Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Teen Mote
Front matter
No text on this page.
यू. ओलेशा तीन मोट,
Юрий Олена
ТРИ ТОЛСТЯКА
Ra Joke Tundu
"
"
अनुवादक : मदन लाल
मधु'
पाठको से
प्रगति प्रकाशन इस पुस्तक की विषय-वस्तु , अनुवाद और डिजाइन
सम्बन्धी आपके विचार जानकर आपका अनुगृहीत होगा। आपके
अन्य सुझाव प्राप्त करके भी हमे बडी प्रसन्नता होगी। कृपया हमे इस
पते पर लिखिये:
प्रगति प्रकाशन , २१, जूबोस्की बुलवार, मास्को, सोषियत सघ ।
अनुक्रम
पहला भाग
नट तिवुल
8
पहला अध्याय । डाक्टर गास्पर पार्नेरो दिन भर परेशान रहे .
दूसरा अध्याय । जल्लादों के दस तस्ते
तीसरा अध्याय । सितारे का चौक
१५
.
२१
दूसरा भाग
उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया
.
.
५८
चौथा अध्याय । गुब्बारेवाले के साथ पया कुछ बोतो
पाचवां अध्याय । नीनो और पत्तागोभी का कल्ला .
छठा अध्याय । अप्रत्याशित परिस्थितियां .
सातवां अध्याय । अजीब गुड़िया की रात .
तीसरा भाग
सूत्रोक
.
.
६७
आठयां अध्याय । छोटी-सी अभिनेत्री की कठिन भूमिका
नौवां अध्याय । तेज भूखवाली गुड़िया .
दसवां अध्याय । चिड़ियाघर
१०६
૧૧૭
५
चोया भाग
हथियारसाज प्रोस्पेरो
१२६
१३८
.
.
ग्यारहवा अध्याय । मिठाईघर का बुरा हाल हो गया
वारहवा अध्याय । नृत्य शिक्षक एक-दो-तीन
तेरहवा अध्याय । विजय हुई
उपसंहार
१४४
पहला भाग नट तिंशुल
No text on this page.
पहला अध्याय
डाक्टर गास्पर पार्नेरी दिन भर परेशान रहे
जादूगरों के जमाने लद चुके हैं। सच तो यह है कि जादूगर कभी थे ही नहीं। उनकी
तो केवल कल्पना की गयी थी, बहुत ही छोटे-छोटे बालकों को सुनाने के लिये उनके बारे
में मनगढन्त कहानियां गढ़ी गयी थी। दर असल कुछ ऐसे मदारी जरूर थे जो ऐसी होशियारी
से सभी तरह के तमाशाई लोगों की आंखों में धूल झोंक पाते थे कि उन्हें मन्न फूकने और
टोने करनेवाले तथा जादूगर समझा जाता था।
कभी एक डाक्टर होते थे। उनका नाम था गास्पर आर्नेरी। भोले-भाले लोग , मेले-
ठेले में घुमक्कड़ी करनेवाले और अधकचरे विद्यार्थी उन्हे भी जादूगर मान सकते थे। वास्तव
मे ये डाक्टर बड़े-बड़े अद्भत काम करते थे जो सचमुच अजूवे ही लगते थे। भोले-भाले लोगों
का उल्लू बनानेवाले मदारियों और जादूगरों जैसी उनमें कोई बात नही थी।
डाक्टर गास्पर आर्नेरी वैज्ञानिक थे। उन्होंने कोई सौ विद्यायें पढ़ी थीं। देश भर में
उनसे अधिक समझदार व्यक्ति , उनकी टक्कर का विद्वान नहीं था।
डाक्टर की विद्वत्ता की सभी में धाक थी- क्या चक्कीवालों, क्या फौजियों,
महिलाओं और क्या मन्त्रियों में। स्कूल के बालक उनके बारे में जो गाना गाते थे, उसकी
स्थायी थी-
उड़कर तारौं तक जो जाये।
दुम से पकड़ लोमड़ी लाये ॥
