीतिर्वतव्या न चलेद्यदि विचन । नेन में दुमशालि म्यात्विचिन्माय न नान्यथा ॥१४॥ या पुरन्दरगान यो सम्भव यण मानना है । जा गयर ग्यागी को मानना है या सपि माग गामुनि की आनाका प्रति गना को मणीमान प्राप्त पर मेला । शान भगवार विनापान न प्राप्त रगं कभी भी मुन नर्ग होता है। अररल पोरगतिपुर प्रानान पर नग भगवान् परक गह- गु जायेंग-ग प्य व पाय पधन पाटवायन मुनि ने समारो योनारी प्रतिम कामगिरी जाने पर उनकी भारतद्वारा प्रा सिर पर उगरे मागनीजयनगर ५११ यगा आमिरर १६८ ] [ सूर्य पुराण शम्भ उस रति से कहा था क्या करना चाहिए। समस्त लोगो के स्वामी से मेर का वारण करने में हम सब लोग विचारे क्या है अर्थान् तुच्छ हैं और कुछ भी नही कर सकते हैं ।१२। रति ने कहा- सोक मे यह सबको द्वारा अपूज्य हो जावे और पातक माने जावे--जिस किसी भी हेतु मे उस प्रकार का ही विध्न करना चाहिए ।१३। यदि कुछ भी नहीं चलता है तो इनकी अपकीर्ति तो अवश्य ही कहनी चाहिए । इसमे ही मेरे हृदय के दुख की शान्ति किंचिन्मान हो जायेगी अन्यथा नहीं होगी 1१४॥ चतुर्दशसु विद्यासु गीयते चन्द्रशेखर । वेदान्ता य च गायन्ति मनय शसितग्रता ॥१॥ ब्रह्माद्या देवता सर्वा इन्द्रोपेन्द्रादयस्तया । न्यूनता तस्य यो ब्रूते कर्मचाण्डाल उच्यते ॥१६॥ तेन तुल्यो यदा विष्णुब्रह्मा वा यदि गद्यते । पष्टिवर्पसहस्त्राणि विष्ठाया आयते कृमि ॥१७॥ तुल्यता यदि नो शक्या न्यूनतायास्तु का कथा । मित्रस्याऽनृण्यमिच्छाम सकट प्रतिभाति न ॥१८॥ विचार्येन तदा सर्वे महामोहपुर सरा । तपस्तेपुर्महारौद्र सर्वलोकभयकरम् ॥१६॥ कदाचिद्भगवान्ब्रह्मा प्रादुरासीद्दयानिधि । मोहो दम्भम्तथा क्रोधो लोभस्ते सेवका कले ॥२०॥ पञ्चमो हेतुवादश्च मघुना सर्व आश्रिता । तानुवाच ततो ब्रह्मा वृणीवा मनसेप्सितम् ॥ यथा वाणी च भवता तथाऽह दातुमुद्यत २१ वमन्त आदि ने कहा-चौदही विद्याओ मे भगवान् चन्द्र शेखर गाये जाते हैं। जिनको वेदान्त गान किया करते हैं और शसित व्रत वाले मुनिगण गाते हैं । ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा इन्द्र उपेन्द्र आदि मय में जो भी गङ्कर भगवान् को न्यूनता वोनता है वह कर्म महेग-विष्णु तुल्यत्व करणादि कथन ] [ १६९ चाण्डाल ही कहा जाया करता है ।१५।१६। उनके तुल्य ब्रह्म जन को कभी विष्णु कहे जाते है वह साठ हजार वर्ष पर्यन्त विष्ठा मे क्रीडा होकर निवास किया करता है ।१७। जव उनकी तुल्यता ही नही बत- लायी जा सकती हैं तो फिर उनकी न्यूनता बताने की बात कुछ भी हो ही नही सकती है। हम मित्र का आनृण्य चाहते हैं । हमसे बडा सङ्कट प्रतीत हो रहा है ।१८। सूतजी ने यहा-उम समय मे सबने इस तरह से विचार करणे महागोह में आगे बढे हुए सब महा रौद्र और मव लोका को महान् भय करने वाला महान् रोद तप किया था।१६ विसी समय में दया के निघि भगवान ब्रह्माजी प्रादुभूत हुए थे । कलि ने मोह-दम्भ- क्रोध-लोभ य ही मब सेवर थे ।२०) पांचवा हेतु वाद था । ये सब मधु के द्वारा हो समाश्चित थे । उन सबसे ब्रह्माजी ने कहा था आप सब मन का अभीप्ट वरदान मांग लो । जैसी वाणी आपकी होगी पैसा ही में देने को उद्यत हूँ ॥२१॥ अम्मार परम मित्र दो नाशित प्रभो ॥२२॥ महादेवेन तेनामी आनृण्य वर्तु मुद्यता । भविप्यामो वय तात रद्रपूजाभिनिन्दवा ॥२३।। यथा न लभते पूजामम्मत्तश्चन्द्रशेखर । अधुना न भवेदेव भविष्यत्यय तधिरम् ॥२४॥ भविष्याम इति प्रोक्त भवत्तो नान्यथा यचित् । ये भवदागा लोकास्तम्य पूजा न धूर्जटे ॥२॥ प्राथितोऽय वरो दतो यथेष्ट पर्तुमय ।।२६।। इत्युक्वत्वा तानयो ग्रह्मा तत्र वान्तरधीयत। मर्वे ते मन्यायाचक रतिना गह दु पिता ॥२७॥ मोह आदि ने कहा-हे प्रमा। हम मामा परम मित्र पक्ष या महादेवजी न विनापर दिया है। उनगे हम मा भानुल्य बरन में निये उदात्तात 'हम देवको पूजा विनिता ररने निगाहोना पारगे। मान ' निता ने Tam १७० ] 1 मूर्य पुराण दीजिए ।२२।२३। हम ऐसा ही चाहते है कि चन्द्रशेखर हमस पूजा प्राप्त नहीं करें। ब्रह्माजी ने कहा-इम प्रकार की वात इस समय म तो नहीं होगी-हाँ, यह लम्बे समय के पश्चात् हो जायगी। आप लोगो ने यही कहा था कि "हो जायेंगे" अन्यथा कही भी नही है। जो आप जैसे मनुष्य है उनसे ही पूर्जरि प्रभु की पूजा न होगी १२४२५। यह तुम्हारा मांगा हुआ वरदान दे दिया है। अब आप ययेप्ट करने के योग्य है ।२६। मूतजी ने कहा-इसके पश्चात् ब्रह्माजी ने यह इतना ही उनगे कहा था और वे वही पर अन्तर्ध्यान हो गये थे । उन सबने कलि के साथ मन्त्रणा अत्यन्न दुसित होते हुए की थी ।२७। भविद्भरधुना नोक्त भविष्याम इतीरितम् । ततो मत्समये प्राप्ते गर्वमेव भविष्यति ॥२८॥ अस्मत्त इति यत्प्रोक्त तेन चास्मद्वशे स्थिता । निन्दाफरा भविष्यन्ति नारमान्यो मन्यते न स ।।२६।। लोभमोहादिसयुक्ता प्राप्ते च मयि दारुणे। हेनुवाद पुरस्फुत्य शिवभक्ति पराड मुखा ॥३०॥ तत कलियुगे प्राप्ते सर्वधर्मविजिते । म्लेच्छैाह्मणधेनूना विध्ससनकरे खरे ।।३१।। अस्वाध्यायवषट्कारे जैनबौद्धादिमकुले । ब्राह्मण म्लच्छमार्गस्थे श्द्रे ब्राह्मणचातिनि ॥३२॥ तदा वसन्त कर्णाटतिलङ्गादिक्दूपक । मधुनामा च विधवाक्षेत्रे विप्राद्भविष्यति ।१३३॥ गोलक स तु पापिष्ठ पद्मपादुक्मीश्वरम् । वेदान्तव्याग्यानरत शिप्यत्वेनार्चयिष्यति ॥३४॥ शास्त्र पूण ततोऽधीत्य स्थित आह्निक्वजित । विमग्रिहोन को यागो हेतुमेव परिप्यति ।।३।। गुमराक्र्ण्य तद्वाक्य ब्राह्मणो न भवेदयम् । इति निश्चित्य त दुट वक्ष्यति थ ततद्वना ॥३६।।

१७२ ] [ मूर्य पुराण मधुनामा तत प्राप्य शाप त दुष्टपुद्धिमान् । वादरायणसूनाणा व्याख्यान स करिष्यति ॥४०॥ मध्वाचार्यस्तो भावाद्दाक्षिणात्यो महान्कलौ। तच्छिप्या प्रतिशिष्याश्च नार्यावर्तेन चोत्कले ॥४१॥ न गौडे न च गङ्गायास्तीरे गोदावरीतटे । नाव॑दारण्यमध्ये च तत्प्रचारो भविष्यति ॥४२॥ यथा यथा कने_रे प्रचारो हि भविष्यति । तथा तथा महाराष्ट्र हैतुका विरला कचित् ॥४३॥ श्री गुरू ने कहा-तुझ दुष्ट ने कपट से शास्त्र मुझमे पढा है अत तुझे सिद्धान्त की मर्यादा स्फुरित न होगी तुमे सिद्धान्त मे तो अन्धता रहेगी तथा पूर्व पक्ष मे चतुरता होगी। ऐसा ही होगा मगर तेरे शिष्य पापी ही होंगे। मोह से वे सिद्धान्त से हीन होगे और लोभ के कारण वे नृप के सेवन बनेगे । क्रोध से तूर बोलने वाले-दम्भ से वेप मे सुग्दर दिमाई देने वाले होंगे 1३७१३८। हेतु वाद से वे सब शास्त्रो यो को नहीं जानते हैं । ये लोग शीघ्र या देर में घोर नरकों में ही गमन परेंगे :३६ श्री सूतजी ने कहा-दुष्ट बुद्धि वाला मधुनाम पारी वहाँ स उम भाप को प्राप्त करके वह वादगयण सूनो की व्याख्यान परेगा। 1४०। इसके पश्चात् भाव में मप्पाचार्य महान् दाक्षिणात्य पलियुग में हुए थे और उन गिप्य प्रशिष्य आर्यावर्त और उत्तल म नहीं है ।४१॥ गौह देश के नीर पर-गोदावरी के तट पर-अर्बुदारण्य के मध्य में उगा प्रचार नहीं होगा ।।२। बमे वलियुग का घोर प्रचार होगा वैगे २ ही महाराष्ट्र में वही पर गिरते ही हेतु हो ।४३। ततोऽतिदुरममये महाम्नेच्दैम्तिरगते । प्रच्छन्न पुरनिसारी प्रचार हि विधाम्यति ॥४४|| पचवस्तु गन्यामी पठिन्या दूरयुद्धिमान् । गिप्योपनिप्पगंयुत्तो हेतुवाद गरियो [ १७३ महेश-विष्णु तुल्यत्न करणादि क्यन ] तत्त्व ममार इत्येव न वाध्य सत्य एव हि। वदम्यतम्तत्त्ववादो मिथ्यावादी स उच्यते ॥४६॥ मिथ्याभूत प्रपञ्चोऽय मया निर्मित इप्यते । मायावादिन इत्यते वस्तुतस्तत्ववादिन 1॥४७॥ मच्छास्त्र जमिनीय तु कर्मकाण्डप्रवर्तकम् । गौतमीय तु मच्छाम्यमीश्वरप्रतिपादयम् ।।४।। पुम्प्रत्यविवेपस्य बोघर वापिल मतम् । तया नेपिर सारणमीश्वरप्रतिपादकम् ॥४६!! इसके उपरान्न अत्यन्त दुष्ट समय म जी महाग्नेलो में निरस्त पा पही पर प्रन्यन्न पापी प्रचारमा रगत पाँच यपं ना मन्यागी पहार दुष्ट बुद्धि पाना शिप्यो और उपशिष्या मे गयुत हार हनुवाद पायरमा ५५ सगार यही राय--वह पापी है प्रारी है -जन याशे एमा पहता। और मिसाला पारा नाया परता है। यह प्रयत्न मिम्मरभूम मरदायको सिमित पिया पा है-रोमा एट होना।। समागपाती है और बाग में हर मादी गाम्न समिति रमिती जो अगर मप्र गगो मारा है भी गा.पारा रा प्रतिमा ४८ पुस ो प्रतिमा योग बन मामा पिन कारागिरागराग पाना मी माशि वित भोपा साम्पmire

१७४]
[ सूय पुराण
मन्यन्ते श्रीमहेशान सण्णिव परात्परम् ॥५३॥
पापिष्ठा नैव मन्यन्ते वेदमार्गवहिष्कृता ।
आचार्य मथुनामान वदन्तो विधवासुतम् ॥५४।।
प्रच्छन्नोऽमौ महादुष्टश्चार्वाको मधुमज्ञक ।
भविष्यति कलौ विप्रा शिवनिन्दाप्रवर्तक ॥५५।।
मोहात्सिद्धान्तवाह्यत्व क्रोधाच्छम्ननिषेधनम् ।
लोभेन नपते मेवा दम्मादन्यप्रतारणम् । ५६।।
गणिकामैथुन कामाद्धेतुवादेन वादिता।
भविष्यति क्लो विप्रा पोय तत्त्ववादिता ॥७॥
पातञ्जल योग शास्त्र है जिसकी रचना पतनि महरि ने की
है । यह शास्त्र शैवनास्त्र अभीप्ट हाता है । वेदान्त शास्त्र तो मूर्धन्य
शास्न होता है अर्थात् सबमे शिरोमणि शास्त्र है जो अद्वैत वा पोध
कराता है ।५०१ सय अर्थात् वारा वद (मग-मजु माम-अधर्व) इन वेदा
के छ अङ्क शास्त्र व्याकरण-छन्द-ज्योतिप-शिगा आदि हैं। पुरा और
इति छ शास्त्र हैं । स्मृतिया-उपम्मृतियों-उपपुराण ये सव शुभ हैं । सर्व
विद्याओ का अन्यान्य अधिकार से प्रामाण्य होता है । सवम ही पुनर्थों
म तात्पर्य बताते हैं ।५११५२। वही पर बुध विराम हो पर भी
तात्त्विक रूप में शासनो म परम्पर कोई विरोध नही है। य सभी
शास्त्र महेश देव पो पर स मी पर मानत हैं। जो पापिष्ठ है और वेद
शास्त्र के मार्ग मे वहिपत हैं ने ही मानते है। मगराम पारी का जो
एक विधवा वा गुत है भानार्य बतलाने वाले ही घोर पापिष्ठ है ॥५३॥
१५ यह मघु सना वाला महार दुष्ट प्रच्छ न चार मतानुयायी है ।
हे विनो। यह कलियुग मे गिय की निन्दा करो म प्रवृत्त हो। वाता
होगा ।५५॥ मोह से ही गासनो से वाधन है और प्रोय रो शास्त्र-निषेध
है। लोम रो नृपति की गेा है तथा दम्भ से दूगर या प्रतारण परना
होरा १५} TM बागना ग गशिरा गाय मेधा पसा हेतु-
पाद से वादिता होगी ॥५॥

[ १७५ महश विष्णु तुल्यत्न करणादि क्थन ] पञ्चवप यतिं कृत्वा क्रमेणादाय वालकम् । माठापत्य विधास्यन्ति द्रव्यलोभेन नास्तिका ॥५८।। पारम्पय मठस्येव रक्षिप्यन्त्यभिरागिण । भोगासत्ताश्च पापिष्ठा दासीगमनकारिण ॥५६॥ नाम्ना सयासिनस्तीर्थे यानास्ढा ससेवका । नरवाहनमारूढा शिसामूनवहिप्कृता ।।६०॥ तत्यक्षपातिनो मूढा गृहस्था शिवनिदवा । मिथ्या वैष्णवमानेन ग्रस्ता निग्यगामिण ॥६॥ गवा वेपमाग त तुमानेग वाडवा । वादिन क्रोधमानेग विद्वासा हेतुवादत ॥६२॥ पठिप्यन्ति च शास्त्राणि केचिद्द पणसिद्धय । स्वकीय गोपयिष्यन्ति परकीयण पण्डिता ॥६३।। पच वप वाक कान मे लाकर य । वाकर मना जमि पति द्रव्य के लाभ स नास्तिर TT क्यिा करम। अभिरा न ग मठ पर अपनी परम्परा की रक्षा बग्ग । य पापिष्ट भागाम असत आर दामी व गमन करन वाले हाग ५८।५६। तीय नाम स ही मयामी हैं और थान पर समारूद रहत हैं तथा सरसा को भी साथ म करते हैं। नर वाहन पर आरूट कान है नपा fTT मूर स वहिप्कृत होते हैं ।६०। उनके पक्षपात करने वात मृढ गहस्थनी हाग जा भग वान शिव की निग करने वारे हैं । य लोग मिया हो रणव होन के मान वान हैं जा वैष्णव व के गभ से ग्रस्त हैं और नरप के गामी हैं । 1.1 वेवमात्र स ही य वैष्णव है न तुमात्र स वाडवा है । क्रोध मात्र मे ही वाटी हैं और हावाद के करने में विधान हागे ।६२। य शास्त्रा के कुछ दोष निकालो के ही दटि म पग। अपन दापा को तो ये रिखाने हैं और दूसरा ये दोषा का उद्धार न करन व निय पूण पति महामोहादय मर्वे रतिमावास्याम्य भामिनीम् । प्राचुरा पक्ष्णया वारा तह. मविनिवारवा ॥६४॥ रक्या

{ सूर्य पुराण
रते मा कुरु सतापमह मोह कले सखा ।
क्रोध पत्यु परो बन्धुर्लोभमोहौ च देवरौ ।।६५॥
प्राप्ने कलियुगे पूर्णे मोहलोभादयो वयम् ।
वसन्त मधुनामानमवतीण च दक्षिण ॥६६।।
समाश्रित्य ततो हेतुवाद कुटिलबुद्धय ।
करिष्यामो यथा शक्य शिवपूजानिवारणम् ।।६७।।
इति ते रतिमाश्वारय ययागनमितो गता ।
इति सर्व समाख्यात शिवनिन्दककारणम् ॥६८।।
श्री सूतजी ने कहा-महामोह आदि सबने रति को आश्वासन
दिया था जो कन्दप की भामिनी थी और उसके दुख वा निवारक
होते हुए बहुत ही नम्र वाणी स योने - मोहादिक ने कहा-हे रते ।
तुम सन्ताप मत करो। यह माह करिग का राषा है। क्रोध तेरे
पति का परम वधु है तथा लोभ और मोह ये दोना तुम्हारे देवर है।
१६४४६५३ वालिय ग के पूण रूप में प्राप्त होने पर मोह लोभ आदि के
हम सब दक्षिण मे मधुनाम से अवतीर्ण वसन्त का समापण ग्रहण करके
कुटिल बुद्धि वाले 'तुवाद को करेंगे जैसे भी शिवकी पूजा का निवारण
हो सके किया जायगा ।६६।६७। सूतजी ने कहा- इस तरह से वे रतिक
वो समाश्वासन देकर जैसे आये थे वैसे ही सब चने गये यह सब
मैंने भगवान् शिवको निन्दा होने का कारण तुम्हारे सामने वणित पर
दिया है।
।। विष्णु चक्र प्राप्ति कथन ।
सुदर्शनास्य पच्चक लब्धवास्तत्क्य हरि ।
महादेवाद्भगवत सूत तदक्त महमि ॥१॥
देवामुराणामभवत्स ग्रामोद तपशंन ।
देवा विनिजिता दत्यविष्णु दारणमागता ॥२॥

विप्णु चक्र प्राप्ति कथन ] [ १७७ स्तुत्वा तं विविधः स्तोत्र. प्रणम्य पुरतः स्थिताः । भयभीताश्च ते सर्वे क्षताङ्गाः क्लेशिता भृशम् ॥३॥ तान्दृष्ट्वा प्राह भागवान्देवदेवो जनार्दनः । किमर्थमागता देवा वक्त महय सांप्रतम् ॥४॥ वचः श्रुत्वा हरेर्देवाः प्रणम्योचुः सुरोत्तमाः । निजिता दान. सर्ने शरण त्वामिहाऽऽगताः ॥५॥ गतिस्त्वमेव देवाना जाता त्व पुरुपोत्तम । हन्तुमर्हसि ताशीघ्रमवध्यान्वारिजेक्षण ।।६।। जालघरवघार्थाय यच्चक शूलपाणिनः । महादेववराल्लब्ध जाहि तेन महावलान् ॥७॥ ऋपियो ने कहा--सुदर्शन नाम वाला जो परम प्रसिद्ध चक है उसको भगवान श्री हरि ने कैसे प्राप्त किया था। सुना है यह महादेव जी से ही मिला या सो कैसे प्राप्त हुआ है यह हे सूतजी ! आप रहने के लिये योग्य होते है ।१। सूतजी ने वहा-एक वार देवी का और असुरो का अद्भुत दर्शन वाला महा मग्राम हुआ था। देव लोग सब दैत्यों के द्वारा पराजित होकर श्री विष्णु के शरण मे समागत हुए १२। विविध भांति के स्तोत्रो के द्वारा उनकी स्तुति करके और प्रणाम पर वे सव भगवान् के आगे स्थित हो गये थे। वे सभी भय से भीत 1-पृश अङ्गो वाले थे और अत्यन्त ही दुनिन थे।३। देवदेव जनार्दन ने उनको देरावर कहा पा–हे देवो! आप मेरे पाम फिम निये आये हो । अब आप यह मुझमे वहो ।। श्रीहरि के वचन पा श्रवणार सुरोतम देवो जनार्दन उनको प्रणाम दिया और कहने लगे थे। दानवी द्वारा हम मब निषित हो गये हैं अतएव यहा पर हम गर यारी दारणागति में समागत हुए हैं ।। हम देवो की तो था ही गति है अर्थात उसार करने वाले हैं रे पुरषोतम ! आप ही हमारे बाग परने पाले हैं। है मनोत्र ! आप उन अयम्मी को नीम ही हलन फरने में लिये समय होते हैं। वारपर वे यर सिमाति महासकी दे ।

१७८ 1
[ सूर्य पुराण
से जो सुदर्शन चक्र आपने प्राप्त किया था उसी
उन महान् बल
वालों का हनन करिए ।७।
तेषा तद्वचन श्रुत्वा भगवान्वारिजेपणः ।
अह देवास्तथा नूनं करिष्यामीति सुव्रताः ॥८
हिमवत्पर्वत गत्वा पूजयामास शर्करम् ।
लिङ्ग तत्र प्रतिष्ठाप्य साप्य गन्धोदकैः शुभैः ॥६
त्वरिताख्येन रुद्रेण संपूज्य च महेश्वरम् ।
ततो नाम्नां संहस्रेण तुष्टाव परमेश्वरम् ।।१०
प्रतिनाम च पद्मानि तेरिष्ट्वा वृपभध्वजम् ।
भवाद्य मिभिर्भक्त्या स्तोतु समुपचक्रमे ॥११
भवः शिवो हरो रुद्रः पुष्कलो मुग्धलोचनः ।
अग्रगण्यः सदाचारः सर्व. शभुर्महेश्वर ॥१२
ईश्वरः स्थाणुरीशानः सहस्राक्ष. सहस्रपात् ।
वरीयान्वतदो वन्द्यः शकर परमेश्वरः ॥१३
गङ्गाधरः शूलधरः परार्थेफप्रयोजकः ।
सर्वज्ञ. सर्वदेवादिगिरिधन्वा जटाधरः ॥१४
भगवान् कमल नेत्र ने उन देवो के उस वचन वा श्रवण करके
उनसे कहा---हे सुग्रतो । हे देवो ! मैं निश्चय ही वैमा हो करू गा ll
फिर श्रीहरि ने हिमाचल पर जाकर भगवान् शकर का अभ्यर्चन किया
था। वहां पर शिव लिङ्ग की प्रतिष्ठा करके और परम गुम भागीरथी
गङ्गा के जल से स्नपन कराकर मुभ गन्धादको मे त्वरितारय रुद्र के
द्वारा महेश्वर की भलीभांति पूजा की थी। इमचे अनन्तर सहाय नाम
के द्वारा उन परमेस्टर की स्तुति की थी। प्रत्येक नाम पर पो को
अस्ति दिया था और वृपमध्वज पा उन दमलो मे पजन रिया था।
भत्ति के साथ मवादिनामी मे आवन करने या उपक्रम आरम्भ कर
दिया या ।।६।।१०॥११॥ भगवान विष्णु ने कहा- यह महसनाम
है)-भर, शिप, हर, गह, गुमन, मुगलोचन, अग्रगम, सभागार,

विष्णु चक्र प्राप्ति कयन ] १७६ सर्व, शम्भु, महेश्वर, ईश्वर, स्थाणु, ईशान, ससाक्ष, सहस्रपात्, वरी- यान्, वरद, वन्द्य, शकर, परमेश्वर, गङ्गाधर, शूनयर, पराक प्रयो. जक, सर्वज्ञ, सर्वदेवावि, गिरिधन्वा, जगाधर ॥१२॥१३॥१४॥ चन्द्रापोडश्चन्द्रमौलिवेचा विश्वामरेश्वरः। वेदान्तसारसदोह' कपाली नीललोहितः ॥१५ ध्यानाहारोऽपरिच्छेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वरः । अष्टमूतिविश्वमूर्तिस्त्रिवर्गः स्वर्गसाधनः ॥१६ ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञो देवदेवखिलोचनः । वामदेवो महादेवः पटुः परिवृढो दृढ. ॥१७ विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीगः श्रुतिमन्नगः । सर्वप्रणवसवादा वृपाको वृपवाहनः ।।१८ ईश पिनाकी ग्वट्वाङ्गी चित्रवेपश्चिरतनः । मनोमयो महायोगी स्थिरो ब्रह्माण्डधूर्जटी 10१६ कालकालः कृत्तिवासा. सुभगः प्रणवात्मक. । नागच्ड सुत्राप्यो दुर्वापाः पुरशासनः ॥२० हगायुधः स्कन्दगुरु परमेशी परायणः। अनादिमध्यनिधनो गिरीगो गिरिजाघवः ॥२१ चन्द्रपीड़, चन्द्रमौलि, वेधा, विश्वामहेश्वर. वेदान्तसार सन्दोह. पाली, नीललोहित, ध्यानाहार, अपरिच्छेश, गौरीमा, गणेश्वर, पटमूति, विश्वमूति, त्रियर्ग, स्वर्ग साधन, गाभगम्य, दृढम, देवदेय, प्रिलोचन, वामदेव, महादेव, पटु, परिदृट, ट, विष, विम्पाक्ष, वागीश, अनिमन्त्रग, सर्यप्रणव, सगरी, पाठ, वृषवाहन, ईस पिनायी, गट्वाङ्गो, चितयेष, विरलन, मनोमय, महायोगी, बिर, ब्रह्माण्ड धूटि, मालान, गृतियागा, गुभग, प्रणवागा, नाग, गुमशुष्य, दुर्वागा पुरमामन, हगामुप, सरगु, परमेष्ठी, परायण, अनादिमध्य- निधन, गिरीश, निग्निाशय ।।१५-२१॥ मुंग्यायुः श्रीरप्टो नोकरन्योनमो मृदुः । मामाग्यो देवो दोनोगद परवशीः ॥२२ १८० ] [ सूर्यपुराण विशालाक्षो महाव्याध सुरेश सूर्यतापन । धर्मधामा क्षमाक्षेत्र भगवान्भगनेत्रहा ।।२३ उग्र पशुपतिस्ताय प्रियभक्त प्रियवद । दाता दयाकरो दक्ष कपर्दी कामशासन ॥२४ श्मशाननिलयस्तिथ्य श्मशानस्थो महेश्वर । लोकर्ता भूतपतिर्महाकर्ता महौषधि ॥२५ उत्तरी गोपतिर्मोप्ता ज्ञानगम्य पुरातन । नीति सुनीति शुद्धात्मा सोम सोमरत सुधी ॥२६ सोमपोऽमृतप सौम्यो महानीतिर्महास्मृति । अजातशत्रुरालोक्य सभाव्यो हव्यवाहन ॥२७ लोककारो वेदकार सूत्रकार सनातन । महपि कपिलाचार्यो विश्वदीप्तिविलोचन ॥२८ कुबैरव घु श्रीकण्ठ, लोकवाद्य, उत्तम, मृदु, सामान्य, देवक, दण्डी, नीलकण्ठ, परश्वधी, विशालाक्ष, महाव्याघ, सुरेश सूर्यतापन, धर्मघामा, क्षमाक्षेत्र, भगवान भगनेत्रहा उग्र, पशुपति, ताक्ष्य, प्रियभक्त, प्रियवद, दाता, दयाकर, दक्ष, कपर्दी कामशासन, श्मशाननिलय, तिदन, श्मशान- स्थ महेश्वर, लोककर्ता, भूतपति, महाकर्ता, महौषधि, उत्तर गोपति, गोप्ता, ज्ञानगम्य, पुरातन, नीति, सुनीति, शुद्धात्मा सोम, सोमरति, अमृतम सौम्य महानीति, महास्मृति, अजात शत्रु आलोक्य, भम्भाव्य, हव्यवाहन, लोककार, वेदकार, सूत्रकार, सनातन, महर्षि कपिलाचाय, विश्वदीप्ति, विलोचन ॥२२-२८।। पिनाकपाणिभूदेव स्वस्तिकृत्स्वस्तिद सुधा। धात्रीधामा धामकर सर्वग सर्वगोचर 08 ब्रह्मसृग्विश्वसृक्सर्ग कर्णिकार प्रिय कवि । शाखो विशाखो गोशाख शिवो भिषगनुत्तम ॥३० गङ्गाप्लवोदको भव्य पुष्कल स्थपति स्थित । विजितात्मा विधेयात्मा भूतवाहनसारथि ॥३१ सुधी, सोमय विष्णु चक्र प्राप्ति क्धन ] [ ११ सगणो गणकायश्च सुकीतिश्छिनसशय । कामदेवः कामकालो भस्मोद्धूलितविग्रह ॥३२ भस्मप्रियो भस्मशायी कामी कान्त कृतागम । समावृत्तो निवृत्तारमा धर्मपुञ सदाशिव ॥३३ अकल्मपश्चतुर्बाहु सर्वावासो दुरासद । दुर्लभो दुगमो दुर्ग'. सायुधविशारद ॥३४ अध्यात्मयोगनिलय सुतन्तुरतन्तुवर्धन । शुभाङ्गो योगसारङ्गो जगदीशो जनार्दन ॥३५ पिनाकपाणि, भूदेव, स्वस्तिकृत, स्वस्तिद, सुधा, धात्रीधामा, धाम- कर, सर्वग, सर्वगोचर, ब्रह्ममृक्, विश्वमृक, सर्ग, कणिकार, प्रिय, कवि, शाखा, विशाख, गोशाख, शिव, भिप्टक्, अतुत्तम, गङ्गाप्लवादक, भव्य, पुष्कल, स्थपति, स्थित, विजितात्मा, विधेयात्मा, भूववाहनसारथि, सगण, गणकाय, मुकीति, छिन्नसशय, कामदेव, कामकाल, भस्मोद्ध लित विग्रह, भस्मप्रिय, भस्मशायी, कामी, कान्त, कृतागम, समावृत्त, निवृत्तात्मा, धर्मपुज, सदाशिव, अक्ल्मप, चतुर्वाहु, पर्वावास, दुरासद दुर्लभ, दुर्गम, दुर्ग, सर्वायुध विशारद, अध्यात्मयोग निलय, सुतन्तु, ततु- पर्धन, शुपाङ्ग योगसारङ्ग, जगदीश, जनार्दन ॥२६-३५॥ भस्मशुद्धिकरो मेरुस्तेजस्वी शुद्धाविग्रह । हिरण्यरेतात्तरणिर्मरीचिौहिमालय ॥३६॥ महाह्रदो महागर्त सिद्धवृन्दारवन्दित । व्याघ्रचर्मघरो व्याली महाभूतो महानिधि ॥३७॥ अमृतात्माऽमृतवपु पञ्चयज्ञ प्रभखन । पञ्चविंशतितत्त्वस्थ पराजात परापर ॥३८ सुलभ सुबत शूरो वाग्मायकनिधिनिधि । वर्णाश्रमगुरुवर्णी शनु जिच्छन्न तापन ॥३६ आश्रम क्षपण क्षामो ज्ञानवानचलश्चल । प्रमाणभूतो दुज्ञेय सुपर्णो वायुवाहन ॥४० १८२] [ सूर्यपुराण धनुर्धरो धनुर्वेदो गुणराशिगुणावर । अनन्तदृष्टिरानन्दो दण्डो दमयिता दम ॥४१ अविवाद्यो महावायो विश्वकर्मा विशारद । वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भूतवाहन ॥४२ भस्म शुद्धिकर--मेरु- तेजस्वी-शुद्ध विग्रह-हिरण्य रेता- वरणि-मरीचि-महिमालय-महाहद-महागरी-सिद्ध वृन्दार वन्दित- व्याघ्र धर्म धर-प्याली महाभूत-महानिधि-अमृतात्माशअमृतवयु-- पक्षयज्ञ-प्रभज्जन-पक्ष विशति तत्वस्थ-पारिजात-परापर- सुलभ--सुव्रत-शूर-वारमायैक विधि-निधि-वर्णाथय गुरु- वर्णी-शत्रु जित-शय तायन-आश्रम-क्षपण-क्षाम-ज्ञानवान - अचल-चल-प्रमाण भूत-दुय-~सुपर्ण-वायुवाहन-धनुर्वेद- धनुर्धर-गुणराशि-गुणराशि-गुणाकर-अनन्त दृष्टि-आनद-दण्ड- दमयिता--दम-अविवाद्य-महाकाय-विश्वकर्मा--विशारद-बीत- गग-विनीतात्मा-तपस्वी-भूतवाहन ॥३६-४२॥ उन्मत्तवेप प्रजन्नो जितकामो जितप्रिय । कल्याणप्रकृति कल्प सर्वलोकप्रजापति ॥४३ तपस्वी तारको धीमा प्रधानप्रमुरव्यय । लोकपालोऽन्तहितात्मा कल्पादि कमलेक्षण ॥४४ वेदशास्त्रार्थतत्वज्ञो नियमो नियमाश्रय । राहु सूर्य शनि केतुविरामो विद्रु मच्छवि ॥४५ भक्ति गम्य पर ब्रह्म मृगवागापणोऽनघ । अद्रिद्रोणिकृनस्थान पवनात्मा जगत्पति ।।४६ सर्वकर्मावलस्त्वष्टा मङ्गल्यो मङ्गलप्रद । महातपा दीर्घतपा स्थविष्णु स्थविरो ध्रुव ।।४७ अह सवरारो व्याल प्रमाण परम तप ।।०२ सवत्सरकरो मन्त्र प्रत्यक्ष सर्वदर्शन ४ मज सर्वेश्वर सिद्धो महारेता महावल ।

विष्णु चक्र प्राप्ति कथन ] [ १८३ योगी योगी महादेव. मिद्ध सर्वादिरच्युत ॥४९ उन्मत्त वेप-बच्चन-जितकाम-जितप्रिय-वल्याण प्रकृति- फ्ल्प--स्वर्लोक प्रजापति-तपस्वी-तारक-धीमान-प्रधान प्रभु- अव्यय-लोकमान-अन्तदितात्मा-वल्पादि-कमलेक्षण-वेदशास्त्रीय तत्वज्ञ---नियम-नियमाथय-राह-सूर्य-शनि-केतु-विरण्य-- विद् म-चवि-भक्तिगम्य-परब्रह्म-मृग वाणार्पण- अनय--अद्रि दोणि कृत स्यान-~पवनारमा-जगत्पति-सर्व कर्माचल-स्वप्टा--- मङ्गल्य-मङ्गल प्रद-महानयास्घविष्णु स्थविट--ध्रुव-अह- सम्बत्सर-व्यात्न-प्रमाण-परम-तय-सम्वत्थरकार- मनज-प्रत्यय --सर्व दर्शन-अब-सर्वेश्वर --सिद्ध-~महारेता-महावल - योगी-- योग-महादेव -सिद्ध-सर्वादि-अच्युत ॥४३---४६॥ वसुर्वसुमना सत्य सर्वपापहरो हर । अमृत शाश्वत शान्तो वाणहस्तः प्रतापवान् ॥५० कमण्डलुघरो धन्वी वेदाङ्गो वेदविन्मुनि । भ्राजिष्णुर्भोजन भोक्ता लोकनेता दुराधर ॥५१ अतीन्द्रियो महामाय सविासश्चतुष्पथ । कालयोगी महानादो महोत्साहो महावल ॥५२ महाबुद्धिमहावीर्यो भूतचारी पुरदर । निशाचर प्रेतचारी महाशक्तिमहाद्य ति ॥५३ अनिर्देश्यवपु थीमा-सर्वाकपंकरो मत । बहुश्रु तो वहुमायो नियतात्माऽभयोद्भव ॥५४ ओजस्तेजोद्य तिघरो नर्तक सर्वनायक । नित्यघन्टाप्रियो नित्यप्रकाशात्मा प्रतापन (५५ सद स्पष्टाक्षरो मन्त्रः मड ग्राम शारदल्पव । युगादिकृद्य गावों गम्भीरो वृषवाहन ॥५६ वमु-वमुमना-सत्य-सर्व पापहर-हर-अमृत-शाश्वत-- धान्त-वाण हस्त-प्रतापवान-मण्ड-घर-घन्वी-वेदाङ्ग- १८४ } { सर्यपुराण वेदविता-मुनि-भ्राजिपणु- भोजन- भोक्ता-लोर नेता--दुराधर -अतीन्द्रय-महामाय-सर्वावास-चतुष्यथ-कालयोगी महानाद -महोत्साह--महाबल-महाबुद्धि-महावीर्य - भूतचारी-पुरन्दर- निशाचर-प्रेतचारी--महाशक्ति-महाधुति-~-अनिदेश्यवयु- श्रीमान -सर्वाकर्षकर-बहुभ्रुत-बहुमाय-मत-नियतात्मा- अमयोद्भव --ओज तेज धुतिघर-नतंप-द्ध-स्सप्टाक्षर-माज-राग्राम- शारह लव उगादि-कृत-युगावतं-गम्भीर---वृहै वाहन ॥५०-५६।। इण्टो विशिष्ट शिष्टेष्ट शरभ सरभो धनु । अपा निधिरधिष्ठान विजयो जयकालचित् ॥५७ प्रतिष्ठित प्रमाण ज्ञो हिरण्यकवचो हरि । विमोचन सुरगणो विद्यशो विबुधाश्रय ॥५८ वालरूपो बलोन्माथी विकर्ता गहनो गुह । करण कारण कर्ता सर्वबन्धप्रणेचन ॥५९ व्यवसायो व्यवस्थान स्थानदो जगदादिज । दुन्दुभो ललितो विश्वो भवात्माऽऽत्मनि सस्थित ॥६० राजराजप्रियो रामो राजचूडामणि प्रभु । वीरेश्वरो वीरभद्रो वीरासनविधिविराट ॥६१ वीरचूडामणिहर्ता तीब्रानन्दो नदीधर । आत्माघारत्रिशूलाङ्क शिपिविष्ट शिवाश्रय ॥६२ वालखिल्यो महाचारस्तिग्माशुर्वारिधि खग । अभिराम सुशरण्य सुब्रह्मण्य सुधापति ॥६३ इष्ट-विशिष्ट-शिष्टेष्ट-शरभ-मरभ-धनु-~-अप निधि- अधिष्ठान-विजय-जय कालवित् प्रतिष्ठित-प्रमाण हिरण्य कवच-हरि-विमोचन-सुरगण-विधेश-विवुधायय--वालरूप बलोमाथी-विद्रा-गहन-गुह-करण-कारण-मर्ता - सर्व बघ प्रभोचन-व्यवसात-व्यवस्थान-स्थानद-जद्वदाहिज-दुदुभ -ललित-विश्व-भवात्मा--आत्मा में सस्किन-राजराज प्रिय- विष्णु चक्र प्राप्ति कथन ] [ १९५ राम-राज चूडामणि-प्रभु-वीरेश्वर-वीरभद्र-वीरासन विधि- विराट-वीर चूडामणि-हर्ता-तीव्रानन्द-नदीघर-आत्माधार- विमूलाङ्क-शिपिविष्ट--शिवाश्रय-वालखिल्य-महाभार-निग्मांशु -वाविधि-खग-अभिराम-मुशरण्य-सुब्रह्मण्य-सुधापति ॥५७ मधुमाकौशिको गोमान्विराम सर्वसाधन । ललाटाक्षो विश्वदेह सार ससारचक्रभृत् ॥६४ अमोघदण्डो मध्यस्थो हिरण्यो ब्रह्मवर्चसी। परब्रह्मपदो हस शवरो व्याघ्रकोऽनल ॥६५ रुचिवररुचिर्वन्द्यो वाचस्पतिरहर्पति । रविविरोचन स्कन्द शास्ता वैवस्वतोऽर्जुन ॥६६ मुक्तिरुन्नतकीर्तिश्च शान्तराम पुरजय । कैलासपति कामारि सविता रविलोचन ॥६७ विद्वत्तमो वीतभयो विश्वकर्माऽनिवारित । नित्यो नियतकल्याण पुण्यश्रवणकीर्तन ॥६८ दूरश्रवा विश्वसहो ध्येयो दुःस्वप्ननाशन । उत्तारको दुप्कृतिहा दुर्धो दु सहोऽभय ॥६६ अनादि भुवो लक्ष्मी किरीटी विदशाधिप । विश्वगोप्ता विश्वहर्ता सुवीरो रुचिराङ्गदी॥७० मधुमान, कौशिक, गोमान, विराम, सर्व साधन, ललाटाक्ष, विश्व- देह, सार, समारचक्रभृत, अमोघदण्ड, मध्यस्थ, हिरण्य, ब्रह्मवर्चसी, परब्रह्मपद, हस, शबर, व्याघ्रक, अनल, रुचि, वन्द्य, वाचस्पति, महपंति, रवि, विरोचन, स्वन्द, शास्ता, वैवस्वत अर्जुन, मुक्ति उन्नतकोत्ति, मान्तराम, पुरज्जय, कैलाशपति, कामादि, सविता, रविलोचन, विद्वत्तम, भीतमय, विश्वकर्मा, अनिवारित, नित्य, नियतकल्याण, पुण्यमय कीर्तन, दूरश्रवा, विश्वसर, ध्येय, दुम्वप्न, नागन, उत्तारक, दुष्कृतिल, १८६ ] [ मूर्यपुराण दुधर्ष, दु सह, अभय, अनादि, भू, भुवः, लक्ष्मी, किरीटी, त्रिदशाधिप, विश्वगोप्ता, विश्वहर्ता, सुवीर, रुचिरागदो ॥६४ ७०।। जननो जनजन्मादि प्रीतिमानीतिमानय वषिष्ट कश्यपो भानुभीमो भीमपराक्रम ॥७१ प्रणव सत्पथाचारो महाकायो महाधनु । जन्माधिपो महादेवः सकलागगपारग ॥७२ तत्त्व तत्त्वविदेकारमा विभूतिभूतिभूपण । ऋपि ह्मणविद्विष्णुर्जन्ममृत्युजरातिग ।।७३ यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञान्तोऽमोघविक्रम । महेन्द्रो दुर्भर सेनी यज्ञाङ्गो यज्ञवाहन ॥७४ पश्चब्रह्मसमुत्पत्तिविश्वतो विमलोदय । आत्मयोनिरनाद्यन्त पत्रिंशो लोकभृत्कवि ॥७५ गायत्रीवल्लभ प्राशुर्विश्वावास सदाशिव । शिशुगिरिरत सम्राट् सुपेण सुरशत्रुहा ॥७६ अमेयोऽरिष्टमथनो मुकुन्दो विगतज्वर । स्वयज्योतिरनुज्योतिरचल परमेश्वर ॥७७ जनन, जनजन्मादि-प्रीतिमान्, नीतिमान, वसिष्ठ कश्यप, भानु, भीम, भीम पराक्रम प्रणव, सलथाचार, महाकाय, महाधन, जमाधिप, महादेव, सकलागमगरग, तत्त्व, तत्त्ववित्, एकात्मा, विभूति, भूतिभूषण, ऋषि, ब्राह्मणवित्, विष्णु ज म मृत्यु जरातिग, यज्ञ, यज्ञपति, यज्वा, यज्ञा-त, अमोघ विक्रम, महेद्र, दुभर, सेनो, यज्ञान यजवाहन पञ्च ब्रह्म समुत्पत्ति, निश्वत, विमलोदय, आत्मयोनि, अनाद्यन्त, पटत्रिंश, लोकमृत, कवि । गायत्री के बल्लभ, प्राशु विश्वादास, सदाशिव, शिशु, गिरिरत, सम्राट, सुषेण, मुर शत्रुओ के हनन करने वाले अमेय, अरिष्टमथन, मुकुन्द, विगतज्वर, स्वय ज्योति, अनुज्योति अचल, परमेश्वर ७१७७॥ पिङ्गत कपिलश्मश्रु शास्त्रनेत्रत्रयीतनु । ज्ञानस्कन्धो महाज्ञानो वीरोत्पत्तिरपप्लवी !॥७८ - विष्णु चक्र प्राप्ति कथन [ १८७ भगो विवस्वानादित्यो योगाचारो दिवस्पति.। उदारकोतिरुद्यागी सद्योगी सदसन्मयः ॥७६ नक्षत्रमालो नाकेशः स्वाधिष्ठानपडाश्रयः । पवित्रपाद: पापारिमणिपूरो नभोर्गातः ८० हृत्पुण्डरीकमासोन: शुक्रा(के शानो बृपाकाप.। तुशे गृहपतिः कृष्णः समर्थोऽनर्थशासनः ।।८१ अधर्मशारक्षय्य. पुरुहून. पुरुष्टुत.। वृहद्भू जा ब्रह्मगर्भो धर्मधेनुर्धनागमः ॥८२ जगद्धितपो सुगतः कुमार. कुशलागमः । हिरण्यगर्भो ज्यातिप्मानुपेन्द्रस्तिमिरापहः ॥८३ अरोगस्तपनाध्यक्षो विश्वामित्रो द्विजेश्वर.। ब्रह्मज्योतिः सुवुद्धारमा वृहज्योतिरनुत्तमः ॥४ पिङ्गल, कपिलश्मथ, शास्त्रनेत्र, यंतनु, ज्ञानस्कन्ध, महाज्ञानी, वीरोत्पत्ति, उपप्लवी, भग, विवस्वान, आदित्य, योगाचार, दिवस्पति, उदार कीति, उद्योगी, सद्योगी, सदसन्मय, नक्षतमालो, नाकेश, स्वा. धिष्टानपडाश्रय, पवित्रपाद, पारो के अरि मणिपूर, नभोगति, हृत्पुण्डरीक में सनासीन, शुक्र शान, वृषाकपि, तुष्ट, ग्रहपति, कृष्ण, समय, अनर्थ शासन, अधर्म शत्रु, अक्षण्य, पुरुहून, पुरस्टुत, वृहद्भ ज, ब्रह्मगर्भ, धर्म- पेनु, धनागम, जगद्धितपी, सुगत, कुमार, कुशलागम, हिरण्यगर्भ, ज्योति- मान्, उपेन्द्र, तिमिरापह, अरोग, तपनाध्यक्ष, विश्वामित्र, द्विजेश्वर, ब्रह्मज्योति, मुबुद्धामा, वृहज्ज्योति, अनुत्तम 11७९-८४॥ मातामहो मातरिश्वा मनस्वी नागहारधृक् । पुलस्त्य पुलहोऽगस्त्यो जातुकर्ण्य पराशरः।।५ निरावरणविज्ञानो विरश्नो विष्टरथवाः । आत्मभूरनिरुद्धोऽत्रिनिमूतिर्महायशा. १८६ लोकचूडामणिरिश्चन्द्र. सत्यपराक्रमः । व्यालकल्पो महाकल्प. कल्पवृक्षः कलानिधिः ।।५७

१५.
[ सूर्य पुराण
अलकरिष्णुरचलो रोचिष्णविक्रमोत्तम ।
आशु सप्तपतिवेंगी प्लवन शिखिसारथि ॥८८
असंतुष्टोऽतिथि शुक्र प्रमाथी पापशासन ।
वसुश्रवा कव्यवाह प्रततो विश्वभाजन IIRE
जयो जरारिशमनो लोहिताश्वस्तनूनपात् ।
पृषदश्वो नभोयोनि सुप्रतीकस्तमित्रहा ।।६०
निदाघस्तपनो मेघ पक्ष परपुरजय ।
सुखी नील सुनिष्पन्न सुरभि शिशिरात्मक ॥६१
मातामह, मामरिश्वा, मनस्वी, नागहार घृक, पुलस्त्य, पुलह,
अगस्त्य, जातूकर्ण्य, पराशर, निरावरण विज्ञान, विरञ्च, विष्टरश्रवा,
आत्मभू, अनिरुद, अत्रि, मानमूति, महायशा, लोक चूडामणि, वीर,
चद्र, सत्य परा पराक्रम, व्यालकल्प, महाकल्प, कल्पवृक्ष, कलानिधि,
अलकरिष्णु अचल, रोचिष्णु, विक्रमोत्तम, आशु सप्तपति, वेगी, प्लवन,
शिखिसारथि, असन्तुष्ट, अतिथि, शुक्र, प्रमाथी, पाप शासन, वसुश्रवा,
कव्यवाह, प्रतप्त, विश्वभोजन, जय, जरारि के शमन करन वाले,
लोहिताश्व, तनूनपात, पृषदश्व, नभोयोनि, सुप्रतीक, तमिस्रहा, निदाघ,
तपन, मेघ, पक्ष, परपुरञ्जय, सुखी, नील, सुनिष्पन, सुरभि, शिशरा
स्मक ॥८५-६१॥
वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बोजवाहन ।
मनो बुद्धिरहकार क्षेत्र क्षेत्रपालक ॥२
जमदग्निर्जलनिधिविपाको विश्वकारक ।
अधरोऽनुत्तरो ज्ञयो ज्येष्टो नि श्रयसालय ॥६३
शेलो नाम ताहो दानवारिररिंदम ।
चामुण्डी जनकश्चारुनि शल्यो लोक्शल्यहृत् ।।१४
चतुर्वेदश्चनुर्भावश्चतुरश्वत्वरप्रिय ।
आम्नायोऽय समाम्नायस्तीर्थ देव शिवालय ॥१५

विष्णु चक प्राप्ति कथन ] [ १८६ वनस्पो महादेवः सर्वरूपश्वराचरः । न्यायनिर्वाहको न्यायो न्यायगम्यो निरञ्जन. ॥६६ सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वशस्त्रप्रभञ्जनः । मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी दान्तो गुणोत्तरः । ६७ पिङ्गलाक्षोऽय हयंश्वो नीलग्रीवो निरामयः । सहस्रबाहुः सर्वेशः शरण्य. सर्वलोकधृक् ।।६८ वसन्त, माधव, ग्रीष्म, नभस्य, बीजवाहन, मन, बुद्धि, अहकार, क्षेप्रज्ञ, क्षेत्र के पालक, जमदग्नि, जलनिधि, विपाक, विश्वकारक, अधर, अनुता, ज्ञेय, ज्येष्ठ, निःश्रेयसालय, शैल, नाम, तरु, दाह, दानवो अरि, अरिन्दम, चामुण्डी, जनक, चारु, निःशल्य, लोकशल्यहृत, चतुर्वेद, चतुर्भाव, चतुर, चत्वर प्रिय, आम्नाय, समाम्नाय, तीर्थदेव, शिवालय, वज्ररूप, महादेव, सर्वरूप, चराचर, न्याय निर्वाहा, न्याय, न्यायगम्य, निरञ्जन, सहस्रमूर्धा, देवेन्द्र, सर्वगान प्रभञ्जन, मुण्ड, विरूप, विकृत, दण्डी, दान्त, गुणोत्तर, पिङ्गलाक्ष, हर्यश्व, नीलग्रोव, निरामय, सहस्र- बाहु, सर्वेश, शरण्य, सर्वलोक घृक् ।।६३-६८॥ पद्मासनः पर ज्योतिः परावरः पर फलम् । पद्मगर्भो महागों विश्वगर्भो विलक्षण 18E यज्ञभुग्वरदो देवो वरेशश्च महास्वन. । देवासुर गुरुर्देवः शंकरो लोकसभव. ॥१०० सर्ववेदमयोऽचिन्त्यो देवतासत्यसभवः । देवाधिदेवो देवपिर्देवासुरवरप्रद ।।१०१ देवासुरेश्वरो दिव्यो देवासुरमहेश्वरः । देवासुराणा वरदो देवासुरनमस्कृतः ॥१०२ देवासुरमहामारो देवासुरमहाश्रयः । सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवानामात्मसंभवः ॥१०३ ईडयोऽनीश. सुरव्याप्तो देवसिंहो दिवाकरः । विवधानवरः श्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः॥१०४ .

१९० ] ' [ सूर्य पुराण क्षण, , शिवध्यानरतः श्रीमाभिासी श्रीपर्वतप्रियः। वजहस्तः प्रतिष्टम्भी विश्वज्ञानी निशाकरः ॥१०॥ पद्मासन, परज्योति, परावर, पर फल, पगर्भ, विश्वगर्भ, बिल- यज्ञसुक वरद, देव, वरेदा, महास्वन, देवासुर गुरु, देव. शहर, लोक सम्भव, सर्व वेदमय, अचिन्त्य, देवता सत्य सम्भव, देवाविदेव, देवपि, देवासुर वर प्रद देवासुरेश्वर, दिव्य, देवामुर महेश्वर, देवो और असुरो यो वरदान दाता, देव तथा अगुरो के द्वारा नगरत देवासुर महामात्र, देवासुर महाश्रय, सर्व देवमय, आचिन्त्य, देवो का आत्म सम्भव, ईडय, अनीश, सुर व्याप्त, देवसिंह, दिवाकर , विबुधारा प्रवर, श्रेष्ठ, सब देवो से उत्तम मे भी उत्तम, शिव ध्यान में रन, थीमान, शिखी, श्री पर्वत को प्यार करने वाले, पचहस्त, प्रतिष्ट भी, विश्व ज्ञानी निशाकर ॥९६-१०५ ।। ब्रह्मचारी लोकचारी धर्मचारी धनाधिपः । नन्दी नन्दीश्वरो नग्नो नग्नव्रतधर शुचिः ॥१०६ लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षो युगावहः ! स्ववशः स्वर्गतः स्वर्गः सर्गः स्वरमय' म्वनः ॥१०७ बीजाध्यक्षो बीजकर्ता, धर्मकृद्धर्मवर्धन. । दम्भोऽदम्भो महादम्मः सर्वभूतमहेश्वर. ।।१०८ श्मशाननिलयस्तिष्य सेतुरप्रतिमा कृतिः। लोकोत्तरः स्फुटालोकस्यम्बको भक्तवत्सल. ॥१०६ अन्धकारिमखद्वेपी विष्णुकधरपातन । वीतदोपोऽक्षयगुणोऽन्तकारिः पूपदन्तभित ।।११० धूर्जटि: खण्डपरशु. सकलो निष्कलोऽनघः । आकारः सकलाधारः पाण्डुरागो मृगो नटः ॥१११ पूर्णः पूरयिता पुण्यः सुकुमार सुलोचन. । समागेयः प्रियः कर. पुण्य कीर्तिरनामग- १११२ ब्रह्मचारी, लोकचारी, धर्मचारी, धनाधिप, नन्दी नन्दीश्वर, नग्न, विष्णु चक्र प्राप्तिकथन [ १९१ नग्नवनधर, गुचि, लिङ्गाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, युगावह, स्ववश, स्वाति, स्वर्ग, स्वरमय, स्वन, वीजाध्यक्ष, बीजकर्ता, धर्मकृत, धर्मवद्धन, दम्भ, बदम्भ, महादम्भ, सर्वभूत महेश्वर, श्मशान निलय, तिष्य, सेतु, अप्रितमा कुति, लोकोत्तर, स्फुटालोक, त्र्यम्बक, भक्तवरमल, अन्धक दैत्य के अरि, मखद्व पी, विष्णु, घरपातन, चीतदोप, अक्षयगुण, अन्तकारि, पूपदन्तमित्, पूर्नटि, खण्डपरशु, सकल, किटकल, अनघ, आकार, सक्लावार, पाण्डुराग, मृग, नट, पूर्ण पूरयिता, पुण्य, मुकुमार, सुलोचन, साम के द्वारा गाने योग्य, प्रिय, क्रूर, पुण्य कीति, अनामय ॥१०६- ११२॥ मनोजवस्तीर्थकरो जटिलो जीवितेश्वरः। जीवितान्तकरोऽनन्तो वसुरेता वमुप्रद ॥११३ सद्गति. सस्कृतिः शान्त कालकण्ठ कलावरः । मानी मन्तुर्महाकालः सद्भ तिः सत्परायणः ॥११४ चन्द्रसजीवन. शास्ता लाकरूढो महाधिप.। लोकबन्धुर्लोकनाय. कृतज्ञ कृतभूपण. ।।११५ अनपायोऽक्षरः शान्त सर्वशस्त्रभृता वर.) तेजोमयो धु तिधरो लोकमायोऽग्रणीरगु. ॥११६ सुविस्मितः प्रसन्नात्मा दुर्जयो दुरनिक्रमः । ज्योतिर्मयो निराकारी जगन्नाथो जलेश्वरः ॥११७ तुम्बी वीणा महाशोको विशोक: शोकनाशनः । त्रिलोकेशत्रिलोकात्मा मिद्धि शुद्धिरधोक्षज ॥११९ अव्यक्तलक्षणो व्यक्तो व्यक्ताव्यक्ती विशापतिः । वरशीलो वरगुणो गतो गव्ययनो मय. ॥११६ मनोजव, तोयंकर, जटिल, जीवतेश्वर, जीविनान्तकर, अनन्त, वमुरेता, वमुप्रद, मद्गति, सस्कृति शान्त, कानकण्ठ, कलाघर, मानी, f मन्तु, महासाल, सद्भ, TYIm ty - [ सूर्य पुराण महाधिप, लोकबन्धु, लोमनाथ, कृतज्ञ, कृतभूषण, अनपाय, अटार शान्त, सवशास्त्र पारियो मे परमश्रेष्ठ, तेजोमय, श्रुतिपर अथवा धुतिघर, लोकमय, अग्रणी, अग्रणी, अणु, सुविस्मित, प्रसन्नात्मा, दुर्जय, दुरति क्रम, ज्योतिर्मय, निराकार जगनाथ, जलेश्वर, तुम्बी, वीणा, महाशोक, विनोक, पोकनाशन, विलोकेश, त्रिलोकारमा, सिद्धि, शुद्धि, अधोक्षज, अव्यक्तलक्षण, व्यक्त, व्यत्ताव्यक्त, विज्ञापनि, वरशील, वरगुण, मत, गत्यपन, मय ॥११३-११६।। ब्रह्मा विष्णु प्रजापालो हमो हसगतिमंत । वेधा विधाता सटा च कर्ता हर्ता चतुर्मुख ।१२०। कैलासशिखरावासी सर्वावासी सदागति । हिरण्यगर्भो गगन पुरुष पूर्वज पिता ।। १२१ भूतालयो भूतपतिभूतिदो भुवनेश्वर । सयमो योगविद्धो ब्रह्मण्यो ब्राह्मणप्रिय ॥ १२२ देवप्रियो देवनायो दैवज्ञो देवचिन्ता । विषमाक्षो विशालाक्षो वृषदो वृषवर्धन ।। १२३ निर्ममो निरहकारो निर्मोहो निरुपप्लव । दर्पहा दर्पणो दृप्त सर्वतु परिवर्तक ।। १२४ सप्तजिह्व सहस्राचि स्निग्ध प्रकृतिदक्षिण । भूतभव्यभवन्नाथ प्रभवो भ्रान्तिनाशन ॥ १२५ अर्थोऽनों महाकोश परकार्य कपण्डित । निष्कण्टक कृतानन्दो मिाजो व्याजदर्शन ॥ १२६ ब्रह्मा-विष्णु-प्रजापाल-हस-हसगति मतवघा-विधाना- स्रष्टा कर्ता हर्ता-चतुर्मुख-कैलासशिखपूर्वज-पिता-भूतालय-भूतपति-भूतिद- भुवनेश्वर-सयम-योगवित्-भ्रद्ध-अमुप-ब्राह्मणप्रिय - देवप्रिय--- देवनाय-देवज्ञ-देवचिन्तक-विपमाक्ष-विशालक्ष-वृपद-वृषवर्धन- विर्मम-निरहकार-निर्मोह - निस्पत्पव-दर्पूहा-दर्पण-दृप्त- सर्वे परिवर्तक-सप्तजिह्न--सहस्रावि-स्निग्य प्रकृतिदक्षिण विष्णु चक्र प्राप्ति कथन ] भूतभव्य भवन्नाथप्रभव-प्रालिनासन-अर्थ-अनर्थ - महाकोश परकाय किपण्डित-निष्कण्टक-- कृतानन-नियाज व्याजदर्शन। ॥१२०११२६॥ सत्ववान्सात्विकः सत्य. कीर्तिस्तम्भः कृत्तागमः। अकम्पितो गुणग्राही नैकत्मा लोककर्मकृत् ।। १२७ थीवल्लभः शिवारम्भः शान्तभद्र समञ्जस.। भूशयो भूतिकृ-भूतिविभूतिभू तिवाहनः ।। १२८ अकातो भूतकायस्थ. कालज्ञानो महापटुः । सत्यव्रतो महात्याग इच्छाशान्तिपरायणः ॥ १२६ परार्थवृत्तिवरदो विविक्त श्रुतिसागर.। अनिविण्णो गुणग्राही निष्कलक. कलङ्कहा ॥ १३० स्वभावभद्रो मध्यस्थ शत्रुध्न शत्रुनाशन. । शिखण्डी कवची शूली जटी मुण्डी च कुण्डली ।। १३१ मेखली कञ्चुको बङ्गी माली ससारसारथि । अमृत्यु सर्वजित्सिहस्तेजोराशिमहामणिः ॥ १३२ असख्येयोऽप्रमेयात्मा वीर्यवान्कार्यकोविदः । वेद्यो वैद्यो वियग्दोप्ता सप्तावरमुनीश्वर. ॥ १३३ सत्त्ववान-सात्त्विक-सत्य-कीतिरतम्भ-कृत्तागम अवम्पित- गुणाग्राही-नकात्मा - लोकवर्मकृत्-श्रीवल्लभ-शिवारम्भ-शान्तभद्र- समन्जस-भूशय-भूति-विभूति-भूति वाहन-अकाय भूतकायस्थ--- कालज्ञान-महापट -सत्यव्रत-महात्याग-इच्छाशान्ति परायण- परावृत्ति वरद-विविक्त-श्रुतिसागर- अनिर्विष्ण-- गुणग्राही- निष्कलङ्क-क्लङ्कहा--स्वाभावभद्र-मध्यस्थ-शत्रुग्न-शत्रुनाशन-- शिसण्डी-कवची मूली-जटी-मुण्डी-कुण्डली-मेखली-कञ्चुकी खङ्गी-माली-ससार के सारार्थ-अमृत्यु-मवंजित्-सिंह-तोजके- राशि-महामणि-यसख्येय-अप्रमेयात्मा- वीर्यवान् योविद वेद्य-वैद्य-वियन्दोहा-सप्तावर मुनीश्वर । १२७-१३३ ।

१६४ ] [ सूर्य पुराण अनुत्तमो दुराधर्षो मधुर प्रियदर्शन । सुरेश शरण शर्म सर्व शब्दवता गति ॥ १३४ काल पक्ष करड्वारि कङ्कणीकृतवासुकि । महेप्वासो महीभर्ता निष्कलङ्को विशृङ्खल ॥ १३५ धु मणिस्तरणिर्धन्य सिद्धिद सिद्धिसाधन । विवृत्त सवृत शिल्पी व्यूढोरस्को महाभुज ॥ १३६ एकज्योतिनिरातको नरनारायणप्रिय । निलेपो निष्प्रपञ्चात्मा निळग्रो व्यग्रनाशन ॥ १३७ स्तव्य स्तवप्रिय स्तोता व्योममूर्तिरनाकुल । निरवद्यपदोपायो विद्याराशिरकृनिम ॥ १३८ प्रशान्तबुद्धिरक्षुद्र क्षुद्रहा नित्यसुन्दर । ध्येयोऽग्रधुर्यो धात्रीश साकल्य शर्वरीपति ॥ १३६ परमार्थगुरुर्व्यापी शुचिराश्रितवत्सल । रसो रसज्ञ सारज्ञ सर्वसत्त्वावलम्बन ॥ १४० अनुत्तमो-दुराधर्ष-मधुर-प्रियदर्शन-सुरेश-शरण- शर्म- सर्व-शब्दवानो की गति-काल-पक्ष-करसारि विवनी कृत वासुकि-- महेष्वास-महीभर्ता-निक्लङ्क-विशृङ्खल- मणि-तरणि-घय सिद्धिद-सिद्धि साधन-विवृत-सवृत-शिल्पी- यूढोरस्क-महाभुज- एकज्योति-निरातङ्क-नरनारायण प्रिय-निलंग-गप्प्रपञ्शात्मा- नियंग्र-व्यग्रनाशन--स्तव्य-स्तव प्रिय-स्तोता-व्योममूर्ति-अना- कुल-निरवद्यपदोपाय-विद्याराशि- थकृत्रिम-प्रशान्तवुद्धि-अक्षुद्र- क्षुद्रहा-नित्यमुन्दर-ध्येय-अमधुर्य-धात्रीश-साकल्य-शर्वरीपति- परमार्थ गुरु-व्यापी-शुचि-आश्रितवत्सल~ रस-रसज्ञ--सारज्ञ- सर्वसत्त्वावलम्बन ॥१३४।१४०।। एव नाम्ना सहस्रण तुष्टाव गिरिजापतिम् । सपूज्य परया भक्त्या पुण्डरीकैद्विजोत्तमा ॥ १४१ विष्णु चक्र प्राप्ति कथन ] [ १६५ जिज्ञासार्थ हरेर्भक्त्या कमलेषु शिव स्वयम् । तक गोपयामास कमल मुनिपु गवा ॥१४२ हृते पुप्पे तदा विप्पणुश्चिन्तयन्किमिद त्विति । ज्ञात्वात्मनोऽक्षिमुद्धृत्य पूजयामास शकरम् ॥ १४३ अथ ज्ञात्वा महादेवो हरेभक्ति सुनिश्चलाम् । प्रादुर्भूतो महादेवो मण्डलात्तिग्मदीधिते ॥ १४४ सूर्यकोटिप्रतीकाशस्त्रिनेत्रश्चन्द्रशेखर । शूलटङ्कगदाचक्रकुन्तपाशधरो विभु ॥ १४५ वरकाभयपाणिश्च सर्वाभरणभूपित । त दृष्ट्वा देवदेवेश भगवान्कमलेक्षण ॥ १४६ पुनर्ननाम चरणौ दण्डवच्छूलपाणिन । दृष्ट्वा शभु तदा देवा दुद्र वुर्भयविह्वला ।। १४७ इस प्रकार क उपर्युक्त भगवान शिव के सहस्रनामो का पाठ करने से गिरिजापति की स्तुति की थी और पराभक्ति से भली भांति पूजन करके हे द्विजोत्तमो ' पुण्डरीको से अभ्यर्चन किया था। श्रीहरि की भक्ति की जानने की इच्छा से वमलो मे भगवान् शिव स्वय ने उनमे एक कमल को गुप्त कर लिया था। हे मुनि श्रेष्ठो । पुष्प हत हो जाने पर उस समय मे विष्णु भगवान् ने चिन्ता की थी कि यह क्या हुआ । अपनी आख को निकाल कर जोकि कमल के ही समान सुन्दर थी जानकर भगवान् शङ्कर की पूजा पूण कर दी थी। १४१-१४३ । इसके अनन्तर श्री महादवजी ने श्री हरि को सुनिश्चल भक्ति को जान- पर महादेवजी प्रादुर्भूत हो गये थे और लिम्ब दीधिति ( सूर्य) के मण्डल से ही उनका प्रादुर्भाव हुआ था। करोडो सूर्यों के समान स्वरूप वाले थे तीन नेत्रो का धारण करने वाले तथा मस्तक में चन्द्र धारण किये थे। शूल-र-गदा-चक्र-पुत और पाश को धारण करने वाले विभु थे ।१४४-१४५॥ भगवान् शिव वरद और अभय दोनो हाथा ग्रहण किये हुए थे तथा सब आभूषणो से विभूपिन थे। भगवान्

१६६ ]
{ सूर्य पुराण
कमलेक्षण ने उन देवो के भी देवेश्वर का दर्शन प्राप्त किया था और
फिर उन्होंने शूल पाणि प्रभु के चरणों मे दण्डवत् प्राणिपाल किया था ।
उस समय मे भगवान् शम्भु का दर्शन करके देवगण भय से विह्वल
होकर भाग दिये थे । १४६-१४७ ।
चचाल ब्रह्मभुवन चकम्पे च वसु धरा ।
अधश्चोध तत. प्रीते ददाह शतयोजनम् ॥१४८
शभोर्भगवतस्तेजस्तदृष्ट्वा प्रहसशिवः ।
अब्रवीच्छाङ्गिण विप्राः कृताञ्जलिपुट स्थितम् ।।१४६
देवकार्यमिदं ज्ञातमिदानी मधुसूदन ।
दिव्य ददामि ते चक्रमद्भ त तत्सुदर्शनम् ॥१५०
हितार्थ सर्वदेवानां निर्मित यन्मया पुरा ।
गृहीत्वा तद्गुणैर्दैत्याहि विष्णो ममाऽऽज्ञया ॥१५१
एवमुक्त्वा ददौ चक्क सूर्यायुतसमप्रभम् ।
लोकेषु पुण्डरीकाक्ष इति ख्याति गतो हरिः ॥१५२
पुनस्तमब्रवीच्छभुर्नारायणमनायम् ।
वतानन्यान्सुरश्रेष्ठ वरयस्व यथेप्सितान् ।।१५३
एव शभोनिगदितं श्रुत्वा देवो जनार्दन ।
अब्रवीत्खण्डपरशु प्राञ्जलि प्रणयान्वितः । १५४
उस समय मे यह ब्रह्म भुवन चलायमान हो गया था और वसु-
न्धरा कम्पाय मान हो गयी थी। इसके अनन्तर शम्भु के प्रीत होने पर
नीचे और ऊपर के दोनो माग शत्र योजन तक हाह से युक्त हो गये थे
१।१४८॥ हे विप्रो ! मगवान् शम्भु का तेज देखकर शिव ह मते हुए
हाथ जोड कर स्थित हुए शाी प्रभु से बोले ! हे मधुसूदन | इस समय
मे जो देवो का कार्या विद्यमान है वह मैंने जान लिया है । मे तुमको
परम अद्भुत दिव्य सुदर्शन चक्र प्रदान कर रहा हूं ॥१४६।।१५०।। मैंने
पहिले देवो के हो हित के कार्य के लिये इसका निर्माण किया था।
उसके गुणो से अब हे विष्णो ! मेरी आज्ञा आपको प्राप्त है आप दैत्यो

विष्णुचक्र प्राप्ति कथन ] [ १९७ का दमन करिये ।।१५१॥ इस प्रकार से कहार सहस्रों सूर्यों के समान प्रभा में समावित उम चक को प्रदान कर दिया था। लोगो में मुण्डरी फाक्ष---इस स्याति को तभी से श्री हरि प्राप्त हुए थे ।।१५२॥ फिर दाम्मु अनामय नारायण से बोले-हे सुरों में श्रेष्ठ ! अन्य भी अभी प्सिन जो भी वरदान तुम्हें चाहिए उनको मुझसे प्राप्त करलो ॥१५॥ देव जनार्दन ने इस तरह के भगवान शम्भु के क्थन का श्रवण करके वे होयो को जोडार प्रणय से सयुत होकर खण्डपरशु प्रभु से बोले ॥१४॥ भगवन्देवदेवेशपरमात्मन्शिवाव्यय । निश्चला त्वयि मे भक्तिभवत्विति वरो मम ॥१५५ भक्तिमयि दृढा विष्णो भविष्यति तवानघ। अजेयरिपु लोकेषु मत्प्रसादाद्भविष्यसि ।।१५६ एव दत्वा वर शभुर्विष्णवे प्रभविष्णवे । अन्तहितो द्विजा इति देवोऽब्रवीद्रविः ।।१५७ नाम्रा सहन यदिव्य विष्णुना समुदीरितम् । य पठेच्छ णुयाद्वाऽपि सर्वपापं. प्रमुच्यते ।।१५८ अश्वमेघसहस्त्रस्य फल प्राप्नोति निश्चितम् । पठन सर्वभावेन विद्या वा महती भवेत् ॥१५६ जायते महदेश्वयं शिवस्य दयितो भवेत् । दुम्तरे जलसधाते यजल स्थलता ब्रजेत् ॥१६० हारायन्ते महापर्पा सिंह क्रीडामृगायते । तस्मान्नाम्ना सहस्रेण स्तोतव्यो भगवाशिव. ॥१६१ प्रयच्छत्यखिलान्कामान्देहान्ते च परा गतिम् ।।१६२ श्री विष्णु भगवान ने कहा- हे भगवन् ! देव देवेश ! हे परमात्मन् हे अव्यय । मुझे यही वरदान चाहिए कि मेरी निश्चल भक्ति आपके धरणो मे होवे ॥१५५।। ईश्वर ने कहा है विष्णो ! आप तो अधो से रहित है मेरी दृढ भक्ति आपमे होगी और मेरे ही प्रसाद से आप तीनो १९८] [ सूर्यपुराण लोको मे अजेय हो जायेगे ।।१५६ । श्री सूतजी ने वहा-इस प्रकार प्रभ विष्णु भगवान् विष्णु के लिए शम्भु भगवान् ने वरदान प्रदान करके हे द्विजो ! अन्तर्धान हो गये थे--यह रवि देव ने बतलाया था 1॥१५७।। भगवान् विष्णु ने जो शम्भु के सहस्त्र नामो बा सत्र दीरण किया था वह परम दिव्य था इस शिव सहस नाम को जो भी कोई पढता है या इसका श्रवण किया करता है वह समस्त पापो से विमुक्त हो जाया करता है ॥१५८।। वह सहस्त्र नाम का वक्ता एक ससस्त्र अश्वमेध यज्ञ के यजन का पुण्य फल निश्चित रूप से ही प्राप्त कर लिया करता है । सर्व भाव से इसके पठन करने वाले को महती विद्या प्राप्त हो जाती है ॥१५१॥ सहस्त्र नाम के पढने वाले के पास महान् ऐश्वर्य हो जाया करता है तथा वह फिर भगवान् शिव का प्रिय बन जाता है । इसकी महिमा से जहाँ परम दुस्तर जल का सघात हो वह भी स्थलता को प्राप्त हो जाया करता है ।।१६०॥ महान् विपले सर्प भी हारो के समान आचरण करने वाले हो जाते हैं और सिंह जैसा भी भयानक हिंसव क्रीडा मृग के समान ही आचरण किया करता है। इसी लिये सहस्त्र नाम के द्वारा ही भगवान् शिव का स्तवन करना चाहिए। इससे परम प्रसन्न होकर भगवान शिव सम्पूर्ण कामनाओ को प्रदान कर दिया करते है तथा देह के अन्त होने पर परागति दे दिया करते हैं ॥१६१॥ ॥१६२॥ ॥ शिव पूजा विधि ।। श्रत शभोर्यथा चक्र प्राप्तवान्पुरुषोत्तमः । इदानी श्रोतुमिच्छामः शिवपूजाविधि शुभम् ॥१ शिवपूजाविधि वक्ष्ये सक्षेपेण द्विजोत्तमाः । वक्तु वर्षशतेनापि न शक्यं विस्तरेण तु ॥२ पुरा मेरुगिरे. शृङ्ग सिद्धगन्धर्वसेविते । उक्त सनत्कुमाराय नन्दिना कुलनन्दिना ॥३

२०० ]
[ सूर्यपुराण
तनाऽज्यो विधिना स्रात्वा ममाचम्य यथाविधि ।
पूजास्थानमनुप्राप्य उपविश्याथ बुद्धिमान ॥
प्राणायामत्रय कृत्वा ध्यायेद्दे व सदाशिवम् ।
शरीरशोचण कृत्वा दहन प्लावन तत: ।।
शंवी तनु समास्थाय न्यासकर्म समावरेत् ।
योऽय सूत्रात्मको मन्त्रः सर्ववेदात्मक पर. ११०
तस्य वर्णाश्च विधिवन्यसेत्प्रणवपूर्वकान ।
ब्रह्माणि ततो विन्यस्य ततश्चन्दनवारिणा ॥११
पूजास्थान सुसप्रोक्ष्य द्रव्याणि च मूनीश्वर ।
क्षालन प्रोक्षण चव प्रणवेन विधीयते ।।१२
स्थापयेत्प्रोक्षणीपान पाद्यपात्र तथैव च ।
तथा ह्याचमनीय च ह्यवगुप्ठ्य यथाविधि ॥१३
आच्छाद्य दमैमंतिमास्तेनैवाभ्युक्ष्य वारिणा।
जल तेषु विनिक्षिप्य द्रव्याणि च तत. क्षिपेत् ।।१४
श्री नन्दिकेश्वर ने कहा-हे ब्रह्माजी के पुत्र आज मैं भगवान्
शिव की पूजा की विधि की बतलाता हूँ आप उसका श्रवण करिए ।
मैं इसीलिए यह आपको बतलाता हूँ कि हे मुने ! आप सर्वात्मक श्री
महा देव जी के परम भक्त हैं ॥७॥ उसके लिये सर्व प्रथम विधि के
सहित स्नान करे और फिर यथा विधि आचमन करके पूजा के स्थान
पर प्राप्त होवे और बुद्धिमान् अर्चन को आसन पर समुय विष्ट हो
जाना चाहिए ॥८॥ तीन बार प्राणायाम करके सदाशिव प्रभु का ध्यान
करना चाहिए। शरीर का शोषण करके फिर इसका दहन और प्लावन
करे ॥६॥ शंवी तनु मे समास्थित होकर न्यास कर्म का समाचरण
करना चाहिए । जो यह सूत्रात्मक मन्त्र है वह पर और सर्व वेदात्मक
है ।।१०।। उस मनज के वणो का विधि के सहित प्रणव के साथ न्यास
करना चाहिए । इसके पश्चात् ब्रह्मो का विन्याम करके फिर सुगन्धित
चन्दन के द्वारा मिश्रित जल से पूजा के स्थान का भली भाति प्रोक्षण

शिव पूजा विधि कथन ] [ २०१ करना चाहिए । हे मुनीश्वर ! जो पूजा के व्यही उनका क्षालन और औक्षण प्रणव के द्वारा ही करना चाहिए। फिर प्रोक्षणी पात्र और पाद्यपात्र को स्थापना करनी चाहिए । उसो भौति आचमनीयको यथा विधि अवगुण्डित परे । मतिमान को हमो मे आच्छादन करना गहिए और उसी जस से अम्यूक्षण वरे। और उनमे जल विक्षिप्त करके फिर द्रव्यो पोशिस्त करे॥१REntell उशीर चादन चैव पाये तु परिकल्पयेत् । चूर्णयित्वा सकझोल कपूर जातिकाफलम् ॥ १५॥ क्षिपेदाचमनीये तु प्रणवेन यथाक्रमम् । सर्वत्र चन्दन दद्यादर्घ्यपाधुता शृणु ।। १६ श्रीहीन्यवाश्च पुप्पाणि कुशाग्राणि तथैव च । सिद्धार्थानक्षताश्चंव साज्य च भसित तथा ॥ १७ कुशपुप्पय बद्रोहिबहुम्लतमालकान् । प्रक्षिपेत्प्रोक्षणीपाने प्रणवेन सुधीस्तत ॥ १८ सूत्रेण भवगायच्या गाय-या च द्विजोत्तम । प्रोक्षणीपानमादाय सप्रोक्ष्य द्वारपालो ।। १६ पाच तो मा चतुर्बाहु सूर्यायुतसमप्रभम् । वानरास्य निनयन पुष्पमालासुशोभितम् ॥ २० सर्वाभरणशोभाव्य नन्दीश मप्रपूजयेत् । दक्षिणे तु महाकाल घोररूप भयावहम् ॥ २१ उशीर और चन्दन को पात्र मे परिकल्पित करना चाहिए । कडी- रब के सहित कार और जाती फल का चूर्ण करना चाहिए ॥१५॥ और यथा ग आननतीय मे दणव से क्षिप्त करे। अर्धापात्र मे सर्वत्र चन्दन देने और अब बागे जो कुछ करना हैं उसका श्रवण करो ॥१६॥ फिर मुधी पुस्प को बौसि यव पुष्प कुशा के अग्नभाग सिद्धार्थ -अक्षत- धृत के सहित भसित-कुश-पुष्प यव व्रीहि बहुमूल तामलक' प्रणव के द्वारा इन सबको प्रोक्षणीपात्र में प्रक्षिप्त करे। द्विजोत्तम को मूत्र के

२०२]
[ सूर्य पुराण
द्वारा-शिव गायत्री के द्वारा और गायत्री मन्त्र के द्वारा प्रोक्षणीपात्रको
ग्रहणाकर द्वार माला को सम्प्रोक्षण करना चाहिए ।१७।१८।१६। पाश्वं
भाग मे नन्दीश्वर कहते है मुझ को सहस्रो मूर्यों के समान प्रभा वाले.
चार वाहुओ से युक्त-वानर के समान मुख से युक्त तीन नेत्रो वाले पुष्पो
की माला से मुशोभित सभी आभरणो की शोभा से आन्य नन्दीश या
भली भांति अर्चन करना चाहिए । दक्षिण भाग मे महाकाल-भयावह
घोररूप हाढो से कराल मुख वाले-कालाग्नि के चय के तुल्य का पूजन
करना चाहिए ।२०।२१॥
दष्ट्राकरालवदन कालाग्निचयसनिभम् ।
पश्चादन्तगृह शभो प्रविश्य सुसमाहित ॥ २२
पञ्चपुष्पाञ्जलिं दद्याह्रह्मभि पञ्चभिमुने ।
गन्धे पुष्पैर्महादेव भक्तया सपूजयेद ध ।। २३
स्कन्द विनायक चैव लिङ्गशुद्धिमथाऽऽरभेत् ।
सूक्त मन्त्रैश्च विधिवन्नमोन्तै प्रणवादिकं ॥ २४
आसन क पयेत्पश्चादैश्वर्यदलपङ्कजे ।
अणिमा पूर्वपत्र स्यात्सर्वज्ञत्वमथेश्वरम् ॥ २५
कणिकाया न्यसेविप्र वह्नव मण्डल तत ।
सौर सौम्य च विन्यस्य धर्मादीन्वै विदिक्षु च ॥ २६
अधर्मादीस्ततो दिक्षु सोमस्यान्ते गुणनयम् ।
तत्त्वत्रयमथो विद्वास्तत शभु प्रपूजयेत् ॥ २७
ख्नापयेदिधिना देव गन्धयुक्त न वारिणा ।
पञ्चामृत ततो मन्त्र साधित विधिपूर्वकम् ॥ २८
इसके पश्चात सुसमा हित होकर भगवान्शम्भु के अताह मे प्रवेश
करके पज-पुष्पाञ्जलि देदे । हे मुने पञ्ज ब्रह्मो के द्वारा देना चाहिए ।
बुध पुरुष को भक्ति के साथ गन्ध और पुष्पा से महादेवजी का पूजन
करना चाहिए ।२२।२३। स्कन्द और विनायक देव का भी पूजन करे।
इसके अनतर निज शुद्धि का आरम्भ करना चाहिए। मूक्ता से और

शिव पूजा विधि कयन । [ २०३ मन्यो के द्वारा विधिवत् पूजन करे। जिनमे "मन" यह तो अन्त में लगाने और अग्नि मे प्रणाव लगा देना चाहिए ।२४॥ पीछे ऐश्वर्य ल. पङ्कज मे आसन की कल्पना करनी चाहिए। अणिमा पूर्व पत्र होगा और इसके पश्चात सर्वज्ञाय ईश्वर होगे । २५ । हे विप्र । इसके अन तर कणिवा मे वह्नि के मण्डल का न्यास करना चाहिए । सौर और सौम्य या विन्यास करे तथा विदिशाओ मे मर्म आदि का न्यास करना चाहिए ।२६। इसके पश्चात, दिशाओं में अधर्म आदि का न्यास करे और सोम के अन मे तीनो गुणो को विन्यस्त करना चाहिए । इसके पदन्त, विद्वान तीनो तत्वो का विन्यास करना चाहिए । फिर भगवान शम्म का पूजन करना चाहिए २७४ विधि से देव का स्मान करावे ओर स्नान का जल गन्ध से युक्त ही होना चाहिए । फिर पञ्चामृत का का साधत मन्त्रों से ही करना चाहिए। और विधि विधान के साथ ही उसे शरना चाहिए ॥२८॥ स्नापयेत्प्रणवेनैव तयाऽऽदो पयसा मुने । आज्येन मधुना दध्ना तथा चेक्षुरसेन च ।। २६ जलस्य शुद्धि विधिवन्मन्त्रं कुर्यादनेक्श । सछाद्य सितवस्त्रेज स्नापयेदिन्दुशेखरम् ।। ३० कुगापामार्गकपूरजातीचम्पकपुष्पकं । करवीर सितश्चैव मलिकाकमलोत्पलं ॥ ३१ आपूर्य पुष्पं सुशुभश्चन्दनार्थ श्च तजलम् । सद्योजातादिकास्तत्र विन्यसेह्रह्मण मुत ॥ ३२ सुवर्णकलशेनाथ तथा च राजतेन च । शङ्खन मृन्मयेनाथ शोभितेन शुभेन च ।। ३३ सकून सपुप्पेण स्नापयेन्मन्त्रपूर्वकम । पवमानेन रुद्रण तथा वामीयकेन च ।। ३४ त्वरितास्येन द्रण नीलरुद्रण वा पुन । अथर्वगिरमा वाऽपि रद्रेण च तथैव च ॥३५ २०४ ] [ सूर्यपुराण हे मुने । प्रणव के ही द्वारा स्नान कराना चाहिए। उसमे आदि मे जल से स्नान करावे । फिर आज्य से मधु से-दघि से तथा ईख के रस से स्नान करावे ।२६। फिर विधि पूर्वक अनेक वार जल की शुद्धि भक्तो के द्वारा करावे । श्वेत वस्त्र से भली भांति छादम करके ही इन्दु शेखर भगवान् का स्नान कराना चाहिए ३० हे ब्रह्माजी के पुष । कुशा-अपा मार्ग-कपूर-जाती-चम्पा कर वीर और शित पुप्पो से तथा माल्लिका और कमलो पलो से पूरित करके सुन्दर पुष्पो से और चन्दनादि से उस जल को मुक्त करे । उसमे सद्योजातादिक का विन्यास करना चाहिए ।३१॥३२॥ सुवर्ण के क्लश से चादी के से-शत से-मृन्तिका से निमित पात्र से किसी से भी जो शोभित हो और शुभ हो फूर्चकोस हित और पुष्पो से युक्त से मन्त्रो के साथ स्नान कराना चाहिए। पव- मान रुद्र से तथा वामीयक से त्वरित नाम वाले रुद्र मे अथवा नील रुद्र मे अथवा अघद शिर से तथा रुद्र से स्नपन करावे ॥३३॥३५॥ रयतरेण पुण्येन श्रीसूक्त नाथवा मुने । पौरुपेण च सूक्तेन ज्येष्टसाम्ना च विष्णुना ॥३६ पञ्चभिव्रह्मभिर्वाध्य सूत्रण प्रणवेन वा । स्नापयेद्देवदेवेश सर्वयज्ञफलाप्तये ॥३७ वस्त्र यज्ञोपनीते च तथा ह्याचमनीयकम् । मुकुट च शुम भद् तथा वै भूपणानि च ॥३ मुखवास च नैवेद्य सर्व वै प्रणवेन न । तत स्कटिक्सकाश देव निष्कलमक्षरम् ॥३६ कारण सर्वलोकाना सर्वलोक्मय परम् । ग्रह्मणा विष्णुरन्द्राय रपि देवरगौचरम् ॥४. वेदयिद्भिदि वेदान्तरगोचरमिति थनम् । आदिमध्यान्तरहित भेषज भारोगिणाम् ॥१ शिवलिङ्गमिति म्यात शिालिने व्यवस्थितम् । प्रणयेनंर मन्त्रण पूजयोलिङ्गमूर्यानि ॥४२ । २०५ शिव पूजा विधि कथन ] पुण्य रथन्तर से हे मुने । अथवा श्री मूक्त से और पुरुप सूक्त से और ज्येष्ठमाम से विष्णु से पांच ब्रह्मो मे-सूत्र से अथवा केवल प्रणव "से देवेश्वर का स्मपन कराना चाहिए। जिससे सब यज्ञों के पुण्य फल की प्राप्ति होवे ॥३६॥३७॥ वस्त्र-यज्ञोपवीत-आचमनीय भद्र-शुभ मुकुट- तथा भूषण मुखावास ताम्वूलादि-नैवेद्य ये सभी प्रणव से समर्पित करे। इसके पश्चात् स्फटिक के सदृश निष्क्ल अक्षर देवश को जो सब लोको के कारण सर्व लोकमय परम हैं तथा ब्रह्मा-विष्णु और रुद्र आदि के द्वारा देवो के भी अगोचर हैं । जो वेदो के ज्ञाताओ के द्वाग वेदान्तो से ही वे गोचर हैं-यह श्रत है। जो आदि मध्य और अन्त से रहित हैं थोर जो भव के रोगियो के भेपज हैं वह शिव लिङ्ग इस नाम से विरयात है और शिव लिङ्ग में व्यवस्थित हैं। लिङ्ग के मस्तक मे प्रणव मन्त्र से ही पूजन करना चाहिए ॥३५-४२॥ स्तोत्रं स्तुत्वा महादेव प्रणिपत्य प्रदक्षिणम् । पुनरयं च वै दत्त्वा पुष्पाणि च विकीर्य वै ।।४३ पादयोदेवदेवस्य प्रणिपत्य विमर्जयेत् । एव सक्षिप्य कथित ब्रह्मसूनो शिवार्चनम् ।।४४ सर्ववेदेषु यद्गुह्य यथा शभोर्मया श्रतम् ॥४५ सनत्कुमारो भगवाञ्च तवान्यच्छिवार्चनम् । नन्दीश्वराद्भगवतस्तन्मया कथित द्विजा ॥४६ यः पठेत्प्रयतो भक्त्या शिवार्चनविधिक्रमम् । सर्वपापविनिमुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥४७ स्तोत्रो के द्वारा स्तवन करके और महादेव जी की प्रदक्षिणा एव प्रणिपात करके फिर अध्यं देवे और पुष्पो का विकिरण करे ॥४३॥ देवो के देव वे परणो मे प्रणिपात करके विसर्जित करे । हे ब्रह्म सुनो ! इस प्रकार से सक्षेप करके भगवान शिव का अर्चन वह दिया है । यह सभी वेदो मे भी परम गोपनीय है । जैसा मैंने भगवान् शम्भु मे सुना है ॥४३-४॥ श्री गूात्री ने कहा है दिनो। भगवान् सनत्कुमार ने २०६ ] [ सूर्य पुराण जो शिवार्चन भगवान् नन्दीश्वर के मुख से सुना था वह मैंने कह दिया है।।४६॥ जो प्रयत होकर भक्ति से इस शिव के अचन की विधि के फ्रम को पढता है वह सभी पापो से निर्मुक्त होकर ब्रह्मलोक में प्रति- ष्ठित होता है ॥४७॥ ॥ दुर्वा-गणपति व्रत कथन । अन्यद्वत पापहर धर्मकामार्थमोक्षदमू । उमामहेश्वर नाम व्रत लोक्यविश्रुतम् ।।१ पौर्णमास्याममावास्या चतुदश्यष्टमी(?) तथा । कार्यमेतासु तिथिपु नक्तमेद्वि गोत्तमा ॥२ ब्रह्मचारी हविष्याशी सत्यवादी सुसयमी। वर्षान्ते प्रतिमा कार्या हेम्ना वा रजतेन च ॥३ पञ्चामृतस्तु सस्नाप्य पूजयेद्विधिवद्विजा । वस्त्र पुष्परलकृत्य भक्ष्य नाविध शुभै ।। ध्वजैवितानेश्चमरयथा शोभा प्रकल्पयेत् । आचार्य पूजयेद्भक्त्या यस्तालारभूपणे ।। भवत्या च दक्षिणा दद्याच्छिवभक्तांश्च भोजयेत् । शेवमेक तु सभोज्य शतभोज्यफल लभेत् ॥६ सत्य सत्य पुन सत्य देवस्त्र ववन यथा । प्रतिमा पूजिता पश्चात्ताम्रपान सुनिमले । ७ निधाय सितवस्त्रेण सवाद्य शिरसा नमेत् । माहतूर्यादिनि?पै शिवस्यायतन महत् । पुनर्वद्या सुमरथाप्य प्रत शभोनिवेदयेत् ।। गुती ने कहा-अन्य न पापा के हरण करने वाला होता है और धर्म-नाम प्रर्य और मोक्ष पा प्रदान करने वाला होता है । उमा हेयर नाम का व्रत लोरम प्रमित है ।१॥ है जोतमो! औषमासी अमावस्या चतुर्दशी अष्टमी इन तिथियो म रात्रि में यह व्रत दुर्वां-गणपति व्रत कथन] । २०७ करना चाहिये ॥२।। व्रत करने वाला ब्रह्मचारी हविष्य के खाने वाला- सत्य बोलने वाला-सुसयमी होना चाहिए। वर्षान्त मे सुवर्ण से अथवा चांदी से प्रतिमा बनानी चाहिए ॥३॥ हे द्विजो! पञ्चामृत से स्नान कराकर उसका विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए वस्त्रो और पुष्षो से अलकृत करके-शुभ भभ्य और नाना प्रकार के शुभ भोग्यो से ध्वजा. विताभो से और चमगे से शोभा की कल्पना करे। भक्ति भाव से आचार्य की पूजा वस्त्र-अलकार-भूपणो से करनी चाहिए ||४|| भक्ति से दक्षिणा देवे और जो शिव के भक्त पुरुप हो उनको भोजन कराना चाहिए। एक शिव के भक्त के भोजन कराने से सो विमो के जिमाने के समान फर मिला करता है ।।६।। यह सत्य है और पुन. सत्य है तथा इसी तरह से सत्य है जैसे देवता के वचन परम सत्य हुआ करते हैं। पूजित प्रतिमा को पीछे सुनिर्मल ताम्र के पात्र मे रखकर सफेद वस्त्र से ढांककर शिर से उनया नमन करे । शव तूर्य आदि वाद्यो से भगवान् शिव का महत् आयतन बनवावे । पुन उनको वेदी मे सस्था- पित करके भगवान् शम्भो के लिये व्रत को निवेदित करना चहिए ७. शिव प्रदक्षिणीकृस्य पश्चाव क्षमापयेत् ॥ श्रद्धया य करोतीद व्रत विदशपूजितम् । सूर्यायुतप्रतीकाश विमान सार्वकामिकम् ॥१० आरुह्य स्त्रीसहस्त्रश्च गर्नानाविधवृतः। याति माहेश्वर स्थान यल गत्वा न शोचति ॥११ तन माहेश्वरान्भोगान्भुक्त्वा कल्पशतनयम् । तदन्ते वैष्णवान्भोगान्मुक्ते विष्णो समीपतः ॥१२ पश्चाद्भोगसमायुक्तो ब्रह्मलोके महोते। ब्रह्मलोकात्परिभ्रष्ट प्राजापत्यान्समथ्रनुते ॥१३ तस्माल्लोकाच्युत: पश्चात्सर्वलोकनमस्कृत. । सोमनोकं समासाद्य मुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् ।।१४ २०८ ] [ सूर्यपुराण भावान् शिजी की परका कर पीछे उसने इस प्रकार से क्षमापन की याचना करनी चाहिए 18जो मनुष्य इस त्रिदशो (देगे) के द्वारा इस वन को किया करता है वह अयुत (दश हजार) सूर्मों के समान सब कामनाओ को पूर्ण करने वाले विमान पर समारोहण करके सहस्रो स्त्रियो के सहित और अनेक प्रकार के गणो से परिवृत होकर मीधा माहेश्वर के स्थान को चला जाया करता है नहाँ पर जाकर फिर चिता नहीं किया करता है । ॥११॥ वहाँ पर तीन सौ कल्लो पर्यत माहेश्वर भोगा का उपभोग करके उसके अत में प्णव भोगो को भगवान् विष्णु के समीप मे स्थित रहता हुआ गिया करता है ।१२। पीछे भोगो से समायुक्त होता हु ग्रह्म तो मे प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ग्रहालोक से परिभ्रष्ट होकर प्रानाय भाले का आनन्द महग करता है ॥१३॥ उस लोग से भी पुर हार पीछे सब लोगो के द्वारा वदित हुआ चद्रलोक को प्राप्त कर यथापित भोगा का भोग करता है ॥१४॥ सोमाद्दे पेन्द्रगन्धवयक्ष गोकमनुत्तमम् । भुक्त्वा तत्र महाभागासदले मेरुपूवाति १५ तदन्ते लोकपालाना लाकानासाद्य मादते । तत कर्मावशेपेण पृथिव्यामेकराडभवेत् ।।१६ उमामहेश्वर नाम व्रत सर्वसुपपदम् । शपरेण पुरा गीत पावत्या पण्मुखस्य च ॥७ अगस्य पण्मुखाल्लन्ध्या प्राप्तवान्मे गुरुम्नन । द्वंपायनान्मुनिवरात्प्राप्तवानमुत्तमम् ॥१८ अन्यन्टूलव्रत नाग शणध्व मुनपुगवा । अमावास्या निराहारो भवेदब्द समयमी ।।१६ मूल पिष्टमय कृत्वा वर्षाने विनिवेदयेत् । शिवाय राजत पा सुग्णं निणिरपू २० भवस्या तु विन्यसेनधि सयमन्या पूर्ववत् । ब्रह्महत्यादिभि पातो यानि परा गम् ि॥२१ दूर्वा गणपति व्रत कथन ] [ २०६ इस रीति से सोम-गन्धर्व-देवेन्द्र और सर्वोतम यक्ष लोक मे भोग भोगकर इसके अन्त में सुमेरू गिरि के मस्तक पर रहता है। उसके अन्त मे लोक शुभ कर्मों के प्रवशिष्ट रहने से वह इस पृथिवा में एक रुड़ (सम्राट) होता है ॥१५॥१६॥ यह उमा महेश्वर नाम वाला व्रत सर्व सुखो का प्रदान करने वाला है । पहिले भगवान शंकर ने पार्वती जी से फिर उन्हो ने पण्मुख को बतलाया था। अगस्त्य मुनि ने पिण्मुख जी के मुख से इसको प्राप्त किया था। उनसे मेरे गुरुजी ने इसे प्राप्त दिया था। उन महा मुनिवर द्वंपायन जी से मैंने इस उत्तम व्रत को प्राप्त किया था ॥१७॥१८॥ हे मुनिश्रष्ठो! मुझ से आप लोग एक शूल व्रत का श्रवण करिए । अमावस्या के दिन निराहार रह कर एक वर्ष तक सुसयमी रहना चाहिए ॥१६॥ शूल को पिष्टमय करके वर्षान्त म निवेदित करे । शिव के लिये राजत (चादी का) पद्म जिममे सुवर्ण की कणिका हो निवेदित करे और मस्तक पर भक्ति से विन्यास करना चाहिए । शेष सव कुछ कृत्य पूर्व व्रत के ही समान होते हैं । इस व्रत के करने वाला ब्रह्म हत्या आदि महापापो से मुक्त हो जाता है और मन्त म वह परागति को प्राप्त किया करता है ।।२०॥२१॥ लोकान्पूर्वोदितान्प्राप्य तदन्ते पृथिवीपतिः । पूर्णमास्याममावास्यामन्दमेक दृढव्रत. ॥२२ वन्तेि सर्वगन्धाढया प्रतिमा विनिवेदयेत् । पूर्ववत्फलमाप्नोति व्रतेनानेन वै द्विजाः ॥२३ अष्टम्या च चतुर्दश्यामुपवासी जितेद्रियः । सर्वभोगसर्मायुक्त शिवलोके महीयते ॥२४ क्षमा सत्य दया दान शौचमिन्द्रियनिग्रहः । शिवपूजाऽग्निहवन मतोपाऽस्तेयता तथा ॥२५ सर्वव्रतेप्वय धर्मः सामान्यो दशधा स्मृतः ।।२६ अन्यग्रतं पापहर शृणुध्व मुनिपु गवा: । पण्मुखस्य पुरा प्रोक्त देवदेवेन दामना .

