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Birla,raja Baldevdas · 2012/10

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विषयानुक्रमणिका दार्शनिक विचार प्राकथन ... क ... ९९ १२० ... १७२ २-श्रीमद्भगवद्गीता (मूल) ३-वेदगीता रहस्य ४-अष्टादशश्लोकी वेदगीता ५-वेदगीतार्थदीपिका ६-रुद्राष्टाध्यायी -रुद्रीप्रकाश ८-रुदभेद १-उपोद्धात १.-शारीरिक मीमांसा 11-ग्रह्मसूत्रके १६ सूत्र १२-उपनिषद्विमर्प १३-आन्तिपाठः १४-कठोपनिषद् १५-कठोपनिपद् रहस्य १६-प्रमोपनिषद् 10-श्री विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् ... १८४ १९६ .. २०६ ... ૨૨૨ ... २३२ ..

VEDA AND VEDIC
१८-
..
...
२६२
-अहंकामाक्षी-दर्शनम्
१९--चतुर्दश सूत्रोंकी दार्शनिक व्याख्या
नन्दिकेश्वरकी दो कारिकाएं
२१-चतुर्दश सूनाका भावार्थ
२२-अटाध्यायी
२३-ज्यौतिपतस्व-विचार
२४-मनन विचार
...
२६८

प्राक्कथन
चेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव
साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥
यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ।
स सो भिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥
[ मनु,
भ०२-६,७]
वेद ही धर्मका मूल है। वेद 'सर्वज्ञानमय' है। यह हम
मानते हैं पर समझते नहीं। मानना व्यर्थ है यदि जानते ही
नहीं कि क्या मानते हैं। हिन्दू मात्रका विश्वास है कि
वेदसे ही सब धर्मों की उत्पत्ति हुई है। 'नाऽसौ मुनिर्यस्य
मतं न भिन्नम्' इस लोकोक्तिद्वारा बताया गया है कि प्रत्येक
मुनि अर्थात् मननशील-विचारशील पुरुपके मत भिन्न-भिन्न
होते हैं । पर सब इस यातमें एकमत है कि धर्मका मूल वेद है।
मतभेद उर्स ज्ञानमय वेदके तात्पर्य के सम्बन्धमें होते रहे हैं और
होते रहेंगे। पर वेदप्रामाण्य हमारे लिए निर्विवाद है। वह घेद
क्या है, यह जानना आवश्यक है। अपनी बुद्धि और समझके
अनुसार श्रीमान् राजा बलदेवदास विरलाने यही समझानेका
'यन किया है। धर्मशास्त्र के विधानानुसार संसारकृत्य सफलता-
पूर्वक समाप्तकर, उसका भार अपने योग्य पुत्रोंको अर्पणकर
रहोस्सहले अपमारोप सप्ताउस शाम सर्यसायारणशक्ष.

VEDA AND VEDIC
( ख )
पहुँचाने में लगाया है जिसे आपने, संसार करते हुप, विद्वजनों
और सन्त महात्माओंके समागमसे शनैः शनैः प्राप्त किया और
जिसका अभ्यास आप सतत मननद्वारा करते रहते हैं। राजा
बलदेवदासका ज्ञान उनके वैभवके समान स्वयमुपार्जित है । वह
केवल पुस्तकीय नहीं है। अपने भीतर आप जिसका अनुभव
करते हैं उसे ही शब्दोद्वारा व्यक्त करते रहते हैं और उसे ही
चेदोंमें पाते हैं। यही कारण है कि आरं श्रुतिका जो विवेचन
करते हैं उसमें एक प्रकारका वैचित्र्य दिखाई देता है। यह
वैचिन्य स्वतंत्र विचार और अनुभवका फल है। वेद, आत्मा,
प्राण, शरीर, इनपर जव आप बातें करने लगते हैं तब ऐसा
मालूम होता है कि अपनी अनुभूति व्यक्त कर रहे हैं, विद्वत्ता
नहीं वर्धार रहे हैं। जिस अनुभूतिसे उन्हें शान्ति मिली है,
सन्तोप प्राप्त हुआ है और उस आनन्दमयको अपने भीतर
और बाहर देखा है उसीको आपने लोककल्याणार्थ प्रकट
किया है।
प्रथमतः संवत् १९८३ वि०में 'छान्दोग्योपनिपत् रहस्य
नामकी पुस्तक आपने फलफोसे प्रकाशित करायी। यद्यपि
इसमें केवल छान्दोग्योपनिषत्का ही रहस्य समझानेकी यात
कही गयी है पर वस्तुतः यह यह उपनिषत्सार है जो राजा
साहयको निजके यत्न और अनुभव से प्राप्त हुआ है। इसकी
मूमिकामें आपने एक जगह अपना सिद्धान्त इस प्रकार व्यक्त
किया है-"उपनिषदामें आदित्यको प्राण और चन्द्रको रयि
(अन्न या भोग्य) कहा गया है। पृथ्वी आदि मूर्तिमान
पदार्थ चन्द्ररूप भोग्य हैं। घायु और तेज आदित्य है ।'
मोका तीनों लोकोंका उत्पन्न पालन और संहार करता
है। ये ही मोक्ता और भोग्य सांख्याशास्त्रकी पुरुप-प्रकृति

पनकर विश्वका सृजन करते हैं। प्राणरूप सूर्य प्रत्येक शरीर की प्रत्येक इन्द्रियों में अपनी किरणोद्वारा प्रवेश करप्रकाश और शक्ति प्रदान करता तथा उत्तर, पूर्व मादि दिशामी और ईशानादि कोणी में प्रवेश कर उनको प्रकाशित करता है। इस लिए वही व्यापक और वही संय प्राणियोंका आश्रयस्थान है।" यहाँ जो तत्व यत्यन्त संक्षेपमें बताया गया है उसीको अधिक स्पष्ट करनेका यत्न छान्दोग्योपनिपत् पर की गई आपकी 'सर- लार्थ' टीकामें आद्योपान्त किया दृष्टिगोचर होता है। इसके यादं भापने संवत् १९९२ वि० में काशीसे 'वेदान्त वा आत्मविचार' प्रकाशित कराया । प्रथम पुस्तकमें उपनिपत्के सहारे जो समझानेका यत्न किया गया है वही चेदान्त सूत्रों के सहारे इस पुस्तकमें अधिक विशद ही नहीं किया गया वरंच नये प्रमाणों द्वारा विशेषरूपसे समझाया भी गया है । १९८३ वि० में जो अंकुररूपमें दिखाई दे रहा था वही इसमें पल्लवित दुआ दृष्टिगोचर होता है और इस पुस्तक की अष्टादश-श्लोकी घेदगीतासे वह फलशाखान्वित वृक्ष यन गया है। इसपर अधिक लिखनेके पहले प्रसंगवश यह कह देना अनुचित न होगा कि राजा साहय अपने चिपयसे अय तन्मय हो गये हैं। यही आपका निदिध्यास है। अपना सांसारिक कृत्य सुसम्पन्न करते हुए भी माप जो गवेषणा कर रहे थे यह पहले पहले अंकुररूपमें संवत् १९८३ में लोकालयमें प्रकट हुई। परन्तु इसका भारम्भ यहुत पहले ही हो चुका होगा, यह भी स्पष्ट है। और क्यों हुआ, यह एक मनो-विज्ञानका प्रदन है। याहरसे जो व्यक्ति धनोपार्जनमें लिप्त दिखाई देता पही भीतर ही भीतर व्यक्ति और व्यष्टि, परमात्मा और उसकी एष्टि, अन्तरेन्द्रिय और बाह्य-कृतिको एक फरने में लिप्त VEDA AND VEDIĆ htttine होता है, यह बात समदर्शनमें विपरीत मालूम होती है पर कुछ विचार फर देखनेसे यह विरोध जाता रहता है। इसका उत्तम दृशान्त राजा जनकका है। राजा होते हुए भी जनक अद्वैत वेदान्तके आचार्य हैं, जिनके पास यड़े यड़े ऋपि भी परमज्ञान प्राप्त करनेके लिए जाते थे। इसका कारण यह है कि चेदान्त केवल शुष्क फल्पना नहीं है, आरमानुभूति है। यह अनुभूति उसीको प्राप्त हो सकती है जिसकी अन्तटि तप और योगसे निर्मल हो गयी है और जिसने घाा संसारको भी भलीभाँति समझा है और समझकर अपने में देख लिया है। इसका सर्वश्रेष्ठ दृष्टान्त भगवान् श्रीकृष्णमें पाया जाता है। श्रीकृष्ण स्वयं राजा नहीं थे पर उनके चरणकमल राजमुकुटोसे रंजित हो रहे थे। कुरुक्षेत्रमें उन्होंने शस्त्र ग्रहण नहीं किया पर वही सर्वश्रेष्ठ सेनानीका काम कर रहे थे। सोलह सहस्र गोपि. काओं और पाठ पटरानियोंके पति होनेपर भी चे बालब्रह्म- चारी यने रहे। सारा कर्म करते हुए भी उससे अलिप्त रहनेकी कला का, उन्हींके यताये अनासक्ति-योगका यह परिणाम है। वह सब कुछ करता हुआ फर्मसे अलिप्त रहता है। भोग्य और भोक्ता होकर भी यह केवल द्रष्टा बना रहता है। सब देहॉम पुरुषरूपसे वास करते हुए संसारके सय काम वही करता और कराता दीख पड़ता है सही, पर है केवल साक्षी । यह पूर्ण रूपेण सम्भव उसीके लिए है जो सबका अनुभव करके उससे अलिप्त यानी गनासक्त रह सकता है। उसीमें पूर्णब्रह्म व्यक होता है--उसके लिए, औरॉके लिए नहीं । औरोंको तो वह संसार-लिस साधारण मनुष्य ही दिखाई देता है । अर्थात् पूर्णस्य उसको प्राप्त नहीं होता जो सयका त्याग करके असङ्ग होनेकी व्यर्थ चेष्टा करता है प्रत्युत उसको होता है जो सब कुछ करता हुआ अपने कार्य से अलिप्त रहता है- 'पद्म-पत्रमिवाम्भसि ।' यह केवल मेरी कल्पना ही नहीं वरञ्च भगवानके कृष्णजन्म का अनुभव है जो आपने इस श्लोक द्वारा व्यक्त किया है-'विपया विनिवर्त्तन्ते निराहारस्य देहिनः, रस- चर्ज रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।' अर्थात् , यदि इन्द्रियोंको भूखों मारा जाय तो उनमें विषय-भोगकी शक्ति न रह जायगी पर भोग की इच्छा (वासना वा रस ) यनी ही रहेगी। तात्पर्य यह कि फर्म न करनेसे, डरके मारे कर्मसे भागनेसे कर्म करनेकी शक्ति नहीं रह जाती पर इच्छा बनी रहती है जिन लोगोने मध्ययुगीन ईसाई सन्तोंका इतिहास पढ़ा है वे इस चातको भलीभाँति समझ सकते हैं। वे सन्त रकमांसमय शरीरको पापका पुतला समझकर उसे तरह-तरहसे कष्ट देकर विषयोंसे विमुख करना चाहते थे पर होता था ठीक उसका विपरीत। उनके निर्यल और कष्टक्लिएशरीर विषयों की ओर अधिक खिंचते रहते थे। इसका हृदयग्राही वर्णन उन लोगोंने आत्म-कथाओं में किया है। उससे श्रीकृष्णकी इस उक्तिका समर्थन होता है कि विषयोंसे अपने आपको जबर्दस्ती अलग करनेसे इन्द्रियोफी-राजा साहयके शब्दमें भाव-शरीरकी-विपय भोगकी शक्ति नष्ट हो जाती है पर घासना बनी ही रहती है घह जाती रहती है परं दृष्ट्वा', अर्थात् मूलतत्त्वको समझनेसे। किसी चीजसे अलग होकर उसका तत्व समझनेमें नहीं आता, यह यात स्पष्ट है। विपयाँसे अलग रहकर जीय अनासक्त नहीं हो सकता। विषयों में रहते हुए उसके तत्वको समझकर ही सच्ची अनासक्ति प्राप्त की जा सकती है। आवश्यकता है उनमें रहकर उनके रूपको समझनेका यत्न करनेकी। मुझे राजा बलदेवदास विरलाके सहवासका सुयोग अधिक VEDA AND VEDIC (च) प्रास नहीं हुआ है। पर आपके सफल सांसारिक जीवनका जो थोड़ा आभास मैंने दूरसे पाया है और कभी-कभी आपके ही मुखसे आपके विचार सुननेका जो सुअवसर मिला है, उससे मेरी यह धारणा हो गयी है कि आपके सांसारिक जीवन तथा यामानात्म-विवागमें पूर्ण सामंजस्य है, विरोध कुछ भी नहीं। सांसारिक दृटिसे आप सफल व्यापारी--सुखी गृहस्थ है । व्या- पारमें सफल वही होता है जो प्रत्येक वस्तुको अपने लाभको एप्टिसे देखता है। अर्थात् जो कुछ बाहर है उसे यह अपने भीतर कर लेने की इच्छा रखता है और चेष्टा करता है। यदि घद यही प्रयान ईमानदारीसे करता रहे, और उसका पूर्वकर्म इस कार्य में सहायक हो, तो निश्चय ही यह बाहर-भीतर एक हो जायगा । कार्नेजी, राकफेलर, फोर्ड आदि सफल. पाश्चात्य व्या. पारियों और व्यवसायियोंके जीवन में भी हम देखते हैं कि धनो- पार्जनमें उन्होंने ज्यों-ज्यों और जिस मात्रामें सफलता प्रास की क्यों-त्यों और उसी मात्रामें उनका जीवनौष लोककल्याणकी ओर मुड़ता गया। पर यह उससे और आगे बढ़कर बाहर- भीतरको एक न कर सका, द्वैतमें अद्वैत न देख सका, जड़- चेतनका रहस्य समझ न सका, जीवात्माको परमात्मामें-विन्दु को सागरमें मिला न सका। केवल लोक कल्याण तफही जाकर यह रुक गया। यह उनके पूर्वसंस्कारफा फल है। श्रीकृष्णने कहा है कि अनेक जन्माके यत्नके वाद अद्वैत-ज्ञान प्राप्त होता है। उनमें भी यह वांत सत्य होंगी और कालान्तरमें पश्चिममें भी यही आत्माएँ अद्वैत का अनुभव करेंगी। यहाँ कुछ विषयान्तर हो गया। मैं जो कहना चाहता था यह यह है कि सफल व्यापारी जीवनसे दी राजा वलदेवदास विरलामें न केवल लोक कल्याणकी भावना ही जागरित हुई (छ) प्रत्युत यह उससे और आगे बढ़कर बाहर भीतर एक देखने लग गयी। यह दृष्टि आपको प्राचीन अन्यों और दर्शनों के अध्ययनसे प्राप्त नहीं हुई वरंच अपने सांसारिक जीयनसे प्राप्त हुई है। अनन्तर पण्डितों के सहवाससे आपको आप ग्रन्याका परिचय मिलने लगा और उसका यर्थ ,वे अपने जीवनके अनु- भवसे लगाने लगे, कोप और व्याकरणसे नहीं। स्वभावतः यह अर्थ पण्डितोंको विचित्र-सा लगने लगा। इस विचित्रतामें ही राजा बलदेवदासका जीवन सर्वस्व है-स्वानुभूतिका सार है। अपनी पुस्तकों द्वारा यह जीवन-सार आपने जिज्ञासुओंको पिलानेका यत किया है। इसमें नवीनता है और विचित्रता भी है पर इसका मर्म फुछ-कुछ घहो समझ सकता है जिसने आपके बगीचे में आपके सम्मुर थैटकर भरपहीके मुंहसे भिन्न- भिन्न शब्दों और द्वन्द्वयांचक शब्दों के नवीन पर आश्चर्य- जनक अर्थ सुने होंगे। उस समयकी आपकी तन्मयंता भूले नहीं भुलाती। जो थात अनुभूति की है वह केवल घुद्धिद्वारा समझी नहीं जा सकती-जानी जा सकती है। पारदर्शी शानियों के लिए जो यात हस्तामलकंवत् स्पट है, प्रन्यपाठी शिक्षार्थी के लिए पही जानना अत्यन्त कठिन हो जाता है। राजा यलदेघदास पिएलाके वेद और वेदान्त विषयक विचार ऐसे ही हैं। ये जाने जा सकते हैं, और जानने का प्रयत प्रत्येक विचारशीलको करना चाहिए। यह शंन जिसमें सर्वसाधारणका हो साधारण शिक्षित जनता इसे समझ जाय, इसी सदुद्देश्यसे पूर्वोक्त दो पुस्तकें और यह तीसरी लिखी गयी हैं। यात्मा और परमात्मा, जीय और पुगर, वेद और वेदान्त इन्हें अभिनय प्रकारसे इनमें समझाया गया है। इन विचारों का सारांश यह है- VEDA AND VEDIC (ज) आत्मा एक अदृश्य और व्यापक है। सृष्टिके लिए यह व्यक्त होता है, दीखता है। सृष्टिको ही शास्त्रों में 'पर' कहा है, अतः 'पर'का जो आत्मा है उसे 'परमात्मा कहते हैं। इसीको अंग्रेजीमें 'युनिवर्सल सोल' ( Universal Soul ) कहते हैं । शरीर-विशेपकी आत्माको केवल 'आत्मा' कहते हैं। अन्यत्र आपने यह भी कहा है कि चाहर जो कुछ है, दीसता है अथवा जिसका अनुभव होता है यह 'ब्रह्म' है। यही शास्त्रने भी कहा है-सर्व वेदाखिलम्ब्रह्म । शरीररूपी पुरीमें रहने के कारण मात्माको 'पुरुप' भी कहते हैं। अनेक शरीरोंमें विभक्त होकर यह अनेक भावों में दीखता है। इसलिए वही अनेक भी कहा लाता है। यहाँपर यह भी स्मरण रखना चाहिए कि 'भाव'से मतलय इन्द्रिय शरीरका है। उसीसे कर्म होता है, वही भोगता और यही मरता है। वह भोगता है और नये भोगकी उत्पत्ति करता है। इसी भोग का नाम 'स्वर्ग' है। इस प्रकार एक ही आत्मा भाव-शरीरसे भोगता है, स्व-रूपसे उसे देखता है और भव्यक्त रूपसे उसका फल देता है, अतएव यह ईश्वर (प्रभु, मालिक) और परमेश्वर भी है। ब्रह्म और आत्माका ज्ञान ही वेद है। चेद बाहर भी है और अपने भीतर भी। हम उसका ग्रहण कान और आँखसे करते हैं यही नाम रूपमयी सृष्टि है। जब हम कानसे उसको अपने भीतर लेते हैं तो उसको रूप देते हैं और जब मुखसे दूसरोंपर व्यक्त करते हैं तय उसे नाम देते हैं। हमारा वेद हमारे भीतर है। प्रत्येक मनुष्यका वेद उसके भीतर है। और वही थाहर सर्वत्र व्याप्त है। जोहमारे भीतर है वह वेद है और जो बाहर है वह शान है क्योंकि हम उसे जानते हैं । हमारा ज्ञान हमारा वेद है; चाहर परमात्मा है, भीतर आत्मा ।

( झ ) शरीरमें स्थित चेदके तीन प्रकार हैं । अन्तरेन्द्रियकी तीन वृत्तियों और तीन कालके कारण ये तीन भेद होते हैं। जैसे चित्तमें भूतकालका धान, जो शरीरका कारण होता है। मनमें भूतके: ज्ञानके साथ भविष्य का भी ज्ञान होता है। वर्तमानके भाव में वर्त-- मान कालका शान । ये ही तीन शान जन्म लेनेके, जीवित रहने के और भावी, शरीरकी उत्पत्तिके कारण है । था, है और होगा-इन तीनोंका समन्वय, शरीरमें होता है और तीनोंका शान समष्टिरूपसे वेद है। इसलिये वेदको प्रयी भी कहा है। यही प्रयी कर्म, विपय और भोगसे सम्बन्ध रखती है, इसी- लिए भगवान्ने अर्जुनसे कहा है-'गुण्यविषयाः चेदाः' और 'नित्र गुण्यो भवार्जुन' । वेदका यही अर्थ 'अष्टादशश्लोकी वेदगीता' द्वारा समझाया गया है। इसमें नवीनत्व है और नहीं भी है । जिस दंगसे यह समझाया गया है वह नयीन है; मूल- तत्त्व चा शान नवीन नहीं है, अनादि है। जो कुछ बताया गया है वह शास्त्रानुमत और प्रमाणसिद्ध है। नये ढंगसे कही हुई पुरानी बात भी नयी लगती है , केवल इसीलिये उसकी उपेक्षा न करनी चाहिये । श्रीमद्भगवद्गीतामें वेदस्पृष्ट १८ श्लोक है। इनपर की गई भावार्थबोधिनी टीकाके सहारे यदि सुज्ञ पाठक मनन करेंगे तो यह विश्वास किया जा सकता है कि घे राजा साहयके परिश्रम और मननको सार्थक कर सकेंगे। चतुर्दश माहेश्वर सूत्रोंकी काशिकावृत्ति इस पुस्तक की विशेषता है। कौमुदीका पठन-पाठन पढ़े जानेसे इस आध्या- त्मिक वृत्तिको हमारा पण्डित-समाज भी भूलसा गया है। इस पुस्तकमें इसका उद्धार करके पण्डितयर श्री सभापति उपा:- ध्यायने एक गुप्तकोप उनताके सामने खोल दिया है। भारतीय VEDA AND VEDIC (स) संस्कृतिक पुनरुद्धारमें आपका यह प्रयत्न मान्य स्थान पाने योग्य है । इसपर श्री विरलाजीकी व्याख्या चमत्कृतिपूर्ण और तत्त्वदर्शिनी है। ऋचावसान अर्थात् नृत्यकी समाधिका अर्थ आपने पूर्वशरीरके अर्थकी समाप्तिका फल कहा है। महाकालका नृत्य तो जन्ममरणरूप संसार ही हो सकता है। अतः उसकी समाप्ति पूर्वकर्मकी समासि ही समझी जा सकती है। इल अवसरपर उत्पन्न हुए वर्णमय सूत्रोंका अर्थभी उसी प्रकारका हो सकता है, जो एक फोप्ठद्वारा (पृष्ठ १६३-२६५) समझाया गया है। मैं चाहता था कि यह अधिक विस्तारके साथ सम- झाया जाता। पर मेरी बीमारी :तथा असमर्थताके कारण पुस्तक प्रकाशनमें यहुत अधिक विलम्ब हो गया, जिसका मुझे अत्यन्त दुःख है। और विलम्य करके राजा साहयके परिश्रम और उत्साहको व्यर्थ करना सर्वथा अनुचित होगा। इस अभावके लिए पाठकोंसे क्षमा माँगकर यह कथन यहीं समाप्त किया जाता है। अन्तमें प्रार्थना यही है कि जितके हाथमें यह पुस्तक पड़े थे इसका मतन करें तथा इसमें, जो विचार प्रकट किये गये हैं औरों के सामने रखनेकी कृपा भी करें। काशी! ९ वृष, सं११९९६ वि०... .. . पा०वि० पराड़कर द्वितीय संस्करण इस संस्करश वन और विषय जोड़ दिये गये हैं। इनमें प्रथम स्थान 'अहं कामाक्षी दर्शनम्' को देना पड़ेगा। इए और श्रत इन दो अति सरल सिद्धान्तोंसे. घोरे-धीरे आगे बढ़ते हुए

(ट)
राजा साहब 'अहं' तत्त्व तक पहुँच गये हैं। कहीं ऐसा मालूम
• नहीं होता कि क्लिष्ट कल्पना की गयी है। पाश्चात्य रेखागणित
के शाता देखेंगे जैसे यूक्लिड कुछ स्वयंसिद्ध सरल सिद्धान्तोंके
आधारपर एक जटिल पर सुन्दर भवन निर्माण करता है उसी
प्रकार राजा यलदेवदासने दृष्ट और श्रुतसे मारम्भ करके तेरह
स्तरोंको स्थापित किया है। न कहीं खेंचातानी और न कहीं
असम्बद्ध कल्पना । अहंकामाक्षीमें सब दृष्ट, श्रुत, प्रत्यक्ष, परोक्ष
ब्रह्माण्डका समावेश हो जाता है। तर्क-पद्धति देखते ही बनती
है। दूसरा विषय नाचिकेतोपाख्यान है। यह उपनिषद्की बड़ी
प्रसिद्ध कहानी है जिसमें जन्म मृत्यु का रहस्य खोला गया है।
तीसरा विपय ज्योतिष शास्त्रका है। इसमें सर्व साधारणके
नित्य काममें आनेवाली बातें बता दी गयी हैं। इससे यह पुस्तक
सबके लिए संग्राहा हो गयी है।
आशा है, प्रबुद्ध जनता राजा साहवके इस यत्न को सफल
करेगी।
काशी
या०वि० पराड़कर
२० मीन सौर सं० २००६ चि०
विचार्य सम्यक् सुचिरं वशास्त्रं
विद्वद्वरेभ्यो यदबोधि तत्त्वम् ।
तस्य प्रचाराय चुधां हिताय
व्यकाशि राज्ञा विरलाभिधेन ॥

ExanxAKKAKO
I
More
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत
श्रीकृष्णपरमात्मने नमः
四大英汉汉英式及彩天天玩天光光汉双孔双孔兵共五五次托托}

श्री परमात्मने नमः श्रीमद्भगवद्गीता अथ न्यासः ॐ अस्य श्रीमद्भगवद्गीतामालामन्त्रस्य भगवान्वेदव्यास- ऋपिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीकृष्णः परमात्मा देवता । अशोच्यानन्त्रशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्व. भापसे इति वीजम् । सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज इति शक्तिः। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिप्मामि मा शुच इति कीलकम् । नैनं छिन्दन्ति शसाणि नैनं दहति पावक इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत इति तर्ज- नीम्यां नमः | अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोप्य एव च इति मध्यमाभ्यां नमः । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातन इत्यनामिकाभ्यां नमः । पश्य में पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहनश इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः इति करन्यासः ॥ अथ हृदयादिन्यासः । नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पायक इति हृदयाय नमः । न चैनं क्लोदयन्त्यापो न शोपयति मारत. इति शिरसे। स्वाहा । अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्ल धोऽशाप्य एव च इति शिखायै -- २ . दार्शनिक विचार वपट् । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातन इति कव- चाय हुम् । पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रश इति नेत्रत्रयाय वौषट् । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च इति अस्त्राय फट् । श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे पाठे विनियोगः ॥ ॐ पार्थाय प्रतियोधितां भगवता नारायणेन स्वयं - व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्येमहाभारतम् ॥ अद्वैतामृतवर्षिणी भगवतीमहादशाध्यायिनी: .. मम्बत्वामनुसंदधामि भगवद्गीते भवद्वेपिणीम् ॥१॥ नमोऽस्तु ते व्यासं विशालयुद्ध फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र। येन त्वया भारततैलपूर्णः-प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः ।।२।। अपनपारिजाताय तोत्रीकपाणये। ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः॥३॥ -वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरगर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे - जगद्गुरुम् ॥४॥ भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला शल्यग्राहवती-कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला । अश्वत्थामयिकर्णधोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी सोत्तीर्णा खलु पाण्डवैरगनदी कैवर्तकः केशयः ॥५॥ पाराशर्यवचःसरोजममलं . गीतार्थगन्धोत्कर्ट "नानाख्यानककेसरं हरिकथासंबोधनाबोधितम् । 7

श्रीमद्भगवद्गीता महिमा
लोके सजनपट्पदैरहरहः पेपीयमानं मुदा
भूयाद्भारतपङ्कजंकलिमलप्रवसि नःश्रेयसे ॥ ६ ॥
मृकं करोति वाचालं पहुं लङ्घयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे. परमानन्दमाधवम् ॥ ७॥ ।
गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतः पुमान् ।
विष्णोः पदमवाप्नोति भयशोकादिवर्जितः ॥१॥
गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च ।
नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च ॥ २ ॥
मलनिर्मोचनं पुंसां जलानं दिने दिने ।
सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम् ॥ ३ ॥
गीता मुगीता कर्तव्या किमन्यः शास्त्रविस्तरः ।
या स्वयं पद्मनाभस्स मुखपद्माद्विनिःसृता ॥ ४ ॥
भारतामृतसर्वस्वं . विष्णोर्वक्त्राद्विनिःसृतम् ।
गीतागोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ५॥
सर्वोपनिपदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ।। ६॥
एक शास्त्रं देवकीपुत्रगीत-
मेको देवो देवकीपुत्र एव ।
एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ॥७॥

दार्शनिक विचार. अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं ' सुरेश विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥१॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै-' दैः साङ्गपदक्रमोपनिपदै- र्गायन्ति यं सागगाः। घ्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं'न विदुः सुरासुरगणा, देवाय तस्मैं mami त्यमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्व मम देवदेव ॥१॥ नमः ॥

श्री परमात्मने नमः
अथ श्रीमद्भगवद्गीता
'अथ प्रथमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥
संजय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं न्यूडं दुर्योधनस्तदा ।..
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमत्रवीत् ॥२॥
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
न्यूडी द्रुपदपुगेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥
अत्र शूरा महेप्यासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च ' महारथः ॥४॥
धृष्टकेतुश्रेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥५॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाथ सर्व एव महारथाः ॥६॥
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्नवीमि ते ॥७॥

दार्शनिक विचार
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥८॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रग्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥९॥
अपर्याप्त तदस्माकं बलं भीप्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्त विदमेतेपां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥१०॥
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥११॥
तस्य सञ्जनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योचैः शङ्खदध्मी प्रतापवान् ॥१२॥
ततः शहाथ भर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।।१३।।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थिती ।..
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शहौ प्रदध्मतुः ॥१४॥
पाश्चजन्यं हृपीकेशो .देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः॥१५॥
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोपमणिपुप्पकौ ॥१६॥
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी.च महारथः । .
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥१७॥

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श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौमद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥१८॥
स घोपो धार्तराष्ट्रणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥१९॥
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कंपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रंसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥२०॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह' महीपते ।
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥२१॥
यावदेतानिरीक्षेऽहं योदुकामानवस्थितान् । .
योद्धव्यमस्मिन्त्रणसमुद्यमे ॥२२॥
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेन समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्ध युद्धे प्रियचिकीर्पवः ॥२३॥
कैर्मया सह
सजय उवाच
एवमुक्तो हपीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोमम् ॥२४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेपां च · महीक्षिताम् । :
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥२५॥
तत्रापश्यस्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान् ।।
. : आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥२६॥

दार्शनिक विचार श्वशुरान्सुहृदबैन सेनयोरुभयोरपि । तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्वन्धूनवस्थितान् ।।२७।। कृपया परयाविष्टो विपीदन्निदमत्रवीत् । अर्जुन उवाच दृष्ट्मं स्वजनं कृष्ण युयुत्सु समुपस्थितम् ॥२८॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुप्यति । वेपथुश्च शरीरे मे शरीरे मे रोमहर्पश्च जायते ॥२९॥ गाण्डीवं स्रसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥३०॥ निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽर्नुपश्यामि हत्त्वा स्वजनमाहवे ॥३१॥ न का विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भौगैर्जीवितेन वा ॥३२॥ ''येपामर्थे कासितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्ध प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥३३॥ आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाश्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा||३४|| एतान हन्तुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन । 'अपि त्रैलोक्यराज्यस हेतोः किं नु महीकृते ॥३५॥ निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याजनार्दन । “पापभेवाश्रयेदरमान्हत्वैतानाततायिनः 1॥३६॥ .

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १ तस्मानार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्ववान्धवान् । स्वजनं हि कथं हत्वासुखिनः स्याम माधवः ॥३७॥ यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। . कुलक्षयकृतं दोष मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥ कथं न ज्ञेयमसाभिः पापादस्मानिवर्तितुम् । . फुलक्षयकृतं दो प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥ कुलक्षये प्रणश्यन्ति. कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्ट कुल कृत्स्नमधर्मोभिभवत्युत ॥४॥ अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुप्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीपु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥४१॥ सरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । :- पतन्ति पितरो घेपां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥४२॥ दोपरेतः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः । उत्सायन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥४३॥ उत्सन्नकुलधर्माणां मनुप्पाणां जनार्दन ।। नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥ अहो वत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुघताः ॥४५॥ यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षमतरं भवेत् ॥४६॥ .

१० दार्शनिया विचार सजय उपाचे एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥४७॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ग्रहाविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंबादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः सञ्जय उवाच . तं तथा कृपयाविष्टपश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥१॥ श्रीभगवानुवाच कुतस्सा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वय॑मकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥ क्लैव्यं मा स गमः पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्सोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥ अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इपुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हापरिसूदनः ॥४॥ +

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २
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गुरूनहला हि महानुभावान्,
..." : श्रेयो भोक्तु भैक्ष्यमपीह लोके ।
हलार्थकामांस्तु गुरुनिहव ।
भुखीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ।।५।।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
'यानेच. हला न जिजीविपाम-
. स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६॥
'कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि सा : धर्मसम्मूहचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं हि तन्मे
शिप्यस्तेऽहं शाधि मां सां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोपणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्ध ।
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८॥
सजय उवाच
एवमुक्ता हपीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्खा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥
तमुवाच हपीकेशः , अंहसन्निव भारत
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥१०॥

दार्शनिक विचार श्रीमगवानुवाच अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांच भापसे । गतासनगतासंथ नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥११॥ न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेगे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे ययमतःपरम् ॥१२॥ देहिनोऽसिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।. तथा देहान्तरप्रातिर्धारस्तत्र न मुह्यति ॥१३॥ मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोप्णसुखदुःखदाः । आगपापायिनोनित्यास्तास्तितिक्षस्य भारत ॥१४॥ यं हि- न व्यथयन्त्येते पुरुष पुरुपर्पभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतसाय कल्पते ॥१५॥ नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्सनयोस्तचदर्शिभिः ।।१६।। अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥१७॥ अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्थ तसाधुध्यस्थ भारत ॥१८॥ य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥१९॥ न जायते म्रियते वा कदाचि- नायं भूखा भविता वा न भूयः ।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२०॥
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुपः पार्थ कं.घातयति हन्ति कम् ॥२१॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवांनि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२२॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैन क्लोदयन्त्यापो न शोपयति मारुतः ॥२३॥
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोप्य एव च।
.. नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४॥
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योज्यमुच्यते ।
तसादेवं विदित्वैनंः नानुशोचितुमर्हसि ॥२५॥
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥२६॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्भुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२७॥
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत:।
अव्यक्तनिधनान्येव -तत्र का परिदेवना ॥२८॥

दार्शनिक विचार
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
मारचर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः भृणोति
श्रुखाप्येनं वेद नचैव कश्चित् ॥२९॥
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत.।
तसात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥३०॥
खधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धाद्धि युद्धाच्छे योऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥३१॥
यदृच्छया चोपपन्न । स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥३२॥
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्य संग्रामं न करिष्यसि ।
तंतः स्वधर्म कीर्ति च हिता पापमवाप्स्यसि ॥३३॥
अकीर्तिं चापिभूतानि कथयिप्यन्तितेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्प चाकीर्तिमरणादतिरिच्यते ॥३४||
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते
लां महारथाः।
येपां च त्वं बहुमतो भूत्वा यांस्यसि लाघवम् ॥३५॥
अवाच्यवादांश्च वहन्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुःखतरं नु किंम् ॥३६॥
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जिवावाभोक्ष्यसे महीम् ।
'तसादुत्तिष्ठ कौन्तेय 'युद्धाय कृतनिश्चयः ॥३७॥

- श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाययौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमयाप्स्यसि ॥३८॥ एपा तेभिहिता सांख्ये बुद्धिोंगे खिमां भृणु। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं ग्रहास्यसि ॥३९॥ नेहाभिकमनाशोऽस्ति' प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य जायते 'महतो भयात् ॥४०॥ व्यवसायात्मिका युद्धिरेकह। कुरुनन्दन । वहुशाखा हनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥४१॥ यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरता पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥४२॥ कामात्मानः .स्वर्गपरां जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेपबहुला भोगैश्वर्यगति प्रति ॥४३॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधी न विधीयते ॥४४॥ त्रैगुण्यविपया वेदा निगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥ यावानर्थः उदपाने सर्वतः ,सम्प्लुतोदके । "तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥४६॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु । कदाचन। 'मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्वकर्मणिः ॥४७॥ ..

दार्शनिक विचार
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूखा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥
दृरेण ह्यवरं कर्म चुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौः शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥४९॥
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुप्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥५०॥
कर्मजं वुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीपिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥५१॥
यदा ते मोहकलिलं पुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेद श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥५२॥
श्रुतिपिप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा' योगमवाप्स्यसि ॥५३॥
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भापा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ।।५४॥
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः. स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागमयक्रोधः . स्थितधीमुनिरुच्यते ॥५६॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ . यः सर्वत्रानमिलहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिताः॥५७|| यदा संहरतें चायं कूमोऽङ्गानीव सर्वशः इन्द्रियोणीन्द्रियार्पेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८॥ विपया विनिवर्तन्ते निराहारस्य दहिने। 'रसवर्ज . रसोऽप्यस्य · परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥५९।। यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपर्थितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥६०॥ तानि सर्वाणि संयम्य युक्त असीत मत्परः। चशे हिः यस्यन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६१॥ ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेपूपजायते । 'सगात्सजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥२॥ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविनमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।३।। - रागद्व पवियुक्त स्तुः । ..विपयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मश्यर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥६॥ प्रसादे सर्वदुःखानी हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो .शाशु...बुद्धिः, पर्यवतिष्ठते ॥६५॥ नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥६६॥ . भ२ F दार्शनिफ.विचार .. इन्द्रियाणां - हि. चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य 'हरति प्रज्ञा वायु वमिवाम्भसि ॥६७|| तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८॥ या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥६९।। आपूर्गमाणमचलप्रतिष्ठ :, : समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामान्यं प्रविशन्ति सर्वे 77: स शान्तिमानोति न कामकामी ॥७॥ विहायः कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । .:: निर्ममो-: निरहङ्कारः: स: शान्तिमधिगच्छतिः॥७१॥ एपा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थिखास्यामन्तकालेऽपि ब्रहानिर्वाणमृच्छति ॥७२॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनि पातु नायिद्यायां 1. योगशास्त्रे.धीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो . नाम द्वितीयोध्यायः॥ -- श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३ -- " " - , 1. . “अथ तृतीयोऽध्यायः {" अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्कि कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ।।१।। च्यामिश्रेणेव वाक्येन चुद्धिं मोहयसीव मे. तदेकं वद निश्चित्य- येन श्रेयोऽहमामुयाम् ॥२॥ . २j} ... श्रीभगवानुवाच लोकेऽसिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥३॥ न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य : पुरुषोऽश्नुते ।। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥४॥ न' हि कश्चित्क्षणमपि जातु निष्ठत्यकर्मकृत् । - कार्यते विशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥५॥ कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा सरन् । इन्द्रियान्विमहात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ।।६।। यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।' कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥७॥ नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो घर्मणः' 15 शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ।सि। . - २० .. " दार्शनिक विचार । यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोयंः कर्मबन्धनः । तदर्थ कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥९॥ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविप्यध्वमेप वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१०॥ देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥११॥ इप्टान्भोगान्हि चों देवां दास्यन्ते यज्ञभाविता तैर्दत्तानप्रदायैम्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥१२॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विपः । भुञ्जते ते बघ पापा ये पंचन्त्यात्मकारणात् ॥१३॥ 'अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥१४॥ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तसात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥ एवं प्रवर्तितं चक्र नानुवर्तयतीह ...यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघ पार्थ स जीवति ॥१६॥ यस्तात्मरतिरेव सादात्मतृप्तश्च : मानवः।- आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस कार्य: न विद्यते ॥१७॥ नैव : तस्य कृतेनार्थो- नाकृतेनेहलफर्थन न चास्य: सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाथयः॥१८॥ :

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३
२१
तसादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर।
.असक्तो ह्याचरन्कर्म परमामोति पूरुपः ॥१९॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥२०॥
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥२१॥
नमे पार्थाम्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥२२॥
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
"मम चानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥२२॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्या कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीपुलॊकसंग्रहम् ॥२५॥
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोपयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥२६॥
'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूहात्मा
कर्ताहमिति मन्यते ॥२७॥
तत्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मला न सजते ॥२८॥

२२ .. दार्शनिक विचार : प्रकृतेर्गुणसम्मूहाः सजन्ते गुगकर्मसु । तानकृत्वविदो मन्दान्कृत्स्नविन विचालयेत् ॥२९॥ मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।। निराशीनिर्ममो भूखा युद्धथख विगतज्वरः ॥३०॥ ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्वावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥३१॥ ये त्वेतदभ्यस्यन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूहांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥३२॥ सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृति यान्ति -भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥३३॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेपो व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्ती । स्वस्य : परिपन्थिनी ॥३४॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्टितात् ।। खधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥३५॥ .....: अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुपः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेयः बलादिव : नियोजितः ॥३६॥ : श्रीभगवानुवाच काम एप क्रोध एप रजोगुणसमुद्भवः। - महाशनो महापाप्मा विद्धये नमिह वैरिणम् ॥३७॥ . .

- श्रीमद्भगवद्गीता अध्यायः३ २३ धूमेनानियतेबहिर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्येनावृतो . गर्भस्तथा.: तेनेदमावृतम् ॥३८॥ आवृतं - ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण . कौन्तेय दुप्पूरेणानलेन च ॥३९॥ इन्द्रियाणि मनो. युद्धिरस्वाधिष्ठानमुच्यते । 'एतैविमोहयत्येप ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥४॥ तस्माचमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य . भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥४१॥ इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धः परतस्तु सः॥४२॥ एवं युद्ध परं बुद्ध्या संतम्यात्मानमात्मना। जहि शत्रु महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥४३॥. ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंबादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः॥

. २४ . दार्शनिक विचार अथ चतुर्थोऽध्यायः . श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेववीत् ॥१॥ एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नरः परन्तप ॥२॥ स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। '' भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥ अर्जुन उवाच में अपरं भवतो जन्म परं जन्म : ' विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादी प्रोक्तवानितिं ॥४॥ श्रीभगवानुवाच बहूनि.मे व्यतीतानि. जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद. सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥५॥ अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोप सन् । प्रकृति स्वामधिष्ठाय .सम्भवाम्यात्ममायया ॥६॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।७।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||८|| श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४ . . जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेति तत्चतः। त्यस्या देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥ वीतरागभयक्रोधा-- मन्मया - मामुपाश्रिताः वहवो ज्ञानतपसा , पूता मद्भावमागताः ॥१०॥ ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम यमांनुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ..सर्वशः ॥११॥ कान्तिः कर्मणां सिद्धि यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानु लोके सिद्धिर्भवतिः कर्मजा ॥१२॥ चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं “गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम् ॥१३॥ न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥१४॥ एवं ज्ञाखा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मव तसात्त्वं पूर्वः पूर्वतरं कृतम् ।।१५।। किं.कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञासा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥१६॥ कर्मणो ह्यपि चोदव्यं योद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च योद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥१७॥ कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स पुद्धिमान्मनुप्येषु स युक्तः कृत्मकर्मकृत् ॥१८॥ .

दार्शनिक विचार यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं युधाः ॥१९॥ त्यक्ता कर्मफलासङ्ग नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किश्चित्करोति सः ॥२०॥ निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वनामोति किल्लिपम् ॥२१॥ यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। . : समः सिद्धावसिद्धौ च कुलापि.न निवध्यते ॥२२॥ गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः । कर्म समग्र प्रविलीयते ॥२३॥ ब्रह्मार्पणं' ब्रह्म हविर्ब्रह्मानौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव : तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥२४॥ दैवमेवोपरे । यज्ञ: योगिनः, पर्युपासते । ब्रह्मानावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥२५॥ श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये'' संयमानिपु जुहति । शब्दादीन्विपयानन्य इन्द्रिामिषु जुह्वति ॥२६॥ सर्वाणीन्द्रियकर्माणि ., प्राणकर्माणि." चापरे । आत्मसंयमयोगानो जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥२७॥ द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाय पत्तपः संशितवताः ॥२८॥ '. - .. -- .

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४ २७ . अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं । तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्या प्राणायामपरायणाः ॥२९॥ अपरे 'नियताहाराः प्राणान्प्राणेपु जुहति । 'सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मपाः ॥३०॥ यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम'॥३१॥ एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो 'मुखे। कर्मजान्विद्धि तांन्सर्वानेव ज्ञात्वा' विमोक्ष्यसे ॥३२॥ श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः .-.:. परन्तप । सर्व कर्माखिलं. पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥ तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेश्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥३४॥ यज्ज्ञात्वा न पुनहिमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेपेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥३५॥ अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । 'सर्व'ज्ञानप्लवेनैव । जिनं . सन्तरिष्यसि ॥३६॥ यथैघांसि समिद्धोऽग्निर्भसंसात्कुरुतेऽर्जुन । नाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥३७॥ न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रामिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥३८॥ . . -

दार्शनिक विचार
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः. संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाविगच्छति ॥३९॥
अज्ञश्वाश्रधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥४०॥
योगसंन्यस्तकर्माण ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबन्नन्ति धनञ्जय ॥४१॥
तसादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥४२॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यास.
योगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥
अर्थ पञ्चमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे हि मुनिश्चितम् ॥१॥
श्रीभगवानुवाच
संन्यास: कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
“तयोस्तु - कर्मसंन्यासाकर्मयोगो - विशिष्यते ॥२॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५ ६९ ज्ञेयास नित्यसंन्यासी योन द्वेष्टि ने काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ सांख्ययोगी पृथन्याला प्रवदन्ति न पंण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोविन्दते फलम् ॥ ४ ॥ यत्सांख्य प्राप्यते स्थानं तयोगैरपि गम्यते । 'एक सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥ संन्यासस्तु . महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥ ६॥ योगयुक्तो विशुद्धारमा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा · कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७॥ नैव किश्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित् । पश्यम्भृण्वन्स्पृशअिघनश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥८॥ प्रलपन्चिसृजन्गृहन्नुन्मिपन्निमिपन्नपि 'इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९॥ ब्रह्मण्यांधाय कर्माणि सङ्ग त्यतयां करोति यः । लिप्यते न स पापेन पनपेत्रमिवाम्मसा ॥१०॥ कायेन मनसा 'बुद्धया केवलरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म पुर्यन्ति संग त्यत्वात्मशुद्धये ॥११॥ युक्ती कर्मफैले त्यत्तयों शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो "निवध्यते ॥१२॥ , ३० . - दार्शनिक विचार सर्वकर्माणि मनसा- संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ||१३॥ न कर्तुत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥१४॥ नादत्त कस्सचित्यायं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥ ज्ञानेन तु . सदज्ञानं येपां. नाशितमात्मनः । तेपामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥१६॥ तयुद्धयस्तदात्मानस्तनिष्ठास्तत्परायणा । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं . ज्ञाननि तकल्मपाः ॥१७॥ विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे' 'गवि: हेस्तिनि । शुनि चैव.श्वपाकेच..पण्डिताः: समदर्शिनः॥१८॥ इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं, मनः। निर्दोष-हि समं ब्रह्म तसाद्ब्रह्मणि वे स्थिताः ॥१९॥ न प्रहृष्येत्मियं प्राप्य नोद्विजेत्याप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥२०॥ बाह्यस्पर्शेष्वसत्तात्मा विन्दत्यात्मनि : यत्सुखम् । : सब्रह्मयोगयुक्तात्माः सुखमक्षय्यमश्नुते ॥२१॥ ये.हि. संस्पर्शजा भोगा 'दुःखयोनय एव ते- आयुन्तवन्तः, कौन्तेय-न- तेषु रमते बुधः ॥२२॥ . :

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५ :- शन्नोतीहव यः सोढुं प्रांक शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥२३॥ योन्तासुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥२४॥ लभन्ते --ब्रह्मनिर्वाणमृपयः क्षीणकल्मपाः । छिन्नद्वैधा- यतात्मानः : सर्वभूतहिते रताः ॥२५॥ कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्मनिर्वाणं :वर्तते विदितात्मनाम् ।।२६॥ 1; स्पर्शान्कृत्वा बहिर्वाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे. ध्रुवोः । प्राणापानौ समी कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥२७॥ • यतेन्द्रियपनोबुद्धिर्मनिक्षिपरायणः ... ... विगतेच्छाभयक्रोधो- यः सदा. मुक्त एव सः-1॥२८॥ : भोक्तारं यत्रतपसां - सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां-शान्तिमृच्छति ॥२९॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां 'योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः-

२२
दार्शनिक विचार
अथ पष्ठोऽध्याय:
श्रीभगवानुयाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरगिर्न चाक्रियः ॥१॥
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डवे ।
न हसंन्यस्तसङ्कल्पोः योगी भवति कश्चन ॥२॥
- आरुरुक्षोर्मु नेर्योगं कर्म .. कारणमुच्यते ।
योगारूहस्य : तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥३॥
'यदा हि नेन्द्रियार्थेपु.: नि कर्मस्वनुपेजते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी " ," योगारूटस्तंदोंच्यते ॥ ४॥
'उद्धरेदात्मनात्मानं-- :: नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥५॥
चन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु ...शत्रुत्ने ....वर्तेतात्मैव - शत्रुवत् ॥६॥
जितात्मनः प्रशान्तस्य -परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥७॥
ज्ञानविज्ञानवतात्मा-कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोटाश्मकाञ्चनः ॥ ८॥
सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थप्यबन्धुपु
साधुष्वपि च पाषेपु समवृद्धिर्चिशिप्यते ॥९॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६ ३३ योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१०॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ।।११।। तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने , युयाद्योगमात्मविशुद्धये ॥१२॥ समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥१३॥ प्रशान्तात्मा विगतभीब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मञ्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥१४॥ युञ्जन्ने संदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्ति निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥१५॥ नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चातिखमशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥१६॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तखमावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥१७॥ यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवायतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥१८॥ यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युजतो योगमात्मनः ॥१९॥ ३ ३४. दार्शनिक विचार यत्रोपरमते चित्तं निरुद्ध योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुप्यति ॥२०॥ सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्वलति तत्वतः ॥२१॥ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥२२॥ तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विष्णचेतसा ॥२३॥ सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेपतः। मनसैवेन्द्रियग्राम विनियम्य- समन्ततः ॥२४॥ शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या - धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किश्चिदपि चिन्तयेत् ॥२५॥ यतो . यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यतदात्मन्येव वशं नयेत् ।।२६।। प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं मुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मयम् ॥२७॥ युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मपः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं मुखमश्नुते ॥२८॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि . चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥२९॥ : .

. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति । . 'तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥३०॥ सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकखमास्थितः। । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥३१॥ आत्मौपम्येन सर्वत्र , समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखे स योगी परमो मतः ॥३२॥ अर्जुन उवाच योऽयं योगस्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चश्चलखास्थिति स्थिराम् ॥३३॥ चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् इहम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव मुदुष्करम् ॥३४॥ श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥३५॥ असंयतात्मना योगों दुष्पाप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥३६॥ अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाचलिततमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥३७॥ कचिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमित्र नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥३८॥ : .- दार्शनिक विचार एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न छुपपद्यते ।।३९।। श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गति तात गच्छति ॥४॥ प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुपिखा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥४१॥ अथवा योगिनामेव कुले भरति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥४२॥ तत्र तं घुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥४३॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव हियते झवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्विषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ।।४५॥ तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिका। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६॥ योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥४७॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगी- नाम पष्ठोऽध्यायः॥

'श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ७
३७
अथ सप्तमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥१॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेपतः ।।
यज्ज्ञाला नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २॥
मनुष्याणां सहस्रषु कश्विद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥३॥
भूमिरापोऽनलो यायुः सं मनो युद्धिरेव च ।
अहकार इतीयं मे भिन्ना . प्रकृतिरष्टधा ॥४॥
अपरेयमितस्तन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम् ।
जीवभृतां महावाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५॥
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥६॥
मतः परतरं नान्यत्किश्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं मोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥७॥
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाम्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः से पौरुपं नृपु ॥ ८॥
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजवारिस विभावसी ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चासि तपस्विपु ॥९॥

३८
दार्शनिक विचार
वीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धियुद्धिमतामसि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥१०॥
चलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽसि भरतर्षभ ॥११॥
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसान ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न खहं तेषु ते मयि ॥१२॥
त्रिभिर्गुणमयभावरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति · मामेभ्यः परमव्ययम् ॥१३॥
दैवी ‘ोपा गुणमयी मम माया ‘दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥१४॥
न मां दुप्कृतिनो मूहाः प्रपद्यन्ते 'नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥१५॥
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥१६॥
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिविशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥१७॥
उदाराः सर्व एवते ज्ञानी खात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स.
युक्तात्मा मामेवानुत्तमांगतिम् ॥१८॥
यहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
चासुदेवः सर्वमिति स . महात्मा सुदुर्लभः ॥१९॥

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ७ ३९ . कामस्तस्त«तज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥२०॥ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥२१॥ स तया श्रद्धया । युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥२२॥ अन्तयत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥२३॥ अव्यक्त व्यक्तिमापन्न मन्यन्ते' मामबुद्धयः। । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥२४॥ नाहं :प्रकाशः । सर्वस्य । योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥२५॥ चेदाह समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥२६॥ इच्छापसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति .परन्तप.॥२७॥ येपां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८॥ जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्म याखिलम् ॥२९॥ - दार्शनिक विचार साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥३०॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः॥ अथ अष्टमोऽध्यायः अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्म किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदेवं किमुच्यते ॥ १ ॥ अधियज्ञः कथं कोच. देहेस्मिन्मधुसदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥२॥ श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥३॥ अधिभृतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भाचं याति नास्त्यत्र संशयः ॥५॥ वर ॥४॥ +

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ८
यं यं चापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥६॥
तस्मात्सर्वेपु कालेपु मामनुस्मर युद्ध्य च ।
मग्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेचैप्यस्यसंशयम्
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा 'नान्यगामिना ।
परमं पुरुपं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ ८॥
कवि पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवणं तमसः परस्तात् ॥९॥
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगवलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुपमुपैति दिव्यम् ॥१०॥
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥११॥
सद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुद्धय च ।
मूाधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥

४२ दार्शनिक विचार: - ओमित्येकाक्षरं व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥१३॥ अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः ॥१५॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन-1 मामुपेत्य तु कौन्तेय : पुनर्जन्म न विद्यते ॥१६॥ सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्रहाणो...- .. - . विदुः। रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥१७॥ अव्यक्ताद्वयक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । राज्यागमे . प्रलीयन्ते - तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥१८॥ भूतग्रामः स एवायं भूखा भृता- प्रलीयते । राज्यागमेऽवशः , पार्थ :- :- प्रभवत्यहरागमे ॥१९॥ परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु. न विनश्यति ॥२०॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥ पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्खनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं.. ततम् ।।२२।।

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ८ यत्र काले सनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥२३॥ अग्निोतिरहः शुक्लः पण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥२४॥ धृमो रात्रिस्तथा कृष्णः पण्मासा दक्षिणायनम् । 'तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥२५॥ शुक्लकृष्णे गती घेते जगतः' शावते मते'। एकया. यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥२६॥ नेते सुती पार्थ जानन्योगी मुद्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु 'कालेषु योगयुक्तो 'भवार्जुन ॥२७॥ वेदेषु यज्ञेषु तपस्नु चैत्र दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्यति तत्सर्वमिदं विदिखा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥२८॥ . ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीरप्पार्जुनसंघादे अक्षरबहायोगी नामाष्टमोऽध्यायः

दार्शनिक विचार
अथ नवमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञासा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥१॥
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥२॥
अश्रद्दधानाः पुरुषा
धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥३॥
मया
ततमिदं, सर्व जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेप्यवस्थितः ॥४॥
न च - मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वाबुः सर्वगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ।।६।।
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥७॥
प्रकृति स्वामयष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिम कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८॥
न च मां तानि कर्माणि नियन्नन्ति धनञ्जय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेपु कर्मसु ॥९॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९ मयाध्यक्षण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥१०॥ अवजानन्ति मां मूहा मानुषी तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥११॥ मोघाशा मोधकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृति मोहिनी श्रिताः ॥१२॥ महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञाखा · भूतादिमव्ययम् ॥१३॥ सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥१४॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥१५॥ अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौपधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरह हुतम् ॥१६॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार अक्साम यजुरेव च ॥१७॥ गतिर्ता प्रभुः साक्षीः निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं चीजमव्ययम् ॥१८॥ तपाम्यहमहं . पं निगृहाम्युत्सृजामि च । अमृतं सदसच्चाहमर्जुन ॥१९॥ चैव मृत्युश्व

४६
दार्शनिक विचार
विद्या मां सोमपाः पूतयाया
वरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यामासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥२०॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥२१॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः .पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।।२२।।
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥२३॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥२४॥
यान्ति देवत्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृवताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।२५।।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं
भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥२६॥
यत्करोपि यदनासि यज्जुहोपि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुप्य मदर्पणम् ॥२७॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९ शुभाशुभफलैरेवं. — मोक्ष्यसे कर्मबन्धनः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैयसि ॥२८॥ समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ।।२९॥ अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥३०॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्ति निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥३१॥ मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियोवैश्यास्तथाशूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥३२॥ किं पुनर्ब्राह्मणाः । पुण्या भक्ता राजर्पयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥३३॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेबैप्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥३४॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराज- गुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥

दार्शनिक विचार
अथ दशमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥१॥
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिहि देवानां महीणां च सर्वशः ।।२॥
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूडः स मत्यैपु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥३॥
बुद्धिानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ।। ४ ।।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥५॥
महर्पयः सप्त पूर्वे चखारी मनवस्तथा ।
महावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥६॥
एतां विभूति योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥७॥
अहं सर्वस्थ प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते ।
इति मखा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥८॥
मचित्ता मद्गतनाणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुप्यन्ति च रमन्ति च ॥९॥

.
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि वुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥१०॥
तेपामेवानुकम्पार्थमहमज्ञान तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥११॥
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं . परमं भवान् ।
पुरुष - शाश्वतं . दिव्यमादिदेवमर्ज विभुम् ॥१२॥
आहुस्त्वामृपयः सर्वे
देवपिन रदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीपि मे ॥१२॥
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्ति विदुर्देवा न दानवाः ॥१४॥
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुपोत्तम ।
भूतभावन भूतेश
देवदेव जगत्पते ॥१५॥
वक्तुमर्हस्यशेपेण 'दिव्या' ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥१६॥
कथं विद्यामहं योगिस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केपु केपु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥१७॥
विस्तरेणात्मनो - योगं विभूति च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥१८॥

दार्शनिक विचार श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥१९॥ अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एच च ॥२०॥ आदित्यानामहं विष्णुर्योतिपां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामणि नक्षत्राणामह शशी ॥२१॥ वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानाममि बांसवः । इन्द्रियाणां मनचासि भूतानामपि चेतना ॥२२॥ रुद्राणां शङ्करथामि वित्त शो यक्षरक्षसाम् । वसूनां पावक्रश्चारिस मेरुः शिखरिणामहम् ॥२३॥ 1. पुरोधसां च मुख्य मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥२४॥ महीणां : भृगुरह गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽसि स्थावराणां हिमालयः ॥२५॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥२५॥ उच्चैःश्रवसमवानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥२७॥ आयुधानामहं यत्र 'धेनूनामसि कामधुक् । प्रजनश्वासि कन्दर्पः सर्पाणामसि वासुकिः ।।२८||

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १०
.
अनन्तयामि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितृणामर्यमा चासि यमः । संयमतामहम् ॥२९॥
प्रहादश्वासि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥३०॥
पवनः पयतामसि
रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झपाणां मकरचासि स्रोतसामसि जाहवी ॥३१॥
सर्गाणामादिरन्तच मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अंध्यात्मविद्या विद्यानां वादः अवदतामहम् ।।३२॥
अक्षराणानकारोऽसि द्वन्द्वः सामासिकस च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥३३॥
मृत्युः . सर्वहरश्वाहमुद्भवश्व भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाश्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिःक्षमा ॥३४॥
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्पोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥३५॥
द्यूतं छलयतामस्मि
तेजस्तेजस्विनामाम् !
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्वं सत्वयतामहम् ॥३६॥
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥३७॥
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीपताम् ।
मौनं चैवास्मि गुयानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥३८॥

५२
दार्शनिक विचार
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥३९॥
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एप तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥४०॥
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ।।४।।
अथरा पहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन !
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ।।४२।।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो
नाम दशमोऽध्यायः॥
अथैकादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परम गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥१॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥२॥
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं., परमेश्वर ।
'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ११ मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर - ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४॥ श्रीभगवानुवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥५॥ पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनी मरुतस्तथा। यहून्यदृष्टंपूर्वाणि पश्याथर्याणि भारत ॥६॥ इहैकस्थं जगत्कृस्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्रष्टुमिच्छसि ॥७॥ न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुपा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८॥ संजय उवाच एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९॥ अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् 'अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥१०॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥११॥ दिवि सुर्यसहस्रस्थ भवेयुगपदुत्थितां । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥१२॥ : . 1

५४
दार्शनिक विचार
तकस्थं जगत्कृत्स्नं अविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥१३॥
ततः स विस्मयाविष्टो हटरोपा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभापत ॥१४॥
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वात्तथा भूतविशेपसंधान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृपीश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥१५॥
अनेकवाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादि
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥१६॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताइ
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥१०॥
स्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥१८॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ११
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहुं शशिवर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥१९॥ ।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्यात त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्याधितं महात्मन् ॥२०॥
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति
केचिद्रीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥२१॥
रुद्रादित्या वसयो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतचोप्मपाथ ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा
वीक्षन्ते त्वां विसिताश्चैव सर्वे ॥२२॥
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुवाहरुपादम्।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रन्यथितास्तथाहम् ॥२३॥

दार्शनिक विचार
नभः स्पृशं दीप्तमनेकवर्ण
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृति न विन्दामि शमं च विष्णो ॥२४॥
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसनिभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगनिवास ।।२५।।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्पदीयैरपि यो मुख्यः ॥२६॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयान तानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
संदृश्यन्ते चूर्णितरुत्तमा ॥२७||
यथा नदीनां वहवोऽम्बुवेगा:
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥२८॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ११
.
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥२९॥
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता-
लोकान्समयान्वदनचलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्र
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥३०॥
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्य
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥३१॥
श्रीभगवानुवाच :-
कालोणि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति संवें
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेपु योधाः ॥३२॥
तसाचमुत्तिष्ठ यशो लभस्त्र
जित्वा शत्रून्मुक्ष्वराज्यंसमृद्धम् ।
मयते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥३३॥

दार्शनिक विचार द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्ण तथान्यानपि योधवीरान् । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युद्धयस्व जेतासि रणे सपलान् ॥३४॥ समय उवाच एतच्छ्र त्या वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी। नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥३५॥ अर्जुन उवाच स्थाने हपीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीवानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसकाः ॥३६॥ करसाच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्ने। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥३७|| त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ११ वेत्तासि वेद्यच.परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥३८॥ वायुर्यमोऽग्निवरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥३९॥ नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्व समामोपि ततोऽसि सर्वः॥४०॥ सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥४१॥ यचाबहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥४२॥ पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।

दार्शनिक विचार ६० पितेय पुत्रस्य न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुत्तोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥४३॥ तस्मात्मणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्यामहमीशमीड्यम् । सखेव सख्युः प्रियः प्रियायाहसि देव सोदुम् ॥४४॥ अदृष्टपूर्व हपितोसि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे। तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥४५॥ किरीटिनं गदिनं चक्रहरत- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥४६ श्रीभगवानुचाव प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । विश्वमनन्तमाद्य वदन्येन न दृष्टपूर्वम् मया दान- क्रियाभिर्न दार्शनिक विचार न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥४३॥ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रय सखेव सख्युः प्रियः प्रियायाहसि देव सोढुम् ॥४४॥ अदृष्टपूर्व हृपितोमि दृष्ट्वा भयेन च अव्यथितं मनो मे। तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥४५॥1 किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥४६॥ श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्य यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूनम् ॥४७॥ चेदयज्ञाध्ययनैर्न · दान- नं च क्रियाभिर्न तपोभिरुणैः।

सञ्जय उवाच श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ११ एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥४८॥ मा ते व्यथा मा च विमूहभायो दृष्ट्वा रूपं घोरमीडङ ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥४९॥ इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥५०॥ अर्जुन उवाच : दृष्ट्वेदं :मानुपं रूपं तब सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥५१॥ श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं. दर्शनकांक्षिणः ॥५२॥ नाहं वेदैर्न तपसा , न दानेन न चेज्यया । , शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा-॥५३॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ! 7 ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन: प्रवेष्टुच परन्तप.॥५॥ . - दार्शनिक विचार मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः समवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥५५॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रहाविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शन- योगो नामैकादशोऽध्यायः॥ अथ द्वादशोऽध्यायः अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्यां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेपां के योगविचमाः ॥१॥ श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा “मतां ॥२॥ ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं , पर्युपासते । सर्वनगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३॥ संनियम्येन्द्रियग्राम सर्वत्र समबुद्धयः। वे प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४॥ क्शोधिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसाम् अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः। "अनन्येनैव योगेन · मा . ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥ । 1 श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १२ ६३ तेपामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७॥ मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्च न संशयः॥८॥ अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोपि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेनं ततो मामिच्छाप्तुं धनन्जय ।।९॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥१०॥ अथैतदप्यशक्तोऽसि कतुं मद्योगमाश्रितः। सर्वकर्मफलत्यागं . ततः , कुरु यतात्मवान् ॥११॥ श्रेयोहि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते । ध्यानाकर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥१२॥ अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ।।१३।। सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निधयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१४॥ यस्यानोद्विजते लोको लोकानोद्विजते चं यः । हमर्पभयोद्वेगैमुक्तो यः स . च में प्रियः ||१५|| अनपेक्षः .. शुचिर्दक्ष उदासीनो. गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१६॥ १

दार्शनिक विचार
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कासति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥१७॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोप्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥१८॥
तुल्यनिन्दास्तुतिमानी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥१९॥
ये तु धामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥२०॥
तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे 'श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम
द्वादशोऽध्यायः॥
३
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
प्रकृति पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं यं च केशव ।।
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय · क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो.वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥१॥
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोजनं तत्तज्ज्ञानं . मतं मम ॥२॥

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १३ तत्क्षेत्रं यच यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् । “स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥३॥ ऋपिभिर्वहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः। ४॥ महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥५॥ इच्छा द्वेपः सुखं दुःखं संघातेश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ।। ६ ।। अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥७॥ इन्द्रियार्थेषुः वैराग्यमनहङ्कार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोपानुदर्शनम् ॥८॥ असक्तिरनभिप्यङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । समचिचत्यमिष्टानिष्टोपंपत्तिषु ॥९॥ मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि । ॥१०॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं · · तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥१२॥ ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि : यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परंः, ब्रह्म न 1 सत्तन्नासदुच्यते ॥२२॥ नित्यं च :1 दार्शनिक विचार सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमलोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१३॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्त च ॥१४॥ बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वाचदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥१५॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभ च तज्ज्ञेयं असिष्णु प्रभविष्णु च ॥१६॥ ज्योतिपामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥१७॥ इति क्षेत्र तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भाबायोपपद्यते ॥१८॥ प्रकृति पुरुपं चैव विद्धयनादी उभायपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥१९॥ कार्यकरणकर्तुत्वे प्रकृतिरुच्यते । 'पुरुपः सुखदुःखानां भोक्तृत्त्वे हेतुरुच्यते ॥२०॥ पुरुपः प्रकृतिस्थो हि मुक्त प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥२१॥ उपद्रप्टॉनुमन्ता . च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । , 'परमात्मेति चाप्युक्तो 'देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥२२॥ .

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १३ य एवं चेति पुरुष प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥२३॥ ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥२४॥ अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्यु श्रुतिपरायणाः ॥२५॥ यावत्संजायते किंचित्सर्च स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥२६॥ समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥२७॥ समं पश्यन्दि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ।।२८॥ प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥२९॥ यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥३०॥ अनादित्वान्निगुणत्वात्परमात्मायमव्ययः शरीरस्थोऽपि कौन्तेय, न करोति न लिप्यते ॥३१॥ । यथा सवगतं :सौक्षम्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा: नोपलिप्यते ॥३२॥ . .

दार्शनिक विचार
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥३३॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुपा
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥३४॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्राधि-
भागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥
.
अथ चतुदशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥१॥
इदं, ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥२॥
मम योनिमहद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ।। ३।।
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं चीजप्रदः रिता ॥४॥
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निवान्ति महाबाहो देहे देदिनमव्ययम् ॥५॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १४ वत्र' सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनाययम् । सुखसङ्गन बनाति ज्ञानसङ्गन चानघ ।।६।। रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निवनाति कौन्तेय कर्मसङ्गन देहिनम् ॥ ७॥ तमस्वज्ञानजं . विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निवनाति भारत॥८॥ सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥९॥ रजस्तमश्वाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । 'रजः सत्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१०॥ सर्वद्वारेपु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥११॥ १. लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्ध भरतर्षभ ॥१२॥ अप्रकाशोऽप्रवृतिश्व प्रमादो मोह एव च । . तमस्येतानि जायन्ते विवृद्ध कुरुनन्दन ॥१३॥ यदा सत्वे प्रवृद्ध तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां. लोकानमतान्प्रतिपद्यते ॥१४॥ रजसि प्रलयं . गला कर्मसङ्गिपु, जायते । तथा अलीनस्तमसि मूडयोनिषु जायते ॥१५॥ .

दार्शनिक विचार
im
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥१६॥
सत्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१७॥
ऊर्ध्व गच्छन्ति सवस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१८॥
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोधिगच्छति ॥१९॥
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥२०॥
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति .प्रभो।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥२१॥
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संग्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥२२॥
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥२३॥
संमदुःखसुखः स्वस्था समलोटाश्मकाञ्चनः ।
· तुल्यप्रियाप्रियो घीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥२४॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १५ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥२५॥ मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥२६॥ ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य मुखस्यैकान्तिकस्य च ॥२७॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंघादे गुणत्रयविभागयोगो : नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ अथ पञ्चदशोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमघाशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१॥ अधश्चोर्ध्व प्रसृतास्तस्य शाखा गुणाप्रवृद्धा विपयप्रवालाः । अधश्व मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥२॥ न रूपमस्यह तथोपलभ्यते मान्दो र यदिर्न च संप्रतिष्ठा ।

'दार्शनिक विचार अश्वत्थमेनं सुविरूडमूल- मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥३॥ पदं तत्परिमार्जितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुपं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥४॥ निर्मानमोहा जितसङ्गन्दोपा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥५॥ न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥६॥ ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । :,मनःपष्ठानिन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कति ॥७॥ शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥८॥ भोत्रं चतुः स्पर्शनं च रसनं प्राणमेव च । अधिष्ठाय मनवायं विपयानुपसेवते ॥६॥ उत्क्रामन्तं स्थितंवापि भुजानं वागुणान्वितम् । विमूडा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचनुपः ॥१०॥ .

"- श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १५ ७३ यतन्तो यौगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्वस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥११॥ यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यचाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥१२॥ गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौपधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥१३॥ अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाधितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१४॥ मरस्य नाई हृदि सप्तरियो मत्तः स्मृतिनिमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो 'वेदान्तकृद्वेदविदेव. चाहम् ॥१५॥ द्वामिमी पुरुपौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥१६॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१७॥ यस्मारक्षरमतीतोऽहमक्षरादपि अत्तोऽस्मि लोके चेदे च प्रथितः 'पुरुपोगमः ॥१८॥ यो मामेवमसंमूडो जानाति पुरुषोपमम् । 'स सर्वविद्भजति मां सर्वमावेन भारत ॥१९॥ १ - चोत्तमः ।

दार्शनिक विचार
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्त मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥२०॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो
नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥
अथ पोडशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥१॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं होरचापलम् ॥२॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति संपदं देवीमभिजातस्य भारत ॥३॥
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुप्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥४॥
दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥५॥
द्वौ भूतस! लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
देवो विस्तरशः प्रोक्त आतुरं पार्थ मे भृशु ॥६॥

श्रीमद्भगवीना, अध्याय १६
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥७॥
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहेतुकम् ॥८॥
एतां दृष्टिमयष्टम्य नष्टात्मानोऽल्पयुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोपहिताः ॥९॥
काममाश्रित्य दुप्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥१०॥
चिन्तापपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतापदिति
एतापदिति निश्चिताः ॥११॥
आशापाराशतदाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्धमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥१२॥
इदमय मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥१३॥
असा मया हतः शाहनिप्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमई भोगी सिद्धोऽहं बलवान्मुखी ॥१४॥
आयोभिजनवानस्मि कोज्योस्तिसदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिप्य इत्यज्ञानचिमोहिताः ॥१५॥
अनेकचित्तपिवान्ता मोहजालसपाताः।
प्रसक्ताः कामभोगेपु पतन्ति नरकेशुची ॥१६॥

दार्शनिक विचार आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥१७॥ अहङ्कारं बलं दपं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विपन्तोऽभ्यस्यकाः ॥१८॥ तानहं द्विपतः क्रूरान्संसारेपु नराधमान् । क्षिपाम्यजसमशुभानासुरीप्वेव योनिपु ॥१९॥ आसुरीं योनिमापना यूटा जन्मनि जन्मनि । माममाप्यैच कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥२०॥ निरिधं नरकस्येदं द्वार नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतनयं त्यजेत् ॥२१॥ एतैर्विमुक्ताः कौन्तेय तमोद्वारैखिभिर्नरः । 'आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥२२॥ यः शास्त्र विधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥२३॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥२४॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवगीतासूपनिपासु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंप- द्विभागयोगो नाम पोडशोऽध्यायः ॥ ។ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १७ ७७ भारत। अथ सप्तदशोऽध्यायः अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्चमाहो रजस्तमः ॥१॥ श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा. देहिनां सा स्वभावजा । सात्त्विकी राजसी चैव तापसी चेति तां शृणु ॥२॥ सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति श्रद्धामयोऽयं पुरुपो यो यच्छद्धः स एव सः॥३॥ यजन्ते साचिका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये वपो जनाः । दम्भाहकारसंयुक्ताः कामरागपलान्विताः ॥५॥ कपयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेवसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥६॥ आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेपां भेदमिमं शृणु ॥७॥ आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः "1 रस्याः स्निग्धाः स्थिराहृयाआहाराः साचिकप्रियाः ॥८॥ कट्वालयणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः 'आहारा राजसस्येष्टा दुःखसोकामयप्रदाः ॥९॥ .

दार्शनिक विचार
यातयाम गवरसं पूति पर्युपितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥१०॥
अफलाकाक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स साचिकः ।।१
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥१२॥
विधिहीनमसृष्टावं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरदितं यज्ञ तामसं परिचक्षते ॥१३॥
देवद्विजगुरुपाज्ञपूजन शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं . तप उच्यते ॥१४॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥१५॥
मनःप्रसाद
सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥१६॥
श्रद्धया परया वसं तपस्तत्निवियं नरैः।
अफलाकादिभिर्युक्तः सात्विकं परिचक्षते ॥१७॥
सत्कारमानपूजार्थ तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥१८॥
मूडग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
'परस्योत्सादनार्थ. वा ' तत्तामसमुदाहृतम् ॥१९॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १७ दातव्यमिति यदानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं साचिकं स्मृतम् ॥२०॥ यत्तु प्रत्युपकारार्थ फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिप्टं तहानं राजसं स्मृतम् ॥२१॥ अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते । असत्कृतमयज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ।।२२।। ॐ वत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३॥ तसादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानततः क्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ||२४|| तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाच विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाशिभिः ॥२५॥ सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छन्दः पार्थ युज्यते ॥२६॥ यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ॥२७॥ अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । असंदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥२८॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां 'योगशाख्ने श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभाग योगोनाम सप्तदशोऽध्यायः॥.

दार्शनिक विचार
या
यातयामं गतरसं पूति पर्युपितं च
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसनियर
अफलाकासिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य
इज्य
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स साचिव
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञ विद्धि राजर,
विधिहीनमसृष्टार्स 'मन्त्रहीनमदक्षिा
श्रद्धाविरहितं यज्ञ तामसं
परिच
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं
शौचमा
ब्रह्मचर्यमहिंसा च . शारीरं . तप
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उम्।
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनि
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो
मानसमु.
श्रद्धया परया
तप्तं तपस्तत्त्रिविधं
अफलाकासिभिर्युक्तः सात्विक परिच
'सत्कारमानपूजार्थ तपो दम्भेन चैव
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमा
'मृहग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते
.. 'परस्योत्सादनार्थ वा . तत्तामसमुदा

८०
दार्शनिक विचार
.
अथाष्टादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हपीकेश
च हुपीकेश पृथकेशिनिपूदन ॥१॥
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥२॥
त्याज्यं दोपवदित्येके कर्म ग्राहुर्गनीपिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥३॥
निश्चयं शृणु मे तन त्यागे । भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र विविधः संप्रकीर्तितः ॥४॥
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीपिणाम् ।।५।।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गत्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ, निश्चितं .मतमुत्तमम् ॥ ६॥
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः . परिकीर्तितः ॥७॥
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेर्जुन ।
सश्त्यक्त्वा फलंचैवस त्यागः साचिको मतः ॥९॥

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १८
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4
नांद्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुंशले नानुपजते ।
'त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१०॥
नहि देहभृता:शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
'यस्तु कर्मफलत्यागी सत्यागीत्यभिधीयते ॥११॥
अनिष्टमिष्टं मिथं चं त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥१२॥
पञ्चैतानि महाबाहो,कारणानि::निरोधः:मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१३॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता- करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च -पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥१४॥
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म-- --प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं चा:- पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१५॥
तत्रय: सति: कारमात्मानं केवलं - तु - यः।
पश्यत्यकृतघुद्धित्वान्न-: स-- पश्यति दुर्मतिः-1॥१६॥
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
“हत्वापि से इमाँल्लोकान हन्ति न निबध्यते ॥१७॥ .
ज्ञानं ज्ञेयं "परिज्ञावा' त्रिविधा 'कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥१८॥
ज्ञानं कर्म च कर्ता च विधेव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणुतान्यपि ॥१९॥

दार्शनिक विचार
सर्वभूतेषु येनैक भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तपुतज्ज्ञानं विद्धि साच्चिकम् ॥२०॥
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
'२ वेत्तिः सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ।।२१।।
यत्तु , कृत्लवदेसिन्कार्ये सक्तमहतुकम् ।
तत्त्वार्थवदर्प: च - तत्तामसमुदाहृतम् ।।२२।।
नियतमा सङ्गरहितमरागद्वेपतः कृतम् ।
अफलीप्सुना कर्म यत्तत्साविकमुच्यते ॥२३॥
यत्तुं कामप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते
बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥२४॥
अमुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुपम् ।
''मोहादारभ्यतें कर्म, यत्ततामसमुच्यते ॥२५॥
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
'सिद्ध्यसिद्धयोनिविकारां कर्ता साविक उच्यते ॥२६॥
रागी कर्मफलनेप्सुर्लब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्पशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥२७॥
अयुक्तः प्राकृतः स्तन्धो शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विपादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥२८॥
युद्धेर्मेदं धृतेश्चैव - गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेपेण ... पृथक्त्वेन धनंजय ॥२९॥

. श्रीमद्भावगीता, अध्याय १८ प्रवृत्ति व निवृत्ति कार्याकार्ये भयाभये । 'बन्धमोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ-साविकी ॥३०॥ यया धर्ममधर्म व कार्य चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धि सा पार्थ राजसी.॥३१॥ अधर्म, धर्ममितिनी या : मन्यते:: तमसावृता । 'सर्वार्थाविपरीतांश्च बुद्धिा सा,पार्थ: तामसी:॥३२॥ त्या ययाः धारयतें मनः प्राणेन्द्रियक्रिया। 'योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्तिकी॥३३॥ यया तु, धर्मकामार्थान्धृत्या। धारयतेऽर्जुनः। , प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः साः पार्थ राजसीना३४॥ त्यया स्वप्नं भयं शोक, विषादं मदमेव च । 'न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ. तामसी ॥३५॥ सुखं त्विदानी त्रिविघं शृणु में भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥३६॥ यत्तदो विपमित्र परिणामेऽमृतोपममम् । तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमास्मबुद्धिप्रसादजम् ॥३७॥ विपयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् 'परिणामे विपमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥३८॥ यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालसप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ।।३९॥ . . -

४
• दार्शनिक विचार
न तदस्ति पृथिव्यांचा दिवि देचेषु चा पुनः।
- सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः 'स्यात्विभिर्गुणैः ॥१०॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशा शूद्राणां च परंतप
कर्माणि प्रविभक्तानि खभावप्रभत्रैर्गुणैः ॥४१॥
शमो दमस्तपः
शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्मस्वभावजम् ॥४२॥
शौर्य तेजोधृतिर्दाक्ष्यं युद्ध"चाप्यपलायनम् ।
दानमीधेरभावश्च क्षात्रं "कर्म संभावजम् ॥४३॥
कपिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म , स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि समावजम् ॥४४॥
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥४५॥
यतः। प्रवृतिभूतानां येन-सर्वमिदं ततम् ।
- स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ॥४६॥
श्रेयान्वधर्मो विगुणः परधर्मात्खनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नामोति किल्लिपम् ॥४७॥
सहजं कर्म कौन्तेय सदोपमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोपेण धूमेनाग्निरियावृताः ॥४८॥
असक्तयुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
“कसिद्धि परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥४९॥

. श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १८ सिद्धि प्राप्तो यथा ब्रह्मा तथामोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय- निष्ठा र ज्ञानस यो परा॥५०॥ युद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्त्रिपयांस्त्यत्वा रांगद्वेषौं व्युदस्य च ।।५१।। विविक्तसेवी लघ्वाशी रयतवाकायमानसी व्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यंगसंमुपाश्रितः ।।५२॥ अहङ्कारं चलंदा काम क्रोध!: परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पतेः॥५३॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न : शोचति न काङ्क्षतिः। समः: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥५४॥ भक्या-मामभिजानाति-यावान्यश्वास्मि-तत्त्वतःः। • ततो मां तत्वतो ज्ञासा विशते, तदनन्तरम्॥५५॥ सर्वकर्माण्यपि, सदा-: कुर्वाणो. मद्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवामोति शाश्वतं -- पदमव्ययम् ॥५६॥ चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ! बुद्धियोगमुपाथित्य : मचित्तः सततं :--भव ।।५७॥ मचित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहङ्कारान श्रीप्यसि, विनयसिः॥५८॥ यदहकारमाश्रित्य -न- योत्स्य- इति-मन्यसे । -मिथ्यैप व्यवसायस्ते -प्रकृतिस्वां नियोक्ष्यति ॥५९॥ --

दार्शनिक विचार
खभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्नु नेच्छसि यन्मोहात्करिप्यस्यवशोऽपि तत् ।।६।।
ईश्वरः - सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यत्रारूहानि मायया ॥६१॥
तमेव शरणं
सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादास्परांशान्ति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥६२॥
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
• विमृश्यैतदशेपेण यथेच्छसि तथा
कुरु ॥६३॥
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृडमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ।।६४॥
मन्मना भव मद्भक्तों मघाजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥६५॥
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं सा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥६६॥
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषचे वाच्यं न च मां योऽभ्यसयति ॥६७॥
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेप्पभिघास्यति ।
भक्ति मयि परां कृता मामप्यत्यसंशयः ॥६८॥
न च तसान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तमादन्यः प्रियतरो भुवि ॥६९॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १८ अध्येप्यते च य इमं घय संवादमावयों। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः समिति मे मतिः-11७०॥ : श्रद्धावाननस्यश्च . शृणुयादपि . यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्रामुयात्पुण्यकर्मणाम् ।।७१॥ कचिदेतच्छ्रुतं पार्थ खयैकाग्रेण चेतसा। कञ्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥७२॥ अर्जुन उवाच नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा सत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽसि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥७३॥ सञ्जय उवाच परम् । इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिमीपमद्भुतं रोमहर्पणम् ॥७॥ व्यासप्रसादाच्छृतवानेतद्गुह्यमहं . योग योगेश्वरात्कृप्णात्साक्षात्कथयतः वयम् ।।७।। राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादपिमतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृप्यामि मुद्ददुः ।।७६॥ तच संस्मृत्य संस्मृत्य रुपमत्सद्भुतं हरेः। विसयो मे महानाबन्दृप्यानि व पुनः पुनः . दार्शनिक विचार यत्र योगेश्वरस:- कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः तत्र -श्रीविजयो, भूतिधु वा नीतिमतिर्ममः ॥७८॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु नाविधायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ .

दार्शनिक विचार
वेदगीता रहस्य ..
.:. एक आकाशमें एक ही शक्ति सब जंगह व्यापक रूपसे है।
वही आत्मा और ग्रहा है। यह रूप होकर अनेक नामसे है।
स्थिररूपका नाम परमात्मा है, . और वही 'सह' है। उसका
'आत्मा' यह नाम स्थिररूपको समझने वास्ते है। उसी स्थिर
रूपमें विषय और रूपकी प्राप्तिके लिए जिसकी भक्ति की जाती
है वह परमेश्वर है। उसीका आत्मामें कर्मफल.शात करने के
कारण ईश्वर नाम है। शरीरसे.कार्य होता है तो साक्षीरूपसे
विशेष होकर वह पुरुष साथमें रहता है। यही शरीरसे कर्मभोग
फर मरता है और उत्पन्न होता है। उसका नाम जीवात्मा है।
अव्यक्त परमात्मा, और आत्मा व्यक्त है, उसीका नाम
संसार (जड़ चेतन-समूह) है। मेदसे उसका नाम जगत् है।
।

-- -- । ९० दार्शनिक विचार वही जगत् एक रूप नामसे लोक शरीर और जीव भी कहलाता है। शरीरसे ही कर्म होता है, शरीर हो भोगता है और वही मरता है। उसीका नाम भाव या इन्द्रिय-शरीर है। इसके कर्मके साथ रहनेवाला, और जिससे भाव या इन्द्रिय-शरीर चिपय करते और भोगते हैं उसका नाम मन है। वह चित्तमें रहकर अव्यक्त है, और चित्त आत्माके साथ रहनेसे व्यक्त है। जब भाच या इन्द्रिय-शरीर सामनेकी वस्तुको विपय करके मनमें आता है तो वह कर्म भोगनेको आगेकी किया करके निश्चयात्मक-बुद्धि हो जानेपर अहंकारमें अभिमान करके भोग- की उत्पत्ति करता है । भोगका नाम स्वर्ग है। क्रियासे शेषकर्म- शरीरका त्याग हो तो उसका नाम मोक्ष है। मन शेषकर्मसे दूसरा शरीर धारण करता है। उसमें भूतकालके फर्मको देय कहा जाता है। उसीका वर्तमानमें ज्ञानेन्द्रियोंसे भोग होता है और कर्मेन्द्रियों द्वारा त्यागके कर्मसे मेदिप्यमें मन शरीर बनता है। ये तीनों काल शरीरमें और शरीरपर हैं। चौथा आत्माका महाकाल है । यह सबसे नित्य है। भूत, भविष्यत् और वर्त- मान ये तीनों काल शरीरसे समझे जाते हैं, और. महाकाल सूर्यसे । जैसा लिखा है, 'सूर्य नात्मा जगतस्तस्युपश्य ' वही शरीरमें प्राण मन है। सव रूप ब्रह्मका है, और शरीरकी उत्पत्ति ब्रह्मके आचारसे है। अपने अपने शरीरके धर्मके अनुसार जो ब्रह्मक रूपमें प्राप्ति होती है, उसका नाम भोग है। जो फर्मकी उत्पत्ति अपने अपने धर्मके भेदसे होती है वह कर्मकी उत्पत्ति, और कर्मका भोग स्व-स्वभावसे मन द्वारा होता है, और मनमें रहता है। क्योंकि' यही शरीरका चीज रूप है। जैसे बीज दौखता है और भूमिमें बो देनेपर वह अदृश्य हो जाता है, फिर वही अंकुर रूपसे वृक्ष होकर दीखता है, और फैलता है। इसी वेदगोता रहस्य तरह मनःपूर्वशरीरको छोड़कर दूसरे पुरुपके रस-बीजमें आता है, और वही स्त्रीरूपी भूमिमें रसरूप यनकर गर्भसे,वाहर आता है। यह जड़ और चेतनकी एक ही बात है। वही मन बीज उत्पन्न होता है। जैसे वृक्ष फलको उत्पन्न करता है, वैसे ही शरीरसे भी, फल उत्पन्न होता है, और वहीं फल वीजरूप है। यही यात शरीरमें समझनी चाहिये। मनका स्थानापन्न पुरुष, और माव या इन्द्रिय-शरीरका स्थानापन्न जीव है। वह मरता है। और घेद-पुरुष या मन नित्य है, वही पूर्वशरीरका शेषकर्म लेकर दूसरे शरीरको उत्पत्ति करता है। उसका नाम वर्तमान शरीर है। वहीं मध्याह्न है, और यही कालापही स्व-स्वभावके द्वारा जगत्का अलग-अलग भेद करता है। श्रुति और चक्षुसे लक्षण करके सामान्यरूप करण द्वारा भोगता है। और चक्षु और श्रुतिसं मनमें अभिमान फरके शेषकर्मसे दूसरा शरीर बनता है। अतः इसी शानका नाम वेद है। शरीरमें तीन तरह के ज्ञान है-चित्तमें भूतकालका. ज्ञान, मनमें भूत और भविष्यत् कालका ज्ञान, और वर्तमानके भावमें वर्तमान कालका शान । ये तीनों शान वेदमें हैं, अतः उसे प्रयी कहते हैं। अतएव गीतामें भी कहा गया है-"गुण्यविषया घेदा"। अन्यत्र यह भी कहा गया है-"निस्वैगुण्यो भवा- झुन"। ये सब महाकालमें रहते हैं । अतः कभी उत्पत्ति होती है, तो फमी लय भी होता है। यही इस अष्टादशश्लोकी वेद- गीताका गूद अभिप्राय है। यह यात गीताके दूसरे अध्यायके २० श्लोक (घेद-प्रकरणके भारंभसे) स्पष्ट है । न जायते नियते या कदाचिधाय भूषा भपिता वा न भूयः । मो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥" . " ९२, दार्शनिक विचार , - चेदपुरुषे नित्य है, और जीवशरीर अनित्य है। यह वात- "वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमंजमध्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ के घातयति हन्ति कम् ॥" इस श्लोकले सिद्ध होती है। गीताके २२वें श्लोकसे- -- - "चासांसि जीर्णागि यया विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ -घेद पुरुष है, और यह नित्य है। घनकी तरह यह इस शरीरको छोड़ता है, और दूसरा शरीर धारण - करता है, यही बात समझने की है। ब्रह्म = घेद जाननेवाला ब्राह्मण अपने अपने शरीरमें रहता है। शरीरके भेदसे उसका भेद, होता है। उक्त घेद मन में रहता है, अतः मनका नाम वेद है। यही ब्रह्मको जागनेसे ब्राह्मण कहलाता है । अक्षर ब्रह्म है, अक्षर नित्य है । और क्षर, भोय, शरीर तथा विषय अनित्य है। अक्षर वेदका नाम है 'मन यांचता है, और चही लिखता है। अतः मन अक्षर है, और नित्य है। अक्षर भावमें वह अनित्य है। यही भाव या इन्द्रिय-शरीर मरता है, और उत्पन्न होता है। भावकों कार्य शरीरसे त्यक्त होकर अनमें जाता है, और मन वर्तमानके ज्ञान द्वारा इन्द्रिय-शरीरसे भोग करता है। वह मन येद नित्य है, अविनाशी है। घेद समझने और समझानेको भी कहते हैं। उसका प्रकार पुस्तकों में लिखा' उसका अक्षर नित्य है और कागज अनित्य | चे (अक्षर) सबके समझने और समझानेमें आते हैं.। मन ही समझता और समझाता है, इससे बह नित्य है। अर्थ भोगा जाता है अतः अतः :

। घेदगीता रहस्य ९३ वह अनित्य है। यही घेद मनके वेदमें है। और इसीका वर्णन इस अष्टादशंश्लोकी गीता में है। समस्त शरीरके अन्तःकरणमें शब्दयोगका अधिकार लेकर मनका निवास है। यह चक्षुके द्वारा याहरी रूपका ग्रहण करता है। प्रयोजन समझकर दूसरेको समझानेके वास्ते मुखसे शन्द- 'का उच्चारण करता है । उस शब्दको दूसरा फानके द्वारा ग्रहण करता है। और चक्षुके द्वारा सामनेके रूपको देखता है। पुनः योलता है। ये ही ६ सम्बन्ध दो शरीरोंमें होते हैं:-मनके साय ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंके योगसे ५ और १ स्वतन्त्र मनका। उन्हींको शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष और कल्प = कल्पना कहते हैं। दो शरीरोंमें वेद वेदान्त है। शरीरका नाम घेदान्त है। क्योंकि कभी तो सम्बन्ध होनेसे उसकी उत्पत्ति होती है, और कभी भोग होनेसे उसका नाश होता है। मनमें जो पूर्वकी यस्तु लायी गयी है वही शिक्षा है। जो उसके संकेतसे व्यवहत होता है यह व्याकरण है। जो फलका निश्चय किया जाता है यह निरुता है । जो फल संसारमें दूसरेके पास है उसको अपने अनुकूल देखना छन्द है। लक्षणा करके ग्रहण करना ज्योतिप है। फलफी कल्पना करना फल्प है। एक वक्त शरीरके शब्दयोग से अधिकार यनता है और दूसरे पक्त भोग होकर संन्यास होता है। शन्दसे रूप समझा जाता है और रूपके द्वारा रसका मनमें ज्ञान होता है। उसका नाम वेद है। मुखके द्वारा दूसरोंको शब्द और रूपका शान कराया जाता है, रूपका चक्षुसे चोर रसका रसनासे ज्ञान होता है। एक शरीरसे अधिकार होता है और दूसरे शरीरसे भोग होता है। पर्तमानमें पूर्वकर्म का भोग होता है और उत्तरमें त्यागकर्म का अधिकार होता है। इसीका विस्तारके साथ कर्म-धर्म के नाम दार्शनिक विचार से गीताके ७०० श्लोकों में घर्गन किया गया है कर्म (कीर्ति) कान से सुना जाता है और धर्म (शरीर) चक्षुसे दीखता है; श्रुतिसे अधिकार कर्म जाना जाता है, लक्षणाले प्रिय और अप्रिय समझकर भोग होता है। कर्मेन्द्रियों के त्यागसे उत्तरकर्म बनता है और ज्ञानेन्द्रियोंके भोगसे संन्यास होता है। यही दो कर्म मुख्य हैं, और यही वेद पुरुषका सरूप है। इससे यही सिद्ध होता है फि चेद योजखरूप है क्योंकि भूतमें उसका नाम है और भविष्यमें उसका वृक्ष, फल, और धीजा है।

अष्टादशश्लोकी वेदगीता
।
.. वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजपव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ क-धातयति हन्ति कम् ।।
गीता, १०.२,.लो. २१
३""
वेदाह समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ।।
श्लो.
......३);
वेदेषु यक्षेपु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिएम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।।
गीता १०८, श्लो० २८
"
गीता भ.७,
'.२६
-
येदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि यांसवः।
इन्द्रियाणां मनचास्मि भूतानामस्मि चेतना ।।
गीवा, भ. १०, श्लो. २२
त्रैगुण्यविषया वेदा-निबैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसवस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।।
गीवा, भ० २, सो० १५

दार्शनिक विचार
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ।।
गीता,
भलो."
.
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुप्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ।।
गीता, भ.", श्वो०४८
.
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ।।
+11.'' गीता, म., श्लो० ५३
--
M
-
यामिमां पुप्पितां वाचं, प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ।।
गीता, ०२ श्लोक ४२
(१०)
यापनार्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेपु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ।।
गीता, म. २, श्लो३ ५६

अष्टादशश्लोकी चेदगीता
(११, ):
यदा ते मोहकलिलं - बुद्धिर्व्यतितरिप्यति ।
तदा गन्तासि निर्येदं श्रोतव्यस्य श्रतस्य च ॥ :
गीता, भ० २, इलो० ५२
.
बहनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं चेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ।।
गीता, भ• ४,
श्लो०५
रसोऽहमप्पु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुपं नृषु ॥
गीता, भ०७, श्लो००
(१४ ).
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनश्च ।
वेदेव सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम् ॥.
गीता, म. १५, श्लो. १५
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि
चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुपोत्तमः॥
गीता, म० १५, एलो. 10

दार्शनिक विचार ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रमणसिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाय यनाथ पिहिताः पुरा । गीता, 80 10, लो. २१ (१७) आधर्यवत्पश्यति कधिदेन- माथर्यवद् वदति तथैव चान्यः । आवर्यवचनमन्यः शृणोति श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।। गीता, १० १, श्लोक २९ ऊर्ध्वमृलमधाशासमश्यत्यं माहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ गीता, म. 1५, श्लो.