जो पत्थर से भाप बनाये।
बड़े करिश्मे कर दिखलाये ।।
जिसके गुण का वार न पार।
अद्भुत है डाक्टर गास्पर ।
क्या
३
. . . जून महीने के एक सुहाने दिन डाक्टर गास्पर ने तरह-तरह की धासें और गुवरले जमा करने के लिये लम्बी सैर को जाने का इरादा बनाया। डाक्टर गास्पर जवान न थे और आधी पानी से घबराते थे। घर से रवाना होने के पहले उन्होने गर्दन पर मोटा गुलूबन्द लपेट लिया, धूल-मिट्टी से आखो का बचाव कहने के लिये चश्मा चढा लिया और हाथ मे छडी ले ली ताकि कही ठोकर न लग जाये। यो कहना चाहिये कि उन्होने बडी सावधानी से सैर-सपाटे के लिये जाने की तैयारी की। दिन बहुत ही प्यारा था। सूरज था कि चमकता ही जा रहा था। घास ऐसी हरी हरी थी कि मुह में पानी भर भर पाता था , हवा मे फूलो का पराग उड रहा था, पक्षी चहचहा रहे थे, बॉल-नाच के फूले-फूले फ्रॉक की तरह हल्की-हल्की हवा लहरा रही थी। "दिन तो खूब बढिया है," डाक्टर ने अपने आप से कहा, "फिर भी बरसाती तो साथ ले ही लेनी चाहिये। गर्मी के मौसम का भरोसा ही क्या जाने कब पानी बरसने लगे। जरूरी प्रादेश देकर डाक्टर ने चश्मे को साफ किया, सूटकेस से मिलता-जुलता हरे रग का थैला उठाया और चल दिये। सैर-सपाटे के लिये सबसे अच्छी जगह नगर के बाहर थी, तीन मोटा के महल के नज़दीक। डाक्टर अक्सर यही जाते थे। तीन मोटो का महल बहुत बडे पार्क के बीचोबीच था। पार्क के गिर्द गहरी-गहरी खाइया थी। खाइयो के ऊपर लोहे के काले पुल बने हुए थे। इन पुलो की रक्षा करते महल के सतरी, पीले पखो वाली मोमजामे की काली टोपिया पहने हुए। पार्क के गिर्द क्षितिज को छूती हुई चरागाहे थी, जिनमे तरह-तरह के फूल खिले थे, वृक्षो के झुरमुट थे और ताल-तलया थी। खूब ही जगह थी यह सैर-सपाटे के लिये। यहा तरह-तरह की घासें उगी हुई थी, बहुत ही खूबसूरत गुवरलो का गुजार सुनाई देता था और बहुत ही प्यारे-प्यारे पक्षी चहचहाते थे। 'जगह बहुत दूर है, पैदल चलने से थक जाऊगा, डाक्टर ने सोचा। के छोर तक जाकर घोडा-गाडी ले लूगा और उसमे बैठकर महल के पार्क तक पहुच जाऊगा। माज नगर के छोर पर, हमेशा की तुलना में कही अधिक लोग दिखाई दिये। N " . " " नगर १० , . 'क्या प्राज इतवार है?" डाक्टर सोच में पड़ गये, “नहीं तो! आज तो मंगलवार है।" डाक्टर नजदीक गये। चौक में लोगों की भारी भीड़ थी। डाक्टर को वहां दिखाई दिये हरे कफ़ों वाली सलेटी ऊनी जाकटें पहने कुछ दस्तकार; जहाजी , जिनके चेहरों पर मौसम की छाप अंकित थी; रंगीन वास्कटें डटे धनी व्यापारी, उनकी बीवियां गुलाब के पौधों की शक्ल के स्कर्ट पहने और सुराहियां , ट्रे, आइसक्रीम के डिब्बे और अंगीठियां लिये हुए विक्रेता एवं गलियों- वाजारों में अभिनय करनेवाले दुबले-पतले अभिनेता जो हरी, पीली और अन्य रंग-बिरंगी पोशाकें पहने थे और जो चिथड़ों से सिली हुई रजाइयों जैसे लगते थे। वहां बहुत ही छोटे- छोटे वालक भी थे जो लाल रंग के खुशमिज़ाज कुत्तों को पूछों से पकड़कर घसीट रहे थे। सभी नगर के फाटकों की ओर जा रहे थे। लोहे के बने बड़े-बड़े और मकानों के समान ऊंचे फाटक बन्द थे। 