२१० ] । सूर्यपुराण कलासशिरारासीन देवदेव जगद्गुरुम् । प्रणम्य विधिवद्भक्त्या पप्रच्छ गिरिजासुतः । २८ पूर्व में वर्णित लोको को प्राप्त करके उसके अन्त में पृथिवी का पति होता है। पूर्णमासो-अमावस्या मे एक वर्ष तक दृढव्रत वाला पुरुष वर्ष के अन्त में समस्त गन्धो से समन्वित एक प्रतिमा को रचना करावे और उमे विनिवेदित कराना चाहिये। हे हिजो । इस प्रत से पूर्व के ही समान पुण्य फल प्राप्त किया करता है ॥२२॥२३॥ अष्टमी और चतुर्दशी में उपवास करने वाला जितेन्द्रिय पुरुष सब भोगो से समायुक्त होकर शिवलोक में प्रतिष्ठित हुआ करता है ॥२४॥ सभी व्रतो मे यह धर्म सामान्य है जो दश प्रकार का महा गया है ॥१५॥ क्षमा-सत्य- दया-दान-शौच-इन्द्रिय-निग्रह-शिवपूजा-अग्नि मे हवन-सन्तोष-अस्तेयता ये ही वे दश प्रकार के धर्म के लक्षण माने गये है ॥२६॥ हे मुनि पुङ्गवो । अन्य जो व्रत हैं वे सब पापो के हरण करने वाले ही हुआ करते हैं । इसे आप सुन लीजिए। देवो के देव शम्भु ने पहिले पण्मुख को यह बतलाया था ॥२७॥ गिरिजा के सुत ने कैलास पर्वत की शिखर पर समासीन जगत् के गुरु देवदेव से प्रणाम करके विधिपूर्वक भक्ति की भावना से यह पूछा था ॥२८॥ केन व्रतेन भगवन्सौभाग्यमतुल भवेत् । पुत्रपौत्रधनश्वर्य मनुज सुखमेधते ॥२६ तन्मे वद महादेव व्रतानामुत्तम व्रतम् । येन चीर्णेन देवेश नरो राज्य च विन्दति ॥३० राजीव जायते नारी अपि दासकुलोद्भवा । राजपुत्रो जयेच्छत्र गरुड पनगानिव ॥३१ ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस प्राप्य सर्वाधिको भवेत् । वर्णाश्रमविहीनोऽपि सोऽपि सिद्धिं च विन्दन्ति ॥३२ शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि व्रतानामुत्तम व्रतम् । अस्ति दूर्वागणपतेव्रत लोक्यविश्र नम् ॥३३ दूर्वा-गणपति व्रत कथन ] [२११ भगवत्या पुरा चीणं पार्वत्या पद्मया सह । सरस्वत्या महेन्द्रेण विष्णु ना धनदेन च ।।३४ अन्यश्च देवमुनिभिर्गन्धर्वः किनरस्तथा। चोर्णमेतद्वत सर्वेः पुराकल्पे पडानन ॥३५ श्रीस्कन्दजी ने कहा-हे भगवन् ! कोनसा ऐसा बन है जिसके करने से अतुल सौभाग्य होता है । पुत्र-पौत्र-धन और ऐश्वर्य का सुख मनुष्य शप्त किया करता है ॥२६॥ हे महादेव ! वही मुझे आप सत्र प्रनो मे उत्तम जो व्रत हो उसको बतलाने की कृपा कीजिये । हे देवे- श्यर ! जिस व्रत के चीर्ण कर लेने पर मनुष्य राज्य की प्राप्ति का लाम लिया करता है ।।३०॥ चाहे दास कुल मे हो क्यों न जन्म ग्रहण किया हो नारा एक रानी के ही समान हो जाया करती है। राजपुत्र अपने शत्रुओ को गरुड जसे सपो को जीत लेता है वैसे ही जीत लेता है ॥३१॥ ब्राह्मण ब्रह्मवर्चम को प्राप्त करके सबसे अधिक तेजस्वी हो जाया करता है । कोई वर्गों और आयमों से हीन भी हो तो भी सिद्धि को प्राप्त कर लिया करता है ॥३२॥ ईश्वर ने कहा- हे वत्म | सुनो, मैं तो मे उत्तम व्रत बतलाता हूँ। दूर्वागणपति या प्रत मिलोसी में प्रसिद्ध प्रत होता है ॥३३॥ पहिले इस व्रत को भगवती ने पार्वती और पपा के साथ चीर्ण किया था। इस व्रत को सरस्वती देवी ने भी किया पा तथा महेन्द्र विष्णु और घनद (कुवेर) ने भी किया था। इनके अतिरिक्त अन्य देवों ने-मुनियो ने-~-गन्धर्वो ने तया विनरो ने इस यत को किया या 1 हे पडानन ! पहिले बस में ही सबने इस व्रत को पीणं दिया था ॥३४॥३५॥ चतुर्थों या भवेन्छुल्का नभोमासस्य पुण्यदा। तस्या प्रतमिदं कुर्यास्कार्तिक्या या पडानन ॥३६ गजाननं चतुर्वादुमेकदन्त विपाटितम् । विधाय हेम्ना विघ्नेा हैमपीठागनस्थितम् ॥३७ । २१२ । । सूर्य पुराण तथा हेममयी दूर्वा तदाधारे व्यवस्थिताम् । सस्थाप्य विघ्नहरि कलशे तानभाजने ॥३५ वेष्टित रक्तवस्त्रेण सर्वतोभद्रमण्डले । पूजयेद्रक्तकुसुमैः पत्रिकाभिश्च पञ्चभिः ॥३६ बिल्वपत्रमपामार्ग शमी दूर्वा हरिप्रिया (?) । अन्यः सुगन्धिकुसुमै पत्रिकाभिः सुगन्धिभिः ॥४० फलश्च मोदकः पश्चादुपहार प्रकल्पयेत् । यथावदुपचारैस्तु x पूछयामि जगत्पते ॥४१ जो नमो मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी होती है वह परम पुण्य ही होती है उसमे इस व्रत को करना चाहिए अथवा कात्तिक की चतुर्थी में करना चाहिए । पडानन | गजानन-चार भुजाओ से युक्त एक दांत वाले त्रिपाटित प्रतिमा बनाकर सुवर्ण से निर्मित करे और विप्रेश प्रभु को हेम के पीठासन पर स्थित करना चाहिए ॥३६॥३७॥ तथा हेममयी दूर्वा को उनके आधार पर व्यवस्थित करे । फिर विघ्न कर्ता को ताम्र के पान कलश मे सस्थापित करे और रक्त वर्ण के वरत्र से वेष्ठिन करके सर्व तो भद्र मण्डल मे रक्त वर्ण के कुसुमो से और पांच पत्रिकाओ से पूजन करना चाहिए ॥३८॥३६॥ विल्व पत्र-अपामार्ग-शमी-दूर्वा - हरि प्रिया तथा अन्य सुगन्धित पुष्पो से और सुगन्ध वाली पत्रिकाओ से-फलो-मोदको से पीछे उपहार को प्रकल्पना करनी चाहिए । हे जगत्यते । मैं यथावर प्राप्त उपचारो से आपका पूजन कर रहा हूँ- यह प्रार्थना करनी चाहिए ॥४०॥४१॥ इत्युक्त्वा श्रद्धया नून पूजयेन्दिरिजासुतम् । एह्य हि देव हेरम्ब विघ्नराज गजानन ॥ उपविश्याऽसन देव सर्वकामप्रदो भव ॥४२ उमासुत नमस्तुभ्य विश्वव्यापिन्सनातन । विघ्नौध छिन्धि सकलमध्यं पाद्य ददामि ते ॥४३

दूर्वा-गणपति व्रत कयन ]
गणेश्वराय देवाय उमापुत्राय वेधमे ।
पूजामय प्रयच्यामि गृहाग भगवन्नम IIm
विनायकाय शुराय वरदाय गजानन ।
उमासुताय देवाय कुमारगुरवे नमः ।।४५
लम्बोदराय वीराय सर्वविघ्नोपहारिणे ॥४६
उमाङ्गमलसभूत दानवाना वधाय ।
अनुगृहाय लोकानां स देव पातु विश्वभुक ॥४७
परज्योति: प्रकाशाय सर्वसिद्धिप्रदाय च ।
तुम्न दीप प्रदास्यामि महादेवात्मने नमः ।।४८
गणानां त्वा गणपति हवामहे
कविं क्वीनामुपमश्रवम्नमम् ।
ज्येष्ठगज ब्रह्मणा ब्रह्मणस्पत
आ न. शृण्वन तिमि सीद सादनन् ।।४'
इतना निवेदन करते थदा से निश्चय ही गिरिजा के
सुत का पूजन
करना चाहिए । हे देव । हे रम्य । हे विघ्न राज! हे गजान । आइए
थाइए । है देव । आमन पर उपविष्ट होरर समस्त कामनाओ के प्रदान
परने वाले हो जाए। यह आवाहन का भनत है। हे उमा सुत
हे विश्व व्यापिन् है मनाद । आपरी मेवा में मेरा नमस्कार है । अन्य
मेरे गर विघ्नो रे आप का छेदन कर दीजिए। मैं आपको अब और पाच
यनित कर रहा है । यह अध्यं और पाय वा मनत है IIIIIII
गणेश्वर देव-या-उमा के पुत्र के लिए पूजा अस्ति कर रहा हूँ। हे
भगवान ! मार इमको ग्रहण कीजिए । बाRT लिए मेरा ममम्बार है ।
यह गन्ध का माम है ॥४४॥ पितापक-फरवरद-उमा मुत-देव-और
युमार गुरु के लिए है गजानन ! मेरा नमार है। सम्योदर-पोर
और सब विप्नों में ममुदाय के हरने वाले प्रभु के लिये मेरा प्रणाम है।
यह पुर प्रांग करने का मन है ॥४५॥४६॥ उमारे बारे पर में
गमुरसान दानकों के परे लिये और मोहों के गार अनुग्रह रोरे

२१४ ] [ सूर्यपुराण -- लिए है आप सभूत हुए हैं । है विश्वमुक देव । वही अप मेरी रक्षा कीजिए ।।४७॥ यह धूप देने का मन्त्र है । परम ज्योति के प्रकाश के लिये और सब प्रकार की सिद्धियो को प्रदान करने के लिए समुत्पन्न आपको मैं यह दीप अर्पित करता हू जोकि आप श्री महादेव जी के आत्मा है ऐसे आपको मेरा नमस्कार है । यह दीप का मनज है ॥४८॥ गणो के गणपनि आपको हम आवाहन करते हैं। आप कवियो मे भी श्रेष्ठ पवि हैं आप यहा पधारिए । हे ब्रह्मणस्वते ब्रह्मो के आप ज्येष्ठ राज है। हमारी प्राथनाओ का थवण करते हुए आप हमारे इस स्थल पर विराजमान होइए यह उपहार काममन्न है ॥४६॥ गणेश्वर गणाध्यक्ष गौरीपुत्र गजानन । व्रत पूर्णता यातु त्वत्प्रसादादिभानन ॥५० एव सपूज्य विध्नेश यथा विभवविस्तर । सोपास्कर गणाध्यक्षमाचार्याय निवेदयेत् ॥५१ गृहाण भगवन्द्रह्म-गणराज सदक्षिणम् । व्रत त्वद्वचनादद्य सपूर्ण यातु सुव्रत ॥५२ एब य पञ्च वर्षाणि कृत्वोद्यापनमाचरेत् । ईप्सिताल्लाभते कामान्देहान्ते शाकर पदम् ॥५३ अथवा शुल्कपक्षस्य चतुर्थ्यां सयनेन्द्रिय । कुर्ताद्वर्पनय त्वेव सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् ॥५४ उद्यापन बिना यस्तु करोति व्रतमुत्तमम् । तेन शुल्कतिले कार्य प्रात स्नान पडानन ॥५५ हेम्ना वा रजतेनापि कृत्वा गणपति बुध । पञ्चगव्यश्च मुस्नाप्य दूर्वाभि सप्रपूजयेत ॥५६ मानश्च दशभिर्भक्त्या दूर्वायुक्त शिखिध्वज । इत्येव कथित वत्स वर्वसिद्धिप्रद शुभम् ।। व्रत दूर्वागणपते किमन्यच्छोतुमर्हसि ॥५७ दूर्वा गणपति वा कथन ] [ २१५ हे गणेश्वर है गणापक्ष ! हे गौरी के पुत्र! हे गजानन ! यह मेरा पूर्णता को आपके अनुग्रह से प्राप्त होवे । यह प्रार्थना कामना है। ॥१०॥ इस प्रकार से विघ्नेश का पूजन करके जो जया भी आपके पास वैभव हो उसी के अनुसार मजन करना चाहिए और फिर सव सामान के सहित गणाध्यक्ष प्रभु की प्रतिमा को अपने याचार्य लिये निवेदिन करना चाहिए ॥५१॥ है भगवान । हे ब्रह्मान इन गणराज प्रमु को याप दक्षिणा रे सहित ग्रहण कीजिए । हे सुनत ! नाज यह मेग प्रत याप के वचनाशीर्वाद से सम्पूर्णता को प्राप्त हो जाये । यह दान देने का मनज है । इसे बोल कर ही आचार्य को दान देना चाहिए 1(२॥ इस प्रकार से जो कोई पाच वर्षों तक करके उद्यापन का आर. म्भ करता है वह पुरुष इस व्रत के समाचरण से अपने अभीष्ट मनोरयों यो प्राप्त कर लेता है और अन्त में भगगन शङ्कर के पद की प्राप्त हुआ करता है ॥५३॥ अथया शुक्र पक्ष की चतुर्थी मे गपत इन्द्रियो याला होरर इस प्रकार से तीन वयं तक परे तो सर्व सिद्धि को पा जाया करता है ॥५॥ जो कोई मनुष्य बिना ही उद्यापन के इस उत्तम प्रन कोरिया परता है उसो हे पडानन ! यह शुक्ल तिथी हो मे परना चाहिए और प्रात याल में स्नान करो। वुध पुरुष को मुवर्ण या चादी में गणपति की प्रतिमा की रचना करनी चाहिए। पजगन्धों से भली भांति सुम्मपन करार फिर दूर्वामी से उनका पूजन करना पाहिए ॥५५॥५६॥ हे शिविप्वज ! भक्ति से मनजीरे और दूर्वानों के द्वारा पूजन करें। वरम ! यह इस प्रशार में सब गिटियोमा देने याता परम गुम मन मैंने बता दिया है । यह दूर्वा गापति का मत है। बर और क्या मुझमे तुम प्रवण बरला पाहते हो ॥५]

२१६ ]
। सूर्य पुराण
॥ शिवालय करणादि फल कथन ।
मृदादिरत्नपर्यन्तद्रव्यैः कृत्वा शिवालयम् ।
यत्फलं लभते मयंस्तन्नो वक्तुमिहार्हसि ॥१
शृणुध्वमृपयः सर्वे प्रभाव परमेष्टिनः ।
शिवालयस्य करणादनन्तमलमुच्यते ॥२
अपि लोष्टमयं वाऽपि यः करोति शिवालयम् ।
सर्वयत्नेन विप्रेन्द्रा धर्मकामार्थमुक्तये ॥३
कैलासाख्यं च यः कुर्यात्प्रासाद परमेष्ठिाः ।
मेख्यि मन्दराख्य वा तुहिनाद्रिमथापि वा।
निषधाद्रि च नीलाद्रि महेन्द्राख्य द्विजोत्तमाः
स तत्सर्वतसकारी विमानै सावं कामिकः ॥५
गत्वा शिवपद दिव्यं शिववन्मोदते चिरम् ।
महाप्रलयपर्यन्तं भुक्त्वा भोगान्यथेप्पितान् ॥
तदन्ते विषयास्त्यक्त्वा शिवसायुज्यमाप्नुयात्
पतित खण्डित वाऽपि जीणं वा स्फुटित तथा ७
ऋपियो ने कहा- मृत्तिका से यादि लेकर रत्नो पर्यन्त एक शिवा-
लय की रचना कराकर जो पुण्य फल मनुष्य प्राप्त किया करता है उसको
आप हमको बतलाने के लिये समर्थ है ॥१॥ श्री सूत जी ने कहा-
हे समस्त ऋपि गणो । अव आप परमेष्ठी प्रभु का प्रभाव सुनिये ! शिवा-
लय की रचना करने से अनन्त फल बतलाया जाता है ॥२॥ जो भी
कोई चाहे लोष्ठमय ही एक शिवालय की रचना करता है हे विप्रेन्द्रो
नह सर्व प्रयत्नो से धर्म काम और अर्थ तथा मुक्ति के लिये ही हुआ
रता है ।।३।। कैलास नाम वाला जो परमेष्ठी का प्रासाद कोई बनाता
अथवा मेरु नाम से युक्त-मन्दर नाम वाला या तुदिन गिरि नाम
ला-निपधाद्रि-महेन्द्र-नीलाद्रि नाम युक्त
शिवालय हे द्विजोत्तमो!
सोई बनवाता है जो कि अत्युत्तम हो वह मनुष्य पर्वत के सदृश सर्व
से

शिवालय करणादि फल कथन ] [ २१७ कामिक विमानो के द्वारा ही परम दिव्य शिव पद को जाकर भगवान शिप की ही तरह चिर काल तक परम प्रसन्न रहा करता है। वह महा प्रलय तक वहा पर यथोप्सित भोगो का भोग किया करता है । इसके अन्त मे सव विष्टयों को त्याग करके भगवान शिव हे सामुज्य को प्राप्त कर लिया करता है । चाहे वह पतित खण्डित-जीर्ण अथवा स्फुटित कैसा ही क्यो न होवे ।।४॥ ५॥६॥७॥ कारयेत्पूर्ववद्यस्तु सुधाद्य सुममोहरे । प्राकार मण्डप वाऽपि प्रासाद गोपर तथा ॥८॥ कर्तु रम्यधिक पुण्य लभते नात्र संशय । वृत्त्यर्थ वा प्रकुर्वोत नर कर्म शिवालरे || य प्रयाति न सदेह स्वर्गलोके सवान्धव । यश्चाऽऽत्मभोगसिद्धयर्थमपि रुद्रालये सकृत् ॥१०॥ कर्म कुर्यादि सुख लब्ध्वा सोऽपि प्रमोदते । यदाऽशक्तो भवेन्मर्त्य प्रासाद वर्तु मीश्वरे ॥११॥ ममार्जनादिभिवाऽपि सर्वान्यामानवाप्नुयात् । समार्जन तु य चुर्यान्माजन्या मृदुमूक्ष्मया ॥१२॥ चान्द्रायणसहस्रम्य फल मासेन लभ्यते । शिवस्य पुरतो पह्नि सम्याप्याभ्यर्च्य शकरम् ॥१३॥ जुहुयादात्मनो देह य स याति लिव पदम् । शिवक्षेमे निराहारो भृत्वा प्राणान्परित्यजेत् ।।१४।। जो पूर्ववत् उस शियालय या उसार कररे प्यार परा देता है और सुधा यादि पुषवा देना है और परम सुन्दर पदार्थों मे विरपित बरा देता है . उमा प्रागार-मप-प्रासाद और गोपुर बनवा देता है। उस पराने यारे को अपिर पुण्य प्राप्त हुआ करता है-दमम पुष भी साय रही है । अपया वृत्ति लिय मनुष्य गिवानप में बम बरे। जो एसा करता है यह वान्धवा महिन स्वर में गमन रिया परता है-इसम सन्देह नही है। जा आग्म भोगासी मिमि लिये २१८] [ सूर्य पुराण भी स्ट्रालय मे यदि एक बार कर्म करे तो वह सुम्प प्राप्त करने वह भी परम प्रसन्न होता है। जब मनुष्य असक्त हो कि ईश्वर के प्रामाद का निर्माण न कर गके तो शिवालय मे सभाजन आदिकी सेवा करने मे भी समस्त कामो की प्रामि कर लिया करता है। जो मनुष्य मृदु सू-मा मानी से समान किया करता है यह एक मास मे एक सहस्र चान्द्रायण व्रतो का पल प्राप्त कर लिया करता है। भगवान् शिव के आगे वृद्धि की सम्थापना करके शहर का अभ्यर्चन करे और अपने देह की आहुतियां देता हैं वह भी शिवजी के पद को प्राप्त किया करता है । भगवान् शिव के क्षेत्र में निराहार होकर जो प्राणो का परित्याग किया करता है वह परमेषी के प्रसाद से शिव के शायुज्य को प्राप्त कर लेता है। ॥८-१४॥ शिवसायुज्यमाप्नोति प्रसादात्परमेष्ठिन । अथाऽऽत्मरणौ छित्त्वा शिवक्षेत्रे वसेन्नर ॥१५॥ देहान्ते शिवसायुज्य लभते नान सशय । फल यदश्वमेघस्य तदेव क्षेत्रदर्शनात् ॥१६॥ शताधिक प्रवेशाच्च द्विगुण लिङ्गदर्शनात् । तस्माच्छतगुणा पूजा जलस्नान ततोऽधिकम् ।।१७।। जलस्नानाच्च विप्रेन्द्रा क्षीरस्नान शताधिकम् । दघ्ना सहस्रमाख्यात मधुना तत्छताधिकम् ॥१८॥ अनन्त सर्पिपा स्नान वाससा तच्छताधिकम् । तस्मात्कोटिगुण पुण्य पञ्चत्व शकरालये ॥१६॥ तस्माच्छतगुण पुण्य नियमर्यस्त्यजेत्तनुम् । प्रदक्षिणात्रय कुर्याद्य प्रासाद समन्तत ॥२०॥ सव्यापसव्यव्याजेन मृदु गत्वा शुचिर्नर । पदे पदेऽश्वमेधस्य यज्ञस्य फलमाप्नुयात् ॥२१॥ इसके अनन्तर जो अपने चरणा का छेदन करके शिव के क्षेत्र मे निवास किया करता है वह देह के अन्त हो जाने पर भगवान विष के

शिवालय करणादि फल कथन )
" २१६
सायुज्यपद को प्राप्त क्यिा पता है- इममे लेश मात्र भी सशय नहीं
है । शिव के क्षेत्र के दर्शन का भी ऐमा फा होता है कि जो अश्वमेघ
यज्ञ करने वाले को हुआ करता है वही उसे होता है ।१५।१६. शिवा-
लय में प्रवेश करने से मौ गुना अधिक और शिवलिङ्ग के दर्शन से
उमसे भी दुगुना पन प्राप्त होता है। उसमे भी शतगुना पूजा का फल
होता है और जल से भगवान् गिव या तान कराने से उससे भी
अधिक फल हुआ करता है ।१७ हे विपेन्द्रो ! जल के द्वारा स्नान
पराने से दूध से स्नान कराने मे सौ गुना अधिक हुआ करता है । दही
मे स्नान कराने पर महस्य गुणा फल कहा गया है और मधु से पत
शतगुना अधिक पल होता हैं। मृत से स्नान कराने पर अनन्त गुना
पल होता है । वारा से वराने पर शताधिक पल हुआ करता हैं । उमसे
वोटि गुना पुण्य पाद्धरालय में पञ्चत्व का होता है ।१८१६ उरासे भी
परोड गुना पुण्य नियमो ये माय रहवर जो शरीर का त्याग दिया
परता है उसका होता है। प्रासाद के चारों ओर जो तीन प्रदानणा
विया परता है। राव्य-अपमव्य व्याज से मुचि मनुष्य म दुगमन
परवे एर-एर पद में अपरमेप यज्ञ का पत्र प्राप्त किया करता
हैं ।२०॥२१॥
दुर्लभा सलु या मुक्तिरनायासेन देहिनाम् ।
जायते क्मा येन शृणुध्व तद्विजोत्तमा ॥२२॥
गौनर्ममात्र मलिप्य मण्डल गोमयेन च ।
चतुरन विधानेन चाद्भिरभ्युदय मन्त्रविन ॥२३॥
अलवृत्य वितानाधरर्वाऽपि मनोहर।
बुबुदैरपंचन्द्रश्च म्यरश्वत्यपत्र ॥२४॥
मितविरमित पचं रक्त नीलोतान्तया ।
विमानेन विचित्रेण मुक्तादाम्ना द्विजोत्तमा. ॥२५॥
मिनमृतास्नय गुस्ता पूर्णकुम्भ।
पत्रपन्यमानाभियंजयन्तीमिर ॥२६॥

२०० - [ सूर्य-पुराण पञ्चाशद्दीपमालाभिधू पैश्च विविधस्तथा। पञ्चाशद्दलसयुक्त लिखित्वा पधमुत्तमम् ॥२७॥ तद्वद्वणस्तथा चूर्णं श्वेतचूर्णरथापि वा। एकहस्तप्रमाणेन कृत्वा पद्म विधानत ॥२८॥ देह धारियो की मुक्ति परम दुर्लभ हुआ करती है वह भी अना- यास से ही हो जाया करती है। उस वर्म के विषय मे हे द्विजत्तमो । अब आप श्रवण कीजिए ।२२। गोमय से गोचर्म के परिणाम वाला 'मण्डत का भली भांति लेप न करे । चतुरस्त्र के विधान से मन्त्र वेत्ता को जल से अभ्युषण करना चाहिए ।२३। वितान आदि से अथवा मनोहर छनो के द्वारा उनको विभूपित करना चाहिए। वृद्धो से- अर्धचन्द्रो से-स्वर्णो से और अश्वत्य के पनो से-सित-विकसित पमो से-रक्त कमलो से-नीलोत्पलो से-विचित्र विमान से--मुक्ताओ की लडियो से हे द्विजोत्तमो । सितमृत्तिका के पात्रो से-सुलक्ष्णपूर्ण कुम्भो से-फल और पल्लवो की मालाओ से-वजयन्तियो के द्वारा- अ शुको से- पचास दीपो की माला से-विविध प्रकार की धूपो से-एक पचास दलो से सयुत उत्तम पद्म का लेखन करके उस वर्णो के चूर्णो से अथापि श्वेत चूर्णों से एक हाथ के प्रमाण वाला विधान पूर्वक पद्म की रचना करे । ।२४-२८॥ कणिकाया न्यसेद्देव देव्या देवेश्वर भवम् । पर्णानि विन्यसेद्वणं रुद्र प्रागाद्यनुक्रमात् ॥२६॥ प्रणवादिदमोन्तानि सर्ववर्णानि सुव्रता । सपूज्यव सुरश्रेष्ट गन्धपुप्पादिभि क्रमात् ॥३०॥ ब्राह्मणान्भोजयत्तत्र पञ्चाशद्विधिपूर्वकम् । अक्षमालोपवीत च कुण्डले च कमण्डलुम् ॥३१॥ आसन च तथा दण्डमुणीप वस्त्रमेव च । दत्त्वा रोपा द्विजेन्द्राणा देवदेवाय शभवे ॥३२।।

शिवालय करणादि फल कथन ]
। २२१
महाचसु विवेद्य गं कृष्ण गोमिथुनं तथा ।
अन्ते च देवदेवाय दत्त्वा तद्वर्णमक्डलम् ॥३३॥
यागोपयोगिद्रव्याणि शिवाय विनिवेदयेत् ।
ओंकाराद्य जपेद्धीमान्प्रतिवर्णमनुक्रमात् ॥३४॥
एवमालिख्य यो भक्त्या वर्णमण्डलमुत्तमम् ।
यत्फलं लभते मत्यस्तद्वदामि समासतः ॥३५॥
उस पद्म की कणिका मे देवी के साथ देवेश्वर भव का न्यास
करना चाहिए । रूद्र वर्गों से प्राग आदि के अनुक्रम से वर्गों का
विन्यास करे ।२६। हे सुव्रतो । प्रणव आदि मे और अन्त' मे "नमः"
शब्द लगाकर सर्व वर्गों का प्रयोग करे। इस प्रकार सुरश्रेष्ठ का
भलीभांति पूजन करके गन्ध आदि का क्रम से अभ्यर्चन करना चाहिए
1३० व्हाँ पर ब्राह्मणो का भोजन कराना चाहिए । कम से कम पचास
वित्रो का भोजन करावे और विधि के साथ ही कराना चाहिए। उन
विप्रो को अक्षमाता उदवीत-दोकुण्डल कमण्डलु-आसन-दण्ड-उष्णीप-
वस्त्र उन द्विजो को देवदेव भगवान् शम्भू का उद्देश्य करके ही अर्पित
करे ।३१॥३२॥ महाचरू का निवेदन करके कृष्ण वर्ण की दो गौओ का
दान करे और अन्त मे देवदेव के लिये उस वर्ण का मण्डल-भाव के
उपयोगी द्रव्यो को भगवान् शिव के लिये विशेष रूप से निवेदित करना
चाहिए । धीमान को प्रत्येक वर्ण के आदि मे ओकार लगाकर अनुक्रम
से जाप करना चाहिए ।३३३३४) जो आदमी इस प्रकार से भक्ति के
साथ उत्तम वर्ण मण्डल को लिखकर अभ्यर्थन करे जो फल मनुष्य
प्राप्त किया करता है उसको सक्षेप से बनलाता हूँ।३५॥
साङ्गान्वेदान्यथान्यायमधीत्य विधिपूर्वकान् ।
इष्ट्वा यजयथान्याय ज्योतिष्टोमादिभिः क्रमात् ।।३६।।
ततो विश्वजिता चेष्ट्वा पुत्रानुत्पाद्य मादृशान् ।
वानप्रस्थाश्रमं गत्वा सरदारः साग्निरेव ज ॥३७॥
चान्द्रायणादिकान्कृत्वा सर्वान्सन्यस्य नै द्विजा ।
ब्रह्मविद्यामधीत्येव ज्ञानमापाद्य यलतः ॥३८॥

२२२ } [ सूर्यपुराण . प्रस्थ ज्ञानेन शेयमालोक्य योगविरफलमाप्नुयात् । तत्फल लभते सर्व वर्णमण्डलदर्शनात् ॥३६।। येन केनापि वालिख्य प्रलिप्याऽऽयत्तनाश्रमम् । उत्तरे दक्षिणे वाऽपि पृष्ठनो वा द्विजोत्तमा ॥४०॥ चतुष्कोणेऽपि वा चूर्णरेलकृत्य समन्तत । विकीर्य गन्धकुसुमधूंपैर्दीपश्चतुर्विधै ॥४१॥ प्रार्थयेद्दे वमीशान शिवलोक स गच्छति ॥४२।। साङ्गवेदो को यथान्याय विधिपूर्वक पढकर और न्यायानुसार यज्ञ के द्वारा भजन करके जो कि ज्योतिष्टोमादि है क्रम से उन्हें करे।३६ो इसके अनन्तर विश्व जिनके द्वारा यजन करके मुझ जैसे पुत्रों का उत्पादन करे फिर वानप्रस्थ आश्रम में गमन करना चाहिए। वान- मे हारा के साथ और साग्नि ही गमन करे ॥३७॥ हे द्विजो । फिर चान्द्रायण आदि व्रतो को करे और सवका अन्त में भलीभांति न्यास कर देना चाहिए अर्थात् सन्यास चौथा आथम ग्रहण करे। ब्रह्म विद्या का अध्ययन करके यत्नपूर्वक ज्ञान का आपादन करना चाहिए ॥३८॥ ज्ञान के द्वारा ज्ञय ( जानने के योग्य ) को देखकर योग का वेत्ता फल को प्राप्त किया करता है। वह सम्पूर्ण फल वर्ण मण्डल के दर्शन से प्राप्त करता हैं ।३९। जिस किसी के द्वारा आलेखन करके और आप तन के आश्रम को लीपकर हे द्विजोत्तमो। उत्तर अथवा दक्षिण में अथवा पृष्ठभाग मे अथवा चतुष्कोण मे चूर्गों से सभी ओर अलकृत करके गन्ध और कुसुम का विकरण करके चारो प्रकार दीपो से ईशान देव की प्रार्थना करनी चाहिए । वह आदमी शिवलोक को चला जाया करता है ।४०॥४१॥४२॥ तत्र भुक्त्वा महान्भोगान्कल्पकोटिशत नर । स्वदेहइन्धश्च शुभै पूरयशिवमन्दिरम् ॥४३॥ क्रमाग्दान्धर्वमासाद्य गन्धर्वश्च सूपूजित । क्रमादागस्य लोकेऽस्मिन्राजा भवति वीर्यवान् ॥४४।।

शिवालय करणादि फल कथन ] [ २२३ आपः पूता भवन्त्येता वस्त्रपूताः समुद्भवाः अफेना मुनिशार्दूला नादेयाश्च विशेषताः ॥४५ तस्माद्व सर्वकार्याणि वैदिकानि द्विजोत्तमाः। अद्भिः कार्याणि सतत पूनाभिः सर्वमिद्धये ॥४६ अहिंसा तु परो धर्मः सर्वेपा प्राणिनां यतः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वस्त्रपूतेन कारयेत् ॥४७ यदानमभयं पुन्य सर्वदानोत्तमम् । तस्मात्सा परिहर्तव्या हिसा सर्वत्र सर्वदा ॥४८ मनसा कर्मणा वाचा सर्वभूतहिते रताः। यदा दशितपन्थान: शिवलोक व्रजन्ति ते ॥४६ वहाँ पर शिवजी के लोक में महा भोगो का भोग करके मनुष्य एक सौ करोड क्ल्पो तक सुप से रहा करता है । अपने देह की परम शुभ जन्यो से शिव मन्दिर को पूरता हुआ वहाँ निवास करता है। क्रम से गन्धर्व लोक में पहुचकर गन्धर्वो के द्वारा वन्दित होता है। फिर क्रम से वह इस लोक में वीर्यवान् राजा होता है । जल पवित्र होते है और ये वस्त्र से भी पूत होकर समुद्धव वाले होते हैं । हे मुनि शार्दूतलो ! फेन सहित जल भी शुद्ध होते हैं तया नदी के जल भी विशेष रूप से पूत माने गये हैं। इसीलिये हे द्विजोत्तमो ! बैदिक सभी कार्य निरन्तर पूत जलो के द्वारा ही करने चाहिए क्योकि सर्व सिद्धि इसीसे होती है ॥४३॥४४॥४५॥४६॥ क्योकि समस्त प्राणियो को अहिंसा परम धर्म होता है । इसलिए सभी प्रयत्नो से जलको वस्त्र से पूछ करके कार्य मे लाना चाहिए । अम्ल का दान जो होता है वह परम प्रायमय है और यह सभी दानो मे अत्युत्तम है। अतएव सर्वत्र और सर्वदा हिंसा का परित्याग कर देना चाहिए। मन-वाणी-कर्म ममस्त मुणियो में रति रखने वाले हैं जब ये दर्शित पन्या वाले होते हैं तो वे शिवलोक को गमन क्यिा करते हैं -win

२२४ ]
[ सूर्य पुराण
लोक्यमग्विलं हत्वा यत्पापं जायते नृणाम् ।
शिवालये विहत्यैकमपि तत्पापमाप्नुयात् ॥५०
शिवार्थ सर्वदा कार्या पुष्हहिसा द्विजोत्तमैः ।
यज्ञार्थ पशुहिंसा च राज्ञा दुष्टस्य शासनम् ॥५१
न हन्तव्या. स्रिय. सर्वा अत्रेश्च कुलसभवाः ।
ब्रह्महत्यासम पापमानेय्या वधतो भवेत् ।।५२
त्रियः सर्वा न हन्नमा सर्वैश्चैव द्विजातिभि ।
सर्वधर्मेपु विप्रेन्द्रा. पापकर्मरता अपि ॥५३
तस्मादहिमादियुतः शान्त शिवजनप्रियः ।
भक्ति शिवे समात्थाय तस्मिजन्मनि मुच्यते ॥५४
विश्वेश्वरे विरूपाक्ष विश्वव्यापिनि विश्वगे।
सर्वमन्यत्परित्यज्य भक्ति कार्या मनीषिभिः ॥५५
पुरवित्तादिषु यथा सक्त चित्त सदा नृणाम् ।
तथा सकृद्विरूपाक्षे दूर किंशाकर पदम् ।।५६
लोक्य के सम्पूर्ण के हनन करने से मनुप्यो को जो पाप समुत्पन्न
होना है उतना ही पाप केवल एक शिवालय का विघ्न न करने से हुआ
करता है। द्विजोत्तमो को शिवार्थ पुण्य हिंसा सदा करनी चाहिये । यज्ञ
में लिये पशु हिंसा सदा करनी चाहित । यज्ञ के लिए पाहिंसा और
राजा के द्वारा दुष्ट पा शासन करे ॥५०॥५१॥ समस्त स्त्रियो वा दमन
नहीं करना चाहिए । और अत्रि के कुल मे सभूत हुए हो उनी हिमा
म परे । आयो के वध से पह हत्या के समान पाप हुआ करता है
॥५२॥ सभी द्विजातियो के द्वारा सभी स्त्रियो या दमन नहीं करना
पाहिए । सब धर्मों में पाप धर्म में रत भी चाहे भले ही होवे ।।५३||
इम पारण से हिसा से युक्त-मान शिव जयो के प्रिय पुरुष मले
भगवान् शिव में भक्ति को समास्थित नरके उसी जन्म में मुक्त हो
जाना पाहिए और मान पुरष उगो जन्म में मुश्त हो जाया करता है
॥५४॥ विश्व स्वर-विहपाश-विश्य ध्यानी-विश्वग में आप
.

शिवालय करणादि फर वथन ] [ २२५ सभी साधनों का त्याग करके मनीषियो को भकि करनी चाहिए ॥५॥ जिस प्रकार से सदा ही मनुष्यो या वित्त पुत्र और वित आदि में समा- सक्न रहा करता है उसी प्रकार से एक बार भगवान् विषाक्ष मे चित को समासवत कर देवे तो भगवान शक्र का पद कुछ भी दूर नहीं है ॥५६॥ भजन्ते ये यथा शभ फल तेगा तथाविधम् । प्रयच्छति महादेवो भक्तिर्नयास्ति निष्फला ॥५७ उच्छिष्ट पूजयेदीश मोहान्धो यद्विजाधम । पिशाचलोफे विपुलान्भोगान्भुङ बने स मानव १५८ सकद्धो राक्षसस्थानमभक्षी याक्षमाप्नुयात् । गानशीलो हि गान्धर्व नृत्यशीलस्थैव च ॥५६ ख्यातिशीलस्तविन्द्रमब्भक्षश्चान्द्रमाप्नुयात् । गायत्र्या पूजयेदीशमब्दमेक निरन्तरम् ।।६० प्राजापत्यमथासाद्य सृष्टिकर्ता स्वय भवेत् । ब्राह्म च प्रणवेनैव तेनैवाऽऽप्नोति वैष्णवम् ॥६१ श्रद्धया सकृनेवापि समभ्यच्यं महेश्वरम् । रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रं सार्ध प्रमोदते ॥६२ य इम पठतेऽध्यायय श्रद्धया शिवसनिधौ । सर्वपापविनिमुक्तो ब्रह्मलोके महीयते । ६३ जो भी जिस प्रकार से भगवान् शम्भु का भजन किया करते हैं उनको उसी प्रकार का फल भगवान शम्भु प्रदान किया करते हैं। भगवान् शिव मे की हुई भक्ति कभी भी निष्फल नही हुआ करती है ॥५७॥ जो अघम द्विज अच्छेप्ट होकर मोह से अन्धा पुरुष शिव का पूजन किया करता है वह मानव पिशाचो के लोक मे विमुल भोगो का भोग किया करता है ।।५८।। जो सप्र द्ध होकर अचंन करता है वह राक्षप्तो के स्थान को पाता है और अभक्षी यक्षो के स्थान को प्राप्त किया करता है। गानशील पुरुष एवं मृत्यशाल पुरुष गायों के स्थान को पाया २२६ ] * [ सूर्यपुराण १ करता है ।।५६।। रयातिशील पुरुष इन्द्र का स्थान प्राप्त किया करता है और जलका भक्षण करके जो शिव का पूजन किया करता है वह चन्द्रमा का स्थान पाया करता है । गायत्री से निरन्तर एकही शब्द वर्ष तक ईश की पूजन करना चाहिए ॥६०॥ वह पुरुष प्राजायत्यस्या न प्राप्त कर स्वय ही सृष्टि का कत्ती हो जाया करता है । केवल प्रणव के द्वारा जो भजन करता है वह ब्रह्मा का स्थान प्राप्त किया करता है और उसो से वैष्णव पद भी प्राप्त किया करता है ॥६॥ श्रद्धा से एक बार भी महेश्वर प्रभु का भली भांति अभ्यर्चन करके उनके ही लोक की प्राप्ति करके मनुष्य रुद्रो के साथ ही में प्रमुदित हुआ करता है ॥१६२।। जो पुरुप इस अध्याय को श्रद्धा से भगवान् शिव की सनिधि मे पढा करता है वह सभी पापो से निमुक्त होकर ब्रह्म लोक मे प्रतिष्ठा प्राप्त किया करता है ॥३॥ ॥ सर्वात्म रुद्र-पाशुपत व्रत कथन । भूयोऽपि श्रोतुमिच्छामो माहात्म्य परमेष्ठिनः । कथ सर्वात्मको रुदः कथं पाशुपतं ब्रतम् ।।१ ब्रूहि सूत महाभाग सर्वमेतदसशयम् । कथ नो जायते प्रीतिः श्रोतु शिवकथामृतम् ॥२ पुरा ब्रह्मादयो देवा द्रष्टकामा महेश्वरम् । मन्दरं प्रययुः सर्वे शभोः प्रियतर गिरिम् ॥३ स्तुत्वा प्राञ्जलयो देवा हरस्य पुरतः स्थिताः। तान्दृष्ट्वास्थ महादेवो लीलया परमेश्वरः ॥४ तेपामपहृतं ज्ञानं ग्रह्मादीनां दिवौकमाम् । देवा हपृच्छंस्त देवमात्मानं परतः स्थितम् ॥५

[ २२७
सर्वात्म रुद्र-पास पत व्रत कयन ]
आसंस्ते सदज्ञानातमाहुः को भवानिति ।
अवोद्भगवानीशो ह्यमेव पुरातनः ॥६
आस प्रथममेवाह वामि(?)च सुरोत्तमाः ।
भविष्यामि च लोकेऽस्मिन्मतो नान्योऽस्ति कश्चन ॥७
प्रपियो ने पहा-हम लोग फिर भी परमेष्ठी के माहात्म्य को
सुनना चाहते हैं विम सर्वात्मक भगवान् रुद्र से है और पाशुपत व्रत
लिस प्रकार का होता है ? ॥१॥ हे महाभाग सूत जी! यह मय सराय
में रहित ही आप बनलाइये और यह भी बतलाइये कि शिव के क्था-
भूत को सुनते ही भौति केसे उत्पन्न हुआ करती है. थी मूतजी ने कहा
प्राचीन काल में ब्रह्मा आदि ममस्त देवगण भगवान महेश्वर के
दर्शन प्राप्त करने की इच्छा वाले हुए थे और वे सब भगवान् शम्भु
या जो थत्यन्स प्रिय मन्दर गिरि पर गये थे ॥२॥३॥ सब देवगण
भगवान हर के सामने स्थित होकर हाथ जोडे हुए स्तुति कर रहे थे
परमेश्वर महादेव जो लीला से ही उनको देखा था। भगवान शम्भु ने
उन ब्रह्मा आदि देवो का ज्ञान अपहृत पर दिया था। देवो ने अपने
सामने है ही समवस्थित उन देवेश्वर से पूछा या क्योकि वे सब अज्ञान
से ही स्थित हो रहे थे । देवो ने कहा--आप कौन हैं ? भगवान ईश ने
पहा था कि मैं ही परम पुरातन ईश हूँ । हे सुरोत्तमो! तब से प्रथम में
ही था और अब भी मैं वत्तं मान रहता हूँ । सथा में ही लोक में रहूंगा
मेरे अतिरिक्त अन्य कोई भी देव नहीं हैं ।।७।।
व्यतिरिक्त च मत्तोऽस्ति नान्यत्तिचित्सुरोत्तमाः ।
नित्यानित्योऽहमेवास्मि ब्रह्माऽह ब्रह्मणस्पति ॥
दिशश्च विदिशश्चैव प्रकृतिश्च पुमानहम् ।
निष्टब्जगत्यनुष्टुप् च पक्तिश्छन्दसूमियः ॥६
सत्योऽह सर्वत. शान्तरेताग्निगारह गुरु. ।
गौर्यह च पररचाह घोरह जगता प्रभुः ॥१०
छोह सर्व तत्वानों वरिटोहमपा पति ।
आपोह भगवानीरास्तेजोह वेदिरम्यहम् ॥११

२८ ] [ सूर्य पुराण ऋग्वेदोऽह यजुर्गेदः सामवेदीऽहमात्मभूः । अथर्वणोऽथ मन्त्रोऽहं तथा चाङ्गिरसां वरः ॥१२ इतिहास पुराणानि कल्पोऽह ह्यहम् । अक्षर च क्षरं चाहं क्षान्तिः शान्तिरह खग ॥१३ गुह्योऽह सर्वदपु आरण्योऽहमजोऽप्यहम् । पुष्कर च पवित्र च मध्य चाहं ततः परम् ।।१४ हे सुरोत्तमो ! मुझसे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। नित्य और अनित्य मैं ही हूँ। मैं ब्रह्मा हूँ और ब्रह्मा का भी पति हूं 1 दिशाऐ- विदिशाएं-प्रकृति और पुरुष मैं हूँ । त्रिष्टुय -जगती-घनुष्टुय और पति यह त्रयीमय छन्द मे हु और मैं सबसे सत्य-शान्त-प्रेताग्नि- गौ तथा गुरु में ही हूँ । मैं ही गौरी हूं तथा हर भी मैं ही हूं-मैं द्यो तथा जगत् का प्रभु हूँ ॥8॥१०॥ मैं सभी तत्वो मे परम श्रेष्ठ एव वरिष्ठ हूं और जलो का स्वामी भी मे हू-मे जल हूँ भगवान ईश-तेज और वेदि हूँ।११।। मैं ही ऋग्वेद यजुर्वेद-सामवेद और आत्मम् हूँ। तथा अथवण मन्त्र और अङ्गिरा के पर भी मैं ही हूँ ॥१२॥ सव इतिहास पुराण-- कल्प और कल्पना भी मैं ही हूँ । अक्षर और क्षर-क्षान्ति-शान्ति चौर खग मैं हूँ ॥१३॥ मैं सब वेदो मे भी परम गोपनीय हूँ। मैं ही आरण्य तथा अजभी हूँ । पुस्कर और पवित्र-मेघ्य तथा इससे भी परभी मैं ही हूँ ॥४॥ वहिश्वाह तथा चान्तः पुरस्तादहमव्ययः । ज्योतिश्वाह तमश्चाहं ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥१५ बुद्धिश्चाहमहंकारस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । एप सर्व घ मामेव यो वेद स सुरोत्तमः ॥१६ स एव सर्ववित्सर्वः सर्वात्मा सर्वदर्शनः । गां गोभिर्दाह्मणान्सन्द्रिाह्मण्येन हपीपि च ॥१७ हविषा यस्तया सत्यं सत्येन च गुरोत्तमाः। धर्मपर्मण पतया तपंपामि स्वतेजसा ta

सर्वात्म रुद्र-पशुपति त कथन )
[ २२६
इत्यादि भगवानुव वा तवान्तरधीयत ।
नापश्यस्ते ततो देव रुद्र परमशारणम् ॥१६
त देवाः परमारमान रुद्र ध्यायन्ति शकरम् ।
सनारायणका देवाः सेन्द्राश्च मुनयस्तधा ।।
ततोलाहवो (?) देवा बस्नुवशकर तदा ॥२०
चाहिर और अन्दर भी मैं हूँ। आगे तथा अव्यय मैं हूँ। मैं ही
ज्योति स्वरूप और घोर तम भी हूं। ब्रह्मा विष्णु और महेश्वर भी मैं
ही हू ॥१५५६ बुद्धि बहवार-तन्मात्राऐ और इन्द्रियाँ भी मैं हू । अर्थात्
पे मभी भी मेरा ही एक भिन्न स्वरूप में रहने वाले हैं और मुझसे
पृथक कुछ भी नहीं है। इस प्रकार से सबको जो मुझको ही समाना
है वही सुरोत्तम होता है ।।१६।। वही सबका ज्ञाता-सर्व-मत्मिा-सर्वदर्शन
होता है । गायों के साथ गो-ब्राह्मण्य से मव ब्राह्मगो को-हवियो को
हपि के साय तथा सस्य के साथ सत्य को जो हे मुरोत्तमो ! देखता है
तथा वर्म को धर्म के साथ समझता है मैं उसको अपने तेज से तृप्त
किया करता हूँ ॥१७॥१८॥ इस प्रकार से यह सब कहकर भगवान्
शिव यही पर जलन होगये थे। फिर उनने उन देव को नहीं देखा
था जो रुद्र परम वारण थे ॥१६॥ देवगण उन्ही परमात्मा रुद्रदेव शकर
वा ध्यान क्यिा करते हैं। नारायण प्रभु के सहित और इन्द्रदेव के
महित समस्त देवगण-मुनिगण अर्धवाह होर उस समय में भावार
शकर का स्तवन करने में सलग्न होगये थे । २०॥
य एप भगवान्द्रो ब्रह्मा विष्णुमहेश्वर ।।२९
स्कन्दश्चाग्निस्तथा चन्द्रो भुवनानि चतुर्दश ।
भूतानि च तया सूर्यः सोमाद्यष्टौ ग्रहास्तथा ॥२२
प्राण कालो यमो मृत्युरमृत परमेश्वर. ।
भूत भव्य भविष्य च वर्वमान महेश्वर. ॥२३
विश्व कृत्स्न जगत्सवं सत्य तस्मै नमो नम ।
ओमादौ च तथा मध्ये भूर्भुव स्वस्तथैव च ॥२४

२३० ] [ सूर्य पुराण अन्ते त्व विश्वरूपोऽसि शीर्ष च जगत सदा। ब्रह्म कस्त्व द्विनिधोमधस्तत्त्व सुरेश्वर ॥२५ शान्तिश्च त्व तथा पुष्टिस्तुष्टिश्चाप्यहुत हुतम् । विश्व चैव तथाऽविश्व दत्त चादत्तमीश्वर ॥२६ ऋत वाऽप्यथवा देव परमप्यपर ध्रुवम् । परायण सता चव असतामपि शकर ॥२७ अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान् । कि नूनमस्मान्कृणवदराति किमु धूर्तिरमृत मर्त्यस्य ।।२८ देवों ने कहा--जो यह भगवान् रुद्र-ब्रह्मा विष्ण और महेश्वर के स्वरूप में हैं तथा स्कन्द-अग्नि-चन्द्र और चौदह भुवनों के रूप में वतं । जो समस्त प्राणी सूर्य-सोमादि माठ तथा ग्रह है जो प्राण-पान-यम मृत्यु-अमृत परमेश्वर हैं-जो भूत-भव्य और भविष्य हैं ये वर्तमान महेश्वर सम्पूर्ण विश्व मय जगत् तथा सब सत्य स्वरूप मे हैं उही शकर के लिये हमारा बारम्बार नमस्कार है। आदि में * तथा मध्य मे भूर्भुव स्व है तथा अत मे आप विश्वरूप हैं एव सदा जगत् के शीर्ष हैं । आप एक हो ब्रह्म है किन्तु दो प्रकार के हैं-ऊवं मे और अघोभाग मे सुरेश्वर तत्त्व हैं ॥२१-२५॥ आप ही शान्ति है- आप ही पुष्टि हैं-आप तुष्टि हैं-अहुत और हुत भी आप ही हैं। ईश्वर आप विश्व-अविश्व-दत्त और अदत्त हैं ॥२७॥ आर ही ऋत हे देव ! आप पर और अपर ध्रव हैं। हे शङ्कर आप परायण यमतोम भी सत्य है ॥२७॥ हम सोम का पान दिया और अमृत होगये हम ज्योति पोप्राप्त हुए और देवो मा ज्ञान प्राप्त किया था। हद ग्रन् आराति गया हमारे लिये है हे अमृत ! मयंपी पति क्या है ॥२८॥ एतज्जगद्वेदितव्यमक्षरं सूदममव्ययम् । प्राजापत्य पवित्र वा सौम्यमग्राममग्रियम् ॥२९ आग्नेयेनापि चाग्नेय यायव्येन समीरणम् । सौम्येन सौम्य असते तेजसा स्वैन लीलया ॥३० - सर्वात्म रुद्र पाशुपत व्रत कथन ] [२३१ तस्मै नमोअसहर्ने महानासाय शूलिने । हृदिस्था देवता. सर्ग हृदि प्राणा प्रतिष्ठिता ॥३१ हृदि समसि योनिस्त्व तिम्रो मात्रा परस्तु स.। शिरश्चोत्तरतस्तस्य पादो दक्षिणतस्तथा ॥३२ सयो जोवोत्तर साक्षात्स आकार मनातन । आकारो य स वै देव प्रणवा व्याप्य तिष्ठति ॥३३ अननतार मुक्ष्मश्च शुक्ल वैद्य तमेव च । परब्रह्म स ईशान एको रुद्र स एव च ॥३४ भवान्महेश्वर साक्षान्महादेवो न सशय । ऊर्ध्वमुनामयत्येव स ओकार प्रकीति ॥३५ यह जगत् में पदितव्य है-अक्षर-सूदम और यव्यय प्राजापत्य अथवा पवित्र सौम्य यग्राह्य और अप्रिय है ॥२६॥ अग्नेय मे भी आग्मय और वायव्य से समीरण है-सोम्य से सौम्य है और लीला के द्वारा अपने ही तेन से प्रसते हैं। उन अप सहार करने वाले के लिये नमस्कार है तथा महामास भगवान मूली के लिये प्रणम है। समस्त देवगण हृदय मे ही जिनके स्थिन हैं और हृदय में प्राण प्रतिक्षित हैं ॥३०॥३१॥ हृदय म आप हैं-आप सबरी योनि हैं-तीन मात्राऐ हैं और वह आप पर हैं। जिसका शिर उत्तर की बोर है तथा पाद दक्षिण की ओर हैं ॥३२॥ वह जो जीवोत्तर सक्षात् सनातन आकार हैं। जो कोद्वार है वह देव आप ही है जो कि प्रणव व्याप्त होकर स्थित रहा करता है ॥३३॥ अनन्तत्तर और सूक्ष्म-शुक्ल-वैद्युत और परब्रह्म वह ईशान एक ही रुद्र हैं ॥३४॥ आप साक्षत महेश्वर हैं । अाप ही महादेव हैं- इसमे लरामाय भी समय नहीं है । इस प्रकार से नो मर्म भाग म उन्नमित कराता है वही औङ्कार प्रकीतित हुआ है ||३५ । प्राणातयति यत्तस्मात्प्रणव परिभा पत.। सर्व व्याप्नोति यत्तस्मात्सर्वव्यापी सनातन ॥३६ २३२ ] [ सूर्य पुराण ब्रह्मा हरिश्च भगवानाद्यन्तं नोपलब्धवान् । यथाऽन्ये च ततोऽनन्तो रुद्रः परमकारणम् ॥३॥ यत्तारयति ससारात्तार इत्यभिधीयते । सूक्ष्मो भूत्वा शरीराणि सर्वदा ह्यधितिष्टति ।।३८ तस्मात्सूक्ष्मः सदा ख्यातो भगवान्नीललोहितः । नीलश्च लोहितश्चैव प्रधानपुरुपान्वयात् ।।३६ स्कन्दतेऽस्य यतः शुक्र ततः शुक्रमयीति च । विद्योतयति यत्तस्माद्वंद्य तं परिगीयते ॥४० वृहत्त्वाबृहणाह्रह्म हते च परापरम् । तस्माद्ब्रहति यत्तस्मात्परं ब्रह्मति कीर्तितम् ॥४१ अद्वितीयोऽथ भगवास्तुरीयः शिव ईशते ?)। ईशानमस्य जगतः स्वदृशं बभ्र मीश्वरम् ।।४२ जो प्राणो को नयन किया करता है इसी कारण से उसको प्रणव परिभापित किया गया है । क्योकि वह सबमे व्याप्त होकर रहा करता है अतएव वह सर्वव्यापी और सनातन कहा जाता है ॥३६॥ ब्रह्मा और भगवान् हरि ने जिनके आदि को और अन्त को नहीं प्राप्त किया है और जिस प्रकार से अन्य देवो ने भी नहीं प्राप्त किया है अतएव रुद्र अनन्त हैं और सबका परम कारण हैं ॥३७॥ जो इस घोर ससार से तार देता है अतएव उसको 'तार"-इस नाम से भी कहा जाया करता है । वह सूक्ष्म स्वरूप होकर सर्वदा शरीरो मे अपना अधिष्ठान किया करते हैं ॥३८॥ इसी कारण से वे सदा ही सूक्ष्म ख्यात हुए हैं ऐसे वे भगवान् नील लोहित प्रभु हैं । प्रधान-पुरुष के अन्वय से ही वे नील और लोहित हैं ॥३६॥ क्योकि यह इसके शुक्र को स्वन्दित किया करते हैं इसी से वे शुक्रमयी हैं । क्योकि वह विघोतित किया करते हैं इसी कारण से उनको वैद्युत गाया जाता है ॥४०॥ वृहत्त्व और वृहण होने से जोकि परापर वो वृहित किया करते हैं ब्रह्म कहा जाता है । उसेस जो वृहत कया करता है इसी कारण से वह-"परब्रह्म"-इस ।

सर्वात्म रुद्र-पाशुपत व्रत कथन ] [ २३३ नाम से कीर्तित किये गये हैं ॥४१॥ अद्वितीय भगवान तुरीय शिव इस नाम से ईश होते हैं। इस जगत् के ईशान स्वदंश वभ्र, ईश्वर हैं ॥४२॥ ईशानमिन्द्र तस्थुग सर्वेषामपि सर्वदा । ईशान सर्वविद्याना यत्तदीशानमुच्यते ॥४३ यदीक्षते च भगवानिरीक्षयति चान्यया । आत्मज्ञान महादेवो योगो गमयति स्वयम् ॥४४ भगवाश्चोच्यते तेन देवदेवो महेश्वर । सर्वाल्लोकान्क्रमणेत्र वो गृह्वाति महेश्वर ।। विसृजत्येष देवेशो वासयत्यपि लीलया ॥४५ एप हि देव प्रदिशो नु सर्वा पूर्वो हि जात स उ गर्ने अन्त । स एव जात स जनिष्यमाण प्रत्यह,जनास्तिष्ठति सर्वतोमुख ।४६। उपासितव्य यत्नेन तदेतत्सद्भिरग्रियम् । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।।४७ तदग्रहणमेवेह यद्वाग्वदति यत्नत । अपर च पर चेति पारायणमिति स्वयम् ॥४९ वदन्ति वाच सर्वज्ञ शकर नीललोहितम् । एप सर्वो नमस्तस्मै पुरुप पिङ्गल शिव ॥ve सबके ऊपर सर्वदा स्थित रहने वाले इद्र भी ईशान हैं। यह सभी विद्याओं के ईशान हैं इसीलिये इनको 'ईशान"-इस नाम से कहा जाता है ।।४३)। जो भगवान् देखते हैं और अन्यथा नही निरीक्षण करते हैं योगी महादेव स्वय आत्मज्ञान को कराया करते हैं ॥४॥ इसीनिने भगवान् देवो के भी देव महेश्वर बहे जापा करते हैं । जो महेश्वर सर्व लोको को कम से ही ग्रहण किया करते हैं और देवेश विमृजन किया करते हैं तया सबको निवसित लोला ही से कराया करते है॥४५यही देव सद प्रदिशाये हैं। यह पूर्व में हो जात हुए हैं। वह गर्भ में अन्दर हैं। यही नात हुए हैं और यही ननिष्प माया भी है।

२३४ ] । सूर्यपुराण वे मनुष्यो के समक्ष सर्वतोमुख होकर स्थित रहा करते हैं ॥४६॥ प्रत- एव यत्न से अग्रिम प्रभु की सत्पुरुषो को उपासना करनी चाहिए । वह उस स्वरूप वाले हैं जहाँ से मन के साथ वाणी निवृत्त हो जाया करती है अर्थात् मन वाणी को जहाँ तक पहुंच नहीं होती है ॥४७॥ यहाँ पर उसी का ग्रहण है जिमको वाणी यत्न से बनाया करती है । वह अपर और पर हैं और स्वय परायण हैं ॥४८॥ वाणी भगवान् शकर को सर्वज्ञ और नील लोहित कहा करती हैं। इस पिङ्गल पुरप शिव को हमारा सबका नमस्कार है ॥४॥ स एक स महारुद्रो विश्व भूत भविष्यति। भुवन बहुधा जात जायमानमितस्तत ॥५० हिरण्यवाहुभगवान्हिरण्यामि चेश्वर। अम्बिकापतिरीशानो हेमरेता वृपध्वज ॥५१ उमापतिविरूपाक्षो विश्वभुग्विश्ववाहन । ब्रह्माण विदघे योऽसौ पुनमग्ने सनातनम् ॥५२ प्रहिणोति स्म तस्मै च ज्ञानमात्मप्रकाशकम् । तमेक पुरुप रुद्र पुरहूत पुरुष्टुतम् ॥५३ वालाग्रमात्र हृदयस्य मध्ये विश्वदेव वह्निरूप वरेण्यम् । तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेपा शान्ति शाश्वतो नेतरेषाम् ५४१ महतोऽपि महीयान्स अणोरप्यण रव्यय । गुहाया निहितश्चाऽ मा जन्तोरस्य महेश्वर ॥५५ विश्व भूत च विश्वस्य कमल स्यादि स्वयम् । गह्वर गननान्लस्थ विश्वान्तश्चोर्ध्वत स्थितम् ॥५६ वह एक ही महारुद्र हैं जो विश्वभूत होंगे। यह भुवन बहुत प्रकार का समुत्पन हो गया है और इधर-उधर जायमान है ॥५०॥ हिरण्यवाहु भगवान् । हिरण्य भी ईश्वर है। अम्बिकापति ईशान हेमरेता वृपध्वज- उमापति विरूपाक्ष विश्वमुक विश्ववाहन है। जिन इनने अग्नि के सना- तन पुत्र ब्रह्माजी को बनायाथा ॥५१॥५२॥ और उन ब्रह्माजी को वात्म र पाशुपत व्रत कथन ] { २३५ बात्म प्रयास शान प्रेरित किया था अर्थात् अपने आपके स्वरूप के पहिचान लेने का ज्ञान प्रदान रिया पा। उन एक पुरुप रुद्र-पुरुहूत- पुरुप्मृत-हृदय के मध्य में वालाग्रमात्र विश्वदेव-चह्निरूप-वरेण्य उनको जो आत्मा में स्थित देखते हैं वे परमघोर पुरुष हैं और उनको शाश्वती शान्ति रहती हैं अन्य लोगों को नही होती है ॥५३॥५४॥ वह महाद से भी महायान् यर्थात अधिा वह है और अगु मे भी अधिक अणु है- अव्यय हैं । इस जन्तु पी गुहा मे अर्थान् अन्त हृदय में महेश्वर भगवान निहित रहा करते हैं ।।५५।। विश्वभून है और हृदय में स्वयं कमल है । गह्वर गगनान में स्थित है और विश्वान्तक पर की ओर स्थित है ॥५६॥ तनापि शुभ्रं गगनमोकार परमेश्वरम् । बालाग्रमान मध्यस्थमृत परमवारणम् ॥१७॥ सत्य ब्रह्म महादेन पुरुपं कृष्णपिङ्गलम् । ऊर्ध्वरेतसमीशान विरुपाक्षमज ध्रुवम् ॥५८।। अधितिष्ठति यो योनि योनिश्च व स ईश्वर'। देहे पञ्चविधात्मान तमीशाने पुरातनम् ।।५।। प्राणेऽप्यन्तर्मनसो लिङ्गमाहुर्यस्मिन्क्रोधो या च तृष्णा क्षमा च तृष्णा छित्त्वा हेतुजातस्य मूल भजस्व देव हरमेव केवलम्।६० परात्परतर चाऽहु परात्परतर ध्रुवम् । ब्रह्मणो जनक विग्योहयो सदाशिवम् ॥६॥ ध्यात्वाऽग्निा व समग्नि विशेदाच पृथक्पृथक् । पञ्च भूतानि सयम्य मानागुणविधिक्रमात् ॥६२।। मात्रा पञ्च चतस्त्रश्च निमाना द्विन्तत परम् । एकमात्रममात्र हि द्वादशान्तेष्ववस्थितम् ।।२।। वहा पर भी शुभ गगन है और ओकार परमेश्वर हैं। वाल के भाग के परिमाण वाो- मध्य में स्थित सुन और रम कारमा हैं ।५७॥ सत्य-ब्रह्म-महादेव-पुरप-कृष्ण पिङ्गल-ऊवं रेता-ईपईशान- २३६ ] [ सूर्य पुराण %3D विरूपाक्ष्य-अज-ध्र व पर वे अधिष्ठिन है जो योनि है और वह ईश्वर ही योनि है । देह मे पाँच प्रकार के आत्मा को उप ईशान्य पुरातन को अधिण्ठित है प्राण में भी अन्त मन का निङ्ग कहते है। जिसमे क्रोध । और जो तृण्णाय तया क्षमा है । हेतु जात की मूल भूता तृष्णा वा छेदन बरके केवल देव हर का ही भजन करो ५८१५६१६०१ पर से मी पर. उनको कहते है और विधित रूप में वे परासर तर है। वे ब्रह्माजी के भी जनक हैं और विष्ण वायु और वह्नि के जन्म देने वाले भगवान् . सदाशिव हैं। उनका ध्यान करके अग्नि के साथ अग्नि को वाणी को पृथक् २ प्रवेश करना चाहिए । मात्रा की गुण विधि के कम से पांच भूतो का सयमन करके पांच माया-चार-तीन मात्रा और इसके पश्चात् दो-एकमात्र और अमात्र द्वाद शान्तो मे ही स्थित हैं १६११६२।६३) स्थित्यां स्थाप्यामृतो (२) भूत्वा प्रतं पाशुपात चरेत् । एतद् व्रतं चरिष्यामः समासतः ।।६४॥ अग्निमाधाय विधिवद्दग्यजु.सामसभग. । उपोपितः शुचिः स्नातः शुक्लाम्बरधरः स्वयम् ॥६५।। शुक्लयज्ञोपवीती च शुक्लमाल्यानुलेपनः । जुहुयाद्विरजा विद्वान्विरजाः स भविष्यति ॥६६।। वायव. पञ्च शुद्धयर्थ वाड.नचरणादयः । थोय जिह्वा तथा घाण मनो बुद्धिस्तथैव च ॥७॥ शिरः पाणिस्तथा पाश्व पृष्ठोदरमनन्तरम् । जड् घे शश्वदुपम्य च पायुमेई तथैव च ॥६॥ त्वच मास च च रुधिर मेदोऽस्थीनी तथैव च। शब्दं स्पर्श च स्प रसो गन्धरतथैव च ॥६६॥ भूतानि चव शुध्यन्तां मद्दे हे धमादयस्छथा । अन्त.प्राणमनोज्ञानं शुध्यतां मे शिवेच्चया ॥७॥ पिति में स्थायात होकर पाशुपत यत पा समा घरण भरला पाहिए। पर पाशुपत प्रा है गका ससेप से रामापरण रूगा ।६४।

सर्वात्म रुद्र पाशुपत व्रत कथन } [ २३७ ऋक्-यजु और साम वेदो के मन्त्री से विधि पूर्वक अग्निका समाधान करके उपोपित रहे-शुचि होकर स्नान किया हुआ स्वय शुक्ल वस्त्र धारण करने वाला होवे ।६५। शुक्र यज्ञोपवीत धारी तथा शुक्ल ही माता धारी ए| शुक्ल श्रेयन वाला होवे । विरजा विद्वान हवन करे और विरजा ही हो जायगा ।६६पाच वायु शुद्धि के लिये वाक्-मन और-चरण आदि-योग-जिह्वा-घ्राण-मन तथा बुद्धि-गिर-हाथ-पाव और अनन्तर में पृष्ठ तथा उदर-दोनों जवाये-उपस्थ-पायु-मेढ़ त्वक्-मास- रधिर-मैद तथा अस्थियां पाब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध ये सब भूत मेरे देह मे शुद्ध होवें । तया दमादि-अन्त प्राण और गनोज्ञान मेरे सय भगवान शिवरी इच्या से शुद्धि को प्राप्त होवे ।६६७०। हुत्वा न समिद्भश्च वरुणाय ययाक्रमम् । उपसहृत्य रुद्राग्नि गृहीत्वा भस्म यत्नत ॥७॥ अग्निरित्यादिना धीमान्विमृज्याङ्गानि सस्पृशेत् । एतत्पाशुपत दिव्य व्रत पाशाविमोक्षणम् ॥७२॥ ग्राह्मणाना सता प्रोक्त क्षत्रियाणां तथैव च । वैश्यानामपि योग्पाना यतीना च विशेषत १७३ । वानप्रस्थाथमस्थाना गृहस्थाना सतामपि । विमुक्तिविधिनाऽनेन दृष्टा ने ब्रह्मचारिणाम् ॥७४|| अग्निरित्यादिना सम्यगृहीत्वा ह्यग्निहोत्रवम् । सोऽपि पारा पतो विप्रो विमृग्याङ्गानि सम्पृशेत् ।।७।। भस्मच्छन्नो द्विजो विद्वान्मदापातक्म भने । पाविमुच्यते मत्य लिप्यते च न संशय. ।।६।। वीर्यमग्नेयंतो भम्म वीर्यवान्मम्मम मत । भस्मयानरतो विप्रो भस्मगामी जितेन्द्रिय. 11530 जिगगे गमिषाओ मे वरणरे लिए यथारम हवन करखे रद्राग्नि को उपमहा करे भग्म यो पल में प्रहा पर। "अग्नि"- सात मन्त्र नाग पोमा पुरष को यो विमान करे उनमा २३८ ] [ सूर्य पुराण समर्श करना चाहिए-नही .पाशुपत दिव्य व्रत है जो पाशो से विमोक्षदित्या ने वाला है ।७रा यह व्रत सत्पुरुष ब्राह्मणो को बताया ग्या है और उसी भांति क्षत्रियो को भी कहा गया है । जो इसके योग्य वैश्य हो वे भी इसको कर सकते हैं । विशेष रूप से यह दिव्ययान व्रत यतियो के लिये ही है ।७३। जो वानप्रस्थ आश्रम मे स्थित हैं उनको सत् गृहस्थो को भी यह समुचित है । इसी विधि से , ब्रह्मचारियो की वियुक्ति होते हुए देख गयी है ।७४। “अग्नि" इत्यादि मन्त्र के द्वारा अग्नि होत्र को भलीभांति ग्रहण करके उसको भी भम्म रूप में पाशुपत व्रत वाला विप्र ग्रहण कर उससे विमार्जन करके अङ्गो का सश्पर्श करावें 1७५३ विद्वान् द्विज भस्म से छन्न हुआ महापातको के करने से होने वाले पापो से विमुक्त हो जाया करता है और सत्य से लिप्त हो जाता है इसमे संशय नही है ।७६६ क्यों कि भस्म अग्तिक. वीर्य है अतएव भस्म से सम्मत वीर्यवान होता है । भस्म मे सान करमे मे रत विप्र भस्मशायी और जितेन्द्रिय होवे १७७१ सर्व पापविनिर्मुक्त. शिवसायुज्यमाप्नुयात् । इत्युक्त्वा भगवान्ब्रह्मा स्तुत्वा देव समप्रभुः ॥७॥ भस्मच्छन्नः स्वयं कृत्स्नं विररामाम्बुजासनः । अथ तेपा प्रमादार्थ पशूना पतिरीश्वरः ॥७९॥ स गत्वा चोमया सार्ध र्सानिध्यमकरोत्प्रभः। अथ सनिहितं रुद्र तुष्टुव : सुरपुंगवाः ॥२०॥ रुद्राध्यायेन देवेश देवदेवमुमापतिम् । देवोऽपि देवानालोक्य घृणया च वृपध्वजः ॥८१॥ तुष्टोऽस्मीत्याह देवेशा वरं दत्त्वा वरारिहा क्षणादन्तपितः शंभ ब्रह्मादीनां प्रपश्यताम् ॥२॥ इमं य: पटतेऽध्याय शुचि त्वा समाहितः । सर्वतीर्थफलं चैव सर्वयाफा तथा ॥३॥ सर्वदेवातफलं मस्तिोत्रफलं तथा । प्राप्नोति सफल विप्राः श्रद्धया शिवम निची ॥४॥ गाणपत्य मवा प्रोति देहान्ते मुने पुगवा ।।८५ सरि रुद्र पाशुपत व्रत कथन ] [ २३६ ऐसा भस्मसेवी पुरुष सव पापो से निमुक्त होकर भगवान् शिव के सामुज्य को प्राप्त किया करता है । इतना महार ब्रह्मा भगवान् ने भावान् समप्रभ वा स्तात करके स्वय पूर्ण रूप से भस्म से छन होकर मम्बु जास्त (ब्रह्माजी) विराम को प्राप्त हो गये थे। इसके अनन्तर उनके प्रसाद के लिय पशुआ के पति ईश्वर ये उमा देवी के साथ ग्मन परके अर्थात् जागर प्रभु सान्निध्य किया था। इसके उपरान्त सुर श्रेष्ठा ने सनिहित हुए सद्रदेव को स्तुति की थी ऋषि वह स्तवन देवा के देव दवेश उमापति पी रुद्राध्याय के द्वारा ही किया था। दव ने भी देवो यो देखकर वृषध्वज प्रभु ने बहुत ही वरणा से उनके कार दृष्टिपात किपा था ७८1७६८०1८१। वहारि ये हनन करने वाले देवेश ने कहा था कि मैं परम तुष्ट हो गया है और वरदान भी प्रदान किया था। फिर उन सभी ब्रह्मा आदि को देखते-देयते भगवान् शम्भ एक क्षण मान में कहाँ पर अनहित हो गये थे ।२। श्री गूतजी ने कहा-को पुरुष परम ममाहित और शुचि होकर इस अध्याय को पढ़ता है यह सय तीर्यो वे तथा समस्त यमापे यजन बरन या फन एव पुण्य एय सम्पूर्ण देव व्रनों का फल और सभी स्तोत्रा का पर प्राप्त कर लिया परता है। मित्रो ! भगया शिव की सनिधि म ही श्रद्धामाप । गरने पर प्राप्त रिया परता है । पिर है मुनि श्रेष्ठो । वह देह ने यन्त हो जाने पर गाणपत्य पद को पा जाता है १८२०५३।४।८५॥ ।। शिव माहात्म्य कथन ।। वक्ष्यामि शिवमाहात्म्य गुणुष्व मुनिपु गया । बहुभिवंहुया माम् योनित मुनिए नव ॥१॥ गरगढ़ पमित्या गदममापि मन्यिाम् । सशिव मुनय पेपिछ प्रात्यन्ति गूरप |

२४०
[ सूर्य पुराण
भूतभावविकारण द्वितीयेन सदुच्यते ।
अव्यक्तेन विहीन स्यादव्यक्तमसदित्यपि ॥३॥
उभे ते शिवरूपेण शिवादन्यन्न विद्यते ।
तयो पतित्वाच्च शिव सदसत्पतिरुच्यते ॥४॥
क्षराक्षरात्मक प्राहु क्षराक्षरपर तथा ।
शिव महेश्वर केचिन्म नयस्तत्त्वचिन्तका ॥५॥
उक्तमक्षरमव्यक्त व्यक्ताक्षरम दाहृतम् ।
रूपे ते शङ्करस्यैव तन्नाम्ना परम च्यते ॥६॥
तयो पर शिव शान्त क्षराक्षरपरो वुधै ।
उच्यते परमार्थेन महादेवो महेश्वर ॥७॥
श्री सूतजी ने कहा-हे मुनिपुङ्गवो । अव मैं भगवान् शिव के
महात्म्य को वतलाता हूं आप लोग श्रवण करिए। इस माहात्म्य को
मुनिथे प्ठो ने और शास्त्रो ने बहुत प्रकार से बहुतो ने कोत्तिन किया
है ।१। केचित तकुदा मुनिगण जिस शिवको सूरिगण देखते हैं सद सद
रूप वाला बताया है और सत् तथा असत् भी सस्थित हैं-ऐसा कहा
है ।। द्वितीय भूतभाव विवार से सद्-यह कहनाते हैं । अव्यक्त से विहीन
हैं और अव्यक्त असत् है-यह भी बताया है ।३। वे दोना ही शिव य
रूप से युक्त हैं क्यापि शिव से अन्य कोई भी वर्तमान नहीं है। इसी से
पति होने के कारण भगवान् शिव सहसत्पति पहे जाया करते हैं ।४।
इनको क्षराक्षर स्वरूप वाले कहते हैं तथा क्षराक्षर पर भी कहते हैं ।
या तत्वा पे चिन्तन परन यान मुगिण शिवको महेश्वर कहते हैं ।।
र और अव्यक्त वहा है और याताक्षर कहा है। ये दोनो रूप हैं
गन् पसर ही और उन गाम मे ये परम पहे जाते हैं ।६। इन
। स पर गिय पान्त है । युघा के द्वारा क्षराक्षर पर कहे जाने हैं।
आप ग महादेव महत्पर हैं ॥७॥
गमाप्टिव्याप्ट याप मष्टिव्यटिशारणम् ।
यतिरेचिदाचार्या शिय परमारणम् ॥८॥

[ २४१
शिव माहात्म्य कथन ]
समष्टिमाहुरव्यक्त व्यष्टि व्यक्ति म नीश्वश. ।
रूपे ते गदिते शभोर्गस्त्यन्यद्वस्तु किंचन ।।६।।
तयो. कारणभावेन शिवो हि परमेश्वरः।
उच्यते योगशास्त्रज्ञः समटिव्यष्टिकारणम् ॥१०॥
क्षेत्र क्षेत्रज्ञरूपीति शिव कश्चिदुदाहृतः ।
परमात्मा परं ज्योतिभंगवान्परमेश्वर. ॥११॥
चतुर्विशतितत्त्वानि क्षेत्रशब्देन सूरय. ।
प्राहुः क्षेत्रज्ञशब्देन भोक्तार परमेश्वरम् ॥१२॥
न किंचिच्च शिवादन्यदिति प्राहुर्मनीषिणः ।
केचिदेव प्रशसन्ति महादेव म नीश्वरम् ॥१३॥
वेदार्थतत्त्वविदुप. सम्यवश्रुत्यनुसारतः ।
प्राणेन प्राणिति ह्यसावपानेन ह्यपानिति ॥१४॥
समाप्टि और व्याप्टि जो रूप है वह समष्ठि-व्यष्टि वा कारण ही
होता है । कुछ आचार्यगण भगवान् शिव को परम कारण कहते हैं ।।
हे मुनीश्वरो | समाप्टिको अव्यक्त कहते हैं और व्याप्टि को व्यक्त कहा
जाता है । वे दोनो रूप भगवान् राम्भ के ही कहे गये हैं क्योकि अन्य
कोई भी वस्तु है ही नहीं है। उन दोनो के कारण होने के भाव से भग-
वान् शिव परमेश्वर हैं । योगगास्त्र के ज्ञाताओ ने शिव को समाप्टि
व्याप्टि का कारण बताया है ।१०। कुछ निद्रानो के द्वारा क्षेत्र और
लेषज्ञ रूप वाले भगवान शिव को बनाया गया है। भगवान् परमेश्वर
परमात्मा और क्षर ज्योति हैं ।११। मुरिगण चौबीस तत्वो को ही क्षेत्र
दाब्द के द्वारा वहा करते हैं और क्षेत्र शब्द से मोक्ता परमेश्वर को
पहा है ।१२। मनीपीगण यही कहते हैं कि शिव से अन्य कुछ भी नहीं
है। कुछ लोग महादेवजी को शुनीश्वर वह पर प्रशंसा क्यिा करते हैं।
वेद वेदार्थ वे तत्वों के विद्वान् पुरुष भनी-भांति यति के यनुमार प्राणी
में प्राण मे और जवान मे अपान कहते हैं ।१३॥१४॥

२४२ ] [ सूर्य पुराण व्यानेन व्यानिति तया चोदानेन ह्य दानीति । समानीति समानेन मन्वीति मनसा द्विजाः ॥१५॥ सुद्धचा विचारयत्येप पर एव महेश्वरः । समस्तकरणयुक्तो वर्ततेऽसौ यदा तदा ।।१६।। जाग्रदित्युच्यते सद्भिरन्तर्यामी सनातनः । यदाऽन्त करणयुक्त स्वेच्छया विचरत्यसो ॥१७॥ सुप्त इत्युच्यते ह्यात्मा स्वय तापविवर्जित.। न बाह्यकरणयुक्तो न चान्तःकरणस्तथा ॥१८॥ सर्वोपाधिविनिमुक्त पुण्यपापविवणितः । स स्वरूपे सदा ह्यास्ते सुपुप्त इति गीयते ।।१६।। स्वप्नान्त चैव बुद्धान्त विचरत्येप शकर । नदीतले यथा मत्स्यो गत्वाऽऽगत्य निवर्तते ॥२०॥ श्येनो वाऽथ सुपर्णो वा श्रान्तः पर्णतकन्दरे । शेते सहृत्य पक्षौ च प्रत्यगात्मा ह्यय तथा ॥२१॥ धाम से घान और उदान से उदान एव ममान से समान हे द्विजो ! मन से भन्वी-ऐसा कहते है । यह बुद्धि से विचार करता है कि महेश्वर पर ही हैं । जव सदा यह समस्त करणो से युक्त वर्तमान रहा करते है ।१५।१६। सत्पुरुषो के द्वारा अन्तर्यामी सनातन जाग्रत- यह कहे जाया करते है । जब यह अन्त करणो से युक्त होकर स्वेच्छा से विचार किया करते है ।१७। स्वय ताप से विवजित होकर यह आत्मा सुप्त-ऐसा कहा जाया करता है । न तो यह वाह्य करणो से य क्त है तमा न अन्त करणो से युक्त है ।१८। यह सभी उपाधियो से विनियक्त है और पुण्य पाप से रहित है । वह सदा स्वरूप मे रहते है और सुयुप्त-इस नाम से गान किये जाया करते है ।१६। यह भगवान् शङ्कर स्वप्नान्त और बुद्धान्त बिचरण करते है । नदी के तल मे जमे मत्स्य जारर और आकर निवृत्तिव हो जाया करता है ।२०। श्येन भयवा स पर्ण पर्वता की वन्दरा मे श्रान्त होता है और अपने दोनो पक्षो शिव माहात्म्य कथन ] [ २४३ क को स हत करके शयन किया करता है । उसी प्रकार से प्रत्यगात्मा यह भी है ।२१॥ जाग्रत्स्वप्नगता भावास्तेप, शान्तो म हुर्मुहुः । संप्रसाद ततः प्राप्य परानन्दमयो भवेत् ॥२२ अविद्ययव सर्वोऽयं व्यवहारः परात्मनः । गुणधर्मो यदि स्यातां सुप प्तो रहितः कथम् ॥२३ सत्या निमित्तभूतायामविद्याया द्विजोत्तमाः। वुद्धौ भ्रमन्त्यामात्माऽपि भ्रमतीति जना विदुः ॥२४ नित्यः सर्वगतो ह्यात्मा नुद्धिमनिधिमत्तया । यथा यथा भवेधुद्धिरात्मा तदिहेप्यते ॥२५ विद्याविद्यास्वरूपीति शंकरः कश्चिदुच्यते । घाता विधाता लोकानामादिदेवो महेश्वरः ।।२६ भ्रान्तिविद्यापरश्चेति शिवरूपमनुत्तमम् । अवाप मनसा सोऽय केचिदागमवेदिन- ॥२७ अर्थपू बहुरूपेषु विज्ञान भ्रान्तिरुच्यते । आत्माकारेण सवित्तिर्बुद्भिविद्येति कीयते ।।२८ जाग्रत् स्वप्नगत भाव है उनमे यह मुहुर्मुह शान्त है फिर सम्प्रसाद को प्राप्त करके परानन्दमय हो जाया करते हैं।२२। परात्मा के विपय यह सभी व्यवहार अविद्या से हो हुआ करता है। उनमे यदि गुण और धर्म होते तो वे स पुप्ति को अवस्था रहित कमे हो सकते है । १२३॥ हे द्विजोत्तमो निमित्त भूता अविद्या के होने पर बुद्धि मे श्रम दिलाया करते हैं। मनुष्य ऐसा जानते है कि यह आत्मा भी भ्रमित होता है ।२४।२४। नित्य और सर्पगत आत्मा बुद्धि की सन्निधि मत्त्वा से जैसे २ वृद्धि होती है उसी के समान आत्मा इष्ट हुआ करता है । १२५ कुछ के द्वारा भगवान् शङ्कर विद्या-अविद्या के रूप वाले है-ऐसा । यादि देव महेश्वर भगवान् लोगो के धाता और विघाता है ।२६॥ भ्रान्ति विद्या पर शिव का अम य प है। मे कहा जाता

२४४ ]
[ सूर्य पुराण
आगम के ज्ञाता लोग यह कहते है कि वह इन्हाने मन से प्राप्त किया
है ।२७। बहुत रूपा वाले अर्थों में विज्ञान जो है वह धाति-इस नाम
से कहा जाता है और आत्मावार से जो भलीभांति का ज्ञान होता है
वही विद्या इस नाम से वोत्तित की जाया करती है ।२८॥
विकल्परहित तत्त्व परमित्यमिधीयते ।
व्यक्ताव्यक्तज्ञरूपोति शिव कैश्चिन्निगद्यते ॥२६
धाता च सर्ननोकना विधाता परमेश्वर ।
तयोविंशतितत्त्वानि व्यक्तिशब्देन सूरय ॥३०
वदन्ति व्यक्तशब्देन प्रकृति च परा तथा ।
कथयन्ति शशब्देन पुरुष गुणभोगिनम् ।।३१
तत्र यच्छ कर रूप नाव्यक्त न च शकरात् ।
यो हेतुस्थिगुणस्यापि सर्वस्य प्रकृते पर ।।३२
चतुर्विधश्च त्रिविध स एव भगवाशिव ।
स एव सर्वभूतात्मा सर्वभूतभवोद्भव ॥३३
आस्ते सर्वरतो देवो न च सर्वत्र दृश्यते।
योगिनामपि यो योगी कारणाना च कारणम् ॥३४
रुद्राणामपि यो रुद्रो देवतान च देवता।
ब्रह्माद्या अपि य देन न विदन्ति महेश्वरम् ॥३५
विकल्यो से रहित जो तत्त्व पर होता वही पर कहा जाता है।
द्वारा शिव व्यक्त -अव्यक्त स्म वाले है-ऐसा कहा
जाया करता है ।२६ परमेश्वर सब लोको के घाता और विधाता हैं।
उन दोनो के वीसस्त्व व्यक्ति शब्द के द्वारा हे जाते हैं-ऐसा सूरिंगण
कहते हैं ।३० तथा व्यक्ति शन के द्वारा परा प्रकृति को कहते है और
ज्ञ'- इस शब्द के द्वारा गुणो का भोग करने वाले पुरष को कहा
करते है।३१। उममे जो शङ्कर भगवान का रूप है वह शङ्कर अव्यक्त
नही होता है । जो हेतु इस त्रिगुण (सत्व-रजन्तम) का होता है वह भी
सर्व प्रकृति के पर है।६२। वह भगवान् शिव चार प्रकार के तथा तीन
कुछ विद्वानो

शिव माहात्म्य कथन ] [ २४५ प्रकार के होते है और वह शिवही के रूप है । वह ही समस्त भूतो के आत्मा है और सब प्राणियो के भव की उत्पत्ति है।३३॥ देव वैसे मभी मे विराजमान रहने वाले है विष्ण के सर्वत्र वर्तमान दिखलाई नही दिया करते हैं जो योगियो के भी योगी है और कारणों के भी कारण है 1३४॥ सब एकादश रुद्रो के भी जो रुद्र है अर्थात् सर्वोपरि विराज- मान देव है और सब देवो के भी जो देव हे ब्रह्मा आदि महान् देवता भी जिस देव महेश्वर का यथार्थ रूप से ज्ञान कर पाते हैं वह महेश्वर देव ऐसे ही है।३। यं ज्ञात्वा न पुनर्जन्म मरण वाऽपि विद्यते ॥३६॥ यदाऽऽपदो देहभृता भवन्ति प्राणात्ययप्राप्तिकृतस्तदानीम् । विहाय देवं जगदेकवन्धु शिव न चान्य परिहारहेतुः ॥३७॥ आस्ते शिशुर्वरान्सर्वान्सर्वेषां देहिना सदा (')। देहभृत्कथ्यते तस्मान्निर्गुणोऽपि महेश्वरः ॥३८॥ भूयानत्र गतः कालस्तकं जन्म गच्छतु । जिज्ञास्यतामियं तावन्मुक्तिरेकेन जन्मना ॥३६॥ भक्त्या भगवत. शभोरिति देवोऽब्रवीद्रविः । सकृत्सस्मरणाच्छभोर्नश्यन्ति क्लेशसंचया ॥४०॥ मुक्ति प्रयाति स्वर्गाप्तिस्तस्य विघ्नोऽनुमीयते। तस्मात्तडिल्लतालोल मानुप्य प्राप्य दुर्लभम् ॥४१॥ शिवं सपूजेन्नित्य भक्त्या ह्यात्मोपलव्धये । मोहनिद्राप्रसुप्तऽस्मिन्पशुपागशताकुले ॥४२॥ जिन महेश्वर देव का ज्ञान यथार्थ रूप में प्राप्त पर लेने पर ससार मे पुनर्जन्म और मरण नही होता है । देह धारियों को जय आपदाएं होती हैं उस समय में प्राणो का विनाश पर देने यापी ही हुआ करती हैं । उस काल में जगत् के एक वन्यू गिय देव को चोटपर अन्य कोई भी परिहार करने का हेतु नही हुआ करता है। सदा समस्त देह धारियो के सबवरो मे शिशु होता है। harma २४६ ] [ सूर्य पुराण निर्गुण भी महेश्वर प्रभु देहधारी है-ऐसे कहे जाया करते हैं ॥३८॥ पुन यहा पर जन्म को एक काल प्राप्त होता है। उसमे यह जानना चाहिए कि यह मुक्ति एक ही जन्म से हो जावे ॥३६॥ देव रवि ने यही बताया है कि एक ही जन्म मे मुक्ति तभी हो सकती है जब भगवान् शम्भु की भक्ति होवे। क्योंकि भगवान् शम्भु के केवल एक ही बार स्मरण करने से सम्पूर्ण क्लेशो के समुदाय नष्ट हो जाया करते है ॥४०॥ और वह स्मरण करन वाला मुक्ति को प्राप्त हो जाया करता है । स्वर्ग की प्राप्ति तो उस गुक्ति के पाने मे विघ्न रूप ही अनुमान किया जाया करता है । इसलिए बिजली की चमक के समान यह मनुष्य का जीवन है जो परम दुर्लभ है। इस मनुष्य जीवन को प्राप्त करके नित्य ही भक्ति की भावना से शात्मा को उपलब्धि के लिये भगवान शिव का अच्छी तरह से पूजन करना चाहिए। यह ससार ऐसा है कि इसमे जीवन प्राय मोह को निद्रा मे प्रसुप्त रहता है और यह पशु के सैकडो पाशो से घिरा हुआ होता है ।४१-४२। पुरुषा कृतकृत्यास्ते ये शिव शरण गता । पुत्रदारगृहक्षेत्रधनधान्यधिमेदिनीम् ॥४३।। लब्ध्वेमा मा कृथा दर्प रे रमा क्षणभगुराम् । त्यक्तवा क्रोध च काम च लोभ मोह मद तथा ॥४४॥ जना यजध्वमीशान समीहितफलप्रदम् । यावन्नाम्येति मरण यावन्नाध्येति वै जरा ॥४॥ यावन्नेन्द्रियवकल्य तावदेवार्चयेश्वरम् । ये यजन्ति न देवेश विपयासवमोहिता ॥४६|| शोचन्ते हि मृता पङ्कलग्ना वनगजा इव । काल सनिहितापाय सपद पदमापदाम् ॥४७॥ समागमा सापगमा सर्वमुत्पादित गुरु । यजन्ति ये विदित्वैव लिङ्कमूर्तिमहेश्वरम् ॥४८।।

[ २४७
-
शिव माहात्म्य कथन ]
लभन्ते विपुतान्कामानिह चामुत्र चाक्षयान् ।
बाराधया विपेन्द्रा सर्वज्ञ विश्वतोमुखम् ॥४६}]
वे ही पुरप कृतकृत्य हैं अर्थात् उन्होंने मनुष्य जीवन को प्राप्त
करने का वास्तविक लाभ प्राप्त कर लिया है जो भगवान शिव के
शरणागति में प्राप्त हो गये हैं ॥४३॥ महामूढ मनुष्य ' पुत्र-हारा-गृह-
क्षेत्र-धन-धान्य-मद्धि और भूमि आदि को प्राप्त करके और इस
एक ही क्षण में विनष्ट हो जाने के स्भाव वाली लक्ष्मी को प्राप्त करके
भ्यर्य हो घमण्ड मत करो। काम-क्रोध-लोम-मोह तथा मद को त्याग
करके हे जनो । भगवान् ईशान का ही भजन करो जो मभी हित फल
के प्रदाता हैं । इस मानुप जीवन मे जिस समय तक मृत्यु नही आती है
और जब तक वृद्धता नही उपस्थित होती है । जव तर इन्द्रियो म
विनता नहीं हाती है तभी तब भगवान शिव का अर्चन करना
चाहिए । जो लोग विपयरूपी मदिरा के कारण मोहित होकर देवेश्वर
घा भगन नही किया करते हैं वे जब मृत होते हैं तो कोच मे पमे हुए
हाथी के ही समान मोर दिया करते हैं। महावाल सनिहित अपापो
चाला है और ये सम्पदाऐ परम आपदा वा ही समागम हैं और
अपगमो से युक्त हैं । सर्व गुरु उपस्थित है । जो लोग इस तरह का ज्ञान
प्राप्त कर लिन मूत्ति महेश्वर प्रभु का भजन पिया करत हैं वे यहा
ससार मे बहुन म मनोरथा वा लाम प्राप्त पिया करते हैं और पर
में भी अक्षय भोगा को प्राप्त करते हैं। हे विपेन्द्रो' इसलिए सर्वज्ञ
विश्वतोमुप महेश्वर की आराधना करो।४३.४६
क्षित यास्यय तेनैव सायुज्य गात्र मराय ।
भवत्या भन यजेवस्तु महापातपवानपि ॥३०॥
सोऽपि याति पर स्थान त्रिसप्तपुरयान्वित ।
अश्वमेघसहस्राणि राजसूयशतानि च ।।१।।
महेशाचनपुण्यम्य यता नाहंन्ति पोहगीम् ।
ग्रीडन्ति शिशवो यन लिङ्ग पृत्वा व्रजन्ति ये ॥५२॥

२४८ ] { सूर्य पुराण सैकत मृन्मय वाऽपि ते भवन्त्येव भूभुज । आध्यात्मिक चाऽऽधिदैन दुख चैवाऽधिभौतिकम् ॥५॥ देवादीना विदित्लौग मोक्षार्थी शिवमर्चयेत् । अपारतरपर्यन्ताद्घोरात्ससारसागरात् । महामोहजलात्कामक्रोघग्राहात्सुखोमिण ॥१४॥ प्राज्ञो वेदान्तविद्योगी निर्ममों निरहकृति । एको योगी प्रशान्तात्मा स सतरति नेतर ॥५॥ दान्त सुसयतो ध्याने निराशो विगतस्पृह । सनसङ्गविहीनश्च निर्द्वन्द्वो निरुपल्लव ॥५६॥ वहुत शीघ्र ही उसी ही के द्वारा सामुज्य को प्राप्त होता हैं इसमे कुछ भी संशय नही हैं । जो भक्ति से भव का भजन किया करता हैं वह महापातको को भी विनष्ट कर दिया करता हैं ।५०। वह पुरुष भी अपनी इक्कीस प्रश्नो के सहित परम स्थान को प्राप्त होता है । एक सहस्र अश्वनेघ यज्ञ और सैकडो राजसूय यज्ञ भी महेश भगवान के अभ्यचंन के पुण्य की सोलहवी कला को भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं । जहाँ पर छोटे २ शिशु क्रीडा किया करते हैं वहाँ पर लिङ्ग की रचना करके जो गमन किया करते हैं ॥५१॥५२॥ वालू का अथवा मृत्ति- का जो लिङ्ग बनाते हैं वे भो अगले जन्म मे राजा हुआ करते हैं । देवादिको को भी आध्यात्मिक-काधिदैविक और आधिभौतिक दुःख हुआ करता हैं—ऐसा समझकर गोक्ष को प्राप्त करने की इच्छा वाले पुरुष को भगवान् शिव का ही अभ्यर्च न करना चाहिए। यह ससार अपार तरपर्यन्त वाला है और महान् घोर सागर के ही समान है । इसमे महान् गो मोह है पही जल भरा हुआ है और वाम तथा शोध जो हैं वे ही बडे-डे माह है और सुख जो विपया मे मिलता है ये ही तरगे है । इस ऐसे महार भीपण ससार सागर को प्राग-- वेदान्त र गाता योगी-ममता से रहित- अहवार से सूय-प्रान्त आत्मा वाला योगी तरकर इससे पार जाया करता है अय कोई भी - शिव माहात्म्य कथन ] [ २४६ इसको पार नहीं कर सकता है। दान्त ध्यान मे सुसयत -निराश और सभी प्रकार की इच्छाओ से रहित-सबके सङ्ग से विहीन- निद्वन्द्व उपद्रवो से रहित ही इस संसार से पार जाया करता है। 1५३-५६) सर्वकर्मफलत्यागी जडान्धवधिराकृति । मित्रारिपु समो मेव समस्तेष्वेव जन्तुपु ।।७।। एन सुदुर्लभो मोक्षो न स्याद्योगीव तादृश । सर्ने पृथिव्या पाताले मुक्ता प्रकृतिजगुण ॥८॥ एव सुदुर्लभ ज्ञात्वा मोक्ष हि वहुसाधनम् । पूजयध्व महादेन कर्मयोगेण चान्यथा ॥५६।। कर्म पूजा जपो होम सभोर्नामानुकीर्तनम् । कर्मयोगा समाख्याता एतं. पूज्यो महेश्वर ॥६॥ य य काममभिध्यायेत्तदर्पितमना शिवम् । सपूज्य त तमाप्नोति सावित्र्याह यथा पुरा ॥६१॥ तन्नामजापी तत्कर्मरतिस्तग्दतमानस । निप्काम पुरुषो विप्रा स रुद्रपदमश्नुते ।।६।। य सर्वदाऽचयेदीश स रुद्र इव भूतले । पापहा सन्माना दर्शनात्स्पर्शनादपि ॥६॥ जो मनुष्य सभी कर्मों के फल का त्याग करने वाला है और जैसे कोई महान् जह एव वहिराहो उसके ही समान आवृति रसने वाला हो वही इससे पार होता है । नो मित्र और गत्रु दोनो मे समान भाव रखता हो अर्थात् सबका हो मित्र जैसा रहे तथा सब प्राणियों के हित करने वाला हो उसी को मोक्ष प्राप्त होता है। यह मोक्ष इम प्रकार से परम दुर्लभ है । वैसा ही योगी सा हो जैमा ऊपर बतला पके हैं उसी को मोल होता है बन्यथा नहीं होता है। सभी लोग पृथ्वी मे-पाताल मे प्रतिजन्य गणो के द्वारा ही मुक्त होते हैं। इस प्रकार से परम दुर्लभ बामपर मोक्ष से बहुत से मायनों वाता

२५० ]
[ सूर्यपुराण
समझना चाहिए। कर्मयोग रो श्री महादेव प्रभु का पूजन करी और
अन्य प्रकार से करो ॥५७१५८१५६॥ कर्म पूजाजए-होम-शभु के शुभ
नामो का कीर्तन-येस भी कर्मयोग कहे गये है। इन्ही के द्वारा महेश्वर
प्रभु का पूजन करना चाहिए ।६० जिस जिस काम का उत्तर प्यान
करे वह सब शिव के लिये अहित मन वाला होवे । पहिले सावित्री
देवी ने कहा है कि भगवान् शिव की पूजा करके उसी उसी को प्राप्त
कर लिया करता है ६१। हे विप्रो । शिव के नामो का जाप करने
वाला-शिव के कर्मों मे रति रखने वाला-शिव के चरणो मे ही
मन सलग्न रखने वाला-निष्काम पुरुप ही रूद्र के पद को प्राप्त
किया करता है ।६२। जो सर्वदा ईश का पूजन किया करता हैं वह
भूतल
मे
रूद्र की तरह से रहता है। वह मनुष्य दर्शन और स्पर्शन
से ही सब मनुष्यो के पापो का हरण कर देने वाला होता है । ६३ ।
। अरुन्धती-सावित्री सम्बाद् ।
पतिव्रता महाभागा सावितो वरणिनी।
यदाह तदात्माक सूत वाक्यविशारद ॥१॥
स्वर्गे ता शोभना दृष्ट्वा गुण सनरलकृताम् ।
अरुन्धत्युत्तमा स्त्रीणा पर्यपृच्छच्छुचिस्मिता ॥२॥
शतश सन्ति सावित्रि देवा स्वगनिवासिन ।
देवपल्यस्तथैवैता सिद्धा सिद्धाङ्गनास्तथा ॥३॥
न तेपामीहशो गन्धो न कान्तिनं सरूपता ।
नान्येपा विद्यते शोभा यथा ते पतिना सह ॥४॥
न चवाऽऽकल्पजातानि भ्राजन्ते सुरयोपिताम् ।
यथा तव तथा पत्युओजन्ते वरवणिनि ॥५॥
नास्ति कान्तिविमानाना शक्रादीना दिवौकसाम् ।
विमानस्यापि ते लान्तिस्तरुणार्कायुतद्युति ॥६॥

अरुन्धती मावित्री सम्बाद् ] 1 २५१ तप प्रभावो दानं वा कर्म वा क्तविरतरम् । युवयोरतन्ममाचक्ष्व ययावद्वरणिनि ॥७॥ गृपियों ने कहा-हे वाक्य विशारद सूतजी | महाभाग बाली पतिव्रता पर वणिनी सावित्री ने जो भी कहा था वह आप हमको बतलाइये ।। मूतजी ने कहा- सब गुणो से अलङ्गता उसको स्वर्ग में देखकर जो कि परम शोभा से समन्वित थी शुचिस्मित वाली और मव लियो मे उत्तम अरुन्धती ने उनसे पूछा था ।। हे सावित्रि । रवर्ग में निवास करने वाले देवगण सैकडो ही हैं तथा ये देवी की पत्निया भी हैं-सिद्ध और वहां पर सिद्धोङ्गनाऐ भी हैं किन्तु उनमे ऐसी गन्ध नही है और न उनकी ऐसी सुन्दर कान्ति ही है और सस्पता ही है। अन्यो की ऐसी शोभा भी नहीं हैं जैसी कि तुम्हारी अपने पतिदेव के साथ में रहने पर हुआ करती है । '१४ है वरवणिनि । आकल्प जात भी सुरो की स्त्रियों के उस प्रकार के मुपमान नहीं हैं जैसे तुम्हारे और आपके पतिदेव के भूपणादि भ्रानभावन हुआ करते हैं ।५। शक्र आदि देवो के विमाना की भी वैसी नहीं है जैसी तरुण सूर्यो की दस हजार सख्या म एकत्रित होने पर जो शुति होवे आपके विमान को कान्ति है ।६६ हे वर वणिनि । आप दोनो का क्या यह तप का प्रभाव है या दान-मं और ऋनुओ की अधिकता का प्रभाव ऐसा है । यह आप हमको बतलाइए ७ शृण प्वतन्महाभागे यत्कृत पूर्वजन्मनि । भ; सह मया भद्रे शभोरायतने शुभे ॥ कृत समार्जन भक्त्या गोमयेनोपलेपनम् । स्वर्गप्राप्तिरिय तस्य कर्मण फलमुत्तमम् IME तीर्थोदक सुगन्धश्च (?) स्नापितो यदुमापति । तेन कान्तिरतीवैपा देहेऽभूत्रिदशेश्वरि ॥१० मन प्रसाद सौम्यत्व शारीरी या च निति । यत्प्रियत्व च सर्वस्य तद्धृतस्नानज फनम् ॥११ २५२ ] [ सूर्यपुराण आह लादः परमस्वास्थ्यमारोग्य चारवेगता। प्राप्तिश्वाशेपकामाणा दधिक्षीरफल शुभे ॥१२ सौगाध्य यत्पर देहे धूपदानम्य तफलम् । गीतेनृत्यस्तथा जाप्यनियमैश्च पृथग्विध ११३ तोपितो भगवानीशस्तस्येय पुष्टिरुत्तमा। स्वर्गेप्सुना सत्यवता मया च शुभदर्शने ॥१४ सावित्री देवी ने कहा-हे महाभागे ! आप अब इसका मुझसे श्रवण कर लीजिए कि जो कुछ मैंने पूर्व जन्म मे कर्म किया है। हे भद्रे ! अपने स्वामी के साथ मैंने भगवान् शम्भु के परम शुभ आयतन में भक्ति भावना से समार्णन किया था और गोमय (गोबर) से उपलेपन भी किया था। यह स्वर्ग में प्राप्ति उसी शुभ कर्म का उत्तम पुण्य फल है HENEll सुगन्धित तीर्थों के जलो से जो उमापति ने स्नान किया था हे त्रिदशेश्वरि ! उसो से यह ऐसी उत्तम कान्ति मेरे देह मे होगई है ।।१०।। मन में प्रसाद का होना-सौम्यता और जो शारीरिक निति तथा सबका प्रियत्व जो होना है उप्त धुन से किये गये स्नान का ही फल है ॥११॥ आलाद-परमोत्तम स्वास्थ्य का होना आरोग्य और चारवेगता तथा कामो की प्राप्ति हे शुभे ! ये सब दघि और क्षीर फा ही उत्तम फ्ल है । हे शुभे। मेरे देह में जो परमोत्कृष्ट मुगन्ध है वह घूप दान का ही पुण्य फल है। गीत-जाप्य नियम जो कि पृथक प्रकार के हैं उनके द्वारा मैंने भगवान ईश को तोपित किया था उसी मी यह उत्तमा पुष्टि है । हे शुभदर्शने । मैंने और सत्यवान ने स्वर्ग पी इच्छा यी थी ॥१२॥१३॥१४॥ कृतमेतदतोन स्थादावयोर्मोगसक्षय.। ये निश्चिता नरा: सम्यक्पूजयन्ति महेश्वरम् ॥१५ तेपा ददाति विश्वेशो देवो मुक्ति सुदुर्लभाम् ॥१६ संवमुक्ताऽय साविया मुनीन्द्रा हटमानसा । ग्रहारनुपा शिवेशानी प्रणिपश्येममयीद ॥१७

अरून्यती-सावित्र सम्बाद ]
[ २५३
सा पूज्या सा नमस्कार्या सा साध्वी सा पतिव्रता।
या पूजयति सावित्रि सदा हैमवतीपतिम् ।।१८
यमाराध्य दिति. पुताल्लेभे शकपुरोगमान् ।
दितिश्च दैत्यान्विविधान्विनता गरुडारुणौ ॥१६
सच्युर्वशीमुखाश्वान्याः सपूज्योमापति पुरा ।
प्रापुश्वाभिमतान्कामारतमीश को न पूजयेत् ।।२०
अभिनन्द्याथ ता चैव वसिष्टार्धशरोरिणी।
जगाम स्वाथम साध्वी सर्वदेवगणाचिता ॥२१
हमने यही किया है इसीलिये हम दोनों के भोग का सक्षय नहीं
होता है । जो विक्षय किये हुए नर महेश्वर भगवान् का भलीभांति पूजन
किया करते हैं विश्वेश उनको सुदुर्लभ मुक्ति का प्रदान किया करते
हैं ॥१५॥१६॥ श्रीसूतजी ने कहा-सावित्री के द्वारा इस प्रकार से
कही गयी थी। इसके अनन्तर मुनीन्द्र गण परम इष्ट मन वाले होते
हुए स्थित होगये थे। ब्रह्मस्नुपा ने शिवाईशान दोनो का प्रणिपात करके
यह पहा था ॥१७ । अरुन्धती ने यहा-वह पूज्या है-नमस्कार करने
के योग्य है-वह साध्वौ और पतिव्रता है। हे सावित्रि ! जो सर्वदा
हेमवती के पति की पूजा किया करती है ॥१८॥ जिनका समाराधन
करके यदिति के शक जिना अग्रणी है ऐसे पुत्रो की प्राप्ति की थी
और दिति ने अनेकों दैत्यो को प्रमूत किया था तथा विनता ने गरुड
और अरुह-इन दो पुत्री को जन्म ग्रहण कराया या ॥१६॥त्री और
उर्वशी प्रधान जिनमे हैं ऐसी अन्य महिलाओ ने पहिले भगवान उमापति
का भलीभांति पूजन करके अपने अभिमत वामनामो को प्राप्ति की पी
उस ईश को कौन नहीं पूजेगा ॥२०॥ मुनिवर वसिष्ठ जी की मां-
गिनी देवी अरुन्धती उस सावित्री देवी का इस प्रकार से अभिनन्दन
करके वह साध्वी सब देवगणो के द्वारा ममपित होती हुई अपने मायम
को चली गयीं थी ॥२१॥

२५४ ]
[ सूर्यपुरा
एव समय गौरीगं श्रद्दधानाश्च योषितः ।
लभन्तेऽभिमतान्भोगान्सावित्र्याह यथा द्विजाः ॥२१
ये नराः सकृदप्यत्र पूजयन्ति त्रिलोचनम् ।
ते धन्यास्ते महात्मानस्ते कृतार्थाश्च पण्डिता.॥२३
धर्मार्थकाममोक्षा लिङ्गार्चा हेतुरुच्यते ।
सर्वेपा प्राणिनां विप्रा इन्द्रियाणा यथा मनः ॥२४
हृत्पद्मकणिकावास तेजोमतिममङ्गिनम् ।
निर्ममा निरहंकारा ध्यायन्ति ज्ञानिन' सदा ।२५
शैलज बाणलिङ्ग वा पूजयेद्विधिवत्सदा ।
मृद्दारुघटित वाऽपि रत्लज वा गृहाश्रमी ।।२६
साम्राज्य मनुज, कैश्चित्स्वाराज्य च तथा परः।
तथा वैराज्यमन्यश्च लिङ्गमिष्ट्वा तदैश्वरम् ॥२७
मोचन्ते ते पर हीना अभाग्याश्च दिने दिने।
प्रमादेनापि यतॊक्त शिव इत्यक्षरद्वयम् ॥२८
इस रीति मे श्रद्धा करने वाली नारियां भगवान् गौरी के पति का
अपर्चन करने अभिमन भोगो की प्राप्ति किया करती हैं जैसा कि
हे द्विजो | सावित्री ने कहा है ॥२२॥ जो मनुष्य एक बार भी
यहाँ पर मिलोचन प्रभु का पूजन किया चरते हैं वे पुरुष परम
धन्य हैं-महान आस्मा वाले हैं-कृतार्थ हैं और महान पण्डित हैं
॥२३॥ धर्म-अयं काम और मोक्ष इन चारों पदार्थों की प्राप्ति
फा हेतु शिवालिङ्ग पूजा ही बतलायी जाती है। सब प्राणियो मे विष
उत्तम होते हैं जिग प्रकार में समस्त इन्द्रियो मे मन शिरोमणि है।
हृदय रूपी मल की कणिया मे आवास वाले असङ्गी-तेजोमूत्ति शिव
का निभय होकर और अहसार से रहित होते हुए ज्ञानी पुरुष मदा ही
ध्यान दिया करते हैं ॥२४॥२५॥ दल से निर्मित या वाणालिङ्ग पा
जो विधि-विधान के साथ सदा पूजन करता है अथवा मृत्तिका सपा
पाठ मे निमित या रस्नो गे रचित मिग का गृहम्य पूजन frया परता
है तो मुष मनुष्यों के द्वारा साम्राज्य तथा दूमरी के द्वारा स्वराज्य और

अरूवती-सावित्री सम्वाद ] [ २५५ अन्यों के द्वारा राज्य उस समय में ईश्वर के लिङ्ग पा भजन करके किया था। जो होन हैं प्राप्न वे शोच ही किया करते हैं और दिन-दिन "मे भाग्य रहित हैं जिन्होंने कभी प्रमाद से भी अपने मुख से "शिव" -- इन दो अक्षरो को कभी भी नहीं कहा है ॥२६॥२७॥२८॥ सपूज्ये सर्वसामान्ये स्वाराध्ये सर्वकामदे । 'भवेऽपि सति सीदन्ति भाविनो यत्तदद्भतम् ॥२६ उपसर्गा. क्षय यान्ति च्छिद्यन्ते विघ्नपल्लवा । मन प्रसन्नतां याति पूज्यमाने महेश्वरे १३० पूजिते सर्वदेवेशे सर्वदेवनमस्कृते । पूजिता सर्गदेवाः स्युर्यतोऽमो सर्वगो विभु ॥३१ शिवार्चनरतो नित्य महापातकसमवे. । दोषन लिप्यते विद्वाम्पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥३२ किमत्र शास्त्रमालाभि. सोपेणोपदिश्यते । व्यापारान्सकलास्त्यक्त्या पूजयध्वा महेश्वरम् ॥३३ निकटा एव दृश्यन्ते कृतान्तनगरमा । शिग स्मर गिन ध्याय शिग विन्तय सर्वदा ॥३४ कि वेदै किमु वा शास्त्र किंवा तीर्थादिसेवया। शिवः सपूज्यता नित्यमुपदेशोऽयमुत्तम. ॥३५ भलीभांति पूजन करने के योग्य-सभी के लिये परम साधारण- अपने द्वारा आराधना करने के योग्य-सभी कामनायो को प्रदान करने वाले भगवान् भव के विद्यमान रहने पर भी भावी वाले लोग उठाया करते हैं यह एक परम अद्भत बात है ॥२६।। उपसर्ग सब प्रय को प्राप्त हो जाते हैं और विघ्न पल्लयो का ऐदन हो जाता है। महेश्वर भगवान के पूजन करने पर मन प्रसन्नता को प्राप्त हो जाता है। सर्व देवो के द्वारा वन्दित सर्व देवेश के पूजित होने पर सभी देव पूजित हो जाया करते हैं क्योंकि यह विभु सभी देवो में निवास किया परते हैं ॥३०॥३१॥ भगवान् शिव के मन में नित्य न रहने वाला २५६ ] [ सूर्यपुराण - विद्वान पुरुप महापातको से होने वाले दोपो से लिप्त नहीं होता है जैमे पल का पत्र जल में लिप्त नही हुआ करता है ॥३२॥ इस विषय मे शास्त्रो की मालाओ से क्या लाभ है। सभेप से ही यह उपदेश दिया जाता है कि सकल व्यापारो को त्याग करके भगवान् महेश्वर का ही पूजन करो ॥३३॥ सर्वदा भगवान् शिव का स्मरण करो-शिव का ध्यान करो और शिव का चिन्तन करो तो वृतान्त के नगर को मनि कर ही दिखलाई दिया करते हैं ॥३४॥ वेदो से क्या प्रयोजन है- शास्त्रो से भी क्या लाभ है अथवा तीर्थ आदि के सेवन से क्या प्रयोजन है केवल नित्य भगवान् शिव का ही पूजन करो। यही सर्वोत्तम उपदेश है ॥३५॥ अयमेव परो धर्मश्चीर्णमेमेतत्परं तपः। इदमेवाखिल ज्ञान पूजनं यन्महेशितुः ।।३६ शिवे दत्त हुत जप्त बलिपूजानिवेदितम् । एकान्तोऽत्यन्तफल तद्भवेन्नात्र संशयः ॥३१ कर्मभूमौ हि मनुष्य जन्मना नियुतैरपि । स्वर्गापवर्गफलद कदाचित्प्राप्यते नरैः॥३८ तदीदृग्दुर्लभं प्राप्य नार्चचन्तीह ये शिवम् । तेपा हि हस्ते मूर्खाणां विवेकः कुत्र तिष्ठति ॥३६ आराधितो हि यः पुसामै 'हेकामुष्मिकं फलम् । ददाति भगवाऽशभुः करत न प्रतिपूजयेत् ॥४. यो यमिच्छति विप्रेन्द्रा: समाराध महेश्वरम् । नि.सशयः तमाप्नोति पुरा गैधाणो यथा ॥४१ दृष्टः संपूजितो ध्यान: सस्मृतो वा स्तुतोऽपि वा । यो ददाति नृणां मुक्ति रास्मानाच्यते शिवः ।।४२ शिय मा सम्पन्न हो रापसे परधर्म है । इसा पीर्ण परना ही परम सप है। यह गम्पूर्ण शान है कि पहेश भगयान् वा पूजन पिया आवे (३६॥ भगवान् ति या उद्देश्य पर दिया हुप्रा दान हान- .