वेदगीतार्थदीपिका (शारी (२) श्रीधरी तथा (३) भायाधबाघना । .२१ . वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुपः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ गीता, अ. श्लो. य एनं चेत्ति हन्तारं (गी० २. १९) इत्यनेन मन्त्रण हननक्रियायाः कर्ता कर्म च न भवतीति प्रतिज्ञाय न जायते" (गो० २. २०) इत्यनेनाविक्रियत्वे हेतुमुक्त्वा प्रतिज्ञातार्थमुप- संहरवि- (शाहरभाष्यम्) वेदाविनाशिनमिति-वेद विजानात्य- विनाशिनमत्यन्ताभावविकाररहितं नित्यं चिपरिणामरहितं यो घेदेति सम्बन्धः । एनं पूर्वेण मन्त्रेणोकलक्षणमजं जन्मरहितम- व्ययमपक्षयरहितं कथं केन प्रकारेण स विद्वान्पुरुषोऽधिकृतो इन्ति हननक्रियां करोति, कर्थ या घातयति हन्तारं प्रयोजयति। न फयश्चित्कञ्चिद्धन्ति न कञ्चित्कञ्चिद् धातयतीत्युभयत्रा- क्षेप एवार्थः, प्रश्नार्थासम्भवात् । हेत्वर्थस्य अविक्रियत्वस्य च तुल्यत्याद्विदुषःसर्वकर्मप्रतिषेध पर प्रफरणार्थोऽभिप्रेतो भगवतः। हन्तेस्त्वाक्षे उदाहरणार्थत्वेन कथितः। विदुषः कं फर्मा- सम्मवेहेतुविशेष. पश्यन्कर्माण्याक्षिपति भगवान् फयं सारुपपु - दार्शनिक विचार इति । ननूक्त एवात्मनोऽविमियत्वं सर्वकर्मासम्भयकारण विशेषः सत्यमुक्ता, न तु स कारणविशेषोऽन्यत्याद्विदुषोऽयिक्रियादा. त्मनः। हाबिक्रियं स्थाणु विदितवतः कर्म सम्भवतीति चेन, चिदुप आत्मस्यात्, न देहादिसहातस्य विद्वत्ता। अतः पारिशे. प्यादसंहत आत्मा विद्वानचिप्रिय इति तस्य विदुपः फर्मासम्म- घादाशेपो युक्तः-फयं स पुरुप इति । तथा युद्ध्याद्याहतस्य शब्दाद्यर्थस्या चिक्रिय एव सन् बुद्धिवृत्त्ययिवेकविमानेनाविद्ययो. पलब्धात्मा फल्प्यते. एवमेयात्मनात्मविवेकशानेन चुद्धिवृ. या विद्ययाऽसत्यरूपयैव परमार्थतोऽयिनिय पचात्मा विद्वानु- च्यते । बिदुपा कर्मासम्भववचनाद्यानि कर्माणि शास्त्रेण विधी- यन्ते, तान्यविदुप्पो विदितानीति भगवतो निश्चयोऽवगम्यते । ननु विद्याऽप्यविदुष एव विधीयते, विदितविद्यस्य पिटपेप. णयद्विद्याविधानानर्थक्यात् । तत्राविदुषः फर्माणि विधीयन्ते, न विदुप इति विशेपो नोपपद्यते इति चेन्न, अनुष्ठेयस्य भावाभा- यविशेपोपपत्तेः। यग्निहोनादिविध्यर्थशानोसरकालमग्निहोगा. दिकर्मानेकसाधनोपसंहारपूर्वकमनुष्ठ यं 'फर्ताऽहम्' 'मम कर्त- व्यम्' इत्येचंप्रकारकविज्ञानवतोऽचिदुपो यथाऽनुष्ठेयं भवति,न तु तथा, न जायत इत्याद्यात्मस्वरूपविध्यर्थशानोत्तरफालभाधि किञ्चिदनुष्ठेयं भवति । किन्तु 'नाहं फर्ता' 'नाहं मोक्का' इत्या- द्यात्मैकत्याकर्तृत्वादिविपयज्ञानादन्यत्रोत्पद्यत इत्येष विशेष उप- पद्यते । यः पुनः कर्ताऽहमिति घेत्त्यात्मानं तस्य ममेदं कर्त- व्यमित्या भाविनी युद्धिः स्यात्तदपेक्षया सोऽधिक्रियत इति तं प्रति फर्माणि सम्भवन्ति, स चाविद्वान् “उभौ तौ न विज्ञानीतः" [गी०२। १९] इति वचनात् । विशेपितस्य च विदुपः कर्माक्षेपवचनाच कथं पुरुष इति ।

वेदगीतार्थदीपिका तस्माद्विशेपितस्यायिक्रियात्मदर्शिनो विदुपो मुमुक्षोश्च सर्व- कर्मसंन्यास एवाधिकारः। अतएव भगवान्नारायणः साइख्या- विदुपोऽविदुपश्च कर्मिणः प्रविभज्य द्वे निष्ठे ग्राहयति-"ज्ञान. योगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेण योगिनाम्" [गी० ३.३] तथा च पुत्रायाऽह.भगवान् व्यासः-"द्वाविमावथ पन्थानौ" [म. भा, शान्तिप० २४० १६] इत्यादि। 3 तथा च क्रियापयश्चैव पुरस्तात्पश्चात्संन्यासश्चेति । एतमेव विभागं पुनः पुनदर्शयिष्यति भगवान् । अतत्स्यवित् "अहंका- रविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते" [गी० ३।२७] तत्त्ववित्तु नाहं करोमीति । तथा च "सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते" [गी०५।१३] इत्यादि। . तत्र केचित्पण्डितम्मन्या वदन्ति-जन्मादिपड्भावविक्रिया- रहितोऽविधियोऽकतैकोऽहमात्मेति न कस्यचिज्ज्ञानमुत्पद्यते यस्मिन्सति सर्वकर्मसन्याल उपदिश्यत इति, तन्न, "न जायते" इत्यादिशास्त्रोपदेशानर्थक्यप्रसङ्गात् । यथा च शास्त्रोपदेशसामर्थ्या- धर्माऽधर्मास्तित्वविज्ञानं कर्तुश्च देहान्तरसम्बन्धिविज्ञानं चोत्प- द्यते, तथा शास्त्रात्तस्यैवात्मनोऽविक्रियत्वाकर्तृकत्यैकत्वादिविज्ञानं कस्मानोत्पद्यत इति प्रष्टव्यास्ते। करणागोचरत्वादिति चेन्न, "मनसैवानुइएश्यम्" [वृ०४, ५, १९] इति श्रुतिः। शास्त्रा. चार्योपदेशशमदमादिसंस्कृतं मन आत्मदर्शने करणम् । तथा च तदधिगमायानुमाने आगमे च सति शानं नोत्पद्यत इति साहस- मात्रमेतत् । शानं चोत्पद्यमानं तद्विपरीतमझानमवश्यं याधत इत्यभ्युपगन्तव्यम् । तचाशानं दर्शितं हन्ताऽहं हतोऽस्मीति "उभौ तौ न विजानीतः"गी०२,१९] इति । अत्र चात्मनो हनन· -- १०२ दार्शनिक विचार फ्रियायाः फ त्वं फर्मत्वं हेतुक त्वं चाज्ञानतं दर्शितम् । तथ सर्व क्रियास्वपि समानम् , फत्वादेरविद्याकृत यमयिफियत्वादा- त्मनः । विक्रियायान् हि फर्ताऽत्मनः फर्मभूतमन्यं प्रयोजयति फुर्षिति । तदेतदपिशेषेण विदुपः सर्वक्रियासु फर्तुत्वं हेतुक त्वं च प्रतिपेधति भगवान् घासुदेवः विदुपः फर्माधिकाराभावप्रद. र्शनार्थ 'वेदाविनाशिन......"कथं स पुरुपः पार्थ' इत्यादिना। क पुनर्विदुषोऽधिकार इत्येतदुक्तं पूर्वमेव "सानयोगेन साङ्ख्या नाम्" [गी० ३,३] इति । तथा च सर्वकर्मसंन्यासं वक्ष्यति "सर्वकर्माणि मनसा" [गी०५, १३] इत्यादिना । ननु मनसेति वचनानयाचिकानां फायिकानां च संन्यास इति चेत, सर्वकर्माणीति विशेषितत्वात् । मानसानामेष सर्वकर्मणामि: ति चेन, मनोव्यापारपूर्वकत्याहाकायव्यापाराणां मनो व्यापारा- भावे तदनुपपत्तेः। शास्त्रीयाणां वाकायकर्मणां कारणानि मानसा- नि कर्माणि वर्जयिस्याऽन्यानि सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते इति चेन्न, “नेय कुर्वनकायरम्" गी०५,१३] इति विशेषणात् । सर्वकर्मसंन्यासोऽयं भगवतीको मरिष्यतो न जीवित इति चेन्न, नवद्वारे पुरे देही":"आस्ते [गी० ५,१३] इति विशेषणा. नुपपत्तेः।नहि सर्वधर्म संन्यासेन मृतस्य तदेह आसनं सम्भवति। अकुर्वतोऽकारयतश्च देहे संन्यस्येति सम्बन्धो न देह आस्त इति चेन्न, सर्वत्रात्मलोऽविक्रियत्वावधारणात् आसनफियाया- श्चाधिकरणापेक्षत्वात्तदनपेक्षत्वाच संन्यासस्य । सम्पूर्वस्तु न्यास- शब्दस्त्यागार्थो न निक्षेपार्थः। तस्माद् गीताशास्त्रे आत्म- ज्ञानवतः संन्यास एवाधिकारो न कर्मणि इति तत्र तत्रोपरिटा- दारमशानप्रकरणे दर्शयिष्यामः ॥२१॥ (श्रीघरीव्याख्या) वेदेति-नित्यं घृद्धिशून्यम् , अव्ययमप- .

चेदगीतार्थदीपिका . क्षयशून्यम् , अजमविनाशिनं च यो घेद स पुरुषः कं हन्ति कथा घा हन्ति, एवम्भूतस्य वधे साधनाभावात् । तथा स्वयं प्रयोजको भूत्वाऽन्येन कं घातयति । न कञ्चिदपि कश्चिदपीत्यर्थः । अनेन मय्यपि प्रयोजकत्वाद्दोपदृष्टिं मा काीरित्युकं भवति ॥ (भावार्थ योधिनी) वेदाविनाशिनं नित्यमिति-शास्त्र में वर्त- मानकालमें, जिससे पूर्वकी फर्मजाति मनमें और जातिकर्म भावमें आता है, उसका नाम चेद है। जैसे-शरीरके अन्दर मन चेद है। उसी तरह बनस्पतिके फलके अन्दर वीज .भी वेद है। कर्मधर्मका जाति के अनुसार भोग होकर वर्तमान शरीरका नाश होता है । भूतकालकी क्रिया फर्म और जातिले भविष्यमें फल और शरीर उत्पन्न होता है । यह बीज और मन नित्य है। फल व्यय है, तथा शरीर अनित्य है। जैसे-शरीरमें पुरुपही वेदपुरुप है, उसी प्रकार बीजमैं भी वेदपुरूप है । आमकी गुठली यो देने पर गुठलीरूपी शरीरका नाश होकर 'अंकुरसे फिर वही आम्रबीज प्रादुर्भूत होता है। यही चीजरूपी चेदपुरुष है । इसी- को समझना वाहिये । यही ऊपरके श्लोकसे कहा गया है। (२). वेदाह समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ।। गीता, भ० ७, श्लो. २१ यत एवमतः (शाङ्करमाष्यम्) वेदेति-अहन्तु वेद जाने समतीतानि - - १०४ दार्शनिक विचार समतिक्रान्तानि भूतानि, वर्तमानानि चार्जुन, भविष्याणि च भूतानि वेदाहम्, मां तु चेद न फश्चन, मद्भक्तं मच्छरणमेक मुफ्त्वा मत्सत्यवेदनाभावादेव न मां भजते ॥ २६ ॥ सर्वोत्तम मस्वरूपमजालन्त इत्युक्तम् - तदेव स्वस्य सर्वो. त्तमस्त्रमनावृतज्ञानशक्तित्वेन दर्शयन्नन्येषामज्ञानमेवाह- (श्रीधरीच्याख्या) वेदेति । समतीतानि बिनधानि वर्तमाः नानि भाषीनि च त्रिकालवर्तीनि भूतानि स्थावरजङ्गमानि सर्वाण्यहं वेद जानामि, मायाऽश्रयत्वान्मम तस्याः स्वाथयव्या- मोहकत्वामावादिति प्रसिद्धम् । मां तु न कोऽपि वेत्ति, मन्माया मोहितत्वात् । प्रसिद्धं हि लोके मायायाः स्वाश्रयाधीनत्वमन्य मोहकत्यं च ॥२६॥ (भावार्थवोधिनी) वाहं समतीतानीति-बीज अपनी जातिके स्वभावसे धीजके समान ही भार उत्पन्न करता है। और वर्तमान काल में जो भाव था यह भूत से आता है वही भविष्य में जाता है। यह सर्वत्र सम है। 1 वेदेषु यज्ञेषु तपासु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्यति तत्सर्वमिदं विदिस्या योगी परंस्थानमुपैति चाद्यम् ॥

चेदगीतार्थदीपिका शृणु तस्य योगस्य माहात्म्यम्- (शाङ्करभाष्यम् ) वेदेष्विति । वेदेषु सम्यगधीतेषु, यशेपु च साद्गुण्येनानुप्टितेषु तपःसु च सुतप्तेषु दानेषु च सम्यग्द- त्तेपु, एतेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टं शास्त्रेणात्येत्यतीत्य गच्छति तत्सर्वं फलजातम् , इदं चिदित्या सप्तप्रश्ननिर्णयद्वारेणोक्तमर्थ सम्यगवधार्यानुष्ठाय योगी परं प्रकृष्टमेश्वरं स्थानमुपैति च प्रतिपद्यते, आद्यमादौ भवम् , कारणं ब्रह्मेत्यर्थः ॥ २८ ॥ अध्यायार्थमष्टप्रश्नार्थनिर्णयं सफलमुपसंहरति- . (श्रीघरीव्याख्या).चेदेप्चिति । वेदेवध्ययनादिभिः, यशे- प्यनुष्ठानादिभिः, तपासु कायशोपणादिभिः, दानेषु सत्पात्रार्पणा- दिभिः, यत्पुण्यफलमुपदिष्टं शास्त्रेषु तत्सर्वमत्येति ततोऽपि श्रेष्ठ योगैश्वर्य प्राप्नोति किं कृत्वा । इदमष्टप्रश्नार्थनिर्णयेनोकं तत्त्वं विदित्वा ततश्च योगी शानी भूत्वा परमुत्कृष्टमाद्य जगन्मूलभूत- स्थानं विष्णोः परमं पदं प्राप्नोति ॥ २८॥ (भावार्थबोधिनी) वेदेषु यशेषु तपःसु चैव इति-वह यीजका अङ्कुर यज्ञ और तपसे बढ़कर वृक्ष यनता है। फिर यही पृथ्वीके रसको लेकर अपने स्वभावसे फल दिखाता है। यही सय वृक्षोंमें तथा, शरीरमें स्व-स्वभावके अनुकूल पूर्वके योगसे (जैसा बीजका स्वभाव था वैसा ही) वर्तमान में वृक्ष सथा शरीर धनता है।

२०६ दार्शनिक विचार (५). वेदानां सामवेदोऽसि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनचाणि भूतानामणि चेतना ॥ . गीता, अ० १०, श्लो. २१ (शाङ्करभाष्यम्) चेदानामिति-वेदानां मध्ये सामवेदों- ऽस्मि । देवानां रुद्रादित्यादीनां पासव इन्द्रोऽस्मि । इन्द्रियाणां मेकादशानां चक्षुरादीनां मनश्वास्मि सङ्कल्पविकल्पात्मकं मन- श्वासि । भूतानामस्मि चेतना कार्यकरणसङ्घाते नित्याऽभिव्यक्ता बुद्धिवृत्तिश्चेतना ॥ २२ ॥ (श्रीधरीव्याख्या) चेदानामिति- वासव इन्द्रः भूतानां सम्बन्धिनी चेतना शानशकिरहमस्मि ॥ २२ (भावार्थ बोधिनी) चेदानां सामवेदोऽस्मि इति वेदोंमें पूर्वकर्मसे सामवेद मैं हूँ । देवों में वलसे इन्द्र मैं हूँ। इन्द्रियोंमें मन मैं हूँ और माणियोंकी आत्मासे चेतन मैं हूँ । त्रैगुण्यविपया चेदा निस्वैगुण्यो भवार्जुन। : निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।। गीता, १०२,श्लो०.४५ चेदगीतार्थ दीपिका य एवं विवेकबुद्धिरहितास्तेषां कामात्मना यत्फलं वदाह- '. (शाङ्करभाष्यम् ) त्रैगुण्येति नैगुण्यविषयास्त्रैगुण्यं संसारो विपयः प्रकाशयितव्यो येषां ते वेदानेगुण्यविषयाः। त्यं तु निस्वैगुण्यो भवार्जुन निष्कामो भवेत्यर्थः । निर्द्वन्द्वः सुख दुःख-- हेतू सप्रतिपक्षौ पदार्थो द्वन्द्वशन्दवाच्यौ ततो निर्गतो निर्द्वन्दो भय । त्वं नित्यसरवस्थः सदासत्वगुणाश्रितो भव । तथा निर्योगक्षेमोऽनुपात्तस्योपादानं योगः, उपात्तस्य रक्षणं शेमः, योगक्षेमप्रधानस्य श्रेयसि प्रवृत्तिर्दुष्करेत्यतो निर्योगक्षेमो भव । आत्मवानप्रमत्तश्च भव । एप तवोपदेशः स्वधर्ममनुतिष्ठतः ॥४५॥ ननु च यदि स्वर्गादिक परमं फलं म भवति वर्हि किमिति वेदैस्तत्साधनदया कर्माणि विधीयन्ते तत्राह- - (श्रीधरीव्याख्या) धैगुण्यविपया इति । त्रिगुणात्मकाः सकामा येऽधिकारिणस्तद्विपयास्तेषां कर्मफलसम्बन्धप्रति- पादकाः वेदाः । त्वं तु निस्वैगुण्यो निष्कामो भंव। तत्रोपाय- माह निर्द्वन्द्वः सुखदुःखशीतोष्णादियुगलानि द्वन्द्वानि तद्रहितो भव । तानि सहस्वेत्यर्थः कथमित्यत्राह-नित्यसत्वस्थः सन् धैर्यमवलम्ब्येत्यर्थः । तथा निर्योगक्षेमः । अप्राप्तस्वीकारो योगः, प्राप्तपरिपालनं क्षेमस्तद्रहितः । आत्मवान् अप्रमत्तः। नहि छन्द्रा. कुलस्य योगक्षेमन्यापृतस्य च प्रमादिनस्वैगुण्यातिक्रमः सम्भव- तीति ॥४५॥ (भावार्थ योधिनी) त्रैगुण्यविषयावेदाः-घेद तीन गुणोंका

१०८
दार्शनिक विचार
विषय है। जैले कर्म, धर्म और फल । वेदमें पूर्वका कर्म है,
उसीके अनुकूल शरीर बनता है। शरीरके धर्मसे वाद्य वस्तुमें
प्रिय और यप्रिय बोध होकर फलका भोग होता है। वही सामने
माता है और कर्तव्य बनता है। उसी क्रियाको करना चाहिये।
प्रिय और अप्रियको समझकर कर्तव्यका त्याग न करना चाहिये।
यदक्षरं वेदविदो बदन्ति विशन्ति यद्यतयो बीतारागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत् पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ।।
गी. अ.८,श्लो."
पुनरपि वश्यमाणेनोपायेन प्रतिपित्सितस्य ब्रह्मणो वेदवि.
द्वदनादिविशेषणविशेष्याभिधानं करोति भगवान--
(शाङ्करभाष्यम् ) यदिति । यदक्षरं नक्षरतीत्यक्षरमधिनाशि
चेदविदो वेदार्थ ज्ञा वदन्ति “तद्वा एतदक्षरं गानि ब्राह्मणा अभिव.
दन्ति" [वृ. ३. ८. ८] इति श्रुतेः । सर्च विशेपनिवर्तफ-
त्येनाभिवदन्ति "मस्थूलमनणु" [.३. ८.८] इत्यादि । किंच
विशन्ति प्रविशन्ति सम्यग्दर्शनमाप्तौ सत्यां यद्यतयो यतनशीला
संन्यासिनो वीतरागा चीतो विगतो रागो येभ्यस्ते पीतरागाः।
यद्याक्षरमिच्छन्तो शामिति वाक्यशेषः, ब्रह्मचर्य गुणै चरन्ति
आचरन्ति तत्ते पदं तदक्षराख्यं पदं पदनीयं ते तुभ्यं स अ ण
सम्प्रदः सोपस्तेन सषक्षेपेण प्रवक्ष्ये कथयिप्यामि ॥११॥

घेदगीतार्थदीपिका केवलादभ्यासयोगादपि प्रणवाधारमभ्यासमन्तख विधि- सुः प्रतिजानी । (श्रीधरीव्याख्या) यदक्षरमिति । यदक्षर वेदान्तहा वदन्ति "पतस्य चाक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ ति- प्टतः" इति श्रुतेः । चीतो रागो येभ्यस्ते वीतरागा यतयः प्रयत्न. यन्तो यद्विशन्ति । यश सातुमिच्छन्तो गुरुकुले ब्रह्मचर्य चरन्ति । तत्ते तुभ्यं पदं पद्यते गम्यते इति पदं प्राप्यं सह ग्रहेण सह क्षेपेण प्रवक्ष्ये वत्प्राप्त्युपायं, कथयिष्यामीत्यर्थः ॥ १९ ॥ (भावार्थयोधिनी) यदक्षरं वेदचिदो बदन्ति । वर्तमान शरीर में (अक्षरमन ) पूर्व के फार्मसे वेद है। यही बोलता है, और घही सुनता है । विषयको पीतराग होफर देखता है। पूर्व में घालमें जैसा भाचार धारण किया है, पैसाही करता है, और फराता है। , (७) न वेदयज्ञाध्ययनर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुनः। एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुपचीर ।। गीता, भ. 11,इलो०१८ . आत्मनो मम रूपदर्शनेन वार्य एष त्वं संवृत · इति सत्स्वोति- - दार्शनिक विचार (शाङ्करभाष्यम् ) न वेदेति । न चेदयक्षाध्ययनैः चतुर्णामपि वेदानामध्ययनैर्यथावद्याध्ययनैश्च, वेदाध्ययनै रेव यशाध्ययनस्य सिद्धत्वात्पृथग्यज्ञाध्ययनग्रहणं यशविज्ञानोपलक्षणार्थम्, तथा न दानस्तुलापुरुषादिभिः न च क्रियाभिरग्निहोत्रादिभिः श्रौतादिभिः नापि तपोभिरुश्चान्द्रायणादिमिरुन घरी एवंरूपो यथादर्शितं विश्वरूपं यस्य सोऽहमेवंरूपः न शक्योऽहं नृलोके मनुष्यलोके द्रष्टुं त्वदन्येन त्वत्तोऽन्येन कुरुप्रवीर ॥ ५८n . एतद्दर्शनमतिदुर्लभं लब्ध्वा त्वं कृतार्थोऽसीत्याह- (श्रीधरीव्याख्या) नेति-वेदाध्ययनातिरेकेण यशाध्ययन- स्याभावात् यशशब्देन यक्षविद्याः कल्पसूत्राद्या लक्ष्यन्ते, वेदानां यज्ञविद्यानां चाध्ययनैरित्यर्थः । न च दानैर्न च क्रियाभिरग्निहो; प्रादिभिर्न चोस्तपोभिश्चान्द्रायणादिभिरेवंरूपोऽहं, त्वदन्येन मनुष्यलोके द्रष्टुं शक्यः। अपि तु त्वमेव केवलं मत्प्रसादेन दृष्ट्वा कृतार्थोऽसि ॥४८॥ (भावार्थ योधिनी ) न वेदयज्ञांध्ययनै दनैरिति-शरीरमें मन और भाव ये दो हैं । भाव तो सामने के विषय को देखता है, और मन भावके देखे हुए विषय को अपनेमें रखता है । भूतफालफी वस्तु को मन जानता है, भाव नहीं जानता । भविष्यमें भूतकालकी बात कहता है। इससे भावका सम्बोधन करके मन कहता है कि-किये हुए कर्मको तुम नहीं जानते, मैं जानता हूँ।

वेदगीतार्थदीपिका --- नाहं वैदैन तपसा न दानेन न चेड्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ।। गी० म: ११, श्लो०.६ . फरमात्- . (शाङ्करभाष्यम्) नाहमिति। नाहं वेदै ग्यजुःसामाथर्व- घेदैश्चतुर्भिरपि न तपसोगेण चान्द्रायणादिना, न दानेन गोभू- हिरण्यादिना, न चेज्यया यरून पूजया या शक्य एवंविधो यथा- दर्शितप्रकारो द्रष्टुंदृष्टवानसि मां यथा त्वम् ॥ ५३॥ वन हेतुः (श्रीधरीव्याख्या) नाहमिति-स्पष्टार्थः ॥ ५३ ॥ (भावार्थबोधिनी) नाहं घेदैर्न तपसा इति । शरीर में मन कहता है कि भूतकालका विषय तुम्हारे सामने आता है, पर उसे तुम नहीं जानते, मैं उसका रूप और गुण जानता हूँ। 1. ." यामिमां पुप्पिां वाचं प्रबदन्त्यविपश्चितः। चेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ गीता, भ० २,श्लो० ४१ दार्शनिक विचार येषां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्नास्ति ते-- .. (शाङ्करभाष्यम् ) यामिति-यामिमां वक्ष्यमाणां पुप्पितां पुप्पितवृक्ष इव शोभमानां श्रयमाणरमणीयां वाचं वाक्यलक्षणां प्रवदन्ति । के? अविपश्चितोऽल्पमेधसोऽविवेकिन इत्यर्थः। घेदवादरता वदर्थवादफलसाधनप्रकाशकेपु वेदवाक्येपुरताः, हे पार्थ ! नान्यत् स्वर्गपश्वादिफलसाधनेभ्यः कर्मभ्योऽस्तीत्येवं- वादिनो वदनशीलाः ॥४२॥ ननु कामिनोऽपि कष्टान्कामान्विहाय व्यवसायास्मिकामेव बुद्धि किं न कुर्वन्ति तत्राइ- (श्रीधरीव्याख्या) यामिति-पुष्पितां पुष्पितविपलता. बदापातरमणीयां प्रकृष्टां परमार्थ फलपरामेघ वदन्ति वाचं स्वर्गा- दिफलश्रुति ये तेषां तया वाचाऽपहृतचेतसां व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधो न विधीयत इति तृतीयेनान्वयः । 'किमिति तथा वदन्ति यतोऽविपश्चितो मूढाः। तत्र हेतुः-वेदे ये वादा अर्थ- वादाः "अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्याजिनः सुकृतं भवति" "अपाम सोमममृता अभूम" इत्याद्यास्तप्वेष रताः प्रीताः । अतपय अतः परमन्यदीश्वरसत्वं प्राप्य नास्तीति वदनशीला:॥ ४२ ॥ (भावार्थवोधिनी) यामिमां पुष्पिता चाचमिति-वर्तमान शरीर में पूर्वके कर्मका ज्ञान और शब्द पुप्प की जगह है, और उससे फल विषय होता है। और वह दूसरे शरीरका चेदगीतार्थदीपिका ११३ विश्य होता है। इसलिये वह अपने वेदके फलमें रत है। वही फलको विषय फरके भोगता है, और दूसरे विषयका चाद करता है। (१०) यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ।। गीता, १० २, श्लो०४६ सर्वेषु वेदोकेसु फर्मसु यान्युक्तान्यनन्वानि फलानि तानि नापेक्ष्यन्ते चेकिमर्थ वानीश्वरायेत्यनुष्टीयन्त इति उच्यते शृणु- (शाङ्करमाप्यम् ) यावानिति । यथा लोके पतडागाधने- फस्मिन्नुदपाने परिच्छिन्नोदके यावान् यावत्परिमाणःस्नानानपाना- दिरयः फलं प्रयोजनं स सर्कोऽर्थः सर्वतः संप्लुतोदकेऽपि तावा- नेव सम्पद्यते तत्रान्तर्मयतीत्यर्थः । एवं तावांस्तावत्परिमाण एव सम्पद्यते सर्वेपु वेदेषु वेदोक्तेपु कर्मसु योऽर्थो यत्कर्मफलं सोऽर्थी ब्राह्मणस्य संन्यासिनः परमार्थतवं विजानतो योऽर्थो यद्वि- मानफलं सर्वतः सम्प्लुतोदकस्थानीय तस्मिंस्तावानेव सम्पद्यते तयान्तर्मयतीत्यर्थः। “यथा कृताय विजितायाघरेयाः संयन्त्ये- चमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किच प्रजाः साधु फुर्वन्ति यस्तद् वेद यरस येद"[छां० ४, १, ४] इति श्रुतेः, "सर्वे कर्माखिलम्" [गी० ४, ३३] इति च वक्ष्यति । तस्मात्प्राग्ज्ञाननिष्ठा- धिकारप्राप्तेः कर्मण्यधिकृतेन कृपतडागाद्यर्पस्थानीयमपि फर्म कर्तव्यम् ॥ ४६॥ - दार्शनिक विचार ननु वेदोक्तनानाफलपरित्यागेन निष्कामतयेश्वराराधनवि. पया व्ययसायात्मिकावुद्धिस्तु कुबुद्धिरेवेत्याशङ्कयाऽह- (श्रीधरीच्याख्या) यावानिति । उदकं पीयतेऽस्मिन्ति त्युदपानं वापीकूपतडागादि तस्मिन् स्वल्पोदके एकत्र कृत्स्नस्या र्थस्याभावात्तत्र तत्र परिभ्रमणेन विमागशो यावान्स्नान- पानादिरर्थः प्रयोजनं भवति, तायन्सोऽप्यर्थः सर्वतः सम्प्लुतोदके महादे एकत्रैव यथा भवति, एवं यावान्सर्वेषु चेदेपु तत्तत्कर्मफलरूपोऽर्थस्तावासोऽपि विजानतो ध्यवसा- यात्मकयुद्धियुक्तस्य ब्राह्मणस्य ब्रह्मनिष्ठस्य भवत्येव, ब्रह्माऽनन्दे क्षुद्राऽनन्दानामन्तर्भूतत्वात् "एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति" इति श्रुतेः । तस्मादियमेव बुद्धिः सुथुद्धि- रित्यर्थः॥ ४६॥ (भावार्थ घोधिनी) यावानर्थ उद्पाने। यावान् यानी संसारमें सारा विपय जगत्के अनुकूल ( अर्थ ) होता है। प्रत्येक शरीरमें पूर्व संस्कारके अनुकूल वह वेद रहता है। घही ब्राह्मण है और यही जानता है। वर्तमानमें संसार एक समुद्रकी तरह है। पुरुष कूपकी जगह है, और स्त्री यापीकी । पुरुषका कार्य त्याग कर्म है, और स्त्रीका कार्य ग्रहण करना है 1 कप अपने जलको ऊपरसे ग्रहण करनेवालोंके लिए त्याग करता है । चावड़ी ऊपरसे मेधका तथा भीतरसे कूपको, भी जल ग्रहण करती है। समुद्रका कार्यसवकीपरस्पर सहायता फरना है। इसी दृष्टान्तके अनुसार पुरुष और स्त्रोका व्यवहार है। जगह वेदगीतार्थदीपिका १९५ प्राप्स्यत यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ गीता, म०२, श्लो० ५१ .योगानुष्ठानन नितसत्वशुद्धिजा बुद्धिः कदा इत्युच्यते- (शाङ्करभाष्यम्) यदेति । यदा यस्मिन्काले ते तव मोह- कलिलं मोहात्मकमविवेकरूपं कालुप्यं येनात्मानात्मविवेकयोधं फलुपीकृत्य विषयं प्रत्यन्तःकरणं प्रवर्तते तत्तव बुद्धिय॑तितरि- प्यति व्यतिमामिप्यति अतिशुद्धभावमापत्स्यत इत्यर्थः। तदा तस्मिन् काले गन्ताऽसि प्राप्स्यसि निर्वदं चैराग्यं श्रोतन्यस्य श्रुतस्य च, तदा श्रोतव्यं श्रुतं च ते निष्फलं प्रतिपद्यत इत्यभि- प्रायः॥५२॥ फदा वत्पदमई प्राप्स्यामीत्यपेक्षायामाह- (श्रीधरीव्याख्या)यदेति द्वाभ्याम् । मोहो देवादिप्यात्म- चुद्धिः तदेय कलिलम् । “कलिलं गहनं विदुः" इत्यभिधानकोश. स्मृतेः । ततश्चायमर्थ:-एवं परमेश्वराराधने क्रियमाणे यदा तत्प्रसादेन तव बुद्धिदेहाभिमानलक्षणं मोहमयं गहनं दुगै विशेपे- णाति तरिष्यति तदा श्रीतम्यस्य श्रुतस्य चार्थस्य निर्वेदं पैराग्यं गन्तासि प्राप्स्यसि । तयोरनुपादेयत्वेन जिज्ञासां न फरिप्य- सीत्यर्थः ॥५२॥ (भायार्थयोधिनी) यदा ते मोहकलिलमिति.। शरीर के मायमें मोह है। संसाररूपी पन गहन है इसलिए यह अपने ।

दार्शनिक विचार
प्रयोजनकी वस्तु पहिचान नहीं सकता ( अर्थात् सुन नहीं
सकता और सुने विना देख नहीं सकता)। जय आत्मा बुद्धिमें
निश्चय करावेगा तय प्रयोजन सिद्ध होता है। वह पूर्वके कर्मसे
आत्मबुद्धिश्रुतिद्वारा निश्चय करने पर अपने प्रयोजनके अनुसार
उस गहन वनको पार करता है।
( २ )
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं चेत्थ परन्तप ।।
गीता, भ.
इलो
या वासुदेवेऽनीश्वरासर्वज्ञाशका मुर्खाणां तां परिहरन्त्री-
भगवानुवाच यदर्थो बर्जुनस्य प्रश्नः-
(शाङ्करभाष्यम् ) यहूनीति । वहूनि मे मम व्यतीतान्यति-
मान्ताति जन्मानि तव च हे अर्जुन । तान्यहं वेद जाने सर्वाणि
न त्वं वेत्थ न जानीये धर्माधर्मादिप्रतिवद्धशानशक्तित्वात् । अहं
पुनर्नित्यशुद्धयुद्धमुक्तस्वभावत्यादनाचरणज्ञानशक्तिरिति चेदाह हे
परन्तप ॥५॥
इति पृष्टवन्तमर्जुनं रूपान्तरेणोपदिष्टवानित्यभिप्रायेणोच-
रम-श्रीभगवानुवाच ।
(श्रीघरीव्याख्या) यनीति । मम यहूनि जन्मानि तव च
व्यतीतानि । तानि साण्यहं वेद जानामि, अलुसविद्याशक्ति-
त्वात् [त्वं तुन चेत्य न जानासि, अघिद्यावृतत्वात् ॥५॥

घेदगीतार्थदीपिका (भावार्थबोधिनी) यहूनि मे व्यतीतानीति-शरीरमें ग्रहण करनेवाली ज्ञानेन्द्रिय हैं, और त्यागकर्म करनेवाली कर्मेन्द्रिय हैं। इनको ही भावशब्द से कहा गया है। यह भाव वर्तमान- कालका योधक है। और मन भूत और भविष्यत् का योधक है। वह भावके द्वारा वर्तमानका शान करता है। भूतकालिक- शान चित्त द्वारा होता है। मन नित्य है और भाव अनित्य है। दोनों इस शरीरमें हैं। और मन दूसरा शरीर बनाता है। यह कर्मरूपी वेद मन है । यही यात इस श्लोकसे ध्वनित है। (१३) रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृपु ।। गीता, भ० ७, श्लो०८ केन केन धर्मेण विशिष्टे स्वयि सर्वमिदं प्रोतमित्युच्यते- (शाङ्करभाष्यम् ) रस इति । रसोऽहमपां यः सारः स रसस्तस्मितसंभूते मय्यापः प्रोता इत्यर्थः । एवं सर्वत्र । यथाऽ हमप्सु रसः, एवं प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणव ओंकारा सर्व- चेदेपु, तस्मिन् प्रणवभूते मयि सर्वे चेदाःप्रोताः। तया खे आकाशे शब्दः सारभूतः, तस्मिन् मयि खं प्रोतम् : तथा पौरुपं पुरु- पस्य भावो पौरुपं यतः पुवुद्धिपु, तस्मिन्मयि पुरुषाः प्रोताः ॥८॥ जगत: स्थितिहेतुत्वं प्रपञ्चयति- (श्रीधरीव्याख्या) रसोऽहमिति पञ्चभिः ।, अप्सु रसोऽ हम् । रसतन्मात्ररूपया विभूत्या तदाश्रयचेनाप्सु स्थितोऽहमि. त्यर्थः । तथा शशिसूर्ययोः प्रभास्मि चन्द च प्रकाशरूपया दार्शनिक विचार विभूत्या तदाश्रयत्वेन स्थितोऽहमित्यर्थः । एवमुत्तरत्रापि द्रष्ट- व्यम् । सर्चेपु वेदेषु वैखरीरूपेषु तन्मूलभूतः प्रणव ओंकारोs स्मि । खे आकाशे शब्दतन्मात्ररूपोऽस्मि । नृपु पुरुषेषु पौरुप- मुद्यमोऽस्मि । उद्यमे हि पुरुषास्तिष्ठन्ति ॥८॥ (भावार्थबोधिनी) रसोऽहमसु कौन्तेय-आत्मा (अहम्) 'रूप, ब्रह्म "रस" स्वरूप, और पुरुप “विपय स्वरूप है। शरीरकर्म के भेदसे मन और प्राण पूर्वकर्मफे स्वरूपसे रस चनकर शरीरका धारण और प्रकाश करता है। वह बेदमें ओंकार और प्रणव है। वही शब्द सुनता है और यही पुरुषः विशेपसे अर्थ भोगता है। (१४) सर्वस्य चाहं हुदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिनिमपोहनं च । वेदैश्च सयैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेय चाहम् ।। गीता, भ. १५. श्लो. १५ किन्च- (शाकरभाष्यम्) सर्वस्येति । सर्वस्य प्राणिजातस्योहमात्मा सन् हदि युद्धौ संनिविष्टः । अनी मत्त आत्मनः सर्वप्राणिनां स्मृतिर्शनं तपोहनम् अपगमनंच। येषां यथा पुण्यकर्म गां पुण्य- फर्मानुरोधेन भानस्मृती भवतः, तथा पापकर्मणां पापकर्मानु- रुपेण स्मृतिमानयोरपोदनंच अपायनमपगमनं च । दैश्च सवर- चेदगीतार्थदीपिका हमेव परमात्मा वेद्यो वेदितव्यः । वेदान्तकद्वेदान्तार्थसम्प्रदाय- कृदित्यर्थः । वेदविद्वेदार्थविदेव चाहम् ॥ १५ ॥ किम्व- - (थीधरीव्याख्या) सर्वस्येति । सर्वस्य प्राणिजातस्य हृदि सम्यगन्तर्यामिरूपेण प्रविष्टोऽहम् । अतश्च मत्त एव हेतोः प्राणिमात्रस्य पूर्वानुभूतार्थविषया स्मृतिर्भवति । ज्ञानं च विषये. न्द्रिसंप्रयोगजं भवति । अपोहनं च तयोः प्रमोपो भवति । वेदैश्च सर्वंत्तत्तद्देवतादिरूपेणाइमेव वेद्यः। घेदान्तकृत्तत्सम्प्रदाय- प्रवर्तकश्च शानदो गुरुरहमित्यर्थः। वेदविदेव च वेदार्थविद्- हमेव ॥ १५॥ (भावार्थ वोधिनी) सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट इति-. सय शरीरों में जठराग्निके योग से प्राण होकर (जड़ और चेतन- के) हृदयमें चकर्मका मत लेकर वर्तमान में पूर्वानुभूतकी स्मृति करता है । यह सब वेदों में रहकर चेदना करता है। पूर्वकर्मका भोग भोगफर उसका क्षय होता है, और आगेकी उत्पत्ति करता है। इसीसे शरीर को नाम वेदान्त है। । यसाक्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽसि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ गीता, भ० १५, श्लोक १० १२० दार्शनिक विचार यथा व्याख्यातस्येश्वरस्य पुरुषोत्तम इत्येतनाम प्रसिद्धम् । तस्य नाम निर्वचनप्रसिद्धपा अर्थवत्त्वं नानो दर्शयन् निरति इयोऽहमीश्वर इत्यात्मानं दर्शयति भगवान्- (शाङ्करभाष्यम् ) यस्लादिति । यस्मात्क्षरमतीतोऽहं संसार- मायावृक्षमश्वत्थारव्यमतिकान्तोऽहमक्षरादपि संसारमायावृक्षः वीजभूतादपि चोत्तमः उत्कृष्टतमः उर्घतमो वा, अतः ताभ्यां क्षरोक्षराभ्यामुत्तमत्वादस्मि लोके वेदे च प्रथितः प्रख्यातः । पुरुपोत्तम इत्येवं मां भक्तजना विदुः। कवयः फान्यादिपु च इदं नाम नियध्नन्ति, पुरुषोत्तम इत्यनेनाभिधानेनाभि- गृणन्ति ॥ १८॥ एवंभूतं पुरुषोचमत्वमात्मनो नाम निर्वचनेन दर्शयति- (श्रीधरीव्याख्या) यस्मादिति । यस्मात्क्षरं जडवर्गमति- क्रान्तोऽहं नित्यमुक्तत्वात् । अक्षराञ्चतनवर्गादप्युत्तमश्च निय- न्तृत्वात् । अतो लोके वेदे च पुरुषोत्तमः इति प्रथितः प्रख्यातो- ऽस्मि । तथा च श्रुतिः-स वा अयमात्मा सर्वस्व वशी सर्यस्य शानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति' इत्यादिः ॥ १८ ॥ (भावार्थवोधिनी) यस्मात्क्षरमतीतोऽहमिति इसलिए नाशको छोड़फर और पुरुषार्थको धारणकर लोक तथा वेदमें में पुरुपोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ। ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ गीता, अ० १७, . वेदगीतार्थदीपिका १२१ यज्ञदानतप:प्रभृतीनां साद्गुण्यकरणायायमुपदेश उच्यते- (शाङ्करभाप्यम् ) ॐ इति । ॐ तत्सत् इत्येवं निर्देशो, निर्दिश्यतेऽनेनेति निर्देशः, त्रिविधो नामनिर्देशो ब्रह्मणः स्मृतश्चि न्तितो चेदान्तेपुब्रह्मविद्भिः। ब्राह्मणस्तेन निर्देशेन विविधेन चेदाश्च यशाश्च विहिता निर्मिताः पुरा पूर्वमिति निर्देशस्तुत्यर्थ- मुच्यते ॥२३॥ ननु चैवं विचार्यमाणे सर्वमपि यज्ञतपोदानादि राजसताम- सप्रायमेवेति व्यर्थो यज्ञादिप्रयास इत्याशङ्कय तथाविधस्यापि सात्विकत्वापादनप्रकारं दर्शयितुमाह- (श्रीधरीव्याख्या) ओमिति । ॐ तत्सदित्येवं त्रिविधो ब्रह्मणः परमात्मनो निर्देशो नाम व्यपदेशःस्मृतः शिरैः । तत्र तावत् 'ओमिति विवृद्ब्रह्म' इत्यादिश्रुतिप्रसिद्ध रोमिति ब्रह्मणो नाम, जगत्कारणत्वेनातिप्रसिद्धत्वात् , अविदुषां परोक्षत्वाञ्च । तच्छब्दोऽपि ब्रह्मणो नाम । परमार्थसत्वसाधुत्वप्रशस्तत्वादिभिः सच्छन्दो ब्रह्मणो नाम 'सदेव सोम्येदमन आसीत्' इत्यादि श्रुतेः । अयं त्रिविधोऽपि नामनिर्देशो विगुणमपि सगुणकर्तु समर्थ इत्याशयेन स्तौति । तेन त्रिविधेन ब्रह्मणो निर्देशेन ब्राह्म- णाश्च वेदाश्च यज्ञाश्च पूर्व सृष्टयादी विहिताः विधात्रा निर्मिताः सगुणीकृता वा । यद्वा यस्यायं त्रिविधो निर्देशस्तेन परमात्मना ब्राह्मणादयः पवित्रतमाः समाः। तस्मात्तस्यायं विविधो निर्देशोऽतिप्रशस्त इत्यर्थः ॥२३॥ (भावार्थबोधिनी) ॐ तत्सदिति-भूतकालके निर्देशले धर्तमानका शरीर है। उसकी विधिको ज्ञानरूपी ब्राह्मण सरण करता है। उसी वेदले ब्राह्मण यज्ञपुरीको अनुकूल चलाता है ।

