Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shrimannandisutram

Muni, Shri Hastimallo · 2011/09

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प्रकाशक प्रयबदाइर मीमोतीलासजी मुया भवानी पेठ सातारा सिट (IL S XL NLY ) मिनागमापनयाऽाराधिताप्रतिठसजिनान् । चन्दनग्रन्थमालेयमाहादयतु सम्मनान् ॥१॥ पसुनिपिनिधिम्ममिसे, पोकऽमौकमेव । पोपे सितेप्रीतियां, नन्दीसूमस्य छद्रण पूर्णम् ॥ २॥ रा रा. पिस परिबर्षे मार्यभूषण मुमणाम्य ९१५१ शिवामीनगर, पुणे, प्रकाशकका वक्तव्य। बन्धुओं । बडे हर्षका विषय है कि आज स्वर्गीय काकाजी शेठ चन्दन- मल्लजी मुथाकी सदिच्छासे आगम-प्रकाशन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य करनेका मुझे सुअवसर मिला । गतवर्ष दशवकालिक सूत्रका हिन्दी व मराठी भाषान्तर टीकाके साथ प्रकाशित किया, उसके बाद द्वितीय वर्षमें नन्दीसूत्रका प्रस्तुत संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है, इसका संशोधन आदि कार्य पूज्यश्रीने सातारामही प्रारम्भ कर दिया था जो इस तीसरे वर्षमें अहमदनगर चातु- सिके समय सामग्री संकलनसे पूर्ण हुआ, यद्यपि पूज्यश्रीका विचार इस- समय लिखवाकर रखनेका था, तो भी हमारी विशेष प्रार्थनासे वह संशोधित पुस्तक हमको मिली और हमने कई प्रेसोंमे पूछताछ करनेके बाद पूनाके आर्यभूषण प्रेसमें छपवानेका प्रबन्ध किया। मुद्रणकार्य कार्तिक पूर्णिमासीतक पूर्ण होसके इस विचारसे आश्विन विजयादशमीमें नन्दीसूत्रकी हस्तलिखित प्रति प्रेस मैनेजरको देदी गई, किन्तु पसन्दयोग्य कागज मिल नहीं सका, कागजके तलासमे विलम्ब होनेसे कार्तिक शु० ५ से मुद्रण कार्यका आरम्भ हुआ, घूफके आने जाने में विशेष विलम्ब देखकर प्रेस मैनेजरने कहा कि इसतरह यह मुद्रणकार्य १ मासमें पूर्ण होना अशक्य है, एक संशोधक पूनामें रखिए, तदनुसार मार्गशीर्ष वद पञ्चमीसे प्रूफ संशोधनके लिये व्यवस्था पूनामे की गई, फिरभी पूज्यश्रीकी दृष्टिमे पूफ एकवार आना अनिवार्य होनेसे १ मासके स्थानमें २ माससे अधिक समय लगा। प्रस्तुत संस्करण अनेक संस्करणों के निरीक्षण करके तथा अनेक विद्वान् मुनिओंसे शङ्का समाधान करके परिश्रमके साथ सम्पन्न किया गया है, तथापि इसकी उपयोगिता व श्रमोंकी सफलता तो पाठकोंके सन्तोषसेही समझी जायगी। प्रार्थी- नम्न-मोतीलाल मुथा. सातारा सिटी.

नन्दीनके सम्पादन आदि कार्यमें संसदीय प्रन्या मंदिर पूमा प्रन्यमाम प्रकाशक या प्राप्तिस्थान १भी मन्दीमीन श्रीराम पमपतिसिंह बहादरका मनमगिरि चिप पाहावयोष आगमसमह-मनीम स ( मा ) भीमचमिसूत्रम् विमपदामपुरिसंशोषित गर्मि हारित्ति इन्दौरसे मुमित मम्दीपूत्र मूळपाठ छोटेखा यदि जीवनकार्यान्यवनमेर नन्दीमत्र सासा खीवसहायबी ज्वाखामता ५ भमोसकसपिगीकृत पसी मदरी पक्षिमीमाबार हिम्पीमावानुवापसहित ममीयाम् मठममिरिहत टीका आगमोदय-समिति सूरत ममीस्मचि मूससहित डारकर माध्य विद्या संशोधन प्रधिकार मसपपिरिसं. १४७8 परम्पसूत्रम् सभाम्प (म नियाम) मैन आस्मानम्म समा, मायामा ८ ममवतीमा पति भयवानवाससम्पादित मुगरात विद्यापीठ, अमदावाद १मर्चमामधी कोप शतावधानी मुनिमी एमागीमाराम सम्पादक-सम्बईत्या. काम्फरन्स १० ममिवावरात्र रतलाम ११ श्रीमवावास्यकनियुकिनीपिका गुहावी म्म्लुमाई, मावनगर म विमान १२मावस्यक-धम् पेरामायमन, सर्व मन्पमिरिचि पदीय माम १५पाश्मसामाण्यमो पति परमोविसावटी रेट, बाप म्याकरमती ममता १५ पयपणाप-वच टीका मुमर प्रम्पस्न बाम्प अमदाबाप रिप्यासिमित १५समवायोय माममोरप समिति सूरत ममयोग परिषत टीका १५ पोम्मरसारमीवकाम परमतममारकमण्यम मदेरी पगार मुंबई २.स्पामम भाममोरय समिति, सूत १८ भइयोनमार नन्दीसूत्रके सम्पादन आदि कार्यमें संगृहीत ग्रन्थ १९ वीरनिर्वाण संवत और जैन -कल्याणविजय शास्त्रसमिति कालगणना जालोर (मारवाड) २० आहेत आगमोनुं अवलोकन याने हीरालाल रसिकदास कापडिया, जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहास सूरत २१ चतुर्थ कर्मग्रन्थ पं. सुखलालजी सम्पादित, रोसन मुहल्ला, आगरा, प्राप्तिस्थान-शेठ हिरालालजी कापडिया, बम्बई. Mes- नन्दीसूत्रके प्रकाशित संस्करण. +-- १ रायधनपतिसिंह बहादुरकी ओरसे- मलयगिरि वृत्ति व बालावबोधसहित मलयगिरिकृत टीका- २ आगमोदय समिति सूरत नन्दीसूत्र सटीक ३ रतलाम-श्वेताम्बरसंस्था श्रीनन्दीसूत्रस्य चूणि हारिभद्रीया वृत्तिश्च ४ लाला सुखदेवसहाय ज्वाला नन्दीसूत्र हिन्दीभाषा टीकासहित प्रसाद दक्षिण हैद्राबाद पूज्यश्री अमोलकऋषिजी कृत ५ इन्दोरसे मुद्रित श्रीममन्दीसूत्रम्, चूर्णि हारिमद्रीय वृत्तिसहितम् ६ शेठीया ग्रन्थमाला, बिकानेर मूलपत्राकार ७ जैन पुस्तकप्रकाशक समिति, रतलाम पुस्तकाकार फलोदी- ९जीवन कार्यालय, अजमेर १० जैनसिंद्धान्त स्वाध्यायमाला जामनगर ११ जीवन श्रेयस्कर पाठमाला,बिकानेर १९ श्रीमहावीर जैन भाण्डार, दिल्ली " " " - प्रवन्धकके दो शब्द । - करीब १८ वर्षसे मुझे जैन मुनिओंकी सेवा करनेका अबसर मिहरहा है यह स्वाधीठ चन्दनमात्री पराब मोप्तीसालजी साहबकी उदारताकाही परिणाम है। सीमाग्यवश आममसेवाके कार्यमें भी उनकी सदिमणासे में मिणुक किया गया। पूण्यभीगीके साथ पुस्तकान्तरसे पाठ मिशाना छापाय अमुवारकी प्रेस-कॉपी करना, और पूज्यमीगीको दिखाकर प्रेसमें रेमा यह मेरा कार्य अता मस्वत मम्मीसमके सम्पादन, मकान मारि कार्यका परिचय देना मेरा कर्मष्य है। नन्दीसूत्रकी आवश्यक्ता एवं कार्य-परिचय । आग मण-साममीकी समता है। इस पुममें जो पोरा मी शिक्षित हुआ पतसे पो चार पुस्तकों का सर कर रम हुए घटा पहराके लेखक या संशोपक बन जाता है। किन्तु संझोपनके लिये पर्याप्त साधन र शाति मही मिछानेके कारणही उनसे भम्पासिमोकी आवस्यकता पूर्ण नहीं होती। प्रखत सूत्रके भी मूल टीका, पर्णि और भमुवादके मिडकर सब १५ प्रकाशम हो चुके हैं, परम्त उनमें मूस संशोपमका पर्याप्त प्रयत्न राष्टिगोचर महीं होता। पसाही स्थपिरामलीक पिपयमें भी बहुतसी पुस्तकॉम ५० मापाएँ भौर काम गापाएँ प्रकाशित हुई हैं, किम्त इसपर किसीने विशेष महापोह नहीं किया। ऐसेवीष्टिबारके वर्णनम भी बहुतसा पाठमेव मिलता है। इन सबपर पर्याखोपन करते हुए नमीसमका कोई संस्करण मागतक नहीं निकसा, अत ऐसा कोई संस्करण मिकले यह चिरकाससे मेरी इसा थी। पर पम्बई मेसिसी में भर्धमामधी शिक्षपके कोसमें मन्दीसूहको भी रक्ता। विधार्थी समितिसे प्रकाशित टीकाबासे गन्दीपप्रकी पुस्तकसे माया अपना काम चलाते पकिन्त भभी यह मी अमाप्पसी हो मई, इससे विशेपतया विधार्थिवर्मकी ओरसे पर मांग होने लगी कि मनीसूमके अमुवारका एक हर संस्करण निकाहामाय। उपरोफ भावम्पकतासे हममे पूज्यभीगीसे मार्थना की, जिसके फलस्वरूप साताराके चातुर्मासमही पूम्यमीने नन्दीमका काय प्रारम्म कर रिया भीर मारकर माध्यविद्या संशोपन मन्दिरकी हस्तलिखित प्रतिसे तया भागमोरप समितिमुदित पुस्तकसे संशोधन यामुवार सम्पन किया । साधर्मासके बार ८मासतक पद कार्य विखसी रक्षा। गुमशाबार्मासमें रा.सा.हासचन्दनी सुपाके सहयोगसे फिर इस कार्यको मारम्म किया भीर पूछायाकी कापी तपासकर हिमी भमुवार एक किया। पं० शशिकाम्स- नीने तीनोंको फिर थिपिपय किये और दिपारठीतक पद ग्रनकार्य पूर्ण ॐ प्रबन्धकके दो शब्द। किया। स्थविरावलीकी सात गाथाओंके बाबत उपाध्याय श्री आत्मारामजी, युवाचार्य श्री आनन्दऋषिजी, शतावधानीजी श्री रत्नचन्द्रजी और पंजाब- केसरी पू० काशीरामजी महराजसे पूछा गया है कि टीकाओंमें इनकी व्याख्या नहीं की है, समितिकी पुस्तकमें भी ये नहीं हैं अत आपका इस विषयमें क्या मत है? सभीकी ओरसे एकही उत्तर मिला कि ये परम्परासे मान्य हैं, रखनी चाहिये । इसकी अन्वेषणामें भी खासा प्रयत्न किया गया, किन्तु चातुर्मासकी समाप्तिपर्यन्त कोई योग्य प्रमाण नहीं मिला । चातुमासके बाद साधनोंके विघटन होने और पू. के विहारसे फिर वह कार्य रुका रहा। नगरके चातु- मांसमें पुनः टिप्पण, परिशिष्टके अलावा उस लिपिबद्धका संशोधन किया। उस समय स्थविरावलीकी गाथाओंके बाबत भी समाधानजनक प्रमाण मिले, उसपरसे इनको मूल क्रमसेही रखनेका निश्चय किया और साथ यह टिप्पण भी लगादिया कि अमुक २ पुस्तकमें ये गाथाएँ नहीं हैं। इसप्रकार नन्दीसूत्रको पूर्ण अन्वेषणके साथ तय्यार करना और परि- शिष्ट आदिसे भी सुसज्जित कर रखना, जो समयपर प्रकाशमें लाया जा सके इसतरह पू का विचार इस समय केवल नन्दीसूत्रको साङ्गोपाङ्ग लिख रखवानेकाही था किन्तु रा व साहबकी सम्मति यह हुई कि पूज्यश्री मार- वाड पधार जायंगे तब फिर अधिक विलम्ब होगा, अतः इसको तो इस वर्ष प्रकाशित करवालेना चाहिये। शेठजीकी इस विनतिपर पूज्यश्रीने भी वह संशोधित पुस्तक हमारे स्वाधीन की। कार्यमें वाधा। इसी बीचमें महायुद्धका बोझ विशेषतया आनेसे कागजकी कीमतमें महर्घता आगई, इतनाही नहीं बल्कि कागज मिलनाही दुस्साध्य होगया । बहुत कुछ खोजनेपर जो भी सन्तोषजनक नहीं तो भी साधारणतया उपयोगी कागज लिया गया। अनेकविध बाधाओंको पार करके आज इस कार्यको पूर्ण कर रहा हूँ यह प्रेसके कार्यकर्ताओंके सौहार्द और सहायकोंके योग्य सहाय- काही परिणाम है। १ आवश्यक सूत्रकी दीपिकाके प्रारम्भमें ५० गाथाकी व्याख्या की है। जैन कालगणनामें मुनिश्री कल्याणविजयजीने लिखा है कि-'जिसप्रकार वल्लभी वाचनाके अनुयायिओंने युगप्रधान गण्डिकाप्रभृति प्रकीर्णक प्रन्योंमें अपनी परम्परागत युगप्रधानावलीका क्रम दिया है, उसी प्रकार देवर्द्धिजीने भी इस थेरावलीमें माधुरी वाचनानुयायी युगप्रधान थेरावलीका वर्णन किया है। इसमें कुल ३१ युगप्रधानोंका क्रम वर्णित है, किन्तु जबसे देवर्द्धिको २७ वा पुरुष माननेकी दन्तकथा प्रचलित हुई तवसे इस थेरावलीमें धर्म, भद्रगुप्त, वज्र, आर्यरक्षित और गोविन्दके वर्णनकी गाथाएँ प्रक्षिप्त समझी जाकर निकाल दी गई । वस्तुत उक गाथाएँ नन्दीकीही है। जैन काल गणना-पृ १२५ प्रबन्धकके पो काम पन्यवाद। मसात कार्यमें जिन १ महामुमामि देखन, पूफ-संशोपन व पुर प्रदान माविसे सहाय किया है उनके धमनाम पम्पयापके साथ भी 1 जात ई- इसमे स्वर्य पूम्पमीका परिणम विशाहशीपताके चलते जिन मा पूम्यभीके ममोका उपयोग नहीं किया जासका, उन्ही शामि इटियों पी. हमारा स्पट कहना है। १ अमोखकाचम्ममी सरपुरिया, पम्, ए, पदपक बी-अपने वकाल भावि आवश्यक कामोको एकतरफ रखकर अम्ताहरणसे प्रेमपूर्वक परिमम किया है। १ पूनमचम्दजी मोर-आपने पूज्यभीनीके छेसकी पानी कॉपी व फ. संघोपममें मम किया है। आत्मानम न छायमरी, पूना-पझते नदीचा टीकाकी पुस्तके मिली हैं। . माम्बारकर माग्यविधा संशोधन मन्दिर, पूना-पसे मनीसूचकी मतिमाचीन प्रति प्राप्त हुई जिसपर किमत प्रकाशन आभार रहता है। गिन र पुस्तकोंते सहाय छिपा है उनके शेणकोंका भी हम सादर संस्मरण करते हैं। अभ्यर्पना। इतना परिमम ठानेपर भी हुरिया राजामा सम्मय है। सह पाठक समी किये में समा मदाम करेंगसुमनवाते इनकी हमें सूचना करें ताकि बामामी संस्करण में उनका उपयोग किया जाय । सो किंबहुना त्वतम् । निषेदक-दालमोचन का।

श्रीनन्दीसूत्रकी भूमिका इसप्रकार नन्दीसूत्रकी चूर्णिमें भी लिखा है, जैसे कि- ॥श्रीः॥ नमोऽत्थु णं समणस्स भगवओ महावीरस्स" लेखक-जैनधर्मदिवाकर पण्डितप्रवर उपाध्याय श्रीआत्मारामजी महाराज इस अनादि संसारचक्रमें आत्माने अनेकवार जन्म-मरण किए। किन्तु अपने स्वरूपको भूलकर परगुणोंमें रत होनेसे यह जीव दुःखोंका ही अनुभव करता रहा। श्रुत, श्रद्धा और संयमसे पराङ्मुख होकर पुद्गल द्रव्योंको अप- नाता हुआ मनुष्य अपने गुणोंको भूलगया। इसीसे अज्ञानवश होकर वह शारीरिक व मानसिक दुःखोंका अनुभव कर रहा है। उन दुःखोंसे छूटनेके लिये सम्यग् ज्ञान, सम्यग् दर्शन, सम्यक् चारित्रकी आराधनाही एकमात्र उपाय है। गुणमय होनेपर भी ज्ञान द्रव्यको मङ्गलमय बनादेता है। जैसे-पुष्पोंकी प्रतिष्ठा सुगन्धिसे होती है, ठीक इसीप्रकार आत्मद्रव्यकी पूजा प्रतिष्ठा ज्ञानसे होती है। ज्ञान और नन्दीसूत्र- नन्दीसूत्रमें पञ्चविध ज्ञानका वर्णन किया गया है, यहाँ प्रश्न यह उपस्थित होता है कि ज्ञान शब्दसे नन्दी शब्दका क्या सम्बन्ध है ? विषय तो इसमें ज्ञानका है फिर इसका नाम नन्दी क्यों पडगया? इस प्रश्नपर आचार्यश्री मलयगिरिजीने जो प्रकाश डाला है, वह यों है- अथ नन्दिरिति कः शब्दाऽर्थः ? उच्यते-टुनदु समृद्धौ इत्यस्य धातोः “उदितो नम्" इति नमि विहिते नन्दनं नन्दिः-प्रमोदो हर्ष इत्यर्थः। नन्दि हेतुत्वाज ज्ञानपञ्चकाभिधायकमध्ययनमपि नन्दिः । नन्दन्ति प्राणि- नोऽस्मिन् वेति नन्दिः, इदमेव प्रस्तुतमध्ययनम् । आविष्टलिङ्गन्त्वाचाध्य- यनेऽपि प्रवर्तमानस्य नन्दिशब्दस्य पुंस्त्वम् । इ: सर्वधातुभ्यः" इत्यौ- णादिक इप्रत्ययः । अपरे तु ' नन्दी ' इति दीर्घान्तं पठन्ति, ते च इक् कृष्यादिभ्यः" इति सूत्रादिक्प्रत्ययं समानीय स्त्रीत्वेऽपि वर्तयन्ति । सच नन्दिश्चतुर्द्धा-नामनन्दिः, स्थापनानन्दिः, द्रव्यनन्दिः, भाव- नन्दिश्च । " २ प्रीमचन्दीसूत्रकी भूमिका सम्पमुखवंषवादीणं मंगलाधिकारे नंदिपि पचम्बा-मवर्ण नंदी, नैदेखि पा णेण चि नदी, नंदी-पमोदो-रिसो कंदपो इत्ययः । वस्स य पनधिहो णिवलेनो, गयायो पामढवणाभो, दमणदी-माणगो मणपरतो, आना-जाणग-मरिय-सरीर-तिरिचो वारसपिए सूरसंघावो इमो- भभा, मुख्द, मबस, करम्प, प्रहरि, हाफ कंसाला । कपाल, तिलिसा, सो, पणनो, संलो य पारसमो॥ मापणंदी-दिसपोवनचमावो, मावा-"इम पंचविरुणाणपस्पर्ग विधि समायणं ।। पहॉपर श्रीहरिमनपरि भी इसीमकार लिखते हैं। मताननी शप आनम्बमनक होमेके कारण हानका वाचक है, न साहित्यमें भाप हुए मम्मी पानाम्नीका । भावनम्वीशम पचविभज्ञानशाही बोभक है पे पांचज्ञान क्षयो पाम वा क्षायिफभावके कारण उत्पन होते हैं। जैसे-मविवान वहान भवविज्ञान व मनापर्यवहान ये चारों ज्ञान क्षयोपशम भावपर निर्भर है, भीर विसमाम मायिक मावसे उत्पव होता है। पानावरणीय कर्म, माना धरणीय कर्म, मोहनीय कर्म और भन्तराय कर्मोकी प्रकृतियों क्षीण हो माती है तब आत्मा केयलमान और केवमानसे पुक भर्यात सर्वह और सर्व हो पाता है। इस मादीसहमें उन पांच धामोंका पिपय सविस्तर मतिपादित किया गया है। या सङ्कलित है या रचित ? आचार्य श्रीववाचक समाप्रमणमे भामममन्योंसे माखरूप पत्र धानोंका मसापक भीननीयपका ग्यार किया है, जैसे कि पाग्याय समयानरमी सिसवे हैं'-"एकादपार मणपरमापित हैं। उन आगाकि भापारपरसमा प्रमप्यने सत्कासिक आदिमाममौका उदार किया है। मनीशास्र मिन जिन मामोसे परसित रनकी पर्चा भी की जाती है-मम्मीसमके मूछकी गवेषणा करते हुए मपम स्थानानपके दिवीयस्थान प्रपम देश के सुपपर पति गाती है। यहाँ नन्दीसूहके लिये निमोक आपार मिलता ६ वह पाठ- है देसिए समाचारमा प्रा मस्साफ्नपिपर पत्र - पियश-मने भाप सममिति प्रमाणित भामामेही प्रभाव प्रनामा पत्रमा उधों से।

, . श्रीमन्नन्दीसूत्रकी भूमिका "दुविहे नाणे पण्णत्ते, तं जहा-पञ्चक्खे चेव, परोक्खे चेव । पञ्चक्खे नाणे दुविहे प० तं०-केवलनाणे चेव १, नोकेवलनाणे चेव २ । केवलनाणे दुविहे प० तं०-भवत्थकेवलनाणे चेव, सिद्धकेवलनाणे चेव । भवत्थ- केवलनाणे दुविहे प० त०-सजोगिभवत्थकेवलनाणे चेव, अजोगिभवत्थ- केवलनाणे चेव । सजोगिभवत्थकेवलनाणे दुविहे प० तं०-पढमसमय- सजोगिभवत्थकेवलनाणे चेव, अपढमसमयसजोगिभवत्थकेवलनाणे चेव । अहवा-चरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलनाणे चेव, अचरिमसमयसजोगिभव- त्थकेवलनाणे चेव । एवं अजोगिभवत्थकेवलनाणे वि । सिद्धकेवलनाणे दुविहे प० तं०-अणंतरसिद्धकेवलनाणे चेव परंपरसिद्धकेवलनाणे चेव । अणंतरसिद्धकेवलनाणे दुविहे प० तं०-एक्काणंतरसिद्धकेवलनाणे चेव, अणेक्काणंतरसिद्धकेवलनाणे चेव"। (पूर्णपाठ) इनके व्याख्यास्वरूप सूत्रभी आगममें मिलते हैं । अनुयोगद्वार सूत्रमें इन्द्रियप्रत्यक्ष नोइन्द्रियप्रत्यक्ष-ये दोनो भेद प्रत्यक्ष ज्ञानके प्रतिपादित किए गए हैं। अवधिज्ञानके भवप्रत्यय और क्षायोपशमिक ये दोनों भेद एवं इसकी व्याख्या भी विस्तारसे मिलती है। स्थानाङ्ग आदिमें अवधिज्ञानके छ भेद प्रति. पादित किए गए हैं। इन भेदोके नाम और मध्यगत-अन्तगत आदि विषय प्रज्ञापनासूत्रमें आते हैं । अवधिज्ञानके द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावरूपसे चार भेदोंका सविस्तर वर्णनभी भगवतीसूत्र में देखा जाता है। मन पर्यवज्ञानके अधिकारका पाठ नन्दीसूत्र और प्रज्ञापनासूत्र में समान- रूपसे ही आता है। भेद केवल इतनाही है कि यह प्रज्ञापनासूत्रमे आहारक शरीरके प्रसङ्गमे वर्णित है । इस सूत्रमें मनःपर्यवज्ञानके द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावरूपसे जो चार भेद प्रदर्शित किए गए हैं, इनका सम्बन्ध भगवतीसूत्रसे मिलता है। केवलज्ञानका वर्णन जिस रूपसे हम यहाँ पाते हैं, वहभी प्रज्ञापना सूत्रसे उद्धृत किया ज्ञात होता है । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूपसे केवलज्ञानके जो चार भेद प्रतिपादित किए है, वेभी भगवंतीसूत्रसे सङ्कलित हैं। १ अनुयोगद्वारसूत्र-जीवगुणप्रत्यक्षाधिकार पत्र २११ । २ स्थानाङ्ग स्थान ६, सूत्र ५२६, पत्र ३७० । ३ प्रज्ञापनासूत्र पद ३३ सू० ३१७ पत्र ५३६ । ४ भगवतीसूत्र शतक ८, उद्देश २, सू० ३२३, पन ३५६ । ५ प्रज्ञापना पद २१, सू० २७३, प ४२३ । ६ देखिए चौथी पादटिप्पणी। ७ पद १, सू० ७०८, पत्र १८ । ८. देखिए चौथी पादटिप्पणी ।

8 भीमचनीमकी भूमिका मतिक्षामके विषयका भूम (पीमरूप) स्थानामा स्थान २, उदेश, सूबर में साधारणरूपसे आपुका है, किन्तु उसके भास भेदोंका वर्णन समेवायासूममें मिमता है। सम्मप है कि नन्दीमम मतिज्ञामका नो सपि स्तर वर्णन आया है, यह किसी अन्य (अधुना अप्राप्य ) जैन भागमसे सहीत हुभा हो। मतिज्ञामकेमी चारों (प्रम्य क्षेत्र, काम और भाव) भेद भमेक्तीसंमसे वस्त किप हप हात होते हैं। किन्तु ममवतीसममें केवल पासा' और मन्दीमें नपासा पेसा पाठ भाता , शेष पाठ समाम है। तज्ञानका विषयमी यहाँ भगवतीबसे उत्कृत किया गया है- कामिरे गं मवे! गणिपिरए प०१ गोयमा ! दुषाससंगे गणि पिटए प००-यापारो नाव दिद्विमाओ । से कि वे आपारो आयारे ण समणाणं णिग्गयाणं मायारगोय० एवं मंगपस्वणा मणियष्या, ना नंदीए मान- मुचस्पो सस पग्मो, बीयो निम्छत्तिमीसिओ मणिो । सामो य निरषसेसो, पस मिशी होइ ममुनोगे ॥१॥" इन सबो मतिरिक ममीसाके कितनेही स्थल स्यामासूम, अनु पोमवारण, पशामृतस्कम्पमा भारि भनेको बागमपन्योंक कितनेही स्थानों मिलते हैं। इसपकारकी तमामतासे यह बात मही माति प्रमाणित हो जाती है कि देववाचक माममपका यह प्रम्य विविध आमोसे साहित निर्मित नहीं है।) नन्दीसूकी मामाणिकवा- सचिमणी समाप्रमणने ममवाम् महावीर स्वामीके ९८० पर्प पभाव भाव ४५४० (५११ वि०) में हमी नमरीम सापुमाको एका किया। तबतक सारा भागम कण्ठस्पही रस्सा माता था। अषवाचक समामममके प्रयत्नसे सामान्क उस महान मधिवेशनमें सबसे महत्वपूर्ण कार्य पर हुमा किम्बक कण्ठस्थ चले आते भामोको सामुोंने सिपिपर कामिया। एक स्थानमें बैठकर एकत्री समयमै सापभोशरा हिले होनेके कारण इम आगमी इन विमिन मानेमें सामग्रस्प पाते हैं और इसीहिये पक पका प्रामाण्य मपवा निर्देश एसरे प्रन्पमें पाते । समाचारीशतक इस विषयको निस मकारसे स्पष्ट किया है- १ समतापासून पत्र ए शौरी पानिमनी ।। म सुसार २५ मेष र सून 11 पा ११ समभरिसका पत्र ।

, श्रीममन्दीसूत्रकी भूमिका " साम्प्रतं वर्तमानाः पञ्चचत्वारिंशदप्यागमाः श्रीदेवार्द्धगाणिक्षमा- श्रमणः श्रीवीरादशीत्यधिकनवशतवर्षे ९८० जातेन द्वादशवर्षीयदुर्भिक्ष- वशात् १ (जातया द्वादशवर्षीयदुर्भिक्षतया) बहुतरसाधुव्यापत्तौ बहुश्रुत- विच्छित्तौ च जातायाम्, यदाहुः-" प्रसह्य श्रीजिनशासनं रक्षणीयम् , तद्रक्षणञ्च सिद्धान्ताधीनम् " इति भविष्यद्भव्यलोकोपकाराय श्रुतभक्तये च श्रीसङ्घाऽऽग्रहान्मृताऽवशिष्ट तत्कालीन ? (लिक) सर्वसाधून वल्लभ्या- माकार्य तन्मुखाद् विच्छिन्नाऽवशिष्टान् न्यूनाधिकान् त्रुटिताऽत्रुटितान् आग- माऽऽलापकान् अनुक्रमेण स्वमत्या सङ्कलय्य (ते) पुस्तकाऽऽरूढाः कृताः । ततो मूलतो गणधरभाषितानामपि तत्सङ्कलनाऽनन्तरं सर्वेषां पञ्चचत्वा- रिंशन्मितानामप्यागमानां कर्ता श्रीदेवर्द्धिगणिक्षमाश्रमण एव जातः । तज् ज्ञापकमपीदम्- यथा श्रीभगवतीसूत्रं श्रीसुधर्मस्वामिकृतम् । प्रज्ञापनासूत्रं च वीरात् पञ्चत्रिशदधिकत्रिशतमिते वर्षे जातं श्रीश्यामाचार्यकृतम् । श्री- भगवत्यां च बहुषु स्थानेषु साक्षिः ? लिखितास्ति- जहा पन्नवणाए । एवमन्येष्वप्यङ्गेषु-उपाङ्गसाक्षिः ? लिखिता, (साक्ष्य लिखितम्) तद्वचने त्वया उपयोगो देयः । इस कथनसे यह भलीभांति सिद्ध हो गया कि देवद्धिगणि क्षमाश्रमण सङ्कलयिता थे। एक आगममे दूसरे आगमके निर्देशका कारणभी इसीसे सम- झमें आजाता है । नन्दीसूत्रका निर्देश अन्य आगमोंमे मिलता है- जहा नंदीएं । जहा नंदीएं । जहा नंदाएं । जहा नंदीएं । इस प्रकार अन्यान्य आगमोंमें भी नन्दीसूत्रका उल्लेख पाया जाता है। इससे नन्दीसूत्रकी पूर्ण प्रामाणिकता व प्राचीनता सिद्ध होती है। नन्दीसूत्रमें अवतरणनिर्देशकी शैली- आगमोंकी प्राचीनशैलीसे पता चलता है कि प्रस्तुत आगमका प्रस्तुत आगममें भी निर्देश किया जाता था, जैसे कि-समवायाङ्गसूत्रमें द्वादशाङ्गके वर्णनप्रसङ्गमें खुद समवायाङ्गका भी नाम आया है। ऐसे व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्रमे द्वादशाङ्गका उल्लेख करते समय खुद व्याख्याप्रज्ञप्तिका भी नाम आया है। यही क्रम अन्य आगमोंमें भी मिलता है । यह प्राचीन परम्परा वेदों में भी पाई जाती है, जैसे कि १२ भग सू शतक ८ उद्देश २ सू० ३२३ पत्र ३५६ पक्ति ६ और ८ । ३ समवायाज समवाय ८८ सू. ८८ पत्र ८८ । ४ रायपसेणइयं पन ३०५ । ५ यजुर्वेद अध्याय १२ मन्त्र ४ ।

. भीमसम्मीसूमकी भूमिका सुपर्णोऽसि गरमा सिमूचे धिरों गायनं च दृश्यन्तरे पक्षी स्वोर्म आत्मा उम्बा स्यानानि य०पि नाम | " इसी प्राचीन शेसीको नन्दीरममें भी स्वीकार किया है। अतएव उस्का सिकमकी गणमामें नमीषमका माम मिलता है। भभुवनिभिवहानकी विशेपवा- मंतिहानके मुतमिमित और भभूतानिमिव ये दो भेद प्रतिपादित किये गए हैं। प्रतनिभितका यो विषय मन्दीरममें प्रतिपादित किया गया है। वह भन्य आममि विधमान है। किन्तु अभुतमिमितके विपयमें मो माया यहाँ दी गई हैं, भिम्पन नहीं मिलती। सम्भव है पववाचक समाभमणने अवाहरपके रूपमें इन गापामोंका निर्माण स्वर्य किया हो। नन्दीको सूत्र काना या सूची ? स्थानार सूर्मक द्वितीयस्थान प्रथम देशमें मृतधामकेपो मेव किये गए मैसे कि-आमविसमत मौर मनायत । भानायके भी आवश्यक और भावास्यकम्पतिरिक ऐसे दो मे किपे मप हैं। आवस्यकम्मतिरिकके मी काठिक तपा उत्कालिक ये दो भेव किये गए है। विवाचक क्षमाप्रमणने स्पानास्प और म्यवहारममें आए हुए आगोंक माम तथा उनके अपने समयमें मो मागम विपमान ये उनमें जो कालिकातके अन्तर्गत ये रानका वैसा मिश करदिया । और जो उत्कासिक अत ये उन्हें उत्कासिक मिसि कर पिये से कि चार मूलसूमिसे चराम्ययनम्न काठिक है और परावकासिक नमी भनुगोगवार पे तीनों घा उत्कालिक सीमकार उपाआविधोके सम्बम्भमें भी समझ सेना पादिप । नदीसूहमें ममुक्रमणिका अंश गौण है. सूत्र अंशही प्रधान है अतः इसका व नामही सार्यक है। मक्षर मादि १४ भुसका मापार कहाँसे सिया - मम्मीसममें भुवमानके १४ मे पर्णित से कि- " से कि सुपनामपरोक्त ? सुयनाणपरोपलं घोपसमिई पम, तमा-भरखरसुर्य १ मणस्वरसुर्य २ सण्णिमुर्य ३ मसम्णि 1 "से कि भाभिाणिछोहियनाणा भामिणिपोहियनाण युपिई पपई तममा-मयनिस्सिर्प मस्सुपनिस्सिय पासे कि मम्मपनिस्सिर्य । मस्मयनिस्सिय पउम्बिई पमा, तमाम- उप्पठिया येणाया मम्मया पारिमामिया । मुची पठम्पिक्ष चुमा पंचमा मोक्टम्मा ।।। ममतानिमित मन्दी।

श्रीमन्नन्दीसूत्रकी भूमिका ७ , सुर्य ४ सम्मसुयं ५ मिच्छसुयं ६ साइयं ७ अणाइयं ८ सपज्जवसिय ९ अपज्जवसियं १० गमियं ११ अगमियं १२ अंगपविट्ठ १३ अणंग- पविट्ठ १४॥ यह प्रसङ्ग भगवतीसूत्रसे लिया गया है। वहाँपर नन्दीसूत्रकी अन्तिम गाथा पर्यन्तका निर्देश है। नन्दीसूत्रकी अन्तिमगाथा ९० वीं गाथा है। किन्तु श्रुतज्ञानके चतुर्दश भेदोंका जो वर्णन विस्तारपूर्वक पहले आ चुका है, उसका पुनः संक्षेपसे ८६ वी गाथामे वर्णन किया गया है जैसे कि-- अक्खर, सन्नी, सम्मं, साइयं, खलु सपज्जवसियं च गमियं अंगपविटुं, सत्त वि एए सपडिवक्खा ॥" अन्तमे निष्कर्ष यह निकला कि अक्षरश्रुत अनक्षरश्रुत आदि विषय भी आगमबाह्य नहीं है। केतुभूतकी द्विरुक्ति- तीर्थङ्करोंके अन्तरोंमें अर्थात् एकके बाद दूसरे तीर्थकरके वीच समयमें दृष्टिवादका व्यवच्छेद होना लिखा है। श्रमण भगवान महावीर स्वामीके हजार वर्षके बाद १४ पूर्वोका व्यवच्छेद हुआ। दृष्टिवादका जो प्रसङ्ग सम- वायाङ्ग सूत्रके द्वादशाइ वर्णनमे आता है वैसाही प्रसङ्ग हम नन्दीमें पाते हैं। केतुभूतका सम्बन्ध इसी व्यवच्छिन्न (विच्छेद पाये हुए) दृष्टिवादसे है, अतः 'केउभूयं के दो बार आनेका कारण ज्ञात करना असम्भव है । वृत्तिकार भी इस व्यवच्छिन्न दृष्टिवादकी व्याख्याके सम्बन्धमे लिखते हैं- सर्वमिदं पायो व्यवच्छिन्नम्, तथाऽपि लेशतो यथागतसम्प्रदायात किश्चिद् व्याख्यायते.... और चूर्णिमें मी-“तं च सव्वं समूलुत्तरभेदं सुत्तत्थओ वोच्छिण्णं जहा- गतसंपदायं वा वच्चं" (पृ०५५) ऐसाही लिखा है। हरिभद्रसूरि भी इससे सह- मत थे। तभी तो उन्होंने अपनी वृत्तिमें पृ १०६ पर चूर्णिका उक्त वाक्य उद्धृत किया है। " यथाऽऽगत सम्प्रदाय के अतिरिक्त और क्या आलम्बन था। इस स्थितिमें 'केउभूयं' की द्विरुक्तिका कारण समझना बडा ही कठिन है। भारत रामायण आदिका उल्लेख- श्रमण भगवान महावीर स्वामीके समयमें गणधरोंने सूत्ररूपसे द्वादशा- गीकी रचना की । उनके समयमें भारत, रामायण आदि ग्रन्थ विद्यमान थे, . १ नन्दीसूत्र, श्रुतज्ञान भेद, सूत्र ३८ । २ भगवती सूत्र, पत्र ८६६, सूत्रसंख्या ७३२, ३ भगवती सूत्र, पत्र ७९२ (सू ६७७) ४. भगवती सूत्र, पत्र ७९२ (सू ६७८) ८ श्रीमत्रमीकी भूमिका अत उनका नाम आमा असाव नहीं है। पचाव पेववाचक समाप्रमणने भारत भीर रामायणके धाप अन्य शास्त्रोका भी उल्लेख अपने मन्दीस्पमें कर दिया, मैसे कि कोरिह (कौटिल्य पाणक्य) आदि।' नन्दीसूपक अध्ययनकी विशिष्टता- मम्मीसूममें पाप हानोका विस्वत स्वरूप प्रतिपादित किया गया है। कारण कि "पदम मार्ण तमोरया" अर्यात् पयाकी अपेक्षा ज्ञानका महत्व अधिक है इसलिए मम्मीस्मका अध्ययम अस्पन्त आवश्यक है। आमोंसे मायः उवृतकर सहसपिता भीवेयवाधक क्षमामममने इसको उस्कालिक सूकि अन्तर्भूत कर दिया, जिससे केवल अमम्पापको छोडकर सीय इसका स्वाम्याय किया जा सकता है। ज्ञानका प्रतिपादक होमेसे इसका मालिक होना भी स्वता सिर है। ज्ञामकी आराधनासे जब निर्याणपरकी मी प्राप्ति हो सकती है तो फिर मीर वस्तुओं का तो कहनाही क्या! इस पातका साक्ष्य मगमतीसूत्र है- “कोसिय मवे ! णाणारादर्ण भारादेचा पवि भषग्गाणेरि सिजति आप मंवे फरेंति ? गोयमा ! मस्पेगइए घेणेप भषग्गहणेणं सिर्मति माप असं करेंसि । अस्पेगाए दोषणं ममम्गहणणं सिवि नान अवं फरेंवि, मस्पेगपए कप्पोषएम मा कप्पावीएस का उपयजति । मम्मिमिय में मत! णाणाराहणं माराचा कति मषम्गहणेहि सिमसि मार म फरेवि ? गोपमा ! भत्येगाए दोषणे मपम्गाणे सिमर्माति, माप अं करेंति, सर्व पुण भयमार्ण नाश्ममइ । जामियम भवे । णाणारााणे माराचा कविहिं भवम्गहणेटिं सिन् वि, माम अब करेंवि ? गोयमा! भस्वेगहए तपेणं ममग्गाणेण सिनमा माप अंत झरेर, सचट्ट मनग्गहणाई पुण नाइल्मइ "। मर्याद मपन्य सम्पराहामकी आराधनासे मी मीप अधिकसे अधिक .-८ मव करके सिनोमाता है। इससे ज्ञानमय बमीसूत्रकी विशिष्टता साम मारम हो सकती है। इस्पर्म विस्म । पीपावली १९९८ } जैनमुनि भास्माराम, लपियाना (पंजाब) " १ पासून मिपावापिमा। १ मा .. ८.१५५ ।

॥ॐ अहँ नमः॥ प्रस्तावना . प्रस्तुत शास्त्रका नाम नन्दीसूत्र है। नियुक्तिकारने नन्दी शब्दके निक्षेप करते हुए कहा है कि 'भावंमि नाणपणगं' अर्थात् भावनिक्षेपमें पांच ज्ञानको नन्दी कहते हैं । नाट्यशास्त्रमें और १२ प्रकारके वाद्य-अर्थमे भी नन्दी शब्दका प्रयोग आता है। किन्तु यहां पांच ज्ञानरूप भावनन्दीका वर्णन करने एवं भव्य जनोंके प्रमोदका कारण होनेसे यह शास्त्र नन्दी कहाता है। पांच ज्ञानकी सूचना करनेसे यह सूत्र है, विशेष जाननेके लिये इसी सूत्रकी भूमिका देखे । अङ्ग, उपाङ्ग, मूल व छेद इस प्रकार जैनागमोंके प्रसिद्ध जो चार विभाग अङ्गादि आगमों में हैं उनमे प्रस्तुत नन्दीसूत्रका मूल आगममे स्थान पाता है, क्योंकि इसमे आत्माके मूल गुण ज्ञानका वर्णन किया नन्दीका स्थान गया है )[अङ्ग, उपाद्ग, मूल व छेदकी विशेष जानाकरीके लिए सातारासे प्रकाशित दशवकालिक सूत्रकी भूमिका देखे ] नन्दीसूत्रका विषय है आत्माके ज्ञानगुणका वर्णन करना, इसमे ज्ञानसे सम्बन्ध रखनेवाले संस्थान आदि सब बातोंको नहीं विषय कहके पांचों ज्ञानके मुख्य भेदोंका स्वरूप और उनके जाननेका विषय दिखाया गया है।) (नन्दीसूत्रमे आचार्य श्रीदेववाचकने सर्व प्रथम अर्हदादि आवलिकारूपसे ५० गाथाओंमें मङ्गलाचरण किया है। फिर आभिनि- नन्दीसूत्रका बोधिकज्ञान, श्रुतज्ञान, आदि ज्ञानके ५ भेद करके प्रका- विषय परिचय रान्तरसे प्रत्यक्ष व परोक्ष संज्ञासे ज्ञानके दो प्रकार किये हैं। प्रत्यक्षके इन्द्रियप्रत्यक्ष व नोइन्द्रियप्रत्यक्ष ऐसे दो भेद करके प्रथम ५ प्रकारका इन्द्रियप्रत्यक्ष कहा है । जिसको जैन न्यायशास्त्रकी परिभाषामें सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहते हैं। तदनन्तर नोइन्द्रियप्रत्यक्षमें अवधि- ज्ञान, मनःपर्यवज्ञान व केवलज्ञानका अवान्तर भेदोंके साथ वर्णन किया गया है। इस प्रकार प्रधानत्वकी दृष्टिसे प्रत्यक्षका वर्णन करके फिर परोक्षज्ञानमें आमिनिबोधिक ज्ञानके अश्रुत-निश्रित व श्रुत-निश्रित ऐसे दो भेद किए गए हैं। तथा औत्पत्तिकी आदि ४ बुद्धिओंके उदाहरणपूर्वक वर्णनसे अश्रुत-निश्रित मतिज्ञान कहा गया है, एवं अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा भेदसे भिन्न श्रुतनिश्रित मतिज्ञानका प्रमेवोंसे वर्णन करके प्रतिबोधक और मल्लकके दृष्टान्तसे III - भीमानीमकी प्रस्तावना अपमाह हा मादिम परस्पर मेर सममाया मया।इसके बाद उत्तराम मुतमाम परोसके १ अक्षर २ अनक्षर ३ सभि । असलि ५ सम्पादमिप्या • सावि ८ ममारि ९ सावसान १०मिरवसान ११ गमिक ११ अममिक ११ आपवित और मनहाधित ऐसे १४ मेषोंका उदश करके कम नका स्वरूप बताया मपा आपायपुतमें आवश्यकके मध्ययन और सत्कालिक व कादिक शुतोकी परिमपना की गई है। पाव भापयितम १ माका विपप परिचय व तस्कम्प अभ्ययन माविका परिमाण एवं रद्देशन समदेशन-कासका निश किया मया है। फिर १९ मारशिवायके परिकम १, सूपर पूर्वगत ! भनुमोम 8, सिकाइन पांचों प्रकारोंका अवान्तर मेकि साय वर्णन किया गया है। अन्समें शापशाही विरामाका संसारम भ्रमणकप और उसकी आराधनाका संचार तारपाप फस बताया है। उपसंहार पास्तिकायकी तपारशाहीकी नित्यता रिसाकर भुतक्षामके मेवोंका दो गायासे संग्रह किया है। माने मनुयोन मवण एवं अनुयोग वामकी विधि कमी मो हैस्मिकार तहाम परोक्षके साथ मनीरामकी समाप्ति होती है। इसकी रचनाका मुछ मापार पाचवा हानप्रबाद पूर्व सम्मन होता पोंकि उसमे हामसम्बन्धी वर्णन है। वर्तमान महो रचनाका मूक- पार भाषि शानाम भी इसका भाचार मिलता आपार जिसका उपाध्यायनीने भूमिका विहान कराया है। मता विशेष भामेनेके सिये भूमिका परें। रखना शैली मन्दीस्वकी रचना सूप मोर गाया ग्मपरपसे है। इसकी सूपरपना ममोचरसपमें होनेसे प्राय सुमम । मस्येकममचाम्यक मन्तिमपरको उत्तर पाक्यमें भी शहराया गया है। प्राचीन माममि बाहुपा पद शेसी हिमोचर होती है(लो भगवतीब मावि आशाम)पही पाठकोको शारा होमी किशामा भत्पा- भार और मदु अर्थवाठे होते हैं। फिर इस सूममें पकही पानी भनेक पार भापति पों की पारससे पुनसळि पोप नहीं होमा ? उत्तरमै पुनरुक्ति सर्वत्र दोपही होता है या कहीं गुण भी पा सम्ममा चाहिपे।भाषामिका प्रसा ऐसे माने हैं जिनमें पुमसक्ति पोप नहीं होता, वेतो- पुनहफिर्न इप्यते उपरोक कोकमै भावार्य किये गये पुनरकको भी मिॉप माना है, इसके सिवाय कही रसबोधार्य भी शामिक या भाषिक पुनफि की माँ से-आपविया, पमा प्राकि इसके लिये नापार्यने 'शिष्यनि- पापा पेला रचर दिया है।

३ श्रीमनन्दीसूत्रकी प्रस्तावना भगवती सूत्रकी तरह नन्दीसूत्रकी मूलभाषा प्राचीन प्राकृत है । प्राकृत साहित्यमे थोडा भी अभ्यास रखनेवाला इसपरसे सहज भाषा और ग्रन्थ- बोध कर सकता है । ग्रन्थ-परिमाण सातसोका कहा परिमाण जाता है । जैसे १४७४ की हस्तलिखित प्रतिमे ग्रन्था ७०० लिखा है। किन्तु 'जयइ ' पदसे अन्तिम ‘से तं नन्दी' इस पदतकके पाठको अक्षरगणनासे गिननेपर २०६८६ अक्षर होते हैं, जिनके ६४६ श्लोक १४ अक्षर होते हैं । अगर कहा जाय कि ७०० की गणना आणुन्नानन्दीको लेकर पूरी की गई है, तो उसमें बहुत श्लोक बढते है, अतः ऐसा मानना भी सङ्गत नहीं । प्रचलित नन्दीसूत्रका मूलपाठ यदि कौसके पाठोंको मिलावे तो भी ६५० करीव होता है; सम्भव है कालक्रमसे कुछ पाठकी कमी हो गई हो, या लेखकोंने अनुमानसे ७०० लिखा हो। (नन्दीसूत्रके कर्ता श्रीदेववाचक आचार्य माने जाते है। चूर्णिकार श्री- जिनदासगणि आपका परिचय देते हुए लिखते हैं कि कर्ता देववायगो साहुजण-हियठाए इणमाह -नन्दीचूर्णि (पृ २०१३) इसकी पुष्टीमे वृत्तिकार श्री हरिभद्रसूरिका उल्लेख इस प्रकार है-" देववाचकोऽधिकृताध्ययनविषयभूतस्य ज्ञानस्य प्रख- पणां कुर्वन्निदमाह " फिर-'न नु देववाचकरचितोऽयं ग्रन्थ इति । नन्दी हा. वृ.(पृ ३७) (उपरोक्त उद्धरणोंसे यह स्पष्ट हो जाता है कि नन्दीसूत्रके लेखक श्रीदेव वाचक आचार्य है, किन्तु यह विचारना आवश्यक हो जाता है कि आचार्य- श्रीने इसको मौलिक निर्माण किया है या प्राचीन शास्त्रोंसे उद्धरण किया है ? टीकाकार श्रीहरिभद्रसूरिने मनापर्यवज्ञानकी व्याख्या करते हुए लिखा है कि यह ग्रन्थ देववाचकरचित है, तब अप्रासनिक गौतमका आमन्त्रण क्यों ? इस शङ्काके उत्तरमे आप कहते हैं कि " पूर्वसूत्रोंके आलापकही अर्थके वशसे आचार्यने रचे हैं " देखो ‘पूर्वसूत्रालापका एव अर्थवशाद्विरचिताः- श्रीमन्नन्दी-हा वृ (पृ ४२) उपाध्याय समयसुन्दर गणि भी लिखते हैं-'अङ्गशास्त्रोंके सिवाय अन्य शास्त्र आचार्योन अङ्गोंसे उद्धरण किये हैं ' देखो-' एकादश अङ्गानि गणधर- भाषितानि, अन्यागमाः सर्वेऽपि छद्मस्थै अनेभ्यः उद्धृताः सन्ति '-पृ ७७, समाचारीशतक। 2 (श्रीदेववाचक आचार्य प्रस्तुत सूत्रके सङ्कलनकर्ता हैं। इन्होंने इसका सङ्कलन किया है, नूतन निर्माण नहीं "उपाध्यायश्रीने सङ्कलनकर्ता व अपनी भूमिकामें इस विषयको सप्रमाण सिद्ध किया है। निर्माता टीकाकार श्रीहरिभद्रसूरिजी भी मनःपर्यव ज्ञानकी व्याख्या करते हुए पूर्व सूत्रोंके आलापकोंकोही आचा- यने अर्थवशसे रचे हैं ' ऐसा लिखते है, देखो टीका पृ ४२ । ।

भीमबन्धीसूमकी प्रस्तावना
दूसरी बात यह है कि मन्दीसूममें भाये तुप 'तेरासिप पदका अर्थ
पूर्णिकार व पतिकानि 'भाभीषिक सम्मवाय दी किया है। दिसो-ते पेष
भाजीषिया वेरासिया मणिया पूर्षि १ १०१५ ९भीर प्रराशिकावामीविका
पपोषयन्ते क्षा ११००५७। यपि पेक्वापककोही नमीसमका भूस
कर्ता माना होता तो पूर्णि भीर पूतिम 'तरासिम पपका भर्य भी आपाय
प्राधिक सम्पवास करते क्योंकि पीमि ५४४ में पेषगुप्त भावार्यसे राशिक
सम्ममायका अविर्भाव हो पुका या। फिर मी रासिय पपसे आजीविक ही
फरे जाते हैं, ऐसा आचार्यमीका निक्षयास्मक पचम पही सिर करता है
कि मनीकी मौलिक रचना मणपरकृती क्योंकि ऐववाचकका सत्ता
समय दम्पमपिके बाद माना गया है)ी नि. ५ के पूर्वका नहीं। इन पर
प्रमाणोंसे सिर होता है कि देववाचक आचार्य मनीसूम सासनकर्ता
.
मम्मीसूमके सासनकर्ता भीदेववाचक और देवझिंगणि दोनों मित्र
मिया एकही भाचार्यके ये दो माम। इस विषय-
देववापक मौर में भीमभन्दीमके उपोदूमातमें इस प्रकार लिखा है-
देवगिणी 'देववाचकका दूसरा नाम भी देवरिंगणी है, किन्तु
मन्दीमाके सामनकर्ता विनायक मागोको पुस्तका
रकरनेवारिसे भिन"।स्थविरावळीकी महवडीया तीकरमें भी
पूतगप्पियो य रेवडी । हिमकर देववाचकका दूसरा नाम बरि माना
है। गच्छमतमबन्ध ममे सर ममति । के सेतक दिखामर पुरीने
५२० की पहावसी में मी पेनवाचक और विधिको भित्र भित्र माने हैं।
उपरोह माम्पतामें मननी कल्पपत्रकी स्पपिपवठी प्रमाण समझी
जाती है. क्योंकि मन्दीपक रचयिता देववाचकको प्रतिकारने तूम्पयपिका
शिम्य कहा और कस्पकी स्पषिरावीके निर्माता देवनि मपी शामिस्र
शिम्य माने मपे परि मो पूबी हैं ये कामोंको पुस्तकात
करनेवासे माने बापने और एप्पमणिके शिष्य क्वाचक मनीयमके लेखक
इमि । भर्याद शामसके बाद नन्दीसमका निर्माण मानना होमा
को सर्वथा मिकरो।
मस्तव सूमो जसपिता श्री परि कब और कहाँ जन्म पारण किये
तपा गमको किस समय मुनिवरिपरमाप्त हुमा भाषि
देवर्षिका परिचय विषयोंका स्पट आहेस आज मनुफ्सम्म तपापि स्पषि-
रारती मावि साहित्यमें इनका छ परिपय मिसतारे
जैसे-शावस्क पर अहमाम्यपनकी-
उत्त्परपममरिए, समाममाामुदिपये।
बारमासमकासपगुचे पनिववामि॥१४॥

श्रीमन्मन्दीसूत्रकी प्रस्तावना इस गाथासे मालुम होता है कि देवद्धि जन्मसे काश्यपगोत्री थे। वृत्तिकार श्री मलयगिरीजीने प्राचीन व्याख्याकारोंकी व्याख्याके आधारपर नन्दीसूत्रमें आई हुई स्थविरावलीको देवद्धिकी देवर्द्धिगणिकी गुर्वावली मानी है और इसीलिये उन्होंने देवद्धिको शाखा महागिरिशाखीय दूष्य माने है। इस विषयमें उनका लेख इस प्रकार है-नन्दीसूत्रके प्रारम्भमें भगवान देवर्द्धिगणिजीने जो स्थविरावली दी है वह हमारे मतसे माधुरी वाचनानुगत युगप्रधान स्थविरावली है। पर आचार्य मलयगिरिजी मेरुतुङ्गसूरि-प्रभृति आचार्योंका कथन है कि नन्दीकी थेरावली महागिरिशाखीय देवद्धिंगणिकी गुरुपरम्परा मात्र है । इस विषयका मलयगिरि सूरिका उल्लेख इस प्रकार है- तत्र सुहस्तिन आरभ्य सुस्थितसुप्रतिवुद्धादिक्रमेणावलिका विनिर्गता सा यथा दशाश्रुतस्कन्धे तयैव द्रष्टव्या, न च तयेहाधिकारः, तस्यामावलिकायां प्रस्तुताध्ययनकारकस्य देववाचकस्याभावात् , तत इह महागिर्यावलिकयाऽधि- कार. "-नन्दीसूत्र टीका, पत्र ४९। मेरुतुगसूरि मी स्थविरावली टीकामें इस प्रकार लिखते हैं-'अत्र चाऽयं वृद्धसम्प्रदायः-स्थूलभद्रस्य शिष्यद्वयम्-आर्य्यमहागिरिः, आर्यसुहस्ती च । तत्र आर्यमहागिरेर्या शाखा सा मुख्या, सा चैवं स्थविरावल्यामुक्ता '- सूरि वलिस्सह साई, सामज्जो संडिलो य जीयधरो। अज्जसमुद्दो मंगू, नंदिल्लो नागहत्थी य ॥ रेवई सिंहो खंदिल, हिमवं नागज्जुणा य गोविंदा । सिरिभूइदिन-लोहिच्च, दूसगणिणो य देवड्डी॥ (मेरुतुङ्गी थेरावली टीका ५) चूर्णिकार व श्री हरिभद्रसूरिने भी इनको दूष्यगणिके शिष्य लिखकर महागिरीय शाखाके आचार्य माना है, जो इस प्रकार है-'एवं कर लो- वयारे थेरावलिकमे य दंसिए अरिहेसु दूसगणिसीसो देववायगो साधुजण- हियट्ठाए इणमाह '-चूर्णि पृ. १० । दूष्यगणिशिष्यो देववाचकः '-हारि. वृ पृ २०॥ इस प्रकार प्राचीन आचार्योंके लेख और प्रसिद्धिमे देवद्धिंगणी महागणी शाखाक आचार्य माने गए हैं किन्तु मुनि कल्याणविजयजीने अपने 'जैन काल- गणना' नामक लेखमें इसका विरोध ८ कारणोंसे किया है । उन्होंने देवद्धिको सुहस्ति परम्पराकी जयन्ती शाखाके आचार्य माने हैं। उनके लेखका वह अंश निम्न प्रकार है-'आजपर्यन्त जो जो उल्लेख हमारे दृष्टिगत हुए हैं उनसे तो यहि साबित होता है-देवर्द्धिगणि आर्य्यमहागिरीकी शाखाके नहीं, किन्तु १ जिनदास गणि चूर्णिकार और वृत्तिकार श्री हरिभद्रसूरि ।

भीमचम्दीमत्रकी मस्ताबमा मापसास्तीकी परम्परामत जयन्ती शासाके स्थविर । टीकाकारों ने ममीकी स्पषिरावलीको वरिकी गुर्वाक्छी मानी है परन्त प्रीवस्याण- विनयमीका कहना है कि 'ननीय बादिमें उन्होंने मिन जिम स्थपिरोंका गलेस किया है वे सब गुरुशिम्पपरम्परामत नहीं परन्त पुममपान-परम्परामव स्थविर पिउनके मिश्च मिन मा भौर गुरुभोंके शिष्य होनेपर भी एक सरेके पीछे पुममधाम-पद प्राप्त होमसे देवरिने उनको कमशा एक भावलि- पर किया है। फिर-दिने सम्भूतषिजयके पार भन्दा और महा मिरिकबाद सास्तिको स्पविर मामा है, इससेहात होता है कि यह पेश पठी गुरुकमवादी पेरावसी नहीं पर एममधान फमवाली ६ । उपरोक विष- रणपर विशीप पिचार करमेसे वरिको सहस्विकी परम्पराम माननादी विशेष मुसाव पिसता है। उपर हम मिस भाप कि मीऐवरि सहस्तीकी परम्पराक श्राचार्य है। भप इस वातका विचार करना आवश्यक है कि उनके देवलिंगणिके पीसागुरु कौन थे। पूर्णिका, वृश्चिकार भादि माचीन दीसागुरु भाचार्योन एप्पगणिको बमके पीलगुरु माने हैं। सनि कस्पाण-विनयमीने शाण्डिस्यको पेरिके वीसागुड मामा है। उनका काना निम्न प्रकार है- आचार्य मलयगिरिमी इनको पूप्पमणिके शिष्य मिलते हैं-'एम्पमपि शिप्यो क्वाचका। प्रसिसिमें भी रिमणि प्यमाणिकेही शिप्प कहलाते हैं। । पर हम समझ सकते हैं कि मायमिरिजीका गहेस और राक्ष मसिरि मन्दी पेरावठीको देवरिंकी गुरममावसी से मेकाही फही। और जब हम पाम पुके हैं कि मनीयेरावठी वारकी गुरुपहाबली नहीं। तब उसके भापारपर यह कैसे मान कि पश्मिणि पूष्पमणिके शिष्य पे। कल्पयेरा- पसी में भी एप्पयापिका नामनिश नहीं है पर यहाँ भम्स्पनाम शाण्डिस्पका है। इससे जामा माता किवरिंगणिहे पीक्षा ग्रह मार्य पमिस्पही होने चाहिए । मनीम पार्दिक पासे पूष्पमनिका नाम होने का अर्थ पाहो सकता है कि परिमाभिके पुरोगामी पुममधान हीने।। आचार्यश्रीदेववाचक वी. नि ९०० में शामवन विपा ऐसा मस्यि रेखो बैन काम्गणना 1 १२० का टिप्पणीमापुरीषी देवदिगमिका मणनाके अनुसार आर्यरसिवनी २० स्पविर वे समय पी नि. से ५८० में स्वर्गवासी हुए । भौर बनके पीछे ५५ वर्षमै परिसहित १९ पुममधान हुए। और ऐगरिने ९८० में पुस्तकोदार किया इसपरसे पह मिर्णय कर सकी।किपीमि गामी शवामीके मन्तिम चरणमें भाचार्य भी वर्तमान थे।

श्रीमन्नन्दीसूत्रकी प्रस्तावना ७ श्रीमन्नन्दीसूत्रकी प्रस्तावना भगवान महावीरके बाद शास्त्रोंकी मुख्य तीन वाचनाएँ हुई जो १ पाटलिपुत्रीया २ माथुरी तथा ३ वालमीक नामसे प्रसिद्ध है। १ पाटलिपुत्रीया-यह वाचना नन्द राजाके शासनकालमें वीर नि. १६० के आसपास पाटलिपुत्र नगरमे हुई, अत यह आगमवाचना और पाटलीपुत्रीय कहाती है। इस वाचनामें श्रमण साने देवर्द्धिगणी एकत्र होकर दुर्भिक्षके कारण छिन्न-भिन्न हुए आग. मोंको पुनः व्यवस्थित किये, यह वाचना श्रुतकेचली मद्रवाहुके समयमे हुई थी! २ माथुरी वाचना-इसके सम्बन्धमे आचार्य श्रीमलयगिरिजी नन्दी. सूत्रकी टीकामें लिखते हैं-स्कन्दिलाचार्यके समयमें बारह वर्षका दुर्भिक्ष पडा, उस महान् दुर्भिक्षके समयमें साधुओंको भिक्षाकी प्राप्ति असम्भव हो गई । इससे अपूर्व सूत्रार्थका ग्रहण और पठितका परावर्तन प्रायः सर्वथा नष्ट हो गया। बहुतसा अतिशययुक्त श्रुत भी इसीसे विनष्ट हो गया तथा परिवर्तन नहीं करनेसे वह अङ्ग-उपाङ्गगत भी भावसे नहीं रहा। वह बारह वर्पका दुर्भिक्ष मिटकर जब सुभिक्ष हुआ तब मथुरामें स्कन्दिलाचार्य प्रमुख श्रमण सङ्घने एकत्र मिलकर जिसको जो याद था उसने वह कहा, इसप्रकार कालिकश्रुत और पूर्वगतको अनुसन्धान करके सङ्घटित किया। मथुरामें यह सङ्घटना हुई इसलिये इसको माधुरी वाचना कहते हैं, और वह उस समयके युगप्रधान स्कन्दिलाचार्यकी मान्य थी व अर्थ- रूपसे उन्होंनेही शिष्योंको उसका अनुयोग दिया, इसलिये वह अनुयोग स्कन्दिलाचार्यका कहाता है। दूसरे आचार्य इस विषयमें ऐसा कहते हैं- दुर्भिक्षसे कुछ भी श्रुत नष्ट नहीं हुआ, किन्तु उस समयमे उतनाही श्रुत रहा था। केवल दूसरे प्रधान अनुयोग करनेवाले आचार्य सभी दुर्भिक्ष समयमे कालके ग्रास होगये, एक स्कन्दिलाचार्यही रहे थे, उन्होंने दुर्भिक्षके अन्तमें फिर मथुरामे अनुयोग किया, इसलिये यह माथुरी वाचना कहाती है। पाठकोंके अवलोकनार्थ हम वह टीकाका अंश यहां उद्धृत करते हैं-- इह स्कन्दिलाचार्यप्रतिपत्तौ दुष्षमसुषमाप्रतिपन्थिन्या. तद्गतसकल- शुमभावग्रसनैकसमारम्भाया दुष्पमायाः साहायकमाधातुं परमसुहृदिव द्वादश- वार्षिक दुर्भिक्षमुदपादि, तत्र चैवरूपे महति दुर्भिक्षे भिक्षालामस्याऽसम्भवादव सीदता साधूनामपूर्वार्थग्रहणपूर्वार्थस्मरणश्रुतपरावर्तनानि मूलत एवापजग्मु श्रुतमपि चातिशायि प्रभूतमनेशत् । अङ्गोपाङ्गादिगतमपि भावतो विषणष्टम्, तत्परावर्तनादेरभावात् । ततो द्वादशवर्षानन्तरमुत्पन्ने सुभिक्षे मथुरापुरि स्कन्दि भीमधनीस्मकी प्रस्तावना साधार्यपातममपसनैका मिसिस्वा यो पद स्मरति स वाकपयतीस्पेवं कासिकात पूर्वमत व किंशियनुसम्पाम पटितम् । यततन्मधुरापरि सा सितमत श्य वाचना 'मापुरीस्पमिमीयते, सा च तत्कालपुममधानानां स्कमि सापार्याणाममिमता तैरेव चाऽर्यता शिप्यादि मापिवेति तपनुयोमा तेषामा चार्याणो सम्बन्धीति म्यपविश्पते । अपरे पुनरेवमाता- किमपि कृतं पुर्मिस पशावमेशव, किन्तु सावरेव तस्का भूतमनुवर्तते स्म । केषटमम्मे प्रधाना पेजुयोगपरा ते सर्वेपि पमिक्षकासकक्सीहता, एक एव स्कन्सिसूरयो विध मते स्म ततस्तीमिक्षापगमे मपुरापुरि पुमरनुयोमा प्रवर्तित इति वाचना 'माधु रीति' म्यपषिस्यते अनुयोगम तेषामाचार्याणामिति " मसपमिरि-वृत्ती। उपरोक पाचनाके समयबाबत गैनकालमणना में निम्न उल्लेख है-'यह पापना पीरनिवापसे ८२० और ८१० के बीच में किसी वपमें पुममपाम भाचार्य स्कम्विछचरिकी प्रमुखतामें मरा नमरीमें हुई पी(1 १०8) बासमी वाचना-पलमीपुरमें की हुई वाघमा वासभी कहाती है. इसके सम्बपने परम्परासे पह मान्यता पठी मारती है कि देवर्दिगणिक प्रमुखत्वमें वसमीपुरम जो शासखम हुआ पही वासभी वाचमा है। लोकमकाश व समाचारी-भातक यह पस मिलता है, किन्तु नकाछमणनामें पोप शाम व कयायही आदिके मापारसे नागार्जुनको बालमी याचनाके प्रवर्तक मामा है। बांका पहसेस इस प्रकार है- मिस काठमें मपुरा, आर्य स्कमिलने भागमोशार करके अपनी वाचना घरू की उसी कालमें क्समी मगरीमें मामार्सनसरिने मी मममसा बन किया और इमिक्षवश मनावदीप आमम सिद्धान्तोका ग्यार शुरू किया। पाचक नागार्जुन और एकत्रित सङ्घको मो सो आगम और उनके अनुयोकि उपरान्त मकरप्प सम्य यार थे वे सित लिए मप और विस्तृत स्थठोंको पूर्वापर सम्पम्पके अनुसार ठीक करके उसके अनुसार वाचनापी गई (१९९०) पोगमकासका उमण भी इसी प्रकार है रेल-मिनवपन च इम्पमा कामशाइबिमापमिति मत्वा मगपभिर्नागार्जुमस्कन्निसाचार्यममतिमिः पुस्तकेपु न्यस्तम्स एतीय प्रकाश प २०७] पापनामंकि इस विवरणसे पद मिष्कर्ष निकलता है कि मदापीर निर्माणके पार एक पगार पर्पम । पाचना हुई जिनमें प्रथम पापनाम मा पाखोंकी सङ्टना की गई और मापुरी य यातभी याचमार्म भोंकी साटना- के सिवाप उनका मन भी करवाया गया। ये दोमों पापमा देवरिसे करीब १००-१९५ पर्ष पूर्वम दो पुकी थी। बासभी पापना जो कि माधुरीक समयसम हुई है परिमणिकी श्रीमन्नन्दीसूत्रकी प्रस्तावना वाचना नहीं किन्तु नागार्जुनकी है क्योंकि देवर्द्धिगणिने देवर्द्धिगणीका अपने नन्दीसूत्रमे स्कन्दिलाचार्यका 'अनुयोग-प्रवर्तक' आगमलेखन और नागार्जुन आचार्यका 'वाचक' इस विशेषणसे वन्दन किया है । इससे नागार्जुनाचार्य ही वालभी वाचनाके प्रवर्तक सम्भव होते हैं। हां! नागार्जुन और स्कन्दिलाचार्यकी वाचनामे समन्वय करके श्री देवर्द्धिगणिने शास्त्रोंको सर्वमान्य एकरूप दिया तथा उन सवको लिपिबद्ध कराये इस दृष्टि से यदि इनको वाचक कहें तो कह सकते हैं। अन्यथा वाचनाके मुख्य प्रवर्तक स्कन्दिलाचार्य और नागार्जुनही हैं । इस विषयमें जैनकालगणना'का उल्लेख इस प्रकार है- स्कन्दिलाचार्यके समयमें वलभीमे मिले हुए सङ्घके प्रमुख आचार्य नागार्जुन थे और उनकी दी हुई वाचना ही वालभी वाचना कहलाती है "- [पृ०११३ टि.] देवर्द्धिगणिकी अध्यक्षतामें वलभीमें जो श्रमणसङ्घ इकट्ठा हुआ उसमें दोनों वाचनाओंके सिद्धान्तोंका परस्पर समन्वय किया गया, और यथा- शक्य भेद मिटाकर उनको एकरूपमे किये, तथा जो भेद महत्त्वपूर्ण दिखे उनको पाठान्तरके रूपसे टीका-चूर्णियोंमे संगृहीत किये अतएव देवद्धिंके इस कार्यको आगमलेखन कहते हैं, 'सिद्धान्त पुस्तकीकृत , ऐसी उक्ति भी प्रसिद्ध है। मेरुतुहीया थेरावलीमे इस विषयका निम्न उल्लेख है-'श्रीवीरादनु सप्तविंशतितम पुरुषो देवद्धिंगणी सिद्धान्तान-अव्यवच्छेदाय पुस्तकाधिरूढा- नकात् ि' । सुबोधिका टीकामें भी इस विषयका एक पद्य है, जैसे- वलहिपुरम्मि णयरे, देविडिपमुहसयलसंघेहिं ॥ पुत्थे आगम लिहिओ, नवसय असियाओ वीराओ॥१॥ उपरोक्त प्रमाणोंसे यह सिद्ध हो जाता है कि श्री देवद्धिंगाणने वी. नि ९८० के समय वलभीपुरमे आगमलेखन सम्पन्न किया। जब आचार्य श्रीदेवार्द्धने आगमका लेखन करवाया है तब आगमोंमें जिनवाणीविरुद्ध भी स्वार्थवश या अज्ञावनवश लिखा देवर्द्धिगणीकी गया होगा, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये, क्योंकि विशेषता आचार्य श्री भवभीरु और ११ अङ्गोंके सिवाय १ पूर्वका ज्ञान रखते थे, जिनवाणीका उच्छेद न होजाय इसी परमार्थबुद्धिसे उन्होंने शास्त्रोंको लिपिबद्ध किये हैं, किन्तु अपनी मान- पूजाके लिये नहीं । इसलिये जहां मतभेदका भी प्रसङ्ग आया तो बहुमतके सिद्धान्तको मुख्य मानकर दूसरेको भी पाठान्तररूपसे रखलिया, जो आग- मोंमें आज भी वाचनान्तरके नामसे उपलब्ध है, और उनकी उत्सूत्र- भीरताका यह खास प्रमाण है। भगवती सूत्रमें चीर निर्वाणसे १००० वर्षतक IV प्रकार - मीमचम्दीस्मकी प्रस्तावना पूर्व-शान बनेका प्रमाण मिसता देते-जाहीये १ मारहे पासे इमीसे उस्सप्पिपीए वायुम्पियाणे पर्न दाससासं पुम्पगए मांसम्मिस्ता (श. २०,3८१०८) उपरोक प्रमाणसे आचार्यमीकी पूर्वपारिता सरची सिय होती है। पूर्व झानके माता और मवमीय होनेके कारण आचार्यभीके सिप जिनवाणी विरुद् लिसमेकी बात नहीं हो सकती, भाचार्यमीकी इस विशेषवाको पिसामेबासी कस्ससूझकी स्पविरावसीम एक माया मिलती है, जो इस * सचत्परयणमरिप, समरममावारि संपचे। देवा समासमणे कासवाचे पमिक्यामि॥१४॥ उपरोक माथामें भाचार्यमीक घुमअर्यरूप विविध एनोंसे पूर्ण और नामयममा मुसि सम्पच पैसे पो विशेषण दिये हैं इससे उनके शानबसपा पारिएका परिचय मिलता है। शामवसके साय चारित्र और भास्माफ्तिा भाचार्यभीकी खास विशेषता है। भाचार्यनीकी भन्य रचना और शिम्पपरिवार आपिका परिचय नहीं मिलता। देवरिंगणी मुख मौर शाखाका उपसम्म सामग्रीले मनुसार हम पहले परिचय करा भाये हैं उसके नापारचे देवदिनणी देवरिंगणीकी शाणिस्पके शिष्य सिर होवे हैं ऐसी परिस्थितिम गुक्ति उनकी गुर्वानी भीमन्दीस्वस्थ स्थपिराबठी मही होकर कस्पस्यकी स्थविरामही होनी चाहिये क्योकि मम्मीवामी स्थपिएपसी१४ मारपर शामिमको सिसकर फिर १७ माम अभ्य पाचापक मिले हैं। ऐसे मन्दीरमकी स्पबिरापठी- मनीस्पस्य स्थपिरायसी १ मार्य भी सुधर्मा ११ आर्य भी मिस्सा स्वाति स्यामार्य शम्पम्मत शाण्डिस्य पशोमन सम्म सामूवविमय मनबाहु १० एखमम २ n M . म ,मभर 8 " ५ 1 P ७ . ८ . - ममगुप्त ९ , » महामिरि D . सास्ती २० " रसित .

श्रीमन्नन्दीसूत्रकी प्रस्तावना " २३ " भूतदिन " ६ " ७ ८ " " जेहिल २१ आर्य श्री नन्दिल (आनन्दिल) २७ आर्य श्री नागार्जुन ૨૨ " नागहस्ती २८ ॥ श्रीगोविन्द रेवतीनक्षत्र , ब्रह्मद्वीपकसिंह ३० लौहित्य २५ 1, स्कन्दिलाचार्य ३१ दूष्यगणी हिमवन्त देवर्द्धिगणी अगर यह स्थविरावली देवर्द्धिगणीकी गुर्वावली होती तो शाण्डिल्यके बाद देवर्द्धिगणीका नाम होता, किन्तु यहां वैसा नहीं है । कल्पसूत्रकी स्थविरावलीमें शाण्डिल्यका नाम अन्तिम लिखकर फिर देवद्धिंगणीका नाम लिखा है, इसलिये इसको देवद्धिकी गुर्वावली मानना सङ्गत दिखता है, वह इसप्रकार है- कल्पसूत्रीय स्थविरावली ५ आर्य यशोभद्र २० आर्य नक्षत्र सम्भूतिविजय २१ " स्थूलभद्र २२ नाग सुहस्ती सुस्थितसुप्रतिबुद्ध २४ विष्णु २५ कालक ११ २६ सम्पलितभद्र १२ सिंहगिरि वृद्ध १३ वन २८ संघपालित श्रीरथ श्रीहस्ती १५ ३० धर्म फल्गुमित्र सिंह १७ धनगिरि ३२ धर्म शिवभूति ३३ शाण्डिल्य १९ भद्र ३४ देवर्द्धिगणी श्रीनन्दीसूत्र और श्री देवद्धिगणीके विषयमे संक्षिप्त परिचय देकर हम प्रस्तुत सूत्रकी विशेषतापर विचार करते हैं । स्थानाङ्ग, नन्दीसूत्रकी समवायाङ्ग, भगवती व रायपसेणिय आदि अङ्ग और विशेषता उपाङ्ग शास्त्रोंमे प्रसङ्गोपात्त ज्ञानका वर्णन मिलता है किन्तु इसप्रकार विशद रीतिसे पांच ज्ञानोंका एकत्र वर्णन नन्दीसूत्रमेही उपलब्ध होता है, श्रुतनिश्रित मतिज्ञानके अवग्रह आदि भेदोंको प्रतिबोधक व मल्लकके उदाहरणसे समझाना और चार बुद्धिओंका उदाहरणके साथ परिचय देना यह नन्दीसूत्रकी खास विशेषता है। पूर्व- " , इन्द्रदिन " दिन २७ " " , पुष्यगिरि WOW " " - १ए भीमानीसूमकी मस्तावना वर्णित विषयका गायामंकि द्वारा संक्षेपमें उपसंहार फर पिजामा पह इस स्मकी दूसरी विशेषता है। मन्दीमपर प्राकृत संस्कृत हिमी गुजराती ऐसी चार मापाम टीकाएँ उपसाप ।नमें प्रथम टीका मो पूर्णि कहाती मन्दीसूत्रपर है, यह मिनासगणि महत्तरकत माहत मापा है टीकाएँ दूसरी टीका मीहरिमवरित संससमापाम है यह टीका बहुत अच्छी है माया पूणिके आपपर निर्माण की मई मारुम होती है, तीसरी भीमसयगिरि टीका है, इसमें भीमसयमिरि भाचार्यहत विस्तृत विवेचन है पापी गुजराती पासावबोध नामकी तीका राधमपतिसिंह महापरकी तरफसे प्रकाशित है, पाँचमी पस्यमी ममोजक- मापिजीकृत हिची अनुवाद है। सभी मूठके साथ मुमित रेख-गन्दीमके समिव संस्करणों का परिचय जो इसी मतिमें भम्पन प्रकाशित है। जब हम नन्दीस्त्र विषयको अन्य शामिलते हैं तब उममें कहीं कही मे मी मिलता है जिसमें कुछ मेव वो विशेषता शाशान्तरके साप पर्शक है और छ मतमेपसूचक मी। पहा हम उनका नन्दीसूत्रका मेव सोपमें रिसर्शन कराते हैं- १अवनितानके विपय संस्थान साम्यन्तर और पाय, तथा पेशावधि सविधि मावि विधार पवनाके १५वे पामें मिलते। २ मतिसम्पदाके नामसे पशातस्करकेपर्य सम्पयममें भवमहा भवाय और धारणाके-क्षिण प्राण करना १ पफसाय पाव माण करना है ममेक प्रकारसे और निमापसे ग्रहण करना -१, पिना किसीके सहारे पपा सन्दरहित प्रहण करना 4 पेछा प्रकार , मतिपक्षक ६ प्रकार मिसानेसे भवाह भारिके १२-१५ भेष होत है। पे दोनों मे विशेषता पांचवान मयमके ज्ञान मिप्यारहिके लिये मिप्याशाम काते हैं। नन्दीसूममें मति-माहान भौर पुत-अज्ञानका उस मिसता है कि समपती आणि शाम मिप्यासिक भवपिहानको भी बिमाचाम कहा है (८०) "मतिधानका विषय-ममीममें मविज्ञानका विषय पिलाते हुए कहा है कि मविहानी सामान्य रूपसे सप नम्वोको जानता है किन्तु सता नहीं। परन्ट भगवती सूत्रक ०८०१ मौर ५० १०२ में कहा है कि "मति पानी सामान्य रूपसे सब इम्पोको जामता भौर सपा ।सपर्युक पोमों उहामि महार मे दिखता है ममबती सूममें टीकाकारने इसको वाचना श्रीमन्नन्दीसूत्रकी प्रस्तावना १३ न्तर माना है, उनका वह उल्लेख इस प्रकार है-" इदं च सूत्रं नन्यामिहैव वाचनान्तरे 'न पासइ' इति पाठान्तरेणाधीतम् ", दोनों वाचनाओंका टीका- कारने इस प्रकार समन्वय किया है। 'आदेश' पदका 'श्रुत' अर्थ करके श्रुत- ज्ञानसे उपलब्ध सब द्रव्योंको मतिज्ञानी जानता है, यह भगवती सूत्रका आशय है। नन्दीसूत्रमे 'न पासइ' कहनेका आशय इस प्रकार है- आदेशका मतलब है प्रकार, वह सामान्य और विशेष ऐसे दो प्रकारका है, उनमें द्रव्यजाति इस सामान्य प्रकारसे धर्मास्तिकायादि सब द्रव्योंको मतिज्ञानी जानता है और धर्मास्तिकाय, धर्मास्तिकायका देश इस विशेष रूपसे भी जानता है, किन्तु धर्मास्तिकाय आदि सब द्रव्योंको नहीं देखता केवल योग्य देशमे स्थित शब्दरूप आदिको देखता है, देखें-वह टीकाका अंश-". आदेश -प्रकारः, स च सामान्यतो विशेषतश्च, तत्र द्रव्यजाति- सामान्यादेशेन सर्वद्रव्याणि धर्मास्तिकायादीनि जानाति, विशेषतोऽपि यथा धर्मास्तिकायो धर्मास्तिकायस्य देश इत्यादि न पश्यति सर्वान् धर्मास्ति- कायादीन्, शब्दादींस्तु योग्यदेशावस्थितान् पश्यत्यपीति"। श्रुतज्ञान-द्वादशाङ्गीका परिचय समवायाङ्ग सूत्र में नन्दीसूत्रसे कुछ भिल मिलता है। परिशिष्टमें समवायाङ्गका पाठ दिया है, जिसको पढकर पाठक सहजमें भिन्न अंशको समझ सकते हैं। उसमें बहुतसा अंश विशिष्टतासूचक है, किन्तु आठवें, नवमे और दशमे अङ्गके परिचयमें जो भेद है वह विशेष विचारणीय है। आठवें अङ्गके ८ वर्ग और उद्देशनकाल हैं परन्तु समवायाङ्गमें दस अध्ययन, सात वर्ग और १० उद्देशनकाल, समुद्देशनकाल कहे हैं । टीकाकारने इसका समाधान ऐसा किया है-१ प्रथमवर्गकी अपेक्षाही दश अध्ययन घटित होते हैं, २ प्रथमवर्गसे इतरकी अपेक्षा ७ वर्ग होते हैं। उद्देशनकालके लिये लिखते हैं कि- नास्यामिप्रायमवगच्छामः' अर्थात् इसका अभिप्राय हम नहीं समझते, सम्भव है यह वाचनान्तरकी दृष्टिसे लिखा गया हो। नवम अङ्गके तीन वर्ग और तीन उद्दशनकाल हैं, किन्तु समवायाह्नमें दश अध्ययन, तीन वर्ग और उद्देशनकाल व समुद्देशनकाल १० लिखे हैं टीकाकार श्रीअभयदेवसूरि इसके विवेचनमें लिखते हैं कि-' वर्गश्च युगपदेवो- द्दिश्यते, इत्यतस्त्रय एव उद्देशनकाला भवन्तीत्येवमेव च नन्द्यामभिधीयन्ते, इह तु दृश्यन्ते दशेत्यत्राभिप्रायो न ज्ञायत इति "-सम.। अर्थात्-वर्गका एकसाथही उद्देशन होता है इसलिये तीनही उद्देशन- काल होते है, और ऐसाही नन्दीसूत्र में कहा जाता है। यहां दश उद्देशनकाल दिखते हैं, किन्तु इसमे अभिप्राय क्या ? वह मालुम नहीं होता। प्रश्नव्याकरणके ४५ उद्देशनकालके लिये भी टीकाकार श्रीअभयदेवसूरि 'वाचनान्तरकी अपेक्षा ' ऐसा उत्तर देते हैं।

मीमचन्दीसूत्रकी प्रस्तावना उपरोक भोके सिवाय मी यो मेरो उसके लिये मानमामेपको कारण समझना चाहिये। मतपगिरि मापार्यमे अपनी टीका पही कारण दिखाया है, से- 'पहिस्कमिठाचार्य-प्रवृत्ती एप्पमानभाषतो इमिझमहत्या सानो पठ मगुणमारिक सर्वमप्यनेपावतो इमिक्षातिकमे समिक्षप्रवृत्ती यो समन्पोमें लापकोऽमबन, तपपा-पको बलम्पामेको मधुरायाम् । ता व धार्य-सहटने परस्परवाचमामेदो जातः । विस्मृतयोहि मार्ययो स्मात्या सहटने मयस्यवस्म वाचनामेपो म काचिदनुपपत्तिः" । समयसनर उपाध्यायने अपने समाचारी शस्तक मी लिखा है- 'तस्फियमेतावन्तो विसंवादा किलितास्तेनापते-पक कारण मि यया । यस्मिम् १ भागमे भूतावाशिवसाधुभिर्यद पाकम् तथा २ तस्मिम् २ भागमे भीदेवलिंगणिक्षमामममेनापि पुस्तकाकरीहतर, महिपापमीरपो महाम्त ' सत्पम् वंतअसत्यमिति एकान्तेन मरूपयन्तीति शिवीर्य व कारणमिद पया पसभ्यो यस्मिन्काले देवाईगणिक्षमाममणतो पाचमा प्रवृत्ता तथा तस्मिवकास मपुरानामपि स्कनिवाचार्यतोऽपि द्वितीया पाचना मवृत्ता, वा तत्कालीनस्तावशिष्टछपस्पसाइमुसाधिमिर्मताअगमाळापकेषुषः हनायो बिसवस्वापिसोप पर पापनाविसबारकारकोनाव-1001 इमिमी पाप पहुए सामु ने जिस र मागममें जैसा कमा पैसा बरिमपीन पुस्तकार करसिया प्योंकि पापभीर आचार्य यह सस्प पा मसस्प पैसा एकातसे प्रापण नहीं करते। दूसरा पम्मी और मपुराम एक समय पोवाचनाएँ थी जिसमें पतावशित सामोंके मुमसे निकले एप आपापोंकी सासनामै विस्मृतस्य भारि पोपाही वाचनाके विसंवादका कारण हुआ। उपरोक ससे पाचनामे मतमेपका कारण स्पट हो माता है, इसलिये शाा करमेकी मावस्यकता नहीं रहती। श्वका परिचय प्रबन्धकको रामके, अन्तमें पं जीने कराया है, मता ग्स पुनरावर्तन करमेकी पई भावश्यकता नहीं एती। बस यह मालम करना भावायको कि प्रखत नका अनुबाद मध्यमिरि और हारिमनीय पातिके भाषारसे किया है। अतः स्पविरावलीके भी अनुबानमै गुमशिष्यका सम्बम्ब उसके भनुसारही सिखा भया है । ११-११ भारि गापामीका सेपकरण भी उसी से शिक्षा था, फिमा उपसमय सामग्रीसे इमको सेपक मानमेकी बात भ्रमपूर्ण पिलती मिसका मस्तापनाम पइसे विवेचम कर आये। प्रस्तुत संस्करण भौर सूचना श्रीमान्दीसूत्रकी प्रस्तावना १५ पुस्तक-मुद्रणके कार्यमें स्थानान्तरसे ग्रन्थसंग्रह, सम्मत्यर्थ पत्र-प्रेषण, प्रूफ-संशोधन व सम्मतिप्रदान आदि प्रापश्चिक कार्य विज्ञप्ति करने या कराने पड़ते हैं। इस बातको जानते हुए भी मैने जो आगमसेवाके लिये इस अंशतः सदोष कार्यको अपवादरूपसे किया है उसका उद्देश निम्नप्रकार है- १ साधुमार्गीय (स्था०) समाजमें विशिष्टतर साहित्यका निर्माण हो। २ मूल आगमोके अन्वेषणपूर्ण, शुद्ध संस्करणकी पूर्ति हो और समा- जको अन्य विद्वान मुनिवरभी इस दिशामें आगे लावें। ३ सूत्रार्थका शुद्ध पाठ पढकर जनता ज्ञानातिचारसे वचे। तीनोंमेंसे यदि एक भी उद्देश सिद्ध हुवा तो मैं अपने दोषोंका प्रायश्चित्त पूर्ण हुआ समझूगा । प्रस्तुत कार्यमें सर्वथा श्रीउपाध्यायजी म० का उपकार नहीं भूल सकता। आपने समय २ पर पूछे गए प्रश्नोंका समाधान करने के सिवाय अवकाश कम होते हुए भी हमारे आग्रहसे नन्दीसूत्रपर भूमिका लिखनेकी कृपा की है, जिससे इस संस्करणकी विशेषता बढ़ जाती है। यद्यपि प्रस्तुत संस्करणकी सच्ची उपादेयता पाठकोंकी परीक्षाबुद्धि ही कहेंगी, तथापि हमे इतना विश्वास है कि यह संस्करण पूर्वकी अपेक्षा अपनी कुछ विशिष्टता सिद्ध करेगा । इस सबका श्रेय मेरे सहायक मुनिवर व ज्ञानप्रेमी गृहस्थोको है जिनके सहायसे कि आज मैं इस कार्यको पूर्ण कर सका हूँ प्रयत्न और इच्छाके प्रवल होते हुए भी मुद्रणकी शीघ्रता तथा विहार आदि कारणोंसे इसमें कुछ त्रुटियाँ होना सम्भव है। विज्ञ मुनिवर एवं तज्ज्ञोंसे निवेदन है कि वे त्रुटिओंको संशोधन कर हमें भी सूचित करें। अन्तमें अल्पज्ञता व प्रमादके कारण जो सर्वज्ञवाणीविरुद्ध लिखा गया हो उसके लिये जिनदेवसे क्षमा चाहता हुआ पश्चात्ताप करता हूँ। और नन्दी- सूत्रके शुद्धपाठसे पाठक सम्यग्ज्ञानमय बने इसी आशाके साथ विराम करता हूँ। 3 शान्तिः वीर सं २४६८ माघ कृ २ रवी मुनिहस्तीमल्ल घोरी जि० पूना

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श्रीनन्दीसूत्रकी विषयानुक्रमणिका -a* *&- ... गा २४ ९ ... . ... गाथा वस्त्राक विपय पृष्ठाडू गा १ से ३ श्रीवीरस्तुति गा. ५ से १९ तक नगर, चक्र, रथ, कमल, चन्द्र, सूर्य, समुद्र और सुमेरुकी- उपमासे सघकी स्तुति २-७ गा २० से २१ तक अर्हदायावलिका गा २२ से २३ तक गणधरावली ... जिनशासनस्तुति मा २५ से ९ स्थविरावली ... छन्द-१ अनुवादकका मङ्गलाचरण शैलसे आमीरीतक श्रोताओंके १४ दृष्टान्त १९-२३ गा. ५२से ५४ तक तीन प्रकारकी सभा-ज्ञायिका, अज्ञायिका और दुर्विदग्धा २३-२४ ज्ञानके पांच भेद म् २ से १ तक ज्ञानके प्रत्यक्ष परोक्ष ये दो भेद २५-२६ नोइन्द्रिय-प्रत्यक्षके ३ भेद सू ६ अवधिज्ञानके दो भेद २६ ७ से ८ तक भवप्रत्ययिक व क्षायोपशमिक इन दोनों अवधिज्ञानका वर्णम २६-२७ सू ९ अवधिज्ञानके आनुगामिक आदि छह भेद अनानुगामिक अवधिज्ञानके अन्तगत व मध्यगत मेद.. २७-३० अनानुगामिक अवधिज्ञानका वर्णन सू. १२ गा. ५५ से बर्द्धमान अवधिज्ञानका वर्णन ३१-३५ ६२ तक सू १३ से १५ तक हीयमान, प्रतिपाति, अप्रतिपाति अवधिज्ञानका वर्णन... ३५-३७ सू १६ गा ६३ से अवधिज्ञानके द्रव्य, क्षेत्र आदि । भेद और भवप्रत्ययिक ६ तक आदिका वर्णन ३७-३९ सू १७ से १८ तक मनापर्यवज्ञान और उसके अधिकारी ३९-४७ स १९ से २३ तक केवलज्ञान उसका ज्ञेय और उसके अधिकारी सिद्धोका वर्णन r७-५१ परोक्षज्ञानके मति, श्रुतरूप प्रकार ५२ सू २५ मतिज्ञान व मतिअज्ञान, श्रुतज्ञान व श्रुतअज्ञान सू २६ गा ६८६९ आमिनिबोधिक ज्ञानके भेद व बुद्धिके चार प्रकार ५३ गा ७० से ८१ तक औत्पत्तिकी आदि चार बुदिओंके भरतशिला आदि कथा- कि साथ उदाहरण ५३-९१ V ... सू. १० स ११ ३१ ... स २४ . ..

