Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Relgadi
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रेलगाडी
TRAINS
WORK LIKE
THIS
केन्द्रीय हिन्नी रिगानय (शिक्षा मंत्रालय) भारत सरकार द्वारा स्वीकृत विहान की विश्वविख्यात पुस्तकें दैनिक जीवन में विज्ञान I-III टो ए टवीडल (EVERYDAY SCIENCE TOPICS I III h T A Tucddle) अाधुनिक जीव-विज्ञान सो एच वाडिगटन (BIOLOGY FOR THE MODLRN WORLD !} ( H Waddin ton) प्रादमी कैसे बना ? ग्राई डस्पू कानवाल मर्वोत्तम बान पुस्ता लागे मागिएणन व पार्नेगो मेडल' म पुरस्त (THE MAKING OF MAN b: Dr 1 W Cornwall) जे योनोस्को विज्ञान का सहज बोध (COMIMON SENSE OF SCIENCL hy J Bronouski) जिन्होने भविष्य बाया एगॉन लासन (MEN WILO SHAPLD THE FUTURE by L.son Lorsen) जिन्होने दुनिया बदल दी एगी लासन (MCN WIIO CHANGED TIIL WORLD 1 Lgon Larsen) आधुनिक विज्ञान के महान अन्वेषक पट्रिय प्रिगल (GREAT DISCOVERERS IN MODERN SCIENCr los Patrick Pringle) बसेपटखाउन प्यनि-अभिलेरान (SOUND RECORDING Works Like This li Ci munt Brown) जेट-यान (JITILATIS Work like This जान पू मार टेसर 11 Julin WR Tuy for)
मानव ससाधन विकास मत्रालय (शिक्षा विभाग) भारत सरकार द्वारा स्वीकृत
रेलगाड़ी
डेविड सेंट जॉन टामस
अलकार प्रकाशन
666, झील दिल्ली-110051
Hind: translation of "TRAINS' Work Like This
David St John Thomas
By arrangement with
JM Dent & Sons Ltd, London
केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा मत्रालय) भारत सरकार के सहयोग से
कार्यान्वित लोकप्रिय पुस्तको की प्रकाशन-योजना के अंतर्गत स्वीकत एव
कैपिटल युक हाउस दिल्ली के निमित्त अलकार प्रकाशन से प्रकाशित
अनुवाद
असीत चौहान
पुनरोधाए
के एन दुये
पुत्प
पपागापर्य15000)
संस्करण
हमा 1990
मनिी 110051
राम नर 110002
।।46 दो शब्द हिन्दी के विकास और प्रसार के लिए शिक्षा तथा युवक सेवा मनालय के तत्वावधान मे पुस्तको के प्रकाशन की विभिन योजनाएँ कार्या िवत की जा रही हैं। हिदी मे अभी तक ज्ञान विनान के क्षेत्र म पर्याप्त साहित्य उपलब्ध नहीं है इसलिए ऐसे साहित्य के प्रकाशन को विशप प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यह तो आवश्यक है ही कि ऐसी पुस्तकें उच्च कोटि की हो किंतु यह भी जरूरी है कि वे अधिक महगी न हो ताकि सामा य हिंदी पाठक उह खरीदकर पढ सकें। इन उद्देश्यो को सामन रखते हुए जो योजनाएं बनाई गई है उनमे से एक योजना प्रकाशको के सहयोग से पुस्तकें प्रकाशित करने की है। इस योजना के अधीन भारत सरकार निश्चित सरया म प्रकाशित पुस्तको की प्रतिया खरीदकर उह मदद पहुचाती है । प्रस्तुत पुस्तक इसी योजना के अतगत प्रकाशित की जा रही है । इसके अनुवाद और कापीराइट इत्यादि की व्यवस्था प्रकाशक ने स्वय की है तथा इसम शिक्षा तथा युवक सेवा मत्रालय द्वारा निर्मित शब्दावली का उपयोग किया गया है । हमे विश्वास है कि प्रशासवा के सहयोग से प्रकाशित साहित्य हिदी को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध होगा और साथ ही इसके द्वारा नान विज्ञान से सम्बधित अधिकाधिक पुस्तकें हिदी वे पाठको को उपल ध हो मकगी। आशा है, यह योजना सभी क्षेत्रो म लोकप्रिय हामी। केद्रीय हि दी निदेशालय ए. सन शिक्षा तथा युवक सेवा मत्रालय
इस पुस्तक में भारत ब्रिटेन तथा अमरीका की रेल-कायविधि में
सर्बाधत रोचक तुलना सम्मिलित है। इन देशो ग प्रयुक्त रेल.
सम्बधी विभिन शब्दा के प्रचलित रूप नीचे दिए गए हैं-
-
भारत में ब्रिटेन मे
अमरीका में
कार (सडक परिवहन) (Car)
कार (Coach)
इजन डाइवर (Engine Driver)
गाड (Guard)
गाड कोप्ठ (मालगाडी) (Guard's Van)
काटा (Point)
रेलमाग (Railway)
मिगनल-बाक्स (Signalbox)
121919754 (Automobile)
कार (Car)
इजीनियर (Engineer)
कडक्टर (Conductor)
कवूज़ (Caboose)
स्विच (switch)
रलमाग (Railway)
नियत्रण या सिगनल बुज
(Control or Signal Tower)
- बुजमैन (Towermin)
-
मिगनलमन (Signalman),
स्लीपर (लाइन के नीचे विद्या
साडी का अाधार) (Sleeper)
टाई (Tic)
विषय-सूची
पृष्ठ
9
10
21
32
40
रेल हमारे लिए अपरिदाय है
भाप
डीजल और विद्युत
रेलगाडिया
रेलमाग
सवेतन
यातायात को गतिशील रखना
वियास
रेल सेवा में नौकरिया
रेल जिनासुप्रा के लिए सुभाव
पारिभापिक शब्दावली
47
62
72
60
81
83
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रेले हमारे लिए अपरिहार्य है रेलगाडियो के इतिहास मे अव-जैसा रोमाचवागेममय कभी भी नहीं रहा। आधुनिक प्रौद्योगिकी के कारण रेलगाडियो, रेतमागों, स्टशनी और सिगनल-बक्मो में सभी प्रसार के विकास करना मम्भव होता जा रहा है। कुछ काय जिनके लिए किमी समय पर दजन या उससे भी अधिर मनुप्यो की आवश्यकता होती थी अव केवल एक मनुष्य जाग मम्पन हो जात है। अय कार्य जिनके लिए कभी घण्टो लगते थे अव केवल कुछ मिनटा मे हो जाते हैं। रेलगाडिया अधिन शीघ्रतापूर्वक अधिर भार ढो रही है और प्राय यह सब अपेक्षाकृत कम मूल्य पर तथा सुरक्षापूवक हो रहा है। यह सच है कि ब्रिटेन और अमरीका मे बहुत मी गाखा लाइो और छोटी लाइनें बद की जा रही है और कुछ छोटे द्वीपो ने अपना ग्ल-नन विल्कुल खत्म कर दिया है । लेकिन बहुत सी लाइने जो समाप्त कर दी गई है, वे है जिनसे कभी भी मुनाफा न हुआ था। वे पिछली शताब्दी मे उम समय बनाई गई थी जब गाडियो के स्थान पर नहरो पर बने पुल और ऊवडखावड सडको पर घोडो द्वारा खीची जाने वाली गाडिया थी। छोटे- छोट वस्वो और गावो की सेवा करने के लिए भी लाइन बनाई गई थी। आजक्ल रेले, परिवहन-सम्बधी कार्य गो, त्रिोपन मामान आदि सम्बधी कार्य को उत्तमता मे परने मे अपना अधिक व्यान केद्रित कर सकती है। सयुक्त राज्य अमरीका में विश्व का मत्तिम मडर तत्र है और बहुत-से परिवार मोटरकारो द्वारा सवन यात्रा करने ह मिन्नु उनके उपयोग मे पाने वाली कुछ वस्तुए उनवे पाम अभी भी रेलगाडी द्वाग ही पहुंचाई जाती है । मोटरगाडियां स्वय भी इम्पात की बनी हुई होती है जो लोहखान मे रेलगाड़ी द्वारा बाहर जाती है और प्रगलन रेन द्वारा ढोए गए कोयले से किया जाता है । ब्रिटेन एक छोटा और घनी आवादी वाला देश है और मार्ग मकुलन के कारण सारे अमरीका की अपक्षा अधिकाधिन यानी रेल द्वारा याना करते है, लेकिन यहाँ भी भारी मामान की ढाई ही अत्यत महत्वपूर्ण है। । 9 ग्लो । युग गमाप्त परी हुअा है-उगमे परिपतन हो रहा है। पारा और वायुयाना की बढती हुई सग्या उनवे लिए एस गौती है किन्तु उनका भविष्य उज्ज्वल है। गरम वडा पग्वितन भाप-युग यो समाप्ति है। लेकिन हम अध्ययन का प्रारम्भ भाप-रलइजनो स ररना हागा क्यारि जो भाप जन प्रान वाले कुछ वर्षों ता बन रहो वे भी अधिकाधिक ध्यान आर्पित ग्नि रहेगे। वस्तुत प्रारम्भ म रेल याया भाप के उपयोग द्वारा ही मम्भव हा मनी थी। भाप सवप्रयम जाज स्टीफमन द्वारा अपो 'गवेट' म प्रयोग की गई थी। आप 'राकेट' और बहुत-मी दूसरी बाता ये गमावकारी प्रारम्भ के बारे में मेरी पुस्तक 'ग्रट मोमेटम विद ट्रेम मे पढ़ सकते हैं। भाप अग्नि पानी को उबालती है और पानी भाप पैदा करता है। भाप सिलिंडरो मे से गुजारी जाती है जहाँ यह पिस्टन पर दवाव डालती है । पिस्टन की गति पहियो तक ले जाई जाती है। यह सब रेतइजन के एर छोर से दूसरे छोर तक फैले वॉयलर में शुरू होता है जिसके तीन भाग होते है-बॉयलर भट्टी (ड्राइवर-कोष्ठ के निकटतम), वैरल और धूम्र बाक्स । वास्तव मे बॉयलर भट्टी (firebox) दो वाक्स होते हैं, अग्नि भीतरी खड मे एक पानी के डिब्बे से घिरी रहती है । जितनी बडी भट्टी की अगीठी होगी और जितनी तेज़ आग होगी उतनी ही अधिक भाप पानी के उबलने से बनेगी। लेकिन अाधुनिक रेलइजनो मे भाप को वहुत मात्रा बरल में उत्पन की जाती है। अग्नि में उत्पन्न रेचर पानी से घिरी हुई क्रमिक छोटी नलिकायो द्वारा सामने स्थित धून-वाक्स को ले जाया जाता है । प्रत्येक नलिका तापन-पृष्ठ बढाती है और इसमें अतिरिक्त ईधन व्यय नही होता। 10 घम्र-बाक्स अग्नि नलिकाएँ पग्नि नलिकाए राव पात्र बॉपलर (The Boiler) रेचक को इन नलकियो मे से चिमनी तक शीघ्रता से ले जाने के लिए ब्लास्ट-पाइप मे सिलिंडरो से प्राप्त रेचक-भाप के उपयोग द्वारा एक कृत्रिम प्रवात उत्पन्न किया जाता है । प्राकृतिक प्रवात पर्याप्त नहीं होता क्योकि पुल और सुरगो के कारण ऊँची चिमनियो का उपयोग नहीं किया जा सकता। इस प्रदात का दाव न केवल चिमनी और नलिकानो मे ही, बल्कि वापस नलिकानो द्वारा वॉयलर भट्टी में भी अनुभव किया जाता है, जहाँ यह एक आशिक निर्वात (partial vacuum) पैदा करता है। इस निर्वात को भरने के प्रयत्न मे आने वाली हवा ऑक्सीजनयुक्त होती है जो कोयले जलाने के लिए आवश्यक है। जव भाप उत्पन हो जाती है तो यह सामान्यत ऋमिक अतितप्त नलिकाओ द्वारा ले जाई जाती है । ये नलिकाए छोटी होती हैं तथा कुछेक वडी अग्निरेचक (fire-exhaust) नलिकाओ द्वारा ढकी हुई बैरल के सबसे ऊपरी और तप्ततम भाग मे स्थित होती है। 600 बल्कि 700डिग्री फारेनहाइट (Fahrenheit) ताप पर भाप इतनी गरम होती है कि यह निलम्बित जल (suspended water) के कणो से मुक्त होती है। अब इस भाप मे इतना वल होता है कि अवसर मिलते ही यह शीघ्रतापूवक फैल सकती है। अब यह (भाप) सिलिडरो मे से गुजरने के लिए तैयार है जहाँ यह मुख्य कार्य करती है। प्रत्येक सिलिंडर एक नाल है जिसमे एक पिस्टन होता है। यह पिस्टन यात्रा के दौरान आगे पीछे होता है जिसे स्ट्रोक कहते हैं जो एक्सप्रेस रेलइजनो मे दो फुट से अधिक होता है । पिस्टन से जुडा हुआ एक पिस्टन- । 11 दड होता है जो सिलिंडरो के भाप-रोक छिद्रो मे से बाहर-भीतर जाता है और एक नासहैड तथा योजक-छडो (बिना गियर के) द्वारा चालक-पहियो से जुड़ा रहता है । ये ही वे बडे पहिए है जिनके माध्यम से रेलइजन अपनी शक्ति पटरी को देता है। सिलिंडर के एक मिरे पर स्थित एक कपाट द्वारा प्रवेश करने वाली भाप पिस्टन को दुमरे मिरे तक धकेलकर चालक-पहियो को चकार लगाने भाप प्रवेशिवा पिस्टन पाट के लिए विवश करती है । न्लास्ट पाइप को जाने PISTON VALVES पिस्टन को वापिस अपनी वाला रेचर प्रारम्भिक स्थिति पर भेजने के लिए सिलिंडर के दूसरे विपरीत सिरे द्वारा भाप भीतर प्रवेश की जाती है और रेचक भाप विसर्जित की जाती है। चालक-पहियो के प्रत्येक पूण पिस्टन धूर्णन के लिए पिस्टन को आगे सिलिडर (The Cylinder) और पीछे चलना पड़ता है और अपशिष्ट-कपाट दारा निष्का- सिन अपशिष्ट-भाप का चिमनी दो कमो मे बाहर निकालती है । लेकिन सरल रेलइजनो मे भी, जिनमे प्रत्येक ओर एक-एक ही सिलिंडर होता है, पिस्टन की गतिया डावाडोल होती है, जिससे चालक-पहियो पर चार प्रघात (thrust) होते हैं और भाप के चार कश निकलते है । बहुत से एक्मप्रेस इजनो मे चार सिलिंडर होते है जिनमे से दो वॉयलर को सम्भालने वाले फेम में स्थित होते है। चार सिलिंडर विशेषत वहा होते है जहाँ सकीणं भार-गेज के कारण दो बड़े सिलिंडरो के लिए स्थान कम रहता है। चारो दो दो के जोडो मे होते हैं ताकि पहिए के प्रत्येक चक्कर के साथ केवल चारही प्रपात हो और चार ही माप कश निकलें। तीन सिलिंडरोवाले रेल- इजन भी होते हैं जिनमे प्रत्येक सिलिंडर स्वतन्त्रतापूर्वक काय करता है और पहिए के प्रत्येक चक्कर के माय चिमनी मे से स्पष्ट रूप से छ कश निकलते हैं। पृष्ठ १३ पर दिए हुए चित्र सिलिडरो मे भेजी जाने वाली भाप का निषत्रण करने वाले कपाटा का उदाहरण हैं। - 12 8 स्टीफेंसन कपाट गियर (Stephenson valie geel) 1 पिस्टन कपाट शीप (Piston valte heads)12 कपाट ता (Valve spindle)। 3 शल धुरा (Rock shaft)। 4 प्रतिवर्ती धुरा (Reversing shaft)| 5 प्रतिवर्ती धुरा स्प्रिंग (Reversing shaft spring) | 6 पिस्टन शीप (Piston head)। 7 पिस्टन दड(Piston rod)। 8 उत्थापक याजक (Lifting links): 9 धुरी(Axle), 8 पाल्स हेटस कपाट गियर (Walschaerts ralve gear) 1 पिस्टन कपाट शीप (Piston valve heads)। 2 त्रिज्या दड (Radius rod)। 3 प्रतिवर्ती धुरा (Reversing shaft)। 4 क्पाट तकु (Vate spandle)। 5 पिस्टन शीप (Piston head) 16 पिस्टन दड (Piston rod) 17 मिश्र लीवर (Combination leser) 1 8 THTC 417* (Expansion link) सिलिंडरो को हर बार पूणत भरने की आवश्यकता नहीं होती क्योकि भाप फैलती है । वस्तुत यदि ऐमा न होता तो पिस्टन अपने प्रधात की सीमा तक प्रचण्डता से फेका जाता और इस प्रकार एक अप्रिय क्श ध्वनि होती । इसलिए प्रघात के समय भाप काट दी जाती है तो सिलिंडर मे घिरी हुई भाप फैलवर पिस्टन को ऐसी गति मे चलाती है जो कम होती रहती है। एक लीवर या हत्था जो प्राय प्रतिवर्ती गियर कहलाता है सब 12 । सिलिंडरो के भाप प्रवेशी कपाटो का नियमन करता है । जब गाडी चलती है तो भाप पिस्टन के तीन-चौथाई प्रघात तक प्रवेश की जाती है। इसके फैलने के लिए अधिक स्थान नहीं होता और एक उग्र, लगभग, विस्फोटक झोका चिमनी में से निकलता है। जैसे-जैसे गाडी गति पकडती जाती है वैसे-वसे भाप की माना कम की जाती है, अन्त मे पिस्टन के स्ट्रोक के 15 प्रतिशत के लिए ही भाप दी जाती है और तब चिमनी से केवल एक मधुर लयपूर्ण ध्वनि निकलती है । जब कोप्ठ मे से विलगक-नियनक या प्रतिवर्ती गियर अपनी अधिकतम या चरम सीमा तव कर दिया जाता है तब यह मशीन को उत्क्रमण मे कर देता है । यह युग्मक-छडो से जुड़ा होता है जिनके बारे में कुछ देर मे और अधिक बताया जाएगा। प्रतिवर्ती गियर कार के गियर के तुल्य होता है । जिस प्रकार एक कार चरम गियर मे चालू नही की जा सकती उसी प्रकार एक रेलइजन अधिक विलगक से सुगमतापूर्वक नही चलाया जा सकता। कार के त्वरक के समान एक नियामक होता है जो बॉयलर में से प्रमुख भाप-नाल मे प्रवेश करने वाली भाप का नियत्रण करता है। इसके कपाट बैरल के शिखर पर पानी की सतह से काफी ऊपर प्राय एक छोटे से गुम्बद मे स्थित होते है । गुम्बद- रहित इजनो मे उच्चतम विन्दु तक पहुँचने वाली भाप को एकत्रित करने मे सहायता देने के लिए वॉयलर नुकीला होता है। भाप का दाव जितना अधिक होगा पिस्टन उतने ही परिश्रम से काय करेगा। ड्राइवर-के कोष्ठ मे छोटे-मोटे कल पुर्जी और मापन-यत्रो की प्रभावशाली व्यवस्था होती है। एक मापन-यत्र बॉयलर मे पानी की मात्रा बताता है ताकि आवश्यक्ता होने पर ड्राइवर या फायरमन इस माना को वढा सके। ताजा पानी भाप-बल द्वारा इजेक्ट क्यिा जाता है। सवारी गाडियो मे तापन तत्र का नियत्रण करने के लिए एक कपाट होता है और लीवर होते है जो रेत छोडते है। यह रेत ढलवां नली द्वारा नीचे रेल की पटरियो पर टपकती है और फिसलने वाली अवस्थामो मे अतिरिक्त पासजन देती है । लेकिन नियामक और प्रतिवर्ती गियर दो मुस्य नियत्रक हैं तथा इह उपयोग में लाते समय ड्राइवर के कौशल की आवश्यक्ता होती है । इन दो प्रमुस नियत्रको के बीच लगभग सीमारहित सचय क्षेत्र है। ड्राइवर के निणय भाप-दाव प्रादि वारखो द्वारा प्रभावित होते हैं। मशीन 14 11016 भूनपूर्व महान पश्चिमी रेलवे के एक रेलइजन का कोष्ठ। बिटन को प्राय रेलवे से मिन्न, इस रेलवे के रेलइजनों का डिजाइन इस प्रकार बनाया गया था कि इहें कोष्ठ की दाहिनी ओर से चलाया जा सके। ड्राइवर रगुलेटर को पकडे हुए है। के परिश्रमयुक्त काय और ईंधन के गुण के अनुसार भाप-दाब कम-ज्यादा होता रहता है । लेकिन एक ही मार्ग पर एकसमान गाडियो को खीचते हुए दो समरूप रेलइजनो को विभिन्न व्यवहार की आवश्यक्ता हो सकती है, जैसा कि पाटो पर कावन या ग्रीज़ के निक्षेप काय-व्यापार को प्रभावित करते है। पहियो की सम्या और प्राकार अत्यत महत्वपूर्ण है। अधिक भार वहन करने वाले छोटे व्यान वाले बहुन मारे चालक-पहिए रेलइजन को अधिक प्रामजन-दर या 'कर्पण-चेष्टा' देते है। क्षण-चेष्टा पौड में मापी जाती है और पहियो के ऊपर वास्तविक भार का अनुपात होती है । हालावि इजन को चालू करने के लिए प्रासजन-दर महत्वपूर्ण है तथापि गाडी चलने लगे तो उसकी गति प्राय अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। जैसे-जैसे गति बढती है रेलइजन के पहियो से रेल की पटरियो तक शक्ति 15 कम हो जाती है और रेलइजन तथा रेल रे डिब्यो के बीच युग्मन द्वारा वह अधिा हो जाती है। यह कपणदड शक्ति कहलाती है। रेलइजन के अपने भार के अनुपात मे शक्ति की उच्चता से गति ज्यादा बढती है । इसमे वडे पहियो का भी हाथ रहता है जो छोटे पहियो की अपेक्षा कम परिश्रमा म अधिर दूरी तय करते है। इमीलिए रेलइजन की डिजाइन बनाते ममय पहला अनिवाय तत्व आसजन दर (या कपण-चेप्टा) और गति (वपणदड शक्ति) पी माग क वीच मतोपजनक समझौते का है। मालगाडी के उजनो में प्रासजन-दर को प्राथमिकता दी जाती है। कुछ तो इतने भारी होते है कि वे अपनी अधिमाश ऊर्जा का उपयोग तो स्वय को चलाने म कर लेते है। येक एक टन रेल-भार के लिए केवल एक तथा एक-चौथाई अश्वशक्ति शेष रहती है । लेकिन कोयले जैसे भार ढोने के लिए गति सदैव आवश्यक नहीं होती। मालगाड़ी के इजन में प्राय आठ पहिए होते है (प्रत्येक पटरी पर चार) जो आपस में जुड़े होते है । पिस्टन अपना बल केवल एक जोडे पहियो पर प्रेपित करता है लेकिन प्रघात का कुछ प्रश युग्मक छड द्वारा दूसरे पहियो तक पहुँच जाता है ताकि चारो जोडे मक्रिय रूप मे घूम सके । माल ढोने वाले इजनो के पहियो का व्यास सामान्यत पाच फुट के लगभग होता है। जमा पि हम पहले देख चुके है एक्सप्रेस रेलइजनो मे भार के अनुपात में शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है लेकिन आसजन-पल को भुलाया नहीं जा सकता अन्यथा रेल को चिक्नी पटरियो पर चालू करना असम्भव हो जाएगा। फिर भी 1930 के आस पास वनाए जाने वाले रेल- इजनो मे आमजन-दर न्यूनतम रखी जाती थी जिमसे भावो रेलो को चालू करना एक अत्यत चातुयपूर्ण कार्य होता था। यह इसलिए या कि सिलिंडरो के पिस्टन की गति-दर को सीमित रखना पडता था । बडे पहिए-जितनी गति पकडने के लिए छोटे व्याम वाले पहिए को अपेक्षाकृत अधिक बार घूमना पडता है और जैसा कि हम देख चुके है प्रत्येक घूणन के लिए पिस्टन का आगे-पीछे चलना अनिवाय हे। आधुनिक पदार्थों और तकनीक, विशेषत शीघ्रतर काय करने वाले कपाटो ने इस समस्या को बहुत हद तक हल कर दिया है और पिस्टन के शीघ्रतर काय ने एक्सप्रेस रेलइजनो के पहिए का व्यास कम करके छ फुट से 16 कुछ ही अधिक रहने दिया है । इस कमी ने प्रासजन-दर या कपण-चेप्टा में उल्लेखनीय वृद्धि को है। आजकल अधिकतर रेलइजनो मे छ चालक-पहिए होते है जो सहयुग्मित होते है। सबसे अधिक प्रचलित प्रकार 4 6-2 'पैसेफिक' का है। 