૬૨૨ दार्शनिक विचार आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्धः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।। गीता, अ० २, श्लो० २९ दुर्विज्ञेयोऽयं प्रकृत आत्मा किं त्वामेवैकमुपालभे साधारणे भ्रान्तिनिमित्ते । कथं दुर्विज्ञ योऽयमात्मेत्यत आह--- (शाङ्करभाष्यम्) आश्चर्यवदिति। आश्चर्यवदाश्चर्यमदृष्ट- पूर्वमद्भुतमकस्माद् दृश्यमाणं तेन तुल्यमाश्चर्यवदाश्चर्यमिवैन- मात्मानं पश्यति कश्चित् । आश्चर्यवदेनं वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति । श्रुत्वा दृष्ट्वोक्त्वाप्येनं आत्मानं वेद न चैव कश्चित् । अथवा योऽयमात्मानं पश्यति स आश्चर्यतुल्यो यो वदति यश्च ऋणोति सोऽनेकसहस्त्रेपु कश्चिदेव भवति । अतो दुर्बोध आत्मेत्यभिप्रायः ॥२९॥ फुतस्तर्हि विद्वांसोऽपि लोके शोचन्ति, आत्मा ज्ञानादेवेत्या- शयेनात्मनो दुर्विज्ञेयतामाह-- (श्रीधरीन्याख्या) आश्चर्यवदिति । कश्चिदेनमात्मानं शास्त्राचार्योपदेशाभ्यां पश्यन्नाश्चर्यवत्पश्यति । सर्वगतस्य नित्य- धानानन्दस्वभावस्यात्मनोऽलौकिकत्वादैन्द्रजालिकवघटमानं पश्यन्निव विसयेन पश्यति असम्भावनाभिभूतत्वात् । तथा आश्च- १२३ वेदगीतार्थ दीपिका र्यवदन्यो घदतिं च । शृणोति चान्यः। कश्चित्पुनर्चिपरीतभाव- नाभिभूतः श्रुत्वापि नैष चेद। चशदादुपत्यापि दृष्ट्वापि न सभ्यर देति द्रष्टव्यम् ॥२९॥ (भावार्थ योधिनी) आश्चर्यचदिति-शरीरमें पूर्वकर्मका ज्ञान चित्तमें रहता है। उसका नाम वेद है। वर्तमान शरीरमें विषयका ज्ञान होने से गुणका ज्ञान नहीं होता। इसलिए वोलगे, सुनने में और देखने में आश्चर्य करता है। शरीरोंके भेदसे ही आश्चर्य है। (१८) । श्रीभगवानुवाच- ऊर्ध्वमूलमघःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ।। - गीता,भ. १५, श्लो० १ यस्मात् मदधोनं कर्मिणां कर्मफलं ज्ञानिनां च ज्ञानफलं,. अंतो भक्तियोगेन मां ये सेवन्ते ते मत्प्रसादाज्ज्ञानप्राप्तिक्रमेण गुणा. वीता मोक्षं गच्छन्ति । किमु वक्तव्यमात्मनस्तत्वमेव सम्यग्विं- जानन्त ईत्यतो भगवान् अर्जुनेनापृष्टोऽपि आत्मनस्तत्त्वं विवक्षु- रुवाच । अर्ध्वमूलमित्यादिना तंत्र तांववृक्षरूपककल्पनया वैरा-- यहेतोः संसारस्वरूपं वर्णयति । विरकस्य हि संसाराद्भगवत्त- स्वज्ञानेऽधिकारो नान्यस्येवि- - - १२४ दार्शनिक विचार (शाङ्करभाष्यम् ) ऊर्ध्वमूलमिति । ऊर्ध्वमूलं कालतः सूक्ष्मत्वात्कारणत्वाग्नित्यत्वान्महत्वाञ्चोर्ध्वम् ब्रह्मउच्यते अन्यक्कं मायाशक्तिमत् , तन्मूलमस्योति सोऽयं संसारवृक्ष ऊर्ध्वमूलः । श्रु तेश्च-"ऊर्चमूलोऽवाक्शाखः एपोऽश्यत्यः सनातनः" [फ६, १] इति । पुण्णे च- .. "अव्यक्तमूलमभवस्तस्यैवानुग्रहोच्छ्रितः धुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः ॥ महाभूतविशाखश्च विपयैः पनवांस्तथा । धर्माधर्मसुपुप्पश्च सुखदुःखफलोदयः ॥ आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः । पतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्मा चरति नित्यशः ॥ एतच्छित्त्वा च भित्त्वा व ज्ञानेन परमासिना। ततश्चात्मरति प्राप्य तस्मान्नावर्तते पुनः।" [म० भा० अश्व० ४७, १२,१५] इत्यादि । तमूर्ध्वमूलं संसारं मायामयं वृक्षमध शाखं महदहकारतन्मात्रादयः शाखा इचास्याधो भवन्तीति सोऽयमधशास्त्रस्तमधःशाखं, न श्वोऽपि स्थाता इत्यश्वत्थस्तं क्षणप्रध्वंसिनमश्वत्यं प्राहुः कथयन्ति अव्ययं संसारमायायाः अनादिकालप्रवृत्तत्वात्लोऽयं संसारवृक्षोऽव्ययो अनाद्यनन्त देहादिसंतानाश्रयो हि सुप्रसिद्धः, तमव्ययम् । तस्यैव संसारवृक्षस्येदमन्यद्विशेपर्ण छन्दांसि यस्य पर्णानि छादनात् ऋग्यजुःसामलक्षणानि यस्यसंसारवृक्षस्य पनीय पर्णनि यथा वेदगीतार्थदीपिका १२५ वृक्षस्य परिरक्षणार्थानि, पर्णानि, तथा चेदाः संसारवृक्षपरिर. क्षणार्थाः, धर्मतहेतुफलप्रदर्शनार्थत्वात् । यथा व्याख्यातं संसारवृक्षं समूलं यस्तं वेद स वेदवित् वेदार्थविदित्यर्थः। नहि समूलात् संसारवृक्षादस्माशेयोऽन्योऽणुमानोऽप्यवशिष्टोऽ स्त्यतः सर्वज्ञः सर्ववेदार्थविदिति समूलसंसारवृक्षशानंस्तौति॥१॥ पूर्वाध्यायान्ते 'मां च योऽव्यभिचारेण भकियोगेन सेवते' इत्यादिना परमेश्वरमेकान्तभक्त्या भजतस्तत्प्रसादलब्धज्ञानेन ब्रह्मभावो भवतीत्युक्तम्, नचैकान्तभक्तिर्ज्ञानं वाऽविरक्तस्य संभ- वतीति वैराग्यपूर्वकं ज्ञानमुपदेष्टुकामः प्रथमं तावत्सार्धश्लो- काभ्यां संसारस्वरूपं वृक्षरूपकालङ्कारेण वर्णयन्- ( श्रीधरीव्याख्या ) ऊर्ध्वमूलमिति। ऊर्ध्वमुत्तमं क्षरा- क्षराभ्यामुत्कृष्टः पुरुषोत्तमो मूलं यस्य तम् । अध इति ततोऽर्चा- चीना कार्योपाधयो हिरण्यगर्भादयो गृह्यन्ते । ते तु शाखा इव शाखा यस्य तम् । विनश्वरत्वेन श्वःप्रभातपर्यन्तमपि न स्थास्य- तीति विश्वासानहत्वादभ्वत्थ प्राहुः। प्रवाहरूपेणापिच्छेदा. व्ययं च प्राहुः । ऊर्ध्वमूलोऽक्शिाखः एषोऽश्वत्थः सनातनः' इत्याद्याः श्रुतयः । छन्दांसि चेदाः यस्य पर्णानि धर्माधर्मप्रति- पादनद्वारेण छायास्थानीयैः कर्मफलैः संसारवृक्षस्य सर्वजीवा- श्रयणीयत्वापादनात्पर्णस्थानीया वेदाः । यस्तमेवंभूतमश्वत्थं घेद स एव वेदार्थवित् । संसारवृक्षस्य मूलमीश्वरः श्रीनारायणः । ब्रह्मादयस्तदंशाः शाखास्थानीयाः । स च संसारवृक्षो विनश्वरः १२६ दार्शनिक विचार प्रवाहरूपेण नित्यश्च । वेदोक्तः कर्मभिः सेव्यतामापादित- श्चेत्येतावानेव दिवेदार्थः अतएव विद्वान् वेदवित् इति स्तूयते। (भावार्थयोधिनी) ऊर्ध्वमूलमिति-संसारवृक्षका दृष्टान्त सब शरीरों में समझना चाहिये। शरीरमें अमूल शिर है। और शास्त्रा पाद है। पूर्वका कर्म अश्वत्थरूप अव्यय है। काँसे प्राणोंका छन्द (व्यापार) होता है वह जैसा वेदमें है वैसा ही फल भोगता है।

Sease - अथ शुक्लयजुर्वेदीय- रुद्राष्टाध्यायी प्रारम्भ श्रीगणेशाय नमः ॥ आचम्य प्राणाना. यम्य संकल्पः देशकालो संकीर्य अद्य पूर्वोच्चारितैवंगुणविशेषणविशिष्टायां शुभ- पुण्यतिथौ ममात्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त. फलप्राप्त्यर्थं धर्मार्थकाममोक्षसिद्धिद्वारा सर्वव्या- धिनिरासपूर्वकं सर्वाभीष्टसिद्धयर्थं श्रीभवानी- शङ्करदेवताप्रीत्यर्थं च रुद्रैकादशिन्या ( सकृदा- वर्तनेन वा) अमुकद्रव्येण । रुद्राभिषेकमहं करिष्ये । तदङ्गतया. विहितान् शरीरशुद्धयर्थं लघुपडङ्गन्यासाँश्च करिष्ये । मनोजूतिरिति मन्त्रस्य · बृहस्पतिषिः वृहतीछन्दः वृहस्पति- १२८ दार्शनिक विचार देवता हृदयन्यासे जपे विनियोगः । ॐ मनौ जूतिर्जुषतामाज्यस्य॒ बृहस्पतिय॒ज्ञमिम- न्तनोत्वरिष्टं व्यज्ञा समिमन्दधातु ॥ विश्वे देवासंऽइह मादयन्तामो३म्प्रतिष्ठ ॥ ॐ हृदया. य नमः ॥१॥ अबोद्धयग्निरिति मन्त्रस्य बुधग- विष्ठिरावृषी त्रिष्टुप् छन्दः अग्निर्देवता शिरोन्यासे जपे विनियोगः ॥ ॐ अबौद्धयग्निः समिधा जनानाम्प्रति धेनुमिवायतीमुषासम् । यताऽईव प्रवृयामुजिहाना प्रभानव' सिस्रते नाक- मच्छ॥ ॐ शिरसे स्वाहा ॥ २॥ मूर्धानमिति मन्त्रस्य भरद्वाज ऋषिः त्रिष्टुप्छन्दः अग्निदेवता शिखान्यासे जपे विनियोगः ॥ ॐ मूर्द्धनन्दि- वोऽअतिम्मृथिव्या व्वैश्वानरमृतऽ आजात- मनिम् ॥ कवि सम्म्राजमतिथिञ्जनानामासन्ना- पात्रंञ्जनयन्त दुवाः ॥ ॐ शिखायै वषट् ॥३॥ मर्माणि त इति मन्त्रस्य अप्रतिरथ ऋषि- विराट् छन्दः मर्माणि देवता कवचन्यासे रुद्राष्टाध्यायी : जपे विनियोगः ॥: ॐ ममीणि ते वर्मणा: च्छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानुवस्ताम् ॥ उरोवरो'यो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तन्त्वानुदेवा मंदन्तु ॥ ॐ कवचाय हुम् ॥ ४ ॥ विश्वतश्श्च- सुरिति मन्त्रस्य विश्वकर्मा भौवन ऋषिः त्रिष्टुप छन्दः विश्वकर्मा देवता नेत्रन्यासे. जपे विनि- योगः ॥ ॐ विश्वतश्श्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोवाहरुत विश्श्वतरप्पात् ॥ सम्वाहु- भ्यान्धमति . सम्पतंगभूमी'जनयन्टेवड एक ॥ ॐ नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ ५ ॥ मान- स्तोक इति मन्त्रस्य परमेष्ठी ऋषिः जगती छन्दः एको रुद्रो देवता अस्त्रन्यासे जपे विनि- योगः ॥ॐ मानस्तोके तनये मा नऽ आयुपि मा- नो गोपु मा नोऽअश्वैपु रोरिषद ॥ मा नो व्वी- रान्नु भामिनी. बंधी विष्मन्त? सदमित्ता हवामहे ॥ ॐ अस्त्राय फट् ॥ ६ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ हरिः ॐ ॥ गणाना- दार्शनिविचार न्वा गणपति हवामहे प्रिंयाणान्त्वॉ प्रियपतिः हवामहे निधीनान्वा निधिपति हवामहे व्वसों मम ॥ आइमानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥ १॥ गायत्रीत्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप्प. तया सह ॥ बृहृत्युष्णिहकिकृप्प्सूचीमि शम्म्यन्तु त्वां ॥ २ ॥ द्विपदा याश्चतुष्पदा त्रिपदा याश्च पट्पदाः ॥ विच्छन्दा या- इश्च सच्छन्दाद सूचीभि+ शम्म्यन्तु त्वा ॥३॥ संहस्तोमा सहछन्दसं ऽआवृतःसहप्रमोऽऋ. या सप्तदैव्या ॥ पूर्वेपाम्पन्थामनुदृश्ये धीरा ऽअन्वालेभिरे रथ्यों न रश्म्मीन् ॥ ४ ॥ ॐबजाग्म्रतोदूर मुदति देवन्तदं सुप्तस्य तथैवैति ।। दूंरमज्योतिपाज्योतिरेकन्तन्मे मन- शिव- सङ्कल्पमस्तु ॥ ५ ॥ येन काफ्यपतो मनी- षिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरोद ॥ यदपूर्व- व्यक्षमन्तः प्र॒जानान्तन्मे मन* शिवसहरुप्पं. मस्तु ॥६॥ यत्प्रज्ञानमुतचैतो धृतिश्च यज्ज्योति- अदायाघ्यावी रन्तरमृतम्प्रजासु। यसमानऽऋते किञ्चन कम्म क्रियते तन्मे मन+शिवसंकल्पमस्तु ॥७॥येनेद- म्भूनम्भुवनम्भविष्ष्यत्परिंगृहीतममृतेन सर्वम् ॥ बेन यज्ञस्तायतै . सप्तहोता - तन्मे मन+ शिवसङ्कल्प्पमस्तु ॥८॥ यस्मिन्नृचः साम यजूपि यस्म्मिन्न्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा॥ यस्म्मिश्चित्तः सर्वमोतंम्प्र॒जानान्तन्मे मन+ . शिवसङ्कल्प्पमस्तु- ॥ ९ ॥ सुपारथिरश्वानि- व यन्मनुष्यान्ननीयतेभीशुभिर्वाजिनऽइव..।। हृत्प्रतिष्टुन्थ्यद ज़रअविष्टन्तन्न्मे मनः शिव- सङ्कल्पमस्तु ॥ १०॥ इति रुढे प्रथमो- ऽध्यायः ॥१॥ हरिः ॐ ॥ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष.. सहस्रपात् ॥ सभूमि सर्वतस्पृत्वात्य॑तिष्ठद्दशा- गुलम् ॥ १ ॥ पुरुप एवेद सव उवद्भूतं यच्च भाव्यम् ॥. उतामृतत्वस्येशानो. यदन्ननाति- रोहति ॥२-॥- एतावानस्य महिमातो.ज्या- * दार्शनिक विचार यांच पूरुषः ॥ पादौम्य विश्वा भूनानि विपाः दस्यामृतन्दुिवि ॥३॥ त्रिपादुद्धऽउदैत्पुरुषः पादोऽस्यहाभवत्पुन+ ॥ ततोव्विष्वयकाम- ताशनानशनेऽअभि ॥ ४ ॥ ततो विराङजा यत विराजोऽअधि पूरुषः । स जातोऽअत्यरि. उच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुर? ॥ ५ ॥ तस्माद्यज्ञा. सर्वहुन सम्भृतम्पृषदाज्यम् ॥ पास्ताँश्चके बायव्यानारण्या ग्राम्म्याश्च ये॥६॥ तस्माद: ज्ञासर्वहुत ऽच सामानि जज्ञिरे ॥ छन्दा. छसि जाजर तस्म्मायजुम्तस्म्मादजायत ॥७॥ तस्म्मादश्श्व ऽअजायन्त ये के चौभयादतह ॥ गावोह जज्ञिरे तस्मात्तम्माज्जताऽअंजावयं+licn तं व्यज्ञम्पहिपि प्रोक्षन्पुरुषञ्जातमन्त? ॥ तेने देवा-अंयजन्तं साध्याऽऋषयश्च ये ॥९॥ यत्पु- रुष व्यदधु कतिधा व्यकल्प्पयन् ॥ मुखति- मस्यासाकिम्वाह किमरूं पादाऽउच्च्येते ॥२०॥ बाम गोऽस्य मुखमासोद्धाहू राजन्न् कृतः॥ऊरु .

रासापायी सदस्य यद्वैश्य+पद्भ्या शूद्रों ऽअंजायत॥११॥ चन्द्रमा मनसोजातश्श्चक्षोसूर्यो ऽअजायत ॥ श्रीत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखाग्निरजायत॥१२॥ नाभ्योऽआसीदन्तरिक्ष शीष्टो द्यो? समंव- र्चत ॥ पद्भ्याम्भूमिर्दिशोधात्तो लोकार ऽअकल्प्पयन् ॥ १३ ॥ यत्पुरुषेण हुविषो देवा यज्ञमन्वित । वसन्तोऽस्यासीदाज्यङ्गी- मऽध्मः शरद्धविः ॥ १४ ॥ सप्तास्यासन्न्प- रियस्त्रि। सप्त समिधः कृता? ॥ टेवा ययज्ञन्त- न्वाना ऽअवघ्नन्पुरुपं पशुम् ॥१५॥. यज्ञेनयज्ञ. मयजन्त देवास्तानि धमाण प्रथमान्न्यासन् ॥ ते हुनाकम्महिमानं सचन्त यन्त्रपूर्वेसाल्या? सन्ति देवाद ॥ १६ ॥ अद्भ्यः सम्भृतः पृथि- व्ये रसाच्च विश्वकर्मणः समवर्तताग्दै ॥ तस्य- त्वष्टा विदधंद्रुपमैति तन्मय॑स्य देवत्वमाजान- मग्ने ॥ १७॥ वेदाहमेतम्पुरपम्महान्तमा दित्यवण्णन्तमसः पुरस्तात् ॥ तमेव विदित्वाति दार्शनिक विचार मृत्युमति नान्न्यः पन्या विद्यतेयनाय ॥१८॥ प्रजापतिश्च्चरति गर्भे ऽअन्तरजायमानो बहुधा विजायते ॥ तस्य योनिम्परिं पश्यन्ति धीरास्त- स्मिन्ह तस्थुर्भुव॑नानि विश्वा ॥ १९ ॥ यो देवेभ्य॑ ऽआतपति यो देवानाम्पुरोहितः ॥ पूवों यो देवेभ्यो जातो नौ रुचाय ब्राह्मये ॥२०॥ रुचम्ब्राह्मञ्जनयन्तो देवा ऽअग्रेतदंब्रुवन् । यसवे. वम्ब्राह्मणो विद्यात्तस्य देवा ऽअसन्न्वशे ॥ २१॥ श्रीश्चं ते लक्ष्मीश्च परक्यावहोरात्रे पाश्चे नक्षत्राणि रूपमविश्वनौ व्यातम् ॥ इष्प्णन्निपा- शामुम्म ऽइषाण सर्वलोकम्म ऽइपाण ॥२२॥ इति रुद्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ हरिः ॐ ॥ आशु? शिशानो वृषभो न भीमो घनाघन क्षोभणश्चर्षणीनाम् ॥ सङ्कन्दनो- निमिषाएकवीर शत सेनअजयत्साकमिन्द्र ॥१॥ सङ्गन्दनेनानिमिपेणजिष्ष्णुना युत्कारेण दुश्च यत्नेनं धृष्णुना ॥ तदिन्द्रेण जयत तसंहः .

"कोटाध्यायी ---- हुँ व्युधो नरऽइपुहस्तेन वृष्णा ॥२॥ सईपु- हस्ते सनिनिमिवंशी सस्रष्टा संयुधऽइन्द्रो गणेन । सः सृष्टजित्सोमपावाहुशुद्धर्युग्ग्रधन्वा- प्रतिहिताभिरस्ता ॥ ३ ॥ बृहस्प्पत परिदीया रयन रक्षोहामिड-अप वाँधमान ॥ प्रभञ्जनसेना प्रमृणो युधा जयंम्माकमेद्ध पं. विता रानाम् ॥ ४ ॥ बलविज्ञाय स्थविर प्रवीर संहस्वान्न्वाजी सहमान उग्र.. अभिवी रोऽअभिसंत्त्वा सहोजा जैत्रमिन्द्ररथमा तिष्ठं गोवित् ॥५॥ गोभिदंडोविदं व्वज्ञ'वाह- अयन्त मज्जम प्रमृणन्तमोजसा ॥ इम संजा- ताऽअनुवीरयदमिन्द्र संखायोऽअनुसहरभद्धम ॥ ६ ॥ अभि गोत्राणि सहसा गाहमानो दयो वीर शतमन्न्युरिन्द्र+॥दुइच्चयवनः पृतनापार्ड- युयोरम्मा सेनोऽअस्तु प्रयुत्सु ॥ ७ ॥ इन्द्रऽ आसान्नेता वृहस्पतिर्दक्षिणा य॒ज्ञः पुरऽरंतु- सोम+॥ देवसेनानोममिभंतीनांजयन्ती- दार्शनिक विचार नाम्मरुतोयन्वयम् ॥ ८॥ इन्द्रस्य वृष्ष्णो व्व- रुणस्य राज्ञऽ आदित्यानाम्मरुता शऽउग्यम् ॥ महामनसाम्भुवनच्च्यवानाकोषों देवानाञ्जय- तामुदस्स्थात् ॥ ९ ॥ उद्धर्षय मघवन्नायुधा- न्युत्सत्वनाम्मामकानाम्मनांसि ॥ उद्दृत्र- हन्वाजिना व्वाजिनान्न्युद्रानाञ्जयंतां- व्यन्तु- घोषाः ॥ १०॥ अम्माकमिन्द्रः समृतेषु द्धजे- एवम्माकं व्याऽ इपवस्ता जयन्तु ॥अम्माकं बी- राऽ उतरे भवन्त्वस्माउ देवाऽ अवता हवेषु ॥११॥ अमीष चित्तम्प्रतिलोभयन्ती गृहाणाहा- प्य परहि ॥ अभिप्रेहि निदेह हृसु शोकर- न्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम् ॥ १२ ॥ अवसृष्टा- पर्राफ्त शर्रव्ये ब्रह्मस शिते ॥ गच्छामित्रा- प्रपंद्यस्व मामीषाकञ्चनोच्छिपः ॥ १३ ॥ प्रेता जयंता नर इन्द्रो वशम्म यच्छतु ॥ उग्मा व+ सन्तु बाहोऽनाधृप्प्या यथासंथ ॥ १४ ॥ असौ या सेना मरुतः परेषामभ्येतिं नऽओजसा स्प्प • रुद्राराध्यायी दुर्द्धमाना ॥ ताहत तमप्ताप॑व्रतेनु यथामीऽअ- न्योऽअन्न्यन्न जानन् ॥१५॥ यत्र वाणाह सम्प- तन्ति कुमारा विशिखाऽइव ॥ तन्न इन्द्रो बृहस्प्प- तिरदितिः शम्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु ॥१६॥ माणि ते बर्मणाच्छादयामि सोम- स्त्वा राजामृतेनानुवस्ताम् ॥ उरोर्वरो'यो वरुण स्ते कृणोतु जयन्तन्त्वानु देवा मंदन्तु ॥ १७ ॥ इति रुद्रे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ हरिः ॐ ॥ विभ्राड् वृहस्पिवतु सोम्म्यम्म- द्धायुधंयज्ञप॑तावविद्भुतम् ॥ बातो यो ऽभिरक्षति त्मना जारपोप पुरुधा विराजति ॥ १॥ उदुत्त्यजातवेदसन्देवं वहन्ति केतव+॥ दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥२॥ येन पावक चक्षसा भुरण्यन्तजन।२॥ऽअनु॥त्वं वरुण पश्यसि॥३॥ दैळ्यावर्दाऽआर्गत रथेन सूर्यत्वचा ॥ मा- यजसमजाये ॥ तम्प्रकथाऽयं नविश्चत्र- न्दुवानाम् ॥ ४॥ तम्पका पूर्व विश्व- -१३८ दार्शनिक विचार - थेमा ज्ज्येष्ठतातिम्बर्हिषद स्वचिदम् ॥प्रती- यीनं बृजनन्दोहसे धुनिमाशुञ्जयन्तमनु यासु व्वर्द्धसे ॥ ५ ॥ अयं वनश्च्चोदयापृश्निगर्भा- ज्योतिर्जरायू रजनो विमाने। इममुपासङ्गमे सूर्यस्य॒ शिशुन्न व्विा मतिभी रिहन्ति ॥ ६ ॥ चित्रन्देवानामुदगादनो'कञ्चम्मित्त्रस्य वरुण- स्याग्ने । आप्पा.यावापृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य ऽआत्मा जगतस्तम्त्थुषश्च ॥७॥ आ नऽ इडा- भिवर्दथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देवाएंतु।। अपि यथा युवानो मसथानो विश्वञ्जगदभिप- स्वे मनीषा ॥ ८॥ यदुध कच्चं वृत्रहन्नुदा. ऽअभि सूर्य ॥ सर्वन्तर्दिन्द्र ते व्वशे ॥ ९ ॥ तरनिर्विश्वदर्शतोज्ज्योतिष्कृदसि सूर्य । वि- ३श्वमाभांति रोचनम् ॥ १० ॥ तत्त्सूर्यस्य देव. स्वन्तन्महित्त्वम्मद्धया कोंम्वितंत सञ्जभार ॥ त्यदेदयुवरक्त: हरित+ सधस्त्थादाद्मास्त्री 'व्वा. संस्तनुते सिमस्म्म.॥११॥ तन्मित्त्रस्य व्वर- दार्शनिक विचार ऽइपवे नम+॥ बाहुभ्यामत ते नम+॥१॥ या ते रुटू शिवा तनुरघोरापापकाशिनी ॥ तर्या नस्त.. न्य शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ २ ॥ यामिद्भिरिशन्त हस्ते विभय॑स्तवे ॥ शिवाहि- रिब ताङ्कुरु मा हिंसी६ पुरुषञ्जगत् ॥ ३॥ शिवेन व्वर्चसा त्वा गिरिशाच्छो बदामसि । यर्था नः सर्वमिज्जगदयक्ष्म सुमना ऽअसत् ॥४॥ अद्धन्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्व्यो भिषक् ॥ अहीश्च साञ्जम्भयन्सश्श्वि यातुधान्न्योऽध- राची: परीसुव ॥ ५ ॥ असो डित बुभ्रासुमङ्गल’॥ ये चैन: रुद्राऽअभितो दिक्षु शिश्रुताः सहस्रशो वैषा, हेडंऽईमहे ॥६॥ असौ योक्सापति नीलग्रीवो विलोहितः । उतै: नकोपा अन्नदृश्रन्नुदहार्य स दृष्टो मृडया- तिनः ॥७॥ नमोऽस्तु नीलग्ग्रीवाय सहस्राक्षाय मीदुपै ॥ अथो ये ऽअस्य सत्वानो हन्तेभ्योकर नमः॥ ८॥ प्रमुश्च धन्वनस्त्वमुभयोरान्यों- यस्ताम्म्राऽअरुण रुद्राष्टापायी. : णस्याभिचक्षे सूर्यो" रूपळूणुने योरुपस्थे । अनन्तमन्यद्रुशंदस्य पार्ज कृष्णमन्न्यद्धरित सम्भरन्ति ॥ १२ ॥ षण्महाँ। ऽसि सूर्य वडादिन्यमहा॥ ऽऽअसि ॥ महस्ते सतो महि- मापनस्य तेद्धा देव महाँ २॥ ऽसि ॥ १३ ॥ वट् सूर्य श्रवसा महाऽसि सुत्रा देव महार॥अति ॥ महा देवानामसुम्य+ पुरोहितों विभुज्योतिरदाभ्यम् ॥ १४ ॥ श्रायंन्तऽइव सूयं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत॥ वसूनि जाते जन- मानऽओजसा प्रतिभागन्न दी धिम ॥ १५ ॥ अया देवाऽउदिता सूर्यस्य निरईस.पिपता निवुयात ॥ तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्ता- मदिति सिन्धु पृथिवी ऽत द्यो? ॥१६॥ आ कृष्णेनरजसा वर्तमानोनिवेशय॑न्न॒मृतम्मय॑ञ्च॥ हिरण्ययन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥१७॥ इति रुंद्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ हरिः ॐ ॥ नमस्ते. मन्यव ऽतो त रुद्राटाध्यायी १४१ जाम् ॥ याश्च ते हस्तऽइपवर परा ता भगवो वप ॥९॥ विज्ज्यन्धनुः कपर्दिनो विशल्ल्यो- घाणवाा उत ॥ अनैशन्नस्य याऽइपवऽआ. भुरस्य निपङ्गुधिः ॥ १०॥ याते तिम्मीदु- हम हस्ते वभूव ते धनुः॥ तयारम्मानिन्वइश्व- तस्त्वमयूक्ष्मया परि भुज ॥११॥ परि ते धन्व- नोहे तिरस्मान्न्र्पूणवरक्तु विश्श्वत:॥अथो यऽईपु. घिरतवारेऽअस्मन्निधेहि तम्॥१२॥ अवतत्त्य धनु वः सहस्राक्ष शतेषुधेनिशीय शल्ल्यानाम्मुखी शिवो न सुमनां भव ॥ १३ ॥ नमस्तु आयुधा- यानांतताय धृष्णवे ॥ उभाभ्यामुत ते नमो. बाहुभ्यान्तव धन्वने ॥१४॥ मा नौ महान्तमः तमा नोऽअर्भकम्मा नऽउक्षन्तमुत मा नंऽउक्षि तम् ॥ मा नौ व्वधीः पितरम्मोत मातरम्मा नं+ प्रियारतन्बो रुडू रीरिपः ॥ १५ ॥ मानस्तोके तनये मा न आयुपि मा नो गोपु मा नो ऽअश्वेषु रोरिपः ॥ मा नौ वीरान्दू भामिनी १४२ दार्शनिक विचार व्वधीहविष्मन्त समित्वा हवामहे ॥ १६ ॥ नमो हिरपण्यवाहवे। सेनान्ये दिशाञ्चपतये नमो नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यः पशूनाम्प- तये नमो नमः शपिञ्जराय विषो मते पथी- नाम्पतये नमो नमो हरिकेशायोपवीतिनै पुष्टा. नाम्पतये नमो नौ बालुशायं ॥ १७ ॥ नमो चभ्लुशाय । व्याधिनेन्नानाम्पतये नमो नमो भवस्य हेत्त्यै जगताम्पतये नमो नमो रुदायात- तायिने क्षेत्राणाम्पतये नमो नमः सूनायाहन्त्य बनानाम्पतये नमो नमो रोहिताय ॥१८॥ नमो रोहिताय । स्थपतये वृक्षाणाम्पतये नमो नमो भुवन्नये व्वारिवग्कृनायोपंधीनाम्पतये. नमो नमो मन्त्रिणे व्वाणिजाय कक्षाणाम्पतये नमो नम उच्चै?पायाक्क्रन्दयंते पत्तोना- म्पतये नमो नम: कृत्स्नाय तया ॥ १९ ॥ नम+ कृत्स्नायतया । धार्यते सत्वनाम्पतये नमो नमः सहमानाय निव्व्याधिन आया.

- रुद्राराध्यायी.
धिनी'नाम्पतये नमो नमो निषङ्गिणे : ककुभायं
स्तेनानाम्पतये नमो नमो निचेरवे परिचराया-
रण्यानाम्पतये नमो नमो व्यञ्चते ॥२०॥ नमो
व्वञ्चंते । परिवञ्चते स्तायूनाम्पतये नमो नमो
निपुगिण 5 इषुधिमते तस्कराणाम्पतये नमो
नम: मृकायिभ्यो जिघांसद्भ्यो मुष्णता-
म्पतये नमो नमो सिमद्भ्यो नक्क्तश्चरद्भ्यो
विकृन्तानाम्पतये नम ॥२१॥ नमऽ उष्टणी-
पिणे । गिरिचराय कुलुचानाम्पतये नमो नमs
इषुमो धन्वयिभ्यश्च्च वो नमो नमs
आतन्न्वानेभ्यं+ प्रतिदर्थानेभ्यश्च वो नमो
नम ऽआयच्छद्भ्योम्य॑भ्यश्च वो नमो नमो
विसृजद्भ्यः ॥२२॥ नमो विसृजदुभ्यो ।
विद्ध्यद्भ्यश्च वो नमो नम+स्वपद्भ्यो जाग्य.
भ्यश्च वो नमो नमः शयानेभ्य: आसी'ने.
भ्यश्च वो नमो नमस्तिष्ठद्भ्यो -धावद्भ्यश्च
वो नमो नम सभावभ्य+ ॥२३॥ नमः.सभाभ्य

दार्शनिक विचार सभापतिभ्यश्च वो नमो नमोरश्वेभ्योइश्व- पतिभ्यश्च वो नमो नमऽ आव्याधिनी'भ्यो- विविद्ध्यन्तीभ्यश्च वो नमो नमऽ उगणा- भ्यस्त हुतीभ्यश्च वो नमो नमो गणेभ्य: ॥२४॥ नमो गणेभ्यो । गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो वातेवायो वातपतिभ्यश्च वो नमो नमो सभ्यो गृत्संपतिभ्यश्च वो नमो नमो बिरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नमो नमः सेनाभ्यः ॥२५॥ नमुद सेनाभ्यः । सेनानि. भ्यश्च वो नमो नमो रथिवभ्योऽ अरथेवभ्यश्श्च वो नमो नमः क्षतृभ्य सङ्ग्रहीतृभ्यश्च वो 'नमो नौ महद्भ्योऽ अर्भकेभ्यश्च वो नम: ॥२६॥ नमस्तक्षभ्यो । रथकारेभ्यश्च्च वो 'नमो नमः अलोलेभ्यः कमारेभ्यश्श्व वो नमो नौ निषादेभ्य: पुञ्जिष्ठेभ्यश्च वो नमो नम+ ३श्वनियों मृगयुभ्यश्च वो नमो नमः इश्वभ्यं ॥ २७॥ नमः ३श्वभ्य: ३श्वपं.

रुद्रीटाध्यायी तिब्भ्यश्च वो नमो नमो भवाय चःरुवार्य च नम शर्वाय च पशुपतये च नमो नील- ग्रीवाय च शितिकण्ठाय च नम कपुदिने ॥ २८॥ नम+कपर्दिने । चः व्युप्सकेशाय चु नम+ सहस्राक्षाय च शतधन्वने च नमो गिरिशयायं च शिपिविष्टाय च नमो 'मीढुष्ट- माय चेपुमते च नमो-हस्वाय ॥ २९॥ नमो हुंस्वार्य । च वामनाय च नमो बृहुते. च वर्षीयसे च नमो व्वृद्धाय च सवृधे च 'नमो- ग्याय च प्रथमाय च नर्मऽ आशवै ॥ ३० ॥ नमंऽ. आशवै। चाज़िराय च नमः शीग्याय च शीभ्याय च नमऽ ऊयाय चारस्वन्न्याय च नमो नादेयाय च वीप्प्याय च ॥ ३१ ॥ नमो ज्येष्ठाय । च कनिष्ठाय च नम पूर्बजाय चापरजायं च नमो मध्यमार्य चापगल्भाय च नमो जघन्याय च न्याय चनमः सोभ्याय ॥ ३२॥ नमसोभ्याया।

१४६ दार्शनिक प्रार च प्रतिसर्याय च । नमोः याम्याय - चं क्षेम्म्याय च नमः श्लोक्क्ष्याय चारसान्याय च. नम उर्चोय च खल्ल्याय च नमो व्वन्न्याय ॥ ३३ ॥ नमो व्वन्याय । च कक्ष्याय च नम+ : अषाय च प्रतिश्श्रवाय च नमऽ आशुषेणाय चांशुरंथाय च नमः शूरोय चावभेदिनेःच नमो विल्म्मिने ॥ ३४ ॥ नमो बिल्म्मिने। च. कवचिने च नमो मिणे च व्वरूथिने च नर्म+ श्श्रुतार्य च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुरुभ्याय चाहनन्याय चं नमो धृष्ष्णवे ॥३५॥ नमो धृष्णवे । च अमृशाय च नमो निषङ्गिणे चेपुधिमते च नमस्तीक्ष्णेपवे चायुधिने चु नम+ स्वायुधाय च सुधन्वने च ॥३६॥ नम६ जुत्याय । च पत्थ्याय च नमः काचोय च नीप्प्याय चु नमा कुल्ल्याय: 'च': सरस्याय . च नमो नादेया-च व्वेशन्ताय चुनमुहः कूप्प्याय स्दाशनायी १४७ ॥ ३७॥ नमः कूपयाप । धावृयाय च नमो व्वीद्ध्याय चातुप्याय च नमो मेग्ध्याय च विद्युत्याय च नमो व्वयि चावार्य च नमो व्वात्याय ॥ ३८॥ नमो व्दात्याय । च रेष्म्याप चु नौ वास्तव्याय च बास्तुपार्य च नमः सोमाय च रुद्बार्य च नमस्ताम्म्रार्य चारुणाय च नम+ शङ्गवै ॥३९॥ नम शङ्गवै । च पशुपतवे च नमऽ उग्याय च भीमाय च नमोग्ग्रेवधार्य च दूरेवधार्य च नमो हुन्त्रे च हनी'यसे च नौ वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यो नमस्तारायं ॥४०॥ नर्मक शम्भवाय । च मयोभुषाय च नम+ शङ्खराय च मयस्कराय च नमः शिवार्य च शिवतराय च ॥४१॥ नमूह पाऱ्यांप । चावार्याय च नम* प्रतरणाय चोत्तरंणाय च नमस्तीर्थ्याय च कूल्ल्याय च नमः शप्प्याय च फेन्याय च नर्म:- सिकृत्याय ॥ ४२ ॥ नर्म सिक- ३४८ दार्शनिक विचार न्याय । चःप्रवाहायच: नमः किशिलायच क्षयणाय च नम कपुर्दिने च पुलुस्तय च नमऽ इरिण्याय च प्रपत्थ्याय च नमो स्त्रज्ज्योय ॥ ४३॥ नमो बज्ज्याय । च गोष्ाय च नमुस्तल्प्प्याय. च गेायं च नौ हृदयाय च निष्प्णाय च नमुह कादृाय च गहरष्टाय च नमः शुष्क्क्याय ॥ ४४ ॥ नमः शुष्क्क्याय । च हरित्याय च नमः पासव्याय च रजस्याय च नमो लोप्प्याय चौलप्प्याय च नमु ऽऊयीय च सूयाय च • नर्म पुर्णाय॥४५॥नम पुर्णायं। च पपर्णशदार्य च नमै ऽउद्गुराणाय चाभिग्नुते च नम ऽआ. खिदते च प्रखिदुते च नम ऽइपुकृद्भ्यो धनु- कृद्भ्यश्च वो. नमो नमो वह किरिकेभ्यो देवाना हृदयेभ्यो नमो विचिन्वत्केभ्यो नमो- विक्षिणत्केभ्यो नम आनिर्हतेभ्यं ॥४६॥ दापे ऽअन्धसस्पते दरिद्र नीललोहित ।

रुद्राटाच्यायो आसाम्प्र॒जानामपाम्पशूनाम्माभेर्मारोङ्यो. च नह किञ्चनाममत् ॥४७॥ इमा रुद्राय । तवसे कपर्दिनै क्षयद्वी राय प्रभरामहे मतो? ॥ या शमसद्धिपढे चतुष्प्पढ़े विश्वम्पुष्टङ्मा- मैऽ अस्मिन्ननातुरम् ॥ ४८ ॥ या तें। रुद्र शिवा तनू? शिवा विश्वाहा भेषजी। शिवा रुतस्य भेषजी तयो नो मृड जीवसे ॥ ४९ ॥ परिं नो रुद्रस्य हेति णक्तु परि त्वेषस्य दुर्मतिरघायो? ॥ अव स्थिरा मुघद्भ्यस्त- नुष्व मीडू ट्वस्तोकाय तनयाय मृड ॥ ५० ॥ मीढुष्टम शिवंतम शिवो नं: सुमना भव ॥ परमे वृक्षs आयुधन्निधाय कृत्तिं व्वसा- नऽ आ चर पिनाकम्विन्झदा गहि ॥ ५१ ॥ विकिरिट्ठ हिलौहित नमस्तेऽ अस्तु भगवः । यात्तै सहस्र हेतयोन्यमम्मन्नि वपन्तु ता? ॥ ५२ ॥ सहस्राणि सहस्रशो चाहोस्तव हेतयः ॥ तासामीशानो भगवद पराचीना वादित विचार मुखो कृषि ५३॥ मसंझावाता सहस्राणि ये रुवाऽ अधि भूम्याम् ॥ तेषां सहस्र- योजनेषु धन्न्यानि तमसि ॥ ५४॥ अस्मि- न्ममहत्त्यर्णवेन्तरिक्षे भयाऽ अपि ॥ तेपाल सहस्रयोजनेव धन्धोनि तन्मसि ॥ ५५ ॥ नीलग्रीवा शितिकण्ठा दिव रुद्रा उपश्रिता ॥ तेपाल सहस्रयोजनेव धन्वानि तम्मति ॥५६॥ नीलग्रीवाद शितिकण्ठाह शुर्वाऽ अधोक्षमारातेषां सहस्रयोजनेव धान्नानि तन्न्मसि ॥ ५७॥ ये वृक्षेषु शुष्टिपञ्जरा नीलग्ग्रीषा बिलोहिताः । तेषांक सहस्रयोजनेव धन्धानि सन्न्मसि ॥ ५८ ॥ ये भूतानामधिपतयो विशिखास+ कपर्दिन । तेषां सहस्रयोजनेवृधन्वानि तन्न्मसि ॥५९॥ ये पथाम्पैधिरक्षयऽ ऐलवृदा आयुटुंध तेषां सहस्रयोजने धम्बोनि तन्न्मसि ॥ ६ ॥ ये तीर्थानि । चरन्ति सृकाहस्ता निपङ्गिण ।

स्द्राटामायी तेषां सहस्त्रयोअनेव धन्वानि तन्न्मसि ॥१॥ येनेषु । वि विद्ध्यन्ति पापु पिवतो जनान् ॥ ते सहस्रयोजनेय धन्न्वानि तन्न्मलि॥६॥ या एतस्यन्तश्च भूयासश्च दिशौ रुद्रा खि तस्थिरे ॥ तेषां सहस्रपोजनेव धन्यानि तन्मसि॥६३॥ नमोस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि वेपी ठवर्ममिपंवः ॥ तेटभ्यो देश प्राचीईशं दक्षिणा दर्श घृतीची ईशोदी'चीईशो ? ॥ तेभ्यो नमोऽ अस्तु ते नौवन्तु ते नौ मृडयन्तु ते यन्दिन- जम्मो यच्चनोष्ट्टि तमेषाञ्जम्भे दध्मः ॥६॥ नमोस्तु।रुद्रेभ्योयेन्तरिक्ष येषां नातऽ इषवः। तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दर्श प्रतीची. ईशोदी'चीर्दशोद्धति ॥ तेभ्यो नमोऽ अस्तु ते नौवन्तु ते नौ मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च मो दृष्टि तपाजम्भे दध्मः ॥ ६५ ॥ नमोस्तु । रुद्रेभ्यो थे , प्रथिव्यां येषामन्नुमिर्षवः ॥ तेलयो दश प्राचीन दक्षिणा दर्श:प्रतीचीई'.

१५२ दार्शनिक विचार शोदी चोदशो तेव्भ्यो नमोऽ अस्तु ते नौवन्तु ते नौ मृडयन्तु ते यन्द्विष्णमो यश्च नो दृष्टि तमेषाञ्जम्भे दध्मः ॥ ६६ः॥ इति रुद्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ हरि: ॐ त्य: सौम ते तव मनस्तनपु विन्ध्रत ॥ प्रजावन्त: सचेमहि ॥१॥ एषत। रुद्द भागः सह स्वस्लाम्बिकया तझुषस्व स्वाहप तेरुद्र भागऽ आखुस्तै :पशु ॥ २॥ अर्व रुद्रमंदीमह्य दुवव्यम्बकम्॥ यथा नो वस्य- सरकद्या न ३श्य॑स॒स्करपा नो व्यवसा- यात् ॥ ३॥- भेषजमसि भेषजङ्गवेश्श्वाय पुरुषाय भेजम् । सुखम्मेषाय मेष्ये ॥ ४ ॥ व्यम्बकं व्यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवद्धनम् ॥ उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ व्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पतिवेदनम् ॥ उर्ला- रुकमिव बन्धनाद्वितो मुक्षीय मामुत ॥ ५ ॥ एतत् । रुवावसन्तेन -पुरो मूजवतोती हि ॥

रुद्राष्टाध्यायी १५३ अवततधन्वा पिनाकावसः कृत्तिवासा ऽअहि. सन्नः शिवोती हि ॥ ६ ॥ व्यायुषञ्जमदग्ने कश्यप॑स्य व्यायुषम् ॥ यद्देवेघु व्यायुपन्तन्नौs अस्तु. व्यायुषम् ॥ ७॥ शिवो नामासि स्वधि- तिस्त्ते पिता नमस्तेऽ अस्तु मा मो हिसी ॥ निवर्तयाम्म्यायुपेन्नायाय अजननाय राय- स्पोपाय सुष्प्रजास्त्वार्य सुदी-य ॥ ८ ॥ इति रुद्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ हरिः ॐ ॥ उग्नश्च । भीमश्च धान्तश्च धुनिश्च धुनिश्च ॥ सासवाँश्चाभियुग्मा च विक्षिपः स्वाहा ॥ १ ॥ अमि हृदये." नाशनि हृदयाग्प्रेण पशुपतिऋत्नुहृदयेन भुवं उपना ॥ शुद्धम्मतस्नाभ्यामीशानम्म- न्युना महादेवमन्तः पर्शव्येनोग्यन्देवं बनिष्ठुना व्वसिष्ट्रहनु शिङ्गी नि कोश्या- भ्याम् ॥ २॥ उग्jल्लोहितेन । मित्र सौन्व्रत्त्येन रुद्रन्दौर्ऋत्येनेन्द्रम्प्रक्कीडेन मरुतो

१५४
दार्शनिक विचार
घलेन साध्यान् प्रमुदा ॥ भवस्य कण्ठ्यं
रुद्रस्यान्तः पाश्र्व्यम्महादेवस्य यकृच्छ्वस्व
व्यनिष्टु पशुपतेः पुरीतत् ॥ ३ ॥ लोमभ्यः
स्वाहा लोमभ्य स्वाही त्रुचे स्वाही त्वचे
स्वाहा लोहिताय स्वाहा लोहिताय स्वाहा
मेदोदभ्यः स्वाहा मेदोन्भ्य: स्वाहा मासेभ्य
स्वाही मासेभ्यः स्वाहा लावभ्य स्वाहा
स्नावभ्यः स्वाहास्थळभ्यद स्वाहास्स्थभ्यह
स्वाहा मजन्भ्यः स्वाही मुज्जब्भ्य: स्वाहा ।।
रेतसे स्वाहा पायवे स्वाहा ॥ ४ ॥ आयासाय
स्वाहा । प्रायासाय स्वाहा संव्यासाय स्वाहा
वियासाय स्वाइौयासाय स्वाहा ॥ शुचे स्वाहा
शोचते स्वाहा शोचमानाय स्वाहा शोकाय
स्वाहा ॥ ५ ॥ तपले स्वाहा । तप्प्यते स्वाहा
तप्प्य॑मानाय स्वाहा तप्ताय स्वाहा घर्माय
स्वाहा ॥ निष्कृत्यै स्वाहा प्रायश्चित्त्यै स्वाहा
भेषजाय. स्वाहा ॥ ६ ॥ यमाय स्वाहान्तंकाय

रुद्राष्टाध्यायी
१५५
स्वाहा मृत्यवे स्वाहा ॥ ब्रह्मणे स्वाहा
'ब्रह्महत्त्याय स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः
‘स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या स्वाहा ॥७॥
इति रुद्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
हरि ॐ ॥ व्याजश्च्च । मे प्रसवइच्च
मे प्रयतिउच्च मे प्रर्सितिश्च्च मे धीतिइच्च मे
वक्रतुश्च मे स्वरश्च्च मे श्लोकश्च मे अवश्च्च
मे इश्रुतिश्च मे ज्ज्योतिश्च मे स्वच्च मे
यज्ञेनं कल्प्पन्ताम् ॥ १ ॥ प्राणश्च । मे
पानश्च मे व्व्यानश्च्च मेसुश्च्च मे चित्तञ्चम
आधी'तश्च मे व्वाक्च मे मनश्च मे चक्षुश्च्च
में इनोवेश्च मे दक्षश्च्च मे चलेच मे युज्ञेन
कल्प्पन्ताम् ॥ २॥ ओजश्च्च । म सहइच्च
मऽ' आत्मा च मे तनूइच्च मे शर्म च मे
वर्म च मेगानि च मेस्थीनि च मे
परूपि च मे शरीराणि च मुऽ आयुश्च्च
मे जरा च मे युजेन कल्पन्तामः ॥ ३॥

१५६ दार्शनिक विचार - ज्ज्यैष्ठ्यश्च । म ऽआधिपत्यश्च मे मुन्न्युश्च्च मे भामश्च मे संश्च्च मेम्भश्च्च मे जेमा च. मे महिमा च मे व्वरिमा च मे प्रथिमा च मे वर्षिमा च मे द्बाधिमा च मे.. वृद्धञ्च में वृद्धिश्च मे यज्ञेनं कल्प्पन्ताम् ॥ ४ ॥ (न०) सत्त्यश्च । मे ३श्रद्धा च मे · जगंञ्च मे धनंश्च मे विश्वञ्च, मे मच्चामे कंक्रीडा चं से मोदइच्च मे जातश्च मे जनिष्ल्याण श्च मे सूकाक्तश्च मे सुकृतश्च मे युज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥ ५॥ ऋत तञ्च सेमृतश्च मे यक्षमञ्च मेनामयच्च मे जीवातुश्च मे दीर्घा युत्त्वञ्च, मेनसित्रश्च मेभयञ्च में सुखञ्च मे शयनश्च मे सूषाच्च. मे सुदिन॑श्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥ ६॥ यन्ता च मे धर्ता चं में :क्षेमश्च्च मे धृतिश्च म विश्वञ्च म. महश्च मे संविच्चं म..ज्ञाश्च मे सूश्च्च मे प्रसूश्च में सोरंश्च म लय इच्च मे यज्ञेन- .