भीमन्दीमप्रकी विषयानुक्रमणिका H " - .. मापा मार विषष पुतनिमित मतिमानके मार १-१२ भाप मेद म्पचनापमा मेव म. २५ अभोरपहर मेव मपमहके पांच नाम " ॥ भोर पांच नाम मापनामा मेर पारमा मेवा पांच माम भरपा पसराप भौर पारमा पालम्माग १८ मकारक मामिनियोकिमानकी प्रतियोवारमा दृधन्तसे प्रापमा २५. मतिमानका विषय उपसमा भुतमानके ममरभुत मारी १ मे गा. तानमाभुतप भमसरमुतन वर्मन समिपुत। मतमतका मन सम्प-भुतका मन मियाभुतका पर्मन १-११ सादिमनाविपक्षित पमपमसित भुतका वर्णन -"r ममिक मगमिक भामति मायाम भुतोका वर्णन 17-110 मामपि सुनके भाचार मार दिकमेव " प्रचार प्रका परिषष १-१२ माता परिचय १२-११२ स्मानाका परिषप भमपायातका परिषष पास्याममिका परिचप 1२५-११ प्रतापमपाका परिषप १५-10 पालम परिषष अन्तमभाता परिचय ५३ अनुचरोपवाप्तिकरणका परिषर Pr-14 मायबाकरण का परिचय विपाकमका परिषष 1-11 इतिार माना परिचय परिक्रमात मे भार नपर्मन 1४१-१५ परितापरे भाप मेरा वन -10 मा... पूर्वगत परिसरकार -14 १ . . 4

श्रीनन्दीसूत्रकी विषयानुक्रमणिका
पृष्ठात
१५१-१५३
१५३
१५३-१५
गाथा व सूत्राक
विपय
स ५७
अनुयोगका विचार
चूलिकाका विचार
दृष्टिवादका उपसहार
द्वादशागीको आराधनाका फल एव द्वादशाङ्गीकी
नित्यता
गा ९३ से ९७ तक अनुयोग श्रवण व प्रदानकी विधि
टीकाकारकी मङ्गलकामनाका १ श्लोक
..
...
.
१५५-१५८
१५८-१६०
१६०
इति समाप्ता।

पूज्यश्रीहस्तिमनजिन्महाराजाना सन्निघो सविनय निवेदनम्- प्रयम तवीय कम्यकथनम्- मेधामन्मानकेनामिदिवमिनगपीगग्यमम्पनषेवा । अन्पेम घिरले निवप्तगुणनिभैरुयमैरम्यममात् ।। यस्नादुनीतवान् सत्सुमतिसमदये शारि हैपङ्गनीनं । प्रग्या श्रीहस्तिमष्ठो मुनिरुपारते नन्दि नगीनम् ॥१॥ तवन तगुणवर्णने मौनोपकमा- दीप देदीप्यमाने तिरयति तिमिरे पाविवे पोक क्षेत् । कोऽपि धूपाचवीय गुणमुपासिया स्पास्सभेयः स नूनम् ।। पूज्ये भीहस्विमछे मनिगुणमदिवे कीर्तिपिचेमिये । मौन स्पातु मचास्ति प्रषषनमनसे मां निरुको सिमर्शः ॥२॥ मथापि भवाम्- घिरजीपातु मीरातस्तस्वीर्यानि संनयन् । कृषि परिहरन् यस्नायुपकोभमसीमसाम् ॥ ३ ॥ हस्तं प्रशस्त मिनघासनस्पो,-मको सदा सङ्गमममम । दयोदय दीननने पिमर्तु निमान्यवन्याभरपन्यभाषम् ॥ ४॥ -पिरानुपरस्य कस्पपिठ- वालेमासानिमावदानजनितांसवानिकीतिकाकादा गाजिनायाजयतिबधानकतावासदेवाविहिताकवलालाका नित्यादिनासिरमाएवालीतावझानजिनामयतिजगादकमगत पित्तातनायडरितयानतिमिगारविविबमिवय्याम्मितविकारोजिानूशावताददसावीणेससारमशानवासीनिनसंचनानारकतिर्यनाराम मातेतिबंधनविविधशारीरमानेमानमवारवाएनियातपीडितनापीडानिादतामसारंपरिजितीयाजन्मजरामरणारागाचाकाद्याशपाएदवास सजापूरमामदूरपनिारयसपदमधिाराडकामनातादयामायरपरसममानतीय यानायकाराययतितगतवाणिमदत्यामागयविवाहा। रापजाति कडाक्यातस्यागविहिपक संपादनायविशेषतावागणूकार यशानयागारापकापश्चहियादद्यातासावदयातवातादिति विशालादिविकाक्षिदारमतवतवकारासलवाता मायानातिका कि अनितामविकातिकाकादाविपितासादायासलवानोबागतिकश्यपरंपर यशितिकामाक्षासारामपादकचातासितवणातापिच मीद्विधाताचाहिन्यायालयामाहाबायश्चारित्रधामीझोता दिशादराबायोमणधनासाचामियधाम्मासनानधाई बधामासमाणलाम्मतनश्रतधासंपन्समछिनारवधाययानिधि प्रमालयामधावत्यरिपालनासमतवतीनि।पक्षमतसत्यदानामधाशातवपरमाईत्यमतिमायातिनगदईमानवामिनिविदितमध्वधा यीणमुक्षामेस्वामिनात संतानतिमितिश्चाधिरपिसनवदाजमकालिनवस्वादविज्ञानाक्षितिनधिताधीवालिरुपजायातीततामाईनणीया यूदरभाचायानमारावयूरमयदनानियवासायालयानयामिरवज्ञविनानिलनियतवश्राभिलविघ्नानिलयंतिसूदतामपिअाश्रय सिपचरानाकापियातिविनायकाsतितासापपारंजावसकालपत्यूदियशमनायमालाधिकारनदिईक्तधाश्रमनदिनितिकशक्षाधा जगानडनमसदानित्ययक्षातासदिक्षातानमिनितमिविहितनंदनदियागादाहर्षयानदिविवातजानपरकानिक्षयकमधय गोत्रासाविसत्तावणणादिहीविसतावणाणामहासमणशावणाणाचारणसमणलादणाणातयनिसयाणासावसिपिरामिविह शासम्राहासागुमायानाएवज्ञशनतिरंगनिहरमनाहासादिमायस्सम्याउस्ताहालम्सासमवायस्माविधाहयामन्त्रीयाणाया धम्मतहाएगावामगारसाएयतगडदसाण अणनाराववातियदसाणापमावागरणाणा विवागवयस्मासाबकि पिपपमिनादासाम मादासामणगामामागायत्तशामुणहरणापडुनानगरवाहसानदासगुप्मानंदापवतशरवानासमखागीदाबणामात एगाबापातक ताजाणामिडाडायसाधादामात्रमा|शिवमश्रिीशमाघस्साचालकानवदिशा लामायबायावसप्तदानानि सिसहितवजयी GUयसझम-नाराराजसागर मारनाम সীলাদার্শানুভাঠিস্টোন 9 वर्षमोपाध्यायमालामालिशियनत्री विनोनारगतिकारमंकी नासा को aamrunanaranरहान श्रीरामध्यम

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# अमहं वन्दे मैं
श्रीमन्नन्दीसूत्रम्
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अथ देवर्द्धिगणिविरचिताऽहंदाद्यावलिका-
मङ्गलार्थ अर्हत्स्तुति
मूल-जयइ जगजीवजोणी,-वियाणओ जगगुरू जगाणंदो।
जगणाहो जगबंधू, जयइ जगप्पियामहो भयवं ॥१॥
छाया-जयति जगज्जीव-योनि-विज्ञायको जगद्गुरुर्जगदानन्दः ।
जगन्नाथो जगद्वन्धुर्जयति जगत्पितामहो भगवान् ॥१॥
शब्दार्थ ( जयइ ) जयवन्त हैं, (जग) पञ्चास्तिकायात्मकलोकवर्ती
(जीवजोणी) जीवोकी उत्पत्तिके स्थानको, (वियाणओ) जाननेवाले,
(जगगुरू) जगद्गुरु, (जगाणंदो) जगतको आनन्द देनेवाले, (जगणाहो)
चराचर जगतके नाथ, (जगबंधू) प्राणिमात्रके बन्धु, (जगप्पियामहो) जग-
तके पितामह याने प्राणिओंकी आत्मिक रक्षा करनेसे धर्म जगतका पिता है
और आप उस धर्मके भी उत्पादक हैं, अतः जगतके पितामह हैं, (भयवं)
भगवान-समग्र ज्ञानादि ऐश्वर्ययुक्त हैं, अत एव (जयइ ) जयवन्त है ॥१॥
श्रीवीरस्तुति
मूल-जयइ मुआणं पभवो, तित्थयराणं अपच्छिमो जयइ ।
जयइ गुरू लोगाणं, जयइ महप्पा महावीरो ॥२॥
छाया-जयति श्रुतानां प्रभवः, तीर्थकराणामपश्चिमो जयति ।
जयति गुरुलॊकानां, जयति महात्मा महावीरः ॥२॥
शब्दार्थ-(जयइ) जयवन्त है, (सुआणं) श्रुतज्ञान याने द्वादशाङ्गरूप
वर्तमान शास्त्रके (पभवो) उत्पत्ति कारण, अर्थात् निर्माण करनेवाले, (तित्थ-
यराणं) तीर्थङ्करोंमें (अपच्छिमो) अपश्चिम याने अवसर्पिणीकालके २४ तीर्थ-
रोमे अन्तिम, (गुरू लोगाणं) [निरीहभावसे संसारको तत्त्वका उपदेश
करनेसे ] लोकके गुरु (जयइ) जयवन्त हैं, (महप्पा) महात्मा (महावीरो)
महावीर (जयह) सर्वोत्कृष्ट है ॥२॥

- , - श्रीमानीस्मर मूल-मई सष्पजगुबोयगस्त, मई जिणस्स वीरस्स। मई मुरासुरनमंसियस्स, महं धूपरयस्स ॥ ३॥ छाया-मदं सर्वजगदपोतकस्य, मदं जिनस्य धीरस्य । म मुरासुरनमस्थितस्य, मदं धूतरजस ॥३॥ शमा-पिप जमुम्मोयमस्स) सब जगतमें ज्योतकारक, माने घरा पर जमतके प्रकाशकका, (माई) कल्याण हो, (जिपस्स) वीतराम-रामरेप रहित (वीरस्स) भी मावीरका, (मई) भव हो, (मुरासर नमसियस्स) देवदामोंसे पंक्तिका, (पूपरपस्स) कमरजको हटानेवासका (मई) मन हो । गुणकि भाषार होने संघकी क्षति करते है- भीसंघस्थति मूल-गुण-मपणाहणसुय-यण,-मरियईसण-विसईनस्थागा । सघनगर ! मई से, असंम्-धारित-पागारा ॥४॥ छाया-गुणभवनगहन-मुतरत्नमृत-पर्शनविशुद्धरम्याक ! । सपनगर ! मई ते, असाचारित्रपाकार !॥१ हावार्य-गुणमधणमााण) जो ग्चर मुणरूप यक्लोसे महन, (सुप रयममारिय) तथा भुतरस्नोंसे मराहुआ, (सणविसरत्यागा) व सम्पम पर्शनाप निर्मठ मार्नवाला याने निर्मस प्रशाइप गीगाहा है, (मसंगचारित पामारा) पर्व मत चारित्राप माकार पाने कोटवाडा, (संघममर) हे संप नगर। (वे) तेरा, (माई) मन हो॥४॥ मूल-जमतपतुपारपस्स, नमो सम्मचपारियाईस्स । अप्परिचस्स जओ, होउ सपा संघचस्स ॥५॥ छाया-संपमतपस्तुम्मारकस्य(फाप), नम सम्यक्त्वपारियष्ठाय । भप्रतिपकस्य अयो, मदतु सदा संघधकस्य ॥ ५॥ हामार्य (संगमस्वकारयस्स) संयम और तपसपद-नामि पाने पाकक मम्पभाग व आरे-वारों वरफकी सारियोंसे पुक (सम्मनपारिय तस्स) सम्पबमय परिकर पाने पाकके ऊपरी मामपासे, तया (मप्परि बास्स)मतिबारहित अर्याद मिसके पिरोपी पस नहीं है ऐसे (संपचास्स) संपचाकको (नमो) नमस्कार दो, मौर (सपा) सबा (अमो) उसकी अय (होउ) हो५॥ सर-ति स्वमिस्ते पळ । २ प्रातलाया। परिमाविस सन्दा परिकराव-ई।

अहंदाधावलिका अव संघको रथकी उपमासे कहते हैं- मूल-भई सीलपडागूसियस्स, तवनियमतुरयजुत्तस्स । संघरहस्स भगवओ, सज्झायसुनंदिघोसस्स ॥६॥ छाया-भद्रं शीलपताकोच्छ्रितस्य, तपोनियमतुरगयुक्तस्य । संघरथस्य भगवतः, स्वाध्यायसनन्दिघोपस्य ॥६॥ शब्दार्थ- (तचनियमतुरयजुत्तस्स ) जो संघरथ तपनियमरूप घोडोंसे युक्त है, (सीलपडागूसियस्स) जो शीलरूप पताकासे ऊचा है, ( सज्झायसुन- दिघोसस्स ) तथा जो संघरथ पंचविधस्वाध्यायरूपनन्दिघोष-माइगलिक ध्वनिघाला है, ऐसे (भगवओ) ऐश्वर्ययुक्त, (संघरहस्स) संघरुप रथका (मदं) भद्र हो ॥६॥ कामभोगसे अलिप्त रहने के कारणसे संघको कमलकी उपमा दी जाती है- मूल-कम्मरयजलोहविणिग्गयस्स, सुयरयणदीहनालस्स । पंचमहव्वयथिरकण्णियस्स, गुणकेसरालस्स ॥७॥ छाया-कर्मरजो-जलौघविनिर्गतस्य, श्रुतरत्नदीर्घनालस्य । पञ्चमहाव्रतस्थिरकर्णिकस्य, गुणकेसरवतः ॥७॥ मूल-सावगजणमहुअरिपरिवुडस्स, जिणसूरतेयबुद्धस्स । संघपउमस्स भदं, समणगणसहस्सपत्तस्स ॥८॥ -श्रावकजनमधुकरीपरिवृतस्य, जिनसूर्यतेजोबुद्धस्य । संघपद्मस्य भद्रं, श्रमणगणसहस्रपत्रस्य ॥८॥ शब्दार्थ- जैसे पद्म-कमल पान से ऊपर उठाहुआ, लम्बी नाल और स्थिर कर्णिकावाला होता है, तथा सुगन्धित पीत परागके कारण भ्रमर- समूहसे सेवित रहता है, सूर्यकिरणसे विकसित होता व हजारपत्रवालाभी होता है वैसे-(कम्मरयजलोहविणिग्गयस्स) जो संघ कर्मरूपरज व जलप्रवाहसे बाहर निकला हुआ है अर्थात् निर्लेप है, तथा (सुयरयणदीह- नालस्स) श्रुत-शास्त्ररत्नमय दीर्घ-लम्बी नाल-डेटवाला व (पंचमहव्वयथिर- कण्णियस्स) पांच महाव्रतही जिसकी स्थिर कर्णिकाएँ हैं, (गुणकेसरालस्स) उत्तरगुण-क्षमा आर्जव आदि जिसके पराग-केसर हैं तथा (सावगजण- १ प्राकृतत्वात् निष्ठान्तोच्छ्रितपदस्य परनिपात । २ कुछ समयके लिये इच्छाओंको रोकना तप है और आजीवन इच्छानिरोध करना , छाया- नियम है॥

भीममन्वीसप्रम् मारि-परिवुरस्स) मावकजनरूप म्रमरोंसे सेषित पा पिराहुआ 4- (जिणसूर तेय पुरस्स) मावसूर्य-तीर्थरके केवमहानरूप तेजसे प्रबोध पाए हुए मर्याद विकाश पाप हुए, और (समणगण सहस्सपत्तस्स) ममण-साधु समूहकप हमारपम-पस्निगीवाले उस (संपपउमस्स) संपपनका (मई) भाहो ॥८ फिर वीम्पगुणसे चम्के रुपयारा संघकी सति करते हैं- मूल-तवसंगममयलंछण, अकिरियरातुमदुद्धरिस निन्छ । जय संघचंद निम्मल,-सम्मचविसुद्रोण्हागा॥९॥ छाया-तप संयममृगलाञ्छन !, अकिपराहमुखदुर्गाप्प ! नित्यम् । जय संपचन्द्र । निर्मल, सम्यक्त्वविशुद्धज्योस्याक ! ॥९॥ भावार्ष-(तव संगम मय सम) हे तपमधाम यमरूप मृग लानबाले । (भकिरिअराहुसह-सरिस) मास्तिक पावसप राहु मुससे पर नहीं परने पोग्य, तपा (निम्मठ सम्मत्त विदमोहामा ) निर्मोप सम्यक्त्यरूप विशुर बावनीयाछे (संपर्चव) हे संघचन्द्र ! भाप (निर्ष) सदा (अय) अयपम्तहीं.९॥ प्रकाशमय होनसे फिर संपकी पूर्यकी उपमा देते हैं- मूल-परतित्पिपगहपहनासगस्स, तवतेयदिवलेसस्स । नाणुज्जीयस्स जए, मई मसंघसूरस्स ॥१०॥ छाया-परतीर्पिकमहममानाशकस्प, सपस्तेगोदीप्तलेश्यस्य । सानोद्योतस्प अगति, मई एमसंघसूरस्प ॥१०॥ शम्दार्य-(परवित्पिप महपहनासमस्स) परतीपिकप पहॉकी प्रभाको मह-मन्द करनेवाले (तवतेपविचछेसस्त) तपस्वेजाप चमकती कान्तिवारी तया (नाणुग्वीपस्स) तामसप प्रकाशबामे, ऐसे (पमसंपरस्स) उपनाम प्रधान संपसूर्यका (सए) भगत( मा) भन हो ॥१०॥ मम्भीरताप गुणसे मप संघको समुद्रकी उपमा देते हैं- मूल-मई पिहवेलापरिगपस्स, समापजोगमगरम्स । अक्सोहस्स भगवओ, संघसमुहस्स रुपस्स ॥११॥ छाया-मई प्रतिवेलापरिगतस्प, स्वाध्यापयोगमकरस्प । भक्षोम्पस्य मगवत , संघसमवस्य सन्देस्प ॥११॥ विस्तारपर्व।

अहंदाद्यावलिका शब्दार्थ-( धिइवेला परिगयस्स ) धैर्य-मूलोत्तरगुणमें उत्साहरूप आत्मपरिणाम ही जिस समुद्रकी वेला याने वृद्धिकी चरमसीमा है, ( सज्झाय जोगमगरस्स) स्वाध्यायकी प्रवृत्तिरूप मकर-ग्राहवाले, व ( अक्खोहस्स) उप- सर्ग आदिसे क्षुब्ध नहीं होनेवाले ऐसे (भगवओ) भगवान् (रुंदस्य ) परमवि- शाल ( संघसमुद्दस्स) श्रीसंघरूप समुद्रका ( भई) भद्र हो ॥११॥ अब शाश्वत व अतिशय उच्च होनेके कारण छ गाथाओंसे संघको मेरुकी उपमासे उपमित करते हैं-- मूल-सम्मइंसणवरवडर, दढरूढगाढावगाढपेढस्स । धम्मवररयणमंडिय,-चामीयरमेहलागस्स ॥१२॥ नियमूसियकणय,-सिलायलुजलजलंतचित्तकूडस्स । नंदणवणमणहरसुरभि,-सीलगंधुद्धमायस्स ॥१३॥ जीवदया-सुंदर-कंदरुद्दरिय,-मुणिवरमईदइन्नस्स । हेउसयधाउपगलंत,-रयणदित्तोसहिगुहस्स ॥ १४ ॥ संवरवरजलपगलिय, उज्झरप्पविरायमाणहारस्स । सावगजणपउररवंत,-मोरनच्चंतकुहरस्स ॥१५॥ विणयनय-प्पवरमुणिवर,-फुरंतविज्जुज्जलंतसिहरस्स। विविहगुणकप्परुक्खग,-फलमरकुसुमाउलवणस्स ॥ १६ ॥ नाणवररयणदिप्पंत, कंतवेरुलियविमलचूलस्स । वंदामि विणयपणओ, संघमहामंदरगिरिस्स ॥१७॥ छाया-सम्यग्दर्शनवरवज्रहढरूढगाढावगाढपीठस्य । धर्मवररत्नमण्डितचामीकरमेखलाकस्य ॥१२॥ नियमकनकशिलातलोच्छ्रितोज्ज्वलज्वलच्चित्रकूटस्य । नन्दनवनमनोहरसुरभिशीलगन्धोद्धमार्यस्य ॥१३॥ जीवदयासुन्दरकन्दरोहप्तमुनिवरमृगेन्द्राकीर्णस्य । हेतुशतधातुप्रगलद्रत्नदीप्तौषधिगुहस्य ॥१४॥ संवरवरजलप्रगलितोज्झरपविराजमानहा(धा)रस्य । श्रावकजनप्रचुररवन्नृत्यन्मयूरकुहरस्य ॥१५॥ १ सम्मइसणवइर, इति हस्तलिखिते हारिमद्रीयवृत्तौ च पाठ । २ पूर्णस्य-इति भाव ।

श्रीमबन्दीपम् विनयनयमवरमुनिवरस्फुरक्षिपुज्वलपिछसरस्य । विविधगुणकल्पवृक्षकफलमरकुसुमाकुलवनस्य ॥ १६ ॥ ज्ञानपररत्नदीप्यमानकान्सपैयविमलयस्य । धन्वे पिनयप्रणतः, संघमझामन्दरगिरिभर) ॥१७॥ शम्पार्प (सम्मासण वर पार परत गारावमार पास्स) जिस संघरप मेरुकी सम्पग्दर्शनम्प रचम कामय र तया बहुत कालसे रोपी हई और बहुत गहरी मूपीठ-भाधारशिला (पम्मवर एयण मंरिय पामीयर मेलामस्स) मत पारिश्रमम्प ग्चम रत्नोंसे मसितष सुवर्णमय ऐसी जिस संपमेरुकी मेखा है, (नियमूसिय कणय सिहायलम्मत जम्त पिचास्स) इन्धियमियह आदि नियमकप सोनकी शिकाओक वलपर मिर्मस और मास्वा चित्तही संयमेरुके उमप इस हैं, (नाणवण मणार सुरमिसील मासुमायस्स) तथा सन्तोषरूप मन्दमवनकी मनोहर और समन्प्युिक शीलमय सुवाससे गो भराई अर्याव समेतकी सुवर्णमयी शिखापर ऊचे २ सम्मल पबमको बासे अनेक विचित्र शिखर पर संघमेरकी नियमाप सुवर्ष शिधापर पाचविचार-परमाम चित्त-ही निर्मम तया सुमार्थकी चिरस्मृतिसे ही प्यमान शिखर, मेव मन्वनयमके सवाससे पूर्व है तो संषमेत सन्तोषकम मनोहर मन्वमकनकी सपाचरणमय समम्पिसे भरा हुभा है इस प्रकार संपमेह सुमेव पर्वतकी वजमा करताहै। १२-१३॥ (भीवषया संवर कामहरिप मुणियर माग बस्स) जीवदयाप सनर बनराम पंगुक-कर्मठ के मति व ऊमतवामौके पति वापरपसे परिष्ट ऐसे मुमिवर हो जहाँ सगेम्ब- सिंह हैं सनसे पूर्ण तया (देग्सपधार पमत रयप पिचोसहिगुएस्स) सैकरों वरुप भात मौर भायोपशामिकमा बसे गिरते हुए शुमविचाररूप रत्लोसे पीप्त व प्रामपभी आदि औपपीसे ख्यामशालावाला संघमेरोभीर समेत औषधीसे व्याप्त गुहावासा है।[पोनॉकी भण्छी तरालमा करमे लिपे पाठक अपनी एग्रिसे काम सेवे॥१४॥ (संवरवर जस पमयि रामरप्पपिरापमाणहारस्स) पांच आसयोंका मिरोभरूप उत्चम सेपरही कर्ममा महासके लिये मिस संभमेसमें मस है तथा बस्ती हमाम मावि विचारोंकी भारा-मादी जिसके शोभाय- मान हार है, (साबमगम पर रक्त मोर मत हारस्स) और बहवसी साति बीसमेवा मारकमाइप मरों मामो संपमेयके छार-कम्परा ग्पाम्यामशासा-मापरहे।१५॥ भ्याप्त अहदाद्यावलिका तथा-(विणयनय पवर मुणिवर फुरंत विज्जुज्जलंत सिहरस्स) विनयसे नम्र प्रवर मुनिराजही चमकती हुई विद्युल्लता है उन विद्युतरूप मुनिवरोंसे वह संघमेरु देदीप्यमान शिखरवाला है, (विविह गुणकप्परुक्खग फलभर कुसुमा- उलवणस्स) तथा अनेक गुणयुक्त मुनिराजही जहाँ परमानन्दकारी धर्मफल- के प्रदानसे कल्पवृक्ष हैं, उन कल्पवृक्षोंके समाधिसुख आदि फलभार व अनेक प्रकारकी अतिशय-विशेषताएँ रूप कुसुमोंसे पूर्ण वनवाला याने साधुसमू- हवाला संघमेरु है ॥१६॥ फिर-(नाणवर रयणदिप्पंत कंत वेरुलिय विमलचूलस्स) उत्तम ज्ञान- रूप रत्नोंसे देदीप्यमान कान्त-मनोहर और विमल वैदूर्यमय चूडावाले ऐसे ( संघमहामंदरगिरिस्स ) इस संघरूप सुमेरुगिरिके [माहात्म्यको] (विणयप- णओ) विनयले विनम्र हुआ मैं (वंदामि ) वंदन करता हूं॥१७॥ मूल-गुणरयणुजलकडयं, सीलसुगंधितवमंडिउद्देसं । सुयवारसंगसिहरं, संघमहामन्दरं वंदे ॥१८॥ छाया-गुणरत्नोज्ज्वलकटकं, शीलसुगन्धितपोमण्डितोद्देशं । श्रुतद्वादशाङ्गशिखरं, संघमहामन्दरं वन्दे ॥१८॥ फिर मेरुकी कुछ बची हुई विशेषताओंको लेकर आचार्य संघको वन्दना करते हैं- शब्दार्थ-(गुणरयणुज्जलकडयं) प्रशस्त गुणरूप उज्वल रत्नमय कटक- मध्यभागवाले, (सीलसुगंधि तवमंडिउद्देसं) तथा शीलसे सुवासित व तपसे मण्डित उद्देश-पार्श्वभूमिवाले, (सुयवारसंगसिहरं ) बारह अङ्गमय श्रुतही जिसके शिखर हैं, उस (संघमहामंदरं ) संघरूप विशाल सुमेरुको (वैदे) वन्दन करता हूं ॥१८॥ मूल-नगर-रहचक्क-पउमे, चंदे सूरे समुद्द मेरुम्मि । जो उवमिज्जइ सययं, तं संघगुणायरं वदे ॥१९॥ छाया-नगररथचक्रपद्मे, चन्द्रे सूरे समुद्रे मेरौ । य उपमीयते सततं, तं संघगुणाकरं वन्दे ॥१९॥ शब्दार्थ (नगर रह चक्क पउमे-) नगर, रथ, चक्र, पद्म तथा (चंदे सूरे) चन्द्र व सूर्यके विषयमें और (समुद्दमेरुम्मि) समुद्र व मेरुमें (जो) जो संघ (सययं) सदा (उवमिज्जइ) उपमित किया जाता है, (गुणायरं ) गुणोंके आकर (तं) उस संघमेरुको (वंदे) वन्दन करता हूं ॥ १९॥ १ सघस्य सुमेरोरुपमा पाठकैनिपुण योजनीया ।

- भीमसम्दीमम् संपकी क्षति करके भव आषष्ठीरूपसे तीर्यहरोंकी क्षति करते है- भीचोवीसनिनस्तुति मूठ-वंदे) उसमं अजिर्य संमष,-मभिनंदण समद सप्पम सुपास । ससि पुप्फदंत सीयल, सिज्जर्स वासुपुरम च ॥२०॥ छापा-ऋपममजित सम्भव,-ममिनन्दनसुमतिसुप्रमसुपार्श्वम् । शशिपुष्पदन्तशीतल,-प्रेयांसं वासुपूज्यश्च ॥२०॥ शाबार्य-उसमें) मापमदेवस्वामीको, ( अभियं) अमितनायजीकी, (समय) सम्भवनापनीको, (भमिनंदण समा सुप्पम सुपार्स) भभिननननी सुमतिमी समम अर्याद पाममममी और सपार्यमापनीको, (ससि पुप्फरत सीपल सियर्स) चममममी, पुष्पान्तजी याने सविपिजी, शीतसनायनी भेयांसमापमी () भीर (पासपुरम) यासपग्पनीको नमन करता :Ron मूल-विमलमर्णत य धर्म, संति कुंए अरं च मल्लिं घ । मुनिसुम्यय नमि नेमि, पास तह पद्धमाणं च ॥ २१ ॥ छाया-विमलमनन्त प धर्म, शान्ति फुयुमर प मल्लिं च । मुनिसुपतनमिनेमि, पाच तथा पर्द्धमानं च ॥२१॥ शाणार्य-(पिमर्स) यिमसनाथमी, (अत) भनम्तमायनी, (य) और (पम्मे) पर्मनायगी (ति) शान्तिमायनी (5) कुरघुनापनी (प) भीर (भर) अरमाधमी. (मति) महिनायनी (प) और (मणिसम्पयनमि ममि) मुनिसुपतमापनी ममिनापमी प नेमिमायनीको (तए) तया (पास) पार्थनायनी (प) मोर (पदमार्ण) पर्वमाम-मदावीर स्वामीजीको न करता हूँ२१॥ अब गणपरायठीको कहते हैं- मूल-पतमिस्थ समूई, पीए पुण होइ अग्गिभूइत्ति । ताइए य पाउमूई, तमो वियत्ते सुहम्मे य ॥२२॥ पापा-प्रथमोऽध इन्धमूतिद्वितीय पुनर्मवस्पनि मूतिरिति । तृतीयम पापुमूतिस्ततो व्यक्त सुधमा च ॥२२॥ तपाप-(परमिाय) यदा महापारकनारामम पदम गणपर (IN) इम्पमूति-गीतमम्पामी (पुण) फिर (बीप) मा (अग्निमामि ) अनिमृति मामपाह (द), (५) भीर (ताप) वीपरे (पा) पापुमति, अहंदाद्यावलिका (तओ) बाद [चौथे] (वियत्ते) व्यक्तस्वामी, और [ पांचवे ] ( सुहम्मे) सुधर्मस्वामी है ॥ २२॥ मूल-मंडिअ मोरियपुत्ते, अकंपिए चेव अयलभाया य । मेयज्जे य पहासे, गणहरा हुंति वीरस्स ॥२३॥ छाया-मण्डितमौर्यपुत्रा,-वकम्पितश्चैवाचलभ्राता च । मेतार्यश्च प्रभासो, गणधराः सन्ति वीरस्य ॥२३॥ शब्दार्थ-(मंडियमोरियपुत्ते-) मण्डित व मौर्यपुत्र (चेव) और ऐसेही (अकंपिए) अकम्पित (चेव ) और (अयलमाया) अचलभ्राता, ( मेयज्जे) मेतार्यस्वामी (य) और (पहासे) प्रभासस्वामी-येसब-(वीरस्स) श्रीमहा- वीरस्वामीके ( गणहरा ) गणधर (हुंति ) हैं ॥ २३॥ अब श्री जिनशासनकी स्तुति करते हैं- मूल--निव्वुइ-पह-सासणयं, जयइ सया सव्वभाव-देसणयं । कुसमयमयनासणयं, जिणिंदवरवीरसासणयं ॥२४॥ छाया-निर्वृतिपथशासनक, जयति सदा सर्वभावदेशनकम् । कुसमय-मद-नाशनकं, जिनेन्द्रवरवीरशासनकम् ॥ २४ ॥ शब्दार्थ-( निव्वुइपहसासणयं) निर्वाण-रत्नत्रयरूप मोक्षमार्गका शासक याने शासन करनेवाला, तथा (सव्वभाव देसणयं) संसारवर्ती सब पदार्थोंका सम्यग् वर्णन करनेवाला, एवं (कुसमयमयनासणयं) कुदर्शन- मिथ्यामतके मदको नष्ट करनेवाला ऐसा (जिणिंदवर वीर सासणयं) जिनेन्द्र- श्रेष्ठ श्रीमहावीरका शासन याने प्रवचन ( सया) सदा ( जयइ) जयवन्त हैं- सर्वोत्कृष्ट हैं ॥ २४॥ अब स्थविरावली कहते हैं- मूल-सुहम्मं अग्गिवेसाणं, जंबूनामं च कासवं । पभवं कच्चायणं वंदे, वच्छं सिज्जंभवं तहा ॥२५॥ छाया 1-सुधर्माणमग्निवेश्यायनं, जम्बूनामानं च काश्यपम् । प्रभवं कात्यायनं वन्दे, वात्स्यं शय्यम्भवं तथा ॥२५॥ शब्दार्थ-श्रीमहावीरके प्रथम पट्टधर ( अग्गिवेसाणं) अग्निवेश्यायन- गोत्री (सुहम्म) श्रीसुधर्मास्वामीको (च) और (कासवं ) काश्यपगोत्री (जंबूनामं) जंबूनामक द्वितीय पट्टधर आचार्यको, (तहा) तथा (कच्चायणं) २

भीमवन्धीधम्
कास्पायनमोत्री (पम) मभवस्वामीको व (वर्ग) घरसमोभी (सिजमवं)
चातुर्य आचार्य भी शय्यमवस्वामीको (म) मनन करताई।१५॥
मूल-जसमदं गिर्य वंदे, संभूय घेव मार ।
भदबाटुंच पाइन्न, थूलमई च गोयमं ॥ २६ ।।
छापा-यशोम तुषिक पन्दे, सम्भूतं चैव मातरम् ।
मनबाहुँच प्राचीन, स्पूलमनं घ गौतमम् ॥ २६ ॥
शवार्य शम्यम्भव स्वामीके शिम्य (मिर्य) वंगिकमोपी स्याप्राप
स्मगोभी ] (जसमाई) भी पशोभत्रको (देव) और इसी प्रकार यशोभपके
शिष्य (मावर) माठरमोनी (संमूर्य) भूतविमयको, (ब) और (पाप)
पाचीनमोमी (महवाई) मनवाको (4) पनन करता है, (च) और
सम्भूतविमयके शिप्य (मोयर्म) मौतमगोपी (भूसमई) स्पूछमा आचार्य
को भी नमस्कार करता।
मूल-पछावचसगोतं, पदामि महागिरि सुहत्यि च ।
सचो कोसियगोच, बालस्स सरिष्वयं वन्दे ॥२७॥
छापा-एलापस्पसगोत्र, पन्दे महागिरि सुधस्तिनश।
तत कौशिकगोत्रं, पालस्य सामग्वयस पन्दे ॥२७॥
शमा (पसावासगोस) स्पूलमनके शिम्प पलापत्य-गोत्रवासे
(महागिरि) माझमिरिको (4) और (सहस्पि-) सहस्ती आचार्य पशिष्ठ-
गोपीको (पदे) रन करता है, [पहाँ धास्तीसे सस्थित-सुमतिपर मावि
नमसे एक भाचार्यावठी चलती है। इस विषयको पशामुतस्करके पहपित
मप्पयन मर्याद कल्पसूत्रसे माममा चाहिए । मस्त मम्पयनकी संकसना
करनेवाले भी ऐववाचकका उसमें सम्पप नहीं होनेसे यहाँ महामिविधिका-
काही रस किया गया है, महामिरि और सहस्ती ये दोनों स्पूलमपके शिम्प
(तत्तो) सहस्वीके पाप (कोसियमोर्च) कौशिकपोत्री (बालस्स) बहुल
मुनिक (सरिम्पर्ष) समामबयवाछे पहिस्सइको (बी) पनन करता है।
अपांव महामिरि आचार्य के बहुत भीर बहिस्सद ये पो प्रपान शिष्य थे।
ये दोनों पमठ-पसाय पैदा होमेवाडे सोपर माता होनेसे सगोत्री ये प्रक
बाकी प्रपामतासे पुममपान श्री बहिस्सह आचार्यको नमस्कार किया जाता
६.२०॥
मूल-हारिपगुच साई प, वैदिमो हारियं च सामज ।
पंदे कोसियगोचे, संदिई मनजीयधरं ॥२८॥

अहंदाद्यावलिका ११ छाया-हारीतगोत्रं स्वातिं च, वन्दे हारीतं च श्यामार्यम् । वन्दे कौशिकगोत्रं, शाण्डिल्यमार्यजीतधरम् ॥२८॥ शब्दार्थ-फिर बलिस्सहके शिष्य-(हारीयगोत्तं) हारीतगोत्री (साई) श्रीस्वाति आचार्यको (च) और स्वातिआचार्यके शिष्य (हारियं) हारीत- गोत्री (सामज्जं) श्यामार्यको (वंदिमो) नमन करते हैं, तथा श्यामायके शिष्य (कोसियगोत्तं ) कौशिकगोत्री (सांडिल्लं) शाण्डिल्य आचार्यको तथा (अज्जजीयधरं ) आर्यजीतधर नामके आचार्यको (वंदे) वंदन करता हूं, [वृत्तिकारने 'आर्य जीतधर' इन दो पदोंको शाण्डिल्यका विशेषण माना है, विशेषणका अर्थ इस प्रकार किया है-आर्य-पापोंसे दूर रहनेवाले, जीतधर-मर्यादादर्शक सूत्रोंको धारण करनेवाले, ऐसे शाण्डिल्यको वन्दन करता हूं, ऐसा मुख्य अर्थ किया और गौण अर्थसे मतान्तरमें आर्यजीतधर नामक दूसरे आचार्यको माना है ] ॥ २८ ॥ मूल-तिसमुद्द-खायकित्तिं, दीवसमुद्देसु गहिय-पेयालं। वंदे अज्जसमुदं, अक्खुभिय-समुद्द-गंभीरं ॥२९॥ छाया-त्रिसमुद्रख्यातकीर्ति, द्वीपसमुद्रेषु गृहीतपेयोलम् । वन्दे-आर्यसमुद्रम्, अक्षुभितसमुद्रगम्भीरम् ॥२९॥ शब्दार्थ-शाण्डिल्यके शिष्य-( तिसमुदखायकित्ति) तीन समुद्र अर्थात् पूर्व, दक्षिण, पश्चिम इन तीनों दिशाओंमें स्थित एकही लवणसमु- द्रके तीन विभागकी अपेक्षासे इन तीन समुद्रपर्यन्त प्रख्यात कीर्तिवाले और (दीव समुद्देसु गहिय पेयालं) विविध द्वीप-समुद्रोंमें प्रमाणको प्राप्त करने- वाले, अर्थात् द्वीपसागर प्रज्ञप्तिके विद्वान तथा (अक्खुभिय समुह गंभीरं ) क्षोभरहित-स्थिर समुद्रकी तरह गम्भीर, ऐसे (अज्जसमुदं) आर्यसमुद्र नामक आचार्यको (वदे) मैं वन्दन करता हूं ॥ २९ ॥ मूल-भणगं करगं झरगं, पभावगं णाणदंसणगुणाणं । वंदामि अज्जमगुं, सुयसागरपारगं धीरं ॥३०॥ छाया-भाणकं कारकं ध्यातारं, प्रभावकं ज्ञानदर्शनगुणानाम् । वन्दे-आर्यमंY, श्रुतसागरपारगं धीरम् ॥३०॥ शब्दार्थ--(भणगं) कालिक आदि सूत्रोंको सदा पढनेवाले, (करगं) सूत्रोक्त क्रियाकलापको करनेवाले तथा (झरगं) धर्मध्यान ध्यानेवाले, अत- एव (णाणदसण गुणाणं पभावगं) ज्ञान, दर्शन व चारित्र इन तीनोंके गुणोंको १ पेयालमिति देशीशब्द प्रमाणमित्यर्थ ।

. भीमपन्दीसूमम् रिपामेवा, तथा (सुयसामरपारर्ग) मुतरूप समयके पारगामी व (धीर) भीर [ पर्वगुणविशिष्ट भार्यसमर भाचार्यक शिप्य (अम्मम) भी भार्य- मंगु माचार्यको (दामि) पनन करता॥३०॥ मूल- वदामि अजधर्म, तचो पद य मगध च । तो य अज्जवदरं, तप-नियम-गुणेहि वारसमं ॥३१॥ छाया-पन्वे-आर्यधर्म, तप्तो पन्दे च भवगुप्तं च । ततधार्यवन, तपोनियमगुणैर्वनसमम् ॥११॥ शमार्य-फिर-(मम्मपर्म) मी आर्यधर्माचार्यको (प) और (तत्तो) उसके बाप (भवगु) भनमुप्ताचार्यको (पवामि) पन्दन करता है (1) और (तत्तो) तवमम्तर (तष नियम गुणे) तप नियम आणि गुणों (वार सम) पत्रके समाम बसशाणी ऐसे (मज्मवार) मार्यषमस्वामीको (वे) वमन करवा ॥१॥ मूल- *वदामि अज्जरक्खिय, सावणे' रक्सिप-धारिचसव्वस्से । रपणकरंगभूओ, अणुओगो रक्खिओ जेहिं ॥३२॥ छाया-पन्दे आरक्षितक्षपणान्, रक्षितचारिघसर्वस्वान् । रत्नकरण्डफमूतो,-अनुयोगो रक्षितो ये ॥३२॥ शपा-(अग्याक्सियतवणे) भीमार्यरक्षित वपस्विराजको (दामि) बमन करता है जिन्होंने (रपिसय चारिचसम्बस्से) उस समयके सभी मुनिक प अपने पारिभसर्वस्व-सपमग्रीधनकी रक्षा की, तपा (हिं) मिन्होंने (त्यपफरममूओ) विचारलपरत्नकि करक-पेटीके समान (अमुमओगो) भनुयोगकी ( रस्सिओ) रमा की थी। तीसरी गापासे सम्बपित आर्यममुके शिम्य- मूल-नाणम्मि ईसणम्मि य, वव-विणए णिचकालमजुत । अज नंदिलसवर्ण, सिरसा पदे पसन्नमणं ॥३॥ छापा-शाने वर्शने च तपो-विनये नित्यकालमपुतम् । आर्य नन्दिलक्षपर्ण, शिरसा पन्ने प्रसन्नमनसम् ॥३३॥ आर्यमंगुके शिप्प- भावार्य (मार्णमि ) ग्राममें, (समि) वर्षान-सम्यकत्वमें (प) १ मा प्रति पम्यम्तरम् मा दो। मने तपासवरम् । 'गापाई पानम्मामा तत्समक्युमप्रपाम्स मम्माइतो मोम् ।

7 अहंदाद्यावलिका १३ और ( तव विणए ) तपस्यामें व विनयमें (निचकालं) सर्वदा (उज्जुत्तं) तत्पर-प्रमादरहित, तथा ( पसन्नमणं) रागद्वेषसे रहित होनेके कारण प्रसन्न- चित्त ऐसे ( अज्जं-नंदिलखवणं) आर्य नन्दिलक्षपणको (सिरसा) मस्तकसे (वंदे ) वन्दन करता हूं ॥ ३३ ॥ श्रीआर्य नन्दिलक्षपणके शिष्य- मूल-बड्डउ वायगवंसो, जसवंसो अज्जनागहत्थीणं । वागरणकरणभंगिय,-कम्मप्पयडीपहाणाणं ॥३४॥ छाया-वर्द्धतां वाचकवंशो, यशोवंश आर्यनागहस्तिनाम् । व्याकरणकरणभाङ्गिक-कर्मप्रकृतिप्रधानानाम् ॥३४॥ शब्दार्थ(वागरण) व्याकरण-संस्कृत शब्दानुशासन अथवा प्रश्न- व्याकरण, (करण) पिण्डविशुद्धि आदि, ( भंगिय) भांगाओंकी विशेषता- वाले, (कम्मप्पयडी) कर्मप्रकृति-श्रुतकी रचनासे या इनकी विशिष्टप्ररूपणा करनेमें (पहाणाणं ) प्रधान ऐसे (अज्जनागहत्थीणं) आर्यनागहस्ती आचा- यंका (वायगवंसो) वाचकवंश (जसवंसो) मूर्तिमान् यशोवंशकी तरह (वडउ ) वृद्धि पावे-चर्द्धमान हो ॥३४॥ आर्यनागहस्तीके शिष्य- मूल-जच्चंजणधाउसमप्पहाणं, मुदियकुवलयनिहाणं । वड्डउ वायगवंसो, रेवइनक्खत्तनामाणं ॥३५॥ छाया-जात्याञ्जनधातुसमप्रभाणां, मृद्वीकाकुवलयनिभानाम् । वर्द्धतां वाचकवंशो, रेवतिनक्षत्रनाम्नाम् ॥ ३५॥ (जच्चंजणधाउसमप्पहाणं) जातिसम्पन्न अजनधातुके समान शरीरकी कृष्णप्रभावाले, तथा (मुद्दिय कुवलयनिहाणं) पकी हुई दाख व नीलकमलके समान कान्तिवाले, ऐसे (रेवइ नक्खत्तनामाणं) रेवतिनक्षत्र नामक आचार्यका (वायगवंसो) वाचकवंश (वडउ ) वर्द्धमान हो ॥ ३५ ॥ रेवतिनक्षत्र आचार्यके शिष्य- मूल-अयलपुरा णिक्खते, कालियसुअ-आणुओगिए धीरे । बंभद्दीवगसीहे, वायगपयमुत्तमं पत्ते ॥३६॥ छाया-अचलपुरान्निष्क्रान्तान्, कालिकश्रुताऽनुयोगिकान् धीरान् । ब्रह्मद्वीपिकसिंहान्, वाचकपदमुत्तमं प्राप्तान् ॥३६॥ शब्दार्थ-(अयलपुरा णिक्खंते) अचलपुरमें दीक्षा लेनेवाले, (कालि- यसुय आणुओगिए) कालिकश्रुतके अनुयोगमे नियोगवाले तथा (धीरे) श्रीमत्वम्मीसूत्रय पीर (वायमपयमुत्तम पचे) तया नचम पाचक परको प्राप्त करनेगासे ऐसे (महीवमसी) पीपकी शाखाप्से उपलक्षित भी सिंहाचार्यको (क) धन्वम करता हूं। मीसिंहाचार्यफे शिष्य- मूल-अर्सि प्रमो अणुमोगो, पयर अवावि अमडमि । पहुनयरनिग्गयअसे, से वदे विलायरिए ॥३७ ।। छाया-येपामयमनुयोगः, प्रचरस्ययाप्पभरते । घहुनगरनिर्गतयशसः, तान् वन्दे स्कन्दिलाचार्यान् ॥ ३७॥ शमा--(मेसि) मिनका (मो) वर्तमानमें मिठनेवासा यह (मा भोमो) भद्योग (भग्जावि) आजमी (आमरहम्मि) आधे भरतमेष- बक्षिण मरतमें (पयय) मपमित है, (प मपर मिग्णयमसे) बहुतसे मम रेमि विस्तृत पशवासे (से) म (सपिलायरिप) सिंह वाचक शिष्य भी स्कनिसाचार्यको (परे) बम्पन करता हूँ। मूल नाचो हिमवंतमहंत,-विनमे पिपरकममणते। सज्झायमर्णतघरे, हिमवते वदिमो सिरसा ॥२८॥ छाया-ततो हिमवन्महाविक्रमान्, अनन्तधृतिपराक्रमान् । अनन्तस्वाध्यायपरान्, हिमवतो पन्दे शिरसा ।। ३८॥ शम्पार्थ-(ततो) स्फन्दितापार्यों बार एनके शिम्य (स्मित मरत विषमे) हिमवानकी तरह बहुक्षेपम्यापी विहार करनेवाले (शि परणाम मते) अपरिमित पर्यप्रपान पराकमवासे तथा (समायमणंतपरे) अर्यकी रमिस ममन्यस्वाम्पायको परनेवाले, ऐसे (हिमवते)मीहिमवमामा भाचार्य को (सिरसा) मस्तकसे (परिमो) पमन करता है। मूल-कालियसुर-अणुभोगस्स, धारप भारए य पुष्वाण । हिमवतखमासमणे, वदे णागमुणायरिए ॥३९॥ छापा-कालिकभुताऽनुयोगस्प, पारकान् पारकाम पूर्णाम् । हिमवत क्षमाममणान्, पन्दे नागार्जुनापार्यान् ॥ ३९॥ शम्पार्प-फिरमी उन्हीकी सति करते है मिसे-कालियसपमा- भोगस्स) कालिकशाससम्बन्धी ममयोगके (पारप) भारक-परमेवाडे (य) भीर (पुस्वार्थ) उत्पाद आणि पूर्वक (पारप) चारण करनेमा इस प्रकारके गुणोंसे पुक ऐसे (दिमवंतसमासमणे ) मीदिमवन्तमामक क्षमाप्रम प्रातमत्या मनात माल पाक्सिाये मप्रास्तानियो । माम्- इति नामविसमास बामेरसम्म् ।

- अर्हदाद्यावलिका १५ णको तथा इन्हीके शिष्य (णागज्जुणायरिए) नागार्जुनाचार्यको (वंदे) वन्दन करता हूं॥ ३९ ॥ मूल-मिउमद्दवसंपन्ने, आणुपुब्बि' वायगत्तणं पत्ते । ओहसुयसमायारे, नागज्जुणवायए वंदे ॥४०॥ छाया-मृदुमार्दवसम्पन्नान्, आनुपूर्व्या वाचकत्वं प्राप्तान् । ओघश्रुतसमाचारान्(चारकान्), नागार्जुनवाचकान् वन्दे॥४०॥ शब्दार्थ--( मिउमद्दवसंपन्ने ) मृदु-मनोज्ञ अर्थात् भव्य जीचोके सन्तोष- कारक ऐसे मार्दव आदि भावोसे युक्त, और (आणुपुचि) अवस्था व दीक्षा पर्यायसे (वायगत्तणं पत्ते ) वाचकपदको पाए हुए, तथा (ओहसुयसमायारे) ओघथुत अर्थात् उत्सर्ग-विधि-मार्गका समाचरण करनेवाले, ऐसे गुणसे युक्त (णागज्जुणवायए) नागार्जुनवाचकको (वंदे ) वन्दन करता हूं ॥४०॥ श्रीगोविन्द आचार्य और भूतदिन आचार्यकी स्तुति-- मूल-गोविंदाणं पि नमो, अणुओगे विउलधारणिंदोणं । णिचं खंतिदयाणं, परूवणे दुल्लभिंदाणं ॥४१॥ तत्तो य भूयदिन्नं, निच्चं तवसंजमे अनिविण्णं । पंडियजणसम्मोणं, वंदामो संजमविहिण्णुं ॥४२॥ छाया-गोविन्देभ्योऽपि नमः, अनुयोगे विपुलधारणेन्द्रेभ्यः । नित्यं क्षान्तिदयानां, प्ररूपणे इन्द्रदुर्लभेभ्यः ॥४१॥ ततश्च भूतदिन्नं, नित्यं तपःसंयमेऽनिर्विण्णम् । पण्डितजनसंमान्यं, वन्दामहे संयमविधिज्ञम् ॥४२॥ शब्दार्थ-(अणुओगे विउल धारणिंदाणं) अनुयोगकी विपुल धारणा- रखनेवालोंमे इन्द्रके समान, (खंतिदयाणं) क्षमा, दया आदि गुणोंकी (परुवणे) प्ररूपणामें (निच्चं ) सदा ( दुल्लमिंदाणं) जो इन्द्रोके भी दुर्लभ ऐसे (गोविं- दाणं पि) श्रीगोविन्द नामक आचार्यको भी ( नमो) नमस्कार हो ॥४१॥ (य) और (तत्तो) तदनन्तर (तवसंजमे) तपसंयमकी आराधनामें (निच्चं) सदा ( अनिविण्णं) निर्वेद-ग्लानिसे रहित (पंडियजणसम्माणं) पण्डितजनसे संमाननीय तथा ( संजम विहिण्णुं ) संयमविधिके विशेष जानकार ऐसे (भूयदिन्नं) श्रीभूतदिन आचार्यको (वंदामो) वन्दन करते हैं॥४२॥ १ 'पुचि', 'पुन्ची' इति पाठान्तरम् । २ 'धारिणदाण' इति रा व मुद्रिते पाठ । ३ 'जुयाण' इति पाठान्तरम् । ४ 'दुल्लमिंदाणि', इत्यपि पाठ. । प्राकृतत्वादिन्द्रशब्दस्य पर- निपात । ५ सामण्ण-इति पाठ । ६ पदामि-इति पाठान्तरम् ।

भीमचन्वीसूमम् मूल-चरफणगतषियर्थपग,-विमउलवरकमलगम्मसरिखने। मवियजणहिययदइए, दयागुणविसारए धीरे ॥४३॥ अमरहप्पहाणे, पदविह-सज्झाय-सुमणियपहाणे । अणुओगिअवरवसमे, नाइलकुलवंसनविकरे ॥४४॥ भूपहियप्पगम्मे, पवेद भूयदिनमायरिए । मवमयनुच्छेयफरे, सीसे नागजुणरिसीर्ण ॥४५॥ छाया-वरतप्तकनकचम्पक,-विमुकलवरफमलगर्मसष्टगवर्णान् । मविकजनहदयदयितान्, दयागुणविशारदान धीरान् ॥४॥ अर्द्धमरतप्रधानान्, सुविज्ञासपाहुविधस्वाध्यायमधानान् । अनुयोजितवरवृपमान, नागेन्द्रकुलवशनन्दिकरान् ॥ ४४ ॥ मूतहितप्रगल्भान्, वन्देऽई मप्तदिनाचार्यान् । मयमयव्युच्छेदकरान, शिप्यान नागार्जुनपीणाम् ॥ ४५॥ दादा--(बर कणग तयिय चंपग मिमठा वर कमल गम्म सरिषण्मे) तपाया हुआ उत्तम सुवर्ण पा सनदरी रमवाला प्रधान पम्पाका स तया सिनुप उत्तम कमसके मर्म इमके समान पीतवर्णयाले और (मवियगण दिययपाप) मग्य मीकि घिसमें प्रेम उत्पन करनेवाले याने नो पक्षम हूँ तपा (इयागुण यिसारप) छोक ममम पयागुणको उत्पम करने में परम निपुण (धीर) यो पीर ६.४३R (भामरदप्पदाणे ) उस कालकी अपेसासे पक्षिणाईमरतके पुगप्रपान और (बबिएसज्झाय समुणियपदाणे) आवाराष्ट्र आदि पापिप स्माम्यायके जो अपीतरद जानकार है (अणुभागियबरयसमे) भनेकयर पम-भेष्ठ सापुको स्याम्पायवेयामुत्य आदि कार्यो मानेयाछे, तथा (मारस एलपस मंदिकरे) नामेन्मकुसनामक पेशका जो प्रमल पा परमान करमेयाले ६.४४म फिर (भूपदियप्पमम्मे) माणिमामके दितमें प्रगल्भ अर्थात् निकितासे उपाशपूर्पक गो माणिदितको फरमेयासे है तया ( भयभयपुरऐपकर) संसारके भपको मष्ट करनेपास है, [इस प्रकारके गुणांसे विशिष्ट पेस (मागग्गुणरिमीण भीनागानमदपिक (सीसे) शिप ( भूपदिषमापरिप) भी भूतरिय मामक आपापा (अई) में (पं) पनन करता ॥५॥ मूट-समुणिप-निचानिय, समुणिप-मुत्तस्यधारय पद । सम्मानुग्मावणया, सस्र्य टोहिराणामार्ण ॥१६॥ मालिशिगन 11 भूपहियाप्पा ताममिल पास मग तिमानिमिगौ। ३ निम्नति पातरम् । मिति गमगुप्मा तिमस्ति ।

अहंदाद्यावलिका १७ छाया-सुज्ञातनित्याऽनित्यं, सुज्ञातसूत्रार्थधारकं वन्दे । सद्भावोद्भावनया, तथ्यं लौहित्यनामानम् ॥ ४६॥. शब्दार्थ-(सुमुणिय निच्चानिच्चं) अच्छीतरह नित्य अनित्यरूपसे वस्तुको जाननेवाले, (समुणिय सुत्तत्थधारयं ) सम्यक समझे हुए सूत्रार्थ- को धारण करनेवाले (सम्भावुभावणया तत्थं) और यथावस्थित वर्तमान भावोंके प्रकाशनमें आविसंवादी याने वस्तुतत्त्वोंका सत्य प्रतिपादन करनेवाले ऐसे उन (लोहिच्चणामाणं) श्रीभूतदिन आचार्यके शिष्य लौहित्यनामक आचार्यको (वंदे ) वन्दन करता हू ॥४६॥ मूल-अत्थमहत्थखाणिं, सुसमणवक्खाणकहणनिव्वाणिं । पयईए महुरवाणिं, पयओ पणमामि दूसगणिं ॥४७॥ छाया-अर्थमहार्थखनि, सुश्रमणव्याख्यानकथननिवृत्तिम् । प्रकृत्या मधुरवाणीकं, प्रयतः प्रणमामि दूष्यगणिनम् ॥४७॥ शब्दार्थ-(अत्यमहत्थखाणिं ) जो अर्थ व महार्थकी खानकी तरह खान याने भाषा विभाषा वार्तिक आदि भेदोंसे अनुयोगविधिमें अत्यन्त कुशल हैं, तथा (सुसमण वक्खाण कहण निवाणिं) मूलोत्तर गुणसम्पन्न सुसाधु- ओंके लिये अपूर्व शास्त्रार्थका व्याख्यान करने व पूछे हुए विषयोंको कहने में जो समाधि अनुभव करनेवाले हैं, उन (पयईए) स्वभावसे (महुरवाणिं) मधुरभाषी (दूसगणि) श्री दूष्यगणी आचार्यको (पयओ) सम्मानपूर्वक (पणमामि-)प्रणाम करता हूं॥४७॥ मूल-तवनियमसच्चसंजम,-विणयज्जवखंतिमद्दवरयाणं । सीलगुणगद्दियाणं, अणुओगजुगप्पहाणाणं ॥४८॥ छाया-तपोनियमसत्यसंयम,-विनयाजेवशान्तिमार्दवरतानाम् । शीलगुणगर्दितानाम्, अनुयोगयुगप्रधानानाम् ॥४८॥ शब्दार्थ-(तवनियम सच्च संजम विणयज्जव खंतिमद्दवरयाणं-) तप, नियम, सत्य, संयम, विनय, आर्जव-सरलभाव, शान्ति, और मार्दव-कोमलता आदि गुणोंमे रत-लगे रहनेवाले तथा (सीलगुणगद्दियाणं) शीलगुणोंसे प्रख्यात होनेवाले, (अणुओग जुगप्पहाणाणं) अनुयोग करनेमें उस समयकी अपेक्षासे जो युगप्रधान हैं ॥४८॥ मूल-सुकुमालकोमलतले, तेसिं पणमामि लक्खणपसत्थे । पाए पावयणीणं, पडिच्छयसयएहिं पणिवइए ॥४९॥ ३ - - भीमशम्मीसूत्रम् छापा-सकुमारकोमलतलान्, तेपो प्रणमामि लक्षणप्रशस्तान् । पादान् प्रावनिकाना, प्रातीछिकशते' प्रणिपतितान् ॥ १९ ॥ हाम्दार्थ-(पाययणी ) मपान प्रवचम करनेवाले (तसिं) पूर्वोक गुण- माले म पूप्पगणीके (सम्मणपसत्ये) लक्षणोंसे प्रशस्त-उत्तम, प (सह- मास कोमसत्तसे) मा और सम्पर तस-त-पाये (पाए) परणौको (पण- मामि) प्रणाम करता है। दो पैर (परिष्य सयपह) सकगे शिपोसे (पणियाप) ममस्कार पाए हुए हैं। ४९॥ मूल-जे अन्ने भगवते, कालिपसुय-आणुओगिए धीरे । ते पणमिण सिरसा, नाणस्स परुवर्ण पोष्छ ॥५० ।। छाया-येऽन्ये भगवन्तः, कालिकमुतानुयोगिनो धीरा । तान् प्रणम्य शिरसा, ज्ञानस्य मरूपां पश्ये ।। ५०॥ पामार्य (अधे ) स्वतिके विपय हुए आचायोके सिवाय मी (जे)मो (कासिपसप मा भोमिए) कातिकशास्त्र अनुयोमवाले (धीर) पार (ममत) विशेषतधारी भाचार्य भगवान है (ते) नको (सिरसा) मस्त कसे (पणमिक्षण) प्रणाम करके (माणस्स) जानकी (परुवर्ण ) प्ररूपणाको (बोई)बईमा ॥५०॥ इतिस्पविरावसी समाप्ता । मौसविंगपिरिपिवासाचतलिपि सम्पूर्ना। मनप्तिके बो रिण पुस्मनमा सरे पगार पणे मानोपायानी मन मसिर (इते, स्नो प्रस्तावित मते हैं। ( एम्पादक) २ सक्स फम्ममम गवाल 1993 मम ममा पहिारि मोगायोमम्मपिरिपती पत मामाता समितिनावप्रपि सन्ति पणास्तप्रियते रमवसतिमिति पुग्म-पषिसम्मादिते पनि मासानिषियोपिकमा व समासते। मारपि वा समायते इबिहारषाविते । मतव पुरानाचार्याना पापरम्मानाsat बनाय प्रामाने वितिय सेतो निलो विवा। (अम्पाय) अथ नन्दीसूत्रम् सच्छायं सभाषाटीकं प्रारभ्यते mmmmmmm अनुवादकका मङ्गलाचरण- श्रोताओंके लिये १४ दृष्टान्त. जगमें कषायोपर विजयकर, केवली जो बनगए, परमार्थ जिनवाणी बना, सर्वार्थहित जो करगए । उन तीर्थपतिको नमन कर, गुरुभक्तिको मनमें धरूं, भाषार्थ नन्दीसूत्रका, चूर्णादि आश्रयसे करूं ॥१॥ मङ्गलके हेतु अर्हत् आदि स्तुतिरूपका आवलिका कहचुके, अब नन्दी- सूत्रके कथित अर्थोको ग्रहण करनेमें योग्य श्रोता कौन ? तथा कैसी परिषद् योग्य होती है, इस दृष्टिसे पहले १४ दृष्टान्तोंसे श्रोताके अधिकारको कहते हैं- मूल-सेल पण कुडग चालिणि, परिपुण्णग हंस महिस-मेसे य । मसग जलूग बिराली, जाहग गो भेरी आमीरी ॥ छाया-शैल-घन-कुटक-चालनी, परिपूर्णक-हंस-महिष-मेषाश्च । मशक-जलौक-बिडाली,-जाहक-गो-भेर्याऽऽभीर्यः॥ टीका-१ शैल-चिकना गोल पत्थर-मुद्गशैल, और घन-पुष्करावर्त मेघ, २ कुडग-घडा, ३ चालनी, ४ परिपूर्णक, ५ हंस, ६ महिष, ७ मेष, ८ मशक, ९ जलौका, १० और विडाली, ११ जाहक, १९ गौ, १३ भेरी, तथा १४ आभीरी इनके समान श्रोता होते है। श्रोताके लिये शैल आदिके दृष्टान्त- १ सेल-किसी समय मुद्गशैल और पुष्करावर्त महामेघमें विवाद खडा हुआ, मुद्गशैल बोलने लगा कि मुझे कोई नहीं गला सकता । यदि २० भीमन्दीसूत्रम् म सो तिरूपमात्र भी सम्मित करसको पा गीठा मी करतको तो मारा पुष्करावर्त माम सरधा समर्झ । पुष्कर मेप पोला-अरे हमारी एक बारा मी नहीं सह सकेमा, यदि हमारे पारा-पातोंके सामने हूं टिक मया तो मैं मी समगा कि सरचा मुश्गीस है। एसा कहकर मेष मूसहभार परसमे लमा और छगातार • पिनोंतक बरसकर सोचा कि भब वो रोल भर होमया होगा ऐसा समझकर वर्षा बन करपी और देखने ममा सो मुद्रशेख अभिक चाकचियपुक पिसपा, वह मेपको देखतेही मोठा-क्यों भी । म्हारा पल पूरा हुमा या महीं। म तो मुझे गहावे थे।" मेष रुमके हस्जित हो चहा मया। सीमकार मुश्मीठके समाम अयोग्य मोता-शिम्यको उपदेश शिक्षा) देते हुए अतिशयहानी-वचन-संपत्तिक आचार्यको भी सम्जित एवं हताश होना परता है। जैसे चिकना मोल पत्थर पुष्करात मेषके सात अहोराम परसनेपर भी नहीं भीजता, असे प्रयत्न पूर्वक भतिशय ज्ञानीके किये गये उपरेशोंसे मी जिसके बायपर असर नहीं होता, वह शेठसम मोता भयोग्य है । प्रतिपक्षमें जैसे हम्प मिट्टी अपने उपर परते हुए पानीको बाहर नहीं जामे रेती ते योग्य प्रोता बहुत भाचपिके उपरेशको म्पर्य नहीं जाने देते किन्तु उसे धारण करते हैं। ऐसे भोता पोग्य होते हैं। करम-कुट-परा-ये चार प्रकारके होते हैं-(१) टूटा मरवनवासा, (२) बामें एक तरफसे फूटा हुभा, (१) नीचेसे पटा, (8) म दूना न टा। जैसे-किनारपर झटे हुए परेमें योग-कुछ कम पानी राता है पीपते फूटेप परेमें पाले पोग पानी कम रहता है, मीसे फूटे हुए पोमें कुछ भी पानी नहीं पता और छिमराप्ति पर सप अस ठारता है, ऐतेही (१) मोताछ कम पारण करता (२) पात पोहा धारण करता, (३) कुछ भी नहीं धारण करता, (8) सना हुमा सम पारण कर सता, पही मौता पूर्ण पोग्य है, और जो कुछ भी धारण नहीं करता वा पूर्ण अमोग्य है। बांकी पो साता नमवणमे पोरवा पटका साम्त दूसरे प्रकारसे मी जैसे-पक माषित इसरा भभावित । इसमें दो भावित उसके भी पी मेव-पक महासत मापित भौर एसप मप्रशस्त मावित । पुष्प कर रह से जी माक्तिपर प्रशस्त माक्ति कालाता है तथा मदिराठ बारिसे जो भावित है, वह अमास्त भामित है। प्रशस्त माबित मी वाम्म और भवाम्प भासे दो तरहका होता है-जो बने, आप और मन भाषिसे परायेमा के पाम्प और मोनही पाहाये जासके वे भवाम्य हैं इनमें प्रशस्त मावित भवाम्प और अमदास्त मावित पाम्य परोकी तराके भोता पोग्य जात सम्पर तत्त्वकी भूतिथे मारित होकर को स्थिर विचारवाने में भौर एस तिक उपपेशवे भापित होकर भी गो पाम्प परिवर्तनीय हैं, ये दोनों प्रकारक मोता योग्य है।

श्रोताओंके लिये १४ दृष्टान्त ३ चालिणि-चालनी-जैसे चालनी एक वाजूसे पानी लेकर दूसरी बाजूसे निकाल देती है, ऐसे जो आचार्यके उपदेशको कुछ भी ध्यानमें नहीं रखता वह चालनीके समान श्रोता भी शास्त्रश्रवणमें अयोग्य है। चालनीके प्रतिपक्षमें-जैसे तापसका कमण्डलु विन्दुमात्र भी जल नहीं गिरने देती ऐसे जो श्रोता उपदेशके तत्त्वको कुछ भी नहीं छोडता वह शास्त्रश्रवणमे योग्य है। ४ परिपुण्णग-परिपूर्णक (घृत आदि छाननेका तृणमय साधन) इसमे जैसे सारसार निकलजाता व मल ठहरता है ऐसे जो श्रोता गुणोको निकाल- कर दोषोंको रखता है वह भी शास्त्रश्रवणमे अयोग्य है। इसके प्रतिपक्षमें- ५ हंस-जैसे हंस मिले हुए दूध व पानीमेसे पानीको अलगकर दूधही पीता है ऐसे जो शिष्य दोषोंको छोडकर गुण ग्रहण करता है वह श्रोता उपदेशश्रवणके योग्य है। ६ महिस-माहिष-जैसे जलाशयमें पानी पीनेको गया हुआ महिस- भैंसा पानीको डुलाकर-मलिन बनाके न तो खुद स्वच्छ जल पीता और न दूसरेकोही पीने देता है, ऐसे जो शिष्य अनेक तरहके कोलाहलद्वारा न तो खुद अच्छीतरह शास्त्रोपदेशको सुनता और न दुसरोंकोही सुनने देता वह शास्त्रश्रवणके अयोग्य है । इसके प्रतिपक्षमें- ७ मेष (भेड)-जैसे भेड गौके खुर डुबे उतने पानीमें भी अपने घुटने टेक, पानीको गैर मलिन किये हुए खुद इच्छाभर पी लेती है तथा दूसरोंको भी पीने देती है, ऐसे जो श्रोता शान्तभावसे स्वयं भी शास्त्र- उपदेश सुनता तथा दूसरोको भी सुनने देता है वह शास्त्रग्रहणके योग्य है। ८ मसग-मशक-मच्छर-डांस-जैसे मच्छर शरीरपर वैठतेही दुःख पैदा करता है ऐसे जो श्रोता आचार्यको उद्वेग व कष्ट पहुँचाता है वह भी उपदेशके लिये अयोग्य होनेसे मशककी तरह हटानेयोग्य है । प्रतिपक्षमे- ९ जलूगा-जलौका (जोंक)-जैसे जलौका विना कष्ट पहुँचाये खराब रक्त पी लेती है ऐसे जो श्रोता आचार्यको विना कष्ट पहुँचाये शास्त्रवाणीका पान करते हैं वे योग्य हैं। १० बिराली-बिडाली (मार्जारी)-जैसे मार्जारी भाजनसे नीचे गिराके धूलयुक्त दूधको पीती है ऐसे जो श्रोता अहंकारवश आचार्यके पास उपदे- शामृतका पान नहीं करके ऊठकर जाते हुए श्रोताओके परस्पर संभाषणसे निकले हुए वचनोंको सुनता है, वह भी उपदेशदानके अयोग्य है । प्रतिपक्षमें- ११ जाहग-जाहक ( उन्दिरकी जातिका एक जन्तुविशेष)-जैसे जाहक भाजनमसे थोडा २ दूध पीकर वाजूके भागको चाटता है और फिर पीता श्रीनन्दीमम् ऐसेही जो मोता पूर्वभुत उपदेशको मनमकर फिर पूछता है किन्त गुरुको सिम नहीं करता वह उपदेशवानके योग्य है। १५ गो-गी (गाय) असे किसी गृहस्पने चार ब्राम्हणोंको एक गाय पानमें दी, उसको वे लोग एक दिन क्रमशः हने लगे तथा उसको सिखा मेके समयमै पेसा विचार करने लगे कि कल तो इसका मोहम दूसरा करेगा फिर माज में इसका पोपण क्यों कर इस विचारसे चारोन उसको खिलामा छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि कुछडी पिक वाद मूससे पीडित हो माप मरगयी, ऐ चारों ब्राम्हण छोमि मिन्नाके पात्र हुए तथा सायही माय और पसे मी उनको हाथ धोना पग । इसीप्रकार जो शिम्य आचार्यसे मृतमहण तो करता है किन्तु सेवा-शुपाके समय पह समझता है कि जिनको अमी आचार्यसे विशेप साम लेना है, वे सेवा करें, मैं क्यों कर ऐसा शिभ्य बहुत समपतक आचार्यसे छाम नहीं ले सकता । स्वार्यभावमधाम होनेसे इस मकारका शिम्य भी शासपएणके विपयमें अयोग्य होता है। इसके विपरीत निस्स्वार्य पुझिसे भाचार्यकी सेषा-मक्ति करनेवाला शिष्य आचायकी मीरी- मता-समापिसे पिशपरूपम भुतवानकी माप्ति करता है और शास्त्रमहणम पोग्य अधिकारी होता है। १५ मेरी-मेरी-भीकमके गुणमादीपनकी परीक्षासे प्रसन्न होकर किसी ऐपने उमको अशियोपशामक-विमनियारक पक मेरीबी मिसकेबमानेपर जहाँ उसक पाप सुनपरे, पहा २ छमासपर्यन्त किसीको कोई रोग नहीं होता तया पासका गुमा रोग नष्ट हो जाता इसमकार रिव्य मभावयुक्त मरीकी पात सुनकर दूरसूरसे रोमी आने लगे। एक समय मस्तककी येवनासे ग्याकुल एक पनी पदों बहा भाषा, उसको अपने माशीपचन्दन उपचारमें बताया जोकही भीम मिला। मेरी छमासमें पनायी जाती थी मगर उसको ती पक दिम भी पिताना कठिन था। ऐसी पशामें उसने मेरीरसक पुरुपको गुप्तरूपसे बामूल्य पुरस्कार कर मेरीका पुष सण (दका) माप्त करलिया। मेरी रक्षको उस टूटे हुए मागपर दूसरा टकरालमा दिया । इस प्रकार भम्प' सपटत गुप पद मेरी कम्यासी पम मई। इससे उसका बदगमीर पाप नहीं पाता भीर रोग मी शाम्त नही दात । लागों को नुप रोगोंको जामकर प मेरीका पदस जसा शद मदीं सुनकर भीरुप्मन उसका निरीक्षण दिया जप पता चला कि मेरी तो पिसमिन कम्यामम होगई तब आयाग कहौस भाये। सस ना होकर भीरमने पहल तकको हाकर उसके पास एमरेको मिपुक पिया तया आम तपकी आराधमाम नयीन भरी माप्त की। जैसे पय भरता भरीका ररित करनेमे पटा दिया गया और प्रिमित कन्या पनकर भरी मी ममापन्य पनई एगमा शिम्य निमपानीको गणितकरम थोक पाम्प मिसाकर कन्या रमापता, यामी शानभानम अपारप दामस आपापक श्रोताओंके लिये दृष्टान्त २३ द्वारा हटा दिया जाता है, प्रतिपक्षमें-जैसे दूसरे भेरीरक्षकने अच्छीतरह भेरीका रक्षण किया, जिससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्णने उसका बहुत सन्मान बढाया व वंशपरम्परातक खा सके, ऐसी जीविका चालू करदी। ऐसे जो शिष्य जिनवाणीका रक्षण करते हैं, वे आचार्यसे सन्मान पाकर जन्मान्तरमें भी सुखके भागी बनते हैं। १४ आभीरी-आभीरी-जैसे एक आमीरी अपने पतिके साथ नगरमें घी वेचनेको गई। गांवके अन्य आभीर भी अपनी २ गाडी लेकर घी वेचने और कुछ सामान लेनेको साथ आये थे। नगरके बाजारमे आकर आभीरने गाडीपरसे घडे उतारने शुरू किये और आभीरी नीचे लेने लगी, दोनोंकी असावधानीसे एकाएक एक घडा गिरगया, जिससे कुछ घी जमीनपर गिर पढा, इसपर दोनों झगडने लगे, आभीर बोला कि तूने अच्छीतरह घडा नहीं पकडा छोडदिया, आभीरी बोलने लगी कि मैं तो पकडनेपरही थी कि तुमने छोडदिया इसीसे गिरगया। इसतरह दोनों वादविवाद करते रहे, तबतक गिरे हुए घडेका घी कुत्ते चट करगये और दूसरे २ आभीर घी बेचकर अपने २ गांव चले आये। आखिर शामको उन दोनोंने भी बचे हुए धीको बेचा तथा रात हो जानेपर घरकी ओर चले, रास्तेमे चोरोंने घेरलियाऔर साथके पैसे लूट लिये इसप्रकार घी भी गया और पैसे भी खोये, प्रतिपक्षमें-दूसरी आभीरी जब नगरमे धी बेचनेको पतिके साथ गई तथा असावधानीसे घी गिरगया तो वोली-पतिदेव ! तुम्हारा कोई दोप नहीं, मैंने अच्छीतरह घडा नहीं पकडा, इससे गिरगया अतः क्षमा करो, इसप्रकार शान्तभावसे पतिको संतुष्ट कर शीघ्रही गिरे हुए घीको व साथ साथ घडेको सम्हालने लगी और उष्ण पानीसे वाटूको तपाकर बहुत कुछ घी भी निकाल लिया तथा वेचकर सबके साथ गांव भी चली गई। इसीप्रकार जो शिष्य सूत्रार्थको अच्छीतरह ग्रहण किये विना आचार्यके कहनेपर कलह करने लगता है वह भी श्रुतज्ञानरूप घीको खो बैठता है अतएव अयोग्य है। विपरीत-जो सूत्रार्थके ग्रहणमें चूक हो जानेपर आचार्यसे प्रेरणा पाया हुआ अपनी चूक स्वीकार करके क्षमा चाहलेता है, वह आचार्यको सन्तुष्ट कर सूत्रार्थक लाभको प्राप्त करता है इससे वह योग्य कहा जाता है। "श्रोताओके समूहको सभा कहते हैं, यह सभा कितनी प्रकारकी है ! इसको दिखाते हैं-- मूल-सा समासओ तिविहा पण्णत्ता, तंजहा-जाणिया, अजाणिया, दुब्वियड्डा । जाणिया जहा-- खीरमिव जहा हंसा, जे घुट्टन्ति इह गुरुगुणसमिद्धा । दोसे अ विवज्जती, तं जाणसु जाणियं परिसं ॥५२॥ , अजाणिया जहा- - २४ भीनम्दीसमम् जा होइ पगइमहरा, मिपठावय-सीह- कुक्कुण्यमूआ। रयणमिव असठविमा, अमाणिया सा मवे परिसा ॥५३॥ दुष्टिअट्टा महा- न य कस्या निम्मामओ, न य पुम्छा परिमपस्स पोसेणं । पत्थिव्य वायपुण्णो, फुटा गामिछय विभड़ो ॥ ५४॥ छाया-सा समासतमिविधा ममता, तपपा-ज्ञायिका, अज्ञायिका, दुर्विदग्धा । ज्ञायिका [नाम ] यथा- झीरमिष पया इंसा , पे पुरन्सि-नह गुरुगुणसमुद्धा। दोपांच विवर्जयन्ती, सामानीविज्ञापिकाका) परिपदमाद)॥५२॥ अज्ञायिका यथा-" या मवप्ति प्रकृतिमधुरा, मृगसिंहकुटशावकमूता । रलमिषाऽसंस्थापिता, अझायिका सा मवेत पर्पद् ॥ ५३॥ दुर्विदग्धा यथा- न च फुघाऽपि निर्माते, न च पृमति परिमवस्प दोपेण । वस्तिरिय पासपूर्ण', स्फुरति ग्रामेपको विदग्ध ॥५४॥ टीका-यह पर्पद-समा संक्षेपमें दीन प्रकारकी से-शापिका सहा पिका व विदग्पा । (१) मका-विरासमा, मेसे-उत्चम ईस पामीको छोडकर असे उपका पाम करते हैं ऐसे जो गुणसम्पम पुरुप गुणों को ग्रहण करते और बोपोको छोडते नको यहाँ परके प्रकरणम हायिका पर्पर समझो। (१) मतायिका जैसे-जो मोता भूम सिंघ भोर ईतके परचोंके समान मरुतिसे मोठे-कोमस होते मर्याद सम आपिके पच्चोंको मिसपकार मच या हर सा पनामा चारपानुसार पना सकते है तथा असंस्थापित रस्म मिस- प्रकार जहाँ पाहे बिठा सकते हैं उसीमकार गो किसी भी मामम सगाई जा सक या महायिका समादास्पीकरण-यो कुमार्गमें नदी समे भीर सन्मार्म क तस्वस भी मनभिज्ञ-अमगाम में पैसे प्रोताभोंको यिमा कमुके समझाया मा सकता है ।(१) इणिग्या समा जैस-कोई प्रामीण परित किसी भी विपयम या शास्त्रमें विश्वा नदी रस्ता और अनादरके सयासस किसी विशनकोही कुछ पूछता है किन्तु यस पापुसे पूरित माके समान होगाँसे अपमे पतितपनके मेवाएको समकर मानो पेट फटरदा दो सतरण मो मता दुआ रहता है एम ठोक समूहको पदिग्पा समा कहते है। इति। मिरर्यायोमम्।

, - ज्ञानके पांच भेद व प्रत्यक्ष परोक्ष सूत्रम्- से किं तं नाणं?] नाणं पंचविहं पन्नत्तं, तंजहा-आभिणि- बोहियनाणं, सुयनाणं, ओहिनाणं, मण-पज्जवनाणं, केवल- नाणं ॥ सू. १॥ छाया-[अथ किं तज्ज्ञानं ? ] ज्ञानं पञ्चविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-१ आभिनिबोधिकज्ञानं, २ श्रुतज्ञानं, ३ अवधिज्ञानं, ४ मन:- पर्यवज्ञानं, ५ केवलज्ञानम् ॥ सू १॥ टीका--[शिष्य-भगवन् ! वह ज्ञान कौनसा है ?] ज्ञान पांच प्रकारका है, जैसे-१ आभिनिवोधिकज्ञान, २ श्रुतज्ञान, ३ अवधिज्ञान, ४ मनापर्य्ययज्ञान, और ५ केवलज्ञान ॥ सू १॥ मूल-तं समासओ दुविहं पण्णत्तं, तंजहा-पच्चक्खं च परोक्खं च ॥सू.२॥ छाया-तत्समासतो द्विविधं प्रज्ञप्त, तद्यथा-प्रत्यक्षश्च परोक्षश्च ॥सू.२॥ टीका-इसप्रकार पांच भेदवाला भी वह ज्ञान संक्षेपमें दो प्रकारका है, जैसे-१ प्रत्यक्ष और २ परोक्ष ॥ सू २ ॥ मूल-से किं ते पच्चक्खं ? पच्चक्खं दुविहं पण्णत्तं, तंजहा-इंदिय- पच्चक्वं, नोइंदियपच्चक्खं च ॥ सू ३॥ छाया-अथ 'किं तत्प्रत्यक्षं ? प्रत्यक्षं द्विविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-इन्द्रिय- प्रत्यक्षं नोइन्द्रियप्रत्यक्षश्च ॥सू ३॥ टीका-शि०-उस प्रत्यक्षका क्या स्वरूप है ? उ.-प्रत्यक्षके दो भेद हैं, जैसे-इन्द्रियप्रत्यक्ष और नोइन्द्रियप्रत्यक्ष ॥ सू ३ ॥ मूल-से किं ते इंदियपच्चक्खं ? इंदियपच्चक्खं पंचविहं पण्णत्तं, तंजहा-१ सोइंदियपञ्चक्खं, २ चक्खिदियपञ्चक्खं, ३ घाणिं- दियपच्चक्वं, ४ जिभिदियपच्चक्खं, ५ फासिंदियपञ्चक्खं, से तं इंदियपच्चक्खं ॥ सू. ४॥ छाया-अथ किं तदिन्द्रियप्रत्यक्षम् ? इन्द्रियप्रत्यक्षं पञ्चविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-(१) श्रोत्रेन्द्रियप्रत्यक्षं, (२) चक्षुरिन्द्रियप्रत्यक्षं, (३) घ्राणेन्द्रियप्रत्यक्षं, (४) जिह्वेन्द्रियप्रत्यक्षं, (५) स्पर्शेन्द्रियप्रत्यक्षं, तदेतद् इन्द्रियप्रत्यक्षम् ॥ सू ४॥ ४ भीनन्दीपमम् टीका-शि-पहन्द्रियमापस किसमे महारका है। उ-इन्धिमत्यक्ष पाच प्रकारका है, जैसे-अत-नास्त्रिय-फर्णहोनेवासा शान-मोम्ब्रिय मस्वस (१)मांससे होनेवाला बाग-परिन्द्रिय-प्रत्यक्ष (२) नाकसे होनेवाला जान-माणेन्द्रिय-प्रत्पस (१,जीमसे होनेवाला शाम-जियेन्द्रिय प्रत्यक्ष (१), स्पचासे होनेवाला बाग-स्पर्शन्द्रिय प्रत्यक्ष (१), इसप्रकार पा इन्द्रियप्रत्यक्ष मा ५४॥ मूल-से किं तं नोइवियपरचसं ? नोइंघियपञ्चतं तिषि पण्ण तंगहा-ओहिनाणपण्यम्स (१) मणपज्जवनाणपबासं (२) केवलनाणपचास (२)स. ५॥ छाया-अप किं तमोइन्द्रियप्रत्यक्ष' नोइन्द्रियमत्यहं त्रिविधं प्राप्त, तथया-अवधिज्ञानमत्यक्षं (१), मन पर्यवज्ञानप्रत्यक्ष (२), केवलज्ञानप्रत्यक्षम् (२)॥ स. ५॥ टीका-शि-मोत्रियप्रत्यक्ष फिसको करते हैं। 7-~-मोइन्द्रिय प्रत्यक्ष [विमा किसी प्रिय मनमप बाध करपकी सहायता साक्षाव आत्मासे होमेवासा वाम तीन प्रकारका है जैसे-भवमिहानमत्यस (१) मनम्पमेधानमत्यम (२) कवमझानमस्पक्ष (१)॥ ५॥ मूल-से किं तं मोहिनाणपञ्चसं ? ओहिनाणपञ्चक्स पुपिई पण्णर्च, संजहा-मवपचार्य ध खाओवसमिर्य प ॥२६॥ छाया-अप किं सदवधिज्ञानमत्यक्षम् ? अवपिज्ञानमत्पक्षे विविध पज्ञप्त, सयपा-मपपत्ययिका सायोपशमिक स्॥ टीका-शिवह अपमिहाममस्पक्ष किसपकार है। -अपपिहान अस्पक्ष दो मकारका है जैसे-भवमत्ययिक (१, मौर सायोपामिक (१) मूल से फिस मषपचाय ? मवपप्पइये पुण्ई, तमा-देवाण य, नेखयाण प ॥ स.७॥ या-अप किं स भवप्रत्ययिकं ? मतपस्पपिकं इयो, तपा- देपानास नैयिकाणाय ॥ स. un टीका--शि-ह भवनस्पयिक मषिताम कीनसा । 30-मब- प्रत्ययिक जम्मसे होनेपाला-भवपिशान होको दोता है, जैसे-वोंका भीर मारक जीपोंका भवधिज्ञान मवमत्यधिक हस,०० क्षायोपशमिक अवधि और उसके ६ भेद. मूल-से किं ते खाओवसमियं ? खाओवसमियं दुण्हं, तंजहा-मणु- स्साण य पंचेंदिय-तिरिक्खजोणियाण य । को हेऊ खाओ- वसमियं ? खाओवसमियं तयावरणिज्जाणं कम्माणं उदि- पणाणं खएणं अणुदिपणाणं उवसमेणं ओहिनाणं समुप्पज्जइ ॥ सू८॥ छाया-अथ किं तत् क्षायोपशमिकं ? क्षायोपशमिकं द्वयोः, तद्यथा- मनुष्याणाञ्च पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिजानाञ्च, को हेतुः क्षायोप- शमिकं ? क्षायोपशमिकं तदावरणीयानां कर्मणाम्-उदीर्णानां क्षयेण, अनुदीर्णानामुपशमेन, अवधिज्ञानं समुत्पद्यते ॥ सू. ८॥ टीका-शि०-वह क्षायोपशमिक अवधिज्ञान किसप्रकार होता है। उ०- क्षायोपशमिक अवधि दोको, जैसे-मनुष्य और पंचेन्द्रियतिर्यंचोंको होता है । शि०-क्षायोपशमिक अवधिज्ञान इस नाममें क्या हेतु है? उ०-अवधिज्ञानके जो आवरक (आवरण करनेवाले) कर्म हैं उनमें उदयावलिका प्राप्तको क्षय करने, और जो उदयमे नहीं आये हैं उनका उपशमन करनेसे जो अवधिज्ञान उत्पन्न होता है उसे क्षायोपशमिक अवधिज्ञान कहते हैं । सू. ८॥ मूल-अहवा गुणपडिवन्नस्स अणगारस्स ओहिनाणं समुप्पज्जइ, तं समासओ छविहं पण्णत्तं, तंजहा-आणुगामियं १, अणाणु- गामियं २, वड्डमाणयं ३, हीयमाणयं ४, पडिवाइयं ५, अप्पडिवाइयं ६॥ सू. ९॥ छाया-अथवा गुणप्रतिपन्नस्याऽनगारस्याऽवधिज्ञानं समृत्पद्यते, तत्स- मासतः षड्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-आनुगामिकं १, अनानुगामिकं २, वर्द्धमानकं ३, हीयमानकं ४, प्रतिपातिकं ५, अप्रति- पातिकम् ६॥ सू. ९॥ टीका-अथवा ज्ञानदर्शनचारित्रके गुणसम्पन्न अनगार-मुनिको जो अवधिज्ञान प्रकट होता है यह भी क्षायोपशमिक है, वह संक्षेपमें ६ प्रकारका है, जैसे-आनुगामिक (१), अनानुगामिक (२), वर्द्धमान (३), हीयमान (४), प्रतिपाति (५), अप्रतिपाति (६)॥ सू ९॥ आनुगामिक आदिका क्रमश विवरण करते हैं- मूल-से किं तं आणुगामियं ओहिनाणं ? आणुगामियं ओहिनाणं दुविहं पण्णत्तं, तंजहा-अंतगयं च मज्झगयं च । से किं तं अंत-

२८
भीमबन्दीमम्
गय? अंतगयं तिवि पण्णचं, तंजहा-पुरओ अंतगयं (१)
मग्गो अंतगर्य (२), पासओ अंतगयं (३)।
से किं तं पुरओ अंतगर्य ? पुरओ अंतगर्य-से जहानामप
का पुरिसे सर्व पा, पलियं पा, अलायं वा, मणिं वा, पार्व
पा, ओई वा, पुरमओ कार्ड पणुछेमाणे २ गमछेना, से ईत
पुरमओ अतगयं ।
से कितं मग्गो अंतगर्य! मग्गओ अंतगयं, से जहानामप
फेा पुरिसे उपा, पलिय बा, मलार्य पा, मणि था, पर्व
पा, जोरपा, मग्गओ कार्ड अणुकमाणे २ गमिज्जा से
ततं मग्गो अंतगयं ।
से किसे पासभो अंतगर्य? पासओ मतगर्य, से जहानामए
केर पुरिसे उर्फ पा, पलियं वा, अलार्य वा, मणि वा, पाव
वा, जोई वा, पासओ काठे परिफमाणे २ गणिज्जा सेत
पासओ अंतगपं, से मंतगयं ।
छाया अप किं तम्-आनुगामिकममधिज्ञानम् ? आनुगामिकमवधि-
शानं विविघं मजप्त, सयपा-अन्तगत
अप किं तदन्तगतम् ! मन्तगत विविध प्रज्ञत, तद्यपा-पुरतोऽ
न्तगते (१), मोर्गतोऽन्तगतं (२), पायतोऽन्तगतम् (२)।
अथ किं तत् पुरतोऽन्तगत ! पुरतोऽन्तगत-स यपानामक'
कमिन् पुरुप-सेल्को पा, दुली पा, मलात पा, मणिं वा,
प्रदीप पा, ज्योतिर्वा, पुरतः कृत्वा प्रणुन २ गमेत, तवेतन
पुरतोऽन्तगतम् ।
अप किं तन्मागतोऽन्तगतं १ मार्गतोऽन्तगत, स पपानामक
फमित्पुरुप'-उस्को पा, पलुसी पा, अहाते पा, मणि वा, प्रदीप
पा, ज्योतिर्वा, मार्गतरुत्वाऽनुकर्षन् २ गमोव, तवेतन्मार्ग
तोऽन्तगतम् ।
मत-म्। मला-पोपिला ॥ दम पर
डान्-मन-कार।

अन्तगत अवधिके अवान्तर मेद २९ अथ किं तत्पार्श्वतोऽन्तगतं ? पार्श्वतोऽन्तगतं, स यथानामकः कश्चित्पुरुष उल्कां वा, चटुली वा, अलातं वा, मणिं वा, प्रदीपं वा, ज्योतिर्वा, पार्श्वतः कृत्वा परिकर्पन २ गच्छेत् , तदेतत्पार्श्वतोऽन्तगतं, तदेतदन्तगतम् । टीका-शि०-गुरुवर! वह आनुगामिक अवधिज्ञान कौनसा है ? उ०- आनुगामिक अवधिज्ञान दो प्रकारका है, जैसे-अंतगत और मध्यगत, वह अंतगत अवधि किसप्रकार है ! उ०-अंतगत अवधिज्ञान तीन प्रकारका कहा गया है, जैसे-पुरतोऽन्तगत (१), मार्गतोऽन्तगत (२), पार्श्वतोऽन्तगत (३)। अब वह पुरतोऽन्तगत अवधि कैसा है ? उ.-जैसे कोई पुरुप दीपिका या चटुली वा तृणावर्ती अग्नि या मणि वा प्रदीप तथा ऐसेही विजली, बॅटरी आदि किसी तरहकी अग्निको आगे करके बढाता हुआ चला जाता है, [ उसके अग्रगामी प्रकाशकी तरह जो ज्ञान आगेके प्रदेशको प्रकाशित करते हुए साथ चलता है ] उसे पुरतोऽन्तगत अवधिज्ञान कहते हैं। वह मार्गतोऽन्तगत अवधि किसप्रकार है। उ०-मार्गतोऽन्तगत, जैसे-कोई पुरुप उल्का-दीपिका, चटुली, अलातक वा मणि या प्रदीप तथा अन्य इसी प्रकारकी अग्निकी ज्योतिको पीछे करके खींचता हुआ जाता है [ ऐसेही जो आत्मा पीछेके क्षेत्रको अवधिज्ञानसे प्रकाशित करता-जानता हुआ जाता है] उसका वह पृष्ठगामी-पीछे चलनेवाला अवधिज्ञान मार्गतोऽन्तगत कहाता है। वह पार्श्वतोऽन्तगत अवधिज्ञान कौनसा है ? उ०-पार्श्वतोऽन्तगत, जैसे- कोई पुरुप दीपिका, चदुली, अलातक वा मणि या प्रदीप आदि पूर्वोक्त प्रकाश- कारी पदार्थों को अपने बगलमें करके साथ ले चलता हुआ वाजूके प्रदेशको प्रकाशित करते जाता है, [ ऐसेही जिसका अवधिज्ञान बाजूके पदार्थोंका ज्ञान कराते हुए साथ चलता है ] वह पार्श्वतोऽन्तगत अवधिज्ञान है, इसप्रकार यह अन्तगत अवधिका वर्णन हुआ। मूल-से किं तं मज्झगयं ? मज्झगयं से जहानामए केइ पुरिसे उक्त वा, चड्डुलियं वा, अलायं वा, माणे वा, पईवं वा, जोई वा, मत्थए काउं समुन्वहमाणे २ गच्छिज्जा, से तं मज्झगयं । छाया-अथ किं तन्मध्यगतं ? मध्यगतं, स यथानामकः कश्चित्पुरुषः- उल्कां वा, चटुली वा, अलातं वा, मणिं वा, प्रदीपं वा, ज्योतिर्वा, मस्तके कृत्वा समुद्वहन् २ गच्छेत्, तदेतन्मध्यगतम् । टीका-शि०-मध्यगत अवधि किसको कहते हैं १ उ०-मध्यगत अवधि- जिसप्रकार कोई पुरुष उल्का, चदुली, अलातक वा मणि व.प्रदीप आदि पूर्वोक्त १० भीमममीसमम् मकाशकारी प्रयोको मस्तकपर रसके उठाता हुआ जाता है [इसमकार चारों ओरके पपायोका ज्ञान कराव हुए जो ज्ञान हावार साय बसता है। उसको मम्पगत अमिहान कहते हैं। मूल-अंतगयस्स मझगयस्स य को पाविसेसो ? [गोयमा!] पुर- ओ अंतगएण ओहिनाणेणं पुरो पेव संसिज्माणि वा असंसे ज्जाणि पा जोपणाई जाणइ पासइ, मग्गभो अंतगपण ओहिनाणेणं मग्गओ व ससिज्जाणि वा असंखिज्जाणि वा जोयणा जाणा पासइ, पासो अतगएण ओहिनाणेणं पास मो चेष सखिम्जाणि पा असखिम्जाणि वा जोयणाई जाणा पासइ, मजागरण ओहिनाणेणं सम्पमो समता संलिज्माणि वा असंखिज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ, से चं आणुगामिर्य ओहिनाणे ॥ स. १०॥ छाया-अन्तगतस्प मध्यगतस्य च क मतिविशेप १ [गौतम !] पुर तोऽन्तगतेनाऽवधिज्ञानेन पुरतमेव संस्येानि वा, मसंस्येया- नि वा योजनानि जानाति पश्यति, मार्गतोऽन्तगतेनाऽवधिमा नेन मार्गतमेव संस्येयानि वा, असंस्पेयानि वा योजनानि जानाति पश्यति, पार्श्वतोऽन्तगतेनाऽनभिज्ञानेन पार्वतमेव संस्येपानि वा, असंख्येपानि पा योजनानि जानाति पश्पति, मध्यगतेनाऽवधिज्ञानेन सर्वतः समन्तात् सस्पेयानि वा असंस्पे- यानि वा योजनानि जानाति पश्यति, सवेतदानुगामिकमवधि- ज्ञानम् ॥ १०॥ टीका-मन्तमत और मम्पगत अवधिमे पा विशेषता है! 70- पुणोतगत अवधिहानसे छाता संम्पात तथा मसंम्पात योजन मामेके पायको ही जामता परेशता है, मामतोज्न्तगत अपितामसे संख्यात या मसम्यात पोनम पीछेके प्रम्पोकोही धात्मा जानता पदेखता है, ऐसे पार्व तोऽन्तमत भवनितानसे दोमो पाबूमें रोए पलायोकोही संख्यात बा असं स्पात पोगमतक मानता व देखता है किन्तमम्पमत अवविज्ञानसे तो समी भोरके संन्यात व असम्पात योगगमभ्यवती पार्योको भास्मा जामता व ऐपता है, [पही बोमौकी विशेषता] पर आमुमामिड-गत्पचित्रसे साय चमनेवासा भवभिन्तान हुआ। १०॥

अनानुगामिक व वर्द्धमान अवधिज्ञान ३१ मूल-से किं तं अणाणुगामि ओहिनाणं ? अणाणुगामि ओहि- नाणं-से जहानामए केइ पुरिसे एगं महंतं जोइट्ठाणं काउं तस्सेव जोइट्ठाणस्स परिपेरंतेहिं परिपेरतेहि, परिघोलेमाणे परि- घोलेमाणे तमेव जोइट्ठाणं पासइ, अन्नत्थगए न जाणइ न पासइ, एवामेव [अज्जो!] अणाणुगामिअं ओहिनाणं जत्थेव समुप्प- ज्जइ तत्थेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा संबद्धाणि वा असंबद्धाणि वा जोयणाइं जाणइ पासइ, अन्नत्थगए ण पासइ, से तं अणाणुगामिअं ओहिनाणं ॥ सू. ११॥ छाया-अथ किं तदनानुगामिकमवधिज्ञानम् ? अनानुगामिकमवधिज्ञानं, स यथानामकः कश्चित्पुरुष एकं महत्-ज्योतिःस्थानं कृत्वा तस्यैव ज्योतिःस्थानस्य परिपर्यन्तेषु२ परिघूर्णन्२ तदेव ज्योति:- स्थानं पश्यति, अन्यत्र गतान् न जानाति न पश्यति, एवमेवाड- नानुगामिकमवधिज्ञान-यत्रैव समुत्पद्यते तत्रैव संख्येयानि वा असंख्येयानि वा सम्बद्धानि वाऽसम्बद्धानि वा योजनानि जानाति पश्यति, अन्यत्र गतान्न पश्यति, तदेतदनानुगामिकम- वधिज्ञानम् ॥ सू ११॥ टीका-शि०-वह अनानुगामिक अवधिज्ञान किसप्रकार है ? उ०-अना- नुगामिक अवधिज्ञान, जैसे-कोई पुरुष एक बडे अग्निस्थानमें अग्निको प्रदीप्त करके उस अग्निस्थानकेही आजूबाजू घूमता हुआ उसी अग्निस्थानको देखता है, दूसरी जगह रहे हुए पदार्थोको अन्धकारके कारण वहाँ जाकर भी नहीं जानता व नहीं देखता है, इसीप्रकार अनानुगामिक अवधिज्ञान जिस क्षेत्रमे उत्पन्न होता है, उसी क्षेत्रमें संख्यात या असंख्यात योजनतक संवद्ध वा पर- स्पर सम्बन्धरहित (असम्बद्ध) पदार्थोको जानता व देखता है, उससे बाहरके पदार्थोको [ नहीं जानता व] नहीं देखता है, इसप्रकार यह अनानुगामिक अवधिज्ञान हुआ॥ ११॥ वर्धमान अवधिज्ञान- मूल-से किं तं वड्डमाणयं ओहिनाणं ? वढमाणयं ओहिनाणं पसत्थेसु अज्झवसायट्ठाणेसु वट्टमाणस्स वडमाणचरित्तस्स विसुज्झ- माणस्स विसुज्झमाणचरित्तस्स सव्वओ समंता ओही वडइ, १ परिघूर्णन-परिभ्रमन्-इत्यर्थ । - भीमबन्दीघ्नम् गाहा-५५जावडा तिसमया-हारगस्स सहमस्स पणगजीवस्स । मोगाहणा महम्ना, ओहीसिचं जहन्न तु ॥१॥ ५६ सव्व-पशु-अगणिजीवा, निरंतरं अचिर्य मरिजसु । सितं सब्यविसागं, परमोही सितनिहितो ॥२॥ ५७ अंगुलमावलियाणे, मागमसंसिज पोस संसिया। अंगुलमावलितो, भावलिया अंगुलपातं ॥३॥ ५८ हत्पम्मि मुहुचतो, दिवसंतो गाउअम्मि पोद्धम्यो। जोयण दिवसपाहतं, पसंतो पन्नवीसाओ॥४॥ ५९ मइम्मि आमासो, अंबुद्दीवाम्म साहिमो मासो। वासं घ मणुयठोप, वासपच व हयगम्मि ॥५॥ ६० संसिज्जम्मि उ काले, दीपसमक्षा वि हुँति संसिज्मा । कालाम्म असंखिये, दीवसमुदा उ मायया ॥६॥ ६१ काले घउण्ड पट्टी, कालो मामव्यु खिचपट्टीए । पडीए दव्यपज्जव, मायया सिधकाला ॥७॥ ६२ सूमो य होइ कालो, तो सम्मपरं हवा सिचं । अंगलसेठीमिचे, मोसप्पिणिमो असंखिया ॥८॥ से स पामाणये ओहिनाणं ॥ १२॥ छाया-मप किं तद् पर्वमानकमवधिज्ञानम् १ वर्धमानकमवधिज्ञाने प्रशस्तेषु अध्यवसायस्थानेषु धर्तमानस्य पर्वमानपारिवस्य विशुद्धधमानस्प विशुद्धपमानचारित्रस्य सर्पत समन्साएक- चिर्वर्धते, गापा-५५ यावती घिसमया,-प्रारकस्य सूक्ष्मस्य पनकजीवस्य । अवगाहना जघन्या, अवधिक्षेत्र जपन्यं तु ॥१॥ ५६ सर्वपाहमिजीवा', निरन्तरं पावद् मृतवन्तः । क्षेत्रं सर्वविक, परमावधि क्षेत्रनिर्दि: ॥२॥ - ३ वर्द्धमान अवधिज्ञान और उसकी क्षेत्रवृद्धि. ५७ अङ्गुलमावलिकायोः, भागमसंख्येयं द्वयोः संख्येयम् । अङ्गुलमावलिकान्तः, आवलिकामङ्गलपृथक्त्वम् ॥३॥ ५८ हस्ते मुहूर्तान्तो, दिवसान्तो गन्यूते बोद्धव्यः । योजनदिवसपृथक्त्वं, पक्षान्तः पञ्चविंशतिम् ॥४॥ ५९ भरतेऽर्द्धमासो, जम्बुद्वीपे साधिको मासः। वर्पश्च मनुष्यलोके, वर्षपृथक्त्वञ्च रुचके ॥५॥ ६० संख्येये तु काले, द्वीपसमुद्रा अपि भवन्ति संख्येयाः।। कालेऽसंख्येये, द्वीपसमुद्रास्तु भाज्याः ॥६॥ ६१ काले चतुर्णां वृद्धिः, कालो भजनीयः क्षेत्रवृद्ध्या (द्धौ)। वृद्ध्या(द्धौ) द्रव्यपर्याययोः, भाज्यौ क्षेत्रकालौ तु ॥७॥ ६२ सूक्ष्मश्च भवति कालः, ततः सूक्ष्मतरं भवति क्षेत्रम् । अङ्गुलश्रेणिमात्रे, अवसपिण्योऽसंख्येयाः॥८॥ तदेतद् वर्द्धमानकमवधिज्ञानम् ॥ सू. १२॥ टीका-शि०-वर्द्धमान अवधिज्ञानका वह स्वरूप किस प्रकार है। उ०- जो पवित्र-उत्तम विचारों में वर्तमान व वर्द्धमान चारित्रवाला है तथा परिणा- मोंकी विशुद्धिसे जिसका चरित्र विशुद्ध हो रहा है याने जो आत्मविकाशके मार्गमे प्रगति कररहा है, उसके ज्ञानकी चारों ओरसे सीमा बढती है, इसीको वर्द्धमान अवधिज्ञान कहते है। गाथार्थ-अवधिज्ञानका जघन्य क्षेत्र-जितनी तीन समयके आहारक सूक्ष्म निगोद जीवकी जघन्य अवगाहना होती है, उतना जघन्य-सबसे थोडा अवधिज्ञानका क्षेत्र है ॥१॥ अवधिज्ञानका उत्कृष्ट क्षेत्र दिखाते हैं जैसे-सर्वबहु अग्मिजीवोंने जितना क्षेत्र निरंतर भरा है याने सूक्ष्मवादररूप सर्वबहु-सबसे अधिक अग्नि- कायिक जीवोंसे विना अन्तरके चारों दिशाका जितना क्षेत्र भरा है, उतना सव दिशामे परमावधिज्ञानका क्षेत्र है, याने इतने क्षेत्रमें रहे हुए रूपी द्रव्य- मात्रको परमावधिज्ञानसे जानता है ॥२॥ अवधिज्ञानका मध्यम क्षेत्र कहते हैं.अंगुल-प्रमाणांगुल या उच्छेदां- गुल, और आवलिकाके असंख्यातवें भागको [क्षेत्र तथा कालकी दृष्टिसे अव- विज्ञानी इतने क्षेत्रको ] जानता है, तथा दोनोंमें याने आवलिका और अंगुलमें १ जैनागमप्रसिद्ध गाउयशन्दस्य पर्यायो गव्यूतशब्द' क्रोशाऽर्थेऽस्ति ।

मीमचन्वीच
गाहा-५५ जावदआ तिसमया-हारगस्स सहमस्स पणगजीवस्स ।
ओगाहणा जहमा, ओहीखिचं जहनत ॥१॥
५६ सष्य-प-अगणिजीपा, निरतर जत्तियं मरिज्जस ।
सित्तं सवदिसागं, परमोही खिचनिबिडो ॥२॥
५७ अंगुलमावलियाणं, मागमसंसिज्ज दोस संसिज्जा।
अंगुलमावलिअंतो, आवलिया अंगुलपाच ॥३॥
५८ हत्पम्मि माचतो, दिवसंतो गाउअम्मि पोम्यो।
जोयण दिवसपुरच, पक्संतो पानवीसाओ ॥४॥
५९ महम्मि अमासो, जमुदीवम्मि साहिभो मासो ।
पासं घ मणुयलोप, पासपचे च दयगम्मि ॥ ५॥
६० संसिज्मम्मि उ काले, दीपसमुदा विदुति संलिम्मा ।
कालम्मि असंखिज्जे, दीपसमझा उ मापवा ॥६॥
६१ काले पठण्ड पुत्री, फालो मामष्णु सितपुडीए ।
पजीप ष्वपज्जव, मइयव्या सित्तकाला
६२ सहमो य होइ कालो, तचो मुहमपरं हा सि ।
अंगुलसेडीमिचे, भोसप्पिणिभो अससिज्जा ॥८॥
से धामाणपं ओहिनाणे ॥ १२॥
छाया-मय कि सद् पर्वमानकमवधिज्ञानम् १ वर्षमानकमवधिज्ञानं
प्रशस्तेषु अध्यवसायस्थानेषु पर्तमानस्प पर्समानवारित्रस्य
विशुसपमानस्य विशुरुषमानपारिमस्य सर्पस' समन्तादव
धिर्वत,
गापा-५५ पावती भिसमया,-प्रारकस्य सूक्ष्मम्प पनकजीवम्य ।
अवगाहना अपन्या, अवधिक्षेत्रं जघन्य तु॥१॥
५६ सर्ववनिमीवा', निरन्तर यावद् मृतवन्त ।
क्षेत्र सर्वविक, परमावधि क्षेषनिर्दिः ॥२॥

