Bharti Bhawan Library, Allahabad
Hathyogpradeepika
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S PEDIO PRATISHTRA 3- - Excelance NO SYococa Gro PRODepreceIc AGRICA මම წc2c9I CIC2VJდიდესი R । । Face Paralyan rance ti SHI ॥ श्रीः॥ seeta हठयोगप्रदीपिका। PM सहजानन्दसन्तानचिन्तामणि- स्वात्मारामयोगीन्द्रविरचिता। SNEL श्रीयुतब्रह्मानन्दविरचितज्योत्स्नाभिधसंस्कृतटीकया, लाँखग्रामनिवासिपाण्डितमिहिरचन्द्रकृत- भाषाटीकया च समता । wer RAAT गङ्गाविष्णु-श्रीकृष्णदास, मालिक-"लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर " स्टीम्-प्रेस, कल्याण-बंबई. 20 STOREA संवत् १९९२, शके १८५७. 1936. PHARMACARE MALAMITAB PLAOMMENRNA Raptine स ලිෂි ලයිස්තර බව මා ට අමාරු කා(මුත් secrecisekselectseradeep Seleased 10 YYYYYYYYYY त्र मुद्रक और प्रकाशक- गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, मालिक-" लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" स्टीम प्रेस, कल्याण-बंबई. सन् १८६७ आक्ट २५ के बमुजब रजिष्टरी सब हक्क प्रकाशकने अपने आधीन रखा है। wtm Remidayna प्रस्तावना। -00- . देखो! इस असार संसारसे मोक्षके अर्थ तथा सर्व मनोगत अभीष्ट सिद्धि योगविषयमें हठविद्या है जो प्राणियोंके हितार्थ योगिराज शिवजीने पार्वतीके प्रति महाकाल योगशास्त्र में वर्णन की है, उसी हठविद्याका सेवन करके ब्रह्माजी ब्रह्मपदको प्राप्त हुए हैं. श्रीकृष्णचंद्रजीने गीतामें अर्जुनको और श्रीमद्भागवतमें उवको उपदेश किया है, प्रायः ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, याज्ञवल्क्य इन सभीने इसका सेवन किया है, मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथजीने प्रथम शिवजीसे हठयोग श्रवण किया, इन्हीं गोरखनाथ- जीकी कपासे स्वात्मारामयोगीन्द्रने सर्व मुमुक्षुओंके मोक्षप्राप्त्यर्थ हठयोग प्रदीपिका नामक अन्य चार उपदेशोंमें रचित किया। प्रथमोपदेशमें यम, नियमसहित (हठका प्रथम) भाग आसन, द्वितीयोपदेशमें प्राणायामप्रकरण, तृतीयोपदेशमें मुद्राप्रकरण, चतुर्थोपदेशमें प्रत्याहारादिरूप समाधिक्रम वर्णन किये हैं, उक्त ग्रन्थ श्रीयुतब्रह्मानन्दविरचित ज्योत्स्ना नामक संस्कृतटीकासहित तथा सर्व साधारण मुमुक्षुओंके लाभार्थ हमने पं. मिहिरचन्द्रजीके द्वारा याथातथ्य भाषाटीका भी कराकर स्वच्छतापूर्वक छापके प्रकाशित किया है, आशा है कि, सर्व सज्जन इसके द्वारा हठयोगका रहस्य जानकर लाभ उठावेंगे और हमारे परिश्रमको सफल करेंगे। आपका कृपाकांक्षी- खेमराज श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-"श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम् प्रेस, बम्बई. t°/ ॥ श्रीः॥ हठयोगप्रदीपिका-विषयानुक्रमणिका । विषय. श्लोक. पृष्ठ. प्रथमोदेशः मंगलाचरण .0 १ १ गुरुनमस्कार मंगलाचरण mr 20 ON . * * 20 4 9 6 8 : : : : : १३ .. ... १४ A १६ (१२) १६ १७ १९ .... ... ... हठयोगसे राजयोगसिद्धि (ज्ञानकी सात भूमि अर्थसहित ) टी. हठविद्याकी श्लाघा महासिद्धोंके नाम योगियोंके आधार हठ हठविद्याकी गोप्यता हठाभ्यासके योग्य देश मठलक्षण मठमें कर्तव्य कर्म योगाभ्यासके नाशकर्ता योगकी सिद्धिके कर्ता यम नियम (प्र) आसनप्रकरण स्वस्तिकासने गोमुखासन वीरासन कूर्मासन कुक्कुटासन उत्तानकूर्मासन धनुरासन मत्स्येन्द्रासन मत्स्येन्द्रासनका फल पश्चिमतानासन पश्चिमतानासनका फल मयूरासन मयूरासनके गुण प्रयोजनसहित शवासन सिद्धासनादि चार आसनोंकी श्रेष्ठता चार आसनोंके नाम और सिद्धासनकी श्रेष्ठता .0. :...:. ... :::: " २२ ..' .. .... .... २४ २५ ... ... ... .... ... .... ... .. ... २७ २८ २९ ३० ३१ . . : :: :: :: २२ -20 ३२ " ३३ ३४ .
3-2८५ विषयानुक्रमणिका। More 28/ विषय. शाक. ... २४ ... #.. .. २५ : :: ::: ४४ ३० सिद्धासन मतांतरका सिद्धासन सिद्धासनके पर्याय नाम सिद्धासनकी श्लाघा पद्मासन मत्स्येन्द्रनाथाभिमत पद्मासन सिंहासन भद्रासन हठाभ्यासका क्रम योगियोंको मिताहार योगियोंको अपथ्य योगियोंको पथ्य योगियोंको भोजन नियम अभ्याससोंसे ही सिद्धि योगांगअनुष्ठानकी अवधि ... ५६ ... ३५ .... ..... ६२ ६३ ६४. ६७ RM ... ३७ .. द्वितीयोपदेशः २. १ ... ४ ३९ m N" ... ... ९ १० ... 2 .. प्राणायामप्रकरण प्राणायाम प्रयोजन मलशुद्धिसे हठयोगको सिद्धि मलशुद्धिकर्ता प्राणायाम मलशोधक प्राणायामका प्रकार प्राणायाममें विशेषता प्राणायामका अवांतर फल प्राणायामके अभ्यासका काल और अवधि उत्तम मध्यम कनिष्ठ प्राणायाम प्राणायामसे प्रस्वेद होने में विशेषता अभ्यासकालमें दुग्धादिनियम प्राणवायुको शनैः २ वश करना युक्तायुक्तको प्राणायामोंके फल नाडीशुद्धिके लक्षण मेदके अधिक होनेमें उपाय धौति आदि षट्कर्म षट्कमौका फल १२ १३ 99. .ORG . 9. ४६ .... ... १९ ... ४८ ".. २२ २३ 19.
(६) विषयानुक्रमणिका- श्लोक. पृष्ठ. विषय, २४ ... .. ... .". .... ३३ ... " AWW धौतिकर्म फलसहित वस्तिकर्म गुणसहित नेतिकर्म गुणसहित त्राटककर्म गुणसहित नौलिकम गुणसहित कपालभातिकर्म गुणसहित षट्कर्म प्राणायामके उपकारी सांवरमें षट्कर्म असंमत गजकरणी प्राणायामाभ्यासकी आवश्यकता वायु आदिकी अनुकूलतामें कालनिर्भयता नाडीचक्रके शोधनसे सुखपूर्वक वायुका प्रवेश मनोन्मनी अवस्थाका लक्षण विचित्र कुम्भकोंका मुख्यफल कुंभकके भेद सर्व कुंभककी साधारण युक्ति सूर्यभेदन गुणसहित ( योगाभ्यासक्रम ) टी उज्जायी ५६ ... ३९ ४० ग ५७ ::::::::::::::: 2030 ६० ... ... ... A ... Kundline ६४ सीत्कारी कुम्भक ... .. ... ५१ ६६ . ... :: . ६८ ६९ ... .. शीतली गुणसहित भस्त्रिका पद्मासनसहित भ्रामरीकुंभक मूर्छाकुंभक प्लाविनीकुंभक प्राणायामके भेद हठाभ्याससे राजयोगप्राप्तिका प्रकार हठयोगसिद्धिके लक्षण 6 ७० 399 : 0 2. ७१ ७७ ... ७८ ... तृतीयोपदेशः ३. १ ७७ .. ... २ ७८ कुण्डलीको सर्वयोगका आश्रयत्व कुण्डलीके बोधका फल सुषुम्नाके पर्यायवाचक नाम दश महामुद्रा महामुद्राके फल .. ... ... ४ ६ " ८ ७९ ... C . d विषयानुक्रमणिका। (७) श्लोक. ८ ... ८० १० १५ १६ विषय. (अष्टसिद्धियोंके अर्थ) टी. महामुद्रा महामुद्राभ्यासक्रम महामुद्राके गुण महाबन्ध महावेध इन तीनों मुद्राओंका पृथक् साधन विशेष स्वरूपलक्षणसहित खेचरी खेचरीसाधन ८३ '... :: २६ ३१ ३२ ८७ खेचरीके गुण ३८ ९४ ४८-४९ ५५ ९९ . .. ... ७० .... १०३ . 19. ७७ ७९ १०६ १०८ P गोमांस और अमरवारुणीका अर्थ अर्थसहित उड्डियानबन्ध मूलबंध मतांतरका मूलबन्ध मूलबन्धके गुण जालन्धरबन्ध आलन्धरपदका अर्थ जालन्धरके गुण तीनों बन्धनका उपयोग देहका जराकरण गुणसहित विपरीतकरणी फलसहित वोली उसके साधन दो वस्तु वज्रोलीके अभ्यासमें उत्तरसाधन वज्रोलीके गुण सहजोली अमरोली त्रियोंकी वज्रोली साधन स्त्रियोंकी वज्रोलीके फल कुण्डलीकरके मोक्षद्वारं विभेदन शक्तिचालन-(शक्तिचालनमुद्रा) कन्दका स्थानस्वरूप राजयोग विना आसनादिक व्यर्थ मुद्रोपदेष्टा गुरुकी श्लाघा ९२ ९६ ९९ Riotowairava ...:". Kodi sorror ११४ . १०४ १११ ११३ १२६ १२९ ११६ ११८ ११९ १२४ १२५ ..
विषयानुक्रमणिका । विषय. श्लोक, muram १ .... :: ... i '.. ..... ८ ... चतुर्थोपदेशः ४. मंगलाचरण समाधिक्रम समाधिपर्यायवाचक राजयोगकी श्लाघा समाधिसिद्धिसे अमरोल्यादि सिद्धि हठाभ्यास विना ज्ञान और मोक्षकी सिद्धि नहीं प्राण और मनकी लयरीति प्राणके लयसे कालका जय लयका स्वरूप शांभवीमुद्रा १४ १५ १६ १२७ १२८ १२९ १३० १३२ १३३ १४४ १४५ १५२ ... ३४ . 4 उन्मनी मुद्रा ३९ १५५ 4. उन्मनी विना संसारसमुद्रके तरनेका अन्य उपाय नहीं उन्मनीभावनाको कालनियमको अभाव १५७ खेचरी मुद्रा ४२ ४३ WW ६७ ६८ १६८ ७० .... .. ... मनके लयसे द्वैतकाभी लय नादानुसन्धानरूप मुख्योपाय शांभवीमुद्राकरके नादानुसन्धान पराङ्मुखी मुद्राकरके नादानुसंधान नादकी चार अवस्था आरंभावस्था घटावस्था परिचयावस्था निष्पत्तिअवस्था प्रत्याहारादि क्रम करके समाधि नानाप्रकारके नाद उन्मनी अवस्थामें योगीकी स्थिति योगीको ही ज्ञानप्राप्ति इति हठयोगप्रदीपिकाविषयानुक्रमणिका समाप्ता ।। . .... .. ७२ ७४ १७० ७६ १७२ १७४ १०६ *१८१ ११४१८५ ... .. .. .. ...
॥श्रीः॥ 32891 22/29 हठयोगप्रदीपिका। संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। *00- प्रथमोपदेशः१ श्रीआदिनाथाय नमोऽस्तु तस्मै येनोपदिष्टा हठयोगविद्या। विभ्राजते प्रोन्नतराजयोगमारोढुमिच्छोरधिरोहिणीव ॥ १ ॥ गुरुं नत्वा शिवं साक्षाब्रह्मानन्देन तन्यते । हठप्रदीपिकाज्योत्स्ना योगमार्गप्रकाशिका ॥ इदानींतनानां सुबोधार्थमस्याः सुविज्ञाय गोरक्षसिद्धांतहार्दम् । मया मेरुशास्त्रिप्रमुख्याभियोगात्स्फुटं कथ्यतेऽत्यन्तगूढोऽपि भावः ॥ मुमुक्षुजनहितार्थ राजयोगद्वारा कैवल्यफलां हठप्रदीपिकां विधित्सुः परमकारु- णिकः स्वात्मारामयोगीन्द्रस्तत्प्रत्यूहनिवृत्तये हठयोगप्रवर्तकश्रीमदादिनाथनमस्कार- लक्षणं मंगलं तावदाचरति-श्रीआदिनाथायेत्यादिना ॥ तस्मै श्रीआदिनाथाय नमोऽस्त्वित्यन्वयः। आदिश्वासौ नाथश्च आदिनाथः सर्वेश्वरः शिवः इत्यर्थः। श्रीमान् आदिनाथः तस्मै श्रीआदिनाथाय । श्रीशब्द आदिर्यस्य सः श्रीआदिः श्रीआदिश्चासौ नाथश्व श्रीआदिनाथः तस्मै श्रीआदिनाथाय । श्रीनाथाय विष्णव इति वाऽर्थः। श्रीआदिनाथायेत्यत्र यणभावस्तु ' अपि माष मपं कुर्याच्छन्दोभङ्गं त्यजेद्रािम् इति च्छंदोविदां सम्प्रदायादुच्चारणसौष्ठवाच्चेति बोध्यम् । वस्तुतस्तु असंहितपाठस्वी- कारापेक्षया श्रीआदिनाथायेति पाठस्वीकारेऽप्रवृत्तनित्यविध्युद्देश्यतावच्छेदकानाक्रांत- त्वेन परिनिष्ठितत्वसंभवात् संप्रत्युदाहृतदृष्टान्तद्वयस्यापीडग्विषयवैषम्यान्नित्यसाहित्य- भङ्ग जनितदोषस्य शाब्दिकाननुमतत्वाचासंमृष्टविधेयांशतारूपदोषस्य साहित्यकार- सक्तत्वेऽपि क्वचित्तैरपि स्वीकृतत्वेन शाब्दिकाचार्यैरेकाजित्यादौ कर्मधारयस्वीकारेण सर्वथाऽनाहतत्वाच्च लाघवातिशय इति सुधियो विभावयतु । नमः प्रतीभावोऽस्तुः। प्रार्थनायां लोट् । तस्मै कस्मै इत्यपेक्षायामाह-येनेति । येन आदिनाथेन उपदिष्टा गिरिजायै हठयोगविद्या, हश्च ठश्च हठौ सूर्यचन्द्रौ तयोर्योगो हठयोगः । एतेन हठशब्द- वाच्ययोः सूर्यचन्द्राख्ययोः प्राणापानयोरैक्यलक्षणः प्राणायामो हठयोग इति हट- , हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- योगस्य लक्षणं सिद्धम् । तथा चोक्तं गोरक्षनाथेन सिद्धसिद्धांतपद्धतौ-" हकारः कीर्तितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते । सूर्याचन्द्रमसोर्योगाठयोगो निगद्यते ॥" इति। तत्प्रतिपादिका विद्या हठयोगविद्या, हठयोगशास्त्रमिति यावत् । गिरिजायै आदिनाथ- कृतो हठविद्योपदेशो महाकालयोगशास्त्रादौ प्रसिद्धः । प्रकण उन्नतः प्रोन्नतः मंत्र- योगहठयोगादीनामधरभूमीनामुत्तरभूमित्वाद्राजयोगस्प मोन्नतत्वम् । राजयोगश्च सर्व- वृत्तिनिरोधलक्षणोऽसंप्रज्ञातयोगः। तमिच्छोर्मुमुक्षोरधिरोहिणीव अधिरुह्यतेऽनयेत्यधि- रोहिणी निःश्रेणीव विभ्राजते विशेषेण भ्राजते शोभते । यथा प्रोन्नतसौधमारोढुमिच्छो- रधिरोहिण्यनायासेन सौधप्रापिका भवति एवं हठदीपिकापि प्रोन्नतराजयोगमारोढु- मिच्छोरनायासेन राजयोगमापिका भवतीति । उपमालंकारः। इन्द्रवज्राख्यं वृत्तम् ॥१ नत्वा साम्ब ब्रह्मरूपं भाषायां योगबोधिका । मया मिहिरचन्द्रेण तन्यते हठदीपिका ।। मोक्षके अभिलाषी जनोंके हितार्थ राजयोगके द्वारा मोक्ष है फल जिसका ऐसी हठयोग- प्रदीपिकाको रचतेहुये परमदयालु स्वात्माराम योगीन्द्र ग्रंथमें विघ्ननिवृत्तिके लिये हठयोगकी प्रवृत्तिके कर्ता जो श्रीमान् आदिनाथ (शिव)जी हैं उनके नमस्काररूप मंगलको ग्रन्थके प्रारम्भमें करते हैं कि, श्रीमान् जो आदिनाथ अर्थात् सनातन स्वामी शिवजी हैं उनको नम- स्कार हो अथवा श्रीशब्द है आदिमें जिसके ऐसा जो नाथ (विष्णु) वा श्री लक्ष्मीसे युक्त जो नाथ विष्णु हैं उनके अर्थ नमस्कार हो । कदाचित् कहो कि, 'श्रीआदिनाथाय' इस पदमें श्री- शब्दके ईकारको यविधायकसूत्रसे यकार क्यों नहीं होता ? सो ठीक नहीं, क्योंकि छन्दके ज्ञाताओंका यह सम्प्रदाय है कि, चाहे माषके स्थानमें भी मषपदको लिखै परंतु छन्दका भंग न करै और उच्चारण करनेमें भी सुगमता है, इससे सूत्रसे प्राप्त भी यकार ग्रन्थकारने नहीं किया। सिद्धांत तो यह है कि, 'श्रीआदिनाथाय' इस पाठकी अपेक्षा 'श्यादिनाथाय' यह पाठ लाघवसे युक्त है, क्योंकि 'श्र्यादिनाथाय' इस पाठमें व्याकरणके किसी सूत्रकी प्राप्ति नहीं है, इससे यह परिनिष्ठित ( सिद्ध हुआ) है और श्रीआदिनाथाय इस पाठमें 'इको यणचि' इस सूत्रकी प्राप्तिकी शंका बनी रहती है और जो दो दृष्टान्त दिये हैं (माष मष-उच्चारणमें सुगमता) वे भी ऐसे विषयसे विषम हैं अर्थात् सूत्रकी प्राप्तिको नहीं हटा सकते और व्याक- रणशास्त्रके ज्ञाता साहित्य (छन्द) के भंगका जो दोष उसको नहीं मानते और असंमृष्ट (शास्त्रसे अशुद्ध ) विधानरूप दोष यद्यपि साहित्यके रचनेवालोंने कहाहै तथापि कहीं २ उन्होंने भी मानाहै-और व्याकरणशास्त्रके आचार्योंने ( एकाज्) इस पाठके स्थानमें कर्म- धारय समास करके (एकाज् ) असंमृष्ट विधानको नहीं माना है-इससे श्यादिनाथाय इस पाठमेही लाघव है । इस बातका बुद्धिमान मनुष्य विचार करे-तात्पर्य यह है कि, उस आदि. नाथको नमस्कार है जिसने पार्वतीके प्रति हठयोगविद्याका उपदेश किया और जिस प्रकार शिवजीने पार्वतीके प्रति हठयोगका उपदेश किया है वह प्रकार महाकाल योगशास्त्र में प्रसिद्ध है और हठयोगविद्याशब्दका यह अर्थ है कि, ह (सूर्य) 8 ( चन्द्रमा ) इन दोनोंका जो योग (एकता ) अर्थात् सूर्यचन्द्रमारूप जो प्राण अपान हैं उनकी एकतासे जो प्राणायाम है प्रथमः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। वह हठयोग कहाता है, सोही सिद्धसिद्धांतपद्धतिमें गोरक्षनाथ आचार्यने इस वचनसे कहा है कि, हकारसे सूर्य और ठकारसे चन्द्रमा कहा जाता है, सूर्य और चन्द्रमाके योगसे हठयोग कहाताहै-उस हठयोगका जिससे प्रतिपादन हो उस विद्याको हठयोगविद्या कहते हैं अर्थात् हठयोगशास्त्रका नाम हठयोगविद्या है और वह हठयोगविद्या सबसे उत्तम जो राजयोग अर्थात् संपूर्ण वृत्तियोंका निरोधरूप जो असंप्रज्ञातलक्षण समाधि है उसके अभिलाषी मुमुक्षुको अधि- रोहिणी ( नसैनी) के समान विराजती है, जैसे ऊँचे महलपर विना परिश्रमही नसैनी पहुँचा देती है, इसीप्रकार यह हठयोगविद्याभी सर्वोत्तम राजयोगपर चढनके लिये मुमुक्षुको अना. याससे राजयोगमें प्राप्त कर देती है । इस श्लोकमें उपमा अलंकार और इन्द्रवज्रा छंद है। भावार्थ यह है कि, जिस श्रीआदिनाथ (शिवजी) ने पार्वतीके प्रति वह हठयोगविद्या कही है जो सर्वोत्तम राजयोगपर चढनेके लिये अधिरोहिणीके समान है उस श्रीआदिनाथको नम- स्कार हो अर्थात् उसको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥ एवं परमगुरुनमस्कारलक्षणं मङ्गलं कृत्वा विघ्नराहुल्ये मङ्गलबाहुल्यस्या- प्यपेक्षितत्वात् स्वगुरुनमस्कारात्मकं मंगलमाचरन्नस्य ग्रंथस्य विषयप्रयोजनादीन् प्रदर्शयति- प्रणम्य श्रीगुरुं नाथं स्वात्मारामेण योगिना। केवलं राजयोगाय हठविद्योपदिश्यते ॥२॥ प्रणम्येति ॥ श्रीमन्तं गुरुं श्रीगुरुं नाथं श्रीगुरुनाथं स्वगुरुमिति यावत् । प्रणम्य प्रकर्षेण भक्तिपूर्वकं नत्वा स्वात्मारामेण योगिना योगोऽस्यास्तीति तेन । केवलं राज- योगाय केवलं राजयोगार्थ हठविद्योपदिश्यत इत्यन्वयः। हठविद्याया राजयोग एव मुख्यं फलं न सिद्धय इति केवलपदस्याभिप्रायः । सिद्धयस्त्वानुषंगिक्यः । एतेन राजयोगफलसहितो हठयोगोऽस्य ग्रंथस्य विषयः । राजयोगद्वारा कैवल्यं चास्य फलम् । तत्कामश्चाधिकारी । ग्रंथविषययोः प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावः संबन्धः । ग्रन्थस्य कैवल्यस्य च प्रयोज्यप्रयोजकभावः संबन्धः । ग्रन्थाभिधेयस्य सफलयोगस्य कैवल्यस्य च साध्यसाधनभावः सम्बन्ध इत्युक्तम् ॥२॥ इस प्रकार परमगुरुको नमस्कार करके अधिक विनोंकी आशंकामें आधिकही मंगलकी अपेक्षा होती है इस अभिप्रायसे अपने गुरुके नमस्काररूप मंगलको करते हुये ग्रन्थकार ग्रन्थके विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन, अधिकारियोंको दिखाते हैं कि, श्रीमान् जो अपने गुरुनाथ ( स्वामी) उनको भक्तिपूर्वक नमस्कार करके स्वात्माराम नामका जो मैं योगी हूँ वह केवल राजयोगकी प्राप्तिके लिये हठविद्याका उपदेश ( कथन) करता हूँ-अर्थात् हठविद्याका मुख्य फल केवल राजयोगही है सिद्धि नहीं है। क्योंकि सिद्धि तो यत्नके विना प्रसंगसेही होजाती है । इससे यह सूचित किया कि, राजयोगरूप फलसहित हठयोग इस ग्रन्थका विषय है और राजयोग- द्वारा मोक्ष फल (प्रयोजन ) है और फलका आभिलाषी अधिकारी है और ग्रन्थ और विषयका प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध है अर्थात ग्रन्थ विषयका प्रतिपादक है और विषय प्रतिपाद्य है ।
MANTRA (४) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेशः- और ग्रन्थ और मोक्षका प्रयोज्य प्रयोजकमाव सम्बन्ध है, क्योंकि ग्रन्थभी हठयोगके द्वारा मोक्षका कारण है और ग्रन्थ और आभिधेय ( विषय ) फल योग और मोक्ष इनका साध्यसाधनभाव सम्बन्ध है । ये सब बात इस श्लोकमें कही है । भावार्थ यह है कि, मैं स्वात्माराम योगी अपने श्रीगुरुनाथको भलीप्रकार नमस्कार करके केवल राजयोगके लिये हठविद्याका उपदेश करता हूँ ॥ २ ॥ ननु मन्त्रयोगसगुणध्याननिर्गुणध्यानमुद्रादिभिरेव राजयोगसिद्धी कि हठविद्योप- देशेनेत्याशंक्य व्युत्थितचित्तानां मंत्रयोगादिभी राजयोगासिद्धेर्हठयोगादेव राजयोग- सिद्धिं वदन् ग्रन्थं प्रतिजानीते- भ्रान्त्या बहुमतध्वान्ते राजयोगमजानताम् । इठप्रदीपिका धत्ते स्वात्मारामः कृपाकरः॥३॥ भ्रान्त्येति ॥ मन्त्रयोगादिबहुमतरूपे ध्वांते गाढधिकारे या भ्रान्तिभ्रंमस्तया । तैस्तैरुपायै राजयोगाथै प्रवृत्तस्य तंत्रतत्र तदलाभात् । वक्ष्यति च ' विना राजयोगम्' इत्यादिना । तथा राजयोगम् अजानतां न जानन्तीत्यजानन्तः तेषाम् अजानतां पुंसां राजयोगज्ञानमिति शेषः । करोतीति करः कृपायाः ।करः कृपाकरः । कृपाया आकर इति वा । तादृशः । अनेन हठप्रदीपिकाकरणे अज्ञानुकंपैव हेतुरित्युक्तम् । स्वात्म- न्यारमते इति स्वात्मारामः हठस्य हठयोगस्य प्रदीपिकेव प्रकाशकत्वात् हठप्रदी- पिका ताम् । अथवा हठ एव प्रदीपिका राजयोगप्रकाशकत्वात् । तां धत्ते विधत्ते करोतीति यावत् । स्वात्माराम इत्यनेन ज्ञानस्य सप्तमभूमिकां प्राप्तो ब्रह्म- विद्वरिष्ठ इत्युक्तम् । तथा च श्रुति:--' आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः' इति । सप्त भूमयश्चोक्ता योगवासिष्ठे-'ज्ञानभूमिः शुभेच्छाख्या प्रथमा समुदाहृता । विचारणा द्वितीया स्यात्तृतीया तनुमानसा ॥ सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका । परार्थाभाविनी षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता ॥' इति । अस्यार्थः--शुभेच्छा इत्याख्या यस्याः सा शुभेच्छाख्या। विवेकवैराग्ययुता शमादि- पूर्विका तीव्रमुमुक्षा प्रथमा ज्ञानस्य भूमिः भूमिका उदाहृता कथिता योगिभिरिति शेषः १। विचारणा श्रवणमननात्मिका द्वितीया ज्ञानभूमिः स्यात् २ । अनेकार्थ- ग्राहकं मनो यदाऽनेकार्थान्परित्यज्य सदेकार्थवृत्तिप्रवाहवद्भवति तदा तनुमानसे यस्यां सा तनुमानसा निदिध्यासनरूपा तृतीया ज्ञानभूमिः स्यादिति शेषः ३ । इमास्तिस्रः साधनभूमिकाः । आसु भूमिषु साधक इत्युच्यते । तिसृभिर्भूमिकाभिः शुद्धसत्त्वे- ऽन्तःकरणेऽहं ब्रह्मास्मीत्याकारिकाऽपरोक्षवृत्तिरूपा सत्त्वापत्तिनामिका चतुर्थी ज्ञान- भूमिः स्यात् । चतुर्थीयं फलभूमिः । अस्यां योगी ब्रह्मविदित्युच्यते । इयं सम्प्रज्ञात- योगभूमिका ४ । वक्ष्यमाणास्तिस्रोऽसम्प्रज्ञातयोगभूमयः । सत्त्वापत्तेरनन्तरा सत्त्वा- पत्तिसंज्ञिकायां भूमावुपस्थितासु सिद्धिषु असंसक्तस्यासंसक्तिनामिका पञ्चमी ज्ञान- प्रथमः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। भूमिः स्यात् । अस्यां योगी स्वयमेव व्युत्तिष्ठते । एतां भूमि प्राप्तो ब्रह्मविद्वर इत्यु- च्यते ५ । परब्रह्मातिरिक्तमर्थं न भावयति यस्यां सा परार्थाभाविनी षष्ठी ज्ञानभूमि: स्यात् । अस्यां योगी परप्रबोधित एव व्युत्थितो भवति । एतां प्राप्तो ब्रह्मविद्वरीया नित्युच्यते ६ । तुर्यगा नाम सप्तमी भूमिः स्मृता । अस्यां योगी स्वतः परतो वा न व्युत्थानं प्राप्नोति । एतां प्राप्तो ब्रह्मविद्वरिष्ठ इत्युच्यते । तत्र प्रमाणभूता श्रुतिरत्रैवोक्ता 'पूर्वमयमेव जीवन्मुक्त इत्युच्यते, स एवात्र स्वात्मारामपदेनोक्तः' इत्यलं बहूक्तेन ॥३॥ कदाचित् कहो कि, मंत्र योग सगुणध्यान निर्गुणध्यान मुद्रा आदिसे ही राजयोग सिद्ध होजायगा, हठयोगविद्याके उपदेशका क्या फल है ? सो ठीक नहीं, क्योंकि जिनका चित्त व्युत्थित ( चंचल) है उनको मंत्रयोग आदिसे राजयोगकी सिद्धि नहीं हो सकती, इससे हठ- योगके द्वाराही राजयोग की सिद्धिको कहते हुए ग्रंथकार ग्रंथके आरंभकी प्रतिज्ञा करते हैं कि मंत्रयोग आदि अनेक मतोंका जो गाढ अंधकार उसके विषे भ्रमसे राजयोगको जो नहीं जानते हैं उनकोभी राजयोगका ज्ञान जिससे हो ऐसी हठयोगप्रदीपिकाको कृपाके कर्ता (दयालु) स्वात्मारामयोगी अर्थात् अपने आत्मामें रमणकर्ता स्वात्माराम करते हैं, अर्थात् हठयोगके प्रकाशक ग्रंथको रचते हैं । अथवा राजयोगके प्रकाशक जो हठ (सूर्य चन्द्र) उनके प्रकाशक ग्रंथको रचते हैं। स्वात्माराम इस पदसे यह सूचित किया ह कि, ज्ञानकी सातवीं भूमिकाको प्राप्त ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ है, सोई इस श्रुतिमें लिखा है कि, आत्मामें है क्रीडा और रमण जिसका ऐसा जो क्रियावान् है वह ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ है और सात भूमि योगवासि- ष्ठमें कही हैं कि, शुभेच्छा १, विचारणा २, तनुमानसा ३, सत्त्वापत्ति ४, असंसक्ति ५, परा- र्थाभाविनी ६, तुर्यगा ७ ये सात ज्ञानभूमि योगकी हैं, इन सातोंमें शुभेच्छा है नाम जिसका और विवेक और वैराग्यसे युक्त और शमदम आदि हैं पूर्व जिसके और तीव्र (प्रबल ) है मोक्षकी इच्छा जिसमें ऐसी ज्ञानकी भूमि प्रथम योगीजनोंने कही है १ । श्रवण मनन आदि रूप विचारणा ज्ञानकी दूसरी भूमि होती है २ । और अनेक विषयोंका ग्राहक मन अनेक विषयोंको त्यागकर एक (ब्रह्म) विषयमें ही वृत्तिके प्रवाहवाला होजाय, तनु (सूक्ष्म ) है मन जिसमें ऐसी वह निदिध्यासनरूप तनुमानसा नामकी तीसरी भूमि होती है ३। ये तीन साधनभूमि कहाती हैं, इन भूमियोंमें योगी साधक कहाता है । इन तीन भूमियोंसे शुद्ध हुये अंतःकरणमें मैं ब्रह्महूँ यह जो ब्रह्माकार अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) वृत्ति है वह सत्त्वापत्ति नामकी चौथी भूमि कहाती है ४ । इन चारोंसे अगली जो तीन भूमि हैं ये असंप्रज्ञात योगभूमि कहाती हैं। सत्त्वापत्तिके अनंतर इसी सत्त्वापत्ति भूमिमें उपस्थित (प्राप्त) हुई जो सिद्धि हैं उनमें असं- सक्त योगीका असंसक्ति नामकी पांचवीं ज्ञानभूमि होती है । इस भूमिमें योगी स्वयंही व्युत्थित होता (उठता ) है और वह ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ कहाता है ५ । जिसमें परब्रह्मसे भिन्नकी भावना विचार ) न रहै वह परार्थाभाविनी नामकी छठी भूमि होतो ह । इसमें योगी दूसरके उठाने- सेहो उठता है और ब्रह्मज्ञानियोंमें अत्यंत श्रेष्ठ कहाता है ६ । और जिसमें तुरीय पदमें योगी पहुँचजाय वह तुर्यगा नामकी सातवीं ज्ञानभूमि है । इसमें योगी स्वयं वा अन्य पुरुषसे नहीं उठता है। इसमें प्राप्त हुआ योगी ब्रह्मज्ञानियोंमें अत्यंत श्रेष्ठसेभी उत्तम कहाताहै । इसमें प्रमाणरूप यह श्रुतिही कही है कि, पहिली भूमियोंमें इसकोही जीवन्मुक्ति कहते हैं और उसकोही इस सातवीं , हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:-- भूमिमें स्वात्माराम कहते ह-इस प्रकार अधिक कहनेसे पूर्ण हुये अर्थात् अधिक नहीं कहते हैं। भावार्थ यह है कि, अनेक मतोंके कियेहुए अंधकारमें राजयोगको जो नहीं जान सकते उनके लिये दयाके समुद्र स्वात्माराम " हठयोगप्रदीपिका " को करते हैं ॥३॥ महत्सवितत्वाद्धठविद्यां प्रशंसन् स्वस्यापि महत्सकाशाद्धठविद्यालाभाद्रौरवं द्योतयति- हठविद्यां हि मत्स्येन्द्रगोरक्षाया विजानते। स्वात्मारामोऽथवा योगी जानीते तत्प्रसादतः॥४॥ हठविद्यां हीति ॥ हीति प्रसिद्धम् । मत्स्येन्द्रश्च गोरक्षश्च तौ आद्यौ येषां ते मत्स्येन्द्रगोरक्षाद्याः। आधशब्देन जालंधरनाथभर्तृहरिगोपीचन्द्रप्रभृतयो ग्राह्याः। ते हठ- विद्यां हठयोगविद्यां विजानते विशेषेण साधनलक्षणभेदफलैर्जानंतीत्यर्थः । स्वात्मारामः स्वात्मारामनामा । अथवाशब्दः समुच्चये। योगी योगवान् तत्प्रसादतः गोरक्षप्रसादा- जानीत इत्यन्वयः। परममहता ब्रह्मणापीयं विद्या सेवितेत्यत्र योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः- 'हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः' इति । वक्तृत्वं च मानसव्यापारपूर्वकं भवतीति मानसो व्यापारोऽर्थादागमः । तथा च श्रुतिः- यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति ' इति । भगवतेयं विद्या भागवतानुवादीन् प्रत्युक्ता। शिवस्तु योगी प्रसिद्ध एव । एवं च सर्वोत्तमैब्रह्मविष्णुशिवैः सेवितेयं विद्या । न च ब्रह्मसूत्रकृता व्यासेन योगी निराकृत इति शंकनीयम् । प्रकृतिस्वातंत्र्यविद्भिर्भेदांशमात्रस्य निराकरणात् । न तु भावनाविशेषरूपयोगस्य। भावनायाश्च सर्वसंमतत्वात्तां विना सुखस्याप्यसंभवात् । तथोक्तं भगवद्गीतासु-' नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥' इति । नारायणतीथैरप्युक्तम्-' स्वातंत्र्यसत्यत्वमुखं प्रधाने सत्यं च चिद्भेदगतं च वाक्यैः । व्यासो निराचष्ट न भावनाख्यं योगं स्वयं निर्मितब्रह्मसूत्रैः॥ अपि चात्मपदं योग व्याकरोन्मतिमान्स्वयम् । भाष्यादिषु ततस्तत्र आचार्यप्रमुखैर्मतः ॥ मतो योगो भगवता गीतायामधिकोऽन्यतः । कृतः शुकादिभि- स्तस्मादत्र सन्तोऽतिसादराः ॥' इति । वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्य- फलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥' इति भगवदुक्तेः । किं बहुना 'जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ' इति वदता भगवता योगजिज्ञासोरप्यौत्कृष्टयं वर्णितं किमुत योगिनः । नारदादिभक्तश्रेष्ठैर्याज्ञ- वल्क्यादिज्ञानिमुख्यैश्चास्याः सेवनाद्भक्तज्ञानिनामप्यविरुद्धेत्युपरम्यते ॥ ४ ॥ महान् पुरुषोंके माननेसे हठविद्याकी प्रशंसा करते हुये प्रथकार अपनेकोभी महत्पुरुषोंसेही हठविद्याका लाभ हुआ है इससे अपनाभी गौरव (बड़ाई) द्योतन करते हैं कि, मत्स्येंद्र और गोरक्ष आदि हठविद्याको निश्चयसे विशेषकर जानते हैं। यहां आधशब्दके पढनेसे जालंधरनाथ, भर्तृहरि, गोपीचंद आदि भी जानते हैं. यह सूचित किया अर्थात् सांधन, ।
प्रथमः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (७) लक्षणभेद, फल इनको भी जानते हैं अथवा स्वात्माराम योगी भी गोरक्ष आदिके प्रसा- दसे हठविद्याको जानता है और सबके परम महान् ब्रह्मानेभी इस विद्याका सेवन किया है, इसमें यह योगी याज्ञवल्क्यकी स्मृति प्रमाण है कि, सबसे पुराने योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं अन्य नहीं हैं और कहना तभी होता है जब मानसव्यापार ( मनसे विचार) पहिले हो चुका हो, वह मानसव्यापार आगम ( वेद ) लेना सोई इस श्रुतिमें लिखा है कि, जिसका मनसे ध्यान करता है उसकोही वाणीसे कहता है । भगवान्ने भी यह विद्या उद्धव आदि भागवतोंके प्रति कही है-और शिवजी तो योगी प्रसिद्ध ही हैं। इससे ब्रह्मा विष्णु शिव इन्होंने भी इस हठयोग विद्याका सेवन किया है । कदाचित् कहो कि, ब्रह्मसूत्रोंके कर्ता व्यासने योगका खंडन किया है सो ठीक नहीं. क्योंकि प्रकृतिको स्वतन्त्र मानते हुए उन्होंने भेदरूप आशंकाकाही खण्डन किया है, कुछ भावना विशेषरूप योगका खंडन नहीं किया है-और भावना तो व्यासको भी इससे संमत है कि, भावनाके विना सुख नहीं हो सकता, सोई भगवद्गीतामें कहा है-जो योगी नहीं है उसको बुद्धि नहीं है और न उसको भावना होती है और भावनाके विना शांति नहीं होती और शांतिसे योग जिसको नहीं उसको सुख कहाँसे हो सकता है । नारायणतोोंने भी कहा है कि, स्वतंत्र सत्यता है मुख्य जिसमें ऐसा सत्य जो चेतनके भेदसे प्रधान (प्रकृति) में प्रतीत होता है उसका खंडन वाक्योंसे व्यासजीने किया है, कुछ अपने रचेहुए ब्रह्मसूत्रोंसे वर्णन किये भावना नामके योगका खंडन व्यासजीने नहीं किया है और आत्माके प्रापक योगका कथन बुद्धिमान् व्यासजीने स्वयं किया ह और तिसीसे भाष्य आदिमें आचार्यआदिकोंने माना है और भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने गीतामें अधिक योग माना है-और शुकदेव आदिकोंने भी योगको रचा है-तिससे इस योगमें बहुत सन्तोंका अत्यंत आदर है और भगवान्ने गीतामेंभी कहा है कि, वेद-यज्ञ-तप और दान इनमें जो पुण्य फल कहा है उस सबको योगी इस योगको जानकर लंघन करता है और उत्तम जो सनातनका स्थान (ब्रह्म) है उसको प्राप्त होता है और योगको जाननका अभिलाषी भी शब्दब्रह्मसे आधिक होता है यह कहते हुए भगवानने योगके जिज्ञासुकोभी उत्तम वर्णन कियाहै- योगी तो उत्तम क्यों न होगा आर भक्तोंमें श्रेष्ठ नारद आदि मुनियोंमें मुख्य याज्ञवल्क्य आदि- कोंने भी इस हठविद्याका सेवन किया है। इससे भक्त और ज्ञानियोंकाभी इस विद्याके संग कुछ विरोध नहीं-इससे अधिक वर्णन करनेसे उपरामको प्राप्त होते हैं । भावार्थ यह है कि, मत्स्येन्द्र और गोरक्षनाथ आदि हठविद्याको जानते हैं और उनकी कृपासे स्वात्माराम योगी (मैं) जानताहूँ ॥ ४ ॥ हठयोगे प्रवृत्तिं जनयितुं हठविद्यया प्राप्तैश्वर्यान् सिद्धानाह- श्रीआदिनाथमस्त्येन्द्रशाबरानन्दभैरखाः। चौरङ्गीमीनगोरक्षविरूपाक्षबिलेशयाः॥५॥ श्रीआदिनाथेत्यादिना ॥ आदिनाथः शिवः सर्वेषां नाथानां प्रथमो नाथः । ततो नाथसंप्रदायः प्रवृत्त इति नाथसंप्रदायिनो वदन्ति । मत्स्येन्द्राख्यश्च आदिनाथ- शिष्यः । अत्रैवं किंवदन्ती । कदाचिदादिनाथः कस्मिंश्चिदू दीपे स्थितः तत्र विजन ।
(८) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:-- मति मत्वा गिरिजायै योगमुपदिष्टवान् । तीरंसमीपनीरस्थः कश्चन मत्स्यः तं योगो- पदेशं श्रुत्वा एकाग्रचित्तो निश्चलकायोऽवतस्थे । तं तादृशं दृष्ट्वा अनेन योगः श्रुत इति तं मत्वा कृपालुरादिनाथो जलेन प्रोक्षितवान् । स च प्रोक्षणमात्रादिव्यकायो मत्स्येन्द्रः सिद्धोऽभूत् । तमेव मत्स्येन्द्रनाथ इति वदन्ति । शाबरनामा कश्चिसिद्धः। आनन्दभैरवनामाऽन्यः । एतेषामितरेतरद्वन्दः । छिन्नहस्तपादं पुरुषं हिन्दुस्थानभाषायां चौरंगीति वदन्ति । कदाचिदादिनाथाल्लब्धयोगस्य भुवं पर्यटतो मस्त्येन्द्रनाथस्य कृपावलोकनमात्रात्कुत्रचिदरण्ये स्थितश्चौरङ्गयंकुरितहस्तपादो बभूव । स च तत्कृपया सञ्जातहस्तपादोऽहमिति मत्वा तत्पादयोः प्रणिपत्य ममानुग्रहं कुर्विति प्रार्थितवान् । मत्स्येन्द्रोऽपि तमनुगृहीतवान् । तस्यानुग्रहाच्चौरंगीति प्रसिद्धः सिद्धः सोऽभूत् । मीनो मीननाथः गोरक्षो गोरक्षनाथः विरूपाक्षनामा विलेशयनामा च । चौरंगीप्रभृतीनां इन्दसमासः॥५॥ अब हठयोगमें श्रोताओंकी प्रवृत्तिके हेतु उन सिद्धोंका वर्णन करते हैं कि, जिनको हठ- विद्यासे ऐश्वर्य मिला है और श्रीआदिनाथ अर्थात् सब नाथोंमें प्रथम शिवजी, शिवजोसेही नाथसंप्रदाय चला है। यह नाथसंप्रदायी लोग कहते हैं-और शिष्य मत्स्येन्द्र-यहां यह इति- हास है कि, किसी समयमें आदिनाथ किसी द्वीपमें स्थितथे, वहां जनरहित देश समझकर पार्वः तीके प्रति योगका उपदेश करतेथे। तीरके समीप जलमें टिका हुआ कोई मत्स्य उस योगोपदे- शको सुनकर एकाग्रचित्त होकर निश्चलदेह टिकता भया। निश्चलकाय उस मत्स्यको देखकर और इसने योगका श्रवण किया यह मानकर कृपालु आदिनाथजीने उसके ऊपर जलका सिंचन किया। प्रोक्षण करनेसेही वह मत्स्येन्द्र सिद्ध होगया । उसकोही मत्स्येन्द्रनाथ कहते हैं और शाबर नामका सिद्ध और आनंदभैरव और चौरंगी सिद्ध किसी समय आदिनाथसे मिले हैं योग जिनको ऐसे योगेन्द्रनाथ भूमिमें रटते थे, उन्होंने कृपासे किसी वनमें टिकेहुए चौरंगीको देखा, उनके देखनेसेही चौरंगीके हाथ और पाद जम आये। क्योंकि, हिंदुस्थानकी भाषामें जिसके हाथ पैर कटजाय उसे चौरंगी कहते हैं, वह चौरंगी इन्हींकी कृपासे मेरे हाथ पैर हुए हैं यह मानकर उनके चरणोंमें प्रणाम करके यह प्रार्थना करता भया कि, मेरे ऊपर अनुग्रह करो । मत्स्येन्द्रने भी उसके ऊपर अनुग्रह किया, उससे वह चौरंगी नामका सिद्ध प्रसिद्ध भया और मीननाथ, गोरक्षनाथ, विरूपाक्षनाथ, बिलेशयनाथ ये सिद्ध हठयोग- विद्याके हुए ॥ ५ ॥ मन्थानो भैरवो योगी सिद्धिर्बुद्धश्च कन्थडिः। कोरण्टकः सुरानन्दः सिद्धिपादश्च चर्पटिः॥६॥ कानेरी पूज्यपादश्च नित्यनाथो निरञ्जनः। कपाली बिन्दुनाथश्च काकचण्डीश्वराह्वयः ॥ ७॥ अल्लामः प्रभुदेवश्च घोडा चोली च टिण्टिणिः। भानुकी नारदेवश्च खण्डः कापालिकस्तथा ॥ ८॥ ।
प्रथमः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। - इत्यादयो महासिद्धा हठयोगप्रभावतः। खण्डयित्वा कालदण्डं ब्रह्माण्डे विचरन्ति ते ॥ ९ ॥ मन्थान इति ॥ मन्थानः भैरवः योगीति मन्थानप्रभृतीनां सर्वेषां विशेषणम् ॥ कानेरीति ॥ काकचण्डीश्वर इत्यायो नाम यस्य स तथा । अन्ये स्पष्टाः॥ अल्लाम इति ॥ तथाशब्दः समुच्चये । इत्यादय इति पूर्वोक्ता आदयो येषां ते तथा । आदि- शब्देन तारानाथादयो ग्राह्याः। महान्तश्च सिद्धाश्च अप्रतिहतैश्वर्या इत्यर्थः । हठयोगस्य प्रभावात्सामर्थ्यादिति हठयोगप्रभावतः । पञ्चम्यास्तसिल । कालो मृत्युः तस्य दण्डनं दण्डः देहप्राणवियोगानुकूलो व्यापारः तं खण्डयित्वा छित्त्वा । मृत्यु जित्वे- त्यर्थः । ब्रह्माण्डमध्ये विचरन्ति विशेषेणाव्याहतगत्या चरन्तीत्यर्थः । तदुक्तं भाग- वते-'योगेश्वराणां गतिमाहुरन्तर्बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मनाम् ' इति ॥ ६-९ ॥ मन्थान-भैरव-सिद्धि-बुद्ध-कन्थडि-कोरंटक-सुरानंद-सिद्धि-पाद-चर्पटि-कानेरी-पूज्यपाद नित्य नाथ-निरंजन-क्रपालि-विन्दुनाथ-काकचण्डीश्वर-अल्लाम-प्रभु-देव-घोडा-चोली-टिंटिणि-भानुकी- नारदेव-खण्डकापालिक इत्यादि पूर्वोक्त महासिद्ध, यहां आदिपदसे तारानाथ आदि लेने । हठ- योगके प्रभावसे कालके दण्डको खण्डन करके अर्थात् देह और प्राण वियोगके जनक मृत्युको जीतकर ब्रह्मांडके मध्यमें विचरते हैं अर्थात् अपनी इच्छाके अनुसार ब्रह्मांडमें चाहै जहां जा सकते हैं । सोई भागवतमें इस वचनसे कहा है कि, पवनके मध्यमें हैं मन जिनका ऐसे योगी- श्वरोंकी गति त्रिलोकीके भीतर और बाहर होती है ॥ ६-९ ॥ हठस्वाशेषतापनाशकत्वमशेषयोगसाधकलं च मठकमठरूपकेणाह- अशेषतापततानां समाश्रयमठो हठः। अशेषयोगयुक्तानामाधारकमठो हठः ॥१०॥ अशेषेति ॥ अशेषाः आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकभेदेन त्रिविधाः । तत्रा- ध्यात्मिकं विविधम्-शारीरं मानसं च । तत्र शारीरं दुःखं व्याधिजम् , मानसं दुःखं कामादिजम् । आधिभौतिक व्याघ्रसादिजनितम् । आधिदैविकं ग्रहादिजनितम् । ते च ते तापाश्च तैस्तप्तानां सन्तप्तानां पुंसां हठो हठयोगः सम्यगाश्रीयत इति समा- श्रयः आश्रयः आश्रयभूतो मठः मठ एव । तथा हठः अशेषयोगयुक्तानाम् अशेषयोग- युक्ताः मन्त्रयोगकर्मयोगादियुक्तास्तेषामाधारभूतः कमठः। एवम् त्रिविधतापतप्तानां पुंसाम् आश्रयो हठः । यथा च विश्वाधारः कमठः एवं निखिलयोगिनामाधारो हठ इत्यर्थः ॥ १०॥ अब हठयोगको संपूर्ण तापोंका नाशक और संपूर्ण योगोंका साधक मठ कमठरूपसे वर्णन करते हैं कि, सम्पूर्ण जो ' आध्यात्मिक आधिभौतिक आधिदैविक ' तीन प्रकारके ताप उनसे तपायमान मनुष्योंको हठयोग समाश्रय मठ (रहनका घर) रूप है । उन तापोंमें आध्या- त्मिक ताप दो प्रकारका है-शारीर और मानस । उनमें शरीरका दुःख व्याधिसे होता है [ उपदेश:- । । - (१०) हठयोगप्रदीपिका। और मनका दुःख काम आदिसे होता है और व्याघ्र सर्प आदिसे उत्पन्न हुए दुःखको आधि. भौतिक कहते हैं और सूर्य आदि ग्रहोंसे उत्पन्न हुए दुःखको आधिदैविक कहते हैं। इन तीन प्रकारके तापोंसे तप्त मनुष्योंको हठयोग इस प्रकार सुखदायी है । जैसे-सूर्यसे तपायमान मनुष्योंको घर होता है और अशेष (संपूर्ण) योगोंसे युक्त जो पुरुष हैं उनका आधार इस प्रकार हठयोग है, जैसे सम्पूर्ण जगत्का आधार कमठ है अर्थात् कच्छपरूप भगवानरूप है । भावार्थ यह है कि, सम्पूर्ण तापोंसे तपायमान मनुष्योंका आश्रय मठरूप और सम्पूर्ण योगि- योंका आधार ( आश्रय) कमठरूप हठयोग है ॥ १०॥ अथाखिलविद्यापेक्षया हठविद्याया अतिगोप्यत्वमाह- हठविद्या परंगोप्या योगिना सिद्धिमिच्छता। भवेद्वीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या तु प्रकाशिता ॥११॥ हठविद्येति ॥ सिद्धिम् अणिमाद्यैश्वर्यमिच्छता यदा सिद्धिं कैवल्यसिद्धिमिच्छता वाञ्छता योगिना हठयोगविद्या परमत्यन्तं गोप्या गोपनीया गोपनाहास्तीति । तत्र हेतुमाह-यतो गुप्ता हठविद्या वीर्यवत्यप्रतिहतैश्चर्यजननसमर्था स्यात् । कैवल्यजनन- समर्था कैवल्यसिद्धिजननसमर्था वा स्यात् । अथ योगाधिकारी-'जिताक्षाय शान्ताय सक्ताय मुक्तौ विहीनाय दोषैरसक्ताय मुक्तौ । अहीनाय दोषेतरैरुक्तक प्रदेयो न देयो हठश्चेतरस्मै ॥' याज्ञवल्क्यः-विध्युक्तकर्मसंयुक्तः कामसंकल्पवर्जितः । यमैश्च नियमैर्युक्तः सर्वसङ्गविवर्जितः ॥ कृतविद्यो जितक्रोधः सत्यधर्मपरायणः । गुरुशुश्रू- षणरतः पितृमातृपरायणः ॥ स्वाश्रमस्थः सदाचारो विद्वद्भिश्च सुशिक्षितः ॥ ' इति । शिश्नोदररतायैव न देयं वेषधारिणे' इति कुत्रचित् । अत्र योगचिन्तामणिकाराः । यद्यपि-'ब्राह्मणक्षत्रियविशां स्त्रीशूद्राणां च पावनम् । शान्तये कर्मणामन्यद्योगान्नास्ति विमुक्तये' इत्यादिपुराणवाक्येषु प्राणिमात्रस्य योगेऽधिकार उपलभ्यते । तथापि मोक्ष- रूपं फलं योगे विरक्तस्यैव भवति । अतस्तस्यैव योगाधिकार उचितः। तथा च वायु- संहितायाम्-" दृष्टे तथानुश्रावके विरक्तं विषये मनः। यस्य तस्याधिकारोऽस्मिन् योगे नान्यस्य कस्यचित् ॥” सुरेश्वराचार्याः-इहामुत्र विरक्तस्य संसारं प्रजिहासतः। जिज्ञा- सोरेव कस्यापि योगेऽस्मिन्नधिकारिता ॥" इत्याहुः । वृद्धैरप्युक्तम्-" नैतद्देयं दुविनी- ताय जातु ज्ञानं गुप्तं तद्धि सम्यक्फलाय । अस्थाने हि स्थाप्यमानैव वाचां देवी कोपानिर्दहेन्नो चिराय ॥ ' इति ॥ ११ ॥ अब संपूर्ण विद्याओंकी अपेक्षा हठयोग विद्याको अत्यन्त गुप्त करने योग्य वर्णन करते हैं, सिद्धि अर्थात् अणिमा आदि ऐश्वर्य वा मोक्षक अभिलाषी योगीको हठविद्या अत्यन्त गुप्त करने योग्य है, क्योंकि, गुप्त कीहुई हठविद्या वीर्यवाली होती है अर्थात् ऐसे ऐश्वर्यके पैदा करती है कि, जो कदाचित् न डिगसकै और प्रकाश करनेसे वीर्यसे रहित हो जाती है । अब प्रसंगसे योगके अधिकारीका वर्णन करते हैं कि, जितेन्द्रिय-शान्त-भोगोंमें आसक्त न हो और दोषोंसे रहित हो और और मुक्तिका अभिलाषी हो और दोषोंसे अन्य जो संसारके धर्म हैं उनसे हीन क . प्रथमः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (११) न हो और आज्ञाकारी हो उसको ही हठयोगविद्या देनी, अन्यको नहीं। याज्ञवल्क्यने भी कहा है कि, शास्त्रोक्त कर्मोंसे युक्त कामना और संकल्पसे रहित यम और नियमसे युक्त और संपूर्ण संगोंसे वर्जित और विद्यासे युक्त क्रोधरहित सत्य और धर्म में परायण गुरुकी सेवामें रत पिता और माताका भक्त अपने गृहस्थ आदि आश्रममें स्थित श्रेष्ठ आचारी और विद्वानोंने जिसको भलीप्रकार शिक्षा दी हो ऐसा पुरुष योगका अधिकारी होता है। और यह भी कहीं लिखा है कि, जो योगीका वेषधारी कामदेव और उदरके वशीभूत हो उसको योगका उपदेश न करै । इस विषयमें योगचिंतामणिके कर्ता तो यह कहते हैं कि, यद्यपि 'ब्राह्मण' इत्यादि- पुराणवचनों में प्राणिमात्रको योगमें अधिकार मिलता है कि, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र स्त्री इनको पवित्र करनेवाला कोकी शांतिके लिये और मुक्तिके अर्थ योगसे अन्य नहीं है तो भी मोक्षरूप जो फल है वह योगसे विरक्तकोही होता है, इससे विरक्तकोही योगका अधिकार उचित है। सोही वायुसंहितामें लिखा है कि, लौकिक और वेदोक्त विषयोंमें जिसका मन विरक्त है उसकाही इस योगमें अधिकार है अन्य किसीका नहीं है । सुरेश्वराचार्यने भी कहा है कि, इस लोक और परलोकके विषयोंमें जो विरक्त मनुष्य संसारके त्यागका अभिलाषी है ऐसे किसीही जिज्ञासु पुरुषका योगमें अधिकार है-इति । वृद्धोंने भी कहा है कि, यह योग दुर्वि- नीत (क्रोधी) को कदाचित् न देना । क्योंकि गुप्त रक्खाहुआ योग भली प्रकारके फलको देता है और अस्थान (कुपात्र ) में स्थापन करतेही क्रोधहुयी वाणी उसी समय दुग्ध करती है, कुछ चिरकालमें नहीं । भावार्थ यह है कि, सिद्धिका आभिलाषी योगी हठविद्याको भलीप्रकार गुप्त रक्खै क्योंकि गुप्त रखनेसे वीर्यवाली और प्रकाश करनेसे वीर्यरहित होती है ॥११॥ अथ हठाभ्यासयोग्यं देशमाह सार्धेन-- सुराज्ये धार्मिके देशे सुभिक्षे निरुपद्रवे । धनुःप्रमाणपर्यन्तं शिलाग्निजलवजिते । एकान्ते मठिकामध्ये स्थातव्यं हठयोगिना ॥ १२ ॥ [युक्ताहारविहारेण हठयोगस्य सिद्धये।] सुराज्य इति ॥ राज्ञः कर्म भावो वा राज्यं तच्छोभनं यस्मिन्स सुराज्यस्तस्मिन् सुराज्ये । 'यथा राजा तथा प्रजाः ' इति महदुक्तेः राज्ञः शोभनत्वात्प्रजानामपि शोभनत्वं सूचितम् । धार्मिके धर्मवति, अनेन हठाभ्यासिनोऽनुकूलाहारादिलाभः सूचितः । सुभिक्ष इत्यनेनानायासेन तल्लाभः सूचितः । निरुपद्रवे चौरव्याघ्राद्युपद्रव- रहिते । एतेन देशस्य दीर्घकालवासयोग्यता सूचिता । धनुषः प्रमाणं धनुःप्रमाणं चतुर्हस्तमात्रं तत्पर्यंतं शिलाग्निजलवजिते शिला प्रस्तरः अग्निर्वह्निः जलं तोयं तैर्वजिते रहिते । यत्रासनं ततश्चतुर्हस्तमात्रे शिलाग्निजलानि न स्युरित्यर्थः। तेन शीतोष्णविका- राभावः सूचितः । एकान्ते विजने। अनेन जनसमागमाभावात्कलहाद्यभावः सूचितः। जनसंमर्दै तु कलहादिकं स्यादेव । तदुक्तं भागवते-' वासे बहूनां कलहो भवेद्वार्ता द्वयोरपि ' इति । तादृशे मठिकामध्ये । अल्पो मठो मठिका । अल्पीयसि कन् ।
[ उपदेशः- (१२) हठयोगप्रदीपिका। तस्याः मध्ये हठयोगिना हठाभ्यासी योगी हठयोगी तेन । शाकपार्थिवादिवत्समासः । स्थातव्यं स्थातुं योग्यम् । मठिकामध्य इत्यनेन शीतातपादिजनितक्लेशाभावः सूचितः ॥ अत्र 'युक्ताहारविहारेण हठयोगस्य सिद्धये । ' इत्य) केनचित्क्षि- तत्वान्न व्याख्यातम् । मूलश्लोकानामेव व्याख्यानम् । एवमग्रेऽपि ये मया न व्याख्याताः श्लोका हठप्रदीपिकायामुपलभ्यरंस्ते सर्वे क्षिप्ता इति बोद्धव्यम् ॥ १२ ॥ अब डेढ श्लोकसे हठयोगाभ्यासके योग्य देशका वर्णन करते हैं कि, जिस देशमें अच्छा राजा हो क्योंकि जैसा राजा वैसोही प्रजा इस महान् पुरुषोंके वचनसे शोभन राजाके होने- पर प्रजाभी शोभन होगी यह सूचित समझना और जो देश धर्मवान् हो, इससे यह सूचित किया कि, धार्मिक देशमें हठयोगके अभ्यासोको अनुकूल भोजन आदिका लाभ होता रहेगा और जिस देशमें भिक्षा अच्छी मिलती हो इससे यह सूचित किया कि, विना परिश्रम भिक्षाका लाभ होगा और जो चोर व्याघ्र आदिके उपद्रवोंसे रहित हो इससे यह सूचित किया कि, वह देश दीर्घ कालतक वसने योग्य है और जहां आसन हो, उसके चारों तरफ धनुष प्रमाण पर्यंत ( ४ हाथभर ) शिला अग्नि जल ये न हों इससे शीत उष्णके विकारका अभाव सूचित किया और जो एकांत (विजन) हो इससे जनोंके समागमाभावसे कलह आदिका अभाव सूचित किया, क्योंकि जहां जनोंका समूह होता है वहां कलह आदि होते ही हैं। सोही भागवतमें कहा है कि, बहुत मनुष्योंके वासमें कलह होता है और दो मनुष्योंकी भी बात होने लगती हैं । ऐसे पूर्वोक्त देशमें जो मठिका (छोटा गृह) उसके मध्यमें हठयोगका अभ्यासी योगी अपनी स्थिति करने योग्य है । इससे शीत धूप आदिके क्लेशका अभाव सूचित किया। यहां किसीने 'युक्ताहार-' यह आधा श्लोक प्रक्षिप्त (बनाकर ) लिखा है। उसका व्याख्याताने अर्थ नहीं लिखा कि, वह प्रक्षिप्त है, क्योंकि मूलके श्लोकोंकाही व्याख्यान व्याख्याताने कियाहै । इसी प्रकार आगे भी 'जिन श्लोकोंका व्याख्याताने व्याख्यान नहीं किया और वे हदीपिकामें मिलजाय तो वे सब प्रक्षिप्त जानने । भावार्थ यह है कि, जहाँ सुंदर राज्य हो जो धार्मिक हों जहाँ सुभिक्ष हो उपद्रव न हो और जहां धनुषके प्रमाणपर्यंत शिला अग्नि जल ये न हों और जो एकान्त हो ऐसे देशमें छोटासा मठ बनाकर हठयोगी रहै।। अथ मठलक्षणमाह- अल्पद्धारमरन्ध्रगर्तविवरं नात्युच्चनीचायतं सम्यग्गोमयसान्द्रलिप्तममलं निःशेषजन्तूज्झितम् । बाह्ये मण्डपवेदिकूपरुचिरं प्राकारसंवेष्टितं प्रोक्तं योगमठस्य लक्षणमिदं सिद्धैर्हठाभ्यासिभिः॥१३॥ अल्पद्वारमिति ॥ अल्पं द्वारं यस्मिस्तत्तादृशम् । रंधो गवाक्षादिः गों निम्न- प्रदेशः विवरो मूषकादिबिलं ते न सन्ति यस्मिंस्तत्तादृशम् । अत्युच्चं च तन्नीचं चात्युच्चनीचं तच्च तदायतं चात्युच्चनीचायतम् । विशेषणं विशेष्येण बहुलमित्यत्र बहुलग्रहणाद्विशेषणानां कर्मधारयः । ननूच्चनीचायतशब्दानां भिन्नार्थकानां कर्थ कर्मधारयः । तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारय इति तल्लक्षणादिति चेन । मठे ।
प्रथमः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१३) तेषां सामानाधिकरण्यसंभवात् ।न चात्युञ्चनीचायतं नात्युच्चनीचायतम् नशब्देन समासान्नलोपाभावः, नेति पृथक् पदं वा । अत्युच्चे आरोहणे श्रमः स्यादतिनीचेऽवरो- हणे श्रमो भवेत् । अत्यायते दूरं दृष्टिगच्छेत्तन्निराकरणार्थमुक्तं नात्युच्चनीचायतमिति । सम्यक्समीचीनतया गोमयेन गोपुरीषेण सान्द्रं यथा भवति तथा लिप्तम् । अमलं निर्मलं निःशेषा निखिला ये जंतवो मशकमत्कुणाद्यास्तैरुज्झितं त्यक्तं रहितम् । बाह्ये मठाइहिः प्रदेशे मंडपः शालाविशेषः वेदिः परिष्कृता भूमिः कूपो जलाशयविशेषः तैः रुचिरं रमणीयं प्राकारेण वरणेन सम्यग्वेष्टितम् , परितो भित्तियुक्तमित्यर्थः। हठाभ्या- सिभिः हठयोगाभ्यसनशीलैः सिद्धः । इदं पूर्वोक्तमल्पहारादिकं योगमठस्य लक्षणं स्वरूपं प्रोक्तं कथितम् । नन्दिकेश्वरपुराणे त्वेवं मठलक्षणमुक्तम्-'मन्दिरं रम्यविन्यास मनोज्ञं गंधवासितम् ।। धूपामोदादिसुरभि कुसुमोत्करमंडितम् ॥ मुनितीर्थनदीवृक्ष- पद्मिनीशैलशोभितम् । चित्रकर्मनिबद्धं च चित्रभेदविचित्रितम् ॥ कुर्याद्योगटह धीमान् सुरम्यं शुभवर्त्मना । दृष्ट्वा चित्रगताञ्छान्तान्मुनीन्याति मनः शमम् ॥ सिद्धान् दृष्ट्वा चित्रगतान्मतिरभ्युद्यमे भवेत् । मध्ये योगगृहस्थाथ लिखेत्संसारमण्डलम् ॥ श्मशानं च महाघोरं नरकांश्च लिखेत्कचित् । तान्दृष्ट्वा भीषणाकारान्संसारे सार- वजिते । अनवसादो भवति योगी सिद्धयभिलाषुकः । पश्यंश्च व्याधितान् जन्तूव्रतान मत्तांश्चलद्रणान् ' इति ॥ १३ ॥ अब मठके लक्षणका वर्णन करते हैं कि,-जिसका छोटा द्वार हो और जिसमें गवाक्ष आदि रंध्र (छिद्र) न हों और गर्न (गढा) न हो और जिसमें मूसे आदिका विवर (बिल) न हो और न अत्यन्त ऊँचा हो और न अत्यन्त नीचा हो और न अत्यन्त विस्तारसे युक्त हो, क्योंकि अत्यन्त ऊंचेपर चढनेमें और अत्यन्त नीचेसे उतरनेमें श्रम होता है और अत्यंत विस्तार संयुक्तमें दूर दृष्टि जाती है, इससे इन सब आसनोंका निषेध किया है । कदाचित् कहो नीच आयत इन तीनों शब्दोंका अर्थ भिन्न २ है, इससे इनका कर्मधारय समास कैसे होगा? क्योंकि कर्मधारय समास उन पदोंका हुआ करैहै जिनका अर्थ एक हुआ करता है, सोई इस सूत्रमें लिखा है कि, समानाधिकरण तत्पुरुषको कर्मधारय कहते हैं, सो ठीक नहीं। क्योंकि मठमें तीनों पदोंका सामानाधिकरण्य है अर्थात् अत्युच्च नीच आयतरूप जो मठ उससे भिन्न मठ हो क्योंकि अत्युच्चनीचआयतशब्दके संग नशब्दको समास होता है और नलोप नहीं होता अथवा 'न' यह पृथक्ही पद है, इससे यह विशेषण विशेष्यके संग समासको प्राप्त होताहै, इस सूत्रसे कर्मधारयसमास करनेमें कोई भी शंका नहीं है और जो मठ भली प्रकार चिकने गोबरसे लिपा हो और निर्मल ( स्वच्छ ) हो और जो मशक मत्कुण आदि जन्तुओंसे रहित हो और जो मठके बाहर देशमें मण्डप वेदी कूप इनसे शोभित हो और जो भलीप्रकार प्राकार ( परकोटा) से वेष्टित ( भीतसे युक्त) हो । यह पूर्वोक्त योगमठका लक्षण हठयोगके अभ्यास करनेवाले सिद्धोंने कहाहै । नंदिकेश्वरपुराणमें तो यह मठका लक्षण कहाहै कि, जिस मंदिरकी रचना रमणीय हो, जो मनको प्रिय हो, सुगंधित हो, धूपकी अत्यन्त गन्धसे सुगंधित हो, पुष्पोंके समूहसे मंडित हो और जो मुनि तीर्थ नदी वृक्ष कमलिनी पर्वत इनसे शोभित हो और जिसमें चित्राम निकसे हों और जो चित्रोंके भेदसे विचित्र हो बुद्धिमान मनुष्य ऐसे ( कि, अत्युच्च SHARE [उपदेशः- । (१४) हठयोगप्रदीपिका। रमणीय योगघरको शुभ मार्गसे करै । क्योंकि चित्रामों में लिखे शांत मुनियोंको देखकर मन शांत होताहै और चित्रामोंके सिद्धोंको देखकर बुद्धिमें उद्यम बढता है । योगघरके मध्यमें संसारके मण्डलको लिखे और कहीं २ श्मशान और घोर नरकोंको लिखै क्योंकि उन भयान नक नरकोंको देखकर सिद्धिके अभिलाषी योगीको असार संसारमें अनवसाद ( अनिश्चय) होताहै क्योंकि नरकोंमें रोगी उन्मत्त व्रणी (घाववाले) जन्तु दीखतेहैं अर्थात् योगमें प्रवृत्ति न होगी तो ऐसेही नरक मुझे भी मिलेंगे। भावार्थ यहहै कि, जिसका छोटासा द्वार हो जिसमें छिद्र गढे बिल न हों और जो अत्यन्त ऊंचा नीचा विस्तृत न हो और जो भलीप्रकार चिकने गोमयसे लिपा हो और जो स्वच्छ हो और जिसमें कोई जीव न हों और जिसके बाहर मण्डप वेदी कूप हो और शोभित हो और जिसके चारों तर्फ प्राकार (भीत) हो यह योगमठका लक्षण हठयोगके अभ्यास कर्ता सिद्धोंने कहाहै ॥ १३ ॥ मठलक्षणमुक्त्वा मठे यत्कर्तव्यं तदाह- एवंविधे मठे स्थित्वा सर्वचिन्ताविवर्जितः । गुरूपदिष्टमार्गेण योगमेव समभ्यसेत् ॥ १४॥ एवंविध इति ॥ एवं पूर्वोक्ता विधा प्रकारो यस्य तथा पूर्वोक्तलक्षण इत्यर्थः । तस्मिन्स्थित्वा स्थिति कृत्वा सर्वा याश्चितास्ताभिर्विशेषेण वर्जितो रहितोऽशेषचिन्ता- रहितः । गुरुणोपदिष्टो यो मार्गः हठाभ्यासप्रकाररूपस्तेन सदा नित्यं योगमेवाभ्य- सेत् । एवशब्देनाभ्यासान्तरस्य योगे विघ्नकरत्वं सूचितम् । तदुक्तं योगबीजे–' मरु- जयो यस्य सिद्धस्तं सेवेत गुरुं सदा । गुरुवक्रप्रसादेन कुर्यात्प्राणजयं बुधः ॥ राजयोगे- वेदान्ततर्कोक्तिभिरागमैश्च नानाविधैः शास्त्रकदम्बकैश्च । ध्यानादिभिः सत्करणैर्न गम्यश्चितामणियेकगुरुं विहाय ॥' स्कन्दपुराणे- आचार्यायोगसर्वस्व- मवाप्य स्थिरधीः स्वयम् । यथोक्तं लभते तेन प्राप्नोत्यापि च निवृतिम् ॥' सुरेश्वराचार्यः- 'गुरुप्रसादाल्लभते योगमष्टाङ्गसंयुतम् । शिवप्रसादालभते योगसिद्धिं च शाश्वतीम् ॥ यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्या प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ इति । श्रुतिश्च-' आचार्यवान्पुरुषो वेद ' इति च ॥ १४ ॥ मठके लक्षण कहकर मठमें करने योग्य कर्मोंको कहते हैं कि, सम्पूर्ण चिंताओंसे रहित मनुष्य इस प्रकारके मठमें स्थित होकर गुरुने उपदेश किया जो मार्ग उससे सदैव योगका अभ्यास करै । और यहां एवपदसे यह सूचित किया कि, अन्य कर्मका अभ्यास विघ्नकारी होता है । सोई योगबीजमें कहा है कि, जिसने वायुको जीत रक्खाहो उस गुरुकी सदैव सेवा करे और बुद्धिमान् मनुष्य गुरुके मुखारविंदके प्रसादसे प्राणोंका जय करै । राजयोगमें भी लिखा है कि, वेदांत और तकोंके वचन वेद और नाना प्रकारके शास्त्रोंके समूह और ध्यान आदि और वशीभूत इन्द्रिये इनसे चिन्तामाण (योग) की प्राप्ति एक गुरुको छोडकर नहीं होती अर्थात् गुरुके द्वारा ही योगकी प्राप्ति होती है । स्कंदपुराणमें भी लिखा है कि, स्थिर- बुद्धि मनुष्य आचार्य गुरुसे योगके सर्वस्व (पूर्ण) को जानकर यथोक्त (शास्त्रोक्त) फलको ।
RAIN प्रथमः] संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता। (१५) प्राप्त होता है और निवृति (आनंद) को भी प्राप्त होता है। सुरेश्वराचार्यने भी कहा है कि, गुरुके प्रसादसे अष्टांगसहित योगको प्राप्त होता है और शिवजीके प्रसादसे सनातनकी जो योगसिद्धि उसको प्राप्त होता है। जिसकी देवतामें परम भक्ति है और जैसी देवतामें है वैसी ही भक्ति गुरुमें है उस महात्माको शास्त्रमें कहे ये सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं और श्रुतिमें भी कहा है कि, वही पुरुष जानता है जो आचार्यवाला है । भावार्थ यह है कि, इस पूर्वोक्त प्रकारके मठमें स्थित होकर संपूर्ण चिंताओंसे रहित मनुष्य गुरुके उपदेश किये मार्गसे सदैव योगका अभ्यास करै ।। १४ ॥ अथ योगाभ्यासप्रतिवन्धकानाह- अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमग्रहः । जनसङ्गश्च लौल्यं च षड्भिौगो विनश्यति ॥१५॥ अत्याहार इति ॥ अतिशयित आहारोऽत्याहारः-क्षुधापेक्षयाऽधिकभोजनम् । प्रयासः श्रमजननानुकूलो व्यापारः । प्रकृष्टो जल्पः प्रजल्पो बहुभाषणम् । शीतो- दकेन प्रातःस्नाननक्तभोजनफलाहारादिरूपनियमस्य ग्रहणं नियमग्रहः । जनानां संगो जनसंगः कामादिजनकत्वात् । लोलस्य भावः लौल्यं चांचल्यम् । षड्भिरत्याहारा- दिभिरभ्यासप्रतिबंधात् । योगो विनश्यति विशेषेण नश्यति ॥ १५ ॥ अब योगाभ्यासके प्रतिबंधकोंको कहते हैं कि, अत्याहार अर्थात् क्षुधासे अधिक भोजन- प्रयास अर्थात् परिश्रम जिसमें हो ऐसा व्यापार, प्रजल्प (बहुत बोलना ) नियमोंके ग्रहण अर्थात् शीतल जलसे प्रातःकालस्नान रात्रिमें ही भोजन फलाहार आदिका नियम करना और जनोंका संग क्योंकि वह भी काम आदिको पैदा करता है और चंचलता इन अत्याहार आदि छः इसे योग विशेषकर नष्ट होता है ॥ १५ ॥ अथ योगसिद्धिकरानाह- उत्साहात्साहसाबैर्यात्तत्त्वज्ञानाच निश्चयात् । जनसङ्गपरित्यागात्षभिर्योगः प्रसिद्धयति ॥ १६॥ उत्साहादिति ॥ विषयप्रवणं चित्तं निरोत्स्याम्येवेत्युद्यमम् उत्साहः । साध्यत्वा- साध्यत्वे परिभाव्य सहसा प्रवृत्तिः साहसम् । यावज्जीवनं सेत्स्यत्येवेत्यखेदो धैर्यम् । विषया मृगतृष्णाजलवदसन्तः, ब्रह्मैव सत्यमिति वास्तविकं ज्ञानं तत्त्वज्ञानं योगानां वास्तविकं ज्ञानं वा । शास्त्रगुरुवाक्येषु विश्वासो निश्चयः । श्रद्धेति यावत् । जनानां योगाभ्यासप्रतिकूलानां यः संगस्तस्यं परित्यागात् । षड्भिरेभिर्योगः प्रकर्षे- णाविलंबेन सिद्धयतीत्यर्थः ॥ १६॥ अब योगके साधकोंको कहते हैं कि, विषयों में लगे चित्तकोभी रोकलंगा यह उद्यमरूप उत्साह आर साध्य असाध्यको विचारकर शीघ्र प्रवृत्तिरूप साहस और धैर्य जीवन पर्यंतमें तो सिद्ध होहीगा इस खेदके अभावको धैर्य कहते हैं और मृगतृष्णाके जलकी तुल्य विषय (१६) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेशः मिथ्या है और ब्रह्मही सत्य है यह वास्तविक ( सत्य) ज्ञानरूप तत्त्वज्ञान और निश्चय अर्थात् शास्त्र और गुरुके वाक्योंमें विश्वास श्रद्धा और योगाभ्यासके विरोधी जनोंका जो समागम- परित्याग इन छः वस्तुओंसे योग शीघ्र सिद्ध होता है ।। १६ ॥ अथ यमनियमाः। [अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्य क्षमा धृतिः। दयाऽऽर्जवं मिताहारः शौचं चैव यमा दश ॥१॥ तपः संतोष आस्तिक्यं दानमीश्वरयूजनम् । सिद्धान्तवाक्य श्रवणं ह्रीमती च तपो हुतम् ॥२॥ नियमा दश संप्रोक्ता योगशास्त्रविशारदः हिंसाका त्याग, सत्य, चोरीका त्याग, ब्रह्मचर्य, क्षमा, धीरता, दया, नम्रता, प्रमितभाजन और शुचिता ये दश यम कहाते हैं और तप, संतोष, आस्तिकता, (परलोकको मानना ) दान, ईश्वरका पूजन, सिद्धांतवाक्योंका श्रवण, लज्जा, बुद्धि, तप और होम थे दश नियम योग- शास्त्रके पंडितोंने कहे हैं ॥ १ ॥२॥-ये अढाई श्लोक प्रक्षिप्त हैं। आदावासनकथने संगति सामान्यतस्तत्फलं चाह- हठस्य प्रथमाङ्गत्वादासनं पूर्वमुच्यते। कुर्यात्तदासनं स्थैर्यमारोग्यं चाङ्गलाघवम् ॥ १७॥ हठस्येति ॥ हठस्य' आसनं कुंभकं चित्रं मुद्राख्यं करणं तथा । अथ नादानुसं- धानम्' इति वक्ष्यमाणानि चत्वार्यगानि । प्रत्याहारादिसमाध्यंतानां नादानुसन्धाने- ऽन्तर्भावः। तन्मध्ये आसनस्य प्रथमांगत्वात्पूर्वमासनमुच्यत इति संबंधः । तदासनं स्थैर्य देहस्य मनसश्चाञ्चल्यरूपरजोधर्मनाशकत्वेन स्थिरतां कुर्यात् । 'आसनेन रजो हति ' इति वाक्यात् । आरोग्यं चित्तविक्षेपकरोगाभावः । रोगस्य चित्तविक्षेपकत्व- मुक्तं पातंजलसूत्रे- व्याधिरुत्थानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रांतिदर्शनालब्धभूमिक- त्वाऽनवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः' इति । अंगानां लाघवं लघुत्वं गौरव- रूपतमोधर्मनाशकत्वमप्येतेनोक्तम् । चकाराक्षुवृद्धयादिकमपि बोध्यम् ॥ १७ ॥ प्रथम आसनके कथनमें संगतिको और आसनके फलको कहते हैं कि, हठयोगका प्रथम अंग होनेसे आसनको प्रथम कहते हैं कि, ये योगके चार अंग कहें। कि, आसन कुंभक प्राणायाम ) विचित्र मुद्राओंको करना और नादका अनुसंधान और प्रत्याहारसे समाधि- पर्यंतोंका अंतर्भाव नादमें है, उन चारोंमें आसन प्रथम अंग है इससे उसकाही पहिले वर्णन करते हैं कि, तिस आसनकी स्थिरता इसलिये करै कि, देह और मनकी चञ्चलतारूप जो रजोगुणका धर्म उसका नाशक आसन है, क्योंकि इस वचनमें यह लिखा है कि, योगी आस. नसेरिजोगुणको नष्ट करता है और आरोग्यकारक है अर्थात् चित्तको विक्षेपक रोग नहीं । - प्रथमः] संस्कृतटीका--भाषाटीकासमेता । (१७) होताहै क्योंकि पतञ्जलिके इस सूत्रमें रोगकोभी चित्तको विक्षेपक कहा है कि, व्याधि. उत्थान-संशय-प्रमाद-आलस्य-अविरति-भ्रांति-दर्शन-अलब्धभूमि ( पूर्वोक्त भूमियोंका न मिलना ) अनवस्थित (चञ्चलता)ये चित्तके विक्षेपरूप विन हैं और अंगोंका लाघव क्योंकि वह लाघव गौरवरूप तमोगुणके धर्मका नाशक है और चकारके पढनेसे क्षुधाकी वृद्धि आदिभी समझने अर्थात् ऐसा आसन हो जो स्थिर नीरोग अंगोंका लाघव उत्पन्न करे और जिससे क्षुधा न बढे ॥ १७ ॥ वसिष्ठादिसंमतासनमध्ये श्रेष्ठानि मयोच्यन्त इत्याह-- वसिष्ठायैश्च मुनिभिर्मत्स्येन्द्रायैश्च योगिभिः । अङ्गीकृतान्यासनानि कथ्यन्ते कानिचिन्मया ॥ १८॥ वसिष्ठायैरिति ॥ वसिष्ठ आयो येषां याज्ञवल्क्यादीनां तैर्मुनिभिर्मननशीलैः । चकारान्मन्त्रादिपरैः । मत्स्येन्द्र आद्यो येषां जालंधरनाथादीनां तैः । योगिभिः हठा- भ्यासिभिः । चकारान्मुद्रादिपरैः । अङ्गीकृतानि चतुरशीत्यासनानि तन्मध्ये कानि- चित् श्रेष्ठानि मया कथ्यन्ते । यद्यप्युभयोरपि मननहठाभ्यासौ स्तस्तथापि वसिष्ठा- दीनां मननं मुख्यम् , मत्स्येन्द्रादीनां हठाभ्यासो मुख्य इति पृथग्रहणम् ॥ १८ ॥ वसिष्ठ आदिकोंके संमत जो आसन हैं उनमें श्रेष्ठ २ आसनोंके वर्णनको प्रतिज्ञा करते हैं कि, वसिष्ठ है आदिमें जिनके ऐसे मननके कर्ता मुनियोंने और चकारके पढनेसे मन्त्रके ज्ञाता- ओंने और मत्स्येंद्र है आदिमें जिनके ऐसे योगियों (जालंधरनाथ आदि)ने अर्थात् हठयोगके अभ्यासियोंने और चकारके पढनसे मुद्रा आदिके ज्ञाताओंने अंगीकार किये जो चौराशी ८४ आसन हैं उनमें कितनेक श्रेष्ठ आसनोंको मैं कहताहूँ । यद्यपि दोनोंको मनन और हठयोगका अभ्यास था तथापि वसिष्ठ आदिकोंका तो मनन मुख्य रहा और मत्स्येंद्र आदिकोंका हठ- योगका अभ्यास मुख्य रहा इससे दोनोंको पृथक् पृथक् पढा है ॥१८॥ तत्र सुकरत्वात्प्रथमं स्वस्तिकासनमाह- जानूवारन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले उभे । ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥ १९॥ जानूर्वोरिति । जानु च ऊरुश्च । अत्र जानुशब्देन जानुसंनिहितो जंघाप्रदेशो ग्राह्यः । जंघोवारिति पाठस्तु:साधीयान् । तयोरन्तरे मध्ये उभे पादयोस्तले तल- प्रदेशौ कृत्वाऋजुकायः समकायः यत्र समासीनो भवेत्तदासनं स्वस्तिकं स्वस्तिकाख्यं प्रचक्षते वदन्ति । योगिन इति शेषः। श्रीधरेणोक्तम्-" ऊरुजंघांतराधाय प्रपदे जानु- मध्यगे । योगिनो यदवस्थानं स्वस्तिकं तद्विदुर्बुधाः ॥ ' इति ॥ १९ ॥ स्वस्तिक आसनको कहते हैं कि, जानु (गोडे ) और जंघाओंके बीचमें चरणतल अर्थात् दोनों तरवाओंको लगाकर जो सावधानीपूर्वक बैठना उसे स्वस्तिक आसन कहते हैं ॥ १९ ॥ - २ (१८ हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- गोमुखासनमाह- सव्ये दक्षिणगुल्फ तु पृष्ठपार्श्वे नियोजयेत् । दक्षिणेऽपि तथा सव्यं गोमुखं गोमुखाकृति ॥ २० ॥ सव्य इति ॥ सव्ये वामे पृष्ठस्य पार्श्वे सम्प्रदायात्कटेरधोभागे दक्षिणं गुल्म नितरां योजयेत् । गोमुखस्याकृतिर्यस्य तत्तादृशं गोमुखसंज्ञकमासनं भवेत् ॥ २० ॥ गोमुख आसनको कहते हैं कि, कटिके वामभागमें दहिना गुल्फ (टकना) और दक्षिणभागमें वाम टकनेको लगाकर जो गोमुखके समान आकार होजाता है उसे गोमुख आसन कहते हैं२० वीरासनमाह- एकं पादं तथैकस्मिन्विन्यसेदूरुणि स्थितम् । इतरस्मिंस्तथा चोरुं वीरासनमितीरितम् ॥२१॥ एकमिति ॥ एकं दक्षिणं पादम् । तथा पादपूरणे । एकस्मिन्वामोरुाण स्थितं विन्यसेत् । इतरस्मिन्वामे पादे ऊरूं दक्षिणं विन्यसेत् । तद्वीरासनमितीरितं कथितम्२१ वीरासनको कहते हैं कि, एक चरणको वाम जंघापर और दूसरेको दक्षिण जंघापर रख- कर वीरासन होताहै ॥ २१ ॥ कूर्मासनमाह- गुदं निरुद्धय गुल्फाभ्यां व्युत्कमेण समाहितः। कूर्मासनं भवेदेतदिति योगविदो विदुः॥ २२॥ गुदमिति । गुल्फाभ्यां गुदं निरुद्धय नियम्य व्युत्क्रमेण यत्र सम्यगाहितः स्थितो भवेत् । एतत्कूर्मासनं भवेत् । इति योगविदो विदुरित्यन्वयः ॥ २२ ॥ कूर्मासनको कहते हैं-दोनों टकनोंसे गुदाको विपरीत क्रमसे अर्थात् दक्षिणसे वामभाग वामसे दक्षिण भागको रोककर जो सावधानीसे बैठजावे उसे कूर्मासन कहते हैं ॥ २२ ॥ कुकुटासनमाह- पद्मासनं तु संस्थाप्य जानूोरन्तरे करौ। निवेश्य भूमौ संस्थाप्य व्योमस्थं कुक्कुटासनम् ॥ २३॥ पद्मासनं त्विति ॥ पद्मासनं तु उर्वोरुपरि उत्तानचरणस्थापनरूपं सम्यक स्थापयित्वा । जानुपदेन जानुसंनिहितो जंघाप्रदेशः । तच्च ऊरुश्च जानूरू तयोरन्तरे मध्ये क निवेश्य भूमौ संस्थाप्य । करावित्यत्रापि सम्बध्यते । व्योमस्थं खस्य पद्मासनसदृशं यत्तत्कुक्कुटासनम् ॥ २३ ॥ - प्रथमः] संस्कृतीका-भाषाटीकासमेता। अब कुक्कुटासनको कहते हैं कि, पद्मासनको लगाकर अर्थात् जंघाओंके ऊपर उत्तान (खडे ) दोनों चरणोंको स्थापन करके और जानु ( गोडे ) और जंघाओंके मध्यभागमें दोनों हाथोंको लगाकर और उन दोनों हाथोंको भूमिमें स्थापन करके आकाशमें स्थित रहे । पद्मासनके समान जो यह आसन है सो कुक्कुटासन कहाता है अर्थात् मुरगेके समान स्थिति करनी ।। २३ ।। उत्तानकूर्मकासनमाह- कुक्कुटासनबन्धस्थो दोभ्यो सम्बध्य कन्धराम् । भवेत्कूर्मवदुत्तान एतदुत्तानकूर्मकम् ॥ २४ ॥ कुक्कुटासनेति ॥ कुक्कुटासनस्य यो बन्धः पूर्वश्लोकोक्तस्तस्मिन स्थितः दो बाहुभ्यां कन्धरां ग्रीवां सम्बध्य कूर्मवदुत्तानो यस्मिन्भवेदेतदासनमुत्तान- कूर्मकं नाम ॥२४॥ अब कूर्मासनको कहते हैं कि, कुक्कुटासनके बन्धनमें स्थित होकर अर्थात् कुक्कुटासनको लगाकर और दोनों भुजाओंसे कन्धरा (ग्रीवा ) को भलीप्रकार बांधकर कूर्म ( कच्छप ) के समान उत्तान ( सीधा) हो जाय तो यह उत्तानकूर्मासन कहाता है ॥ २४॥ धनुरासनमाह- पादांगुष्ठौ तु पाणिभ्यां गृहीत्वा श्रवणावधि। धनुराकर्षणं कुर्याद्धनुरासनमुच्यते ॥२५॥ पादांगुष्ठौ त्विति ॥ पाणिभ्यां पादयोरंगुष्ठौ गृहीत्वा श्रवणावधि कर्णपर्यन्तं धनुष आकर्षणं यथा भवति तथा कुर्यात् । गृहीतांगुष्ठमकं पाणिं प्रसारितं कृत्वा गृहीतां- गुष्ठमितरं पाणिं कर्णपर्यन्तमाकुञ्चितं कुर्यादित्यर्थः । एतद्धनुरासनमुच्यते ॥ २५ ॥ अब धनुरासनको कहते हैं कि, दोनों पादोंके अंगूठोंको हाथोंसे पकडकर श्रवण (कान) पर्यन्त धनुषके समान आकर्षण करै ( खींचै) उसको धनुरासन कहते हैं ॥ २५ ॥ मत्स्येन्द्रासनमाह- वामोरुमूलार्पितदक्षपादं जानोर्बहिर्वेष्टितवामपादम् । प्रगृह्य तिष्ठेत्परिवर्तिताङ्गःश्रीमत्स्यनाथोदितमासनं स्यात्॥२६ वामोर्विति ॥ वामोरुमूलेऽर्पितः स्थापितो यो दक्षपादः तं सम्प्रदायात्पृष्ठतोगत- वामपाणिना गुल्फस्योपरिभागे परिगृह्य जानोर्दक्षिणपादजानोर्वहि प्रदेशे वेष्टितो यो वामपादस्तं वामपादजानोर्बहिर्वेष्टितदक्षिणपाणिनांगुष्ठे प्रगृह्य । परिवर्तिताङ्गः वाम- भागेन पृष्ठतो मुखं यथा स्यादेवं परिवर्तितं परावर्तितमङ्गं येन स तथा तादृशो यत्र तिष्ठेत् स्थिति कुर्यात्तदासनं मत्स्येन्द्रनाथेनोदितं कथितं स्यात् । तदुदितत्वात्तन्नामक- मेव वदन्ति । एवं दक्षोरुमूलार्पितवामपादं पृष्ठतोगतदक्षिणपाणिना प्रगृह्य वामजानो- (२०) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेशः- चैहिर्वेष्टितदक्षपाद दक्षिणपादजानोर्वहिवेष्टितवामपाणिना प्रगृह्य दक्षभागेन पृष्ठतो मुखं यथा स्यादेवं परिवर्तिताङ्गश्चाभ्यसेत् ॥ २६ ॥ अब मत्स्येंद्रासनको कहते हैं कि, वाम जंघाके मूलमें दक्षिण पादको रखकर और जानुसे बाहर वाम पादको हाथसे लपेटकर और पकडकर और परिवर्तित अंग होकर अर्थात् वाम- भागसे पीठकी तर्फ मुखको करके जिस आसनमें टिकै वह मत्स्येंद्रनाथका कहा मत्स्येन्द्रासन होता है । इसीप्रकार दक्षिणजंघाके मूलमें वामपादको रखकर और पीठपर गये दक्षिणहाथसे उसको ग्रहण करके और वामजानुसे बाहर हाथसे लपेटे दक्षिणपादको दक्षिण पादकी जानुसे बाहर लपेटे फिर उसको वाम हाथसे ग्रहण करके और दक्षिणभागसे पीठकी तरफ मुखको करके भी हठयोगका अभ्यास करै अर्थात् यह भी एक मत्स्येन्द्रासन है ॥ २६ ॥ मत्स्येन्द्रासनस्य फलमाह - मत्स्येन्द्रपीठं जठरप्रदीप्तिं प्रचण्डरुग्मण्डलखण्डनास्त्रम् । अभ्यासतः कुण्डलिनीप्रबोधं चन्द्रस्थिरत्वं च ददाति पुंसाम्॥२७ मत्स्येन्द्रति ॥ प्रचण्डं दुःसहं रुजां रोगाणां मण्डलं समूहः तस्य खण्डने छेदनेऽस्त्रमस्त्रमिव तादृशं मत्स्येन्द्रपीठं मत्स्येन्द्रासनम् अभ्यासतः प्रत्यहमावर्तनरूपा- दभ्यासात् पुंसां जठरस्य जठराग्नेः प्रकृष्टां दीप्तिं वृद्धिं ददाति । तथा कुण्डलिन्या आधारशक्तेः प्रबोधं निद्राभावं तथा चन्द्रस्य तालुन उपरिभागे स्थितस्य नित्यं क्षरतः स्थिरत्वं च क्षरणाभावं च ददातीत्यर्थः ॥ २७ ॥ अब मत्स्येन्द्रासनके फलको कहते हैं कि, यह मत्स्येंद्रासन जठराग्निका दीपक (अधिक) करता है क्योंकि यह आसन प्रचण्डरोगोंका जो समूह उसके नाशके लिये अत्रके समान है और कुण्डलिनी जो आधारशक्ति है उसके प्रबोध (जागरण) अर्थात् निद्राके अभावको और तालुके ऊपरके भागमें स्थित जो चन्द्र (नित्य झरे है) उसकी स्थिरताको अर्थात् झरनेके अभावको पुरुषोंको देता है अर्थात करता है।। २७॥ पश्चिमतानासनमाह- प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरूपी दोभ्या पदाग्रद्वितयं गृहीत्वा । जानूपरिन्यस्तललाटदेशो वसेदिदं पश्चिमतानमाहुः ॥२८॥ प्रसार्येति ॥ भुवि भूमौ दंडस्य रूपमिव रूपं ययोस्तौ दंडाकारौ श्लिष्टगुल्फो मसार्य प्रसारितौ कृत्वा । दोभ्या॑माकुञ्चिततर्जनीभ्यां भुजाभ्यां पदोः पदयोश्वाने अग्रभागौ तयोदितयं द्वयमंगुष्ठप्रदेशयुग्मं बलादाकर्षणपूर्वकं यथा जान्वधोभागस्य भूमेरुत्थानं न स्यात्तथा गृहीत्वा जानोरुपरि न्यस्तो ललाटदेशो येन तादृशो यत्र वसेत् । इदं पश्चिमताननामकमासनमाहुः ॥ २८॥ अब पश्चिमतानासनको कहते हैं कि, दंडके समान है रूप जिनका ऐसे और मिले हैं गुल्फ जिनके ऐसे दोनों चरणोंको भूमिपर फैलाकर और आकुंचित (सुकडी ) है तर्जनी जिनकी - प्रथमः ] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। ऐसी भुजाओंसे दोनों पादोंके दोनों अग्रभागोंको ग्रहण करके अर्थात् अँगूठोंको इस प्रकार पकडकर जैसे जानुओंके अधोभाग भूमिसे ऊपर न उठे और जानुओंके ऊपर रक्खा है ललाट (मस्तक) भाग जिसने ऐसा होकर जहां पुरुष वसै उस आसनको पश्चिमतान आसन कहते हैं२८ अथ तत्फलम्- इति पश्चिमतानमासनाय्यं पवनं पश्चिमवाहिनं करोति । उदयं जठरानलस्य कुर्यादुदरे कार्यमरोगतां च पुंसाम् ॥२९॥ इतीति ॥ इति पूर्वोक्तमासनेष्वयं मुख्यं पश्चिमतानं पवनं प्राणं पश्चिमवाहिनं पश्चिमेन पश्चिममार्गेण सुषुम्नामार्गेण वहतीति पश्चिमवाही तं तादृशं करोति । जठरा- नलस्य जठरे योऽनलोऽग्निस्तस्योदयं वृद्धिं कुर्यात् । उदरे मध्यप्रदेशे काय कृशत्वं कुर्यात् । अरोगतामारोग्यं चकारान्नाडीवलनादिसाम्यं कुर्यात् ॥ २९ ॥ अब इस आसनके फलको कहते हैं कि, संपूर्ण आसनोंमें मुख्य यह पश्चिमतान नामका आसन प्राणरूप पवनको पश्चिमवाही करता है अर्थात् सुषुम्नानाडीके मार्गसे प्राण बहने लगता है और जठराग्निको उत्पन्न करता है अर्थात् बढाता है और उदरके मध्यमें कृशताको करता है और पुरुषोंकी अरोगता (रोगका अभाव) करता है और चकारसे नाडियों के वलन आदिकी समताको करता है ॥ २९ ॥ अथ मयूरासनमाह- धरामवष्टभ्य करद्वयेन तत्कूपरस्थापितनाभिपार्श्वः। उच्चासनो दंडवदुत्थितः स्यान्मायूरमेतत्प्रवदंति पीठम् ॥३०॥ धरामिति ॥ करद्वयेन करयोईयं युग्मं तेन धरां भूमिमवष्टभ्यावलंब्य प्रसारितां- गुली भूमिसंलग्नतलौ सन्निहितौ करौ कृत्वेत्यर्थः । तस्य करद्वयस्य कूपरयोर जमध्य- संधिभागयोः स्थापिते धृते नाभेः पार्थे पार्श्वभागौ येन स उच्चासन उच्चमुन्नतमासनं यस्यैतादृशः । खे शून्ये दंडवदंडेन तुल्यमुत्थित ऊर्ध्वं स्थितो यत्र भवति तन्मायूरं मयूरस्यैतत्संबंधित्वात्तन्नामकं प्रवदंति । योगिन इति शेषः ॥ ३० ॥ अब मयूरासनको कहते हैं कि, दोनों हाथोंसे भूमिका अवलंबन करके अर्थात् फैलाये हुये हाथोंसे भूमिका स्पर्श करके और उन हाथोंका जो कूपर (भुजा, करका संधिभाग) जिसको मणिबंध वा गट्ठा कहते हैं उसके ऊपर नाभिके दोनों पार्श्वभागोंको स्थापित करके वह दंडके समान उठा हुआ उच्चासन होता है, इस आसनको योगीजन मायूर कहते हैं अर्थात् मयूरके समान इसमें स्थिति होती है ॥३०॥ अथ मयूरासनगुणानाह- हरति सकलरोगानाशु गुल्मोदरादी- नभिभवति च दोषानासनं श्रीमयूरम् ।
हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- बहु कदशनमुक्तं भस्म कुर्यादशेष जनयति जठराग्निं जारयेत्कालकूटम् ॥३१॥ हरतीति ॥ गुल्मो रोगविशेषः उदरं जलोदरं ते आदिनी येषां प्लीहादीनां ते तथा तान्सकलरोगान् सकला ये रोगास्तानाशु झटिति हरात नाशयति श्रीमयूरमासन- मिति सर्वत्र सम्बध्यते । दोषान्वातपित्तकफानालस्यादींश्चाभिभवति तिरस्करोति । बहतिशयितं कदशनं कदन्नं यद्भुक्तं तदशेषं समस्तं भस्म कुर्यात्, पाचयेदित्यर्थः। जठराग्निं जठरानलं जनयात प्रादुर्भावयात । कालकूटं विषं कालकूटवदपकारकान्नं समस्तं जारयेज्जीर्णं कुर्यात्पाचयेदित्यर्थः ॥ ३१ ॥ अब मयूरासनके गुणोंको कहते हैं. कि, गुल्म और जलोदर आदि और जो प्लीहा, तिल्ली आदि सब रोग हैं उनको शीघ्र हरता है और संपूर्ण जो वात, पित्त, कफ, आलस्य आदि दोष हैं उनका तिरस्कार करता है और अधिक वा कुत्सित अन्न जो भक्षण करलिया होवे तो उस संपूर्णकोभस्म करता है और जठराग्निको बढाता है और कालकूट (विष) को भी जीर्ण करता है अर्थात् विषके समान अपकार करनेवाला जो अन्न है उसकोभी पचाताहै ॥ ३१ ॥ अथ शवासनमाहार्धेन- उत्तानं शववद् भूमौ शनयं तच्छवासनम् । शवासनं श्रान्तिहरं चित्तविश्रांतिकारकम् ॥३२॥ उत्तानमिति । शवेन मृतशरीरेण तुल्यं शववदुत्तानं भूमिसंलग्नं पृष्ठं यथा स्यात्तथा शयनं निद्रायामिव सन्निवेशो यत्तच्छवासनं शवाख्यमासनम् ॥ शवासनप्रयोजनमाह- उत्तराधेन । शवासनं श्रान्तिहरं श्रांति हठाभ्यासश्रमं हरतीति श्रांतिहरं चित्तस्य विश्रांतिर्विश्रामस्तस्याः कारकम् ॥ ३२ ॥ अब शवासन और उसके फलको कहते हैं कि, शव (मृतके समान) भूमिपर पीठको लगाकर उत्तान ( सीधा) शयन निद्राके तुल्य जिसमें हो वह शवासन होता है और यह शवासन हठयोगके परिश्रमको हरता है और चित्तकी विश्रांति (विश्राम ) को करता है अर्थात् इसके करनेसे चित्त स्थिर होजाता है. ॥ ३२ ॥ वक्ष्यमाणासनचतुष्टयस्य श्रेष्ठत्वं वदन्नाह- चतुरशीत्यासनानि शिवेन कथितानि च । तेभ्यश्चतुष्कमादाय सारभूतं ब्रवीम्यहम् ॥ ३३॥ चतुरशीतीति ॥ शिवनेश्वरेण चतुरधिकाशीतिसंख्याकान्यासनानि कथितानि चकाराच्चतुरशीतिलक्षाणि च । तदुक्तं गोरक्षनाथेन-' आसनानि च तावंति यावत्यो जीवजातयः । एतेषामखिलान्भेदान् विजानाति महेश्वरः ॥ चतुरशीतिलक्षाणि एकैकं समुदाहृतम् । ततः शिवेन पीठानां षोडशोनं शतं कृतम् ॥ ! इति । तेभ्यः शिवोक्त-
प्रथमः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
(२३)
चतुरशीतिलक्षास नानां मध्ये प्रशस्तानि यानि चतुरशीत्यासनानि तेभ्य आदाय
गृहीत्वा । सारभूतं श्रेष्ठभूतं चतुष्कमहं ब्रवीमीत्यन्वयः ॥ ३३ ॥
अब चार आसनोंकी श्रेष्ठताका वर्णन करते हैं कि, शिवजीने चौरासी आसन कहे हैं और
चकारके पढनेसे उनके चौरासी लाख लक्षण कहे हैं सोई गोरक्षनाथने कहाहै कि, जितनी
जीवोंकी जाति हैं उतनेही आसन हैं, इनके संपूर्ण भेदोंको शिवजी जानते हैं, उनमेंभी एक एक
चौरासी लक्ष कहाहै तिससे शिवजीने चौरासी आसनही किये हैं, उनमें श्रेष्ठ जो चौरासी आसन
हैं उनमेंसे लेकर श्रेष्ठ जो चार आसन हैं उनको मैं कहताहू ॥ ३३ ॥
तदेव चतुष्कं नाम्ना निर्दिशति-
सिद्धं पमं तथा सिंह भद्रं चेति चतुष्टयम् ।
श्रेष्ठं तत्रापि च सुखे तिष्ठेत्सिद्धासने सदा ॥ ३४ ॥
सिद्धमिति ॥ सिद्ध सिद्धासनम् । पमं पद्मासनम् , सिंह सिंहासनम्, भद्रं भद्रा-
सनम् इति चतुष्टयं श्रेष्ठमतिशयेन प्रशस्तम् । तत्रापि चतुष्टये सुखे सुखकरे सिद्धासने
सदा तिष्ठेत् । एतेन सिद्धासनं चतुष्टयेप्युत्कृष्टमिति सूचितम् ॥ ३४ ॥
उन चारोंकेही नामोंको दिखाते हैं कि, सिद्धासन-पद्मासन-सिंहासन और भद्रासन ये
चार आसन अत्यंत श्रेष्ठ हैं । उन चारों में सुखका कर्ता जो सिद्धासन है उसमें सदैव योगी
टिकै-इससे यह सूचित किया कि, इन चारोंमेंभी सिद्धासन उत्तम है ॥ ३४ ॥
आसनचतुष्टयेप्युत्कृष्टत्वात्प्रथमं सिद्धासनमाह-
योनिस्थानकमंत्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसे-
न्मेद्रे पादमथैकमेव हृदये कृत्वा हुनु सुस्थिरम् ।
स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदशा पश्येभ्रुवोरंतरं
ह्येतन्मोक्षकपाटभेदजनकं सिद्धासनं प्रोच्यते ॥ ३५ ॥
योनिस्थानकमिति ॥ योनिस्थानमेव योनिस्थानकम् । स्वार्थे कप्रत्ययः ।
गुदोपस्थयोर्मध्यमप्रदेशे पदं योनिस्थानं तत् अंघ्रिर्वामश्चरणस्तस्य मूलेन पाणि-
भागेन घटितं संलग्नं कृत्वा । स्थानांतरम् एकं पादं दक्षिणं पादं मेटेन्द्रियस्योपरि-
भागे दृढं यथा स्यात्तथा विन्यसेत् । हृदये हृदयसमीपे हनुं चिबुकं सुस्थिरं सम्यक्
स्थिरं कृत्वा हनुहृदययोश्चतुरंगुलमन्तरं यथा भवति तथा कृत्वेति रहस्यम् । संयमि-
तानि विषयेभ्यः परावृत्तानीन्द्रियाणि येन स तथा । अचला या दृक् दृष्टिस्तया
भ्रुवोरंतरं मध्यं पश्येत् । हि प्रसिद्ध मोक्षस्य यत्कपाटं प्रतिबन्धकं तस्य भेदं नाशं
जनयतीति तादृशम् । सिद्धानां योगिनाम् आस्ते अत्रास्यतेऽनेनेति वा आसनं सिद्धा-
सननामकमिदं भवेदित्यर्थः ॥ ३५ ॥
(२४) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- अब चारों आसनोंमें उत्तम जो सिद्धासन उसके स्वरूपका वर्णन करते हैं कि, गुदा और लिंग इन्द्रियका मध्यभाग जो योनिस्थान है उससे वाम चरणके मूल (एडी) को मिलाकर और दक्षिण दूसरे पादको दृढ रीतिसे लिंग इन्द्रियके ऊपर रक्खे और हृदयके समीपभागमें हनु चिबुक वा ( ठोडी) को भली प्रकार स्थिर करके अर्थात् हनु और हृदयका चार अंगु- लका अंतर रखकर भली प्रकार विषयोंसे रोकी हैं इन्द्रियें जिसने ऐसा स्थाणु (निश्चल) योगी अपनी अचल ( एकरस) दृष्टि से भृकुटीके मध्यभागको देखता रहै। यह मोक्षके कपाट (अव- रोध वा राक ) का जो भेदन (नाश) उसका करनेवाला योगिजनोंने सिद्धासन कहाहै- अर्थात् सिद्धयोगी इस आसनसे बैठते हैं ॥ ३५ ॥ मत्स्येन्द्रसंमतं सिद्धासनमुक्त्वाऽन्यसंमतं वक्तुमाह-मतान्तरे विति । मतान्तरे तु- तदेव दर्शयति- मेद्रादुपरि विन्यस्य सव्यं गुल्फें तथोपरि। गुल्फान्तरंच निक्षिप्य सिद्धासनमिदं भवेत् ॥३६॥ मेदादिति ॥ मेद्रादुपस्थादुपयूर्वभागे सव्यं वामगुल्फ विन्यस्य तथा सव्यव- दुपरि मुख्यपादस्योपरि न तु सव्यगुल्फस्य । गुल्फान्तरं दक्षिणगुल्फ च निक्षिप्य वसेदिति शेषः । इदं सिद्धासनं मतान्तराभिमतमित्यभेद इत्यर्थः ॥ ३६ ॥ अब मत्स्येन्द्रके संमत सिद्धासनको कहकर अन्य योगिय के संमत सिद्धासनको कहते हैं कि, मतांतरमें तो यह लिखाहै कि-लिंग इन्द्रियके ऊपरके भागमें वामगुल्फको रखकर और तैसेही सव्य (वाम) पादके ऊपर दक्षिण गुल्फको रखकर बैठे तो यह भी किसी २ ने सिद्धासन कहा है ॥ ३६ ।। तत्र प्रथमं महासिद्धसंमतमिति स्पष्टीकर्तुमस्यैव मतभेदान्नामभेदानाह- एतत्सिद्धासनं प्राहुरन्ये वज्रासनं विदुः । मुक्तासनं वदंत्येके प्राहुगुप्तासनं परे ॥ ३७ ॥ एतदिति। एतत्पूर्वोक्तं सिद्धासननामकं प्राहुः । केचिदित्यध्याहारः । अन्ये वज्रा- सनं वज्रासनसंज्ञकं विदुः जानन्ति । एके मुक्तासनं मुक्तासनाभिधं वदन्ति । परे गुप्तासनं गुप्तासनाख्यं प्राहुः। अत्रासनाभिज्ञाः । यत्र वामपादपाणि योनिस्थाने नियोज्य दक्षिणपादपाणिर्मेद्रादुपरि स्थाप्यते तत्सिद्धासनम् । यत्र वामपादपाणि योनिस्थाने नियोज्य दक्षिणपादपाणिर्मेद्रादुपरि स्थाप्यते तद्वज्रासनम् । यत्र तु दक्षिणसव्यपाणियमुपर्यधोभागेन संयोज्य योनिस्थानेन संयोज्यते तन्मुक्तासनम् । यत्र च पूर्ववत्संयुक्तं पाणिद्वयं मेट्रादुपरि निधीयते तत् गुप्तासनमिति ॥ ३७॥ इसकोही कोई सिद्धासन कहते हैं और कोई वज्रासन कहते हैं और कोई मुक्तासन और कोई गुप्तासन कहतेहैं अर्थात् इस सिद्धासनके ही ये भी नाम हैं और आसनके जो भली प्रकार ज्ञाता है वे इन चारों आसनोंमें यह भेद (फरक ) कहते हैं जिसमें वाम पादकी प्रथमः] संस्कृवटीका-भाषाटीकासमेता। (२५) पाणिको लिंगके स्थानपर लगाकर और दक्षिणपादकी पाणि ( एडी) को लिंगके ऊपर रखकर स्थित हो वह सिद्धासन कहाता है और जहां वाम पाठिणको लिंगके स्थानमें और दक्षिण पादकी पाणिको लिंगके ऊपर लगाकर स्थिति करै वह वज्रासनभी कहाताहै अर्थात् इन दोमें भेद नहीं है और जहां दक्षिण और वाम पादकी दोनों पार्णियोंको ऊपर नीचे मिलाकर योनिके स्थानमें लगाकर स्थितहै वह मुक्तासन कहाताहै और जहां पूर्वोक्त रीतिसे मिलाई दोनों पार्णियोंको लिंगसे ऊपर रखकर स्थित हो वह गुप्तासन कहाता है ।। ३७ ।। अथ सप्तभिः श्लोकैः सिद्धासनं प्रशंसति- यमेष्विव मिताहारमहिंसां नियमष्विव । मुख्यं सर्वासनेष्वेकं सिद्धाः सिद्धासनं विदुः॥ ३८ ॥ यमेष्विति ॥ यमेषु मिताहारामिव । मिताहारो वक्ष्यमाणः 'सुस्निग्धमधुराहारः' इत्यादिना । नियमेषु अहिंसामिव सर्वाणि यान्यासनानि तेषु सिद्धाः एकं सिद्धासनं मुख्यं विदुरिति सम्बन्धः ॥ ३८ ॥ अब सात श्लोकोंसे सिद्धासनकी प्रशंसा करते हैं कि, जैसे दश प्रकारके यमोंमें प्रमित भोजन मुख्य है और नियमोंमें अहिंसा मुख्य है इसी प्रकार संपूर्ण आसनोंमें सिद्धासन सिद्धोंने मुख्य कहाहै और प्रमित भोजन इस वचनसे कहेंगे कि, भली प्रकार स्निग्ध (चिकना) और मधुर आदि जो भोजन वह मिताहार कहाता है ॥ ३८॥ चतुरशीतिपीठेषु सिद्धमेव सदाऽभ्यसेत् । द्वासप्ततिसहस्राणां नाडीनां मलशोधनम् ॥ ३९ ॥ चतुरशीतीति ॥ चतुरधिकाशीतिसंख्याकानि यानि पीठानि तेषु सिद्धमेव सिद्धासनमेव सदा सर्वदाऽभ्यसेत् । सिद्धासनस्य सदाऽभ्यासे हेतुगर्भ विशेषणम् । द्वास- प्रतिसहस्राणां नाडीनां मलशोधनं शोधकम् ।। ३९ ॥ चौरासी जो आसन हैं उनमें सदैव सिद्धासनका अभ्यास करै क्योंकि यह आसन बहत्तर हजार नाडियोंके मलोंका शोधक है ॥ ३९ ॥ आत्मध्यायी मिताहारी यावद्वादशवत्सरम् । सदा सिद्धासनाभ्यासाद्योगी निष्पत्तिमाप्नुयात् ॥ ४० ॥ आत्मध्यायीति ॥ आत्मानं ध्यायतीत्यात्मध्यायी मित आहारोऽस्यास्तीति मिताहारी यावन्तो द्वादश वत्सराः यावद्द्वादशवत्सरम् । ' यावदवधारणे' इत्यव्ययी- भावः समासः । द्वादशवत्सरपर्यंतमित्यर्थः । सदा सर्वदा सिद्धासनस्याभ्यासाद्योगी योगाभ्यासी निष्पत्तिं योगसिद्धिमाप्नुयात्प्राप्नुयात् । योगान्तराभ्यासमंतरेण सिद्धा- सनाभ्यासमात्रेण सिद्धि प्राप्नुयादित्यर्थः ॥ ४० ॥ ।
(२६)
हठयोगप्रदीपिका ।
[ उपदेश:-
आत्माके ध्यानका कर्ता और मिताहारी होकर द्वादशवर्ष पर्यंत सदैव सिद्धासनके अभ्यास
करनेसे योगी योगकी सिद्धिको प्राप्त होता है अर्थात् अन्ययोगोंके अभ्यासके विनाही केवल
सिद्धासनकेही अभ्याससे सिद्धिको प्राप्त होता है ।। ४० ॥
किमन्यैर्बहुभिः पीठैः सिद्धे सिद्धासने सति ।
प्राणानिले सावधाने बद्धे केवलकुम्भके ॥४१॥
किमन्यरिति ॥ सिद्धासने सिद्ध सत्यन्यैर्बहुभिः पीठैरासनैः किम् ? न किमपी-
त्यर्थः । सावधाने प्राणानिले प्राणवायौ केवलकुंभके बद्धे सति ॥ ४१ ॥
सिद्धासनके सिद्ध होनेपर अन्य बहुतसे आसनोंसे क्या फल है ? अर्थात् कुछ नहीं है और
इस सिद्धासनसे सावधान प्राणवायुके केवल कुंभक प्राणायाम बँधनेपर अन्य सब आसन
वृथा समझने ॥ ४१ ॥
उत्पद्यते निरायासात्स्वयमेवोन्मनी कला।
तथैकस्मिन्नेव दृढे सिद्ध सिद्धासने सति ॥
बन्धत्रयमनायासात्स्वयमेवोपजायते॥४२॥
उत्पद्यत इति।।उन्मनी उन्मन्यवस्था सा कलेवाह्लादकत्वाच्चन्द्रलेखेव निरायासा-
दनायासात्स्वयमेवोत्पद्यत उदोत । तथेति । तथोक्तप्रकारेणैकस्मिन्नेव सिद्धे दृढे बद्ध
सति बन्धत्रयं मूलबन्धोड्डीयानबन्धजालन्धरबन्धरूपमनायासात् पार्णिमार्गेण सम्पीड्य
योनिमाकुंचयेद् गुदम् ' इत्यादिवक्ष्यमाणमूलबन्धादिष्वायासस्तं विनैव स्वयमेवोप-
जायते स्वत एवोत्पद्यत इत्यर्थः ॥ ४२ ॥
और इस सिद्धासनके प्रतापसेही चंद्रमाकी कलाके समान उन्मनी कला विना परिश्रम
उत्पन्न होजाती है और तिसी प्रकार एक दृढ सिद्धासनके सिद्ध होनेपर मूलबंध उड्डीयानबंध
जालंधरबंधरूप तीनों बंध विनाश्रम स्वयंही होजाते हैं अर्थात् पाणिके मार्गसे योनि (लिंग) को
भली प्रकार दबाकर गुदाका संकोच करै इत्यादि वचनोंसे जो मूलबंध आदिमें परिश्रम कह
है उसके किये बिनाही तीनों बंध सिद्ध होजाते हैं ॥ ४२ ॥
नासनं सिद्धसदृशं न कुंभः केवलोपमः।
न खेचरीसमा मुद्रा न नादसदृशो लयः ॥४३॥
नासनमिति ॥ सिद्धेन सिद्धासनेन सदृशमासनम् । नास्तीति शेषः । केवलेन
केवलकुम्भकेनोपमीयत इति केवलोपमः कुम्भः कुम्भको नास्ति । खेचरीमुद्रासमा
मुद्रा नास्ति । नादसदृशो लयो लयहेतुर्नास्ति ॥ ४३ ॥
सिद्धासनके समान अन्य आसन नहीं है. और केवल कुंभकके समान कुंभक नहीं है और
खेचरीमुद्राके समान मुद्रा नहीं है और नादके समान अन्य ब्रह्ममें लयका हेतु नहीं है ॥४३॥
प्रथमः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
(२७)
अथ पद्मासनं वक्तुमुपक्रमते-
वामोरूपरि दक्षिणं च चरणं संस्थाप्य वामं तथा
दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् ।
अङ्गुष्टौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकये
देतद्व्याधिविनाशकारि यमिनां पद्मासनं प्रोच्यते ॥४४॥
पद्मासनमाह-वामोरूपरीति ॥ वामो य उरुस्तस्योपरि दक्षिणम् । चकारः
पादपूरणे । संस्थाप्य सम्यगुत्तानं स्थापयित्वा वामं सव्यं चरणं तथा दक्षिणचरणव-
दक्षो दक्षिणो य ऊरुस्तस्योपरि संस्थाप्य पश्चिमेन भागेन पृष्ठभागेनेति । विधिविधानं
करयोरित्यर्थात्। तेन कराभ्यां हस्ताभ्यां दृढं यथा स्यात्तथा पादांगुष्ठौ धृत्वा गृहीत्वा ।
दक्षिणं करं पृष्ठतः कृत्वा । वामोरुस्थितदक्षिणचरणाङ्गुष्ठं गृहीत्वा वामकरं पृष्ठतः
कृत्वा । दक्षिणोरुस्थितवामचरणांगुष्ठं गृहीत्वेत्यर्थः । हृदये हृदयसमीपे । सामीपि.