'फाटक क्यों बन्द है ?" डाक्टर को हैरानी हुई। लोग शोर मचा रहे थे, ऊंचे ऊंचे बातें कर रहे थे, चीख-चिल्ला और भला-बुरा कह रहे थे। मगर किसलिये? यह समझ पाना सम्भव नहीं था। डाक्टर एक जवान औरत के पास गये जो अपने हाथों में मोटी-सी भूरी बिल्ली उठाये थी। उन्होंने पूछा-- 'जरा यह बताने की कृपा कीजिये कि यह सब क्या किस्सा है ? यहां इतनी भीड़ क्यों जमा है, लोग इतने उत्तेजित क्यों है और नगर के फाटक क्यों बन्द कर दिये गये है ?" "सैनिक नगर के लोगों को बाहर नहीं जाने देते..." सो क्यों? ताकि वे उनकी मदद न कर सकें पहले ही निकलकर तीन मोटों के महल की ओर जा चुके है। "श्रीमती जी क्षमा कीजिये, मगर वात मेरी समझ में आई नहीं..." "हे भगवान! क्या आपको यह भी नहीं मालूम कि आज हथियारसाज प्रोस्पैरो और नट तियुल लोगों को लेकर गये हैं कि हल्ला बोलकर तीन मोटों के महल पर कब्जा कर लिया जाये?" 'हथियारसाज प्रोस्पेरो?" "हा, हां... चारदीवारी तो बहुत ऊंची है और फाटक के पीछे बैठे हैं निशानेवाज़ सैनिक । अब कोई भी तो नगर से बाहर नहीं जा पाता और जो लोग हथियारसाज़ के साथ गये है, उन्हें महल के सैनिक मार डालेंगे। और सचमुच ही, बहुत दूर से गोलियां दाने को कुछ हल्की-सी आवाजें सुनाई दी। " " " " कबूतर ज़ोर-ज़ोर पख औरत के हाथ से मोटी बिल्ली छूट गई। वह गुधे हुए आटे की तरह नीचे जा गिरी। भीड जोर से चीख उठी। इसका मतलब यह है कि एक बहुत बड़ी घटना घट गयी और मुझे उसका पता तक नही लगा, डाक्टर ने सोचा । “हा, मै तो महीने भर से अपने कमरे मे ही बन्द रहा है। वाहर निकला ही नही, वही काम करता रहा। मुझे तो दीन-दुनिया की खबर ही नही रही इसी समय , कुछ और दूरी पर, कई बार तोप की धाय-धाय सुनाई दी। तोप का धडाका गेद की तरह हवा में उछला और वातावरण मे झूल-सा गया। न केवल डाक्टर ही काप उठे और कुछ कदम पीछे हट गये, बल्कि भीड मे जमा सभी लोगो के दिल दहल उठे और वे इधर-उधर बिखर गये। बच्चे रोने लगे, फडफडाते हुए उडने लगे और कुत्ते बैठकर हूकने लगे। तोप की धाय-धाय जोर पकडती गयी। ऐसा शोर मच गया कि वयान से बाहर। लोगा की भीड फाटक के और नज़दीक जाकर चिल्लाने लगी- 'प्रोस्पेरो। प्रोस्पेरो।" 