त . . वर्द्धमान अवधिज्ञान और उसकी क्षेत्रवृद्धि ३३ ५७ अङ्गुलमावलिकायोः, भागमसंख्येयं द्वंयोः संख्येयम् । अङ्गुलमावलिकान्तः, आवलिकामङ्गुलपृथक्त्वम् ॥३॥ ५८ हस्ते मुहूर्तान्तो, दिवसान्तो गव्यूते बोद्धव्यः। योजनदिवसपृथक्त्वं, पक्षान्तः पञ्चविंशतिम् ॥४॥ ५९ भरतेऽर्द्धमासो, जम्बुद्वीपे साधिको मासः। वर्षश्च मनुष्यलोके, वर्षपृथक्त्वञ्च रुचके ॥५॥ ६० संख्येये तु काले, द्वीपसमुद्रा अपि भवन्ति संख्येयाः।। कालेऽसंख्येये, द्वीपसमुद्रास्तु भाज्याः ॥६॥ ६१ काले चतुणा वृद्धिः, कालो भजनीयः क्षेत्रवृद्ध्या (द्धौ)। वृद्ध्या(द्धौ) द्रव्यपर्याययोः, भाज्यौ क्षेत्रकालौ तु ॥७॥ ६२ सूक्ष्मश्च भवति कालः, ततः सूक्ष्मतरं भवति क्षेत्रम् । अगुलश्रेणिमात्रे, अवसपिण्योऽसंख्येयाः॥८॥ तदेतद् वर्द्धमानकमवधिज्ञानम् ॥ सू १२॥ टीका-शि०-वर्द्धमान अवधिज्ञानका वह स्वरूप किस प्रकार है ! उ०- जो पवित्र-उत्तम विचारोंमें वर्तमान व वर्द्धमान चारित्रवाला है तथा परिणा- मोंकी विशुद्धिसे जिसका चरित्र विशुद्ध हो रहा है याने जो आत्मविकाशके मार्गमें प्रगति कररहा है, उसके ज्ञानकी चारों ओरसे सीमा बढती है, इसीको वर्द्धमान अवधिज्ञान कहते हैं। गाथार्थ-अवधिज्ञानका जघन्य क्षेत्र-जितनी तीन समयके आहारक सूक्ष्म निगोद जीवकी जघन्य अवगाहना होती है, उतना जघन्य-सबसे थोडा अवधिज्ञानका क्षेत्र है ॥१॥ अवधिज्ञानका उत्कृष्ट क्षेत्र दिखाते है-जैसे-सर्वबहु अग्निजीवोंने जितना क्षेत्र निरंतर भरा है याने सूक्ष्मबादररूप सर्वबहु-सबसे अधिक अग्नि- कायिक जीवोंसे विना अन्तरके चारों दिशाका जितना क्षेत्र भरा है, उतना सब दिशामे परमावधिज्ञानका क्षेत्र है, याने इतने क्षेत्रमें रहे हुए रूपी द्रव्य- मात्रको परमावधिज्ञानसे जानता है ॥२॥ अवधिज्ञानका मध्यम क्षेत्र कहते है-अंगुल-प्रमाणांगुल या उच्छेदां- गुल, और आवलिकाके असंख्यातवें भागको [ क्षेत्र तथा कालकी दृष्टिसे अव- धिज्ञानी इतने क्षेत्रको ] जानता है, तथा दोनोंमे याने आवलिका और अंगुलमें १ जैनागमप्रसिद्ध गाउयशब्दस्य पर्यायो गन्यूतशब्द' क्रोशाऽर्थेऽस्ति ।

मीनदीस्त्रम् सम्पय माग दिसता हैमर्याद अमुलके सेम्पेय मागमाम क्षेत्रको जानता हमा मामपिकाके भी संरमेय मागतकही मानता है अंगुष्ठको देखता हुआ कुछ कम आवठिकातक मानता है यदि कालस माममिकाममाण काठको देखता है तो क्षेमसे अंगुहारस्व परिमित क्षेत्रमें देखता है ॥१॥ इस्तमाम क्षेत्रके मामनेपर काठसे अन्तर्गत प्रमाण पेसता है तथा काठसे कुछ कम एक दिवसको पेसता हुआ क्षेत्रसे पक गमतपर्यन्त अवधि शाम होता है। ऐसेही पोसमपर्यन्त क्षेप देखता हुआ काससे विवसायस्थ देखता है, व कुछ कम पक्ष पेसता हुखा क्षेत्र पचीस योगनतक खताan मरतक्षेत्रविषयक अवधिमान होनेपर काससे अर्थमासतक [भूतमपि प्यको ] अबपिहानी देखता है समुद्रीपविषयक अबधिक होनेपर साधिक- छछभषिक एकमास आगपीछे देखता है, ममुप्पक्षेत्रपरिमित अवधिक होनेपर पंक पर्पतक और सचदीपपरिमित क्षेपमें भवधिक होनेपर पर्पयत्व पाने पोसे नव वर्षतक ऐसाताne संम्पातकाल पाने हमार बर्षसे उपर भवधिक विषय होनेपर क्षेत्रसे संस्पातदीपसमम भी अवधिक विपय होते हैं और भवधिज्ञानके मम्म कासिक होनेपर द्वीपसमय भगनासे होते हैं मपाद संम्यात, असंसथात पा बिसीको दीपसमयका पकोणाही अवपिशामका विषय होता है। [अब किसी मनुप्यको मसंम्पकाविषयक भवभिशाम उस्पच होता है वर असंम्प दीपसमम उसके मानके विषय होते हैं, और जब मनुप्यक्षेत्रसे बाहरके किसी समनवमीपर्मे तिर्यचको असमयकासका भवधिज्ञान होता इतब सम्पात दीपसमय रसके मानपिपम होते हैं। स्वयम्भूरमण दीप पा स्मनके किसी तिर्यचको जब भसंम्पकासविषयक भवपिसान होता है, तब उसको उस दीप या समुदके एकदेशका ज्ञान होती असमकार क्षेत्र और कालकी परस्पर अपेक्षाको रखते हुए पर्समान अब पिका वर्णन किया अब प्रम्प क्षेत्र, कास और भावमें किसकी दिसे किसकी दि होती है य किसकी नहीं होती इस विपयको कहते हैं-कासकेगानेपर चारों की चि होती है। मेनकी वृमि कासकी ममना समसमी चाहिए, याने कमी तोकासपरता और कभी नहीं बनता है, इसप्रकार पिकस्स सम सना चाहिए, मध्य भौर पर्यामकी दिमें क्षेत्र का विकल्प करने पाहिए याने कदाचित् बढते कदापि नहीं बताया कि सेमसे मी मम्म अति सूक्ष्म एक माकाशमदेशम अमम्त स्कम्प रात है मौरमायसे भी पर्याय अत्यन्त पम Ju0॥ कौन किससे सूक्ष्म इस बातको दिखाते हैं- १ से मानसाने प्रपात ।

हीयमान व प्रतिपाति अवधिज्ञानका स्वरूप काल सूक्ष्म होता है और कालसे क्षेत्र सूक्ष्मतर याने अधिक सूक्ष्म होता है; एक प्रमाण अंगुलमात्र क्षेत्रकी श्रेणिमें श्रेणिरूपसे प्रत्येक क्षेत्रप्रदेशको समयकी गणनासे गिना जाय तो असंख्य अवसर्पिणी पूरी हो जाती हैं [ एक प्रमाणांगुलमात्र श्रेणिके आकाशखण्डमे अवसर्पिणीके जितने समय है उतने प्रमाणमे असंख्य आकाश-प्रदेश होते हैं अर्थात् एकसौ उत्पलपत्रके भेदनमें प्रत्येक पत्रके पीछे असंख्य समय लगते हैं, अतः काल सूक्ष्म है, कालसे क्षेत्र असंख्यगुण अधिक सूक्ष्म है, क्षेत्रसे भी द्रव्य अनन्तगुण और द्रव्यसे भी अवधिज्ञान-विषयक पर्याये संख्यातगुण या असंख्यगुण अधिक सूक्ष्म होती है ]॥८॥ यह वर्द्धमान अवधिज्ञानका वर्णन पूर्ण हुआ ॥ सू १२ ॥ मूल-से किं तं हीयमाणयं ओहिनाणं ? हीयमाणयं ओहिनाणं अप्प- सत्थेहिं अज्झवसायट्ठाणेहिं वट्टमाणस्स वट्टमाणचरित्तस्स संकि- लिस्समाणस्स संकिलिस्समाणचरित्तस्स सवओ समंता ओही परिहायइ, से तं हीयमाणयं ओहिनाणं ॥ सू. १३॥ छाया-अथ किं तद्धीयमानकमवधिज्ञानं ? हीयमानकमवधिज्ञानम्- अप्रशस्तेष्वध्यवसायस्थानेषु वर्तमानस्य वर्तमानचारित्रस्य संक्तिश्यमानस्य संक्तिश्यमानचारित्रस्य सर्वतः समन्तादवधिः परिहीयते, तदेतद्धीयमानकमवधिज्ञानम् ॥ सू १३ ॥ टीका-शि०-वह हीयमान अवधिज्ञान कौनसा है ? उ०-अप्रशस्त-अशुभ विचारस्थानोंमे वर्तमान साधु जव संक्लिश्यमान अर्थात् अशुभ विचारोंसे शुभ परिणामके मलिन होनेपर संक्लिश्यमान चारित्रवाला होता है उस समय चारों ओरसे उसके ज्ञानकी अवधि हीन होती है, इसीको हीयमान अवधिज्ञान कहते है । सू.१३॥ मूल-से किं तं पडिवाइ ओहिनाणं ? पडिवाइ ओहिनाणं जहण्णेणं अंगुलस्स असंखिज्जइभागं वा, संखिज्जइभागं वा, बालग्गं वा, बालग्गपुहुत्तं वा, लिक्खं वा, लिक्खपुहुत्तं वा, जूयं वा, जूय- पुहुत्तं वा, जवं वा, जवपुहुत्तं वा, अंगुलं वा, अंगुलपुहुत्तं वा, पायं वा, पायपुहुत्तं वा, विहत्थिं वा, विहत्थिपुहुत्तं वा, रयणि वा, रयणिपुहुत्तं वा, कुच्छि वा, कुच्छिपुहुत्तं वा, धणुं वा, धणुपुहुत्तं वा, गाउयं वा, गाउयपुहुत्तं वा, जोयणं वा, जोयण- १ भीगन्दीस्त्रम् पाच वा, जोअणसर्व वा, जोपणसयपत्तं वा, जोयणसहस्स पा, जोयणसहस्सपूढचं था, जोयणलसं वा, जोयणलपतपूर्व पा, [जोयणकोरिया, जोयणकोरिपर वा, जोयणकोगकोरि पा, जोयणकोगकोरिपूरचं पा, ओमणसंसिज्ज वा, जोअण- संखिज्जपूतं पा, ओमणमसंसेज्ज पा, जोभणअसंखेज्जपूरच पा, उक्कोसेणं लोग वा पासिसाणं परिवइज्जा, से में परिवार ओहिनाणं ॥ १४॥ छाया-अप किं तत्पतिपाति-अवपिक्षानं १ प्रतिपाति-अवधिज्ञानं जघन्येनाऽमुलस्याऽसंस्पेयमागं वा, संख्येयमार्ग वा, बालान घा, पालाप्रपृथक्त्वं पा, शिक्षा पा, लिक्षापृथक्त्वं पा, यूको पा, यूकापृयक्त्वं पा, पर्वधा, यवपृथकूत्वं वा, अमुल वाघुल प्रपक्वं वा, पाई वा, पावपक्वं वा, वितस्ति वा, वितस्ति पृथक्त्वं वा, रनि वा, रस्निपूपत्वं पा, कुर्तिवा, कुक्षिप्रपक्व पा, धनुर्वा धन पृथकत्वं पा, गम्पूतं वा गम्पूसस्यत्वं वा, योजनं वा, योजनपथक्वं वा, पोजनशतं वा, योजनशत प्रपक्वं वा, पोजनसहर्ष वा, योजनसहसपुपकूत्वं वा, योजन- लक्ष पा, योजनलक्षपक्वं वा, [पोजनकोटि पा, योजनफोटि- पुषकत्वं वा, योगनकोटीफोर्टि पा, योजनकोटीकोटिपृथकूत्वं वा, योजनसंस्पेयं था, योजनसंख्येयपृथक्त्वं पा, योजनाऽसंस्थैर्य वा, पोमनाऽसस्पेयपृथक्त्वं वा, ] उत्कर्पण लोकं वा हवा प्रतिपतेस, तदेतस्प्रतिपात्यवधिज्ञानम् ॥ स. १४॥ टीका-शि-पहमतिपाति भवपिज्ञान किसमकार! 10-अमन्य अंगु उका मसम्पमाम पा सम्पातमान पासप वा पासामध्यवस्थ, सीस भयपा टीसापत्य पूका(पू) पा पुकामपाइप, जब वा जमायलय, अमुक मयमा भेगुसायकल पौव भपवारसे पोर परिमित सेब, वितस्ति (बत) या यितस्ति-प्रपझस्व नि(पाप)वा इस्तश्यमस्व,फसि-पोदाय या कृतिपयनत्य अनुप पा पनुपापात्प, काश या कायमस्व, योगन या पोगनपाव पातयोमम पा पातयोगमपुपाय, योगमसाम पा पोजनसमापदत्य, होमे मान्न संसाने पास। , अप्रतिपाति अवधिज्ञान और द्रव्य क्षेत्र आदि ४ भेदसे उपसंहार ३७ योजनलक्ष वा योजनलक्षपृथक्त्व, यावत् संख्यात, असंख्यात वा उत्कृष्ट सम्पूर्ण लोकको देखकर जो फिर गिरजाता है वह प्रतिपाति अवधिज्ञान है ॥ सू. १४ ॥ मूल-से किं तं अपडिवाइ ओहिनाण ? अपडिवाइ ओहिनाणं जेणं अलोगस्स एगमवि आगासपएसं जाणइ पासइ तेण परं अपडि- वाइ ओहिनाणं, से तं अपडिवाइ ओहिनाणं ॥ सू १५॥ छाया-अथ किं तदप्रतिपात्यवधिज्ञानम् ? अप्रतिपात्यवधिज्ञानं येनाs- लोकस्यैकमप्याकाशप्रदेशं जानाति पश्यति तेन परमप्रतिपात्य- वधिज्ञानं, तदेतदप्रतिपात्यवधिज्ञानम् ॥ सू. १५॥ टीका--वह अप्रतिपाति अवधिज्ञान कौनसा है ? उ०--अप्रतिपाति अवधिज्ञान-जिस अवधिज्ञानसे आत्मा अलोकके एक भी आकाश-प्रदेशको जानता व देखता है, उसके बाद वह अप्रतिपाति अवधिज्ञान होता है । यह अप्रतिपाति अवधिज्ञान पूर्ण हुआ ॥ सू १५ ॥ मूल-तं समासओ चउन्विहं पण्णत्तं, तंजहा-दवओ, खित्तओ, कालओ, भावओ, तत्थ दवओ णं ओहिनाणी जहन्नेणं अणं- ताई रूविदव्वाइं जाणइ पासइ, उक्कोसेणं सव्वाइं रूविदवाई जाणइ पासइ । खित्तओ णं ओहिनाणी जहन्नेणं अंगुलस्स असंखिज्जइभागं जाणइ पासइ, उक्कोसेणं असंखिज्जाइं अलोगे लोगप्पमाणमित्ताइं खंडाइं जाणइ पासइ। कालओ णं ओहि- नाणी जहन्नेणं आवलिआए असंखिज्जइभागं जाणइ पासइ, उक्कोसेणं असंखिज्जाओ उस्सप्पिणीओ अवसप्पिणीओ अईयमणागयं च कालं जाणइ पासइ । भावओ णं ओहिनाणी जहन्नेणं अणते भावे जाणइ पासइ, उक्कोसेण वि अणते भावे जाणइ पासइ, सन्वभावाणमणंतभागं जाणइ पासइ ॥सू १६॥ छाया-तत्समासतश्चतुर्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-द्रव्यतः, क्षेत्रतः, कालतो भावतः, तत्र द्रव्यतः (नु) अवधिज्ञानी जघन्येनानन्तानि रूपिद्रव्याणि जानाति पश्यति, उत्कर्षेण सर्वाणि रूपिद्व्याणि जानाति पश्यति। क्षेत्रतोऽवधिज्ञानी जघन्येनाङ्गुलस्याऽसंख्येय- भीमन्दीरमम् मार्ग जानाति पश्पति, उत्कर्पणाऽसंस्येयान्यलोके लोकप्रमाण- मावाणि सणानि जानाति पश्यसि।कालतोऽवविज्ञानी जयन्ये नाऽऽवलिकाया असंम्पेयमार्ग जानाति पश्यति, उत्कणा- संस्पेया उत्सर्पिणीरवसर्पिणी-अतीतमनागतच कालं जानाति पश्यति । भावतोऽवधिज्ञानी अपन्नाऽनन्तान् भावान जानाति पश्यति, उत्कर्पणाऽपि-अनन्तान् मावान् जानाति पश्यति, सर्वमावानामनन्तमार्ग जानाति पश्यति ॥ १६॥ टीका--पूर्वोक वदभवपिडाम संमपसे चार प्रकारका हामवा है, जैसे- मध्य (१) क्षेत्र (२) काठ (१) और भाष (8) उन चार मेदोंमें मम्पसे अवभिधानी बपन्य-कमसेकम भनम्त रूपी म्योको जानता व देखता है भीर उस समी बपी मम्पोको जानता व देखता है। क्षेत्रसे अवापिसानी जपम्प अंगुलके असंख्यातमागमा क्षेत्रको जामता देखता सकसे सोकजितने भमाणके असमयसंगको असोकमैं जानता मौरसता है।कामसे भवभिहानी जपम्प मानसिका असंभपभाममात्र काहकी बात मानता देखता है, उसका असमय उवसर्पिणी और अवसर्पिणी रूप भतीत मनामत [ मूत-मविप्य] कासको जानता प पेसता है, भाषसे अबाधिज्ञामी अनन्य बनम्तमावोंको जामता देखता है और उससे भी मनम्तमानों [ पर्याय मागि] को जानता वसता है, सव मावोंके अमम्त भानको नानता देखता है। स् १५॥ मूल-गाहा-५३ मोदी भवपच्यामो, गुणपञ्चामो य पण्णिो दुविहो । सस्स य बहूविगप्पा, दम्वे खिचे अ काले य ॥१॥ ६४ नेण्यदेवतित्पकरा य, ओहिस्सऽमाहिरा ईप्ति । पासंति सवओ साल सेसा वेसेण पार्सति ॥२॥ से ओहिनाणपग्पक्स। छाया-गामा-६३ भवधिर्मवपत्पयिको,-गुणपत्पपिकम वर्णितो विविध । तस्य च बहुविकल्पा, दम्ये क्षेत्रे च फाठे च ॥१॥ ६४ नैरपिकदेवतीपकराम, अवधेरवाया मवन्ति, पश्यन्ति सर्वत' सल, शेपा पेशेन पश्यन्ति ॥२॥ सदेतवधिज्ञानप्रत्यक्षम् ।

मनापर्यवज्ञानके आधिकारी ३९ टीका--पूर्वोक्त वर्णनका संग्रहगाथासे उपसंहार कहते हैं-भवप्रत्ययिक और गुणप्रत्ययिक इसप्रकार अवधिज्ञान दो प्रकारका वर्णन किया गया है, द्रव्य क्षेत्र और कालके सम्बन्धसे उसके बहुत विकल्प होते हैं ॥१॥ नैरयिक जीव देव और तीर्थकर अवधिज्ञानके अबाह्य होते हैं अर्थात् इनको नियमसे अव. धिज्ञान होता है और ये निश्चय सभी ओरसे देखते हैं, शेष जीव एकदेशसे देखते हैं ॥ २॥ इसप्रकार यह अवधिज्ञान-प्रत्यक्षका वर्णन हुआ। मूल-से किं तं मणपज्जवनाणं ? मणपज्जवनाणे णं भंते ! किं मणु- स्साणं उप्पज्जइ अमणुस्साणं ? गोयमा ! मणुस्साणं नो अमणुस्साणं । छाया-अथ किं तन्मनःपर्यवज्ञानं ? मनःपर्यवज्ञानं नु भदन्त ! किं मनुष्याणामुत्पद्यते, अमनुष्याणां [वा] ? गौतम ! मनुष्याणां नो अमनुष्याणाम् । टीका-शि०-गुरुजी। वह मनःपर्यवज्ञान कौनसा है ! मनःपर्यवज्ञान क्या मनुष्योंको उत्पन्न होता है या अमनुष्योंको याने मनुष्यभिन्न देव नारक तिर्यञ्चोंको ? उ०-गौतम ! यह ज्ञान मनुष्योंकोही होता है, अमनुष्योंको नहीं। मूल-जइमणुस्साणं किं संमुच्छिममणुस्साणं गब्भवक्कंतियमणुस्साणं?, गोयमा ! नो संमुच्छिममणुस्साणं गब्भवक्कंतियमणुस्साणं उप्पज्जा। छाया-यदि मनुष्याणां किं सम्मछिममनुष्याणां गर्भव्युत्क्रान्तिकमनु- घ्याणां [वा] उत्पद्यते ? गौतम ! नो सम्मूछिममनुष्याणां गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणामुत्पद्यते । टीका-यदि मनुष्योंको उत्पन्न होता है तो क्या सम्मूर्छिम मनुष्योंको उत्पन्न होता है या गर्भज मनुष्योंको ? गौतम ! सम्मूछिम मनुष्योंको नहीं किन्तु गर्भज मनुष्योंकोही उत्पन्न होता है। मूल-जइ गम्भवक्कंतियमणुस्साणं किं कम्मभूमिय-गब्भवक्कंतिय- मणुस्साणं, अकम्मभूमिय-गब्भवक्कंतियमणुस्साणं, अंतर- १ गर्मसे उत्पन्न १०१ क्षेत्रके मनुष्योंके मलमूत्र आदि १४ स्थानों में सम्मूर्छनरूपसे पैदा होनेवाले मनुष्योंको सम्मूर्छिम-मनुष्य कहते हैं, इनका शरीर अगुलके असंख्य भागका होता है और अतर्मुहूर्तके बहुत थोडे समयमें ये मर जाते हैं । देखें । टिप्पण । - BO - भीमन्दीसूत्रम् पीवग-गम्भवक्कतियमणुस्सार १, गोयमा ! फम्मभूमिय- गम्मषस्फतियमणुस्साणं, नो भकम्मममिय-गम्भपस्कतिय- मणुस्साणं, नो अंतरदीवग-गमवक्कतिपमणुस्साणे । छाया-पदि गर्मपुकान्तिकमनुप्पाणां किं कर्मभूमिजगर्मपुकान्तिक मनुष्याणाम्, अकर्मभूमिज-गर्मयुरक्रान्तिकमनुष्याणाम्, अन्त पिज-गर्मष्पुस्कान्तिफमनुष्याणाम् !, गौतम ! कर्ममूमिज- गर्मम्पुकान्तिक-मनुष्याणां, नो अकर्ममूमिज-गर्मग्युस्क्रान्तिक- मनुष्याणा, नो अनसीपम-गर्मग्युस्कान्तिकमनुप्याणाम् । टीका-अगर गर्मावकान्त मनुष्यों को होता है तो क्या कर्मभूमिज- गर्भावकान्त मदुप्पोको या अकर्मभूमिग-गर्मायकान्त मनुष्योंको अपना अम्सखीपके मविकान्त ममुप्पोको होता है। गीतमा कर्मसुमिन-मर्मावकात मनुम्पोको होता किन्तु अकर्मभूमि वा अंतणीप गर्भन मनुष्योंको यह मममर्मयासान नहीं होता है। मूलमा कम्मभूमिप गम्मपतियमणुस्साणे, किं संसिम्जवासाउ -कम्मभूमिय-गम्भवतियमणुस्साणं असखिज्जवासाउप- कम्ममूमिय-गम्भवतियमणुस्साणं ! गोपमा ! मसेज्जवासा उप-कम्ममूमिय-गरमवातियमणुस्साण, नो असंसेजवा साउप-कम्ममूमिय-गम्मवाप्तियमणुस्साण । छापा-यदि कर्मभूमिज-गर्मम्युत्कान्तिकमनुष्याणां, किं संस्पेयवर्षा पुष्क-कर्ममूमिज-गर्मपुकान्तिकमनुप्पाणाम् , भसख्येयवर्पा- पुष्क-कर्मभूमिग-गर्मम्मुक्कान्तिकमनुष्याणाम् ? गौतम 1 सस्येयवर्षायुक-फर्ममूमिज-गर्मष्युकान्तिकमनुप्पाणां, मो भर्सस्पेयवर्घायुष्क-कर्मभूमिज-गर्मभ्युकान्तिकमनुम्याणाम् । टीवा-ममरकर्मभूमि पर्मन मखप्पोको हाता है तो मा सम्पात बर्षकी भारपाको होता है पा अस्पातनची मागवाहोको गौतम । सम्पातवर्षकी मापुपाडेको होता है किन्त असंम्बात्तवर्षकी आमुचाकी नहीं होता।

मनापर्यवज्ञानका अधिकारी ४१ मूल-जइ संखेज्जवासाउय-कम्मभूमिय-गम्भवक्कंतियमणुस्साणं, किं पज्जत्तग-संखेजवासाउय-कम्मभूमिय-गब्भवक्कंतियमणु- स्साणं, अपज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूमिय-गम्भवक्कं- तियमणुस्साणं ? गोयमा! पज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्म- भूमिय-गब्भवक्कंतियमणुस्साणं, नो अपज्जत्तग-संखेज्ज- वासाउय-कम्मभूमिय-गब्भवक्कंतियमणुस्साणं । छाया-यदि संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणां, किं पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्या- णाम्, अपर्याप्तक-संख्येयवयुक-कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रान्तिक- मनुष्याणाम् ? गौतम ! पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज- गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणां, नो अपर्याप्तक-संख्येयवर्पायुष्क- कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणाम् । टीका-यदि संख्यातवर्षकी आयुवाले कर्मभूमिज गर्भज मनुष्योंको मनः पर्यवज्ञान होता है तो क्या पर्याप्तकको होता है या अपर्याप्तकको ! गौतम ! पर्याप्तकको होता है अपर्याप्तकको नहीं होता है। , मूल-जइ पज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूमिय-गम्भवक्कंतियमणु- स्साणं, किं सम्मदिट्ठि-पज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्म- भूमिय-गब्भवक्कंतियमणुस्साणं, मिच्छदिद्वि-पज्जत्तग-संखेज्ज- वासाउय-कम्मभूभिय-गन्भवतियमणुस्साणं, सम्मामिच्छदि- द्वि-पज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूमिय-गब्भवक्कंतियमणु- स्साणं ? गोयमा ! सम्मदिद्वि-पज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्म- भूमिय-गब्भवक्कंतियमणुस्साणं, नो मिच्छदिदि-पज्जत्तग-संखे- ज्जवासाउय-कम्मभूमिय-गन्भवक्कंतियमणुस्साणं, नोसम्मा- मिच्छदिट्ठि-पज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूमिय-गब्भव- क्कंतियमणुस्साणं । -- १ सम्ममिच्छ इति पाठान्तरम् । ६ भीमबन्दीयम् छापा पनि पर्याप्तक-संस्येयवर्पायुप्फ-कर्ममूमिज-गर्भम्पुकान्तिकमनु- प्याणां, किं सम्यगनुष्टि-पर्याप्तक-संस्पेयवर्षायुक-कर्मभूमिन गर्मभ्युत्कान्तिफमनुष्याणां, मिथ्याटि-पर्याप्तक-संस्पेपवर्षायुप्क कर्मभूमिज-गर्मव्युत्क्रान्तिकमनुप्पाणां, सम्पमिच्याइटि-पर्या- तक-संस्येयवर्षायुप्फ कर्ममूमिम-गर्मव्युकान्तिकमनुष्याणाम् ? गौतम ! सम्पग्दरि पर्याप्तक-संस्पेयवर्षायुप्फ कर्ममूमिम-गर्म व्युत्क्रान्तिफमनुष्याणाम् [ उत्पद्यते ], नो मिथ्यादहि-पर्या- तक-संस्पेयवर्पायुप्क-कर्ममूमिज-गर्मव्युत्क्कान्तिकमनुष्याणाम् , नो सम्पमिथ्यावष्टि-पर्याप्तक-संस्पेयवर्षायुष्क-कर्मभूमिग- गर्मष्युकान्तिकमनुष्याणाम् । टीका-अमर पूर्वकथित पर्याप्त मनुम्यको होता है तो क्या सम्पाटि पर्याप्त संस्पेयापक कर्मभूमि ममम ममुप्यको होतापा मिप्यारति पर्याप्त संम्पेपगगुप्फ कर्मभूमिग मर्मव्युत्क्रान्तिकोंको होता है अपवा मिमी पर्याप्त संम्पपवर्षापुक कर्मभूमिम गर्मम मनुष्योंको होता है।मौतम । सम्म गाप्ति पर्याप्त संम्पेयवर्षायुष्का कर्मभूमिग मर्मग मनुष्यको होता है कि मिप्यारति मिभरति पर्याप्त संम्पेयवर्षायुफ कर्मभूमिग मर्मस मनुवाको मही होता है। मूल-मा सम्मविहि-पञ्चत्तग-संखेजवासाठय-कम्मभूमिय-गम्म- पक्कतिपमणुस्साणं [उप्पई], किं सजय-सम्मविछि- पञ्जचग-संसेज्जवासाउय-कम्ममूमिय-गम्भवफ्कंतियमणुस्सा- ण, भसंजय-सम्मविद्धि-पजचग-सैलेजवासाउप-कम्मभूमिफ- गम्भवस्कतिपमणुस्सार्ण, संजपासंजय सम्मविद्धि-पजचग- संसेज्जवासाउय-कम्ममूमिय-गग्मपतियमणुस्साणं ? गोपमा! सजय-सम्मदिछि-पजचग-संखेनवासाउप-फम्ममूमिय-गाम- वक्कतियमणुस्साण, नो असंगप-सम्मविधि-पवलग-लेज वासाउय-कम्मभूमिय-गम्मपक्कतियमणुस्साणे, मो संजपार्स- जय-सम्मविहि-पाचग-संतेजवासाउयकम्ममूमिप - गम्मक कतियमणुस्साण।

मनापर्यवज्ञानका अधिकारी . , छाया-यदि सम्यग्दृष्टि-पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रा- न्तिकमनुष्याणां, किं संयत-सम्यग्दृष्टि-पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क- कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणाम् , असंयत-सम्यग्दृष्टि- पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणां, संयताऽसंयत-सम्यग्दृष्टि-पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज- गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणाम् ? गौतम ! संयत-सम्यग्दृष्टि-पर्या- तक-संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणां, नो असंयत-सम्यग्दृष्टि-पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज-गर्भव्यु- स्क्रान्तिकमनुष्याणां, नो संयताऽसंयत-सम्यग्दृष्टि-पर्याप्तक- संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणाम् । टीका--अगर सम्यग्दृष्टि पर्याप्त संख्येयवर्षायुष्क कर्मभूमि गर्भज मनु- ष्यको यह ज्ञान होता है तो क्या संयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त संख्येयवर्षायुष्क गर्भज मनुष्यको होता है ? या असंयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त संख्येयवर्षायुष्क गर्भज मनुष्यको अथवा संयतासंयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त संख्येयवर्षायुष्क गर्भज मनुष्यको होता है ? गौतम ! पूर्वोक्त ज्ञान संयत (साधु) सम्यग्दृष्टि पर्याप्त संख्येयवर्षायुष्क गर्भज मनुष्यको होता है, असंयत या संयतासंयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त संख्येयवर्षायुष्क कर्मभूमिज गर्भज मनुष्योंको नहीं होता। मूल-जइ संजय-सम्मदिद्वि-पज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूमिय- गब्भवक्कंतियमणुस्साणं [उप्पज्जई ], किं पमत्तसंजय-सम्म- दिट्टि-पज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूमिय-गब्भवक्कंतिय- मणुस्साणं, अपमत्तसंजय-सम्मदिवि-पज्जत्तग-संखेज्जवासा- उय-कम्मभूमिय-गम्भवक्कंतियमणुस्साणं ?) गोयमा ! अप- मत्तसंजय-सम्मदिद्वि-पज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूमिय- गम्भवक्कंतियमणुस्साणं, नो पमत्तसंजय-सम्मदिट्ठि-पज्जत्तग- संखेज्जवासाउय-कम्मभूमिय-गम्भवक्कंतियमणुस्साणं । छाया यदि संयतसम्यग्दृष्टि-पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज- गर्मव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणाम् [उत्पद्यते], किं प्रमत्तसंयत-सम्य- ग्दृष्टि-पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क-कर्मभूमिज-गर्भव्युत्क्रान्तिकमनु- घ्याणाम्, अप्रमत्तसंयत-सम्यग्दृष्टि-पर्याप्तक-संख्येयवर्षायुष्क- 88 भीमबन्दीमम् कर्मभूमिज-गर्मव्युस्कान्तिकमनुप्पाणाम् ! गौतम ! अप्रमत्तसं- यत सम्यग्दृष्टि-पर्याप्तक-संख्येयवायुष्क-कर्मभूमिज गर्भष्पुका- सिकमनुष्याणां, नो प्रमचसंयत-सम्परहष्ठि-पर्याप्तक-संम्पेय- वर्षायुप्क-फर्ममूमिज-गर्मव्युक्तान्तिकमनुष्याणाम् । सीका-अगर सापओंको होता है तो क्या प्रमत्तसंयत (साम)को होता है, या अपमससेयत (सा) को गौतमा यह मान अपमत्सयत (सा- को होता है ममत्त साइको नहीं होता। मूल-जइ अपमचसंजय-सम्मदिद्धि-पज्जत्तग-संखेनवासाउप- कम्ममूमिय-गम्भवक्कतिपमणुस्साणे, किं डीपत्त-अपमच संजय-सम्मदिद्वि-पग्मचग-ससेजवासाउप-कम्मभूमिय- गम्मवस्कतियमणुस्साण, अणिडीपत्त-अपमधर्ममय-सम्मवि- छि-पजग-संखेज्नवासाउप-कम्ममूमिय-गम्भवस्कतिप- मणुस्साणं ? गोपमा ! डीपत्त-अपमत्चसमय-सम्मविधि- पज्जत्तग-संखेज्जवासाउप-कम्ममूमिय-गम्मवक्कतिपमणुस्सा णे, नो अणिडीपत्त-अपमचसंजय-सम्मदिदि-फजलग-संसे ज्जवासाउप-कम्मभूमिय-गम्मवस्कतियमणुस्साण मणपज्जक- नाणं समुप्पज्जा ॥ सू १७ ॥ छाया-पदि अममचसंपत-सम्पष्टि-पर्याप्तक-संस्पेयवर्षापुष्क-कर्मम् मिज-गर्भष्युस्कान्तिकमनुष्याणां, किं ऋद्धिमाप्ताऽप्रमत्तसंपत- सम्पदाधि-पर्याप्तक-संस्पेयवर्पायुष्क-कर्मभूमिज-गर्मम्युका न्तिकमनुष्याणाम्, अनुद्धिमाप्ताऽसमचर्सयत-सम्पति-पर्या- पक-संस्पेयवर्पायुम्क-कर्मभूमि-गर्मम्पुकान्तिकमनुष्याणाम् ? गौतम ! सिमाप्ताऽममत्तसंयत सम्यगहासि-पर्याप्तक-सस्पेयवर्षा- पुष्क-कर्ममूमिज-गर्मम्पुक्कान्तिकमनुष्याणां, नो अनुन्द्रिमाप्ता प्रमत्तसयत-सम्यगा-पर्याप्तक-संस्पेयवर्पापुष्क-कर्मभूमिज- गर्म पुकान्तिकमनुप्पार्णा मन पर्यवज्ञानं समुत्पते ॥ १७॥ टीका-यदि आपमत्त संयतको पहचान पैदा होता है तो क्या मदि भात अप्रमच सायको होतापा भाग्रिमात हरिपन्य अपमत्त सापको - मनःपर्यवज्ञानके प्रकार और उसकी शक्ति ४५ , होता है ? गौतम ! ऋद्धि-आमोषध्यादि शक्ति प्राप्त अप्रमत्त संयतकोही मन पर्यवज्ञान होता है, ऋद्धिशून्य अप्रमत्त साधुओंको यह ज्ञान उत्पन्न नहीं होता [ मनोवर्गणासे गृहीत मनोयोग्य पुद्गलोंका आश्रयण-अवलम्बन लेकर मान- सिक भावोंको जानना इसको मनः पर्यवज्ञान कहते हैं ] ॥ सू. १७ ॥ मनापर्यवज्ञानके प्रकार- मूल- तं च दुविहं उप्पज्जइ, तं जहा-उज्जुमई य विउलमई य, तं समा- सओ चउविहं पन्नत्तं,तं जहा-दव्वओ, खित्तओ, कालओ, भाव- ओ, तत्थ दवओणं उज्जुमई अणंते अणंतपएसिए खंधे जाणइ पासइ, ते चेव विउलमई अब्भहियतराए विउलतराए विसुद्ध- तराए वितिमिरतराए जाणइ पासइ। खित्तओणं उज्जुमई य जह- नेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं, उक्कोसेणं अहे जाव इमीसे रयणप्पभाए पुढ़वीए उवरिमहेडिल्ले खुड्डगपयरे, उड्ढे जाव जोइ- सस्स उवरिमतले, तिरियं जाव अंतोमणुस्सखित्ते अड्डाइजेसु दीवसमुद्देसु पन्नरससु कम्मभूमिसु तिसाए अकम्मभूमिसु छप्पन्नाए अंतरदीवगेसु सन्निपंचिंदियाणं पज्जत्तयाणं मणोगए भावे जाणइ पासइ, तं चेव विउलमई अड्डाइज्जेहिमंगुलेहिं अब्भहियतरं विउलतरं विसुद्धतरं वितिमिरतरागं खेत्तं जाणइ पासइ। कालओ । णं उज्जुमई जहन्नेणं पलिओवमस्स असंखिज्जइभागं उक्को- सेणावि पलिओवमस्स असंखिज्जय भागं अतीयमणागयं वा कालं जाणइ पासइ, तं चेव विउलमई अन्भहियतरागं विउल- तरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं (कालं) जाणइ पासइ । भावओ ण उज्जुमई अणते भावे जाणइ पासइ, सवभावाणं अणंतभागं जाणइ पासइ, तं चेव विउलमई अब्भहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं (भाव) जाणइ पासइ। गाहा-६५ मणपज्जवनाणं पुण, जणमणपरिचिंतिअत्थपागडणं । माणुसखित्तनिबद्धं, गुणपञ्चइअं चरित्तवओ ॥१॥ से तं मणपज्जवनाणं ॥ सू १८॥ छाया-तच्च द्विविधमुत्पद्यते, तद्यथा-ऋजुमतिश्च विपुलमतिश्च, तत समासतश्चतुर्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-द्रव्यतः, क्षेत्रतः, कालतो भावतः, तत्र द्रव्यतो नु ऋजुमतिरनन्तान् अनन्तप्रदेशिकान् भीमचनीसूमम् स्कन्धान जानाति पश्यति, सान् चैव विपुलमतिरम्पधिकतरान् विपुछतरान् विशुद्धतरफान् वितिमिरतरकान् जानाति पश्यति। क्षेत्रतो नु मुमतिम जघन्नाजस्ठस्पाऽसस्पेयमागम्, उत्क- घेणाऽधो यावस्या रत्नप्रभाया' पृपिण्या उपरितनानधस्त- नान् कमतरान्, ऊर्य यावज्योतिप्कस्योपरितनातलम् , तिर्यग्यापदन्तोमनुष्यक्षेने-अतृतीयप, दीपसमझेप, पत्र पशसु फर्मभूमिपु, प्रिंशवकर्ममूमिपु, पदपंचाशवन्तदीपषु, संक्षिपन्द्रियाणां पर्याप्तकानां मनोगतान् भावान् जानाति पश्यति, तथैव विपुलमतिरसतीयरगुस्लैरम्यधिकतरं विपुलतरं विश्वप्तरं वितिमिरतर क्षेत्रं जानाति पश्यति । फालतो न जु मसिर्जघन्येन पस्योपमस्याऽमस्पेयमागमुत्कर्षणाऽपि फ्ल्यो पमस्याऽसंस्येयभागमतीतमनागतं वा फालं जानाति पश्यति, तवैव विपुलमतिरम्पधिकतरक विपुलतरक विशुद्धतरक वितिमिरतरकं (काल) जानाति पश्यति । मावतो नु मजुमति- रनन्तान् भावान जानाति पश्यति, सर्वमावानामनन्तमार्ग जानाति पश्यति सचैव विपुलमतिरम्यधिकतर विपुलतरक विशुद्धतरक वितिमिरतरकं जानाति पश्यति । गापा-६५ मन पर्यवज्ञान पुन, जनमन परिचिन्तितार्थप्रकटनम् । मानुपक्षेषनिपचं, गणमस्पयिक परिप्रवत ॥१॥ सदेतन्मन पर्यवज्ञानम् ॥ ८.१८॥ टीका-और षहमम-पर्यवसान दोपकारका उत्पादोता है जैसे माहमति श्रीर बिपुरुमति दोनों प्रकारवाला बद ममन्पर्यवहान संक्षिपसे चार प्रकारका कहा गया है जिसे सम्म (१) क्षेत्र () काल (१) और भाव (8)से इनमें भव्यकी अपेक्षास मनुमति अनम्तमोती अनन्त स्कोको जामता रेखता भीर रसीको पिपुसमति कुछ अधिक विपुल श्रीर गिराया म पकारीत मामता पोलता है। समसे महमति अपम्प अगुतो मसरुपातमाम भीर महा मी-रस निममाएप्पीके उपरी मामके नीचेणे प्रततकमानता है, उपर फ्योतिक बिमानके रपरी तठपर्पन्त तथा तिर्यद-मगुप्यक्षेत्रके भीतर मरानीपसमपर्यन्त पामे पन्द्रह फर्ममामि तीस मार्मामि और एप्पन भन्सपीपर्पोम पे हुए सही पपेन्द्रिय पर्याप्त सीबोरे मनोयत मायाँको जानता पपेराता है और विपुखमात उसीको भर्ग अंगुल भाषिक रिपुट वियर केवलज्ञानके भवस्थ आदि प्रकार , तथा अन्धकाररहित क्षेत्रकी दृष्टिसे जानता व देखता है। कालसे ऋजुमति जघन्य और उत्कृष्ट से भी पल्योपमके असंख्यातवाँ भाग भूत व भविष्यकालको जानता देखता है, और विपुलमति उसीको कुछ अधिक विस्तारयुक्त तथा विशुद्ध जानता व देखता है। भावसे ऋजुमति अनन्त भावोंको जानता देखता है, (विशेष स्पष्ट-) सभी भावोंके अनन्तवें भागको जानता देखता है, और विपुलमति उसीको कुछ अतिविस्तीर्ण तथा विशुद्धतर जानता व देखता है। उपसंहार-गाथार्थ-६५ मनःपर्यवज्ञान सभी जीवोंके मनमें सोचे हुए अर्थको प्रकट करनेवाला है, और मनुष्यक्षेत्रमें सीमित तथा चारित्रयुक्त साधुके क्षयोपशम गुणसे उत्पन्न होनेवाला है । इसप्रकार मनःपर्यवज्ञानका वर्णन हुआ ॥सू १८॥ मूल-से किं तं केवलनाणं ? केवलनाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा- भवत्थकेवलनाणं च सिद्धकेवलनाणं च । छाया-अथ किं तत् केवलज्ञानम् ? केवलज्ञानं द्विविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा- भवस्थकेवलज्ञानश्च सिद्धकेवलज्ञानश्च । टीका-चह केवलज्ञान किस प्रकार है ? केवलज्ञान दो प्रकारका कहा गया है, जैसे-भवस्थकेवलज्ञान और सिद्धकेवलज्ञान । मूल-से किं तं भवत्थकेवलनाणं? भवत्थकेवलनाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-सजोगिभवत्थकेवलनाणं च अजोगिभवत्थकेवलनाणं च। छाया-अथ किं तद् भवस्थकेवलज्ञानम् ? भवस्थकेवलज्ञानं द्विविधं प्रज्ञ- तम्, तद्यथा-सयोगिभवस्थकेवलज्ञानञ्च, अयोगिभवस्थकेवल- ज्ञानञ्च। टीका-वह भवस्थ केवलज्ञान कौनसा है ? उ०- भवस्थ केवलज्ञान (संसारमें रहे हुए अर्हन्तोंका केवलज्ञान) दो प्रकारका कहा गया है, जैसे- सयोगिभवस्थकेवलज्ञान और अयोगिभवस्थकेवलज्ञान । मूल-से किं तं सजोगिभवत्थकेवलनाणं? सजोगिभवत्थकेवलनाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-पढमसमयसजोगिभवत्थकेवलनाणं च अपढमसमयसजोगिभवत्थकेवलनाणं च । अहवा चरमसमयस- जोगिभवत्थकेवलनाणं च अचरमसमयसजोगिभवत्थकेवलनाणं च, से त्तं सजोगिभवत्थकेवलनाणं ।

- , भीमपन्दीम छाया-अथ किं तत् सयोगिमवस्थकेवलज्ञानम् १ सयोगिमवस्यकेवल- ज्ञानं विविध प्रज्ञप्त, तयथा-प्रथमसमयसयोगिमवस्यकेवल- मानस अप्रथमसमयसयोगिमवस्थकेवलज्ञाना । अथवा चरमसमयसयोगिमवस्थकेवलज्ञानय अचरमसमयसयोगिमव स्थकेवलज्ञान, तदेतत् सपोगिमवस्यकेवलज्ञानम् । टीका-पासपोमिमवस्यवसलाम किस प्रकार ! --सयोनि- मवस्यकेवमहान दी मकारकावे-अपमसमयसयोमिमवस्यकेवलहान और अप्रथमसमयसयोमिभवत्यकेबलहान । भयवा सपोमिमवस्य देबठ हानके दूसरी तरासे पो प्रकार हैं, मैसे-परमसमयसयोमिमबस्यकेवलमान भीर भचरमसमयसयोमिभवस्यकेवलशाम इसप्रकार पह सयोमिमवस्य- भवसमाम हुआ। मूल-से किं तं अमोगिमवत्यकेवलनाणं | अजोगिमवत्यकेवलनार्म विहं पण्णर्च, ते जहा-पतमसमयमजोगिमवत्यकेवलनार्ण । अपामसमयअजोगिमवत्यकेवलनार्ण च । अहया परमसमय जोगिमवत्यकेवलनाणं च भघरमसमयभजोगिमवत्यकेवलनार्ण च, से अगोगिमवत्यकेवलनाणं, से सं मवस्थकेवल मार्ण ॥ २०१९॥ छापा-भप किं सहयोगिमवस्थकेवलगानम् ! अयोगिमवस्थकेवल- शाने विविध प्रज्ञप्त, समया-प्रथमसमयाऽयोगिमवस्यकेवलशाने पाऽमपमसमयाऽयोगिमवस्थकेवलज्ञाना । अथवा परमसम- याऽयोगिमवस्थकेवलज्ञानसाऽचरमसमपाऽयोगिभवस्पकेवल- शानम, तदेतदयोगिमवस्थकेवलज्ञानम् , तदेतद् मबस्थकेक्स- ज्ञानम् ॥ १९॥ गीका-यह अयोमिमवस्यकवडतान कौनसा है!--अयोनिमारक करण्ठाम (मी) वो मकार कर गया है जैसे-अयमसमयका ममीकि मवस्पोक्हाम और ममयमसमयका भपीमियस्य यसहान, अपवा चरमसमय भयोमिमधस्थ विज्ञान और भचरमसमप अमोमिमबस्थ वेबसवान (इस प्रकार मी दो मेष होते)पद मा भयोनिमबस्य कहान, पपने साप मास्पषमझान भी पूर्ण भासू १५. - सिद्ध केवलज्ञानके भेद. ४९ मूल-से किं तं सिद्धकेवलनाणं ? सिद्धकेवलनाणं दुविहं पण्णत्तं, तंजहा-अणंतरसिद्धकेवलनाणं च परंपरसिद्धकेवलनाणं च ॥ सू. २०॥ छाया-अथ किं तत् सिद्धकेवलज्ञानम् ? सिद्धकेवलज्ञानं द्विविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-अनन्तरसिद्धकेवलज्ञानञ्च परम्परसिद्ध- केवलज्ञानञ्च ।। सू २० ॥ टीका-वह सिद्धकेवलज्ञान किस प्रकार है ! सिद्धकेवलज्ञान दो प्रका- रका कहा गया है, जैसे-अनन्तरसिद्धकेवलज्ञान और परम्परसिद्धकेवल- ज्ञान ।। सू २०॥ मूल-से किं ते अणंतरसिद्धकेवलनाणं ? अणंतरसिद्धकेवलनाणं पण्णरसविहं पण्णत्तं, तं जहा-तित्थसिद्धा (१), अतित्थ- सिद्धा (२), तित्थयरसिद्धा (३), अतित्थयरसिद्धा (४), सयंबुद्धसिद्धा (५), पत्तेयबद्धसिद्धा (६), बुद्धबोहियसिद्धा (७), इथिलिंगसिद्धा (८), पुरिसलिंगसिद्धा (९), नपुंसग- लिंगसिद्धा (१०), सलिंगसिद्धा (११), अन्नलिंगसिद्धा (१२), गिहिलिंगसिद्धा (१३), एगसिद्धा (१४), अणेग- सिद्धा (१५), से तं अणंतरसिद्धकेवलनाणं ॥ सू. २१ ॥ छाया-अथ किं तदनन्तरसिद्धकेवलज्ञानम् ? अनन्तरसिद्धकेवल- ज्ञानं पञ्चदशविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-तीर्थसिद्धाः (१), अतीर्थ- सिद्धाः (२), तीर्थकरसिद्धाः (३), अतीर्थकरसिद्धाः (४), स्वयंबुद्धसिद्धाः (५), प्रत्येकबुद्धसिद्धाः (६), बुद्धबोधित- सिद्धाः (७), स्त्रीलिङ्गसिद्धाः (८), पुरुषलिङ्गसिद्धाः (९), नपुंसकलिङ्गसिद्धाः (१०), स्वलिङ्गसिद्धाः (११), अन्य- लिङ्गसिद्धाः (१२), गृहिलिङ्गसिद्धाः (१३), एकसिद्धाः (१४), अनेकसिद्धाः (१५), तदेतदनन्तरसिद्धकेवल- ज्ञानम् ॥ सू. २१॥ टीका-वह अनन्तरसिद्धकेवलज्ञान किस प्रकार है? अनन्तरसिद्धकेवल- ज्ञान पन्द्रह प्रकारका कहा गया है, जैसे-तीर्थसिद्ध (१), अतीर्थसिद्ध .

. , ५० भीमबन्दीसूत्रम् (२), वीर्घकासिद (३), अतीर्थकरसिद (8), स्वयंसिये (५), प्रत्येक पुरसिद (१) पुरबोधितसिर (७) श्रीतिगसिर (८), पुरुषशिसिर (.), नपुंसकछिसिर (१०), स्वशासिद (१९), मन्पसिनासिर (१२) सहिसिासिर (११) पकसित (१४) अनेकसिव (१५) इनका केवल शान मनन्तरसिद्ध फेवसमान है यह हुआ अनन्तरसिदकेवछहाम । म् २१॥ मूल-से किं तं परंपरसिकेवलनाण' परंपरसिद्धफेवलनाणं अणे गविहं पण्ण, त महा-अपडम समयसिमा, इसमयसिद्धा, सिसमयसिद्धा, उसमयसिसा, भाव ससमयसिद्धा, संसिज्जसमयसिद्धा, असखिजसमपसिद्धा, अर्णतसमयसिमा, से परपरसिर्फेपलनाण, से सिद्धकेवलनाणं । से समासओ पठविहं पण्णवं, त जहा-दम्पओ, सितो, कालओ, भावभो, सस्य वष्वओ केवलनाणी सव्वदवार माणइ पासह । सिचओ णे केवलनाणी सम्बं सिर्च जाणार पासइ । कालओ णे फेवलनाणी सर्व काल आणा पासइ । मावओणं केवलनाणी सव्ये मावे आणइ पासइ । गाहा-६६ अह सव्वदम्पपरिणाम, मावविण्णचिकारणमणतं । सासयमप्पसिवाई, एगविहं केवल नार्ण ॥ स २२॥ जया-अथ किं तत्परम्परसिद्धफेवलज्ञानम् १ परम्परसिद्धकेवलज्ञान- भनेकविध प्राप्तम्, तपधा-अमथमसमयसिद्धा, दिसमय सिद्धान निसमयसिद्धाः, चतुसमयसिद्धान पावदशसमय सिद्धा, संस्येयसमयसिद्धा', असंख्येयसमपसिना' अनन्त समयसिद्धा', सदेतस्परम्परसिद्ध केवलज्ञान, सदेतरिससूफेवल ज्ञानम् । तत्समासत चतुर्विध मजप्तम् , तद्यथा-वग्यता, क्षेत्रत', कालतो, मावत', मन्त्र प्रयत' केवलज्ञानी सर्वव्याणि मानाति पश्पत्ति, क्षेत्रत केवलज्ञानी सर्व क्षेचं जानाति पश्यति, काठतः केवलशानी सर्व कार्ल मानाति पश्यति, मावत केवलज्ञानी सवान् मावान् जानाति पश्यति । , संक्षेपसे केवलज्ञानके चार भेद पर गाथा-६६ अथ सर्वद्रव्यपरिणामभावविज्ञप्तिकारणमनन्तम् । शाश्वतमप्रतिपाति, एकविधं केवलं ज्ञानम् ॥ सू २२ ॥ टीका-वह परम्परसिद्धकेवलज्ञान किस प्रकार है ? उ०- परंपरमिद्ध- केवलज्ञान अनेक प्रकारका कहा गया है, जैसे-अप्रयमसमयसिद्ध, द्विसमय सिद्ध, त्रिसमयसिद्ध, चतुःसमयसिद्ध, यावत् दशसमयसिद्ध, संख्येयसमय- सिद्ध, असंख्यातसमयसिद्ध, अनन्तसमयके सिद्ध, इस प्रकार इनका केवलज्ञान परम्परसिद्ध केवलज्ञान कहाता है, यह परम्परसिन्दकेवलज्ञान हुआ, साथही भवस्थ व परम्परकेवलज्ञानके वर्णनसे यह सिद्धकेवल ज्ञान भी पूर्ण हो चुका। ऊपर कहा गया वह केवलज्ञान संक्षेपसे चार प्रकारका है, जैसे-द्रव्य १) क्षेत्र (२) काल (३) और भाव (४), इनमें द्रव्यसे केवलज्ञानी सब द्रव्योंको जानता व देखता है, क्षेत्रसे केवलज्ञानी लोकालोकरूप सब क्षेत्रको जानता व देखता है, कालसे केवलज्ञानी सब काल-तीनों काल-के द्रव्योंको जानता और देखता है, भावसे केवलज्ञानी अनन्तपर्यायात्मक द्रव्योके सव भावोंको जानता व देखता है। उपसंहार-गाथा-६६ सभी द्रव्योके परिणाम और भाव-औदयिकादि व वर्णगन्धादिको जाननेका कारण है अर्थात् सब द्रव्योंके परिणाम और भावोंको जाननेवाला है, अन्तरहित तथा शाश्वतसदा- कालस्थायी व अप्रतिपाति-नहीं गिरनेवाला ऐसा यह केवलज्ञान एकप्रकारका है। सू. २२॥ मूल-६७ केवलनाणेणऽत्थे, नाउं जे तत्थ पण्णवणजोगे। ते भासइ तित्थयरो, वइजोगसुअं हवइ सेसं ॥१॥ से तं केवलनाणं, से तं नोइंदियपञ्चक्खं, से त्तं पञ्चक्खनाणं ॥ सू. २३॥ छाया-६७ केवलज्ञानेनार्थान्, ज्ञात्वा ये तत्र प्रज्ञापनयोग्याः। तान् भापते तीर्थंकरो, वाग्योगश्रुतं भवति शेपम् ॥ १॥ तदेतत्केवलज्ञानं, तदेतन्नोइन्द्रियप्रत्यक्षं, तदेतत्प्रत्यक्षज्ञानम् ॥सू २३॥ टीका केवलज्ञानसे सब पदार्थोको जानकर उनमे जो पदार्थ वर्णनयोग्य हैं तीर्थंकर महाराज उनको वर्णन करते हैं, शेषभाव वाग्योगश्रुत होता है यह हुआ केवलज्ञान, इसके साथ ही यह नोइन्द्रियप्रत्यक्ष व प्रत्यक्षज्ञानका भी वर्णन हुआ ॥ सू २३॥

भीमबन्दीबम मूल-से कि परक्सनाणं ? परक्सनाणं दुविहं पण्णत, तं जहाँ- आमिणिचोहियनाणपतसं प, मुयनाणपरुक्तं च, जत्य आमिणियोहियनाणं तत्थ सुपनार्ण, जस्थ सुयनाण तस्यामिणि- भोहियनाणं, पोऽवि एपाइ अण्णमण्णमणुगयाई, तहवि पुण इस्थ आयरिमा नाणचं पण्णषयति, अमिणिपुज्झइ चि मामि णिमोहियनाणं मुणेइचि सुर्य, मापुम्वं जेण सअ न मई सुर- पुचिपा ।। सू. २५॥ छाया-अथ किं तत्परोक्षज्ञानम् ? परोक्षशाने विविध प्रज्ञस, तपपा- आमिनिवोधिकज्ञानपरोक्ष मुसज्ञानपरोक्षच, यत्रामिनि घोधिकज्ञान तत्र भुतज्ञान, यत्र प्रतज्ञानं सत्रामिनिबोधिकज्ञानं, दे अपि पते अन्पदन्पदनगसे, तयापि पुनरबाऽऽचा` नानात्वं प्रज्ञापयन्ति-अमिनियुष्यत इत्पामिनियोधिकज्ञानम् , मृणोति- पति भुतम् मतिपूर्व येन भुतं न मति भुतपूर्विका ॥ २४ ॥ टीका-बह परोक्षताम कोनसा है परोक्षजान दो प्रकारका का मजा है, जैसे-माभिनिचोधिकहानपरोस और भुतज्ञानपरोक्ष यहाँ आमिनियो पिकवान है वहाँ भूतज्ञान है,औरजहाँ मृतज्ञाम होता है यहाँ आमिनियोभिकशान होता है इस प्रकार पे बोमों परस्पर अनुमत हैं, तो भी फिर भाचार्य पही विशेपता दिखाते है-अभिमुस आये हुए पार्योंका मो नियमित पोप करता है उस इन्द्रिय भौर मनसे होनेयाछे) ज्ञानको आभिमिबोधिकझान कही। समा आप यह मृतहान है, जिससिप भुवज्ञान (शपजम्प ज्ञान) मतिपूर्वक होता है किन्त मति पतपूर्विका मही होती, इसप्ठिप मति भुत पोनमि मति शामका दी पूर्वमयोग होता है॥ २४॥ मूल-अविसेसिया मई माइनाणं च मदमण्णाणे प। विसेसिया सम्मदिद्विस्स मई मइनाण, मिच्छदिद्विस्स मई महामार्ण । अविसेसिपे सुर्य सुयनाण प सुपममार्ण च । विसेसि सुर्य सम्मविविस सुर्भ सुपनाणं, मिळविधिस्स सुर्य सुप अनाणं ॥ २५॥ पा-अविशेपिता मतिर्मतिज्ञानस, मस्यज्ञानश, विशेपिता सम्पगटे मंतिर्मतिज्ञान, मिप्यारटेमतिमस्पज्ञानम् । अविशेषितं भूतं पुत छापा-३ आभिनिवोधिक ज्ञानके भेद वुद्धिके प्रकार. ५३ ज्ञानञ्च श्रुताज्ञानश्च, विशेषितं श्रुतं सम्यग्दृष्टेः श्रुतं श्रुतज्ञानं, मिथ्यादृष्टेः श्रुतं श्रुताज्ञानम् ॥ सू २५॥ टीका-विना विशेषताकी मति मतिज्ञान और मतिअज्ञान उभयरूप है, विशेषतायुक्त वही मति सम्यग्हाप्टके लिए मतिज्ञान है व मिथ्याष्टिकी मति, मति-अज्ञान कहाती है। विशेषताकी अपेक्षासे रहित श्रुत श्रुतज्ञान और श्रुतअज्ञान उभयरूप कहाता है, एवं विशेषता पाकर वही सम्यग्दृष्टिका श्रुत श्रुतज्ञान तथा मिथ्याष्टिका श्रुत श्रुत-अज्ञान कहाता है । सू २५ ।। मूल-से किं तं आभिणिबोहियनाणं ? आभिणिबोहियनाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-सुयनिस्सियं च, असुयनिस्सियं च । से किं तं असुयनिस्सियं ? असुयनिस्सियं चउन्विहं पण्णत्तं, तं जहा- गाहा-६८ उप्पत्तिया १ वेणइआ २, कर्मया ३ परिणामिया ४ । बुद्धी चउन्विहा वुत्ता, पंचमा नोवलन्र्भई ॥ सू २६ ॥ छाया-अथ किं तदाभिनिबोधिकज्ञानम् , आभिनिबोधिकज्ञानं द्विविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-श्रुतनिश्रितञ्च, अश्रुतनिश्रितश्च । अथ किं तद- श्रुतनिश्रितम् ? अश्रुतनिश्रितं चतुर्विधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा- गाथा-६८ औत्पत्तिकी १ वैनयिकी २, कर्मजा ३ पारिणामिकी ४ । बुद्धिश्चतुर्विधोक्ता, पंचमी नोपलभ्यते ॥ सू २६॥ टीका-वह आभिनिबोधिकज्ञान किस प्रकार है ? उ०-आभिनिबोधिक शान दो प्रकारका कहा गया है, जैसे-श्रुतनिश्रित और अश्रुतनिश्रित । स्वल्प याच्य होनेसे पहले अश्रुतनिश्रित मतिज्ञानको कहते हैं-वह अश्रुतनिश्रित मति कैसी है? उ०- अश्रुतनिश्रित मति चार प्रकारकी कही गई है, जैसे-गाथार्थ- औत्पत्तिकी (१) वैनयिकी (२) कर्मजा (३) पारिणामिकी (४) इस तरह बुद्धि चार प्रकारकी कही गई है, पांचवाँ प्रकार नहीं मिलता है । सू २६ ॥ मूल-गाहा-६९ पुव्वमदिट्ठमस्सुय,-मवेइय-तक्खण-विसुद्धगहियत्था । अव्वाहयफलजोगा, बुद्धी उप्पत्तिया नाम ॥१॥ १-कम्मिया-इति समितिमुद्रितमलयगिरिवृत्तौ । २ आ नि गा ९३८-त ५१ पर्यन्ता १४ गाथा धुद्धि-सिद्ध-प्रतिपादके प्रकरणे .

4a श्रीममनीमधम् छाया-गाथा-६९ पूर्वमष्टाऽमुताऽविततत्क्षणपिशुद्धगृहीतार्था । अम्पाहतफलयोगा, पुद्धिरीत्पधिकी नाम ॥१॥ औस्पत्तिकी-पहले बिना देसे विना सुने और बिना जाने पदार्थोकी तरकालदी (उसी मण) विशुर यथाथसपसे ग्रहण करनेवाली तया अबाधित फसके योगवाली पुदि औत्पत्तिकी मामबासी है याने (जो बुदिपहले विना येते, पिना समे विना जाने विषयोंको उसी क्षणमें विरार ययावस्थित महण करती दय अबाधितफसके सम्बन्धवाली या औत्पत्तिकी मामकी पुति है ) अर्यात पाखाम्पास य अनुभव आदिके विना फेवल उत्पातहीस यो उत्पन्न होती है यह भीत्पत्तिकी पुरि कहावी है। औत्पतिकी मुश्केि विषयमें रोहक स्मारके सान्तोंका पहला उदाहरण गापारूपसे कहते हैं- मूल-गाहा-७० मरहसिल १ मिद २ कसर ३, तिल ४ पालुप ५ क्षस्थि६ अगर ७वणसटे पायस ९ आ १० पत्ते ११, सार हिला १२ पचपियरो य १३ ॥२॥ छापा-गाथा-७० मरतशिठा १ मेण्ड २ कुकुट ३, तिल ४ वालुका ५ हस्त्यगर ६, ७ पनसण्या' ८ पायसाऽतिग ९, १० पत्राणि १९, साटहिला १२ पमपितरश्च १२॥२॥ टीका-गापार्य-०-मरत शिक्षा-उस्मपिनीके पास भटोका पक गांव था जिसम भरत मामका एक मट रहता था। उसकी खी किसी रोगसे मरमा किन्तु पीए रोदा मामके पक छोरे बासकको गोरमा, तब उस भरात-नटने अपनी य शिरोदाकी सेपाक सिप पूसरी शाषी की। किमाथा सपस्नी मी रोहक साथ प्रेमाययकार ठीक नहीं करती, मिससे एसी दो रोकने एक दिन उसको कहा कि मई मेरेस परावर मेमका व्यवहार नहीं करती पर अरामदी है। इसपर मा बोठी कि अरे रोका म भगर ठीक नही करती तो मरा क्या करेमा रोक पोला कि मैं ऐसा कमा जिससे तमको मेरे पपिपर गिरमा परगा। अरे। पासपर गिरानेयापटपमे होगा उसे जो करना दो करमा पसा कमांपुप दो गई। और रोदक मी अपनी बात पूरी करनेका अपमा रामे समा, एकरात पप समय बाद पह अपने पिताके पास मोया माथा अपामा बासम समा किमो काका यदरतो गोवा (अन्य पुगर) पीटा आता बालककी पदपात एमर मटको अपनी जीके औत्पत्तिकी बुद्धिके विषयमें रोहकका दृष्टान्त - - प्रति शंका हो गई। उसी रोजसे वह स्त्रीके साथ अच्छी तरह संभाषण भी नहीं करता, तथा दूर होकर सोने लगा। इस प्रकार पतिको अपनेसे मुह मोडे हुए देखकर वह समझ गई कि यह सब वालककी ही करामात है, विना इसको प्रसन्न किए काम नहीं चलेगा, ऐसा सोचकर उसने अनुनय पूर्वक भविष्यके सद्व्य- वहारका विश्वास दिलाते हुए बालकको संतुष्ट किया, प्रसन्न होकर रोहकने भी पिताकी शकाको दूर करनेके लिए किसी चांदनी रातमें अंगुलीके अग्रभागसे अपनी छायाको दिखाते हुए पितासे बोला कि ओ पिता! देखो यह गोहा (अन्य पुरुष ) जा रहा है। सुनते ही उस नटने गोहा (अन्य पुरुष) को मार- नेके लिए क्रोधमे आकर म्यानसे तलवार निकाली, और बोला कि कहाँ है वह लंपट गोहा, जो मेरे घरमे धर्म नष्ट करता है १ दिखा, अभी उसको इस लोकसे विदा कर देता हू। रोहकने उत्तरमें अंगुलीसे अपनी छायाको दिखाते हुए कहा कि वह गोहा है । छायाको गोहा कहके समझानेकी वालचेष्टा देखते ही भरत तो लज्जित हो गया और सोचने लगा कि अही। मैंने झूठेही बालकके कहनेसे अपनी स्त्रीके साथ अप्रीतिका व्यवहार किया। इस प्रकार पश्चात्तापके बाद भरत पूर्ववत् ही स्त्रीसे प्रेमव्यवहार करने लगा, तब रोहाने सोचा कि मेरे दुर्व्यवहारसे अप्रसन्न हुई माता कदाचित् मुझे विप आदि देकर मार देगी, इसलिए अब अकेले भोजन नहीं करना चाहिये, ऐसा सोचके वह अपना खाना पीना पिताके साथ ही करता तथा सर्वदा पिताकेही साथ रहता । एक दिन कार्यवश रोहा अपने पिताके साथ उज्जयिनी गया। नगरीको देवपुरीकी तरह देखके रोहा बहुत विस्मित हुआ और अपने मन में उसका पूर्ण चित्र खींचलिया, पीछे जब पिताके साथ घरकी ओर आने लगा तव नगरीके बाहर निकलते ही भरतको कुछ भूली हुई चीजकी याद आई और उसे लेनेके लिए रोहकको सिप्राके तीरपर बिठाके वह फिर शहरमें चला गया। इसी बीचमे रोहाने नदीके किनारेकी वाल्पर अपनी बालचचलतासे कोटपूर्ण नगरी लिख डाली। इधर फिरनेको आया हुआ राजा संयोगवश साथियोंके मार्ग भूल जाने से अकेला होकर उस रास्तेसे चला आया, उसको अपनी लिखी हुई नगरीके बीचसे आते देख रोहा बोला-ऐ राजपुत्र ! इस रास्तेसे मत आओ, राजा बोला क्यो क्या है ? रोहक बोला-देखते नहीं। यह राजभवन है, जहाँ हरएक प्रवेश नहीं कर सकता । यह सुनते ही कौतुकवश हो राजाने उसकी लिखी हुई सारी नगरी देखी और उस बालकसे पूछा-अरे ! पहले भी तुमने कभी यह नगरी देखी है या नहीं कभी नहीं, आजही ग्रामसे यहाँ आया हूँ,रोहक बोला। बालककी अपूर्व धारणाशक्ति व चातुरीको देखकर वह राजा चकित हो गया और मनही मन उसकी बुद्धिकी प्रशंसा करने लगा। कुछ समयके बाद राजाने रोहकसे पूछा-वत्स! तुम्हारा नाम क्या है ? और कहाँ रहते हो १ वह बोला-राजन् । मेरा नाम रोहक है और मैं इस पासके नटोंके ग्राममें रहता भीमनदीसूत्रम् हैं। इस तरह पोनोंकी वास बसही रही थी कि इसी बीच में रोका पिता आ पहुंचा और दोनों पितापुत्र मामको पहेगप । राजा भी अपने भवम पछा माया और घोचने ठमा कि मुझको एक कम पाँचसी मंत्री पनि मन्त्रिमरहमें भून्य मत्यम्त बुद्धिमान एक बरामम्बि और हो जाय तो मेरा राज्य सबसे बछेगा। क्यों कि अम्प बसके कम रहते भी पुरिमाही राजा शसे कर मही पाता और सेलही शापर विनय पा देता है, इसपकार विचार कर रामाये कुछ दिनोंतक रोहककी बुद्धिपरीक्षा करनी हकी। (१) शिखा (शिला) सर्व प्रथम उस गोयके छोगोंको रामाने आदेश दिया फिलम समी पफ राजाके योग्य मंडप बनामो मिसपर प्रामक पाहरवासी वह पी शिक्षा विना उखाडे भारइनके सपमें बन जाये। रानाके उपरीक भाषेशको सुनकर सभी मामपाले आइह हो रठे, प प्राम बाहर समामें इको होकर परस्पर विचार करने लगे कि, अब क्या करना चाहिए। राजाकी माझा हम सबोपर आ परी है और उसका पालन करना असम, तथा माता पूरी नहीं करनेपर राजा अवश्य भारी पडदया। इस वह पिन्वासे म्पाइस उन सोको विचार करतेमप्पपिन (दोपहर) हो आयाम्पर रोहक पिताके बिना नहीं सावा मौरपिता मामके मेले में था। इसाटप वा मूलसे व्याकुल होकर पिताके पास आयाधबोसा कि पिताजी में भूतसे बहुत सी है इसलिए भोगनक लिए जली पर पटो। भरतने का- पस्सा हम सनी दी जिसलिये कि मामके कुछ भी करको नहीं मानते हो।रोक्षक पोला-पितामी। पामको क्या कहा इसपर मरतने रामाकी आहाप उसकी कठिनाई फहरामी। सन बात सुननेपर एंसते हुए रोक्षाने कहा-क्या पही करतो मैं भभी पूर कर देता है इसमें चिन्ताफी कोई बात नहीं है आप सोग मप बमानेके सिप शिसाके चारों बार नीचे की भूमिको सोदो और फिर यथास्थान भापार मौको भगाकर मध्यवर्ती जमीनको मी तोतो भीरचा भार अति सनर विवाय करमोमिल्प बन जायमा मम्प निर्माण इस उपायको सुनकर समी मामके मपान पुरुप पोसमे हमे, हाँगी! यह ती ठीक ऐसा ही करना चाहिए। इसप्रकार निर्णय कर सब मोमनके लिए अपने पर मप भीर मोमन कर फिर सीट माए। शिठाके नीचे तोपका काम भारम्म किया मीर ही दिनकि बाद मण्डपका काम मी सम्पूर्ण हो गया मादेशक अमुरल दी शिलाकी छत पनापी गई तब मामके खोगनि जाकर मासे नियान कर दिया कि भीमानकी आशा पूरी करनी मा ६। रामाने पण कसे वर सबमि मण्डप बनानेकी सारी कथा कप गली। रामाने प्रण-पद किसकी दिदि साले कहा कि देय पद मरत-पुर रोकी पुचि है। पहरोहककी उत्पातबुरिका मपम गादरण हुआ। मित्र- मैदका लापरण-कए समय बार फिर रामाने रोकी इरि-परीक्षा करनेके लिए एक माममा और सापही पद धूपमा भी ऐसी औत्पत्तिकी बुद्धिके विषयमे रोहकका दृष्टान्त कि यह मेढा आज जितना वजनमें है एक पक्षके बाद भी उतना ही रहना चाहिए, न घटे और न बढे ही, बरावर वजनसे पीछे हमको सोंप देना । उप- रोक्त हुक्म मिलते ही सब गामवाले व्याकुल हो गए कि यह कैसे हो सकता है ? अगर खानेको अच्छा देंगे तो बढेगा और खानेको नहीं देंगे तो घटेगा ही। फिर क्या करना चाहिए ? उपाय नहीं दिखनेपर सवोंने रोहकको बुलाया और कहा कि वत्स! पहले भी अपने बुद्धिरूप बांधसे राज-दण्डरूप सागरसे तुमनेही हम सबोंको पार किये थे, आज फिर समय आया है कि तुम अपने उस बुद्धिवलसे गांवको कष्टसे मुक्त कर दो। इसप्रकार भूमिकाक साथ ग्रामवासियोंने जिस आज्ञाको पूर्ण करना उनकी शक्तिके बाहर था वह आज्ञा रोहकको सुना दी। इसपर रोहकने बुद्धिवलसे ऐसा मार्ग निकाला कि जिससे, एक पक्षको कौन गिने, कई पक्षतक मेढा उतनाही वजनमे रहा जितना कि आज है, सव लोग इससे प्रसन्न हो गए और रोहकके कहे मुताबिक व्यवस्था कर दी। मेढेको प्रतिदिन पर्याप्त घास व जव आदि समय २ पर खिलाया जाता और सामने एक वृक (हुरार) भी रख दिया गया जिससे डरता रहे, भोजनकी अधिकता एवं वृकका भय दोनोंने मिलकर उस मेढेको न तो घटने दिया न बढनेही दिया। एक पक्ष बीतनेपर मेढा उसी हालातमे पीछा राजाको लौटा दिया गया। राजाने वजन किया तो पूरा निकला, (घटा बढा कुछ नहीं), यह उत्पातबुद्धिका दूसरा उदाहरण हुआ ॥ २ ॥ कुक्कुट-मुर्गा-कुछ दिनोंके बाद फिर रोहककी बुद्धि-परीक्षा करनेके लिये राजाने ग्रामवालोके पास एक कुक्कुट भेजा, और उसके साथ ऐसी आज्ञा भेजी कि विना दूसरे कुक्कुटके इस कुक्कुटको लडाकू बनाकर भेजो। ऐसी राजाज्ञाको सुनकर फिर सभी रोहकके पास आए, तथा सारी बातें उससे कह सुनाई। इसपर रोहकने एक साफ तथा बडा दर्पण मंगवाया, उस दर्पणको कुक्कुटके सामनेमे रखवा दिया, दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बको दूसरा कुक्कुट समझकर उसके साथ वह राजकुक्कुट लडने लगा, क्यो कि तिर्यग्जाति जडबुद्धि होती है। इस प्रकार दूसरे कुक्कुटके अभावमे भी राजकुक्कुटको लडते देख ग्रामवासी लोग रोहककी बुद्धिपर मुग्ध हो गए। कुछ कालके बाद राजकुक्कुट राजाको लौटा दिया गया। अकेला ही कुक्कुट लडाकू बना, इस बातकी राजाने परीक्षा की, सच्ची घटना देखकर राजा बहुत खुश हुआ ॥३॥ तिल-कुछ दिनोंके बाद राजाने फिर रोहककी बुद्धि-परीक्षा करनेके लिए उस गांवके लोगोंको अपने यहां बुलाया, तथा कहा कि तुम सबोंके सामने जो तिलके ढेर पडे हैं उन्हें विना गिने कहो कि ये कितने हैं। मगर देखो इसमें अधिक देर न लगे। इसपर सभी ग्रामीण लोग चिन्तित हो गये तथा उत्तरके लिए रोहकके पास दौड आए । रोहकने कहा कि राजा पगला है, ऐसा भी कहीं प्रश्न होता है ? अस्तु, जाओ और उससे बोलो कि महाराज।

- भीमबन्दीमा हम गणित तो मही है जिससे आपको तिलोकी एक संसपा करें। फिर भी मापकी माता शिरोधार्य करके उपमासे कहते हैं-गांयके कपर इस भाफाशमें जितमे पार बस सतनी संसपाही सरेरमै तिल। सोने राजाके पास आकर पेसाही कह सुनाया। रामा ममही मम लजित हो गया ॥४॥ बालक-बाल्छ विनंकि बाद रामा रोहककी परीक्षाके सिप फिर एक आज्ञा गांववालंकि माम निकाली कि तुम्हारे गांवके पास सबसे बरियाँ पाद है, इसलिए उस बालसे पक मोटी गरी बनाके शीघ्र भेज दो। सोनि रोहकसे कहा तव रोहकने अपन पुशिबससे रामाको जवाव भेजा कि हम सब नट है, मापमा जानते हैं, किन्तु रोरी पनाना मही जामते लेकिन राजाका भावेश अवश्य पालनीय है इसलिए मार्यमा ६ कि आपके राम मयनमें कोर्ष पुरामी पालमप गेरी हो तो मरनेके तीरपर मेन वें जिससे कि हम उसके अनुसार मवीन गरी पनाकर भेज दंगे। गांववामि इसी प्रकार रोहफकी पात रामासे मिययन कर दी। राजा मी निरुत्तर हो उप एमया ५॥ हस्ती-दापी-उछ पिनाक बार फिर राजाने एक पुराना मरणप्राय हाथी गांववालोंके पास भेजा तया पेसा आदेश दिया कि पापी मरा है ऐसा नहीं कहना तया उसकी पैनिक वार्ता निलम करते रहमा भन्यया भारी पण मिसेमा। इस तरह राजाकी माला सुमकर समी सोग समासे बाहर आप भीर रोइकसे इसका उपाय पूछने सगे । रोहकमे जबाब रिया किस छापीको बराबर मान्म जानेको देते रहो पिछे जो होगा उसे मैं समझ स्मा। इस प्रकार रोककी पातसे गांवयानि हायीको पाम्य भारि सिसाया किन्त यह तो रावको ही सरपुर सिपार मया । तब हमके कथनानुसार सोने रामासे आकर निवेदन किया कि देश भाग हापी न तो पिठता है न उठता हैन साना गाता है, म मममस्याग करता है, न श्वासोमास ही सेवा है, विशेप क्या करें सचेतनताकी एक मी हा नहीं करता है। तव रागामे पूण अरे! क्या तोहाची मरगया। मामीणोंने जवाब दिया कि रेप। श्रीचरण ऐसा कर सकते है हम लोग नहीं। इसपर रामा पुप हो गया, और पामीण खोम सर्प अपने घर चले आए.६० अगा-रुप-10 दिनों के पार रामाने फिर आदेश निकाला कि तुम्हारे पामका जो सुस्वार जसपूर्ण रुपले उसको शीमही यहाँ मेम दो । आरे शको सनकर मी किताप, और रोहसे इसका उपाय पूछने आप । रोएक पोला-रामासे साकर यह मर्म करोकि पामीण कृप स्वमापसे पीर पाक दातादिभीर समातीयके बिना उसको अप किसीपर विश्वास भी नहीं दोता। इसलिए एक मामरिक कप मेज, मिसपर पिरासकर यप उसके साप वदाँतक चला मायमा । छेनेके लिये माये गुप रामपुरुपमे जाकर रामासे औत्पत्तिकी बुद्धिके विषयमें रोहकका दृष्टान्त. ५९ इसी प्रकार निवेदन करदिया । राजा भी अपने मनमें रोहककी वुद्धिमत्ताको विचारकर चुप रह गया ॥७॥ वणसंडे-चनखंड-कुछ दिनों के बाद राजाने फिर हुक्म दिया कि ग्रामके पूर्व दिशाम वर्तमान वनखण्डको पश्चिम दिशाम कर दो । उसी समय रोह- कके वुद्धिवलसे ग्रामीण लोग वनखडके पूर्वदिशामे ठहर गए (याने पूर्वकी तरफही गांव वना लिया) फिर तो वनखंड गांवके पश्चिममे हो गया। आदेशको पूरा हुए देखकर राजपुरुपने राजासे निवेदन करदिया ॥८॥ पायस-खीर-फिर कुछ दिनोंके बाद राजाने आदेश दिया कि विना अग्नि-संयोगके ही पायस (खीर) पकाके भेजो। इस अपूर्व वातको सुनकर सभी ग्रामीण लोक क्षुब्ध हुए और रोहकसे पूछने लगे, तब रोहक बोला कि जलमे अच्छी तरह चावलोंको भींगोके जूर्यकी किरणोंसे खूब तपे हुए कोयले या पत्थरपर चावलोंकी थाली रखदो, इससे कुछ समयमे खीर बनकर तैयार हो जायगी। लोगोंने ऐसाही किया और पायस तैयार कर राजासे निवेदन कर दिया, राजा भी रोहककी बुद्धिमत्ता देखकर वडा विस्मित हुआ ॥९॥ अइय-अतिग-इसप्रकार रोहककी तीव्र बुद्धि समझकर राजाने उसको अपने पास बुलाया, मगर यह शर्त रक्खी कि मेरे आदेशोंको पूरा करनेवाला वालक न शुक्ल पक्षमे आवे न कृष्णपक्षमे, न रात्रिमे और न दिनमे, तथा छाया व धूपमे भी नहीं आवे, न आकाशसे आवे न पावसे, न मार्गसे आवे न उन्मार्गसे, न नहाके आवे और न विना नहाए, किन्तु आवे जरूर । उपरोक्त आदेशको सुनकर रोहकने कण्ठस्नान किया और रथके चक्रकी धाराके ऊरणपर बैठकर संध्यासमयमें चालनीका छत्र धारण किए हुए अमा- वस्या व प्रतिपतके संयोगमे वह राजाके पास चला गया। 'खाली हाथ राजासे नहीं मिलना चाहिए, इस लोकोक्तिको विचारकर रोहकने एक मिट्टीका पिण्ड हाथमे ले लिया और राजाके पास जाकर प्रणामके बाद वह पृथ्वी-पिंड आगे रख दिया। राजाने पूछा-अरे रोहा! यह क्या? तब रोहा बोला-महाराज। आप पृथ्वीपति हैं इसलिए मैं पृथ्वी लाया हूँ। प्रथम-दर्शनमे इसप्रकार मंगल-वचन सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और गांवके लोग सब प्रभुदित हो चले गए ॥१०॥ अजे-अजा-राजाने प्रसन्न होकर रोहकको रातमें अपने पासही सुलाया और शेप लोग भी वाजूमे सुलाये गये । रातके प्रथम पहर बीतनेपर राजाने रोहकसे पूछा-क्या रे ! जगा है या सोया ? रोहक बोला-महाराज ! जगा हूँ। १ ( यद्यापि वृत्तिकारने अजाका उदाहरण १२ वां और पत्रका दृष्टान्त ११ वां दिया है, लेकिन मूलमें पहले अजाका निर्दश किया है, इसलिए यहाँ अजोदाहरणके बाद पत्रका दृष्टान्त दिया जायगा)।

भीमपन्दीमा रामा-तपस्या सोचता है। वह पोखा देव। ममा-चकरो के पेटमेंचकसे उतरी हुईकी तरह गोल २ मोसियां क्यों होती है। उसके पेसा पोलनेपर संशययुको रामाने कहा-रामही कहो क्यों होती है। वह बोला-देव ! संवर्चनामक पायुविशेषसे पैसा होता है । ऐसा कहकर रोहक सो मया ॥११॥ पसे-पम-रातको पो पहर पीत गानेपर फिर रामाने का कि अरे । मोता है या सगा है। यह दोला-देव ! आगता हूँ। तप क्या सोचता है वह पोलाकि देव ! पीपलके पत्तका का माग पहा है या आगेका भाग-शिसा! उसके ऐसा कहनेपर संशयाकुल हो राजामे कहा-अच्छा सोचा किन्तु इसमें मिर्णय क्या हुमा । हूँ ही कह। रोहक पोसा कि पेय । गवतक की आगेका भाम नहीं घुसता है तबतक पोमो समान है। इसपर राजाने पास दूसरे लोगोंसे पूछा उन सपनि भी कहा ठीक है। इसके बाद रोक सो मया १५ । सारहिसा-रावक तीसरे पहर पीतनेपर रामाने फिरसे पूर्ण क्यों जागता है या सोता ! उसमे मवाव दिया-महाराजा मागता है। ताण सोचता है। वह बोसा-देव ! सारहिला जीवको जितना पग शरीर होता है उतना ही महा पुछ है या कुछ कम विशेप ! इसके निर्णयमें भी अपनेको भसमर्थ देख राजाने कहा-अच्छा, तो दममे क्या निर्णय किया है। पा बोला-देव पोनों परापर होते हैं ऐसा कह कुछ समय रोहक सो गया ॥११॥ पपिया-पंथापितर-पर सुबहके मंगसमय धाय समकर राजा अगा तया रोहकको पुकारा । यह मात्र नियामें सीन होनेके कारण जवाब महीने सका।तब राजाने उसको गीली तसे तमिक स्पर्श कर दिया जिससे यह जग उठा। राजाने पूछा-क्यारे! सोता है। यह पोठा-नही मागता है। अब तो फिर क्या सोचते तुप मीम है। बोस क्या सोचता है। यह पोसा किया यदी सोपता कि आप कितमेसे पैदा हुए है। रोइकके पेसा कहनेपर रामा दामाफर कुछ समय परपा भौर फिर बोसा किमाछा! काम कितमेसे पैदा हुआ। यह पाला-आप पानसे पैदा हुए है। राजाने फिर पूछा-किस किससे। राहक पोसा-व! एक तो कुरसे क्यों कि उसके साशदी आपकी दामशकि है। दूसरे पाराम, पयों कि परीसमूएक प्रति आप चणालयव दीर। तीसर भोपीस, स्पा कि धोपीकी तरफ सरेको पीपा पर्तुपाके उसका साधन दर देते हैं। पीय रियासे क्यों कि विगएकी तह निवाधीन बासकको भी लील पिकाममे मार मापने अगा दिया । पांच अपमे पितासे, क्योंकि पितायत आपभीन्यायका परिपाटन करते हैं । उपरोक सदेतक वार्ता समकर रामा पुप दो गया और मातकाल शीवादि हत्य कर मौको प्रणाम करने गया। प्रणामके बाद मासे मपमी अससियत के सिप मभ किया परोदककी पदी सारी पातासाठी माताने उत्तर दिया कि पिकारी से रेरामा परिरे संस्कारका कारण दो तो ऐसा सटर शुभा है। नदी तो सलमान औत्पत्तिकी बुद्धिके विषयम-उदाहरण ६१ सिद्ध असलियतमें तो तुम्हारे एकही पिता है । इसप्रकार मांकी बात पूर्ण हो जानेपर राजा प्रणाम कर रोककी बुद्धिपर विशेष चकित होता हुआ अपने महलको चला आया और समयपर रोहकको सब मन्त्रियोमे मूर्धन्य बना दिया १४ । ये रोहककी औत्पत्तिकी बुद्धिके उदाहरण हैं। मूल-गाथा-७१ भरहसिल १ पणिय २ रुक्खे ३, खुड्डग ४ पड ५ सरड काय ७ उच्चारे ८ । गय ९ घयण १० गोल ११ खंभे १२, खुड्डग १३ मग्गि १४ त्यि १५ पइ १६ पुत्ते १७ ॥३॥ ७२ ॥ महुसित्थ १८ मुद्दि १९ अंके २०, (अ) नाणए २१ भिक्खु २२ चेडगनिहाणे २३ । सिक्खा २४ य अत्थसत्थे २५, इच्छा य महं २६ सयसहस्से २७ ॥४॥ छाया-गाथा-७१ भरतशिला १ पणित २ वृक्षाः ३ क्षुल्लक ४ पट ५ सरट ६ काकोच्चाराः ७, ८ । गज ९ घयण (भाण्ड) १० गोलक ११ स्तम्भाः १२, क्षुल्लक १३ मार्ग १४ स्त्री १५ पति १६ पुत्राः १७ ॥३॥ ७२॥ मधुसिक्थ १८ मुद्रिका १९ अङ्काः २०, ज्ञायक २१ भिक्षु २२ चेटकनिधानानि २३ । शिक्षा २४ च अर्थशास्त्रम् २५, इच्छा च महत् २६ शतसहस्रम् २७ ॥४॥ टीका-गाथार्य ७१-७२ भरतशिला १ पणित ( जूआबाजी) २ वृक्ष ३ क्षुद्रक ४ पट-वस्त्र ५ सरट ( जन्तुविशेष ) ६ काक ७ उच्चार ८ हाथी ९ और घृतमांड १० गोलक ११ स्तम्भ १२ क्षुद्रक १३ मार्ग १४ स्त्री १५ पति १६ और पुत्र १७॥३॥ इन सब उदाहरणोंसे भी औत्पत्तिकी बुद्धिका परिचय दिया गया है, जो इसप्रकार है। १भरतशिला-इसका उदाहरण पहले रोहककी बुद्धिके उदाहरणोमें दे आए हैं। २ पणित-कोई ग्रामीण किसान अपने ग्रामसे ककडिएँ लेकर नगरमे वेचनेको गया। नगरके द्वारपर जातेही उसे एक धूर्त नागरिक मिल गया । उस धूर्त नागरिकने ग्रामीण किसानको भोला समझकर ठगना चाहा और इसलिए धूर्ततासे बोला कि क्या एक आदमी इन सब ककडिओंको नहीं खा सकता है । इसपर ग्रामीण बोला-किसकी ताकत है जो इतनी ककडिएँ खा लेगा!