कांधारे सप्तमी। चिबुकं हनुं निधायोरसश्चतुरकुलांतरे चिबुकं निधायोति रहस्यम् ।
नासायं नासिकाग्रमालोकयेत्पश्येद्यत्रैतद्यमिनां योगिनां व्याधेविनाशं करोतीति व्याधि-
विनाशकारि पद्मासनमेतन्नामकं प्रोच्यते, सिद्धैरिति शेषः ॥ ४४ ॥
अब पद्मासनको कहते हैं कि, वाम जंघाके ऊपर सीधे दक्षिण चरणको भली प्रकार
स्थापन करके और तिसी प्रकार सीधे वाम चरणको दक्षिण जंघाके ऊपर भली प्रकार स्थापन
करके और पृष्ठभागसे जो विधि उससे दोनों हाथोंसे दृढ रीति चरणोंके अँगूठोंको ग्रहण
(पकड) कर अर्थात् पृष्ठपर किये दक्षिणहाथसे वाम जंघापर स्थित दक्षिण वाम चरणके अंगूठेको
हण करके और पृष्ठपर किये वाम हाथसे दक्षिण जंघापर स्थित वाम चरणके अँगूठेको ग्रहण
करके और हृदयके समीप चार अंगुलके अंतर चिबुक (हनु वा ठोडी) रखकर अपनी
नासिकाके अग्रभागको देखता रहै अर्थात् ऐसी स्थिति जिसमें हो यह योगियोंकी संपूर्ण व्याधि-
योंका विनाशकारक पद्मासन सिद्धोंने कहा है अर्थात् इस आसनके लगानेसे संपूर्ण व्याधि
नष्ट होती हैं ॥४४॥
मत्स्येन्द्रनाथाभिमतं पद्मासनमाह-
उत्तानौ चरणौ कृत्वा उरुसंस्थौ प्रयत्नतः।
ऊरुमध्ये तथोत्तानो पाणी कृत्वा ततो दृशौ ॥१५॥
उत्तानाविति ॥ उत्तानौ उरुसंलग्नपृष्ठभागौ चरणौ पादौ प्रयत्नतः प्रकृष्टाद्
यत्नादूरसंस्थावूर्वोः सम्यक तिष्ठत इत्यूरुसंस्थौ तादृशौ कृत्वा । उर्वोर्मध्ये उरुमध्ये।
तथा चार्थे । पाणी करावृत्तानौ कृत्वा । ऊरुसंस्थोत्तानपादोभयपाणिसंलग्नपृष्ठं
सव्यं पाणिमुत्तानं कृत्वा तदुपरि दक्षिणं पाणिं चोत्तानं कृत्वेत्यर्थः । ततस्तदनंतरम् ।
दृशौ दृष्टी ॥ ४५ ॥
(२८)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेशः-
MIMIN
अब मत्स्येंद्रनाथके कहे पद्मासनको कहते हैं कि, उत्तान चरणोंको बडे यत्नसे जंघाओं-
पर स्थित करके अर्थात् जंघाओंपर लगा है पृष्ठभाग जिनका ऐसे चरणोंको उत्तम यत्नसे
जंघाओंपर स्थित करके और जंघाओंके मध्यमें उत्तान (सीधे) हाथोंको रखकर, तात्पर्य यह
है कि, जंघाओंपर स्थित जो चरणोंकी दोनों पाणि उसमें लगा ह पृष्ठभाग जिसका ऐसे
वामहाथको उत्तान करके और उसके ऊपर दक्षिण पार्णिको उत्तान करके और फिर दृष्टि
(नेत्रों) को ॥४५॥
नासाग्रे विन्यसेदाजदन्तमूले तु जिह्वया
उत्तम्भ्य चिबुकं वक्षस्युत्थाप्य पवनं शनैः॥४६॥
नासाग्र इति ॥ नासाग्रे नासिकाग्रे विन्यसेद्विशेषेण निश्चलतया न्यसेदित्यर्थः ॥
राजदंतानां दंष्ट्राणां सव्यदक्षिणभागे स्थितानां मूले उभे मूलस्थाने जिह्वया उत्तभ्य
ऊर्ध्वं स्तंभयित्वा । गुरुमुखादवगंतव्योऽयं जिह्वाबंधः। चिबुकं वक्षसि निधायोति शेषः ।
शनैमैदमन्दं पवनं वायुमुत्थाप्य । अनेन मूलबंधः प्रोक्तः। मूलबंधोऽपि गुरुमुखादेवा-
वगन्तव्यः। वस्तुतस्तु जिवाबंधेनैवायं चरितार्थ इति हठरहस्यविदः ॥ ४६ ॥
अपनी नासिकाके अग्रभागमें निश्चलरूपसे लगा दे और राजदन्तों (दाढ) के मूलाको
जिह्वासे ऊपर स्तंभन (थांभना) करके और चिबुकको वक्षस्थलपर रखकर यह जिह्वाका
बंधन गुरुके मुखसे जानने योग्य है और शनैः २ पवनको उठाकर इससे मूलबंध कहा है यह
भी गुरुके मुखसेही जानने योग्य है, हठरहस्य (सिद्धांत वा तत्त्व) के ज्ञाता तो यह कहते हैं
कि, जिह्वाके बन्धसेही मूलबंध होसकता ह ॥ ४६॥
इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधिविनाशनम् ।
दुर्लभं येन केनापि धीमता लभ्यते भुवि ॥४७॥
इदमिति ॥ एवं यत्रास्यते तदिदं पद्मासनं पद्मासनाभिधानं प्रोक्तम् । आसनई-
रिति शेषः । कीदृशं सर्वेषां व्याधीनां विशेषेण नाशनं येनकेनापि भाग्यहीनेन
दुर्लभम् । धीमता भुवि भूमौ लभ्यते प्राप्यते ॥ ४७ ॥
इस पूर्वोक्त प्रकारसे आसन लगाकर जहां बैठे वह संपूर्ण व्याधियोंका नाशक योगिजनोंने
पद्मासन कहा है और दुर्लभ आसन जिस किसी बुद्धिमान् मनुष्योंको पृथिवीमें मिलता है
अर्थात् विरलाही कोई इसको जानता है अथवा जिस किसी मूर्खको दुर्लभ है और बुद्धि-
मान्को ता भूमिक विष मिल सकता ह ॥ ४७ ।।
एतच्च महायोगिसंमतमिति स्पष्टयितुमन्यदपि पद्मासने कृत्यविशेषमाह-
कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बद्धा तु पद्मासनं
गाढं वक्षसि सन्निधाय चिबुकं घ्यायंश्च तच्चेतसि ।
वारंवारमपानमूर्वमनिलं प्रोत्सारयन्पूरितं
न्यञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रभावानरः॥१८॥
PRASTAHyari प्रथमः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता । (२९ कृत्वेति ॥ सम्पुटितौ सम्पुटीकृतौ करावुत्संगस्थाविति शेषः। दृढतमतिशयन दृढं सुस्थिरं पद्मासनं बदध्वा कृत्वेत्यर्थः । चिबुकं हनुं गाढं दृढं यथा स्यात्तथा वक्षास वक्षःसमीपे सन्निहितं कृत्वा चतुरंगुलान्तरेणेति योगिसम्प्रदायाज्ज्ञेयम् । जालन्धरबन्धं कृत्वेत्यर्थः। तत्स्वस्वेष्टदेवतारूपं ब्रह्म वा । 'ओतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः इति भगवदुक्तेः। चेतसि चित्ते ध्यायन् चिन्तयन् । अपानमनिलम् अपानवायुम् ऊर्व प्रोत्सारयन्मूलबन्धं कृत्वा सुषुम्नामार्गेण प्राणमूर्ध्वं नयन पूरितं पूरकेण अन्तर्धारित प्राणं न्यञ्चन्नीचैरधोऽञ्चन् गमयन् । अन्तर्भावितण्यर्थेऽश्चतिः। प्राणापानयोक्यं कृत्वे- त्यर्थः । नरः पुमानतुलं बोधं निरुपमज्ञानं शक्तिप्रभावाच्छक्तिराधारशक्तिः कुण्ड- लिनी तस्याः प्रभावात्सामर्थ्यादुपैति प्राप्नोति । प्राणापानयोरैक्ये कुण्डलिनीबोधो भवति । कुण्डलिनीबोधे सुषुम्नामार्गेण प्राणो ब्रह्मरन्ध्र गच्छति । तत्र गते चित्तस्थैर्य भवति । चित्तस्थैर्य संयमादात्मसाक्षात्कारो भवतीत्यर्थः॥४८॥ यह पद्मासन बडे २ योगियोंको संमत है इस बातको स्पष्ट करते हुये ग्रंथकार पद्मासन के विषे अन्य भी कृत्यको कहते हैं कि, दोनों हाथोंको संपुटित करके उत्संग ( गोदी ) में स्थित करके और दृढ रीतिसे पद्मासनको बाँधकर और चिबुकको दृढ रीतिसे वक्षःस्थलके समीप करके यह चार अंतुलका अंतर योगियोंकी संप्रदायसे जानना अर्थात् इस पूर्वोक्त प्रकारसे जालंधरबंधको करके उस २ अपने इष्टदेव वा ब्रह्मका चित्तके विषे वारंवार ध्यान करता हुआ योगी ओं तत् सत् यह तीन प्रकारका ब्रह्मनिर्देश (रूप) कहाहै क्योंकि यह भगवान्ने गीतामें कहा है । अपानवायुको ऊपरको प्रोत्सारित (चढाता) करता और मूलबंधको करके सुषु- नाके मार्गसे प्राणवायुको ऊपरको ( चढाता ) हुआ और पूरित किये अर्थात् पूरक प्राणाया- मसे अंतर्धारण किये गमन करता हुआ अर्थात् प्राण और अपानकी एकताको करके मनुष्य शक्ति ( आधारशक्ति कुंडलिनी) के प्रभावसे सर्वोत्तम ज्ञानको प्राप्त होता है अर्थात् प्राण अपानकी एकताके होनेसे कुंडलिनीका बोध (प्रकाश) होता है कुंडलिनीका बोध होनेपर सुषुम्नाके मार्गसे प्राण ब्रह्मरंध्रमें प्राप्त होजाता है और उसमें जानेसे चित्तकी स्थिरता होजाती है, चित्तकी स्थिरता होनेपर संयमसे आत्माका साक्षात्कार होता है अर्थात् आत्मज्ञान होजाता है । भावार्थ यह है कि, दोनों हाथ संपुटित और भली प्रकार दृढ पद्मासन लगाया और अपने वक्षःस्थलपर चिबुकको लगाकर और चित्तमें वारंवार इष्टदेवका ध्यान करता हुआ और अपानवायुको ऊपरको पहुँचता और पूरित किये प्राणवायुको नीचेको करता हुआ मनुष्य शक्तिके प्रभावसे उत्तम ज्ञानको प्राप्त होताहै ॥ ४८॥ पद्मासने स्थितो योगी नाडीद्वारेण पूरितम् । मारुतं धारयेद्यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ॥ १९॥ पद्मासन इति ॥ पद्मासने स्थितो योगी योगाभ्यासी पूरितं पूरकेणान्नीतं मारुतं वायुं सुषुम्नामार्गेण मूर्धानम् । नीत्वोत शेषः। धारयेत् स्थिरीकुर्यात्स मुक्तः । अत्र संशयो नास्तीत्यन्वयः ॥ ४९ ॥ प्राणवायुको नीचे
-
(३०)
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेशः-
पद्मासनमें स्थित यागका अभ्यासी नाडीके द्वारा पूरित अर्थात् पूरकमें अंतर्गत (मध्यमें )
किये वायुको सुषुम्नाके मार्गसे मस्तकपर्यंत पहुँचाकर जो स्थिर करै वह मुक्त है इसमें संशय
नहीं है ।। ४९ ॥
अथ सिंहासनमाह-
गुल्फी च वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत् ।
दक्षिणे सव्यगुल्फं तु दक्षगुल्फं सव्यके ॥५०॥
गुल्फो चेति ॥ वृषणस्याधः अधोभागे सीवन्याः पार्श्वयोः सीवन्या उभय-
भागयोः क्षिपेत् प्रेरयेत् स्थापयेदिति यावत् । गुल्फस्थापनप्रकारमेवाह-दक्षिण इति ।
सीवन्याः दक्षिणे भागे सव्यगुल्फ स्थापयेत् । सव्यके सीवन्याः सव्यभागे दक्षिण-
गुल्फ स्थापयेत् ॥ ५० ॥
अब सिंहासनका वर्णन करते हैं कि, वृषणों ( अंडकोष ) के नीचे सीवनी नाडीके दोनों
पार्श्वभागोंमें गुल्फोंको लगावे और दक्षिण पार्श्वमें वाम गुल्फको और वाम पार्श्वमें दक्षिण
गुल्फको लगावै ॥५०॥
हस्तौ तु जान्वोः संस्थाप्य स्वांगुलीः संप्रसार्य च ।
व्यात्तवको निरीक्षेत नासाग्रं सुसमाहितः॥५१॥
हस्ताविति ॥ जान्वोरुपरि हस्तौ तु संस्थाप्य सम्यक् जानुसंलग्नतलौ यथा
स्यातां तथा स्थापयित्वा । स्वांगुलीः हस्तांगुली संप्रसार्य सम्यक् प्रसारयित्वा ।
व्यात्तवक्रः संप्रसारितललजिह्वमुखः सुसमाहितः एकाग्रचित्तः नासाग्रं नासिकाग्रं
यस्मिनिरीक्षेत ॥ ५१॥
और जानुओंके ऊपर हाथोंके तलोंको भली प्रकार लगाकर और अपने हाथोंकी अंगुलि-
योंको प्रसारित करके अर्थात् फैलाकर-चंचल है जिह्वा जिसमें ऐसे मुखको वा (खोल) कर
भलीप्रकार सावधान हुआ मनुष्य अपनी नासिकाके अग्रभागको देखे ॥५१॥
सिंहासनं भवेदेतत्पूजितं योगिपुंगवः।
बंधत्रितयसंधानं कुरुते चासनोत्तमम् ॥५२॥
सिंहासनमिति ॥ एतत्सिंहासनं भवेत् । कीदृशं योगिपुङ्गवैः योगिश्रेष्ठैः पूजितं
प्रस्तुतमासनेषूत्तमं सिंहासनं बन्धानां मूलबन्धादीनां त्रितयं तस्य सन्धानं सन्नि-
पानं कुरुते ॥ ५२॥
योगियोंमें जो श्रेष्ठ उनका पूजित यह सिंहासन होता है और संपूर्ण आसनोंमें उत्तम यः
भासन मूलबंध आदि तीनों बंधोंके संधान (संनिधान वा प्रकट ) को करता है ॥ ५२ ।।
अथ भद्रासनमाह-
गुल्फो च वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत् ।
सव्यगुल्फं तथा सव्ये दक्षगुल्फं तु दक्षिणे ॥५३॥
प्रथमः ] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। गुल्फाविति ॥ वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः सीवन्या उभयतः । गुल्फो पाद- ग्रन्थी क्षिपेत् । क्षेपणप्रकारमेवाह-सव्यगुल्फमिति । सव्ये सीवन्याः पार्थे सव्यगुल्फं क्षिपेत् । तथा पादपूरणे । दक्षगुल्फं तु दक्षिणे सीवन्याः पाश्चे क्षिपेत् ॥ ५३ ॥ अब भद्रासनका वर्णन करते हैं कि, वृषणोंके नीचे सीवनीके दोनों पार्श्वभागोंमें इस प्रकार गुल्फोंको रक्खै कि, वामगुल्फको सीवनीक वामपार्श्वमें और दक्षिणगुल्फको दक्षिणपार्श्वमें लगाकर स्थित करै ॥५३॥ पार्श्वपादौ च पाणिभ्यां दृढं बद्धा सुनिश्चलम् । भद्रासनं भवेदेतत्सर्वव्याधिविनाशनम् ॥ ५४॥ पार्श्वपादाविति ॥ पार्श्वपादौ च पार्श्वसमीपगतौ पादौ पाणिभ्यां भुजाभ्यां दृढं बद्ध्वा । परस्परसंलग्नाङ्गुलिभ्यामुदरसंलग्नतलाभ्यां पाणिभ्यां बद्ध्वेत्यर्थः एतद्भद्रासनं भवेत् । कीदृशं सर्वेषां व्याधीनां विशेषेण नाशनम् ॥ ५४॥ और सीवनीके पार्श्वभागोंके समीपमें गये पादोंको भुजाओंसे दृढ बांधकर अर्थात् परस्पर मिलीहुई जिनकी अंगुली हों और जिनका तल हृदयपर लगा हो ऐसे हाथोंसे निश्चल रीतिसे थामकर जिसमें स्थित हो संपूर्ण व्याधियोंका नाशक वह भद्रासन होता है । ५४ ॥ गोरक्षासनमित्याहुरिदं वै सिद्धयोगिनः । एवमासनबन्धेषु योगीन्द्रो विगतश्रमः॥५५॥ गोरक्षेति ॥ सिद्धाश्च ते योगिनश्रसिद्धयोगिनः इदं भद्रासनं गोरक्षासनमित्याहुः । गोरक्षण प्रायशोऽभ्यस्तत्वाद्गोरक्षासनमिति वदन्ति । आसनान्युक्तानि । तेषु यत् कर्तव्यं तदाह-एवमिति । एवमुक्तेष्वासनबन्धेषु बन्धनप्रकारेषु विगतः श्रमो यस्य स विगतश्रमः आसनानां बन्धेषु श्रमरहितः । योगिनामिन्द्रो योगीन्द्रः ॥ ५५ ॥ और सिद्ध जो योगी हैं वे इसकोही गोरक्षासन कहते हैं अर्थात् पूर्वोक्त गोरक्षनाथने प्रायः इसका अभ्यास किया है इससे इसको गोरक्षासन कहते हैं । आसनोंको कहकर उनके कर्त- व्यको कहते हैं कि, इसप्रकार आसनोंके बांध में विगत (नष्ट) है श्रम जिसका ऐसा योगीन्द्र श्रेष्ठ योगी)॥ ५५॥ अभ्यसेनाडिकाशुद्धिं मुद्रादिपवनक्रियाम् । आसनं कुम्भकं चित्रं मुद्राख्यं करणं तथा ॥५६॥ अभ्यसेदिति ॥ नाडिकानां नाडीनां शुद्धिम् । 'प्राणं चेदिडया पिवेनियमि- तम् ' इति वक्ष्यमाणरूपा मुद्रा आदिर्यस्याः सूर्यभेदादेस्तादृशीम् । पवनस्य प्राण- वायोः क्रियां प्राणायामरूपां चाभ्यसेत् । अथ हठाभ्यसनक्रममाह-आसनमिति । आसनमुक्तलक्षणं चित्रं नानाविधं कुंभकं 'सूर्यभेदनमुज्जापी ' इत्यादिवक्ष्यमाणम् । मुद्रा इत्याख्या यस्य तन्मुद्राख्यं महामुद्रादिरूपकरणं हठसिद्धौ प्रकृष्टोपकारकम् । तथा चार्थे ॥ १६ ॥ - (३२) हठयोगमदीपिका। [ उपदेशः- नाडियोंकी शुद्धिकी अभिलाषी और नियमित ( रुके ) प्राणको इडा नामकी नाडीसे पीवै, आगे कही हुई यह मुद्रा है आदिमें जिसके ऐसी प्राणवायुकी क्रिया (प्राणायाम ) का अभ्यास करै। अब हठाभ्यासके क्रमको कहते हैं कि, पूर्वोक्त आसन और चित्र(नानाप्रकारका) कुम्भक प्राणायाम और मुद्रा है नाम जिसका ऐसा करण ये हठ सिद्धिमें प्रकृष्ट (उत्तम) उप- कारी है । इस श्लोकमें तथाशब्द चशब्दके अर्थमें है ॥५६॥ अथ नादानुसन्धानमभ्यासानुक्रमो हठे। ब्रह्मचारी मिताहारी त्यागी योगपरायणः। अब्दादूर्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥१७॥ अथेति ॥ अर्थतन्त्रयानुष्ठानानन्तरं नादस्यानाहतध्वनेरनुसन्धानमनुचिन्तनं हठे हठयोगेऽभ्यासोऽभ्यसनं तस्यानुक्रमः पौर्वापर्यक्रमः । हठसिद्धेवधिमाह-ब्रह्मचारीति। ब्रह्मचर्यवान् मिताहारो वक्ष्यमाणः सोऽस्यास्तीति मिताहारी। त्यागी दानशीलो विषय- परित्यागी वा योगपरायणः योगाभ्यसनपरः । अन्दावर्षादूर्व सिद्धः सिद्ध हठो भवेत् । अत्रोक्तेऽर्थे विचारणा स्यान्न वोत संशयप्रयुक्ता न कार्या एतनिश्चितमेवेत्यर्थः ॥५७॥ इन पूर्वोक्त आसन आदि तीनोंके करनेके अनंतर नादका अनुसंधान ( चिंतन ) अर्थात् कानोंको दवाकर जो अनाहत ताडनाके विना ध्वनि सदैव अन्तः होती रहती है उसका विचार, यह संपूर्ण हठयोगमें अभ्यासका क्रम है अर्थात् इस क्रमसे हठयोगका अभ्यास करे । अब हठयोगकी सिद्धिकी अवधिको कहते हैं कि, ब्रह्मचारी और प्रभित भोजी त्यागी ( दानी वा विषयोंका त्यागी) योगमें परायण ( योगका अभ्यासी ) मनुष्य एक वर्षके अनंतर सिद्ध होजाता है इसमें यह विचार नहीं करना कि होगा वा न होगा अर्थात् निश्चयसे सिद्ध होजाता है ।। ५७ ॥ पूर्वश्लोके मिताहारीत्युक्तं तत्र योगिनां कीशो मिताहार इत्यपेक्षायामाह- सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थांशविवर्जितः। भुज्यते शिवसम्प्रीत्यै मिताहारः स उच्यते ॥५८॥ सुस्निग्धेति ॥ सुस्निग्धोऽतिस्निग्धः स चासौ मधुरश्च तादृश आहारश्चतुर्थांश- विवर्जितश्चतुर्थभागरहितः । तदुक्तमभियुक्तैः-दौ भागौ पूरयेदन्नस्तोयनकं प्रपूर- येत् । वायोः सञ्चरणार्थाय चतुर्थमवशेषयेत् ' इति । शिवो जीव ईश्वरो वा । 'भोक्ता देवो महेश्वरः' इति वचनात् । तस्य संप्रीत्यै सम्यकू प्रीत्यर्थ यो भुज्यते स मिता- हार इत्युच्यते ॥ ५८॥ पूर्व श्लोकमें जो मिताहारी कहा है उसके लिये योगियों के मिताहारको कहते हैं कि, भलो प्रकार निग्ध (चिकना ) और मधुर जो आहार वह चतुर्थाशसे रहित जिस भोजनमें शिवजी ( जीव वा ईश्वर ) के प्रीतिके अर्थ भक्षण किया जाय वह मिताहार कहाता है, सोई इस वचनसे पंडितोंने कहा है कि, उदरके दो भाग अन्नसे पूर्ण कर (भरै) और एक भागको - प्रथमः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (३३) जलसे पूर्ण कर और चौथे भागको प्राणवायुके चलनेके लिये शेष रक्खे और देव जो महेश्वर वह भोक्ता है देह नहीं ।। ५८ ॥ अथ योगिनामपथ्यमाह द्वाभ्याम्- कट्सम्लतीक्ष्णलवणोष्णहरीतशाकसौवीरतैलतिलसर्षप- मद्यमत्स्यान् । आजादिमांसदधितक्रकुलत्थकोल पिण्याकहिंगुलशुनावमपथ्यमाहुः ॥९॥ कविति ॥ कटु कारवेल्ल इत्यादि, अम्लं चिंचाफलादि तीक्ष्णं मरीचादि लवणं प्रसिद्धम् उष्णं गुडादि हरीतशाकं पत्रशाकं सौवीरं कालिकं तैलं तिलसर्षपादिस्नेहः तिलाः प्रसिद्धाः सर्षपाः सिद्धार्थाः मद्यं सुरा मत्स्यो झपः । एषामितरेतरद्वन्दः । एतानपथ्यानाहुः । अजस्येदमाजं तदादिर्यस्य सौकरादेस्तदाजादि तच्च तन्मांसं चाजा- दिमांसं दधि दुग्धपरिणामाविशेषः तक्रं गृहीतसारं दधि कुलत्थादिदिलविशेषः कोलं कोल्याः फलं बदरम् । 'ककधूर्वदरी कोलिः' इत्यमरः । पिण्याकं तिलपिण्डं हिंगु रामठं लशुनम् । एषामितरेतरद्वन्दः । एतान्यायानि यस्य तत्तथा । आद्यशब्देन पलाण्डुगृञ्जनमादकद्रव्यमाषान्नादिकं ग्राह्यम् । अपथ्यमहितम् । योगिनामिति शेषः। आहुयॊगिन इत्यध्याहारः ॥ १९ ॥ अब दो श्लोकोंसे योगियोंके अपथ्यको कहते हैं कि, करेला आदि कटु और इमली आदि अम्ल (खट्टा) और मिर्च आदि तीक्ष्ण लवण और गुड आदि उष्ण और हरीतशाक (पत्तोंका शाक ) सौवीर ( कांजी) तैल तिल मदिरा मत्स्य इनको अपथ्य कहते हैं और अजा ( बकरा) आदिका मांस दही तक्र ( मठा) कुलथी कोल (बेर) पिण्याक (खल) हींग लहसन ये सब हैं आद्य ( पूर्व) जिनके ऐसे पलांडु (सलजम) गाजर मादकद्रव्य उडद ये सब योगीजनोंने योगियोंके अपथ्य कहे हैं ॥ ५९॥ भोजनमहितं विद्यात्पुनरस्योष्णीकृतं रूक्षम् । अतिलवणमम्लयुक्तं कदशनशाकोत्कटं वय॑म् ॥ ६०॥ । भोजनमिति ॥ पश्चादग्निसंयोगेनोष्णीकृतं यद्भोजनं सूपौदनरोटिकादि रूक्षं घृतादिहीनम् अतिशयितं लवणं यस्मिंस्तदतिलवणम् यद्वा लवणमतिक्रांतमतिलवणं चाकूवा इति लोके प्रसिद्ध शाकं यवक्षारादिकं च । लवणस्य सर्वथा वर्जनीयत्वा- दुत्तरपक्षः साधुः। तथा दत्तात्रेयः-'अथ वानिवक्ष्यामि योगविघ्नकराणि च । लवर्ण सर्षपं चाम्लमुग्रं तीक्ष्णं च रूक्षकम् ॥ अतीव भोजनं त्याज्यमतिनिद्रातिभाषणम् ।' इति ॥ स्कंदपुराणेऽपि-त्यजेत्कट्वम्ललवणं क्षीरभोजी सदा भवेत् ' इति । अम्ल- युक्तमम्लद्रव्येण युक्तम् । अम्लद्रव्येण युक्तमापि त्याज्यं किमुत साक्षादम्लम् । अत्र तृतीयपादं पललं वा तिलपिण्डमिति केचित्पठति। तस्यायमर्थः-पललं मांसं तिलपिंडं - ३ -- (३४) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- पिण्याकम् । कदशनं कदन्नं यावनालकोद्रवादि शाकं विहितेतरशाकमात्रम् । उत्कटं विदाहि मिरचीति लोके प्रसिद्धम् । मिरचा इति हिंदुस्थानभाषायाम् । कदशनादीनां समाहारद्वन्दः । अतिलवणादिकं वयं वर्जनार्हम् । दुष्टमिति पाठे दुष्टं पतिपर्युषि- तादि । अहितमिति योजनीयम् ॥ ६० ॥ और इस योगीको ये भोजन अहित हैं कि अग्निके संयोगसे पुनः (दुबारा) उष्ण किया जो दाल चावल आदि और रूखा अर्थात् घृत आदिसे रहित जिसमें अधिक लवण हो वा जो लवणका भी अवलम्बनकारी हो जैसे चाकूबा नामका शाक वा जौंका खार इन दोनों पक्षोंमें इससे उत्तरपक्ष श्रेष्ठ है, कि, लवण सर्वथा वर्जित है ।सोई दत्तात्रेयने कहा है कि, इसके अनंतर वर्जितोंको और इस योगमें विघ्नकारियोंको कहता हूं कि-लवण, सरसों, अम्ल, उग्र ( सौहां- जना) तीक्ष्ण रूखा अत्यन्त भोजन ये भोजन और अत्यन्त निद्रा और अत्यन्त भाषण ये त्याज्य हैं । स्कंदपुराणमें भी लिखा है कि, कटु, अम्ल, लवण इनको त्यागदे और सदैव दूधका भोजन करै । अम्लसे युक्त भी पदार्थ त्यागने योग्य हैं तो साक्षात् अम्ल क्योंन होगा। इसमें तीसरा पाद कोई यह पढते हैं कि 'पललं वा तिलपिंडं ' उसका यह अर्थ है कि, मांस और खलको वर्जदे और कुत्सित अन्न यावनाल कोदूआदि) और शास्त्रोक्तसे अन्य शाक और उत्कट (विदाही) जिससे उदर में जलन हो ऐसे मिर्च आदि ये सब अतिलवण आदि वर्जित हैं और वय॑ इसके स्थानमें 'दुष्टं यह पाठ होय तो वह दुष्ट पूति ( दुर्गधि) और पयुषित (बासी) आदिभी अहित है ।। ६० ।। एवं योगिनां सदा वान्युक्त्वाऽभ्यासकाले वान्याहार्धेन- वह्निस्त्रीपथिसेवानामादौ वर्जनमाचरेत् ॥ ६१ ॥ तथाहि गोरक्षवचनम्-“वर्जयेदुर्जनप्रान्तं वह्निस्त्रीपथिसेवनम् । प्रातःस्नानोपवासादि कायक्लेशविधि तथा ॥' वहीति ॥ वह्निश्च स्त्री च पंथाश्च तेषां सेवा वह्निसेवनस्त्रीसंगतीर्थयात्रागमनादि- रूपास्तासां वर्जनमादावभ्यासकाले आचरेत् । सिद्धेऽभ्यासे तु कदाचित् । शीते वह्निसेवनं गृहस्थस्य ऋतौ स्वभार्यागमनं तीर्थयात्रादौ मार्गगमनं च न निषिद्ध- मित्यादिपदेन सूच्यते । तत्र प्रमाणं गोरक्षवचनमवतारयति-तथाहीति । तत्पठति- वर्जयेदिति । दुर्जनप्रान्तं दुर्जनसमीपवासम् । दुर्जनप्रीतिमिति क्वचित्पाठः । वह्निस्त्री- पथिसेवनं व्याख्यातं प्रातःस्नानम् उपवासश्चादिर्यस्य फलाहारादेः तच्च तयोः समाहार- द्वन्दः। प्रथमाभ्यासिनः प्रातःस्नाने शीतविकारोत्पत्तेः । उपवासादिना पित्ताद्युत्पत्तेः। कायक्लेशविधि कायक्लेशकरं विधि क्रियां बहुसूर्यनमस्कारादिरूपां बहुभारोदहनादिरूपां च । तथा समुच्चये। अत्र प्रतिपदं वर्जयेदिति क्रियासम्बन्धः ॥ ६१ ।। इस प्रकार योगियोंको जो सदैव कालमें वर्जित हैं उनको कहकर योगके समयमें जो वर्जित है उनको कहते हैं कि, वह्नि स्त्री मार्ग इनकी सेवा अर्थात् आग्निकी सेवा स्त्रीसंग तीर्थयात्रा- "
AURIDIOHNNER
प्रथमः ]
।
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
गमन इनका वर्जन अभ्यासके समयमें करे और अभ्यासके सिद्ध होनेपर कदाचितही वर्जदे ।
शीतकालमें आग्निका सेवन गृहस्थको ऋतुके समय स्वभार्यागमन और तीर्थयात्रा आदिमें मार्ग-
गमन निषिद्ध नहीं है यह आदिपदसे सूचित किया। उसमें प्रमाणरूप गोरक्षका वचन कहते
हैं कि, दुर्जनके समीपका वास और कहीं यह पाठ है कि, दुर्जनके संग प्रीति और अग्नि
स्त्री मार्ग इनका सेवन और प्रातःकाल स्नान और उपवास आदि । यहां आदिपदसे फलाहार
और कायाके क्लेशकी विधिको अर्थात् अनेकवार सूर्यनमस्कार आदिको और अधिक भारका
लेजाना आदिको वर्जदे । इस श्लोकमें तथापद समुच्चयका बोधक है ॥ ६१ ॥
अथ योगिपथ्यमाह-
गोधूमशालियवषाष्टिकशोभनानं क्षीराज्यखण्डनवनीत-
सितामधूनि । शुण्ठीपटोलकफलादिकपञ्चशाकं मुगादि
दिव्यमुदकं च यमीन्द्रपथ्यम् ॥ १२॥
गोधूमेत्यादिना ॥ गोधूमाश्च शालयश्च यवाश्च षाष्टिकाः षष्ट्या दिनैये पच्यन्ते
तन्दुलविशेषास्ते शोभनमन्नं पवित्रान्नं श्यामाकनीवारादि तच्चैतेषां समाहारद्वन्द्वः।
क्षीरं दुग्धमाज्यं घृतं खण्डः शर्करा नवनीतं मथितदधिसारं सिता तीव्रपदी खण्ड-
शर्करेति लोके प्रसिद्धा । मिसरीति हिन्दुस्थानभाषायाम् । मधु क्षौद्रमेषामितरेतरद्वन्द्वः।
शुण्ठी प्रसिद्धा । पटोलफलं परवर इति भाषायां प्रसिद्ध शाकं तदादिर्यस्य कौशा-
तक्यादेस्तत्पटोलकफलादिकं “ शेषाद्विभाषा" इति कप्रत्ययः । पंचानां शाकानां
समाहारः पञ्चशाकम् । तदुक्तं वैद्यके-' सर्वशाकमचाक्षुष्यं चाक्षुष्यं शाकपञ्चकम् ।
जीवन्तीवास्तुमूल्याक्षीमेघनादपुनर्नवाः' ॥ इति । मुद्गाः द्विदलविशेषा आदिर्यस्य
तन्मुद्गादि आदिपदेन आढकी ग्राह्या । दिव्यं निर्दोषमुदकं जलम् । यम एषामस्तीति
यमिनः तेष्विन्द्रो देवश्रेष्ठो योगीन्द्रस्तस्य पथ्यं हितम् ॥ ६२॥
अब योगियोंको पथ्यका वर्णन करते हैं कि, गेहूँ शालि (चावल) जौ और पाष्टिक
(सांठी) और पवित्र अन्न ( श्यामाक नीवार आदि ) दूध घी खांड नौनी घी सिता
(मिसरी) मधु (सहत ) सोंठ पटोलफल ( परवल ) आदि, पांच शाक मूंग आदि,
आदि पदसे आढकी और दिव्य जल अर्थात् निर्दोष जल ये योगियोंमें जो इंद्र हैं उनके पथ्य
हैं। वैद्यकमें भी ये पांच शाक पथ्य कहे हैं कि, सम्पूर्ण शाक अचाक्षुप्य हैं अर्थात् नेत्रोंका
हितकारी नहीं हैं किन्तु ये पांच शाकही चाक्षुष्य हैं कि, जीवन्ती वास्तु (बथुवा) मूल्याक्षी
मेघनाद और पुनर्नवा ।। ६२ ।।
अथ योगिनो भोजननियममाह-
पुष्टं सुमधुरं स्निग्धं गव्यं धातुप्रपोषणम् ।
मनोभिलषितं योग्यं योगी भोजनमाचरेत् ॥ ६३॥
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेश:-
पुष्टमिति ॥ पुष्टं देहपुष्टिकरमोदनादि सुमधुरं शर्करादिसहितं स्निग्धं सघृतं गव्यं
गोदुग्धघृतादियुक्तं गव्याला माहिषं दुग्धादि ग्राह्यम् । धातुप्रपोषणं लड्डुका-
यूपादि मनोभिलषितं पुष्टादिषु यन्मनोरुचिकरं तदेव योगिनां भोक्तव्यम् । मनोभिल-
षितमपि किमविहितं भोक्तव्यम् ? नेत्याह-योग्यमिति । विहितमेवेत्यर्थः । योगी
भोजनं पूर्वोक्तविशेषणविशिष्टमाचरेत्कुर्यादित्यर्थः । न तु सक्तुभर्जितान्नादिना निर्वाह
कुर्यादिति भावः ॥ ६३ ॥
अब योगीके भोजनोंका नियम कहते हैं कि, · ओदन आदि देहपुष्टिकारक और शर्करा
आदि मधुर और घृतसहित भोजन और दुग्ध घृत आदि गव्य यदि गौके घृत आदि न मिलें
तो भैसके ग्रहण करने और धातुपोषक (लड्डू पूआ आदि) इनमें जो अपने मनको
वांछित हो उस योग्य अर्थात् शास्त्रविहित भोजनको योगी करै और सन्तु भुने अन्न आदिसे
निर्वाह न करै ॥ ६३ ॥
योगाभ्यासिनो वयोविशेषारोग्याद्यपेक्षा नास्तीत्याह-
युवा वृद्धोऽतिवृद्धो वा व्याधितो दुर्बलोऽपि वा।
अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति सर्वयोगेष्वतन्द्रितः ॥ ६४॥
युवेति ॥ युवा तरुणः वृद्धो वृद्धावस्था प्राप्तः अतिवृद्धोऽतिवाईकं गतो वा ।
अभ्यासादासनकुम्भकादीनामभ्यसनासिद्धिं समाधितत्फलरूपामाप्नोति । अभ्यास-
प्रकारमेव वदन्विशिनष्टि-सर्वयोगेष्विति । सर्वेषु योगेषु योगाङ्गेष्वतन्द्रितोऽनलसः
योगाङ्गाभ्यासात् सिद्धिमाप्नोतीत्यर्थः । जीवनसाधने कृषिवाणिज्यादौ जीवनशब्द-
प्रयोगवत्साक्षात्परंपरया वा योगसाधनेषु योगाङ्गेषु योगशब्दप्रयोगः ॥ ६४ ॥
अब इस बातका वर्णन करते हैं कि, योगके अभ्यासीको अवस्थाविशेष और दुर्बल आरोग्य
आदिकी अपेक्षा नहीं है कि, युवा हो वृद्ध वा अतिवृद्ध हो रोगी हो वा दुर्बल हो अभ्याससे
आसन कुम्भक आदिके करनेसे समाधि और उसके फलको प्राप्त होता है । अभ्यासके स्वरू-
पको कहते हैं कि, संपूर्ण जो योगके अंग उनमें आलस्य न करै, यहां योगके साधन योगा-
गोंमें इस प्रकार योगशब्दका प्रयोग है जैसे जीवनके साधन कृषि वाणिज्य आदिमें जीवन-
शब्दका प्रयोग होता है ॥ ६४॥
अभ्यासादेव सिद्धिर्भवतीति द्रढयन्नाह द्वाभ्याम्-
क्रियायुक्तस्य सिद्धिः स्यादक्रियस्य कथं भवेत् ।
न शास्त्रपाठमात्रेण योगसिद्धिःप्रजायते ॥६५॥
क्रियायुक्तस्येति ॥ क्रिया योगांगानुष्ठानरूपा तया युक्तस्य सिद्धियोगसिद्धिः
स्यात् । आक्रयस्य योगाङ्गानुष्ठानरहितस्य कथं भवेन्न कथमपीत्यर्थः । ननु योग-
शास्त्राध्ययनेन योगसिद्धिः स्यान्नेत्याह-नेति ॥ शास्त्रस्य योगशास्त्रस्य पाठमात्रेण
केवलेन पाठेन योगस्य सिद्धिर्न प्रजायते नैव जायत इत्यर्थः ॥ १५ ॥
प्रथमः]
-
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
अब अभ्याससे सिद्धि होती है इस बातको दृढ करनेके लिये दो श्लोकोंको कहते हैं कि,
योगांगोंके करनेमें जो युक्त उस पुरुषको योगसिद्धि होती है और जो योगांगोंको नहीं
करता उसको योगकी सिद्धि नहीं होती। कदाचित् कहो कि, योगशास्त्रके पढनेसे सिद्धि हो
जायगी. सो ठीक नहीं क्योंकि योगशास्त्रके केवल पढनेसे योगसिद्धि नहीं होती ॥ ६५ ॥
न वेषधारणं सिद्धःकारणं न च तत्कथा ।
क्रियैव कारणं सिद्धेः सत्यमेतन संशयः॥ ६६ ॥
नेति ॥ वेषस्य काषायवस्वादेः धारणं सिद्धोगसिद्धेः कारणं न । तस्य योगस्य
कथा वा कारणं न । किं तर्हि सिद्धेः कारणमित्यत आह-क्रियैवेति ॥ ६६ ॥
गेरुसे रंगे वस्त्र आदिका धारण सिद्धिका कारण नहीं और योगशास्त्रकी कथा भी सिद्धिका
कारण नहीं और सिद्धिका कारण तो क्रियाही है यह सत्य है इसमें संशय नहीं ।। ६६ ॥
योगाङ्गानुष्ठानस्यावधिमाह-
पीगनि कुंभकाश्चित्रा दिव्यानि करणानि च ।
सर्वाण्यपि हठाभ्यासे राजयोगफलावधि ॥६७॥
इति श्रीसहजानंदसंतानचिंतामणिस्वात्मारामयोगीन्द्रविरचितायां
हठयोगप्रदीपिकायामासनविधिकथनं नाम प्रथमोपदेशः ॥१॥
पीठानीति ॥पीठान्यासनानि चित्रा अनेकविधाः कुंभकाः सूर्यभेदादयः दिव्या-
न्युत्कृष्टानि करणानि महामुद्रादीनि, हटसिद्धौ प्रकृष्टोपकारकत्वं करणत्वं हठाभ्यासे
सर्वाणि पीठकुम्भककरणानि राजयोगफलावधि राजयोग एव फलं तदवधि तत्पर्यंत
कर्तव्यानीति शेषः ॥ ६७॥
इति श्रीहठयोगप्रदीपिकायां ब्रह्मानन्दकृतायां ज्योत्स्नाभिधायां
टीकायां प्रथमोपदेशः ॥ १॥
अब योगांगोंके करनेकी अवधिको कहते हैं कि, पूर्वोक्त आसन और अनेक प्रकारके
कुंभक आदि प्राणायाम महामुद्रा आदि दिव्य करण ये संपूर्ण हठयोगके अभ्यासमें राजयोगके
फलपर्यंत करने योग्य हैं अर्थात् ये राजयोगमें प्रकृष्ट उपकारक हैं क्योंकि प्रकृष्ट जो उपकारक
वही करण होता है ।। ६७ ॥
इति श्रीसहजानंदसंतानचिन्तामणिस्वात्मारामयोगीन्द्रविरचितहठयोगप्रदीपिकायां
लाँखग्रामनिवासि पं० मिहिरचंद्रकृतभाषाविवृतिसहितायामासनविधि
कथनं नाम प्रथमोपदेशः ॥१॥
(३८) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेश:- द्वितीयोपदेशः२ नि अथासनोपदेशानंतरं प्राणायामान्वक्तुमुपक्रमते- अथासने दृढे योगी वशी हितमिताशनः । गुरूपदिष्टमार्गेण प्राणायामान्समभ्यसेत् ॥१॥ अथेति ॥ अथेति मंगलार्थः । आसने दृढे सति वशी जिताक्षः हितं पथ्यं च तन्मितं च पूर्वोपदेशोक्तलक्षणं तत्तादृशमशनं यस्य स हितमिताशनः गुरुणोपदिष्टो यो मार्गः प्राणायामाभ्यासप्रकारस्तेन प्राणायामान् वक्ष्यमाणान्सम्यगुत्साहसाहस- धैर्यादिभिरभ्यसेत् । दृढे स्थिरे कुक्कुटादिविवर्जिते सिद्धासनादाविति वा योजना ॥१॥ आसनोंके उपदेशको कहकर प्राणायामोंके कहनेका प्रारंभ करते हैं । इस श्लोकमें अथ- शब्द मंगलके लिये है वा अनंतरका वाचक है। इसके अनंतर आसनोंकी दृढता होनेपर जीती हैं इन्द्रियें जिसने हित (पथ्य) और पूर्वोक्त प्रमित है भोजन जिसका ऐसा योगी गुरुके उप- देश किये मार्गसे आगे वर्णन किये प्राणायामोंका भलीग्रकार अभ्यास करै अर्थात उत्साह, साहस-धीरता आदिसे प्राणायामोंके करनेमें मतको लगावै ॥ १ ॥ प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते ' इति महदुक्तेः प्रयोजनाभावेन प्रवृत्त्य- भावात् प्राणायामप्रयोजनमाह- चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् । योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत् ॥२॥ चले वात इति ॥ वाते चले सति चित्तं चलं भवेत् । निश्चले वाते निश्चलं भवे- चित्तमित्यत्रापि सम्बन्ध्यते । वाते चित्ते च निश्चले योगी स्थाणुत्वं स्थिरदीर्घजीवित्व- मिति यावत् । ईशत्वं वाऽऽप्नोति । ततस्तस्मादायुं प्राणं निरोधयेत्कुम्भयेत् ॥ २ ॥ कदाचित् कहो कि, प्रयोजनके विना मंद भी प्रवृत्त नहीं होता इस महान् पुरुषोंके वच- नसे प्रयोजनके अभावसे प्राणायामों में योगीकी प्रवृत्ति नहीं होगी इसलिये प्राणायामोंका प्रयोजन कहते हैं कि, प्राणवायुके चलायमान होनेसे चित्तभी चलायमान होता है और प्राण- वायुके निश्चल होनेपर चित्त भी निश्चल होता है और प्राणवायु और चित्त इन दोनोंके निश्चल होनेपर योगी स्थाणुरूपको प्राप्त होता है अर्थात् स्थिर और दीर्घकालतक जीता है तिससे चोगी प्राणवायुका निरोध करै अर्थात् कुम्भकप्राणायामोंको करै ॥ २ ॥ यावद्वायुः स्थितो देहे तावजीवनमुच्यते । मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत् ॥ ३॥ यावदिति ॥ देहे शरीरे यावत्कालं वायुः प्राणः स्थितः तावत्कालपर्यन्तं जीवन- मुच्यते लोकैः । देहप्राणसंयोगस्यैव जीवनपदार्थत्वात् । तस्य प्राणस्य निष्क्रान्ति- देहाद्वियोगो मरणमुच्यते । ततस्तस्माद्वायुं निरोधयेत् ॥ ३ ॥ ।
सुषुम्नामार्गवाही नैव स्यात् । अपि तु शुद्धमलास्वेव मध्यगो भवतीत्यर्थः । उन्मनी- द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (३९) जबतक शरीरमें प्राणवायु स्थित है तबतकही जगत् जीवनको कहता है क्योंकि देह और प्राणका जो संयोग है वही जीवन कहाता है और उस प्राणवायुका जो देहसे वियोग (निक- सना) उसको ही मरण कहते हैं तिससे जीवनके लिये प्राणवायुके निरोध ( रोकना) रूप प्राणायामको करें ॥३॥ मलशुद्धेईठसिद्धिजनकत्वं व्यतिरेकेणाह- मलाकुलासु नाडीषु मारुतो नैव मध्यगः। कथं स्यादुन्मनीभावः कार्यसिद्धिः कथं भवेत् ॥ ४॥ मलाकुलास्विति ॥ नाडीषु मलैराकुलासु व्याप्तासु सतीषु मारुतः प्राणो मध्यगः - भाव उन्मन्या भावो भवनं कथं स्यान्न कथमपीत्यर्थः । कार्यस्य कैवल्यरूपस्य सिद्धि- निष्पत्तिः कथं भवेन्न कथंचिदपीत्यर्थः ॥ ४ ॥ अव मलकी शुद्धि हठयोगसिद्धिका जनक है इस बातको निषेवमुखसे वर्णन करते हैं कि, जबतक नाडी मलसे व्याकुल ( व्याप्त) है तबतक प्राण मध्यग नहीं हो सकता अर्थात् सुषुम्ना नाडीके मार्गसे नहीं चल सकता किन्तु मलशुद्धि होनेपर ही मध्यग हो सकता है तो मलसे युक्त नाडियोंके विद्यमान रहते उन्मनीभाव कैसे हो सकता है और मोक्षरूप कार्यकी सिद्धि कैसे हो सकती है अर्थात् नहीं हो सकती । सुषुम्नानाडीके प्राणसंचार होनेको उन्मनी- भाव कहते हैं ॥४॥ अन्वयेनापि मलशुद्धेहठसिद्धिहेतुत्वमाह- शुद्धिमेति यदा सर्व नाडीचकं मलाकुलम् । तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणे क्षमः॥५॥ शुद्धिमेतीति ॥ यदा यस्मिन्काले मलैराकुलं व्याप्तं सर्वं समस्तं नाडीनां चक्र समूहः शुद्धिं मलराहित्यमेति प्रामोति तदैव तस्मिन्नेव काले योगी योगाभ्यासी प्राणस्य ग्रहणे क्षमः समर्थो जायते ॥५॥ मलोंसे व्याकुल संपूर्ण नाडियोंका समूह जब शुद्धिको प्राप्त होता है उसी कालमें, योगी प्राणवायुके संग्रहण ( रोकना) में समर्थ होता है, इस श्लोकसे यह बात वर्णन की कि अन्वयसेही मलशुद्धि हठयोगसिद्धिकी हेतु है अर्थात् इन पूर्वोक्त अन्वयव्यतिरेक कारणोंसे योगी मलशुद्धिके लिये प्राणायामोंका सदैव अभ्यास करै ॥ ५ ॥ मलशुद्धिः कथं भवतीत्याकांक्षायां तच्छोधकं प्राणायाममाह- प्राणायामं ततः कुर्यान्नित्यं सात्त्विकया धिया । यथा सुषुम्नानाडीस्था मलाः शुद्धिं प्रयान्ति च ॥६॥ प्राणायाममिति ॥ यतो मलशुद्धिं विना प्राणसंग्रहणे क्षमो न भवति ततस्तस्मा- दीश्वरप्रणिधानोत्साहसाहसादिप्रयत्नाभिभूतविक्षेपालस्यादिराजसतामसधर्मया सात्त्वि- ADIO
चन्द्रनाडयेडया पूरयेत् । शक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति धारयित्वा कुम्भयित्वा भूयः
(४०)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
कया प्रकाशप्रसादशीलया धिया बुद्धया नित्यं प्राणायाम कुर्यात् यथा येन प्रकारेण
सुषुम्नानाड्यां स्थिता मलाः शुद्धिमपगमं प्रयान्ति नश्यन्तीत्यर्थः ॥ ६॥
अब मलशुद्धिके हेतु प्राणायामको कहते हैं-जिस कारण योगो मलशुद्धिके विना प्राणोंके
संग्रहणमें समर्थ नहीं होता तिससे सात्त्विक बुद्धिसे प्राणायामको नित्य करे अर्थात् ईश्वरका
प्रणिधान उत्साह साहस आदि यत्नोंसे तिरस्कारको प्राप्त भये हैं विक्षेप आलस्य आदि
रजोगुणीधर्म जिसके ऐसी सात्विक अर्थात् प्रकाशमान और प्रसन्न बुद्धिसे सदैव प्राणाया-
ममें उस प्रकार तत्पर रहै जिस प्रकारसे सुषुम्नानाडीमें स्थित सम्पूर्ण मल शुद्धिको प्राप्त होय
अर्थात नष्ट होजाय ॥ ६॥
मलशोधकप्राणायामप्रकारमाह दाभ्याम्-
बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत् ।
धारयित्वा यथाशक्ति भूयः सूर्येण रेचयेत् ॥ ७॥
बद्धपद्मासन इति ॥ बद्धं पद्मासनं येन तादृशो योगी प्राणं प्राणवायुं चन्द्रेण
पुनः सूर्येण सूर्यनाड्या पिङ्गलया रेचयेत् । बाह्यवायोः प्रयत्नविशेषादुपादानं
पूरकः । जालन्धरादिवन्धपूर्वकं प्राणनिरोधः कुम्भकः । कुंभितस्य वायोः प्रयत्न
विशेषाद्गमनं रेचकः । प्राणायामागरेचकपूरकयोरेखेमे लक्षणे इति । भस्त्राव-
लोहकारस्य रेचपूरौ ससम्भ्रमौ' इति गौणरेचकपूरकयो तिव्याप्तिः। तयोर्लक्ष्य-
स्वाभावात् ॥ ७॥
अब मलके शोधक प्राणायामके प्रकारको कहते हैं कि, बांधा ह पद्मासन जिसने ऐसा
योगी प्राणवायुको चन्द्रनाडी ( इडा) से पूर्ण करै अर्थात् चढावे फिर उसको अपनी शक्तिके
अनुसार धारण करके अर्थात् कुंभक प्राणायाम करके फिर सूर्यकी नाडी (पिंगला) से प्राण-
वायुका रेचन करै अर्थात् छोडदे । बाहरकी वायुका जो प्रयत्नविशेषसे ग्रहण उसे पूरक कहते
हैं और जालंधर आदि बन्धपूर्वक जो प्राणों का निरोध उसे कुम्भक कहते हैं और कुंभित
प्राणवायुका जो प्रयत्न विशेषसे गमन उसे रेचक कहते हैं ये रेचक और पूरकके लक्षण उन्हीं
रेचक पूरकोंके हैं जो प्राणायामोंके अंग हैं इससे वचनमें गौण रेचक पूरक कहे हैं उनमें
अतिव्याप्ति नहीं क्योंकि वे लक्ष्यही नहीं कि लोहकारकी भलाके समान रेचक और पूरकको
संभ्रमसे करै ॥७॥
प्राणं सूर्येण चाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः।
विधिवत्स्तम्भकं कृत्वा पुनश्चन्द्रेण रेचयेत् ॥ ८॥
प्राणमिति ॥ सूर्येण सूर्यनाडया पिङ्गलया प्राणमाकृष्य गृहीत्वा शनैर्मन्दमन्दमुदरं
जठरं पूरयेत् । विधिवद्वन्धपूर्वकं कुम्भकं कृत्वा पूनर्भूयश्चन्द्रेणेडया रेचयेत् ॥ ८ ॥
करे फिर विधिसे कुम्भक (धारण) करके चन्द्रमाकी इडा नामकी नाडीसे रेचन करे अर्थात् द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (४१) और सूर्यकी नाडी पिंगलासे प्राणका आकर्षण (खींचना) करके शनैः शनैः उदरको पूरण । प्राणवायुको छोड दे ॥ ८॥ उक्त प्राणायामे विशेषमाह- येन त्यजेत्तेन पीत्वा धारयेदतिरोधतः। रेचयेच्च ततोऽन्येन शनैरेव न वेगतः॥९॥ येनेति ॥ येन चन्द्रेण वा त्यजेद्रेचयेत्तेन पीत्वा पूरयित्वा । अतिरोधतोऽतिशयि- तेन रोधेन स्वेदकम्पादिजननपर्यंतेन । सार्वविभक्तिकस्तसिल् । येन पूरकस्ततोऽन्येन शनै रेचयेन तु वेगतः वेगानेचने बलहानिः स्यात् । येन पूरकः कृतस्तेन रेचको न कर्तव्यः । येन रेचकः कृतस्तेनैव पूरकः कर्तव्य इति भावः ॥९॥ अब उक्त प्राणायाममें विशेष विधिको कहते हैं कि, जिस चन्द्रमा वा सूर्यकी नाडीसे प्राणवायुका त्याग (रेचन) करै उसी नाडीसे पान (पूरण) करके अत्यन्त रोधन (रोकना) से अर्थात् स्वेद और कम्पके पर्यन्त धारण करै । फिर जिससे पूरक किया हो उससे अन्य नाडीसे शनैः शनैः रेचन कर वेगसे नहीं क्योंकि वेगसे रेचन करनेमें बलकी हानि होती है अर्थात् जिस नाडीसे पूरक किया हो उससे रेचक न करै और जिससे रेचक क्रियाहो उसीसे पूरकको तो करले ॥ ९॥ बद्धपद्मासन इत्याद्युक्तमध पिंडीकृत्यानुवदन्प्राणायामस्यावांतरफलमाह- प्राणं चेदिडया पिबेनियमितं भूयोऽन्यया रेचयेत् पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बद्धा त्यजेदामया। सूर्याचन्द्रमसोरनेन विधिनाऽभ्यासं सदा तन्वतां शुद्धा नाडिगणा भवन्ति यमिनां मासत्रयादूर्ध्वतः॥ १० ॥ प्राणमिति ॥ चेदिडया वामनाड्या प्राणं पिवेत्पूरयेत्तर्हि नियमितं कुंभितं प्राणं भूयः पुनरन्यया पिंगलया रेचयेत् । पिंगलया दक्षनाड्या समीरणं वायु पीत्वा पूर- यित्वाऽथो पूरणानंतरं बद्ध्वा कुंभयित्वा वामयेडया त्यजेद्रेचयेत् । सूर्यश्च चंद्रमाश्च सूर्याचन्द्रमसौ तयोः “ देवताद्वंद्वे च " इत्यानङ् । अनेनोक्तेन विधिना प्रकारेण सदा नित्यमभ्यासं चन्द्रेणापूर्य कुम्भयित्वा सूर्येण रेचयेत्सूर्येणापूर्य कुंभयित्वा च चन्द्रेण रेचयेदित्याकारकं तन्वतां विस्तारयतां यमिनां नाडीगणा नाडीसमूहा मासत्रयादूर्ध्वतो मासानां त्रयं तस्मादुपरि शुद्धा मलरहिता भवंति ॥ १० ॥ पूर्वोक्त आठ श्लोकोंसे वर्णन किये तात्पर्यको करके अनुवाद करते प्राणायामके अवान्तर फलको कहते हैं, यदि योगी इडासे अर्थात् वामनाडीसे प्राणका पान ( पूरण ) करै तो नियमित कुंभित उस प्राणको फिर दूसरी पिंगला नाडीसे रेचन करै और एकत्र हुए ग्रन्थकार । (४२) हठयोगप्रदीपिका । [उपदेशः- यदि पिंगलासे प्राणको पीवै अर्थात् दक्षिण नाडीसे वायु पूरण करे तो उस प्राणवायुको बांधन कर अर्थात् कुम्भित करके इडारूप वामनाडीसे प्राणवायुका रेचन करे । इस पूर्वोक्त सूर्य और चन्द्रमाको विधिसे अर्थात् चन्द्रमासे पूरण और कुम्भक करके सूर्यसे रेचन करै और सूर्यसे पूरण और कुम्भक करके चन्द्रमासे रेचन करै इस पूर्वोक्त विधिसे सदैव अभ्यास करते हुए योगिजनोंके नाडियोंके गण तीन मासके अनन्तर शुद्ध होते हैं अर्थात् निर्मल हो जाते हैं।॥१०॥ अथ प्राणायामाभ्यासकालं तदवधि चाह- प्रातमध्यंदिने सायमर्धरात्रे च कुंभकान् । शनैरशीतिपर्यंतं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥ ११ ॥ प्रातरिति ॥ प्रातररुणोदयमारभ्य सूर्योदयाद् घटिकात्रयपर्यंते प्रातःकाले मध्यं- दिने मध्याह्ने पंचधा विभक्तस्य दिनस्य मध्यभागे सायं सन्ध्या त्रिनाडीप्रमिता- काऽस्तादधस्तादूर्ध्वं चेत्युक्तलक्षणे सन्ध्याकाले रात्ररर्धमर्धरात्रं तस्मिन्नर्धरात्रे रात्रे- मध्ये मुहूर्तद्वये च शनैरशीतिपर्यंतमशीतिसंख्यावधि चतुर्वारं वारचतुष्टयं 'काला- ध्वनोरत्यंतसंयोगे' इति द्वितीया । चतुर्पु कालेष्वेकैकस्मिन्काले अशीतिप्राणायामाः कार्याः । अर्धरात्रे कर्तुमशक्तश्चेत्रिसंध्यं कर्तव्या इति संप्रदायः । चतुर्वार कृताश्चेदिनदिने विंशत्यधिकशतत्रय (३२०) परिमिताः प्राणायामा भवंति । वारत्रयं कृताश्चेच्चत्वारिंशदधिकशतद्वय (२४० ) परिमिता भवति ॥ ११ ॥ अब प्राणायामके अभ्यासकाल और उसकी अवधिको कहते हैं कि, प्रातःकाल अर्थात् अरुणोदयसे लेकर सूर्योदयसे तीन घडी दिनचढे तक और मध्याह्नमें अर्थात् पांचभाग किये दिनके मध्य भागमें और सायंकाल अर्थात् सूर्यास्तमें पूर्व और सूर्यास्तके अनन्तर तीन घडी- रूप सन्ध्याके समयमें और अर्द्धरात्रमें अर्थात् रात्रिके मध्यभागके दो मुहूतोंमें शनैःशनैः इन पूर्वोक्त चारों कालोंमें चार वार अशीति (८०) प्राणायाम करै।यादि अर्द्धरात्रमें करनेको असमर्थ होय तो तीन कालमेंही अस्सी २ प्राणायाम करे, चार वार करे तो (३२०) तीनसौ बीस प्राणा-- याम होते हैं-तीनवार करै तो (२४०) दोसा चालीस होते हैं ॥ ११ ॥ कनिष्ठमध्यमोत्तमानां प्राणायामानां क्रमेण व्यापकविशेषमाह- कनीयासि भवेत्स्वेदः कंपो भवति मध्यमे । उत्तमे स्थानमाप्नोति ततो वायं निबन्धयेत् ॥ १२॥ कनीयसीति ॥ कनीयसि कनिष्ठे प्राणायामे स्वेदः प्रस्वेदो भवेद्भवति । स्वेदा- नुमेयः कनिष्ठः । मध्यमे प्राणायामे कंपो भवति । कंपानुमेयो मध्यमः। उत्तमे प्राणा- यामे स्थानं ब्रह्मरंध्रमाप्नोति । स्थानप्राप्त्यनुमेय उत्तमः । ततस्तस्माद्वायुं प्राणं निबंधयेन्नितरां बंधयेत् । कनिष्ठादीनां लक्षणमुक्तं लिंगपुराणे-" प्राणायामस्य मानं तु मात्राद्वादशकं स्मृतम् । नीचो द्वादशमात्रस्तु सकृदुद्धात ईरितः । मध्यमस्तु द्विरु- दानश्चताशातिमात्रकः । मुख्यस्तु यस्त्रिरुद्धातः षट्त्रिंशन्मात्र उच्यते । प्रस्वेदकंपनो- । द्वितीयः संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। त्यानजनकश्च यथाक्रमम् । आनंदो जायते चात्र निद्रा धूमस्तथैव च ॥ रोमांचो ध्वनिसंवित्तिरंगमोटनकंपनम् । श्रमणस्वेदजल्पाद्यं संविन्मूच्छी जयेद्यदा ॥ तदोत्तम इति प्रोक्तः प्राणायामः सुशोभनः ।" इति ॥ धूमश्चित्तांदोलनम् । गोरक्षोऽपि-'अधमे द्वादश प्रोक्ता मध्यमे द्विगुणाः स्मृताः। उत्तमे त्रिगुणामात्राः प्राणायामे द्विजोत्तमैः।।' उद्घातलक्षणं तु-प्राणेनोत्सर्पमाणेन अपानः पीड्यते यदा । गत्वा चोर्ध्व निवर्तेत एतदुद्धातलक्षणम् ।' मात्रामाह याज्ञवल्क्यः- अंगुष्ठांगुलिमोक्षं त्रिस्त्रिर्जानुपरि- मार्जनम् । तालत्रयमाप प्राज्ञा मात्रासंज्ञां प्रचक्षते ॥ ' स्कन्दपुराणे-'एकश्वास- मयी मात्रा प्राणायामो निगद्यते । एतद्व्याख्यातं योगचिन्तामणौ- निद्रावशं गतस्य पुंसो यावता कालेनैकः श्वासो गच्छत्यागच्छति च तावत्कालः प्राणाया- मस्य मात्रेत्युच्यते ' इति ॥ अर्धश्वासाधिकद्वादशश्वासावच्छिन्नः कालः प्राणायाम- कालः । षड्भिः श्वासरेक पलं भवति । एवं च सार्धश्वासपलद्वयात्मकः कालः प्राणायामकालः सिद्धः साईद्वादशमात्रामितः प्राणायामो यः स एवोत्तमः प्राणा- याम इत्युच्यते । न च पूर्वोदाहृतलिङ्गपुराणगोरक्षवाक्याविरोधः । तत्र द्वादश- मात्रकस्य प्राणायामस्याधमत्वोक्तिरिति शङ्कनीयं 'जानु प्रदक्षिणीकुर्यान्न द्रुतं न विलम्बितम् । प्रदद्याच्छोटिकां यावत्तावन्मात्रेति गीयते ॥' इति स्कन्दपुराणात् । अंगुष्ठांगुलिमोक्षं च जानोश्च परिमार्जनम् । प्रदद्याच्छोटिकां यावत्तावन्मात्रेति गीयते ॥' इति च स्कन्दपुराणात् । अंगुष्ठो मात्रा संख्यायते तदा' ॥ इति दत्ता- त्रेयवचनाच्च । लिङ्गपुराणगोरक्षादिवाक्येष्वेकच्छोटिकावच्छिन्नस्य कालस्य मात्रात्वेन विवक्षितत्त्वात् । याज्ञवल्क्यादिवाक्येषु छोटिकात्रयावच्छिन्नस्य कालस्य मात्रात्वेन विवक्षणात् । त्रिगुणस्याधमस्योत्तमत्वं तत्राप्युक्तमित्यविरोधः । सर्वेषु योगसाधनेषु प्राणायामो मुख्यस्तत्सिद्धौ प्रत्याहारादीनां सिद्धेः। तदसिद्धौ प्रत्याहाराद्यसिद्धश्च । वस्तुतस्तु प्राणायाम एव प्रत्याहारादिशब्दौर्निगद्यते । तथा चोक्तं योगचिन्तामणौ- प्राणायाम एवाभ्यासक्रमेण वर्धमानः प्रत्याहारध्यानधारणासमाधिशब्दैरुच्यत इति । तदुक्तं स्कन्दपुराणे-"प्राणायामद्विषट्केन प्रत्याहार उदाहृतः । प्रत्याहारद्विषट्केन धारणा परिकीर्तिता ॥ भवेदीश्वरसङ्गत्यै ध्यानं द्वादशधारणम् । ध्यानद्वादशकेनैव समाधिरभिधीयते ॥ यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं स्वप्रकाशकम् । तस्मिन्दृष्टे क्रिया- काण्डयातायातं निवर्तते ॥" इति ॥ तथा-'धारणा पञ्चनाडीभिानं स्यात्पष्टि- नाडिकम् । दिनद्वादशकेनैव समाधिः प्राणसंयमात् ॥ ' इति च । गोरक्षादिभिरप्येव- मेवोक्तम् । अत्रैवं व्यवस्था । किञ्चिदूनद्विचत्वारिंशद्विपलात्मकः कनिष्ठप्राणायाम- कालः । अयमेवैकच्छोटिकावच्छिन्नस्य कालस्य मात्रात्वविवक्षया द्वादशमात्रक: कालः । किञ्चिदूनचतुरशीतिविपलात्मको मध्यमप्राणायामकालः। अयमेकच्छोटिका- वच्छिन्नस्य कालस्य मात्रात्वविवक्षया चतुर्विंशतिमात्रकः कालः । पञ्चविंशत्युत्तर- शतविपलात्मक उत्तमः प्राणायामकालः । अयमेकच्छोटिकावच्छिन्नस्य कालस्य - उतना काल प्राणायामकी मात्रा कहाता है। आधे श्वाससहित द्वादश श्वासके कालका प्राणा- (४४) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- मात्रात्वविवक्षया षट्त्रिंशन्मात्रककालः। छोटिकावयावच्छिन्नस्य कालस्य मात्रात्व- विवक्षया तु द्वादशमात्रक एव । वन्धपूर्वकं पञ्चविंशत्युत्तरशतविपलपर्यन्तं यदा प्राणा- यामस्थैर्य भवति तदा प्राणो ब्रह्मरन्ध्र गच्छति । ब्रह्मरन्धं गतः प्राणो यदा पञ्चविंशति पलपर्यन्तं तिष्ठति तदा प्रत्याहारः। यदा पञ्चघटिकापर्यन्तं तिष्ठति तदा धारणा । यदा षष्टिघटिकापर्यन्तं तिष्ठति तदा ध्यानम् । यदा द्वादशदिनपर्यन्तं तिष्ठति तदा समाधि- भवतीति सर्व रमणीयम् ।। १२॥ अब कनिष्ठ मध्यम उत्तम रूप तीन प्रकार के प्राणायामों में क्रमसे व्यापक जो विशेष उसका वर्णन करते हैं कि, कनिष्ठ प्राणायाममें स्वेद होता है अर्थात् प्राणायाम करते पसीना आजाय तो वह प्राणायाम कनिष्ठ (निकृष्ट ) जानना और मध्यम प्राणायाममें कम्प होता है अर्थात् देहमें कम्प होजाय तो वह प्राणायाम मध्यम होता है और उत्तम प्राणायाम करनसे योगी ब्रह्मरंध्ररूप उत्तम स्थानको प्राप्त होता है अर्थात् ब्रह्मरंध्रमें वायु पहुँच जाय तो उत्तम प्राणा- याम जानना तिससे प्रामवायुका निरंतर बंधन करै अर्थात् राकै। कनिष्ट आदि प्राणा- यामोंका लक्षण लिंगपुराणमें कहा है कि, प्राणायामका प्रमाण द्वादश १२ मात्राका कहाहै, एकबार है प्राणवायुका उद्बात ( उठाना ) जिसमें ऐसा द्वादशमात्राका प्राणायाम नीच होता है और जिसमें दोवार उद्घात हो वह चौवीस मात्राका प्राणायाम मध्यम होता है और जिसमें तीनवार उद्घात होय वह छत्तीस ३६ मात्राका प्राणायाम मुख्य होता है आर तीनोंमें क्रमसे प्रस्वेद, कम्पन और उत्थान होते हैं और प्राणायामोंमें आनंद निद्रा और चित्तका आंदोलन रोमांच ध्वनिका ज्ञान अंगका मोटन और कम्पन होते हैं और जब योगी श्रम स्वेद भाषण संवित् (ज्ञान मूछी) इनको जीतले तब वह शोभन प्राणायाम उत्तम कहा है । गोर- क्षने भी कहा है कि, अधमप्राणायाममें द्वादश, मध्यममें चौबीस, उत्तममें ३६ छत्तीस मात्रा द्विजोत्तमोंने कही है । उद्घातका लक्षण तो यह कहा है कि, ऊपरको चढतेहुए प्राणसे जब अपानवायु पीडित होता है और ऊपरको गया प्राण लाटता है यह उद्घातका लक्षण है मात्राकी संज्ञा याज्ञवल्क्यने यह कही है कि, अंगुष्ट और अंगुलीको तोनवार मोक्ष ( बजाना वा त्याग) और तीनवार जानुका मार्जन अर्थात् गोडेपर हाथ फेरना और तीनताल इनको बुद्धिमान मनुष्य मात्रा कहते हैं । स्कंदपुराणमें लिखा है कि, एक श्वासकी जो मात्रा उसे प्राणायाम कहते हैं अर्थात् शयन करते हुए मनुष्यका श्वास जितने कालसे आवे वा जाय यामका काल कहते हैं। छः श्वासका एक पल होता है इससे आधे श्वाससहित दो पलका जो काल वही प्राणायामका काल सिद्ध हुआ साढे बारह मात्रा है प्रमाण जिसका वहा प्राणायाम उत्तम प्राणायाम कहाता है, कदाचित् कोई शंका करै कि, जिस पूर्वोक्तलिंगपुराणके वचनमें द्वादशामात्राका अधम प्राणायाम कहा है उसको विरोव होगया सो ठीक नहीं क्योंकि जानुको न शीघ्र न विलम्बसे प्रदक्षिणा करके एक चुटको बजावे इतनेमें जितना काल लगे उतने कालको मात्रा कहतेहैं, अंगुष्ठ और अंगुलिका मोक्ष जानुका मार्जन आर चुटकी बजाना जितने कालमें होय उसे मात्रा कहते हैं। अंगुष्ठ जो है सो मात्राका बोधक है । इन स्कंदपुराण और दत्तात्रेयके वचनोंसे एक छोटिका (शिखा) युक्त जो काल वह मात्रा प्रतीत होता है और याज्ञ- वल्क्य आदिके वचानोंमें तीन छोटिका युक्त कालको मात्रा कहा है इससे त्रिगुणितको त्रिगुणित
द्वितीयः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
अधमको उत्तमता वहां भी कहीहै इससे कुछ विरोध नहीं । संपूर्ण योगके साधनोंमें प्राणायाम
मुख्य है क्योंकि प्राणायामकी सिद्धि में प्रत्याहार आदि सिद्ध होतेहैं और प्राणायामकी असिद्धिमें
प्रत्याहार सिद्ध नहीं होते सिद्धान्त तो यह है कि प्राणायामही प्रत्याहार आदि शब्दोंसे कहा जाता
है सोई योगचिंतामाणिमें कहा है कि, अभ्यासके क्रमसे बढता हुआ प्राणायामही प्रत्याहार ध्यान
धारणा समाधि शब्दसे कहा जाता है सोई स्कंदपुराणमें कहा है कि, द्वादशप्राणायामोंका प्रत्या-
हार और द्वादशप्रत्याहारोंकी धारणा और ईश्वरके संगमके लिये द्वादश धारणाओंका एक
ध्यान होता है और द्वादश ध्यानोंकी समाधि इसलिये कहाती है कि, समाधिमें अनंत स्वप्र-
काशक ज्योति ( ब्रह्म) दीखता है जिसके दीखनेसे कर्मकाण्ड और जन्म मरण निवृत्त होजाते
हैं और पांच नाडियोंको धारणा और ६० नाडि ( घडि) योंका ध्यान होता है और बारह
दिन प्राणायाम करनेसे समाधि होती है इस वचनसे गोरक्षआदिनेभी ऐसेही कहा है। यहां
यह व्यवस्था है कि, जिसमें कुछ कम ४२ विपल हो यह कनिष्ठ प्राणायामका काल है और
यही एक छोटिकाके कालको जब मात्रा कहते हैं तब द्वादश पलरूप होता है और
कुछ कम चौराशी ८४ विपलका मध्यम प्राणायामका काल है और यही पूर्वोक्त मात्राके
प्रमाणसे २४ चौवीसमात्राका होता ह और १२५ सवासौ विपलका उत्तम प्राणायामका
काल होता है और पूर्वोक्त मात्राके प्रमाणसे छत्तीस ३६ मात्राका होता है और जब तीन
छोटिकाके कालको मात्रा मानते हैं तब तो यह भी द्वादश मात्राका होता है । जब बन्धपूर्वक
सवासौ विपल पर्यंत प्राणायामकी स्थिरता होजाय तब प्राण ब्रह्मरंध्रमें चला जाता है ब्रह्मरंध्रमें
गया प्राण जब २५ पल पर्यंत टिकजाय तब प्रत्याहार होता है और पांच घटिकापर्यंत टिक
जाय तब धारणा होती है और जब ६० घडी पर्यंत टिक जाय तब ध्यान होता है और जब
प्राण १२ बारह दिनतक ब्रह्मरंध्रमें टिकजाय तब समाधि होती है इससे सम्पूर्ण रमणीय है
अर्थात् पूर्वोक्त कोई दोष नहीं । भावार्थ यह है कि, कनिष्ठ प्राणायाममें स्वेद, मध्यममें कम्प
होता है उत्तम प्राणायाममें प्राण ब्रह्मरन्ध्रमें पहुँचता है इससे योगी प्राणायामका बन्धन करै१२
प्राणायामानभ्यसतः स्वेदे जाते विशेषमाह-
जलेन श्रमजातेन गात्रमर्दनमाचरेत् ।
हृढता लघुता चैव तेन गात्रस्य जायते ॥ १३॥
जलेनेति ॥ श्रमात्माणायामाभ्यासश्रमाजातं तेन जलेन प्रस्वेदेन गात्रस्य
शरीरस्य मर्दनं तैलाभ्यङ्गवदाचरेत्कुर्यात् । तेन मर्दनेन गात्रस्य दृढता दायं लघुता
जाड्याभावो जायते प्रादुर्भवति ॥ १३ ॥
अब प्राणायामके अभ्याससे स्वेद होनेपर विशेष कहते हैं कि, प्राणायामके परिश्रमसे
उत्पन्न हुआ जो जल उससे अपने गात्रोंका मर्दन करै उससे शरीरकी दृढता और लघुता होती
है अर्थात् जडता नहीं रहती ॥ १३ ॥
अथ प्रथमोत्तराभ्यासयोः क्षीरादिनियमानाह-
अभ्यासकाले प्रथमे शस्तं क्षीराज्यभाजनम् ।
ततोऽभ्यासे दृढीभूते न तानियमग्रहः ॥ १४ ॥
- तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम् ॥ १५॥ तिसी प्रकार अभ्यास किया। (४६) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:- अभ्यासकाल इति ।। क्षीरं दुग्धमाज्यं घृतं तद्युक्तं भोजनं क्षीराज्यभोजनम् । शाकपार्थिवादिवत्समासः । केवले कुम्भके सिद्धेऽभ्यासो दृढो भवति । स्पष्टमन्यत् १४ अब पहिले और पिछले अभ्यासोंमें दुग्ध आदिके नियमोंका वर्णन करते हैं कि, पहिले अभ्यासकालमें दुग्ध और घोसहित भोजन श्रेष्ठ कहा है फिर अभ्यासके दृढ होनेपर अर्थात् कुम्भकके सिद्ध होनेपर पूर्वोक्त नियममें आग्रह न करै ॥ १४ ॥ सिंहादिवच्छनैरेव पाणं वशयेन्न सहसेत्याह- यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेश्यः शनैः शनैः। यथेति ॥ यथा येन प्रकारेण सिंहो मृगेन्द्रो गजो वनहस्ती व्याघ्रः शार्दूलः शनैः शनैरेव वश्यः स्वाधीनो भवेन्न सहसा तथैव तेनैव प्रकारेण सेवितोऽभ्यस्तो वायुः प्राणो वश्यो भवेत् । अन्यथा सहसा गृह्यमाणः साधकमभ्यासिनं हन्ति सिंहादिवत् ॥ १५ ॥ सिंह आदिके समान शनैः २ प्राणको वशमें करै शीघ्र न करै इस बातका वर्णन करते हैं, जैसे सिंह गज (वनका हाथी) व्याघ्र ( शार्दूल) ये शनैः २ ही वशमें होसकते हैं शीघ्र नहीं समान साधकको अपने समान नष्ट करदेता है ॥१५॥ युक्तायुक्तयोः फलमाह- प्राणायामादियुक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत् । अयुक्ताभ्यासयोगेन सर्वरोगसमुद्भवः ॥ १६॥ प्राणायामेति ॥ आहारादियुक्तिपूर्वको जालन्धरादिवन्धयुक्तविशिष्टः प्राणायामो युक्त इत्युच्यते । तेन सर्वरोगक्षयः सर्वेषां रोगाणां क्षयो नाशो भवेत् । अयुक्त उक्त- युक्तिरहितो योऽभ्यासस्तद्युक्तेन प्राणायामेन सर्वरोगसमुद्भवः सर्वेषां रोगाणां सम्य- गुद्भव उत्पत्तिर्भवेत् ॥ १६ ॥ अब युक्त और अयुक्त प्राणायामोंके फल कहते हैं । आहार आदि और जालंधर आदि बंध इनकी युक्तियोंसहित जो प्राणायाम उसे युक्त कहते हैं । उस युक्त प्राणायामके करनेसे संपूर्ण रोगोंका क्षय होजाता है और अयुक्त प्राणायामके अभ्याससे अर्थात् पूर्वोक्त युक्तिरहित प्राणायामके करनेसे संपूर्ण रोगोंकी उत्पत्ति होती है ॥ १६ ॥ अयुक्तेन प्राणायामेन के रोगा भवन्तीत्यपेक्षायामाह- हिका श्वासश्च कासश्च शिरकर्णाक्षिवेदनाः। भवंति विविधा रोगाः पवनस्य प्रकोपतः ॥ १७॥ -
-
द्वितीयः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
(४७)
हिक्केति ॥ हिकाश्वासकासारोगविशेषाः शिरश्च कर्णौ चाक्षिणी च शिरकाक्षि
शिरःकर्णाक्षिणि वेदनाः शिरःकर्णाक्षिवेदनाः विविधा नानाविधा रोगा ज्वरादयः
पवनस्य वायोः प्रकोपतो भवन्ति ॥ १७ ॥
अब अयुक्त प्राणायाम करनेसे जो रोग होते हैं उनका वर्णन करते हैं कि हिक्का (हुचकी)
श्वास कास और शिर नेत्र कर्ण इनकी पीडा और ज्वर आदि नानाप्रकारके रोग प्राण वायुके
कोपसे होते हैं ॥ १७॥
यतः पवनस्य प्रकोपतो विविधा रोगा भवत्यतः किं कर्त्तव्यमत आह-
युक्तं युक्तं त्यजेद्वायुं युक्तं युक्तं च पूरयेत् ।
युक्तं युक्तं च बनीयादेवं सिदिमवाप्नुयात् ॥ १८॥
युक्तं युक्तमिति ॥ वायुं युक्तं युक्तं त्यजेत् । रेचकाले शनैः शनैरेव रेचयेन वेगत
इत्यर्थः । युक्तं युक्तं न चाल्पं नाधिकं च पूरयेत् । युक्तं युक्तं च जालंधरवन्धादि
युक्तं वनीयात्कुंभयेत् । एवमभ्यसेञ्चेसिद्धिं हठसिद्धिमवाप्नुयात् ॥ १८ ॥
जिससे वायुके कोपसे अनेक रोग होते हैं इससे जो योगीको कर्तव्य है उसका वर्णन करते
हैं कि, युक्तयुक्त प्राणवायुको त्यागै अर्थात् रेचनके समयमें शनैः २ ही प्राणका रेचन करै
शीघ्र न करै और युक्त २ ही वायुको पूर्ण करे अर्थात् न अल्प न अधिक और जालंधर बन्ध
आदि युक्त वायुको युक्त २ ही बांधे अर्थात् कुम्भक कर इस प्रकार योगी अभ्यास करै तो
हठयोगकी सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ १८ ॥
युक्तं प्राणायाममभ्यसतो जायमानाया नाडीशुद्धेर्लक्षणमाह द्वाभ्याम्-
यदा तु नाडीशुद्धिः स्यात्तथा चिह्नानि बाह्यतः।
कायस्य कृशता कांतिस्तदा जायेत निश्चितम् ॥ १९॥
यदा त्विति ॥ यदा तु यस्मिन्काले तु नाडीनां शुद्धिर्मलराहित्यं स्यात्तदा बाह्यतो
बाह्यानि । सार्वविभक्तिकस्तसिः । चिह्नानि लक्षणानि तथाशब्देनांतराण्यपि चिह्नानि
भवंतीत्यर्थः। तान्येवाह-कायस्येति ॥ कायस्य देहस्य कृशता काश्र्मम् । कांतिः
सुरुचिनिश्चितं जायेत ॥ १९ ॥
युक्त प्राणायामके अभ्यासीको जो सिद्धि होती है उसके लक्षण दो श्लोकोंसे कहते हैं कि
जिस कालमें नाडियोंकी शुद्धि होती है उस समय बाह्य और भीतरके ये चिह्न होते हैं कि
कायाकी कृशता और कांति (तेज) उस समय निश्चयसे होते हैं ॥ १९ ॥
यथेष्टधारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् ।
नादाभिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडिशोधनात् ॥२० ॥
यथेष्टमिति ॥ वायोः प्राणस्य यथेष्टं बहुवारं धारणं कुम्भकेषु । अनलस्य जठ-
राग्रेः प्रदीपनं प्रकृष्टा दीप्तिर्नादस्य ध्वनेरभिव्यक्तिः प्राकट्यमारोग्यमरोगता नाडि-
शोधनान्नाडीनां शोधनान्मलराहित्याजायते ॥ २० ॥
। (४८) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:- यथेष्ट ( अनेकबार ) वायुका जो धारण है वह जठराग्निको भली प्रकार दीपनहै अर्थात् जठराग्निके दीपनसे यथेष्ट वायुके धारणके अनुमान करना और नादकी जो आभिव्यक्ति अर्थात् अन्तर्ध्वनिकी प्रतीति और रोगोंका अभाव यह नाडियोंके शोधनसे अर्थात् मलरहित करनेसे होता है ॥ २०॥ मेदआद्याधिक्ये उपायान्तरमाह- मेदःश्लेष्माधिकः पूर्व षट्कर्माणि समाचरेत् । अन्यस्तु नाचरेत्तानि दोषाणां समभावतः॥२१॥ मेदःश्लेष्माधिकः इति ॥ मेदश्च श्लेष्मा च मेदाश्लेष्माणौ तावधिको यस्य स तादृशः पुरुषः । पूर्व प्राणायामाभ्यासात्माङ्न तु प्राणायामाभ्यासकाले । षट् कर्माणि वक्ष्यमाणानि समाचरेत्सम्यगाचरेत् । अन्यस्तु मेदाश्लेष्माधिक्यरहितस्तु तानि षद् कर्माणि नाचरेत् । तत्र हेतुमाह-दोषाणां वातपित्तकफानां समस्य भावः समभावः समत्वं तस्माद्दोषाणां समत्वादित्यर्थः ॥२१॥ मेदा आदि जिस पुरुषके अधिक हों उसके लिये अन्य उपायका वर्णन करते हैं कि, जिस पुरुषके मेदा और श्लेष्मा अधिक होय वह पुरुष प्राणायामके अभ्याससे पहिले छः काँको करै । मेदा और श्लेष्माकी अधिकतासे जो रहित हो वह उन छः ६ कमाको दोषोंकी समा- नता होनेसे न करै ॥ २१ ॥ षट् कर्माण्युपदिशति- धौतिर्बस्तिस्तथा नेतित्राटकं नौलिकं तथा। कपालभातिश्चैतानि षट् कर्माणि प्रचक्षते ॥२२॥ धोतिरिति ॥ स्पष्टम् ॥ २२ ॥ छः कौंको वर्णन करते हैं कि, धौती १, बस्ति २, नेति ३ मार्ग त्राटक ४, नौलिक ५ और कपालभाति ६ बुद्धिमानोंने छः कर्म योगमार्गमें कहे हैं ॥ २२ ॥ इदं रहस्यमित्याह- कर्मषट्कमिदं गोप्यं घटशोधनकारकम् । विचित्रगुणसंधायि पूज्यते योगिपुङ्गवैः॥ २३॥ कर्मषट्कमिति ॥ घटस्य शरीरस्य शोधनं मलापनयनं करोतीति घटशोधन- कारकमिदमुद्दिष्टं कर्मणां षट्कं धौत्यादिकं गोप्यं गोपनीयम् । यतः-विचित्रगुण- सन्धायीति ॥ विचित्रं विलक्षणं गुणं षट्कर्मरूपं सन्धातुं कर्तुं शीलमस्येति विचित्र- गुणसंधायि योगिएङ्गवैयोगिश्रेष्ठैः पूज्यते सक्रियते । गोपनाभावे तु षट्कर्मकमन्यपि विदितं स्यादिति योगिनः पूज्यत्वाभावः प्रसज्जेतेति भावः। एतेनेदमेव कर्मषट्कस्य - द्वितीयः] संस्कृवटीका-भाषाटीकासमेता। (४९) । । मुख्यं फलमिति सूचितम् । मेद श्लेष्मादिनाशस्य प्राणायामैरपि सम्भवात् । तदु- क्तम्-'षट्कर्मयोगमानोति पवनाभ्यासतत्परः ।' इति । पूर्वोत्तरग्रन्थस्याप्येवमेव स्वारस्याच ॥ २३ ॥ ये छः कर्म गुप्त करने योग्य हैं और देहको शुद्ध करते हैं और विचित्रगुणके सन्धानको करते हैं इससे योगिओंमें श्रेष्ठ इनकी प्रशंसा करते हैं यदि ये गुप्त न रक्खे जाँय तो अन्यभी इनको कर सकेंगे तो योगियोंकी पूज्यता न रहेगी-इससे योगियोंको सर्वोत्तम बनानाही षट् कर्मका फल है-क्योंकि मेदा श्लेष्माका नाश तो प्राणायामोंसे भी हो सकता है । सोई इस वचनमें लिखा है कि प्राणायामके अभ्यासमें तत्पर मनुष्य षट्कर्मके योगको प्राप्त होता है। पूर्व और उत्तर ग्रन्थकीभी इस प्रकार संगति हो सकती है ॥ २३ ॥ तत्र धौतिकर्माह- चतुरङलविस्तारं हस्तपंचदशायतम् । गुरूपदिष्टमार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैपॅसेत् ॥ पुनःप्रत्याहरेच्चैतदुदितं धौतिकर्म तत् ॥२४॥ चतुरडलमिति ॥ चतुर्णा मंगुलानां समाहारश्चतुरंगुलं चतुरंगुलं विस्तारो यस्य तादृशं हस्तानां पंचदशैरायतं दीर्घ सिक्तं किञ्चिदुष्णजलानै वस्त्रं पटं तच्च सूक्ष्म नूतनोष्णीषादेः खण्डं ग्राह्यम् । गुरुणोपदिष्टो यो मार्गों वस्त्रग्रसनप्रकारस्तेन शनैर्मन्द- मन्दं किञ्चित्किञ्चिद् ग्रसेत् ॥ द्वितीये दिने हस्तद्वयं तृतीये दिने हस्तत्रयम् । एवं दिन- वृद्धया हस्तमात्रमधिकं असेत् । पुनरिति ॥ तस्य प्रांतं राजदन्तमध्ये हठे संलग्नं कृत्वा नौलीकर्मणोदरस्थवस्त्रं सम्यक् चालयित्वा । पुनः शनैः प्रत्याहरेच्च तहस्त्रमुद्गिरे- निष्कासयेच्च । तद्धौतिकमोदितं कथितं सिद्धैः॥ २४ ॥ अब छःमें धौतिकर्मको कहते हैं कि, चार अंगुल-जिसका विस्तार हो और १५ पंद्रह हाथ जो आयत ( दीर्घ) हो-अर्थात् चार अंगुल चौडा और पंद्रह हाथ लंबा जो वस्त्र उसको उष्ण जलसे सींचकर-गुरुके उपदेश किये मार्गसे शनैः २ ग्रसै अर्थात् प्रथम दिन एक हाथ, दूसरे दिन दो हाथ, तीसरे दिन तीन हाथ,इस प्रकार एक एक हाथको वृद्धिसे उसके ग्रसनेका अभ्यास करै और वह वस्त्र भी सूक्ष्म लेना उचित है । उस वस्त्रके प्रान्त ( छोर) को अपनी डाढोंमें भली प्रकार दाबकर नौलीकर्मसे उदरमें टिकै उस वस्त्रको भलीप्रकार चलाकर उस वस्त्रका शनैः २ प्रत्याहरण करै अर्थात् निकाले । यह सिद्धोंने धौतीकर्म कहा है ॥ २४ ॥ धौतिकर्मणः फलमाह - कासश्वासप्लीहकुष्ठं कफरोगाश्च विंशतिः। घौतिकर्मप्रभावेन प्रयान्त्येव न संशयः॥२५॥ कासन्चासेति ॥ कासश्च श्वासश्व प्लीहश्च कुष्ठं च । समाहारद्वन्दः । कासादयों रोगाविशेषाः विंशतिसंख्याकाः कफरोगाश्च ॥ धौतीति ॥ धौतिकर्मणः प्रभावेन गच्छ- न्त्येव न संशयः । निश्चितमेतदित्यर्थः ॥ २५ ॥ -- हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- अब धौतीकर्मके फलको कहते हैं-कास श्वास प्लीहा कुष्ठ और बीस प्रकारके कंफरोग धौतीकर्मके प्रभावसे नष्ट होते हैं इसमें संशय नहीं । अर्थात् यह निश्चित है ।। २५ ॥ अथ वस्तिकर्माह- नाभिदघ्नजले पायौ न्यस्तनालोत्कटासनः। आधाराकुञ्चनं कुर्यात्क्षालनं वस्तिकर्म तत् ॥२६॥ नाभिदनेति ॥ नाभिपरिमाणं नाभिदन्नम् । परिमाणे दनच् प्रत्ययः।तस्मिन्नाभि- दन्ने नाभिपरिमाणे जले नद्यादितोये पायुर्मुदं तस्मिन्न्यस्तो नालो वंशनालो येन कनिष्ठिकाप्रवेशयोग्यरंध्रयुक्तं षडंगुलदीर्घ वंशनालं गृहीत्वा चतुरंगुलं पायौ प्रवेशयेत् अंगुलिद्वयमितं बहिः स्थापयेत् । उत्कटमासनं यस्य स उत्कटासनः । पाणिद्वये स्फिचौ विन्यस्य पादांगुलिभिः स्थितिरुत्कटासनम् । आधारस्याकुञ्चनं यथा जल- मंतः प्रविशेत्तथा संकोचनं कुर्यात् । अन्तः प्रविष्टं जलं नौलिकर्मणा चालयित्वा त्यजेत् । क्षालनं वस्तिकर्मोच्यते । धौतिवस्तिकर्मद्वयं भोजनात्यागेव कर्तब्यम् । तद- नन्तरं भोजने विलम्बोऽपि न कार्यः । केचित्तु पूर्व मूलाधारेण वायोराकर्षणमभ्यस्य जले स्थित्वा पायौ नालप्रवेशनमन्तरेणैव वस्तिकर्माभ्यसंति । तथा करणे सर्वं जलं बहि याति । अतो नानारोगधातुक्षयादिसंभवाच्च तथा वस्तिकर्म नैव विधेयम् । किमन्यथा स्वात्मारामः पायौ न्यस्तनाल इति ब्रूयात् ॥२६॥ अब वस्तीकर्मको कहते हैं कि, नाभिप्रमाणका जो नदी आदिका जल उसमें स्थित गुदाके मध्यमें ऐसे बाँसके नालको रक्खै जिसका छिद्र कनिष्ठिका अंगुलिके प्रवेश योग्य हो और छ: अंगुल उस बाँसके नालको लेकर चार अंगुल उसको गुदामें प्रवेश करै और दो अंगुल बाहिर रक्खे और उत्कट आसन रक्खे अर्थात् दो पाणियोंसे ऊपर अपने स्फिच (चूतड) पादोंकी अंगुलियोंसे बैठनेको उत्कट आसन कहते हैं। उक्त आसनमें बैठा हुआ मनुष्य आधाराकुंचन करै अर्थात् जैसे वंशनालके द्वारा वंशनालमें जल प्रविष्ट हो तैसे आकुंचन करै । भीतर प्रविष्ट हुए जलको नौलीकर्मसे चलाकर त्याग दे-इस उदरके क्षालन (धोना) को वस्तिकर्म कहते हैं। ये धौति वस्ति दोनों कर्म भोजनसे पूर्वही करने और इनके करनेके अनन्तर भोजनमें विलंबभी न करना । कोई तो पहिले मूलाधारसे प्राणवायुके आकर्षण (खींचना) का अभ्यास करके और जलमें स्थित होकर गुदामें नाल प्रवेशके विनाही वस्तिकर्मका अभ्यास करते हैं-उस प्रकार वस्तिकर्म करनेसे उदरमें प्रविष्ट हुआ संपूर्ण जल बाहर नहीं आसकता आर उसके न आनेसे धातुक्षय आदि नानारोग होते हैं इससे उस प्रकार वस्तिकर्म न करना, क्योंकि अपनी गुदामें रक्खा है नाल जिसने ऐसे स्वात्माराम अन्यथा क्यों कहते? ॥ २६ ॥ वस्तिकर्ममुणानाह द्वाभ्याम्- गुल्मप्लीहोदरं चापि वातपित्तकफोद्भवाः। वस्तिकर्मप्रभावेन क्षीयन्ते सकलामयाः ॥२७॥ areer द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। गुल्मप्लीहोदरमिति । गुल्मश्च प्लीहश्च रोगविशेषावुदरं जलोदरं च तेषां समाहार- छन्दः । वातश्च पित्तं च कफश्च तेभ्य उद्भवा एकैकस्माद् द्वाभ्यां सर्वेभ्यो वा जाता: सकलाः सर्व आमया रोगा वस्तिकर्मणः प्रभावःसामर्थ्यं तेन क्षीयंते नश्यति ॥२७॥ अब वस्तिकर्मके गुणों को दो श्लोकोंसे वर्णन करते हैं-कि वस्तिकर्मके प्रभावसे गुल्म (गुम), प्लीहा, उदर (जलोदर ) और वात, पित्त, कफ इनके द्वन्द्व वा एकसे उत्पन्न हुए संपूर्ण रोग नष्ट होते हैं ॥ २७ ॥ धात्विन्द्रियान्तःकरणप्रसादं दद्याच कान्तिं दहनप्रदीप्तिम् । अशेषदोषोपचयं निहन्यादभ्यस्यमानं जलवस्तिकर्म ॥२८॥ धात्विति ॥ अभ्यस्यमानमनुष्ठीयमानं जले वस्तिकर्म जलवस्तिकर्म । कर्तृ । दद्यादनुष्ठातुरिति शेषः। धातवः रसामृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः' इत्युक्ताः इन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थानि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिबाघ्राणानि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि च अंत:करणानि मनोबुद्धिचित्ताहंकाररूपाणि तेषां परितापविक्षेप- शोकमोहगौरवावरणदैन्यादिराजसतामसधर्मविनिवर्तनेन सुखप्रकाशलाघवादिसात्त्विक- धर्माविर्भावः प्रसादस्तं कांतिं द्युतिं दहनस्य जठराग्नेः प्रदीप्ति प्रकृष्टां दीप्तिं च तथा अशेषाः समस्ता ये दोषा वातपित्तकफास्तेषामुपचयम् । एतदपचयस्याप्युपलक्षणम् । उपचयापचयौ निहन्यान्नितरां हन्यात् । दोषसाम्यरूपमारोग्यं कुर्यादित्यर्थः ॥२८॥ अभ्यास किया हुआ यह वस्तिकर्म करनेवाले पुरुषके धादु अर्थात् रस, रुधिर, मांस, मेदा, आस्थि, शुक्र और वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ ये पांच कर्मेन्द्रिय, श्रोत्र, त्वक्, जिह्वा, घ्राण, चक्षु ये पांच ज्ञानेन्द्रिय और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकाररूप अंतःकरण इनकी प्रसन्नताको करता है अर्थात् इनके परिताप विक्षेप शोक मोह गौरव आवरण दैन्य आदि रजोगुण तमोगुण धर्माको दूर करके सुखका प्रकाश लाघव आदि सात्विक धर्मोको प्रकट करता है और देहकी कांति और जठराग्निकी दीप्तिको देता है और संपूर्ण जो वात, पित्त, कफ आदि दोष हैं उनकी वृद्धिको नष्ट करता है और इन दोषोंके अपचय (न्यूनता) को भी नष्ट करता है अर्थात् दोषोंकी साम्यरूप आरोग्यताको करता है ॥ २८ ॥ अथ नेतिकर्माह- सूत्रं वितस्ति सुस्निग्धं नासानाले प्रवेशयेत् । मुखानिर्गमयेच्चैषा नेतिः सिद्धनिगद्यते ॥२९॥ सूत्रमिति । वितस्ति वितस्तिमितं वितस्तिरित्युपलक्षणमधिकस्यापि । यावता सूत्रेण सम्यक् नोतकर्म भवेत्तावद ग्राह्यम् । सुस्निग्धं सुष्ठ स्निग्धं ग्रंथ्यादिरहित सूत्रं तच्च नवधा दशधा पंचदशधा वा गुणितं सुदृढं ग्राह्यम् । नासा नासिका सैव नालः सच्छिद्रत्वात्तस्मिन्प्रवेशयेत् । मुखान्निर्गमयनिष्कासयेत् । तत्पकारस्त्वेवम् ।
-- - (५२) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:- सूत्रप्रान्तं नासानाले प्रवेश्येतरनासापुटमंगुल्या निरुध्य पूरकं कुर्यात् । पुनश्च मुखेन रेचयेत् । पुनःपुनरेवं कुर्वतो मुखे सूत्रप्रांतमायाति । तत्सूत्रप्रांतं नासाबहिःस्थसूत्र- प्रांतं च गृहीत्वा शनैश्चालयेदिति । चकारादेकस्मिन्नासानाले प्रवेश्येतरस्मिन्निर्गमये- दित्युक्तं तत्प्रकारस्त्वेकस्मिन्नासानाले सूत्रप्रान्तं प्रवेश्येतरनासापुटमंगुल्या निरुध्य पूरकं कुर्यात्पश्चादितरनासानालेन रेचयेत् । पुनःपुनरेवं कुर्वत इतरनासानाले सूत्रप्रांत- मायाति तस्य पूर्ववच्चालनं कुर्यादिति । अयं प्रकारस्तु बहुवारं कुर्वतः कदाचिद्भवति । एषोक्ता सिद्धराणिमादिगुणसंपन्नैः । तदुक्तम्-' अवाप्ताष्टगुणैश्वर्याः सिद्धाः सद्भि- निरूपिताः ' इति । नेतिनिगद्यते नेतिरिति कथ्यते ॥ २९ ॥ अब नेतिकर्मका वर्णन करते हैं कि वितरित ( विलायद) रिमित-भली-प्रकार स्निग्ध (चिकने) सूत्रको नासिकाके नालमें पविष्ट करके मुखमसे निकाल दे यह सिद्धोंने नेति कही है। यहां जितने सूत्रसे नेतिकर्म होसके उतना सूत्र लना कुछ वितस्तिका नियम नहीं और वह सूत्र नव दश वा पंद्रह तारका लेना। उस नेति करनेका प्रकार तो इस प्रकार है कि, सूत्रके प्रान्तभागको नासाके नालमें प्रविष्ट करके और दूसरी नासाके पुटको अंगुलिसे रोक- कर पूरकप्राणायाम करे फिर मुखसे वायुका रेचन करै वारंवार इस प्रकार करते हुए मनु- प्यके मुखमें सूत्रका प्रान्त आजाता है। मुखमें आये सूत्रके प्रान्त (छोर) को और नासिकाके बाहर टिके सूत्रप्रान्तको शनैः २ चलावे इसको नेतिकर्म कहते हैं और चकारके पढनसे एक नासिकाके नालमें प्रवेश करके दूसरी नासिकाके नालमें प्रवेश करले यह समझना । उसका प्रकार यह है कि, एक नासिकाके नालमें सूत्रके प्रांतको प्रवेश करके इतर नासिकाके पुटको अंगुलिसे दाबकर पूरक प्राणायाम करै फिर इतर नासिकाके नालसे प्राणका रेचन करे । वारं. वार इस प्रकार करते हुए मनुष्यकी दूसरी नासिकाके नालमें सूत्रका प्रांत आजाता है । उसका पूर्वके समानही चालन करै परन्तु यह प्रकार बहुतबार करनेवाले पुरुषको कदाचितही होता है। आणिमा आदि गुणोंसे युक्त सिद्धोंने यह नोति कही है सोई इस वचनसे कहा है कि, जिनको आणिमा आदि आठ प्रकारका ऐश्वर्य होवे वे सज्जनोंने सिद्ध कहे हैं ॥ २९॥ नेतिगुणानाह- कपालशोधिनी चैव दिव्यदृष्टिप्रदायिनी । जबूर्ध्वजातरोगौवं नेतिराशु निहन्ति च ॥ ३० ॥ कपालशोधिनीति ॥ कपालं शोधयति शुद्धं मलरहितं करोतीति कपाल- शोधिनी । चकारान्नासानालादीनामपि। एवशब्दोऽवधारणे। दिव्यां सूक्ष्मपदार्थग्राहिणी दृष्टिं प्रकर्षेण ददातीति दिव्यदृष्टिप्रदायिनी । नेतिक्रिया जत्रुणोः स्कंधसंध्योरूर्ध्वमुपरि- भागे जातो जलजातः स चासौ रोगाणामोघश्च तमाशु झटिति निहन्ति । चकारः पादपूरणे । 'स्कंधो भुजशिरोऽसोऽस्त्री संधी तस्यैव जत्रुणी ।' इत्यमरः ॥ ३० ॥ अब नेतिके गुणोंको कहते हैं कि, यह नेतिक्रिया कपालको शुद्ध करती है और चकारसे नासिका आदिके मलको दूर करती है और दिव्य दृष्टिको देती है और जत्रुके अर्थात् स्कंधकी ।
द्वितीयः] संस्कृतटीका--भाषाटीकासमेता । (५३) - संधिके ऊपरले भागके रोगोंका जो समूह उसको शीघ्र नष्ट करती है क्योंकि इस अमरकोशमें स्कन्ध भुजा शिर इनकी संधिको जत्रु कहा है ॥ ३० ॥ अथ त्राटकमाह- निरीक्षेनिश्चलदृशा सूक्ष्मलक्ष्यं समाहितः। अचसंपातपर्यंतमाचार्यस्त्राटकं स्मृतम् ॥३१॥ निरीक्षेदिति ॥ समाहितः एकाग्रचित्तः निश्चला चासौ दृक् च दृष्टिस्तया सूक्ष्म च तल्लक्ष्यं सूक्ष्मलक्ष्यमश्रूणां सम्यक पातः पतनं तत्पर्यंतम् । अनेन निरीक्षण- स्यावधिरुक्तः । निरीक्षेत्पश्येत् । आचार्यैर्मत्स्येन्द्रादिभिरिदं त्राटकं त्राटककर्म स्मृतं कथितम् ॥ ३१ ॥ अव त्राटकका वर्णन करते हैं कि, समाहित अर्थात् एकाग्रचित्त हुआ मनुष्य निश्चल दृष्टिसे सूक्ष्म लक्ष्यको अर्थात् लघुपदार्थको तबतक देखै जबतक अश्रुपात न होवे। यह मत्स्येन्द्र आदि आचार्योंने त्राटककर्म कहा है ॥ ३१ ॥ त्राटकगुणानाह- मोचनं नेत्ररोगाणां तन्द्रादीनां कपाटकम् । यत्नतस्त्राटकं गोप्यं यथा हाटकपेटकम् ॥ ३२॥ मोचनमिति ॥ त्रस्य रोगा नेत्ररोगास्तेषां मोचनं नाशकं, तन्द्रा आदिर्येषा- मालस्यादीनां तेषां कपाटकं कपाटवदन्तर्धायकमभिभावकमित्यर्थः । तन्द्रा तामस- श्चित्तवृत्तिविशेषः। त्राटकं त्राटकाख्यं कर्म यत्नतः प्रयत्नाद्गोप्यं गोपनीयम् ॥ गोपने दृष्टांतमाह-यथेति ॥ हाटकस्य सुवर्णस्य पेटकं पेटी इति लोके प्रसिद्धं यथा येन प्रकारेण गोप्यते तद्वत् ॥ ३२ ॥ अव त्राटकके गुण कहते हैं कि, यह त्राटककर्म नेत्रके रोगोंका नाशक है और तन्द्रा आलस्य आदिका कपाट है अर्थात् कपाटके समान तन्द्रा आदिका अन्तर्धान (तिरस्कार) करता है । तमोगुणी जो चित्तकी वृत्ति उसे तन्द्रा कहते हैं । यह त्राटककर्म इस प्रकार यत्नसे गुप्त करने योग्य है जैसे सुवर्णकी पेटी जगत्में गुप्त करने योग्य होती है ।। ३२ ॥ अथ नौलिकर्माह- अमन्दावर्तवेगेन तुन्दं सव्यापसव्यतः। नतांसो भ्रामयदेषा नौलिः सिद्धैः प्रचक्ष्यते ॥ ३३ ॥ अमन्देति ॥ नतौ नम्रीभूतावंसौ स्कन्धौ यस्य स नतांसः पुमानमन्दोऽतिश- यितो य आवर्तस्तस्येव जलभ्रमस्येव वेगो जवस्तेन तुन्दमुदरम् । 'पिचण्डकुक्षी जठरोदरं तुन्दं स्तनौ कुचौ ' इत्यमरः । सव्यं चापसव्यं च सव्यापसव्ये दक्षिणवाम- ?