4-6-2 का अथ है कि आगे चार छोटे पहिए होते हैं, जिसके बाद क्रमश छ चालक और तव दो छोटे पहिए होते है । चित्र मे यह इस प्रकार दर्शाया जाएगा मानो आप इजन को केवल एव तरफ से ही देख रहे हो, जमे~-00000, या 00000०-यह दिखाने के लिए कि छ चालक- पहिए युग्मित होते हैं। छोट पहिए विना प्रमुख पहिए के आधार को लम्बा किए भरा सम्भालते है क्योकि जितने अधिक पहिए पापम मे जोडे जाते है, चक्कर लगाते समय उतना ही अधिक प्रतिरोध हाता है । 000000 प्रकार मे, दो जोडी अग्रणी पहिए वोगी (bogre) के होते है जो चूल पर घूमती है और रेलजन को सुगमता स घूमने मे सहायता देती है । ड्राइवर-कोष्ठ के नीचे पिछता जोडा छोट पह्यिो का होता है जो 'पोनी पह्यिा' कहलाता है और घूमता भी है। क्याकि इन छोटे पहियो मे भार होता है तथा ये चालक- पहिए नहीं होते इसलिए ये स्पष्ट म्प से आसजन-शक्ति घटाते है। पुराने जमाने मे 'एक ड्राइवर' रेलइजन होते थे जिनमे चालक- पहियो का केवल एक जोडा होता था जैसे कि 4-2-2, 0000 । आठ फुट तक व्यास होने के कारण ये जल्दी याना करते थे लेकिन इनकी कपण चेप्टा बहुत कम होती थी जो आजकल के भार ढोने के लिए व्यथ सिद्ध होगे। दूसरी चरम सीमा पर कुछ देशो मे दो रेलइजनो वाले भीमकाय जुडवा रेलइजन होते है और प्रत्येक के पहिए का आधार अलग होता है जैसे 0000000000000000 जिसका वणन इस प्रकार किया जाएगा 4-8-4+4-8-41 रेल का इजन विना पानी के कभी भी नहीं रहना चाहिए । अगर कोयला (या तेल, लकडी या कुछ मामलो मे पीट भी) समाप्त हो जाए तो मशीन केवल स्कती ही है। लेकिन यदि जल-पृष्ठ (water-level) कम हो जाए तो भीतरी बॉयलर भट्टी जल्दी ही बहुत गम हो जाती है और यदि आग जलती ही रही तो भारी क्षति हो जाएगी। इस प्रकार के नुकसान से बचने के लिए वॉयलर भट्टी मे एक धातु का फ्यूज होता है और जब ताप सुरक्षा-स्तर (safety level) से ऊपर वढना शुरू होता है तो यह आसानी ।
टडर मे कोयला और पानी (Coal and water in the tender) से पिघल जाता है । जब डॉट पिघल जाती है तो भाप ज्वाला कोआर्द्र करके बुझा देती है । धातु की डॉट को प्रासानी से बदला जा सकता है। दूसरी स्वचालित युक्ति वॉयलर भट्टी के ऊपर वॉयलर के शिखर पर सुरक्षा वाल्व स्थित होता है। यदि दाव बहुत अधिक हो जाए तो यह भाप को निकाल देता है। वहुत-से लोग सोचते हैं कि रेलइजन को केवल कोयले के टेडर की आवश्यक्ता है लेकिन अधिक स्थान तो जल-टकी घेर लेती है । जब इजन स्थिर खडा हो तब टकी किसी रेलइजन डिपो या स्टेशन पर जल केन से TE MAHINILION रेलइजन पानी लेते हुए (Taking up water) 18 भरी जा सकती है, या लम्बे अविराम माग पर पटरियो के बीच बिछी हुई जलद्रोणी या रडाह द्वारा भरी जाती है। ठी समय पर फायरमैन डोई (scoop) को दो इच नीचे भरा देता है और गाडी की गति पानी को पर खीव लेती है। टिग करने तथा स्थानीय गाडी में चलने वाले इजन जलन से अपनी पिया कई वार भर सरने हैं और उह परिचर को आवश्यकता नही.. होतो : जैसा कि टंक इजन नाम से पता चलता है पानो रेलइजनो से ही लगी - टक वाला रेलइजन (A tank locomotive) - हुई टक्यिो में ले जाया जाता है। टैक इजन दर्शाने के लिए पहियो के विन्यास के बाद T अक्षर जोड दिया जाता है जैसे 2-6-2TI भाप-रेनइजा का लाभ उनके डिजाइन की सादगी और उनकी सवलता में निहित है। वे डीजल की अपेक्षा बहुत कम कीमती और अधिक टिकाऊ होते हैं। जव ड्राइवर प्रतिवर्ती गियर ठीक बैठा देता है और नियामर (regulator) खोल देता है तो रेलइजन गाडी को बिना अतिरिक्त सहायता के चालू कर देता है । पहाडी पर चढते समय अस्थायी रूप से भाप के दाब को कम करके वास्तव में बनने वाली भाप की अपेक्षा अधिक भाप का उपयोग किया जा सकता है और शिखर पर पहुँचने पर उसे पुनगृ हीत किया जा सक्ता है। दुर्भाग्यवश, उनके लिए, जो श्वेत भाप के बादल देखना और तालपूण ध्वस्विर सुनना चाहते है, भारी असुविधाए भी है।
डिजाइन मे सरल होते हुए भी भाप-इजनो मे समय-समय पर ईंधन भरने की, सफाई तथा देख-भाल करने की आवश्यक्ता होती है और इसी लिए डीजल तथा विद्युत्-इजनो की तुलना मे ये दिन मे कम घटे तक ही कार्य कर सकते है। एक्सप्रेस भाप के रेलइजनो के पीछे पूर्ण-व्यवस्था से यात्रा करना आलादपूण हो सकता है लेकिन बहुधा ईधन खराव होता है या यतावति वा कुछ भाग समजन से परे हो जाता है। चालक और फायरमैन पर बहुत कुछ निभर करता है जो अपने कौशल के अनुमार एक ही रेल के इजन से बहुत भिन्न-भिन प्रकार के काम लेते है । इजन गदगी फैलाते हैं और खतरनाक चिंगारिया पेरते है । उनका भार भी बहुत अधिक होता है जिससे उनके स्वय के चलने मे इंधन व्यथ जाता है। भाप के रेलइजना की गति १०० मील प्रति घटा से ऊपर तक पहुंच चुकी है लेकिन ऐमा लगता है कि उनको अन्तिम सीमा तक सुधारा जा चुका है। एक निराशा तो इस बात से हुई पि धारारेसण (मारी मशीन को एक पारागिन रेसजन (Streamlined locomotire) Fiगोन मेटर) भी प्रधिर मतराने म प्रगपत रहा। मम्मी मोर प्रति घटे गे रम गति हो पर रायु प्रनिगेय नही ये बरावर राम हपा। बागी पारागिा गोरे पर हटाई जा चुरी है यानि ये 'इन (innards) नागरमा मे पाने में बाधा उत्पन्न करती हैं। 20 डीजल और विद्युत् आप लगभग दम मम्भव प्रकार के रेल-चालन शक्ति की सूची बना सकते है । उदाहरण के लिए याना प्रारम्भ होने से पूर्व विद्युत द्वाग चाजित वैटरी से चलने वाले इजन और टरवाइन रेलइजन जो सामान्य तरीके से भाप बनाते है लेकिन जो इसका उपयोग अपनी स्वय की विद्युत् बनाकर पहिए को चलाने में करते है । गैस-टरवाइन रेलइजन भी होते है और एक दिन ऐसा ग्राएगा कि परमाणु-शक्ति युक्त रेलइजन भी सम्भव हो सकेंगे। लेकिन साधारण भाप के अतिरिक्त डीजल और विद्युत् ये दो प्रकार की शक्तिया बडे पैमाने पर उपयोग की जाती है। विद्युत्-चालित गाडियो को, शक्ति उत्पन करने वाला सामान अपने साथ नही ढोना पडता इसलिए वे सबसे सस्ती पडती है। लेकिन प्रारम्भिक विद्युतीकरण अत्यधिक कीमती पडता है और यह उसी स्थिति में उचित है जवकि यातायात वहुत अधिक हो। गाडिया चलाने मे कम खर्च आने के कारण यानियो को जी भरकर सुख सुविधाए दी जा सकती है गौर इससे भावी यातायात को प्रोत्साहन भी मिलता है यदि वह पहले से ही नहीं है। इसके विपरीत यदि यातायात क्म हो जाए तो विद्युतीकरण पर लगाया हुआ धन बचाया नही जा सकता और रेल-सेवा कम करने से व्यय मे उतनी कमी नही होगी जितनी की डीजल रेलो के बद करने से होगी। उन स्थानो पर जहाँ तेल मस्ता है और उसकी सप्लाई का आश्वा सन है विद्युतीकरण की अपेक्षा डीजलीकरण की क्रिया अधिक तेजी से हो रही है । वस्तुत अमरीका मे तो विद्युतीकरण लगभगसमाप्त कर दिया गया है। परन्तु ब्रिटेन को तेल का आयात करना पड़ता है और उसके पास विद्युत् बनाने के लिए काम में लाए जाने वाले कोयले की किस्म वहुत खराब है । परमाणु-ऊर्जा का उपयोग सीधे रेलइजनो के लिए करने की अपेक्षा विद्युत् द्वारा किए जाने की अधिक सम्भावना है। माल ढोने वाली और बहुत सी एक्मप्रेस गाडियो के लिए अलग- अलग रेलइजनो का उपयोग होता है। लेपिन कम या मध्यम दूरी तक जाने वाली डीजल या विद्युत् गाडियो में प्राय एकसाथ कई इजन होते है। 21 बहुल इवाई मे अमिय मवारी डिरे होते है जो कम से कम विसी एक सैट म बनाए गए डीज़ल इजन या बिजली की मोटर से जुड़ होते है। प्रत्येक सैट के अन्त म एक चालन-मोठ होता है। कई सटा वा प्रापम HRIMARBLEEL दो डिवो वाली टीजर यहुल इकाई (Tho coach diesel multiple unut) मे जोड़ा जा सकता है और उन सभी ये इजना को उम ममय उपयोग में आने वाल काप्ठ द्वारा एकमाय नियनित किया जा सकता है। किसी भी सिरे स चलायी जा सकने के कारण बहुल इकाई गाडिया शटिंग से बहुत कुछ बची रहती है। इनमे ड्राइवर को आवश्यक नियत्रण-हत्या अपने हाथ मे लेकर वेवल कोप्ठ बदलने पडते है । और चाहे कितनी ही इकाइया आपस म जोडी जाए शक्ति से-भार का अनुपात वही रहता है क्याकि प्रत्येक अतिरिक्त इकाई अपने साथ अपना इजन लाती है । वहुत-सी शाखा-लाइनो पर दो कोच वाली इकाइया उपयोग की जाती है । किसी एक कार मे जो शक्ति-वार होती है एक डीजल इजन या बिजली की मोटर और एक चालन-कोप्ठ भी होता है । दूसरी कार में भी चालन-कोष्ठ तो होता है लेकिन यह शक्ति युक्त नहीं होती और चालक- अनुयान कहलाती है। व्यस्त लाइनो पर प्राय तीन या चार कार वालो इवाइया होती है। चार कारो वाले सैट मे आम तौर पर शक्ति गाडी होती है जिसके दोनो सिरो पर चालन-कोष्ठ होते है। इन सैटो के बीच में बिना चालन-कोष्ठ वाले अनुयान होते है । इस प्रकार की दो, तीन या चार इकाइया भी प्रापस मे जोडी जा सकती है। लेकिन प्रत्येक की कार मरम्मत की दूवान के अतिरिक्त और कही नही खोली जाती। 'बहुल इकाई' शब्द का तात्पय एक अकेली कोच या एक रेलकार से हो सकता है जो उपवरणो द्वारा दूमरी कारो से जोड दिए जाने पर स्वय । 22 कार्य करने लगती है। किसी समय भाप की रेलकारे, मिले-जुले भाप-इजन और कोचे भी होती थी लेकिन ये अधिक सफल न थी। उन लाइनो पर जहाँ भारी उपनगरीय या स्थानीय यातायात और उन शाखामो पर जहा कम यातायात होता है वहुल इकाई गाडिया अत्युत्तम रहती है । वस्तुत बहुत-सी शाखाएँ केवल इसीलिए खुली हुई ह कि छोटी बहुल इकाई टीजल गाडियाँ छोटे-से छोटे रेलइजन को गाडिया की अपक्षा बहुत सस्ती पडती है। इम सब का तात्पय सैट को यथासम्भव विनिमयशीन बनाना है ताकि प्रत्येक सैट आत्मनिभर हो और सब दर्जे की सीटे हो । इसका अर्थ हुआ कि उन स्थानीय सेवाग्रो के अतिरिक्त, जहाँ आवश्यक्ताएँ मामूली होती है, कम-से-कम तीन कार वाली इकाई का उपयोग किया जाना चाहिए। उन एक्सप्रेसो के लिए जिनमे भोजन और शयनकार तथा यात्रा के दौरान दूसरी लाइनो वाले मीधे डिब्बे प्रयुक्त और नियुक्त किए जाते हैं अलग अलग रेलइजन काम मे लाने चाहिएँ । प्रत्येक अवस्था में अलग-अलग रेलइजन द्वारा खीची जाने वाली गाडियाँ अधिक आमानी से चलती है यद्यपि कई वर्षो तक दिन मे चलन वाली अमरीकी और महाद्वीपीय तीव्रगामी एक्सप्रेम गाडियो मे केवल एक बहुल इकाई रही है। इस बहुल इकाई में कारो का क्रम होता है जिसमे खान-पान वाली कार भी सम्मिलित है और जिसकी व्यवस्था कभी नहीं बदली जाती। शटिंग के काम मे आने वाले छोटे इजनो को छोडकर डीजल और विद्युत् रेलइजन मुरयत कुछ कुछ सवारी कारो की भाति लगते है जिनका सारा भार दोनो सिरा पर स्थित बोगिया द्वारा ढोया जाता है। बहुत से उदाहरणो में कम-से-कम वहा जहा विजली के रेलइजन होते हैं और प्रत्येक धुरी शक्तियुक्त होती है, शक्ति इन वोगियो द्वारा प्रेपित की जाती है । इसका अथ है कि क्षण-चेष्टा की हानि नही होती जैसा वि भाप-इजनो मे होता है जि हे सुगमता से चलाने के लिए बडे चालक-पहियो के साथ-साथ छोटे बोगी पहियों की आवश्यकता भी पडनी है हालांकि ये इजन इन पह्यिा द्वारा नहीं चल सकते। जैसा कि हम पिछले अध्याय मे देख चुके हैं इन अतिरिक्त पहियो द्वारा उठाया गया भार चालव-पह्यिो पर भार वम पर, देता है और इसलिए क्पण-चेप्टा कम हो जाती है। 11461 23 - विजली के ऐसे इजन जिनकी कपण-चेप्टा भाप-जन जिती होती है बहुत हत्के होते हैं और परिचर (tender) को अनुपस्थिति को ध्यान में रखते हुए यह इंधन पर होने वाले बहुत मे व्यय को बचाता है । यह बहुत-से डीजल रेलइजनो के बारे में मच है लेकिन डीजल रेलइजनो का भार उनके ग्राकार के अनुमार कम-ज्यादा होता है। जमा कि ऑटोमोबाइल पेट्रोल-इजन मे होता है, डीजल में घन का सम्भरण गियत्रित करने के लिए बाऽग्टर नहीं होता और इसे मिलिंडर में विस्फोट करने के लिए स्फुलिंग प्लग नही होता । मिलिंडर मे उपस्थित पिस्टन वायु पोतर तक सम्पीडित करता है जब तक रि यह अपने प्रारतिव आकार से पद्रह्वा भाग घेर ले और लगभग 1000 डिग्री फारेनहाइट तर गरम हो जाए। इस स्थिति में कुछ तैल-रिदुपा को उच्च दाव पर सिलिंडर मे घुमाए जाने पर वायु विस्फोटित होती है । विस्फोटन या दहन इजन का कशेपट घुमाने के लिए पिस्टन को नीचे ढकेलता है। अॉटोमोबाइल का पेट्रोल-इजन अपने काळूरेटर द्वारा ईधन और वायु के मिश्रण को चूमता है और अपरिपक्व-प्रज्वलन और शक्ति (power) की हानि को रोकने के लिए सम्पीडन-दर को सात या दम से एक के बीच रखना पड़ता है। जब तक मिलिंडर म पिस्टन अपने स्ट्रोक के चरम पर नहीं होता इधन प्रवेशित नही किया जाता। डीजल में इस प्रकार का खतरा नहीं होता। पद्रह या उससे अधिक और एक के अनुपात वाली सम्पीडन-दर का अर्थ इंधन से अधिकतर शक्ति प्राप्त किया जाना है। दो और चार, दोनो प्रकार के स्ट्रोक वाले इजन काम में लाए जाते है। चार स्ट्रोर चक्र इस प्रकार है-(1) वायु भीतर खीची गई, (2) वायु सम्पीडित की गई, (3) ईधन प्रवेश और विस्फोट किया गया (यह शक्ति- स्ट्रोक) है, (4) दग्ध गैमो का रेचन । दो स्ट्रोक वाले इजन मे, जिसम प्रत्येक द्वितीय स्ट्रो शक्ति वाला होता है, गैसो का रेचन किया जाता है जबकि पिस्टन के आगेहण के साथ-साथ शुद्ध ताजा वायु प्रदर आने दी जाती है और सम्पीडित की जाती है। एक ऑटोमोबाइल अपने इजन की शक्ति को पहिया तक ले जाने के लिए क्रमश फिसलते हुए क्लच का उपयोग करता है। रेलवे के काम के लिए पाँव द्वारा चलाया जाने वाला साधारण क्लच मजबूत नहीं होता लेकिन तीन प्रकार के डीजल जनो मे से डीजल-यात्रिक प्रकार वाले इजन मे एक 24 यानिक-क्लच और एक गियर-वाक्स होता है जिसमे गियर, या तो निश्चित गति पकड लेने पर, स्वत ही विजली द्वारा अथवा स्विच के टिमटिमाने पर, ड्राइवर द्वारा वदले जाते है। जितनी बार गियर बदला जाता है उतनी ही वार इजन की गति कम की जाती है और प्रत्येक गियर मे पूरी शक्ति उसी स्थिति में इस्तेमाल १ 10 ॥ RAM 14 12 13 डीजल द्रवचालित कोष्ठ नियर (Diesel by draunc cab controls) 1 स्वत गाडी नियत्रय पुन स्थापन हत्या (A T C resetting handle)। 2 निवान व सपाट (Vacuum brake valre)| 3 एक वायु-गय मापी (Single ur pressure guge)। 4 दुष्ल वा-गाव मापी (Duplexair pressure gauge)। 5 यायु-प्रेर कपाट (Air brake valhe)6 नियत्रण स्विच (Control switch es) (frह सगाने वाले प्रकाश, वायू गियर प्राषि) (marker lights sanding scar, etc) 7 6717 5T17 (Warning lights) : S 9777117 (Speedom meter)। 9 निर्शन मापी (Vacuum gaugc) 1 10 शोत चालन के लिए गोंटिंग स्विप (Shorting switch for cold start) 11 इजन पोर मवरण पपगारक (Enginc ard transmisson isolator) 12 517 777 791 (Horn valte handle)| 13 शक्ति हत्या (Poucr hindic), 14 परमार प्रशिक्षा नियम (Forward and rescrse control): 15 अगिर मेजर पौर विच (Moment contactors and switches)! 