'तीन मोटे मुर्दाबाद।" डाक्टर गास्पर के तो होश हवा हो गये। लोगो ने उन्हे पहचान लिया, क्योकि बहुत से उन्हे जानते थे। कुछ लोग तो उनकी ओर भागे मानो डाक्टर उनकी रक्षा कर सकते हो। मगर डाक्टर तो ख द जैसे-तैसे अपने प्रासुप्रो पर काबू पा रहे थे। "जाने वहा क्या हो रहा है? कैसे मालूम किया जाये कि वहा फाटका के पीछे क्या हो रहा है ? मुमकिन है कि लोग जीत जाये ? मगर यह भी हो सकता है कि उन सबको मौत के घाट उतार दिया गया हो इसी समय कोई दसेक व्यक्ति उस चौक की ओर दौडे , जहा तग-सी तीन गलिया मिलती थी। वहा नुक्क्ड पर पुराने और ऊचे बुर्जवाला एक मयान था। औरो के साथ-माय डाक्टर ने भी बुर्ज पर चढने का इरादा बना लिया। नीचे की मजिल पर गुसलपाने से मिलती-जुलती लाड़ी थी। वहा तहखाने के समान अधेरा था। ऊपर जाने के लिये चार- दार जीना था। छोटी छोटी पिडरियो से रोशनी पा रही थी, मगर बहुत ही कम । सभी लोग बहुत ही धीरे-धीरे और मुश्किल से ऊपर चढ रहे थे। ऐसा इसलिये भी था वि जीना यस्ताहाल था और रेलिग भी टूटी-फूटी थी। इस बात की कल्पना तो की ही जा सकती है कि डाक्टर गास्पर ये लिये सबसे ऊपरवाली मजिल पर पहुंचना बिनना पटिन था। पर तो वे अभी वीरावी पैडी पर ही पहुंचे थे कि प्रधेरे में चीय उठे- "हाय , मेरा दिल निाना जाता है और मेरे जूने की एक एडी टूट गई। . " १२ डाक्टर अपनी बरसाती तो तोप के दसवीं वार गरजने के बाद चौक में ही खो बैठे थे। बुर्ज के ऊपर पत्थरों की मुंडेर से घिरी हुई चौड़ी-सी छत थी। यहां से कम से कम पचास किलोमीटर तक का दृश्य दिखाई दे रहा था। दृश्य बेशक रमणीक था, मगर उसपर मुग्ध होने , उसे सराहने की फुर्सत ही कहां थी। सभी की नजर उधर लगी हुई थी जहां लड़ाई हो रही थी। "मेरे पास दूरवीन है। मैं हमेशा पाठ शीशों वाली दूरवीन अपने पास रखता हूं। यह लो!" डाक्टर ने कहा और पेटी खोलकर दूरबीन लोगों की ओर बढ़ाई। सभी लोग एक-एक करके दूरबीन में से देखने लगे। डाक्टर गास्पर को हरे-भरे खुले मैदान में बहुत-से लोग दिखाई दिये। वे नगर की ओर भागे आ रहे थे , सिर पर पैर रखकर। दूर से वे रंग-बिरगे झण्डों जैसे प्रतीत हो रहे थे। घुड़सवार सैनिक उनका पीछा कर रहे थे। डाक्टर गास्पर को यह सारा दृश्य मामादीप के एक चिन्न जैसा प्रतीत हुआ। सूरज ख व चमक रहा था, हरियाली चमचमा रही थी। गोले रूई के टुकड़ों की तरह फटते और घड़ी भर के लिये उनकी चमक ऐसे कौधती मानो कोई दर्पण द्वारा सूर्य की किरण को प्रतिबिम्बित कर रहा हो। घोड़े पिछली टांगों पर खड़े होते थे और लट्ट, की तरह घूमते थे। तीन मोटों का पार्क और महल सफ़ेद और पारदर्शी धुएं की जाली में लिपटे हुए थे। "वे भाग रहे है !" "वे भागे आ रहे है ... लोग हार गये !" भागे आ रहे लोग नगर के करीब पहुंचते जा रहे थे। बहुत-से लोग रास्ते में ही गिर पड़े थे। ऐसा लगता था मानो घास पर रंग-बिरंगे चिथड़े बिखरा दिये गये