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हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेशः
भागौ तयोः सव्यापसव्यतः । सप्तम्यर्थे तासः । भ्रामयेद भ्रमन्तं प्रेरयेत् । सिद्धैरेषा
नौलिः प्रचक्ष्यते कथ्यते ॥ ३३ ॥
अब नौलिका वर्णन करते हैं कि, नवाये हैं कांधे जिसने ऐसा मनुष्य अत्यन्त है वेग जिसका
ऐसे आवर्त (जलभ्रम ) के समान वेगसे अपने तुन्द (उदर) को सव्य और अपसव्य
(अर्थात् ) दक्षिणवामभागोंमें भ्रमावै सिद्धोंने यह नौलिकर्म कहा है ॥ ३३ ॥
नौलिगुणानाह-
मन्दाग्निसन्दीपनपाचनादिसन्धापिकाऽऽनन्दकरी सदैव ।
अशेषदोषामयशोषणी च हठक्रियामौलिरियं च नौलिः ॥३४॥
मन्दाग्नीति ॥ मन्दश्चासावाग्निर्जठराग्निस्तस्य दीपनं सम्यग्दीपनं च पाचनं
च भुक्तानपरिपाकश्च मन्दाग्निसन्दीपनपाचने ते आदिनी यस्य तन्मन्दाग्निसन्दी-
पनपाचनादि तस्य सन्धापिका विधात्री । आदिशब्देन मलशुद्धयादि । सदैव
सर्वदैवानन्दकरी सुखकरी अशेषाः समस्ताश्च ते दोषाश्च वातादय आमयाश्च रोगा-
स्तेषां शोषणी शोषणकर्ती । हठस्य क्रियाणां धौत्यादीनां मौलिमौलिरिवोत्तमा
धौतिवस्त्योनौलिसापेक्षत्वात् । इयमुक्ता नौलिः ॥ ३४ ॥
अब नौलिके गुणोंको कहते हैं कि, मन्दाग्निका भली प्रकार दीपन और अन्न आदिका पाचन
और सर्वदा आनन्द इनको यह नौलि करती है और अशेष (समस्त)जो वात आदि दोष
और रोग इनका शोषण (नाश) करती है और यह नौलि धौति आदि जो हठयोगकी क्रिया
हैं उन सबकी मौलि ( उत्तम ) रूप है ।। ३४ ॥
अथ कपालभाति तद्गुणं चाह-
भस्त्रावल्लोहकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमौ ।
कपालभातिर्विख्याता कफदोषविशोषणी ॥ ३५ ॥
भस्त्रावदिति ॥ लोहकारस्य भस्वाऽग्नेर्धमनसाधनीभूतं चर्म तद्वत्संभ्रमेण सह
वर्तमानौ ससंभ्रमावमन्दौ यौ रेचपूरौ रेचकपूरको कपालभातिरिति विख्याता । कीदृशी
कफदोषविशोषणी कफस्य दोषा विंशतिभेदभिन्नाः । तदुक्तं निदाने- 'कफरोगाश्च
विंशतिः' इति । तेषां विशोषणी विनाशिनी ॥ ३५ ॥
अब कपालभाति और उसके गुणोंको कहते हैं कि, लोहकारकी भस्त्राके समान संभ्रमसे
अर्थात् एकबार अत्यन्त शीघ्रतासे रेचक पूरक प्राणायामको करना वह योगशास्त्रमें कफदोषका
नाशक कपालभाति विख्यात है ॥ ३५॥
पटकर्मणां प्राणायामोपकारकत्वमाह-
षट्कर्मनिर्गतस्थौल्यकफदोषमलादिकः
प्राणायामं ततः कुर्यादनायासेन सिद्धयति ॥ ३६ ॥
द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। । षट्कर्मेति ॥ षट्कर्मभिधौतिप्रभृतिभिनिर्गताः स्थौल्यं स्थूलस्य भावः स्थूल- त्वम्, कफदोषा विंशतिसंख्याका मलादयश्च यस्य स तथा । ' शेषाद्विभाषा' इति कप्रत्ययः । आदिशब्देन पित्तादयः। प्राणायाम कुर्यात् । ततस्तस्मात्षट्कर्मपूर्वकात् प्राणायामादनायासेनाश्रमेण सिद्धयति । योग इति शेषः । षट्कर्माकरणे तु प्राणायामे श्रमाधिक्यं स्यादिति भावः ॥ ३६ ॥ अब इन छः पूर्वोक्त कमोंको प्राणायामकी उपकारकता वर्णन करते हैं कि, धौति आदि छः कर्मोंसे दूर भये हैं स्थूलता बीस प्रकारके कफदोष और मल पित्त आदि जिसके ऐसा पुरुष षट्कर्म करनेके अनन्तर प्राणायाम करे तो अनायाससे ( विनापरिश्रम ) प्राणायाम सिद्ध होताहै । यदि षट्कोंको न करके प्राणायामाको करै तो आधिक परिश्रम होताहै इससे षट्- कमक अनन्तरही प्राणायाम करना उचित ह ॥ ३६॥ मतभेदेन षट्कर्मणामनुपयोगमाह- प्राणायामैरेव सर्वे प्रशुष्यन्ति मला इति । आचार्याणां तु केषांचिदन्यत्कर्म न संमतम् ॥३७॥ प्राणायामैरिति ॥ प्राणायामैरेव । एवशब्दः षट्कर्मव्यवच्छेदार्थः । सर्वे मलाः प्रशुष्यन्ति । मला इत्युपलक्षणं स्थौल्यकफपित्तादीनाम् । इति हेतोः केषांचिदाचा- र्याणां याज्ञवल्क्यादीनामन्यत्कर्म षट्कर्म न संमतं नाभिमतम् । आचार्यलक्षणमुक्तं वायुपुराणे-'आचिनोति च शास्त्रार्थमाचरेत्स्थापयेदपि । स्वयमाचरते यस्मादाचार्य- स्तेन चोच्यते ॥' इति ॥ ३७ ।। अब मतभेदसे छः कर्मके अनुपयोगको कहते हैं कि, प्राणायामके करनेसेही सम्पूर्ण मल शुष्क होते हैं और स्थौल्य कफ आदिकी निवृत्तिभी प्राणायामोंसेही हो सकती है इससे किन्ही किन्ही आचार्योंको-प्राणायामोंसे अन्य जो धौति आदि कर्म हैं वे सम्मत नहीं हैं। वायुपुराणमें आचार्यका लक्षण यह कहा है कि, जो शास्त्रके अर्थका संग्रह करे और शास्त्रोक्तको स्वयं करै और अन्यास करावै वह आचार्य कहाता है ।। ३७ ।। गजकरणीमाह- उदरगतपदार्थमुद्रमन्ति पवनमपानमुदीर्य कण्ठनाले। क्रमपरिचयवश्यनाडिचक्रा गजकरणीति निगद्यते हठज्ञैः ॥३८॥ उदरगतमिति ॥ अपानं पवनमपानवायुं कण्ठनाले कण्ठो नाल इव कण्ठनाल- स्तस्मिन्नुदीयोंक्षिप्योदरे गतः प्राप्तः स चासौ पदार्थश्च भुक्तपीतान्नजलादिस्तं परयो- दमन्त्युद्भिरन्ति यथा योगिन इत्यध्याहारः । क्रमेण यः परिचयोऽभ्यासस्तेनावश्यं स्वाधीनं नाडीनां चक्रं यस्यां सा तथा । सा क्रिया हठज्ञैर्हठयोगाद्यभिज्ञैर्गजकरणीति:
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
निगद्यते कथ्यते । क्रमपरिचयवश्यनाडिमार्गा इति क्वचित्पाठस्तस्यायमर्थः-क्रमपरि-
चयेन वश्यो नाड्याः शंखिन्याः मार्मः कण्ठपर्यन्तो यस्यां सा तथा ॥ ३८ ॥
अब गजकरणीका वर्णन करते हैं कि, अपान वायुको ऊपरको उठाकर अर्थात् कण्ठके नालमें
पहुंचाकर उदरमें प्राप्त हुये अन्न जल आदि पदार्थको जिससे योगीजन उद्वमन करते हैं इसका
क्रमसे जो अभ्यास तिससे वशीभूत ( स्वाधीन) है नाडियोंका समूह जिसके ऐसी उस
क्रियाका नाम हठयोगके ज्ञाता आचार्योंने गजकरणी कहा है और कहीं 'क्रमपरिचयवश्यनाडि-
मार्गा' यहभी पाठ है उसका यह अर्थ है कि, क्रमसे किये अभ्याससे वशीभूत है शंखिनी नाडीका
कण्ठपर्यंत मार्ग जिसमें ऐसी गजकरणी कहाती है ॥ ३८ ॥
प्राणायामोऽवश्यमभ्यसनीयः सर्वोत्तमैरभ्यस्तत्वान्महाफलत्वाच्चोते सूचयन्नाह
चतुर्भि:-
ब्रह्मादयोऽपि त्रिदशाः पवनाभ्यासतत्पराः ।
अभूवन्नन्तकभयात्तस्मात्पवनमभ्यसेत् ॥ ३९॥
ब्रह्मादय इति ॥ ब्रह्मा आदिर्येषां ते ब्रह्मादयस्तेऽपि । किमुतान्य इत्यर्थः । त्रिदशाः
देवाः अन्तयतीत्यन्तकः कालस्तस्माद्भयमन्तकभयं तस्मात्पवनस्य प्राणवायो-
रभ्यासो रेचकपूरककुम्भकभेदभिन्नप्राणायामानुष्ठानरूपस्तस्मिंस्तत्परा अवहिता
अभूवन्नासन् । तस्मात्पवनमभ्यसेत्याणमभ्यसेत् ॥ ३९ ॥
अब प्राणायामके अवश्य अभ्यास और सर्वोत्तमोंके कर्तव्य और फलका वर्णन करते हैं
कि, ब्रह्मा आदि देवताभी अन्तकके भयसे अर्थात् काल जीतनेके लिये प्राणवायुके अभ्यासमें
तत्पर हुए अर्थात् रेचक, कुम्भक, पूरक भेदोंसे भिन्न २ जो प्राणायाम उनके करनेमें सावधान
रहे तिससे प्राणायामके अभ्यासको अवश्य करे ॥ ३९॥
यावद्वद्धो मरुद्देहे यावञ्चित्तं निराकुलम् ।
यावदृष्टिभ्रुवोर्मध्ये तावत्कालभयं कुतः॥४०॥
यावदिति ॥ यावद्यावत्कालपर्यन्तं मरुत्प्राणानिलो देहे शरीरे बद्धः श्वासोच्छ्वास-
क्रियाशून्यः । यावञ्चित्तमन्तःकरणं निराकुलमविक्षिप्तं समाहितम् । यावद् भ्रुवोर्मध्ये
दृष्टिरन्तःकरणवृत्तिः । दृष्टिरत्र ज्ञानसामान्यार्थः । तावत्तावत्कालपर्यन्तं कलयतीति
कालोऽन्तकस्तस्माद्भयं कुतः न कुतोऽपीत्यर्थः । तथा च वक्ष्यति-खाद्यते न च
कालेन बाध्यते न च कर्मणा । साध्यते न स केनापि योगी युक्तः समाधिना ॥
इति । स्वाधीनो भवतीत्यर्थः॥४०॥
यावत्कालपर्यन्त प्राणवायु शरीरमें बद्ध है अर्थात् श्वास और उच्छ्वास क्रियासे शून्य है
और इतने अन्तःकरण निराकुल अर्थात् विक्षेपरहित वा सावधान ह और इतने भ्रुकुटियोंके
मध्यमें अन्त:करणकी वृत्ति है तावत्कालपर्यन्त कालसे भय किसी प्रकार नहीं होसकता है
अर्थात् योगी स्वाधीन होजाता है सोई आगे कहेंगे कि, उस योगोको कोई खा नहीं सकता न
कोई कर्म बांध सकता न कोई उसे साधसकता जो योगी समाधिसे युक्त है ॥ ४०॥
द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (५७) विधिवत्प्राणसंयामैर्नाडीचके विशोधिते। सुषुम्नावदनं भित्त्वा सुखाद्विशति मारुतः ॥ ११ ॥ विधिवदिति ॥ विधिवत्प्राणसयामैरासनजालन्धरबन्धादिविधियुक्तप्राणायामै- नांडीचक्रं नाडीनां चक्र समूहस्तस्मिन्विशोधित निर्मले सति मारुतो वायुः सुषुम्ना इडापिंगलयोर्मध्यस्था नाडी तस्या वदनं मुखं भित्त्वा सुखादनायासाद्विशति । सुषु- म्नान्तरिति शेषः ॥ ४१ ॥ विधिपूर्वक अर्थात् आसन जालन्धरबन्ध आदिपूर्वक किये हुए प्राणायामोंसे नाडियोंके समूहके भलीप्रकार शोधन हुएपर प्राणवायु इडा और पिंगलाके मध्यमें वर्तमान सुषुम्ना- नाडीके मुखको भली प्रकार भेदन करके सुषुम्नाके मुखमें सुखसे प्रविष्ट होजाता है ॥ ४१ ।। मारुते मध्यसञ्चार मनास्थैर्य प्रजायते। यो मनःसुस्थिरीभावःसैवावस्था मनोन्मनी॥४२॥ मारुत इति ॥ मारुते प्राणवायौ मध्ये सुषुम्नामध्ये संचारः सम्यक्चरणं गमनं मूर्धपर्यन्तं यस्य स मध्यसञ्चारस्तस्मिन् सति मनसः स्थैर्य ध्येयाकारवृत्तिप्रवाहो जायते प्रादुर्भवति । यो मनसः सुस्थिरीभावः सुष्ठस्थिरीभवनं सैव मनोन्मन्यवस्था । मनोन्मनीशब्द उन्मनीपर्यायः । तथा ग्रे वक्ष्यति-राजयोगः समाधिश्च' इत्यादिना४२ जब प्राणवायुका सुषुम्नाके मध्यमें संचार होनेपर मनकी स्थिरता होजाती है अर्थात् ध्यान करने योग्य वस्तुक आकारकी वृत्तियोंका प्रवाह होजाता है वह जो मनका भलोप्रकार स्थिर होजाना है उसकोही मनोन्मनी अवस्था कहतेहैं । यहां मनोन्मनीशब्द उन्मनीका पर्याय है यही बात राजयोग और समाधियोगसे आगे कहेंगे॥४२॥ विचित्रेषु कुंभकेषु प्रवृत्तिं जनयितुं तेषां मुख्यफलमवांतरफलं चाह- तत्सिद्धये विधानज्ञाश्चित्रान्कुर्वन्ति कुंभकान् । विचित्रकुंभकाभ्यासाद्विचित्रां सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ४३ ॥ तत्सिद्धय इति ॥ विधानं कुम्भकानुष्ठानप्रकारस्तज्जानंतीति विधानज्ञास्तत्सिद्धये उन्मन्यवस्थासिद्धये चित्रान्सूर्यभेदनादिभेदेन नानाविधान्कुम्भकान्कुवैति । विचित्राश्च ते कुम्भकाश्च विचित्रकुम्भकास्तेषामभ्यासादनुष्ठानाद्विचित्रामणिमादिभेदेन नाना- विधा विलक्षणां वा जन्मौषधिमंत्रतपोजाताम् । तदुक्तं भागवते 'जन्मौषधितपोमंत्र- वितीरिह सिद्धयः। योगेनामोति ताः सर्वा नान्यैर्योगगतिं व्रजेत् ॥' इति । आप्नुयात् प्रत्याहारादिपरंपरयेति भावः ॥ १३ ॥ विचित्र कुंभकप्राणायामोंमें प्रवृत्ति होनेके लिये उनके मुख्य फल और अवान्तरफलको कहते हैं कुंभक प्राणायामको विधिके ज्ञातायोगीजन उन्मनी अवस्थाकी सिद्धिके लिये अनेक प्रकारके (५८) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेश:- अर्थात् सूर्यभेदन आदिसे भिन्न २ प्राणायामोंको करते हैं, क्योंकि विचित्र कुंभकप्राणायामोंके अभ्याससे विचित्रही सिद्धिको प्राप्त होजाता है अर्थात् जन्म, औषधी, मंत्र, तप इनसे उत्पन्न हुई विलक्षण सिद्धि कुंभक प्राणायामोंसे होती है । सोई भागवतमें कहा है कि, उत्तम जन्म औषधि तप और मंत्र इनसे जितनी सिद्धि होती हैं उन सबको योगी योगसे प्राप्त होता है और अन्य काँसे योगकी गति प्राप्त नहीं होती और उस गतिकी प्राप्ति प्रत्याहार आदिकी परम्परासे समझनी ॥४३॥ अथाष्टकुम्भकभेदान्नामाभिनिर्दिशति- सूर्यभेदनमुनायी सीत्कारी शीतली तथा । भस्त्रिका भ्रामरी मूर्छा प्लाविनीत्यष्ट कुंभकाः ॥१४॥ सूर्यभेदनमिति ॥ स्पष्टम् ॥ १४ ॥ अब आठ कुंभक प्राणायामोंको नाम लेलकर दिखाते हैं कि, सूर्यभेदन, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा, प्लाविनी ये आठ प्रकारके कुंभकप्राणायाम जानने ॥ ४४॥ अथ हठसिद्धावनन्यसिद्धां पारमहंसी सर्वकुम्भकसाधारणयुक्तिमाह त्रिभिः- पूरकान्ते तु कर्तव्यो बंधो जालन्धराभिधः । कुंभकान्ते रेचकादौ कर्तव्यस्तूड्डियानकः॥४५॥ पूरकान्त इति ॥ जालंधर इत्यभिधा नाम यस्य स जालंधराभिधो बंधो बध्नाति प्राणवायुमिति बंधः कण्ठाकुञ्चनपूर्वकं चिबुकस्य हृदि स्थापनं जालन्धरबन्धः पूरकांते पूरकस्यांते पूरकानन्तरं झटिति कर्तव्यः । तुशब्दात्कुम्भकादावुड्डियानकस्तु कुम्भ कांते कुम्भकस्यांते किंचित्कुम्भकशेषे रेचकादौ रेचकात्पूर्व कर्तव्यः । प्रयत्नविशेषेण नाभिप्रदेशस्य पृष्ठत आकर्षणमुड्डियानबंधः ॥ ४५ ॥ अब हठसिद्धिके विषे परमहंसोंकी उस सर्वकुंभक साधारण युक्तिको तीन श्लोकोंसे कहते हैं-जा अन्यसे सिद्ध न होसकै कि, पूरकप्राणायामके अंतमें जालंधर है नाम जिसका वह बंध करना अर्थात् कंठके आकुंचनको करके चिबुकको हृदयमें स्थापनरूप जालंधरबंधसे प्राण- वायुका बंधन करै और तुशब्दसे कुंभककी आदिमें भी जालंधर बंध करै और कुंभकके अंतमें अर्थात् कुंभकके किंचित् शेष रहनेपर और रेचकप्राणायामकी आदिमें उड्डियानबंधको करै प्रयत्न विशेषसे नाभिप्रदेशका पीठसे जा आकर्षण उसे उड्डियानबंध कहते हैं ॥ ४५ ॥ अधस्तात्कुञ्चनेनाशु कण्ठसङ्कोचने कृते । मध्ये पश्चिमतानेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः ॥ ४६॥ अधस्तादिति ॥ कण्ठस्य संकोचनं कण्ठसंकोचनं तस्मिन्कृते सति जालंधर- बंधे कृते सतीत्यर्थः । आश्वव्यवहितोत्तरमेवाधस्तादध प्रदेशादाकुंचनेनाधाराकुचनेन मूलबंधनेत्यर्थः । मध्ये नाभिप्रदेशे पश्चिमतः पृष्ठतस्तानं ताननमाकर्षणं तेनोड्डियान- बर्धनत्यर्थः । उक्तरीत्या कृतेन बंधत्रयेण प्राणो वायुर्ब्रह्मनाडी सुषुम्नां गच्छतीति - द्वितीयः ] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। ब्रह्मनाडिगः सुषुम्नानाडिगामी स्यादित्यर्थः। अत्रेदं रहस्यम् । यदि श्रीगुरुमुखा- ज्जिबाबन्धः सम्यक् परिज्ञातस्तर्हि जिह्वावन्धपूर्वकेण जालन्धरबन्धेनैव प्राणायाम सिध्यति । वायुप्रकोपेनैवमधातुर्वपुःकृशत्वं वदने प्रसन्नतेत्यादीनि सर्वाणि लक्षणानि जायन्त इति मूलबन्धोड्डियानबन्धौ नोपयुक्तौ । तयोजिह्वावन्धपूर्वकेण जालन्धरबन्धे- नान्यथा सिद्धत्वात् । जिह्वाबंधो न विदितश्चेदधस्ताकुंचनेनेति श्लोकोक्तरीत्या प्राणा- यामाः कर्तव्याः । त्रयोऽपि बन्धा गुरुमुखाज्ज्ञातव्याः । मूलबन्धस्तु सम्यगज्ञातो नानारोगोत्पादकः । तथा हि । यदि मूलबन्धे कृते धातुक्षयो विष्टंभोऽग्निमांद्यं नाद- मांचं गुटिकासमूहाकारमजस्येव पुरीषं स्यात्तदा मूलबंधः सम्यक् न जात इति बोध्यम् । यदि तु धातुपुष्टिः सम्यक् मलशुद्धिरग्निदीप्तिः सम्यक् नादाभिव्यक्तिश्च स्यात्तदा ज्ञेयं मूलबन्धः सम्यक् जातः इति ॥ ४६॥ कंठका संकोचन करनेपर अर्थात् जालंधर बंध किये पीछे शीघ्रही नीचेके प्रदेशसे आकुं- चन होनेसे अर्थात् आकुंचनसे मूलबंध होनेसे हुआ जो मध्यमें पश्चिमतान अर्थात् पृष्ठसे नाभिप्रदेशमें प्राणका आकर्षणरूप उड्डियानबंधसे प्राण ब्रह्मनाडीगत होजाता है। सुषुम्ना- नाडीमें पहुँच जाता है, यहां यह रहस्य अर्थात् गोप्य वस्तु है कि, यदि गुरुमुखसे जिह्वाबंध भली प्रकार जानलिया होय तो जिह्वाबंधके करनेके अनंतरही जालंधर बंधसे प्राणायाम सिद्ध होता है अर्थात् वायुके प्रकोपनसेही धातुओंकी प्रसन्नता देहमें कृशता और मुखकी प्रसन्नता आदि संपूर्ण लक्षण हो जाते हैं इससे मूलबंध उड्डियानबंध करनेका कुछ उपयोग नहीं और जिह्वाबंध न जाना होय तो इस श्लोकमें उक्त रीतिसे प्राणायाम करने और ये तीनों बंध गुरुमुखसे जानने योग्य हैं, क्योंकि भली प्रकार न जाना हुआ मूलबंध नाना- रोगोंको पैदा करता है सोई दिखाते हैं कि, यदि मूलबंध कियेपर धातुका क्षय विष्टंभ भंदाग्नि नादकी मंदता और गुटिकाके समूहकेसा है आकार जिसका ऐसा बकरीके समान पुरीष (मल) होय तो यह जानना कि, मूलबन्ध भली प्रकार नहीं हुआ और यदि धातुओंकी पुष्टि भली प्रकार मलशुद्धि और अग्निका दीपन और भली प्रकार नादकी प्रकटता होय तो यह जानना कि मूलबंध भली प्रकार हुआ है. भावार्थ यह है-कण्ठके संकोच कियेपर नीचेके प्रदेशसे प्राणके आकुंचनसे पश्चिमतान करनेपर नाभिप्रदेशमें पृष्ठसे प्राणके आकर्षणसे प्राणं सुषुम्नामें पहुँच जाता है। ४६ ।। अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्राणं कण्ठादधो नयेत् । योगी जराविमुक्तः सन् षोडशाब्दवया भवेत् ॥४७॥ अपानमिति ॥ अपानमपानवायुमूर्ध्वमुत्थाप्याधाराकुश्चनेन प्राणं प्राणवायु कण्ठादधः अधोभागे नयेत्प्रापयेद्यः स योगी योगोऽस्यास्ति अभ्यस्यत्वेनेति योगी योगाभ्यासी जरया वार्धक्येन विमुक्तो विशेषेण मुक्तः सन् । षोडशानामब्दानां समा* हारः षोडशाब्दं षोडशाब्दं वयो यस्य स तादृशो भवेत् । यद्यपि ' पूरकान्ते तु कर्तव्यः' इत्यादिना त्रयाणां श्लोकानामेक एवार्थः पर्यवस्यति तथापि ' पूरकान्ते तु (६०) हठयोगप्रदीपिका । [उपदेशः- कर्तव्यः' इत्यनेन बन्धानां काल उक्तः। अधस्तात्कुञ्चनेन ' इत्यनेन बन्धानां स्वरूपमुक्तम् । ' अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य ' इत्यनेन बन्धानां फलमुक्तमिति विशेषः । जालन्धरबन्धे मूलबन्धे च कृते नाभेरधोभाग आकर्षणाख्ये बन्ध उड्डियानबन्धो भवत्येवेत्यस्मिन् श्लोके नोक्तः । तथाचोक्तं ज्ञानेश्वरेण गीताषष्ठाध्यायव्याख्यायाम्- मूलबन्धे जालन्धरबन्धे च कृते नाभेरधोभाग आकर्षणाख्यो बन्धः स्वयमेव भवति' इति ॥ ४७॥ अपानवायुको ऊर्ध्व ( ऊपर) को उठाकर आधाराकुंचनसे प्राणवायुको जो कण्ठके अधो- भागमें स्थापन करै वह योगी जरासे विमुक्त होता है और षोडश वर्षका है देह जिसका ऐसा होता है. यद्यपि पूर्वोक्त तीनों श्लोकोंका अन्तमें एकही अर्थ होता है तथापि (पूरकान्ते) इस प्रथम श्लोकसे बन्धोंका समय कहा है और (अधस्ताकुंचनेन ) इस दूसरे श्लोकसे बन्धोंका स्वरूप कहा (अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य ) इस तीसरे श्लोकसे बन्धोंका फल कहा है यह विशेष जानना और जालंधरबन्ध मूलबन्ध करनेपर नाभिके भागमें आकर्षण नामका बन्ध जो उड्डियान बंध है वह स्वयंही हो जाता है इससे इस श्लोकमें नहीं कहा, सोई ज्ञानेश्वरने भीतामें छठे अध्यायकी व्याख्यामें कहा है-मूलबन्ध जालंधर किये पीछे आकर्षण नामका बन्ध स्वयंही हो जाता है ॥४७॥ अथोद्देशानुक्रमेण कुम्भकान्विवास्तत्र प्रथमोदित सूर्यभेदनं तदगुणांश्चाह त्रिभिः- आसने सुखदे योगी बद्धा चैवासनं ततः। दक्षनाड्या समाकृष्य बहिःस्थं पवनं शनैः॥१८॥ " योगाभ्यासक्रमं वक्ष्ये योगिनां योगसिद्धये । उषःकाले समुत्थाय प्रातःकाले- ऽथवा बुधः ॥ १ ॥ गुरुं संस्मृत्य शिरसि हृदये स्वेष्टदेवताम् । शौचं कृत्वा दन्तशुद्धिं विदध्याद्भस्मधारणम् ॥ २ ॥ शुचौ देशे मठे रम्ये प्रतिष्ठाप्यासनं मृदु । तत्रोपविश्य संस्मृत्य मनसा गुरुमीश्वरम् ॥ ३ ॥ देशकालौ च संकीर्त्य संकल्प्य विधिपूर्वकम् । अयेत्यादिश्रीपरमेश्वरप्रसादपूर्वकं समाधितत्फलसिद्धयर्थमासनपूर्वकान् प्राणायामादीन करिष्ये । अनन्तं प्रणमेदेवं नागेशं पीठसिद्धये ॥ ४ ॥ मणिभ्राजत्फणासहस्रविधृत- विश्वंभरामण्डलायानन्ताय नागराजाय नमः । ततोऽभ्यसेदासनानि श्रमे जाते शवा- सनम् । अन्ते समभ्यसेत्तत्तु श्रमाभावे तु नाभ्यसेत् ॥ ५ ॥ करणी विपरीताख्यां कुम्भकात्पूर्वमभ्यसेत् । जालन्धरप्रसादार्थ कुम्भकात्पूर्वयोगतः ॥ ६ ॥ विवायाचमनं कृत्वा कर्मागं प्राणसंयमम् । योगीन्द्रादीन्नमस्कृत्य कौर्माच शिववाक्यतः ॥ ७ ॥" कूर्मपुराणे शिववाक्यम्-"नमस्कृत्याथ योगीन्द्रान्सशिष्यांश्च विनायकम् । गुरुं चैवाथ मां योगी युञ्जीत सुसमाहितः ॥ ८ ॥ बद्ध्वाऽभ्यासे सिद्धपीठं कुम्भकावन्धपूर्वकम् । मथमे दश कर्तव्याः पञ्चवृद्धया दिनेदिने ॥ ९ ॥ कार्या अशीतिपर्यन्तं कुम्भकार सुसमाहितैः । योगीन्द्रः प्रथमं कुर्यादभ्यासं चन्द्रसूर्ययोः॥१०॥ अनुलोमविलोमाख्य- । द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमता। मेतं प्राहुर्मनीषिणः । सूर्यभेदनमभ्यस्य बन्धपूर्वकमेकधीः ॥ ११ ॥ उज्जायिनं ततः कुर्यात्सीत्कारी शीतली ततः । भस्त्रिकां च समभ्यस्य कुर्यादन्यान्नवापरान् ॥ १२ ॥ मुद्राः समभ्यसेद्वद्ध्वा गुरुवत्राद्यथाक्रमम् । ततः पद्मासनं बद्ध्वा कुर्यान्नादानुचिन्त- नम् ॥ १३ ॥ अभ्यासं सकलं कुर्यादीश्वरार्पणमादृतः । अभ्यासादुत्थितः स्नानं कुर्यादुष्णेन वारिणा ॥ १४॥ स्नात्वा समापयेन्नित्यं कर्म संक्षेपतः सुधीः । मध्याह्ने- ऽपि तथाऽभ्यस्य किंचिद्विश्रम्य भोजनम् ॥ १५॥ कुर्वीत योगनां पथ्यमपथ्यं न कदा- चन । एलां वापि लवङ्गं वा भोजनान्ते च भक्षयेत् ॥ १६ ॥ केचित्कर्पूरमिच्छन्ति ताम्बूलं शोभनं तथा । चूर्णेन रहितं शस्तं पवनाभ्यासयोगिनाम् ॥ १७ ॥ इति चिन्ता. मणेर्वाक्यं स्वारस्यं भजते नहि । केचित्पदेन यस्मात्तु तयोः शीतोष्णहेतुना ॥१८॥ भोजनानन्तरं कुर्यान्मोक्षशास्त्रावलोकनम् । पुराणश्रवणं वापि नामसंकीर्तनं विभोः ॥ १९ ॥ सायंसन्ध्याविधिं कृत्वा योगं पूर्ववदभ्यसेत् । यदा त्रिघटिकाशेषो दिवसो- ऽभ्यासमाचरेत् ॥ २० ॥ अभ्यासानन्तरं कार्या सायंसन्ध्या सदा बुधैः । अर्धरात्रे हठाभ्यासं विदध्यात्पूर्ववद्यमी ॥ २१ ॥ विपरीतां तु करणी सायंकालार्धरात्रयोः । नाभ्यसेद्भोजनादूर्ध्वं यतः सा न प्रशस्यते ॥ २२ ॥ आसन इति ॥ सुखं ददातीति सुखदं तस्मिन्सुखदे । 'शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ' इत्युक्तलक्षणे विविक्तदेशे सुखासनस्थः शुचिः “समग्रीवशिरःशरीरम् ' इति श्रुतेश्च । चैलाजिन- कुशोत्तर आसने । आस्तेऽस्मिन्नित्यासनम् आस्यतेऽनेनेति वा तस्मिन् योगी योगा- भ्यासी । आसनं स्वस्तिकवीरसिद्धपद्माद्यन्यतमं मुख्यत्वात्सिद्धासनमेव वा बद्ध्वा बन्धनेन सम्पाद्यैव कृत्ववेत्यर्थः। तत आसनबन्धानन्तरं दक्षा दक्षिणभागस्था या नाडी पिंगला तया बहिःस्थं देहाद्वहिर्वर्तमानं पवनं वायुं शनैमदमंदमाकृष्य पिंगलया मन्द- मन्दं पूरकं कृत्वेत्यर्थः॥४८॥ अब सूर्यभेदन आदि आठ कुंभकाके वर्णन करनेके आभिलाषी आचार्य सबसे प्रथम जो सूर्यभेदन उसका वर्णन करते हैं और हम कुछ योगाभ्यासका क्रम यहांपर लिखते हैं कि, योगियोंकी योगसिद्धि के लिये योगाभ्यासको कहते हैं उससे अर्थात् प्रातःकालमें उठकर और शिरपर अपने गुरुका और हृदयमें अपने इष्टदेवका वर्णन करके दंतधावन और भस्मधारण करै शुद्धदेश और रमणीय मठमें कोमल आसन बिछाकर उसपर बैठकर और ईश्वर और गुरुका मनसे स्मरण करके देश और कालका कथन करके अर्थात् विधिपूर्वक संकल्प करे कि, अधेत्यादि श्रीपरमेश्वरकी प्रसन्नतापूर्वक समाधि और उसके फलकी सिद्धिके लिये आसन- पूर्वक प्राणायामोंको करताहूँ। और आसनकी सिद्धिके लिये अनंत जो नागेश देव हैं उनको प्रणाम करै कि, मणियोंसे शोभायमान सहस्रों फणोंपर धारण किया है विश्वमंडल जिसने ऐसे अनंत नागराजको नमस्कार है । फिर आसनोंका अभ्यास करै और परिश्रम होय तो शवा- सन करै और उसका अन्तमें अभ्यास करै श्रम न होय तो शवासनका अभ्यास न करे और (६२) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- । विपरीत है नाम जिसका ऐसी करणीका कुंभकसे पूर्व अभ्यास करै जालंधरकी प्रसन्नता (सिद्धि) के लिये कुंभकसे पूर्व आचमन करके कर्मका अंग जो प्राणसंयम उसको करै। कूर्मपुराणमें शिवके वचनानुसार योगीन्द्रोंको नमस्कार करके, कूर्मपुराणमें शिवका वाक्य यह है कि, शिष्योंसहित और गणेश गुरु और मुझ शिवजीको नमस्कार करके भली प्रकार साव- धान हुआ योगी योगाभ्यास करै और अभ्यासके समय कुंभकसे बंधपूर्वक सिद्ध पीठ(आसन) बांधकर पहिलेदिन दश प्रणायाम करै । फिर दिन दिनमें ( प्रतिदिन) पांच पांचकी वृद्धिसे प्राणायाम करै इस प्रकार अस्सी प्राणायामोंको भली प्रकार सावधान मनुष्य करै । प्रथम योगीन्द्र चंद्र और सूर्यका अभ्यास करै और बुद्धिमान् मनुष्योंने यह अनुलोम विलोम रूपसे दो प्रकारका कहा है और एकाग्रबुद्धि होकर बंधपूर्वक सूर्यभेदनका अभ्यास करके फिर उज्जायीको करै फिर सीत्कारी और शीतलीको करै फिर भस्त्रिकाका अभ्यास करके अन्य प्राणायामको करै वा न करै और प्राणोंको बांधकर गुरुमुखसे कहे क्रम अनुसार मुद्रा- ओंका भली प्रकार अभ्यास करै फिर पद्मासनको बांधकर नादका अनुचिंतन ( स्मरण ) करै और आदरपूर्वक ईश्वरार्पणबुद्धिसे संपूर्ण अभ्यासको करे और अभ्याससे उठकर उष्ण जलसे स्नान करै और-संक्षपसे किये नित्यके कर्मको स्नान करके बुद्धिमान् मनुष्य समाप्त करें और मध्याह्नमें भी तिसी प्रकार अभ्यास करनेके अनंतर कुछ विश्राम करके भोजन करै। योगियोंको पथ्य भोजन करावे अपथ्य कदापि न करावे । इलायची वा लौंग भोजनके अन्तमें भक्षण करै और कोई आचार्य कपूर और सुन्दर तांबूलके भोजनको कहते हैं और प्राणायामके अभ्यासी योगियोंको चूनेसे रहित तांबूल श्रेष्ठ होता है । केचित्पदके पढनेसे यह चिंतामणिका वचन उत्तम नहीं है क्योंकि चंद्र और सूर्य शीत उष्णके हेतु हैं। भोजनके अनन्तर मोक्षशास्त्रको देखै (विचारै) और जब तीन घटी दिन शेष रहै तब फिर अभ्यास करै और अभ्यासके अनंतर बुद्धिमान् मनुष्य सायंसन्ध्याको करै फिर योगी अर्द्धरातके समय पूर्वके समान हठयोगका अभ्यास करै और सायंकाल और अर्द्धरात्रके समयमें विपरीतकरणीका अभ्यास न करें, क्योंकि भोजनके अनंतर विपरीतकरणो श्रेष्ठ नहीं कही है। अब प्रासंगिकको समाप्त करके श्लोकार्थको कहते हैं कि सुखदायी आसनपर योगी पूर्वोक्त अर्थात् शुद्ध देशमें न 'अत्यन्त ऊंचा और न अत्यन्त नीचा और जिसपर क्रमसे वस्त्र मृगचर्म बिछे हों ऐसे आस- नको बांधकर जिसमें “ग्रीवा शरीर शिर ये समान रहैं " इस श्रुतिके अनुसार ऐसे आस- नको बांधकर अर्थात् स्वस्तिक वीर सिद्ध पद्म कोईसे आसनसे बैठकर फिर दक्षिण नाडी (पिंगला) से देहसे बाहर वर्तमान जो पवन उसको शनैः २ खींचकर अर्थात् पिंगला नाडीसे पूरकप्राणायामको करके ॥४८॥ आकेशादानखानाच निरोधावधि कुंभयेत् । ततः शनैः सव्यनाड्या रेचयेत्पवनं शनैः॥ १९॥ आकेशादिति ॥ केशाना मर्यादीकृत्याकेशं तस्मान्नखाग्राना मर्यादीकृत्येत्यान- स्वाग्रं तस्माच निरोधस्य वायोरवरोधस्यावधिर्मर्यादा यस्मिन्कर्मणि तत्तथा कुंभयेत् । केशपर्यंत नखाग्रपर्यंतं च वायोनिरोधो यथा भवेत्तथाऽतिप्रयत्नेन कुंभकं कुर्यादित्यर्थः। ननु 'हठानिरुद्धः प्राणोऽयं रोमकूपेषु निःसरेत् । देहं विदारयत्येष कुष्टादि जनय- - द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। त्यापि ॥ ततः प्रत्यापितव्योऽसौ क्रमेणारण्यहस्तिवत् । वन्यो गजो गजारिर्वा क्रमेण मृदुतामियात् । करोति शास्त्र निर्देशान्न च तं परिलंघयेत् । तथा प्राणो हृदिस्थोऽयं योगिनां क्रमयोगतः ॥ गृहीतः सेव्यामानस्तु विश्रंभमुपगच्छति' इति वाक्यविरुद्ध- मिति प्रयत्नेन कुंभकं कुर्यादिति कथमुक्तमिति चेन्न ।' हठानिरुद्धः प्राणोऽयम् इति वाक्यस्य बलादचिरेण प्राणजयं करिष्यामीति बुद्ध्यारंभः ।। एवं च बह्वभ्यासा- सक्तपरत्वाकमेणारण्यहस्तिवदिति दृष्टांतस्वारस्याच्च । अत एव सूर्याचंद्रमसोरभ्यासे धारयित्वा यथाशक्ति निधारयेदिति निरोधत इति चोक्तं संगच्छते । तस्मात्कुंभकस्त्व- तिप्रयत्नपूर्वकं कर्तव्यः। यथायथाऽतियत्नेन कुंभकः क्रियते तथातथा तस्मिन्गुणाधिक्यं भवेत् यथायथा च शिथिल: कुंभकः स्यात्तथातथा गुणाल्पत्वं स्यात् । अत्र योगिना- मनुभवोऽपि मानम् । पूरकस्तु शनैः शनैः कार्यः वेगाहा कर्तव्यः । वेगादपि कृते पूरके दोपाभावात् । रेचकस्तु शनैः शनैरेव कर्तव्यः। वेगात्कृते रेचके बलहानिप्रसंगात् । ततः शनैःशनैरेव रेचयेन तु वेगतः।' इत्याद्यनेकधा ग्रंथकारोक्तेश्च । ततो निरोधा वधि कुम्भकानन्तरं शनैःशनैमैदमंदं सव्ये वामभागे स्थिता नाडी सव्यनाडी तया सव्य- नाड्या इडया पवनं वायु रेचयेदहिनिःसारयेत् । पुनः शनैरित्युक्तिस्तु शनैरेव रेचये- दित्यवधारणार्था । तदुक्तं-'विस्मये च विषादे च दैन्ये चैवावधारणे । तथा प्रसादने हर्षे वाक्यमेकं द्विरुच्यते ॥ इति ॥ ४९ ॥ और नखाग्रसलकर केशोंपर्यंत जबतक निरोध होय अर्थात् संपूर्ण शरीरमें पवन रुकजाय तावत्पर्यंत कुम्भकप्राणायाम करै । कदाचित् कोई शंका करें कि, हठसे रोका यह प्राण रोम कूपोंके द्वारा निकलजायगा देह कट जायगा वा कुष्ठ आदि रोग हो जायेंगे तिससे इसको यत्नसे प्रतीतिके द्वारा इसप्रकार रखना चाहिये जैसे वनके हस्तीको वशमें रखते हैं कि, वनका हाथी वा सिंह क्रमसे मृदु होजाता है और स्वामोकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करता और शास्त्रोक्त अपन स्वामीकी आज्ञाको करता है तिसी प्रकार हृदयमें स्थित यह प्राण भी क्रमसेही योगियोंको ग्रहण करना चाहिये क्योंके सेवा करनेसे प्राण विश्वासको प्राप्त होजाता है। इस वाक्यके विरुद्ध आपका कथन है इससे कैसे कहते हो कि, यत्नसे कुम्भकको करै यह किसीकी शंका ठीक नहीं क्योंकि 'हठसे रोकाहुआ प्राण ' इस वाक्यका इस बुद्धिसे आरंभ है कि, बलसे शीघ्रही मैं प्राणका जय करूंगा इससे उसके लिये ही यह वचन है कि, जो बहुत अभ्यास करनेमें असमर्थ है इसीसे क्रमसे वनके हस्तीके समान यह दृष्टान्त भी ठीक लगसक्ता है इसीसे सूर्य और चन्द्रमा नाडीके अभ्याससे धारण करके ( रोककर) यथाशक्ति धारण करै यह भी पूर्वोक्त संगत होता है तससे अत्यन्त प्रयत्नसे कुंभकप्राणायाम करना क्योंकि जैसे २ प्रयत्नसे कुम्भक किया जाता है तैसा २ ही उसमें अधिक गुण होता है और जैसा २ शिथिल होता है तैसा तैसा ही अल्पगुण होता है और इसमें योगियोंका अनुभव भी प्रमाण है पूरकप्राणायाम तो शनैः वा वेगसे करना क्योंकि वेगसे किये भी पूरकमें दोष नहीं- और रेचक तो शनैः करना क्योंकि वेगसे रेचक करने में बलकी हानि होती है तिससे शनैः २ ही रेचक करै वेगसे न करै-इत्यादि अनेक ग्रन्थकारोंकी युक्तिसे पूर्वोक्त शंका ठीक नहीं है- 2 हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- (६४) फिर प्राणके निरोषपर्यन्त कुम्भकके अनतर सव्य नाडीसे अथात् वामभागमें स्थित इडा नाडीके द्वारा प्राणवायुका शनैः २ रेचन करै इस श्लोकमें पुनः जो शनैःपद पडा है वह अवधारणके लिये है सोई इस वचनमें कहा है कि, विस्मय विषाद दीनता और अवधारण (निश्चय) इनमें एक शब्दका दोवार निश्चय किया जाता ह । भावार्थ यह है कि, नखके अग्रभागसे लेकर केशोंपर्यंतकी पवनको रोककर कुंभक करै फिर वामभागमें स्थित इडा नाडीसे शनैः २ पवनका रेचन कर ॥४९॥ कपालशोधनं वातदोषघ्नं कृमिदोषहृत् । पुनःपुनरिदं कार्य सूर्यभेदनमुत्तमम् ॥५०॥ कपालशोधनमिति ॥ कपालस्य मस्तकस्य शोधनं शुद्धिकरं वातजा दोषा वात- दोषा अशीतिप्रकारास्तान् हन्तीति वातदोषघ्नं कृमीणामुदरे जातानां दोषो विकार- स्तं हरतीति कृमिदोषहृत् । पुनःपुनर्भूयोभूयः कार्यम् । सूर्येणापूर्य कुम्भयित्वा चन्द्रेण रेचनमिति रीत्येदमुत्तममुत्कुष्टं सूर्यभेदनं सूर्यभेदनाख्यमुक्तम् । योगिभि- रिति शेषः ॥ ५० ॥ यह सूर्यभदन नामका कुंभक मस्तकको शुद्ध करता है और अस्सी प्रकारके वातदोषोंको हरता है और उदर में पैदा हुआ जो कृमि उनको नष्ट करता है, इससे यह उत्तम सूर्यभेदन वारंवार करना अर्थात् सूर्यनाडीसे पूरक और कुम्भक करके चन्द्रनाडीसे रेचन करै-इस रीतिसे किया हुआ यह सूर्यभेदन योगीजनोंने उत्तम कहा है ॥५०॥ अथोजायिनमाह सार्धेन*- मुखं संयम्य नाडीभ्यामाकृष्य पवनं शनैः। यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् ॥५१॥ मुखमिति ॥ मुखमास्यं संयम्य संयतं कृत्वा मुद्रयित्वेत्यर्थः। कण्ठात्तु कण्ठा- दारभ्य हृदयावधि हदयमवधियस्मिन्कर्मणि तत्तथा स्वनेन सहितं यथा स्यात्तथा । उभे क्रियाविशेषणे । लगति श्लिष्यते पवन इत्यर्थात् । तथा तेन प्रकारेण नाडीभ्या- मिडापिङ्गलाभ्यां पवनं वायुं शनैर्मदमाकृष्याकृष्टं कृत्वा पूरयित्वेत्यर्थः ॥ ५१ ॥ अब डेढ श्लोकसे उज्जायीनामके कुम्भकको कहते हैं-मुखका संयमन (दाबना) करके और इडा और पिंगला नाडीसे शनैः शनैः इस प्रकार पवनका आकर्षण करै जिस प्रकार वह पवन कण्ठसे हृदयपर्यन्त शब्द करती हुई लैग ॥ ५१ ॥ पूर्ववत्कुम्भयेत्प्राणं रेचयोदडया ततः। * श्लेष्मदोषहरं कण्ठे देहानलविवर्धनम् ॥५२॥ पूर्ववदिति ॥ प्राणं पूर्ववत्पूर्वेण सूर्यभेदनेन तुल्यं पूर्ववत् । ' आकेशादान- खाग्राञ्च निरोधावधि कुम्भयेत् ' इत्युक्तरीत्या कुम्भयेद्रोधयेत् । ततः कुम्भकानन्तर- द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। मिडया वामनाड्या रेचयेत्त्यजेत् ।। उजायिगुणानाह सार्थश्लोकेन-श्लेष्मदोषहरमिति। कण्ठे कण्ठप्रदेशे श्लेष्मणो दोषाः श्लेष्मदोषाः कासादयस्तान हरतीति श्लेष्मदोषहरस्तं देहानलस्य देहमध्यगतानलस्य जाठरस्य विवर्धनं विशेषेण वर्धनं दीपनमित्यर्थः॥५२॥ फिर सूर्यभेदनके समान प्राणका कुम्भक करै फिर कुम्भक करनेके अनन्तर इडा वामनाडीसे प्राणका रेचन करै अर्थात् मुखके द्वारा बाहिर देशम पवनको निकासे । अब डेढ श्लोकसे उज्जायीके गुणोंको कहते हैं कि, कण्ठमें जो श्लेष्म-कफके दोष हैं उनको हरता है और जठ- राग्निको बढाताहै अर्थात् दीपन करता है ॥ ५२॥ नाडीजलोदराधातुगतदोषविनाशनम् । गच्छता तिष्ठता कार्यमुजाय्याख्यं तु कुम्भकम् ॥ ५३॥ नाडीति ॥ नाडी शिरा जलं पीतमुदकमुदरं तुन्दमा समन्तादेहे वर्तमाना धातव आधातवः । एषामितरेतरद्वन्दः । तेषु गतः प्राप्तो यो दोषो विकारस्तं विशेषेण नाश- यतीति नाडीजलोदराधातुगतदोषविनाशनम् । गच्छता गमनं कुर्वता तिष्ठता स्थितेन वापि पुंसा उज्जाय्याख्यमुज्जायीत्याख्या यस्य तत् । तु इत्यनेन नास्य वैशिष्टयं द्योत- यति । कार्य कर्तव्यम् । उजापीति क्वचित्पाठः । गच्छता तिष्ठता तु बन्धरहितः कर्तव्यः। कुम्भकशब्दस्त्रिलिङ्गः।पुंलिङ्गपाठेतु विशेषणेष्वपि पुंलिङ्गपाठः कार्यः॥५३॥ नाडी जलोदर और सम्पूर्ण देहमें वर्तमान जो धातु इनमें जितने दोष हैं उनको नष्ट करता है और यह उज्जायो नामका कुम्भक गमन करते हुए वा बैठे हुए मनुष्यकोभी करने योग्य है अर्थात् इसमें पूर्वोक्त बन्धोंकी आवश्यकता नहीं ।। ५३ ।। अथ सीत्कारीकुम्भकमाह- सीत्कां कुर्यात्तथा वके घ्राणेनैव विजृम्भिकाम् । एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्वितीयकः॥५४॥ सीत्कामिति ॥ वके मुखे सीत्कां सीदेव सीत्का सीदितिशब्दः सीत्कारस्तां कुर्यात् । ओष्ठयोरंतरे संलग्नया जिह्वया सीत्कारपूर्वकं मुखेन पूरकं कुर्यादित्यर्थः । घ्राणेनैव नासिकयैवेत्यनेनोभाभ्यां नासापुटाभ्यां रेचकः कार्य इत्युक्तम् । एवशब्देन वक्रस्य व्यवच्छेदः । वक्रेण वायोनिःसारणं त्वभ्यासानन्तरमाप न कार्यम् । बलहानि- करत्वात् । विजृम्भिकां रेचकं कुर्यादित्यत्रापि संबध्यते । कुम्भकस्त्वनुक्तोऽपि सीत्कार्याः कुम्भकत्वादेवावगन्तव्यः।अथ सीत्कार्याः प्रशंसा । एवमुक्तप्रकारेणाभ्यास: पौनःपुन्येनानुष्ठानं स एव योगः योगसाधनत्वेन द्वितीय एव द्वितीयकः कामदेवः कन्दर्पः । रूपलावण्यातिशयेन कामदेवसादृश्यात् ॥ ५४ ॥ अब सीत्कारी कुम्भकका वर्णन करते हैं-तिसी प्रकार सीतका (सीत्कार ) को करै अर्थात् दोनों ओष्ठोंके मध्यमें लगी हुई जिह्वासे सीत्कार करता हुआ मुखसे प्राणायाम करै । ब्राणसेही अर्थात् नासिकाके दोनों पुटोंसे रेचक करै । यहां एवशब्दसे यह सूचन किया है कि, मुखसे -
।
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेशः-
रेचन न करे और मुखसे वायुका निकासना तो अभ्यासके अनन्तर भी न करे, क्योंकि
उससे बलकी हानि होती है। यहां विज्रंभिकाशब्दसे रेचक प्राणायामका ग्रहण है । अब
सीत्कारीकी प्रशंसाको कहते हैं कि, इस पूर्वोक्त प्रकारके अभ्याससे अर्थात् बारम्बार करनेसे
रूपलावण्यसे योगी ऐसा होजाता है मानो दूसरा कामदेव है अर्थात् रूप और शोभामें काम-
देवके समान होजाता है ॥ ५४॥
योगिनीचक्रसामान्यः सृष्टिसंहारकारकः।
न क्षुधा न तृषा निद्रा नैवालस्यं प्रजायते ॥५५॥
योगिनीति ॥ योगिनीनां चक्रं योगिनीचक्रं योगिनीसमूहः तस्य सामान्यः
संसेव्यः । सृष्टिः प्रपंचोत्पत्तिः संहारस्तल्लयः तयोः कारकः कर्ता । क्षुधा भोक्तु-
मिच्छा न । तृषा जलपानेच्छा न । निद्रा सुषुप्तिर्न । आलस्य कायचित्तगौरवात्
प्रवृत्त्यभावः । कायगौरवं कफादिना, चित्तगौरवं तमोगुणेन । नैव प्रजायते नैव
प्रादु-
भवति । एवमभ्यासयोगेनेति प्रजायत इति च प्रतिवाक्यं संवध्यते ॥ ५५ ॥
योगिनियोंका जो समूह उसके भलीप्रकार सेवने योग्य होता है और सृष्टिकी उत्पत्ति और
लय (संहार ) इनका कर्ता होता है और सीत्कारी प्राणायामके करनेवालेको क्षुधा तृष्णा
और निद्रा आलस्य अर्थात् देह और चित्तके गौरवसे कार्यमें प्रवृत्तिका अभाव-उनमें देहका
गौरव कफ आदिसे और चित्तका गौरव तमोगुणसे जानना-नहीं होते हैं ॥ ५५ ॥
भवेत्सत्त्वं च देहस्य सर्वोपद्ववर्जितः।
अनेन विधिना सत्यं योगीन्द्रो भूमिमण्डले ॥५६॥
भवेदिति ॥ देहस्य शरीरस्य सत्त्वं बलं च भवेत् । अनेनोक्तेन विधिनाऽभ्यास-
विधिना योगीन्द्रो योगिनामिन्द्र इव योगीन्द्रो भूमिमंडले सर्वैरुपद्रवैर्जितः सर्वोपदव-
वर्जितो भवेत्सत्यम् । सर्वं वाक्यं सावधारणमिति न्यायाद्यदुक्तं फलं तत्सत्यमेवेत्यर्थः५६
और देहका बल बढता है । इस पूर्वोक्त विधिके करनेसे योगीजनोंमें इन्द्र और भूमिके मण्ड-
लमें सम्पूर्ण उपद्रवोंसे रहित होता है । यह सीत्कारी कुम्भक प्राणायामका फल सत्य है अर्थात्
इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५६ ॥
अथ शीतलीकुंभकमाह-
जिह्वया वायुमाकृष्य पूर्ववत्कुम्भसाधनम् ।
शनकैर्घाणरन्ध्राभ्यां रेचयेत्पवनं सुधीः ॥ १७ ॥
जिह्वयति ॥ जिह्वयौष्ठयोवहिनिर्गतया विहंगमाधरचंचुसदृशया वायुमाकृष्य शनैः
पूरकं कृत्वेत्यर्थः । पूर्ववत्सूर्यभेदनवत्कुम्भस्य कुम्भकस्य साधनं विधानं कृत्वेत्यध्या:
हारः। सुधीः शोभना धीर्यस्य सः घ्राणस्य रन्ध्रे ताभ्यांनासापुटविवराभ्यां शनकैः शनै-
खे। अव्ययसर्वनाम्नामकचू प्राक्टेः' इत्यकन् । पवनं वायुं रेचयेत् ॥ ५७ ॥
। । द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (६७) अब शीतली कुम्भकका वर्णन करते हैं कि, ओष्ठोंसे बाहिर निकसी हुई उस जिह्वासे जो पक्षीकी चंचुके समान हो वायुका आकर्षण करके अर्थात् शनैः २ पूरक प्राणायामको करके और फिर सूर्यभेदनके समान कुम्भकके साधन विधिको करके शोभन है बुद्धि जिसकी ऐसा योगी नासिकाके छिद्रोंमेंसे शनैः२ पवनका रेचन करे अर्थात् रेचक प्राणायामको करै ॥५॥ शीतलीगुणानाह- गुल्मप्लीहादिकाब्रोगान् ज्वरं पित्तं क्षुधां तृषाम् । विषाणि शीतली नाम कुम्भिकेयं निहन्ति हि॥२८॥ गुल्मेति ॥ गुल्मश्च प्लीहश्च गुल्मप्लीहौ रोगविशेषावादी येषां ते गुल्मप्लीहादिका- स्तान रोगानामयान् ज्वरं ज्वराख्यं रोगं पित्तं पित्तविकारं क्षुधां भोक्तुमिच्छां तृषां जलपानेच्छां विषाणि सर्पादिविषजनितविकारान् । शीतली नामेति प्रसिद्धार्थकमव्य- यम् । इयमुक्ता कुम्भिका निहन्ति नितरां हन्ति । कुम्भशब्दः स्त्रीलिंगोऽपि । तथा च श्रीहर्ष:--'उदस्य कुम्भीरथ शातकुम्भजाः' इति ॥ ५८॥ अब शीतलीके गुणोंको कहते हैं कि, शीतली है नाम जिसका ऐसा यह कुम्भक प्राणायाम गुल्म प्लीहा आदि रोग ज्वर पित्त क्षुधा तृषा और सर्प आदिका विष इन सबको नष्ट करता है अर्थात् इसके कर्ताका देह स्वाभाविक शीतल रहता है । ५८ ॥ भलाकुम्भकस्य पद्मासनपूर्वकमेवानुष्ठानात्तदादौ पद्मासनमाह- ऊर्वोरुपरि संस्थाप्य शुभे पादतले उभे । पद्मासनं भवेदेतत्सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ५९॥ उर्वोरिति ॥ उपर्युत्ताने शुभे शुद्धे उभे द्वे पादयोस्तले अधःप्रदेशे ऊर्वोः संस्थाप्य सम्यक् स्थापयित्वा वसेत् । एतत्पद्मासनं भवेत् । कीदृशं ? सर्वेषां पापानां प्रकर्षण नाशनम् । अत्रोपरीत्यव्ययमुत्तानवाचकम् । तथा च कारकेषु मनोरमायाम्-' उपर्यु- परिबुद्धीनाम्' इत्यत्रोपरिबुद्धीनामित्यस्योत्तानबुद्धीनामिति व्याख्यानं कृतम् ॥१९॥ अब पद्मासन और भात्रिका नामसे कुम्भकप्राणायामको कहते हैं कि, जंघाओंके ऊपर दोनों पादोंके शुभ (सीधे) तलोंको भली प्रकार स्थापन करके जो टिकना वह पद्मासन सब पापोंका नाशक होता है । यहां उपार यह अव्यय उत्तानका वाची है इसीसे कारककी मनो- रमामें कहा है कि,-'उपर्युपारबुद्धीनाम् ' इसके व्याख्यानमें उत्तानबुद्धियोंके ऊपर २ ईश्वरकी बुद्धि चरती है ॥ ५९॥ भस्त्रिकाकुम्भकमाह सम्यक्पद्मासनं बद्धा समग्रीवोदरं सुधीः। मुखं संयम्य यत्नेन ब्राणं प्राणेन रेचयेत् ॥६॥ सम्यगिति ॥ ग्रीवा च उदरं च ग्रीवोदरम् । प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावः । समं ग्रीवो- दरं यस्य स समग्रीवोदरः सुस्थिता धीर्यस्य स सुधीः पद्मासनं सम्यक स्थिरं बद्ध्वा R
(६८)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
मुखं संयम्य संयतं कृत्वा यत्नेन प्रयत्नेन घ्राणेन घ्राणस्यैकतरेण रन्ध्रेण प्राणं शरी-
रान्तःस्थितं वायु रेचयेत् ॥ ६० ॥
भलीप्रकार ऐसे पद्मासनको बांधकर जिसमें ग्रीवा और उदर समान (बराबर ) हो बुद्धि-
मान् मनुष्य मुखका संयम (बोचना) करके घ्राणके द्वारा अर्थात् नासिकाके एक छिद्रमेंसे
प्राणवायुका
रेचन करै ।। ६०॥
रेचकप्रकारमाह-
यथा लगति हत्कण्ठे कपालावधि सस्वनम् ।
वेगेन पूरयेच्चापि हृत्पद्मावधि मारुतम् ॥ ६१ ॥
यथेति ।। हृच्छ कण्ठश्च हृत्कण्ठं तस्मिन् हृत्कण्ठे । समाहारद्वंद्वः। कपालावधि
कपालपर्यंत स्वनेन सहित सस्वनं यथा स्यात्तथा येन प्रकारेण लगति । प्राण इति
शेषः । तथा रेचयेत् हृत्पद्ममवधिर्यस्मिन् कर्मणि तत् हृत्पद्मावधि वेगेन तरसा मारुतं
वायुं पूरयेत् । चापीति पादपूरणार्थम् ॥ ६१ ॥
उस प्राणका इस प्रकार रेचन करै-जैसे वह प्राण शब्दसहित हृदय और कण्ठमें कपाल-
पर्यन्त लगै । फिर वेगसे हृदयके कमलपर्यन्त वायुको वारंवार पूर्ण करै अर्थात् पूरक प्राणा-
याम करै।। ६१ ॥
पुनर्विरेचयेत्तद्वत्पूरयेच पुनः पुनः।
यथैव लोहकारेण भस्वा वेगेन चाल्यते ॥ ६२॥
पुनरिति ॥ तद्वत्पूर्ववत्पुनविरेचयेत्पुनःपुनः पूरयेच्चेत्यन्वयः। उक्तेऽर्थे दृष्टांतमाह-
यथैवेति ॥ लोहकारेण लोहविकाराणां का भस्त्राऽग्नेर्धमनसाधनीभूतं चर्म यथैव येन
प्रकारेण वेगेन चाल्यते ॥ ६२ ॥
फिर तिसीप्रकार प्राणवायुका वेगसे रेचन करै और तिसीप्रकार पूर्ण करै अर्थात् पूरक करै
और वेभी वारंवार इस प्रकार वेगसे पूरक रेचक करने जैसे लोहकार भत्राको चलाताहै ॥६२॥
तथैव स्वशरीरस्थं चालयेत्पवनं धिया।
यदा श्रमो भवेहेहे तदा सूर्येण पूरयेत् ॥ ६३॥
तथैवेति ॥ तथैव तेनैव प्रकारेण स्वशरीरस्थं स्वशरीरे स्थितं पवनं प्राणं धिया
बुद्ध्या चालयेत् । रेचकपूरकयोनिरंतरावर्तनेन चालनस्यावधिमाह-यदा श्रम इति ॥
यदा यस्मिन् काले देहे शरीरे श्रमो रेचकपूरकयोनिरंतरावर्तनेनायासो भवेत्तदा
तस्मिन् काले सूर्येण सूर्यनाड्या पूरयेत् ॥ ६३ ॥
तसेही अपने शरीरमें स्थित पवनको बुद्धिसे चलावै और रेचक और पूरककी अवधि यह है
कि, जब रेचक पूरकके करनेसे शरीरमें श्रम हो तब सूर्यनाडीसे पूर्ण करै ।। ६३ ।।
यथोदरं भवेत्पूर्णमनिलेन तथा लघु ।
धारयेन्नासिकां मध्यतर्जनीभ्यां विना दृढम् ॥ ६४ ॥
द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। यथेति ॥ यथा येन प्रकारेण पवनेन वायुना लघु क्षिप्रमेवोदरं पूर्ण भवेत्तथा तेन प्रकारेण सूर्यनाड्या पूरयेत् । लघु क्षिप्रमरं दुतम्' इत्यमरः। पूरकानन्तरं यत्कर्तव्य तदाइ-धारयेदिति ॥ मध्यतर्जनीभ्यां मध्यमातर्जनीभ्यां विनाऽन्छानामिकाकनिष्ठि- काभिर्नासिकां दृढं धारयेत् । अंगुष्ठेन दक्षिणनासापुटं निरुध्यानामिकाकनिष्ठिकाभ्यां वामनासापुटं निरुध्य नासिकां दृढ़ गृहीयादित्यर्थः॥ ६४ ॥ जिस प्रकार पवनसे शीघ्रही उदर पूर्ण हो (भर) जाता है तिसी प्रकार सूर्यनाडीसे पूर्ण करै । अब पूरकके अनन्तर जो कर्तव्य है उसका वर्णन करते हैं कि, मध्यमा और तर्जनी अंगु- लियोंके विना अर्थात् अंगुष्ट अनामिका कनिष्ठिका इन तीनोंसे वाम नासिकाके पुटको दृढतासे रोककर प्राणवायुको ग्रहण करै अर्थात् कुम्भक प्राणायामसे धारण करै ।। ६४ ॥ विधिवत्कुम्भकं कृत्वा रेचयेदिडयाऽनिलम् । वातपित्तश्लेष्महरं शरीराग्निविवर्धनम् ॥ ६५ ॥ विधिवदिति ॥ बन्धपूर्वकं कुम्भकं कृत्वेडया चन्द्रनाड्यानिलं वायुं रेचयेत्। भस्त्राकुम्भकस्यै परिपाटी-वामनासिकापुटं दक्षिणभुजानामिकाकनिष्ठिकाभ्यां निरुध्य दक्षिणनासिकापुटेन भस्त्रावद्वेगेन रेचकपूरकाः कार्याः । श्रमे जाते तेनैव नासापुटेन पूरकं कृत्वाऽङ्गुष्ठेन दक्षिणं नासापुटं निरुध्य यथाशक्ति कुम्भकं धारयेत् । पश्चा- दिडया रेचयेत् । पुनर्दक्षिणनासापुटमंगुष्ठेन निरुध्य वामनासिकापुटेन भस्त्रावज्झटिति रेचकपूरकाः कर्तव्याः । श्रमे जाते तेनैव नासिकापुटेन पूरकं कृत्वाऽनामिकाकनिष्ठि- काभ्यां वामनासिकापुटं निरुध्य यथाशक्ति कुम्भकं कृत्वा पिङ्गलया रेचयदित्येका रीतिः । वामनासिकापुटमनामिकाकनिष्ठिकाभ्यां निरुध्य दक्षिणनासिकापुटेन पूरक कृत्वा झटित्यंगुष्ठेन निरुध्य वामनासापुटेन रेचयेत् । एवं शतधा कृत्वा श्रमे जाते तेनैव पूरयेत् । बन्धपूर्वकं कृत्वेडया रेचयेत् । पुनर्दक्षिणनासापुटमंगुष्ठेन निरुध्य वामनासापुटेन पूरकं कृत्वा झटिति वामनासिकापुटमनामिकाकनिष्ठिकाभ्यां निरुध्य पिङ्गलया रेचयेद्भस्त्रावत् । पुनः पुनरेवं कृत्वा रेचकपूरकावृत्तिश्रमे जाते वामनासा- पुटेन पूरकं कृत्वाऽनामिकाकनिष्ठिकाभ्यां धृत्वा कुम्भकं कृत्वा पिङ्गलयारेचयेदिति द्वितीया रीतिः । भस्त्रिकागुणानाह-वातपित्तेति ॥ वातश्च पित्तं च श्लेष्मा च वात- पित्तश्लेष्माणस्तान्हरतीति तादृशम् । शरीरे देहे योऽग्निर्जठरानलस्तस्य विशेषेण वर्धनं दीपनम् ॥६५॥ विधिपूर्वक कुंभकको करके इडानामकी चन्द्रनाडीसे वायुका रेचन करै। इस भस्राकुंभककी यह परिपाटी (क्रम ) है कि, वाम नासिकाके पुटको दक्षिणभुजाकी अनामिका कनिष्ठिकाओंसे रोककर दक्षिण नासिकाके पुटसे भलाके समान वेगपूर्वक रेचक पूरक करने फिर श्रम होने- पर ऊसी नासिकाके पुटसे पूरक करके अँगूठेसे दक्षिण नासिकाके पुटको रोककर यथाशक्ति कुंभक प्राणायामसे वायुको धारण करै फिर इडासे रेचन करै फिर दक्षिण नासिकाके पुटको (७०) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:- anand अँगूठसे रोककर वामनासापुटसे भलाके समान शोत्र २ रेचक पूरक करनेसे श्रम होनेपर तिसी नासिकाके पुटसे पूरक करके अनामिका कनिष्ठिकासे नासिकाके वामपुटको रोककर यथाशक्ति कुंभकको करै। पिंगला नाडीसे प्राणका रेचन करै। एक तो यह राति है और नासि. काके वामपुटको अनामिका कनिष्ठिकासे रोककर नासिकाके दक्षिण पुटसे पूरक करके शीघ्र अँगूठेसे रोककर नासिकाके वामपुटसे रेचन करै। इस प्रकार शत १०० वार करके श्रम होने- पर उससे ही पूरण करै और बंधपूर्वक करके इडानाडीसे रेचन करै फिर नासिकाके दक्षिण- पुटको अँगूठेसे रोककर नासिकाके वामपुटसे पूरक करके शीघ्रही नासिकाके वामपुटको अना- मिका कनिष्ठिकासे रोककर पिंगलासे भलाके समान रेचन करै,वारंवार इस प्रकार करके रेचक पूरककी आवृत्तिमें जब श्रम होजाय अर्थात् थकावट होजाय तब वामनासिकापुटसे पूरक करके अनामिका और कनिष्ठिकासे धारण करनेके अनंतर कुंभक प्राणायामको करके पिंगलासे रेचन करै यह दूसरी रीति है। अब भस्त्रिका कुंभकके गुणोंको कहते हैं कि, वात पित्त श्लेष्मा (कफ) इनको हरती है और शरीरको आग्न ( जठराग्नि ) को बढाती है ।। ६५ ॥ कुण्डलीबोधकं क्षिप्रं पवनं सुखदं हितम् । ब्रह्मनाडीमुखे संस्थकफाद्यर्गलनाशनम् ॥ ६६॥ कुण्डलीति ॥ क्षिप्रं शीघ्रं कुण्डल्याः सुप्ताया बोधकं बोधकर्तृ पुनातीति पवनं पवित्रकारकं सुखं ददातीति सुखदं हितं त्रिदोषहरत्वात्सर्वेषां हितं सर्वदा च हितम् । सर्वेषां कुम्भकानां सर्वदा हितत्वेऽपि सूर्यभेदनोज्जायिनावृष्णौ प्रायेण हितौ। सीत्कारी- शीतल्यौ शीतले प्रायेणोष्णे हिते । भस्त्राकुम्भकः समशीतोष्णः सर्वदा हितः। सर्वेषां कुम्भकानां सर्वरोगहरत्वेऽपि सूर्यभेदनं प्रायेण वातहरम् । उज्जायी प्रायेण श्लेष्महरः। सीत्कारीशीतल्यौ प्रायेण पित्तहरे । भस्त्राख्यः कुम्भकः त्रिदोषहरः इति बोध्यम् । ब्रह्मनाडी सुषुम्ना ब्रह्मपापकत्वात् । तथा च श्रुति:-" शतं चैका च हृद- यस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्र- मणे भवन्ति ॥” इति । तस्या मुखेऽग्रभागे संस्थः सम्यक् स्थितो यः कफादिरूपो- ऽर्गलः प्राणगतिप्रतिबन्धकस्तस्य नाशनं नाशकर्तृ॥ ६६ ॥ और शीघ्रही सोती हुई कुंडलीका बोधक है और पवित्र करता है और सुखका दाता है और हित है । यद्यपि संपूर्ण कुंभक सब कालमें हित होते हैं तथापि सूर्यभेदन और उज्जायी ये दोनों उष्ण हैं। इससे शीतके समय हितकारी हैं और सीत्कारी शीतली ये दोनों शीतल हैं। इससे उष्ण कालमें हित हैं और भस्खा कुंभक न शीतल है न उष्ण है । इससे सब कालमें हित है । यद्यपि संपूर्ण कुंभक सब रोगोंको हरते हैं तथापि सूर्यभेदन प्रायसे वातको हरता है और उज्जायी प्रायसे कफको हरता है और सीत्कारी शीतली ये दोनों प्रायसे पित्तको हरते हैं और भखानामका कुंभक त्रिदोष ( संनिपात ) को हरता है यह और ब्रह्मलोक प्राप्त करनेवाली जो सुषुम्ना नामकी ब्रह्मनाडी है सोई इस श्रुतिमें लिखा है कि एक सौ एक १०१ हृदयकी नाडी हैं उनमें से एक नाडी मूर्द्धा और मस्तकके सम्मुख गयी है उस नाडीके द्वारा जो ऊर्ध्व लोकमें जाता है वह मोक्षको प्राप्त होता है और अन्य सब नाडी जहां तहां क्रमको छोडकर गयी हैं उस ब्रह्म- MIN द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (७१) नाडीके मुख (अग्रभाग) में भली प्रकार स्थित जो कफ आदि अर्गल अर्थात् प्राणको गतिका प्रतिवन्धक उसका नाशक है ।। ६६ ॥ सम्यग्गात्रसमुद्भूतं ग्रन्थि त्रयविभेदकम् । विशेषेणैव कर्तव्यं भस्त्राख्यं कुम्भकं त्विदम् ॥ ६७॥ सम्यगिति॥ सम्यग्दृढीभूतं गाने गात्रमध्ये सुषुम्नायामेव सम्यगुद्भूतं समुद्भूतं जातं यद् ग्रन्थीनां त्रयं ग्रन्थित्रयं ब्रह्मग्रन्थिाविष्णुग्रन्थिरुद्रग्रन्थिरूपं तस्य विशेषेण भेदजनकम् । अत एव इदं भस्वा इत्याख्या यस्येति भस्वाख्यं कुम्भकं तु विशेषेणैव कर्तव्यमवश्यकर्तव्यमित्यर्थः । सूर्यभेदनादयस्तु यथासम्भवं कर्तव्याः ॥ ६७ ॥ भली प्रकार (दृढ) जो गात्र (सुषुम्ना ) नाडीके मध्यम भली प्रकार उत्पन्न हुई जो तीन ग्रंथि अर्थात् ब्रह्मग्रंथि विष्णुप्रंथि रुद्रग्रंथिरूप जो तीन गाँठ हैं उनका विशेषकर भेदजनक है इसीसे यह भस्त्रानामका कुम्भकप्राणायाम विशेषकर करने योग्य है और सूर्यभेदन आदि यथा- संभव ( जब तब ) करने योग्य हैं अर्थात् आवश्यक नहीं हैं ॥ ६७ ॥ अथ भ्रामरीकुम्भकमाह- वेगाद घोषं पूरकं भृङ्गनादं भृङ्गीनादं रेचकं मन्दमन्दम् । योगीन्द्राणामेवमभ्यासयोगाच्चिते जाता काचिदानन्दलीला॥६८॥ वेगादिति ॥ वेगात्तरसा घोषं सशब्दं यथा स्यात्तथा भृङ्गस्य भ्रमरस्य नाद इव नादो यस्मिन्कर्मणि तत्तथा पूरकं कृत्वा । भुंग्यो भ्रमर्यस्तासां नाद इव नादो यस्मि- स्तथा मन्दमन्दं रेचकं कुर्यात् । पूरकानन्तरं कुम्भकस्तु भ्रामर्याः कुम्भकत्वादेव सिद्धो विशेषाच्च नोक्तः । पूरकरेचकयोस्तु विशेषोऽस्तीति तावेवोक्तौ । एवमुक्तरीत्याऽभ्यसन- मभ्यासस्तस्य योगो युक्तिस्तस्माद्योगीन्द्राणां चित्ते काचिदनिर्वाच्या आनन्दे लीला क्रीडा आनन्दलीला जातोत्पन्ना भवति ॥ ६८ ॥ अब भ्रामरी कुम्भकका वर्णन करते हैं कि, वेगसे शब्दसहित जैसे हो तैसे भ्रमरके समान शब्द जिसमें उस प्रकारसे कुम्भकप्राणायामको करके फिर भ्रमरीके समान है शब्द जिसमें उस प्रकार मन्द २ रेचक प्राणायामको करै। यहां पूरकके अनंतर कुम्भकको भी करै । कदाचित् कहो कि, वह कहा क्यों नहीं ? सो ठीक नहीं. क्योंकि वह बिना कहे भी इससे सिद्ध है कि, भ्रामरी भी कुंभक ही है इससे विशेषकर कुंभक नहीं कहा है और पूरक रेचक इन दोनों में तो विशेष है इससे वे दोनोंही कहे हैं । इस पूर्वोक्त रीतिके द्वारा जो अभ्यास योग (करने) से योगीन्द्रोंको चित्तमें कोई (अपूर्व ) आनंदमें लीला (क्रीडा) उत्पन्न होती है अर्थात् इस भ्रामरीकुम्भकके अभ्याससे योगियोंके चित्तमें आनन्द होता है ।। ६८ ॥ अथ मूर्छाकुम्भकमाह- पूरकान्ते गाढतरं बद्धा जालंधरं शनैः। रेचयेन्मूर्च्छनाख्येयं मनोमूर्छा सुखप्रदा ॥ ६९ ॥ । shor - mona (७२) हठयोगप्रदीपिका । [उपदेश:- पूरकान्त इति ॥ पूरकस्यांतेऽवसानेऽतिशयेन गाढतरं जालंधराख्यं बंध बद्ध्वा शनैर्मदमंदं रेचयेत् । इयं कुम्भिका मूर्च्छनाख्या मूर्च्छना इत्याख्या यत इति मूर्च्छनाख्या। कीदृशी ? मनो मूर्च्छयतीति मनोमूर्छा । एतेन मूर्च्छनाया विग्रहदर्शन पूर्वकं फलमुक्तम् । पुनः कीदृशी ? सुखप्रदा सुखं प्रददातीति सुखप्रदा ॥ ६९ ॥ अब मूर्छा नामके कुम्भकको कहते हैं कि, पूरक प्राणायामके अन्तमें (पीछे) अत्यन्त गाढ रीतिसे पूर्वोक्त जालंधर बन्धको बांधकर शनैः२प्राणवायुका रेचन करै । यह कुंभिका मूर्च्छना- नामकी कहाती है और मनकी मूर्छाको करती है और उत्तम सुखको देतीहै ॥ ६९ ॥ अथ प्लाविनीकुम्भकमाह- अन्तःप्रवर्तितोदारमारुतापूरितोदरः। पयस्यगाधेऽपि सुखात्प्लवते पद्मपत्रवत् ॥ ७० ॥ अन्तरिति ॥ अंत: शरीरांतः प्रवर्तितः पूरित उदारोऽतिशयितो यो मारुतः समीरस्तेना समंतात्पूरितमुदरं येन स पुमानगाधेऽप्यतलस्पर्शेऽपि पयसि जले पद्मपत्र- वत पद्मपत्रेण तुल्यं सुखादनायासात् प्लवते तरति गच्छति ॥ ७० ॥ अब प्लाविनी नामके कुंभकका वर्णन करते हैं कि, शरीरके मध्यमें प्रवृत्त किया (भरा) उदार (आधिक ) जो पवन उससे चारों ओरसे पूर्ण है उदर जिसका ऐसा योगी अगाध जलमें भी इस प्रकार प्लवता (तरता) है जैसे कमलका पत्र अर्थात् विना आश्रयके ही जलके ऊपर तर जाता है ॥७॥ अथ प्राणायामभेदानाह- प्राणायामस्त्रिधा प्रोक्तो रेचपूरककुम्भकैः । सहितः केवलश्चेति कुम्भको द्विविधो मतः॥ ७१ ॥ प्राणायाम इति ॥ प्राणस्य शरीरान्तःसंचारिवायोरायमनं निरोधनमायामः प्राणा- यामः। प्राणायामलक्षणमुक्तं गोरक्षनाथेन-'प्राणः स्वदेहजीवायुरायामस्तन्निरोधनम् । इति । रेचकश्च पूरफश्च कुम्भकश्च तै दैविधा त्रिप्रकारका रेचकप्राणायामः पूरकप्राणा- यामः कुम्भकप्राणायामश्चेति । रेचकलक्षणमाह याज्ञवल्क्य:-'बहिर्यद्रेचनं वायोरुदरा- द्रेचकः स्मृतः' इति । रेचकप्राणायामलक्षणम्-‘निष्क्रम्य नासाविवरादशेषं प्राणं बहिः शून्यमिवानिलेन । निरुध्य संतिष्ठति रुद्धवायुः स रेचको नाम महानिरोधः ॥ ' पूरक- लक्षणम्- 'बाह्यादापूरणं वायोरुदरे पूरको हि सः ॥' पूरकप्राणायामलक्षणम्-'बाह्ये स्थितं प्राणपुटेन वायुमाकृष्य तेनैव शनैः समंतात् । नाडीश्च सर्वाः परिपूरयेद्यः स पूरको नाम महानिरोधः ॥ ' कुम्भकलक्षणम्-'संपूर्य कुम्भवद्वायोर्धारणं कुम्भको भवेत् । अयं कुम्भकस्तु पूरकप्राणायामादभिन्नः। भिन्नस्तु 'न रेचको नैव च पूरकोत्र नासापुटे संस्थितमेव वायुम् । सुनिश्चलं धारयते क्रमेण कुम्भाख्यमेतत्प्रवदंति तज्ज्ञाः॥' ।
। द्वितीयः1 संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (७३) अथ प्रकारांतरेण प्राणायाम विभजते-सहित इति ॥ कुम्भको द्विविधः । सहितः केवलश्चेति । मतोऽभिमतो योगिनामिति शेषः । तत्र सहितो द्विविधः । रेचकपूर्वकः कुम्भकपूर्वकश्च । तदुक्तम्- आरेच्यापूर्य वा कुर्यात्स वै सहितकुंभकः ।' तत्र रेचक- पूर्वको रेचकप्राणायामादभिन्नः पूरकपूर्वकः कुम्भकः पूरकप्राणायामादभिन्नः । केवल- कुंभक: कुंभकमाणायामादभिन्नः। प्रागुक्ताः सूर्यभेदनादयः पूरकपूर्वकस्य कुंभकस्य भेदा ज्ञातव्याः ॥ ७१॥ अब प्राणायामके भेदोंको कहते हैं कि, रेचक प्राणायाम पूरक प्राणायाम कुंभक प्राणायाम इन भेदोंसे प्राणायाम तीन प्रकारका योगियोंने कहा है । प्राणायामका लक्षण गोरक्ष नाथने यह कहा है कि, अपने देहकी जो जीवनकी अवस्था उसको प्राण कहते हैं और उस अवस्थाके अवरोधको आयाम कहते हैं अर्थात् अवस्थाके अवरोधका नाम प्राणायाम है और रेचकका लक्षण याज्ञवल्क्यने यह कहा है कि, उदरसे बाहिर जो वायुका रेचन उसको रेचक कहते हैं और रेचकप्राणायामका यह लक्षण है कि, सम्पूर्ण प्राणको नासिकाके छिद्रमेंसे बाहिर निकास और प्राणवायुको रोककर इस प्रकार टिकै कि मानो देह प्राणवायुसे शून्य है । यह महान् निरोध रेचकनाम प्राणायाम कहाता है और पूरकका लक्षण यह है कि, बाहिरसे जो उदर में वायुका पूरण वह पूरक होता है और पूरकप्राणायामका लक्षण यह है कि, बाहिर टिकीहुई पवनको नासिकाके पुट से आकर्षण करके उसी नासिकाके पुटसे शनैः २ सम्पूर्ण नाडियोंको जो पूर्ण करदे उस महानिरोधको पूरकनाम प्राणायाम कहते हैं । कुम्भकका लक्षण यह है कि, कुम्भ (घट) के समान वायुको पूर्ण करके जो धारण वह कुम्भक होता है। यह कुम्भक- प्राणायाम तो पूरकप्राणायामसे अभिन्न अर्थात् दोनों एकही हैं । भिन्न तो यह है कि न रेचक करै न पूरक करै किंतु नासिकाके पुटमें टिके हुए वायुकोही भली प्रकार निश्चल रीतिपूर्वक क्रमसे जो धारण करना प्राणायामका ज्ञाता इसको कुंभक कहते हैं। अब अन्यप्रकारसे प्राणा- यामके विभाग करते हैं कि, कुंभक दो प्रकारका योगीजनोंने माना है एक सहित और दूसरा कवल अर्थात् रेचकपूर्वक और पूरकपूर्वक । सोई कहा है कि वायुका आ समंतात् रेचन वा पूरण करके जो प्राणायाम करै वह सहित कुम्भक होता है। उन तीनोंमें रेचकपूर्वक प्राणायाम रेचक प्राणायाम रूप है और पूरकपूर्वक कुंभक पूरकप्राणायामले आभिन्न रूप है और केवल कुंभक कुंभकप्राणायामसे आभिन्नरूप है पूर्वोक्त सूर्यभेदन आदि जो प्राणायाम हैं वे पूरकपूर्वक कुंभ- कके भेद जानने । भावार्थ यह है कि, रेचक पूरक कुंभकके भेदसे प्राणायाम तीन प्रकारका है और सहित केवलके भेदसे कुंभक दो प्रकारका है ॥ ७१ ।। सहितकुभकाभ्यासस्यावधिमाह- यावत्केवलसिद्धिः स्यात्सहितं तावदभ्यसेत् । रेचकं पूरकं मुक्त्वा सुखं यदायुधारणम् ॥ ७२ ॥ यावदिति ॥ केवलस्य केवलकुम्भकस्य सिद्धिः केवलसिद्धिर्यावत्पर्यंतं स्यात्ताव- त्पर्यंत रहितकुम्भकं सूर्यभेदादिकमभ्यसेदनुतिष्ठेत् । सुषुम्नाभेदानंतरं यदा सुषुम्नांत-
(७४)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
र्घटशब्दा भवंति तदा केवलकुम्भकः सिद्धयति । तदनन्तरं सहितकुम्भका दश विंश-
तिर्वा कार्याः । अशीतिसंख्यापूर्तिः केवलकुम्भकैरेव कर्तव्या । सति सामर्थ्य केवल-
कुम्भका अशीतेरधिकाः कार्याः । केवलकुम्भकस्य लक्षणमाह-रेचकमिति ॥ रेचक
पूरकं मुक्त्वा त्यक्त्वा सुखमनायासं यथा स्यात्तथा वायोर्धारणं वायुधारणं यत् ॥७२
अब सहित कुंभकके अभ्यासकी अवधिको कहते हैं कि, केवल कुम्भकप्राणायामकी सिद्धि
जबतक होय तबतक सूर्यभेदन आदि सहितकुम्भकका अभ्यास करै । सुषुम्नानाडीके भेदके अनं-
तर सुषुम्नाके अन्दर जब जलपूरित घटके समान शब्द होय तब कवल कुभक सिद्ध होता
है । उसके अनंतर दश वा बीस सहितकुंभक करने । अस्सी संख्याका पूरण केवल कुंभकोसेहो
करना। सामर्थ्य हाय तो अस्सीसे अधिक भी केवल कुंभक करने । अब केवल कुम्भकके लक्ष-
णोंको कहते हैं कि, रेचक और पूरकको छोडकर सुखसे जो वायुका धारण उसे केवल
कुम्भक कहते हैं ।। ७२ ॥
प्राणायामोऽयमित्युक्तः स वै केवलकुंभकः।
कुंभके केवले सिद्धे रेचपूरकवर्जिते ॥ ७३ ॥
प्राणायाम इति ॥ सवै मिश्रितः केवलकुम्भकः प्राणायाम इत्ययमुक्तः । केवलं
प्रशंसति-केवल इति ॥ रेचो रेचकः रेचश्च पूरकश्च रेचपूरकौ ताभ्यां वर्जिते रहिते
केवले कुम्भके सिद्धे सति ॥७३॥
वह मिश्रित प्राणायाम और केवल कुम्भकप्राणायाम इस पूर्वोक्त प्रकारसे कहा । रेचक
और पूरकसे वर्जित (विना ) केवल कुम्भकके सिद्ध होनेपर ॥७३॥
न तस्य दुर्लभं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
शक्तः केवलकुंभेन यथेष्टं वायुधारणात् ॥ ७ ॥
नेति ॥ तस्य योगिनस्त्रिषु लोकेषु दुर्लभं दुष्प्रापं किंचित्किमपि यथेष्टं यथेच्छं
वायोर्धारणं वापि न विद्यते । तस्य सर्व सुलभमित्यर्थः ॥ शक्त इति ॥ केवलकुम्भ-
केन कुंभकाभ्यासेन शक्तः समर्थो यथेष्टं यथेच्छं वायोर्धारणं तस्माद्वायुधारणात्।।७४॥
उस केवल कुम्भक प्राणायाम करनेवाले योगीको तीनों लोकोंमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है
अर्थात् त्रिलोकीकी सम्पूर्ण वस्तु सुलभ हैं और केवल कुम्भकके अभ्यासमें जो समर्थ है वह
अपनी इच्छाके अनुसार प्राणवायुके धारणसे ॥ ७४ ॥
राजयोगपदं चापि लभते नात्र संशयः।
कुम्भकात्कुण्डलीबोधः कुण्डलीबोधतो भवेत् ॥ ७ ॥
राजेति ॥ राजयोगपदं राजयोगात्मकं पदं लभते । अत्र संशयो न । निश्चितमेत-
दित्यर्थः । कुम्भकाभ्यासस्य परंपरया कैवल्यहेतुत्वमाह-कुम्भकादिति ॥ कुम्भकात्
कुम्भकाभ्यासात्कुण्डल्याधारशक्तिस्तस्या बोधो निद्राभंगो भवेत् । कुण्डल्या बोधः
कुण्डलीबोधस्तस्मात्कुण्डलीबोधतः ॥ ७९ ॥
द्वितीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (७५) राजयोगपदको भी योगी प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं। अब कुम्भकप्राणायामके अभ्या- सको परम्परासे मोक्षका हेतु वर्णन करते हैं कि, कुंभक प्राणायामके अभ्याससे आधारशक्ति-- रूप कुण्डलीका बोध होता है-अर्थात् निद्राका भंग होता है और कुण्डलीके बोधसे ।। ७५ ।। अनर्गला सुषुम्ना च हठसिद्धिश्च जायते। हठं विना राजयोगं राजयोगं विना हठः॥ न सिध्यति ततो युग्यमानिष्पत्तेः समभ्यसेत् ॥ ७६॥ अनर्गलेति ॥ सुषुम्नानाडयनर्गला कफाद्यर्गलरहिता भवेत् । हठस्य हठाभ्या- सस्य सिद्धिः प्रत्याहारादिपरंपरया कैवल्यरूपा सिद्धिर्जायते । हठयोगराजयोगसाध- नयोः परस्परोपकार्योपकारकत्वमाह-हठं विनेति । हठं हठयोगं विना राजयोगो न सिध्यति राजयोगं विना हठो न सिध्यति ततोऽन्यतरस्य सिद्धिर्नास्ति । तस्मानिष्पत्ति राजयोगसिद्धिमामर्यादीकृत्य या निष्पत्तिस्तस्या राजयोगसिद्धिपर्यंतं युग्मं हठयोग- राजयोगद्वयमभ्यसेदनुतिष्ठेत् । हठातिरिक्ते साक्षात्परंपरया वा राजयोगसाधनेत्र: राजयोगशब्दः । जीवनसाधने लांगले जीवनशब्दप्रयोगवत् । राजयोगसाधनं चतुर्थों- पदेशे वक्ष्यमाणमुन्मनीशांभवीमुद्रादिरूपमपरोक्षानुभूतायुक्तं पंचदशांगरूपं दशांगरूपं च । वाक्यसुधायामुक्तं दृश्यानुविद्धादिरूपं च ॥ ७६ ॥ सुषुम्नानाडी अनर्गल होजाती है अर्थात् कफ आदि बंधनसे रहित होजाती है और हठ- योगके अभ्यासको सिद्धि प्रत्याहार आदिकी परम्परासे होजाती है अर्थात् मोक्षसिद्धि होजाती है। अब हठयोग और राजयोगके जो साधन हैं उनका परस्पर उपकार्य उपकारक भावका वर्णन करते हैं कि, हठयोगके विना राजयोग सिद्ध नहीं होता और राजयोगके विना हठ- योग सिद्ध नहीं होता जिससे एकके विना एककी सिद्धि नहीं होती तिससे राजयोगसिद्धि- पर्यंत हठयोग और राजयोग दोनोंका अभ्यास करै अर्थात् राजयोगसिद्धिका यत्न करै । यहां राजयोगपद उस राजयोगके साधन (हेतु) का वाचक है जो हठयोगसे भिन्न हो और साक्षात् वा परम्परासे राजयोगका कारण हो जैसे जीवनके साधन लांगलमें जीवनशब्दका प्रयोग होता है वह राजयोगका साधन उन्मनी और शाम्भवी मुद्रामें कहेंगे और अपरोक्षानुभूतिमें पंचदशांग और दशांग रूप कहाहै और वाक्यसुधामें दृश्यानुविद्ध आदिरूप कहाहै ।। ७६।। हठाभ्यासाद्राजयोगप्राप्तिप्रकारमाह- कुम्भकप्राणरोधान्ते कुञ्चित्तं निराश्रयम् । एवमभ्यासयोगेन राजयोगपदं व्रजेत् ॥ ७७॥ कुम्भकेति ॥ कुम्भकेन प्राणस्य यो रोधस्तस्यांते मध्ये चित्तमंतःकरणं निरा- श्रयं कुर्यात् । संप्रज्ञातसमाधौ जातायां ब्रह्माकारस्थितेः परं वैराग्येण विलयं कुर्यादित्यर्थः। एवमुक्तरीत्याऽभ्यासस्य योगो युक्तिस्तेन ' योगः संनहनोपायध्यान- संगतियुक्तिषु ' इति कोशः। राजयोगपदं राजयोगात्मकं पदं व्रजेत्प्राप्नुयात् ॥७७॥ । and
(७६)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेशः द्वि.]