रुद्राष्टाध्यायी 4 कल्प्पन्ताम् ॥७॥ शश्च मे मयश्च मे प्रियञ्च मेनुकामश्च मे कार्मच्च मे सौमनसश्च मे भगइच में द्रविणश्च मे भद्रश्च मे श्रेयश्च मे बसी'यश्च मे यशश्च मे यज्ञेने कल्प्प. न्ताम ॥ ८ ॥ (न०) ऊर्च । - मे सूत्र- तौ च मे पर्यच्च मे रसच्चमे घृतश्च मे मधु च मे सग्धिश्च मे संपी लिइच्च मे कृषिश्च मे वृष्टिश्च्च मे जैत्रश्चं-मऽ ओद्भियञ्च मे यझेन : कल्प्पन्ताम् ॥ ९ ॥ रयिश्च मे रायश्च मे पुष्टश्च मे पुष्टिश्च मे विभुःर्च मे प्रभु च मे पूर्णश्च मे पूर्णतरञ्च मे : कुर्यवञ्च मेक्षितञ्च मेन्नश्च मे क्षुच्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम :॥१०॥ वित्तञ्च । मे. व्वेद्यश्च मे भूतञ्च मे भविष्ष्यच्च मे सुगंध मे सुपत्थ्यश्च म ऋद्धश्चै म ऋद्धिश्च मे क्लृप्तश्च मे क्लुप्तिश्च मे मतिश्च मे सुमतिश्च मे यज्ञेन , कल्प्पन्ताम् १.१॥ ब्रीहर्यश्च । मे यांचा मे मापा- १५८ दार्शनिक विचार इच्च मे तिलाश्च मे मुगाच्च मे खल्ल्याश्च मे प्रियवइच्च मेणवश्च मे श्यामाकाश्च्च मे नीवारोश्च मे गोधूमोश्च मे मसूरीश्च मे यज्ञेन कल्प्यन्ताम् ॥ १२॥ ( न० ) अम्मा च । मे मृत्तिका च.मे गिर्यश्च मे पर्वताश्च मे सिताश्च मे व्वनरप्पतयश्च मे हिरण्य- श्च मेयश्च मे श्यामञ्च मे लोहश्च मे सीसंञ्च मे अपुं च मे यज्ञेने कल्प्पन्ताम् ॥ १३ ॥ अभिश्च । मा.आपश्च्च मे वीरुधश्च्च मऽ ओप.. धयश्च मे कृष्टपुच्च्याच मेकृष्टपच्च्याश्च मे ग्याम्म्याश्च मे पुशवs आरपण्याचं मे वित्तञ्च मे वित्तिश्च मे भूतञ्च मे भूतिश्च मे युज्ञेन कल्पन्ताम् ॥ १४ ॥ व्वसु च । मे रसुतिश्चं मे कर्म च मे शक्तिश्च मेथश्चमऽ एमश्च मऽ इत्या च मे गतिश्च मे युज्ञेन कल्प्पन्ताम ॥ १५ ॥ ( न०) अग्निश्च्च । म इन्द्रश्च्च मे सोमश्च्च मा इन्द्र इच्च मे सविता च मुऽ - रुद्रायायायी १५९ इन्द्रश्च्च मे सरस्वती च म ऽइन्द्रश्च्च मे पूषा चं मऽ इन्द्रश्च्च मे बृहस्पतिइच्च मा इन्द्रश्च्च यज्ञेने कल्प्पन्ताम् ॥१६॥ मित्रश्च । मा इन्द्रश्च मे वरुणश्च्च मुऽ इन्द्रच्च मे धाता च मऽ इन्द्रश्च्च मे त्वष्टौ च मुऽ इन्द्र- ३च्च मे सुरुतंश्च्च मुऽ इन्द्रश्च मे विश्व च मे दुवाऽ इन्द्रश्च्च मे युज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥ १७ ॥ पृथिवी च । मुऽ इन्द्रश्च मे न्त- रिक्षच मा इन्द्रश्च मे दयौउच्च मा इन्द्रश्च्च मे समाश्च्च मुऽ इन्द्रश्च्च मे नक्षत्राणि च मुऽ इन्द्रश्च्च मे दिशश्च्च मा इन्द्रश्च मे युज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१८॥ (न०) अशुइच्च । मे रहिम्मइच्च मेदाभ्यइच्च मेधिपतिश्च्च मा उपाशुश्च मेन्तानश्च्च मऽ ऐन्द्र. वायुवश्च मे मैत्रावरुणश्च्च मऽ आश्वि- नश्च्च मे प्रति प्रस्थानश्च्च मे शुक्क्रश्च्च मे मुन्थी च मे युज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥ १९॥ आग्र- १६० दार्शनिक विचार यणश्च्च । मे व्वैश्वद वश्च्च मे धुवश्च मे व्वैश्वानरच्चं मऽ ऐन्द्राग्नश्च मे महावै- श्व वश्च मे मरुत्वतीयांश्च्च मे निष्कव. ल्ल्यश्च्च मे सावित्रश्च्च मे सारस्वतश्च मे पात्नीवुतश्च मे हारियोजनइच्च मे यज्ञेने कल्प्पन्ताम् ॥२०॥ सुचइच्च । मे चमसाइच्च मे व्वायुठळ्यानि च मे द्रोणकलशश्च मे ग्यावाणश्च्च मेधिषवणे च मे पूतभृच्च मा आधवनीयश्च मे व्वेदिइच्च मे बहिश्च्च मेवभृथश्च्च मे स्वगाकारश्च मे योन कहप्प. न्ताम् ॥ २१ ॥ (न०) अग्निश्च । मे धर्मश्च मे कश्च मे सूय॑श्च मे प्राणश्च्च मेश्श्वमेघश्च्च मे पृथिवी च मेदितिश्च मे दि- तिउच्च मे योश्च मे गुलय शक्करयो दिशश्च मे युज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥ २२ ॥ वृतश्च । म ऋतर्वश्च मे तपश्च्च मे संव- त्तरश्च्च मेहोरात्रेऽ ऊर्वष्ठीवे बृहद्रथन्तुरे च

रुद्राटाध्यायी
मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥ २३ ॥ (न०) एका
च । मे तिस्रश्च मे तिस्रश्च मे पञ्च च में पञ्च
च मे सप्त च मे सप्त च मे नवं च मे नर्वच
म एकादश च मऽ एकादश च मे त्रयोदश
च मे त्रयोदश च मे पञ्चदश च मे . पञ्चदश
च मे सप्तदश च मे सप्तदश च मे नर्वदश
च मे नवेदश च मऽ एकविशतिच्च मा
एकविशतिश्च मे . त्रयोविशतिश्च मे त्रयो-
विशतिश्च्च मे पञ्चविशतिश्च मे पञ्चवि.
शतिश्च मे सप्तविंशतिश्च मे सप्तविशतिश्च्च
मे नवविशतिश्च मे नवविशतिउच्च मा
एकत्रिशच मुऽ एकत्रिशच्च मे यत्रिशच्च
मे यज्ञेनं कल्प्पन्ताम् ॥२४॥ (न०)चतस्त्रश्च।
मेष्टौ च मेट्टिौं च मे द्वादश च मे द्वादश च
मे पोडश च से पोडश च मे विशतिश्च मे
विशतिश्च मे चतुविशतिश्च में चतुधिg.
शतिश्च मेऽष्टाविंशतिश्च मेष्टाविंशतिइच्च मे
-

१६२ दार्शनिक विचार - वाविठःशचम द्वात्रि: शश्च मे विठशच्च मे पविठ.शच्च मे चत्वारिठ.शच्च मे चत्वारिठ.शच में चतुश्चत्वारिठ.शच मे चतु. उच्चत्त्वारिठ.शच्च मेटाचत्वारिठ.शच मे यज्ञेनं कल्प्पन्ताम् ॥२५॥ (न०) व्यविश्च । मे व्यवी च मे दित्त्यवाट् चं. मे दित्यौही. च मे पंचा- विश्च मे पञ्चावी, च मे त्रिवत्सश्च मे त्रिवत्सा चं मे तुय वाट् च तुथ्योही च मे यज्ञेन कल्प्प- (न्ताम् ॥२६॥ पष्टवाट च मे पष्टीही च म.उक्षा च मे वशा च म ऋषभश्च में वहच मेनड्डाँइच्च मे धेनुश्च्च मे युजेनं कल्प्पं. म्ताम ॥२७॥ (न०)व्वाजाय स्वाहा। प्रसवाय स्वाहा पिजाय स्वाहा. क्र्तः स्वाहा वसवे स्वाहाहुप्र्पतये स्वाहान्न्हे मुग्धाय स्वाहा मुग्धार्य व्वैनाशनाय स्वाहा विन शिनs - आन्त्या. यनाय स्वाहान्याय: भोवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वादाविपतये स्वाहा प्रजापतयः स्वाहा । * - ::दादाभ्यायी हुयन्ते राणिम्मुत्रायः- यन्तासि यमनऽ ऊर्जे वा दृष्ट्य त्वा प्रजानानवाधिपत्याय ॥२८॥ आयुर्व्यज्ञेन । करप्पताम्प्राणो यज्ञेन कल्प्पता- चक्षुर्यज्ञेनं कल्प्पता:श्रोत्रं यज्ञेन कल्प्पता- म्वाग्यज्ञन कल्पताम्मनो यज्ञेनं कल्प्पतामात्वमा यज्ञेने कल्प्पताम्ब्रह्मा. यज्ञेन कल्पताज्योनिः यज्ञेन कल्प्पता: म्य॑ज्ञेन' कल्प्पता:पृष्टं: रुयज्ञेन कल्प्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पशाम ॥ स्त्तामश्च यर्जुश्च्चऽ ऋक्च सामं च यहच्च रथन्तरश्च । स्वदे॒वाऽ अगन्मामृताs: अभुम प्रजापते प्रजाऽ अभूम व्वेट् स्वाहा ॥२९॥ : इति रुद्रेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ हरिः ॐ ऋचं व्वाचम्प्रपद्ये मनो. यजु:- प्रपद्ये साम प्राणाम्प्रपद्ये चक्षुः श्रात्र प्रपद्ये ॥ नागोज सहोजा: मणि प्राणापानौ ॥ १॥ यन्म छिद्रश्चक्षेपो हृदयम्य मनसो व्वातितृपणम्बृहस्पतिम् तद्दधातुः ॥ शन्नो १६४ दार्शनिक विचार भवतु भुवनस्य यस्प्पति+ ॥ २॥ भूर्भुवः स्व+ ।' तत्सवितुर्वरेण्यम्भर्गो देवस्य धीमहि ॥ धियो यो न+ प्रचोदयात् ॥ ३॥ का नश्चित्रऽ आ भुवती सदा वृधः सर्खा । कया शष्ठिया वृता ॥४॥ कस्वा । सत्त्यो मदानाम्महिष्ठो मत्सदन्धसः ॥ दृढ़ा चिदारुजे व्वसु ॥ ५॥ अभी षु णः । सखी'नामविता जरितॄणाम् ॥ शतम्भवास्यू. तिभि+ ॥ ६ ॥ कया त्वन्नं ऊत्याभि प्रम- न्दसे वृषन् ॥ कया स्तोतृभ्य आ भर ॥७॥ इन्द्रो विश्वस्य राजति॥ शन्नो अस्तु द्विपढे शञ्चतुष्पदे ॥८॥ शन्नो मित्र शं वरुणद शन्नौ भवत्वयंमा ॥ शन्नुऽ इन्द्रो वृहस्पति शनो विष्णुरुरुक्क्रमः ॥ ९ ॥ शन्नो व्वात पवता शन्नस्तपतु सूर्य+ ॥ शन्नद कनिक्क- दद् हुँव पर्जन्योऽ अभि वर्षतु ॥१०॥अहानि शम्भवन्तु नः शहरास्त्रीद प्रति धीयताम् ॥

रुद्राष्टाध्यायी १६५ शन्नऽ इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्नऽ इन्द्रा- वरुणा रातहव्व्या ॥ शन्नऽ इन्द्रापूषणा व्याज- सातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शंब्यो। ॥११॥ शन्नो देवीरभिष्ट्टयऽ आपो भवन्तु पीतये ॥ शंब्योरभि स्रवन्तु नः ॥१२॥स्योना धिवि। नो भवानृक्षरा निवेशनी ॥ यच्छो नशम सप्प्राद ॥१३॥ आपो हि । हा मयोभुवस्ता नऽ कुर्ने दंधातन ॥ मुहे रणाय चक्षसे ॥१४॥ यो वं+ शिवतमो रसस्त्तस्य भाजयतेह न’ ॥ उशतीरिव मातर+ ॥ १५ ॥ तस्म्माऽ .अरङ्गमाम वो यस्य क्षायु जिन्न्वथ ॥ आपो जनयथा च नः ॥ १६ ॥ द्यौः शातिरन्तरिक्ष शान्ति+ पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयुद्ध शान्तिः ॥ व्बनस्पतयः शान्तिविश्वेदेवाः शन्तिब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव. शान्ति सा मा शान्तिरेधि ॥ १७ ॥ हते हा. मा मित्रस्य मा . चहूंपा सर्वाणि भूतानि दार्शनिक विचार समीक्षन्ताम् ॥ मित्रस्याहश्चक्षुषा साणि भूनानि समोक्षे ॥ मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ॥ १८ ॥ हते हं मा ॥ ज्योक्क्त सन्दर्शि जीव्यासज्योक्तं सहशि जीव्यासम् ॥ १९ ॥ नमस्ते हरसे शोचिपे नमस्ते अस्त्वचि ॥ अन्यारतः अस्म्मत्तपन्तु हेतय+ पावुकोऽ अम्मभ्यं शिवो भव ॥ २० ॥ नमस्तेऽ अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्न ॥ नमस्ते भगवन्नस्तु यतः स्व- समीहसे ॥ २१ ॥ यतो यतः समीहसे तो नोऽ अभयङ्कुरु ॥ शन्नं कुरु प्रजाभ्योभयन्नः पशुभ्यं ॥ २२ ॥ सुमिस्त्रिया नऽ आपs ओषधयः सन्तु दुम्मिस्त्रियास्तसम्मै : सन्तु मोम्मान्द्वेष्टि यञ्च व्यं द्विषम्म? · ॥ २३ ।। तच वनिम्पुरस्ताच्छुक्क्रमुच्चन्त्॥ पश्येम शरदं* शतञ्जीवेम शरदः शतहः शृणुयाम शरद शतं प्रवाम शरद शतमदीना

रुद्राष्टाध्यायी
१६७
स्याम शरद शतम्भूयश्च शरद शतात् ॥२४॥
॥ इति रुद्रे शान्त्यध्यायः ॥
अथ रुद्रे स्वस्तिप्रार्थनामन्त्राध्यायः॥
हरिः ॐ ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धभ्रंश
स्वस्ति न+ पूषा विश्ववेदाः । स्वस्तिं
नस्तावक्ष्योऽ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पति-
ईधातु ॥ १ ॥ ॐ पर्य' पृथिव्याम्पय
ओपंधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाइ ।
पर्यस्वतोद प्र दिश’ सन्तु माम् ॥ २ ॥
ॐ विष्णो राटमति विष्णोर भत्रे स्स्थो
विष्णो; स्यूरसि विष्णोधुवोसि
॥
वैष्णवमसि विष्णवे त्वा
अग्निदेवता व्वातौ देवता सूर्यो' देवता चन्द्रमा
दुवता वसवो देवता रुद्रा दुवा दिल्या
देवा ॥४॥ ॐ सद्योजात में पंद्यामि
सद्यो जाताय वै नमो नमः . भवे भवे
नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ ५ ॥

दार्शनिक विचार
वामदोवाय नमो ज्ये ठाय नमः श्रेष्ठाय
नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलंविकरणाय
नमो बलविकरणाय नमो वलाय नमो
बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो
मुनोन्मनाय नमः ॥ ६॥ अघोरेभ्योथ घोरेभ्यो
घोरघोरतरेभ्यः ॥ सर्वेभ्यः सर्व शर्वेभ्यो नमस्तेऽ
अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ७ ॥ तत्पुरुषाय विद्महे
महावार्य धीमहि ॥ तन्नो रुद्रः प्र चोदयात्
॥ ८ ॥ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभू.
तानाम् ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोधिपतिर्ब्रह्मा
शिवो में अस्तु सदाशिवोम् ॥९॥ ॐ
शिवो नार्मासि स्वधितिस्ते पिता नमस्ते ऽअ.
स्तु मा मा हिसी६ ॥ निवर्तयाम्म्यायुपेन्ना
याय प्रजननाय रायस्पोपाय सुप्रजास्वार्य
सुवोर्याय ॥ १० ॥ ॐ विश्वानि देव सवि.
तदुरितानि परासुव ॥ यद् भद्न्तन्नु ऽआसुव
॥ ११ ॥ ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्ति

रुद्राष्टाध्यायी पृथिवी शान्तिरापुः शान्तिरोषधयः शान्तिः ॥ व्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेवाः शान्तिब्रह्म- शान्ति सङ्घर्ट. शान्तिः शान्तिर व शान्ति सा मा शान्तिरेधि ॥१२॥ ॐ सर्वेषां वा एष व्वेदाना रलो यत्साम सर्वेषामेवैनमेतद्वेदाना रसेनाभिषिञ्चति ॥ १३ ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः सुशान्तिर्भवतु सर्वारिष्टशान्तिर्भवतु ॥ अनेन कृतेन रुद्राभिषेककर्मणा श्रीभवानीशङ्करमहारुद्रः प्रीयतां न मम ॥ ॐ सदाशिवार्पणमस्तु ॥ इति स्वस्तिप्रार्थनामन्त्राध्यायः॥ -

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स्त्री-प्रकाश
८ अध्याय १७६ मन्त्र
शान्ति अध्याय २४ मन्त्र
स्वस्ति प्रार्थना अध्याय १३ मन्त्र
प्रथम अध्याय में-भाष कर्म मन की प्रशंसा १० मन्त्रों से है।
द्वितीय अध्याय में-मन चित्त फर्म के सम्बन्ध से १६ कला पुरुष
और ६ सम्बन्ध इन २२ मन्त्रों से पुरुप की प्रशंसा है।
एतीय अध्याय में-न्ददेव के यल की प्रशंसा है। सोमवर्ण से
अनलाफ भेद है। भोग कर्म और त्यागकर्म सोमवर्ण
में होता है। सर अर्थख्य सोम का है। इन्द्रियवल
इन्द्र से लेकर फर्म की समाप्ति १७ मन्त्रों से वृहस्पति
धान में हैं।
चतुर्थ अध्याय में-सूर्य प्राण की प्रशंसा है। सूर्य काल और
प्राण काल से १७ मन्त्रों से शरीर का आदि अन्त
होता है।
पञ्चम अध्याय में शरीर में १० इन्द्रिय १ मन एकादशकी रुद्र
संज्ञा है। ६ सम्बन्ध से ११ गुना ६६ मन्नों से खद्र फर्म
फी प्रशंसा है।

‘रुद्री प्रकाश
छठे अध्याय में सोम सम्पन्ध से सूर्य यायु और अग्निरूप
त्रिनेत्र रुद्र की प्रशंसा ८ मंत्रों से है।
सप्तम अध्याय में-9 मंत्रों से फर्म फल का सम्बन्ध है।
भटम अध्याय में-' में" (मेरो) की प्रशंमा है।५ तत्वों से मैं
और सांख्यमत से २४ तत्वों अथवा न्यायमतसे गुणों के
द्वारा मैं सर्वस्व रूप है। इन २९ मंत्रों से पुरुष जीव
की प्रशंसा होती है।
शान्त्यध्याय में शन्तिपाठ २४ मन्मों से है।
स्यस्ति प्रार्थनामन्त्राध्याय में-१३मंत्री से स्वस्ति (फल्याण) है।

दार्शनिक विचार
श्रीः
अथ रुद्रभेदाः
रुद्दकल्पद्रुमे--
शृणुश्व भो महाप्राज्ञ रुद्रभेदान्यदामि ते ।
रुद्राः पञ्चविधाः मोक्ता दैशिकैरुत्तरोत्तरम् ॥
साङ्गस्त्वाद्यो रूपकाख्यः सशीपों रुद्र उच्यते ।
एकादश गुणस्तद्वदुद्रिसंज्ञो द्वितीयकः ।।
एकादशभिरेताभिस्तृतीयो
लघुरुद्रका।
लम्बेकादशभिः प्रोक्तो महारुद्रश्यतुर्थकः ॥
पञ्चमः स्यान्महारुद्वैरेकादशभिरन्तिमः ।
अतिरुद्रः समाख्यातः सर्वेभ्यो झुत्तमोत्तमः॥
श्री रुद्र भगवानके पाँच भेद आचार्योंने कहे हैं। साग अर्थात् हृदय,
शिर, शिखा, कवच, नेत्रादि पञ्चाङ्ग के सहित रुद्राध्यायका सम्पूर्ण पाठ
करके पुनः महच्छी एवं लटाका (अथवा पक्षान्तरमें धमकाध्यायका)
पाठ और शान्यध्यायका पाठ करे। यह प्रथम प्रकार है। इसका नाम
सम्पूर्ण सदाध्यायके अन्त में चमकानुवाकी आवृत्ति लगाकर एकाद.
सावृत्ति को यह द्वितीय प्रकार है। इसका नाम 'रुद्रि' है । इसीको
'रुद्वैकादशिनी' भी कहते हैं ।
इसी रुद्रकादशिनीकी ११ आवृत्ति करना (आदि) यह तृतीय
प्रकार है और इसका नाम 'लघुरुद्र' है।
लघुरुद्रकी ११ भावृत्ति करना (अर्थात् रुद्रिकी १९१ भावृति) यह
चतुर्थ प्रकार है। इसका नाम 'महारद है।
महारुद्रको ११ भावृत्ति करना (अर्थात् रुद्रिकी १३३. भावृत्ति)
यह पम प्रकार है। इसका नाम 'शविरूद' है। इस पानों में प्रत्येक

रुद्रभेदाः M 1 उत्तरोत्तर उत्तम माना गया है। जैसे . पहलेसे दूसरा, दूसरेसे वीसरा, तीसरेसे चौथा, और चौथेसे पाँचवाँ प्रकार उत्तम है। अथ रुद्रैकादशिनी जप प्रकारः रुद्र कल्पद्रुमे परशुरामः- साझमाद्य जपेदुद्रं केवलानि नवान्तरे सासशीर्पकं चान्त्यं निरङ्गमिति केचन ॥ शान्तिरले कौशिक दौधायनी- जपित्या सर्वरुद्रांश्च चमकाद्य ततो जपेत् । पुनरेतजपेत्सर्वे द्वितीयं चमकं - तथा ॥ पचमेकादशगुणान् क्रमेण चमकांस्तथा। रुद्रकादशिनी त्वेपा सर्वकामफलप्रदा ॥ भर रुदैकादशिनीका प्रकार कहते हैं । पहिले रुद्राध्यायका हृदयादि पञ्चागों के साथ पाठ करे। फिर (महच्छी, जटाका, पाठ करके चमकाध्यायका प्रथम अनुवाक (४ मन्त्र) कहे। मध्यमें केवल ९ बार रुद्राध्यायका पार करे । प्रत्येक पाठके अन्त में चमकाध्यायका एक एक अनुवाक कहना चाहिये। इस प्रकार, रुद्राध्यायका दश पाठ हुआ। पुनः ग्यारहवाँ पाठ हृदयादि पञ्चाङ्गों के साथ, अयवा केवल, करके मन्तिम चमकानुवाक पढ़े। चमकरध्याय और महच्छीपके पाठमें विकल्प है, पर, इसमें प्रचलित परम्परा चमकानुवाइके साथ ही रुद्राध्यायके पाटकी है। विक्रम होनेपर भी लोग महच्छीका (तथा जटाका भी) पाठमात्र ही करते हैं, हवनादि उससे नहीं होता, यही शिष्ट सम्प्रदाय है। ११ भावृत्ति पूरी होनेपर शान्त्यर्थ शान्यध्यायका पाठ करे । फिर 'सद्योजात' भादि इन पाँच मन्त्रों से पञ्चवरद्र की स्तुति कर 'ॐ शान्तिः ऐसा ३ चार कहे। समाप्तिमें भी पूर्वोक्त प्रकारसे हृदयादि पडहन्यास करे। प्रत्येक रुगाध्यायके भादि भोर मन्तमें ॐ भूः ॐ भुवः स्वः ॐ इस प्रकार सप्रणव यादति लगाना चाहिये। 1 , दार्शनिक विचार अथ रुद्रस्वरूपम् हम कल्पद्रुमे वृहस्पराशरा- शिखा तस्य तु रुद्रस्योत्तरं नारायणं स्मृतः । शिरर पुरुषसूक्तं च शिवमंकल्पकं च हृत् ॥ फयचं चाऽप्रतिरथं नेनं विभ्राड् बृहत्स्मृतम् । शतरुट्रियमांच देवस्यारत्रं प्रकल्पयेत् ॥ सव- पूर्वमङ्गानि संजप्य रुद्राध्यायं ततो जपेत् । तदन्ते सप्तमन्त्रांश्च 'ययंसोम' महच्छिरः ।। उग्रश्चेति यजुर्मन्त्र जटामाहुर्जपेदिति ॥ अप यहाँ श्री रुगभगवानका स्वरूप वर्णन करते हैं। अनयः सम्भृतः' इस १० मन्त्रसे अध्याय समाप्ति पर्यन्त मन्त्र 'उसर पारायण सून' कहलाते हैं, यह रुद्रभगवानकी शिखा है। द्वितीयाध्यायके भारम्भसे १६ मन्त्र पुरुष सूक्त' हैं, यह रुद्रमावानका मस्तक। अधमायायमें 'यमानतः' इस पन्चम मनसे अध्याय समाप्ति पर्यन्त मन्त्र 'शिवसंकल्पसूक्त' है यह रुद्र भगवानका हृदय है। तृतीयाध्यायके भारम्भसे १२ मन्त्र 'अमतिरथसूक्त' कहलाते हैं। यह कवच हैं। चतुर्थाध्याय सम्पूर्ण 'सौरसूत' कहलाते हैं, यह रुद्र भगवान के नेत्र हैं । 'शतरुद्रिय' अर्थात् सम्पूर्ण पञ्चमाध्याय रुद्रमंगवानके अस्त्र हैं। इसीको 'रुद्राध्याय कहते हैं। पूर्व का पाठ करनेके बाद सम्पूर्ण पठाध्याय जो कदमगवानका महत् शिर, एवं समाध्याय जो भगवान की जटा है, इसका भी पाठ करना चाहिए। अथ रुद्रफलानि सत्र आयालश्रुति:- किं जप्येनामृतत्वं नो हि शतरुद्रियेणेत्येतानि हवा अमृतनामधेयैई वा अमृतो भवतीति । -- .

. 7. रुद्रमेदो कैवल्योपनिषदि- यः शतरुद्रियमधीते सोऽमिपूतो भवति स्वर्णस्तेपात्यता भवति कृत्याकत्यात्पूतो भवति । अनेन , शानमाप्नोति संसाय.. र्णवनाशनम्। तस्मादेन विदित्यैव फैवल्यफलमचुत इति । रुद्रस्यविष्यम्: बोधायन:- अथातः पञ्चाङ्गरुद्राण जपहोमार्चनविधि व्याख्यास्यामः। अर्चनमभिपेक इति महार्णवः ।। अभिषेकात्मक रुदचिन्तामणी-समाप्य रुद्रपद्धतौ च- जलेन वृष्टिमाप्नोति च्याधिशान्त्यै कुशोदकैः । दना च पशुकामाय धिया इक्षुरपन च । मध्वाज्येन धनार्थी .च मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा। पुत्रार्थी , पुनमाप्नोति पयसाञ्चाभिषेवनात् ॥ जपात्मक पा-शिवगीतासु- यस्तु रुद्रं जपेन्नित्यं ध्यायमानो ममातिम्। स तेनैव च देहेन शिवः सतायत ध्र यम् ॥ पायवीये- सर्वपु ग्रहदोपेषु दुःस्वप्नाद्भुतदर्शने । जपन् रद्दान्तकाद्वनःसव दापैः प्रमुच्यत ।। रुद्र कपटुमे- नमकं चमकं चैव पौरुष सूक्तमेव च। नित्यं त्रयं प्रयुआनो-ब्रह्मलोके महीयते ॥ 7 । . 1

दार्शनिक विचार
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होगात्मकः
विष्णु धर्मोत्तरे--
रुद्राणां च तथाजप्यं सर्वाधयिनिषूदनम् ।
सर्वकामकरोहोमस्तथा सर्वत्र शान्तिदः ॥
यजाविकानामश्वानां कुलराणां तथा गवाम् ।
मनुष्याणां नरेन्द्राणां चालानां योपितामपि ॥
ग्रामाणां नगराणां च देशानामपि भार्गव ।
मरके समनुप्रासे रिपुजे च तथा भये ॥
रुद्रहोमः पराशान्तिः पायसेन धृतेन चा ॥
इत्यादि वचन से पूर्वोक्त पक्षभेदात्मकरुंद्रका अनुष्ठान तीन प्रकार से
होता है। अभिषेकात्मक, जपारमक, होमारमक, ये तीनों ही प्रकार उसम
हैं। तीनोंके फल ऊपर बताये गये हैं। रुदानुष्टानसे पढ़कर पीड़ा और
संकष्ट निवारक, इहलौकिक कल्याण और पारलौकिक श्रेय प्रदान करने-
वाला कोई दूसरा साधन हमारे यहाँ नहीं है । 'भधिकस्याधिकं फलम्।
इस न्यायसे जो जितना अधिक करेगा उसे उतना ही अधिक फळ
मिलेगा। मुख्य प्रश्न श्रद्धा और विधिका है। विधि संक्षेपमें ऊपर पता
दी गयी है। श्रद्धा अपनी अपनी है तदनुरूप फल भी मिलता है-'यो
यच्छूद्धः स एव सः।'
यह रुद्रानुष्टान द्विजाति मानको स्वयं अथवा अपने प्रतिनिधिभूत
वैदिक ब्राह्मणों के द्वारा करना-कराना चाहिये। कहा भी है-
स्वयं कर्तुमशकश्वेथिग्भिः फर्मकारयेत् ॥
केदारनाथ शर्मा
(अग्निहोनी)
.

उपोद्घात . पूर्वाचार्योंके अनुभव और उपदेशसे लाभ उठाना तथा अपने अनुभव और मननका फल मागे भानेवालोंके लिए छोड़ जाना, यही मननशील मनुष्यका स्वभाव है, और यही उन्नतिका मुख्य साधन । पूर्वजोंके पदचिन्होंका अनुसरण कर हम मनुष्य हुए, हमारा कर्तव्य है फि पीछे आनेवालोंके लिए कुछ चिन्द छोड़ जाय, जिसमें ये यदि चाहे तो पथभ्रए होनेसे बचें, तथा स्वयं सुखी होकर औरोंको भी सुखका मार्ग दिखा सकें। यह छोटीसी पुस्तफा लिखनेका यही हेतु है। मैं विद्वान् नहीं हूँ, न मुनि, न. तपस्वी; संसारमें रहते हुए, पूर्वकाँका भोग करते हुए विद्र- रसंगसे जो कुछ शान हुआ, श्रुति-स्मृतिका जो अर्थ समझमें आया, और दीर्घकाल के अनुभवसे जो कुछ मालूम हुआ, वहीं: आज इस पुस्तकद्वारा नम्रतापूर्वक नर-नारायणकी सेवामें उप.. १२ " दार्शनिक विचार स्थित कर रहा हूँ। यह मेरे पक्षमें केवल धृष्टता है, अथवा इसका कुछ उपयोग भी है, इसका निणय करनेके अधिकारी तो पाठक ही हैं। जिसे आजतक अपना समझता रहा यही जिसमें सबका हो जाय, आत्मयुद्धि परमात्मबुद्धिमें मिलकर कृतकृत्य हो, यही आशा इस प्रयासकी प्रेरिका है। आत्मा घटघटमें व्याप्त है। वही सर्वत्र दीखता है, और प्रसिद्ध है । फिर उसके विचारको आवश्यकता ही क्या है ? इसका सामान्यतया उत्तर यह है कि जो बहुत परिचयका होता है, जो अत्यन्त निकट होता है, उसीका विचार सबसे कठिन होता है। जौहरी हीरा पहचान सकता है पर अपने आपको पहिचानना यड़ा कठिन है। यह अत्यन्त कठिन है इसीसेच तिने भी इसपर जोर दिया है; यथा-"आत्मा या अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (वृ० आ० ४५) क्या इसको जानना चाहिए, इसका उत्तर भी यही श्रुति देती है-"आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञान- नेदं सर्व विदितम् ।" (आत्माके देखने सुनने मनन करने और जाननेसे सवका मान होता है।) आत्मा सर्वव्यापक है, इसलिए उसको जाननेका यत्न करनेकी आवश्यकता नहीं, यह धारणा विलकुल भ्रममूलक है, परन्तु उसको जाननेसे सब जाना जाता है-जाननेको और कुछ याकी नहीं रह जाता, अतएव उसे जाननेका यत करना प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य है। यह एक कारण हुआ। दूसरा कारण यह भी है कि शास्त्रों में आत्माको प्रल भी कहा है. पुरुष भी कहा है, और जीव भी। इन भेदोंको समझकर सन्देह-रहित होनेके लिए भी 'आत्म-विचार' आव. श्यक है। . , उपोद्धात -- आत्मा अदृश्य और व्यापक है। संसार वा सृष्टिका जवं व्यापार होता है तो यह व्यापाररूपमें वा व्यापारके लिए दीखता है। उस समय उसके दो भाव होते हैं। जो दीखता है वह "पर" होता है, इसलिए परकी आत्माको परमात्मा और शरीरकी आत्माको केवल यात्मा कहा जाता है; यही व्यापार है। इसको नैयायिकोने द्रव्य कहकर दो भागों में विभक किया है। उन्होंने परमात्माको परमाणु और आत्माको अणु कहा है। प्राण और मनसे विशिष्ट होनेपर शरीरात्माको ही जीवात्मा भी कहते हैं । सृष्टिन्यापारके लिए वही समस्त रूपाँको धारण करता है। पृथिवी, अन्तरिक्ष, दिक् , नक्षत्र आदि सयको एक साथ लेकर अर्थात् उसके समष्टि-रूपको ब्रह्म कहते हैं। यही आदित्य रूपसे दिखाई देता है। शरीर-आत्माको हम आँखोंसे देखते हैं। उसीको आदित्य और सोलह-कलायुक्त पुरुष कहा जाता है। सामान्य और एकरूपसे यही ब्रह्मा है । यही पुरुष रूप का विभाग करता और कराता है। तथा शरीर रूपी पुरीमें रहने के कारण पुरुष कहलाता है। एक भावसे सोलह कलाओंसे युक्त होनेके कारण यही (एक) मादित्य पुरुष है, और वही विभक्त होकर अनेक भावों में दीखता है तो अनेक-पुरुष कहलाता है। गुण फर्म जैसा छोटा बड़ा होता है, पुरी भी घेसी ही छोटी बड़ी अनेक प्रकारकी होती है। उस पुरीमें प्राण और मनसे गुक्त होनेपर यही पुरुष जीव कहलाता है। आत्माके नामके ये ही चार भेद शास्त्रोंमें प्रमाणित हैं। । जो अदृश्य रहता है यह आत्मा है। जो सयको सय रूपोंमें दीखता है वह ग्रहा है। गुण कर्मानुसार छोटी या बड़ो पुरीम रहने के कारण प्रहका नाम पुष्प होता है। यही पुरुष पुष्पार्थके - दार्शनिक विचार द्वारा अर्थकी सिद्धि कराता है। सांख्य शास्त्रका यही मत है। उसको फलके साथ जो युक्त करता है उसे ईश्वर कहा है । मन और प्राणके द्वारा जो भोग करता है उसे जीव कहते हैं। फिर वही पुरुष साक्षीरूप होकर जीपको, उसने जैसा समवाय (संचय ) किया हो तदमुरूप, फल देता है; यही भेद है। और विचार फरनेसे अभेद हो जाता है । जो भेदरहित होकर, सारे भेदोंमें अभेद देखता हुआ केवल शरीरसे क्रिया करता है वही आत्मदर्शी वा आत्मज्ञानी है। आत्माको ॐ और शरीरको उद्गीथ कहते हैं। ग्रह एक है। सर्वज्ञ और सर्वशक्ति-सम्पन्न है। मकड़ी जैसे अपने ही सूत्रसे अपना घर बना लेती है उसी तरह वह भी आप अपनेसे इस विश्वका निर्माण करता है। यही पुरुप, ईश्वर वा सर्वसाक्षी होकर अपने अंशभूतजीयको उसके प्रारब्धके अनु- सार अर्थ की प्राप्ति कराता है। जीव स्वयं भोक्ता और दूसरेके प्रति भोग्य है। सृष्टि के लिए ईश्वरने दाम्पत्यकी सृष्टि की है। ब्रह्मांशभूत- जीव उसका सूत्रपात करता है। उससे नाभिचक्रके द्वारा जरायुपटकी उत्पत्ति होती है जो गर्भमें बच्चेकी रक्षा करता है। जरायुपटसे आच्छन्न वही देह जब बाहर आता है तो अनेक चेष्टाओंका आश्रय होता है, अतः उसे घट कहते हैं। उसीको शरीर, पुरी और कर्म भी कहते हैं। उक्त शरीररूपी पुरीमें विहार वा शयन करनेके कारण ब्रह्मको पुरुप कहते हैं। स्थावर जंगम समस्त सृष्टिका प्रम यही है। यही एक ब्रह्म अपने सूत्र- द्वारा समस्त विश्वमें व्याप्त होकर घटघट में प्रकाश करता है। अन्तमें निवेदन यही है कि पाण्डित्यका परिचय देने के लिए -- 1 उपोदात यह प्रयास नहीं किया गया है। किन्तु जिन्हें वेदान्तसे रुचि है, पर समयका अभावं, और विद्वानोंका संग प्राप्त न होने के कारण उसके अध्ययनसे वंचित रह जाते हैं, उनको जिसमें हिन्दी भाषाके द्वारा वेदान्तके रहस्यों का ज्ञान हो जाय इसलिये यह यन किया गया है। इसमें सफलता कहाँतक प्राप्त हुई है, इसका निर्णय तो पाटक ही कर सकते हैं। इस पुस्तकसे यदि एक भी जीवका उद्धार हुआ, यदि अधिकं गहरे पानी में पैठकर रत निकालनेकी इच्छा उत्पन्न हुई, तो मैं अपने प्रयासको सफल समझूगा। वलदेवदास विरला भ दाशनिक विचार शारीरक मीमांसा शारीरक मीमांसा शरीरमें शानेन्द्रियोंसे देखता है, कर्मे- न्द्रियोंसे क्रिया करता है और मनसे उसे बनाता है। क्योंकि आकाश, शब्द और रूप इन तीन गुणोंका नाम इहा है (पञ्च- तत्व) शब्दरूप है और रूपसे ६ रस बनते हैं। रस रूप और रंगके भेदसे धनते हैं। ६ रस+७ रूप+५ तत्व ये मिलकर १८ तत्व हुए, यही १८ ब्रह्म के सूत्र हैं। आत्मा, पुरुष और जीव ये तीनो शरीरमें रहते हैं । त्रिविध ज्ञानेन्द्रियोंके व्यापारसे मुक्ति होती है । और त्रिविध कर्मेन्द्रियोके त्यागसे पुनः शरीर बनता है और दूसरा शरीर प्राप्त होता है। १८ के साथ इन ६ व्यापारीका सम्बन्ध होनेसे २४ तत्त्व होते हैं। इनका व्यक्त भोग होता है और कर्मेन्द्रियों के त्यागसे अव्यक्त में रहता है। इन्हीं ६ सम्बन्धोंके द्वारा झरनेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियांसे कर्मफल- का भोग होता है । और क्रिया कर्मके दूसरे शरीरमें जाती है। यही कर्मकी उत्पत्ति और त्यागसे मोक्ष और वन्ध होता है। यही शारीरक मीमांसा है। . ब्रह्मसूत्रके ४ अध्याय हैं इसके प्रत्येक थध्यायमै चार-चार पाद हैं । वही प्रत्येक पादके आदि के सूत्र ये १६ सूत्र हैं । ब्रह्म संसारका आधाररूप है। भेदसे अपने-अपने अङ्करके स्वरूपका नाम जगत् (शरीर) है। वही अङ्कर सूत्ररूप है। भूतकालका ।

दार्शनिक विचार 1 ब्रह्मसूत्र के १६ सूत्र 71 १ अथातो ब्रह्मजिज्ञासा [प्रथमाध्याये प्रथमपादः] २ सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् । द्वितीयपादः] ३ धुम्वाद्यायतनं स्वशब्दात् । तृतीयपादः] ४ आनुयानिकमप्येकेपामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्त- गृहीतेर्दर्शयति च । [ चतुर्थपादः] ५ स्मृत्यनवकाशदोपप्रमङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाश- दोप प्रसङ्गात् । [द्वितीयाध्या० प्रथमपादः]] ६ रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् । द्वि० पा.] ७ न वियदश्रुतेः १. पा.] ८ तथा प्राणा: च० पा०] ९ तदन्तरप्रतिपत्ती रहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाम्याम् [ तृतीयाध्याये प्रथमपाद:] १० सन्ध्ये सृष्टिराह हि [ द्वि० पादः] ११ सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेपात् [तृ.तृ. पा०) १२ पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति बादरायणः [३० च० पा०] १३ आवृत्रिसदुपदेशात् [चतुर्थाच्या० प्र० पा०] १४ वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच [च० अ० द्वितीयपादः] [ [ ब्रह्मसूत्र के १६ सत्र १५ अचिरादिना तत्प्रथिते [च० अ० तृतोयपादः] १.१६ सम्पयाविर्भावःस्वेन शब्दात् [च० अ० चतुर्थपादः ] S १६ ब्रह्मसूत्रों की व्याख्या जयतक वेदान्तदर्शनके आद्योपान्त विषयोंका शान नहीं होगा, तयतफ उसका रहस्य भी पाठकोंके हृदयङ्गम न,. न. होगा। एतदर्थ यदि सम्पूर्ण ब्रह्मसूत्रोंका पर्शलोचन किया जाय, तष भी यह बहुत बड़ा होनेसे सुगमताके साथ थोड़े समयमें पढ़ा नहीं जा सकता। अतः संक्षेप में पर्याप्त ज्ञान के लिए ब्रह्मसूत्रके ४ अध्यायके १६ पादोंके थम १६ सूत्रोंकी यहाँ संक्षितरूपसे व्याख्या की गई है । आशा है कि जिज्ञासुओंको इससे 'स्थाली- पुलाफ' न्यायसे ग्रह्मदर्शनका पर्याप्त विषयका शान हो जायगा । १-अथातो ब्रह्मजिज्ञासा । (अध्याय १ पाद स्था) अथ अनन्तर-नित्यानित्ययस्तुविवेक, पेहलौकिकपारलौ- किकमोगविराग, शमादिसाधनसम्पत् (शम, दम, उपरति, तिति. क्षा, समाधान, थक्षा), मुर्मुक्षुत्व इन साधनचतुष्टयोंके प्राप्त्य- अतः अग्निहोत्रादिधर्म के अनित्यफलफ होनेके कारण- ब्रह्मजिशासा-ब्रह्मके जानने की इच्छा होती है। २-सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् । (म.पा.२ ०.) मनोमयत्यादि धासे ब्रह्मही उपासनीय है, जीय नहीं। क्योंकि सर्वत्र सम्पूर्ण वेदान्तयाक्यों में ब्रह्मशब्दका आलम्यन जग- कारण प्रादी प्रसिद्ध है। और श्रुतियोंसे भी ब्रह्महीका उप- देश। - नन्तर।

दार्शनिक विचार ३-धुभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ।। (अ.पा. ३." 'यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम्' इस मन्त्रमें शुभ्वादि-स्वलोक तथा पृथिवी आदिका आयतन ( आधार) जो सुना जाता है यह ब्रह्म ही है । वायु या प्रधान प्रकृति नहीं है क्योंकि-'तमेवैकं जानथ आत्मानम् ' इस श्रुतिमै आत्म शब्दहीका ग्रहण है, वाय्वादिका नहीं। ४---आनुमानिकमप्येकेपामिति चेन. शरीररूपकविन्यस्त- गृहीतेर्दर्शयति च । (म० १ पा० ४ सू०.) "जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रसे इस प्रपञ्चका जिससे उत्पत्ति हो, जिसमें स्थिति हो और जिसमें लय हो वही ब्रह्म है, ब्रह्मका लक्षण कह आये हैं, परन्तु यह लक्षण तो कपिलादि- -सम्मत प्रकृति अजामें भी है । इस दोपका निराकरण घेदसम्मत प्रधानकी कारणता नहीं है यह पूर्वमें दिखला आये हैं। परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि कठोपनिषत्के; 'महतः परमव्यक्त- मव्यक्तात्पुरुषः' इस वचनसे प्रधानको कारणता सिद्ध होती है। यही बात 'आनुमानिकमध्येकेपाम्' कपिलादिकोंके मतसे अनु- मानसिद्ध जो प्रधानका कारणत्व है वह-श्रुति-स्मृति-शब्द- प्रमाणसिद्ध भी है। यह कहकर खण्डन करते हैं कि यह कठका वचन लोकसिद्धार्थप्रतिपादक है, अपूर्व नहीं। क्योंकि रूपका- •लकारसे विन्यस्त शरीरका ही अव्यक्त शब्दसे काठक वचनों में ग्रहण किया है। यथा--- आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । युद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रमहमेव च ॥ यह . - .

। ब्रह्मसूक्षके १६ सूत्र इन्द्रियाणि हयानाहुः विपयाँस्तेपु गोचरान् ।' :- आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं मोक्रेत्याधुर्मनीषिणः ॥ इस रूपकके यादही का यह वचन है- इन्द्रियभ्यः परा खर्या अर्येभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु पग बुद्धिबुद्धरात्मा महात्परः॥ महतः परमव्यक्तमव्यतात्पुरुषः पुरपानपरं किञ्चित्सा काप्टा सा परागतिः॥ यहाँ पूर्वोक्तरूपकमें कहे गये ही इन्द्रियादि ही उपक्रमवश लिये गये है। अतः अव्यक्तशब्देन परिशिप्यमाण शरीर है, प्रधान नहीं। प्रथम अध्यायमें ब्रह्म जगदुत्पत्तिका कारण है, जैसे. मृत्सु. पर्णादि घट फुण्डलादिफा । उत्पन्न जगत्का नियन्ता होनेसे स्थितिका कारण भी यही है, जैसे ऐन्द्रशालिक-इन्द्रजालका फैले हुए जगत् उसी में लय होनेसे संसारका भी यही कारण है, जैसे पृथिवी पार्थिव प्रपञ्चका यह यात दिसला चुके । अय द्वितीय अध्याय में ग्रामको जगत् कारण माननेसे अन्य सिद्धान्ता- चलम्बियोंको स्मृतिम्यायका विरोध प्रतीत होता है, उसका निराकरण तथा प्रधानवादियोंका न्यायामासोपण इत्यादि कहेंगे । प्रथमस्मृतिघिरोधपरिदारके लिए यह प्रथम सूत्र है। ५-स्मृत्यनवकाशदोपप्रसङ्ग इति चेन्नान्य- स्मृत्पनवकाशदोपप्रसङ्गात् । (म. २ पा. १०.) 'ऋषिप्रस्तं कपिलं यस्तमझानैर्विमर्ति जायमानं च पश्येत्' (ये०५।२) इस बचनके अनुसार कपिलका मत भयधार्य नहीं .