'अन्धवी-सावित्री सम्वाद ] [२५ जार-लि-पूजा जो भी निवेदित किया गया है वह एकान्त रूप अत्य- धिक फल प्रदान करने वाला होता-इसमे लेशमात्र भी सशय नहीं है ॥३७॥ यह कर्मभूमि है। इसमें मनुष्य योनि अरबो जन्मो के पश्चात् ही प्राप्त होती है शायद कदाचित ही मनुष्यो के द्वारा मनुष्य जीवन मे भी स्वर्ग-अपवर्ग के फत्र देने वाला प्राप्त किया जाया करता है। तात्पर्य यह है कि शायद कोई ही स्वर्ग और अपवर्ग के फल को प्राप्त किया करता है नहीं तो सभी आना यह दुर्लभ जीवन व्यर्थ ही गंवा दिपा करते हैं । ३८। इस परम दुर्लभ मनुष्य जीवन को प्राप्त करके भी जो मनुष्य इम समार में आकर भी भगवान शिव का अभ्यचंन नहीं किया करते हैं उन मूर्यो के हाथ में विवेक कहां पर स्थित रहता है ३६) पुरुषो मे जिसने भी शिव को बाराधित किया है तो उस पुरप को भगवान् शिवलौकिक और पारलौकिक फल प्रदान किया करते हैं । ऐसे भगवान् शिव को कौन महामूद है जो नहीं पूजा करता है ॥४०॥ हे विन्द्रो ! जो महेश्वर प्रभु की समागधना करके जिसको भी चाहता है उसी को वह बिना किसी संशय के प्राप्त कर लिया करता है जैसे प्राचीन काल मे वयवण ने प्राप्त कर लिया था ॥४१॥ केवल दर्शन किये हुए-मलीभांति पूजे हुए-ध्यान किये हुए-सस्मरण किये हुए और स्तवन किये हुए जो गिव मनुष्यो को मुक्ति देता है इससे किनके द्वारा वे शिव अचित नहीं किये जाते हैं ॥४२॥ श्वपचोऽपि मुनिष्टा शिवभक्तो द्विजाधिक. । शिवभक्तिविहीनस्तु द्विजोऽपि श्वपचाधमः ।।४३ यद्वा तद्वा शिवे कर्म पुमान्कृत्वा शिवालये। लोभात्सङ्गात्प्रमादाद्वा पृथिव्यामेकराड्मवेत ॥४४ कथ वैश्रवणः पूर्व समाराध्य महेश्वरम् । लब्ध तस्माकुवेरत्व सूत तद्वक्त मर्हसि ।।४५ शृणुध्वमृपय सर्वे यदुक्त नमेऽन्तरे। माहात्म्यमूचनक्था शिवस्य'परमेष्ठिनः ।।४६ - २५८ ] [ सूर्य पुराण राट कश्चिदासीद्विजोऽवन्त्या सोमशति विश्रु तः । पुत्रक्षेत्रकलादिव्यापारेषु रत. सदा ॥४७ विहायाथ म गार्हस्थ्य धनार्य लोभमोहितः । प्रचचार मही सर्वा सग्रामपुरपत्तनाम् ।।४८ भार्या तस्य विशालाक्षी तस्मिन्गेहाद्विनिर्गते । स्वच्छन्दचारिणी नित्य बभूवानगमोहिता ||४६ हे मुनि श्रेष्ठो ! श्वपचभी चाहे भगवान शिव का भक्त है तो द्विज से भी अधिक श्रेष्ठ है । शिव की भक्ति से विहीन द्विज भी वपन से भी कही अधिक अघम हुआ करता है ॥४३॥ शिवालय मे जो भी जैसा-तैसा शिव के लिए कर्म करके मनुष्य चाहे वह लोभ से किया हो या प्रमाद से किया गया हो या किसी सङ्ग से किया हो पृथ्वी मे एक होता है ॥४४।। ऋपियो ने कहा-हे सूतजी ! वैश्रवण ने पहिले किस प्रकार से महेश्वर प्रभु की समाराधना करके उनसे कुवेरत्व के पद को प्राप्त किया था- यह ही आप बतलाने के योग्य होते हैं ॥४५॥ श्री सूतजी ने कहा-हे ऋपि गणो ! आप सब लोग श्रवण करिए जो कुछ सप्तम अन्तर मे कहा गया है परमेष्ठी शिव की माहात्म्य के सृचन की कथा है ॥४६॥ कोई एक द्विज जिसका नाम सोम शर्मा प्रसिद्ध था वह अवन्ती पुरी मे रहता था। वह सदा ही पुत्र–कलत्र-क्षेत्र आदि व्यापारी में निरत रहा करता था ॥४७। उसने अपने गार्हस्थ्प का त्याग कर धन के लिए लोभ से मोहित होकर सम्पूर्ण भूमि पर जिसमे ग्राम- नगर और प्रट सभी थे प्रचरण किया था । उसके घर से विविर्गन हो जाने पर उसकी विशालाक्षी भार्या अनङ्ग (कामदेव) से मोहित होकर नित्य ही स्वच्छन्द ससाचरण वाली व भगयी थी ॥४८॥४६॥ तस्या कदाचित्पुत्रस्तु शूद्राज्जातो विघेवंशात् । दुरात्माऽतीव निगूढो नाम्ना दु सह इत्युत ।।५० सोऽथ कालेन महता व्यसनोपप्लुतोऽभवत् । सर्वेधुजनैस्त्यक्त पपिपन्थिपथे स्थित ॥५१

अरूधवी-सावित्री सम्वाद ]
[ २५६
पूजोफरणद्रव्य (?) स कस्मिश्चिच्छिवालये ।
रजन्यां प्रविवेशाथ व्यसनेन प्रपीडितः ॥५२
यावद्दीपो गतप्रायो वतिच्छेदाऽभवत्किल ।
तावत्तेन दशा दत्ता द्रव्यान्वेषणकारणात् ॥५३
प्रवुद्धश्वोच्छि तस्तत्र देवपूजाकरो नरः ।
कोऽय कोऽय मिति प्रोच्चाहरन्परिघायुधः ॥५४
स च प्राणभयान्नष्टो वित्रस्तश्चापि मूढवीः ।
न विन्दन्नात्मनो जन्म क्मं वाऽपि सुदु.खितः ।।५५
पुरपालेहतोऽवन्त्या मृत कालादभूत्ततः ।
गान्धाराविपये राजा ख्यातो नाम्ना सुदुर्मुख. ॥५६
उस द्विज की भार्या मे से फिसी समय मे विधि के वश से एक शूद्र से
पुत्र उत्पन्न हुआ था । वह दुष्ट आत्मा वाला-निगूढ-और अतीव
दुसह तथा नाम भी दु सह था ।५०॥ वह विशेष काल के होने पर
विदेश में व्यसनो मे उपल्पुत हो गया था। जब वह परिपल्य में स्थित
देख गया हो सभी बन्धुओ के द्वारा भी परित्याक्त हो गया था ॥५१॥
छ यामतम में पूजा के उपकरण द्रव्य रहते ही हैं । वह एक वार किसी
शिवालय में व्यसन से उत्पीडित होकर रात्रि के समय मे प्रविष्ट हुआ
था। जव तक दीपक बुझा था और दीपक की वत्ती का छेदन हुआ था
तव तक द्रव्य के अन्वेषण करने के कारण से दृश्य दी थी ॥५३॥ वहा
पर देवता की पूजा करने वाला मनुष्य जाग उठा । उसने 'यह कौन
है-यह कौन हैं"-ऐसे कहते हुए जोर से रिल्लाया और हाथ में उसने
परिध ग्रहण कर लिया था ॥५४॥ वही पर वह विप्र प्राणी के भय से
मूढ वुद्धि वाला नष्ट हो गया था। उसने अपना जन्म और कर्म को भी
प्राप्त सही किया था और अत्यन्त दु खिन हुआ ॥५५॥ अवन्ती पुरी मे
वह पुरी के पालन करने वालो के द्वारा मार दिया गया था। इसके
उपरान्त दुध वाल में वह गान्धार देश में सुदुमुंख नाम से राजा
विख्यात हुआ था ॥५६॥

२६० ]
[ सूर्यपुराण
गीतवाद्यरत स्तव्यो वेश्यापानरुनिभृशम् ।
प्रजोपद्रवकृन्मूखः सर्वधर्मवहिप्कृतः ।।५७
कि त्वचंयत्यसौ नित्य लिङ्ग राज्यक्रमागतम् ।
पुष्पपूपसुनैवेद्यगन्धादिभिरमन्त्रवित् ॥५८
स्मुरन्दै पोविक कमं शिवस्याऽभ्यतनेषु च ।
ददाति बहुशो दीनान्यतितै नस मुज्ज्वलान् ।।५६
कदाचिन्मगयासक्तो ममाराथ स वीर्यवान् ।
पूर्वारिभिहंतो युद्ध ऐरावत्यास्तटे शुभे ।।६०
शिवपूजाप्रभावेन विध्वस्तापकिल्विष ।
पुत्रो विश्रवसश्चाभूत्सर्वयक्षाधिपो बली ॥६१
कुबेर इति धर्मात्मा थ्र तिशास्त्रसमन्वितः।
सपूज्याथ स चेशान विधिवत्स्वधु नीतटे ।।
स्तोत्रणानेन तुष्टाव भक्त्वा ते सर्वकामदम् ।।६२
, वह गान और वाद्य में रति रखने वाला-परम स्तब्ध और वेश्या
तथा मद्यपान करने में रुचि रखने वाला अत्यधिक था। वह इतना मूर्ख
था कि प्रजा मे उपद्रव किया करता था तथा सभी धर्म के कर्मों से रहि
प्कृत हो गया था ॥५७॥ किन्तु यह राज्य क्रम से आगत शिवलिङ्ग का
नित्य ही अर्चन किया करता था। यह मन्त्रो का ज्ञाता तो बिल्कुल था
ही नही विन्तु बिना ही मन्त्रो के पुष्प-धूम-नैवेद्य और गन्ध आदि के
द्वारा अभ्यर्चन करता था ॥५८। वह पूर्व जन्म के कर्म का स्मरण करते
हुए भगवान् शिव के आयतनो मे बहुत से पत्ती और तेल से समुज्ज्वलित
दीपको को अर्पित किया करता था ॥५६॥ किसी समय मे मृगया
(शिकार) मे समासक्त हुआ वह वीर्यचान् राजा मर गया था। ऐरावती
नदी के शुभ तट पर पहिले शत्रुओ के द्वारा वह युद्ध मे हत किया गया
मा ॥६०॥ किन्तु भगवान् शिव की पूजा के प्रभाव से उसके समस्त
पाप नष्ट हो गये थे और फिर वह विधवा मुनि का पुत्र होकर समुत्पन
हुआ था जो बलवान् समस्त यक्षो का अधिप हो गया था ।।६१॥ वह

अरुन्धरी-पावित्रो सम्वाद ] [ १६ बुवेर- इस नाम वाला परम धर्मात्मा हुआ था जोकि श्रुति (वेद) और शास्त्रो के ज्ञान समन्वित था। उसमे वधु नी के तट पर विधि-विधान के साथ भगवान् ईशान की भली भांति पूजा करके उन समस्त कामनाओ के प्रदाता शिव को भक्ति से इस निम्नलिखित यांत्र से स्तवन किया था।६२॥ नमाम्यहं देवमज पुराणमुपेन्द्रवेधोमरराजजुष्टम् । शशाङ्कसूर्याग्निसमाननेत्र वृपेन्द्रचिन्हे विलयादिहेतुम् ।।६३ सर्वेश्वरंक त्रिदर्शकवन्धु ध्यानाधिगम्य जगतोऽधिवासम् । त व ङाधारमनन्तशक्ति ज्ञानार्णव स्थ यंगुणाकर च ।।६४ पिनाकपाशाडकुशशूलहरत कपर्दिन मेघसहस्रघोपम् । सकालकूट स्फटिकावभास नमामि शभु भुवनेकनाथम् ॥६५ कपालिन मालिनमादिदेव जटाधार भीमभुजगहारम् । प्रशासितार च सहस्त्रमूर्ति सहस्रशीप पुरप वरिष्ठम् ॥६६ यमक्षर निर्गुणमप्रमेय त ज्योतिरेकप्रवदन्ति सन्तः । दूरगम वेदविदा च वन्द्य सर्वस्य हृरथ पविनम् ॥६७ तेजोनिधि बालमृगावमोलि नमामि रुद्र स्फुरदुग्रवक्त्रम् । कालेन्धन कामदमस्तसङ्ग धर्मासनस्थ प्रकृतिद्वयरथम् ॥६८ अतीन्द्रिय विश्वभुज जितारि गुणत्रयातीतमज निरीहम् । मनोमय वेदमय च हस प्रजापतीश पुरहूतमिन्द्रम् ॥६६ अनाहतकध्वनिरूपमा ध्यायन्ति य योगविदो यतीन्द्राः। संसास्पासच्छिदर विमुत्तय पुन. पुनरतं प्रणमामि नित्यम् ॥७० दुवेर ने कहा-मैं उपेन्द्र- वेघा और देवो के राजा के द्वारा सेवित-अज-प्रराण देव यो नमभार करता हूँ। बाम चन्द्र-गूयं और अग्नि के समान नेत्री वाले हैं और वृषेन्द्र के चिन्ह से युक्त तथा सृष्टि के विलय आदि ये हेतु हैं उनको में प्रणाम करता हूं। हे भगवान् ! मा ही सबके ईसर-है-देको के परम धुमाल द्वारा ही अधिगमन करने के योग्य और इम जगर के अधिवाग है। उन याद.

२६२ ] [ सूर्य पुराण व्यय के आधार-अनात शक्ति से सम्पज्ञ-ज्ञान के सागर और स्थैर्य गुण के आकर आपको मैं प्रणाम करता हूं ॥६४॥ आप पिनाक घनुप, पाश, अंकुश और विशुल इन आयुधों के धारण करने वाले हैं-कपर्दी -सहस्त्रो मेघो के समान घोप वाले-कालकूरम हाविप से युक्त -स्फटिक मणि के समान भासित-भुवनो के नाथ भगवान् शम्मु को मैं नमस्कार करना हूं ॥६शा कपाली-और कपालो की मालाधारी-आदि देव-जटाधारी-भीपण सर्पो के हार को पहिनने वाले-प्रशासिता-सहस्त्र मूर्तियों वाले सहस्र शीपो वाले-वरिष्ठ पुरुष आपकी सेवा मे प्रणाम समर्पित करता हूं ॥६६॥ सन्त लोग जिनको अक्षर-निर्गुण-अप्रमेय- एक ज्योति पहा परते हैं। जो वेदो के ज्ञाताओ को बहुत दूर रहने वाले हैं सबके वन्दना करने के योग्य हैं-हृदय मे ही स्थित रहने वाले और परम पवित्र हैं ऐसे तेज के निधि और वाल चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले स्फुरित अग्र- मुख वाले भगवान रुद्र से लिए मैं नमस्कार करता हूं। काल के ई धन- कामनाओ के प्रदान करने वाले समस्त सङ्ग से रहित-धर्म-धर्म के आसन पर समवस्थित--प्रकृति हृय मे स्थित भगवान् रुद्र को प्रणाम करता हूँ ॥६७॥६८॥ इन्द्रियो को पहुंच से परे-विश्व के भोग करने घाले-शत्रुओ के जोतने वाले--तीनो गुणो से अतीत-अज-निरीह- मनोमय-वेदमय-हस-प्रजा परियो के ईश-पुरुहूत-इन्द्र-अनाहत एक ध्वनि और रूप वाले-आद्य-आप हैं जिनको योग के ज्ञाता यतीन्द्र गणध्यान मे लाया करते हैं । ससार के पाशो के छेदन करने वाले- विमुक्ति के प्रदान करने वाले उन भगवान शम्भु को मैं बारम्बार नित्य प्रणाम करता हूँ ॥६८॥६६॥७०।। न यस्य रूपं न वलप्रभावो न च स्वभाव. परमस्य पुंसः । विज्ञायते विष्णुपितामहाद्य रतं वामदेवं प्रणमाम्यचिन्त्यम् ७१। शिव समाराध्य यमृग्रमूर्ति पपौ समुद्र भगवानगस्त्यः । लेभे दिलीपोऽप्यखिलां स चोवीं तं विश्वयोनि शरणं प्रवद्य ७२।

[ २६३
अरूधरी-सावित्री सम्बाद् ]
सपूजयन्तो दिवि देवसवा ब्रह्मन्द्र मुख्या विविधाश्च कामान् ।
त रतोमि नौमीह जपामि शव वन्देऽभिवन्द्य शररा प्रपद्य १७३।
स्तुत्ववमीश विरराम यावत्तावत्सहस्त्रासमानतेजा ।
ददौ स तस्मं वरदोन्धकारिवरनय वैश्रवणाय देव ॥७४।।
कृत्वाऽधिराज च ततत्रिनेनो यशस्विन गृह्यराजमत्र ।
ब्रह्माच्युतेन्द्रादिनता घ्रिपद्मो जगाम कैलासममोधवाक्य ।७५॥
सख्य च दिक्पालपद चतुर्य धनाधिपत्य च दिवौकसा स ।
तथाऽधिक चतदनिन्द्यकीति सुखी बभूवाप्रतिमप्रभाव १७६॥
दोपाचरेन्द्रश्च तथा दशास्य सज्य दोपाकरचारुमौलिम् ।
दोपार रश्चाप्यजितेद्रियश्च मुक्ति स लेभेऽस्तसमरतदीप १७७
जिनका कोई भी सप नहीं है और न कोई वल का ही प्रभाव
है-ने स्वभाव है ऐम यह परम पुरप हैं । विष्णु और पितामह आदि
के द्वारा ही उनका शाा प्राप्त किया जाता है उन आच य यामदेव
प्रमु को मैं प्रणाम करता हूँ ७१। भगवान् अगम्त्य मुनि ने भगवान्
शिव की ही ममारापना करते जो म अष्टमूनि हैं समुद्र पा पान पर
लिया था। राजा दिलीय ने भी इहीं यामह से सम्पूण पृथ्वीना
लाभ प्राप्त पिया या उदा विश्व पी योनि प्रभु को पारणागतिया म
मान होता है । ग्रह्म ६८ जिनम प्रमुग हैं एमे सब देवो प
ममुदाय ने विलोम भीमपूजन परत डा यार मनोरपायो
प्राप्न रिया पा उहा भगवान शिव का में गम्यार परता?
सयन करता है-चाप परा और वरना मरता हूँ। म अभि-
परना परने प योग्य प्रभु की मैं परण म गाना 1७३ग गैनि ग
सुनि पर जम ही पुरेर गिरा हा पा बंम हो गया गर्यो ।
गमा नेग पुरा प्रपा रे तु देव के जो बरक्षा दल पार है उग
aur नियनीन पर गनर 151गर उपरान मापान
पिनेर ने वन अधिरान पनागर जोरि पाम पायो और

२६४] [ सूर्य पुराण गुह्यको का राजा था फिर ब्रह्मा-अच्युत-इन्द्र आदि के द्वारा प्रणत चरणो वाले और अमोघ वाद्यो से युक्त प्रभु कैलाश पर्वत पर चले गये थे ।७२१ सस्य-हिरूपातकापद-और वह दोनों के धन का आधिपत्य प्राप्त करके उससे भी अधिक अनिन्ध कीति वाला और अप्रतिम प्रभाव पे युक्त वह परम सुखी हो गया था ७६। द्रोणाचर-इन्द्र तथा दृशास्य (रावण ) ने चन्द्रदेव को मस्तक पर धारण करने वाले प्रभु शङ्कर का पूजन करके समस्त देवो का निराकरण करके उस अजित इन्द्रियो वाले और दोपो के आकरने भी मुक्ति को प्राप्त कर लिया था ।७७) स्वर्गस्य मार्गा बहव प्रविष्टास्ते वृच्छ्रसाध्या वह्व सविघ्ना । निमेषमात्रेण महाफलोऽयमृजुथ पन्था स्मरण पुरारे ७८) दृष्ट तदेवाद्भ तमन मा माहात्म्यमेश ससुरासुराश्च । त्यक्त्वाऽऽत्मयोग च मखक्रियाश्च यजन्त्यतस्त्र्यम्बकमेव सर्वे ॥७६।। गायन्ति देवा किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूय पुरुषा सुरत्वात् ॥८॥ कर्माण्यसकल्पिततत्फलानि सन्यस्य रुद्र परमात्मरूपे । अवाप्य ते कर्ममहीमनन्ते तस्मिल्लय ये त्वमला प्रयान्ति ।।१। जानीय (२) नैताद्धि कदा विलीने शुभप्रदे कर्मणि देहबन्ध । प्रासाम खण्डे किल भारताख्ये कुलेऽकलङ्क शिवधर्मनिष्टा ।२। स्तोत्रेण येऽपि कचिदत्र मक्ता प्रसस्तुवन्ति प्रमथैकनाथम् । प्रयान्ति ते लोकेमिहान्धकारे पुरदरोद्गीतमहाप्रभावा ।३। एव वैश्ववणो जातो महादेवप्रसादत । सर्वमेतशेषेण कथित मुनिपु गवा ८४ य पठेच्छणुयाद्वाऽपि सर्वपापै प्रमुच्यते । ब्रह्मलोके वसेत्वमित्ति देवोऽब्रवीद्रवि १८॥

अरुन्धरी-सावित्री सम्बाद् ] यो तो स्वर्ग के प्राप्त करने के लिए बहुत से मार्गों को बताया गवा है किन्तु वे सभी मार्ग कठिनाई से साधन करने के योग्य हैं और उनसे बहुत से विघ्न भी रहा करते हैं। एक निमिप मान मे ही महान् फल देने वाला -परमाधिक सरल यही एक सुगम मार्ग है जो भगवान् पुरारि का स्मरण किया जावे ७८। यहां पर मनुष्य सुर और अमुर सभी ने भगवान ईश्वर के माहात्म्य में एक परम अद्भुतता देखी है और सभी लोग आत्म योग-यज्ञादि की क्रिया इन सबका त्यार करके एक येवल भगवान् त्र्यम्बक का ही भजन किया करते हैं ॥७९॥ देवगण ऐसे अनेक गीतो का गान किया करते है कि जो भारत देश की भूमि भाग मे वर्तमान प्राणी हैं वे परम धन्य हैं। यह भारत देश की भूमि स्वर्ग और अपवर्ग ( मोक्षपद ) के मार्ग के ही समान है अर्थात् इसी भूमि म उत्पन्न होकर प्राणी स्वर्ग और मोक्ष के स्थान की प्राप्ति किया करते हैं। जो भारत में जन्म प्राप्त परते हैं वे परम धन्य हैं। अतएव देवगण की सुरत्व का त्याग करके इस भारत मे पुन पुरुष होकर जन्म ग्रहण परने के इच्छर रहा करते है ।20। परमात्मा के स्वरूप वाले भगवान् रुद्र के चरणो मे ही सब असहाल्पित फना पाते कमों को समर्पित करक वे सब इस स्मभूमि को प्राप्त पाये उस अनन्त में लय प्राप्त कर निर्मल होते हुए प्रपाण पिया करते हैं ।।८१॥ यह न जानकर कि व शुभप्रद श्म के विलीन होने पर देह का बन्धन होता है । अतएव भारत नाम याले भूपण्ड म पिसी पनडु गैरहित दुल म शिव के घमं मे निप्पो वाले निवाम वरें। यहाँ पर इग स्तोम के द्वारा जो भी कही पर भक्त लाग प्रमया के एर नाप प्रम का स्तयन रिया वरते हैं वे अभारि भगवान शिव नोर म प्रपाण विया परते हैं और इन्द्र के द्वारा उन महाप्रभाव के गीत गाये गये हैं।२।९३॥ श्री मतगी ने कहा-इम प्रभार से बंधवण महादेवजी के प्रमाद से ही गपुरपान हुआ था। मुनि पुनयो । मैंन यह सय पूर्ण स्पसे वह दिया है । जो इसको पढ़ता है अपवा अयप पिया मरता २६६ ] [ सूर्य पुराण है वह सभी पापो से प्रमुक्त हो जाया करता है। रविदेव ने यह यहा था कि वह अन्त में जाकर ब्रह्मलोक में कल्प पर्यन्त निवास पिया करता है । ८५॥ ॥ सुदेव्युपाख्यान ॥ पुनर्वक्ष्यामि माहात्म्यं देवदेवस्य शूलिनः । पठता शृण्वतां सद्योऽघानि हन्ति बहून्यपि ॥१॥ जितारीन्द्रियपगर्दा योगिनोऽप्येनहकृताः। यजन्ति ज्ञानयोगेन शिवमात्मस्वरूपिणम् ॥२॥ • तीर्थोदकविशुद्धा ये दानयज्ञतपोव्रत । ते यजन्ति महेशानं कर्मयोगेण साधवः ।।३।। लुब्धा व्यसनिनोज्ञाश्च न यजन्ति जगत्पतिम् । अजरामरवन्मूढास्तिष्टन्ति नरकीटकाः ॥४॥ शिवधर्मरताः शान्ताः शिवशाबरताः सदा। देवात्केपीह जायन्ते पृथिव्या पुरुषोत्तमाः ॥५॥ रूप न शक्यते तस्य सस्थान वा कदाचन । निर्देपुप्राणिभिः कैश्चिद्रप्टु वाऽप्यकृतात्मभिः ॥६॥ कियता मदच. कणे शिवे वाऽऽत्मा नियुज्यताम् । आदीप्ते भवने कूप खनितु नैव शक्यते ॥७॥ श्रीसूतजी ने कहा-देवदेव भगवान् शूली माहात्म्य को मे पुनः बतलाता है । इसके पढ़ने बोर सुनने वालो के अद्य सद्य ही नष्ट हो । जाया करते हैं चाहे भले ही बहुत-से ही क्यो न होवें ११ पङ्गर्ग इन्द्रियो के शनुओ के जीत लेने वाले-विना अहकार वाले योगीगण भी आत्म स्वरूपी भगवान् शिव का ज्ञान योग के द्वारा यजन किया करते हैं राजो साधुगण तीर्थदको से और दान-यज्ञ-तप और व्रतोसे विशुद्ध हुए हैं

[ २६७
सुदेव्युपाख्यान ]
वे भगवान् महेश का कर्मयोग के द्वारा भजन किया करते हैं ।३। जो
सुब्धक्व्यसनी-
-अज्ञ जो हैं वे जगत् के पति का यजन नही किया
करते हैं । वे अजरामर व्रत मूढ नरकीटक स्थित रहा करते हैं ।४
भगवान् शिव के धर्म मे रत-शान्त और सदा शिव के शास्त्र मे
निरत ऐसे उत्तम पुरुष देववश कुछ ही इस पृथ्वी मे उत्पन्न हुआ करते
है ।५। विन्ही भी प्राणियो के द्वारा जो अकृतात्मा हैं उन प्रभू का रूप-
सस्यान कभी भी निर्दिष्ट करना अथवा देखना नहीं हो सकता है ।।।
अतएव मेरे वचन को कानो मे स्यान दो और अपनी आत्मा को
भगवान् शिव मे नियोजित करदो। जव चारो ओर से भवन मे आग
लगकर वह जलने लगता है तो उस समय में अग्नि के बुझाने के लिये
भुये का खोदना सम्भव नही हो सकता है जिसके जल से आग बुझाई जा
सके 11
सत्या वच्मि हितं वच्मि सारं वच्मि पुन. पुनः ।
असारे दग्ध ससारे सारं यच्छिवपूजनम् ।।८।।
तदस्या दग्धससारग्रन्येरत्यन्तदुर्भिदः ।
पर निमूं लविच्छेदि क्रियता तद्भवार्चनम् ॥६॥
मनस्तद्विद्धि कर्मज्ञ शारे यत्प्रवर्तते ।
सा वाणो वाक्पति शभु या रतीत्यच्युतमच्युता ॥१०॥
श्रवणो तो श्रुती याम्या श्रूयन्ते तत्तथा शुभा.।
पादो तो सफतौ पुमा शिवायतनगामिनी ॥११॥
ते च ने शुभायाल याम्या सदृश्यते शिव. ।
सफलो तो स्मृतो विप्रास्तत्पूजा कारिणी परी ॥१२॥
तदेव सफल कम शिवमुद्दिश्य यरतम् ।
सेयं नदमीः पुमा सेय भक्ति समीह्निा ॥१३॥
प्रेयम्बरी भक्तिमुक्ता गिरिजापते. ।
रिपयरनं न हिमन्ति न च गादन्ति मासमा: ॥१॥

२६८] [ सूर्य पुराण मैं सर्वथा सत्य पहता हूं-हित की बात कहता हूं और सार भूत बारम्बार वह रहा हूं कि इस सार शून्य दग्ध ससार मे सार वस्तु वेवल एक भगवान शिव का ही पूजन है 1८1 अत्यन दुभिद इस रुग्ध ससार की ग्रन्यि के पर निमूल का विच्छेदन करने वाला भगवान् भव का अर्चन ही होता है अतः उसे करो ।। कर्म के ज्ञाता उस मन को ही जानना चाहिए जो शंकर मे प्रवृत्त हो जाता है । वाणी भी वहीं है जो वाणी के स्वामी अच्युत शम्भ, को अच्युता होती हुई स्तवन विया करती है ।१०। वे ही थेवण श्रुत हैं जिनके द्वारा उनकी शुभ कथा सुनी जाया करती है। वे ही पर मनुष्य के मफल एव सार्थक हैं जो भगवान शिव के आपतन तक गमन करने वाले हो । वे ही नेन शुभ एव भूपित हैं जिनके द्वारा शिवेश्वर प्रभु का दर्शन प्राप्त किया जाया करता है। हे विप्रो ! उन भगवान की पूजा करने वाले करहो वे ही कर सफल वताये गये है। कर्म भी वही सफल है जो भगवान शिव का उद्देश्य करके ही किया गया होवे । पुरुषो की वही लक्ष्मी परा अर्थात् उत्कृष्ट कोटि वाली है जो यह भक्ति ही कही गयी है ।११।१२।१३। गिरिजापति की जो भक्ति है वही मुक्ति के श्रेय के करने वाली कल्याणकारिणी है उसको रिपुगण हिंसित नही किया करते हैं और राक्षस लोग नहीं खाते है ॥१४॥ न दशन्ति च नागेन्द्रा नर रुद्रपरायणम् । विपाककटुकान्रम्याविषयांन्विषसनिभान् ॥ सत्यज्या राधयेद्दे व शकर लोकश करम् ॥१५ अहिंसा सत्यमस्तेयं दया भूतेप्वनुग्रहः । यस्यैतानि सदा विधारनस्य तुष्यति शकरः ॥१६ या सपूजित लिङ्ग भक्त्या यश्चाभिनन्दति । तौयंत्रिक वायः कुर्यात्तस्य तुष्यति शंकरः॥१७ वाड मनःकायकर्मेच्छा यस्य भक्तिमहेश्वरः। व्यसनोपहतम्यापि तस्य तुष्यति शंकरः ॥१८ सुदेव्युपास्यान ] [ २६६ यथा द्विजा हस्तिपदे पदानि सलीयन्ते सर्वसत्त्वोद्भवानि । एव धर्मा. शिवधर्मे तु सर्वे सलीयन्ते नात्र चिन मुनीन्द्राः ।।१६ अल्पाश्रयानल्पफलास्वराश्च धर्मानन्यान्याहुरिह द्विजेन्द्राः । महाश्रयवहुक्ल्याणरूप वदन्ति सन्त शिवधर्ममेकम् ॥२० सर्वे वर्णा देवदेवस्य शभोः पूजा कृत्वा सत्यवावयानि चोक्त्वा । त्यक्त्वा धर्म दारुण मृत्युलोके यान्ति स्वर्ग मात्र कार्यो विचार.।२१॥ ये वामदेव हि यजन्ति नित्य सद्वत्तशीलाः किल लिङ्गमतिम् । ते ध्वरतदोषा हि भवन्ति मां भवावुराशि विपम तरन्ति ।२२। भगवान् रुद्रदेव मे परायण रहने वाले नर नागेन्द्र भी नहीं हुआ करते हैं। विपाक की दशा मे अर्थान् परिणाम प्राप्त करने के समय में महान् बटुला आरम्भ काल मे बडे ही सुरम्य ऐसे विप के समान विपयो को परित्याग कर लो के मङ्गल करने वाले भगवान् गकर देव वा आराधन करना चाहिए ।१५। यहिंसा-सल-अस्तेय भूनमार पर दया अनुग्रह ये गुण किसके अन्दर विद्यमान हैं हे वियो। उसी पर शकर भगवान् परम सन्तुष्ट एवं प्रसन्न हुआ करते हैं ॥१६॥ भलीभांति से समचित शिव लिङ्ग का दर्शन कर भक्ति भाव से जो अभिनन्दन पिया करता है अथवा जो तौयंत्रित (नृत्यगीत) क्यिा करता है उसमे भगवान् पर परममन्तुष्ट हो जाया करते हैं ।१७ जिमी भक्ति महावर प्रभु है और वह वाक्-मन-कार्य-वर्म और इच्छा के रिसी भी रूप में हो। चाहे वह व्यसनो से भी उपहत भी क्यो न हो भगवान् शकर उम पर .प्रसन्न हो जाते हैं ।१८। हे हिजो! जिस तरह से सभी प्राणियो के परी ये चिन्ह हाथी के पर के चिन्ह के अन्दर ही समा जाया करते हैं उमी माति सभी धर्म भगवान शिव के पमं में हे मुनीन्द्रो! लीन हो जाया परते है-इममे बुध भी विचित्रता की बात नहीं है ।१६। द्विजेन्द्रो! अन्य का आश्रय ही पल पल वाले ही होते हैं और यहाँ पर अन्य धर्म .घर कहे गये हैं। मन पुग्ण एक शिव पर्म को महान् साथय याला और यहुत अधिश पम्याण करने के स्थान नाला बहा करते हैं।२०॥

२७० ] । सूर्यपुराण देवदेव दाम्भु की पूजा सभी वर्गों वाले करके तपा सत्य वचन कहार और मृत्यु लोक मे दारुण धर्म को त्याग कर स्वर्ग को जाया करते हैं इस विषय में कुछ भी विचार नहीं करना चाहिए ।२१जो नित्य ही वामदेव प्रभु का यजन किया करते हैं और सुन्दर आचरण के स्वभाव दाले लिङ्ग मूत्ति को पूजते हैं वे मनुष्य अपने समस्त दोपो को ध्वस्त कर दिया करते हैं और महान् विषम इस ससार रूपी सागर को तेर पर पार हो जाया करते हैं अर्थात् सासारिक बन्धनो से घटकर सुगति को प्राप्त कर लिया करते हैं ।२२। तैरिष्ट विविधयंज्ञदेवपिपितृमानवाः । तपिता: स्युजंगद्ध तुरिष्टो भगवान्भवः ।।२३ पर्वतान्दश यद्दत्वा महादानानि पीडश । धेनूश्च दश यहत्त्वा यदृष्ट्वा लिङ्गमाप्नुयात् ॥२४. शिवभक्तो न यो राजा भक्तोऽन्येषु सुरेपु सः । स्वपत्नी युवती त्यक्त्वा यर्थवान्यासु रज्यते ॥२५ व्याजेनापि हि ये कुयुः किचित्कर्म शिवालये। न ते यान्तीह नरक पापात्मानोऽपि मानवाः ॥२६ समार्जनादिकर्तारो मार्गशोभाकराश्च ये। तेऽवश्य पृथिवीपाला भवन्ति त्रिदशोपमा ॥२७ अस्मिन्नथें पुरा वृत्त तच्छृणुध्व द्विजोत्तमाः । यच्छु त्वा प्राणिन प्रायो न मोहमुरयान्ति ते ॥२८ देव-ऋपि-पितृ और मानव कोई भी हो उन्होने विविध प्रकार के यतो के द्वारा यजन किया है जिन्होंने जगन के हेतु स्वरूप भगवान् भव का यजन किया है वे पूर्णतया सभी प्रकार से तपित भी ले जाते हैं ॥२३॥ दश पर्वतो का दान करके और सोलह महादान करके तथा दश घेनुओ का दान करके जो पुण्य-फल प्राप्त होता है वही फन भग- बात के लिङ्ग का दर्शत करके हा मनुष्य प्राप्त कर लिया करता है ।।२४।। जो राजा शिव का भक्त नहीं है और अन्य देवो में भक्ति किया सुदेव्युपास्यान ] [ २७१ परता है यह इसी प्रकार का होता है जैसा कोई अपनी युवती पत्नी का स्याग करके अन्य स्त्रिया में रमण किया करता हो ॥२५३जो किसी बहाने भी शिवालय में कुछ कम किया करते हैं वे मानव पापात्मा भी हो तो भी वे नरक में नहीं जाया करते हैं ॥२६॥ जो समाजन आदि को के करने वाले होते हैं तथा मार्गों की शोभा को करने वाले हैं हैं व अवश्य देवो के ही समान पुरुष हैं और पृथिवीपाल ही हुआ करते हैं ॥२७॥ हे द्विजोत्तमो । इस अर्थ म जो कुछ भी दहिले घटित हो चुका है उसका आप लोग प्रवण करिये। जिसको सुनबर प्राय प्राणी- गण मोह को नही प्राप्त हुआ करते हैं ॥२८॥ स्वाय मुवेतरे त्वासीद्राजा परम पार्मिक पञ्चालविपये विप्रा नवर्मेति विथ न ॥२६ दैवमन्त्रविदुत्साहाक्तियुक्त प्रतापवान् । पाड्गुष्पवि-महासत्त्व स्मितपूर्वाभिभापित. ॥३० तस्य भार्यासहस्त्राणा दर्शनीयतमाति । दशानामग्रमहिपी सुदेवीत्यभिविथता ॥३१ सर्वलक्षणसपना सचीव वरवणिनी। भत्श्वापि प्रिया साध्वी चन्द्रकान्तिसमप्रभा ३२ करोति प्रत्यह राजी भूमिममार्जनादिभि । दारसोमा मागोमा शिवस्यायनने गुभे ॥३३ तो तयाऽभिरता हट्वा तस्य राज पुरोहित । पप्रच्छेद स तन्वङ्गो गालको रहसि स्थिताम् ॥३४ यहि मुभ महामागे विमर्थ हरमन्दिरे । समाजनरता नित्यमन्यस्मंपराध मुसी ॥३५ स्वायम्भुव मन्वन्तर में एक परम पामिर राजा एमापा। पितो वह पाजाम (पवार) देश महा था और नरवान्दिन माम से प्रसिरपा ॥२६॥ यह रासा देव माना मोर उरगाह गति से पुरा पा सपा महान प्रतार यासा भी था। पर राजा पद गुणोंगे [ सूर्यपुराण युक्त था-महान् सत्त्व वाला था और मन्द मुस्कान के साथ भाषण करने वाला था ॥३०॥ उसकी एक सहस्र भार्यायो मे परम दर्शनीय आकृति वाती और दशो में भी अनमहिषी जो थी वह सुदेवी-इ नाम से विश्रुत थी ॥३१॥ यह सुदेवी राजा को पटरानी सभी सुलक्षणो से सम्पन्न थी तथा वह वरवणिनी शची के ही समान थी। उसकी कान्ति चन्द्रमा के ही समान थी और वह अपने भर्ती की परम प्यारी थी तथा परम साध्वी थी ॥३२॥ वह रानी प्रतिदिन भूमि की सभार्जना आदि के द्वारा शुभ भगवान् शिव क आयतन मे द्वार की शोभा और मार्ग की शोभा दिया करती थी॥३३॥ उस रानी को उस प्रकार स अभिरत देखकर उस राजा का पुराहित गालव मुनि ने उस रानी से एकान्त में स्थित हुई से यह पूछा था ॥३४॥ हे महाभागे । हे सुभ्र ! आप अप सभी कर्मों से पराड मुखी होकर नित्य ही समार्जन के करने में किसलिये इतनी रत रहा करती हैं यह मुझे बतलाइये ॥३॥ सेवामुक्ता तदा तेन मुनिना विनयान्विना । प्रहस्याऽऽह विशालाक्षो मुनीन्द्र गालव प्रति ॥३६ न मेऽन्यत्र परा भक्तिर्यथा समाजनादिपु। तवाह कथयिष्यामि पुरा कर्म कृत मया ॥३७ पूर्वमासमह गृध्री पक्षिणी व्योमचारिणी। कदाचिभ्रममाणा तु गता किष्किन्धपर्वतम् ॥३८ सिद्धविद्याधराकीणं हेमकूटमिवापरम् । आश्चर्यवग्निरावाध खलिङ्ग यत्र तिष्दति ॥३६ यस्य सदशंनादेव स्वर्ग यान्ति मनीषिण । सपूज्याथ तमेवेश पुष्पर्धू पाक्षतादिमि ॥४० न्यस्त नापि तत्पाचे नैवेद्य यत्तदेव हि। तदादानु समागत्य लिङ्ग कृता प्रदक्षिणम् ॥४१ क्षुधार्ताह महाभाग नैवेद्य तु कृतोद्यमा। तद्गृह्वया क्रमाद्विध पक्षाम्या मार्जनम् ॥४२ सुरेन्युपास्थान ] [२७३ टस मुनि के द्वारा जब उस रानी से इस प्रकार से कहा गया था तो वह बहुत ही विनय से समान्विता होकर विशाल नेत्रों वाली उसमे हंसार गालव मुनि से कहने लगी थी ॥३६॥ मेरी अन्य किसी भी कम मे अधिक भक्ति नहीं है जैसी कि समार्गन आदि के कर्म मे होती है। अब मैं थापको बतलाती हूं जोकि मैंने पहिले जन्म मे कर्म किया है ।३७। पहिले जन्म में मैं व्योम में सचरण करने वाली गृधी पक्षिगी थी । किसी समय मे भ्रमण करती हुई किपिन्या नाम वाले पर्वन पर पहुंच गई थी।३८ वह पर्वत सिद्ध योर विद्याधरो से घिरा हुआ था और ऐसा प्रतीत होता पा कि मानो दूसरा हेमाचल पा ही शिख र होवे। वह आश्चर्य से भरा हुआ-निरावाघ या जहाँ पर खलिङ्ग स्थित था जिसके केवल दर्शन से ही मनीषी लोग स्वर्ग को प्रयाण किया करते हैं। उन्ही ईश को पुष्प धूर और असत आदि से भलीगाति पूजन करके उनके पाश्वं भाग में किसी ने नवेद्य रक्खा था । उसी समय में उसको लेने के लिये लिङ्ग की प्रदक्षिणा करके हे महाभाग ! मे दुधा से अत्यन्त आत्तं वहां आई और उम नैवेद्य को प्राप्त करने का उद्यम करने वाली हुई थी। हे विप्र उगको जैसे ही ग्रहण करने को मैंने अपका मारा तो वहां पर मेरे दोनों पंगो से यहां की पूलि का समान होगया पा ॥३६-४२॥ मृत देवस्य पुरतो देवयोगादाणात्ततः । तावत्तत्र समायातस्तस्य देवस्य पूजकः ।।४३ उद्गताह ततः फालान्मृता जाता यसोगहे । नृवमं च तेनाह प्रदत्ता प्रथमा वधूः ॥ दसरानीमहमाणामुत्तमा मत्प्रभावतः । मान्या पदयिता रामः पुत्रपौत्रममन्गिता ॥४५ अपामादीप्यरागारे प्रत्ययं पांगमार्जनम् । दुहितान्हं यसोर्माता रामोजातिस्मरा तथा ४ फामात्ममानं पश्या भविष्यामिन पेपि सत् । एरमुराग्तया राधा प्रदानामपाइयो ।

२७४ ] [ सूर्य पुराण समाराध्य सुरेशान सर्वद त्रिपुरान्तकम । किमाश्चर्य गुणावासे यदेतत्प्राप्तवत्यसि ॥४८ चक्षुपा प्रेक्षण चैर नमन च प्रदक्षिणम् । लिङ्गमूर्ते. शिवस्यैव राज्यावाप्तिकर स्मृतम् ॥४६ मैंने देव के ही आगे ऐमा किया था। देवयोग से एक ही क्षण भर मे तब तक वहाँ पर देवकी पूजा करने वाला वहाँ पर आगया था ।४३। उसी काल मे मैं वहा से उद्गता होगई और मृत होने के पश्चात् वसु के घर मे समुत्पन्न हुई थी। उसने मुझको नुवर्या के लिये प्रथमा वभू के रूप मे दे दिया था ॥४४॥ उसी के प्रभाव से मैं दश सहस्र रानियो मे सर्वोत्तमा रानी हूँ। मैं महामान्या हूँ और राजा को पुत्र-पौत्र से समन्वित प्रिया रानी हूं ॥४५॥ बिना ही किसी कामना के ईश्वर के आयतन मे इस प्रकार से घूनि का मार्जन कर पर वसु की बेटी हुई तथा एक परम श्रेष्ठ राजा की जातिस्मरा अर्थात् परम प्रिया पत्नी होगई हूँ ॥४६।। यदि कामनाओ से समार्जन करके मैं क्या हो जाऊ गी- इसको मैं नहीं जानती हूं। इस तरह रानी के द्वारा कहे गये गालव मुनि ने परम प्रहृष्ट होकर उससे कहा था ॥४७॥ सभी कुछ करने वाले त्रिपुरान्तक सुरेशान का समाराधन करके गुणावास मे जो यह आपने प्राप्त किया है-इसमे क्या आश्चर्य की बात है ? ॥४८॥ केवल चक्षु के द्वारा देखना योर प्रक्षिण देवेश को करन नमन करना लिङ्ग मूत्ति भगवान् शिव इतना ही सम्मान करना राज्य की प्राप्ति करा देना वाला बताया गया है ।।४६ll जातिस्मरत्वमश्वर्य विद्याज्ञान प्रजासुखम् । अज्ञानाद्वा भयादाऽपि दृष्ट्व वेह महेश्वरम् ॥५०॥ नाम्नाऽपि नरकच्छेदः स्मरणाढू बुध पदम् । पूजानाद्यस्य निर्वाण तमीश को न सथयेत् ॥५१॥ फलं प्रमादाज्जायेत घवं कालेन देहिनाम् । अथिना त्वखिलान्यामान्सद्यः फलति शकर. ॥५२॥ के प्रदान सुदेव्युपास्मान ] [ २७५ शाठ्य नापि नरा नित्यं ये स्मरन्ति महेश्वरम् । तेऽपि यान्ति तनु त्यक्त्वा शिवलोकमनामयम् ॥५३॥ चराचरगुरोरस्य शंभोरमिततेजसः । न कृता यह ढा भक्तिर्मञ्चितास्ते स्फुटं जनाः ॥५४॥ प्रमादेनाप यः फापि प्रणामः मूलिनः कृतः । कल्पान्तेऽपि भवग्रन्थिन तंपा जायते पुनः ।।५।। जाति स्मरत्व-ऐश्वर्य-विद्या का शान अजा का मुप यह सय तो अगान से अथवा भय से यहाँ पर महेश्वर प्रभ को देखकर ही प्राप्त हो जाया करता है । देवल नाम या उच्चारण करने मे ही नरमी का' घेदन हो जाया करता है और शिव का स्मरण करने मे वियो का पद प्राप्त होग है । पूजन करने से उस पुरर यो निर्वाण पर प्रास हो जापा कराा है ऐसे महामहिम देव वा मौन मूा है जो गमायर ग्रहण नहीं परेगा ।५०५१। येहयारियों को दुध पात्र में भगवान ये प्रसाद में फल होता है और निश्चित ल मे हुमा करता है। जो गोंजन हैं उनकी मपूर्ण पामनाओ पो भगगार पर तुरन ही फनिा कर दिया गरते है ।५२। जो नर पटमा गं भी निर ही मरेश्वर प्रन गा स्मरण लियारो भी सपने शरीर मा परिपार मरने में परसात् मना. गय विपतो यो प्राप्त कर लिया पर है ॥५३॥ अपरिमित सेम यारे पर-अगर गरे ग भगवार सम्म.मी भक्ति बिताने नोरी और एक मषित भाप हृदय में नही मार १ ये मनुप्प पाट मागे यति तरह मापा गरी मागे भी मिन्होंने गहरी पर भी गमी प्रभुमो प्रनाम fri: सोपान में भी गागारिक अपि नही हा करती है। पापभन्न ग गार गारमोगपणा । गानंचालविण्यात यायव गरिम. ॥५॥ दन्तिमपुराणाग्निग वानम् । yi गारमेर मा गगनात मरा 1510 प्रोपागदाने सीपंग्नाप मरना।

२७६ ] [ सूर्य पुराण तत्त पा स्यान्न स देह इत्याह परमेश्वर ॥८॥ विनष्टलोभा विषयेषु निस्पृहा प्रसन्नचिताश्च शिवार्चनोद्यता । वजन्ति श भो परम सनातन निरामय यत्प्रवदन्ति सूरय ॥५६ कुल पवित्र पितर समुद्धृता वसुन्धरा तेन च पाविता द्विजा । सनातनोऽनादिरनन्तविग्रहो हृदि स्थितो यस्य सदैव शकर ॥६०॥ तभी तक ये प्राणी इस ससार मे शोक मोह मे परायण होकर भ्रमण किया करते है जब तक ये शरीरधारी भगवान् विरूपाथ की अचंना नही किया करते हैं ॥५६॥ इतिहास और पुराणादि जो भगवान शिव के विषय में लिखित पुस्तके हैं उनका पांचवा जो कोई एक बार भी इस जीवन में किया करते हैं और इस प्रकार से जो नर भक्ति भाव से श्रवण किया करते हैं। उनको व्रत उपवास और दानो में जो भी कुछ पुण्य-फल प्राप्त होता है वह हो जाया करता है-इसमे लेशमात्र भी सन्देह का कोई भी अवसर नही है-ऐसा परमेश्वर ने स्वय कहा है ।५८विषयो मे लाभ को नष्ट कर देने वाले–निस्पृह अर्थात् किसी भी प्रकार की कोई भी इच्छा नहीं रखते हैं प्रसन्न चित्त वाले और शिव के अर्जन में उद्यत रहने वाले मनुष्य भगवान शम्भ के परम सना तन विरामय पद को प्रणाम किया करते हैं ऐसा सूरिगण कहते हैं ॥५॥ हे द्विजो । उस पुरुष का कुल परम पवित्र हो जाता हैं-उसके पितृगणो का समुद्धय कर देते हैं और उसके सम्पूर्ण वसुन्धरा को भी पावित कर दिया है जिनके हृदय मे सनातन-अनादि-अनन्त विग्रह पाले भग- वान् शङ्कर सदा ही स्थित रहा करते हैं अर्थात् जो सर्वदा शिव का मन मे प्यान रक्खा करते हैं।६०॥ ॥ रक्तासुर वध कथन ॥ पार्वत्या श्रोतुमिच्छामो माहात्म्य रोमहर्पण । जधान सा यथा दैत्यारक्तासुरपुरोगमान् ॥क्षा रक्तासुर वध कथन ] [ २७७ प्राणिरत्य महादेवी शङ्करार्धशरीरिणीम् । महेन्द्राणीश्वरनुता भक्तानुग्रहकारिणीम् ॥२॥ एकाक्षरीति विख्याता ब्राह्मो दाक्षयगीति या। उमा हैमवती दुर्गा सती माता महेश्वरी ॥३॥ आर्याऽम्बिका मृडानी च चण्डी नारायणी शिवा । महालक्ष्मोजगन्माता कालिका मेनकात्मजा ॥४॥ नानारूपधरा सैवमवती पार्वती। धर्मरस्यापनार्थाय निघ्नती दैत्यदानवान् ॥५॥ परमात्मा यया रुद्र एकोऽपि बहुधा स्थित.। प्रयोजनवशाद्देवी गैकाऽपि वहुधा भवेत् ॥६॥ आमीद्रक्तासुरो नाम महिपस्य मुतो बली। महामायो महावाहुहिरण्याक्ष वापर. ॥७॥ ऋषियों ने कहा-हे रोम हर्पणजी। अब हम देवी जगदम्वा पार्वतीजी या माहात्म्य श्रवण करना चाहते हैं जिनमे रक्तमुर जिनमे प्रधान पा ऐगे दैत्यों वा हनन गया था। श्री गूनजी ने कहा- भगवान् का कर देश की अर्धाङ्गिनी महादेवी को प्राणपात पर जो महेन्द्राणी और ईश्वर के द्वारा भी वन्दिता है और अपने भक्तों पर अनुग्रह परने वाली हैं। जो एपारी-दम नाम गे विस्थान है और जो वादी-दापादाणी-उमा-हैमवतीदुर्गा मती-माना-महेश्वरी-अम्पिवा- मदानी चाटीदाक्षायणी-गिया-महालमी-जगत् को माता-यालिरा. मेनारमा और अनेक रूपो ये धारण करने वाली है यह हो 'पानी' इंग नाप में अवतीर्ण होर आई है। उनने पर्म की मम्यापना सरने' लिए और दाशे पानिनन किया है । जिम प्रार एकही परमारमा एम्बिा पदापरते है वही प्रयोजन या गे पह देवी भी पा ही होगे हुए यल गे सालों में हो पारावरती है। एप सागुर नाग वाना भाई पागुर का पुत्र बाहो पिर २७८ । [ सूर्य पुराण वलवान था । वह महती भाया वाला महान् भ जाओ से युक्त बहुत बलवान था 11 . स विजित्य सुरान्सर्वान्विष्ण्विन्द्राग्निपुरोगमान् । त्रैलोक्येऽस्मिन्निरातङ्कश्वके राज्य प्रतापवान् ।।८।। तस्यैते मत्रिणश्चऽऽसन्रुद्रात्मानो मदोत्कटा । त्रयस्त्रिशहिवजश्रेष्ठा. सहस्राक्षीहिणीयुताः ।।६।। सिंहस्कन्धा महाकाया दुरात्मानो महावलाः । धूम्राक्षो भीमदंष्टश्च कालपाशो महाहनु. ॥१° ब्रह्मघ्नो यज्ञकोपश्च स्त्रीघ्नो वालघ्न एव च । विद्य न्माली च वन्धूकः शड्.कुकर्णो विभावसुः॥ देवान्तको विधर्मश्च दुर्भिक्षः क्रूर एव च । हयग्रीवोऽश्वकर्णश्च केतुमान्वृपभो गजः ॥१२ शलभः शरभो व्याघ्रो निकुम्भो मणिको वक. । सूर्यको विक्षुरो माली कालो दण्डश्च केरलः ॥१३ स कदाचित्ममासीनो दैत्यकोटिसमावृतः । सदस्ययाब्रवीद्दत्यान्दानवान्सनरांस्तथा ॥१४ मा यजध्य स्तुवाध च पूज्योऽहं भवता सदा । यस्तु देवान्समातिप्ठेत्स गच्छेद ध्यता मम ।।१५ उमने सभी मुरो को युद्ध मे जीत लिया था जिनमे विष्णु इन्द्र और अग्नि सभी पुरोगामी थे । वह ऐमा प्रताप पाला था कि लोग मे निरातङ्कगग्य कर रहा था 141 उगके रद्रात्मा मदोवट मयी थे। हे द्विज श्रेप्टो । ये सब तैतीम थे जो मस्रो अक्षोहिणी मेनाओं से गमा- वृत रहा गरते थे। इनके सन्य रािहो के ममान थे--इना गरीर विशाल था-ये सभी बड़े दुरात्मा थे और महान यसगाती थे । उनी नाम-धूम्राटा-भीमदन-पासास-महाउनु-यान-यशो-पीना-यालश विद्यमानी-कयूमार पाणं-विमावा-देपालग-विपमं दुनिश-पर- ।

रखतामुर वध क्थन [ २७६ हयग्रीव-अश्वगं केतुमाव-नृपभ-पज-सनम परम-ध्यान-निकुम्भ- मणिक वर-सूर्यव-विक्षुर माली कात दण्ड-वेल ये वे। वह किसी समय में करोडो दैत्यो मे समाकृत हुआ पैदा हुआ था। उसने समा म सब दैत्यो~-दानवो और नरो से कहा था--तुम लोग किसी का भी यजन मत करो-सवन न करो योनि में ही सदा आप सब लोगो का पूज्य हूँ। जो कोई भी देवों का पूजनार्चन नरेगा मैं उसको मार डालू गा।१०११५ दानयज्ञोपवामाश्च त्यक्त्वा देवर्षिदर्शितान् । प्रत्यक्षमोल्यान्भुञ्जध्य ययेष्ट सुरयोपित ॥१६ इति दत्येन्द्रवाक्येण नष्टा यज्ञक्रियास्तदा। नाधीयन्ते तदा वेदा न पूज्यन्ते च देवता उत्सवा न प्रवर्तन्ते सर्व मासीत्तदाऽमुरम् । धर्महीनस्ततो लोको म्लेच्याकुल इवाभवत् ॥१८॥ धर्मनाशात्सुरेन्द्रस्य वलहानिरजायत । ज्ञात्वा हीनवल शक्र दानवास्त समाद्ववन् ।।१६ सोऽभिभूतिो सुरैर्गाढ त्यक्त्वा राज्य च देवराट् । वृहम्पतिमुपागम्य वाक्यमेतदुवाच ह ।।२० रक्तास राभ्यनुज्ञाता दैत्या कोटिसहनश । आवाधन्ते स्म सनन मद्ववार्थ न स शय ॥२१ दान यज्ञ-उपवास जो देवो ने और ऋषियो ने दर्शित किये हैं उन सव का त्याग करके प्रत्यक्ष सुयो का भोग करो और ययेष्ट रूप से देवाङ्गना का उपभोग क्यिा करो।१६। इन दैत्येन्द्र के वचन से निलोकी में सभी यज्ञ की क्रियाओ का विनाश हो गया था। उस समय में कोई भी वेदो का अध्ययन नहीं किय करते थे और दवता का यजन भी नही किये जाते थे ।१७। कोई भी उत्सव कही पर प्रवृत्त नहीं होते थे उस समय मे तो महादत्य ये भय मे समस्त समार ही आसुरी प्रकृति २८०] [ सूर्य पुराण ! वाला हो गया था। तव तो सब लोक धर्म से हीन म्लेछो के द्वारा ही घिरा हुआ सा हो गया था ।१८। धर्म की हानि होने से सुरेन्द्र के बल की कमी हो गयी थी। जब दानवो ने इन्द्र को हीन बल वाला समझ लिया था तो सब दानवो ने उस पर आक्रमण कर दिया था १९ वह देवो का राजा जब असुरो के द्वारा बहुत अधिक अभिभूत हो गया था तो उसने अपना राज्य का सिंहासन ही त्याग दिया था। इन्द्र ने सुर गुरु वृहस्पतिजी के पास जाकर यह वाक्य कहा था-२०। हे भगवन रक्तास र के द्वारा आज्ञा प्राप्त किये हुए करोडो सहस्र दत्याण सर्वत्र बाधाएं सब ओर से कर रहे है और वे सब मेरे वध के लिए ही तैयार हो रहे हैं-इसमें तनिक भी सशय नही है ।२१) न स्थातुमत्र शक्रोमि न गन्तुं तैस्त्वभिद्र तः । सर्नया योद्ध मिजामि यद्भविष्यति ।।२२ नश्यतो युध्यतो वाऽपि तावद्भवति जीवितम् । यावत्प्रमाटिन विधिर्भालेऽस्य लिग्विताक्षरम् ॥२३ जयमाशस मे ब्रह्मन्योत्स्येऽहमरिभिः सह । मुहूर्त ज्वलितं श्रेयो न तु धूमायितं चिरम् ।।२४ विक्तस्य जीवित पुंस. शत्र गामाततायिनाम् । अपकर्तु मशक्तो यो जीवामीत्यधिगच्छति ॥२५ कर्मायत्त किलेश्वर्य मदायत्त च पौरुपम् । तम्मायुद्ध करिष्यामि ध्रुन थेयो भविष्यति ॥२६ श्रुत्लोवा मघवद्वाक्य वाचसतिरथाब्रवीत् । न कालो विग्रहस्याद्य कि कोपेन शचीपते ॥२७ न च खेदस्त्वया कार्यः कार्याणा गतिरीहशी। देवाद्भदन्ति भूतानां संपदो विपदोऽपि वा ॥२८ में न तो यहाँ पर ही स्थित रह सकता हूँ और न उनके द्वारा अभिद्रत हुमा यही अन्य स्थान पर ही जाने में समध हूँ। प्रकार से य द वरने की ही इच्छा करता हूँ फिर जो भी होनहार है रक्तामुर वध कथन ] [ २८१ वहीहोगा ।२रा नष्ट होते हुए और य द वरते हुए जभी त्व में रहूंगा तव तक मेरा जीवित शेष रहेगा मैं वरावर य द करता ही हूंगा जब तक विधाता इसके भाल में लिखे हुए अक्षरों काप्रमार्जन नहीं करते हैं ।२३। ह ब्रह्मन् ! आप मुझे विजय होने का आशीर्वाद दीजिए। में अपने शव ओं के साथ युद्ध रगा। एक मुहूर्त मात्र का समय जाज्वल्यमान रहे वही कल्याण करने वाला होता है और जो समय धूमायित रहे वह अत्यधिक भी अच्छा नही हुआ करता है ।२४। उस पुरप का जीवन ही रिकारने के योग्य है जो आनतायी शत्र ओ के अपकार करने में असमर्थ होवे और मैं जीवित रहता हूँ--ऐसा मन में ममझा करता है ।२५। ऐश्वर्य तो कम के ही अधीन हुआ करता है और पौरप मदापत्त होता है । इस लिए मैं युद्ध करूगा। निश्चय ही मेरा श्रेय होगा।२६। इस तरह के इन्द्र देव के वाक्य को स नकर इसके उपरान्त वृहस्पतिजी ने उससे कहा था हे पाचीपते । आज तो विग्राह करने की काल ही नही है । फिर इस वोप का करना भी तुम्हारा व्यर्थ ही है । आपको इस विषय मे मेद भी नहीं करना चाहिए क्योंकि कार्यो के होने की गति ऐमी ही हुआ करती है । प्राणियों को ससम्पाऐ और विपदाऐ देव के वक्ष से हुआ करती हैं ॥२७॥२८॥ स्वशक्ति परशक्ति च पाडगुप्यविदुदारधी । देशकालवलोपेताज्ञात्वा विग्रहमाचरेत् ॥२६॥ देशकालविहीनानि कर्माणि विपरीतवत् । क्रियमाणानि दुप्यन्ति हविरप्रयतेष्विव ॥३७॥ सम्यग्विज्ञातशास्त्रों राजा विजयसाचरेत् । सप्ताङ्गराज्यनाण च बुद्ध्वा वारिविनिग्रहम् ॥३॥ कुर्यादेवान्यथा नाशमुपयाति शचीपते। विश्वासयति भूतानि न च विश्वसते कचित् ॥३२॥ छिद्रेषु योऽन्विवियाच्छुत्रुच राज्य महदश्रुते । साप्रत वद्धमूयोऽसौ तं देवानवलोक्ति ॥३३॥ ।

२८० ]
[ सूर्य पुराण
वाला हो गया था। तब तो सब तोक धर्म मे हीन रोछो के द्वारा ही
घिरा हुआ सा हो गया था ।१८॥ धर्म की हानि होने से सुरेन्द्र के वल
की कमी हो गयी थी। जब दानवो ने इन्द्र को हीन बल वाला समझ
लिया था तो सब दानवो ने उस पर आक्रमण कर दिया था 1१६। वह
देवो का राजा जब असुरो के द्वारा बहुत अधिक अभिभूत हो गया था
तो उसने अपना राज्य का सिंहासन ही त्याग दिया था। इन्द्र ने सुर
गुरु वृहस्पतिजी के पास जाकर यह वाक्य कहा था-२०। हे भगवन !
रक्तास र के द्वारा आज्ञा प्राप्त किये हुए करोड़ो सहस्र दत्यगण सर्वत्र
बाधाएं सब ओर से कर रहे है और वे सब मेरे वध के लिए ही
तैयार हो रहे हैं-इसमें तनिक भी सशय नही है ।२१॥
न स्थातुमत्र शक्रोमि न गन्तु तस्त्वभिद्रुत ।
सर्वथा योद्ध मिच्जामि यद्भविष्यति ॥२२
नश्यतो युध्यतो वाऽपि तावद्भवति जीवितम् ।
यावत्प्रमाष्टिन विधिर्भालेऽस्य लिग्विताक्षरम् ॥२३
जयमाशंस मे ब्रह्मन्योत्स्येऽहमरिभिः सह ।
महूर्त ज्वलितं श्रेयो न तु धूमायितं चिरम् ।।२४
विक्तस्य जीवित पुस शव णामाततायिनाम् ।
अपकर्तुमशक्तो यो जीवामीत्यधिगच्छति ।।२५
कर्मायत्तं किलश्वर्य मदायत्त च पौरुपम् ।
तस्मायुद्धं करिष्यामि ध्रुव श्रेयो भविष्यति ॥२६
श्रुत्पैन मघवद्वाक्यं वाचस्पतिरथाब्रवीत् ।
न कालो विग्रहस्याद्य किं कोपेन शचीपते ।।२७
न च खेदस्त्वया कार्यः कार्याणा गतिरीदृशी।
देवाद्भदन्ति भूतानां संपदो विपदोऽपि वा ।।२८
में न तो यहां पर ही म्पित रह साता हूँ और न उनके द्वारा
अभिद्रत हुआ कही अन्य स्थान पर हो जाने में समषं है। मैं सय
प्रसार से युद्ध करने की ही इच्छा बर"
र जोशी रौनसार,

।
रक्तासुर वध कथन ]
[ २८१
वहीहोगा 1२२१ नष्ट होते हुए और य द वरते हुए जभी त्य में
रहेगा तब तक मेरा जीवित शेप रहेगा में बरावर यद्ध करता ही
हूंगा जब तक विधाता इसके भाल में लिखे हुए अक्षरो काप्रमार्जन नहीं
करते हैं ।२३। ह ब्रह्मन् । आप मुझे विजय होने का आदीर्वाद दीजिए।
में अपने शत्रु ओ के स युद्ध करूगा । एक मुहूर्त मात्र का समय
जाज्वल्यमान रहे वही कल्याण करने वाला होता है और जो समय
धूमायित रहे वह अत्यधिक भी अच्छा नही हुआ करता है ।२४। उम
पुरुष का जीवन ही रिकारने के योग्य है जो आनतायी शत्र ओ के
अपकार करने में असमर्थ होवे और मैं जीवित रहता हूँ-ऐसा मन मे
समझा करता है ।२५। ऐश्वर्य तो कर्म के ही अधीन हुआ करता है
और पौरुप मदायत्त होता है । इस लिए मैं युद्ध करू गा। निश्चय ही
मेरा श्रेय होगा ।२६। इस तरह के इन्द्र देव के वाक्य को स नकर इसके
उपरान्त वृहस्पतिजी ने उससे कहा या हे शचीपते आज तो विग्राह करने
की काल ही नहीं है । फिर इस कोप वा करना भी तुम्हारा व्यर्थ ही
है । आपको इस विषय मे खेद भी नहीं करना चाहिए क्योकि कार्यो
के होने की गति ऐसी ही हुआ करती है । प्राणियो को ससम्पाऐ और
विपदाऐ देव के वस से हुआ करती हैं ।२७।२८।
स्वशक्ति परशक्ति च पाड्गुण्यविदुदारधी ।
देशकालवलोपेताज्ञात्वा विग्रहमाचरेत् ॥२६॥
देशकालबिहीनानि कर्माणि विपरीतवत् ।
क्रियमाणानि दुष्यन्ति हविरप्रयतेष्विव ॥३७॥
सम्यग्विज्ञातशास्त्रों राजा विजयसाचरेत् ।
सप्ताङ्गराज्यत्राण च बुद्ध्वा वारिविनिग्रहम् ॥३१॥
कुर्यादेवान्यथा नाशमुपयाति शचीपते ।
विश्वासयति भूतानि न च विश्वसते कचित् ॥३२॥
छिद्रेप, योऽन्विवियाच्छुत्रु च राज्य महदश्रुते।
साप्रत बद्धमूयोऽसौ त्त देवानवलोक्ति ॥३३॥

२८२ ] [ सूर्य पुराण अतो युद्धावकाश ते न पश्यामि शतक्रतो । मत्सहायाश्च ये शूराः शक्तिमन्तो निरुत्सुका ।।३४।। दुघर्षानपि ते शन अयन्त्येव सदा नृपा । पुरोधसैवमुक्तस्तु पुनराह पुर दर ॥३५ पागुण्य को जानने वाला उदार बुद्धि से युक्त पुस्प अपनी शक्ति और पराण शक्ति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके ही देश-काल और बल से उपेतो वो समझकर ही युद्ध करे ॥२६॥ देश और काल से विहीन कों को विपरीत के समान किये हुए कर्म अप्रयतॊ मे दविक ही तुल्य दूषित हो जाया करते हैं ।।३०।। जो भली भाँति शस्त्रार्थों को ज्ञात कर लेता है वही राजा विजय प्राप्त किया करता है । अथवा साल राज्य के प्राण करने वाले अङ्गो को समझकर शत्रुओ के साथ विग्रह करे ॥३॥ हे शचीपते । जो इसके विपरीत युद्ध किया करके हैं वे नाश को प्राप्त हो जाया करते हैं । भूतो को विश्वास दिलाता है किन्तु स्वय कही पर भी विश्वास नहीं किया करता है ।।३२॥ जो विद्रो मे शत्रु का अनुगमन किया करता है वही महान राज्य की प्राप्ति किया करता है । इम समय में यह वद्ध मूल है और आप देर के द्वारा अवलोकित नहीं हो रहे है अर्थात भाग्य आपके अनुपूत नहीं है । हे शतक्रतो । अतएव इसीलिए मैं आपके युद्ध का अवसर नहीं समझता हूँ । मेरे सहायफ जो पूर हैं वे शक्तिमान हैं किन्तु उत्सुकता से रहित हैं । नृप सदा तुम्हारे दुर्घपं शत्रुलो को भी जीत ही लेते हैं। इस प्रकार से पुरोहित जी के द्वारा कहे जाने पर फिर-इन्द्र ने कहा-॥२३॥३४॥३॥ अभिभूतो भृश दैत्यहि जीवितुमुत्सहे । शन भिर्वर्तमानम्य मूखं स्य स्त्रीजितस्य च ॥३६ व्याधितस्य दरिद्रस्य श्रेयो मृत्युर्न जीवितम् । किमन बहनोक्तेन यो स्येऽह दानवैः सह ॥३७ नृणा क्मसमारम्भे श्रेयसी ह्ये कचित्तता । गुणदोपावुमावतायैकीकृत्य विचक्षण ॥३८

| २८३
रक्तासुर वध कयन ]
।
कार्यमारभते यस्तु तस्य दोपः पराड मुखा ।
यावद्भयस्य भेतव्य यावद्भयमनागतम् ॥३!
आगत तु भय दृष्ट्वा योद्धव्य वाप्य भीरुवत् ।
मृतस्य जीवतो वाऽपि नरस्येह प्रयुध्यत: ॥४०
श्रेय एव महधि. स्वात्तस्माद्योत्स्याम्यह परैः
तयो. सवदतोरेव ब्रह्माऽऽगत्येदमब्रवीत् ॥४१
मा वपाद कृथा शक्र शरणं व्रन पार्वतीम् ।
या जध्ने महिप दैत्य रुरु चित्रासुर तथा १४२
दत्यो के द्वारा अभिभूत हुआ मे जो बहुत ही अधिक तिरस्कृत हो
चुवा हूँ। ऐमी स्थिति मे मैं जीवित रहना नही चाहता हूँ । जो शनुमो
के द्वारा घिरा हुआ वर्तमान हो-मूर्ख हो और स्त्री के द्वारा जिन हो
-~-व्याधि से युक्त हो-दरिद्र हो उमका श्रेय कभी नहीं हुआ करता है
और उमकी मृत्यु ही है जीवन नहीं है। यहा पर बहुत अधिक क्थन से
क्या लाभ है। मैं तो दानवों के माथ अवश्य ही युद्ध करू गा ॥३६॥३७॥
मनुप्यो के कर्मों के समारम्भ मे एकचित्त का होना ही कल्याणकारी
होता है । विचक्षण पुम्प को गुणो और दोपो दोनो को एकीकृत करके
ही कार्यों का बारम्भ करना चाहिए ॥३८॥ जो इस रीति से वार्य वा
आरम्भ किया करता है उसके सब दोप पएड मुख हो जाया करते हैं।
भय से तभी तक डरना चाहिए जब तक नहीं आया है । आये हुए भय
को देखकर तो अभीरुवी भांति ही अर्था शूरता से युद्ध करना चाहिए ।
मृत अथवा जीवित मनुष्य का जो युद्ध कर रहा हो श्रेय ही महान्
ऋद्धि है । इसीलिये मैं शत्रुओ से युद्ध अवश्य ही करू गा । वे दोनो जव
इस प्रकार से सम्वाद कर रहे थे तो वहा पर ब्रह्माजी ने उपस्थित
होकर यह कहा था ॥३६॥३७॥३८॥३६॥४०॥४१॥ हे इन्द्र | विषाद
मत करो और तुम जगदम्बा पार्वतीजी की शरण में चले जाओ जो देवी
ने महिषासुर को रुद्र और चित्रासुर दैत्य को मार चुकी हैं ॥४२॥

२८४ ] [ सूर्य पुराण सद्यो रक्तासुरं हत्वा स्व राज्य ते प्रदास्यति । एवमुक्त्वा हरि ब्रह्मा नौवान्तरधीयत ॥४३ शकोऽपि निदर्श. सार्ध जगाम हिमवान्दिरिम् । स तत्र गत्वा शर्वाणो निभयो विगतज्वरः।।४४ स्तोत्रेणानेन तुटाव शिवा याकरवल्लभाम् । जयाक्षरे जयानन्ते जयाव्यक्ते निरामये ।।५ जय देवि महामाये जय विदशवन्दिते । जय भद्रे विदेहस्ये जयाऽऽद्य त्रिगुणात्मिके १४६ जय विश्वभरे गङ्ग जय सर्वार्थसिद्धिदे। जय ब्रह्माणि कौमारि जय नारायणीश्वरि ।।४७ जब वाराहि चामुण्डे जयेन्द्राणि महेश्वरि । जय मातमहालक्ष्म जय पावति सवंगे | जय देवि जगज्ज्येष्ठे जयरावति भारति। मृगावति जपानन्ते तेजोवति जयामले ॥४६ वह जगदम्बा तुरन्त हो रक्तासुर को मार कर तुमयो तुम्हारा राग्य प्रदान कर देंगी। इस रीति से ब्रह्माजी इन्द्र से पहकर यहां पर हो अहित हो गये थे ॥४३॥ इन्द्र देव भी अन्य सब देवो के साथ हिमवान् गिरि पर चले गये । उसने यहाँ पहुँचवर सर्वाणी को सनिधि में निबर और विगतज्वर वाला होकर इरा निम्न पषित सोर के द्वारा पर भगवान को वल्लभा शिवा का स्तपन दिया था। इन्द्र देव ने पहा-है जमाारे ! हे जय अनन्त यालो ! हे जया व्ययते ! हे आभयो रो रहित रहने वानी! हे महामाये ! हे देवि हे देवो के द्वारा धन्यमान होने वाली ! यापकी जा हो। हे भद्र !हे विदेह में स्थित रहो वासी भारी जय होवे । हे आये ! हे विगुणात्मरे ! आपकी जप हो ॥४॥ ॥४४॥ हे विश्वभरे ! हे गों! आपकी जय हो। हे समस्त वर्षाप्रमाणे वासी ! प्रापरी जय हो । हे हागि ! रहे। गौर हनिर पो!ि माय हो ॥४॥ है पारादि। - रक्तासुर वध कथन ] [ २८५ हे चामुण्डे । हे इन्द्राणि । हे महेश्वरि । आपकी जय होवे। हे माता महालक्ष्मि । हे पात हे सर्वत्र सब में गमन करने वाली । आपकी जय हो ॥४८॥ हे देवि । हे जगत् मे सबसे श्रेष्ठे । हे ऐराबति । हे भारति । हे अनते । हे तेजो वति । हे प्रपले I आपकी जय हो ॥४६॥ जयेशानि शिपे सवे जय नित्य जयाचिते । मोक्षदे जय सर्वज्ञ जय धर्मार्थकामदे ॥५० जय गायति कल्याणि जय सध्ये विभावरि । जय दुर्गे महाकालि शिवदूति जयाजये ॥५१ जय दण्डमहामुण्डे जय नन्दे शिवप्रियं । जय क्षेमकरि शिवे जय भ्रामणि रेवति ॥५२ जयोमे साध्वि मङ्गल्ये हरसिद्ध नमोऽस्तु ते । जयाऽऽनन्दे महावर्णे महिषासुरघातिनि ।।५३ जयानघे विशालाक्षि जयानङ्ग सरस्वति । जयाशेपगुणावासे जय वृत्रासुरान्तके ॥५४ जय योगेशि सकल्पे जय त्रैलोक्यसुन्दरि । जय शम्भनिशुम्भघ्ने जय पद्मेन्दुसभवे ॥५५ जय कौशिकि कौमारि जय वारुणि कामदे। नमो नमस्ते शर्वाणि भूयो भयो जयाम्बिके ॥५६ हे इशानि ' हे शिवे ' हे सर्वे । हे नित्ये । हे अचिते । आपकी जय हो। हे मोक्ष के प्रदान करने वाली । हे सब कुछ का ज्ञान रखने वाली। है। अर्थ और काम को देने वाली । आपकी जय हो ॥५०॥ हे गायत्रि । हे कल्याणि । हे सन्ध्ये ' हे विभावरि । आपकी जय होवे । हे दुर्ग । हे महा कालि । हे शिव इति । हे अजये जय हो ॥५१॥ हे दण्ड महा मुण्डे । हे नन्दे । हे शिव प्रिये ! है सेमके करने वाली । हे शिवे हे भ्रामणि 'हे रेवति । आपकी जय हो । हे उमे। हे साध्वि। 1 [ सूर्य पुराण हे मङ्गल्ये ! हे हरसिद्ध ! आपके लिये हमारा नमस्कार है। हे आनन्दे! है महावणे ! हे महिपा सुर को मारने वाली ! हे अनथे ! हे विशालाक्षि! हे अनङ्ग! हे सरस्वती! हे मस्त गुणों के आवास रूपे ! हे वृक्षासुर के अन्तकर देने वाली ! आपकी जय होवे ॥५२॥५३॥५४॥ हे योगेशि ! हे सङ्कल्पे । हे भैलोम्य सुन्दरि ! आपकी जय हो । हे शुम्भ और निशुम्भ का दमन करने वाली ! हे पद्मेन्दु से उत्पन्न होने वाली । आपकी जय होवे । हे कौशिवि ! है कौमारि । हे वारुणि! हे कामदे ! हे शर्वाणि ! हे अम्बिके ! आपको बारस्वार नमस्कार समर्पित है। आपकी जय हो ॥५५॥५६॥ ग्राहि नस्राहि नो देवि शरणागतवत्सले । य इमा कीर्तयिष्यन्ति जयमाला भवानि ते ॥५७।। विविधैरपि दुःखीर्घमुच्यन्ते परमेश्वरि । सर्वपापविनिमुक्ताः सर्वैश्वर्यसमन्विताः ॥५८।। भान्ति लोके तथाऽऽदित्याः सर्वरोगविवजिताः । देहावसाने तेऽवश्यं पश्यन्त्येव हि पार्वतीम् ॥५६।। नेन्द्रियाणा विकलता यथाऽन्येषां भवेन्नृणाम् । देवीलोक गमिष्यन्ति स्कन्दलोकोपरिस्थितम् ॥६८. पुनरावृत्तिरहित रतोत्रजाप्यान्न संशयः । संवं स्तुता भगवती महेन्द्रणाथ पार्वती । आत्मान दर्शयामास सर्वालंकरणान्वितम् ॥६१।। नमस्कृत्याथ तामूचुः मुरास्ते भयनाशिनीम् । हत्वा रक्तासुर दैत्य पाहि नो महतो भयात् ।।६२॥ तेपा तद्वचनं श्रुत्वा दत्त्वा तेभ्योऽभय तत.। बभूवाद्भतरूपा सा पिनेया चन्द्रशेसरा ॥६॥ है देवि ! हे शरण में समागती पर प्यार करने वाली ! हमारा परित्राण करो हमारी रक्षा करो। हे भवानि । जो कोई भी आपसी जयमाला पा पोर्तन करेंगे है परमेश्वरि वे तीनो प्रसार के दुगो पे

रक्तासुर वध कथन ]
[ २८७
1
समुदायों से मुक्त हो जाया करते हैं। वे कीर्तन करने वाले लोग मभी
पापो मे निमुक्त होते हुए सय तरह के ऐश्वर्य से समान्विप्त हो जाते
हैं । ५७५५८। वे मादित्य होकर लोक में जाया करते हैं और सभी
रोगो में वर्जित हो जाया करते हैं। देह के ममाप्त हो जाने पर वे
ववश्य ही पार्वतीदेवी का दर्शन प्राप्त किया करते हैं ।५६। अन्य नरों
की जैमी हुआ करती है वमी इनको इन्द्रियों की विवसता कभी नहीं
होनी है। वे सब नन्द के लोग में कार में स्थित देवी लोक को चले
जाया करते हैं 1 इस स्तोत्र के जाप से पुनरावृत्ति से अर्थात् ससार मे
फिर दूसरा जन्म ग्रहण करने से रहित हो जाया करते हैं-इस विपय
में कुछ भी मगय नहीं है ।६०१ श्रीमूनजी ने कहा-महेन्द्र के द्वारा इम
तरह से स्तुत हुई भगवती पाती ने अपने आपका दर्शन दिया था जो
नि उनका स्वरूप नभी आभूपणो से समबद्ध न था।६११ पावंतीदेवी
वो नमसार करवे इमर उपरान्त सुरा न उस भय नागिनी देवी से
प्रार्थना की थी कि रतासुर दैत्य का हनन करके महान् भय से हमारा
परित्राण वरिए ।६२। उन देवों के भय से युक्त उन वचनो वायवण
पसे इसके उपरान्त उन सबको समय वचन देरर वह तीन नेत्री ताली
मस्तक पर चन्द्रमा को धारण करती हुई अझ न स्वरूप वाली हो गयी
थी।६३॥
मिहाल्टा महादेवी नानागखानधारिणी।
सुवक्त्रा विगतिमुजा सूजद्विद्युल्लतोपमा ॥६॥
ततोऽम्बिया ननादौच्चे माट्टहाम मुहुमुह ।
तस्या नादेन पोरेण कृत्स्नमापूरित जगत् ।।६।।
प्ररम्मिनासिया चोवी तदा वारिधिमेपला।
गंगोत्तमम्तनी रम्या प्रमदेव भयानुग ।।६।।
तेरि तमामुरा प्रामाचतुरनवालोचटा ।
गम्यग्विदितवृत्तान्ना पालान्तायमोपमा ॥६॥

२८८ ] [ सूर्य पुराण रक्षोदानवदेत्याश्च पातालेष्वपि ये स्थिता. । ते सर्व एव दैत्येन्द्र कोटिशस्तमुपागता. १६८|| देवारयस्तदा सर्वे सनद्धाश्चोच्छितध्वजाः । पालिता दानवेन्द्रण नानाशस्त्रास्त्रपाणयः ॥६६॥ तमालालिकुलाभासा जीमूतध्वनिनि स्वनाः । युगान्तमिव कुर्वाणा नानालङ्कारभूषिता. ॥७॥ मिह पर समारूढा हुई अनेक प्रकार के शस्त्रो और अस्त्री को धारण करने वालो-सुन्दर मुख से सम्पन्न-बीस भुजाओं से युक्त महादेवी चमचमाती हुई बिजली की लता के ही समान थी।६४) इराके अनन्तर अम्बिकादेवी अट्टहास के साथ बारम्बार बहुत ही ऊंचे स्वर में नाद करने लगी थी। उनके उस महान् घोर नाद से सम्पूर्ण जगत् ध्वनित होकर मर गया था।६५। उस समय मे समस्त पृथ्वी कम्पित हो गई थी जिसके चारो ओर समुद्र की मेखला थी। शैल ही है उत्त ग (अंधे) स्तन जिसके ऐसी परम सुरम्य भय से आतुर प्रमदा के ही समान वह उौ वम्पायमान्त हो रही थी। वे असुर भी वहां पर प्राप्त हो गए थे जिनके पास चतुरङ्गिणी सेना थी और इस सेना के बल से वे बहुत ही उत्कट हो रहे थे। भलीभांति जिनको सब वृतान्त विदित था और जो कालान्तक यम के समान भीषण थे।६६.६७१ राक्षस-दानव और दैत्य जो नीचे वाले पाताल लोक मे भो स्थित थे दे सबके सब करोडो की संख्या उस दैत्येन्द्र की सहायता करने के लिए उसके समीप मे समागत हो गये थे ।६८। देवो के शतु उस समय मे सब अपनी ध्वजाऐ ऊंची करके सन्नद्ध हो गये थे। जो कि दानवेन्दु के द्वारा पालित थे और अनेक शास्त्रास्त्रो को हाथो मे धारण किये हुए 1६६ तमाल वृक्ष की पक्ति तया भौंरो के समुदाय के समान एकदम कृष्णकान्ति वाले और महामेघों के समान ध्वनि करने वाले थे । वे सब अनेक अलङ्कारो से भूपित हुए युग के अन्त जैसा करने के लिये प्रस्तुत हो रहे थे ।७१ रक्तामुर वध नयन ] [ २६ गजघण्टारगेनोग्रंयानामय हेपितः । मिहनादश्च शूराणां शस्त्राणां मणितेन च ।।१।। रयनेमिनिनादच कम्पयन्तो वमुधराम् । ततस्ते दानवाः सर्वे देवो दृष्ट्वा प्रहर्षिताः ।।७२।। आम्फोटयन्तः पटहान्भेरीजजेरिणीमुसान् । अनेकान्यादयन्तो गबदमरुदिण्टमान् ॥७३|| मनोजौहंयगंजदचाचलमनिर्भः। अत्यविचित्रराम्ढा विरेजुदैत्यपुगवाः ।।७४।। एनाविधै समाजे ता भवानी विदगारयः । सन एव समाजघ्नुः गर्वाणी सर्वतोमुसीम् ।।७।। बाणेर्नानाविधोरयंमदण्टोपमै. शिते. । कुठारचक्रारशुमुसलाइ कुरालाङ्गले. १७६|| पारातोमरमूलश्च दण्डपट्टिशमुद्गरे । परिघप्रासशक्त्यृष्टिशतघ्नीकण (पाद)पोपलं ॥७॥ हायियो के कण्ठ में बंधे हुए घण्टामा के महान उग्र पनपनाहट से तथा अश्वो के हिनहिनाहट गे और शूरो के सिंह के समान गर्जन की ध्वनि से एव शास्त्री की सनसनाहट से-रथो पी नेमियो थे शब्दो से वे सब दैत्य दानव भूमि को प्रकम्पित कर रहे थे। इसके पश्चात् वे सब दानव समक्ष मे देवी को देखवर अत्याधिक प्रहपित हो गये थे।७१। ७२१ वे सब दैत्य पटही को पीट रहे थे-कुछ भेरी और जर्जरिणी के मुग्लो पर डई, की चोट मार रहे थे। अन्य लोग शह-डमरू और डिण्डल आदि अनेको वाद्यो को बजा रहे थे ।७३। वे सब दैत्य श्रेष्ठ बहुत उत्तम मन के समान वेग वाले अश्वो के ऊपर तथा पर्वती के समान गजो पर एव अन्य चित्र-विचित्र वाहनो पर समारूढ हुए उस समय में शोभित ही रहे थे ।७४) इस प्रकार के देस्यो के समाज मे वे देवो के शत्रुगण उस भवानी शर्वाणी और सर्वतो मुखी के ऊपर एक साथ सबके सव शस्त्रास्त्री के प्रहार करने के लिये टूट पड़े थे ७५ २६०] । सूर्य पुराण उन दैत्यों के पास प्रहार करने के लिये अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र थे जो नाना प्रकार के वर्णों वाले महान् घोर और मनराज के दण्ड के समानसित थे! कुठार-चक्र-परशु-मुसल-अंकुश-लाल-पाश- तोमर-शूल--दण्ड–पट्टिश-मुद्गर-परिध-प्रास-शक्ति-ऋषि -शतघ्नी-तथा पीपल आदि अनेक शस्त्रास्त्रों से दैत्य आक्रमण कर रहे थे १७५१७६१७॥ आयोगुडे शुण्डीभिश्चक्रकुन्तगदादिभिः । छादयन्तो महादेवी सिंहनादान्विनेदिरे ।।७।। सा हन्यमाना राषेण जज्वाल समरेऽम्बिका। अग्रसत्साऽथ शर्वाणी शस्त्रास्त्राणि सुरद्विपाम् ॥७६|| शैलेन्द्रतनया देवी स्तूयमाना सुरपिभिः । युयुधे दानीः साधं महासमरदुर्दिने ।।८।। ते हन्यमाना. पार्नत्या तामेवाभिप्रदुदुवु. । परिपूर्णे यथा काले शलभा जातवेदसम् ॥१॥ सका प्रवता तेपा बहूनामाततायिनाम् । दधार वेग सर्वेषा मरुतामिव पर्वत: ॥२॥ पार्वतीशस्त्रनिभिन्ना दैत्यास्ते क्षतजेक्षणा. । आलिङ्गय शेरते क्षोणी रते कान्तामिव प्रियाम् ।।३।। मण्डलीकृतकोदण्डा ददृशुश्चाम्बिका तदा । मृत्युजिह्वोदिताकारा प्राणकर्षणतत्पराम् ।।४।। आयोगुड-मृशुण्डी-चक्र-कुन्ता और गदा आदि के द्वारा महादेवी को छादित करते हुए उन दैत्य-दानवो ने सिंहनाद किये थे ।७२। उस समर मे वह देवी जब दैत्यो के द्वारा हन्यमान हुई तो वह रोप रो अम्बिका गल उठी थी। और उस शर्वाणी ने गुरद पियो के सब शस्त्रास्त्रो को ग्रमित कर लिया था ७६। उस महासमर के दुर्दिन में शरेन्द्र की तनया देवी सुर और ऋषियो के द्वारा स्तूयमाना होती हुई दानवों के साथ युद्ध किया था। वे सब पार्वती के द्वारा हन्य-

रक्तासुर वध कथन ]
[ २६१
मान होते हुए उसी देवी पर अभिद्रत हुए थे। जिस तरह से काल के
परिपूर्ण होने पर शलभ (पतङ्ग) अग्नि में जापर एक साथ गिरा परते
हैं । वह एक ही थी और उन पर आक्रमणकारी वे सभी थे तो उन
समस्त प्रद्रत हुए बहुत से आतातापिओ का वेग मस्ती का वेग पर्वत
पे ही समान देवी न घारण पर लिया था ।१।०२। पार्वतीदेवी के
रास्य से दिन्न-भिन्न हुए सब वे दैत्य क्षतजेक्षण हो गये थे और रति
मे प्रिययान्ता की तरह मे भूमि का आलिङ्गन करके सो रहे थे
॥१८३। मण्डली कृत कोदण्ड वाली अम्बिका वो उस समय मे उन्होंने
देया था जो कि मृत्यु की जिह्वा के समान ही समुदित यागार
वाली थी और प्राणा के अपक्पण परने के वर्म परायण हो रही
थी।।८४॥
जध्नुस्ते कोटिशो दैत्ग पावंती समाराङ्गणे ।
हुकारेण निनादेन पातयन्ती सहस्रश ।।८५
प्रचिच्छेद रणेऽरीणा शिरासि निशते शरै ।
देवीकार्मुकनिमुक्तैर्दिव्य नाविधं शरै ॥८६
दह्यन्तेऽसुरसंन्यानि तृणानीव दवाग्निना ।
सिंहवेगानिलोद्ध ताश्चर्णयन्ती महारथान् ।।८७
ववपं शरवर्षाणि युगान्ताम्बुदसनिभान् ।
गजवाजिरथाना च द्रवता पतता तथा ।।55
दत्येन्द्राणा च भारेण श्वसतीव वसु धरा।
समुत्थित रजो घोर सस्पृश्यावेन्दुमण्डलम् ||२६
गजाश्वदत्यरत्ती प्रशान्तिमगमत्तत ।
प्रावर्तत नदी तत्र शोणितोदतरङ्गिणी
हयमत्स्या गजग्राहा चर्मर्मास्थिसकुला।
महारथमहावर्ता पताकाछफेनिला ॥६१
उस समराङ्गण मे उन करोडो दैत्यो ने मिलकर पार्वती देवी
पर हनन करने के लिये प्रहार किये थे किन्तु पार्वती देवी ने अपने