अब हठयोगके अभ्याससे राजयोग प्राप्तिका प्रकार कहते हैं कि, कुम्भकप्राणायामसे
प्राणका रोध करनेके अंत (मध्य) में अन्तःकरणको निराश्रय करदे अर्थात् सम्प्रज्ञात
समाधिके होनेपर ब्रह्माकर स्थितिके अनन्तर वैराग्यसे चित्तका लय करदे । इस पूर्वोक्त रीतिसे
किये अभ्यासके योगसे राजयोग पदको प्राप्त होता है। यहां योगपद इस कोशके अनुसार
युक्तिका बोधक है ॥ ७७ ॥
हठसिदिज्ञापकमाह-
वपुःकृशत्वं वदने प्रसन्नता नादस्फुटत्वं नयने सुनिर्मले।
अरोगता बिन्दुजयोऽग्निदीपनं नाडीविशुद्धिहठयोगलक्षणम् ७८
इति श्रीसहजानंदसंतानचिंतामणिस्वात्मारामयोगीन्द्रविरचितायां
हठयोगप्रदीपिकायां द्वितीयोपदेशः ॥ २॥
वपुःकृशत्वमिति । वपुषो देहस्य कृशत्वं काश्य वदने मुखे प्रसन्नता प्रसादो
नादस्य ध्वनेः स्फुटत्वं प्राकट्यं नयने नेत्रे सुष्टु निर्मले अरोगस्य भावोऽरोगता आरोग्य
विंदोर्धातोर्जयः क्षयाभावरूपः अग्नेरौदर्यस्य दीपनं दीप्ति डीनां विशेषेण शुद्धिर्मलाप-
गमः एतद्धठस्य हठाभ्याससिद्धीविन्या लक्ष्यतेऽनेनोति लक्षणम् ॥ ७८ ॥
इति श्रीहठयोगप्रदीपिकायां ब्रह्मानन्दकृतायां ज्योत्स्नाभिधायां
टीकायां द्वितीयोपदेशः ॥ २ ॥
अब हठयोग सिद्धिके लक्षणोंको कहते हैं कि देहकी कृशता मुखमें प्रसन्नता नादकी प्रकटता
और दोनों नेत्रोंकी निर्मलता रोगका अभाव बिन्दुका जय अर्थात् नाडियोंमें मलका अभाव
ये हठयोगसिद्धिके लक्षण हैं अर्थात् ये चिह्न होय तो यह जानना कि, इसको हठयोगकी
सिद्धि होजायगी ॥ ७८ ॥
इति श्रीसहजानंदसंतानचिन्तामणिस्वात्मारामयोगीन्द्रविरचितहठयोगप्रदीपिकायां
लॉखग्रामनिवासि पं० मिहिरचंद्रकृतभाषाविवृतिसाहितायां द्वितीयोपदेशः ॥२॥
(७७)
[उ. तृतीयः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
तृतीयोपदेशः ३.
अथ कुण्डल्याः सर्वयोगाश्रयत्वमाह-
सशैलवनधात्रीणां यथाऽऽधारोऽहिनायकः।
सर्वेषां योगतत्राणां तथाऽऽधारो हि कुण्डली ॥१॥
सशैलेति ॥ शैलाश्च वनानि च शैलवनानि तैः सह वर्तमानाः सशैलवनास्ताश्च
ता धात्र्यश्च भूमयस्तासाम् । धात्र्या एकत्वेऽपि देशभेदा दमादाय बहुवचनम् ।
अहीनां सर्पाणां नायको नेताऽहिनायकः शेषो यथा यवदाधार आश्रयस्तथा तद्वत् ।
सर्वेषां योगस्य तन्त्राणि योगतन्त्राणि योगोपायास्तेषां कुण्डल्याधारशक्तिराश्रयः ।
कुण्डलीबोधं विना सर्वयोगोपायानां वैयादिति भावः ॥१॥
अब इसके अनंतर कुण्डली सर्व योगोंका आश्रय है इसका वर्णन करते हैं कि, जैसे संपूर्ण
पर्वत वनोंसहित जितनी भूमि हैं उनका आश्रय (आधार ) जैसे साँका नायक शेष है तिसी
प्रकार योगके समस्त उपायोंका आधार भी कुण्डली है, क्योंकि कुण्डलीके बोध विना योगके
संपूर्ण उपाय व्यर्थ हैं। यद्यपि भूमि एक है-तथापि देशभेदसे भूमिके भेदको मानकर बहुवचन
(धात्रीणाम् ) यहां दिया है ॥१॥
कुण्डलीबोधस्य फलमाह द्वाभ्याम्-
सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कुण्डली।
तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रन्थयोऽपि च ॥२॥
सुप्तेति ॥ सुप्ता कुण्डली गुरोः प्रसादेन यदा जागर्ति बुध्यते तदा सर्वाणि पद्मानि
षट्चक्राणि भिद्यन्ते भिन्नानि भवन्ति । ग्रन्थयोऽपि च ब्रह्मग्रन्थिविष्णुप्रन्थिरुद्रग्रन्थयों
भियन्ते भेदं प्राप्नुवन्तीत्यन्वयः॥२॥
अब कुण्डलीके बोधका दो श्लोकोंसे फल कहते हैं, जब गुरुकी प्रसन्नतासे सोती हुई कुण्डली
जागती है तब संपूर्ण पद्म अर्थात् हृदयके षट्चक्र भिन्न होजाते हैं अर्थात् खिल जाते हैं और
ब्रह्मग्रंथि विष्णुप्रथि रुद्रग्रंथिरूप तीनों ग्रंथि भी खुल जाती हैं ॥ २॥
प्राणस्य शुन्यपदवी तथा राजपथायते ।
तदा चित्तं निरालम्ब तदा कालस्य वञ्चनम् ॥३॥
प्राणस्येति ॥ तथा शून्यपदवी सुषुम्ना प्राणस्य वायो राज्ञां पन्था राजपथ
राजपथमिवाचरति राजपथायते राजमार्गायते । सुखेन गमनसम्भवात् । तदा चित्त-
मालम्बनमाश्रयस्तस्मानिर्गतं निरालम्ब निर्विषयं भवति । तदा कालस्य मृत्योर्वचनं
प्रतारणं भवति ॥ ३ ॥
(७८)
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेशः-
और तिसी प्रकार प्राणकी शून्यपदवी (सुषुन्ना) राजपथ (सडक ) के समान होजावी
है अर्थात् प्राण उसमें सुखसे गमन करने लगता है और उसी समय चित्तभी निरालंब
होजाता है अर्थात्-विषयोंका अनुरागी नहीं रहता और उसी समय कालका वंचन होता है
अर्थात् मृत्युका भय दूर होजाता है ॥ ३ ॥
सुषुम्नापर्यायानाह-
सुषुम्ना शून्यपदवी ब्रह्मरन्ध्र महापथः।
श्मशानं शाम्भवी मध्यमार्गश्चेत्येकवाचकाः ॥४॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रबोधयितुमीश्वरीम् ।
ब्रह्मद्वारमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं समाचरेत् ॥५॥
सुषुम्नेति ॥ इत्युक्ताः शब्दाः एकस्य एकार्थस्य वाचकाः एकवाचकाः ।
पर्याया इत्यर्थः । स्पष्टः श्लोकार्थः ॥ तस्मादिति ॥ यस्माकुण्डलीबोधेनैव षट्चक्र-
भेदादिकं भवति तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सर्वेण प्रयत्नेन ब्रह्म सच्चिदानन्दलक्षणं तस्य द्वारं
प्राप्त्युपायः सुषुम्ना तस्या मुखेऽग्रभागे मुखेन सुषुम्नाद्वारं पिधाय सुप्तामीश्वरी कुण्डली
प्रबोधयितुं प्रकर्षण बोधयितुं मुद्राणां महामुद्रादीनामभ्यासमावृति समाचरेत्
सम्यगाचरेत् ॥ ४ ॥५॥
अब सुषुम्नानाडीके पर्यायोंको कहते हैं कि, सुषुम्ना, शून्यपदवी, ब्रह्मरंध्र, महापथ, श्मशान,
शांभवी, मध्यमार्ग ये संपूर्णशब्द एक अर्थके वाचक हैं अर्थात् इन सबका सुषुम्ना नाडी अर्थ
है । जिससे कुण्डलीके बोधसेही षट्चक्र भेद आदि होते हैं इससे संपूर्ण प्रयत्नसे सच्चिदानन्द-
रूप ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय जो सुषुम्ना उसके अग्रभागमें सुषुम्नाके द्वारको ढककर सोती हुई
जो ईश्वरी (कुण्डली ) है उसका प्रबोध (जगाना) करनेके लिये मुद्राओंका अभ्यास करै
अर्थात् महामुद्रा आदिको करै ॥ ४॥५॥
अथ मुद्रा उद्दिशति महामुद्रेत्यादिना सार्धन-
महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खेचरी।
उड्यानं मूलबन्धश्च बन्धो जालन्धराभिधः ॥६॥
करणी विपरीताख्या वज्रोली शक्तिचालनम् ।
इदं हि मुद्रादशकं जरामरणनाशनम् ॥७॥
महामुद्रेति ॥ सार्धार्थः स्पष्टः॥ मुद्राफलमाह साईद्वाभ्याम्-इदमिति ॥ इद-
मुक्तं मुद्राणां दशकं जरा च मरणं च जरामरणे तयोर्नाशनं निवारकम् ॥ ६ ॥ ७ ॥
महामुद्रा, महाबन्ध, महावेध, खेचरी, उड्यान, मूलबंध, जालंधरबन्ध, विपरीतकरणी,
चञोली, शक्तिचालन ये पूर्वोक्त दशमुद्रा जरा और मरणको नष्ट करती हैं ॥ ६॥७॥
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
तृतीयः]
(७९)
।
।
आदिनाथोदितं दिव्यमष्टैश्वर्यप्रदायकम्
वल्लभं सर्वसिद्धानां दुर्लभं मरुतामपि ॥ ८॥
आदिनाथेति ॥ आदिनाथेन शम्भुनोदितं कथितम् । दिवि भवं दिव्यमुत्तमम् ।
अष्टौ च तान्यैश्वर्याणि चाष्टैश्वर्याणि अणिमामहिमागरिमालधिमाप्राप्तिप्राकाम्येशतावशि-
ताख्यानि । तत्राणिमा संकल्पमात्रेण प्रकृत्यपगमे परमाणुवदेहस्य सूक्ष्मता ११ महिमा
प्रकृत्या पूरेणाकाशादिवन्महद्भावः२ । गरिमा लघुतरस्यापि तूलादेः पर्वतादिवद् गुरु-
भावः३। लघिमा गुरुतरस्यापि पर्वतादेस्तूलादिवल्लघुभावः ४ । प्राप्तिः सर्वभावसान्नि-
ध्यम् । यथा भूमिस्थ एवांगुल्यग्रेण स्पृशति चन्द्रमसम् ५। प्रकाम्यमिच्छानभिघातः
यथा उदक इव भूमौ निमज्जत्युन्मजति च ६ । ईशता भूतभौतिकानां प्रभवाप्यय-
संस्थानविशेषसामर्थ्यम् ७ । वशित्वं भूतभौतिकानां स्वाधीनकरणम् ८ । तेषां प्रदायक
प्रकर्षेण ददातीति तथा तं स च ते सिद्धाश्च कपिलादयस्तेषां वल्लभं प्रियं मरुतां
देवानामाप दुर्लभं दुष्पापं किमुतान्येषामित्यर्थः ॥ ८ ॥
और आदिनाथने कहे जो उत्तम आठ ऐश्वर्य उनको भली प्रकार देती हैं और सम्पूर्ण जो
कपिल आदि सिद्ध हैं उनको प्रिय हैं और देवताओंकोभी दुर्लभ हैं । वे आठ ऐश्वर्य ये हैं कि
अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशता,वशिता । उनमें आणमा वह सिद्धि
होती है कि, योगीके संकल्पमात्रसे प्रकृतिके दूर होनेपर परमाणुके समान सूक्ष्म देह होजाय
उसे अणिमा १ कहते हैं और प्रकृतिके आपूरका करक अर्थात् अपन देहमें भरके आकाशके
समान महान् स्थूल हो जानेको महिमा २ सिद्धि कहते हैं और तूल (रुई) आदि लघु
पदार्थकोभी पर्वत आदिके समान जो गुरु ( भारी) हो जाना ह उसे गरिमा ३ कहते हैं
और अत्यंत गुरु ( पर्वत आदि) का जो तूल आदिके समान लघु (हलका ) होना है उसे
लधिमा ४ कहते हैं और संपूर्ण पदार्थोके जो समीप पहुँचना जैसे कि भूमिपर स्थित योगी
अंगुलिके अग्रसे चंद्रमाका स्पर्श करले इसे प्राप्ति ५ कहते ह और इच्छाका अनभिघात
अर्थात् जलके समान भूमिमें प्रविष्ट होजाय और निकस आवै इसको प्राकाम्य ६ कहते
हैं। पांचों महाभूत और उनसे उत्पन्न भौतिकपदार्थ इनकी उत्पत्ति और प्रलय और पालनके
सामर्थ्यको ईशता सिद्धि ७ कहते हैं और भूत भौतिक पदार्थोंको अपने अधीन करनेको
वशिता ८ सिद्धि कहते हैं ये आठों सिद्धि पूर्वोक्त दशों मुद्राओंके करनेसे होती हैं ॥ ८ ॥
गोपनीयं प्रयत्नेन यथा रत्नकरण्डकम् ।
कस्यचिन्नैव वक्तव्यं कुलस्त्रीसुरतं यथा ॥९॥
गोपनीयमिति ॥ प्रयत्नेन प्रकृष्टेन यत्नेन गोपनीयम् । गोपनीयत्वे दृष्टांतमाह-
यथेति ॥ रत्नानां हरिकादीनां करण्डकं रत्नकरण्डकं यथा येन प्रकारेण गोप्यते तद्वत्
कस्यापि जनमात्रस्य । यदा कस्यापि ब्रह्मणोऽपि नैव वक्तध्यं नैव वाच्यम्, किमुता-
न्यस्य । तत्र दृष्टान्तः । कुलस्त्रियाः सुरतं कुलस्त्रीसुरतं संगमनं यथा तद्वत् ॥ ९ ॥
(८०)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेशः-
ये पूर्वोक्त दशों मुद्रा इस प्रकार प्रयत्नसे गुप्त करने योग्य हैं जैसे हीरा आदि रत्नोंका
करंड (पेटारी) गुप्त करने योग्य होतीहै और किसी मनुष्यको वा ब्रह्माको भी इस प्रकार
नहीं कहनी अन्यकी तौ कौन कथा है ? जैसे कुलीनस्त्रीके सुरत ( संगम) को किसीको नहीं
कहते हैं ॥ ९॥
दशविधमुद्रादिषु प्रथमोदिष्टत्वेन महामुद्रां तावदाह-
पादमूलेन वामेन योनि संपीड्य दक्षिणम् ।
प्रसारितं पदं कृत्वा कराभ्यां धारयेदृढम् ॥१०॥
पादमूलेनेति ॥ वामेन सव्येन पादस्य मूलं पादमूलं पाणिस्तेन पादमूलेन
वामपादपाणिनेत्यर्थः । योनि योनिस्थानं गुदमेद्रयोर्मध्यभागं संपीड्याकुञ्चितवाम-
पादपाणना योनिस्थानं दृढं संयोज्येत्यर्थः । दक्षिणं सव्येतरं पदं चरणं प्रसारितं
भूमिसंलग्नपाष्णिकमूवीगुलिक दण्डवत्कृत्वा कराभ्यां संप्रदायादाकुञ्चितकरतर्ज-
नीभ्यां दृढं गाढं धारयेदंगुष्ठप्रदेशे गृहीयात् ॥ १० ॥
अब दशोमुद्राओंमें प्रथम जो महामुद्रा उसका वर्णन करते हैं कि, वामपादके मूल ( तल)
से अर्थात् पाणिसे योनिस्थानको अर्थात् गुदा और लिंगके मध्यभागको भलीप्रकार पीडित
(दबाना) करके और दक्षिणपादको प्रसारित (फैलाना) करके अर्थात् दक्षिणपादकी पाणि
(ऐड) को भूमिसे मिलाकर और उसकी अंगुलियोंको ऊपरको करके और उस दक्षिण-
पादको सुकडीहुई दोनों हाथोंकी तर्जनीओंसे दृढरीतिसे ( खूब ) अंगूठेके स्थानमें धारण करै
अर्थात् जोरसे पकडले ॥ १०॥
कण्ठे बन्धं समारोप्य धारयेद्वायुमूलतः।
यथा दण्डहतः सौ दण्डाकारः प्रजायते ॥ ११॥
कण्ठ इति ॥ कण्ठे कण्ठदेशे बन्धनं सम्यगारोप्य कृत्वा । जालन्धरबन्धं कृत्वे-
त्यर्थः । वायुं पवनमूर्ध्वत उपरि सुषुम्नायां धारयेत् । अनेन मूलबन्धः सूचितः । स
तु योनिसम्पीडनेन जिह्वाबन्धनेनं चरितार्थ इति साम्प्रदायिकाः। यथा दण्डेन हत-
स्ताडितो दण्डहतः सर्पः कुण्डली दण्डाकारः दण्डस्याकार इवाकारो यस्य स तादृशः।
वक्राकारं त्यक्त्वा सरल इत्यर्थः । प्रकर्षेण जायते भवति ॥ ११ ॥
और कंठके प्रदेशमें भलीप्रकार जालंधरनामके बंधको करके वायुको ऊर्ध्वदेश (सुषुम्ना),
ही धारण करै अर्थात् मूलबंध करे और सांप्रदायिक अर्थात् संप्रदायके ज्ञाता तो यह कहते
हैं कि, वह मूलबंध तो योनिका संपीडन और जिह्वाके बंधनसे चरितार्थ है अर्थात् पृथक् मूल-
बंध करनेका कुछ प्रयोजन नहीं है ऐसा करनेसे जैसे दंडसे हत हुआ सर्प ( कुण्डली) दण्डके
समान आकारवाला होजाता है अर्थात् वक्रताको त्यागकर भलीप्रकार सरल होजाता है।॥११॥
ऋग्वीभूता तथा शक्तिः कुण्डली सहसा भवेत् ।
तदा सा मरणावस्था जायते दिपुटाश्रया ॥ १२ ॥
तृतीयः] संस्कृवटीका-भाषाटीकासमेता। (८१) ऋज्वीभूतेति ॥ तथा कुण्डल्याधारशक्तिः सहसा शीघ्रमेव ऋज्वी सम्पद्यते तथाभूता ऋज्वीभूता सरला भवेत् । तदा सेति । द्वे पुटे इडापिङ्गले आश्रयों यस्याः सा मरणावस्था जायते । कुण्डलीबोधे सति सुषुम्नायां प्रविष्टे प्राणे दयोः प्राणवियोगात् ॥ १२ ॥ तिसीप्रकार आधार शक्ति रूप जो कुण्डली है वह शीघ्रही ऋज्वीभूत (सरल) होजाती है और उस समय इडा और पिंगलारूप जो दोनों पुट हैं वे आश्रय जिसके ऐसी वह मरणकी अवस्था होजाती है अर्थात् कुण्डलीका बोध होनेपर सुषुम्नानाडीमें प्राणका प्रवेश हो जाता है इससे इडा और पिंगला दोनोंका प्राणवियोग ( मरण ) होजाता है ।। १२ ।। ततः शनैःशनैरेव रेचयेनैव वेगतः। महामुद्रां च तेनैव वदन्ति विबुधोत्तमाः॥१३॥ इयं खलु महामुद्रा महासिद्धःप्रदर्शिता । महाकेशादयो दोषाःक्षीयन्ते मरणादयः॥ महामुद्रां च तेनैव वदन्ति विबुधोत्तमाः ॥१४॥ तत इति ॥ इयमिति ॥ ततस्तदनन्तरं शनैः शनैरेव रेचयेत् । वायुमिति सम्ब. ध्यते । वेगतस्तु वेगान्न रेचयेत् । वेगतो रेचने बलहानिप्रसङ्गात् । खल्विति वाक्याल- ङ्कारे । इयं महामुद्रा महासिद्धरादिनाथादिभिः प्रदर्शिता प्रकर्षेण दर्शिता । महामुद्राया अन्वथतामाह-महान्तश्च ते क्लेशाश्च महाक्लेशाः अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च त आदयो येषां ते शोकमोहादीनां ते दोषाः क्षीयन्ते । मरणमादियेषां जरादीनां तेऽपि च क्षीयन्ते नश्यति । यतस्तेनैव हेतुना विशिष्टा बुधा विबुधास्तेषूत्तमा विबु- धोत्तमा महामुद्रां वदति । महाक्केशान्मरणादींश्च दोषान्मुद्रयति शमयतीति महामुद्रेति व्युत्पत्तरित्यर्थः ॥ १३ ॥ १४ ॥ तिससे शनैः २ प्राणवायुका रेचन करै वेगसे न करै क्योंकि वेगसे रेचन करनेमें बलकी हानि होती है। तिससेही देवताओंमें उत्तम इसको महामुद्रा कहते हैं और वह महामुद्रा आदि- नाथ आदि महासिद्धोंने भलीप्रकार दिखाई है। अब महामुद्राके अन्वर्थनामका वर्णन करते हैं कि, आविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेशरूप पांचों महाक्लेश और मरण आदि दुःख इस मुद्राके करनेसे क्षीण (नष्ट) होजातेहैं । तिससेही देवताओंमें श्रेष्ठ इसको महामुद्रा कहते हैं अर्थात् महाक्लेशोंके नष्ट करनेसेही इसका देवताओंने महामुद्रा नाम रक्खा है ॥ १३ ॥ १४ ॥ महामुद्राभ्यासक्रममाह- चन्द्राङ्गे तु समभ्यस्य सूर्या) पुनरभ्यसेत् । यावत्तुल्या भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥ १२॥ -- । ६
(८२)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
चन्द्राङ्ग इति ॥ चन्द्रेण चन्द्रनाड्योपलक्षितमङ्गं चन्द्राङ्गं तस्मिन् चन्द्राङ्गे
वामाङ्गे । तुशब्दः पादपूरणे । सम्यगभ्यस्य सूर्येण पिंगलयोपलक्षितमंगं सूर्याङ्गं
तस्मिन् सूर्यांगे दक्षांगे पुनर्वामांगाभ्यासानन्तरं यावद्यावत्कालपर्यंत तुल्या वामांगे
कुम्भकाभ्याससंख्यासमा संख्या भवेत्तावदभ्यसेत् । ततः संख्यासाम्यानन्तरं मुद्रां
महामुद्रां विसर्जयेत्। अत्रायंक्रमः-आकुञ्चितवामपादपाणि योनिस्थाने संयोज्य प्रसा-
रितदक्षिणपादांगुष्ठमाकुञ्चिततर्जनीभ्यां गृहीत्वाऽभ्यासो वामांगेऽभ्यासः। अस्मिन्नभ्यासे
पूरितो वायुर्वामांगे तिष्ठति । आकुञ्चितदक्षपादपाणि योनिस्थाने संयोज्य प्रसारित-
वामपादांगुष्ठमाकुञ्चिततर्जनीभ्यां गृहीत्वाऽभ्यासो दक्षांगेऽभ्यासः । अस्मिन्नभ्यासे पूरित
वायुर्दांगे तिष्ठति ॥ १५॥
अब महामुद्राके अभ्यासका क्रम कहते हैं कि, चंद्रनाडी ( इडा ) से उपलक्षित (ज्ञात )
जो अंग उसे चंद्रांग कहते हैं अर्थात् वाम अंगके विषे भली प्रकार अभ्यास करके सूर्यनाडी
(पिंगला) से उपलक्षित जो दक्षिण अंग उसके विषे अभ्यास करै और जबतक कुंभक
प्राणायामोंके अभ्यासकी संख्या समान ( तुल्य) हो तबतक भलीप्रकार अभ्यास कर फिर
संख्याओंको समानताके अनंतर महामुद्राका विसर्जन करदे, यहां यह क्रम जानना कि,
संकुचित किये वामपादकी पार्णिको योनिस्थानमें युक्त (मिला ) करके प्रसारित ( पसारे )
दक्षिण पादके अँगूठेको आकुंचित ( सुकडी) तर्जनियोंसे ग्रहण करके जो अभ्यास उसे
वामांगमें अभ्यास कहते हैं इस अभ्यासमें पूरित किया (भराहुआ) वायु वामांगमें टिकता
है और आकुंचित किये दक्षिणपादकी पार्णिको योनिस्थानमें संयुक्त करके और प्रसारित
( फैलाये ) किये वामपादके अँगूठेको आकुंचित कीहुई दोनों हाथोंकी तर्जनियोंसे ग्रहण
करके जो अभ्यास उसे दक्षांगमें अभ्यास कहते हैं । इस अभ्यासमें पूरित किया वायु दक्षिण
अंगमें टिकता है ॥ १५॥
महामुद्रागुणानाह त्रिभिः-
न हि पथ्यमपथ्यं वा रसाः सर्वेऽपि नीरसाः।
अपि भुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीर्यति ॥ १६ ॥
न हीति ॥ हि यस्मान्महामुदाभ्यासिन इत्यध्याहारः। पथ्यमपथ्यं वा न । पथ्या-
पथ्यविचारो नास्तीत्यर्थः । तस्मात्सर्वे भुक्ता रसाः कट्वम्लादयो जीर्यन्ति इति
विभक्तिविपरिणामेनान्वयः। नीरसा निर्गतो रसो येभ्यस्ते यातयामाः पदार्या जीर्यन्ति ।
घोरमिति । दुर्जरं भुक्तमन्नं विषं वेडमपि पीयूषमिवामृतमिव जीर्यति जीर्ण भवति ।
किमुतान्यदिति भावः ॥ १६ ॥
अब तीन श्लोकोंसे महामुद्राके गुणोंको कहते हैं कि, जिससे महामुद्रा अभ्यास करनेवाले
योगीको पथ्य और अपथ्यका विचार नहीं है तिससे नीरस ( बिगडे हुए) भी संपूर्ण भक्षण
किये कटु अम्ल आदि रस जीर्ण हो ( पच ) जाते हैं और भक्षण किया विषके समान
घोर अन्नभी अमृतके समान जीर्ण होजाता है अर्थात् पचनेके अयोग्यभी पचजाता है तो योग्य
क्यों न पचेगा ॥ १६ ॥
तृतीयः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
(८३)
क्षयकुष्ठगुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः।
तस्य दोषाः क्षयं यान्ति महामुद्रां तु योऽभ्यसेत् ॥ १७ ॥
क्षयेति ॥ यः पुमान् महामुद्रामभ्यसेत्तस्य क्षयो राजरोगः कुष्ठशुदावर्तगुल्माः
रोगविशेषाः । अजीर्ण भुक्तान्नापरिपाकस्तानि पुरोगमान्यग्रेसराणि येषां महोदरज्वरा-
दीनां तथा तादृशा दोषा दोषजनिता रोगाः क्षयं नाशं यांति प्राप्नुवंति ॥ १७ ॥
जो पुरुष महामुद्राका अभ्यास करताहै, क्षय कुष्ठ गुद उदावर्त गुल्मरूप रोगविशेष अजीर्ण
अर्थात् भोजन किये अन्नका अपरिपाक ये हैं मुख्य जिनमें ऐसे महोदर, ज्वर आदि दोष उसके
क्षय हो जाते हैं अर्थात् नहीं रहते हैं ॥ १७ ॥
महामुद्रामुपसंहरंस्तस्या गोप्यत्वमाह-
कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम् ।
गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्यकस्यचित् ॥१८॥
कथितेति ॥ इयमेषा महामुद्रा कथितोक्ता। मयेति शेषः । कीदृशी नृणामभ्य-
सतां नराणां महत्यश्च ताः सिद्धयश्चाणिमाद्यास्तासां करी कर्जीयम् । प्रकृष्टो यत्नः
प्रयत्नस्तेन प्रयत्नेन गोपनीया गोपनार्दा यस्यकस्यचिद्यस्यकस्याप्यनधिकारिणोऽस-
म्बन्धस्य । सामान्ये षष्ठी । न देया दातुं योग्या न भवतीत्यर्थः ॥ १८ ॥
अब महामुद्राको समाप्त करते हुए उसको गुप्त करने योग्य वर्णन करते हैं कि, यह पूर्वोक्त
जो महामुद्रावर्णन की है वह मनुष्योंको महासिद्धिकी करनेवाली है और बडे यत्नसे गुप्त करने
योग्य है और जिस किसी अनधिकारी पुरुषको न देनी ॥ १८ ॥
अथ महाबन्धमाह-
पाणि वामस्य पादस्य योनिस्थाने नियोजयेत् ।
वामोरूपरि संस्थाप्य दक्षिणं चरणं तथा ॥ १९ ॥
पाणिमिति ॥ वामस्य सव्यस्य पादस्य चरणस्य पाणि मुल्फयोरधोभागम्
'तद्ग्रन्थी घुटिके गुल्फो पुमान्पाणिस्तयोरधः' इत्यमरः । योनिस्थाने गुदमेद्रयोरंतराले
नियोजयनितरां योजयेत् । वामः सव्यो य ऊरुस्तस्योपरि दक्षिणं चरणं पादं संस्थाप्य
सम्यक् स्थापयित्वा । तथाशब्दः पादपूरणे ॥ १९ ॥
अब महाबन्धका वर्णन करते हैं कि, वामचरणकी पार्णिको योनिस्थानमें अर्थात
गुदा
और
लिंगके मध्यभागमें लगावे और वामजंघा ऊपर दक्षिणपादको रखकर बैठे ॥ १९ ॥
पूरयित्वा ततो वायुं हृदये चिवुकं दृढम् ।
निष्पीड्य योनिमाकुंच्य मनो मध्ये नियोजयेत् ॥ २० ॥
[ उपदेश:- हठयोगप्रदीपिका। (८४) me पूरयित्वेति ॥ ततस्तदनंतरं वायुं पूरयित्वा हृदये चितुकं दृढं निष्पीड्य संस्थाप्य । एतेन जालन्धरबन्धः प्रोक्तः। योनि मुदमेडूयोरन्तरालमाकुंच्य । अनेन मूलबन्धः सूचितः। स तु जिह्वाबन्धेन गतार्थत्वान्न कर्तव्यः। मनः स्वान्तं मध्ये मध्य- नाड्यां नियोजयेत्प्रवर्तयेत् ॥ २० ॥ इस पूर्वोक्त आसन बांधनेके अनन्तर वायुको पूरण करके और हृदयमें दृढतासे (खूब) चुबुक (ठोढी) को अर्थात् इस जालंधरबन्धको करके और योनि (गुदा लिंगके मध्य) को संकुचित करके अर्थात् मूलबन्धको करके परन्तु यह मूलबन्ध जिह्वाके बन्धनसेही सिद्ध है इससे करने योग्य नहीं है फिर मनको मध्य नाडीके विषे प्रविष्ट करै ॥ २० ॥ धारयित्वा यथाशक्ति रेचयेदनिलं शनैः। सव्याले तु समभ्यस्य दक्षाढ़े पुनरभ्यसेत् ॥२१॥ धारयित्वेति ॥ शक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति धारयित्वा कुम्भयित्वा शनैमदं- मन्दमनिलं वायु रेचयेत् । सव्यांगे वामांगे समभ्यस्य सम्यगावर्त्य दक्षांगे दक्षिणांगें पुनर्यावत्तुल्यामेव संख्यां तावदभ्यसेत् ॥ २१ ॥ फिर वायुको यथाशक्ति धारण करके अर्थात् कुम्भक प्राणायामको करके शनैः २ वायुकारेचन करै । इस प्रकार वाम अंगमें भली प्रकार अभ्यास करके दक्षिण अंगमें फिर अभ्यास करै और वह अभ्यास तबतक करै जबतक वामांग अभ्यासकी जो संख्या उसकी तुल्यता हो ॥ २१ ।। अथ जालन्धरबन्धे कण्ठसंकोचस्यानुपयोगमाह- मतमत्र तु केषांचित्कण्ठबन्धं विवर्जयेत् । राजदन्तस्थजिह्वायां बन्धः शस्तो भवेदिति ॥२२॥ मतमिति ॥ केषांचित्त्वाचार्याणामिदं मतम् । किं तदित्याह । अत्र जालन्धर- बन्धे कण्ठस्य बन्धनं बन्धः संकोचस्तं विवर्जयेद्विशेषेण वर्जयेत् । कुतः यतो दन्तानां राजानो राजदन्ता राजदन्तेषु तिष्ठतीति राजदन्तस्था, राजदन्तस्था चासौ जिह्वा च तस्यां राजदन्तस्थजिह्वायां बन्धस्तदुपरिभागस्य सम्बन्धः शस्तः कण्ठाकुञ्चनापे- क्षया प्रशस्तो भवेदिति हेतोः ॥ २२ ॥ अब जालन्धरबन्धमें कण्ठके संकोचका अनुपयोग वर्णन करते हैं कि, किन्ही २ आचार्योंका यह मत है कि, इस जालन्धरबन्धमें कण्ठकाजो बन्धन (संकोच) उसको विशेषकर वर्जदे क्योंकि राजद्न्तों ( दाढ ) के ऊपर स्थित जो जिहाउसका बन्धही जालन्धर बन्धमें प्रशस्त होता है अर्थात् कण्ठ संकोचकी अपेक्षा वह उत्तम होताहै ॥ २२ ॥ अयं तु सर्वनाडीनामूर्ध्वगतिनिरोधकः। अयं खलु महाबन्धो महासिद्धिप्रदायकः॥२३॥ अयं त्विति ॥ अयं तु राजदन्तस्थजिह्वायां बन्धस्तु सर्वाश्च ता नाड्यश्च सव- नाड्यो द्वासप्ततिसहस्रसंख्याकास्तासां सुषुम्नातिरिक्तानामूर्ध्वमुपरि वायोर्गतिरुचे
तृतीयः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
(८५)
गतिस्तस्या निरोधकः प्रतिबंधकः । एतेन बध्नातेि हि शिराजालम् ' इति जालन्ध-
रोक्तं फलमनेनैव सिद्धमिति सूचितम् । महाबन्धस्य फलमाह-अयं खल्विति ॥ अय-
मुक्तः खलु प्रसिद्धः महासिद्धीः प्रकर्षेण ददातीति तथा ॥ २३ ॥
यह राजदंतोंमें स्थित जिह्वाका बन्ध, बहत्तर सहस्र ७२००० सुषुम्नासे भिन्न नाडियोंकी जो
ऊर्ध्वगति अर्थात् नाडियोंमें जो प्राणवायुका ऊर्ध्वगमन उसका प्रतिबन्धक है। इससे यह सूचित
किया कि, नाडियोंके जालको जो बन्धन करै उसे जालन्धरबन्ध कहते हैं। यह जालंधरबंधका
फल इससेही सिद्ध है । अब महाबंधके फलको कहते हैं कि, यह महाबंध निश्चयसे महासिद्धि-
योंको भली प्रकार देता है ॥ २३ ॥
कालपाशमहाबन्धविमोचनविचक्षणः।
त्रिवेणीसङ्गमं धत्ते केदारं प्रापयेन्मनः ॥२४॥
कालेति ।। कालस्य मृत्योः पाशो वागुरा तेन यो महाबन्धो बन्धनं तस्य विशे-
षेण मोचने मोक्षणे विचक्षणः प्रवीणः । तिसृणां नदीनां वेणी समुदायः स एव संगमः
प्रयागस्तं धत्ते विधत्ते । केदार ध्रुवोर्मध्ये शिवस्थानं केदारशब्दवाच्यं तं मनः स्वान्तं
प्रापयेत् । 'गतिबुद्धि-' इत्यादिना अणौ कर्तुर्मनसो णौ कर्मत्वम् ॥ २४ ॥
और मृत्युके पाशका जो महाबंधन उसके छुटाने में विशेषकर प्रवीण है और तीन नदियोंका
संगम जो प्रयाग है उसको करता है और मनको भ्रुकुटियोंके मध्यमें जो शिवजीका स्थानरूप
केदार है उसमें प्राप्त करता है अर्थात् पहुँचाता है ॥ २४ ।।
महावेधं वक्तुमादौ तस्योत्कर्ष तावदाह-
रूपलावण्यसम्पन्ना यथा स्त्री पुरुषं विना
महामुद्रामहाबन्धौ निष्फलौ वेधवर्जितौ ॥२५॥
रूपेति ॥ रूपं सौन्दर्य चक्षुःप्रियो गुणो लावण्यं कान्तिविशेषः । तदुक्तम्-'मुक्ता-
फलेषु छायायास्तरलत्वमिवान्तरम् । प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते' इति ।
ताभ्यां सम्पन्ना विशिष्टा स्त्री युवती पुरुषं भर्तारं विना यथा यादृशी निष्फला तथा
महामुद्रा च महाबन्धश्च तौ । वेधेन महावेधेन विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोलोंपो वक्तव्यः'
इति भाष्यकारोक्तेमहच्छब्दस्य लोपः। वर्जितौं रहितौ निष्फलौ व्यर्थावित्यर्थः ॥२५॥
अब महावेधके कहने के लिये प्रथम उसकी उत्तमताको कहते हैं कि, रूप (सुंदरता) और
इस वचनमें कहे हुए लावण्य-मोतियोंमें छाया (प्रतिबिंब) की तरलताके समान स्त्रोके अंगोंमें
अंतर जो प्रतीत होता है वह यहां लावण्य कहाता है, इन दोनों पूर्वोक्त रूप और लावण्यसे युक्त
श्री, पुरुषके विना निष्फल है. तिसी प्रकार महामुद्रा और बंध ये दोनों भी महावेधके विना
विश्कल हैं. शोकमें वेधपदसे महावेध लेते हैं, क्योंकि प्रत्ययके विना भी पूर्व और उत्तरपदका
लोप कहनां । इस भाष्यकारके वचनसे महच्छब्दका लोप होताहै ॥२५॥
(८६)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेशः-
-
अथ महावेधमाह-
महाबन्धस्थितो योगी कृत्वा पूरकमेकधीः ।
वायूनां गतिमावृत्य निभृतं कण्ठमुद्रया॥२६॥
महावेधेति ॥ महाबन्धे महाबन्धमुद्रायां स्थितो महाबन्धस्थितः । एका एकाग्रा
धीर्यस्य स एकाग्रधीयर्योगी योगाभ्यासी पूरकं नासापुटाभ्यां वायोर्ग्रहणं कृत्वा कण्ठे
मुद्रा कण्ठमुद्रा तया जालन्धरमुद्रया वायूनां प्राणादीनां गतिमूधिोगमनादिरूपां
निभृतं निश्चलं यथा भवति तथाऽवृत्य निरुध्य कुम्भकं कृत्वेत्यर्थः ॥ २६ ॥
अब महावेधका वर्णन करते हैं कि, महाबंधमुद्रा में स्थित अर्थात् करता हुआ योगी एकाग्र-
बुद्धिसे पूरक प्राणायामको करके अर्थात् योगमार्गसे नासिकाके पुटोंसे वायुका ग्रहण करके
कंठमुद्रा (जालंधर मुद्रा) से प्राण आदि वायुओंको जो ऊर्ध्व अधोगतिरूप गमन है उसको
निश्चल रीतिसे रोककर अर्थात् कुंभकप्राणायामको करके ॥ २६ ॥
समहस्तयुगो भूमौ स्फिचौ सन्ताडयेच्छनैः।
पुटद्वयमतिक्रम्य वायुः स्फुरति मध्यगः॥२७॥
समहस्तेति ॥ भूमौ भुवि हस्तयोर्युगं हस्तयुगं समं हस्तयुगं यस्य स समहस्त-
युगः भूमिसंलग्नतलौ सरलौ हस्तौ यस्य तादृशः सन्नित्यर्थः । स्फिचौ कटिमोथौ ।
स्त्रियां स्फिचौ कटिमोथौ' इत्यमरः । भूमिसंलग्नतलयोर्हस्तयोरखलंबनेन योनि-
स्थानसंलग्नपाणिना वामपादेन सह भूमेः किञ्चिदुत्थापितौ शनैर्मदं सन्ताडयेत्सम्यक्
ताडयेत् । भूमावेव पुटयोयमिडापिङ्गलयोर्युग्ममतिक्रम्योल्लङ्घय मध्ये सुषुम्नामध्ये
गच्छतीति मध्यगो वायुः स्फुरति ॥ २७ ॥
भूमिपर लगाहै तल जिनका ऐसे सरल हाथोंको अपने जो स्फिच (चूतड ) हैं उनको
भूमिपर लगेहुए हाथोंके आश्रय और योनिस्थानमें लगीहुई पाणि जिसकी ऐसे वामपाद-
सहित पूर्वोक्तं स्फिचोंको भूमिसे ऊपर किञ्चित् उठाकर शनैः २ भली प्रकार ताडे, इस प्रकार
करनेसे इडा और पिंगलारूप दोनों नाडियोंका उल्लंघन (छोड) करके सुषुम्नाके मध्यमें वायु
चलने लगता है अर्थात् सुषुम्नामें प्राणवायुको गति होजाती है ॥ २७ ॥
सोमसूर्याग्निसंबन्धो जायते चामृताय वै।
मृतावस्था समुत्पन्ना ततो वायुं विरेचयेत् ॥ २८॥
सोमेति ॥ सोमश्च सूर्यश्चाग्निश्च सोमसूर्याग्नयः सोमसूर्याग्निशब्दैस्तदधिष्ठिता
नाड्य इडापिङ्गलासुषुम्ना ग्राह्यास्तेषां सम्बन्धः तद्वायुसम्बन्धात्तेषां संबन्धः अमृ-
ताय मोक्षाय जायते । वै इति निश्चयेऽव्ययम् । मृतस्य प्राणवियुक्तस्यावस्था मृतावस्था
समुत्पन्ना भवति । इडापिङ्गलयोः प्राणसञ्चाराभावात् । ततस्तदनन्तरं वायुं विरेचये-
नासिकापुटाभ्यां शनैस्त्यजेत् ॥ २८ ॥
तृतीयः
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
(८७)
फिर चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि अर्थात् ये तीनों देवता हैं क्रमसे अधिष्ठाता जिनके ऐसी इडा
पिंगला सुषुम्ना नाडियोंका संबंध मोक्षका हेतु निश्चयसे होजाता है अर्थात् तीनों नाडियोंका
वायु एक हो जाता है। तब इडा और पिंगलाके मध्यमें प्राणसंचारके अभावसे मरण अवस्था
उत्पन्न होजाती ह. क्योंकि, इडा पिंगलामें जो प्रागोंका संचार उसका नामही जीवन है,
फिर मरण अवस्थाकी उत्पत्तिके अनंतर वायुको विरेचन करदे अर्थात् नासिकाके पुटोंमेंसे
शनैः२ त्यागदे ॥ २८॥
महावेधोऽयमभ्यासान्महासिद्धिप्रदायकः।
वलीपलितवेपघ्नः सेव्यते साधकोत्तमैः ॥२९॥
महावेध इति ॥ अयं महावेधोऽभ्यासात्पुनःपुनरावर्तनान्महासिद्धयोऽणिमाद्या-
स्तासां प्रदायकः प्रकर्षेण समर्थकः । वली जरया चर्मसंकोचः, पलितं जरसा
केशेषु शाक्ल्यं, वेपः कम्पस्तान् हन्तीति वलीपलितवेपन्नः । अत एव साधकेष्वभ्या-
सिषत्तमाः साधकोत्तमास्तैः सेव्यतेऽभ्यस्यत इत्यर्थः ॥ २९ ॥
यह महावेध अभ्यास करनेसे अणिमा आदि महासिद्धियोंको भलीप्रकार देता है और
वली अर्थात् वृद्ध अवस्थासे चर्मका संकोच और पलित अर्थात् वृद्धतासे केशोंकी शुक्लता और
देहका कंपना इनको नष्ट करता है इसीसे साधकों ( अभ्यासी) में जो उत्तम हैं वे इस महा-
वेधका अभ्यासरूप सेवन करते हैं ॥ २९ ॥
महामुद्रादीनां तिसृणामतिगोप्यत्वमाह-
एतत्रयं महागुह्यं जरामृत्युविनाशनम् ।
वह्निवृद्धिकरं चैव झुणिमादिगुणप्रदम् ॥३०॥
एतदिति ॥ एतत्रयं महामुद्रादित्रयं महागुह्यमतिरहस्यम् । अत्र हेतुगर्भाणि
विशेषणानि हि यस्माज्जरा वार्धकं मृत्युश्चरमः प्राणदेहवियोगः तयोविशेषेण नाशनं
वह्वेर्जाठरस्य वृद्धिप्तिस्तस्याः करं कर्तृ अणिमा आदिर्येषां तेऽणिमादयस्ते च ते
गुणाश्च तान् प्रकर्षेण ददातीत्यणिमादिगुणप्रदम् । चकारः आरोग्यबिन्दुजयादि-
समुच्चयार्थः । एवशब्दोऽवधारणार्थः ॥ ३० ॥
अब महामुद्रा आदि पूर्वोक्त तीनोंको अत्यन्त गुप्त करने योग्य वर्णन करते हैं कि, ये
तीनों मुद्रा अत्यंत गुप्त करने योग्य है और जरा मृत्युको विशेषकर नष्ट करती हैं और जठरा-
ग्निको बढाती हैं और अणिमा आदि सिद्धियोंको देती हैं अर्थात् अणिमा आदि गुणोंको
भलीप्रकार उत्पन्न करती हैं और चकारके पढनेसे आरोग्य और बिंदुका जय समझना और
इस श्लोकमें एवपद निश्चयका बोधक है ॥३०॥
अर्थतत्रयस्य पृथक्साधनविशेषमाह-
अष्टधा क्रियते चैव यामे यामे दिने दिने।
पुण्यसंभारसन्धायि पापौघभिदुरं सदा ॥
सम्यक्शिक्षावतामेवं स्वल्पं प्रथमसाधनम् ॥ ३१ ॥
M । (८८) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- अष्टधेति ॥ दिनदिने प्रतिदिनम् । यामेयामे प्रहरमहरे पौनःपुन्ये द्विवचनम् । अष्टभिः प्रकारैरष्टधा क्रियते । चशब्दोऽवधारणे । एतत्रयमित्यत्रापि संबध्यते । कीदृशं पुण्यस्य संभारः समूहस्तस्य संधायि । पुनः कीदृशं पापानामोघः पूरः समूह इति यावत् । तस्य भिदुरं कुलिशमिव नाशनं सदा सर्वदा यदाभ्यस्तं तदैव पापनाश- नम् । सम्यक सांप्रदायिकी शिक्षा गुरूपदेशो विद्यते येषां ते तथा । एवं दिनदिने यामेयामेऽष्टधेत्युक्तरीत्या पूर्वसाधनं स्वल्पस्वल्पमेव कार्यम् ॥ ३१ ॥ अब इन तीनोंके पृथक् २ साधन विशेषको कहते हैं कि, प्रहर २ में और दिन २ में वार- वार आठ प्रकारसे ये तीनों मुद्रा की जाती हैं, यहां भी एवशब्द निश्चयका वाची है और ये तीनों मुद्रा पुण्यके समूहको करती हैं और पापोंका जा समूह है उसको सदैव छेदन करती हैं और भलीप्रकार गुरुकी है शिक्षा जिनको ऐसे पुरुषोंको पूर्वोक्त आठ प्रकारका जो प्रहर २ और दिन २ में साधन है वह अल्प २ (थोडा २) ही करना योग्य है अधिक २ नहीं ॥३१॥ खेचरी विवक्षुरादौ तत्स्वरूपमाह- कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा। भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥३२॥ कपालेति ॥ कपाले मूनि कुहरं सुषिरं तस्मिन् कपालकुहरे विपरीतं प्रतीपंगच्छ- तीति विपरीतगा पराङ्मुखीभूता जिह्वा रसना स्यात् । भ्रुवोरन्तर्गता भ्रुवोर्मध्ये प्रविष्टा दृष्टिदर्शनं स्यात् । सा खेचरी मुद्रा भवति । कपालकुहरे जिह्वाप्रवेशपूर्वक भ्रुवोरन्तर्दर्शनं खेचरीति लक्षणं सिद्धम् ॥ ३२ ॥ अब खेचरीमुद्राके कथनका अभिलाषी आचार्य प्रथम खेचरीके स्वरूपका वर्णन करते हैं कि, कपालके मध्यमें जो छिद्र है उसमें विपरीत ( उलटी) हुई जिह्वा तो प्रविष्ट हो जाय और भ्रुकुटियोंके मध्यमें दृष्टिका प्रवेश होजाय तो वह खेचरीमुद्रा होती है अर्थात् कपालके छिद्रमें जिह्वाके प्रवेशपूर्वक जो भृकुटियोंके मध्यका दर्शन उसे खेचरीमुद्रा कहते हैं ।। ३२ ।। खेचरीसिद्धेर्लक्षणमाह- छेदनचालनदोहैः कलां क्रमेण वर्धयेत्तावत् । सा यावद् भ्रूमध्यं स्पृशति तदा खेचरीसिद्धिः ॥ ३३ ॥ छेदनेति ॥ छेदनम् अनुपदमेव वक्ष्यमाणम् । चालनं हस्तयोरंगुष्ठतर्जनीभ्यां रसनां गृहीत्वा सव्यापसव्यतः परिवर्तनम्, दोहः करयोरंगुष्ठतर्जनीभ्यां गोदोहनवत्तद्दो- हनं तैः कलां जिहां तावद्वर्धयेदीर्घा कुर्यात् । तावत् कियत् ? यावत्सा कला भ्रूमध्यं बहिर्बुवोर्मध्यं स्पृशति यदा तदा खेचर्याः सिद्धिः खेचरीसिद्धिर्भवति ॥ ३३ ॥ अब खेचरीमुद्राको सिद्धिके लक्षणका वर्णन करते हैं कि, छेदन जिसका आगे शीघ्रही वर्णन करेंगे और चालन अर्थात् हाथके अँगूठे और तर्जनीसे जिह्वाको पकडकर वाम और तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (८९) दक्षिणरूपसे परिवर्तन (हलाना) और पूर्वोक्त अँगूठे और तर्जनीसे गोदोहनके समान जिह्वाका दोहन इन तीनोंसे कला (जिह्वा) को तबतक बढावै जबतक वह कला भ्रुकुटियोंके मध्यका स्पर्श करे फिर स्पर्श होनेपर खेचरीमुद्राकी सिद्धिको जानै ॥ ३३ ॥ तत्साधनमाह- स्नुहीपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् । समादाय ततस्तेन रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥ ३४ ॥ स्नुहीति ॥ स्नुही गुडा तस्याः पत्रं दलं स्नुहीपत्रेण सदृशं स्नुहीपत्रनिभं सुतीक्ष्ण- मतितीक्ष्णं स्निग्धं च तन्निर्मलं च स्निग्धनिर्मलं शस्त्रं छेदनसाधनं समादाय सम्य- गादाय गृहीत्वां ततः शस्त्रग्रहणानंतरं तेन शस्त्रेण रोमप्रमाणं रोममात्रं समुच्छिनेत् सम्यगुच्छिनेत् छिन्द्यात् । रसनामूलशिरामिति कर्माध्याहारः। मिश्रेयाप्यय सीहुण्डो वज्रस्नुकू स्त्री स्नुही गुडा' इत्यमरः ॥ ३४ ॥ अब खेचरीकी सिद्धिके साधनोंका वर्णन करते हैं कि, स्नुही (सेहुंड) के पत्तेके समान जो अत्यन्त तीक्ष्ण शस्त्र है चिकने और निर्मल उस शस्त्रको ग्रहण करके उससे जिह्वाके मूलकी नाडीको रोममात्र छेदन करदे ॥ ३४ ॥ ततः सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रघर्षयेत् । पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥ ३५ ॥ तत इति ॥ ततश्छेदनानंतरं चूर्णिताभ्यां चूर्णीकृताभ्यां सैन्धवं सिंधुदेशोद्भवं लवणं पथ्या हरीतकी ताभ्यां प्रघर्षयेत्प्रकर्षेण घर्षयेत् छिन्नं शिराप्रदेशं सप्तदिन- पर्यंत छेदनं सैंधवपथ्याभ्यां घर्षणं च सायंप्रातर्विधेयम् । योगाभ्यासिनो लवणनिषेधात् खदिरपथ्याचूर्ण गृहति । मूले सैंधवोक्तिस्तु हठाभ्यासात्पूर्व खेचरीसाधनाभिप्रायेण । सप्तानां दिनानां समाहारः सप्तदिनं तस्मिन् प्राप्ते गते सति अष्टमे दिन इत्यर्थात् । ये प्राप्त्यर्थास्ते गत्यर्थाः । पूर्वच्छेदनापेक्षयाधिक रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥ ३५ ॥ और छेदनके अनंतर चूर्ण किये (पीस) हुये सैंधव (लवण) और हरडसे जिह्वाके मूलको भलीप्रकार घिसे, सात दिनतक प्रतिदिन छेदन और घिसनेको पूर्वोक्तप्रकारसे प्रातः- काल और सायंकालको करै और योगके अभ्यासीको लवणका निषेध है इससे यहां खदिर ( कत्था ) और पथ्याका चूर्ण लेना योगियोंको कहाहै और मूलग्रंथमें तो सैंधवका कथन हठयोगके अभ्यासके पूर्व खेचरीकी सिद्धिके अभिप्रायसे है, फिर सात दिनके बीतनेपर आठवें दिन रोममात्रका छेदन करै अर्थात् प्रथमच्छेदनसे अधिक रोममात्रका छेदन करे ॥ ३५॥ एवं क्रमेण षण्मासं नित्यं युक्तः समाचरेत् । पण्मासाद्सनामूलशिराबन्धःप्रणश्यति ॥३६॥ एवमिति ॥ एवं क्रमेण पूर्व रोममात्रच्छेदनं सप्तदिनपर्यंतं तावदेव सायंप्रातश्छे- दुनं घर्षणं च । अष्टमे दिनेऽधिकं छेदनमित्युक्तक्रमेण षण्मासं षण्मासपर्यंतं नित्य ।
(९०)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
युक्तः सन् समाचरेत्सम्यगाचरेत् छेदनघर्षणे इति कर्माध्याहारः । षण्मासादनन्तरं
रसना जिह्वा तस्या मूलमधोभागो रसनामूलं तत्र या शिरा कपालकुहररसनासंयोगे
प्रतिबंधिकाभूता नाडी तस्या बंधो बंधनं प्रणश्यति प्रकर्षेण नश्यति ॥ ३६ ॥
इस प्रकार क्रमसे प्रथम रोममात्रका छेदन और उसकाही सातदिनपर्यंत सायंकाल प्रात:
कालके समय घर्षणको प्रतिदिन युक्तहुआ छ:मासपर्यंत करै और आठवें दिन पूर्व किय छेदनसे
आधिक राममात्रका छेदन करक पूर्वोक्त घर्षणको करता रहै । इस रीतिसे छः मासके अनं-
तर जिह्वाके मूलभागमें जो शिराबंध है अर्थात् जिससे जिह्वा कपाल छिद्रमें नहीं पहुँच सकती
वह बधन भलीप्रकार नष्ट होजाता है ।। ३६ ॥
छेदनादिना जिह्वावृद्धौ यत्कर्तव्यं तदाह-
कलां पराङ्मुखी कृत्वा त्रिपथे परियोजयेत्
सा भवेत्खेचरी मुद्रा व्योमचक्रं तदुच्यते ॥३७॥
कलामिति ॥ कलां जिह्वां पराङ्मुखमास्यं यस्याः सा तथा तां पराङ्मुखी
प्रत्यङ्मुखीं कृत्वा तिसृणां नाडीनां पंथाः त्रिपथस्तस्मिंत्रिपथे कपालकुहरे परियो-
जयेत्संयोजयेत् । सा त्रिपथे परियोजनरूपा खेचरी मुद्रा तद् व्योमचक्रमित्युच्यते-
व्योमचक्रशब्देनोच्यते ॥ ३७ ॥
अब छेदन आदिसे जिह्वाको वृद्धि होनेपर करने योग्य कर्मको कहते हैं कि, जिह्वाको पराङ्-
मुख करके अर्थात् पश्चिमको लौटाकर तीनों नाडियोंका मार्ग जो कपालका छिद्र है उसमें संयुक्त
करदे वही खेचरीमुद्रा होतीहै और उसको ही व्योमचक्र कहते हैं ॥३७॥
अथ खेचरीगुणाः-
रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्धमपि तिष्ठति ।
विषैर्विमुच्यते योगी ध्याधिमृत्युजरादिभिः॥३८॥
रसनामिति ॥ ऊर्ध्वं तालूपार विवरं गच्छतीति तां तादृशी रसनां जिह्वां कृत्वा
क्षणार्धं क्षणस्य मुहूर्तस्य अर्ध क्षणार्धं घटिकामात्रमाप खेचरी मुद्रा तिष्ठति चेत्तर्हि
योगी विषैः सर्पवृश्चिकादिविषैर्विमुच्यते विशेषेण मुच्यते । व्याधिर्धातुवैषम्यं मृत्यु-
श्वरमः प्राणदेहवियोगो जरा वृद्धावस्था ता आदयो येषां बाल्यादीनां तैश्च विमुच्यते ।
'उत्सवे च प्रकोष्ठे च मुहूर्ते नियमे तथा । क्षणशब्दो व्यवस्थायां समयेऽपि निगद्यते'
इति नानार्थः ॥ ३८ ॥
अब खेचरीके गुणोंका वर्णन करते हैं कि, जिह्वाको तालुके ऊपरले छिद्र में करके जो योगी
क्षणार्धमी टिकता है अर्थात् एक घटिकामात्र भी स्थित रहताहै (यहां क्षण पदसे इस वचनके
अनुसार मुहूर्तका ग्रहण है ) वह योगी धातुओंकी विषमतारूप व्याधि और मृत्यु अर्थात् प्राण
और देहका वियोग और वृद्ध अवस्था आदिकोंसे और सर्प बिच्छू आदिके विषोंसे विशेष.