हों। एक गोला दनदनाता हुआ चौक के ऊपर से गुजरा। कोई बुरी तरह डर गया और उसने दूरबीन नीचे गिरा दी। गोला फटा और छत पर खड़े लोग बुर्ज से नीचे भाग चले । इनमें एक तालासाज भी था। उसका चमड़े का पेशबन्द किसी हुक में अटक गया। उसने मुड़कर देखा, उसे कोई भयानक दृश्य दिखाई दिया और वह गला फाड़कर चिल्ला उठा- 'भागो! उन्होंने हथियारसाज प्रोस्पेरो को पकड़ लिया! वे अब नगर में आये कि आये !" चौक में खलबली मच गयी। लोग झटपट फाटकों से दूर हट गये और चौक से गलियों की ओर भाग चले। गोलियों की ठा-ठा से सभी के कानों के पर्दे फटने लगे। १३ से बाहर डाक्टर गास्पर और दो अन्य व्यक्ति बुर्ज की तीसरी मजिल पर ही रुख गये। वे मोटी दीवार में बनी हुई छोटी-सी खिडकी मे से झाकने लगे। खिडकी इतनी छोटी थी कि केवल एक व्यक्ति ही ढग देख सकता था। बाकियो को तो जरा-सी झलक ही मिल सकती थी। डाक्टर भी झलक ही पा रहे थे। मगर वह झलक भी काफी भयानक थी। लोहे के बडे-बडे फाटक पूरी तरह खोल दिये गये थे। लगभग तीन सौ व्यक्ति इन फाटको से एकदम बाहर आये। ये हरे कफो वाली सलेटी ऊनी जाकटें पहने हुए दस्तकार थे। सून से लथ- पथ ये लोग जमीन पर गिरते जा रहे थे। सैनिको के घोडे इनके सिरो पर चढे पा रहे थे। सैनिक तलवारो से वार कर रहे थे, गोलिया दाग रहे थे। उनकी मोमजामे की चमकती हुई काली टोपियो मे लगे पीले पख लहरा रहे थे। घोडे अपने लाल-लाल मुह बोलते थे, जिनमें से झाग निकल रहा था और वे अपने दोदे इधर-उधर धुमा रहे थे। "वह देखिये। उधर देखिये। वह डाक्टर चिल्लाये। हथियारसाज प्रोस्पेरो को रस्से से वाधकर घसीटा जा रहा था। वह कुछ कदम चलता, गिर पडता और फिर उठता। उसके लाल बाल उलझे-उलझाये . रहा प्रोस्पेरो।
हुए थे, चेहरा खून से लथ-पथ था और उसके गले में मोटे रस्से का फंदा पड़ा हुआ था। "प्रोस्पेरो। बन्दी बना लिया गया !" डाक्टर चिल्लाये। इसी समय एक गोला लांड्री पर आकर गिरा। बुर्ज झुका, झूल-सा गया, घड़ी भर के लिये टेढ़े रुख सम्भला रहा और फिर धड़ाम से नीचे जा गिरा। डाक्टर भी कलाबाजियां खाते हुए नीचे जा पहुंचे और अपने बूट की दूसरी एड़ी, छड़ी, थले और चश्मे से हाथ धो बैठे। दूसरा अध्याय जल्लादों के दस तख्ते नीचे तो जा गिरे कलाबाजियां खाते हुए, मगर कुशल ही रही। उनका सिर भी नहीं फटा और टांगें भी सही-सलामत रहीं। मगर इससे क्या! बेशक हड्डी-पसली सलामत रही, फिर भी गिरते हुए बुर्ज के साथ नीचे जा गिरने में तो कोई मजा नहीं हो सकता खास तौर पर डाक्टर जैसे व्यक्ति के लिये, जो जवानी की मंजिल लांघकर बुढ़ापे में कदम रख चुका हो। डर से ही डाक्टर बेहोश हो गये। जव उन्हें होश आया तो शाम हो चुकी थी। डाक्टर ने अपने इर्दगिर्द नजर डाली- "प्रोह , क्या