भीमन्दीरमम् मागरिक पोसा-अमर मैं सा जातोया पोगे। इस पातको असंभव मानते हुए मामीणने कहा कि अमर वा माओ तो जो इस प्रारसे महीं आसके ऐसा परा थानाम दूंगा। इसपर उन दोनोंने साक्षी बनाकर प्रतिज्ञा कर ली। बार उस नागरिकमे मामीणकी सारी ककरि जूठी करके छोस दी श्रीर मामीणसे फा कि मैमे सारी ककरि सा ही है अत' अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार द्वारसे नहीं आमेलापक पहा सा मुझको दो। इसपर मामीण बोला कि तुमने मेरी सारी ककरी स्वाधीमही फिर मैं उतना परा मोषक कैसे इसपर मामरिक पोला कि मैंने तुम्हारी सारीफकार साठी फिर भी विश्वास मही हो तो पागारमे रखकर परीक्षा कर लो। इसको पामीणमे काम किया। तष पोनि ककरियों समाकर पामारमें देश के लिए रसदी । सरीरनेवासे आए मगर पहने लगे कि भजी! ये तो सारी ककरिय साई हुई।स तरह सोकि कहमेपर नागरिकने पामीणको तया साक्षीको विश्वास उत्पम करा दिया। अप मामीण तो मुम्भ हो मया कि मैं इसको शरम नहीं आ सके उत्तमे परिणामका मोषक कैसे । तव इसमकार माकुल हो उस प्रामीणमे मामरिकपूर्तसे पीछा पुगमेके लिये भयसे उसको एक रुपया देना पाहा, किम्त यह पूत इतनेपर राजी नहीं हुभा । भासिर प्रामीणने १०० रुपयातक ऐना कपूस कर लिया, किन्त पूर्वको कुछ भपिक मिलनेकी भाशा थी, भता उसने उतनेको स्वीकार नहीं किया। इसपर षह प्रामीण सौपने कमा कि हाथी हाथीसदी हवामा गाता है वास्ते किसी पूर्त मागरिककी शरण सेनी चाहिए । ऐसा सोचकर उस प्रामीणने मामरिकसे छ विमाका अवकाश सिपा तथा भयरमें एमकर किसी पूर्व भागरिकसे मित्रता करसी पर्व अपमी सारी पटना काकर उससे बचनेकी उचित सम्मति मांगी। उसने मामीणको उस भूर्तसे झ्टमेका उपाय बता दिया जिसके अनुसार ग्रामीणने पाजारसे पक ला कर भयरके परवानेके बीच रस पिया भीर मतिपक्षी नामरिक पूर्त पर्व साक्षियों को बुला लिया तथा उनके सामने पोसा कि मरे मोषक! परे भाओ बछे आमो, किन्तु मोषक वारसे तिममर भी विचमित नहीं हुआ, तव प्रामीणने उपस्थित होगसि कहा कि मैंने आप होमोके सामने पही मतिया की थी कि अगर परामित हो जाममा तो ऐसा मोषक रंगा जो सवारसे नहीं मा सबै घो पह मोपकारसे नहीं आता आप मी गुहा कर बस सकते हैं। अता भव में प्रविधासे मुक्त होमपा हूँ सामी पर्वावर सोमकि ऐसा स्वीकार कर मनपर वह पूर्व नामरिक भी समितही पर गया। क्या प्रामीप मी पूर्व पीछा एट गाभेसे प्रसव होता हा मॉबको चहा गया । पा मतिनी पूर्त तया नामरिक पूर्तकी औत्पतिकी शिई। हमसे-पूस पक्षका उदाहरण इस प्रकार किसी महमें माम सेनेके एक हप पोरियों को पक पनर पापा ने व्यासपर पटोहीने मारिसे उपाय चोचा भीरपारफे पर पत्थर फेंकना एक किया। बमरने । औत्पत्तिकी बुद्धिके उदाहरण भी बदलेमें रोपयुक्त होकर बटोहीको मारनेके लिये आमके फल तोडकर फेंकना आरम्म कर दिया। बटोहियोंके अभीष्ट मनोरथ अनायासही पूरे हो गये । यह पथिककी औत्पत्तिकी बुद्विका उदाहरण हुआ। ४ खुड्डग-अंगुलीयाभरण-(अंगूठी) इसका उदाहरण इस प्रकार है, अढाई हजार वर्पसे पूर्व राजगृह नगरमे प्रसेनजित नामका राजा राज्य करता था। उसको बहुतले पुत्र थे। किन्तु उन सबसे केवल एक श्रेणिकही राजाको राजलक्षणसम्पन्न पुत्र मालूम हुआ। श्रेणिकको अधिक आदर व प्यार करनेसे शेष राजकुमार ईर्ष्यावश उसे मार देंगे इसलिये प्रसेन- जित उसको न तो कुछ अच्छी वस्तु देता और न बातसे ही लारप्यार करता। केवल अंतरंगरूपसे उसका ध्यान रखता था। पिताके इस व्यवहारसे खिन्न होकर एक दिन श्रेणिक विना कुछ साथ लिपही राजभवनसे निकल पडा तथा चलते चलते कुछही समयमे वह वेन्नातट नगरमे जा पहुंचा, और विभ- वसे क्षीण निर्धन बने हुए एक शेठकी दुकानपर जाके बैठ गया । शेठने उसी रात स्वप्नमें अपनी लडकीका विवाह किसी रत्नाकरसे होते देखा था। इधर श्रेणिकके पुण्य-प्रभावसे शेठके यहाँ कई दिनोंकी खरीदके रख्खी हुई चीजे एकदम बिकने लगी। इससे उस दिन शेठको बहुत आशातीत लाभ हुआ। इसके सिवाय म्लेच्छोंके द्वारा लाये गए कई बहुमूल्य रत्न भी अल्प मूल्यमे ही मिल गये । सहसा इस प्रकारके अचिन्त्य लाभको देखकर शेठको विस्मय हुआ। उसने इसका कारण सोचा तो मालूम हुआ कि यह जो मेरी दुकानके बाहरी बाजूम पुण्यवान् पुरुप बैठा है उसीके आतिशय पुण्यका यह प्रभाव है । जबसे यह आके बैठा है, तभीसे मुझको व्यापारमे अधिक लाभ होने लगा है । इसका ललाट एवं भव्याकार भी इसके पुण्यातिशयकी साक्षी देता है। मैंने जो गत रातमें अपनी कन्याका रत्नाकरसे पाणिग्रहण होनेका स्वप्न देखा है वह रत्नाकर वास्तवमे यही है। इस प्रकार विचार करनेके बाद शेठने विनयपूर्वक हाथ जोड श्रेणिकसे पूछा कि महा- भाग! आप किसके यहाँ पाहुने हैं? व कहांसे पधारे हैं ? श्रेणिकने भद्रतासे जबाब दिया कि अभी तो आपहीके यहाँ आया हूं। श्रेणिकके उपरोक्त इष्ट वचनको सुनकर शेठ बहुत प्रसन्न हुआ और बहुमानके साथ श्रेणिकको अपने घर ले गया। तथा अपने भोजनसे भी विशिष्ट भोजनके द्वारा उसका सत्कार किया। शेठके यहाँ प्रतिदिन विशेष धनवृद्धि होने लगी। कुछ दिनोके बाद प्रसन्न होकर शेठने अपनी लडकी नन्दाके साथ श्रेणिकका सम्बन्ध- विवाह कर दिया। श्रेणिक भी उस नन्दाके साथ सांसारिक सुखको अनुभव. करता हुआ रहने लगा। कुछ दिनोंके बाद नन्दाको गर्भाधान हुआ। उधर राजा प्रसेनजित श्रेणिकके चले जानेपर कुछ चिन्तातुर बन गया तथा खोज करते २ प्रसेनजितको ऐसा मालूम हुआ कि श्रेणिकका वेनातटके किसी शेठकी कन्यासे विवाह हो गया और वह वहाँ सुखपूर्वक रहता है । जब प्रसेन- ।

48 भीमबम्पीत्रम् मितको ऐसा मालूम हुमा पर अपना अन्तिम समय ममपीक जानकर राजाने मेणिकको दुखानेके लिये आवमी मेगे। मेगे हुप रामपुरुषोन वेनावटमें भाकर मेणिकसे विनती की कि देय। महाराज प्रसेमजित आपको जली पुताते हैं, अतः आप शीन धर्म। प्रेणिक भी पीताकी आमाको शिरोभा समझकर सगर्मा मवासे पूछकर रामपुरुषोंके साथ राजगृहीको पल दिया। जाते समय अपना परिचय व नियास भादि पस्नीकी जानकारीके छिप भीतक किसी पक मागपर मिस पिया। तीन महिन बीत जानेपर मंदाको पेसा पोहा- मनोरम उत्पम हुमा फिदायीपर पैठी हुई सब छोमोको प्रम्पवान देती हुई में समयदान को मर्याद भयभीत माणियोको मिर्मय करें। महाके पिताको मा यह बात मालूम हुई तब रामाकी अमुमति लेकर उसने उसका ममोरय पूर्ण कर दिया। कासकमसे पिशाओंको प्रकाशित करते हुए पुनरलका गन्म हुआ।पारदम दिन पोहरके अमुसार पुपका अमयकुमार यह नाम रफ्ता मया। कुमार मी भवनयनके करपवृसकी तरह इसपूर्वक पहने छमा । यथासमय फलामोका अम्ययन कर कुमार सयोग्य बन गया। एक दिन उसने अपनी मातासे पूछा कि मां । मेरे पिता कौन एवं कहाँ है। माताने मूलसे छेकर पर वृत्चान्त कह सुनाया तथा उनका लिखा हुआ या परिषय ठेस मी दिसा दिया । अपना पिता राजगहमें ही रामा हैं इस प्रकार माताके पचन व सते समझकर ममयकुमार अपनी मासे पोला किमा। हम सब भी साथसे राम गृह पसे तो पितामीसे मिलमा दो भायमा, एक रिचार हो जानेपर दोनों मविटे रागदपले भाप । फिर नगरीके बाहर उधाममें माताको छोटकर अभयकुमार नगरीका बाल समझने व पिताको परिचय देने तथा पर्शन फरनक लिए एप ममरीमें गया । वही जाते ही एक पुसे (निर्मल) कूपके पास अभयकुमारमै बनुतसे सोमोको चारों तरफ इक देखा। तब उसने एकसे पूण कि माई। यहाँ सोयोका पद जमाययोंत्तरमै किसीने कहा कि रामाका अंगूठीयामरण (अंगठी) इस रूपम गिरा हुआ द।पके बाहर परे रहकर ओरसको निकाल ले उसको रामा पाती वृत्ति देता है। उसीको निकाउनके उपायोको रोगमे ही पहा सर छोक राणे । अमयकुमारन पासम सके रामपुरुपोंसे विशेप निर्णयके लिए पण उन लोगोंने भी ऐखादी कदा तप भमयकुमार पोठा कि मैं पादर पता (एफेदी मिकाल लेतामगर प्रमाको मपनी प्रतिक्षा पूर्ण करमी दोगी। इसपर पज पुरुप दोरे-भरा हुम निकासो, रामा अपनी प्रतिता नकर पाटनरेगा। भमपकुमारने उस भएडीको अच्छीतरद देसकर उसपर गीला मोवर मिरा रिया जिससे अंगुठीका पद भामरण गोवरम मिसगया भीर कुछ समयके पार गोपरके न जानेपर कपको पानीसे मरपिया इससे पाद अंगुठीयक मी माबरके साप ऊपर भाके तिरन लया । उसी समय अभयपुमारने बापर तो दी गुठीपक निकाष्ठ लिया, जिसपर सोमोम एर्पगन्य पास कोहाएस । औत्पत्तिकी बुद्धिके उदाहरण ६५ होने लगा। तब राजपुरुषोंने भी राजाको निवेदन किया कि देव! एक विदेशी युवकने आपका अंगुलीयक आदेशानुसार ही निकाल लिया है। उत्कण्ठाके साथ राजाने अभयकुमारको अपने पास बुलाया और पूछा कि वत्स ! तू कौन है? अभयकुमारने कहा कि महाराज! मै आपहीका पुत्र हूँ। राजाने पूछा कैसे इसपर कुमारने पहलेका सब वृत्तान्त कह सुनाया, सुनकर राजा बहुत हर्षित हुआ तथा कुमारको हृदयसे लगाकर स्नेहपूर्वक उसके शिरका चुम्बन किया और पूछा कि वत्स! तुम्हारी माता अभी कहाँ है? कुमार बोला कि देव ! मेरी माता अभी नगरीके बाहर उद्यानमे है । कुमारकी बात सुनकर उसी समय राजा सपरिवार नन्दा रानीको लानेके लिए उसके सम्मुख गया । अभयने आगे जाकर मातासे पिताके आनेकी सूचना कर दी जब नन्दाने अपने देहको सजाना शुरू किया, तब कुमारने निषेध करते हुए उससे कहा कि माताजी। पतिके विरहवाली कुलकामिनीको अपने पतिके दर्शन किए विना शृङ्गार करना योग्य नहीं होता है। इतनेमे राजा भी वहाँ पहुँच गया और दोनोंका स्नेहपूर्वक वहाँ मीलन हुआ फिर श्रेणिकराजाने बडे समारोहसे नन्दा रानी व अभयकुमारका नगर-प्रवेश कराया, नन्दा रानी सुखपूर्वक श्रेणिक महाराजके साथ रहने लगी। अभयकुमारको भी राजाने प्रधानमन्त्रीपदपर नियुक्त कर दिया। यह अभयकुमारकी औत्पत्तिकी बुद्धि हुई । ५ प्रड-पट (वस्त्र) का उदाहरण इस प्रकार है-दो आदमी एक साथ किसी जलाशयपर जाकर स्नान करने लगे, उनमे एकके पास ऊर्णमय वस्त्र- कम्बल ओढनेको था और दूसरेके पास शरीर आच्छादनको सूतका वस्त्र था, कम्बलवाला तत्काल स्नान कर अच्छा होनेसे तुरंत सूतके वस्त्रको लेके चलने लगा, दूसरा पुकारकर मांगने लगा-अजी! तुम्हारा वस्त्र यह है वह मेरा है, अत मुझे दे दो, किन्तु वह इसकी कुछ भी नहीं सुनता हुआ चला गया। गांवमे आकर दोनों अपना न्याय करानेके लिये राजकुलमे पहुंचे। न्यायरक्षकने दूसरी तरहसे निर्णय होना कठिन समझकर बुद्धिबलसे दोनोंके शिरपर केकतिकासे लेपन कर दिया । उससे कम्बलवालेके शिरसे ऊर्णके केश निकल आए, तब यह निश्चय हो गया कि यह सूतका वस्त्र इसका नहीं है। उसी समय राजपुरुषोंने उसका निग्रह कर वह वस्त्र दूसरेको दिला दिया। यह राजपुरुषकी औत्पत्तिकी बुद्धि है । ६ सरड-सरट-इसपर कथानक इस प्रकार है-कोई एक आदमी जंगलमें मलत्याग करने गया था, उस समय वह किसी बिलके उपर बैठ गया, सहसा एक सरटजंतु बिलमें प्रवेश करते हुए पूंछसे उसके गुदाभागको छू लिया, इत- नेहीसे उसको यह शंका होगई कि यह तो मेरे पेटमे चलागया है, इसी शंका- से वह रोगीकी तरह प्रतिदिन दुर्बल होने लगा । बहुतेरे चिकित्साप्रयोग किये परन्तु सब व्यर्थ हुए । एक दिन वह किसी वैद्यके पास पहुँचकर अपना हाल- ९ भीमभन्नीसुबम् समामे छमा पैपने मरछी वरए परीक्षा की तो मालूम हुभा कि इसको कवस म्रम हुभा है और कुछ नहीं, ऐसा सोचकर पेयमे कहा कि मैं तेरा रोग मिटा देवा है किन्तु पी रुपयेगा। इसपर उसने स्वीकार करलिया। तब धने उसको घिरेषक पिया भीर एक मिट्टीके मोम्म लाज्ञारससे भरा जा सरत रसके उसको मलत्याग करनेको कहा । विरेचन साफ हो जानेपर घने मारसे सरस निकास के दिखाया कि देखो यह निकल गया। तत्काली उसकी शंका दूर होगई और पह नीरोग तथा कुछही समयमें दारीरते सपस होमया। पह हु चैपकी मीत्पत्रिकी बुदि। ७काम-काफ-कौएका मान्त इस प्रकार मातटम पक पीर मिभुने किसी नसे पूण कि अजी। मारे देव सर्वजीर म उनके मकहो तो कहो कि इस गांवमें काग (कीए) कितने हैं। इसपर पदमाईतमक सोचने लगा कि यह शठ है सरळतासे केय समझमेषाला नहीं है. वास्ते ऐसादी अधर देना चाहिए । इस प्रकार सोचके बह बोला कि साठ हजार काग इस मौवमें रहते हैं, ममर कमी लमस ए बाहर जाते हैं तो कम हो जाते हैं और जब छ बाहरसे मेहमान आते हैं तो बस जाते हैं। पीय मिस इसकी जांच अशाप मानके सिर खुमलाता मा उपचाप चला गया । यह हा सहककी मीत्पतिकी बुदिका शान्त । ८ उरचार-मछपरीक्षा-पाहरण इस प्रकार है-किसी शारमें एक मापण रहा करता था। उसकी भी धनरता व मीरावस्थाका कारण अधिक वाले काममें उम्मत रहा करती थी। पकदिन वह मायण अपनी सीके साथ शान्तरको जा रहा था रास्ते माझपको एक पूर्व मिठ गपा और बामणी साप कुछ बात करके उसने उसको अपने प्रेममें खींच लिया। कुछ दूर जाकर पूतन प्रामणसे विवाद करमा शुरू किया और पोसमे हमा किपहनी मेरी बास्से पर मत आमो। तब बामण पोसा-अगी। नही पहतो मेरी भी है। विवाद पर जामेसे दोनों भ्याय कराने के लिए प्रमसमें पहुंचे। अधिकारियोंने पोमोका मामला समझकर दोनोंको असम २ कर लिए भार उनसे पूछा कि मने का क्या लाया था। माझमने कहा मैं मपमी मी सायकस तिलका मोरकसाया पा, भूतने कुछ और ही कहा जय पिरेचन रेकर परीक्षा की मई तोप्रामपका कपम खस्य मिसा। तब उसी समय म्यायाधीशने ब्राह्मणको उसकी श्री पिसा पी और भूतको पण देकर निकाल दिया। १ गप-मम (पापी) से दुरि परीक्षाका उपाहरण इस मबार है-परत- पुरके रामाने नतिशयरिसम्पद मन्त्रीको पाने के लिए चप्पथ (बीक) में आसानत्तम्मपर पक दापी बंपवा दिया और सायही पर घोषणा करवाई कि इस हाधीको मो वोट देगा पसको रामा बसी पति (बशीस) मा ।

औत्पत्तिकी बुद्धिके उदाहरण घोषणाको सुनकर एक बुद्धिमान् पुरुपने उसको तोलना स्वीकार किया। हाथीको नौकापर चढाके एक तालावमे ले गए और हाथीके वजनसे नौका जितनी (जहाँतक ) पानीमे डूबी थी वहाँतक रेखा खींच दी गई, फिर हाथीको नौकासे बाहर कर उसमें बडे २ उतने पत्थर भर रक्खे जितनेसे नावका रेखांकित भाग इब जाय। इतना करनेके वाद उन पत्थरोंको तोललिए और हाथीका भी उसके अनुसारही तोल बता दिया गया। राजा उसकी इस बुद्धिमानीपर वडा प्रसन्न हुआ तथा अपने सब मन्त्रियोंमें उसको प्रधान- मन्त्रीका पद दे दिया। १० घण-भंडन ( अकीर्ति )का उदाहरण इस प्रकार है-जैसे एक आदमी राजाका बहुत मुंहलगा हुआ था, उसके पास राजा अपनी रानीकी तारीफ किया करता। एकदिन राजाने कहा कि मेरी रानी पूर्ण चतुर व आज्ञाकारिणी है। मुंहलगेने कहा-महाराज! आज्ञाकारिणी तो होगी किन्तु अपने मतलबके लिए। आपको यदि शंका हो तो कलही परीक्षा करके देख लीजिए, रानीजीसे कहिए कि मैं एक नवीन रानी बनाना चाहता हूँ और उसीके लडकेको राजपद दूंगा, मेरी यह इच्छा तुमको पसंद हो तो मै ऐसा करता हूँ। राजाने इसी तरह दूसरे दिन रानीसे कहा। रानीने कहा-देव। अगर आप दूसरा सम्बन्ध करना चाहते हैं तो भले करिये, किन्तु राज्यके उत्तराधिकारी तो वही रहेंगे जो रहते आए है, इसमें दखल नहीं हो सकता। इस बातपर राजा कुछ मुस्कुराया । जब रानीने आग्रहपूर्वक मुस्कुराहटका कारण पूछा तो मालूम हुआ कि अमुक मुंहलगेने जो बात कही वह सत्य निकली। सब अपने मतलबकी आज्ञा पालती हैं। रानीने क्रुद्ध होकर उस मुंहलगेको देशनिकालेका दण्ड दे दिया। अब तो वह चिन्तामें पडा और सोचने लगा कि क्या करना चाहिए? आखिर बुद्धिसे एक उपाय निकाला। बहुतसे जूतोंकी एक बडी गठडी बनाली और गठडी लिये रानीसे मिलने गया। वहाँ जाके बोला कि देवि ! अब मैं देशान्तर जा रहा हूँ। रानीने कहा- अरे! यह जूतोंकी गठडी किसलिये उठाली है ? वह बोला देवि! इन जूतोंसे जहाँतक जा सकूँगा जाऊँगा व आपकी अकीर्ति फैलाऊँगा । रानीने अपवादके मयसे तुरन्तही बहिष्कारके हुक्मको रद्द करवा दिया और उसे रोकलिया । यह उस मुंहलगेकी औत्पत्तिकी बुद्धि हुई। ११ गोल-गोलकीका उदाहरण, जैसे-किसी बालकके नाकमें लाखकी एक गोली घुसगई थी। जिससे बालकके मांबाप अत्यन्त आतुर हो गए और उसको एक सुवर्णकारके पास ले गए। सुवर्णकारने अपने बुद्धिबलसे लोहमय एक बारीक शलाकाके अग्रभागको आगमें तपाकर उससे धीरे २ १ यहां टीकागत उदाहरण अश्लील होनेसे कुछ परिवर्तनके साथ दिया गया है। -सम्पादक १८ भीमसन्दीसूमम् सायमानीपूर्वक उस गोष्ठीको थोडीसी गरम करके सर्वया निकास ली। यह सुपर्णकारकी श्रीस्पसिकी पुदि तुई। ११ संभ-स्तम्म-का उदाहरण, जैसे-किसी योग्य मन्त्रीकी तलाश पक रामाने शाहरके बटे साठायके बीच एक स्सम्म लगयाया और पसी पोपणा करयाइ कि जो किनारपर सटे धोकर इस स्तम्भको होरीसे बापदगा उसका राग्यफी मोरसे लास रुपये इनाम मिलगे।इस मकारकी घोषणा सुनकर एक बुदिमाम् पुरुपन येसा करना कपूस करलिया। उसने किमारपर पक कील पदयावी तथा दोरीको उससे बांधकर पारों किनारे सोरीको लिये पुए एम आया । इससे यह मायका स्तम्म चोरीसे भमया । उसकी पुदिमसापर प्रसन होकर रामा मी उसको अपना मी पनालिया। यह उम पुरुपकी स्तम्भवन्धनकी श्रीत्पत्तिकी पुदि । ११ उग-मुद्रके (पालकोका उदाहरण मैसे-किसी मगरम अतिकुरास को एक परिमानिका रहती थी उसमे राजाक पास यह प्रतिज्ञा की कि में मपाल कर सकती है। मुझे कोई भी फलामें परामित नहीं कर सकता ।स पर राजाने पोपमा करया दी कि अमर कोई अपनेको भेट फलाकार समतता होता कलामें इस परिमानिकाको जीत स मैं उस बात इनाम दूंगा। मिशाके ति एमत हुए किमीशुस्तकम पोपणा समी और राजासे मियेवम किया कि पया में परिवामिकाको एरा दूंगा। किन्तु अपरापकी क्षमा मिलनी चाहिये। रामामे उसका एली एमागत ली। इसपर परिवामिका मुह पमाती गुरं पोती कि पद पाटामा है मुन्ने शासक या जीतगा। परिवाजिकाके पसा कहनपर धरुपम अपनी एंगोट हाली और ममममासे सस्प य भनेकविध भाभुत आमन कर निमाय फिर परिणामिकामे पोरा कि अप आप अपनी सस्ता गिटायमीमा मुपाम भासम भारि दोम पाहिए ऐगा फरनेम भममर्प परिणाजिरा दार मानगर लखित दो पर पठी गई। लोगोंने शासकी जीत पारित की यद उसकी भीत्पत्तिकी बुधिई। १० मग्ग-मार्म-का गादरण, असे कार्य पुरुप अपनी मायाका कर पाहना पूगर गोप माग्दा था। पर्म किमी जगददारीरपिन्ताक लिए जगभर गरी पीर पर माफर मिपारण मे समी। सनदीम एक पET पदमपा प्रपा पुरुपक सीन भात पा मुगए AT पग गलाग भाकर पादपरमार होगा। नर पर मामानी पिता निपारपरमादमाग ता अपने Anी म्पनीका पादमपर जानी। पर उसको पाग भागार पुरुषपदा नि पदक in मराणा पबमार 1ran गारमि-पास औत्पत्तिकी बुद्धिके उदाहरण तुम्हारे पास आना चाहती है, इसलिए वाहनको जल्दी चलाओ। पुरुषने वैसाही किया। इधर वह स्त्री रोती चिल्लाती हुई पीछे पीछे आने लगी। उसके आर्तस्वरको सुनकर वह पुरुष भी विचारमूढ बनगया और वाहनको धीरे २ चलाने लगा। तब उस मनुष्य स्त्री व व्यंतरीका परस्पर कलह शुरू हो गया, गांवतक दोनों लडती झगडती आई । गांवमे आकर दोनोंने न्यायालयमें फरियाद की और अभियोग चला । न्यायाधीशने पुरुषसे पूछा कि तुम्हारी स्त्री कौन है? किन्तु वह निर्णय नहीं कर सका, तव न्यायाधीशने अपने बुद्धिबलसे पुरुषको दूर हटाकर स्त्रियोंसे कहा कि तुम दोनोंमेसे जो पहले अपने हाथसे इसका स्पर्श करेगी उसीका यह पुरुप होगा, दूसरीका नहीं। व्यंतरी इस निर्णयपर बहुत प्रसन्न हुई और तुरंतही दिव्य भावसे हाथको फैलाकर पुरु- षका स्पर्श करलिया। अधिकारियोंने सत्य समझकर व्यन्तरीसे कहा कि तुम इसकी असली स्त्री नहीं हो, तुमने अपनी दैवी मायासे इस पुरुषको छला है, अब जाओ। यह पुरुष इसी मनुष्य स्त्रीका है। ऐसा कहके उस पुरुषको मनुष्य स्त्रीके साथ करदिया । यह न्यायाधीशकी औत्पत्तिकी बुद्धि है। १५ इत्थी-स्त्री-का उदाहरण इस प्रकार है-मूलदेव और कंडरीक नामके दो मित्र कहीं साथ जा रहे थे। इधर कोई अन्य पुरुष अपनी भाके साथ उसी मार्गसे जाने लगा। दूरमें रहा हुआ कंडरीक उसकी स्त्रीके रूपको देखकर मुग्ध होगया, उसने मूलदेवसे कहा कि अगर इस स्त्रीसे तुम मुझे मिलाते हो तो मैं जीऊँगा, नहीं तो मैं मरता हूँ। तब मूलदेव बोला कि मित्र ! घब- राओ मत, मैं जरूर तुमको इससे मिलादूंगा। ऐसा विचारकर दोनों जल्दीसे लक्षित न हो इस प्रकार दूर चले गए। कंडरीकको एक वनकुंजमें बिठाकर मूलदेव स्वयं रास्तेपर आके खडा रहा, पीछेसे जब वह पुरुष स्त्रीके साथ वहाँ आया तब मूलदेवने कहा-भो महापुरुप ! इस वनकुंजमें मेरी स्त्रीको प्रसव हुआ है अत. क्षणभरके लिए तुम अपनी स्त्रीको वहाँ भेजो। उसने स्त्रीको जानेके लिए कह दिया वह कंडरीकके पास गई और कुछ समय ठहरके चली आई, यह मूलदेवकी औत्पत्तिकी बुद्धि हुई। १६ पह-पतिका दृष्टान्त, जैसे-किसी स्त्रीके दो पति थे, और वह दोनों- पर प्रेम करती थी। लोगोंको आश्चर्य होता था कि यह दोनों पतिको कैसे प्रसन्न रखती है। राजाने भी परम्परासे यह बात सुनी और आश्चर्यपूर्वक मंत्रीसे पूछा। मंत्रीने कहा देव! ऐसा नहीं हो सकता, इसमें कुछ विशेष कारण मालूम पडता है। राजाने कहा-वह कैसे मालूम होगा? मंत्री बोला- महाराज ! इसका रहस्य जिस प्रकार जल्दी मालूम हो सके ऐसा यत्न करूँगा। एक दिन मंत्रीने उस स्त्रीको लेख भेजा, उसमें लिखा था कि तुम्हारे दोनों पतियोंको दो गाँव में भेजो। एकको पूर्वकी ओर व दूसरेको पश्चिमकी तरफ अमुक गांवमें, साथही उनको यह कह देना कि उसी दिन पीछे घर चले आवे।

। मीममनीलम मंत्रीका हुक्म पाकर उस स्त्रीने जो अपना अधिक मिय था उसको पमिमकी भोर ममा और पम प्रेमवाले को पूर्णकी ओर। उसके आते आते दोनों समय पूर्ण सामने होता था। मंत्रीने इसपरसे मिर्णय किया कि पगिमकी ओर भेजा गया अधिक प्रेमपात्र है और पूधकी ओर मेजा हुभा इससे कम प्रिय है। राजासे जब उक्त निर्णय सुनाया तो उसमे स्वीकार नहीं किया तथा बोसा कि किसी पकको पूर्वमें भीर दूसरेको पश्चिममें भेजना अनिवार्य था क्यों कि मुफ्म ऐसाही था इसलिये इससे कछ विशेषता नहीं समझी जा सकती। सव मंत्रीमे फिर संख मेजकर कहलाया कि तम्हारे दोनों पतिको एकसाय उन गांवमि मेमो । स्त्रीने सादी किया। मनीमे फिर पो आवमी उस पाईके पास को जो एकसाथ दोनोंका कुशस समाचार उस पाईको आकर समा पये, पोडी पूर जाकर दोनों पकसाय भाए और तम्हारे पोनों मर्ताभोंको कुछ पीडा होती है पेसा कनके पाईको दुष्ठाने लगे तब घर मदवस के अकुशल मियेक पुरुपसे पोठी जी। यह तो समादी ऐसे रहते है, दूसरे बतुत कोमल महतिक होनेसे आतुर दंग रससिए मैं उनकी तरफ जाती हूँ ऐसा कर यह उपर गई । सबर पाकर मंत्री रामासे सारा हाल निषेवन कररिया जिससे राजा उसकी पुरिमत्तापर पात उस हुआ। यद मग्रीकी औत्पत्तिकी बुदि हुई। १७ पुसे-पुष-का वयात इस प्रकार है-पक महामनके पोखियाँ धी जिनमें एक पुपयती श्रीर पूसरी भाषा थी। किन्तु उस बालकका या भी अरछा प्यार करती थी इससे उस पासकको यह निग्रय नहीं हो सका कि मरी असती मा कीन है। कुछ कालके पार जब यह महामन दोनों त्रिय सया पुषको सकर परपश गया भीर मावेही मरगया तब दोनों खियाम पुनके लिये कारद होने लगा, पक पोसी कि यह एका मेरा है अतः घरकी स्वामिनी में है। सरी बोसी-भरी। हकीम है। पद लटका तो मेरा सहिप पदग्यामिमी में है। इस प्रकार वोमा कसद पाते बात रामसमें गई मतीन दिवससे इसका निर्णय करना पादा, भीर अपने आवमीको दुखाकर कदाकिमक सप पनको साकर दो भाग बाट यो वपमेही दरयतसे साके के भी पा दिस्म करतो फिर पानोका आपा ११ग । ममीकी इस बातको एकर पुरवी मी मो मस्तरपर जैसे किसीमे वनमदार किया हो उस तरह ग्याकुल दोकर बोसी कि महाराज! मुत पुष मदीपादिप पद उसका उसीकारा पिम्त पाटो (मारो) मत भले यदीसरी बाई घरकी माठि निमदासमे पुण्ममदी ६ में वो दूसोक पहा नौकरी करती भी इम पास्का मीवित पर अपने मनमें मतोप मागी, किन्तु पिना के परो ममदीद गती। मरीन एण नदी कदा र मीने पुमाना पारो गरी माता समझकर निर्णय लिया कि पद पुषमीका ६ मत परी रपामिनी पदी दोगी । तपा परीको तिरस्कार कर मिकाष्ठ पीपद समापही भीत्पतितीपुचि।

औत्पत्तिकी बुद्धिके उदाहरण ७१ टीका गाथार्थ ७२-मधुच्छत्र १७ मुद्रिका १८ अङ्क १९ नाणक २० भिक्षुक २१ चेटक (बालक) २२ और निधान २३ शिक्षा २४ अर्थशास्त्र २५ वडी इच्छा २६ सौ हजार २७। इन सबोंके दृष्टान्त निम्नप्रकार हैं, जैसे- १७ महुसिक्थ-मधुसिक्थ-मधुच्छत्र-किसी पहाडी छोटी नदीके दोनों किनारेपर कुछ धीवर (मछुए) रहते थे। दोनों (किनारेवालो) में जातीय सम्बन्ध होनेपर भी आपसमे मनमुटाव था। इसलिए दोनों किनारेवालोंने अपनी २ स्त्रीको पर तीर जानेकी मनाई करदी थी। किन्तु धीवरलोग जब अपने २ व्यवसायके लिए बाहर चले जाते तब उनकी स्त्रियाँ एक दूसरेके यहाँ आती जाती थी। एक धीवरीने एकदिन उस पारसे अपने घरके पास कुंजमें मधुच्छत्र देखा । दूसरे दिन उसका पति जब मधु खरीदने लगा, तब उसकी स्त्रीने कहा कि मधु मत खरीदो चलो, मैं तुम्हे अपने घरके पासही मधु- च्छत्र दिखा देती हूँ। ऐसा कहकरके वह अपने पतिको साथ लेकर छत्र दिखाने गई । किन्तु ढूंढनेपर भी उसे मधुच्छत्र दिखाई नहीं पडा, तब वह विस्मितसी होकर बोल उठी कि सामनेके तीरसे वरावर दिखता है वहां चलो देख आवे । धीवर भी उसके साथ दूसरे किनारे गया, वहां उस स्त्रीने निषिद्ध घरके पासही खडी रहकर मधुच्छत्र दिखाया। धीवरने अनायासही यह समझ लिया कि मेरी स्त्री इस निषिद्ध धरमें आती जाती है। यह उस धीवरकी औत्पत्तिकी बुद्धि थी। १८ मुद्दिय-मुद्रिका-का दृष्टान्त-किसी नगरमे एक पुरोहित सर्वत्र सत्य- वादीके नामसे प्रसिद्ध था, लोगोंको विश्वास था कि यह समय बीत जाने पर भी दूसरोंका निक्षेप (ठेव) नहीं पचाता किन्तु पीछे दे देता है । इसी विश्वासपर एक गरीब आदमी उसके पास अपनी ठेव रखकर देशान्तर चला गया। विदेशमे बहुत समय बिताकर जब वह अपने घर जाने लगा तो पुरो- हितजीसे अपनी ठेव मांगी। किन्तु पुरोहितने एकदम अस्वीकार कर दिया व कहने लगा कि तुम कौन हो ? तुम्हारी ठेव कौनसी व कैसी थी? इस पर वह गरीब अपनी ठेव गुम होते देख बहुत चिन्तातुर हुआ। दूसरे दिन राजाका प्रधान कहीं बाहर जा रहा था। उसको जाते देखकर उसने कहा कि महानुभाग मेरी हजार रुपयोंकी नोली पुरोहितके पास रक्खी हुई है, कृपया वह मुझे दिलादो । बडा उपकार होगा। सारा हाल समझकर प्रधानको उसपर दया होगई। उसने राजासे कह दिया, तब राजाने ठेव रखनेवाले पुरोहितको बुलाया और कहा कि तुम्हारे यहाँ इसकी जो ठेव रक्खी हुई है, वह पीछे इसे लौटा दो। पुरोहितने जवाब दिया कि राजन् ! मैंने इसका कुछ लियाही नहीं तो देऊँ क्या ? इसपर राजा चुप रहगया। पुरोहितके घर लौट जानेपर राजाने उस ठेव रखनेवाले गरीबको पूछा कि सच सच बोल तूं उसके यहाँ किसके सामने व कब ठेव रक्खी थी? इसपर उसने देनेका स्थान समय व साक्षी बता दिए ।

भीमचमीत्रम् तब राजाने निर्णय करना चाहा और एकश्मिरस पुरोहित के साथ सहसेसमा शुरु किया। कीगकमसे अपनी और पुरोहितकी अंगूठी अपाठ करली। पुरोहितसे छिपकर उसकी अंगूठी पक भावमीको दी और उसके द्वारा पुरो हितानीको कहलाया कि पुरोहितजीने उस मरीषकी ठेवमें रक्सी हुई मोसी (पेठी) मांगी है और सबूतके सिप यह अपनी अंगूठी मेभी है। इसपर विश्वास कर पुरोहितानीने मोठी भेभपी । रामाने दूसरी भनेक मोतिभाक बीच उस थैलीको रसकर ठव रखनेवासेसे अपनी मोठी हनेको कहा। उसने पहचानकर अपनी मोसी उठासी । तब राजाने उसे सरचा समझकर भेजा मेकी भाचा पी भीर पुरोहितको कठोर पा दिया। पहराबाकी औत्पचिकी बुदिई। १९ अंक-मका बहान्त, मैसे-पक भादमीने किसी शेठके पास हजार रुपयोंसे भरी एक मोठी रस्सी। शेठने नोसीके नीचेका हुछ माग काट कर उससे भससी रुपये निकाल हिए तया बदले में नकली रुपये सतमें भरके मते भामको सिलाकर योका स्यों रसादिया। पीछे सब ठेष रसनेवालने मपनी चीन मममी तो शेठने उसे मोली दी। उसने नब सोछकर देती तो पता चला कि असम रुपये गुम हैं। आखिर उसने राजाके पास भभियोग पहाया। न्यायाधीशमे पूण कि तम्हारी मोहीमें कितने रुपये रखे जा सकते हैं। उसने अपाच दिया-हमार रुपये । न्यायाधीशाने परीक्षा की तो जितना भाम पस मोसीका कटा था उतनही रुपये पाकीचे थे शेप सभी समामप।इसपर न्यायाधीशको उसकी पात सरची मालम परी । अभियुक्त से अनुशासनपूर्वक उसके रुपये रिसादिप । वह सुशी पर चला गया। यह न्यायाधीशकी भौत्पत्तिकी पुरि हुई। २० नाण-माणक-सान्त निम्न प्रकार है-कोई पछि किसी कोठक पास अपनी मोहरोसे मरी हुई एक पैठी रण पेशाम्तर गया। कुछ समय पीतनेपर थैली रखनेवासे इस शेठने पठीसे उत्तम सवर्णमय सुदामोंकी मिकालकर उतमीही संख्या में इसके कमकीमती-सोनेकी सदाएं उसमें मपी और पसी उसी तरह सीपी। को दिनोंक पारबह पछी रखनेवासा पषिद विवेपासे पर माया और शेठसे मपमी पैडी मामी। बौठने भी उसको पेशी देवी। उसने भी अच्छीतरख देखा तो धठी यही मादम हुई, किन्तु पर माकर जब उसको पोला तो पता पहा कि इसमें भसष्ठी सुवर्णमयाएँ भहीं है, मो मेरी पहले थी उनकी जमह मकसी सवाएँ रक्सी हुई है। उसमे पोठसे माकर कारण पूछा तो शौठने जवाब दिया कि वमने मो मुझे खनेको दी थी पदी सी एमन पीपी है। मसली नकसी हम नहीं जानते। इसपर उसने म्यायालपमें फरियार की।म्पायाधीशने दोनों भाभियोक्ता व आभियुक्त-को मुसाकर उनके पयान सने। सनने पार पायाधीशने उस पपिसे प्रणा ।

। औत्पत्तिकी बुद्धिके उदाहरण. ७ कि तुमने शेठके पास थैली किस वर्ष व किस दिन रक्खी थी। उसने वह वर्ष व वह दिन बता दिया। फिर मुद्राओंपर बननेका काल देखा तो उसके बादका निकल आया। उसी समय न्यायाधीशने शेठसे कहा कि ये मोहरे इसकी नहीं है क्योंकि नवीन डाली हुई है, अतः इसकी मोहरे जो असली है वे इसे देदो। यह न्यायाधीशकी औत्पत्तिकी बुद्धि थी। २१ भिक्खु-भिक्षु-दृष्टान्त भावना जैसे-किसी साहुकारने एक मठाधि- पति भिक्षुकके पास एक हजार मोहरे ठेवरूपमे रक्खीं। कालान्तरमे जब वह भिक्षुकके पास मांगनेको गया तो भिक्षुक आजकल्हका बहाना करने लगा। तब साहुकारने कुछ जुआरियोंसे मैत्री की और भिक्षुकसे अपनी ठेव लेनेकी बात कही। जुआरियोंने कहा कि हम तुम्हें भिक्षुकसे सब रुपये दिलादेगे। ऐसा कहकर वे लोक किसी गेरुए वस्त्रवाले साधुका वेप बनाकर एक बडी सोनेकी बूंटी लिए उस भिक्षुकके पास गए और बोले कि हम लोग यात्रामे जाते हैं, आप बडे विश्वासपात्र हैं इसलिए यह सुवर्ण सूंटी हम आपके पास रखजाते हैं। इसप्रकार ये कह रहे थे इसी बीचमे वह साहुकार आगया और बोला महाराज। मेरी रकम दे दीजिए। भिक्षुकने सुवर्ण खूटीकी लालचसे उसी समय उसकी ठेव-रकम देदी। वे जुआरी कुछ समय विचारकर बोले- महाराज। कुछ यहाँका जरूरी काम आगया है इसलिए अभी हमको नहीं जाना है ऐसा कहके वे सुवर्ण खूटी लिए चले गये । यह जुआरीकी औत्पत्तिकी बुद्धि हुई। २२ चेडगनिहाणे-चेटक और निधान-दृष्टान्त इस प्रकार है-किसी गांवमें परस्पर भिन्न स्वभाववाले दो पुरुष रहते थे। संयोगवश दोनोंकी विशेष परिचयसे मैत्री होगई । एकदिन एकको किसी जगह निधान प्राप्त हुआ। उसी समय मायावी मित्रने उससे कहा कि मित्र ? आजका मुहूर्त ठीक नहीं है कल्ह शुभमुर्तमें अपने इस निधानको लेगे। दूसरेने सरल मनसे वैसा स्वीकार करलिया। इधर मायावी मित्रने रातमे उस जगह आकर निधान लेलिया और वहाँ कोयले डालदिए । दूसरे दिन दोनों साथ आकर देखते हैं तो निधानकी जगह कोयले मिले । तब मायावी कपटपूर्वक रोने लगा, और बोला कि हा ! हम भाग्यहीन हैं जिसलिए कि देवने निधान की जगह हमको कोयले दिखाये । एक तरहसे उसने आंखे देकर हमसे छिनली हैं। ऐसा कहते हुए वह वारंवार दूसरेकी ओर देखने लगा। दूसरेने उसकी नकली चिन्तासे असलियत समझ ली और आकारको बदलकर कहा-मित्र! कुछ चिन्ता मत करो, गया हुआ निधान कुछ दुःख करनेसे नहीं आता, चलो अपने भाग्य ऐसेही हैं। इस प्रकार शान्त होकर दोनों अपने २ घर गए। इधर सच्चाईको प्रकट करनेके लिये बुद्धिवलसे दूसरेने उस मायावीकी लेप्यमय प्रतिमा बनाई और दो पालतू बन्दर भी रक्खे । प्रतिदिन प्रतिमाके हाथ शिर व स्कन्ध आदि अंगोंपर उन बन्दरोंके खाने योग्य वस्तुएँ रख देता और खानेके लिये बन्दरोंको छोड देता। १० प्रीममनीसूत्रम् भूख प्याससे पीरित बन्दर भी वहीं माफर उस मतिमा पेहपरसे मस्य पवाय लाया करते। को दिनसि उनकी पा शेती बन गई। एकदिन किसी पर्वको लेकर दूसरे मित्रमे मायावीके दोनों पुभोंको अपने पहाँ भोमनके लिए निमन्त्रण पिया बीर बरे प्रेमसे दोनोंको अच्छी तरह भोजन कराके उसपूर्वक यहीं कहीं दूसरी बमह छिपादिए । पूसरे दिन जब पासक नहीं आप तब मायावी मित्र उनकी खोज करने मित्रके यहाँ भाया और पूछा- पोनों हाके कहाँ है। वह बोला-मिः। 7 खेद है कि तुम्हारे पोमी पुष पनर हो मए । मायापी परमें मया तप पूसरे मित्रने उन पाह पन्वरोको खोल दिये वे किसकिसाएट करते आए और इसके अंगोंपर मा सगे वछ चाटने लगे।सपर दूसरा बोला-मित्रा देखिए ये आपके मति अपना मेम पुषववही दिखा रहे हैं। तब मायावी बोला-मित्र ! क्या मनुष्य भी तरका समें पन्दर दो सकते हैं। दूसरा बोछा-भाई। जैसे अपने कर्मक फेरसे मिभान कोपा होगमा पेसही तुम्हारे कर्मकी प्रतिकवतासे तुम्हारे पुत्र पर हो गए हैं। मायाधीने सोचा कि मही। इसने मकर मेरा निपान मान लिया है अप अगर पिस्माता तो रामकुममें समग होगा और पुत्र भी नहीं मिलेम, पेसा समझकर उसने निघामका सपहास काफर उसको भाषा हिस्सा बदिया। दूसरेने भी उसके पुम मिठा दिये। पटक और निधान विश्पक उसकी औस्पतिकी बुदि हुई। २५ सिक्ता प-सिम्स-शिम्पका पद्वान्त जैसे-भमुाम कुशा एक प्राचार्य किसी मगरमें भाया और छ पमियोंके पुमोको पटाने समा बालकोंसे उस कहाचार्यने बहुतसा पन प्राप्त कराठिया। इसपर शेठने सोचा कि बालकोनासको बहुतसा पन दिया है मतानब यह यहाँसे आवेगा तो इसको मारके सब पन लेना चाहिये। कलाबार्यन किसी तरह यह हाल मानखिपा भीर पूसरे भाव एप अपने पम्पुमोको पसी पर पी कि अमुक रातको मैं मोबर पिण्डोको नहीम गा (गिराखंगा। वम इनको लोमा। उनके स्वीकार कर लेमेपर कलाचायने प्रप्पके साथ गोवरके पिण्ण धूपमें सुखासिये। फिर शठक साकसि कहा कि अमुक तिषिपर्वम एम स्नाम व मरके साथ मीम मोबरफ पिणाको मिराते हैं, ऐसी हमारी कुलविधि। सपर बालकोंने भी कदा ठीक है, जैसी भापकरणहो। फिर कसाचायने उम पाठकोंक सायोगसे उस रात में मर्पक मोपरक पिणोंको नीमें किदिये। उपर मोपर पिण बम्पुओंने लिए। फिर कुछ दिनोंके पार उन पाठको शेठ आदिको कार सिर दणाणके परमात्र हिप हप कहाचार्य अपने मावको चला। शेठने भी ऐसा कि इसके पास तो कुछ नाही ६ फिर क्यों मारना। इसमकार उस कसाचार्यने तम धन पचा सिप । पए कलापार्यकी श्रीत्पत्तिकी पुरि थी।

औत्पत्तिकी बुद्धिके उदाहरण. ७५ २४ अत्थसत्थे-अर्थशास्त्रका दृष्टान्त, जैसे-एक शठको दो स्त्रियाँ थी, उनमें एकको पुत्र नहीं था और दूसरीको था, किन्तु विना पुत्रवाली भी उस लडकेको बहुत प्यार करती थी, जिससे वह बालक दोनों मांमे कुछ भेद नहीं समझता । एकवार वह शेठ व्यवसायके लिए घूमता हुआ श्रीसुमतिनाथ स्वामीकी जन्मभूमि हस्तिनापुरमें पहुंचा और संयोगवश यहीं मरगया तब दोनों पत्नियोंमें सम्पत्तिके लिए कलह होने लगा, एक कहती कि यह मेरा पुत्र है अतः गृहकी स्वामिनी मैं हूँ। दूसरी बोलती-नहीं गृहस्वामिनी मैं हूँ क्यो कि यह मेरा पुत्र है। विवाद बढते २ राजकुलमें गया। महारानी मङ्गला- देवीको जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने दोनोंको अपने पास बुलाकर कहा कि कुछ दिनोंके बाद मुझको पुत्र होगा और वह बडा होकर इस अशोकवृक्षके नीचे बैठा हुआ तुम्हारा न्याय करेगा, तबतक तुम दोनों सुख- पूर्वक यहाँ रहो। और अपने पुत्रको हमारे अधीन कर दो, न्याय होनेके बाद जिसका होगा देदिया जावेगा। जिसका पुत्र नहीं था उसने यह सहर्ष स्वीकार कर लिया। इससे महारानीजी सत्य समझ गई और पुत्रवालीको पुत्र दे दिया तथा गृहस्वामिनी बना दी । झूठा वाद करनेसे दूसरी तिरस्कारपूर्वक हटा दी गई। यह महारानीजीकी औत्पत्तिकी बुद्धि हुई। २५ इच्छा य महं-इच्छा महत्-का दृष्टान्त, जैसे-एक शठानकि पतिका देहान्त हो गया। जव व्याज आदिपर दिए हुए उसके रूपये लोगोंने देने बन्द कर दिये, तब उसने अपने पतिकै मित्रसे रूपये वसूल करानेको कहा। उसने जवाब दिया कि यदि प्राप्त द्रव्यमेसे मुझे भी कुछ दो तो मैं वसूल करा सकता हूँ। शेठानीने कहा-जैसी तुम्हारी मर्जी हो मैं वैसाही करूँगी। इसपर उसने लोगोंसे सब रकम वसूल कर ली और उसका थोडा भाग शेठानीको देना चहा । किन्तु शेठानी इसपर राजी न हुई और उसने राजकुलमें फरियाद की। तब अधिकारियोंने वसूल किया हुआ सब द्रव्य मॅगाकर दो भागोंमे विभक्त कर दिया, एक भाग बड़ा और दूसरा छोटा । फिर वसूल करनेवालेसे पूछा कि तूं कौनसा भाग लेना चाहता है ? वह बोला-बडा भाग। तब न्यायाधीशने अक्षरार्थका विचारकर कहा कि बडा भाग इसका भी दूसरा हिस्सा तुम्हारा है, इस प्रकार न्यायाधीशने मामला निपटा दिया। यह अधि- कारिओंकी औत्पत्तिकी बुद्धि थी। २६ सयसहस्से-शतसहस्रका दृष्टान्त इसप्रकार है-किसी परिव्राजकके पास चांदीका एक बड़ा मांड था और साथही उस परिव्राजकमें यह भी खुबी थी कि जिसको वह एकवार सुनलेता उसे धारण किये विना नहीं छोडता । इससे बुद्धिका उसे अहंकार होगया और उसने ऐसी घोषणा करदी कि जो कोई मुझे कुछ अश्रुतपूर्व बात सुना दे उसको मैं आपना यह रजतभांड दे दूंगा। किन्तु उसको कोई भी अपूर्व बात नहीं सुना सका क्यों कि सुन भीमसन्दीमम् सेमेके बाद अपनी पारणाशक्तिके पसपर पर मनानेवासेको ज्योका स्या सना प्ता भीर कहता यह तो मैंने पहले वही सनी है। किसी सिरपुत्रने यह प्रतिमा समी और कहा कि में परिव्रामकजीको भपूर्व पात सुना दूमा, पाते कि या प्रतिज्ञापर वन र । यह बाप्त राजाके कानतक पहुंची और मिर्णयके लिप राममबनही स्थान पुना गया। हजारों भावमी पूर्शकके रूपमें कटे होमप, परिणामकमी भी वहीं आए और रामाके सामने कार्यक्रम घाल हुमा।सियामने आमेका श्लोक पठा- गाहा-सुज्म पितामह पिउणो, धार अणूणयं सयसहस्स। जा सुयपुटर विजउ, अह न सुर्य खोरयं देस ॥१॥ जिमका माव यह है कि-तेरा पिता मेरे पिताके एक खास रुपये भारता है अमर पहले सुना है तो यह मध्य कामो अमर महीं सुना है तो प्रतिक्षाके मनुसार सो घोषीका मागहो। इसपर परिमाजकको पपमित होकर पह मोर पेमा पाप सियएमकी भीत्पत्तिकी बुरिधी। ये औत्पत्तिकी एरिक बाहरण समाप्त हुए । अब आमे जाकर शास कार मयिकी दुनिकी चर्चा करते हैं- मूट-गाहा-७३ भरनित्थरणसमस्या, तिवग्गसुत्तस्थगहियपेयाछा। उममोलोगफलवई, विणपसमुत्था इपर पुची ॥१॥ छापागापा-७३ मरनिस्तरणसमर्था, त्रिवर्गसूचार्यगृहीतपेयाला (प्रमाणा) उमयलोकफलवती, विनयसमुस्था भवति पुति॥१॥ टीका-कठिन कार्यभारके निस्तरण-निर्वाह करनेमें समर्थ, तथा पर्म. मर्य, कामरूप पिवर्गक वर्णन करनेसे घर मीर भर्यका प्रमाण वा चार पाप करनेवाली तथा मो इस सोकभीर परसाक पोमि फम्मामिनी है वह विनपसे होनेवाली दुरि । अर्थात विनयसे उत्पबाई शिकठिनसे कदिन मलेमको भी सामानवाही भौर नीतिपर्म व मशाम सारको पाहण करनेवाली होती है। इसीलिए यह पोनों लोकों में सहायिनी है। इसपर कुछ उपाहरण पिसारी है- निमिचे'१ अत्पसत्ये २ अ, हे ३ गणिए ४ भब ५ था वैनयिकी बुद्धिके उदाहरण अस्से ६ य । गद्दभ(ह) ७ लक्खण ८ गंठी ९ अगए १० रहिएं ११ य गणिया १२ य ॥२॥ छाया-गाथा-७४ निमित्त १ अर्थशास्त्रे २ च, लेखे ३ गणिते च ४ (उदा- हरणानि) कूपाश्वौ च ५, ६ गर्दभ ७ लक्षण ८ ग्रन्थ्य गदाः ९।१०, रथिकश्च ११ गणिका १२ च ॥ २॥ टीका-गाथार्थ-७४ निमित्त १, अर्थशास्त्र २, लेख ३, गणित ४, कूप ५, अश्व ६, गर्दभ ७, लक्षण ८, ग्रन्थि ९, अगद १०, रथिक और गणिका ११- १२ इन सब उदाहरणोंका कथारूपसे विशेष स्पष्टीकरण नीचे करते है- १ निमित्ते-निमित्त का दृष्टान्त जैसे-किसी नगरमें एक सिद्धपुत्र अपने दो शिष्योंको निमित्तशास्त्र पढा रहा था। शिष्योंमें एक जो विनय- सम्पन्न था वह गुरुके उपदेशको यथावत् बहुमानपूर्वक स्वीकार करता और बाद अपने चित्तमें विचार करते हुए जहाँ भी सन्देह हुआ तत्काल गुरुके पास जाकर विनयपूर्वक पूछ लेता। इस प्रकार निरन्तर विनय और विवेकके साथ शास्त्र पढते हुए उसने तीव्र बुद्धि प्राप्त कर ली। दुसरा इन गुणोंसे रहित होनेके कारण केवल शब्दज्ञानही मिला सका। एक दिन दोनों गुरुके आदेशसे किसी पासके गाव में जा रहे थे। मार्गमें किसी बडे जन्तुके चरण चिन्ह दिखाई देते थे। विनयी शिष्यने दुसरेसे पूछा कि बन्धु ! ये किसके पाँव है। उसने कहा इसमें क्या पूछना ? ये साफ हार्थाके पॉवके चिन्ह दिखते है। विनयीने कहा-नहीं ऐसा नहीं हो सकता, ये हथिनीके चरणचिन्ह है, और वह हथिनी बांयी आंखसे काणी है तथा उसपर किसी बडे घरकी सधवा स्त्री बैठके जा रही है व एक दो दिनमेंही उसको बालक पैदा होगा क्योंकि उसके मास अब पूरे हो गये हैं । विनयीके ऐसा कहनेपर दूस- रेने पूछा-अजी ! यह किसपरसे समझते हो विनयी बोला-ज्ञानका सारही विश्वास होना है, चलो आगे इसका निर्णय हो जायगा । ऐसा कहके दोनों उस गांवमें पहूँचे । जातेही देखते हैं कि गांवके बाहर तालावके किनारे किसी रानीका डेरा है । और हयिनी भी बॉयी आंखसे काणी है। इसी बीचमें एक दासीने आकर मंत्रीसे कहा कि स्वामिन् ? राजाको पुत्रलाभ हुआ है, बधाई दीजिए । विनयीने ऐसा सुनकर दूसरेसे कहा कि क्यों बन्धु ? दासीका वचन सुना । उसने कहा-हाँ, तेरी सब बात सच्ची है। फिर तालावमें हाथ पाँव धोकर दोनों विश्रामके लिए एक वटवृक्षके नीचे बैठे। उधरसे मस्तकपर पानीका घडा रक्खे हुए एक बुढिया जा रही थी उसने इन दोनोंकी आकृति व प्रकृति देखकर सोचा कि ये दोनों कोई विद्वान् है। अतः इनसे पूछना चाहिए १ गणिया य रहिए य-त्ति-आ. म. वृत्तौ ।

भीमबनीमम् कि मेपशान्तरमें गया हुआ पुत्र का टोटमा। ऐसा सोचकर पास नई भौर ममतापूर्वक बने एगी। उसी समय मस्तकसे गिरकर घग सुकरी २ होगया तरन्त दसरा यह देखके बोझ उठा- मारा पूल पठेकी तय मरपया है। इसपर विनयीम कहा-मित्र पेसा मत कहो। इसका पुष अभी परपर भाया हुआ है और रियासे भी परोहा कि मा पर माओ अपमे चिरबिरे पुत्रका झंह रेखो। विनयीकी पातसे मसब हुई पुटिया उसको आशीर्वाद देती हुई घर भई और उसी समय परपर आप हुप पुसको देखा। पुनके प्रणाम करनेपर आशीर्वाद देकर दुरियाने मैमित्तिकका कहा हुआ सब वृत्तान्त पुषसे का सनाया। फिर पुत्रको पाकर छ रुपये व परपुमल पुरिया विनयीको अर्पण किये । तव दूसरा सोचने लगा कि-अहो! गुरुने मुझे महामही पाया है अन्पया अप्सा यह जानता है, पसा में क्यो नहीं मानता।। कार्य हो जामेपर दोनों गुरुके पास भाए। गुरु पर्शन करतेती विनयीमे अप्रति मोरे हुप शिरको ममाकर आनन्दासपूर्वक गुरुके घरमि प्रणाम किया। दूसरा ससम्मकी तरह योग भी विना नमे मात्सर्य भरता हुमा गुरुके सामने खग रहा। तब उससे गुरु मोठे-अरे! क्या माज मणाम भी नहीं फरता पद मोठा जिसको अच्छी तरह सिताये हो यह प्रणाम करेगा एम पक्षपाती गुरुको प्रणाम नहीं करते। गुरु वासे-क्या तमका मा नहीं पराया इसपर उसने पहलेका सर हास का सनाया। तब यहने पिनपीसे पूजा-पत्सा वमने यह सब कैसे जाना! कहो । पद पोसा-गुरुदेव ! मैंने आपकी रुपासे विमार करना घर किया कि हाथी के तो पाव दिसतेही है किन्तु विशेष मया । फिर उसकी सपुशंकाको देखकर निसय किया कि पे पपिनीके पाय हैं।क्षिण चाके सब इस साये हुए थेफिन्त पायी वामूक नदी, इसस पद समझा कि बोयी मोससे पद काणी है। सापारण मनुप्म दाधीकी सबारी नहीं कर सकता इससे मिसय किया कि इसपर राजकीय मनुप्प है। वृक्षपर लगे हुए मीत घनके भामसे सपना राणी और भूमिपर सपुशंका करनेका पार दाप रेक्के उठने से गर्भयती तथा राक्षिमपरण और दायपर अधिक मार पामेसे अस्पसमयमही पुषोत्पप्ति होगी पैसा तमसा । माया मन करतदी जा पा मिरफर गया तब मैंने सोचा फिनसे परेका मिमाग मिट्टी में भार पानी पानीमें मिटगया ६ पसे पवाको भी इसका पुत्र मिटना बादिप। विनयी सरकार मिवेकपूर्वक पामको सन परापायमे प्रेम प्रकट किया भोर रसका समझकी तारीफ की, फिर मणबोस परमासम हमारा बोप नदी या तेरावी पाप कि विचार मी करता दम तामारा समझाने मषिकारी विमर्श करमा तो तुम्हारा कार्य पिमपी शिशप्पकी पद निमित्त विपपमें नापिकी धिरें। १आपसक-अरपो पिपय मकस्पक मैनीका सात वैनयिकी धुद्धिके उदाहरण ७९ ३-४ लेहे-लिपिज्ञान और गणिए-गणितज्ञान में कुशलता भी विनयजा बुद्धि है। ५ कूध-कूप भूमि विज्ञानमें कुशल ऐसे पुरुपका उदाहरण, जैसे-किसी खोदकार्यमें कुशल पुरुपने एक किसानको कहा कि यहाँ इतनी दूरमे पानी है । अब उतनी जमीन खोदलेनेपर भी पानी नहीं निकला तब किसानने उससे कहा पानी तो नहीं निकला तब उसने कहा-बाजूकी भूमिपर जरा (थोडा ) एडीसे प्रहार करो। किसानके ऐसा करतेही पानी निकल आया । यह उसकी वैनयिकी बुद्धि हे । ६ अस्से-अश्व-के ग्रहणम वासुदेवकी बुद्विका उदाहरण, जैसे-किसी समय बहुतसे घोडेके व्यापारी घोडे बेचनेको द्वारिका गये । उस समय यदुवंशी राजकुमारोंने सब आकार प्रकारसे बडे घोड़े खरीदे, वासुदेवने लक्षणसम्पन्न एक दुर्बल घोडा खरीदा। कुछही दिनोंमे वह घोडा सब हम पुन घोडोंको पीछे चलानेवाला और कार्यक्षम सिद्ध हुआ। यह वासुदेवकी विनयजा चुद्धि थी। ७ गद्दभ-गर्दभका दृष्टान्त, जैसे-किसी राजपुत्रको युवावस्थाके प्रारम्भ मेंही राज्यपद मिला था, इससे वह सभी कार्याम युवावस्थाकोही समर्थ मानता था। इसीलिये उसने अपने सैन्यमें भी सब युवकोंकोही भर्ती किये, तथा वृद्धोको निकाल दिये । एक दिन सैन्य लेकर राजा कहीं युद्धको गया हुआ था, जब कि अकस्मात् मार्ग भूलजानेसे किसी अटवीमे पड गया और पानी नहीं होनेसे साथके सभी लोग प्यासके मारे व्याकुल होगए। तब राजा भी किंकर्तव्यविमूढ बन गया। उस समय एक सेवकने कहा-देव ! वृद्ध पुरुषकी बुद्धिरूप नौकाके सिवाय यह दुःखसागर पार नहीं किया जा सकता। अतः आप किसी वृद्ध पुरुषकी तलाश करें। इसपर राजाने सब कटकमे वृद्धकी तलाश की व घोषणा करवाई। वहाँ एक पितृभक्त सैनिकने छिपाकर अपने पिताको रख्खा था। वह बोला-देव ! मेरा पिता वृद्ध है, सुनकर राजाने उसे बुलाया और आदरसे पूछा-महाभाग ! मेरे सैन्यको इस अटवीमे पानी कैसे मिलेगा ! कहो, वृद्धने कहा-स्वामिन् ! कुछ गदहोंको स्वतन्त्र छोड दीजिए और जहाँ वे भूमिको सूंघे वहीं आसपासमें पानी है यह समझ लेवे। वैसाही किया गया जिससे कटकको पानी मिलगया और सभी लोग स्वस्थ होगये। यह स्थविरकी विनयजा बुद्धि थी। ८ लख्खण-लक्षण का दृष्टान्त, जैसे--पारसदेशीय एक गृहस्थ बहु- तस घोडोंका मालिक था। उसने किसी योग्य आदमीको घोडोके रक्षणके लिए रक्खा और उससे कहा कि इतने वर्षतक तुम काम करोगे तो दो घोडे तुमको परिश्रमके बदले दिये जायेगे । उसने भी यह स्वीकार करलिया। रहते २ स्वामीकी लडकीके साथ उसका बडा लह होगया । एक दिन उसने कन्यासे - ट. भीमचन्दीप पूछानन सब मोमें कौन दो पोरे सबसे अमले हैं। स्वामिकन्याने कहा कि यो तो सभी पोरे विश्वासपाम है, किन्द वो पोरे मो सों गिराए ये परे पात्यकिशनोंको सुनकर मी नहीं बरते वे उत्तम है। उसने उसी प्रकार परीक्षा की भीर उन पोरोको पहचान लिया। फिर वेतन देनेके समयमें स्वामीसे बोला कि मुझे अमुकर या मोरे वीलिए । स्वामी पोता-अरे। सरे अपर पारे । उनको से इन दोका मेकर क्या करमा पे मछे भी नहीं ६। लेकिम उसने यह बात नहीं मानी। तब शेठने सोचा-सको घरजमाई पनाना चाहिए, नहीं तो इन उत्तम घोको लेके यह चला गापमा । क्षणसम्पम घोडेसे कदम व अश्वसम्पतिकी भी वृद्धि होगी। पेसा सोप कर कन्याकी अनुमतिसे उन पोनोंका विवाह कर दिया। उसको घरममाई बनानेसे सक्षणसम्पम घोडे पचाविप गये। या अम्बस्वामीकी विनयमा पुरि थी। ९ मेटि-प्रन्थि के पार समझनेमे पादलिप्ताचार्यकी दुदिका सात इस प्रकार है-किसी समय पाटाठिपुरमै मुर नामका रामा राग्य करता था। परराम्फे रामान एकदिन कौतकक लिए उसके पास तीन चीमें भेगी । १ भूम-छिपी गांठपामा घर, २ समयाट्रि-सममामवाठी एकही. प. लालसे चिपकाया हुआ जिप शारका मा । रामाने अपने सभी परबारियोको पनीज रिसाइ किन्तु कोई भी नहीं समझ सका। तब राजाने पारसिप्त मामके आचार्यको पुसाकर पूछा-भगवन् । भाप इनके प्रन्पिहार जानत हो । भाषा पमे कहा-हों जामता है। ऐसा कहके उसी समय सूतको गरमपानीमें गाता तो उप्य पानीके संयोगसेस्तका मस इट मया और अम्त-प्रन्थिका भाग-पित पग। सकरी को भी पानी में गिराया जिससे माम हुभा कि मूल भारी है और मारी मामपरदीपम्धि होती है। फिर रखको भी मरम करवाया जिससे लाम्मका सब माम गठ मानेपर शार प्रकट पामया। रामा भावि समी दर्शक हम कीतुकको पनकर पुश हुए, फिर राजाने आपापस कदा-महाराज! आप भी को पंसा पर्याय कीतक करिय मिसको मैं षदों मेज सई। तब आचार्यने किसी फि पकप्रदेशमें एफ सण्ठ दाकर पदो रन मर दिए तया उस राणाको इस प्रकार सीपिया कि पिसीको एक्षित दी मही पो। फिर पर राष्ट्रक रामपुपोको सूपमा पती कि इसको भाम (फोग) कर इससे एन से। किन्तु बहुत प्रयत्न करनेपर भी उनको रनोंका पता नहीं चाहा। पद आचार्यकी यिनयमा पुरि थी। १० अपप-भगायकी विपापराममरिकापसाम्स जैस-किसी रामा राज्यका रामपक्षक रामानि चारों भोरम पर लिया। धोते सम्यसे नका HAVE करना अमाप ६, पेसा मोषका रामानं पानीम विषयोम करयामा शुरू किया। सभी छोम अपने १ पासका यिप सान समे। एक पैप पपमात्र वैनयिकी बुन्दिके उदाहरण ८१ विप लेकर राजाको भेंट किया। बहुत थोडा विय देखकर राजा वैद्यपर बहुत कुन्द्ध हुआ। तब वैध बोला-महाराज ! या विप सहस्रवेधी है, थोडा देखकर आप नाराज न होव। इसपर राजाने पूछा कि इसके सहस्रवेधी होनेमे क्या सबूत है। वैध बोला-देव । किसी पुराने हाथीको मंगवाइये में प्रयोग करके दिखाता है। उसी समय एक चूढा हाथी लाया गया और वैद्यने उसकी पुच्छका एक बाल उसाटकर उस वालसे हाथीके भिन्न २ अंगोमे विपप्रयोग किया। जिस २ अंगम विप फैलता गया उन २ अंगोको नष्टसा करदिया। तब वैद्य बोला-देव। हाथी विपमय होगया है अब जो भी इसको खायगा वह भी विषमय हो जायगा। इसमकार यह विष क्रमशः हजारतक पहुंचता है । हाथीकी मृत्युसे राजा कुछ उदास होकर बोला-क्या अब हाथीको जिला- नेका भी उपाय है। वैद्य बोलल-जरूर ! उसी बालके रन्ध-(खडे )में एक औषध दिया गया जिससे कुछी समयमं वह विपविकार शान्त होगया। हाथी अच्छा बनगया और राजा भी वैद्यपर सन्तुष्ट हुआ। यह वैद्यकी विन- यजा बुद्धि हुई। ११-१२ रहिए अ गणिआ-रथिक और गणिकाकी वैनयिक-बुद्धिम उदाहरण-स्थूलभद्रकी कथामें एक रथिकका आम्रफलाकी लम्बी तोडना और गणिकाका सर्पपकी राशिपर नाचना । ये भी विनयजा बुद्विके क्रमशः उदाहरण बताए गए हैं। मूल-गाहा-७५ सीआ साडी दीहं च तणं, अवसव्वयं च कुंचस्स १३ । निव्वोदए १४ य गोणे, घोडग पडणं च रुक्खाओ १५॥३॥ छाया-गाथा-७५ शीता साटी दीर्घञ्च तृणम्, अपसव्यश्च क्रोश्चस्य १३ । नीबोदकं १४ च गौः, घोटक-(मरणं) पतनश्च वृक्षात् १५ ॥३॥ टीका-गाथार्थ-७५ सूखी साडीको ठंडी कहने और तृणको लम्बा कहने, एवं क्रोंचका वामभागमे घूमनेसे आचार्यका वोध १३ । विषमय पानीसे जारमरण १४, व बैलका चोरी जाना, घोडेका मरण और वृक्षसे पतन १५ इनका भाव दृष्टान्तसे समझें। १३ साटी आदिका दृष्टान्त, जैसे- कुछ राजकुमारोंको एक कलाचार्य शिक्षण दे रहा था। राजकुमारोंने भी उपकारके वदलेमें बहुमूल्य द्रव्योंसे समय २ पर आचार्यका सन्मान किया। इसप्रकार अपने पुत्रोंके बहुमूल्य द्रव्य देनेपर १.निचोदए'-इत्यपि पाठान्तरम् । ११ भीमबन्दीस्त्रम् फुख होकर राजाने आचार्यको मरवाना चाहा। किसीतरह राजपुषोंको यह पात मालूम हो गई। उन्होंने सोचा कि विधापता होनेसे भाचार्य मी हमारे पिता अताइनको विपसिसे वमा सेना हमारा कर्चव्य है। योरी परके पार आचार्य मोमनके लिए भाए और पोती मांगने लगे। इसपर कुमारोंने सूती होते हुए भी कहा-साटी गीली है, सया द्वारके सामने एक छोटा बम सरा करके पोल-तम बात दीर्घ-सम्पा है । ऐसेही कोंचशिप्प पहले समा आचार्यकी दक्षिण ओरसे प्रदक्षिमा करता किन्तु अभी यह पाममामसे पूमने लगा। इसमकार कुमारोंके विपरीत कयन और कॉपके सामनमणसे आचार्य समझगये कि सभी मेरेस विकर (उलटे) केयस ये कुमारणी भकि मतार ई पेसा सोचकर राणाको बक्षित न हो इसपकारसे आचार्य पते गए । पद आचार्य और माराकी धिमयमा इशि हुई। १५ मिग्योदए-मीनोपक-कोतवालकी मृतकपरीक्षाफा व्याम्त असे- पात दिौसे किसी पपिसीका पति विदेशमै मया हुआ था। एक दिन उस पणिझ यपूने कामाठर होकर अपनी पासीसे किसी पुरुपको सामेक लिये कहा । दासी मी एक पुवायस्थासम्पम पुरुपको ले आई। फिर नाईले उसके मस्त केश आदिका संस्कार करवाया गया। रातमें उस पुरुषके साप पाठानी दूसरे मंजिलपर गई। कुछ समपके पार उस पुरुपको प्यास लगी। उसने तत्काल परसा हुआ मेपका पामी पीलिया। पानी स्यचा विपवासे सर्पसे एभा गया था अतः पानी पीनेके दूसरेदी क्षण धद पुरुप मरमया ।त माकस्मिक घटनासे भयभीत हो उस पणिग्यपूने रातके पिछले मागमे किसी शून्य वस्टम पद पाय ठेगाकर राया दिया । मातःकाल होतेदी लोगोंकी रति पदी तो दरमा कोतयालको सूचना पीई । उसन आकर देखा तो मालूम हुआ कि इस मृतपुरुपके नराकशादि पाटेदी समय पहले बमाप गये हैं। इसपर मायोसे पूणा मया उनमेंसे एकने कहा कि स्यामिम् ! अमुक शेठकीपासीके कदनेसासक मरा आदि मने पनाप दासीस भी इस बातकी जांच करके मेर उसया सिया। यद मगररर पिनयमा बुदि हुई। १५ गोणे योग-(मरण), पदम पश्यामओ-वसकी चोरी पोमा प्रदारसे पोका मरण भीर पुराने यब टनक कारण वृक्षस गिरमा इमफा अभिभाप मिनमाम्तमे ममझ जम किपी गोयम एक पण्पहीम पुरुप रहता था। एक पिन या अपन मिपम बस मांगकर दस पटाने गया। कार्य हो नानपर पापाक गमप पैसो पाम सागर छोरिया । मिस मोजम फररदा था जत पद उनके पाग नदी ममा यस मिमने बसका सिया है, इससिप मिमको पिना पदी पद पर पमा गया।बत भमापपाभीक कारण बाटेमे निकाका पनी गला गया भीरपारोन मीना पारको गुरासिया । मित्र बारे में मा नकर उगम मांगन एमा जित पद मागता पोंकि

वैनयिकी व कर्मजा बुद्धिके उदाहरण
वह तो चोरी हो गया था। तव न्याय करानेके लिए वह मित्र पुण्यहीनको
राजकुलमें ले चला। मार्गमें घोडेपर चढा हुआ एक आदमी सामनेसे आ
रहा था, अकस्मात् घोडेके चौंकनेसे वह उसपरसे गिर गया और घोडा
भागने लगा। ये लोग सामने आ रहे थे वास्ते उसने कहा कि घोडेको जरा
मारके वहीं रोक रखना । पुण्यहीनने उसकी बात सुनतेही घोडेके मर्मस्थलपर
एक प्रहार करदिया, घोडा कोमल प्रकृतिका होनेसे प्रहार लगतेही मरगया,
अब तो घोडावाला भी पुण्यहीनपर अभियोग चलानेको साथ हो गया,
जबतक ये लोग नगरके पास आये तबतक सूर्य अस्त हो गया, इसलिए रातमे
तीनोंही नगरके बाहर ठहर गये । वहाँ बहुतसे नट सोये हुए थे। उसी
समय वह पुण्यहीन सोचने लगा कि इस प्रकारके दुःखसे तो गलेमे पाश
डालके मर जाना अच्छा है, जिससे कि सदाके लिए विपत्तिका पिण्डही इन्ट
जाय । ऐसा सोचकर अपने वस्त्रका वृक्षपर पाश बांधके गलेमें डाल लिया।
अत्यन्त जीर्ण होनेसे वह वस्त्र भार पडतेही टूट गया, इससे वह बेचारा नीचे
सोये हुये एक नटके मुखियेपर जा गिरा, जिससे वह नट मरगया।
नटोंने भी उस पुण्यहीनको पकडा और सुबह होतेही तीनों पुण्यहीनको
लिए हुए राजकुलमें पहुँचे । राजकुमारने उन सबोंकी बाते सुनकर पुण्यहीनसे
पूछा । उसने दीनताके साथ कहा कि महाराज ! इन सबका कहना सच्चा है।
तव राजकुमार इसपर दया करके उसके मित्रसे बोले कि यह तुमको बैल
देगा किन्तु तुम्हारी आंखें उखाड लेगा, क्योंकि जिसी समय तुमने अपने
सामने बैल देखलिया उसी समय यह ऋणमुक्त हो गया। अगर तुम नहीं देखे
होते तो यह भी अपने घर नहीं जाता, क्यों कि जो जिसको कुछ देनेके लिए
आता है वह बिना उसको समझाये अपने घर नहीं जा सकता। इसने तुम्हारे
सामने लाकर बैल छोडा था अतः यह निर्दोष है। फिर घोडेवाले को बुलाया
और कहा कि हम तुम्हारा घोडा दिलायेगे, किन्तु तुमको अपनी जीभ काट-
कर इसको देनी होगी, क्यों कि तुम्हारे कहनेपरही इसने घोडेपर प्रहार किया
है, विना कहे नहीं, अतः तुम्हारी जीमही पहले दोषी होती है, उसको उखाड-
कर अलग कर देना चाहिये । इसी प्रकार नटोंको बुलाकर कहा-देखो, इसके
पास कुछ भी नहीं जो तुमको दण्ड में दिलायें, इन्साफ इतनाही कहता है कि
जैसे गलेमे पाश डालके यह वृक्षसे तुम्हारे स्वामीपर गिरा, इसी प्रकार तुम्हारे-
मेंसे कोई प्रधान इसपर वृक्षसे गिरें यह नीचे सो जायगा । कुमारकी ऐसी
बातें सुनकर सभी चुप हो गये और वह पुण्यहीन अभियोगसे मुक्त हो गया ।
यह राजकुमारकी वैनयिकी बुद्धि हुई।
कर्मजा बुद्धिका विवरण--
मूल-गाथा-७६
उवओगट्ठिसारा, कम्मपसंगपरिघोलणविसाला ।
साहुक्कारफलवई, कम्मसमुत्था हवइ बुद्धी ॥१॥

भीमचन्दीसूत्रम् गाया-७ हेरण्णिए १करिसएर,कोलिअ ३सोवे ४ यमुचि ५घय पपए तुनाए ८ वा ९ य पूयह १० घर ११ मित्तकारे १२ य॥२॥ छाया-गामा-५६ उपयोगवटसारा, कर्मप्रसन्परिघोलनविशाला । साधुकारफलवती, कर्मसमुत्था भवति बुद्धि ॥१॥ ७ हेरण्यक. १, कर्षका २, कौलिफा ३, होप (दुर्वीकारम) ४, मौक्तिक-घृत-पृषका' ५।६।७। तुनागो ८पकिम ९ आपूपिक १० घट-चित्रकारी च ११।१२ ॥२॥ टीका-माया ७- भव कर्ममा मुश्किा सक्षण करत - पकाम चिचसे उपयोनसे कार्योक परिणामको पेसमेवाठी, तया अनेक कार्योक भम्पास और विचार-चिन्तनसे विशाल एवं विशनोंसे की हुई प्रशंसाप फम्बासी पसी कर्मसे उत्पच होनेवाली पुधि कर्मचा कहाती है ।१॥ फर्ममा एरिके पिपयमें रहात-१ सवर्णका, कर्षक, सिक रोकपी आदि बनानेवासा पाने सोहकार, ५ मणिका, पतविकमी, . मक-उछलनेवासा, ८ माम-धीमेवाहा ९ पछि-पर्य, १० बापूपिक- दसवाई, ११ उम्मका, १२ चिपकार आदि।२॥ बम शान्तीफा विशेपडपसे स्पष्टीकरण- ११रण्यक-सुवर्णकार-जिस सुवर्णकारमे अपने विज्ञानमें अच्छीतप अनुभव प्राप्त कर लिया है यह समय पाकर स्तस्पर्क तया समेमाणसेही सोनेवादीकी पयार्य परीक्षा कर मेता है या उसकी कर्ममा पुदि है। २कर्षक-किसी शेरमे रातमें एक पीके यहाँ पाके आकार संघ जोगी । मातकाल वहाँ बसे छोग जमा हुए भीर चोरके सेंप खोदनेकी प्रशंसा करने छमे । छिपेकपसे चोर मी सुन रहा था। इसी समय एक किसान घोडा कि जिसने जिस कार्यका अधिक सम्यास किया है पर उसमें काम होताहीसमें आर्य करनेकी कोई बात नही । किसानकी बात मकर चोरको बहुत कोष हुआ। उसने एक मादमीसे पसा कि पह कीमतमा काही पता है ! पता समझकर कुछ देर बाद किसानके पास मेतमें पहुंचा भौर बोका-मरे! भाग मैदसे मारता है। किसान मोठा-क्यों। चोरमे कहा- धर्म हा सामने मेरी संपकी मर्शसा नहीं की इसलिये। पदोहा १ मा पो ए 1 4-तिमा म... नि गा. in कर्मजा वुद्धिके उदाहरण प्रशंसा नहीं करनेका कारण ठीक है, जो जिस कार्यमें सदा अभ्यास करता है, वह उस विषयमें कुशल होता है, देखो, मैही उसमें दृष्टान्त हूँ। हाथमे लिए हुए इन मूंगोंको अगर कहो तो सब उल्टे मुंह डालूं और कहो तो ऊर्ध्व- मुख-ऊपरसुख से, या बाजूसे गिराऊँ । इसपर चोर बहुत विस्मित हुआ और बोला कि सभीको नीचे मुखसे गिराओ। किसानने भूमिपर एक कपडा फैलाकर सभी मूंग अधोमुख-नीचे मुंह-से गिरादिये। चोरको बडा विस्मय हुआ। किसानकी कुशलताको वारवार सराहता हुआ वह चला गया । कर्ष- कके प्राण बच गये। यह कर्षककी कर्मजा बुद्धि हुई। ३ कोलिय-कौलिक-तन्तुवाय-कपडा बुननेवाला अपनी मुष्टिमें तन्तुओं- (सूतों) को लेकर जान लेता है कि इतने कंडोंसे इतना वस्त्र बनेगा । यह तन्तुवायकी कर्मजा बुद्धि है। ४ दवा-डोव बनानेवाला-लोहकार यह सहजमें जान जाता है कि इसमे इतनी वस्तु समायेगी यह उसकी कर्मजा बुद्धि है। ५ मौक्तिक-मणिकार अपने अभ्याससे मोतीको आकाशमे उछालकर नीचे युक्तिसे रक्खे हुए शूरके बालमें उसे इस प्रकार धरते हैं कि वह मोती बालमें पिरोलिया जाता है। यह उसकी कर्मजा बुद्धि है। ६ घय-घृत-विक्रयी-घी बेचनेवाला अधिक अभ्याससे ऐसा कुशल बन जाता है कि चाहे तो गाडीमें रहा हुआ भी नीचेकी कुण्डीकी नालमें घी डाल देता है। ७ प्लवक-कूदनेवाला भी अपनी क्रियाके अनुभवसे आकाशमें अनेक प्रकारके खेल दिखा देता है। ८ तुम्नाग-सीनेवाला अपने क्रिया-कौशलसे वैसा सीलेता है जो किसीको लक्षित भी न हो। ९ वर्द्धकि-कुशल रथकार विना मापे ही रथ आदिमे लगने वाली लकडीका प्रमाण जान लेता है। १० आपूपिक-निपुण हलवाई विना तोले अपूप-मालपुए आदिका माप जान लेता है और आदेशानुसार वस्तु बना देता है। ११ घड-घटकार-अनुभवी कुम्भार विना वजन कियेही घडे बनाने जितने मृत्पिण्ड ले लेता है। १२ चित्रकार-कुशल चितारा चित्रकी भूमि विना मापेही चित्रका प्रमाण जान लेता है और कूचीमे उतना ही रंग लेता है जितनेका उसको प्रयोजन होता है। तन्तुवायसे लेकर चित्रकारतक ये सब कर्मजा बुद्धिके उदाहरण हैं।

भीमचन्तीमम् मूल-गाहा-७८ अणुमाण-देउ-विटुंत-साहिया धयविवागपरिणामा । हियनिस्सेपसफलवई, बुद्धी परिणामिया नाम ॥१॥ ७९ ममप १ सिद्धि २ कुमारे ३, देवी ४ उदिओदए हवा राया ५॥ साडू य नदिसेणे ६, घणचे ७ सावग ८ अमचे ९॥२॥ छाया-गाथा-७८ अनुमानहेतवष्टान्त-साधिका, वयोविपाकपरिणामा । हितनि यसफलवती, पुनि पारिणामिकी नाम ॥१॥ ७९ अभय' १ मेष्ठिकुमारो २३, देवी ४, उदितोपयो भवति रामा ५। साधुम्म नन्दिपेण ६, धनदत्त' ७, थावकोऽमास्य' ८९ ॥२॥ टीका-गापार्य-७८-७२ मनुमान है और प्यान्वसे दिपपको सिर करनेवाठी भवस्याके परिपाकसे पट तथा उपति और मोक्षरूप फम्वाली पुद्धि पारिणामिकी । अर्थात् जो स्वार्यानुमान हेव और सातसे विषयको सिर करती है तथा लोकगीत बाकोचर मोक्षको पेनेवाली ऐसी भवस्याके परिपाकसे होनेमाही बुद्धि पारिपामिक्री है।१॥ अमयकुमार १ मेष्ठी कुमार देवी ४ दिवोदय रामा ५ मुनि और मंदिपेण मार ६ पनाच भावक अमात्य ।। ये पारिभामिकी सुरिक उदाहरण। १ भमयछमार-मधीवसे अमयकुमारम चार वर मांग औरगम घोतको पोषकर रोते हुए अमयमार मगरमें है भाया था । यह मभया मान एकी पारिणामिकी पुगिहै। २ सिद्धि-भाटी, जसे-किसी शेठने अपनी मायके समाधिको रेसाकर पीसा स्वीकार की । उपर उस भीको परपरुप समागम मर्म रामपा तब रामपुरुष उसको रामाके पास ले आए। उसी समय एक मुनि मी विहारकमसे प्रमते ए उस गावसे निकले। मीने उनको देखकर प्रसपुरोक समतेप कहा कि मुनि! यह मर्म मारा और इसको छोरकर पूसरे गांव मापा फिरासका क्या होमा । मुनिने यह सुनकर विचारा कि प्रसस्प पापमसे पहनी सिनशासन और सुसामुओंकी अकीर्ति परेगी अतः इसका डि-नापि पायताम्। २स्पा सम्मान मि परिखि । सम्पादक पारिणामिकी बुद्धिके उदाहरण ८७ निवारण करना चाहिए। ऐसा सोचकर मुनिने उस स्त्रीको शाप दिया कि यदि यह गर्म मेरा किया हो तो पूर्ण समयपर योनिसे निकले, अगर हमारा नहीं हो तो पेट फाडकरही निकले, इस शापसे समय पूर्ण होनेपर भी गर्भ नहीं निकला, इससे उस स्त्रीको भयङ्कर कट होने लगा, तब उस स्त्रीने राजकर्मचारिओंके सामने मुनिराजसे प्रार्थना की कि महाराज ! यह गर्भ आपका किया हुआ नहीं है, मैंने झूठा आपको कलङ्क दिया, अब फिर कभी ऐसा अपराध नहीं करूंगी, उसके असह्य कप्टको देखकर कारुणिक मुनिने अपना शाप हटालिया, इस- प्रकार धर्मका मान और उस स्त्रीके प्राण दोनों वचालिये, यह उनकी पारिणा- मिकी बुद्धि हुई। ३ कुमार- एक राजकुमारको मिष्टान्न बहुत प्रिय था, एक दिन उसने भरपेट मोदक खा लिया, अधिक खानेसे अजीर्ण हो गया, अजीर्णके कारण मुखसे दुर्गन्धि निकलने लगी। दुःखी होकर राजकुमारने सोचा कि इस अशुचि शरीरसे संयोग पाकर मधुर जैसा मनोहर पदार्थ भी विगड गया। इसी शरीरके लिये लोग अनेक पाप करते हैं, अवश्य यह धिकारने योग्य है। ऐसा सोचकर वह विरक्त हो गया, यह उसकी पारिणामिकी बुद्धि हुई। ४ देवी-पुष्पवती नामकी देवीने अपनी पुष्पचूला नामक पुत्रीको स्वर्ग- नरक दिखाकर प्रतिवोध दिया, यह उसकी पारिणामिकी बुद्धि थी। ५ उदितोदय राजाका दृष्टान्त, जैसे-पुरिमताल नगरमे उदितोदय नामका राजा था, श्रीकान्ता नामकी उसकी विशेष रूपवती रानी थी, जिसके लिये वानारसीके धर्मरुचि नामक राजाने अपने सैन्यसे पुरिमताल नगरको घेर लिया। कुछ समय तक घेरे रहा तो उदितोदयने निष्कारण जनक्षय होगा ऐसा सोचकर तपोवलसे वैश्रमण देवका आवाहन किया। देवने धर्मरुचि राजाको उसके नगरमे साहरण कर दिया। इसप्रकार विना जनक्षयके उदितो. दय राजाने अपना व प्रजाजनोंका रक्षण कर लिया यह राजाकी पारिणामिकी बुद्धि थी। ६ साधु और नंदिपेण कुमारका दृष्टान्त, जैसे- भगवान् महावीरके समवसरणमे एक साधु चित्तकी चंचलतासे साधुव्रत छोडना चाहता था। उसी समय प्रभुको वंदन करनेके लिये राजकुमार नंदिपेण अपने अंतःपुरके साथ आया था। रूपलावण्यसे उसका अंतःपुर अप्सरावृन्दको भी जीतनेवाला था, फिर भी प्रभुके उपदेशसे नंदिपेणने विरक्त होकर उन सबोंको छोड दिया। यह देखकर वह साधु भी विशेषरूपसे संयममे स्थिर हो गया। यह उस साधुकी पारिणामिकी बुद्धि थी। ७ धनदत्तका दृष्टान्त, जैसे-किसी समय चिलातीपुत्र चोरने धनदत्तकी पुत्री सुसुमाको द्रव्यलोमसे जंगलमे ले जाके मार गिराया। शेठ भी खोजते भीमबन्दीसमम् परी कठिनाईसे मत अटवीमें पापा और साकीको मरी पड़ी पास में पेला। भूससे बहुत पाठ होकर फस खोजने लगा किन्तु फलंकि नहीं मिससे उसीसे देह निर्वाह किया-प्राण बचाया, यह उसकी पारिणामिकी पुदि थी। ८ साक्म-भावक-मतरमा पस्नीकी पुदि से किसी भाबकने परमी गमनका स्पाम किया था। एक दिन अपमी श्रीकी सखीको देखकर पा कामावरहो मया । श्रीने उसकी चिंताके कारणको समझ लिया और सोचा कि ऐसे विचारोंमें यदि इसकी मृत्यु हो मई वो यह दुर्मतिम चहा नायगा। इसलिए कोई उपाय करें जिससे इसकी रक्षा हो ऐसा सोचकर यह पतिसे बोसी-स्वामिन् । चिन्ता मत करो मैं संभ्या होनेपर उसको डामेका उपाय करती है। भाषको मैसूर किया। पर संभ्या होती वह स्त्री अपमी सतीके पसमूपण पहनकर सती अपने भावकके पास एकान्दमें मई। उसने भी अपनी भीकी ससी समसकर उसके साथ संमोग किया फिर कुछ समयके बाप कामका ज्वर तरा तब हित प शोकके चलते व्याकुल होता जा पोडने सगा कि हाय! मेरा तो प्रत जण्डित कर दिया। अब संसारमें किस मरसे पोछंगा ! उस स्त्रीने मावकमीको अधिक चिम्तावर पेखकर सबी बात कह पी. मिससे वह इस स्वस्थ हुमा । मातकाल गुरुके पास जाकर मानसिक छविचार व परसीके संकल्पसे विपपसेवनके लिए प्रायविच कर घरमा। उस मावकपनीने भपने पतिका व्रत और प्राण पोनोंकी रक्षा कर ली। पर उसकी पारिभामिकी बुधि है। भमास्य-मग्रीका ग्वाहरम से-परपन मंत्रीने स्वामिपुत्र महावतकी माके लिए सुरंग पाकर बसवत्तको उससे निकाल लिया पह मंत्रीकी पारिणामिकी बुदि। मूलाहा-८० समप १० ममञ्चपुत्ते ११, घाणम्के १२ घेव पूलमद्दे १५ ५। नासिकसंवरिनवे १५, बहरे १५ परिणामया पुद्धीप ॥३॥ ८१ चलणादण'१६ मामले १७,मणी १८ यसप्पे १९ य सग्गि २० पूर्मिदे २१॥२२ । परिणामियमुद्रीए एयमाई उदाहरणा ॥४॥ से च अस्सुयनिस्सिर्य। १५ दिमा. नि. ९४१।१ परिम्पमिमा पुर्य-नि. ९५ ।

पारिणामिकी'बुद्धिके उदाहरण ८९ छाया-गाथा-८० क्षपकोऽमात्यपुत्रः ११११, चाणक्यश्चैव १२ स्थूलभद्रश्च १३। नासिक्ये सुन्दरीनन्दः १४, वज्रः १५ परिणामबुद्धयाः ॥ ३ ॥ ८१ चलनाहत १६ आमलके १७ मणिश्च १८ सर्पश्च १९ खड्ग २० स्तूपेन्द्रः २१ । पारिणामिक्या बुद्ध्या एवमादीनि उदा- हरणानि ॥४॥ तदेतदश्रुतनिश्रितम् । टीका-गाथार्थ-८०-८१ खमए-साधु १० अमात्यपुत्र-मंत्रिपुत्र ११ चाणक्य १२ और स्थूलभद्र १३ तथा नासिकपुरमे सुदरीपति नंद १४ वज्र- स्वामी १५ ये पारिणामिकी वुद्धिके उदाहरण हैं ॥ ३ ॥ चलणाहण-चलनाहत याने चरणाहतको क्या दण्ड देना ? ( राजाका प्रश्न) १६ आमलक १७ मणि १८ सर्प १९ खट्न (गेंडा) २० स्तूप २१, इत्यादिक पारिणामिकी बुद्धिके उदाहरण हैं ॥४॥ १० क्षपक-साधुका दृष्टान्त, जैसे-कोई साधु क्रोधके आवेशमें मरनेके कारण सर्प हो गया था, वहाँसे मरकर शुभकर्मोदयसे एक राजाके यहाँ जन्म लिया और मुनियोंके उपदेशसे विरागी होकर फिर साधु बन गया तथा नम्र भावसे गुरुजनोंकी सेवा करने लगा। भिक्षाके समय एक दिन साधुओंने उसके पात्रमे थूक गिरा दिया, फिर भी वह अपने ही दुर्गुणोंकी निन्दा करता रहा कि मैं पापी हूँ, सदा खाते रहता हूँ व आपलोग धन्य हैं, जो तपस्यामें अपने देहका बल लगा रहे हैं। इस प्रकार प्रतिकूल संयोगमें शान्त रहके केवलपद मिला लिया। यह उसकी परिणामिकी बुद्धि है। ११ अमात्यपुत्र-मंत्रीके लडकेकी पारिणामिकी बुद्धि, जैसे-ब्रह्मदत्तके विषयमें दीर्घपृष्ठ राजाने वरधनु मंत्रीसे बहुत प्रश्न किए, उन सबोके उत्तर और वैसे अन्य प्रसंगोंमें मंत्री वरधनुने इस प्रकारसे काम लिया कि दीर्घपृष्ठको भी मालुम नहीं हो सका कि यह मेरा विरोधी है और साथ २ ब्रह्मदत्तकी भी रक्षा कर ली। यह उसकी पारिणामिकी बुद्धि है। १२ चाणक्यकी बुद्धिके बहुतसे उदाहरण हैं, उनमेंसे एक यहाँ दिया जाता है, जैसे--चन्द्रगुप्तके राज्य करते हुए जब भंडार समाप्त होने लगा तो चाणक्यने एक दिनके उत्पन्न हुए अश्व आदिकी याचना की और भंडारकी पूर्ति की। यह चाणक्यकी पारिणामिकी बुद्धि थी। १३ स्थूलभद्रकी पारिणामिकी बुद्धि, जैसे-स्थूलभद्रके पिताको मार १२ भीमानीमा । देने पर मंगनने मनिपपके लिए पुछयमको पाव कुछ का, किम्त सनानि मोममाषनाको नाशका कारण और संसारकै समयको पुसकर मानकर सनि पीक्षा हेली, यह स्पूपमनकी पारिणामिकी बुदिई। १४ नासिक्ये सम्परीनक, जैसे-नासिकपुरके सारीपतिको उसके माई साशन मेसो शिखरपर से नाके देवदेवी दिखाये । यह ग्तकी पारिभामिकी बुदि। १५ पत्र-पसस्वामीकी पारिणाभिकी पुनि, जैसे-बमस्वामीने बालकपनमें मी माताक मेमकी उपेक्षा करके संपका बहुमान किया, पाने संपके दिसाये हुए रजोदरण-मुसबमिकाबप साध्वेशकी सिया । किन्तु माताकी औरचे दिए गाते हुए विधीने भापि नहीं लिए। २५ चरणाव याने मस्तकपर परफ-प्रहार करनेबाहेको क्या पणना चाहिए। इस विषयमै पजा मोरयोंकी पारिवामिकी पुसि,से-छतरण सेवनि एक राजासे कहा किवा पके हुए केश भीर जीणे शरीरबा डों को म रसकर वहाँकोही भपनी सेवाम एक्से भापर्क सभी काम कर सकेंग। इसपर परीक्षा लिप राजाने पुषकोंसे पूछा कि विकोई मेरे शिरपर परिहा महार करे तो क्या पण देना चाहिए । तस्मोंने कहा-महाराज! तिक मितने छोटे दुबो कर उसको मरवा देना चाहिए । राजानेवही प्रम फिर पनोंसे पूजा ।पयों कहा-स्वामिन् ! हम विचार करके कोम ऐसा का पर पकान्त पडे गप और विचारने मगे कि एनीके सिवाय भम्प राजा मस्तकपरकीन पापका प्रहार कर सकता है। और तभी तो विशेष सम्मान करने पायक होती है इस प्रकार सापके पर राजाके पास भाकर बोले देव । रसव विशेष सत्कार करना चाहिए इसपर पना पुडौकी पुदिपर पात प्रसव हुमा और सपा उनकोडी अपने पास रसता। यह रागा मौर योकी पारिणामिकी पुरि हुई। २० भामरे-भामहक फसका हात, जैसे-किसी छम्मकारने पर बार मीको पक बनावटी ओवठा दिया। म प समान होनेपर मी उसने अतिशय कदिन स्पर्श मौर विहमे फसनेकी पहमत नहीं इससे समक्ष सिया कि पह असली नहीं है। यह उसकी पारिपामिकी पुदि हई। १८ मषि-एक सर्प वृक्षपर परके सपा पसियोंके बचे खाया करता पा। किसी दिन वह सर्पककर इससे मीचे मिर मया और मणि सके ही किसी मवेशपर रह गई । मणिके प्रकाशमें एमराठा बह सर्प मार्मिक एर जानेपर भपमे भरको पराबर नहीं मार सका। प्रसके नीचे एक पथा उसमें गा पा उपर रहे हुए मणिकी किरणों के कारण उस रूपका सारा जस लारिसने गाए गए किसी वाहने पापक पद बावर्यकी गाव पारिणामिकी बुद्धि व श्रुतनिश्रित ज्ञानका विवरण ९१ देखी व आकर अपने पितासे निवेदन की, उस वुड्ढने भी वहाँ आकर अच्छी तरह देखा और कारणका पता लगाकर मणिको प्राप्त कर लिया। यह उसकी पारिणामिकी बुद्धि हुई। १९ सर्प-चंडकौशिककी बुद्धि, जैसे-भगवान् महावीरके अलौकिक रक्तके आस्वादको विचारपूर्वक देखकर चंडकौशिकने ज्ञान प्राप्त करलिया। यह उसकी पारिणामिकी बुद्धि हुई । २० खड्ग-गेंडा-(अरण्य पशु विशेष) की बुद्धि, जैसे-किसी श्रावकने युवावस्थाके मदमे व्रतोंकी विना आलोचना किये ही प्राणत्याग किया। जिससे वह एक जंगलमें खने-पशुके रूपमे उत्पन्न हुआ। और अटवीमें आने- वाले मनुष्यको मारकर खाने लगा। किसी समय उस मार्गसे कुछ साधु चले आ रहे थे, उसने साधुओंपर आक्रमण करना चाहा किन्तु उनके आत्मवलसे वैसा नहीं कर सका, फिर विचार करते २ जातिस्मरण ज्ञान प्राप्त कर लिया तथा अनशन करके देवलोग गया । यह उसकी पारिणामिकी बुद्धि हुई। २१ स्तुपका दृष्टान्त, जैसे-विशाला नगरीके नाशके लिए कुलबालुक मुनिने कहा कि मुनिसुव्रत स्वामीके पादुकायुक्त स्तूपको उखडवा दिया जाय तो नगरीका भंग हो सकता है। यह मुनिकी पारिणामिकी बुद्धि हुई। यह उपरोक्त स्वरूपवाला अश्रुत निश्रित मतिज्ञान हुआ। मूल-से किं तं सुयनिस्सियं? सुयनिस्सियं चउविहं पण्णत्तं, तं जहा-उग्गहे १ ईहा २ अवाओ ३ धारणा ४ ॥ २६॥ छाया-अथ किन्तत्-श्रुतनिश्रितम् ? श्रुतनिश्रितं चतुर्विधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-अवग्रहः१, ईहा २, अवायः३, धारणा ४॥सू. २६॥ टीका-प्र०-अब श्रुतनिश्रित मतिज्ञान कौनसा है ? उ०-श्रुतनिश्रित मतिज्ञान चार प्रकारका है, जैसे-अवग्रह १ ईहा २ अवाय ३ और धारणा । स्पष्टीकरणरूप आदिकी विशेषतारहित पदार्थके सामान्यरूपका ज्ञान करना अवग्रह कहलाता है। अवमहसे गृहीत पदार्थमे क्या है, क्या नहीं, इस प्रकार विचारक तर्कको ईहा कहते हैं। विचारके उत्तर क्षणमें जो पदार्थका निश्चय होता वह अवाय कहाता है। अवग्रहसे निर्णीत अर्थका कुछ कालतक अविच्छिन्न उपयोग रहना अविच्युति, और उससे जो संस्कार धारण हुआ वह वासना कहाती है, यह संख्यात या असंख्यात काल तक रहती है, फिर कालान्तरमे किसी वैसे पदार्थको देखने आदिसे ऐसा ज्ञान होना कि यह वही पदार्थ है ओ मैंने पहले देखा था इसको स्मृति कहते हैं, अविच्युति, वासना १ चलते हुए जिसके दोनों बाजूके चमडे लटकते रहते हैं ।