२६२ ] [ सूर्यपुराण हुकार के निनाद से ही सहस्रो भूमि पर गिराती हुई रणभूमि मे शत्रुभो मस्तको को अपने पैने पजो से काट कर फेंक दिया था। देवी के धनुप से निकले हुए दिव्य नाना प्रकार के शरी के द्वारा दवाग्नि के द्वारा कृणों के समान ही असुरो को सेनाऐ दग्घ होगयी यौं । सिंह के वेग से उस्थित वायु के शोको से बडे-बडे महारयो को चूर्ण कर रही थी ॥८५-८७॥ युगान्त मे होने वाले मेघों के समान ही शरो की वर्षा की थी । गज-अश्व और रथो के द्रविन एवं पतित होने वालो के-दैत्येन्द्रो के भार से भूमि सांसें सी ले रही थी। उस युद्ध क्षेत्र में महान् घोर रज उडकर छा गयी थी जो सूर्य और चन्द्र मण्डल तक व्याप्त होगई थी।11८६॥ वह उडी हुई धूल हाथी घोडे और दैत्यो के रुधिर के प्रवल वहाव से प्रशान्त हुई थी और वहां पर शोणित रूपी जल की एक नदी वहने लग गयी थी ॥६०॥ उसमे जो घोडे बह रहे थे वे ही मत्स्य के समान दिखाई देते थे और हाथी ग्राह जैसे प्रवाहित हो रहे थे तथा चर्म कूर्म जैसे थे । इस तरह से वह अस्थियो से सकुल हो रही थी। बडे-बडे रथ ही उस नही मे महान आवतं जैसे दिखलाई पड रहे थे एव पताकाऐ और छन जो उसमे बहे चने जा रहे थे वे ही मानो फेन जैसे थे जिससे वह नदी फेनिल हो रही थी ||६|| वहन्ती यमलोकान्त दैत्यासुरतटद्र मान् । तद्वल च बभौ शीघ्र शस्त्रास्त्रक्षतकधरम् ॥१२ गलद्र घिरफेनौघ घूर्णितार्णवसनिभम् । वध्यमान स्वक सैन्य दृष्ट्वा देव्याश्च विक्रमम् ॥६३ रक्तासुरोऽभ्युवाचंद सैनिकाजातविस्मय । हन्यता हन्यता शीघ्र भवानीकालसनिभा ।।६४ परिवृत्य रथ गर्हयैश्चैव पदातिभिः । दानवेश्वरवाक्येण ततस्ते तस्य सैनिका ६५ त्यक्त्वाऽमान महात्मानो देवीमापुर्बलान्विता । धूमाक्षप्रमुखा धीरा पोडशैव महारया ॥६

रक्तासुर वध कथन ]
[ २६३
शरशक्तिगदाशूलैस्ताडयन्तोऽम्बिकां रणे।
श्वसन्त इव नागेन्द्राः प्रज्वलन्त इवाग्नयः॥९७
जम्भन्त इव शार्दूला गर्जन्त इव तोयदाः ।
युयुधुरते स्थिरीभूता विविघायुधयोधिन. 18
दैत्य और असुर रूपी तट के उपर रहने वाले द्रुम जैसे थे जिनको
वह रुधिर नदी यमलोक के अन्न तक ही बहाकर पहुंचा रही थी।
उस समय में उस दैत्येन्द्र की सेना शीघ्र ही शस्त्रास्त्रो के द्वारा कटी हुई
कन्धराओ वाली होकर एक विचित ही शोमा से युक्त हो गयी थी
HE२॥ बहते हुए रुविर के फेनो के समुदाय वाली और घृणित अर्षद
के सदृश वध्यमान होती हुई अपनी सेना को देखकर और जगदम्वा देवी
के महान विक्रम को देखकर विस्मित होकर रक्तासुर अपने सैनिको से
यह बोला- अरे । आप सब मिलकर इस काल
सहश भवानी का
हनन शीघ्र कर डालो ९४|| इसके अनन्तर दानवेश्वर के इम
वचन से उसके सब मैनिक रथ-गज-अश्व और पंदल वीरो के माय
वापिम लौट पडे और अपने आपने जीवन की आशा छोडकर सब
महारथा वल से समन्वित होकर देवी पर आक्रमण करने लगे थे।
धूम्राक्ष जिनमे प्रधान या ऐसे उस सेना में परमधीर सोलह ही महार
थे। उन्होने रणक्षेत्र में देवी पर शर-शक्ति-गदा और भूलो के द्वार
ताइन कर रहे थे। बड़े-बडे नागेन्द्र अन्तिम मांस लेते हुए जलती हुई
अग्नियो के समान थे। बडे बडे शार्दूल सिंहनाद करते हुए गर्जन करने वाले
मेघो के सहम दिखाई दे रहे थे। वे अनेक प्रकार के दायुधो से युद्ध
'करने वाले स्थिरीभूत होकर युद्ध कर रहे थे ॥६५-६८ll
नृत्यन्तीव च रुद्राणी नून भाति महाहवे।
पार्वती चण्डकोदण्डनादापूरितदिड मुखी MEE
पदिशाभिहतान्काश्चिन्मुसलोन्मथितारतथा ।
सारोहान्यातयामास गजानश्वाच कोटिशः ॥१००
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२६४ ] । सूर्य पुराण कालपाशशिरश्छित्त्वा सार्धचन्द्रेण भासुरम् । गदया प्रभमाथाऽशु देवान्तकमहाहनुम् ॥१०१ ब्रह्मनस्यासिना कायापातयामास चाम्बिका । धूम्राक्ष कालदण्डे । वज्रण क्रू रमेव च । १०२ यज्ञदष्ट्र यज्ञकोप विधर्म च चम्पतिम् । रोद्रानन्याखिशूलेन जघान परमेश्वरी ।।१०३ सशड कुकर्णदुभिक्षविद्यमालिविभावसून् । दुर्वारपोरुपाश्चके चक्र णोत्कृत्तमस्तकान् ॥१०४ रक्तासुरानुजो चोमो महावलपराक्रमो। यूष्माण्डशुभकाक्षी तु जघ्नतुमुंशनाश्मभि ॥१०५ उम महा सग्राम मे रुद्राणी नृत्य सा करती हुई शोभित हो रही थी । पार्वती देवी ने अपने प्रचण्ड धनुष के निनाद से सव दिशाआ के मुखो को आपूरित कर दिया था ॥६६देवी ने कुछ को पट्टिश के द्वारा निहत किया था तथा कुछ मनिको को मुमन से मार गिराया था। बहुत से सैनिको को उनके वाहनों के ही सहित भूमि पर गिरा दिया था। ऐसे करोडो ही गजो और अश्वो को भूमिशायी कर दिया था ॥१००॥ सार्धचन्द्र के द्वारा कालपाश के शिर का छेदन कर दिया था और भासुर को-देवान्तक-महाहनु को गदा से बहुत ही शीघ्र प्रमाणित कर दिया था ।।१०१॥ उस अम्बिका ने ब्रह्मघ्न का शिर खड्न के द्वारा शरीर से अलग कर गिरा दिया था कालदण्ड से धूम्राक्ष को और वज्र के द्वारा कर को तथा यज्ञद्रष्ट यज्ञकोप-विधर्म और चमूपति को और दूसरे रोद्रो को विशूल के द्वारा परमेश्वरी ने हनन कर दिया था। ॥१०२॥१०३।। शक कर्ण दुर्भिक्ष विद्युन्माली-विभावसु के मस्तको को घक के द्वारा काटकर दुरि पौरप वाले बना दिये थे॥१०४॥ रक्तासुर के दो अनुज थे जो महान बल और पराकम वाले थे। उन कूप्माण्ड शुभकाक्षो को मूसल और पाषाणो के द्वारा मार गिराया था ॥१०५ रक्तासुर वध क्यन] [ २६५ महावलो महाकायौ घोरो तत्र महासुरी। शरराशीविपाकारर्जधानाथ तदा द्विजा. ॥१०६ तत स्रोनोऽभ्यधावत्ता दृष्ट्वा तो विनिपातितो। तमन्यपातयद्भ मौ खड्गेनाभिहत रपा ।।१०७ घण्टकरचाथ देत्येन्द्रो गिरीन्द्र सदृशो वली। परिघेणाऽयसेनाऽऽजी देवी कद्रोऽभ्यताडयत् ॥१०८ तत सपरिघश्चासौ देव्या करतलापत.. म पपात तदा भूमौ वजाहत इवाचल ॥१०६ प्रापश्चिको महावाहुश्चक्रीकृतशरासनः। शक्त्या दग्धतनुत्राणो जगामान्तकमन्दिरम् ॥११० अष्टादशैव दुर्धर्षात्रिहत्यासुरसैनिकान् । सानन्दा विननादौन्चं सवर्तकघनोपमा ११११ जधान दानवानीकमेकाऽनेकस्वरूपिणी। विद्य सपातनिहादा विद्य त्सपातश्चला ! ११२ महान बल वाले और महान शरीरो वाले वहाँ पर यति घोर महा- सुर दो थे । हे द्विजो ! उसी समय में सपा के समान आधार वाले पाणी के द्वारा उनका हनन दिया था ॥१.६॥ उन दोनो को विधि पतित हुए देखकर लीघ्न नाम याला दैत्य उस अम्बिका के प्रार आक्रामक हुमा पा । उसको भी देवी ने क्रोध से पङ्ग के द्वारा मारवर भूमि पर गिरा दिया था॥१०॥ घण्टक नामव देस्येन्द्र बहुत बलवान् गिरीन्द्र पे राहश था । उस युद्ध भूमि में लोहे के परिधि से उसको भी अत्यन्त प्रद होरर मार गिराया पा ||१०|| इसके पश्चात् परिप मे सहित इमो देवी ने बरसन्न गे माहत कर दिया था और यह भूमि पर यच रो आहा पवंत गमान गिर गया पा ॥१०॥ महान् याही वाला एक प्राञ्चिा देय था जिसने अपने कोपर ये समान पर रपमा था। यह भी शक्ति द्वारा हम शरीर याला होरर यमपुरी यो गमन पर गया था।११०१ इस पद से मारह बहन ही दुर भगुर भनियो को मार २९६ ] । सूर्य पुराण अम्बिका देवी आनन्द के साथ प्रलयमास में होने वाले साम्पत्तक मेघ के समान बहुत ही ऊँचे स्वर से नाद करने वाली हो गयी थी ॥१११॥ इस एक ही देवी ने जो अनेको रूपो वाली थी दानवो की सेना का हनन कर दिया था । वह देवी विद्यु तु के सपप्न के ही समान निह्लाद वाली थी और बिजली के सम्पात के ही तुत्य चञ्चला थी ॥११२।। पातयन्नी चचाराऽऽजो साऽसुरेन्द्रमहाचम्म् । तत्रातुलश्च तुमुलो नादो बाध्येपु शनुपु ।।११३ बभूव येन ब्रह्माण्डमकाण्डाकुलता ययौ । जघानैव चतु सप्त त्रिदशैखिदशाद्विपाम् ।।११४ अक्षौहिणीपहयाणि त्रयविंशत्सुरेश्वरो । एकत्रिशत्सहस्राणि शतोन्यष्टौ च सप्तनि ।।११५ सानुगाना सयोधाना रयाना वातरइसाम् । सख्येवैपा गजेन्द्राणामक्षौहिण्या महौजसाम् ॥११६ त्रिगुण चतुरङ्गाणा पञ्च चैव पदानिनाम् । क्वचिद्रथस्थिता सैव विविधायुधधारिणी ।।११७ जघानासुरसैन्यानि यहस्यिगता कचित् । कचिच्च महिपारूढा वृप च स्थिता कचित् ॥१८ वेताले प्रेतभृतेश्च स्वेच्छासृष्टवताऽद्भ ते १११६ वह देवी युद्ध मे असुरे द्र की महाचमूका निपानन करती हुई सन्जरण कर रही थी वहा पर अतुल तुमुल नाद उन वाध्य शत्रुभो में हो रहा था ॥११३। जिस निनाद से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आकुलता को प्राप्त होगया था। इस प्रकार से देवो के शत्रुओ को अट्ठाईस देवी के द्वारा हनन किया था ॥११४॥ सुरेश्वरी ने तेतीस सहस्र अक्षौहिणी-इकतीस सहस्र भाठ सौ सत्तर को अनुगो के और योघाओ के सहित तथा वायु के तुल्य वेग वाले रथी की यह सरया थी और महान् ओज वाले गजेन्द्रो की अक्षौहिणी में यही सख्या थी ॥११५।११६॥ चतुरगो का विगुण और पदातियो का पञ्च गुण कही पर रथ मे स्थित वही विविध आयुधो

कामुर वध क्थन ]
[ २६७
के पारण करने वाली किसी जगह पर रयो में स्थित और बड़ी पर
अन्च और हापियो पर स्थित यह संना अमुरी की थी। विसी स्थल
पर महिषयो पर समाज और वहीं पर यूपभो बाद वेताल प्रेत-भूतों
गं परिपृत थी जो स्वेच्या गे समुतन हुए थे और अत्यन्त मदन थे
11११७.११८॥
कवन्धनृत्यगने यमृग्यमाथिार्दमे
रणाजिरे निशाचराम्नतो विजुजिता ।
गालगृधवायमा. पर प्रपानमादधुः
पाचितरेतनावबा, प्रतीतगोणिता वमु.॥१२०॥
पपचित्पनाराणय पिनाच यक्षगक्षगा.
प्राप्यं गागृजा पि.गमच्यन्नयामिपं ।
गजान्नराग्नुरनमान्नभायन्ति निघृणा-
ग्नदोहोम्नधागो तालिगोणितापगाम् ॥१२॥
इनि प्रगादगगरे गुगग्गिधगत
मिराजायरा धन नगगिपूरपारिणी।
गजेन्द्रपन्दमदिनी तुजपपोधिनी
मसापोषणानिनी गगग्गिंन्यनामिनी ॥१॥

२९८ ] [ सूर्य पुराण नमम्मृत्य रक्तासुर तेऽभ्यधावरणे पार्वती ताडयन्तोऽम्ग्रपूग. ॥१२॥ समुदत्य नेत्राणि किंचिद्धसन्ती द्विपसन्यमघानि मा सहरन्ती । न्यमुञ्चततोऽम्यागि दिव्यानि देवी नदत्स्वार्यतूर्ये पु सेऽनन्तसत्त्वा ॥१२६।। क्यन्धो ( पडो ) के नत्य से मयुल तया रुधिर और अस्थियो के पर्दम वाले रणाङ्गण मे फिर निशाचर अत्यन्त अजित होते हुए शोभित हो रहे थे । गीदड गिद्ध और यौए परमाधिक प्रपान को प्राप्त कर रहे थे। यही पर मृत पुरुष के शावव प्रतीत शोभित गोमायमान हो रहे थे ।१२०। वही पर हायों में घनुप धारण किये हुए पिशाच-यक्ष और राक्षस रुधिर से अपने पितृगणो का तर्पण कसे उनको मांस से समचित कर रहे थे। निर्घण लोग गजो को-अश्वो वो भक्षण कर रहे थे । दूसरे लोग उन मृत गजादिव के उडवो के द्वारा उस रुधिर की नदी को पार कर रहे थे ।१२१॥ इस रीति से सुरो के शत्रुओं के सपो से सकुल उस प्रगाढ युद्ध मे अम्बिका देवी धनुप-शर-सङ्ग-शूल - इन आयुधो को धारण किये हुए विराजमान थी। वह अम्बिकादेवी बडे-बडे गजो के वृन्दो का मर्दन करने वाली-तुरङ्गो के यूथो या पोथन करने वालो-महान् रथियो के समुदाय के घात करने वाली और सुरो के अरियो की सेना का विनाश कर देने वाली थी ।१२२। इसके पश्चात् चण्डिका देवी के घनुप से टूटे हुए वाणो से दिवलोक के हरण करने वालो के सोलह करोड दैत्य हत किये गये थे और पट्टिशो के द्वारा तीन लाख अठारह करोड और नेतीस मारे गये थे। इसके अनन्तर दानवो के स्वामी पर रण क्षेत्र मे तर्जना करती हुई देवी नृत्य करने लगी थी जो विलास से ही उल्लासित वाहुओ मे शास्त्रो का धारण करने वाली थी । ऐसी प्रमेय प्रभाव वाली भवानी देवी आनन्द से महेन्द्र आदि देवो को हर्पित कर रही थी ।१२३३१२४१ फिर हयग्रीव जिनमे प्रमुख था [ २६६ रक्तासुर वध कथन ] ऐमे दैत्या के सघ महारौद्र रूप वाले केवल दश ही शेष रह गये थे। उहोंने रक्तामुर को प्रणाम किया था और फिर वे अस्त्रो के समुदाय से पार्वती देवी पर ताडन करते हुए घावमान हुए थे ।१२। नेनो का निकाल कर कुछ ह सती हुई वह देवी शत्रुओ की सेना के समुदायों का महार कर रही थी इसके अनन्तर वह दिव्य अस्त्रो को छोड रही थी। आकाश में अनन्त सत्त्व वाले आर्य तुर्य का नाद कर रहे थे ।१२६। ततो गिरीन्द्रजारीणा चक्रे सैन्यानि भस्मसात् । रक्तासुरमथाभ्यंत्य शस्त्रास्त्रपृतपाणिनम् (?) ॥१२७।। पादाकान्त्यानतभुव सक्षोभितजगन्नयम् । मण्डलीकृतकोदण्ड गर्जन्त कालमेघवत् ॥१२८॥ गरवाणि मञ्चन्त पार्वती तमुवाच ह । कृत्वोपताप देवाना जीवन्क्वाद्य गमिप्यमि ॥१२६।। देप्टेत्युक्त्वाऽथ सा देवी शूलेनाभिहन दि । सभिन्नहृदयो दैत्यो मूर्ति चक्र सुदारुणाम् ।।१३०।। रक्तविन्दुसमो दैत्यो देवी व्यामोहयन्निव । जगामानेकरूपोऽमौ निहतोऽम्बिक्या रणे ॥१३॥ रक्तासुरोऽपि निधन गत्वा त्रिदशकण्टकः। पपात मुनिश र्दूला प्रज्वलज्ज्वलनोपम ॥१३२॥ हाहाकार प्रकृर्वाणा दत्यस्तेऽथ प्रदुद्रुवु । के चिच्छिटा भयत्रम्ता विमृष्टायुधजीविता ॥१३३।। इसके उपरान्त गिरीन्द्रजा न यरिया की सेनाओं को भस्मसात् वर दिया था। इसके अनन्तर वह उसे रक्तामुर के समीप में प्राप्त हुई थी जो हाथो मे गम्त्र और अस्त्र धारण किये हुए या।१२१ अपने चरणो की माक्रान्ति से भूमि से नत पर देने वाले तीनो लोग यो मझो. भित पर देने वाले-पनुप यो मण्डनीयन करके रपने वारे तथा मालमेघ के रामान गर्जते हुए और गरो की वर्षा वो मोचन परते हुए उसमे देवी पार्वतीजी ने पहा-अरे दुष्ट । देशी वा नगन बरये वाः। ३०० ] [ सूर्य पुराण जीवित रहते हुए तू आज कहाँ पर जायगा? इतना ही कहकर उस अम्बिका देवी ने उसके हृदय मे श ल से अभिनन किया था। सभिन्न हृदय वाले दैत्य ने अपनी मूत्ति का परम दारण बना लिया था ।१२८१ १२६।१३०१ रक्तविन्दु के समान दैत्य देवी यो व्यामोहित सा करता हुआ यह अनेक रूपो वाला हो गया था और उस रण में अम्बिका के द्वारा निहत कर दिया गया था ।१३११ वह देवो का कटक स्वरूप रक्तासुर भी निधन (मृत्यु) को प्राप्त होकर हे मुनि शार्दू लो ! जलती हुई अगि के ही सदृश भूमि पर गिर पड़ा था। इसके अनन्तर वे सब दैत्य हाहाकार करते हुये प्रदूत हो गये थे। कुछ बचे हुए भय मे डर गये थे जो आयुध जीवित विगृष्ट कर दिये गये थे। १३२११३३। केचित्समुद्र विविशुरन्द्रीन्केविच्च दा केचिल्लुञ्चित्तमूर्धानो नग्ना भूत्वा वनेऽवसन् ।।१३४।। दयाधर्म व वाणाश्च निर्ग्रन्थव्रतमाश्रिताः । केचित्प्राणपरा भीताः पाखण्डव्रतमाश्रिताः ।।१३५॥ हेतुवादपरा मूढा नि.शौचा निरपेक्षकाः । असुरस्य जनस्यैते क्षपणा इव लक्षिताः ॥१३६॥ ते चाद्यापीह दृश्यन्ते लोके क्षपणका. किल । अर्हन्तश्च तथैवान्ये शिवशास्त्रबहिष्कृताः ॥१३७।। मन्त्रौषधप्रयोगैश्च जनवञ्चनकारका.। समुत्पत्स्यन्ति दैत्याश्च घोरेऽस्मिन्वै कलौ युगे ॥१३॥ शिवोक्त कर्मयोग च द्विपन्तश्व कुयुक्तिभि. । देव्या क्रोधाग्निा दग्धा वेदमार्गविनिन्दका ॥१३॥ शास्यन्ते नरकाग्नौ ते नि.शेषा. पापकर्मिणः । न दृष्टा निष्कृतिस्तेपा शास्त्रेषु परमर्षिभि. ॥१४०।। समुद्र मे प्रवेश कर गये थे और कुछ दानव महारण क्षेत्र से भागकर पर्वतो की गुफाओ मे जाकर छिप गये थे। कुछ कटे मस्तक वाले थे और नग्न होकर वन में निवास करने लगे थे ।१३४। कुछ दैत्य 50625 रक्तासुर वध कथन ] [ ३०१ वे दयाधर्म को बोलते हुए निग्रन्थ व्रत के आश्रित हो गये थे । कुछ प्राणो की रक्षा में ही तत्पर हुए भयभीत होते हुए पाखण्ड व्रत का आश्रय लेने वाले हो गये थे ।१३५॥ हेतुवाद में परायण-महामूढ- शौचरहित-निरपेक्षक ये अमुर जन के लोग थे किन्तु क्षपणा के समान लक्षित हुआ करते थे ।१३६॥ वे आज इस समय मे भी इस ससार मे क्षपण निश्चय ही दिखलाई दिया करते हैं। तथा अन्य लोग अर्हन्त हैं और शिवशास्त्र से वहिष्कृत हुआ करते हैं ।१३७। ये लोग मन्त्रों और औपधियो के प्रयोगो के द्वारा साधारणजनो को वञ्चित करने वाले ही हुआ करते हैं। इस घोर कलियुग में ये ही दैत्यगण सवंत्र समुत्पन्न हो जाये गे ।१३८१ अपनी कुत्सित युक्तियो के द्वारा भगवान् शिव के द्वारा वणित कर्म योग की ये दुराई क्यिा करते हैं । देवी के क्रोध रूपी अग्नि के द्वारा दग्ध हुए य लोग वेदमार्ग के विशेप निन्दा करने वाले होते हैं । १३६। ये सभी पाप वर्मों के करने वाले नरको की अग्नि में पड़े हुए शासित किये जाया करते हैं । उनकी निस्कृति परमपियो ने शास्त्रो मे कही पर भी नहीं देखी है ॥१४॥ रराजाचिन्त्यमाहात्म्या चिद्रूपा परमेश्वरी । हत्वाऽरिं जगदैश्वर्य दत्त्वा नमुचिशनवे ॥१४१।। जगामादर्शन देवी व्यक्ताव्यक्तम्वरूपिणी । शक्रोऽपि ता प्रणम्याथ सर्वज्ञा विश्वरूपिणीम् ॥१४२।। प्रययौ विबुध साधं स्वा पुरीममरावतीम् ॥१४३॥ अचिन्तनीय माहात्म्य वाली ज्ञानस्वरूप वाली परमेश्वरी ने शत्रु का हनन करपे नमुचि शत्रु के लिए जगत् का ऐस्वयं देर वह परम दीप्तिमतो हो गमी पी १४११ वह व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप वाली वह देवी अदर्शन को प्राप्त हो गयी थी। इन्द्रदेव ने भी विश्वरूपिणी सर्वज्ञा उस जगदम्बा को प्रणाम पिया या ।१४२। फिर यह इन्द्रदेव देवो में ही साप में अपनी पुरी अमरावती यो प्रस्थान करसे पले गरे ।

[ सूर्य पुराण पार्वती प्रभाव कथन । अयोपविश्य सुरराट पूज्यमानो परासने अप्सरोगणगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगः ॥१ सहस्रानुचराणां च देवतानां महोगमाम् । निर्जराणां निशस्फोटिभिः परियारितः ॥२ सोभिपित्तस्यदा सर्वे हस्पतिपुरोगमः । लोषयेऽस्मिन्पुनः शफारचक्रे राज्यमकण्टकम् ॥३ समाजग्मुस्तदा द्रप्राप्तराज्य सुराधिपम् । मुनयश्वाङ्गिरा दक्षमिष्ठमनुगौतमाः१४ पुलस्त्यपुसहागस्त्यविश्वामियात्रिशीनकाः । जमदग्निभरद्वाजभृगुभागरिगालवाः ।।५ ऋभुः शण्डिल्यदुर्वासोगर्गमिनिनारदाः । दात्यूहोद्दालवाभ्रव्यारभङ्गनिशाकराः ।। मरीचिच्यवनोत्तङ्ककात्यायनपराशराः । सवतंशवलिखितदेवभागसुपेणकाः ॥७ वितरभ्ययवक्रीतश्वेतकेतूपमन्यवः । शाकटायनकौण्डिन्यकचगृत्समदासिताः ।। थी मूत जी ने कहा-इसके पश्चात् अपने वरासन पर बैठकर वह पुरी के राजा पूज्यमान हुए थे । और अप्सराओ के समुदाय-गन्धर्व- सैद्ध-विद्याधर और उरगो के द्वारा यह सेन्य मान हुए थे ।।१॥ सहस्रो अनुसर- देव गण-महान् ओज वाले निरगण जो सख्या तेतीस करोड ये वह महेन्द्र देव उन सबसे परिवारित हो रहे थे ॥२॥ वे फिर उस समय मे वृहस्पति जिनमे अग्रणी थे ऐसे महपियो के सबके द्वारा अभि- विक्त हो गये थे । पुनः त्रैलोक्य मे इन्द्रदेव ने अन्टक राज्य कर दिया था ॥३।। उस समय मे राज्य की प्राप्ति कर तेने दाल सुरो के अधिप के दर्शन पाने के लिए मुनि लोगो ने भी यहाँ पर आगमन किया था।

पावंती प्रभाव कयन } [ ३०३ उन मुनिगणो मे अङ्गिरा-दक्ष-वसिष्ठ-ऋतु-गौतम-पुलस्त्य- पुलहा-अगस्त्य-विश्वामित्र--अधि-शनक-जमदग्नि-भरद्वाज- भगु-भागुरि-गालव-ऋभु-शाण्डिल्य-दुर्वासा-गर्ग-जमिनि- नारद-दात्यूह-उबाल-बाभ्रव्य-शरमङ्ग-निशाकर-मरीचि च्यवन- अतङ्क-कात्याय-परागर-संवत्तं-राव-लिसित-देव-भाग- मुषेणा-त्रित-रंम्य-य-क्रीत-श्वेतकेतु-उपमन्यु-शाकरायन -नौगिम्य-वचन--समद-अमित ॥४॥५॥६॥७॥८॥ देवरातश्च जावालिहारीतच कश्यपः। वृहदश्वाम्बिकौतथ्या जातूकण्य : पराशरः ॥६ पैटीनसिघ्रपादो वीतिहोवाश्वलायनो। मातातपो मधुच्छन्दा ऋचोकमतुदेवलाः ॥१० घामदेवश्न मंडेयमार्कण्डेयपुरोगमाः । कृष्णाजिनोत्तरीयास्ते जटिला भस्मभूपिताः ॥११ रुद्राय महात्मानो वेदवेदाङ्गपारगाः । तानामतान्मपूज्य वृतासनपरिग्रहान् ॥१२ ब्रह्मकल्पानपोन्गर्वान्पप्रच्छेद पुरदरः । फपमाराध्यते देवी घरदाञ्चलकन्यका ॥१३ से धन्यास्त ताम्ने . सम्यजिता लिया। पस्या. प्रसादादयोऽपि राज्य प्राप्तमिद मया ॥१४ देवरान-गायनि-हागा-पप-गृहाव-प्रबिर-ौनप्र- जाना-सर-कोन-मिमामा--पौनिहोत्र-प्रसमापन- पासानपान मधुप्पा- गोर-र-देवत-जाम-भव-- यिनि मुनिगणों में पुरोगामी । ये सबालमृगमा उत्तरीय पार पाने का सामे-जापार और मम्म से विभूषित मागों पाने समय होगमान महान मामा मामे और भी:- पहातो पामrit for उन मा गुनियों सान retternaनिमोere-first .

३०४ ]
। सूर्य पुगण
गये थे ॥६॥१॥११॥१२ इन सव ब्रह्माजी के सहा मुनियो से पुरन्दर
ने पूछा था-कृपया आप लोग यह बतलाइये कि वरदा अचल कन्या
जगदम्बा की आराधना कैसे की जाया करती है ? ॥१३॥ वे ही पुरुष
परमधन्य एव कृतार्थ हैं जिन्होने देवी शिवा का अच्छी तरह से
पूजन
किया है । उन्ही देवी का यह प्रमाद है जिसके प्रभाव से मैंने पुनरमि
अपना राज्यासन प्राप्त कर लिया है ।।१४॥
भवान्या. सर्वमेवैतद्वक्त महय सत्तमाः।
ते चंवमुक्ताः शक्रेण मुनयो मुनिपुंगवा. ॥१५
प्रत्यूचुस्ता नमस्कृत्य शर्वाणी शिवरूपिणीम् ।
ते धन्यास्ते कृतार्थाश्न साधवस्ते शचीपते ॥१६
भक्त्या यजन्ति ये नित्य पार्वती परमेश्वरीम् ।
कुर्वन्तोऽपीह कर्माणि चण्डिकार्पिनमानसाः ।।१७
सूर्याशव इव जालैर्न वाध्यन्तेऽत्र किल्विप.।
आयुरारोग्यसौख्यानि सौभाग्य च वरस्त्रियः ॥१८
भवन्ति तेपा ये नित्य स्तुवन्ति परमेश्वरीम् ।
सवत्सरास्तथा मासा विफला दिवसरश्च ते ॥१६
नराणां विषयान्धाना येपा गेहे न पार्वती।
यत्र यत्रायते देवी वरदा परमेश्वरी ॥२०
तत्र तत्राक्षय पुण्य त्यादित्याह प्रजापतिः।
नामोच्चारणमात्रेण यस्याः क्षीणाघसचय ॥२१
हे श्रेष्ठतमो ! आप भवानी का यजनार्चनाराघन सभी कुछ बताने
के योग्य हैं । इन्द्र देव के द्वारा इस प्रकार से पूछे गये उन मुनियो मे
परमश्रेष्ठ मुनियो ने सर्व प्रथम उस शिव के स्वरूप वाली शर्वाणी देवी
को नमस्कार किया था और फिर उत्तर दिया था है शचीपते ! वे पुरुष
परमधन्य और कृतार्थ जीवन वाले है तथा परम साधु हैं जो भक्तिभाव
मे नित्य ही परमेश्वरी पार्वतीदेवी का नित्य ही सजन किया करते हैं ।
चण्डिका मे समर्पित मनवाले यहा पर कर्मों को करते हुए भी इनका

पावंती प्रभाव कथन ] [ ३०५ यजन करते हैं वे यहाँ ससार में किल्विपो के द्वारा वाधित नहीं हुआ करते हैं जैसे जालो के द्वारा सूर्य की किरणें कभी बाधित नहीं हुआ करती हैं । जो लोग नित्य ही परमेश्वरी का स्तवन किया करते हैं उन- को आयु-आरोग्य-सुख-मौभाग्य और वर स्त्रीयाँ लिया करती हैं । प्रजा- पति ने यही बताया है कि उस-उसमे अक्षय पुण्य होता है। जिसके केवल नाम के उच्चारण से ही सब अवों का सचय क्षीण हो जाता है। ॥१५-२१॥ भवत्यवाप्नकल्याण कस्ता नाऽऽराधयेच्छिवाम् । पशुभिस्त्विह तुस्यास्ते मूढा ते शवा इव ।।२२ ये मूढा नार्चयन्त्यार्या पार्वती परमेश्वरीम् । अचिन्त्या सारस्वरूपा ता शाश्वती विश्वतोमुखीम् ।।२३ ये यजन्तीह धन्यास्ते शिवा स्वर्गापवर्गदाम्। तपस्तीर्थप्रदाननैश्च यज्ञ वा वहुदक्षिणैः ।।२४ न ता गतिं लभन्नेऽत्र या स्तुत्वाऽवलकन्यकाम् । सर्वान्कामानवाप्नोति यान्यानिच्छति मानव. ॥२५ व्रतोपवासपूजाभि समाराध्य महश्वरीम् । व्रतेन येन देवेन्द्र प्रमीदत्याशु पावती ॥२६ यच्चोल्कानवमीस शृणु सर्वफलप्रदम् । तस्या नवभ्या शवाणी महिपादीन्महासुरान् ॥२७ जधान समरे शक तेन सा नवमी प्रिया। अश्वयुक्शुल्करक्षस्य नवम्या प्रयतात्मवान् ।।२८ मनुष्य देवी ये यजन से कल्याण प्राप्त करने वाला हो जाया करता है। ऐमी उस देवी शिवा या कोन मूद होगा जो माराधना नहीं करेगा। मूडता से हावा ममाराधन नही करते हैं वे पशुओ ये ही तुल्य मानव हुमा करते है यया ये मृन ये गयो की ही भाति हैं जो कि सभी मेष्टायो से शून्य हुमा करते हैं । जो महामूढ आर्या-परमेश्वरी-पार्वती देवी का सारा नहीं दिया करते हैं जो अपिलनीया-सरम्बार ॥२२।। जो के भजन ३०६ ] [ सूर्य पुराण वाली - माश्वती और विश्वतोमुपी है ॥२३॥ जो लोग यहा संसार मे स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) दोनो का प्रदान करने वाली शिया देवी का समर्चन किया करते हैं वे परम धन्य एव महान् भाग्यमाली प्राणी होते हैं । तप-तीर्थ-दान- और बहुत अधिक दक्षिणा वाले यज्ञो करने से उस गति को यहाँ नही प्राप्त किया करते हैं जिसको कि केवल गिरि कन्या अम्बिका के स्तवन करने से ही प्राप्त किया जा सकता है। जग- दम्बा से मनुप्य सभी कामनाओं को प्राप्त कर लिया करता है जिन-जिनकी वह मनमे इच्छा क्यिा करता है ॥२४॥२शा व्रत उपवास और पूजाओ के द्वारा महेश्वरी का समाराधन करके मनोरथो के पाने का परम लाभ होता हे । हे देवेन्द्र ! जिस व्रत के द्वारा वह देवी पार्वती बहुत ही शीघ्र प्रसन्न हो जाया करती हैं और जो उल्कानवमी नाम वाला है और सभी पुण्य-फती के प्रदान करने वाला भी है । अव आप उसका श्रवण करिए। उस नवमी तिथि मे भगवती शर्वाणी ने महिप आदि महान् असुरो का समर मे हनन किया था। हे इन्द्र ! इसी कारण से वह नवमी तिथि उनकी प्रिय होती हैं । आश्विन के शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन मे प्रयत आत्मा वाला होवे ॥२६॥ स्नात्वाऽभ्यर्च्य पितृन्देवान्मनुष्यांश्च यथाक्रमम् । यजेत्पश्चान्महादेवी महिपासुरघातिनीम् ॥२६ पुष्पर्धू पैश्च नैवेद्य : पयोदधिफलादिभि. । भक्त्या सपूजयित्वैव स्तुत्वा सप्रार्थयेत्ततः ।।३० मन्त्रणानेन वृत्रारे श्रद्धावान्प्रयतो व्रती। महिपनि महामाये चामुण्डे मुण्डघातिनि ।।३१ द्रव्यमारोग्यविजय देहि देवि नमोऽस्तु ते। भूतप्रेतपिशाचेभ्यो रक्षोभ्यश्च महेश्वरि ॥३२ देवेभ्यो मानुपेभ्यश्च भयेभ्यो रक्ष मा सदा। सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ॥३३ उमे ब्रह्माणि कौमारि विश्वरूपे प्रसीद मे। कुमारी जयित्वा वा कुर्यादाच्छादनादिभि ॥३४ : F

पार्वती प्रभाव कथन ]
[ ३०७
यथावणं कुमारीश्च भोजयित्वा क्षमापयेत् ।
नव सप्ताथ एका वा चित्तवित्तानुसारत. ॥३५
श्रद्धया प्रीतिमान्पोति देवी भगवती शिवा।
अनेन विधिना वर्ष मासि मासि समाचरेत् ॥३६
नवमी तिथि मे प्रात स्नान करके पितृगण और देवी का यया क्रम
अभ्यर्चन करके तथा गुरु वर्ग गे जो मनुष्य हो उनका भी यमन करके
पीछे से महिषासुर के घात करने वाली महादेवी का अर्चन करना
चाहिए ॥२६॥ पुष्प धूप-दीप नैवेद्य-दूध-जल दघि और फर यादि के
द्वारा भक्तिभाव से इस प्रकार से अचंन करके फिर प्रार्थना करनी
चाहिए ॥३०॥ श्रद्धा से सम्पन्न प्रयत व्रतधारी को अमुक मन्त्र से
प्रार्थना करनी चाहिए-हे वृधारे । हे महिप के हनन करने वाली।
है महामाये । हे चामुण्डे ! हे मुण्ड दैत्य का घात करने वाली । मुझे
द्रव्य आरोग्य और विजय प्रदान पगे। हे देवि । आपको नमसार है
है महेश्वरि । मून प्रेत-पिशाच राक्षम-देव मनुप्प और सम्पूर्ण भयो से
मेरी सदा रक्षा करिए। मभी मजना के मङ्गल करने वाली । हे शिवे ।
आप सब अर्थों के माधा वरन वानी हैं। है उमे ! हे ब्रह्माणि । है
पोमारि हे विश्व रूपे माप मुथ पर प्रसन्न होइये। फिर इम प्रार्थना
करने के पश्चात् पुमारियो को भोजन करारर उन्ह वादादा वस्त्रा
आदि का दान करना पाहिए । वर्ग के अनुमार बुमारियों को भोजन
परापर उनमे देवो वे स्वरूप वाली रामन पर समापन पराव । कुमारी
सम्या में नो हो या सात हो वे अयया एस ही होये जैसी भी अपनी
आवित्र स्थिति हो उमी ये अनुमार करें भगवनी गिया देवो तो प्रमा
भाव में ही प्रीति को प्राप्त हुआ परती है। इस विधि से एक वर्ष
पर्यन्त प्ररर माम म इस न पोपरला पाहिए ॥३१.३६॥
सत रावसारस्थाने भोगपित्या उमागिताः ।
यसं राभरणं पूज्या प्रणिपत्य विमर्जयेत् ॥३॥

hot '१०८ [ सूर्यपुराण मर कमशृङ्गा गा दद्यात्सुविप्राय शुशोभनाम् । नरो वा यदि वा नारी व्रतमेतत्करोति च ॥३८ उल्कावत्सा सपत्नीना तेजसा भाति भूनले । श्रीमहानवमीत्येपा ख्याता सुरपतेऽधुना ॥३६ सर्वसिद्धिकरी पुण्या सर्वोपद्रवनाशिनी। नाsध्यात्मिक तस्य भय देव स्यान्न धिभौतिकम् ।।४० रक्षत्येव सदा शक सर्वांपत्सु च चण्डिका । शान्तिपुष्टिकरी पुण्या पुत्रारोग्यार्थलाभदा ॥ अनुष्ठे या सदा पु भिश्चतुवगफलार्थिभि ॥४१ यश्छद्मनाऽपि कुरुते व्रतमेतदित्थ चण्डीप्रिय सुरपते मुनिसिद्धजुष्टम् । रुद्राङ्गनाकुलवराकुलित विमान मारुह्य याति स सुखेन शिवस्य लोकम् ।।४२ फिर जब एक वप पूर्ण हो जाये तो सम्वत्सर के अन्न में छोटी- छोटी कुमारिकाओ को भोजन कराकर वस्त्र और यथा शक्ति आमरणो के द्वारा उनकी पूजा करके फिर उनको प्रणिपत्य परे और विसजन कर देना चाहिए ॥३७॥ किसी परम अच्छे योग्य विप्र को एक सुवर्ण के सीगो वाली गो का दान परना चाहिए जो दिगो परमशोभना हो । मर हो अथवा नारी हो जो भी कोई हो इस बा को पिया करता है यह अपनी सपलियो के मध्य म अल्कावासा भूतल मे तेज से मुभासित रहा करती है । हे सुरपते । अब यह श्री महानवमी के नाम से विस्यात है यह महानवमी समस्त सिद्धियो के परने वाली पुण्यमयी और सम्पूण उपद्रवो के विनान कर देने वाली होती है। इसके धन को परने वान पुरुष वो कभी भी आध्यात्मिप- आधिदैविर और आधिभौतिय भय नहीं हआ परता है ॥४०॥ पन्डिया देवी हे पक्र मभी आपदामा म सदा उसको रक्षा किया करती है। जो मनुष्य चतुवगरे पगार प्राप्त करो की इच्छा वान हो उनको यह प्रत सग ही परना पाहिये क्यापि यह नवमी दाति और पुष्टि ३१०] [ सूर्य पुराण . धाना स्वहस्तलिखितानि ललाटपट्टे दैवाक्षराणि दुरितकनिवन्धनानि । गौरीप्रसाद्रजनितेन जन समस्त- स्तान्येकत सपदि माजंयतीति चिनम् ॥४८ ते समता जनपदेषु धनानि तेपा तेषा यशासि न च सीदति बन्ध वर्ग । धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येपा सदा भ्युदयदा गिरिजा प्रसन्ना ॥४६ निशूल के अग्रभाग से भिन्न किये हुए महिपागुर के पादरीठ पर मुत्खात खड्ग और रुचिर अङ्गदो से शोभित बाहुदण्डो वाली देवी को नवगी तिथि मे जो रात्रि को भोजन करने वाले मनुष्य अचित किया करते हैं वे मनुष्य दुर्गत्ति गहन-दुर्ग मे कभी भी प्रवेश नहीं किया करते है ।४३॥ महात्मा भगवान् कपिल ने जो एक अन्य व्रत बतलाया है और मेरु पर्वत पर दैत्यो के गुरुदेव भृगुनन्दन को बताया है। उसको भी आप सुन्दर मन वाले होकर श्रवण कर लीजिये । हे मघवन्म । तीनो जगता की जननी या क्तिना ही महान् आराधन होता है ॥४४॥ जो भक्ति में करने वाले मनुष्य हैं उनके लिये तो देवी काम के ही समान सकल मनोरथो वो पूर्ण करने वाली है। और जो मुतिया के लिये वरपवृक्ष के समान है अथवा घन के इच्छुको के लिये यह चिन्तामणि हो जानी गयी हैं हे भृगु सुत । यहाँ पर ऐमी उस गौरी को या क्यो नही यजन विया परते हैं ॥४५11 fगिहो के द्वारा बंधे हुए परो वाले भी जो उस देवी का स्मरण किया करते हैं और जो व्याघ्र अहि-चोर- नृप अग्नि आदि के भय उपस्थित होने पर दुर्गा वा यजन दिया यरते हैं उस मनुप्पो यो कुछ भी शत्रुओ मे भय नही होता है और जो वृद्ध होत हैं वे मी गति की प्राप्ति परये सुस प्राप्त विया करते हैं ॥४६॥ है भार्गव ! यार्य । गिरिजा वे प्रणति के प्रमाद या मनुष्य पर निम्न देव भी अवश्य ही कृप प्रभार नही दिया करता है। मेघा ना गमय पार्वती प्रभाव थन ] [३११ जिनका समीप है ऐसी वनराजि को ऊचे दरजे की ग्रोम भी पल्लदो के उपचय से उपचित कर दिया करती है ॥४७॥ विधाना ने ललाट पट्ट में अपने हाथ से जो दवाक्षर लिख दिये हैं जो कि रिये हुए पापो के लिए एक नियन्यन स्वरूप ही होते हैं उन सब को भी भगवती गौरी के प्रमाद मे जनित प्रभाव से मनुष्य समस्तो वो तुरन्त ही एक बार मे परिमार्जित कर दिया करता है-यह एक प्रत्यात विचिकता है क्योकि भाग्य मे लिसा हुआ जो कभी भी मिदा नहीं करता है और अवश्य हो भोगना पडता है मह भी गौरी के प्रसाद के प्रभाव से तुरन्त ही नष्ट हो जाया करता है। ऐसी देवी के प्रसाद में अद्भत शक्ति है। ये देवी के प्रसाद प्राप्त करने वाले मनुष्य जनपदो में समत होते हैं-उनको पास अतुल पर होता है -उनपा वान यरा भी हुआ करता है और उनका यन्धु वर्ग कभी सीमित नहीं होता है। वे ही पुरुष परम पन्य हैं जिनके निभृत आत्मन-भृत्य और दारा है और ये सब गिनर लिए सदा ही अभ्युदय में प्रसार करने वाले है जल गिरिजा देवी उन पर प्राप्त हो जाया करती हैं ॥४॥ यः कारयेदरपतापसितागौर तग्दोपुर च सुधयायतनं भवान्याः। चन्द्रावदातभवने विपुले च सरोवर राज्यं श्रिय च भुवि काममुपति मरयम् ॥५. ये कारयन्ति भवन भृगुनन्दनामा गपत्या मुर्णरजतायसनानलम् । सागरमोलिम परिमममुग्गरले ते मिहानेपकिरीटमो रमन्ते ॥५॥ ये मेरमनि गुग्यमानाभिषेका पनामृतगिरिगनामिनयन्ति । से दियरामनुभूय सुरेन्द्रराज्य राज्याभिषेप मतुन पुनराप्नुवन्ति ॥५२ ३१२ ] [ सूर्यपुराण ये देवदारुमलयोद्भवचन्दनेन ये कुडकुमेन च शिवामुपलेफ्यन्ति । ते दिन्यगन्धपटवाससुगन्धदेहा नन्दन्ति नन्दनवनेपु सहाप्परोभिः ।।५३ दिव्यश्च पद्मकरवीरकजातिपुष्पै- गौरी शुभैरनुदिन ननु येऽचंयन्ति । ते भूतले नरपतित्वमवाप्य योगा- द्यास्यन्ति सौस्यमचिरेण परां च सिद्धिम् ।।५४ आमोदिभिर्मरुकपुष्पसुगन्धधूपै. येलोकनाथदयितामिह धूपयन्ति । कर्पूरसारसमगन्धवराः सुरामा आलिङ्गयन्ति दयिता. सुरराजलोके ।।५५ दोधूयते कनकदण्डविराजितश्च सच्चामरै प्रचलकुण्डलसुन्दरीभिः । दिव्याम्बरनगनुलेपनभूपिताङ्गः पृत्वा मृडानिभवने वरवस्त्रपूजाम् ॥५६ देदीप्यते स कनकोज्ज्वलपपराग- रत्नप्रभाभरणहेममये विमाने । दिव्याङ्गनापरिवृतो मनसोऽभिरामः प्रज्वाल्य दीपममलं भवने भवान्या: ।।५७ जो पुरुष भयानी के आयतन और गोपुर को श्रेष्ठ पनाराओं से सितागोर बनवाया वरता है और मफेरी में लिप्त पराया करते हैं यह पन्द्र में समान प्रयदात भवन में जो यति विशाल होता है उसमे मोग्य राज्य-धो गरम पाम सतीगी रा भूमण्डार में प्राप्ति किया परसा है ॥१०॥ है भृगुनादन ! जो मनुष्य आर्या देवी पा भयन मुवर्ण- पादरी-मोह और पापान में निर्माण या तरते है ये सामन्ती के मग्नरो यो मणियों को हिरणों में गमुम्बन सिंहासन पर मार और पार्नती प्रभाव कयन ] किरीट के धारण करने वाले रमण किया करते हैं ॥५१॥ जो लोग सुमेरु परत पर अर्थात् गिरि के शिखर पर सुरी के ससुदाय के द्वारा अभिषेक की गई गिरि मुना का पञ्चामृत अभिषेक किया करते हैं वे दिव्यकल्प- पर्य त सुरेन्द्र के राज्यातन-मुख का अनुभव करके पुनः अतुल राज्या- मिपेक प्राप्नि किया करते हैं ॥५२॥ जो लोग देवदारु और मलय से समुत्रन चन्दन से और कुडूम से शिवा देवी का उरलेपन किया करते हैं। मे दिन मुगन्ध से युक्त पट और देहो वाले होकर अप्पराओ के समूह के साथ नन्दन (देवो का उद्यान) वन मे यानन्द किया करते हैं ॥५३जो लोग दिव्य पद्म-करवीर-जाती के पुष्पों से जो कि परम शुभ होते हैं प्रतिदिन गोरी की अर्चना किया करते हैं वे लोग इस भूतल में नरपति के पद को प्राप्त कर योग से सौत्य को प्राप्त करते हैं और थोडे से ही समय में परासिद्धि को प्राप्त किया करते हैं ॥५४॥ जो लोग आमोद वाले मरुआ को पुष्प और सुगन्धित धूप से भगवान लोग नाप की दयिता को पूपित किया करते हैं अर्थात् पुरावा आघ्राण कराया करते हैं वे कपूर के सार के समान गन्ध मे श्रेष्ठ सुरामा दयिताओ का गुरराज के लोक में आलिङ्गन पिया करते हैं ॥५५॥ सुवर्ण के दण्ड मे गोभिन ४ चमरो को जो देवी पर दुनाता है वह हिलते पुण्डली वाली मुन्दग्यिो के द्वारा दिय्य अवरमा और अनुलेपन आदि मे भूपिन अङ्गो वाला होार मृडानी के भवन में पर वस्त्र पूजा करता है यह बना रे सपान उन्मत और पपराग रत्न की प्रमा वा आम. रण युक्त मुवर्णमय विमान पर दिव्याङ्गनामो से परिवृत हुआ मन मे मुन्दर हो भवानी रे भवन में दीपा को जलाया करता है यह देदीप्य- मान होता है ॥५॥१७॥ यो जागर गिरिमुताभवने ददाति चंयोत्सयादिदिवसेऽधि तूर्यनादम् । वीणामृदगमधुरम्वरभाषिणीभिः सगीयते स हिशोरकिनीशि 1y- [ सूर्य पुराण कुर्वन्ति ये सदुपलेपनवासचित्रं समाजन गिरिसुतायतनेऽनुरक्ताः । मुक्ताकलापमणिकाञ्चनभित्तिचित्र- वैदूर्यकुट्टिमतले भवने वसन्ति ॥५६ दद्याच्च यः परमभक्तियुतो भवान्या घण्टावितानमथ चामरमातपत्रम् । केयहारमणिकुण्डलमण्डितोऽसौ रमधिपो भवति भूतलचक्रवर्ती ॥६० अभ्यचंयन्ति विधिवद्विविधोपचार। गन्धर्वसिद्धवियुधस्तुतपादपद्यान । भक्त्या प्रहृष्टमनसः प्रणमन्ति देवी ते भूर्भुवःस्वमहिमाप्तफला (?) भवन्ति ॥६१ गायन्ति ये गिरिमुता च विलोकयन्ति ध्यायन्ति वाऽमलधियश्च शिवां स्मरन्ति । गौरीमुमां भगवती जगदेकदेवी ते वै प्रयान्ति परम पदमिन्दु गोलेः ।।६२ देवी समस्तभुवनादिविचित्रदैहा सूर्याग्निचन्द्रनयनामिह कालवनाम् । दीर्घाष्टदिग्भुजचया मृदुभावहासा येऽम्यर्चयन्ति हृदि हन्त त एव धन्या ॥६३ इक्ष्वाकुपूरुपृथुराघवधुन्धुमार. माधातृहैहग्ययात्यजमीठमुस्यः । पारोग्यसतिघराजयसौस्यलुब्धं सपूजिता भगवती मनुजभवानी ॥६४ जो गिरि सुता के भवा में जागरण किया करता है और चैत्र के उत्पब आदि दिवस में मध्य में तमंनाद दिया करता है तथा वीणा• मृग से मधुर स्वरों में भाषण परने वाली शोदरी शिनरियो के पार्वती प्रभाव कयन ] [ ३१५ साथ मे गान किया करता है ॥५८|| जो भक्त लोग मद्उपलेपन के द्वारा वासको चित्र दिया करते हैं और समार्जन करते हैं तथा गिरि मुना वे मायतन में अनुराग रमने वाले होते हैं वे लोग मुता कनाप-मणि- काञ्चन को भित्तियो से चित्रित वैदूर्यबुट्टिम तन वाले भवन मे जाकर नियाम किया करते हैं ॥५६॥ जो परमाधिर भक्ति से युक्त होकर भवानी को घण्टा वितान-चामर और मातपत्र समर्पित किया करता है वह से पूर-हार-मणि-युण्डली से मण्डिन होकर ग्लो या स्वामी और भूतल पर चक्रवर्ती राजा हुआ करता है ॥६०। जो लोग गन्धर्व मिद्धि- वियुधो के द्वारा स्तुति दिये गय चरण कमला वाली देवी हैं उन देवी को भक्ति भाव से प्रणाम पर विधिपूर्वर अनेक उपचारों मे अभ्यर्चन किया करत हैं और प्रसन्न मन वाले होकर प्रणाम करते हैं वे भू व स्व की महिमा के प्राप्त फल वाले हुआ करते हैं ॥६१॥ जो गिरिसुना के गुणों का गान किया करते हैं जो उनका विलोकन करते हैं और ध्यान क्यिा करते हैं अथवा अमल बुद्धि वाले लोग शिवा का स्मरण किया करते हैं जो गौरी उमा भगवती जगत् की एक ही करने वाली है वे इन्दु मोलिके परम पद को प्राप्त किया करते हैं ॥६॥ समस्त भुवन आदि से विचित्र देहवाली सूर्य अग्नि और चन्द्र के नयना वाली-काल रूपी मुम्ब वाली दीर्घ आठ दिशा के भुजाओ के समुदाय वाली मृदुभाव हास से मम्पन्ना को हृदय म जा सभ्यर्चन किया करते हैं वे ही परम धन्य होत हैं ॥६३॥ इक्ष्वाकु पूरु-पृथु-राघव घुघुमार माधाता-हैय-पयाति और अजामोढ जिनमे प्रमुख हैं जो कि आरोग्य पन्तनि-पृथ्वी जय- सौख्य के लुब्धक थे उन मनुप्यो के द्वारा भगवती भवानी भलीभांति पूजित हुई है ॥६॥ योगेश्वरी वेदवती भवानी ब्राह्मी कुमारी सुभगा च वाणीम् । नारायणी हैमवतीमनन्ता विश्वादिभुता भज भार्गवाऽऽयम् ॥६५ ३१६ ] । सूर्यपुराण यशासि विद्या सुखमय॑मायुविभूतय पुष्टिनर्थहानि । तद्भक्तिभाजा भविना विमुक्तये भवन्ति योगानेगता समाधय ॥६६॥ नीचोऽपि मन्दमतिरल्पकुलोद्भवोऽपि भीर शठोऽपि चपलोऽपि निरुद्यमोऽपि । गौरोपदाब्जयजनार्थमिहोद्यतश्च सदृश्यते ननु सुरैरपि गौरवेण ।।६७।। तावत्कृताकृतमपि प्रतिघातमेति कमाजितेन विधिनाऽपि कृतोद्यमेन । आर्यापदाम्धुजरजो विरज प्रणम्य यावन्नवत्स शिरसा ध्रियते जनेन ॥६॥ विद्या तप कुलजनिविविध च शिल्प शौर्य मतिश्च विनयस्तु विदग्धता च । एते गुणागुणावता परमे च भद्रा गौरीप्रसादरहितस्य तृणी भवन्ति ॥६६॥ तावन्य सिध्यति रसोन रसायनानि मन्ना महोदयफला विलसत्प्रवादा । क्लिश्यन्ति साधकजना भुवि वर्तिवाश्च यावन्न तुष्यति कवे वरदा भवानी ॥७॥ हे भार्गव । योगेश्वरी-वेदवती-भवानी-ब्राह्मी-कुमारी- सुभागा-वाणी-नारायणी-हैमवती-अनन्ता-विश्व पी आदि- भूता-आर्या का सेवन करो ।६। उस दवी की भक्ति करने वाले मनुष्यो ने या--विद्या-सुस-अध्य-आयु-विभूति-पुष्टि- अनर्थों की हानि ये सब योगानुगत समाधियाँ हुआ करती हैं ।६६। चाहे पोई अत्यन्त नीच भी हो-मन्दमति-छोट बुल में उत्पन्न-भीरू- पाठ-चपत-निरुद्यम भी कोई हो वितु गौरी के चरण कमल थे पार्वती प्रभाव कथन ] [ ३१७ भजन के लिये यहाँ ससार में उद्यन रहना हो तो देवो के द्वारा भी बडे गौरव के साथ देखा जाया करता है ।६७ तब तक भी कृत और अकृत भी प्रतिधात को प्राप्त हुआ करता है। कर्म के द्वारा अजित विधाता भी कृत उद्यम वाला हुआ करता है जब तक आर्या के चरण कमलो को प्रणाम करके विरज अर्थात् निर्मल हो जाता है और हे वत्म ' जब तक चरण कमलो को मनुष्य अपने शिर से धारण नहीं किया करता है १६८१ विद्या-तप-कुल-जन्म-विविध शिल्प-शूरता-मति-विनय- विदग्यता-ये सभी गुण गुणवानो के परम भद्र होते हैं किन्तु इन सबके होने पर भी यदि मनुष्य देवी गौरी के प्रसाद से रहित है तो ये सय तृण के ही समान हो जाया करते हैं 1६६ तब तब न तोर ससिद्ध होता है और रमायन ही मिद्ध हुआ करती हैं। महाद उदय के फनी वाले मन्त्र और विनस प्रवाद भी सिद्ध नही होते हैं और इनके सायन करने वाले गनुप्य और पत्तिय इम भूमण्ड7 में क्लेश ही उटाया करते हैं जब तक हे कवे । वरदा भवानी तुष्ट नही हुआ करती है ॥७॥ गोत्राह्मणाचनपराइच रता स्वधमें ये मद्यमासविमुखा शुचयश्च शेवा । सत्यप्रिया सक्लभूतहिते रतारच तपा च तुप्यति मदा मुमते मृडानी ॥७॥ भूतादिभूता विपयेन्द्रियाणा परा तथाऽन्त परणारमम्पाम् । म्पदाक्षया पायमनोवाभि मचिन्तयाज्यां सबलायदात्रीम् ।।७२।। अगामेया लोलिगुक्लवर्णा यही प्रजा मृजमाना मुम्पाम् । अजो हर यो जुपमाणोनुमेने जहाना भुराभोगामजोग्य ||३|| [ सूर्य पुराण ३१८ ] प्रभावमेतं त्रिजगज्जनन्यास्तवोदितं भार्गव वेदगुह्यम् । श्रोतु यदिच्छा तदुदीरयस्व विप्रेषु कि वाऽकथनीयमस्ति ।।७४॥ शृण्वन्ति ये वाऽथ पठन्ति माः स्तवात्विताख्यानमिद भवान्या: भुक्त्वाऽक्षयान्कामसुखांश्च तेऽत्र प्रयान्ति शंभोः परमं पदं च ॥७॥ एवं मुनीना गदितं भवान्याश्चरितं शुभम् । श्रुत्वा पुरदर श्रीमान्भक्त्या परमया द्विजाः ॥७६।। आराधयामास तदा पार्वती परमेश्वरीम् । बरांश्च विविधाल्लॅबध्वा चक्रे राज्यमकण्टकम् ।।७।। हे सुमते । मुडानी देवी उन्ही के ऊपर सदा प्रसन्न हुआ करती हैं जो गो-ब्राह्मण के अभ्यर्च न मे तत्पर रहा करते है तथा अपने धर्म मे निरत रहा करते हैं-जो मद्य-मांस सर्वदा पराड मुख रहा करते हैं- शुचि-शव अर्थात् शिव के भक्त हैं तथा सत्य से प्यार करने वाले और सकल भूतो के हित में रति रक्सा करते हैं ७१॥ सतस्त भूतो की आदि भूता-विपयेन्द्रियो मे परा अर्थात् विपयेन्द्रियो से परे रहने वाली- अन्त करण के आत्म स्वरूप वाली-सदा अक्षय-सकलार्थ दात्री आर्या का मन-वाणी और शरीर से भलीभांति चिन्तन परो ।७२। अजा-मेवा-लोहित तथा शुक्ल वर्ण वाली वह्वी-प्रजा पो मृजन करने वाली-मुन्दर रूप से सम्पन्न-मुक्त भोगो वाली उमयो त्याग देते हैं को अन्य-अज-एक सेवमान होता हुआ अनुरायन किया यरता है 1७३। तीनों जगतो की जननी या यह प्रभाव वेदों में भी परम गोपनीय है और मैंने हे भार्गव ! आपको वतला दिया है । यदि श्रवण परने की इच्छा है तो उसे यतलाओ । विप्रो वो कुछ भी न रहने के योग्य नही होता है । जो मनुष्य इस वितानास्य नाम भवानी के साथ या

पार्वती प्रभाव कथन ]
[ ३१६
श्रवण करते हैं अथवा पढ़ते हैं वे यहां पर अक्षय वाम मुग का भोग
परके अन्त ममय में भगवान शिव के परम पद को प्रयाण किया करते
है ।७॥ थी सूतजी ने कहा-इस प्रकार के मुनिगणो के रहे हुए को
भवानी के शुभ चरित यो पुरन्दर ने श्रवण किया था। हे द्विजो!
इन्द्रदेव ने श्रीमान होते हुए भी इसको परम भक्ति के साय सुना था।
और उसी समय में उम महेन्द्र देव ने परमेश्वरी पार्वती देवी वा समा-
रायन किया था। उसने देवी से विविध वरदान भी प्राप्त किये थे और
फिर कण्ठक रहित राज्य पिया या १७६/७७।
। तिथि निर्णयादि कयन ।।
तिथिनो निर्णय मूत प्रायश्चित्तविधि तथा ।
वक्त महंसि चास्माक घ्यामशिण्य महामते ।।१।।
शृणुव्यमृपय म तिथीना निर्णय परम् ।
अनिर्णीतासु तियिषु न किंचित्कम सिध्यति ॥२॥
श्रोत स्मात प्रत दान यच्चान्यत्कम वैदिकम् ।
निर्गीतामु तियिष्येव फर्म युर्वीत नान्यया ॥३॥
प्रायः प्रान्तमुपोप्य स्यात्तियेर्दैवफतेप्मुभि ।
मूत्र हि पितृतुटपर्य पित्र्य चोक्त महर्षिभिः ॥४॥
या प्राप्याम्तमुपेत्यर्फ मा चेम्याम्पिमुहूतिका ।
घमंरत्येप गर्वेषु मपूर्णा ता विदुम्तिथिम् ॥५॥
क्षये पूर्वा प्रयतंच्या वृदो कार्यातयोत्तरा।
तियेस्तस्याम्बिक्षणाया, यवृद्धत्वकारणम् ॥६॥
अटभ्यदलो पटी मृतीया ग धनुदंगी।
यतम्याः परमयुक्ता अपरा: पर्पमिश्रिताः ॥७॥

३२० ]
[ सूर्य पुराण
ऋषियो ने कहा-हे सूतजी । तिथियो का निर्णय तथा प्रायश्चित
की विधि आप हम लोगो को बताने के लिये परम योग्य है क्योकि एक
तो वैसे ही महती मति वाले हैं और आप महामनीपी ब्लासदेवजी के
प्रमुख शिष्य है ।१। सूतजी ने कहा है ऋपियो । आप सब लोग
तिथियो के विषय मे जो परम निर्णय है उराका अव मुझसे श्रवण
कीजिए । जो तिथियाँ निर्णीत नही हैं उनमे किया हुआ कर्म कभी भी
सिद्ध नही हुआ करता है ।१। कर्म श्रुति प्रतिपादित हो चाहे स्मृति
प्रतिपादित हो- भले ही कोई व्रत या दान हो और जो कोई भी वैदिक
कर्म हो इन सभी को निर्णय को हुई तिथियो मे करना चाहिए। इसके
विपरीत कभी भी नहीं करना चाहिए ।३. दैवफलो की इच्छा रखने
वालो के द्वारा प्राय तिथि के प्रान्त का ही उपवास करना चाहिए ।
मूल पितृगण को तुष्टि के लिये ही होता है और महर्षियो ने उसे
पिश्य-इस नाम से कहा है ।४। जिस तिथि शासन काल मे सूर्यदेव
अस्ताचल की जाते हैं वह तिथि यदि ती मुहर्त पाली हो तो समस्त धर्म
सम्बन्धी कृत्यो मे उस तिथि को सम्पूर्ण ही समझना चाहिए ।। क्षय
में पूर्वा तिथि ही करनी चाहिए और तिथि की वृद्धि मे उत्तरा तिथि
को मानना चाहिए । तीन क्षण वाली उस तिथि का कारण क्षय और
वृद्धि का हो जाना ही हुआ करता है । ६। भष्टमी-एकादशी-पष्ठी-
तृतीया और चतुर्दशी इन तिथियो को पर से सेयुक्त ही करना चाहिए।
और दूसरी तिथियां पूर्ण मिश्रित करनी चाहिए । ऐमा शास्त्रो का
सिद्धान्त होता है ।
बृहत्तपा तथा रम्भा सावित्री वटपतृकी।
कृष्णाष्टमी च भूता च कर्तव्या समुखी तिथि ॥८॥
शुक्ले द्वे द्वे तथा कृष्णे युगादी कवयो विदु ।
शुक्ले पूर्वाहिके कार्य कृष्णे चैवापरालिके ॥६॥
नागविद्धा तु या पष्ठी शिवविद्धा तु सममी ।
दशम्यकादशी विद्धा नोगोयव कथचन ॥१०॥

तिथि निर्णायादि क्थन ] |३२१ ज्ञात्वंव सूर्यचन्द्राभ्या तिथि स्फुटतरं व्रती। एकादशी तृतीया च पटी चौपवसेत्सदा ।।११ फलमेकादशी हन्ति विहित दशमीयुता। पारण तु त्रयोदश्यामुल्लड, घ्य द्वादशीव्रतम् ॥१२ पारणाहे न लभ्येत द्वादशी सकलाऽपि चेत् । तदानी दशमी विद्धा ह्य पोप्यकादशी तिथिः ।।१३ शुक्ले वा यदि वा कपणे भवेदेकादशीद्वयम् । उत्तरा तु यति. कुर्यात्पूर्वामेव सदा गृही॥१४ वृहत्तया- रम्भा - सविवी- वह पेस्ट की-कृष्णाष्टमी-मृता- इनको तभी करे जब तिथि समुखी होवे ॥८॥ दो शुक्ल और दो कृष्णो यो यदि लोग युगादी कहा परत हैं । जो शुल हो उन्हें पूर्याहिक में परना चाहिए । और जो कृष्ण हो उन्हें अपराह्निक मे परना चाहिए 18 जा पछी नाग मे विद्धा हो और जो मप्तमी शिवविदा हो और दामी मे विद्धा एकादगी रो तो इनका उपवास कभी भी नहीं करना चाहिए ॥१०॥ न करने या न व्यक्ति यो मूर्य और चन्द्र के द्वारा स्पष्ट रूप स तिथि का ज्ञान प्राप्त य एतादशी-तृतीया और पप्टी का मदा ही उपवाम परना चाहिए ॥११॥ दशमी से युक्त एकादशी विहित 47 वा दमा पर विश करती हैं। द्वादशी व्रत का उल्लट्सन परके प्रयोदशी में पारण होता है । पारण 2 दिन में यदि द्वादपी सम्पूर्ण न भी मिले तो उस समय म दसमी से देय पापी हुई एकादमी तिपिपाही उपनाम पर लेना चाहिए। गुएन पक्ष मे अथवा वृष्ण पदा मे यहिदो एमाली रोष तो उत्तरा एगदगो प्रत सो यनि यो परना चाहिए और महायो को गदा पूर्गही एमादमी पा न करना पाहिए ॥१२॥११॥ दां च पौर्णमाग र सप्तमी पितृवारारम् । पूर्यविनमार्वाणो नरकं प्रतिपद्यते ॥१५ ३२२ । गुर्यपुराण सिनीवाली द्विज ह्या साग्निकः श्राद्धकर्मणि। कुहू सीभिस्तथा शूद्र रपि चान्य रनग्निकं ।।१६ पारणे मरणे नृणा तिथिस्तात्कालिकी स्मृता । निशानतेपु च ग्राह्या प्रदोपव्यापिनी सदा ॥१७ उपोपितव्य नक्षत्र मनास्त याति भास्कर. । यच्च वा युज्यते विप्रा. प्रदोपे हिमरश्मिना ।।१८ सर्वाक्पोडश नाड़यस्तु परतश्च व पोडम । पुष्पकालोऽसकान्तो स्नानदानजपादिषु ।।१६ आसन्नसक्रम पुण्य दिनाधं स्नानदानयोः । रातो सक्रमणे भानाविपुवत्ययने दिने ॥२० सूर्येन्दुग्रहण यावत्तावत्कुर्याज्जपादिकम् । न स्वप्यान च भुञ्जीर स्नात्वा भुञ्जीत मुक्तयोः ॥२१ दर्श-पौर्ण माम~-सप्तमी और पिन्ट वासर इनका जो पूर्व तिथि से विद्धको नहीं पिया करता है वह नरक को प्राप्त किया करता है ॥१५॥ साग्निक द्विजो के द्वारा श्राद्ध कर्म मे मिनी वाली का ही ग्रहण करना चाहिए । स्त्रियो के द्वारा और शूदो के द्वारा और अनातिक अन्यो के द्वारा भी कुहू का ग्रहण करना चाहिए ॥१६॥ पारण में और मनुष्यो के मरने मे तात्कालिको अर्थात् उस समय मे वर्तमान रहने वाली ही तिथि प्रहण करनी चाहिए-ऐसा बताया गया है। रात्रि काल के जोबत होवें उनमे सदा बही तिथि ग्रहण करनी चाहिए जो प्रदीप काल मे व्यपिनी होवे ॥१७॥ जिसके द्वारा भगवान् भास्कर अस्ताचल को गमन किया करते हैं वही नक्षत्र उपवास में ग्रहण करे । हे विप्रो और लो प्रदोष मे हिमरश्मि (चन्द्र) के द्वारा पुज्यमान किया जाना हो ॥१८॥ सोलह नाडियों के पूर्व और षोडश नाडियो परे अर्क (सूर्य) की सक्रान्ति मे स्नान-ज्ञान और जय आदि कर्मों के लिए पुण्य काल माना जाता है ॥१६॥ जो समीप मे ही रहने वाला सक्रमण है। वहीं पुण्य है और समान-दान में दिन का आधा भाग लेवे ३२४ ] । सूर्य पुराण आदि का कर्म करना चाहिए क्योकि दीक्षा मे स्थित होने पर उनको न तो गाव अदि मृतक का आशौच लगता है और न आत्माओ का सूतक ही होता हैं ॥२५॥ जिमका देवार्चन गिव मे है अथवा जिमका अग्नि परिग्रह होता है तथा ब्रह्मचारी और मतियों को शरीर में कभी सूतक नही होता है ॥२६॥ जो महत् राक से प्रयुक्ता हो और जो उपपदा के सहित तिथि हो वह अमावस्या के ही समान होती है और दान तथा अध्यपन कर्मों में उसे ऐसा ही माना जाया करता है ।।२७॥ अपर पक्ष मे मार्गी और पूर्व मन्या शब्दिता ये तीन चतुरष्ट का होते हैं और सप्तमी आदि म अनुक्रम से हुआ करते हैं ॥२८॥ माघे पञ्चदशी कृष्णा नभस्ये च नयोदशी । तृतीया माधवे शुल्का नवमी कातिके सिता ॥२६ एता युगादय प्रोक्ता सर्वाश्च क्षयपुष्पदाः। सिंहवश्चिकयो कुम्भसक्रान्तिपु (1) भवन्त्युत ॥३० क्रमा कृतयुगादीना युगान्ताश्च महर्षय । श्राद्धपक्षे त्रयोदश्या मघास्विन्दु करे रवि १३१ यदा तदा गजच्छाया श्राद्ध पुण्यरवाप्यते । धनुस्नोमीनयुग्माडा पडशीतिमुखा स्मृता ।।३२ अश्वयुक्शुल्कनवमी द्वादशी कातिके सिता । तृतीया चत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च ॥३३ फाल्गनस्य त्वमावास्या पीपस्यैकादशी तया । आपाटस्यापि दशमी माघमासस्य सप्तमी ।।३४ माघ म कृष्ण पच की पक्ष दगी और नमस्य में प्रमोदसी-माघ मे शुक्ल पक्ष की तृतीया-कौतिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिदि- येतिथियो युगा थे आदि मानी गयी है और ये सब अक्षय पुण्य प्रदान करने यात्री मानी गयी हैं। मिह और वृधिन को समातिया में और धुम्भ की समातियो म हाती हैं ॥२६॥३०॥ हे महपिओ क्रम से जन युगादिवे युगान्त होते हैं। पाद पक्ष में त्रयोदशी में-मयामो म तिथि निर्णायादिकथन ] [ ३२५ चन्द्रमा और पर में रवि हो। जब ऐमा हो तब गजाम होतो है और पुण्यो के द्वारा ही प्राप्त की जाया करती है। धनु-म्यो-मीन युग्माइ, पडगी ये प्रमुख बनाई गई हैं ॥२१॥३२॥ अश्व युक्त माम की गुक्त पक्ष की नवमी तथा कात्तिक मास के शुन पक्ष की द्वादगी- चैत्रमाम की और भाद्रपद मास की तृतीया-पाल्गुन मासकी अमा- चम्या तथा पोप माम की एकादमी-आपाह की दशमी और माध माम दी सलमी तिथि ॥३३॥३४॥ श्रावणस्याप्टमी कृष्णा तथाऽपाढी च पूर्णिमा । कार्तिकी फ लानी चैव ज्येष्ठ पञ्चदशी सिता ॥३५ मन्वन्तरादयचंता दत्तम्पाकारिका । मक्रन्तयम्तथा पुण्या भाम्बतो द्वादमेव हि ॥३६ पर्वस्वेतप दानानि धेनुगं नादिकानि च । प्रयच्छन्ति 'द्वजेन्द्र पालभन्न चाक्षया गतिम् ।।३३ पानायमप्येप तिलविधि दद्यापितृभ्य प्रयतो मनुष्यः । श्राद्ध कृत तेन समासहस्य रहस्यमेतस्पिनरो वदन्ति ॥३८ धावा की अष्टमी जो कि कृष्ण पक्ष में हो-आपाढी पूर्णिमा जो मिना मे बानी है और कानिकी पात्गुनी और मेष्ठ मे मित्रपक्ष की पचनी ये मर निथियो मन्यन्नर होने की आदि होने की तिषियों होगी हैं। इन तिथियों में दिये हाए दान बशप होने थाने माने जाया करते हैं । मूर्य देव को पो वां मे दारह गक्रान्तिया होती है वे शिपिया भी परम पुष्प मयी हा परती है ॥३४॥३६॥ इन उपयुक्त पर्यो में जो दान दिये जाते है और हिन्दी को धेनु तथा मंत्र आदि दिये जाां हैं वे अशर गति को प्रपहा परते हैं ।।३। इन पो म निलों में गाप विमिश्रित की जन प्रयत गनुप यो निमगो को देना है उगोदाग हा महान वर्षता पे थानी रेरी गमान हो। -मा यह रम्य मिला है ।।३८॥

मदन-दहन ]
[ ३२७
पार्वती के पनि देव भगवान् के माहात्म्य यो भतीभांति जानते है ।
आपने अतिरिक्त दूसरा कोई भी अन्य इमका ज्ञाता नहीं है-~ऐसा
थुति ने कहा है ।४। क्योकि आप तो ईश की ही गरी मूर्ति हैं और
परमेश्वर ही हैं । अतएव आप ही महेग की महिमा को जानते हैं ।।
मैं आप ही की शरण म जाता हूं क्यो कि आप ही वरद रुद्र-शिव और
परम कारण हैं । आप तपन हैं-ज्योतियो के भानु हैं और अव्यय
ज्योति हैं । आप ही अम्बिका के पति-ईगात-ज्योतिप्मान और दिवाकर
हैं 1६७४
हिरण्यवाहु जटिलमोकारास्य प्रचेतसम् ।
ब्रूहि मे देवदेवश विवाह परमोष्ठिन (८t
काती हैमवती गौरी पुनीना 1 विभो ।।६।।
पृट यत्तत्प्रवदयामि गगुप्य मनुजेश्वर ।
मर्गपापक्षयकर पर या गनातनम् ॥१०॥
नीलग्रीवो महादेव शरण्या गोतिविराट् ।
प्रपद्य त्वा महेगानमग्न शर्व कपर्दिनम् ॥११॥
सा नमामि पर हम पगुभारमीश्वरम् ।
गरा स्मरणादेव देहिना मोक्षमाधनम् ।।१२।।
य एतनामभि रतीति प्रात मप्रयतात्मवान्
तम्य पाप क्षय याति लामोग्नव पवर्धने ।
गर्वगेगविनिर्मुतो जीवेद्वर्गशत नर ॥१३॥

३२८ } [ सूर्य पुराण गति म जाता हूं ॥११॥ मैं पशुभर्ता-ईश्वर-परम हन आपको प्रणाम करता हूं। सब देहधारियो को स्मरण मान से ही मोक्ष का साधन हुआ करते हैं ।१२। जो कोई इन नामो के द्वारा सम्प्रपत आत्मा वाला होकर प्रात काल म स्तुति किया करता है उसके समस्त पाप क्षाप को प्राप्त हो जाया करते हैं और लक्ष्मी यी वृद्धि हुआ करती है। वह मनुष्य सभी रोगो से निर्मुक्त होर सौ वर्ष तक जीवित रहा करता है ।१३॥ एव मनोर्वच श्रुत्वा यदुवाच दिवाकर ॥१४।। तदह सप्रवक्ष्यामि शृणुष्व मुनिपु गवा ॥१५॥ या सा दक्षसुता देवी सती लोक्यपूजिता। त्यक्त्वा दाक्ष शरीर च वभूवाचलकन्यका ॥१६॥ नाम्ना कालीति विस्याता विश्वरूपा महेश्वरी । जगच्चतन्यस्पा च जगच्चैतन्यबोधिनी ॥१७॥ अधिष्ठितरतया काल्या हिमवान्पर्वतोत्तम । पुण्यरथानमभूद्विप्रा मोक्षद सर्वदेहिनाम् ॥१८॥ सिद्धाना च मुनीना च गन्धर्वाणा दिवौकसाम् । आवास किनराणा च स्मरणात्पुप्यदो नृणाम् ॥१६॥ शिव भर्तारमिच्छन्ती तस्मिन्गिरिवरोत्तमे। तपस्तप्तु गता काली शिवा पित्रोरनुज्ञया ॥२०॥ अथास्मिन्नन्तरे दैत्यस्तारको लोककण्टक । जातो दैत्यकु ने बीरो मृत्युरूपो दिवौकसाम् ॥२१॥ श्री स्तजी ने कहा-इस प्रकार के मनुमहाराज वचन को सुनकर भगवान् दिवाकर ने जो कुछ भी कहा था हे मुनि श्रष्ठो । वही मैं अब आप लोगा को बतलाता हूँ आप लोग उसका श्रवण करिये ॥१५॥ नो दश की सुता देवी थी वह सती लोक्य के द्वारा पूजित थी । उसने दक्ष से समुत्पन शरीर वा त्याा परके पुन, अचल (हिमालय) को कन्या होकर वह समुत्पन्न हुई थी ।१६। वहविश्वरूपा महेश्वरी काली इस नाम से विख्यात हुई थी। यह गत की चतर ।

मदन-दहन । [ ३२६ स्पा और जगत् के चतन्य के बोध करने वाली है ।१. उस काली के द्वारा पवंता म उत्तम हिमवान् अधिष्टित हो गया था। ह वित्रो। सब देह धारिया के लिये मोश देन वाना परम पुण्य स्थान हो गया था। वह हिमवान् गिरिराज मिद्धा का मुनिया का गन्धवा का और देवा का तथा किन्नरो का आवास स्थल हो गया था और स्मरण करन से मनुष्यों को पुण्य देने वाला था ।१८ १९ उम उतन गिरिवर म शिव को अपना भर्ता चाहती हुई वह कानी शिवा माता पिता की आज्ञा प्राप्त करके तपरया करने को चनी गयी थी। इससे अननर इमी वीच म तारक दैत्य हुआ था जा समस्त लोग के लिए वन्दव स्वरुप था अर्थात महान दु यदायी था। वह इस दवा का मृत्यु स्वरूप ही बोर दैत्य कुल म ममतन्न हुआ था ।२०।२१। ब्राह्माण तपसाऊराव्य वर तम्मादवाप है। देवा पलायिनारतेन तारकेण वलीयसा ॥२२॥ देवाना घोपितो याश्च व नादपहृताश्च ता । दुखग्गिना मुमतप्ता शमाद्या प्रयितीजस ।।२३।। गता सशका शरण ब्राह्मण निदशेश्वरम् । आगताश्च सुरान्दा तन प्रावाच पद्मज ॥२॥ करमाग्रत्ता मुरा यूरमागता मै ममान्तिके । ब्रूत तत्सरल देवा उपाय वच्मि व स्फुटम् ।।२।। तारवाद्भयमनम्ता शरण देवमागता । यथा मृत्योर्भय देव तम्मान्नस्त्रातुमहमि ॥२६॥ अपि क्षण सुरश्रेष्ठ न लभामो वय मुखम् । सिंगर्षमहाणि हरितारवयारतदा ॥२७॥ वहनिशमविधान्त युद्धमामीरसुदाम्णम् । तयासीन जितम्सेन देवदेवेन चक्रिगा ॥२८॥ तपम्याद द्वारा ब्रह्मा जी की आराधना कर उनग उगो वरदान प्राप्त पिया था। 37 यती तारा देश मो भगा दिया था ।२२।।

३३० ।
[ सूर्य पुराण
पी जो स्त्रियाँ थी गर गदा के वल रो बरहन पर लिया था।
इन्द्र आदि प्रायन ओर याने मप दुमती अग्नि मे गुमाप्त हो गये थे
।२३। इन्द्रदेव महित सादरता देवोरेश्वर ब्रह्मानी पी शरण में
गये थे। ग्रह्मजी ने जर गमागत हुए देवी को देता था तो ये उन में योने
१२४। श्री ब्रह्माजी ने पहा-हे स रगणा ! आप लोगशस यारण से मेरे
समीप में समागा हुए हैं। हे देवो । यह गव म ने आपयताइये गिरागे
नि मैं आपको स्पष्ट गोई उपाय बनलादू।२५। देवी ने कहा-हम लोग
तारव देत्य में भय से डरे हुए हैं और अब आपी दारणागति
उपस्थित हुए है । हे देव । उससे मृत्य, जसा भय है उससे आप रक्षा
करने के योग्य होते हैं ।२६। हे मुरश्रेष्ठ | हम लोग एक क्षण गात्र भी
मुख प्राप्त नही परते है अर्थात एक क्षण को भी हमको चन नही
मिरना है । उस समय में तीस सरस वर्ष तब अहनिरा निरन्तर-परम
दारुण युद्ध हरि और तारव इन दोनो वा हुआ था। तो भी देवी के
देव चकी प्रशु ने उसो नहीं पता था अर्थात इतन लम्बे समय तक
युद्ध होने पर भी विष्णु भगवान ने उग पर विजय प्राप्त नहीं की
थी ।२७॥२८॥
अवध्योज्योमिति ज्ञात्वा ययौ त्यक्त्वा महोदधिम् ।
भ्रान्तचित्तस्तदा शाी गतस्तूर्ण महाबल ।।२१।।
वयमप्पवमेव हि भीमास्त्वा शरण प्रभो।
जागतास्त्राहि नस्तस्मात्मुखदो भव पद्मज ॥३०॥
शृणुध्व मेऽमरा सर्न युप्माक सुखद महत् ।
योऽसो हप्तस्तारकारयस्तताप परम तप ॥३१॥
तस्य दैत्यस्य तपसा दह्यमान नराचरम् ।
दृष्ट्वा तारदानार्थ गतोऽह तारकान्तिकम् ॥३२।।
उक्त मया वर वत्स वरयेति महासुर ।
अन्न वोहैत्यराजो मामभिवन्ध कृताञ्जलि ॥३३॥

मदन-दहन ] अवध्योऽह सुरै सवैर्विवाद्य · पद्मसभव । भवाम्यह यया देव तथा त्ला देहि मे वरम् ॥३४॥ एवमस्त्वित्यह तस्मं वर दत्वा सुरोत्तमा । अन्यच्चोक्ताहतार्थ व कम्माद्वध्योऽसि तद्वद ॥३५॥ यह तारक दैत्य वध करने के योग्य नहीं है-यहां समसार महान् बल वाने शाम भगवान भ्रान्त चित्त बाले होर महा देवि का त्याग करके यहां से शीघ्र ही चले गये हैं ।२६। हे प्रभो । इसी प्रकार से हम भी भयभीत हुए आपती शरण मे ममागत हुए हैं। हम लोग आपके समीप सम पास्थिन हो गये हैं। है पद्मा | आप हमारी रक्षा पीजिए और हमको सम प्रदान करने वाले होइये ।३०। श्री ब्रह्माजी ने कहा- है अमरगणे । थाप मा लोग मेरी बाा म निये । मैं तो पापयो महान् गग देने वाला है। जो यह नारा दत्व है उगने परम तप पिया था ।१६ उग दात्य वै तप से यह ममम्न चराचर दह्यमान हो रहा है। उमगो तप करते हुए देगार उगयो वरदान देने के लिये मैं स्य तारक पे गमी में गया था। यामैंने उगमे पहा था- महाग र वरदान मांग लो । उग त्यगज मसो प्रणाम करके दाय जोडर मशी बोला था । नार गा-३१ मम्भा विष्ण आदि ममम्न नगे द्वारा मी जाऊ। मैं है देव । ग्गामा जाऊ । एमाही वरदा म प्रदान पी1ि:४१ है मनम गा भवगा-यह गैन उगमा वरदान दिया पा मा ग्लिसरा मैंने अब याा भी नही थी Jिपर पानी साताग वर frगम होगा चाहिए। याज्य वा धिदेवा कपर्दी नीललोहित 1 रार रेल गुरा पीत्या मग विमाना गत ॥६॥ भविष्यनि ना जानान्मृत्युरिटोन यार । तभाम्विनि निरनोरा तो मेरमूनि IIEI पिपरामानमार राना ३३२ ] [ मूय पुराण मक्त्वा हरात्मर देव लोको सचराचरे। न त पश्यामि भो देवास्तारक यो पधिप्यति ॥३॥ ब्रह्मणो वचन श्रुत्वा सहस्राक्ष शचीपति । क्थ भविष्यतीत्येवमालोक्य मनमा द्विजा ॥४०॥ गुरुणा देववै सावें पुनरेव स देवराट् । हरम्यैव सुतोत्पत्तावुपायश्चिन्त्यता सुरा ॥४१।। इत्युक्त्वा प्रययुर्देवा शकाद्या ब्रह्मणा मह । मेरोरत्तरत शृङ्ग यन तिति माधव ॥४२।। गुप्तरितष्टत्यमेयात्मा तारकाद्भयपीडित । सब्रह्मकान्सुरान्दृष्ट्वा हृष्ट प्रोवाच माधव ॥४३॥ तारक ने कहा-जो यह देवाधिदेवर पर्दी नोन लोहित प्रभु हैं उनके रेत को विष्णु के साथ सुरो ने पीकर वे सब सगर्म हो गये हैं । इसके पश्चात् जात हुए से मृत्यु अभीष्ट है। दूसरा कोई भी नही है । ऐसा ही होवेगा-यह कहकर मैं इसके उपरान्त मेरु की शिपर पर गमन कर गया हू । सव देहधारिया के शरण्य-विश्वेश्वर- उमाकान्त लोक का श्रेय करने वाले भगवान् शकर के समीप गया या 1.1 चराचर घलोक्य मे हरात्मक देव को छोडकर हे देवो । मै उससे नहीं देखता हू जो इस तारक का वध कर देगा। तात्पर्य यह है कि शङ्कर के शिवाय अन्य काई भी देव नहीं है जो तारक को मार देवे । इस प्रकार के ब्रह्माजी के वचनो को सुनकर शचीयति सहस्राक्ष कहा-- यह 4 से होगा-~~यही मन से विचार करके हे द्विजो गुरुजी के और अन्य देवो के गाथ देवो का राजा पुन कहा-हे सुरो । अव तो आप लोग विचार करो कि भगदान हर के मुत की उत्पत्ति हो जावे । यह कहकर समस्त देवगण ब्रह्माजी के ही साथ म मेरू पर्वत के उत्तर की ओर शिवर पर चने गये थे जहाँ पर माधव स्थित रहा करते है । वे अमेय आत्मा वाले प्रभु तारक के भय मे पीडित होकर गुप्त रूप से ही बहा पर अवस्थित रहा करते है । मापव ने जद ब्रह्माजी के साथ ।

मदन-दहन ] [ ३३३ मे से गणदेवो को देखा तो बहुत ही हर्पित होकर बोले-३६।४० । ४११४२।४३ उपायश्चिन्तितः कोऽत्र ववार्थ तारकस्य हि । अरित चेदुच्यता देवा. शर्श नो जायते यथा ॥४४॥ एव विष्णोर्वच. श्रुत्वा ब्रह्माद्या: सुरसत्तमाः। यथोक्त ब्रह्मणा तेभ्यस्तथोक्त विष्णवे सुरैः ॥४५।। किमिदानी तु कर्तव्यमिति सचिन्त्य देवराट् । सोऽस्मरन्मनसा काममजेयमसुरैः सुरैः ।।४६।। शक्रस्य चिन्तित ज्ञात्वा कामो रतिपति. स्वयम् । शचीपति समागम्य प्राह पुष्पधनुर्धर ॥४७॥ कि कार्य विदशीष्ठ कर्तव्य कि मया प्रभो। तीवेण तपसा को हि स्थानमीहेत तावकम् ।।४।। कि वा काचित्तवाऽऽदेश कर्तु नेच्छति चाङ्गना। ता कामिनी करोम्यद्य तव ध्यानपरायणाम् ।।४६।। भाधव प्रभु ने पहा-इम विषय मे इस तारव के पथ के लिये क्या उपाय सोचा हैं ? यदि कोई भी ऐसा उपाय हो तो है देवो ! बतलाइये जिससे आपका कल्याण हो जावे !४४। श्रीमूतजी ने कहा- इस प्रकार मे भगवान् विष्णु के वचन यो मुनवर ब्रह्मा आदि सय श्रेष्ठ सुरो ने जैसा कि ब्रह्माजी ने उनमे पहा था वह उन्होंने विष्णु के लिये कह दिया था।४५॥ देवराज ने यह सोचा था लि अब क्या करना चाहिए । उसने मन में स्मरण किया था कि यह कामदेव अमुरो और मुरो के द्वारा अजेय ही है ।४६॥ इन्द्रदेव यी इस चिन्ता का विचार परके रतिया पति स्यय ही दापी में पति के समीप में उपस्थित हो गया पा और यह पुरपी के घनुप यो धारण परने वाला यामदेव ने पहा है देवो मे परमयंतप्रमो ! क्या पर्याय मुझे परना पाहिए। यह योग है जो तीरता से आपर स्थान यो प्राप्त करना चाहता है।४५ अपया कोई अजना ऐसी है जो आपके आदेस करना ३३४] [ सूर्य पुराण नही चाहती हो। तो मैं उसी पामिनी को ऐसा बना सकता हू जो आपके ही ध्यान परायण हो जाये ।४६। न कश्चिदरित मे सूरो न मानी न च पण्डित । व्यापयाज्ञि जगत्कृत्स्न ब्रह्माद्य स्तम्वगोचरम् ।।५०॥ अथ किं बहुनोक्तन दुर्वासा वा महामुनि । सोऽपि विद्ध पतत्याशु मद्वाण नरुता पते ॥५१।। जानाम्यह रतेथि सामव्यं पुष्पधन्विन । नून हि सर्वकार्याणि त्वत्त सिध्यन्ति नान्यथा ॥२॥ गच्छ पार्च महेशस्य सुरार्णा हितकाम्यया । चित्त हरस्य सक्षोभ्य पार्वत्या सगम कुरु ॥५३॥ एतधुव हि मे कामिष एव मनोरथ । एतस्मात्कारणात्व हि स्मृत पुष्पधर्नु र ॥५४।। एन शक्रवच थ त्वा बलमान्मकरध्वज । मधो सखा रतीयुक्त पञ्चवाणो मनोभव ॥५५॥ यत्राऽऽस्ते भगवाशमुनिदृष्टया समाहित । निप्फम्प म्वात्मनाऽऽत्मान चिन्तयानो महेश्वर (१५६।। मेरे सामने कोई भी ऐसा शूर नही है न कोई मानी है और न कोई ऐसा पण्डिन है । मैं तो सम्पूर्ण जगत् मे व्यापक रहता हू ब्रह्मा से आदि लेकर जो भी कुछ स्तम्ब पर्यन्त है मैं सभी भ घ्यापक रहता हूँ । ५० हे मरुता पते | इस विषय मे अत्यधिक कथन निप्प्रयोजन ही है । अथवा महामुनि दुर्वाता बहुत शक्तिशाली हैं किन्नु वे भी मेरे वाणो से गीघ्र ही विद्ध होकर गिर जाया करते हैं ॥५१॥ इन्द्रदेव ने कहा- हे रनि के नाय ! पुष्षो के धनुर्धारी आपकी सामथ्र्य मैं खूब जानता हूँ। यह गदमा निश्चित है कि आपसे ही समस्त कार्य सिद्ध हुआ करते हैं अन्य किसी भी साधन से असम्भव ही है ॥५२॥ अव तुम सुरो की हित वामना के लिये महेश भगवान के पास मे जाकर पहुंच जाओ वहाँ पर 1 मदन-दहन ] [ ३३५ तुम्हारा इतना ही कर्तव्य है कि महादेवजी के चित्त मे क्षोभ करदो कि पार्वती पा सङ्गम परो ।५३। मेरा यही कार्य है और मेरा यह ही मनोरथ है । हे पुप्पधनुर्धर । इसी कारण से मैंने तुम्हारा स्मरण किया था ।५४इस रीति से महेन्द्र के वचन को सुनकर बलवान् मकरध्वज --मधुमा समा-रति से युक्त-पांव वाणो वाला-मनोमव ने जहाँ पर भगवान् शम्भु ध्यान की दृष्टि से समाहित थे और अपनी आत्मा से आत्मा का चिन्तन करते हुए महेश्वर निकम्प थे उनको देखा था। 1-५॥५६ प्राप्य शभोरायतनमपश्यन्मकरध्वज । शैला दि द्वारदेशे तु मेरुशृङ्गमिवोदितम् ॥५७।। सर्वाभर गमयुक्त सहनादित्यवर्चसम् । गुलहन निनेन च चन्द्रावयवभूपणम् ॥५८।। वज्रपाणि चतुर्बाहु द्वितीयमिव शबरम् । त दृष्ट्वा मदनो विप्राश्चित्ताक्रान्तस्तदाऽभवन् ॥५६॥ कथ प्रविश्य वक्ष्यामि शमु त्रिदशवन्दितम् । क्थ कार्य वरिप्यामि सुराणा प्रीतिवर्धनम् ।।६०।। चिन्तयित्वा तु बहुधा यञ्चनार्थाय नन्दिन । वापुस्प तन हत्वा सुगन्य मृदुशोतलम् ॥६१॥ प्रविवेश तदा पामो दक्षिणा दिशमाश्रयम् । तेन याम्या दिशि गतो यायुवाति सुपावह ॥६२।। अद्यापि वारणालोज्य सुगन्धो मृदुगीनल । अपश्यत्तम मान मूर्यगोटिमियोदितम् ॥३॥ पारध्यन ने भगयाद गम्भु पे जागा में पगार देगा पाfr द्वार देश में मेरमो शिर ने गमान ही उना गति पिाजो मामला मे गया-गरर मूरों के गमान यम् यसरे-हर में नियूर वि-तीा नेत्री से माय हाय में धारण रि:- [ सूर्य पुराण चन्द्रकला के मस्तक भूषण वारे-चार भुजाओ से मुक्त दूसरे शकर की ही भाति विराजमान थे। ई विप्रो । उस शैलादि को देखकर मदन उस समय मैं चिन्ता से समाक्रान्त हो गया था ।५७।५८।५६॥ कामदेव को यही चिना हुई थी कि मे किस प्रकार से अन्दर प्रवेश करके देवो से वन्दित भगवान् शम्भु को बोलू गा । और सुरो की प्रीति का बढाने वाला कार्य करू गा ।६० नन्दी के वञ्चन करने के लिये बहुत सी रोतियो से सोच करके उस मदन वायु का स्वरूप धारण किया था जो परम सुदर गध वाला-मृदुल और शीतल था ।६१। उस समय मे कामदेव ने दक्षिण दिशा का आश्रय ग्रहण करके अन्दर प्रवेश किया था। उसके द्वारा याम्य दिगा में जाकर वहाँ पर सुख देने वाली बायु वहन करने लगा था । ६२। आज भी इसी कारण से वह यह सुगंध मृदु और शीतल वायु है। वहाँ पर मदन ने उदित करोडो सूर्यों के सदृश भगवान् शम्भु को देखा था ६३॥ सहस्रनयन देव सहस्रतनुमीश्वरम् । नीलकण्ठ गुधाभास शुभ्रखण्डेदुधारिणम् ।।६४॥ जगदुत्पत्तिसह्रारस्थित्यनुग्रहकारिणम् । शुद्धस्फटिक्सकाश विधू मामिव पावकम् ॥६५।। रण्डमालाचित देव सूर्यमालाविभूषितम् । अनौपम्यमसादृश्यमप्रमेयमनाकुलम् ॥६६॥ जयच्चक्षुर्जगद्वाहु जगच्छीर्ष जगन्मयम् । जगत्पाद जगच्छोन मूक्ष्मस्थूल परात्परम् ॥६७।। रुद्र गर्व पशुपतिमुग्र भीम भव द्विजा । महादेव महेशानमष्टमूर्ति जगत्पतिम् ॥६८।। व्यक्ताव्यक्त ग्रिलोवेश पूजित च सुरासुरै । अथ दृष्ट्वा महादेव प्रहृष्टो मारध्वज ॥६६॥ निप्य चापमापूर्य स्थित पश्यन्भवोद्भवम् । एन स्थितस्य कामस्य सहस्राण्ययुतानि पट् ॥७०।।