25 की जा सकती है जबकि उस गियर मे गति लगभग अधिक्तम हो, फिर भी यह बहुत से रेल-कार्यों की भावी मांग को पूरा नही कर सकती। ग्राम तौर पर डीजल यात्रिय 600 अश्वशक्ति से यम होते है। कभी-कभी इनका उपयोग बहुल इकाई (गाडियो) के लिए किया जाता है जिनके लिए कई छोटे इजन चाहिएँ। दूसरे दो प्रकार के टीजलो-डीजल-द्रवचालित और डीजल-विद्युत् -मेइजन विना क्मिी रुकावट के काम कर सकते है। दरअसल रास्ता माफ होने पर इजन को प्रति मिनट बरावर सग्या के परिक्रमण से लगातार चलाया जा सकता है। प्रवणता और वक्र के द्वारा दिए जाने वाले प्रतिरोध अनुसार माग मे पह्यिो की गति स्वत बदलती रहती है। वस्तुत इजन सामा यत एक ही गति पर नही रखा जाता । त्वरव या शॉटल सिलिंडर मे प्रवेश करने वाले तेल की माना को बढाता-घटाता रहता है । लेकिन इजन की गति भले ही कुछ हो, पहिए की गति प्राप्त होने वाली ऊर्जा तथा प्रवणता के प्रतिरोध और अन्य कारका के अनुसार स्वत नियत हो जाती है। डीजल द्रवचालित मे इजन की गति और पहिए की गति के बीच स्वत समजन ऐठ परिवर्तिन' के वद डिब्बे मे द्रव्य (पानी नही बल्कि तेल) द्वारा सचरण से होता है। ऐठन शक्ति सीधे इजन से सम्पर्क रखने वाले पहिए से चालक धुरी से (गियर द्वारा) जुडे हुए दूसरे पहिए को तेल द्वारा पहुँचाई जाती है। डीजल द्रवचालित को विकसित करने में अच्छी प्रगति की जा रही है। उदाहरण के लिए ब्रिटिश रेलवे अपने मुरय लाइन के एक भाग की डीजलीकरण योजना के लिए 2000 से 4000 अश्वशक्ति पर निर्भर है। लेकिन तीसरे प्रकार का डीजल-डीजल-विद्युत्-अभी भी एक्सप्रेस गाडियो और स्विचन काय के लिए बहुत उपयुक्त है हालाकि उतनी ही अश्व- शक्ति के डीजल-द्रवचालित की तुलना में इन मशीनो का भार आधा होता है। इसका सिद्धात साधारण है । इजन जनिन को चलाता है जो एक साधारण विजलीघर की तरह ही विजली बनाता है। यह विजली चालक- धुरी के विभिन्न क्षण मोटरो मे ले जाई जाती है । टीजल यात्रिक और डीजल द्रवचालित रेलइजन के सभी भागो का चालन मचारण इजन से धुरी तक एक-दूसरे के प्रति एक नियत भौतिक सम्बध से होना चाहिए। लेकिन डीजल-विद्युत् रेलइजन को केवल इजन - 26 भार- डीजल यचालित रेलइजन (Diesel hydraulhe locomotive) और जनित्र की मावश्यकता है । जनित्र से धुरी तक शक्ति उन केवलो द्वारा ले जाई जाती है जिनको किसी विशेष व्यवस्था की आवश्यकता नही । यह डिजाइन मे बहुत सहायक है और कम मे-कम कुछ अश तक अतिरिक्त -विशेषत जनित्र के भार- ~को क्षतिपूर्ति करती है। कुछ शॉटल नियतक, या जैसा कि ये कभी-कभी मान नियत्रक भी कहलाते है, ड्राइवर को बहुत-सी निश्चित स्थितियो की छूट देते है । इजन जिस 'क्रान्तिक' गति पर कम्पन करने लगता है उससे बचना पडता है। जहाँ लचकदार नियत्रण हत्थे की व्यवस्था है वहां भी यह इन गतियो को पीछे छोड जाता है। बहुल इकाई गाडियो के इजन उपयोग मे आने वाले किसी भी कोष्ठ से एक दूरस्थ वैद्युत-वातिल नियत्रण-तत्र द्वारा नियत्रित किए जा सकते हैं। ट्रेन से एक केबल जुड़ा रहता है और विद्युत् द्वारा नियत्रित वाल्व कपाट सम्पीडित वायु के दाब का नियमन करते हैं और वायु प्रत्येक इजन को सप्लाई होने वाले इंधन की देखभाल करती है। छोटे बहुल इकाई इजनो मे भी कई सिलिंडर होते है जो छत के नीचे क्षतिज रूप से लगे होते है। बिल्कुल यही तरीका 6000 या अधिक अश्वशक्ति वाले आपस में जुड़े हुए दो या अधिक रेलइजनो को नियनित करने मे बरता जाता है, जैसा बहुधा अमरीका मे होता है। डीजल और विद्युत् रेलश्जन तथा बहुल इकाई गाडियो के नियत्रक से आम तौर पर एक 'जड मनुष्य का' हत्या या बटन जुडा होता है जिसे कि ड्राइवर को हर समय पकडे या धकेलते रहना पड़ता है। यदि कोई ऐसी घटना हो जाए जिससे ड्राइवर की पाड ढीली हो जाए तो 'जड आदमी' रेल को बन्द कराा शुरू कर देता है-हालांकि ड्राइवर को कुछ सेकड का समय 27 दिया जा सकता है ताकि वह अपने कोष्ठ से शीघ्रता मे बाहर देस सके। डीजल-रेलइजन मे बहुत से क्ल-पुर्जे चाहिए और प्रत्येक मशीन के प्राचार-प्रसार के अनुसार ही इनकी विविधता होती है। उदाहरण के लिए छोटे शटिंग करने वाले डीजल-यात्रिक हाय द्वारा घुमावर चालू किए जाते हैं जबकि डीजल-विद्युत् बैटरी मे सचित को हुई विद्युत्-धारा द्वारा चलाए जाते हैं । कभी-कभी एक छोटा भिन्न जनित्र होता है जो शीतक-पखो और प्रेक-तत्र आदि को चलाने के लिए बिजली उत्पन्न करता है। स्नेहन के लिए भारी उपस्वर और आग बुझाने के लिए स्वचालित यय अवश्य चाहिएँ। और अब हम विजली के रेलइजनो पर पाते हैं जो बिना देखभाल किए बहुत लम्बे समय तक कायरत रह सकते हैं और केवल उसी समय शक्ति का उपयोग करते हैं जवकि वास्तव मे चल रहे हो। विजली की कहानी केवल रेलवे तक ही सीमित नहीं है। जैसा कि बहुत-से पाठक जानते होगे, विद्युत्-धारा चुम्बकीय क्षेत्र मे घूम रहे विद्युत्- चालक द्वारा बनाई जाती है। इसी प्रकार जव रेलइजन द्वारा धारा काम मे लाई जाती है तो यह चुम्बकीय क्षेत्र में परिकामी आमेचर या ढोल पर लपेटे हुए चालको मे से गुजारी जाती है । प्रार्मेचर को गति क्रमिक गियरो मे से पथ पर स्थित पहियो की धुरी तक ले जाई जाती है। विद्युत्-कर्षण-मोटरें कभी-कभी ही दिखाई पड़ती हैं । सामा यत वे जिस धुरी को चलाती हैं प्राधी तो उसी द्वारा आलम्बित होती हैं और आधी बोगी के ढाचे से निलम्बित होती है । इसे 'धुरी से लटकी, नाक से निलम्बित' ('axle hung, nose suspended') कहते है । लेकिन ऐसी कुछ मोरे अब पूरी तरह ढाचे से निलम्बित होती हैं और धुरी का चालन भी लटका हुप्रा होता है, ताकि पहिया के हिचकोले मोटर को नही लगते । रेल को विद्युत्युक्त करने से पूर्व दो प्रश्ना के उत्तर देने पडते है । क्या काम मे लाई जाने वाली धारा दिप्ट या प्रत्यावर्ती होनी चाहिए? और क्या यह धारा रेल द्वारा अथवा ऊपरी तार द्वारा सप्लाई की जाए दिष्ट धारा से साधारणतम मोटर सम्भव है अर्थात् धारा परिपथ के चारो ओर लगातार एक ही दिशा मे बहती रहे । यह विशेषत क्रमवद्ध खोटी मोटरोवालीबहुल इकाई गाडियो के लिए अधिक उपयुक्त है। दरअसल प्रारम्भ मे विद्युतीकरण का लगभग हमेशा ही अथ होता था दिष्ट धारा, बहुल इकाई गाडिया, और एक तीसरी पटरी। तीसरी पटरी (जिससे गाडी 28 अपनी धारा लोह-सम्पर्क-जूते से प्राप्त करती है) विशेष इस्पात की होती है और बहाव का कम-से-कम प्रतिरोध करती है। लेकिन धारा को अपना परिपथ गाडी द्वारा काम मे लाई जाने वाली किसी एक पटरी द्वारा पूर्ण करना होता है। कभी-कभार इसके लिए दो अलग-अलग रेलो की व्यवस्था की जाती है। साधारण विजलीघर प्राय प्रत्यावर्ती धारा बनाते है और यदि रेल- पथ को दिष्ट धारा चाहिए तो पटरी पर हर कुछ मील बाद इसे एकदिशकारी मे परिवर्तित करना होता है । ब्रिटिश रेलवे का दक्षिणी क्षेत्र, जहाँ विश्व का सबसे अधिक याता- यात है, 660 वोल्ट की दिष्ट धारा, तीसरी पटरी प्रणाली का उपयोग करता है और लगभग सारी दिष्ट धारा बहुल इकाई गाडियो मे उपयोग करता है। नए ट्रक-पथ (trunk route) के विद्युतीकरण के लिए अब प्रत्यावर्ती धारा और ऊँचाई पर स्थित तार पसद किए जाते है। प्रत्यावर्ती धारा परिपथ मे अपने प्रवाह की धारा लगातार बदलती रहती है। प्रत्यावर्ती धारा के बदलने की और पुन अपनी मूल दिशा मे जाने की सस्या को अभिव्यक्त करने के लिए प्रति सेकड इतने चक्र' ऐसा कहा जाता है। अभी तक (ब्रिटेन मे) रेल-काय के लिए साधारण विजलीघर या पटोग्राफ सहित विद्युत रेसइजन (Electric locomotive mth pantograph) 29 शक्ति-स्टेशन की 50 चक्र प्रतिसेकड वाली प्रत्यावर्ती धारा को काम मे लाना असम्भव था लेकिन अब ऐसा सम्भव है और दूसरे सुधार भी प्रत्यावर्ती धारा मोटर (alternating current motors) को स्वीकार करते हैं । आकार बढने के साथ साय दिष्ट धारा मोटरें अपनी सरलता और हल्केपन वाला लाभ खो बैठती है। ब्रिटिश रेलवे की प्रमुख शाखा के विद्युतीकरण का मानक 2,500 वोल्ट है । इस प्रकार के ऊंचे वोल्ट के दो लाभ हैं उन्हे इतने मोटे सचालक की आवश्यकता नही और इसीलिए अधिक सुरक्षित ऊंचाई वाले तार सत्रिय रेलो (live ratls) का स्थान ले सकते हैं । तव सम्भरण स्थलो को और दूर- दूर रखा जा सकता है क्योकि उच्च वोल्टेज वेहतर ढग से सचारित होते हैं। इन उप-स्टेशनो पर ट्रासफार्मर (transformer) होते हैं जो राष्ट्रीय ग्रिड की ऊँची वोल्टेज तक की धारा कम कर देते हैं । इससे पूर्व कि कपक इजन इस धारा का उपयोग कर सके यह आवश्यक है कि दूसरे चरण मे यह धारा 2,500 वोल्ट से केवल कुछ सौ रह जाए। यह रेलइजन के ट्रान्सफामर द्वारा किया जाता है । पटोग्राफ (pantograph) के तावे की सतह द्वारा यह धारा एकत्रित की जाती है । पटोग्राफ रेलइजन के शिखर पर निकला हुआ नलिका का ढाचा होता है जो ऊपर लगे हुए तारो को हल्के-हल्के दवाते हुए छुए रहता है । अमरीका और महाद्वीप, विशेषत मास मे, अधिकतर बिजलीयुक्त प्रमुख शाखाएँ भी ऊँचाई पर स्थित उच्च-वोल्टता व्यवस्था काम मे लाती है। विद्युत्-चालित बहुल इकाई गाडियो मे प्राय अर्द्ध-स्वचालित नियत्रक होता है । ड्राइवर गाडी को जिस गति पर पहुंचाना चाहता है, उस पर इस नियम को सट पर देता है और पहियो को फिमलने से बचाते हुए शक्ति के अनुसार ही शीघ्रता से त्वरण किया जाता है। रेल के इजन पर नियमय की सम्भाल पूर्णत ड्राइवर के अधीन होती है । यह नियत्रक खोच- युक्त होता है और प्रत्येक सांच मोटर में 'प्रतिरोध' पाटती है। भारी गाडी में पूरी शक्ति तक 'सांचने में कई मिनट लग जाते हैं । ड्राइवर को मीटर पर निगाह रखनी होती है वि कही मोटर को प्राप्त होने वाली पारा या एम्प्स (amps) निरापद-सीमा का उल्लघन न पर माए । यदि गति बहुत तेज कर दी जाती है तो एक स्वचालित यत्र मोटर गोमाद पर देता है और तब उमे दुवारा घालू परना पड़ता है। 30 बिजली की मोटरे अत्यधिक गरम होने से पूर्व ही कार्य कर सकती है और तापमान घटाने के लिए रेलइजन मे एक यात्रिक सवातन उपस्कर होता है जो काफी जगह घेरे रहता है । विद्युत् के लिए शीत अच्छा है। कुछ मोटरे इस प्रकार बनाई जाती है कि वे एक निश्चित गति से ऊपर लगातार नही चलाई जा सकती लेकिन केवल कुछ मिनटो त अतिरिक्त ऊर्जा का भार सह सकती है। पहाडी से उतरते समय कुछ रेलगाडियो की मोटरा को विद्युत् व्यय करने के बजाय विद्युत् बनाने वाली कर दिया जाता है। इस तरह उत्पन्न धारा तार या सक्रिय रेल को वापस कर दी जाती है । साधारण ब्रेको को क्षति से बचाने के लिए ये मोटरे को का काम भी करती हैं। विद्युत् और डीजल-विद्युत् रेलइजनो के पहियो की व्यवस्था धुरी- शक्ति (power arles) के लिए अक्षरो द्वारा अभिव्यक्त की जाती है (A का अथ एक और B का अथ दो आदि) और अशक्त या 'सुस्त' ('rdler') धुरी की अभिव्यक्ति के लिए सरया का उपयोग होता है। प्रत्येक भिन-भिन्न पहिए के आधारो के बीच +, -, - या x चिह्न होते है। छ पहियो वाली बोगी, जिसमतीनो धुरियो मे शक्ति होती है, C या Co कहलाती है। छोटा 'o' इमीलिए जोड़ा जाता है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि धुरिया शक्तियुक्त है। दो शक्तियुक्त धुरियो के बीच मे एक सुस्त धुरी वाली छ पहियो की बोगी को A1A लिखकर दर्शाया जाता है। एक ऋण चिह्न (minus sign) जैसे कि Co- Co या 1-B-B-1 [दोनो सिरोपर भिन शक्ति- रहित (non-powered) पोनी पहिए (pony truck) वाला रेलइजन तथा शक्ति-सम्पन्न धुरी वाली दो बोगिया भी] केवल यह बताता है कि विभिन्न पहियो के आधार के वीच ब्रेक है। धन-चिह्न जैसे Bo+Bo का अथ है कि बोगियाँ बिना प्रमुख रेल- इजन के ढाँचे की सहायता के एक-दूसरे से जुडी हुई है (जब तक कि गाडी के अग्रणी यान के साथ अन्य प्रकार से सूचित न किया गया हो)। अमरीका मे x और जैसे कि 2x (Co-Co) या 3-(AIA+ AIA) का क्रमश यह अर्थ है कि एकसाथ काम करने वाली रेलइजन इकाइयो के वीच एक स्थायी 'क्पण-दड' (drawbar) सम्बध अथवा स्वचालित युग्मक (automatic coupler) सम्बध है। - 31 रेलगाडियों पुराने जमाने में रेलगाडियो में जजीरो द्वारा ढीले-ढाले जुड़े हुए डिब्बे होते थे और तक या तो रेलइजन मे या गार्ड के डिब्बे में होते थे। निटेन की बहुत मी मालगाडियां अभी भी अच्छी हैं। उनके खुले डियो (trucks) मे ग्रेक लगे हुए होते है, लेकिन येवल हाथ-बेक (hand brakes) होते हैं जो व्यक्ति द्वारा ही काम में लाए जा मरते हैं । इस "पिनिग डाऊन' ('pinning doun') के लिए रेलगाडी को अवश्य ठहरना पडता है, और विसी ढलान पर से गुजरते समय रेलइजन को ब्रेक के दाव के विपरीत डिब्बो को खीचना पडता है। यदि ऐसा न हो तो डिब्बो का रामपुर वायु-ग्रेक (Air brake) प्रमुख प्राशय (Main resernor)| 2 रेचर (Exhaust) । 3 इजन ब्रेक सिलिंडर (Engine brake cylinder) | 4 वायु मपोडर (Air compressor)। 5 भाप रोक कपाट (Steam stop valve): 6 ब्रेक कपाट (Brake valve) । 7 गाडी नाल (Trun pipe)। 8 माशय (Reservoir)। १ प्राशय (Reservoir)! 10 गाई पाट (Guards valve)। 11 माशय (Reservox) | 12 ब्रेक सिलिंडर (Brake cylinder)। सारा भार बुरी तरह से रेलइजन को ढकेल दे। इस अपव्यय वाली प्रणाली का अन्त तभी होगा जब ब्रिटिश रेलव अपनी आधुनिकीकरण योजना पूर्ण कर लेगी। तब ब्रिटेन और अमरीका मे भी लगभग सारी रेलें एक गहरी गुंथी 32 हुई इकाइयां होगी । प्रत्येक यान न केवल अपना भार ढोएगा वल्कि सपूर्ण तत्र के एक अग के रूप मे महत्वपूण काय भी करेगा, उदाहरण के लिए ब्रेक-तत्र की नलियाँ जो एक सिरे से दूसरे तक फैली होती है । हालाकि कभी-कभी विद्युत्-शक्ति का उपयोग किया जाता है, पर दो प्रमुख प्रकार के ब्रेक होते हैं जो बहुत-से पहियो पर एकसाथ लगते है। अमरीका के अधिकतर रेल-मार्गा द्वारा सम्पीडित वायु-नेक का उपयोग किया जाता है। ब्रिटेन की कुछ शाखाप्रो पर भी इसी प्रकार के वायु-ब्रेक बरते जाते है लेकिन वहाँ निर्वात ब्रेको का प्रचलन अधिक है । दोनो ही मामलो मे रेलइजन मे एक पम्प होता है जो रुक-तत्र मे दाब या निर्वात पैदा करता है। इसका सिद्धात यह है कि यदि उपकरण का कोई भाग क्षतिग्रस्त हो जाए तो वे स्वत ही लगते रहे। वायु-ब्रेक मे दाब सामान्यत 70 पौड प्रति वग इच रखा जाता है और जब ब्रेक काम नहीं करते तो सम्पीडित वायु प्रत्येक यान पर स्थित टकी को भेजी जाती है । जव ड्राइवर गाडी की गति घटाना चाहता है तो वह एक लीवर (lever) को घुमा देता है जो मुरय तत्र मे दाब को कम कर देता है। इससे वायु को टकी मे ले जाने वाले कपाट स्वत ही बन्द हो जाते हैं और टकी तथा ब्रेक-सिलिंडर के वीच वाले कपाट खुल जाते है। सचित सम्पीडित वायु का दाव सिलिंडर मे उस पिस्टन को धकेलता है जिससे ब्रेक-दड (brake-rod) जुडा रहता है। यह तन सवथा दोपरहित है क्योकि जब तक कि मुरय नाल और सारी टकियो मे काफी दाब नही होता गाडी चल नही सकती और यदि युग्मन ढीला हो जाए तो दो यानो के बीच ब्रेक-नाल का सम्बध टूट जाने के कारण दाब एकदम कम हो जाएगा और इस प्रकार दोनो डिब्बे रुक जाएंगे। वायु-ब्रक वायुमडल से ऊँचे वायु-दाब पर निर्भर करता है। निर्वात बेक इससे विपरीत प्रकार से काय करता है । इस क्रिया में वायु, रेलइजन के निष्कासक द्वारा बाहर निकाली जाती है और इस प्रकार जब तक समुचित निर्वात नहीं होता तब तक गाडी चालू नहीं होती । जब ड्राइवर द्वारा जान- बूझकर या किसी और तरह से वायु प्रवेश करायी जाती है तब वह प्रत्येक ब्रेक-सिलिंडर के पिस्टन के नीचे अपना माग ढूढ लेती है और बचे-खुचे निर्वात मे पिस्टन को ऊपर धकेलकर रोक लगा देती है। 33 HIM firafa às (Vacuum brake) 1 इजन ब्रेक सिलिंडर (Engine brake cylinder) । 2 रचक (Exhaust)। 3 भाप मोर ब्रेक कपाट (Steam and brake valves) | 4 निर्वात गेज (Vacuum gauges) । 5 पम (Pump)। 6 कपाट (Valve)। 7 लचकदार युग्मन (Flexible coupling) | 8 ग्राशय (Reservour) | 9 नेक ब्लॉक तथा कषण दड (Brake blocks and pull rods) | 10 गाडी नाल (Train pipe)। 11 कपाट (Valve)। 12 ब्रेक ब्लॉक (Brake blocks)। 13 ग्रेक सिलिंडर (Brake cylinder)। शक्ति के शन -शन उपयोग द्वारा ही रेल चालू की जाती है और इसी प्रकार शनै -शन ही इसे रोक्ना भी चाहिए । बहुत तेज गति को धीमा करते समय ही अधिक्तम ब्रेक लगाए जा सकते है और जसे-जैसे गति कम होती जाती है वैसे-वैसे दाब भी कम करना पडता है, अयथा पहियो में ताला लग जाएगा और वे विना घूमे ही आगे की ओर फिसलते रहेंगे। जब आपतकालीन स्थिति में कोई यात्री जंजीर खीचता है तो ब्रेक आशिक रूप से लग जाते हैं लेकिन निरापद समय देखते ही रेल को पूरी तरह रोक्ने का दायित्व ड्राइवर का ही होता है । यह बहुत ही कम होता है कि एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैले को मे ढीलापन मा जाए, फिर भी इस बारे में सावधानी बरतनी पड़ती है। युग्मनों को सुधारने के लिए बहुत-से प्रयोग किए गए हैं और बहुत धन खच किया गया है। 