भीमसम्पादनम् और स्मृति पे वीनों पारणाके अवान्तर मेद हैं, अपद अवायते मिति में उपयोग स्मरण और वासनाको पारणा कहते हैं। स् १६ ॥ मूल-से किं ते उग्गहे ? उग्गहे दुषिहे पण्णचे, त महा-अत्युग्गो य पंजणुग्गहे य ॥म, २७ ॥ छाया-अथ फ* सोऽवग्रह १ अवग्रहो विविध प्राप्त , तग्रभा- अर्थावमहम म्पअनावग्रहम ॥ २७ ॥ सीका-प्र०-यह अवमह कौनसा है। 30-अवमा दो प्रकारका काहा मया है, जैसे-अर्यामपद और ध्यानावहम् २७॥ मूल-से किं ते जणुग्गहे ? वंजणुग्गहे पउम्बि पण्णते, सं जहा- सोइविअर्वमणुग्गहे, पाणिदिपर्वअणुग्गहे, शिमिवियर्वजणुग्गडे, फासिवियर्वजणुग्गहे, से संबंजणुग्गहे ॥ स. २८॥ छाया-अप क स व्पअनावमा म्यसनावग्रहमतुधि प्रज्ञात', सपथा-मोघेन्द्रियम्पसनावया, घ्राणेन्द्रियम्यसनावग्रह, जिटेन्द्रियम्पअनावग्रह , स्पर्शेन्द्रियम्पसनावग्रह', स एप म्पसनावग्रह ॥ २८॥ टीका-म-पापानावह किस प्रकार है! -यजनावमा चार प्रकारका है जैसे-५ मोमोन्द्रिय ग्यानावग्रह २ प्राणेन्द्रिय प्पडमावमह पअिमेम्बिय म्यनमावमा ४ स्पर्गेम्बिप म्पशनावमा, यह मा म्पबनावमा । भोग आदि पाप उपकरणेत्रियोंका शाप गर आदि पुरेसाय समाप धोनको म्पनन कहते हैं, उस सम्बन्पसे शाप आरिपदापोंका जो क्या शाम होता है पद ग्यानापमह कहलाता है। अपया इन्द्रियों साप्त शण आरिमयोंका भस्पष्ट पाम मीम्पानापमाद कहाता है। अधिशम्मारिके साप पारम्यिक सम्परप-सजसे हर मर्यावमासे पूर्वतक जो सप्त ममत पा मूछित पुरुपकी तप कैपल शप मंच रस और स्पर्श कुछ ऐसा मा अम्यक ज्ञान होता है. यह पत्रमावह है। बा भीर मनरूप भाविका सम्पम्प किपे बिना दी शाम करते है मता इमसे म्पसमावह नही होता है। इसलिए पानापपदके पारदी मकार । २८ मूल-से हि माधुग्गहे ? अत्युग्गहे छबिहे पण्णते, न जहा- सोईदिप-अरघुग्गाहे, पक्खिदिप-अत्युग्गहे, माणिनिय-अत्यु अर्थावग्रह और ईहाका विचार ग्गहे, जिभिदिय-अत्थुग्गहे, फासिंदिय-अत्थुग्गहे, नोइंदिय- अत्थुग्गहे ॥ सू २९॥ छाया-अथ कः सोऽर्थावग्रहः ? अर्थावग्रहः पड्विधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा- श्रोत्रेन्द्रियार्थावग्रहः, चक्षुरिन्द्रियार्थावग्रहः, घ्राणेन्द्रियार्थावग्रहः, जिह्वेन्द्रियार्थावग्रहः, स्पर्शेन्द्रियार्थावग्रहः, नोइन्द्रियार्थावग्रहः ॥ सू. २९॥ टीका-प्र०-वह अर्थावग्रह किसप्रकार है ? उ०-अर्थावग्रह छ प्रकारका कहा गया है, जैसे-१ श्रोत्रन्द्रिय अर्थावग्रह, २ चक्षुरिन्द्रिय अर्थावग्रह, ३ घ्राणेन्द्रिय अर्थावग्रह, ४ रसनेन्द्रिय अर्थावग्रह, ५ स्पर्शेन्द्रिय अर्थावग्रह, ६ नोइन्द्रियमन) अर्थावग्रह । पांच इन्द्रिय और मनसे पदार्थोके सामान्य ज्ञान करनेको अर्थावग्रह कहते हैं, आश्रयके भेदसे वह छ प्रकारका है, जैसे- मार्गमे जल्दीसे चलते हुए कुछ दिख पडता है तो दर्शक यही कहता है कि मैंने कुछ देखा था, इसे अर्थावग्रह कहते हैं ॥ सू २९ ॥ मूल-तस्स णं इमे एगट्ठिया नाणाघोसा नाणावंजणा पंच नाम- धिज्जा भवंति, तं जहा-ओगेण्हणया, उवधारणया, सवणया, अवलंबणया, मेहा, से तं उग्गहे ॥ सू. ३०॥ छाया-तस्येमानि एकार्थिकानि नानाघोषाणि नानाव्यञ्जनानि पंच नामधेयानि भवन्ति, तद्यथा-अवग्रहणता, उपधारणता, श्रवणता, अवलम्बनता, मेधा-स एषोऽवग्रहः ॥ सू ३०॥ टीका-उस अवग्रहके ये पांच नाम अनेकविध घोष और अनेक व्यञ्जन- युक्त होते हैं, जैसे-१ अवग्रहणता, २ उपधारणता, ३ श्रवणता, ४ अवलम्बनता, और ५ मेधा । यह अवग्रहका स्वरूप पूर्ण हुआ ॥ सू ३० ॥ १ प्रथमसमयमें आए हुए शब्द आदि पुद्गलोंका ग्रहण करना अवग्रह कहाता है। २ व्यञ्जनावग्रहके दूसरे आदि समयोंमे नवीन २ शब्द आदि पुद्ग- लोका प्रतिसमय ग्रहण करना और पूर्वगृहीतका धारण करना यही उपधारणता है। ३ एक समयमें होनेवाला सामान्यरूपसे अर्थग्रहणरूप बोध श्रवणता है। ४ अर्थग्रहणही अवलम्बनता है।५ मेधा स्पष्ट ही है । मूल-से किं तं ईहा ? ईहा छविहा पण्णत्ता, तं जहा-सोइंदिय-ईहा चक्खिदिय-ईहा, पाणिदिय-ईहा, जिमिंदिय-ईहा, फासिंदिय- ईहा, नोइंदिय-ईहा, तीसे णं इमे एगडिया नाणाघोसा नाणावं- नीमचन्नीसूत्रम् , जणा पंच नामधिज्जा भवंति, ते जहा-आमोगणपा, मग्गणवा, गधेसणया, चिंता, विमसा, से ईहा ॥ स, १॥ छाया-अथ का सा ईहा ? हा पहिला प्रज्ञप्ता, तथपा भोवेन्द्रियहा, घरिन्द्रियेहा, घाणेन्द्रियेहा, जिरेन्द्रियेहा, स्पम्हिा, नोइन्द्रियेहा, तस्या इमानि-पकार्यकानि नानापोवाणि नानाम्पसनानि पच नामधेयानि मबन्ति, तपा -आमोगनता, मार्गणता, गवेषणता, चिन्ता, विमर्श (मीमांसा) सा-माहा ॥ सू३१॥ टीका--- ममबम् । वह हा क्या नामकारकी कही है, वैसे-१ मोमेन्द्रिय हा र चरिन्द्रिमाणेम्ब्यि हा रसने त्रिय हा स्पॉन्द्रिय हा मोइम्बिय बहा। यह हाप का शुर- मिमित मतियान भा। (म्बियोंकि पांच विषय और दर्प विपार भारि मानसिक मायके समयमै हा-मिर्णपार्य विचार होतातपय इसके भेष किये गये हैं। इस बारे भी मिल पोप और मामा म्यनमवाले ये एकार्यक पांच नाम होते हैं जैसे कि१ भामोममता २ माणता , मवेपणव, पिता भौर विमर्श । सामान्पापसे एकार्यक होते हुए भी विशीपमें पे मिवार्थक हैं, जैसे-अर्याप महके पाप ही सारस्त भर्य-विशेपका माठोधन करना मामोननता है। अम्वय पम्पतिरक मर्मका अन्वेपण करना मार्मणा, और म्पतिरेक भर्याद पिकर धर्म स्यागपूर्वक मम्य पर्मकी मालोचना करना नवेषणात अर्यको वारंवार पिम्तम फरमा चिन्ता भौर स्पड विचार करना धिपायों हाफ मामाम्तर है, यह आहाका वर्णन ३१॥ मूछ-से कि त अवाप ? अवाए छब्धिहे पण्णते, ते जहा-सोईदिय- अवाए, चम्सिदिय-अदाए, पाणिदिप-प्रवाए, जिम्मिविए- अवाप, फासिंदिर-मवाए, नाइदिय-अवाए, तस्स र्ण इमे एगठिया नाणाघोसा नाणावजणा पंच मामधिमा मवेति, त महार माउणपा, पाचारणया अवाए, पुनी, विण्णाणे, से अवाए ॥ स. ३२।। पापा-मथ क सोऽवाप ? अपाय पविध प्रजम', तण्या-मोने निपावाप' १, पक्षरिनियापाय' २, माणेम्ब्रियावापा २, अवाय और धारणाका विचार . । जिह्वेन्द्रियावायः ४, स्पर्शेन्द्रियावायः ५, नोइन्द्रियावायः ६, तस्य इमानि-एकार्थकानि नानाघोषाणि नानाव्यंजनानि पंच नामधेयानि भवन्ति, तद्यथा-आवर्त्तनता १, प्रत्यावर्त्तनता २, अवायः (अपायः) ३, बुद्धिः ४, विज्ञानं ५, स एषोऽवायः ॥ सू. ३२॥ टीका-प्र०-भगवन् । वह अवायज्ञान कौनसा है? उ०-अवायज्ञान छ प्रकारका है, जैसे कि श्रोत्रेन्द्रिय अवाय १, चक्षुरिन्द्रिय अवाय २, घ्राणेन्द्रिय अवाय ३, रसनेन्द्रिय अवाय ४, स्पर्शेन्द्रिय अवाय ५, नोइन्द्रिय अवाय ६। श्रोत्रेन्द्रियके अर्थावयहको लेकर जो निश्चय किया जाता है वह श्रोत्रेन्द्रिय अवाय है, ऐसे आगे भी समझें, इस अवायके ये एकार्थक पांच नाम नाना- घोष और नानाव्यंजनवाले होते हैं, जैसे कि १ आवर्त्तनता-ईहासे हटकर अवायके सम्मुख रहनेवाला ज्ञान, २ प्रत्यावर्त्तनता, ३ अवाय-सर्वथा ईहासे निवृत्त पदार्थका ज्ञान, ४ बुद्धि-उसी निर्णीत अर्थको स्थिरतासे वारंवार स्पष्ट- रूपमें जानना, ५ विज्ञान-विशिष्टज्ञान । यह अवायज्ञानका वर्णन पूर्ण हुआ ॥ सू ३२ ॥ मूल--से किं तं धारणा ? धारणा छन्विहा पण्णत्ता, तं जहा-सोइंदिय- धारणा, चक्खिदियधारणा, घाणिदियधारणा, जिभिदिय- धारणा, फासिंदियधारणा, नोइंदियधारणा, तीसे णं इमे एग- द्विया नाणाघोसा नाणावंजणा पंच नामधिज्जा भवंति, तं जहा- धरणा, धारणा, ठवणा, पइट्ठा, कोटे, से तं धारणा ॥सू. ३३॥ छाया-अथ का साधारणा ? धारणा षड्विधा प्रज्ञप्ता, तद्यथा-श्रोत्रेन्द्रिय- धारणा १, चक्षुरिन्द्रियधारणा २, घ्राणेन्द्रियधारणा ३, जिह्वे- न्द्रियधारणा ४, स्पर्शेन्द्रियधारणा ५, नोइन्द्रियधारणा ६, तस्या इमानि एकार्थकानि नानाघोषाणि नानाव्यंजनानि पंच नामधेयानि भवन्ति, तद्यथा-धरणा, धारणा, स्थापना, प्रतिष्ठा, कोष्ठः, स एषा धारणा ॥ सू ३३ ॥ टीका-प्र०-गुरुदेव ! वह धारणा कौनसी है ? उ०-धारणा छ प्रकारकी जैसे कि १ श्रोत्रेन्द्रियधारणा, २ चक्षुरिन्द्रियधारणा, ३ घाणोन्द्रियधारणा, 8 रसनेन्द्रियधारणा, ५ स्पर्शेन्द्रियधारणा, ६ नोइन्द्रियधारणा । उस धारणाके ये एकार्थक पांच नाम-नामान्तर होते हैं, जो नानाघोष और नाना- ? , , भीमचमीचमन म्यानमार है जैसे कि-१ परणा-जाने हुए भर्पको मषिविपूर्ण मत संदर्तवक परे रहना, २ पारणा जपन्य अतीत मौर सत्ता मसम्म काठके बाद भी स्मरण (रसना), स्थापना-पयमें उसको स्थापन परमा, ४ मतिष्ठा-पत मर्यको ही प्रभेषके साथ सयौ स्थापन करना, ५ कोट-कोठेकी तरह धारण किये पर्यको परसित रसमा, यह पारणासप मतिज्ञान सम्पूर्ण आ। ६॥ मूल-उग्गहे इस्कसमइए, अंतोमाइत्तिया ईहा, अतोमुत्तिए अवाए, धारणा ससेज वा कालं असंखेज वा काल ॥ स. १४॥ छाया-अवग्रह एफसामयिकः, आन्तमहर्तिकीहा, आन्तमतिकोऽ पाय , धारणा संख्येय वा कालमसंस्पेयं पा कालम् ॥ २४॥ टीका-अब अवमहापिका कासमान कहते हैं-अपमहान पक समय तक पता। मतम स्पितिवासी है और अषाय भी मताकी स्थितिवाला है। भारणा संरुपात काठ पा गुमटिक आविकी अपेक्षा असम फाउतक मी राती ३४ ॥ मूल एवं अट्ठावीसाइविहस्स आमिणिबोहिपनाणस्स पंजणुग्गहस्स पतवणं करिस्सामि परियोगविद्वतण मल्लगदि तेण य । से किं तं परियोहगविलुतेर्ण ? परिवोदगविट्ठरोणं से जहानामप का पुरिसे कपि परिर्स सुर्च परियोहिज्जा अमुगा अमुगत्ति, तरप बोयगे पन्नवर्ग पर्व वयासी-किं पगसमयपविट्ठा पुग्गला गहणमागछति १ पुसमयपविट्ठा पुग्गला गहणमागमति ? जाव इससमयपविष्टा पुग्गठा गहणमागछति ? संसिजसमब पविट्ठा पुग्गला गहणमागमति १ मसैसिलसमयपविट्ठा पुग्गला गहणमागच्छति । एवं पर्यत पोयगं पण्णवर एवं पपासी-नो पगसमपपक्डिा पुग्गठा गहणमागाति, नो दुसमन पविठ्ठा पुग्गला गहणमागमति, गाव नो ससमयपविट्ठा पुग्गला गहणमागछति, मो संसिजसमयपविट्ठा पुग्गला गहणमाग: पति, असखिज्जसमपपविट्ठा पुग्गला गहणमागणति, से है परियोइगरि तेणं। छाया-पवमहाविंशतिविधस्य-भामिनिमोधिकज्ञानस्प म्पसनावर ९७ प्रतिबोधक दृष्टान्त व मल्लकदृष्टान्तसे व्यञ्जनावग्रहका स्वरूप हस्य प्ररूपणं करिष्यामि प्रतिबोधकदृष्टान्तेन मल्लकदृष्टान्तेन च । अथ किं तत्पतिबोधकदृष्टान्तेन ? प्रतिबोधकदृष्टान्तेन, स यथानामकः कश्चित्पुरुषः कंचित्पुरुषं सुप्तं प्रतिबोधयेत् अमुक-अमुक ! इति, तत्र चो(नो)दकः प्रज्ञापकमेवमवादीत्- किमेकसमयप्रविष्टाः पुद्गला ग्रहणमागच्छन्ति ? द्विसमय- प्रविष्टाः पुद्गला ग्रहणमागच्छन्ति ? यावद्दशसमयप्रविष्टाः पुद्गला ग्रहणमागच्छन्ति ? संख्येयसमयप्रविष्टाः पुद्गला ग्रह- णमागच्छन्ति ? असंख्येयसमयप्रविष्टाः पुद्गला ग्रहणमाग- च्छन्ति ? एवं वदन्तं नोदकं प्रज्ञापक एवमवादीत्-नो एकस- मयप्रविष्टाः पुद्गला ग्रहणमागच्छन्ति, नो द्विसमयप्रविष्टाः पुद्गला ग्रहणमागच्छन्ति, यावन्नो दशसमयप्रविष्टाः पुद्गला ग्रहणमागच्छन्ति, नो संख्येयसमयप्रविष्टाः पुद्गला ग्रहणमाग- च्छन्ति, असंख्येयसमयप्रविष्टाः पुद्गला ग्रहणमागच्छन्ति, तदेतत् प्रतिबोधकदृष्टान्तेन । टीका-(अर्थावग्रहके चार प्रकार, व्यञ्जनावग्रहके छह, ईहाके छह, अवा- यके छह, और धारणाके भी छह, इसप्रकार ये सब मिलकर मतिज्ञानके २८ भेद होते हैं) इस तरह अट्ठाइस प्रकारका आभिनिबोधिक ज्ञान है। उस मतिज्ञानके व्यञ्जनावग्रहकी प्रातिबोधक और मल्लकके दृष्टान्तसे प्ररूपणा करूंगा । प्र०- प्रतिबोधकके दृष्टान्तसे वह व्यञ्जनावग्रह किस प्रकार है। उ०-प्रतिबोधक- जगानेवालेके दृष्टान्तसे व्यञ्जनावग्रहकी प्ररूपणा इस प्रकार है-जैसे कोई पुरुष किसी अनिर्दिष्टनामवाले सोये हुए पुरुषको ओ अमुक ! ओ अमुक ! ऐसा कहकर जगावे, इस विषयमे शिष्य गुरुको ऐसा पूछता है-भगवन् ! क्या एक समयके प्रविष्ट (कर्णमें गए हुए) पुद्गल ग्रहणमें आते हैं ! या दो समयके प्रविष्ट पुद्गल ग्रहण किये जाते हैं या यावत् दश समयक प्रविष्ट पुद्गल ग्रहणमें आते है ? या संख्येयसमयके प्रविष्ट पुद्गल ग्रहणमें आते हैं ! या असंख्येय समयके कानमें पडे हुए पुद्गल ग्रहणमें आते हैं ? इसप्रकार पूछते हुए शिष्यको आचार्य उत्तर फरमाते हैं-एक समयके प्रविष्ट पुद्गल ग्रहणेमें नहीं आते, न दो समयके प्रविष्ट पुद्गल ग्रहणमें आते, यावदश समय- तकके पुद्गल भी ग्रहणमें नहीं आते है, न संख्येयसमयके प्रविष्ट पुद्गलही ग्रहणमे आते, किन्तु असंख्यसमयके प्रविष्ट पुद्गलही ग्रहण करनेमे आते है, यह प्रतिबोधकके दृष्टान्तसे व्यञ्जनावग्रहका स्वरूप हुआ।

। ९८ भीमपन्नीसूत्रम् मूल-से किं तं मझगविलुतेणे' मष्ठगपिटुतेण से जहानामए केह पुरिसे आवागसीसाओ मालगं गहाय तत्येग उदगणितुं पक्से विज्ञा से नड्डे, अण्णेऽवि पक्सित्ते सेऽवि नडे, एवं पक्सिप्प- माणेसु पक्तिप्पमाणेसु होही से उदगर्षितू जे णं तं मल्लग रावेहिति, होही से उदगहिंदू जे णं संसि मछगंसि ठाहिति, होही से उदगर्षि जे ण तं मल्लग मरिहिति, होही से उदगबिंदू जेणं तं मच्छर्ग पवाहेहिति, पवामेव पक्सिप्पमाणेहिं पक्सिप्प माणेहिं अतिहिं पुग्गलेहिं जाहे से वंजणे पूरिय होइ, साहे हु' ति करो, नो पेव णं जाणइ के पस सदाइ ? तो ईई पविसइ सओ आणर अमगे एस सहाइ, तो अवार्य पविसइ, तओ से उषगय हवा, तओ धारण पविसइ, तमो गं घारेर संसिज वा कालं असंसिज पा काल । छाया-अप किं तत् (महपर्ण) मछकहटान्तेन ! मठकाधान्तेन स पथानामक कमित्पुरुप आपाकशीर्पतो मामुक गृहीत्वा तत्रैक मुदकपिन्, प्रक्षिपेत् स नट, अम्पोऽपि प्रक्षित, सोऽपि नष्ट, एवं प्रक्षिप्यमाणेषु २ मविप्यति स उदकपिन्दुर्यों मुसं मछके रावेहिति-भाईपिम्पति, मविम्पति स उदकपिन्तुर्यो न तस्मिन् माछके स्थास्यति, मविप्पति स उवकपिन्तुर्यो न त माछक मरि- प्पति, भविष्यति स उपकषिन्दुर्यो न तं मछर्क प्रवाहपिप्पति, एवमेव मक्षिप्यमाणे २ अनन्त पुरलैयदा त म्पसन पूरितं भवति तदा हुमिति करोति, नो पेव जानाति क एप शम्पाकि तत ईहां प्रविशति ततो जानाति भमुक पप शम्दादि', ततो- वार्य मविशति, तत' स उपगतो मवति, ततो धारणा प्रविशति, ततो नु धारपति संस्पेयं वा कालमसंस्पेयं वा काठम् । टीका-प्र- मस्सक सान्तसे पह प्यखनावग्रह सा है। उबारावेके सान्तसे प्यमनावमहका स्वरूप इस प्रकार है मैसे-यथानाम किसी पुरुपने बिसी आपाकशी याने कुम्माफि माण पकानेके स्थानमें सगी हुई भाण्डराशि से एक मस्सा-पाया सेकर उसपर पानीकी पक ससाठी वद मप्त हो मा, पूसरी र गसी तो यह भी मार दी गई, अवग्रह आदिके छ भेदोंका उदाहरणसे स्पष्टीकरण इस प्रकार विंदुओंके गिराते २ एक वह जलविंदु होगा जो उस शरावेको गीला कर देगा, फिर इसीप्रकार विंदुओंके गिरनेसे दूसरा वह जलविंदु होगा जो उस शरावेपर ठहरेगा, फिर निरन्तर बिन्दुओके डालनेसे एक वह जल- विन्दु होगा जिससे वह शरावा भरजायगा, ऐसेही एक वह जलविन्दु होगा जो उस शरावेसे वाहर बह निकलेगा, इसी प्रकार (शरावेपर जलविन्दुकी तरह) कर्णेन्द्रियपर शब्दयोग्य अनन्त पुद्गलोंके वारंवार निरन्तर गिराते २ जब वह व्यञ्जन (इन्द्रिय अथवा उपकरणेन्द्रिय और पुद्गलोका सम्बन्ध) पूर्ण हो जाता है याने भर जाता है तब वह श्रोता 'हुँ। ऐसा करता है याने अर्थावग्रहसे शब्द आदिका ग्रहण करता है, फिर भी नहीं जानता कि यह शब्द आदि कैसा है व किसका है ! ( अर्थावग्रहसे पूर्वका सामान्यमात्रग्राही ज्ञान व्यअनावग्रह है।) यही मल्लकदृष्टान्तसे व्यञ्जनावग्रहकी प्ररूपणा हुई। फिर जब पदार्थोंका सामान्यग्रहणरूप अवग्रह हो गया तव ईहा-विचारणा-में प्रवेश करता है अर्थात् यह क्या ? इसका विचार करने लगता है, उसके फलस्वरूप जानता है कि यह अमुक शब्द आदि है, तब अवायमें प्रवेश करता है, फिर अवायके वाद अन्तर्मुहूर्त कालपर्यन्त वह शब्दादि ज्ञान उपगत-आत्मामे परिणत रहता है, उसके बाद धारणामे प्रवेश करता है, फिर संख्यात काल या असंख्यात कालपर्यन्त हृदयमें धारण करता है-धारे रहता है। उपरोक्त अवग्रह आदिका क्रम जागृत अवस्थामें कैसे घटित होगा ? क्यों- कि जगे हुए प्राणीको शब्दश्रवणके समकालही अवग्रह ईहाके विना अवाय- ज्ञान होता दिखता है, इस शंकाके निवारणार्थ- अवग्रह ईहा अवाय और धारणाका छ भेदोंमें उदाहरणके साथ -वर्णन करते हैं- मूल-से जहानामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सदं सुणिज्जा तेणं सदोत्ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस सद्दाइ, तओ ईहं पवि- सइ, तओ जाणइ अमुगे एस सद्दे, तओ अवायं पविसइ, तओ से उवगयं हवइ, तओ धारणं पविसइ, तओ णं धारेइ संखेज्जं वा कालं असंखेज्जं वा कालं । से जहानामए केइ पुरिसे अव्वत्तं एवं पासिज्जा तेणं स्वेत्ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस रूवत्ति, तओ ईहं पविसइ, तओ जाणइ अमुगे एस रूवे, तओ अवायं पविसइ, तओ से उवगयं हवा, तओ धारणं पविसइ, तओ ण धारेइ संखेज्जं वा कालं, असं- खेज वा कालं । से जहानामए केइ पुरिसे अव्वत्तं गंधं अग्या- १०० भीमभन्दीसूमम . इज्जा तेणं गंपधि उग्गहिप, नो पेवणं जाणइ के पेस गंधेति, तओ हिं पविसर, तओ जाणइ अमुगे एस गंधे, तो अवार्य पविसइ, तओ से उपगय हवइ, तो धारणं पविसर, तओ णं धारेज संसेज वा काले असंखेज वा कालं । से जहानामए केर पुरिसे अव्वत रसं आसाइज्जा सेणं रसोति जग्गहिए, नो वेष णं जाणइ के वेस रसेचि, तओईह पविसइ, तमो जाणा अमुगे पस रसे, तओ अवार्य पविसह, तमओ से उपगय हवा, सओ धारणं पविसर, सओ णं धार संखिज्ज वा कालं असं खिजपा काठं । से अहानामए केर पुरिसे अव्व फार्स पनि विराज्जा तेणं फासेचि उग्गहिए, नो पेषण आणइ के पेस फासोधि, तमो ईह पविसइ, समो जाणा अमृगे एस फासे, तओ अवार्य पविसइ, तओ से उवगर्य हवा, तो धारण पविसर, तमो णं धाप संखेजपा काल मसखेज वा कालं। से जहानामए का पुरिसे अव्व सुमिणं पासिजा सणं सुमि णोचि उग्गहिए, नो पेव णं आणइ के पेस समिणेति, तो हिं पविसइ, सभी जाणा अमुगे एस समिणे, तओ भवार्य पविसइ, सओ से उबगयं हवर, तो धारण पपिसा, तो णं धारेह संसेज वा काल मसंखेज वा कालं, से मस्लग- पिट्टतेणे ॥ सू १५॥ छापा-अप ययानामक कमिस्पुरुपोज्यस्त शब पृणुयात् सेन शरद इस्पवगृहीतम्, नो पैव आनाति को देष शप्पादि तत ईहो प्रविशप्ति, सतो जानाति-अमुक एप शब्द, ततोऽवार्य प्रविशति, तत स उपगतो मपति, ततो धारणा मविशति, ततो न धारयति संस्थेचे वा कालमसंख्येयं वा कालम् । भम पथा नामक कमिपुरुषोऽम्पर्स सपं पश्येत् सेन सपमिस्पवगृहीतम्, मो व जानाति किं तद् अपमिति, तत ईहां प्रविशति, ततो मानाति-अमुकमेतपम्, ततोऽवायं मविशति, ततस्तदुपगत मवति, ततो पारणां प्रविशति, सतो न धारयति संस्पेयं वा - - - अवग्रह आदिके छ भेदोंका उदाहरणसे स्पष्टीकरण कालमसंख्येयं वा कालम् । स यथानामकः कश्चित्पुरुषोऽव्यक्तं गन्धमाजि त्-तेन गन्ध इत्यवगृहीतम्, नो चैव जानाति को वैष गन्ध इति, तत ईहां प्रविशति, ततो जानाति-अमुक एष गन्ध इति, ततोऽवायं प्रविशति, ततः स उपगतो भवति, ततो धारणां प्रविशति, ततो नु धारयति संख्येयं वा कालमसंख्येयं वा कालम् । स यथानामकः कश्चित्पुरुषोऽव्यक्तं रसमास्वादयेत तेन रस इत्यवगृहीतम्, नो चैव जानाति-को वैष रस इति, तत ईहां प्रविशति, ततो जानाति-अमुक एष रसः, ततोऽवायं प्रवि- शति, ततः स उपगतो भवति, ततो धारणां प्रविशति, ततो नु धारयति संख्येयं वा कालमसंख्येयं वा कालम् । स यथानामकः कश्चित्पुरुषोऽव्यक्तं स्पर्श प्रतिसंवेदयेत्, तेन स्पर्श इत्यवगृहीतम्, नो चैव जानाति को वैष स्पर्श इति, तत ईहां प्रविशति, ततो जानाति-अमुक एष स्पर्शः, ततोऽवायं प्रविशति, ततः स उपगतो भवति, ततो धारणां प्रविशति, ततो संख्येयं वा कालमसंख्येयं वा कालम् । स यथानामकः कश्चि- त्पुरुषोऽव्यक्तं स्वप्नं पश्येत्, तेन स्वप्न इत्यवगृहीतम्, नो चैव जानाति-को वैष स्वप्न इति, तत ईहां प्रविशति, ततो जानाति- अमुक एष स्वप्नः, ततोऽवायं प्रविशति, ततः स उपगतो भवति, ततो धारणां प्रविशति, ततो नु धारयति संख्येयं वा कालम- संख्येयं वा कालम्, सैषा (प्ररूपणा) मल्लकदृष्टान्तेन ॥सू. ३५॥ टीका-श्रुत इन्द्रियसे अवग्रह आदिका स्वरूप कहते हैं-यथानामक किसी जागृत पुरुषने अव्यक्त शब्दको सुना और कुछ शब्द है ऐसा उसने ग्रहण किया, किन्तु जाति आदिसे नहीं जानता कि यह शब्द क्या है। फिर ईहा-तर्कमें प्रवेश करता है तब जानता है कि यह अमुक शंख आदिका शब्द है, इसके बाद अवाय-निश्चयज्ञानमें प्रविष्ट होता है तब वह सुना हुआ शब्द उपगत होता है, फिर धारणामें प्रवेश करता है तब संख्येय- काल वा असंख्येयकालपर्यन्त हृदयमें धारण किये रहता है । चक्षुरिन्द्रियसे अवग्रहादि, जैसे-यथानामक किसी पुरुषने अव्यक्तरूपको देखा और कोई रूप है ऐसा उसने ग्रहण किया, फिर भी यह रूप कौनसा है ? ऐसा नहीं जानता, तब ईहामें प्रवेश करता है, उससे जानता है कि यह अमुक मनुष्य आदिका नु धारयति १०२ भीमचन्नीभम् रुप है, बाद मार-मिमयम मधेश करता है तब यह पेसा हुमा रुप उप गत होता है, फिर धारणा प्रविष्ट होता है, उसके बाद संस्येयकास वा अस सयेयकासतक उस रूपको हदयमें धारण किये रहता है। प्राणेन्द्रियसे अक्मा आपि, जसे-पथानामक कोई पुरुप भग्यत-जाति मारिसे भहात मपको संषता उससमय सामान्य रूपसे उसने गंध पेसा ग्रहण किया, किन्न कौनसा मप है। ऐसा नहीं जामता तप हमें प्रवेश करता है, उससे मानता है कि यह ममुक गप, फिर भयायको माप्त करता है, तब वह गमहान उपगत-माप्त होता है, फिर पारणामें प्रवेश करता है, बार संस्पेयकाल पा मसंख्येयकालतक उसको धारण किये रहता है ।सनेन्द्रियसे अवमा भारि असे कोई पथानामक पुरुप पालेपहछ आयक्त रसका आस्वाद करता है उससमप उसने कोई रस है ऐसा प्रहण किया फिर भी पद कौमसा रस है। ऐसा नहीं जानता तब हामें प्रवेश करता है, उससे अमुक रस पेसा जानता तब अयापमं प्रवेश करता है उसके बार पारसज्ञान उपगत होता है, फिर पारयामें प्रवेश करता है तब संसपेयकाला भस्मय कासपर्यन्त उस रसनामको धारण किय दवा है। भव स्पन्त्रिपसे अवमा मारिका समाप दिलाते हैं जैसे-माहात नामवाला कोई पुरुप अध्यक्तस्पर्शका प्रतिविपन-अनुभव करता है, उससमय को स्पर्श है पेसा उसने प्रहण किया, किम्त ऐसा नहीं मानता कि यह कीनसा स्पर्श है। वबहामें प्रवेश करता है. उससे मानता है कि पहममुक स्पर्श है, फिर अवाय-निमय, मवेश कप्ता , पाद वह स्पर्शशाम उपमत होता है, फिर पारणामें प्रवेश करता है, तब स्पेयकास अपया भत्तस्येपकालतक उसको धारण कर रखता है। नोबन्दिप-मम अर्यावाहमादिवान इसप्रकार है, जैसे-किती सामाम्पनामा पुरुपने भापक स्वम पेसा मारम्भमें उसने म स्वमी पेक्षा माण किया फिर भी ऐसा नहीं जानता कि पह कौनसा स्वमहामें प्रवेश करता है उससे पेसा भामता है कि पडू अमुक स्वो फिर का भवायमें प्रवेश करता है, पर यह स्वम उपगत होताईफिर पारणाम प्रवेश भरता, तब संम्पेयकास या मसंख्येपकामतकरसको पारप किप यता है पर मकवानरसे अवमहमादिका स्वरूप पूर्ण मा। १५० मूल-से समासमो परविहं पण्णवं, जहापम्पमो, सिचमो, कालभो, मापओ, सत्य वष्यमो गं भामिणिगोहिपनाणी माएसेणे सध्याई दवाई माणइ, न पासा । सेचमओ आमि- णियोशियनाणी मारसेणं सध्वं जाणइ, न पासह । कालमो णं आमिणिमोहियनाणी भाएसेणं सर्व कालं जाणा, न पासइ । मावमा णे भामिणिपोहियनाणी आपसेणं सम्वे मापे जाणा, न पासह।

आभिनिबोधिक ज्ञानके प्रकार
१०३
~
छाया-तत्समासतश्चतुर्विधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा-द्रव्यतः, क्षेत्रतः, कालतो
भावतः, तत्र द्रव्यतो नु-आभिनिबोधिकज्ञानी-आदेशेन सर्वाणि
द्रव्याणि जानाति, न पश्यति । क्षेत्रत आभिनिबोधिक-
ज्ञानी-आदेशेन सर्वं क्षेत्रं जानाति, न पश्यति । कालत आभि-
निबोधिकज्ञानी-आदेशेन सर्व कालं जानाति, न पश्यति ।
भावतो नु-आभिनिबोधिकज्ञानी-आदेशेन सर्वान् भावान्
जानाति, न पश्यति ।
टीका-वह आमिनिबोधिकज्ञान संक्षेपसे चार प्रकारका कहा गया है,
जैसे-१ द्रव्य २ क्षेत्र ३ काल और ४ भावसे । इनमें द्रव्यसे मातिज्ञानी सामान्य
प्रकारसे सब द्रव्योंको जानता है किन्तु देखता नहीं, क्षेत्रसे मतिज्ञानी सामान्य
प्रकारसे सर्वक्षेत्रको जानता है किन्तु देखता नहीं, कालकी अपेक्षासे मतिज्ञानी
सामान्य प्रकारसे सब कालको जानता है परन्तु देखता नहीं, भावसे मतिज्ञानी
सब भावोंको सामान्य प्रकारसे जानता है किन्तु देखता नहीं।
मतिज्ञानका उपसंहार-
मूल-गाहा-८२
उग्गह ईहाऽवाओ, य धारणा एव हुंति चत्तारि ।
आभिणिबोहियनाण,-स्स भेयवत्थू समासेणं ॥१॥
८३ अत्थाणं उग्गहणं,-मि उग्गहो तह वियालणे ईहा ।
ववसायम्मि अवाओ, धरणं पुण धारणं विति ॥२॥
८४ उग्गह इक्कं समय, ईहावाया मुहुत्तमद्धं तु ।
कालमसंखं संख, च धारणा होइ नायव्वा ॥३॥
८५ पुढे सुणेइ सइं, रूवं पुण पासइ अपुटुं तु ।
गंधं रसं च फासं, च बद्धपुटुं वियागरे ॥ ४ ॥
८६ भासासमसेढीओ, सदं जं सुणइ मीसियं सुणइ ।
वीसेढी पुण सद, सुणेइ नियमा पराघाए ॥५॥
८७ ईहा अपोह वीमंसा, मग्गणा य गवसणा।
सन्ना सई मई पन्ना, सव्वं आभिणिबोहियं ॥ ६ ॥
तं आभिणिबोहियनाणपरोक्ख, से त्तं मइनाणं ॥सू ३६॥
छाया-गाथा-८२
अवग्रह ईहाऽवायश्च, धारणा-एवं भवन्ति चत्वारि ।
आभिनिबोधिकज्ञानस्य, भेदवस्तूनि समासेन ॥ १॥

, - १०४ भीमबन्नीसूत्रम् दर अर्थानामवग्रहणे, अवग्रहस्तपा विचारणे-नहा । व्यवसापेऽवाय', धरणं पुनारीणां पते ॥२॥ र अवग्रह पर्फ समयम्, बहावायो मुहर्तमई तु । काठमसंस्म्य संम्पेय(मय), धारणा भवति ज्ञातव्या ॥३॥ ८५ स्पृष्टं शृणोति शर्थ, सप पुनः पश्यत्पस्पृष्टन्तु । गन्धं रसम स्पर्शन, परस्पृष्टं ध्यागृणीयात् ॥ ४ ॥ ८६ मापा समप्रेणीत, शम्दं ये शणोति मिमितं शृणोति । विणि पुन शम्द, शृणोवि नियमात्पराघाते ॥ ५॥ ८७ हाऽपोहविमर्शाः, मार्गणा घ गवेपणा । सज्ञा, स्मृप्ति, मति', प्रज्ञा, सर्वमामिनिघोधिकम् ॥६॥ तदेतवामिनिबोधिज्ञानपरोक्षम्, तदेतन्मतिज्ञानम् ॥ १५॥ दीका-गाचार्य-१ भवग्रह हा भवाय तथा धारणा इसप्रकार भामिनिषोभिक काम संक्षेपसे चार भेष होते हैं। ८२ ॥ भबिमाण होनेपर अवमान तथा उनके पर्यामोचन-विचारमें बिहान होता है, मोक निमय होनेपर अवायज्ञान होता है तथा बासना बारिकपसे भारण करनेको धारणा करते हैं भवमा भाविका स्पिात-माम करते- भवमा एक समयता राता (विशेष पर्व सामाम्प अाक्पह प्रपर अम्तमपूर्वप्रमाण होता है) हा मार अवाप अमर्ततक होते हैं (परमार्यसे अन्तमार्त समझना चाहिए), पारमा संरूपातका भौर भसंध्यकासक बासनासपसे होती, पेसा समझना चाहिए । पाम व-पुमा गया-(माप्त) समा जाता है और अपको मनमा भवात-अमाप्त पाने मिपसे विमा एप पैलता है, रस भौर पप स्पर्शको (माण प्रापिन्धियोंके साप) या व पद-भास्मभपेशोते हीत होनेपर ही पाणी निमय करता है भाव मानता है ऐसा करना चाहिए। भाषाकी सममेपिमहामा-दाममपसे होगा जाता हुआ पसमूह मापा कहतारसके प्राचार्य क्षेत्रमपाकी पंकिपा समपि बोहरपक पताछो पिशामीमें होती , उनमें छोगी नई भाषाएँ मयमसमयमैदी डोकामततक चली जाती है, उन मेणियमि रहामा यो सुनता है यह मिम- पीच पानाम्पोंसे मिश्रित शमको सुनतामीर विमेधिमें नियमसे पण पोते मामिहत मा राममयोंके ममिपातसे भारत होनेपर ही बामको सुनता है.40 मतिज्ञानका उपसंहार व श्रुतज्ञानपरोक्षके भेद १०५ , ईहा, अपोह, विमर्श और मार्गणा, गवेषणा, संज्ञा, स्मृति, मति व प्रज्ञा ये सब आमिनिबोधिक ज्ञान है, अर्थात् मतिज्ञानके पर्याय नाम हैं ॥ ८७ ॥ स्पष्टीकरण-सदर्थकी पर्यालोचनाको ईहा और निश्चय करनेको अपोह कहते हैं, अन्य भी काल व सूक्ष्मताकृत-भेदसे भिन्नार्थक नाम होते हैं, जो सुगम हैं। यह आभिनिबोधिक परोक्षज्ञानका वर्णन पूर्ण हुआ, यह पांच ज्ञानोंमें पहला मतिज्ञान पूर्ण हुआ ॥ सू ३६ ॥ अब श्रुतज्ञानका वर्णन करते हैं। मूल-से किं ते सुयनाणपरोक्खं ? सुयनाणपरोक्खं चोदसविहं पण्णत्तं, तं जहा-अक्खरसुर्य १, अणक्खरसुयं २, सण्णिसुर्य ३, अस- पिणसुयं ४, सम्मसुयं ५, मिच्छासुयं ६, साइयं ७, अणाइयं ८, सपज्जवसियं ९, अपज्जवसिय १०, गमियं ११, अगमियं १२, अंगपविट्ठ १३, अणंगपविटुं १४ ॥ सू ३७॥ छाया-अथ किं तच्छ्रुतज्ञानपरोक्षम् ? श्रुतज्ञानपरोक्षं चतुर्दशविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-१ अक्षरश्रुतम्, २ अनक्षरश्रुतम्,३ संज्ञिश्रुतम्, ४ असंज्ञिश्रुतम्, ५ सम्यक्-श्रुतम्, ६ मिथ्याश्रुतम, ७ सादिकम्, ८ अनादिकम्, ९सपर्यवसितम्, १० अपर्यवसितम्, ११ गमिकम्, १२ अगमिकम, १३ अङ्गप्रविष्टम्, १४ अनङ्गप्रविष्टम् ॥ ३७॥ टीका-प्र०-वह श्रुतज्ञानरूप परोक्षज्ञान किस प्रकार है ! उ०-श्रुतज्ञानरूप परोक्षज्ञान चौदह प्रकारका कहा गया है, जैसे कि-१ अक्षरश्रुत २ अनक्षरश्रुत ३ संक्षिश्रुत ४ असंनिश्रुत ५ सम्यक्श्रुत ६ मिथ्याश्रुत ७ सादिश्रुत ८ अनादि- श्रुत ९ सपर्यवसितश्रुत १० अपर्यवसितश्रुत ११ गमिकश्रुत १२ अगमिकश्रुत १३ अङ्गप्रविष्ट और १४ अनङ्गप्रविष्ट ॥ सू ३७ ॥ क्रमशः श्रुतज्ञानके प्रत्येक भेदोका स्वरूप सूत्रकार स्वयं कहते हैं- मूल-से किं तं अक्खरसुयं ? अक्खरसुयं तिविहं पण्णत्तं, जहा- सन्नक्खरं, वंजणक्खरं, लद्धिअक्खरं । से किं तं सन्नक्खरं ? सन्नक्खरं अक्खरस्स संठाणागिई, से तं सन्नक्खरं। से किं तं वंजणक्खरं ? वंजणक्खरं-अक्खरस्स वंजणाभिलावो, से तं वंजणक्खरं । से किं तं लद्धिअक्खरं ? लद्धिअक्खरं-अक्खर- लद्धियस्स लद्धिअक्खरं समुप्पज्जइ, तं जहा-सोइंदियलद्धि- अक्खरं, चक्खिदियलद्धिअक्खरं, धाणिदियलद्धिअक्खरं, तं , १०६ भीमपन्दीधम् रसणिदियलदिअक्खर, फासिवियलद्धिअक्सरं, नोइंदियलन्द्रि अक्सरं, से लविअक्सर से अक्सरसुर्य । से कि अणक्सरसुयं अणक्खरसुप अणेगविहं पण्णच, तं जहा- गाहा-८८ ऊससियं नीससियं, निच्छुई सासियं च छीयं च । निस्सिघियमणुसार, अणक्सर रेलियाईयं ॥१॥ से अणक्सरसुर्य ॥ स. ३८॥ छाया-अथ किं तदक्षरमुतम् १ अक्षरभुत विविध प्रशत, तपथा-संज्ञा क्षर १, व्यसनाक्षरं २, लगयक्षरम् ३ । अप किं तम् संज्ञा- क्षरम् ? संज्ञाक्षरम्-अक्षरस्य संस्थानाऽऽकृति , तपेतसंज्ञा क्षरम् । अप किं तद् म्पसनाक्षरम् ? व्यसनामरम्-अक्षरस्य व्यसनामिलाप', सदेतद् व्यसनाक्षरम् । अप किं सहाय- क्षरम् ? लगयक्षरम्-अक्षरलब्धिकस्य लगयक्षरं समुत्पपाते, तपथा-पोवेन्द्रियप्ठध्यक्षरम्, पसुरिन्द्रियलायझरम्, प्राणे- न्द्रियलगयक्षरम्, रसनेन्द्रियलायझरम्, स्पर्शेन्द्रिपलपयक्षरम्, नोइन्द्रियटगपक्षरम् ६, तदेतायक्षरम्, तदेतपक्षरमुप्तम् । अथ किं तदनक्षरमुतम् ? अनक्षरमुतमनेकविध प्रज्ञप्तम, तपथा- गापा-८८ उमसित निश्वसितं, निष्ठपूत काशित पुस । निस्सिडिसमनुस्वार, मनक्षर सेंटितादिकम् ॥१॥ तदेतदनक्षरमुसम् ॥ स. २८ टीका-०-यद भारत कोनसा है 30-अक्षरभुत तीम मकारका करा गया , मैसे-संज्ञाक्षर १ प्यमनाक्षर रसायसरा-यह संहाक्षर गया है। ०-आकार आदि-अक्षरकी पट्टी भारिपर बनाई गई संस्थामाइति-रचना पिशेपको संताक्षर करते ई पद आ संज्ञासर ।-अब यादम्पत्रमाक्षर किस मकार-अक्षरके प्यजनामिछापको पत्रमाक्षर कहत है, मर्याद अकार आरिभक्षक भर्यका स्पर पोभ दो उस तरह उपारण फरमा म्यानमार, न मामामे भी नहीं बना पाते यामरामानास्पा भी मालग समागमा मान रहता है म मनापरणे परम पारादिमी पपारये मम माने।भारम्प मे भाभा पहले है।

अक्षर, अनक्षर संज्ञि व असंक्षिश्रुत और उनके प्रकार १०७ १ यह हुआ व्यजनाक्षर । प्र०-वह लब्धि-अक्षर क्या है ! उ०-अक्षरलब्धिवाले जीवको लब्धिअक्षर-भावश्रुत उत्पन्न होता है, वह छह प्रकारका है, जैसे- श्रोत्रेन्द्रियलब्ध्यक्षर १, चक्षुरिन्द्रियलब्ध्यक्षर २, घ्राणेन्द्रियलब्ध्यक्षर ३, रसनेन्द्रियलब्धि-अक्षर ४, स्पर्शेन्द्रियलब्धि-अक्षर ५, नोइन्द्रियलब्धि-अक्षर ६, यह लब्ध्यक्षरका वर्णन हुआ यह पूर्वोक्त अक्षरश्रुत पूर्ण हुआ। स्पष्टीकरण- श्रोत्रेन्द्रियसे शब्द सुननेपर यह शङ्खका शब्द है इत्यादि अक्षरानुविद्ध जो शब्दार्थकी पर्यालोचनाका विज्ञान होता है वह श्रोत्रेन्द्रियनिमित्तक होनेसे श्रोत्रेन्द्रिय-लब्धिअक्षर कहाता है, इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिये, प्र० अब वह अनक्षरश्रुत किस प्रकार है ? उ०-अनक्षरश्रुत अनेक प्रका- रका कहा गया है, जैसे कि-उच्छसित-ऊर्ध्वश्वास लेना, निःश्वसित-नीचा श्वास लेना, निष्ठचूत-यूँकना, काशित-खांसना, और छींकना नाक निसंघना और अनुस्वारयुक्त चेष्टा करना इसप्रकार सेण्टितादिक अनक्षरश्रुत हैं । यह अनक्षरश्रुतका वर्णन हुआ । स्पष्टीकरण ये उच्छृसित आदि ध्वनिमात्र भाव- श्रुतके कारण होनेसे द्रव्यश्रुत कहाते हैं, अभिप्रायपूर्वक कुछ विशेषताके साथ किसीको कुछ अर्थ समझानेके लिए जब उच्छास आदिका प्रयोग किया जाता है, तब चेष्टाएँ प्रयोगकर्ताके भावश्रुतकी फलरूप और श्रोताके भाव- श्रुतकी कारण होती हैं और सुनी जाती हैं, इसलिए इनको अनक्षरात्मक श्रुत कहते हैं । हस्त आदिकी चेष्टाएँ इसप्रकार सुनी नहीं जाती अतः इनका अनक्षरश्रुतमें ग्रहण नहीं होता है। सू ३८ ॥ मूल--से किं तं सण्णिसुयं ? सण्णिसुयं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-कालि- ओवएसेणं, हेऊवएसेणं, दिहिवाओवएसेणं, से किं तं कालि- ओवएसेणं? कालिओवएसेणं जस्स णं अत्थि ईहा, अवोहो, मग्गणा, गवेसणा, चिंता, वीमंसा, सेणं सण्णीति लब्भइ, जस्स णं नस्थि ईहा, अवोहो, मग्गणा, गवेसणा, चिंता, वीमंसा, से णं असण्णीति लन्भइ, से तं कालिओवएसेणं । से किं तं हेऊव- एसेणं ? हेऊवएसेणं जस्स णं अस्थि अभिसंधारणपुब्विया कर- णसत्ती से णं सण्णीति लब्भइ, जस्स णं नत्थि अभिसंधारण- पुब्धिया करणसत्ती से णं असण्णीति लब्मइ, से त्तं हेऊवए- सेणं । से किं तं दिद्विवाओवएसेणं ? दिट्ठिवाओवएसेणं सण्णि- सुयस्स खओवसमेणं सण्णी लब्भइ, असण्णिसुयस्स खओव- समेणं असण्णी लब्भइ, से तं दिहिवाओवएसेणं, से तं साण्ण- सुयं, से तं असण्णिसुयं ॥ सू ३९॥

- - भीमन्नन्वीस्त्रम् छाया-अप किन्तत् संज्ञितम् ? सज्ञिभुतं विविध प्रज्ञप्तम् , सयपा- कालिक्युपदेशेन, हेतूपदेशेन, एप्टिवायोपदेशेन, अथ कोऽय कालिक्युपदेशेन (सझी) कालिक्युपदेशेन यस्याऽस्ति ईहा, अपोह', मार्गणा, गवेषणा, चिन्ता, विमर्शः, स संझीति लम्पते, यस्य नास्ति ईहा, अपोह', मार्गणा, गवेपणा, चिन्ता, विमर्श', सोऽसीति लम्यते, सोऽय कालिक्युपदेशेन । अथ कोऽयं हेतू पदेशेन (संजी) हेतूपदेशेन यस्याऽस्ति-अमिसन्धारणपूर्विका करणशक्ति' स सज्ञीति लम्पते, यस्य नास्ति-अमिस पारण पूर्पिका फरणशक्ति, सोऽसंधीति लम्पते, सोऽये इतपदेशेन । अप कोऽयं प्टिवादोपदेशेन (संझी) १ मष्टिवायोपदेशेन संशि- भुप्तस्य क्षयोपशमेन संज्ञी लम्पते, असशिग्रुप्तस्य क्षयोपशमेन असंही लम्यते, सोऽय हाधिपादोपदेशेन (संशी) तदेतत् संशि मुप्तम् , तदेतवसजिभुतम् ॥ स. ३९॥ टीका-म०-भव वह संविभुत क्या है। उस-ससिंत तीन प्रकारका कम मया है से-१ कासिकी उपदेशसे, २ हेवपीशसे, सहिषादोपरेशसे । मा-अब काशिकी परेशसे पा संझी क्या है। उ०-काखिकी उपपेशी-जिन जीमको हा अपोह, मार्गणा गवेपणा, चिन्ता और विमर्श पे हैं, पर ही ऐसा प्राप्त होता-कहाता है। मिस बीवको हा अपोह मार्मणा, भषमा, पिता और पिमर्श ये महीं यह असंही पेसा-कहाता है। (सम्मूउंग, पञ्चेन्द्रिय विकम्निय भावि भविशय अल्प मनीसधिवा होमेसे मस्फुट मर्यकोही जामते इससे उमकी माहारादि संज्ञा भम्पक्स कपमें होती हा आदिमानसिक क्रियाके ममावसे ये मसंधी पहपीर्यकाभिकी पोशते संधी भसंही हुए। प्र-भव देवपदेशसे षद संही मसंधी किस मकार ।।30- देवपोशसे संही असंही मैसे-मिस पानीको भापक्त पा म्यक्त रिचारपूर्वक किया प्रवृत्ति होती है वह हेतूपयेशसे सही माप्त होता है, सारांश-मो पुचिपूर्वक मपमे देहके पाससके लिए एप माहार माश्मेिं प्रवृत्ति करता भीर मनिटसे निश्च होताई वा विपरेशसे संझी है. इस प्रकार विफलेन्द्रिय भी सही कहासे । मिस मीरको विचारपूर्वक किया करने में प्रवृत्ति नहीं है यह असंधी कराता है (असे-पकेन्द्रिय जीव), पर ऐवपदेशसे संदीप असंधीका विचार तुमा । म-धि-सम्यस्वभाषिके कपमकी अपेक्षा बहसंही कीन है। १पहरेमाहीमा को स प्रभारे रिपो पिम पर बने चास्पित पस्नग न ममा रिम।

सम्यरुश्रुतका वर्णन १०९ , . उ०-सम्यग्दृष्टिके श्रुतका क्षयोपशम होनेसे दृष्टिवादोपदेशके द्वारा संही होता है, ऐसेही असंक्षिश्रुत-मिथ्याशुतके क्षयोपशमसे असंज्ञी कहाता है, यह दृष्टि- वादोपदेशसे संज्ञी असंज्ञीका वर्णन हुआ। संज्ञी व असंज्ञी जीवोंके भेदसे संज्ञि असंज्ञिश्रुत भी तीन प्रकारका होता है । यह संज्ञिश्रुत हुआ। यह असंज्ञिश्रुतभी वर्णनसे पूर्ण हुआ। सू ३९ ॥ मूल-से किं तं सम्मसुयं ? सम्मसुयं जं इमं अरिहंतेहिं भगवंतेहिं उप्पण्णनाणदंसणधरेहिं तेलुक्कनिरिक्खियमहियपूइपहिं तीय- पडुप्पण्णमणागयजाणएहिं सवण्णूहिं सवदरिसीहिं पणीयं दुवालसंगं गणिपिडगं, तं जहा-आयारो १, सूयगडो २, ठाणं ३, समवाओ ४, विवाहपण्णत्ती ५, नायाधम्मकहाओ ६, उवा- सगदसाओ ७, अंतगडदसाओ ८, अणुत्तरोववाइयदसाओ ९, पण्हावागरणाइं १०, विवागसुयं ११, दिद्विवाओ १२, इच्चेय दुवालसंगं गणिपिडगं चोदरापुस्विस्स सम्मसुयं, अभिण्णदस- पुब्बिस्स सम्मसुयं, तेण परं भिण्णेसु भयणा, से त्तं सम्मसुयं ॥ सू ४०॥ छाया-अथ किन्तत्सम्यक्-श्रुतम् ? सम्यक्-श्रुतं यदिदम्-अर्हद्भिर्भग- वद्भिरुत्पन्नज्ञानदर्शनधरैस्त्रैलोक्यनिरीक्षितमहितपूजितैः, अती- तप्रत्युत्पन्नानागतज्ञायकैः, सर्वज्ञैः सर्वदर्शिभिः प्रणीतं द्वादशा गणिपिटकम् , तद्यथा-आचारः १, सूत्रकृतम् २, स्थानम् ३, समवायः ४, विवाहप्रज्ञप्तिः ५, ज्ञाताधर्मकथाः ६, उपासक- दशाः ७, अन्तकृद्दशाः ८, अनुत्तरौपपातिकदशाः ९, प्रश्नव्याक- रणानि १०, विपाकश्रुतम् ११, दृष्टिवादः १२, इत्येतद् द्वाद- शाङ्गं गणिपिटकं चतुर्दशपूर्विणः सम्यक्-श्रुतम् , अभिन्नदश- पूर्विणः सम्यक्-श्रुतम्, ततः परं भिन्नेषु भजना, तदेतत्सम्यक्- श्रुतम् ॥ सू. ४० ॥ टीका-प्र०-अब वह सम्यकश्रुत कौनसा है ? उ०-उत्पन हुए केवल. ज्ञान और केवलदर्शनको धारण करनेवाले तथा जो देव दानव मानव आदि प्राणिवर्गसे आदरपूर्वक देखे गये और स्तुति नमस्कारको प्राप्त करनेवाले हैं व भूत भविष्य वर्तमानके ज्ञाता होनेसे सर्वज्ञ एवं सर्वदर्शी हैं, उन अर्हत् भग- १ द्वादशानामझाना समाहारे द्वादशाङ्गीति रूपम् , अत्र तु द्वादशाङ्गानि यस्मिन्निति पहुव्रीहि समासे द्वादशाङ्गमिति ।

" भीमबम्पीसूत्रम् पन्त- सीरोंसे प्रणीत जो यह शापशाही गणिपिटक-शेटके रमपिटक (पटी की तरह आचार्यका सर्वस्व है वह सम्पमत है, उसके बारह मा है मैसे-भाचारा, मकतार, स्थानार, समवाया , विवाहमाप्ति- भा५,शाता-धर्मकथाए। उपासकाशा . अन्तकदशा, अनुचरीप पातिकशार, प्रप्तम्याकरण १०, विपाकवत ११, प्टिवाए १२स प्रकार पह शपशार गणिपिता बीपहर्षीको सम्यकभुत है तथा भमिभवशी- सम्पूर्ण परापूर्वका ज्ञान धारण करनेवाछेको सम्पक्षत है, क्योंकि-परापूर्वका सम्पूर्ण काम सम्पफ्स्पीको ही होता है, उससे आगे पूर्वक मिन होनेपर पाने कए कम पश मव भादि पूर्वहाम हो तो सम्पमतपनकी मनमा है याने उसके लिये यह सम्यकभुत मी हो सकता है भौर मिप्या भी, मियम नहीं है। यह सम्पमतमा॥४०॥ मूल-से किं त मिच्छासुर्य मिष्ठासुर्य हम अण्णाणिएहि मिच्छा- विधिएहि समंदपुद्धिमहविगप्पियं, जहा-मायं, रामायण, मीमामुरुम्स(क), कोरिल्लय, सगरमधियाओ, सोगपोडग) महं, कप्पासिय, नागमहर्म, फणगसचरी, वइसेसियं, मुस्वयण, सेरासियं, काविलिय, लोगायय, सद्वितंतं, माजरं, पुराण, वागरण, मागवर्य, पायमली, पुस्सदेवयं, लेह, गणिय, सउणरुप, नारयाई, अहवा पावधरि कलाओ, पचारि य घेया संगोवगा, एपाई मिमहादिविस्स मिपातपरिग्गहियाई मिच्छासुर्य, एपाई चेष सम्मदिद्धिस्स सम्मतपरिग्गहियाई सम्मसुर्य, अहवा मिच्छविहिस्स वि पपाई घेव सम्मसुर्य, कम्हा ? सम्मत्तउत्तणभो, जमाते मिषाविडिया सेहिं पेव समएहिं पोइया समाणा के सपास विठीओ चर्यति, से च मियासुर्य ॥४१॥ छाया-अप किं तन्मिभ्यामुप्तम् ! मिथ्यामुत पविषमज्ञानिकर्मिच्यार- टिक स्वादिमतिविकल्पितम्, तपथा-मारतम् १, रामा पणम् २, मीमासुरोकम् ३, कौटिल्पकम् ४, शकतममिका' ५, सोग(घोटफ)मुखम् ६, कासिकम् ७, नागसूक्ष्मम् ८, कनक सप्तति ९, बैशेषिकम् १०, बुरुपयनम् ११, घेराशिकम् १२, कापिस्टिकम् १३, लोकायसिकम् १५, पठिसन्त्रम् १५, मातरम् नरेशदासप्रेरनेम बाप्पारण देशपिन राशि शयम एकमपणे परिजि।४ मानसपलस्पापर कमायग्राम ।

मिथ्याश्रुत और सादि-अनादिश्रुतका विचार , १६, पुराणम् १७, व्याकरणम् १८,भागवतम् १९, पातञ्जलि:२०, पुष्यदेवतम् २१,लेखम् २२, गणितम् २३, शकुनरुतम् २४, नाट- कानि २५, अथवा द्वासप्ततिः कलाः, चत्वारश्च वेदाःसाङ्गोपाङ्गाः, एतानि मिथ्यादृष्टेमिथ्यात्वपरिगृहीतानि मिथ्याश्रुतम्, एतानि चैव सम्यग्दृष्टेः सम्यक्त्वपरिगृहीतानि सम्यक-श्रुतम् । अथवा मिथ्यादृष्टेरप्येतानि चैव सम्यक्-श्रुतम्, कस्मात् ? सम्यक्त्व- हेतुत्वात्, यस्मात्ते मिथ्यादृष्टयस्तैश्चैव समयोंदिताः सन्तः केचित्स्वपक्षदृष्टीस्त्यजन्ति, तदेतन्मिथ्याश्रुतम् ॥ सू. ४१ ॥ टीका-प्र०-वह मिथ्याश्रुत क्या है ? उ०-अल्पमति मिथ्याष्टियों के द्वारा अपनी इच्छानुसार बुद्धिकी कल्पनासे कल्पित जो ये ग्रन्थ वे मिथ्याश्रुत हैं, जैसे-भारत १, रामायण २, भीमासुर कथितग्रन्थ ३, कौटिल्य-अर्थशास्त्र ४, शकटभद्रिका ५, खोड (घोटक) मुख ६, कापासिक ७, नागसूक्ष्म ८, कनकसप्तति ९, वैशेषिक १०, बुद्धवचन ११, त्रैराशिक १२, कापिलीय १३, लौकायत १४, षष्ठितन्त्र १५, माठर १६,पुराण १७, व्याकरण-शब्दशास्त्र या पाशावली आदिके प्रश्नोत्तर १८, भागवत १९, पातञ्जलि २०, पुष्यदैवत २१, लेख २२, गणित २३, शकुनरुत २४, नाटक २५, अथवा ७२ कलाएँ और अङ्गोपाङ्गसहित चार वेद, ये सवग्रन्थ मिथ्यादृष्टिके मिथ्यात्वरूपसे परिगृहीत-ग्रहण किये गये मिथ्याश्रुत हैं और ये ही भारत आदि सम्यग्दृष्टिचालेको सम्यक्त्वरूपसे परिगृहीत याने यथार्थरूपसे ग्रहण किये गये सम्यकश्रुत हैं, अथवा मिथ्याष्टिके भी येही सम्यक् श्रुत हैं, क्योंकि उनकेसम्यक्त्वमें ये हेतु होते हैं, जिसलिये वे मिथ्याष्टि उन भारत आदिशास्त्र ग्रन्थोंसेही प्रेरणा-बोध पाये हुए कई स्वपक्षष्टि-अपनी मिथ्याष्टिको छोड देते है, इसलिये उनके लिये भी वे वेद आदि सम्यक्थुत हो जाते हैं । यहमिथ्याश्रुतका वर्णन पूर्ण हुआ ॥ सू ४१॥ मूल-से किं तं साइयं सपज्जवसियं? अणाइयं अपज्जवसियं च? इच्चे- इयं दुवालसंगं गणिपिडगं वुच्छित्तिनयट्टयाए साइयं सपज्जव- सियं, अवुच्छित्तिनयट्टयाए अणाइयं अपज्जवसियं, तं समासओ चउब्विहं पण्णत्तं, तं जहा-दव्वओ, खित्तओ, कालओ, भावओ, तत्थ दबओ णं सम्मसुयं एगं पुरिसं पडुच्च साइयं सपज्जवसियं, बहवे पुरिसे य पडुच्च अणाइयं अपज्जवसियं, खेत्तओ णं पंच भरहाई पंचेरवयाई पडुच्च साइयं सपज्जवसियं, १ यह कपिलमुनिरुत अङ्कशान है। २ अनुयोगद्वार में इसको लौकिकागमके नामसे कहा है ।

नो- " भीमचम्पीपणम् पंच महाविहाई पडुन अणाइयं अपज्जवसिर्य, फालओ 4 उस्सप्पिणि ओसप्पिणिं च पाच साइर्य सपज्जवसिर्य, उस्सप्पिणिं नोओसप्पिणिं च पाच अणाइयं अफ्जवसिये, भावभो णं जे जया जिणपन्नत्ता भावा आपविजेति, पण्णवि- जति, परुपिजेति, सिज्जति, निसिजति, उपदसिजेति, तया ते मावे पशुच्च साइयं सपज्जवसिप, साओवसमियं पुण मात्र पक्ष अणाइये अपज्जवसिर्प, अहषा मवसिद्रियस्स सुर्य साइयं सपज्जवसियं च, अमवसिद्धियस्स पुर्य अणाइये अफज पसियं च, सव्वागासपएसग्गं सव्वागासपएसेहिं अर्णतगुणिर्य पञ्चवक्सर निफज्जद, सजीवाणं पिपर्ण अक्सरस्स अर्णत मागो निग्ग्धारिमो (पिइ) । जा पुण सोऽवि आवरिजा तेर्ण जीवो भजीवचं पाविजा- महुवि मेहसमुपए, छोह पमा पदसराणं । से साइपं सपज्जवसिप, से अणाइयं अपज्जवसिप ।सू ४२॥ गया-अप किं तत्सादिकं सपर्यवसितम् ? अनादिकमपर्यवसित इस्पे तत्वावशाचं गणिपिटकं व्युछित्तिनयापतया साविक सपर्य- पसितम्, भव्युणिचिनयार्थतयाऽनादिकमपर्यषसितम्, तत्समा सप्तमतुर्विध प्रज्ञप्तम्, सयपा-मम्यत', क्षेत्रत', कालतो मावत', तन दम्यतो न सम्यकू-मुप्तम्-पकं पुरुपं प्रतीस्प सादिकं सपर्यव सितम, महून् पुरुषधि प्रतीस्य अनादिकमपर्यवसितम्, क्षेत्रतो न पम भरतानि परापतानि प्रतीत्य सादिकं सपर्यवसितम्, पर- महाविदेहानि प्रतीत्यानादिकमपर्यवसितम्, कालत उत्सपिणी- मवसर्पिणीश प्रतीत्य सादिकं सपर्यवसितं, नोउत्सर्पिणी नो अवसर्पिणीच प्रतीस्पाऽनादिफमपर्यवसितम्, मावतो मु ये यदा मिनमज्ञप्ता मावा आस्यायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, प्ररुप्यन्ते, पमन्ते, नियन्ते, उपश्यन्ते, तदा तान् मावान् प्रतीस्प सादिक सपर्य पसितम्, क्षायोपशमिर्क पुनर्माचं प्रतीत्याऽमादिकमपर्यवसितम्, अपवा मवसिद्धिकस्प मुते सादिकं सपर्यवसितब, अभय सादि, अनादि, सपर्यवसित व अपर्यवसित श्रुतका विचार सिद्धिकस्य श्रुतमनादिकमपर्यवसितञ्च । सर्वाकाशप्रदेशाग्रं सर्वा- काशप्रदेशैरनन्तगुणितं पर्यवाक्षरं निष्पद्यते, सर्वजीवानामपि च अक्षरस्याऽनन्तभागो नित्यमुद्घाटितः (तिष्ठति ), यदि पुनः सोऽपि-आब्रियेत तेन जीवोऽजीवत्वं प्राप्नुयात् ॥ 'सुपि मेघसमुदये भवति प्रभा चंद्रसूर्याणाम् ।' तदेतत् सादिकं सपर्यवसितम्, तदेतदनादिकमपर्यवसितम् ॥ सू ४२॥ टीका-प्र०-भगवन् ! वह सादि सपर्यवसित-आदि अन्तवाला और अनादि अनन्त-श्रुत किस प्रकार है ? उ०-पूर्वोक्त यह द्वादशाङ्गी गणिपिटक व्यव- च्छित्तिनय-पर्यायार्थिकनयकी अपेक्षासे सादि और सान्त है, तथा अव्यवच्छि- त्तिनय-द्रव्यार्थिकनयके अर्थकी अपेक्षा याने द्रव्यकी अपेक्षासे आदि अन्तरहित है।द्रव्य क्षेत्र आदिकी अपेक्षा सादि व अनादि श्रुतका विचार करते हैं-वह सादि सपर्यवसित और अनादि अपर्यवसित श्रुत संक्षेपसे चार प्रकारका कहा गया है, जैसे कि १ द्रव्यसे २ क्षेत्रसे ३ कालसे व ४ भावसे, इनमे द्रव्यसे एक पुरुपकी अपेक्षा सम्यकश्रुत सादि सान्त है और बहुतसे पुरुषोंकी अपेक्षासे कभी अभाव नहीं होनेके कारण अनादि अनन्त है, क्षेत्रसे पांच भरत व पांच ऐरावत- को लेकर सादि सान्त है और पांच महाविदेहकी अपेक्षा श्रुत आदि व अन्तसे रहित है, कालसे उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी कालकी दृष्टिसे सादि सान्त है, और नोउत्सप्पिणी नोअवसप्पिणी-हानि वृद्धिरहित कालकी अपेक्षासे अनादि अनन्त भी है, भावसे जिनप्ररूपित जो भाव जिस समय कहे जाते, नाम आदि भेदसे दिखाये जाते व प्ररूपण दर्शन निदर्शन और उपनयरूप उपदर्शनसे कहे जाते हैं, उस समयके उन भावोंका आश्रयण करके सादि सपर्यवसित श्रुत है, और क्षायोपशमिक भावकी अपेक्षा अनादि अनन्त है, अथवा मव सिद्धिकका श्रुत सादि सान्त है क्योंकि मिथ्याश्रुतके त्याग और केवलज्ञानकी उत्पत्तिकी अपेक्षासे भव्यका श्रुत आदि अन्तवाला है, अभवसिद्धिकका श्रुत-मिथ्याश्रुत अनादि और अन्तरहित है, सभी आकाशके प्रदेशाग्रको सभी आकाश-प्रदेशोंसे अनन्तवार गुणन करनेपर पर्यायाक्षर निष्पन्न होता है। अर्थात् एक आकाश प्रदेशपर अनन्त अगुरुलघु पर्याये होती है, अतः पर्याय- परिमाणका अक्षरज्ञान होता है, धर्मास्तिकाय आदि अल्पपरिमाणमे होनेसे सूत्रमें साक्षात् नहीं कहे गये हैं, किन्तु यहाँ उनका भी ग्रहण करना चाहिए, अर्थात् सब द्रव्यपर्यायोंका जितना परिमाण होता है, अक्षर परिमाण भी उतना होता है, वह अक्षर ज्ञानरूप और अकारादि वर्णरूप है, अकार ककार आदि प्रत्येक अक्षर हस्व दीर्घ प्लुत आदि स्वपरपर्यायोंसे सभी द्रव्यपर्यायके समान अनन्त है और वह उत्कृष्ट श्रुतकेवलीको होता है । और अन्य सव १५ २१४ भीमपन्दीसूत्रम् जीवोंको भी मारका भगन्तवा माम भर्याद अवज्ञानका भनम्तवां भाप सरा मुसा एता है अगर फिर यह अनन्तयां भाग भी आवृत हो जाय तो सतसे जीष असीवपमको माप्त कर गाय क्योंकि चैतम्य नीयका लक्षण इस विपयको सान्तसे कहते हैं-"तुत सपन पावसके पटससे आपादित होने पर भी चम्न सूर्पकी ममा होती है पाने इस दो प्रकाश होता है (ती प्रकार अनम्तानन्त सामावरप-र्शनावरपके फर्मपरमाणुसे भारममोशाये वेटिव होमेपर मी भास्माको सर्वजपन्य ज्ञानमाया पतीही बदमानमात्रा मतिमृतात्मक सहिये सुवज्ञानका अनाविपन विकर नहीं होता है)पा सारि सपर्पवसित भुत तथा भनावि अपर्यबसित प्रतम भी वर्णन पूर्ण मा॥५२॥ मूल-से किं तं गमियं । गमियं दिद्विवाओ, से कि से भगमिय? अगमिष कालिय सुर्य, से चं गमिय, से अगामयं । छाया-भप किं तद्गमिकम् ? गमिक टिवाद अप किं तद्गमिकम् ? अगमिकं कालिकं पृतम्, तदेतत् गमिकम् , तदेतद्गमिकम् । टीका-प्र-वाह गमिक मृत किस प्रकार -मिस सूमो मात मम्प और मम्वमें कुछ विशेषतासे वारंवार उसी पाठका उच्चारण ही उसकी मामिक कावे हैं, टिवाप गमिक भुत है। यह अममिक मृत कौनसा है। उ०-मममिक-ममिकसे विपरीत, भाषा आदि काठिक त मममिक। पा गमिक भुत प भगमिक मुतका वर्णन पूर्ण हुमा। मुख-महवा तं समासमो पुषिहं पण्ण, तं जहा-अंगपपिठं अंग- बाहिरं प । से किं तं अंगबाहिरं ? अंगबाहिरं दुईि पण्ण, से जहा-आवस्सयं च आवस्सयवहरि प । से किस भाव- स्सय १ आवस्स छविहं पण्णवं, त जाा-सामाइर्य १, पडवी- सत्यमो २, वणर्य ३, परिक्कमणं ५, काउस्सग्गो ५, पत्र पसाणं ६, से आवस्सयं । छाया-मयवा तत्समासतो विविध प्रसप्तम्, सपा-भङ्गमविटम् मायाप । अथ किं सद्-अन्यायम् ? अन्याय दिविर्ष मज्ञप्तम्, तथपा-भावश्यकत्र भाषश्यकम्पतिरिक्तचाभप कि तवावश्यकम्, मावश्यक पडिपं प्रसप्तम्, तयपा-सामापिक, पतुर्विशतिस्तवः २, पन्दनकं ३, प्रतिक्रमणे , कायोत्सर्ग ५, मस्यास्पानम् ६, तदेतदापश्यफम् ।

संक्षेपसे श्रुतज्ञानके अङ्गप्रविष्ट व अङ्गबाह्यरूप भेद टीका-अथवा वह श्रुतज्ञान संक्षेपसे दो प्रकारका है, जैसे-अङ्गप्रविष्ट और अङ्गवाह । स्पष्टीकरण-श्रुतपुरुषके द्वादश अङ्गोंसे बहिर्भूत जो शास्त्र है वह अङ्गवाह्य-अनङ्गप्रविष्ट है, अथवा गणधरदेवके वचनोंका आश्रय कर स्थविरोंसे रचे गये शेष श्रुत अनङ्गप्रविष्ट होते हैं, तथा जो नियमितरूपसे सर्वदा अङ्गकी तरह नहीं रहते वे अनङ्गप्रविष्ट कहाते हैं। प्र०-भगवन् ! वह अङ्गबाह्य किस प्रकार है? उ०-अङ्गबाह्य श्रुत दो प्रकारका है, जैसे-आवश्यक और आवश्यक- व्यतिरिक्त-भिन्न । प्र०-वह आवश्यक क्या है ? उ०-आवश्यक छ प्रकारका कहा गया है, जैसे-सामायिक १, चतुर्विशतिस्तव २, वन्दना ३, प्रतिक्रमण ४, कायोत्सर्ग ५, और प्रत्याख्यान ६। (अवश्य करनेयोग्य क्रियाएँ आवश्यक हैं, उनको कहनेवाला श्रुत भी आवश्यक है,) यह आवश्यकका वर्णन पूर्ण हुआ। मूल-से किं तं आवस्सयवइरित्तं ? आवस्सयवइरित्तं दुविहं पण्णतं, तं जहा-कालियं च उक्कालियं च । से किं तं उक्कालियं ? उक्कालियं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-दसवेआलियं, कप्पि- याकप्पियं, चुल्लकप्पसुयं, महाकप्पसुयं, उववाइयं, रायपसेणियं जीवाभिगमो, पण्णवणा, महापण्णवणा, पमायप्पमायं, नंदी, अणुओगदाराई, देविदत्थओ, तंदुलवेयालियं, चंदाविज्जयं, सूर पण्णत्ती, पोरिसिमंडलं, मंडलपवेसो, विज्जाचरणविणिच्छओ, गणिविज्जा, झाणविभत्ती, मरणविभत्ती, आयविसोही, वीयराग- सुयं, सलेहणासुयं, विहारकप्पो, चरणविही, आउरपञ्चक्खाणं, महापच्चक्खाणं एवमाइ, से तं उक्कालियं । छाया-अथ किन्तदावश्यकव्यतिरिक्तम् ? आवश्यकव्यतिरिक्तं द्विविध प्रज्ञप्तम् , तद्यथा-कालिकञ्च-उत्कालिकश्च । अथ किं तदुत्का- लिकम् ? उत्कालिकमनेकविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-दशवै- कालिकं १, कल्पिकाकल्पिकं(कल्पाकल्पम्)२, चुल्ल(क्षुल्ल) कल्पश्रुतं ३, महाकल्पश्रुतम् ४, औपपातिकं ५, राजप्रश्नीकं ६, जीवाभिगमः७, प्रज्ञापना८, महाप्रज्ञापना ९, प्रमादाप्रमादं १०, नन्दी ११, अनुयोगद्वाराणि १२, देवेन्द्रस्तवः १३, तन्दुलवै- चारिकं १४, चन्द्रकवेध्यं १५, सूर्यप्रज्ञप्तिः १६, पौरुषी- मण्डलं १७, मण्डलप्रवेशः १८, विद्याचरणविनिश्चयः १९, गणिविद्या २०, ध्यानविभक्तिः २१, मरणविभक्तिः २२, भीमचमीमा आत्मविशोधि २३, वीतरागमुक्त २४, सम्लेसनामुतै २५, विहारफल्प २६, धरणविधि २७, आतुरप्रत्यास्यानं २८, महामस्यास्यानम् २९, पवमादि, तदेतदुत्कालिफम् । टीका-प्र० अब भावश्यकसे भिन्न माह कौनसा भुत है। उ०-आवस्यक ग्मतिरिक पत पो मकारका है जैसे-कासिक भुत भीर सत्कालिक मुत, (जो दिनरातके मपम और भन्तिम पहरसप काछम परे जाते हैं कातिक तपा जो उससे मिव समयमें पढे माते वे सत्कालिक कहाते हैं।) म०-मगवम् । नाकासिक त कौनसे है। 30-उरकासिक भुत भनेक प्रकारके को गये असे कि काहिक, कल्पाकस्प, कस्पात, महाकल्पभुत, भोपपा तिक, रायपवेणिय, जीवामिगम महापमा, महामझापमा प्रमादाममाए, नदी ममुयोगदार यन्त्रस्तष, वनस्येयाछियरसमस पैचारिक) चन्द्रविया, पूर्व- माहाप्ति, पीरुपीमण्यक, मण्डलमवेश, विधाचरणविनिमय मणिविधा, म्यान विमाफि, मरणविमति, भारमविशुसि, वीतरागत संसनामुत विहारकल्प परणपिषि आतमत्वाम्मान महापस्याख्यान इत्यापि, इस मकार मामले अनुसार विपयवासे पेशास उकासिक है। यह उत्कातिकतका वर्षम पूर्ण हुमा। मूछ-से कि से काठिय ? कालिये अणेगविई पण्णत १ तं जहा- उत्तरायणाई, वसाओ, कप्पो, ववहारो, निसीह, महानिसी, इसिमासिपाई, जीवपाची, दीवसागरपसाची, पंपाची, सुविआविमाणपविमती, महल्लियाविमाणपविभत्ती, अंग पूठिया, पग्गधूलिया, विवाहपलिया, अरुणोववाद, वरुणो- पवार, गरुलोवषाए, परणोववाए, पेसमणोपवाए, पेलंघरोववाए, देविदोववाए, उट्ठाणसुर्य, समुट्ठाणसुपं, नागपरियायणियामो, निरयावलियामो, फप्पियामो, फापवर्गसियाओ, पुफियाओ, पुप्फपूठियाओ, बण्हीवसाओ, (आसीविसमाषणाण, विहि- विसमावणाणं, सुमिणमावणाण, महासमिणमावणार्ण, पग्गि- निसग्माण,) एषमाइपाई परासीइ पहनगसहस्साई भगवओ अहमो उसहसामिस्स माइतित्यपरस्स, सहा संलिज्जाई पान गसहस्साई मनिझमगाणं जिणपराणं, बोहसपहनगसहस्साणि अप्रतिम विपत परिशिम । " आवश्यक व्यतिरिक्त और कालिकश्रुतका वर्णन ११७ . , भगवओ वद्धमाणसामिस्स, अहवा जस्स जत्तिया सीसा उप्पत्तिआए वेणइयाए कम्मयाए परिणामियाए चउविहाए बुद्धीए उववेया, तस्स तत्तियाइं पइण्णगसहस्साई, पत्तेयबुद्धा वि तत्तिया चेव, से तं कालियं, से तं आवस्सयवइरित्तं, से तं अणंगपविटुं । सू. ४३॥ छाया-अथ किं तत्कालिकम् ? कालिकमनेकविधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा- उत्तराऽध्ययनानि, दशाः, कल्पः, व्यवहारः, निशीथं, महा- निशीथम् , ऋपिभाषितानि, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिः, द्वीपसागरप्रज्ञप्तिः, चन्द्रप्रज्ञप्तिः, क्षुल्लिकाविमानप्रविभक्तिः, महल्लिका(महा)- विमानप्रविभक्तिः, अङ्गचूलिका, वर्गचूलिका, विवाहचूलिका, अरुणोपपातः, वरुणोपपातः; गरुडोपपातः, धरणोपपातः, वैश्र- मणोपपातः, वेलन्धरोपपातः, देवेन्द्रोपपातः, उत्थानश्रुतं, समु- त्थानश्रुतं, नागपरिज्ञापनिकाः, निरयावलिकाः, कल्पिकाः, कल्पावतंसिकाः, पुष्पिताः, पुष्पचूलिका(चूला), वृष्णिदशाः, (आशीविपभावनं, दृष्टिविषभावनंस्वप्नभावनं, महास्वप्नभावनं तेजोऽग्निनिसर्गः) एवमादिकानि चतुरशीति प्रकीर्णकसहस्राणि भगवतोऽहंत ऋषभस्वामिन आदितीर्थङ्करस्य, तथा संख्येयानि प्रकीर्णकसहस्राणि मध्यमकानां जिनवराणाम् , चतुर्दशप्रकीर्ण कसहस्राणिभगवतो वर्द्धमानस्वामिनः, अथवा यस्य यावन्तः शिष्या औत्पत्तिक्या वैनयिक्या कर्मजया पारिणामिक्या चतु- विधया बुद्धयोपपेताः, तस्य तावन्ति प्रकीर्णकसहस्राणि, प्रत्येक- बुद्धा अपि तावन्तश्चैव, तदेतत्कालिकम्, तदेतदावश्यकव्यति- रिक्तम् , तदेतदनङ्गप्रविष्टम् ॥ सू. ४३॥ टीका-प्र०-वह कालिकश्रुत कौनसा है? उ०-कालिकश्रुत अनेक प्रकारका कहा गया है, जैसे कि १ उत्तराध्ययनसूत्र, २ दशाश्रुतस्कन्ध, ३ कल्प-बृहत्कल्प- सूत्र, 8 व्यवहार, ५ निशीथ, ६ महानिशीथ, ७ ऋषिभाषित, ८ जम्बूद्वीप- प्रज्ञप्ति, ९ द्वीपसागरप्रज्ञप्ति, १० चन्द्रप्रज्ञप्ति, ११ क्षुद्रिकाविमानप्रविभक्ति, १२ महतीविमानप्रविभक्ति, १३ अङ्गचूलिका, १४ वर्गचूलिका, १५ विवाहचूलिका, १६ अरुणोपपात, १७ वरुणोपपात, १८ गरुडोपपात, १९.धरणोपपात, २० वैश्र- , - भीमममीन मणोपपात, ११ वेष्ठ परोपपात, २२ देवेन्द्रोपपात, ११ उत्यानमुवा ॥ त्यानहत, २५ मागपरिक्षा २६ निरयावाटिका, २० कास्पिका २८ असा परीसिका, २९ पुष्पिता ३० पुप्पमिका ५ वृणितमा (अम्भकप्णिाशा) जाशीविष' स्पाविक ८४ दबार प्रकीर्णक प्रथम तीर्थर भनवान भी सपम: देव स्वामीके हैं, तया संभ्यात हमार मकीर्णक भम्पम मिनवरकि, भमवान् पर्समाम स्वामीके १४ हमार प्रकीर्णक होते हैं। अक्वामिन तीर्यारो मितने शिम्य भौत्पत्तिकी धमयिकी कर्ममा भौर परिणामिकी इन चार प्रकारकी दुनिसे एक है, नवीकरोकि उतने ही हजार प्रकीर्णक होते। भौर मस्कार मी सतनही है, यह कालिकत भावपकम्पतिरिक, वषा श्रमाविष्ट भूतका वर्णन समाप्त हुमा 80 मूल-से कि ते अगपविट्ठी भंगपवितु दुवालसविहं पण्ण, त गा- भायारो १, प्रयगडो २, ठाणे, समवामो ४, विवाहपाची ५, नापाधम्मकहाओ ६, उवासगदसाओ , अंतगावसामो ८, अणुत्तरोषवाइयवसाओ९, पणहावागरणाई १०, विवागसुर्य ११, विद्विषाओ १२॥ स. १४ ॥ छाया-अप किं तद् अनमविष्टम् १ अङ्गमविटं पादाविध प्राप्तम्, तपया-आचार' १, सनकृत् २, स्पानं २, समवाय' ४, विवाहप्रज्ञप्ति ५ ज्ञाताधर्मकया ६, उपासकदशा' ५, अन्त रुदशा' ८, अनुघरोपपातिकशा' ९, ममम्पाकरणानि १०, विपाक मुतम् ११, टिवार १२॥ स. ४॥ टीका-म-परमामवित भुत कैसा है: रमापविष्टभुत बारा मका रका कया गया है खे-१ माचार-भाचारा २ मा स्पाना ४ समवाया, ५विवाहमज्ञाति-भपवती, मातापर्मकपा उपासकासार, ८ भम्वादशा १ ममुत्तरीपपातिकाशात १० ममम्पाकरण ११ विपाक प्रत, मीर १२ रहिवाय. 18 मत्येकका स्वरूप व परिचय कमसे माग समकार सर्य करते हैं- मुष्ट-से कि ते आपारे ! आपारे जे समणाण निग्गयाणे आपा- रगोयरविणयवेणइयसिसामासाममासापरणकरणजायामापा- भापरिमारन शिविरमावर, पारपमान सम्मान यात्मभासमोर पेप्रीम निबाम मी किम्प प्रति मिले है। ममुनामपि मातिामेति नियमाप।। - आचाराङ्ग सूत्रका परिचय ११९ १ , -- वित्तीओ आघविजंति, से समासओ पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-नाणायारे, दसणायारे, चरित्तायारे, तवायारे, वीरियायारे, आयारे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखिज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखिज्जाओ निज्जुत्तीओ,संखिज्जाओ पडिवत्तीओ, से अंगट्ठयाए पढमे अंगे, दो सुयक्खंधा, पणवीस अज्झयणा, पंचासीई उद्देसणकाला, पंचासीई समुद्देसणकाला, अट्ठारसपयसहस्साइं पयग्गेणं, संखिज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासयकडनिबद्ध- निकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविनंति, पन्नविजंति, परूविजंति, इंसिज्जंति, निदंसिज्जंति, उवदंसिज्जति, से एवं आया एवं नाया एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आघ- विज्जइ, से तं आयारे ॥ सू. ४५ ॥ छाया-अथ कः स आचारः ? आचारे श्रमणानां निर्ग्रन्थानामा- चारगोचरविनयवैनयिकशिक्षाभाषाभापाचरणकरणयात्रामात्रा वृत्तय आख्यायन्ते, स समासतः पञ्चविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा- ज्ञानाचारः १, दर्शनाचारः २, चारित्राचारः ३, तपआचारः ४, वीर्याऽऽचारः ५, आचारे नु परीता (परिमिता) वाचना, संख्येयानि-अनुयोगद्वाराणि, संख्येया वेढाः (वृत्तयः), संख्येयाः श्लोकाः, संख्येयाः निर्युक्तयः, संख्येयाः प्रतिपत्तयः, स नु अङ्गार्थतया प्रथममङ्गम् , द्वौ श्रुतस्कन्धौ, पञ्चविंशतिरध्ययनानि, पञ्चाशीतिरुद्देशनकालाः, पञ्चाशीतिः समुद्देशनकालाः, अष्टा- दश पदसहस्राणि पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परीतास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृत- निबद्धनिकाचिता जिनप्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते प्रज्ञाप्यन्ते, प्ररूप्यन्ते, दय॑न्ते, नियन्ते, उपदय॑न्ते, स एवमात्मा, एवं १ परिपूर्वकस्य क्तप्रत्ययान्तस्य गत्यर्थकस्य इण्धातो. परीतमिति रूपम् , तस्य परीता-परिमितेति तात्पर्यम् ।

११० भीमप्रमीसुषम झाप्ता, एवं विज्ञाता, एवं परणकरणरूपणा आम्यायते, स पर आचार ॥ ५५॥ सीमा-प्र०मा-आचार भूत मामके अपम आमें स्पा वर्णन है। - भाचारामें ममनिमन्यो अनेकविध भाचार, गोषर भिक्षामहपरिधि, विनम और विनयफल तथा माणा व मूमगुण व उत्तएपकी आबना कप शिक्षा, सस्प म्यवहारमापा, असत्य मार मिम अभापा-नहीं बोली-योग्य पषम, मारामत आदिमाचरण, व पिण्डविशुद्धि भाविकरण, संयमपामा- संयमनिर्वाहके सिये आहारका प्रमाण और उसके निर्वाहकी पदि पे का भाव कहे जाते हैं। वह भाचार संक्षेपसे पांच प्रकारका जैसे-वामाचार रानाधार, परिणाचार, तपाचार, ५ वीर्याचार । भाचा सम भर्प भवानरूप वाचमा परिमित , पिकम निक्षेप आवि संगमेप अनुमोमार है, पर (छनोविज्ञप भी) संस्म्याव या सम्यात शोक और सम्मान निपुत्तियों है, प्रतिपन्धि-सम्म आदि पदार्यके कयनकी पाली, या प्रतिमा अमिमा विशेषकप मतिपतियाँ संम्पात है, आकी हिते यह जाचार मयम भरपो इसके तस्कम्प और पचीस भम्पयन हैं, मोशन कार और मदेशमकाम हैं परामपपरिमापसे मठारह बजार इतके पर है, सम्मात भार व भनम्बमम-अर्थशाम होते (पकर पामें मपरि मित अर्थ वान होनेवे ) स्वपरमेरसे पर्याय भी मनम्त । सहीन्त्रिप मापि परिमिव भौर स्थावर अनन्त धर्मास्तिकाय भापिशाबत या प्रयोग ब विमसासे होनेवास भससम्म्याराग भाषि-कर पेसमी माचार में निवासरूपसे कहे गए, वय-निकाषित-नियुक्तिनीय माहरणपूर्णक अनेक वयसे म्यवस्पापित ऐसे मिनरशित भाष इसमें को जात महा पम प्ररूपम, पान, निदर्शन और उपरान भादि विशेषतासे समझाये जाते हैं। माय सम्पा भाषापार परमेपर नो फल होता है से दिखाते हैं- भाषाणा पाठक पर्वकप पाने माचाररूप को बाता , मिस प्रकार भाधारामें कहा है उसी प्रकार आचार भाविका ज्ञाता होवाईसी प्रकार विशेषता के साप भी उनको गानता है। इस मकार भाचापामें परफारमकी मनपणा की जाती है। यह भाचाराका स्वरूप पूर्ण हुमाग १॥ मूल से किं तं सूपगडे १ सूपगडे ण छोप सज्जा, अलोप पाजा, लोयालोप भाजा, जीवा साति, मजीवा साति, जीवाड- जीवा सार्जति, ससमप धामा, परसमप सूइज्जर, ससमय- परसमप सजा, सुपगडे असीयस किरियावाइसयस्स, पतपसीहए अकिरियापाईण, सट्ठीप भण्णामियाईर्ण, परिपिडा - सूत्रकृताङ्गका परिचय १२१ , , तेसट्ठाणं पासंडियसयाणं बूहं किच्चा ससमए ठाविज्जइ, सूयगडे णं परित्ता वायणा, संखिज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखिज्जाओ निज्जुत्तीओ, (संखिज्जाओ संगहणीओ) संखिज्जाओ पडिवत्तीओ, से णं अंगठ्ठयाए बिईए अंगे, दो सुयक्खंधा, तेवीसं अज्झयणा, तित्तीसं उद्देसण- काला, तित्तीसं समुद्देसणकाला, छत्तीसं पयसहस्साणि पयग्गेणं, संखिज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासयकडनिबद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविजंति, पण्णविजंति, परूविजंति, देसिज्जति, निदंसिज्जति, उवदंसिर्जति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आघविज्जइ, से तं सूयगडे २ ॥ सू०४६ ॥ छाया-अथ किं तत् सूत्रकृतम् ? सूत्रकृते लोकः सूच्यते, अलोकः सूच्यते, लोकालोको सूच्येते, जीवाः सूच्यन्ते, अजीवाः सूच्यन्ते, जीवाऽजीवाः सूच्यन्ते, स्वसमयः सूच्यते, परसमयः सूच्यते, स्वसमयपरसमयाः सूच्यन्ते, सूत्रकृते-अशीत्यधिकस्य क्रिया- वादिशतस्य, चतुरशीतरक्रियावादिनां, सप्तषष्ठेरज्ञानिकवादिनां (अज्ञानवादिनां), द्वात्रिंशतो वैनयिकवादिनां, त्रयाणां त्रिषठ्य- धिकानां पाषण्डिकशताना व्यूहं कृत्वा स्वसमयः स्थाप्यते, सूत्रकृते परीता वाचनाः, संख्येयानि-अनुयोगद्वाराणि, संख्येयाः वेढाः, संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया निर्युक्तयः ( संख्येयाः सङ्ग- हण्यः ) संख्येयाः प्रतिपत्तयः, तदङ्गार्थतया द्वितीयमङ्गम् , श्रुतस्कन्धौ, त्रयोविंशतिरध्ययनानि, त्रयस्त्रिंशदुद्देशनकाला, त्रयस्त्रिंशत् समुद्देशनकाला, पत्रिंशत् पदसहस्राणि पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परिमि- (री)तास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृतनिबद्धनिकाचिता जिन प्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते प्ररूप्यन्ते दर्श्यन्ते निदर्श्यन्ते . - द्वौ , १२० श्रीमनीरत्रम् ज्ञाता, एवं विज्ञाता, पर्व चरणकरणकपणा आम्पायते, स एष आचार ॥सू ४५ ॥ टीका-मयय-आचार भुत नामके मयम माम क्या वर्णन है। उv- भाचारामें भमपनिर्मन्योंकि ममेकविध भाषा, मोचर भिक्षापामावधि, पिनप मौर विनयफम क्या महणा व मूगुण पाघरगुपकी बासेबना कप शिक्षा, सत्य म्यवहारमाष, भसत्य भौर मिम अमापा-नहीं बोलने योग्य पचन, महावत मावि भाचरण . पिण्मविएरि मावि करण, संपमयात्रा- संपमनिर्वाहके लिपे बाहारका प्रमाण और उसके निर्वाहकी पति पे सब भाव को जाते हैं। वह माचार संक्षेपसे पांच मयरका , जैसे-जामाचार २पर्शनाचार, १ चरिमाचा तपाचार वीर्याचार । भाषामें सूब मर्ष भपानसप वाचनाएँ परिमित हैं, उपक्रम निक्षेप भारि संख्येप भनुयोगशार है, पेर (छनोविशेष मी) संस्मात हैं । तया संख्यात श्लोक और संपात मिकियाँ हैं, प्रतिपति-पम्प भादि पदार्थक कयनकी शैली, या प्रतिमा- मभिमा विशेषरूप प्रतिपत्तियाँ संम्पात हैं मानी शाहिसे पह माचार प्रयम मा हो इसके तस्कम्प भौर पचीस अध्ययन हैं, नीराम कास और ससदेशमकास पदामपपरिमापसे भठार हजार इतके पर हैं सम्पात अक्षर प भनम्तमम-मर्यशान होते हैं (एक पल्में भपरि मित भर्य वाम होने ) स्वपरमेदवे पर्याय मी ममन्त । सहीत्रिप भारिपरिमित भौर स्थावर अनन्त हैं धर्मास्तिकाय आदि शाबत सपा मपीम व विमसासे होनेवाले पटसम्भ्याराम भावि-कृत पे सभी माचार में निवर स्वरूपसे को गप, क्या-मिकावि-निषित व मारणपूर्वक अनेक तरासे म्पयस्थापित पैसे जिनमदशित भाषासमें को जाते हैं महा पन मपम, पान, नियम और ग्पर्शन भाषि विशेषतासे समझाये जाते हैं। भावसे सम्पआचाणाके परमेपर गो फस होता है उसे दिखाते हैं- भाचाणका पाठक पर्वकप पाने भाषाररूप हो जाता है जिस प्रकार मापागामे कहा है उसी प्रकार आचार बारिका पाता होता है इसी प्रकार विधीपता के साप मी उमको नामता है, इस मकार माघाण पापकरणकी प्रकपणापही गाती है। यह आपापका स्वरूप पूर्ण हुमा मू. मूल-से किं सं स्पगडे ? सूयगडे णे लोप सामर, अलोए सामा लोपालोप हाम्नइ, जीवा सहज्जति, मजीवा साजंति, जीवाड जीवा साति, ससमप साजा, परसमप सूाज्जा, ससमय परसमए सूइज्जइ, सूपगडे णं असीयस्स किरियावाइसपस्स, परासीरए अकिरिपावाईणं, सचट्ठीए भण्णाणियपाईर्ण, पारपिर।

सूत्रकृताङ्गका परिचय १२१ , तेसट्ठाणं पासंडियसयाणं बूहं किच्चा ससमए ठाविज्जेइ, सूयगडे णं परित्ता वायणा, संखिज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखिज्जाओ निज्जुत्तीओ, (संखिज्जाओ संगहणीओ) संखिज्जाओ पडिवत्तीओ, से णं अंगट्ठयाए बिईए अंगे, दो सुयक्खंधा, तेवीसं अज्झयणा, तित्तीसं उद्देसण- काला, तित्तीसं समुद्देसणकाला, छत्तीसं पयसहस्साणि पयग्गेणं, संखिज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणता थावरा, सासयकडनिबद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविजंति, पण्णविजंति, परूविजंति, दंसिज्जति, निदंसिज्जंति, उवदंसिज्जंति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आघविज्जइ, से तं सूयगडे २ ॥ सू०४६ ॥ छाया-अथ किं तत् सूत्रकृतम् ? सूत्रकृते लोकः सूच्यते, अलोकः सूच्यते, लोकालोको सूच्येते, जीवाः सूच्यन्ते, अजीवाः सूच्यन्ते, जीवाऽजीवाः सूच्यन्ते, स्वसमयः सूच्यते, परसमयः सूच्यते, स्वसमयपरसमयाः सूच्यन्ते, सूत्रकृते-अशीत्यधिकस्य क्रिया- वादिशतस्य, चतुरशीतेरक्रियावादिनां, सप्तषष्ठेरज्ञानिकवादिनां (अज्ञानवादिनां), द्वात्रिंशतो वैनयिकवादिनां, त्रयाणां त्रिषष्ठ्य- धिकानां पाषण्डिकशतानां व्यूहं कृत्वा स्वसमयः स्थाप्यते, सूत्रकृते परीता वाचनाः, संख्येयानि-अनुयोगद्वाराणि, संख्येयाः वेढाः, संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया नियुक्तयः ( संख्येयाः सङ्घ- हण्यः ) संख्येयाः प्रतिपत्तयः, तदङ्गार्थतया द्वितीयमङ्गम् , द्वौ श्रुतस्कन्धौ, त्रयोविंशतिरध्ययनानि, त्रयस्त्रिंशदुद्देशनकालाः, त्रयस्त्रिंशत् समुद्देशनकालाः, षटत्रिंशत् पदसहस्राणि पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परिमि- (री)तास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृतनिबद्धनिकाचिता जिन प्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते प्ररूप्यन्ते दयन्ते निदर्श्यन्ते , १४ भीमानीसूत्रम् उपवश्यन्ते, स एवमास्मा, पवं ज्ञाता, एवं विज्ञाता, एवं परण- करणमरुपणाऽऽसयायते, तदेतत्सूत्रकृतम् ॥ ८.४६ ॥ टीका-म०-भगयम्। कताइमें क्या वर्णन है।०-मात पवास्ति कायास्मक लोक पत्रित किया जाता है (कदा माता है) असोक कहा जाता है और होकाठोकोमों कहे माते हैं जीय कदे जाते, मजीव कहे जाते भीर मीर अजीव उभय कहे जाते हैं तया सूत्रकृतसे स्वममय-मनदर्शन कहा जाता, पर समय-परमत कहा जाता और स्वसमय परसमय दोनों कहे गाते हैं, सपासमें पकसी अस्सी क्रियायारियांका चीरासी भकिपायावियोंक, सतस्ठ माज्ञानवाति पौके पत्तीस विनयवादियोंके समकार सब मिलकर तीनसो प्रेसठपासणियोंकि ब्यूहको बनाकर स्वसमम-स्यमत स्थापन किया माता है, प्रकृतमे परिमित वाचनाएँ हैं, संस्पात अनुपोगवार, संस्पात बेडरूप छप भीर संस्मेव लोकरें. सत्यात निकि पसंसयात मविपचियाँ हैं, अपेक्षा वह सूत्राव पूसरा मामा भुतस्कम्प और इसके तेवीस भम्ययन हैततीस शनास तया तेतीस ही सहदेशनकार है, पदापसे इसक छत्तीस हजार पद है संकपात अक्षर और अनन्त भनाम अनन्त पर्याय अस परिमित है श्रीर स्थावर अमम्त हैं, पर्मास्तिकाय मादि सम्परूपसे पाचत और मयोम व विमसाकरण अपसे निपर है या हेतु आदिसे स्पषस्थापित यो जिनमणीत माय पेरतम कोनाते हैं, महापन मडपण, पर्शन निदर्शन व उपवन आदि विशेषताये कोनाते हैं, (मम्पयनकि लिये फस दिसाते सुमाताका र पाठक अध्ययनोक्त विपयम तोकतान होनेसे परम्भूत होता है पात्रोक पायर्योका उसीप्रकार ज्ञाता व तपनुसाती विज्ञाता होता है समकार सुगाव, चरणकरणकी महपप्पा कही जाती है, यह मा सूमरुतात्मामक दूसरा भर ॥सू०४६॥ मूल-से कि त ठाणे ! ठाणे णे जीवा ठाविति, अजीवा ठाविति, जीवाजीपा ठाविति, ससमए ठाविजइ, परसमए ठाविना ससमयपरसमए ठाविज्मा, लोए ठापिज्जा, अलोप ठावि ज्जा, लोपालोर ठगविज्जा, ठाणे णे का, कूग, सेला, सिह रिणो, परमारा, कुगाई, गुहाओ, भागरा, पहा, नईमो, माम विचति, ठाणे णं एगाइयाए एणुचरिपाए पीए सटाणग विवरियाणं मावाणं परवणा आपपिज्जा, ठाणे णं परिचा पापणा, संसेजा अणुओगदारा, संसेज्मा पेठा, संसेज्मा सिलोगा, संमेजाभो निग्गुचीभो, संखेज्मामो संगहणीओ, परिमिसम्म स्थानाङ्गका परिचय १२३ - संखज्जाओ पडिवत्तीओ, से णं अंगद्वयाए तईए अंगे, एगे सुयखंधे, दस अज्झयणा, एगवीसं उद्देसणकाला, एगवीसं समुद्देसणकाला, बावत्तरिपयसहस्सा पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासयकडनिबद्धनिकाइया जिणपन्नत्ता भावा आघवि- ज्जंति, पन्नविज्जति, परूविज्जति, इंसिज्जति, निदसिज्जति, उवदंसिज्जंति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आघविज्जइ, से त्तं ठाणे ३॥ सू ४७ ॥ छाया-अथ किं तत् स्थाने ? स्थानेन जीवाः स्थाप्यन्ते, अजीवाः स्थाप्यन्ते, जीवाऽजीवाः स्थाप्यन्ते, स्वसमयः स्थाप्यते, परसमयः स्थाप्यते, स्वसमयपरसमयौ स्थाप्येते, लोकः स्थाप्यते, अलोकः स्थाप्यते, लोकाऽलोको स्थाप्येते, स्थाने टङ्कानि, कूटानि, शैलाः, शिखरिणः, प्रारभाराः, कुण्डानि, गुहाः, आकराः, द्रहाः, नद्य आख्यायन्ते, स्थाने एकादिकयैकोत्तर- कया वृद्ध्या दशस्थानकविवर्द्धितानां भावानां प्ररूपणाऽऽख्या- यते, स्थाने परीता वाचनाः, संख्येयान्यनुयोगद्वाराणि, संख्येया वेढाः (वृत्तयः), संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया नियुक्तयः, संख्येयाः सङ्ग्रहण्यः, संख्येयाः प्रतिपत्तयः, तदङ्गार्थतया तृतीयमङ्गम् , एकः श्रुतस्कन्धः, दशाऽध्ययनानि, एकविंशति- रुद्देशनकालाः, एकविंशतिः समुद्देशनकालाः, द्वासप्ततिः पदसहस्राणि पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परीतास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृत- निबद्धनिकाचिता जिनप्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, प्ररूप्यन्ते, दर्यन्ते, निदर्श्यन्ते, उपदय॑न्ते, स एवमात्मा, एवं ज्ञाता, एव विज्ञाता, एवं चरणकरणप्ररूपणाऽऽख्यायते, तदेत- स्थानम् (ने) ॥ सू ४७ ॥ टीका-प्र०-गुरुदेव! स्थानाङ्गमें क्या विषय है ? उ०-स्थानाङ्गसे जीव स्थापन किये जाते, अजीव स्थापन किये जाते और जीवअजीव दोनों १२४ श्रीभवमीसूत्रम् स्थापन किये आवे, स्वसमय स्थापन किया जाता है परसमय स्थापन किया जाता है तथा स्वसमय परसमय पोनों स्थापन किये जाते है सोकस्वरूप स्थापन किया जाता है, असोक स्यापम किया मावा है मीर होक अठोक दोनों स्यापन किये जाते हैं फिर स्यामा टरपर्वतके टूटे हुए तट, शिखर, सह-दिमवत् भावि पर्वत, शिखरवाछे पर्वत, पारमार- रूपरसे कुछ सफा हुआ अट अयवा पर्वतके ऊपर छापीकेम्मकी आकृतिक समाम निकले हुए विमाम, कृण-पडामपातकण आदि गुहारी गुफा भाकर- लोह आषिकी मान, प्रह-जहाशय, भौर नयी ये सच कमाते हैं। स्पाना पकसे लेकर भागे एक एककी दिसे पश स्थानतक बडे हुए मावोंकी प्ररूपमा की जाती है, स्थानाम परिमित वाचनाएँ और समयात ममुयोगवार है, मेर छनोविशेप संन्यात व लोकमी संख्यात हैं नियुक्ति संपणी मीर मतिपचिनो संम्पेय संम्पेय माकी पटिसे वह स्थाबाद तीसरा आहै इसके एक भूतस्कन्म और मा मध्ययन, देशन काठ या समुपेशन का एक वीस है, पदामसे पारर इमार पद है, संम्पात मक्षर और अमन्त मम-अर्च- धान हैं, मनम्न पर्पय , परिमित बस व भमन्त स्थावर तपा धर्मास्ति- कापारिक शास्वत व प्रयोम मादितइसमें मिवर व भारिसेम्पक्स्थापित मिनमणीत माव इसमें कडे जाते हैं महापन मरूपण पर्शन निर्शन, भौर उपपनसे विशेषतापूर्वक कोमाते इस अध्ययनसे पद पाठक ताप हो माता पसे पात्रो मर्योका वाता तथा इसी मकार पिज्ञाता बनता है मकार पहोचरणकरप्पकी मनपणा कही गाती है पर हुआ स्थान तीसरा मासू० मूल-से कि ते समबाए ? समवाए णे जीवा समासिज्नति, अजीवा समासिज्जति, जीवाजीवा समासिजति, ससमए समासिरमा, परसमए समासिज्मा, ससमयपरसमप समासिज्जा, लोए समासिज्जा, अलोप समासिज्जा, लोपालोए समासिजा। समवाए णं पगाइपाणं एगतरियाणं ठाणसपविवडिया भावार्ण पक्षपणा आपविया, पुपालसविहस्स य गणिपिडगस्स पाठवग्गो समासिजह । समवायरस णं परिचा वापणा, संसिखा मणुओगदारा, संखिया पेठा, संसिजा सिलोगा, संविधाओ निजुचीमो, संसिज्वामो संगहणीओ, संखिजाभो पति- वत्तीओ, से णे अंगठ्ठपाए पउत्ये भंगे, पगे सुपरसबे, पगे अमापणे, एगे उद्देसणकाले, पगे समुसणकाले, पगे चोपाठे समवायागका परिचय १२५ - सयसहस्से पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासयकडनिबद्धनि- काइया जिणपण्णत्ता भावा आघविजंति, पण्णविज्जति, पर- विज्जंति, दंसिज्जंति, निदंसिज्जंति, उवदंसिज्जंति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरवणा आघविज्जइ, से त्तं समवाए ४ ॥ सू० ४८ ॥ छाया-अथ कः समवायः ? समवायेन जीवाः समाश्रीयन्ते, अजीवाः समाश्रीयन्ते, जीवाऽजीवाः समाश्रीयन्ते, स्वसमयः समाश्रीयते, परसमयः समाश्रीयते, स्वसमयपरसमयो समाश्रीयेते, लोकः समाश्रीयते, अलोकः समाश्रीयते, लोकालोको समाश्रीयेते । समवाये नु एकादिकानामेकोतरिकाणां स्थानशतविवर्द्धितानां भावानां प्ररूपणाऽऽख्यायते, द्वादशविधस्य च गणिपिटकस्य पल्लवानः समाधीयते । समवायस्य परीता वाचनाः, संख्येयान्य- नुयोगद्वाराणि, संख्येया वेढाः, संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया निर्युक्तयः, संख्येयाः सङ्ग्रहण्यः, संख्येयाः प्रतिपत्तयः, स नु अङ्गार्थतया चतुर्थमङ्गम, एकः श्रुतस्कन्धः, एकमध्ययनम्, एक उद्देशनकाला, एकः समुद्देशनकालः, एक चतुश्चत्वारिंशदधिक शतसहस्रं पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परीतास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृतनिबद्ध- निकाचिता जिनप्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, प्ररू- प्यन्ते, दर्श्यन्ते, निदर्श्यन्ते, उपदर्श्यन्ते, स एवमात्मा, एवं ज्ञाता, एवं विज्ञाता, एवं चरणकरणप्ररूपणाऽऽख्यायते, स एवं समवायः ॥ सू० ४८॥ टीका-प्र०-देव ! समवायाङमें क्या विषय है ? उ०-समवायाङमें यथाव- स्थितरूपसे जीव आश्रयण किये जाते, अजीव आश्रयण किये जाते और जीव-अजीव दोनों विपरीत प्ररूपणासे खींचकर सम्यक् प्ररूपणामें प्रक्षिप्त किये जाते हैं, स्वसमय, परसमय, और एकसाथ स्वसमय-परसमय दोनों यथावस्थित रूपसे आश्रयण किये जाते है, लोक, अलोक और लोकालोक नीमचनीस्त्रम् उभय सम्पर प्ररूपणासे कहे जाते हैं। समवाय-जीवादि पदाकि निमय करमेयाट शुमसे एक आपि एकपककी आमे पदिसे सेक स्थानपर्यन्त पो हुए भावोंकी मतपणा कही जाती है, और बारह प्रकारफे गणिपिटक पाने आ सझोका संक्षिप्त परिचय धामयण किया जाताअर्याद कहा जाता है। सम- पायाकी परिमित वाचनाएँ और संम्यात इसके अनुयोगदार है, पेस्पन्दो- विशेप-ठोक नियुक्ति, सप्राणी, और प्रतिपतियां पेसमी संमपात है। माकी मिसे वह समवायचीया आइसका पफ वतस्कन्प, एक उदेशनकाह और पकही समदेशनका पामसे पकडास्त्र पौवालीस हमार पर संसपात अक्षर व अमन्त अर्थशान है, अनन्त पर्याय है, परिमित बस भमन्त स्थावर और धर्मास्तिकायाविक शाश्वत तया मयोम आदि से निपर होव भारिते निर्णयमात जिममणीत भाव इसमें कहे जाते हैं, प्रज्ञापम, प्ररूपण, पर्शन निव न भौर अपार्शनसे विशेप स्पष्ट किये जाते हैं समवायका बह पाठक तमाम रुप बन जाता है तथा सूत्रके कयमानुसार पदार्पाका शाता व ऐतेही मिलता होता है, इस प्रकार समवाय, परपकरणकी ममपणा की जाती है यह समवायरीया भरमा । No 8८॥ मूल-से कि त विवाहे ? विवाहे णं जीवा विआहिति, भजीपा पिमाहिज्जति, जीवाजीवा विआहिज्नति, ससमए विहिम्मति, परसमए विाहिज्जति, ससमयपरसमए पिाहिज्जति, लोए विमाहिज्जति, अलोए विआहिज्जति, लोपालोप पिाहिज्जति। विवाहस्स ण परिचा पायणा, संसिज्जा अणुभोगदारा, संतिम्या धेठा, संखिजा सिप्लोगा, संसिजाभो निम्नुचीमो, ससिम्जाओ सगहणीमो, सिम्माओ पग्विधीमो, से ण अंगट्टयाए पंचमे भंगे, पगे सुयफ्रधे, पगे साइरेगे अजायणसए, इस उद्देसगस- हस्साई, इस समुसिगसहस्साई, पचीस वागरणसहस्साई, दो टक्सा अट्ठासी पपसहस्साइ पयग्गेणं, संसिज्जा मसरा, भर्णता गमा, अर्णता पज्मवा, परिता तसा, अर्णता पावरा, सासयकहनिबदनिकाइया जिणपण्णता भावा आपविमति, पण्णविरति, परुविमति, इसिज्मप्ति, निसिमति, उवर्ष सिम्नति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णापा, पर्व परण करणपठवणा आधपिज्जद से विवादे ५॥ सू० ४९॥ . .