कर छुट जाताहे ॥ ३८ ॥
(९१) संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। तृतीयः] न रोगो मरणं तन्द्रा न निद्रा न क्षुधा तृषा । न च मूर्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥ ३९ ॥ न रोग इति ॥ यः खेचरी मुद्रां वेत्ति तस्य रोगो ने मरणं न तन्द्रा तामसान्त:- करणवृत्तिविशेषः । न निद्रा न क्षुधा न तृषा पिपासा न मूर्छा चित्तस्य तमसा- भिभूतावस्थाविशेषश्च न भवेत् ॥ ३९ ॥ जो योगी खेचरीमुद्राको जानता है उसको रोग, मरण और अंतःकरणकी तमोगुणी वृत्ति रूप तंद्राऔर निद्राक्षुधा तृषा और चित्तकी तमोगुणी अवस्थारूप मूर्छा ये सब नहीं होतेहैं ३९ पीडयते न सरोगेण लिप्यते न च कर्मणा । बाध्यते न स कालेन यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥४०॥ पीडयत इति ॥ यः खेचरी मुद्रां वेत्ति स रोगेण ज्वरादिना न पीडयते ॥४०॥ जो खेचरीको जानता है वह रोगसे पीडित नहीं होताहै और न कर्मसे लिप्त होताहै और न कालसे बांधा जाताहै ॥ ४० ॥ चित्तं चरति खे यस्माजिह्वा चरति खे गता। तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा सिद्धैर्निरूपिता ॥४१॥ चित्तमिति ॥ यस्माद्धेतोश्चित्तमन्तःकरणं खे भ्रुवोरन्तरवकाशे चरति जिह्वां खे तत्रैव गता सती चरति । तेन हेतुना एषा कथिता मुद्रा खेचरीनाम खेचरीति प्रसिद्धा। नामेति प्रसिद्धावव्ययम् । सिद्धैः कपिलादिभिर्निरूपिता । खे भ्रुवोरंतव्योम्नि चरति गच्छति चित्तं जिह्वा च यस्यां सा खेचरीत्यवयवशः सा व्युत्पादिता । उक्तेषु त्रिषु श्लोकेषु व्याध्यादीनां पुनरुक्तिस्तु तेषां श्लोकानां संगृहीतत्वान्न दोषाय ॥४१ ॥ जिससे चित्त (अंतःकरण) भृकुटियोंके मध्यरूप आकाशमें विचरता है और जिह्वाभी भृकुटियोंके मध्यमेंही जाकर विचरती है तिसीसे (सिद्धों कपिल आदि) की निरूपण की हुई यह मुद्रा खेचरी इस नामसे प्रसिद्ध है। भृकुटियोंके मध्यरूप आकाशमें जिस मुद्राके करनेसे जिह्वा विचरै उसे खेचरी कहते हैं उस व्युत्पत्तिसे सिद्धोंने यह अन्वर्थमुद्रा वर्णन की है, इन पूर्वोक्त तीनों श्लोकोंमें व्याधिआदिकी जो पुनरुक्ति है वह इसलिये दूषित नहीं हैं कि, ये तीनों श्लोक संगृहीत (किसीके रचेहुए) है अर्थात् मूलके नहीं है ॥ ४१ ।। खेचर्या मुद्रितं येन विवरं लंबिकोलतः। न तस्य क्षरते बिन्दुः कामिन्या श्लेषितस्य च ॥१२॥ खेचर्येति ॥ येन योगिना खेचर्या मुद्रया लंबिकाया अर्ध्वमिति लंबिकोव॑तः । सार्वविभक्तिकस्तसिः । लम्बिका तालु तस्या अर्ध्वत उपरिभागे स्थितं विवर छिद्र-
(९२)
हठयोगप्रदीपिका ।
[ उपदेश:-
मुद्रितं पिहितम् । कामिन्या युक्त्या श्लेषितस्यालिंगितस्यापि । चशब्दोऽप्यर्थे । तस्य
बिन्दुऊर्य न क्षरते न स्वलति ॥ ४२ ॥
जिस योगीने खेचरीमुद्रासे लंबिका (तालु) के ऊपरका छिद्र ढकलिया है कामिनीके स्पर्श
करनेपरभी उस योगीका बिंदु (वीर्य) क्षरित (पडता) नहीं होता अर्थात् अपने मस्तकरूप
-स्थानसे नहीं गिरता है ॥ ४२ ॥
चलितोऽपि यदा बिन्दुः संप्राप्तो योनिमण्डलम् ।
बजत्यूर्व हृतः शक्त्या निबद्धो योनिमुद्रया ॥४३॥
चलित इति ॥ चलितोऽपि स्खलितोऽपि विंदुर्यदा यस्मिन् काले योनिमण्डलं
योनिस्थानं संप्राप्तः संगतस्तदैव योनिमुद्रया मेद्राकुंचनरूपया । एतेन वज्रोलीमुद्रा
सूचिता । निबद्धो नितरां बद्धः शक्त्या आकर्षणशक्त्या हृतः प्रकृष्टं ऊर्ध्वं व्रजति
सुषुम्नामार्गेण बिन्दुस्थानं गच्छति ॥ ४३ ॥
और चलायमान हुआभी विंदु जिस समय योनिके मंडलमें प्राप्त होजाता है तोभी लिंगके
संकोचनरूप योनिमुद्रासे अर्थात् वज्रोलीसे निरंतर बंधा हुआ बिंदु आकर्षण शक्तिसे खिंचा हुआ
सुषुम्नानाडीके मार्गसे ऊर्ध्व (बिंदुके स्थान ) को चला जाता है ॥ ४३ ॥
ऊर्ध्वजिह्वः स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः।
मासार्धेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ॥४४॥
ऊर्ध्वजित इति ॥ ऊर्ध्वा लंबिकोलविवरोन्मुखा जिह्वा यस्य स ऊर्ध्वजितः।
स्थिरो निश्चलो भूत्वा । सोमस्य लम्बिकोलविवरगलितचन्द्रामृतस्य पानं सोमपानं
यः पुमान् करोति । योगं वेत्तीति योगवित् स मासस्याध मासाधैं तेन मासाधेन पक्षण
मृत्युं मरणं जयति अभिभवति । न सन्देहः । निश्चितमेतदित्यर्थः ॥ ४४ ॥
तालुके ऊपरके छिद्रके उन्मुख है जिह्वा जिसकी ऐसा जो योगी वह सोमपान करता है अर्थात्
ऊर्ध्व छिद्रमेंसे गिरते हुए चन्द्रामृतको पीता है योगका ज्ञाता वह एकही मासार्द्धसे अर्थात् पक्ष-
भरसे मृत्युको जीतता है इसमें सन्देह नहीं है अर्थात् यह निश्चित है ।। ४४ ॥
नित्यं सोमकलापूर्ण शरीरं यस्य योगिनः ।
तक्षकेणापि दृष्टस्य विषं तस्य न सर्पति ॥ ४५ ॥
नित्यमिति ॥ यस्य योगिनः शरीरं नित्यं प्रतिदिनं सोनकलापूर्ण चन्द्रकला-
मृतपूर्ण तस्य तक्षकेण सर्पविशेषेणापि दष्टस्य देशितस्य योगिनः शरीरे विषं गरलं
तज्जन्यं दुःखं न सर्पतिं न प्रसरति ॥ ४५ ॥
जिस योगीका शरीर नित्य (सदैव) चन्द्रकलारूप अमृतसे पूर्ण रहता है तक्षक सर्पसे उसे
हुएभी उसके शरीर में विष नहीं फैलता अर्थात् सर्पका विष नहीं चढता ॥ ४५ ॥
तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। इन्धनानि यथा वहिस्तैलवति च दीपकः। तथा सोमकलापूर्ण देही देहं न मुञ्चति ॥४६॥ इन्धनानीति ॥ यथा वह्निः इन्धनानि काष्ठादीनि न मुंचति दीपको दीपः तैल- वति तैलयुक्तां वति च न मुंचति । तथा सोमकलापूर्ण चन्द्रकलामृतपूर्ण देहं शरीरं देही जीवो न मुंचति न त्यजति ॥ ४६ ॥ जैसे अग्नि काष्ठ आदि इंधनोंको और दीपक तैल और बत्तीको नहीं त्याग करते हैं अर्थात् उनके विना नहीं रहते हैं तैसेही देही (जीवात्मा) सोमकलासे पूर्ण देहको नहीं त्यागता है अर्थात् सोमकलासे पूर्ण देह सदैव बना रहता है ॥ ४६ ॥ गोमांस भक्षयेन्नित्यं पिबेदमरवारुणीम् । कुलीनं तमहं मन्ये चेतरे कुलपातकाः ॥४७॥ गोमांसमिति ॥ गोमांसं पारिभाषिकं वक्ष्यमाणं यो भक्षयन्नित्यं प्रतिदिनममर- वारुणीमाप वक्ष्यमाणां पिवेत्तं योगिनम् । अहमिति ग्रन्थकारोक्तिः । कुले जातः कुलीनः तं सत्कुलोत्पन्नं मन्ये । तदुक्तं ब्रह्मवैववर्ते-'कृतार्थों पितरौ तेन धन्यो देशः कुलं च तत् । जायते योगवान्यत्र दत्तमक्षय्यतां व्रजेत् ॥ दृष्टः सम्भाषितः स्पृष्टः पुंप्रकृत्योविवेकवान् । भवकोटिशतापातं पुनाति वृजिनं नृणाम् ॥ ' ब्रह्माण्डपुराणे- 'गृहस्थानां सहस्रेण वानप्रस्थशतेन च । ब्रह्मचारिसहस्रेण योगाभ्यासी विशिष्यते ॥ राजयोगे वामदेवं प्रति शिववाक्यम्-' राजयोगस्य माहात्म्यं को विजानाति तत्त्वतः । तज्ज्ञानी वसते यत्र स देशः पुण्यभाजनम् । दर्शनादर्चनादस्य त्रिसप्तकुलसंयुताः ॥ अज्ञा मुक्तिपदं यांति किं पुनस्तत्परायणाः ॥ अन्तर्योगं बहियोंगं यो जानाति विशेषतः । त्वया मयाप्यसौ वन्द्यः शेषैर्वन्धस्तु किं पुनः ॥' इति । कूर्मपुराणे-'एक- कालं दिकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा । येयुञ्जन्ते महायोगं विज्ञेयास्ते महेश्वराः ॥' इति । इतरे वक्ष्यमाणगोमांसभक्षणामवारुणीपानरहिता अयोगिनस्ते कुलघातकाः कुलनाशकाः सत्कुले जातस्य जन्मनो वैयर्थ्यात् ॥ १७ ॥ जो योगी प्रतिदिन गोमांस (जो आगे कहेंगे) को भक्षण करता है और प्रतिदिन अमर- वारुणी ( जो आगे कहेंगे) को पीता है उसकोही हम श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न मानते हैं अन्य सब मनुष्य कुलका घातक (नाशक) हैं क्योंकि श्रेष्ठकुलमें उनका जन्म निरर्थक है । सोई ब्रह्मवैवर्त में कहा है कि, योगीके माता पिता कृतार्थ हैं और उसके देश और कुलभी धन्य है जहां योग- वान् पैदा होता है और योगीको दिया दान अक्षय होता है पुरुष और प्रकृतिका विवेकी योगीजन दर्शन, भाषण स्पर्श करनेसे मनुष्योंके कोटियों जन्मोंके पापोंसे पवित्र करते हैं। ब्रह्मांडपुराणमें लिखा है कि, सहस्र गृहस्थी और सौ वानप्रस्थ और सहस्र ब्रह्मचारियोसे योगाभ्यासी अधिक होता है और राजयोगके विषयमें वामदेवके प्रति शिवजीका वाक्य है कि, राजयोगके यथार्थ माहात्म्यको कौन जान सकता है ? राजयोगका ज्ञानी जहां वसता है (९४) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- वह देश पुण्यात्मा है इसके दर्शन और पूजनसे इक्कीस कुल सहित मूर्ख भी मुक्तिके पदको प्राप्त होते हैं योगमें तत्पर तो क्यों न हागे जो अन्तर्योग और बहियोगको विशेषकर जानता है वह मुझे और तुझेभी नमस्कार करने योग्य है और शेषमनुष्योंको वन्दना करने योग्य तो क्यों न होगा । कूर्मपुराणमें लिखा है कि, एक समय वा द्विकालमें वा त्रिकालमें वा नित्य जोमहायोगका अभ्यास करते हैं वे महेश्वर (शिव) जानने । इन वचनोंसे योग सर्वोत्तम है ॥४७॥ गोमांसशब्दार्थमाह- गोशन्देनोदिता जिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि । गोमांसभक्षणं तत्तु महापातकनाशनम् ॥४८॥ गोशब्देनेति ॥ गोशब्देन गोइत्याकारकेण शब्देन, गोपदेनेत्यर्थः । जिह्वा रसना उदिता कथिता । तालुनीति सामीपिकाधारे सप्तमी। तालुसमीपोर्ध्वविवरे तस्या जिह्वायाः प्रवेशो गोमांसभक्षणं गोमांसभक्षणशब्दवाच्यम्, तत्तु तादृशं गोमांसभक्षणं तु महा- प्रातकानां स्वर्णस्तेयादीनां नाशनम् ॥ ४८ ॥ अब गोमांसशब्दके अर्थको कहते हैं कि, गोपदसे जिह्वा कही जाती है और तालुके समीप जो ऊर्ध्व छिद्र उसमें जो जिह्वाका प्रवेशउसको गोमांसभक्षण कहते हैं-वह गोमांसभक्षण महा. पातकोंका नाश करनेवाला है ॥४८॥ अमरवारुणीशब्दार्थमाह- जिह्वाप्रवेशसंभूतवह्निनोत्पादितः खलु । चन्द्रात् स्रवति यः सारः स स्यादमरवारुणी ॥ ४९ ॥ जिह्वेति ॥ जिह्वायाः प्रवेशो लंबिको विवरे प्रवेशनं तस्मात्संभूतो यो वह्निरूष्मा तेनोत्पादितो निष्पादितः । अत्र वह्निशब्देनौष्ण्यमुपलभ्यते । यः सारः: चन्द्राभुवो- रन्तर्वामभागस्थात्सोमात्स्रवति गलति सा अमरवारुणी स्यादमरवारुणीपदवाच्या भवेत्॥ अब अमरवारुणीशब्दके अर्थको कहते हैं कि, तालुके ऊर्ध्व छिद्रमें जिह्वाके प्रवेशसे उत्पन्न हुई जो वह्नि ( ऊष्मा ) उससे उत्पन्न हुआ जो सार चन्द्रमासे झरता है अर्थात् भ्रुकुटियोंके मध्यमें वामभागमें स्थित चन्द्रमासे बिंदुरूप सार गिरता है उसको अमरवारुणी कहते हैं ॥४९ चुम्बन्ती यदि लम्बिकायमनिशं जिह्वा रसस्पन्दिनी सक्षारा कटुकाम्लदुग्धसदृशी मध्वाज्यतुल्या तथा। व्याधीनां हरणं जरान्तकरणं शस्त्रागमोदीरणं तस्य स्यादमरत्वमष्टगुणितं सिद्धाङ्गनाकर्षणम् ॥५०॥ चुम्बन्तीति ॥ यदि लम्बिकाग्रं लंबिकोर्ध्वविवरं चुंबन्ती स्पृशन्ती । अनिशं निरन्तरम् । अत एव रसस्य सोमकलामृतस्य स्पन्दः स्पन्दनं प्रस्त्रवणमस्यामस्तीति तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। रसस्पन्दिनी यस्य जिह्वा । शारेण लवणरसेन सहिता सक्षारा कटुकं मरिचादि आम्लं चिञ्चाफलादि दुग्धं पयस्तैः सदृशी समाना । मधु क्षौदमाज्यं घृतं ताभ्यां तुल्या समा। तथाशब्दः समुच्चये। एतैर्विशेषणैरसस्यानेकरसत्वान्मधुरत्वात्स्निग्धत्वाच्च जिह्वाया अपि रसस्पन्दने तथात्वमुक्तम् । तर्हि तस्य व्याधीनां रोगाणां हरणमपगमो जराया वृद्धावस्थाया अन्तकरणं नाशनं शस्त्राणामायुधानामागमः स्वाभिमुखागमनं तस्यो- दीरणं निवारणम् । अष्टौ गुणाः अणिमादयस्ते अस्य सञ्जाता इत्यष्टगुणितममरत्व- ममरभावः । सिद्धानामङ्गनाः सिद्धाङ्गनाः सिद्धाश्च ता अङ्गनाश्चेति वा तासामाकर्षणम आकर्षणशक्तिः स्यात् ॥ ५० ॥ यदि रस (सोमकलाका अमृत) का स्पन्दन (झरना) करनेवाली और लवणके रसके समान और मरिच आदि कटु और इमली आदि अम्ल और दूध इनके सदृश और मधु (सहत) और घृत इनकी तुल्य इन सब विशेषणोंसे रसमें अनेक रस और मधुरता और स्निग्धता (चिकनाइ ) कही उस रसके झरनेवाली जिह्वाकोभी वैसीही कही समझना अर्थात् पूर्वोक्त प्रकारकी जिह्वा तालुके ऊपर वर्तमान छिद्रका वारंवार चुंबन (स्पर्श) करे तो उस मनु- प्यकी व्याधियोंका हरण और वृद्ध अवस्थाका अन्त करना और सम्मुख आये शस्त्रका निवारण और आणिमा आदि आठ सिद्धि हैं जिसमें ऐसा अमरत्व (देवत्व) और सिद्धोंकी अंगनाओंका वा सिद्धरूप अंगनाओंका आकर्षण (बुलाना) उसको ये फल होत हैं ॥ ५० ॥ मूर्ध्नः षोडशपत्रपद्मगलितं प्राणादवाप्तं हठा- दूर्खास्यो रसनां नियम्य विवरे शक्तिं परां चिन्तयन् । उत्कल्लोलकलाजलं च विमलं धारामयं यः पिबे- निर्व्याधिः स मृणालकोमलवपुर्योगी चिरं जीवति ॥५१॥ मूर्ध्न इति ॥ रसनां जिह्वां विवरे कपालकुहरे नियम्य संयोज्य । ऊर्ध्वमुत्तानमास्यं यस्य सः। ऊर्खास्य इत्यनेन विपरीतकरणी सूचिता । परां शक्तिं कुण्डलिनी चिंतयन्ध्यायन्सन् प्राणान्साधनभूतान् । षोडश पत्राणि दलानि यस्य तत् षोडशपत्रं तच्च तत्पमं कण्ठस्थाने वर्तमानं तस्मिन् गलितं हठाठयोगादवाप्तं प्राप्तं विमलं निर्मलं धारामयं धारारूपमुत्कल्लोलमुत्तरङ्गं च तत्कलाजलं सोमकलारसं यः पुमान् पिवेत् धयेत्स योगी निर्गता व्याधयो ज्वरादयो यस्मात्स नियाधिः सन् । यद्वा निर्गतो विविधः आधिर्मानसीव्यथा यस्मात्स तादृशः सन् । मृणालं बिसमिव कोमलं मृदु वपुःशरीरं यस्य स मृणालकोमलवपुश्च सन् चिरं दीर्वकालं जीवति प्राणान् धारयति । हठाठयोगात् । प्राणात्साधनभूतादवाप्तमिति वा योजना । प्राणैरिति क्वचित्पाठः॥५१॥ जो योगी, जिह्वाको कपालके छिद्रमें लगाकर और ऊपरको मुख करके इससे विपरीत- करणी सूचित की और परमशक्ति जो कुंडलिनी उसका ध्यान करता हुआ प्राणवायुके साधन और हठयोगसे प्राप्त और षोडश हैं पत्र जिसके ऐसे पद्ममें मस्तकसे पतित और निर्मल और -
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेश:-
धारारूप और ऊपरको है तरंग जिसकी ऐसे चंद्रकलाके जलको पीता है व्याधिसे रहित
और मृणाल ( बिस) के समान कोमल है वपु ( देह) जिसका ऐसा वह योगी चिर-
कालतक जीता है ॥ ५१ ॥
यत्पालेयं प्रहितसुषिरं मेरुमूर्धान्तरस्थं
तस्मिस्तत्त्वं प्रवदति सुधीस्तन्मुखं निम्नगानाम् ।
चन्द्रात्सारः स्रवति वपुषस्तेन मृत्युनराणां
तनीयात्सुकरणमथो नान्यथा कायसिद्धिः॥५२॥
यत्प्रालेयमिति ॥ मेरुवत्सर्वोन्नता सुषुम्ना मेरुस्तस्य मूोपरिभागस्तस्यांतरे
मध्ये तिष्ठतीति मेरुमूर्धान्तरस्थं यत्पालेयं सोमकलाजलं प्रहितं निहितं यस्मिस्तत्तथा
तञ्च तत्सुषिरं विवरं तस्मिन्विवरे सुधीः शोभना रजस्तमोभ्यामनभिभूतसत्त्वा धीर्बुद्धि-
यस्य सः। तत्त्वमात्मतत्त्वं प्रवदति प्रकर्षेण वदति । तस्याः शिखाया मध्ये पर-
मात्मा व्यवस्थितः” इति श्रुतेः । आत्मनो विभुत्वे खेचरीमुद्रायां तत्राभिव्यक्तिस्त-
स्मिस्तत्त्वमित्युक्तम् । निम्नगानां गङ्गायमुनासरस्वतीनर्मदादिशब्दवाच्यानामिडापिङ्ग-
लासुषुम्नागांधारीप्रभृतीनां तत्तस्मिन्विवरे तत्समीपे मुखमग्रमस्ति चन्द्रात्सोमादपुषः
शरीरस्य सारः स्रवति क्षरति तेन चन्द्रसारक्षरणेन नराणां मनुष्याणां मुत्युर्मरणं
भवति । अतो हेतोस्तत्पूर्वोदितं सुकरणं शोभनं करणं खेचरीमुद्राख्यं बध्नीयात् ।
सुकरणे बद्धे चन्द्रसारस्रवणाभावान्मृत्युन स्यादिति भावः। अन्यथा सुकरणबन्धना-
भावे कायस्य देहस्य सिद्धिः रूपलावण्यवलवज्रसंहननरूपा न स्यात् ॥ ५२ ॥
मेरुके समान सबसे ऊँची जो
सुषुम्ना
नाडी उसके मूर्द्धा (ऊपरके भाग) के मध्यमें टिका
हुआ जो प्रालेय अर्थात् सोमकलाका जल है और जिसमें वह जल स्थित है ऐसा विवर
(छिद्र ) है उस विवरमें रजोगुण तमोगुणसे नहीं हुआ है तिरस्कार जिसका ऐसी बुद्धिवाले
मनुष्य आत्मतत्त्वको कहते हैं, क्योंकि श्रुतिमें लिखा है कि, सुषुम्नाकी शिखाके मध्यमें पर-
मात्मा स्थित है क्योंकि आत्मा विभु (व्यापक ) है और खेचरीमुद्रामें उस विवरम आत्मा
प्रगट होता है इससे उसमें तत्त्व है यह कहना ठीक है-और गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा
आदि शब्दोंका अर्थ जो इडा, पिंगला, सुषुम्ना, गांधारी आदि नाडी हैं उनक मुखभी उसी
छिद्रके समीपमें है और चन्द्रमासे जो देहका सारांश झरता है उससेही मनुष्योंकी मृत्यु होती
है तिससे शोभन करणरूप खेचरीमुद्राको बांधे ( करै)क्योंकि खेचरीमुद्राके करनेसे चन्द्रमाके
सारके न झरनेसे मृत्यु न होगी और अन्यथा अर्थात् खेचरीमुद्राके न करनेसे देहका जो रूप,
लावण्य, बल, वज्रके समान संहनन ( दृढता) रूप सिद्धि न होगी । भावार्थ यह है कि, जो
सोमकलाका जल सुषुम्नाके मध्यमें स्थित है वह जल जिस छिद्रमें है उस छिद्र ही बुद्धिमान्
मनुष्य परमात्माको कहते हैं और उसी छिद्रके समीप इडा पिंगला आदि नाडियोंका मुख ह
और चन्द्रमासे जो देहका सारांश झरता है उससे मनुष्योंकी मृत्यु होती है तिससे खेचरी
मुद्राको करै क्योंकि न करनेसे देहकी सिद्धि नहीं होसकती अर्थात् पुष्ट न हागा ॥५२॥
तृतीयः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
सुषिरं ज्ञानजनकं पंचस्रोतःसमन्वितम् ।
तिष्ठते खेचरी मुद्रा तस्मिन् शून्ये निरञ्जने ॥५३॥
सुषिरमिति ॥ पंच यानि स्रोतांसीडादीनां प्रवाहास्तैः समन्वितं सम्यगनुगतम् ।
" सप्तस्रोतःसमन्वितम् " इति क्वचित्पाठः । ज्ञानजनकमलौकिकबोधितात्मसाक्षा-
कारजनकं यत्सुषिरं विवरं तस्मिन्सुपिरेऽञ्जनमविद्या तत्कायै शोकमोहादि च निर्गतं
यस्मात्तन्निरंजनं तस्मिन्निरंजने शून्ये सुषिरावकाशे खेचरी मुद्रा तिष्ठते स्थिरीभवति ।
प्रकाशनस्थेयाख्ययोश्च' इत्यात्मनेपदम् ॥ ५३ ॥
इडा आदि नाडियोंके जो पांच स्रोत ( प्रवाह ) हैं उनसे
युक्त
जो सुषिर (छिद्र ) है वह
ज्ञानका उत्पादक है अर्थात् आत्माके प्रत्यक्षका जनक है। शोक मोह आदिसे रहित रूप निरं-
जन और शून्यरूप जो है उसके विष खेचरीमुद्रा स्थिर होतीहै अर्थात् खेचरीमुद्राकी महिमासे
उस छिद्र में मनके प्रवेशसे आत्मज्ञान होता है ॥ ५३॥
एकं सृष्टिमयं बीजमेका मुद्रा च खेचरी।
एको देवो निरालम्ब एकाऽवस्था मनोन्मनी॥५४॥
एकमिति ॥ सृष्टिमयं सृष्टिरूपं प्रणवाख्यं बीजमेकं मुख्यम् । तदुक्तं मांडूक्यो-
पनिषदि- ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्' इति । खेचरी मुद्रा एका मुख्या। निरालंबः
आलंबनशून्य एको मुख्यो देवः। आलंबनपरित्यागेनात्मनः स्वरूपावस्थानात् । उन्म-
न्यवस्थैका मुख्या। एके मुख्यान्यकेवलाः' इत्यमरः। बीजादिषु प्रणवादिवन्मुद्रासु
खेचरी मुख्येत्यर्थः ॥ १४ ॥
सृष्टिरूप जो प्रणव (ओं) नामका बीज है वह मुख्य है सोई मांडूक्य उपनिषद्में कहा है
कि, यह सम्पूर्ण जगत् ओं इस अक्षररूप है-और खेचरीमुद्राभी एक (मुख्य ) है और निरा-
लंब अर्थात् आलंबनशून्य देव परमात्मा भी एकही है और मनोन्मनी अवस्था भी एकही है।
यहां एकशब्द इस अमरके अनुसार मुख्यका बोधक है अर्थात् बीज आदिमें जैसे प्रणव मुख्य
है ऐसेही मुद्राओं में खेचरीभी मुख्य है ॥ ५४ ।।
अथोड्डीयानवन्धं विवक्षुस्तावदुड्डीयानशब्दार्थमाह-
बद्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः।
तस्मादुडीयनाख्योऽयं योगिभिः समुदाहृतः॥ ५५॥
बद्ध इति ॥ यतो यस्माद्धेतोर्येन बंधेन बद्धो निरुद्धः प्राणः सुषुम्नायां मध्य-
नाड्यामुड्डीयते सुषुम्नां विहायसा गच्छति तस्मात्कारणादयं बन्धो योगिभिर्मत्स्येंद्रा-
दिभिरुड्डीयनमाख्याऽभिधा यस्य स उड्डीयनाख्यः समुदाहृतः सम्यग्व्युत्पत्त्योदाहृतः
कथितः । सुषुम्नायामुड्डीयतेऽनेन बद्धः प्राण इत्युड्डीयनम् । उत्पूर्वात ' डीङ्-विहा-
यसा गतौ' इत्यस्मात्करणे ल्युट् ॥ ५५ ॥
।
(९८)
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेशः-
अब उड्डीयानबंधको कहनेके अभिलाषी आचार्य प्रथम उड्डीयानशब्दके अर्थको कहते
हैं. कि, जिस बंधसे बंधा हुआ प्राण मध्य नाडीरूप सुषुम्नाके विषे उडजाय अर्थात् आकाशमेंसे
सुषुम्नामें प्रविष्ट होजाय तिस कारणसे यह बंध मत्स्येंद्र आदि योगियोंने उड्डीयान नामका
कहा है अर्थात् सुषुम्नामें जिससे प्राण उडै इस व्युत्पत्तिसे इसका उड्डीयान नाम रक्खा है।
उड्डीनं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः।
उड्डीयानं तदेव स्यात्तत्र बन्धोऽभिधीयते ॥५६॥
उड्डीनमिति ॥ महांश्चासौ खगश्च महाखगः प्राणः । सर्वदा देहावकाशे गति-
मत्त्वात् । यस्माद्बन्धादविश्रान्तं यथा स्यात्तथोड्डीनं विहङ्गमगतिं कुरुते सुषुम्नाया-
मित्यध्याहार्यम् । तदेव बंधविशेषमुड्डीयानमुड्डीयाननामकं स्यात् तत्र तस्मिन्विषये
बन्धोऽभिधीयते बन्धस्वरूपं कथ्यते मयेति शेषः ॥ ५६ ॥
सदैव देहके अवकाशमें गति है जिसकी ऐसा महाखगरूप प्राण जिस बंधसे निरंतर उड्डीन
(पक्षीके समान गति) को सुषुम्नामें करता है वही बंध उड्डीयान नामका होताहै । उसमें मैं
बंधके स्वरूपको कहताहूं ॥ ५६ ॥
उड्डीयानबन्धमाह-
उदरे पश्चिमं तानं नाभेसूर्य च कारयेत् ।
उड्डीयानो ह्यसौ बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी ॥१७॥
उदर इति ॥ उदरे तुन्दे नाभेरूज़ चकारादधः उपरिभागेऽधोभागे च पाश्चिमं
तानं पश्चिममाकर्षणं नाभेरूर्वाधोभागौ यथा पृष्ठसंलग्नौ स्यातां तथा तानं ताननं
नामाकर्षणं कारयेत्कुर्यात् । णिजर्णोऽविवक्षितः । असौ नाभेरूवर्धाधोभागयोस्तानरूप
उड्डीयान उड्डीयानाख्यो बन्धः । कीदृशः ? मृत्युरेव मातंगो गजस्तस्य केसरी सिंहः
सिंह इव निवर्तकः ॥ ५७ ॥
उदर (पेटके तुंद) में नाभिके ऊपर और नीचे पश्चिम तान करै अर्थात् नाभिके ऊपरके
और निचले भागको इस प्रकार तान (आकर्षण) करै जैसे वे दोनों भाग पृष्ठमें लगजाय । यह
नाभिके ऊर्ध्व अधोभागका तान उड्डीयान नामका बंध होताहै और यह बंध मृत्युरूप हस्तीको
केसरी है अर्थात् नाशक है ॥ ५७ ॥
उड्डीयानं तु सहजं गुरुणा कथितं सदा ।
अभ्यसेत्सततं यस्तु वृद्धोऽपि तरुणायते ॥५८॥
उड्डीयानं त्विति ॥ गुरुहितोपदेष्टा तेन गुरुणा उड्डीयानं तु सदा सर्वदा सहर्ज
स्वाभाविकं कथितं प्राणस्य बहिर्गमनम् सर्वदा सर्वस्यैव जायमानत्वात् । यस्तु यः
पुरुषस्तु सततं निरन्तरमभ्यसेत् उड्डीयानमित्यत्रापि संवध्यते । स तु वृद्धोऽपि
स्थविरोऽपि तरुणायते तरुण इवाचरति तरुणायते ॥ ५८ ॥
। तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (९९) हितके उपदेष्टा गुरुने उड्डीयान सदैव स्वाभाविक कहा है अर्थात् प्राणका बहिर्गमन स्वभा- वसे सबको होताहै परन्तु जो पुरुष इसका निरंतर अभ्यास करता है वृद्धभी वह तरुण (युवा) के समान आचरण करता है ।। ५८ ॥ नाभेरूलमपश्चापि तानं कुर्यात्प्रयत्नतः षण्मासमभ्यसेन्मृत्युं जयत्येव न संशयः॥ ५९॥ नाभरिति ॥ नाभेरूर्ध्वमुपरिभागेऽधश्चाप्यधोभागेऽपि प्रयत्नतः प्रकृष्टो यत्नः प्रयत्नस्तस्मात्प्रयत्नतः। यत्नविशेषात्तानं पश्चिमतानं कुर्यात् । पूर्वार्धेनोड्डीयानस्वरूप- मुक्तम् । अथ तत्पशंसा । षण्मासं षण्मासपर्यंतम् उड्डीयानमित्यध्याहारः। अभ्यसेत्पुन:- पुनरनुतिष्ठत्स मृत्युं जयत्येव संशयो न । अत्र संदेहो नास्तीत्यर्थः ॥ ५९ ॥ नाभिके ऊपर और नीचे भली प्रकार यत्नसे तान करै अर्थात् यत्न विशेषसे पश्चिमतान कर और षण्मास (छः मास) पर्यंत इस उड्डीयानबंधका वारंवार अभ्यास करै तो मृत्युको जीतताहै इसमें संशय नहीं है ॥ ५९॥ सर्वेषामेव बन्धानामुत्तमो युड्डियानकः। उड्डीयाने दृढे बन्धे मुक्तिः स्वाभाविकी भवेत् ॥६० ॥ सर्वेषामिति ॥ सर्वेषां बन्धानां मध्ये उड्डियानक उड्डीयानबन्ध एव । स्वार्थे कप्रत्ययः । उत्तमः उत्कृष्टः हि यस्मादुड्डीयाने बन्धे दृढे सति स्वाभाविकी स्वभाव- सिद्धव मुक्तिर्भवेत् । उड्डीयानबन्धे कृते विहंगमगत्या सुषुम्नायां प्राणस्य मूर्ध्नि गम- नात् । समाधौ मोक्षमाप्नोति ' इति वाक्यात्सहजैव मुक्तिः स्यादिति भावः ॥६०॥ संपूर्ण बन्धोंके मध्यमें उड्डियान बन्ध उत्तम है, क्योंकि उड्डियान बन्धके दृढ होनेपर स्वाभाविकी मुक्ति होती है अर्थात् उड्डीयान बन्धके करनेसे पक्षीके समान गतिसे सुषुम्नाविषे प्राण मस्तकमें चला जाताहै । उस समाधिमें इस वाक्यके अनुसार अनायाससे मुक्ति हो जाती है ॥ ६॥ अथ मूलबन्धमाह- पाणिभागेन संपीड्य योनिमाकुंचयेद्वदम् । अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबन्धोऽभिधीयते ॥६॥ पाणिभागेनेति ॥ पाणेर्भागो मुल्फयोरधःप्रदेशस्तेन योनि योनिस्थानं गुद- मेयोर्मध्यभागं संपीडय सम्यक् पीडयित्वा गुदं पायुमाकुंचयेत्संकोचयेत् । अपान- मधोगति वायुमूर्ध्वमुपाकृष्याकृष्टं कृत्वा मूलबन्धोऽभिधीयते कथ्यते । पाणिभागेन योनिस्थानसंपीडनपूर्वकं गुदस्याकुंचनं मूलबन्ध इत्युच्यत इत्यर्थः ॥ ६१ ॥ अब मूलबन्धमुद्राका वर्णन करते हैं कि, पाणिके भाग (गुल्फोंका अधःप्रदेश) से योनि- स्थानको अर्थात् गुदा और लिंगके मध्यभागको भलीप्रकार पीडित ( दुबा) करके गुदाका ।
(१००) ट्ठयोगप्रदीपिका । [ उपदेश:- संकोच करै और अपानवायुका ऊपरको आकर्षण करै यह मूलबन्ध होता है। ऐसा योगशास्त्रको जाननेवाले आचार्य कहते हैं ॥ ६१ ॥ अधोगतिमपानं वा ऊर्ध्वगं कुरुते बलात् । आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धं हि योगिनः॥ ६२॥ अधोगतिमिति ॥ यः अधोगतिम् अधोग्गितिर्यस्य स तथा तमपानमपान- वायुमाकुंचनेन मूलाधारस्य संकोचनेन बलाद्धठादूर्ध्व गच्छतीत्यूर्ध्वगस्तमूर्ध्वगं सुषुम्नायामूर्ध्वगमनशीलं कुरुते । वै इति निश्चयेऽव्ययम् । योगिनो योगाभ्यासिनस्तं मूलबन्धं मूलस्य मूलस्थानस्य बन्धनं मूलबन्धस्तं मूलबन्धमित्यन्वर्थं प्राहुः । अनेन मूलबन्धशब्दार्थ उक्तः । पूर्वश्लोकेन तु तस्य बन्धनप्रकार उक्त इत्यपौनरुक्त्यम्६२॥ जो बन्ध अधः ( नीचेको) गति है जिसको ऐसे अपानवायुको बलसे ऊर्ध्वगामी करता है अर्थात् जिसके करनेसे अपान सुषुम्नामें पहुँच जाता है योगके अभ्यासी उस बन्धको मूल- बंध कहते हैं अर्थात् मूलस्थानका जिससे बन्धन हो वह मूलबंध अन्वर्थनामसे कहाताहै। इस श्लोकसे मूलबन्धशब्दका अर्थ कहा और पिछले श्लोकसे बन्धनका प्रकार कहा है. इससे पुन- रुक्तिदोष नहीं है ॥ ६२॥ अथ योगबीजोक्तरीत्या मूलबन्धमाह- गुदं पाया तु संपीड्य वायुमाकुञ्चयदलात् । वारं वारं यथा चोर्व समायाति समीरणः॥६३ ॥ गुदमिति ॥ पायर्योर्मुल्फयोरधोभागेन गुदं वायु संपीड्य सम्यक् पीडयित्वा संयोज्येत्यर्थः । तुशब्दः पूर्वस्मादस्य विशेषद्योतकः । यथा येन प्रकारेण समीरणो वायुरूज़ सुषुम्नाया उपरिभागे समायाति गच्छति तथा तेन प्रकारेण बलादठा- द्वारंवारं पुनःपुनर्वायुमपानमाकुंचयेद् गुदस्याकुञ्चनेनाकर्षयेत् । अयं मूलबन्ध इति वाक्याध्याहारः॥६३ ॥ अब योगबीजमें कहीहुई रीतिसे मूलबंधको कहते हैं कि, पाणिंसे गुदाको भलीप्रकार पीडित करके वायुको बलसे इस प्रकार वारंवार आकर्षण करै जैसे वो सुषुम्नाके ऊपरले भागमें पहुँचजाय यह मूलबन्ध कहाता है । इस श्लोकमें दु यह शब्द पिछले मूलबंधसे विशेष जतानेके लिये है ।। ६३ ॥ अथ मूलबन्धगुणानाह-- प्राणापानौ नादबिन्दू मूलबन्धेन चैकताम् । गत्वा योगस्य संसिद्धिं यच्छतो नात्र संशयः॥ ६४ ॥ प्राणापानाविति ॥ प्राणश्चापानश्च प्राणापानावूर्वाधोगती वायू । नादोऽनाहत- ध्वनिः बिन्दुरनुस्वारस्तो मूलबंधेनैकतां गत्वैकीभूय योगस्य संसिद्धिं सम्यक् RECE SARAN तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१०१) सिद्धिस्तां योगसंसिद्धिं यच्छतो ददतः अभ्यासिन इति शेषः । अत्रास्मिन्नर्थे संशयो न सन्देहो नास्तीत्यर्थः । अयं भावः-मूलबन्धे कृतेऽपानः प्राणेन सहकीभूय सुषुम्नायां प्रविशति । ततो नादाभिव्यक्तिर्भवति ततो नादेन सह प्राणापानौ हृदयोपरि गत्वा नादस्य बिन्दुना सहैक्यं विन्दुनाऽऽधाय मूर्धिन गच्छतः ततो योगसिद्धिः॥६॥ अब मूलबन्धके गुणोंका वर्णन करते हैं कि, ऊपर और नीचेको है गति जिनको ऐसे प्राण और अपान दोनों वायु और अनाहत ( स्वाभाविक ) ध्वनि और बिंदु (अनुस्वार) ये दोनों मूलबन्धसे एकताको प्राप्त होकर योगाभ्यासीको योगकी सिद्धिको भलीप्रकार देते हैं इसमें संशय नहीं है । तात्पर्य यह है कि, मूलबन्धके करनेसे अपान प्राणके संग एकताको प्राप्त होकर सुषुम्नामें प्रविष्ट होजाता है फिर नादकी प्रकटता होती है फिर नादके संग प्राण अपान हृदयके ऊपर जाकर और नादके संग बिन्दुकी एकताको करके मस्तकमें चले जाते हैं फिर योगसिद्धि होजाती है ।। ६४ ॥ अपानप्राणयोरैक्यं क्षयो मूत्रपुरीषयोः। युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात् ॥६५॥ अपानप्राणयोरिति ॥ सततं मूलबंधनान्मूलबन्धमुद्राकरणादपानप्राणयोरैक्यं भवति । मूत्रपुरीषयोः संचितयोः क्षयः पतनं भवति । वृद्धोऽपि स्थविरोऽपि युवा तरुणो भवति ॥ ६५॥ निरंतर मूलबंधमुद्राके करनेसे अपान और प्राणकी एकता और देहमें संचितहुये मूत्र और मलका क्षय होता है तिससे वृद्धभी मनुष्य युवा होजाता है ।। ६५ ॥ अपान ऊर्ध्वगे जाते प्रयाते वह्निमण्डलम् । तदाऽनलशिखा दी जायते वायुनाऽऽहता ॥६६॥ अपान इति॥ मूलबन्धनादपाने अधोगमनशीले वायौ ऊर्धगेऊर्ध्वं गच्छतीत्युप्रंग- स्तस्मिन् तादृशे सति वह्निमण्डलं वह्नर्मण्डलं त्रिकोणं नाभेरधोभागेऽस्ति । तदुक्तं याज्ञवल्क्येन- देहमध्ये शिखिस्थानं तप्तजाम्बूनदप्रभम् । त्रिकोणं तु मनुष्याणां चतुरस्त्रं चतुष्पदाम् ॥ मण्डलं तु पतङ्गानां सत्यमेतद्रवीमि ते । तन्मध्ये तु शिखा तन्वी सदा तिष्ठति पावके ॥' इति । तदा तस्मिन्काले वायुना अपानेना- हता सङ्गता सत्यनलशिखा जठराग्निशिखा दीर्घा आयता जायते । वर्धते ' इति वचित्पाठः ॥६६॥ मूलबन्ध करनेसे अधोगामी अपान जब ऊर्ध्वगामी होकर आग्निमण्डलमें पहुँच जाता है अर्थात् नाभिके अधोभागमें वर्तमान त्रिकोण जठराग्निके मण्डलमें प्रविष्ट होजाता है उस समय अपानवायुसे ताडित की हुई जो जठराग्निकी शिखा है वह दीर्घ होजाती है अर्थात् बढजाती है। सो याज्ञवल्क्यने कहा है कि, तपाये हुये सुवर्णके समान अग्निका स्थान मनुष्योंके देहके मध्यमें
(१०२)
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेश:-
त्रिकोण और पशुओंके देहमें चतुष्कोण है और पक्षियोंके देहमें गोल है, यह आपके प्रति मैं
सत्य कहताहूँ और आग्नके मध्यमें सदैव सूक्ष्म शिखा टिकती है ।। ६६ ।।
ततो यातो वह्नयपानौ प्राणमुष्णस्वरूपकम् ।
तेनात्यन्तप्रदीप्तस्तु ज्वलनो देहजस्तथा ॥६७॥
तत इति ॥ ततस्तदनन्तरं वह्निश्चापानश्च वह्नयपानौ । उष्णं स्वरूपं यस्य स
तथा तमनलं शिखादैर्ध्यादुष्णस्वरूपं प्राणमूर्ध्वगतिमनिलं यातो गच्छतः ततोऽनल-
शिखादैादुष्णस्वरूपकादिति वा योजना । तेन प्राणसंगमनेन देहे जातो देहजो
ज्वलनोऽग्निरत्यन्तमधिकं दीप्तो भवति । तथेति पादपूरणे । अपानस्योर्ध्वगमने दीप्त
एव ज्वलनः प्राणसंगत्याऽत्यन्तं प्रदीप्तो भवतीत्यर्थः॥ ६७॥
फिर अग्नि और अपान ये दोनों अग्निकी दीर्घ शिखासे उष्णरूप हुए ऊर्ध्वगति प्राणमें पहुँच
जाते हैं । तिस प्राणवायुके समागमसे देहमें उत्पन्न हुई जठराग्नि अत्यन्त प्रज्वलित होजाती है
अर्थात् अपानकी ऊर्ध्वगतिसे दीप्तहुई अग्नि अत्यन्त प्रदीप्त होजाती है ।। ६७ ॥
तेन कुण्डलिनी सुप्ता सन्तप्ता सम्प्रबुध्यते ।
दण्डाहता भुजङ्गीव निश्वस्य ऋजुतां मेत् ॥ ६८॥
तेनेति ॥ तेन ज्वलनस्यात्यन्तं प्रदीपनेन सन्तप्ता सम्यक तप्ता सती सुप्ता निद्रिता
कुण्डलिनी शक्तिः संप्रबुध्यते सम्यक् प्रबुद्धा भवति । दण्डेनाहता दण्डाहता चासो
भुजङ्गीव सर्पिणीव निश्वस्य निश्वासं कृत्वा ऋजुतां सरलतां व्रजेद्गच्छेत् ॥ ६८ ॥
तिस अग्निके अत्यन्त दीपनसे भली प्रकार तपायमान हुई कुण्डलिनी शक्ति इस प्रकार
भलीप्रकारसे प्रबुद्ध होजाती है और कोमल होजाती है जैसे दंडसे हतीहुई सर्पिणी कोमल
होजाती है ॥ ६८ ॥
बिलं प्रविष्टेव ततो ब्रह्मनाड्यन्तरं व्रजेत् ।
तस्मान्नित्यं मूलबन्धः कर्तव्यो योगिभिः सदा ॥ ६९॥
बिलं प्रविष्टेति ॥ ततः ऋजुताप्राप्त्यनन्तरं विलं विवरं प्रविष्टा भुजङ्गीव ब्रह्म-
नाडी सुषुम्ना तस्या अन्तरं मध्यं व्रजेत् गच्छेत्तस्माद्धेतोर्योगिभिर्योगाभ्यासिभिर्मूल-
बन्धो नित्यं प्रतिदिनं सदा सर्वस्मिन्काले कर्तव्यः कर्तुं योग्यः ॥ ६९ ॥
उसके अनन्तर बिलमें प्रविष्ट सर्पिणीके समान ब्रह्मनाडी (सुषुम्ना) के मध्यमें कुण्डलिनी
प्रविष्ट होजाती है । तिससे योगाभ्यासियोंको मूलबन्ध प्रतिदिन करने योग्य है ॥ ६९ ॥
जालन्धरबन्धमाह-
कण्ठमाकुंच्य हृदये स्थापयच्चिबुकं दृढम् ।
बन्धो जालन्धराख्योऽयं जरामृत्युविनाशकः ॥ ७० ॥
तृतीयः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
यह
बंध जरा
कण्ठमिति ॥ कण्ठे गले विलमाकुंच्य हृदये वक्षःसमीपे चतुरकुलान्तरितप्रदेशे
चिबुकं हनुं दृढं स्थिरं स्थापयेत् स्थितं कुर्यात् । अयं कण्ठाकुञ्चनपूर्वकं चतुरङ्गुला-
न्तरितहृदयसमीपेऽधोनमनयत्नपूर्वकं चिबुकस्थापनरूपो जालन्धर इत्याख्यायत इति
जालन्धराख्यः जालन्धरनामा बन्धः। कीदृशः ? जरा वृद्धावस्था मृत्युमरणं तयो-
विनाशको विशेषेण नाशयतीति विनाशको विनाशकर्ता ॥ ७० ॥
अब जालंधरबंधको कहते हैं कि, कंठके बिलका संकोच करके वक्षस्थलके समीपरूप हृदयमें
चार अंगुलके अंतरपर चिबुक ( ठोढी) को दृढरीतिसे स्थापन करै, कण्ठके आकुंचनपूर्वक
चार अंगुलके अंतरपर हृदयके समीपमें नीचेको नमनपूर्वक चिबुकका स्थापनरूप यह जालंधर
नामका बध कहाहै और
और
मृत्युका
विनाशक है ।। ७० ॥
जालन्धरपदस्यार्थमाह-
बध्नाति हि शिराजालमधोगामि नभोजलम् ।
ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठदुःखौघनाशनः ॥ ७१ ॥
बध्नातीति ॥ हि यस्माच्छिराणां नाडीनां जालं समुदायं बध्नाति । अधो गन्तुं
शीलमस्येत्यधोगामि नभसः कपालकुहरस्य जलममृतं च बध्नाति प्रतिवध्नाति । तत.
स्तस्माज्जालन्धरो जालन्धरनामकोऽन्वर्थों बन्धः जालं शिरा(दशा) जालं जलानां समूहो
जालंधरतीति जालन्धरः। कीदृशः ? कण्ठे गलप्रदेशे यो दुःखौषो विकारजातो दुःख-
समूहस्तस्य नाशनो नाशकर्ता ॥ ७१ ॥
अब जालंधरपदके अर्थको कहते हैं कि, जिससे यह बंध शिरा ( नाडी) ओंके समूहरूप
जालको बाँधता हैं और कपालके छिद्ररूप नभका जो जल है उसका प्रतिबन्ध करताहै तिससे
यह जालंधर नामका अन्वर्थ बंध जालन्धरबन्ध कहाताहै क्योंकि जाल नाम समुदाय और जलोंके
समूहको कहते है और यह जालन्धरबन्ध कण्ठमें जो दुःखोंका समूह है उसका नाशकहै ॥७१
जालंधरगुणानाह-
जालंधरे कृते बन्धे कण्ठसङ्कोचलक्षणे ।
न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति ॥ ७२ ॥
जालंधर इति ॥ कण्ठस्य गलबिलस्य संकोचनं संकोच आकुंचनं तदेव लक्षणं
स्वरूपं यस्य स कंठसंकोचलक्षणः तस्मिन् तादृशे जालंधरे जालंधरसंज्ञके बंधे कृते
सति पीयूषममृतमग्नौ जाठरेऽनले न पतति न सरति । वायुश्च प्राणश्च न कुप्यति
नाड्यंतरे वायोर्गमनं प्रकोपस्तं न करोतीत्यर्थः ॥ ७२ ।।
अब जालंधरबंधके गुणोंका वर्णन करते हैं कि, कंठका संकोच है स्वरूप जिसका ऐसे जालं-
धरबंधके करनेपर पूर्वोक्त अमृत जठराग्निमें नहीं पड़ता है और वायुका भी कोप नहीं होता
अर्थात् अन्य नाडियोंमें वायुका गमन नहीं होता है ॥ ७२ ॥
(१०४)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
कण्ठसंकोचनेनैव द्वे नाड्यौ स्तंभयेदृढम् ।
मध्यचक्रमिदं ज्ञेयं षोडशाधारबन्धनम् ॥ ७३ ॥
कण्ठसंकोचनेनेति ॥ दृढं गाढं कण्ठसंकोचनेनैव कण्ठसंकोचमात्रेण दे नाडयौ
इडापिंगले स्तंभयेदयं जालंधर इति कर्तृपदाध्याहारः । इदं कण्ठस्थाने स्थितं विशु-
दाख्यं चक्रं मध्यचक्र मध्यमं चक्रं ज्ञेयम् । कीदृशं? षोडशाधारबंधनं षोडशसंख्याका
ये आधारा अंगुष्ठाधारादिब्रह्मरन्ध्रान्तास्तेषां बंधनं बंधनकारकम् । अंगुष्ठगुल्फजानूरु-
सीवनीलिंगनाभयः । हृदीवा कण्ठदेशश्च लंबिका नासिका तथा ॥ भ्रूमध्यं च
ललाटं च मूर्धा च ब्रह्मरंध्रकम् । एते हि षोडशाधाराः कथिता योगिपुंगवैः ॥'
तेष्वाधारेषु धारणायाः फलविशेषस्तु गोरक्षसिद्धान्तादवगन्तव्यः ॥ ७३ ॥
यह जालंधरबन्ध दृढतासे कंठसे संकोच करनेसेही इडा पिंगलारूप दोनों नाडियोंका
स्तंभन करता है और कंठस्थानमें स्थित इन सोलह आधारोंका बंधन करनेवाला मध्यचक्र
विशुद्धनाम) जानना । अंगुष्ठ, गुल्फ, जानु, ऊरु, सीविनी, लिंग, नाभि, हृदय, ग्रीवा, कंठ-
देश, लंबिका, नासिका, भ्रुकुटियोंका मध्य, ललाट, मूर्द्धा, ब्रह्मरंध्र योगियोंमें श्रेष्ठोंने ये सोलह
आधार कहे हैं इन आधारोंमें धारणका फल विशेष तो गोरक्ष सिद्धांत ग्रंथसे जानना ॥७३॥
उक्तस्य बन्धत्रयस्योपयोगमाह-
मूलस्थानं समाकुंच्य उड्डियानं तु कारयेत् ।
इडां च पिंगलां बहा वाहयेत्पश्चिमे पथि ॥ ७४ ॥
मूलस्थानमिति ॥ मूलस्थानमाधारभूतमाधारस्थानं समाकुंच्य सम्यगाकुंच्य
उड्डियानं नाभेः पश्चिमतानरूपं बन्धं कारयेत्कुर्यात् । णिजर्थोऽविवक्षितः । इडा पिंगलां
गङ्गां यमुनां च बद्ध्वा । जालन्धरबन्धेनेत्यर्थः । 'कण्ठसंकोचनेनैव दे नाड्यौ स्तम्भ-
येत् ' इत्युक्तेः । पश्चिमे पथि सुषुम्नामार्गे वाहयेद्गमयेत् प्राणमिति शेषः ॥ ७४ ॥
अब पूर्वोक्त तीनों बन्धोंके उपयोगका वर्णन करते हैं कि, मूलस्थानको अर्थात् आधारभूत
आधारस्थानका भलीप्रकार संकोच करके नाभिके पश्चिमतानरूप उड्डीयानबंधको करै और
जालंधरबंधसे अर्थात् कंठके संकोचसेही इडा और पिंगलारूप दोनों नाडियोंको स्तंभन करै
फिर प्राणको पश्चिममार्गमें (सुषुम्नामें ) प्राप्त करै ।। ७४ ॥
अनेनैव विधानेन प्रयाति पवनो लयम् ।
ततो न जायते मृत्युजरारोगादिकं तथा ॥ ७५॥
अनेनेति ॥अनेनैवोक्तेनैव विधानेन पवनः प्राणोलयं स्थैर्य प्रयाति गत्यभावपूर्वक
रन्ध्रे स्थितिः प्राणस्य लयः । ततः प्राणस्य लयान्मृत्युजरारोगादिकम् । तथा चार्थे ।
न जायते नोद्भवति । आदिपदेन वलीपलिततंद्रालस्यादि ग्राह्यम् ॥ ७५ ॥
तृतीयः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
इस पूर्वोक्त विधानसेही प्राण लय (स्थिरता) को प्राप्त हो जाता है, गमनको निवृत्ति होने
पर ब्रह्मरन्ध्रमें स्थितिही प्राणका लय होता है उस प्राणके लयसे मृत्यु, जरा, रोग और
आदिपदसे वली, पलित, तन्द्रा, आलस्य आदि नहीं होते हैं ।। ७५ ॥
बन्धत्रयमिदं श्रेष्ठं महासिद्धैश्च सेवितम् ।
सर्वेषां हठतन्त्राणां साधनं योगिनो विदुः ॥ ७६ ॥
बन्धत्रयमिति ॥ इदं पूर्वोक्तं बन्धत्रयं श्रेष्ठं षोडशाधारबन्धेऽतिप्रशस्तं महासिद्धै-
मत्स्येन्द्रादिभिश्चकाराद्वसिष्ठादिमुनिभिः सेवितं सर्वेषां हठतन्त्राणां हठोपायानां साधनं
सिदिजनकं योगिनो गोरक्षाद्या विदुर्जानंति ॥ ७६॥
ये पूर्वोक्त तीनों बन्ध श्रेष्ठ हैं अर्थात् षोडशाधार बन्धमें अत्यंत उत्तम है और मत्स्येन्द्र
आदि योगीजन और वसिष्ठ आदि मुनियों करके सेवित है और संपूर्ण जो हठयोगके उपाय हैं
उनका साधन है यह बात गोरक्ष आदि योगीजन जानते हैं ॥ ७६ ॥
विपरीतकरणी विवक्षुस्तदुपोद्धातत्वेन पिण्डस्य जराकरणं तावदाह-
यत्किंचित्स्रवते चन्द्रादमृतं दिव्यरूपिणः ।
तत्सर्वं ग्रसते सूर्यस्तेन पिण्डो जरायुतः॥ ७७॥
यत्किचिदिति ।। दिव्यमुत्कृष्टं सुधामयं रूपं यस्य स तथा तस्मादिव्यरूपिणश्चन्द्रात
सोमात्तालुमूलस्थाद्यत्किंचिद्यत्किमप्यमृतं पीयूषं स्त्रवते पतति तत्सर्वं सर्वं तत्पीयूषं सूर्यों
नाभिस्थोऽनलात्मकः ग्रसते ग्रासीकरोति । तदुक्तं गोरक्षनाथेन-' नाभिदेशे स्थितो
नित्यं भास्करो दहनात्मकः । अमृतात्मा स्थितो नित्यं तालुमूले च चन्द्रमाः ॥
वर्षत्यधोमुखश्चन्द्रो ग्रसत्यूर्ध्वमुखो रविः । करणं तच्च कर्तव्यं येन पीयूषमाप्यते ॥'
इति । तेन सूर्यकर्तृकामृतग्रसनेन पिण्डो देहो जरायुतः जरसा युक्तो भवति ॥७॥
अब विपरीतकरणीके कथनका अभिलाषी आचार्य प्रथम उसके उपोद्घातरूप होनेसे पिंडके
जराकरणका वर्णन करते हैं कि, दिव्य (सर्वोत्तम) सुधामय है रूप जिसमें ऐसे तालुके
मूलमें स्थित चंद्रमासे जो कुछ अमृत झरताहै उस संपूर्ण अमृतको नाभिमें स्थित आग्निरूप
सूर्य ग्रस लेताहै । गोरक्षनाथने कहाहै कि, नाभिके देशमें आग्नरूप सूर्य स्थित है और तालुके
मूलमें अमृतरूप चंद्रमा स्थित ह अधोमुख होकर चन्द्रमा जिस अमृतको वर्षाताहै और ऊर्ध्व-
मुख होकर सूर्य उस अमृतको ग्रस लेताहै। उसमें वह करण (मुद्रा) करना चाहिये जिससे
अमृतकी नष्टता न हो अर्थात् पुष्टि रहै फिर सूर्यके किये उस अमृतके ग्रसनेसे पिण्ड ( देह)
वृद्ध अवस्थासे युक्त होजाताहै ।। ७७ ॥
तत्रास्ति करणं दिव्यं सूर्यस्य मुखवञ्चनम् ।
गुरूपदेशतो ज्ञेयं न तु शास्त्रार्थकोटिभिः ॥ ७८॥
(१०६) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- तत्रेति॥ तत्र तद्विषये सूर्यस्य नाभिस्थानलस्य मुखं वंचतेऽनेतेति तादृशं दिव्य- मुत्तमं करणं वक्ष्यमाणं मुद्राख्यमस्ति तद् गुरूपदेशतः गुरूपदेशाज्ज्ञेयं ज्ञातुं शक्यम्। शास्त्रार्थानां कोटिभिः न तु नैव ज्ञातुं शक्यम् ॥ ७८ ॥ उस अमृतको रक्षा करनेमें जिसे सूर्यके मुखकी वंचना होय ऐसा आगे कहनेयोग्य मुद्रा- रूप करण है और वह करण गुरुके उपदेशसे जानने योग्य है और कोटियों शास्त्रोंके अर्थसे जाननेको शक्य नहीं है ॥ ७८ ॥ अथ विपरीतकरणीमाह- ऊर्श्वनाभेरवस्तालोरूर्व भानुरधः शशी। करणी विपरीताख्या गुरुवाक्येन लभ्यते ॥ ७९ ॥ ऊर्ध्वनाभेरिति ॥ उर्ध्वमुपरिभागे नाभिर्यस्य स उर्ध्वनाभिस्तस्योर्ध्वनाभे- रधः अधोभागे तालु तालुस्थानं यस्य सोऽधस्तालुस्तस्याधस्तालोयोगिन ऊर्ध्वमुपरि- भागे भानुर्दहनात्मकः सूर्यों भवति । अधः अधोभागे शश्यमृतात्मा चन्द्रो भवति । प्रथमांतपाठे तु यदा ऊर्ध्वनाभिरधस्तालुयोगी भवति तदोज़ भानुरधः शशी भवतीति यदातदापदयोरध्याहारेणान्वयः । इयं विपरीताख्या विपरीतनामिका करणी । ऊवधिःस्थितयोश्चन्द्रसूर्ययोरधऊर्ध्वकरणेनान्वर्था गुरुवाक्येन गुरोर्वाक्येनैव लभ्यते प्राप्यते नान्यथा ॥ ७९ ॥ अब विपरीतकरणीमुद्राके स्वरूपका वर्णन करते हैं कि, ऊपरके भागमें है नाभि जिसके और अधोभागमें है तालु जिसके ऐसा जो योगी उसके ऊपरके भागमें तो अग्निरूप सूर्य होजाय और अधोभागमें अमृतरूप चंद्रमा होजाय और जब ' ऊर्चनाभिरवस्तालः ' यह प्रथमांत पाठ है तब यदा तदापदोंके अध्याहारसे इस प्रकार अन्वय करना कि, जब ऊपरके भागमें नाभि और नीचेके भागमें तालु जिसके ऐसा योगी होजाय तब ऊपर सूर्य और नीचे चंद्रमा होजाते हैं । यह विपरीत ( उलटी) नामकी करणी ऊपर और नीचे स्थित जो चंद्रमा सूर्य हैं उनके नीचे ऊपर क्रमसे करनेसे अन्वर्थ है अर्थात् विपरीतकरणी अर्थ तभी सकता है जब पूर्वोक्त मुद्रा कीजाय और यह विपरीतकरणी गुरुके वाक्यसे मिल सकती है अन्यथा नहीं॥ ७९ ॥ नित्यमभ्यासयुक्तस्य जठराग्निविवर्धिनी। आहारो बहुलस्तस्य संपाद्यः साधकस्य च ॥८॥ नित्यमिति ॥ नित्यं प्रतिदिनमभ्यासोऽभ्यसनं तस्मिन् युक्तस्यावहितस्य जठ- राग्निरुदराग्निस्तस्य विवर्धिनी विशेषेण वर्धिनीति विपरीतकरणीविशेषणम् । तस्य साधकस्य विपरीतकरण्यभ्यासिन आहारो भोजनं बहुलो यथेच्छः संपायः संपाद- नीयः । च पादपूरणे ॥ ८० ॥ घट तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१०७) प्रतिदिनके अभ्यासमें युक्त जो योगी है उसकी जठराग्निको यह विपरीतकरणी बढाती है और इसीसे उस विपरीतकरणीके अभ्यासी योगीको यथेच्छ अधिक भोजन संपादन करने योग्य है अर्थात् अल्पभोजन न करै ॥ ८० ॥ अल्पाहारो यदि भवेदनिर्दहति तत्क्षणात् अधःशिराश्चोर्ध्वपादः क्षणं स्यात्प्रथम दिने ॥ ८१ ॥ अल्पाहार इति ॥ यद्यल्पाहारः अल्पो भोक्तुमिष्टान्नस्याहारो भोजनं यस्य तादृशो भवेत्स्यात्तदाऽग्निर्जठरानलो देहं क्षणमात्राहहेत् । शीघ्रं दहेदित्यर्थः । ऊधि: स्थितयोश्चन्द्रसूर्ययोरधऊर्ध्वकरणक्रियामाह-अधःशिरा इति । अधः अधोभागे भूमौ शिरो यस्य सोऽधःशिराः कराभ्यां कटिप्रदेशमवलंब्य बाहुमूलादारभ्य कूपरपर्यंताभ्यां बाहुभ्यां स्कन्धाभ्यां गल पृष्ठभागशिरःपृष्ठभागाभ्यां च भूमिमवष्टभ्याधःशिरा भवेत् । ऊर्ध्वमुपर्यंतरिक्षे पादौ यस्य स उर्ध्वपादः प्रथमदिने आरंभदिने क्षणं क्षण- मात्रं स्यात् ॥ ८१ ॥ क्योंकि, यदि विपरीतकरणीका अभ्यासी योगी अल्पाहारी हो अर्थात् अल्पभोजन किया जाताहै तो जठराग्नि उसी क्षणमात्रमें देहको भस्म करदेती है। अब ऊपर नीचे स्थित चन्द्रमा सूर्यके नीचे ऊपर करनेकी क्रियाको कहते हैं कि, प्रथम दिनमें क्षणभर नीचेको शिर करै अर्थात् भुजा दोनों स्कंध गल और शिर पृष्ठभाग (पीठ)से भूमिका स्पर्श करके नीचे शिर किये स्थित हो और ऊपरको पाद करै अर्थात् प्रारंभके दिन क्षणमात्र इस प्रकार स्थित रहै ।। ८१ ॥ क्षणाच किंचिदधिकमभ्यसेच दिने दिने । वलितं पलितं चैव षण्मासोर्चे न दृश्यते ॥ याममात्रं तु यो नित्यमभ्यसेत्स तु कालजित् ॥ ८२॥ क्षणादिति ।। दिनेदिने प्रतिदिनं क्षणात् किंचिदधिकं द्विक्षणं त्रिक्षणम् एकदिन- वृद्धयाऽभ्यसेदभ्यासं कुर्यात् ॥ विपरीतकरणीगुणानाह-वलितमिति ॥ वलितं चर्म- संकोचः पलितं केशेषु शौक्ल्यं च, षण्णां मासानां समाहारः षण्मासं तस्मादूर्ध्वमुपरि नैव दृश्यते नैवावलोक्यते । साधकस्य देह इति वाक्याध्याहारः। यस्तु साधको याम- मात्र प्रहरमात्रं नित्यमभ्यसेत्स तु कालजित्कालं मृत्युं जयतीति कालजिन्मृत्युजेता भवेत् एतेन योगस्य प्रारब्धकर्मप्रतिबन्धकत्वमाप सूचितम् । तदुक्तं विष्णुधर्मे- स्वदेहारंभकस्यापि कर्मणः संक्षयावहः । यो योगः पृथिवीपाल शृणु तस्यापि लक्ष- णम् ' ॥ इति । विद्यारण्यैरपि जीवन्मुक्तायुक्तम्-" यथा प्रारब्धकर्म तत्त्वज्ञानात्प्रबलं तथा तस्मादपि कर्मणो योगाभ्यासः प्रबलः अत एव योगिनामुद्दालकवीतहव्यादीनां स्वेच्छया देहत्याग उपपद्यते” इति । भागवतेऽप्युक्तम्-'देहं जह्यात्समाधिना' इति ८२ फिर प्रतिदिन क्षणसे कुछ २ अधिक अभ्यास करै अर्थात् दो क्षण, तीन क्षण काल एक २ दिनकी वृद्धिसे अभ्यासको बढाता रहै । अब विपरीतकरणीके गुणोंको कहते है कि, पूर्वोक्त.
(१०८) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेश:- प्रकारके करनेसे वलीपलित छ:मासके अनन्तर नहीं दीखते हैं अर्थात् यौवन अवस्था हो जाती है और जो साधक प्रतिदिन प्रहरमात्र अभ्यास करता है वह मृत्युको जीतता है. इससे यहभी सूचित किया कि, योग प्रारब्धकर्मकाभी प्रतिबन्धक है। सोई विष्णुधर्ममें कहा है कि, अपने देहके आरम्भककर्मकाभी नाशक जो योग है हे पृथ्वीपाल ! उस योगको तू सुन और विद्या- रण्यने जीवन्मुक्तिग्रन्थमें यह कहा है कि, तत्त्वज्ञानसे प्रारब्धकर्म जैसे प्रबल है ऐसेही प्रारब्ध कर्मसे योगाभ्यास प्रबल है इसीसे उद्दालक, वीतहव्य आदि योगियोंने अपनी इच्छासे देहका त्याग किया। भागवतमेंभी लिखा है कि,समाधिसे देहको त्याग ।। ८२ ।। वज्रोल्यां प्रवृत्ति जनयितुमादौ तत्फलमाह- स्वेच्छया वर्तमानोऽपि योगोक्तैनियमबिना। वज्रोली यो विजानाति स योगी सिद्धिभाजनम् ॥ ८३॥ स्वेच्छयेति ॥ योऽभ्यासी वज्रोली वज्रोलीमुद्रां विजानाति विशेषेण स्वानु- भवेन जानाति स योगी योगे योगशास्त्रे उक्ता योगोक्तास्तैोगोक्तैनियमैर्ब्रह्मचर्या- दिभिविना ऋते स्वेच्छया निजेच्छया वर्तमानोऽपि व्यवहरन्नपि सिाद्धभाजनं सिद्धीनामणिमादीनां भाजनं पात्रं भवति ॥ ८३ ॥ वज्रोलीमुद्राकी प्रवृत्तिको उत्पन्न करनेके लिये प्रथम वज्रोलीके फलका वणन करते हैं कि, जो योगाभ्यासी वज्रोलीमुद्राको अपने अनुभवसे जानता है वह योगी योगशास्त्रमें कहेहुये नियमोंके बिना अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करताहुआभी अणिमा आदि सिद्धियोंका भोक्ता है अर्थात् ब्रह्मचर्य आदि नियमोंके विनाभी उसको सिद्धि प्राप्त होती है ।। ८३ ॥ तत्साधनोपयोगिवस्तुद्वयमाह- तत्र वस्तुयं वक्ष्ये दुर्लभं यस्यकस्यचित् । क्षीरं चैकं द्वितीयं तु नारी च पशवर्तिनी ॥ ८४॥ तत्रेति ॥ तत्र वज्रोल्यभ्यासे वस्तुनोईयं वस्तुयं वक्ष्ये कथयिष्ये । कीदृशं वस्तुद्वयं यस्यकस्यचित् यस्यकस्यापि धनहीनस्य दुर्लभं दुःखेन लब्धुं शक्यं दुःखे- नापि लब्धुमशक्यमिति वा । 'दुःस्यात्कष्टनिषेधयोः ' इति कोशात् ॥ किं तद्वस्तु- द्वयमित्यपेक्षायामाह-क्षीरमिति । एकं वस्तु क्षीरं पानार्थ मेहनानन्तरमिन्द्रियनैर्बल्या- 'चला क्षीरपानं युक्तम् । केचित्तु अभ्यासकाले आकर्षणार्थमित्याहुः । तस्यांतर्ग- तस्य घनीभावे निर्गमनासंभवात्तदयुक्तम् । द्वितीयं तु वस्तु वशवर्तिनी स्वाधीना नारी वनिता ॥८४ ॥ अव वज्रोलीमुद्राके साधक दो वस्तुओं का वर्णन करते हैं कि, उस वज्रोलीकी सिद्धिमें जिस किसी निर्धन पुरुषको दुर्लभ जा दो वस्तु हैं उनको मैं कहता हूँ उन दोनोंमें एक दूध है और दूसरी वशवर्तिनी नारी है अर्थात् मैथुनके अनन्तर निर्बल हुई इंद्रियोंकी प्रबलताके लिये दूधका पान याग्य ह आर कोई यह कहते हैं कि, अभ्यासकालमें आकर्षणके लिये दूधका पान उत्तम है सो ठीक नहीं, क्योंकि अन्तर्गत हुए दूधका आकर्षण नहीं हो सकता है।८४॥
तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। वज्रोलीमुद्राप्रकारमाह- मेहनेन शनैः सम्यगूर्वाकुञ्चनमभ्यसेत् । पुरुषोऽप्यथवा नारी वज्रोली सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ८५ ॥ मेहनेनेति ॥ मेहनेन स्त्रीसंगानन्तरं विन्दोः क्षरणेन साधनभूतेन पुरुषः पुमा- नथवा नार्यपि योषिदपि शनैमदं सम्यक् यत्नपूर्वकमूर्ध्वाकुञ्चनमूर्ध्वमुपर्याकुञ्चनं मेद्रा- कुश्चनेन बिन्दोरुपर्याकर्षणमभ्यसेइज्रोलीमुद्रा सिद्धिमाप्नुयासिद्धिं गच्छेत् ॥ ८५ ॥ अब वज्रोलीमुद्राके प्रकारका वर्णन करते हैं कि, पुरुष अथवा स्त्री मेहन ( बिन्दुका झरना) से शनैः २ भलीप्रकार यत्नसे ऊपरको आकुंचन ( संकोच ) का अभ्यास करे अर्थात् लिंग इंद्रियके आकुंचनसे बिन्दुके ऊपर, खींचनेका अभ्यास करे तो वज्रोलीमुद्रा सिद्धिको प्राप्त होती है ॥ ८५ ।। अथ वज्रोल्याः पूर्वाङ्गप्रक्रियामाह- यत्नतः शस्तनालेन फूत्कारं वज्रकन्दरे । शनैः शनैः प्रकुर्वीत वायुसंचारकारणात् ॥ ८६ ॥ यत्नत इति ॥ शस्तः प्रशस्तो यो नालस्तेन शस्तनालेने सीसकादिनिर्मितेन नालेन शनैः शनैर्मदंमन्दं यथाऽग्नेर्धमनार्थ फूत्कारः क्रियते तादृशं फूत्कारं वज्रकन्दरे मेदविवरे वायोः संचारः सम्यग्वज्रकन्दरे चरणं गमनं तत्कारणात् तद्धेतोः प्रकुर्वीत प्रकर्षेण पुनः पुनः कुर्वीत ॥ अथ वज्रोलीसाधनप्रक्रिया। सीसकनिर्मितां स्निग्धां मेद्रप्रवेशयोग्यां चतुर्दशांगुलमात्रां शलाकां कारयित्वा मेढ़े प्रवेशनमभ्यसेत् । प्रथम- दिने एकांगुलमात्रां शलाका प्रवेशयेत् । द्वितीयदिने व्यंगुलमात्रां, तृतीयदिने घ्यंगुल- मात्राम् । एवं क्रमेण वृद्धौ द्वादशांगुलमात्रप्रवेशे मेड्रमार्गः शुद्धो भवति ॥ पुन- स्तादृशीं चतुर्दशांगुलमात्रां इचंगुलमात्रवक्रामूर्ध्वमुखां कारयित्वा तां द्वादशांगुलमात्रां प्रवेशयेत् । वक्रमूर्ध्वमुखं यंगुलमात्रं बहिः स्थापयेत् । ततः सुवर्णकारस्य अग्निधमन- साधनीभूतनालसदृशं नालं गृहीत्वा तदग्रं मेद्प्रवेशितद्वादशांगुलस्य नालस्य वक्रोल- मुखव्यंगुलमध्ये प्रवेश्य फूत्कारं कुर्यात् । तेन सम्यक् मार्गशुद्धिर्भवति । ततो जलस्य. मेद्रेणाकर्षणमभ्यसेत् । जलाकर्षणे सिद्धे पूर्वोक्तश्लोकरीत्या बिन्दोर्वाकर्षणमभ्यसेत् । बिन्दाकर्षणे सिद्धे वज्रोलीमुद्रासिद्धिः । इयं जितप्राणस्यैव सिध्यति नान्यस्य खेचरी- मुद्राप्राणजयोभयसिद्धौ तु सम्यक् भवति ॥ ८६ ॥ अब वज्रोली मुद्राकी पूर्वाङ्ग क्रियाका वर्णन करते हैं कि, सीसे आदिकी उत्तम नालीसे शनैः २ इस प्रकार लिंगके छिद्र में वायुके संचार (भली प्रकार प्रवेश) के यत्नसे फूत्कारको करै जैसे अग्निके प्रज्वलनार्थ फूत्कारको करते हैं। अब वज्रोलीकी साधन प्रक्रियाको कहते हैं कि, सीसेसे बनी हुई लिंगमें प्रवेशके योग्य चौदह अंगुलकी शलाई बनवाकर उसके लिंगमें प्रवे- शका अभ्यास करै । पाहेले दिन एक अंगुलमात्र प्रवेश करै दूसरे दिन दो अंगुल मात्र और - ।
MARA (११०) हठयोगप्रदीपिका । [ उपदेशः- तीसरे दिन तीन अंगुलमात्र प्रवेश करै इस प्रकार क्रमसे वृद्धि करनेपर बारह अंगुल शलाकाके प्रवेश होनेके अनन्तर लिंगका मार्ग शुद्ध होजाता है फिर उसी प्रकारकी और चौदह अंगुलकी ऐसा शलाई बनवावे जो दो अंगुल टेढी हो और ऊर्ध्वमुखी हो उसकोभी बारह अंगुल भर लिंगके छिद्र में प्रवेश करै, टेढा और ऊर्ध्वमुख जो दो अंगुल मात्र है उसको बाहर रक्खे फिर सुनारके अग्निधमनके नालकी सदृश नालको लेकर उस नालके अग्रभागको लिंगमें प्रवेश किये बारह अंगुलके नालका जो टेढा और ऊर्ध्वमुख दो अंगुल है उसके मध्यमें प्रवेश करके फूत्कार करे तिससे भली प्रकार लिंगके मार्गकी शुद्धि होती है फिर लिंगसे जलके आकर्षणका अभ्यास करै जलके आकर्षणकी सिद्धि होनेपर पूर्वोक्त श्लोकमें कही रीतिके अनुसार बिंदुके ऊपरको आक- धणको अभ्यास करै विंदुके ऊर्ध्व आकर्षणकी सिद्धि होनेपर वज्रोलीमुद्राकी सिद्धि होती है । यह मुद्रा उस योगीको सिद्ध होती है जिसने प्राणवायुको जीत लिया है अन्यको नहीं होती है और खेचरी मुद्रा और प्राणका जय होनेपर तो भली प्रकार सिद्ध होती है। भावार्थ यह है कि, लिंगके छिद्रमें वायुके संचार करनेके लिये उत्तम नालसे शनैः २ यत्न- पूर्वक फूत्कारको करै ।। ८६ ॥ एवं वज्रोल्यभ्यासे सिद्धे तदुत्तरं साधनमाह- नारीभगे पतद्विन्दुमभ्यासेनोर्ध्वमाहरेत् । चलितं च नि बिंदुमूर्ध्वमाकृष्य रक्षयेत् ॥ ८७॥ नारीभग इति । नारीभगे स्त्रीयोनौ पततीति पतन् पतंश्चासौ विन्दुश्च पत- हिन्दुस्तं पतद्विन्दुं रतिकाले पतन्तं विन्दुमभ्यासेन वचोलीमुद्राभ्यासेनोर्ध्वमुपर्या- हरेदाकर्षयेत् । पतनात्पूर्वमेव । यदि पतनात्पूर्व बिन्दोराकर्षणं न स्यात्तार्ह पतित- माकर्षयेदित्याह-चलितं चेति । वलितं नारीभगे पतितं निजं स्वकीयं बिन्दुं चकारा- त्तद्रजः ऊर्ध्वमुपर्याकृष्याहृत्य रक्षयेत् स्थापयेत् ॥ ८७ ॥ अब वज्रोली मुद्राकी सिद्धिके अनन्तरका जो साधन है उसका वर्णन करते हैं कि, नारीके भग (योनि) में पडते हुये बिंदु (वीर्य) का अभ्याससे ऊपरको आकर्षण करै अर्थात् पड- नेसे पूर्वही ऊपरको खींचले यदि पतनसे पूर्व बिंदुका आकर्षण न होसके तो पतित हुये बिंदुका आकर्षण करै कि चलित हुआ अपना बिंदु और चकारसे स्त्रीके रज इनको ऊपरको आकर्षण करके रक्षा करै अर्थात् मस्तकरूपं जो वीर्यका स्थान है उसमें स्थापन करै ॥ ८७ ।। वज्रोलीगुणानाह- एवं संरक्षयेद्विन्दु मृत्युं जयति योगवित् । मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात् ॥ ८८॥ एवमिति । एवमुक्तरीत्या बिन्दुं यः संरक्षयेत् सम्यक् रक्षयेत् स योगवित योगाभिज्ञो मृत्युं जयत्यभिभवति । यतो बिन्दोः शुक्रस्य पातेन पतनेन मरणं भवति । बिन्दोर्धारणं विन्दुधारणं तस्माद्विन्दुधारणाजीवनं भवति । तस्माद्विन्दु संरक्षयदित्यर्थः॥
तुतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१११) अब वज्रोलीके गुणोंका वर्णन करते हैं कि, इस प्रकार जो योगी बिंदुकी भली प्रकार रक्षा करता है योगका ज्ञाता वह योगी मृत्युको जीतता है क्योंकि, बिंदुके पडनेसे मरण और बिंदुकी रक्षासे जीवन होता है तिससे बिंदुकी रक्षा करै ।। ८८ ॥ सुगन्धो योगिनो देहे जायते बिन्दुधारणात् । यावद्विन्दुः स्थिरो देहे तावत्कालभयं कुतः॥ ८९ ॥ सुगन्ध इति ॥ योगिनो वज़ोल्यभ्यासिनो देहे बिन्दोः शुक्रस्य धारणं तस्मात् सुगन्धः शोभनो गन्धो जायते प्रादुर्भवति । देहे यावद्विन्दुः स्थिरस्तावत्कालभयं मृत्युभयं कुतः। न कुतोऽपीत्यर्थः ॥ ८९ ॥ वज्रोलीके अभ्यासकर्ता योगीको देहमें बिंदुके धारण करनेसे सुगन्ध होजाती है और देहमें जबतक बिंदु स्थिर है तबतक कालका भय कहां अर्थात् कालका भय नहीं रहता है ॥८९ ॥ चित्तायत्तं नृणां शुक्र शुक्रायत्तं च जीवितम् । तस्माच्छुकं मनश्चैव रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥ ९ ॥ चित्तायत्तमिति ॥ हि यस्मान्नृणां शुक्रं वीर्यं चित्तायत्तं चित्ते चले चलत्वाच्चित्ते स्थिरे स्थिरत्वाच्चित्ताधीनं जीवितं जीवनं शुक्रायत्ते शुक्रे स्थिरे जीवनाच्छुके नष्टे मरणं शुक्राधीनं तस्माच्छुक्रं विन्दुं मनश्च मानसं च प्रकृष्टाद्यत्नादिति प्रयत्नतः रक्षणीयमेव । अवश्यं रक्षणीयमित्यर्थः । एवशब्दो भिन्नक्रमः ॥ ९ ॥ जिससे मनुष्योंका शुक्र (वीर्य) चित्तके आधीन है अर्थात् चित्तके चलायमान होनेपर चलायमान और चित्तके स्थिर होनेपर स्थिर होजाता है इससे चित्तके वशीभूत है और मनु- ष्योंका जीवन शुक्रके आधीन है अर्थात् शुक्रकी स्थिरतासे जीवन और शुक्रकी नष्टतासे मरण होताहै इससे जीवन शुक्रके आधीन है तिससे शुक्र ( बिंदु) और मनकी भली प्रकार यत्नसे रक्षा करै ॥९०॥ ऋतुमत्या रजोऽप्येवं बीज बिन्दुं च रक्षयेत् । मेद्रेणाकर्षयेदूर्व सम्यगभ्यासयोगवित् ॥ ९१ ॥ ऋतुमत्या इति ॥ एवं पूर्वोक्तेनाभ्यासेन ऋतुर्विद्यते यस्याः सा ऋतुमती तस्याः ऋतुमत्या ऋतुस्नातायाः स्त्रियो रेतः निजं स्वकीय बिन्दुं च रक्षयेत् । पूर्वोक्ताभ्यास दर्शयति-मद्रेणेति । अभ्यासो वज्रोल्यभ्यासः स एव योगो योगसाधनत्वात्तं वेत्तीत्य- भ्यासयोगवित् भेद्रेण गुह्येन्द्रियेण सम्यग्यत्नपूर्वकमूर्ध्वमुपर्याकर्षयेत् । रजो बिंदुं चेति कर्माध्याहारः । अयं श्लोकः क्षिप्तः॥ ९१॥ ऋतु हुआ है जिसके ऐसी स्त्रीके रज (वीर्य) की और अपने बिंदुकीभी इसी पूर्वोक्त अभ्याससे रक्षा करै अर्थात् ऋतुस्नानके अनंतर रज और वीर्य दोनोंकी रक्षा करै । पूर्वोक्त अभ्यासकोही दिखातेहैं कि, वज्रोलीके अभ्यासरूप योगका ज्ञाता योगी लिंग इंद्रियसे रज और बिंदुका भली प्रकार ऊपरको आकर्षण करै ( खींचे ) यह श्लोक क्षेपक है अर्थात् मूलका नहीं है ।। ९१ ॥
है
(११२)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेशः-
सहजोल्यमरोल्यौ विवक्षुस्तयोर्वज्रोलीविशेषत्वमाह-
सहजोलिश्चामरोलिर्वज्रोल्या भेद एकतः।
जले सुभस्म निक्षिप्य दग्धगोमयसंभवम् ॥ ९२॥
सहजोलिश्चेति ॥ वज्रोल्या भेदो विशेषः सहजोलिरमरोलिश्च । तत्र हेतु:-
एकतः एकत्वादेकफलत्वादित्यर्थः । एकशब्दाद्भावप्रधानापंचम्यास्तसिः । सहजोलि-
माह-जल इति । गोः पुरीषाणि गोमयानि दग्धानि च तानि गोमयानि च दग्धगोम-
यानि तेषु सम्भव उत्पत्तिर्यस्य तद्दग्धगोमयसम्भवं शोभनं भस्म विभूतिः तत् जले
तोये निक्षिप्य तोयमिश्रं कृत्वेत्युत्तरश्लोकेनान्वति ॥ ९२ ॥
अब सहजोली और अमरोली मुद्राओंका वर्णन करते हैं कि, वज्रोलीमुद्राका भेदविशेषही
सहजोली और अमरोली हैं, क्योंकि तीनोंका फल एक उन दोनोंमें सहजोलीमुद्राका वर्णन
करते हैं कि, दुग्ध किये हुये गोमयों का जो सुन्दर भस्म है उसको जलमें डालकर अर्थात् जल-
मिश्रित उस भस्मको करै।।९२ ॥
वज्रोलीमैथुनादूचं स्त्रीपुंसोः स्वाङ्गलेपनम् ।
आसीनयोः सुखेनैव मुक्तव्यापारयोः क्षणात् ॥ ९३ ॥
वज्रोलीति ॥ वज्रोलीमुद्रार्थ मैथुनं तस्मादूर्ध्वमनन्तरं सुखेनैवानन्देनैवासीनयो-
रुपविष्टयोः क्षणाद्रत्युत्सवान्मुक्तस्त्यक्तो व्यापारो रतिक्रिया याभ्यां तौ मुक्तव्यापारी
तयोर्मुक्तव्यापारयोः स्त्री च पुमांश्च स्त्रीपुंसौ तयोः स्त्रीपुंसोः स्वांगलेपनं शोभनान्य-
ङ्गानि स्वाङ्गानि मूर्धललाटनेत्रहृदयस्कन्धभुजादीनि तेषु लेपनम् ॥ ९३ ॥
वज्रोलीमुद्राकी सिद्धि के लिये कियेहुये मैथुनके अनंतर आनंदसे बैठेहुये और उत्साहसे
त्याग दिया है रतिका व्यापार जिन्होंने ऐसे स्त्री और पुरुष दोनों पूवाक्त भस्मको अपने
मस्तक, शिर, नेत्र, हृदय, स्कन्ध, भुजा आदि अंगोंपर लेपन करें ॥ ९३ ॥
सहजोलिरियं प्रोक्ता श्रद्धेया योगिभिः सदा ।
अयं शुभकरो योगो भोगयुक्तोऽपि मुक्तिदः ॥ ९४ ॥
सहजोलिरिति । इयमुक्ता क्रिया सहजोलिरिति प्रोक्ता कथिता योगिभिर्मत्स्ये-
न्द्रादिभिः। कीदृशी सदा श्रद्धेया सर्वदा श्रद्धातुं योग्या । अयं सहजोल्याख्यो योग
उपायः शुभकरः शुभं श्रेयः करोतीति शुभकरः। 'योगः संहननोपायध्यानसंगति-
युक्तिषु' इत्यभिधानात् । कीदृशो योगः भोगेन युक्तोऽपि मुक्तिदो मोक्षदः ॥ ९४ ॥
वह पूर्वोक्त भस्मलेपनरूप क्रिया मत्स्येंद्र आदि योगीजनोंने सहजोलिमुद्रा कहा है और
यह योगीजनोंको सदैव श्रद्धा करने योग्य है, यह सहजोलि नामका योग ( उपाय) शुभ-
कारी जानना और भोगसे युक्त भी यह योग मोक्षका दाता है ॥ ९४ ॥
तृतीयः ] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। अयं योगः पुण्यवतां धीराणां तत्त्वदर्शिनाम् । निर्मत्सराणां सिध्येत न तु मत्सरशालिनाम् ॥ ९५॥ अयं योग इति ॥ अयमुक्तो योगः पुण्यं विद्यते येषां ते पुण्यवन्तः सुकृतिन- स्तेषां पुण्यवतां धीराणां धैर्यवतां तत्त्वं वास्तविकं पश्यंतीति तत्त्वदर्शिनस्तेषां तत्त्व- दर्शिनां मत्सरान्निष्क्रान्ता निर्मत्सरास्तेषां निर्मत्सराणामन्यगुणद्वेषरहितानाम् । मत्सरोऽन्यगुणद्वेषः' इत्यमरः । तादृशानां पुंसां सिध्येत सिद्धिं गच्छेत् । मत्सर- शालिनां मत्सरवतां तु न सिध्येत् ॥ ९५ ॥ और यह सहजालिरूप योग पुण्यवान् और धीर और तत्त्व ( ब्रह्म) के जो द्रष्टाहैं और अन्यके गुणाम द्वेषरहित (निर्मत्सर ) हैं ऐसे पुरुषोंकोही सिद्ध होता है और जो मत्सरी हैं अर्थात् अन्यके गुणोंमें द्वेष (वैर) के करते हैं उनको सिद्ध नहीं होता है ।। ९५॥ अथामरोलीमाह- पित्तोल्वणत्वात्प्रथमाम्बुधारां विहाय निःसारतयान्त्यधारा । निषेव्यते शीतलमध्यधारा कापालिके खण्डमतेऽमरोली॥१६॥ पित्तोल्वणत्वादिति ॥ पित्तेनोल्वणोत्कटा पित्तोल्वणा तस्या भावः पित्तोल्व- णत्वं तस्मात् । यथा प्रथमा पूर्वा या अंबुनः शिवांबुनो धारा तां विहाय शिवाम्बु. निर्गमनसमये किंचित्पूर्वी धारां त्यक्त्वा । निर्गतः सारो यस्याः सा निःसारा तस्या भावो निःसारता तया निःसारतया निःसारत्वेनान्त्यधारा अन्त्या चरमा या धारा तो विहाय किंचिदन्त्यां धारां त्यक्त्वा । शीतला पित्तादिदोषसारत्वरहिता या मध्यधारा मध्यमा धारा सा निषेव्यते नितरां सेव्यते । खण्डो योगविशेषो मतोऽभिमतो यस्य स खण्डमतस्तास्मिन् खण्डमते कापालिकस्यायं कापालिकस्तस्मिन् कापालिके, खण्ड- कापालिकसंप्रदाय इत्यर्थः । अमरोली प्रसिद्धति शेषः॥ ९६ ॥ अब अमरोलीमुद्राका र्णन करते हैं कि, पित्त है उल्वण (अधिक) जिसमें ऐसी जो प्रथम शिवांबु (बिंदु) की धारा है उसको और नहीं है सार अंश जिसमें ऐसी जो अन्त्यधारा है उसको छोडकर अथात् पहली और पिछली धारोंको किंचित् २ त्यागकर पित्त आदि दोष और सारतासे रहित शीतल मध्य धाराका जिस रीतिसे नित्य सेवन (पान) किया जाय वह क्रिया योगविशेष जो खंड उसके माननेवाले कापालिक मतमें अर्थात् खंडकापालिक मतमें अमरोली नामकी मुद्रा प्रसिद्ध है ॥ ९६ ।। अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन्दिनेदिने । वज्रोलीमभ्यसेत्सम्यगमरोलीति कथ्यते ॥९७॥ अमरीमिति ॥ अमरीं शिवांबु यः पुमान् नित्यं पिबेत् । नस्यं कुर्वन् श्वासे अमर्या घ्राणांतर्ग्रहणं कुर्वन् सन् दिनेदिने प्रतिदिनं वज्रोली मेहनेन शनैः' इति - (११४) हठयोगप्रदीपिका । [उपदेशः- - श्लोकेनोक्तां सम्यगभ्यसेत्साऽमरोलीति कथ्यते । कापालिकैरिति शेषः । अमरी पीता- मरी । नस्यपूर्विका वज्रोल्यमरोलीशब्देनोच्यत इत्यर्थः ॥ ९७ ॥ जो पुरुष शिवांबुरूप अमरीको नासिकासे नित्य पीता है अर्थात् नासिकाके छिद्रद्वारा अमरीको अंतर्गत करताहै और मैथुनसे प्रतिदिन वज्रोलीका भलीप्रकार अभ्यास करता है उस मुद्राको कापालिक अमरोली कहते हैं अर्थात् नासिकाके छिद्रसे पानकी अमरी वज्रोलीके अनंतर अमरोली कहाती है ।। ९७ ॥ अभ्यासान्निःसृतां चान्द्री विभूत्या सह मिश्रयेत् । धारयेदुत्तमाङ्गेषु दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥ ९८॥ अभ्यासादिति ॥ अभ्यासादमरोल्यभ्यासान्निःसृतां निर्गतां चान्द्री चन्द्रस्येयं चान्द्री तां चान्द्री सुधां विभूत्या भस्मना सह साकं मिश्रयेत्संयोजयेत् । उत्तमाङ्गेषु शिरस्कपालनेत्रस्कंधकण्ठहृदयभुजादिषु धारयेत् । भस्ममिश्रितां चांद्रीमिति शेषः । दिव्या अतीतानागतवर्तमानव्यवहितविप्रकृष्टपदार्थदर्शनयोग्या दृष्टिर्यस्य स दिव्य- दृष्टिदिव्यदृक् प्रजायते प्रकर्षेण जायते । अमरीसेवनप्रकारविशेषाः शिवांबुकल्पा- दवगंतव्याः॥ ९८॥ अमरोलीमुद्राके अभ्याससे निकसी जो चंद्रमाकी सुधा (अमृत) है उसको विभूति(भस्म) के संग मिलाकर शिर, कपाल, नेत्र, स्कंध, कंठ, हृदय, भुजा आदि उत्तम अंगोंमें धारण करे तो मनुष्य दिव्यदृष्टि होजाता है अर्थात् भूत, भविष्यत्, वर्तमान, व्यवहित और विप्रकृष्ट (दूर ) के जो पदार्थ उनके देखनेयोग्य दृष्टि होजाती है और अमरीसेवनके भेद ता शिवांबुकल्पग्रंथसे जानने ॥ ९८ ॥ घुसो बज्रोलीसाधनमुक्त्वा नास्तिदाह- पुंसो बिन्दु समाकुच्य सम्यगभ्यासपाटवात् । यदि नारी रजो रक्षेद्वज्रोल्या साऽपि योगिनी ॥ ९९ ॥ पुंसो बिन्दुमिति ॥ सम्यगभ्यासस्य सम्यगभ्यसनस्य पाटवं पटुत्वं तस्मात्पुंसः पुरुषस्य बिन्दुं वीर्य समाकुंच्य सम्यगाकृष्य नारी स्त्री यदि रजो वज्रोल्या वज्रोली- मुद्रया रक्षेत् । सापि नारी योगिनी प्रशस्तयोगवती ज्ञेया । 'पुंसो बिंदुसमायुक्तम्' इति पाठे तु एतद्रजसो विशेषणम् ॥ ९९ ॥ पुरुषको वज्रोलीके साधनको कहकर नारीको वज्रोलीके साधनको वर्णन करते हैं कि, भली प्रकारसे कियेहुये अभ्यासकी चतुरतासे पुरुषके बिंदुका भलीप्रकार आकर्षण करके यदि नारी वनोलीमुद्रासे अपने रजकी रक्षा करै तो वह भी योगिनी जाननी । 'पुंसो बिंदुसमा- युक्तम् ' यह पाठ होय तो यह अर्थ समझना कि, पुरुषके बिंदुसे युक्त अपने रजकी रक्षा करै तो वह नारी योगिनी होती है ॥ ९९ ।।
A तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। नारीकृताया वज्रोल्याः फलमाह-- तस्याः किंचिद्रजो नाशं न गच्छति न संशयः। तस्याः शरीरे नादश्च बिन्दुतामेव गच्छति ॥ १० ॥ तस्या इति ॥ तस्या वज्रोल्यभ्यसनशीलायाः नार्या रजः किंचित् किमपि स्वल्पमपि नाशं न गच्छति नष्टं न भवति, पतनं न प्राप्नोतीत्यर्थः। अत्र संशयो न संदेहो न । तस्या नार्याः शरीरे नादश्च विदुतामेव गच्छति मूलाधारादुत्थितो नादो हृदयोपरि विदुभावं गच्छति । विंदुना सहैकीभवतीत्यर्थः । अमृतसिद्धी-बीजं च पौरुष पोक्तं रजश्च स्त्रीसमुद्भवम् । अनयोर्वाह्ययोगेन सृष्टिः संजायते नृणाम् ॥ यदाभ्यंतरयोगः स्यात्तदा योगीति गीयते । बिन्दुश्चन्द्रमयः प्रोक्तो रजः सूर्यमयं तथा ॥ अनयोः संगमादेव जायते परमं पदम् । स्वर्गदो मोक्षदो बिन्दुर्धर्मदोऽधर्मद- स्तथा ॥ तन्मध्ये देवताः सर्वास्तिष्ठते सूक्ष्मरूपतः ॥' इति ॥ १०० ॥ अब नारीकी कीहुई वज्रोलीके फलको कहते हैं कि, वज्रोलीके अभ्यास करने में शीलवती उस नारीका किंचित् भी रज नष्ट नहीं होता है अर्थात् अपने स्थानसे पतित नहीं होता इसमें संशय नहीं है और उस नारीके शरीरमें नादभी बिंदुरूपको प्राप्त होजाताहै अर्थात् मूलाधा- रसे उठाहुआ नाद हृदयके ऊपर बिंदुके संग एक होजाता है । अमृतसिद्धिग्रंथमें लिखा है कि, पुरुषके वीर्यको वीज और नारीके वीर्यको रज कहते हैं । इन दोनोंका देहसे बाहर योग होनेसे मनुष्यों के संतान होती है । यदि दोनोंका भीतरही योग होजाय तो वह योगी कहा जाता है। उन दोनों में बिंदु चंद्रमय है और रज सूर्यमय है । इन दोनोंके संगमसे परम पद होता है और यह बिंदु स्वर्ग, मोक्ष, धर्म और अधर्मका दाता है। उस बिंदुके मध्य में सूक्ष्मरूपसे संपूर्ण देवता टिकते हैं ॥१०॥ स बिन्दुस्तद्रजश्चैव एकीभूय स्वदेहगौ। वज्रोल्यभ्यासयोगेन सर्वसिद्धिं प्रयच्छतः ॥१०॥ स बिन्दुरिति ॥ स पुंसो बिन्दुस्तद्रजो नार्या रजश्चैव वज्रोलीमुद्राया अभ्यासो बबोल्यभ्यासः स एव योगस्तेनैकीभूय मिलित्वा स्वदेहगौ स्वदेहे गतौ सर्वसिद्धिं प्रयच्छतः दत्तः ॥ १०१ ।। पुरुषका वह बिन्दु और नारीका वह रज दोनों एक होकर वज्रोलीमुद्राके अभ्यासयोगसे यदि अपने देहहीमें स्थित रहजाँय तो सम्पूर्ण सिद्धियों को देते हैं ॥१०१॥ रक्षेदाकुञ्चनादूर्व या रजः सा हि योगिनी। अतीतानागतं वेत्ति खेचरी च भवेद ध्रुवम् ॥ १०२ ॥ रक्षेदिति ॥ या नार्याकुञ्चनाद्योनिसंकोचनादूर्ध्वमुपरिस्थाने नीत्वा रजो रक्षेत् । हीति प्रसिद्धं योगशास्त्रे । सायोगिन्यतीतानागतं भूतं भविष्यं च वस्तु वेत्ति जानाति । ध्रुवमिति निश्चितम् । खेऽन्तरिक्षे चरतीति खेचर्यन्तरिक्षचरी भवेत् ॥ १०२ ।।
हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- जो नारीअपनी योनिके संकोचसे रजको ऊर्श्वस्थानमें लेजाकर रजकी रक्षा करै वह योगिनी होतीहै और भूत,भविष्यत, वर्तमान वस्तुको जान सकती है और यह निश्चित है कि, वह खेचरी होती है अर्थात् उसको आकाशमें गमन करनेका सामर्थ्य होजाताहै ॥ १०२ ॥ देहसिद्धिं च लभते वज्रोल्यभ्यासयोगतः। अयं पुण्यकरो योगो भोगे भुक्तेऽपि मुक्तिदः॥ १०३॥ देहसिद्धिमिति ॥ वज्रोल्या अभ्यासस्य योगो युक्तिस्तस्मादेहस्य सिद्धि रूप- लावण्यबलवज्रसंहननत्वरूपां लभते । अयं योगो वज्रोल्यभ्यासयोगः पुण्यकरोऽदृष्ट- विशेषजनकः । कीदृशो योगः ? भुज्यत इति भोगो विषयस्तस्मिन भुक्तेऽपि मुक्तिदों मोक्षदः ॥ १०३ ॥ और वज्रोलीके अभ्यासयोगसे रूप, लावण्य, वज्रोलीकी तुल्यतारूप देहकी सिद्धिको प्राप्त होती है और यह वज्रोलीके अभ्यासका योग पुण्यका उत्पादक है और भोगोंको भोगनेपरभी. मुक्तिको देता है ।। १०३ ॥ शक्तिचालनं विवक्षुस्तदुपोद्धाततया कुण्डलीपर्यायान् तथा मोक्षद्वारविभेदनादिकं चाह सप्तभि:- कुटिलागी कुण्डलिनी भुजङ्गी शक्तिरीश्वरी। कुण्डल्यरुन्धती चैते शब्दाः पर्यायवाचकाः॥१०४॥ कुटिलाङ्गीति ॥ कुटिलाङ्गी १,कुण्डलिनी २, भुजङ्गी ३, शक्तिः ४, ईश्वरी ५, कुण्डली ६, अरुंधती ७ चैते सप्त शब्दाः पर्यायवाचका एकार्थवाचकाः ॥ १०४ ॥ शक्तिचालनमुद्रा कहने के अभिलाषी आचार्य कुण्डलिनीके पर्याय और कुण्डलिनीसे मोक्ष- द्वारविभेदन ( खोलना) आदिका वर्णन करते हैं कि, कुटिलांगी १, कुंडलिनी २, भुजंगी ३, शक्ति ४, ईश्वरी ५, कुंडली ६, अरुन्धती ७ ये सात शब्द पर्यायवाचक हैं अर्थात् सातोंका एकही अर्थ है ॥ १०४ ॥ उद्घाटयेत्कपाटं तु यथा कुंचिकया हठात् । कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत् ॥ १०५॥ उद्घाटयेदिति ॥ यथा येन प्रकारेण पुमान् कुञ्चिकया कपाटार्गलोत्सारण- साधनीभूतया हठाबलात्कपाटमररमुद्घाटयेदुत्सारयेत् । हठादिति देहलीदीपकन्याये- नोभयत्र सम्बध्यते । तथा तेन प्रकारेण योगी हठाठाभ्यासात्कुण्डलिन्या शक्त्या मोक्षद्वारं मोक्षस्य द्वार प्रापकं सुषुम्नामार्ग विभेदयेद्विशेषेण भेदयेत् । 'तयोर्ध्वमायन्नमृ- तत्वमेति' इति श्रुतेः ॥ १०५ ।। जैसे पुरुष कपाटों (किवॉड ) के अर्गल ( ताला) आदिको हठ ( बल ) से कुंचिका ( ताली) से उद्घाटन करता है, तिसीप्रकार योगी भी हठयोगके अभ्याससे कुंडलिनीमुद्राके तृतीयः] संस्कृतटीका--भाषाटीकासमेता । (११७) द्वारा मोक्षद्वार अर्थात् मोक्षके दाता सुषुम्नाके मार्गको भेदन करता है क्योंकि श्रुतिमें लिखा है कि सुषुम्ना मार्गसे ऊपर (ब्रह्मलोक ) को जाताहुआ मोक्षको प्राप्त होता है ॥ १०५ ।। येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम् । मुखेनाच्छाद्य तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी ॥ १०६॥ येनेति ॥ आमयो रोगजन्यं दुःखं दुःखमात्रोपलक्षणं तस्मानिर्गतं निरामयं दुःख- मात्ररहितं ब्रह्मस्थानं ब्रह्माविर्भावजनकं स्थानं ब्रह्मस्थानं ब्रह्मरन्ध्रम् तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः ' इति श्रुतेः । येन मार्गेण सुषुम्नामार्गेण गन्तव्यं गमनाईमस्ति तद्वारं तस्य मार्गस्य द्वारं प्रवेशमार्ग मुखेन आस्येनाच्छाद्य रुद्धा परमेश्वरी कुण्डलिनी प्रसुप्ता निद्रिताऽस्ति ॥ १०६॥ रोगसे उत्पन्न हुआ दुःखरूप आमय जिसमें नहीं है ऐसा ब्रह्मस्थान जिस मार्गसे जाने योग्य होता है अर्थात् जिस मार्गसे ब्रह्मस्थानको जाते हैं क्योंकि श्रुतिमें लिखा है कि, उस सुषु- म्नाकी शिखाके मध्यमें परमात्मा स्थित है । उस सुषुम्ना मार्गके द्वारको मुखसे आच्छादन करके अर्थात् रोककर परमेश्वरी (कुंडलिनी) सोती है ॥ १०६ ॥ कन्दोर्व कुण्डली शक्तिः सुप्ता मोक्षाय योगिनाम् । बन्धनाय च मूढानां यस्तां वेत्ति स योगवित् ॥ १०७॥ कन्दोर्ध्वमिति ॥ कुण्डली शक्तिः कन्दोज़ कन्दस्योपरिभागे योगिनां मोक्षाय सुप्ता मूढानां बन्धनाय सुप्ता । योगिनस्तां चालयित्वा मुक्ता भवन्ति । मूढास्त- दज्ञानाद्वद्धास्तिष्ठन्तीति भावः । तां कुण्डलिनी यो वेत्ति स योगवित् । सर्वेषां योग- तन्त्राणां कुण्डल्याश्रयत्वादित्यर्थः ॥ १०७ ॥ कंदके ऊपरभागमें सोतीहुई कुण्डलिनी योगीजनोंके मोक्षार्थ होती है और वह पूर्वोक्त कुण्डलिनी मूढोंके बन्धनार्थ होती है अर्थात् योगीजन कुण्डलिनीको चलाकर मुक्त होजाते हैं और उसके अज्ञानी मूढ बन्धनमें पड़े रहते हैं । उस कुंडलिनीको जो जानता है वही योगका ज्ञाता है, क्योंकि सम्पूर्ण योगके तंत्र कुंडलिनीके अधीन हैं ।। १०७ ॥ कुण्डली कुटिलाकारा सर्पवत्परिकीर्तिता। सा शक्तिश्चालिता येन स मुक्तो नात्र संशयः॥ १०८॥ कुण्डलीति । कुण्डली शक्तिः सर्पवद् भुजङ्गवत्कुटिल आकारः स्वरूपं यस्याः सा कुटिलाकारा परिकीर्तिता कथिता योगिभिः । सा कुण्डली शक्तियेन पुंसा चालिता मूलाधारादूर्वा नीता स मुक्तोऽज्ञानबंधानिवृत्तः । अत्रास्मिन्नर्थे संशयो न संदेहो नास्तीत्यर्थः । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति' इति श्रुतेः ॥ १०८॥ योगीजनोंने जो सर्पके समान कुटिल है आकार जिसका ऐसी कही है वह कुण्डली शक्ति जिसने चलादी है अर्थात् मूलाधारसे ऊपर पहुँचादी है वह मुक्त है अर्थात् बन्धनसे निवृत्त है (११८) हटयोगप्रदीपिका। [उपदेशः- जिनके वा इडा इसमें संशय नहीं है, क्योंकि पूर्वोक्त श्रुति है कि, उस सुषुम्नासे ऊपरको जाताहुआ योगी मोक्षको प्राप्त होता है ॥ १०८ ।। गङ्गायमुनयोर्मध्ये बालरण्डां तपस्विनीम् । बलात्कारेण गृह्णीयात्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ १०९॥ गङ्गायमुनयोरिति ॥ गङ्गायमुनयोराधाराधेयभावेन तयोर्भावनाद्गङ्गायमुनयो- रभेदेन भावनाद्वा गङ्गायमुने इडापिंगले तयोर्मध्ये सुषुम्नामार्गे तपस्विनी निरशन- स्थितेः । बालरण्डां बालरण्डाशब्दवाच्यां कुण्डली बलात्कारेण हठेन गृह्णीयात् । तत्तस्या गंगायमुनयोर्मध्ये ग्रहणं विष्णोर्हरेयापकस्यात्मनो वा परमं पदं परम- पदनापकम् ॥ १०९ ॥ गंगा यमुना हैं आधार गंगा यमुनारूप जो पिंगला नाडी हैं उनके मध्यम अर्थात् सुषुम्नाके मार्गमें तपस्विनी अर्थात् भोजनरहित बालरंडा है उसको बलात्कार (हठ- योग) से ग्रहण करै वह उस कुण्डलीका जो बलात्कारसे ग्रहण है वही व्यापकरूप विष्णुके परम पदका प्रापक है ।। १०९ ।। गङ्गायमुनादिपदार्थमाह- इडा भगवती गङ्गा पिङ्गला यमुना नदी। इडापिङ्गलयोर्मध्ये बालरण्डा च कुण्डली ॥ ११० ॥ इडेति ॥ इडा वामनिःश्वासा नाडी भगवत्यैश्वर्यादिसंपन्ना गंगा गंगापदवाच्या, पिंगला दक्षिणनिःश्वासा यमुना यमुनाशब्दवाच्या नदी । इडापिंगलयोर्मध्ये मध्य- गता या कुण्डली सा बालरण्डाशब्दवाच्या ॥ ११० ॥ अब गंगा यमुना आदि पदार्थों का वर्णन करते हैं कि, इडा अर्थात् वामनिःश्वासकी नाडी भगवती गंगा कहाती है और पिंगला अर्थात् दक्षिणनिःश्वासकी नाडी यमुना नदी कहाती है और इडा और पिंगलाके मध्यमें वर्तमान जो कुण्डली है वह वालरण्डा कहाती है ।। ११०॥ शक्तिचालनमाह- पुच्छे प्रगृह्य भुजगी सुप्तामुद्बोधयेच्च ताम् । निद्रां विहाय सा शक्तिसूर्ध्वमुत्तिष्ठते हठात् ॥ १११॥ पुच्छे इति ॥ सुप्तां निद्रितां भुजङ्गी तां कुण्डलिनी पुच्छे प्रगृह्य गृहीत्वोद्बोधयेत् प्रचोधयेत्सा शक्तिः कुण्डली निद्रां विहाय हठादूर्ध्व तिष्ठत इत्यन्वयः । एतद्रहस्यं तु मुरुमुखादवगन्तव्यम् ॥ १११॥ अब शक्तिचालनमुद्राका वर्णन करते हैं कि, सोतीहुई भुजगी ( कुण्डली) के पुच्छको ग्रहण करके उस मुजगीका प्रबोधन करे (जगावे) तो वह कुण्डली निद्राको त्यागकर हठसे ऊपरको स्थित होजाती है। इसका रहस्य (गुप्तक्रिया) तो गुरुमुखसे जानने योग्य है ॥ १११ ॥ ।
- - तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। अवस्थिता चैव फणावती सा प्रातश्च सायं प्रहराधमात्रम् । प्रपूर्य सूर्यात्परिधानयुक्त्या प्रगृह्य नित्यं परिचालनीया॥११२॥ अवस्थितेति ॥ अवस्थितार्वाक स्थिता मूलाधारस्थिता फणावती भुजंगी सा कुण्डलिनी सूर्यादापूर्य सूर्यात्पूरणं कृत्वा परिधाने युक्तिस्तया परिधानयुक्त्या प्रगृह्य गृहीत्वा । सायं सूर्यास्तसमये प्रातः सूर्योदयवेलायां नित्यमहरहः प्रहरस्य यामस्याध प्रहराधैं प्रहरार्द्धमेव प्रहरार्धमात्रं मुहूर्तद्वयमात्रं परिचालनीया परितश्चालयितुं योग्या । परिधानयुक्तिर्देशिकाद्वोध्या ॥ ११२ ॥ नीचे मूलाधारमें स्थित वह फणावती कुण्डलिनी सूर्यसे पूरण करनेके अनन्तर परिधानमें जो युक्ति है उससे ग्रहण करके सायंकाल और प्रातःकालके समय प्रतिदिन आधे प्रहर पर्यंत चारों तर्फ चालन करने योग्य है । परिधानकी युक्ति गुरुमुखसे जाननी चाहिये ॥ ११२ ।। कन्दसम्पीडनेन शक्तिचालनं विवक्षुरादौ कन्दस्य स्थानं स्वरूपं चाह- उर्व वितस्तिमात्रंतु विस्तारं चतुरङ्गुलम् । मृदुलं धवलं प्रोक्तं वेष्टिताम्बरलक्षणम् ॥ ११३॥ ऊर्ध्वमिति ॥ मूलस्थानाद्वितस्तिमात्रं वितस्तिप्रमाणमूर्ध्वमुपरि नाभिमेट्यो- मध्ये । एतेन कन्दस्य स्थानमुक्तम् । तथा चोक्तं गोरक्षशतके-“ऊज़ मेदादधो नाभेः कन्दयोनिः खगाण्डवत् । तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणां द्विसप्ततिः ॥” इति । याज्ञवल्क्यः-" गुदात्तु व्यंगुलादूर्ध्व मेदात्तदूधंगुलादधः । देहमध्यं तनोर्मध्यं मनु- जानामितीरितम् ॥ कन्दस्थानं मनुष्याणां देहमध्यान्नवांगुलम् । चतुरंगुलविस्तार- मायामं च तथाविधम् ।। अण्डाकृतिवदाकारं भूषितं च त्वगादिभिः। चतुष्पदां तिरश्चा च द्विजानां तुंदमध्यगम् ” इति । गुदाद् व्यंगुलोपर्येकांगुलं मध्यं तस्मान्नवाडुलं कन्दस्थानं मिलित्वा द्वादशांगुलप्रमाणं वितस्तिमात्रं जातम् । चतुर्णामंगुलीनां समा- हारश्चतुरंगुलं चतुरंगुलप्रमाणं विस्तारम् । विस्तारो दैय॑स्याप्युपलक्षणम् । चतुरंमुलं दीर्घ च मृदुलं कोमलं धवलं शुभ्रं वेष्टितं वेष्टनाकारीकृतं यदंबरं वस्त्रं तस्य लक्षणं स्वरूपमिव लक्षणं स्वरूपं यस्य तादृशं प्रोक्तं कथितम् । कन्दस्वरूपं योगिभिरिति शेषः।। कंदके पीडनेसे शक्तिचालनके कथनाभिलाषी आचार्य प्रथम कंदके स्थान और स्वरूपका वर्णन करते हैं कि, मूलस्थानसे वितस्तिभर ऊपर अर्थात् नाभिस्थल और लिंगके मध्यमें इस वर्णनसे कंदका स्थान कहा । सोई गोरक्षनाथने कहा है कि, लिंगसे ऊपर और नाभिसे नीचे पक्षियोंके अंडेके समान कंदकी योनि है, उसमें बहत्तर सहस्र नाडी उत्पन्न हुई हैं. याज्ञ- वल्क्यने कहाहै कि, गुदासे दो अंगुल ऊपर लिंगसे दो अंगुल नीचे मनुष्योंके देह (तनु) का मध्य कहा है । मनुष्योंका कंदस्थान देहके मध्यसे नौ अंगुल ऊपर चार अंगुल चौडा और चार अंगुल लंबा है और त्वचा आदिसे अंडाकारके समान शोभित है और तिरछी योनियोंके और
।
(१२०)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
पक्षियोंके और चौपायाक तुंद मध्यमें होता है अर्थात् गुदाके दो अंगुलोंसे ऊपर एक अंगुलका
मध्य और उससे नौ अंगुल कंदस्थान हुआ, ये सब मिलाकर बारह अंगुलका प्रमाण जिसका
ऐसा वितस्तिमात्र हुआ और वह कंदस्थान चार अंगुल और कोमल और धवल और वेष्टित
किये (लपेटे) वस्त्रके समान है रूप जिसका ऐसा योगीजनोंने कहाहै । भावार्थ यह है कि,
मूलस्थानसे ऊपर वितस्तिमात्र चार अंगुलभर कोमल शुक्ल लपेटे हुये वस्त्रके समान कंदस्थान
योगीजनोंने कहा है ॥ ११३ ।।
सति वज्रासने पादौ कराभ्यां धारयेद् दृढम् ।
गुल्फदेशसमीपे च कन्दं तत्र प्रपीडयेत् ॥ ११४॥
सतीति ॥ वज्रासने कृते सति कराभ्यां हस्ताभ्यां गुल्फो पादग्रन्थी तयोर्देशौ
प्रदेशौ तयोः समीपे गुल्फाभ्यां किश्चिदुपरि । ' तद्ग्रन्थी घुटिके गुलफौ' इत्यमरः ।
पादौ चरणौ दृढं गाढं धारयेत् गृहीयात् । चकाराद्धृताभ्यां पादाभ्यां तत्र कन्दुस्थाने
कन्दं प्रपीडयेत्प्रकर्षेण पीडयेत् । गुल्फादूर्वं कराभ्यां पादौ गृहीत्वा नाभेरधोभागे
कन्दं पीडयेदित्यर्थः ॥ ११४ ।।
वज्रासन करनेके अनंतर हाथोंसे गुल्फोंके समीपके स्थानमें दोनों चरणोंको दृढतासे धारण
करै अर्थात् गुल्फोंके कुछेक ऊपरके भागमें चरणोंको हाथोंसे खूब पकडे और हाथोंसे पकड
हुये पादोंसे कन्दके स्थानमें कन्दको पीडित करै अर्थात् गुल्फसे ऊपर पादाको हाथोंसे पकडकर
नाभिके अधोभागमें कंदको पीडित करै ( दाबै ) ॥ ११४ ॥
वज्रासने स्थितो योगी चालयित्वा च कुण्डलीम्
कुर्यादनन्तरं भस्त्रां कुण्डलीमाशु बोधयेत् ॥ ११५॥
वजासन इति ॥ वज्रासने स्थितो योगी कुण्डली चालयित्वा शक्तिचालन-
मुद्रां कृत्वेत्यर्थः । अनन्तरं शक्तिचालनानन्तरं भस्त्रां भस्त्राख्यं कुम्भकं कुर्यात् । एवं
रीत्या कुण्डली शक्तिमाशु शीघ्रं बोधयेत्प्रबुद्धां कुर्यात् । वज्रासने शक्तिचालनस्य
पूर्व विधानेऽपि पुनर्वचासनोपपादनं शक्तिचालनानन्तरं भस्वायां वज्रासन मेव कर्तव्य-
मिति नियमार्थम् ॥ ११५ ॥
वनासनमें स्थित (बैठा हुआ) योगी कुण्डलीको चलाकर अर्थात् शक्तिचालन मुद्राको
करके उसके अनन्तर अर्थात् शक्तिचालनके पीछे भस्त्रानामके कुंभक प्राणायामको करे, इस
रीतिसे कुण्डलीका शीघ्र प्रबोधन करे । यद्यपि वज्रासनमें शक्तिका चालन पहिले कह आये हैं
फिर जो वज्रासनका कथन है वह इस नियमके लिये है कि, शक्तिचालनके अनन्तर भत्रामें
वज्रासनही करना, अन्य नहीं ॥ ११५ ॥
भानोराकुञ्चनं कुर्यात्कुण्डली चालयेत्ततः ।
मृत्युक्क्रगतस्यापि तस्य मृत्युभयं कुतः॥११६॥
तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१२१) भानोरिति ॥ भानो भिदेशस्थस्य सूर्यस्याकुञ्चनं कुर्यात् । नाभेराकुंचनेनैव तस्याकुञ्चनं भवति । ततो भानोराकुञ्चनात्कुण्डली शक्तिं चालयेत् । एवं यः करोति मृत्योर्वकं मुखं गतस्यापि प्राप्तस्यापि तस्य पुंसो मृत्युभयं कालभयं कुतः न कुतोऽपीत्यर्थः ॥ ११६॥ नाभिदेशमें स्थित सूर्यका आकुंचन करै और वह सूर्यका आकुंचन नाभिके आकुंचनसेही होता है, फिर सूर्यके आकुंचनसे कुण्डली शक्तिका चालन करै, जो योगी इस प्रकारकी क्रियाको करता है मृत्युके मुखमें गये हुये भी उस योगीको कालका भय किस प्रकार हो सकता है ? अर्थात मृत्युका भय नहीं रहता ॥ ११६ ॥ मुहूर्तद्वयपर्यन्तं निर्भयं चालनादसौ । ऊर्ध्वमाकृष्यते किंचित्सुषुम्नायां समुद्गता ॥ ११७ ॥ मुहूर्तद्वयमिति ॥ मुहूर्तयोईयं युग्मं घटिकाचतुष्टयात्मकं तत्पर्यन्तं तवधि निर्भयं निःशंकं चालनादसौ शक्तिः सुषुम्नायां समुद्गता सती किंचिदूर्ध्वमाकृष्यते आकृष्टा भवति ॥ ११७ ॥ दो मुहूर्त अर्थात् चार घडी पर्यन्त निर्भय (अवश्य ) चलायमान करनेसे सुषुम्नामें प्राप्त हुई यह शक्ति (कुण्डली) किञ्चित् (कुछ ) ऊपरको खिंच जातो है ॥ ११७ ।। तेन कुण्डलिनी तस्याः सुषुम्नायां मुखं ध्रुवम् । जहाति तस्मात्प्राणोऽयं सुषुम्नां ब्रजति स्वतः॥ ११८॥ तेनेति ॥ तेनोर्ध्वमाकर्षणेन कुण्डली तस्याः प्रसिद्धायाः सुषुम्नाया मुखं प्रवेश- मार्ग ध्रुवं निश्चितं जहाति त्यजति । तस्मान्मार्गत्यागादयं प्राणवायुः स्वतः स्वयमेव सुषुम्नां व्रजति गच्छति । सुषुम्नामुखात्मागेव कुण्डलिन्या निर्गतत्वादिति भावः ११८ तिस ऊपरको आकर्षण करनेसे वह कुंडली उस प्रसिद्ध सुषुम्नाके मुख अर्थात् प्रवेशके मार्गको निश्चयसे त्याग देती है। तिस मार्गके त्यागसे प्राणवायु स्वतः (स्वयं ) ही सुषुम्नामें प्रविष्ट होजाताहै. क्योंकि, कुंडलिनी तो सुषुम्नाके मुखपरसे पहिलेही चली गई, अवरोधके अभाव होनेसे प्राणका स्वयंही प्रवेश होजाता है ॥ ११८ ॥ तस्मात्संचालयेन्नित्यं सुखसुप्तामरुन्धतीम् । तस्याः संचालनेनैव योगी रोगैःप्रमुच्यते ॥११९॥ तस्मादिति ॥ यस्माच्छक्तिचालनेन प्राणः सुषुम्नां व्रजति तस्मात्सुखेन सुप्ता सुखसुप्ता तां सुखसुप्तामरुन्धती शक्तिं नित्यं प्रतिदिनं सञ्चालयेत्सम्यक् चालयेत् । तस्याः शक्तेः सञ्चालनेनैव सञ्चालनमात्रेण योगी रोगैः कासश्वासजरादिभिः प्रमुच्यते प्रकर्षेण मुक्तो भवति ।। ११९ ॥
कहनेसे क्या है ? कालकोभी (१२२) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- जिससे शक्तिके चालनसे प्राण सुषुम्नामें प्राप्त होता है तिससे सुखसे सोई हुई अरुंधती ( कुंडलिनी) को नित्य भली प्रकार चलायमान करै क्योंकि तिस शक्तिके चलायमान करने- सेही रोगी कास श्वास जरा आदि रागोंसे निवृत्त होजाताहै ॥ ११९ ॥ येन संचालिता शक्तिः स योगी सिदिभाजनम् । किमत्र बहुनोक्तेन कालं जयति लीलया ॥ १२० ॥ येनेति ॥ येन योगिना शक्तिः कुण्डली सञ्चालिता स योगी सिद्धीनामणि- मादीनां भाजनं पात्रं भवति । अत्रास्मिन्नर्थे बहूक्तेन बहुप्रशंसनेन किम् ? न किम- पीत्यर्थः । कालं मृत्युं लीलया क्रीडयाऽनायासेनैव जयत्यभिभवतीत्यर्थः ॥ १२० ॥ जिस योगीन शक्ति चलायमान करली है वह योगी आणिमा आदि सिद्धियोंका पात्र होजाता है और इसमें अधिक कहनेसे क्या है ? कालकोभी लीलासे अर्थात् अनायाससे जीत लेताहै ॥ १२०॥ ब्रह्मचर्यरतस्यैव नित्यं हितमिताशिनः। मण्डलादृश्यते सिद्धिः कुण्डल्यभ्यासयोगिनः ॥ १२१ ॥ ब्रह्मचर्येति ।। ब्रह्मचर्य श्रोत्रादिभिः सहोपस्थसंयमस्तस्मिन् रतस्य तत्परस्य नित्यं सर्वदा हितं पथ्यं मितं चतुर्थाशवर्जितमश्नातीति तस्य कुण्डल्यभ्यासः शक्ति- चालनाभ्यासः स एव योगः सोऽस्यास्तीति स तथा तस्य मंडलाच्चत्वारिंशद्दिनात्मका- दनन्तरं सिद्धिः प्राणायामसिद्धिदृश्यते । तदुक्तम्-- नासादक्षिणमार्गवाहि पवनामाणोऽतिदीर्घाकृत- श्चन्द्राभः परिपूरितामृततनुः प्राग्घण्टिकायास्ततः । छित्त्वा कालविशालवह्निवशगं भ्रूरन्ध्रनाडीगतं तत्कायं कुरुते पुनर्नवतरं छिन्नं ध्रुवं स्कन्धवत् ॥” इति ॥ १२१ ॥ श्रोत्र आदि इंद्रियोंसहित लिंगके संयममें तत्पर जो योगी है और नित्य हितकारी प्रमित अर्थात् चतुर्थाशसे न्यून भोजन करता है शक्तिचालनके अभ्यासी उस योगीको मंडल (४० दिन) के अनन्तर प्राणायामकी सिद्धिको देखते हैं। सोई कहा है कि, नासिकाके दक्षिणमार्गमें बहनेवाले पवनसे अत्यंत बढाया और घंटिका (कंठ) से पूर्ण चंद्रमाके समान अमृत है शरीर जिसका ऐसा प्राण जिसके अनंतर विशाल काल और अग्नि ये वशमें हुई उस कुंडलीके अभ्यास- शील योगीको कायाको भ्रुकुटीके छिद्रमें वर्तमान नाडोमें पहुँचकर और कायाका छेदन करके इस प्रकार पुनः अत्यंत नवीन करता है, जैस छेदन करनेसे वृक्षका स्कंध ( डाली ) नवीन होजाता है ॥ १२१ ॥ कुण्डली चालयित्वा तु भस्त्रां कुर्याद्विशेषतः। एवमभ्यसतो नित्यं यमिनो यमभीः कुतः ॥ १२२ ॥ RAM (१२३) तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। -- कुण्डलीमिति ॥ कुण्डली चालयित्वा शक्तिचालनं कृत्वा । अथानन्तरमेव भस्त्रां भस्त्राख्यं कुम्भकं कुर्यात् । नित्यं प्रतिदिनम् । एवमुक्तप्रकारेणाभ्यसतो यमिनो योगिनो यमभीर्यमाद्भयं कुतः न कुतोऽपीत्यर्थः । योगिनो देहत्यागस्य स्वाधीनत्वा- दिति तात्पर्यम् ॥ १२२ ॥ कुंडलीको चलायमान करके उसके अनंतरही विशेषकर भस्रानामके कुंभक प्राणायामको करै । इस प्रकार प्रतिदिन अभ्यास करता हुआ जो यमी (योगी) है उसको यमका भय कहाँ रहताहै, क्योंकि योगीके देहका त्याग अपने अधीन होता है ॥ १२२ ॥ दासप्ततिसहस्राणां नाडीनां मलशोधने । कुतः प्रक्षालनोपायः कुण्डल्यभ्यसनाहते ॥ १२३ ॥ द्वासप्ततीति ॥ द्वाभ्यामधिका सप्ततिः दासप्ततिसंख्याकानि सहस्राणि दास- प्ततिसहस्राणि तेषां तत्संख्याकानां नाडीनां मलशोधने कर्तव्ये सति कुण्डल्यभ्यसना- च्छक्तिचालनाभ्यासाइते विना कुतः प्रक्षालनोपायः । न कुतोऽपि । शक्तिचालना- भ्यासेनैव सर्वासां नाडीनां मलशोधनं भवतीत्यभिप्रायः ॥ १२३ ॥ बहत्तर सहस्र नाडियोंकी मलशुद्धिके करनेमें शक्तिचालनके विना प्रक्षालन (धोना) का अन्य कौन उपाय है अर्थात् कोई नहीं है, शक्तिचालनमुद्राके करनेसेही संपूर्ण नाडियों के मलकी शुद्धि होती है ॥ १२३ ।। इयं तु मध्यमा नाडी दृढाभ्यासेन योगिनाम् । आसनप्राणसंयाममुद्राभिः सरला भवेत् ॥ १२४ ॥ इयं त्विति ॥ इयं मध्यमा नाडी सुषुम्ना योगिनां दृढाभ्यासेनासनं स्वस्तिकादि प्राणसंयामः प्राणायामः मुद्रा महामुद्रादिका तैः सरला ऋज्वी भवेत् ॥ १२४ ॥ यह सुषुम्नारूप मध्यमनाडी योगियोंके दृढ अभ्याससे स्वस्तिक आदि आसन प्राणायाम और महामुद्रा इनके करनेसे सरल होजाती है ।। १२४ ॥ अभ्यासे तु विनिद्राणां मनो धृत्वा समाधिना। रुद्धाणी वा यदा मुद्रा भद्रां सिद्धिं प्रयच्छति ॥ १२५॥ अभ्यास इति ॥ समाधिनेतरवृत्तिनिरोधरूपेणैकारयेण मनो धृत्वाऽन्तःकरणं धारणानिष्ठं कृत्वाऽभ्यासे मनःस्थितौ यत्ने विगता निद्रा येषां ते तथा तेषाम् । निद्रा- पदमालस्योपलक्षणम् । अनलसानामित्यर्थः। रुद्राणी शाम्भवीमुद्रा वा अथवा पराऽन्या उन्मन्यादिका भद्रां शुभां सिद्धिं योगसिद्धिं प्रयच्छति ददाति । एतेन हठयोगोपका- रको राजयोगः प्रोक्तः॥ १२५ ॥ अन्य विषयोंसे वृत्तिके रोकनेसे चित्तकी एकाग्रतारूप समाधिसे मनको धारणामें स्थित करके अभ्यास करनेमें जो निद्रा और आलस्यसे रहित हैं उनको शांभवीमुद्रा वा अन्य (१२४) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- उन्मनी आदि मुद्रा शोभन योगसिद्धिको देती है। इससे यह कहा कि, हठयोग राजयोगका उपकारक है ।। १२५ ॥ राजयोगं विना आसनादीनां वैयर्थ्यमौपचारिकश्लेषेणाह- राजयोगं विना पृथ्वी राजयोगं विना निशा। राजयोगं विना मुद्रा विचित्राऽपि न शोभते ॥ १२६॥ राजयोगमिति ॥ वृत्त्यन्तरनिरोधपूर्वकात्मगोचरधारावाहिकनिर्विकल्पकवृत्ती राजयोगः । “ हठं विना राजयोगः' इत्यत्र सूचितस्तत्साधनाभ्यासो वा तं विना तमृते पृथ्वीशब्देन स्थैर्यगुणः राजयोगादासनं लक्ष्यते । राजयोगं विना परमपुरुषार्थफला- सिद्धिरित हेतुरग्रेऽपि योजनीयः। राजयोगं विना निशेव निशा कुम्भको न राजते निशायां प्रायेण राजजनसञ्चाराभावात्। निशाशब्देन प्राणसञ्चाराभावलक्षणः कुम्भको लक्ष्यते । राजयोगं विना मुद्रा महामुद्रादिरूपा विचित्रापि विविधाऽपि विलक्षणाऽपि वा न राजते न शोभते । पक्षांतरे-राज्ञो नृपस्य योगो राजयोगो राजसम्बन्धस्तं विना पृथ्वी भूमिर्न राजते । शास्तारं विना भूमौ नानोपद्रवसंभवात् । राजा चन्द्रः । सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा ' इति श्रुतेः। तस्य योगं सम्बन्ध विना निशा रात्रिन राजते । राजयोगं विना नृपसंबन्धं विना मुद्रा राजभिः पत्रेषु क्रियमाणश्चिह्नविशेषः । विचित्राऽपि पृथ्वीपक्षे रत्नादिजनकत्वेन विलक्षणाऽपि । निशापक्षे ग्रहनक्षत्रादिभिर्विचि- त्राऽपि । मुद्रापक्षे रेखाभिर्विचित्राऽपि न राजते ॥ १२६ ।। अब राजयोगके विना आसन आदिकी निष्फलताको उपचारसे वर्णन करते हैं कि, अन्य, वृत्तियों को रोककर आत्मविषयक जो धारावाहिक निर्विकल्प मनकी वृत्ति उसे राजयोग कहते हैं और वह राजयोग-'हठके विना राजयोग वृथा है' इस वचनमें सूचित कर आये हैं। उस राजयोगके वा उसके साधनोंके विना पृथ्वी (स्थिरता ) शोभित नहीं होती है । यहां पृथ्वी शब्दसे स्थिरता और राजयोगपदसे आसन लेना अर्थात् राजयोगके विना परम पुरुषार्थरूप मोक्ष नहीं हो सकता, यह हेतु आगेभी सम्पूर्ण वाक्योंमें समझना और राजयोगके विना निशा शोभित नहीं होती अर्थात् निशाके समान कुम्भकप्राणायाम शोभित नहा होताहै, क्योंकि जैसे निशामें राजपुरुषोंका सञ्चार नहीं होता है इसी प्रकार कुम्भकमें प्राणोंका सञ्चार नहीं होता है इससे निशारदसे कुम्भक लेते हैं और राजयोगके विना विचित्र भी मुद्रा अथात् अनेक प्रकारकी वा विलक्षण महामुद्रा आदि मुद्रा शोभित नहीं होतीहै । पक्षांतरमें इस श्लोकका यह अर्थ है कि, राजाके सम्बन्ध विना रत्न आदिके उत्पन्न करनेवालीभी पृथ्वीका शोभा नहीं है, क्योंकि राजाकी शिक्षाके विना नाना उपद्रवभूमिमें होते हैं और राजा (चन्द्रमा) के सम्बन्ध विना ग्रहनक्षत्रोंसे विचित्रभी निशाकी शोभा नहीं होती है ' सोम हम ब्राह्मणोंकी राजा है' इस श्रुतिसे यहां राजपदसे चन्द्रमा लेते हैं और राजाके योग विना मुद्राकी शोभा नहा अर्थात् रेखा आदिसे विचित्रभी मुद्रा राजाके हाथसे किये हुए चिह्नविशेषरूप राजसम्बन्धके विना ग्रहण करनेयोग्य नहीं होतीहै ।। १२६ ।। .