दार्शनिक विचार हो सकता, अतः प्रधानको ही जगत्का कारण मानना चाहिए, ब्रह्मको नहीं, क्योंकि उक्त स्मृतिका विरोध होगा। इसी शङ्काको इस सूत्रमें उठाकर समाधान भी किया है- स्मृत्यनवकाशदोपप्रसङ्गः --उपयुक्त स्मृतिवाक्य अनवका- श हो जायगा, ब्रह्मको जगत् फारण मानने से यह यात ठीक नहीं है क्योंकि अन्य म्मृतिवाक्योंका अनवकाशरूप दोष प्रसक्त होगा । यही बात इति चेनान्यस्मृत्यनवकाशदोपप्रसङ्गात् इस सूत्रोत्तरार्द्धसे कही गई है। यहाँ स्मृतिपदसे श्रुति स्मृति दोनों- का ग्रहण है। यद्यपि पहले ही सांख्या दिमतका निराकरण कर दिया है, तथापि पूर्वमें केवल शब्दप्रमाणमारसे मतान्तरका निराकरण किया गया है। अब युक्तियोंसे भी वेदान्तमतका स्थापन तथा मतान्तरका निरसन ही इस पादका विषय है, वही युक्ति इस सूत्रले दिखलाते हैं। ६-रचनानुपपत्तेश्च नानुशनम् । (अ०२पा०२सू०१) प्रधानवादी कहते हैं, कि घट शराव इत्यादि वस्तु जैसे मृदात्मक वस्तुसे अनुस्यूत है, उसी प्रकार सर्यवस्तु सुखदुःख- मोहात्मक प्रकृतिसे अनुम्यूत है, क्योंकि प्रकृतिले अन्वित है। इसपर ब्रह्मवादी कहते हैं कि यदि दृष्टान्तवलसे प्रधान सिद्ध करते हो तो कहीं भी अचेतन वस्तु बिना चेतनके पुरुषार्थ साधक विकार जातको यनाते हुए नहीं देखा गया है। किन्तु मोह मासाद शय्या इत्यादि विशिल्पियाँद्वारा ही बनाये गये सुखदुःखप्राप्ति परिहारयोग्य होते हैं। उसी तरह सकल पृथि- व्यादि प्रपञ्च याहापदाथ तथा आध्यात्मिक शरीरादि यड़े बुद्धि. मान लोक प्रसिद्ध असंख्य शिल्पियोंसे भी नहीं बनाये जा ब्रह्मसूत्रके १६ सूत्र सकते, अचेतन प्रकृतिकी क्या गणना। अचेतनसे रचना जग- वकी हो नहीं सकती, अतः चैतन्यस्वरूप ब्रह्म अवश्य मानना चाहिये। ७-न वियदश्रुतेः। (१०.पा. ) जगत्की उत्पत्ति तथा उसके क्रमके विषयमें अनेक मत हैं। उनमें आकाशकी उत्पत्ति नहीं होती यही पूर्वपक्ष दिखलाते हुए घेदान्तियोंने ब्रह्मातिरिक पदार्थमात्रको जन्य तथा नश्वर माना है। यही पूर्वपक्ष लेकर यह सूत्र है "न वियदश्रुतेः" आकाशकी उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि उत्पत्तियोधक कोई श्रुति नहीं है। अन्तमें उत्पत्तियोधक श्रुतियां दिखलाकर उसकी उत्पत्ति सिद्ध ३ . .. तथा प्राणाः। (K. २ पा० ४ सू०) कुछ ऐसे वैदिक चाफ्य मिलते हैं जिनसे प्राणफी अनुत्पति सिद्ध होती है। कुछ ऐसे भी वचन मिलते हैं जिनसे प्राणकी उत्पत्ति सिद्ध होती है। इस विप्रतिपत्तिके इटानेके लिए यह सूत्र (तथा प्राणाः) का उपन्यास है। जैसे आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति है, उसी प्रकार प्राणको उत्पत्ति भी घेदवाप्यास उपलब्ध है। यथा--(पतस्मादात्मनः सर्व प्राणा) एतस्मासायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । (मु० उ०२१॥३) सप्राणमएजत् (प्र० ६५) यदी तया शब्द उत्पत्तियाफ्यस्थ लोकादिकोंका या पियदादिका परामर्शक है।

दार्शनिक विचार ९-तदन्तरप्रतिपत्तौ रहति सम्परिष्वक्ता प्रश्ननिरूपणाभ्याम् । (भ.३ पा०१सू०." द्वितीयाध्यायमें अद्वैतसिद्धान्तमें किए हुए पूर्वपक्षियोंसे स्मृतिन्यायविरोधोंका परिहारादि विपय कहकर जीवव्यतिरिक्त जीवोपकरणीभूत तत्वोंकी ब्रह्मसे उत्पति बतलायी गयी है। अव तृतीयाध्यायमें उपकरणोपहित जीवका संसरणप्रकार ब्रह्मका कालत्रयायाधितत्वादि अनेक विषयोंका वर्णन किया गया है। उनमें प्रथमपादमें पञ्चाग्निविद्याको लेकर संसारगवि- भेद दिखलाया गया है। जीव प्राण, इन्द्रियाँ तथा मनके साथ अविधाकर्म, पूर्वप्रज्ञा (जन्मान्तरसंस्कार) परिग्रहपूर्वक पूर्व- देहको छोड़कर देहान्वर को प्राप्त करता है। अब इसमें यह शङ्का होती है कि क्या जीय इस देहको छोड़कर देहान्तरका वीज सूक्ष्म भूनोंके सहित जाता है या सूक्ष्म भूतसे रहित छोकर जाता है। स पतास्तेजो मात्रा समभ्याददानः (g- ४१) इस पचनसे तेजोमात्र करणोंका उपादान प्रतीत होता है । भूत सूक्ष्मफा उपादान किसी मन्त्रसे सिद्ध नहीं होता, इस पूर्वपक्षके उत्तर में यह सूत्र है~-'तदन्तरप्रतिपत्तो रहति सम्परिश्वतः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् । तदन्तरप्रतिपत्ती-देहा. ग्तरप्राप्तिम देह धीजभूत सूक्ष्म भूतॉसे परिष्वक्त होकर जीव इस शरीरसे जाता है, क्योंकि वेदों में एतद्विषयक प्रश्नोत्तरसे यही प्रतीत होता है । यथा- ब्रह्मसूत्रके १६ सूत्र प्रश्न-"वेत्थं यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुपवचसो भवन्ति"। प्रवाहण राजाने श्वेतकेतुसे पूछा कि आप जानते हैं कि सायं प्रातर् अग्निहोत्र में दी हुई आहुतियों में पाँचवीं आहुति पुरुष यन जाती है। उनके उत्तर न देनेपर उनके पितासे पूछा। पिताने उत्तर दिया कि वे आहुतियाँ श्रद्धापूर्वक देनेसे श्रद्धा नामको सूक्ष्म जलरूप होकर धु लोकमें जाकर सोम -चन्द्रमा धन जाती हैं। फिर चन्द्रमाद्वारा पर्जन्याग्निमें हुत होकर वृष्टिः रूपमें परिणत होकर अन्न यन जाती है। तदनन्तर पुरुषमें हुत होकर रेतः (घीर्य) यन जाती है। फिर योपित् (स्त्री) में पाँच बार हुत होनेपर आप (जल) होकर पुरुष यन जाती । है। इससे स्पष्ट हो गया कि जीव सूक्ष्मभूत (जल) से परि- ये.टत होकर देहान्तरप्राप्ति के लिए जाता है। -सन्ध्ये सृष्टिराह हि। (भ. ३ पाद० २ ०.) पूर्वपादमें जीवका संसारगतिभेद फहकर अब इस द्वितीय । पादमें उसकी भवस्याविशेष मादिका वर्णन करेंगे। जीवकी स्वप्नावस्थाको लेकर 'स यत्र प्रस्वपित्ति' वृ० (४९) इस श्रुतिके उपक्रम "न तत्र रया न रयशोगा न पन्थानो भवन्त्यय रपान रथयोगान्पयः एजते" यह श्रुति कही गई है। इस पूर्व पक्षप्रदर्शकश्रुतिसे सिद्ध होता है फि स्वप्नावस्थाको सृष्टि सत्य है। इसी पूर्वपक्षका समर्थक 'सन्ध्ये सृष्टिराह हि' यह सूत्र है। समय-स्वप्नस्थानमें--एप्टेः रयादिनिर्माण सत्य है । फिर उत्तरपक्षमें ३ सुझसे कहा है कि स्वप्नमें माया अनादिवास- .

दार्शनिक विचार नामात्रसे रथादिकी प्रतीतिमात्र है। क्योंकि वहाँ रथादिनिर्मा- णका देह देशमें स्थान नहीं, सामग्री नहा, कैसे पास्तविक स्थादिकी रचना क्षणमात्रमें हो सकती है। अतः वह सृष्टि असत्य है । यह सय वर्णन वैराग्यरूप साधनकी सिद्धिके लिये किया गया है। पूर्वपादमें तत् त्वं पदार्थ का निरूपगपूर्वक ब्रह्मविचार हो गया। अब इस तृतीय पादमें प्रतिवेदान्त अर्थात भिन्न २ उप- निपदोंमै भिन्न भिन्न ब्रह्मज्ञान वर्णित है उसोका विचार इस पादमें करेंगे। क्या वेदान्तभेदसे ब्रह्मविज्ञानका भेद है या नहीं? इसपर पूर्वपक्षरूपमें विज्ञानका तैत्तिरीयक, वाजसनेयक, कौथु- मक इत्यादि नामभेद, रूपभेद जैसे कोई प निविद्यामें छठवाँ अति भी मानते हैं, और कोई पाँच ही मानते हैं। एवं कर्मभेद" भी मिलते हैं। इस तरह प्रतिवेदान्त विधानभेद पतला कर सिद्धान्त किया है कि- . ११.-"सर्ववेदान्तप्रत्पयं चोदनाद्यविशेषात्" । - . (म०३ पा० ३ सू०१) .सब वेदान्तों में प्रत्यय-विज्ञान एक ही है। जैसे अग्निहोनमें शाखाभेद होनेपर भी पुरुषप्रयत्न एकसा ही रहता है, उसी प्रकार नाममेदसे विज्ञानभेद यद्यपि प्रतीत होता है तथापि उसका स्वरूप एक हो है। इसी तरह पञ्चाग्निविद्या, वैश्वा: नरविद्या शाण्डिल्यविद्याओं में भी ऐक्य ही है। भेदका प्रयोजक चोदनाभेद ही होता है। यहाँ प्रतिवेदान्त में चोदना एक ही है। यही उपयुक्तसूत्रमें कहा गया है।

ब्रह्मसूत्रके सूत्र "चोदनायधिशेगत्" इति । चोदना पुरुषप्रयला पुरुषके व्या- पारही यहाँ चोदना दिसे विवक्षित है । वह संघ शाखाओं में एक ही है। पूर्वपादमें परापयविद्याका स्वरूपनिरूपम हो चुका । अब वे विद्याएं करि हाकर पुरुषार्थ (मोक्ष) का साधक हैं या स्वतन्त्र रूपसे इस सन्देहका दूर करने के लिये यह सूध १२-पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति वादरायणः ।। (म०३ पा० ४ सू०) अतः वेदान्तविहित मात्मवान स्वातन्त्र्येण मोक्षंको सिद्धि होती है कतिया नहीं।"शब्दात्" तरति शोकमात्मविद् (छा० ७१॥३) ब्रहाविदामांति परम् । ते २११) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्मशानकी साक्षात् माक्षसाधकता सिद्ध होती है। यह बादरायण (व्यासजी का मत है। तृतीयाध्यायमें पंगपरविद्याका साक्षान्मोक्ष साधकता है, या कारतया है, इस विवार के अनन्तर अध्याय में फलका निरूपण करेंगे। प्रथम श्रवण मनन निदिध्यासनादि साधनोंका फलसिद्धिक लिए यार चार अनुसरण करना चाहिये, या एक बार ही इस संशयके निराकरणके लिए यह सूत्र है। ... १३-आवृत्तिरसकृदुपदेशात् । - (अ० १.पा० । सू. १) "धोमव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितभ्यः। एतचनविहितश्रष- णादिका यार यार अबलम्पन- करना चाहिये। क्योंकि वेदमें कई पार श्रवणादि विधायक बोस्यको धाति देख पड़ती है।

१९४ दार्शनिक विचार अतः श्रवणादिकी आवृत्ति ही इसका तात्पर्य है। श्रवणादिका ब्रह्मदर्शन ही फल है. अतः जबतक ब्रह्मदर्शन न हो तबतक श्रवणादिकी आवृत्ति करनी चाहिए। यही इस सूत्रका तात्पर्य है। १५-चाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच । (अ०४ पा०२ सू०१) इस पादमें विद्याद्वारा फलप्राप्तिके लिये देवयानपथका वर्णन करेंगे। इसके पहले उत्क्रान्ति (मरण) का कुछ विचार करते है । विद्वान् हो या अविद्वान् हो सयका-मरणक्रम पकसा होता है यह.आगे कहेंगे । अस्य..सौम्यपुरुषस्य प्रयतो । नियमा- णस्य.) पाठ मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ) क्या वागिन्द्रियका मनमें लय होता है या चागिन्द्रियके व्यापारका मनमें लय होता है ? इसी सन्देहपर इस, 'वाङ मनसि दर्शनाच्छब्दाच" सूत्रसे चारवृत्ति (व्यापार) का ममर्मे लय होता है, वागिन्द्रियका नहीं। 'दर्शनात्' :मरण समय में देखा गया है कि मनोवृत्ति रहते हुए भी वाग् बन्द हो जाती है. शब्दाच'-कारणमें ही. कार्यका लय घेदप्रमाणादिसे सिद्ध हैं। अतः वाग्वृत्ति (वाग्व्यापार.) का हो. लय मनमें अध्यारोपित है, क्योंकि मनके अधीन ही इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ है। मरणान्तर जानेके लिए "अथैतैरेव रश्मिभिरुव॑ आक्रमते, तेऽर्चिपमभिसम्भवन्त्यापोऽहः, स एतं देवयानं पन्थावमासा- धाग्निलोकमागच्छति, यदा वै पुरुषोऽस्मालोकात् प्रति स वायुमागच्छति, सूर्यद्वारेण ते-धिरजाः प्रयान्ति इन अतियोंसे नानामार्ग सुने जाते हैं । परन्तु, एक ही सृति (मार्गः) अनेक विशेषणोपलक्षित रूपसे ब्रह्मलोकमापिकर होती है। यही इस ब्रह्मसूत्रके १६ सूत्र १९५ १५-अर्चिरादिना तत्प्रथितेः । (०४ पा० ३२० सूत्रसे उपलब्ध होता है। ब्रह्मोपासकोंके अचिरादि मार्गसे ही सम्पूर्ण ब्रह्मेसु कार्य ब्रह्मलोकको जाते हैं । उन्हीं अर्चिरादि- मार्गीका अनेक रूपले भनेका वर्णन है। "तत्मथिते" क्योंकि उसी मार्गकी सर्वत्र प्रसिद्धि है। तृतीयपादमें सगुणविद्याफलोपयोगी गतिगन्तव्यमार्ग गम नाधिकारियोंका निरूपण हो गया । अय चतुर्थ पादमें परविद्या- फलभूतब्रह्माविर्भाव सगुणविद्याफल सर्वेश्वरतुल्यभोग इस्यादिका निरूपण होगा। यह जीय शरिसे उठकर परंज्योतिः पावलको प्राप्त होकर "स्थेन रूपेणाभिनिप्पद्यते" यहाँ स्वरूप मान्दका आत्मरूप अर्थ है, या आत्मीय आगन्तुक रूप है, आत्मरूपसे ही आविर्भूत होता है, आत्मीयागन्तुक रूपसे नहीं। क्योंकि जिस किसी रूपसे याधिभूत होगा, यह सप'मात्मीय ही रूप हो जायगा। फिर "स्पेन रूपेण" इस पाक्यमें स्वशब्दका उपादान ध्यर्थ होगा । अतः स्वान्द यहाँ आत्मीय अर्थ में नहीं है, किन्तु आत्मा मर्थ में है । यही यात- १६--सम्पयाविर्भावः स्वेन शब्दात् । (म.पा. ४ ०१) इस सूत्रसे कही गई है। सम्पद्य-परब्रह्मको प्रासफर स्वेन भारमा भिष्ट रूपसे अविर्भूत होता है। शन्दात् श्रुतिसे यही वात प्रमाणित होती है। .

दार्शनिक विचार Fउपनिषद्विमर्श - . सांसारिक उन्नतिकी दौड़ में आर्यजाति इस समय चाहे जितनी पिछड़ गयी हो, परन्तु पारलौकिक उन्नति जो उसने अतिप्राचीन कालमें कर ली थी, उसकी समता आज भी संसारमें सभ्यताके प्रचार करनेका दमभरनेवाली जातियाँ नहीं कर सकीं। जातिकी इस ऊर्जितावस्थाका सारा श्रेय उन वैदिक ऋषियोंको है जो अपनी अनन्तज्ञानराशिमें हमें चेदों "और वेदान्त के रूपमें छोड़ गये हैं। वेदोंका निचोड़ पा शिरो- भाग वेदान्त कहाता है क्योंकि धर्म शेष करता है और यह वेदान्त ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन करता है। इस ब्रह्मविद्या चा वेदान्तके मूल आधार . उपनिषत' नामसे प्रसिद्ध है। यद्यपि वेदान्तशब्दमें ब्रह्मविद्याका उपदेश करने वाले सभी विषयोंका -समावेश हो सकता है, तथापि श्रीवादरायणाचार्यकृत वेदान्त वा ब्रह्मसूत्रों, उपनिपदों और श्रीमद्भगवद्गीताको.ही मुख्य कर वेदान्त नामसे पुकारते हैं। इन्हें 'प्रस्थानत्रयी'. भी कहते हैं। • श्रीमद्भगवद्गीताकी संज्ञा भी उपनिषत् ही है । और इस घवन "सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थी वरसः सुधार्मोक्ता दुग्धं गीताऽमृतं महत् ॥ T के अनुसार मता उपनिषदोंका सागमात्र है । ब्रह्मसूत्र स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं कहे जा सकते, क्योंकि ये भी उपनिषदोंके ही सार भूत हैं। उनमें विशेषता केवल उतनी ही है कि उपनिषदों में जहाँ कहीं मतमेदसा दिखाई दिया है, वहाँ श्रीयादरायण व्यासने 'उपनिपविमर्श: पफवश्यता सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है। इसलिए उपनिपदों: को ही ब्रह्मविद्याका मूल मानना उचित है। वेदान्त वेदका ही अङ्ग है, केवल ब्रह्मशानका उपदेश करनेके कारण. वेदका अन्त या मथितार्थ अथवा निचोद बताया गया है। यों तो उप- निपदोंकी संख्या दो सौ यत्तीस यताई जाती है, इर इनमें अक परके समय ही बनी 'अल्लोपनिषत् तकका समावेश हो जाता है । साधारणतया १०८ उपनिपर्दै मानी जाती हैं, परन्तु इनमें भी सय प्राचीनसी शात नहीं होती है। मुख्य उपनिषदें १० ही हैं, क्योंकि शरीरमें १० इन्द्रियाँ ही है और ये सय वेदोंकी भूत हैं। उक्त १० उपनिषदें ये हैं---- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और वृहदारण्यक । ऐतरेय ऋग्वेदकी, तैत्तिरीय और कठ कृष्ण यजुवेंदकी, श और गृहदारण्यकशुलायजुर्वेदकी, केन और डान्दोग्य सामवेदकी तथा प्रश्न, मुण्डक और माण्डूक्य अथर्ववेदकी उपनिषदें है। ईशोपनिषत् संहिताके अन्तर्गत और शेर नपोपनिषत् ब्राह्मणोंके अन्तर्गत हैं । उपनिषत्का अर्थ हैं- "उपनिषद्यते याप्यते ब्रह्मविद्या अंनया, इत्युपनिपत्" अर्थात् जिससे ग्रह्मविद्या प्राप्त हो यह उपनिषत् है । दूसरा अर्थ यह है-"उप-नितरां साइयति-अविद्यां विनाशयतीन्युपनिपत्" अर्थात् ग्राहके समीप पहुँचने के लिए अविद्यारूपी अन्धकार जो नाश करे यह उपनिषत् है। इन दोनों अयों में शन्दके सिवा माघमें मन्तर नहीं है। .. ऊपर जिन उपनिषदोंका नामोल्लेख हुआ है उनमेंश, केने और कठ उपनिषदोंमें संय, रज और तम इन तीन गुणोंका और - . दार्शनिक विचार प्रश्न, मुण्डक, माण्डक्य, ऐतरेय और तैत्तिरीयमें पञ्चभूतों यथा आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीके सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्वों-- पर विचार किया गया है। छान्दोग्यमें प्राणविद्या और आदित्य- विज्ञानका प्रधानतया विवरण है। प्रश्नोपनिषद आदिमें आदित्यको प्राण.और चन्द्र को रयि कहा गया है। अर्थात् मादित्य भोका और चन्द्र भोग्य कहा गया है। पृथ्वी आदि मूर्तिमान पदार्थ चन्द्ररूपभोग्य है। वायु और तेज आदित्य हैं। भोक्ता तीन लोकोंको उत्पन्न, पालन और संहार करता है। ये ही भोक्ता और भोग्य सांख्यशालके पुरुप-प्रकृति वनकर विश्वका सर्जन करते हैं। प्राणरूप सूर्य प्रत्येक शरीरकी प्रत्येक इन्द्रियों में अपनी किरणों द्वारा प्रवेशकर प्रकाश और शक्ति प्रदान करता तथा उत्तर पूर्व अदि दिशाओं और ईशानादि कोणों में प्रवेश कर उनको प्रकाशवान बनाता है। सूर्यही समस्त विश्वका आश्रयः स्थल है, प्रकाशक है और-रक्षक है, इसलिए, उसेही विद्वानों ने विश्वरूप, जातवेदी, परायण और सहस्ररश्मि आदि कहा है। भूः,भुवः, स्वः ये तीनों लोक सूर्यसे:प्रकाशित है शरीरके तीनों लोक प्राणसे प्रकाशित हैं और मदः, जनः तप और सत्यं स्वयें प्रकाशवान् है। सूर्य ही काल है, कालही प्रजापति है और प्रजातिही संवत्सर है। यही शरीरमें समझना। संघत्सर या। वर्षके दो भाग हैं। एक दक्षिणायन और दूसरा उत्तरायण । प्रथम में सूर्य दक्षिणकी.ओर, दूसरे में उत्तरकी ओर रहता है। श्रौतस्मातकर्मकरनेवाले और इशापूर्त आदि यज्ञ करनेवाले पुरुष चन्द्रमा को प्राप्त करते और दक्षिणायनमार्गसे जाते हैं । इसीका नाम पितृमार्ग भी है । तपस्वी ब्रह्मचारी, वेदगुरुभक्त और सूर्यो. पासक पुरुष सूर्यलोकको प्राप्त करते और उनकी गति उत्तरायण मार्ग से है। चन्द्रलोक या स्वर्गलोकके जीवका पुनरागमन होता उपनिषद्विमर्श - N शास्त्र है। परन्तु-सूर्यलोकं प्रास जीवका पुनरागमन नहीं होता। मासमें जो दो पक्ष हैं, उनमें कृष्णपक्ष चन्द्रमा है और शुक्लपक्ष सूर्य है। कृष्णपक्षं रयि और शुक्लपक्षप्राण है। विद्वान लोग प्राणरूप सूर्य की ही उपासना करते हैं । फलतः प्राणही जगत्का' एकमात्र आश्रयस्थल है। इसलिए छान्दोग्योपनिषद्ने प्रधान तया प्राणविद्याकी ही विवेचना की है..... .: गायत्री, त्रिष्टुप् उष्णिक, बृहती आदि छन्दोंमें घेदमन्त्रों- के निबद्ध होनेसे वेदाको छन्दस् भी कहते हैं। और घेदोंके गाने वालोंका नाम छन्दोग है. तथा छन्दोगोंका धर्मसम्बन्धी जो उसका नाम छोन्दोग्य है । यद्यपि छान्दोग्यशब्दको उपः युक अर्थ है, किन्तु आजकल'केवल सामवेदियों में ही छन्दोग शब्द रूढिसा हो गया है। इसलिए सामगही छन्दोग और यह उपनिषत् ही छान्दोग्य कही जाती है। यह उपनिषत् सामवेदक सुप्रसिद्ध ताण्ड्य" ब्राह्मणसे निकली है। जैसा इस श्लोकसे: सिद्ध होता है--:.-: 'छान्दोग्योपनिषष्ठा ताण्ड्यब्राह्मणनिःस्तर। अष्टौ प्रपाठकाः खण्डा, समुद्रभूतभूयुताः । अर्थात् उपनिषदों में श्रेष्ठ छान्दोग्योपनिषत् ताण्ड्यंब्राह्मणसे निकली है। इसमें आठ प्रपाठक या अध्याय और १५४ खण्ड है। उपनिपदों में चार विषयोंका विशेष विवेचन है"आत्मव्या. पकता, देहान्तरग्रहण, सृष्टितरव और लयरहस्य । किन्तु ब्राह्म- विद्याके उपदेशसे ये चारों ओतप्रोत हैं। एकै प्रकारसे ब्रह्मात्मैक्य मूल है। और ये चारों विपय उनकी शाखाएँ हैं। "सत्यं ज्ञान- मनन्तं ब्रह्म,"अहं ब्रह्मास्मि': "एकमेवाद्वितीयम्""सर्वे खल्विदं:- ब्रह्म' आदि महावाक्योंको छोड़ भी दिया जाय तोमी उपनिषदोंमें ।

:०० दार्शनिक विचार कदाचित ही कोई ऐसा प्रपाठक, खण्ड वा अनुवाफ मिलेगा जिसमें परब्रह्मकी महिमाका आभास न मिलता हा। इसीसे उपनिषद्का एक नाम "ब्रह्मविद्या" मी है। मार उपनिषदोंको ही वेदान्त कहते हैं। उपनिषदोंकी महत्ताका अनुमान तभी लग सकता है जब सभ्य संसारकी भाषाओंका ज्ञान हो और मनुष्य यह जाने कि चे कहा किम रूपमें विराज रही हैं। शाहजहाँके येटे दाराने इन उपनिपदकोका फारसीमें उल्या कराया था। पहले भी उल्थे फारसीमें हो चुके थे जिन के आधार पर: मौलाना कमने अपनी मस्नवी रची थी, र्जा तसवुक या सफी सम्प्रदायका प्रसिद्ध प्रन्थ फारमी भाषामें समझा जाता है। तसव्वुफ. और कुछ नहीं हमारा वेदान्तही है। फारसीमे ग्रीक और लै टेन भाषाओं: द्वारा उपनिषदोंका शान यूरोप पहुँचा और- यह प्रसिद्ध है कि जर्मनी के प्रगत प्रोफेसर शोपहर इन उपनिषदोंका अध्ययन. कर ऐसे मुरर हुए कि उन्होंने यहाँतक कह डाला कि यह (उपनिषत् । मुझे जीवनकालमें, सान्त्वना देनी रही है, और मरने पर भी मांत्वना देगी। इससे मिख होता है कि आर्य- 'नातिका मातक संसारमें ऊँचा रखने में वेदसा समर्थ रहेंगे। छन्द क्या है ? ... शरीर द्वारा जिमरे रचना हाती है उसको छन्द कहते हैं। और मैं मैं ( अहंभाव से उसे समझा जाता है। शब्द, 'कर (पाणि.) उपन्थ आदिसे रचना होती है। श्रोत्र, चक्षु और जिहा मादिसे समझा जाता है। व्याकरणसे ये कमेन्द्रिय तथा ज्ञानेन्द्रिय कहे जाते हैं। अतएव अभिप्रायश्छन्दमाशय यह कोश भी संगते. दाता है। ओर पिङ्गलकी मात्रावृत्ति तथा .

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उपनिषद्विमर्ष
वर्णवृत्ति ये दो वृत्तियाँ हैं, अतः व्याकरण तथा पिङ्गल ये दोनों
छन्दःम्वरूप है-अर्थात् छन्दःप्रतिपादक है, क्योंकि व्याकरणसे
शब्दका ग्रहण और त्याग होता है । पिङ्गलसे भावद्वारा मात्राका
ग्रहण और त्याग होता है तथा मनद्वारा अक्षरका त्याग और
ग्रहण होता है । इसा प्रकार वृक्षमें भी छन्दका स्वरूप समझना
चाहिये । वृक्षपत्र, फूल एवं वीजस्वरूप है । ब्रह्मसे संसारवृक्ष,
होता है और भेदसे जगत् (शरीरावर ) वृक्ष भासता है,
यही छन्दः है।
त्रयी विद्या .
१- हृदय रहनेवाला मन वेद है। और फलमें वीज बंद
है। चीजका भेद अपने अपने स्वरूप और स्वभावके अनुकूल
आकर उत्पन्न करता है।
२-ब्रह्मसूत्रको योजाङ्करके तरह समझना. चाहिए। जैसा
अङ्करका भेदं होता है, चैमाही शरीर और वृक्ष बनता है वृक्षके.
अनुरूप फल लगता है और फल में बीज रहता है । यही भेदसे
अनेक है और शब्दसे एक है। ब्रह्म शब्दरूप है। संसार
शब्दका अर्थरूप है, क्योंकि मुखसे एक शब्द घोला जाता है
और सहस्रों उसे सुनते है। पूर्वक कर्मसे शरीरका भेद होता
है. जैसे आयु एक है और आयुमें फल प्रतिदिन अलग अलग
भोगा जाता है। यह बात जड़ और चेननमें समान है। छन्द,
शब्द और रूपका बनता है। इसको लोग सुनते, देखते और
समझते हैं। इन्हीं तीनों को 'यीविद्या" कहते हैं।
- (राजा) यलदेवदास बिरला
-

२०२- दार्शनिक विचार . .. शान्तिपाठः तैत्तिरीयोपनिषत् । प्रथमोऽनुवाकः । ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रों बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्म- वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिप्यामि । तन्माम- क्तु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥ कठोपनिपत् । ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सहवीय, कर- वावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु ।. मा. विद्विपावहै.... ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥२-10::: तैत्तिरीयोपनिषत् ॥ चतुर्थीनुवाकः । "ॐ यश्छन्दसामृपभो विश्वरूपः। छन्दोम्योऽध्यमृतात् संबभूव । स मेन्द्रो.मेधया स्मृणोतु,। अमृतस्य देवधारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्पणम् । जिह्वा में मधुमत्तमा । कर्णा- भ्यां भूरि-विश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः। श्रुतं मे गोपाय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ३ ॥ 1.

शान्तिपाठ:15 २०३. :: तैत्तिरीयोपनिषत् दशमोऽनुवाकः/2 TIRIT ॐ अहं वृक्षस्य रेरिवा ।.कीर्तिः:पृष्ठं गिरेरिव । उर्ध्व- पवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि । द्रविणं सुवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशको वेदानुवचनम् ॐ शान्तिः, शान्तिः शान्तिः, ॥४॥ ईशावास्योपनिषत् । वृहदारण्यकोपनिषत् ! .. अपूर्णमदः- पूर्णमिदं -पूर्णाव- पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते । ॐ शान्तिः- शान्तिः- शान्तिः ।। ५. Sms. FREE फेनोपनिषत् । छान्दोग्योपनिपत्रमा ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि बाक्-प्राणश्चचुः श्रोत्रमथो चलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्व ब्रमोपनिपदं: माहं ब्रह्म निराकुम्मा मा ब्रह्म-निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरण- मे अस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु: ते मयि:सन्तु 1-ॐशान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥६॥ । ; ऐतरेयोपनिपत् ॐ वाङ मेमनसि प्रतिष्ठिता.मनो मे वाचि प्रतिष्ठित-- माविरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीर- नेनाधीतेनाहोरात्रात्संदधाम्यूतं वदिष्यामि । सत्यं वदि:: प्यामि तन्मामवतु | तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् || अवती २०४ दार्शनिक विचार वक्तारमवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥७॥ माण्डूक्योपनिषत् ॐ भद्रं नो अपिवातय मनः | ॐ शान्तिः शान्तिः যাবি। प्रदनोपनिषत् । मुण्डकोपनिषत् । माण्डूक्योपनिषत् । ॐ भद्रं कर्णेमिः भृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्य- जत्राः स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः। स्वस्ति न इन्द्रो बृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥९॥ श्वेताश्वतरोपनिषत् । ॐ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदां वे पहि- शोति तस्मै । त ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षु शरणमह प्रपद्य । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥१०॥ ॐ नमो ब्रह्मादिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकई भ्यो वंशपिम्यो महद्भ्यो नमो गुरुभ्यः । सर्वोपप्लवरहितः प्रज्ञानधनः प्रत्यगनौवाहमसि ॥१॥ ॐ नारायणं पद्मभवं वसिष्ठं 'शक्तिञ्च तत्पुत्रपंरा- शरश्च । व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्फ शिष्यम् ।। २॥ श्रीशकराचार्यमथास्य पद्मपादं च हस्ताम- PM ..

भाशान्तिपाठ:: , लकञ्च शिष्यम् । तं त्रोटक 'पार्तिककारमन्यानस्मद्गुरून् संततमानतोऽस्मि ।। ॥३.11.- श्रुतिस्मुतिपुराणानामालय करुणालयम् । नमामि भगवत्पाद शंकर : लोकशंकरम् ॥४॥ शंकरं शंकराचार्य केशवं पादरायणम् ।। सूत्रभाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः ॥५॥ ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने ।' व्योमवव्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ॥६॥ अनध्यायमङ्गलपाठः। अशुभानि निराचष्टे तनोति शुभसंततिम् । स्मृतिमात्रेण यत् पुंसां ब्रह्म तन्मङ्गलं परम् ॥१॥ अतिकल्याणरूपत्वान्नित्यकल्याणसंश्रयात् । स्मर्तृणां वरदत्वाच्च ब्रह्म' तन्मङ्गलं विदुः ॥२॥ ॐकारवाथशन्दव द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ठं भिवा विनिर्याती तसान्माङ्गलिकावुभौ ॥३॥ इति दश शान्तयः समासाः ।। हरिः ॐ तत्सत् परब्रह्मार्पणमस्तु ।। ..

'२०६ दार्शनिक विचार -श्री: कठोपनिषद् ॐ सह नाववतु ॥ सह नौ.भुनक्तु ॥ सह वीर्य कर- चावहै ।। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विपावहै. ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ उशन ह वै-वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य है नचिकेता नाम- पुन .आस ॥ १.॥त छः ह कुमार छ सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु-श्रद्धाऽवियेश सोऽमन्यत।। २।। पीतोदका जग्धणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । अनन्दा नाप ते लोकास्तान्स:गच्छति ता ददत् ॥ ३ ॥ स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयं त छ होवाच मृत्यवे त्वा ददमीति.॥ ४ ॥ बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । कि स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति॥५॥ अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपय तथा परे ।. सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥ वैश्वानरः प्रविशत्य- तिथि ह्मणो गृहान् । तस्यै ता, शान्ति कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७ ॥ आशाप्रतीने सङ्गत छ सूनृतां चेप्टापूर्ते पुत्रपशू, श्च सर्वान् । एतद्दत पुरुपस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥८॥ तिस्रो रात्रीर्यदवासीहे मेऽनन्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु ६ 00 ....... ionalRIGur नचिकेता-कर्म-भाव-कर्म (भोग) नचिकेतो यमं वत्रे तातः शान्तोऽस्तु विश्वसन् । अग्निविद्याञ्च मे हि ब्रह्मज्ञानं तृतीयकम् ।।

२०७ -::कठोपनिषद तसात्प्रति श्रीवरान्तणीप्वः॥ ॥ शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युगौतमो मामिमृत्यो । त्वत्प्रसृष्टं मामिव. देप्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥१०॥ यथा पुर- स्ताद्भविता. प्रतीत. औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः। सुख, रात्रीः शयिता चीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥११॥ स्वर्ग-लोकेन भयं किचनास्ति नः तत्र त्वं न जरया विभेति । उमे ती|शनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ।।१२।। स त्वमग्नि में स्वर्गामध्येषि मृत्यो प्रवृहि .त श्रद्दधानाय . मह्यम् । स्वर्गलोका-अमृतवं भजन्त .एतद्वितीयेन वृणेवरेण ।।१३।। प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतन्निहितं गुहायाम् ॥१४॥ लोकादिमग्निं तमु- पाच तस्म या इप्टका यावतीर्वा यथा वा । स चापि तत्प्र- त्यवदद्यथोक्तमथास्य · मृत्युः : पुनरेवाह - तुष्टः ॥१५॥ तमत्रवीत्प्रीयमाणो. महात्मा वरं तवेहाय ददामि भूयः । संच. नाना - भवितायमग्निः सङ्कां च मामनेकरूपां गृहाण ॥१६॥ त्रिणाचिकेतस्विभिरेत्य सन्धि : त्रिकर्म- कृत्तरति जन्ममृत्यू । ब्राह्मजनं देवमीडयं विदित्सां निचा- प्यमा शान्तिमत्यन्तमेति ॥१७॥ त्रिणाचिकेतस्रयमे- तद्विदित्वा य एवं विद्वाविनुते नाचितम् । स मृत्यु- २०८ दार्शनिक विचार पाशान्पुरतः प्रणोध शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१८॥ एप तेऽग्निर्नचिकेतः स्खयों 'यमवृणीचा द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति · जनास तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥ ये यं प्रेते 'विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके 'नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं चराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥ देवरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः । अन्यं वरं नचिकेतो वृणीप्य मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥ देवैरत्रापि विचिकि- त्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्य । वक्ता चास स्वागन्यो,न लेभ्यो नान्यो वरंस्तुल्य एतस्य कथित् ॥२२॥ शतायुषः - पुत्रपौत्रान्वृणीय बहून्पशून्ह स्तिहिरण्यमश्वान् । भूमर्महदायतनं वृणीप्य स्वयंचजीवशरदो यावदिच्छसि ॥२३॥ एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कापानां त्या कामभाजं करोमि ॥२४॥ ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामा छ श्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या नहादृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥ श्वोभावा मर्त्यस यदन्तकैतत्सर्वे- न्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्व जीवितमल्पमेव तवैव -वाहास्तव नृत्तगीतेगारान-विरोन तर्पणीयो मनुष्यो .

कठोपनिषद् लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविप्यामो यावदीशिप्यसि वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥२७॥ अजीर्यताममृताना- मुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः कपः थः प्रजानन् । अमिध्यायन्वर्ण- रविप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥ यस्मि िदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति बेहि नस्तत् ॥ योऽयं वरोगूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मानचिकेता वृणीते ॥२६॥ इति प्रथमेऽध्याये प्रथमा बल्ली ॥१॥ अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुष सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाध उ प्रेयो घृणीते ॥१॥ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तो सम्प- रीत्य पिचिनक्ति धीरः। श्रेयो हि धीरोभिप्रेयसो घृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ २॥ स त्वं प्रियान्प्रिय- रूपा व कामानभिध्यायनचिकेतोऽत्यसाक्षीः । नैतां सृका वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मजन्ति वहयो मनुष्याः ॥३॥ दूमते विपरीते विधूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । विद्यामीप्सिन नचिकेतसं मन्ये न ला कामा बह्वोऽलोलु- पन्त ॥४॥ अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितमन्यमानाः । दन्द्रम्पपाणाः परियन्ति भूडा अन्धे- नव नीयमाना यथाऽन्याः ॥५॥ न सांपरायः प्रतिभाति चालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूरम् । अयं लोको नास्ति पर ૨૦ दार्शनिक विचार इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥ श्रवणायापि बहुभियों न लभ्यः भृण्वन्तोऽपि यहयो यं न विद्यु। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥ न नरेणावरेण प्रोक्त एप सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्य- मानः। अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणोयान्यतय॑मणु- प्रमाणात् ।।८।। नेपा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञा- नाय प्रेष्ठ ॥ यां समापः सत्यधृतिर्वतासि खादृङनो भूया- नचिकेतः प्रष्टा ।। ९ ॥ जानाम्यह छ शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुधैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नचिकेतश्चितो- ऽग्निरनित्यैव्यैः प्राप्तवानसि नित्यम् ॥१०॥ कामस्याप्ति जगतः प्रतिष्ठा क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् । . स्तोममह दुरुगायं प्रतिछां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्त्राक्षी॥११॥ तं दुर्दर्श गूडमनुप्रविष्टं गुहाहितं गहरेष्टं पुराणम् । अध्या- त्मयोगाधिगमेन देवं मखा धीरो हर्पशोकौ जहाति ॥१२॥ एतच्छ्र खा संपरिगृह मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीय हि लब्ध्वा पिवृत सब नचिकेतसं मन्ये ॥१३॥ अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रासात्कृता- कृतात् । अन्यत्र भूताच भव्याञ्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥१४॥ सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपा छसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पद संग्रहेण वीम्यो - कठोपनिषद् २११ मित्येवत् ॥१५॥ एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म ह्येतदेवाक्षरं परम् एतद्धयेवाक्षरं झाला यो यदिच्छति तस तत् ॥ १६ ॥ एतदालम्बन ७ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञाला नसलोके महीयते ॥ १७ ॥ न जायते नियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्व- तोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥ हन्ता चेन्मन्यते इन्तुं हतश्वेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९॥ अणोरणीयान्महतो महीया- नात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीत. शोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः। आसीनो दूरं प्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं मदामहं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २० ॥ अशरीर शरीरेप्यनवस्थेप्यवस्थि- तम् । महान्तं विभुमात्मानं मसा धीरो न शोचति ॥२१॥ नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैप घृणुते तेन लभ्यस्तस्यैप आत्मा विवृणुतेतन्छ स्वाम् ॥२२॥ नाविरतो दुश्चरितानाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमनसो वापि प्रज्ञानेननमाप्नुयात् ॥२३॥ यस ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः मृत्युर्यखोपसेचनं क इत्या वेद यत्र सः॥२४॥ इति प्रथमऽध्याये द्वितीया वल्ही ॥२॥ ऋतं पिन्नी सुकतन- गुहां प्रविष्टौ परमे दार्शनिक विचार परार्धे । छायातपी ब्रह्मविदो वदन्ति पश्चानयो ये च त्रिणा- चिकेताः ।। १ ॥ यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं वितीर्पतां पारं नाचिकेत शकमहि ॥ २॥ आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं स्थमेव तु ॥ बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥३॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विपर्यास्तेपु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्त भोक्तोत्याहुर्मनीपिणः॥४॥ यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रि- याण्यवश्यानि दुष्टाचा इव सारथेः ॥ ५ ॥ यस्तु विज्ञान- चान्भवति युक्तन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि पश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६॥ यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः। न स तत्पदमामोति स ॐ सारं चाधि- गच्छति ।।७|| यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदाशुचिः। स तु तत्पदमामोति यसाभूयो न जायते ॥८॥ विज्ञान- सारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवानरः । सोऽधनः पारमामोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥९॥ इन्द्रियेभ्यः परा ह्या अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धरात्मा महान्परः ॥१०॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरूपः परः । पुरुषान परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥११॥ एप सर्वेषु भूतेषु गूडोल्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्ययायुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥१२॥ यच्छेद्वामानसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमारम- फटोपनिषद २१३ नि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥१३॥ उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । पुरस धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति ।। १४ ॥ अशब्दमस्पर्शमरूपम- व्ययं तथारसं नित्यमगन्धवञ्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५॥ नाचिकेत- मुपाख्यानं मृत्युप्रोक्त सनातनम् । उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्रह्म संसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥ इति प्रथमाऽध्याये तृतीया वही ॥ ३ ॥ इति प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १॥ पराश्चि खानि व्यत्स्वयंभूस्तसात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमक्षदावृत्तचक्षुरमृत- खमिच्छन् ॥ १॥ पराचा कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीराअमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेप्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २॥ येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाथ मधुनान् । एवेनैव विजानाति फिमत्र परिशिप्यत एतद्वै तन् ।। ३ ।। समान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।। महान्तं विमुपात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥४॥ य इमंय मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्स्य २१४ दार्शनिक विचार न ततो विजुगुप्सत एतद्वै तत् ॥ ५॥ यः पूर्व तपसो जात- मनः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभि- य॑पश्यत एतद्वै तत् ॥ ६॥ या प्राणेन संभवत्यदितिर्देव- तामयी ! गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्यजायत एतद्वै तत् ॥७॥ अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिहविप्पद्भिर्मनुप्येभिरग्निरेतद्वै तत् ॥८॥ यतचोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । तं देवाः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन एतद्वै तत् ॥ ९ ॥ यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमामोति य इह नानेच पश्यति ॥ १० ॥ मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन । मृत्योः स मृत्यु गच्छति य इह नानेच पश्यति ॥१२॥ अङ्गुष्टमात्रः पुरुपो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूत- भव्यस्य न ततो विजुगुप्सत एतद्वै तत् ॥१२॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुपो ज्योतिरियाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्व एतद्वै तत् ॥ १३ ॥ यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु चिंधावति । एवं धर्मान्पृथक पश्यंस्तानेवासुविधावति ॥१४॥ यथोदकं शुद्ध शुद्धमासिक्त तागेव भवति । एवं मुनेर्विजा- नत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥ इति द्वितीयेऽध्याये चतुर्थी वल्ही समाप्ता ॥४॥ पुरमेकादशद्वारमजस्सावक्रचेतसः। अनुष्ठाय न शोचति न लिप्यते लोकदुःखेन बायः ॥ ११॥ एको वशी सर्व- चक्षुर्न लिप्यते चानुपायदोपैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा कठोपनिषद् २१५ विमुक्तश्च विमुच्यत एतद्वै तत् ॥ १॥ हसः शुचिपद्वसु- रन्तरिक्षसद्धोता वेदिपदतिथिर्दुरोणसत् । नृपद्वरसदृतस- योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं वृहत् ॥२॥ ऊर्ध्व आणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते ॥ ३॥ अस्य वित्र ७ समानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यत एतद्वै, तत् ॥ ४ ॥न प्राणेन नापानेन मर्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यसिन्नतावुपाथितौ ॥ ५॥ हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्य बता सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ॥ योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । साणुमन्येऽनुसंवन्ति यथाकर्ग यथाश्रुतम् ।। ७॥ य एप मुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुपो निर्मिगाणः । तदेव शुक्रं तद्रीय तदेवामृतमुच्यते । तसिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन एतद्वै तत् ॥८॥ अग्निर्यथको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो पहिश्य ॥९॥ यायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तधा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १०॥ सूर्यो यथा सर्वलोकस्य २१६ दार्शनिक विचार भूतान्तरात्मा एक रूपं बहुधा यः करोति । तगात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेपा छ सुख , शाश्वतं नेतरेपाम् ॥ १२ ॥ नित्यो नित्यानां चेतनचेतनानामको पहनां यो विदधाति कामान् । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेपा शान्तिः शाश्वती नेतरेषां ॥१३॥ तदेतदिति मन्यन्तेऽनि- श्यं परमं सुखम् । कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति ना ॥ १४ ॥ न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारक नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१५॥ इति द्वितीयेऽध्याये पञ्चमी चल्ली समाप्ता ॥ ५ ॥ ऊर्ध्वमूलोऽवाशाख एपोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्रल्ल तदेवामृतमुच्यते। तसिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्वन एतद्वै तत् ॥ १॥ यदिदं किञ्च जग- सर्व प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एत- द्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २॥ भयादयानिस्तपति भयात्त- पति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥३॥ इह चेदशकरोडुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरलाय कल्पते ।। यथादर्श तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥५॥ इन्द्रियाणां पृथग्भाच- कठोपनिषद् मुदयास्तमयो च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मखा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्वमुत्तमम् । सच्चादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ अन्य- कानु परः पुरुषो व्यापको लिङ्ग एव च । यज्ज्ञासा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८॥ न संशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुपा पश्यति कश्चनकम् । हृदा मनीपी मनसाऽ- भिटतो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ६॥ यदा पञ्चाव- तिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ।। १०॥ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामि- न्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवा- प्ययौ ॥ ११ ॥ नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति अवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ।। अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः। अस्तीत्येवोप- लन्धस्य तत्वभावः प्रसीदति ॥ १३॥ यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येस्स हदि श्रिताः । अथः मर्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समनुते ॥ १४ ॥ यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । अथ मोऽमृतो भवत्येतावदनुशासनम् ॥ १५ ॥ शतं चका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतका । तयोर्ध्वमायनमृतसपेति विप्यन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥१६॥ अष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः।