मदन दहन । भगवान् शम्भु को स्वरूप जो कामदेव ने वहाँ पर देखा था वह मा नयनो स युक्त था और ईश्वर मस्र शरीर वाले देव थे-नीले चण्ठ वाले और मुघा मास तथा परम शुभ्रचन्द्र की वला को मस्त कपट धारण करने वाले थे । इम जगन् की उत्पत्ति म हार तथा स्थिति का अनुग्रह करने वाले थे । गम्भु का स्वरूप शुद्ध मटिक मति के समान स्वच्छ एव यूमरहित पावर क मदृश तेज युक्त या ।६४॥३५॥ नरमुण्टो यी मालाओ से चिनदेव सूर्यों की मानाओ स विभूषित गिन या स्वरूप था । उन भगवान् शम्मु का सरप एमा विलक्षण था कि अनुपम सादृश्य से मुक्त-अप्रमेय एव अनाकुल था। वे इस जगत के नेत्र थे- जगत् वाहु थे-जगत् शीर्ष और जगन्मय थे । जगन् पाद-जगत श्रोत्र. सूक्ष्म एन स्पून तथा परमे भी पर थे।६६।६७। रदशर्न-पगुपति-उग्र- भीम-भव गहशान-अष्टत्ति-जगताति-व्यक्ताव्यक्त-तीनो लोगों के ईग शोर सुर-असुरो के द्वारा पूजित महादेवजी का दर्शन परये मरवन बहुत प्रसन्न हुआ था।६८/६६। मदन ने आप धनुष निवालवर उस चाप धो आरित किया था तथा इम मसार को उत्पन्न करने वाले भगवान् शम्भु को देवत हुए गह स्थित हो गया था। इसी से स्थित हुए कामदेव को छ महन अयुत वयं व्यतीत हो गय थे 1001 गतानि तस्य वर्षाणि मुनीन्द्राश्चित्तजन्मन । तत म भगवान्देवो ने उन्मील्य गह्वर ॥७१|| अपश्यदिरिजा देवीमग्रे विश्वेश्वर मिव । गिरीन्द्रपुत्री तपस मि) प्रमक्ता नज्जयान्विताम् ।।७२।। दृष्ट्वा लिमोति विक पबुद्धया यामोऽयमति विचिन्त्य गर्ने । ज्ञात्वा पितोक्य प्रविष्टचाप नेग्राग्निनाऽमी मदनोऽपि दग्ध ॥७३ है मुनीन्द्रा । मन म ममुत्पन्न हान वान मदन को इसी तरद स स्थित रहल हए बहन म य व्यतीत हो गये थे। भगवान् शम्भु दव ने नेत्रा वा उन्मोक्ति पर विश्यावर देय ने भागे देवी गिरिजा दो दा पा वह गिगेन्द्र पानी तपम म्पित थी और मम्जा से गमन्वित थी। उन्होंने देगा याfr यह यहाँ पर क्या है और सिल बुद्धि में विचार निया इमरे पश्चात् [ सूर्य पुराण था कि यह तो कामदेव है। भगवान् गर्व ने यह विचार कर उस काम यो चाप चढाये हुए देखकर और भलीभांति जानकर उनने अपने तीसरे नेन की अग्नि से उस मदन को दग्य कर दिया था ।७३। - ॥ महादेव वर प्रदान ॥ दग्धे रतिपतौ शभुरुवाचाचलकन्यकाम् । किमह तव देवेशि करोमि मनासि स्थितम् ॥१॥ वर व हि महादेवि दास्याभ्यद्य सुरेश्वरि । मयि प्रसन्ने देवेशि किं दुर्लभतिहास्ति ते ॥२॥ हते तु कामे वद नीलकण्ठ वरेण कि देव करोमि तेऽद्य । विन व कामेन न चास्ति भाव स्त्रीपु सयोभास्करकोटिकल्प ।३ भावस्य हाने सुखमनिकर्ष कथ भवेद्रूहि सुरेशवन्द्य । उवाच भूयो मदनान्तकारी देहे न चाह मदन सुने।। नेग्रस्य चैव ज्वलनात्मकस्य स्वरूपमेत्तदूद किं करोमि ॥४॥ वालेति मत्वा भव भूतनाथ व्यामोह(मुह्य)से किं त्वमनिन्द्यवर्य । स्वतन्नष्टत्तिर्य दि वा तवैपा तदा दहेर्सामपि चानसस्थाम् ॥५॥ यदि विश्वेश्वरो देवो ब्रह्मादीना हर शिव । प्रतारण प्रवृत्तश्च त्को निवारयितु क्षम ॥६॥ नाह प्रतार्या भगवस्त्वामह शरण गता। गतिनन्यिाऽस्ति मे देव तस्मात्मा प्रातुमर्हसि ॥७॥ श्री सूतजी ने यहा-रति के पति वामदेव के दग्य हो जाने पर भगवान् शम्शु ने अन्ल कन्या पार्वती से कहा था-हे देवेशि। मैं थापक मन म स्थित किस मनोरथ को पूर्ण करूं? हे महादेवि अब मुझमे वरदान मांग लो। हे सुरेश्वरि ! मैं आज जो भी आप याचना करेंगे दे दूगा। हे देवेशि । आप यह समझ लो कि मेरे प्रसन्न हो जाने पर इस समार म बुध भी पदार्य दुर्लम नही रहा करता है तो फिर आपको भी रिमी की भी कमी नहीं रहेगी ।१।२१ श्री पार्वती देवी ने कहा-हे नीत कण्ठ । वामदेव के निहत हो जाने पर मैं आज आपरे दिये हुए वरदान से क्या करूंगी । विना कामदेव के रहे स्त्री-पुरुष या भासर बोटि पलप भाव ही नहीं होता है।३। है गुरेश यन्य भी हानि से गुग का गन्निवर्ष होगा~यह आप ही बतलाये । आप भाव महादेव बर प्रदत्न ] [ ३३६ इसके अनन्तर मदन के अन्न कर देने वाले प्रभु ने कहा-हे सुनेत्र ! मैं और मदन देह में नही हैं ! मेरा जो ज्वननात्मक नेत्र है उममा ही यह स्वरूप है मैं क्या करूं।४ देवी ने कहा है भूतो के स्वामी भन ! आप तो अनिन्द्य वर्ण हैं । आप मुझको वाला मानकर क्यो व्यामोहित कर रहे है ? यदि आपको ऐसी ही स्वतल वृत्ति है तो मैं जो आपके सामने म स्थित हूं मुझको भी आप दग्य कर दीजिएगा । यदि विश्व का म्वामी देव हर शिव ब्रह्मा यादि देशो ने भी प्रतारण में यदि प्रवृत्त हैं तो फिर आपको निवारित करने में कौन गमर्थ हो सकता है।५६। हे भगवान् ! मैं आपके द्वारा प्रतारण करने यान नहीं हूँ ! मैं ती आपकी शरण में प्राप्त हो गयी हूं। हे देव । मेरी अन्य कोई भी गति नही है । इमलिये आप मेरा परिताण परने के योग्य होते है 10। त्वमेव चक्ष जगतस्त्वमेव वचसा पति । त्वमेव धाता जगतो विधाता विश्वतोमुख ॥६॥ नमाम्यह देववरं पुराणमुपेन्द्रवेघोमरराजजुष्टम् । शशाङ्कसूर्याग्निमय निनेन घ्यानाधिगम्य जगत प्रकाशम् ॥ त्वा वाड नयाधारमनन्तवीर्य ज्ञानार्णव चैव गुणार्णव च । परापर धामनिधि सुसूक्ष्मनादिमध्यान्तविहीनरूपम् ॥१०॥ हिरण्यगर्भ जगत प्रसूतिं नमामि देव हरिणावचिह्नम् । पिनाकपाशाड् कुशालहस्त कपदिन मेघमहाघोपम् ॥११॥ तमालकण्ठ स्फटिकावदात नमामि शभु भुवनकसिंहम् । दशावकर सुरमिन्धुशीपं शशाङ्कचिह्न नरसिंहदारणम् ।१२ त्वा नमामि शरभरूपधरोरगेन्द्रराजहार चलदलयभूपण हरम्। वरवियुधमुकुटाचिताड् घ्रि नमामि हि हरिचर्मवसन त्वाम्।१३ यदक्षर निर्गुणमप्रमेय यज्योतिरेक प्रवदन्ति सन्न । द्रगम देवमनन्तमूर्ति नमामि मूदम परम पविनम् ॥१४॥ नमामि रद प्रथमाधिनाथ धर्मासनस्थ प्रतिढयस्थम् । तेजोनिधि बालगगाइमौलि कालेन्धन पह्निरवीन्दुनेयम् ।१५ है भगवन् ! आप ही इस जगत वे नत्र हैं और आप ही याणियां पे स्वामी है-आप ही दम जगन व पाता है और थाप विश्वतोमुग विधाता है। मैं परम पुराण देव दर को जो उपेन्द्र वैषा और देवो पदारा सेमिश चन्द्र-गूपं और अग्नि भय तीन नेत्रों पारे-प्यान के

३४० ]
पारण किये
{ सूर्य पुराण
द्वारा अधिगमन करने के योग्य और जगत के प्रकाग है उन आपको
नमस्कार करती हूँ। आप इस वाड मय के आधार है--अनन्न वीर्य
वाले है-जान के सागर है-गुणो के अर्णव हैं-परसे भी पर है-
धाम के निधि है। आप सु सूक्ष्म हैं और आदि-मष्य और अन्त से
विहीन रूप वाले है ऐसे आपको मैं प्रणाम करती हू।१०। आप हिरण्य
गर्भ हैं - आप इस जगत् की प्रसूति हैं-हरिणाङ्क (चन्द्रमा) के नित
गले है ऐसे देव को मैं नमस्कार करती हूं। आपके हाथो मे पिनाक-
पाश, अकुश, मूल धारण किये हुए है-कपर्दा और सहस्रो मेघो के
समान भोप वाले हैं-आप तमाल के सहा नीलकण्ठ वाले तया स्फटिक
मणि के समान अवदात हैं ऐसे भुवन के एक मिह आपको मैं प्रणाम
मरती हूँ। आपके पांच मुख है-गुरासिन्य (गङ्गा) को मस्तक पर
हुए है-चन्द्र के चिह्न वाले है तथा नरसिंह के समान परम
दारुण है । आप शरम रूप के पारी उरगेन्द्र राज के हार धारण करने
वाले-चलायमान वलय भूपण से युक्त हर आपकी सेवा में मेरा प्रणाम
अर्पित है मिह के चर्म के वसन वाले तथा श्रेष्ठ देवो के मुकुटो से सम-
चित घरण वाले आपको मैं प्रणियात करती हूँ। जिनो मन्त पुरुष
भक्षर-निर्गुण-अप्रमेय एम ज्योति कहा करते हैं उन दूरगम-अनन्त मूत्ति
सूक्ष्म घरम पवित्र-प्रमथों अद्यिनाथ धर्म आमन पर विराजमान-
परम पवित्र प्रक्रतिद्वय में स्थित रुद्रदेव को मैं प्रणाम करती हूँ तेज
के निधि-बालचन्द्र को गस्तक पर धारण करने वाले वाल के ईधन
और अग्नि रवि और चन्द्र के तीन नको वाने आपकी सेवा में मेरा
प्रणाम समर्पित है ।१५५
प्रसन्नोऽयाद्रवी वी काली त्रिपुरहा हर ।
वरयस्व वर देवि ददामि तव सुनते ॥१६॥
जीवत्वय महादेव कामो लोकप्रतापन ।
विना यामेन भगवन्नाह याचे यथवन ॥१७॥
भवत्वनङ्गो गदनन्वत्प्रियार्थ सुलोचने।
तेन रूपेण लोपस्त क्षोभणाय भवत्वलम् ॥१६॥
तदोत्यितो वायुरिवाप्रमेयम्त्वनङ्गरूपो मकरध्वजश्च ।
हरस्य वाक्पादुमयोरितश्च सचापवाण मरतिबं भूव ॥१९॥
इति प्रीत्या महेशानी वर दत्त्वा हर स्वयम् ।
स्मरस्य पथवाणम्प तवान्तरधीयत ॥२०॥

महादेव वर प्रदान 1 [ ३१ य पठेदिममध्याय भरत्या देवम्य म निधी। सर्वपापविनिमुक्तो ब्रह्मनोफे महीयते ।।२१।। सूतजी ने कहा-इम प्रसार की स्तुति करने के बाद में त्रिपुर दत्य येहान पसे वाले भगवान् हर परम प्रसन्न होकर पाती देवी से बोले - हे गुरते । हे देवि आप वरदान मांगतो। में भापरी जो भी चाहोगी प्रदान कर दूंगा ।१६। देगी ने महा-हे महादध | गर्व प्रथम तो मैं यही चाहती हु मि गह वामदेव जीवित हो जा। जो लोगों पो प्रतपन पराने वाला है । हे भगवन् । यामदव के जीवित हुए बिना मैं frगी भी प्रसार म कुछ भी याचना नहीं करती हूँ।१७। ईश्वर ने पहा-हे मुनोचने । आपका प्रिय करने के लिए मदन बनन हो जावेगा। पह उसी विना अङ्ग वाले स्वम्प ये ही द्वारा लोग हृदय म क्षोभ समुत्पल परने के लिये पयामालियाना हो जायगा । १३ उमी समय म यायु की सरर मै अप्रमेयन्नाय है य उत्थित हो गया था उस समय म वह मारपज बिना अस सरूप याना ही था। भगवान् हर ये वाक्य स उमा देवी के द्वारा ईरित यह मदा चाप आर धाण ये महित और रति प गाय म रहन यारा हो गया था। दूगरी गैति । भगवान् मरेगान र म्यय गरी के माप वरदान देर तया यस वाण गमर की आग में म्याप म जीवित परसे परी पर अनाहित हो गये थे ।२०। जो पुग्प इस अभ्मा मा भक्ति में गाय पाट पिया पगाहै और देवेयर पी गन्निधि म पदावर गव पानी गे एटारा प्राप्त पर मामे प्रसार म प्रतिष्ठा प्राप्त है ।२०११॥ ॥ माहेश्वर ज्ञान कपन ।। मगच्च यर मनरा देवी रमिता। उभगती रानी गाना रिमन्दिरम् ॥१॥ आपदिग्गिजमा भानाम् । दोपपती जगाय मिनाममाम् ॥ अगासी ममापाय गियापाप गतिमा उवान परया प्री या गिनी पीचर ॥३ [ मूर्यपुराण तपसा तोपित श भुरमेयात्मा सनातन । कीदृशश्च वरो लब्धस्त्वया देवान्महेश्वरात् ||४|| तपसाऽऽराध्य विश्वेश गोपति शूलपाणिनम् । तमेश पति लब्ध्वा कृतार्थाऽस्मीति मे वर || भेदोऽस्ति तत्त्वतो राजन्न मे देवान्महेश्वरात् । सिद्धमेवाऽऽवयोरैक्ग घेदान्तर्थविचारणात् ॥६॥ यदेतदेश्वर तेजस्तनमा विद्धि नगेश्वार । सर्वभूतात्म शान्त विश्वा यन प्रतिष्ठितम् ।।७।। थी मूतजी ने कहा- लौक्य की पूजित देवी पार्वती ने भगवाव शङ्कर से वरदान प्राप्त करके बह भगवती उमा काली अपने पिता के मन्दिर मे प्राप्त हो गयी थी।। चन्द्रमा की कान्ति के सदृश मुख वाली उम उमा को गिरिराज हिमाचल ने देखा था जो वि सम्पूण जगत को दीप्त कर रही थी और विद्युत के समान प्रभाव वाली थी। है द्विजो ' गिरिराज ने अपनी गोद मे वाली को पिठाकर उसके शिर पर आघ्राण किया था। फिर पर्वतेश्वर ने परमप्रीति के साथ विश्वेश्वरी से पूछा था । ३। हिमालय ने कहा-अमेय आत्मा वाले याले भगवान शम्भु जो दि सनातन प्रभु है तुम्हारी तपश्चर्या मे तोपित हो गये है। हे पुनि यह बतलाभो कि तुमने महेश्वर देव से किस प्रकार का वरदान प्राप्त रिया है ।१४१ देवी ने कहा- मैंने अपनी तपस्या के द्वारा विश्वेश्वर पशुपति शूलपाणि का समाराधन करने और उन्ही ईश को आना पति प्राप्त परसे मैं कृतार्थ हो गयी हूं-यही मेरा याचित रिया हुआ पर- दान था ।। हे राजन् तात्विक रप में मश्वर देर मे मेरा भेद नहीं है। हम दोनों की एकता तो सिद्ध ही है और यह अभेद वेदान्त के अर्थ वे विचार करने स ही होता है ।। है नगेशर जो यह ईश्वरीय तेज है उमी यो मुझे आप ममा लीजिए। जिग तेज में मयं भूनागर परम शान्त विस्य प्रतिष्टित रहा करता है।

माहेश्वर ज्ञान कथन ] [ ३४३ अह सर्वान्तरा शक्तिर्माया मायो महेयरः । अहमेका परा शक्तिरेक एव महेश्वर. 11८॥ नाऽवयोविद्यते राजन्भेदो वै परमार्थतः। एकाह विश्वगाऽनन्ता विश्वरूपा सनातनी ॥६॥ पिनाकपाणेर्दयिता नित्या गिरिवरोत्तम । झातु न शक्ता प्रह्माद्या मत्स्वरूप हि तत्त्वत.॥१०॥ इच्छाशक्तिरह राज्ञानशक्तिरहं पुनः । कियाशक्ति प्राणशक्ति शक्तिमान्भगनेत्रहा ॥११॥ कूटस्थमचल सूक्ष्म सत्य निर्गुणमव्ययम् । आनन्दमक्षर ब्रह्म तात जानीहि मत्पदम् ॥१२॥ तत्पद ते प्रपश्यन्ति येपा भक्तिर्मयि स्थिरा। नान्यथा क्मकाण्डैश्च तयोभिश्चापि दुप्फर ॥१३॥ गिवस्य परमा शक्तिनित्याऽऽनन्दमयी ह्यहम् । ब्रह्मणो वचनाद्राजन्तभव दक्षकन्यया ॥१४॥ मैं सन्तिरा शक्ति माया हूँ और महेश्वर मायी है । मैं ही एक परा शक्ति हूं और महेश्वर देव भी एक ही हैं ॥८॥ हे राजन् । हम दोनो का परमार्थ रूप से कोई भी भेद नहीं है। मैं भी एक ही है जो कि विश्व मे गमन करने वाली-अनन्ता-विश्वरूपा और सनातनी है। है गिरिवरो में उत्तम । पिनाद पानिको मैं नित्या दायिता हूँ। ब्रह्मा आदि देवगण भी तात्त्विक रूप से मेरे स्वरा को जानने म समयं नही हैं ।।१० है राजन् ' में ही इच्छा मक्ति हू और पुन भान कोक्ति भी हूँ। मैं क्रिया करने की शक्ति है -याग मति हूँ और मग ये नेत्रों ये हनन करने वाले महेश्वर पूर्ण सनिमान हैं ।११॥ हे तात ' मेरे पद को आप पूरस्य--अचल-गुदम--सत्य-~-निर्गुण-अव्यय-मानन्द अक्षर और ब्रह्म जानिये ।१२। उस पर वो ये ही मनुष्य देग मरते हैं जिनकी मेरे विषय में स्थिरा भत्ति होती है । अन्य निमी भी प्रसार के ३४४ ] [ सूर्य पुराण साधनों से नहीं देख साने है। बडे-बडे कर्म काण्डों के द्वारा तथा परम दुधार तों से भी उसे नही देव पाते हैं ।१ । भगवान् शिव की परमा नित्या और आनन्दमयी शक्ति है ही हूं। हे राजन् । ब्रह्माजी के वचनादेश से मैं उस समर मे प्रजापति दक्ष की कन्या हुई थी ।१४॥ शूलिनो देवदेवम्य निन्द्रक परमेटिन । विनिन्द्य पितर दक्ष जानाऽम्मितव कन्यका ॥१५॥ स्वेच्छययावतारो मे नव चान्यवशापित । तस्मान्मा परमा शक्तिमित ज्ञात्वा मुसो भव ।।१६।। नाशयामि तवाज्ञान भववन्धनकारणम् । दिव्य ददामि ते ज्ञान दु खनयविनाशकृत् ।।१७।। एव देव्या प्रसादेन हिमवान्पर्वतेश्वर । लब्ध्वा माहेश्वर ज्ञान जीवन्मुक्तस्तदाऽभवत् ॥१८॥ अपश्यदाखिल विश्वमुमामहेश्वरात्मकम् । नित्यानन्द निविभागमात्मान च तदात्मकम् ॥१६॥ मानगेयादिरहित भेदाभेदविवजितम् । वाह्याभ्यन्तरनिर्मुक्त शुद्ध निर्गुणमव्ययम् ।।२०।। न समीप न दूरस्य न स्थूल नापि वा कृशम् । न दीर्घ नापि वा हस्व न पीत नापि लोहितम् ॥२१॥ विगलबारी देवी के भी देव परमेष्ठी की निन्दा करने वाले पिता दक्ष को विनिन्दित से मैं आपकी नपा के रूप मे सगुलन्न हुई हूँ १५॥ हे पिताजी | मेरा यह अवतार स्वेच्दा ही में हुआ है अन्य किसी वरा से नही हुआ है। इस कारण से मुझनो परमाशक्ति समझार आप मुवी होइये ।१६। सांसारिय बन्धन का कारण जो आपा अज्ञान है उसका मैं नाश कर देती है। और फिर मैं आप परम दिव्य ज्ञान दे दूगी जो तीनो प्रकार के दुपा का पिनाग करा वाला है ।१७। इम प्रकार से देवी के प्रमाद में पर्वावर हिमवान् महेश्वर ज्ञान को प्राप्त माहेश्वर ज्ञान क्थन ] कर उसी समय म जीवन मुक्त हो गया था। फिर तो उसने सम्पूर्ण विश्व को ही उमा महेश्वरात्मा देवा था। और अपने आप को भी नित्यानन्द से युक्त-निर्मिभाग तथा तदम्मक देखा था (१९r उसने शिव को किस रूप म देखा था यह बतलाते हुए रहते है कि मित्र या स्वरूप मानमेवादि मे रहित है-भेदागेद मे वजित है---वहायाम्यन्तर से नियुक्त है--सुद्ध-निर्गण और अव्यय है ।२०। न वे समीप म हैं और न दूर मे ही स्थित है और न स्यूत है और न कृश ही हैं। न वे दीर्य हैं और न ह्रस्व है - पोर हैं और न मोहिा है।२११ न नीन न च कृष्ण च न मुक्त नापि यमुरम् । पाणिपादविनिर्मुक्त न थो (यौ) न न च चाशुपम् ॥२२॥ अनामिकमजिह्व च मनोयुद्धविवजितम् । बन्धमोक्षविनिक्ति बोधायोपविजितम् ॥२३॥ नाचारस्य न नाभिस्य न हृदिस्य न कण्ठगम् । नापि नामाग्रग विप्रा न घूमध्यगत हि तर ॥२४॥ ननाडीग्रयमध्यस्थ दादगान्तगत न च । नोतिन्तुनिभ तत्त विद्य पुगिम न च ॥२५॥ सर्वोपाधिविनिर्मुक्त चतन्य मवा शिरम् । तदेवेदमिद विश्व तम्मादन्यन्न विद्यते ।।०६|| आम्याय परमा भक्ति गित्रयो पादपङ्कजे । पित्रोहिरण्यगर्भम्य शाङ्गिाश्चा प मुझेती ॥२७॥ शिव या स्थापन नीन है- कृष्ण है-न मुक्त है और न पर ही है। पाणि और पार म विनिमुन - श्रोत्र है अर्थात श्रोत्रा का विषय है और न पाप अनि शुभी दे दाग देगे जान यारे । नायिका मेग्नि-रिक्षा में ही तया मा और बुद्धि से यजित है १२ नरिगी आधार पर माननानि म यिा और Tre मगमारने वाले ही। यिो मागिता अन

[ सूर्यपुराण
भाग में ही रहने वाले है और न भौहो के मध्य मे ही
रहने वाले है ॥२४।। उनका स्वरूप तीनो नाडियो के मध्य में
भी स्थित रहने वाला नहीं है और द्वादशान्तगत भी नहीं है । न तो
ऊकितन्तु के ही सदुश है और न विद्यत् के पुज के तुल्य ही है ॥२५॥
सर्वन गमन करने वाले-चंतन्य स्वरूप शिव सभी उपाधियो से
विनिमुक्त है। वही मद विश्व है क्योंकि उनसे अन्यत् कुछ भी नहीं
है ।२६॥ शिवा और शिव इन दोनो के चरण कमल में परमोत्कृष्ट
भक्ति को समास्थित करके ही जीवन बिताना चाहिए। ये दोनो
हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी थे और हे सुव्रत ! भगवान् शाङ्गी के भी
माता-पिता है ।२७।
॥ साम्ब विवाह मंडप वर्णन ।
अह्वानयत्ततो विश्वकमाणं पर्वतेश्वरः।
विवाह्मण्डपं कर्तुं नानाश्चर्यविभूपितम् ||१||
तेनाऽहूतस्ततः शीघ्र विश्वकर्मा महामतिः।
प्रययी हिमवत्पा– कुशलो विश्वकर्मणि ॥२१॥
दृष्ट्वाऽथ विश्वकर्माण हृष्ट पर्वतराट् स्वयम् ।
वागतासनपाद्याद्य सादरस्तमपूजयत् ॥३॥
विधिवत्यूजयित्वा तु विश्वकर्माणमयबीत् ।।४।।
विश्वामन्महाप्राज्ञ मर्वशास्त्रविशारद ।
यत्कारणादिहाहूतो मया त्वं तहवीम्यहम् ॥५॥
विश्वेश्वरी महादेवो भगवान्नीललोहितः ।
आगमिष्यति विश्वंशी परिणतु शिवः स्वयम् ।।६।।
मण्डपरतय कर्तव्यो यज्ञार्य हि हिरण्मयः ।
योजनायुनविरतीर्णमनेकाश्चर्यसयुतम् ॥७॥

माम्न विवाह मदप वर्णन ]
श्री मूतजी ने कहा-इसके पश्चात् पर्वतेश्वर हिमालय ने विस्व-
वर्मा वो बुलवाया था और उसे आज्ञा दी थी कि वह अनेक अद्भुत
भाश्चों से विभूषित विवाह का एर मण्डप विरचित करें। हिमाचल
के द्वारा चलाये गये विश्वसमां ने जो महनी मनि वाला था शीघ्र ही
हिमाचल के समीप में गगन लिया था। विश्वकर्मा ने विश्व के मापूर्ण
यमों में बहुत ही पुगा था ।रा विश्वामा यो गमागत हुए देगार
पवंतो का राजा स्थय परयन्त हपित हुए थे। विश्वकर्मा का स्वागत-
यासन यादि के द्वारा बडे ही आदर में गाय उनका अपचन किया
था 1३। हिमाचन ने विधान के साथ उनका अन वरवे विश्ववर्मा से
यह रहा पा--) पर्वतराज ने कहा है विश्ववमन् ! आप नो
महान मनीपी और मेधानी है और ममी नास्त्रों के आप पण्डित भी
हैं। जिस कारण मन आज आपतो यहा बनाया है उसे भी मैं
यापको यतलामा है। विश्व के ईश्वर महादेव जो मिजोवन भगवान
नील लोहित है वे गाधर गिय स्वय ही विश्वंगर पायंनी रे माय
परिणय परने के लिये यही पर पदार्पण परेंगे। अनव यहाँ पर उग
विवाह या वे पाय या मागदन वा य fur हिग्य मा की
ग्पना परनी चाहिए। वह मप्र महगार गोग्न में यरावर
विस्तीर्ण और अनेराने आदचों ग ममन्वित हाना पाहिए
हमारेण मळम्प प्रीतिभवति यथा।
तया लमप नीघ्र विश्वेश्वरप्रियम् ।।
एपमुक्तारतदा तेन गिरिणा विधामा।
वार मन्डप नीघ्रमजदत्यनविग्रहम् ॥६॥
गम्भहें मगन में पभि गृर्गनिमें
इन्द्रनी मदिराविपि १०॥
मानियनन गटानगगी।
पटिiमिनानि मुसासमतियां ॥३१॥

३४० ] [ सूर्यपुराण चामरालकृतरुच्चैदर्पणविविधरपि । सूर्यविम्बप्रतीकाशश्चन्द्रविम्बसमप्रभः ॥१२ ध्वजमालाकुल दिव्य पताकानेकगोभितम् । रत्न सिंहशार्दूलैगजवणनिरन्तरम् । १३ रचित मण्डप दिव्य प्रिय त्रिपुरविद्विप । रुद्राणा च तथा रूपगन्धर्वाप्सरसा तथा ।।१४ आप यहाँ पर एक ऐसा उत्तम मण्डप बनाइए कि जिसे देखते ही सबकी प्रीति उत्पन्न हो जावे। आप कृपया ऐसा ही एक मण्डप बहुत ही शीघ्र निर्मित कर दीजिए जो भगवान् प्रभु को भी बहुत प्रिय लगे Het गिरिराज हिमालय के द्वारा जब इस रीति से कहा गया तो वह विश्वकर्मा ने विवाह के मण्डप वो जो रत्नो के द्वारा विरचित विग्रह वाला था बहुत ही शीघ्र बना दिया था l वह मण्डप ऐसा बनाया गया था जिसमे सुवर्णमय बहुत से स्तम्भो से युक्त था-विचित्र मणियो जो सूर्य के सदृश दीप्ति वाली थी उस मण्डप मे जडी गयी थी। दिव्य इन्द्रनील मणिया वैदूर्य विद्रम-मोती वचनील मणि और चन्द्रकान्त मणिया भी उममे सचिन की गयी थी। स्फटिक-विद् म मणिया उसमे लगाई गयी थी जो मोतियो की झालरो के सहित लटकी हुई थी ॥१०॥११॥ वह मण्डप चमरी से अलवृत था और अनेक भांति क मेचे-ऊचे दर्पण उसमे लगे हुए थे। जो सूर्य विम्ब के तुल्य थे और चन्द्र विम्ब के समान प्रभा से युक्त थे ॥१२॥ वह मण्डप दिव्य मालाओ मे घिरा हुआ था और वह अनक पतावाओ से भी शोभा वाला था। उग मण्डप में रहनो के बने हुए अन सिह सार्दूल और गज विद्यमान थे जो निरन्तर ही शोभायमान हो रहे थे ॥१३॥ वह रचित मण्डप परम दिव्य और भगवान शिव का बहुत ही प्रिय था तथा गन्धर्व- अपसराय और मद्रो व रूपी से भी युक्त पा॥१४॥ देवश्च । मनोहार्यमंत्यंज च तथा परं । मालाभि. स्तम्प विप्रा रत्नज कुमुम,सम् ।।१५

साम्म विवाह मडप वर्णन ]
[ ३४६
क्वचिच्चामीकरणाथ हृद्या भूमि विनिमंमे।
क्वचित्पद्मदलाकारा मन्द्रायुधसमप्रभाम् ।।१६।।
क्वचिन्नीलोत्पलाभासा नीलजीमूतमप्रभाम् ।
मनसंव यथा ब्रह्मा विश्वमेतद्धि निर्ममे ॥१७
क्वचिद्वन्धूकसकाशा दीप्ता विद्रु मसनिभाम् ।
अनेकाकारविन्यासैस्ततो धानी विनिर्ममे ॥१८
क्वचित्कलशविन्यास. क्वचित्स्वस्किभूपित. ।
हरिचन्दनगन्धाद्य कर्पूरोद्गारगन्धिभिः ॥१६
जातीपाटलपद्माना चम्पकाना सुगन्धिभि ।
आसनविविधै पूर्तश्चन्द्रजीमूतसनिभै ॥२०
उदयाकसमाकारर्मेरुशृङ्गोपमैभृशम् ।
तमालचम्पकाभैश्च इन्द्रनीलमयंस्तथा ॥२१
देवो के द्वारा मनोहारी मयों के द्वारा तथा परो के द्वारा मालाओ
से-स्तवको से तथा रनो से निर्मित कुमुमो से बहुत अधिक शोभित
था । उस मपटप म पिसी स्थल मुवर्ण से एक बहुत मनोहर भूमि का
निर्माण किया था। पिसी जगह पर पग दल के आकार वाली तो
किसी स्थान पर इन्द्र धनुष के समान प्रभा वाली भूमि का निर्माण
पिया था ।।१५।।१६।। यही पर नीलोत्पनभा वाली बनाई थी जो यही
पर नीले मेघो को प्रभा के तुल्य भूमि की रचना की गयी थी जिस
प्रकार से मन के द्वारा ही श्री ब्रह्मा जी ने इस सम्पूर्ण विश्व की रचना
भी थी ॥१७॥ कही पर वपूर पुष्प वे महा दीप्ता तथा विमी जगह
पर विटम में समान भूमि की रचना की थी। ऐमें अनेर आरारी के
विन्यासो द्वारा उस पानी का निर्माण किया था ॥१८॥ कहीं पर
मलगो के तुन्य विन्यासो से तया वही पर स्वास्तियो गे भूपिन विन्यामो
-हरि पन्दन गन्ध आदि से सपा कपूरोपदार ये गन्धी म और जाती-
पाटन-गणी की एष पम्मी मुगन्धों में उनकी रचना की गयी थी।
पन्द्र और जीमूनो रे सुन्ध विविध मासरे द्वारा जो परम पून

:५० ] [ सूर्यपुराण निर्माण किया गया था ।।१६॥२०॥ उदय के समर मे जैसा सूर्यदेव का आवार होता है उनके समान विन्यासो से तथा मेरु पर्वत के शिखरो के महश विन्यासो से और तमाल-चम्पा के आभास वाले तथा इन्द्र नीलमय आभामो वाले विन्यासो से रचना की गयी थी ।।२१।। सिन्दूरच यसकाशजपाकुसुमसनिभैः । सध्यारागनिभश्चा-यै राडिमीकुसुमप्रभ । हेमकुम्मनिर्भश्चन्य मुक्ताफलनिभैपि ॥२२ तारकापुचमकाशै पद्मनीलेन्द्रनीलजः। तत्र व मण्डपे दिव्ये तीयस्थानान्यकल्पयत् ॥२३ दीपिकाम्तोयपूर्णाश्च क्षीरपूर्णास्तथैव च । दधिह्वदाननेकाश्च सुधासपूरितानि वै ॥२४ घृतपूर्णा महानद्यो रत्नमापानमण्डिताः । वृक्षाश्च कामिकान्दिव्यान्दीपिकाणा तयोभयोः ।।२५ असृजत्कीडनार्थाय सदा पुष्पफलान्वितान् । भक्ष्य र्नानाविधैदिच्यैः फलितान्मुनिपुगवाः ।।२६ कदलीखण्ड मध्ये तु तमालगहनेष्वपि । क्रीडावापीः सुशोभाढयास्तथैवाशोकसकुलाः ॥२७ दोधिकाणा तटे रभ्ये तरुणाः स्निग्धशाखिपु । दोलाचऽऽवन्धयामासुमुतादापभिरुनले. ॥२८ सिन्दूर के ममूह सहश-जया के कुमुमों के समान-सन्ध्याकाल के राग के तुल्य-दाडिम के पुष्पो के सहा-सुवर्ण के कुम्भो के समान-अन्य मुक्ताफलो के समान-तारकाओ के समुदायों के सदृश और पानीलेन्द्र नीलजो के तुल्य विन्यासो से उस भूमि की अनेक प्रकार की भूमि वा निर्माण वही पर दिव्य मण्डप में करके जल के स्थानो को भी कलना की गयी थी ॥२॥२३॥ यही पर ऐसी दीर्घकाएं बनायो यी जो जल से परिपूर्ण थी और शोर से भरी हुई थी। वहाँ पर अनेक ह्रददधि से पूर्ण एव गुपा से सपूरित ये ॥२४॥ बहुत सी महा नदिया वनापी पी साम्ब विवाह मडप वर्णन ] घृत मे परिपूर्ण थी और जिनके सोपान रत्नो से मण्डित बनाये गये थे। उन दीर्घकाओ के दोनो ओर उत्तम एव दिव्य कामिक वृक्षो की रचना की गयी थी ॥२॥ हे मुनि श्रेष्ठो । सदा पुष्पो और फलो से युक्त क्रीडा करने के लिये नाना प्रकार के भक्ष्य एव दिव्य फलो से लदे हुए वृक्षो की रचना की थी ॥२६॥ कही पर केली के खण्डो के मध्य मे और तमालो के वृक्षो के झुरमुट में क्रीडा करने के लिये वापी बनायी गयी थी जो सुन्दर शोभा से युक्त और अशोक के वृक्षो से सकुल थी ॥२६॥२७॥ उन दीपिकाओ के सुरम्य तट पर स्निग्ध शाखियो पर उज्ज्वल मोतियो की लडियो से दोलाओ का बन्धन किया था अर्थात् झूले डाले गये थे ॥२८॥ रमणीयानि दिव्यानि मनस्तुष्टिकराणि च । उद्यानवनखण्डानि स्थाने स्थाने ह्यकल्पयत् ।।२६ लोक्यतिलके तस्मिन्हेमपीठस्य मध्यगाम् । सिदश्च विघृता श्वेत. सहस्रदलमण्डिताम् ।।३० पारिजात माणा च मञ्जरीभिरलकृताम् । इन्दनीलमयी वेदि चारसोपानभूषिताम् ।।३१ शतयोजनविस्तीर्णा स्तम्भश्च कलशान्विताम् । नानानेकाप्सरोभिश्च रत्नजा दिव्यरूपिणीम् ॥३२ पोनोरुजघनास्ताश्च पीनोन्नतपयोघरा । चामराग्रकरास्तास्तु हारावलिविभूपिता: ३३ वीणावेणुकराश्वान्या काञ्चीगुणविराजिताः। चञ्चलायतनेवाश्च तिलकालकमण्डिताः ॥३४ मध्यक्षमाश्च विम्बोष्ठी. कमलोत्पलमालिका । अनेकाकारविन्यासनिममे ताः पृथक्यम् ॥३५ एव हि दिव्य. सुरमुन्दरीभिनानाप्रयोगविविधश्च चित्र। मोनियाभिरालाल येदि स्वस्तित्यकार:

३५२
[ सूर्यपुराण
इस तरह मे परम स्मणीय-अत्यन्त दिव्य मन की तुष्टि करने वाले
उद्यान वनो के खण्ड थे जो कि स्थान-स्थान पर विरचित किये गये थे
॥२६॥ लोक्य मे प्रमुख उसमे हेमपीठ के मध्य में स्थित श्वेत सिंहो
से विधृत और सहस्र दतो से मण्डित-पारिजात दुमो की मज्जरियो से
अलंकृत वेदी इन्द्र नील मणियो से परिपूर्ण थी और परम सुन्दर सीढियो
मे भूपित थी ।।३०॥३१॥ वह वेदी एकसौ योजनो के विस्तार से युक्त
थी और स्तस्भो तथा कलशो से समन्वित थी। उस पर अनेक प्रकार
वी अनेक अप्सराऐ भी विद्यमान थी और वह रत्नों के द्वारा निर्मित
की गयी थी तथा दिव्य रूप वाली थी ।।३२।। जो अप्सराएं वहाँ पर
थी वे पीन अरजघनो वाली थी तथा पीन एव उन्नत स्तनो वाली थी।
उनके हाथो के अग्रभाग मे चमर लगे हुए थे और वे हारो की पक्तियो
से विभूपित थी ॥३३।। अन्यो के हाथो मे वीणा तथा वेगु था और वे
काजी गुणो से विराजित हो रही थी, बनने नेत्र बहुत ही चञ्चल
तथा आयत ये और तिलक तथा अलको से मण्डिन थी ॥३४॥ जिनके
मध्य भाग क्षाम थे-विम्व फल के समान जिनके ओप्ठ थे-जी
फमलोत्पल की माला धारण करने वाली थी ऐसी अनेक भाकारो और
विन्यासो से पृथक् पृथक् निर्मित की गयी थी ॥३५॥ इस प्रकार से
परम दिव्य सुरो की मुन्दरियो से-अनेक तरह के प्रयोगो से और विविध
भाति के चित्रो से जो मन को अभिराम लगने वाले थे और नेत्रो को
भी मुन्दर प्रतीत होते थे उनसे युक्त वेदी बहुत ही दोन तयार करदी
पो ॥३६॥

कालाग्न्याद्यागमन कथन )
[ ३५३
॥ कालाग्याद्यागमन कथन।
मण्डप निमितं श्रुत्वा शंकरो विश्वकर्मणा ।
शलादिमप्रवीद्द यो विश्वे शो विश्वपूजित. ॥१
हितार्थ सर्वदेवानामस्माकं च विशेषाः।
विवाहयज्ञ मारब्धो नगराजेन धीमताः ॥२
दानार्थमद्रिकन्याया' प्रस्थितो हिमवान्स्वयम् ।
अह तय गमिप्यामि सुत्रह्मादिभिः सह ।।३
त्वमिहाऽवाहय सुरान्कालान्यादीन्दिजास्तथा।
द्वीपाश्च सागराश्चैव पवतायच नदीस्तथा १४
मण्डप सुन्दर यत्र निर्मित विश्वकर्मणा ।
तस तिप्टत्युमा देवी मम ध्यानपरायणा ॥५
विद्युल्लतेव भागन्ती चन्द्रकोटिनिभानना।
एवमुत्तो महेशेन नन्दी मूर्यायुतप्रभ ॥६
नता विश्वेश्वर देव ध्यानाम्टम्सदाभवत् ।
ध्यात क्षणात्ममागात कालाग्निविश्वदाहक ॥७
श्रीगूनजी ने यहा-भगया दूरविवर्मा के द्वारा निर्माण
निये हर मण्डप का वृतान्न गुनार विश्वपूजिन विश्वेश्वर ने
पलादि से कहा था-श्री भगवान् ने कहा-समस्त देदों की मलाई के
लिये और विशेष रस में हमारे ही हित के सम्मान करने के लिए
नगराज ने जो यहन ही पीमान है विवाह पन का प्रारम्भ निया
अहिंमन्या ये दान परने के लिये हिमरान स्वय परिपत
एव में ब्रह्मा आदि समस्त गुरोरे ही गाय में कार पर गमन
मरगा ३९ अनाय नुए यहा पर पानानि यादि सब मुरोका और
हिमो घा, दोरा, गागरों , परंतों वा नपा नदियां बरा मागहन
परोपर विवाद्विारा एक मुहर मारिया
गया। यहां पर समादेश मेरे ही थान में पराग होर था।
प्रभु

३५४ ]
[ सूर्यपुराण
वह देवी विद्युत् की लता के समान दीप्तिमती हो रही है और उनका
मुख करोडा चन्द्रमाओ के समान सुन्दर है । इस प्रकार से जव नन्दी से
कहा गया गया था तो वह नन्दी जिसकी छटा दश हजार सूर्यों की
प्रभा के समान थी। उसने विश्वेश्वर देव को प्रणाम किया था और
फिर वह उस समय मे ध्यान मे समारूढ होगया था। जैसे ही ध्यान
किया गया था वैसे ही विश्व का दाहक कालाग्नि वहाँ पर क्षणमात्र मे
ही समागत हो गया था ।।४-७॥
रुद्र. परिवृतो देवः कोटिकोटिगणेश्वरैः ।
ततोऽब्रवीत्स कालाग्नि. सर्वज्ञ नन्दिकेश्वरम् ।।
किमर्थमहमाहूनो देवदेवेन शभुना ।
उपस्थितो वा प्रलयः सहरिष्यामि तत्क्षणात् ।।
एवमुक्तस्तदा तेन शैलादिस्तमथाब्रवीत् ।
प्रलयार्थ न चाहूतस्त्व विश्वेशेन शभुना ॥१०
ग्रहीप्यति गिरेः पुत्री पत्नीत्वेन महेश्वरः ।
तदर्थ त्वमिहाहूतो ब्रह्माद्याश्च दिवौकसः ॥११
नन्दिनो वचन श्रुत्वा कालाग्निरिदमप्रवीत् ।
द्रष्टुकामा वय सर्व ब्रह्माद्याः शूलपाणिनम् ।।१२
शीन दर्शय शैलादे निर्वृताः स्मो यथा वयम् ।
विज्ञापय महादेव ब्रह्माद्याश्चाऽऽगता इति ॥१३
सर्वे त्वधाननिरताः सर्वे त्वद्दर्शनोत्सुकाः ।
कालाग्निप्रमुपाणा च वच. श्रुत्वा गणाग्रणीः ।।
प्राह विश्वेश्वर देव स्निग्धगम्भीरया गिरा ||१४
वह देव रुष्ट्री से परितृत तथा और उसके पारो ओर करोडो गणे.
श्वर विद्यमान थे। इसके पश्चात् वह कालाग्नि ने सर्वेश नन्दिवेश्वर
में पहा पा-मुझे यहाँ विस प्रयोजन के लिये बुलाया गया है जो कि
देयो के भी भगवान् गम्भु ने मुझे याद दिया है ? मैं उपरियन होगया
है कि सरक्षण मे ही में सहार कर दूंगा और प्रलय हो जायगा। जय

कालात्याद्यागमन कयन]
{ ३५५
इस रीति से कालाग्नि ने कहा वो शलादि ने उससे कहा था कि इस
समय में विश्वेश देव शम्भु ने तुमको प्रलय करने के लिये नही बुलवाया
है । आज सो महेश्वर द्रभु गिरिराज की पुत्री पार्वती देवी को अपनी
पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे। उसी के लिये आपको यहां पर बुलावा
गया है । और ब्रह्मा आदि सब देवगण भी बुलाये गये हैं ||१०॥
११॥ नन्दी के इस वचन का श्रवण करके कालाग्नि ने नन्दी से यह
कहा था कि हम ब्रह्मा आदि सभी देव मूलपाणि प्रभु के दर्शन करने की
इच्छा वाले हैं ।।१२।। है शैलादे | आप बहुत ही शीघ्र भगवान् शम्भु
के दर्शन मरोगे । जिससे हम सब निवृत्त हो जावें। आप अव महादेव
जो यो विज्ञापित कर दीजिए कि ब्रह्मा आदि सभी देव समागत होगये
हैं ॥१३॥ ये सभी आप ही ध्यान में निरत हैं और सभी आपके
दान करने के लिये बहुत ही उत्सव भी हो रहे हैं । उस गणो के
मुसिया ने रालाग्नि प्रमुखों के इस वचन का श्रवण किया था और
फिर जापर विश्वमदेव स बहुत ही मित्र और गम्भीर वाणी से कहा
था--||१४॥
ब्रह्मायाश्चागता. सर्वे पूल पाणे तनाज्ञया ।
द्रष्टुभिधन्ति ते सा नमक तथा मुदा ॥१५
दिशादेश पुरारे मा शिवपामि गुरासुरान् ।
वारिता द्वारमूलेपु द्रप्टुवामाश्च सस्थिता ॥१६
यत्रो निररम रूप तेजोमयमनिन्दिनम् ।
यदपोभागमाश्रित्य र कानाग्निमजित ॥१७
पश्यन्तु चते भूनेश मूल व सदोज्ज्वनम् ।
रातो शिवग काराग्निविष्णुब्रह्मा गतवतु ॥१८
मन्ये च देवगन्धर्वा प्रापयो मनवम्तथा।
गर्व कोताहा त्या देवागुरमपोरगा ||१६
विपिगुहेरगम्यान नयाचा इर गागरम् ।
प्रविश्य भवन रम्ये नानापानुविनिषिते ॥२.

३५६ ] [ सूय पुराण गणकोटिसमाकीर्णे रुद्रकोटिसुसेविते । अग्रजन्मगुरु पूर्व रुद्र देव तस्तदा ।।२१ नन्दिश्वर ने कहा-हे शूलपाणे | आपकी आज्ञा से ये ब्रह्मा आदि सव देवगण आकर उपस्थित हो गये है । ये सब आपका दर्शन करने की इच्छाकर रहे हैं और आपको प्रणाम करना आनन्द के साथ चाहते है ॥१५॥ हे पुरारे ! मुझको अपना आदेश प्रदान कीजिए कि मैं सब सुरासुरो को क्या कह । मैंने इन सवको द्वार मूल मे ही बारित कर कर दिया है और वे सब आपके दर्शन करने की इच्छा वाले है तथा वही पर खडे हुए है ।।१६।। जो आपका यह निरुपम-तेजोमय एव अनि- न्दित स्वरूप है जिसके अघोभाग मे आश्रय ग्रहण करके कालाग्नि से सज्ञा वाला रद्र है ।।१७। ये सब भूतो के ईश और सदा उज्ज्वल शूल का दर्शन प्राप्त करें। इसके अनन्तर कालाग्नि ब्रह्मा-विष्णु और शतवतु ने अन्दर प्रवेश किया था । तथा अन्य देव गन्धर्व-ऋपिगण-मनुगण-इनने की अन्दर प्रवेश किया था। सब देव-असुर और महोरगो ने बड़ा भारी आनन्दोल्लास मे कोलाहल किया था ॥१८॥१६।। जैसे नदी-नद आदि सब सागर मे प्रवेश करके उसमे ही मिल जाते है वैसे ही सवने हर के सस्थान में प्रवेश किया था । वह भवन जिसमे उन्होंने प्रवेश किया था अनेत्र धातुओ से विचित्र घातुभो से विचिन था और करोडो गणो से समाकीर्ण था तथा करोडो रुद्रो के द्वारा यह सेवित था। उस समय मे रद्री और देवी से परिवृत पूर्व में अग्र जन्माओ के गुरु थे ॥२०॥२१ भवारिमन्धकारि तमपश्यदन्तकानलः । मुक्ताचलप्रतीकाश शशाङ्कचयसनिभम् ॥२२ नीलकण्ठ ग्रिनेत्र च शूलिन सर्वतोमुखम् । कोटिसूर्यप्रतोकाश गजदानन्दकारिणम् ॥२३ कपालमानिन देव कपर्दकृतभूपणम । दशवाहु दगार्धास्यमनन्तं तेजसा निधिम् ॥२४ जगदुतत्तिस हारस्थित्यनुग्रहकाणरिम् । मनावास्मप्रपञ्चमनाकुलम् ।।२५ .

कालार याद्यागमन क्थन ] [ ३५७ सिंहासनस्थमचल चराचरविभू तिदम् । क्षीरोदमिव निष्कम्प लोक्यप्रभव शिवम् ॥२६ सर्व त पाणिपादान्त सर्वतोक्षिशिरोमुखम् । सर्वतश्र तिमल्लोके सर्व मावृत्य स स्थितम् ॥२७ सुरासुरेन्द्यमान घ्यायमान मुमुसुभि । इद रूप समालोक्य देवदेवस्य शूलिन ॥२८ दन्तकानन ने भव के शनु और अन्धक वे अरि उन गिनको देवा था जो मुक्ताआ के पर्वन के तुल्य थे और शमाङ्क (चन्द्रमा) वे समूह के महश थे ॥२२॥ शिव का स्वरूप नीलकण्ठ वाला तीन नेनो स युक्त- शूलधारी सब ओर मुखो वाला--करोडो मूर्यो के सदृश-जगत् के आनन्द को करने वाला-पालो (नर मुण्डो की माला को धारण करने वाला---पर्दो से भूपण करने वाना-दशवाहुभा से युक्त पाच मुखो वाला अनन्त और तजा की निधि या ॥२३॥२४ इस जगत् की उत्पत्ति- स्थिति और सहार और अनुग्रह करने वाला-अपमेय-अनाकाश- प्रपद्य रहित और अनाकुल भगवान शम्भु थे ।।२५।। सिहामन पर स्थित --चर और अचर को विभूति के प्रदान करने वाले - क्षीर सागर की भौति निष्फम्ब त्रिलोकी के प्रभव अर्थात उत्पन करने वाले सभी ओर हाथ और चरणा वाले तथा सब ओर नेत्र-शिर और मुख वाल- सभी ओर लोक म श्रुति रखन वाले-सवको ममावृत करके मस्थित- सुरो और अमुरो के द्वारा वन्ध्रमान तथा मुमुधुओ क द्वारा ध्यायमान शिव हैं । देवो क देव चूली प्रभु के इस रूप का अवकोकन करके वह कालाग्नि उनके ममप मे सस्थित हो गया था ॥२६॥२७॥२८॥ अग्ने स्थित स कालग्निरौ मेरुरिवापर । अयोवाच स शलादि प्रणिपत्य सनातनम् ॥२६ नरकाणाधोभाग पुरत्रय प्रतिष्ठितम् । योजनायुतविस्तीण कामद शुभलक्षणम् ॥३० यस्यध्व निरालम्व शतयोजनमानत । ज्वालामालाकुल दिव्य सर्वलोकभयकरम् ॥३१ ३५८ ] [ सूर्य पुराण प्राकाराट्टालकयुक्त गोपुरस्तोरणान्वितम् । रक्तनीलसमानाभीमघोषदुरासदै ॥३२ वृतो रुद्रसहन स्तु सिंहरूपैर्महाबलः । नियम्य च स्वक तेज प्रीत्यर्थ तेऽधुनाऽऽगत ॥३३ ध्वान्तचामीकराभासश्चन्दनागरुगन्धयुक् । नीलकण्ठस्त्रिनेत्रश्च वृषकेतुर्महावल ॥३४ द्वीपिचर्मपरीधान पञ्चवक्नेन्द्भपण । अनन्तमेखलाधारी कुण्डलीकृततक्षर ॥३५ भगवान् शिव के सामने स्थित हुआ वर कालाग्नि मेरु पर्वत पर दूसरे मेरु के ही समान था। इसके अनन्तर वह शैलादि मनातन प्रभु को प्रणिपात करने वोला ॥२६।। नरको के नीने वाले भाग मे तीन पुर प्रतिष्ठित हैं । वे दश हजार योजन पर्यन्त विस्तीर्ण है-वामनाओ व प्रदान करने वाले हैं और परम शुभ लक्षणो मे युक्त हैं ॥३०॥ जिसके ही उध्वं भाग में बिना अबलम्ब बाला-मान में शत योजन घाला- ज्वालाआ की मालाओ से-समाकुल परम दिव्य और राव लोग। यो भय देने वाला प्राकार (चहार दीवारी) अट्टालो से युक्त- गोपुरी वाना तथा तोरणो मे गमन्वित-रत्त, नीर पे समान आभा वाले भीम पोप मे युक्त-दुरामद-मिह के दप वाले-महान बलवान महसी रमो स ममाव त अपने तेज को नियमित वसे वह आपली प्रीति के लिये इस ममप म गमागन हुए हैं ॥३१॥३॥३३॥ मान्न धामी परये ममान आभाग बारे~चन्दन और अगम की गन्ध से मुक्त-नीत पठ-तीन नमो यारो-चप घेतु-गहान बलवात-हाथी के पर्म या परिपान रगने यारे-पाच मुग से मुवाच या भूपणमस्तक पर धारण परने पारो-अनन्त-मेराता में पारी और लक्षण रापं पा गुण्डनी में रूपम रसने वाले ॥३४॥३५॥ दमयाहुमहातेजा पीनवक्षा महाभ ज । प्रयोदनिधर्षोपो रक्तनीतमहातनु ॥३६ मागत गौम्यम्पेण तव देव ममीपत । परपसा मृहभाग देवदय जगरात 11३७ कालाग्न्याद्यागमन कथन । { ३५६ एते चैव महावीर्या. कालाग्नेस्तु समीपत. । तिष्टन्ति ज्वलनाभासा रुद्राश्च शतकोटय. ॥३८ त्ववियोगान्महादेव कालाग्न्यादेशकारिण । तिष्ठन्ति स्वपुरे रम्ये क्रीडमाना मनोरमे ।।३६ तवानुज्ञागता ह्य ते शशाकमौलिनोऽमला । शुद्धस्फटिकसकाशा पद्मरागसमप्रभा ॥४० तडिद्ममरसकाशा वज्रशूलधनुर्धरा । नीलकण्ठास्त्रिनेताश्च सुखदु सविजिता ॥४१ सर्वाभरणसपत्रा अनन्तवलविक्रमा । जरामरणनिमुक्ता शार्दूलचर्मवासस ॥४२ दगवाहुओ वाले-महान तेज मे सयुत पीन वक्षा स्थल वाले-महान् भुगाओ वाले --प्रलय काल के उदधि के घोष से युक्त-रखत-नील वर्ण के महान शरीर वारे वे है देव आपके ममीप मे समागत हुये है। हे देवो के देव । हे जगत् के स्वामिन् । आप मृदु भाव से ही देग्विये ॥३६॥३७ ये महान् वीर्य वाले जो इस का लाग्नि के समीप में स्थित हैं और जो अग्नि के समान आभा वाले हैं वे सैकडो करोड रुद्र हैं ॥३॥ महा देव। ये आरसे वियोग से कालाग्नि के आदेश के परने वाले हैं। ये सब अपने परम मनोरम एव रम्य पुर म क्रीडा करने वाले है ॥३६॥ ये भराष्ट्रमौलिनी-अमल सब आपकी अनुज्ञा म रहने वाले है। ये विशुद्ध स्फटिक के समान-पद्मराग के तुल्य प्रभा वाले--तरित भ्रमर के महश --वन, शूल और धनुप के धारण करने वाले नीले कठ वाले तीन नेत्रा से युक्त-सुख-दुःख से रहित-समस्त थामरणो से सम्पन-अनन्त बल और विक्रम वाले जरा मरण से निर्मुक्त और शार्दूल के चर्म के वस्त्र धारी हैं ॥४०॥४१॥४२॥ इमानपि महादेव पश्यन्त्रीतिकरो भव । हरिचन्दनलिप्ताङ्गानशोवकमलाचितान् ॥४३ दैत्याधिपतयश्चैव प्रहादाद्या महाला, समागता महादेव नागा। शेषादय शिव ।।४४

३६० ।
। सूर्य पुराण
सर्वा पातालवासिन्यो रूपोवनविता ।
आगता देवदेवेश द्वीपैश्च सह सागरा १४५॥
गन्धर्वा किनारा यक्षा सिद्धविद्याधरा शिव ।
उर्वश्याद्याश्चाप्सरसो नद्य पापहरा शुभा ।।६॥
एते च मुनयो देव भृग्वाद्या प्रथितौजस ।
सप्राप्तानि पुराणीह शक्कादीना महात्मनाम् ॥४७॥
एते लोका समायात सत्यान्ता सप्त शकर ।
मूर्तयस्तव देवेश भवाद्याश्च समागता १४८॥
आदित्या वसवो रुद्रा साध्याश्चैव मरुग्दण] ।
सनकाद्या महात्मान सत्यलोकनिवासिन १४६
हे महादेव । इनको भी आप देखते हुए अर्थात् कृपा पूर्ण दृष्टिपात
करके प्रीति के करने वाले हो जाइए। यै सव हरिचन्दन से प्रलिप्त
अड्डो वाले हैं और अशोक तथा कमलो से समचित हैं ।४३। महान्
बलवान प्रह्लाद आदि दैत्यो के अधिपतिगण हे महादेव जी । समागत
हुए हैं-नाग भी शेष प्रभूति हे शिवजी | आपके समीप मे आवर
उपस्थित हुए हैं १४४। हे देव देवेश | सभी पाताल के निवास करने
वाली-रूप और यौवन मे सम्पन्न एव गवित द्वीपी के साथ साथ सागर
भी ममागत हुए हैं ।४५॥ हे शिवजी | गन्धर्व-विनर-यक्ष-सिद्ध-विद्या-
घर-उवशी आदि अप्सराए और परम शुभ पापो के हरण करने वाली
मदिया भी आयी हैं ।४६३ ह देव । ये राब प्रधित ओज वाल भृगु
मादि मुनिगण आये हैं और महात्मा इन्द्र आदि के पुर भी सम्प्राप्त हुए
हैं (४७। हे गदर । ये सत्य के अन्त ता वाल समस्त लोक भी समा-
यात हुए हैं ह देवेश | आको भव आदि जो मूतिया है वे भी समागत
हुई हैं ।४८। आदिरप-वागण-रुद्रगण-साघ्याण-मरन्द्रण और
सनरादि महारमा लोग जो सत्य लोक के निवास करने वाले भी महो
आये हुये हैं ॥४६॥

। सूर्य पुराण सर्वा पातालवासिन्यो रूपयौवनविता । आगता देवदेवेश द्वीपैश्च सह सागरा ।४५५ गन्धर्वा किनरा यक्षा सिद्धविद्याधरा शिव । उर्वश्याद्याश्चाप्सरसो नद्य पापहरा शुभा ॥६॥ एते च मुनयो देव भृग्वाद्या प्रथितौजस । सप्राप्तानि पुराणीह शक्रादीता महात्मनाम् ।४७॥ एते लोका समायात सत्यान्ता सप्त शकर। मूर्तयस्तव देवेश भवाद्याश्च समागता ।४८/ आदित्या वसवो रुद्रा साध्याश्चैव मरुणदणा । सनकाद्या महात्मान सत्यलोक निवासिन ।४६ हे महादव ! इनको भी आप देखते हुए अर्थात् कृपा पूर्ण दृष्टिपात करके प्रीति क करने वाले हो जाइए । ये सव हरिचन्दन से प्रलिप्त अहो वाल है और अशोक तथा कमलो से समचित है ।४३। महान बलवान प्रसाद यादि दैत्यो के अधिपतिगण हे महादेव जी । समागत हुए हैं-नाग भी शेष प्रभूति हे शिवजी आपके समीप मे आयर उपस्थित हुए हैं ।४४॥ हे देव देवेश र सभी पाताल के निवास करने वाली-रूप और यौवन से सम्पन्न एव गवित द्वीपो के साथ साथ सागर भी समागत हुए हैं ।४५हे शिवजी | गन्धर्व-विनर यक्ष-सिद्ध-विद्या- घर-उपशी आदि अप्सराएं और परम शुभ पापो के हरण करने वाली नदियां भी आयी है ।४६1 है देव । ये सब प्रधित ओज वाल भृगु भादि मुनिगण आय हैं और महात्मा इन्द्र आदि क पुर भी सम्प्राप्त हुए हैं ।४७॥ हे साङ्कर ये सत्य के अन तक वाले समस्त लोग भी समा- यात हुए हैं ह देवश ! आपको भव आदि जो मूर्तियां है वे भी समागत हुई हैं ।४८१ आदित्य--वसुगण-रुद्रगण-साध्यगण-महन्द्रण और सनकादि महात्मा लोग जो सत्स लोक के निवास करने वाले भी यहाँ आये हुये हैं ।४६ कालान्याद्यागमन कथन ] । ३६१ पद्मरागनिभो देवो बन्धककुसुमधु ति । जटाभिस्तु शिरोनद्धो रत्नमालाविभूपित ।५० कमण्डलुधर श्रीमान्दण्डहस्त सुलोचन । कृष्णाजिनोत्तरीयेण रक्तमाल्याम्बरेण च ।। सुवर्णमेखलाचारी रौश्मकुण्डलमण्डली । हमध्वजश्चतुर्बाहु सुरासुरनमस्कृत ।५२॥ सावित्र्या सहितो देव पद्मोनिरिहाऽऽगत । अतसीपुष्पसकाशस्तमालदलवर्चस ॥५३॥ पीताम्बरधर श्याम पीतगन्धानुलेपन । शङ्खचक्रगदाधारी शाी गरुडवाहन ॥५४॥ किरीटी कुण्डली हारी कौस्तुभाभरणान्वित । केयूरवलयापीड पीनवक्षा गदान्वित ॥५५॥ चामीकरसुमालाभिर्दीप्यमानो विराजते । सूर्यायुतप्रतीकाशो नीलोत्पलदलक्षण ।५६ पद्मराग के सदृक्ष-वन्धूक कुसुम के तुल्यद्य त्ति वाले-जटाओ के द्वारा नद्ध शिर वाले-रत्नमाल से विभूषित - कमण्डल के धारण करने वाले हाथ मे दण्ड धारण किये हुए श्रीमान्-सुलोचन-कृष्ण मृग के धर्म के उत्तरीय से युक्त और रक्त मान्ध और अम्बर से मयुक्त-मुवर्ण की मेखना के घारण करने वाले-रोक्म के कुण्डलो के मण्डल वाल-हस की वजा से युक्त चार वाहुओ वाले-सुर-असुरो के द्वारा नमस्कृत-सादिनी देवी के सहित पद्मयानि देव भी यहाँ पर आये हुए हैं। अलसी के पुष्प के सदृश-तमाल के तरु के वर्चस वाले पीताम्बर के धारी- श्याम-पीतगन्ध के अनुलेपन कर्ता-श चक्र. गदा के धारण कर्ता-पाणीघनुप वाली- गरुड के वाहन वाले विरीट धारी-कुण्डल धारी-हार के पहिन ने वाले कोस्तुभमणी के भामरण वाले–केयूर-वत्रय और आप ड वाले-पीनवक्षस्थल से युक्त-गदा से सयुत-स्वर्ण की मालाआ से दीप्यमान होकर विजित । सूर्य पुराण हैं । अयुत (शहजार ) मूओं के समान-नीलाल के दल के सदृश लोचनो से सम्पन विष्णु देव है ।५० ५६॥ क्षीरोदाणवशायी च नीलजीमूतानि स्वन । ग्मामर्दितसर्वाग शेपपर्यङ्कलालम १५७ गुरूणां च गुरुर्देव ईश्वराणामपीश्वर । वरदो भव वात्सल्यो दैत्यकोटिक्षयकर ।५८ आगोऽय महादेव विष्णु प्रियतरस्तव । तप्तचामोकरप्रस्यो वज्रहस्तो महापल ।। पट्टाशुकपरोधानो हेममालाविभूपित: ।५६ प्रख्यातवीर्यों बलवृत्रहन्ता वालार्कभासो हरिचन्दनाङ्क । पुन्नागनागवकुलेश्च जुष्टो मुक्ताफलालकृतकण्ठदेश ।६० अय समागत शक्नो वह्निवैवस्वतस्तथा । म तिर्वरुणो वाय कुबेरश्च समागत १६१ ईशानश्च महाभागस्त्रिंशत्कोटिगणवृत्त । आगतस्त्रिजगद्योने पिनाकी च गणेश्वर १६२ दशकोटिगणयुक्त कालकण्ठस्तथैव च । सप्तकोटिगणयुक्तो घण्टाकर्णो महावल ।६३॥ क्षीर सागर मे शयन करने वाले-नीलमेघ वे समान गर्जन करने ति-रमा के द्वारा समस्त अङ्गो का मश दिये गये-शेप की शय्या रायन की इच्छा पाले-गुरुयो के भी गुरुदेव-ईश्वरो के भी श्वर-वरद-भव-वात्सल्य रूपीयरोडा दैत्यो के क्षय को करो ले-है महादेव जी । आपके अधिक प्रिय यह विष्णु भगवान आये । सपे हुए गुवण के सदृश हाथ म यज धारण करने वाले-महा- लिवान-पट्ट वर के धारी-हेम को मात्रा से विभूषित प्रख्यात वीर्य ले-बल वृज से हनन करने वाले-गल मूर्य के समान आभा वाने- परिचन्दन के निलम पाले-पुन्नाग-नाग और बयुर के द्वारा सेविन- मोनियो अनवृत कण्ठ भाग वात यह इन्द्र-अग्नि और वैवस्वत मा

कालाग्याद्यगमन कयन ]
गये हैं। निति-वरुण -वायु-कुवेर भी आ गये हैं । महामाग
ईगान जो तीन करोड गणो से परिवृत थे-हे त्रिजगत् की योनि ।
पिनाकी और गणेश्वर आ गये हैं। दश करोड गणों से युक्त बालकण्ठ
तथा सात करोड गणों से समन्वित महा वलवान् घण्टा वर्ण का
गये हैं ।५७-६३॥
दशकोटिगणयुक्तो वसुघे पो महावल ।
चतुष्कोटिगणैर्देण्डी शिखण्डो दशकोटिभि १६४।
पभिर्मयूरवदन मिहास्यो दशकोनिभिः ।
सप्तकोटिगणर्युक्त किरीटी च समागत. १६५॥
कालान्तस्तु दशाम कुली दशकोटिभिः ।
पड्मिस्तु मुण्डमाली च त्रिशूली पञ्चकोटिभि ।६३।
अष्टाभिविश्वमाली च निमूतिर्नवकोटिभिः ।
rतेश्वरा सन्था चान्ये गणेश्वरा ।६७।
येपा सस्या न जानन्ति ब्रह्मद्या देवतागणा ।
आगताना महादेव शृणु कोलाहल विमो १६८१
अमरेश प्रभासश्च पुष्करो नमियम्नथा ।
पाटी दण्डी मुष्टी च भारभूतिस्तथा कुली १६६॥
तीर्थाधिपतयो देवा आगता दिव्यमूर्तय ।
एते गुह्याटमा देव कामरूपा महायताः 101
दश रोड गणो वे सहित महा वउदान् वगुधाप-धार करोड
गणों में माय दण्डो-दा बरोह गपो के सहित निमण्डी-६ परोही
के साथ मयूर वदन-दस परोह गणे से सयुना सिंहाग्य और मात
घरो गणो मे मन्वित विरोट समागत ए हैं ६४ दररोड
गणोरे साथ पासानादाम और नवमी ममागन ए हैं। छ
परोह गलो में मुरा मुमामी-पांच रोष्ट गणो मे मुक्त विनी
पाठ मरा.गणारे गहित विस्यमामी-नो परोह गो मे मपुत्र
विभूगि-ये सर गणेशर तया अप गणेश्वर त ने अपिल मस्या में है

२६४ ] [ सूर्य पुराण । कि जिस संख्या को ब्रह्मा आदि देवतागण भी नही जानते हैं अन्य की तो बात ही क्या है । हे विभो । हे महादेव जी! इन आये हुओ का कोलाहल का श्रवण कर लीजिये । अमरेश-प्रभास-पुष्कर-नैमिष- आषाढी-दण्डी-मुण्डो-भारभूति-कुली ये दिव्य मूत्तियो वाले तीर्थों के सब अधिपतिगण आये हैं। हे देव ! ये गुणाष्टक हैं जो काम रूप और महान् बल वाले हैं १६६-७० । तवाऽजयाजाता देव ब्रह्माण्डान्तरवासिनः । कोटिकाटिगणेयुक्ता देवदेव महेश्वर ।७१॥ विश्वेश्वरजटोद्भता सिन्धुश्चैव सरस्वती । यमुना गण्डकी नागा विपाशा नर्मदा शिवा ।७२। रुवमा घण्टा च निविन्च्या देविका च दृपद्वती। शतद्रुश्च पयोप्णी च चन्द्रभागा च गोमती १७३। चर्मण्वती च कावेरी सरयूश्च परावतो । धूतपापा च सारथ्या माणा माला सुगन्धिका ।७४। जम्बू तापी वनी शूरा कौशिको कुमुदा करा। मन्दाकिनी चन्द्रलेखा चम्पकाऽऽमोदवाहिनी ।७५॥ ऐरावती कामवगा प्रेसला कामचारिणी। पूर्णभद्रा महामोदा गम्भीरावर्तिनी स्मृता ७६। मेघमाला मेघवां सदानोरा च नन्दिनी । वेदा वेदवती वीणा सीता चित्रोत्पला तया ।७७1 हे देव ! ये सब अन्य अन्य यहा.ण्टो के निवास करने वाले आपको हो आशा मे यहाँ पर समागत हुए हैं। हे देवो के भी देव महेश्वर ! य सब करोडो करोडो गणो से युक्त है ।७१. विश्वेश्वर प्रभु ये जटाओं से ममुशाम हुई (गगा)-सिन्धु-सरस्वती-यमुना-गण्डकी-नागा-- विपागा-~-मंदा-शिवा-मा-पण्टा--निविध्यादेविना- हपती-पना स्व-पयोणी-चन्द्रभागा-गोमती-चर्मपती-वेरी- सरयू-परावती-पापा-सारा माणा-माला-गुगन्धिा- कालाग्न्याद्यागमन कथन ] [ ३६५ जम्बू-तापी-वनी-शूरा-कोशिका- कुमुदा-रा-मन्दाकिनी- चन्द्रलवा-चम्पका-आमोदवाहिती-ऐरावती-बामवेगा--प्रेहला- कामचारिणी-पूर्णभद्रा-महामोदा-गम्भीरावत्तिनी-मेघमाला-मेघवर्णा- मदानीरा-नन्दनी-वेदा-वेदवती-वीणा-मीता-चित्रोत्सला १७२१७॥ वेत्रवती न वृतघ्नी पिप्ला जजलो तथा। सरजा कुमुदा शिक्षा कौशिकी निपधा सिता ७८॥ बैतरणी सिनीवाली वेगवती पुन. पुना । गौरी कृष्णा तथा दुर्गा तुगभद्रोत्पलावती ७६। स्वर्णा भीमरथी शुद्धा कृतमाला तरङ्गिणी। एता देव महानद्य पावना वल्मपापहा ।। मूर्तिमत्यरतवेशान रसदे त्विह आगता. । सर्वा एता महादेव पश्य कारण्यवारिधे ।।१। भवन्ति कृतिन सर्वे त्वयि दृप्टे महेश्वर । एवमुक्त्वा तदा नन्दी देवदेवस्य चाग्रत । २। पपात दण्डवद्भूमौ भयत्या परमया युत । नन्दिन त महात्मान दृष्ट वा विश्वेश्वरः प्रमु ।। प्रीतो भूत्याह कालारिमंन्दरे चारुपन्दरे ।४। इद य पटते नित्य शृणुयादाणी भक्तिन । प्रीता स्युचना मारतस्याभीष्टफलप्रदा ॥८॥ येत्रवती-पप्मी-पिपला-अजमी-गाजा-मुमुदा-शिक्षा- बोशितो-निगया-सिपा-वतरणी-गिनीवाली- देगनी-पुन पुन-गोगे-प-दुर्गा-गहमा-मावती-पप-भीम. घो-ग-मामा-भानपी-देव ! ये सब परम पायन मरिया, मोर पस्मपोरे प्रणाने यामीfor मर भूमिती नदियां बाग में की गमागत है। गागरमी मा पर मार गिर .७८ मा मागेरने पर गरी होगा।

[ सूर्य पुराण इस प्रकार से कह कर नन्दीदेव देव के आगे भूमि में दण्ड के समान गिर गया था और परमा भक्ति से युक्त होकर उसने साष्टाग प्रणाम किया था। विश्वेश्वर प्रभु ने उस महात्मा नन्दी को देखा और उरा चारु कन्दराओ वाले मन्दराचल पर पालारि परम प्रसन्न होकर बोते-इसको जोभी काई पढना है या सुनता है और नित्य भक्ति से श्रवण करता है उस पर सब देव प्रसन्न होते है और उसे अभीष्ट देने वाले होते हैं। ॥ साम्ब विवाह वर्णन (१)॥ अथासौ हिमवान्विप्रा देवीमात्मसुतामुमाम् । प्रदानार्थ महेशाय सप्राप्तो मन्दर क्षणात् ॥१॥ आह दृष्ट्वा गिरि नन्दी देवदेव पिनाकिनम् । वक्त काम समायातो भगवान्पर्वतेश्वर ॥२॥ थु त्वा तु वचन श्लक्ष्ण व्यक्त नन्दीमुखात्तदा । मेघगम्भीरया वाचा महादेवोऽब्रवीदिदम् ॥२॥ वदत्वय गिरिष्टो हृदये यत्प्रतिष्ठितम् । कामस्तस्प (स्या) चिरादेव भविष्यति न सशय ॥४॥ एवमुक्तस्तदा विप्रा देवदेवेन शभुना। उवाच गिरिशार्दूलो भूत्वाऽऽवनताञ्जलि ॥५॥ याऽऽमीत्पूर्व च ते पत्नी साऽवतीर्णा गृहे मम । तामेव तव दानार्थमागतोऽस्मि महेश्वर ॥६॥ अमी ब्रह्मादयो देवास्त्वत्समीपमिहागता । वि गोनमिति मृच्छामि ह्य पामग्ने विभो वद ॥७॥ श्री सूतजी ने वहा-इसके अनन्तर हे विप्रो ' वह हिमवान् अपनी पुत्री देवी उमा को महेश के लिये प्रदान करने के वास्ते क्षण मात्र मै साम्ब विवाह वर्णन (१) ] [ ३६७ ही मन्दराचल पर प्राप्त हो गये थे 1११ नन्दी ने गिरिराज हिमवाद को देवकर देवो के देव पिनाकधारी से कहा-यह कुछ कहने की इच्छा वाला भगवान् पर्वतेश्वर समागत हुए हैं ।२। उस समय मे नन्दी के मुख में परम लक्षण वचन व्यक्त स्प मे श्रवण करके मेघ के सदृश परम गभीर वाणी से महादेवजी ने यह कहा था।३। यह गिरियो म थे कहें जो चुछ भी इनके मन में तिष्टित है । उनका मनोरथमीन ही हो जायगा--इसम सराय की कोई भी वात नहीं है ।४। हे विप्रो । समय मे देवदेव के द्वारा इस प्रकार से वहने पर गिरि शाहूंल उनके आगे प्रणत अजलि वाला होकर यह वोला- हिमवान् ने कहा-- जो पूर्वजन्म है आपकी पत्ती थी वही अव मेरे घर म अवतीर्ण हुई हैं। है महेश्वर । उमी को आपके लिये दान देने के उद्देश्य से मैं वहाँ पर समागत हुआ है। ये ब्रह्मा आदि सब देवगण भी यहां पर आपके समीप मे समुपस्थित हो गये है। हे विभो । आप यह बतलाइये कि आपका गोत्र क्या है ? आप इन सबके समक्ष म वता देवें ।। श्रुत्वा तु भारती तस्य विश्व शो विश्ववन्दित । कि गोत्रमिति सचिन्त्य नोत्तर प्रमसर्ज ह ।।८।। दृष्ट्वा निरुत्तर शमु जहमुर्देवदानवा । एप एव जयद्योनिर्गोत्रमस्य क्थ भवेत इत्यूचुविवुधा मर्वे हिमवन्त नगोत्तमम् । देवाना च वच श्रुत्वा गिरिराजोऽत्रवीदिदम् ॥१०॥ विश्वेश्वर पर धाम परमात्मानमव्यम् । शाश्वत गिरिश स्याणु विश्वाकार सनातनम् ।।११।। दत्ता दत्ता पुनर्दता उमा मत्येन ते प्रभो । ततो महान्रवो विप्रा जयशब्दादिमङ्गले ॥१२॥ दुन्दुभीना च वाद्यानामभवत्मागरोपम । गृहीतेति शिव प्राह पानी पर्वतेश्वरम् ।।१३।।

३६८ ]
सूर्य पुगण
तद्धरते भगवाञ्शभुरङ्ग लीय प्र(न्य)वेशयत् ।
इम च कलश हैममाद्राय त्व नगौत्तम ||१४||
विश्व के ईश और विश्व के द्वारा वन्दित प्रभू ने उस हिमवान् की
भारती का श्रवण करके मेरा क्या गोत्र है-इसका चिन्तन करके कुछ
भी उत्तर नही दिया था ।८। जब शम्भू को बिना उत्तर वाला देखा तो
सभी देवगण और दानव हस गये थे। उन्होन कहा यह ही तो सम्पूर्ण
जगत् के उत्प न करने वाले है। इनका गोत्र कैसे हो सकता है ।।
यही बात सब देवो ने नगो मे उत्तम हिमवान् से कही थी। देवो के
इस वचन का श्रवण करके गिरिराज यह बोले-१० विश्वेश्वर---
परमघाम-परमात्मा-अव्यय-शाश्वत-गिरिश-स्थाणु-विश्वा-
कार-सनातन वो मैंने अपनी पुत्री उमा दे दी-और पुन दे दी है-
यह मैं सत्य निवेदन कर रहा हूँ। हे विप्रो । इसके
पश्चात् जय शब्द आदि क मङ्गल सूचक शब्दो से महान् ध्वनि हो गयी
थी ।११।१२। उस समय म दुन्दुभियो तथा अन्य वाद्यो वा भी मागर
की गणना के समान बहुत भारी ध्वनि उत्पन्न हो गयी थी। तब
भगवान् शिव ने पवतेश्वर हिमवान् से कहा था कि मैंने पार्वती को
ग्रहण कर लिया है । उसके हाथ मे भगवान् शम्भू ने अगलीय का
प्रवेश करा दिया था। हे नगोत्तम । आप इस हैमकलश को लाकर
यह हे प्रभो।
जाइये ।१३।१४॥
याहि गत्वा त्वनेनेव तामुमा स्नापय त्वरा।
अन्येपा परिहारार्थमेप एव विधि सदा ॥१५॥
जगत्रयेऽपि नून स्याद्ब्रज तूर्ण नराधिप ।
ततस्तुटो महागलोभोजयत्सुसमाहित ॥१६॥
तव यसरतो विप्रारतपंणत्य चराचरान् ।
अभवत् वमुद्दिश्य शक्र म गिरिस्तदा ॥१७॥

साम्ब विवाह वर्णन (१) ]
[ ३६६
तथाऽस्मिन्नन्तरे देवो धर्मकेतुमहेश्वर ।
उत्यितो मुनिशार्दूला समालोक्य च शाङ्गिणम् ॥१८॥
अभवज्जयशब्दाना तुमुलो हि महारतदा ।
पुष्पवृष्टिनिपातन सत्यलोकाद्विजोत्तमा ॥१६॥
नानावनाधिपाश्चैव कलवश्न मुदान्विता ।
कुमुमदिव्यगन्धाढ्य वृपुर्मेधवृन्दवत् ॥२०॥
वीणीवेणुमृदङ्गाना दुन्दुभीना ततो रवः ।
हरिविरञ्चिशकात्ता. पूरयन्ति सुरास्तदा ॥२१॥
याप जाइये और जाकर शीघ्र ही अपने से ही उस उमा का
स्तपन कराइये । अन्यो के परिहार के लिये यह हो सदा विधि है।
यह तीनो जगत् म भी निश्चय ही होती है। अतएव है नराधिप ।
शीघ्र ही गमन करो। इसके अनन्तर परम तुष्ट होकर महाशैल ने
सुममाहित होते हुए मोजन कराया था। इस प्रकार से है विनो' पर
और बचरो को तर्पण करने के लिये यज्ञ में रत हो गया था। उस
समय म वह गिरिराज भगवान् महर का उद्देश्य करके ही रत हो
गया या ।१५।१६।१७। हे मुनि शार्दू लो । तथा इस अन्तर म देवधर्म
केतु महेश्वर उत्थित हुए और साङ्गी भगवान् को देखा था 1१1 उम
समय ने महान् जय-जय शब्दो का तुमुल हो गया था। पुप्पो की वृष्टि
का विपात हुआ। है द्विजोत्तमो ' कुसुमो की वर्षा सत्य लोक से
था। अनेक प्रकार के वना के अधिक योर यानन्द स समन्वित नुओ ने
दिव्य गन्य से युक्त कुसुमो के द्वारा मेघो के समुदाय के ही समान वर्षा
की थी। उन शुभ समय म हरि-ब्रह्मा और महेन्द्र आदि सुरा ने
वीणा-घेणु-मृदङ्ग और दुन्दुनियो की ध्वनि को पूरित किया था।
१६२०१२॥
विप्रालोक्यनादेन वेदघोष प्रचक्रिरे ।
गायत्री चंव सावित्री रुद्रकन्यारतयंद ॥२२॥

३८० । सूर्य पुराण विद्याधर्योऽथ नागिन्यो देवानां च तथाऽङ्गना । सिद्धकन्या मनोहार्या यक्षकन्यारतथैव च ।।२३।। मातर सप्त याश्च व याश्च नक्षनमातर । गिरीणा च तथा नार्य समुदाश्च सरोसि च ॥२४|| मङ्गल गायनाश्च अर्घमष्टाङ्गसयुतम् । सुप्रष्ट्रा ददुः सर्वा देवदेवस्य पादयो ॥२५॥ एतस्मिन्नन्तरे विना हिमवत्सप्रणोदित । मैनावस्तर सप्राप्तो हेमकुम्मकर सुधी ॥२६।। सालकायनपोनरय गत्वा तस्याग्रत स्थित । तेनापि देवदेवस्य ज्ञापितो गिरिरग्रत ॥२७॥ अथासौ भगवान्देवो मङ्गलेशो जलाशय । म्नापयद्वेधसा युक्त समुद्र मूलपाणिनम् ॥२८॥ विप्रो ने त्रैलोक्य नाद से वेदघोष अर्थात् वेदो के मन्त्रोच्चारण की ध्वनि को किया था । गायत्री-सावित्री-रुद्रो की कन्याऐ -- विद्याधरी-नागिनी-देवो की अङ्गनाऐ-मनोहर सिखो की कन्याएं तथा यक्षो की कन्याऐ - ~मात माताएं जो थी उन्होंने और जो नक्षम माताऐ थी~-पर्वतो की स्त्रिया समुद्र मर सव मङ्गल गान कर रहे थे और परम प्रहष्ट होते हुए सबने देवदेव के चरणों में अष्टाङ्ग सयुत अर्घ दिया था।२२।२३।२४।२५। इसी बीच में हे विप्रो । हिमवान में द्वारा प्रेरित होकर मैं नाव सुधी हेम वा कुम्भ हाय मे ग्रहण करने वहां पर मम्प्राप्त हुआ था ।२६। साराष्ट्वामन पौच के आगे जाकर वह स्थित हा गया था। उसके द्वारा भी दरदेव के आगे गिरि ज्ञापित हुआ था ।२७ इमवे यनन्तर भगवान् देव मलश जलाशय न बंधा मे पुक्त होकर समुद्री के द्वारा शूलपाणि का स्नपन कराया था ।२८॥ स्नाप्यमाने तदा देवे नद्यो गे सागरा द्विजा । बभूवु सलिलयुंक्ता मागा स्वेदसयुता ॥२॥ - साम्ब विवाह वर्णन (१) । [ ३७१ अथ ते त्रिदशाः सर्वे सनारायणका द्विजाः । पर विस्मयमापन्ना भन पश्यन्ति चा तम् ॥३०॥ ततो निलीयमानास्तु शरीरे शकरस्य तु। नद्य. सर्वा. समुद्राश्च प्रपश्यन्ति सुविस्मिताः ॥३१॥ योगमायाहतं वीक्ष्य तत्तोय जगति स्थितम् । अस्तुवन्पशुभर्तारं ब्रह्माद्या देवतागणाः ॥३२॥ ततस्तैरतु स्तुतो देव प्रहस्य भगवाभवः । विमृज्य च तदा तोयमभवत्पूर्णरूपवृत् ॥३३॥ एन साम्ये स्थिते तस्मिन्देवदेवे पिनाकिनि । स्नापितोऽसी विराद्य त्रिमूर्तिर्भगवान्भवः ॥३४॥ मैनाकोऽप्यञ्जलि कृत्वा देवदेवस्य चाग्रतः । सस्थितो हर्पसयुक्तो निधि लब्ध्वा यथाऽधन ॥३५॥ उस सगय मे देव के स्नप्पमान होने पर नदियों और सागर है द्विजो! कृशाङ्ग और स्वेद स सयुक्त सलिलो से समन्वित हो गये थे ।२६। इसके उपरान्त सब विदृशगण नारायण के सहित परम आश्चर्य को प्राप्त हो गये थे और अब न स्वरूप वाले भगवान् भव को देख रहे थे।३०। इसके उपरान्त भगवान् शङ्कर के शरीर मे विलीन होती हुई समस्त नदियो और सव समुद्र मुविस्मित होकर देख रहे थे ।३१। जगत् में स्थित उस जल को योगमाया से हृन देखकर ब्रह्मा आदि देवगणो ने पशुपति प्रभ का स्तनन किया था।२२। इसके अनन्तर उन सबके द्वारा स्तुति किये गये देव भगवान् भव हंसकर उमी समय मे जल का विसर्जन करके पूर्व रूप के धारण करने वाले हो गये थे।३३। इस रीति से साम्य दसा में स्थित उन देवो के देव विनाशी के वह त्रिमूर्ति भगवान् भव ब्रह्मा आदि के द्वारा स्नापित किये गये थे १३४॥ मनाक पर्वत भी देवदेव के आगे अजलि करके गस्थित हो गया था। उस समय में वह इतना अधिक प्रदमित हो रहा था जमे कोई बहुत

३७२ ]
[ सूर्य पुराण
निधन पुरुप धन की निधि को प्राप्त करखे खुश हो जाया करता है।
विजितस्ततस्तेन देवदेवेन शभुना।
लोवपतिलके तस्मिन्ययौ तूर्ण नगात्मज ॥३६॥
तदशुक परिधाप्य देवी तामरसेक्षणाम् ।
स्नापयस्तेन कुम्भेन हराङ घ्रिपतितेन च ॥३७॥
नीरपात द्विजय॑ष्टा कृतमेतत्कपदिना।
पार्वतेयविधिन कुलजाना सदाऽनघ ॥३८॥
ततो भगवती देवी हृष्टपुष्टा तपोमयी।
पितुरम्याशगा भूत्वा विवेश परमासने ॥३६॥
इसके उपरान्त देवदेव शम्भ ने उसे विदा कर दिया था। लोक्य
के तिलक उसके जाने पर वहुत शीघ्र नगात्मज अर्थात् हिमवान का
पुत्र गया था । तामरम के समान नेत्रो वाली उस देवी को यह उनका
वस्त्र पहिनाकर शिव के चरणो के ऊपर से गिरे हुए उसी कुम्भ ये
द्वारा नवन करते हुए है द्विज थैप्ठो । वपदा प्रम ने यह नीरपात
किया था। कुलजी की सदाअनघ पार्वतेय विधि निश्चय ही सम्पन्न
हुई थी।३६।३७१३८। इसके पश्चात् तपोतयी भगवती देवी परम हष्ट-
पुष्ट होती हुई पिता के समीप वतिनी होर परमासन पर प्रवेश कर
बैठ गयी थी ।३६॥
। साम्ब विवाह वर्णन (२)।
अथाऽऽयान्त शिव दृष्ट्वा हिमवान्पर्वतेश्वर ।
मेररचंय यथामस्य रविचन्द्रदिवापरं ॥१॥
तथा देवे स वेधाद्य वृत छोण सयुतम् ।
जयेत्युक्त्या नगेन्द्रस्तु ह्यात्तमात्याम्बरस्तदा ॥२॥

साम्ब विवाह वर्णन (२) ] [ ३७३ उन्थित. सहसा विप्राः पुष्पहस्तो महेश्वर। मुदा परमया युक्तो भवन्या चानन्यया द्विजाः ॥३॥ वर्नानाविधैश्चर्के मार्गभूपां तदा गिरिः । पताकाभिर्जयन्तीभिः स्रग्दामदिव्यगन्धिभिः ॥४॥ ध्वजश्च विविधाकारैः पञ्चवर्णमनोरमैः । चामरश्चन्द्ररम्यैस्तु लम्बकैश्च समन्ततः ।।५।। मुक्ताना प्रकरश्चव पुष्पाणा तु तथैव च । एवमाद्यरनेकैश्च शोभा कृत्वा नगोत्तम. ॥६॥ स्थितस्तु वीक्षमाणोऽसो विश्वव्यापिनमीश्वरम् । सपूर्णचन्द्रवदना मदनानलदीपिताः ॥७॥ श्रीसूतजी ने कहा -इसके अनन्तर पर्वतेश्वर हिमवान ने आते हुए भगवान शिव को देखकर और मेरु ने भी यथासस्य रविचन्द्र दिवाकरो के तथा वैधा आदि देवो के द्वारा परिवृत और धन से सयुत थे । उस ममय में नगगज ने "जय हो"-यह कहकर उग समय मे हाय मे वस्त्र और माल्य कर सहसा उस्थित हो गया था । हे विप्रो । महेश्वर पुष्प हाथ में लेने वाले हो गये थे । हे द्विजो । उस समय मे गिरिराज परम आनन्द से युक्त और अनन्य भक्ति से सयुत होकर उन्होंने उस समय मे नाना प्रकार के वस्त्रो से मार्ग की सजावट की थी। पताकाओ से-जमान्नियो से-दिव्य गन्ध वाली मालाओ से विविध आकार वाले वजो मे--मनोरथ पांच वर्णों वाले चमरो मे जो सभी योर लम्बे और चन्द्रमा के समास सुरम्य थे । मोतियो के तथा पुष्पो के प्रकरो से इस प्रकार के अनेक पदार्थों के द्वारा नगोत्तम ने मार्गों की शोभा की थी। फिर यह स्थित होकर विश्वव्यापी ईश्वर को देखते हुए विराजमान थे। फिर मदन के अनत मे दीपित हुई सम्पूर्ण चन्द्रमा के समान मुरो वापी अप्परा वहाँ पर विद्यमान थी।१-७४ ३७४] [ सूर्य पुराग शतकोटयोऽप्सराणां तु निर्ययुः समुखाश्च तम् । हेमपात्रकरासक्ताः पद्मन्दीवरहस्तकाः ॥८॥ मणिपात्राणि पूर्णानि दूर्वानिद्धार्थकाइ क्षितैः। दधिरोचनमादाय द्रोहिभिश्चम्पर्यवैः ।। हरिचन्दनलिप्ताङ्गा हरिचन्दनहस्तका. । विद्रुमाङ कुरहस्ताश्च तथैवोत्पलशेखराः ॥१० x चूतमरिहस्ताश्च पारिजातकराः पराः । स्वादूदकेन सपूर्णभृङ्गारकरपल्लवाः ॥११ हावभावविलासिन्यो मदनातुरहिनाः । मदनारि प्रण मुस्ता गायमानास्त्रिलोचनम् ॥१२ अथासौ भगवाशूली चान्तर्यामी महेश्वरः । त्रैलोक्यतिलके तस्मिन्क्षणादाविर्वभूव ह ॥१३ ततो घनर्बहुविधः पूजयामास पर्वतः । स्तुत्वा च पूजयित्वा च ननाम च पुनः पुनः ॥१४ मैकडो करोड अप्सरायें उनके सामने में निकली थीं। उनके हाथों में सुवर्ण के पात्र थे । वुछ के हाथों में इन्दीयर पद थे। कुछ के हापों मै दूर्वा-सिद्धार्थ काड क्षितों से युक्त पूर्ण मणियों के पात्र थे । ग्रीहि- चम्पक और यवों से युक्त दघिरोचन लेकर हरिचन्दन से लिप्त भङ्गो घाली पों और कुछ अप्सराएं हरिचन्दन को हाथों में ग्रहण किये हुए थी। उन अप्सराओ में कुछ विद्रमो के अधुर हाथों मे ग्रहण किये हुए मी तथा कुछ उत्पलो को मस्तक पर धारण किये थी ।।८-१०॥ मुष अप्सराओ के हाथों में आम्र महजरियो लगी हुई थी और दूसरी अपने करों में पारिजात तिये हुए थों। कुछ स्वादिष्ट उदक से पूर्ण भङ्गारक अपने कर पल्पयो मे ग्रहण किये हुए थी ॥११॥ ये सब असगरे गामदेव से अत्यन्त आतुर और बिह्वल हो रही थी। ये राय ग. पाती. सरसके. श्रीमापा प्रापको, प्रणाम. कर रही पीं ॥१२॥ इससे अनातर भगवान् शूली अन्तर्यामी महेयर सोक्य

साम्ध विवाह वणन (२) ]
।। ३७५
तिलय उसमे क्षणभर म ही आविर्भूत होगये थे ॥१३॥ इसपे उपरान्त
बहुत प्रभार ये धनो के द्वारा पत्रतराज ने भगवान शिव की पूजा की
थी। स्तुति परये और अम्पचन पर बारम्बार प्रणाम किया था
गोर्तश्च विविध क्यै प्रविवेश हाम्तदा ।
भाऽभवत्तदा वालो द्वधष्टपीकृति स्वयम् ॥१५
हेमाङ्गा भगवान्भु पिरीटी युण्डली हर ।
गुरासुराश्च विप्रैन्द्रा दृष्ट्वा रूप पिनाविन ॥१६
अवलोक्य मुम्वाऽन्योन्य जहसुस्ते मुदाऽन्विता ।
आसने हेमजे विद्या नानारत्नश्च भूपिते ॥१७
घिवेश भगवाशली महादेवा जगत्पति ।
हरस्य दक्षिण बेधा वामभाग जनादन ॥१८
लादिरग्रत शगो पालरदश्च सुनता ।
सद्गगोश्वरदेव सिद्धश्च मुनिभिस्तथा । १९
उपविष्टेषु सर्वेषु गन्धर्वाधा समन्तत ।
जगुर्गीत च हिन्दोल तुम्वरुारदादय ॥२०
मत्तमातङ्गगामिन्यो गेय ताल तयान्वितम् ।
रम्भाद्यप्सरस सर्वा मिनर्वा ननृतुद्विजा ॥२१
उस समय म हर भगवान् ने विविध प्रकार के गीतो के द्वारा तथा
पापा पे द्वारा प्रवेश दिया था। उस समय में सोलह पए की भारति
वाले भगवान् भव स्वय बाना होगये थे ॥१॥ भगवान् हर हेम में
रामा अङ्ग वारे-पिरीट को धारण किये हुए और पुण्डलो को
पहिनो वाते होगय थे। हविद्रो । समस्त मुर और असुरा ने भग
यान् पिनासी पे सुदर स्वरूप पो गा था। शिव के रूप को देखकर
थापस म एक दूगरे यी योर मुग घर पे आT द से युक्त होरर हमने
लग गये थे। हे विप्रो नारा प्रकार के रलो से विभूषित सुपण निर्मित
भासा पर जगत घे स्वापी भगवान् शूनी महादेव जी विराजमान होगये
।