तृतीयः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। मारुतस्य विधि सर्व मनोयुक्तं समभ्यसेत् । इतरत्र न कर्तव्या मनोवृत्तिर्मनीषिणा ॥ १२७ ॥ मारुतस्येति ।। मारुतस्य वायोः सर्वं विधि कुम्भकमुद्राविधानं मनोयुक्तं मनसा युक्तं समभ्यसेत्सम्यगभ्यसेत् । मनीषिणा बुद्धिमता पुंसा इतरत्र मारुतस्य विधरन्य- स्मिन्विषये मनोवृत्तिर्मनसो वृत्तिः प्रवृत्तिन कर्तव्या न कार्या ॥ १२७ ॥ प्राणवायुकी जो कुम्भकमुद्रा आदि सम्पूर्ण विधि हैं उसका मनसे युक्त होकर (मन लगाकर ) भली प्रकार अभ्यास करै और प्राणवायुकी विधिसे अन्य जो विषय उनमें मनकी प्रवृत्तिको न करै ।। १२७ ।। मुद्रा उपसंहरति- इति मुद्रा दश प्रोक्ता आदिनाथेन शंभुना । एकैका तासु यमिनां महासिद्धिप्रदायिनी ॥ १२८ ॥ इतीति । आदिनाथेन सर्वेश्वरेण शम्भुना शं सुखं भवत्यस्मादिति शम्भुस्तेन । इत्युक्तरीत्या दश दशसंख्याका मुद्राः प्रोक्ताः कथिताः । तासु मुद्रासु मध्ये एकै- काऽपि प्रत्येकमपि या काचन मुद्रा यमिनां यमवतां योगिनां महासिद्धिप्रदायिन्यणि- मादिमदात्री वा ॥ १२८ ॥ अब मुद्राओंकी समात्रिका वर्णन करते हैं कि, आदिनाथ (महादेव) ने ये दश मुद्रा कही हैं, उन मुद्राओंमें एक एक भी मुद्रा (प्रत्येक) अर्थात् जो कोई मुद्रा योगी जनोंको महासिद्धि वा अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्रदायिनी (देनेवाली) है ।। १२८ ।। मुद्रोपदेष्टारं गुरुं प्रशंसति- उपदेशं हि मुद्राणां यो दत्ते सांप्रदायिकम् । स एव श्रीगुरुः स्वामी साक्षादीश्वर एव सः॥ १२९ ॥ उपदेशमिति ॥ यः पुमान्मुद्राणां महामुद्रादीनां सम्प्रदायाद्योगिनां गुरुपरंपरा- रूपादागतं सांप्रदायिकमुपदेशं दत्ते ददाति । स एव स पुमानेव श्रीगुरुः श्रीमान् गुरुः सर्वगुरुभ्यः श्रेष्ठ इत्यर्थः । स्वामी प्रभुः स एव साक्षात्प्रत्यक्ष ईश्वर एव सः । ईश्वराभिन्न एव स इत्यर्थः ॥ १२९ ।। सांप्रदायिक ( योगियोंकी गुरुपरम्परासे चले आये) महामुद्रा आदिके उपदेशको जो पुरुष देता है वही श्रीमान् गुरु अर्थात सब गुरुओंमें श्रेष्ठ है और वही स्वामी अर्थात् प्रभु है और वही साक्षात् परमेश्वरस्वरूप है ।। १२९ ॥
(१२६) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेशः तु.] तस्य वाक्यपरो भूत्वा मुद्राभ्यासे समाहितः। अणिमादिगुणैः सार्ध लभते कालवञ्चनम् ॥ १३० ॥ इति श्रीसहजानंदसंतानचिंतामणिस्वात्मारामयोगीन्द्रविरचितायां हठयोगप्रदीपिकायां मुद्राभिधानं नाम तृतीयोपदेशः ॥३॥ तस्येति ॥ तस्य मुद्राणामुपदेष्टु रोर्वाक्यपरो वाक्यमासनकुम्भकाद्यनुष्ठानविष- यकं युक्ताहारविहारचेष्टादिविषयकं च तस्मिन् परस्तत्परः तत्परश्चाद्वान् । आद- रश्च विहिततपःकरणं भूत्वा संभूय मुद्राणां महामुद्रादीनामभ्यासः पौनःपुन्येनावर्तनं तस्मिन् मुद्राभ्यासे समाहितः सावधानः पुरुषोऽणिमादिगुणैरणिमादिसिद्धिभिः सार्ध साकं कालस्य मृत्योर्वचनं प्रतारणं लभते प्राप्नोति ॥ १३० ॥ इति श्रीहठयोगप्रदीपिकायां ब्रह्मानन्दकृतायां ज्योत्स्नाभिधायां टीकायां मुद्राकथनं नाम तृतीयोपदेशः ॥ ३ ॥ तिन मुद्राओंके उपदेशकर्ता गुरुके वाक्यमें अर्थात् आसन कुम्भक आदिके अनुष्ठान विष- यकी और युक्ताहार विहारकी चष्टा आदि विषयोंकी आज्ञामें तत्पर ( आदरवान ) और शास्त्रोक्त तप करनेरूप उस आदरके अनन्तर बारंबार महामुद्रा आदिके अभ्यासमें सावधान होकर मनुष्य अणिमा आदि सिद्धियोंसहित कालके वंचनको प्राप्त होता है अर्थात् उसको सिद्धि और कालसे निर्भयता ये दोनों प्राप्त होते हैं ।। १३० ॥ इति श्रीसहजानं इसंतानचिन्तामणिस्वात्मारामयोगीन्द्रविरचितहठयोगप्रदीपिकायां लाँखग्रामनिवासि पं० मिहिरचंद्रकृतभाषाविवृतिसहितायां मुद्राभिधानं नाम तृतीयोपदेशः ॥ ३ ॥ MIN ANANDALAIMERICA चतुर्थः ] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१२७) चतुर्थोपदेशः ४. प्रथमद्वितीयतृतीयोपदेशोक्तानामासनकुंभकमुद्राणां फलभूतं राजयोगं विवक्षुः स्वात्मारामः “श्रेयांसि बहुविनानि ” इति तत्र विघ्नबाहुल्यस्य सम्भवात्तन्निवृत्तये शिवाभिन्नगुरुनमस्कारात्मकं मङ्गलमाचरति- नमः शिवाय गुखे नाविन्दुकलात्मने । निरञ्जनपदंयाति नित्यं यत्र परायणः॥१॥ नम इति ॥ शिवाय सुखरूपायेश्वराभिन्नाय वा । तदुक्तम् ‘नमस्ते नाथ भग- वन् शिवाय गुरुरूपिणे ' इति । गुरवे देशिकाय यद्वा गुरवे सर्वांतर्यामितया निखि- लोपदेष्ट्रे शिवायेश्वराय । तथा च पातञ्जलसूत्रम्-'स पूर्वेषामेष गुरुः कालेनानव- च्छेदात ' नमः प्रतीभावोऽस्तु । कीदृशाय शिवाय गुरवे नादबिंदुकलात्मने कांस्य- घण्टानिर्हादवदनुरणनं नादः। बिन्दुरनुस्वारोत्तरभावी ध्वनिः । कला नादैकदेश- स्ता आत्मा स्वरूपं यस्य स तथा तस्मै । नादबिन्दुकलात्मना वर्तमानायेत्यर्थः । तत्र नादविन्दुकलात्मनि शिवे गुरौ नित्यं प्रतिदिनं परायणोऽअहितः पुमान् । एतेन नादानुसन्धानपरायण इत्युक्तं पूर्वपादेन गुरुशिवयोरभेदश्च सूचितः । अञ्जनं मायो- पाधिस्तद्रहितं निरञ्जनं शुद्ध पद्यते गम्यते योगिभिरिति पदं ब्रह्म याति प्राप्नोति । तथा च वक्ष्यति- नादानुसन्धानसमाधिभाजम् ' इत्यादिना ॥१॥ प्रथम, द्वितीय, तृतीय उपदेशों में कहे जो आसन कुम्भक मुद्रा हैं उनका फलरूप जो राज- योग है उसके कथनका आभिलाषी स्वात्माराम ग्रन्थकार 'श्रेयकमा में बहुत विन्न हुआ करते हैं। इस न्यायसे अनेक विनोंका संभव होसकता है उन विनोंकी निवृत्तिके लिये शिवरूप गुरुके नमस्कारात्मक मंगलको करते हैं, कि शिवरूप अर्थात् सुखरूप वा ईश्वररूप । सोई कहाहै कि, हे नाथ ! हे भगवन् ! शिवरूप गुरु जो आप हैं उनको नमस्कार है। गुरुको अथवा सबके उपदेशके अन्तर्यामिरूपसे शिवरूपसे ईश्वरको । सोई पातंजलसूत्रमें कहा है कि, कालसे अव- च्छेदके न होनेसे यह ईश्वर पहिले सब आचार्योंकाभी गुरु है। उस गुरु वा ईश्वरको नमस्कार है, जो गुरु नादबिन्दुकलारूप है। कांसीके घंटाके समान जो अनुरणन अर्थात् शब्द उसको नाद कहते हैं और अनुस्वारके अनन्तर जो ध्वनि होती है उसको बिन्दु कहते हैं और नादके एकदेशको कला कहते हैं, ये तीनों जिस गुरु वा ईश्वर के रूप हैं अर्थात् जो नाद बिन्दु कलारूपसे वतमान हैं और जिस नाद बिन्दु कलारूप शिवरून गुरुमें प्रतिदिन परायण ( सावधान ) मनुष्य, इस कथनसे नादके अनुसंधानमें परायण और पूर्व पादसे शिव और गुरुका अभेद सूचित किया, उस मायोपाधिरूप अंजनसे रहित शुद्ध ब्रह्मपदको प्राप्त होता है, जिसको योगीजन प्राप्त होते हैं उसको पद कहते हैं। सोई कहेंगे नादुका जो अनुसंधानी और जो समाधिका ज्ञाता है वह योगी है । भावार्थ यह है कि, शिवरूप और नाद बिन्दु कला जिसकी आत्मा है ऐसे उस गुरुको नमस्कार है जिसमें प्रतिदिन तत्पर मनुष्य शुद्धरूप ब्रह्म- पदको प्राप्त होता है ।।१।। - (१२८) [उपदेश:- हठयोगप्रदीपिका। - - समाधिक्रम प्रतिजानीते- अथेदानी प्रवक्ष्यामि समाधिकममुत्तमम् । मृत्युग्नं च सुखोपायं ब्रह्मानन्दकरं परम् ॥२॥ अथेति ॥ अथासनकुम्भकमुद्राकथनानन्तरमिदानीमस्मिन्नवसरे समाधिक्रम प्रत्याहारादिरूपं प्रवक्ष्यामि प्रकर्षेण विविच्य वक्ष्यामीत्यन्वयः । क्रीदृशं समाधिक्रमम् ? उत्तमं श्रीआदिनाथोक्तसम्पादनकोटिसमाधिप्रकारेषूत्कृष्टम् । पुनः कीदृशं ? मृत्यु कालं हन्ति निवारयतीति मृत्युघ्नं स्वेच्छया देहत्यागजनक तत्त्वज्ञानोदयमनोनाशवासना- क्षयैः सुखस्य जीवन्मुक्तिसुखस्योपायं प्राप्तिसाधनम् । पुनः कीदृशं ? परं ब्रह्मानन्दकर प्रारब्धकर्मक्षये सति जीवब्रह्मणोरभेदेनात्यन्तिकब्रह्मानन्दप्राप्तिरूपविदेहमुक्तिकरम् । तत्र निरोधः समाधिना चित्तस्य ससंस्काराशेषवृत्तिनिरोधे शान्तघोरमूढावस्थानिवृत्तौं जीवन्नेवेह विद्वान् हर्षशोकाभ्यां विमुच्यते' इत्यादिश्रुत्युक्तनिर्विकारस्वरूपाव- स्थितिरूपा जीवन्मुक्तिर्भवति । परममुक्तिस्तु प्राप्तभोगान्तेऽन्तःकरणगुणानां प्रतिप्रस- वेनौपाधिकरूपात्यन्तिकनिवृत्तावात्यन्तिकं स्वरूपावस्थानं प्रतिप्रसवसिद्धम् । व्युत्थान- निरोधसमाधिसंस्कारा मनसि लीयन्ते । मनोस्मितायामस्मिता महाति महान् प्रधान इति चित्तगुणानां प्रतिप्रसवः प्रतिसर्गः स्वकारणे लयः। ननु जीवन्मुक्तस्य व्युत्थाने ब्राह्मणोऽहं मनुष्योऽहमित्यादिव्यवहारदर्शनाच्चित्ताभिरौपाधिकभावजननादम्लेन दुग्ध- स्येव स्वरूपच्युतिः स्यादिति चेन्न । सम्प्रज्ञातसमाधावनुभूतात्मसंस्कारस्य तात्त्वि- कत्वनिश्चयात् । अतात्विकान्यथाभावस्याविकारित्वाप्रयोजकत्वात् । अम्लेन दुग्धस्य दधिभावस्तु तात्त्विक इति दृष्टान्तवैषम्याच्च । पुरुषस्य त्वन्तःकरणोपाधिकोऽहं ब्राह्मण इत्यादिव्यवहारः स्फटिकस्य जपाकुसुमसन्निधानोपाधिरूपक एव न तात्विकः। जपा- कुसुमापगमे स्फटिकस्य स्वस्वरूपस्थितिवदन्तःकरणस्य सकलवृत्तिनिरोध स्वरूपाव- स्थितिरच्युतैव पुरुषस्य ॥ २॥ अब आचार्य समाधिका जो क्रम उसके वर्णनको प्रतिज्ञा करते हैं कि, इसके अनंतर अर्थात् आसन कुंभकमुद्रा वर्णन करनेके अनंतर इदानीं (इस अवसरमें) प्रत्याहार आदिरूप उस समाधिके क्रमको प्रकर्षतासे (पृथक् ) कहता हूँ जो समाधिका क्रम आदिनाथकी कहीहुई संपा- दनकोटिरूपसमाधियों के प्रकारों (भेदों) में उत्तम है और जो मृत्युका निवारणका है अर्थात् अपनी इच्छासे देहके त्यागका जनक है और जो तत्त्वज्ञानकी उत्पत्ति, मनका नाश, वासनाका क्षय इन तीनोंके होनेपर जीवन्मुक्तिरूप सुखका उपाय ( साधन ) है और जो परमब्रह्मानंदका कर्ता है अर्थात् प्रारब्ध कर्मका क्षय होनेपर जीव ब्रह्मको अभेदका ज्ञान होनेसे आत्यंतिक ब्रह्मानन्दकी प्राप्तिरूप जो मुक्ति उसको करता है। वहां प्रथम समाधिसे चित्तका निरोध होता है और संस्कारसहित सम्पूर्णवृत्तियोंका निरोध होनेपर शांत घोर मूढ अवस्थाओंकी निवृत्ति होते संते इत्यादि श्रुतियों में कहीहुई कि, 'जीवताहुआही ज्ञानी हर्षशोकसे छूटजाता है, निर्वि. कार स्वरूपमें स्थितिरूप जीवन्मुक्ति होजाती है और परममुक्ति तो यह है कि, प्राप्त हुये ।
चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१२९) भोगके अन्तमें अन्तःकरणके गुणोंका प्रतिप्रसव होनेसे औपाधिकरूपकी अत्यन्त निवृत्ति होने- पर आत्यंतिक स्वरूपमें अवस्थान प्रतिप्रसवसे सिद्ध है और व्युत्थान निरोध समाधि संस्कार ये सब मनमें लीन होजाते हैं और मन अस्मितामें अस्मिता महान्में महान् प्रधानमें लीन होजाता है । इस प्रकार चित्तके गुणोंका प्रतिप्रसव अर्थात् अपने २ कारणमें लयरूप प्रतिसर्ग होता है । कदाचित् कोई शंका करै कि, समाधिसे व्युत्थान ( उठाना) के समय मैं ब्राह्मण हूँ मैं मनुष्य हूँ इत्यादि व्यवहारके देखनेसे चित्त आदिसे औपाधिक भावके पैदा होनेसे अम्लसे दूधके समान अपने ब्रह्मस्वरूपसे च्युति (पतन) होजायगा-सो ठीक नहीं है, क्योंकि सम्प्रज्ञात समाधिमें अनुभूत ( ज्ञात) जो आत्मसंस्कार उसके तात्त्विकत्व (यथार्थता) का निश्चय हो जाता है-और अतात्त्विक जो अन्यथाभाव है वह आधिकारित्वका प्रयोजक नहीं होता है, अम्लसे जो दूधका दधिभाव है वह तात्त्विक है, इससे दृष्टांतभी विषम है, मनुष्यको तो अन्त:- करणरूप उपाधिसे मैं ब्राह्मण हूँ इत्यादि व्यवहार होता है और वह स्फटिकको जपाकुसुमकी संनिधानरूप उपाधिके समानहीं है तात्त्विक नहीं है । जपाकुसुमके हटानेपर स्फटिककी अपने स्वरूपमें स्थितिके समान अन्तःकरणकी सम्पूर्ण वृत्तियोंके निरोध होनेपर अपने स्वरूपमें स्थिति नष्ट नहीं होती है अर्थात् जीवन्मुक्तिकी अवस्थामें मनुष्य ब्रह्मरूपमें स्थित रहता है। भावार्थ यह है कि, इसके अनन्तर उत्तम मृत्युके नाशक, सुखका उपाय और परम ब्रह्मानन्दका जनक जो समाधिका क्रम उसको मैं अब वर्णन करताहूँ ।। २ ।। समाधिपर्यायान् विशेषेणाह राजयोग इत्यादिना श्लोकद्वयेन- राजयोगः समाधिश्च उन्मनी च मनोन्मनी। अमरत्वं लयस्तत्त्वं शून्याशून्यं परं पदम् ॥ ३॥ अमनस्कं तथाऽद्वैतं निरालम्बं निरञ्जनम् । जीवन्मुक्तिश्च सहजा तुर्या चेत्येकवाचकाः॥४॥ राजयोग इति स्पष्टम् ॥ ३ ॥४॥ अब समाधिके पर्यायोंका वर्णन करते हैं कि, राजयोग-समाधि-उन्मनी-मनोन्मनी-अम- रत्व-लय-तत्त्व-शून्याशून्यपरंपद-अमनस्क-अद्वैत-निरालम्ब-निरंजन-जीवन्मुक्ति-सहजा- तुर्या-ये सब एक समाधिकेही वाचक हैं। इन सब भेदोंका आगे वर्णन करेंगे ॥ ३ ॥४॥ त्रिभिः समाधिमाह- सलिले सैन्धवं यद्वत्साम्यं भजति योगतः। तथाऽऽत्ममनसोक्यं समाधिरभिधीयते ॥५॥ यदा संक्षीयते प्राणो मानसं च प्रलीयते । तदा समरसत्वं च समाधिरभिधीयते ॥६॥ ९ (१३०) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- तत्समं च द्वयोरैक्यं जीवात्मपरमात्मनोः । प्रनष्टसर्वसंकल्पः समाधिः सोऽभिधीयते ॥७॥ सलिल इति ॥ यदेति ॥ तत्सममिति ॥ यद्यथा सैन्धवं सिन्धुदेशोद्भवं लवणं सलिले जले योगतः संयोगात्साम्यं सलिलसाम्यं सलिलैक्यं भजति प्राप्नोति तथा तद्रदात्मा च मनश्चात्ममनसी तयोरात्ममनसोरक्यमेकाकारता । आत्मनि धारितं मन आत्माकारं सदात्मसाम्यं भजति तादृशमात्ममनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते समाधि- शब्देनोच्यत इत्यर्थः ॥ ५-७ ॥ जिस प्रकार सिंधुदेशमें उत्पन्न हुआ लवण जलके विषे संयोगसे साम्यको भजता है अर्थात् जलका संयोग होनेसे जलके संग एकताको प्राप्त होजाताहै तिसी प्रकारसे जो आत्मा और मनकी एकता है अर्थात् आत्मामें धारण किया हुआ मन आत्माकार होनेसे आत्मरूपको प्राप्त होजाताहै उसी आत्मा मनकी एकताको समाधि कहते हैं। जब प्राण भलीप्रकार क्षीण होजाता है और मनकामी लय होजाताहै उस समयमें हुई जो समरसता उसकोभी समाधि कहते हैं और जीवात्मा और परमात्मा इन दोनोंकी एकतारूपकोही समता कहते हैं और उस समय नष्ट हुये हैं संपूर्ण संकल्प जिसमें उसको समाधि कहते हैं ॥५-७ ।। अथ राजयोगप्रशंसा- राजयोगस्यमाहात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः । ज्ञानं मुक्तिःस्थितिः सिद्धिगुरुवाक्येन लभ्यते ॥८॥ राजयोगस्येति ॥ राजयोगस्यानंतरमेवोक्तस्य माहात्म्यं प्रभावं तत्त्वतो वस्तुतः को वा जानाति ? न कोऽपि जानातीत्यर्थः । तत्त्वतो वक्तुमशक्यत्वेऽप्येकदेशेन राज- योगप्रभावमाह-ज्ञानं स्वस्वरूपापरोशानुभवः मुक्तिविदेहमुक्तिः स्थितिनिर्विकारस्वरू- पावस्थितिरूपा जीवन्मुक्तिः सिद्धिरणिमादिः गुरुवाक्येन गुरुवचसा लभ्यते । राज- योगादिति शेषः ॥ ८ ॥ अब राजयोगकी प्रशंसाका वर्णन करते हैं कि, इसके अनंतर कहे हुये राजयोगके माहा- स्त्रको यथार्थरूपसे कौन जानता है अर्थात् कोई भी नहीं जानता है, तत्त्वसे कहनेके अयोग्य भी एकदेशरूपसे राजयोगके प्रभावको वर्णन करते हैं कि, ज्ञान अर्थात् अपने आत्मस्वरूपका अपरोक्ष अनुभव और विदेहमुक्ति और निर्विकारस्वरूपमें अवस्थितिरूप जीवन्मुक्ति और अणिमाआदि सिद्धि ये सब गुरुके वाक्यसे प्राप्त हुये राजयोगके द्वारा प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥ दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् । दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥९॥ दुर्लभ इति ॥ विशेषेण सिन्वंत्यवबंध्नंति प्रमातारं स्वसंगेनेति विषया ऐहिकाः दारादयः, आमुष्मिकाः सुधादयस्तेषां त्यागो भोगेच्छाभावोदुर्लभः तत्त्वदर्शनमात्मा- चतुर्थः) संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता । (१३१) उपरोक्षानुभवः दुर्लभं सहजावस्था तुर्यावस्था सद्गुरोः 'दृष्टिः स्थिरा यस्य विनैव दृश्यम' इति वक्ष्यमाणलक्षणस्य करुणां दयां विनेति सर्वत्र संवध्यते । दुर्लभा लन्धु- मशक्या । 'दुःस्यात्कष्टनिषेधयोः' इति कोशः। गुरुकृपया तु सर्व सुलभमिति भावः९ अपने प्रमाता (भोक्ता ) को जो अपने संगसे विशेष करके बांधे उन्हें विषय कहते हैं। और वे विषय इस लोकके स्त्री आदि और परलोकके अमृत आदि होते हैं । उन विषयोंका त्याग दुर्लभ है और आत्माके अपरोक्षानुभवरूप तत्त्वका दर्शन दुर्लभ है और सहजावस्था (तुरीया अवस्था) दुर्लभ है अर्थात् ये पूर्वोक्त तीनों सद्गुरुकी दयाके विना दुर्लभ है और गुरुकी दयासे तो संपूर्ण सुलभ हैं और सद्गुरुके स्वरूप यह कहेंगे कि-'देखने योग्य पदार्थके विनाही जिसकी दृष्टि स्थिर हो, वह सद्गुरु होता है ॥ ९ ॥ विविधैरासनैः कुम्भर्विचित्रैः करणैरपि । प्रबुद्धायां महाशक्तौ प्राणःशून्ये प्रलीयते ॥१०॥ विविधैरिति ॥ विविधैरनेकविधैरासनैमत्स्येन्द्रादिपीठविचित्रैर्नानाविधैः कुम्भकैः । विचित्ररिति काकाक्षिगोलकन्यायेनोभयत्र संबध्यते । विचित्रैरनेकप्रकारकैः करणैर्हठ- सिद्धौ प्रकृष्टोपकारकैर्महामुद्रादिभिर्महाशक्तौ कुण्डलिन्यां प्रबुद्धायां गतनिद्रायां सत्यां प्राणो वायुः शून्ये ब्रह्मरंध्रे प्रलीयते लयं प्राप्नोति । व्यापाराभावः प्राणस्य प्रलयः१०॥ अनेक प्रकारके मत्स्येंद्र आदि आसन और विचित्र २ कुंभक प्राणायाम और विचित्र अर्थात् अनेक प्रकारके हठसिद्धि में महा उपकारक महामुद्रा आदि इनसे जब महाशक्ति (कुंडलिनी) प्रबुद्ध होजाती है अर्थात् निद्राको त्याग देती है तब प्राणवायु शून्य (ब्रह्मरंध्र ) में लय होजाता ई-और व्यापारके अभावकोही प्राणका लय कहते हैं ॥ १० ॥ उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः । योगिनःसहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ ११॥ उत्पन्नेति ॥ उत्पन्नो जातः शक्तिबोधः कुण्डलीवोधो यस्य तस्य त्यक्तानि परि- हृतानि निःशेषाणि समग्राणि कर्माणि येन तस्य योगिनः आसनेन कायिकव्यापारे त्यक्ते प्राणेन्द्रियेषु व्यापारस्तिष्ठति । प्रत्याहारधारणाध्यानसंप्रज्ञातसमाधिभिर्मानसिक- व्यापारे त्यक्ते बुद्धौ व्यापारस्तिष्ठति । असङ्गो ह्ययं पुरुषः' इति श्रुतेरपरिणामी शुद्धः पुरुषः सत्त्वगुणात्मिका परिणामिनी बुद्धिरिति परवैराग्येण दीर्घकालसंप्रज्ञाता- भ्यासेनैव बुद्धिव्यापारे परित्यक्ते निर्विकारस्वरूपावस्थितिर्भवति । सैव सहजावस्था। तुर्यावस्था जीवन्मुक्तिः स्वयमेव प्रयत्नांतरं विनैव प्रजायते प्रादुर्भवति । येन त्यजसि तत्त्यज' इति निःसंगः प्रज्ञया भवेत् ' इति च श्रुतेः ॥ ११ ॥ उत्पन्न हुआ है कुंडलिनीरूप शक्तिका बोध जिसको और त्याग दिये हैं संपूर्ण कर्म जिसने ऐसे योगीको स्वयंही सहजावस्था होजाती है क्योंकि आसन बांधनेसे देहके व्यापारका त्याग
(१३२)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेशः-
होनेपर प्राण और इंद्रियोंमें व्यापार बना रहता है और प्रत्याहार धारणा ध्यान संप्रज्ञातसमाधि
इनसे मानसिक व्यापारके त्याग होनेपर बुद्धिमें व्यापार टिकता है, क्योंकि इस श्रुतिमें-असंग
यह पुरुष है-यह कहा है, इससे पुरुष अपरिणामी और शुद्ध है और सत्त्वगुणरूप बुद्धि परि-
णामवाली है और उत्तम वैराग्यसे वा दीर्घकालतक संप्रज्ञात समाधिके अभ्याससे बुद्धिके
व्यापारका भी त्याग होनेपर निर्विकारस्वरूपमें स्थिति होजाती है। वही सहजावस्था, तुर्यावस्था,
जीवन्मुक्ति अन्य प्रयत्नके विनाही होजाती है, क्योंकि इस श्रुतिमें लिखा है कि, जिससे त्यागता
है उसकोभी त्यागकर बुद्धिसे संगरहित होजाय ॥ ११ ॥
सुषुम्नावाहिनि प्राणे शून्ये विशति मानसे।
तदा सर्वाणि कर्माणि निर्मूलयति योगवित् ॥ १२॥
सुषुम्नेति॥ प्राणे वायौ सुषुम्नावाहिनि मध्यनाडीप्रवाहिनि सति मानसेऽन्तःकरणे
शून्ये देशकालवस्तुपरिच्छेदहीने ब्रह्मणि विशति सति तदा तस्मिन् काले योगवित
चित्तवृत्तिनिरोधज्ञः सर्वाणि कर्माणि सप्रारब्धानि निर्मूलानि करोति निर्मूलयति निर्मूल-
शब्दात् ' तत्करोति' इति णिच् ॥ १२ ॥
प्राणवायु जब सुषुम्नामें बहने लगता है और मन देश, काल, वस्तुके परिच्छेदसे शून्य
ब्रह्ममें प्रविष्ट होजाता है उस समय चित्तवृत्तिके निरोधका ज्ञाता योगी प्रारब्धसहित संपूर्ण
कोंको निर्मूल (नष्ट) करदेता है ।। १२ ।।
समाध्यभ्यासेन प्रारब्धकर्मणोऽप्यभिभवान्जितकालं योगिनं नमस्करोति-
अमराय नमस्तुभ्यं सोऽपि कालस्त्वया जितः।
पतितं वदने यस्य जगदेतच्चराचरम् ॥ १३॥
अमरायति ॥ न म्रियत इत्यमरः । तस्मा अमराय चिरञ्जीविने तुभ्यं योगिने
नमः। सोऽपि दुर्वारोऽपि कालो मृत्युस्त्वया योगिना जितोऽभिभूतः । इदं वाक्यं नम-
स्करणे हेतुः । स कः? यस्य कालस्य वदने मुखे एतत् दृश्यमानं चराचरं स्थावरजङ्गमं
जगत्संसारः पतितं सोऽपि जगद्भक्षकोऽपीत्यर्थः ॥ १३ ॥
समाधिके अभ्याससे प्रारब्ध कर्मकाभी तिरस्कार हो जाता है, इससे जिसने कालकोभी
जीत लिया है उस योगीको सब नमस्कार करते हैं कि, तिस अमर (चिरंजीवी) आपको
नमस्कार है जिसने दुःखसे भी निवारण करने अयोग्य वह काल ( मृत्यु) जीत लिया, जिस
कालके मुखमें यह स्थावर जंगमरूप चराचर जगत् पतित है ॥ १३ ॥
पूर्वोक्तममरोल्यादिकं समाधिसिद्धावेव सिद्धयतीति समाधिनिरूपणानन्तरं समाधि-
सिद्धौ तत्सिद्धिरित्याह-
चित्ते समत्वमापने वायौ व्रजति मध्यमे ।
तदाऽमरोली वज्रोली सहजोली प्रजायते ॥१४॥
चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। चित्त इति ॥ चित्तेऽन्तःकरणे समत्वं ध्येयाकारवृत्तिप्रवाहत्वम् आपन्ने प्राप्ते सति वायौ प्राणे मध्यमे सुषुम्नायां व्रजति सतीति चित्तसमत्वे हेतुः । तदा तस्मिन् काले अमरोली वज्रोली सहजोली च पूर्वोक्ताः प्रजायन्ते नाजितप्राणस्य न चाजितचित्तस्य सिद्धयन्तीति भावः ॥ १४ ।। पूर्वोक्त अमरोली आदि मुद्रा समाविक सिद्ध होनेपरहो सिद्ध हो जाती हैं, इससे समाधि निरूपणके अनन्तर समाधिके सिद्ध होनेपर उनकोभी सिद्धिका वर्णन करते हैं कि, जब अंत:: करणरूप चित्तध्यान करने योग्य वस्तुके आकार वृत्तिप्रवाहको प्राप्त होजाताहै अर्थात् ब्रह्माकार होजाता है और प्राणवायु सुषुम्नामें प्रविष्ट होजाताहै अर्थात इस प्रकार चित्तकी समता होने- पर उस कालमें अमरोली, वज्रोली, सहजोलोयेपूर्वोक्त मुद्रा भली प्रकार होजाती हैं और जिसने प्राण और चित्तको नहीं जीता उसको सिद्ध नहीं होती हैं ॥ १४ ॥ हठाभ्यास विना ज्ञानं मोक्षश्च न सिद्धयतीत्याह- ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत् प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत् । प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेयो मोक्षं स गच्छति नरोन कथंचिदन्यः ॥ १५ ॥ ज्ञानमिति ॥ यावत्माणो जीवति । अपिशब्दादिन्द्रियाणि जीवन्तिन तु म्रियन्ते। यावन्मनो न म्रियते किन्तु जीवत्येव । इडापिङ्गलाभ्यां वहनं प्राणस्य जीवनं, स्वस्व- विषयग्रहणमिन्द्रियाणां जीवनं, नानाविषयाकारवृत्त्युत्पादनं मनसो जीवनं, तत्तद्भाव- स्तत्तन्मरणमत्र विवक्षितम् । न तु स्वरूपतस्तेषां नाशस्तावन्मनस्यन्तःकरणे ज्ञानमात्मा- परोक्षानुभवः कुतः सम्भवति ? प्राणेन्द्रियमनोवृत्तीनां ज्ञानप्रतिवन्धकत्वादिति भावः। प्राणो मनः इदं इयं यो योगी विलयं नाशं नयेत्स मोक्षमात्यन्तिक- स्वरूपावस्थानलक्षणं गच्छति प्राप्नोति। ब्रह्मरन्ध्र निर्व्यापारस्थितिः प्राणस्य लयः। ध्येयाकारावेशात् ! विषयान्तरेऽव्यापारेण मनसो लयोऽन्यः । अलीनप्राणोऽलीनमनाश्च कथञ्चिदुपायशतेनापि न मोक्षं प्राप्नोतीत्यर्थः । तदुक्तं योगवीजे-' नानाविधर्विचारै- स्तु न साध्यं जायते मनः । तस्मात्तस्य जयः प्रायः प्राणस्य जय एव हि ॥' इति । *नान्यमार्गः सुखप्राय कैवल्यं परमं पदम् । सिद्धमार्गेण लभ्येत नान्यथा शिव- भाषितम् ॥” इति च । सिद्धमार्गों योगमार्गः। एतेन योगं विना ज्ञानं मोक्षश्च न सिद्धयतीति सिद्धम् । श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणादिषु चेदं प्रसिद्धम् । तथाहि-'अथ तद्दर्शनाभ्युपायो योगः' इति । तद्दर्शनमात्मदर्शनम् । 'अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोको जहाति' इति । 'श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवेद ' इति । यदा पञ्चाव- तिष्ठते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टेत तामाहुः परमां गतिम् ॥ तां योगमिति *-[ नानामार्गः सुखदुःवप्राय (!) कैवल्यं परमं पदम् ] ।
(१३४) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेशः- मन्यन्ते स्थिरामिंद्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति' इति । 'यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्म- तत्त्वं दयोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् । अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व- पाशैः ॥ ब्रह्मणे त्वा महस ओमित्यात्मानं युंजीतेति त्रिरुन्नतः स्थाप्यः समशरीरः हृदीन्द्रियाणि मनसा सन्निवेश्य ब्रह्माह्वयेन प्रतरेत विद्वान् स्रोता ५ सि सर्वाणि भया- वहानि' इति । 'ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम् ' इत्याद्याः श्रुतयः ॥ यतिधर्म- प्रकरणे मनुः- भूतभाव्यानवेक्षेत योगेन परमात्मनः । देहद्वयं विहायाशु मुक्तो भवति बन्धनात् ॥' याज्ञवल्क्यस्मृतौ-' इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् । अयं तु परमो धर्मों यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥' महर्षिमातङ्गः- अग्निष्टोमादिकान् सर्वान् विहाय दिजसत्तमः ॥ योगाभ्यासरतः शांतः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ब्राह्मण- क्षत्रियविशां स्त्रीशूद्राणां च पावनम् । शान्तये कर्मणामन्यद्योगान्नास्ति विमुक्तये॥' दक्षस्मृतौ व्यतिरेकमुखेनोक्तम्-' स्वसंवेद्यं हि तद्ब्रह्म कुमारी स्त्रीसुखं यथा । अयोगी नैव जानाति जात्यन्धो हि यथाऽवटम् ॥' इत्याद्याः स्मृतयः । महाभारते योगमार्गे व्यासः-अपि वर्णावकृष्टस्तु नारी वा धर्मकांक्षिणी। तावप्येतेन मार्गेण गच्छेतां परमां गतिम् ॥ यदि वा सर्वधर्मज्ञो यदि वाप्यकृती पुमान् । यदि वा धार्मिकः श्रेष्ठो यदि वा पापकृत्तमः ॥ यदि वा पुरुषव्याघ्रो यदि वा क्लैब्यधारकः । नरः सेव्यं महादुःखं जरामरणसागरम् ॥ अपि जिज्ञासमानोऽपि शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥' इति ॥ भगवद्- गीतायाम्-'युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः।शान्ति निर्वाणपरमां मत्संस्था- मधिगच्छति ॥ यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानम् ' इत्यादि च ॥ आदित्यपुराणे-'योगात् सञ्जायते ज्ञानं योगो मय्येकचित्तता ॥ ' स्कन्दपुराणे-'आत्मज्ञानेन मुक्तिः स्यात्तच्च योगादृते नहि । स च योगश्चिरं कालमभ्यासादेव सिद्धयति ॥' कूर्मपुराणे शिव- वाक्यम-' अतः परं प्रवक्ष्यामि योगं परमदुर्लभम् । येनात्मानं प्रपश्यन्ति भानुमन्त- मिवेश्वरम् । योगाग्निर्दहति क्षिप्रमशेषं पापपञ्जरम् ।। प्रसन्नं जायते ज्ञानं ज्ञानान्निर्वाण- मृच्छति ॥' गरुडपुराणे-' तथा यतेत मतिमान्यथा स्यान्नितिः परा । योगेन लभ्यते सा तु न चान्येन तु केनचित् ॥ भवतापेन तप्तानां योगो हि परमौषधम् । [परावरप्रसक्ता धीर्यस्य निर्वेदसम्भवा । स च योगाग्निना दग्धसमस्तक्लेशसञ्चयः । निर्वाणं परमं नित्यं प्राप्नोत्येव न संशयः ॥ सम्प्राप्तयोगसिद्धिस्तु पूर्णो यस्त्वात्म- दर्शनात् । न किञ्चिदृश्यते कार्य तेनैव सकलं कृतम् ॥ आत्मारामः सदा पूर्णः सुख- मात्यन्तिकं गतः । अतस्तस्यापि निर्वेदः परानन्दमयस्य च ॥ तपसा भावितात्मानो योगिनः संयतेन्द्रियाः। प्रतरन्ति. महात्मानो योगेनैव महार्णवम् ॥' विष्णुधर्मेषु- यच्छ्रेयः सर्वभूतानां स्त्रीणामप्युपकारकम् । अपि कीटपतङ्गानां तन्नः श्रेयः पर वद ॥ इत्युक्तः कपिलः पूर्व देवैर्देवर्षिभिस्तथा । योग एव परं श्रेयस्तेषामित्युक्तवान् पुरा ॥' वासिष्ठे-'दुःसहा राम संसारविषवेगविषूचिका । योगगारुडमन्त्रेण पावनेनो- पशाम्यति ॥ ' ननु तत्त्वमस्यादिवाक्यैरप्यपरोक्षप्रमाणं भवतीति किमर्थमतिश्रमसाध्ये चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१३५) योगे प्रयासः कार्यः? न च वाक्यजन्यज्ञानस्यापरोक्षत्वे प्रमाणासम्भव इति वाच्यम् । तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानमपरोक्षम् । अपरोक्षविषयकत्वात् । चाक्षुषघटादिप्रत्यक्षव- दित्यनुमानस्य प्रमाणत्वात् । न च विषयगतापरोक्षत्वस्य नीरूपत्वाद्धेत्वसिद्धिरिति वाच्यम् । अज्ञानविषयचित्ततत्तादात्म्यापन्नत्वान्यतररूपस्य तस्य सुनिरूपत्वात् । यथा हि घटादौ चक्षुःसन्निकर्षणांतःकरणवृत्तिदशायां तदधिष्ठानचैतन्याज्ञाननिवृत्तौ तच्चैतन्यस्याज्ञानविषयता तद्घटस्याज्ञानविषयचैतन्यतादात्म्यापन्नत्वं चापरोक्षत्वम् , तथा तत्त्वमस्यादिवाक्येन शुद्धचैतन्याकारान्तःकरणवृत्त्युत्त्थापने सति तदज्ञानस्य निवृत्तत्वेनैव तत्त्वस्याज्ञानविषयत्वाच्चैतन्यस्यापरोक्षत्वमिति न हेत्वसिद्धिः । न चाप्र- योजकत्वं ज्ञानगम्यत्वापरोक्षत्वं प्रत्यक्षपरोक्षविषयकत्वेन प्रयोजकत्वात् । न त्विन्द्रिय- जन्यत्वं मनस इंद्रियत्वाभावेन सुखादिपरत्वे व्यभिचारात् । अथवाऽभिव्यक्तचैतन्या- भिन्नतया भासमानत्वं विषयस्यापरोक्षत्वम् । अभिव्यक्तत्वं च निवृत्तावरणकत्वं परोक्षवृत्तिस्थले त्वावरणनिवृत्यभावान्नातिव्याप्तिः। सर्पादिभ्रमजनकदोषवतस्तु नायं सर्पः किन्तु रज्जुरिति वाक्येन जायमाना वृत्तिस्तु नावरणं निवर्तयतीति तत्र परोक्ष एव विषयः । वेदान्तवाक्यजन्यं च ज्ञानमावरणनिवर्तकत्वादपरोक्षमेव तन्मननादेः पूर्वमुत्पन्नम् । ज्ञाननिवर्तकप्रमाणासम्भावनादिदोषसामान्याभावविशिष्टस्यैव तस्याज्ञान- निवर्तकत्वात् । किञ्च तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' इति श्रुतिप्रतिपन्नमुपनिषन्मात्र- गम्यत्वं योगगम्यत्वे नोपपन्नं स्यात् । तस्मात्तत्त्वमस्यादिवाक्यादेवापरोक्षमिति चेन्न । अनुमानस्याप्रयोजकत्वात् । न च प्रत्यक्षं प्रति निरुक्ताक्षसामान्यं प्रतींद्रियत्न कारण- तया तज्जन्यत्वस्यैव प्रयोजकत्वान्नित्यानित्यसाधारणप्रत्यक्षत्वे तुन किञ्चित्प्रयोजकत्व- मिति । तन्मते तु प्रत्यक्षविशेषे इंद्रियं कारणं तद्विशेषे च शब्दविशेष इत्येवं कार्यकारण- भाववयं स्यात् । न च मनसोऽनिन्द्रियत्वं मनस इंद्रियत्वे बाधकाभावात् 'इन्द्रियाणां मनो नाथः' इति मनुष्यमिवोद्दिश्य मनुष्याणामयं राजेत्यादिवदिन्द्रियेष्वेव किञ्चिदुत्कर्ष ब्रवीति। न तु तस्याप्यनिन्द्रियत्वं तत्त्वं च षट्स्वखण्डोपाधिविशेष एव। अत एव 'कर्मेंद्रियं तु पायवादि मनोनेत्रादिधीन्द्रियम्' इति 'प्रत्यक्षं स्यादैद्रियकमप्रत्यक्षमतींद्रियम्' इति च शक्तिप्रमाणभूतकोशेऽपीन्द्रियाप्रमाणकज्ञानस्याप्रत्यक्षतं वदन्मनस इन्द्रियत्वज्ञापकत्वं संगच्छते। 'इंद्रियाणि दशैकं च' इति गीतवचनं मनस इन्द्रियत्वे प्रमाणम्। किञ्च तत्त्व- मस्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानं शाब्दम् । शब्दजन्यत्वात् 'यजेत' इत्यादिवाक्यजन्यज्ञानव- दित्यनेनापरोक्षविरोधिशाब्दत्वसाधकेन सत्प्रतिपक्षः। न चेदमप्रयोजकम् । शाब्दं प्रत्येव शब्दस्य जनकत्वेन लाघवमूलकानुकूलतर्कात् । त्वन्मते तु शब्दादपि प्रत्यक्षस्वीका- रेण कार्यकारणभावदयकल्पने गौरवम् । अपि च मनननिदिध्यासनाभ्यां पूर्वमप्युत्प- नम् । तव मते परोक्षमपि नाज्ञाननिवर्तकमित्यज्ञाननिवृति प्रति बाधज्ञानत्वेनैव हेतुत्व- मिति गौरवम् । मम तु समाध्यभ्यासपरिपाकेनासम्भावनादिसकलमलरहितेनान्त:- करणेनात्मनि दृष्टे सति दर्शनमात्रादेवाज्ञाने निवृत्ते न कश्चिद्गौरवावकाशः । एष -- ( १३६) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेश:- सर्वेषु भूतेषु गूटोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वय्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥ यच्छेदाङ्मनसी प्राज्ञः' इत्यारभ्याज्ञाननिवृत्त्यर्थंकेन मृत्युमुखात्प्रमुच्यते' इत्य- न्तेन कठवल्लीस्थमृत्यूपदेशेन संमतोऽयमर्थ इति न कश्चिदत्र विवादः इति । यदि तु मननादेः पूर्वमुत्पन्नं ज्ञानं परोक्षमेवेति न प्रतिबद्धत्वकृतगौरवमिति मतमाद्रियते तदपि श्रवणादिभिर्मनःसंस्कारे सिद्धेऽव्यवहितोत्तरमात्मदर्शनसंभवात्तदुत्तरं वाक्यस्मरणादि- कल्पनं महद्गौरवापादकमेव । ननु न वयं केवलेन तर्केण शब्दजन्यज्ञानस्यापरोक्षत्वं वदामः किंतु श्रुत्याऽपि । तथाहि-तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' इति श्रुत्या चौप- निषदत्वं पुरुषस्य नोपनिषजन्यबुद्धिविषयत्वमात्रं प्रत्यक्षादिगम्येऽप्यौपनिषदत्व- व्यवहारापत्तेः। यथा हि-द्वादशकपालेऽष्टानां कपालानां सत्त्वेऽपि द्वादशकपालसंस्कृते नाष्टाकपालादिव्यवहारः। यथा च न द्विपुत्रादावेकपुत्रादिव्यवहारस्तथानापि । नान्यत्र तथा व्यवहार इति उपनिषन्मात्रगम्यत्वमेव प्रत्ययार्थः । तच्च मनोगम्यत्वेऽनुपपन्नामिति चेन । नहि प्रत्ययेनोपनिषद्भिन्नं सर्व कारणत्वेन व्यावय॑ते । शब्दापरोक्षवादिना त्वयाऽप्यात्मपरोक्षे मनआदीनां करणत्वस्यांगीकारात् । किंतु पुराणादिशब्दांतरमेव श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यः' इति स्मरणात् । स चार्थो ममापि संमत इति न किंचिदे- तत् । प्रमाणांतरव्यावृत्तौ तात्पर्यकल्पनं चात्मपरोक्षे शब्दस्य प्रमाणत्वे सिद्ध एव वक्तुमुचितम् । शब्दांतरव्यावृत्तितात्पर्य तु श्रुत्यादिसंमतत्वात्कल्पयितुमुचितमेव । एवं स्थिते ' मनसैवानुद्रष्टव्यम् मनसैवेदमाप्तव्यम्' इत्यादिश्रुतयोऽप्यांजस्येन प्रतिपादिता भवेयुः। यत्तु कैश्चिदुक्तम् । दर्शनवृत्तिं प्रति मनोमात्रस्योपादानत्वपरा- यत्ताः श्रुतयो न विरुध्यंत इति तदतीव विचारासहम् । यतः प्रमाणाकांक्षायां प्रवृत्ता- स्ताः कथमुपादानपरा भवेयुः । ' कामः संकल्पो विचिकित्सा ' इत्यादिश्रुत्या सावधारणया सर्वासां वृत्तीनां मनोमात्रोपादानकत्वे बोधिते आकांक्षाभावेनोपादान- तात्पर्यकत्वेन वर्णयितुं कथं शक्येरन् । पूर्व द्वितीयवल्ल्यां प्रणवस्य ब्रह्मबोधकत्वे- नोक्तस्तस्याप्यपरोक्षहेतुत्वमिति शंकां निवारयितुं मनसैवानुद्रष्टव्यम् ' इत्यादिसाव- धारणवाक्यानीत्येव वर्णयितुं शक्यानि स्युरित्यलमतिवाग्जालेन । वस्तुतस्तु योगिनां समाधौ दूरविप्रकृष्टपदार्थज्ञानं सर्वशास्त्रप्रसिद्धं न परोक्षम् । तदानीं परोक्षसामत्र्यभा- वात् । नापि स्मरणं तेषां पूर्वविशिष्याननुभवात् । नापि सुखाादिज्ञानवत्साक्षिरूपम् अपसिद्धान्तात् । नाप्यप्रमाणकं प्रमासामान्ये करणनियमात् । नापि चक्षुरादि- जन्यम् । तेषामसन्निकर्षात् । तस्मान्मानसिकी प्रमैव सा वाच्येति मनस इन्द्रियत्वं प्रमाणत्वं च दुरपह्नवमेवेति । येऽपि योगश्रुत्योः समुच्चयं कल्पयन्ति तेषामपि पूर्वोक्त- दूषणगणस्तदवस्थ एव । तस्माद्योगजन्यसंस्कारसचिवमनोमात्रगम्य आत्मेति सिद्धम् । न च कामिनी भावयतो व्यवहितकामिनीसाक्षात्कारस्येव भावनाजन्यत्वेना- म साक्षात्कारस्याप्रमात्वप्रसंगः । अबाधितविषयत्वात दोषजन्यत्वाभावाच्च । कामिनी- । । - चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१३७) साक्षात्कारस्य तु बाधितविषयत्वाद्दोषजन्यत्वाचाप्रामाण्यं न । भावनाजन्यत्वात् । न च भावनासमाधेापकत्वे प्रमाणान्तरापातः तस्या मनःसहकारित्वात्प्रमाणनिरूप- णानिपुणै यायिकादिभिरपि योगजप्रत्यक्षस्यालौकिकप्रत्यक्षेऽन्तर्भावः कृतः। योग- जालौकिकसन्निकर्षेण योगिनो व्यवहितविप्रकृष्टसूक्ष्मार्थमात्मानमाप यथार्थ पश्यन्ति । तथा च पातञ्जले सूत्रे-“ ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषा- र्थत्वात् " तत्र समाधौ या प्रज्ञाऽस्याः श्रुतं श्रवणं शाब्दबोधः । अनुमननमनुमानं यौक्तिकज्ञानं तद्रूपप्रज्ञाभ्यामन्यविषया । कुतः ? विशेषार्थत्वात् । विशेषो निर्विकल्पो- ऽर्थो विषयो यस्याः सा तथा तस्या भावस्तथात्वं तस्माच्छब्दस्यापदार्थतावच्छेदक- पुरस्कारेणैवानुमानस्य व्यापकत्वावच्छेदकपुरस्कारेणैव धीजनकत्वनियमेन तद्ग्रहणे योग्यविशेष्यमात्रपरत्वादित्यर्थः । अत्र बादरायणकृतं भाष्यम्-श्रुतमागमविज्ञानं तत्सामान्यविषयं नह्यागमेन शक्यो विशेषोऽभिधातुं कस्मान्नहि विशेषेण कृतसंकेत: शब्द इत्यारभ्य समाधिप्रज्ञानिाद्य एव सविशेषो भूतसूक्ष्म गतो वा पुरुषगतो वेति ॥ योगबीजे-' ज्ञाननिष्ठो विरक्तोऽपि धर्मज्ञोऽपि जितेन्द्रियः । विना योगेन देवोऽपि न मोक्षं लभते प्रिये ॥ ' किञ्च-' तदेव सक्तः सह कर्मणेति लिंगं मनो यत्र निषिक्त- मस्य' इति श्रुतेः । 'कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु इति स्मृतेश्च देहावसानसमये यत्र रागाद्युबुद्धो भवति तामेव योनि जीवः प्राप्नोतीति योग- हीनस्य जन्मान्तरं स्यादेव, मरणसमये समुद्भूतवैक्लव्यस्यायोगिना वारायितुमशक्य- खात् । तदुक्तं योगबीजे.- देहावसानसमये चित्ते यद्यविभावयेत् । तत्तदेव . भवेज्जीव इत्येवं जन्मकारणम् ॥ देहान्ते किं भवेजन्म तन्न जानन्ति मानवाः । तस्माज्ज्ञानं च वैराग्यं जपश्च केवलं श्रमः ॥ पिपीलिका यदा लग्ना देहे ज्ञानाद- विमुच्यते । असौ किं वृश्चिकैर्दष्टो देहान्ते वा कथं सुखी ।। ' इति । योगिनां तु योग- बलेनान्तकालेप्यात्मभावनया मोक्ष एवेति न स्याज्जन्मांतरम् । तदुक्तं भगवता- प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव' इत्यादिना, 'शतं चैका च हृदयस्य नाडयः' इत्यादिश्रुतेश्च । न च तत्त्वमस्यादिवाक्यस्यापरोक्षज्ञान- जनकत्वे तद्विचारस्य वैयर्थ्यमेवेति शंक्यम् । वाक्यविचारजन्यज्ञानस्य योगद्वाराऽपरोक्ष- ज्ञानसाधनत्वात् । अत्र च योगवीजे गौरीश्वरसंवादो महानस्ति, ततः किञ्चिल्लि- ख्यते-'देव्युवाच ॥ ज्ञानिनस्तु मृता ये वै तेषां भवति कीदृशी। गतिः कथय देवेश कारुण्यामृतवारिधे ।। ईश्वर उवाच ॥ देहान्ते ज्ञानिना पुण्यात्पापात्फलमवाप्यते । यादृशं तु भवेत्तत्तद् भुक्त्वा ज्ञानी पुनर्भवेत् । पश्चात्पुण्येन लभते सिद्धेन सह सङ्ग- तिम् । ततः सिद्धस्य कृपया योगी भवति नान्यथा ॥ ततो नश्यति संसारो नान्यथा शिवभाषितम् ॥ देव्युवाच ॥ ज्ञानादेव हि मोक्षं च वदन्ति ज्ञानिनः सदा । न कथं सिद्धयोगेन योगः किं मोक्षदो भवेत् ॥ ईश्वर उवाच ॥ ज्ञानेनैव हि मोक्षो हि तेषां वाक्यं तु नान्यथा । सर्वे वदन्ति खङ्गेन जयो भवति तहि किम् ॥ विना युद्धेन वाण (१३८) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेश:- कथं जयमवाप्नुयात् । तथा योगेन रहितं ज्ञानं मोक्षाय नो भवेत् ' इत्यादि । ननु जनकादीनां योगमन्तरेणाप्यप्रतिवद्धज्ञानमोक्षयोः श्रवणात्कथं योगादेवाप्रतिवद्धज्ञानं मोक्षश्चेति चेत् । उच्यते-तेषां पूर्वजन्मानुष्ठितयोगजसंस्काराज्ज्ञानप्राप्तिरिति पुराणादौ श्रूयते । तथाहि-जैगीषव्यो यथा विप्रो यथा चैवासितादयः । क्षत्रिया जनकाद्यास्तु तुलाधारादयो विशः ॥ सम्प्राप्ताः परमां सिद्धिं पूर्वाभ्यस्तस्वयोगतः। धर्मव्याधादयः सप्त शूद्राः पैलवकादयः ॥ मैत्रेयी सुलभा शाङ्गी शाण्डिली च तपस्विनी। एते चान्ये च बहवो नीचयोनिगता अपि ॥ ज्ञाननिष्ठां परां प्राप्ताः पूर्वाभ्यस्तस्वयोगतः ॥ इति । किञ्च पूर्वजन्मानुष्ठितयोगाभ्यासपुण्यतारतम्येन केचिद्ब्रह्मत्वं केचिद् ब्रह्मपुत्रत्वं केचिद्देवर्षित्वं केचिद्ब्रह्मर्षित्वं केचिन्मुनित्वं केचिद्भक्तत्वं च प्राप्ताः सन्ति । तत्रोपदेश- मन्तरेणैवात्मसाक्षात्कारवन्तो भवेयुः । तथाहि-हिरण्यगर्भवसिष्ठनारदसनत्कुमारवाम- देवशुकादयो जन्मसिद्धा इत्येव पुराणादिषु श्रूयते । यत्तु ब्राह्मण एव मोक्षाधिकारीति श्रूयते पुराणादौ तदयोगिपरम् । तदुक्तं गरुडपुराणे-“ योगाभ्यासो नृणां येषां नास्ति जन्मान्तरादृतः । योगस्य प्राप्तये तेषां शूद्रवैश्यादिकक्रमः ॥ स्त्रीत्वाच्छूद्रत्वमभ्येति ततो वैश्यत्वमाप्नुयात् । ततश्च क्षत्रियो विप्रः कृपाहीनस्ततो भवेत् ॥ अनूचानः स्मृतो यज्वा कर्मन्यासी ततः परम् । ततो ज्ञानित्वमभ्येति योगी मुक्ति क्रमाल्लभेत्।।' इति । शूद्रवैश्यादिक्रमाद्योगी भूत्वा मुक्तिं लभेदित्यर्थः । इत्थं च योगे सर्वाधिकार- श्रवणाद्योगोत्पन्नतत्त्वज्ञानेन सर्व एव मुच्यन्त इति सिद्धम् । योगनस्तु भ्रष्टस्यापि न शूद्रादिक्रमः । 'शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ अथवा योगिनामेव ' इत्यादिभगवदचनादित्यलम् ॥ १५ ॥ अब हठाभ्यासके विना ज्ञान और मोक्ष सिद्ध नहीं होते इसका वर्णन करते हैं कि जब तक प्राण और इंद्रिय जीवते हैं और मनभी नहीं मरता है अर्थात् जीवता है, इडा और पिंग लामें प्राणके बहनेको प्राणका जीवन और अपने २ विषयोंका ग्रहण करना इंद्रियोंका जीवन और नाना प्रकारके विषयोंको उत्पन्न करना मनका जीवन कहाताहै और तिस २ भावको प्राप्त हो जाना ही तिस २ का मरण यहां विवक्षित है कुछ स्वरूपसे इनका नाश विवक्षित नहीं है-तवतक मनरूप अंतःकरणमें अपरोक्षानुभवरूप ज्ञान कैसे हो सकता है अर्थात् कदाचित्भी नहीं हो सकता है । क्योंकि प्राण, इंद्रिय, मन इनकी जो वृत्ति हैं वे ज्ञानकी प्रतिबंधक होती है और जो योगी प्राण और मन इन दोनोंका विशेषकर लय करदेता है वह योगी आत्यंतिक स्वरूपमें स्थितिरूप मोक्षको प्राप्त होताहै-और ब्रह्मरंध्रमें जो विना व्यापार प्राणकी स्थिति वही प्राणका लय कहाता है और ब्रह्मसे भिन्न विषयोंमें व्यापाररहित होनाही मनका लय कहाता है और जो अन्य है अर्थात् जिसके प्राण और मनका लय नहीं हुआहै वह योगी सैकडों उपा- योसेभी किसी प्रकार मोक्षको प्राप्त नहीं होताहै, सोई योगबीजमें कहाहै कि,नानाप्रकारके विचा- रोंसे तो मन साध्य नहीं होताहै तिससे तिस मनका जयही प्राणका जय है, अनेक प्रकारके मार्गोंसे बहुधा जिसमें सुख दुःख हैं वह जन्म हाताहै आर योगमार्गसे कैवल्य ( मोक्ष ) रूप परमपद मिलताहै अन्यथा नहीं मिलताहै, यह शिवजीका कथन है। इससे यह सिद्ध भया कि, चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। योगके विना ज्ञान और मोक्ष सिद्ध नहा होते हैं और श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण आदिकोंमें भी यही प्रसिद्ध है कि इसके अनंतर आत्मदर्शनका उपाय योग है और अध्यात्मयोगकी प्राप्तिसे देवको मानकर धीरमनुष्य हर्ष और शोकको त्यागताहै और श्रद्धा भक्ति ध्यान योगसे आत्माको जानता भया और जब मनसहित पांचा ज्ञान इंद्रिय विषयोंसे रहित टिकती हैं और बुद्धि भी चेष्टा न करती हो उसको परमगति योगीजन कहते हैं और उस स्थिर इंद्रियोंकी धारणाकोही योग मानते हैं और उस समय योगी अप्रमत्त होजाताहै और जीव दयावान् आत्मतत्त्व (आत्म- ज्ञान) से योगी ब्रह्मतत्त्वको देखता है, तब अज और नित्य जो संपूर्ण तत्त्वोंसे विशुद्ध देव है उसको जानकर संपूर्णबंधनोंसे छूटता है, ब्रह्मरूप तेज तुझ आत्माको ओंकाररूपसे उपासना करै ओर तिन उन्नत ( सोधे ) और सम शरीरको स्थापन करके और मनसहित इंद्रियोंको हृदयमें प्रविष्ट करके ब्रह्मनामसे भयके दाता संपूर्ण स्रोतोंको विद्वान् योगी तरे-ओंकाररूपसे आत्माका ध्यान करो-और यतिधर्म प्रकरणमें मनुने लिखा है कि, परमात्माके योगसे भूत और भावो पदा- थोंको देखै तो स्थूल सूक्ष्मरून दोनों देहोंको शोघ्र त्यागकर बंधनसे छूट जाताहै । याज्ञवल्क्य स्मृतिमें लिखाहै कि, यज्ञ, आचार, इंद्रियोंका दमन, अहिंसा, दान, स्वाध्याय, कर्म-इनका यहो परमधर्म है कि, योगसे आत्माको देखना । मातंगमहर्षिका वाक्य है-ब्राह्मण अग्निष्टोम आदि संपूर्ण यज्ञोको छोडकर योगाभ्यासमें तत्पर हुआ शांत होकर परब्रह्मको प्राप्त होताहै । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री और शूद्र इनके लिये पवित्रकर्मीको शांति और मुक्तिके अर्थ योगसे अन्य कोई वस्तु नहीं है । दक्षस्मृतिमें निषेधमुखसे कहाहै कि, स्वसंवेद्य (स्वयं जानाजाय ) जो वह ब्रह्म उसको योगीसे भिन्न इस प्रकार नहीं जानते हैं जैसे कुमारी (कन्या) स्त्रोके सुखको और जन्मांध गढेको नहीं जानता-इत्यादि स्मृतियों में और महाभारतमें भी योगमार्गमें व्यासने कहाहै कि, वर्णावकृष्ट (पतित ) वा धर्मकांक्षिणी नारी हो वे दोनों भी इस मार्गसे परम गतिको प्राप्त होते हैं संपूर्णधर्मोंका ज्ञाता हो वा अकृती ( पुण्यहोन) हो धार्मिक हो वा अत्यंत पापी हो पुरुष हो वा नपुंसक हो ऐसा मनुष्यभी जरामरणसमुद्रके महादुःखको सेवन करके जाननेका अभिलाषी शब्दब्रह्मका अवलंबन करताहै । भगवद्गोतामें भी लिखा है कि, वशीभूत है मन जिसके ऐसा मनुष्य सदा इस प्रकार आत्मयोगको करता हुआ मेरेमें स्थितिरूप और मोक्ष है परम जिसमें ऐसे शांतिरूप स्थानको प्राप्त होताहै, जो स्थान सांख्योंको प्राप्त होताहै उसी में योगीभी जाते हैं। आदित्यपुराणमें लिखाहै कि, योगसे ज्ञान होताहै और मेरेमें एकरस चित्त रखनेको योग कहते हैं। स्कंदपुराणमें लिखाहै कि, आत्मज्ञानसे मुक्ति होती है, वह आत्मज्ञान योगके विना नहीं हो सकता और वह योग चिरकालके अभ्याससेही सिद्ध होताहै। कूर्मपुराणमें शिवजीका वाक्य है कि, इससे आगे परमदुर्लभ योगको कहताहूँ, जिससे सूर्यके समान ईश्वर आत्माको योगी देखते हैं, योगरूप अग्नि शीघ्रही संपूर्ण पापके पंजरको दग्ध करती है और प्रसन्न ज्ञान होताहै और ज्ञानसे मोक्ष होजाताहै-गरुडपुराणमें कहा है कि, बुद्धिमान अनुष्य तिस प्रकार यत्न करै जैसे परसुख हो और वह सुख योगसे मिलताहै अन्य किसीसे नहीं । संसारके तापोंसे तपायमान मनुष्याक लिये योग परम औषध है, जिसको निर्वेद (वैराग्य ) से उत्पन्न हुई बुद्धि परअवरमें प्रसक्त है, योगरूप अग्निसे दुग्धहुये हैं समस्त क्लेश- संचय जिसके ऐसा वह परमनिर्वाणपदको सदैव प्राप्त होताहै इसमें संशय नहीं है प्राप्त हुईही है योगसिद्धि जिसको उसको और आत्माके दर्शनसे पूर्ण जो है उसको कुछभी कर्तव्य नहीं देखते उसने सब कर लिया। आत्माराम और सदा पूर्णरूप और आत्यतिक सुखको प्राप्त है, है (१४०) हठयोगप्रदीपिका । [ उपदेशः- इससे परमानंदरूप उसको निर्वेद (सुख) हो जाताहै । तपसे जानाहै आत्मा जिन्होंने और वशमें हैं इन्द्रियें जिनके ऐसे महात्मा योगीजन योगसेही महासमुद्र (जगत् ) को तरजाते हैं और विष्णुधर्मों में लिखा है कि, जो सब भूतोंका श्रेय है और स्त्रियोंका और कीट पतं- गोंका भी उपकार है उस परमश्रेयको हमारे प्रति कहो-इस प्रकार देव और देवर्षियोंने कहा है जिनको ऐसे कपिलमुनि पहिले समयमें योगकोही श्रेय कहते भये-वासिष्ठमें लिखा है कि, हे राम ! संसारके विषका जो वेग उसकी विषूचिका दुःसह है वह योगरूप और पवित्र गारुडमन्त्रसेही शांत होती है । कदाचित् कोई शंका करै कि तत्त्वमसि आदि महावाक्योंसे भी अपरोक्ष प्रमाण (ज्ञान) होता है तो किसलिये अत्यन्तश्रमसे साध्य योगमें प्रयास करते हो कदाचित् कहो कि वाक्यसे जन्य ज्ञानके अपरोक्ष होनेमें प्रमाणका असंभव है-सो नहीं क्योंकि, तत्त्वमसि आदि वाक्योंसे उत्पन्न हुआ ज्ञान अपरोक्ष है-अपरोक्ष विषयक होनेसे, चक्षुसे हुये घट आदिके प्रत्यक्षकी तुल्य यह अनुमान प्रमाण । कदाचित् कहो कि, विष- यकी अपरोक्षताके नीरूप (रूपहीन) होनेसे हेतुकी असिद्धि है सो ठीक नहीं. क्योंकि अज्ञा. नका विषय चित्त और चित्तके संग तादात्म्यरूपको प्राप्तत्व ये दोनों है रूप जिसके ऐसी जो विषयकी अपरोक्षता वह भली प्रकार निरूपण करने योग्यहै, जैसे घट आदिमें जब चक्षुकी संनिकर्षदशामें उसके अधिष्ठानरूप चैतन्यकी अज्ञाननिवृत्तिके होनेपर उसका चैतन्य अज्ञानका विषय होना और उस घटका अज्ञान विषय चैतन्यके संग तादात्म्यकी प्राप्ति होना ये दोनों अपरोक्ष हैं-तिसीप्रकार तत्वमसि आदि वाक्योंसे शुद्ध चैतन्याकार वृत्तिके होनेपर उसके अज्ञानकी निवृत्ति होनेसेही तत्त्व अज्ञानका विषय (नहीं) रहा इससे चैतन्य अपरोक्ष है, इससे हेतुकी असिद्धि नहीं है । कदाचित् कहो कि, हेतु अप्रयोजक है अर्थात् अपने साध्यको सिद्ध नहीं कर सकता, अपरोक्षता ज्ञानसे होती है इससे प्रत्यक्ष जो परोक्ष उसका विषयक होनेसे हेतु प्रयोजक है कुछ इंद्रियजन्यही अपरोक्ष नहीं होता, क्योंकि मन इंद्रियं नहीं है उसकोभी सुख आदिको विषयकता होनेसे व्यभिचार होजायगा अथवा अभिव्यक्त (प्रकट ) चैतन्यके आभिन्नरूपसे जो भासमान होना वही विषयकी अपरोक्षता है आवरणकी निवृत्ति होनेकोभी अभिव्यक्त कहते हैं-और परोक्ष वृत्तिके स्थलमें आवरण निवृत्तिका अभाव है इससे वहां अतिव्याप्तिरूप दोष नहीं है-जो मनुष्य रज्जु आदिमें सर्प आदि भ्रमके उत्पादक दोषवाला है उसको जो यह सर्प नहीं किंतु रज्जु है इस वाक्यसे उत्पन्न हुई जो वृत्ति वह आवरणको निवृत्त नहीं करती है, इससे वहां परोक्षही विषय है और वेदांतके वाक्योंसे जो ज्ञान उत्पन्न होता है आवरणका निवर्तक होनेसे वह अपरोक्षही है । क्योंकि वह मनन आदिसे पूर्व उत्पन्न हुआ है और ज्ञाननिवर्तक प्रमाणकी असंभावना आदि सपूर्ण दोषोंके अभाव विशिष्टही उस वेदांत वाक्योंसे जन्य ज्ञानको अज्ञानकी निवर्तकता है और उस उपनिषदोंसे प्रतिपादन किये पुरुषको पूछताहूँ इस श्रुतिसे प्रतिपन्न (सिद्ध ) उपनिषद मात्रसे जो जाना जाता है वह योगसेही जाना जायगा तिससे तत्त्वमसि आदि वाक्यसेही अपरोक्षज्ञान होता है सो ठीक नहीं है, क्योंकि अनुमान अप्रयोजक है, क्योंकि प्रत्यक्षके प्रति और पूर्वोक्त अक्ष (इन्द्रिय) सामान्यके प्रति इंद्रियरूपसे कारणता है, इससे इंद्रियसे जन्यत्वही प्रयोजक है और नित्य अनित्य साधारण प्रत्यक्षमें तो कुछ प्रयोजक नहीं होताहै और उनके मतमें तो किसी प्रत्यक्षमें इंद्रिय कारण है और किसी प्रत्यक्षमें शब्दविशेष कारण है इस प्रकार दो कार्य कारणभाव हो जायगे अर्थात एक कार्यक दो कारण मानने पडेंगे। कदाचित् कहो कि मन इंद्रिय नहीं है चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१४१) उत्पन्न सो भी नहीं क्योंकि, मन इंद्रियोंका नाथ है यह वचन मनुष्यके समान उद्देश करके मनुष्योंका यह राजा है इसके समान मनुष्योंमेंही कुछ उत्कर्षको कहताहै कुछ मनको इंद्रियभिन्न नहीं कहताहै और तत्त्व तो यहहै कि, मन इंद्रियोंमें एक अखंडोपाधिरूपही है, इसीसे पायु (गुदा) आदि कर्मेन्द्रिय और मन नेत्र आदि ज्ञानेंद्रियहैं और जो प्रत्यक्ष हो वह ऐंद्रियक और जो अप्रत्यक्ष हो वह अतींद्रिय कहाता है, इन शक्तिके निर्णायक कोशोंमें इंद्रियाप्रमाणक ज्ञानको अप्रत्यक्ष कहते हुये मनको इंद्रिय होना प्रतीत कराते हैं और दश और एक इंद्रिय है यह गीता वचनभी मनके इंद्रिय होनेमें प्रमाणहै और तत्त्वमसि आदि वाक्योंसे पैदा हुआ ज्ञान-शब्दसे है, शब्दसे उत्पन्न होनेसे,-यज्ञ करै इत्यादि वाक्योंसे उत्पन्न ज्ञानके समान-इस अप्रत्यक्ष विरोधि शब्दजन्यके साधक अनुमानसे सत्प्रतिपक्षभी है, विरोधि पदार्थके साधक हेतुको सत्प्र- तिपक्ष कहतेहैं । कदाचित् कहो कि, यह अनुमान अप्रयोजक है सोभी नहीं क्योंकि, शब्दजन्य ज्ञानकाही शब्द जनक होता है, यह लाघवमूलक अनुकूल तर्क इस अनुमानमें है, तेरे मतमें तो शब्दसेभी प्रत्यक्षके स्वीकार करनेसे दो कार्य कारण भाव होजायेंगे इससे गौरव है-और मनन निदिध्यासनसे पहिले भी उत्पन्न है और तेरे मतमें परोक्षभी उक्त ज्ञान अज्ञानका निवर्तक नहीं होगा इससे अज्ञाननिवृत्तिके प्रति बाधज्ञानरूपसेही हेतु मानना पडेगा यह भी गौरव है, मेरे मतमें तो समाधिका जो अभ्यास उसके परिपाकसे असंभावना आदि संपूर्ण मलोंसे रहित अर्थात् अंतःकरणसे आत्माके देखनेपर और दर्शनमात्रसेही अज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है इससे कोईभी गौरवका अवकाश नहीं है-और सम्पूर्ण भूतोंमें यह गुप्त आत्मा प्रकाशित नहीं होता है, परन्तु. सूक्ष्मदर्शी मनुष्य इस आत्माको सूक्ष्म और मुख्य जो बुद्धि उससे देखते हैं-धीर मनुष्य वाणी और मनको रोकै इन वचनोंसे लेकर अज्ञानकी निवृत्ति है अर्थ जिसका ऐसे इस कठवल्लीके 'मृत्युके मुखसे छुटताहै' मृत्युके उपदेशकोभी यह बात संमत है, इससे इसमें कोई विवाद नहीं है और यदि मनन आदिसे पूर्व उत्पन्न हुआ ज्ञान परोक्षही है इससे प्रतिबन्धका किया गौरव नहीं है इस मतको मानोगे तो तब भी श्रवण आदिसे मनका संस्कार सिद्ध होनेपर उसके अनन्तर कालही में आत्माका दर्शन संभव है, इससे उसके अनन्तर वाक्योंके स्मरण आदिको कल्पना करने में भी महान् गौरव है । कदाचित् शंका करो कि हम केवल तर्कसे शब्दजन्य ज्ञानको अपरोक्ष नहीं कहते हैं किन्तु श्रुति भी कहती है सोई दिखाते हैं कि, उस उपनिषदोंसे कहे हुये पुरुषको मैं पूछता हूं इस श्रुतिसे जो पुरुषको औपनिषदरूप कहा है वह कुछ उपनिषदोंसे उत्पन्न जो बुद्धि उसकी विषयमात्र नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष आदिसे जानने योग्यमें औपनिषद यह व्यवहार होजायगा जैसे बारह कपालोंमें आठ कपालोंके होनेपरभी द्वादश कपालोंमें संस्कार किये पदार्थमें आठ कपालोंमें संस्कृत यह व्यवहार नहीं होताहै और जैसे द्विपुत्र मनुष्यमें एकपुत्र व्यवहार नहीं होताहै तैसेही यहां भी समझना और अन्यत्र तैसा व्यवहार नहीं होताहै इससे उपनिषदमात्रसे जानने योग्यही यहां प्रत्ययका अर्थ है और मनसे जानने योग्य आत्माको मानोगे तो वह सिद्ध नहीं होगा यह शंका भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रत्ययसे उपनिषदसे भिन्न जो सब कारण हैं उनकी निवृत्ति (निषेध) नहीं होती है, क्योंकि शब्दके अपरोक्षवादी अपने भी आत्माके परोक्षज्ञानमं मन आदि करण माने हैं किन्तु प्रत्य- यसे पुराण आदि जो अन्य शब्द हैं उनकीही व्यावृत्ति होती है, क्योंकि श्रुतिके वाक्योंसे आत्मा सुनने योग्य है यह कहा है और वह अर्थ मुझे भी संमत है, इससे आपका कथन तुच्छ है और प्रमाणांतरकी व्यावृत्तिमें श्रुतिके तात्पर्यकी कल्पना तभी कहनी योग्य है जब शब्द- (१४२) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- रूप प्रमाण सिद्ध होजाय और पुराण आदि शब्दांतरकी व्यावृत्तिम तात्पर्य तो श्रुति आदिका संमत होनेसे कल्पना करनेको उचितही है ऐसा सिद्ध होनेपर यह आत्मा मनसेहो देखने योग्य है इत्यादि श्रुतिभी अनायाससे लग सकती है । जो किसीने यह कहा है कि,दर्शनवृत्तिके प्रति जो मनमात्रकोही उपादान कहती हैं उन श्रुतियों के संग कुछ विरोध नहीं है। यह उसका कहना तो अत्यन्तही विचारमें नहीं आसकता। क्योंकि, प्राणको आकांक्षा में प्रवृत्त हुई ये श्रुति उपादानमें तत्पर कैसे होसकती हैं ? क्योंकि काम, संकल्प, विचिकित्सा ( संदेह ) ये सब मनहीसे हैं इत्यादि श्रुतिसे निश्चयपूर्वक सब वृत्तियोंका मनकोही उपादान कारण बोधन करदिया, तब आकांक्षाके अभावसे उपादानमें तात्पर्यको श्रुति कैसे वर्णन कर सकती है ? पहिले दूसरी वल्लीमें ओंकारको ब्रह्मबोधक कहा है इससे ओंकारभी अपरोक्षज्ञानका हेतु हो जायगा, इस शंकाके निवारण करनेके लिये मनसे ही आत्मा देखने योग्य है इत्यादि निश्चायक वचन हैं इस रीतिसे सम्पूर्ण श्रुति वर्णन करने ( लगने ) को शक्य हैं इस प्रकार वाक्जालसे अलं है अर्थात् वाणीके जालको समाप्त करते हैं। सिद्धांत तो यह है कि, योगि- योको समाधिकेविषे दूर और विप्रकृष्टपदार्थों का जो ज्ञान है संपूर्ण शास्त्रोंमें प्रसिद्ध वह ज्ञान परोक्ष नहीं है, क्योंकि उस समय कोई परोक्षको सामग्री नहीं है और स्मरण भी नहीं है क्योंकि उनका पहिले पृथक् २ अनुभव नहीं है और सुख आदिके ज्ञान समान वह साक्षिस्व- रूपभी नहीं है क्योंकि इसमें सिद्धांतका विघात है और प्रमाणरहितभी नहीं हैं क्योंकि संपूर्ण प्रमाणों में कारणका नियम है और चक्षुआदिसे उत्पन्न भो वह ज्ञान नहीं हैं क्योंकि चक्षु- आदिका उस समय संनिकर्ष नहीं है तिससे वह मानसिक प्रमाही कहनी चाहिये । इससे मन प्रमाणरूप और इंद्रिय है यह निर्दोष है-और भी जो योग और श्रुतिके समुच्चयकी कल्पना करते हैं उनके भी मतमें पूर्वोक्त दूषणोंका गम तदवस्थही है, तिससे यह सिद्ध भया कि, योगजन्य संस्कारहै सहायक जिसका ऐसे मनसेही आत्मा जानने याग्य ह । कदाचित् कोई कहै कि, कामिनीकी भावना करनेवाले पुरुषको जैसे व्यवहित (दूरस्थित ) कामिनीका साक्षात्कार अप्रमा होता है इसीप्रकार भावनासे उत्पन्न आत्मसाक्षात्कारभी अप्रमा होजायगा सोभी ठीक नहीं, क्योंकि आत्मसाक्षात्कारका विषय ( आत्मा ) वाधित नहीं है और न दोषसे जन्य है कामिनीका साक्षात्कार तो बाधितविषयक है और दोषजन्यमी है इससे अप्रमाण है तिससे भावनासे जन्य आत्मसाक्षात्कार अप्रमाण नहीं है । कदाचित् कहो कि, भावनाको समाधिका ज्ञापक मानोगे तो यह भी एक प्रमाण होजायगा सो ठीक नहीं क्यों- कि, भावना मनकी सहकारिणी है इससे प्रमाणके निरूपणमें अनिपुण नैयायिक आदिकोंने भी योगजप्रत्यक्षका अलौकिक प्रत्यक्षमें अन्तर्भाव किया है और योगसे उत्पन्न हुये अलौकिक संनिकर्षसे योगीजन व्यवहित विप्रकृष्ट और सूक्ष्म पदार्थरूप भी आत्माको यथार्थरीतिसे देखते हैं-सोई इस पातंजलसूत्र में कहा है कि, उक्त समाधिमें जो सत्यप्रज्ञा ( बुद्धि ) है उसके शाब्दबोध और अनुमानसे अर्थात् युक्तिसिद्ध ज्ञान है उनसे वह प्रज्ञा अन्यविषयक हो जाती है अर्थात् भिन्न अर्थकोभी विषय करलेती है, क्योंकि उसका विषय निर्विकल्प अर्थ है- तिससे शब्द पदार्थ वृत्तिधर्म (घटत्व आदि) पुरस्कारके विनाही और अनुमान व्यापकों वर्तमान धर्मके पुरस्कार (ज्ञान) सेही बाधके जनक नियमसे है, इससे अर्थके ग्रहणमें योग्य विशेष्यमेही तत्पर है अर्थात् योगविषयकोही ग्रहण करते हैं यहां व्यासजीका रचा यह भाष्य है कि, अतनाम आगमविज्ञान है-वह आगमविज्ञान सामान्य विषय है क्योंकि आगम विशे- चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। षको नहीं कहसकता; क्योंकि विशेषरूपसे शब्दका संकेत नहीं होता है-इससे आरम्भ करके समाधि प्रज्ञासे भली प्रकार ग्रहण करने योग्य वह विशेष है और वह पुरुषगत है वा भूत- सूक्ष्मगत है । योगबीजमें कहा है कि, ज्ञाननिष्ठहो वा विरक्तहोधर्मज्ञहो वा जितेंद्रियहो योगके विना देव भी हे प्रिये ! मोक्षको प्राप्त नहीं होता है और यह श्रुति भी है कि, कर्मके संग उसी बातके करनेमें यह मनुष्य असक्त है जिसमें इसका मनरूप लिंग प्रविष्ट है और स्मृति भी है कि सत् असत् योनियोंके जन्मोंमें इसको गुणोंका संगही कारण है-देहके मरण समयमें जिस विषयमें राग आदिसे उबुद्ध होता है उसी योनिको जीव प्राप्त होता है इससे योग- हीनका अन्य जन्म होताही है, क्योंकि मरणके समयमें हुई जो विक्लवता उसको अयोगी नहीं हटा सकता है सोई योगबीजमें कहा है कि, देहके अन्तसमयमें जिस २ को विचारता है वही वह जीव होजाता है. यही जन्मका कारण है देहके अन्तमें कौन जन्म होगा यह मनुष्य नहीं जानते हैं-तिससे ज्ञान, वैराग्य, जप ये केवल श्रम हैं जब पिपीलिका (चेंटि) देहमें लग जाती है और ज्ञानसे छूटजाती है तो वृश्चिकोंसे डसा हुआ यह जीव देहके अन्तमें कैसे सुखी हो सकता है ? योगियोंको तो योगके बलसे अन्तकालमेंभी आत्मविचारसे 'मोक्षही होता है जन्मांतर नहीं होता है, सोई भगवान्ने कहा है कि, मरण समयम अचल मनसे भक्तिसे युक्त वा योगके बलसे मोक्ष होता है और यह श्रुतिभी है कि एकसौ एक हृदयकी नाडी हैं कदाचित् कहो कि, तत्त्वमसि आदि वाक्यको अपरोक्षज्ञानका जनक मानोगे तो उसका विचार करना व्यर्थ है, सो ठीक नहीं क्योंकि वाक्यके विचारसे उत्पन्न जो ज्ञान है वह योगके द्वारा अपरोक्ष साधन है इसविषयमें योगबीजमें गौरी और महादेवका बहुत संवाद है उसमें से कुछ यहां लिखते हैं कि, पार्वती बोली जो ज्ञानी मरते हैं उनकी कैसी गति होती है । हे देवेश ! हे दयारूप अमृतके समुद्र ! इसको कहो । ईश्वर बोले कि, देहके अंतमें ज्ञानीको पुण्य पापसे जो फल प्राप्त होता है उसको भोगकर फिर ज्ञानी होजाताहै फिर पुण्यसे सिद्धोंके संग संगतिको प्राप्त होता है फिर सिद्धोंकी कृपासे योगी होताहै अन्यथा नहीं होता, फिर संसार नष्ट होजाता है अन्यथा नहीं। यह शिवका कथन न है। पार्वती बोली-ज्ञानी सदा ज्ञान- सेही मोक्षको कहते हैं तो सिद्धयोगसे योग मोक्षका दाता कैसे होजाता है? ईश्वर बोले-ज्ञानसे मोक्ष होता है यह उनका वचन अन्यथा नहीं है. जैसे सब कहते हैं कि, खड्गसे जय होता है तो युद्ध और वीर्यके विना जयकी प्राप्ति कैसे होगी-तैसेही योगरहित ज्ञानसे मोक्ष नहीं होता है इत्यादि । कदाचित् कोई शंका करै कि, जनक आदिकोंको योगके विनाही प्रतिबन्धरहित ज्ञान और मोक्ष सुनेजाते हैं तो कैसे योगसेही प्रतिवन्धरहित ज्ञान और मोक्ष होंगे ! इस शंकाका उत्तर देते हैं कि, उनको पूर्वजन्ममें किये योगसे उत्पन्न जो संस्कार उससे ज्ञानकी प्राप्ति पुराण आदिमें सुनीजाती है सोई दिखाते हैं कि जैसे जैगीषव्य ब्राह्मण और आसित आदि ब्राह्मण और जनक आदि क्षत्रिय और तुलाधार आदि वैश्य ये पूर्व जन्ममें किये अभ्यासके योगसे परमसिद्धिको प्राप्त हुये और धर्मव्याध आदि सात शूद्र पैलवकआदि और मैत्रेयी सुलभा शाङ्गीं शांडिली ये तपस्विनी-ये और अन्य बहुतसे नीचयोनिमें गती पूर्वजन्ममें किये अभ्यासके योगसे परमज्ञाननिष्ठाको प्राप्त हुये-और पूर्वजन्ममें किये योगके पुण्यके अनुसार कोई ब्रह्मा, कोई ब्रह्माके पुत्र, कोई देवर्षि, कोई ब्रह्मर्पि, कोई मनि, कोई भक्तरूपको प्राप्त हुये हैं-और उपदेशके विनाही आत्मसाक्षात्कारवाले हो जायेंगे सोई दिखाते हैं कि हिरण्यगर्भ, वसिष्ठ, नारद, सनत्कुमार, वामदेव, शुक आदि ये पुराण आदिमें जन्मसेही
AND
(१४४)
हठयोगप्रदीपिका ।
[ उपदेशः-
सिद्ध सुनेहैं और जो पुराणआदिमें यह सुनाहै कि, ब्राह्मणही मोक्षका अधिकारी है वह योगीसे
भिन्नके विषयमें समझना । सोई गरुडपुराणमें कहाहै कि, जन्मान्तरमें किया योगाभ्यास जिन
मनुष्योंको नहीं है उनको योगप्राप्ति के लिये शूद्र वैश्य आदिका क्रम है वे खीसे शूद्र होते हैं
और शूद्रसे वैश्य होतेहैं और दयास रहित क्षत्रिय होजाते हैं फिर अनूचान ( विद्यावान् )-
यज्ञका कर्ता-फिर कर्मसंन्यासी होते हैं फिर ज्ञानी योगी होकर क्रमसे मुक्तिको प्राप्त होजाते
हैं अर्थात् शूद्र वैश्य आदि क्रमसे योगी होकर मुक्तिको प्राप्त होजातेहैं, इस प्रकार सब जाति-
योंका आधिकार सुननेसे योगसे उत्पन्न तत्त्वज्ञानके द्वारा सब मुक्त होते हैं यह सिद्ध भया और
भ्रष्टभी योगीको तो शूद्र आदिका क्रम नहीं है क्योंकि भगवान्का यह वचन है कि, योगसे
भ्रष्ट मनुष्य, शुद्ध जो धनी उनके कुलमें पैदा होताहै अथवा बुद्धिमान् योगियोंके कुलमें पैदा
होताहै-इति अलम् । भावार्थ-यह है कि, जबतक प्राण जीवै और मन न मरै तबतक इस
लोकमें ज्ञान कहांसे होसकता है और जो मनुष्य प्राण और मनका लयकरदे वह मोक्षको प्राप्त
होता है अन्यमनुष्य किसीप्रकार भी प्राप्त नहीं होताहै ।। १५ ॥
प्राणमनसोर्लयं विना मोक्षो न सिध्यतीत्युक्तम् । तत्र प्राणलयेन मनसोऽपि लयः
सिध्यतीति तल्लयरीतिमाह-
ज्ञात्वा सुषुम्नासद्भदं कृत्वा वायुं च मध्यगम् ।
स्थित्वा सदैव सुस्थाने ब्रह्मरन्ध्र निरोधयेत् ॥१६॥
ज्ञात्वेति ॥ सदैव सर्वदेव सुस्थाने शोभने स्थाने सुराज्ये धार्मिके देशे' इत्या-
झुक्तलक्षणे स्थित्वा स्थितिं कृत्वा, वसतिं कृत्वेत्यर्थः। सुषुम्ना मध्यनाडी तस्याः
सद्भेदं शोभनं भेदनप्रकारं ज्ञात्वा गुरुमुखाद्विदित्वा वायु प्राणंमध्यगं मध्यनाडीसञ्चा-
रिणं कृत्वा ब्रह्मरन्ध्रे मूर्धावकाशे निरोधयेन्नितरां रुद्धं कुर्यात् । प्राणस्य ब्रह्मरन्ध्र
निरोधो लयः, प्राणलये जाते मनोऽपि लीयते । तदुक्तं वासिष्ठे-'अभ्यासेन परिस्पन्दे
प्राणानां क्षयमागते । मनः प्रशममायाति निर्वाणमवशिष्यते ॥' इति प्राणमनसोर्लये
सति भावनाविशेषरूपसमाधिसहकृतेनान्तःकरणेनाबाधितात्मसाक्षात्कारो भवति तदा
जीवन्नेव मुक्तः पुरुषो भवति ॥ १६ ॥
प्राण और मनके लयविना मोक्ष सिद्ध नहीं होता यह कहा उनमें प्राणके लयसे मनकामी
लय सिद्ध होता है इससे प्राणके लयकी रीतिका वणन करते हैं कि, सदैव उत्तमस्थानम अर्थात्
उत्तमराज्य और धार्मिकदेशमें स्थित होकर सुषुम्ना नाडीके भेदनको भली प्रकार गुरुमुखसे
जानकर और प्राणवायुको मध्यनाडोमें गत (संचारी) करके ब्रह्मरध्र ( मूर्द्धाके अवकाश ) में
निरुद्ध करे (रोकै) प्राणका ब्रह्मरंध्रमें जो निरोध वही लय है और प्राणके लय होनेपर मनका
लय होजाता है, सोई वासिष्ठमें कहा है कि, अभ्याससे जब प्राणोंकी क्रियाका क्षय होजाता
है तब मन शांत होजाता है और निर्वाणही शेष रहता है और प्राण और मनका लय होनेपर
भावना विशेषरूप समाधि है सहकारी जिसकी ऐसे अंतःकरणसे अबाधित आत्मसाक्षात्कार
जब होजाता है तब पुरुष जीवन्मुक्त होजाता है ॥ ६६ ॥
चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१४५) " देवताइन्वे च - प्राणलये कालजयो भवतीत्याह- सूर्याचन्द्रमसौं धत्तः कालं रात्रिंदिवात्मकम् । भोकी सुषुम्ना कालस्य गुह्यमेतदुदाहृतम् ॥ १७॥ सूर्याचन्द्रमसाविति ॥ सूर्यश्च चन्द्रमाश्च सूर्याचन्द्रमसौ । इत्यानङ् । रात्रिश्च दिवा चरात्रिंदिवम्। 'अचतुर-' इत्यादिना निपातितः । रात्रिंदिवम् आत्मा स्वरूपं यस्य स रात्रिंदिवात्मकस्तं रात्रिंदिवात्मकं कालं समयं धत्तो विधत्तः कुरुतः। सुषुम्ना सरस्वती कालस्य सूर्याचन्द्रमोभ्यां कृतस्य रात्रिंदिवात्मकस्य सम- यस्य भोक्री भक्षिका विनाशिका । एतद् गुह्यं रहस्यमुदाहृतं कथितम् । अयं भावः- साधं घटिकाइयं सूर्यों वहति । सार्धं घटिकाद्वयं चन्द्रो वहति । यदा सूर्यों वहति तदा दिनमुच्यते । यदा चन्द्रो वहति तदा रात्रिरुच्यते । पञ्चघटिकामध्ये रात्रिंदिवात्मकः कालो भवति । लौकिकाहोरात्रमध्ये योगिनां द्वादशाहोरात्रात्मकः कालव्यवहारों भवति । तादृशकालमानेन जीवानामायुर्मानमस्ति । यदा सुषुम्नामार्गेण वायुर्ब्रह्मरन्ध्र लीनो भवति तदा रात्रिंदिवात्मकस्य कालस्याभावादुक्तम् ' भोक्री सुषुम्ना कालस्य' इति । यावद् ब्रह्मरन्ध्रे वायुीयते तावद्योगिन आयुर्वर्धते । दीर्घकालाभ्यस्तसमाधि- योगी पूर्वमेव मरणकालं ज्ञात्वा ब्रह्मरन्ध्रे वायुं नीत्वा कालं निवारयति स्वेच्छया देह- त्यागं च करोतीति ॥ १७॥ अब प्राणका लय होनेपर कालका जय होता है इसको वर्णन करते ह कि, सूर्य और चन्द्रमा रात्रिदिन है स्वरूप जिसके ऐसे कालको करते हैं और सुषुम्ना जो नाडी है वह सर- स्वतीरूप नाडी सूर्य और चन्द्रमाके किये रात्रिदिनरूप कालको भक्षण करनेवाली है अर्थात् नाशिका है, यह गुप्त वस्तु कही ह । तात्पर्य यह है कि, अढाई घडीतक सूर्य बहता है और अढाई घडीतक चन्द्रमा बहता है, जब सूर्यस्वर बहता है वह दिन कहाता है और जब चन्द्रमा बहता है तब रात्रि कहाती है. इस प्रकार पांच घडीके मध्यमेंही रात्रिदिनरूप काल होजाता है, लौकिक अहोरात्रके मध्यमें योगियोंके बारह अहोरात्र होते हैं और उसी लौकिक कालके मानसे जीवोंकी आयुका प्रमाण है । जब सुषुन्नाके मार्गसे वायु ब्रह्मरन्ध्रमें लीन हो जाता है तब रात्रिदिनरूप कालके अभावसे कहा है कि, सुषुम्ना कालकी भोक्त्री है। जितने कालतक वायु ब्रह्मरन्ध्रमें लीन रहता है उतनेही कालतक योगियोंकी आयु बढती है, बहुत कालतक किया है समाधिका अभ्यास जिसने ऐसा योगी पहिलेही अपने मरणसमयको जानकर और ब्रह्मरन्ध्रमें प्राणवायुको लेजाकर कालका निवारण करता है और अपनी इच्छासे देहका - त्याग करता ह॥१७ ।। दासप्ततिसहस्राणि नाडीद्वाराणि पारे । सुषुम्ना शाम्भवी शक्तिः शेषास्त्वेव निरर्थकाः॥१८॥ १०
(१४६)
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेश:-
द्वासप्ततीति ॥ पञ्जरे पंजरवच्छिरास्थिभिर्बद्धे शरीरे द्वाभ्यामधिका सप्ततिः
द्वासप्ततिः दासप्ततिसंख्याकानि सहस्राणि द्वासप्ततिसहस्राणि नाडीनां शिराणां द्वाराणि
वायुप्रवेशमार्गाः संति, सुषुम्ना मध्यनाडी शांभवी शक्तिरस्ति, शं सुखं भवत्यस्मा-
द्भक्तानामिति शंभुरीश्वरस्तस्येयं शांभवी । ध्यानेन शंभुप्रापकत्वात् । शंभोराविर्भाव-
जनकत्वाद्वा शांभवी । यद्वा शं सुखरूपो भवति तिष्ठतीति शंभुरात्मा तस्येयं