व्याख्या(विवाह)प्रज्ञप्तिका परिचय १२७ , , छाया-अथ का सा व्याख्या? (कः स विवाहः ?) व्याख्यायांजीवा व्याख्या- यन्ते, अजीवा व्याख्यायन्ते, जीवाऽजीवा व्याख्यायन्ते, स्वसमयो व्याख्यायते, परसमयो व्याख्यायते, स्वसमयपरसमयौ व्याख्या- येते, लोको व्याख्यायते, अलोको व्याख्यायते, लोकालोको व्याख्यायेते।व्याख्यायाः परीता वाचनाः,संख्येयान्यनुयोगद्वाराणि, संख्येया वेढाः, संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया नियुक्तयः, संख्येयाः सङ्ग्रहण्यः, संख्येयाः प्रतिपत्तयः, सा अङ्गार्थतया पश्चममङ्गम्, एकः श्रुतस्कन्धः, एकं सातिरेकमध्ययनशतं, दशोद्देशकसहस्राणि, दश समुद्देशकसहस्राणि, पत्रिंशद् व्याकरणसहस्राणि, द्वे लक्षे अष्टाशीतिः पदसहस्राणि पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परीतास्त्रासाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृतनिबद्धनिकाचिता जिनप्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, प्ररुप्यन्ते, दर्यन्ते, निदर्श्यन्ते, उपदर्श्यन्ते, स एवमात्मा, एवं ज्ञाता, एवं विज्ञाता, एवं चरणकरणप्ररूपणाऽs- ख्यायते, सैषा व्याख्या ५ ॥ सू० ४९ ॥ टीका- गुरुदेव ! व्याख्याप्रज्ञप्तिमे क्या वर्णन है ? उ०-व्याख्याप्रज्ञप्तिमें जीवोंके स्वरूपका व्याख्यान होता, है अजीवोंकी व्याख्या की जाती और जीव- अजीव दोनोंकी व्याख्या की जाती है, स्वसमयकी व्याख्या की जाती, परस- मय-परदर्शनकी व्याख्या की जाती, और दोनोंकी सम्बन्धपूर्वक व्याख्या की जाती है, लोकका विवेचन किया जाता, अलोकका वर्णन किया जाता और लोकालोक उभयका साथ विवेचन किया जाता है। व्याख्याप्रज्ञप्तिकी परिमित वाचनाएँ और संख्यात अनुयोगद्वार है, वेढ, श्लोक, नियुक्ति, सग्रहणी और प्रतिपत्तियाँ प्रत्येक सख्यात २ हैं, अङ्गकी अपेक्षा वह व्याख्यासूत्र पाँचवॉ अङ्ग है, एक श्रुतस्कन्ध और कुछ अधिक एकसौ इसके अध्ययन हैं, दशहजार उद्देशक और दशहजारही समुद्देशक हैं, छत्तीस हजार प्रश्नोत्तर हैं, पदपरि- माणसे दो लाख अठासीहजार पद है, संख्येय अक्षर तथा अनन्त अर्थज्ञान हैं, अनन्त पर्याय हैं, परिमित त्रस और अनन्त स्थावर हैं, धर्मास्तिकाय आदि शाश्वत व प्रयोग आदि कृतसे यह निबद्ध है, हेतु आदिसे निर्णीत जिनप्रणीत भाव इसमें कहे जाते है, प्रज्ञापन, प्ररूपण, दर्शन, निदर्शन, और उपदर्शनसे विशेष स्पष्ट कहे जाते हैं, व्याख्यानका वह पाठक अध्ययनकी तल्लीनतासे तद्रूप होजाता है, तथा सूत्रवचनानुसार पदार्थोंका ज्ञाता व इसीमकार विज्ञाता भीममम्मीसमम् अवता है, इसतरह म्यान्मामे चरण करणकी मपणा की जाती है या ध्यास्यामप्ति पत्रम मा पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥ मूल-से किं तं नायाधम्मकहाभो ? नायाधम्मकहासु णे नायाणं मगराई, उजाणारं, चेहयाई, वणसंगर, समोसरणाई, रापाणो, अम्मापियरो, धम्मायरिया, घम्मकहाओ, बहलोइयपरलोइया इदिविसेसा, मोगपरिचाया, पव्यजाओ, परिभाषा, सयपरिग्गहा, सघोषहाणाई, सैलेहणाओ, मचपनपताणाई, पाओवगमणाई, देवलोगगमणा, सकलपञ्चायाईओ, पुणपोशिलामा, अंतकिरि याओ य आपपिज्जति, इस धम्मकहाणं वग्गा, सस्प णं एग मेगाए पम्मकहाए पंच पंच असाइयासपाई एगमेगाए अक्साइयाए पंच पंच उपसाइपासयाई, पगमेगाए उप मसाइयाए पंच पैच अक्साइपटवक्खाइयासमाई, एवमेव सपुष्यावरेणं अवडाभो कहाणगफोडीमोहति ति समक्साये । नायाधम्मकहाणं परिचा पापणा, ससिज्जा अणुओगदारा, संसिज्मा पेठा, ससिज्मा सिलोगा, ससिज्जाओ निजुचीओ, संसिज्जाओ संगहणीओ, संसिगाओ परिपतीओ, से णे अंगठयाए छठे अंगे, दो सुयक्संधा, पगूणवीसे अज्झयणा, पगूणवीसं उछेसणकाला, पगूणवीस समुदसणकाला, संसलाई पपसहस्साई पयग्गेण, संखेम्जा अक्सरा, अर्णता गमा, अर्णता पम्जवा, परित्ता तसा, अर्णता थापरा, सासयकडनिमदनि काइया जिणपण्णचा मावा आपविगंति, पण्णपिजति, विज्जप्ति, देसिनति, निर्देसिज्जति, उपदसिज्नति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरुपणा भाष विज्जद से त नायाधम्मकहाओ ६॥ ५० ॥ छापा-अप कासा ज्ञाताधर्मकथा' ? ज्ञासाधर्मकपासु न ज्ञातान नगराणि, उधानानि, चत्पानि, यनसण्गनि, समवसरणानि, रागाना, मातापितर, धर्माचार्या', धर्मकपा', पेतलौकिक- पारलौकिका मद्धिविशेपा, मोगपरित्यागा, प्रमज्या, पर्याया, ज्ञाताधर्मकथागका परिचय १२९ श्रुतपरिग्रहाः, तपउपधानानि, संलेखनाः, भक्तप्रत्याख्यानानि, पादपोपगमनानि, देवलोकगमनाति, सुकुलप्रत्यावृत्तयः, पुन:- धिलाभाः, अन्तक्रियाश्चाऽऽख्यायन्ते, दश धर्मकथानां वर्गाः, तत्र-एकैकस्यां धर्मकथायां पञ्च पश्चाऽऽख्यायिकाशतानि, एकैकस्यामाख्यायिकायां पश्च पश्चोपाख्यायिकाशतानि, एकैकस्यामुपाख्यायिकायां पञ्च पश्चाऽऽख्यायिकोपाख्यायिका- शतानि, एवमेव सपूर्वापरेण अध्युष्टाः कथानककोटयो भव- न्तीति समाख्यातम् । ज्ञाताधर्मकथानां परीता वाचनाः, संख्ये- यान्यनुयोगद्वाराणि, संख्येया वेढाः, संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया नियुक्तयः, संख्येयाः सङ्ग्रहण्यः, संख्येयाः प्रतिपत्तयः, ता अङ्गार्थतया षष्ठमङ्गम् , द्वौ श्रुतस्कन्धौ, एकोनविंशतिरध्ययनानि, एकोनविंशतिरुद्देशनकालाः, एकोनविंशतिः समुद्देशनकालाः, संख्येयानि पदसहस्राणि पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परीतास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृतनिबद्धनिकाचिता जिनप्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, प्ररूप्यन्ते, दय॑न्ते, निदर्श्यन्ते, उपदर्यन्ते, स एवमात्मा, एवं ज्ञाता, एवं विज्ञाता, एवं चरणकरणप्ररूपणाऽs- ख्यायते, ता एता ज्ञाताधर्मकथाः॥ सू. ५०॥ . - टीका-गुरुदेव । ज्ञाताधर्मकथा- उदाहरण और धर्मकथाप्रधान अङ्ग कौनसा है ? उ०-ज्ञाताधर्मकथामे ज्ञातों-उदाहरणभूतव्यक्तियों के नगर, उद्यान, बगीचे, वनखण्ड, चैत्यं-यक्षायतन, समवसरण, राजा, मातापिता व धर्माचार्य, व धर्मकथा, इसलोक परलोकसम्बन्धी ऋद्धिविशेष भोगका परित्याग, प्रव्रज्या- मुनिदीक्षा, पर्याय-दीक्षासमय, श्रुतग्रहण, तपउपधान-तपस्याविशेषकी आरा- धना, संलेखना, भक्तप्रत्याख्यान-अन्तिम समयका अनशन या आहारत्यागकी समयगणना, पादपोपगमन-टूटे हुए वृक्षकी तरह चेष्टारहित अनशन (संथारा) करना, देवलोकगमन, सुकुलमें (मनुष्यजन्मकी अपेक्षा) प्रत्यागमन-पीछे आना, पुनः सम्यक्त्वधर्मकी प्राप्ति और अन्तकिया ये सब कहे जाते है। १ उदाहरणभूतानाम्-इत्यर्थः । २ चैत्य-व्यन्तरायतनम् समवा० वृ पृ १०८ भीमप्रमादाम मयम भूतस्करपके जो १९ अध्ययन हैं उनमें पासेके पर केवल मान हैं, उनमें आसपायिकाओंका सम्मय नहीं है, शेष नव भाययन और दूसरे अवस्करपमें आस्यायिकाएं आती हैं जो इसमकार है- पर्मकपाक पश धर्ग हैं उनमें प्रत्येक भर्मकपामें पांच सौ आम्पा यिकाएँ है. एक ' भाम्पायिका पाप र सौ उपाण्यायिकाएँ है, एक र उपा प्यापिकाम पांच र सी पाण्यायिकोपाण्यायिका समकार पासे पीछेकी मिलाकर अप्पुम-साखेतीन करोग कथाएँ होती है, ऐसा तीर्थहर गपपने फदा है। माताधर्मकपाकी परिमित वाघमा है संभपात भयोगदार तपा र लोक नियुक्ति संग्रहणी, और प्रतिपतियों भी संख्यात है। आकी भपेक्षा यह हाताधर्मकया ण्टा अरोतक और उनीस इसके मप्यपन है, देसनकाल और ससुदेशनकाठ मी १९-१९ हैं, पपरिमापसे संक्यात हजार पर ह, संस्पात अक्षर तथा अनन्त अर्यज्ञान और अनम्त पर्याय ६. परिमित प्रसप अनन्त स्थावर है, धर्मद्रग्य भावि पायत और भयोम आविकासे निपट व ऐतादिसे मिनीत जिममणीत भाव इसमें कहे माते 4 महापन प्ररूपण, वर्शम, मियर्शन भीर उपार्शमसे विशेप समझाये जाते है वसीमतासे आपयन करमेयाला यह पाठक ताप बन जाता है, तपा मोक पदार्योका जाता था इसी प्रकार विनाता होता है, इस प्रकार घाताधर्मकयामे परणकरणकी महपणा की जाती है। पहातापर्मकयानामक ण्टा मा एआ॥१०॥ मूल-से किं त उपासगदसाओ ? उवासगदसासुर्ण समणोवासपाणं नगराइ, उजाणाई, चेहयाई, पणसंगाइ, समोसरणाई, रापाणो, अम्मापियरो, धम्मापरिपा, धम्मकहाओ, इहलोइयपरलोइया इडिषिसेसा, मोगपरिचाया, पयजाओ, परिआगा, सुपपरि ग्गहा, तयोवहाणाइ, सीलवपगुणवेरमणपससाणपोसहोषवा- सपटियनणया, पटिमाओ, उवसग्गा, संटेहणाओ, मतपत कसाणाई, पाओवगमणाइ, देवप्लोगगमणाई, कुलपयाआईओ, पुणोदिलामा, अंतहिरिपाभो प आपपिजति, उपासगदसाणं परिता पापणा, सरोजा अणुओगारा, सिमा पेठा, सरोमा सिटोगा, संगेवाओ निनुतीओ, संसेग्मामो संगदणीओ, संग्रगामी पटियतीभो, से गं अंगठपारा सतमे अंगे, एगे गरण र समानता Atter उपासकदशाङ्गका परिचय १३१ . . सुयक्खंधे, दस अज्झयणा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसण- काला, संखेज्जा(ई) पयसहस्सा(ई) पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासयकडनिबद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघ- विजंति, पन्नविज्जति, परुविज्जंति, इंसिज्जंति, निदंसिज्जति, उवदंसिज्जति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आविज्जइ, से तं उवासगदसाओ ७ ॥ सू० ५१ ॥ छाया-अथ कास्ता उपासकदशाः? उपासकदशासु श्रमणोपासकानां नग- राणि, उद्यानानि, चैत्यानि, वनखण्डानि, समवसरणानि, राजानो मातापितरो धर्माचार्या धर्मकथाः, ऐहलौकिकपारलौकिका ऋद्धि- विशेषाः, भोगपरित्यागाः, प्रव्रज्याः, पर्यायाः, श्रुतपरिग्रहाः, तपउपधानानि, शीलवतगुणविरमणप्रत्याख्यानपौषधोपवासप्रति- पादनता, प्रतिमाः, उपसर्गाः, संलेखनाः, भक्तप्रत्याख्यानानि, पादपोपगमनानि, देवलोकगमनानि, सुकुलप्रत्यायातयः, पुन- बर्बोधिलाभाः, अन्तक्रियाश्चाख्यायन्ते, उपासकदशानां परीता वाचनाः, संख्येयान्यनुयोगद्वाराणि, संख्येया वेढाः (वृत्तयः), संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया नियुक्तयः, संख्येयाः सङ्ग्रहण्यः, संख्येयाः प्रतिपत्तयः, ता अङ्गार्थतया सप्तमभङ्गमेकः श्रुतस्कन्धः, दशाऽध्ययनानि, दशोद्देशनकालाः, दश समुद्देशनकालाः, संख्ये- यानि पदसहस्राणि पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परीतास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृतनि- बद्धनिकाचिता जिनप्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, प्रसू- प्यन्ते, दयन्ते, निदर्श्यन्ते, उपदय॑न्ते, स एवमात्मा, एवं ज्ञाता, एवं विज्ञाता, एवं चरणकरणप्ररूपणाऽऽख्यायते, ता एता उपासकदशाः ॥ सू० ५१॥ टीका--प्र०-भगवन् ! वे उपासकके दशाऽध्ययन कौनसे हैं ? उ०-इस प्रकार हैं, उपासकदशामे श्रमणोपासकों-साधुओंके सेवक श्रावकों के नगर, , - 1 - भीमञ्चमीसमम् ज्यान व्यन्तरायतन, घनत्रण, समवसरण, रामा मातापिता, पर्माचार्य, भर्मकया इससोक व परसोकसम्बधी माझिविशेप मोमोंका परित्याग, प्रमज्या-भावकदीमा पर्याय-मापकपनकी भवस्थाका कासमान इतमाम तपउपधान शीलवत अपनेत, गुणवत, विरमण-पापसे निवृत्ति स्वरूप सामायिक भावि, मत तथा प्रत्यासयान पोपप-उपवास इनको स्वीकार करना प्रतिमाओं का आरामन, उपसर्म, संसना मदमस्याम्पान, पारपोपयमम- मन्तिम समयमै पक्षकी तरह निधरहकर अमशम सापना पेक्सोकममन, और मनुष्यभव फिर मुकुलकी प्राप्ति आदि पुमा सम्पमत्वधर्मकी माप्ति, और जन्त- किया-संसारके पपनसे मुफ होमा, ये सब विषय को जाते हैं, उपासकासाकी परिमित वाघमाएँ और संस्येय अनुयोगदार हैं पेर, लोक नियुक्ति संग्रहणी, भीर मविपत्तिपोभी संम्पात परिमाणवाली है। बाकी अपेक्षा मह उपासकाशा सातवा भाई एक भुतस्कन्म और इसके पश अभ्यमम है पशगेशन पाठ धीर समुशाम काछ मी पश। पदपरिमापसे संभपात हजार पद है संकपात अक्षर तया अनन्त अर्यशाम व अनन्त ही पधि , परिमित और मनन्त स्पायर हैं। धर्मवम्प आपिशाचत ष मयोम मावि तसे निपर तथा खपूर्वक म्पयस्यापित पेसे जिनमणीव माय इसमें कहे गाते हैं, महापन, मरूपमा वर्णन निवर्शन और उपवर्शनसे वियोपरूपमै समझाये जाते हैं। सूत्रका स्पिपिचरी मध्यपन करनेवासा पा पाठक तर्प बन जाता है तथा माक्कके स्त्रोक कर्मयोंका यथार्थ माता व पैसेही विज्ञाता हो जाता है। उपासकाशाइन इस प्रकार चरणकरणकी मरूपमा की जाती है। पर उपासकाशामामक सातों आपूण हुमा ०५१॥ मूल-से किं तं भतगम्दसाओ ' अंतगग्दसासु णे अंतगार्ण नगराई, उजाणाई, पेइयाइ, पणसंगई, समोसरणाई, पपाणो, अम्मापियरो, धम्मायरिया, भम्मकहाभो, इहलोइयपरलोइपा इदिविसेसा, मोगपरिचागा, पयजाओ, परिआगा, सुपपरि ग्गहा, तपोवहाणाई, सलेहणाओ, मत्तपञ्चासाणाइ, पाभी- षगमणाइ, अतकिरियाओ भापविमति, अंतगादसासणे परिचा वापणा, सखिया अणुओगदारा, संरोज्या पेठा, सलेमा सिष्ठोगा, संसेमाओ निन्जुचीओ, संखेन्याभो संगह- णीभो, सिम्मामो पसिषधीओ, से णे अंगट्ठयाप अट्ठमे अगे, १ से परिचित । १. भापकरे सो प्रतिमा विशेष ऐt परिका- अन्तकृदशाङ्गका परिचय , एगे सुयक्खंधे, अट्ठ वग्गा, अट्ठ उद्देसणकाला, अट्ठ समुद्दे- सणकाला, संखेज्जाई पयसहस्साइं पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासयकडनिबद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आपविजंति, पन्नविज्जंति, परूविज्जंति, दंसिज्जंति, निदंसिज्जंति, उवदंसि- ज्जति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आघविज्जइ, से तं अंतगडदसाओ ८ ॥ सू० ५२॥ छाया-अथ कास्ता अन्तकृदशाः ? अन्तकृदशासु-अन्तकृतां नगरा- णि, उद्यानानि, चैत्यानि, वनखण्डानि, समवसरणानि, राजानो मातापितरः, धर्माचार्याः, धर्मकथाः, ऐहलौकिकपारलौकिका ऋद्धिविशेषाः, भोगपरित्यागाः, प्रव्रज्याः, पर्यायाः, श्रुतपरिग्रहाः, तपउपधानानि, संलेखनाः, भक्तप्रत्याख्यानानि, पादपोपगम- नानि, अन्तक्रिया आख्यायन्ते, अन्तकृदशासु परीता वाचनाः, संख्येयान्यनुयोगद्वाराणि, संख्येया वेढाः, संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया नियुक्तयः, संख्येयाः सहण्यः, संख्येयाः प्रतिपत्तयः, ता अङ्गार्थतयाऽष्टममङ्गम, एकः श्रुतस्कन्धः, अष्टौ वर्गाः, अष्टा- बुद्देशनकालाः, अष्टौ समुद्देशनकालाः, संख्येयानि पदसहस्राणि पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परीतास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृतनिवद्धनिका- चिता जिनप्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, प्ररूप्यन्ते, दर्श्यन्ते, निदयन्ते. उपदर्यन्ते, स एवमात्मा, एवं ज्ञाता, एवं विज्ञाता, एवं चरणकरणप्ररूपणाऽऽख्यायते, ता एता अन्त- कृद्दशाः ॥ सू० ५२॥ टीका-प्र०-गुरुजी ! अन्तकृवके वे दश-अध्ययन कौनसे हैं ? उ०- अन्तकृत्के दश अध्ययनोंमें अन्तकृत्-कर्म या संसारका अन्त करनेवाले महापुरुषोंके नगर, उद्यान, चैत्य-व्यन्तरायतन, वनखण्ड, समवसरण, राजा, मातापिता, धर्माचार्य व उनकी धर्मकथाएँ, इसलोक और परलोककी ऋद्धि- - १५४ भीमानीवनम विशेषता, मोगोंका परित्याग प्रमज्या-मुनिकीमा पर्याय-दीसापर्याय, महन, तपउपपान-सपोपारण, सलेसना, भकमस्याम्पाम, पादपोपगमन-आगीवनका अनशनमत अन्तक्रियाठिशी अवस्था अषि,ये सब भाव कहे जाते हैं। मन्तक पशाओम परिमित वाचनायें और संस्पात अनुयोमवार के लोग नियुक्ति, संग्रहणी भौर प्रतिपतियाँ सव संस्पात २१ माकी अपेक्षा वह अम्तकाशा आठवा मर है, एफ तस्कम्प मौर इसके आठ वर्ग है उदेशनकासा मेशन कास भी माठ आठ हैं पापरिमाणसे संम्पेय-जारों पद संख्यात भक्षर अमम्त अर्थशाम तया भनन्तपर्याय, परिमित प्रस पभमन्त स्थावर वमा पर्म मध्य आदि शायत और प्रयेम भवि तसे यह अम्बरम निवर, हेममाष्पपूर्वक निर्णय प्राप्त निनप्रणीतमाव इसमें कडे जाते हैं मज्ञापन, प्ररूपण, पर्शन मिपर्शन भौर उपशमसे विशेष को जाते हैं फल-चा भम्पयन करनेवामा तवकतानचितसे भम्यमम करनेके कारण तदारमाप हो माता है, सूमके कपनानुसार पार्योंका यया हाता तथा विद्याता बन जाता है।स प्रकार अम्तहाशामें चरणकरणकी पझपप्पा की माती है, यह भाठवाँ भम्तादगार पूर्ण हुआ।०५९॥ मूल-से कि से अणुप्तरोववाइयवसाओ ? अणुचरोववाइयवसासु णे अणुत्तरोववादयार्ण नगराई, उज्माणाई, पेहयाई, वणसमई, समोसरणाई, रायाणो, अम्मापियरो, घम्मायरिया, धम्मकहाओ, इहलोपपरलोया इडिविसेसा, मोगपरिधागा, पयज्माओ, परिमागा, सुयपरिग्गहा, सपोवहाणाई, पडिमाओ, उपसग्गा, लिहणामो, मतपचक्साणाई, पाओवगमणाई, भणुत्तरो पवाइपत्ते उपवती, अकुलपवायाईमो, पुणपोहिलामा, आ- किरियाओ आपविज्जति, अणुत्तरोववाइयवसासु पं परिता वापणा, संखेमा अणुओगवारा, संखेजा वेढा, संख्या सिलोगा, संखजाओ निग्नुपीओ, संखियाओ संग हणीभो, संखेजाभो परिवधीभो, से अंगनुपाए नवमे अंगे, एगे सुपरसंघे, सिसि बग्गा, सिनि उद्देसणकाला, तिमि समुसणकाला, संसेलाई पयसहस्साइ पपग्गेणं, संखेमा - - ॥ (गर पर परिमानमा १७ जापान माना दसरा मासा सरों पर है। १ मतसरापाई।

. अनुत्तरौपपातिकदशागका परिचय अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासयकडनिबद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघ- विजंति, पण्णविनंति, परूविजंति, दंसिज्जंति, निर्देसिज्जंति, उवदंसिज्जंति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आघविजइ, से तं अणुत्तरोववाइयदसाओ ९ ॥ सू० ५३॥ छाया-अथ कास्ता अनुत्तरौपपातिकदशाः ? अनुत्तरीपपातिकदशासु अनुत्तरौपपातिकानां नगराणि, उद्यानानि, चैत्यानि, वन- खण्डानि, समवसरणानि, राजानो, मातापितरः, धर्माचार्याः, धर्मकथाः, ऐहलौकिकपारलौकिका ऋद्धिविशेपाः, भोगपरि- त्यागाः, प्रव्रज्याः, पर्यायाः, श्रुतपरिग्रहाः, तपउपधानानि, प्रतिमाः, उपसर्गाः, संलेखनाः, भक्तप्रत्याख्यानानि, पादपोपगम- नानि, अनुत्तरौपपातिकत्वे-उपपत्तिः, सुकुलप्रत्यावृत्तयः, पुनर्बो- धिलाभाः, अन्तक्रिया आख्यायन्ते, अनुत्तरौपपातिकदशासु परीता वाचनाः, संख्येयान्यनुयोगद्वाराणि, संख्येया वेढाः, संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया निर्युक्तयः, संख्येयाः संग्रहण्यः, संख्येयाः प्रतिपत्तयः, ता अङ्गार्थतया नवममङ्गम्, एकः श्रुत- स्कन्धः, त्रयो वर्गाः, त्रय उद्देशनकालाः, त्रयः समुद्देशनकालाः, संख्येयानि पदसहस्राणि पदाण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परीतास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृतनिबद्धनिकाचिता जिनप्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, प्ररुप्यन्ते, दय॑न्ते, नियन्ते, उपदय॑न्ते, स एवमात्मा, एवं ज्ञाता, एवं विज्ञाता, एवं चरणकरणप्ररूपणा- ऽऽख्यायते, ता एता अनुत्तरौपपातिकदशाः ॥ सू० ५३ ॥ टीका-प्र०-देव । वह अनुत्तरोपपातिकदशा क्या है ? उ०-अनुत्तरौ- पपातिकके दश अध्ययनोंमे अनुत्तरौपपातिक-अनुत्तर विमानमे उत्पन्न होने- वाले जीकि नगर, उद्यान, व्यन्तरायतन, वनखण्ड, समवसरण, राजा, १. अभिग्रहविशेषा इत्यर्थ । . , । भीमसन्दीमत्रम् मातापिता धर्माचार्य और धर्मकया इससोक व परसोको प्रशिविशेष, मोगोंका परित्याग, प्रवज्या-मुनिदीक्षा, पर्याय-उसका काम्मान मृतसाग तपउपभान, प्रतिमा-ममिमहविशेष उपसर्ग, संमेखमा, मकपरित्याग, पार पोपगमन अमुचर-सोचम विमयापि-विमामि भीपपातिक पसे उत्पा होमा मनुष्यमवमें फिर मेष्ठ कुलकी प्राप्ति आदि तया सम्पद धर्मका पुन आम और अन्तकिया ये सब विषय कहे जाते हैं. अमुसरीपपातिकपशाम परिमित वाचनाएँ बीर संम्पेय अमुयोगदार बेठ, खोक, निति संमहणी भीर प्रतिपत्तियों भी संख्येय १ हैं। आकी अपेक्षा पद नवमा भर है, एक भूतस्कप और इसके तीन बर्ग हैं, तीन उद्देशनकाह और तीन ही समुदेशनकास ह पदपरिमाण-संम्पासे परिमित इनारों पर हैं संम्पात असर ीर अनन्त अर्यवान व अनन्त पाये है, परिमित मस भीर अनम्स स्थावर ई तपा शाचत और रुतसे यह निबर पेठ आपिसे स्पिर किये भूप जिनमणीत माय इसम कहे जाते हैं तथा प्रशापन प्ररूपण, पर्शन, निए नि, और उपार्शमसे रमका विशेप वर्णन किया जाता है, फस-सह पाठक एयम्भूत आरमापाला वमता है, तया सूमके कयमानुसार पार्योका हाता और इसीतरह विज्ञाता मी होता है। इस प्रकार अनुत्तरीपपातिकमा परणकरणकी मनपभा की जाती है, पर ममुसरीपपातिकाशा मपमा आई पूणे मुआ.५५॥ मुट-से कि तं पाहावागरणाई ? पाहायागरणेसु णं अत्तरं पसिण सर्य, अदुत्तर अपसिणसर्य, अदुत्तरं पसिणापसिणसये, से जहा-भंगगुपसिणाइ, पाहुपसिणाई, महागपसिणाई, अने वि विपिचा विज्ञाइसया, नागसुषण्णेहिं सहिं दिव्या संवाया आपविजेति, पण्हावागरणार्ण परित्ता पापणा, सरोज्जा अणु- ओगवारा संरोज्मा वेदा, संसेवा सिलोगा, संसग्माओ निग्न सीमो, संसेग्जामो संगहणीओ, संसेज्माो पठियत्तीमो, से णं अंगनुपाए इसमे अंगे, एगे सुपारधे, पणपाटीस अमा पणा, पणपाटीसं उदेसणकाला, पणयालीसे समुद्देसणकाला, संरोग्नाई पपसहस्साई पयग्गेण, संसग्ना अपरारा, अणता गमा, मर्णता पज्नया, परिचा तसा, अणता पायरा, सासपक १ मा मौगान्यापी म. सातारा १.COMमरीमार हो।

प्रश्नव्याकरणसूत्रका परिचय १३७ डनिबद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आधविज्जति, पण्ण- विजंति, परूविज्जति, दसिज्जंति, निदंसिज्जंति, उवदंसिज्जंति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आघविज्जइ, से तं पण्हावागरणाई १० ॥ सू० ५४ ॥ छाया-अथ कानि तानि प्रश्नव्याकरणानि ? प्रश्नव्याकरणेषु-अष्टोत्तरं प्रश्नशतम्, अष्टोत्तरमप्रश्नशतम्, अष्टोत्तर प्रश्नाऽप्रश्नशतम् , तद्यथा-अङ्गुष्ठप्रश्नाः, बाहुप्रश्नाः, आदर्शप्रश्नाः, अन्येऽपि विचित्रा विद्याविशया नागसुपर्णैः साधं दिव्याः संवादा आख्यायन्ते, प्रश्नव्याकरणानां परीता वाचनाः, संख्येयान्यनुयोगद्वाराणि, संख्येया वेढाः, संख्येयाः श्लोकाः, संख्येया नियुक्तयः, संख्येयाः सङ्ग्रहण्यः, संख्येयाः प्रतिपत्तयः, तान्यङ्गार्थतया दशममङ्गम् , एकः श्रुतस्कन्धः, पश्चचत्वारिंशध्ययनानि, पञ्चचत्वा- रिशंदुद्देशनकालाः, पश्चचत्वारिंशत् समुद्देशनकालाः, संख्ये- यानि पदसहस्राणि पदाग्रेण, संख्येयान्यक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ताः पर्यवाः, परीतास्त्रसाः, अनन्ताः स्थावराः, शाश्वतकृत- निबद्धनिकाचिता जिनप्रज्ञप्ता भावा आख्यायन्ते, प्रज्ञा- प्यन्ते, प्ररूप्यन्ते, दर्श्यते, नियन्ते, उपदय॑न्ते, स एवमात्मा, एवं ज्ञाता, एवं विज्ञाता, एवं चरणकरणप्ररूपणाऽऽख्यायते, तान्येतानि प्रश्नव्याकरणानि ॥ सू. ५४ ॥ टीका-प्र०-देव ! वे प्रश्नोत्तरोंके दश अध्ययन कैसे हैं ? उ०-वे इस प्रकार हैं-प्रश्नव्याकरणोंमें १०८ प्रश्न हैं अर्थात् पूछे हुए प्रश्नोंके जपमात्रसे शुभाशुभ उत्तर कहनेवाली विद्या व मन्त्र १०८ हैं, १०८ अप्रश्न याने विना पूछे शुभाशुम कहनेवाली विद्याएँ है, पृष्टादृष्ट-पूछे या विनापूछे शुभाशुभ कहनेवाली विद्याएँ भी १०८ हैं, जैसे कि-अङ्गुष्ठ प्रश्न-अड्डष्ठ विद्या, बाहुप्रश्न, आदर्शप्रश्न अन्य भी अनेक विचित्रविद्यातिशय तथा नागकुमार सुवर्णकुमार आदिके साथ दिव्यसंवाद इसमें कहे जाते हैं, प्रश्नव्याकरणकी परिमित वाचनाएँ हैं, संख्यात अनुयोगद्वार, तथा वेढ-श्लोक, नियुक्ति, संग्रहणी और प्रतिपत्तियाँ ये सब संख्यात २ हैं, अलकी अपेक्षा वह दशमा अङ्ग है, एक श्रुतस्कन्ध और पैंतालीस इसके अध्ययन हैं, पैंतालीस उद्देशन- १ वाचनान्तरकी अपेक्षा ४५ अध्ययन सम्भव होते हैं सम० अभ० । - ? १८ १८ भीमचम्दीसूत्रम् कास और पैवासीसही समुदेशनकाल हैं। पापारमाणते संम्मेप-बारों पर हैं संख्येय ममद अमन्त मम अर्यज्ञान और मनन्तपर्याय र परिमित असप भनन्त स्थावर हैं क्या शाचत भौर तरसमें निरखि भारिसे सिद मिनप्रणीत भाव पहाँ को जाते हैं। प्रद्धापन, प्रापण पर्शन, निए पान और उपदर्शनसे विशेष कोजाते हैं फल-स्थिरता पद पाठक पसम्भूत आस्मावाला हो जाता तया शास्त्रोक विधाओंका पपाशाता बिहाता बनतासमकार प्रमध्याकरणमें भरपकरणकी प्रकपणा की गादी वा प्रभम्पाकरण पराको भावर्षमसे पूर्ण मा ।मु० ५४ मूलसे कि त विवागसुय? विवागसुए णे सुकरमाण कम्माण फलविवागे भाषविस्जद, तत्मण इस पुहविषागा, इस सा. विवागा, से किं ते दुहविवागा ? इपिवागेस णं हविवागार्ण नगराई, उज्जाणाई, वणसंगई, पेड्याई, समोसरणाई, गगाणो, अम्मापियरो, धम्मायरिया, पम्मकदाभो, इहलोइयपरलोया इडिविसेसा, निरयगमणाई, संसारमवपर्वचा, दुइपरपराभो, कुलपचापाइओ, पुछकोहियत्त आपविजइ, से दुह- . विवागा। , , , छाया-अप किं तद् विपाकभुतम् ? विपाकमुते सातदुपताना कर्मर्णा फलविपाक आस्यायते, तब दश दुसविपाका पक्ष सुसविपाका', अथ के ते दुलविपाका. दुसविपाकेषु दुखविपकाना नगराणि, उचानानि, वनसण्डानि, पेस्पानि, समवसरणानि, प्रमान', अम्मापितर, धमोचार्या, धर्मकपा', पेदलौकिकपारलौकिका मद्विविशेपा', निरयगमनानि, संसार- मवमपश्चा, इसपरम्परा, दुप्कलपस्पावृत्य', दुर्लभबोधिकत्व- मारुपायते, त एते पुस्खविपाका । टीका-१०-गुलेव ! पद विपायात क्या है।०-विपाकातमें सात अफत पाने अममराम-बमाक फह-विपाक की बात है, उसमें पस साविपाक मीर पारिपाक हैं। मानव बामविपाकमा । उ- - १९१ मत (IR पर प्रपम मापा मगमार देते है। स्वमिममिया विपाकसूत्रका परिचय १२९ . दुःखविपाकोंमें दुःखरूप विपाकोंको भोगनेवाले उन पुरुषोंके नगर, उद्यान, वन- खण्ड, व्यन्तरायतन, समवसरण, राजा, मातापिता, धर्मगुरु और उनकी धर्मकथा, इसलोक व परलोकके ऋद्विविशेप, दुरुपयोगसे निरयगमन, ससारमें जन्मका विस्तार, दुःखकी परम्परा, हीनकुलमें फिर उत्पत्ति, और सम्यक्त्व- धर्मकी दुर्लभता आदि विषय कहे जाते हैं, यह दुःखविपाकका वर्णन हुआ। मूल-से किं तं सुहविवागा ? सुहविवागेसु णं सुहविवागाणं नगराई, उज्जाणाई, वणसंडाई, चेइयाइ, समोसरणाई, रायाणो, अम्मा- पियरो, धम्मायरिया, धम्मकहाओ, इहलोईयपरलोइया इविवि- सेसा, भोगपरिचागा, पव्वजाओ, परियागा, सुयपरिग्गहा, तवोवहाणाई, सलेहणाओ, भत्तपञ्चक्खाणाई, पाओवगमणाई, देवलोगगमणाई, सुहपरंपराओ, सुकुलपञ्चायाईओ, पुणबोहि- लाभा, अंतकिरियाओ आवविज्जति । विवागसुयस्स णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ निज्जुत्तीओ, संखिज्जाओ संगहणीओ, संखिज्जाओ पडिवत्तीओ, से णं अंगट्ठयाए इक्कारसमे अंगे, दो सुयक्खंधा, वीसं अज्झयणा, वीसं उद्देसणकाला, वीसं समुद्देसणकाला, संखिज्जाइं पयसहस्साइं पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासयकडनिबद्धनिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघ- विज्जंति, पण्णविज्जति, परूविज्जंति, देसिज्जंति, निर्देसिज्जंति, उवदंसिज्जंति, से एवं आया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आघविज्जइ, से तं विवागसुयं ११ ॥ सू ५५ ॥ छाया-अथ के ते सुखविपाकाः ? सुखविपाकेषु नु सुखविपाकानां नग- राणि, उद्यानानि, वनखण्डानि,चैत्यानि, समवसरणानि, राजानः, अम्बापितरः, धर्माचार्याः, धर्मकथाः, ऐहलौकिकपारलौकिका ऋद्धिविशेषाः, मोगपरित्यागाः, प्रव्रज्याः, पर्यायाः, श्रुतपरिग्रहाः, १ 'पारलोइआ' इति इन्दौरस्थ चूर्णिप्रतौ । २ पिपाकवतामित्यर्थ ।

- " काला, १४० मीमधलीवम् तपउपधानानि, संलेखना, मकास्यास्पानानि, पादपोपगमनानि, देवलोकगमनानि, सुसपरम्परा', मुकुलपस्यावृत्तपा, पुनधि ठामा', अन्तकिया आम्पायन्ते । विपाकमुतस्प परीता गायना', संख्येयान्यनुयोगदायणि, संस्येया पेशा संस्पेयाः श्लोका', संश्येया नियुक्तय', संसयेपा' साहण्य', संख्येया प्रतिपत्तपः, तवार्यतया एकादशमनम् , हौ भूतस्कधी, विंशतिध्ययनानि, विंशतिरोशनकाष्ठा', विंशति समुदेशन संस्पेयानि पदसहस्राणि पाण, संस्पेयान्पक्षराणि, अनन्ता गमाः, अनन्ता पर्यवा', परीतामसार, अनन्ता स्पापरा', शाश्वतकृतनिषदनिकाषिता जिनमज्ञता मावा आस्पायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, रुप्यन्ते, पय॑न्ते, नियन्ते, उप- पर्यन्ते, स एवमारमा, एवं जाता, एवं विज्ञाता, पर्व परण- करणप्ररूपणाऽऽस्पापसे, त एते विपाकमुतम् ॥ ५५ ॥ टीका-प्र०-गुरुोगा ये सखविपाकके प्रतिपादक भम्पपम कौनसे हैं। उ०-उत्सपिपार्कोम ससविपाक-फस-को भोगनेवासे पुरुषोंक ननर उपाय, वनसण्ड, स्प-पन्तरायतन समवसरण, रामा, मातापिता धर्मगुरु, धर्मकपा, इसछोक व परछोफसम्बन्धी प्रतिविशेष मोमौका परिवार, माम्पा-मुनिदीक्षा परीक्षापर्याय श्रुतसमह वपम्पपान संसना माहारस्याम पारपोपगमन-संपारा ऐवष्ठीकममन, सुसकी परम्परा और फिर मनुष्य मबमे गसम हलमें उत्पन होना आदि फिर सम्पमस्वसाम तथा अन्त किया कही जाती है। पिपाफतकी परिमित वाचनाएँ। सम्मेव अनुयोगशार और पेट-छोक, निधि, संपाहणीय मतिपत्तियों मी संस्थातर है महकी सरिसे यह ११ अर, पोतस्कप और वीत सकेसम पन है, बीस रमेशनकाष्ठ तथा वीसही समदेशनकास भी है, पापरिमाणसे संहपेय एगार पर है, संसयात ममप ममन्त मर्यज्ञान और पर्याय मी भनम्त हैं, परिमित प्रसव जमम्त स्थायर हैं तथा शाबत और तसे समारण मापिसे सिर निममणीत माव इसमें कथन किये जाते हैं, प्रज्ञापन प्रकपण पनि निर्शिन, और ग्पार्शनसे विशेष स्पष्ट कहे गाते फसरिताते हैं- तोकतामतासे पाठ करनेपर बद पाठक यूप हो जाता है तथा सूमोक विषयोका पपाहाता पसीवरद वितावा बनता है इस प्रकार विपाक- १ एम्परामी बपौर पसार पर।

दृष्टिवाद अङ्गका परिचय १४१ श्रुतमें चरणकरणकी प्ररूपणा की जाती है, यह ११ वाँ अङ्ग विपाकश्रुत पूर्ण हुआ ॥ सू०५५॥ मूल-से किं तं दिद्विवाए ? दिद्विवाए णं सव्वभावपरूवणा आघविज्जइ, से समासओ पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-परिकम्मे १, सुत्ताई २, पुवगए ३, अणुओगे ४, चूलिया ५ । से किं तं परिकम्मे ? परिकम्मे सत्तविहे पण्णत्ते, तं जहा-सिद्धसेणिया-परिकम्मे १ मणुस्ससेणिया-परिकम्मे २, पट्ठसेणिया-परिकम्मे ३, ओगाढ- सेणिया परिकम्मे ४, उवसंपंज्जणसेणियापरिकम्मे ५, विप्प- जहणसेणियापरिकम्मे ६, चुयाचुयसेणियापरिकम्मे ७ । छाया-अथ कः स दृष्टिवादः ? दृष्टिवादे सर्वभावप्ररूपणाऽऽख्यायते, स समासतः पञ्चविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-परिकर्म १, सूत्राणि २, पूर्वगतम् ३, अनुयोगः ४, चूलिका ५। अथ किं तत् परिकर्म ? परिकर्म सप्तविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-सिद्धश्रेणिकापरिकर्म १, मनुष्यश्रेणिकापरिकर्म २, पृष्टश्रेणिकापरिकर्म ३,अवगाढश्रेणिका- परिकर्म ४, उपसम्पादनश्रेणिकापरिकर्म ५, विप्रजहच्छ्रेणिका- परिकर्म ६, च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म ७ । टीका-प्र०-देव ! वह दृष्टिवाद-सभी नयदृष्टियोंको कहनेवाला श्रुत किस प्रकार है । उ०-दृष्टिवादसे सब भावोंकी प्ररूपणा की जाती है, वह दृष्टिवाद संक्षेपसे पांच प्रकारका है, जैसे-परिकर्म १ सूत्र २ पूर्वगत ३ अनु- योग ४ और चूलिका ५। प्र०-वह परिकर्म क्या है ? उ०--परिकर्म सात प्रकारका कहा गया है, जैसे-सिद्धश्रेणिकापरिकर्म १, मनुष्यश्रेणिकापरि- कर्म २, पृष्टश्रोणिकापरिकर्म ३, अवगाढश्रेणिकापरिकर्म ४, उपसम्पादनश्रेणिका- परिकर्म ५, विप्रजहत्श्रेणिकापरिकर्म ६, च्युताच्युतश्रेणिकापरिकर्म ७। मूल-से किं तं सिद्धसेणियापरिकम्मे ? सिद्धसेणियापरिकम्मे चउद्द- सविहे पण्णत्ते, तं जहा-माउगापयाई १, एगट्ठियपयाई २, अट्ठपयाई ३, पाढोआगासपयाई ४, केउभूयं ५, रासिबद्धं ६, एगगुणं ७, दुगुणं ८, तिगुणं ९, केउभूयं १० पडिग्गहो ११, १ ओगाहण । २ उवसंपन्नसे । ३. विप्पजह समवाय) स पृ ११९ प्र.।

२४२ भीमपन्दीमत्रम् - संसारपडिग्गहो १२, नपापत १३, सिंदावचे १४, से सिर सेणियापरिफम्मे ॥ १॥ छाया-अप किं तत् सिमेणिकापरिकर्म ! सिणिकापरिकर्म चतुर्दशषिधं प्रज्ञसम्, सपथा-मातृकापदानि १, एकार्यकप दानि २, अर्थपदानि ३, पृपगाकाशपदानि ४, केतुभूत ५, राशिषम् ६, एफगुणं ७, विगुण ८, त्रिगुण ९, केतुमूर्त १०, प्रतिमाह' ११, संसारपतिमह १२, नन्दाय १३, सिद्भाव १५, तदेतत् सिद्धमेणिकापरिकर्म ॥१॥ टीका-प्र०-यह सिदमेणिकापरिकर्म किस प्रकार है। उ०-सिस्मेमिका परिकर्म पीपह प्रकारका कहा गया है वैसे-मातृकापा १ पकार्यकपदर मर्यपर प्रथगाकाशपद : केठमूत ५ पशिषर ६ पकगुण द्विगुण ८ मिगुण केतुभूत १० मतिपय ११ संसारमतिमह १५ नमावर १५ सिवा वर्ष १४, इसमकार पह सिस्मेणिकापरिकर्म हुआ ॥१॥ मूल-से कि त भणुस्ससेणियापरिकम्मे मणुस्ससेणियापरिफम्मे घउसविहे पण्णसे, ते जहा-माउगापयाई १, पगट्ठियपयाई २, अद्वैपयाइ ३, पाढोमगासपयाइ ४, केउसूर्य ५, रासिपी ६, एगगुणं ७, वर्ण, तिगुण १, फेउमूर्य १०, परिग्गही ११, संसारपनिगगहो १२, नदावचे १३, मणुसविच १४, से मणुसरासेणियापरिकम्मे ॥२॥ किं तन्मनुप्यमेणिकापरिकर्म ? मनुप्पप्रेणिकापरिकर्म चतुवंशविध प्रशसम, तद्यथा-मातृकापदानि १, एकापक पदानि २, अथपदानि ३, पृथगाफाशपदानि ५, केतुमूर्स ५, राशियद्धम् ६, एफगुणं , दिगुण ८, निगुणं ९, केतु- भूत १०, प्रतिग्रह ११, संसारप्रतियह १२, नन्दावर्स १२, मनुष्यापत १५, सदेत मनुप्पभेणिकापरिकर्म ॥२॥ आपा-अ १ मिपदापारादाबानि मगाशी समाये । ४ मम्मरमा।

परिकर्मीका परिचय टीप--प्र०-देव ! वह मनुष्यश्रेणिकापरिकर्म क्या है ? उ०-मनुष्यश्रेणिका. परिकर्म १४ प्रकारका कहा गया है, जैसे-मातृकापद १ एकार्थकपद २ अर्थपद ३ पृथगाकाशपद ४ केतुभूत ५ राशिवद्ध ६ एकगुण ७ द्विगुण ८ त्रिगुण ९ केतुभूत १० प्रतिग्रह ११ संसारप्रतिग्रह १२ नंदावर्त्त १३ और मनुष्यावर्त्त १४, यह मनुष्यश्रेणिकापरिकर्म हुआ॥२॥ मूल--से किं तं पुट्ठसेणियापरिकम्मे ? पुटुसेणियापरिकम्मे इक्कारस- विहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढोआगासैपयाई १ केउभूयं २ रासि- बद्धं ३ एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केउभूयं ७ पडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ नंदावत्तं १० पुट्ठावत्तं ११, से तं पुट्ठसेणि- यापरिकम्मे ॥३॥ छाया-अथ किं तत्पृष्टश्रेणिकापरिकर्म ? पृष्टश्रेणिकापरिकर्म-एकाद- शविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-पृथगाकाशपदानि १ केतुभूतं २ राशि- बद्धम् ३ एकगुणं ४ द्विगुणं ५ त्रिगुणं ६ केतुभूतं ७ प्रति- ग्रहः ८ संसारप्रतिग्रहः ९ नन्दावत्तं १० पृष्टावतं ११, तदेतत्पृष्ट- श्रेणिकापरिकर्म ॥३॥ टीका-प्र०-गुरुदेव ! वह पृष्टश्रेणिकापरिकर्म क्या है? उ०-पृष्टश्रेणिका- परिकर्म एकादश प्रकारका है, जैसे-पृथगाकाशपद १ केतुभूत २ राशिबद्ध ३ एकगुण ४ द्विगुण ५ त्रिगुण ६ केतुभूत ७ प्रतिग्रह ८ संसारप्रतिग्रह ९ नन्दावर्त्त १० पृष्टावत ११, यह पृष्टश्रेणिकापरिकर्म पूर्ण हुआ॥३॥ मूल-से किं तं ओगाढसेणियापरिकम्मे ? ओगाढसेणियापरिकम्मे इक्कारसविहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढोआगासपयाइं १ केउभूयं २ रासिबद्धं ३ एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केउभूयं ७ पडि- ग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ नंदावत्तं १० ओगाढावत्तं ११, से तं ओगाढसेणियापरिकम्मे ॥ ४ ॥ १ हस्तलिखिते, आगमोदयसमितिमुद्रिते चूर्णियुते रायधनपतिसिंहमुद्रिते च ' पाढो आमास- पयाई ' इति पाठ , पूज्य ऋषिसम्पादिते तु 'पाढो आपयाई पाढो आगासपयाइ' ईदृश पाठद्वय दृश्यते, तथापि अर्थस्य विशेषसमन्ततया एवविधाभ्यासेन मुनिप्रवरोपाध्यायानामभिमतत्वेन च पाढो आगासपयाइ' भयमेव पाठो मूले मया न्यधायि-सम्पादक ।

१४१ भीमपन्दीसम् संसारपडिग्गहो १२, नंदापत्र १३, सिद्धावसं १४, से त सिद्ध सेणियापरिकम्मे ॥१॥ छाया-अप किं सत् सिद्धभेणिकापरिफर्म ! सिमेणिकापरिकर्म चतुर्वशविध प्रज्ञप्तम् , तपथा-मातृकापदानि १, एकार्यकप दानि २, अर्थपदानि २, पृषगाकाशपदानि , केतुभूतं ५, राशिवम् ६, एफगुणं ७, दिगुण ८, विगुणं ९, केतुमूर्त १०, प्रतिग्रह ११, संसारपतिग्रह १२, मन्दावर्स १३, सिद्धावसं १४, तदेतत् सिमेणिफापरिकर्म ॥१॥ टीका-म-प सिमेणिकापरिफर्म किस प्रकार है।०-सिस्मेनिका परिफर्म चौवद प्रकारका कहा मया है, जैसे-मातृकापड १ एकार्यकपर २ मर्पपप । प्रयमाकाशप : केतुमूत ५ राशिषर १ पकगुण । विगुण ८ मिगुण ९ केतुभूत १० मतिमह ११ संसारमतिमा ५ नाव १५ सिया पर्व १४, इसमकार यह सिदमेणिकापारकर्म हुभा ॥१॥ मूल-से कि ते मणुस्ससेणियापरिकम्मे' मणुस्ससेणियापरिकम्मे पठासबिहे पण्णत्ते, से जहा-मागापमाई १, एगवियपगार २, अटुंपयाइ ३, पागेगासपयाई ४, केतभूयं ५, सिप ६, एगगुर्ण ७, युगणं ८, तिगुणं ९, केतसूर्य १०, परिग्गहो ११, संसारपरिग्गहो १२, नाव, १३, भणुस्सविच १४, से वं भणुस्ससेणियापरिकम्मे ॥२॥ छापा-अथ किं तन्मनुप्पणिकापरिफर्म १ मनुष्यभेणिकापरिफर्म चतुर्दशविध प्रज्ञप्तम्, तपथा-मातृकापदानि १, एकार्थक पदानि २, अर्थपदानि ३, पृपगाकाशपदानि ४, केतुमूतं ५, राशियनम् ६, एकगुण , दिगुण ८, म्रिगुणं , फेत. भूत १०, प्रतिग्रह ११, संसारमतिग्रह १२, नन्दाप १३, मनुप्यावर्त १५, तवेतन्मनुप्पमेणिकापरिफर्म ॥२॥ १ सियद। १. पादपवानि। ३ भागामी समजाये ।

परिकर्मका परिचय १४५ पडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ नंदावत्तं १० विप्पजहणा- वत्तं ११, से त्तं विप्पजहणसेणियापरिकम्मे ॥ ६॥ छाया-अथ किं तद् विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म ? विप्रजहच्छ्रेणिकाप- रिकर्म-एकादशविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-पृथगाकाशपदानि ? केतुभूतं २ राशिबद्धम् ३ एकगुणं ४ द्विगुणं ५ त्रिगुणं ६ केतुभूतं ७ प्रतिग्रहः ८ संसारप्रतिग्रहः ९ नन्दावर्त १० विप्र- जहदावर्त्तम् ११, तदेतद् विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म ॥ ६ ॥ टीका-प्र०-भगवन् ! विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म क्या है ? उ०-विप्रजह- च्छेणिकापरिकर्म ११ प्रकारका कहा गया है, जैसे-पृथगाकाशपद १ केतुभूत २ राशिवद्ध ३ एकगुण ४ द्विगुण ५ त्रिगुण ६ केतुभूत ७ प्रतिग्रह ८ संसार- प्रतिग्रह ९ नंदावर्त्त १० विप्रजहदावर्त्त ११, यह विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म हुआ ॥६॥ मूल-से किं तं चुयाचुयसेणियापरिकम्मे ? चुयाचुयसेणियापरिकम्मे इक्कारसविहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढोआगासपयाई १ केउभूयं २ रासिबद्धं ३ एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केउभूयं ७ पडि- ग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ नंदावत्तं १० चुयाचुयवत्तं ११, तं चुयाचुयसेणियापरिकम्मे ॥७॥ छ चउक्कनइयाई सत्त तेरा- सियाई, से तं परिकम्मे । छाया-अथ किं तच्च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म ? च्युताऽच्युतश्रेणि- कापरिकर्म-एकादशविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-पृथगाकाशपदानि ? केतुभूतं २ राशिबद्धम् ३ एकगुणं ४ द्विगुणं ५ त्रिगुणं ६ केतु- भूतं ७ प्रतिग्रहः ८ संसारप्रतिग्रहः ९ नन्दावर्तं १० च्युताs च्युतावतं ११, तदेतच्च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म ॥७॥ षटू- चतुष्कनयिकानि सप्त त्रैराशिकानि, तदेतत्परिकर्म । टीका-प्र०-वह च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म किस प्रकार है ? उ०-च्युता- च्युतश्रेणिकापरिकर्म ११ प्रकारका है, जैसे-पृथगाकाशपद १ केतुभूत २ राशिबद्ध ३ एकगुण ४ द्विगुण ५ त्रिगुण ६ केतुभूत ७ प्रतिग्रह ८ संसार- प्रतिग्रह ९ नन्दावर्त्त १० च्युताऽच्युतावत ११, यह च्युताच्युतश्रेणिकापरि- कर्म हुआ॥७॥[सिद्धश्रेणिका आदि ७ परिकर्मोंमे पहलेके छ परिकर्म स्वस- से ' १९ २४० प्रामधनीसूत्रम् छाया-अप किं सदवगारमेणिकापरिकर्म १ अवगाहमेणिकापरिकर्म एकादशविध पक्षप्तम्, तपथा-पृथगाकाशपदानि १ केतमूत २ पशिद्धम् ३ एकगुणं ४ विगुणं ५ त्रिगुणं ६ केतुमूतं ७ प्रतिग्रह' ८ संसारभतिग्रह' नन्दाव १० अगावावर्च ११, तदेतदवगावमेणिकापरिफर्म ॥४॥ टीका-अानेवापा भवमारमेणिकापरिकर्म किस प्रकार है।10- भवगात्मेणिकापरिकर्म ११ भकारका कहा गया अखे-प्रयमाकाशपा' कसपूत १ राशिवर। एकमुष ४ विगुण ५ त्रिगुण । केस्त प्रतिमा संसारमतिमहनवाषर्च १० भीर अवमाराव ११ पा अपवारमेषिका परिकर्म हुमा 18 मूल-से कि उपसंपवणसेणियापरिकम्मे ? उमसंपवणसेणियाप- रिफम्मे कारसहि पण्णचे, त महा-पाठोआगासपपाई १ फेउ मूर्य २ रासिप ३ पगगुणं १ पुगण ५ तिगुण । केउमूर्य ७ परिग्गहो ८ संसारपरिग्गहो ९ नंदावचं १० उपसंपजणा वर्ष ११, से उपसपमणसेणियापरिकम्मे ॥५॥ छाया-अय किं स उपसम्पादनमेणिकापरिकर्म ? उपसम्पादनभेणिका परिफर्म-एकापशविध प्रज्ञप्तम्, तपथा-पृथगाकाशपदानि ! केतुमूत २ पशिद्धम् ३ एकगुणं ४ विगुर्ण ५ त्रिगुणं ६ केतु भूतं ७ प्रतिग्रह' ८ संसारमतिपह' ९ मंदावतम् १० उपसम्पाद नाव ११, तदेतद् उपसम्पादनमेणिकापरिफर्म ॥ ५ ॥ टीकाप-गुरुदेषा या उपसम्पादमभेणिकापरिकम पा 11 उपसम्पायनमिकापरिकर्म ११ मकारका कहा गया है, असे कि पपमाका पर पकेटमूत १ पशिषर एफगुण . विराण ५ मिगुण । देवभूत. प्रतिपदससारमतिमह महापर्च १० उपसम्पायनापत १५ या उप- सम्पापमभेणिहापरिकफर्म हुमा ।५. मूल-से कि विप्पमहणसेणिपापरिकम्मे ! विपनदणसेणियापरि कम्मे इमारसपिढे पण्ण, से महा-पागोमागासपपाई १ केट भूपं २ गसिप ३ एगगुर्ण ५ दुगणे ५ तिगुणं ६ केउमूर्य ७ परिकर्मका परिचय १४५ पडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ नंदावत्तं १० विप्पजहणा- वत्तं ११, से त्तं विप्पजहणसेणियापरिकम्मे ॥६॥ छाया-अथ किं तद् विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म ? विप्रजहच्छ्रेणिकाप- रिकर्म-एकादशविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-पृथगाकाशपदानि ? केतुभूतं २ राशिबद्धम् ३ एकगुणं ४ द्विगुणं ५ त्रिगुणं ६ केतुभूतं ७ प्रतिग्रहः ८ संसारप्रतिग्रहः ९ नन्दावर्त १० विप्र- जहदावर्त्तम् ११, तदेतद् विप्रजहच्छेणिकापरिकर्म ॥ ६ ॥ टीका-प्र०-भगवन् ! विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म क्या है ? उ०-विप्रजह- च्छेणिकापरिकर्म ११ प्रकारका कहा गया है, जैसे-पृथगाकाशपद १ केतुभूत २ राशिबद्ध ३ एकगुण ४ द्विगुण ५ त्रिगुण ६ केतुभूत ७ प्रतिग्रह ८ संसार- प्रतिग्रह ९ नंदावर्त्त १० विप्रजहदावर्त ११, यह विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म हुआ ॥६॥ मूल-से किं तं चुयाचुयसेणियापरिकम्मे ? चुयाचुयसेणियापरिकम्मे इक्कारसविहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढोआगासपयाइं १ केउभूयं २ रासिबद्धं ३ एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केउभूयं ७ पडि- ग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ नंदावत्तं १० चुयाचुयवत्तं ११, से त्तं चुयाचुयसेणियापरिकम्मे ॥७॥ छ चउक्कनइयाइं सत्त तेरा- सियाइं, से तं परिकम्मे । छाया-अथ किं तच्च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म ? च्युताऽच्युतश्रेणि- कापरिकर्म-एकादशविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-पृथगाकाशपदानि ? केतुभूतं २ राशिबद्धम् ३ एकगुणं ४ द्विगुणं ५ त्रिगुणं ६ केतु- भूतं ७ प्रतिग्रहः ८ संसारप्रतिग्रहः ९ नन्दावर्ते १० च्युताऽ च्युतावत्तं ११, तदेतच्च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म ॥७॥ षटू- चतुष्कनयिकानि सप्त त्रैराशिकानि, तदेतत्परिकर्म । टीका-प्र०-वह च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म किस प्रकार है ? उ०-च्युता- च्युतश्रेणिकापरिकर्म ११ प्रकारका है, जैसे-पृथगाकाशपद १ केतुभूत २ राशिवद्ध ३ एकगुण ४ द्विगुण ५ त्रिगुण ६ केतुभूत ७ प्रतिग्रह ८ संसार- प्रतिग्रह ९ नन्दावर्त्त १० च्युताऽच्युतावर्त्त ११, यह च्युताच्युतश्रेणिकापरि- कर्म हुआ॥७॥[सिद्वश्रेणिका आदि ७ परिकोंमें पहलेके छ परिकर्म स्वस- २५४ भीमचनीवन छापा-अप किं तदवगारमेणिकापरिकर्म १ अवगाठभेणिकापरिकर्म एकादशविध प्रशवम्, तद्यथा-पृथगाकाशपदानि १ केतुमूतं २ पशिषवम् ३ एकगुणं ४ विष्णं ५ विगुणं ६ केतुमूते ७ प्रतिमह' ८ संसारप्रतिग्रहः ९ नन्दापर्व १० अपगाठावर ११, तदेतदवगाठमेणिकापरिकर्म ॥५॥ टीका-अ-देव! यह अपमारमणिकापरिफर्म किस प्रकार है- भक्मारमेणिकापरिकर्म १५ प्रकारका कक्षा मया, असे प्रयगाकारापा १ टिपूत १ राशिफ्ट एकगुण निगुण ५ मिगुण । केवमत ७ प्रतिमा ८ संसारमतिमा वाव १० बीर अवगाहापत १ पद अबगारमेणिका परिफर्म मा. मूल से किसे उबसैपजणसेणियापरिफम्मे १ उपसंपज्जणसेमियाप- रिकम्मे कारसहि पण्णचे, ते महा-पाठोआगासपया केर मूर्प २ शसिपई । पगगुर्ण ४ दुगुणं ५ तिगुण र केटमूर्य . पडिग्गहो ८ संसारपरिग्गहो ९ नापचे १० उपसंपक्षणा वर्ष ११, से उपसंपजणसेणियापरिकम्मे ॥५॥ छापा-अप किंतर उपसम्पादनमेणिकापरिकर्मी उपसम्पादनमेणिका परिकर्म-एकादशविर्ष प्रशप्तम्, तरापा-पपगाकाशपदानि ? केवमूतं २ राशिवनम् एकगुण ४ दिगणं ५ निगुण ६ केतु- मूर्त ७ प्रतिमा ८ संसारमतियह ९ मंदापर्चम् १० उपसम्पाद नाव ११, तदेतत् अपसम्पावनभेणिकापरिकर्म ॥ ५ ॥ टीका-मा-गुष! यह उपसम्पाकममेणिकापरिफर्म मा है। उ- ग्पसम्पादनभिकापरिकर्म ११ प्रकारका कामया जैसे कि प्रथमाकाश- पर एकमत १ विवर एकमुष : रिगुण १ भिगुण मेयरत . मतिपद संधारपतिमह महापत १० उपसम्पापमान ११ यह प सम्पापनश्रेणिक्षापरिकर्म हुमा ॥५॥ मूल-से किं विप्पमाणसेणिपापरिकम्मे १ विप्पाहणसेणिपापरि कम्मे इशारसबिहे पण्ण ने महा-पागोमागासपपाई १ केउ- मूर्य २ रासिक एगगुणं गर्ण ५ तिगुण ६ फेटभूयं ७ परिकर्मका परिचय १४५ पडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ नंदावत्तं १० विप्पजहणा- वत्तं ११, से तं विप्पजहणसेणियापरिकम्मे ॥६॥ छाया-अथ किं तद् विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म ? विप्रजहच्छ्रेणिकाप- रिकर्म-एकादशविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-पृथगाकाशपदानि ? केतुभूतं २ राशिबद्धम् ३ एकगुणं ४ द्विगुणं ५ त्रिगुणं ६ केतुभूतं ७ प्रतिग्रहः ८ संसारप्रतिग्रहः ९ नन्दावत्तं १० विप्र- जहदावर्त्तम् ११, तदेतद् विप्रजहच्छेणिकापरिकर्म ॥ ६ ॥ टीका-प्र०-भगवन् । विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म क्या है ? उ०-विप्रजह- च्छ्रेणिकापरिकर्म ११ प्रकारका कहा गया है, जैसे-पृथगाकाशपद १ केतुभूत २ राशिबद्ध ३ एकगुण ४ द्विगुण ५ त्रिगुण ६ केतुभूत ७ प्रतिग्रह ८ संसार- प्रतिग्रह ९ नंदावर्त्त १० विप्रजहदावर्त्त ११, यह विप्रजहच्छ्रेणिकापरिकर्म हुआ ॥६॥ मूल-से किं तं चुयाचुयसेणियापरिकम्मे ? चुयाचुयसेणियापरिकम्मे इक्कारसविहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढोआगासपयाइं १ केउभूयं २ रासिबद्धं ३ एगगुणं ४ दुगुणं ५ तिगुणं ६ केउभूयं ७ पडि- ग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ नंदावत्तं १० चुयाचुयवत्तं ११, से तं चुयाचुयसेणियापरिकम्मे ॥७॥ छ चउक्कनइयाई सत्त तेरा- सियाई, से त्तं परिकम्मे । छाया-अथ किं तच्च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म ? च्युताऽच्युतश्रेणि- कापरिकर्म-एकादशविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-पृथगाकाशपदानि ? केतुभूतं २ राशिबद्धम् ३ एकगुणं ४ द्विगुणं ५ त्रिगुणं ६ केतु- भूतं ७ प्रतिग्रहः ८ संसारप्रतिग्रहः ९ नन्दावर्त १० च्युताs च्युतावत्तं ११, तदेतच्च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म ॥ ७॥ षट्- चतुष्कनयिकानि सप्त त्रैराशिकानि, तदेतत्परिकर्म । टीका-प्र०-वह च्युताऽच्युतश्रेणिकापरिकर्म किस प्रकार है ? उ०-च्युता- च्युतश्रेणिकापरिकर्म ११ प्रकारका है, जैसे-पृथगाकाशपद १ केतुभूत २ राशिवद्ध ३ एकगुण ४ द्विगुण ५ त्रिगुण ६ केतुभूत ७ प्रतिग्रह ८ संसार- प्रतिग्रह ९ नन्दावर्त १० च्युताऽच्युतावत ११, यह च्युताच्युतश्रेणिकापरि- कर्म हुआ॥७॥[सिद्धश्रेणिका आदि ७ परिकौमें पहलेके छ परिकर्म स्वस- १४० भीमचन्दीसूत्रम् छाया-अप किं तदवगाडमेणिकापरिकर्म १ अषगास्मेणिकापरिकर्म एकादशविध प्रज्ञातम्, तपथा-पृथगाकाशपदानि १ केतुमूर्त २ पशिषम् ३ एफगुण ४ विगणं ५ त्रिगुणं ६ केतुमूतं ७ प्रतिमह' ८ संसारमतिग्रहः ९ नन्वाप १० भवगाठाव ११, तदेतदवगाठमेणिकापरिकर्म ॥४॥ टीका-मा-देवदह भवगाह मेमिकापरिधर्म किस प्रकार है- भवमाठमेणिकापरिकम १५ प्रकारका कहा गया जिसे-प्रथमाकाशपर भास्त १ राशियस एकगुण विगुण पिमुल मूत० प्रतिमा संसारप्रतिमह भाव १० और अपमाराव ११ यह भवमानमणिका परिकर्म हुआ मूल-से कि उपसंपजणसेणियापरिकम्मे १ तवसंपजणसेणिपाप- रिकम्मे इशारसविद पण्णचे, तं जहा-पाडोआगासपपाई १ केड- भूपं २ रासिप पगगुणे ४ गुणे ५ सिगुर्ण ५ केभूपं ७ पडिग्गहो ८ संसारपडिग्गदो १ नदावरी १० उपसंपखणा- व ११, से उपसंपचणसेणियापरिकम्मे ॥५॥ छाया-अप किंसद उपसम्पादनप्रेणिकापरिकर्म ? उपसम्पादन मेणिका परिकर्म-एकादशविध प्राप्तम्, सपमा-पपगाकाशपदानि ? केवमूतं २ राशिवम् ३ एकगुणं ४ विगुणे ५ त्रिगुण केतु भूत ७ प्रतिमह' ८ संसारमतिमह ९ नंदावतम् १० उपसम्पाद नाव ११, सदेतद् उपसम्पादनभेणिकापरिकर्म ॥५॥ टीका- गुरुीय बद उपसम्पापममेणिकापरिकर्म क्या है। 30- उपसम्पाइनभेणिकापरिचर्म ११ मकारका कहा गया असे कि प्रथमाकार- पद १ केटमूत र शिवर। एकमुष्ण गुण मिगुण ६ वमत . मतिपय संसारपतिमाह मदापर्स १. उपसम्पादनापर्स ११ पर उप सम्पारनमेणिकापरिकर्म हुआ।५० मूठ-से किं न विप्पमहणसेणिपापरिकम्मे ! विपमहणसेणियापरि कम्मे फारसविहे पण्णते, त जहा-पाढोआगासपयाई १ केट भूपं २ रासिमन्द्र ३ पगगुर्ण ४ पुर्ण ५ तिपूर्ण र केउमूर्प ७ दृष्टिवादके सूत्ररूप भेदका वर्णन १४७ सम्भिन्नं ९ यथावादं १० स्वस्तिकावर्त्तम् ११ नन्दावर्त १२ बहुलं १३ पृष्टापृष्टं १४ व्यावर्त्तम् १५ एवम्भूतं १६ द्विकावत १७ वर्तमानपदं १८ समभिरूढं १९ सर्वतोभद्रं २० प्रशिष्यं २१ दुष्प्रतिग्रहम् २२, इत्येतानि द्वाविंशतिः सूत्राणि छिन्नच्छेदनयि- कानि स्वसमयपरिपाट्या, इत्येतानि द्वाविंशतिः सूत्राणि अच्छिन्नच्छेदनयिकानि-आजीविकसूत्रपरिपाट्या, इत्येतानि द्वाविंशतिः सूत्राणि त्रिकनयिकानि राशिकसूत्रपरिपाट्या, इत्येतानि द्वाविंशतिः सूत्राणि चतुष्कनयिकानि स्वसमयसूत्र- परिपाट्या, एवमेव सपूर्वापरेणाऽटाशीतिः सूत्राणि भवन्तीत्या- ख्यातम्, तान्येतानि सूत्राणि । टीका-प्र०-भगवन् ! वह सूत्ररूप दृष्टिवाद क्या है ? उ०-सूत्र वाईस प्रका- रके कहे गये हैं। जैसे-१ ऋजुसूत्र, २ परिणतापरिणत, ३ बहुभगिक, ४ विजय- चरित, ५ अनन्तर, ६ परम्पर, ७ आसाण,८ संयूथ, ९ सम्भिन्न, १० यथावाद, ११ स्वस्तिकावर्त्त, १२ नन्दावर्त्त, १३ बहुल, १४ पृष्टापृष्ट,१५व्यावर्त्त, १६ एवम्भूत, १७ द्विकावर्त्त, १८ वर्तमानपद, १९ समभिरूढ, २० सर्वतोभद्र, २१ प्रशिष्य, और २२ दुष्प्रतिग्रह, इसप्रकार ये बाईस सूत्र स्वसमयसूत्रकी परिपाटीसे याने स्वदर्शनकी वक्तव्यताका आश्रयण कर छिन्नच्छेदनयवाले हैं, ये ही वाईस सूत्र आजीविक-गोशालकके मतकी सूत्रपरिपाटीसे अच्छिन्नच्छेदनयवाले होते है, इसप्रकार ये ही वाईस सूत्र त्रैराशिकसूत्र परिपाटीसे विवक्षित होनेपर तीन नयवाले होते हैं, तथा येही बाईस सूत्र स्वसमयसूत्रकी परिपाटीसे स्वदर्शनकी वक्तव्यताका आश्रयण कर चतुष्क नयवाले हैं, इसतरह पूर्वापर याने पहले पीछेके सब मिलाकर अट्ठासी सूत्र होते हैं, ऐसा तीर्यवरों व गणधरोंने कहा है, यह हुआ सूत्ररूप दृष्टिवादका भेद । मूल-से किं तं पुव्वगए ? पुवगए चउद्दसविहे पण्णत्ते, तं जहा- उप्पायपुव्वं १ अग्गाणीयं २ वीरियं ३ अत्थिनत्थिप्पवायं ४ नाणप्पवायं ५ सच्चप्पवायं ६ आयप्पवायं ७ कम्मप्पवायं ८ पञ्चक्खाणप्पवायं ९ विज्जाणुप्पवायं १० अबझं ११ पाणाऊ १२ किरियाविसाल १३ लोकबिंदुसारं १४ । उप्पायपुवस्स णं १ सभी पूर्वके सूत्रार्थकी ये सूचना करनेवाले हैं, तथा सर्व द्रव्य, सर्व पर्याय और सभी नय तथा सर्व भङ्ग-विकल्पोंके प्रदर्शक हैं अत सूत्र कहे जाते हैं, सूत्र या अर्थ रूपसे ये अभी व्यवच्छिन्न हैं।

१४५ श्रीमचमीयमम् मयकी पकस्यताके प्रकाशक है, मोशासकके मतानुसार गुतागुतीमित परिकर्मसहित सात परिकर्म कहे जाते है] अमममें नयका विचार करते हैं- परिकर्भ धार मयषासे हैं, अर्थात नेगम आदि सात मोमैसे सामाम्ममापी नैसममें संमा मयों और विशेषमाही म्पपहारनपमें अम्तहित होते हैं ऐसे ही शाम सममिका और पवम्भूत इन तीनोंका भी पर्यावापिक अप पक नपर्म समावेश कर छेते हैं, तब समह व्यवहार, सूप, और पर्या पार्षिक [शमादि तीन ] इस प्रकार पार नय हो जाते हैं। इनसे पहले परिकर्म स्वसमयकी पतम्यतासे विषारे जाते हैं, सात परिकर्म राशिक- गोशासकके मतका अनुममन करनेवाले हैं यह परिकर्म पूर्ण हो उका। [ मणितके परिकमकी तरह सून पूर्व व अमुयोम आविक पापकी पोग्यता कराममें समर्थ इस तिपयको भूतपरिकर्म कहते हैं। सिरणिय आदि मूठमेव भीर ८३ इसके उसर मेव हैं। यह सब सा व भरपसे विष्ठिा है, मतपम इसका स्वरूप पयागत सम्मायके अनुसार समझना चाहिये ] मूल-से कि त सुचाई ? सुचाई बावीस पन्नचाई, तं जहा-उम्पुसुप? परिणयापरिणयं २ बहुमगिर्य ३ विजयचरिय ४ अर्णतरं ५ पर- परं ६ आसार्ण ७ संजूहं ८ संमिण्णं ९ माहवार्य १० सोव- त्थियावन ११ नंदावतं १२पालं १३ पुढाप १४ वियामिर्च १५ पूर्वसूर्य १६ दुयावर १७ बत्तमाणपर्व १८ सममि १९ सय्बओम २० पस्सासं २१ दुप्पजिग्गहं २२, इबेहयाई बावीस सुधाई छिन्नोपनइयाणि ससमयसुत्तपरिवारीप, हो इयाई पापीस सुताई अशिपठेपनाइयाणि आजीवियसुचपरि वारीप, इमेइपाई पापीस सुताई तिगणइयाणि सेरासियसुचप- विासीए, रोहपाई पावीसं सत्ताई पटपकनइयाणि ससमयसूच परिवाडीए, पकामेव सपुष्यावरेणं अट्ठासी सुत्ताई मतिति म(मस्सायं, से सुचाई। छाया-अप कानि तानि सूत्राणि ? सूत्राणि शविंशति प्राप्तानि, तपपा-मसूत्रम् १ परिणताऽपरिणतं २ बहुमकिं १ विजयपरितम् १ अनन्तरं ५ परम्परम् ६ आसानम् ७ संयूपं ८ मामीनिष्काम मालपानी रातिबाते समीप गोल पोष सामोसी क्यमरमा प्रवेपास्ते पति।

दृष्टिवादके सूत्ररूप भेदका वर्णन १४७ सम्भिन्नं ९ यथावादं १० स्वस्तिकावर्त्तम् ११ नन्दावर्त १२ बहुलं १३ पृष्टापृष्टं १४ व्यावर्त्तम् १५ एवम्भूतं १६ द्विकावत १७ वर्तमानपदं १८ समभिरूढं १९ सर्वतोभद्रं २० प्रशिष्यं २१ दुष्पतिग्रहम् २२, इत्येतानि द्वाविंशतिः सूत्राणि छिन्नच्छेदनयि- कानि स्वसमयपरिपाट्या, इत्येतानि द्वाविंशतिः सूत्राणि अच्छिन्नच्छेदनयिकानि-आजीविकसूत्रपरिपाट्या, इत्येतानि द्वाविंशतिः सूत्राणि त्रिकनयिकानि त्रैराशिकसूत्रपरिपाट्या, इत्येतानि द्वाविंशतिः सूत्राणि चतुष्कनयिकानि स्वसमयसूत्र- परिपाट्या, एवमेव सपूर्वापरेणाऽष्टाशीतिः सूत्राणि भवन्तीत्या- ख्यातम्, तान्येतानि सूत्राणि । टीका-प्र०-भगवन् ! वह सूत्ररूप दृष्टिवाद क्या है ? उ०-सूत्रं बाईस प्रका- रके कहे गये हैं। जैसे-१ ऋजुसूत्र, २ परिणतापरिणत, ३ बहुभङ्गिक, ४ विजय- चरित, ५ अनन्तर, ६ परम्पर, ७ आसाण,८ संयूथ, ९ सम्भिन्न, १० यथावाद, ११ स्वस्तिकावर्त्त,१२ नन्दावर्त्त, १३ बहुल, १४ पृष्टादृष्ट,१५व्यावर्त्त, १६ एवम्भूत, १७ द्विकावत, १८ वर्तमानपद, १९ समभिरूढ, २० सर्वतोभद्र, २१ प्रशिष्य, और २२ दुष्प्रतिग्रह, इसप्रकार ये बाईस सूत्र स्वसमयसूत्रकी परिपाटीसे याने स्वदर्शनकी वक्तव्यताका आश्रयण कर छिनच्छेदनयवाले हैं, ये ही बाईस सूत्र आजीविक-गोशालकके मतकी सूत्रपरिपाटीसे अच्छिन्नच्छेदनयवाले होते हैं, इसप्रकार ये ही बाईस सूत्र त्रैराशिकसूत्र परिपाटीसे विवक्षित होनेपर तीन नयवाले होते हैं, तथा येही बाईस सूत्र स्वसमयसूत्रकी परिपाटीसे स्वदर्शनकी वक्तव्यताका आश्रयण कर चतुष्क नयवाले हैं, इसतरह पूर्वापर याने पहले पीछेके सब मिलाकर अट्ठासी सूत्र होते हैं, ऐसा तीर्थङ्करों व गणधरोंने कहा है, यह हुआ सूत्ररूप दृष्टिवादका भेद । मूल-से किं तं पुव्वगए ? पुबगए चउद्दसविहे पण्णते, तं जहा- उप्पायपुव्वं १ अग्गाणीयं २ वीरियं ३ अत्थिनत्थिप्पवायं ४ नागप्पवायं ५ सच्चप्पवायं ६ आयप्पवायं ७ कम्मप्पवायं ८ पञ्चक्खाणप्पवायं ९ विज्जाणुप्पवायं १० अबंझं ११ पाणाऊ १२ किरियाविसाल १३ लोकबिंदुसारं १४ । उप्पायपुवस्स णं १ सभी पूर्वके सूत्रार्थकी ये सूचना करनेवाले हैं, सर्व सर्व पर्याय और सभी नय तथा सर्व भग-विकल्पोंके प्रदर्शक हैं अत सूत्र कहे जाते हैं, सूत्र या अर्थ रूपसे ये अभी व्यवच्छिन्न हैं। तथा द्रव्य, प्रीमनमीत्रम् मपकी वफम्यताफे प्रकाशक है, गोशासकके मतानुसार मुसामुतमेविका परिकर्मसहित सात परिकर्म को जाते हैं] मवइनमें मयका विचार करते हैं- छ परिफर्म चार नमवाछे हैं, अपात मम मावि सात नोंमेंसे सामान्यपाही भैगममें संग्रह मममें और विशेपमाही व्यबहारनयमें भन्तर्विध होवे हैं ऐसे ही शम सममिर और पपम्भूत इम तीनोंका भी पर्यावार्षिक कप एक नयमें धमावेश कर सेते हैं, तब संग्रह, म्यवहार, मन, और पर्चा पार्षिक [शवादि वीन] इस मकार चार नय होनाते हैं। इनसे पहले परिकर्म स्वस्मयकी बकम्पतासे विचार जाते सातपरिकर्म राशिक- मोशासकके मतका अनुममन करनेवाले हैं, पह परिकर्म पूर्ण हो पुका। [ मपितके परिकर्मकी तरा पूल पूर्व व ममुयोम आपिक महणकी योग्यता करामेमें समर्थ सपिपयको तपरिकर्म कहते हैं। सिरामेणिका आणि सूसमेव और इसके उत्तर मेव हैं। यह सब सून व अपसे विपिन है, मतपय इसका स्वरूप पयामत सम्प्रदायके अनुसार समझना चाहिये] मूल-से किं तं सुचाई ? सुचाई पापीस पन्नचाई, सं जहा-उज्युसुर्य । परिणयापरिणयं २ पहुमगिर्य । विजयचरियं ४ मणतरं ५ पर परं ६ आसाणं ७ संग्रह ८ संमिणं ९ आहव्याय १० सोव त्थियाय ११ नवाव १२बहुल १३ पुष १४ विपावित् १५ पर्वमूर्य १६ दुपावत १७ पत्रमाणपयं १८ सममिक १९ सवओभइ २० पस्सासं २१ वुप्पडिग्गई २२, इण्याई बावीस सुचाई छिसम्पयनदयाणि ससमयसुसपरिवारीए, इथे इयाई पावीस सुत्चाई अनिच्छेयनइयाणि आजीवियसत्तपरि पासीप, इपेइयाई वापीसं सुचाई तिगणापाणि सेरासिपसुत्फ- रिवारीप, इचाहयाई मावीस अचाई पक्कनइयाणि ससमयसच परिवारीप, एयामेव सपुण्यावरेणं भट्ठासीर सत्ताई मवतिपि म(अपसार्य, से सत्ताई। छाया-अप कानि तानि सम्राणि ? स्माणि द्वाविंशति प्राप्तानि, तथपा-कास्त्रम् १ परिणताऽपरिणतं २ वमनिकं ३ विजयपरितम् ४ अनन्तरं ५ परम्परम् ६ आसानम् ७ संयूपं -आदि-पीनामनामाची पहियोगतेसमी बक्तबार बस सागर व मामा म पास्ते परिक।

पूर्वगत दृष्टिवादका विचार २४९ वीर्यपूर्वस्याऽष्टी वस्तवः, अष्टौ चूलिकावस्तवः प्रज्ञप्ताः ३, अस्तिनास्तिप्रवादपूर्वस्य-अष्टादश वस्तवो दश चूलिकावस्तवः प्रज्ञप्ताः ४, ज्ञानप्रवादपूर्वस्य द्वादश वस्तवः प्रज्ञप्ताः ५, सत्यप्रवाद- पूर्वस्य द्वौ वस्तू प्रज्ञप्तौ ६, आत्मप्रवादपूर्वस्य षोडश वस्तवः प्रज्ञप्ताः ७, कर्मप्रवादपूर्वस्य त्रिंशद् वस्तवः प्रज्ञप्ताः ८, प्रत्या- ख्यानपूर्वस्य विशतिर्वस्तवः प्रज्ञप्ताः ९, विद्यानुप्रवादपूर्वस्य पञ्चदश वस्तवः प्रज्ञप्ताः १०, अबन्ध्यपूर्वस्य द्वादश वस्तवः प्रज्ञप्ताः ११, प्राणायुःपूर्वस्य त्रयोदश वस्तवः प्रज्ञप्ताः १२, क्रियाविशालपूर्वस्य त्रिंशद् वस्तवः प्रज्ञप्ताः १३, लोकबिन्दु- सारपूर्वस्य पञ्चविंशतिर्वस्तवः प्रज्ञप्ताः १४ । गाथा--८९ दश १ चतुर्दश २ अष्टाऽष्टादशैव ३-४ द्वादश ५ द्वौ ६ च वस्तवः। षोडश ७ त्रिंशद् ८ विंशतिः ९ पञ्चदश १० अनुप्रवादे ॥१॥ ९०-द्वादशैकादशे, द्वादशे त्रयोदशा एव वस्तवः। त्रिंशत्पुनस्त्रयोदशे चतुर्दशे पञ्चविंशतिः ॥२॥ ९१-चत्वारि १ द्वादश २ अष्टौ ३ चैव दश ४ चैव चूलवस्तूनि । आदिमानां चतुण्णां, शेषाणां चूलिका नास्ति ॥३॥ तदेत्पूर्वगतम् । टीका-प्र०-देव ! वह पूर्वगत दृष्टिवाद कौनसा है ? पूर्वगत दृष्टिवाद १४ प्रकारका कहा गया है- जैसे कि-१ उत्पादपूर्व [इसमे सब द्रव्य और पर्यायोंके उत्पाद-उत्पत्ति- की प्ररूपणा की गई है-इसके कोटि पदपरिमाण हैं ] २ अग्रायणीयपूर्व [ सभी द्रव्य, पर्याय और जीवविशेषके अग्र-परिमाणका इसमें वर्णन किया गया है, इसके ९६ लाख पद है ] ३ वीर्यप्रवादपूर्व [ सकर्म या निष्कर्म जीव तथा अजीवके वीर्य-शक्तिविशेषका इसमें वर्णन है तथा ७० लाख इसके पद हैं ] ४ अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व [ यह वस्तुओंके अस्तित्व नास्तित्वका वर्णन करने- वाला है, धर्मास्ति आदि द्रव्यका अस्तित्व और खपुष्प वगैरहका नास्तित्व तथा प्रत्येक द्रव्यमें स्वरूपसे अस्तित्व और पररूपसे नास्तित्व प्रतिपादन किया गया है, इसके ६० लाख पद है ] ५ ज्ञानप्रवादपूर्व [ मति आदि पांच १ तीर्थप्रवृत्तिके समयमें तीर्थकर गणधरोंको सकल श्रुतार्थमें अवगाहन करनेलायक समझकर पहले पूर्वगत सूत्र कहते हैं, इसलिये ये पूर्व कहलाते हैं, वे पूर्व चौदह हैं ।

२३८ भीमपन्दीसमम घुसपत्यू चत्वारि यूलियावत्यू पण्णचा, अग्गाणीयपुथ्वस्स णे पोहसवत्यू दुवालस पूलियावत्यू पण्णचा, वीरियपुष्यस्स अट्ठ बत्यू अट्ठ पूलियावत्यू पण्णता, अत्यिनस्थिप्पवायपुष्वस्स 4 अट्ठारसवत्थू यस पूलियाप पू पण्णचा, नाणप्पवायपुरुवस्स पारस वस्यू पण्णचा, सम्पप्पवायपुष्यस्सणं दोषिणवत्यूपपणता, आयप्पवायपुष्वस्स ण सोलस पत्थू पण्णचा, फम्मप्पवायपुम्पस्स ण तीसं परपू पण्णचा, पञ्चक्लाणपुष्वस्स णं पीसं वत्यू पण्णचा, विजाणुप्पवायपुष्वस्स णं पारसपत्यू पण्मचा, अर्थसपुष्वस्स णं पारसवस्यू पण्णचा, पाणाऊपुष्वस्स णे सेरस- पत्यू पण्णता, किरियाविसालपुष्वस्स गं तीर्स पत्यू पण्णचा, लोकबिंदुसारपुष्यस्स णे पणवीस पल्यू पण्णचा- गाहा-८९ स १ चोइस २ अट्ठ ३ अट्ठारसेव ४ पारस ५वे ६ य वत्पूणि । सोलस ७ तीसा ८ पीसा ९, पत्नरस १० अणुप्पवामि ॥१॥ --भारस इकारसमे, पारसमे सेरसेव परपूणि। सीसा पुण तेरसमे, चोहसमे पण्णवीसामओ ॥ २॥ ९१-चवारि १ दुवालस २, अटु ३ व दस १ व पुरवत्पूणि । आखाण पठणहं, सेसाणं घूपिया नत्यि ॥२॥ से ते पुष्वगए। छापा-अप किं तत् पूर्वगतम् ? पूर्वगत चतुर्दशविध प्रज्ञप्तम्, नया- उत्पावपूर्वम् १ अयायणीप २ वीर्यम् (प्रवादम्) ३ अस्तिनास्ति मवाद ४ ज्ञानप्रपाद ५ सस्पमवादम् ६ आरममवाद ७ कर्म प्रवाद ८ मत्यास्यानमवादं ९ विधानुमवादम् १० अमनाये ११ पाणायु १२ क्रियाविशाल १५ लोकपिन्दुसारम् १४॥ उत्पाद पूर्वस्प दश वस्तव', पत्वारभूलिकावस्तव' प्रज्ञा १, भग्रा यणीपपूर्वस्प चतुर्दश पस्तयो द्वादशपूलिकावस्तव प्रज्ञाप्ता २, बस्नु यस पुस्तमासार, जिस्म मेभिवान।

१४९ ܝ , पूर्वगत दृष्टिवादका विचार वीर्यपूर्वस्याऽष्टी वस्तवः, अष्टौ चूलिकावस्तवः प्रज्ञप्ताः ३, अस्तिनास्तिप्रवादपूर्वस्य-अष्टादश वस्तवो दश चूलिकावस्तवः प्रज्ञप्ताः ४, ज्ञानप्रवादपूर्वस्य द्वादश वस्तवः प्रज्ञप्ताः ५,सत्यप्रवाद- पूर्वस्य द्वौ वस्तू प्रज्ञप्तौ ६, आत्मप्रवादपूर्वस्य षोडश वस्तवः प्रज्ञप्ताः ७, कर्मप्रवादपूर्वस्य त्रिंशद् वस्तवः प्रज्ञप्ताः ८, प्रत्या- ख्यानपूर्वस्य विंशतिर्वस्तवः प्रज्ञप्ताः ९, विद्यानुप्रवादपूर्वस्य पञ्चदश वस्तवः प्रज्ञप्ताः १०, अबन्ध्यपूर्वस्य द्वादश वस्तवः प्रज्ञप्ताः ११, प्राणायुःपूर्वस्य त्रयोदश वस्तवः प्रज्ञप्ताः १२, क्रियाविशालपूर्वस्य त्रिंशद् वस्तवः प्रज्ञप्ताः १३, लोकबिन्दु- सारपूर्वस्य पञ्चविंशतिर्वस्तवः प्रज्ञप्ताः १४ । गाथा--८९ दश १ चतुर्दश २ अष्टाऽष्टादशैव ३-४ द्वादश ५द्वौ ६ च वस्तवः। षोडश ७ त्रिंशद् ८ विंशतिः ९ पञ्चदश १० अनुप्रवादे ॥१॥ ९०-द्वादशैकादशे, द्वादशे त्रयोदशा एव वस्तवः । त्रिंशत्पुनस्त्रयोदशे चतुर्दशे पञ्चविंशतिः ॥२॥ ९१-चत्वारि १ द्वादश २ अष्टौ ३ चैव दश ४ चैव चूलवस्तूनि । आदिमानां चतुण्णां, शेषाणां चूलिका नास्ति ॥३॥ तदेत्पूर्वगतम् । टीका-प्र०-देव ! वह पूर्वगत दृष्टिवाद कौनसा है ? पूर्वगत दृष्टिवाद १४ प्रकारका कहा गया है- जैसे कि-१ उत्पादपूर्व [इसमे सब द्रव्य और पर्यायोंके उत्पाद-उत्पत्ति- की प्ररूपणा की गई है-इसके कोटि पदपरिमाण हैं ] २ अग्रायणीयपूर्व [ सभी द्रव्य, पर्याय और जीवविशेषके अग्र-परिमाणका इसमे वर्णन किया गया है, इसके ९६ लाख पद है ] ३ वीर्यप्रवादपूर्व [ सकर्म या निष्कर्म जीव तथा अजीवके वीर्य-शक्तिविशेषका इसमें वर्णन है तथा ७० लाख इसके पद हैं ] ४ अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व [ यह वस्तुओंके अस्तित्व नास्तित्वका वर्णन करने- वाला है, धर्मास्ति आदि द्रव्यका अस्तित्व और खपुष्प वगैरहका नास्तित्व तथा प्रत्येक द्रव्यमें स्वरूपसे अस्तित्व और पररूपसे नास्तित्व प्रतिपादन किया गया है, इसके ६० लाख पद हैं ] ५ ज्ञानप्रवादपूर्व [ मति आदि पांच १ तीर्थप्रवृत्तिके समयमें तीर्थङ्कर गणधरोंको सकल श्रुतार्थमें अवगाहन करनेलायक समझकर पहले पूर्वगत सूत्र कहते हैं, इसलिये ये पूर्व कहलाते हैं, वे पूर्व चौदह है।

भीममन्दीसूधम् सामोंका इसमें सविस्तर वर्णन किया गया है, परपरिमाण इसके पककम पक कोटिका है सस्यमवावपूर्व [पद सत्यवचन या संयमका विस्तारसे और मतिपक्षके साथ पर्मम फरमेयाला है इसके पक कोटि भीर छ पर] ७ आरममयावर्षे भनेक प्रकारके मयमतसे यह पूर्व आरमाका वन करने पाला है इसमें २१ कोटि पर ] ८ फर्मप्रवाहपूर्व भाठ प्रकार के मौका महति स्थिति आदि के मेवप प्रभवले विस्तारपूर्वक इसमें वर्णन किया गया हैसके एक कोटि अस्सी हमार पर]प्रत्याभ्यान-अवारपूर्व यह प्रत्या रुपानका भेषममेषके साप विस्तारपूर्वक वर्णन करता है इसके छात पर ११० विधामुफ्यावपूर्व [सम ममेक प्रकारकी भतिशयसम्पम दिया और सामनकी अमुहलतासे रमकी सिद्धि कही गई है, इसके पक कोटि १० सात पर है ] ११ अपम्पपूर्व [ यहाँ शाम तप आदि समी सत्कर्म एमफलवासे भीर ममा आदि कार्य अशुमफसवा को गये हैं इसलिये यह असमय है, इसके फोति पर है] १९ प्राणायापूर्वी आपु और अन्य प्राणोंका वर्णन करनेसे समभेद यह पूर्वमी उपचारसे प्राणापुम्पूर्व कहता है कोटि खास इसके पर होते हैं ] १५ कियाविशाहपूर्व पद कापिकी आदि किसानों के वर्मनसे विशाल सका पक्ष्परिमाण भव कोटिका है] १४ लोकपिनुसारपूर्व [सर्वामर सभिपात मावि लग्थियो-विशेपशधियोंके कारण संसारमं बा अल्लोकमें पह मारके पिनकी वह सर्वोचम सार मता सोम इसको पिन पार करते हैं..कोटि सके पर ] उत्पापपूर्वके पशबद मौर चार पुति कामस्तु-मकरण कहे गये हैं, भमायणीयपूर्वक चौदह पख तथा पारसिका वस्तु-मन्पमिशेप की गये हैं, वीर्यवंक माठ बह और बाठ ठिकागत कहे मपे । भस्तिनास्तिवावपूर्वक भठाए बस व मश सिमाबत को मये ४५ धाममवारपूर्वक बारात गए सत्यमबार यो पक्ष भास्ममवारपूर्वक सोसारकर्ममवापपूर्वक तीव पख है,९प्रस्था पानवापपूर्वक वीस बल है १० विधानुमवारी पन्नाप-प्रन्यविशेष कहे ममे १९ भवम्म्पपूर्ण पाए त कहे गये, १२ मामाएम्पूर्वक तेरा पस्त क्रियाविशाखपूर्वक टीवपखकोमये हैं. १४ छोफबिनसारएसी पचीसपल को गये हैं। प्रत्येक वस्तमयक्षका गापासे वर्णन क्लिाते हैं- भयभमें परापत रितीयमें बापतीसोमें माठ मौर बापेमें अठाफ पाचवे पारा मौरममै दोबत है, साबमें सोकामाठयमे वीस नबमें बीस तभा पस भवमया-विधानुमबास्में पम्बा, एनायबम बारावल, बारा में तरह पन , फिर तेरह पूर्वम तीस मार बागायें पूमि पचीस बस। ॥८९-१०० माणिक बार पूर्वोको कमसे पार, बारह नाक और रा वस्तएं में शोप पूर्षकि मिया-पाक बत्त महीं हैं। पर पूर्वगतका बर्वन हमा। न्यायमस्वप पापपुणते ।

अनुयोगका परिचय - - मूल-से किं तं अणुओगे ? अणुओगे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-मूल- पढमाणुओगे, गंडियाणुओगे य । से किं तं मूलपटमाणुओगे ? मूलपढमाणुओगे णं अरहताणं भगवंताणं पुव्वभवा, देवलोग- गमणाई, आउँ, चवणाई, जम्मणाणि,अभिसेया,रायवरसिरीओ, पव्वज्जाओ, तवा य उग्गा, केवलनाणुप्पयाओ, तित्थपवत्त- णाणि य, सीसा, गणा, गणहरा, अज्जा, पवत्तिणीओ, संघस्स चउन्विहस्स जं च परिमाणं, जिणमणपज्जवओहिनाणी, सम्मत्तसुयनाणिणो य, वाई, अणुत्तरगई य, उत्तरवेडविणो य मुणिणो, जत्तिया सिद्धा, सिद्धिपहो जह देसिओ, जचिरं च कालं, पाओवगया जे जहिं जत्तियाई भत्ताइं (अणसणाए) छेइत्ता अंतगडे, मुणिवरुत्तमे तिमिरओघविप्पमुक्के, मुक्खसुह- मणुत्तरं च पत्ते, एवमन्ने य एवमाइभावा मूलपढमाणुओगे कहिया, से त्तं मूलपढमाणुओगे। छाया-अथ कः सोऽनुयोगः? अनुयोगो द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-मूल- प्रथमानुयोगः, गण्डिकानुयोगश्च, अथ कः स मूलप्रथमानुयोगः? मूलप्रथमानुयोगेऽहतां भगवतां पूर्वभवाः, देवलोकगमनानि, आयुः (यूपि ), च्यवनानि, जन्मानि, अभिषेकाः, राज्यवरश्रि- यः, प्रवज्याः, तपांसि चोग्राणि, केवलज्ञानोत्पादः, तीर्थप्रवर्तनानि च, शिप्याः, गणाः, गणधराः, आर्याः, प्रवर्त्तिन्यः, सङ्घस्य चतु- विधस्य यच्च परिमाणम् , जिनमनः पर्यवावधिज्ञानिनः, समस्त- श्रुतज्ञानिनश्च, वादिनः, अनुत्तरगतयश्च, उत्तरवैकुर्विणश्च मुनयः, यावन्तः सिद्धाः, सिद्धिपथो यथादेशितो यावच्चिरञ्च कालं पदापोपगताः, ये यत्र यावन्ति भक्तानि छित्त्वाऽन्तकृतो मुनिवरोत्तमास्तिमिरौघविप्रमुक्ता मोक्षसुखमनुत्तरञ्च प्राप्ताः, एवमन्ये चैवमादिभावा मूलप्रथमाऽनुयोगे कथिताः, स एप मूलप्रथमानुयोगः। १'अतगडा' इत्यादि आकारान्त. पाठ । २ ए एअ० समवाये।

१५२ भीमषम्पीयम् टीका-०-ममन्! वह मनुयोग किस प्रकार है। उ०-अनुयोन को मकारका कक्षा से-१मूहपथमामुपोग, भीरमणिकाहयोगामा-पाएक- मयमानुयोम क्या है। उ-मूम्मथमानुयोगमै भरिपन्त भगवम्तके सम्पाय पाक्षिके मवसे मेकर पूर्णमव देवलोक गमन वहाकी बायुमाशा देवमय वा उमसे पूर्वमयोंमें प्यधम तीर्थकररूपसे जन्म, अमिपेकनीयभागिहत जन्मा भिपेक तथा राज्यायिक प्रपान राम्यसमी, मनम्पा-सापुदीक्षा बोर राम- पोर तप, केवलज्ञानकी उत्पत्ति, और वीर्यकी प्रवृत्ति करना, उनके शिम्य, मण-गपा मणपद भाषि व प्रतिनियों, और पतविप संपनमो परिमाण है मिन-केयसी, ममन्पर्यवधानी भवधिशाभी, और सम्पह (समस्त) मुतझानी पादी-वादसपिसम्पन मुनि भीर अमुत्तरगतिवाझे फिर रचर पकिय करनेवाले मुमि, मितने सिद्ध हुए, तया जिसमकार सिरिमार्गका उपरेश किया और जितने लम्बे समयतक सिस्मिार्म अपातर पता जो सौ पारपोपगमन संपाप पारण किये व मितने भक भनशनसे कर पाने पिना माहारके बिताकर संसारका अन्त किये, अर्याद अतहत इप, भौर महानरूप तिमिर-अम्पकारके मवाहसे विप्रमुक मुनिमेष्ट जिसपकार सर्वोत्तम मोम सुखको माप्त किये पेसव और इस मकारके बम्प मी मो ऐसे भार सब मूड मयमानुयोग, की मये, पह मूल भयमामुयोम हुआ। मूछ-से कि त गरियाणुओगे' गछियाणुओगे फुलगरगंडियाओ, सिरथपरगरियामो, चक्कपहिर्गचियाओ, सारगडियामो, बलदेवर्गडियाओ, वासुदेवरियामो, गणधरगरियामो, मा पाहुगंडियामो, तपोकम्मगरियाओ, हरिवंसगरियाओ, उस्स- प्पिणीगनियाभो, मोसप्पिणीगरियामो, पितरगरियाओ, भमरनरतिरियनिरयगागमणविविक्षपरिपत्रणाणुभोगेस पषमा पामो गैडियाओ आपपिज्जेति, पण्णपिति, से गरिया णुभोगे, से मणभोगे ॥४॥ छापा-मपक स गसिकानुयोग ? गयिकानुयांगे कुलकरगशिका, तीर्थकरगरिका, चयगिणिका, दशारगडिका, बल- देवगण्डिका', पासवेषगडिका', गणधरगसिका', मन- वाहगणितका, सप कर्मगडिका, हरिवंशगण्डिका', उस पिणीगणिका', अवसर्पिणीगण्डिका', चिधान्तरगशिका, अमरमरतिनिरयगतिगमनविविधपरिवर्चनानुयोगेषु-एपमादि .