युक्त गेय पर । सूर्य पुराण थे। हर के दक्षिण भाग में वेधा विराजमान हुए थे और वामभाग में জসান प्रभु ममवस्थित हुए थे ॥१६-१८॥ हे सुव्रतो ! शम्भु भगवान् के आगे शैलादि विराजमान थे और कालरुद्र स्थित है। रुद्रो गणो- ईश्वरी-देवो-सिद्धो और मुनियों के द्वारा सबके उपविष्ट हो जाने पर पारो ओर गन्धर्व आदि विराजमान हुए थे। नारद आदि ने तथा तुम्बरू ने हिन्दोल गीत का गान किया था। इस ताल और लय हे द्विजो! मस्त गज के समान गमन करने वाली सब रंभा आदि अप्स- राऐ और किनरिया नृत्य करने लग गयी थी ।।१७-२१॥ वीणावल्लकिवेणूना मृदङ्गाना विशेषतः । ध्वनिभिर्मनसस्तुष्टिज्ञ सुमनसा तदा ॥२२ अथ विश्वेश्वरः शभुपणं नर्भास स्थितम् । प्रायच्छग्दिरिजायं तदाह्लादजनक मुदा ॥२३ अनेनालकृता देवि मम योग्या भविष्यसि । पितुर्दक्षस्य यः कोप. पूर्वजस्य वरानने ।।२४ प्रह स्यसि तमेवाऽऽशु भाव चैव तु तामसम् । तत. सा पार्वती देवी गृहीत्वाऽऽकाशमण्डलात् ॥२५ पितुः समीपमगमद्वस्त्राभरणमुत्तमम् । महता ह्य त्सवेनाऽऽशु भ्पयित्वा शिवा नगः ॥२६ वस्त्रं राभरणदेवी दिव्य सिंहवाहिनीम् । मेनोत्मङ्गगता भूयश्चन्द्रलेसेप तोयदे ॥२७ दधती निता देवी बभौ तामर सेक्षगा। अप देवं परिवृतो विष्णवाद्य त्रिपुरान्तकः ।।२८ उस समय मे वीणा-यन्लवी वेणु और विशेष हा मे मृदही की प्वनियो रो गुन्दर मन वागों के मन को शुटि उरान होगई थी ॥२२॥ इगरे पश्चात् विश्व में ईश्वर भगवान् सम्मु ने नभ में स्थित भूपण गिरिजा के लिये प्रदान रियाया। वह बानाद में माप बहुत ही भाहलाद मा नरम करने वारा था ॥२३॥ है देवि साम्ब विवाह वर्णन (२)] [ ३७७ समलड कृत होती हुई आप मेरे योग्य हो जाओगी। हे वरानने । जो तुम्हारा पूर्वज पिता दक्ष प्रजापति या उसके कार उत्पन हुए कोप को बहुत ही शीघ्र त्याग दोगी और जो तामस भाव उस पर समुत्पन्न हुआ या उसका भी त्याग कर दोगी ॥२४॥ इसके पश्चात् पार्वती देवी आकाश मण्डल से उसका ग्रहण किया था और फिर वह अपने पिता के समीप मे गयी थी। पर्वतराज ने महान् उत्सव के साथ बहुत शीघ्र शिवादेवी को उत्तम वस्त्राभरणो से भूपित कर दिया था ॥२॥२६॥ वह देवी वस्ती और आभरणो से जो कि परम दिव्य थे भूषित होकर सिंह गामिनी वह देवी मेना के गोद मे स्थित हुई पुन मेघ मे चन्द्रमा की लेखा के हो तुल्य भासित हुई थी ॥२७॥ भूपणो को धारण करती हुई देवी परम निबंता हो गई थी और तामरस के तुल्य नेत्रो वाली अत्यन्त राजित हुई थी। इधर देवगणो से परिवृत त्रिपुरान्तक थे जिनमे विष्णु आदि सभी थे।॥२८॥ वभ्राम मुनिशार्दूला क्रीडास्थानानि कृत्स्नश. । भगवन्देवदेवेश विश्वेशान्धकसदन ॥२६ प्रणम्य परया भक्त्या शैलादिरिमब्रवीत् ॥३० वेदीयमिन्द्रनीलाभा भाति विश्वभरा शिव । सेय जलमयी नाथ निमिता विश्वकर्मणा ॥३१ या चेय परमा रम्या तोयाना भ्रान्तिकारिणी। सेय भाति महादेक रत्नानामीदृशी प्रभा ॥३२ इद च द्वारसथान दृश्यते लम्बकंवृतम् । कुड्यस्य रत्नविन्यासे लक्ष्यते द्वाररूपता ॥३३॥ इद चित्ररथाकार दृश्यते वनमुत्तमम् । प्रतिविम्ब महादेव रत्नभूमेन सशय ।।३४ इद च मन्दिराकार सापानचयमडिण्तम् । प्रतिविम्वमिद चैव दृश्यते नवमडितम् ॥३५ हे मुनि शार्दूलो । फिर वे सम्पूर्ण क्रीडा के स्थाना में भ्रमण करने ३७८ ] [ सूर्यपुराण के लगे थे। शैलादि ने पराभक्ति से प्रणाम करके यह कहा था-हे भग. वन् ! हे देवदेवेश्वर ! हे विश्व के स्वामिन् ! हे अन्धक के सूदन करने वाले ! नन्दिकेश्वर ने कहा-हे शिव । इन्द्रनील को 'आमा वाली यह वेदी शोभित हो रही है जो कि विश्वम्भरा है। हे नाय ! वहाँ यह वेदी विश्वकर्मा के द्वारा जलमयी निर्मित की गयी है ।।२६-३शा जो यह परम रम्या है वह जलो की भ्रान्ति समुत्पन्न कर देने वाली है । हे महादेव जी । रलो की ऐसी ही प्रभा है कि यह वेदी ऐसी ही शोभा वाली प्रतीत होती है लम्बको से घृत यह द्वार का सस्थान दिखाई देता है । भित्ति के अन्दर जो रलो के विन्यास मे द्वार रूपता लक्षित हुआ करती है । यह चित्र रथ के आकार वाला उत्तम वन दिखाई दे रहा है । हे महादेवी जी! यह रत्नों की भूमि का प्रतिविम्व है-- इसमे कुछ भी सशय नहीं है । और यह जो मन्दिर के आकार वाला है वह सोपानो समुदाय से मण्डिन है। यह भी गवमण्डित प्रतिबिम्ब ही दिखलाई दे रहा है ॥३२-३५॥ या चेय सागराकारा दृश्यते तोयरूपिणी । एषाऽपि परमेशान रत्नभूमिर्जलोपिता ॥३६ यदिद गगनाभास मूर्तिद्रव्यरिवोजितम् । क्रीडामण्डपमेतस्मिन्प्रदेशे देव तिष्ठति ॥३७ अम्बराभैर्महारत्नैर्वाह्यदेशे विनिर्मितम् । अनेकवाद्यसयुक्त रमणीय ययो हरः ॥३८ एव क्रीडति देवेशे सुरासुरमहोरगा । विद्याधरास्तथा यक्षा गन्धर्वाप्सरसादय. १३६ दीपिकासु तडागेपु नदीषु च ह्वदेषु च । क्रीडावापीषु ते रम्यर्यन्त्रैर्नानाविधभृशम् ।।४० बभूवुर्देवता. सर्वाः क्रीडारतिषु लालसा. । अथ सक्रीय विश्वात्मा निवृत्तस्तत्प्रदेशत. । वेद्याः समीपमगमत्स्तूयमानो मुनीश्वरैः ।।४१ साम्ब विवाहावर्णन (२) ] प्राप्याऽऽरुरोह प्रसभ सुरेशस्तदिन्द्रनीलामलवेदिकान्तम् । सहस्रपत्रं वकुलश्च नार्गः कोण हि यत्काञ्चनपारिजातै ॥४२ जो यह सागर के से आकार वाली जलके स्वरूप वाली सामने दिग्वलाई दे रही है । हे परमेशान । यह भी जलोपिता रत्नभूमि हो है ॥३६॥ जो यह गगन के आभास वाला मूत्ति द्रव्यो से अजित के ही समान है। हे देव । इस प्रदेश में क्रीडा का मण्डप स्थित है ॥३७॥ अम्बर के समान आभा वाले महा रलो से विरचित वाह्म, देश मे जो अनेक वाद्यों से समन्वित और परम रमणीय था वहाँ पर शम्भु गये थे। इस प्रकार से देवेश्वर के क्रीडा करने पर समस्त सुर-असुर-महोरग- विद्याधर-यक्ष गन्धर्व और अप्सरा आदि समस्त देवगण दीधिकाओ मे- तहागो में नदियो मे-हो मे और क्रीडा वापियो में अनेक प्रकार के मुन्दर यन्त्रो के द्वारा अत्यन्त ही क्रीडा की रति मे लालसा वाले होगये थे। इसके अनन्तर विश्वात्मा उस प्रदेश मे निवृत्त होगये थे और मुनीश्वरो के द्वारा स्तुति किये गये प्रभु वेदी के ममीप मे गये थे । उस इन्द्रनील के समान निर्मल वेदिका के समीप मे सुरेश प्राप्त होकर बल पूर्वक आरूढ हुए थे जो वि सहय पत्रो-वकुलो-नागो और काञ्चन पत्र नातो से समाकीर्ण था ॥३८-४२॥ सत प्रविष्टो हरिणाइचिह्न सरश्मिजालाकुलवेदिकान्तम् । विवेश सूर्यायुतसुप्रभासो वतो विरच्यादिसुरं समन्तात।४३ अथोपविष्ट सवीक्ष्य विश्वोश पर्वतेश्वर । तस्य सस्थाप्य पुरतो नेवेशीमनवीदिदम् ॥४४ त्वमेवैक पर धाम अर्धनारीश्वरस्तत । देवताना हितार्थाय जातो ह्यधंतनु पृथक् ।।४५ दक्षस्य दुहिता देवी जगद्धात्री ह्य मा सती। वितिन्द्य च ततो दक्ष त्यक्त्वा देह निज पुन ॥४६ तवैव पत्नी देवेश जाता मम सुता सती । तत श्रुत्वा गिरीन्द्रस्य वचत्रिभुवनेश्वर । प्रसन्नो वरद शभुरनवीरपर्वतेश्वरम् ।।४७ ३८. 1 [ सूर्य पुराण जानाम्यह येन ममैव माया शक्तिवरपा नजराजसिंह । सत्यज्य देह तव धाम्नि जाता योगात्स्वय चारुशशाइवत्रा ॥४८ आचारार्थ गिरिथेष्ठ दत्ता गृह्णामि पार्वतीम् । अदत्ता यदि गृह्णामि तथा लोकेऽपि वर्तते (वर्तेत नै जन) ॥४६ इसके पश्चात् हरिणाइ के चिह्न वाले भगवान् शिव जो अयुत (दश सहस्र) सूर्यो की प्रभा से युक्त विरञ्चि आदि सुरों से चारो ओर परिवृत थे प्रभु शिव किरणो के जाल से समाकुल उस वेदी के समीप मे प्रविष्ट हुए थे ।।१३।। इसके अनन्नर पर्वतो के स्वामी हिमवान् ने विश्वेश्वर को वेदी के समीप मे प्रविष्ट हुए देखकर उनके आगे देवीशी के संस्थापित करके उस समय में यह कहा था ॥४४॥ हिमवान् ने रहा-अरप ही एक परमधाम और अर्ष नारीश्वर है। देवताओ के हित करने के लिये ही आपने पृथक् शरीर धारण किया है ॥४५॥ यह दक्ष प्रजापति की पुत्री जगत् की धात्री सती उमा है । इसने अपने पिता दक्ष को विनिन्दित करके और अपने देह का त्याग करके यह हे देवे- श्वर । यह आपकी ही पत्नी फिर सती मेरी पुत्री होकर समुत्पन हुई है । इसके उपरान्त तीनो भुवनो के ईश्वर प्रभु शिव ने गिरीन्द्र हिमवान् के इम वचन का श्रवण करके वग्दाता भगवान् शम्भु परम प्रसन्न हुए थे और पर्वतेश्वर से बोले-॥४७॥ ईश्वर ने कहा है नगराज सिंह । मैं यह सब कुछ भलीभाति जानता है कि यह मैरी वरा शक्ति माया है जिसने अपने देह का त्याग किया था और अब आप यहाँ समुत्पन्न हुई है । और चारु शशाइवक्त्र के द्वारा स्वय ही योग से प्रसूत हुई हैं ॥४८॥ हे गिरि श्रेष्ठ | इस समय मे मैं प्रदान की हुई पार्वती को केवल आचार के लिये ही ग्रहण कर रहा हूँ अर्थात् यह विवाह का कृत्य मच लोकाचार की रक्षा के लिये ही हो रहा है। यदि बिना दान किये हए ही इस का ग्रहण करता हूं तो लोक के लोग भी विद्यमान हैं उनके आचार की रक्षा नही हो सकती है ॥४६।। अथ दिव्योदकै पूर्णमादाय कलश गिरि ! परिपूर्णस्य नित्यस्य नित्यानुग्रहकारिण ।।५० साम्ब विवाह वर्णन (२) ] [ ३८१ प्रक्षाल्य पादौ शिरसा प्रणम्य भृङ्गारमादाय स शैलराजः । मुमोच तोय भवपाणिपने दत्त ति दत्तेति तदा प्रजल्पन ॥५१ ततो मङ्गलनिर्घोपः समभूत्रिदिवौकसाम् । वीणावेणुमृदङ्गाना काहलाना च नि स्वनः ॥५२ सा हारकण्ठी कटिसूत्रदामा मुभ्रू लता चारुविलोलनेत्रा। मेरायथवोपरि चन्द्रलेखा तथा वभौ पर्वतराजपुत्री ॥५३ अथ वेद्या गतो ब्रह्मा विश्वमाया स्मरारणिम् । ददर्शीदकपात्रेण विभावसुपुरस्थितः ।।५४ माहेश्वरी काममयी दृष्ट्वा ता तु पितामह । अक्षरत्सहसा शुक्र भग्नकुम्भादिवोदकम् ॥५५ पादेन तन्ममर्दाऽऽशु शुक्र तत्पमसभवः । पभजोऽपि महातेजा देवदेवस्य पश्यतः ।।५६ इसके अनन्तर दिव्य जल से पूर्ण कलश को हिमवान् ने लिया था और नित्य ही परिपूर्ण और अनुग्रह करने वाले प्रभु के चरणो को घोकर शिर के बल प्रणाम करके फिर शैलराज ने भृङ्गार को ग्रहण किया था । भगवान् शिव के हस्त कमल मे "दत्ता-दत्ता" अर्थात् प्रदान कर रही है ऐसा कहते हुए जल छोड दिया था ॥५०॥५१॥ इसके पश्चात् देवगणो मे मङ्गल सूचक निर्घोप हुआ था तथा वीणा-वेणु- मृदङ्ग और पहलो की ध्वनि भी हुई थी ॥५२॥ वह देवी कण्ठ मे हार धारण करने वाली-कटि मे सूत्रदाम पहिने हुए-सुन्दर भृकुदियो से सम्पन्न-चारु और विशाल नेत्रो वाली पर्वतराज की पुत्री ऐमी शोभित हुई थी जैसे मेरु पर्वत पर चन्द्रमा की लेखा शोभित हुआ करती है ५३॥ इसके उपरान्त वेदीवर ब्रह्माजी गये थे और विभावसु के आगे पित उनमे विश्वमाया को तथा स्मरारणि को उदा पात्र से युक्त देखा था ॥५४॥ पितामह ने उन काममयी माहेश्वरी देवी का दर्गन किया था तो उसी समय मे फूटे हुए बुम्भ से जल की ही भांति सहसा उनका शुक्र क्षरित होगया था । पप सम्भव ब्रह्माजी ने उम क्षरित शुक्र ३८२ ] [ मूर्यपुराण को पाद से ही मस्ति कर दिया था । देवो के देव यह सब देख ही रहे थे कि महातेज वाने पयज क्या कर रहे थे ॥५५॥५६॥ मैवं मर्देति तं दृष्ट्वा त्रिपुरारिः पितामहम् । कुरुप्वे (जुहुधी) तीति पोवाच भगवात्रीललोहितः ।।५७ अमोघं तत्तदा विप्रोः शुक्रमग्नौ प्रजापतिः । जुहोति व (अजुहोद्व)चनाच्छंभोमिनाऽऽदाय पाणिना ॥५८ हवनाच ततः प्राप्ता. सवितारं वियद्धतम् । तेजोमयाश्च ते सर्वे तपोनिष्ठाः समन्ततः ।।५६ अष्टाशीतिः सहस्राणि मुनयस्तूर्ध्वरेमसः । माने त्वङ्गठमात्रास्तु जाता ह्यथ मुवर्चस. ॥६० बभूवुस्ते महात्मान: पतङ्गसहचारिणः । निस्पृहा रश्मिपाः सर्वे सर्ने ज्वलनस निभा ॥६१ ततो देवा सगन्धर्वां सिद्धाश्च मुनयस्तथा। पिशाचा दानवा दैत्याः किंनराश्च महोरगा.॥६२ विद्याधराश्चाप्सरसस्तथा चान्ये, सुरासुरा. । प्रहृष्टाः सर्व एवते पार्वत्या हरसगमात् ॥६३ निमुरारि प्रभु ने पिता मह को देखकर उनसे कहा था इस प्रकार से मर्दन मत करो। भगवान् नील लोहित ने कहा था कि हवन करो ॥५७॥ उस समय उस अमोघ शुक को हे विप्रो ! प्रजापति ने अग्नि में भगवान् शम्भु के वचन से बॉये हाथ से लेकर उमका हवन कर दिया था ॥५८।। इसके उपरान्त वें सब तेजो मय-तपोनिष्ठ चारो ओर से आकाश मे स्थित सविता को प्राप्त हो गये थे ॥५६॥ इसके अनन्तर अट्ठासी हजार अस्त्रं रेता मूतिया जो परिमाण मे अङ्ग प्ठ के बरावर सुन्दर वचं स वाली समुत्पन्न हो गयी थी॥६०। वे सब महान् आत्मा 'वाले सूर्य के सहचारी हो गये थे जो नि स्पृह और सव रश्मियो के पान करने वाले और अग्नि के ही सदृश थे ॥६॥ इसके पश्चात समस्त देव- गन्र्धव-सिद्ध-मुनिगण-पिशाच-दैत्य-दानव-किन्नर-महोरग-विधाघर-अप्सरा साध्व विवाह वर्णन(२) ] [ ३८३ गण और अन्य सुरासुर बहुत ही प्रसन्न होते हुए पार्वती का भगवान् हर के साथ सनम होने से आनन्द में निमग्न हो गये थे ।।६।६।। मुमोच वृष्टि ऋतुराट्मुतुष्ट पुप्परनेकर्धमराकुलश्च । वाद्य विचितंवरराह्मनाद सुगीतगानव रमङ्गलश्च ॥६४ वीणारवर्दुन्दुभिवेणुनादः समन्तत कर्णमुख प्रजज्ञ । आनृत्यतीभि सुरसुन्दरोभिजंगीयतीभिवंरकिंनरीभिः ॥६५ दैत्याङ्गनाभिश्च वसीदतीभि कामायतेऽतीव तदुत्सव च(वश्च)। काञ्चीरवेणाथ नितम्बिनीना मनोभिरामेण च नूपुराणाम् ॥६६ सामा स्मितेनाथ मुनीन्द्रवर्या व व वामानलदीपचर्या । होमावसाने मधुपर्क युक्त देवाय तस्मै मधुभाजन च ॥६७ ततो निवेद्य प्रमथाधिपाय चार तुष्टि परमा विरञ्चि ।।६८ अथ देवेपु विश्वेशो वरदोऽभ द्विजोत्तमा । वराश्च विविधान्दत्त्वा ब्रह्मादिभ्यो महेश्वर ॥६६ व्यसर्जयत्तत सर्वांन्स्थावराअङ्गमास्तथा । विसजिता प्रणम्येश प्रीति ते परमा गता ॥७० ऋतुराज ने परम सन्तुष्ट होकर भ्रमरो से समावुल अनेक प्रकार के पुष्पो की वर्षा की थी। विचित्र वाद्यो सेनर शसों के नाद से--- सुगीत मान श्रेप्ट मङ्गल गानों से-वीणा की ध्वनियो से--दुन्दुभि के तथा बैरणु के शब्दो से चारो ओर कानो यो सुष समुत्पन्न हुआ था। चारी और नृत्य करने वाली सुरो की सुन्दरियो से और गान करने वाली किन्नारियो से और वसीदती दैत्यो की अङ्गनाओ से वह उत्सव अत्यन्त ही कामायमान हो गया था । नितम्बनियो की काञ्ची के शब्द से तथा नूपुरो पे मनोऽभिराम दाब्द से तथा उन अङ्गनाओ के मन्द मुस्कान से बडे बडे मुनीन्द्र गण भी कामाग्नि वे प्रदीप्त चर्मा वाले हो गये थे । होम के अन्त में ब्रह्माजी ने मधुपर्क से युक्त मधु भाजन को उन देवेश्वर को प्रमथो वे अधिय के लिये निवेदन करने परमाधिक तुष्टि यो प्राप्त किया या ॥६४॥१५॥६६॥६७१६॥ हे द्विजोत्तमो | इसके अनन्तर ३८४ ] [ सूर्य पुराण देवो के जार विश्वेश वरदान दो दाने हो गये थे। महेश्वर ने ब्रह्मा आदि देवो को अनेक घरदान देकर वहाँ मे विदा करा दिया था । वे भी सब ईश को प्रणाम बरखे परमाधिर प्रीति को प्राप्त हुए थे ॥६६॥७॥ एव सक्षेपतो विप्रा विवाहो गिरिजापते । कथितो रविणा पूर्व यथावत्समुदीरित ७१ शृणोति श्रद्धया यस्तु पठेदा प्रयतात्मवान् । सर्वान्कामानवाप्नोति वदर्वाड न सराय ॥७ सर्वपापविनिर्मुक्तस्तेजस्वी प्रियदर्शन । जीवेद्वपंशत साग्र गच्छेनह्मपद तत ७३ हे विप्रो इस प्रकार से परम सक्षेप से गिरिजा के पति का विवाह वर्णन वह दिया है जैसा कि पहिले रवि देव ने इसका वर्णन किया था ॥७१॥ जो इरा भगवान शहर के विवाह का वर्णन प्रमत आत्मा वाला श्रद्धा से श्रवण किया करता हैं या पढता है वह एक वर्ष से ही पूर्व अपने मन की सब कामनाओ की प्राप्ति कर लिया करता है-इसम तनिक भी मगय नहीं है ॥७२॥ वह मनुष्य समस्त पापो से विनियुक्त होकर परम तेजस्वी-प्रिय दर्शन सौ वर्ष तक इस ससार मे जीवित रहता है और अन्त मे ब्रह्मपद को प्राप्त हो जाता है ॥७॥ ॥ साम्ब कोडादि वर्णन ॥ विवाह्याद्रिस ता शभु ययौ कैलासपर्वतम् । क्रीडा व वर्पसाहस्रीमकरोत्तत्र श कर ॥१ गणैर्नानाविधैश्चव सिंहास्य शरभानने । कश्चिद्व्याघ्रमुखैभीम कैश्चिन्दृध्रमुखैरपि ॥२ कश्चिन्दमुखैरन्यै कश्चिन्मृगमुखैरपि । कश्चिदुष्ट्रमुखर्दीर्घ कश्चिद्धयमुखैरपि ॥३ माम्ब क्रीडादि वर्णन । [ ३८५ कैश्चिच्चित्रमुरोरन्यै कश्चिद्देफमुमेरपि । मूपकाम्यस्तथा चान्यर्मार्जारवदनरपि ।।४ सास्य कुलास्गश्च जम्ब कास्यस्तथाऽपरः। शिशुमारमुसंश्चान्गर क्षवक्त्रस्तथाऽपर ॥५ मयूरवदनैरन्यैर्वक्वोस्तयाऽपरं । शाखामृगमुसौश्चान्यौ खरास्यैश्च तथापरं ॥६ अन्यरसख्य प्रमथैर्जरामरणजित । नित्यतृप्तेनिरातई. कालस हरणक्षौ ।।७ श्री मून जी ने कहा-भगवान शम्भ ने अद्रि की पुत्री के साथ विवाह करके वे फिर अपने फैलास पर्वत पर चले गये थे। वहां पर नाना सहस्र वर्षों तक क्रीडा करते रहे थे ॥१॥ वहाँ पर नाना प्रकार के स्वरूप वाले गणो के साथ भगवान शम्भ, क्रीडा क्यिा करते थे। कुछ गण सिंह के समार मुखी वाले थे-कुछ शरभ के तुल्य आननो वाले थे। कुछ ऐम गण भी थे जिनके तुल्य थे। कुछ के मुख बहुत भयानक थे तथा मृघ्र के समान मुग्न थे--कुछ ऊट के से मुखो वाले थे-कुछ के मुस बहुत बडे तथा अश्वो के समान थे-कुछ विचित्र मुग्गी वाले और अन्य वृमा के तुल्य मुखो वाले थे-भूपिको के समान मुमो वाले-मार्गार जसे वदनी वारे-सपस्थि और नकुल के तुल्य मुखो वाले-जम्वुको के सदृश आननो वाले दूसरे शिशुमार के समान मुखो वाले- अन्य रीछो वे सदृश माननो वाले गण थे-मोर के समान मुगो वाले तथा वगुलाओ क सहा मुग्गी वाले-वन्दरो जैसे मुखो वाले-गधे के समान मुख से युक्त ऐसे बहुत से गण थे तथा अन्य असख्य प्रमथ ये जो जरा मरण से रहित थे-योग्ण नित्य तृप्त-निरातङ्क और काल का भी सहार करने में समर्थ थे ।।२।। से ॥७॥ तक सहस्रकोटिसस्याकै स्वच्छन्दगतिचारिभि । क्रीडा विधाय भगवान्कैलासे पर्वतोत्तमे ।। तपसा महता शभुरनुगृह्य च मन्दरम् । कलास स परित्यज्य मन्दरे चारुकन्दरे ॥६ मुख व्याघ्र के ३८६ ] [ सूर्य पुराण तत्रापि रममाणस्य गते वर्प सहस्रके। देवताना हितार्थाय प्रकृत्या सह शूलभ त् ॥१० प्रक्रीडतीह विश्वात्मा कामासक्तश्च सर्वथा । प्रार्थितोऽहं सुरः पूर्व तारकस्य बधेप्सया ॥११॥ मद्रेतसः समृत्पन्नस्तारकं स हनिप्यति । इति मत्वा मपादेवे रममाणे सहोमगा ॥१२॥ उत्पाताश्च महाघोराः संप्रवृत्ताः सुदारुणाः । रुधिराम्थीनि वर्षन्ति नदन्तो मेघसकुलाः ॥१३॥ वाययश्च महानेगा पर्वताश्चालयन्ति ते । विमानानि सुराणा च निपेतुर्गसुधातले ॥१४॥ ऐसे गणेवी सहस्रो करोड संख्या थी और ये सव स्वच्छन्द गति के चरण करने वाले थे । इन सबके साथ भगवान् शम्भु पर्वतो मे उत्तम कैलास पर क्रीड़ा किया करते थे ।। भिर भगवान् शम्भु ने महान् तप के द्वारा प्रसन्न होकर मन्दर पर्वत पर अनुग्रह किया था और कलास का त्याग करके सुन्दर कन्दराओ वाले मन्तप गिरि पर जाकर क्रीडा फरने लग गये थे । वहा पर भी रमण करते हुए भगवान् शङ्कर को एक सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये थे। यह इस प्रकार की क्रीडा शूली प्रभु ने प्रकृति के साथ देवो के ही हित सम्पादन करने के लिये की थी 18।१०। यहाँ पर विश्वात्मा सर्वथा काम से आसक्त होकर ही क्रीडा कर रहे थे क्योकि मैं तारक वध घी इच्छा से सुरो के द्वारा प्रार्थित किया गया था ।११। क्योकि मेरे वीर्य से जो समुत्पन्न होगा वही तारक दैत्य का हनन करेगा । यह मानकर ही उमादेवी के साथ रममाण महादेवजी के होने पर महान् घोर एव परम दारुण उत्पात सप्रवृत्त हो गये थे। साकुल हुए मेघ गर्जन करते हुए रुधिर और अस्थियो की वृष्टि करने लगे थे। उस समय मे वायु भी महान् वेग वाली चलने लगी थी जो पर्वतो को भी चालित किया करते हैं । सुरगणों के विमान वसुधा तल में गिर गये थे।१२।१३।१४।

साम्ब क्रीडादि वर्णन ] [ ३८७ उल्काभिर्गगन व्याप्त पतन्तीभिर्द्विजोत्तमा । केतवश्चोदिता सर्ने जृम्भन्त इव पावका ॥१५॥ दिग्दाहाश्च महाघोरा दावाग्निरिव सक्षये । मृत्युकाले यथा जन्तु व सौख्यमवाप्नुयात् ॥१६॥ जगनयमिद कृस्न न लभेत तथा सुखम् । न वेदा पठितास्तम्मिन्न विप्रा जजपुर्जपम् ॥१७॥ पार्वत्या कम्पमानाया कम्पमाने च शकरे। लोक्यमभवन्नून कम्पमान भयातुरम् ॥१८॥ कालाग्निकम्पितो देवो विरञ्चिमुनिभि सह । चक्रायुधोऽपि चात्यर्थमिन्द्राद्यं परिवारित ॥१६॥ ये केचिद्देवगन्धर्वा सिद्धा गगनचारिण । विद्याधराश्च यक्षाश्च सप्राप्ताश्च वमु घराम् ॥२०॥ एतस्मिन्नन्तरे प्राप्त शक्र देवमित्तम । यथावन्मधुपर्वाद्यं शक्रस्तमभ्यपूजयत् ॥२१॥ ह द्विजोत्तमो। गिरने वाली उल्लाआ मे सम्पूर्ण गगन व्याप्त हो गया था। राम वेतु उदित हा गर ये जा कि जुम्मा लेते हुए पावको के ही समान थे ।१५। समय के समय म हाहाग्नि में ही तुल्य महान् घोर दिग्दाह होने लग गये थे। निम प्रकार मे मृत्यु के समय में जीव सुम प्राप्त नहीं दिया करता है ।१६। में तीना भुवन सम्पूर्ण मुग प्राप्त नही क्यिा करता था वह ऐमा समय समास हो गया था कि उमम न तो पैदा काही पाठ किया जाना था और न विप्रगण जाप किया करते ये।१७। पार्वती देवी के पम्पमान होने पर तथा प्रभु सादर के प्ररमित हो जाा पर पूर्ण मोक्य निश्चित प ग भयातुर और प्रय म्पिन हो उठा या १८ देव विरजि मुनिया के साथ गालाग्नि से पम्पित हो गये थे--मुबान पर वो धारण परा वान विष्णु भी इन्द्र यादि गाप परिवाग्नि होकर अत्यधिक कम्पापमान हो गये थे। जो बुध देव गन्यवं गिर गगन म सम्मरण परले पारे पे और ये मय ३८८ ] [ सूयपुराण विद्याधर और यक्ष वसुन्धरा पर आकर प्राप्त हो गये थे ।२०। इसी बीच में देवर्षिया मे परम श्रेष्ठ नारद मुनि इन्द्र के समीप मे समागत हुए थे । इन्द्रदेव ने जब तक मधुपर्क आदि के द्वारा उनका अभ्यर्चन दिया था ।२१। अब्रवीद्देवराजस्तमपविष्ट महामुनिम् । निकालदर्शिन शान्तमात्मनिष्ठ तपोनिधिम् ।।२२।। उत्पाताश्च महाघीरा सप्रवृत्ता सुदारुणा । कारण वद मे सर्न शान्तिश्चैव यथा भनेत् ॥२३।। उमया सह विश्वेश पर ज्योतिर्ममश्वर । अहर्निशमविश्रान्त युक्त एव प्रवर्तते ॥२४॥ तस्माद्ध तो प्रवर्तन्त उत्पाता वृत्रहन्किल । विघ्न तस्य प्रकर्तव्य यदीच्छसि पर सुखम् ।२५। उमागर्भसमुत्पन्न सनस्मादधिको हि स । कथ धारयितु शक्ता ब्रह्माद्या ससुरासुरा १२६) जगनयमिद कृतस्न धरणीधारयिष्यति । नापत्यघारणे शक्ता सजात शिवयो खलु ।२७। नारदस्य वच श्रुत्वा शको विस्मयता गत । तदा चिन्तार्णने मग्नो देने सह पुरदर २८ पड़ गौरिव सीदत्मु देवेप्वय जनार्दन । उवाच श्लक्ष्णया वाचा देवाना हितकाम्यया ।२९। जव देवपि अपने आसन पर समर्पित होकर उपविष्ट हो गये थे तो देवराज न उन महामुनि स जो त्रिकान की बातें जानने वाले थे तया परम शान्त-आरमनिष्ठ और तपो निधि 4 1१२॥ राक्रदेव ने कहा--- है महामुने । परम धारण महान् घोर उत्तात पारो ओर प्रवृत्त हो गये हैं । इन राबसा क्या कारण है। उसे आप वतनाइय जिससे कि यह मयात होवें और हम सबो शालि की प्राप्ति हो गये ।२३॥ श्री नारदजी ने कहा-पर ज्योति महेश्वर विश्वेश उमा के साथ अवि- 1 . साम्ब क्रीडादि वर्णन ] [ ३८६ थान्त रूप से अहर्निश युक्त होकर ही प्रवृत्त होते रहे हैं। ॥२४॥ हे वृत्रहन । उसी हेतु से ये सब उत्पात प्रवृत्त हो रहे हैं। उसका विघ्न करना चाहिए यदि परम सुख की इच्छा करते हो।२५॥ उमा के गर्भ से समुत्पन्न जो है वह सबसे अधिक है। ब्रह्मा आदि सुरासुर कैसे धारण करने के लिए समर्थ हो सकते है। धरणी इस तीनो जगतो के सम्पूर्ण समूह को धारण करेगी। शिव और शिवा इन दोनो के अपन्य के धारण करने से सजात को शक्त नहीं है। श्री नारदजी के इस वचन को सुनकर महेन्द्र विस्मय को प्राप्त हो गये थे। इसके अनन्तर पुरन्दर देवो के साथ चिन्ता के सागर मे निमग्न हो गये थे ।२६।२७।२८। इसके अनन्तर पङ्ग मे गौ के ही समान देवो के अवसन्न होने पर भगवान् जनार्दन ने देवो की हित की कामना से परम लक्षण वाणी से पहा था ।२६॥ शृणुध्व देवता सर्वी कामासक्तो न शङ्कर । युष्माक हितवामाय भोगयुक्तोऽभवच्छिव १३०॥ स्वतन्त्रशक्तिविश्वात्मा जितकाम स्वभावत । सपूर्णकामः स विभु क्थ वामेन वाध्यते ॥३१॥ तद्रेतसा समुत्पन्नस्तारक स वधिप्यति । एतस्मात्सारणाद्देवो देव्या युत्तोऽभवत्सुरा ॥३२॥ किंतु तत्केवलोत्पन्न सेन्द्र रपि मुरासुरै । तेजोधारयितु तस्य न शक्यमिति निश्चितम् ॥३३।। इद यत्वार्यमुत्पन्न व्याधिरूप दिवौनसाम् । उपेक्षित न सदेहो हन्यान्नून जगप्रयम् ॥३४॥ यदि तत्वेवलो जातो भविप्यति सुरास्तदा। असह्यो दुर्घरो घोर इति तथ्य न संशय ॥३५|| भगवान् श्री विष्णु ने पहा हे समस्त दवों में समुदायो । आप प्रवण कीजिए-भगवाद सहर काम म गमाराक्त नहीं होते है। भगवान शिव आपके साथ लोगोरे हित की कामना + लिये भोग में युक्त हुए थे।३०। स्वतन्त्र परिवाये पिस्वारमा स्वभाव में हो वाम

३६० ]
[ सूर्य पुराण
को जीतने वाले हैं। वह विभु मम्पूर्ण काम हैं ये काम के द्वारा से
वाधित किये जा सकते हैं ।३१। उनके वीर्य से जो समुत्पन्न होगा वही
तारक का वध करेगा । हे सुरगणो। इसी कारण से देवेश्वर देवी के
साथ सयुत हुए हैं ।३२५ किन्तु उनसे ही केवल उत्पन्न वो इन्द्र के सहित
सुरासुरो के द्वारा भी उसका तेज धारण नही दिया जा सकता है-
यह सर्वथा निश्चित है ।३३। यह जो व्याधिरूप जो देवो का वार्य
समुसन्न हो गया है वह उपेक्षित नहीं है इसमें कोई सन्देह भी नही
है वह निश्चय ही जगत्त्रय का हनन कर देगा ३४। यदि यह
केवल
ही समुत्पन्न होगा तो हे सुरो। उस समय मे वह अमा-दुर्घर-घोर
होगा-यह तय्य है और इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।३५।
स एव विष्णुवलवानिन्द्रश्च व प्रजापति ।
स चाऽऽदित्यः कुबेरश्च ईशानो वरुणस्तथा ।३६॥
स यम स च मोमश्च स वायु स्वर्गवासिन ।
स एव सर्व भविता भवद्भिश्च दुपोक्षित ३७।
दृश्यतेऽत्राप्युपायश्च कार्यस्यास्य सुरोत्तमा ।
यस्मादग्निमुखा यूय तस्मादग्निहि नान्यथा ।३८।
यदुन गहन धोरमप्रधृष्यमगोचरम् ।
हृदि यद्भवता कार्यमग्निस्तत्साधयिष्यति ।३६)
एवमुक्त्वाऽथ विश्वादि शङ्खचक्रगदाधर ।
अब्रवीत्कष्णवमान देवाना सदसि स्थितम् ।४०॥
शृणु मद्वचन वह्न देवाना यदुपस्थितम् ।
त्वया तत्माधनीय हि हितार्थ निदिवौकसाम् ।४१।
योऽसौ देव पर ज्योतिर्नीलग्रीवो विलोहित ।
रमते चोमया साधं चराचरपति शिव १४२।
वह ही बलवान् विष्णु देव हैं और वही इन्द्र और प्रजापति है।
वह आदित्य हैं—वही कुवेर हैं वही ईशान और यरण है ॥३६॥ वह
यम-वह सोम वह वायु और स्वर्गवासी हैं। वह ही सब होगा । यदि

साभ्य क्रीडादि वर्णन ] (३६१ आप लोगों के द्वारा उपेक्षित है ॥३७॥ है सुरोत्तमो ! यहां पर भी उपाय इस कार्य का दिखाई देता है । जिससे तुम लोग अग्नि मुख हैं इससे अग्नि ही है अन्यया नहीं है ॥३८॥ जो आप लोगों के हृदय में 'अत्यन्त उग्र-गहन-घोर अप्रष्य और अगोचर है उस कार्य को अग्नि मिद्ध करेंगे ॥३६॥ इस तरह से बह कर विश्व के आदि-शह्वः चक्र और गदा के धारण करने वाले देवो के सभा में स्थित कृष्णवर्मा से बोले ॥४०॥ थी विष्णु भगवान् ने कहा-हे वह्न ! आप मेरे वचन वा श्रवण करो जो कि कार्य इस समय में देवो का उपस्थित हुआ है। देवो के हित के लिये वह आपको साधित करना ही चाहिये । जो 'यह देव परम् ज्योति-नीलग्रोव-विलोहित हैं वे चराचर पति शिव उमा देवी के साथ रमण कर रहे हैं ।।४११४२।। भयं तस्मात्समुत्पन्न कारणाद्धि दिवौकसाम् । तस्मादिताय गच्छ व महादेवम्य सनिधौ ।४३१ मुख त्वमेव सर्वेषा कार्यागा चैव साधक । इत्यवं वचन शुन्वा पावक देशवात्तदा ।। उवाचेद मुनिश्रा श्रीवत्मावितवक्षसम् Iml यदुक्त भवता देव किं त्वयुक्त सनातन । महेशस्य रह स्यस्य प्रवेष्टु नेव साप्रतम् ।४५१ ध्यानयुक्तो जन. पश्चिन्मनभोजनतत्पर । रहः स्योऽय च दानस्थरतदयुक्त प्रवेशनम् ॥४६॥ जाप्योपहारयुक्तो वा होमयुक्तोन्यवा भवेत् । अर्चनाभिरत कश्चित्तदयुक्त प्रवेशनम् ॥४॥ प्राकृतस्यापि देवेश रह स्थस्य रमापते । तस्मिन्काले सुरेशान हित तु प्रवेशनम् ।४८१ कि पुनभंगवान्भीमस्तिग्मरश्मिमहेश्वर. देवाना च हिताय प्रवृत्या सह मगतः।४।।

३६२ ]
[ सूर्य पुराण
उस कारण से देवो को भय समुत्पन्न हो गया है। अतएव देवगण
के हित के लिये आप इस समय मे गहादेव जी की सन्निधि में गमन
कीजिए ॥४३॥ आप ही सब के मुख हैं और देवो के कार्य के साधन
भी हैं। उम समय म इम वचन को पावक ने वेशब के
मुख
से श्रवण
किया था। हे मुनि श्रेष्ठो । पावक देव ने श्रीवत्स के अङ्क से चिह्नत
वक्ष स्थल वाले समु से यह वचन कहा था ॥४४॥ अग्नि देव ने कहा-
हे देव । हे सनातन । आपने जो भी कुछ कहा है वह अयुक्त है । रह मे
अर्थात् बिल्कुल एकान्त मे स्थिति महेश के समीप मे प्रवेश करना उचित
नहीं है ॥४५॥ कोई भी जन ध्यान मे युक्त हो अथवा मन्त्र, जाप और
भोजन मे परायण-एकान्त स्थल में स्थित हो और दान में समवस्थित
हो नब उसके समीप में प्रवेदा वरना युक्त नहीं होता है ।।४६।। जाप्योप-
हार से कोई युक्त हो अथवा होम के कार्य मे व्यस्त हो तथा देव की
अर्चना करने म निरत हो तो उसके समीप में प्रवेश करना उचित नहीं
होता है ॥४७॥ काई साधारण मनुष्य भी जब एकान्त लीला मे नरत
हो तो देव रमापते । उसके पास जाना अनुचित ही हुआ करता है । है
सुरेशान उस समय मे प्रवेश करना तो उचित नहीं है और गहित भी
माना जाता है ॥४८।। फिर भगवान् के विषय मे तो कहने की बात ही
क्या है । भगवान् तो वहुत ही भीम है--स्तिग्म राश्मियो वाले है।
वे महेश्वर तो देवो के हित सम्पादन करने के लिये प्रति के साथ
सङ्गत हुए हैं ॥४६॥
नाह तत्र विशे नून विभेमि मधुसूदन ।
आगत मा समालोक्य क्षणाच्छभुर्हनिष्यति ॥५०॥
जुगुप्सितमिद कार्यमिति कष्ट भयावहम् ।
विवस्त्रा जननी देवी कथ द्रक्ष्यामि केशव ॥५१॥
कि वक्ष्यति प्रविष्टस्य वक्ष्यामि किमह विभो।
जल्पयिष्यति मा देवो घिडमोध्यमिति ध्र वम् ॥५२॥

साम्य क्रीडादि वर्णन ] [ ३६३ ही क्षण यद्भाव्यं तद्भवत्तद्य न अरोमिच निन्दितम् । अग्निना चैवमुक्तरतु विष्णुर्दानवसूदनः ॥५३॥ भयद मोहद थत्वा वाक्ययं हृदयकम्पनम् । उवाच भगवान्विष्णुः पुनर्वाह्निमिति स्तुवन् ।५४। त्रलोक्यरक्षणार्थाय शक्रादीना च सनिधौ ।५५॥ हे मधुसूदन । वहाँ पर मे निश्चय ही प्रवेश नही कर सकता हूँ- मैं तो डरता हूं। मुझको आया हुआ यदि शिवजी ने देख लिया तो एक मे शमु मेरा हनन कर देंगे ।५०। यह कार्य बहुत ही निन्दित है अतएव कष्टप्रद है, भया वह भी है । हे केशव ! मैं आप यह तो विचा- रिए नग्न हुई जननी को कैसे देख गा ।५१ प्रविष्ट हुए मुझसे वे क्या कहेंगी और हे विमो । मैं फिर क्या उत्तर दूगा । देव मुझसे यही कहेंगे-धिक्कार है-तू बडा निश्चय मूर्ख हैं ॥५२॥ जो भी कुछ होन- हार हो वह होवे, इस समय मैं बुरा काम नहीं करता हूं। अग्नि देव के द्वारा दानवसूदन विष्णुभगवान् अब इस प्रकार से कहा गया तो भय देने वाला और मोह देने वाले वाक्य को सुनकर हृदय मे कम्पन होता है। भगवान विष्णु ने पुत्र वह्निकी स्तुति करते हुए कहा या जो लोक्य की रक्षा करने के लिए इन्द्र आदि देवो को सन्निधि में ही कहा था। ॥५३॥५४॥५५॥ यदुक्त भवता व सत्यमेतन्न सशय । आत्महेतोविरुद्ध स्यात्परार्थ नैव दुष्यति ॥५६॥ प्रदिष्टो देवदेवेन सहाराथं कदिना। प्रविश त्वमणो रूपमादाय न हि दुष्यसि ।५७ ॥ प्रस्तुताप्रस्तुत नास्ति तेजोमूर्तेस्तवानघ । सर्वदा सर्वगस्त्व हि न क्वचित्प्रतिहन्यसे ।५८। भूतग्रामं समस्त वै त्वमेको व्याप्य तिष्ठसि । उदरस्थः पचरपन्न प्राणिना मेपवाहन ।६।

३६४ ] [ सूर्य पुराण त्वयकेन जगत्कृत्रन गोप्यते यदि पावक । किं न प्राप्तं त्वया ब्रू हि दोपः क. स्याद्धताशन ।६० जुगुप्साऽस्मिन्न कर्तव्या त्वया वै हव्यवाहन । उत्पत्रस्यास्य कार्यस्य काल एप तत्रानघ ।६।। पिंदशाः शरणं प्राता हुतभुक्त्वा विभावसो । अहो धन्यतरश्चासि श्लाघ्यो यदि करिष्यसि ।६२। कुरु कार्य सुराणा त्व मग्नाना फरुणां कुरु । सर्वकाले यथा मां वीक्षमाणास्तु भास्करम् ।६३। भगवान श्री विष्णु ने कहा-हे वह्ने ! तुमने जो कहा है यह सर्वथा रात्य ही है-इसमे कुछ भी सशय नहीं है किन्तु ऐसा करना अपने स्वार्थ के लिये तो अवश्य दोष होता है पर यदि दूसरो की भलाई के लिये किया जावे तो यह कोई दोष नही हुआ करता है ।५६। देयो के देव केपर्दी ने यह सहार के लिए प्रदिष्ट किया है । अतएव आप अणु रूप को ग्रहण करके प्रवेश करिये तो कोई दोष से युक्त नहीं होओगे ।५७। हे अनद्य ! आप तो तेज की मूत्ति हैं अतएव प्रस्तुत और अप्रस्तुत कुछ भी नहीं है । आप तो सर्वदा सर्वत्र गमन करने वाले हैं और कहीं पर भी भाप प्रति हनन नहीं किये जाते हैं ? १५८। आप एक ही समस्त भूतो के समुदाय को व्याप्त करके स्थित रहा करते हैं। हे मेपवाहन । आप प्राणियो के उदर मे स्थित होकर अन्न को पचाते हैं ।५६। हे पावक | यदि आप एक के ही द्वारा यह सम्पूर्ण जगत की रक्षा की जाती है तो आपने क्या प्राप्त नहीं किया है-यह बतलाइये । है हुताशन ! कौन सा दोष होता है ? ।६० हे हव्यवाहन आपको जुगुप्सा नहीं करनी चाहिये । हे अनघ ! यह कार्य उत्पन्न हो गया है इसको करने के लिये आपका यह समय ही है । १६१४ हे विभा- वसो ! ये सब देवगण आपकी शरण में प्राप्त हुए हैं । हे हुतभुक् ! आर इसके रक्षक हैं ? अहो ? आप यदि इस कार्य को कर देंगे तो अधिक धन्य और श्लाघा करने के ही योग्य होंगे ।६२। आप इस समय मे इस कार्य मे साम्य क्रीडादि वर्णन ] । सुरगणो का यह कार्य कर दीजिये और आप दुख मग्न हुए इनके ऊपर करुणा करिए । जिस तरह से सभी कष्टो मे मनुष्य भास्कर भगवान् को देखा ही करते हैं । ६३। तथा तवाऽऽनं वह्न प्रश्यन्ति सुरसत्तमाः चारुचन्द्रप्रतीकाशं कुण्डलाभ्यामल कृतम् ॥६४। अनेन किं न पर्याप्त वद नून विभावमो । एवं सबोध्यमानोऽग्निविष्णुना द्विजसत्तमाः ।६५॥ हृदये चिन्तित तेन यास्यामि हरसंनिधौ। ततो वनोगत ज्ञात्वा अग्ने वास्तदाऽनघाः ॥६६॥ सेन्द्राः सवरुणादित्याः सयक्षोरगराक्षसाः तुष्टुवुस्ते शुभैर्वाक्य पावक द्विजसत्तमाः १६७। हे वह उसी प्रकार से सब सुर श्रेष्ठ आप का मुख देखते हैं । जो सुन्दर चन्द्रमा के समान प्रकाश वाला है और दो कुण्डलो से अलकृत है ।६४। हे विभावसो ! क्या इससे पर्याप्त नहीं है ? आप ही निश्चित रूप से बतलाइये । हे द्विज श्रेठो ! भगवान् विष्णु के द्वारा इस प्रकार से सम्बोध्यमान अग्नि हुआ था ।६५1 उम अग्नि देव ने अपने हृदय में सोचा था कि मैं भगवान शिव को सन्निधि मे गमन करूंगा । उस समय मे अनद्यदेवो ने अग्नि के मन में रहने वाले भाव का ज्ञान प्राप्त कर लिया था ।६६। हे द्विज श्रेष्ठो । उस समय मे इन्द्र ---वरुण-आदित्य- राक्षस-यक्ष और उरगो के सहित सब देशो मे परम शुभ वाक्यो के द्वारा पावक की स्तुति की थी ।६७१ ३६६ ] [ सूर्य पुराण ॥ पावक स्तुत्यादि कथन । जलभीरो जलोत्पन्न जलाजल जलेचर । जलजामलपत्राक्ष यज्ञदेव हुताशन ।। कृष्णकेतो कृष्णवर्भन्स्वर्गमार्गप्रदर्शक । यज्ञा हुतिहुताहार यज्ञाहार हराकृते ।स पूर्णगर्भ गवा गर्भ जय देव महाशन । तमोहर महाहार स्वाहाभर्तनम ऽस्तु ते ॥३॥ हव्यवाहन सप्ताचे चित्रमानो महाद्य ते । अनलाग्ने यज्ञमुख जय पावक सर्वग ४। विभावसो महाभोग वेदमापार्थभापण । कृशानो कनुसभारप्रिय विश्वप्रभावन (५॥ सागराम्बुघृत देव त्वमश्वमुखसश्रितः । पिवश्व वोग्दिरश्चैव न तृप्तिमधिगच्छसि ।। त्व वाक्येऽवनुवाक्येषु निषत्सूपनिपत्सु च । ब्राह्यणा ब्रह्मयोनि त्वा स्तुवन्ति त्वत्परायणा. ७। देवगण ने कहा-हे हुताशन ! आप जल से ही समुत्पन्न हुए है और आप जलाजल हैं तथा जलेचर भी हैं किन्तु आपको जल से भय होता है अर्थात् जल से डरे हुए रहते हैं । हे जलज के अमल दल के समान नेत्रो वाले । आप तो यज्ञो के देवता हैं । ११ हे कृष्ण वर्मन् | आप कृष्ण केतु हैं और स्वर्ग के मार्ग के प्रदर्शक हैं । आप यज्ञो की आहुतियो के हुत का बाहार करने वाले हैं-यज्ञो के आहार हैं और आप हर की आकृति वाले हैं ।२। हे देव महाशन | आप पूर्ण गर्भ-गौओ के गर्भ है । आपका जय हो । माप तम के हरण करने पर महान आहार वाले और स्वाहा देवो के भर्ता हैं । आपको हम सबका नमस्कार है ।३। हे हव्य वाहन ! आप सात अचियो से युक्त है। हे चित्रभानो! आप महतीद्य ति से पावक स्तुत्यादि कथन ] । १९७ सम्पन्न हैं । हे अनलग्ने ! आप यज्ञ के 'मुख हैं। हे सर्वत्र गमन करने वाले पावक देव ! आपका जय हो ।४। हे विभावसो ! हे महाभागा । आप वेदो की भाषा के अर्य का भाषण करने वाले हैं। हे वृशानो ! आप ऋतुओ के सम्भार से प्यार करने वाले है और समस्त विश्व के ऊपर कृपा करने वाले हैं ।। हे देव | सागर के जल के धृत स्वरूप हैं और आप अश्व मुग्व मे सश्रित हैं। आप उसका पान करते हुए और उसका उग्दिरण करते हुए भी कभी तृप्ति को प्राप्त नहीं होते है ।६। आप ही में परायण रहने वाले ब्राह्मण ब्रह्मयोनि आपका स्तवन किया करते हैं । आप वाक्यो में- अनु वाक्यो मे--निपदो मे और उपनिपदो . मे है । तुभ्य कृत्वा नमो विप्राः स्वकर्मविहिता गतिम् । ब्रह्मन्द्रविष्णुरुद्राणा लोकान्सप्राप्नुवन्ति च 10) त्वमन्तः सर्वभूताना भुक्त भोक्ता जगत्पते । पचसे पचतां श्रेष्ठ त्री लोकान्संक्षयिष्यसि ।। साक्षी लोकत्रयस्यास्य त्वया तुल्यो न विद्यते । शरण भव देवाना विश्वनयमहेश्वर ॥१०॥ इत्येव स्तूयमानोऽमावुत्थाय ज्वलनस्तदा । देवान्प्रदक्षिणीकृत्य ययौ शभुगृह द्विजाः ॥११॥ तनापश्यत्प्रतीहार महादेवसम बले। पूजित सेन्द्रकदेवमहादेवदिदृक्षुभिः ।१२। कपीद्रवदन देव कुलिशोद्यतपाणिनम् । शुलहस्त महावीर्य सूर्यायुतमिवोदितम् ।१३। नन्दिन तु तदा दृष्ट्वा पावकस्य द्विजोत्तमाः । वेगस्तस्यातुलस्तीक्ष्णः सहसव व्यहन्यत्त ॥१४॥ हे विप्रो ! उन्होंने कहा-आपको नमस्कार करके प्राणी ब्रह्मा-- इन्द्र-विष्णु और रुद्रो के लोकों को जाकर अपने कर्मों द्वारा विदित गति को प्राप्त किया करते हैं ।। हे जगत्पते ! आप समस्त प्राणियों के ३६८1 [ सूर्य पुराण अग्निदेव शम्भु अन्त करण है-आप ही मुक्त हैं और आप ही भोक्ता है । हे पचन करने वालो में परम श्रेष्ठ | आप ही पाचन किया करते हैं और आप तीनो लोको का सक्षय कर देंगे | आप इस त्रैलोक्य के साक्षी हैं और आपके मदृश अन्य कोई भी नहीं है। आप इस समय में सब देवो के शरण अर्थात् रक्षक हो जाइये । आप तीनो विश्वो के महेश्वर हैं ॥१०॥ इस रीति से स्तुति किये हुए अग्नि देव उस समय मे उठकर खडे होगये थे । हे द्विजो | फिर अग्नि देवो की परिक्रमा करके फिर के घर में चले गये थे। वहाँ पर बल मे महादेव जी से भी अधिक द्वारपाल को देखा था जो इन्द्र के साथ समस्त महादेव जी के दर्शन करने की इच्छा वाले देवो के द्वारा पूजित थे ॥११॥१२।। वह द्वारपाल कपीन्द्र के समान मुख वाले और हाथ मे कुलिश ग्रहण करके उद्यत, शूल मे हाथ मे ग्रहण किये हुए, महान वीर्य से युक्त और दश सहस्र उदित सूर्यों के तुल्य नन्दी को वहां पर देखा था हे द्विजोत्तमो । उसी समय मे पावक का जो अतुल और तीक्ष्ण वेग था वह सहसा ही हय. मान होगया था ।।१३।१।" तत्रस्थश्चिन्तयामास पश्यामीति कथ हरम् । नन्दिना द्वारसस्थेन पुमान्न प्रविशेद्गृहम् ।।१५ पश्यमानस्य शैलादे प्रविशे यद्यह गृहम् । फसिद्धि न गच्छेय नन्दिना कुपितेन च ॥१६ एव चिन्ताणवे मग्नो यावत्तिष्ठत्यसो कदि । द्विजानानविधास्तावद्भ्रममाणाश्च दृष्टवान् ।।१७ तान्दृष्ट्वा चिन्तयामास हसस्य हरसनिधौ। रूप कृत्वा प्रवेक्ष्यामि इत्युपायमचिन्तयत् ॥१८ मादाय हसरूप तु प्रविष्ट पावकस्तदा । प्र वश्य शङ्कारहित सूक्ष्मरूपो व्यवस्थित ॥१६ पार्वत्या वाहन सिंहमपश्यच्च विभावसु । गोक्षीरधवलामास महालाइ गूलशोभितम् ॥२० पावक स्तुत्यादि कथन ] ३६६ जाज्वल्यमाननयन चन्द्रकोटिसमप्रभम् । प्रसारितच्छटाटोप हु कारकृतभूषणम् ॥२१ वहाँ पर खदे हुए अग्नि ने चिन्ता की थी कि मैं भगवान शिव को कैसे देखू गा। द्वार पर सस्थित नन्दी के द्वारा कोई भी पुरुष गृह में प्रवेश नहीं कर सकता है ।।१५।। इस शैलादि के देखते हुए यदि मैं प्रवेश करता हूं तो कुपित हुए नन्दी के द्वारा मैं कभी भी फल की सिद्धि को प्राप्त नही कर पाऊंगा ।।१६॥ इस प्रकार से चिन्ता से आतुर होकर जब तक यह अग्नि स्थित होता है तभी वहा पर अग्नि ने इधर- उघर भ्रमण करते हुए अनेक द्विजो को वहां पर देखा था ॥१७॥' हर की सन्निधि मे उन द्विजो को देखकर मैं ह स का स्वरूप धारण करके प्रवेश करू गा-यही उपाय उसने सोचा था ॥१८॥ उस समय में हस के रूप को ग्रहण करके पावक ने प्रवेश दिया था। प्रवेश करके वह शक्षा से रहित होगया था और सूक्ष्म रूप वाला होकर व्यवस्थित होगया था ॥१९॥ विभावसु ने पार्वत्री देवी के वाहन सिंह को यहाँ पर देखा था जो कि जो के दूध के समान धवल आभास वाला था और बहुत बडी पूछ से शोभित था ॥२०॥ उस सिंह के जाज्यल्यमान नेत्र थे और वरोडो चन्द्रो के समान प्रभा वाला था । उस सिंह ने सटाओ के आटोप को प्रसारित कर रखा था और हुकारो के भूपण से सयुत पा ॥२१॥ दानवाना क्षयकर देवानामभयप्रदम् । हुकारेण ततस्तस्य ज्वलनो बधिरीकृत ॥२२ अहो दुखमिद प्राप्तमिति सचिन्त्य चेतसा। यदि जीवनगमिष्यामि सिंहादस्मादह तदा ॥२३ तेन पर्याप्तफामोऽहमिति सचिन्त्य निर्गत । या देवा महेन्द्राद्याः सस्थिता मेरुमूर्धनि । देवाः सर्वे मुसद्दष्टा ऊचस्त जातवेदसम 1e ४०० ] [ सूर्यपुराण अस्मत्कार्य त्वया वह्न गत्वा तत्र यथा कृतम् । तत्सर्वं हि न क्षिप्र शर्मास्माय यथा भवेत् ॥२५ गतोऽह तस्य भवन देवदेवस्य शूलिन । मया नन्दीश्वरो दृष्टो द्वारदेश उपस्थित ॥२६ ह सरूप तत कृत्वा प्रविश्यान्त पुर सुरा । तत्र सूक्ष्मवपुर्भूत्वा यावत्क्षणमह स्थित ॥२७ तावत्पञ्चाननो दृष्टो गिरिजायास्तु वाहनम् । अतिरौद्रो महाकाय प्रलयान्तकसनिभ ॥२८ वह सिंह दानवो के क्षय का करने वाला और देवो को अभय का प्रदान करने वाला था। इसके पश्चात् उस सिंह को हुकार से वह अग्नि वहिरा मा होगया था ॥२२।। अहो ! यह दु ख मुझे प्राप्त होगया है-ऐसा चित्त से उसने चिन्तन दिया था। उस समय में इस सिंह से यदि मैं जीवन बचाना चाहता हूं तो मैं इससे पर्याप्त काम वाला हू- ऐसा सोचकर वह वहां से निकल कर चला गया था। जहा पर महेन्द्र आदि देव सुमेरु पर्वत के मस्तक पर सस्थित हो रहे थे। समस्त देवगण परम प्रसन्न हुए थे और उन्होने अग्निदेव से कहा था ॥२३॥२४॥ देवो ने कहा-हे अग्ने । आपने हमारा वहाँ पर जाकर जिस प्रकार से किया था वह सभी हमको आप बतलाइये जिससे हम सबका कल्याण होवे ॥२५।। अग्निदेव ने कहा-मैं उन देवो के देव शूली के भवन मे गया था वहाँ पर द्वारदेश में स्थित नन्दीश्वर को मैंने देखा था ॥२६॥ हे सुरो । इसके अनन्तर मैंने ह स का रूप धारण किया था और फिर मैंने अन्त पुर में प्रवेश किया था। फिर बहुत ही अधिक सूक्ष्म स्वरूप बना कर जब तक मैं क्षण भर वहां पर स्थित रहा था ॥२७॥ तब तक गिरिजा का वाहन पञ्चानन (सिंह) मैंने देखा था। वह अत्यधिक रोद्र, महान् वपु वाला और प्रलयान्तक के तुल्य था ॥२८॥ भीतोऽह निर्गतरतस्माददृष्ट्वैव पिनाकिनम् । युष्मत्कार्यमकृत्वैव सप्राप्त इह भो सुरा ॥२६ पावक स्तुत्यादि कथन ] [ ४०१ पुनविचिन्त्यता कायं मर्वेषां वो यथा सुसम् । एव वह्नवंच. श्रुत्वा देवा विष्णुपुरोगमाः ॥३० ययुमुनिगणः सार्घ मन्दर चारुकन्दरम् । तमामाद्य गिरिश्रेष्ठ प्रिय देवस्य मूलिन ३१ कृताञ्जलिपुटा. सर्वे ह्यस्तुवन्वृपमध्वजम् ॥३२ ॐ नमः परमेशाय त्रिनेत्राय त्रिशूलिने । विरूपाय सुरूपाय पञ्चास्याय त्रिमूर्तये ॥३३ वरदाय वराहस्य कूर्माय च मृगाय च । नीलालकशिखण्डाय मण्डलेशाय ते नमः ।।३४ विश्वमानाय विश्वाय विश्वेशशायाऽऽत्मरूपिणे । कालध्नाय मखध्नाय अन्धकघ्नाय वै नम ॥३५ मैं तो अत्यन्न ही भीत होगया था और भगवान् पिनाकी को न देखकर ही मैं उम स्थान से निर्गन होगया था। हे सुरगणो । माप लोगो का कार्य न करके ही मैं यहां पर प्राप्त हो गया हूँ ॥२६॥ पुन. आप विचार कीजिये जिससे आप लोगो को सुख समुत्पन्न होवे । इस प्रकार से अग्नि के वचन को श्रवण करे विष्णु जिनमे प्रमुख थे ऐसे समस्त देवना सुन्दर कन्दराओ वाले मन्दराचल पर मुनिगणो के साथ गये थे। देवेश्वर भगवान् शूली के परम प्रिय उस श्रेष्ठ गिरि पर पहुच कर सब हाथों को जोड कर वृषभध्वज प्रभु का स्तवन करने लग गये थे ॥३०॥३१॥३२॥ देयो ने कहा-परमेश, त्रिनेत्र, त्रिशूली प्रभु के लिये हमारा नमस्कार अपित है। विरूप, सुरूप, पञ्चमुखी, त्रिमूर्ति, वराह, कूर्म, भृग, नीते मलको वाले शिग्दण्ड और मण्डलेश आपकी सेवा में हमारा नमस्कार है ॥३३॥३४॥ विश्वमान, विश्व, विश्वेश, प्रात्मरूपो, कालघ्न, मखका हनन करने वाले तथा अन्धकासुर के मारने वाले आपके लिये हम मवना प्रणाम है ॥६॥ नमो मन्त्राय जप्याय कोटिजाप्याय ते नम । ध्यानाय ध्येयरूपाय ध्येयध्यानात्मने नमः ॥३६ ४.० ] [ सूर्यपुराण ईशोऽनीशस्त्वमेवेश अन्तोऽनन्नस्त्वमेव च । अधयस्त्व व्ययश्चैव जन्माजन्म त्वमेव च ॥३७ नित्यानित्यस्त्वमेवेश धर्माधर्मस्त्वमेव च । गुरुस्त्वमगुरुर्देव वीज वाघोजमेव च ॥३३ कालस्त्वमसि लोकानामकालः परिगीयसे । बलस्त्वमबलश्च प्राणश्चाप्राण एव च ॥३६ साक्षी त्व कर्मणा देव तथाऽमाक्षी महेश्वर । शास्ताऽशास्ता विरूपाश ध्र वश्चाध्रुव एव च ॥४० ससारी त्व हि जन्तूनाममसारी त्वमेव च । गोप्ना व सर्वभूताना नास्ति गोप्ता तवेश्वर. ४१ जीवस्त्व जीवलोकस्य जीवस्तेऽन्यो न विद्यते । न्यनातिरिक्तभावेन समायुश्च शरीरिणाम् ।।४२ मन्त्ररूप, जप्यस्वरूप और कोटि जाप्य के लिये नमस्कार है ॥३६॥ हे ईग । आप ईश और मनीश है । और आप ही अन्त तक अनन्त है। आप अव्यय हैं और व्यय हैं। और आप ही जन्म तथा अजन्म है ॥३७।। हे ईश | आप ही नित्य तथा अनित्य भी है। आप धर्म तथा अधर्म हैं । आप गुरु और अगुरु हैं आप सबके बीज हैं और अबीज भी हैं ॥३८ । आप लोको के काल हैं और आप अकाल भी गाये जाते हैं । आप बल है और अबल भी हैं । आप प्राण और अप्राण हैं ।।३६॥ हे भगवन् ! आप साक्षी हैं जोकि सब लोग कर्म करते हैं उनको देखने वाले हैं। हे देव महेश्वर | आप असाक्षी हैं । आप शास्त्रा, अशास्त्रा, हे विरूपाक्ष! आप ध्र व तथा अध्र व हैं । आप जन्तुओ के ससारी है और आप ही अमसारी हैं । आप समस्त भूतो के गोप्ता है और आपका गोप्ता ईश्वर नहीं है । आप इस जीव वोक के जीव हैं और आपका जीव अन्य कोई भी विद्यमान नहीं है । न्यून सथा अतिरिक्त भाव से शरीर धारियो के आप ही आयु है ॥४०.४२।।

पावक स्तुत्यादि कथन ]
[ ४.३
देहिना शकरस्त्व हि न चान्यस्तव शकर ।
अरुद्रस्त्व महादेव रुद्रस्त्व धोरकर्मणाम् ॥४३
देवाना च महादेवो महास्त्वत्तो न विद्यते ।
कामस्त्व भविना सर्वकामदस्त्व जगत्पते ॥४४
अजेयो जयिना श्रेष्ठो जयरूपस्त्वमेव हि ।
पुराणपुरुपस्त्व हि पुराणोऽन्यो न विद्यते ॥४५
व्यालयज्ञोपवीताय सरोजाङ्काय ते नम ।
नमोऽस्तु नीलग्रीवाय शितिकण्ठाय मीटुपे ।।४६
नम कपालहस्ताय पाशहस्ताय दण्डिन ।
नमो देवाधिदेवाय नमो नारायणाय च ।।४७
ऊर्ध्वमागप्रणेने च नमस्ते ह्य र्ध्वरेतसे ।
क्रोधिने वीतरागाय गजचर्मावगुण्ठिने ॥४८
नमो ब्रह्मशिरोघ्नाय नमस्ते रुक्मरेतसे ।
नमश्चण्टाय धीगय कमण्डलुनिपङ्गिणे ।।४६
आप देहधारियो के शहर अर्थात् कल्याण करने वाले हैं और अन्य
कोई भी आपके कल्याण करन वाला शार नहीं है । हे महादेव । आप
ही अरुद्र हैं और जो घोर कर्मों के करने वाले प्राणी हैं उनके लिये भाप
ही रुद्र होते हैं। आर मर देवो म महान् देव हैं और आपसे महान्
अन्य कोई भी नही है । आप भावियो के काम हैं । हे जगत्पते । आप
सब कामनाओ के प्रदान करने वाले हैं ॥४३॥४४।। आप स्वय अजेय
हैं और आप जय वाला मैं परम श्रेष्ठ हैं। आप स्वय ही जय स्वरूप
वाले हैं । आप परम पुराण पुस्प हैं। आपसे पुराण यन्य कोई भी नहीं
हैं ॥४५॥ व्याल (सर्प) का यज्ञोपवीत धारण करने वाले और सरोजाइ
थापके लिये हम सबका प्रणाम है। नीलग्रोव, शितिकण्ठ, मोटुप आपके
लिये नमस्कार है ॥४६॥ कपाल हाथ मे रखने पाले, पाराहस्त, दण्डी,
देवो के अधिदेव आपको नमस्कार है। नारायण आपको प्रणाम है
॥४७॥ ऊचे मागे के प्रणेता, ऊर्ध्वरेता आपके लिये नमस्कार है।

[ सूर्यपुराण क्रोधी, वीतराग, गज के चम्मन का अगुष्ठन करने वाले, ब्रह्मा के शिर का हनन करने वाले और रुक्मरेता आपकी सेवा मे हम सब का प्रणाम समर्पित है। चण्ड, धीर, कमण्डलुनिषङ्गी आपके लिये नमम्कार है ॥४८॥४६॥ नमः प्रचण्डवेगाय क्रोधचण्डाय ते नमः। वरेण्याय शरण्याय ब्रह्मण्यायाम्बिकापते ॥५० सर्वानुग्रहकर्ता त्व धनदाय नमो नमः । नम: ससारपोताय अणिमादिप्रदायिने ।।५१ ज्येष्ठसामादिसस्थाय रथतराय ते नमः । त्रिगाथाय बिमात्राय त्रिमूर्ते त्रिगुणात्मने । ५२ त्रिवेदिने त्रिसंध्याय त्रिशून्याय त्रिवर्मगे। विदेहाय त्रिकालाय विशक्तिव्यापिने नमः ।।५३ शक्तित्रयविर्हानाय शक्तित्रययुताप च । शक्तित्रयात्मरूपाय शक्तित्रयधराय च ॥५४ योगीशाय विपघ्नाय विजयाय नमो नमः । नमस्ते हरिकेशाय लोकपालाय दण्डिने ॥५५ हलीशाय प्रमेयाय कुलीशाय तु चक्रिणे । नमो बिन्दुविसर्गाय नादायानादधारिणे ॥५६ प्रचण्ड वेग वाले को नमस्कार है तथा प्रचण्ड क्रोध वाले को प्रणाम है । वरेण्य, शरण्य और ब्रह्मय आपके लिये हे चण्डिकापते । नमस्कार है ।।५०।। आप सभी पर अनुग्रह करने वाले हैं, धनद आपकी सेवा में नमस्कार है तथा बारम्बार प्रणाम है। इस मपार रूपी सागर के तरण करने के लिये पोत स्वरूप आपकी सेवा मे प्रणाम हैं तथा अणिमा आदि सिद्धियो के प्रदाता आपको मेरा नमस्कार है ॥५१॥ ज्येष्ठ सामादि सस्थ और रथन्तर के लिये नमस्कार है। विगाथ, त्रिमात्र, त्रिमूत्ति और त्रिगुणात्मा आपकी सेवा मे नमस्कार है ॥५२॥ निवेदी, त्रिमध्य, त्रिशून्य, त्रिवर्मा, विदेह, त्रिकाल और निशक्ति व्यापी आपके लिये पावक स्तुत्यादि कथन ] [ ४०५ नमस्कार है ॥५३।। तीन शक्तियों से विहीन तथा शक्तित्रय से युक्त अर्थात् तीन शक्तियो के धारण करने वाले, योगीश, विप का हनन करने वाले, विजय आपके लिये बारम्बार प्रणाम अर्पित है। हरिकेश, लोक- पाल, दण्डी, हतीश, प्रमेय, कुलीश, चक्री, विन्दुविसर्ग, नादरूप और अनादधारी आपको नमस्कार है ॥५४-५६।। नाडीस्थाय च नाड्याय नाडीवाहाय वै नमः । नमो गायत्रीनाथाय गायत्रीहृदयाय ते ॥५७ नमो गायत्रीगोप्त्रे च गायत्र्याय नमो नमः । य इद पठते स्तोत्र गीर्वाणः समुदीरितम् ॥५८ यावज्जीवकृतः पापमुक्तो याति परा गतिम् । एव स्तुतः सुरैः शभु प्रसनो वरदोमवत् ॥५९ वर वृणीव हे देवा इत्युवाच महेश्वर । अथ त वरद ज्ञात्वा शभुमग्निमुखा सुराः ।।६० ऊचु प्राञ्जलय. सर्वे भय त्यक्त्वा द्विजोत्तमाः । यदि तुष्टोऽसि विश्वेश देहीम वरमुत्तमम् । ६१ गिरिजाकुक्षिसभूत पुत्रो मा भूत्तवानघ । एवमस्त्वित्यसो शभुः पुनरुक्त्वा ततो वचः ॥६२ नाह रेतो वृथा स्कन्दे लोक्यक्षयकारकम् । वृथा शुक्र मदीये तु वलोक्य भस्मसाद्भवेत् ॥६३ नाडीस्य, नाड्य, नाडीवाद को नमस्कार है। गायत्री के नाय, गायत्री के हृदय, गायत्री के गोप्ता और गायत्र्य आपके लिये बार-बार नमस्कार है । जो कोई इस स्तोत्र को जो कि देवो के द्वारा समुदीरित है पढ़ता है वह जब तक जीवन में किये हुए पाप होते है उन सबसे विमुक्त होकर परमगति को प्राप्त किया करता हैं। इस प्रकार से देवो के द्वारा स्तुति किये गये भगवान् शम्भु परम प्रसन्न होगये थे और वरदान प्रदान करने वाले होगये थे ॥५७-५६॥ महादेव जी ने हे देवगणो । वरदान का वरण करलो। इसके अनन्तर अग्निमुख सुरो ४०६ [ सूर्यमण ने भगवान् शम्भु को वरदाता जागार हाथो यो जोहते हुए सब देवगण है द्विजोत्तमो । भय छोडकर बोले ॥६॥५१॥ देवगणो ने कहा-हे विश्वेश! यदि आप परम तुट होगये हैं तो आप इस उत्तम वरदान को प्रदान कीजिए ॥१२॥ हे अनध! गिरिजा ये दुक्षि से समुत्पन्न आपका पुत्र न होवे। ऐगा ही होवेगा-~पह सम्भु ने पह यहकार फिर यह वचन यहा-६२।। मैं अपना रेन (घीय) वृभा स्कन्दिन नही करता है क्योकि यह लोय के क्षय या करने वाला है। मेरे शुक्र के वृथा होने पर तो यह लोक्य ही भस्मसात हो जायगा ॥६३।। हिताय तस्माल्लोकाना मम रेतो दिवौकसः । शान्त्यर्थ चैव युष्माभिः शीनमेव प्रयुज्यताम् ॥६४ एवं शभोर्वचः श्रु वा देवाराने भयविह्वला: । सलोकेशा: सगोविन्दा न किंचिदन वन्द्विजाः॥६५ अथ देवेषु सीदत्सु वह्निगोरिव कर्दमे । प्रसार्य स्वाञ्जलिं शभु रेतो मुश्चेति चारवीत् ॥६६ देवदेवामृत दिव्य हस्ताम्या मम शंकर । शीघ्रमेव प्रयच्छस्व निबन्तु सुरपुगवाः ॥६७।। ततो लिङ्गाद्विनिनिष्क्रान्त चन्द्रविम्बात्सुनिर्मलम् । जातीनीलोत्पलामोद पाणी वह्नर्ददौ शिवः ।।६८ कराभ्यां पतित रेतस्तदाऽभूत्पावकस्य वै । पपो वह्निस्तत शुक्र ज्वलत्तद्भास्करप्रभम् ॥६६ सुधेति मनसा मत्वा हृष्टात्मा मृदयाऽन्वितः । अथ पीते तदा शुक्र वह्निना मुनिपु गवा ॥७० इस कारण मे लोको के हित के लिये ही हे देवगणो ! मेरे रेत को आप भोग शक्ति के लिये शीघ्र ही प्रयोग मे लाइये ।।६४।। इस प्रकार के वचन को सुनकर वे सब देवगण मय से विह्वल होगये थे । हे द्विजो ! लोकपालो के सहित और गोविन्द के सहित देवो ने कुछ नही कहा था ॥६५॥ इसके अनन्तर देवो के दुखित होने पर अग्नि के शम्भु

थी ।।७०1
पावक स्तुत्यादि कथन ।
[ ४०७
कोच में फंसी हुई गो की तरह से अपनी अमलि को फैलाकर शम्भु
समक्ष में कहा था कि बाप रेत का मुज्जन कीजिए ॥६६।। हे शकर !
मुझे दिव्य आप देव देवामृत हाथो से शीघ्र ही प्रदान कीजिये जिसको
सुरश्रेष्ठ पान करें ॥६७इसके पश्चात् भगवान् शिव ने लिङ्ग से
विनिप्कान्त चन्दविम्व से सुनिर्मल-जातीफल नीलोत्पल के समान
आमोद अग्नि के हाथ में दिया था ॥६८॥ करो से गिरा हुमा रेत उस
समय में पावक का होगया था। इसके अनन्तर वह्नि ने जलते हुए
भास्कर की प्रभा के तुल्य प्रभा वाला वह शुक्र पावक ने पी लिया था
॥६६।। यह सुधा है-ऐसा मन से मानकर बहुत प्रहृष्ट आत्मा वाला
और मानन्द से युक्त होगया । हे मुनि श्रेष्ठो ! इसके अनन्तर वह्नि के
द्वारा उस समय मे शुक्र के पान किये जाने पर परम प्रसन्नता हुई
रेत पातेन सतर्य स देवासुरपूजितः ।
विसृज्य तास्तु भगवास्तत्र वान्तरधीयत ॥७१
तदा हविर्भुज देव सेन्द्रा ब्रह्मपुरोगमाः ।
यथाऽगता ययुस्तत्र पूजयित्वा दिवौकस ॥७२
रेतसा दह्यमानोऽग्निः पातालात्सुतल गत.।
ततो विवेश गिरिशो यत्राऽऽस्ते पार्वती शिवा ।।७३
उवाच पार्वती शभु. प्रहमन्कमलेक्षणाम् ।
शृणु देवि महाभागे यवृत्त तहवीम्यहम् ।।७४
स्वतन्त्रकामाऽसि शिवे यथाह वरवणिनि ।
देवा मच्छरण प्राप्ता न चाह शरण त्यजे ११७५
गोप्या मया सदा कान्ते महादेवो मतः स्मृतः ।
भविष्यति महाभागे पुत्रस्तव पडानन ॥७६
कि त्वौरसस्तु सुधाणि देगर्नेष्टस्तवांशतः।
तस्माच्छुद्ध (स्क्षिप्त) मया रेतो मुसे नै जातगेदसः ॥७७
उन देवो और असुरो के द्वारा पूजित प्रभु ने रेतम् के पात के
द्वारा भलीभांति तर्पण कर और उनको विद्या करके भगवान् वहीं पर

४०.] । सूर्य पुराण अन्तहित होगये थे |७|| उम समय में इन्द्र के सहित ब्रह्माजी जिनमें अग्रगामी थे सब देशो ने हविभुज देव का पूजन किया था तथा फिर जस आये थे वैस हो सब चले गय थे ॥७२॥ उस शुक्र के पीने से अग्नि दह्यमान होगया था और वह पाताल से गुगललोय को गया था। इसके पश्चात् गिरीश प्रभु ने अन्दर प्रवेश रिया था जहाँ पर शिवा पार्वती विराजमान थीं। उन मन के ममान लोवनी वाली पार्वती जी से भग. वान् गम्भु ने हंसते हुए कहा था-ईश्वर ने कहा-हे महाभागे । है देवि ' आप सुनिए-जो चुछ घटित हुआ है उपको मैं आमो बोलता हूँ ॥७३॥७४।। हे शिवे | आप मान्य काम वानी हो हे वर वणिनि । जिस प्रकार से मैं हू । देवगण मेरी गरण में प्राप्त हुए थे और जो मेरी शरण मे आजावे उस मैं स्याग नहीं किया करता हू ॥७॥ हे कान्ते । धेशरणागत देर मेरे द्वारा सदा ही रक्षा करने के योग्य होते हैं और महादेव रत कहे गये हैं । हे महाभागे | आपरा पुत्र पडा- नन होगा ॥७६।। किन्तु हे मुधोणि । आपा और सपुत्र देवों के द्वारा आपके अ श से अभी नही था। इससे मैंो शुद्ध वीर्य अनि के मुख मे डाल दिया है । ७७।। वह्निकुक्षिगत रेतो गत देवाविभागश । यच्छेष मदरे वह्निस्नग्दङ्गाया प्रदास्यति ॥७६ तत साऽपि विदह्यन्ती मम तेज पतापवत् । कृत्तिका पट समाख्याता गङ्गाया स्नातुमागता ॥७६ तासु गङ्गाविनिक्षिप्त मम रेतस्तदद्भतम् । ततस्ता कृत्तिका स्तब्धा देवि मा शरण गता ॥८० अनुग्रहान्मय तासामिदमुक्त तदा शिवे । ममाऽऽदेशान्दता सर्वा शरधानवन शुभम् ॥८१ मोचयिष्यन्ति ता गर्भ देवाश्च कमलेक्षणे। वचनान्मम सुश्रोणि भंशल्य वरानने ॥८२ पवक स्तुत्यादि कथन ] [ ४०६ ततस्ते भविता पुन एकीभूत्वा स्वतेजस । बालसूर्यायुतप्रस्यो वालेन्दुभ्रूलतावित ॥८३ आग्नेयो वह्निजो गाङ्गय कृत्तिकामुत । स्कन्दो गुहस्तथा पुनो नामभिरते भविष्यति ॥८४ अग्नि की कुक्षि में प्राम हुआ रेत विभागश देवा को गया था। जो कुछ उदर में शेप रह जायगा उसको वह अग्नि गङ्गा में प्रदानकर देगा ||७८ वह भी इसके अनन्तर विहाय होतो हुई मेरे प्रताप वाले तेज यो उम गङ्गा ने उन कृत्तिकाओ म पिनिक्षिप्त कर दिया था। जो ये कृत्तिका समाख्यात की गयी हैं और जो गङ्गा मे समान करने के लिये ही वहां पर ममागत हुई थी किन्तु मेरा शुक्र बहुत ही अद्भुत था। हे देवि । इसके अनन्तर वे कृत्तिकाएं स्तव्य हो गयी थी और मैरी शरण में समागत हो गयी थी ७६८० है शिवे । उनके ऊपर अनुग्रह करके मैंने उम समय मे उनसे यह कहा था कि तुम शुभ शर- धान वन म चली जाओ और मेरे आदेश से वहां पर चली गयी थी ८१। है कमलक्षणे वे यहाँ पर गर्भ का मोचन करेगी। देव रानने । और देवगण हे सुशोणि । मरे वचन से वह गर्भ झाल्य हो गया था। इसके पश्चात् वह तेरा पुत्र होगा जो अपन तेज को एकीभूत होकर ही होगा ! वह वार सूर्य जो दम हजार हा उनक समान मुख्य होगा और वालेन्दु के समान भ्रूलताओ से अङ्कित है । उमक बहुत से नाम भी होगे--केनाम गाङ्गेय-बहिनज-देव-आग्नेय-वृत्तिका मुन-म्कन्द- गुह वे सभी उसके हागे ॥५२॥८६॥४॥ एव शभोर्वच श्रुत्वा प्राह देवी गिरीन्द्रजा। मम कुक्षिसमुत्पत्र यतो नेच्छन्ति पुनकम् ॥८५ अत पुनविहीवारते भविष्यन्ति सुरादय । यो हि नन्दी महावीर्य सुरासुरमहोरग ।।८६ दुर्जय सर्वभूताना योगी योगवलान्वित । प्रविश्यान्त पुरे वह्निता मा वखवजिताम् ॥१७ ४१०] । मूर्य पुराण यस्मादुपेक्षितस्तस्मा मनुप्यत्व प्रयातु स । शाप श्रुत्वाऽथ शैलादिवंजेणेव हतो गिरि ॥८८ न्यपतद्योगिनामग्यो ज्ञानमूर्तिघरो द्विजा । पुनश्च शभोर्वचनाच्छैलादिमनुगृह्य च ॥ समालिङ्गय महादेव स्थिति देवीति न श्रुतम् ॥८९ इस रीति से पथित भगवान् शम्भु के वचन को सुनरर गिरीन्द्रना ने कहा-मेरी कुक्षि से साक्षात् समुत्पन्न होने पाने पुत्र को जिम कारण से भी देवगण नही चाहते है अतएव वे समस्त सुरगण आदि देव यानि वाले पुत्रो स विहीन ही हो जायगे । अर्थात् उनके विसी के भी पुन नहीं होगे। दूसरो का जो अहित चाहते है उनको वही परिणाम होना ही चाहिए । जो महनन्दी है और ऐसा महान् वीर्य वाता है जिसको सुर-असुर और महेश्वर भी नहीं जीत सकते हैं वह समस्त भूतो मे योगी और योग के बल से समवित है उसके द्वारा जिस कारण से उपेक्षित वहिाको कर दिया गया था और उस वहिन्वे ने मुझको वस्त्र से रहित देखा था इस कारण से वह मनुष्यत्व को प्राप्त करेगा । इस शाप का श्रवण करके शौलादि वन से हत गिरि के ही समान हत होकर हे द्विजो | वह ज्ञान मूर्तिधारी और योगियो से अग्रणी गिर गया था। फिर शम्भु देव के वचन से श लादि पर अनुग्रह किया गया था । इसके पश्चात् वह देवी महादेव जी का समालिङ्गन करके स्थित हो गयी थी-ऐसा ही हमने सुना है ।५।६।

परमेश्वर-स र सम्बादादि कथन] [ ४११ ॥ परमेश्वर-सुर सम्वादादि कथन । वह्नौ संतपिते सूत रेतसा त्रिदिवौकस. । सगर्भाः खलु. संजाता देवदेवेन शंभु ना ॥१ सौख्य कथमवापुस्त उदरस्थेन रेतना। किमकुर्व स्तदा सर्ने नारायणपुरोगमा. ॥२ गर्भ निष्क्रमण तेपामुत्मन्नेन च किं कृतम् । एतत्सव समासेन ब्रूहि नः स त पृच्छताम् ॥३ वह्नौ सपपितास्तेन रेतसा त्रिदिवौकसः । रेतसा चोदरस्थेन संतप्तास्ते सुरादय. ॥४ दशपञ्चसहस्राणामतीतेपु द्विजोत्तमाः । वाणा च तथाऽटो च गूढगर्भा दिवौकमः ॥५ दुखिता. पार्वतीकान्त शकर शरण ययुः । ऊचु प्राञ्जलयः सर्ने सर्यकोटिसमप्रभम् ॥६ ऋपियो ने कहा-हे श्री मूतजी । वह्नि के सतपित होने पर देव देव शम्भु के द्वारा वीर्य से समस्त देवगण मगम हो गये हैं तो उन्होंने फिर उदर मे स्थित शुक्र से रिम प्रार मे मुख की प्राप्ति की थी। फिर उन समस्त देवगणो ने जिनमे साक्षात् नारायण भगवान भी पुरो- गामी थे क्या रिया था।१।२। उनके गर्मों का निष्क्रमण मे हुआ और समुत्पन्न उसने क्या किया था-यह सम्पूर्ण वृत्तान्न सक्षेप से हे मूत जी! हमारे सामने गित कीजिए क्योकि हम इस समय में मभी यह पूद रहे हैं ।३। श्री महा मुनीन्द्र मूतजी ने कहा-उम पीयं से जो यलि में विक्षिप्त किया गया था सभी देवगण गतपित यह अवश्य ही हुआ कि उस उदर में स्थित वीर्य मे ये सभी मुरादि गण सतप्त हो गये थे।४। हे दिगोत्तमो ! पन्द्र हमार वर्षों के व्यतीत हो जाने पर और आठ वर्ष कार होने पर गर्भ को गूढ सपने यारे देव- गण परम दुसित होर पार्वती स्वामी गार की शरण में प्राय गये थे किन्तु ४१२ ] [ सूर्य पुराण हुए थे । सबने दोनो हाथो को जोडकर करोडो सूर्यों के समान प्रभा वाले भगवान शकरजी से प्राथना की थी ।१६। भगवत्यदिद दुख गर्भज देहशोषणम् । यथा नश्यति देवेश तदुपाय कुरु प्रभो ॥७ वह्निना पीतमात्रेण रेतसा तव शकर । वय मगर्भा स जाता गर्भकाले च तोयदा ॥ उपहास्यमिद देव पुसा यद्नर्भस भव । सर्वे व भ शमुद्विग्नास्तव तेजोवशाद्विभो ।। दह्यमाना महादेव नरके पापिनो यथा । शरण भव देवाना करालम्ब ददस्व न ॥१० दु खोदधौ प्रदुस्तारे प्रणतातिविनाशन । एवं श्रुत्वा तु वचन देवाना पार्वतीपति ॥११ ईपद्विहस्य भगवानुवाचेद सुरेश्वर । भवद्भिरीदृश कार्य मिष्ट ने सुरपु गवा ॥१२ नेष्ट देव्यो(व्यु)दरस्थ हि तस्मान्दर्भ दशा गता ॥१३ इदानी यत्प्रकर्तव्य शृणुध्व तत्स रोत्तमा । वह्नि यूय पुरस्कृत्य मेरु व्रजत मन्दरात् ।।१४ देवो ने कहा-हे भगवन् । जो यह गर्भ से ममुत्पन देह के शोषण करने वाला दुग्य है हे देवेश । हे प्रभो । यह जैसे भी विनष्ट हो जाने वहीं अब उपाय पीजिए १७ हे शरर ' बहिा के द्वारा पीत मात्र आपके वीर्य से हम सभी गर्भ गे समवित हो गये हैं और गर्भ के समय म तो यह हो गये हैं ।८। हे देव | यह एक बहुत ही उपहास योग्य यात हुई हैं नि पुरुषा व उदर म गर्भ हो जावे ? हे विभो । आपरे तेज ये वा से हम लोग अत्यत अधिर उद्विग्न हा रहे हैं। है म देिव जी । जैस नरवो म पडे हुए महा पापी होते है पेस ही हम सब दयमान हो रहे हैं । अव आप हम समस्त देवा पे शरण (रसा) हा जादय और हम सबको अपना परापतम्ब प्रदान - । 1 परमेश्वर-स र सम्वादादि कथन ) [ ४१३ कीजिए 18१० है प्रणत भक्तो की आत्ति के विनाश करने वाले प्रभो! इस बहुत ही अधिक बढे हुए दु खो के सागर मे हम विमग्न हैं । पार्वती देवी के स्वामी दशम्भ ने इस प्रकार के देवो के वचन भ्रवण करके भगवान् मुरेश्वर ने थोडा मा हँसकर यह वचन कहा था-ईश्वर ने कहा-हे मुर श्रेष्ठो । आपके द्वारा ही ऐसा कार्य अभीष्ट हुआ था ।११।१२। आप लोग स्त्रय ही देवी के उदर में रहने वाले गर्भ को नहीं चाहते थे । इसीलिये अप लोग इस तरह की गर्भ की दशा को प्राप्त हुए हैं ।३। हे सुरोत्तमो । इस समय मे जो भी आप मवको करना चाहिए उसके विषय म आप श्रवण कीजिए । अब आप सब लोग अग्नि को अपने आगे करके इस मन्दर पर्वत से सुमेरु पर्वत पर चले जाइए ॥१४॥ शरघानवने यूय हदोत्सङ्ग प्रस यत(?) । नि सरिप्यत्यस देह तत सौरयमवाप्स्यथ ।।१५ तत शभोवंच श्रुत्वा नारायणपुरोगमा । अग्निमन्विष्य च ययुमेरु गिरिवरोत्तमम् ।।१६ तस्य चोत्तरदिग्भागे शरधानवने शुभे। उपविश्य महात्मानो मध्ये स म्याप्य वेधसम् ॥१७ नारायण पुरस्कृत्य प्रसूता सर्व देवता । गर्भ शल्यविनिमुक्ता जातारते मसिनो द्विजा ।।१८ गार्गेण तेजमा तेन रञ्जितो मेरपर्वत । तत पावनता प्राप्त मगैलवनवानन ॥१६ शाव तेजो घृत यस्माद्देव हिनपुरोगर्म । तम्माजरादिभिमुता अमराइच मरोत्तमा २० सिद्धारच मुनयरचंब ये चित्तत्र म स्थिता । तृणगुल्म नताश्चंव जलस्थलरहाश्च ये ॥२१ यहां पर गरपान वन में जो हर है उमम उन म बार गर्भमा प्रसन परिये । यह गर्म वहा पर नि गदह राम निम्न जायेगा और ४१४ ] [ सूर्य पुराण उसके पश्चात आप लोग सुख की प्राप्ति कर लेंगे ।१५। इसको पश्चात भगवान शम्भु वे वचन सुनकर नारायण प्रसेगम समस्त देवगण मेरु मे चले गये हैं जो गिरिवरो मे बहुत ही उत्तम थ ।१६। उस पर्वत के उत्तर के भाग मे शुभ शरधान वन था उसमे सभी महान आत्मा वाले उपविष्ट हो गये थे और मध्य मे वेधा को स स्थापित कर लिया था ।१७। भगवान् नारायण को आगे करके सब देवो ने प्रसव किया था। हे द्विजो । फिर वे देवगण गर्भ के शल्प से विनियुक्त होकर वे सब सुखी हो गये थे ।१८। उस शर्व के तेज से वह सम्पूर्ण मेरु पर्वत रज्जित हो गया था ! इमरे पश्चात वह सम्पूर्ण पर्वत और उसका वन एव वानन सुपर्ण को प्राप्त हो गया था ।१९। अग्नि जिनमे प्रमुख था ऐसे सब देवो ने भगवान् शम्भु का तेज धारण किया था इसी कारण से सव जरा आदि से स रोत्तम विमुक्त होकर अमर हो गये थे ।२०। सिद्ध- मुनि और जो भी कोई वहाँ पर स स्थित थे -तरु-गुल्म-लताऐ- जन और स्थल म समुत्पन्न सब जो भी वे सभी सवर्ण स्वरप हो गये थे ॥२१॥ सर्ने काञ्चनसकाशा सजातास्तत्प्रभाक्त । पार्श्व मेरोविनिर्भिद्य शभोस्तेजो विनिर्गतम् ॥२२ गङ्गाया निहित यच्च तदेकस्थमभूद्विजा । अथ देवो महादेवस्तेजोराशिरुमापति ॥२३ गोपयामास तत्तेज पिङ्गल प्रेक्ष्य शकर । गोप्यमाने तु तस्मिश्च मेरौ सूर्यायुतप्रभ ॥२४ वाणा च सहस्रण कठिन बन्दता गत । स्पन्द इत्युच्यते तेन तदाप्रभृति सुव्रता ॥२४ हराज्जातो यतस्तेन कुमार इति कथ्यते । स्कन्द कुमार पड़ वक्त्रस्तमा द्वादशलोचन ॥२६ भुजदिशभिवंच शोभमानोऽभवत्तदा । ईशादेशात्पुन स्नातु वृत्तिया परमोज्ज्वला ॥२७

परमेश्वर-सुर सम्बादादि कथन ]
[ ४१५
ताभि क्षीर यतो दत्त कार्तिकेय इति स्मृत ।
गर्भपङ्कविलिप्ताङ्गो गङ्गाया स्नापित प्रभु ।२८।
उम वीर्य के प्रवल प्रभाव से सभी काञ्चन के सदृश हो गये थे।
मेरु पर्वत के पाश्वं भाग का विनिर्भेदन वरखे भगवान् शम्भ का तेज
निर्गत हो गया था।२२। हे द्विजो । जो भी गङ्गा मे निहित तेज था
वह सब मिलकर एक में ही स्थित हो गया था। इसके अनन्तर
देव उमा के पति तेज के रामि महादेव शकर ने उस तेज को पिङ्गल
वर्ण वाला देखकर गोपित कर लिया था। उसके गोप्पमान होने पर
उस मेरु पर्वत मे वह अयुत सूर्य की प्रभा के समान हो गया था। एक
सहस्र वर्षों के समय व्यतीत होने पर वह कठिन होकर स्कन्दता को
प्राप्त हुआ था। इसी कारण से हे सुव्रतो । तभी से लेकर वह सन्द
इम नाम मे कहे जाते है ।२३।२४।२५। क्योकि भगवान् हर से समुत्पत्र
हुए है अतएव कुमार इस नाम से कहे जाते हैं । सन्द-युमार--पड-
वक्त-द्वादशनोचन ये उनके नाम है और वे द्वादश भुजाआ से उस
समय मे परम शोभमान हुए थे । ईश के आदेश स वृत्ति का पुन स्मान
परने के लिये प्रस्तुत हुई और परम उज्जवत हो गयी थी ।२६॥२४॥
उनके द्वारा ही उनको दूध पिलाया गया था। इसी कारण से 4 काति-
पेय इम नाम स कहे गये हैं। गर्म के पास विनिप्त हुए अगी पाने
व प्रभु गना म म्नापित हुए थे ॥२८॥
तप्तचामोराभाम शरघानवने तदा।
नाम्ना सहस्रेण तदा कुमारो वेधसा स्तुत ।।२६।।
मुमोच नादमुत्याय सर्वभूतभयकरम् ।
पाताल भेदयित्वा तु तच्च.न शतधा वृतम् ॥३०॥
सिंहादयोऽपि तम्यास्तेन नादेन मूदिता ।
ततम्त ग्रीडमान तु दृष्ट्वा देय शिवात्मजम् ।।३१॥
पिङ्गलो देवदेवेश ज्ञापयामाग गपरम् ।
पश्य त्व देवदेवेश क्रीमान कुमारवम् ॥३२॥

४१६ ]
[ सूर्य पुराण
सूर्यायुतप्रतीकाशमात्मसूनु पडाननम् ।
ज्ञापित पिङ्गलेनेशो वाक्य देव्यै मुदावहम् ।
वरो वरेण्यो वरदो विश्वाकार उवाच ह ॥३२॥
गच्छाव एहि देशि मेरौ यन सुतस्तव ।
पश्यावस्त बराराहे कुमार तु पडाननम् ।।३४।।
पुरा त्वयेष्ट कनकावभास प्रश्याद्रिजे मानसराजहसम् ।
प्रधावमान शतसूर्यकृल्प पडानन कार्मुकपाणिमन ।३५॥
उस समय मे तपाये हुए सुवर्ण के समान आभास वाले शरधान
वन मे उस समय मे सहस्र नामो के द्वारा कुमार का स्तवन ब्रह्माजी ने
क्यिा था ।२६। समस्त प्राणियो को भय करने वाले नाद को उठाकर
छोड दिया था । पाताल का भेदन करके उस भङ्ग के सैकडा टकडे हो
गये थे ।३०। वहां पर स्थित सिंह आदि भी उस नाद से सूदित हो गये
थे। इसके अन तर शिव के पुत्र देव शो भी क्रीडा करते हुए देखकर
पिङ्गल ने देवदेवेश भगवान् शङ्कर को विज्ञामित किया था-हे देव
देवेश्वर आप क्रीडा करते हुए कुमार वो देखिए ।३१।३२। अयुत
( दश सहस्र ) सूयो के सदृश अपने पुत्र कुमार पडाना के विषय म
पिङ्गल के द्वारा भगवान् ईश शापित किये गये थे। यह वाक्य देवी के
लिये आनद के प्रदान करने वाला था। वर-वरोग्य-वरद चौर
विश्वाक्म ने कहा--1३३। ईश्वर ने कहा-हे देवेशि । आइये, चलें,
मेरु पर्वत पर जहाँ आपका पुत्र है । हे वरासे है | उस पठानन कुमार
को देखें ।३४। हे अद्विजे। जैसा कि पहले आपका कनर के समान
आभारा वाला मानस राजहस आपको बहुत ही प्रिय या उसको अब
आप देश लो। शत मूश के सदृश दौड लगाने वाला और हाथ म धनुप
धारण किए हुए आगे की ओर देख लीजिए ।३५॥
समागतो राज्यलनोऽय दृष्ट्वा त्रिलोचनायो जगत प्रदीपो ।
उवाच वहिवरद कुमार हराम्विये दो पितरो तातो ॥३६॥

परमेश्वर-मुर सम्वादादि क्थन । [ ४१७ त्वामागती द्रष्ट मनन्तवीर्य वजाश्रयेति प्रमयाधिनायो। गतोऽय वह्नर्वचन निशम्य तत मुतत्वाग्दिरिजाङ्कगोऽभूत ॥३७॥ त सा पिबन्त महुरङ्घसस्थमतृप्यमान कलहसनादिनी। उमाङ्कमरथो मदनारिसुनु करेण तस्यास्तिलवालको तु ।३८ ममर्द गभोश्च भुजङ्गहार जग्राह चन्द्र स कपर्दसस्थम् ॥३६॥ पञ्चम्या स्थापित सोऽथ पटिया पष्ठीप्रियो गुह । चतुप्पादवती त्यक्त्वा ने लोक्य हन्तुमुद्यत ॥४०॥ अवोधयत्तदा वालो जन्तून्स्थावरजगमान् । क्वच्छि.ग गिरे शौर्यान्नयत्याशु समानताम् ॥४१॥ क्वचित्मिहान्समाकृष्य पातयामास भूतले । मारुह्याभ्यहनत्पृष्ठे (?) तानेव भ्रामयन्पुन ४२। वह ज्वलन समागत हो गया था। जगत् के प्रदीप तीना लोका के नाथ दोना को देखकर अग्नि ने वरद कुमार से कहा था-हर और अम्बिा। य दोगो तुम्हार माता पिता है ।६६। अनन्त वीर्य वाने आपको ही अवलोपन वरने के लिये ये यहाँ पर ममागन हुए हैं आप जाइए और इन दोनों प्रमथा के अधिनाया का समाश्रय ग्रहण कीजिए। इसक अनन्तर यति बचा बा धरण पर वह इसके उपरान्त गिरिजा के यङ्गगत हो गये थे ।३२ इगर परचार पल्प हम के समान नाद करने वानी वह देवी ने गोद म बैठे हुए और वार-चार दूध का पान करके भी तृप्ति को न भाम होो वा कुमार को देखा था और उमा देवी के गोद म समम्यिा मदनारि के पुत्र कुमार ने उन अपनी माता अम्बिा। ये तिर और अनया या मर्दन कर रहे थे ३८६ उम कुमार ने शम्भु प्रमुरे भुजमो ये हार को ने किया पा और कादं म रास्थित चन्द्र को प्रहण कर लिया था।३० वर पचमी म स्यापिन हा थे और पप्टी म गह पाटी प्रिय हुए । चम्पावती को पाग करा वे लोग्य का हनन पग्न यो गमय हो गये थे 1261 उम ममय मबार ने स्थावर जनम जो धोपिग परास्या याापही पानी गोर्य गरिमा ४८ ] [ सूर्यपुराण को शीघ्र ही समानता को ले आया करते थे।४१। और कही पर किसी समय में सिंहो को खीचकर भूतल मे गिरा दिया करते थे। उनकी पीठ पर आरोहण करके फिर उनको ही श्रामित करा दिया करते थे।४२। क्वचिन्नागौ गृहीत्वा तु कराम्या समुखावुभौ । आस्फोटयत्तदाऽत्योन्य कुम्भाझ्या स च लीलया ॥४३।। समुत्पत्य समादाय खेचराणामुमासुत । चिक्षेप सहसा बालो विमानान्यवनीतले ॥४४॥ पुनरुत्पत्य वेगेन प्रेक्ष्यमाण खमण्डले । मार्ग रुरोध सूर्येन्द्रोग्रंहाणा च तथैव स ॥४५॥ उत्पाट्य मेरुशृङ्गाणि इतश्चेतश्च सोऽक्षिपत् । पर्पताश्च विशेपेण नदीश्चोन्मार्गतोऽनपत् ।।४६॥ प्रासित तु जगत्सर्व दामोदरपदनये। ततस्ते भृशमुद्विग्ना शक शनुप्रतापनम् ॥४॥ ऊचुगत्वा द्विजश्रेष्ठा भृता वाक्यमिद तदा । अयमकायुतप्रख्यो वालो नो हन्ति वृनहन् ॥४८॥ तवैप राज्यहर्ता वे भविष्यति न सशय । पराक्रमाद्वलाच्छक तथोत्साहाच्च तेजस ॥४६॥ यही पर दो नागो को अपने सामने दोनो को स्थित करके हाथो से एक दूसर से आरफोटित पर दिया करते थे अर्थात् दोना भी टकर खिला दिया करते थे। दोनो को भिडावर स्फोटित कर देना उनकी एक लीला मात्र ही थी ।४३। वह उमा सुत ऊपर को उछल कर सेचरो यो पक्ड लाते थे और वह वालक वुमार सहसा ही विमानो को भूतल पर प्रक्षिप्त पर दिया यरते थे।४४। फिर एक उदाल मारकर के वेग के साथ आपाग मण्डल में दृष्टिपात करते हुए सूर्य और चन्द्र पा तथा अन्य ग्रहो के मार्गों को रुद्ध पर दिया वरते थे।४५॥ मेरू पर्वत के सिगरो यो उपाहकर घर-उपर वह तुमार फेंक दिया करते थे।

परमेश्वर-सुर सम्वादादि कथन ]. [ ४१६ विगेप रूप मे पातो को और नदियों को उन मार्गों में डालकर ला दिया करते थे .४६. दामोदर के पत्रत्रय मे अर्थात् त्रिलोकी में सम्पूर्ण जगत् को उन्होने बासित कर दिया था। इसके अनन्तर सभी बहुत ही उद्विग्न हो उठे थे और शत्रुओ को प्रतापन देने वाले इन्द्रदेव के समीप में पहुंच गये थे और उनसे हे द्विज श्रेष्ठो । उस समय में यह वाक्य बोले-हे वृत्रहन ! यह अयुत अर्को से तुल्य वालक हमको हनन करता है ।४७१४८ा यह थापके राज्य का भी हरण कर्ता होगा इसमे कुछ भी संशय नहीं है। यह अपने पराकन से-अपने बल से तथा तेज के समुत्साह से आपके राज्यासन का भी कर्ता होगा ४६1 नून शतगुणेनायमधिकरचे दृश्यते । यदि सूदयसे नाथ तत्व सुखमवाप्स्यसि ॥५॥ करिष्यसि वचोऽस्माक तव राज्य भविष्यति । उपेक्षा नैव कर्तव्या शिशु मत्वा पुरदर १५॥ एतद्विचाय यत्नेन ततो वाल निपूदय । एवमुक्तस्ततस्तस्तु भूतन ते पुरदर ।। उवाच वचन श्लक्ष्ण तपा घमपरायणम् 1५२। कथमुक्तमिद भूता वालस्य हनन प्रति । धर्मनपापसपात कीतिघ्न वै चराचरे ।५३॥ थ यतामभिधास्यामि धर्मशास्त्रस्य निश्चितम् । पिभिश्च पुरास्यात पुराणेपु चराचरा ॥५४॥ मातुर भीरुमुद्विग्नमेकस्य शरणागतम् । स्त्रियमाप्यथवा बालमन्ध पङ्ग तपस्विनम् ।।५। लिजपन्त तयोन्मत्त विश्वन्तं ग्राहाण तथा । पनित प्रपलायन्त यामामक्त निरायुधम् ॥५६॥ पह बालप तो निश्चित रस से नौ गुरे मे भी नहीं अधिक है। ऐसा यहां पर दियाई देता है । है नाय ! यदि आर मूदित करते हैं +- ४१८ ] [ सूर्यपुराण कोशीघ्र ही समानता को ले आया करते थे।४१। और कही पर किसी ममय मे सिंहो को खीचकर भूतल मे गिरा दिया करते थे। उनकी पीठ पर आरोहण करके फिर उनको ही श्रामित करा दिया करते थे।४२॥ क्वचिन्नागी गृहीत्वा तु कराम्या समुखावुभौ । आस्फोटयत्तदाऽत्योन्य कुम्भाभ्या स च लीलया ॥४३।। समुत्पत्य समादाय खेचराणामुमासुत । चिक्षेप सहसा वालो विमानान्यवनीतले ।।४।। पुनरुत्पत्य नेगेन प्रेक्ष्यमाण खमण्डले। मार्ग रुरोध सूर्यन्द्वोर्ग हाणा च तथैव स ॥४५॥ उत्पाट्य मेरुशृङ्गाणि इतश्चेतश्च सोऽक्षिपत् । पर्वताश्च विशेषेण नदीश्चोन्मागतोऽनयत् ॥४६॥ त्रासित तु जगत्सर्व दामोदरपदनये। ततस्ते भृशमुद्विग्ना शक्र शत्रुप्रतापनम् ॥४॥ ऊचुगत्वा द्विजश्रेष्ठा भृता वाक्यमिद तदा। अयमकायुतप्ररयो वालो नो हन्ति वृनहन् ॥४८॥ तवैप राज्यहर्ता वै भविष्यति न सराय । पराक्रमादलाच्छक तथोत्साहाच्च तेजस ॥४६॥ यही पर दो नागो को अपने सामने दोनो को स्थित करके हाथो से एक दूसरे से आम्फोटित कर दिया करते थे अर्थात् दोना की टकर खिला दिया करते थे। दोनों को भिडावर स्फोटित कर देना उनकी एक लीला मात्र ही थी।४३वह उमा सुत ऊपर को उछल पर खेचरो को परड लाते थे और वह बालक कुमार सहसा ही विमानो को भूतल पर प्रक्षिप्त वर दिया यरते थे।४। फिर एक उछाल मारकर के वेग के साय आगरा मण्डल मे दृष्टिपात करते हुए सूर्य और पद्र या तपा अन्य ग्रहों के मार्गों को रुख पर दिया करते थे ।४। मेरु पर्वत के शिमरा यो उपारकर घर-उपर यह कुमार फेर दिया करत थे।