शांभवी चिदभिव्यक्तिस्थानत्वाद्ध्यानेनात्मसाक्षात्कारहेतुत्वाच्च । शेषा इडापिंग-
लादयस्तु निरर्थका एव निर्गतोऽर्थः प्रयोजनं यासां ता निरर्थकाः । पूर्वोक्त-
प्रयोजनाभावात् ॥ १८॥
इस मनुष्यके पंजरमें अर्थात् पंजरके समान शिरा अस्थियोंसे बंधेहुये शरीरमें बहत्तर सहस्र
नाडियोंके द्वार हैं अर्थात् वायुप्रवेश होनेके मार्ग हैं, उनमें सुषुम्ना जो मध्यनाडी है वह शांभवी
शक्ति है अर्थात् तिससे भक्तोंको सुख हो ऐसे शंभु (शिवजी) की शक्ति है,क्योंकि वह नाडी
ध्यानसे शंभुको प्राप्त करती है वा शंभुकी प्रकटताको पैदा करती है, इसीसे शांभवी कहाती है।
अथवा शं (सुख) रूप जो टिकै उस आत्माको शंभु कहते हैं, उसकी जो शक्ति वह शांभवी
कहाती है, क्योंकि वह चैतन्यकी अभिव्यक्ति (प्रकटता) का स्थान है और ध्यानसे आत्माके
साक्षात्कारका हेतु भी सुषुम्ना है और शेष जो इडा पिंगला आदि नाडी हैं वे सब निष्प्रयोजन
हैं अर्थात् उनसे पूर्वोक्त प्रयोजन सिद्ध नहीं होताहै ॥ १८ ॥
वायुः परिचितो यस्मादग्निना सह कुण्डलीम् ।
बोधयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधतः॥ १९॥
वायुरिति॥ यस्मात्परिचितोऽभ्यस्तो वायुस्तस्मादग्निना जठराग्निना सह कुण्डली
शक्तिं बोधयित्वा अनिरोधतोऽप्रतिबंधात्सुषुम्नायां सरस्वत्यां प्रविशेत् वायोः सुषुम्ना-
प्रवेशार्थमभ्यासः कर्तव्य इत्यर्थः ॥ १९ ॥
जिससे परिचित अर्थात् अभ्यास किया वायु जठराग्निके संग कुंडलीशक्तिके बोधन (जगा)
करके निरोध (रोक) के अभावसे सरस्वतीरूप सुषुम्नामें प्रविष्ट होजाताहै इससे वायुका सुषु-
नामें प्रवेशके लिये अभ्यास करना उचित है ॥ १९ ॥
सुषुम्नावाहिनि प्राणे सिद्धयत्येव मनोन्मनी।
अन्यथा त्वितराभ्यासाः प्रयासायैव योगिनाम् ॥२०॥
सुषुम्नेति ॥ प्राणे सुषुम्नावाहिनि सति मनोन्मनी उन्मन्यवस्था सिद्धयत्येव ।
अन्यथा प्राणे सुषुम्नावाहिन्यसति तु इतराभ्यासाः सुषुम्नेतराभ्यासा योगिनां योगा-
भ्यासिनां प्रयासायैव श्रमायैव भवतीत्यर्थः॥२०॥
जब प्राण सुषुम्नामें बहने लगताहै तब मनोन्मनी अवश्य सिद्ध होजाती है और प्राणके
सुषुम्नावाही न होनेपर तो सुषुम्नाके अभ्याससे भिन्न जितने अभ्यास योगियोंके हैं वे सब
वृथा है अर्थात परिश्रमके ही जनक होनेसे उनसे कोई अर्थ सिद्ध नहीं होताहै ॥ २० ॥
चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१४७) पवनो बध्यते येन मनस्तेनैव बध्यते । मनश्च बध्यते येन पवनस्तेन बध्यते ॥२१॥ पवन इति ॥ येन योगिना पवनः प्राणवायुर्वध्यते बद्धः क्रियते तेनैव योगिना मनो बध्यते । येन मनो बध्यते तेन पवनो बध्यते । मनःपवनयोरेकतरे बढे उभयं बद्धं भवतीत्यर्थः ॥ २१ ॥ योगी जिससे पवनका बंधन करलेता है उसीसे मनको भी बंधन करलेता है और जिस कारणसे मनका बंधन कर सकता है उसी रीतिसे प्राणकोभी बांध सकता है अर्थात् मन और पवन इन दोनोंमेंसे एकके बंधनसे दोनोंका बंधन हो सकता है ॥ २१ ॥ हेतुद्वयं तु चित्तस्य वासना च समीरणः। तयोविनष्ट एकस्मिस्तौ द्वावपि विनश्यतः॥२२॥ हेतुद्वयं तु चित्तस्येति ॥ चित्तस्य प्रवृत्तौ हेतुद्वयं कारणद्वयमस्ति, किं तदि- त्याह-वासना भावनाख्यः संस्कारः, समीरणः प्राणवायुश्च । तयोर्वासनासमीरणयो- रेकस्मिन् विनष्टे सति क्षीणे सति तौ दावपि विनश्यतः । अयमाशयः-वासनाक्षये समीरणचित्ते क्षीणे भवतः। समीरणे क्षीणे चित्तवासने क्षीणे भवतः । चित्ते क्षीणे समी- रणवासने क्षीणे भवतः । तदुक्तं वासिष्ठे-द्वे बीजे राम चित्तस्य प्राणस्पन्दनवासने। एकस्मिंश्च तयोर्नष्टे क्षिप्रं दे अपि नश्यतः ॥' तत्रैव व्यतिरेकेणोक्तम्-'यावद्विलीनं न मनो न तावदासनाक्षयः । न क्षीणा वासना यावच्चित्तं तावन्न शाम्यति ॥ न यावद्याति विज्ञानं न तावञ्चित्तसंक्षयः । यावन्न चित्तोपशमो न तावत्तत्त्ववेदनम् ।। यावन्न वासनानाशस्तावत्तत्त्वागमः कुतः । यावन्न तत्त्वसम्प्राप्तिर्न तावदासनाक्षयः ॥ तत्त्वज्ञानं मनोनाशो वासनाक्षय एव च । मिथः कारणतां गत्वा दुःसाध्यानि स्थितान्यतः ॥ त्रय एते समं यावन्न स्वभ्यस्ता मुहुर्मुहुः । तावन्न तत्त्वसम्प्राप्तिर्भव- त्यपि समाश्रितः ॥' इति ॥ २२ ॥ चित्तकी प्रवृत्तिमें दो हेतु हैं एक तो वासना अर्थात् भावना नामका संस्कार और प्राण- वायु, वासना और प्राणवायु इन दोनोंमेंसे एकके नष्ट होनेपर वे दोनोंभी नष्ट हो जाते हैं। यहां यह आशय है कि, वासनाके क्षय होनेपर पवन और चित्त नष्ट होजाते हैं और पवनके क्षीण होनेपर चित्त और वासना नष्ट होजाते हैं और चित्तके क्षीण होनेपर पवन और वासना क्षीण होजातेहैं। सोई वासिष्टमें कहा है कि, हे राम! प्राणकी क्रिया और वासना ये दोनों चित्तके बीज हैं, उन दोनोंके मध्यमें एकके नष्ट होनेपर वे दोनोंभी नष्ट होजातेहैं और वासिष्ठमें ही व्यतिरेक (निषेध) के द्वारा कहा है कि, जबतक मनका लय नहीं होता तबतक वासनाका क्षय नहीं होता है और जबतक वासनाका क्षय नहीं होता तबतक चित्त शांत नहीं होता है और जबतक विज्ञान नहीं होता तबतक चित्तका संक्षय नहीं होता है और जबतक चित्त शांत नहीं होता तबतक तत्त्वज्ञान नहीं होता है और जबतक वासनाका नाश न हो तबतक तत्त्वका (१४८) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- आगमन कहां और जबतक तत्त्वका आगम (प्राप्ति) न हो तबतक वासनाका क्षय नहीं होता। इससे तत्त्वज्ञान मनका नाश और वासनाका क्षय ये तीनों परस्पर कारण होकर दुःखसे साध्यरूप होकर स्थित हैं, इससे जबतक इन तीनोंका सम रीतिसे वारंवार अभ्यास न किया जाय तबतक अन्य कारणोंसे तत्त्व (ब्रह्मज्ञान) की संप्राप्ति नहीं होती है ॥ २२ ॥ मनो यत्र विलीयेत पवनस्तत्र लीयते । पवनो लीयते यत्र मनस्तत्र विलीयते ॥२३॥ मन इति ॥ यत्र यस्मिन्नाधारे मनो लीयते तत्र तस्मिन्नाधारे पवनो विलीयत इत्यन्वयः ॥२३॥ जिसमें मनका लय होता है वहांही पवनका लय हो जाता है और जहां पवनका लय होता है वहां ही मनभी लीन हो जाता है ॥ २३ ।। दुग्धाम्बुवत्समिलितावुभौ तौ तुल्यक्रियौ मानसमारुतौ हि । यतो मरुत्तत्र मनःप्रवृत्तियतो मनस्तत्र मरुत्प्रवृत्तिः॥२४॥ दुग्धांबुबदिति ॥ दुग्धाम्बुवत्क्षीरनीरवत्समिलितौ सम्यक् मिलितो तावुभी द्वावपि मानसमारुतौ मानसं च मारुतश्च मानसमारुतौ चित्तप्राणौ तुल्यक्रियौ तुल्या समा क्रिया प्रवृत्तिर्ययोस्तादृशौ भवतः । तुल्यक्रियत्वमेवाह-यत इति । यतः यत्र । सार्वविभक्तिकस्तसिः। यस्मिन् चक्रे मरुद्वायुः प्रवर्तते तत्र तस्मिन् चक्रे मनःप्रवृत्तिः मनसः प्रवृत्तिर्भवति । यतो यस्मिन् चक्रे मनः प्रवर्तते तत्र तस्मिश्चक्रे मरुत्प्रवृत्तिः वायोः प्रवृत्तिर्भवतीत्यर्थः। तदुक्तं वासिष्ठे-'अविनाभाविनी नित्यं जन्तूनां प्राण- चेतसी । कुसुमामोदवन्मिश्रे तिलतैले इवास्थिते ॥ कुरुतश्च विनाशेन कार्य मोक्षाख्य- मुत्तमम् ॥' इति ॥ २४॥ दूध और जलके समान मिलेहुये मन और पवनरूप जो चित्त और प्राण हैं वे दोनों तुल्य- क्रिय हैं अर्थात् दोनोंकी प्रवृत्ति तुल्य होती है अर्थात् जिस नाडियोंके चक्रमें वायु प्रवृत्त होता है उसी चक्रमें मनकी प्रवृत्ति होती है और जिस चक्रमें मन प्रवृत्त होताहै उसी चक्रमें वायुकी प्रवृत्ति होती है। सोई वासिष्ठमें कहा है कि, प्राणियोंके प्राण और चित्त दोनों अविना- भावी हैं अर्थात् एकके विना एक नहीं हो सकता है और पुष्प और सुगंधके समान मिलेहुए तिल और तेलके समान स्थित हैं और ये अपने विनाशसे मोक्षरूप उत्तम कार्यको करते हैं।२४ तत्रैकनाशादपरस्य नाश एकप्रवृत्तेरपरप्रवृत्तिः। अध्वस्तयोश्चेन्द्रियवर्गवृत्तिःप्रध्वस्तयोर्मोक्षपदस्य सिद्धिः॥२६॥ तत्रेति ॥ तत्र तयोर्मानसमारुतयोर्मध्ये एकस्य मानसस्य वा मारुतस्य नाशाल्लया- दपरस्यान्यस्य मारुतस्य मानसस्य वा नाशो लयो भवति । एकप्रवृत्तेरेकस्य मान, सस्य मारुतस्य वा प्रवृत्तेापारादपरप्रवृत्तिरपरस्य मारुतस्य मानसस्य वा प्रवृत्ति चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेती। (१४९) ापारो भवति । अध्वस्तयोरलीनयोर्मानसमारुतयोः सतोरिन्द्रियवर्गवृत्तिरिन्द्रियसमु- दायस्य स्वस्वविषये प्रवृत्तिर्भवति। प्रध्वस्तयोः प्रलीनयोस्तयोः सतोमोक्षपदस्यमोक्षाख्य- पदस्य सिद्धिनिष्पत्तिर्भवति । तयोर्लये पुरुषस्य स्वरूपेऽवस्थानादित्यर्थः। तत्रापि साध्यः पवनस्य नाशः षडङ्गयोगादिनिषेवणेन । मनोविनाशस्तु गुरोः प्रसादानिमेष- मात्रेण सुसाध्य एव ॥' योगबीजे मूलश्लोकस्यायमुत्तरः श्लोकः ॥२५॥ उन दोनों पवन और मनके मध्यमें एक मन वा पवनके नाशसे दूसरा पवन वा मनका नाश होता है और एक मन पवनके व्यापारसे दूसरे मन वा पवनका व्यापार होता है और जबतक मन और पवन नष्ट नहीं होते तबतक सम्पूर्ण इन्द्रियोंका समुदाय अपने २ विषयमें प्रवृत्त होता है और जब मन और प्राणका भलीप्रकार लय हो जाता है तब मोक्षरूप पदकी सिद्धि होती है, क्योंकि इन दोनोंका लय होनेपर पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति होजाती है और इस मूलके श्लोकके उत्तरश्लोक योगबीजमें यह लिखा है कि, षडंगयोग आदिके सेव- नसे पवनका नाश साधन करने योग्य है और मनका विनाश तो गुरुके प्रसादुद्वारा निमेष- मात्रसे सुसाध्य है ॥ २५ ॥ रसस्य मनसश्चैव चञ्चलत्वं स्वभावतः। रसो बद्धो मनो बद्धं किं न सिद्धयति भूतले ॥२३॥ रसस्येति ॥ रसस्य पारदस्य मनसो मानसस्य स्वभावतः स्वभावाच्चञ्चलत्वं चांचल्यमस्ति । रसः पारदो बद्धश्चेन्मनश्चित्तं बद्धं भवति । ततो भूतले पृथिवीतले किं न सिद्धयति सर्व सिध्यतीत्यर्थः॥ २६। और रस (पारा) और मन ये दोनों स्वभावसे चञ्चल हैं। यदि रस और मन ये दोनों बन्धजायँ तो भूतलमें ऐसी वस्तु कौनहै जो सिद्ध न हो सकै अर्थात् सब पदार्थ सिद्ध हो सकते हैं ॥ २६॥ तदेवाह- मूच्छितो हरते व्याधीन मृतो जीवयति स्वयम् । बद्धः खेचरतां धत्ते रसो वायुश्च पार्वति ॥२७॥ मूच्छित इति ॥ औषधिविशेषयोगेन गत चापलो रसो मूच्छितः, कुम्भकान्ते रेचकनिवृत्तो वायुर्मूच्छित इत्युच्यते । हे पार्वतीति पार्वतीसुबोधायेश्वरवाक्यम् । मूछितो रसः पारदो वायुः प्राणश्च व्याधीन रोगान् हरते नाशयति । भस्मीभूतो रसो ब्रह्मरन्ध्र लीनो वायुश्च मृतः स्वयमात्मना स्वसामर्थ्येनेत्यर्थः । जीवयति दीर्घकालं जीवनं करोति । क्रियाविशेषेण गुटिकाकारकृतो रसः बद्धो भ्रूमध्यादौ धारणाविशेषण धृतो वायुश्च बद्धः खेचरताभाकाशगतिं धत्ते विधत्ते करोतीत्यर्थः । तदुक्तं गोरक्ष- शतके-'यद्भिन्नाञ्जनपुञ्जसन्निभमिदं वृत्तं भ्रुवोरन्तरे तत्त्वं वायुमयं पकारसहितं तत्रे- - (१५०) हठयोगप्रदीपिका । [उपदेश:- श्वरो देवता । प्राणं तत्र विलाप्य पञ्चघटिकं चित्तान्वितं धारयेदेषा खे गमनं करोति यमिनां स्याद्वायुना धारणा ॥' इति ॥ २७ ॥ औषधिविशेषके योगसे नष्टहुई है चपलता जिसकी ऐसा रस मूच्छित कहाता है और कुंभ- कके अन्तमें रेचकसे निवृत्त वायुको मूछित कहते हैं, हे पार्वती ! मूच्छित कियाहुआ पारद और प्राणवायु सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करता है और माराहुआ अर्थात् भस्म कियाहुआ पारा और ब्रह्मरंध्रमें लीन प्राणवायु यह अपने सामर्थ्यसे मनुष्यको दीर्घकालतक जिवा सकता है और बद्ध किये हुए वे दोनों अर्थात् क्रियाविशेषसे गुटिकाकार कियाहुआ पाराऔर भ्रुकुटियोंके मध्य आदिमें धारणविशेषसे धारण किया हुआ प्राणवायु ये दोनों आकाशगतिको करते हैं अर्थात् वह योगी पक्षियोंके समान आकाशमें उड़ सकता है। सोई गोरक्षशतकमें कहा है कि, भिन्नांजनपुंजके समान अर्थात् पिसे हुए अंजनके समूहकी तुल्य गोलाकारवायुरूप और पकार- (अंतःकरण) सहित तत्त्व (प्राण) भ्रुकुटियोंके मध्यमें है, उस तत्त्वका ईश्वर देवता है, उस ईश्वरमें प्राणको चित्तसहित लय करके पांचघटीपर्यंत धारण करे, यह वायुके संग चित्तको धारणा योगीजनोंका आकाशमें गमन करती है ॥ २७ ॥ मनःस्थैर्य स्थिरो वायुस्ततो बिन्दुः स्थिरो भवेत् । बिन्दुस्थैर्यात्सदा सत्त्वं पिण्डस्थैर्य प्रजायते ॥२८॥ मनःस्थैर्य इति ॥ मनसः स्थैर्ये सति वायुः प्राणः स्थिरो भवेत् । ततो वायु- स्थैर्याद्विन्दुर्वीय स्थिरो भवेत् । बिन्दोः स्थैर्यात्सदा सर्वदा सत्त्वं बलं पिण्डस्थैर्य देह- स्थैर्य प्रजायते ॥ २८॥ मनकी स्थिरता होनेपर प्राणभी स्थिर होता है और वायुकी स्थिरतासे वीर्यको स्थिरता होती है और वीर्यकी स्थिरतासे सदैव बल होता है और उससेही देहको स्थिरता होतीहै ।। २८ ।। इन्द्रियाणां मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुतः। मारुतस्य लयो नाथः स लयो नादमाश्रितः॥२९॥ इन्द्रियाणामिति ॥ इन्द्रियाणां श्रोत्रादीनां मनोऽन्तःकरणं नाथः प्रवर्तकः । मनोनाथो मनसो नाथो मारुतः प्राणः । मारुतस्य प्राणस्य लयो मनोविलयो नाथः स लयो मनोलयः नादमाश्रितो नादे मनो लीयत इत्यर्थः ॥ २९ ॥ श्रोत्र आदि इन्द्रियोंका नाथ ( प्रवर्तक) अन्तःकरण मन है और मनका नाथ प्राण है और प्राणका नाथ मनका लय है और वह मनका लय नादके आश्रित है अर्थात् नादमें मनका लय होता है ॥ २९ ॥ सोऽयमेवास्तु मोक्षाख्यो माऽस्तु वापि मतान्तरे। मनःप्राणलये कश्चिदानन्दः सम्प्रवर्तते ॥३०॥ सोऽयमिति ॥ सोऽयमेव चित्तलय एव मोक्षाख्यो मोक्षपदवाच्यः । मतान्तरे अन्यमते माऽस्तु वा । चित्तलयस्य सुषुप्तावपि सत्त्वान्मनःप्राणयोर्लये सति कश्चि-
FARMER
चतुर्थः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१५१)
दनिर्वाच्य आनन्दः सम्प्रवर्तते सम्यक् प्रवृत्तो भवति । अनिर्वाच्यानन्दाविर्भाव जीव-
न्मुक्तिसुखं भवत्येवेति भावः ॥ ३० ॥
सो यही चित्तका लय मोक्षरूप है अर्थात् इसकोही मोक्ष कहते हैं अथवा मतांतर में इसको
मोक्ष मत मानो, क्योंकि चित्तका लय सुषुप्तिमें भी होता है तो भी मन और प्राणके लय
होनेपर जो कुछ अकथनीय आनन्द प्रकट होता है उस अनिर्वचनीय आनन्दके प्रकट होनेपर
जीवन्मुक्तिरूप सुख अवश्य होता है ॥३०॥
प्रनष्टश्वासनिश्वासः प्रध्वस्तविषयग्रहः।
निश्चेष्टो निर्विकारश्च लयो जयति योगिनाम् ॥३१॥
प्रनष्टेति ॥ श्वासश्च निश्वासश्च श्वासनिश्वासौ प्रनष्टौ लीनौ श्वासनिश्वासौ यस्मिन्
स तथा बाह्यवायोरन्तःप्रवेशनं श्वासः, अन्तःस्थितस्य वायोहिनिःसरणं निश्वासः,
प्रध्वस्तः प्रकर्षेण ध्वस्तो नष्टो विषयाणांशब्दादीनां ग्रहो ग्रहणं यस्मिन्, निर्गता चेष्टा
कायक्रिया यस्मिन्, निर्गतो विकारोऽन्तःकरणक्रिया यस्मिन् एतादृशो योगिनां
लयोऽन्तःकरणवृत्तेध्येयाकारा वृत्तिर्जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते ॥ ३१ ॥
जिसमें श्वास और निःश्वास भलीप्रकार नष्ट होजाय अर्थात् बाहरकी पवनका जो भीतर
प्रवेश वह श्वास और भीतरकी पवनका बाहर निकासना यह निश्वास यह दोनों जिसमें
न रहैं और इन्द्रियोंसे विषयोंका ग्रहण करनाभी जिससे भलीप्रकार नष्ट होजाय और देहकी
क्रियारूप चेष्टाभी जिसमें न रहै और अन्त:करणका क्रियारूप विकारभी जिसमें न हो ऐसा
जो योगियोंका लय है अर्थात् ध्यान करने योग्य वस्तुके आकारकी जो अन्तःकरणवृत्ति है वह
सबसे उत्तम ह ॥ ३१ ॥
उच्छिनसर्वसङ्कल्पो निःशेषाशेषचेष्टितः।
स्वावगम्यो लयः कोऽपि जायते वागगोचरः॥३२॥
उच्छिन्नेति ॥ उच्छिन्ना नष्टाः सर्वे संकल्पा मनःपरिणामा यस्मिन् स तथा,
निर्गतः शेषो येभ्यस्तानि निःशेषाण्यशेषाणि चेष्टितानि यस्मिन् स तथा, स्वेनैवाव-
गन्तुं बोटुं शक्यः स्वावगम्यः वाचामगोचरोऽविषयः कोऽपि विलक्षणो लयः जायते
योगिनां प्रादुर्भवति ॥ ३२ ॥
जिसमें मनके परिणामरूप सम्पूर्ण संकल्प नष्ट होगये हों और जिसमें सम्पूर्ण चेष्टित न रहे
हों अर्थात् कर चरण आदिका व्यापार निवृत्त हो और जो अपने आपही जानने योग्य हो अर्थात्
जिसको अन्य पुरुष न जान सके और जो वाणीका भी अगोचर हो अर्थात् वाणीभी जिसको
न कह सके ऐसा विलक्षण लय योगीजनोंको प्रगट (उत्पन्न) होताहै ॥ ३२॥
यत्र दृष्टिर्लयस्तत्र भूतेन्द्रियसनातनी ।
सा शक्तिीवभूतानां दे अलक्ष्ये लयं गते ॥ ३३ ॥
(१५२)
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेश:-
यत्र दृष्टिरिति ॥ यत्र यस्मिन्विषये ब्रह्मणि दृष्टिरन्तःकरणवृत्तिस्तत्रैव लयों
भवति । भूतानि पृथिव्यादीनि इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि सनातनानि शाश्वतानि यस्यां
सा सत्कार्यवादेऽविद्यायां कार्यजातस्य सत्त्वात् । जीवभूतानां प्राणिनां शक्तिर्विद्या इमे
दे अलक्ष्ये ब्रह्मणि लयं गते योगिनामिति शेषः ॥ ३३ ॥
जिस ब्रह्मरूप विषयमें अन्तःकरणकी वृत्ति होती है उसीमें मनका लय होताहै और पृथ्वी
आदि पंच महाभूत आर श्रोत्र आदि इन्द्रिय ये जिसमें न हों वह अविद्या, क्योंकि सत्कार्य-
वाद मतमें अविद्यामें सम्पूर्ण कार्यका समूह रहता ह, सत्कार्यवाद मत यह है कि, घट आदि
कार्य सत्रूप है-और प्राणियोंकी शक्तिरूप विद्या, ये अविद्या और विद्यारूप दोनों अलक्ष्य
ब्रह्ममेंही योगियोंके लय हो जाते हैं ॥ ३३ ॥
लयो लय इति प्राहुः कीदृशं लयलक्षणम् ।
अपुनर्वासनोत्थानाल्लयो विषयविस्मृतिः॥ ३४ ॥
लय इति ॥ लयो लय इति प्राहुर्वदंति बहवः। लयस्य लक्षणं लयस्वरूपं कशि-
मिति प्रश्नपूर्वकं लयस्वरूपमाह-अपुनरिति । अपुनर्वासनोत्थानात्पुनर्वासनास्थाना-
भावाद्विषयविस्मृतिविषयाणां शब्दादीनां ध्येयाकारस्य विषयस्य वा विस्मृतिर्लयो
लयशब्दार्थ इत्यर्थः॥ ३४॥
बहुतसे मनुष्य लय एसा कहते हैं परन्तु लयका लक्षण (स्वरूप ) क्या है ऐसा कोई
पूछे तो शब्द आदि सम्पूर्ण विषयोंकी वा ध्यान करनेयोग्य विषयकी जो विस्मृति उसको
लय कहते हैं, क्योंकि उस मनमें फिर वासना नहीं उठती हैं वा वह मन फिर वासनाओंका
स्थान नहीं रहता है ॥ ३४ ॥
वेदशास्त्रपुराणानि सामान्या गणिका इव ।
एकैव शाम्भवी मुद्रा गुप्ता कुलवधूरिव ॥ ३९ ॥
वेदेति ॥ वेदाश्चत्वारः शास्त्राणि षट् पुराणान्यष्टादश सामान्या गणिका इव
वेश्या इव । बहुपुरुषगम्यत्वात् । एका शांभवी मुद्रैव कुलवधूरिव कुलस्त्रीव गुप्ता ।
पुरुषविशेषगम्यत्वात् ॥ ३५ ॥
चारों वेद आर छहों शास्त्र और अष्टादश पुराण ये सब सामान्य गणिका (वेश्या) के
समान हैं, क्योंकि ये अनेक पुरुषोंके जानने योग्य हैं और एक पूर्वोक्त शांभवीमुद्राही कुल-
वधूके समान गुप्त है, क्योंकि उसको कोई विरला मनुष्यही जान सकता है ।। ३५ ॥
चित्तलयाय प्राणलयसाधनीभूतां मुद्रां विवक्षुस्तत्र शांभवी मुद्रामाह-
अन्तर्लक्ष्यं बहिर्दृष्टिनिमेषोन्मेषवर्जिता।
एषा सा शाम्भवी युद्रा वेदशास्त्रेषु गोपिता ॥ ३६॥
- चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। अन्तलक्ष्यमिति ॥ अन्तः आधारादिब्रह्मरन्ध्रान्तेषु चक्रेषु मध्ये स्वाभिमते चके लक्ष्यमन्तःकरणवृत्तिः। बहिर्दैहादहि प्रदेशे दृष्टिः चक्षुःसंबन्धः । कीदृशी दृष्टिः ? निमेषोन्मेषवर्जिता निमेषः पक्ष्मसंयोगः, उन्मेषः पक्ष्मसंयोगविश्लेषः ताभ्यां वर्जिता रहिता चित्तस्य ध्येयाकारावेशे निमेषोन्मेषवर्जिता दृष्टिर्भवति । सोक्तैषा मुद्रा शांभवी शंभोरियं शांभवी शिवप्रिया शिवाविर्भावजानिका वा भवति । कीदृशी ? वेदशास्त्रेषु गोपिता वेदेषु ऋगादिषु शास्त्रेषु सांख्यपातञ्जलादिषु गोपिता रक्षिता ॥ ३६ ॥ चित्तके लयार्थ प्राणलयका साधन जो शांभवीमुद्रा उसके कथनके अभिलाषी आचार्य मुद्राका वर्णन करते हैं कि, भीतरके जो आधार आदि चक्र हैं उनके मध्यमें अपनेको अभीष्ट जो चक्र हो उसमें लक्ष्य (अंतःकरणकी वृत्ति) हो और बाहिरके विषयोंमें जो दृष्टि हो वह निमेष और उन्मेषसे वर्जित हो अर्थात् पक्ष्म (पलक ) के संयोग और वियोगसे हीन हो, क्योंकि चित्तमें ध्यान करनेके योग्य जो वस्तु उसके आकारके आवेश होनेसे निमेषरहित प्रकाशित हो नेत्र बने रहते हों, वेद और शास्त्रोंमें गुप्त यह मुद्रा अर्थात् ऋग्वेद आदि वेद और सांख्य पातंजल आदि शास्त्रोंमें भी छिपीहुई यह मुद्रा शांभवी कहाती है कि, इससे शंभुका आविर्भाव (प्रकटता) होता है वा यह मुद्रा शंभु भगवान्ने कही है ॥ ३६ ।। शांभवीं मुद्रामभिनीय दर्शयति- अन्तर्लक्ष्यविलीनचित्तपवनो योगी यदा वर्तते दृष्टया निश्चलतारया बहिरधः पश्यन्नपश्यन्नपि । मुद्रेयं खलु शाम्भवी भवति सा लब्धा प्रसादाद गुरोः शून्याशून्यविलक्षणं स्फुरति तत्तत्त्वं परं शांभवम् ॥ ३७॥ अन्तर्लक्ष्यमिति ॥ यदा यस्यामवस्थायामन्तः अनाहतपद्मादौ यल्लक्ष्यं सगु- णेश्वरमूर्त्यादिकं तत्त्वमस्यादिवाक्यलक्ष्यं जीवेश्वराभिन्नमहं ब्रह्मास्मीति वाक्यार्थभूतं ब्रह्म वा तस्मिन्विलीनौ विशेषेण लीनौ चित्तपवनौ मनोमारुतौ यस्य स तथा योगी वर्तते, निश्चलतारया निश्चला स्थिरा तारा कनीनिका यस्य तादृश्या दृष्टया बहिर्देहात बहिःप्रदेशे पश्यन्नपि चक्षुःसम्बन्धं कुर्वन्नपि अपश्यन् बाह्यविषयग्रहणमकुर्वन् वर्तते आस्ते । खल्विति वाक्यालंकारे । इयमुक्ता शांभवी मुद्रा शांभवीनामिका मुद्रयति क्केशानिति मुद्रा गुरोर्देशिकस्य प्रसादात्प्रीतिपूर्वकादनुग्रहाल्लब्धा प्राप्ता चेत्तदिदमिति वक्तुमशक्यं शांभवं शांभवीमुद्रायां भासमानं पदं पद्यते गम्यते योगिभिरिति पदमात्म- स्वरूपं शून्याशून्यविलक्षणं ध्येयाकारवृत्तेः सद्भावाच्छून्यविलक्षणं तस्या अपि भाना- भावादशून्यविलक्षणं तत्त्वं वास्तविकं वस्तु स्फुरति प्रतीयते । तथा चोक्तम्- अन्तर्लक्ष्यमनन्यधीरविरतं पश्यन्मुदा संयमी दृष्टयुन्मेषनिमेषवर्जितमियं मुद्रा भवेच्छाम्भवी ।
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेश:-
गुप्तेयं गिरिशेन तन्त्रविदुषा तंत्रेषु तत्त्वार्थिना-
मेषा स्याद्यमिनां मनोलयकरी मुक्तिप्रदा दुर्लभा ॥
ऊर्ध्वदृष्टिरधोदृष्टिरूज़वेधो ह्यधःशिराः ।
राधायंत्रविधानेन जीवन्मुक्तो भवेक्षितौ ॥” इति ॥ ३७॥
अब शांभवीमुद्राके स्वरूपको घटाकर दिखाते हैं कि, जिस काल में योगी इस प्रकार वतें
अर्थात् स्थित रहैं कि, भीतर अनाहत (निश्चल) पद्म आदिमें जो सगुण मूर्ति आदि लक्ष्य
है वा 'तत्त्वमसि'आदि महावाक्योंसे लक्ष्य जो जीव ईश्वरके अभेदरूप मैं ब्रह्म हूँ इस वाक्यका
अर्थरूप ब्रह्म हैं उसमें ही विशेषकर जिसके चित्त और पवन (प्राण) ये दोनों लीन हो और
निश्चल है तारे जिसमें ऐसी दृष्टि ( नेत्र) से देहसे बाहिरके देशमें देखताहुआभी अद्रष्टाके
समान हो अर्थात् बाहिरके विषयको न जानता हुआ अधोदृष्टि रहताहै-यह पूर्वोक्त शांभवी
नामकी मुद्रा है और जो क्लेशोंको छिपाले उसे मुद्रा कहते हैं-यदि यह मुद्रा गुरुके प्रसादसे
प्राप्त होजाय तो वह शांभव शंभुभगवान्का तत्त्व जिसको इस प्रकार नहीं बता सकते कि,
'यह है' शांभवीमुद्रामें भासमान वह योगियोंको प्राप्त होनेयोग्य आत्मारूप तत्त्व अर्थात् ध्येया-
कार वृत्तिके होनेसे शून्यसे विलक्षण और अंतमें ध्येयाकारवृत्तिकेभी अभावसे अशून्यसे
विलक्षण वास्तविक वस्तु योगीजनोंके मनमें स्फुरती है अर्थात् प्रतीत होती है । सोई कहा है
कि-"अनन्यबुद्धि होकर अर्थात् अन्यविषयमें बुद्धिको न लगाकर भीतरके लक्ष्य (ब्रह्म) को
दृष्टिके उन्मेष निमेषसे वर्जित नेत्रोंसे निरंतर आनंदसे देखताहुआ संयमी ( योगी)
होय तो यह शांभवीमुद्रा होती है और तंत्रके ज्ञाता गिरिश (शिव) ने यह गुप्त रक्खी है
और यह दुर्लभ मुद्रा तत्त्वके अभिलाषी योगीजनोंके मनको लय करती है और मुक्तिको भली-
प्रकार देती है और ऊर्ध्व और अधोदृष्टि होकर और ऊर्ध्ववेध और अधःशिर होकर स्थित
योगी इस राधायंत्रके विधानसे भूमिमें रहताहुआ भी जीवन्मुक्त होताहै " भावार्थ-यह है
कि, भीतरके लक्ष्यमें लयहुये हैं चित्त पवन जिसके और निश्चल है तारा जिसके ऐसी दृष्टिसे
बाहिरके विषयको देखताहुआ भी न देखनेके ससान हो ऐसे योगीकी यह शांभवीमुद्रा होती
है। यदि यह गुरुके प्रसादसे प्राप्त हो जाय तो योगीको शून्य अशून्यसे विलक्षण जो शंभुका
पदरूप परमतत्त्व है वह प्रतीत होताहै ।। ३७ ।।
श्रीशाम्भव्याश्च खेचर्या अवस्थाधामभेदतः।
भवेच्चित्तलयानन्दःशून्ये चित्सुखरूपिणि ॥ ३८॥
श्रीशांभव्या इति ॥ श्रीशांभव्याः श्रीमत्याः शांभवीमुद्रायाः खेचरीमुद्रायाश्च
अवस्थाधामभेदतः अवस्थाऽवस्थितिर्धाम स्थानं तयोर्भेदाच्छांभव्यां बहिर्दृष्टया बहिः
स्थितिः खेचर्या भ्रूमध्यदृष्टयाऽवस्थितिः । शांभव्यां हृदयं भावनादेशः खेचर्या भ्रूमध्य
एव देशः। तयोर्भेदाभ्यां शून्ये देशकालवस्तुपरिच्छेदशून्ये सजातीयविजातीयस्वगत-
भेदशून्ये वा चित्सुखरूपिणि चिदानंदस्वरूपिण्यात्मनि चित्तलयानंदो भवेत्स्यात् ।
श्रीशांभवीखेचोरवस्थाधामरूपसाधनांशे भेदः, नतु चित्तलयानन्दरूपफलांश इति
भावः ॥ ३८॥
चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१५५) इस पूर्वोक्त श्रीमती शांभवीमुद्राके और खेचरीमुद्राके द्वारा अवस्था और धाम (स्थान) के भेदसे अर्थात् शांभवीमुद्रामें बाहिर दृष्टिसे बहिःस्थिति और खेचरीमुद्रामें भ्रुकुटीका :मध्यमें दृष्टिसे स्थिति होती है और शांभवी में हृदय भावनाका देश है और खेचरीमें भ्रुकुटीका मध्य ही देश है, इन दोनों भेदोंसे देश काल वस्तुके परिच्छेदसे और सजातीय विजातीय स्वगत- रूप भेदसे शून्य ( रहित) चिदानंद स्वरूप आत्मामें चित्तके लयका आनंद होता है अर्थात् दोनों शांभवी खेचरीमुद्राओंका अवस्था और धामरूप साधन अंशमें तो भेद है और चित्त- लयके आनंदरूप फलके अंशमें भेद नहीं है ॥ ३८॥ उन्मनीमुद्रामाह- तारे ज्योतिषि संयोज्य किंचिदुन्नमयेद् ध्रुवौ । पूर्वयोगं मनो युञ्जनुन्मनीकारकः क्षणात् ॥ ३९ ॥ तारे इति ॥ तारे नेत्रयोः कनीनिके ज्योतिषि तारयो साग्रे योजनात्प्रकाश- माने तेजसि संयोज्य संयुक्ते कृत्वा ध्रुवौ किंचित्स्वल्पमुन्नमयेदूर्ध्वं नयेत् । पूर्वः पूर्वो- क्तोऽन्तर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिरित्याकारको योगो युक्तिर्यस्मिन् तत्तादृशं मनोऽन्तःकरणं युंजन युक्तं कुर्वन् योगी क्षणान्मुहूर्तादुन्मनीकारक उन्मन्यवस्थाकारको भवति ॥ ३९ ॥ अब उन्मनीमुद्राका वर्णन करते हैं कि, नेत्रोंकी कनीनिकारूप ताराको ज्योतिमें अर्थात् तारोंको नासिकाके अग्रभागमें संयोग करनेसे प्रकाशमान जो तेज उसमें संयुक्त करके भृकुटियोंको किंचित् (कुछेक ) ऊपरको करदे और पूर्वोक्त जो अंत:लक्ष्य बहिःदृष्टि (भीतर लक्ष्य बाहिर दृष्टि ) रूप योग है जिसमें ऐसा अंत:करण (मन) उसको युक्त करता हुआ योगी क्षणमात्रमें उन्मनी अवस्थाका कारक होताहै अर्थात् पूर्वोक्त अवस्थासे स्थित योगीका उन्मनीमुद्रा होती है ॥ ३९ ॥ उन्मनीमन्तराऽन्यस्तरणोपायो नास्तीत्याह- केचिदागमजालेन केचिनिगमसङ्कुलैः । केचित्तण मुह्यन्ति नैव जानन्ति तारकम् ॥ ४० ॥ केचिदिति ॥ केचिच्छास्वतन्त्रादिविदः आगच्छन्ति बुद्धिमारोहन्त्यर्था येभ्य इत्यागमाः शास्वतन्त्रादयस्तेषां जालैर्जालवबंधनसाधनस्तदुक्तैः फलैर्मुह्यति मोहं प्राप्नुवन्ति । तत्रासक्ता बध्यन्त इति भावः । केचिद्वैदिका निगमसंकुलैनिंगमानां निग- मोक्तानां संकुलैः फलवाहुल्यैर्मुह्यति । केचिदैशेषिकादयस्तर्केण स्वकल्पितयुक्ति- विशेषेण मुह्यन्ति । तारयतीति तारकस्तं तारकं तरणोपायं नैव जानन्ति । उक्तोन्मन्येव तरणोपायस्तं न जानन्तीत्यर्थः॥ ४० ॥ अब इसका वर्णन करते हैं कि, उन्मनीके विना अन्य तरनका उपाय नहीं है कि, कोई शास्त्र और तन्त्र आदिके ज्ञाता आगमके जालसे अर्थात् जिससे बुद्धिमें पदार्थ आजाय उन्हें आगम कहते हैं वे शास्त्र और तंत्ररूपोंके समूहसे मोहको प्राप्त होजाते हैं अर्थात् जालके समान बंध- नके कर्ता जो शास्त्रतंत्रमें कहे हुये फल उनमेंही मोहित रहते हैं उनमें आसक्त हुये बंध जाते हैं - (१५६) हठयोगप्रदीपिका। [उपदेश:- और कोई निगम (वेद) में कहे जो फलोंके समुदाय उससे ही मोहित रहते हैं और कोई वैशेषिक आदि अपनी कल्पना किये हुये जो युक्तिरूप विशेष तर्क उनसेही मोहित रहते हैं-परन्तु तारकको नहीं जानते हैं अर्थात् संसार समुद्रके तरनेका उपाय जो पूर्वोक्त उन्मनी उसको नहीं जानते हैं । भावार्थ यह है कि, कोई शास्त्र और तंत्रके जालसे कोई वेदोक्त फलोंसे कोई तकसे मोहित रहते हैं, परन्तु उन्मनीरूप तारकको नहीं जानते हैं ।। ४० ॥ अर्धोन्मीलितलोचनः स्थिरमना नासाग्रदत्तेक्षण- श्चन्द्राविपि लीनतामुपनयन्निष्पन्दभावेन यः। ज्योतीरूपमशेषबीजमखिलं देदीप्यमानं परं तत्त्वं तत्पद्मेति वस्तु परमं वाच्यं किमत्राधिकम् ॥४१॥ अर्धोन्मीलितेति ॥ अर्धम् उन्मीलिते अर्धोन्मीलिते अर्धोन्मीलिते लोचने येन स अर्धोन्मीलितलोचनः अर्धोद्धाटितलोचन इत्यर्थः । स्थिरं निश्चलं मनो यस्य स स्थिरमनाः नासाया नासिकाया अग्रेञ्ग्रभागे नासिकायां द्वादशाङ्गुलपर्यंते वा दत्ते अहिते ईक्षणे येन स नासाग्रदत्तेक्षणः । तथाह वसिष्ठः- द्वादशाङ्गुलपर्यंते नासाने विमलेऽम्बरे । संविदृशोः प्रशाम्यन्त्योः प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥' इति । निष्पन्दस्य निश्चलस्य भावो निष्पन्दभावः कायेन्द्रियमनसां निश्चलत्वं तेन चन्द्राकों चन्द्रसूर्यावपि लीनतां लीनस्य भावो लीनता लयस्तमुपनयन्प्रापयन्कायेन्द्रियमनसां निश्चलत्वेन प्राणसञ्चारमपि स्तम्भयन्नित्यर्थः। तदुक्तं प्राक्-'मनो यत्र विलीयेत ' इत्यादिना । पूर्वोक्तविशेषणसम्पन्नो योगी ज्योतीरूपं ज्योतिरिवाखिलप्रकाशकं रूपं यस्य स तथा तमशेषबीजमाकाशाद्युत्पत्तिद्वारा सर्वकारणमखिलं पूर्ण देदीप्यमानमतिशयेन दीप्यत इति देदीप्यमानं तत्तथा स्वप्रकाशकं परं कायेन्द्रियमनसां साक्षिणं तत्त्वमनारोपितं वास्तविकमित्यर्थः । तदिदमिति वक्तुमशक्यं पद्यते गम्यते योगिभिरिति पदं परमं सर्वोत्कृष्टं वस्तु आत्मस्वरूपमेति प्राप्नोति । उन्मन्यवस्थायां स्वस्वरूपावस्थितो योगी भवतीत्यर्थः । अत्राधिकं किं वाच्यम् ? अपरं वस्तु प्राप्नोतीत्यत्र किं वक्तव्यमित्यर्थः४१ आधे उन्मीलित किये (खोले) हैं नेत्र जिसने और निश्चल है मन जिसका और नासि- काके बारह अंगुलपर्यंत अग्रभागमें लगाये हैं नेत्र जिसने । सोई वसिष्ठने कहाहै कि, अंगुल पर्यंत निर्मल जो नासिकाके अग्रभागमें आकाश उसमें यदि ज्ञान, दृष्टि दोनों भली- प्रकार शांत होजाय तो प्राणोंका स्पंद (गति) रुक जाती है-ऐसा योगी और देह, इंद्रिय, मन इनके निष्पंदभाव (निश्चलता) से चंद्रमा और सूर्यकी भी लीनताको करताहुआ अर्थात् देह, मन, इंद्रियोंकी निश्चलतासे प्राणके संचारको भी रोकता हुआ सोई कहभी आये हैं कि, जहां मनभी विलय हो जाता है। इस पूर्वोक्त प्रकारका योगाभ्यासी ज्योतिके समान सबका प्रकाशक और आकाश आदिकी उत्पत्तिके द्वारा सबका कारण और अखिल (पूर्ण) रूप और अत्यंत प्रकाशमान और देह इंद्रिय मन इनका साक्षीरूप पर और वास्तविक तत्त्वरूप द्वादश चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१५७) जो वह पद है जिसको यह नहीं कह सकते कि, वह यह है-और योगीजन जिसमें जाय उसे पद कहते हैं-उस परम (सबसे उत्तम) आत्मस्वरूपको प्राप्त होताहै अर्थात् उन्मनी अव- स्थामें योगी अपने स्वरूपमें स्थित होताहै । इसमें अधिक और क्या कहने योग्य है अन्य वस्तु- ओंकी तो अवश्यही प्राप्ति होती है । भावार्थ यह है कि, जिसके आधे नेत्र खुले हो मन स्थिर हो नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि हो आर जिसने देह आदिकी निश्चलतासे प्राणकोभी लीन करा- लियाहो ऐसा योगी, ज्योतिस्वरूप सबके कारण पूर्ण देदीप्यमान साक्षीरूप जो तत्त्व उस परमपदको प्राप्त होताहै इसमें अधिक क्या कहने योग्य है ॥ ४१ ॥ उन्मनीभावनायाः कालनियमाभावमाह- दिवा न पूजयेल्लिङ्गं रात्रौ चैव न पूजयेत् । सर्वदा पूजयेल्लिङ्गं दिवारात्रिनिरोधतः ॥ ४२॥ दिवा नेति ॥ दिवा सूर्यसञ्चारे लिङ्गं सर्वकारणमात्मानम् । एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' इत्यादिश्रुतेः । न पूजयेत् न भावयेत् । ध्यानमेवात्मपूजनम् । तदुक्तं वासिष्ठे-ध्यानोपहार एवात्मा ध्यानमस्य महार्चनम् । विना तेनेतरेणायमात्मा लभ्यत एव नो' इति । रात्रौ चन्द्रसञ्चारे च नैव पूजयेन्नैव भावयेत् । चन्द्रसूर्यसञ्चारे चित्तस्थैर्याभावात् । 'चले वाते चलं चित्तम्' इत्युक्तत्वात् । दिवारात्रिनिरोधतः सूर्यचन्द्रौ निरुध्य । ल्यब्लोपे पञ्चमी तस्यास्तसिल । सर्वदा सर्वस्मिन् काले लिङ्ग- मात्मानं पूजयेद्भावयेत् । सूर्यचन्द्रयोनिरोधे कृते सुषुम्नान्तर्गते प्राणे मनःस्थैर्यात् । तदुक्तम्- सुषुम्नान्तर्गते वायौ मनःस्थैर्य प्रजायते” इति ॥ १२॥ अब उन्मनीभावनामें कालके नियमका अभाव वर्णन करते हैं कि, दिनमें अर्थात् सूर्यके संचारमें लिंगका पूजन न करै अर्थात् सबके कारण लिंगरूप आत्माका ध्यान करै सोई कहा है कि, इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ और यहां ध्यानही पूजनशब्दसे लेना, पुष्प आदिसे पूजन नहीं । सोई वासिष्ठमें वसिष्ठजीने कहाहै कि, आत्माका उपहार ( भेंट) ध्यानहीं है और ध्यानही इसका अर्चन (पूजा) है उसके विना यह आत्मा प्राप्त नहीं होता है और रात्रिमें अर्थात् चंद्रमाके बारमेंभी लिंगरूप आत्माका पूजन न करै क्योंकि, चंद्र और सूर्यके वारमें चित्तकी स्थिरता नहीं रहती है। कहभी आये हैं कि, प्राणवायुके चलायमान होनेसे चित्तभी चलायमान होजाताहै और दिवा और रात्रिके निरोधको करके सब कालमें लिंगका पूजन करै क्योंकि सूर्य आर चंद्रका निरोध होनेपर प्राण सुषुम्नाके अंतर्गत होजाताहै और उससे मनकी स्थिरता होजाती है उस समय लिंगरूप आत्माका ध्यान करै। सोई कहा है कि, सुषुम्नाके अंतगत सूर्यके होनेपर मनकी स्थिरता होजाती है । भावार्थ यह ह कि, सूर्य और चंद्रमाके संचारमें आत्माका ध्यान करै सूर्य और चंद्र संचारको रोककर सब कालमें आत्माका ध्यान करै ॥ ४२ ॥ अथ खेचरीमाह- सव्यदक्षिणनाडिस्थो मध्ये चरति मारुतः। तिष्ठते खेचरी मुद्रा तस्मिन्स्थाने न संशयः॥४३॥ weta 1950 हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:- सव्येति ॥ सव्यदक्षिणनाडिस्थो वामतदितरनाडिस्थो मारुतो वायुयंत्र मध्ये चरति यस्मिन्मध्यप्रदेशे गच्छति तस्मिन्स्थाने तस्मिन्प्रदेशे खेचरी मुद्रा तिष्ठते स्थिरा भवति । 'प्रकाशनस्थेयाख्ययोश्च' इत्यात्मनेपदम् । न संशयः उक्तेऽर्थे सन्देहो नास्तीत्यर्थः॥४३॥ अब खेचरीमुद्राका वर्णन करते हैं कि, इडा पिंगला नामकी जो सव्य दक्षिण नाडी हैं उनमें स्थित प्राणवायु जिस मध्य प्रदेशमें गमन करताहै उसी स्थानमें खेचरी मुद्रा स्थिर होजाती है इसमें संशय नहीं है ॥ ४३ ॥ इडापिङ्गलयोर्मध्ये शून्यं चैवानिलं ग्रसेत् । तिष्ठते खेचरी मुद्रा तत्र सत्यं पुनः पुनः॥४४॥ इडापिङ्गलयोरिति ॥ इडापिङ्गलयोः सव्यदक्षिणनाडयोमध्ये यच्छून्यं खम् कर्तृ । अनिलं प्राणवायुं यत्र ग्रसेत् । शून्ये प्राणस्य स्थिरीभाव एव ग्रासः । तत्र तस्मिञ्छून्ये खेचरी मुद्रा तिष्ठते । पुनः पुनः सत्यमिति योजना ॥ ४४ ॥ इडा पिंगला जो सव्य दक्षिण नाडी हैं उनके मध्यमें जो शून्य (आकाश) है वह शून्य जिसमें प्राणवायुको प्रसले और शून्यमें प्राणकी जो स्थिरता उसकोही ग्रास कहते हैं उस शून्यमें खेचरीमुद्रा स्थिर होती है यह बात वारंवार सत्य है ।। ४४ ॥ सूर्याचन्द्रमसोर्मध्ये निरालम्बान्तरं पुनः। संस्थिता व्योमचक्रे या सा मुद्रा नाम खेचरी ॥४५॥ सूर्याचन्द्रमसोरिति ॥ सूर्याचन्द्रमसोरिडापिङ्गलयोर्मध्ये निरालम्बं यदन्तरमव- काशस्तत्र । पुनः पादपूरणे । व्योम्नां खानां चक्रे समुदाये। भूमध्ये सर्वखानां सम- न्वयात् । तदुक्तम्-'पञ्चस्रोतःसमन्विते' इति । या संस्थिता सा मुद्रा खेचरीनाम ॥४५ सूर्य और चंद्रमा अर्थात् इडा और पिंगलाके मध्यमें जो निरालंब अंतर ( अवकाश ) है उस आकाशोंके समुदायरूप चक्रमें, क्योंकि, भृकुटीके मध्यमें सब आकाशोंका सवन्वय(मेल) है । सोई कहाहै कि, पांच स्रोतोंसे युक्त भ्रूका मध्य है उस उक्त अवकाशमें जो भलीप्रकार स्थित हो वह खेचरी नामकी मुद्रा होती है।॥ ४५ ॥ सोमायत्रोदिता धारा साक्षात्सा शिववल्लभा। पूरयेदतुलां दिव्यां सुषुम्नां पश्चिमे मुखे ॥४६॥ सोमादिति ॥ सोमाञ्चन्द्राद्यत्र यस्यां खेचयाँ धाराऽमृतधारा उदितोद्भूता सा खेचरी साक्षाच्छिववल्लभा शिवस्य प्रियेति पूर्वेणान्वयः। अतुलां निर्मलां निरुपमा दिव्यां सर्वनाड्युत्तमां सुषुम्नां पश्चिमे मुखे पूरयेत् । जिह्वयेति शेषः ॥ ४६॥ जिस खेचरीमुद्रामें चंद्रमासे अमृतकी धारा उत्पन्न होती है वह खेचरीमुद्रा साक्षात् शिव- जीको वल्लभ (प्यारी) है और अतुल अर्थात् जिसकी उपमा न हो और दिव्यरूप अर्थात् सब नाडियों में उत्तम जो सुषुम्ना है उसको पश्चिम मुखके विषे जिहासे पूर्ण करै ॥ ४६॥ - चतुर्थः] संस्कृवटीका-भाषाटीकासमेता । पुररस्ताच्चैव पूर्येत निश्चिता खेचरी भवेत् । अभ्यस्ता खेचरी मुद्राप्युन्मनी संप्रजायते ॥ १७॥ पुरस्ताच्चैवेति ॥ पुरस्ताच्चैव पूर्वतोऽपि पूर्यंत । सुषुम्नां प्राणेनेति शेषः । यदि बहिं निश्चिताऽसन्दिग्धा खेचरी खेचर्याख्या मुद्रा भवेदिति । यदि तु पुरस्तात्प्राणेन न पूर्येत जिह्वामात्रेण पश्चिमतः पूर्यंत तर्हि मूढावस्थाजनिका। न निश्चिता खेचरी स्यादिति भावः । खेचरीमुद्राप्यभ्यस्ता सती उन्मनी संप्रजायते चित्तस्य ध्येयाकारावे- शात्तुर्यावस्था भवतीत्यर्थः॥४७॥ और पूर्वमुखके विषेभी पूर्ण करै अर्थात् सुषुम्नाको प्राणसे पूर्ण करे तो निश्चयसे अर्थात् निःसंदेह खेचरी नामकी मुद्रा होती है और यदि पूर्वमुखमें प्राणसे पूर्ण न करें और पश्चिम मुखमें केवल जिह्वासेही पूर्ण करदे तो खेचरीमुद्रा मूढ अवस्थाकी पैदा करती है इससे यह निश्चित नहीं है और अभ्यास कीहुई खेचरीमुद्राभी उन्मनी होजाती है अर्थात् चित्तके ध्येया- कार होनेसे तुर्यावस्था होजाती है ॥ ४७ ॥ भ्रुवोर्मध्ये शिवस्थानं मनस्तत्र विलीयते । ज्ञातव्यं तत्पदं तुर्य तत्र कालो न विद्यते ॥ १८ ॥ भ्रुवोरिति ॥ ध्रुवोर्मध्ये भ्रुवोरन्तराले शिवस्थानं शिवस्येश्वरस्य स्थानं शिवस्य सुखरूपस्यात्मनोऽवस्थानमिति शेषः । तत्र तस्मिन् शिवे मनो लीयते शिवाकार- वृत्तिप्रवाहवद्भवति तच्चित्तलयरूपं तुर्य पदं जाग्रत्स्वमसुषुप्तिभ्यश्चतुर्थाख्यं ज्ञात- व्यम् । तत्र तस्मिन् पदे कालो मृत्युर्न विद्यते । यद्वा सूर्यचन्द्रयोनिरोधादायुः- क्षयकारकः कालः समयो न विद्यत इत्यर्थः । तदुक्तम् कालस्य' इति ॥ ४८॥ दोनों भ्रुकुटियोंके मध्यमें शिवरूप ईश्वरका वा सुखरूप आत्माका स्थान है उस शिव वा आत्मामें मन लीन होताहै अर्थात् मनकी वृत्तिका प्रवाह शिवाकार होजाताहै और वह चित्तका लय तुर्यपद अर्थात् जाग्रत् स्वप्न सुषुप्तिसे चौथा पद जानना और उस पदमें काल (मृत्यु) नहीं है अथवा सूर्य और चन्द्रके निरोधसे अवस्थाके क्षयका कारक समय नहीं है सोई कह आये हैं. कि, सुषुम्ना कालके भोगनेवाली है॥४८॥ अभ्यसेत्खेचरी तावद्यावत्स्यायोगनिद्रितः। संप्राप्तयोगनिद्रस्य कालो नास्ति कदाचन ॥१९॥ अभ्यसदिति ॥ तावत्खेचरौं मुद्रामभ्यसेत् । यावद्योगनिद्रितः । योगः सर्व- वृत्तिनिरोधः सैव निद्रा योगनिद्राऽस्य संजाता इति योगनिद्रितः तादृशः स्यात् । संप्राप्ता योगनिद्रा येन स संप्राप्तयोगन्द्रिस्तस्य कदाचन कस्मिंश्चिदपि समये कालो मृत्युनास्ति ॥ ४९ ॥ भोत्री सुषुम्ना (१६०) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- योगी जबतक योगनिद्रित हो अर्थात् संपूर्ण वृत्तियोंका निरोधरूप जो योग वह निद्रारूप जिसको हो वह योगनिद्रित कहाताहै तबतक खेचरीमुद्राका अभ्यास करै और जिस योगीको योगनिद्रा भलीप्रकार प्राप्त होगई हो उसका किसी कालमें भी मृत्यु नहीं होती॥ ४९ ॥ निरालम्बं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् । स बाह्याभ्यन्तरे व्योम्नि घटवत्तिष्ठति ध्रुवम् ॥५०॥ निरालंबमिति ॥ यो निरालंबमालम्बशून्यं मनः कृत्वा किंचिदपि न चिंतयेत् खेचरीमुद्रायां जायमानायां ब्रह्माकारामपि वृत्तिं परमवैराग्येण परित्यजेदित्यर्थः । स योगी बाह्याभ्यन्तरे बाह्ये बहिर्भवे आभ्यंतरेऽभ्यंतर्भवे च व्योम्न्याकाशे घटवत्तिष्ठति ध्रुवं निश्चितमेतत् । यथाऽऽकाशे घटो बहिरंतश्चाकाशपूर्णों भवति तथा खेचर्या- मालम्बनपरित्यागेन योगी ब्रह्मणा पूर्णस्तिष्ठतीत्यर्थः ॥ ५० ॥ जो योगी निरालंब (निराश्रय) मनको करके किंचित् भी चिंता नहीं करताहै अर्थात् खेचरीमुद्राके सिद्ध होनेपर ब्रह्माकार वृत्तिकाभी परमवैराग्यसे त्याग करता है वह योगी बाहिर और भीतरके आकाशमें घटके समान निश्चय कर टिकताहै अर्थात् जैसे घट आकाशके विषय बाहिर और भीतर आकाशसे पूर्ण होताहै तिसी प्रकार खेचरीमुद्राके होनेपर आल- म्बनके परित्यागसे योगीभी ब्रह्मसे पूर्ण टिकताहै ॥५०॥ बाह्यवायुर्यथा लीनस्तथा मध्ये न संशयः। स्वस्थाने स्थिरतामेति पवनो मनसा सह ॥५१॥ बाह्येति ॥ बाह्यो देहाबहिर्भवो वायुर्यथा लीनो भवति खेचर्याम् । तस्यान्तः प्रवृत्त्यभावात् । तथा मध्यो देहमध्यवर्ती वायुलीनो भवति तस्य बहिःप्रवृत्त्यभावात् । न संशयः अस्मिन्नथें संदेहो नास्तीत्यर्थः । स्थीयते स्थिरीभूयतेऽस्मिन्निति स्थान स्वस्य प्राणस्य स्थानं स्थैर्याधिष्ठानं ब्रह्मरन्ध्र तत्र मनसा चित्तेन सह पवनः प्राणः स्थिरतां निश्चलतामेति प्राप्नोति ॥५१॥ खेचरीमुद्राके विषय देहसे बाहिरका पवन जिस प्रकार लीन होताहै क्योंकि, उसकी भीतर प्रवृत्ति नहीं होती, तिसी प्रकार देहके मध्यका वायुभी लीन हाजाताहै क्योंकि, उसकी बाहिर प्रवृत्ति नहीं होती इसमें संशय नहीं है. किंतु मनसहित पवन (प्राण) स्थिरताका स्थान जो ब्रह्मरंध्र है उसमें निश्चलताको प्राप्त होजाताहै ॥ ५१ ।। एवमभ्यसमानस्य वायुमार्गे दिवानिशम् अभ्यासाजीर्यते वायुमनस्तत्रैव लीयते ॥५२॥ एवमिति ॥ एवमुक्तप्रकारेण वायुमार्गे प्राणमार्गे सुषुम्नायामित्यर्थः । दिवा- निशं रात्रिंदिवमभ्यसमानस्याभ्यासं कुर्वतो योगिनोऽभ्यासाद्यत्र यस्मिन्त्राधारे वायुः प्राणो जीर्यते क्षीयते, लीयते इत्यर्थः । तत्रैव वायोर्लयाधिष्ठाने मनश्चित्तं लीयते जीर्यत इत्यर्थः ॥ ५२॥ Ani चतुर्थः संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता । इस पूर्वोक्त प्रकारसे प्राणरूप वायुका मार्ग जा सुषुम्ना उसमें रात्रिदिन अभ्यास करतेहुए योगीके अभ्याससे जिस आधारमें प्राणवायु जीर्ण होजाता है अर्थात् लय होजाता है उसी वायुके लयाधिष्ठान (स्थान) में मनभी लीन होजाताहै ॥ ५२ ।। अमृतैः प्लावयेदेहमापादतलमस्तकम् । सिद्धयत्येव महाकायो महाबलपराक्रमः॥५३॥ इति खेचरी। अमृतरिति ॥ अमृतैः सुषिरनिर्गतैः पादतलं च मस्तकं च पादतलमस्तकम् । दंदश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् ' इत्येकवद्भावः । पादतलमस्तकमभिव्याप्येत्यापादतल- मस्तकं देहमालावयेदाप्लावितं कुर्यात् । महानुत्कृष्टः कायो यस्य स महाकायः महान्तौ बलपराक्रमौ यस्येत्येतादृशो योगी सिद्धयत्येव अमृतप्लावनेन सिद्धो भवत्येव ॥ ५३॥ योगी पादतल और मस्तकपर्यंत देहका सुषिर ( चन्द्रमा) से निकसे जो अमृत उनसे सेचन करै तो उत्तम है काया जिसकी और अधिक बल पराक्रम जिसके ऐसा योगी पूर्वोक्त अमृतके स्नानसे शुद्ध होजाताहै ॥ ५३॥ शक्तिमध्ये मनः कृत्वा शक्तिं मानसमध्यगाम् । मनसा मन आलोक्य धारयेत्परमं पदम् ॥ १४ ॥ शक्तिमध्य इति ॥ शक्तिः कुण्डलिनी तस्या मध्ये मनः कृत्वा तस्यां मनो धृत्वा तदाकारं मनः कृत्वेत्यर्थः । शक्तिं मानसमध्यगां कृत्वा शक्तिध्यानावेशा- च्छक्तिं मनस्येकीकृत्य तेन कुण्डली बोधयित्वेति यावत् । 'प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह ' इति गोरक्षोक्तेः । मनसाऽन्तःकरणेन मन आलोक्य बुद्धिं मनसा अवलोकनेन स्थिरीकृत्येत्यर्थः । परमं पदं सर्वोत्कृष्टं स्वरूपं धारयेद्धारणाविषयं कुर्यादित्यर्थः ॥ ५४॥ शक्ति ( कुण्डलिनी) के मध्यमें मनको धरकर अर्थात् कुंडलीके आकारका मनको करके और शक्तिको मनके मध्यमें करके अर्थात् शक्ति ध्यानके आवेशसे शक्तिको मनमें एक करके और उससे कुंडलीका बोधन करके सोई गोरक्षने कहा है कि, मन और पवनसहित कुंडली वहिके योगस प्रबुद्ध होती है और अंतःकरणरूप मनसे मनको देखकर अर्थात् मनसे देखनेके द्वारा बुद्धिको स्थिर करके सर्वोत्तम स्वरूप जो परमपद है उसकी धारणा करै अर्थात् ब्रह्ममें मनको लगावै ॥ ५४॥ खमध्ये कुरु चात्मानमात्ममध्ये च खं कुरु । सर्वे च खमयं कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥५५॥ खमध्य इति ॥ खमिव पूर्ण ब्रह्म खं तन्मध्ये आत्मानं स्वस्वरूपं कुरु । ब्रह्माह- मिति भावयेत्यर्थः । आत्ममध्ये स्वस्वरूपे च खं पूर्ण ब्रह्म कुरु । अहं ब्रह्मेति च - - णमें ब्रह्माकारवृत्तिके होनेसे वा ब्रह्मकी वासनासे वायु पूर्ण हो और अंत:करणसे वा हृद. (१६२) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- भावयेत्यर्थः । सर्वं च खमयं कृत्वा ब्रह्ममयं विभाव्य किमपि न चिन्तयेत् अहं ब्रह्मोति ध्यानमाप परित्यजेदित्यर्थः ॥ ५५ ॥ आकाशके समान पूर्ण जो ब्रह्म उसके विषे अपने आत्माको करके अर्थात् ब्रह्म मैं हूँ ऐसी भावना करके अपने रूप स्वरूप आत्मामें पूर्ण ब्रह्मको करो-में ब्रह्म हूँ ऐसी भावना कर और संपूर्ण प्रपंचको ब्रह्ममय करके अर्थात् ब्रह्मरूप विचारकर किसीकीभी चिंता न करै अर्थात् मैं ब्रह्म हूँ इस ध्यानकाभी परित्याग करदे ॥ ५५ ॥ एवं समाहितस्य स्वरूपे स्थितिमाह- अन्तःशून्यो बहि:शून्यः शून्यः कुम्भ इवाम्बरे । अन्तःपूर्णों बहिःपूर्णः पूर्णः कुम्भ इवार्णवे ॥५६॥ अन्तःशून्य इति । अन्तः अन्तःकरणे शून्यः ब्रह्मातिरिक्तवृत्तेरभावाद् द्वितीय- शून्यः । बहिरन्त:करणाद्वहिरपि शून्यः द्वितीयादर्शनात् । अम्बरे आकाशे कुम्भो घटो यथाऽन्तर्बहिःशून्यस्तद्वदन्तःकरणे हृदाकाशे वायुपूर्णः ब्रह्माकारवृत्तेः सद्भावाद्ब्रह्म- वासत्वाद्वा । बहिःपूर्णोऽन्तःकरणादहिहृदयाकाशाद्वहिर्वा पूर्णः । सत्तया ब्रह्मातिरिक्त- वृत्तेरभावाद्ब्रह्मपूर्णत्वाद्वा । अर्णवे समुद्रे कुम्भो घटो यथा सर्वतो जलपूर्णों भवत्येवं समाधिनिष्ठो योगी ब्रह्मपूर्णो भवतीत्यर्थः॥ ५६ ।। इस प्रकार समाधिमें स्थित योगीकी अपने स्वरूपमें स्थितिका वर्णन करते हैं कि, अन्त:- करणमें शून्य हो अर्थात् ब्रह्मसे अतिरिक्त वृत्तिके अभावसे दूसरेकी प्रतीति न होती हो और दूसरेके न देखनेसे अन्तःकरणसे बाहिरभी इस प्रकार शून्य हो जैसे आकाशमें स्थित घट भीतर और बाहिर जलसे शून्य होता है-और तिसी प्रकार हृदयके आकाशरूप अन्तःकर- । याकाशसे बाहिरभी पूर्ण हो अर्थात् सत्तारूपसे वा ब्रह्मातिरिक्त वृत्तिके अभावसे वा ब्रह्मरूपसे इस प्रकार पूर्ण जैसे समुद्र के विषे डुबाहुआ कुम्भ चारों तरफसे जलपूर्ण होताहै इसी प्रकार समाधिमें स्थित पुरुषभी ब्रह्मसे पूर्ण होताहै ।। ५६॥ वायचिन्ता न कर्तव्या तथैवान्तरचिन्तनम् । सर्वचिन्तां परित्यज्य न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥१७॥ बाह्यचिन्तेति ॥ समाहितेन योगिनेत्यध्याहारः । बाह्यचिन्ता वाह्यविषया चिन्ता न कर्तव्या तथैव बाह्यचिन्ताऽकरणवदान्तरचिन्तनमान्तराणां मनसा परिकल्पि- तानामाशामोदकसौधवाटिकादीनां चिन्तनं न कर्तव्यमिति लिङ्गविपरिणामेनान्वयः । सर्वचिन्तां बाह्याभ्यन्तरचिन्तनं परित्यज्य किञ्चिदपि न चिन्तयेत्परमवैराग्येणात्माकार- वृत्तिमपि परित्यजेत् । तत्त्यागे स्वरूपावस्थितिरूपा जीवन्मुक्तिर्भवतीति भावः ॥७॥ समाधिमें स्थित योगी बाहिरके (माला, चंदन आदि) विषयोंकी चिंता न करे और तिसी प्रकार अंतःकरणमें मनसे कल्पना किये जो आशामोदक, श्वेतमंदिर, वाटिका आदि हैं उनका
चतुर्थः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
भी चिन्तन न करै । इस प्रकार बाहर भीतरकी सम्पूर्ण चिंताओंका परित्याग करके किंचित् भी
चिंता न करै अर्थात परमवैराग्यसे ब्रह्माकारवृत्तिकाभी परित्याग करदे, क्योंकि ब्रह्माकार-
वृत्तिका त्यागने में अपने स्वरूपमें स्थितिरूप मुक्ति जीवन समयमें ही हो जाती है ।। ५७ ।।
बाह्याभ्यन्तरचिन्तापरित्यागे शान्तिश्च भवतीत्यत्र वसिष्ठवाक्यं प्रमाणयति-
संकल्पमात्रकलनैव जगत्समग्रं
संकल्पमात्रकलनैव मनोविलासः।
संकल्पमात्रमतिमुत्सृज निर्विकल्प-
माश्रित्य निश्चयमवाप्नुहि राम शान्तिम् ॥१८॥
संकल्पेति ॥ संकल्पो मानसिको व्यापारः स एव संकल्पमात्रं तस्य कलनैव रच-
नैवेदं दृश्यमानं समग्रं जगत् बाह्यप्रपञ्चो मनोमात्रकल्पित इत्यर्थः । मनसो मानसस्य
विलासो नानाविषयाकारकल्पना आशामोदकसौधवाटिकादिकल्पनारूपो विलासः
संकल्पमात्रकलनैव । मानसः प्रपञ्चोऽपि संकल्पमात्ररचनैवेत्यर्थः । संकल्पमात्रे बाह्या-
भ्यन्तरप्रपञ्चे या मतिः सत्यत्वबुद्धिस्तामुत्सृज । तर्हि किं कर्तव्यमित्यत आह-निर्वि-
कल्पमिति । विशिष्टकल्पना विकल्पः । आत्मनि कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखित्वदुःखित्वसजा-
तीयविजातीयस्वगतभेददेशकालवस्तुपरिच्छेदकल्पनारूपः तस्मानिष्क्रांतो निर्विकल्प-
स्तमात्मानमाश्रित्य धारणादिविषयं कृत्वा हे राम ! निश्चयमसंदिग्धं शांति परमोपरति-
मवाप्नुहि । ततः सुखमपि प्राप्स्यसीति भावः । तदुक्तं भगवता व्यतिरेकेण-' न
चाभावयतः शांतिरशांतस्य कुतः सुखम् ' इति ॥२८॥
बाह्य और आभ्यंतर चिंताओंके परित्यागसे शांति भी होती है, इसमें वसिष्टके वाक्यका
प्रमाण देते हैं कि, मानसिक व्यापाररूप जो संकल्प है उसकी रचनारूपही यह दृश्यमान
संपूर्ण जात है अर्थात् बाह्य प्रपंच मनसेही कल्पित है और आशामोदक श्वेतमंदिर वाटिका
आदि नाना प्रकारके विषयोंकी कल्पनाका जो विलास है वहभी संकल्पकीही रचना है अर्थात्
मानसप्रपंचभी संकल्पकीही रचनारूप है, इससे हे राम ! संकल्पमात्रमें जो मति अर्थात् बाह्य
और आभ्यंतरके प्रपंचमें सत्यत्वबुद्धि है उसको त्याग दे। कदाचित् कहो कि, फिर क्या करूं?
इससे कहते हैं कि, निर्विकल्पके आश्रय होकर अर्थात् आत्माके विषे जो कर्ता भोक्ता सुखी
दुःखी सजातीय विजातीय स्वगत भेद देश काल वस्तु परिच्छेदरूप विशिष्ट कल्पना है उनसे
रहित जो निर्विकल्पस्वरूप अर्थात् पूर्वोक्त विशिष्ट कल्पनासे शून्य आत्मा है, उसकोही धारणाका
विषय करके हे राम ! निश्चयसे तू शांतिको प्राप्त हो उस शांतिसे फिर सुखको भी प्राप्त हो
जायगा । सोई भगवान्ने गीतामें कहा है कि, विचारहीन पुरुषको शांति नहीं होती है और
अशांत मनुष्यको सुख कहांसे होताहै ।। ५८ ॥
कर्पूरमनले यद्रत सैन्धवं सलिले यथा ।
तथा सन्धीयमानं च मनस्तत्त्वे विलीयते ॥ १९ ॥
(१६४) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेशः- कर्पूरमिति ॥ यद्वद्यथाऽनलेऽग्नौ संघीयमानं संयोज्यमानं कर्पूर विलीयते विशे- पेण लीयते लीनं भवति अग्न्याकारं भवति । यथा सलिले जले संघीयमानं सैन्धवं लवणं विलीयते लवणाकारं परित्यज्य जलाकारं भवति तथा तद्वत्तत्वे आत्मनि संधी- यमानं कार्यमाणं मनो विलीयते आत्माकारं भवति ॥ ५९॥ जैसे कपूर अग्निमें संयोग करनेसे विशेषकर लीन होता है अर्थात् अग्निके आकार होजाता है और जैसे जलमें संयुक्त किया सैंधव लत्रण विलीन होता है अर्थात् लवणके आकारको त्यागकर जलाकार होजाता है-तिसी प्रकार तत्त्वरूप आत्मामें संयुक्त किया मन विलीन होता अर्थात् आत्माकार होजाता है ॥ ५९ ॥ मनसो क्लिये जाते द्वैतमपि लीयत इत्याह त्रिभिः- ज्ञेयं सर्व प्रतीतं च ज्ञानं च मन उच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं समं नष्टं नान्यः पन्था द्वितीयकः ॥६॥ ज्ञेयमिति ॥ सर्वं सकलं ज्ञेयं ज्ञानार्ह प्रतीतं च ज्ञातं च ज्ञानं च इदं सर्व मन उच्यते । सर्वस्य मन:कल्पनामात्रत्वान्मनःशब्देनोच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं च समं मनों विलीयते मनसा सार्धं नष्टं यदि तर्हि द्वितीयकः द्वितीय एव द्वितीयकः पन्था मनो- विषयो नास्ति । द्वैतं नास्तीति फलितार्थः॥ ६० ॥ अब मनके लय होनेपर द्वैतकाभी लय वर्णन करते हैं कि, सम्पूर्ण जो ज्ञेय (ज्ञानके योग्य) अर्थात् ज्ञात प्रतीयमान है और ज्ञान यह सब मन कहाता है, क्योंकि ये सब मनकी कल्पना- मात्र है। यदि ज्ञान और ज्ञेय मनसहित नष्ट हो जायँ तो दूसरा मार्ग नहीं है अर्थात् मनका विषय जो द्वैत है वह नहीं रहता है ॥ ६॥ मनोदृश्यमिदं सर्वं यत्किञ्चित्सचराचरम् । मनसो ह्युन्मनीभावाद् द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥६॥ मनोदृश्यमिति ॥ इदमुपलभ्यमानं यत्किंचिद्यत्किमपि चरं जंगममचरं स्थावर चरं चाचरं च चराचरे ताभ्यां सह वर्तत इति सचराचरं यजगत्सर्व मनोदृश्यं मनसा दृश्यम् । मनःसंकल्पमात्रमित्यर्थः । मनःकल्पनासत्त्वे प्रतीतेस्तदभावे चाप्रतीतेभ्रम एव सर्वं जगत् । भ्रमस्य प्रतीतिकशरीरत्वात् । न च बौद्धमतप्रसंगः । भ्रमाधिष्ठानस्य ब्रह्मणः सत्यत्वाभ्युपगमात् । मनस उन्मनीभावाद्विलयाद्वैतं भेदः नैवोपलभ्यते नैव प्रतीयते । द्वैतभ्रमहेतोर्मनःसङ्कल्पस्याभावात् । हि तद्धेतावव्ययम् ॥ ६१ ॥ यह दीखता हुआ जो स्थावर जंगम (चराचर ) रूप सहित जगत् है वह सब मनसे देखने योग्य है अर्थात् मनसे कल्पित है अर्थात् मनकी कल्पना होनेपर प्रतीत होताहै और कल्पनाके अभावमें प्रतीत नहीं होता है, इससे भ्रमरूपही है और भ्रमका शरीर प्रतीति- मात्र होता है । कदाचित् कहो कि, ऐसे कहोगे तो बौद्धमतका प्रसंग होजायगा, सो ठीक जो कुछ चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१६५) नहीं. क्योंकि, भ्रमके आधिष्ठान ब्रह्मको सत्य मानते हैं और उक्त मनके उन्मनीभाव (विलय ) से द्वैत (भेद) प्रतीत नहीं होता है. क्योंकि, द्वैत भ्रमका हेतु जो मनका संकल्पहै उसका अभाव है ॥ ६१ ॥ ज्ञेयवस्तुपरित्यागाद्विलयं याति मानसम् । मनसो विलये जाते कैवल्यमवशिष्यते ॥ ६२॥ ज्ञेयमिति ॥ ज्ञेयं ज्ञानविषयं यद्वस्तु सर्व चराचरं यद् दृश्यं तस्य परित्यागानाम- रूपात्मकस्य तस्य परिवर्जनाद्विलयं सच्चिदानंदरूपात्माकारं भवति । मनसो विलये जाते सति कैवव्यं केवलस्यात्मनो भावः कैवल्यमवशिष्यते । अद्वितीयात्मस्वरूपमव- शिष्टं भवतीत्यर्थः ॥ ६२ ॥ ज्ञानका विषय जो चराचररूप दृश्य है उसके परित्यागसे अर्थात् नामरूपात्मक जगत्के वर्जित करनेसे मन विलयको प्राप्त होजाता है अर्थात् सच्चिदानन्दरूप आत्माकार होजाता है और मनका विलय होनेपर कैवल्य शेष रहजाता है अर्थात् आद्वितीय आत्मारूपही शेष रह जाता है ॥ ६२ ॥ एवं नानाविधोपायाः सम्यक्स्वानुभवान्विताः। समाधिमार्गाः कथिताः पूर्वाचार्यैर्महात्मभिः॥ ६३ ॥ एवमिति ॥ एवमंतर्लक्ष्यं बहिर्दृष्टिरित्यायुक्तप्रकारेण महान् समाधिपरिशीलन- शुद्ध आत्माऽन्तःकरणं येषां ते महात्मानस्तैर्महात्मभिः पूर्वे च ते आचार्याश्च पूर्वा- चार्याः मत्स्येन्द्रादयस्तैः समाधेश्चित्तवृत्तिनिरोधस्य मार्गाः प्राप्त्युपायाः कथिताः । कीदृशाः समाधिमार्गाः ? नानाविधोपायाः नानाविधा उपायाः साधनानि येषां ते तथा सम्यक् समीचीनतया संशयविपर्ययराहित्येन यः स्वानुभव आत्मानुभव: तेनान्विता युक्ताः ॥ ६३ ॥ इस प्रकार नानाप्रकारके उपाय ( साधन) हैं जिनके और भलीप्रकार जो स्त्रानुभव अर्थात् संशय और विपर्ययसे रहित आत्मानुभव उससे युक्त चित्तवृत्तिनिरोधरूप समाधिके मार्ग अर्थात् प्राप्तिके उपाय पहिले महात्मा आचार्योंने कहे हैं अर्थात् समाधिके अभ्याससे महान् (शुद्ध ) है आत्मा ( अन्तःकरण) जिनका ऐसे महात्मा मत्स्येंद्र आदि पूर्वाचायोंने अपने अनुभवसे पूर्वोक्त समाधिके मार्ग वर्णन किये हैं। ६३ ।। सुषुम्नादिभ्यः कृतकृत्यस्ताः प्रणमति- सुषुम्नाय कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्रजन्मने। मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने ॥ ६४ ॥ सुषुम्नाय इति ।। सुषुम्ना मध्यनाडी तस्यै कुण्डलिन्यै आधारशक्त्यै चन्द्राद् भ्रूमध्यस्थाजन्म यस्याः तस्यै सुधायै पीयूषायै मनोन्मन्यै तुर्यावस्थायै चित्
(१६६)
हठयोगप्रदीपिका।
[उपदेश:-
चैतन्यस्वरूपं यस्याः सा तथा तस्यै । महती जडानां कायेन्द्रियमनसां चैतन्यसंपादक-
त्वात्सर्वोत्तमा या शक्तिश्चिच्छक्तिः पुरुषरूपा तस्यै तुभ्यमिति प्रत्येकं सम्बध्यते ।
नमः प्रतीभावोऽस्तु ॥ ६४ ॥
सुषुम्ना आदि नाडियोंसे कृतकृत्य हुये आचार्य उनको प्रणाम करते हैं कि, मध्यनाडीरूप
सुषुम्नाको और आधारशक्तिरूप कुण्डलिनीको और चन्द्रमासे है जन्म जिसका ऐसी सुधाको
और तुर्यावस्थारूप उस मनोन्मनीको नमस्कार है जो मनोन्मनी देह इन्द्रिय मनरूप जो जड
पदार्थ हैं उनकोभी चेतनताकी सम्पादक होनेसे सबसे बडी शक्ति (चित् शक्ति) पुरुष-
रूप है और जो चेतन आत्मा स्वरूप है-इस श्लोकमें 'तुमको नमस्कार है। इस पदका
सर्वत्र सम्बन्ध है ।। ६४ ॥
नानाविधान् समाध्युपायानुक्त्वा नादानुसन्धानरूपं मुख्योपायं प्रतिजानीते-
अशक्यतत्त्वबोधानां मूढानामपि संमतम्
प्रोक्तं गोरक्षनाथेन नादोपासनमुच्यते॥६५॥
अशक्येति ॥ अव्युत्पन्नत्वादशक्यस्तत्त्वबोधस्तत्त्वज्ञानं येषां ते तथा तेषां
मूढानामनधीतानां संमतम् । अपिशब्दाकिमुताधीतानामिति गम्यते । गोरक्षनाथेन
प्रोक्तमित्यनेन महदुक्तत्वादुपादेयत्वं गम्यते । नादस्यानाहतध्वनेरुपासनमुनुसन्धान-
रूपं सेवनमुच्यते कथ्यते ॥ ६५ ॥
अनेकप्रकारके समाधिके उपायोंको कहकर नादानुसन्धानरूप मुख्य जो उपाय है उसक
वर्णनकी प्रतिज्ञा करते हैं कि, अव्युत्पन्न ( मूर्ख ) होनेसे जिनको तत्त्वज्ञान अशक्य है उन
मूढोंकोभी जो संमत है और अपिशब्दसे पठित मनुष्योंको तो संमत क्यों न होगा ? ऐसे
गोरक्षनाथके कहेहुये नादोपासन अर्थात् अनाहतध्वनिका सेवन वर्णन करते हैं और यह नादका
अनुसन्धान गोरक्षनाथ महान् पुरुषने कहाहै इससे अवश्य करने योग्य है ॥६५॥
श्रीआदिनाथेन सपादकोटिलयप्रकाराः कथिता जयन्ति ।
नादानुसन्धानकमेकमेव मन्यामहे मुख्यतमं लयानाम् ॥६६॥
श्रीआदिनाथेनेति ॥ श्रीआदिनाथेन शिवेन कथिताः प्रोक्ताः पादेन चतुर्थी-
शेन सह वर्तमानाः कोटिसंख्याका लयप्रकाराश्चित्तलयसाधनभेदा जयन्त्युत्कर्षण
वर्तन्ते । वयं तु नादानुचिन्तनमेव एकं केवलं लयानां लयसाधनानां मध्ये मुख्यतम-
मतिशयेन मुख्यं मन्यामहे जानीमहे, उत्कृष्टानां लयसाधनानां मध्ये उत्कृष्टतमत्वात्
गोरक्षाभिमतत्वाच नादानुसन्धानमेव अवश्यं विधेयमिति भावः ॥ ६६ ॥
श्रीआदिनाथ (शिवजी) ने सवा करोड चित्तके लयके प्रकार कहे हैं और वे सर्वोत्तम
रूपसे वर्तते हैं, हम तो एक नादानुसंधान (नादका सेवन ) कोही केवल अत्यंत मुख्य लयके
साधनों में मानते हैं क्योंकि, वह सबसे उत्तम है और गोरक्षनाथको अभिमत है इससे अवश्य
करने योग्य है ॥ ६६॥
है चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१६७) शांभवीमुद्राया नादानुसन्धानमाह- मुक्तासने स्थितो योगी मुद्रा सन्धाय शाम्भवीम् । शृणुयादक्षिणे कर्णे नादमन्तःस्थमेकधीः॥ ६७॥ मुक्तासन इति ॥ मुक्तासने सिद्धासने स्थितो योगी शांभवीं मुद्राम् अन्त- लक्ष्यं बहिर्दृष्टिः' इत्यादिनोक्तां सन्धाय कृत्वा । एकधीरेकाग्रचित्तः सन् दक्षिणे कर्णेऽन्तःस्थ सुषुम्नानाड्यां सन्तमेव नादं शृणुयात् । तदुक्तं त्रिपुरसारसमुच्चये- आदौ मत्तालिमालाजनितरवसमस्तारसंस्कारकारी नादोऽसौ वांशिकस्यानिलभारतलसदंशनिस्वानतुल्यः। घण्टानादानुकारी तदनु च जलधिध्वानधीरो गभीरो गर्जन्पर्जन्यघोषः पर इह कुहरे वर्तते ब्रह्मनाड्याः॥" इति ॥ ६७ ॥ अब शांभवीमुद्रासे नादानुसन्धानका वर्णन करते हैं कि, मुक्तासन सिद्धासनमें स्थित योगी भीतर लक्ष्य और बाहिर दृष्टि इत्यादि ग्रन्थसे कही हुई शांभवी मुद्राको करके और एकाग्रचित्त होकर दक्षिणकर्णके विषे सुषुम्नानाडीमें वर्तमान जो देहके भीतरका शब्द उसको सुनें। सोई त्रिपुरसारसमुच्चयमें कहा है कि-"तारके संस्कारका कर्ता नाद प्रथम तो उन्मत्त भ्रमरोंके समूहका जो शब्द उसके समान और फिर पवनसे भरेहुये शोभित वंशके शब्दकी तुल्य और फिर घण्टाके शब्द समान और समुद्रके शब्दकी तुल्य धीर और फिर गर्जतेहुये मेघका जो शब्द उसके समान गम्भीर ऐसा पूर्वोक्त नाद इस देहमें सुषुम्नानाडीके छिद्रमें वर्तता है" ॥६७ ॥ पराङ्मुखीमुद्रया नादानुसन्धानमाह- श्रवणपुटनयनयुगलप्राणमुखानां निरोधनं कार्यम् । शुद्धसुषुम्नासरणौ स्फुटममलः श्रूयते नादः॥ ६८ ॥ श्रवणेति ॥ श्रवणपुटे नयनयोर्नेत्रयोर्युगलं युग्मं घ्राणशब्देन घ्राणपुटे मुख- मास्यम् एषाम् । इन्द्रे प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावे प्राप्तेऽपि सर्वस्यापि द्वन्दैकवद्भावस्य वैकल्पि- कत्वान्न भवति । तेषां निरोधनं करांशुलिभिः कार्यम् । निरोधनं चेत्थम्-"अंगुष्ठाभ्या- मुभौ कौँ तर्जनीभ्यां च चक्षुषी । नासापुटौ तथाऽन्याभ्यां प्रच्छाद्य करणानि च” इति । चकारात्तदन्याभ्यां मुखं प्रच्छायेति समुच्चीयते । शुद्धा प्राणायामैर्मल- रहिता या सुषुम्नासराणः सुषुम्नापद्धतिस्तस्याममलो नादः स्फुटं व्यक्तं श्रूयते ॥६८॥ अब पराङ्मुखीनाडीसे नादके अनुसंधानका वर्णन करते हैं कि, कर्ण आर नेत्र और घ्राण इन तीनोंके युगल ( दोनों छिद्र) और मुख इनका निरोध करै अर्थात् हाथकी अंगुलियोंसे इनको रोक और निरोध भी इस वचनके अनुसार करै कि अंगुष्टोंसे दोनों कानोंका और तर्जनियोंसे दोनों नेत्रोंका और मध्यमाआंस नासापुटोंका और चकारके पढनेसे अन्य अंगु- लियोंसे मुखका आच्छादन करै । इस प्रकारका इंद्रियोंका निरोध करनेसे प्राणायामोंसे मल- रहित जो सुषुम्नाका मार्ग है उसमें स्फुट (प्रत्यक्ष ) अमल ( स्पष्ट ) नाद सुनता है ॥ ६८॥ -
(१६८)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
अथ नादस्य चतस्रोऽवस्थाः प्राह-
आरम्भश्च घटश्चैव तथा परिचयोऽपि च ।
निष्पत्तिः सर्वयोगेषु स्यादवस्थाचतुष्टयम् ॥ ६९ ॥
आरंभश्चेति ॥ आरम्भावस्था घटावस्था परिचयावस्था निष्पत्त्यवस्था इति ।
सर्वयोगेषु सर्वेषु चित्तवृत्तिनिरोधोपायेषु शांभव्यादिषु अवस्थाचतुष्टयं स्यात् । चचैव-
तथापिचाः पादपूरणार्थाः ॥ ६९ ॥
अब नादकी चार अवस्थाओंका वर्णन करते हैं कि, आरंभ अवस्था-घटावस्था-परिचया-
वस्था और निष्पत्ति अवस्था ये चार अवस्था संपूर्ण चित्तवृत्तिके निरोधरूप योगोंमें होती हैं
अर्थात् शांभवीमुद्रादिकोंमें ये चारही अवस्था होती हैं ॥ ६९॥
अथारम्भावस्थामाह-
ब्रह्मग्रन्थभवेद्भदो ह्यानन्दः शून्यसम्भवः।
विचित्रः कणको देहेऽनाहतः श्रूयते ध्वनिः ॥ ७० ॥
ब्रह्मग्रन्थेरिति ॥ ब्रह्मग्रन्थेरेनाहतचक्रे वर्तमानाया भेदः प्राणायामाभ्यासेन भेदनं
यदा भवेत्तदेति यत्तदोरध्याहारः । आनन्दयतीत्यानन्दः आनन्दजनकः शून्ये हृदया-
काशे सम्भवतीति शून्यसंभवो हृदाकोशात्पन्नो विचित्रो नानाविधः क्वणो भूषण-
निनदः स एव कणकः भूषणनिनदसदृश इत्यर्थः । 'भूषणानां तु शिंजितम् ।
निक्वाणो निक्कणः काणः क्वणः क्वणनमित्यपि ' इत्यमरः । अनाहतो ध्वनिरनाहतो
निर्हादो देहे देहमध्ये श्रूयते श्रवणविषयो भवतीत्यर्थः ॥ ७० ॥
उन चारोंमें आरंभावस्था जो सबसे प्रथम ह उसका वर्णन करते हैं कि, अनाहतचक्रमें
वर्तमान ब्रह्मग्रंथिका जब प्राणायामोंके अभ्याससे भेद होताहै तब आनंदका उत्पादक आर
हृदयाकाशरूप शून्यमें उत्पन्न-और अनेकविध और भूषणोंके शब्दकी तुल्य-अनाहत अर्थात्
विना ताडनासे उत्पन्न ध्वनि (शब्द) देहके मध्यमें सुनता ह-इस श्लोकमें कणशब्दसे भूष-
णोंका शब्द इस अमरके श्लोकसे लेना कि, भूषणोंके शब्दको शिंजित-निकाण-निक्कण-काण-
कण-कणन कहते ह ॥ ७० ॥
दिव्यदेहश्च तेजस्वी दिव्यगन्धस्त्वरोगवान् ।
संपूर्णहृदयः शून्य आरम्भो योगवान्भवेत् ॥ ७१ ॥
दिव्यदेह इति ॥ शून्ये हृदाकाशे य आरम्भो नादारम्भस्तस्मिन् सति हृदा-
काशविशुद्धाकाशभूमध्याकाशाः शून्यातिशून्यमहाशून्यशब्दैर्व्यवहियन्ते योगिभिः
सम्पूर्णहृदयः प्राणवायुना सम्यक् पूर्ण हृदयं यस्य स तथा आनन्देन पूणे हृदये
योगवान् योगी दिव्यो रूपलावण्यवलसम्पन्नो देहो यस्य स दिव्यदेहः तेजस्वी
प्रतापवान् दिव्यगन्धः दिव्य उत्तमो गन्धो यस्य स तथा अरोगवान् रोगरहितों
भवेदिति सम्बन्धः ॥ ७१ ॥
चतुर्थः] (१६९) संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता । हृदाकाशरूप शून्यमें आरंभ (नादका प्रारंभ) होनेपर अर्थात् यदि हृदयमें नादकी प्रतीति होय तो प्राणवायुसे भलीप्रकार पूर्ण है हृदय जिसका और आनंदसे पूर्ण हृदयके होनेपर योगी रूप लावण्य बलसे संपन्नरूप दिव्यदेह होताहै और तेजस्वी (प्रतापी) और उत्तम गन्धवान् और रोगासे रहित होताहै । यहां शून्यसे हृदयाकाश इसलिये कहाहै कि, हृदाकाश विशुद्धाकाश भ्रुकुटिमध्यका आकाश इन तीनोंको क्रमसे शून्य अतिशून्य महाशून्य शब्दोंसे व्यवहार योगीजन करते हैं। ७१ ॥ अथ घटावस्थामाह- द्वितीयायां घटीकृत्य वायुर्भवति मध्यगः । दृढासनो भवेद्योगी ज्ञानी देवसमस्तदा ॥ ७२॥ द्वितीयायामिति ॥ द्वितीयायां घटावस्थायां वायुः प्राणः घटीकृत्य आत्मना सहापानं नादबिन्दू चैकीकृत्य मध्यगो मध्यचक्रगतः कण्ठस्थाने मध्यचक्रम् । तदुक्त- मत्रैव जालन्धरबन्धे-' मध्यचक्रमिदं ज्ञेयं षोडशाधारबन्धनम् ' इति । यदा भवे- दित्यध्याहारः। तदाऽस्यामवस्थायां योगी योगाभ्यासी दृढमासनं यस्य सः दृढासन: स्थिरासनो ज्ञानी पूर्वापेक्षया कुशलबुद्धिर्देवसमो रूपलावण्याधिक्याद्देवतुल्यो भवेत् । तदुक्तमीश्वरोक्ते राजयोगे-'प्राणापानौ नादबिन्दू जीवात्मपरमात्मनोः । मिलिखा घटते यस्मात्तस्मात्स घट उच्यते ॥” इति ॥ ७२ ।। अब घटावस्थाको कहते हैं कि, दूसरी घटावस्थामें प्राणवायु अपने संग अपान और नाद बिंदु इनको एक करके कण्ठस्थानके विषे वर्तमान जो मध्यचक्र उसमें गत ( पहुँच ) हो जाता है, सोई जालंधर बन्धमें कह आये हैं कि, सोलह आधार हैं बंधन जिसका ऐसा यह मध्यचक्र जानना अथात् यह पूर्वोक्त अवस्था होजाय तो योगी उस अवस्थामें दृढ (स्थिर) आसन और ज्ञानी अर्थात् पूर्वकी अपेक्षासे कुशलबुद्धि और रूप लावण्यका अधिकतासे देव- तुल्य होजाता है, सोई ईश्वरोक्त राजयोगमें कहा है कि, जिससे प्राण अपान नाद बिंदु जीवात्मा परमात्मा इनको मिलकर यह घटती हातसस घटावस्था कहाती है ॥७२॥ विष्णुग्रन्थेस्ततो भेदात्परमानन्दसूचकः। अतिशून्ये विमर्दश्च भेरीशब्दस्तदा भवेत् ॥७३॥ विष्णुग्रन्थेरिति ॥ ततो ब्रह्मग्रन्थिभेदनानन्तरं विष्णुप्रन्थेः कण्ठे वर्तमानाया भेदात्कुम्भकभैदनात्परमानन्दस्य भाविनो ब्रह्मानन्दस्य सूचको ज्ञापकः । अतिशून्ये कण्ठाकाशे विमदोंऽनेकनादसम्मदों भेर्याः शब्द इव शब्दो भेरीशब्दो भेरीनादश्च तदा तस्मिन् काले भवेत् ॥ ७३ ॥ फिर ब्रह्मग्रंथिभेदनके अनन्तर कण्ठके विषे वर्तमान जो विष्णुप्रथि है उसके भेदसे अर्थात् कुम्भकप्राणायामोंसे विष्णुग्रंथिके खुलनेपर होनेवाला जो परमानन्द (ब्रह्मानंद ) ह उसको सूचक (ज्ञापक ) अतिशून्यरूप कण्ठाकाशमें विमर्द अर्थात् भेरीके शब्द समान अनक नादोंका संमर्द और भेरीका शब्द उस समय होते हैं ॥ ७३ ।।
(१७०)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
अथ परिचयावस्थामाह साईद्वाभ्याम् -
तृतीयायां तु विज्ञेयो विहायोमर्दलध्वनिः ।
महाशून्यं तदा याति सर्वसिद्धिसमाश्रयम् ॥ ७॥
तृतीयायामिति ॥ तृतीयायां परिचयावस्थायां विहायोमदर्लध्वानविहीयसि
भ्रूमध्याकाशे मर्दलस्य वाद्यविशेषस्य ध्वनिरिव ध्वनिर्विज्ञेयो विशेषेण ज्ञानाहों
भवति । तदा तस्यामवस्थायां सर्वसिद्धिसमाश्रयं सर्वासां सिद्धीनामणिमादीनां समा-
श्रयं स्थानम् । तत्र संयमादणिमादिप्राप्ते महाशून्यं भ्रूमध्याकाशं याति गच्छति
प्राण इति शेषः ॥७४॥
अब अढाई श्लोकोंसे परिचयावस्थाका वर्णन करते हैं कि, तीसरी परिचयावस्थामें भ्रुकु-
टिके मध्यरूप आकाशमें मर्दलनाम वाद्यविशेष (ढोल) की ध्वनि विशेष करके जाननी
और उस अवस्था में प्राणवायु संपूर्ण अणिमा आदि सिद्धियोंका समाश्रय जो (स्थान) महा.