दृष्टिवादका उपसंहार " का गण्डिका आख्यायन्ते, प्रज्ञाप्यन्ते, स एप गण्डिकानुयोगः, स एपोऽनुयोगः। टीका-प्र०-देव ! वह गण्डिकानुयोग क्या है ? उ०-गण्डिकाके व्याख्यानमें कुलकरगण्डिका-जिनमें विमलवाहन आदि कुलकरोंके पूर्वभव व नाम आदिका विस्तृत वर्णन है, तीर्थङ्करगण्डिका, चक्रवर्तिगण्डिका, दशार- गण्डिका, बलदेवगण्डिका, वासुदेवगण्डिका, गणधरगण्डिका, भद्रबाहुगण्डिका, तपाकर्मगण्डिका, हरिवंशगण्डिका, उत्सप्पिणीगण्डिका, अवसप्पिणीगण्डिका, चित्रान्तरगण्डिका अर्थात् प्रथम व द्वितीय तीर्थङ्करके अन्तरकालके चित्र- अनेक अर्थको कहनेवाली गण्डिका, मनुष्य तिर्यग और निरयगतिमें गमनरूप अनेक परिवर्ती-भवभ्रमणोमे जीवोंका गमन, इत्यादि बहुतसी गण्डिकाएँ कही जाती है, विशेष रूपते दिखाई जाती है, यह हुआ गण्डिकानुयोग, इस प्रकार दोनों प्रकारका यह अनुयोग पूर्ण हुआ। मूल-से किं ते चूलियाओ ? चूलियाओ आइल्लाणं चउण्हं पुव्वाणं चूलिया, सेसाई पुब्बाइं अचूलियाई, से तं चूलियाओ। छाया-अथ कास्ताः-चूलिकाः ? चूलिका आदिमानां चतुण्णां पूर्वाणां चूलिकाः, शेपाणि पूर्वाण्यचूलिकानि, ता एताश्शूलिकाः । टीका-प्र०-देव दृष्टिवादका शिखररूप वह चूला(डा) किस प्रकार है ? उ०-चूलिका इसप्रकार है (परिकर्म आदि दृष्टिवादके चारों अङ्गोंमे कहे हुए तथा कुछ अनुक्त विषय चूलामे कहे गए हैं )-आदिके चार पूर्वोकी चूलाएँ हैं, शेष पूर्व विना चूलिकाके हैं, यह हुआ चूलारूप दृष्टिवाद । अब बारहवें दृष्टिवाद अङ्गका उपसंहार करते हैं- मूल-दिडिवायस्स णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ, संखेज्जाओ निज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, से णं अंगट्ठयाए बारसमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, चोद्दस पुव्वाइं, संखेज्जा वत्थू, संखेज्जा चूलवत्थू, संखेज्जा पाहुडा, संखेज्जा पाहुडपाहुडा, संखेज्जाओ पाहुडियाओ, संखेज्जाओ पाहुडपाहुडियाओ, संखेज्जाई पय- सहस्साइं पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता १ ऋषभदेव स्वामीके पशज सभी राजा मोक्ष या सर्वार्थसिद्ध विमानमें ही गये है, ऐसा इस गण्डिकामें वर्णन किया गया है। २० भीमबन्दीप पज्जवा, परिचा तसा, अणता थावरा, सासयकरनिबदनिकााया जिणपण्णता मावा आवधिजति, पण्णविज्जति, पविजेति, दसिर्जति, निर्देसिजति, उवदसिज्जति, से एवं आया, एवं नापा, एवं विण्णापा, पवं चरणकरणपळवणा आपविज्जति, से विद्विपाए १२ ॥ सू० ५६ ॥ छाया-ष्टिषाद(पात)स्य परीता पाचनाम, संस्पेयान्यनुयोगदाराणि, संख्येया वेढा (वृत्तय'), संख्येया श्लोकाः संस्येया प्रति- पत्तयः, संख्येया निर्युकया, संख्येया सण्या, सोमार्यतपा बादशमम्, एक भुतस्कन्ध, चतुर्दश पूर्वाणि, संस्पेयानि वस्तूनि, सस्येयानि यूलावस्तूनि, संस्पेयानि प्रामृतानि, संस्ये यानि मामृप्तमामृतानि, संरपेया माभूतिका', संस्पेया' पाभूत मामृतिका, संस्पेयानि पयसहस्राणि पदामेण, संख्येयान्पक्षराणि, अनन्ता गमा', अनन्ता' पर्यवा', परीतामसा', अनन्ता स्थापरा', शाम्चसकृतनिषद्धनिकाषिता जिनमज्ञप्ता मावा आरपायन्ते, प्रज्ञाप्पन्ते, परप्पन्ते, दय॑न्ते, नियन्ते, उप- पर्यन्ते, स एवमात्मा, एवं ज्ञाता, एवं विज्ञाता, एव परण फरणमरुपणाऽऽरयायते, स एप टिवाद १२॥ सू०५६ ॥ टीका-बारद सठियाद बाकी परिमित याचना है संतयेप भनुपीम- पार सम्पात वेर सम्यात ठोक, संख्यात मतिपति भीर नियुक्ति व संमहतो भी संसयात १६ भाकी पटिसे पद पारदयौ अ है एक तस्कम्प और श्रीपद पूर्य है. संग्येय यातया संस्पेय पम-छोटी मस्ती सेल्पात भामुख भीर मामतमापत मी सम्येय है, प्रातिका च मामतमापतिका में दोनों संस्पात, पापरिमाणसे परत्येप पासहन है और संसयात परिमित पस ए अनन्त स्थापर . धर्मनग्य आविशावत तथा प्रयोग आणि हत निबद देत मारिसे पिच भिमपणीत माय इसमें की जाते. मशापन भरूपणन निर्शन तपा ग्पामसे पिराप समाप्ताए जाते हैं। फस-टिपाएका पद पाठक ताप दा जाता है, स्मोक भायोंका पाप पाता पपेमेदी पिशाता बनता, मप्रकारपरणकरपकी इस प्रकपणा की जाती है, पद रहिमा पारदा मा पूर्ण हुभा ॥३.५.

- द्वादशागीके अन्तर्भूत विषय १५५ मूल-इच्चेइयंमि दुवालसंगे गणिपिडगे अणता भावा, अणता अभावा, अणता हेऊ, अणंता अहेऊ, अणंता कारणा, अणंता अकारणा, अणंता जीवा, अणंता अजीवा, अणंता भव- सिद्धिया, अणता अभवसिद्धिया, अणंता सिद्धा, अणंता आसिद्धा पण्णत्ता- ( संग्रहणी गाथा) ९२-भावमभावाहेऊ,-महेऊकारणमकारणे चेव । जीवाजीवाभवियम,-भविया सिद्धा असिद्धा य ॥१॥ छाया-इत्येतस्मिन् द्वादशाङ्गे गणिपिटकेऽनन्ता भावाः, अनन्ता अभावाः, अनन्ता हेतवः, अनन्ता अहेतवः, अनन्तानि कार- णानि, अनन्तान्यकारणानि, अनन्ता जीवाः, अनन्ता अजीवाः, अनन्ता भवसिद्धिकाः, अनन्ता अभवसिद्धिकाः, अनन्ताः सिद्धाः, अनन्ता असिद्धाः प्रज्ञप्ता:- ९२ ---भावाऽभावौ हेत्वहेतू कारणाऽकारणे चैव । जीवा अजीवा भविका अभविकाः सिद्धा असिद्धाश्च ॥१॥ टीका-इस प्रकार इस द्वादशाङ्गी गणिपिटकमें अनन्त जीवादि भाव और अनन्त हेतु और अनन्त अहेतु, अनन्त कारण, अनन्त अकारण, अनन्त जीव, अनन्त ही अजीव, अनन्त भवसिद्धिक तथा अनन्त अभवसिद्धिक, अनन्तसिद्ध व अनन्त असिद्ध-संसारी जीव कहे गये हैं । इसी बातको संग्रहणी गाथासे कहते हैं-भाव १ अभाव २, हेतु ३ व असद्धेतु ४, कारण ५ और अकारण ६, जीव ७, अजीव ८, भव्य ९, अभव्य १०, सिद्ध ११ और असिद्ध १२, ये सब अनन्त हैं। मूल-इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं तीए काले अणंता जीवा आणाए विराहित्ता चाउरतं संसारकंतारं अणुपरियहिसु, इच्चे- इयं दुवालसंगं गणिपिडगं पडुप्पण्णकाले परित्ता जीवा आणाए विराहित्ता चाउरंतं संसारकंतारं अणुपरियटृति, इच्चे- इयं दुवालसंगं गणिपिडगं अणागए काले अणंता जीवा आणाए विराहिता चाउरतं संसारकंतारं अणुपरियट्टिस्संति ।

भीमपन्दीसूत्रम् छाया-त्येतत् दावशाचं गणिपिटकमतीते कालेऽनन्ता जीवा आज्ञया विराध्य चतुरन्तं संसारकान्तारमनुपर्याटिपुः, इस्पेत शवशाहं गणिपिटकं प्रत्युत्पन्नकाले परीता-परिमिता जीवा आज्ञया विराम्य पतुरन्सं संसारकान्तारमनुपर्यटन्ति, इस्पेतन द्वादशाक गणिपिटकमनागते कालेऽनन्ता जीवा आशया विराध्य चक्षुरन्त संसारकान्तारमनुपर्यविम्यन्ति । टीका-अब प्रावशाहीकी विरापनाका काधिक फर करते हैं- मतकालमै अनन्त जीयोनि पूर्वोक्त इस शवशाही गणिफ्टिककी आमासे विरापमा कर चारों भोर चमतिरूप अन्तवाले संसारकाम्तारमें भ्रमण किया इसी प्रकार हादशाही इस मणिपिटकका आशासपसे मान करके (परिमित) संभ्यास भीव चार गविरूप संसारफास्तारमें वर्तमामकाहमें चार भगाते हैं, मविप्यकालमै भी इस पूर्वोकशाही गणिपिठककी बाहाको माकर अनन्त गीध चार गतिमप संसारफान्तारमें प्रमण करेंगे। मूल-श्य दुवालसंग गणिपिनगं सीए काले अर्णता जीवा आणाए आराहिता चाउरत संसारफतार पीईवासु । इचार्य दुवालसर्ग गणिपिसगं पप्पण्णकाले परिचा जीवा आणाए आपहिचा पाउरंत संसारफतारं धीवियति । इचाय दुवालसगं गणिपिडग अणागए काले अणता जीवा आणाए आराहिला चाउरंत संसारकतार पीईवरस्सति । छाया-इत्येतत् शवशागणिपिटकमतीत कालेऽनन्ता जीवा आश- याऽऽराज्य चतुरन्त ससारकान्तार व्यस्पवाजिपुर, इत्येत दादशा गणिपिटर्क प्रस्पुत्पत्रिकाले परीता जीवा आत याऽऽराज्य चतुरन्त संसारकान्तार व्यतिवन्ति, इत्येतद छावशाई गणिपिटकमनन्ता जीवा आशयाऽऽराध्य धतुरन्त ससारकान्तार व्यतिवजिम्पन्ति । टीका-भप वावशादीकी मापनाका फल कहते ई-मतकाहमें इस पापडी मणिपिटककी आज्ञासे आरापमा पालनकर मनम्त जीप पारगति रूप संसारकाम्सारको तिर गप, पर्तमामबाट परिमित-संध्येय जीव रस मादडीयणिपिटककी मापासे भारापना कर पारमसियालेसंसारकाम्तारको दिशाङ्गीका नित्यत्व १५७ पार कर जाते हैं। ऐसेही भविष्यकालमें इस द्वादशाही गणिपिटककी आज्ञानुसार आराधना करके अनन्त जीव चतुरन्त संसारकान्तारको पार कर जायेंगे। अव अर्थरूपसे इस द्वादशाङ्गीकी नित्यता दिखाते हैं- मूल-इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं न कयाइ नासी, न कयाइ न भवइ, न कधाइ न भविस्सइ, भुविंच, भवइ य, भविस्सइ य, धुवे, नियए, सासए, अक्खए, अव्वए, अवट्ठिए, निच्चे । से जहानामए पंच अत्थिकाया न कयाइ नासी, न कयाइ नत्थि, न कयाइ न भविस्सइ, भुविं च, भवइ य, भविस्सइ य, धुवे, नियए, सासए, अक्खए, अव्वए, अवट्ठिए, निच्चे, एवामेव दुवालसंगं गणिपिडगं न कयाइ नासी, न कयाइ नथि, न कयाइ न भविस्सइ, भुवं च, भवइ य,. भविस्सइ य, धुवे, नियए, सासए, अक्खए, अव्वए, अवट्ठिए, निच्चे । से समासओ चउविहे पण्णत्ते, तं जहा-दव्वओ, खित्तओ, कालओ, भावओ, तत्थ, दव्वओ णं सुयनाणी उव- उत्ते सव्वदन्वाइं जाणइ पासइ, खित्तओ णं सुयनाणी उवउत्ते सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ, कालओ णं सुयनाणी उवउत्ते सव्वं कालं जाणइ पासइ, भावओ णं सुयनाणी उवउत्ते सव्वं (ब्बे) भावं (वे) जाणइ पासइ ॥ सू ५७ ॥ छाया-इत्येतद् द्वादशाङ्ग गणिपिटकं न कदाचिन्नासीन् , न कदाचित् भवति, न कदाचिन्न भविष्यति, अभूञ्च, भवति च, भविष्यति च, ध्रुवं नियतं शाश्वतमक्षयमव्ययमवस्थितं नित्यम्, स यथा- नामकः पञ्चास्तिकायो न कदाचिन्नासीत्, न कदाचिन्नास्ति, न कदाचिन्न भविष्यति, अभूञ्च, भवति च, भविष्यति च, ध्रुवो नियतः शाश्वतोऽक्षयोऽन्ययोऽवस्थितो नित्यः, एवमेव द्वादशाङ्गं गणिपिटकं न कदाचिन्नासीत्, न कदाचिन्नास्ति, न कदाचिन्न भविष्यति, अभूञ्च, भवति च, भविष्यति च, ध्रुवं नियतं शाश्वत- मक्षयमव्ययमवस्थितं नित्यम्, तत्समासतश्चतुर्विधं प्रज्ञप्तम् । तद्यथा-द्रव्यतः, क्षेत्रतः, कालतो, भावतः, तत्र द्रव्यतः श्रुत- , ,

भीमबन्दीधाम
शानी उपयुक्तः सर्ववष्याणि जानाति पश्यति, क्षेत्रत' भुत
ज्ञानी-उपयुक्ता सर्व क्षेत्र जानाति पश्यप्ति, कालत अतमानी-
उपयुक्त सर्व काले जानाति पश्पति, भावत अवज्ञानी-उप-
पुक' सर्वान् भावान्-जानाति पश्यति ॥ सू० ५७ ॥
टीका-अव प्रापशाहीकी मित्यता दिखाते है-पूर्वोक पर प्राशाही
मणिपिटक कमी नहीं था ऐसा नहीं कमी नहीं है वैसा भी कोई समानी
तया कमी नहीं होमा पर मी नही, मतकासम या वर्तमानमें है मौर मरियम
भी रहेगा, पहनावशाही व निमत शाबत माय भम्पप-म्पयरहित, अब
स्थित तत्वापसे पकसा मतपय मिस्या है इसी बावको बाहरणसे समहास
जैसे-पयानामक संमाम्य नामवासे ] पांच मस्तिकाय कमी नहीं थे कमी
मही है पा कमी नहीं होंगे ऐसा कोई समय नहीं मिता, किन्तु मतकाहमें
थे पर्वमानमें है बार भविष्यमें होंगे गुप, नियत, मावत भमय, अम्पर भर
स्थित दया निस्प-समाकाम रहनेवाले इसी प्रकारापशादी मणिपिटक कमी
नहीं था पहनहीं कभीमही है और कभी नहीं होमा यह मीनही, किन्तु या
वर्षमानमें है और मयिम्पमें मी प्रेमा क्योकि सुष, मियत, शापत, अक्षण,
अम्पप अवस्थित होनेसे यह निस्प है। भवज्ञानका सामाम्पसपसे उपसंहार
करते-ह तहान संक्षेपसे चार प्रकारका कहा मया जैसे १ नम्बर क्षेत्र
कास और भावने, गन पारों प्रकामसे-मम्पसे मुहानी अपक-
उपयोमवाया सब पप्पोको जानता व देवता के क्षेबसे उपयुक भुतहामी
सप क्षेत्रके पायोको मानता पखता है, काठसे तमानी उपयुक होकर
सबकास पामे निकालपर्ती विपीको जानता व पेलवा भाषसे मुसमानी
उपयुक सब मायो-पायोंको जामता व रेलता है। 400
९१-मूल-गाहा
(अस्सरसनी सम्म, साइयं सलु सफजवासियं च ।
गमिर्य अंगपविट्ठ, सपदि पप सपरिवक्ता ॥१॥
९५--आगमसरपग्गहण, जं पुझिगुणेहि अहिं विलु।
रिति सुपनाणठंम, पुष्वपिसारया धीरा ॥२॥
१५--सुस्मुसहर परिपुच्छा२, सुणेद ३ गिहा य ईहए ५ यावि।
सचो अपोहए ६ था, वा पारेर ७ करेइ पा सम्म ८॥३॥
९६-भूअं कारं वा, पावकारं परिपुन्छ वीमसा।
ततो पसंगपारायणं व परिणि सक्षमए ॥ ४ ॥

श्रुतज्ञानका उपसंहार १५९ सुत्तत्थो खलु पढमो, बीओ निज्जुत्तिमीसिओ भणिओ। तइओ य निरवसेसो, एस विही होइ अणुओगे ॥५॥ से तं अंगपविट्ठ, से तं सुयनाणं, से तं परोक्खनाणं, [ से तं नाणं] से तं नदी। ॥ नंदी समत्ता॥ ९३-छाया अक्षरसंज्ञि सम्यक, सादिकं खलु सपर्यवसितं च । गमिकमङ्गप्रविष्टं, सप्ताऽप्येते सप्रतिपक्षाः ॥१॥ ९४-आगमशास्त्रग्रहणं, यद्बुद्धिगुणैरष्टभिदृष्टम् । बुवते श्रुतज्ञानलाभं, तत्पूर्वविशारदा धीराः ॥२॥ ९५-शुश्रूपते प्रतिपृच्छति, शृणोति गृह्णाति चेहते वाऽपि । ततोऽपोहते वा धारयति करोति वा सम्यक् ॥३॥ ९६-~मूकं, हुङ्कारं, वाढंकारं, प्रतिपृच्छां विमर्शम् । ततः प्रसङ्गापरायणं च परिनिष्ठा सप्तमके ॥४॥ ९७--सूत्रार्थः खलु प्रथमः, द्वितीयो नियुक्ति-मिश्रितो भणितः। तृतीयश्च निर वशेष एष विधिर्भवत्यनुयोगे ॥ ५॥ तदेतदङ्गप्रविष्टम् , तदेतच्छ्रुतज्ञानम्, तदेतत्परोक्षज्ञानम्, [तदेतज्ज्ञानम्] ॥ सा एषा नंदी समाप्ता ॥ टीका-श्रुतज्ञानका उपसंहार व शास्त्रकी समाप्ति-१ अक्षर २ संज्ञि ३ सम्यक् ४ सादिक और निश्चयसे ५ सपर्यवसित अन्तवाला ६ गमिक व ७ अङ्गप्रविष्ट, ये सातों प्रतिपक्षके साथ अर्थात् अक्षरश्रुत १ अनक्षरश्रुत २ संज्ञि३ व असंक्षिश्रुत ४ सम्यकश्रुत ५ तथा मिथ्याश्रुत ६ सादिक ७ व अना- दिकश्रुत ८ सपर्यवसितश्रुत ९ और अपर्यवसितश्रुत १० गमिकश्रुत ११ ऐसे अगमिकश्श्रुत १२ अङ्गप्रविष्ट श्रुत १३ व अनङ्गप्रविष्टश्रुत १४ इसप्रकार श्रुतज्ञानके १४ भेद होते हैं ॥९३ ॥ आगे कहे जानेवाले आठ बुद्धिगुणोंसे जो आगम मर्यादापूर्वक यथावस्थित अर्थोकी प्ररूपणा करनेवाले शास्त्रका महण देखा है, उसको पूर्वविशारद धीर-व्रतपालनमें स्थिर मुनि श्रुतज्ञानका लाम कहते हैं अर्थात् जिनप्रणीत वचनका अर्थपरिज्ञानही परमार्थसे श्रुतज्ञान है, अन्य

भीमचमीत्रम्
नहीं। अब पूर्वोक माठ पुचिगुणोंको कहते पाहे सुनना चाहता है फिर
शहरके स्पोको विनयसे पाता है, पूछनेपर मुरु जो कई उसे सावधान
मनसे सुनता है और पाण करता है। फिर उसपरभी विचार करता है।
तब विधार करनेके बाद सम्यक नियय करता है. फिर एपमें पारण
करता मोर सम्यक प्रकारसे माधरणमें लाatraामावरण मंत्र
क्षयोपशमके निमित्त होनेसे बन आठोंको मुण कहा है। अब शाम उनमेकी
विधि कहते हैं-मयम मूक-मेकी तरह रहके सने फिर हुंकार को पाने
स्वीकारभूचक मल्पफ पनि करे ९, वाइमें वारंकार-जी हाँ, वस्व मादि पासे
स्वीकार करे, कुछ पूछे। पिम-मिशासा करे ५, बार छठे भवण प्रसार
उत्तरगुणमसा में परायण होता है और सातवें प्रवपमे गुरुकीवरह परिसिमित
हो जाता (उपरोक गाथामें कई आचार्य सात बारमें मवणका अधिकार
पूर्ण करते है)। भव गुरुके म्याम्यान करनेकी विधि रिक्षावे -पाठे
पोम-म्याम्पान समार्य-मूस और मर्यरूपसे पूसरा भमुयोम नियुक्तिसहित
कहा गया है और तीसरा अनुयोग मसाममसार कपनसे मिरमशेष कहा
माता है, पह अनुमोम-म्पास्मान-पानमें विपि कही गई है, (न तीन अर्ग
पोमिसे किसी एमके पारवार विचार करनेसे सात प्रवण करवाये जाते
हैं। यह भषण भौर ममुपोगकी रीति साधारण पुनिया शिम्योंकी रहिसे
कही गई इति-यह मामविश्ववान र समस्त तहान पूर्ण हुआ साप
ही परोक्षज्ञान भी हो चुका, पर शानका वर्णम हुमा बौर मनीया भी
पूर्ण हुआ।
पूग्य मीहस्तिमानिनिमिव छापावागोपेतं
मीदेवरि मणिशमाममण विरचित
भीममम्मीसूर्य
समाप्तिममाव
मानन्दो मन्दन नन्दिनन्दी संमदपाषया ।
उपचारास्समाप्तास्वे, स्वार्थका सर्वदाऽऽसवाम् ॥१॥
मङ्गलाऽप्रामससर्गान्मास यन्मयामितम् ।
आपा वरममावेण, जगग्मेनं सुमङ्गसम् ॥२॥

प्रथम परिशिष्टम् । पारिभापिक और विशिष्ट शब्दोंपर टिप्पण। (१) अंगुल (पृ ३२ गा. ५७ )-अङ्गुलको अनुयोगद्वार सूत्रमें विभाग- निष्पल क्षेत्रप्रमाणमे आदिप्रमाण माना है। आत्मागुल, उच्छेदाद्गल और प्रमाणाहुल इस प्रकार वह अगुल प्रमाण तीन प्रकारका है, उनमंसे यहाँ उच्छेदाद्गुल समझना चाहिए । आठ जवमध्योंका एक उच्छेदाङ्गुलप्रमाण होता है। इसका खुलासा 'वालग्ग' नामक सातवे टिप्पणमे देखे । (२) आवलिया (पृ ३२ गा ५७)-असंख्यात समयाकी एक आवलिका होती हैं। एक श्वासोच्छासमें संख्यात आवलिकाएँ हो जाती हैं । (अनुयोग- द्वारसूत्र में कालानुपूर्वी देखिए) (३) गाउय (पृ ३२ गा ५८)-कौटिलीय अर्थशास्त्रमे 'गाउय' के अर्थ में 'गोरुता शब्द मिलता है, जैसे-'धनुस्सहस्रं गोरुतम्, चतुर्गोरुतं योजनम् ।। उपरोक्त श्लोकमें १००० धनुपका कोश माना है किन्तु वह मगधदेश-प्रसिद्ध है, शीरसेन देशमें दो हजार धनुपका क्रोश माना जाता था। इस विषयका वैजयन्ती कोशमें निम्न उल्लेख है- 'चतुर्हस्तो धनुर्दण्डो धनुर्धन्वन्तरं युगम् ।' धन्वन्तरसहस्त्र तु कोशो गव्या तु तद्वयम् । स्त्री-गन्यूतिश्च गव्यूतं गोरुतं गोमतं च तत् ॥ गन्यूतानि च चत्वारि योजनं कोशलादिपु । गन्यूतिद्वयमेव स्याद्योजनं मगधादिषु ॥ ६३ ॥" वैजयन्ती-देशाध्याय ४०। (४) जंवूद्दीव (पृ. ३२ गा० ५९) जम्बूद्वीप यह प्रमाण अगुलोंसे ४ लाख कोशके विस्तारवाला द्वीप है । इसके भरत आदि अनेक क्षेत्र विभाग है। (५) मनुष्यलोक (पृ ३२ गा ५९)--जितनी भूमिमें मनुष्य रहते हैं उसको मनुष्यलोक कहते हैं, इसमें जम्बूद्वीप, घातकीखण्ड व अर्द्धपुष्करद्वीप ऐसे ढाईद्वीप और दो समुद्र हैं। कुल ४५ लाख योजनके विस्तारका यह भूखण्ड है। (६.) ओसप्पिणी (पृ ३२ गा ६२)-जिस समयमें भूमि व धान्य आदिके वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श क्रमशः हीन होते जाते और मनुष्य एवं भीमबन्धीसूत्रम् विर्यम् प्राणिमोकी आयु व शरीरकी लम्बाई कम होती हो, तथा सामोंकी हीनता क्षेती जाय ऐसे कालको भवसर्पिणी कास कहते हैं उसके परमा- काठ, सकास, सुपमष्वम-पाठे मष्ठा किन्तु अम्तमें बुराम सपम-कमें कुछ भशुम फिर भषा 8, इम्पम-समधाम साधनबाठा, इम्पमदुप्पम-पूर्ण एम्स व प्रवमविका समय। ऐसे इस अवसर्पिणी कालक बिमाम होते हैं, मिनें आप भी करते हैं। यह भवसपिणीका १०कोडा फोरी सामरका होता है । वर्तमानमें पांचवें इप्पम समय । हजार वर्ष बीते हैं पर समय कुस २१ हजार मर्पका है। दे-मम्दीतूमकी टीका पा मम् दीप-प्राप्तिसूत्रका कालवर्णन । (७)पालम्म (३५ सू १४)-रयके पास पाहत होकर उसमेवाहा पूछि-कण रपरेण कहा जाता है, आठ रपरे से १ पाठाम होता है पासापसे भाठ गण मभिक १ डीस व बिसे माठ गुण भधिक पर पू(पूछ) होती है से माठगुण अधिक पक जबमम्प और माठ अपमम्प परिमाणका एक भास होता है। आसका एक पैर-सरपतह होता है, १५ भागेकी पक पितस्ति-वैत भौर २४ आडौंका पक रलिहाय, दो हायोंकी पर भी भीर चार हार्योंका पक पनुप पोहगार धनुप अर्यात् भाउ हजार हापोका पक कोश और चार कोशोका एक योजन होता है।(विशेष बामको सिये अमुपोमवारनमें क्षेत्रमापके शुलाधिकारको पेले) (८) रस्सप्पिणी (1१०स् १५) पहले को गप यासपिजी काडते विपरीव गम भावोंकी पनि करमेवाले कासको सर्पिणीकार करते हैं। इसके विमाोंमें क्रमश पदापों वर्ण रस, गन्ध, मयिकी उमति होती पाती है इसरिये इस कासको गपिणीकाम कहास कामामको भवसर्पिणी रहट समाः पह काम १० कोगकोडी सामरोपम परिमाणका विचम्कीप-प्राप्ति । (१) समुहिम मगुस्सा (१९१७)-मनुष्य मादि प्राणियों मसम्म वीपसे विमा मर्मक पैला होनेवासे मीयोंकी संपूर्फमम पा संमूछिम करते हैं, मनुम्पमाणमस २ब हेमा, सिवाण-माफका भक, ५वमन, ६ पित, शोणित-रक ए-राम, ९ वीर्य, १० सुतेप बीपी पुनलोंका फिर मीठा होना ११ मी-पुरुषका संपाम १५ शहरीकी बनी मासियो, १५ माकि कसेयर, तया १० सर्व अधिक स्थान, इम १४ स्वामि B८ मिन्नोंके भीतर संमूर्णिम मनुष्य जीवोंकी गस्पति होतीलका जीवनकाठमी भन्तमाका होता है (पच १पर)। (१०) सम्मममिय, मकम्ममूमिय, भैतरणीवम (१९स् १०) धर्म- भूमिम, भकर्मममिम मोर अन्तखीपम इस प्रकार मर्मज मनुमोक संतपत्ते पारिभापिक और विशिष्ट शब्दोंपर टिप्पण ३ तीन प्रकार होते हैं । जहाँ असि, मासि व कृपिरूप साधनोंसे जीविका चलती है और जहाँ राजा और धर्माचार्य आदि होते हैं, उसे कर्मभूमि कहते हैं। भरत, ऐरवत व महाविदेह ये तीन कर्मभूमि-क्षेत्र हैं। इनमें उत्पन्न होनेवाले मनुष्य कर्मभूमिज कहे जाते है । अकर्मभूमि-इससे उलट जहाँ कृपि, वाणिज्य या शास्त्र-जीवनकी वृत्ति नहीं हो, सभी पूर्ण स्वतन्त्र व कल्पवृक्षसे सुखमय जीवन बिताते हों, उसको अकर्मभूमि या भोगभूमि-क्षेत्र कहते है। देवकुरु १, उत्तरकुरु २, हरिवर्ष ३, रम्यवर्ष ४, हैमवत ५, हैरण्यवत ६, ये छ अकर्मभूमिक्षेत्र है। यहाँ जन्मनेवाले मनुष्य अकर्मभूमिज कहलाते है। अन्तरद्वीप-दोनों वाजू पानीसे घिरे हुए व जम्बूद्वीपसे सम्बन्धित भूमिप्रदेशको अन्तरद्वीप कहते हैं। चुल्लहिमवान और शिखरी पर्वतकी दो २ दाढाएँ लवणसमुद्रमे निकली हुई हैं, जो पूर्व-पश्चिम दोनों दिशाओं में हैं। उनपर ५६ अन्तरद्वीपके क्षेत्र हैं। यहां भी कृषि, वाणिज्य आदि कर्म नहीं होते हैं। फिर भी समुद्रवर्ती भूभागमें होनेसे इनको अकर्मभूमि नहीं कहके अन्तरद्वीप कहा है। यहां के मनुष्य अन्तरद्वीपज कहलाते हैं। (११) पज्जत्तग(पृ ४१ सू १७)-छ प्रकारकी पज्जत्ति-पर्याप्तिओंमेंसे अपने २ योग्य शक्तिको जिसने पूर्ण प्राप्त करलिया उसे पज्जत्त या पर्याप्त कहते है। आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा और मनःपर्याप्ति ये छह पर्या- प्तियाँ है। मनुष्यमें ये छहही पर्याप्तियाँ होती हैं, इन छह पर्याप्तिको पा लेने- पर मनुष्य पर्याप्त कहाता है। इनकी व्याख्या प्रथम कर्मग्रन्थकी ४९ वीं गाथाके अर्थमें देखे (१२) पलिओवम (पृ ४५ सू १८)-पल्योपम-उद्धारपल्य १, अद्धा. पल्य २ व क्षेत्रपल्य ३, इसप्रकार पल्योपमके तीन प्रकार हैं। सूक्ष्म और व्यावहारिक भेदसे प्रत्येकके दो दो प्रकार हैं । उद्धार पल्योपमसे द्वीप- समुद्रोंका पारमाण किया जाता है और क्षेत्रपल्योपमसे दृष्टिवादके द्रव्योंका परिमाण समझा जाता है। किन्तु कालमान व आयुमान अद्धापल्योपमसेही १ पर्याप्तिका स्वरूप-पर्याप्ति वह शक्ति है, जिसके द्वारा जीव आहार-श्वासोच्छ्वास आदिके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करता है और गृहीत पुद्गलोंको आहार-आदि-रूपमें परिणत करता है। ऐसी शक्ति जीवमें पुद्गलोंके उपचयसे वनती है। अर्थात् जिसप्रकार पेटके भीतरके भागमें वर्तमान पुदलोंमें एक तरहकी शक्ति होती है, जिससे कि खाया हुआ आहार भिन्न २ रूपमें बदल जाता है, इसीप्रकार जन्मस्थान प्राप्त जीवके द्वारा गृहीत पुद्गलोंसे ऐसी शक्ति बन जाती है, जो कि आहार आदि पुदलोंको खल-रस आदि रूपमें बदल देती है, वही शक्ति पर्याप्ति है । पर्याप्तिजनक पुदलों से कुछ तो ऐसे होते हैं, जो कि जन्मस्थानमें आए हुए जीवके द्वारा प्रथमसमयमें ही ग्रहण किये होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो पीछेसे प्रत्येक समयमें ग्रहण किये जाकर पूर्वगृहीत पुगलोंके ससर्गसे तद्रूप बने हुये होते हैं-चतु० कर्म० परिशिष्ट । ।

8 भीमवन्दीमणम् किया जाता है । उसका स्वरूप इस प्रकार है-पक भोजन सम्बा चौग परतमाही मारा तथा कुछ अधिक तीनगुण परिभिवाला एक मात्र है उसको एक पिन, दो दिन पावद उतम दिनों के पैदा हप बासस पासामोसे खूप कसकर भर देवें । पस्यको मरनेमें बालापोंको वना कसदेना चाहिए जिससे कि उसके पालाम अभिसे बहे नही, पानीले गले नहीं तथा वायुसे से नहीं व पक्रयातीकी पाणिनी सेनाले भी हो नहीं, इसप्रकार कसकर भरदेनेपर सौ सौ वर्षांसे एक एक वासाम निकाल जाय तप मितने समयमें यह सहा साठी होजाप अर्याद एक पर बाडात्र निकल जाप उसको व्यावहारिक अापस्योपम कहते हैं। जब व बाम मोंको प्रत्येक दिख नहीं पर इतने छोटे दुकरे-असंख्य ताण करणे पूर्ववत पस्प-महाको मरे और उससे एक एक सुकराको सी सी से निकाले पसे करनेपर मितने दिनों में वह पस्प भर्यात सहा बाली हो रस समयको सूम्म अवापस्प कहते हैं। कोगकोशी पस्यका एक सापरोपम का होता है, इसीसे पेष नारकोंकी आयुका माम होता है। ग्वारपस क्षेमपम्पमें प्रतिसमय पालामा भपहरण किया जाता है, शेष बनाती महार। (११) अर्णतरसिकेवसनार्म (1 ४१ ११)-शैलेशी-प्रबरपाके भम्तिम समपमें जो सिर हुए उनका फेवताहान अनन्तरसिरमाम है पूर्वमयसम्बन्धी उपाधिके मेदस सिर १५ प्रकारके होते हैं से- १ तीर्थसिर-पीतपग व सर्वत्र तीर्थ महाराज भणीत मारमा सहवीर्य कमाता है । उस तीर्थकी स्थापना हो जानेपर जो सिखाप तीर्थसिर होते हैं। २ मतीसिरपूर्योक ठीर्यकी स्थापना होनेसे पहले पातीपी विच्छेतुके समय बाप्तिस्मरण माविसे मोषीकी तरह मिल होनेगा मतीर्थ- सिर । धीयारसि-अपभ आदि तीर्थ होकर जो सिर हुए गर्न वीर्य स्सिटकात अतीसिर-जो सामान्य केवठीपरसे सिर परें। ५सपारसिर-गुरु आरके रपोशक पिना स्वयं दोष पावर सिर होनेवाले। भस्पेकबुसिद-करकण माविकी तरा पूपम मारि किसी पास बक्षके मि भत्तसे बोप पाकर सिर होनेवाले प्रत्येकासिर को जाते हैं। •पुरमोपितस्मिाचार्य मारिसे बोन पाकर भो सिरहुए। ८मीनिसिय-मोमीक शरीरसे सिर होते हैं। १पुलिसिद-पुरुपसिणसे जो सिर हुए हैं। १० नपुंसकलिखिर-मर्पसकके शरीरसे मो सिदइप हैं।

पारिभाषिक और विशिष्ट शब्दोंपर टिप्पण ११ स्वलिङ्गसिद्ध--रजोहरण मुखवस्त्रिकारूप जैनलिङ्ग(चिह्न)से सिद्ध होनेवाले। १२ अन्यलिङ्गसिद्ध-परिव्राजक आदिके लिङ्गसे सिद्ध होनेवाले। १३ गृहिलिङ्गसिद्ध-भावोंकी उच्चतासे-भावसाधुतासे गृहस्थवेशमें सिद्ध होनेवाले। १४ एकसिद्ध--एकसमयमें एकही सिद्ध होनेवाले। १५ अनेकसिद्ध-एकसमयमे अनेक सिद्ध होनेवाले। तीर्थसिद्ध व अतीर्थसिद्ध इन दो भेदोंमें सव सिद्धोंका समावेश हो जानेपर भी जो १५ भेद दिखाये गए हैं, वे विशेष बोधके लिये हैं। इन १५ सिद्धोंके आश्रयसे केवलज्ञान भी १५ प्रकारका है, जैसे-धर्मभेदसे धर्मीमे भेद होता है, वैसे धर्मीके भेदसे धर्ममें भी भेद होता है, जैसे-कुड्य, नभ व वृक्षपर बैठने उडनेवाले पक्षी। (१४) मिथ्याश्रुत (पृ १११ सू.४१)-जैन आचार्योंने विषय-कषायोंसे निवृत्त होकर निजात्ममावमें प्रवृत्ति करनेकोही उपादेय माना है । पुरुषार्थ चतुष्टयीमें भी 'धर्म प्रवरं वदन्ति के अनुसार मोक्षसाधक धर्मतत्त्वकोही वे पुरुषार्थ मानते हैं, और प्रधानतासे उस शुद्ध धर्मके प्रदर्शक शास्त्रकोही वे सम्यकश्रुत कहते हैं, देखें श्रुतका लक्षण-'जं सुच्चा पडिवज्जति तवं खंतिमहिंसयं' अर्थात् जिस शास्त्रको सुनकर श्रोता तप क्षति और अहिंसाको धारण करता हो उसे सम्यक्शास्त्र कहते हैं (उ ३ गा ८)। इस लक्षणके अनुसार कामशास्त्र, अर्थशास्त्र, शिल्पशास्त्र, भाषाशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, व इतिहास आदि शास्त्र व्यवहारज्ञानके पोषक और प्रधान- तासे प्रवृत्तिसाधक होनेसे मोक्ष मार्गसे विपरीत हैं, अतएव इन आदि' लौकिक शाखोंको यहां मिथ्याश्रुत कहा है । किसी विशिष्ट व्यक्तिको विशुद्ध दृष्टिके कारण इनशास्त्रोंसे भी सम्यक्ज्ञानकी प्राप्ति हो सकती है, उसके लिये ये सम्यक्श्रुत होते हैं। परिचय-इनमें भारत, महाभारत और रामायण व कौटिलीय अर्थशास्त्र प्रसिद्ध है, भीमासरोक्त १, शकट-भद्रिका २, घोटकमुख-वात्स्यायन 'नो पूर्वगामी कामशास्त्रनो रचनार' देखें-जैन साहि- त्यनो ('सक्षिप्त इतिहास' गु.) ३, कार्पासिक ४, नागसूक्ष्म ५, कनकसप्तति ६, त्रैरासिक ७, लोकायत ८, पुण्यदैवत ९, ये उपरोक्त ग्रन्थ अनुपलब्ध हैं, माठर-माठराचार्यकृत सांख्यकारिकाकी माठरवृत्ति जो वर्तमानमें उपलब्ध है, पुराण, व्याकरण, भागवत, पातञ्जल (योगसूत्र) और सामोपाङ्ग चार वेद ये वर्तमानमें उपलब्ध एवं प्रायः प्रसिद्ध हैं। (१५) उत्कालिक-श्रुत (पृ ११५ सू ४३)-नियत समयके अलावा भी जो पढे जावें उनको उत्कालिकश्रुत कहते है। भारत भीमचनीयम् पसवेमालिय१ रखवाश्य ५, रायपसेपायजीवामिममपानमा मपी ११, मपभोगवार १२, धरपण्मति १५ ये प्रत वर्तमानमें उपमा हैं।,18९, १० १५,१७, १८, १९, २१ २१, २१, २, २०, ये १० तपर्व माममें अमुफ्सम्परें । देवेन्द्रस्तव भावि शेप त उस नाम श प्रकीकॉम मिलते हैं। किन्तु उनकी मापा प रचना भारिसे मालम होता है कि भाषा योनि माचीम के माधारसे उन अन्योंका पिछेसे निर्माण किया हो लें- मरमसमापिकी प्रशस्ति- पर्य मरणविभर्ति भरणविसोहिं नाम गुणरयम् । मरण समाहिताय, संरणमय पउत्प११८९५॥ पंचम मत्तपरिण्या, छ? आठरपरचक्ता। सप्तम महपश्चामार्ण मम भाराषपाणी ॥ १६२ १८९.. इमामो भासपाओ भावार महियमि मेस भत्यामो। मरणविमती पप, वियनाम मरणसमाहिं ५६१ ॥ १८१८॥ पति सिरिमरणविमची पापणय संम। ८॥वि संडेखनाशतम्। सस्कासिक भुताकी सूची। पावकाहिक -मोश अभ्ययनोसे सामुकि भाचारोंको करने बाछा वह शाम मसिही है।।१॥ कस्प मीर अस्पका वर्णन करनेवाला साबकल्पाकल्प कहा जाता है। परमही मिसता ॥२॥ स्थविरकम्प मावि मोवाको कानेवासा अन्य सम्पपत कहा जाता है। पायो वएका है, एक सूत्र तया मर्यके परिमाणसे छोटा से उस कम्पमत करते हैं दूसरा सूमाकि परिमाणसे विशास से महायस्पटव कहते हैं। रामबाई, रायपसेणि भौर जीवाभिमम पे तीनों कमसे पहले तो व वीसरे उपा.५-1-20 माधापनासमें सीव नमीका ज्ञान कराया मया ॥८॥ महामाहापना-या स्मार्पाकी भपेसासे प्रथम महापनासे पाहै. प्रमाणाममापशाम-नसमें प्रमार मीर मप्रमारके मेष स्वप भीर फल पिसाप नए हैं.१०॥ मन्दी-पांच ज्ञानोको रामेबाठा शाम। ११. भनुपोमवार-नसमें उपक्रम, निक्षेप बादि म्यासपाक शारोंका वर्णन है। पिम्बस्तप-मेव देवेन्यकी स्खति, सम्पारिक-मर्म बीस्वभाव धारितसम्बन्धी वर्णन करनेवाला वश मकीकॉम इस नामका एक प्रकीर्मक उपसाप है।

पारिभाषिक और विशिष्ट शन्दोंपर टिप्पण ७ चन्द्रविद्या-चन्द्रसम्बन्धी ज्ञान करानेवाला ग्रन्थविशेष, यह वर्तमानमें अनुपलब्ध है ॥१४॥ सूर्यप्रज्ञप्ति-इसमें सूर्यकी गति आदिका वर्णन है ॥ १६ ॥ पौरुपीमण्डल-इसमें पुरुपके शरीर या शङ्खकी छायासे पौरुषीका ज्ञान कराया गया है, जैसे उत्तरायणके अन्त और दक्षिणायनके प्रारम्भमें केवल एक दिन शड्डू वगैरह किसी भी वस्तुकी अपने वरावर छाया हो, तव पौरुपी-प्रहर दिन समझना चाहिए । इसप्रकार प्रत्येक सूर्यमण्डलकी अपेक्षासे पौरुपीका वर्णन करनेवाला अध्ययन पौरुपीमण्डल है ॥१७॥ मण्डलप्रवेश-इसमें दक्षिण और उत्तरके मण्डलोंमें चन्द्रसूर्यके एक मण्डलसे दूसरे मण्डलमे प्रवेशका वर्णन किया गया है ॥१८॥ विद्याचरणविनिश्चय-इसमे सम्यग्ज्ञान और चरणके फलका निश्चय कहा गया है।॥ १९॥ गणिविद्या-ज्योतिष व निमित्तके विषयमें आचार्यकी विद्या-इसी नामसे यह प्रकीर्ण उपलब्ध है ॥२०॥ ध्यानविभक्ति- इसमें आर्त, रौद्र आदि ध्यानोंके विभाग व उनके स्वरू- पोका वर्णन है ॥ २१॥ मरणविभक्ति-इसमें अनुसमय आदि मरण विभागोंका वर्णन है ।। २२ ॥ आत्मविशुद्धि- इसमें आलोचना व प्रायश्चित्त आदि प्रकारसे जीवकी विशुद्धिका वर्णन है ॥ २३ ॥ वीतरागवत-इसमे वीतरागके स्वरूपका वर्णन है ॥२४॥ संलेखनाश्रुत- इसमें द्रव्यभावसे संलेखनाका वर्णन है ॥ २५ ॥ विहारकल्प- स्थविर आदि कल्पके विहारकी व्यवस्था करनेवाला ग्रन्थ ॥२६॥ चरणविधि-व्रत आदि चरणका वर्णन करनेवाला ग्रन्थ ।। २७॥ आतुरप्रत्याख्यान-महाप्रत्याख्यान-रोगिओंको प्रत्याख्यान करानेका विस्तारसे वर्णन करनेवाला तथा भवचरम प्रत्याख्यानका प्रतिपादन करने- वाला ग्रन्थ । ये सब प्रायः अनुपलब्ध हैं ॥ २८ ॥ कालिक श्रुतोंकी सूची। १ उत्तराध्ययन-सभी प्रकारके भावोंको ३६ अध्ययनोंमें वर्णन करने. वाला शास्त्र। २ दशाश्रुतस्कन्ध- इसमें १० अध्ययनोंसे २० असमाधिस्थानोंको लेकर ९निदानतकका वर्णन है। ३ कल्पं-बृहत्कल्पसूत्र । ४ व्यवहारसूत्र--इसमें साधुओंके आलोचनादि व्यवहारका वर्णन है।

- १० भीमबम्बीसूत्रम् १६मीप चिरसे अपमेही कारणोंसे उत्पम होकर नित्य राताहै। १४ भीष अपने मिमिससे इन्चासे उत्पध होकर भी मनित्य होता है। १५ मीन परकारणोंसे ईश्वरसे पनाया जाता भार निस्य है। १६ जीव वरसे परकारों को मिमित्त छेकर पनाया माता व अमित्व है। भास्मा- १०जीव स्पर्य आस्मरूपसे उत्पम होता और नित्य है। १८ जीव आस्मरूपसे स्वयं पैदा होकर भनित्य रहता है। १९ आस्मकपसे जीप दूसरेसे उत्पम होता व नित्य है। २० जीव दूसरेसे आत्मरूपमें उत्पन होता भीर अनित्य है। जीवके साप जैसे २० विकल्प हुए ऐसेही अगीव १ पुण्य २ पाप ! भामय 8 संवर ५ निर्जरा ६ बम और मोक्ष दान माठोंके २०-२० विकल्प होवे जो मिठामेसे सब १८० दो जाते हैं। ये कियावादीके १८० मकार हुए। र भक्रियावादी-कियायावीसे विपरीत-पकात जीव भादिका निषेप करनेवाले अक्रियावादी हैं इनके ८४ मे होते हैं, जैसे-पुण्यपाप आदिको छोडकर भीव अजीव आदि सात पपायोंको लिसकर उनके नीचे स्व-पर पे पो मेष रणना, फिर काल, याण, नियति, स्वमाय, घर और आस्मा इन को मी रसनसे ८० प्रकार हो जाते है, भले- १जीम स्थर्यकालसे नहीं है। २जीप परताकाससे नहीं है। जीव स्वर्य पापणसे नहीं है। ४सीय परता यापासे नहीं है। ५जीव नियतिसे स्वयं नहीं है। जीव नियतिका आभयपकर परसे नदी है। स्वभावसे जीव स्वयं नहीं है। ८स्वभाषसे भीव परतामही है। परसेवि स्वर्य मही है। १०बरसे जीव परता नदी है। १भारमठपसे जीप स्वये मदी। १५जीप मास्मतपसे परस नदी। जीयक साय जिस मकार १९ पिकस्प हुए इसी मकार मनीय भापित पापोंके साथ भी १९१९ विश्स्प होते है, तब मिसकर भकियायापकि ८४ प्रकार दाते। भशामयापी-अतामसही मार्पसिन्धि पादपाठे महामवारियो १० मेर जीव जारिनब पापोंक विषयमें राव मसद भादिसतमहोस संशय करमपर७ प्रकार दात से- पारिभाषिक और विशिष्ट शब्दोंपर टिप्पण -- १ जीव सत् है यह कौन जानता और यह जाननेसे क्या प्रयोजन २ जीव असत् है यह कौन जानता और इसके जाननेसे क्या मतलब ३ जीव सदसद्रूप है यह कौन जानता और इसके जाननेसे : लाभ है? ४ जीव अवक्तव्य है यह कौन जानता? अथवा इसके जाननेसे । प्रयोजन ? ५ जीव सत होकर अवक्तव्य है यह कौन जानता ? अथवा इसके नेसे क्या प्रयोजन है ? ६ जीव असत् अवक्तव्य है यह भी कौन जानता 1 अथवा इसके 5 नेसे क्या प्रयोजन है? ७ जीव सदसद् अवक्तव्य है यह भी कौन जानता है तथा इसके ज नेसे प्रयोजन भी क्या है ? जिस प्रकार जीवके साथ सप्तभंग हुए उसी प्रकार अजीव आ तत्वोंके भी सात २ भङ्ग होते हैं, वे सब मिलकर अज्ञानवादिओंके ६३ होते हैं, फिर- १ पदार्थोकी उत्पत्ति सती (वर्तमान) है यह कौन जानता' वा इ. जाननेसे क्या प्रयोजन है। २ पदार्थोकी उत्पत्ति असती है इसे भी कौन जानता ? अथवा जाननेसे क्या प्रयोजन है ? ३ पदार्थों की उत्पत्ति सदसती है यह भी कौन जानता? तथा इसके नेसे क्या प्रयोजन है ? ४ पदार्थोंकी उत्पति अवक्तव्य है यह भी कौन जानता ? व इसके नेसे भी क्या प्रयोजन है ? ६३ के साथ इन चारको मिला देनेसे अज्ञानवा ६७ भेद हो जाते हैं। ३ विनयवादी-विनयसे परलोककी सिद्धि माननेवाले वैनयिकवादीके मेद हैं, १ देव २ राजा ३ यति ४ ज्ञाति ५ वृद्ध ६ अधम ७ माता और ८ जि इन आठोंमे प्रत्येकके साथ मन वचन काय और दानसे चार प्रकारका दि किया जाता है, आठोंके चार २ भेद मिलानेसे सब विनयवादीके ३२ प्र हो जाते हैं। क्रियावादीके १८०, अकियावादीके ८४, अज्ञानवादके ६७ विनयवादीके ३२, इस प्रकार कुल मिलाकर ३६३ एकान्तवादिओंके प्र होते हैं । एकान्तवादी होनेसे ये मिथ्यादृष्टि कहाते हैं, इन्हीं बातोको स ग्दृष्टि नयष्टिसे अनेकान्तरूपमे मानते हैं। विशेष ज्ञानके लिए सूत्रकृता द्वादश समवसरण अध्ययन देखें । (१७) सीलन्वयगुण-वेरमण पच्चक्खाण पो० (पृ १३० सू १) मीमचन्दीसूमम् ५ मिशीय-इसमें सासाम्बियोंके इपित चारिमको भुर भरनेके सिये प्रायमियका पिपान है ये पांच शाम वर्तमानकालमें सपसम्म । महानिशीप-यहशाम निशीपनकी अपेक्षा मम्पपरिमाणमेपा है। मापिमापित- ८ समीपमाहाप्ति-समें क्षेत्र वकाठमेरसे मनीपके मावांका वर्णन है। दीपसागरमाधि-पहपन्य दीप भार सम्मोंका वर्णन करनेवासा है। १० चन्नमवाप्ति-पह शास चन्द्रकी मशहमति और नमत्रपरिवार भाविका वर्णन करता है। ११-१२ महिकाबिमामप्रविमति और मातीविमानमविमति पे पोनों प्रम्य भावलिकामवित व पुप्पावकीर्ण बिमानकि घिमागोंका वर्णन करते हैं। १३-१४ मासिका-आचारासादिकी पूसा, पर्यमा बोकी बिका। १५ म्याम्पाचूमिका-ममवतीमकी पूजा। १५ मरणोपपात-उपयोमपूर्वक मिसके पठनसे अहयोग पाएँ। १० रुपोपपात-सके सपयोगपूर्वक पठनसे बरुपयका भागमन १८ मरुगेपपात। १९परणोपपात। २० पैममणीपपात। २१ सम्परोपपाव। २१ देवेन्योपपात न पौष शास्त्रोंका भी उपयोगपूर्वक पठन करनेपर महामारिब वहम्मका भी आममम होता, उम शामाकी रचना इसी मकारकी नाकर्षकताबाठी थी। उपरोक्त कासिमभुमिसम्पाके प्रम्प रस मामसे ग्पसम्म किन्तु अपने मूखरूपमें नहीं, जो उमकी रचना भापिसे मालूम हो सकता है। २५ गस्थानमुत-कोभीप मुनि जिस गांव पा मगरके सिये संकल्पके साय उपयोमपूर्वक तीनबार पठन करें तो वह गांव पा मगर रोता हुमा माटते उठगाप। २४ समुत्पानमत-पेही मुनि जब प्रसन्न होकर सहस्पके साप उपयोग पूर्वक चीनपार समुस्थानधनका पाठ करें तो पह गाय पा नमर फिर बों आगाया नागपपिता-सको मब साधु उपयीमपूर्वक परते हैं तब सरस्पर पिना भी नागहमारऐव यहाँ विराममाम उन मनिओको जाम जाते तपा पमान करते हैंभीर पयोमनामुसार परसाम भी देते हैं। २५ मिरयावठिका-भरकायासोंका तपा भरकमामी जीपोंका पर्णन करमेवाहा।

पारिभाषिक और विशिष्ट शब्दोंपर टिप्पण ९ २७ कल्पिका-इसमे सौधर्म आदि कल्पका तथा देवलोक और उनमें जाने- वाले जीवोंका वर्णन है। २८ कल्पावतंसिका-इसमें सौधर्म ईशानके कल्पविमानोंमें उत्पन्न हुई देवियोंका वर्णन किया गया है । २९ पुष्पिता-संयमभावसे पुष्पित-सुखी आत्माओंका वर्णन करने- वाला शास्त्र। ३० पुष्पचूला-प्रस्तुत अर्थकी विशेषताका वर्णन करनेवाला शास्त्र । ३१ वृष्णिदशा-अन्धकवृष्णि राजाकी वक्तव्यताबोधक शास्त्र । ९ और ११ से २५ तककी संख्याके ग्रन्थ वर्तमानमें प्रायः अनुपलब्ध हैं। आसीविसभावना, दिट्ठीविसभावना, चारणभावना, सुवि(मि)णभावना, तेय- निसग्ग, कालिकश्रुतमे उपरोक्त नाम किसी किसी प्रतिमे मिलते हैं । व्यवहार- सूत्रके २० वे उद्देशकमें इनका उल्लेख मिलता है, इससे इनको मूलपाठमें मानना सद्गत दिखता है। ये सर्व श्रुत नियत समयमेही पढे जाते हैं, इसलिये कालिक कहाते हैं। (१६) तिण्हं तेसट्टाणं पासंडिय सयाणं पृ १२१ सू ४६-क्रियावादी आदि एकान्तवादी तीथिकोंके ३६३ भेद इस प्रकार होते हैं- १ क्रियावादी-जीव अजीव पुण्य पाप आदि हैं और क्रियाही आत्मसाधक इस प्रकार इनका एकान्त अस्तित्व माननेसे ये-क्रियावादी मिथ्याष्टि हैं, इनके १८० प्रकार मन्तव्य भेदसे होते हैं, जिसमे जीव आदि नवपदार्थ स्वपर दृष्टिसे नित्य व अनित्यरूपमें विचारे जाते हैं, काल स्वभाव आदि ५ विकल्पसे प्रत्येकका विचार करनेपर १८० होते हैं, जैसे- १ जीव स्वतः कालसे नित्य है। २ जीव स्वतः कालसे अनित्य है। ३ जीव परतः कालसे नित्य है। ४ जीव परतः कालसे अनित्य है। ५ जीव स्वयं चेतन स्वभावसे नित्य है। ६ जीव स्वतः होकर भी स्वभावसे अनित्य है। ७ जीव परतः होकर भी स्वभावसे नित्य है। ८ जीव परसे प्रकट होता और स्वभावसे अनित्य है। ९ जीव होनहारसे स्वयं हजारोंकी संख्यामें उत्पन्न होता है और नित्य रहता है। १० होनहारकोही लेकर जीव परतः उत्पन्न होता व नित्य रहता है। ११ होनेवाला हुआ तो जीव स्वयं उत्पन्न होकर भी अनित्य रहता है। १२ होनहारके कारणही जीव परतः उत्पन्न होकर अनित्य रहता है। ईश्वरसे भी चार विकल्प । 2 १० भीमचमीसूत्रम् ११मीप बरसे अपमेही कारोसे उत्पन होकर मिस्प रहता है। १४ जीव मपने निमित्तसे ईचरसे उत्पथ होकर भी अनित्व होता है। १५ जीव परकारणोंसे विरसे बनाया जाता और निस्प है। १५ नीव बिरसे परकारणोंको निमिच रेकर बनाया जाता व मनित्य है। आत्मा- २० भीष स्वर्य आस्मलपसे उत्पन होता और निस्प है। १८ जीव मारमापसे स्वयं पैदा होकर भनित्य रहता है। १९ आरमकपसे नीव दूसरेसे उत्पन होता व निस्म है। २० जीव दूसरेसे आस्मरूपमें उत्पन होता और अनित्य है। जीवके ताप जैसे २० विकल्प हुए ऐसेही अजीब १ पुण्य २ पाप । मासय ४ संवर ५ मिर्मरावबन्ध भऔर मोक्ष इन आठोंके २०५०बिकास्प होते हैं जो मिलानेसे सब १८० हो नाते हैं। मे कियावारीके १८० प्रकार हुए। २ अक्रियावादी-क्रियावादीसे विपरीत-पकान्त बीय आविका मिरेष करनेवासे अक्रियावादी हैं इनके ८४ भेद होते हैं, जैसे-पुण्यपाप बारिको छोटकर जीव भजीव आदि सात पदायाँको सिसकर उमके भीचे स्व-पर पे पो मेष रखना, फिर कास, पाणा, नियति स्वभाव, ईचर और आत्मा इन ६को नीचे रसनेसे ८० प्रकार हो जाते हैं, जैसे- १जीव स्वयंकासे मही है। २ जीव परतः कालसे नहीं है। जीव स्वर्य पाळासे नहीं है। ४ नीव परत याच्छासे महीहै। ५नीप नियतिसे स्वयं नहीं है। सीव नियतिका आमयमकर परसे नहीं है। कत्वमावसे ग्रीव स्वयं नहीं है। ८ स्वभावसे जीव परत नहीं है। १बरसे जीव स्वर्य नही। १०ईबरसे जीव परत नही है। ११ आरमरूपसे जीप स्वयं नहीं है। १५ जीव मास्मरूपसे परसे नहीं है। जीवके साथ जिस प्रकार १२ विकल्प हुए इसी प्रकार अजीव आदि पराया साप मी १९१२ विकल्प होते हैं, सब मिलकर मकिपावापर प्रकार होते है। भवानवादी-असामसेही कार्यसिरि चादनेवाले महामवादियों के ६० मेष है-जीव नादि मन परायोंके विषयमें सव असत आपिसप्तमहासे सपाय करनेपर १० प्रकार होते हैं, जैसे- पारिभाषिक और विशिष्ट शब्दोंपर टिप्पण - १ जीव सत् है यह कौन जानता' और यह जाननेसे क्या प्रयोजन ? २ जीव असत् है यह कौन जानता और इसके जाननेसे क्या मतलब है! ३ जीव सदसद्रूप है यह कौन जानता और इसके जाननेसे क्या लाभ है? ४ जीव अवक्तव्य है यह कौन जानता? अथवा इसके जाननेसे क्या प्रयोजन ? ५ जीव सत् होकर अवक्तव्य है यह कौन जानता ? अथवा इसके जान- नेसे क्या प्रयोजन है? ६ जीव असत अवक्तव्य है यह भी कौन जानता ? अथवा इसके जान- नेसे क्या प्रयोजन है? ७ जीव सदसद् अवक्तव्य है यह भी कौन जानता ? तथा इसके जान- नेसे प्रयोजन भी क्या है ? जिस प्रकार जीवके साथ सप्तभंग हुए उसी प्रकार अजीव आदि ८ तत्त्वोंके भी सात २ भङ्ग होते हैं, वे सब मिलकर अज्ञानवादिओंके ६३ भेद होते हैं, फिर- १ पदार्थों की उत्पत्ति सती (वर्तमान) है यह कौन जानता ? वा इसके जाननेसे क्या प्रयोजन है ? २ पदार्थों की उत्पत्ति असती है इसे भी कौन जानता' अथवा ऐसा जाननेसे क्या प्रयोजन है ? ३ पदार्थोंकी उत्पत्ति सदसती है यह भी कौन जानता ? तथा इसके जान- नेसे क्या प्रयोजन है? ४ पदार्थों की उत्पति अवक्तव्य है यह भी कौन जानता ? व इसके जान- नेसे भी क्या प्रयोजन है ? ६३ के साथ इन चारको मिला देनेसे अज्ञानवादीके ६७ भेद हो जाते हैं। विनयवादी-विनयसे परलोककी सिद्धि माननेवाले वैनयिकवादीके ३२ भेद हैं, १ देव २ राजा ३ यति ४ ज्ञाति ५ वृद्ध ६ अधम ७ माता और ८ पिता, इन आठोंमें प्रत्येकके साथ मन वचन काय और दानसे चार प्रकारका विनय किया जाता है, आठोंके चार २ भेद मिलानेसे सब विनयवादीके ३२ प्रकार हो जाते हैं। क्रियावादीके १८०, अक्रियावादीके ८४, अज्ञानवादीके ६७ और विनयवादीके ३२, इस प्रकार कुल मिलाकर ३६३ एकान्तवादिओंके प्रकार होते हैं । एकान्तवादी होनेसे ये मिथ्यादृष्टि कहाते हैं, इन्हीं बातोंको सम्य- रहष्टि नयदृष्टिसे अनेकान्तरूपमें मानते हैं। विशेष ज्ञानके लिए सूत्रकृताङ्गका द्वादश समवसरण अध्ययन देखे। १७) सीलब्बयगुण-वेरमण पच्चक्खाण पो० (पृ १३० सू १) शीलनत-अहिंसा, सत्य, अचौर्य, स्वदारसन्तोष व इच्छापरिमाण, नीमचन्दीसूत्रम् इन पांच अणुव्रतोंको शीसमत कहते हैं। गुणवत-विसमत मोमोपमोग-परिमाण भौर भनर्यदण्डविरमणात पे तीन गुणवत होते हैं। वेरमण-विरमण-क्रोप, माम लोम आदि सदोष (A) कापासे निवृत्ति करनेकपसायचयोमविरमण-सामायिक प्रत मादि विरमण कहते हैं। परवाण-ममोक्षारसी व पोरसी आदि नत मस्याम्मान कराते हैं। पोसदोषवास-पीपप याने अामी आदि पर्वदिमि माहार, शरीर सत्कार-वेशप्पा स्नान मावि तथा पम्मा व्यापार भादिका त्याग करना इसको पीपमोपवास करते हैं। (१८) परिमा (११०५ ५१)-अमिमहविशेषको या कायोत्सर्गको मतिमा करते हैं। अमिमहरूप उपासकोंकी ११ प्रतिमायें हैं जैसे- १पर्शन-प्रतिमा-समें निर्योप सम्परुततकी आरापना की जाती है। २ व्रतमतिमा-समें उपासोक १२ मतोंकी मिर्पोप भाराभमा की जाती है। सामायिक-प्रतिमानसमें दोनों सम्या सामायिक की माती है। पीपभमतिमा-समें पर्वतिपिर्म उपवास किया जाता है। ५ प्रतिक्षा-पांच प्रतिवाओंके साप पक रात्रिको कायोत्सर्म करना। अनमत्याग-प्रतिमा-पूर्ण ब्रह्मचर्य प रानिमोजनका स्याम करना। सचित्सत्याग-पतिमा-पसमें सजीव-सचित्त बनस्पति पकाचा पामी आपि आहारका स्याम करना । भारम्भस्याम-प्रतिमा-स्वपं भारम्म फरमेका स्याम करना। १ मेपारम्मत्याग-प्रतिमा-सेवक मापिसेमी भारम्भ नहीं कराना। १० रविष्टस्याम-प्रतिमा-भपने लिये भारम्मपूर्वक की हुई वस्तुको भी मदी सेमा। ११ भमणभूत-प्रतिमा-साकी सरह विशेप नियमसे राना। (विशेष समझके लिये रेसिप-उपाण्यायमी महाराम सम्पादित पशाभूतस्कम्पका सम्पयन, अपवा उपासकरशााके प्रयमाम्ययनकी टीका) (५) गसणकाए धीर समसणकास (२०४३ से ५५)- किसी भी शासका शिक्षम छना हो तो गुरुकी भाषा प्राप्त करके सना ऐसा शास्त्रीय नियम है। रसके अनुसार जब कोई शिप्प गुरुसे पूछता है कि मदापमा म कौनसा सूप पर तब आचाण अपचा 'माता' पर पेसी गुरुकी सामाम्प भाताको देश करते हैं तथा आचाराके मपम भुतस्कम्भक प्रथम मध्यपनको पर इस प्रकारकी विशेप माझाको समुपेक्षा कहते हैं। पूर्वसमपमें गुरुजम अपमे शिप्योको कण्ठान दी शाखकी पाचमापि रते थे। इससिपे भयपन आदि सिमामके अनुसार उन्होंने नियत पिनाम पारिभापिक और विशिष्ट शब्दोंपर टिप्पण सूत्रार्थ-प्रदानकी व्यवस्था निर्माण की, जिसको उद्देशनकाल व समुद्देशनकाल कहते हैं। मौखिक शिक्षणकी समाप्तिके लगभगही यह प्रथा बंद हो गई हो ऐसा प्रतीत होता है, अतएव भगवती तथा उपाद्गशास्त्रोंके उद्देशनकालका उल्लेख नहीं मिलता। अग, श्रुतस्कन्ध, अध्ययन और उद्देशकका एकही उद्देशनकाल है, आचाराङ्गके ८५ उद्देशनकाल हैं। जो इस प्रकार कहे गए हैं-१ शास्त्रपरिक्षा अध्ययनके ७ उद्देशन, २ लोकविजयके ६ उद्देशनकाल, ३ शीतोष्णीयके ४ उद्देशनकाल, ४ सम्यक्त्व अध्ययनके ४ उद्देशनकाल, ५ लोकसार अध्य- यनके ६ उद्देशनकाल, ६ श्रुत अध्ययनके ५ उद्देशनकाल, ७ विमोह अध्ययन के ८ उद्देशनकाल, ८ महापरिज्ञा अध्ययनके ७ उद्देशनकाल, ९ उपधानश्रुत अध्ययनके ४ उद्देशनकाल, १० पिण्डैपणा अध्ययनके ११ उद्देशनकाल, ११ शय्या अध्ययनके ३ उद्देशनकाल, १२ ईर्ष्या अध्ययनके ३ उद्देशनकाल, १३ भाषाजात अध्ययनके २ उद्देशनकाल, १४ वस्त्रैपणा अध्ययनके २ उद्देशन- काल, १५ पात्रैपणा अध्ययनके २ उद्देशनकाल, १६ अवग्रह प्रतिमा अध्ययनके २ उद्देशनकाल,१७-२३ इन सात अध्ययनोंके ७ उद्देशनकाल, २४ भावना अध्य- यनका १ उद्देशनकाल, और २५ विमुक्ति अध्ययनका १ उद्देशनकाल, इस प्रकार सब मिलकर ८५ उद्देशन काल होते हैं, ऐसेही समुद्देशनकाल भीसमझे । सूत्रकृताद्गाके ३३ उद्देशनकाल होते हैं-" जैसे प्रथम अध्ययनमे ४ उद्दे- शनकाल, २ य अध्ययनमें ३ उद्देशनकाल, तीसरे अध्ययनमे ४ उद्देशनकाल, चतुर्थ अध्ययनमे २ उद्देशनकाल, पञ्चम अध्ययनमें २ उद्देशनकाल, और शेष ११ अध्ययनोंमें प्रत्येकका एक एक उद्देशनकाल, इस प्रकार प्रथम श्रुत स्कन्धके २६ उद्देशन काल होते हैं। द्वितीय श्रुतस्कन्धके ७ अध्ययनोंके ७ उद्देशनकाल हैं, इसप्रकार कुल मिलाकर ३३ उद्देशनकाल होते हैं। स्थानाङ्गके २१ उद्देशनकाल होते हैं, वे इस प्रकार हैं-दूसरे, तीसरे व चौथे अध्ययनके ४-४ उद्देशनकाल हैं, पञ्चम अध्ययनके ३ उद्देशनकाल, वाकी ६ अध्ययनों में प्रत्येकका एक एक उद्देशनकाल, इस प्रकार सब २१ एकवीस उद्देशनकाल होते हैं। ४ समवायाङ्गका एकही उद्देशनकाल कहा गया है। ५ व्याख्याप्रज्ञप्ति-भगवतीके उद्देशनकालका निर्देश मूलमें नहीं किया है। ६ ज्ञाताधर्मकथाके २९ एकोनतीस उद्देशनकाल व समुद्देशनकाल होते हैं जैसे प्रथमश्रुत स्कन्धके १९ अध्ययनों में १९ उद्देशनकाल और दूसरे श्रुत- स्कन्धके १० अध्ययनोंमें १० उद्देशनकाल, ऐसे २९ उनतीस उद्देशनकाल हो जाते हैं। ७-८ उपासकदशान और अन्तकृदशाशके ( अध्ययन व वर्गके अनु- सारही क्रमशः १० और ८ उद्देशनकाल होते है।

१४ भीमवन्दीसूत्रम् ९मनुचरीपपातिकके मी ३ उदेशनकाठ और । समुदेशनकाल हैं। १० मसपाकरणके ४५ उदेशमकाछ व समरेशनकाठ को मप हैं। फिन्त समवाया के प्रतिकार मी ममयदेवमूरि १० बापरिचयकी पत्ति लिखते हैं कि मो भी अम्पयन १० होनेसे उदेशनकाल मी पशही होते हैं, फिर भी पापमान्तरकी भपेसासे १५ संख्याका सम्भव होता है। ११ विपाकभुतके-कोनों मृतस्करपके २० ओशनकाल और २० समुदेशम काल है। (२०) परिकम्म (१ ११ १.५१) परिकर्म-योग्यता उत्पा करमा, से गणितशाममें सासन मावि सोसा परिकोको समझनेवाला बाकीके मणितशास्त्रको ग्रहण करनयोग्य होता है, वैसे विषक्षित परिकर्मणके अर्थको पदण किया हया मनुष्य लियावके अन्पश्तको महण करनेयोग्य होता है भन्यथा नहीं।सीलिये परिकम्म(कमीको पप्टिवायके प्रथम मकारमें कहा है। (२१) भामीपिय (पठ ११०/- यहां मामीयिय शपसे मोशाहबका आजीविकमत छिया जाता है। वीरनिवाणसेघर्ष पूर्व मसालिपुत्र गोशालकमे महावीरसे भलम होकर इस मतकी स्थापना की थी। भगवान महावीरका द्वितीय चातुर्मास मा रामगृहीके मागदापामै था, उसी समय मोशासकने रमको गुरुतरीके स्वीकार किये और वर्पतक प्रणीत भूमिमं उनके साय पा। किसी समय सिद्धार्यमामते र्मयाम जाते हुए उसने महावीरसे तिलके पक्ष के फलके पाबत प्राप्त किया उसपर प्रमुने उत्तर दिया कि यह तिलका पुस फलेगा और इन मौके जीव मरके तिसके सात मीयरूपसे उत्पमोंगे। मोशाहकमे प्रभुकी पात मूठी करने के लिये धीरेसे पीछे माकर उस मासको उसे फेंका। फिर भी कुछ समयके वार या झार दिग्यप्ति आदि संयोमसे रुप मया मब पीछे आते हुए गोशालकमे उस तिसके सादको फसा हुषा रेखा तप महावीरकी सस्पताके साथ उसको पद मियप हुया कि सब मीय मिसयाचे प्रवच-परिकारी है मनुम्य कितना भी प्रयत्न करे फिन्ट मासिर पदी होता है जो निपत-दोना-योता है। इसमकार परिवर्तयार तथा मिपतिवारको सेकर पद भीमदाषीरसे असम दुपा। और साम, अलाम, सत इस जीयन और मरण हम बातोंकी जमताम मतपमा करने लगा। भवानिमित्त दिवाकर मीविका पसामेसे इसको मामीयिक करते है, भागीरिक सम्मायकी मुग्य मान्यताएँ निम्न प्रकार है-समी मीय सभित्तादारी है इसलिपे पदनम ऐन उम्पन, पिटम्पन, प उपमय दिनाशाम ग्यिाभोको करके भावार करते हैं। भाजी विकोपासकोंक भरिहन्त (गागासक) ऐप है। पर्म-माता-पिताकी भकि करमा, और राबरके फल पटके फड योर सतरके फष्ठ, य पिम्पसके फस नफोका पर्मन करना, पर्व-काना (प्याम ), ससप्प तया कम्पमूलको पारिभाषिक और विशिष्ट शब्दोंपर टिप्पण १५ - नहीं खाना तथा विना खसी किये व विना नाक वींधे हुए बैलोंसे त्रस जीवोंकी जिसमें हिंसा न हो ऐसे व्यापारके द्वारा आजीविका चलाना धर्म है इत्यादि। विशेष जाननेके लिये देखें--भगवतीसूत्र श० १५ तथा श०८ उ० ५। (२२) तेरासिय (पृ ११०) [अ] टीकाकारने आजीविक सम्प्रदायकोही तेरासिय-त्रैराशिक माना है, रोहगुप्तसे प्रचलित 'त्रैराशिक' सम्प्रादायका इन्होंने उल्लेख नहीं किया है। [व] वीर निर्वाण ५४४ मे रोहगुप्तसे त्रैराशिक मतकी स्थापना हुई। उसने अंतरंजिका नगरीमें 'पोदृशाल' नामक एक परिव्राजकके साथ विवाद किया, जिस समय परिव्राजकने जीव और अजीव इस प्रकार संसारमें दोही राशि हैं ऐसा पूर्वपक्ष रक्खा। उस समय श्रीगुप्तके शिष्य रोहगुप्तने कहा- पहीं, तीन राशि हैं, जैसे-जीव, अजीव, नोजीव ३, शुभ, अशुभ, शुभाशुभ ३ आदि। परिव्राजकको वाग्बल और विद्याबलसे जीतकर रोहगुप्त जब गुरुके पास आया और गुरुको सब हाल कह सुनाया तब गुरु बोले कि रोहगुप्त तुमने तीन राशिकी स्थापना की यह शास्त्रविरुद्ध है, अतः इसका सभामें जाकर पीछा स्पष्टीकरण करो। रोहगुप्तने इसको नहीं सुना। गुरुजीने ६ मासतक राजाके समक्ष शास्त्रार्थ करके आखिर रोहगुप्तको पराजित किया। उसने भी अपना हठ न छोडकर त्रैराशिक' मतकी स्थापना की। विशेषावश्यकमे इसको 'षडलूक ' और 'वैशेषिक ' दर्शनके नामसे भी कहा है। यह द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय, ऐसे ६ पदार्थोको मानता है-देखें-विशेषा- वश्यक भाष्य या आवश्यककी बृहद्वृत्ति । . १ आजीवियोवासगा अरिहत देवतागा, अम्मा-पिक सुस्सूसगा, पच फलपडिता, तंजहा- उंबरेहि, वडेहिं, वोरेहिं, सतरेहिं, पिलक्खूहिं, पलडू-ल्हसुणकदमूलविवज्जगा, अणिलछिएहिं अणकभिन्नेहिं गोणेहिं तसपाणविवज्जिएहिं वित्तेहिं वितिं कप्पेमाणा विहरति भग० श० ८ उ० ५ सू० १०॥

द्वितीय परिशिष्टम् । समवायाङ्गस्थो बादशाझ्याः परिचय । + १५-से कि मापारे । मापारे 4 भापारमोपरसिमकोणापट्टाणममण कमणपमापजोममुजणमासासमितिगुत्तीवेजोवहिमत्चपापडग्यम उप्पापणपसपाविसोहिमवानग्गहाणवपणियमतयोवापसप्प- सत्यमादिजा से समासमो (नार) विरिपापारे, मापारस्स (जार) संसेम्मा भणु संग्नामो पी सकेग्ला बेग संसग्मा सि संग्णामो न (जाय) महारस पइसस (पाप) सासपा का निबदा निकाया (जार) पम्परिम्मति सिरजति मिसिग्मति उदसिम्नति, से च मापारे में m-से कि सूभगो! मगो ससमपा सम्मति (गाय) जीवाणीषा ए मिति स्मैगो पम्मति (जाप)ोगारगो मारगति, समगोन जीवाजीव पुण्मपावासपर्ववनिम्मरणबंधमोक्यावसामा पयत्या पति, समणार्ण भचिरकासपस्वायाण इसमयमोहमोहमम्मोहिमा सपहसायसाजधुरिपरिणामसमरपार्ण पावकरमलिनमगुणविसो. हणस्य मतीमत्त भरिपालाइपसपस्स (जाप) तिन पटाप मण्मदिन परमाण पूरा ससमए ठारिम्नति पाणापितवयणपिस्सार छु परिसयंता विविहवित्यराष्ट्रगमपरमसम्भावगुप्पविसिट्टा मोक्त पहोयारमा बारा मण्यातमधफाएग्रोस पीवपूमा सोषाणा व सिद्धिसमागिहुप्तमस्स मिक्सोमनिप्पकंपा सत्तस्था, सूपगास में परिचा (जार)पपमोर्ण प ससम्मा अक्सरा मर्णता पमा भयंता परमा परिचा (जार) परणकरणपरपणपा नापरिम्नति, से एमगो प्र.. re-affठाने हाले जनसमपा टापिग्मवि (जार)होगामेगा पिग्मति गले सम्पगुणसेत्तकासपग्ममपयस्या- सेहा ससिछा प समुदा मरमयण विमाण भामर पपीमो। मिदिओ पुरिसरणापा सरा प गोत्ता पमोसंपाठा १० एकयिहपत्तम्पर्य इविद माय इसविदयत्तावर्य नाम पोम्पमाप । मोगह परसपा भापपिग्मति सामरस + परित्ता पापमा (जार) ससेग्मामो सगानीमा, से मे भंगट्टपार र मंगे एमे सुपाचे व भगापमा रोस पोसामा मापार समत्त साई पर प (माल) से संसाराप्र५.

श्रीमनन्दीसूत्रम् २ न० सू०१९-से कि तं समवाए १ समवाए ण ससमया (जाव ) लोगालोगा सूइज्जति, समवाएण एकाइयाण एगट्ठाणं एगुत्तरियपरिवुड्डीए टुवालसगस्स य गणिपिडगस्स पल्लवग्गे समणुगाइज्जइ ठाणगसयस्स बारसविहवित्थरस्स सुयणाणस्स जगजीवहियस्स भगवओ समासेणं समोयारे आहिज्जति, तत्थ य णाणाविहप्पगारा जीवाजीवा य वणिया वित्थरेण अवरे वि अ बहुविहा विसेसा नरगतिरियमणुअसुरगणाणं आहारुस्सासलेसा- आवाससंखआययप्पमाणउववायचवणउग्गहणोवहिवेयणविहाण- उवओगजोगइंदियकसायविविहा य जीवजोणी विक्खंभुस्सेह- परिरयप्पमाणं विहिविसेसा य मंदरादीणं महीधराणं कुलगरतित्थ- गरगणहराणं सम्मत्तभरहाहिवाण चक्कीणं चेव चक्कहरहलहराण य वासाण य निगमा य समाए एए अण्णे य एवमाइ एत्थ वित्थरेणं अत्था समाहिज्जति, समवायस्स ण परित्ता वायणा जाप से णं अगट्ठयाए चउत्थे अगे एगे अज्झयणे एगे मुयक्खधे एगे उद्देसणकाले एगे चउयाले पदसहस्से पदग्गेण प० सखेज्जाणि अक्सराणि जाव चरणकरणपरूवणया आघविज्जति, से त्त समवाए ॥ सूत्र १३९ ॥ न० सू० ५०-से किं तं वियाहे ! वियाहे ण ससमया (जाव ) जीवाजीवा विआहिज्जति (जाव) लोगालोगे विआहिज्जति, वियाहे णं नाणाविहसुरनरिंदरायरि- सिविविहसंसइअपुच्छियाणं जिणेणं वित्थरेण भासियाणं व्व- गुणखत्तकालपज्जवपदेसपरिणामजहच्छिट्ठियभावअणुगमनिक्खेव- णयप्पमाणसुनिउणोवक्कमविविहप्पकारपगडपयासियाणं लोगा- लोगपयासियाणं संसारसमुद्दरुंदउत्तरणसमत्थाणं सुरवइसंपूजि- याणं भवियजणपयहिययाभिनंदियाणं तमरयविद्धंसणाणं सुदिदी- वभूयईहामतिबुद्धिवद्धणाणं छत्तीससहस्समणूणयाणं वागरणाणं दसणाओ सुयत्थबहुविहप्पगारा सीसहियत्था य गुणमहत्या, वियाहस्स ण परित्ता वायणा (जाव ) निज्जुत्तीओ, से ण अगट्ठयाए पंचमे अगे एगे सुयफ्सघे एगे साइरेगे अज्झयणसते दस उद्देसगसहस्साइ दस समु- द्वेसगसहस्साई छत्तीस वागरणसहस्साई चउरासीई पयसहस्साइ पयग्गेण पण्णत्ता ( जाव ) से तं वियाहे ॥ सूत्र १४० ॥ न • सू० ५१-से कि त णायाधम्मकहाओ णायाधम्मकहासु ण (जाव) अतकिरियाओ २२ य आघविज्जति जाव नायाधम्मकहासु णं पव्वल्याणं विणयकरणीजण- सामिसासणवरे संजमपईण्णपालणधिइमइववसायदुब्बलाणं १ तव- नियमतवोवहाणरणदुद्धरभरभग्गयीणस्सहयणिसिट्ठाणं २ घोरपरि- सहपराजियाणं सहपारद्धरुद्धसिद्धालयमग्गनिग्गयाणं ३ विसय- सुहतुच्छआसावसदोसमुच्छियाणं ४ विराहियचरित्तनाणदसणजह गुणविविहप्पयारनिस्सारसुन्नायणं ५ संसारअपारदुक्खदुग्गइभव- विविहपरंपरापवंचा ६ धीराण य जियपरिसहकसायसेण्णधिध. 3 समयायास्यो द्वादशामा परिषयः णियसंगमउपयाहनिप्रियाणेमाहिपनामदेसणचरितमोग निस्सतससियालयमग्गममिमुगाणं सरमवणविमाणसम्सा अयोवमा मुसूण चिरं च भोगमोमाणि ताणि विश्वाणि मपरिहाणि ततो य फालकमपुयाण जए य पुणो छरसिदिमग्गा भवकिरिया चठियाण य सवेपमाणुस्सधीरकरणकारणाणि बोभपासास पाणि गुणोसपरिसपाणि रिहते पछये पसोऊण झोगमणिणो माइट्ठियसासणम्मि जरमरणमासणकरे भारादिमसममा प सर खोगपडिमियमचा भोवेन्ति मह सासर्य सिर्ष सम्वास्थमोप पए अण्णे य पवमाइमस्या विरपरण य, मापापमान में परिचा पापमा सेवा भनुमोगरा जाल संग्गामो संगाजीमो, से मंगापार गेमगे वो कुमासमा एगणी मरमपणा ते समासभो पुविधा पण्यसा तं जमा-परिसा पकप्पिया प, बस धम्मकाण बम्गा, पाम में रपमेपार पामामए (जार) अहामो अक्साश्यासोडीमो मातीनि मसापामो, एलता उसगकाला एणतासे समुदसणाम संसेग्गाई पपतास्सम पपमोर्ण पग्मचा (जात) से पापामनाममो । mn * ५१-से तिमासगदसायो। सपासपदसामु पासवाण (जास) मसमेफ- परस्योपनिरिसेमा उवासया पीलमपरेरमगमुणपरपसालपोतमेपास परिपवणवामी (पाप ) भापरिग्मति पासमरसार रवासया रिशिवितेसा परिसा वित्थरपम्मसवमाणि बोडियाम अमिमम सम्मत्त विसरया पिरतं मूगुणउत्तरगुणाइयारा निविसेसा प पहुविसेसा परिमामिग्महग्याणपासणा वसग्गारियासणा पिका सम्मा पतबा प विचित्ता सीठम्वयगुणवरमणपसाणपोसहो बवासा मपम्मिमारतिया य संरपझोसणाहि अप्पा गा प मावाचा परणि भत्ताणि मपसमाप पछेजाचा श्ववण्णा कम्पवरविमाणुत्तमेस मा भनुमति पुरषरविमाणबरपोरीप्स सोम्बाई भणोकमाई कमेणवण उचमाई तमो भाउसपर्ण पुमा समाषा जाह मिणमयम्मि पोहि सण प संग्रचर्म तमरपोम- पिप्पमझा उति मह मानार्य सम्पासमोर पो अक्षेप पवमानसत्या पित्यरेण प, पासपनाम परिचा पारमा (जात) एपेपरपकरणफारामपा भाषरिणति से सगासगवसामोप + से मेनगादशाभो ! मतगसाम मतगान जगराई (जार) पहिमामो महिामो नमा मज मासा सबसहिय सचरसमिधा व संममा गचर्म में वार्षिषपया तबो चियामो समिागुचीओ पता मप्पमापनोगो तापम्हाण प उप माणे पोण्हपि पक्षणा पत्ता संपत्तम जियपरीसहाण श्रीमन्नन्दीसूत्रम् चउन्विहकम्मक्खयम्मि जह केवलस्स लंभो परियाओ जत्तिओ य जह पालिओ मुणिहिं पायोवगओ य जो जहिं जत्तियाणि भत्ताणि छेअइत्ता अंतगडो मुनिवरो तमरयोघविप्पमुक्को मोक्खसुहमणंतरं च पत्ता एए अन्ने य एवमाइअत्था वित्थारेणं परवेई, अतगडदसासु ण परित्ता वायणा सखेज्जा अणुओगदारा जाव सखेज्जाओ संगहणीओ, जाव से ण अंगठ्ठयाए अट्ठम अगे एगे सुयक्खधे दस अज्झयणा सत्त वग्गा दस उद्देसणकाला दस समुद्देसणकाला सखेज्जाइ पयसहस्साइ (जाव) से त्त अतगडदसाओ ॥ सूत्र १४३ ॥ न० सू० ५-से किं तं अणुत्तरोववाइयदसाओ 2 अणुत्तरोववाइयदसामु ण अणुत्तरोववाइयाणं नगराइ उज्जाणाइ चेड्याई वणखडा रायाणो अम्मापियरो समोसरणाइ धम्मा- यरिया धम्मकहाओ इहलोगपरलोगइड्डिविसेसा भोगपरिच्चाया पव्वज्जाओ सुयपरिग्गहा तवोवहाणाइ परियागो पडिमाओ सलेहणाओ भत्तपाणपच्चक्सा- णाइ पाओवगमणाइ अणुत्तरोववाओ मुकुलपच्चायाया पुणो बोहिलाभो अत- किरियाओ य आघविज्जनि, अणुत्तरोववाइयदसामु ण तित्थकरसमोसरणाई परमंगलजगहियाणि जिणातिसेसा य बहुविसेसा जिणसीसाणं चेव समणगणपवरगंधहत्थीणं थिरजसाणं परिसहसेण्णरिउवलपम- दणाणं तवदित्तचरित्तणाणसम्मत्तसारविविहप्पगारवित्थरपसत्थ- गुणसंजुयाणं अणगारमहरिसीणं अणगारगुणाण वण्णओ, उत्तम- वरतवविसिटणाणजोगजुत्ताणं जह य जगहियं भगवओ जारिसा इडिविसेसा देवासुरमाणुसाणं परिसाणं पाउन्भावा य जिणसमीवं जह य उवासंति जिणवरं जह य परिकहति धम्मं लोगगुरू अमर- नरसुरगणाणं सोऊण य तस्स भासियं अवसेसकम्मविसयविरत्ता नरा जहा अब्भुवैति धम्ममुरालं संजमं तवं चावि बहुविहप्पगारं जह बडूणि वासाणि अणुचरित्ता आराहियनाणदसणचरित्तजोगा जिणवयणमणुगयमहियं भासित्ता जिणवराण हिययेणमणुण्णेत्ता जे य जहिं जत्तियाणि भत्ताणि छेअइत्ता लळूण य समाहिमुत्तम- ज्झाणजोगजुत्ता उववन्ना मुणिवरोत्तमा जह अणुत्तरेसु पावंति जह अणुत्तरं तत्थ विसयसोक्खं तओ य चुआ कमेण काहिंति संजया जहा य अंतकिरियं एए अन्ने य एवमाइअत्था वित्थरेण, अणुत्तरोववाइयदसामु ण (जाव) एगे सुयक्तधे दस अज्झयणा तिन्नि बग्गा दस उद्देसणकाला दस समुद्देसणकाला सखेज्जाइ पयसयसहस्साइ (जाव ) से त अणुत्तरोववाइयदसाओ ॥ सूत्र १४ ॥ नं० सू० ५५-से किं त पण्हावागरणाणि ! पण्हावागरणेसु अटुत्तर पसिणसय (जाव) विज्जाइसया नागसुवन्नेहिं सद्धिं दिवा सवाया आघविज्नति, पण्हावा गरणदसामु णं ससमयपरसमयपण्णवयपत्तेअबुद्धविविहत्थ- .