34 ब्रिटेन मे सामान्यत दो योजक और एक पेंच वाले पेच-युग्मन का उपयोग किया जाता है । पेंच को तब तक कसा जाता है जब तक कि दो डिब्बो के साइड बफ्फर (side buffers) एक-दूसरे से सट न जाएँ। सख्त युग्मनो से यात्रा सुविधाजनक बन जाती है। अमरीकी दृढपाशी स्वत युग्मक जो एक-दूसरे मे हुक की तरह फसी हुई हाय की अगुलियो की भांति होता है, युग्मक और वफ्फर दोनो का काम देता है । इससे यानो के बीच की दूरी न तो बढ सकती है और न ही घट सकती है । युग्मित तो वास्तव मे लौह या इस्पात छडो की केन्द्रीय सिलें (centre-sills) होती हैं जो आर-पार होती हैं और गाड़ी के मेरुदड के समान होती है । इन्ही केन्द्रीय-सिलो द्वारा रेलइजन के कषणदड-शक्ति और ब्रेक-तनाव दोनो सचारित होते हैं। सर्वोत्तम सरल गति सन्धित (articulated) गाडियो की होती है जो एक अकेली अविभाज्य इकाई होती है । इसमे एक बोगी दो डिब्बो के सिरो को खीचती है । इसमे एक स्पष्ट कठिनाई यह है कि यदि एक डिब्बे मे कुछ खराबी हो जाए तो सारे सैट को ही मरम्मत-घर मे भेजना पडता है। कुछ . 'पिग्गो-पीठ' गाडी ('Piggy back' train) 35 प्रसिद्ध महाद्वीपीय एक्सप्रस गाडिया सन्धित गाडियां हैं। सवारी गाडियो के डिब्बे के बीच, युग्मक-योजक और ग्रेक-नाल की तरह ही प्राय गलियारा या द्वार-प्रकोष्ठ योजन (आमतौर पर चमडे की घोकनी) और तापन-नाल योजन होता है । भाप-रेलइजन तापन-तत्र को सीधे अपने बॉयलर से भाप देते हैं। सदियो मे 10 प्रतिशत तक भाप इस प्रकार उपयोग में लाई जाती है। इस काय के लिए डीज़ल मे प्राय एक विशेष प्रकार का छोटा बॉयलर होता है। विद्युत्-गाडियो मे तापन और प्रकाशन की व्यवस्था सक्रिय तार (live wire) या रेल से प्राप्त धारा द्वारा की जाती है । भाप और डीजल वाले डिब्बे अपनी प्रकाशन धारा का निर्माण बैटरी का भरण करने वाले पट्टी-चालित डायनमो (dynamo) द्वारा स्वय रते है। ब्रेक-तत्र, युग्मन और अय उपकरणो का काफी मानकीकरण हुआ है। आजकल लगभग सारा अमरीकी चल-स्टाक किसी भी रेलपथ द्वारा यात्रा 150 -130 90 -109- ब्रिटिश यूरोपीय उत्तर अमरीकी तुलनारमा भार मापी (Comparatire loading gauges) 36 कर सकता है। इसके विपरीत यानो की और विशेषतया माल ढोने के यातायात की विविधता बढ रही है । यह ब्रिटेन के बारे में भी सच है जहा अधिकाश माल-डिब्बो में, जिनमे निर्यात मेक और पेंचदार जोड वाले डिब्बे भी सम्मिलित है, अभी भी चार पहिए होते हैं । मालगाड़ी को सामान्य सीमा 60 डिब्बो तक की है। इससे अधिक डिब्य वाली लम्बी गाडियां दो के बराबर मानी जाती है। अन्त मे गार्ड का डिब्बा होता है जो अमरीका म 'कब्बूज' (caboose) के नाम से पुकारा जाता है। गार्डो का काय महत्वपूर्ण होता है जिसमे अपनी गाडियो की देख-रेख और उनके प्रेको का नियत्रण भी सम्मिलित है। लकडी की बनी पुरानी ब्रिटेन की मालगाडियाँ मात्र 10 टन तक भार ढो सकती हैं और नए मानक इस्पात के बने खुले डिब्ध भी केवल 242 टन भार ढो सकते है । माल ढोनेवाली अमरीकी कार को भार वहन करने की औसत क्षमता 43 टन है और कारो की लम्बाई इतनी अधिक होती है कि धुमावो पर आराम से मुड सकने के लिए कारो के बीच मे बोगियो की आवश्यकता होती है। कुछ गाडियो मे कारो की सरया 100 से भी अधिक होने के कारण उनकी लम्बाई एक मील से अधिक हो जाती है। इसीलिए रेलइजन के इजीनियर और कैब्वूज़ के चालक के बीच रेडियो-सचार- व्यवस्था होती है। विभिन्न प्रकार के सामान ढोने के लिए अभी तक मानक- वक्स-कारें बरती जाती है लेकिन कुछ उदाहरणो मे जैसे-दूध, मास, मोटर- गाडियां, फल, अनाज और फर्नीचर आदि के लिए विशेष कारें होती है जिनका क्षेत्र प्रतिवर्ष बढता रहता है । कुछेक कारें वायुमडल के प्रतिरोधी होती है और कुछ पूणत प्रशीतित होती है। अमरीका और कनाडा मे 'पिग्गी बैक' ('Piggy Back') गाडियो की वृद्धि मे महत्वपूर्ण उनति हुई है। ये पूरे लदे हुए सडक पर चलने वाले ट्रको को विशेष प्रकार के चपटे-तल वाली कारो मे प्राय बहुत दूर-दूर तक ले जाती है। कोयले जैसा मानक-सामान ढोने वाले वाक्स-वैगन के सिवाय बाकी सभी लदी हुईमालगाडियोका यात्राग्रारम्भ करने से पूर्व एक भार-गेज द्वारा निरीक्षण किया जाता है ताकि यह पता चल जाए कि कोई ऐसी चीज़ बाहर तो नही निकली हुई है जो किसी मुरग या पुल से टकरा जाए। हालाकि ब्रिटेन और अमरीका, दोनो मे, रेल-पटरिया के बीच की दूरी 4 फुट 83 इच 37 MS । 2 3 प्रतिहपी मिटिग एक्सप्रेस गाडीक 1 सामान (Luggage)। 2 बदली गाड (Relief guard)| 3 और 4 द्वितीय श्रेणी यात्रीगण (II class passengers) है फिर भी अमरीका की अपेक्षा ब्रिटेन मे अतिव्यापन कम छोड़ा जाता है। इसके कारण ब्रिटेन की सवारी गाडी के डिब्बो का आकार-प्रकार बहुत सीमित हो गया है लेकिन चूकि छ या सात घण्टे से अधिक समय लेने वाली यात्राए बहुत कम होती है इसलिए अत्यधिक विविधता की प्रावश्यक्ता है भी नहीं। भोजन और शयन-यानो को छोडकर ब्रिटिश रेलगाडियो मे बैठने की व्यवस्था अधिकतर दो प्रकार की होती है । अभी तक अधिकाश यात्री छ या आठ सीट वाले डिब्बे पसद करते हैं (या स्थानीय यात्रा-सेवा में अभी भी बरती जाने वाली दसया बारह सीट वाली विना गलियारे की कोचें) लेकिन इन दिनो अब 'खुली' कोच का रिवाज बढ रहा है जिसमे भोजन-कार की तरह बीच वाले गलियारे के दोनो ओर बैठने की व्यवस्था होती है। ब्रिटेन की गाडियो मे कोचो की सामान्य संख्या 15 है। प्रत्येक की लम्बाई 60 फुट से तनिक अधिक होती है। आगे और पीछे जहा हवडादवडी मे चढने-उतरने के कारण दुघटना द्वारा क्षति की सम्भावना अधिकतम होती है वही सामान रखने की जगह छोडी जाती है । सामान रखने की जगह या तो सवारी गाडी के डिब्बे मे ही होती है या एक अथवा अधिक विशेप पार्सल- डिब्बे होते हैं । उन गाडियो मे, जिनमे अलग अलग शाखाओ को जाने वाले डिब्बे जुडे रहते है, विभिन्न शाखाओ वाले खडो के लिए गाड तथा सामान रखने की जगह अलग-अलग होती है। बहुत-से पार्सल और डाक भी सवारी गाडी द्वारा भेजी जाती है। (एक्सप्रेस की गति से चलने वाली विशेष प्रकार को पासल और डाकगाडियां भी होती है।) यदि भोजन-कार को केवल थोडी ही दूर तक नही जाना होता तो यह कार सामा यत बीच मे लगी हुई होती है और प्रथम तथा द्वितीय दोनो श्रेणी के डिब्बे इसके निकट ही होते है। कुछ गाडियो में दो भोजन-यानो के बीच मे एक रसोई-यान और हल्के जलपान के लिए शायद अलग से युफेन्यान (Buffet Car) भी होती है। 38 DUPLETCHIO IRTER SHARE REFEDu 7 8 ! of typical British Express) 5 प्रथम श्रेणी यात्रीगण (I class passengers)। 6 बुफ-यान(Buffet car)17 एव8 दितीय श्रणी यात्रीगण (II class passengers)19 गाह व मामान(Gunrd& Luggage) अमरीकी गाडियो मे सवमे महत्वपूण सुधार वातानुकूलन की दिशा में हुआ है ताकि बाह्य मौसम चाहे जैसा भी हो गाडी के भीतर सुखद ताप ही रहता है । वातानुकूलन का प्रारम्भ 1930 मे हुआ था। बहुत-सी अाधु- निक अमरीको कारें 85 फुट लम्बी होती है। ब्रिटेन मे भी कुछेक गाडियाँ आरामदेह पुलमन-यान (Pullman-Car) हैं लेक्नि फिर भी अमरीका से कोई समानता नहीं, जहाँ गाडियाँ क्या है पहियो पर घूमते-फिरते वास्तविक DERERBEFFEED ran . एक प्रतिस्पी ब्रिटिश रेलवे का यात्री डिस्चा (Atypical British Railways passenger coach) होटल हैं जिनमे बैठने का प्रब व ऐसा है कि वे अकेले व्यक्ति, दम्पत्ति और समूह के लिए रात और दिन, दोनो मे, काम आ सके ! उदाहरणाथ, इनमे तीन गयन-कक्ष वाली इकाइयां होती हैं जि हे दिन के समय एक विश्रामकक्ष के रूप मे बदला जा सकता है । पुल और सुरगो की ऊँचाई से लाभ उठाकर दुमजली-व्यवस्था की जाती है जिनमे कारो की छत पर शीशे के गुम्बद बने होते है ताकि चारो ओर के दृश्यो का अवलोकन किया जा सके। 39 रेलमार्ग चूकि बहुत-सी एक्सप्रेस गाडियो का भार 500 टन और भार ढोने वाली कुछ अमरीकी गाडियो का भार 5000 टन से भी अधिक होता है और पटरियो पर आसजन शक्ति केवल रेलइजन के पहियो द्वारा डाली जाती है। अत आश्चर्य नहीं कि सौ मे केवल एक प्रवणता होने पर भी गति तत्काल धीमी हो जाती है। 50 मे से 1 प्रवणता भावी गाडियो के लिए खतरनाक है इसका यह अथ है कि सवारी गाडी के डिब्बो का अगला भाग पिछलो से एक फुट ऊचा है। मुन्य शाखाओ पर भी 35 मे से 1 प्रवणता वाले छोटे- छोटे टुकडे होते हैं लेकिन उन अवस्था मे गाडी के प्राय पिछले भाग मे अतिरिक्त रेलइजन शक्ति को आवश्यकता पडती है । एक आधुनिक मोटर- कार विना कठिनाई के 5 मे से 1 वाली पहाडी पर चढ जाती है लेकिन गाडियो के लिए यह असम्भव है-सिवाय उन पहाडी रेलमार्गों पर जिनकी पजायुक्त लौह-पटरियो की किगरी रेलइजन के विशेष पहिए के दातो को फसा लेती है। || सयुक्त राग्य को मपरिवतनीय पुसमन (Convertible Pullman on United States rallmays) 40 mar DISMITION ALBERaney सयुक्त राज्य पुलमन वे काच के गुम्बद (Glass dome on United States Pollman) इसलिए सड़को को अपेक्षा रेलमार्गों मे घाटियाँ और पहाडिया पार करने के लिए अत्यधिक उत्तार और कटाव होते है । किमी भी रेलमार्ग के लिए शानदार उत्तार और लम्बी गहरी सुरगे बहुत खर्चीली होने के साथ- ही-साथ मूल्यवान निधियाँ है। पवत-माग मे 'नियत्रक ढाल' सवसे तीखा होता है और इसके कारण विभिन प्रकार के रेलइजन एक सीमित माना तक भार खीच सक्ते है । प्रवणता की भाति ही भयकर मोड भी गति को कम कर देते है इसीलिए इजीनियर मोडो की रिज्या एक मील से कम रखना पसन्द नहीं करते। लेकिन कई बार कम गिज्या वाले मोड भी रखने को विवश होना पडता है, विशेषकर पवतीय जिलो मे जहा मोड एक मील से भी कम दूरी मे अपना चक्र पूरा कर लेते है । गाडी को माग मे यथासम्भव सहायता देने के लिए बाहरी पटरी, भीतरी पटरी की अपेक्षा तनिक ऊँची रखी जाती है। इसका सिद्धात भी वैसा ही है जैसे कि मोड काटते ममय मोटर- साइकिल सवार स्वय को तथा अपनी मगीन को एक कोण पर तिरछा कर लेता है। 41 (((. USANEL रेलमाग के उत्तार (Railway jaduct) रेलपथ के तीन मुख्य भाग होते हैं--पटरियां, स्लीपर जिन पर पटरियाँ रखी जाती हैं, और गिट्टिया (ballasts) (प्राय टे हुए पत्थर के टुकडे) जो स्लीपर को खिसकने से रोकते है तथा नीव का काम करते है । अव मे कुछ समय पूर्व तक ब्रिटेन ही एक अपवाद था जो बुलहैड पटरी (bulthead rails) का उपयोग करता था। इन पटरियो की निचली सतह एक्दम ऊपर की सतह की तरह थी जिस पर गाडी चलती थी। ऐसा इस कारण रखा गया था कि जब उपरला तल घिस-पिट जाए तो पटरी को उल्टा बदलकर उसके निचले तल को काम मे लाया जा सके। यह योजना खरी नहीं उतरी क्योकि गाडियो के पम्पन के कारण इन पटरियो का पैदा भी खराब हो जाता था। लेकिन वह रेलपथ स्थायी होता था जिसमें पटरियो के सकीणतम भाग और उहे स्लीपरो से बाधे रखने वाली कुसियो के बीच लकडी की गिट्टियाँ (wooden keys) फंसी रहती थी। उपर्युक्त रेलपथ इस शताब्दी मे अमरीका तथा अय स्थानो मे बरते जाने वाले चपटे-तल वाले (flat bottomed) रेलपथ जितना ही अच्छा होता था। इसमे पटरियो को अपनी जगह बनाए रखने के लिए उनमे से 42 नुकीली लम्बी कीले ठोकवर स्लीपर तक पहुँचायी जाती थी। लेकिन अब प्रतिगज 100 से 110 पौड भारवाली पटरियों कुछ अधिक गच्छी तरह फिट की जाती हैं और वे प्रतिगज 95 पौड भार वाली ब्रिटेन की बुलहेड पटरियो जैसी स्थिरता वाले रेलपथ बनाती हैं । ब्रिटेन के पुराने ढग के रेल- पथ की अपेक्षा चपटे-तल वाले रेलपथ में अभी भी प्रतिमील सैकडो से भी कम फिटिंग की आवश्यकता होने के कारण ब्रिटिश रेलवे अव द्रुतगति से चपटे-तल वाले रेलपथ बना रही है। रेल-पटग्यिो की मानक लम्बाई त्रिटेन मे 60 और अमरीका मे 39 फुट है तथा पटरियो के बीच में गरम ऋतु के कारण फैलने के लिए जगह छोड दी जाती है। लेकिन बहुत लम्बी झली हुई पटरिया का उपयोग बढ रहा है जो कभी-कभी सतत पटरिया कहलाती है । एक मील लम्बी पटरी बाएँ, बुलहैड पटरी का ऊपरी और पाश्व दृश्य । लकडो को गिट्टिया देखिए जो पटरी को कुर्सी में स्थित रखती हैं। दाएँ, चपटे तल वालो पटरियो का ऊपरी तथा पाश्य दृश्य । कुसों और गिटटी का स्थान क्लिप ने ले लिया है। पर यदि प्रसयमित है तो 0 से 100 अश फाग्नेहाइट ताप के बीच इमरी लम्बाई माढे तीन फुट बढ जाएगी लेक्नि झनी हुई पटरी प्रत्येक स्लीपर के साथ मजबूती से बधे होने के कारण मुड नहीं पाती। भली हुई पटरियाँ महगी अवश्य पडती है लेकिन यात्रा सुगमतापूर होती है । सामा यत परिरक्षक से पुते हुए लवडी के म्लीपर ही नाम में लाए जाते है, किन कुछ तो पर कक्रीट और धातु के बने स्लीपर भी ग्राम हो गए है। अभिनव वर्षों में रेलपथ मे इतनी क्राति नहीं हुई है जितनी दि 43 उनके विद्याए जाने के टग मे। पुगने तरल लोहे को, जो यमीट की तरह ही सम्न बन जाता है, पूटने और गाटने तथा पटरियों को उठाने-धरने में जो कठिन श्रम होता था वह अव यन द्वारा किया जाता है। रेलपथ को बनाए रखने के लिए जलनिवाग का महत्वपूर्ण योग होता है, यह साई सोदने वाली मशीनों द्वारा सोदा जाता है। कीमती मगनीज मिनधा-युक्त विगेप स्प से टिकाऊ इस्पात का उपयोग काटो, या स्विनो तथा कचियो के लिए दिया जाता है। स्विच और चिया कई प्रकार की होती है । बाटो पर चल जिह्वा होती है जो गाडियो के पहियो के निकले हुए किनारो का सही दिशा में निर्देशन करती है। केवल शटिंग या संग्रह के लिए ही नहीं बल्कि सीधे यातायात के लिए उपयोग मे पान वानी मीधीलाइनोपर सम्मुख और अनुमुप काटोके बीच एक महत्वपूर्ण अन्तर है। सम्मुस काटा सामान्य दिशा की ओर भागती हुई गाडी के लिए पथ बदलने का कार्य करता है और गाडी को दो मे से कौनसे एक पथ पर जाना है इमका निश्चय सिगनलमन करता है। उदाहरणाथ, HINITINENTATIDATE माग की देखभाल के लिए उपयोग म पाने वाली साई सोने को मनीन । 44 वह गाडी को मुरय लाइन पर ही चलने दे सकता है या उसे लूप लाइन की ओर मोड सकता है ताकि उससे अधिक तेज गति वाली रेल आगे निकल मके। पीछे छूट जाने वाली गाडी लूप के दूसरे छोर पर स्थित अनुमुख काटे सम्मुख वाटे FACING POINTS अन मुष का TRAILING POINTS बाएं, एक काटे की यात्रावलि । दाएँ, सम्मुख और अनुमुप काटे गाडी को दिशा देखें। द्वारा पुन मुरय लाइन पर आ जाती है । अनुमुख वाटा दो मार्गों के मिलन- स्थल पर स्थित होता है और जब तक कि गाडी वापिम पीछे न मरने, वह दिशावरण के लिए गुजाइश नही छोडता। नितात आवश्यकता पड़ने पर ही मम्मुख काटो का उपयोग किया जाता है क्योकि इस बात की वहुत मावधानी रखनी पडती हे वि चल जिहा अपनी जगह पर मजबूती से स्थित रह । मिगनल-वाक्म की (जिमके वार मे विस्तार से अगले अध्याय में बताया जाएगा)अत पागन पद्धति के कारण जव तक मिगनलमैन काटा को यथास्थान न बठाद और मम्मुख बाटोकोपागन-दह द्वारा ताला न लगा दे तब तक गाडी के लिए मिगनत दे मकना उमगे लिए असम्भव है । ये सम्मुख काटे खोल पिना पुन नहीं घुमाए जा मरत और जिस समय उनके ऊपर से गाडी गुजर रही हो उस समय उह खाना नहीं जा सकता क्योकि गाडी के पहिए पाशन-दट पर दबाव डालते हैं और दम 45 - समाय उपयोग मे पाने वाले कुछ काटे बतलाते हुए पथ विपास 1 एक्त सम्मुषी पारगामी (Single facing crossover)। 2 अनुमुखी पारगामी (Trailing crossover)। 3 अनुमुख काटा (Trailing point)| 4 एक्त सम्मुख अग्रगामी (Single ficing lead)| 5 चालू पारगामी (Running cross overs) : 6 te fago TEST HITT (Diamond with single slip) : 7 21377 स्लिप वाला हीरा (Diamond with double sthp) 1 8 दोहरा जक्शन (Double junction) प्रकार ताला लगा देते हैं। लूप-लाइन के अन्त म एक सुरक्षा-काटा होता है जिमका काय गाडी को बिना सिगनल पाए वापिम मुख्य लाइन पर आने से रोकना है। गाडी की टक्कर का सतरा मोल लेने की अपेक्षा उसे पटरी से उतार देना अच्छा है। यदि सवारी गाडियो ने इस लूप का उपयोग किया तो सम्मुख दिशा मे होने के कारण सुरक्षा-काटो को भी पाशन-दड की आवश्यकता होगी। 