परमेश्वर-सुर सम्वादादि कथन ] विशेप रूप से पतिो को और नदियों को उन मार्गों में डालकर ला दिया करते थे ४६। दामोदर के पत्रत्रय में अर्थात् त्रिलोकी मे सम्पूर्ण जगत् को उन्होंने त्रासित कर दिया था। इसके अनन्तर सभी वहुत ही उद्विग्न हो उठे थे और शत्रुओ को प्रतापन देने वाले इन्द्रदेव के समीप मे पहुंच गये थे और उनसे हे द्विज श्रेष्ठो ' उस समय मे यह वाक्य वोते-हे वृत्रहन् । यह अयुत यों से तुल्य वालक हमको हनन करता है ।४४४४पा यह यापके राज्य का भी हरण कर्ता होगा-इसम कुछ भी सराय नहीं है । यह अपने पराक्रन से अपने बल से तथा तेजक समुत्साह से आपके राज्यासन का भी कर्ता होगा II नून शतगुणेनायमधिकश्ह दृश्यते । यदि सूदयसे नाथ तत्व सुखमवाप्स्यसि ॥५०॥ करिष्यसि वचोऽस्माक तव राज्य भविष्यति । उपेक्षा नैव कर्तव्या शिशु मत्वा पुरदर ५१॥ एतद्विचाय यत्नेन ततो वाल निपूदय । एवमुक्तस्ततस्तैस्तु भूतब तै पुरदर ।। उवाच वचन श्लक्ष्ण तेपा धमपरायणम् ।५२९ कथमुक्तमिद भूता वालस्य हनन प्रति । धर्मघ्न पापसपात कीर्तिघ्न वै चराचरे ।५३। श्रयतामभिधास्यामि घमशास्त्रस्य निश्चितम् । ऋपिभिश्च पुराख्यात पुराणेषु चराचरा १५४॥ आतुर भीरमुद्विग्नमेकस्थ शरणागतम् । स्त्रियमाप्यथवा वालमन्ध पङ्ग तपस्विनम् ॥५५॥ लिजपत्त तथोन्मत्त विश्वन्त ब्राह्मण तथा। पतित प्रपलायन्त कामासक्त निरायुधम् ॥५६॥ यह बालक तो निश्चित रूप से सौ गुने से भी कही अधिक है- ऐसा यहां पर दिरालाई देता है । हे नाय | यदि आप सूदित करते हैं ~ ] ४२० । सूर्य पुराण ता तभी आप सुख प्राप्त करेगे।५०। आप यदि हमारे द्वारा कथित वचन को करेंगे तभी आपका राज्य रहेगा । हे पुरन्दर ! इसको बहुत छोटा सा शिशु समझ कर इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ॥५१॥ यह विचार करके यत्नपूर्वक इस बालक का निपूदन कर दीजिये। इस प्रकार से इसके पश्चात् उन भूतो के समुदायो के द्वारा कहे गये पुरन्दर ने उनसे धर्म परायण और परम इलक्ष्ण वचन कहा था ।५२॥ इन्द्र देव ने कहा- हे भूतो ' बालक के हनन करने के विषय में यह आपने कैसे कहा है ? इमका हनन करना तो धर्म का घातक----पापो का सघात और घराचर मे कीत्ति का नाशक ही है ।५३। आप लोग श्रवण कीजिएगा, मैं आपको धर्मशास्त्र का जो निश्चित सिद्धान्त है उसको बत- लाऊणा । चराचर ऋपियो ने पहिले पुराणो मे कहा है ।५४। वे मनुष्य महामूढ ही होते हैं जो किसी भी आतुर को-भीरु को-उद्विग्न को- एक स्थान पर स्थित को-शरण म समागत हुए को-खी-बालक- अन्धा-पगला-तपस्वी--विलाप करने वाले दो-उन्मत्त-विश्वास मे स्थित-प्राह्मण-पतित-पलापमान-काम मे समा सक्त–विना हथियार वारो को मारेंगे वे नरक के सागर से हो गतं मे स्थित हाथी के तरह से ही अम्युस्थित होगे ।५५। ।५६॥ नग्न दीन तथा वृद्ध नसरोमसममन्वितम् । मुपनवेश तथा मत्त सुप्त च भुवनौकसः ।५७। मूदयिष्यन्ति ये नून मूढास्ते नरकार्णवात् । सनुत्थाना भविष्यन्ति गर्तस्य दुसरो यथा ॥५॥ तस्माद्यजध्व दारणयन साभुमुतो गुह । नाह बालवध वर्तु मुत्सहे सचराचरे Idel एवमुक्ने तु शरण भूतास्ने भृशदु सिता. । गोधरादीपन पापय पुनस्पुश्चराचराः ।६०१ गर्भो दितेयंया शक मरम्भारमूदितस्त्वया । तदा नीतिगता पुत्र दारों गर्भपातने ।६।।

रमेश्वर-मुर सम्बादादि कथन ]
[ ४२१
अशक्यामिति मत्वैव नीतिमानसि मानद ।
अशक्यकर्मणि विभो नीतिमान्पुरुपो भवेत् ।६२।
कश्च नाय नर गुरो यो वाल योधयेद्रणे।
अपि शकशस्तस्य वनकोटिनितिनै ।६३।
जो नग्न -दीन-वृद्ध-नख और रोमो मे समन्वित को-मुक्त
झेशी वालो को-यज-सुन को भुवनीकम मारेंगे वे नारकीय प्राणी ही
होगे। इस कारण से आप लोग उन्ही की दशरणागति मे जाइये जहाँ
पर यह भगवान् शम्भु के पुत्र गुह विराजमान हैं । मैं तो इस घराचर
मे बालक के वध करने का उत्साह ही नही करता हूँ १५७।६८१५६। इस
प्रकार से इन्द्र देव के द्वारा कहे जाने पर वे समस्त भूत अत्यन्ताधिक
दुखित हो गये थे। वे चराचर पुन क्रोध के सदीप्त करने वाला वाक्य
बोले थे ।६०। भूता ने कहा-हे शक ? आपने सरम्भ मे आकर दिती
के गर्भ को जिस तरह से मूदित किया था उस समय में आपकी यह
धर्म नीति उस दारण गर्भ को परतन करने के समय मे कहा चली गयी
थो अर्थात् उस समय म आपने इस धर्म शास्त्र के सिद्धान पर आपने
क्यो नही विचार दिया था जो भर हमको बता रहे हैं ।६११ यह आपके
द्वारा किया ही नही जा सपना है-यह मानसर ही इस समय मे आप
धर्म नीति के मानने वाले बने रहे हैं। हे मानद । जो कर्म शक्ति क
चाहिर होता है हे विमा उसी क विषय मे पुरुष नीति के मानने वाला
पना करता है ।६२। कौन मनुष्य शूरवीर है जो रण मे उस बालक के
साथ युद्ध चरेगा थाप तो हैं ही क्या संबडा इन्द्र भी परोडो वजी के
नियातनो से भी उस बालक के एक भी रोम वा निपातन नहीं कर
सवते । ६३॥
अप्येकमपि रोमान पातितु नैव शक्यते ।
एवमुक्तस्ततस्तैस्तु भूतबात पुरदर ।६४१
आज्यधाराभिषिक्तोऽग्नियर्थव प्रज्वलस्तया ।
उयाचेद वचस्तान्स कोरवाह्निप्रदीपित ॥६५॥

४२२ ]
[ सूर्य पुराण
वज्रमुद्यम्य हस्तेन वृनहा कुलिशायुध ।६६।।
पुरा मया यथा गर्भो घानितश्च चराचरा ।
दिते काय समाविश्य तथेदा; निहन्यते ।६७।
अथ गत्वा हनिष्यामि पतङ्गमिव वह्रिना ।
वन हस्ते समादाय आहवे प्रसहेत क ।६८)
एवमुक्त्वा तत शक्र क्रोधानलसमीरित ।
आज्ञापयत्तदा विप्रा साध्यान्देवान्दिवाकरान् ।६॥
शरघान गमिष्यामि वधार्थ वाल कस्य च ।
हसकुन्देन्दुवर्णाभ चतुर्दन्त महागजम् ७०
यह पुरन्दर जव उन मूतो के ममुदाय के द्वारा इस प्रकार से कहा
गया था तो घृत की धाराओं से अभिषिक्त अग्नि के ही ममान प्रज्वलित
होते क्रोध की अग्नि से दीपित होकर उनसे यह वचन बोले-उस
समय मे वृत्रहा ने पुलिश के आयुध को धारण करते हुए हाथ मे वच
को उठाकर ही वचन कहा था-इन्द्र देव ने कहा-पूर्व मे मैंो हे
चराचरो । जिस प्रकार से गर्भ का घात किया था और दिति के शरीर
मे मैंने ममावेश किया था उसी प्रकार से इस समय में भी निहनन किया
जाता है ।६४॥६७। अग्नि के द्वारा पतङ्ग के ही समान जाकर मार
दूंगा। वच्च हाथ मे ग्रहण करके जब मैं मम्मुख खडा होऊँगा तो मेरे
प्रहार को कौन सहन कर सकता है ? अर्थात् किसी में भी वच के प्रहार
को सहन करने की शक्ति नहीं है ।६८। इस प्रकार से कहकर वह महेन्द्र
क्रोध को अग्नि से समीरित हो गये थे । है विप्रो । उसी ममय में उसने
साध्यो पो-देवो को और दिवाकर आदि पो आशा दी थी।६६। मैं
अय परपान वन में उस बालय के वध दरोथे किये गमन करूगा जो
हस-कुन्द और चन्द्रमा के तुल्य वर्ण की थाभा वाला है-घार दोस्तो
वाला है और महान् गज के समान है 1७०।
आनयध्य ममाग्रे तु परीन्द्र मम वल्लभम् ।
जलधे (पि) रिप गम्भीर दीपंहस्त धनस्वनम् ॥७१॥

परमेश्वर-सुर सम्वादादि कथन ] [ ४२३ दैत्यदानवरक्तेन क्लिन्नदष्ट्र भयावहम् । तदादेशात्सुरैस्तूर्ण सर्वायुधसमन्वित १७२१ निवेदित स शक्राय तमारुह्य पुरदर । विश्वदेवेश्च साध्यश्च वसुभिश्न मरुन्दणं ॥७३॥ आदित्यरश्विनीभ्या च ययौ स्कन्दवधाय सः। वियन्मप्डलमास्थाय स्तूयमानश्चराचर ।।४। नृत्यमानाप्परोभिश्च वाशमानश्च किनर । गीयमानश्च गन्धवैः सुगीतंर्गीतशालिभि १७५॥ नदद्भिश्व महासिदैगर्जाद्भिश्च गजत्तमै । हरिभिह पमाणश्च वायुवेगमहारथै १७६१ पताकामिर्जयन्ती मिवरच चामरै । एवमायरनेकैश्च नन्दीश्वर इवापर १७१ दोधूयमानश्चमरश्च दिव्यजेंगीयमान सुरक्निरीभि । पेपीयमान सुरसुन्दरीभि कामातुराभिनयनरजत्रम् ।७८॥ सपूज्यमानो मुनिसिद्धिसदाऽन्वितो वनभर किरीटी। कुमारमुद्दिश्य गतोऽय देगादरिहरि म(द)नुजान्यथैव ७६ अब मेरे सामने मेरा प्रिय जो गज है उसको ले आओ जिस पर मैं समाम्ढ होऊगा वह मेरा प्रिय गज जलधि वे समान गम्भीर-दीर्घ मूख वाला और घनेस्वम (ध्वनि) वाला है ।७१। दंत्यो जोर दानवा के रघिर मे उसकी दाढ विलन हो रही है और यहत ही भणयह है। उमरे आदेश मे मुग्गण मे तुरन्त ही मव तयारी कर दी थी और इन्द्र सभी आयुधों से समन्वित हो गया था 1७११७२। उसको लाकर इद्र देव के लिये निवेदित पर पिया था और फिर पुरन्दर देव ने उस पर समा. रोहण रिया था तथा विरदेवा- माध्य-दमुगण-मरणग-आदित्य और अश्विनी कुमारी के माय स्पन्द देय में यप करने के लिय गया था। वह जब विगन्मण्डल पर ममा स्थित हुआ था तो सब पराचगें ये दारा स्तुति दिया गया था ।।७३७४ा नृत्य करती हुई अपरानी द्वारा- याचीरे-पजाने वाले ग्निरों द्वारा गन्यवादेवारा गीयमान होते हए सामान करने वालो ये सुन्दर गीतों रे द्वारा गान रिये गये ४२४ ] [ सूय पुराण थे । महासिंहो की गर्जनो से युक्त और गर्जना करने वाले महागजी के साथ समन्वित होकर । वह हपमाण अश्वो से युक्त तथा वायु के समान वेग पाले महारथो से समुक्त था। जयन्ती पताकाओ के द्वारा-ध्वज और चामरो से समन्वित होकर इस प्रकार से अनेको से युक्त होकर वह दूसरे नन्दीश्वर के ही तुल्य हो गये थे । चमर उस समय मे उसके ऊपर ठुराये जा रहे थे और किन्नरियाँ सुरो का गान कर रही थी। जो काम से आतुर सुरसुन्दरियां थी उनके नेत्रो के द्वारा निरन्तर पान दिये गये थे 1७५१ १७८। मुनि और सिद्धो के समुदाया के द्वारा वह भली भांति पूज्यमान हो रहे थे-वज्र के धारण करने वाते-विरीटधारी आनन्द से समन्वित हो रहे थे। वह हरि हरि के ही ममान जैसे मनुजा के ऊपर चढाई कर रहे हो उसी तरह मे कुमार का उद्देश्य लेकर वह इन्द्रदेव गये थे।७६ । ॥ नारद-इन्द्र संवादादि कथन ।। एव गत्वा सहयाक्षो यनाऽऽस्ते पार्वतीसुत । वाल सूर्यायुतप्रव्य तमपश्यच्छचीपति ।। प्रलयाग्निनयाकार दृष्ट्वा नारदमब्रवीत् ॥१॥ इद किं भाति देवर्षे मेरो शतगुणोच्छ यम् । तेजसा व्याप्तभुवन सर्वभूतभयङ्करम् ॥२॥ एव शक्वच श्रुत्वा भगवान्पद्मभूसुत । ऐरावतगजारूढ़ शचीपतिमथाब्रवीत् ॥३॥ योऽमो देव त्वया न्यस्तो गर्भश्चैव सहामरं । तस्यैवीप प्रभावोऽय नुन देव शतक्रतो ।४। भाम्याराणा न पुञ्जोग्य नव पर्वतमचय । बालेनोत्पाद्यमानेन सह देश्च रजित ॥

नारद-इन्द्र संवादादि कथन ] [ ४२५ अधो योजनसस्याभि सहस्राण्येव पोडश । चनुरशोतिरुत्सेधो द्वानिशाद्विस्तर स्मृत ॥६॥ यग्रि सकलोऽय तु मेर काञ्चनता गत । तत्तेज स्पन्दना यात सहस्राद्ध गतैस्तथा ॥७॥ श्री सूतजी ने कहा था-इम प्रकार से सहस्रार इन्द्र जाकर वहां पर पहुचे जहाँ पर पावती के सुत कुमार विद्यमान थे शची पति ने उस मयुत सूर्यो के समान प्रख्य उस बालक को रखा था। प्रनय काल की अग्नि में समुदाय क समान आकार वाले उसको देखकर वह महेद्रदेव नारदजी वोल ।१॥ इद्रदेव न कहा- हे देव। यह मरु पवत की ऊँचाई से भी शतगुण ऊंचाई वाला क्या आनासित हो रहा है ? जिसके तेज से समस्त भुवन व्याप्त हो रहा है और जो सब भूता के लिये महान् भयङ्कर है ।२। इस प्रकार के इन्द्र के वचन का शवण करके ब्रह्माजी पुत्र भगवान् नारदजी न ऐरावत हाथी पर बैठे हुए शचीपचि म कहा था ।३। श्री दवपि नारदजी न कहा-हे दव | अमरा के साथ गर्मों से जो यह न्यस्त किया गया था ह शतक्रतो । उसी का यह निश्चित प्रभाव है ।४। यह भास्करा का समुदाय है और पवता का सचय नही है। देवा क साथ उत्मधमान वालक के द्वारा यह र जित हो गया है ।। नीचे की आर सालह सहन योजना की सस्या से युक्त है और चौरासी योजना की ऊचाइ है तथा बत्तीस याजना का विस्तार है १६। यह सम्पूण पवत काञ्चनता को प्राप्त हो गया है । वह तन स्वदता को एक महस्र अश्या के समाप्त होने पर प्राप्त हुए है 1७। चतुर्थ्या साकृतिद व पञ्चम्यामङ्गवाँस्तत । पठ्या पझ्या यथा वेप लोक्य विजयप्यिति ।। त्वया सहाय सप्तम्या पालयिष्यति वा पुन । त्व तु नून न शक्तोऽसिं जेतु वर्षशतैरपि || कुमार वरद देव पार्नत्यानन्दवचनम् । नानाप्रहरणोपेत नानाभरणभूषितम् ॥१०॥ के

४२६ ]
[ सूर्य पुराण
मातृभिर्गणवृन्दैश्च सेव्यमानमुमासुतम् ।
एग सजल्पमानोऽसौ जम्भारिलिक प्रति ।११॥
वज्र मुमोच वृत्रारि स्फुलिङ्गोग्दारिभीषणम् ।
तृणवन्मन्यमानोऽसौ वज्र तत्पातीसुत ।१२।
शरेणकेन विव्याध पपात च स मूड़ित ।
पुनरन्टर समादाय शर ज्वलनमानभम् ।१३।
छत्र ध्वज पताकाश्च हरेश्चिच्छेद पण्मुख ।
विभेदान्मन तीक्ष्णेन हस्त नै वनिणो गुह ॥१४॥
हे देव । चतुर्थी मे आकृति से युक्त हुए थे और पचमी मे वह फिर
अङ्गो वाला हो गया था। पप्ठी में पदो से युक्त हो गया था-जैसे कि
यह लोक्य पर विजय को प्राप्त करेगा ।। सप्तमी मे फिर आपके
साथ सहाय का पालन करेगे। आप चढाई करने के लिये तैयार होकर
जो यहां पर आये है सो आप तो सौ वर्षों में भी इनको जीत नही सक्ते
हैं 180 युमार वरदान देने वाले देव पार्वती के आनन्द के वर्धन परने
वाले हैं। ये अनेक प्रहरणो से समन्वित हैं तथा भने आमरणो से भी
विभूपित हैं। यह उमा के सुत माताओं और गण वृन्दा के द्वारा
सेव्यमान हैं । इस प्रकार से अच्छी तरह से वहा गया भी उस जम्भारि
ने उस बालक के प्रति वृत्रादि ने बच या मोचन किया था जो स्फुलिङ्गो
के उद्धरण करने वाला और महान् भीषण था । उस पार्वती के मुत ने
उस वज वो एक तिनके ही 'समान मान लिया था।१०।११।१२।
उस कुमार ने एक ही शर से विद्ध कर दिया था और वह इन्द्र मूच्छित
होर गिर गया था। फिर दूसरे अग्नि में समान शर को लेकर पण्मुस
ने इन्द्र के पत्र-घ्यज और पनागाओ या छेदन कर दिया था। पिर गुह
ने अन्य एक तीक्ष्ण शर से इन्द्र के हाय या भेदन पर दिया था ।
११३॥१४॥
गरेणादित्यतुल्येन रस शभुर्मयाहने ।
पुनर्माण गमादाय त जपान शतक्रतुम् ॥१५॥

नारद-इन्द्र सवादादि कथन ] [ ४२७ अपरेण तु तीक्ष्णेन मुकुट तु तथा हरे । शरेण वह्नितुल्येन निच्छेद च स लीलया ॥१६॥ यम च पञ्चभिर्वाणनिति दशाभिमुह । दशपञ्जशरैराशु वरुण च विभेद स ११७) विशत्या वायुदेन च रवि च दशपञ्चभि । निशद्भि सोमराजान ताडयित्वा रणे पुन (१८१ शक्र पञ्चशतैराशु शरश्च प्राणहारिभि । अन्यानापि सुरान्स्कन्दनिभिद्विपञ्चभि शरै ।१६। शूरो नाद प्रमुञ्चन्ने शक द्राव शभुज । वसुभिश्च तथाऽऽदित्यैमरुद्भिश्च महावले ॥२०॥ पृत शस्त्रकराल सिंहै शरभराडिव । ततस्तानागतान्दृष्ट्वा देवाञ्शङ्करवल्लभ ॥२१॥ आदित्य के तुल्य शर से जैसे युद्ध मे रुरु को भगवान् शम्भु हान किया करते हैं वैसे ही पुन वाण ग्रहण करके उस शतक्रतु का विहनन कर दिया था ।१५। दूसरे तीक्ष्ण वाण से जो अग्नि के ही समान शर था उन्हो ने लीला ही से हरि के मुकुट का छेदन कर दिया था।१६१ गुह ने पांच बाणो से यमराज का-दम मरो से निऋति को और शरो से वरण का भेदन कर दिया था।१७। बीस शरो से 'वायु देव और पन्द्रह से रविदेव-तीस वाणी से सोम गजा का रणस्थल मे तारण किया था। फिर बहुत ही शीघ्र पांच सौ वाणो से जो कि प्राणी के हरण करने वाले थे इन्द्रदेव को तथा अन्य सुरो को भी तीन- दो पाँच शरों से स्कन्द देव ने आघात किया था। शम्भु के आत्मज शूर ने नाद को छोडते हुए शक्र को विद्रुत कर दिया था । वयुगण- आदित्य-महावलशाली मरुद्गणो से परिवृत बालक ने हाथो मे शस्त्र ग्रहण करने वाले सिंहो के सहित शरभराट् को ही भांति फिर आगत हुए देवो को देखकर शङ्कर भगवान् का वल्लभ ने क्षुद्र मृगी को पेसरी ही के रामान दिवोरमो (देवा) को वहां से भगा दिया या पदेह पन्द्रह

४२८ ]
[ सूर्यपुराण
कर आमद्रुत कर दिया था । पून इन्द्र ने वज्र के द्वारा स्कन्द के ऊपर
प्रहार किया था ।१६।२०।२१।
केसरीव मृगान्क्षुद्रान्दुद्राव च दिवौकस !
पुन. स्कन्द सहस्राक्षो वज्रेण तमताडयत् ।।२२
ताडिते तु ततस्तस्मादुत्पन्नाश्चारुमूर्तयः ।
प्रयो देवाश्च वेदाश्च लोकाश्चाग्निदिवाकराः ॥२३
ततश्चेद सहस्राक्ष वृहद्गुरुवृहस्पति (?) ।
देवमन्त्री महाप्राज्ञो वृहस्पतिरथाब्रवीत् ।।२४
अल युद्धेन देवेश महादेवस्य सूनुना ।
हित तवोपदेक्ष्येऽहं सहस्राक्ष शृणुष्व तत् ॥२५
यदीप्स सि मुख भोक्तु कुरुष्व वचन मम ।
अनेन सह सप्रीतिं कृत्वा राज्यमकण्टकम् ॥२६
भुइक्ष्व त्व निश्चल कृत्वा दानवाश्च निपूदय ।
यस्य वज्राभिघातेन नातिः स्वल्पाऽपि जायते ।।२७
हन्तव्यः म कथ शक शत्तसख्यभवादृशः ॥२८
उसके ताडिन होने पर उनसे सुन्दर आत्ममूर्तिया समुत्पन्न होगयी
थी । तीनदेव वेद, लोक, अग्नि और दिवाकर हुए थे। इसके अनन्तर
वृहद् गुरु वृहस्पति जी ने जो देवो के मन्त्री, महान् पण्डित थे, इन्द्रदेव
से भोले ।।२२-२४।। वृहम्मति जी ने कहा-हे देवेश्वर ! महादेवजी
पुत्र के साय युद्ध मत करो। मैं आपके हित की उपेक्षा करूगा ।
हे सहस्राक्ष ! आप इसका श्रवण वीजिए ॥२५॥ यदि आप सुप का
उपभोग करना चाहते हैं तो मेरे कथित वचन का पूर्णतया आप पालन
योजिए। दम सन्ददेव के साथ अच्छी प्रीति करके ही आपरा राज्य
पटक रहित रहेगा। और उस राज्य वा उपभोग करिए। बाप अपने
गग्यासन के निश्चल करके ही दानवो का विपूदन कर डालिए । जिसरा
ऐसे भमोद्य पय के आपात से भी शिविमान दुख नही होता है है
राब ! वह गंगे मारे जाने के योग्य हो सकता है। आप अकेने की पन

नारद-इन्द्र सवादादि कथन ]
[ ४२६
ही क्या सकती है आप जैसे सो भी हो तो भी इनको नहीं मार सक्ते
हैं ॥२५-२८॥
श्रुत्वा तस्य वचः शक्रस्तदा सुरगुरोद्विजाः ।
तमेव शरण प्रायात्कुमार पार्वतीसुतम् ।।२६
प्रसीद मे त्व शरणगतस्य पादौ तवाह शिरसा वहामि ।
मुराधिपस्त्व भव शर्वसूनो गृहाण राज्य मम गभुकल्प ॥३०
एपोऽञ्जलि पङ्कजचारुनेन कृत्तोत्तमाङ्ग (7) जहि मन्युमुग्र ।
सता हि कोप. प्रणतेषु नित्य विनाशमेत्यार्यमन. सुसिद्धम् ॥३१
अथेन्द्रवचन थ त्वा भगवान्पण्मुसस्तदा ।
अब्रवीत्करुणाविष्टः शक्र प्रति मुनीश्वराः ॥३२
करोमि किमह राज्य भोगैश्च प्राकृतरलम् ।
अपर्याप्त न मे किंचिदस्ति पित्रोः प्रसादतः ॥३३
निष्कण्टक त्वमेवेह राज्य कुरु शचीपते ।
मम सख्येन मकलाशय अहि पुरंदर ॥३४
एव स्कन्दवचः थ त्वा पुनराह शचीपतिः ।
भगवन्नापरः कश्चिद्दवाना विदितो बली ॥३५
श्री सूतजी ने कहा-हे द्विजो ! उम समय मे महेन्द्र देव ने उन
वृहस्पति जी के वचन को सुनकर जोकि सभी सुरो के गुरु थे तुरन्त ही
पार्वती के सुत कुमार स्वन्द की शरण में चला गया था ॥२६॥ इन्द्रदेव
कहा-हे भगवन् ! आप मुझ शरण में आये हुए प्रसन्न हो जाइये ।
मैं आपके चरणो को शिर के बल वहन करता हूं हे पादमूनो। थाप सब
सुरो के अधिप हो जाइए। हे गम्भुदेव के महश | आप मेरे राज्य को
भी ग्रहण कीजिए ॥३०॥ हे पङ्कज के तुल्य सुन्दर नेत्रो वाले । मैं यह
आप को हाथ जोह रहा हूँ । इम वृत्त उत्तमान में उग्रमन्यु को (क्रोध
को) त्याग दीजिए । श्रेष्ठ मन वालो को यह बात परम प्रसिद्ध है कि
सज्जनो का कोप प्रण भक्तो के कार नित्य हो विनाश को प्राप्त हो
जाया करता है ॥३१॥ इसके अनन्तर इन्द्र के इन वचनो श्रवण
ने

दूसरा कोई ४३० ] [ सूर्य पुराण करके उस समय मे भगवान् पण्मुख करुणा से आविष्ट होते हुए हे मुनी श्वरो। कहने लगे ॥३२॥ स्क ददेव ने कहा-मैं आपके राज्य को ग्रहण करके क्या करू गा मैं इन प्राकृत भोगो को नही चाहता हूँ। मेरे माता पिता के प्रमाद से कुछ भी पदार्थ मेरे लिये अपर्याप्त नहीं है । हे शचीपते । आप ही अपने राज्य का सुख निष्कट क रूप से भोगिये । हे पुरन्दर । मेरे साथ सख्यमान रखने से आप अपने समस्त शत्रुओ को मार भगायेंगे ॥३३॥३४॥ इस प्रकार से कथित भगवान् स्कन्ददेव के वचन का श्रवण करके इन्द्र ने पुन कहा -हे भगवन् बलशाली देवो को विदित नहीं है ॥३५॥ तस्मात्कुरु त्वमेवेह राज्यमीश्वरनन्दन । क्व वाल क्व च सग्राम क्व नीति क्व पराक्रम ॥६६ क्व ज्ञानमतुल देव क्व मति क्व च सौम्यता। क्व माया क्व च दाक्षिण्य क्व शान्ति क्व प्रसादता ।।३७ अल त्वमेव राज्यस्य गुणैरेभिरुदीरित । स्वरूप स्वगुणस्त्व हि वन्दिभिश्चारणस्तया ॥३८ विद्याधरैश्च यक्ष श्च विविधैर्गुणकोटिभिः । स्तूयमानोऽमर सिद्ध गन्धर्वाप्सरसा गणे ॥३६ अह सेनापतिर्देव भवामि भवनन्दन । तिष्ठस्वोपरि कृत्स्नस्य लोक्य भुड क्ष्व पण्मुख ।।४० सर्वग सर्वभूतस्त्व यथा देवो महेश्वर । एव शक्रवच श्रुत्वा पुन. प्राहाम्विकासुत ।।४१ हे ईश्वर नन्दन | इस वारण से यहां पर आप ही राज्य शासन कीजिए। यहाँ तो बालक और कहा सग्राम-कहाँ नीति और कहाँ पराक्रम है। कहा पर अतुल ज्ञान हे देव । यहाँ परमति और कहां पर सौम्यता, कहाँ माया और यहाँ दाक्षिण्य, शान्ति तथा प्रमादता है। इन उत्तम गुणो के द्वारा तो आप ही राग्य ये करने के लिये पूर्णतया उदारित होते हैं। आप अपने स्वरूपो से, अपने सद्गुणों से राज्य करने के योग्य हैं। वदो, धारण, 1 नारद-इन्द्र सवादादि कथन ] । ४३१ विद्यापर, यक्ष और विविध गुण कोटिभो के द्वारा स्तूयमान हैं तथा अमर, सिद्ध, गन्धर्व और अप्मराओ के गणा के स्तुत हैं । हे देव । हे भवनन्दन । मैं आपका सेनापति हो जाऊँगा । हे पणमुख सबके ऊपर आप स्थित हो जाइये और इम लोक्य का उपभोग करिए। आप तो सवम गमन कग्न वत, सर्वभून स्वरूप हैं जैमे देव महेश्वर हैं । ऐसे महेन्द्रदेव के वचन का श्रवण करके पुन अविवा सुत बोले ॥३७-४१॥ अभय शक्र मा भैपी कुरु राज्यमकण्टकम् । इन्द्रम्त्व देवराजस्तव त्वमेव जगत प्रभु ॥४२ दपंगवलोदी दानवा ये च तास्तदा । ये पराजीयसेऽत्यर्थ सूदयेऽह त्वया स्मृत ॥४३ वह्वालापरले शक्र गदितेन पुन पुन । निश्छयेन सखाऽह ते भवाम्पसुरसूदन ।।४४ अथोवाच महादेवपुन सवौक्ष्य निस्पृहम् । नेप्ट त्वयाऽपि हीन्द्रत्व भव सेनारतिर्मुह ।।४५ एवमस्त्विति त प्राह कार्तिकेय शचीपतिम् । तत सर्व सुरैविप्रा आदेशात्परमेष्ठिन ॥४६ अभिषिक्तोऽथ विधिना सेनापत्ये तदा गुह । यावदत्त कुमाराय सेनापत्य हराज्ञया ॥४७ हन्तुमभ्यागतस्तूर्ण कुमार तारकस्तदा। आगत त तदा वीक्ष्य लीलया पावतोसुत । ददाहाऽऽशु महादैत्य तूल पह्निरिवाऽऽहवे ।।४ दग्ध्वा तु तारक घोर पतङ्गमिव पावक । तत प्रीतमना स्कन्दो मातुरङ्कमुपाविशद ।।४६ महादेवोऽपि भगवान्वैधादीन्विष्णुना सह । विसृज्य गणपं साधं क्षणादन्तहितोऽभवद १५० भगवान सन्ददेव ने कहा-हे शुक्र ! आप में अभय का वरदान ४३० ] [ सूर्य पुराण करके उस समय में भगवान् पण्मुख करुणा से आविष्ट होते हुए है मुनी. श्वरो! कहने लगे ।। ३२॥ स्कन्ददेव ने कहा-मैं आपके राज्य को ग्रहण करके क्या करूंगा मैं इन प्राकृत भोगो को नहीं चाहता हूं। मेरे माता पिता के प्रसाद से कुछ भी पदार्थ मेरे लिये अपर्याप्त नहीं है । है शचीपते । आप ही अपने राज्य का सुख निष्कटक रूप से भोगिये । हे पुरन्दर ! मेरे साथ सख्यमान रखने से आप अपने समस्त शत्रुओ को मार भगायेंगे ॥३३॥३४॥ इस प्रकार से कथित भगवान् स्कन्ददेव के वचन का श्रवण करके इन्द्र ने पुत्र. कहा - हे भगवन् ! दूसरा कोई बलशाली देवो को विदित नहीं है ।।३५॥ तस्मात्कुरु त्वमेषेह राज्यमीश्वरनन्दन । क्व वाल क्व च सग्रामः क्व नीतिः क्व पराक्रमः ॥६६ क्व ज्ञानमतुल देव क्व मतिः क्व च सौम्यता। क्व माया क्व च दाक्षिण्य क्व शान्तिः क्व प्रसादता ।।३७ अल त्वमेव राज्यस्य गुणरेभिरुदीरितः । स्वरूप स्वगुणस्त्व हि बन्दिभिश्चारणस्तथा ॥३८ विद्याधरैश्च याश्च विविधैर्गुणकोटिभिः । स्तूयमानोऽमरै सिद्ध गन्धर्वाप्सरसा गणः ॥३६ अहं सेनापतिर्देव भवामि भवनन्दन । तिष्ठस्वोपरि कृत्स्नस्य लोक्य भुड क्ष्व पण्मुख ॥४० सर्वगः सर्वभूतस्त्व यथा देवो महेश्वर । एव शक्रवचः श्रुत्वा पुनः प्राहाम्बिकासुतः ॥४१ हे ईश्यर नन्दन इस कारण से यहाँ पर आप ही राज्य शासन कीजिए। यहाँ तो वालक और कहा सग्राम-कहाँ नीति और कहाँ पराक्रम है। यहाँ पर अतुल ज्ञान हे देव ! कहाँ पर मति और कहां पर सौम्यता, वहाँ माया और यहाँ दादिण्य, शान्ति तथा प्रसादता है। इन उत्तम गुणो के द्वारा तो आप ही गग्य वे करने के निये पूर्णतया उदारित होते हैं। आप अपने स्वरूपो से, अपने सद्गुणों से राज्य परने के योग्य हैं। वन्दो, पारण, , नारद-इन्द्र संवादादि कयन ] विद्याधर, यक्ष और विविध गुण कोटिभो के द्वारा स्तूयमान हैं तथा अमर, सिद्ध, गन्धर्व और अप्सराओ के गणो के स्तुत हैं । हे देव । हे भवनन्दन । आपका सेनापति हो जाऊंगा। हे पण्णमुस । सबके कार आप स्थित हो जाइये और इस प्रलोक्य का उपभोग करिए। आप तो सबमे गमन करन वान, सर्वभूत स्वरूप हैं जैसे देव महेश्वर हैं। ऐसे महेन्द्रदेव के वचन का श्रवण करके पुन. अम्बिका सुत बोले १३७-४१॥ अभय शक मा भपी. कुरु राज्यमकण्टकम् । इन्द्रस्त्व देवराजस्तव त्वमेव जगत प्रभु ।।४२ दर्पगर्ववलोदीर्णा दानवा ये च तास्तदा । ये पराजीयसेऽत्यर्थ सूदयेऽह त्वया स्मृत ।।४३ बह्वालापरल शक्र गदितेन पुन पुन । निश्छयेन सखाऽह ते भवाम्पसुरसूदन ।।४४ अथोवाच महादेवपुन सवोक्ष्य निस्पृहम् । नेप्ट त्वयाऽपि हीन्द्रत्व भव सेनापतिगुह ॥४५ एवमस्त्विति त प्राह कार्तिकेय शचीपतिम् । तत सर्व सुरैविप्रा आदेशात्परमेष्ठिन ।।४६ अभिपिक्तोऽथ विधिना सेनापत्ये तदा गुह । यावदत्त कुमाराय सेनापत्य हराज्ञया ॥४७ हन्तुमभ्यागतस्तूर्ण कुमार तारकस्तदा । आगत त तदा वीक्ष्य लीलया पार्वतीसुत । ददाहाऽऽशु महादेत्य तूल वह्निरिवाऽऽहवे ॥४८ दग्ध्वा तु तारक घोर पतङ्गमिव पावक । तत प्रीतमना स्कन्दो मातुरङ्कमुपाविशत् ।।४६ महादेवोऽपि भगवान्वेधादीन्विष्णुना सह । विसृज्य गणपं सार्घ क्षणादन्तहितोऽभवत् ॥५० भगवान् सन्ददेव ने कहा है शुक्र I आपसे मैं अभय वा वरदान । - ४६२ [ सूर्य पुराण देता हूं। डगे मत अकष्टक राज्य का उपभोग करो। आप देवो के राजा हैं-आप इन्द्रदेव हैं और आप ही इस जगत् के प्रभु हैं ॥४२॥ हर्प गर्व और बल से उदीर्ण जो ये दानव हैं जिन्हो के द्वारा आप पराजित हो जाते हैं उनको मैं जब भी आपके द्वारा याद किया जाऊ गा सबको मार डालू गा ॥४३॥ हे शक्र ! बहुत अधिक बातें करना तो व्यर्थ है और वार-वार वही कथन भी नही करना चाहिए । यह निश्चित है कि मैं आपका सन्दा हूं और हे अरिसूदन | मैं सखा ही रहूगा ॥४४॥ इसके उपरान्त महादेव जी के पुत्रो को सर्वथा स्पृहा से शून्य देसकर इन्द्र ने कहा कि यदि आपको इन्द्र का पद अभीष्ट नहीं है तो हे गुह मेरे सेनापति हो जाइये। तब कात्तिकेय प्रभु ने शचीपति से कहा था- अच्छा, ऐसा ही होगा। इसके अनन्तर हे विप्रो । परमेष्ठी के आदेश से सब सुरो के द्वारा अभिपिक्त हो गये थे और विधि के द्वारा गुहदेव सेनापति के पद पर स्थापित किये गये थे। जब तक कुमार के लिये भगवान् हर की आज्ञा रो सेनापत्य का पद प्रदान किया किया था ।४। उसी समय मे तारक दैत्य शीघ्र ही कुमार को मारने के लिये वहाँ आगया था। उस समय मे पार्वती मुन ने समागत हुए उसको देखकर उस महादैत्य पो लोला ही से वह्नि जैसे तूतको भस्म कर दिया करती है उसी भांति युद्ध मे शीघ्र ही दग्ध कर दिया था। पायक जमे पतङ्ग यो भस्म कर दिया करता है वैसे ही उम महान् घोर तार को दाय परमे फिर प्रसन्न मन यारो सन्ददेव अपनी माता की गोद मे मार बैठ गये थे। भगवान् महादेव भी विष्णु भगवान के सहित ब्रह्मा आदि देपोमो विदा पर अपने गणो के साथ एा ही क्षण में अन्तपनि हो नमे ॥४८-५०॥

ब्रह्मन्नारद सवादादि कथन ] [ ४३३ ॥ ब्रह्म-नारद संवादादि कथन ॥ कथितो भवता सून विवाहः परमेष्ठिनः । उत्पत्ति. कार्तिकेयस्य तस्य चैव पराक्रमः ॥१॥ सेनापत्य यथा दत्त श्रत सर्वमशेषतः । भक्तियोगमदानी वद सूत महामते ॥२ तृप्ति द्यायभूद्यस्माच्छ वा चंब पुनः पुनः। जानासि त्वा भगवतो माहात्म्य मिपुरद्विपः ॥३ उपासितो यत. सभ्यग्भगवान्यादरायणि। तत्प्रसादात्वया लब्ध ज्ञान तसारमेश्वरम् ॥४ दुर्लभ मर्मशास्त्रेषु मुनीना च महात्मनाम् ॥५ यदुक्त ब्रह्मणा पूर्ण नारदाय महात्मने । प्रीतेन मनसा तेन तच्छणुध्ठा द्विजोत्तमाः ।।६ सत्यलोके सुखामीन ब्रह्माण तेजसा निधिम् । प्रापिभिमुनिभि सिद्धर्मेदै साङ्गरपासितम् ।।७ पिगणों ने कहा-हे मूतनी। आपने कृपा करके परमेष्ठो प्रभु के विवाह का वर्णन करके मुना दिया है और आपने कुमार कासिीय की राति मे हुई और उन किनना अनुर पराक्रम था यह भी मुना दिया है । जिस प्रकार मे उनको मेनाररय पर प्ररान किया गया पा यह भी मर हमने पूर्णतया श्रवण कर लिया है । हे मूतजी । अब तो आप भक्तियोग के विषय मे हमरो यनसाइये क्योकि आप तो यह महती विमान मनि से गुसम्मन महापुरुष है ॥२॥ यर हम लोगो ने बार- म्बार बार मुगारविन्द मे मुना तो भी हमारे मन को मृप्ति अभी तक भी नही हुई है पाप तो त्रिपुरस्ट् िममवान् रे माहात्म्य को अट्री तरह से जानते है क्योकि अपने भगन वादगण को अच्छी तरह से उामना की। उार प्रमाद से ही प्रारने उन पामर से सम्बन्धित भान प्रालिया है। यह मार जो बातो का है वही.

४:४ [ सूर्यपुराण बडे महात्मा और मुनियो को भी परम दुर्लभ होता है । तथा यह समस्त श स्त्रो मे भी दुर्लभ है ।।५॥ श्री सूतजी ने कहा-पहिते समय मे ब्रह्माजी ने महान् आत्मा वाने नारदजी को यह बतताया था और उन्होने परम प्रसन्न मन से ही इसका उपदेश किया था । ह द्विजोत्तमो । उसी को मै बतलाता हूँ आप लोग श्रवण करिय ।।६।। सत्यलोक में तेज की निधि ब्रह्माजी मुख पूर्वक बैठे हुए थे और उस समय मै ऋषि- मुनि, सिद्ध वेद अपने अङ्ग शास्त्री के सहित उाकी उपामना कर रहे थे ॥७॥ सगीयमान गन्धर्व स्तूयमान मरुद्गणे । दृष्ट्वा प्रणम्य विधिवनारदस्तमथाब्रवीत् ॥८ देवदेव जगन्नाथ चतुर्मुख सुरोत्तम । भक्तियोगस्थ माहात्म्य देवदेवस्य शूलिन ॥९ प्रणम्य शकर शान्तमप्रमेयमनामयम् । पर ज्योतिरनाद्यन्त निगुण तमस परम् ।।१० भक्तियोग प्रवक्ष्यामि शृणु नारद मुव्रत । भक्तियोगस्य माहात्म्य यथा शभोमया श्रुतम् ॥११ भक्तिभंगवत शमोर्दुर्लभा खलु देहिनाम् । क्थचिद्यदि सा लम्मा तेपा नवानि दुर्लभम ।।१२ भवत्येव प्राप्यते राज्यमिन्द्रत्व मत्पद च यत् । विष्णुत्वमपि मुक्ति च नन प्राप्नोति नारद ॥१३ शुभानामशुभाना च यमणा रा स चयम् । फरोति भस्ममाङ्गवितभवस्याग्मिययेन्चनम् ॥१४ गन्धर्व गण उनमा गान कर रहे ये तथा मन्दगण स्तवन कर रहे थे । देवर्षि नारद जी ने उनमा दर्शन दिया था और फिर उनो जामो प्रपाम दिया था। विधि विधान पूर्वर प्रणिIT परख नारद जी ने उनने वहा था। श्री नारदजी ने पहा-है दवो वे भी देश जार जगत् के नाय हैं। ह चतुमुंग | आर समन मुग्गणो म अत्युत्तम हैं।

ब्रह्म-नारद संवादादि कयन }
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वाप देवदेव भगवान् मूली के भक्तियोग माहात्म्य को बतलाने कृपा
कीजिए ॥६॥ श्री ब्रह्माजी ने कहा-मैं सर्वश्यम परम मान्त स्वरूप
वाले प्रमा के विषय के अयोग्य-आभय से रहित परम ज्योति'---आदि
और अन्त दोनो से रहित-निर्गुण और तम से परे रहने वाले भगवान्
शङ्कर को प्रणाम करके उनके भक्तियोग को बनलाता हूं । हे सुदन
नारद ! थाप मुनिये। भगवान् गम्भु के भक्तियोग का माहात्म्य जमा
भी मैंने सुना है भगवान् शम्भु की भक्ति का योग देहयारियो के लिये
बहुत ही दुर्लभ है। यदि किसी भी प्रकार से वह भक्ति प्राप्त करली
गयी हो तो फिर उनकी पुद भी पदार्थ दुर्लभ नहीं रहा करता है ।।१०.
१२॥ भक्ति ही के द्वारा राज्य प्राप्त किया जाया करता है -इन्द्र का
यह और जो मेरा पद है वह प्रान कर लिया जाता है। हे नारद !
विष्णुस्व और मुक्ति भी निश्चय ही प्राप्त किया जाता है ॥१३॥ निम
तरह से अग्नि के द्वारा इन्धन पी भम्म हो जाती है उमी भांति शुभ
और अशुभ कर्मों की रानि का मग्य होता है उसको भगवान् भव को
भक्ति भस्म कर दिया करती है ।।१४।
म्लेच्छोऽपि या यदि भवेद्धवभािसमन्धित. ।
न तत्ममधनुर्वेदी नाग्निधोमादियज्ञकृत् ।।१५
अपि पापानि घोराणि सदा युर्वन्नगे यदि ।
लिप्यते नैव पापम्तु भक्तो भाति चंद्रिये ॥१६
शिवभपता महात्मानो मुच्यन्ते ते ग सशय. ।
अपि दुतकर्माण प्रसादा लिनो मुने ॥१.
मधूगयते यस्तु भगवन्त मुमापतिम् ।
नवमेधावधिक फल भवति नारद ॥१८
जोषित चल जात्या पद्मपत्र इवोदकम् ।
मृतेदुरन्तानरपालत. युनिटने मतिम् ॥१६
प्रिये मनि निः गमागनिमीपणाम् ।
मुन्यते मुनितादन मति. पायेंशिदुल भा ॥२०
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४३६ । सूर्य पुराण भवव्यालमुखस्याना भीरूणां देहिना मुने। तस्माद्विमोचकस्तेषां महादेव इति श्रतिः ॥२१ कोई म्लेच्छ भी क्यो न हो यदि वह भगवान की भक्ति से सम- वित होता हो तो उसकी समानता रखने वाला चारो वेदो का ज्ञाता भी न होता है और न अग्निष्टोम आदि यज्ञो के करने वाला ही हुआ करता है ।।१२॥ यद्यपि सदा महान् घोर पापो को भी मनुष्य कर रहा हो और वह भगवान शिव का परम भक्त हो तो वह पापो से भी लिप्त नही हुआ करता है ।।१६।। भगवान् शिव के भक्त महान् आत्मा वाले होते हैं और निश्चित रूप से मुक्त हुआ करते हैं-इसमे संशय नही है । हे मुने ! चाहे दुष्कृत कर्मों के भी वे क्यो न करने वाले हो भगवान् शूली के प्रसाद से विमुक्त हो जाया करते हैं ॥१७॥ जो एकबार भी भगवान् उमापति को पूजा किया करता है । हे नारद ! उसका पुण्य फल अश्वमेघ यज्ञ से भी अधिक हुआ करता है ।।१८।। पद्म के पत्र पर इवद की तरह ही इस जीवित को चञ्चल समझकर मृत्यु और दुरन्त नरको से बचने के लिये शिव के चरणो में अपनी भक्ति करनी चाहिए ॥१९॥ भगवान शिव के चरणो मे अपनी मति करने वाला इस अत्यनाषिक भीषण ससार से हे मुनि शार्दूल ! मुक्त हो जाया करता है किन्तु शिव मे मतिका होना अत्यन्त दुर्लभ है ॥२०॥ हे मुने ! इस ममार रूपी सर्प के मुख मे स्पित-डरपोक देहधारियो को उससे विमो. चन कराने वाले महादेव ही है-ऐमा श्रुति प्रतिपादन करती है ॥२१॥ भक्ति: शिवे यदि भवेन्न कस्मात्कस्यचिद्भयम् । भवार्णवं तरत्येव प्रसादात्परमेष्टिनः ॥२२ स्वर्गायिना मुमुक्ष णा ब्रह्मत्वमपि काङ् क्षिणाम् । भक्तिरेव विरूपाक्षे नान्यः पन्या इति श्रुतिः ॥२३ आदिमध्यान्तरहिते पिनाकिनि जगत्पतो। सदा मनीपिभिः कार्या भक्तिरेव हि नारद ॥२४ ब्रह्मन्नारद सम्वादादि कथन ] [४३७ सर्वमन्यत्परित्यज्य भक्तो भव हरे मुने। मुक्तो भविष्यसि क्षिप्र तस्य शंभोरनुग्रहात् ॥२५ यम्य प्रसादलेशेन ब्रह्मत्व प्राप्तवानहम् । विष्णुत्वमपि विष्णुश्च स शिव कर्न सेव्यते ॥२६ गिवे दान शिवे होमः शिवे स्नान शिवे जप । अक्षयानि फलान्पामित्याह भगवाशिव ॥२७ कुरुक्षेत्रे निवसता यत्फल नैमिषे तथा । प्रयागे च प्रभासे च गङ्गासागरसगमे ॥२८ यदि भगवान शिव मे भक्ति हो तो फिर उसको किसी से भी किसी का भय नहीं होता है और वह इस समार सागर को परमेष्ठी के प्रसाद से तैर कर पार हो ही जाया करता है ।२२। स्वर्ग का निवास चाहने वाले मुक्ति की प्राप्ति की इच्छा रखने दाने तथा ब्रह्मत्व के पद को भी चाहने वाले मनुष्या को विरुपाक्ष प्रभ मे भक्ति का करना ही परमोत्तम साधन है तथा अन्य मार्ग नहीं है-ऐसा भी श्रुति के द्वारा प्रतिपादित है ।२३। हे नारद । आदि-मध्य और अन्त से रहित जगत के पति पिनाकी मे मनीषियों को सर्वदा भक्ति ही करनी चाहिये ।२४। हे मुने । अन्य सभी साधना के समुदाय का त्याग करके भगवान हर के भक्त हो जाओ । उन परम वाणिव शाम के अनुग्रह में बढ़त शीघ्र ही मुक्ति की प्राप्ति हो जायगी ऐसे ही आप शीघ्र मुक्त हो जायगे ।२५। जिनके लेश मात्र प्रसाद मे मैंने ब्रह्मा वा पद प्राप्त कर लिया है और भगवाद विष्णु ने विष्णुत्व को प्रान दिया है । वह ऐमे दयालु शिव भगवान् पिनके द्वारा नही सेवन दिये जाते हैं अर्थात दयालु देव का कौन मेवन नहीं परेगा १२६॥ भगवान शिव ने स्वय ही अपने मुख से पहा हैं- लिजा बुध भी दान दिया जावे वह दान होम-स्नान योर जाप सब भगवान् शिव की मेवा म ममपित कर देना चाहिए। ऐमा परने पानी के फल अक्षय होते हैं ।२१ युर गेर धाम म तथा नमिप टोत्र म जो नितम करने वाले हैं उनसे जो भी पुण्य-पर मिरता है तथा ४३८ ] । सूर्य पुराण प्रयाग म-प्रभास मे और गङ्गासागर से सङ्गम स्थल में निवास से फल होता है। वह सब शिव के केवल अर्चन से ही हो जाया करता है ।२८) रद्रकोट्यां गयायो च शालिग्रामेऽमरेश्वरे। पुष्करे भारभूतेशे गोकर्णे मण्डलेश्वरे ॥२६ तत्फल दिवसेन व भवत्या भईर्चनाद्भवेत् । नास्ति लिङ्गार्चनात्पुण्यमधिक भवनमये ॥३० लिङ्ग चितेऽखिल विश्वमचित स्यान्न सशय । मायया मोहितात्मानो न जानन्ति महेश्वरम् ॥३१ अनुग्रहाद्भगवतो जानन्त्येव हि नारद । य पूजित शिव दृष्ट्वा प्रणमेद्भक्तिभावत ॥३२ पुण्डरीकस्य यज्ञस्य फल भवति निश्चितम् । ये पुन शान्तमनस शिवभक्ता जितेन्द्रिया ॥३३ मय (यम)स्य वदन तेऽपि नैव पश्यन्ति नारद । पृथिव्या यानि तीर्यानि पुण्यान्यायतनानि च ॥३४ शिवलिङ्ग वसन्त्येव तानि सर्वाणि नारद । तम्माल्लिङ्ग सदा पूज्य भक्तिभावेग नित्यश ॥३५ रद्र वोटि मे-गया मे-शालिग्राम मे--अमरेश्वर म-- -भार भूतेश मे-गोरणं : -मण्डलेश्वर म निवास में जो भी फर प्राप्त हाता है वह मम्पूर्ण प्रण्य-फा एक दिवस के ममय म ही भक्ति साय मार्ग पे अभ्यच न ही प्राप्त हो गया करता है। इन तीनो ही भवना मे भगवान शिव के लिङ्ग के अभ्यर्च न मे अधिव' पुण्य रिसी से भी नही होता हैं ।३०।एर लिग के अनंन करने मे गम्पूर्ण विश्व सम- पित हो जाया करता है - इसमे तनिक भी सराय रही है। माया से जिनकी आत्मा मोहित हैं वै महेश्वर प्रभु वो नही जानते हैं अर्थात महादेवजी के महत्व का शाम ही नहीं हुआ करता है ।३१। है नारद । यह भी भगवान के अनुग्रह होन पर मनुष्य जाना करते हैं। जो कोई “पृप्वर में ब्रह्म-नारद सम्वादादि क्यन ] [ ४३६ भगवान शिव को पूजित हुए देव लेता है और भक्ति भाव से दांत के पाचगन् उनको प्रणिपात पिया करता है उम प्राणी को प्रण्डरीक नाम वाते यह बग्ने वा पुण्य पर निश्चित रूप से प्राप्त हो जाया करता है। जो लोग शान्त मन वाले और जिनेन्दीय पुम्प गिव के भक्त होते हैं हे नारद वे भी यमरावा मुष नही देशा र रते हैं अर्थात् कर्मों के पल मे विमुक्त होकर मुक्त हो जाया करते हैं। इस पृथ्वी में जो भी तीरं हैं और पुण्य म्यान हैं हे नारद । वे शिव के निङ्ग मे निवाम पिया करते हैं । अतएव शिवलिङ्ग का सदा पूजन परला चाहिए और नित्य ही भक्ति की भावना मे करना चाहिए १३२॥३५॥ म म्नात सर्वतीर्थेषु सर्वस्मादधिकश्च स । यस्नु लिगार्चन' त्यक्त्वा देवानन्याश्च पुजयेत् ॥३६ रत्न विहाय महात्मा यथा वाचमपेक्षते । चतुर्दश्यामथाटम्बा पौर्णमाम्या तथैव च ॥३७ अमावास्या (या वा) त्रयोदश्या पूजयेदिन्दुशेखरम् । स स्नात मर्वतीर्येषु सवं यज्ञपु. दीक्षित ३८ शिवलोकमवाप्नोति देहान्ते दुर्लभ मुने । शिवाचनरतो नित्य महापातकमभवे ॥३६ दोष व्रतन लिप्येत पद्मपनमिवाम्भसा । दर्शनाच्छिवभक्ताना मकसभापणादपि ॥४० अतिरानस्य यज्ञम्य फल भवति नारद । ब्राह्मण क्षत्रिया भ्य शूद्रो वाऽन्त्यजजातिल ॥४१ शिवभक्त मदा पूज्य सर्वावस्था गतोऽपि वा। नाम्याऽचार परीक्षेत न बुल न व्रत तथा ।।४२ उसन सभी तीर्थों म सान कर लिया है और वह सबमे बधिर है। जो लिङ्ग का अर्चन त्यागकर अन्य देवी का भजन किया करता हैं उसका यह अन्य देव का अर्चन इमी प्रकार से है जैसे कोई मूढ आत्मा बराना रत्न का परित्याग करके वाच की अपेक्षा करता है। चतुर्दशी- .

४४० ]
[ सूर्य पुराण
भष्टमी-प्रमोदशी-पौर्णमासी और अमावस्या तिथिमो मे इन्दु
शेखर का अर्चन करना चाहिए। ऐसा जो करता है वह सभी तीर्थों में
स्नान कर च का हैं और मभी यज्ञो मे दीक्षित भी हो चुका है ।३६॥
३७८। हे मुने । वह प्राणी देह के अन्त होने पर सीधा शिवलोक को
प्राप्त हुआ करता है जोकि उसका प्राप्त करना अत्यन्त दुलभ होता है। शिव
के अर्चन मे रत रहने वाला पुरुप महा पातको के द्वारा होने वाले दोपो
के किये जाने पर भी जल से पद्म पत्र के ही समान लिप्त नहीं हुआ
करता है । शिव के भक्तों की भी बडी महिमा है इनके दर्शन करने से
तथा इनके साथ एक बार सम्भाषण करने से भी हे नारद । अतिरात्र
यज का फल मनुष्य प्राप्त कर लेता है। चाहे कोई ब्राह्मण हो-क्षत्रिय
-श्य-शूद्र अथवा अन्त्यज जाति मे समुत्पन्न मनुष्य हो और भले
की सभी अवस्थाआ में भी वह वर्तमान क्यो न हो यदि वह शिव का
रक्त है तो सदा ही पूज्य होता है। शिव भक्त के आचार व्रत की
और कुल की भी परीक्षा नहीं करनी चाहिए ।३६४२।
विपुण्ड्राङ्कितभालेन पूज्य एव हि नारद ।
कर्मणा मनसा वाचा यस्तु भक्तान्विनिन्दति ॥४३
निरयान्तिप्कृतिर्नास्ति तस्य मूढात्मनो मुने ।
शिवभक्तान्वर्जयित्वा सर्नेपा शासको यम ॥४४
य पुन शिवभक्ताना शिव एव न चापर ।
न शिवाथयिणो मौञ्जी न दण्डो न च कुण्डले ॥४५
नैव कापायवासासि भक्तिरेवान वारणम् ।
यदि भपता पशुपतौ पापकर्मसु ये रता ॥४६
यमस्य वदन तेऽपि नैव पश्यिन्ति नारद ।
पुन वान्तमनस शिवभक्ता जितेन्द्रिया ॥४७
मत्यंधर्म समासाद्य विजेयास्ते गणेश्वरा ।
मृतस्य जीवतो वाऽपि शिवभत्तम्य नारद ।।४६
यमाद्भय न तम्यारित राजश्चय तु मा क्या।
आश्चर्य क्षयिष्यामि मृणु नारद यापुरा ४९

[४४१ ब्रह्म-नारद सम्बादादि क्यन ] हे नारद । निपुण्ड के द्वारा अङ्कित भाल के द्वारा ही वह शिव का भक्त पूजने के ही योग्य हो जाया करता है । कम-मन और वचन से जो मनुष्य शिव भक्तो की निन्दा किया करता है हे मुने । उस मनुष्य को नरक से कभी भी निष्कृति नही हुआ करती है और वह मूढ आत्मा वाला प्राणी है । शिव के भक्तो को छोडकर ही अन्यो पर यमराज का शासन हुआ करता है ।४३४४जो शिव के भक्तों को ऐसा ही मानता है कि यह तो साक्षात् ही शिव है और अन्य कोई नहीं है। शिव के समाधय ग्रहण करने वाले पुरुष के किसी भी चिह्न की आवश्यकता नही है । न उसे मौकी होने की जरूरत है--न दण्ड और कुण्ठनो की ही उमे आवश्यकता होती है । कापात वस्त्रों के धारण करने का भी कोई आवश्यकता नही है शिव भक्त का कारण तो केवल उनके चरणो मे भवित रखना ही हुआ करता है। यदि कोई पशुपति मे मुक्ति रखता है और पापकर्मो म भी रत रहता है तो वह हे नारद । यमराज के सदन वो नही देखा करता है । जो पुम्प परमशान्त मन वाले हैं और इन्द्रियो वो जीतकर शिव के भक्त होते है उनसे साक्षान गणे- स्वर ही समझना चाहिए उन्होंने मनुष्य धर्म को देखने में ही प्राप्त कर रक्खा है । हे नारद । चाहे वह जीवित रहेगा मृत हो जावे जो शिव का भक्त है उसको यमराज का, कभी भय नहीं रहा करता है फिर साधारण राजा मे भय को तो बात ही क्या है। हे नारद । मैं एम परम आश्चर्य की बात बतलाऊ गा जो पहिले घटित हो चुकी है। उसका आप इस समय म थवण कीजिए ।४५४६॥ उज्जयिन्या नृपो ह्यासीनाम्ना सत्यध्वजो मुने । धर्मात्मा सत्यसकल्प प्रजापालनतत्पर १५०1 भुक्त्वा समस्तामवनि कालेनाथ दिव गत । वसुश्रु त इति ख्यात पुनस्तस्य महात्मन १५१॥ महाकालान्नतस्तन्निष्टस्तत्परायण । न धर्मण प्रजा शान्ति राजधर्मवहिप्पत ५२।

४४२ ] [ सूर्यपुराण असाधून्सपरित्यज्य साधून्वं हन्त्यसौ नृप । प्रजाना कुशल नास्ति सर्वन परिपन्थिन ।५३। यज्ञाश्च यज्वना दृष्ट्वा म्लेच्छा विध्यसयन्ति तान् । गते वर्षसहस्र तु राज्ये तस्मिन्वसुश्र ते ।५४ मृत्युकालोऽथ सप्राप्तो देहिनामतिभीपण । पापिष्ठ इति त मत्वा मप्राप्ता यमकिकरा १५५। शिवभक्त इति प्राप्तास्त्रिनेता शूलधारिण । शिवदूतै समानीत विमान सार्वकामिकम् ।।५६॥ हे मुने | उज्जयिनी पुरी मे एक सत्यध्वज नाम वाला राजा हुआ था। वह राजा परम धर्मात्मा था तथा सत्य सङ्कल्प पाला और अपनी प्रजा के परिपालन करने में सदा परायण रहा वरता था ।५७। उसने सम्पूर्ण भूमि के शासन करने का सुख भोगा था और जब उसका समय हो गया तो वह देवलोक को चला गया था। उस महान् आत्मा वाले नृप या पुन वसुश्रु त इस नाम से विरयात हुआ था । यह वमुथुत महाकाल के अर्चन रत तथा उमी की निष्ठा रखने वाला और उसी मे तत्पर रहा करता था। यह कभी भी अपने धर्म के अनुसार प्रजा का शामन नहीं किया करता था तथा राजा के धर्म से बहिष्कृन रहता था ।५११५२। यह नृप जो असाधु लोग थे उनको तो त्याग दिया करता था और सदा माधुओ का ही हनन किया करता था। उसके शामन काल में प्रजाओ का कुशन नही था। सभी जगहों पर परिप थी लोग थे ।५३। मेच्च लोग ऐसे बढ गये थे पि यज्ञो वो और यजन करने वालो का विधा कर दिया करते थे। उम राजा वसुयत क एक महय वर्ष राज्य शामन पर लेने पर उसने मृत्यु का काम सम्प्राप्त हो गया था जो Fि देहयारियों के किये अत्यन्त भीषण हुमा करता है । वह परमाधि पापिष्ठ है-मा मानकर यमराज वे विहर उमे यमपुरी रे जाने के लिये वही पर धाार प्राप्त हो गये थे। वह शिप का परम भत है-ऐगा ममझार शियन तीन नेत्री याने और भूत- ब्रह्म-नारद मवादादि कथन ] [ ४४३ धारी भी वहां पर समापन हो गये थे। शिप के दूनो के द्वारा सब मनोरथो से पूर्ण एर विमान वहां पर लाया गया था ५४:५५१५६। यमदूताम्त्वतिक्रा पागदण्डामिपाणय । पाहतु मुद्यता सर्वे नृप त यमविपरा ॥७॥ गणेश्वराम्नत ऋद्धा इवा तान्यमकिंकरान् । निमूग्दरेश्वर मंदाभिर्गुमलन्तथा ५८॥ ताडयित्वा भृश दूतात्यमगामनपालकान् । नीत शिवपुर दिव्य पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥५६॥ अय ते किकरा मर्वे यम गन्वेदम चन् । शृणु धर्म यथा वृत्तमोधरम्य गणेश्वर ।। सर्वानरमाम्नायित्वा नीत पापो वमुथतः ॥६०१ न यज्ञयंजते देवान्न विप्रान्नातिथीनपि । न धर्मेण प्रजा पाति क्थ शिवपुर गत्त ।६१) तत्व धर्म विजानामि धर्मदण्डधरो भवान् । नम्मालवीहि (1) भगवम्तनाऽज्ञागारिणो वयम् ॥२॥ एक तेपो वच श्रुत्वा धर्मराट् गूर्यनन्दन । वच प्रोवाच गम्भीर निरगन्यति नारद ।।

[ सूर्य पुराण
ने जो कुछ किया है उस धर्म को आप सुनिए। उन्होने हम सवको
मारपीट कर महान् पापी जी बहुश्रुत नृप था वह छीनकर ले गये हैं ।
वह तो ऐसा दुष्टालगा था कि न तो कभी यज्ञ किया करता था-न
देवो का भी भजन किया करता था- विप्रो और अतिथियो का
सत्कार करता था और धर्म के द्वारा अपनी प्रजा के जनो का भी पालन
नही किया करता था फिर भला बताइये वह शिवतोब मे कैसे चला
गया है ? ।६०११। सो आप तो धर्म को भली भांति जानते ही है
क्योकि आप तो धर्मदण्ड के धारी हैं । इससे हे भगवान्
आप हमको
वतलाइये क्योकि हम सब तो आपके ही आदेश के पालन करने वाले
रहते हैं ।६२। धर्मराज ने जो सूर्य का पुत्र था उन किङ्करो के वचत का
श्रवण करके हे नारदजी । वह किङ्करो के प्रति परम गम्भीर वचन
बोला-1६३।
देवासुरमनुष्याणा सर्वेपा प्राणिनामपि ।
शारताह नास्ति सदेह शिवभक्तमृते किल ।६४।
माहात्म्य शिवभक्ताना को वा विन्दति तत्त्वत ।
तेपा नियन्ता भगवान्महादेवो च चापर ।६५
शिवभक्ता महात्मान सदा शर्चिने रता ।
अप्याश्रमाचारहीनास्त्यजध्व तान्प्रयत्नत १६६।
वर्णाश्रमाणामाचारा अपि नेन विजिता ।
शररे यदि भक्त स्यान्न शाम्य पूज्य एव हि ।६७।
भवद्धि परिहर्तव्या शिवभक्ता प्रयत्लत ।
पापकर्मस्वपि रतारतेपामेनो न विद्यने 1६८
विभेमि शिवभक्त भ्य सिंहादिव यथा मृगा ।
श्वेतस्याहरणे पूर्वमह देवेन घातित १६॥
तत प्रभृत्य शारता तद्वत्ताना नविकरा।
यामी वमुथुतो राजा न प्रजा पारयायदि ।७०।

ब्रह्मनारद मवादादि कथन ] [ ४४५ यमराज ने कहा-में सभी देवासुर मनुष्यो का और प्राणियों का भी भारता हूँ---इसमे कुछ भी सन्देह नहीं है। किन्तु शिवभक्त को छोडकर ही मैं सवका शासक हूं 1६४। कौन पुरुप है जो भगवान शिव के भक्तो की निन्दा करने वाले हैं क्योंकि तात्त्विक रूप से उनका नियन्ता भगवान् महादेव ही होते हैं अन्य दूसरा कोई भी नहीं हैं ॥६५॥ भगवान् शिव के भक्त सदा ही शिव के अभ्यचन मे निरत रहा करते हैं। चाहे वे आश्रमो के आवार से हीन ही क्यों न होवे उनको प्रयत्न- पूर्वक त्याग दिया करो।६६। वर्षों और याप्रमो का आचार वाले ही होवे और गिवान से रहित हो तो उनको पक्ड लामा करो। यदि भगवान् शङ्कर के चरणो मे भक्ति करने वाला हो तो वह शासन करने के योग्य नहीं होता है और वह पूज्य ही हुआ करता है ।६७. आप लोगो को प्रयलपूर्वक शिव के भक्तो को परित्याग ही पर देना चाहिए। चाहे वे पापकर्मों में निरत भी क्यो न होवे विन्तु उनको पाप नही लगा करता है ।६८जैसे मृग मिह से भयभीत रहा करते हैं उसी भांति मैं गिव के भक्तो से डरता रहा करता हूँ। पूर्व मे मैं श्वेत के आहरण में देव के द्वारा पानित हो गया था। तभी से सेपर है विरो। मैं गिव भक्तो के नाम नहीं हूँ। हे पिरो । जो यह राजा बहुधन र वह यदि प्रजा का पालन नहीं भी कर रहा था तो भी मन-वाणी और गरीर से भगवान पार का भक्त या 1001 तयापि सावरे भक्तो मनोवाकायरमंमि।। प्रमादात्तस्य देवस्य पाप स्पृशति त क्यम् ७॥ सत्पश्यनि यो देव महापाल त्रिलोचनम् । सर्वपापविनिर्मुत्तो याति शंव पर पदम् ।७२। य मदायते देव महापातमीश्वरम् । गरावर म मलम्यो भवद्भिरिनि किचरा १७३१ एव यमम्प वचन थु त्वा ते (तु) यमपिपराः। तूष्णीमासाद्य ते मर्ने बभूवुविगतज्वरा, 1981 - ४४६ ] । मूर्य पुराण तरमात्पूज्यो महादेवस्तद्भक्तश्च विशेपत । भक्ताना पूजनाच्छ भु प्रीतो भवति नारद ७५१ शिवस्य नित्यतृमस्य कि नाम क्रियते जन । यत्कृत शिवभक्ताना तेन प्रीतो भवेच्छिव १७६१ देवान्सर्वान्परित्यज्य भज नारद शकरम् ॥७७।। उन देव शम्भु के प्रसाद से उसको पाप कैसे स्पर्श कर सकता है 1७१। जो एक बार भी महाकाल भगवान् शिलोचन का दर्शन कर लिया करता है यह सभी प्रकार के महापातको से विमुक्त होकर अन्त में भगवान् शिव के परम पद को प्राप्त हुआ करता है ।७। जो उस मसाकाल ईश्वद का सदा ही अभ्यर्चन किया करता है हे किंकरो। उसे आप लोग माधारण प्राणी न मानकर भगवान् शिव का गणेश्वर ही समझना चाहिए ।७३1 उन यमराज के किंकरों ने इस प्रकार के यमराज के वचन का श्रवण करके वे सब चुपचाप होकर विगत ज्वर हो गये थे।७४। इसी परण से भगवान शिव के भक्त पा सदा ही पूजन करना चाहिए और जो शिव के भक्त हो उनका विशेष रूप से अर्चन करना चाहिए। हे नारद । अपने भक्तो के पूजन से शम्भु परम प्रसन्न हुआ करते है ।७५। नित्य ही तृप्त भगवान शिव के लिये मनुष्यो के द्वारा क्या रिया जाता है। शिव ये भक्तो के लिये जो भी दिया जाता है भगवान् गिव उमी से परम प्रसन्न हुआ परते है 1७६। अतएव है नारद । अन्य सव देवो वापरित्याग करके क्बल एक भगवान् वापर का ही भजन परो १७७॥

पंचाक्षर मंत्र प्रभावादि कथन ] [ ४४७ ।। पंचाक्षर मंत्र प्रभावादि कथन ।। पञ्चाक्षरेण मन्त्रण पत्र पुप्पमयापि वा। य. प्रयच्छति गर्वाय तदनन्तफल सकृत ॥१॥ सप्तकोटिमहामन्त्राः शिवक्नाद्विनिर्गताः । पञ्चाक्षरस्य मन्त्रस्य कला नाहन्ति पोडशीम् ॥२॥ दोक्षितोऽदीक्षितो वाऽपि विधानादन्यथाऽपि वा। पञ्चाक्षर जपेद्यस्तु शिवाम्यानुचरो भवेत् ।।३।। अपिकृत्वा भ्रूणहत्या पापानि सुवहून्यपि । पञ्चाक्षरजपात्मद्यो मुच्यते नात्र सगय ।४॥ न हि पञ्चाक्षरजपाछु योऽस्ति भुवनत्रये । एव ज्ञात्वा जपेद्विद्वान्विद्या पञ्चाक्षरी शुभाम् ।।५।। पञ्चाक्षरेण मन्त्रेण बिल्वपत्र. शिवाचनम् । करोति श्रद्धया यस्तु म गच्छेदश्वर पदम् ॥६॥ दर्शनाद्विल्पवृक्षम्य म्पर्शनाद्वन्दनादपि । अहोराकृत पाप नश्यते ऋपिमत्तम ॥७॥ श्री ब्रह्माजी ने पहा-पाच अक्षरो के मन्त्र से अर्थात "ॐ नमः शिवाय" '-- इग मन्त्र के द्वारा जो योई पत्र-पुप्प और जल का समर्पण भगवान् गिर के लिये किया करता है उम एक बार के करने ही मे उमा अनन पत हुआ करता है ।११ भरमा गिय के मुपारविन्द में गात करोड मन्त्र पिनिगन हुए थे किन्तु वे मभी मन्त्र मितार भी इम प चाभरी मन्त्र की मोलवी यता रे ममान भी नहीं होने हैं। विधान मे दा हो अथवा अदीक्षित हो चंगा भी क्यों नही जो प्राणी इम पाक्षरो वा मन्त्र का जाप frपा मरना वर अश्य ही निय या अनुपर हो जाया पता है ।३। भ्रूण हत्या परी भी तपा बदन में मार लामा को भी करके भी इस सोच प्रागे वाले मन्त्र को पता है उस गाा गे तुम्न ही गुम हो जाया परसा:-गमे तुर

४४८ ]
[ सूर्यपुराण
लेश मात्र भी सन्देह नही है ।४। इन तीनों भवनों मे इस पांच अक्षरों
वाले मन्त्र से अधिक कुछ भी श्रेय नही है । इस प्रकार से समझ कर
ही विद्वान पुरुष को इस परम शुभा पञ्चाक्षरी विद्या का जाप करना
चाहिए ।५। इस पञ्चाक्षरी मन्त्र के द्वारा विल्व के पत्रो से जो भगवान
शिव का समचंन किया करता है और परम श्रद्धा की तो भावना से जो
करता है वह ईश्वरीय पद को प्राप्त किया करता है । हे ऋषि
सनाम ! विल्व वृक्ष की बडो महिमा है क्यो कि यह भगवान् शिव का
परम प्रिय वृक्ष है । इसके दर्शन से-इसके स्पश करने से और इसकी
वन्दना करने से भी एक अहोरात्र का किया हुआ पाप नष्ट हो जाया
करता है ।
अन्तकाले नरो यस्तु बिल्वमूलस्य मृत्तिकाम् ।
आलिम्पेत्सर्वगात्राणि मृतो याति परा गतिम् ॥८
विल्ववृक्ष समाश्रित्य द्वादशाहमभोजनम् ।
यः कुर्याद्धृणहा पापान्मुक्तो भवति नारद ।।
बिल्ववृक्ष समाश्रित्य त्रिरायोपोपितः शुचिः ।
हरनाम जपल्लक्ष भ्रूणहत्या व्यपोहति ।।१०
विल्वपत्रंश्च खण्डेश्च पूजयेदिन्दुशेखरम् ।
माघे कृष्णचतुर्दश्या पूजयेदिन्दुशेखरम् ॥११
भक्त्या बिल्वदल मौनी हरनाम जपग्निशि ।
सर्वपापविनिमुक्तो याति शैवं परं पदम् । १२
शुप्कैः पयुपित. पत्ररपि बिल्वस्य नारद ।
पूजयैदिरिजानाथं गुच्यते सर्वपातक. 11१३
अध्यं पुष्पफलोपेत यः शिवाय निवेदयेत् ।
युगानामयुत सान शिवलोके वसेन्नरः ॥१४
जो मनुष्य अन्त काल में बिल्व वृक्ष के मूल की मृत्तिा से अपने
समस्त अङ्गो पा विलेपन दिया करता है यह मृत होकर परागति को
प्राप्त किया करता है । वित्त वृक्ष को समाश्रय करके जो दादा

पचाक्षर मंत्र प्रनावादि कथन ] दिन तक भोजन नहीं किया करता है हे नारद । वह भ्रूणहा पाप से मुक्त हो जाया करता है | दिल्व वृक्ष का समाधय ग्रहण करके जो तीन रात्रि पर्यन्त शुचि होकर उपवास क्यिा करता है और एक लक्ष भग- वान हर के नाम का जाप किया करता है वह भ्रूण हत्या के पाप को विनष्ट कर दिया करता है ॥१०॥ विल्वपनो से तथा उनके खण्डो से इन्दुशेखर भगवान शिव का माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी मे पूजन करना चाहिए ॥११॥ भक्ति की भावना से विल्व दलो के द्वारा मौनी होकर रात्रि में हर का नाम का जाप करना चाहिए । वह समस्त पापो से निर्मुक्त होकर अन्तकाल म भगवान शिव के परमपद को प्राप्त हो जाया ररता है ॥१२॥ हे नारद । गुष्प, पयुं पित विन्द के पत्रो से भी यदि गिरिजा के नाथ का पूजन किया करता है तो मनुष्य सभी पात से मुक्त हो जाया करता है ।।१३।। पुष्प योर फलो से युक्त अध्यं वो जो भगवान शिव के लिये निवेदित किया करता है वह मनुष्य डेढ अयुन युगो तब शिवलोक में निवास किया करता है ||१४|| माप क्षीर कुशाग्राणि सघृत दधि तण्डुला । तिलश्च सपप साधमोन्टाङ्ग इति स्मृत ।१५ फ्लकोटि मुवर्णस्य यो दद्योदे दपारगे। शिवाय वितकामात्र प्रस्त्वा (?) वाऽधिक भवेत् ॥१६ तस्मात्पत्र फ्ल. पुष्पस्तीयैरपि यजेच्छिवम् । तदनन्तफल प्रोक्त भक्तिरेनात्र कारणम् ।।१७ लिङ्गस्य लेपन कुदिन्यगन्ध मनोरमै । वोटिशत दिव्य गिलोरे महीयते ॥१८ सुगन्धालेपनात्पुष्प द्विगुण चन्दनस्य तु । चन्दनाच्चागराय पुण्यमष्टगुणाधिकम् कृण्णागरोवियोपेण द्विगुण फलमिप्यते । तस्माच्छनगुण पुण्य मुडमस्य विधीयते॥२. चन्दनागर रैनाभिरोचनाम। लिगमेतः समालिप्य गाणपत्यमनाप्नयात " ४५० ] । सूर्य पुराण जल, दूध, कुशा के अग्रमाग, घृत, दघि चावल, तिल, सरसो इन सबका अन्यं आठ अङ्गो वाला होता है-ऐसा कहा गया है ।।१५। जो मनुष्य सुवर्ण की पलकोटि को किसी वेदो के पारगामी को देता है । शिव के लिये एक रत्तीमात्र ही अथवा अधिक दिया करता है ॥१६॥ इस कारण से पत्र, फल, पुष्प और जल से ही भगवान शिव का भजन करना चाहिये । उसका अनन्त फत बतलाया गया है किन्तु इसमे भी एकमात्र भक्ति ही कारण होता है ।।१७॥ भगवान के लिङ्ग का लेपन दिव्य गन्धो से जो बहुत ही मनोरम हो करना चाहिए। वह मनुष्य जो ऐसा किया करता है सौ करोड दिव्य वर्षों तक शिवलोक में प्रति- वित हुआ करता है ॥१८॥ चन्दन के लेपन से सुगन्धित पदार्थ के लेपन से द्विगुण पुन्य हुआ करता है। चन्दन से भी आठ गुना अधिक पुण्य अगरु के लेपन से हुआ करता है-ऐसा ही जानना चाहिए ॥१६॥ जो कपण अगर होता है उसके लेपन से विशेष रूप से दुगुना फल हुआ करता है। उसस भी सौगुना फल पुण्य कु कुम का होता है ॥२०॥ चन्दन, अगरु, कपूर, नाभिरोचन, कुमकुम इन सबके द्वारा शिव लिङ्ग का विलेपन करके मनुष्य गाणपत्य पद की प्राप्ति किया करता है ।।२१। सवीज्य तालवृन्तेन लिङ्ग गन्धः सुलोपितम् । दशवर्षसहस्राणि शिवलोके महीयते ॥२२ मयूरव्यजन दद्याच्छिवायातीव शोभनम् । चकोटिशत दिव्य शिवलोके महीयते ॥३३ चामर यः शिवे दद्याम्मणिरत्नविभूपितम् । हेमरूप्यादिदण्ड वा तम्य पूणफल शृणु।।२४ चामरासक्तहस्ताभिदिव्यस्त्रीपरिवारित. । विमान परमारुह्य गणेर्यानि शिव पदम् ॥२५ अरण्यराभव: पुणः परमिरिशमः । अपयुपितनिधिहररक्तजन्तुवजितः ॥२६ पचाक्षर मत्र प्रभावादि कयन ] [ ४५१ आत्मारामोद्ववापि पुष्पं. सपूजयैच्छिवम् । पुप्पजातिविशेषेण भवेत्पुण्यमयोत्तरम् ॥२७ तप.शीलगुणाढयाय वेदवेदाङ्गामिने । दश दत्वा सुवर्णस्य फल हि तदवाप्नुयात् ||२८ तालवृन्त से सवीजन को शिव भगवान के लिङ्गको गन्ध वाले पदार्थों से लेपन करे ऐसा परने से मनुष्य दस महस्र वर्ष पर्यन्त शिव लोक मे प्रतिष्ठा प्राप्त किया करता है ॥२२॥ मयूर या व्यजन शिव के लिये देना चाहिये यह अतीव शोभन हुआ करता है। वह मनुष्य सौ करोड वर्ष तक जोशि दिव्य वर्ष होते हैं शिवलोक में प्रतिष्ठित रहा करता है ।।२३।। जो कोई शिव का भक्त मणि और रस्नो से विभूषित चमर उन पर दुलाया करता है जिसका दण्ड हेमया रूप्य आदि वा हो उसका जो पुण्य-फन होना है उसे भी सुन लो ॥२४॥ चमरो मे समा. सक्त हापों वाली दिव्य स्त्रियों के द्वारा परिवारित होता हुआ गोरे साय परम अंध विमान पर समारूढ होकर वह मनुष्य अन्त मे भगवान शिव के पद को प्राप्त पिया परता है ।।२५।। जमलो में समुत्पन्न पुष्पो से, पत्री मे जो पर्वती में समुत्तम हुए हो और ये यायु पित, निरिधर अरक्त और जन्तुओ से यजित होने चाहिए अपवा आरमारामोद्भप हो अर्थात् अपने बाग में पैदा हुए हो ऐमे पुप्रो मे भगवान शिव का पूजन करना पाहिए । पुष जाति विशेष में उत्तर पुग्म होता है। तपः गोल और गपाड्य तथा वेद पेदाङ्गो का शान ब्रह्मा के लिये दा गुवर्ष ने फर दान देवर यही पुध पर प्राय होता है ।।२६-२८॥ अकंप. ना पूगा यदि देयाय गंभवे । वयंपुप्पमहान्य करवीर प्रशस्यते ॥२६ फरवीरमरन्यो विन्यपत्र विशिष्यते । विन्यपनमयेभ्यः शमीपत्र विशिष्यते ॥३० पुणगरा, मीण गिनिध्यने । शमोपुष्पमय म्या युगात रिभिरते । ३१ ४५२ ] [ सूर्य पुराण पुशपुष्पजहस्रन्योः पापुष्पं विशिष्यते । मपुपमहमेभ्यो वकपुप्पं विशिष्यते ॥३२ वकपुष्पमहान्यो एक धत्त रकं तथा । धत रयामहले यो वृहत्पुष्प विशिष्यते ॥३३ वृहत्पुप्पमहलेभ्यो द्रोणपुष्प विशिष्यते। द्रोणपुप्पसहनेभ्यः (म्यो ह्य)पामार्ग विशिष्यते ॥३४ अपामागंसहस्रेण श्रीमन्नीलोत्पल वरम् । नोलोलालसहर्ष म्यः यो मालां संप्रयच्छति ॥३५ भार के पुप्पो से देय सम्भु के लिये की हुई पूजा यदि होरे तो उत्तम होती है योर परवीर पुष्प एक सहय भाग के पुप्पी से भी प्रशस्त मानी गयी है ॥२६॥ एा सहरा परवीर के पुषी से भी अधिक प्रास्त दिल्यपर माना गया है। एक गहन विल्व पत्रों में भी प्रभात दामो माने गए हैं। एक दमो के पुजी से की अपित प्रगस्त मुग पे पुष्प माने गये हैं युवा फे सह्य पुप्पो से अधिर प्रारत पप पुष्प नि और परे महल पुप्पो में अधिर प्रसन्न या पुष्प गाने गये RIPT महल यर गो गे भी अपिर प्रशस्त पारे पे पुन माने गये पर ये गाय गुणों से भी अधिक प्रगरत यहाण माना गया है। तुम महार गे अपिर प्रशस्त टोग पुप होता है और रा दोष पुषी अपि प्रगामारामार्ग पाप माना गया है । अपामार्ग रेमो पिर प्राप्त धीमन्नीलाल होगा। नोमोगर गरमपुरो रो भी प्रापिर प्राय: मेर माना समय पता है 10-11 निगम शिपियनया माप पफामा। परमहनिया गंगकारं श्रीनागपगार मागीरगमामा माती निमारा समागमगिय ममममम् । मामगागा पा रकमाता र

पचाक्षर मत्र प्रभावादि कथन ।
[ ४५३
बन्धक रेतकोपुष्प कुन्दयूथोमदन्तिका.।
शिरीप चार्जुन पुष्प प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥३६
कनवानि कदम्बानि राम्रो देयानि सकरे।
दिवा शेपाणि पुष्पाणि दिवा रात्रौ च मल्लिका १४०
प्रहर तिष्ठते जाती करवीरमहनिशम् ।
केश कीटापविद्धानि शीपर्यु पितानि च ॥४१
स्वय पतितपुप्पाणि त्यजेदुपहतानि च ।
मुकुल नाचयेदीश यस्य कस्यापि नारद ॥४२
भगवान् शिव के लिये भक्ति से विधिपूर्व जो अर्पण करता है
उसका पुण्य फर श्रवण कीजिए। एक सहस रोड पल्लो तक और सो
करोड पल पनि वह धीमान् शिव के तुल्प पराक्रम वाना होरर
शिवपुर म निवास पिया करता है। करवीर के ही समान जाती और
विजय पाटला या समझना चाहिए ॥३६॥३७॥ श्वेतमन्दार का मुम
और सित पर भी उसी के समान होता है। नाग, चम्बा और पुप्राग
धतूरे पे पुष्प वे ही तुल्य माने गये हैं ॥८॥ शिव के समर्थन में
प्रयतपूर्व यन्पूर पुष्प, वेतरी पुष्प, युन्द, यूपिका, मदनिका, शिगेर
और अर्जुन रे पुप्पो वा यजित रपना नाहिए। अर्थात् इन उपयुक्त
वृक्ष एव लताओ के पुष्प गिर के मजन म ग्रहण नहीं करने चाहिए
||३६॥ पनर और पदर के पुर पहर के कार रात्रि म ही देने
पाहिए । शेष पुष्पो दो दिन में अग्नि कर नया मस्निया में पुप दिन
में और रात्रि में दो म ही अपित जिजा मरते है । जानी पाप
एक ही प्रहर पर टहरता है और परवीर का पुल बहनिय नाग
परता है । जो परदेस और योगे से यपनिद हाँ, गोवं हो, पनि
हो तपा मय ही गिरे हुए हो एवं उपहन दा उनमा रयाग का दना
पाहिए प्रति ऐरो पुतों में पूजन नही पर। हे नारद । मस्तिो
भी से मुरली से अरनिया में कभी भी नियमा सयंत नहीं
परला पादित॥४.४२॥

४५४ ]
[ सूर्यपुराण
कलिकन येद्देव चम्पकर्जलजैविना ।
न पपितदोपोऽरस्ति जलजोहालचमकं ॥४३
पुप्पाणामप्यलाभे तु पनाण्यपि निवेदयेत् ।
फलानामप्यलाभे तु तृणगुल्मोषधरपि ॥४४
औषधानामभावे तु भक्त्या भवति पूजित.।
बिल्वपत्र रखण्डस्तु सकृत्पूजयते शिवम् ॥४५
सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोके महीयते ।
धत्त रकैस्तु या लिङ्ग सकृत्पूजयते नरः ।।४६
गोलक्षस्य फल प्राप्य शिवलोके महीयते ।
बृहतीकुसुमैर्भक्त्या यो लिग सकृदर्चयेत् ॥४७
गवामयतदानस्य फल प्राप्न शिव प्रजेत् ।
मलिकोत्पलपुष्पाणि नागपु नागचम्पकै ॥४८
अशोकश्वेतमन्दारकणिकारबकानि च ।
करवीरार्कमन्दारशमीतगरकेमरम् ॥४६
कुशापामार्गकुमुदकदम्बकुरवैरपि ।
पुप्परेतयंथालाभ यो नर पूजयेच्छिवम् ॥
स परफलमवाप्नोति तदेकानमना शृणु ५०
चम्पक और जलज के पिता वलियो से कभी भूलकर भी देव की
अर्चना नहीं करनी चाहिये । जलज, उत्पल और चम्पको में पभी पयु-
पिरा होने का दोष नही हुआ करता है ॥४३॥ यदि पुष्पो वा लाभ
नही तो ऐसी दशा मे पत्रो पो ही भगवान को निवेदित पर देवे ।
पनी के लाग न होने पर भी तुण, गुल्म और औषधियो रो समर्थन परे
और औषधो के भी अभाव में भक्ति से हो शिव पूजित हो जाया करने
हैं । असण्ड दिल्य पत्रो से एक बार ही शिव का पूजन करना चाहिये।
वह आदमी गब पापो से विशेष सर मे निमुक्त होकर रसोग में
प्रतिष्ठा प्राप्त रिया परता है। जो मनुष्य एक बार लिङ्ग यी पूजा
पतूरे पुषी प्रौर पनी से रिया यरता है पर ए लारा गौओ के दान

पचाक्षर मन प्रभावादि कथन ]
का फल प्राप्त करके शिवलोक में ही प्रतिष्ठिन हुआ करता है । जो कोई
मनुप्य भक्ति से वृहती के पुप्पो के द्वारा एकवार शिवलिङ्ग की पूजा
करता है वह अयुत गौओ के दान कर फल प्राप्त करके शिव की
सनिधि म प्राप्त हुआ करता है । जो मनुष्य, मल्लिका, उत्पल, नाग,
पुनाग, चम्पक, अशोक, श्वेत मन्दार, शमी, तगर, केसर, कणिकाट,
वक, करवीर, अर्क, बुश अपामार्ग, कुमुद, कदम्ब कुरव इन पुष्पो से
जो भी यथा ममय प्राप्त होवें उनसे भगवान् शिव का जो मनुष्य पूजन
किया करता है उसको जो भी पुण्य प्राप्त होता उसो एकाग्न मन
वाला होकर श्रवण करो ।।१४-५०।।
सूर्यकोटिप्रनीका विमान सार्वकामिकं ॥५१
पुष्पमालापरिक्षिप्तीतवादिवनि स्वनै ।
तन्त्रीमधुरनादैश्च स्वच्छन्दगमनस्तथा ॥५२
रुद्रक-यासमाकीर्णं समन्तादुशोभित ।
दाधूयमानश्चमर शिवलोके महीयन ॥५३
अनेकाकारविन्यास कुमुदैश्च शिव गृहम् ।
य कुर्यात्पर्वकालेषु विचित्रवुमुमोज्ज्वलम् ।।५४
स पुष्पकविमानेन सहस्त्रपरिवारित ।
दिव्यस्त्रीमुषसौभाग्यकोडारतिमन्वित ॥५५
अक्षयाल्लभते लोकानतिरस्कृतशासन ।
शिवादिसर्वलोकेषु योष्ट तत्र याति स ॥५६
सब कामनाआ को पूर्ण करने वाले और करोड मूर्यों के समान
दीप्यमान विमाना के द्वारा जादि पुष्पा को मालाओं से परिक्षिप्त होने
हैं तया गीत-वाहित्रा पो ध्वनि से परिपूर्ण होते हैं एव तत्री के मधुर
मादा से युक्त होते हैं और स्वन्दर गमन करने वाले हैं। द्रिा की
पन्यामा से समारीगं और चारो ओर मे मुगोभित विमान होते हैं-
उनकार मार दुनाये जाया करते हैं ऐसे विमानों से वे निवार
गमन कर,
शिव मोरको गमन किया करते हैं और वहां पर युतिशित

४५६ ] { सूर्य पुराण रहते हैं । जो अनेक आकार वाले विन्यासो से और कुमुदो मे पर्वकालो में भगवान् शिव के आयतन को विचित्र कुसुमा से उज्ज्वल क्यिा करता है वह पुष्पक विमान के द्वारा महस्रो मे परिवरित होकर दिव्य स्त्रियो सुख सौभाग्य को क्रीडा रति स मयुत होता हुआ अक्षय लोको को प्राप्त किया करता है और उसका शासन वही पर भी तिरस्कृत नहीं होता है । वह शिवादि समस्त लोको मे अपनी इच्छा के अनुसार ही गमन किया करता है ।।५१-५६॥ पूजादिभक्ति विन्यासैरर्चनादिषु सर्वत । फलमेक सम ज्ञेय फल वित्तानुसारत. ॥५७ स्वयमुत्पाद्य पुष्पाणि य स्वय पूजयेच्छिवम् । तानि साक्षात्प्रगृह्वाति देवदेवो महेश्वर ॥५८ कृष्णागरो सवपूरघुप दद्याच्छिवाय वै। नरन्तर्येण मासाधं तस्य पुण्यफल शृणु ॥५६ कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च । भुक्त्वा शिवपुरे भोगास्तदन्ते पृथिवीपति ॥६० गुग्गुल घृतसयुक्त साक्षाद्गह्वानि शकरः मासाधं धूपदानेन शिवलोके महीयते ॥६१ कृष्णपक्ष चतुर्दश्या य माज्य गुग्गुल दहेत् । स याति परम स्थान यत्र देव पिनावत् ॥६२ श्रीफल चाऽऽज्यसमिथ दत्त्वा नाति परा गतिम् । एभि सुगन्धितो धूप पट् सहस्रगुणोत्तरः ॥६३ यस्त्वर्करापुटे कृत्वा मधु चाघस्य मन्त्रत । निवेदयति शर्वाय सोज्वमेघफल लभेत् ।।६४ पूजा आदि-भक्ति विन्यासो के द्वारा अर्चना आदि मे सब ओर से सवका समान पा ही फल होता है-ऐमा रामा लेना चाहिए। पत वित्त में ही अनुमार हुआ करता है ॥५७॥ जो स्वप पुमो वा उत्पादन पर और स्वय हो भगवान शिव का या किया करता है उनक पंचाक्षर मंत्र प्रभावादि कथन ] [ ४५७ साक्षात् देवी के भी देव महेश्वर ग्रहण किया करते हैं .५८॥ शिव के लिये कपूर के साथ कृष्ण अगरु को धूप देनी चाहिये । इस तरह निर- न्तरता से जो एक मास के अर्घभाग तक किया करता है उसका जो पुण्य-फल होता है उसे भी सुनलो ॥५६॥ एक महत और सौ करोड कल्पो तक दिव्य भोगो का शिव के पुर मे उपभोग करके उसके अन्त में वहां मसार मे आकर पृपिवी पनि राजा होता है ॥६०॥ पृत से सयुक्त गूगल की धूपको भगवान शङ्कर साक्षात् ही ग्रहण किया करते हैं मास के अर्थ भाग तक ऐमा करने से अर्थात् धूपदान से मनुप्य शिवलोक में प्रतिष्ठित हुआ करता है ॥६१॥ मास के कृष्ण पक्ष मे चतुर्दगी तिथि मे धुन के सहित गूगल का दाह करना चाहिए। वह मनुछ। उमी परम स्थान को चला जाया करता है जहां पर पिनाकधारी देव विराजमान रहते है ॥६२॥ घृन से मिश्रित श्रीफन को समर्पित करके मनुष्य पगगति को प्राप्त हुआ करता है । इन पदार्थों से सुगन्धित धूप छ सहर उत्तर गुणो वाली होती है ॥६३॥ जो आदमी आक के पर का सम्मुट बनाकर मन्त्र के द्वारा अर्पना मधु शिव को निवेदित प्रिया करता है वह अश्वमेध यज्ञ के यजन करने का फल प्राप्त कर लिया करता है ।।६४॥ शालितण्डुलप्रस्न कुदिन सुसम्पृतम् । शिवाय तच्चरु दत्वा चतुर्दश्या विशेषतः ॥६५ यावन्तस्तण्डुलास्तस्मिन्नैवेद्य परिसम्यया। तावद्धपंसहस्राणि मित्रलोके महीयते ॥६६ गुडसण्डघृताना न भक्ष्याणा च निवेदनात् । घृतेन पाचिताना तु दत्त्वा शतगुण भवेत् । ६५ घृतदीपप्रदानेन शिवाय शनयोजनम् । विमान लभते दिव्य मूर्यकोटिसमप्रभम् ॥६७ यः बुर्याकातिके मामि शोभना दीपमालिकाम् । घृतेन च चतुर्दश्याममावास्या (यां वा) विशेषतः ॥१६

४५८ ]
[ सूर्यपुराण
सूर्यायुतप्रतीकाशस्तेजसा भासयन्दिश ।
तेजोराशिविमानस्थ मूर्यवद्द्योतते सदा ॥७०
शिरसा धारयेद्दीप सर्वराच्या विशेषतः ।
ललाटे वाध्य हस्ताभ्या शिरसा वाऽथ नारद ।।७१
मर्यायुतप्रतीकाशैविमान सार्वकामिकै. ।
कल्पायुतशत दिव्य शिवलोके महीयते ॥७२
शालि-तण्डुल प्रस्थ से अन्न को सुसस्कृत करना चाहिए। उसका
चरु भगवान् शिव के लिये विशेष रूप से चतुर्दशी मे देवे । उस नैवेय
मे परिसख्या मे जितने भी चावल होगे उतने ही सहस्र वर्षों तक वह
शिव लोक मे प्रतिष्ठित रहा करता है ॥६५॥६६॥ गुड, खांड और
धृतो के भक्ष्य पदार्थों के निवेदन करने से जो केवल धृ। मे पाचित
पदार्थ है उनको समर्पित करके सौगुना पुण्य फल प्राप्त किया करता
है ।।६७॥ भगवान् शिवजी की सेवा मे चुत के दीपक दान से शतयोजन
वाला विमान प्राप्त करता है जो परम दिव्य और करोड मूर्यों के समान
दीप्ति वाला होता है । ६८॥ जो आदमी कात्तिक मास मे परम शोभन
दीपो की मालिया किया करता है। चतुर्दशी में घृत से दीपक जलाता
है तथा विशेष रूप से अमावस्या मे दीप दान करता है वह अयुत सूर्यो
के प्रतिकाश वाले विमानो के द्वारा जिनमे सभी कामनाओ की पूति
के माधन विद्यमान ये गमन किया करते हैं और सो अयुत पल्पो तक
दिव्य शिव लोक मे प्रतिष्ठित हुमा करते हैं ।।६६-७२॥
शिवस्य पुरतो दत्त्वा दपंण च सुनिर्मलम् ।
चन्द्राशुनिमलः श्रीमान्सुभग. कामरूप धत् ।।७३
कल्पयुतसहस्र तु शिवलोके महीयते ।
वृत्वा प्रदक्षिण भक्त्या शिवस्याश्यतन नरः ।।७४
अश्वमेघसहस्रस्य फलमाप्नोति नारद ।
यूनारामप्राांस्तु शिवागतनकमणि ॥७५

पंचाक्षर मय प्रमावादि कयन ]
[ ४५६
उपयुक्तानि भूतानि खननोत्पातनादिषु ।
कामतोऽकामतो वाऽपि स्यावराणि चगणि च ।।७६
शिव यान्ति न सदेह प्रसादात्परमेष्टिन ।
क्रोशमान शिवक्षेत्र समन्तात्परमेछिन ॥७७
भगवान शिव के धागे मुनिर्मल दर्पण को समर्पित करके जो अर्चन
करता है यह स्वय चन्द्र पिरण समान निर्मल होकर कामदेव के
सुल्य सुन्दर स्वरूप को धारण करने वाला धीमान् मुभग सहस्र आयुत
कल्प पय्यंन्त शिव लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त किया करता है । मनुष्य भक्ति
भावना से सिर के बायतन की प्रदक्षिणा करके हे नारद ! एक सहस्त्र
अश्वमेघ यज्ञो के यजन करने का पुण्य-पल प्राप्त किया करता है।
निव के आयतन कर्म में कूप-आराम और प्ररा (प्याज) आदि से खनन
और उरातन आदि में जो भूत उपयुक्त होते हैं, चाहे इच्छा मे और
भले ही बिना ही इच्दा के स्थावर और घर मव परमेधी के प्रसाद से
शिवकी सनिधि को प्राप्त दिया करते हैं---इसमे लेगमात्र को मन्देह
नही है । परमेष्ठी प्रभु के ममी और एक वोग भर तर सरकार
होता है । तात्पर्य यह है कि शिवालय के चारो ओर एक कोश ता शिव
या हो धोत्र माना जाता है ।।७३-७७॥
देहिना तय पञ्चव शिवमायुज्यतरणम् ।
मनुष्यस्थापित लिने क्षेत्रमानमिद स्मृतम् ।।७८
स्थायभुवे योजनं स्पादाप चंद तदधाम् ।
पापाचारोऽपि यस्ता पञ्चय याति नारद ॥
गोऽपि यानि शिवस्थान यद्देवैरपि दुर्लभम् ।
तम्मात्मर्यप्रयत्लन ताम्नानादिर चरेत् ।।८०
तम्मादावसय र्याच्छिाक्षेत्रममीपत.।
शिवलिङ्गसमीपस्य यत्तीय पुरत स्थितम् ॥१
शिवगानि म य तर म्नानादिना प्रजेन् ।
प पुर्यादीमा वापि धूप वाणिशिमे ।।
विमानमयुरा गिलोर महो।

४६० ] [ सूर्य पुराण इस शिव के क्षेत्र मे देहधारियो को मृत्यु यदि हो जाती है तो वह शिव के सायुज्य प्राप्त कराने का कारण हुआ करता है। मनुष्य के द्वारा स्थापित किये हुए शिव लिङ्ग का यह क्षेत्रमात्र बताया गया है। स्वायम्भुव में एक योजन ( योजन ४ कोस का होता है ) और ऋषियो के द्वारा यदि स्थापित शिव लिङ्ग हो तो उनका क्षेत्र स्वायम्भुव से आपा हुआ करता है । हे नारद । कैसा ही पाप पूर्ण आचार वाला भी कोई वहाँ पर मृन हो जाये तो वह भी शिव के स्थान को गमन किया करता है जो कि देवो के द्वारा भी प्राप्त करना अत्यन्त दुर्लभ हुआ करता है । इसीलिये सभी प्रयत्नो से वहाँ पर स्नान आदि करना चाहिये और इसी कारण मे शिव के क्षेत्र के समीप ही अपना निवास रखना चाहिये । शिव के लिङ्ग के समीप मे जो जल आगे स्थित है वह शिवगड़ा इस सज्ञा वाली है। वहां पर स्नानादि करके ही गमन करे । जो कोई शिवाश्रय मे कुआ या दीपिका (बावडी) बनवाता है वह अपने इक्कीस कुलों के महित शिवलोक में प्रतिष्ठित हुआ करता है ॥७८-८२॥ ॥ शिवार्चन माहत्म्यादि कथन । पुप्पं वा यदि वा पत्रसकृलिङ्ग समर्पितम् । तदनन्तफल प्रोक्त हेतुभवति मुक्तये ॥१ तुष्टे शिवे पदार्थः को दुर्लभो हि नृणा प्रभो । तस्मात्सर्वप्रयलेन शिवधीत्यर्थमाचरेत् ।।२ तावदातु शिवः शक्तस्तावञ्चिन्तयितु प्रभुः । तत्सर्वन नर सोन्यं शिवप्रीत्यर्थमाचरेत् ॥३ ऋद्धिसिद्धो न दूरस्थ शिवप्रीत्यर्थकर्मणाम् । नराणां नरनाये कि प्रीते तु दुर्लभं भवेद !