दार्शनिक विचार तं स्वाच्छरीरात्मबृहेन्मुञ्जादिवेपीकां धैर्येण । तं विद्याच्छुक- ममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥ मृत्युप्रोक्ता नचि- केतोऽथ लब्ध्या विद्यामेतां योगविधिं च कृत्नम् । ब्रह्म- प्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥१८॥ इति द्वितीयेऽध्याये पष्ठी वल्ली समाप्ता ।। ६ ।। इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य कर- वावहै । तेजस्त्रिनायधीतमस्तु मा विद्विपावहै ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।। इति यजुर्वेदीयकठोपनिषत्समाप्ता ॥

कठोपनिषद् रहस्य २१२ ॥श्री॥ कठोपनिषद् रहस्य प्राचीन युगमें गौतमवंशीय वाजवात्मजं विश्वविख्यात उहालक नामक एक महर्षि थे। उन्होंने सर्वस्वदेय सर्वमेध यज्ञ की दक्षिणामें अपनी समस्त गोसम्पत्तिको भी ब्राह्मणदानार्थ प्रस्तुत किया। पितृभक्त विशुद्धबुद्धि कुमार नचिकेताने अपने पिताके अशास्त्रीय इन गायों के दानसे अत्यन्त क्षुब्ध होकर नम्र- निवेदन किया, कि पिताजी ! मुझे आप किसको दे रहे हैं। पुत्रके.सतत हटसे कुपित होकर पिताने कहा कि मैं तुझे यम- राजको दे रहा हूँ। पिताके वचनको सुनकर प्रसन्नचित्त, नचि- फेता यमद्वारपर समुपस्थित हुआ, तथा तीन दिनोंको उपवास तथा प्रतीक्षाके बाद उसे यमका साक्षात्कार हुआ। तीन रात्रिसे उपवास ब्राह्मण अतिथिको निजद्वारपर पाकर धर्मच्युत होनेके भयसे धर्मराजने फहा कि ऋपिपुत्र ! आप अतिथिश्रेष्ट होते हुए भी मेरे द्वारपर तीन रात और दिन उपवास रहे, अतः तीन पर देना चाहता हूँ, माँगो। धर्मराजकी दया देखकर नचिकेताने माँगा। पहला घर- भगवन् ! मैं पिताकी सेवा कर इस असारसंसारसे उत्तीर्ण हो। पालकती दृढ़ पितृभक्तिसे अतिसन्तुष्ट धर्मराजने दोनों २२० दार्शनिक विचार हाथोंको उठाकर गद्गद् स्वरले कहा-ब्राह्मण कुमार ! तुम्हारी अभिलापा परिपूर्ण हो । अब दूसरा घर माँगो । दूसरा वर- . नचिकेता हाथ जोड़कर बोला-मैं दूसरे वरसे अग्निविद्या प्राप्त्यर्थ आपका कृपापान होना चाहता हूँ। धर्मराजने सत्पात्र नचिकेताको अग्निविद्याका उपदेश दिया। क्योंकि अग्निविद्या ही इस लोक सभी वस्तुओंकी उत्पत्तिका कारण है तथा इसीसे सर्वसमृद्धि प्राप्त होती है। मेधावी नचिकेताले प्राप्त अग्नि विद्याको सुनकर प्रसन्नचित्त धर्मराज- ने उसे लोकदुर्लभ-रतमालाको भी वरमें प्रदान किया,.तथा- कहा कि लोकमें यह अग्नि तुम्हारे नचिकेता नामसे ही प्रसिद्ध होगा अय तीसरा वर माँगो। -तीसरा घर- महाभाग ! आप आत्मविद्याके तत्त्व है। अतः मुझे उस विद्याका उपदेश देकर कृतार्थ करें। धर्मराजने कहा नविकता! यह आत्मविद्या देवताओले भी अलभ्य रही है । इस मार्गका अवलम्बन करना सर्वदा लिए कठिन मार्गका पथिक बनना है। अतः अन्य घर माँगो । बुद्धिमान नविताने कहा कि धर्मराज ! यदि वह विद्या देवासे भी अगम्य है, तो मैं सब प्रकारका कष्ट उठा कर भी उसे प्राप्त करना चाहता हूँ। अतः मुझे इसी वरको देकर कृतार्थ कीजिए । नचिकेताके इस दृढ़ निश्चयसे प्रसन्नचित्त धर्मराजने उसे गलेसे लगाते हुए गद्गद् स्वरमें कहा कि मुनिकुमार ! तुम वास्तवमें 'धन्य हो। त्यागधीर वत्स ! वही मनुष्य सच्चा विवेकी एवं कठोपनिपद् रहस्य २२१ भाग्यशाली है, जो तुम्हारी तरह दृढ़ संकल्प रखता है और मानवजीवनके तत्वांकी खोज में अपने सभी लौकिक सुखों को भुला देता है। आज आत्मविद्याफा सशा अधिकारी तुम्हें जान- कर मैं अत्यधिक प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हें उस विद्याका उपदेश कर रहा हूँ। अब तुम ब्रह्मद्वारके समक्ष हो । परन्तु आगेका मार्ग अतिसूक्ष्म बुद्धिसे भी कष्टसाध्य है । अतः तुम बुद्धिचक्र पर बैठकर मेरे पीछे आमो। देखो, विश्वका सकलवस्तुसमु- दाय इसी ज्योतिः समुद्र में विलीन हो रहा है, आगे लक्ष्यका ही दर्शन होगा। ऐसा कह धर्मराजने नचिकेताके कन्धोपर सहंसा करकमलोंको रखते हुए कहा- लो यही तुम्हारा तीसरा वर है। अध्यात्मज्ञान प्राप्त नचि- कोताले धर्गराजने अन्तमें कहा कि हे तात ! इस जीवनविद्याका मूलतत्व यही है, जब मनुप्य निष्काम हो जाता है तब उसका मन मलिनवासनाओंसे विमुक्त होकर ब्रह्मानन्दमें विलीन हो जाता है। उसका हृदयकमल विकसित हो जाता है। अब तुम अपने गृहको जागो । तथा अपने पूज्य पिताके प्यासे नयनोंको तृप्त करो। यही कठोपनिषद्का सारांश है। इस कथानकका भाय अधिक- तर स्पष्ट हो जाता है जब हम स्मरण करते हैं कि उद्यालक मन है नचिकेता भाव गोदानका अर्थ कर्मफलका त्याग है, इससे. भूत कर्मफल के शरीरसे भोग ओर त्यागसे कर्मकी उत्पत्ति. अभिव्यक होती है।

२२२ दार्शनिक विचार तत्सत् ।। प्रश्नोपनिपद् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम् देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्य- जत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा छ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूपा विश्व- वेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्द- धातु ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॐ सुकेशा च भरद्वाजः शैव्यश्च सत्यकामः सौर्या- यणी च गार्ग्यः कौशल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो चैदर्भिः कवन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेपमाणा एप ह चै तत्सर्व वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पला- दमुपसन्नाः ॥ १॥ तान्ह स ऋपिरुवाच भूय एवं तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छथ यदि विज्ञास्यामः सर्व ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥ अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य प्रपच्छ । भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥३॥ तस्मै स होवाच अजा- कामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्सा स मिथुन- मुत्पादयते । रयिं च प्राणं चेत्येतो मे बहुधा प्रजाः करिप्य इति ॥४॥ आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा -- प्रश्नोपनिषद् ૨૩ रयिर्चा एतत्सर्व यन्मूर्त चामूर्त च तस्मान्मूतिरेव रयिः ।।५।। अथादित्य उदयन्यत्माची दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान्या- णान् रश्मिपु संनिधत्ते । यद्दक्षिणां यत्प्रतीची यदुदीची यदधो यदूर्ध्व यदन्तरा दिशो यत्सर्व प्रकाशयति तेन सर्वा- न्प्राणान् रश्मिपु संनिधत्ते ॥६॥ स एप वैश्वानरो विश्व- रूपः प्राणोऽनिरुदयते । तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥ ७॥ विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येप सूर्यः ॥ ८॥ संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणश्चोत्तरं च । तोह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिज- यन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तसादेते ऋपयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एप ह वै रयिर्यः पिल्याणः ॥ ९ ॥ अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विप्या- दित्यमभिजयन्त एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्प- रायणमेतमान पुनरावर्तन्त इत्येप निरोधः। तदेप श्लोकः ॥१०॥ पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृति दिव आहुः परे अर्प पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे पलर आहुरर्पितमिति ॥ ११॥ मासो – प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुकः प्राणस्तसादेते ऋषयः शुक्ल इष्टिं कुर्वन्तीतर इतरसिन् ॥ १२ ॥ अहोरात्रो यै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो २२४ दार्शनिक विचार रात्रिरेव रयिः प्राणं चा एते प्रस्कन्दन्ति । ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ।। १३ ।। अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तसादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥ तो ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ये मिथुन- मुत्पायन्ते । तेषामेवैप ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्य येसु सत्यं प्रतिष्टितम् ॥ १५ ॥ तेपामसौ मिरजो ब्रह्मलोको न येपु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ इति प्रथमः प्रश्नः॥१॥ अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन् कत्येव देवाः प्रजा विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः युनरेपां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥ तस्मै स होयाचाकाशो ह वा एप देवो वायुरनिरापः पृथिवी वामनश्चक्षुः श्रोत्रश्च । ते प्रकाश्या- भिवदन्ति वयमेतद्वाणमवष्टम्य विधारयामः ॥ २ ॥ तान्च- रिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथाह मे वै तत्पश्चधात्मानं अविभज्यैतद्वाणमयष्टभ्य विधारयामीति ॥३॥ तेऽश्रद्दधाना बभूवुः सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तसिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तसिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते, तसिंश्च प्रतिष्ठपाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वामनश्चक्षुः श्रोत्रश्च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥४॥ एपोमिस्तपत्येप म प्रश्नोपनिषद् २२५ सूर्य एप पर्जन्यो मघवानेप वायुरेप पृथिवी रयिर्देवः सदस- चामृतं च यत् ॥५॥ अरा इव रथनाभी प्राणे सर्व प्रतिष्ठितम् । ऋचो यपि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६॥ प्रजाप- तिश्वरसि गर्ने समेव प्रतिजायसे । तुभ्यं प्राणः प्रजास्त्रिमा बलि हरन्ति यः प्राणः प्रतितिष्ठसि ॥७॥ देवानामसि वहितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा । अपीणां चरितं सत्यमथ- गिरसामसि ॥ ८॥ इन्द्रस्त्वं प्राण 1 तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । खमन्तरिते चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥६॥ यदा समभिवपस्यथेमाः प्राण ! प्रजाः । आनन्द- रूपास्तिष्ठन्ति कामायानं भविष्यतीति ॥१०॥ बात्यस्त्वं प्राणैकऋपिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः। चयमाद्यस्य दातार! पिता त्वं मातरिश्चनः ॥ ११॥ या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता .या श्रोत्रे या च चक्षुपि । या च मनसि संतता शियां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥ प्राणस्येदं वशे सर्व 'त्रिदिवे यत्न. तिष्ठितम् । मातेर पुत्रानक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न. इति ॥१३॥ . 1 इति द्वितीयः प्रश्नः॥२॥ अथ हैन कौशल्यथावलायनः पप्रच्छ । भगवन-कुत एप प्राणो जायते, कथमायात्यसिञ्छरीर-आत्मानं वा प्रवि- भज्य कथं प्रातिष्ठते केनोरक्रमते,कथं बाह्यमभिधत्ते कथम- २२६ दार्शनिक विचार ध्यात्ममिति ॥१॥ उम्मै म होवाचातिप्रश्ना-पञ्चसि बझिष्ठोऽसीति तसात्तेऽहं ब्रवीमि ॥२॥ आत्मन एप प्राणो जायते । यथैपा पुरुषे छायैतसिन्ने वदाततं मनो- कृतेनायात्यसिञ्छरीरे ॥३॥ यथा सम्राडेवाधिकृता- विनियुक्ते एतान्यामानधिविठस्वेत्येवमेवैष गण इतरान्मा- गान्पृथक् पृथगेव संनिधते ॥४॥ पायूपग्थेऽपानं चक्षु: श्रोत्रे सुखनासिकाम्यां प्राणःस्वयं प्रतिष्ठते मध्ये तु ममानः । एप हतदुतमन्न समुन्नयति तमादेताः सप्तार्चिपो भवन्ति ॥५॥ हृदि होप आत्मा अत्रैवदेकशतं नाडीनां तासां यंत शतमेकैकस्यां द्वासप्सविसप्ततिः प्रतिशाखानाडीसह- स्राणि भवन्त्यासु व्यानश्वरति ॥६॥ अथैकयोचं उदान: पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाम्यामेव मनुष्यलोक ७) आदित्यो ह वै बाझ प्राणं उदयत्येप होनं चाक्षुषं प्राणानुगृहानः । पृथिया या देवता सैपा: पुरुषस्यापानम- घष्टम्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुानः ॥८॥ तेजो ह वार उदानस्तरसादुपशान्ततेजाः। पुनर्भवमिन्द्रियर्मनसि संपद्यमानः 18li यचित्तस्तेन प्रोणमायाति प्राणस्तेजसा युक्त सहात्मना यथा संकल्पितं लोकं नयति ।। १.॥ ये एवं विद्वान्प्राणं वेद । न हास्य प्रजा हीयतेऽस्तो भवति 'तदेप श्लोकः ।।१॥ उत्पत्तिमायति स्थान विभुत्वं चैव .. -- . . प्रश्नोपनिषद् पञ्चधा ! अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते । विज्ञाया- मृतमश्नुत इति ॥१२॥ इति तृतीयः प्रश्नः॥ ३॥ अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पच्छ । भगवन्न तसिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यसिन् जाग्रति कतर एप देवः स्वमान् पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कसिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भव- न्तति ॥१॥तस्मै स होवाच । यथा गाये मरीचयोs स्यास्तं गच्छतः सर्वा एतसिंस्तेजोमण्डल , एकीभवन्ति । वाः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै.तत्सर्व परे देवे.मन- स्येकीभवति । तेन ताप पुरुषो न भृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपित त्याचक्षते ॥ २॥ प्राणामय एवैतसिन्पुरे जाग्रति गाईपत्यो ह वा एपोऽपानो न्यानो न्वाहार्यपचनो यद्गाई पत्यात्यणीयते प्रणयनादावनीयः प्राणा ॥३॥ यदुधासनिःश्वासावेत्तावाहुंनी समं नंयतीति :स समानः । मनो हयावं यजमान इष्टफलमेवोदानः स एने यजमानमहरहा गमयति ॥४॥ अत्रैप देवः खमे महि- भानमनुभवति । यदृष्टं दृष्टमनुपश्यति- श्रुतं श्रुतमेवार्थमनु. भृणोति देशदिन्तिरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति रएश्चाटन श्रुवश्चाश्रुतश्चानुभूतवाननुभूत सञ्चासच सर्व दार्शनिक विचार पश्यति सर्वः पश्यति ।।५|| स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैप देवः स्वमान्न पश्यत्यथ तदैतसिञ्छरीरे एतत्सुखं भवति ॥६॥ स यथा सोम्य वयांसि वासो वृतं संप्रतिष्ठन्ते । एवंह वैतत्सर्व पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥७॥ पृथिवीच पृथिवीमात्रा चायापोमात्रा च तेजश्व तेजोमात्रा च वायुश्च वायुयात्रा चाकाशश्वाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घातव्यं च रसश्च रसयितव्यञ्च खक् च स्पर्शयित- व्यञ्च वाक् च वक्तव्यञ्च हस्तौ चादातव्यञ्चोपस्थश्चानन्दयि- तव्यश्च पायुश्च विसर्जयितव्यच पादौ च गन्तव्यश्च मनश्च मन्तव्यञ्च पुद्धिश्च बोद्धव्यश्चाहधारवाहंकर्तव्यच चित्त चेतयितव्यञ्च तेजश्व विद्योतयितन्यश्च प्राणश्च विधारयित- 'व्यञ्च ॥८॥एप हि द्रष्टा स्पष्टा धोता प्राता रसयिता मन्तायोद्धा का विज्ञानात्मा पुरुषः । स परेऽक्षरे आत्मनि संप्रतिष्ठते.॥ ९ ॥ परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तद- छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स 'सर्वज्ञः सर्यो भवति तदप श्लोकः॥१०॥ विज्ञानात्मा सह देवश्च सर्व प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं येदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥११॥ इति चतुर्थः प्रश्नः ॥ ४॥ अथ छैन: शैव्या सत्यकामा पप्रच्छ । स यो ह वैतद्भगवन्म- 17 प्रश्नोपनिपद् २२९ नुष्येषु प्रायणान्तमोकारमभिध्यायीत । कतम चाव स तेन' लोकं जयतीति ॥१॥ तस्मै स होवाच । एतद्वै सत्यकाम पर चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारस्तमाद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति, ॥ २ ॥ स यद्यकमात्रपमिघ्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्ण- मेव जगत्यामभिसंपद्यते । तमृचो मनुप्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण.. श्रद्रया संपन्नो महिमानमनुभवति । ॥३॥ अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्ष यनुभिरुन्नीयते सोमलोकं स . सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४॥ यः पुनरेतत्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषममिध्यायीन स तंजसि सूर्य संपन्नः । यथा पादोद- रस्तंचा विनिर्मुच्यत एवं ह स पाप्मनां विनिर्मुक्तः स सापमिरुन्नीपते ब्रह्मनोकं स एतस्माजीवधनात्परात्परं पुरि- शय पुरुपपीक्षते ॥ ५॥ तदेतौ श्लोको भवनः । तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः। क्रियामु याह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक् प्रयुक्तासु न कम्पते . ज्ञः ॥६ ।। ऋग्भिरेतं यजुर्मिरन्तरितं स सामभिर्यत्तत्कायो वेदपन्ने । तमांकारशयननेनान्वेति विद्वान्यत्तच्छन्तिमज. रममृवमभयं परं चेति ॥ ७॥ .. . इति पञ्चमः प्रश्नः ॥५॥ अब हनं सुकेश भारद्वाजः पप्रच्छं । भगवन्हिरण्यनाम:

दार्शनिक विचार . कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यतं प्रश्नमपृच्छत । पोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ तयहं कुधार त्रुवं नाहमियं वेद यद्यह- मिनमवेदिपं कथं ते नावक्ष्यमिति समूलो वा एप परिशुष्यति योऽनृतममिवदति तस्मानाम्यिनृतं वक्तुं स तूष्णीं रथमारुप प्रवबाज । तं सा पृच्छामि कासो पुरुष इति ॥१॥ तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेता पोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥ २॥ स ईक्षांचक्रे । कस्मिन- हमुत्क्रान्ते उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥३॥ स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं पायुज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियम् मनोऽनमन्नाद्वीयं तपो मत्राः कर्म लोका लोकेषु नाम च ॥ ४ ॥ स यथेमा नद्यः स्यन्द- माना: समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः पोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुपं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्यते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एपोकोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५ ॥ अरा इव स्थनाभी कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः । तं वेद्य पुरुपं वेद यथा मा यो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥ वान्होबाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति ॥७॥ ते, तपर्चयन्तस्त्वं हि ना - प्रश्नोपनिषद् २३१ पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति। नमः परम- ऋषिम्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८॥ इति षष्ठः प्रश्नः ॥६॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा , सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः । "स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाःस्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । खस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ * इति प्रश्नोपनिषत्समासा *

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श्रीपरमात्मने नमः
अथ श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
यस्य सरणमानेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे 'प्रभविष्णवे ॥
नमः समस्तभूवानामादिभूताय, भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णये
प्रभविष्णवे॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुखा धर्मानशेपेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनयं पुनरेवाभ्यभापत ॥१॥
युधिष्ठिर उवाच
किमेकं देववं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥२॥
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारवन्धनात् ॥३॥

PREALABAS
मंगलाचरण
Merence Hamer Unnnnetnी
टासम्मम्ममसराराम
SEASHEREALALALALALALA
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तं वेदपुरुष नौमि लोकाः स्युर्यदनुमहात् ।
मध्यस्तं च जगतस्मिन् शोधयन्ति मनीषिणः ।
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थीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् २३३: -- -- भीष्म उवाच जगत्प्रभु देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रण पुरुपः सततोत्थितः ॥४॥ तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुपमव्ययम् । ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥५॥ अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यतं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ।।६।। ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भुतं , सर्वभूतभवोद्भवम् ॥७॥ एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेनरः सदा ॥८॥ परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणा ॥९॥ पवित्राणां पवित्रं यो मगलानां च मङ्गलम् दैवतं देवनानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥१०॥ यतः सर्वाणि भूनानि भवन्यादियुगागमे । यसिंश्व प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥११॥ तस्य लोकग्धानम्य जगन्नाथम्य भृपते । विष्णोनामसहस्र मे भृणु पापभयापहम् ॥१२॥ .

२३४
दार्शनिक विचार
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋपिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥१३॥
ॐ विश्वं विष्णुर्वपट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकद्भूतभृद्भावो भूतात्मा
भूतभावनः ॥१४॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुपः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥१५॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुपेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान्केशवः पुरुषोत्तमः ॥१६॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिनिधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्वा प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥१७॥
खयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥२८॥
अप्रमेयो हुपीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टास्थविष्ठाः स्थविरो ध्रुवः ॥१९॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥२०॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥२१॥
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो. दुराधर्षः कृतज्ञ: कृतिरात्मवान् ॥२२॥

श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् २३५ सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः। अहः संवत्सरो,व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥२३॥ अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः।। पाकपिरमेयान्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥२४॥ वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा संमितः समः । अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृपकर्मा पाकृतिः ॥२५॥ रुद्रो बहुशिरा वर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अमृतः शाश्वतः स्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥२६॥ सर्वगः सर्वचिद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । चेदो वेदविदव्यङ्गो चेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥२७॥ लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतर्गृहश्चतुर्दष्ट्रयतुर्भुजः ॥२८॥ प्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥२९॥ उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिसर्जितः । अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥३०॥ येद्यो वैद्यः सदायोगी चीरहा माधवो मधुः। अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महारलः ॥३॥ महायुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः। श्रीमानमेयात्मा महाद्रिभृक् ॥३२॥ अनिर्देश्यवपुः

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२३६
दार्शनिक विचार
महेवासो महीभः श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदांपतिः ॥३३॥
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥३४॥
अमृत्युः सर्वदृसिंहः संधाता सन्धिमान्स्थिरः ।
अजो दुर्मपणः शास्ता विथुतात्मा सुरारिहा ॥३५।।
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः।
निमियोऽनिमिपः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥३६॥
अग्रणीामणीःश्रीमान्न्यायो नेता समीरणः।
'सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥३७॥
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः संप्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको बहिरनिलो धरणीधरः ॥३८॥
सुप्रसादः प्रसन्गत्मा विश्वग्विश्वभुम्विभुः।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह नुर्नारायणो नरः ॥३९॥
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥४०॥
वृपाही · वृपभो विष्णुपपर्वा वृपोदरः ।
वर्घनो वर्धमानव विविक्तः श्रुतिसागरः ॥४१॥
सुभुजो दुर्घरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । .
नैकरूपो वृहद्रुपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥४२॥

श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् २३७
ओजस्तेजोधु तिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः॥४३॥
अमृतांशूद्भयो भानुः शशपिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥४४॥
भूतभव्यभवन्नाथः पवन: पावनोऽनलः।
कामहा कामकृन्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥४५॥
युगादिकृयुगावा नैकमायो
महाशनः।
अदृश्योऽव्यक्तरूपश्च
सहस्रजिदनन् जित् ॥४६॥
इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुपो घृपः।
'क्रोघहा क्रोधकत्कर्ता विश्वपाइर्महीधरः ॥४७॥
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः॥४८॥
स्कन्दः स्कन्दधरो'धुर्यों वरदो वायुवाहनः।
वासुदेवों वृहद्भानुरादिदेवः । पुरन्दरः ॥४९॥
अशोकस्तारणस्तारः, सूरः शौरिर्जनेश्वरः।
अनुकूलः शतावः पनी पद्मनिभेक्षणः ॥५०॥
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्म गर्भः शरीरभृत् ।
महर्द्धिनदो वृद्धामा महाक्षो गरुडध्वजः ॥५१॥
.. अतुलः शरभो..भीमः समयज्ञो हविईरिः।
सर्वलक्षणलक्षण्यो. लक्ष्मीवान्समिविजयः ॥५२॥

२३८ दार्शनिक विचार विक्षरो रोहितो मार्गों हेतुर्दामोदरः सहः । महीधरो महाभागो वेगवानमिवाशनः ॥५३॥ उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः । करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥५४॥ व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः। परर्द्धिः परमः स्पष्ट स्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥५५॥ रामो विरामो रिजो मार्गो नेयो नयोऽनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मतिदुत्तमः-॥५६॥ चैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः , पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो. व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥५७॥ ऋतुः सुदर्शनः कालः, परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विथामो विश्वदक्षिणः ॥५८॥ विस्तार स्थावर स्थाणुः प्रमाणं-बीजमव्ययम् । अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥५९॥ अनिर्विणः, स्थविष्टोऽभूधर्मयूपो महापखः । नक्षत्रनेमिनक्षत्री क्षमः क्षामः समाहनः ॥६०॥ यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । 'सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥६॥ सुवतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।। ''मनोहरो जितक्रोधो वीरवाहुर्विदारण. १६२४ श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् २३९ खापनः ववश व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् । वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥६३॥ धर्मगुन्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् । 'अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥६४॥ गंमस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भृतमहेश्वरः । आदिदेवो महादेवो. देवेशो देवभृद्गुरुः ॥६५॥ उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः। शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो ‘भूरिदक्षिणः ॥६६॥ सोमपोऽमृतपः । सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः। विनयो जयःसत्यसन्धो दाशार्हः साचतां पतिः ।।६७॥ जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः । अम्मोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥६॥ अजो महाहः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः । 'आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥६९॥ 'महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः । त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षों महाभृङ्गः कृतान्तकृत् ।।७०॥ महावराहो 'गोविन्दः' सुपेणः कनकाङ्गदी । 'गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥७॥ वेघाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृडःसंकर्षणोऽच्युतः। चरुणो वारुणों वृक्षः पुष्कराक्षो' महामनाः ॥७२॥ - -- २४० दार्शनिक विचार भगवान्भगहानन्दी बनमाली हलायुधः। आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥७३॥ सुधन्या खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः। दिविस्टक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥७॥ त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् । संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणः ॥७५॥ शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिगोता वृपभाक्षो - वृपप्रियः ॥७६।। अनिवर्ती निवृत्तात्मा.-संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरा ॥७७॥ श्रीदाश्रीशः श्रीनिवास:श्रीनिधिः श्रीविभावनः। श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥७८॥ स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दियोतिर्गणेश्वरः । विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः॥७९॥ उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतः स्थिरः । भूशयो भूपणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥८॥ अर्चिष्मानचिंता कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः । ..अनिरुद्धोअतिरथः -प्रद्युम्नोमित विक्रमः ॥८॥ कालनेमिनिहा चीरः, शौरिः शूरजनेश्वर:। त्रिलोकात्मा, त्रिलोकेशः केशवा केशिहा-हरिः ॥८२॥ -

श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
कामदेवः कामपालः कामीकान्तः कृतागमा
: अनिर्देश्ययपुर्विष्णु/रोऽनन्तो धनंजयः ८३॥
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्रमा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥४॥
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः॥८५॥
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोतारणप्रियः।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥८६॥
मनोजवस्तीर्थकरी 'वसुरेता वसुप्रदः।
वसुप्रदों वासुदेवो· वसुर्वसुमनां हविः ॥८७॥
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः।
सूरसेनो 'यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥८॥
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा" दर्पदो' दृप्तो दुर्धरोऽथांपराजितः ॥८९॥
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान
अनेकमूर्तिरन्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।।६०॥
एको नैका सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥११॥
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी।
वीरहा विपमः शुन्योधृताशीरचलबलः ॥१२॥

२४२ दार्शनिक विचार अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकक । सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥९३।। तेजोवृपो यतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वर:। प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥९४॥ चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुव्यूहश्चतुर्गतिः चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥१५॥ समावर्तोऽनिवृत्तात्मा · दुर्जयो दुरतिक्रमः । दुर्लभो दुर्गमो दुर्गा दुरावासो दुरारिहा ॥१६॥ शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः । इन्द्र कर्मा महाकर्मा .. कृतकर्मा कृतागमः ॥१७॥ उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः । अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविजयी ।।९८॥ सुवर्णविन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः। महाहृदो, महाग” महाभूतो · महानिधिः ॥९९।। कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोनिलः । अमृतांशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥१०॥ सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्धनिपूदनः ॥१०१। सहस्राचिः सप्तजिहः सप्तधा सप्तवाहनः ।. अमूर्तिरनघोचिन्त्योभयकृद्भयनाशनः ११०२।।

श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
२४३
अणुवृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥१०॥
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥१०४॥
धनुर्धरो . धनुर्वेदो दण्डो - दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमो यमः ॥१०५॥
सत्त्ववान्सात्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः।
अभिप्रायः प्रिया.हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ॥१०६॥
विहायसगतिज्योतिः सुरुर्चिहुतभुग्विभुः।
रविविरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ।।१०७॥
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥१०८॥
सनात्सनातनतमः कपिला. कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्खस्ति स्वस्तिमुक्स्वस्तिदक्षिणः॥१०९॥
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥११०॥
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥१११।।
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥११॥

२४४ दार्शनिक विचार - . .. अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः॥११३॥ अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः। जननो जनजन्मादिीमो भीमपराक्रमः ॥११४॥ आधारनिलयों धाता पुप्पहासः प्रजागरः। ऊर्ध्वगः : सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥११५॥ प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः। तत् तत्त्वविवेकात्मा ' जन्ममृत्युजरातिगः ॥११६॥ भूर्भुवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञचाहनः ॥११७॥ यज्ञभुग्यज्ञसाधनः यज्ञान्तकृद्यज्ञगुधमन्नमन्नादं एवं च ॥११८॥ आत्मयोनिः स्वयंजावों वैखान: सामंगायनः । देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥११९॥ शमृन्नन्दकी चक्री शाङ्गधन्या गदाधरः । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥१२०॥ ॥ सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति । इतीदं- कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः । नाम्नां सहसू दिल्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥१२॥ यज्ञमृद्यकृयज्ञी ..

श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
૨૪૬
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किचित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥१२२॥
चेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छुद्रः सुखमबाप्नुयात् ॥१२३॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्मजाम् ॥१२४॥
भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्तमानसः।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥१२५॥
यशः प्रामोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अंचलां श्रियेमामोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ।।१२६॥
न भयं.. क्वचिदामोति वीर्य तेजश्च:विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान्यलरूपगुणान्वितः ॥१२७॥
रोगार्ता मुच्यते रोगाबद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः-॥१२८॥
दुर्गाण्यतिवरत्याशु .पुरुषः .. पुरुषोत्तमम् ।
: स्तुवन्नामसहस्रण-: नित्यं, भक्तिसमन्वितः ॥१२९॥
वासुदेवाश्रयो .मयों . वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा- यावि- ब्रह्म - सनातनम् ॥१३॥
न । वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते चित्..
'. - जन्ममृत्युज़राव्याधिभ्यं .नवोपजायते ॥१३॥

२४६
दार्शनिक विचार
इमं स्तवमधीयान: श्रद्धाभक्तिसमन्वितः।
युज्यतात्मसुखक्षान्तिथीतिस्मृतिकोतिभिः ॥१३२॥
न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभा मतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुपोत्तमे ॥१३३॥
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः।
चासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि
महात्मनः ॥१३४॥
ससुरासुरगन्धर्व
सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ।।१३५॥
इन्द्रियाणि मनो, युद्धिः सत्वं तेजो वलं धृतिः ।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥१३६॥
सर्वागमानामाचारः प्रथम परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥१३७॥
ऋपयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥१३८॥
योगों ज्ञानं तथा सांख्यं विद्या शिल्पादि कर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्व जनार्दनात् ॥१३९॥
एको विष्णुर्महद्भूतं. पृथग्भूतान्यनेकशः।
त्रील्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुक्ते विश्वभुगव्ययः॥१४०॥
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्म्यासेन कीर्तितम् ।
-पठेच इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥१४॥

श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् भजन्ति ये पुष्करानं न ते यान्ति पराभवम् ॥१४२॥ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्यां चैयासिक्या- मानुशासनिके पर्वणि भीष्मयुधिष्टिरसंवादे श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रम् ॥ हरिः ॐ तत्सत् हरिः ॐ तत्सत् हरिः ॐ तत्सत् श्री अहं-कामाक्षी-दर्शनम् (शरीरों ) अहंके भीतर सर्वदर्शन ही पूर्णता है। इसी- के लिए सर्वदर्शनोंकी रचना हुई है । इस लेखमें महके भीतर कैसे सर्वदर्शनोंका समावेश हो जाता है, इसीका विवेचन किया जाता है। यह सारा विश्व दृष्टथुतात्मक है । कोई पदार्थ ऐसा नहीं जो दृष्ट एवं श्रुत उभयले भिन्न हो। दृष्ट तो प्रत्यक्ष है, श्रुत परोक्ष है। यह विलक्षणता निर्याज नहीं हो सकती। इसलिए वीजनामक पदार्थ की कल्पना स्वाभाविक हो जाती है। इसी प्रसंगसे क्षेत्र तथा कर्म नामका चौथा एवं पाँचवाँ पदार्थ और. भी प्रकाशित हो जाता है, क्योंकि विलक्षणता बीजके बिना असम्भव है, और वीज बिना क्षेत्र और कर्म के युक्तियुक्त तथा उपयुक्त नहीं हो सकता । जो चीज क्षेत्रके भीतर छिपे रहते हैं ये दृष्ट नहीं हो सकते, श्रुत ही रहते हैं। कर्म अर्थात् किया स्रोतका ही हम दर्शन करते हैं । इसीलिए चौथे तत्व क्षेत्र और पाँचवें तत्व कर्मको हमें मानना पड़ता है। इनके मान लेने पर यद्द सहज ही प्रतीत हो जाता है कि यह विश्व क्या दृष्ट और श्रुतरूप दो विभागों में निरन्तर विभाजित है। अब हमें देखना चाहिए कि इस विश्वका ऐसा फोन रूप है जो दृष्ट, श्रुत,." क्षेत्र तथा कर्म इन पाचोंमें समान रूपसे अनुस्यूत . हित है। यह छडाँ तत्व ब्रह्म रूपमें सामने उपस्थित .

अहं-कामाक्षीदर्शनम् २४९ जैसे मुकुट, कटक, कुण्डलादिमें सुवर्ण अनुस्यूत है वैसे ही दृष्ट, धु त, वीज, क्षेत्र तथा कर्म सबमें ब्रह्मतत्व समानरूपसे अनु- -- " स्यूत है। । जय हम इन छचों तत्वाफा भलीभाँति मननकर लेते हैं तब हमारे सामने एक आत्मतत्वका प्रकाश आता है क्योंकि यद्यपि ब्रह्मतत्य सारे विश्व में व्याप्त है तथापि व्यावहारिक रूप विना उसका व्यवहार असामञ्जस्य उत्पन्न करता है। 'आत्म'. शब्दसे हम दृष्ट, श्रुत, वीज, क्षेत्र, कर्म तथा ब्रह्म सबका व्यवहार कर लेते हैं। आत्मतत्वकी यही विशेषता है कि वह स्थूलातिस्थूल, सूक्ष्मातिसूक्ष्म सर्वविध व्यवहारोंका अधिकरण है। जब हम आत्मतत्वका व्यवहार इस प्रकार करने में अभ्यस्त हो जाते हैं तब उसका और भी अधिक मधुर व्यावहारिक पुरुषतत्यके रूपमें व्यवहार करने लग जाते हैं। प्रायः लोग विज्ञान सीमा तक पहुँचकर भी आत्मा के नामसे चौंक जाते हैं जैप्ता भगवान्ने गीतामें कहा है कि "आश्चर्यचरप- श्यति कश्चिदेनम्" इत्यादि परन्तु पुरुष तो हमारे लिए एकदम परिचित है। पुरुष शब्द से चौकनेवाला सम्भवतः कोई भी समझदार नहीं होगा, क्योंकि पुरुषको हम स्पष्ट देखते हैं कि वह पञ्चकर्मेन्द्रियों द्वारा विश्व को कुछ देता है और ज्ञाने- न्द्रियों द्वारा विश्वसे कुछ लेता है। इस पुरुपतत्व के बाद उससे भी बढ़कर हृदयग्राही स्तर जीवरूपमें प्रकट होता है। जीव शब्द हमारे लिए ऐसा स्वा. भाविक ऊँचता है कि जितने भी चतुरशीतिलक्ष योनिमें प्राणी है, उन्हें हम जीव कहा करते हैं। उनको पुरुष भादि कहनेमें जो झिझक सी आती है यह इसमें गन्धमात्र भी नहीं प्रतीत होती। असल में जीवही पूर्योक सय तत्वों के बादका प्रकट श्री अहं-कामाक्षी-दर्शनम् (शरीरों) अहंके भीतर सर्वदर्शन ही पूर्णता है। इसी. के लिए सर्वदर्शनोंकी रचना हुई है। इस लेखमें अहंके भीतर कैसे सर्वदर्शनोंका समावेश हो जाता है, इसीका विवेचन किया जाता है। यह सारा विश्व दृष्टश्रुतात्मक है । कोई पदार्थ ऐसा नहीं जो दृष्ट एवं श्रुत उभयसे भिन्न हो। दृप्ट तो प्रत्यक्ष है, श्रुत परोक्ष है। यह विलक्षणता निर्वीज नहीं हो सकती। इसलिए घोजनामक पदार्थ की कल्पना स्वाभाविक हो जाती है। इसी प्रसंगसे क्षेत्र तथा कर्म नामका चौथा एवं पाँचवाँ पदार्थ और. भी प्रकाशित हो जाता है, क्योंकि विलक्षणता बीजके बिना असम्भव है, और चीज बिना क्षेत्र और कर्म के युक्तियुक्त तथा उपयुक्त नहीं हो सकता । जो चीज क्षेत्रके भीतर छिपे रहते हैं घे दृष्ट नहीं हो सकते, श्रुत ही रहते हैं। कर्म अर्थात् क्रिया स्रोतका ही हम दर्शन करते हैं । इसीलिए चौथे तत्व क्षेत्र और पाँचयें तत्व कर्मको हमें मानना पड़ता है। इनके मान लेने पर यह सहज ही प्रतीत हो जाता है कि यह विश्व क्यों दृष्ट और थुतरूप दो विभागों में निरन्तर विभाजित है। अब हमें देखना चाहिए कि इस विश्वका ऐसा कौन रूप है जो दृष्ट, श्रुत, वीज, क्षेत्र तथा कर्म इन पावों में समान रूपसे अनुस्यूत होकर प्रवा- द्वित है। वह छठाँ तत्व ब्रह्म रूपमें सामने उपस्थित होता है।

२४२ अहं-कामाक्षीदर्शनम् जैसे मुकुट, कटक, कुण्डलादिमें सुवर्ण अनुस्यूत है वैसे ही दृष्ट, श्रुत, बीज, क्षेत्र तथा कर्म सबमें ब्रह्मतत्व समानरूपसे अनु- स्यूत है। जय हम इन छचों तत्वोंफा भलीभाँति-मननकर लेते हैं तब हमारे सामने एक आत्मतत्वका प्रकाश आता है क्योंकि यद्यपि ब्रह्मतत्व सारे विश्व में व्याप्त है तथापि व्यावहारिक रूप बिना उसका व्यवहार असामञ्जस्य उत्पन्न करता है। 'मात्म' शब्दसे हम दृष्ट, श्रुत, योज, क्षेत्र, कर्म तथा ब्रह्म सवका व्यवहार कर लेते हैं। आत्मतत्वकी यही विशेषता है कि वह स्थूलातिस्थूल, सूक्ष्मातिसूक्ष्म सर्वविध व्यवहारोंका अधिकरण है। जब हम आत्मतत्वका व्यवहार इस प्रकार फरने में अभ्यस्त हो जाते हैं तब उसका और भी अधिक मधुर व्यावहारिक पुरुपतत्वके रूपमें व्यवहार करने लग जाते हैं। प्रायः लोग विज्ञान सीमा तक पहुँचकर भी आत्मा के नामसे चौक जाते हैं जैसा भगवान्ने गीतामें कहा है कि "आश्चर्यवत्प. श्यति कश्चिदेनम्" इत्यादि परन्तु पुरुप तो हमारे लिए एकदम परिचित है। पुरुप शब्द से चौंकनेवाला सम्भवतः कोई भी समझदार नहीं होगा, क्योंकि पुरुषको हम स्पष्ट देखते हैं कि वह पञ्चकर्मेन्द्रियों द्वारा विश्व को कुछ देता है और ज्ञाने. न्द्रियों द्वारा विश्वसे कुछ लेता है। इस पुरुषतत्व के बाद उससे भी बढ़कर हृदयग्राही स्तर जीवरूपमें प्रकट होता है। जीव शन्द हमारे लिए ऐसा खा- भाविक ऊँचता है कि जितने भी चतुरशीतिलक्ष योनिमें प्राणी हैं, उन्हें हम जीव कहा करते हैं। उनको -पुरुष आदि कहने में जो झिझक सी माती है वह इसमें गन्धमान भी नहीं प्रतीत होती। असलमें जीवही पूर्वोक सय तत्वों के यादका प्रकट .