46 एक सटका काटा भी होता है ताकि यदि कोई गाडी या यान लूप- लाइन से पीछे खिसकने लगे तो यह मुम्य लाइन पर आने के बजाय पटरी से उतर जाए। खटको मे स्प्रिंग लगे होते हैं जो गाडी को एक दिशा मे ही जाने देते हैं । पहियो द्वाग म्प्रिग पर डाला गया बल एक अटूट पटरी बनाता ह लेकिन सटके गाडी को वापिस नहीं आने देते। ये प्राय प्रवणो पर इस्तेमाल किए जाते है और नियत्रण के बाहर हो चुकी गाटो को सवेग (inomentum) युक्त होने से रोकते है ताकि वह वापिस हटार पीछे पा रही गाडी मे टक्कर न मारे। सामा य तौर पर काम मे आने वाले विभिन्न प्रकार के वाट पृ 46 पर 'पथ-वियाम' ये चित्र में दिसलाए गए है। संकेतन रेलवे के प्रारम्भिक दिनो मे सुरक्षा को भाग्य का विषय माना जाता था। मनुष्यो द्वारा हाथ उठाकर दिए गए सिगनल, गाडी गुजर जाने के बाद भी कुछ मिनटो ता 'खतरे' पर ही रहते और तर 'सब ठीक' का सकेत देने Ki हाय से दिए जाने वाले सिंगनल (Signas used to be alen by hand) से पूव मावधान चिह्न बनाए रखते । माग साफ हाने का मोन भी गनाहा सक्ता या क्योति इस वात वा निश्चय न या वि दुमरे मिगनलमन तर 47 लाइन साली होगी। यह मम्भव होता था कि पहले गई हुई गाडी खराबी होने के कारण पटरी पर ही खडी हो । आधुनिक सिगनल-सिद्धात (signallimg) का जन्म उम समय हुआ जब एक सिगनलमैन का दूसरे सिगनलमन से तार द्वारा सम्बन्ध स्थापित कर सकना सम्भव हुआ। इसके अनुसार गाडियो को सुरक्षित दूरी पर रखने के लिए 'समय के अतगल की अपेक्षा उनके 'पथ' की दूरी पर निभर होना चाहिए। प्रत्येक पय (साइडिंग के अतिरिक्त) खडा या 'ब्लॉको' मे बँटा हुआ होता है और हमेशा यह नियम है कि जब तक पहनी गाडी सड को खाली न कर दे दूसरी गाडी खड मे प्रवेश नहीं कर सकती। प्रत्येक वड या ब्लॉग के सिरे को ब्लॉक्-पोस्ट कहते है । आजकल विद्युत्-उपकरण के कारण यह सम्भव हो गया है कि एक सिगनलमन बहुत-से ब्लॉक्-पोस्टोका नियत्रण कर सके और मीलोतक याता- यात का निर्देशन कर सके । जब तक केन्द्रीकृत नियत्रण की व्यवस्था नहीं होती, तब तक यह देखकर शुरुआत की जाती है कि लाइन पर क्या होता है और इसके लिए हरेक ब्लॉक पोस्ट पर एक मिगनल वाक्स या बुर्ज बनी होती है । परिस्थितियो के अनुसार ही खडो की लम्बाई कुछ सौ गज से लेकर दस या अधिक मील तक होती है। जहा सभी ब्लॉग पोस्टो पर सिगनल- बाक्स हैं वहां भी शान्त समय मे (जब गाडिया नहीं गुजर रही होती) कुछ को बन्द करके बचत की जा सकती है और इस प्रकार खडो को दूरी बढाई जा सकती है। उदाहरण के लिए यदि स मवेत-जाक्स बन्द कर दिया जाता है तो खड का फैलाव 'क' से 'ग तक हो जाएगा, 'क' और 'ग के सिगनल- मैन या वुजवाले (towermen) एक दूसरे से मीधा सम्पर स्थापित कर लेते हैं और 'ख' पर मुख्य-लाइन वाले सिगनल म्थायी रूप से सब ठीप' पर छोड दिए जाते हैं। दो मुस्य प्रकार के सिगनल होते है-रोन सिगनल और दूर सिगनल (या चेतावनी-सिगनल)। एक ही सिगनल-बाक्स द्वारा नियमित रा-सिगनलो की सम्या भिन्न-भिन्न होती है। कुछ वाक्म व्यस्त स्टसनो और जक्सना का नियंत्रण मरते हैं, दूसरे वाक्म (जो गायद हर गज कुछ ही समय के लिए सुलते हैं) मेवत लम्ब मडको छाटे पड़ी में विभाजित करत ह । सोधे यातायात द्वारा परते जाने वाले पथ पर एक याक्म पम-मे-यम एप रो-सिगनल मा अवश्य 48 नियत्रण करता है। प्रत्येक काटे या स्विच की भी एक रोक्-सिगनल द्वारा रक्षा की जाती है। ऐसे काटे पर जो गाडी के लिए कई पथ हो गन्त्री या या वकेट पर प्रत्येक वैकल्पिक पथ के साथ-साथ एक सिगनल होता है। जैसा कि 'रोक-सिगनल' नाम से स्पष्ट है निजली वद हो जाने या दूसरी खराबी के मामलो के अलावा (जववि विशेष मावधानी बरतनी पडती है) कोई भी गाडी विना 'सब ठीक' का सिगनल पाए गुजर नहीं सकती। इसके विपरीत दूर-सिगनल चाहे 'सावधानी' की और 'सब ठीक नहीं' होने की सूचना दे, तव भी गाडियां उन्हे अनदेखा कर सकती है। केवल सीधे पथ पर ही दूर-सिगनल होते है और प्राय प्रत्येक ब्लॉक्-पोस्ट के पथ पर एक दूर सिगनल होता है। उस ब्लॉक-पोस्ट के मिगनल बाक्स द्वारा नियत्रित प्रथम-सिंगनल पर ही सदा गाडी पहुंचती है। यह प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण है क्योकि यह दूसरे सिगनलो के लिए चाभी का काय करता है । उस ब्लॉक-पोस्ट के उसी पथ के सभी रोक-सिगनल जव तक 'सब ठीक' न दिखलाए तव तक इसके (प्रथम-सिगनल) द्वारा 'सब ठीक' नही दिखलाया जा सकता । जब ड्राइवर दूर सिगनल को अपने अनुकूल देखता है तो वह समझ जाता है कि जिस ब्लॉक-पोस्ट पर वह पहुंचने वाला है उसके 'वाद' वाले ब्लॉक-पोस्ट के प्रथम रोक-सिगनल तक उमका मार्ग साफ है । लेकिन यदि दूर सिगनल 'सावधानी' पर है तो वह समझ जाता है कि जिस ब्लॉक-पोस्ट पर वह पहुँच रहा है उसका एक रोक-सिगनल 'खतरे' पर है और वह गाडी रोकने की तैयारी करने लगता है । यह सम्भव है कि जब तक वह रोक-सिगनल पर पहुँचे तब तक वह 'सव ठीक' की अवस्था मे बदल जाए। रोम और दूर, दोनो सिगनलो मे ही इगक कहलाने वाली या रगीन प्रकाश वाली एक भुजा होती है। इगक-सिगनलो की भुजा जिस समय सिगनल खम्भे के समकोण होती है तो 'खतरा' बतलाती है और इसकी अधो- दिशी (लघु चतुर्थाश) या उपरिदिशी (गुरु चतुर्थाश) गति ‘सब ठीक' का द्योतक होती है। अर्ध्व चतुर्थाश धीरे-धीरे अधिक लोकप्रिय हो गए है। रोक-सिगनल की भुजा का सम्मुखीय पक्ष लाल रग का होता है। इसके विपरीत दूर-सिगनलो की भुजा मे बाहर वाले अन्तिम सिरे पर V चिह्न का टुकडा कटा होता है और वे पीले रंग के होते है। दूर-सिगनल को प्रथम रोक-सिगनल से आगे काफी दूरी पर रखना - 49 पडता है ताकि लाइन पर मा रही द्रुततम गाडी को पूरी तरह रकने का समय मिल जाए दोना ये वीच की दूरी एक मील ये तिहाई भाग के वरावर होती है लेकिन यह प्रवणता तया भय यारयों पर निर्भर करती है । गुर तथा लघु चतुयाश इगक सिगनल । गु चतुगाश रोक सिगनल सब दिखा रहा है। रोक सिगार र नीचे दर मिगनल है जो सावधान पर है और इसरा V प्राकृति का एक टुपमा पटा हुआ है। जब दो सिंगनल बाक्स पास-पास होने है तो एr (वाक्म) द्वारा नियनित दूर-मिगनल कभी-कभी पहले वाक्स के गेर गिगनल पे एकदम पास रखा जाता है। सामने पृष्ठ पर दिए गए ग्नि द्वारा यर समझने मे सहायता मिलेगी गि उम सरल दोहरी लाइन पर, जिम पर प्रत्यालॉक-पोस्ट का मिन सिंगनल-वाक्म होता है, ब्लॉ-तन पिस प्रसार गाय करता है। जब व पावा वे मिगनतमैन यो स ला पर गाडी भेजनी होती है तब वह दूसरे सिगनल-बाक्स के सायो मे घटी मवेत द्वारा एक लेता है 50 DOUYN UNE UPLINE ~- NATUR ML- | NARLI LIN वायनग 'गपूर गि CSTANT fire fro MOME Kramreme Tourn STARTIR --- nde -we- 4:" 1-17 'रिट nि. riwomandaar ad twan IMIArrrrrrrama गिर ग गप्रापान गि. सिगान बस गरगि. ग ile faranno off (flock siqnallios atera) क्रिपया लाइन माफ है और तब वह गाडी 'पेग' ('offer') उरता है। अगर लाइन साफ है तो 'म' वाक्स वाला गिगनलमैन घटा-मवेत दोहरापर गाही 'ग्रहण' ('accept') वरना है । तर वह एक हत्या या भूटी हिलाता है ताकि 'क' और 'स' दोनो वाक्मो मे उपकरणिका के दिल्हा म 'लाइन साफ' ('line clear') दर्गाया जा सके । उपकरणिया या दिल्हा ब्लॉप-तप की वायविधि नियत्रित रसता है । इसी तरह 'स' को ब्लॉक-उपारणियापर यूंटी के बदल देने से 'क' पर पारान-युक्ति निमुक्त हो जाती है जो वहा के सिगनलमैन को सिगनल का लीवर सोचने के योग्य करती है और इससे गाडी को 'स' लाइन पर जाने की आज्ञा मिल जाती है। 'क' बाक्म के सिगनलमैन द्वारा नियमित अनुपम का यह अन्तिम सिगनल है । यह आम तौर पर 'प्रस्थान-सिगनल' कहलाता है हालाकि जव 'ख' वाक्स की तरफ भी एक अतिरिक्त सिगनल होता है तब यह 'अग्रिम प्रस्थान सिगनल' कहलाता है। जब गाडी '' से गुजरती है तो सिगनलमंन इसकी सूचना 'ख' वाले साथी को दे देता है जो ब्लॉक-उपकरणिका का घुमा देता है ताकि ('क' और 'ख' दोनो पर) 'लाइन साफ' के स्थान पर 'खड रद्ध' ('Train on line') हो जाता है। अब सड को उपयोग में लाया जाता है और उसे तब तक सुरक्षित रखा जाता है जब तक गाडी 'ख' तक न पहुँच जाए। जैसे ही गाडी गुजर जाती है 'क' वाला सिगनलमैन अपने प्रस्थान- सिगनल को 'खतरे' पर कर देता है और वह तब तक सिगनत को खीचने मे असमथ रहता है जब तक एक वार पुन ब्लॉक-उपकरणिका 'लाइन साफ' D til M M माग परिपथन (Track circuiting) 52 नही दिखलाती तथा पाशन-युक्ति विमुक्त नही हो जाती । ऐसा उस समय तक नही होता जब तक 'ख' वाला सिगनलमैन घटी द्वारा 'गाडी खड से बाहर' का घटी-सकेत नहीं देता और ब्लॉक-उपकरणिका को 'उदासीन' पर नही कर लेता। जब तक 'ख' का रोक-सिगनल (निकट-मिगनल-home signal) 'खतरे' पर नहीं होता, तब तक उदासीन ब्लॉक-उपकरणिका द्वारा पुन 'लाइन साफ' नहीं दिखलाया जा सकता। एक ही पथ पर दो गाडियो के बीच कम-से-कम एक रोक-मिगनल अवश्य 'खतरे' पर होना चाहिए (जिसका स्वत ही यह अर्थ है कि दूर-सिगनल सावधान' पर है)। बहुत-से पुराने फैशन के सिगनल वाक्सो में ऐसा कुछ नही होता जो ड्राइवर को 'गाडी सड से बाहर' घटी-सकेत देने, निकट-सिगनल को 'खतरे' पर करने और पहली गाडी के, जिसके अतिम डिब्बे की पिछली वत्ती यह दर्शाती है कि पीछे कुछ नहीं बचा है, वास्तव मे गुजर जाने के पूर्व ही 'लाइन साफ' की सूचना देने से रोक सके । वास्तव मे, विशेषत रात को ड्यूटी देने वाले सिगनलमैन ने ऐसे स्वप्न देखे है कि समय से पीछे (overdue) पाने वाली गाडियां गुजर गई है जबकि वास्तविकता यह होती है कि वे खराब हो गई हैं या ग्वड के मध्य मे ही आपत्काल में ठहर गई है। दुर्घटनाग्रो के कारणो में मनुष्य का भी एक कारण बन जाने का एक तरीका यह भी है। आधुनिक सिगनल-वाक्मो मे मार्ग-परिपथन के उपयोग के कारण दुघटनामो की सम्भावनामो का लगभग उन्मूलन हो गया है । एक पटरी द्वारा निम्न वोल्टता वाली विद्युत्-धारा जाती है तथा उमी पथ की दूमरी पटरी द्वारा वापस आ जाती है । इस मार्ग-परिपथन की लम्बाई कितनी भी हो सकती है लेकिन अधिकतर यह लम्बाई दो रोक-सिगनलो के बीच की दूरी के बरावर होती है। विद्युत् धारा के सप्लाई स्थान से सबमे दूर वाले सिरे पर दो पटरियो के बीच के विद्युत्-रिले (electric relay) द्वारा परिपथ पूरा हो जाता है। जितनी देर तक धारा ग्लेि से होकर परिपथ पूरा करती है उतनी देर मार्ग सालो माना जाता है लेकिन यदि एक भी यान मार्ग पर हो तो धारा पहियो प्रोर उनकी धुरी द्वारा छोटा रास्ता अपना लेती है और मार्ग रखा हुमा माना जाता है । माग-परिपयन, पासन-युक्ति के ब्लॉप उपमरण से सम्बद्ध होता है। इस कारण जर ता मागेका गड माफ नहीं हो गाडी को 'लाइन साफ' देना असम्भव है। माग परिपथा द्वारा सिगनल-याम के 53 अन्त पाशन-उपकरण गोरिले की गई सूचना के पारण भी नॉक-पोस्ट के अपने निपट-सिगनल और प्रस्थान-सिगनल ये वीच, पहले से ही अवरुद्ध माग पर पाने के लिए, गाडी गो मिगनल देना असम्भव है। यह कहना विषयान्तर होगा परतु बहुत-से पाठक शायद जानते हैं कि अन्त पाशा-युक्ति का काय सिगनलमन को दो गाडियो को सिगनल देकर एक-दूसरे से टकराने से रोस्ने या कांटो के ठीक से बैठाने (set) से पूर्व रोक-सिगनल देने अावा जव तक सारे गेक-सिगनल 'सब ठीक नहीं बतलाते तव तक दूर-सिगनल को सोचने से रोक्ना है। म हाय द्वारा परिचालित सिगनल लीवर का मत पाशन । प्रत्येक पारेख का बापी प्रोर पाला लीवर दूर सिगनल तथा दायर्यो भोर याला रोक सिगनल है । सिगनल-वाक्स के आकार और आयु के अनुसार विरोधी गति (conflicting movement) रोकने के विभिन साधन होते है । आधुनिक बटे बाक्स मे फश वाले तरतो के नीचे लगे विद्युत्-उपकरण (जिसमे माग- परिपथन द्वारा भेजी गई सूचना पाप्त करने वाला उपकरण भी सम्मिलित है) ला सविस्तार वणन करने मे इस किताब जितनी अनेको पुस्तकें भर जाएगी। पुराने और छोटे वाक्मो मे जहाँ काटे और मिगनल हस्त-उत्तोलक द्वारा चलाए जाते है वहाँ उत्तोलक क्रिया, जिस फश पर मिगनलमैन काम करता है उससे नीचेवाले पाशन-ढांचे मे लम्बत होती है । प्रत्येक उत्तोलक मे उचित स्थानो पर क्रमिक खाचे होते है और ये खाचे उत्तोनक-क्रिया से समकोण पर स्थित पाशन-छड की पिनो से फमे रहते हैं। इस प्रकार दो उत्तोलक दिखलाने के लिए जब तक रोक्-सिगनल नही खीचा जाता तब तक दूर-मिगनल भी नही खिंचता और एक बार दोनो 54 ।
मिगनल खीच दिए जाने पर, पहले दूर-सिगनल को बदले बिना, रोक- सिगनल को बदलना असम्भव हो जाता है। अब तक हमने केवल यह देखा है कि यदि मार्ग पहले से ही रुका हुआ है तो सिगनल खीचने से रोकने के लिए माग-परिपथन किस प्रकार सुरक्षा के उपाय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इसका उपयोग स्पष्टत इससे भी बहुत बडा है क्योकि इसके कारण सिगनलमैन उस गाडी को भी नियत्रित कर सकता है जिसे वह वास्तव मे देखता भी नहीं। मार्ग से सूचना, विन्यास के प्रदीप्त पारेख को रिले की जाती है और सिगनलमैन को मान इतना करना पड़ता है कि इस सूचना की निगरानी करे। कुछ मामलो मे मार्ग-आरेख पर ही लगे हुए स्विच के फ्लिक (fiuck) से सारे कौटे और सिगनल बदले जा सकते हैं। अन्य मामलो मे अभी भी उत्तोलको पी कतार होती है लेकिन आधुनिक वाक्सो के काटे और रगीन प्रकार के PLE QAR सिगनल-बास मे माग मारेख (Track diagram in the signalbox) सिगनल विद्युत् द्वारा बदले जाते है और इतने बडे उत्तोलको को आवश्यकता नहीं होती जितने कि उन वाक्सो मे होते हैं जहां प्रत्येक काय मिगनलमन वो स्वय की सीनने की शक्ति द्वारा होना है। रगीन-प्रवाश सिगनल धीरे- धीरे हर स्थान पर चतुर्थाश की जगह ले रहे हैं लेकिन प्राजकत वे आम तौर पर मानिव बेन्द्रीकृत नियत्रण ये महयोजन के सग उपयोग में लाये जाते हैं। 55 ब्रिटेन और अमरीका दोनो मे बहुत-से उदाहरण है जहाँ आधुनिक विद्युत्-उपकरणो से युक्त सिगनल बाक्स ने हाथ द्वारा नियनित होने वाले एक दजन या अधिक पुराने ढग के मिगनल-बाक्सा की जगह ले ली है। अमरीका मे, जहा लगभग सभी मुख्य लाइनें शुरू से अन्त तक अलग-अलग परिपथ की श्रेणियो द्वारा माग-परिपथित होती है, केन्द्रीकृत यातायात नियत्रण (Centralized Traffic Control) या के या नि (CT C ) विशेपत प्रचलित है। बडे स्टेशनो और जकगनो से दूर, मार्ग-परिपथन गाडियो द्वारा स्वत अपना सिगनल कर लेने के काम भी लाया जा सकता है। इस मामले मे सामान्यतया सिगनल हरे प्रकाश द्वारा 'सब ठीक' होने की सूचना देते हैं और लाल प्रकाश द्वारा 'खतरे' की सूचना तभी देते हैं जब गाडी गुजर जाती है या उसे बचाव की आवश्यकता होती है। सबसे महत्वपूण नियम यह है कि माग का विभाजन करने वाले विन्ही दो ब्लॉक-पोस्टो के बीच केवल एक ही गाडी होनी चाहिए। जितना भारी यातायात हो उतने ही पास-पास ये ब्लॉक-पोस्ट होने चाहिएँ। इसीलिए बहुत व्यस्त रहने वाली लाइनो पर बहुमुखी (multiaspect) रगीन-प्रकाश वाले सिगनल उपयोग में लाए जाते है। प्रत्येक ब्लॉक-पोस्ट पर केवल एक सिगनल होता है लेकिन हर मिगनल, रोक तथा दूर-या चेतावनी सिगनलका सयोग होता है। कुछ मामलो मे लाल सिगनल से पहले दो या तीन अग्रिम चेतावनी-सिगनल होते है। 0000 स ग चौमुखी सिगनल (Four aspect signals) चौमुमी (four-aspect) मिगनल शृपला (series) मे जव 'क' पर हरा मिगल होता है तो ड्राइवर समझ जाता है कि उसके लिए 'घ तब माग प्रगनीन गड माफ ह । लेपिन जब वर 'सपर दूसरे व चौथे प्रकाश 56 को पीला पाता है (जो दुगुना पीला कहलाता है) तो वह ममझ जाता है कि अगले केवल दो सड ही साफ ह । वह 'ग' पर पीला और 'घ' पर लाल प्रकाश देखने के लिए तैयार हो जाता है । इस प्रकार की मिगनल-शृखना द्वारा ड्राइवर को यह समझ लेना चाहिए कि आगे जाने वाली गाडी कितनी तीव्र गति से जा रही है और उसे अपनी गति इतनी कम कर लेनी चाहिए कि दोनो गाडियो के बीच उचित दूरी रहे । इम प्रसार जब तक जक्शन या स्टेशन से सिगनल मिलने मे विलम्व न हो ड्राइवर गाडी को विल्कुल ही रुक जाने से बचाए रखे। गति का प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है। लन्दन के भूमिगत रेलमार्गो पर ऐसी युक्तियो द्वारा परीक्षण किए जाते हैं जो पटरी पर गुजर रही गाडियो की गति का मापन करती है 1 अधिक शीघ्रता से जा रही गाड़ियो को रोक- सिंगनल द्वारा वीमा कर दिया जाता है और जो चाल-मीमा से जा रही होती ह उहे सामने वाली गाटी के कुछ और निकट जाने दिया जाता है । कुछ लाइनो पर विद्युत् गाडियाँ स्वत ही धारा वद करने के माथ-माथ अपने पीछे मिगनल को 'खतरे' पर करके छोड जाती है। बहुमुखी रगीन-प्रकाश सिगनलन उन्हीमार्गोतक मीमित नहीं हैं जहां माग-परिपथन का उपयोग गाडी द्वारा स्वय अपना मिगनल देने के लिए होता है। व्यस्त जक्शन और स्टेशन पर,जहाँ गाडिया लगे-बँधे कम से नहीं पहुँचती, प्राय मानवीय देखभाल आवश्यक होती है, जहा सारी सिगनल-निया एक सिगनलमैन द्वारा नियनित की जाती है, उन व्यस्त लाइनो पर भी ब्लॉक- पोस्टो का आपस म इतना ममीप होना अनिवाय है कि प्रत्येक सिंगनल अगले दो या तीन सिगनलो को चेतावनी दे सके। विभिन्न रेलमार्गों पर नहुमुवी मिगनला व प्रमाग की व्यवस्था विभिन्न होती है। यहाँ एक सामाय उदाहरण दिया गया है । कभी-कभी स्वचालित और अस्वचालित सिगनल मिला दिए जाते है । उदाहरणाय, जव किसी विशेप लाइन पर गाटियो को काफी ममय तक अपना मिगनल स्वय देना पडता है तब यह प्रावस्या हा जाता है कि मालगाडियो के गटिग के समय सिगनल मैन प्रतिदिन वायभा सम्भाले । अधिक व्यय वाने वहुमुखी मिगनलन (जा केवल तब उचित हाता है जवयि भागे यातायात हा) या अत्यधिक पे द्रीकृत नियत्रण को अपेक्षा माग परिपथन का लाभ उठाना चाहिए। 57 . TAMIneerNew-mNA -- Mana ००००००००० तक के लिए मान लें कि 'क' और 'ध' पर सिगनल-बाक्म है तथा 'प' और 'ग' वाला लॉ-पास्ट दूर से नियमित पिया जाता है । 