शून्य है, भ्रूमध्याकाशरूप उसमें पहुंच जाताहै, क्योंकि महाशून्यमें वायुका संयम करनेसे
अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है।। ७४ ॥
चित्तानन्दं तदा जित्वा सहजानन्दसम्भवः।
दोषदुःखजराव्याधिक्षुधानिद्राविवर्जितः ॥ ७॥
चित्तानन्दमिति ॥ चित्तानन्दं नादविषयान्तःकरणवृत्तिजन्यं सुखं जित्वाभिभूय
सहजानन्दसम्भवः सहजानन्दः स्वाभाविकात्मसुखं तस्य सम्भव आविर्भावः सः। दोषा
वातपित्तकफाः, दुःखं तज्जन्या वेदना आध्यात्मिकादि च, जरा वृद्धावस्था, व्याधि-
वरादिः, क्षुधा बुभुक्षा, निद्रा स्वाप एतैर्विवर्जितो रहितस्तदा योगी भवतीति ॥७५॥
और उस योगीका नादका विषय जो अन्तःकरणकी वृत्ति है उससे उत्पन्न रूप जो
चित्तका आनन्द है उसका तिरस्कार करनेके अनंतर स्वाभाविक आत्मसुखरूप जो सहजानन्द
है उसका आविर्भाव (प्रकटता ) होता है-फिर वह योगी वातपित्तकफरूप दोषोंका दुःख,
वृद्ध अवस्था और आध्यात्मिक दुःख और ज्वर आदि व्याधि क्षुधा ( भोजनकी इच्छा)
निद्रा-इनसे विवर्जित उस समय होता है ।। ७५ ।।
तदा कदेत्यपेक्षायामाह-
रुद्रग्रन्थि यदा भित्त्वा शर्वपीठगतोऽनिलः।
निष्पत्तौ वैणवः शब्दः कणवीणाकणो भवेत् ॥७६ ॥
रुद्रति ॥ यदा रुद्रग्रन्थि भित्त्वा आज्ञाचक्रे रुद्रग्रन्थिः शर्वस्येश्वरस्य पीठं
भ्रूमध्यं तत्र गतः प्राप्तोऽनिलः प्राणो भवति तदा । निष्पत्त्यवस्थामाह-निष्पत्ता-
विति ॥ निष्पत्तौ निष्पत्त्यवस्थायाम् । ब्रह्मरन्ध्र गते प्राणे निष्पत्त्यवस्था भवति ।
वणवः वेणारयं वैणवो वंशसम्बन्धी शब्दो निनादः कणन्ती शब्दायमाना या वीणा
तस्याः क्वणः शब्दो भवेत् ॥ ७६॥
चतुर्थः ] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१७१) जिस समय प्राण उस रुद्रग्रंथिका भेदन करके जो रुद्रग्रंथि आज्ञाचक्रमें होती है शर्व (ईश्वर) का पीठ (स्थान ) जो भ्रुकुटीका मध्य है उसमें प्राप्त होजाता है * ॥ अवनिष्पत्तिअवस्थाका वर्णन करते हैं कि, निष्पत्तिअवस्थामें अर्थात् प्राणके ब्रह्मरंध्रमें पहुंचनेपर ऐसा वेणु (वंश) के शब्दकी तुल्य शब्द होता है जैसा शब्द करतीहुई वीणाका शब्द होताहै ॥ ७६ ॥ एकीभूतं तदा चित्तं राजयोगाभिधानकम् । सृष्टिसंहारकर्ताऽसौ योगीश्वरसमो भवेत् ॥ ७७॥ एकीभूतमिति ॥ तदा तस्यामवस्थायां चित्तमन्तःकरणमेकीभूतमेकविषयीभूतम् , विषयीभूतम् । विषयविषयिणोरभेदोपचारात् । तद्राजयोगाभिधानकं राजयोग इत्यभिधानं यस्य तद्राजयोगाभिधानकं चित्तस्यैकाग्रतैव राजयोग इत्यर्थः । सृष्टि- संहारेति ॥ असौ नादानुसन्धानपरो योगी सृष्टिसंहारकर्ता सृष्टिं संहारं च करोतीति तादृशः। अतएवेश्वरसम ईश्वरतुल्यो भवेत् ॥ ७७ ॥ उस निष्पत्ति अवस्थामें चित्त एकीभूत होजाता है अर्थात् विषय और विषयी (ज्ञान) इनका अभेद ( एकता) होनेसे राजयोग है नाम जिसका ऐसा यह चित्त होजाता है। क्योंकि, चित्तकी एकाग्रताकाही राजयोग कहते हैं और वह योगी सृष्टि और संहारका कर्ता ईश्वरके समान होजाताहै अर्थात् नादके अनुसंधानसे रचना और संहारका कर्ता ईश्वररूप होजाताहै७७ अस्तु वा मास्तु वा मुक्तिरत्रैवाखण्डितं सुखम् । लयोद्भवमिदं सौख्यं राजयोगादवाप्यते ॥७८ ॥ राजयोगमजानन्तः केवलं हठकर्मिणः। एतानभ्यासिनो मन्ये प्रयासफलवर्जितान् ॥ ७९ ॥ अस्तु वेति॥ राजयोगमिति ॥ उभौ प्राग्व्याख्यातौ ॥ ७८ ॥ ७९ ॥ यद्यपि इन दोनों श्लोकोंका अर्थ पहिले लिख आये हैं तथापि यहांभी किंचित् लिखते हैं कि, मुक्ति हो वा मत हो इस नादानुसंधान करनेमेंही अखंड सुख होता है और लयसे उत्पन्न हुआ यह सुख राजयोगसे प्राप्त होता है और जो योगी राजयोगको नहीं जानते हैं और हठ- योगकी क्रियाको करते हैं उन अभ्यासियोंको मैं परिश्रमके फलसे वर्जित मानता हूँ अर्थात् उनको हठयोगका फल नहीं होता है ॥ ७८ ॥ ७९ ॥ उन्मन्यवाप्तये शीघ्र भूध्यानं मम सम्मतम् । राजयोगपदं प्राप्तुं सुखोपायोऽल्पचेतसाम् ॥ सद्यः प्रत्ययसन्धायी जायते नादजो लयः॥ ८० ॥ उन्मन्यवाप्तय इति ॥ शीघ्रं त्वरितमुन्मन्या उन्मन्यवस्थाया अवाप्तये प्राप्त्यर्थं भूध्यानं भ्रुवोानं भ्रूमध्ये ध्यानं मम स्वात्मारामस्य संमतम् । राजयोगो योगानां राजा तदेव पदं राजयोगपदं तुर्यावस्थाख्यं प्राप्तुं लब्धं पूर्वोक्तभ्रूध्यानरूपः सुखोपायः । (१७२) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:- सुखसाध्यः उपायः सुखोपायः। अल्पचेतसामल्पबुद्धीनामपि । किमुतान्येषामित्यभि प्रायः । नादजः नादाजातो लयश्चित्तविलयः सद्यः शीघ्रं प्रत्ययं प्रतीति सन्दधातीति प्रत्ययसन्धायी प्रतीतिकरो जायते प्रादुर्भवति ॥ ८० ॥ उन्मनी अवस्थाकी शीघ्र प्राप्तिके लिये मुझे स्वात्मारामयोगीको भ्रुकुटियोंके मध्यमें जो ध्यान है वह संमत है और सब योगोंका राजारूप जो राजयोग है उस तुर्य अवस्थानामके राजयोगकी प्राप्तिके लिये पूर्वोक्त भ्रुकुटियों का ध्यानही अल्पबुद्धियोंके लिये सुख (सरल) उपाय है-और नादसे उत्पन्न भया जो चित्तका विलय है वह शीघ्रही प्रतीतिको करनेवाला होता है ॥ ८० ॥ नादानुसन्धानसमाधिभाजां योगीश्वराणां हृदि वर्धमानम् । आनन्दमेकं वचसामगम्यं जानाति तं श्रीगुरुनाथ एकः॥८१ ॥ नादानुसन्धानेति ॥ नादस्यानाहतध्वनेरनुसन्धानमनुचिन्तनं तेन समाधिः चिचैकाग्यं तं भजन्तीति नादानुसन्धानसमाधिभाजस्तेषां योगिषु योगयुक्तेष्वीश्वराः समर्थास्तेषां हृदि हृदये वर्धते इति वर्धमानस्तं वर्धमानं वचसां वाचामगम्यम् इदमिति वक्तुमशक्यं तं योगशास्त्रप्रसिद्धमेकं मुख्यमानन्दमालादमेकोऽनन्यः श्रीगुरु- नाथः श्रीमान् गुरुरेव नाथो जानाति वेत्ति । एतेन नादानुसन्धानानन्दो गुरुगम्य एवेति सूचितम् ॥ ८१॥ अनाहतध्वनिरूप जो नाद है उसके अनुसन्धान (स्मरण) से जो चित्तकी एकाग्रतारूप समाधि है उसके कर्ता जो योगीश्वर (योगियोंमें जो उत्तम ) हैं उनके हृदयमें बढताहुआ और वाणी जिसको ‘ यह है ' इस प्रकार नहीं कह सकती है-ऐसा जो योगशास्त्रमें प्रसिद्ध एक (मुख्य) आनन्द होता है उसका एक श्रीगुरुनाथ अर्थात् श्रीयुत गुरुस्वामीही जानते हैं इससे यह सूचित किया कि नादके अनुसन्धानका आनन्द गुरुकी दयासेही प्रतीत हो सकता है अन्य प्रकारसे नहीं हो सकता ॥ ८१॥ नादानुसन्धानात्मत्याहारादिक्रमेण समाधिमाह कर्णावित्यादिभिः- कर्णी पिधाय हस्ताभ्यां यं शृणोति ध्वनि मुनिः। तत्र चित्तं स्थिरीकुर्याद्यावस्थिरपदं ब्रजेत् ॥ ८२॥ कर्णाविति ॥ मुनिर्मननशीलो योगी हस्ताभ्यामित्यनेन हस्तांगुष्ठौ लक्ष्येते, ताभ्यां कौँ श्रोत्रे पिधाय । हस्तांगुष्ठौ श्रोत्रविवरयोः कृत्वेत्यर्थः । यं ध्वनिमनाहत- निःस्वनं शृणोत्याकर्णयति तत्र तस्मिन् ध्वनौ चित्तं स्थिरीकुर्यादस्थिरं स्थिरं सम्पद्य- मानं कुर्यात् । यावत् स्थिरं पदं स्थिरपदं तुर्याख्यं गच्छेत् । तदुक्तम्-तुर्यावस्था चिद- भिव्यञ्जकनादस्य वेदनं प्रोक्तमिति नादानुसन्धानेन वायुस्थैर्यमणिमादयोऽपि भव- तीति । उक्तं च त्रिपुरसारसमुच्चये-' विजितो भवतीह तेन वायुः सहजो यस्य समुत्थितः प्रणादः । अणिमादिगुणा भवन्ति तस्यामितपुण्यं च महागुणोदयस्य ॥ , चतुर्थः ] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता । सुरराजतनूजवैरिरन्ध्र विनिरुध्य स्वकराङ्कुलिद्वयेन । जलधेरिव धीरनादमन्तः मसालोंक सहसा शृणोति मर्त्यः ॥ ' इति । सुरराज इन्द्रस्तस्य तनूजोऽर्जुनस्तस्य वैरी कर्णस्त- द्रन्ध्रे । स्पष्टमन्यत् ॥ ८२॥ नादके अनुसन्धानसे प्रत्याहार आदिके क्रमसे समाधिका वर्णन करते हैं कि, मननका कर्ता योगी हाथोंके अंगूठोंसे कौँको ढककर अर्थात् अंगूठोंको कोंके छिद्रोंमें लगाकर जिस अनाहतध्वनिको सुनता है उस अनाहतध्वनिमें अस्थिरभी चित्तको तबतक स्थिर करै जबतक तुर्यावस्थारूप स्थिरपदको प्राप्त न हो । सोई कहा है कि, तुर्यावस्था-चेतनका अभिव्यंजक (ज्ञापक) जो नाद उसका ज्ञानरूप है और नादके. अनुसन्धानसे वायुकी स्थिरता और अणिमा आदि सिद्धिभी होती हैं। और त्रिपुरसारसमुच्चयमेंभी कहा है कि, जिस योगीके देहमें स्वाभाविक नाद भलीप्रकार उठता है वह वायुको जीतलेता ह और उसको अणिमा आदि गुण और उस महोदयको अतुल पुण्य होते हैं, अपने हाथकी दो अंगुलियोंसे काँके छिद्रोंको रोखकर समुद्रके समान धीर जो नाद देहके भीतर फैलाता है उसको मनुष्य ( योगि) शीघ्रही सुनता है ।। ८२ ॥ अभ्यस्यमानो नादोऽयं बाह्यमावृणुते ध्वनिम् । पक्षाद्विक्षेपमखिलं जित्वा योगी सुखी भवेत् ॥ ८३ ॥ अभ्यस्यमान इति ॥ अभ्यस्यमानोऽनुसंधीयमानोऽयं नादोऽनाहताख्यो बाह्य- ध्वनि बहिर्भवं शब्दमावृणुते श्रुत्योर्विषयम् । योगी नादाभ्यासी पक्षान्मासार्धादखिलं सर्व विक्षेपं चित्तचाञ्चल्यं जित्वाऽभिभूय सुखी स्वानन्दो भवेत् ॥ ८३ ॥ अभ्यास कियाहुआ अर्थात् अनुसन्धान किया यह नाद बाहिरका जो शब्द है उसका आवरण करता है अर्थात् बाह्यके शब्दकोभी योगी सुनलेता है और वह नादका अभ्यासी योगी एक पक्षभरसेही चित्तकी चंचलतारूप संपूर्ण विक्षेपको जीतकर सुखी होता है अर्थात् आत्मानन्दरूप सुखको प्राप्त होता है ।। ८३ ॥ श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादो नानाविधो महान् । ततोऽभ्यासे वर्धमाने श्रूयते सूक्ष्मसूक्ष्मकः॥ ८४॥ श्रूयते इति ॥ प्रथमाभ्यासे पूर्वाभ्यासे नानाविधोऽनेकविधो महान् जलधि- जीमूतभेर्यादिसदृशो नादोऽनाहतस्वनः श्रूयते आकर्ण्यते । ततोऽनन्तरमभ्यासे नादा- नुसन्धानाभ्यासे वर्धमाने सति सूक्ष्मसूक्ष्मकः सूक्ष्मः सूक्ष्म एव श्रूयते श्रवण विषयो भवति ॥ ८४॥ प्रथम २ के अभ्यासमें अनेक प्रकारका अर्थात् समुद्र मेघ भेरीके शब्दकी तुल्य महान् (भारी) नाद सुना जाता है और उसके अनन्तर अभ्यासके होनेपर सूक्ष्म २ शब्द सुना जाता है। ८४॥
हठयोगप्रदीपिका। [उपदेशः- (१७४) नानाविधं नादमाह द्वाभ्याम्- आदौ जलधिजीमूतभेरीझर्झरसंभवाः। मध्ये मर्दलशोत्था घण्टाकाहलजास्तथा ॥ ८५ ॥ आदाविति ॥ आदौ वायोर्ब्रह्मरन्ध्रगमनसमये जलधिः समुद्रो जीमूतो मेघो भेरी वाद्यविशेषः । भेरी स्त्री दुंदुभिः पुमान् ' इत्यमरः । झर्झरो वाद्यविशेषः । वाद्यप्रभेदा डमरुमड्डुडिंडिमझर्झराः । मर्दलः पणवोऽन्येऽपि ' इत्यमरः । जलधि- प्रमुखेभ्यः संभव इव संभवो येषां ते तथा मध्ये ब्रह्मरंध्रे वायोः स्थैर्यानन्तरं मर्दलो वाद्यविशेषः शंखो जलजस्ताभ्यामुत्था इव मर्दलशंखोत्याः घण्टाकाहलौ वाद्य- विशेषौ ताभ्यां जाता इव घण्टाकाहलजाः ॥ ८५ ॥ अब दो श्लोंकोंसे नाना प्रकारके नादका वर्णन करते हैं कि, प्रथम २ प्राणवायुके ब्रह्मरंध्रमें गमनसमयमें समुद्र, मेघ, भेरी (धोंस) जो बाजे हैं और झझरी (झांझ) जो वाद्य विशेष हैं उनके शब्दके समान शब्द बह्मरंध्रमें सुने जाते हैं और मध्यमें अर्थात् सुषुम्नामें प्राणवायुकी स्थिरताके अनंतर मर्दल, शंख इनके शब्दकी तुल्यशब्द सुने जाते हैं और तिस प्रकार घंटा और काहलनामके जो बाजे हैं उनके शब्दकी सदृश शब्दभी प्रतीत होते हैं ।। ८५ ॥ अन्ते तु किङ्किणीवंशवीणाभ्रमरनिस्वनाः । इति नानाविधा नादाः श्रूयन्ते देहमध्यगाः॥८६॥ अन्ते त्विति ॥ अन्ते तु प्राणस्य ब्रह्मरंध्रे बहुस्थैर्यानंतरं तु किंकिणी क्षुद्र- घण्टिका वंशो वेणुः वीणा तंत्री भ्रमरो मधुपः तेषां निस्वना इति पूर्वोक्ताः नाना- विधाः अनेकप्रकारका देहस्य मध्ये गताः प्राप्ताः श्रूयंते ॥ ८६ ॥ फिर प्राणकी ब्रह्मरंध्रमें स्थिरताके अंतमें किंकिणी-वंश-वीणा-भ्रमर इनके शब्दकी तुल्य शब्द सुनेजाते हैं। इस प्रकार देहमें नाना प्रकारके शब्द सुने जाते हैं ॥ ८६ ॥ महति श्रूयमाणेऽपि मेघभयांदिके ध्वनौ तत्र सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नादमेव परामृशेत् ॥ ८७॥ महतीति ॥ मेघश्च भेरी च ते आदी यस्य स मेघभेर्यादिकस्तस्मिन् मेघभेरी- शब्दौ तज्जन्यनिर्घोषपरौ । महति बहुले ध्वनौ निनादे श्रूयमाणे आकर्ण्यमाने सत्यापि तत्र तेषु नादेषु सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरमतिसूक्ष्मं नादमेव परामृशेचिन्तयेत् । सूक्ष्मस्य नादस्य चिरस्थायित्वात्तत्रासक्तचित्तश्चिरं स्थिरमतिर्भवेदिति भावः ॥ ८७ ॥ : मेघ, भेरी आदिका जो महान् शब्द है उसकी तुल्य शब्दके सुननेपरभी उन शब्दोंमें सूक्ष्म जो नाद है उसका चिंतन करै क्योंकि सूक्ष्मनाद चिरकालतक रहता है उसमें आसक्त हुआ है चित्त जिसका ऐसा मनुष्यभी चिरकालतक स्थिरमति होजाता है ॥ ८७ ।। सेभी सूक्ष्म TAGRA
चतुर्थः]
मघ,
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता ।
(१७५)
घनमुत्सृज्य वा सुक्ष्मे सुक्ष्ममुत्सृज्य वा घने ।
रममाणमपि क्षिप्तं मनो नान्यत्र चालयेत् ॥८८॥
घनामिति ॥ घनं महान्तं नादं मेघभेर्यादिकमुत्सृज्य घने वा नादे रममाणं धन-
सूक्ष्मान्यतरनादग्रहणपरित्यागाभ्यां क्रीडन्तमाप क्षिप्तं रजसाऽत्यंतचंचलं मनोऽन्यत्र
विषयांतरे न चालयेन्न प्रेरयेत् । क्षिप्तं मनो विषयांतरासक्तं न समाधीयते नादेषु
रममाणं तु समाधीयत इति भावः ॥ ८८ ॥
भेरी आदिके महान् नादको त्यागकर सूक्ष्ममें वा सूक्ष्मनादको त्यागकर महान्
नादमें रमण करतेहुये रजोगुणसे अत्यंत चंचल चित्तको अर्थात् महान् सूक्ष्म शब्दके ग्रहण वा
परित्यागसे क्रीडा करते हुये मनको चलायमान न करै-क्योंकि, विषयांतरोंमें आसक्त मन
समाधान नहीं होसकता है और नादमें रमता हुआ जो मन उसका समाधान होसकताहै८८।।
यत्रकुत्रापि वा नादे लगति प्रथमं मनः ।
तत्रैव सुस्थिरीभूय तेन सार्धं विलीयते ॥ ८९ ॥
योति ॥ वा अथवा यत्रकुत्रापि नादे यस्मिन्कस्मिश्चिंद् घने सुक्ष्मे वा नादे प्रथम
पूर्व मनो लगति लग्नं भवति तत्रैव तस्मिन्नेव नादे सुस्थिरीभूय सम्यक् स्थिरं भूत्वा
तेन नादेन सार्धं साकं विलीयते लीनं भवतीत्यर्थः । अत्र पूर्ववाक्येन प्रत्याहारो द्विती-
येन धारणा तृतीयेन ध्यानद्वारा समाधिरुक्तः ॥ ८९॥
अथवा जिस किसी धन वा सूक्ष्म नादमें प्रथम मन लगे उसी नादमें भली प्रकार स्थिर होकर
उसी नादके संग लय होजाताहै-यहां पूर्व वाक्यसे प्रत्याहार दूसरेसे धारणा और तीसरेसे
ध्यानके द्वारा समाधि कही है ।। ८९ ॥
मकरन्द पिबन् भृङ्गो गन्धं नापेक्षते यथा ।
नादासक्तं तथा चित्तं विषयान्न हि कांक्षते ॥९॥
मकरन्दमिति ॥ मकरन्दं पुष्परसं पिबन धयन् भृङ्गो भ्रमरो गन्धं यथा नापे-
क्षते नेच्छति तथा नादासक्तं नाद आसक्तं चित्तमन्तःकरणं विषयान् विषिण्वन्त्येव
बध्नन्ति प्रमातारं स्वसङ्गेनेति विषयाः स्रक्चन्दनवनितादयस्तान् न कांक्षते नेच्छति ।
हीति निश्चये ॥९॥
जैसे मकरंद (पुष्पका रस) का पान करता हुआ भ्रमर पुष्पके गंधकी अपेक्षा नहीं करता
है तिसी प्रकार नादमें आसक्त हुआ चित्त भी अपने बंधनके कर्ता जो स्रक् चंदन वनिता आदि
विषय हैं उनकी आकांक्षा नहीं करता है यह निश्चित ह ॥ ९॥
मनोमत्तगजेन्द्रस्य विषयोद्यानचारिणः।
नियन्त्रणे समर्थोऽयं निनादनिशिताङ्कुशः॥९१ ॥
हठयोगप्रदीपिका। [उपदेशः- (१७६) मन इति ॥ विषयः शब्दादिरेवोद्यानं वनं तत्र चरतीति विषयोद्यानचारी तस्य मन एव मत्तगजेन्द्रः। दुनिवारत्वात् । तस्य निनाद एवानाहतध्वनिरेव निशितांकुशः तीक्ष्णांकुशः नियंत्रणे परावर्तने समर्थः शक्तः । एतैः श्लोकः ' चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम् । यत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः प्रकीर्तितः ॥' इन्द्रियाणां विष- येभ्यः प्रत्याहरणं प्रत्याहार इत्युक्तलक्षणः प्रत्याहारः प्रोक्तः ॥९१॥ शब्द आदि विषयरूप जो उद्यान उसमें विचरता हुआ जो मनरूप उन्मत्त गजेंद्र है उसके परावर्तन (लौटाना) म यह-नादुरूप जो तीक्ष्ण अंकुश है वही समर्थ है । इन श्लोकोंसे इंद्रि- योंका विषयोंसे वह प्रत्याहार कहाहै जो इस श्लोकमें कहा कि, विषयों में क्रमसे चरते हुये जो नेत्र आदि इन्द्रिय हैं उनकी जो विषयोंसे निवृत्ति उसको प्रत्याहार कहते हैं ॥ ९१ ॥ बद्धं तु नादबन्धेन मनः संत्यक्तचापलम् । प्रयाति सुतरां स्थैर्य छिन्नपक्षः खगो यथा ॥ ९२॥ बद्धं त्विति ॥ नाद एव बन्धः बध्यतेऽनेनेति बन्धः बन्धनसाधनं तेन स्वशक्त्या स्वाधीनकरणेन बद्धं बन्धनमिव प्राप्तम् । नादधारणादावासक्तमित्यर्थः । अत एव सम्यक् त्यक्तं चापलं क्षणेक्षणे विषयग्रहणपरित्यागरूपं येन तत्तथा मनः सुतरां स्थैर्य प्रयाति नितरां धारणमेति । तत्र दृष्टान्तमाह-छिन्नौ पक्षौ यस्य तादृशः खें गच्छतीति खगः पक्षी यथा । एतेन-'प्राणायामेन पवनं प्रत्याहारेण चेन्द्रियम् । वशीकृत्य ततः कुर्याञ्चित्तस्थैर्य शुभाश्रये ॥' शुभाश्रये चित्तस्थापनं धारणेत्युक्त लक्षणा धारणा प्रोक्ता ॥९२॥ नादरूप जो बंधनका साधन है उससे अपनी शक्तिके अनुसार बंधनको प्राप्त हुआ मन अर्थात् नादकी धारणा आदिमें आसक्त हुआ चित्त और इसीसे भली प्रकार त्यागदी है क्षण २म विषयोंका ग्रहणरूप चपलता जिसने ऐसा मन निरन्तर स्थिरताको प्राप्त होता है अर्थात् धारणाको प्राप्त इस प्रकार होताहै जैसे छेदन किये हैं पक्ष जिसके ऐसा पक्षी हा जाताहै । इस आश्रयमें चित्तका स्थापनरूप उस धारणाको कहाहै जो इस वचनमें कही है कि, प्राणायामसे पवनको और प्रत्याहारसे इंद्रियोंको वशमें करके शुभाश्रय (ब्रह्मरंध्र) म चित्तकी स्थिरताको करै ।। ९२॥ सर्वचिन्तां परित्यज्य सावधानेन चेतसा । नाद एवानुसन्धेयो योगसाम्राज्यमिच्छता ॥९३ ॥ सर्वचिन्तामिति ॥ सर्वेषां बाह्याभ्यन्तरविषयाणां या चिन्ता चिन्तनं तां परि- त्यज्य त्यक्त्वा सावधानेनैकाग्रेण चेतसा योगानां साम्राज्यं सम्राजो भावः। योग- शब्दोऽधिजन्तः । राजयोगित्वमिति यावत् । इच्छता वांछता पुंसा नाद एवानाहत- ध्वनिरेवानुसन्धेयोऽनुचिन्तनीयः, नादाकारवृत्तिप्रवाहः कर्तव्य इत्यर्थः । एतेन तद्रूप- प्रत्ययैकाम्यसन्ततिश्चान्यनिस्पृहा । तद्धयानं प्रथमैरङ्गैः षभिनिष्पाद्यते नृप ॥' तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानमित्युक्तलक्षणं ध्यानमुक्तम् ॥ ९३ ॥ लोकसे शुभ
चतुर्थः]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता।
(१७७)
बाह्य और भीतरके जो संपूर्ण विषयहैं उनकी चिंताको त्यागकर सावधान ( एकाग्र)
चित्तसे राजयोगका अभिलाषी योगी नादकाही अनुसंधान करै अर्थात् नादाकार वृत्तिका प्रवाह
करै इससे वह चित्तकी प्रत्ययकतानतारूप ध्यान कहा, जो इस वचनमें कहाहै कि, ब्रह्मरूप प्रत्य-
यकी जो एकाग्र (एकरस ) संतति और अन्य विषयोंकी निःस्पृहा वह ध्यान हे नृप !
प्रथम छः अंगोंसे प्राप्त होताहै अर्थात् उसकी प्राप्तिके छ: अंग कारण हैं ॥ ९३ ॥
नादोऽन्तरङ्गसारङ्गबन्धने वागुरायते ।
अन्तरङ्गकुरङ्गस्य वधे व्याधायतेऽपि च ॥ ९४ ॥
नादोऽन्तरङ्गेति ॥ नादः अंतरङ्गं मन एव सारंगो मृगस्तस्य बंधने चांचल्य-
हरणे वागुरायते वागुरेवाचरति, वागुरा जालम् । यथा वागुराबंधनेन सारङ्गस्य चांचल्यं
हरति तथा नादोऽन्तरंगस्य स्वशक्त्या चांचल्यं हरतीत्यर्थः । अंतरंगं मन एव
कुरंगो हरिणस्तस्य वधे नानावृत्त्युत्पादनापनयनमेव मनसो बंधस्तस्मिन् व्याधा-
यते व्याध इवाचरति । यथा व्याधो वागुराबद्धं मृगं हंति एवं नादोऽपि स्वासक्तं
मनो हंतीत्यर्थः ॥ ९४ ॥
नाद अंतरंग (मन ) जो सारंग मृग उसके बंधन (चंचलताका हरण) में वागुरा (मृग-
बंधनमें जाल) के समान है अर्थात् जैसे वागुराके बंधनसे मृगकी चंचलता हरीजाती है
इसा प्रकार नादभी मनकी चंचलताको अपनी शक्तिसे हरताहै और नादही अंतरंग (मन)
हरिणके वधम व्याधके समान है अर्थात् जैसे व्याध वागुरामें बंधे हुये मृगको हरताहै इसी
प्रकार अपनेमें आसक्तहुये मनको नादभी हरताहै अर्थात् नानावृत्ति जो मनमें उत्पन्न होती हैं
उनको दूर करताहै ॥ ९४ ॥
अन्तरङ्गस्य यमिनो वाजिनः परिवायते ।
नादोपास्तिरतो नित्यमवधार्या हि योगिना ॥ ९५ ॥
अन्तरङ्गस्येति ॥ यमिनो योगिनोऽन्तरङ्गं मनस्तस्य चपलत्वादाजिनोऽश्वस्य
परिघायते वाजिशालाद्वारपरिघ इवाचरति नाद इति शेषः । यथा वाजिशालापरिधों
वाजिनोऽन्यत्र गति रुणद्धि तथा नादोऽन्तरंगस्येत्यर्थः । अतः कारणाद्योगिना नाद-
स्योपास्तिरुपासना नित्यं प्रत्यहमवधार्याऽवधारणीया । हीति निश्चयेऽव्ययम् ॥९५ ।।
योगीजनका जो अंतरंग (मन) रूप बाजी है उसके परिघ अर्थात् घुडशालाके द्वारमें अव-
रोधक लोहदंडके समान नाद है, निदान जैसे वाजिशालाका परिघ वाजीकी अन्यत्र गतिको
रोकताहै इसीप्रकार नादभी मनकी अन्यत्र विषयादिकोंमें जो गति है उसको रोकैहै, इस कार.
रणे योगीजन निश्चल करके नादको उपासनाका निश्चय करै ।। ९५ ।।
बद्ध विमुक्तचाञ्चल्यं नादगन्धकजारणात् ।
मनःपारदमानोति निरालंबाख्यखेऽटनम् ॥ ९६॥
(१७८) [उपदेशः- हठयोगप्रदीपिका। बद्धमिति ॥ नाद एव गन्धक उपधातुविशेषस्तेन जारणं जारणीकरणं नाद- गन्धकसम्बन्धेन चाञ्चल्यहरणं तस्माद्बद्धं नादैकासक्तम् । पक्षे गुटिकाकृति प्राप्तम् अत एव विमुक्तं त्यक्तं चांचल्यमनेकविषयाकारपरिणामरूपं येन । पक्षे विमुक्तलौल्यं मनःपारदं मन एव पारदं चंचलं निरालंबं ब्रह्म तदेवाख्या यस्य तन्निरालंबाख्यं तदेव खमपरिच्छिन्नत्वात्तस्मिन्नटनं गमनं तदाकारवृत्तिप्रवाहम् । पक्षे आकाशगमनं प्राप्नोति । यथा बद्धं पारदमाकाशगमनं करोति एवं बद्धं मनो ब्रह्माकारवृत्तिप्रवाह- मविच्छिन्नं करोतीत्यर्थः॥ ९६ ॥ नादुरूप जो गन्धक उससे जारण (भस्म) करनेसे अर्थात् नाद गन्धकके संयोगसे चंच- लताके हरनेसे बद्ध (एक नादमेंही आसक्त) और पाराके पक्षमें गुटिकारूप हुआ समझना और जारणसेही त्यागदिया है विषयाकार परिणामरूप चांचल्य जिसने और पाराके पक्षमें त्यागदी है स्वाभाविक चंचलता जिसने वह समझना, ऐसा मनरूप पारद (चंचलरूप) निरालम्बनामक आकाशरूप अपरिच्छिन्न ब्रह्ममें गमनको अर्थात् ब्रह्माकार वृत्तिके प्रवाहको प्राप्त होता है और पाराके पक्षमें आकाशगमनको प्राप्त होना समझना, तात्पर्य यह है कि, इस प्रकार बंधाहुआ मन निरवच्छिन्न (एकरस) ब्रह्माकार वृत्तिके प्रवाहको करता है ।। ९६ ॥ नादश्रवणतःक्षिप्रमन्तरङ्गभुजङ्गमः। विस्मृत्य सर्वमेकायः कुत्रचिन हि धावति ॥ ९७॥ नादेति ॥ नादस्यानाहतस्वनस्य श्रवणतः श्रवणात् क्षिप्रं द्रुतमन्तरङ्गं मन एव भुजंगमः सर्पश्चपलत्वान्नादप्रियत्वाच्च भुजंगमरूपत्वं मनसः, सर्व विश्वं विस्मृत्य विस्मृतिविषयं कृत्वैकाग्रो नादाकारवृत्तिप्रवाहवान् सन्कुत्रापि विषयांतरे नहि धावति नैव धावनं करोति । ध्यानोत्तरैः श्लोकैः तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत् । मनसा ध्याननिष्पाद्यः समाधिः सोऽभिधीयते ॥ इति विष्णुपुराणोक्तलक्षणेन 'तदे- वार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः' इति पातंजलसूत्रोक्तलक्षणेन च संप्रज्ञात- लक्षणः समाधिरुक्तः ॥ ९७॥ अनाहत शब्दरूप नादके श्रवणसे शीघ्रही मनरूप भुजंगम (सर्प) यहां चपल और नाद. प्रिय होनेसे मनको भुजंगम समझना, सम्पूर्ण विश्वका विस्मरण करके एकाग्र हुआ अर्थात् नादाकारवृत्तिप्रवाही होकर किसी विषयमें नहीं दौडताहै । ध्यानसे पीछे कहेड्डये श्लोकोंसे इस विष्णुपुराणके वचन और इस पातंजल सूत्रमें क्रमसे कहीहुई समाधि और संप्रज्ञात समाधि कही है कि, उसकाही कल्पनाहीन जो स्वरूपका ग्रहण मनसेहै वही ध्यानसे उत्पन्न होता है और उसकोही समाधि कहतेहैं, उस आत्माकाही जो अर्थमात्र निर्भास स्वरूप शून्यके समान है उसको सप्रज्ञात समाधि कहते हैं ॥ ९७ ॥ काष्ठे प्रवर्तितो वह्निः काष्ठेन सह शाम्यति । नादे प्रवर्तितं चित्तं नादेन सह लीयते ॥ ९८ ॥ ।
चतुर्थः ]
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेती।
(१७९)
काष्ठ इति ॥ काष्ठे दारुणि प्रवर्तितः प्रज्वलितो वह्निः काष्ठेन सह शाम्यति
ज्वालारूपं परित्यज्य तन्मात्ररूपेणावतिष्ठते यथा तथा नादे प्रवर्तितं चित्तं नादेन
सह लीयते राजसतामसवृत्तिनाशात्सत्त्वमात्रावशेष संस्कारशेषं च भवति । तत्र च
मैत्रायणीयमन्त्रः- यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति । तथा वृत्तिक्षयाच्चित्तं
स्वयोनावुपशाम्यात ' इति ॥ ९८॥
काष्ठमें प्रवृत्त की अर्थात् जलाईहुई अग्नि ज्वालारूपको त्यागकर जैसे काष्टके संग शांत
होजाती है अर्थात् काष्ठरूप रहजाती है तिसी प्रकार नादमें प्रवृत्त किया चित्त नादके संग
लीन होजाता है अर्थात् रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियोंके नाशसे सत्तामात्र वा संस्कारमात्र
शेष रहजाताहै । इसमें मैत्रायणीय शाखाका यह मंत्र प्रमाण है कि, जैसे इंधनराहित अग्नि
अपने योनिरूप काष्ठमें शांत होता है इसी प्रकार वृत्तियोंके क्षयसे चित्तभी अपनी योनि
(ब्रह्म ) में शांत होजाता है ।। ९८ ॥
घण्टादिनादसक्तस्तब्धांतःकरणहरिणस्य।
प्रहरणमपि सुकरं शरसन्धानप्रवीणश्चेत् ॥ ९९ ॥
घण्टादीति ॥ घण्टा आदिर्येषां शंखमर्दलझर्झरदुन्दुभिजीमूतादीनां ते घण्टादय-
स्तेषां नादस्तेषु सक्तः अत एव स्तब्धो निश्चलो योऽन्तःकरणमेव हरिणो मृगस्तस्य
प्रहरणं नानावृत्तिप्रतिबन्धनमन्तःकरणपक्षे । हरिणपक्षे तु प्रहरणं हननमपि शरवद्
द्रुतगामिनो वायोः सन्धानं सुषुम्नामार्गेण ब्रह्मरन्ध्रे निरोधनं पक्षे शरस्य बाणस्य
सन्धानं धनुषि योजनं तस्मिन् प्रवीणः कुशलश्चेत्सुकरं सुखेन कर्तुं शक्यम् ॥ ९९ ॥
घण्टा आदि जिनके ऐसे जो शंख मर्दल, झर्झर, दुंदुभी आदिके नाद हैं उनमें आसक्त
और निश्चल जो अन्तःकरणरूप मृग उसका प्रहार करनाभी सुकर है, यदि बाणके सन्धानमें
मनुष्य प्रवीण हो । यहां अन्तःकरणका प्रहार नाना वृत्तियोंका प्रतिबन्धरूप लेना और
हरिणपक्षमें हनन लेना और बाणका सन्धानभी बाणके समान शीघ्रगामी जो वायु उसका
सुषुम्नामार्गसे ब्रह्मरन्ध्रमें प्रवेश करलेना और हरिणपक्षमें धनुषपर बाणका योजन
(लगाना) लेना ॥ ९९ ॥
अनाहतस्य शब्दस्य ध्वनिय उपलभ्यते ।
ध्वनेरन्तर्गतं ज्ञेयं ज्ञेयस्यान्तर्गतं मनः॥
मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ १० ॥
अनाहतस्येति ॥ अनाहतस्य शब्दस्यानाहतस्वनस्य यो ध्वनिर्निर्हाद उपलभ्यते
श्रूयते तस्य ध्वनेरन्तर्गतं ज्ञेयं ज्योतिः स्वप्रकाशचैतन्यं ज्ञेयस्यान्तर्गतं ज्ञेयाकारता-
मापन्नं मनोऽन्तःकरणं तत्र ज्ञेये मनो विलयं याति परवैराग्येण सकलवृत्तिशून्यं
संस्कारशेषं भवति । तद्विष्णोविभोरात्मनः परममन्तःकरणवृत्त्युपाधिराहित्यानिरुपा-
धिकं पद्यते गम्यते योगिभिरिति पदं स्वरूपम् ॥ १०० ॥
(१८०)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेश:-
अनाहत अर्थात् विना ताडनाके उत्पन्न जो शब्द उसकी जो ध्वनि प्रतीत होती है उस ध्वनिके
अन्तर्गतही ज्ञेयरूप प्रकाशमान चैतन्य है और उस ज्ञेयके अन्तर्गत अन्तःकरणरूप मन है और
उस ज्ञेयमेंही मन विलयको प्राप्त होता है अर्थात् परमवैराग्यसे सम्पूर्ण वृत्तियोंसे शून्य होकर
संस्कारमात्र शेष रहजाता है और यही विष्णु (व्यापक ) आत्माका परम पद है अर्थात् योगी-
जनोंकी प्राप्तिके योग्य अन्तःकरणकी वृत्तिरूप उपाधिसे रहित आत्मारूप है ।। १००॥
तावदाकाशसंकल्पो यावच्छब्दः प्रवर्तते ।
निःशब्दं तत्परं ब्रह्म परमात्मेति गीयते ॥ १०१॥
तावदिति ॥ यावच्छन्दोऽनाहतध्वनिः प्रवर्तते श्रूयते तावदाकाशस्य सम्यकल्पन
भवति । शब्दस्याकाशगुणत्वाद् गुणगुणिनोरभेदादा मनसा सह शब्दस्य विलयान्नि:-
शब्दं शब्दरहितं यत्परं ब्रह्म परब्रह्मशब्दवाच्यं परमात्मेति गीयते परमात्मशब्देन
स उच्यते । सर्ववृत्तिविलये यः स्वरूपेणावस्थितः स एव परब्रह्मपरमात्मशब्दाभ्या-
मुच्यत इति भावः ॥ १०१॥
जितने अनाहत ध्वनिरूप शब्द सुनेजाते हैं उतनीही आकाशकी भलीप्रकार कल्पना होती
है, क्योंकि शब्द आकाशरूप है और गुणगुणीका अभेद है और मनसहित जब शब्दका विलय
होजाता है तब शब्दरहित जो परब्रह्म है वही परमात्माशब्दसे कहाजाता है अर्थात् सम्पूर्ण
वृत्तियोंका लय होनेपर जो स्वरूपसे स्थित है वही परब्रह्म परमात्मास्वरूप है ॥ १०१ ॥
यत्किञ्चिन्नादरूपेण श्रूयते शक्तिरेव सा।
यस्तत्त्वान्तो निराकारः स एव परमेश्वरः॥१०२॥
यत्किश्चिदिति ॥ नादरूपेणानाहतध्वनिरूपेण यत्किञ्चित् श्रूयते आकर्ण्यते सा
शक्तिरेव । यस्तत्त्वान्तस्तत्त्वानामन्तो लयो यस्मिन् स तथा । निराकार आकाररहितः
स एव परमेश्वरः सर्ववृत्तिक्षये स्वरूपावस्थितो यः स आत्मेत्यर्थः । काष्ठे प्रवर्तितो
वद्भिरित्यादिभिः श्लोकैः राजयोगापरपर्यायोऽसम्प्रज्ञातः समाधिरुक्तः ॥ १० ॥
जो कुछ नादरूपसे सुनाजाता है वह शक्तिही है और जिसमें तत्त्वोंका लय होता है वह निरा-
कार परमेश्वर है अर्थात् सम्पूर्ण वृत्तियोंका क्षय होनेपर जो स्वरूपावस्थित है वही आत्मा है ।
इन पूर्वोक्त पांच श्लोकोंसे राजयोग नामकी असंप्रज्ञातसमाधि कही है ॥ १०२ ॥
सर्वे हठलयोपाया राजयोगस्य सिद्धये ।
राजयोगसमारूढः पुरुषः कालवञ्चकः॥१०३॥
सर्वे इति ॥ हठश्च लयश्च हठलयौ तयोरुपाया हठलयोपाया हठोपाया आसन-
कुम्भकमुद्रारूपा लयोपाया नादानुसन्धानशाम्भवीमुद्रादयः । राजयोगस्य मनसः
सर्ववृत्तिनिरोधलक्षणस्य सिद्धये निष्पत्तये प्रोक्ता इति शेषः । राजयोगसमारूढः
सम्यगारूढः प्राप्तवान् यः पुरुषः स कालवञ्चकः काल मृत्युं वञ्चयति जयतीति तादृशः
स्यादिति शेषः ॥ १०३ ॥
चतुर्थः]
संस्कृतटीका--भाषाटीकासमेता।
(१८१)
हठ और लयके जो संपूर्ण उपाय हैं अर्थात् आसन कुम्भक मुद्रा आदि हठके उपाय और
नादानुसन्धान शांभवीमुद्रा आदि लयके उपाय हैं वे सम्पूर्ण मनकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका निरोध-
रूप जो राजयोग उसकी सिद्धिके लिये ही कहे हैं और उस राजयोगमें भलीप्रकार आरूढ
(प्राप्त ) जो पुरुष है वह कालका वचक अर्थात् मृत्युका जीतनेवाला होजाता है ॥ १०३ ॥
तत्त्वं बीजं हठः क्षेत्रमौदासीन्यं जलं त्रिभिः।
उन्मनीकल्पलतिका सद्य एव प्रवर्तते ॥ १०४॥
तत्त्वमिति ॥ तत्त्वं चित्तं बीजं बीजवदुन्मन्यवस्थांकुराकारेण परिणममानत्वात् ।
हठः प्राणापानयोरक्यलक्षणःप्राणायाम क्षेत्रम् , क्षेत्रे इव प्राणायामे उन्मनी कल्पलति-
कोत्पत्तेरौदासीन्यं परवैराग्यं जलं तस्या उत्पत्तिकारणत्वात् । परवैराग्यहेतुकः संस्कार-
विशेषश्चित्तस्यासम्प्रज्ञात इति तल्लक्षणात् । एतैस्त्रिभिरुन्मन्यसम्प्रज्ञातावस्था सैव कल्प-
लतिका सकलष्टसाधनत्वात्सद्य एव शीघ्रमेव प्रवर्तते प्रवृत्ता भवति उत्पन्ना भवति ॥१०४
तत्त्व (चित्त) ही बीज है क्योंकि, चित्तही उन्मनी अवस्थारूप जो अंकुर है उसके आका-
रसे परिणामको प्राप्त होता ह और प्राण अपानकी एकतारूप जो हठ है वही क्षेत्र है क्योंकि,
क्षेत्रके समान प्राणायाम ही उन्मनीरूप कल्पलता उत्पन्न होती है और उदासीनता ( परम
वैराग्य ) जल है क्योंकि, उदासीनताही उन्मनी कल्पलताकी उत्पत्तिका कारण है क्योंकि,
असंप्रज्ञात समाधिका यह लक्षण कहा है कि, परम वैराग्यका हेतु जो चित्तका संस्कार-
विशेष है वही असंप्रज्ञात समाधि है । इन बीज, क्षेत्र, जलरूप पूर्वोक्त तीनोंसे असंप्रज्ञात
अवस्थारूप उन्मनी कल्पलता शीघ्रही उत्पन्न होजाती है, सम्पूर्ण इष्टकी साधक होनेसे उन्म-
नीको कल्पलता कहते हैं ॥ १०४ ।।
सदा नादानुसन्धानात्क्षीयन्ते पापसञ्चयाः।
निरञ्जने विलीयेते निश्चितं चित्तमारुतौ ॥ १०५॥
सदेति ॥ सदा सर्वदा नादानुसन्धानान्नादानुचिन्तनात्पापसञ्चयाः पापसमूहा:
क्षीयन्ते नश्यन्ति । निरञ्जने निर्गुणे चैतन्ये निश्चितं ध्रुवं चित्तमारुतौ मनःप्राणौ विली
येते विलीनौ भवतः ॥ १०५ ॥
सदैव नादके अनुसंधानसे पापोंके समूह क्षीण होते हैं और निर्गुण चैतन्यमें चित्त और पवन
ये दोनों अवश्य लीन हो जाते हैं अर्थात् मन और प्राण इन दोनोंका ब्रह्ममें लय हो जाता है ।।
उन्मन्यवस्था प्राप्तस्य योगिनः स्थितिमाहाष्टभिः-
शङ्खदुन्दुभिनादं च न शृणोति कदाचन।
काष्टवजायते देह उन्मन्याऽवस्थया ध्रुवम् ॥ १०६॥
(१८२)
हठयोगप्रदीपिका।
[ उपदेशः-
शंखदुन्दुभीति ॥ शंखो जलजो दुन्दुभिर्वाद्यविशेषस्तयोर्नादं घोषं कदाचन
कस्मिंश्चिदपि समये न शृणोति । शंखदुन्दुभीत्युपलक्षणं नादमात्रस्य । उन्मन्याऽव-
स्थया देहो ध्रुवं काष्ठवजायते । निश्चेष्टत्वादित्यर्थः ॥ १०६ ॥
अब आठ श्लोकोंसे उन्मनीअवस्थाको प्राप्त जो योगी है उसकी स्थितिका वर्णन करते हैं
कि, वह योगी शंख दुंदुभी इनके शब्दको कदाचितभी नहीं सुनता है। यहां शंख दुंदुभी शब्द-
मात्रके उपलक्षक हैं और उन्मनी अवस्थासे देह काष्ठके समान चेष्टारहित होजाता है।।१०६॥
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिन्ताविवर्जितः।
मृतवत्तिष्ठते योगी स मुक्तो नात्र संशयः॥ १०७॥
सति ॥ जाग्रत्स्वमसुषुप्तिमूर्छामरणलक्षणाः पञ्च व्युत्थानावस्थास्ताभिर्विशे-
षेण मुक्तो रहितः सर्वा याश्चिन्ताः स्मृतयस्ताभिर्विवर्जितो विरहितो यः योगः सकल-
वृत्तिनिरोधोऽस्यास्तीति योगी तुर्यावस्थावान् स मुक्तो जीवन्नेव मुक्तः। सकलवृत्ति-
निरोधे आत्मनः स्वरूपावस्थानात् । तदुक्तं पातञ्जलसूत्रे-'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽव-
स्थानम् ' इति । स्पष्टमन्यत् ॥ १०७ ॥
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मूच्र्छा, मरणरूप जो पांच व्युत्थानावस्था हैं उनसे विशेष करके रहित
होता है और संपूर्ण चिंताओंसे विवर्जित जो योगी है अर्थात् संपूर्ण वृत्तियोंके निरोधरूप
योगमें स्थित है वह जीवन्मुक्त है इसमें संशय नहीं है, क्योंकि संपूर्ण वृत्तियोंके निरोधमें
आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित होजाता है। सोई पातंजल सूत्र में कहाहै कि, उस समय द्रष्टा अपने
स्वरूपमें स्थित होता है ॥ १०७ ॥
खाद्यते न च कालेन बाध्यते न च कर्मणा।
साध्यते न स केनापि योगी युक्तः समाधिना ॥ १०८॥
खाद्यत इति ॥ समाधिना युक्तो योगी कालेन मृत्युना न खाद्यते न भक्ष्यते
न हन्यत इत्यर्थः । कर्मणा कृतेन शुभेनाशुभेन वान बाध्यते जन्ममरणादिजननेन
न क्लिश्यते । तथा च समाधिप्रकरणे पातञ्जलसूत्रम्- ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः' इति ।
केनापि पुरुषांतरेण यन्त्रमन्त्रादिना वा न साध्यते साधयितुं शक्यते ॥ १०८ ॥
समाधिसे युक्त योगीको मृत्युभी भक्षण नहीं करता है और शुभ अशुभरूप किये हुये
काँसे जन्म मरण आदि क्लेशभी नहीं होते हैं और न वह योगी किसी उपायसे साध्य हो
सकताहै अर्थात् कोई पुरुष यंत्र मंत्र आदिसे साध नहीं सकता। सोई समाधिप्रकरणमें पतं-
जलिका सूत्र है कि, उस समाधिके समय केशकी निवृत्ति होती है ।। १०८ ॥
न गन्धं न रसं रूपं न च स्पर्श न निस्वनम् ।
नात्मानं न परं वेत्ति योगी युक्तः समाधिना ॥ १०९॥
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१८३) न गन्धमिति ॥ समाधिना युक्तो योगी गन्धं सुरभिमसुरभि वा, न रसं मधुराम्ल- लवणकटुकषायतिक्तभेदात् षड्विधं न रूपं शुक्लनीलपीतरक्तहरितकपिशचित्रभेदात्- सप्तविधं, न स्पर्शं शीतमुष्णमनुष्णाशीतं वा, न निस्वनं शंखदुंदुभिजलधिजीमूतादि- निनादं बाह्यमाभ्यंतरं वा, न आत्मानं देहं, न परं पुरुषांतरं वेत्तीति सर्वत्रान्वेति । आत्मा देहे धृतौ जीवे स्वभावे परमात्मनि ' इत्यमरः ॥ १०९ ॥ समाधिसे युक्त योगी सुरभि, असुरभिरूप गंध और मधुर, आम्ल, लवण, कटुक, कषाय तिक्तरूप छः प्रकारका रस और शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश, चित्ररूप सात प्रका- रका रूप और शीत, उष्ण, अनुष्णाशीतरूप तीन प्रकारका स्पर्श और शंख, दुंदुभी, समुद्र, मेघ इनका बाह्य शब्द और नादुरूप भीतरका शब्द और अपना देह और अन्यपुरुष इन पूर्वोक्त गंध आदिको नहीं जानता है ॥ १०९ ॥ चित्तं न सुप्तं नो जाग्रत्स्मृतिविस्मृतिवर्जितम् । न चास्तमेति नोदेति यस्यासौ मुक्त एव सः ।। ११०॥ चित्तमिति ॥ यस्य योगिनश्चित्तमन्तःकरणं न सुप्तम् । आवरकस्य तमसोऽभा- वात् त्रिगुणेऽन्तःकरणे यदा सत्त्वरजसी अभिभूय समस्तकरणावरकं तम आविर्भवति तदाऽन्तःकरणस्य विषयाकारपरिणामाभावात्तत्सुप्तमित्युच्यते । नो जाग्रत् इंद्रियैरर्थग्रह- णाभावात् । स्मृतिश्च विस्मृतिश्च स्मृतिविस्मृती ताभ्यां वनितम् । वृत्तिसामान्याभावा- दुरोधकाभावाच्च स्मृतिवर्जितम् । स्मृत्यनुकूलसंस्काराभावाद्विस्मृतिवर्जितम् । न चास्तं नाशमेति प्राप्नोति । संस्कारशेषस्य चित्तस्य सत्त्वात् । नोदेत्युद्भवति वृत्त्यनु- त्पादनात् । सोऽसौ मुक्त एव जीवन्मुक्त एव ॥ ११० ॥ जिस योगीका चित्त आच्छादक तमोगुणके अभावसे सोवता न हो, क्योंकि त्रिगुण अंत:करणमें जिस समय सत्त्वगुण और रजागुणका तिरस्कार करके सब इंद्रियोंका आच्छा- दुक तमोगुण अधिक होताहै उस समय अंतःकरणका विषयाकाररूप परिणाम न होनेसे सुप्त अवस्था ( शयन) कहाती है और इंद्रियोंसे विषयोंका ग्रहण होनेसे योगीको जाग्रत्भी न हो और स्मरण विस्मरणसे वर्जित हो अर्थात् सम्पूर्ण वृत्तियोंके और उद्बोधकके अभावसे स्मृति- रहित हो और स्मृतिका जनक जो संस्कार उसके अभावसे विस्मृतिसे रहित हो और संस्कारशेष चित्तके होनेसे नाशकोभी प्राप्त न हो और वृत्तियोंकी उत्पत्तिके अभावले उदय ( उत्पन्न) भी न होता हो वह भी योगी मुक्तही है ॥ ११० ॥ न विजानाति शीतोष्णं न दुःखं न सुखं तथा। न मानं नापमानं च योगी युक्तः समाधिना ॥ १११॥ न विजानातीति ॥ समाधिना युक्तो योगी शीतं च उष्णं च शीतोष्णम् । समाहारबंदः । शीतमुष्णं वा पदार्थ न दुःखं दुःखजनकं परकृतं ताडनादिकं न सुखं (१८४) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:- सुखसाधनं सुरभिचंदनाद्यनुलेपनादिकम् । तथा चार्थे । मानं परकृतं सत्कारं न अप- मानमनादरं च न विजानातीति क्रियापदं प्रतिवाक्यमन्वेति ॥ १११ ।। समाधिसे युक्त योगी शीत, उष्ण पदार्थको और ताडना आदि दुःखको और सुरभि चंदन आदिके लेपनरूप सुखको और मान अपमानको अर्थात् दूसरेके किये सत्कार और अना- दुरको नहीं जानता है ॥ १११ ।। स्वस्थो जाग्रदेवस्थायां सुप्तवद्योऽवतिष्ठते । निश्वासोच्छासहीनश्च निश्चितं मुक्त एव सः॥ ११२॥ स्वस्थ इति ॥ स्वस्थः प्रसन्नेन्द्रियांत:करणः । एतेन तन्द्रामूर्छादिव्यावृत्तिः । जाग्रदवस्थायामित्यनेन स्वप्नसुषुप्त्योनिवृत्तिः । सुप्तवत् सुप्तेन तुल्यं कायेन्द्रिय व्यापारशून्यो यो योगी अवतिष्ठते स्थितोभवति । 'समवप्रविभ्यः स्था' इत्यात्मनेपदम् । निश्वासोच्छ्वासहीनः बाह्यवायोः कोष्ठे ग्रहणं निश्वासः कोष्ठस्थितस्य वायोर्वाहिनि:- सारणमुच्छ्वासस्ताभ्यां हीनश्चावतिष्ठत इत्यत्रापि संवध्यते । स निश्चितं निःसं- दिग्धं मुक्त एव । जीवन्मुक्तरूपमुक्तं दत्तात्रेयेण-निर्गुणध्यानसंपन्नः समाधि च ततोऽभ्यसेत् । दिनद्वादशकेनैव समाधि समवाप्नुयात् ॥ वायुं निरुध्य मेधावी जीव- न्मुक्तो भवेद् ध्रुवम् ॥' इति ॥ ११२ ॥ जो योगी स्वस्थअवस्था अर्थात इंद्रिय और अंतःकरणकी प्रसन्नतामें स्थित होकर जाग्रत् अवाथामेंभी देह और इंद्रियोंके व्यापारसे शून्य सुप्तके समान और बाहिरकी वायुका देहमें ग्रहणरूप निश्वास और देहमें स्थित वायुका बाहिर निकासनेरूप उच्छ्वास इन दोनोंसे रहित होकर निश्चल टिकताहै वह योगी निश्चयसे मुक्तही है और दत्तात्रेयने जीवन्मुक्तका स्वरूप यह कहा है कि, निर्गुणके ध्यानमें संपन्न मनुष्य समाधिका अभ्यास करै फिर बारह दिनसही समाधिको प्राप्त होता है और बुद्धिमान मनुष्य वायुको रोककर निश्चयसे जीवन्मुक्त होता है ॥ ११२ ॥ अवध्यः सर्वशस्त्राणामशक्यः सर्वदेहिनाम् । अग्राह्यो मन्त्रयन्त्राणां योगी युक्तः समाधिना ॥ ११३॥ अवध्य इति ॥ समाधिनायुक्तो योगी। सर्वशस्त्राणामिति सम्बन्धसामान्ये षष्ठी। सर्वशस्त्ररित्यर्थः । अवध्यो हन्तुमशक्य इत्यर्थः । सर्वदेहिनामित्यत्रापि संबंधमात्रविव- क्षायां षष्ठी। अशक्यः सर्वदेहिभिः बलेन शक्यो न भवतीत्यर्थः । मन्त्रयन्त्राणां वशी- करणमारणोच्चाटनादिफलमैत्रयन्त्रैरग्राह्यः वशीकर्तुमशक्यः । एवं प्राप्तयोगस्य योगिनो विघ्ना बहवः समायान्ति । तन्निवारणार्थ तज्ज्ञानस्यापेक्षितत्वात्तेऽपि प्रदश्यते । दत्तात्रेयः- 'आलस्यं प्रथमो विघ्नो द्वितीयस्तु प्रकथ्यते । पूर्वोक्तधूर्तगोष्ठी च तृतीयो मन्त्रसाध- नम् ॥ चतुर्थों धातुवादः स्यादिति योगविदो विदुः।।' इति । मार्कंडेयपुराणे-'उपसर्गाः प्रवर्तते दृष्टा ह्यात्मनि योगिनः । ये तांस्ते संप्रवक्ष्यामि समासेन निबोध मे ॥
(१८५) चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। काम्याः क्रियास्तथा कामान्मनुष्यो योऽभिवांछति । स्त्रियो दानफलं विद्यां मायां कुप्यं धनं वसु ॥ देवत्वममरेशत्वं रसायनवयःक्रियाम् । मेरुं प्रयतनं यज्ञं जलाग्न्या- वेशनं तथा ॥ श्राद्धानां शक्तिदानानां फलानि नियमास्तथा । तथोपवासात्पूर्ताच देवपित्रर्चनादपि ॥ अतिथिभ्यश्च कर्मभ्य उपसृष्टोऽभिवांच्छति । विघ्नमित्थं प्रवर्तेत यत्नाद्योगी निवर्तयेत् ॥ ब्रह्मासंगि मनः कुर्वन्नुपसर्गः प्रमुच्यते ॥' इति । पद्मपुराणे- यदैभिरन्तरायैर्न क्षिप्यतेऽस्य हि मानसम् । तदाऽग्रे तमवाप्नोति परं ब्रह्मातिदुर्लभम् ॥ योगभास्करे- सात्त्विकी धृतिमालंब्य योगी सत्त्वेन सुस्थिरः। निर्गुणं मनसा ध्याय- न्नुपसगैः प्रमुच्यते ॥ एवं योगमुपासीनः शक्रादिपदनिस्पृहः । सिद्धयादिवासना- त्यागी जीवन्मुक्तो भवेन्मुनिः ॥ विस्तरस्य भिया नोक्ताः संति विना ह्यनेकशः । ध्यानेन विष्णुहरयोरिणीया हि योगिना ॥ ' इति ॥ ११३ ॥ समाधिसे युक्त योगी संपूर्ण शस्त्रोंसे वध करनेके अयोग्य होता है और सब देहधारियोंको वश आदि करने में अशक्य है और वशाकरण, मारण, उच्चाटन हैं फल जिनके ऐसे मंत्र यंत्रों- सेभी वशमें करने अयोग्य है, इस प्रकारके योगीको अनेकप्रकारके जो विन्न होतेहैं उनको दिखातेहैं-दत्तात्रेयने कहाहै कि, पहिला विन आलस्य और दूसरा धूतौकी सभा और तीसरा मंत्रसाधन और चौथा धातुवाद ये योगके ज्ञाताओंने विघ्न कहे हैं और मार्कडेयपुराणमें ये विन कहे हैं कि, योगीकी आत्मामें देखनेसे जो विघ्न होतेहैं उनको मैं तेरे प्रति संक्षेपसे कहता हूँ, तू उनको सुन-कामनाके लिये कर्म और कामनाओंकी जो मनुष्य वांछा करताहै-स्त्री, दानका फल, विद्या, माया, ताम्रादिधातु और प्रकट धन, देव और इन्द्र होना और रसायनरूप देहकी क्रिया, मेरु, यत्न, यज्ञ, जल और आग्निमें प्रवेश, श्राद्ध और शक्तिसे दान, फल और नियम और उपवास वापीकूपतडागादि पूर्त, देव और पितरोंका पूजन, अतिथि और कर्म वांछा करताहै उसके योगमें विघ्न प्रवृत्त हो जाता है, इससे योगी यत्नोंसे विघ्नको निवृत्त करै, ब्रह्ममें आसक्त मनको करताहुआ योगी विघ्नोंसे छूटताह और पद्मपुराणमें लिखाहै कि, जब इन विघ्नोंसे जिस योगीके मनम विक्षेप न हो वह अति दुर्लभ उस परब्रह्मको प्राप्त होताहै । योगभास्करमें लिखा है कि, सात्त्विकी धीरताको करके सत्त्वगुणसे भलीप्रकार स्थिर और मनसे निर्गुणका ध्यान करता हुआ योगी विनोंसे अवश्य छूटता है । इस प्रकार योगका उपासक और इन्द्रआदिके पदकी इच्छासे रहित और सिद्धि आदिकोंकी वासनाका त्यागी मुनि जीवन्मुक्त होताहै, विघ्न अनेक प्रकारके हैं परन्तु विस्तारके भयसे यहां नहीं कहे हैं और वे सब विघ्न विष्णु और शिवजीके ध्यानस योगियोंको निवा- रण करने योग्य हैं ॥११३ ॥ इनसे युक्त हुआ योगी जा कुछ । अयोगिनां ज्ञानं निराकुर्वन् योगिनामेव ज्ञानं भवतीत्याह- यावन्नैव प्रविशति चरन् मारुतो मध्यमार्गे यावद्विन्दुन भवति दृढः प्राणवातप्रबन्धात् ।
। (१८६) हठयोगप्रदीपिका । [ उपदेश:- यावद्ध्याने सहजसदृशं जायते नैव तत्त्वं तावज्ज्ञानं वदति तदिदं दम्भमिथ्याप्रलापः॥११४॥ इति श्रीसहजानंदसंतानचिंतामणिस्वात्मारामयोगीन्द्रविरचितायां हठयोगप्रदीपिकायां समाधिलक्षणं नाम चतुर्थोपदेशः॥४॥ इति हठयोगप्रदीपिका समाप्ता ॥ यावदिति ॥ मध्यमार्गे सुषुम्नायां चरन् गच्छन् मारुतः प्राणवायुः यावत् यावत्कालपर्यंतं न प्रविशति प्रकर्षण ब्रह्मरन्ध्रपर्यंतं न विशति ब्रह्मरंध्र गतस्य स्थैर्या- द्ब्रह्मरंध्र गत्वा न स्थिरो भवतीत्यर्थः । सुषुम्नायामसंचरन् वायुरसिद्ध इत्युच्यते । तदुक्तममृतसिद्धौ-यावद्धि मार्गतो वायुनिश्चलो नैव मध्यगः। असिद्धं तं विजानीया- वायुं कर्मवशानुगम् ॥ ' इति । प्राणयति जीवयतीति प्राणः स चासौ वातश्च प्राणवातः तस्य प्रबन्धात्कुंभकेन स्थिरीकरणाद्विदुर्वीय दृढः स्थिरो न भवति प्राण- वातस्थैर्ये बिंदुस्थैर्यमुक्तमत्रैव प्राक् । 'मनःस्थैर्ये स्थिरो वायुस्ततो बिंदुः स्थिरो भवेत् ।' इति । तदभावे त्वसिद्धत्वं योगिनः उक्तममृतसिद्धौ- तावद्धोऽप्यसिद्धो- ऽसौ नरः सांसारिको मतः। यावद्भवति देहस्थो रसेन्द्रो ब्रह्मरूपकः ॥ असिद्धं तं विजानीयानरमब्रह्मचारिणम् । जरामरणसंकीर्णं सर्वक्लेशसमाश्रयम् ॥' इति । यावत् तत्त्वं चित्तं ध्याने ध्येयं चित्तं न सहजसदृशं स्वाभाविकध्येयाकारवृत्तिप्रवाहो नैव जायते नैव भवति, प्राणवातप्रबन्धादिति देहलीदीपकन्यायेनात्रापि सम्बध्यते। वायुस्थैर्ये चित्त- स्थैर्यमुक्तममृतसिद्धौ-'यदाऽसौ श्रियते वायुर्मध्यमां मध्ययोगतः । तदा बिंदुश्च चित्त च म्रियते वायुना सह ॥' तदभावे ह्यसिद्धत्वमुक्तममृतसिद्धौ-यावत्सस्पन्दते चित्तं बाह्याभ्यन्तरवस्तुषु । असिद्धं तद्विजानीयाच्चित्तं कर्मगुणान्वितम् ॥' इति । तावद्यत् ज्ञानं शाब्दं वदति कश्चित् तदिदं ज्ञानं कथनं दंभमिथ्याप्रलापः देभेन ज्ञानकथनेनाहं लोके पूज्यो भविष्यामीति धिया मिथ्याप्रलापो मिथ्याभाषणं दंभपूर्वकं मिथ्या- भाषणमित्यर्थः। प्राणबिंदुचित्तानां जयाभावे ज्ञानस्याभावात्संसृतिर्दुवारा । तदुक्त- ममृतसिद्धौ-' चलत्येष यदा वायुस्तदा बिंदुश्चलः स्मृतः । विंदुश्चलति यस्याङ्गे चित्तं तस्यैव चञ्चलम् ॥ चले बिंदौ चले चित्ते चले वायौ च सर्वदा ॥ जायते म्रियते लोकः सत्यं सत्यमिदं वचः ॥' इति । योगबीजेऽप्युक्तम्-' चित्तं प्रनष्टं यदि भासते वै तत्र प्रतीतो मरुतोऽपि नाशः। न वा यदि स्यान्न तु तस्य शास्त्र नात्मप्रतीतिर्न गुरुन मोक्षः ॥' इति । एतेन प्राणबिन्दुमनसां जये तु ज्ञानद्वारा योगिनो मुक्तिः स्यादेवेति सूचितम् । तदुक्तममृतसिद्धौ-यामवस्थां व्रजेद्वायु- चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। ॥ बिन्दुस्तामधिगच्छति । यथाहि साध्यते वायुस्तथा बिन्दुप्रसाधनम् ॥ मूच्छितों हरति व्याधि बद्धः खेचरतां नयेत् । सर्वसिद्धिकरो लीनो निश्चलो मुक्तिदायकः ॥ यथाऽवस्था भवद्विन्दोश्चित्तावस्था तथा तथा ॥ ' ननु- योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥' इति भगव- दुक्तास्त्रयो मोक्षोपायास्तेषु सत्सु कथं योग एव मोक्षोपायत्वेनोक्त इति चेन्न। तेषां योगाङ्गेष्वन्तर्भावात् । तथाहि-' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदि- ध्यासितव्यः' इति श्रुत्या परमपुरुषार्थसाधनात्मसाक्षात्कारहेतुतया श्रवणमनननिदि- ध्यासनान्युक्तानि । तत्र श्रवणमनने नियमान्तर्गते स्वाध्यायेऽन्तर्भवतः। स्वाध्यायश्च मोक्षशास्त्राणामध्ययनम् । स च तात्पर्यार्थनिश्चयपर्यवसायो ग्राह्यः । तात्पर्थिनिर्ण- यश्च श्रवणमननाभ्यां भवतीति श्रवणमननयोः स्वाध्यायेऽन्तर्भावः। नियमविवरणे याज्ञवल्क्येन-'सिद्धान्तश्रवणं प्रोक्तं वेदान्तश्रवणं बुधैः' इति स्पष्टमेव श्रवणस्य निय- मान्तर्गतिरुक्ता । ' अधीतवेदं सूत्रं वा पुराणं सेतिहासकम् । पदेष्वध्ययनं यश्च सदा- ऽभ्यासो जपः स्मृतः ॥ ' इति युक्तिभिरनवरतमनुचिन्तनलक्षणस्य सदाऽभ्यासरूपस्य मननस्यापि नियमान्तर्गतिरुक्ता । विजातीयप्रत्ययनिरोधपूर्वकसजातीयप्रत्ययप्रवाह- रूपस्य निदिध्यासनस्य उक्तलक्षणे ध्यानेऽन्तर्भावः। तस्यापि तत्परिपाकरूपसमाधिना- त्मिसाक्षात्कारद्वारा मोक्षहेतुत्वमीश्वरार्पणबुद्धया निष्कामकर्मानुष्ठानलक्षणस्य कर्म- योगस्य ' तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः । इति पतञ्जलिप्रोक्ते नियमा- न्तर्गते क्रियायोगेऽन्तर्भावः । तत्र तप उक्तमीश्वरगीतायाम्-' उपवासपराकादिकृच्छ्र- चांद्रायणादिभिः । शरीरशोषणं प्राहुस्तापसास्तप उत्तमम् ॥' इति । स्वाध्यायो ऽपि तत्रोक्तः- वेदान्तशतरुद्रीयप्रणवादिजपं बुधाः। सत्त्वशुद्धिकरं पुंसां स्वाध्याय परिचक्षते ॥' इति । ईश्वरप्रणिधानं च तत्रोक्तम्-' स्तुतिस्मरणपूजाभिर्वाङ्मनः- कायकर्मभिः। सुनिश्चला भवेद्भक्तिरेतदीश्वरपूजनम् ॥' इति । क्रियायोगश्च परम्प- रया समाधिनाऽऽत्मसाक्षात्कारद्वारैव मोक्षहेतुरिति समाधिभावनार्थः । क्लेशतनूकर- णार्थश्च ' इत्युत्तरसूत्रेण स्पष्टीकृतं पतंजलिना । भजते सेव्यते भगवदाकारमन्तः- करणं क्रियतेऽनयेति भक्तिरिति करणव्युत्पत्त्या ' श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद- सेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥' इति नवधोक्ता साधनभक्ति- रभिधीयते । तस्या ईश्वरप्रणिधानरूपे नियमेऽन्तर्भावः । तस्याश्च समाधिहेतुत्वं प्रोक्तं पतंजलिना- ईश्वरप्रणिधानादा इति । ईश्वरविषयकात्प्रणिधानाद्भक्तिविशेषात् समाधिलाभः समाधिफलं भवतीति सूत्रार्थः । भजनमन्तःकरणस्य भगवदाकारता- रूपं भक्तिरिति भावव्युत्पत्त्या फलभूता भक्तिरभिधीयते । सैव प्रेमभक्तिरित्युच्यते । तल्लक्षणमुक्तं नारायणतीर्थः-'प्रेमभक्तियोगस्तु ईश्वरचरणारविन्दविषयकैकान्तिका- त्यन्तिकप्रेमप्रवाहोऽविच्छिन्नः' इति । मधुसूदनसरस्वतीभिस्तु-द्रवीभावपूर्विका ।
, . (१८८) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:- मनसो भगवदाकारतारूपा सविकल्पवृत्तिभक्तिः' इति । ' तस्यास्तु श्रद्धाभक्तिध्यान- योगादवेहि ' इति श्रुतेः 'भक्त्या मामभिजानाति' इति स्मृतेश्च आत्मसाक्षात्कारद्वारा मोक्षहेतुत्वम् । भक्तास्तु सुखस्यैव पुरुषार्थत्वाद् दुःखासंभिन्ननिरतिशयसुखधारारूपा प्रेमभक्तिरेव पुरुषार्थ इत्याहुः । तस्यास्तु संप्रज्ञातसमाधावन्तर्भावः । एवं च अष्टाङ्ग- योगातिरिक्तं किमपि परमपुरुषार्थसाधनं नास्तीति सिद्धम् ॥ ११४ ॥ ग्राह्यमेव विदुषां हितं यतो भाषणं समयदर्यसंस्कृतम् । रक्ष गच्छति पयो न लेहितं ह्यम्ब इत्यभिहितं शिशोर्यथा ॥ सदर्थद्योतनकरी तमःस्तोमविनाशिनी। ब्रह्मानंदेन ज्योत्स्नेयं शिवांघ्रियुगुलेऽर्पिता ॥ इति श्रीहठयोगप्रदीपिकाव्याख्यायां ब्रह्मानन्दकृतायां ज्योत्स्नाभिधायां समाधिनिरूपणं नाम चतुर्थोपदेशः ॥ ४॥ टीकाग्रन्थसंख्या २४५०॥ अब अयोगियोंको ज्ञानका निराकरण करते हुए योगियोंकोही ज्ञानकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं कि, जबतक सुषुम्नाके मार्गमें बहताहुआ प्राणवायु ब्रह्मरंध्रमें प्रविष्ट होकर स्थिर नहीं होता, क्योंकि सुषुम्नामें नहीं बहते हुए प्राणवायुको आसिद्ध कहते हैं, सोई अमृतसिद्धि में कहा कि, जबतक अपने मार्गसे वायु सुषुम्नामें प्राप्त होकर निश्चल न हो-कर्मवशके अनु- यायी उस वायुको आसिद्ध जाने और जीवनका आधाररूप जो प्राण उसके दृढबंधन अर्थात् कुंभकसे दृढ करनेसे जबतक बिंदु (वीर्य) स्थिर नहीं होताहै और प्राणवायुकी स्थिरतासे बिंदुकी स्थिरता इसी ग्रंथमें कह आयह कि, मनकी स्थिरतासे वायु और वायुकी स्थिरतासे बिंदुकी स्थिरता होती है वह न होय तो योगी असिद्ध होताहै । सोई अमृतासद्धि में कहा है कि, तबतक बद्ध और असिद्ध यह सांसारिक जन मानाहै इतने रसेंद्र जो ब्रह्मरूप ह वह देहमें स्थित हो अर्थात् अपने स्थानसे पतित होकर देहमें आजाय और ब्रह्मचर्यसे हीन उस मनु- ज्यको आसिद्ध जाने और जरामरणसे युक्त और सम्पूर्ण क्लेशोंका आश्रय होता है और जब तक चित्तरूप तत्त्व ध्यानमें ध्येय चित्त नहीं होता है अर्थात् स्वाभाविक ध्येयाकार जो वृत्ति- योंका प्रवाह उससे सहजसदृश प्राणके बन्धनसे नहीं होताहै और वायुकी स्थिरतासे चित्तकी स्थिरता अमृतसिद्धिमें कही है कि, जब यह वायु सुषुम्नाके योगसे प्रविष्ट होजाताहै तब बिंदु और चित्त ये दोनों वायुके संग होकर मरजाते हैं और इसके अभावमें असिद्धताभी अमृत- सिद्धिमें कही है कि, इतने बाह्य और भीतरकी वस्तुमें चित्तका स्पन्दन (चेष्टा) होतीहै, कर्मके गुणोंसे युक्त उस चित्तको असिद्ध जान, तबतक सो यह ज्ञान दंभमिथ्या प्रलाप होता है अर्थात् मैं जगत्में पूज्य हूँगा इसप्रकार दंभपूर्वक ज्ञानके कथनसे बुद्धिसे मिथ्याभाषणही होता है क्योंकि प्राण, बिन्दु, चित्त इनके जयके अभावसे ज्ञानका अभाव होता है और उससे जन्म मरणरूप संसारकी निवृत्ति नहीं होसकती है। सोई अमृतसिद्धिमें कहा है कि,जब यह प्राणवायु चतुर्थः] संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता। (१८९) चलताहै तब बिंदुभी चल कहाहै और जिसके अङ्गमें बिन्दु चञ्चल है उसका चित्तभी चञ्चल होताहै और बिंदु, चित्त, वायु इन तीनोंके चञ्चल होनेपर संपूर्ण जगत् उत्पन्न होताहै और मरता है यह वचन सत्य है। योगबीजमेंभी कहा है कि, यदि चित्त नष्ट हुआ भासै तो वह वायुकाभी नाश प्रतीत होता है यदि चित्त वायुका नाश न होय तो उसको शास्त्रका ज्ञान और आत्माकी प्रतीति और गुरु और मोक्ष ये नहीं होते हैं-इससे यह सूचित किया कि-आण, बिंदु, मन इन तीनोंके जयमें ज्ञानके द्वारा योगीकी मुक्ति होही जाती है-सोई अमृतसिद्धि में कहा है कि, जिस अवस्थाको वायु प्राप्त होता है उसी अवस्थाको बिंदुभी प्राप्त होजाताहै और जिस प्रकार वायु साध्य किया जाताहै उसी प्रकारसे बिंदु साध्य किया जाताहै और मूच्छित हुआ वायु व्याधियोंको हरताहै और बन्धन किया वायु आकाशगतिको देता है और लयको प्राप्त हुआ निश्चल वायु सम्पूर्ण सिद्धियोंको करताहै और मुक्तिको देताहै और जैसी जैसी अव- स्था बिंदुकी होती है तैसी २ ही अवस्था चित्तकी होती है । कदाचित् कोई शंका करै कि, मनुष्योंके कल्याण करनेकी इच्छासे ज्ञान कर्म भक्ति ये तीन योग मैंने कहे हैं, अन्य कोई उपाय किसी शास्त्रमें भी नहीं है । इस भगवान्के वाक्यसे तीन मोक्षके उपाय हैं तो योगही मोक्षका उपाय कैसे कहा ? सो ठीक नहीं, क्योंकि उनका योगके अंगोंमें अन्तर्भाव है-सोई दिखाते हैं कि, आत्मा-देखने, सुनने, मानने, निदिध्यासन करने योग्य है । इस श्रुतिसे परम पुरुषार्थका साधन जो आत्माका साक्षात्कार है उसके हेतु श्रवण, मनन, निदिध्यासन कहे हैं. उन तीनोंमें श्रवण मनन ये दोनों नियमके अंतर्गत होनेसे स्वाध्याय ( पठन) में अंतर्गत होते हैं और मोक्षशास्त्रके अध्ययनको स्वाध्याय कहते हैं और वह अध्ययनभी तात्पर्याथके निश्चय- पर्यत लेना। वह तात्पर्याथके निर्णय श्रवण मननसे होताहै । इससे श्रवण मननका स्वाध्यायमें अंतर्भाव है-और नियमोंके विवरणमें याज्ञवल्क्यने कहा है कि, बुद्धिमान् मनुष्योंने वेदांतका श्रवण सिद्धांतश्रवण कहाहै, इससे स्पष्टही श्रवणका नियममें अंतर्भाव कहाहै-और जिसने वेद , सूत्र वा पुराण वा इतिहास पढे हों इनके अध्ययन और उत्तम अभ्यासको जप कहते हैं, इस युक्तिसे निरंतर अनुचिंतन है लक्षण जिसका ऐसा जो उत्तम अभ्यासरूप मनन है उसकाभी नियममें अन्तर्भाव कहाहै-और विजातीय प्रतीतिके निरोधपूर्वक सजातीय प्रत्ययका प्रवाहरूप जो निदिध्यासन है उसकाभी पूर्वोक्त ध्यानमें अन्तर्भाव है, क्योंकि वह भी तिसके परिपाकरूप समाधिसे आत्मसाक्षात्कारके द्वारा मोक्षका हेतु है-और ईश्वरार्पण बुद्धिसे निष्काम कर्मका अनुष्ठानरूप जो कर्मयोग है उसका नियमके अंतर्गत इस पंतजलिके कहे- हुए क्रियायोगमें अंतर्भाव है कि, तप, स्वाध्याय, ईश्वरका प्रणिधान (स्मरण ) इनको क्रिया- योग कहते हैं और वे तीनों ईश्वरगीतामें इन वचनोंसे कहे हैं कि, उपवास पराक और कृच्छ चांद्रायण आदि व्रत इनसे जो शरीरका शोषण वही तपस्वियोंने उत्तम तप कहा है और मनुष्योंके अंतःकरणकी शुद्धिका कर्ता जो वेदान्त, शतरुद्रीय, प्रणव आदिका जप है वही बुद्धिमान् मनुष्योंने स्वाध्याय कहाहै और स्तुति, स्मरण, पूजा इनसे और वाणी मन काया कर्म इनसे जो भलीप्रकार निश्चल भक्ति वहां ईश्वरपूजन कहाता है और क्रियायोग परंपरासे समा- धिसे आत्मसाक्षात्कारके द्वाराही मोक्षका हेतु होनेसे समाधिकी भावनाके लिये और क्लेशोंको दूर करनेके लिये है,यह बात उत्तरसूत्रसे पतंजलिने स्पष्ट की है, जिससे अंतःकरण भगवान्के आकार होजाय उसे भक्ति कहतहैं, इस करणव्युत्पत्तिसे वह नौ ९ प्रकारकी साधनभक्ति कही, वह इस श्लोकमें वर्णन की है कि,विष्णुका श्रवण, कीर्तन,स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, पढा हो, (१९०) हठयोगप्रदीपिका। [ उपदेश:-च. दासता, मित्रता और आत्माका निवेदन यह नौ प्रकारकी भक्ति होतीहै और उस भक्तिका ईश्वरके प्रणिधानरूप नियममें अंतर्भाव है और उस भक्तिकी समाधिमें हेतुता पतंजलिने इस सूत्रसे कही है कि, ईश्वरविषयक जो भक्तिविशेषरूप प्रणिधान उससे समाधिका लाभ (फल) होताहै और अंतःकरणका भगवदाकारतारूप जो भजन उसे भक्ति कहतेहैं, इस भावव्युत्प- त्तिसे तो फलभूत भक्ति कही है, उसकोही प्रेमभक्ति कहतेहैं, उसका लक्षण नारायणतीर्थोंने यह कहा है कि, ईश्वरके चरणारविंदमें जो एकाग्रतासे निरवच्छिन्न अत्यंत प्रेमका प्रवाह उसको प्रेम- भक्ति कहतेहैं और मधुसूदनसरस्वतियोंने तो भक्तिका यह लक्षण कहा है कि, द्रव होकर मनकी जो भगवदाकाररूप सविकल्पवृत्ति उसको भक्ति कहतेहैं। यह भी आत्मसाक्षात्कारके द्वारा मोक्षका हेतु है क्योंकि, इन श्रुति और स्मृतियोंमें यह लिखा है कि-श्रद्धा, भक्ति, ध्यान योगसे आत्माको जानो और भक्तिसे मुझे जानता है और भक्त तो यह कहते हैं, कि, सुखही पुरुषार्थ है इससे दुःखसे असंभिन्न जो सर्वोत्तम सुखरूप प्रेमभक्ति है वही पुरुषार्थ है। उस भक्तिका संप्रज्ञात समाधि अन्तर्भाव है-इससे यह सिद्ध भया, कि अष्टांगयोगसे भिन्न परम पुरुषार्थका कोईभी साधन नहीं है भावार्थ यह है कि, इतने गमन करते हुए प्राणवायु सुषु- म्नाके मार्गमें प्रविष्ट न हों और प्राणवायुके हृढबन्धनसे इतने बिंदु स्थिर न हों और इतने चित्त ध्यानके विषय ध्येयकी तुल्य न हो तबतक ज्ञान दंभसे मिथ्याप्रलप रूप होता है ॥ ११४ ।। इति श्रीसहजानंदसंतानचिन्तामणिस्वात्मारामयोगीन्द्रविरचितायां हठयोगप्रदीपिकायां श्रीयुत पं० रामरक्षाङ्गजलाँखग्रामनिवासि पं० मिहिरचंद्रकृतभाषाविवृतिसहितायां समाधिलक्षणं नाम चतुथापदशः समाप्तिमगात् ॥ ४॥ श्रीरस्तु ।। समाप्तोऽयं ग्रन्थः। sa पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास, 'लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्-प्रेस, कल्याण-चम्बई. खेतवाडी-बम्बई. 3८२१५ 20 जाहिरात. --- की. रु. आ. ८-८ गोरक्षपद्धति-भाषाटीकासहित । इसमें योगाभ्यासका क्रम सुगम रीतिसे वर्णित है ०-१० घेरण्डसंहिता-भाषाटीकासहित । इसमें अष्टाङ्गयोगवर्णन भली भाँति किया गया है ०-१० पातञ्जलयोगदर्शन-दोहा तथा भाषाटीकासहित । इसमें अष्टाङ्ग- योगनिरूपण बहुत ही सरल और सुगम किया गया है १-० बिन्दुयोग-भाषाटीकासहित, स्व० वि० वा० ५० ज्वालाप्रसादजी मिश्रकत । राजयोगका प्रारंभिक ग्रंथ । इसमें समस्त राज- योगका सार सरलतासे समझाया गया है योगतत्त्वप्रकाश-भाषामें अत्युत्तम योगमार्ग वर्णित है योगमार्गप्रकाशिका अर्थात् योगरहस्य-भाषाटीकासहित ०-१२ योगसन्ध्या-भाषादीकासहित (साधन करनेवालोंको अमृतकी लता) योगाभ्यासियोंको परमोपयोगी योगसोपान-पूर्वचतुष्क-( यम, नियम, आसन और प्राणा- याम इनके परिपूर्ण विवेचनसहित ऋषिप्रणीत योगशास्त्र) इसमें योगिराज नारायणबाबाने ३७ आसनोंके फोटो- चित्र और ॐके आकारमें ४७ आसन, षट्कर्मविधि और प्राणायामके प्रकार आदि अपूर्व विषय अनेक योग- ग्रन्थोंके आधार और स्वानुभवसे लिखे हैं। पुस्तक देखने ही योग्य है ०-१० शिवसंहिता-भाषाटीकासहित । इसमें शिवजीने योगोपदेश, ब्रह्मज्ञान, हठयोगक्रिया तथा राजयोगादिका वर्णन किया है ...१-४ १-८