समवामाइस्यो माया परिचया मासामासियार्ण आसयगुणवसमणापप्पमारापरिषमासिया बिस्यरेणं मीरमातीहि विधियित्परमाखियाण , समदिया अदागंगवाहुमसिमणिसोमनाएषमासिपाणं विविधमहापसिब विनामणपसिणविम्जादेवयपयोगपहाणगुणप्पयासिया सम्मूब- गुणप्पभावनरमणमाविमायकराणे आसपायकाहस्मयाम- समतित्यकरचमस्स ठिाकरणकारणार्थ पुरादिगम्मुरबगाहस्स सध्वसम्पन्नुसम्ममरस भबुहमपवियोहणकरस्स पचालय पञ्चयकराण पणा विविगुणमहत्या मिणवरप्पषीपा भाप विनंति, पम्मागरमेसु में परिचा पापना (जात) एमे सुपासरे पण पाहात देतमासा पणवाडीसे समुदेवमकान सेग्माणि पपमस्सामि (जात) से पम्मागरणा । स्म १५॥ , सू १५-से किन निरापसुप पिचामतुर प (जार) से समासो दकित प --- प्रहविवायेचेष सहविवागे पेव (णार ) से निपागामि ! दु मिनागेतु (जार) मम्मकामभो नमर( नरम ममपाई संसारपा परपरामो (जाप) से ति विकागानि ! माविकागेतु समनिमगाव (जार) पुरुपिरास पालापापममिवयमबोरिकारमपावारमेपतर्सगपार माचिन कसाबविपप्पमापपातप्पभोनभान्सचामसपिपाणे मार्ग पावपार्म पारमणमामारिवाना गिरपातिनिरिक्तमोनिमाविसमतपपरपरमपान मगुपचेनि मागपाणे मान पातरम्मतेसेप्म पापमा सेम्ति पवितामा तण- विणासनासाकडएकरपरमाणेपणजिम्मकोममर्मजमकरगियापक यमरणासगरहवमसूरुमपाम्माभिणपतरसीसातत्ततेससभाह- सिंचणकृमिपागकरणपिरमरणोमगाचमपतिमपररपाठीरप्परिणत नापि दुपसामि भणोरमाणि मषिविहपरंपरामुपदा म मुचंति परमार मरेपानाभि मोस्तो तपेण विमभिपयाण साम तत्व पाR एण्णा, चोप सानिमागेत सीलर्समममियमगुमतमोजमापे मन सुपिरित ममुपासपप्पमोगतिकारमपितामचपाई पपघमणसा पिलानीसस तिनपरिपामनिमिषनई पपषिकर्ष पपौनसहम जान निधिति र यो मर्म जान रितील मरनस्पतिरिपत्रमपरिपुसपरिवाभरसिमपरिहा- पसोगमिणचसेही मनामत वकारपिसितार जामरनजोकि- पमिपत्रमा समासासापापप्पाची भाप्पारम भरवम्म सर सागरमिक माप मिति मार तुरगगेतु कार मनुमानि तुरपणपिमान होमणि मनोरमाणि ततो पासरे मात्र दोष मरहोममापारी मार सम्पपमानिससम्ममारोगटिमेनाविता मिधामवरणपणसम्मति पतमिदनारतमपरितेता पालिकामोम्मान तोक्सान पापिरापोचमेत भारपरागुपदा भामा प्रधान र कम्पन भातिमा पनि मला RITHपम नगरपा निभषरेण विंगकरमापा भने Rप रपमानामा श्रीमनन्दीसूत्रम् wr . . विहा वित्थरेणं अस्थपळवणया आघपिज्जति, विवागसुअस्स णं परित्ता वायणा (जाव ) एकारसमे अगे वीसं अज्झयणा (जाव ) पयसयसहस्साइं पयग्गणं प० (जाव) से त्त विवागसुए ॥ सूत्र १६ ॥ न सू० ५७-से कि त दिट्ठिवाए । दिट्टिवाए णं सव्व० से समासओ पचविहे प तं. (जाव) ओगाहणसे० उवसंपज्जसे० चुआचुअसे० से किं त सिद्धसे० १ २ सिद्ध- सेणियापरिकम्मे चोदसविहे प०त.माउयापयाणि एगठिय०पादो?० आगास० केउभूय रासिबद्ध (जाव) सिद्धवद्धं, से त सिद्ध० से किं त मणुस्ससेणिया ताई चेव माउआपयाणि (जाव) नदावत्तं मणुस्सवद्धं, से त्त मणुस्स० अवसेसा परिकम्माई पुट्ठाइयाई एक्कारसविहाइं पण्णत्ताई, इच्चेयाइ सत्तपरिकम्माड ससमइयाइ सत्तआजीवियाई छ चउकणइयाइ सत्ततेरा- सियाइ एवामेव सपुत्वावरेणं सत्तपरिकम्माई तेसीति भवंतीति मक्खायाई, से त परि० से किं त सुत्ताइ ! सुत्ताइ अट्टासीति भवंतीति मक्खायाई, तं ...से तं सुत्ताइ ४ विप्पच्चइयं ( विनय चरियं ) ७ समाणं १० अहाच्चयं ११ सोवत्थि (वत्त य) १ पणाम (इन भेदोंके सिवाय समवा- यांगमें शेष सूत्रके भेद नन्दीसूत्रवत् हैं ) से किं त पुन्वगयं ! पुन्वगयं चउद्द सविह पण्णत्त, ते २ अग्गेणीय, (शेप १३ पूर्वोके नाम नन्दीवत् है, पूर्वोकी चूलिकाके अधिकारमें 'अग्गणीय पुव्यस्त णं ' आदिके स्थानपर समवायोगमें अग्गेणीयस्स णं पुवस्स, वीरियपवायस्स णं पुष्वस्स, ऐसे सर्वत्र दोनों पद स्वतंत्र पष्ठी विभक्तयन्त मिलते हैं, बांकी पाठ समान हैं।) अनुयागके वर्णनमें नन्दीसूत्रकी अपेक्षा समवायांगमें कुछ पाठ न्यूनाधिक है। जैसे:- नन्दी समवायांग मूल पढमाणुओगे ण एत्थ ण देवगमणाणि देवलोगगमणाणि रायवरसिरीओ रायवरसिरीओ सीयाओ तवा य भत्ता केवलनाणुप्पयाओ केवलनाणुप्पाया अ तित्थपवत्तनाणि य सीसा -पवत्तनाणिय सघयण संठाण उच्चत्तं आउ वनविभागो सीसा अज्जपवत्तिणीओ अज्जापवत्तणीओ ज च परिमाणं जं वा विपरि० अणुत्तर गइय उत्तर वेउव्विणो य मुणिनो अणुत्तरगई य सिद्धा, सिद्धिपहो जहदेसिओ जच्चिर च कालं पाओ० सिद्धा, पाआवगया तवा य उग्गा } समवायात्यो द्वापशापा परिचया . . मचाई नमसमाप मचाई तिमिरमोपविप्पमुझे मुस्ससुइमण तमरओपविप्पमुडा सिशिपामण पचे एवमने प पचा, एएम य पहिया, से - फाहिमा आपविम्मति पण्ण. परु. से गडियाणुमोगे १२ पुसमा गंरियाणुमोगे ! ममेगविहे ,ते समर चावनिगरियामो पाहरगडियामो मिरयागमणविविधपरियङ्गमसू निरिपरदगमणविविहपरिणाणुओमे, पपणपिम्मति से- पण्णविन्मसि पफविरजति से से से अमुमोगे -पूलियामो २ आ. -भूरिमामो षण्ण मा० संसिन्मा मणभोगवारा ससिन्मा वेडा संसिज्मा मणुभोगवारा संसम्माई पयसास्साई पयागेम, सन्माणि पयसयसहस्साणि पयग्मेणे 4. समभाषपहरणा समभावपररगया मापपिसा भापपिति परिकम मोगाइसेपिया गोपाहाणिया उपायगोपिया उपपबपिन विप्पणामटेमिया विप्पमममिया सियाम निदान माठयापपई तर मारपालपण मास्कार मस्समर्थ ममता परिकम्माई पुछारमा सविता पण्ण एनामेष धपुम्मापरेम प्रस्परिकम्पई तेतील भक्तीति मस्तापाई महासीति भवतीति मम्साया विप्पशाय समाण महार्य सोवत्यि पणाम समिणीय मोमीपास में पुमस (शेप पाठ दोनों समान) तृतीय परिशिष्टम् । नन्दीसूत्रेणसह शास्त्रान्तरपाठानां साम्यम् " " " . " न स् गा ५१-सेलघणकुडग चालिणी (पूर्ण) वृहत्कल्पसूत्र पीठिकाभाप्य गा 337, आ. नि गा १३९ ५२-सीरमिव राय हसा जे घोति उ गुणे गुण समिदा दोसेवि य छड्डता बृ पी मा गा ३६६ ॥ ५३-जे होंति पगय मुद्दा मिगछावगसीह कुक्कुरग० रयणमिव. असठविया बू पी. भा. गा ३६७ ५४-नय कत्थइ निम्मातो नय पुच्छइ परि दोसेण, वस्थीव० बृ पी. मा. गा ३७१ सू १ (प्र) कातिविहे...गोयमा ! पचविहेणाणे प त-आभिणियोहियणाणे सुय (पूर्ण) भग श ९ उ २ सू १७ "राय सू. १६५ २ दुविहे नाणे पण्णत्ते त पन्चक्ले चेव परोक्खे चेव १, स्थानांग स्था. २ उ १ सू " ३ पच्चक्खे दुविहे प त. इदिय पच्चक्लेअ णोइदिअपच्चक्लेअ अनु जीवगुण प्र सू १४ 7 से किं त इदिअपच्चक्खे । पचविहे प० त० सो इदियपच्चक्खे चक्र- रिदिय प घाणिदि ५ जिभिदिय फासिंदिअ. से त इदिय । से कि त णो इदिय १२ तिविहे ५० त० (पूर्ण) अनु जी सू १४४ ६ ओहिणाणे दुविहे प० तं०-भवपन्चइए चेव खओवसमिए चेव १३, स्थानां स्था २ उ १ सू ७१ ओहिणाण भवपच्चइय साओवसमिय, राय सू १६५ ७ दोण्ह भवपच्चइए प०त. देवाण चेव नेरइयाणं चेव १४, स्थानां स्था २ उ. १७१ पन्नवणा ३३ वा पद ८ दोण्ह खओवसमिए प० त०-मणुस्साण चेव पचिंदियतिरिक्सजोणियाण चेव १५ स्था स्था २ उ १ सू ७१ ९ रायपसेणइय सू. १६५, पन्नवणा पद 33 वां स्था स्था ६ उ सू ५५-जावइया तिसमया-हारगस्स मुहुमस्स पणगजीवस्त आव नि गा ३० ५६-सव्वबहु अगणिजीवा, निरतर जत्तिय मरिज्जसु । ५७--अगुलमावलियाण, भागमससिज्ज दोमु सखिज्जा।. ५८-हत्थान मुहुत्ततो, दिवसतो गाउयामि बोम्यो ।... " " " " " " गा ३१ " , ३२ A ३३ २ मन्दीस्पतह शामाम्तरपाठाना साम्पम् में 1 " A " सू. गा.१९-मरामि भामातो, जयामि मारिनो मासो। .. भाषा -सिग्नमि गमकेदीपसमुहारि ति सिज्मा। -काहे उगती काहो मार विचार । ६१-सामोप म कामे तपोधामय मा हिच । १५-से समासमो राषिो पाते तना-सितमो, काभो, मारमो,। पनमो ग मोरिमामी विवनाई जाय पासर, जाप मारमो म. श.. 7 . n n n ६-रापरेपतित्व प... मा. मा ६५ १४-मगपम्मरणाणे दुषित प है -स्नुमति र सिमति ग , स्था स्पा २ १५" राभपसेप्पप १५५ से समासमो परमो मो अचमों, काहओ, भाषभो, । म मो न रम्मुमती मते मपतपदेसिर जाप मारमो। मम "" 1 , मा ५५-मणपग्मा नाणं पुष जजमनपरिचिसियामपापा. मा. गा. ५ १९-गाणाले पिप + -भात्य परमाणे और सिगमणाने । मात्य रकमाने दुषित प . समोगिनपत्य पणाने और भणोगि मरण करतणारे देष सजोगिमा पठणाणे सिप है पहमसमपत जोगिमलाप पम्पाने व पामसजोनिमनत्य पणाणे प ५ मामा परिम समपसणोमिमाम परमाणे पेर भपरिमसमपरजोगिमपत्य परभागेर एवं मनोमिमवाप ससम्मारि म । स्या. त्या.' 11 7 n -सिदयसमा दुखिप -भर्षतरसि फेसणाणे रेस परंपरतिधा- पामेष. स्था स्था. २१." २१-बापी पुरीसठिया पतपसगा। समिम ममलिंग पमिलिगे तोर पसभ ..गा. ५ "-मतासिह वसंसारसमापन्य पण्यासविन प त तिापविद्या मतिम खिा(जात) मलेपसिहा. १५-से परसिथ मोगरा प त भपरमसमपमिदा (पाप) मर्वत समसिहा तेच पम सू से समातमो पानिपतममो सिपमो कासमी, मपभो, । मनो गत नाची समस्या मान्य पाता । स मत मारमो. मग ॥ .

नन्दीसूत्रेणसह शास्त्रान्तरपाठानां साम्यम् " २१ " नं.स. गा. ६६-अह सव्वदचपरिमाण-भावविण्णत्तिकारणमणंतं । ...... माव. नि. गा. ७० ६५-केवलणाणेणत्थे णाउँ, जे तत्थ पण्णवणजोगे ।.. " , सू. २४-परोक्खणाणे दुविहे प० तं० आभिणियोहियणाणे चेव मुयनाणे चेव १७ स्था स्था २ उ. १ सू. ७१ ॥ ॥ ॥ २६-आमिणिबोहियणाणे दुविहे प० तं०-सुयनिस्सिए चेव असुयनिस्सिए चेव १८ स्था स्था २ उ १ सू ७१ ,, गा. ६८-उप्पत्तिया वेणइया, कम्मिया परिणामिया ।... ..आ नि. म गा ९३८ ,,, ६९ से ८१ तक-पुज्वमदि-इत्यादि ६९ गाथासे ८१ गाथातक, आ नि म गा. ९३८ से १५१ , सू. २७-आमिणिचोहियणाणे चउन्विहे प०त०-उग्गहो, ईहा अवाओ, धारणा, भग श ८ उ २ सू १८ २८-से किं तं उग्गहे ! उग्गहे दुविहे पन्नचे तं०-अस्थुग्गहे य,-, , , , २९ से ३४-एवं जहेव आमिणिबोहियनाणं तहेव, नवर एगहियवज्ज जाव नोइदि- यधारणा सेत्त धारणा भ श ८ उ. २ सू २१ ३७-से समासओ चउन्विहे प तं दवओ, खित्तओ, कालओ, भावो । दवओ णं आमिणिबोहियनाणी आएसेण सव्वदव्वाइ जाणइ पासात खेत्तओणं आभि- णियोहियनाणी... भ श. ८ उ २ सू १०२ गा८२-उग्गह ईहाऽवाओय धारणा एव हुँति चत्तारि,.. आ. नि गा ८३-अत्थाणं ओगहणम्मि, उग्गहो तह वियारणे इंहा ८r-उग्गह इक समयं ईहावाया मुहुत्त मदतु । काल...... ., ८५-पुट्ट सुणेइ सद्द स्व पुण पासई अपुट्ठतु । गंधं रस..... ..., ५ " , ८६-मासासमसेढीओ सह ज सुणइ मीसय सुणई ८७-ईहा अपोह वीमंसा, मग्गणा य गवेसणा । सण्णा ८८-कससिय सू ४१-जं इमं अरिहतेहिं भगवतेहिं......दिट्ठिवाओ अ, (लोकोत्तर भावश्रुत) अनु स् ४२ (लोकोत्तर आगम)" ज्ञानप्रमाण १२-जं इमं अण्णाणिएहि, .चत्तारि वेआ संगोवगा, (लौकिक भावश्रुत ) अनु स् ४१ (लौकिक आगम ) ज्ञानप्रमाण. " " " " . " ६ १२ " णीसिंघिय मणुसार २० " " """ . ... " Pr-सुयनाणे दुविहे प त -अंगपविटे चेव अंग बाहिरे चेव २१ स्था स्था सू ७१ -अंगबाहिरे दुविहे प त -आवस्सए चेव आवस्सयवइरित्ते चेव २२ स्था स्था २ सू ७१. 4 F " " . U M 1n M D A" M " " . M " - n " H " मनीसूत्रेणसह शास्त्राम्तरपाठामो साम्पर में सू. पा. -मास्सपपतिरित दुनि. काविर पेर उपाठिए रेष स्था. स्पा.१ ५-दुपाठसंगे गणिपिागे पं -भापारे दिविवार सम .. से मापारे । से कि समग। re-से भिठाणे! १९-से कि समवाए। सम म १९ ५ -से विषा। ५१-सेक पापामामभा ! ,५२-से कि उपाहगइसाभो ! ५.सेवित भवगाणसामो । ५v-से ति भणुचरोपवापिसाभो। ५५ बिपन्नलागरमाणि 1. ५६-से किसान। .५-से विहिसार। ५ -स्पर्म दुशठसंग गणिपिगमे मपता माता ५८-हर्ष दुपाहर्सर्ग गपिपि भनीतकाते ५८-से समासमो चरणिो पानचे . दममो... । ममोर्ण सपनामी उपरत्वे सम्बदमाई जागति पाचति एवं पेओल काहभोषि मारमा म.उ... ९४-मासरसन्जी सम्म, सवर्ष उलु सपणपसिना मग ४५ एम भान... ९-भागम सभागमजबुदिगु भनि हिंसी मग.श.५र 7 "H . " ५ 14 re १४ * M - १४ । " M M . H - में M भा नि.मा." 8 . " १५-नुग्नुमा पुिणा, भुमेह गिभ ए पावि । . मग.१५ . H मा.मि.. १५-मम मारमा पाकर परिपुष्प पोर्नसा । मग ५ भ मान" भत्तायो पनुपरमो, मोमरमुचि मीतमो गनिमी.. मग रा ५१. समिमिम ममोगे...... भा .. ה " .

- चतुर्थं परिशिष्टम् । श्वेताम्बर एवं दिगम्बर सम्प्रदायोंकी दृष्टिसे ज्ञानकी प्ररूपणा। १ श्वेताम्बर दृष्टिमें पांच ज्ञानमें प्राथमिक तीन ज्ञान मिथ्याष्टिके लिये मिथ्यारूप होते हैं, अतः पांच ज्ञान और तीन अज्ञान माने गये हैं। लेकिन दिगम्बर इन आठ भेदों के अलावा मिश्रप्रकृतिके उदयसे होनेवाला एक मिश्र- ज्ञान मानते हैं, देखें-गोम्मटसार, जीव० गा. ३०१ । २ श्वेताम्बर मतिज्ञानके मूल २८ भेद मानते हैं। प्रथम कर्मग्रन्थमें ३४० भेद भी मतिज्ञानके मिलते हैं, लेकिन दिगम्बर मूल २८ भेदोंकेही बहु, अल्प, बहुविध, एकविध, क्षिप्र, अक्षिप्र, निसृत, अनिसृत, उक्त, अनुक्त, त्रुव, और अनुव, इन बारह विषयोंके भेदसे गुणन करनेपर ३३६ भेद मानते हैं, देखें- गोम्मटसार गा० ३०९ । अश्रुतनिधितके चार भेद गोम्मटसारसे नहीं मिलते हैं। ३ सैद्धान्तिक मतसे श्रुतज्ञानके अक्षर, अनक्षर-श्रुत आदि १४ भेद हैं, और कर्मग्रन्थके मतसे पर्यवश्रुत, अक्षरश्रुत आदि २० भेद भी होते हैं, संक्षे- पसे अक्षरात्मक श्रुत अङ्गप्रविष्ट और अनङ्गप्रविष्ट (अङ्गबाह्य) ऐसे दो प्रकारका है। अङ्गवाह्यमें दशवकालिक आदि उत्कालिक और उत्तराध्ययन आदि कालिक शास्त्रोंका समावेश होता है। अङ्गप्रविष्ट आचाराङ्ग, सूत्रकृताङ्ग आदि बारह प्रकारका है। श्वेताम्बरदृष्टिसे उपलब्ध शास्त्रोंमें अङ्गप्रविष्ट और अमवाह सब मिलकर ३२ या ४५ आगम पूर्ण प्रामाणिक माने गये हैं। गुरुशिष्यपर- म्परासे ये शास्त्र मूल परम्पराको नहीं छोडकर अविच्छिन्न चले आरहे हैं। वाचनाओंके मूल भावके संरक्षणका पूर्ण ध्यान रक्खा गया है। श्वेताम्बर सम्प्रदायकी तरह दिगम्बर भी श्रुतके अङ्गबाह्य और अङ्ग- प्रविष्ट ऐसे दो प्रकार मानते हैं। अङ्ग्वाह्यमें उनकी दृष्टिसे १४ प्रकीर्णक संमिलित हैं, जो इसप्रकार हैं-१ सामायिक, २ संस्तव, ३ वन्दना, ४ प्रति- क्रमण, ५ विनय, ६ कृतिकर्म, ७ दशवैकालिक, ८ उत्तराध्ययन,९ कल्पव्यवहार, १० कल्पाकल्प, ११ महाकल्प, १२ पुण्डरीक, १३ महापुण्डरीक और १३ निषी- धिका। अङ्गप्रविष्ट आचार, सूत्रकृत आदि बारह भेदयुक्त हैं। द्रव्यसङ्ग्रहमें प्रत्येकके पीछे 'अङ्ग' शब्द जोडकर आचाराम आदि नाम लिखे है, छठे अर्को ज्ञातृधर्मकथा और नामधर्मकथा भी लिखा है, शेष सब समान है। दिगम्बर उपरोक्त अङ्ग एवं अङ्गवाह्यादि श्रुत दुर्भिक्ष आदि कारणसे विच्छिनप्राय समय भी भीमचनीसमम् मानते हैं, मतपम वर्तमाममें उपसम्प माषाणयापि शाम उनकी रहिसे मामाणिक नहीं हैं। भुतके इन २० मेदामें पक पर-भूत भी आया है। पाका परिमाण श्वेताम्पर सम्पायमें निमितरूपसे नहीं मिलता। कहीं कहीं ५१०८८५ (a लोकोंका) माया पापरिमाण सिसा है। शवशाहीका पषमान परोक पाते करना पा अबोधक पदसे इसमें भी मतमे।बीनाकारने 'माहापक- पदामेण सम्पातान्येव पदपासापि भवन्ति इन शममि स्मासापकरप परको भी माना है। परमतिपछि, अनुयोम, असर, पर्याय, प्रामक प्रापत पात्रत और पूर्व, इनको मन्दीममें माके अवयवनपसे कहां है उ- वापारा प पतिवादका परिचय-स्म । मोम्मटसारमें पदपरिमाणका स्पष्ट गत है वहाँ १६३४ कोयम्स मार, ८८८ भक्षरोंका पक पद माना है। इसीसे शक्शामा पापरिमाण माना गया है। इसके शिवाय परके अपन, ममाणपर और मम्पमपल पते तीन मेष है। उपरोक मान्यतामें २००० श्लोक करीबका परस्पर दोनों सम्म पार्योर्म फर्फ पडता है। बाकी परगणमा ताम्बर विगार १८ १ १ OR २ ३ ४ ५ ४ ५ २२८ २२८ ५५६ १९५२ २३४ 4 २३२८. ११ १८४३२. ११ १. १२ १ . ५(पूर्वस्प परवंसया)/ १२१८५०९६ .५ ५मयमके पौष पूकि सिवाय बम्य पूर्वक पस्त दिगम्बर सम्मापर्ने विपमरूपसे है। सिकार परिफर्म, घुम पूर्ण, अनुयोग भीर भूमिका पेसे पांचमकार वेताम्बर मानते हैं। परिकमेके सिरामिका मारि मूठ लात मार। सा बास महारका पूर्व पीपद मकारके होते हैं और अमुयोम भूमना भुयोम भीर गतिकाम्पोम पैसामो प्रकारका है। जीप में सिर्फ बार पूोपर ३ श्वेताम्बर एवं दिगम्बर संम्प्रदायोंकी दृष्टिसे ज्ञानकी प्ररूपणा। दिगम्बर भी दृष्टिवादके पांचही प्रकार मानते हैं, लेकिन वे श्वेताम्बरोंसे भिन्न हैं, जैसे-परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत एवं चूलिका। परिकर्मके चन्द्रप्रज्ञप्ति, सूर्यप्रज्ञाप्ति, जम्बूद्वीपप्रज्ञाप्ति, दीपसागरप्रज्ञप्ति, और व्याख्याप्रज्ञप्ति आदि भेद वे मानते हैं। सूत्र एकही प्रकारका है, एवं प्रथमानुयोग भी एक प्रकारका है। पूर्वगतके चौदह प्रकार माने गये हैं, जैसे-१ उत्पादपूर्व, २ अमायणीयं, ३ वीर्यानुप्रवाद, ४ अस्तिनास्तिप्रवाद, ५ज्ञानप्रवाद, ६ सत्यप्रवाद, ७आत्मप्रवाद,८कर्मप्रवाद,९प्रत्याख्यान, १०विद्यानुप्रवाद, ११ कल्याणानुवाद, १२ प्राणानुवाद, १३ क्रियाविशाल और १४ त्रिलोकबिन्दुसार। दिगम्बर दृष्टिसे चूलिकाएँ पांच तरहकी हैं-१ जलगता, स्थलगता, ३ रूपगता, ४ मायागता और ५ आकाशगता। गोम्मट जीव० गा. ३६१ । ७ श्वेताम्बर अवधिज्ञानके भवप्रत्ययिक और क्षायोपशमिक ऐसे दो भेद और गुणप्रत्ययिकके १ अनुगामिक, २ अनानुगामिक, ३ वर्द्धमान,४ हीयमान, ५ प्रतिपाति और ६ अप्रतिपाति, ऐसे छह प्रकार मानते हैं। उनकी दृष्टिसे परमावधि भी वर्द्धमान अवधिके वर्णनमें आता है। लेकिन दिगम्बर भवप्रत्ययिक और गुणप्रत्ययिक ऐसे अवधिके दो मुख्य भेद मानकर गुणप्रत्ययिक अवधिके १ देशावधि, २ परमावधि और ३ सर्वा- वाध ऐसे तीन प्रकार मानते हैं। अनुगामिक आदि छ प्रकार श्वेताम्बर सम्प्र- दायकी तरहही है। ८ श्वेताम्बर आम्नायमें मनापर्यवज्ञान मनुष्योंके मनमें सोचे हुए भाव अर्थ )को प्रकट करता अर्थात् जानता है । ऋजुमति एवं विपुलमति ये उसके दो भेद हैं। यह ज्ञान ऋद्धिप्राप्त साधुओंकोही होता है ऐसा वे मानते हैं। लेकिन मनापर्यवज्ञानसे चिन्तित, अर्द्धचिन्तित एवं अचिन्तित भी मनके विचार जाने जाते हैं ऐसा दिगम्बर मानते हैं। ऋजुमति वर्तमानके मनोगत विचारोंको जानता है और विपुलमति भूत-भविष्यको भी जानता है। मन, वचन, कायकी ऋजुता व सरलतासे प्रत्येकके तीन भेद ऐसे मनःपर्यवके छह भेद वे मानते हैं।

प्रहर M पत्रम परिशिष्टम् ॥ सूत्रपठनमें अनध्याय ॥ अनध्याय समय १बा तारापात होतो २ दिशा रकवर्णयाठी होतो अबतक दिशा रफवर्ष हो तक्तक अकाल पास गर्नमेपर बिजलीके चमकनेपर बिजलीक करकगरहोतो. शलपमकी मतिपर, द्वितीया तृप्तीपा प्रदर रानिपर्यन्त ५ आकाशमैं यक्षाकार होतो आकार हनेतक ६सफेव पूभर होनेपर पूंजर हमतक रुष्यभर होनेपर ८पूलिसे आकाशके हकनेपर एका रहे तक ९बीके सिनेपर १० मसिके ममदीक होनेपर २१ रफके पास रहनेपर १५ बिठा भादिके मजदीक २५ स्मशानके पास १५चत्रपक्षण होमेपर १२॥१५ महरपर्यन्त १५ सूर्यग्रहण होनेपर २५राजा आरि किसी पर आदमीके मरनेपर शय-संस्कार होमतक २०रामार्मोक पुरस्थानमें प रहनेतक १८ पासपके भीतर पन्यि जीव मरा हो तो रहे तबतक २१ पशुका कसेपर १०हायके भीवर होतो २० मनुष्यका कलेवर १०० दापके २१ आपार घ पूर्णिमा पूर्ण दिम पत २९ मावण कृष्ण मतिपत् २५ भाप्रपा पत पूर्णिमा ९अश्विन शुक्ल पूर्णिमा २५ थपिन कृष्ण मतिपद १६ कार्तिक कृष्ण प्रतिपद २० कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा १०मागा कृष्ण प्रतिपद ५ शत पूर्णिमा २० विशाल कृष्ण प्रतिपद १ध्यायके समय सूपारतके समय १५मप्यार के समय मम्परारिके समप " ນ " " M " पापटीपर्पत " " , । पष्ठं परिशिष्टम् । स्पष्टीकरण और सूचना - (१) हमने नन्दीसूत्रका अनुवाद अधिकांश वृत्तिके आधारसे किया है, अतएव स्थविरावलीके अनुवादमें टीकाकारके मतानुसारही गुरु-शिष्य कम रक्खा है। वस्तुतः यह युगप्रधान स्थविरावली है, गुरुशिष्यक्रमवाली नहीं। प्रस्तावनामें इस विषयपर हमने विचार किया है, देखे। (२) अश्रुतनिश्रित मतिज्ञानकी औत्पत्तिकी आदि ४ बुद्धिओंके कथा- भागमें कहीं २ परिवर्तन भी किया है, जैसे-तिल-रोहकके दृष्टान्तमें चतुर्थ उदाहरण, औत्पत्तिकी बुद्धिका १० वाँ, १३ वाँ और १८ वा मधुसिक्थका उदाहरण। (३) मुद्रित पुस्तकों में अधिकांश भरहसिल पणिय इस गाथाकोप्रथम रखकर फिर 'भरहसिल मिठ' आदि गाथाको दूसरे नम्बरपर रक्खा है, किन्तु यहां दृष्टान्तके कमसे 'भरहसिल मिंठ । इस गाथाको प्रथम रक्खा है। (४) कुछ उदाहरण आतिशय संक्षिप्त होनेसे अस्पष्ट रहजाते हैं, उनका यहां स्पष्टीकरण किया जाता है। (अ) वैनयिकी बुद्धिका ११ वाँ १२ वाँ उदाहरण 'रथिक और गणिका'- पाटलीपुत्रमें कोशा नामकी एक वेश्या रहती थी। उसके यहां स्थूलभद्र मुनिने वर्षावास किया। और हावभावसे विचलित न होकर उसको उपदेशसे श्राविका बनादी, जिससे राजनियोगके सिवाय उसनेभी मैथुनके त्याग कर दिये । किसी समय एक रथिकने राजाको प्रसन्नकर कोशाकी मांगनी। की राजाने भी उसके मांगनेपर कोशाको हुकुम दे दिया, किन्तु जब रथिक उसके पास पहुंचा तो वह वारंवार स्थूलभद्र मुनिकी स्तुति करती, परन्तु उसको नहीं चाहती । रथिक अपने विज्ञानसे उसको प्रसन्न करनेके लिये अशोक वनिकामे ले गया, और जमीनपर खडा २ आम्रवृक्षसे आम्रकी लुम्बीको तोडकर अर्धचन्द्रके आकारसे काटली । फिर भी कोशा सन्तुष्ट नहीं हुई और बोली कि शिक्षितको क्या दुष्कर है, देखो-मैं सर्षपकी राशिपर सूईमे पोए हुए कनेरके फूलोपर नाचती हूं, ऐसा कहके उसने सर्षपराशिपर नृत्य कर दिखाया । रथिक सुलस उसकी बहुत प्रशंसा करने लगा, तब वेश्याने कहा-“ आम्रकी लुम्बी तोडना और सर्षपकी ढेरीपर नाचना दुष्कर नहीं, किन्तु प्रमदा-समूहमें रहकर मुनि बना रहना यह दुष्कर हैं"। इसपर स्थूलभद्र मुनिका वृत्तान्त कह सुनाया जिससे रथिकको भी वैराग्य आया। यह रथिक और गणिकाकी विनयजा बुद्धि हुई।

भीमनमीमणम् (ब) पारिणामिकी मुश्किा मयम उदाहरण- बण्मयोत राजाको पांधके ले बामेमें भमपकुमारने मो पुद्रिमचा की, उसका विस्तार पेसमेके लिये मावस्यककी प्रवृत्ति देखें। (क) पारिष्यामिकी दिका चतुर्य उदाहरण देवी। पुप्पमय नमरके पुष्पसेम रानाको १ पुष और १ पुषी ऐसे पो सम्मान पी। संयोमवश साय राते हुप दोमि वैषयिक प्रेम जग मया मौर ये परस्पर मोम मोममे हगे। राणी पुप्पयतीको पहनकर परी ग्लानी हुई। सीनि पसे बहसंसार छोरफर दीक्षित बन गई। कुछ समयसे संयम-जीवनमें बाप पूर्णकर वह पेयी बनी श्रीर अपने पूर्वजन्मके पुनभिओंका भनुचित सम्मम्म पैसकर सोचने लगी कि पे पोमों विषयमें मूठित होकर इसमकार रमते हैं तो इमको मरक भावि पुर्गतिमें उत्पड होना पडेमा मेरा कर्तव्य है कि बमको सन्मार्मपरसा। ऐसा सोचकर देवीने उनको स्वपमें भरकमतिकशासवान मिससे उन पोनोंको चिन्ता होने समी किन जोसे कैसे छूटना फिर पूसरे दिन स्वममें पवलोकके सुख रिमापे । प्रात:काष्ठ आचार्यक पास जाकर दोनोंने नरकगतिसे बचने और देवसोकमें जानेका उपाय पण । आचाने स्वर्गपाप्तिका मार्ग बताते हुए पर्मका उपदेश दिया उससे पोनोंने पीक्षा कर इयोंसे मुक्ति मिठासी। यह देवीकी पारिणामिकी बुद्धिका उपाहरण है। सव कथाएँ शिौक बाहरणरूप हैं मत इमपरसे विधिवार पा ऐतिहासिक निर्णय करनेका मयस्न नहीं करें। संशोधन- संशोमनकी पूर्ण सावधानी रखते हुए भी परिस्थितिकी विषमता । मकाशनकी शामता तथा पूम्यमीका यिहारमें होना मारि कारपोसे छठ पूरप गई है, जिनका इस परिशिष्टसे संशोधन कर लें। . धूमके भन्तमें से भरपाया। पद पाठ भी मिलता है। नवी गापाकी छायामें ज्ञापकके स्यामपर मापक परें। १वी मापाकी टीका पूतमार' के स्थानपर माल परें। 1१० १०६ बाहरणर्म- भान (मकीर्ति) के स्थानपर- 'माण्ड-टाकरमेपाले पुरुप परें। ४० ०१५०१ में गादरणांकी संस्पाम फतुई उसकी सप्रकार पो-२८ मनुसित्य- १९ मुदिक- २० मेक- २९ माणय- ११ मिड-२५ चटगमिदाणे २४ सिमग प-२५भस्यसत्य-, १६ प म ७ सय सदस्स-, गापाम भी पद संगोपन करसे।। ८०पी गायाकेम्तिम पाने पीए स्थानम 'पुदी । .

स्पष्टीकरण और सूचना
पृ १२१ के आदिमें 'तेसट्टाण'के पहले 'बत्तीसाए वेणइयवाईणं, तिण्हं'-
ऐसा पढ़ें।
पृ. १४६ में 'आसा-की जगह मासा'।
पृ १४७ में 'प्रशिष्यके' स्थान 'प्रशास्य'।
पृ १५७ में 'कधाइ' के स्थान 'कयाइ' पढ़ें।
गाथा ९५ वेमें 'सुस्सुसइ के स्थान ‘सुस्सूसइ' और 'वा धारेइ के
स्थान' 'धारेह' ऐसा पड़े।
इसके सिवाय मात्रा, बिन्दु और चिन्हकी चूकसे या विपर्याससे जो
अशुद्धियां रह गई हैं, उनको पाठक सावधानीसे पढे और संशोधन करले।
अल विद्वत्सु।
प्रार्थी-
प्रबन्धक

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श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश शब्द सूत्राक अर्थ ओत्पत्तिकी बुद्धिका ११ वा दृष्टान्त अतीत-भूतकाल १८ . २३ अकर्मभूमिक्षेत्रोंमें अक्रियावादी रूप राहुके मुखसे नहीं पकडने योग्य ९ अकम्पित नामके ८ वें गणधर अक्रियावादियोंका औत्पत्तिकी बुद्धिका २० वाँ दृष्टान्त अक्षर (वर्ण) rriry . वर्ण ज्ञान ... ३८ २९ अइय अईयम् अकम्मभूमिमु अकिरियराहुमुहदुररिस अकपिय अकिरियावाईणं अक अक्खरा अक्सर अक्खए अक्खरसुयं अक्सरलद्वियस्स अक्खोह अक्खुभिय समुह गंभीर अखंड चारित्त पागारा अगुलसे दिमित्ते अगुल पुहुत्त अगमिय अगए अगड अगणिजीव अग्गिभूइ अग्गिस अंगुल अगपविट्ठ अगवाहिर अंगचूलिया अगठ्याए अगे अंगुठ्ठपसिणाई अगुलेहि अक्षत-क्षयरहित श्रुतोंका १ भेद अक्षरश्रुत अक्षरलब्धिवालेका ३९ क्षोभरहित, ११ तरगरहित समुद्रकी तरह गभीर परिपूर्ण चारित्ररूप कोटवाला अगुल श्रेणिमात्र क्षेत्र में ६२ अगुल पृथक्त्व २ से ९ अंगुल प्रमाणवाला ५७ श्रुतज्ञानका १२ वाँ भेद अगद विनयजा बुद्धिका १० वाँ दृष्टान्त औत्पत्तिकी बुद्धिका ७ वाँ दृष्टांत वन्दिकायके जीव ५६ अमिमतिनामके दूसरे गणधर अग्निवेश्यायन गोत्र विशेष अगुल नामका १ प्रमाण १११५५७ श्रुतज्ञानका १३ वा भेद ... २२ " अगचूलिका नामका एक कालिक शाख अगकी अपेक्षासे अंगशास्त्र अङ्गुष्ठमन्न-वियाविशेष ... ५५ अङ्गुलोंसे ...

भीमबन्दीस्त्रका शस्दकोश मा - भाषाज्य महिपाई मचरमसमप मर्थ समे रिना भमिमा पूर्व मन्तिमसमपसे मिनसमबो सिद भार भानीलपर मामले स्पपिर मार्पपम नाम परिर भाषनागासी नाम स्पपिर मामा मार्चसमुद्र " भरमजीपचर मन्णयम्म मम्गनागप भग्गर्म भजम्मा भाजपापिनीमो माजात . " . . भाभोंमें मुरुष ५. 11 मजाणिपा भजोगिमात्यवाना भनी भन्छपणा भग्रतामापी मणिप Tr भाजभी आपका नाम स्पतिर महोत्री सभा अपोनिमपत्यपान मजीव मपपन भन्मपसावरपानीले मणितनापनी दूसरे तीर आर माग सपद नामका परिकर्मका भवाम्सर परमे भय्यासी भाव तय ५० भापपार ५. आमरसेप मजुतीसद हिस्स T भासी मारो महमरामाये महापरले महान् मनमार मापसी मोचर, रस्तो माठ माठ (पुहिगुण) भानाव, पसिनमरवमें भामरतमें प्यान माई (हीपसमुद्र) मगई (मपुर) से मनान-मामरत्वान तापु मनामुगानिक मानिशाना सार ។ - D ५. मणानुमानित २ - श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश www ... r३ .. .. . . ... . . ११ १८ ... ... " शब्द अणागए (यं) . अणाहय अण्णाणिय वाईणं. अणत अणते अणंताइ अणतभागं अणतर सिद्ध अणतपएसिए अण्णमण्णमणुगयाइ अणुओगियवरवसभे अणुओगजुगप्पहाणाण अणुदिण्णाण अनुओगो (गे). अणुप्पवायम्मि अणुत्तरगई अणुपरियति अणुपरियटिंसु अणुपरियहिस्सति अणुयोगदारा ( र) अणिट्टीपत्त अणेगविह अतगय अतर दीवग अतो मणुस्सखित्ते अतर दीवगेसु अतीय अतित्थसिद्धा अतित्थयर सिद्ध अतो मुहुत्तिया (ए) अतकिरियाओ अतगडाण अतगडदसाओ अतोमणुस्स सित्ते अंतगड़े अर्थ सूत्राक अनागत-भाविण्यत्काल ५७ आदिरहित अज्ञानवादिङका अनन्तनाथजी १४ वे तीर्थकर अनन्त १६ अनन्त अनन्तवा भाग एकसाथहोनेवाले सिद्ध अनन्त प्रादेशिक एक दूसरेसे मिले हुए बडोंको अनुयोगोंमें लगानेवाले अनुयोगमें युगप्रधान अनुदीणं-उदयमें नहीं आए हुए अनुयोग ३७१३२ अनुप्रवादनामक पूर्व अर्थात् वियानुप्रवादपूर्व ५७ अनुत्तर-श्रेष्ठ ५ विमानोंकी गतिसे मटकते हैं भटक चुके भटकने रहेंगे अनुयोगद्वार सूत्र अनृद्धिमाप्त अर्थात् लब्धिरहित अनेक तरहके ४४२२ अवधिज्ञानका भेद अन्तर्पिवर्ती १७ मनुष्यक्षेत्रके भीतर अन्तीपोंके भीतर वीतागुआ-भूतकाल अतीर्थसिद्ध अर्थात् १५ सिद्धोंमें दूसरा भेद अतीर्थङ्करसिद्ध अन्तर्मुहूर्तकी ३५ अन्तक्रिया ५२ अन्तकरनेवालोंका अन्तरुशाग आठवा अङ्ग ५३ मनुष्यक्षेत्रके भीतर अन्तकरनेवाले ... .. .. १७ . १० .. ... १८ . १८ . . " २१ . . . . . १८ ५७ B भीमबन्दीसूत्रका शम्पकोश अर्थ राम्ब मायाज मत्पसत्ये भाधुम्हे मदिरा भापमापक्सान २८ महाग पसिनाई समाा अपर मातापिपानविकीधिकार सम्म । मारपर भरपाका प्रथममेरे मार-पिना देसा अर्थ मनपाका समाना दर्पण मापारसे परे हुए मम ५५ अदमास दूसो मेसे पेमेपासे सिद्ध मनम्तसममि सिद् मन्थम-दूसरे स्थानमें एक समपमें एक भपिक सिर मेनेपासे दूसरे १ २१ -- महिम र ५ मिभ्या मानमाहात दूसरे मी ५ समलिंगसिधा मनवसमशिता ममव भोगनिद भने भनिभर ममामिल भनेर मपचिमो अपरिमारत मपणपसिम भपसिणसप अमरत्वेदि अप्पमचर्सजन मपनिर (प) भएम्म समपति मपोर १ JI ५५ सबसे मम्तिम प्रतिपसरमित मन्तरहित सेको बिना पूछे भशास्त प्रमावरहित साधु मही पानेवासे दूसरे समबके खि निश्रम करता विनास किए निभरमा मनिधितो पाला पारिमामिकी बुदिका पासा पदमरम भपिक पिसे रोपतासे भचिक अपोट अमर भरमहिपतरार भमहिपतर मम्ममितराम भनिनिन्धर मामिसेसा भमाया मभितवारमनिपा मामिपारस्पमिस्त N ममिक मापोहने पोपवान पपातोपनासाप H पूरे परा पूर्वीही माननेपाल श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश Anmmmmwwwwwwwwww 73 . शब्द अभवसिद्धियस्स अभिनदन अमचे . ... अर्थ মূসা अभवसिद्धिक-मुक्तिके अयोग्य वर्तमान अवसर्पिणीके चतुर्थ तीर्थकर अमात्य-प्रधान-पारिणामिकी बुद्धिका ९ मा उदाहरण अमात्यपुत्र-प्रधानका लडका-पारिणामिकी बुद्धिका ११ वा उदाहरण देव अमच्चपुत्ते ... माता पिता ५१ अमर अम्मापियरो अमुक अमणुस्साण अयलमाया अयलपुर १७ २३ ३६ अर . २१ .. . " १० अरिहतेहिं अरहताण अरहओ अरुणोववाए अलाय अलोगस्स अवसव्वय अविसेसिया अव्वाहय फलजोगा अवेइय अवहिए अव्वर अवाओ अज्ञातनामवाला मनुष्यसे भिन्न अचलभ्राता स्थविर अचलपुर नामका ग्राम १८ वें तीर्थकर अरिहतदेवोंसे अर्हन्त देवोंका अर्हन्तदेव अरुणोपपात ग्रन्थविशेष जलती हुई लकडी अलोकका वाममागसे विशेषता रहित निर्वाध फलोंसे युक्त अज्ञात स्थिर रहनेवाला नाशरहित अवाय मतिज्ञानका भेद अवलम्बनता, ज्ञानका अवान्तरभेद अबाय अवायमें अव्यक्त अस्फुट मतिज्ञानका भेद अवसर्पिणी-कालका भेद १५ ७५ २५ • . .. २७ अवलयणया ३१ .. अवाए अवाय ૬ ૩૬ ... अन्वत्त अवोहो अवसप्पणीओ असण्णिसुय असिद्धा असाझ श्रुत ३८ . सिद्धोंसे भिन्न अश्रुत . अस्सुय ...

- भीममन्दीमका शम्मकोश मरमच निस्सिप . मभुत भाभितरानेवासम मपीतरामा महामा भसंस्पेप-संसपागार मसम्प भकमाता माम मसम्मातप्तमोमें सिदराने भसपमा स पाही नापिकी पुदिका गानदारण भरस्थसमपमें परिहार मस्तीसम्मापास्म मसेठरिप भसोचागि असहिग्गा भसनिग्जमा भरीक्षिणतमपसिहा मरणम सम्मविडि मस्ते भरसिम्पसमप पपिडा बसीपस्स भामा मो १ भमा कारपते हीन ५७ मा r भार तित्यपरस्स मामा भागप्पा भारपणासान मामिपिपि माण मामीरा भानुनाभिप मागासपएस भापरिपार मारिया भामरे . मावितामार मादिषसे ५. मापर्तनता- रोगीका प्रयास्पान मामिनियोतिषमान हा मातिकी सी श्रोताला पौ बारम ५१ भागामिक अवाम मेव भागमा पोरा ។ परि-पेणिवे भाचार्य बनावटी मॉलस्त्रका पस पारिमानिकी भूषिता १.पानाहरण मामोगनवा माते मासादो मानिनिमोषिकसानवाला मामाते भाषास्त्र-मथनमा भामोममा . + मासयमा माभिविमोविपनामी भारमेज भाषारो भापविग्यति माविमभावमा सपतिपरका सामान्य प्राय श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश সুব্ধ शब्द आयविसोही आराहित्ता आगरा अर्थ आत्मविशुद्धि आराधना करके आकर-सान सूत्र ग्रन्थ आज्ञासे .. आगम : : .. आणाए आया आलं आत्मा . ४६ ५७ आयारे जीवनमर्यादा आचाराङ्गमें . ढक जाय r3 .. आविरिज्जा आवस्सय आवस्सयपहरित आणुपुग्विवायगसण छह आवश्यक आवश्यकठ्यातिरिक्त आनुपूर्वीके वक्ता :: tus २२ : .. ५२ ३ .. इन्द्रभूति एक गणधर यह समान इन्द्रियप्रत्यक्ष ऋद्धिप्राप्त-लब्धिसम्पन्न इसके स्त्रीलिङ्गसे सिद्धहोनेवाली स्त्री ... १८ . इंदभूई इमो इव इदिय-पच्चक्ख इड्ढीपत्त इमीसे इत्थीलिंगसिद्ध इत्थी इमे इकसमइए इक इच्चेय इसिभासिय इहलोइयपरलोइया इट्टिविसेसा इकारसमे इकारसविहे ये सब ૩ ૨ एक समयमें ... १ एक यह ऋषिमापित इसलोक व परलोक सम्बन्धी ऋद्धिविशेप इग्यारहवें इग्यारहप्रकारके ५७ ईहा ईहायाया ईहा-मतिज्ञानका भेद ईहा अवाय ज्ञानके भेद ८r ८ भीमबम्दीमका शम्पकोश भर्भ भपता करता हरपाल स उयनी मपनशील " १७ H उपमेसेज उचारे उगम सम्गहिर उम्मगम्मि रम्गमा . अपिछवासे मोपविकी पुटिका भरपाबान पाम किपा हुआ पामकरमेमे अनुमति चिम उपमें भाषामा भरोसमानधरनासे धोभापमान रूपर रदिप उज्झरपरिराषमाणाम १८ उम्पन्न होता समग्मा उप्पचिपा गरिमोनिछे उपरिमत ग्दविंद उदारणा रविमोदर ५ . १ । हरसम सपारमा समोविएसारा मौत्पचिकी पुदि मपर नीचे भाग ऊपरा भान जसकी स्वामम-धम्त उदितोष पारिणामिकी दिम ५ौरसरम पापामा उपरान उपपारमता ज्ञानका भेट उपपोगले सात नारी अपामारेष मगमन् प्रथम हीर दोनोसोरमें सम्समा देनेटी गतिविी पास सन दुर माननको परमेपासे सासारणामामका पप पान कराने राति भोंगा भाका मेय उमौसप्रेगनमा पस्तममामी उपनामईनपरे सातगइसाभो गाईतिनि उफामिय H " भोपपालिका H श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश or शब्द সুমা 1" . . . . ५० ... ५१ उत्तरज्झयणाइ उठाणसुए उप्पत्तियाए उववेया उद्देसनकाला उद्देसणसहस्साइ उज्जाणाइ उपसग्गा उपासगदसाण उवसपज्जसेणिया उवसपज्जणावत्त उग्गा उत्तरवेउन्विणो उस्सप्पिणी गडियाओ उवउत्ते उपवत्ती अर्थ उत्तराध्ययनसूत्र उत्थानश्रुत औत्पत्तिकी बुद्धिसे युक्त हुए उद्वेशनका काल हजारों उद्देशन उद्यान बगीचा उपसर्ग-विघ्नबाधा उपासकोंकें दश अध्ययनोंका उपसम्पद्-श्रेणिका नामक परिकर्म उपसम्पादनावर्त-परिकर्मका भेद उम भयङ्कर उत्कट उत्तर विकुणावाले उत्सर्पिणी गण्डिका उपयुक्त-तल्लीन हुआ उपपत्ति-प्राप्ति अथवा उत्पत्ति " ५१ ११ १५ २१ एक एकभी एकसमयमें अकेले सिद्ध होनेवाले एक प्रकारका येही इसतरहके अन्य भी एक एक वृद्धिसे इक्कीस ... .. एग एगमवि एगसिद्ध एगविह एयाइ एवमाई एगुत्तरियाए एगवीसे एकवीस एगाइयाण एगुत्तरियाण एगट्ठियपयाइ एगगुण एवमन्ने एषमाइयाओ एए एस ... एक आदि एक उत्तरवाली " .. ५७ एकार्थक पद एक गुण इसीतरह दूसरे इसतरहके " .. ये सब यह ६७ भीमबन्दीसमका शप्पकोश मर्थ एम एमापवसगोच समय २. एतापस्त गोमपाले H मो १२ ५. म १ C. मोगामा भोगतार भोगारसेणिपा भोसप्तमीमो मोसपणीगहिषासो मोरय भोशिाम भोििदसत मोहिस्सम्पादिरा मोनिमामा भवगाना असमागवत परिकर्मकाभेद भषगाम्पेलिका परिकर्मका पौभा मेन भपसर्पणी अपसर्पिणीमणिका श्रोपमुत भवपिमान भरविसेत्र साड़ा मापिहानबारे समयमता-मन पर्ने सामा ११ ... " क को पर कमीमी . कपिमा कपारि कारमा पचायण का कणगसचरी कात्यापनगोन विमाभा कमासप्रति-अग्धविशेष पसम्म कताप सिका कापासिकपन्धविशेष काम्पस . कपासिपामो बप्पाति ५ परररिप पपिपाभो निपारमित पापा कादराम दर्पत कमिका करपाइपग्ध पामारपिक सापशेिष r H सममित भिवार कम्मरतन परियोमत्रा भापतिका कर्म कर्मभूमिनि कर्मभापदिसे पुरमा श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश ११ NN शब्द . ... :: ... ... .. ... .. ... ११ ... :: . ... . . कम्मसमुत्था कम्हा का करणसत्ती करग करिसए करिस्सामि करेइ काट काले कालिय काविलिय कालिओवएसेण कालियसुय आणुयोगिए कासव किरियावाइसयस काउस्सग्गो कुक्कुड कुचस्स कुहाई किरियाविसालपुव्यस किच्चा कुथु कुलगरगडियाओ कूडा कूव कुच्छि कुडव कुमारे केई केउभूय केवलनाण केवलनाणाणुप्पयाओ कोसियगोत्तो कोटे अर्थ মুসা कर्मीसे पैदा होनेवाली.. ... क्यों! किसीको ३६ करनेकीशक्ति या इन्द्रियोंका बल करनेवाला ३० कर्मजावुद्धिका दूसरा उदाहरण करूगा ૩૬ करताहै करनेके लिये समयमें ६० कालिक सूत्र कपिलरुते १२ कालिक उपदेशसे कालिक सूत्रोंमें अनुयोग करनेवाले ३६ काश्यप गोत्र सैकडों क्रियावादी कायोत्सर्ग औत्पत्तिकी बुद्धिका । र्थ उदाहरण वैनयिकी बुद्धिका १३ वा उदाहरण ७५ गङ्गाप्रपात आदि कुण्ड क्रिया विशाल पूर्व करके कुन्थुनाथजी १७ वें तीर्थकर ५७ पर्वतके शिखर कूप १८ अगुलका प्रमाणविशेष परिमाण विशेष ५१ कुमार-पारिणामिकी बुद्धिका ३ रा उदाहरण ७९ कोई केतुभूत परिकर्मों के अनेक भेद केवलज्ञान १९ केवलज्ञानानुप्रवाद कौशिक गोत्र ૨૬ कोष्ठक (कोठार) ... .. .. कुलकर गण्डिका ... ... १० ... ... . ... ... .

नीमचन्नीसूपका शम्मकोश सूमा भप कर्मणाविका राहदारण व समोरसरण पीमा सामोपसमिव हरण समए सपोपशमसे छोटी सापीरशामिक पारिणामिकी प्रतिका पा उमारण पारिणामिकी मुदिका र पानवारण कम्विताचार्य स्पपिर समावपाके » दिखापरिए निदपा संगई हितकात सिचमुही साहिला क्षेत्र सेमात क्षेत्रही दिसे भोलपिकी बुद्धिका बाहरम मोपधिकादिका ५५ उवामन . * ८१ " समे मोत्पतिकी बुदिका ५ राहदाहरण सीर सांसना-मनसा भेद पोटकमुस नामकमपरिगेप हासिम ग . पब परपुर मौलचिलीवुद्धिका पो उपहाम विनवणादिका र पारदामम मनपनापदिसामा रगाहरण UY . 1 " - ममम महिपापा गापिपेपार मम्माकतिप गितिगति प्रजरेसास गमवा भग्राम करनेवाले भमानको मात कराते मर्मस पैदा होनेने पारपरपसे बिर नेले पुसि पूर्व .

श्रीमनन्दीसूत्रका शब्दकोश १३ १ शब्द সুমাঞ্জ अर्थ गुणरूपरत्नसे चमकनेवाले गुणोंसे युक्त ... गुणोंसे विश्वासपात्र-प्रख्यात विशालगुणसे दीप्तिमान लोगोंके गुरु ૨ ५८ ५४ १० ६१ ७ वां उदाहरण " . ... ૩ ૬ ... ३८ गुणरयणुज्जल गुणपहिवन्न गुणपच्चइओ गुरुगुणसमिद्ध गुरु गाउयम्मि गामल्लिय गोयम। गोविंदाणपि गोल गणिया गोणे गद्दभ गहण गहाय गमिय गणिपिडग गणिय गवेसणया गवसणा गणिविज्जा गमा गरुलोववाए गडियाणुओगे गणा गणहरा गणहरगडियाओ गइ गमण गंडियाओ गध गिण्हद गुण गुहाओ गधत्ति प्रमाणविशेप ग्रामीण गौतम गोविंदनामक स्थविरको ओत्पत्तिकीवुद्धिका ११ वा उदाहरण विनयजाबुद्धिका १२ वा उदाहरण विनयजावुद्धिका १५ वा उदाहरण विनयजावुद्धिका ग्रहणकरना या वन ग्रहणकरके गमिक श्रुतका भेद गणिओंकी आगमरूपपेटी गणित गवेषणता ईहाके पांचनामोंमें तीसरा गवेपणा आभिनिबोधिकज्ञानकाभेद गणिविद्या अर्थज्ञान गरुडोपपात कालिकश्रुतकाभेद गहिकानुयोग चतुर्विधसघ गणधर गणधरगडिका गति जाना गडिका गन्धको ग्रहण करता है ३२ ... ८७ ... . " .. " ૩૬ दया आदि ૫૨ .. ४८ कन्दराएं गन्धसामान्य .. ३६ १४ भीमबन्दीमयका शम्मकोश मर्थ मा घ . प्रय पपण पोपमरण माणिविष ति पन पोरक फर्ममानुदिका । स सदाहरण भौत्पचिकीविका , पारसारण कममादिका 14 उवारण पिनपणादिका १५ पौ बारण प्राविप पति भोत्ताका प्रथम सदामाण पोटकमुख ५३ ३ पारोगा .. २२ m ५. चाउमिना परतमपटिदा पपस्वियमो पउासी पत्थे पगसति पशिरिप चालगिरिपामो परणनिधी पपति मंदारिन् परिचापारे परणकरणपसमा " ५. पर समयाम तिव नेवासे रिमतिताप गौरती सम्पानाका तुम बौदा प्रसारक पारिदिप पति-पत्रिका परमविपि लायते। पणोप पारिशेष पारिभरप भाचारमें परमकरणकी भापणा देखोगते व्यवन नरमपमें माना पारिमानिकानुदिका मारण मन्तिमसमप 4 , + पठणाण परमसमप पपी संसान परिचरमो सामीपर मेडागस्त पासनी परिवलका पुरमकानोरात. पोतामहरा दान - .

श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश १५ ~~ शब्द चाणक चित्तकार चड्डुलिय चिंता अर्थ सूत्राक चाणक्य पारिणामिकी वृद्धिका १२ वा उदाहरण ७१ चित्रकार कर्मजा बुद्धिका १२ वा उदाहरण जलती हुई लकडी मतिज्ञानका भेद ३२ च्युताच्युत-श्रेणिकापरिकर्म च्युताच्युतायत १० ... चुयाय्य सेणिया छोटा कल्पसूत्र .. चुयाचुयायत्तं चुल्लप्पसुयं चुल्लवस्थूणि चाउरत चेडग निहाणे ५६ ... .. चलिकावस्तु चार प्रकार की गतिरुप अन्तवाला चेटक निधान औत्पत्तिकी बुद्धिका- २२ वो उदाहरण चैत्य-न्यन्तरगृह प्रेरणा करनेवाला चौदहपूर्वो के जानकार चौआलीस ६३ .. चेइयाइ चोयग चोद्वसपुस्विस्स चोयाले ३६ ९ १८ ३० ... छन्विय छप्पन्नाए छविहे छ चउक्क छेइत्ता छत्तीस छेलियाइ छीय छहो छप्पन्नतरह के अन्तर्वीपोंसे छहतरहके पट्चतुष्क छेदकर छत्तीस स्वेलित अनक्षर श्रुतों का भेद छींकना ५६ .. जगत के जीव .. १ जगजीव जगगुरु जगाणंदो जगणाहो जगबंधू जगप्पियामहो जगत के गुरु जगतके आनन्द दाता जगतकेनाथ जगतके बन्धु जगतका पिता धर्म आप उसके मी पिता अतः पितामह " .. जय जयवन्त है .. ... ..

भीमसन्दीपका शपकोश समा मचिय पर्व मापनामर म मितमे जयको माहात मामला भिसस्पेि जप नितमे निमक जपा पचिपा जस्त फाममा मधिर नी जतिपाइ H . मितनी देर जितने जन " ५ जमी णम जाम ५१ प्रणमण मीनपामती जसस जसमा ਬੈਚੇ ग जकतामा जना मनमें जानीपप्रभाव पशोषण पगोड कोय जहमन जास्वामी जातिमत भवन T मनान ५१ २५ पेदार जापा जाम जानिया ५१ मूपिकजातिका जीत जाननेवाली जामनेवाले m ५५ जिण . १ ५ रागनिजी जिन मिनरेगा निगरपकौममाते र मिनरेगा यह गिहमन्त्रिपसे प्रात्मा मिनिप पचनावा पिलिप भाषणा गिपरतेपर निदर मिम्मिविपागार मिम्मिदिनगनुम्गो निम्मिदिप पुगो २४ r श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश १७ सूत्राक ३२ ३३ ४२ . ५८ ... . शब्द जिभिदिय ईहा जिभिदिय अवाए जिणपण्णता जिणवराणं जीवदया जीवाजीवा जीवाभिगमो जे जेहिं जेसिं जूय ज्यपुहुत्त जोइसस्स जोइट्ठाण जोयणाद जोइ जोणीवियाणओ अर्थ जिह्वाइन्द्रियसम्बन्धी ईहा जिह्वेन्द्रिय अवाय जिनदेयोंसे कहेगए जिनेन्द्रदेवोंके जीवों के ऊपर दया जीव अजीव जीवाभिगमसूत्र जो जिन्होंने जिनके यूका एक परिमाण यूका पृथक्त्व २ से ९ तक ज्योतिष विमानवासीका ज्योतास्थान योजन प्रमाण ज्योति योनिओको जाननेवाले... ३२ ... ३८ ... ... .. :: . " ... ... ... ܩ . झ ध्यानकरनेवाला ध्यानविभक्ति शरग झाणविभत्ती ३० .." ट टका पर्वतोंका ऊपरीभाग ... ठ ठपणा ... ३ ठाण ठाविज्जइ ठाणे ठाविज्जति ठाणसयविवाडियाणं ठाहित्ति स्थापना स्थानस्थानागसूत्र स्थापन किया जाता स्थानान्सूत्रमें स्थापन करते हैं सैकडों स्थानोंसे बढे हुए ... " .. ठहरता है। ३५ ड टोवे कर्मजावुद्रिका ' था दृष्टान्त ७७ ३ १५ भीमशमीमका शम्पकोश सुमार ५५ पम्प पचिप ण मानामर भर्य मितमे जपको वातनामस्म भिमटिपे YY जपा मचिपा जस्स जम्मणाी जपिर जितने जिनके M ५. मितनी देर " " नचिकाई M जा जितने परी जप ។ नमो णम १२ १८ गोटा जब्ता एमा जो मममें नदीपमालि पोषण भयोमब जममच मइयानपामती जसप्रेस जसमा Tr 17 छोय जम्मान सामी जातिमत मणन पैदार जापा नाग मूमिकणातिका जीत जाननेवाली जाननेवाले H H १ पायग जाणिम जिण जिणरस मिणपुरतेपण मिर निम्भिदिपपचार निम्मिविपर्षगगुम्गड़े निलिदिप मत्पुम्पो ५ रागषषिणपी जिन मिनरेगा मिनापनकोपमा मयूर मिनदेमि श्रेष्ठ मिमम्निषते मात्र भिाविप बनाया मिन्त्रिप माप r २९ श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश १७ सूत्राङ्क ३२ 33 ... .. " ५८ . शब्द जिभिदिय ईहा जिभिदिय अवाए जिणपण्णत्ता जिणवराणं जीवदया जीवाजीवा जीवाभिगमो जे जेहिं जेसिं जूय जूयपुहुत्त जोइसस्स जोइट्ठाण जोयणाइ जोइ जोणीवियाणओ अर्थ जिह्वाइन्द्रियसम्बन्धी ईहा जिह्वेन्द्रिय अवाय जिनदेयोंसे कहेगए जिनेन्द्रदेवोंके जीवोंके ऊपर दया जीव अजीव जीवाभिगमसूत्र जो जिन्होंने जिनके यूका एक परिमाण यूका पृथक्त्व २ से ९ तक ज्योतिष विमानवासीका ज्योत:स्थान योजन प्रमाण ज्योति योनिओंको जाननेवाले... ३२ .. ... ३८ १r .. ... " १८ . ... ... .. ... " .. १ . झ ... 30 झरग साणविभत्ती ध्यानकरनेवाला ध्यानविभक्ति ट टका पर्वतोंका ऊपरीभाग ठ ... ... १ ठपणा ठाणं ठाविज्जइ ठाणे ठाविज्जति ठाणसयविवाट्टियाण ठाहित्ति स्थापना स्थानस्थानान्सूत्र स्थापन किया जाता स्थानाङ्गसूत्रमें स्थापन करते हैं सैकड़ों स्थानोंसे पढ़े हुए %3D ठहरता है ३५ ड डोये कर्मजावुद्धिका • था दृशान्त ७७ १८ श्रीमचन्दीमूत्रका शम्मकोश मर्थ भ - मामासजमुम पापम्गुभापरिए निपते कानदानगुण नागार्जुनाचा नामक स्थपिर निजामत-निकोबार निस्प-महा त बमो ५ २५ सम भत्तो वृती-सीसो उत्तपात पसे इसीतरह क्वनम्तर तो मी (तथापि) सत्प तृप नापिकी शिकायत पापर गर्म मरमम तलहरसौषक ११ पपर एक तम्रण नाभेग तपनिबन नारियर तरनमे सर नपम तपनियमें नपपम नास्पा रताको TU ५१ " H. " मपरिमान भाररमकामेषाने ५ नरसेन नपाररमिन में मदुलममातिय मन्बुस मासिक १ जैसे कि प्रहकारिक मर तप भाषारने T नापारे HH श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश १९ सूत्राक ६३ १५ ... ૨. ... २१ २२ अर्थ स्त्री तीर्थकर चारतार्थ तीर्थकर तीर्थमें सिद्ध होनेवाले तीर्थकरसिद्ध तीन समयों में सिद्धहोनेवाले तिर्यक्-तिरछे त्रिवर्ग तीन प्रकारका तीनोंका तेंतीस तीन वर्ग तीन उद्देशनकाल त्रिगुण-तीनगुणा तीर्थीका आरम्भ १५ ७३ ५ .. " ५४ - ५७ .. .. तीस सख्या शब्द स्थि तित्थंकरा तित्थ तित्थयर तित्थसिद्धा तित्थयरसिद्धा तिसमयसिद्ध तिरिय तिवग्ग तिविह तिह तित्तीस तिन्नि वग्गा तिन्नि उद्देसणकाला तिगुणं तित्थपपत्तणाणि तीसा तीस तीए तिसमुइसाय कित्ति तिसमयाहारग तुगियं तुण्णाए तुरगजुत्त तेणं तेहि तेयरिंग निसग्गाण . तेरासिय तेवीस तेण तेरसमें तेरसेव ते तेलुकनिरिक्सिय तिमिर ओघ पिप्पमुके .. " ५७ २९ तीस भूत तीनसमुद्रोंतक ख्यातकीर्ति तीनसमयतक आहारकरनेवाला तुगिकानगरविशेष कर्मजाबुद्धिका ५ वा उदाहरण २६ घोडासे युक्त ६ ३६ .. उसमें उनसे तेजोऽनि निसर्ग त्रैराशिक मत विशेष तेस उसकेवाद तेरहवा तेरह ही ... ... ." :: ५७ वे सब ३७ तीन लोकसे देखे गए अन्धकारसमूहसे रहित ..

१० भीमसेनीसूत्रका शम्मकोश मर्थ एमा ५. तपोकम्मगशिपामो सपालमपगिका स्थावर मीन ग पूर्णिम प्रतम पारिणामिकी पूर्वका २१पा उदारण स्मभद पारि अदिका उदारम . एमसंघर पने " बसोबासि पसामो बन्दालपस्थितिमा ५ पसारपसलामो इमपणा पससमय सिद पामुमतितारए २१ द दातासे पैदा हुमा रपयममपान सैप का प्रमों ट्रम्प एशकासिम पथाथताप परास्थामरासि पर पा-ममपरिगेष पणिकानुयोगकका चौपा ने प्रम्मपष पासमों में सिद्ध पपापुमान नपुम दर्शन विरार माता नापारमै दत्तसहपायें दरिषद पारमा भार रेषसम्बन्धी देश गमा सितम रविरमारन-मुका मेव सिदोरयते इसिसमुद्र दुषमणी स्मति दुटिप-पहानी दोनोश " सिम्मति देसमाबाद विहिलामो दिना शि दिसमस्त RREमातमा RIमोधरसेन दौरसमुह दूतपमि इमिना २९ श्रीमनन्दीसूत्रका शब्दकोश २१ सूत्राक ८ ५८ शब्द दोसु देसेण दिवसतो धम्मवर धरणोववाए धरणा धणदत्ते १२ ... धम्मायरिया धम्मकहाओ ५ अर्थ दोनोंमें एकदेशसे एक दिनके भीतर श्रेष्ठ धर्म धरणोपपात श्रुतभेद मतिज्ञानका नाम धनदत्त० पारिणा० बुद्धिका ७ वा उदाहरण धर्माचार्य धर्मकथाएँ मतिज्ञान का भेद र हाथ का एक प्रमाण २ से ९ धनुषतक धारण करता है धारण करनेवाले धेर्यरूप पराक्रम धीर पापरूपमलको दूर करनेवाले धेर्यरूप तटसे युक्त ध्रुव धारणा . धण वा १४ .. ૩૬ घणपुहुत्त धाइ धारए घिइपरकम धीरा धुयरय धिइवेलापरिगय धुवे ३९ ३५ 3 ११ न २१ नमो नमि नेमि नपुसगलिगसिद्ध नर न भव न भविस्सइ नस्थि नगराइ नवमे ५७ नमस्कार हो नमिनाथ २१ वें तीर्थङ्कर नेमिनाथ २२ वें तीर्थकर नपुसकलिङ्गी सिद्ध मनुष्य नहीं होता है नहीं होगा नहीं है नगर नवमें नहीं नन्दनवन के समानमनोहर नगररूपरथ ५१ ५१ ५७ न नदणवणमणहर नगर रह १३ ... .

नीमचनीसूबका शप्पकोश मविल सपम मंदिसणे । मर्ष मन्दिसम्ममण पारिणामिकी भूपिका ठा उदाहरण मशुमा मंदीस्त्र नम्दालत परिकर्मकामेव सानोपात मापार्नुनपाचमुस्म मंदी मैदावरी मामुखोप नागग्गुमरापर Tr मागिम मोपपिरोप मागार्नुम कारिक ५ ५ नागमरिणि नामस्म मार भाग माणए जामनेरे लिपे 7 महारोप मोसनिकी दिशा । . मातिपररान मामागोता नामधिया माताजणा " ५४ भावाचम्मकाओ D नारपाई भापपरिमापतिबाभो माजापारे मावा पारिवामिकी पुषिका ५ पदारण ममेकनराकी पनिवास TP भनेझम्पयनरामे जमना पामीर माताधर्मकपा मापरस्म मानक भादि मागपपापालिका सामाचारमें ग्दाहरणपहाताना माननेपाळ माग पुरके साथ निषिते मिटा मा मित्प निरत रानेवाल पापपुर मिरमुचिर्मासिनी निगर मासी मी था निरषगममा निचरमति नरको पमन निएन किया जाता श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश २३ মান্ধ .. अर्थ बंधा गया विशेष रीतीसे बांधेगए नियुक्तिएँ साधुओंके निशीथ सूत्र शब्द निबद्ध निकाइया निज्जुत्तीओ निग्गंथाणं निसीहो निच्चुग्घाडिओ निष्फज्जइ निस्सिंघिय निच्छूढ नियमा नीसमिय निव्वोदए 73 . सदा सुला हुआ निष्पन्न होता है अनक्षर श्रुत का भेद ५५ श्रुतका भेद . ૫૬ ३९ ७५ निमित्ते ५५ ५६ .. १३ नियम सुना हुआ छप्परसे गिरा हुआ पानी-विनयजा बुद्धिका १४ वा उदाहरण निमित्तशास्त्र-विनयजा बुद्धिका पहला उदाहरण लगातार कहा हुआ मायासहित-मायावी सदा हठात् लिया हुआ निर्मल निर्वृति-शान्तिसुस नारकिओंका नारकी जीव मानस प्रत्यक्ष नोइन्द्रिय नो इन्द्रिय का अर्थावग्रह नो इन्द्रियसम्बन्धी ईहा नो इन्द्रियसम्बन्धी अवाय नो इन्द्रियसम्बन्धी धारणा नहीं पक्षान्तरमें नहीं ९ निरतर निविट्ठ निम्माओ निच्च नियमूसिय निम्मल निष्वुइ नेरइयाण नेरइय नोइदियपच्चक्स नोइदियाण नो इदिय अस्थुग्गहे नो इदिय ईहा नो इद्रिय अवाए नो इदिय धारणा नो नो चेच ... ३४ ... ३ ३० ૩ ૨ . 33 ३६ " प पभयो उत्पत्तिस्थान ... ९ भीमबन्दीस्त्रका शम्मकोश - M ५ अर्थ परमतावलम्बीप पके मागको रोकनेवाले पांच मयताप स्थिर कर्णिकाला पापर पाके श्रीमनवीर समपर प्रमसत्तामी ममाषURA मसमविच पप्र-मोत्पविकी पुदिनाको बारम मामकरनेष . H . परतिषियमा पानामग पंपमानम चिरकागिप पमित्प पामसे पमाग पसनमन पचे पचे पषप पपभो पणमामि पार पापपणी परिपपसरमि पपिपर पणिनिकष पपर्ण पग्णा परिस पात पुणत पुमान पीपगमसामग्म पाहम पपार पवित्र कर ममाम करत चरणोंको 1 " सैको मनासशिष्मति प्रपतार मणामकारक मपण ។ ५ १२ मीपवनामसामी तीधार पुमइम्ससामा में सीपार मौका पपितनि माननीय प्रकीय ५ पानी पुस्त पुरित -- समापी अशवरापुराण पतवनिहत पम्प पुमषत पन्धविशेष पुरुपको रदेश करके महापन किये जाते? मापन किए जाने। पपासर " 71 H H . Ne ... . परिपतन पपिराम । 7 H H H श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश २५ शब्द अर्थ सूत्राक ४३ ... पमा पडिक्कमण पच्चक्खाण पण्णवणा ... ... .. . . प्रभा प्रतिक्रमण चतुर्थ अध्याय प्रत्याख्यान प्रज्ञापनासूत्र प्रमादाप्रमादश्रुत पौरुषीमण्डलश्रुत पुष्पिकाश्रुत पुष्पचूलिका प्रकीर्णक सहस्र पारिणामिकी बुद्धिसे प्रत्येक बुद्ध भी श्रोताके उदाहरणमें चतुर्थ दृष्टान्त प्रश्नव्याकरण १० वा अङ्ग पांच प्रकारके परिमित प्रतिपत्ति ... प्रथम पचीस पचासी . " ५१ ... .. " ... ... " ... पमायप्पमाय पोरिसिमंडलं पुफियाओ पुप्फचलियाओ पइन्नगसहस्सा पारिणामियाए पत्तेयबुद्धावि परिपुण्णग पण्हावागरणाइ पंचविहे परित्ता पडिवत्तीओ पठमे पणवीसं पंचासीह पयसहस्साई पयम्गणं परसमए पासंडिय पदमारा परवणा पल्लवम्गे पचमे पव्यज्जामो परियागा पोसहोववास पहिवज्जणया पडिमाओ पाओवगमणाइ पुणवोहिलामा पसिणसयं हजारों पद ... .. . . .. " :: ... ... .. .. ... पदपरिमाणसे अन्यमत अन्यतीर्थी झुके हुए शिखर प्ररूपणा पल्लवाय-संक्षिप्त परिचय पांचवें दीचाएं दीक्षासमय पौषध उपवास स्वीकार करना श्रमण और श्रावकोंका व्रतविशेष पादपोपगमन-सथारा फिर सम्यग-ज्ञानका लाभ सैकड़ों प्रश्न ५० ५२ ... ... ..

२६ भीममन्दीसमका शमकोश सूमार पसिमापसिमस पणवार्स H भ फिनपूरे क्षेत्रों मम पैंतालीस पाच प्रकार परिकर्म रिसायका प्रकार प्रत्येकमुद कर सिट र पुरुषलिली सिद परम्पर-संगतार सिद प्रसपनपोम्प का चोप मत्पक्षशान परोशमान 1 परिकाम्मे पचेपालि पुरित हिंगसिद्ध परंपरविध पम्यपणजोग पचपसमाण परोक्सनाम पम्मरपति २२ पशापन करते। पुन ५ पजिप ७ १ . H पथर पर पा पुते पचे पावस चपिपरो १४ पूर्व मानविशेष मोत्पपिली मुश्किा रा उदाहरण कर्मणा विकासबारम कर्मणा बुद्धिका .का उपारण मोत्पचिकी मुखिका ५वा उदाहरण पति भोस पुनिका १५ पदारण पुष भोप पुष्किा का पारण पत्र मौष मुश्मि 4 सपा R पचारमा " पंचनामपिया r परसन पारियोपनिष पुरिते परियोनिग्मा पभबग पुम्प मार परिसरमा पपिसप्पमान बाउदा पांच मचानता पारंपार भाचि भापके पांच मामि दूसरा नाम पाच मान प्रतिहा-पारणाका बर्ष मैप मापमा प्रतियोगकररान्त पुरुष जमायेचा समय महारह पोसमेरामा प्रश्पस प्रहातमारनेमा " H प्रक्षेप विधामाताभा M श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश अर्थ মুসান্ধ ३६ प्रवाहयुक्त करेगा . -- पूर्ण प्रवेश करता है देखे शब्द पवाहेहित्ति पूरिय पविसह पासिज्जा पडिसवेइज्जा पुढे पराघाए पन्ना पूइएहिं अनुभव करे स्पृष्ट-स्पर्श किये ८७ पणीयं .. " " .. " पुषगए पुट्ठसेणिया पाढो आगासपयाड पडिग्गहो पुहावत्त पण्णवीसा पन्नरस पाणाउपुव्व पञ्चक्खाणप्पवाय पुवमवा परिमाणं परियहण पाहुडा पाहुड पाहुडा पाहुडियाओ पाहुह पाहुडियाओ पडुप्पण्णकाले पंचत्थिकाए पुन्वविसारया पहिपुच्छइ पसंग पारायणं परिणि? पढमो परिणयापरिणय प्रत्याधात होनेपर-पीछे टकरानेपर ८६ प्रज्ञा-आमिनिबोधिक ज्ञानका ९ मा नाम पूजित हुए तीर्थकरोंने प्रणीत पूर्वगत दृष्टिवादका ३ रा भेद पृष्टश्रेणिका परिकर्मका ३ रा भेद सिद्धश्रेणिका परिकर्मका चतुर्थं भेद परियह मनुष्यश्रोणिका परिकमका ११ वा भेद पृष्टावर्त-पृष्टश्रेणिकापरिकर्मका ११ वा भेद पचास पन्द्रह-पश्चदश प्राणायुःपूर्व-पूर्वगतका १२ वा भेद प्रत्याख्यानप्रवाद ९ मा भेद पूर्वमव परिमाण-संख्या पर्यटन प्राभृत-दृष्टिवादका प्रकरण विशेष प्राभृत प्रामृत प्राभृतिका प्राभृत प्राभृतिका उपस्थित-वर्तमानकालमें पश्चास्तिकाय १४ पूर्वीमें निपुण पीछे शङ्कास्थलको पूछता है अवसरमें निपुण होना. परिनिष्ठित-पूर्ण पहला बाईस प्रकारके सूत्रोंमें २ रा भेद " " " " ११ भीमचम्पीमका शम्पकोश शम्य मर्य सूचार मंत पामर चमकतामा समुसा मार स्वारे ४ १५ मासिदिपपवार भासिदिप जमुग्मो कास फासेपि पासे पासिदिपादिमाखरं मापन सन्द्रिपावस सोनिपम्पचनावमा सपको पहस्सा ऐसा सको सोशिप सम्मि अक्षर परिपाकाको ५५ पारिम्सम्माप पापपर पामापप . भनेक मारकी सामाशि भनेक नगरो पईमानक माविमान मकता पभोर पर भनेकों पदम्पनसामी बचीव पहारको बामम भामेर गणिका बारा बाप-मनामविशेष बाग्मय परतता मौसतिकी पुरी दसान पमाणशामिरस पचीसार बाहुपसिया पम्प नरिधाओ पारसभे N -- ५. पाडण पुरी RIR .. H पासनामास्वपिर महानिक ग्राRNA बगदीरमसि बापर किर पिरासी २२ पोका प्रदरण दूसरे - N H पीता H .

श्रीमान्दीसूत्रका शब्दकोश २ सूत्रा ... .. .. ... ... अर्थ बुद्धबोधित बुद्धवचन-बौद्धमन्य बुद्धि बुद्धिका समझना चाहिए सम्यगज्ञानका लाभ दूसरा अङ्गीकारसूचक ध्वनि बुद्धिगुणोंसे ५ शब्द युवोहिय बुवयणं बुद्धी बुद्धीए योद्यो बोहिलाम बीमो चाढकार बुद्धिगुणेहिं पीईवइंसु बीईवयति बीईवइस्संति ... . . ... अन्त करगए ५ अन्त करते है अन्त करेंगे भ भगवान् भद्र-कल्याण भगवान्का भद्रबाहु स्वामी स्थविर कथन करनेवाले स्थविर भद्रगुप्त ... .. भयवं भद्द भगवओ मद्ववाह मणग मद्वगुत्त मवियजण भवभय भगवते मवे भवपच्चइय भारिज्जमु भाग भरहम्मि मइयत्वा मंते। भावे भावभो भवत्थकेवलनाण भासद भूयहियप्पगठभे भूयदिन :: . . : . मन्यजन ससारकी भीति भगवन्तोको संसारमें भवप्रत्ययिक अवधिज्ञान भरा-पूर्ण किया भाग-हिस्सा अर्द्धभरतमें चाहिए भगवन् । मावोंकों भावसे भवस्थ केवलज्ञान चोलता है जीवोंके हितमें निर्भय भूतदिन्न नामके स्थविर ६ १ . ... .. .. : ..

भीममन्त्रीस्त्रका शब्दकोश मपा ५० . . . मर्थ पायपिशेप, मोताका मा उदारण समान ले। औसधिको मुनिका मपम उपामण औषधिकी वृद्धिका मलग स्वारम कठिम कार्यको पार लगामेमें समर्थ ते। मर भावगा पापोंसे मापसे मणना-मनिपवपन भामरत्याग भगवन्तेषि मपसिदिक भगवानगणिका मम्पममम्म पता होमा मासिक मरा मरनिरपरमसमत्या मोति मरविधि मगतिमि मारमो मपणा मचपचतामा मगताण मासिदिमा परिपा मपिपममनिया भा मविस्मा ममिमो गचाई मावासमोरीमो . ५२ " " मापारीहमपेमिसे भारतमामक पग्य मागपत यम्य मापरव माता मिक्स मिने मीनापुरपक्ष मिक्ष मेषस्तु मपूर्ण परिमि मीमानरोक पम्प पुमा n ५. re म पामा २ मम्ममा भगतम् मातार महिमापातम्मा ९ अगित मामा मनपा श्रीमनन्दीसूत्रका शब्दकोश १ शब्द सूत्राङ्क माढर महागिरि महुरवाणिं मवरयाणं महिस मसग r८ ५१ मणपज्जवनाण १ १० मणुस्ताण मज्झगय मग्गओ अंतगय मणी महुसित्थ मिढ " मग १० - ११ अर्थ माठर ग्रन्थविशेष महागिरि नामक स्थविर मीठी पाणीवाले मृदुतामें सलम श्रोताका ६ ठा दृष्टान्त श्रोताका ७ वां दृष्टान्त मन.पर्यवज्ञान मनुष्योंका मध्यगत पृष्ठतः अन्तगत पारिणामिकी बुद्धिका १८ वा उदाहरण औत्पत्तिकी बुद्धिका १७ वां उदाहरण औत्प बुद्धिका ३ रा उदाहरण औत्प बुद्धिका १४ वां उदाहरण मस्तकपर महान् मर्त्यलोकमें मतिज्ञानपूर्वक मति-आमिनियोधिक ज्ञानका नाम मतिज्ञान मार्गणता-ईहा-मतिज्ञानका नाम सरावा-मिट्टीका छोटा पात्र मार्गणा-मतिज्ञानका नाम पूजित महाकल्पश्रुत महाप्रज्ञापना महानिशीथसूत्र महतीविमान-प्रविभक्ति ग्रन्थ महास्वप्नभावन नामक ग्रन्थ मरणविभक्ति नामक ग्रन्थ मनोगत मायोको मण्डलप्रवेश ग्रन्थ मध्यके तीर्थवरोंके मनुष्यश्रेणिकापरिकर्म मनुण्यावर्त परिकर्मका मेद मत्थए महत मणुयलोए मइपुन्व मई मइनाण मग्गणया ५९ . २५ ૨ ૨ मल्लग ३ " " मगणा महिय महाकप्पसुय महापण्णवणा महानिसीह महल्लिया विमाण-पविभत्ति महासुमिण मावणाण मरणविभत्ती मनोगए महलपयेस मझिमगाण मणुस्ससेणियापरिकम्मे मणुस्सावत्त " ५७ भीमधनीसूत्रका शवकोश पम्प H - म पी ((भा)-मोल पुदिका ५ो उदारण " मातृकाप-परिम्भका मेव मात्रानि मनुम्मसेनमें नेपाल मिमा मिम्बारिमसि मियाभुत मिभ्मावसे परिणीत मृमका बच्चा मृदु मारने, पुज मुनिवररस मूमेव से पूर्ण द्राक्षापमतमान कान्तिपाने मारपापपर्य माचा माणसविचनिय मिपाती मिमादिदि मिपामु मिच्चपरिगरिपाई मिपसाब मिसमपर्सपो मुकिपरम्पदाम- मुहिपामसपनिमन मुमुचतो मोचि मुदिप यात्म " T तक मतिर कर्मणा पुषिका ५वा बदामण भोप पुदिका वा सवारण माचा पूत मुख-पोरसमस अन्धविशेष भूमपथमानुचोप ५. मूळपामाणुओगे मुनियो मुभिवचने मुस्तान N मेम मेम्समबर मोरनयंत मोरिषपुचे मुनिमि पेष्ठ मोसार उप राना-मनुपोगनिपि मेष-मतिमानमा एक नाम पारगमलेर नाचते समोर मोपुर-मवर तामामा वणवर प मोर . १७ . . 17 (परिसर रक्त रलसि ही मौषीतकमाचारम पावामा १५ H H सिरियनमस्त पारिमतो रहा +6 .. . .. . ... १r शब्द रयणकरंडगभूय रक्सिओ रेवइनक्सत्तनाम रयणमिद रुययम्मि रयणि साविदन्बाई रयणप्पमाए रुक्स रहिए रुक्खाओ राया रावेहित्ति रुवं रुवात्ति रस रसोत्ति रसे .. रसणिंदिय-लद्विअक्सरं रायपसेणियं रामायणं रायाणो रासिचद्धं रायपर सिरीओ अर्थ सूत्राक रत्नोंकी पेटीके समान ... ३२ रक्षित रक्खा रेवतीनक्षत्र नामवाले ३५ रत्नके समान ૫૨ रुचकद्वीपमें ५९ रत्निप्रमाण-१ हाथ रूपी द्रव्योंका १६ रत्नप्रमानामकपृथ्वीके. वृक्ष रथिक-विनयजा बुद्धिका ११ वा उदाहरण वृक्षसे ७५ राजा आई (गीला ) करेगा ३६ रूप कोई रूप है ऐसा रसको ... .. .. " " . .. यह रस है " ३९ रसनेन्द्रिय-लब्यक्षर राजमश्नीयसूत्र रामायण-रामचरित्र ४२ .. परिकर्मका अवान्तर भेद श्रेष्ठ राजलक्ष्मी ल लक्षण लक्षणोंसे प्रशस्त-उत्तम १४ लक्षण लक्सणपसत्थे लदिअक्सर लिक्स लिक्सपुहुत्त लेह लोगबिंदुसारपुन्व लोग लोयालोय ५ ૪૨ लिक्षा-प्रमाणविशेष लिक्षा पृथकत्व-२ से ९ तक लेख लोकविन्दुसार-पूर्वीका एक मेद लोक लोकालोक ५७ १४ ...

२० स्वाद सोरिषणाम स्लेगाव म होस्पि नामक स्थविर सौकापति-मतका प्राय प पेरोनिक-मैपाकिएन m पासेसिप पम्पपलिया पक्ष्योवार पण पल्लोपपात-पम्पपिशेष ५. " पामाण पामाणपरिच पस्तु-रिसादका एक मा पर्तमान वर्षमान पारिवषम बाता परसाप मिलपमें म्पक्षनर्णमेव पाइन्द्रप . . पसार्पमि पंजर्य पर्वत बयासी जम्म बोलते हुएको . ७. पारे पपरिणाम पाजोप . पति-कर्मणा भुक्षिका मी सकारण पारिपामिकी बुदिका ५ना सवारण बाका परिणाम पागनोगवाम श्रुत वर्णन किया भाषाम पदनाममपन माकरम H Tr , समय श्रवण पाई पम्परम बातचरिकामो पापमा वापरप-प्रास्ता पास पासपुर पागरेमविषामो रममा सिटम शिस्तरे पाचना-पाठ जारों म्पास्मान ५ - पमा सेवा पामदेषगणिका Ram-मेव विपुसमाति बात भपिक पिस्वारपासा १४ .

श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश ३५ सूत्राङ्क अर्थ अन्धकाररहित अतिशय शुद्ध :: . . २५ ८५ ... १२ . ३३ . " विज्ञप्ति-विज्ञापना विनयसे होनेवाली विशेषतायुक्त कथनकरे विशेषतासे शुद्ध होता हुआ विशेषज्ञान विपाकसूत्र व्याख्याप्रज्ञप्ति ( भगवतीसूत्र ) विद्याचरण-विनिश्चय ग्रन्थ विहारकल्प विमान प्रविभक्ति वृत्ति-व्यवहार विज्ञाता-विशेषज्ञ भगवती सूत्रमें व्याख्यात किये जाते हैं व्याख्यात किया जाता विचित्र-विविधतायुक्त... अतिशययुक्त विद्याएँ ... ... . " शब्द वितिमिरतराए विसुद्धतर विण्णत्ति विणयसमुत्था विसेसिया वियागरे विभुज्झमाण विन्नाणे विवागम्य विवाहपन्नत्ति विज्जाचरण विणिच्छओ विहारकप्पो विमाण पविभाती वित्तीओ विण्णाया विवाहे विआहिज्जति विआहिज्जति विचित्ता विज्जाइसया विवागसुयं विप्पजहणसेणिया विप्पजहणावत्त विविह विराहित्ता विही वीयरागमुय विवाहचूलिया वीरियायारे धीमंसा वियालणे वियावत्तं पीसेढी बुच्छित्ति चूह ... ५० . ५३ . विपाक सूत्र ५६ ५७ . " विप्रजहच्छ्रेणिका-परिकर्मका भेद विप्रजहदावर्त विविध विराधना करके अनुयोग-विधि वीतराग श्रुत :: ३ . . . व्याख्या चूलिका वीर्याचार विमर्श-मतिज्ञानका ३ रा भेद ईहाका स्थानविचालन 1 . सूत्रका १५ घी मेद . ८६ ... विषम श्रेणि विच्छेद होना समूह ...

मीमबन्दीसमका शम्मकोश मर्थ पादिसे डी पा पापा पेसमोसार परोपपर पापपाई देव विनयजा दि पेपरणोपपात बेहपरोपपात लपिक पादिमौका इपितापनि ३१.२ 140 सटणक्य समामहिपामो पसिमोश पप-मिमित शरमद्धिका-यपरिशेप " H सदिसत H समिनिस्तमाण सिनसभपमिद शिबनान 1 पष्ठितम्य पम्पपिरोष सतोपा-आप साम सस्पेफ-संस्बा करने योग्य पुम्दी पामीन मेता मा संपात समपके सिव सम्पर्श माम सम्मेष की भाषा पानिपा परप मामे पांव साधु साथी, भातक पारिकाप अपमपिविध शामित्म भाचार्य विमा गरे तापम प्रेमेष जीन H “ - संगमामो सभामबर सेब संजमविवि H १ मुचितम मा सेजपाजप सेजपा मविनि मामिची पारिक भ हेचतापस-पापक संपत्तप्रवा-िसाधु पमिमारि-मिथान सम्पमा गम्तिनामनी १६ तीर सम्मपनामनी रेवीपार राशि-मममजीवीधर . + - श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश মা ૨૬ ... ३८ ... ... १० .. ... ... १३ १६ १२ ... अर्थ सम्भत नामक स्थविर अपरिमित स्वाध्यायोंको धरनेपाले उत्पन्न होता हे अच्टीतरह पहन करता हुआ चारों तरफ संक्षेपसे सब ओरसे मर्यटर्शिाने सर्वदिशा सम्बन्धी सबसे अधिक सब भाकि सब द्रव्योंको सभी जीवोंका सब द्रव्योंके परिणामको सिद्धान्तोसे . . ... . १३ . ... ... ૨૨ ... r३ ... ૨૨ ... ४२ ... होते हुए .. शब्द समय सजसायमणतधरे समुपजह समुन्यहमाणे सपओ समंता समासओ सबओ सध्यदरिसीहि सम्बदिसाग सव्यपहु सध्यभावाण सम्बदवाई सधजीयाणं मि सम्बदख्ख परिणाम ... समएहि समाणा सम्मत्त परिग्गाहियार सम्मत्तउत्तणओ सपक्म दिहिओ सपज्जवसियं सव्वागासपएसगं सव्यागासपएसेहिं समवाओ ससमए ससमयपरसमए सत्तट्ठीए सम्माबुब्मावणया समुद्देसणकाला सवभावदेसणय सयय सरिन्वय समणाणं समुहाणसुए सजोगिमवत्था सयंयुद्धसिद्ध " ... " 13 ... .. सम्यक् रूपसे ग्रहण किये गए सम्यक्त्यके हेतु होनेसे... अपने पक्षकी दृष्टिओंको अन्तवाला या श्रुतका एकभेद सर्व आकाशके प्रदेशायको सर्वाकाश-प्रदेशोसे समवायागपत्र स्वसिद्धान्त रघपर दोनों सिद्धान्त सततठ सद्भावोंका विस्तार करना समुद्देशनकाल सर्व मावोंका उपदेशक सदा समान घयवाले साधुओंका समुत्थान श्रुत सयोगिभवस्था स्वयम्बुद्धसिद्ध-सिद्धोका भेद ... ० ... २७ .. ... . ... .. १९ २१ भीमन्नन्दीसमका शवकोश मगसिद्ध मनिक्रिम अर्थ सगिहिद-सिदोडा व सहम सबमार पन्द्रप जीर भैपत्तिकी एरिता उदाहरण मोत्यक्षिणी मुदिका २५ मारम मा समागम . ता t. . . ता सीमारी मामा . A - भाना " साधित पाम मामा परि रानि मापा मा २८ पुस भेर मामपिी पुगिगाम ५ तपुरमा मापु-परिणामिका nिdin पासारिणमिरी पुहिका वादा पाना-मायातमाम शएमा गपणे in-MAMIमार पी सम्पापन-मनालमेर मना " भगाभाग भारत मरस 4. .. 4 4 " HALA . مزدا - 4. هنرہرا کرادا ۱۱ کي مليلية नागरिमा ratnaduindian Lum Hal. ADAu" . - .. - - श्रीमन्नन्दीसूत्रका शब्दकोश ३९ सूत्राङ्क ८ .. ११ .. . .. . . . समणगणसहस्सपत्त संघचक्क संघसमुद्द सघमहामदर सावगजणमहुअरि सघनगर सिट्टि सिल सिक्खा सिज्जस सिज्जंभव सीयल सिलायलुज्जल सीलपहागूसिंय सिलोगा सीसा सुयरयण सुअ . अर्थ साधुसमूहरूप विशाल कमल सघरूपचक सघरूप समुद्र संघरूप मन्दराचल श्रावकरूप भ्रमर सघरूप नगर पारिणामिकी बुद्धिका २ रा उदाहरण औत्पत्तिकी बुद्धिका २ रा उदाहरण.. २३ वा उदाहरण श्रेयांसनाथजी, ११ वे तीर्थकर शय्यम्मवस्थविर शीतलनाथजी, १० वें तीर्थकर शिलातल उज्ज्वल शीलरूप पताकासे उच्च श्लोक शिष्य श्रुतरूप रत्न श्रुत सुन्दर कन्दरा देवदानवोंसे वन्दित शीलरूप सुगन्धियुक्त श्रुतज्ञानपरोक्ष १३ ६ ० ... . २ सुदर दर 3 १३ ३८ ... सुनता है ... ८५ स्वप्न स्वप्न है ... सुरासुरनमंसिय सुरभिसील सुयनाणपरोक्स सुणेइ सुमिणे सुमिणेत्ति सुणिज्जा सुत्त सुयनिस्सिय सुत्तत्थ सुयअन्नाणं सुयनाण सुहमयर सुहुमो सूइज्जइ सूयगडे सुने सूत्र श्रुतनिश्रित मतिज्ञानका भेद .. ८१ सूत्रार्थ ७३ श्रुत अज्ञान श्रुतज्ञान २५ अधिक सूक्ष्म सुक्ष्म सुत्रित किए जाते हैं सूत्रकृताङ्ग ४० भीममम्मीसूत्रका हाम्मकोश पसंपा भूमिममाषणा सरपम्मची भर्प भुतस्कम सामाषन नामक पम्भपिप तर्पमानि म अपवरामी सौरम इदशा मुवास पिसरसामा अर्गपि सुमपारसमसिम सर समा फुपम सुपास मुम्म । सुमतिनापणी, ५ वीर सुममनाथजी, सीधार सुपानापणी, साभार गुमासामी, ५२ पपवर सुस्ति स्थपिर नित्य शामित्वमाता अमेधा मपिपनिचानिन उसमय मुपसानरपरप समाळ सममिन उपाय पार सेहपण शुक्सागरके पारगामी भविष मूड 4. अहात भारपारक पोताला प्रथम पदाहरण सेसा उपेविप मोन्दिप मोत्पचिकी मुदिका. स्थि स्पानि परिषसमरिमामो हरिवनपणिका मेवारी पसमिष पति गोप मतमोध मिपम्सनामक हारिव Rषमुच शिमरंत समाराम तमस्तरिमे विनिस्सेषतामा हिमाचसो मुल पातामा विमान- H

नीमन्नन्दीसूत्रका गन्दकोश
सूत्राङ्क
९६
३८
अर्थ
होते है
स्वीकारसूचक ध्वनि
हेतु
सेकडों हेतु
हेतु
हेतूपदेशसे
कर्मजा चुद्रिका प्रथम उदाहरण
होता है ..
हुँति
हुंकार
हेउ
हेतुसत
हेऊ
हेऊवएसेण
हेरपिणए
होड
.
४०
७७

8o प्रीमचन्दीसूका शायकोश सुमार अर्थ मुतस्कम्प समावन माम पापविशेष m अपसंपा निगमारमा पग्याची सहुति - तमनधि सभा अपडीतरामी १. सुपपारसमसिहर सूर वा भुवयप पिसापाला . २ " सुमतिनापनी, ५२ तीमार सुषमनायनी, तीधार मुपार्मनापजी, भार सुभास्तामी, ५३ पणपर सास्ति स्थापिर मिल भनिस्पके हावा २. अच्छे साधु » मुमम मुपास सुसम्म उत्यि भुममिपनिपानिय मुतमम मुपत्तागरपारण समाळ जमुमिप सत्ताप पार सेहपम से देशा मोतिष पुगतागरके पारगामी +++ भनिराप मूड - H समस्त समापदभारक मोसाका प्रथम उदाहाल - H पाही पोन्दिप मोत्पषिती पुदिना हा पहरण W एपनि लिसीरामो हरिरागिरा ५. १० - पलामो मत प्रेम परालगोप AAAAEमापमम हिमापरलेल्प ममपराकी MAणामको साती पारित हिमा समातम Ratnaरिक RAAT " १ 14 पगामा . पमानर-माविशाल H

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-- . भीमपन्दीसमका शमकोश सूचना-पिपरमें होमेसे शपकोष पुग्यमानी पिगोपर न रापा गया मता उसमें गुरु माविमा राणा प्रताकारण विशेषनाम र पारिमापिक रोग पपकरण मी उसमें मकिपा मपा । मुम पाठक उनको सुधारक परे । विशेषा- पृष्ठ परिक प्रहपाठ पोम्प शिम्पाशे भनुमोगर्ने समालेगा भनम्व समपड़े भनिभिन्न नगरनि भसंस्मात समपरे भात सिकार का सामा परपते एक समपकी स्थितियाते कपर मीरा भाग एक से बहनेवासे Y १ १४ ६ १ १ १९ " . ५ M १३ ५ पग-पग समानका रत्पाद सोना-चोरमुख मामा पाप प्रगमप परागते पूर्व गुमणस्पपिक अपमिशाल चौथे समपमें विश मेने परम्पमामि...नार मणमासे-सतमपसे सेस्टितारिक मनसरपुलका मेर पथानामक निसके 2. . 4 १ भन पाकमतेम जसका परेमा हीसरे समपर्ने सिबनेपा प, म कामास-पि तेदास पर समपके लिए १ " 11 2 २३ १५ सरकोपमें रेप समारी दिला पाई पाई पाठक थापा भने महोपानसे समजले। क्षyा.

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. Y १ । २४ ४२ भीमचन्दीनका शमकोश सूचना-रिसरमें होनेसे रायप पुरभीजीके दाहियोचर नही करापा ममा मता समें भगदिमा यगई। शामनाकार विशेषनाम र पारिभाषिक मोगपरण भी उसमें नहीं किया गया । सुन्न पाठक उनको पारणे परें। मिग- पठ पदि पाठ पोप शियोंहो भनुपागमें सपालाले ममम्त घमपड़े मनिधिष्ण रोमन भसंस्पात समपके भापतिकारपकास सामारपसे एक समयकी पत्तिबाले कपरमरिका माम एक से बदमेवासे ३५ प्परग उपग-पग १५ समानका सत्पाद सोग्गा-चोपन्मुस नामक पाय ३५ मुषमप परागसे पूर्ण मुममत्पपिक मपविज्ञान बपि समयमें सिद प्रेमेसी पपपपापि... पार नपा-ससमक्ते १५ सेन्टिताविक मनभरपुलका मेव पानामक गिसके २ - २. H " ५ R . १४ D १. . मेटा वाकमसेकम जोहा हरेमा सीसरे प्रमप सिद्ध नेपाहे प, मध, कामरस-भिपन ३२ ए समपड़े सिप मानात आपकोप पेपह या विषा गया है, पर पास गामा पा स्पो भारकोप्पामते समपते। दिया।

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Shrimannandisutram

Author
Muni, Shri Hastimallo
Title
Shrimannandisutram
File name
Shrimannandisutram
Text
OCR done
Citation
1942
Published
2011/09
Publisher
Puna, Aryabhushan Mudranalaya
Language
Sanskrit
Pages
294
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314172
Barcode
99999990312312.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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