'ब' और 'घ' के बीच एक ही समय मे तीन गाडियां हो सकती हैं, इस स्थिति में कोई ऐसा उपाय सोजना होगा कि उन दोनो जगह के मिगनलमैनो का समय टेलीफोन पर नष्ट न परके उहे वास्तविक्ता की सूचना दी जाए। प्रत्येर मिगनल-बाग पर लगे हुए 'रचनाकार' ('describer') पर लगे प्रकाश यह बतलाते है कि कौनसी गाडी तीनो मे से किस सड पर है। उदाहरण के लिए, जैसे ही एक गाडी ब्लॉक्पोस्ट 'ग' को पार करती है वैसे ही 'स' ब्लॉर-पोस्टवाला सिगनल बदल दिया जाता है ताकि दूसरी गाडी 'ख' और 'ग' वीच वाले खड पर आ सके। सिगनल-वाक्सोकेवीच परामश की कोई आवश्यक्तानहीऔर समयकीयह बचत ग्रीष्मकालीन शनिवारो को, जबकि एक ही ममय लगभग सभी खडो पर गाडियाँ सिगनल-बाक्स मे गाडी रचनाकार हो, विशेषत उपयोगी होती है। (Train describer in Signalbox) अव तक हमने केवल दोहरी लाइन के बारे मे बतलाया है और हमारे सिगनल के उदाहरण एक लाइन पर एक-दूसरे के पीछे चल रही गाडियो से सम्बधित रहे है। दूसरी लाइन पर भी ठीक यही क्रियाविधि वरती जाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सदा सिगनलमैन ही गाडी को आगे वढने की अनुमति देता है। इसलिए एक ओर को जा रही रेलगाडी के बारे मे 'क' वाले मिगनलमैन को ख' से आज्ञा की आवश्यकता होती है और विपरीत दिशा की ओर जा रही गाडी के बारे मे ख' को 'क' से आज्ञा लेनी होती है। प्रिटेन मे गाडिया बायो और अमरीका में दायी ओर रहती है। चार-लाइन वाला माग दोहरी लाइन का एक जोडा ही होता है हालाकि उह दो स्वतत्र जोडो के रूप में विद्याया जा सकता है अथवा उनके दो अप (Up) मार्ग एक अोर तथा दो डाउन (Down) मार्ग दूसरी ओर बिछाए जा सकते हैं । यदि दोहरी अथवा चार-लाइन वाले मार्ग पर आपत्कालीन स्थिति 58 . का यह अर्थ है कि अप और डाउन दोनो ही गाडियो को एक माग पर चलना है तो टक्कर रोकने के लिए एक 'पायलटमैन' की नियुक्ति की जाती है। बिना पायलटमैन की अनुमति मिले गाडी आगे नहीं बढ सकती। लेकिन जव लाइन इकही होती है तो आमने-सामने की भिडत रोकने के लिए प्राय एक स्थायी व्यवस्था की आवश्यकता होती है। अधिक तर, और कम-से-कम ब्रिटेन मे, यह नियम है कि जब तक ड्राइवर को 'स्टाफ' (staff) [या टोकन (token), या टेबलेट (tablet) आदि जो एक ही वस्तु के पर्याय हैं] नही मिल जाता उसे इक्हरी लाइन पर नही चलते रहना चाहिए। कम काम मे आने वाली लाइनो के अतिरिक्त, जहाँ लाइन पर एक से अधिक इजन कभी नही चलने के कारण लकडी का साधारण-सा टुकडा ही बहुत है, दो सिगनल-बाक्सो के बीच उपयोग में लाए जाने के लिए धातु के बहुत-से स्टाफ होते है। ये इन वाक्सो के इकहरे लाइन ब्लॉक, या विद्युत्- स्टाफ, 'उपकरणिका' मे सचित रहते है । यह स्टॉक दोनो के बीच किसी भी अनुपात मे वाटा जा सकता है लेकिन खड के सिरे पर लगी उपकरणिका बिजली से अन्त पाशित होती है ताकि दोनो इकट्ठे स्टॉक मे से एक समय एक स्टॉक बाहर निकाला जा सके। किसी भी सिगनल बाक्स से दूसरा स्टॉक तब तक नहीं निकाला जा सकता जब तक निकाला हुआ पुन स्यापित नही होता। यह बात महत्व की नही है कि यह किस सिरे परवापम किया जाता है। यदि कोई ड्राइवर विना स्टाफ लिए आगे न वढे तो यह तन सवथा दोषमुक्त है । लेकिन इस तन के भी भारी दोष हैं- एक तो यह है कि प्रत्येक प्रॉसिंग लूप पर सिगनलमैन और रेलइजन-ड्राइवर को आपस में स्टाफ का आदान-प्रदान करना पडता है । कभी-कभी डाक्-यंले की भाति ही यानिक आदान-प्रदान उपयोग में लाया जाता है (अगला अध्याय देखें)। दूसरी कमी यह है कि स्टाफ वा उपयोग उन्ही ब्लॉक-पोस्टो के वीच क्यिा जा सकता है जिनका नाम स्टाफ पर लिखा हुआ हो । शहरी लाइन पर एक गाडी के गुजरने के लिए भी पाय सारे सिगनल-चावम सुले रखना अावश्या है। जैसा कि हम पहले देख चुके हैं जब दोहरी लाइन पर यातायात हला होता है तो खडो को बढाकर विचले सिगनल-बाक्म अस्थायी रूप से वद दिए जा सरते हैं। कोई कारण नही है कि इहरी लाइनो पर केंद्रीयन यातायात नियत्रण न हा और ययाय में अमरीका में इकहरी लाइन इनमा उपयोग 59 करती है । गाडियां जिस विद्युत्-स्टाफ को अनिवाय रुप से साथ ले जाती हैं उसे मुक्त कर दिया जाता है और मार्ग-परिपथन, लॉक-तत्र तथा अत- पाशन के सयोग से टक्करें बचाई जाती हैं । लाइन पर गाडी की उपस्थिति के कारण मार्ग परिपथन लघु हो जाता है और पहले ब्लॉक-उपकरण का विद्युत गाडी हाउन स्टाफ बाहर अप स्टाफ बाहर- स्टाफ मदर 809 टोकन विद्युत गाडी स्टाफ । इकहरी लाइन की क्रिया के उपयोग में प्राने वाली दो प्रकार की उपकरणिका । ताला लग जाता है जो पुन उन सिगनलो को ताला लगा देता है जो गाडी को खड पर पाने की अनुमति देते । यदि सड खाली हो तब भी सिगनल को दोनो छोरो के बजाय एक ही छोर पर खीचा जा सकता है। कुछ अमरीकी इकहरी लाइनो पर स्वचालित सिगनल का उपयोग इस प्रकार भी होता है कि नियनक माग-परिपथन द्वारा निर्धारित गति का अवरोध केवल यह सूचित करने के लिए करता है कि कोई गाडी विपरीत दिशा से आ रही दूसरी गाडी से क्रॉम (cross) करने के लिए या उसी दिशा मे आ रही दूसरी गाडी को आगे निकल जाने के लिए किस नॉसिंग लूप (crossing loop) पर ठहरे। इस समय ब्रिटेन की इकहरी लाइनो के लगभग सभी क्रॉसिंग लूप पर एक सिगनल-बाक्स है लेकिन अब अमरीका की तरह सव मार्गों को के द्रीय काँटो द्वारा नियत्रित करने का विचार है । अब से पूव लगभग सभी ब्रिटिश समपारो पर काम करने के लिए कानूनन एक आदमी अवश्य होता था और चूकि बहुत-से इकहरी लाइन वाले लूप-स्टेशनो पर समपार हैं इस- 60 लिए मिगनल-बाक्सो को वन्द करने के लिए अधिक प्रोत्साहन नहीं मिला। लेकिन महाद्वीपो में प्रचलित स्वत नियनित समपार व्यवस्था वा अनुकरण करना होगा। जप गाडी एक निश्चित स्थल पर पहुंच जाती है ना माग- परिपथन के उपयोग द्वारा एक चेतावनी-घटी बजती है और सड़क ने याता. यात को नियमित करने वाले प्रकाश लाल पर हो जाते है और नाका झुक जाता है। प्रत्येक नियम के अपने अपवाद होते है। इस मूल नियम के लिए भी कि प्रत्येक जोडे ब्लॉक्-पोस्टो के बीच एक गाडी से अधिक नही हानी चाहिए एक अपवाद है। अमरीका या प्रिटेन मे सवारी-लाइनो पर कभी मुश्किल से ही उपयोग में लाया जाने वाला 'अनुज्ञात्मक नॉक' खड के दूसरे मिरे पर पहली गाडी पहुँचने के पूर्व ही दूसरी गाडी को सावधानी से आगे बढ़ने की अनुमति दे देता है । जहा यह तत्र विद्युत्-स्टाफ से युक्त इवहरी लाइना पर काम मे लाया जाता है वहा एक सिरे पर मिगनलमैन एक क्रम से बहुत से स्टाफ निकाल सकता है, हालाकि उपकरणिका के बीच विद्युत् पागन के कारण दूसरे सिरे वाला सिगनलमैन तब तक एक स्टाफ नहीं निकाल मक्ता जव तक पूरे स्टॉक (stock) का पुनभरण नहीं हो जाता । इकहरी लाइन पर काम में लाया जाने वाला अनुज्ञात्मक ब्लॉक कम आबादी वाले दगा के लिए लाभदायक है, उदाहरण के तौर पर जहाँ फमल के कारण अचानर ही एक दिशा मे यातायात की भीडभाड हो जाए। यह नियम है कि पहले से ही रके हुए माग पर गाडी पाने के लिए सिगनल नही किया जा सकता। लेकिन इसका भी एक अपवाद है। बड़े स्टेशन के काय को देखने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि रेलइजना को उन प्लेटफार्म-लाइना पर पाने के तिए लगातार सिगनन किया जाता है जहा उनकी गाडियां उनकी प्रतीक्षा में पहले से ही खडी होती है । इस प्रकार के मामलो एक विशेष 'कॉलिंग प्रॉन' ('calling on) मिगनत उपयोग में लाया जाता है जो प्राय छोटा होता है । यह मुग्य सिगनल की देखरेख मे काम करता है और माग परिपथन के साथ पाणित नहीं होता। - 61 यातायात को गतिशील रखना एक एक्सप्रेस गाडी बिना ठहरे 400 मील तक की यात्रा कर सकती है लेकिन इसका पता-पता हमेशा मातृम रहता है। इसका कारण यह है कि सिगनलमैन एक्साय बहुत-मी गाडियो का निर्देशन नहीं करता जैसा कि पुलिसमैन कार यालारियो का करता है । सिंगनलमन ऐसी व्यक्तिगत गाडिया को सिगनल देता है जिनकी अपनी विशेषता होती है, जिनका लगभग अपना लक्षण होता है। नामकरण का ढग भिन्न-भिन होता है। कैक (Crack) एक्सप्रेसो के नाम प्राय उस क्षेत्र या कस्बो के नाम पर रखे जाते है जिनके काम वे पाते हैं । लेकिन स्टाफ के बीच शीध्र सन्देश के लिए नाम प्राय अनुकूल नहीं होते। अव तक ब्रिटेन मे बहुत-सी गाडियो के नाम उस समय के ऊपर रसे जाते हैं जिस समय वे प्रस्थान-स्थल से चलती है । इस प्रकार प्रसिद्ध 'कॉनिश रिवेरा एक्सप्रेम' (Corash Rivtera Express) पेज़ान्स (Penzance) तक '10-30 प्रात पंडिंगटन' (Paddington) कहलाती है ।लेकिन ब्रिटिश रेलवे भी अमरीकी और महाद्वीपीय रेलवे द्वारा उपयोग में लाए जाने वाला वर्गो- करण तर ही आरम्भ कर रही है। प्रत्येक गाडी को विभिन अक्षरो और सख्यानो के मेल का नाम दिया जाता है जो रेलइजन के सामने लगा दिया जाता है और सारे रास्ते लगा रहता है (या बहुल इकाई गाडियो में अग्रिम यान के सामने नाम लगाहोता है)। स्टाफ के लिए प्रत्येक गाडी की सख्यासमय- सारणी मे छपी रहती है और आधुनिक सिगनल-बाक्स में यह 'रचनाकार' पर दर्शाया जाता है । यह सम्या ही सिगालमैन को (ोरसकेत सीखने वाले रेल-जिज्ञासुनो को) बतलाएगी कि गाडी किस प्रकार की है और कहा जा रही है। प्राजक्ल अधिकतर ब्रिटिश सिंगनलन्याक्स में सिगनलमैन विभिन्न प्रकार की गाडियो को बताने के लिए घटी-समतो (bell-codes) का उप- योग करते हैं । घटी पर चार आघात का अर्थ है एक्सप्रेम सवारी गाडी तथा तीन प्राघात एव कुछ रुककर एप और प्राधात का अर्थ है रुकने वाली सवारी गाडी । अय वाता के लिए भी सकेत होते है जैसे ध्यानाकर्षण के लिए एक घटी, खड पर गाडी के प्रवेश के लिए दो घटिया, गाडी सड से चली गई है के लिए दो के बाद एक घटी, और वाधा के खतरे के लिए छ घटियाँ। 62 ब्रिटेन की बहुत-मी गाडियो ने कई वर्षों तक अग्नदीपो का प्रयोग किया है । कुछ मामान्य अग्रदीप पृष्ठ 64 पर दिसलाए गए हैं । गाडी किस प्रकार की है यह बतलाने की अपेक्षा कभी-कभी यह बतलाना अधिक आवश्यक हो जाता है कि वह किस माग के लिए जा रही है। उदाहरण के लिए निटिग रेलवे दक्षिणी प्रदेग (British Railways Southern Region) की बिजली-लगी लाइनो पर गाडिया एक या दो प्रकार की होती है लेकिन उनके द्वाग अपनाए गए मार्ग विभिन्न होते है । इसलिए अग्नदीपो के लिए माग-मकेत (route code) होते हैं जिनकी जगह दिन में सफेद गोल टार्गेट (targets) लगा दिए जाते है । उन लाइनो पर जहां अग्रदीपो का उपयोग गाडी या प्रकार बताने के लिए किया जाता है, व्यस्त समय मे (जैसे ग्रीष्मकालीन शनिवारो को) कभी-कभी रेलइजन के सामने एप वटा बोर्ड लगा दिया जाता है जिम पर सख्या लिखी होती है ताकि मिगनलमंन को गाडी पहचानने का अतिरिक्त साधन मिल जाए। ब्रिटेन मे लगभग सभी रेलमाग घेरेवाले (fenced) होते है और यदि सिंगनल उमये अनुसून हुए तो ड्राइवर अनुमान लगा लेता है कि रास्ता साफ है। अग्रदीपो की आवश्यक्ता केवल ऊपर बताएकाय के लिए ही होती है और वे बहुत कम प्रकाश देते है । लेकिन अमरीका तथा दूसरे बडे देशो मे जहाँ वडी-बडी खुली जगहे हैं और मार्ग की क्डी देखभाल रखना कठिन है, वहाँ लाइन पर तीन-चौथाई मील तक तेज किरणावलिया (beams) फेंकी जाती है। एक प्रकार से ब्रिटेन के ड्राइवरो की अपेक्षा अमरीकी ड्राइवर माग की दृश्यता पर कम निभर रहते हैं । ट्र क (trunk) लाइनो पर साकेतिक' ('coded') माग परिपथन का उपयोग इजीनियर के कमरे मे लगे रगोन- प्रकाश वाले लघु सिगनलो (miniature colour-light signals) द्वारा अगले सिगनलो की स्थिति बताने के लिए किया जाता है । इजीनियर को इस प्रकार के मार्गों पर वास्तविक मिगनर की ओर देखने की बहुत कम आवश्यक्ता होती है । वस्तुत लघु सिगनल कभी-कभी दृश्यता से दूर भागे वाने तीन या चार मिगनलो की स्थिति बताता है और जिस क्षण वास्तविक सिगनल बदलते है उमी क्षण ड्राइवर के कोष्ठ के मिगनल भी बदल जाते है । माग-परिपथन द्वारा अब तक किया जाने वाला महानतम काय 63
एक्सप्रम मवारी गाडी
मनमाना मवारी गाडी
ऐमप्रस मालगाया
पानामवारी गान
एक्सप्रनमानगाटा
मोपी जाने वाली मालगाडी
हलका इजन
पासन नाशवान या
माधी जान वानी यमिज मन वाली माल गाडी
पगुवाहक रगाडी
या वाती गाडी
मिटिग शोषलम्प सक्त (British headlamp codes)
निरन्तर कोप्ठ-सिगनलन करना है । और यदि ड्राइवर 'खतरे' का सिगनल न देख पाए तो नेक स्वत ही आशिक रूप से लग जाते है । यह 'स्वत गाडी नियत्रण' (Automatic Train Control) या ए टी सी (A TC) कहलाता है। ब्रिटिश रेलवे ने निरन्तर कोष्ठ-सिगन नन (continuous cab signalling) की नकल नहीं की है। कुछ तो इस कारण कि इस प्रकार के घने लाइन के जालो पर माग-परिपथन तथा अय उपकरण अत्यधिक कीमती होंगे, दूसरे, वतमान सिगनलन-तत्र (signalling system) ने समुचित सन्तोष दिया है। रगोन प्रकाग मिगनलो द्वारा फेंकी गई तेज किरणावलि, सिवाय गहरे कोहरे के, हर समय दूर तक देखी जा सकती है। कुछ लोगो का यह भी कहना है कि ड्राइवरो को सिगनल देखने के लिए बहुत अधिक सहायता नहीं देनी चाहिए क्योकि उनका विश्वास है कि सुगमता के कारण कार्य मे ढीलापन पाता है। फिर भी, त्रिटिग रेलवे के पश्चिमी प्रदेश और इसके पूर्ववर्ती ग्रेट वैस्टन रेलवे मे वहत मालो तक मुधग हुमा ए टी सी तत्र रहा। यह दूर- मिगनल (distant signal) मे जुडा हुया होता हे और जैसा कि पिछले अध्याय मे बताया जा चुका है एक्मप्रेस गाड़ी के ड्राइवरो को इसका बहुत भरोसा करना पड़ता है। दूर-मिगनल मे पहले रलपटरियो के बीच एक रपटा बिछा दिया जाता है और रेलइजन के नीचे लगा हुअायू (shoe) इससे सम्पर्क स्थापित करता है । अगर सिगना सब ठीक' पर होता है तो इस सम्पर्क के परिणाम- स्वरुप ड्राइवर की बगान में लगी घटी वजने लगती है। यदि यह सिगनल 'मावधान' पर हुअा तो एक घटी (gong) आवाज करती है और यदि ड्राइवर कोई कायवाई नहीं करता तो ब्रेक आशिक स्प से लग जाते हैं। गाडी को पूरी तरह ठहराने का काय वडे कौशल का है और यह ड्राइवर पर ही छोड देना चाहिए हालावि अच्छी समतल लाइनो पर, जहाँ सभी गाडियाँ लगभग एक ही भार की होती है, पूणत स्वचालित रोष का उपयोग होता है। ब्रिटेन की मुख्य लाइना पर अव इसी प्रकार के ए टी सी तत्र का आरम्भ हो गया है । इममे रेलइजन और रपटा के वीच सम्पद को बजाय, गिट्टी में गडे हुए एक चुम्बक ये उपयोग द्वारा पटरी पर से गुजरने वाले इजन मे धारा का संचार होता है । हालावि दुर्घटनाग्रो की मन्या और भी कम 65 . होनी चाहिए फिर भी इस तत्र की स्पष्ट मी यह है कि यह मिगनल की स्थिति को केवल उस समय सूचित (register) करता है जब रेलइजन चुम्वक पर से गुजरता है और यदि सिगाल एप सेपद बाद भी वदने ता उसकी सूचना नहीं दे सकता। सभी कोष्ठ सिगनलन-तयो के दो उद्देश्य हैं- सुरक्षा और ममय की बचत, विशेषत जबपि दृश्यता कम हो। समय का प्रश्न ऐमा है जिसके बारे मे बहुत-रो यात्री ऊटपटाग वातें करते हैं चाहे वे रेलवे के बारे में कुछ जाने या न जाने । उदाहरण के लिए उतावले लोग शिकायत करते है कि एक गिगनलमैन उनकी गाटी व लिए सिगनल देना भूल गया है अथवा उनकी गाडी के बजाय उस माग पर मालगाडी को पाने देकर उन्हें देर कर रहा है। गाडी चाहे समय से बहुत पीछे (long overdue) हो, फिर भी इसे सामान्यत सिगनन नहीं दिया जाता जब तक कि वह वेचन कुछ ही दूर न रह जाए। केन्द्रीकृत यातायात नियत्रण लागू होने पर परिस्थिति के अनु- सार दूरी बहुत कम-ज्यादा होती रहती है लेकिन पूरी रफ्तार से आ रही एक्सप्रेस गाडियो के लिए कम-से-कम दो मील पूर्व ही मार्ग साफ होने की सूचना प्रावश्यक है। जहाँ प्रत्येक ब्लॉक-पोस्ट पर अलग-अलग सिगनल- बाक्स होते हैं वहाँ सामान्य क्रियाविधि दूसरे खड को उस समय सिगनल देने की है जब कि गाडी पहले खड में प्रवेश करती है। लेकिन यदि प्रथम सड इतना छोटा हो कि दूसरे सिरे वाले सिगनलमैन को गाडी पहुँचने से पूर्व दूर-सिगनल खीचने का अवकाश नही मिले तो दो या कभी-कभी अधिक खड एक्साथ बनाए जाते है। जहाँ खड लम्वे होते हैं, जैसा कि कुछ गौण अमरीकी लाइनो पर हैं, वहाँ यह पाशा को जाती है कि रेलइजन के इजीनियर 'सीटी पोस्ट' (whistle post) से गुजरते हुए सीटी या हूटर (hooter) द्वारा सूचना देंगे। सीटी का उपयोग बहुत-मी वातो के लिए किया जाता है ड्राइवरो के लिए एक सकेत होता है जिसके द्वारा वे सिगनलमैन को सूचित करते हे कि वे कहा हैं या वे क्या चाहते है। उदाहरण के लिए ब्रिटेन में तीन छोटी सीटियो का अर्थ यह है कि रेलइजन काटो से दूर है और इसलिए काटे बदले जा सकते हैं। सीटी पोस्ट के अतिरिक्त बहुत-से दूसरे माग-चिह्न है जिनमे स्थायी 66 ५ . या अस्थायी गति-सीमा की चेतावनी या प्रवणता-मम्बन्धी परिवतन भी सम्मिलित है। हम पहले ही देख चुके हैं कि शुरू के दिनो मे टेलिग्राफ और ब्लॉक- उपकणिका से पूर्व, दुर्घटना रोकने के लिए गाडियो के गुजरने के अन्तराल पर भरोसा रखना पड़ता था। दूसरी सावधानी यह बरती जाती थी कि समयसारणी का दृढतापूर्वक अनुसरण किया जाता था। गाडियो को समय- सारणी में दिए गए ममय के अनुसार ही चलना और एक-दूसरे से मिलान करना पडता था, भले ही इसका यह अर्थ निकले कि देर से आनेवाली एक गाडी जब तक स्वय नही पहुँचे तब तक दूसरी बहुत सी गाडियो को प्रतीक्षा म रखे। समयसारणी द्वारा निर्धारित गाडी 'क्रम' (order) का अप्रत्यास्थ- तन अभी भी कुछेक दूरवर्ती लाइनो पर काम में लाया जाता है, लेकिन आम तौर पर आजकल इस प्रकार के अपव्यय की आवश्यकता नहीं है। हालाकि सवारी गाडियो के बीच विज्ञापित मेल (connections), जहाँ कही सभव हो वहाँ, पूरे किए जाते है, फिर भी मुख्य उद्देश्य यह है कि मार्ग का पूणरूपेण उपयोग किया जाए और इस पर से अधिकतम मात्रा मे याता- यात गुजरने में सहायता दी जाए। यदि कोई सवारी गाडी शायद संक्डो मील की दूरी पर होने वाली किसी कठिनाई के कारण प्राधा घटा पिछड जाए तो सिगनलमैन किसी मालगाडी को पहले जाने देकर अपना कर्तव्य निभाता है, चाहे इससे प्रतीक्षा कर रहे यानी क्तिने ही उत्तेजित हो । लेकिन अकेले सिगनलमैन के लिए यह निणय करना प्राय विल्कुल असम्भव हो जाता है कि समय से पीछे आ रही सवारी गाडी से पूर्व एक अतिरिक्त मालगाडी को निकालने का समय है अथवा नही । यह दो तथ्यो पर निर्भर करता है जिनमें से किसी को भी सिगनलमैन स्वय नही जान सक्ता । वास्तव मे गाडी कितनी लेट है और क्या यह और भी लेट हो रही है अथवा लेट पूरी कर रही है ? और इससे पूर्व कि सवारी गाडी मालगाडी के निकट पहुंचकर उसके कारण लेट हो जाए क्या इस बात की गुजाइश होगी की मालगाडी को पावं या लूप लाइा पर रास्ते मे आगे कही पाश्व- मार्ग (sidetrack) दिया जाए ऐसे प्रश्नो का उत्तर देने के लिए यातायात पैटर्न (trafficpattern) का विस्तृत अवलोक्न आवश्यक है। विशेषत अमरीका में कुछ केन्द्रीकृत 1 67 यातायात नियत्रण सिगनल-वाक्स इतने बड़े क्षेत्र की देखभाल करते है कि उनके बुर्जवालो (tovermen) को विस्तृत दृश्य के कारण अतिरिक्त निर्देशन की आवश्यकता नहीं पड़ती। लेकिन अधिकतर, विशेषतया ब्रिटेन मे, एक पृथक् नियत्रक होता है जो स्वय सिंगनलन नहीं करता लेकिन अपने जिले मे विभिन्न गाडियो की प्रगति पर निगरानी रखता है और अवसर प्राने पर सिगनलमन को अनुदेश देता है। जो बात वारम्वार होती है वह इस प्रकार है य ₹ ल दो गाडियाँ 'य' से 'र' माग पर एक दूसरे का अनुगमन कर रही है। 