२५० दार्शनिक विचार ।श्यास, प्रभ्यास, धर्म, अधर्म, सुख, दुःख आदि उसीके दल, पुष्प, फलादि हैं। यदि जीच न होता तो ये सब निराधार हो जाते । पशु, पक्षी, मानव सभी जीव हैं और हम सभी जीव, पशुपक्षीमानय भी है। जहाँतक मनन अर्थात् मान. सिक मियासे सम्बन्ध है मानव है। आहार निद्रादि तथा वर्णभेदसे हम पशु है। दक्षिण याम रूप दो पक्षयुक्त होने से तथा उड़ने के भेदसे पक्षी भी है। धान विचारसे मनुष्य हैं। चार प्रकारके अशनरूप अशीतिमें लक्ष रखनेसे चतुरशीति लक्ष भी हैं। यहाँ तक जो स्तर-विभाग यताये गये हैं, उनसे भी आगे जय हम इस विचार पथपर बढ़ते हैं कि एक रूपमें प्रतीत होने वाले पदार्थोके इतने स्तरभेद कैसे होते गए तय हमारी दृष्टि अन्तर्निहित गुणोंकी और पड़ती है, क्योंकि गुणभेद विना पदार्थ भेद, घर्णभेद, जातिभेद हो ही नहीं सकते। इसीलिए गुणोंको भेदक तथा विशेषफ भी कहा जाता है । गुणों में पहली संख्या रजोगुणकी है इसे हम अपने भीतर मनके रूपमें पाते हैं। रज चञ्चल है मन भी चञ्चल है। ब्राला रजोगुणी है। उप- निषदोंमें भी "मनोधै ब्रह्मा" कहा गया है। यह मन ही पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच फर्मेन्द्रियों की उपाधियोंसे दस रूपमें आता है। इसलिए रुद्रीके प्रथमाध्यायमें जिसमें मनोनिरूपण है दस मन्त्र हैं। रजके बाद दूसरी संख्या सत्वकी है। यही चित्त है। वर्तमान फालका शाता मन पक, भूतकालका शाता वित्त दो, एवं इन दो उपाधियाँसे युक्त दस दस इन्द्रियाँ येही पोडशकला पुरुषसूक्त और छः सम्बन्ध लक्ष्मीसूक्त येही बाइस मन्त्र द्वितीयाग्यायमें हैं •सत्त्वरूपचित्तके बाद हम तमको पाते हैं। तमकी यही - अहंकामाक्षीदर्शनम् २५१ विशेषता है कि स्वयंको छोड़कर दूसरेको प्रतीति नहीं होने देता (योगः चित्तवृत्तिनिरोधः, योगसूत्र) यही तृतीयाध्यायका अप्रतिरथ है। हममें बह निश्वयात्मिका बुद्धिके रूप में है इसी लिए हमारी वुद्धि भी अपने से पृथक किसी पदार्थ की प्रतीति नहीं होने देती। 'बुद्ध यन्तर्गत सव बुद्धि रूप है। बुद्धि के बिना कुछ भी ज्ञात नहीं होता। यहाँतक पारह स्तरोंका निरूपण हुमा जैसे १ दृष्ट, २ श्रुत, ३ योज, ४ क्षेत्र, धर्मक्षेत्रे फुरुक्षेत्रे गीता, ५ कर्म, ६ ब्रह्म आत्मा, ८ पुरुप, ९ जीय, १० मन, ११ वित्त और १२ बुद्धि । ये बारह तत्व क्रमशः हमारे सामने एकके बाद एक आते तो गये परन्तु अब तक हमें यह प्रतीत नहीं हुया कि कौन इनको एकसे अनेक और अनेकसे एक रूपमें गणित कराता है। जैसे गेहूँ बीज रूपले ,एक और फल रूपमें अनेक तथा पुनः जाति रूप में एक प्रतीत होता है। इसे समझनेकी चेष्टा करनेपर हमें सर्वान्तहिर्निहित अहं तत्त्वका साक्षात् होता है । यह अहं ही एकले अनन्त और अनन्तसे एककी ओर ले जाता है। यदि अहं न होता तो निश्चयतः यही फ्या विश्वका सारा व्यवहार ही ठप हो जाता । इसीलिए यह तेरहवाँ अहं तत्व सर्वो- परि है । यह महं-दृष्टि ही त्रयोदशी (क्षेत्र-क्षेत्रायोनिम्- 'उदय' गीता ) है और सही,सर्व सिद्धा है । यह काम तिथि है। इसी त्रिविक्रम रूपके भीतर, शिव-शशि तिथियाँ भी निहित हैं। यही चतुर्थाध्यायकी-एक रूपमें सचिव शक्ति, पञ्चमाध्यायकी अनन्त रुद्रशक्तियाँ, पटाध्यायकी सोमदेवता है। सप्तमाध्याय प्रतिपादित सर्वानिष्टनिवर्तिका महाकाली - और अष्टमाघ्याय प्रतिपादित सर्वकल्याणगुण गौरी देवी महालक्ष्मी हैं। इसके अभिध्यानसुधाभिषेकसे नवमाध्यायोक्त सर्व शान्ति-रूप समृद्धि . दार्शनिक विचार लक्ष्मी प्रकट होती है। इसी लिए भगवान्ने भी गीतामें कहा है कि "अहं सर्वस्य प्रभवः"। उपनिषदोंका भी इसी में विधाम है। छान्दोग्यमें "अहमेवेदं सर्वम् एकोऽहं यहुस्याम्" बताया गया है। वृहदारण्यक है कि "यो वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वममधत्" 1 तैत्तिरीय के उपसंहारमें भी यही है कि "अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्, अह- मम्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः, अहं श्लोककृदहश्लोककृदहं श्लोककृत् , अहमस्मि प्रथमजाऋतास्य, पूर्व देवेभ्योऽमृतस्यना- भायि यो मा ददाति साइदेय मा याः, अहमन्नममदन्तमाभि, अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाँ सुवर्णज्योती, देवीसूक्तमें भी "अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः, अहं मित्रावरुणा. बुभाविभय॑हमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ". इत्यादि मन्त्रोंका उल्लेख इसी कामेश्वरी दर्शनको मूल हैं। हम भी उपसंहारमें इस अहंकामाक्षी देवीकी इन लोंकोंमें वन्दना करते हैं- दृष्टश्रुतसिंहास बीजच्छनान्तराच्छन्नाम् । 'सक्षेत्रकर्मवीज्यों ब्रह्मालङ्कारसम्भूपाम् ॥१॥ आत्मोरुशाटकाव्यां । 'पुशक्षारद्वयीयुक्ताम् । साशीतिचतुर्लक्षस्निह्यजीवाख्यपरिमलोद्गाराम् ॥२॥ पशुपक्षिमानवमयी स्फूर्जद्धर्मक्रियाकुराफाराम् । राजसमानसमणिकां चित्सवांमत्यविटंप संयुक्ताम् ॥३॥ बुद्धितम श्रीसुरभि, सर्वसुधार्पिकामाक्षीम् । ऐक्यानन्त्यसुतन्त्रां त्रिदशाहंकारशारदां वन्दे ॥४॥ एममशरीरिशरीरोऽहं हरहरी से गीता व्याकरणमीमांसा) । इतिशम् चतुर्दशसूत्रोंकी दार्शनिक व्याख्या बजाया। यह नादमे समझता है कि अकारादिबतिक की मय मन मुत्रेषु अन्स्यवसासम्। नस्वा शन्दारमकं ब्रह्म नन्दिकेश्वरकाशिकाम् । समाधिस्य च ध्याचष्टे सूत्रं वेदेन्दुसंख्यकम् it बहुतसे महर्पि स्वाभिमतसिद्धिके निमित्त तप कर रहे थे। महेश्वरने वागगोचर ब्रह्मतत्वको बतलाते हुए अपने डमरूके नादसे ऋपियोंके अभिमत पदार्थका उपदेश किया। तदनन्तर चतुर्दशत्रात्मक नादका रहस्य जय ऋपियाँको समझ न आया तो ये सब लोग नन्दिकेश्वरके समीप उन सूघाँका रहस्य सम- झनेके लिए आये । उनके पूछने पर नन्दिकेश्वरने 'नृत्तावसाने' इत्यादि २७ सत्ताईस कारिकामोंसे इन १४ सूत्रोंका रहस्य बत- लाया । चे कारिफाएँ तथा उनकी हिन्दी व्याख्या यहाँ प्रदर्शित की गई है। नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद दर्श नवरवशारम् । उद्धकामः सनकादिसिद्धानेवद्विमझे शिवम्यबाटम् ॥ १ ॥ अर्थ-विश्वप्रपञ्चका नानाविध मुष्टि-स्थिति-प्रलयरूप विचित्र नाट्यप्रदर्शनयाले अतएव नटराजराज महादेवने नर्तनके अन्तम २४ बार डमरुको सनकादिसिद्धाक डाको से रहस्यभूत शिवजीका सूत्रसमुदाय . या कल्याएर साह है। पारदर्थ समुपादिष्ट सामिकालिद १ इन सब घोंमें चन्तिम (इसंहक) काम पहिलो बन्दशास्त्र प्रत्याहातारा मालिक मुनिके घानुमूलक

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दार्शनिक विचार
शिवजीने उपदेश किया है। यह अन्य राषियोंके अन्य अभीष्टों-
का भी उपलक्षण है।
अइउण् ॥ १॥
भकारो ब्रारूप: स्यारिवगुणः सर्ववस्तुषु ।
चिरकलामि समाश्रिरय लगद्रूप उणीश्वरः ॥ ३ ॥
निगुणब्रह्मस्वरूप ही अकार है। इसीलिए गीतामें कहा
है-'अक्षराणामकारोऽस्मि' इति । घद इ-मायाको समाश्रयण
कर सर्ववस्तुओंमें उ-व्यापक सगुण ईश्वर जगद्रूपसे ण-
आसीत्-आविर्भूत हुआ। सृष्टिकालमें अ-इ-उ-ऋ-ल इन
'पाँच घाँसे ही उनचास अक्षरों, पञ्चभूतों तथा पञ्चवर्गीकी
उत्पत्ति हुई। तथा च श्रुतिः 'असद्वा इदमन मासीत् ततो थै
सदजायत' सृष्टिके पूर्व असत्-इस समय असत् रूपसे प्रती-
तसा हो रहा अकाररूप ब्रह्म ही था। उसीसे सत्-सद्रूपले प्रती.
यमान अर्थात् सगुण होकर आविर्भूत हुआ।
अकारः सर्ववर्णायः प्रकाशः परमेश्वरः।
श्राद्यमन्त्येन संयोगादहमित्येव जायते ॥ ५ ॥
अर्थ -संव पोंमें अग्रगण्य अकार प्रकाशस्वरूप परमारमा
ही है। परमात्मासे आविर्भूत अकारादि इकारान्तवर्णसमुदाय-
का आद्यन्त मकार हकारके सम्बन्ध होनेसे 'अहम्' बन जातर
है। इससे यह भी उपलब्ध हुआ कि 'एकोऽहं द्वितीयः स्याम्'
इस श्रुतिसे वोधित अहम् पदवाच्य ही जीव भी है।
सर्व परात्मकं पूर्व ज्ञप्तिमात्रमिदं जगत् ।
शबभूव पश्यन्ती मध्यमा पाक ततः स्मृता ॥ ५ ॥

चतुर्दशसूनॉकी दार्शनिक व्याख्या २५५ पक्ने विशुद्धचक्रायये वैखरी सा मता ततः । सृष्ट्याविर्भावमासाद्य मध्यमा पाक् समा मता ॥ ६ ॥ अर्थ यह सम्पूर्ण जगत् पहले शप्तिमात्र हास्वरूपहीथा। फिर यही परमात्मा मनादिजीवोपाधिभूतान्तःकरणके आश्रित कर्मप्रेरित प्राणव्यापारानन्तर मायायश नाभिस्थ होकर परावार हुआ। हृदयस्थ होकर पश्यन्ती बाग हुथा। विशुद्धचक्रस्थ होकर , मध्यवार हुआ । - फिर वक्त्र (मुख) स्थ होकर वैखरोवाङ्मयवेदादिरूपमें आविर्भूत हुआ। यह बात 'वागेय विभ्या भुवनानि जछे' सूक्ष्मावाग् ही का समस्त प्रपञ्च विवर्त हुआ। 'वाचैव विश्वं यहुरूपं नियद्धं तमेवैकं प्रविभज्योपभुङ्क्त' यह ध्रुति भी उसी यात की पोपिका है। अकारं संनिधीहरय जगतां कारणरवतः । इकारः सर्ववर्णानां शक्तिकाकारणं गतम् ॥ ७ ॥ अर्थ-अकारके सनिधान से जगत् कारण होनेसे शक्ति- रूप इकार सब वर्गोका कारण माना गया है। यहाँ 'गतम्' की जगह 'मतम्' उचित है। मगरमष्टुमभूदिच्छा परा झासीत्तदाभवत् । कामबीज मिति प्राहुर्मुनयो घेदपारगाः ॥ ८॥ अर्थ -जय ईश्वरकी इच्छा सृष्टि करनेकी हुई तय काम. यीज (इकार) आविर्भूत हुआ। भकारो शसिमाग्नं स्यादिकारविरला मता। उकारो विष्णुरिस्याहुसकरवान्महेपरः ॥ ९॥ अर्थ-अकार शानस्वरूप (ब्रह्म) है। इस प्रकार चित्कला माया है। उकार घ्यापक होनेसे मद्देश्वरस्वरूप विष्णु भगवान् है। पूर्याकार्य ही द्विर्यद्धं सुबद्धं भवति इसन्यायसे फिर कहा ।

२५६ दार्शनिक विचार ऋलक् ॥२॥ ऋलक सर्वेश्वरी मायां मनोवृत्तिमदर्शयत् । तामेव वृत्तिमानित्य नगदपमजीजनत् ॥ १० ॥ अर्थ-वेदान्तसिद्धान्तमें परमेश्वरातिरिक्त कोई वस्तु नहीं है। यदि परमात्मा इरूप चित्कलाको आश्रयण कर जगदप हुआ यह माना जाय तो अद्वैतसिद्धान्त भङ्ग हो जायगा। इस शकापर समाधानरूप यह कारिका है। ऋ-परमेश्वरने ल- माया नामक मनोवृत्ति को क-अदर्शयत्--दिखलाया । यहाँ सर्वेश्वर पदसे यह सूचित किया कि माया परमेश्वरातिरिक्तं नहीं है। उसी मनोवृत्तिको आथयण कर परमेश्वरने जगत्का उत्पादन (विवर्त) किया। 'ऋतं सत्यं परं ब्रह्म' यह श्रुति हो ऋ परमेश्वरका योधक है, इसमें प्रमाण है। तत्पदार्थ परब्रह्मस्व- रूप सत्य है। वृत्तिवृत्तिमतोरन भेदलेशो न विद्यते । चन्द्रचन्द्रिकयोर्यद्वद्यथा वागर्थयोरपि ॥१॥ स्वेच्छया स्वस्य चिनुको विश्वमुन्मूलयत्यसो। वर्णानां मध्यमं क्लीवमृलवर्णद्वयं विभुः ॥ १२ ॥ अर्थ-जैसे चन्द्रमा और चन्द्रिका तथा वाग और अर्थ में भेद नहीं है उसी प्रकार वृत्तिमान्--परमात्मा तथा वृत्ति- मायामें भेद नहीं है। फेवल पार्थ क्यकी प्रतीतिमात्र है। अतः वृत्तिके माननेपर भी अद्वैतसिद्धान्तको हानि नहीं है। स्वेच्छया अपनी चिच्छक्तिमें विश्वको प्रकाशित करता है, वह वर्णीका मध्यम जो ऋ-लवर्णद्वय है उनको क्लीय-अद्वैत प्रापि लोग जानते हैं।

, चतुर्दशसूत्रोंकी दार्शनिक व्याख्या २५७ एओङ् ॥ ३॥ एषोड, मायेश्वरात्मैक्यविज्ञानं सर्ववस्तुषु । साक्षित्वारसर्वभूतानां स एक इति निश्चितम् ॥ १३ ॥ अर्थ-पूर्व में 'जगद्पमजीजनत्' जगत्को पैदा किया ऐसा कहा गया है। इस तरह जन्यजनकभाव माननेसे अद्वैत- हानि हो जायगी । अतः 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' इस श्रुतिके आधारपर इस कारिकाले उस संशयको दूर करते हैं। जन्यजनकभाव व्यवहारमात्र है। परमात्मा ही जगदपसे धर्तमान है। अतः अद्वैतहानि नहीं है। समष्टि-व्यटि-भेदसे असे युक्त इ=ए, असे युक्त उ-ओ इन दोनों वर्णोसे माया तथा ईश्वरका सय वस्तुओंमें ऐक्य योधन करते हैं। सर्वभूतोंके साक्षी होनेसे वह एक ही है। ऐऔच ॥ ४ ॥ ऐभौचमझस्वरूपः सन् जगत्स्वान्तर्गतं ततः। इच्छया, विस्तरं कर्तुमाविरासीन्महामुनिः ॥१४॥ अर्थ -ततः तय स्थान्तति जगत्का विस्तार करनेकी इच्छासे परमात्मा दीर्घाकारेकारयोगात्मक शानशक्तिरूप ऐकार तथा दीर्घाकारोकारयोगात्मक मौकाररूप प्रज्ञानात्मा मायाश- चलित होकर आविर्भूत हुए । 'अकारेकारोकाराणां हखदीर्घाणां संयोगात्सर्वसम्भूतिरिप्यते' यह ईश्वरविमर्शिनीका वचन भी इसमें मूल है। हयवरट् ॥ ५॥ भूतपन्धकमेतस्मादयवरण महेश्वरान् । ग्योमवारवम्बुवक्ष्यास्यभूवान्यासीरस एप हि-५॥

अथ दार्शनिक विचार हकारा व्योमसंज्ञा यकाराद्वायुरुच्यते । रकाराद्वहिस्तोयं तु वकारदिति सैव चाम् ॥ १६ ॥ अर्थ-पञ्चवर्णात्मक महेश्वरसे पञ्चमहाभूतकी सृष्टि हुई। यद्यपि यहाँ पृथ्वीकी सृष्टि नहीं कही गई है, तथापि उसकी भी उत्पत्ति अगली कारिकामें कहेंगे। लण् ।। ६॥ भाधारभूतं भूतानामन्नादीनान्च कारणम् । असारोतस्ततो जीयः कारणत्वाचणीरितम् ॥ १७॥ -सब भूतों (जरायुज-मनुष्यादि-अण्डज्ञ-स्वेदज-- मत्कुणादि-उद्भिज्ज-लतावृक्षादि)का आधार तथा अन्नपानादि- कोको कारणभूत पृथ्वीको उत्पत्ति लरूप परमेश्वरसे हुई। अन्नसे रेतः (वीर्य), रेतसे शरीरकी उत्पत्ति होती है। शरीर. की उत्पत्ति ही यहाँ जीवकी उत्पत्ति समझनी चाहिये। इस प्रकार कारण होनेसे लरूपकारणक पृथ्वी है। नमङणनम् ॥ ७ ॥ सन्दस्पशी रूपरसगन्धाश्च जमणनम् । व्योमादीनां गुणा होते नानीयात्सर्ववस्तुषु ॥ १८ ॥ अर्थ-व्योमादिकारणीभूत तथा सूक्ष्मरूपेण सय वस्तुओं में व्याप्त शब्दतन्मात्रारिकी उत्पत्ति अमडनरूप परमात्मासे हुई जाननी चाहिये । एते गुणाः तन्मात्ररूपेण व्योमादीनां कारणा. नीति जानीयादित्यर्थः । इससे 'गुणान्' द्वितीयान्त होना चाहिये यह शङका निरस्त हुई। .

कोहरेक माया कन? र = किनारेमज्या ? नारा.. चरून यम्। ॥९ शाजनको कदर मई-कई कटुवर मन्दिरकार है। विज्ञानाने मार-माइपबच्या इतर दिर रन गये। इन्दु के बाद सर इन्दुला है। पनाने हो निद-टु-पक सदनाकर बरख-वायू-उत्पानेन्द्रि-रत्यारेन्दिरा रूमौन्दर कागदम् ॥ १०॥ सौदापयामन्दिर। ने दूसनाबापडदए २ अर्व वा नपचनात्यो सन्दिपाणः स्' इस पवन मनुजार ज द ग ड वर्षपञ्चक बनेर-' नासिवा-निहाल्प त मानिया यातनमन कनेन्द्रिय वन गरे। साठवचम् ॥ ११ ॥. मातादिनदहतिः। दमूब समवेत रुजवावर २२ . २६० दार्शनिक विचार वर्गद्वितीयवर्णोत्थाः प्राणायाः पन्चवायवः । मध्यवर्गत्रयाजाता भन्तःकरणवृत्तयः ॥ २३ ॥ अर्थ -ख फ छ ठ थ वर्गके इन द्वितीय वर्गौसे प्राण-] अपान-ध्यान-उदान तथा समान ये पञ्च वायु उत्पन्न हुए । च ट त इन तीन मध्य वर्गके तृतीय व से अन्तःकरणकी मन- बुद्धि- अहंकार रूप ये तीन वृत्तियाँ उत्पन्न हुई। कपय् ॥ १२ ॥ प्रकृति पुरुपं चैव सर्वेषामेव सम्मतम् । सम्भूतमिति विज्ञयं कपय् स्यादिति निश्चितम् ॥ २४ ॥ अर्थ- आद्यन्त वर्यद्वय पवर्ग यवर्ग के प्रथम क प रूप दो घों के सम्पुटसे सर्वसम्मत 'प्रकृति:पुरुप का सम्भव हुआ। यद्यपि साङ्ख्याभिमत प्रकृति-पुरुप नित्य हैं, तथापि प्रकृति- पुरुपका सम्बन्ध होना ही उनकी उत्पत्ति यहाँ सम- झनी चाहिये। शपसर् ॥ १३ ॥ सवं रजस्तम इति गुणानां त्रितयं पुरा । समाश्रित्य महादेव शपसर क्रीदति प्रभुः ॥ २५ ॥ सकाराद्राजसोत्पत्तिः पकारात्तामसोद्भवः । सकारात्वसम्भूतिरिति त्रिगुणसम्भवः ॥ २३ ॥. अर्थ-सृष्टि के प्रथम सत्त्व-रज-तम इन तीनों गुणोंका कारणीभूत जिन शपस वर्णोंका समाश्रयण कर जगत्प्रभु महा- देव फ्रीड़ा किया करते हैं, उन्हीं वर्णो से उक्त गुणत्रितयकी उत्पत्ति हुई। - चतुर्दशसूत्रोंकी दार्शनिक व्याख्या २६१ हल् ॥ १४ ॥ . . " . तस्वातीतः परः साक्षी संानुपहविग्रहः । भहमात्मा परो हल् स्यामिति शम्भुस्तिरोदधे ॥२७॥ अर्थ-सम्पूर्णतत्वोंका पैदा करनेघाला सर्वानुग्रहीता तथा निग्रहकारी तत्वागोचर पर-सर्वकारण हकार ('हकारः शिव- चर्णः स्यादिति शैवागमस्थितिः') इस वचन के अनुसार में वास्तविक अपने स्वरूप में हो जाऊँ इस इच्छा से शङ्कर भग- 'वान् अन्तर्हित हो गये। पूर्वोक २७ फरिकाओंमें नन्दिकेश्वरने ब्रह्मस्वरूप तथा क्रमिक प्रपञ्चकी उत्पत्तिका.वर्णन किया है। उन्हीं कारिकाओं- की 'तत्त्वविमर्शिनी' नामक व्याख्या संक्षिप्त रूपसे उपमन्युने की है। तदनुसार ही समालतः मैंने हिन्दी व्याख्या की है । परन्तु इसको व्याख्या न कह कर स्वयमूहित इन सूत्रोंसे सृष्टिक्रमका उपपादनमात्र कहा जाय तो अनुचित न होगा। नन्दिकेश्वरने किस आधारपर १४ सूत्रोंसे सृष्टिका उपपादन किया यह भी चिन्तनीय है। समय मिलने पर अनुसन्धानपूर्वक इसकी आर्थिक व्याख्या लिखने का मैं यत्न करूँगा। इति शिवम् । सभापति य, ता०५-१-४१ प्रिन्सिपल, चिरला संस्कृत कालेज, बनारस 4 .

૨૨ दार्शनिक विचार- नन्दिकेश्वरकी दो कारिकाओंपर राजा बिरलाजीकी व्याख्या ... नृत्तावसाने नटराजराजो नदान डकां नवपञ्चवारम् । उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्श शिवसूग्रजालम् ॥ १॥ भावार्थ-पूर्वशरीरके कर्मसमाप्तिके फलका नाम नृत्ता बसान है। उसके फलसे वर्तमान शरीर नटराजराजों अर्थात् नट (शरीर) राज (भाव) राजो (अन्तःकरण मन आदि) है। वही चार अन्तःकरण सनकादि शरीरका कार्य पूरा करनेके लिए 'उद्धर्तुकाम होते हैं। अन्तःकरणकी चेष्टासे प्राणमें धक्का लगता है। उसीसे नवस्वर पाँचवर्ग निकलते हैं और बनते हैं, 'वही समझा जाता है, वही १४ सूत्र विमर्श से समझा गया है, जिसका नाम शिवसूत्रजाल है। यही १४ सूत्र है, जिसका नाम व्याकरण है । शिव जलरूप है, और जल से सव वस्तु संसारमें बनती है, वह अनेक होने से समझमें नहीं आती इससे जाल है। इस उपयुक्त श्लोकको अपराविद्यासे समझना चाहिये। अकारो ब्रह्मरूपः स्यान्निर्गुणः सर्ववस्तुपु । चिटकलामिम् समाश्रित्य जगद्रूप उणीश्वरः ॥२॥ . - भावार्थ-- --सव शरीरोंका आकार ब्रह्मनाम रूप है। यह शरीर निगुण है। शरीर सव वस्तुरूप है, क्योंकि जब चित्त प्राणकी कला शरीरको प्रेरणा करती है, तभी इन्द्रियोंसे गुणका ग्रहण तथा त्याग होता है, अन्यथा नहीं। शरीर पृथिव्यादिरूप नन्दिकेश्वरकी दो कारिकायें २६३ है, पृथिव्यादिमें चित्तकी कलाके याश्रयणखे वह जगत् उत्पन्न होता है तथा लय होता है। उण ही कर्म है, और उसके फल- स्वरूप दूसरा शरीर धारण करे उस शरीरके कर्मफल भोगने- पाला ईश्वर नाम है। यह श्लोक अपरा के अनुमानसे समझा जाता है।', दार्शनिक विचार चतुर्दशसूत्रोंका भावार्थ पञ्चमहाभतविस्तार स्वरसङ्ख्या ९ पञ्चभूतव्यक्तिके वास्ते सङ्ख्यामें व्यअनन्यापार है। यही मिलाकर १५ सूत्र हैं । अतएव "नवपञ्चवारम्" इति सङ्गतम् । उ ण वर्ण विस्तार व्यापक चेतन व्यक्ति कर्म धर्म २ ल वर्ण धमें क्रिया कर्म ३ एओङ् ४ ऐओच् ५ हयवरट् वर्णानुसार शरीर जगत् शरीर कर्मसे पूर्ण अधिकार रूप भोग ६ लण भन्नाधार ७ञमङणनम् | ८ झभञ् शब्दसे शरीरका भूतोंमें आवागमन है विहार और व्यापार है, चतुर्दशसूत्रोंका भावार्थ ९ घढधप् वर्णमें. त्याग और ग्रहण है। १० जवगडदश पञ्चज्ञानेन्द्रियों में विहार है ११ खफछठथचटतव कर्मेन्द्रियोंका व्यापार १२ कपय प्रकृति-पुरुषका भाव मन व्यापार जडचेतन . प क्रिया कर्म धर्म कर्म भोग फल वर्ण रूप (अर्थ) भोग धर्म १४ ह सांख्यमें वर्ण वर्णमें लेन देन है (राजा) यलदेवदास विरला १ २६६ दार्शनिक विचार नन्दिकेश्वरकृत कारिकाओंकी २७संख्याका अभिप्राय १-अ इ उ ण (९ स्वर) २-लक (३ गुण-सत्व, रज, तम)३ ३-ए ओ ङ {अ से युक्त इ=ए (मन) अद्वैत और असे युक्त उ=ओ ज्ञानेन्द्रिय कर्मेन्द्रियोंके व्या- पारसे जगत् परिपूर्ण है।} १ ४-ऐ औ च ५-ह य व र ट्. इन ९ सूत्रोंपरकी कारि-२ ६-ल ण काओंकी ११ संख्याओंसे? ७-अम ङ ण न म्. ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय तथा? ८-झ भन मनका बोध होता । १ ९-घड ध प् १ १४-जयगड दश १ ११-ख फछ ठथच टेत व् १२ क प य् इन दोनोंपरकी कारि-२ १३-श प स र काओंकी ३ संख्यासे पूर्व १ १४-हल् Dj शरीर, वर्तमान शरीर और २ फलभोग, शरीर इन तीनों का चोध होता है। २७ .

अष्टाध्यायी २६७ अष्टाध्यायी शब्द व्याकरण अक्षर धातु का न्याय समझने के लिये पाणिनीय जी ने (१० इन्द्रिय और ४ अन्तःकरण) १४ सूत्रों का प्रयोग किया है। और शरीर से ९ द्वार से विषय का ग्रहण त्याग करने के लिये नन्दिकेश्वर ने.२७ कारिकाओं से समझाया है। शरीर में ८ धातुये हैं उनका अष्टाध्यायी में . ८.अध्यायों के ३२ पाद से ३९८२ -सूत्रों से वृत्तिमयोग करने के लिये बनाया है और सिद्धान्तकौमुदी में ३९७८ सूत्रों से प्रयोग वृत्ति फरके दिखाया है। यही व्याकरण से शब्द और धातु से न्याय समझना चाहिये।

श्रीगणेशायनमः।
.
ज्यौतिपतत्व-विचार
ज्यौतिप शास्त्र के तीन विभाग हैं। १–फलित, २: गणिते,
३-सिद्धान्त । ये तीनों विभाग शरीरसे सम्बन्ध रखते हैं।
ज्योतिषका निर्वचन इस प्रकार है--ज्योतिष (प्रकाश) तेज
स्वरूप, नवग्रहोंका विचार जिससे हो उसे ज्यौतिप कहते हैं।
इन्हीं नवग्रहों द्वारा ज्योतिपका विचार करना चाहिये। जैसा
कि वृहज्जातकमें कहा है--
कालारमा दिनकृन्मनस्तुहिनगुः सत्वंकुजोज्ञोवचो ।
जीवोज्ञानसुखे सितश्च मदनो दुःख दिनेशात्मजः ॥
राजानी रविशीतगू क्षितिसुतो नेताकुमारी बुधः ।
सूरिनवपूजितश्च सचिवी प्रेप्यः सहस्रांशुजः ॥
शरीर, काल, आत्माका स्वामी सूर्य, मनका स्वामी चन्द्रमा
सत्य (शौर्य) का स्वामी मंगल, वाणी ( बोध) का स्वामी
बुध, शान और सुखका स्वामी गुरू, मदनका स्वामी शुक्र और
दुःखका स्वामी शनि है। ग्रहोंमें सूर्य और चन्द्रमा राजा,
मंगल नेता, बुध राजकुमार, गुरू और शुक्र राजमन्त्री, शनि
दास हैं। तात्पर्य यह है कि जन्माङ्गमें जो जो ग्रह बलवान हैं
वे जिन २ मात्मा आदि पदार्थोके स्वामी और कारक है वे २
आत्मा आदि पदार्थ शरीरमें वली होकर निज आकार स्वरूप
शरीरको करते हैं।

ज्योतिपतत्व-विचार शरीर के बारह अङ्गों (शिर, मुख, वक्षस्थल, हृदय, उदर, कटि, बस्ति (नाभि-लिङ्ग के मध्य का स्थान ),व्यंजन (स्त्रीपुरुष के चिह्न विशेष), दोनों ऊरू, दोनों जानु, दोनों जंघा, दोनों चरणों) में स्थित बारह राशियों (मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धन, मकर, कुम्भ, मीन) के स्वामी कम- से भौम, शुक्र, चुध, चन्द्रमा, सूर्य, बुध, शुक्र, भौम, शनि, शनि और गुरू है। यदि यह कहा जाय कि इस पृथ्वी रूपी शरीर में ५ कर्मेन्द्रिय और ५ ज्ञानेन्द्रिय, मन, और प्राण इन बारहों स्थानों में १२ राशियाँ हैं, जिनमें प्राण और मन के सूर्य और चन्द्रमा अपने स्वभावानुकूल तेजखभाव सिंह का स्वामी सूर्य और शीतलखभाव कर्क का स्वामी चन्द्रमा, शेष १० इन्द्रियात्मक १० राशियों में से एक २ राशियों को रवि चन्द्र ने शेप ग्रहों को दिया तो अत्युक्ति न होगी इस प्रकार पंचताराग्रह दो २ राशियों के स्वामी हुये। सिंहस्याधिपतिः सूर्यः फर्कस्याधिपतिः शशी । मेपवृश्चिकयोभीमो बुधो मिथुनकन्ययोः । जीवो मीनधनुः स्वामी शुको वृपतुलाधिपः । प्रारधिपतिः प्रोक्तः शनिर्मकस्कुम्भयोः । सूर्यादिग्नहों के उच्च -सूर्य का मेष, चन्द्र का वृप, भौम का मकर, बुध का कन्या, गुरू का कर्क, शुक का मीन, शनि का तुला उच्च राशि है। अपने २ उच्च राशि से सातवीं नीच राशि होती है। अजपममृगानाकुलोरा झपवणिजौ च दिवाकरादितुलाः । दशशिखि मनुयुक्तिीन्द्रियाँशस्त्रिनवकविंशतिभिश्चतेऽस्तनीचाः ॥ :

ज्यौतिपतत्व-विचार
२७१
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7 उपर्यु
नहीं देते। अर्थात् शरीर सुख, गृहसुख, स्त्रीसुख, राज्यसुख
नहीं देते । यदि इन स्थानों के स्वामी पापग्रह हों तो अशुभफल
नहीं देते है। जैसा कि पाराशरजोने कहा है--
शान्ति शुभंनृगां सौम्या: केन्द्राधिपा यदि ।
होते. प्रबलाश्चोत्तरोत्तराः ॥
' असंगत मालूम होता है।
भफल न दे और पापफल
इसलिये यदि यहाँ यह
है। जिन पाँच ज्ञाने.
और पाँव कर्मेन्द्रियोंके
पशानेन्द्रियसे भोग
है। अतएव भोग
नहीं देता, और
नहीं देता अर्थात्
-
'नः।
"
शरीरका
रकी जाया
क्षा करना
वें भावको
idea

२७० दार्शनिक विचार जो अह अपने राशि में या अपने उच्चस्थान में होता है यह बलवान होता है। शरीरके उत्पत्तिके समय द्वादश (१२) राशियों में से जो राशि अपने क्षितिज (उदयप्रदेश) में उदय हुई रहती हैं वही लग्न होती है और उसीको तनुभाव कहते हैं। शेप भावोंकी गणना वहींसे क्रमशः आरम्भ होती है जैसा कि नीचे चक्रमें है- भाय चक्रम् .घन २ व्यय १२ तनु १ आय ११ . ८. सुख 'कर्म १०. . सुत ५ जाया ७ भाग्य ९ रिपु ६ मृत्यु८ इन भावों में शरीरके उदयके समय जो ग्रह जिस राशिमें हो उसे उस राशिमें रखकर शुभाशुभ विचारना चाहिये । विशे- पता केवल इतना ही है कि यदि ग्रह अपने उच्च, स्थानादिमें हो तो वह अपने भावया पूर्णफल देता है और नीचादि राशियों में हो तो शून्यफल देता है। इस पृथ्वीरूपी शरीरके तीन उपकरण (गृह, स्त्री, राज्य) और हैं । अर्थात् शरीरको लेकर चार हैं । यही चार स्थान याने १।४।७।१० केन्द्र हैं। इनके स्वामी गुभग्रह हों तो शुभफल 1.

ज्यौतिपतत्व-विचार
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नहीं देते । अर्थात् शरीर सुख, गृहसुख, स्त्रीसुख, राज्यसुख .
नहीं देते । यदि इन स्थानोंके स्वामी पापग्रह हो तो अशुभफल
नहीं देते है। जैसा कि पाराशरजोने कहा है-
न दिशान्ति शुभंनृणां सौम्याः केन्द्राधिपा यदि।
फराश्चेदशुभं ह्येते प्रवलाश्चोत्तरोत्तराः।
किन्तु यहाँपर उपर्युक्त अर्थ असंगत मालूम होता है।
अर्थात् शुभफल देनेवाला शुभग्रह शुभफल न दे और पापफल
देने वाला पापग्रह अशुभफल न दे ? इसलिये यदि यहाँ यह
कहा जाय तो अर्थ की संगति हो जाती है। जिन पाँच ज्ञाने.
न्द्रियोंफे स्वामी देवस्वरूप शुभग्रह हैं और पाँच कर्मेन्द्रियोंके
स्वामी असुररूप पापग्रह हैं। इनमें देवस्वरूप ज्ञानेन्द्रियसे भोग
करता है और असुरस्वरूप त्याग करता है। अतएव भोग
करनेसे देवस्वरूप शुभग्रह पारलौकिक शुभफल नहीं देता, और
त्याग करनेसे असुर स्वरूप पापग्रह अशुभफल नहीं देता अर्थात्
पारलौकिक शुभफल देता है।
दृष्टिविचार-पश्यन्ति सप्तमं सर्वे शनिजीवकुजाः पुनः।
विशेषतश्च त्रिदशनिकोणचतुरष्टमान् ॥
अपने अपने स्थानसे सप्तमस्थान जायास्थान है। शरीरका
मन ही राजा है और पूर्वके कर्मोंको भोगनेके हेतु शरीरकी जाया
संशा है और त्यागनेके हेतु स्त्री संज्ञा है। शरीरकी रक्षा करना
मनका कार्य है। इसीलिए ये सभी ग्रह अपनेसे सातवें भावको
देखते है। जैसा फि लिखा है-
स्वां प्रसूति चरित्रं च कुलमात्मनमेव च ।
स्यं च धर्म प्रयरमेन जायां रक्षन्हि रक्षति ॥
A

२७२ दार्शनिक विचार तृतीय भाव पराक्रम स्थान है और दशम राज्य स्थान है। राजाके पराक्रम (बल) और राज्यको रक्षा करना भृत्य (सेवक) • का कार्य है । ग्रहों में शनि भृत्य है, इसलिए शनि १० को भी देखता है। ५ वाँ स्थान वुद्धि विद्याका है, ९ वाँ स्थान धर्मका है । विद्या और धर्मकी शिक्षा देना गुरुका कार्य होता है। इसलिए गुरु ९५ को भी देखता है। ४था स्थान सुखका है। ८ वाँ स्थान दुर्ग (किला) और आयुका है। दुर्गकी रक्षा करते हुप सुख देना यह सेनापतिका कार्य है,। इसलिये सेनापति भौम अपने स्थानसे ४८ को भी देखता है। इसी प्रकार फलित स्कन्धसे शारीरिक सुख दुःखका विचार करना चाहिये। और गणितसे कौन ग्रह किस भावमें कय गया है यह ज्ञान करना चाहिये । तथा सिद्धान्तसे "सभी पदार्थों को समझाकर यही ठीक है" यह निश्चय करना चाहिये । विक्रमके चलाये हुए सम्बत् और शालिवाहनके चलाये हुए शाकाके विषयमें शरीरके विचारसे इस प्रकार है। पूर्व शरीरसे किए हुए फर्मका फल वर्तमान शरीरमें भोगना यही विक्रम सम्वत् है। और सत्कर्म फल लेकर आना वर्तमान शरीरमें भोग लेकर जाना यही शाका है। विक्रम सम्यत् और शाका का अन्तर इस प्रकार है-- सम्बत् २००७-शाका १८७२-१३५ वर्ष का अन्तर होता है। वस्तुतः विक्रमके १० सम्वत्सरोका अन्त माघ या फाल्गुनमें हुआ करता है और उसी समय विक्रमके दूसरे सम्वत्सरका प्रवेश हो जाता है किन्तु शाका वही रहता है । जब मेष संका- न्ति चैत्र या वैशाखमें होती है। उस समय शाका याने नूतन वर्ष का प्रारम्भ होता है। किन्तु प्रचलित प्रथाके अनुसार वान्द्र- मासके अनुसार सम्वत् शाकाका आरम्भ चैत्र शुक्ल १ प्रतिपदसे ज्योतिपतत्व-विवार २७३ ही मान लिया जाता है जो कि युक्तियुक्त नहीं मालूम होता है। इसलिए सम्वत् और शाकाका अन्तर उक्त समयमें १३६ भी हो सकता है। इसी हेतु चैत्रके आरम्भसे ही लोक और शरीरके काशी क्षेत्रमें 'बुढ्या मंगल"नामक आमोद प्रमोद होता है। कलि आरम्भ होने के ३०५४ वर्ष के बाद युधिष्ठिर नामके शककारक हुए यदि इसमें विक्रम और शाकाके अन्तर वर्ष १३५ युत कर दें तो शाकारम्भके पूर्व कलिके गत वर्षका ध्रुवा हो जायगा। इसमें वर्तमान शाकाको जोड़ते जायँ तो अभीष्ट शाकामै वीते हुए कलिके काफी संख्याका ज्ञान हो जायगा । जैसे ३१७९५ १८७२-५०५१ - गत कलिवर्ष । यदि १३६ को सम्वत्का ध्रुवा और १ शाकाका धंधा मान लिया जाय तो नूतन सम्वत् और शाका किसीके भी . नामसे चलाया जा सकता है। विक्रमके ६० सम्वत्सरों. के नाम अधोलिखित हैं जिनमें पहले २० सम्वत्सर ब्रह्म- विशतिके है~१ प्रभव, २ विभव, ३ शुक्ला, ४ प्रमोद ५ प्रजापति, ६ अंगिरा,७ श्रीमुख, ८ भाच, ९ युवा, १० धाता, ११ ईश्वर, १२ बहुधान्य, १३ प्रमाथी, १४ विक्रम, १५ वृष, १६ चित्रभानु, १७ सुभानु, १८ तारण, १९, पार्थिव, २० व्यय । आगेके २० सम्वत्सर विष्णु विंशतिके है। २१ सर्वजित्, २२ सर्वधारी,२३ विरोधी, २४ विकृति,२५ खर, २६ नन्दन, २७ विजय, २८ जय, २९ मन्मथ, ३० दुर्मुघ, ३१ हेमलम्ब, ३९ विलम्ब, ३३ विकारी, ३४ शर्वरी, ३५ प्लय, ३६ शुभरून्, ३७ शोभन, ३८ प्रोधी, ३९ विश्वावसु, ४० पराभव । आगेके २० सम्वत्सर रुद्र विशंतिके है। ४१ प्लचंग, ४२ कीलक, ४३ सौम्य, ५४ सांधारण, ४५ पिरोधक, ५६ परिधापी, ४७ प्रमादी, ४८ आनन्द, ४१ राक्षस, ५० नल, ५१ पिंगल, ।

दार्शनिक विचार
५२ कालयुक्त, ५३ सिद्धार्थ, ५४ रौद्र, ५५ दुर्मति, ५६ दुंदुभि,
५७ रूधिरोद्वारी, ५८ रक्ताक्ष, ५१ शोधन, ६० क्षय। इसी प्रकार
ईश्वी सन् और शाफा का अन्तर १९५० - १८७२ =७८ होता
है। और सम्बत् तथा ईस्वी का अन्तर ५७ वर्ष होता है।
युगव्यवस्था-
खस्थ मनुष्य सुखसे बैठा हुआ जितने समयमें सरलतासे
श्वासको खींचता है और बाहर छोड़ता है इतने समयको
प्राण कहते हैं । ऐसे ६ प्राणों की एक विनाडी, ६० विमाडीकी
एक नाडी और ६० नाडीका एक नाक्षत्रदिन होता है। इसी
प्रकार एक दिनमें २४ घंटे होते है। नीचेकी तालिकासे यह
स्पष्ट हो जायगा कि प्राण और सेकेंडका क्या अन्तर है:-
१ नाक्षत्रदिन-२० घड़ी (नाडी)-२४ घण्टा
६०४६०=३६०० पल-२४४६०-१४० मिनिट
३६००४ ६२१६०० प्राण-१४४० x ६०-८६४००. सेकेंड
अर्थात् १ प्राण-४ सेकेंड
वस्तुतः विषयके कारण दो है उनमें एक प्रथान होता है
और दोनोंके तीन २ (आँख, नाक, मुख) इन्द्रियाँ याने
६ इद्रियाँ प्रधान होती है। इस प्रकार २१६ संख्यायें हुई।
एक शरीरकी दश इन्द्रियाँ अर्थात् एकसे दशगुनी हैं इस प्रकार
दोनों मिलकर शतगुणित हुई अर्थात् २१६०० यही अहोरात्रमें
शरीरके प्राण का मान है। दोनोंके योगले विषयकी पूर्ति होती
है इसलिये पूर्वाक संख्याको दूना कर देनेसे ४३२०० हुआ
किन्तु दोनोंकाः लक्ष एक है इसलिये एक बिन्दु और
बढ़ा देनेसे ४३२००० यह कलियुगका मान हुआ। सत्ययुगमें
कलियुगसे चारगुना धर्म होनेसे फलिके वर्षों को चौगुना
करनेसे सत्ययुगके १७२८००० पर्प हुये। त्रेतामें तीन गुना धर्म

ज्योतिपतत्व-विचार
२७५
दोनेसे फलिसंग्याको तीन गुना करने से १६२६००० पर्प-प्रेता
युगमा मान हुआ । इसी प्रकार द्वापर, दुगुना धर्म होने से
फलि संख्याको दुना करनेसे ८१४००० द्वापरयुगके वर्णका
प्रमाण होता है। वास्तव में सत्ययुग और फलियुग के थोकी
संख्यायोंका योग और प्रेता तथा वापर घाँकी संख्याओंफा
योग भी२१६०००० के बराबर हो जाता है। वास्तधमें प्रत्येक
युग वर्षमानसे अन्तिम सदन और लक्षके दोबिन्दुओंको जो
फिभोग स्वरुप निकाल दिया जाय तो केवल फर्मका २१६००
संक दी जायेगा।
पश्चा--
तिथि यार नक्षत्र योग फरण यही पञ्चा है। यार रविवार..
के मामसे क्योंकि तृष्टयादिमें रयियार ही था। रपि चन्द्रमा
फा १२ अंश अन्तर होनेसे १ तिथि होती है । चन्द्रमाके प्रति-
दिन योगयो भनुसार १३, अंग एक नक्षम होता है।
रविचन्द्र योग होने से २७ योग होते हैं। प्रत्येक तिथियोंमें दी
फरक होते हैं।कारीर के पश्चा: कान, गेन, नाक, जिदा, मुघ
है। नक्षत्र कक्षा सबसे ऊपर होनेसे रविफे मार्गसे आकर उदय
को माग होता है इसलिये अतिथि रूपसे निधि होता है। नक्षत्र
नारीर है। प्राण, मन, सूर्य और चन्द्रका योग यही योग है।
मामीनदीको जो मार्ग हैं यही पार । यद सय फानसे सुनते है
उसाफ करण करने हैं। ऐसा शरीरम (मनको) विचारसे
सिस होता है।
पद पृष्धी पी शरीर चल (प्राण) मूर्य स्थिर है। यह
भायमटफा मनसेनाका या रेलगाड़ी पर चलने वाले
पो मालूम होता कि नौा या गाड़ी स्थिर और पृथ्वी
चल रही है। इसी प्रकार मय स्थिर है और पृथ्यो चलती

। दार्शनिक विचार सूर्य का चलना भ्रम है ? परंतु यदि पृथ्वी का चलना पश्चिम मुख मान लिया जाय तो वृक्षपर रहनेवाले जीव अपने रहनेके स्थानको छोड़ कर पूर्वमें चारा लेने के लिए गए हुए हैं वे जव चारा लेकर लौटेगें तो वे अपने स्थान को कैसे पायेंगे? क्योंकि उनका स्थान पृथ्वीके पश्चिमाभिमुख गतिके कारण पश्चिम चला गया होगा। किंतु प्रत्यक्ष देखा जाता है कि नित्य पक्षी चारे को जाते हैं और लौटकर अपने स्थान पर आते हैं । इस- लिए पृथ्वी स्थिर है और सूर्य चल है। देश भेदसे अधिकमास मलमास पुरुपोत्तममास तीनों एक ही मासके नाम हैं। जिस चान्द्रमासमें सूर्य की संक्रान्ति न हो उसे अधिमास कहते हैं। चान्द्रमास अमावास्यासे अमावास्या तक होता है। जैसे चैत्रके अमावास्यासे वैसाखके अमावास्या तक मेपके सूर्य होनेसे . चैत्र मास होता है। इसो क्रमसे शेप मासों को जानना चाहिये । शरीर में अधिक आहारादिके करनेसे मलविशेप हो जाता है । जव सौर चान्द्र दिनोंका अन्तर अधिक दिन बढ़ते बढ़ते जब ३० दिन होता है तो एक मलरूपी मास मलमास होता है। जो कि शुभ कार्यमें अशुभ होता है। यदि एक चान्द्रमासमे दो संक्रान्ति हो जाय तो पूर्वनियमके अनुसार एक क्षयमास होता है। ग्रहण-किसीको ग्रहण करना यही ग्रहण है। जैसे पूर्णिमामें भूमिकी छाया चन्द्रविम्बको ग्रहण करती है इसलिए पूर्णिमाको चन्द्रग्रहण होता है। अमावास्याको चन्द्रविम्ब सूर्य- विम्यको ग्रहण करता है इसलिए अमावस्याको सूर्यग्रहण होता है। विवाहमुहूर्त गोत्र कुलादिसे शुद्ध गुणसे युक्त कन्यासे यर विवाह करे। विवाहमें वर्ण, वश्य, तारा, योलि, ग्रहमैत्री, गणमैत्री, साड़ी इन M ज्योतिपतत्व विचार माठ गुणांका विचार करना चाहिये। ये आठों उत्तरोत्तर वली हैं। सभी गुणोंका योग १८ से ऊपर हो तो विवाह शुभद होता है। विवाहमें शुभ नक्षत्र-रेवती, रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराबाद, उत्तराभाद्र, मृगशिरा. मघा, मूल अनुराधा, हस्त, स्वाती । कन्या, तुला, मिथुन लग्नमें और ४।९।१४।३० तिथियों- फो छोड़कर शेष तिथियों में शुभद होता है। विवाह लग्नसे ३६८ इन स्थानों में रबि, केतु, राहु शनि, मंगल, ३२६।११, चन्द्र, २,३, ११, बुध और गुरु, ७१८ को छोड़कर शेष स्थानों में और शुक्र ८ स्थानोंको छोड़कर शेप स्थानों में शुभद होता है। यात्रामुहर्च जन्मान या प्रश्न फालिक लग्न द्वारा दशा अन्तर्दशा भादिसे शुभाशुभका विचार कर यात्रा करनी चाहिये। यात्राके नक्षत्र--पुप्य, हस्त, पुनर्वसु, मृगशिरा, अश्विनी, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती ये नक्षत्र यात्रामें श्रेष्ठ हैं। पष्ठी, द्वादशी, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी और पर्वदिन (पूर्णिमा, अमा, रविसंक्रान्ति ) इन तिथियोको छोड़कर शेष तिथियों में और मीन, तुला, कन्या, मिथुन इन लग्नोंमें यात्रा करना श्रेष्ठ होता है। दिग्द्वारलग्न याने जिस दिशामें यात्रा करना है उस दिशाके लग्नमें ) यात्रा करनेसे यात्रा श्रेष्ठ होती है और द्रव्य- का लाभ होता है। इसके विपरीत लग्नमें यात्रा करनेसे हानि, द्रव्यका नाश थोर शत्रुका भय होता है। इन मुहत्तोंके अनुसार विवाहादि कार्य करने से सुख-समृद्धि होती है। श्रीगणेशात पाठक श्रीहरेकृष्ण झा मनन विचार नाम-रूपका धर्म--- १-आत्माके नाममें एक धर्म-व्यापकल २-पुरुपके नाममें २ धर्म- सामान्य, विशेष ( साक्षी) २ २ ३-ब्रह्मके नाममें ३ धर्म- शब्द (सत् ), रूप (चित् ), रस (आनन्द), १ २ ३ ४-जीवके नाममें ४ धर्म- वासना क्रिया कर्म फल १ २ ३ - ४ उपर्युक्त दश धर्म शरीरमें ही हैं। १-एक शरीररूपी वर्णके धर्ममें - ४. वर्गाके ४ धर्म हैं- शब्द सुने, सुनावे रूप देखे, दिखावे २ रस ग्रहण करे, करावे; गन्ध ग्रहण करे, करावे १ उपर्युक्त नाम-रूप समुदाय (प्रवाह ) का नाम संसार है । एक एक भिन्न भिन्नका नाम जगत् है । उसी जगत् .

मनन-विचार
૨૨
में कर्मसे शरीर और शरीरसे कर्मकी उत्पत्ति है; उसीके
फलसे दूसरे जन्मके शरीरमें फलभोग है। पूर्वशरीर
में इन्द्रियोंके व्यवहारसे सम्बन्ध होता है और उस पूर्वजन्म
सम्बन्धसे कर्म-शरीर उत्पन्न होता है, उसीको प्रकृति
कहते हैं । वह प्रकृति पुरुपसे चैतन्य है और उसके न
रहनेसे जड़ है। पूर्वसम्बन्धसे शरीरके धर्मसे प्रिय
और अप्रिय दो प्रकृति (स्वभाव) हैं । वर्ण-कर्ण, चक्षु, मुख
में गुणके अनुसार अनुकूल और प्रतिकूल ६ प्रकृति हैं।
ये सब मिलकर ८ प्रकृति हैं, वही एक शरीरमें है। इन
चारों वासे चारों जातियाँ बन गयी हैं । यथा-कर्णके
तीन ज्ञानसे ब्राह्मण जाति, और चक्षुसे क्षेत्र दो ज्ञानसे
क्षत्रिय जाति, और मुखसे रस दो ज्ञानसे वैश्य जाति,
और प्रिय, अप्रिय गन्ध ज्ञान नासिका सब शरीर शुद्र
जाति । इन चार ज्ञानोंसे तीन द्विजाति ब्राह्मण, क्षत्रिय
वैश्य अधिकारसे बन गयी । शूद्रजाति एक शरीर जाति
हो गयी । यही निय और अनुकूल प्रकृति शरीरोंका मेल
होता है, और प्रतिकूलमें कैप ( झगड़ा ) होता है।
यथा-कर्मणा प्राप्यवे गोत्रं गोत्राद्वर्णोऽभिजायते ।
वर्णाद्धर्मश्च वृत्तिश्व एप धर्मः सनातनः ।।
चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः । (गीता)
इसका अभिप्राय यह है कि शरीर में १ कर्म और

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Author
Birla,raja Baldevdas
Title
Darshnik Vichar
File name
Darshnik Vichar
Text
OCR done
Citation
1950
Published
2012/10
Publisher
Banaras.,birla Sanskrit College
Language
Sanskrit
Pages
299
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313547
Barcode
99999990322224.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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