४६२]
। सूर्य पुराण
शिरसा शिवनिर्माल्य भक्त्या यो धारयिष्यति ।
अशु चिभिन्नमर्यादः सर्वावस्था गतोऽपि वा IRE
स्वरी चैवाप्रयुक्तात्मा नियमैश्च बहिष्कृतः ।
तस्य पापानि नश्यन्ति नात्र कार्या विचारणा॥१०
मोहान्न धारयेच्छंभोनिर्माल्य न च भक्षयेत् ।
न स्पृशेदपि पादेन लङययेन्नापि नारद ॥११
निर्माल्यलडघनाच्छंभोश्चाण्डाल. सोभिजायते ।
पृथूदक महत्तीर्थ गङ्गा च यमुना तथा ॥१२
नर्मदा सरयू. क्षिप्रा तथा गोदावरी नदी।
सदा सनिहितास्त्वेवं शभोः स्नानोदके मुने ||१३
शंभोः स्नानोदकं सेव्य सर्वतीर्थमयं हि तन् ।
धारणात्पापसंघातस्तत्क्षणादेव मुच्यते ॥१४
पार्वती पति के निर्माल्य को जो भक्ति भाव से शिर पर धारण
भरता है वह राजसूय यज्ञ के भजन करने का ही उत्तग पुण्य फल प्राप्त
कर लेता है।८। शिर से भक्ति भावना के साथ जो शिव के निर्माल्प
को धारण करेगा चाहे वह अशुचि हो अथवा मर्यादा का भेदन करने
बाला सभी अवस्थाओ मे रहने वाला भी क्यो न हो । स्वरता रो समा-
चरण करने वाला-अप्रयुक्त आत्मा वाला और नियमो से बहिष्कृत हो
उसके सभी पाप विनिष्ट हो जाया करते हैं-इसमे कुछ भी विचार
करने की आवश्यक्ता ही नहीं है ।।१०। जो मोह से शिव के निर्माल्य
वो धारण नहीं किया करता है अथवा उसका भक्षण नहीं करता है । हे
नारद उस शिव निर्माल्य कोपर से कभी स्पर्श नही बरे और न उसया
कभी उल्लवन ही करना चाहिए।११। गम्भ के निर्माल्य के समन करने
से वह मनुष्य चाण्डाल होकर उत्पन्न हुआ करता है। हे मुने ! पृधू-
दक यह तीर्य-गङ्गा-यमुना-नर्मदा-सरयूक्षिप्रा तथा गोदावरी नदी दाम्भ.
के स्नानोदय ने सदा सन्निहित रहा बरती हैं।१२।१३। शम्भु
जल सदा ही सेवन करना चाहिए योनि वह सभी तीरे से परिपूर्ण
में स्नान

शिवार्चन माहात्म्यादि क्थन ]
हैं । उसके केवल धारण करने ही से समस्त पापो के सघाती से मनुष्य
उसी क्षण मे युक्त हो जाया करता है ।१४१
लिङ्ग स्वायंभुवे वारगे रत्नजे रसनिमिते ।
सिद्धप्रतिष्ठित लिङ्गन चण्डोऽधिकृतो भवेत् ॥१५
पादोदक च निर्मात्य भक्त धार्य प्रयत्नत ।
न तान्म्पृशन्ति पापानि मनोवाकायजान्यपि ॥१६
किं लिङ्ग प्रोच्यते तात केन वा तदधिष्ठितम् ।
भगवन्ब्रूहि मे सर्वमाश्चर्य ह्य तदुत्तमम् ।१७
अव्यक्त लिङ्गमित्युक्तमानन्द तमस परम् ।
महादेवस्य यत्नेन लिङ्गी स्यात्तेन शकर (१८
एकाणचे पुरा धोरे नष्टे म्यावरजङ्गमे ।
मम विष्णो प्रवौधार्यमाविर्भूत शिवात्मकम् ॥१६
सदाप्रभृत्यह विष्णुभक्त्या परमया मुदा ।
लिङ्गमूर्तिधर शान्त पूजयावो वृपध्वजम् ।।२०
स्वायम्भव लिङ्ग मे~वाण मे-रलो से निर्मित मे-रस के
द्वारा (पारे से) निर्मित मे-मिद्धो के द्वारा प्रतिष्ठिन मे कभी चण्ड
अधिकृत नही हुआ करता है ।१५। शिव का पादोदर निर्मान्य भवती
को सदा ही धारण करना चाहिए और प्रयत्न पूर्वक धारण करे। उन
मनुष्यो को मन वाणी और शरीर से कभी भी पाप रूप नहीं किया
करते हैं ।१६। श्री नारद जी ने कहा-हे तात ' नि: किसको कहा
जाता हैं और किसके द्वारा वह अधिष्ठित होता है । हे भगवान
समी आप हमारे सामने वतलाइये । यह एक उत्तम आश्चर्य ही है ।१७१
श्री ब्रह्माजी ने कहा-जो अव्यक्त है वही लिङ्ग कहा गया है। वह
आनन्द स्वरूप होता है और तय से परे है । यल से महादेव का लिङ्गी
होना चाहिए उससे मकर होता है ।१८) प्राचीन समय मे पहिले जिम
ममय मे परम घोर एप अणं वही था और ममी म्वर था जरास
भ्रष्ट हो गये थे तो मेरे विष्णु के प्रबोध प्रदान करने के लिए गिवात्मक
1

{ सूर्यपुराण आविर्भूत हुए थे। तभी स लेयर मैं और विष्णु देव भक्ति से परमा- यि आनन्द पे साथ लिङ्ग मूत्ति के धारण करने वाले एप परम शान्त वृषव ध्वज भगवान पा पूजन किया करते हैं ।२३॥ लिङ्ग कयमभूत्पूर्वमानन्दभजर ध्र वम् । प्रबोधार्थ च युवयोयंक्त महंसि पद्मज ॥२१॥ आसीदेकाणवे घोरे निविभागे तमोमये। शेते च भगवान्विस्तप्तजाम्बूनदप्रय ॥२२॥ तत्समीपमह गत्वा सरस्भादिदमुक्तवान् । कस्त्व किमर्थ या शेपे शीघ्रमुत्तिष्ट दुर्भते ।।२३।। कुरु युद्ध मया साधमहमेव जगरपति । अथ वा भज मा देव लोक्यस्याभयप्रदम् ॥२४॥ एव गदचन श्रुत्वा प्रहसन्मधुसूदन । मामब्रवीदमेयात्मा कथ गर्वायसे मुधा ।२५१ कर्ताह सर्वलोकाना पालकोट न संशय सहर्ताह पुनश्चान्ते नान्योऽस्ति सदृशो मया ।२६। एव विवादे समाते मम देवेन शाङ्गिणा। प्रादुर्भूत तदा लिङ्गमावयोर्दर्पहारि तत् ।२७। कालाग्निप्रयुतप्रस्म ज्वालामालासमाकुलम् । आदिमस्यान्तरहित क्षयवृद्धिविवर्जितम् ॥२८॥ श्री नारदजी ने कहा-यह लिङ्ग पूर्व मे आनन्य स्वरूप और धूप एवं अगर कैसे हुआ था जो कि दोनों पुत्रों के प्रबोधाय कराने के लिए ही हुआ था । हे पद्यमन् । यह सब आप वराने के लिये परम मुयोग्य हैं ।२१) श्रीब्रह्माजी ने कहा जिस समय म यहा पर एक मान सपत्र अर्णव ही था और यह स्थल परम भोर एव तमोमय था उस समय में तपाये हुए सुवर्ण के समान प्रभा वाले भगवान विष्णु उसम शयन किया करते हैं । उनक ममीप में मैंने जाकर सरम्भ से इस प्रकार से वहा थाहै दुर्मते आप कौन है और क्यो शयन कर रहे हैं। शीघ्र ही शिवार्चन माहात्म्यादि क्थन ] [ ४६५ -- । उठिये। मेरे साथ युद्ध करो क्योकि मैं ही प्रजापति हू । अथवा देव मेरा यजन करो क्योंकि मैं न लोक्य को अभय प्रदान करने वाला हू ।२२-२४॥ इस तरह के वचना का श्रवण करके मधुसूदन हसते हुए मुझसे कहने लगे क्योकि वे तो अमेवात्मा थे। उन्होने कहा-वयो वृथा गर्व कर रहे हो ।२। इन समस्त लोको का मैं कर्ता है और मैं ही इनके पालन करने वाला भी हू-इसमे कुछ भी सशय नहीं है । अन्त काल में मैं ही इनके सहार का भी करने वाला हूँ और मेरे सहश अन्य कोई भी नहीं है ।२६। इस तरह से विवाद के हो जाने पर जो कि मेरा देव शाीं के साथ हो गया था। उसी समय मे हम दोनो के दपं वो हरने वाला लिङ्ग प्रादुर्भूत हो गया था जो कालाग्नि प्रयुतप्ररय था और ज्वालाओ की मालाओ से समाकुल था। वह आदि-मध्य और अन्त से भी रहित तथा क्षय एव वृद्धि से वर्जित था (२७-२८1 तस्मिल्लिङ्ग महादेव म्वयज्योति सनातन । सहस्रशीर्पा पुरुष सहस्राक्ष सहस्रपात् ।२६। अर्धनारीश्वरोऽनन्तस्तेजोराशिर्दुरासद । ज्येष्टत्व युवयोस्तावदास्ता किचिह्नवीम्यहम् ॥३०॥ मूल ममास्य लिङ्गस्य यदि पश्यति माधव । नून भविष्यति ज्येष्ट इति देवेन भापितम् ॥३१॥ मूर्धानमभ्य लिङ्गस्य यदि पश्यति पद्मज । भविष्यति ततो ज्येष्ठ इति देवेन भापितम् ॥३२॥ एव शभोनिगदितमुररीकृत्य नारद । गतोऽस्मि मस्तक द्रष्छ, तस्य लिङ्गस्य पुत्रक १३३॥ आवयोमाहले गच्छनोर्मोहितात्मनो । गत देवम्सपे नून विस्मयाविष्टचित्तयो १३४॥ हरि लमहष्टव त देन पुनरागत । यथा हरिस्तथवाहमागतो मुने तदा १३॥

[ सूर्य पुराण तमेव शरणं गत्वा संस्तूय विवियः स्तमैः । प्रीतो भूत्या महादेवो वाक्यमेतदुवाच ह ॥३६॥ उस लिङ्ग मे स्वयं ज्योति--सनातन महादेव ही थे जो सहल शीयों वाले---सहस्राक्ष और सहस्रपात् पुरप थे । वे अर्धनारीश्वर- अनन्त-तेज की राशि-दुरासद थे । तुम दोनो का मेष्ठत्व तव तक ही जब तक मैं कुछ वोलता हूं। हे माधव । मेरे इस लिग का मूल देखें तो आप निश्चय ही ज्येष्ठल को प्राम हो जायेंगे-मह देव ने उस समय मे कहा था (२६॥३०॥३१॥ पद्मन (ब्रह्मा) यदि इस लिङ्ग के मूर्धा को देख लेते हैं तो वह ज्येष्ठ हो जायेंगे-यह भी देव ने कहा था ।३२। हे नारद ! इस प्रकार के शम्भु के कथन को स्वीकार करके मैं मस्तक को देखने से लिये गया था जो कि है पुत्र ! उस लिङ्ग का था ।३३। है देवर्षे । मोहित आत्मा वाले तथा विस्मय से आविष्ट चित्त वाले हम दोनो को इस तरह से एक सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये थे ।३४। श्री हरि ने उस लिङ्ग के मूल को नहीं देखा था और वे यो ही पुन. समागत हो गये थे। उस समय में जैसे हरि आये थे वैसे ही मैं भी आ गया था। उन्ही की शरण में जाकर विविध स्तवो से उनकी स्तुति की थी तब महादेवजी परम प्रसन्न होकर यह वाक्य बोले थे १३५५३६॥ मत्प्रसादेन सर्नस्मादधिको भव माधव । मद्भक्ताना त्वमेवाग्यः पूज्यो मान्यस्त्वमेव हि १३७। लिङ्ग मा पूजय हरे लिङ्गमूर्तिधरो ह्यहम् । अत ऊन न संदेहः सर्ने चान्ये दिवौकसः ॥३८॥ लिङ्गाराधनतः क्षिप्रमज्ञान नाशयाम्यहम् । झार्चनस्तानां च नास्ति ससारज भयम् (३६। एव हरेनर दत्त्वा मामुवाच महेश्वरः । विरञ्च तव दास्यामि गृहाण वरमुत्तमम् 1४०। चराचरस्य जगतो मान्यो भव पितामह । गृहाण चतुरो वेदांश्चतुभिर्गदनविधे।४१।

शिवाचन माहात्म्यादि कयन ] [ ४६७ इत्यावाभ्या वर दत्त्वा देवदेव पिनाकघृत् । विश्वेश्वर स्वयग्योति क्षणादन्तहितोऽभवत् ।।२। ईश्वर ने कहा था- माधव । अव आप मेरे प्रमाद स आप सरस अधिक हो जाइय 1 मेरे भक्तो के लिये भी आप ही अग्र म रहने वाले होंगे और आप ही पूज्य एव मान्य होंगे । ह हरे । मेरा पूजन लिङ्ग मे ही करिए क्याकि यब मैं लिङ्ग की मूर्ति का धारण करने वाला हो गया हू । इमके आगे सभी अन्य दवगण भी लिङ्ग के ही आराधना करन म रति वाने हाग । जो मेरी आराधना करने वाले हैं उनके अज्ञान को मैं शीघ्र ही विनष्ट कर देता हूं। जो लिङ्ग के अर्चन में निरत रहा करते हैं उनको कभी भी ससार स समुत्पनमय नहीं हुआ करता है ।३७३८६३६ इस प्रकार से हरि को वरदान प्रदान करके महेश्वर ने मुझसे कहा था-ह विरजे । मैं तुमको भी उत्तम वरदान दूगा। आप उसको ग्रहण कीजिए 1४० है पितामह | आप इम चराचर जगत् के मान्य हा जादए । देविधे । आप अपने चार मुखो से चारा वेदो को ग्रहण कीजिए।४१। इस तरह से हम दोनो को वरदान देकर देवो व भी देव पिनामधारी प्रभु विश्वेश्वर स्वय ज्योति एक ही क्षण म वही पर अन्तर्धान हो गये ।४२। तत प्रभृति विष्ण्वाद्या देवा दैत्याश्च दानवा । गन्धर्वा मुनय सिद्धा यक्षा नागाश्च विनरा १४३। सपूज्य परम लिङ्ग परा सिद्धि गता मुने । नास्ति लिङ्गार्चनादान्यच्छ, योऽस्मिन्भुवनप्रये ॥४४॥ ज्ञात्वा त्वमेव देवर्षे लिङ्गार्चनरतो भव । क्षेपु चव तीर्थेषु वनेपूपवनेषु च ।४५॥ यानि लिङ्गानि दिव्यानि म्यापितानि गुरागरे । द्रष्ट यानि बुधम्तानि श्रद्धयव हि नारद ।४६। मुक्तिभाजो भवन्त्येव तेऽपि शभोरनुग्रहान् ।४।

४६८ ] [ सूर्य पुराण कानि स्थानानि दिव्यानि येपु सनिहित. शिव. । आचक्ष्व तानि मे ब्रह्मन्याहात्म्य चापि कृत्स्नशः ॥४८ माहात्म्य दिव्यलिङ्गानां तीर्थानामपि नारद । अत्र ते कथयिष्यामि श्रूयतामघशास (नाश) नम् ।४६। हे मुने ! तभी से लेकर विष्णु आदि देवगण-दैत्य-दानव- गन्धर्व-मुनि--सिद्धयक्ष-नाग-किन्नर इन सबने परम लिङ्ग की पूजा करके परासिद्धि को प्राप्त हो गये थे। इन तीनो भुवनो में लिङ्ग के अर्चन से अन्य कोई भी श्रेय नहीं है । हे देवर्षे ! आप भी इसी प्रकार का ज्ञान प्राप्त करके लिङ्ग के अर्चन में निरत हो जाइये । क्षेत्रो मे-~-वनो मे-उपवनो मे तीर्थों में जी दिव्य लिङ्ग सुरासुरो ने स्थापित किये है । ब्रह्मपुरपो को उनका दर्शन करना ही चाहिए और हे नारद ! बहुत ही श्रद्धा की भावना से ही उनका दर्शन करे । वे लोग जो दर्शन किया करते है मुक्ति को प्राप्त करने वाले हो जाया करते है। यह भवगान् सम्भु का ही परम अनुग्रह उस पर हुआ करता है । श्री नारदजी ने कहा-वे दिव्य स्थान कौन से हैं जिनमे भगवान् शिव नित्य सन्निहित रहा करते हैं । हे ब्रह्मन् ! उनको आप मुझे बतला दीजिए और पूर्ण रूप से उनका माहात्म्य भी बतला दीजिए । श्री ब्रह्मा जी ने कहा-हे नारद ! दिव्य लिङ्गो वा माहात्म्य और उन तीर्थों या भी महात्म्य यहाँ पर मैं आपको बतला दूगा उसका श्रवण आप साव- पान होकर श्रवण परिये क्योकि यह समस्त अघो का विनाश करने थाला है ।४३-४६ या मा शंवी पराभूतिः शिवभक्त्या हपा पतिः । नारायण. स्वय साक्षादहं चान्याश्च देवताः ॥५०॥ वरान्ति सागरे नूनं तीर्थराजेति स स्मृतः जम्यूटीप महापुण्यं तत्रापि लवणोदधिः ॥५१॥ अहोरामात पाप दांनादेव नश्यति । स्पृशा निराश्रय पापनाशयत्येव सागरः ५२। - शिवार्चन माहात्म्यादि क्थन } [ ४६६ सप्तरात्रकृत पाप प्रोक्षणादेव नश्यति । पानेन पक्षजनित स्नानात्पक्षद्वयम्य च ।५३। तुद्वये तथाऽष्टम्या पर्नस्नान च वार्षिकम् । भानावनुदिते नित्य य स्नाति लवणोदधौ ॥५४ कपिलाया फल तस्य दत्ताया श्रोत्रिये ध्रुवम् । उपोष्य रजनीमेका रविसक्रमण प्रति ॥५५॥ स्नात्वा शतसुवर्णस्य दत्तम्य फलमाप्नुयात् । व्यतीपाते दिनच्छिद्रे अ (ह्य) यने विपुवेषु च १५६। जो भगवान् शिव की परामप्ति है वह शिव की भक्ति से वरण- नारायण और स्वयं साक्षात् में तया अन्य देवगण उम सागर में निवाम परते है और वह तीर्थराज इस नाम से कहा गया है। जम्बूद्वी महान् पुण्य से परिपूर्ण है । वहां पर भी क्षीर सागर है। अहरोत्र पृत पाप उसके दर्शन से ही नष्ट हो जाया करता है । स्पर्श करने पर वह सागर तीन रात्रियो म रिये हुए पाप का विनाश कर दिया करता है । सात रात्रि में दिया हुआ पाप ग्रोक्षण करने ही से नष्ट हो जाता है । पान करने मे एक पक्ष मे किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है और स्नान करने से एक माम मे किया हुआ पाप नष्ट होता है । दोनो ऋतुओ मे-अप्टमी तिथि और वापिय पर्वो मे स्नान मूर्य के उदित न होने पर ब्रह्म मुहूर्त में जो नित्य ही इस लवणोदघि में स्नान किया करता है उसका पत चैसा ही होता है जैसा कि किसी क्षोनिय विप्र को पिला गौ ये दान देने मे पुन्यफल हुआ करता है। सूर्य के सक्रमण करने के समय म एक रात्रि तक उपवाम करके और स्नान करके जो शत सुवणं ये दान पा फल होता है वैसा ही पुण्य हुआ करता है। व्यतीपस्त म-दिन के छिद्र मे-अपन में और विपुवेषु में सान करने का वडा महत्व है। (५०-५६ युगादी च नर. स्नात्वा विधिवा तवणोदयो। गोमह्यम्य दतम्य युगक्षेत्रे फन हि यत् ॥५७१ ४७० ] [ सूर्य पुराण तत्फल लभते मर्यो भूमिदानस्य च ध्रुवम् । दानानि यानि लोकेषु विख्यातानि मनीपिभि ।५८ तेपा फलमवाप्नोति ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो । वडवानलमुक्तोऽसौ पूतो भवति नारद ॥५६॥ अतोऽस्माद्धि पर नास्ति सुतीर्थमवनीतले। गङ्गा गोदावरी रेवा चन्द्रभागा च वेदिया।६। एतासा सगमो यन स्नान कुर्यान्महोदधौ । यानि पापानि घोराणि भ्रूणहत्यादिकानि च ।६१॥ नाश यान्ति क्षणादेव सगमस्य प्रभाषत । अश्वमेघसहस्रस्य फल च भवति भ्र वम् ।६२। समुद्रतीरे परम तेजोलिङ्घ दुरासदम् । यन सिद्धा पुरा वत्स मुनय सप्तकोटय 1६३। युग के आदि दिन मे विधिपूर्वक मनुष्य स्नान लवणोषधि मे परके पुरक्षेत्र मे एक सहस्र गौओ के दान देने में जो पल होता है वहीं पुण्य पन मनुष्य प्राप्त किया करता है और भूमि के दान का पुण्य-फल भी प्राप्त हो जाता है। मनीपियो के द्वारा लोगो में जो भी दान विख्यात विये गये हैं उन मवका पल चन्द्र और गूयं वे ग्रहण में प्राप्त होता है। हे नारद वह मनुष्य वडवानल से मुक्त होकर पल हो जाया करता है 1५७।५८।५६। इमीलिये इस तीर्थ गे परमतीय इम अवनीतल में दूमरा कोई भी नही है। गङ्गा-गोदावरी- रेवा-- चन्द्रभागा- येदिवा इन नदियो नानी पर सङ्गम होता है वही पर महोदधि में स्नान करना चाहिए । गगम ये स्नान का वडा भारी अधिष प्रभाव होता है । उगमे जो भी महान पोर भ्रूण हत्या आदि पाप होते हैं ये राय एक ही क्षण में नाग को प्राप्त हो जाया करते हैं। एर सहय अश्वमेघ या ये यजन बग्ने का पल भी निधिन का मेहुपा परता है। समुद्र तट पर परम दुरागद तेजोनिग विराजमान हैं। है वम जहा पर पहिले मिड और गात यरो मुनिगण शिवाम दिया परते थे।६०-६॥ ।

शिवाचन माहात्म्यादि कथन ]
[ ४०१
सप्तकोटीश्वर नाम तत प्रभृति नारद ।
तस्य लिङ्गस्य माहात्म्य मया वक्तु न शक्यते ॥६४
स्मरणादस्य लिङ्गस्य गोसहस्राफल लभेत् ।
समुद्रे विधिवत्स्नात्वा सप्तकीरिश्वर शिवम् ॥६५
ये द्रक्ष्यन्ति महात्मानो मुक्तिभानो भवन्ति ते ।
राजसूयस्य यज्ञस्य सहस्रगुणित फलम् ॥६६
तथा गोमेधयज्ञस्य दर्शनात्तत्फल विह।
सप्तकोटीश्वरो देवो दृष्टश्चद्भ वि मानवं ।।६७
धन्यास्ते ये च लोकेऽस्मिस्तेपा मुक्ति करे स्थिता।
तय म्नान जपो होमो दान ध पितृतर्पणम् ॥६८
मर्व तदक्षय प्रोक्त सप्तकोटीश्वरे शिवे।
मप्तकोटीश्वर प्राप्य क्थ शोचन्ति जन्तव ॥६६
हे नारद । तभी से लेकर उस लिङ्ग का नाम सप्त पोटीश्वर पह
गया था। उस लिग का माहात्म्य मेरे द्वारा तो घणित नहीं किया
जा सकता है ॥६४॥ इस बिल के येवल स्मरण से ही एप सहन
गौओ के दान का फल प्राप्त हो जाया करता है। उम समुद्र मे विधि-
पूर्वर स्नान करके सप्तरोटिश्वर शिव या जो दी करेंगे ये महान्
आत्मा वाले मनुप्य मुक्ति के भागो हा परत है और उनको राजसूप
पज का जो पन होता है उगगे सहय गुना पुण्य का हुआ करता है
॥६॥६६॥ तथा गोमेघ यजा फल यहाँ पर दान ग ही हो जाया
परता है। यदि मानयो के द्वारा सप्त पोटीवर दव का भूमण्टन म
सन पर लिया गया है तो परम सौभाग्य को पात है। ये पुष्प इम
सोर में परम धन्य है और मुक्ति तो उनसे हापा में स्पिर रहा परमी
है। यहां पर सान, जप, होम, दान और शितपंप ये भी राप्त
पोटरीयर सियरे स्थान मे बार यताय गये हैं। यह भादशान
है मप्त कोटीकार निजको प्राप्त रस पागप रंग गोपरिया
करते हैं।"

४७२) { सूर्य पुराण सर्वानुग्राहको रुद्रस्तस्तिल्लिङ्ग व्यवस्थितः । न तच्छलमय लिङ्ग न तद्धम न राजतम् ॥४६ नतद्रस्नमय लिग ज्ञातव्य मिति नारद । कि तज्ज्योतिर्मय लिङ्ग शव पदमनामयम् ।।७१ सप्तकोटीश्वर लिङ्ग प्राहुर्वेदविदो बुधाः । अह नारायणो देवः शक्रश्चन्द्रो दिवाकर. ।।७२ मरुतो मुनय. सिद्धाः खेचरा भूचराश्च ये। अर्चयित्वा पर लिङ्ग सप्तकोटीश्वर शिवम् ।। प्राप्तवन्तः परा सिद्धि तस्मिल्लिङ्ग च नारद ॥७३ उस लिङ्ग में व्यवस्थित रुद्र सब पर अनुग्रह करने वाले है। वह दौलमय, हैम, राजत, रत्नमय लिङ्ग नहीं है हे नारद ! ऐसा ही जान लेना चाहिए किन्तु वह ज्योतिर्मय लिङ्ग है जो भगवान शिव का अना- भय पद है ॥७०।७१।। वेदो के ज्ञाता बुध पुरुप इसको सप्न कोटीश्वर लिङ्ग ही कहा करते हैं। मैं, नारायण देव, इन्द्र, चन्द्र, दिवाकर, मरुद्- गण, मुनि, सिद्ध, सेवर और जो भूचर है के सब सप्तकोटिश्वर शिव लिङ्ग का अभ्यर्चन करके उस तिङ्ग मे हे नारद ! परम सिद्धि को प्राप्त हुए है ॥७३॥७३॥ ॥ महाकाल माहात्म्य कथन ।। उजयिन्यां महाकाल ये वै पश्यन्ति मानवाः । अवाप्नुयुः पर लोक यत्र गत्वा न शोचति ॥१ महाकालस्प लिङ्गस्य दिव्यलिङ्ग तदुच्यते। स्पर्शनात्तस्य लिङ्गस्य सशरीरा: शिव ययुः ॥२ तज्ज्ञात्वा च मया तत्र पापाणः कुक्कुटाकृतिः । निक्षिप्तश्च महागले ततोभूपाटेश्वरः ॥३ महाकाल माहात्म्य कथन ] [ ४७३ तव नगरे रम्ये शूलेश्वर इति स्मृतः । तस्य दर्शनमात्रेण हयमेघफल लभेत् ।।४ शूलेश्वरस्य पूर्वे तु ॐकार लिङ्गमुत्तमम् । तत्र कुण्ड महादिव्य पूरितं पुण्यवारिणा ॥५ स्नान समाचरस्तत्र प्रयतात्मा समाहितः । द्वितीयेऽह्नि तृतीयेहनि दशमे वाऽपि नारद ॥६ पक्षे मासेऽय पण्मासे स्वप्ने पश्यति गकरम् । दिव्य ज्ञानमवाप्नोति देवानामपि दुर्लभम् ॥७ श्री ब्रह्माजी ने कहा-उजयिनी पुरी मे महाकाल शिव है । जो मनुष्य उनका दान किया करत है वे परमोत्कृष्ट लोक की प्राटिन किया करते हैं जहां पर पहुंच कर फिर कुछ भी चिन्ता नहीं किया करते है।१' महाकालेश्वर का जो लिङ्ग है वह दिव्य लिङ्ग वहा जाता है उस लिंग के केवल स्मरण करने ही से मनुष्य शरीर के सहित ही शिव को प्राप्त होगये है ॥२॥ यह जानकर मैंने एक कुक्कुट की आकृति गला पापाण महाकाल मे निक्षिप्त पर दिया था तभी स यह कक्कुटेश्वर हो गये हैं । ३॥ उसी परम रम्य मगर में यूनेश्वर कहे गये हैं। उनके दर्शन मात्र से ही हयमेध यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है ॥४॥ इन मूलेश्वर के पूर्व गॐकारेश्वर नामक उत्तम शिवलिङ्ग हैं। वहां पर एक महान दिव्य कुण्ड है जो परम पुग्य जल से भरा हुआ है ॥५॥ वहाँ पर स्नान का समाचरण बरता हुआ प्रयत आस्था वाला ममाहित होकर द्वितीय दिन में, तीसरे दिन में, दसवे दिन मे हे नारद पक्ष मे, मास मे अथवा पण्मास मे या स्वप्न मे शङ्कर को देखा करता है। वह फिर परम दिव्य ज्ञान की प्राप्ति किया करता है जो कि ज्ञान देवगणो वो भी अत्यन्त दुर्लभ हुआ करता है ॥६॥७॥ य पश्येल्लिङ्गमोकार स्नात्वा कुण्डे ममाहित । दीक्षासहस्रस्य फल प्राप्य याति परा गतिम् ॥

४७४ ] [ सूर्यपुराण तन वागस्त्य मुनिना तपसाऽऽराधित शिव । प्रादुर्भूतश्च भगवानगस्त्येश्वरनामत | प्रसिद्धो दशनात्तस्य ब्रह्महत्या व्यपोहति । तत्र व शक्तिभेदाख्य तीर्थ मुनिविपेवितम् ॥१० तन स्नात्वा भद्रवट यस्तु पश्यति मानव । सवपापविनिमुक्त स्कन्दलोके महीयते ।।११ तीर्थानि कोटिश मन्ति उज्जयिन्या समन्नत । तेपा माहात्म्यमखिल स्कान्दे स्कन्देन भा पतम् । १२ कुरुक्षेत्रे तु देवर्षे स्थाणुन म महेश्वर । तपस्तप्त्वा मया तत्र प्राप्त ब्रह्मत्वमुत्तमम् ।।१३ वालखिल्यादयस्तन सिद्धि प्राप्ता परा द्विजा । तनाऽऽमी पुलह पूर्व मशक स्थाणुमन्दिरे ॥१४ पुरुष समाहित होकर कुण्ड मे स्नान करके ॐकार लिङ्ग का दशन किया करता है वह एक सहस्र दीक्षाओ का पुण्य, फल प्राप्त करके परागति को प्राप्त किया करता है ॥८॥ वहाँ पर ही अगस्त्य मुनि ने तप के द्वारा भगवान् शिव की आराधना की थी और अगस्त्ये- श्यर के नाम से भगवान् प्रादुर्भूत हुए थे। वे इसी नाम से ही फिर प्रसिद्ध होगये थे। उनके दशन म मनुष्य ब्रह्महत्या का व्यपोह कर दिया करता है । वहाँ पर ही मुनियो के द्वारा निषेवित शक्ति भेद नाम वाला तीर्थ है ॥६॥१०॥ वहाँ पर स्नान करके जो मनुष्य भद्रवट को देखना है वह सभी पापो से निर्मुक्त होकर स्कद लोक मे प्रतिष्ठा प्राप्त किया करता है ॥११॥ उज्जयिनीपुरी में चारो ओर करोडो ही तीर्थ विद्यमान है। उनका सम्पूण माहात्म्य स्कन्द भगवान ने स्वय ही स्कद पुराण म भाषित किया है। हे देव । कुरुभन म स्थारगु नाम बाले महेश्वर हैं। वहाँ पर मैंने तपश्चर्या का ता करके ही यह उत्तम ब्रह्मस्व पद प्राप्त किया है। वातखिल्म आदि द्विजा ने वहां पर परा-

महाकाल माहात्म्य कथन ]
[ ४७५
सिद्धि प्राप्ति की थी। वहां पर पूर्व मे स्थाणु मन्दिर में पुलह मशक
था ॥१२-१४॥
मृतस्तु विविधान्भोगान्मुक्न्या दिव्यमनोरथान् ।
तदन्ते मत्सुतो जात स्थाणुढ (नि)प्रभावतः ॥१५
सर्वदेवमयो यत्र स्थाणुर्नाम महेश्वर ।
इष्ट सकृच्च मनुज शव पदमावाप्नुयात् ॥१६
तीर्थराज इति ख्यान प्रयागो मनिमत्तमाः।
गङ्गायमुनयोस्तर मगमो लोकविश्रुतः ॥१७
ताम्र स्नात्वा दिव गत्वा भोगा-भुक्त्वा यथेप्सया।
आम्ते महेश्वरो यत्र सर्वानुग्राहक पर ॥१८
दर्शनादक्षयाल्लो कान्प्राप्नोति मनुजोत्तमः।
अन्यत्तीर्थ पर गुह्य गयातीर्थ मिति स्मृतम् ॥१६
यत्र शभोभवतश्चरणौ सुप्रतिष्ठितो।
पितृगामक्षया तप्निस्तत्र पिण्डप्रदानतः ॥२०
मृत होकर उसमे विविध भोगो का उपभोग करके और दिव्य
मनोरथो को प्राप्त करके उसके अन्त में वह स्थाणु मूर्ति के प्रभाव से
मेरा पुत्र हुआ था॥१॥ जहाँ पर सर्व देवमय स्थाणु नाम वाले महेश्वर
विराजमान हैं। मनुष्य एकबार भी उनका माराधन करके इष्ट बना
लेता है तो वह शिव के पद को प्राप्त किया करता है ॥१६॥ हे मुनि-
श्रेष्ठो । प्रयाग तीर्थराज इस नाम से विख्यात हुआ था। वहां पर गङ्गा
और यमुना इन दोनो परम पवित्र नदियो का लोगो मे प्रसिद्ध सङ्गम
हुआ था ॥१७॥ वहां पर स्नान करके दिवलोक में गमन करके और
यथेसा में भोगी का उपभोग करके मनुष्य सद्गति को प्राप्त करता है।
जहाँ पद पर और समी पर अनुग्रह करने वाले महेश्वर विराजमान है
॥१८॥ उत्तम मनुज उनके दशन करने से अक्षय लौकी की प्राप्ति किया
करता है। अन्य तीर्थ परम गुह्य हैं गया तीथं इस नाम में कहा गया
है। जहां पर भगवान् शम्भु के चरण सुप्रतिष्ठित रहा करते हैं। वहीं

नियि मुहूर्त निर्णयादि क्थन ] [ ४७३ लिङ्ग स्वायमुवे बाणे रत्ने च रम मिते । मिद्धप्रतिहिते लिङ्गे न चण्डस्याधिकारत ॥५ वापलिङ्ग स्वय भूमिश्चन्दकान्निस्तथैव च । चान्द्रायणसम पुण्य शमोनैवेद्यभक्षणातु ॥६ वृप चण्ड वृप चव सोमसूत्र पुन पम् । चण्ड च सोमसूत्र च पुनश्चण्ड पुनर्वृ पम् !! उन तीर्य में देवका की इच्छा करने वालो के द्वारा प्राय प्रान्त उपोप्य होता है । मूत पितृ तृष्टि के लिये है और महपियों ने उसे पिन्य कहा है ।।१।। जिमको प्राप्त करके सूर्य अस्तता को प्राप्त होता है यदि वह त्रिमुत्तिका होवे तो समम्न धर्म कृत्यों मे उसको सम्पूर्ण नियि जाननी चाहिए ॥२॥ अष्टमी, एकादशी, पप्ठी, तृतीया, चतुर्दशी ये तिथियों पर मयुक्त हो ग्रहण करनी चाहिए । दूमरी तिथियों पूर्व तिथि से मिश्रित हो ग्रहण करे ॥३॥ वृहतया, रम्भा, सावित्री, वट पंतृती, कृप्याप्टमी ममुग्नी नियि सभूना ही करनी चाहिए ॥४॥ दापलिङ्ग में, स्वायम्मुव म, रल मे, रस निमित में और मिदा के द्वारा प्रतिष्टिन लिङ्ग मे पण्डका अधिकार से नहीं है । वाणविन स्वय भूमि तथा चन्द्रक्रान्ति है । भगवान् शम्भु के नंवेद्य के भक्षण मे घान्द्रायण में ही समान पुण्य होता ॥५॥६॥ वृपचण्ड और वृपही सोममूत्र है तथा पुन वृप है पण्ड और सोम मूत्र-पुन. पण्ड और पुन वृष है ॥७॥ आर च आरनाल च काम्पपात्र ममूरिवा। चाम्तिनतल च मन्यवीयंहराणि पट् ॥ll वामपावं विनिक्षप्य गृहीत्या वामपाणिना। धृत्वा च दक्षिणे पाणी तं दद्याग्जलातिम् ॥ गुमव्दम्न्वन्धवारश्च रगदम्नु निरोधर । आधार निरोयत्याग्दुरगदा निगद्यते ।१०। गुग्न्यागी सभेन्यु मन्त्रत्यागी दरिद्रनाम । गुरमन्त्रारियागारिसादोऽपि नरय प्रजेत् ११३

'गु" यह शब्द
४७८ ]
[ सूय पुराण
एक्मय॑ प्रदातव्य मध्याह्न भास्वर प्रति ।
उभयो सध्ययोरापस्त्रि क्षिपेदसुरक्षयात् ॥१२॥
भ्रातृद्वय न कुर्वीत न कतव्य पितासुतम् ।
अनग्निक न कर्तव्य न कुर्याग्दर्भिणीपतिम् ॥१३॥
निरग्निक स्मृतस्तावद्यावद्भार्या न विन्दति ।
साग्निको भार्यया युक्त इत्य्व मनुरब्रवीत् ।१४।
आर-आरनाल-कास्यपान- ममूरिका-चणवतिल तेल ये छ
मन्त्र के वीर्य के हरण करने वाले होते हैं ॥८॥ वाम पार्श्व में विशेष
रूप से निक्षिप्त परके वाम हाथ में ग्रहण करे। फिर दक्षिण हाथ में
धरकर तैल म जला नलि देनी चाहिए ।
अन्धकार वाचक है अर्थात् अन्धकार को बतलाता है और "ह"
यह शब्द निरोध करने वाले अथ
का वाचक हैं । क्योकि
अज्ञान रूपी अन्धकार के निरोधक होने से ही गुरू शब्द कहा
जाता है ।१०। गुरू के त्याग करने वाला मृत्यु को प्राप्त हो जाता है
और मन्त्र का त्याग करने वाला दरिद्रता को प्राप्त किया करता है।
गुरू और मन्त्र को परित्याग करने से सिद्ध पुरप भी नरक का गमन
करने वाला हुआ करता है ।११। मध्याह्न मे भास्कर देव को एक ही
वार अध्य देना चाहिए । दोनो सध्याओ में असुरा केक्षय होने से तीन
बार जल की अजलि का प्रक्षेप करना चाहिए ।१२। दो भाइयो को नहीं
करना चाहिए और पितासुत को नही करना चाहिये । अनग्निक
को न करे और गर्भिणी के पति को न करे।१३। निरग्निक तभी तक
वहा गया है जब तक भार्या को प्राप्त नहीं करता है । जो भार्या से
युक्त होता है वह साग्निक होता है-ऐमा मनुमहर्षि ने कहा है ।१४।
प्रणाममेकहस्तेन एक वाऽपि प्रदक्षिणम् ।
कालसेवा तथाजाले अन्दपुण्य विनश्यति ।१५।
सभाया यज्ञशालाया देवतायतने गुरौ ।
प्रत्येक च नमस्कारो हन्ति पुण्य पुराकृतम् ॥१६॥

देवेन्द्र चरिन कथन ] [ ४७६ गोक्षीर गोघृत चव मुग्दधान्य तिला यवा । एते चैवाक्षारगणा अन्ये क्षारगणा स्मृता ११७ मक्षिका मशका वेश्या याचवाश्चैव मूपका । गणका ग्रामणीश्चैव सप्त ते परभक्षका १८॥ एक हाथ स प्रणाम करना और एक प्रदाक्षिणा तथा अकाल म काल सवा-इनमे एक वर्ष का पुण्य विनष्ट हो जाया करता है ।१५। सभा म-निशाता म-देवतायतन म - गुरू म प्रत्यक को नमस्कार फरना पुराकृत पुण्य का हनन क्यिा करता है ।१६। गौ का का दूध-- गाय का धन-मुग्दवाय यव-तित-न्य सब अक्षारगण कहे गये हैं अन्य क्षारगण होते हैं । मक्षिका-मशक-वेश्या-याचा-पर-गणक -ग्रामणी-ये सात पर भक्षर होत है ११७ १८॥ । देवेन्द्र चरित कथन ॥ मन्वन्तराणि वक्ष्यामि शृणुध्व मुनिपु गवा । मनव पडतीतास्ते सप्तमो वर्तते क्लि ।११ तेपा स्वायभुवम्त्वाद्यस्तत स्वारोचिप स्मृत । उत्तमम्तामसञ्चव रेवतश्चानुपस्तथा ।२। म्बायभुव तु कल्पादावन्तर कथित मया। स्वारोचिपेन्तरे देवाम्नुपिता नाम ते म्मृता ॥३॥ विपाश्चिन्नाम देवेन्द्र पीन्वक्ष्यामि मानतम् । जंग्तम्भस्तथा प्राणो दान्तोश्य पमन्तया 1४1 तिमिर शार्वरीयाश्च सतत पय स्मृता । उत्तरे त्वन्तरे देवा मुघामानो द्विजोत्तमा १५॥ प्रतदंना शिवा गत्याम्ताच दशवतिन । एतेषा न गणा प्रोता भवद्वादशमिगंण ।।

४८० ] [ सूर्य पुराण - सुदान्ति म देवेन्द्रो महाबलपराक्रमः। रजो गोत्रोऽर्धवाझ्च सवनश्चानघस्तथा ।७। हे मुनि पुङ्गवो ! अव आप लोग मन्वन्तरों को श्रवण कीजिए। अब तक छै मनु व्यतीत हो गये हैं । इस समय मे सातवा मनु वर्तमान है ।१॥ उन सब मन्वन्तरो मे स्वायम्भुव मनु सबसे प्रथम मनु हुए थे। इसके पश्चात् स्वारोचिप मनु हुए थे। इनके पश्चात् उत्तम-तामस-रेवत और चाक्षुप हुए थे ।२। कल्पादि मे स्वायम्भुव अन्तर मैंने कह दिया है । स्वारोचिष अन्तर मे तुपिता देव हुए थे ऐसा कहा गया है ।। विजाश्चित नाम वाला देवेन्द्र हुए थे । अब मैं ऋपियो को बतलाऊंगा। उम समय में ऊर्ज स्तम्भ-प्राण-दान्त-पभ-तिमिर और शबरीवान--ये सात (मप्तपि) ऋषि कहे गये है। हे द्विजोत्तमो ! उत्तर अन्तर में सुघामान देव हुए थे पुतर्दन-शिव-सत्य और इसके पश्चात् वशवर्ती हुए थे। इनके गण भी कहे गये हैं जो आपके द्वादश गणों से । मुक्त थे ।४।५।६। सुदान्नि नाम वाला देवेन्द्रथा जो महान् वल और पराक्रम से समन्वित था। रज -गोत्र-अर्धवाहु-सवन-अनघ-- सुतया-शुक्र-इन नाम नामो वाले सात ऋपि हुए थे-ऐसा बतलाया गया है । सुतपाः शुक्रनामाऽथ सप्त त ऋपयः स्मृताः । मांश्च सुधियश्चैव तामसस्यान्तरे सुराः । ज्योतिधर्मः पृयुः कल्पश्चंगाग्निः सवनस्तथा 141 पीवरश्च समास्याताः सप्त ऋपयो मताः। स्याच्छिबिनाम देवेन्द्रः सिद्धचारणसेवितः ।। देवराज्यं परित्यज्य परं वैराग्यमाथितः । ज्ञात्वाशाश्वतं सर्ग वृहस्पतिमथानवीत् ॥१०॥ भगवन्कि करोमीदं राज्यं तुच्छमुखं यतः । कवल्यिं लभते केन तन्मे ब्रूहि गुरो स्फुटम् ।११।

देवेन्द्र चरित कथन ] [ ४०१ अन्त्यनन्तगुणावाम परानन्दकविग्रह । ध्यात कैवल्यपद पुसा महादेवो न चापर ।१२। मोहपाशनिवद्ध ना महामोहान्मता हरेत् । स्मरणान्मोचकस्तेपामुमापतिरिति श्रुति ॥१३॥ यहह्म परम ज्योति प्रतिष्ठाक्षरमव्ययम् । सर्वानुग्राहिण शभु तमाशु शरण व्रज ।१४। तामस मवन्तर मे मनुष्य और सुघागण सुर हुए थे। ज्योति-धर्म -पृथु-कल्प-च नाग्नि-सवन और पीवर ये मात ऋपि माने गये हैं। शिविनाम वाला देवन्द्र था जो मिद्ध और चारणो के द्वारा सेवित था । HEIR वह देवराज्य का परित्याग करके परमाविव वैराग्य के माश्रय लेने वाला हो गया था। इस सवको अशाश्वत समझ कर ही वृहस्पति जी से कहा था ।१०। हे गुरुवर्य । हे भगवान् । इस परम तुच्छ सुख वाले राज्य से मैं करूगा । अब आप मुझे यही बताने की कोशिश कीजिए कि कैवल्य की प्राप्ति किससे हो जाता है ।११। देवगुरु वृहस्पति जी ने कहा-अनन्त गुणो का निवास-परानन्द ही जिनका एक विग्रह है अर्थात् आनन्दमय स्वस्प वाल महादेवजी का ध्यान दिया जाये तो वे ही कैवल्य के प्रदान करने वाले हैं अन्य कोई भी नहीं है ।१२। वह देवेश्वर मोह के पास मे बधे हुओ को जो महामोहात्मा है उसका हरण कर दिया करते हैं। श्रुति के द्वारा प्रतिपादन किया जाता है कि उमापति के बल स्मरण से ही उन पाशो से मोचक हो जाया करते हैं । १३३ जो ब्रह्म पर ज्योति-प्रतिष्ठाक्षर और अव्यय हैं तथा सभी पर अनुग्रह करने वाल है उन्हों भगवान् शम्भ के तुम शरण में चले जाओ। ।१४ स ज्योतिपा पर ज्योतिरानन्द तमस परम् । नयस्मादधिक किचित्तत्तत्त्व विद्धि शाकरम।१५। त जानीहि पर ब्रह्म विश्वात्मान महेश्वरम् । तदात्मक्तया सर्ग जानीह्यसुरसूदन ।१६॥

४८२ ] । सूर्य पुराण आत्मान ये हि मत्यन्ते विभिन्न त्रिपुरद्विप । ते पश्यन्नेव त देन नाऽऽवर्तन्ते पुन पुन ।१७॥ सनस्मादधिर शभु परमात्मा महेश्वर । इति ये निश्चितधिय कृतार्थास्ते सुराधिप ।१८॥ दर्शन तस्य काड क्षन्ते हरिब्रह्मादय सुरा । योगिनो नियतात्मानस्तमीश शरण व्रज 1१६॥ महदादिविशेषान्त जगद्यस्मिल्लँय व्रजेत् । पुनरुत्पद्यने यस्मात्त जानीहि पिनाकिनम् ॥२०॥ लीलाविलसित यस्य विश्वमेतच्चराचरम् । तदभावाच्च विलयस्त जानीहि महेश्वरम् ॥२१॥ वे ज्यातियो के भी परम ज्योति हैं तम से परे और आनद स्वरूप हैं। उनसे अधिक कुछ भी तत्व है ही नही। वह इमी शाकुर तत्व को ममझो जो सर्वोपरि विराजमान है ।१५। उनको आप परम ब्रह्म- विश्वात्मा महेश्वर ही जान लो। यह जो भी कुछ दृश्य है वह मभी उनकी आत्मा का ही स्वरूप है-ऐमा ही हे अरिसूदन । आप जानलो। 1१६। जो लोग त्रिपुरद्विक् श्री शिव से अपन आपको भिम्र मानता है वे उस देव को देखते है अर्थात् दशन प्राप्त कर लिया करते हैं तो वे किर वारम्बार इस संसार में जन्म लिया करते हैं ।१७। शम्भ, परमात्मा महेश्वर सभी स अधिक हैं । हे सुराधिप । ऐसी जिनकी निश्चित बुद्धि है वे समझ लो नि पूर्णतया कृतार्थ ही हो गये हैं ।१८। हरि-ग्रह्मा आदि मुरगण भी जिनके दर्शन प्राप्त करने की आकाक्षा रखते हैं तथा योगिगण भी नियतात्मा को देखना चाहते हैं तो आप भी उसी ईश की भारणागनि म चो जाओ। जिसमे महा स भारम्भ करके विशेष पयंत लय को जगा प्राप्त होता है और फिर भी उही स इसकी उत्पत्ति हुआ करती है उन भगवान का ही मान प्राप्त गरे अर्थात् शरण में जाओ। यह मपूर्ण स्थावर और जद्गग जगत् जिसकी एप सीना देवेन्द्र चरित कयन ] [ ४५३ का विलास जैसा है और उनके अभाव से विलय को प्राप्त होता है उन्ही महेश्वर प्रभु की शरण म जाओ ।२०।२१। यस्याऽऽज्ञया स्थितो ब्रह्मा जगज्जननकर्माणि । हरिश्च पालने रुद्र सहारे च म शूलभृत् ।२२। यम्य प्रसादलेशेन मया मरणमिण । भवन्त्येव हि तेऽमा भजन्ते वृषभध्वजनम् ।२३। क्षण मुहूर्तमयवा ध्यात सपूजित स्मृत । प्रददात्याशु कैवल्य यस्त भज महेश्वरम् ।२४। यम्यैव मूर्तयस्तिस्रो ब्रह्मविष्णु हरा इति । सर्गरक्षागुणलोस्तमीश शरण व्रज ।२५॥ यस्यान्त स्थानि भूतानि येनेद भ्राम्यते जगत् । ब्रह्मति च जगुर्वदास्त रुद्र शरण ब्रज ।२६। यज्ञर्ण इज्यते दवो मुक्तये वेदवादिभि । कर्मणा फलस्तेपा शरण व्रज त हरम् ॥२७॥ ये विनिद्रा जितश्वासा ध्यायन्ति क्षीणकर्मिण । तेपा प्रजायते यत्तत्तत्त्व विधि च शाकरम् ।२८। जिन महेश्वर भगवान की आज्ञा से ही इस जगत् के जनन करने के कर्म में स्थित रहा करते हैं। श्री हरि भी उही की आज्ञा से परि- पालन करने के कर्म से जुटे रहा करते हैं एव रुद्र इसके सहार का कर्म किया करते हैं और सर्वदा सलग्न हैं वही भगवान् शूलधारी प्रभु हैं। ।२२। जिन के प्रसाद के नेश मान से मरण के धम वाले मनुष्य जो वृषभध्वज वा भजन किया करते हैं वे अमर्त्य हो जाया करते हैं।२३॥ एक क्षणभर या एक मुहूर्त भर जो बयान किये जान पर या सम्पूजित होने पर तथा स्मृत होने पर जो शीघ्र ही वैवल्य पद को दे दिया करते हैं उही भगवान् महश्वर का भजन करो 1२४. उन्ही की ये तीन ब्रह्मा-विष्णु और मूत्तियां हैं और सर्ग-रक्षा तथा लय करने के गुणों के ही कारण हैं तो उसी ईशा की शरण मे गमन करो।२॥ जिनके ४८४ ] [ मूर्यपुराण यन्त करण में समस्त भूत है और जिसके द्वारा यह जगत् भ्रमाया जाया करता है-वेद जिसमो ब्रह्म कहकर गान करते हैं उन्ही भगवान रद्रदेव की शरण में जाभो ।२६। जो देवयज्ञो ये द्वारा यजन किया जाता है और वेदवादियों के द्वारा मुक्ति प्राप्त करने को जिनका भजन दिया जाता है और जो उनके कर्मों या फल प्रदान करने वाला है उन्ही भगवान हर की शरण में चले जाइये ।२७। जो निद्रा पा स्याग करने वाले तथा श्वासो पर विजय पाने वाले क्षीण कमों वाले जिनका ध्यान किया करते हैं और उनको वही तत्त्व उत्पन्न हो जाया करता है वही तत्त्व शाङ्कर तत्व है-यह समा लेना चाहिए ।२८। अज्ञानरज्जवा बद्धाना मनुष्यदिशरीरिणाम् । महादेवादृते नान्या शक्र पश्यामि मोचकम् ।२६। तस्मात्वा तपसा शक्र समाराधय शकरम् । प्रसन्नो दास्यति पद तब कैवल्यमुत्तमम् ॥३०॥ एन गुरोनिगदित श्रुत्वा सुरपतिस्तदा । समाराधयितु देवा ययौ वदरिकाश्रमम् ॥३१॥ तन गत्वा जटी भूत्वा भस्मनिष्ठो जितेन्द्रिय । मन्दाकिनीजले स्नात्वा भस्म चैवभिमत्त्र्य च ॥३२॥ अग्निरित्यादि मन्त्रंश्च समुद्ध ल्य च विग्रहम् । पूजायामास देवेश पुष्पै पर्मनोहरै ॥३३॥ शवी विद्या जपन्नास्ते शिवध्यान तत्पर । एग गतानि वर्षाणि सहस्राणि चतुर्दश ।३४॥ तपसा देवराजस्य प्रसन्नोऽभूत्तत शिव । प्राह मिपुरहा शक वर ब्रूहि शतक्रतो ।३५। अज्ञान की डोरी से बधे हुए मनुष्य आदि शरीरधारियो को मोचन करने वाला श्रीमहादेव जी से अन्य किसी को भी नहीं देखता हूं।२६। इस कारण मे हे इन्द्रदेव | आप प्रयश्चर्या के द्वारा भगवान् शकर की ही समाराधना करिए । वह प्रसन्न होकर आपको उत्तम पद को प्रदान देवेन्द्र चरित क्थन J [ ४८५ पर देंगे। उस समय में इस प्रकार के श्री गुरुदेव के नयन का श्रवण फरक सुरपति महादेवजी की समाराधना करने के लिये वह एकाश्रम मे चले गये थे।३०।३१। वहां पहुचकर सुग्पनि जहावारी हो गया था । केवल भस्म म ही निष्ठा रखने वाले और जितेन्द्रिय हो गये थे। वहाँ पर मन्दाकिनी गङ्गा के जल म स्नान करके उहोंने उम भस्म को अभि- मन्त्रित किया था ।२२॥ "अग्नि"---इत्यादि मन्ना मे अपन शरीर को उदलित किया था। फिर उना पत्रा और मनोहर पुणो से दवेश्वर का पूजन किया था ।३३। वे वहाँ पर शवी विद्या का जाप करते हुए केवर भगवान् शिव के ही प्यान म परायण हाकर स्थित रहे थे। इस प्रकार से करत हुग सुरपति को चौदह महय वप व्यतीत हो गये थे ५३४। इसके अनन्तर देवराज की उस तपस्या से भगवान् शिव प्रसन्न हो गय थे। तब विपुर क शत्रु भगवान् शम्भ न इन्द्र से कहा था-- है शतक्रतो । वरदान माम लो ।३श तपसाऽनेन तीव्रण प्रसन्नोऽह तवानघ । ईप्सित ते प्रदास्यामि तव यद्यपि दुर्लभम् ॥३६॥ मयि प्रसन्ने तु हरे न किंचिदपि दुर्लभम् ।३७१ एन मभोर्वच श्व त्वा स्तुत्वा त विविध स्तने । कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणम्याऽऽह महेश्वरम् 1३८1 भगवन्कृतकृत्यो म्मि भवतो दर्शनाच्छिन । अलमन्यैर भो भक्तिर्भवतु मे त्वयि ।३६१ तव भव यमृताम्वादपरानन्दम्य देहिन । भवेत्वष्ट कुत शुभा पूर्णवामो यता हिम [४॥ तावदेवास्थिर नेत परिभ्रमति वस्तुपु। न यावत्वयि देवेश भत्तिमवति देहिन । तावदेव भवाम्भोचिटुम्तरो देहिन हरा। तव पादाम्बुजे भति परा यावन्न लन्यते ।

देनेन्द्र चरित कथन } [ ४५५ कर देग । उम समय म इस प्रकार के श्री गुरुदेव के कथन का श्रवण फरक सुरपति महादेवजी की समाराधना करने के लिये वह एकाश्रम मै चले गये थे।३०।३१। वहाँ पहुचकर मुरपनि जटाधारी हो गया था। केवल भस्म म ही निष्ठा रसन पारे और जितन्द्रिय हो गये थे। वहाँ पर मन्दाकिनी के जल म स्नान करके उन्होने उस भस्म को भि- मन्त्रित किया था ।२२ "अग्नि"-दत्यादि मन्त्रों से पन शरीर वो उदलित किया था। फिर उन पया और मनाहर पुख्ता से दवेश्वर का पूजन दिया था । ३३ वे वहां पर मंत्री विद्या का जाप करते हुए केवल भगवान शिव क ही ध्यान में परायण हार स्थित रहे । इस प्रकार से परत हा मुरपति को चौदह सहय ५५ व्यतीत हो गय थे १३४। इसके अनन्तर दराज की उस तपस्या से भगवास गिव प्रसन्न हा गर धे। तर बिपुर क शत्रु भगवान् शम्भ न इन्द्र च पहा था- हे शतक्रतो । वरदान माय खास तपसाऽनेन तीव्रण प्रमन्नोन्ट तवानय । ईप्सित ते प्रदास्यामि तर यद्यपि दुर्लभम् ॥३६॥ मयि प्रसन्न तु हरे न किचिदपि दुर्लभम् ।३७॥ एका शभोन व त्या स्तुत्वा त विविध म्तने । ताम्रलिपुटो भूत्वा प्रणम्याह महेश्वरम् ॥३८॥ भगवन्तात्योऽस्मि भवतो दर्शनाच्छिव । अलमन्यनर गमो भलिभवतु मे त्वयि । ३६॥ ता भात्यमृतास्वादपरानन्दम्य देहिन । नवेतर कुन सभा पूसामो यता हि ग 1601 तावदवाम्बिर चेत परिभ्रमति वस्तुए। न पावत्वरि देवेश नतिमवति देहिन 1४१॥ नाबदेय भवाम्भोपिर्दुस्तरो देहिन हरा। तर पादाम्पु भक्ति पग पापन्न सम्पते ।।

४८६ ] [ सूर्यपुराण प हे अनय ! तुम्हारी इस तीव्र तपस्या से मै परम प्रसन्न हो गया हूँ। अब मैं यद्यपि कुछ परम दुर्लभ भी होगा उम भी आपके अभीष्ट को प्रदान कर दू गा !३६। मुश हर के प्रसन्न हो जाने पर आपको अव कुछ भी दुर्लभ नही है।३७। इस प्रकार के भगवान् शम्भ, के वचनो का श्रवण करके सुरपति ने सर्व प्रथम अनेक स्तवो के द्वारा उन का स्तवन किया था और फिर दोनो हाथो को जोडकर उनको प्रणाम किया था और फिर भगवान् महेश्वर से कहा था ।३८। इन्द्रदेव ने कहा-हे शिव ! हे भगवन् । मैं आपके दर्शन प्राप्त करके आज कृत्य- कृत्य हो गया है। क्योकि मैंने साक्षात् आपके दर्शन प्राप्त कर लिये हैं। अन्य वरदानो की अब कोई भी आवश्यकता नही है केवल आपके चरणो मे मेरी भक्ति बनी रहे ।३६। आपकी भक्ति के अमृत का आस्वादन से देहधारी को परम आनन्द प्राप्त होता है। फिर कष्ट तो उसको हो ही नही सकता है क्योकि आप तो पूर्ण काम प्रभ, है ।४०। नव तक ही यह अस्थिर विज्ञ सासारिक भोग्य वस्तुओं मे श्रमता रहता है । हे देवेश ! जब तक इस देहधारी की आपके चरणो मे भक्ति नहीं हुआ करती है ।४११ हे हर ! देहधारियो को यह ससार रूपी सागर भी तभी तक दुस्तर हुआ करता हैं जब तक आपके पदाम्बुज मे इसको पराभक्ति प्राप्त नहीं हुआ करती है ।४२। तावत्पतति ससारगर्ते जन्तु. पुनः पुनः । यावन्न तब कारुण्यलेशो भवति शंकर ॥४३॥ ससारविपवृक्षो य. सनतोऽतिभयंकरः। तव भक्तिकुठारेण च्छिद्यते नान्यथा शिव ।४४॥ इति शक्रवचः श्रुत्वा कारुण्यादबलोक्य तम् । समुत्स्पृश्य तु पाणिभ्या गाणपत्य ददौ शिवः ।४५॥ विरञ्चिप्रमुखा देवा जायन्ते कर्मगौरवात् । प्रलये च विनश्यन्ति भवन्ति च पुन. पनः ।४६।

देवेन्द्र चरित कयन [ ४८७ स्वर्ग गत्वा गता श्वभ्र तिर्यक्त्व च मनुप्यताम् । पुनविरच्यादि पदमेव चक्रररम्परा १४७॥ शभोगणेश्वरा ये च चाऽऽवतन्ते भवे पन । भोगान्यथेप्सितान्भुक्त्वा शभो सायुज्यमाप्नुयु 1४८1 स्वेच्छाविग्रहण मर्ने स्वेच्छाचारा गणेश्वरा। शिवेन सह ते भोगाभुक्त्वा यान्ति शिव पदम् ।४६ । यह जन्तु इस समार के गर्त मतभी नक वारम्बार गिरा करता है। हे शङ्कर । जब तक आपकी करुणा का देस इमे प्राप्त नही होता है ।४३॥ ससार का यह विष वृक्ष जो सभी आर से महान नयकर होता है । हे शिव ! आपकी भक्ति रूपी कुठार से इसना छेदन किया जाया करता है। अन्य किसी भी प्रकार से इसका वेदन होता ही नहीं है ।४४। इन प्रकार के दद्र के वचना का श्रवण करने वढी हो करुण स उसकी ओर भगवान् शिव ने अपनी दृष्टि डानी थी और दोना अपने हाथों से उसके अङ्गा का मस्पर्ण किया या शिव न उन अपना गणपत्य पद प्रदान कर दिया था ।४५ विरञ्जि प्रमुख देवया कमों के गौरव से जन्म ग्रहण किया करते हैं और जव प्रलय कार होता तो ये मव विनष्ट हो जाया करते हैं । इसी प्रकार से ये सब वारम्बार हुआ करते हैं। ये स्वर्ग म जाकर बभ्र वायु धारण करते हैं तिय कृत्व को भी प्राप्त किया करते हैं और मनुष्यता प्राप्त करत हैं। ये फिर विरन्जि आदि के पद का प्राप्त किया करते है। इसी प्रकार से चक्र भी परम्परा चला करती है ।४७। भगवान् गम्भ, के जो गणेश्वर होत हैं वे इस तरह म इस ममार म फिर आत्तिन नही हुआ करते है। वे तो यथेथित भोगो का उपभोग करके भगवान् सम्म के सापुज्य को ही प्राप्त किया करते हैं 1४८) मरणेश्वर सब अपनी इच्छा से ही विग्रह धारण करन वाले हुआ करते हैं और स्वेच्छा य ही आचार करने नाले होते हैं , व तो भगवान शिव के साथ भोगा को मोगलर अन्त मे शिव क पद को प्राप्त कर लिया करते है ।।४

४८८
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[ सूर्य पुराण
एव दत्त्वा वर शभुर्गाणपत्य मुदुर्लभम् ।
सुरराजाय शिवये तत्रैवान्तहिताऽभवत् ॥५०
गाणपत्य वरं लव्च्या शिविर्भगवतो द्विजाः।
आशया तस्य देवस्य जगाम स्वपुरी ततः ॥५१
महादेवार्चनरतो महादेवकथारतः ।
स्थित्वा मन्वन्तर तत्र चण्डो नाम गणोऽभवत् । ५२
वृषध्वज त्रिनेत्रश्च जटाजूटेन्दुमण्डित. ।
शुद्धस्फटिकस काशश्चतुर्बाहुत्रिशूलभूत ॥५३
अक्षमालावर. खड्नो मर्वेपामभयप्रदः ।
द्वीपिचर्माम्बरवर. सर्वाभरणभूपितः ।।
रराज शाकरपदे नन्दीश्वर इवापरः ॥५४
एतद्वः कथितं सर्व शिवस्तु चरित द्विजाः।
सर्वपापक्षयकरं सर्वसिद्धिप्रदं नृणाम् ।।५५
श्रद्धया ये पठन्तीदं शिवस्तु चरितं द्विजाः ।
प्राप्नुवल्यश्वमेवस्य फलमित्यत्रवोद्रविः ॥५६
इस प्रकार से भगवान् गम्भु ने वरदान करके और परम दुर्लभ
गणि परय पद प्रदान करके मुरराज के कल्याण के लिये वही पर अन्त.
हित हो गये थे ॥५०॥ हे द्विजो ! शिधि गणपत्य पद का वरदान प्राप्त
करके जो भगवान से मिला था उन्ही देवेश्वर की आज्ञा से वह फिर
अपनी पुरी पो चना गया था ५६। वह फिर मदा महादेव जी की
अर्चना में हो निरत हो गया था और मवंदा महादेवजो की क्या में रत
हो गया था। एक मन्वन्तर तक यहाँ रह परके वह फिर पण्ड दाम
याला शिव का गण पन गया था १५२ उमरा स्पा फिर पम्पन--
प्रिनेत्र राजूट में पन्द्रयारण कर परम मण्डित-शुर सटिक मणि के
सहस-पार भुजाओं वाला और विमून के पारण करने वाला हो गया
पा॥५६॥ यह अक्षो की माला को धारण करने वाला समाजपारी
और सभी को अभय के प्रदान करने वाला हो गया था। हाथी के धर्म

नित्यादि प्रति सचर कथन । [ ४८९ यह के द्वारा अङ्गो को डाकने वाले समस्त आभूषणों से भूषित शाक र पद दूसरे नन्दीश्वर क ही समान शोमित हो गये थे ।५४॥ हू द्विजो । सम्पूर्ण मिविका चरित्र मन आप लोगा को बता दिया है। यह सभी पापा का क्षय करने वाला है और मनुष्य को सभी सिद्धिया के देने वाला है।५। जो इस शिवि के चरित को मध यज्ञ के भजन करने का पुण्य फल प्राप्त कर लिया करते है ऐसा रवि देव ने कहा था ॥५६॥ ॥ नित्यादि प्रति संचर कथन । विभुनीमा भदेदिन्द्रो रक्तस्यान्तरे द्विजा । वैकुण्ठाद्या देवा गणाश्चत्वार ईरिता ॥१ हिरण्यरोमा विश्वश्रीरूध्र्ववाहुस्तथै च । ऐन्द्रवाहु सुवाश्च पर्जन्यश्च महामुनि ॥२ मप्तत पय प्रोक्ता प्रियव्रतकुलोद्भवा । मनोजय सुरेन्द्रोऽभूच्चाक्षुपेऽप्यन्तरे द्विजा. ॥? आयोः प्रसूता भावाद्या कथिता देवतागणा । सुमेधा विरजाश्चैव हविष्मानुत्तमो वुधः ।।४ अविनामा सहिष्णुश्च सप्तैत ऋपय स्मृताः पुत्रो विवस्वतो विप्रा मनुवैवस्वत स्मृत ॥५ साप्रत वर्तते योऽसौ तत्र देवान्नवीम्यहम् । मरुद्भणास्तथाऽदित्या रुद्राश्च वसव स्मृता ॥ पुरंदरस्तु देवेन्द्रो वभूवासुरदर्पहा । वसिष्ठ कश्यपश्चानिजमदग्निश्व गौतम ॥ श्री सूतजी ने कहा-ठे द्विवो । रेवत मन्वन्तर मे त्रिभुनाम वाला इन्द्र हुआ था । वैकुण्ठ आदि देवता हुए थे जो चार गण ही कहे गये हैं ४६० । सूर्य पुराण ११॥ हिरण सेमा-विश्वथी-ऐन्द्र वाहु-ऊर्ध्व वाहु-सुवाहु-पर्जन्य और महा- मुनि-मेरी मात ऋपि बताये गये है जो प्रिय वन राजा के कुल मे प्रमूत होने वाले थे ! हे द्विजो ! चाक्षुष मन्वन्तर मे, मनोजव सुरेन्द्र हुआ था ।२।३। आयु से भावाद्य प्रसू से हुए थे जो देवगण कहे गये हैं। सुमेधा-विरजा-हविप्तार उत्तम-बुध अत्रिनाम वाला सहिष्णु-ये सात ऋपि कहे गये हैं ? हे चित्रो ! विवस्वान का पुन वैवस्वत मनु कहा गया है । ।४।५। इस समय मे जो वर्तमान है । उसमे जो देवगण है उनको भी बतलाता हूँ । मरुद्रण-आदित्यगण-रुद्रगण-वसुगण- ये सब देवता बताये गये हैं 1६। असुरो के हर्प का हनन करने वाला पुरन्दर देवेन्द्र है। वसिष्ठ-कश्यप-अत्रि-जमदग्नि-गौतम-विश्वामित्र-भरद्वाज- पेसे वृषि गण है ॥ विश्वामित्रो भरद्वाज: सप्तैत ऋपया मताः । मन्वान्तराण्यतीतानि वर्तमान मया द्विजाः ॥ कथितान्यथ वक्ष्यामि शृणुध्वं प्रतिसंचरम् । चतुर्धा कथित सोऽपि पुराणेऽस्मिन्द्विजोत्तमाः ॥ निस नैमित्तिकश्चैव प्राकृतात्यन्तिको तथा । योऽय भूतक्षयो लोके नित्यं नित्यस्तु स स्मृतः ।।१० फल्पान्ते यस्तु सहारो नैमित्तिक इहोच्यते । महदाद्य विशेषान्त स यदा याति सक्षयम् ॥११ प्राकृतः प्रतिसर्गोऽय कथ्यते मुनिभिदिजाः । यात्यन्तिकस्तु प्रलयो ज्ञानादेव स जायते ॥१२ तच्च ज्ञान महेगस्यक्तिलभ्यमिति श्रुतिः । पतुयुंगसहस्रान्ते सप्राप्ते भूतगक्षये ॥१३ अनावृष्टिस्ततस्तीमा जायते शतवापिकी। पृक्षगुल्मलताः सर्वाः पृथिव्या यान्ति सक्षयम् ॥१४ है हियो ! मैंने अतीव और वर्तमान मन्वन्तर बतला दिये हैं इसके पक्षात् में प्रति सनर तो बतलाऊंगा। उसका आप लोग थपण करिये ।

नित्यादि प्रति सचर कथन ] [ ४६१ है द्विजोत्तमो ! इस पुराण में वह भी चार प्रकार का बताया गया है IRI नित्य-नैमित्तिक-प्राकृत और आत्यन्तिक ये उसके चार भेद हैं । जो लोक मे भूनो का क्षय होता है वही नित्य कहा गया है ।१०) कला के अन्त मे जो सहार होता है वही नैमित्तिक कहा जाता है। महत से आदि लेकर विशेष के अन्त तक वह सव क्षय को प्राप्त होता है वही प्राकृत प्रतिसर्ग हे द्विजो ! मुनियो के द्वारा कहा गया है । अत्य- न्तिक प्रलय जो होता है वह ज्ञान से ही हुआ करता है ।११।१२। और वह ज्ञान भगवान् महेश के भक्ति से तन्य हुआ करता है-वही श्रुति है। चारो युगो के एक सहस्र के अन्त के प्राप्त होने पर जो भूतों का सक्षय होता है । उसमे बहुत तीन अनाहा होती है जो एक सौ वर्ष तक घला करती है । इम पृथ्वी मे वृक्ष गुल्म और लता आदि सभी सक्षय को प्राप्त हो जाया करते हैं ।१३।१४। गभस्तिमाली भगवानथ सप्तरथोऽभवत् । रश्चिभिः सागराम्भासि तदा पिवति भास्करः ॥१५ दीप्ताश्च रश्मयतेन भवन्ति मुनिपु गवाः । भवन्ति सूर्याः सप्तते सर्वतो रश्मिसकुलाः ।।१६ पा रश्मिप्रतापेन दग्या भवनि मेदिनी। दीपश्च पर्वते. सार्ध सागरैश्च द्विजोत्तमाः ॥१७ सूर्यतेजोग्निदधाना भूताना च परस्परम् । एकत्वमुपजातानामग्निरेकस्ततोऽभवत् ।।१८ ज्वालाभिरखिल विश्व निर्दहत्वाशु पावक । स दग्ध्वा पृथिवी सर्वा रुद्रतेजोविजृम्भित. ॥१६ दिव दग्ध्वाऽथ पाताल दन्दहीति द्विजोत्तमाः। उत्तिष्टन्ति शिखास्तस्य शतयोजनमायताः ॥२० तेजसा तस्य कालाग्नेरग्निः सवर्तकः स्वयम् । दग्ध्वा स चतुरो लोकान्सयक्षोरगराक्षसन् ॥२१

४६२)
[ सूर्य पुराण
.
इसके पश्चात भगवान गस्ति माली अर्थत सूर्य सात रथो वाले
हो जाया करते हैं । उस समय में भगवान भास्कर सागर के जलो को
पोजाया करते हैं ।१५ हे मुनि पुनयो ! उससे उसको किरणे बहुत ही
दीप्त हो जाया करती है। मे सात मूर्य सभी ओर से रश्मियो से सकुल
हो जाया करते हैं ।१६। उनको किरणो के प्रताप से यह सम्पूर्ण पृथ्वी
दग्ध हो जाती है । हे द्विजोत्तमो ! सभी पवंत-द्वीप और सागरो के
सहित पृथ्वी जली हुई सी हो जाया करती है ।१७। सूर्य की अग्नि मे
दग्ध हुए भूतो का परस्पर मे एकत्व को प्राप्त हो जाने वाले होने से एक
ही अग्नि हो जाया करती है ।१८। यह पावक अपनी ज्वालाओ से
सम्पूर्ण विश्व को निर्दग्ध कर दिया करता है । रुद्र के तेज से विजम्मित
वह समस्त पृथ्वी को दाध करके फिर दिप लोक को जलाकर हे द्विजोत्तमो!
इसके पश्चात वह पाताल लोक को जला दिया करता है उस अग्नि की
शिखायें सौ योजन तक ऊची उठा करती हैं 1१६।२०। उस कालाग्नि के
तेज से सम्वत्तंक स्वयं चारो लोको को दाध करके यश-उरग और
राक्षसो पो जला देता है।
तप्तायःपिण्डवत्सर्व जगदेतत्प्रकाशते ।
उत्तिष्ठन्ते ततो मेघास्तडिद्भश्च समन्ततः ।।२२
सवर्तकोपमाः सर्वे नानावर्णा भयकराः ।
जायन्ते भास्कराद्घोरा राविणो मुनिपुंगवाः ॥२३
ततो वर्ष प्रमुञ्चन्ति विन्दुभिर्गजसनिमः ।
ब्रह्मणा प्रेरिता वृष्टिर्जायते शतवापिकी ॥२४
जलोध शमायान्ति तदा कल्पान्तपावकाः ।
दीपश्च पर्वतयुक्ता पृथियो पूर्य ते जलः ॥२५
विलीयते धरा चंव मर्वा एव द्विजोत्तमाः ।
तस्मिन्लेकार्णवे पोरे देवदेवः प्रजापतिः ।।२६
योगनिद्रा समास्थाय शेते ध्यायन्महेश्वरम् ।
एप नमितिकः प्रोक्तः प्रलयो मुनिपुंगवाः ।।

नित्यादि प्रति सचार कथन ] [ ४६३ अत श गुध्वं वक्ष्यामि प्राकृतः प्रलयो यथा । कालाग्निरुद्रो भगवान्परार्धद्वितये गते ।।२८ यह सम्पूर्ण जगन् उस समय मे एक तपे हुए लोहे के गोले के ही समान प्रकाशित हुआ करता है। इसके पश्चात फिर मंध उठते हैं जिनमे सभी और विद्युत चमका करती है ।२२। सभी मेघ साम्वत्तं क के ही समान होते हैं जिनके विभिन्न और विविध तो वर्ण होते हैं और वहुत अधिक भयङ्कर हुआ करते हैं । हे मुनि थप्ठो । वे भास्करा से अधिक घोर ध्वनि करने वाले हुआ करते हैं ।२३। इसके पश्चात् वे मेघ गजी के समान विगाल दो से वर्पा किया करते हैं । यह वृष्टि ब्रह्मा जी के द्वारा प्रेरित होती है और सौ वर्ष तक निरन्तर हुआ करती है ।२४। वे क्ल्प के अन्त की पावक उस समय मे जलो के समुदायो से नाश को प्राप्त हो जाया करती हैं । द्वीपो और पर्वतो से युक्त सम्पूर्ण पृथ्वी जल से परिपूर्ण होकर भर जाया करती है ।२५। है द्विजोत्तमो ! उस समय में यह समस्त पृथ्वी जल मे विलीन-सी हो जाया करती है। वह तो ऐसा समय होता है कि सर्वन एक मात्र सागर ही दिखलाई दिया करता है और वह परम घोर होता है। उसमे देवो के देव प्रजा- पति योग निद्रा में शयन करते हुए महेश्वर भगवान् का ध्यान किया करते हैं । इसीको नैमित्तिक प्रलय कहा गया है हे मुनि श्रेष्ठो ! यह भी उन चारो में से एक प्रलय है ।२६।२७) अव इससे आगे मैं यह वतलाऊगा कि प्राकृत प्रलय कैसे होता है। पराध द्वितय के समाप्त होने पर भगवान् कालाग्नि रुद्र इस ब्रह्माण्ड को भस्मसप्त करके ताण्डव नृत्य करने के लिये समास्थित हो गये थे २८ ।

४६४ ]
[ सूय पुराण
॥ शिव तीर्थ कथन ॥
हेतुना केन भगवोन्कालकालो महेश्वरः ।
श्रोतुमिच्छामि भगवन्ब्रूहि मे कमलोद्भव ॥१
आसीन्मुनिवरः पूर्व नाम्ना श्वेत इति स्मृतः ।
तीर्थोदकानि सेवेत यमाश्च नियमास्तथा ॥२
माहेश्वराग्रणीः शान्तो महादेवार्चने रतः ।
तं नेतुमागतः कालो दण्डहस्तो भयंकरः ।।३
दृष्ट्वा काल स विप्रेन्दो भयव्याकुलितेन्द्रियः ।
स्पृष्ट्वा कराभ्या तल्लिङ्ग ध्यायमानो महेश्वरम् ॥४
प्रहसनववीत्कालः श्वेत मुनिवर मुने।
प्राप्त मयि कथ ब्रह्मन्स्वस्थास्तिष्ठन्ति जन्तवः ॥५
चरन्ति मद्भयात्सर्ने ब्रह्मचर्य तपासि च ।
तीर्थ दान प्रशसन्ति निरताः स्वेष कर्मसु ॥६
यजन्ति मद्भयाद्देवान्यज्ञाश्च विविधास्तथा।
तस्मादुत्तिष्ठ नेप्यामि मम पारावश गतः ।।७
श्री नारदजी ने कहा-किस हेतु से कालकाल महेश्वर भगवान
हैं । है भगवान् ! हे कमलोद्भव ! यह मे भवण करना चाहता हूँ।
आप मुझे बतला दीजिए ।११ श्री ब्रह्माजी ने कहा-पुराने समय में
एक महान श्रेष्ठ मुनि वर थे जिसका नाम श्वेत कहा गया था। वह
सदा तीयों के ही जलो का सेवन क्यिा करने ये तथा यमो के नियमो
का भी पूर्ण पालन किया करते थे । यो में वे मुखिया थे और महादेव
जी की अचना में रति रखने वाले परम शान्त मूति थे। उनको लेने
के लिए हाय में दण्ड धारण कर महात् भयपुर काल लाया था। उम
कार को देगार यह विप्रेन्द्र भय से प्याकुल इन्द्रियों वाला हो गया
था। उनने अपने दोनो करो में भगवान महेस्वर सा ध्यान करणे हुए
उनके लिङ्गका सर्म कर लिया था। उम गमय में हंगते हुए पार ने

शिव तीय कथन ]
[ ४१५
स्वत मुनि वर से कहा था-है मुने । हे प्रान । मरे आ जान पर
जन्तु गण कम स्वस्थ रह सकते हैं ? १२।३.४मेरे ही भय के कारण
स सव ब्रह्मचर्य और तप का समाचरण किया करत हैं। मेरे ही डर
स लोग तीर्थरन दान की प्रशसा किया करते हैं और अपन वर्मों
निरत रहते हैं । मेरे ही भय होन से दवा का-यज्ञा का जोगि अनेक
प्रकार के होत हैं भ जन किया करते हैं । अतएव अब उटिय में आपको
ल जाऊ गा। अब तो आप मरे पास म प्राप्त हो गय हैं अत चलना ही
पडेगा ।६७
दा(ना)तार नैव पश्यन्ति (श्यामि) तवाद्य मुनिपु गवा (व)।
एच निगम्य वचन स वै कालस्य नारद । ८
अथाब्रवीद्यम भीत पाशहरत करालिनम् ।
क्थमीशाचनरत त्व मा नतुमिहाहामि ।।
भिवाचनरताना च त्वत्त कम्माद्भय वद ।
एवमुक्तो यम कोपादुद्वन्ध्य मु(दभान्त्सोन्मु)निपु गवम् ||१०
पारी ढतरं शीघ्र घ्यायमान महेश्वरम् ।
अय देवो महादेव प्रादुर्भूतविनोकभृत् ॥११
त दृष्ट्वा दवदवश प्रहृष्टोभूतदा मुनि ।
शवराज्यारवीत्काल मम भक्त विमाचय ॥१२
स्वतन्त्र एव मद्भक्त स क्य नीयत त्वया।
पदुक्त दवदेवन तदतिक्रम्य मूयंज ॥१३
पुनर्व वन्य नृपति म्यपुरीगमनाद्यत ।
जय दवा महादया विश्वस्वर उमापति ॥१४
है मुनि पुनया गाना गाता या नहा दमत है। नारद!
इस तरह के काम के यान को मुनार इमबन तर पनीर भुन
हापा म पास प्रहारनपा महान करा काल म बारा-1 र
अमनिरत मुनापार संग पास यह है मिारत
पानीमनी नरहा गादी

४६६ ॥ ( सूर्यपुराण । शिवार्चन मे निरत है उनको किमसे भय हो सकता है-आप ही इसे बतलाइये । इस प्रकार से कहे गये यमराज ने क्रोध से उस मुनि पुङ्गव को वाँध लिया था और महेश्वर को ध्यान में भी वह निरत था तो भी मजबूत पाशो से यम ने शीघ्र ही पकडकर बद्ध कर दिया था। इसके अनन्तर त्रिलोकी को धारण करने वाले देव प्रादुर्भूत हो गये थे । और भगवान श कर को देखकर जो स्तक्षात् देवो के भी देव थे वह मुनि परम प्रहृष्ट हुए थे। इसके पश्चात् शङ्कर भगवान उस काल से वोले --मेरे भक्त को छोड दो । मेरा भक्त तो सदा स्वतन्त्र होता है उसको तुम कैसे ले जा रहे हो ? देवदेव ने जो भी कहा था उसका भी अति- क्रमण करके यमराज ने उस नृपति को पुनः बांध लिया था और वह अपनी पुरी को गमन करने के लिये सप्रघत हो गया था। इसके उप- रान्त यह हुआ था कि देवेश्वर महादेव जी ने जो विश्व के ईश्वर और उमा के पति हैं उन्होने उस काल को भस्म सात् कर दिया था और श्वेत मुनि को पाशो मे विभोचित कर दिया था ।८।१४। अकरोद्भस्मसात्काल श्वेत. पाशैविमोचितः । दत्त भपुवता तस्मै गाणपत्यं च शाश्वतम् ॥१५ देव्या सह महादेवः क्षणादन्तहितोऽभवत् । अनेन हेतुना शभ : कालकाल इति स्मृतः ।।१६ अह च विष्णुना सार्धं स्तुत्वा देव महेश्वरम् । प्रसाद्याथ पुनर्जातः कालः शभोरनुग्रहात् ।।१७ अन्यतीर्थ पुण्यतमं ज्वालेश्वरमिति स्मृतम् । रेवातीरे मुनिश्रेष्ठ महापातकनाशनम् ॥१८ कोटिशः सन्ति तीर्थानि तस्मिज्वालेश्वरे शिवे । तत्र स्नात्वा देवरपे दृष्ट्वा ज्वालेश्वर शिवम् ॥१६ कुलकविशमुख त्य (?) गिवलोके महीयते । अन्य श्रीपर्वत श्रेष्ठ सिद्धानामालय शुभम् ॥२० तत्र सिद्धाश्च मुनयो दृश्यन्ते सर्वतो गिरी। सदा सनिहितः श मुलिङ्ग श्रीमल्लिकार्जुने ॥२१ शिव तीर्थ कयन] । ४९७ भगवान् शिव ने उस राजा को शाश्वत गाणपत्य पद प्रदान कर दिया था ।१५। फिर देवी के ही साथ महादेव जी क्षण भर में ही अन्त हित हो गये थे। इसी हेतु से भगवान् शम्भु काल क भी काल कह गय है ।१५। मैंने विष्णु भगवान क ही साथ ही महश्यर देव की स्तुति करके उनको प्रसन्न करके सन्तुष्ट किया था। इसके पश्चात् पुन. शम्भु के अनुग्रह स ही काल समुत्पत्र हुआ अर्थात् सजीव हुआ था 1१७। एक परम पुण्यतम तीर्थ है जो जालेश्वर इस नाम से कहा गया है । हे मुनि श्रेष्ठ । यह तीर्थ रेवा नदी के तद पर है और महान से भी महान् पातका का विनाश कर देने वाला है ।१८। उन जालेश्वर शिव के समीप में करोडा अन्य तीर्थ भी हैं। है दवर्ष ! उनम स्नान करके और जालेश्वर देव का दशन करक इक्कीस अपने कुलो का उद्धार करके स्वय शिव लोक म प्रतिष्ठित हुआ करता है। एक अन्य परम श्रेष्ठ श्री पर्वत है जा परम शुभ और सिदो वा मालय है ।१६।२०। वहा पर सभी आर गिरि म सिद्ध और मुनिगण दिसलाई दिया करते है। श्री मन्जिकार्जुन म भगवान शम्भ सदा ही सन्निहित रहा करते हैं वह लिङ्ग ऐसा दो शिवलिङ्ग है ।२१॥ दृष्टे तस्मिन्परे लिङ्ग जीवन्मुक्तो नरो भनेत् । मनुप्या पशव कोटिमृगाश्वमशकादय ॥२२ श्रीपर्वते मृता सर्व यान्ति श भी पर पदम् । केदारे परम तीर्थ प्रिय देवस्य शूलिन. ॥२३ तन स्नात्वीदक पीत्वा सपूज्य च पिनाकिनम् । गाणपत्यमवाप्नोति देवानामपि दुर्लभम् ।।२४ वृपध्वजे पर तीर्थ देविकायास्तटे मुने । यत्र स्नात्वा शिव दृष्ट्वा ब्रह्महत्या व्यपोहति ॥२५ गादावरी नदी या निर्गता पापहारिणी। तम देवाधिदेनेगस्त्रियम्बा इति स्मृत ॥२६ ४६८ [ सूर्य पुराण तत्र स्नान जपो दान बह्मयज्ञमख कृत । सर्व तदक्षय प्रोक्त नून ब्रह्मगिरौ मुने ॥२७ तन स्नात्वा शिव दृष्ट्वा देवदेव त्रियम्वकम् । स्कन्दनन्दिसमो भूत्वा क्रीडते शिवसनिधौ ।।२८ उम पर लिंग के दर्शन कर लेने पर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाया करता है। श्री पर्वत की बहुत बडी महिमा है वहा पर मनुष्य हो या पश, हा तथा गोटि कोटि मृग-अश्व और मशक आदि प्राणी है वे सब वहाँ पर मृत्युगते होकर भगवान शम्भ के परम पद को ही प्राप्त पर लिया करते हैं। केदार भी एक परमोत्तम तीर्थ है जो देवेश्वर का अत्यधिक प्रिय है । वहा पर स्नान करके तथा वहां का जल पान करके और पिनावी प्रभु का अभ्यर्च न करके मनुष्य गाणपत्य पद की प्राप्ति कर लिया करता है जोकि परम पद देवगणो को प्राप्त करना परम दुनम हुआ करता है ।२२।२३।२४। हे मुने । देविका नदी के तट पर वृषध्वज म एव परमोत्तम तीर्थ है जहां पर स्नान करके और भगवान् शिव का दर्शन करके मनुष्य ब्रह्म हत्या के महा पाप का भी व्यपोह कर दिया करता है ।२५। जहाँ पर गोदावरी नदी निकली है जोकि सभ' पापा का हरण पर दने वाली है वहाँ पर जो दवाधिदेव विराजमान हैं वे त्रियम्बक इस नाम रा वहे गये हे ।२६॥ हे मुने । वहां पर जो पिया गया स्नान-दान-तपश्चर्या और ब्रह्म यज्ञ मग्य है वे सब ब्रह्म गिरि म निश्चय ही अक्षय कहे गये हैं ।२७१ वहा पर स्नान करके और नगवान गम्भु वा दर्शन करके जो देवा के देव श्रियम्वर हैं वह स्वन्द तथा नन्दी र ही समान होकर भगवान् शम्भु देव की सन्निघि म ही क्रीणा पिया करता है ।२८॥ रवाया नातिदूरे तु गोकर्ण इति विश्रुत । जनुग्रहार्थ लोकाना तत्र सनिहित शिव ॥२६ नियतोऽनियतो वाऽपि यो वा को वाऽपि मानव । यस्तु पश्यति गााण रदस्यानुचरो भवत् ॥३०

दिशव तीच व्यन ]
[ ४६९
देवस्य वायुदिभाग दाशी भद्रकालिका।
यासिद्धिप्रदा नित्य दर्शनात्त्राणिना मुन ॥३१
महावलपच भगवान्यास्त गरितापति ।
तम्य दा नमानेण गोमहम्फन लभेत् ।।३२
जयदक्षिणायण मिन्धुतीय मदार ।
तम्य दर्ग नमानण राजमूवफा नमन् ॥३३
अन्यद्दारुवन पुम्य शकरस्यातिवल्लभम् ।
गिरिजारतिना यत्र मोहिता मुनिपरनय ॥३४

५०० ] [ सूर्य पुराण शृण नारद वक्ष्यामि भवस्य चरित शुभम् । श्रवणादेव मनुज शिवस्य दयितो भवेत् । ६। मृगुरत्रिर्वसिष्टश्च पुलस्त्य पुलह ऋतु । जमदग्निर्भरद्वाजो गौतमो भागुरिस्तथा ।३७। वामदेवोऽङ्गिरा शङ्गो लिखितश्च बहच्छवा । विश्वामिनोऽथ जावालिरन्ये च मनयस्तथा ।३८॥ यज्ञर्यजन्ति देवेश तपन्ति च तपस्तथा। अज्ञात्वैव पर भाव देवदेवस्य शूलिन ।३६॥ तेपा मूर्घोत्थितो धूमस्तपसा क्लेशितात्मनाम् । तेन धूमेन महता व्याप्तो ब्रह्माण्डमण्डप १४०। शभोरुत्सङ्गगा देवी धूमव्याप्त जगनयम् । दृष्ट्या पप्रच्छ विश्वेश कोतुकादीश्वरेश्वरी ॥४१॥ श्री नारदजी ने कहा था-हे तात ! भगवान् शम्भु के द्वारा मुनियो की पत्नियां कैसे मोहित करदी गयी थी। इस वृत्तान्त को आप सक्षेप से ही मुझको यतलाने की कृपा कीजिए। मेरे हृदय मे इसके श्रवण करने का बड़ा भारी कौतुक हो रहा है ।३५॥ श्री ब्रह्माजी ने कहा- हे नारद । आप श्रयण कीजिए। मैं भगवान् भव का शुभ चरित बतलाऊ गा । एक ही क्षण मे मनुष्य भगवान् शिव का प्रिय हो जाया करता है । वह ऐसे ही । परम दयालु हैं ॥३६॥ भ गु- अधि-वशिष्ठ- पुलस्त्य-प्रलह-ऋतु-जमदाग्नि-भरद्वाज-गौतम-भागरि वामदेव -अद्विरा-दाल-लिखित-वृहच्छ वा-विश्वामित्र- जावालि और अन्य मुनिगण उम समय म देवेश्वर या यजन यज्ञो के द्वारा पिया करते थे और तपस्या का भी तपन करते थे। विन्तु व देवदेव शूली के भाव को न जानवर ऐमा विया वरते थे। तप से कनेशित आरमा वाले उनके मूर्धा में धूम उत्थित हुना था । वह इतना महार धूम था जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मण्डप व्याप्त हो गया था।३७।१८।३६।४०। भगवान सम्मु की गोद में बैठी हुई देवी ने तीनो भुवनों को धूम से व्याप्त देकर उस ईश्वर की देवी न कौतु से ही विश्वेश्वर से पूछा पा ।४॥

शिव तीर्थ कयन ]
[ ५०१
आश्चर्यमिव मे भाति धूमव्याप्तमिद जगत् ।
धूमस्य कारण ब्रूहि देवदेव महेश्वर ।४२॥
या दारुवन पुण्य मम चातीव वल्लभम् ।
तन तिष्टन्ति मुनयस्तपोनिष्ठा जितेन्द्रियाः ।४३॥
अविदित्वैव या देवि शरीर क्लेशकारिणि (णाम्) ।
तेपा मूनि स्थितो धूमो त्याप्योति सचराचरम् ।।४।
कर्माणि यानि लोकेषु पुष्कलानि वहूनि च ।
सर्वाणि निष्फलाव मामज्ञात्वंव पार्वति १४५३
एव देवस्य वचन भ्रुत्वा शवमथाब्रवीत् ।४६।
देवी ने कहा-मुझे बहुत ही आश्वयं सा प्रतीत हो रहा है कि यह
मम्पूर्ण जगद धूम से व्याप्त हो रहा है। हे देवो के भी देव ।
है महेश्वर | इमका कारण क्या है-यह मुझे आप बतलाने की कृपा
कीजिए ४२॥ ईश्वर ने कहा--जहाँ पर पुण्यमय दारुवन है वह मुझको
अत्यधिक प्रिय है। वहाँ पर मुनिगण स्थित रहा करते हैं जो कि तप में
निष्टा गने वाले हैं और इन्द्रियों को जीत लेने वाले है। है देखिये
लोग मुझको न जानवर ही अपने शरीर को क्लेश करने वाले हैं। उनके
मस्तक मे स्थित धूम ही इम मम्पूर्ण चराचर जगत् पो व्याप्य कर रहा
है।४३४४ हे पावंति ! मेरा नान प्राप्त न करके जो भी कम हैं और
लोगों में ऐसे बहुन से कर्म हुना करत हैं वे सर के सब निष्फल ही हुआ
करते हैं क्योकि उन कर्म करने वालो को मेरा विल्कुल भी शान नही
हुआ करता है। इस प्रकार के दोश्वर के वचन पा श्रवण करके ही
देवी ने भगवान शम्भु ने कहा ४ि५४६॥
देवदेव महादेव मुनीनां भावितात्मनाम् ।
ज्ञानम्य यथा व्याप्तिस्तामह द्रष्टुमुत्सहे ।।
एव देच्या यच श्रुत्वा भगवान्नीललोहिन
विटवेपमधास्थाव यो दास्वन प्रति ।।

५०२ ] । सूर्य पुराण स्त्रीरूपधारी विष्णुश्च शकरेण समागतः । विष्णुना सह विश्वेशो देवदारुवनौकसः ।।६। मोयन्मायया यंभुर्विवचार वने तदा । मुनिस्त्रिय. शिव दृष्ट्वा मदनानलदीपिताः ।५०। त्यक्तलज्जा विवस्त्राश्च ययुस्ता अनु शकरम् । स्त्रीरूपधारिणं विष्णु सर्वे मुनिकुगारका. ॥५१॥ अन्वगच्छन्त देव कामवाणप्रपीडिताः । तदद्भत तदा ज्ञात्वा कुपिता मुनयस्तदा ।१२। लिङ्गहीन हर कृत्वा यो (चक गो) पनेपधर हरिम् । तदा प्रभृति विपेन्द्र शिवा मेखलसज्ञिता ।५३। उभयोश्चैव सयोग. सर्ग पापहर. शिव. इति श्रुत्वा तु देवर्षिब्रह्मणो वचन तदा । जगाम कर्तुं तीर्थानि शिवभक्तिपुरस्कृत. १५४। देवी ने कहा -हे देवो के भी देव महादेव ! भावित आत्मा वाले मुनियो को अज्ञान की जो व्याप्ति हो गई थी उमको में देखने की अभिलाषिणी हूँ कि कैसा अज्ञान उन्हे है ।४७। इस प्रकार के देवी जगदम्बा के वचन को सुनकर नील लोहित भगवान् ने वेप धारण करके वे फिर उस दारुवन में चले गये थे ।।८। सती का स्वरूप धारण करने वाले विष्णु भगवान् भी शङ्कर के ही साथ में वहाँ पर समागत हो गये थे । विष्णु भगवान के साथ विश्वेश्वर ने सव देवो को. जो दारुवन मे निवास करते थे मोहित कर दिया था। जब वे मव माया से मोहित हो गये तो भगवान् शम्भु ने उस समय मे वन में विचार किया था। जितनी भी वहाँ पर मुनियो की स्त्रियां थी उन्होने जव शिव को देखा था तो वे मदन की अग्नि से दीपित हो गयी थी।४६५०। वे सब मुनि पलियाँ लज्जा का परित्याग करके नग्न होकर भगवान् शङ्कर के ही पीछे २ चली गयी थी। हे देव । स्त्री के रूप को धारण करने वाले विष्णु को देखकर सभी मुनियों के कुमार भी काम वाण से पीडिन होकर उनके ही पीछे एक विरका

शिव तीर्थ कयन ]
[ ५०३
चलने लग गये थ। उस समय म उस अद्भुत घटना को देखकर मुनि-
गण बहुत ही कुपित हो गये थे।५१।५२। हर को लिङ्गहीन करके गाप
वेपधारी हरि को करके तभी से लेकर हे विपेन्द्र | शिवा मेखल सज्ञिता
हो गयी थी ।५३। दोना का सयो। सब पापो के हरण करने वाले शिव
हैं। उस समय म देवर्षि ने ब्रह्माजी के इस वचन को मुनकर शिव
की भक्ति से वह पुरस्कृत होकर तीर्यों को करने के लिये चले गये थे।
एतत्सौर पुराण ते यथावत्समुदीरितम् ॥५५॥
यच्छ त्वा मनुज सम्यग्गोसहस्रफल लभेत् ।
कि तीर्थस्तु प्रयागाद्य किं यज्ञैर्भूरिदक्षिण १५६।
यदि श्रुत श्रद्दधान पुराणमिदमुत्तमम् ।
यन देवाधिदेवस्य माहात्म्य कथ्यते विभो ।५७।
गिरीशस्य तु योगीन्द्रा किं तन सदृश भवेत् ।
श्रद्दधान शिने भक्तो नियत शृणुयादिदम् ।५८
ब्राह्मणाशिवभक्ताश्च पुरस्कृत्य समाहित ।
समाप्य सकल वेद पूजयद्वाचक नर ॥५६॥
क्नकेन सुशुद्धन तथा चन्दनखण्डक ।
विश्वेश्वरो महादव प्रीयतामिति भावत ।६०।
दद्यात्स्वण यथाशक्ति वाचकाय सचन्दनम् ।
यद्यपाशी (श) रमामाऽपि दत्ता भूमि शिवाधिना।६११
सा तारयति दातुहि पूर्वजान्सकलानपि ।
श्रुत्वा ग्रामम सम्यग्दद्याद्दानानि शक्तित। ६२।
तान्यक्षयफनान्याहुमुनया बदवादिन ।६३।
यह मूय पुराण में भी था बैंमा ठीक-टोक हमने सुना दिया है।
14 जिसवा अवा करक मनुप्प एव सहन गोआ व दान करना
पुष्प-पत्र प्राप्त पिया करता है । फिर प्रयाग बादि तीर्थो न करने से
तथा बहुत अधिा दक्षिणा यार या क रन से क्या लाभ है ॥५६॥

[ सूय पुर इस उत्तम पुराण को यदि श्रद्धालु पुरुषां ने सुन लिया है जिसमे देवाधि- देव विभु का माहात्म्य कहा जाता है ।। हे योगीन्दो ! इसमे गिरिरा की महिमा भरी हुई है उसके सदृश अन्य क्या हो सकता है ? शिव म भक्ति रखने वाला श्रद्धालु नियत होकर इसका प्रवण करे और शिव के भक्त ब्राह्मणो को समाहित होकर आगे कर लेवे । सम्पूर्ण वेद को समाप्त करक जो वाचक मनुष्य हो उराकी पूजा करनी चाहिए ।५८।५। विशुद्ध कनक से तथा चन्दन के पण्डो से भाव से विश्वेश्वर महादेव प्रसन्न होवें ।६०। जो वाचन करने वाला हो उसको यथाशक्ति चन्दन के सहित स्वर्ण का दान करे । यदि शिवार्थी के द्वारा एक शीर मात्र भी भूमि दी गयी है ।६११ वह दाता को तार देती है और सब पूर्वजो को भी तार दिया करती है। इस ग्रन्थरत का श्रवण कर शक्ति से अच्छी तरह दान देने चाहिए । वेदवादी मुनिगण उन दानो को अक्षय फलो वाले कहते हैं ।६२।६३। ॥ मूर्य पुराण समाप्त ॥

Surya Purana

Author
Gouttam,chamanlal
Title
Surya Purana
File name
Surya Purana
Text
OCR done
Citation
1972
Published
2012/08
Publisher
Barely.,uttar Pradesh.,sanskriti Sansthan Vednagar
Language
Sanskrit
Pages
495
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313028
Barcode
99999990321757.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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