'व' को जानेवाली पहली गाडी मन्द गति से चल रही है और पीछे आने वाली दसरी गाडी को देर कर रही है जोकि 'श' तक जाने वाली है। हालाकि पहली गाडी बिना रुके 'ल' या 'द' तक भी जाने वाली हो सकती है और पहले से ही लेट हो सकती है, फिर भी नियत्रक यह निश्चित करता है कि इसे लूप लाइन 'र' पर रोका जाए ताकि findian गति नियंत्रण (Morement control) गरी गादी इसे पार कर जाए। यि यह आगे वाली पहली गाड़ी की उप- स्थिति के पारण लेट हानी है अत इममा अथ है कि यह उच्चतर गति की 68 क्षमता रखती है। और चूकि इसे 'व' से बहुत आगे 'श' तक जाना होता है प्रत सम्पूण देरी का समय कम हो जाता है, भले ही पहली गाडी से 'व' को जाने वाले यानी रेलवे की अदक्षता की शिकायत करें। अगर एक एक्सप्रेस लेट है तो नियनक अपने सामने विन्यास का नक्शा रखकर यह निश्चित करता है कि मिलान गाडियां (connecting trains) जकशन स्टेशनो पर रके अथवा नहीं, और खराब मौसम के कारण दुघटना या विम्यापन हो जाने के बाद नियनक ही व्यवस्था कायम करने के समयसारणी प्राफ (Tianetable graph) अभियान मे अग्रणी होता है। यह कार्य, जितना प्राय मममा जाता है उमसे यही अधिव, कठिन है क्योवि स्टाफ के भरमक प्रयत्नो के वावजूद देर परने वाली कुछ गाडियां पैटर्न को विगाड देती हैं। विस्थापन अग्नि की तरह फैलता है। ग्रिटेनमे कुहग एकबहुत बडा प्राकृतिक शत्रु है । न केवल ड्राइवरोको पई वार गति कम करनी पडती है अपितु सभी-कभी सुरक्षा के हेतु प्रयेा दो ब्लॉक्-पडो के बीच केवल एक गाडी जाने दी जाती है। यह द्वि-लॉक प्रणाली 69 पहलाती है और इसका प्रय है गाडियो की सम्या में भारी कमी करना। कुछ जिलो मे हरेक दिनो के लिए विशेष ममयमारणी होती है । खास-खास सिंगननो के साथ माग मे युहरा मिगनल या पटारो (detonators) होते हैं और जर गाडो उन पटासो पर से गुजरती है तो विस्फोट द्वारा ड्राइवर को उन चीजो के बारे म भी मालूम हो जाता है जो दिमायी नहीं देती। उन देशो मे जहाँ प्राप्लावन और भूमि-स्खलन ग्राम होता है वहाँ ऐसे सिगनल हैं जो पानी के निश्चित स्तर पर पहुंच जाने या पथ पर चट्टान गिर पाने से स्वत ही खतर' पर हो जाते है । अमरीका के उन भागो मे जहाँ भूकम्प प्राते है कुछ पुल, सुरगे और मार्ग-सड मसूचक द्वारा रक्षित होते है । इन समूचको में एप सुई हाती है जा किसी भी यम्पन से घूमती है और सम्बधित लाइन पर माग-परिपथा को कम करके पुन सिगनला को स्वत ही खतरे' पर कर देती है। अब हम पुन नियनक स्टाफ पर पाते है। उनका दूसरा काय इस बात का लेखा-जोखा रसना है कि कौनसा चल-स्टार कहाँ है, और पाव- श्यकता पड़ने पर सन्तुलन ठीक रखने के लिए खाली गाडियाँ चलाना है। AIL पूरे देग से जा रही गाडी तथा प्रेषण बाहु के बीच डाक् थलो का स्थानातरण । 70 सूक्ष्म वातो तक की भी पूर्वयोजना बनायी जाती है। उदाहरण के लिए जैसे ही ड्राइवर अपनी वारी के अनुसार कार्य पर आता है, रेलइजन- डिपो मे एक इजन किसी विशिष्ट माग पर जाने के लिए तैयार रहता है। लम्बी यात्रा वाली एक्सप्रेस गाडियो के अमले को दूसरे अमले द्वारा कहाँ भारमुक्त किया जाए यह एक जटिल काम है हालाकि मुरय समयसारणी बनाने-जितना जटिल नहीं है जिममे तमाम मालगाडियो और सवारी गाडियो के सामाय समय और आगे निकलने के स्थल दिए जाते है । व्यस्त लाइनो की समयसारणियाँ ग्राफ द्वारा तैयार की जाती है और उन्हे देखकर पता चलता है कि एक्सप्रेस गाडियो के बीच मन्दचाल गाडियो को बिठाना कितना कठिन काय है। 'यातायात को गतिशील रखना' अध्याय पूरी गति वाले एक्सप्रेस स्लिप-टिब्बो के उल्लेख विना अधूरा ही रहेगा। ये डिब्बे उन यानियो की सुविधा के लिए लगाए जाते हैं जो बीच के स्टेशनों पर उतरना चाहते हैं जहा पूरी गाडी नहीं ठहरती। केवल ब्रिटेन ही एक ऐसा देश था जहाँ यह व्यवस्था सचमुच लोकप्रिय थी। हालाकि वहाँ भी सौ वप वाद यह रोचक अभ्यास खत्म कर दिया गया है। एक विशेष गार्ड स्लिप-डिब्बे को हटाता था और फिर ब्रेक लगाकर इसे खड़ा करता था जबकि बाकी गाडी चलती रहती थी, इस गार्ड पर किया जाने वाला व्यय बहुत भारी सिद्ध हुआ। लेकिन डाक-थैलो की अभी भी, लाइन के किनारे लगी प्रेषण भुजामो और जालो तथा गाडी से बाहर निकले हुए इसी प्रकार के उपकरण के बीच, पूण गति पर अदला-बदली होती है। ब्रिटेन और अमरीका, दोनो मे, डााधर गाडियो का काफी उपयोग करते हैं और वास्तव मे बहुत-सी डाक शैल्फ (shelves) लगे यानो मे छाँटी जाती है। राति मे गजन करती जाती रेल मे सॉटर (sorters) जिस गति से कार्य करते है उसका विश्वास करने के लिए उहे ऐसा करते देखना आवश्यक है।
विन्यास प्राधुनिक सिगनलन और निययण माधन महत्वपूर्ण होने पर भी, यदि मार्ग तथा स्टेशन अपर्याप्तया अव्यवस्थित है तो साधन विषम परिस्थितियो का सर्वोत्तम उपयोग करने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते। जैसाकि रेल- जिज्ञासु लोग भलीभांति जानते है कि किसी भी तत्र की क्षमता अन्नत उसके मूल विन्यास द्वारा सीमित होती है। इसहरी लाइन वाले माग दोहरी लाइन वाले मे आधे से काफी कम यातायात ढो सकते हैं क्याकि विपरीत दिशा को जाने वाली गाडियाँ ऑसिंग लूप (crossing loop) पर, जहा वे एक-दूसरे से आगे निकलती या मिलती है, भूले-विसरे ही एक्साथ पहुंचती है। यदि वे एकसाथ पहुँचे तो भी समय तो नष्ट होता ही है। आमतौर पर लूप केवल इतने लम्बे होते हैं कि सबसे लम्बी गाडी को ठहरा सके, इसी से स्पष्टत प्रत्येक मिलन पर कस-से-कम एक गाडी को पूरी तरह ठहरना पडता है । टक्कर हो जाने का खतरा मिटाने के लिए यदि गाडिया नूप के सिरो से बाहर निकल जाएं तो दूसरी गाडी को सामा यत उस समय तक सिगनल नही दिया जाता जब तक कि पहली गाडी रुक न जाए । अमरीको इकहरी लाइनो पर जहा औसत से अधिक लम्बे आगे निकलने वाले लूप होते हैं और जहाँ के द्रीकृत यातायात नियत्रण अपना लिया गया है वहा अब बिना रुके मिलान (non-stop meet) आम हो गया है। नीचे दिये एक प्रतिरूपी ब्रिटिश इकहरी लाइन वाले क्रॉसिंग-स्टेशन के वियास में यह दिखाया गया है कि सिंगनल-वाक्स का प्रत्येक लीवर (lever) कैसे अन्त पाशित होता है । (चिह्नो के लिए अगला पृष्ठ देखिए)। सवान 14 9 150-DB 120 - 1. 22 सिगनल बावस सावधान सिगनल लीवरों का मत पागन (Interlocking of signal levers) 72 परिचालित होने पर (When operated) सस्या द्वारा निर्मुक्त (Released by) सामा य स्थिति किसी एक स्थिति म पाशन में पाशन निमुक्त (Locks in (Locks in परती है normaal either '(Releases) | position) position) 22 17* 110 9 13* 141 16 113 1 22 8 2 1 7 19 20 2 10 111 3 122 4फालतू लीवर के लिए स्थान 5 फालतू लीवर के लिए स्थान 6 | फालतू लीवर के लिए स्थान 7 8 9 9 ॥ 14 10 116 9 12 ४ 12 11520 13 17 14 13 19 21 15 112 16 10 17 पास सीवर के लिए म्यान । 18 पालनू लीवर के लिए स्थान 19 पासनू सीवर के लिए स्थान | 20 12 21 13 22 16 10 14 14 21 12 15 22 22 7 110 914 13 16 -- . जर 9 सामार तो पोर 13 मरिमी एर स्थिति म पान दोसरी लाग्ने पत्यधिर यातायात दो पनी है नेग्नि यातापान मातान मेस गिगाला पतिल गादिया मीमाश चाल पर भी गिभर परती है । पृष्ठ 69 पर दिया गया ग्राफ मच प्रारी गारियो दीवाली साइन में मम्बध में बताता है पोर नरिना न म दात EिTI रोगी । इमाना मार्ग में मगो मारे गमरचे धोरयल पास गरा होना माना। पान निानी मारहमी मानी हो साफ समातर रेसाएं होगी और शटिंग तथा माग-पाश्वन को उतनी ही कम आवश्यकता होगी-शटिंग और माग-पाश्वन में समय व्यय जाता है । पहले जिम यातायात के लिए चार मार्गों की आवश्यकता पडतो थी वे अव दोहरी लाइनो द्वारा सम्पन्न हो रहे है । ऐमा इसलिए है कि माल- गाडियो की चाल धीरे-धीरे सवारी गाडियो ये निनट पहुँच रही है । लेकिन चार पथ अभी भी ग्राम है और दोहरी लाइन की तुलना में दुगने से भी अधिक यातायात ढोते है, क्योकि शीघ्रगामी और धीमी चाल वाली गाडियों अलग-अलग रखी जा सकती है। सामा यत प्रत्येक दिशा में एक मार्ग एक्सप्रेस गाडिया के लिए आरक्षित कर लिया जाता है और दूमरा माग अधिकतर मालगाडियो और स्थानीय सवारी यातायात के लिए उपयोग मे लिया जाता है । पूरे तौर मे एकसमान चाल रसना कठिन है हालाकि ऐमा चाहना उचित है। इसी कारण पथिकाएं और लूप लाइने अपरिहाय है। मलवा डालने वाले स्थानो का आमतौर पर मुरय लाइन से अनुयार मम्बध होता है। इस कारण गाडिया को उनपर पीछे वापिस जाना पडता है। लेकिन जैसा कि 68 पृष्ठ पर चिनित है यदि लुप लाइनो की सुविधा हा तो गाडियो को पीछे हटने की आवश्यक्ता नहीं। ऐसे स्टेशनो पर, जहाँ केवल धीमी चाल वाली गाडियां आती है, यानियो के प्लेटफाम कभी-कभी लूप लाइनो के साथ साथ होते है। अय मामलो में वे मुरय लाइनो और लूप लाशो के बीच मे रखे जाते है ताकि दोनो के काम आ सके और ऐमी स्थिति मेये द्वीप-प्लटफाम कहलाते है। एक्जक्शन स्टेशन मे काफी द्वीप प्लैटफाम होते है और द्वीपो के एक मिरे पर प्राय कुछ लघु-साडी-प्लैटफाम भी होते है। ब्रिटेन एक अपवाद है जहा सारे प्लेटफाम कई फुट उचे होते है ताकि यानी गाटियो मे चढने के श्रम-विना उनमे वठसकें। अब तक अधिकाश स्टेशनो पर माल-विभाग होते थे, लेकिन छोटी जगहो पर प्राय लघु पथिका होती है और जब शटिंग की जाती है तब मालगाडी का मुन्य भाग चालू माग पर ठहरा रहता है। केवल स्थानीय मालगाडिया ही छोटे स्टेशनो पर आती है और इन मालगाडियो को चाहिए कि काटे जाने वाले सारे माल-डियो को किसी सुविधाजनक स्थल पर एक खड के रूप मे एकसाथ रखकर पहुंचे । पथिका पर मटिंग कर सकने से पहले रेलइजन को कभी-कभी गाडी के 'चारो ओर' दौडना पडता है। विकल्पत छाटे माल-याई (goods-yard) की सेवा केवल एक 74 दिशा को जाने वाली गाडियो द्वारा होती है, चाहे इसके कारण डिब्वो को स्टेशन से आगे निकटतम विन्यास-याई को भेजना और वापिस लौटाना पडे । अय बातो की तरह जहाँ तक सम्भव हो शटिंग भी बड पैमाने पर करना है । दरअसल कुछ छोटे स्टेशन आजकल अपना माल-विभाग विल्कुल ही खो रहे हैं या फिर पथिकाएँ मालगाडियो के केवल वैगन भार (wagonloads) के व्योहार के लिए रखी जाती है । भविष्य मे जकशन स्टेशन पर यातायात केन्द्रित करने के लिए शायद कुछ शाखा-लाइनो पर से मालगाडियाँ हटा ली जाएं। विशेषत तरह-तरह के छोटे सामान (miscellaneous cargoes) को रेलहैड' ('railhead') पर भेजना और वहां से उसे सडक द्वारा पहुंचाना सस्ता पडता है। बडे स्टेशनो पर माल-शटिंग चालू लाइनो से अलग की जाती है। वियास मे कई जोडे समातर-मार्ग होते है (प्रत्येक जोडे के बीच सडक-मार्ग होता है) जो एक या अधिक शटिंग मार्गों को जाते है । हालाकि यहाँ भी न्यूनतम शटिंग की जाती है ताकि रेलवे और सहक-यानो के बीच माल लादना और उतारना विना रुकावट के चलता रहे विन्यास-याड से, जो शटिंग का वास्तविक घर है, भरे पूरे माल-डिब्बे सही क्रम से पहुंचते रहते हैं । वियास-याड, जहा से बहुत सी मालगाडियाँ अपनी यात्रा प्रारम्भ करती है, महत्वपूर्ण स्टेशनो और जाशनो के निक्ट होते है । इनमे भी समातर-मार्गो का क्रम होता है (वीच सडक मे यानो के लिए स्थान नहीं वियास याड (Marshalling Yard) 75 । होता)। वियास-याउ पी प्रत्येव पथिवा विभिन्न दिशा को जाने वाले याता. यात के लिए प्रारक्षित होती है और जहां कही भी सम्भव हो एक गन्तव्य स्थान के लिए एक पूरी गाडी बना दी जाती है । फिर भी बहुत-सी गाडियो को डिब्बे बदलने के लिए वीच-बीच मे वियास-याड जाना पडता है। आधुनिक याडों में कारो या माल डिव्यो को एक शटिंग मार्ग द्वारा पथिकानो तक भेजा जाता है। यह माग एप वृत्रिम पहाडी या कूबड पर से गुजरता है। याड मे पहुंचने के बाद एक मालगाडीकोडियो को 'कॉटो' ('cuts') मे बांट दिया जाता है। प्रत्येक पॉट भिन-भिन्न पथिका के लिए नियत होता है। शटिंग या स्विचन करता हुअा रेलइजन गाडी को, पथिका से काफी दूर, कूबड की तरफ ढकेलता है। शिखर पर पहुँचने के बाद प्रत्येक कॉट अपने निजी सवेग के कारण पूचड की दूसरी तरफ ढलान की ओर दौडता है । ढाल-केबिन या बुर्ज मे यार्ड-नियत्रक सही पथिका के लिए काटा बैठा देता है और उसके पास इतना समय होता है कि ढलान पर से लुढक्ते आते दूसरे डिब्बो के कॉट को दूसरी पथिका के लिए बदल सके । वह विलम्ब- कर को भी काम मे लाता है। विलम्बकर एक वायवीय-निपीडक होता है जो पहियो के घेरे पर दाब डालकर उनकी चाल कम कर देता है ताकि वे पथिका पर पहले से ही खडी हुई गाडी मे बुरी तरह टक्कर न मारें। अमरीका के लिए, जहा भारी माल डिब्बे होते हैं, ऐसा बहुत आवश्यक है । नियत्रक यह जान लेता है कि कॉट किस मार्ग से जाएँ कि वे बहुत उच्च आवृत्ति वाले रेडियो से या लेवल-लगे डिब्बो के अयुग्मन (uncoupling) टेलिविजन चित्रो से वायवीय-नलिका द्वारा भेजा जाने वाला लिखित संदेश बन सकें। डिब्बो का अयुग्मन कूबड की उलटी तरफ तल मे होता है । कुछ मामलो मे सूचना एक मशीन को दे दी जाती है जो स्वत ही कांटो को बैठा देती है और विलम्बकर को काम में लगा देती है। अपने चल-स्टाक याड मे सवारी गाडियो को भी व्यापक शटिंग की आवश्यकता पडती है । यह शटिंग चालू मुरय माग से विल्कुल अलग होती है और माल-यार्ड ऐसे माग से दूर ही होते है। यातायात की विभिनता के अनुसारगाडियो की लम्बाई समजित करनी पड़ती है और डिब्बो को मरम्मत या रग रोगन के लिए वारम्बार हटाया जाता है। शटिंग की तरह ही प्रत्येक दिन सफाई भी होती है । अव बाह्य सफाई अक्सर गाडी को उच्च-दाब वाले जल-प्रधार के पुल के नीचे से वापिस गुजारकर की जाती है। 76 कभी-कभी सवारी गाडी के चल-स्टाक यार्ड उन स्टेशनो से बहुत दूर रखे जाते हैं जिनके वे काम आते है शहरो के केन्द्रीय क्षेत्रो मे जगह कम और कीमती होने के कारण ऐसा होता है। जहाँ इस तरह की बात है वहाँ यदि अलग मार्ग नही है तो खाली गाडियो को स्टेशन पर लाने-लेजाने मे माग पर भीड बढती है । वही बडा अन्तिम स्टेशन आदश है जिसमे न केवल खाली गाडियो के लिए ही बल्कि रेलइजन-डिपो से आ-जा रहे मुख्य-लाइन वाले रेलइजनो के लिए भी अलग-अलग माग हो । खाली गाडियाँ आमतौर ए रेल जन डिपो स्टेशन भवन 660 माल गोदाम - मप्य माकार का भादश मतिम स्टेशन (Ideal medium-sized terminus) ! धूमधार (Turntable)। 2 सवारी गाडी स्टॉक की शटिंग के लिए वा शटिंग (Back shunt for shunting passenger train stock) 3 FATTET ATTA (Signal box)1 4 पोयला स्टज (Coal stage)15 जल युज (Water toucr)। 6 इन पा शैड (Engine shed)। 7 ये प्लेटफाम (Bay platform)1 8 नम्बर 4 प्लटफाम (Number 4 platform)। 9 मुम्य भागमन टफाम (Main arrival platform)। 10 मुख्य प्रस्थान प्लटपाम (Main departure platform)। ॥ मासगागे मीटिंग के लिए वर शट (Back shunt for goods trains) | 12 उस बुज (Water tower), 13 मालगोदाम (Warehouse). 14 पागन पातारातनिए सदान स्थल (Loading dock for pareels traffic)| 15 यह मान को पहुंचने वाली मातगारी में लाना मो. गाडी रिंग रिए जान में पूर्व ही रेसानो जाने के लिए उपयोग की जाती है। 16 मानगारी पदपन मौर एटने गरीमान (Goods ariral and drrarture lines): 10 गपहरा पपिराएँ (Storage srdings)। 18 मासगा स्टेशन (Goods station) 77 पर उन शटिंग-इजनो द्वारा लाई जाती है जिनका समय बडी मशीनो की तुलना में कम मूल्यवान है । कभी-कभी जब तक कि गाडी वास्तव मे चली नहीं जाती तब तक ये शटिंग-इजन स्टेशन के दूर मिरे पर फंसे रहते हैं । मुख्य लाइन और उपनगरीय तर भली-भाति पृथक होने चाहिए, हालाकि यह सम्भव है कि व्यस्त समय में कुछ अतिव्यापन हो जाए। मुत्य- लाइन खड मे पहुँचने और प्रस्थान करने वाली गाडियो के लिए अलग अलग प्लैटफाम होते है लेकिन स्थानीय गाडिया (विशेषत डीज़ल या विद्युत् बहुल इकाई गाडिया) यानियों के एक सैट (set) को लेकर तुरत चल देती है। सवारी गाडी याड मे, स्थानीय गाडियो की उतनी जबरदस्त देख- भाल की आवश्यकता नहीं होती जितनी एक्सप्रेस की होती है। सुबह तडके यातायात अधिकतर वढे क्स्वी या शहरो की ओर होता है और शाम को महरो से गाँव या उपनगरो की ओर। इसीलिए स्थानीय गाडियाँ मुख्यत अपनी यात्रा के सुदूर सिरे पर गांव या उपनगरो मे एकनित की जाती है जहां जमीन सस्ती होती है। यातायात के पृथक्करण के प्रश्न पर अधिक बल नही दिया जा सक्ता । हम ऐसा मान सकते है कि हमारे अतिम स्टेशन से चार माग कम- मे-कम दम मौत की दूरी तक जाते है और हम कल्पना कर सकते हैं कि तेज- लाइन पर बिना रुके जा रही एक्सप्रेस गाडी, मन्द-लाइन पर रुक-रुककर जाने वाली दो या तीन गाडियो से आगे निकल जाती है। यदि अन्तिम स्टेशन से कुछ मील दूर मार्ग इस प्रकार विद्याए जाएँ कि मद-लाइनें एकसाथ एक ही तरफ होने की अपेक्षा तेज़-लाइनो के दोनो तरफ एक-एक रखी जाएँ (यह व्यवस्था कुछ विशेष प्रकार के मध्यवर्ती स्टेशनो के विन्यास में सहायक होती है) तो ये मन्द-लाइनें, निचले या ऊपरी घुमाव सगम पर (iy-under or fly-over junction) दोनो तेज़ मार्गों के नीचे या ऊपर से स्ख बदलती जाएंगी और तब भी चारो मार्गों का एक्साथ उपयोग करने मे बाधा नहीं पहुँचाएंगी। रेलवेवाले अक्सर यह कहते है कि एक वार गाडी चल पडती है तो उसको चिन्ताएँ लगभग समाप्त हो जाती है । वहुत कम यात्रियो को इतना अवकाश हाता है कि इस बात का अनुमान लगा सके कि एक एक्सप्रेस को तैय्यार करने में कितना काय करना पड़ता है इसमे शयन-यानो के लिए काममाने वाली चादरो के फलाने से लेकर सीटो के प्रारमण तक (इस सबकी 78 - जांच शायद महीनो पूर्व गाडी के पारेख के आधार पर होती है। भोजन- यान के लिए मछली के आदेश से लेकर कर्मीदल तथा रेलहजन चलने लिए अग्रिम रोस्टर (rostering) तक का कार्य होता है। कुछ भी क्यो न हो रेलइजन को अवश्य तैयार होना पडता है। माल-यार्ड और सवारी चल-स्टाक याड की ही भॉति रेलइजन-डिपो भी, मुस्य लाइनो से अलग, प्रारमनिर्भर होते है । यह स्वाभाविक है कि रेलइजन के प्रकार के अनुरूप ही व्यवस्था में भी बहुत विभिन्नता होगी। भाप-रेलइजनो को सम्भालने की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। दिन भर के काय से लौटने के बाद इजन मबसे पहले कोयला प्लाट पर जाता है । आधुनिक डिपो पर प्लाट या बुर्ज मे कोयला एक अविरत पटट द्वारा अथवा यात्रिक तरीके से ऊँचे उठाए जाने वाले लदे हुएडियो द्वारा भरा जाता है । आवश्यकता पड़ने पर यह कोयला एक नाली (chute) द्वारा रेलइजन के टडर (tender) मे डाला जाता है। दूसरी पारी आती है जल- केन पर जाने की जहा कि टक्यिा पुन भरी जाती है । इसके बाद राख गर्त से भाग निकाली या उममे 'डाली जाती है और यदि रेलइजन टेडरवाला होता है तो शड मे जाने से पूर्व इसे घूमचक्कर पर घुमाया जाता है। शेड मे रेलइजन वी सामान्य देखभाल और सफाई हो जाने के बाद ही पुन आग जलाई जाती है । पहले घूमचक्कर कर्मीदली द्वारा धकेला जाता था, लेकिन आधुनिक घूमचक्कर रेलइजन के अपने प्रेक-तन के पम्प द्वारा काम करता है। जब इजन डिपो मे होता है तब भले ही यह ढके हुए शेड के नीचे न हो फिर भी यह शैड पर' कहलाता है। प्रत्येक इजन एक विशेष गंड के लिए नियत कर दिया जाता है लेकिन एक्सप्रेस रेलरजनो को एक रात छोडवर हर दूसरी रात सैकडो मील दूर स्थित डिपो में वितानी पड़ती है। विमी डिपो मे जाने पर ही आपको वास्तव मै समझ मे आ मक्ता है कि भाप क्यो बाहर निकाली जा रही है। भाप-रेतइजन की तुलना में डीजल और विद्युत् महीने बहुत पम समय मे तैयार की जाती है और ये बहुत अधिक साफ भी होती है । कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता वि डीजल पोर विद्युत-गाडियां भाप वाली गाडियो जितनी रोचक है लेकिन जैगा कि मैं यणन पर गुया हूँ प्राय मिगाल पार अ य युतियो की सहायता गे ये कम से-चम मुख्य-साइन रलवे को इतना ममय बनाती है कि वे मात्म- विश्वास से भविष्य को मोर देस सरें। - 79 रेल-सेवा मे नौकरियों ब्रिटेन में रेलवे नौकरी देने वाली बहुत बडी सस्थानो मे से एक है। आजकल लगभग 550,000 स्त्री पुरप ग्ल-सेवा मे हैं। 1948 मे हुए रेलवे राष्ट्रीकरण के बाद यह सरया लगभग 100,000 कम हो गई है लेकिन विशेषज्ञों के ज्ञान और प्रशिक्षण की माग करने वाली नौकरिया अधिक हो गई है । एकवार नियुक्ति पाने के बाद आगे की गिक्षा के लिए अच्छे अवसर मिलते है और कुछ देहाती क्षेत्रो को छोडकर बाकी जगह सभी विभागो मे उनति अधिक शीघ्र होती है। आजकल रेलवे में काम करने वाले उच्चपदाधिकारियो ने अपना जीवन सीढी के पहले सोपान से प्रारम्भ किया है और नये रेलवे कर्मचारियो मे अभी भी अधिकाशत वे है जिन्होने स्कूल की शिक्षा पूरी नहीं की है। लेकिन चालन-शक्ति, सिविल इजीनियरिंग, सिगनलन और दूर-सचार के लिए विश्वविद्यालयो के स्नातक और तकनीकी उपाधि प्राप्त व्यक्तियो की मांग उत्तरोतर बढ़ रही है और एक 'यातायात शिक्षु (apprentice) योजना' भी है जिसके अन्तगत परिचालन और वाणिज्य विभागो मे तीन वर्ष का प्रशिक्षण दिया जाता है। इस योजना के अतगत अट्ठाइस वर्ष तक की आयु वाले नवयुवको के लिए एक खुली लिखित प्रतिस्पर्धी परीक्षा होती है। ब्रिटेन और अमरीका दोनो की रेलवे-सेवाग्रो मे बहुत विविधता है क्योकि गाडियों चलाने के साथ-साथ रेल विभाग का इजीनियरिंग के बडे- बड़े कामो की देखभाल करनी होती है, उनकी अपनी टेलीफोन व्यवस्था है, उनके पास अपनी जमीनें है, सडक परिवहनो का वेडा है और उहे प्रतिदिन हजारो यात्रियो को भोजन देना होता है। विभिन्न प्रकार की नौकरियो का वणन करने वाली पुस्तिकाए नि शुल्क प्राप्त है। ब्रिटेन में परिवहन आयोग, प्रचार विभाग, 222, मालवॉन मार्ग, लदन, एन डब्ल्यू -1 (Transport Commission, Publicity Division, 222, Marylebone Road, London, NW-1) को लिखे। 89 .
रेल-जिज्ञासुओ के लिए सुझाव आजकल के दिन रेलवे मे द्रूत परिवतन के हैं । जब आप दुवारा रेल-यात्रा या अपने स्थानीय स्टेशन पर जाएं तो आधुनिकीकरण और केन्द्री- करण के उदाहरणो को खोजना रोचक सिद्ध हो सकता है। विटन के बहुत-से भागो मे इगको का स्थान रगीन-प्रकाश वाले सिगनल ले रहे है और बहुत-से पुराने सिगनल-वाक्स की जगह एक ही आधुनिक सिगनल-चाक्स र्याप्त है। आप शायद विभिन्न प्रकार के डीजल और विद्युत्-चालित बहुल इकाई गाडियो को आपम मे तुलना करना पसन्द करें। कुछ महत्त्वपूण जकशनो के निकट नये वियास-याड बनाए जा रहे है और वहुत-से छोटे-छोटे भाल तथा सवारी-गाडियो के स्टेशन बन्द किए जा रहे हैं। प्राजक्ल सडको द्वारा यात्रा करना अधिक सुविधाजनक हो जाने के कारण बडे कस्यो के निकट उपनगरीय लाइनो पर बद किए हुए सवारी गाडी स्टेशन विशेषतया दिखाई पडते है। जो परिवर्तन आपकी दृष्टि मे आते है आप उनके फोटोग्राफ ले सकते हैं या चाहे तो भाप-गाडियो के फोटोग्राफ का सग्रह बना सकते है। जैसे-जैसे डीजल या विद्युत्-शक्ति द्वारा चालित गाडियो का प्रलचन बढ रहा है वैसे-वैसे भाप-रेलइजनो के चित्र बहुत रोचक होते जाएँगे। विभिन क्षेत्रो के रेलइजन से सम्बन्धित क्षायो का वणा करने वाली पुस्तिकाएँ अधिक- तर समाचारपन-विक्रेतागो के पास उपलब्ध है। रेलवे और उसकी कार्यविधि में रुचि रखने वाले व्यक्तियो के लिए बहुत-सी सस्थाएँ हैं । जाज रोनल्ड (George Ronald) द्वारा प्रकाशित 'रेल-जिज्ञासुग्रो की निदेशिका' (The Ramay Enthusiast s Gunde) मे इसकी पूरी सूची दी गई है और कुछ की क्रियाएँ 'रेलवे मैगजीन' और 'ट्रेन्स इलस्ट्रेटड' नामक पत्रिकामो में प्रकाशित होती हैं। कुछ सस्थाएँ रेलइजन-डिपो दिखाने की व्यवस्था करती है और ऐसे असाधारण मार्गों पर सैर के लिए गाडियां किराए पर लेती है जिनमे व शाखा-लाइनें भी सम्मिलित होती है जो माधारण यात्रियो के लिए बंद हो चुकी है। यदि आपकी रुचि 81 शाखा-लाइन और छोटी-लाइन वाली रेलवे मे है तो आप किसी ऐसी ऐच्छिक सस्था मे शामिल हो सकते है जिसने बन्द लाइनो का भार सम्भाल लिया है और उन्हे जिज्ञासुग्रो व भ्रमणार्थियो के लिए पुन खोल दिया है । साप्ताहिक या पाक्षिक अवकाश वाले दिन आपकी सहायता का निश्चित रूप से स्वागत किया जाएगा। रेलवे सम्बन्धी कार्यों के विभिन पहलुप्रो पर प्रतिवष बहुत-सी पुस्तके प्रकाशित होती है । वे सरया मे इतनी अधिक हैं कि कुछ चुनी हुई पुस्तको की सूची देना भी कठिन है। लेकिन यदि आप किसी विशेष पहलू का और अधिक अध्ययन करना चाहते हैं जैसे सिगनलन अथवा रेलइजन का, तो आपका पुस्तकाध्यक्ष या पुस्तको की दूकान आपकी सहायता करेगी अथवा रेलवे-साहित्य मे विशेषज्ञता प्राप्त करने वाले प्रकाशको और पुस्तक- विक्रेताओ के नाम प्रापको 'रेलवे मंगजीन' और 'ट्रेन्स इलस्ट्रेटड' (Railway Magazine and Trans Illustrated) नामक पत्रिकामो मे मिल सकते है। 82 पारिभाषिक शब्दावली क्रॉस है। क्रासिंग लूप र शपट crack express मत पाशन युक्ति interlocking device अग्रदीप headlamp अतितप्त superheated प्रतिव्यापन overlapping प्रघोदिशी downward अनुक्रम sequence अनुज्ञात्मक ब्लॉक permissive block अनुमुख काटा trailing point अनुयान सम्बध trailing connection अप्रत्यास्थ-तत्र inelastic system अपशिष्ट कपाट waste valve अध स्वचालित semi automatic continuous belt अश्वशक्ति horsepower प्रसयमित unrestrained ऑटोमोबाइल automobile प्रामचर artnature मावृति frequency भासजन शक्ति इगक semaphore इजक्ट idject Innard उत्तार viaduct उत्तोलक lever उदासीन neutral उपवरण apparatus उपकरणिका instrument उपरिदिशी upward अविरत पट्ट उपस्कर equipment ঋ বিদ্ধ minus sign एकदिशकारी rectifier एकसार uniform इनहरी लाइन single line ऐंठ परिवर्तिन torque converter पातिक critical cross head crossing loop crank shaft का एक्सप्रेस कडाह pan कम्पन vibration कपरगदड शक्ति drawbar power tractive effort अपए मोटर tractive motor कल पुर्ने gadgets काटा point काबूरेटर carburettor विगरी cog किरणावलियाँ beams केन्द्रीकृत नियत्रण centralised control केद्रीय सिल centre sull बैंची crossing दब्बूज caboose वोयला-प्लाट coaling plant section train on line खटका-काटा वपण चेष्टा adhesion power catch point 83 motive power गत्री gantry गमन अधिकार line clear गलियारा corridor गिट्टियाँ ballasts गुरु चतुर्थाश upper quadrant घटी सकेत bell-code घूमचक्कर turntable धूगन rotation चक्र cycle चतुर्थाश quadrant चल जिह्वा movable tongue चल स्टार rolling stock चालन conductor चालक अनुयान driving vehicle चालय धुरी driving axle चालर पहिया driving wheel चालन पोष्ठ driving cab चालन शक्ति चालन सचरण drie transmission speed limit running track चेतावनी सिंगनल warning signal algut feration four-aspect signal जनित्र generitor water cranc water level जल द्रोणी water trough अत्तनिवास drainage जुडवो राजन articulated locomotse welded मोरा blast trunk route turbinc डारपमा mailbag सीजन पचालित diesel hydraulic उस-यात्रिय diesel mochanical डोजल विद्युत diesel-electric डीजलीकरण dieselization पटाखा (डेटोनेटर) detonator scoop ढांचा framework ढाल वेबिन hump cabin विज्या radius त्वरक accelerator system तकनीकी विवान technology तरलाशय reservoir तापन क्षेत्र heating surface तापन तत्र heating system प्रॉटल throttle द्विलॉक प्रणाली double block Working द्वीप प्लटफाम island platform combustion दिल्हा pinel दिष्ट धारा direct current देद पाश tight lock distant signal पर प्रकाप्ठ vestibulc दोहरी लाइन double line ध्यानाक्पए calling attention smokc bor bumer निक्ट मिगनल home signall निम्न बोल्टता low voltage नियन controller नियत्रय ढाल ruling gradient निपरा हत्या control handle नियामर regulator निर्वात Vacuum निलम्बित इल suspended water निवास eyector पजामुन riched चाल सीमा चालू माग दूर सिगनल जलन जल पृष्ठ पून याक्स भनी हुई 84 pony truck block system block post blast pipe बहुल इकाई प्रेषण भुजा प्रकोष्ठ vestibule प्रगलन smelting प्रघात thrust प्रत्यावर्ती धारा alternating current प्रतिरोध resistance प्रतिरोधी insulated प्रतिवर्ती गियर reversing gear प्रदीप्त पारेख illuminated diagram प्रधार jets प्रवणता gradient प्रवात draught प्रशीतित refrigerated प्रस्थान सिगनल starter, starter signal प्रसारित transmit dispatching arm पटरी raill पथिका siding परमाणु-ऊर्जा atomic energy atomic power परिचर टेंडर tender ससूचक detector परिपथ circuit परिरक्षर preservative पहिए का आधार wheel base पायलटमन pilotman पाणन छड locking bar पाशन दांचा locking frame पाशन युक्ति locking device piggy back pinning down piston rod पीट peat पुलमनन्यान pullman-car पंच युग्मन screw coupling पोनी पहिया फ्लिक fick ब्रेक-दड bruke rod ब्रकट bracket ब्लॉक block ब्लॉक-तम ब्लॉग पोस्ट ब्लास्ट पाइप वफर buffer बहु मुखी multi aspect बहु मुखी सिगनल multi aspect signal multiple unit बॉयलर boiler बॉयलर भट्टी firebox बिजलीघर power station बुफे कार buffet car बुलहैड पटरी bullhead rail भट्टी अगीठी firegrate भाप नाल sterm pipe भाप रेलइजन steam locomotive भाप रोक steam tight भार गेज loading gauge मानकीकरण stand ırdısation मापन यत्र gauge माग परिपयन track circuiting माग पाश्वन side trucking माग मवेत route code माल डिब्बा goods wigon माल याड freight yard मिनट minute (time) मिश्रधातु alloy मेग्दड backbone मगनीज़ maganesc यत्रावलि mechanism याधिक वनच mechanical clutch याज छड परमाणु शक्ति पिग्गी बन पिनिग डाउन पिस्टन दड connecting rod 85 युक्ति युग्मन युग्मक छड योजक device couplung coupling rod link राख गत ash pit रचनाकार रपटा describer रिले रेचक रेलव-तत्र रोक सिगनन लघु खाडी staff प्लटफाम लघु चतुर्थाश लम्बन सूप-लाइन लौह सम्पर वत्र वातानुकूलन वायवीय निपाडक वास्तविक सिंगाल विद्युत रिल विद्युतीकरण वियास वियास-याड विनिमयशील विलगक विलम्बकर विश्राम-वक्ष विस्थापन ramp relay exhiust railway system stop signal short bay platform lower quadrant perpendicularly loop line iron contact curve airconditioning pncumatic squeezer proper signal electric relay electrification layout marshalling yard interchangeable cut-off retarder lounge dislocation विसजन discharge वैद्युत वातिल electropneumatic वोल्टता voltage शिक्षु apprentice शड shed शेल्फ shelf सचालक conductor (electric) सम्पीडित compressed सवातन ventilation सवेग momentum स्ट्रोक stroke स्टॉक stock स्टाफ स्फुलिंग प्लग sparking plug स्नेहन lubrication स्लिप डिब्बा slip coach स्लीपर sleeper समजन adjustment सम्भरण supply सम्मुख काटा facing point समपार level crossing सहयुग्मित coupled together सहयोजन conjunction सापेक्ष चाल relative speed सिगनलन,सवेतन signalliog सिगनल-खम्मा signal post मुप्रवाहिता streamliniog safety point handle baad lever सुरक्षा काटा हत्या हस्त उत्तोलक 86
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