मुसीवत है ! जाहिर है कि ऐनक तो चूरचूर हो गयी। ऐनक के विना मुझे सम्भवतः ऐसा ही नजर आता है जैसा कि अच्छी नजरवाले व्यक्ति को उस समय जव वह ऐनक चढ़ा लेता है। यह तो बहुत बुरी बात है।" इसके बाद वह टूटी हुई एड़ियों के बारे में बड़बड़ाते रहे - "मेरा तो वैसे ही कद छोटा है और अब एक इंच और छोटा हो जाऊंगा। या शायद दो इंच, क्योंकि दोनों एड़ियां टूट गयी हैं। नहीं, नहीं, केवल एक इंच ही..." वह मलबे के ढेर पर पड़ा हुआ था। लगभग पूरे का पूरा पुर्ज गिर गया था। दीवार का लम्बा-लम्बा और पतला-पतला टुकड़ा हड्डी की तरह बाहर को निकला हुमा था। कही बहुत दूर से संगीत की स्वरलहरी सुनाई दे रही थी। वाल्व की दिलकश धुन हवा के पंखों पर उड़ती हुई पाती, खो जाती और फिर से सुनाई न देती। डाक्टर ने ऊपर की ओर नजर डाली। ऊपर विभिन्न दशाओं में काली टूटी हुई कड़ियां लटकी हुई थी। शाम के हरे-से भाकाश में तारे झिलमिला रहे थे। "जाने यह वाल्ल की धुन कहां से सुनाई दे रही है!" डाक्टर आश्चर्यचकित हुए।
बरसाती के बिना ठड महसूस होने लगी। चौक मे एकदम सन्नाटा था। कराहते हुए डाक्टर पत्थरो के ढेर पर से उठे और उन्होने किसी के वडे-से बूट से ठोकर खाई। तालासाज़ एक कडी के आर-पार पडा हुआ आकाश को ताक रहा था। डाक्टर ने उसे हिलाया-डुलाया। मगर तालासाज नही उठा । वह मर चुका था। डाक्टर ने मृत व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करने को टोप उतारने के लिये हाथ वढाया- " "अोह, टोप भी गया। तो अब मैं क्या करू डाक्टर चौक से चल दिये। सडक पर लोग पडे थे। डाक्टर ने झुककर हरेक को निकट से देखा। उनकी खुली हुई फैली-फली आखो मे सितारे प्रतिविम्बित हो रहे थे। उन्होंने उनके माथे छुए जो वहुत ठण्डे और रक्त से भीगे हुए थे जो रात के समय काला-काला दिखाई दे रहा था। "तो यह हुआ। यह हुमा डाक्टर फुसफुसाये। इसका मतलब है कि लोग हार गये.. तो अब क्या होगा?" आधे घण्टे बाद वे वहा पहुचे जहा लोग दिखाई दिये। वे बहुत थक चुचे थे, बेहद भूखे-प्यासे थे। शहर के इस हिस्से मे हर दिन का सा दृश्य था। डाक्टर चौराहे पर खडे थे, काफी देर तक चलते रहने के बाद थोडा दम लेते हुए सोच रहे थे- "कैसी अजीव वात है। यहा रग-विरगी वत्तिया जल रही है , घोडा-गाडिया प्रा-जा रही है , शीशे के दरवाजे खुल और वन्द हो रहे है। अर्ध-गोलाकार खिडकियो मे से सुनहरी रोशनी छन रही है। वहा स्तम्भो के करीब जोडे नाच रहे है। लोग नाच-रग मे डूबे हुए है। काले-काले पानी के ऊपर रग-विरगी चीनी हाडिया घूम रही हैं। लोग उसी तरह से अपनी रास-रग की दुनिया मे मस्त है , जैसे एक दिन पहले थे। क्या वे यह नही जानने कि आज सुवह क्या काण्ड हुअा है? क्या उन्होने गोलिया की ठाय-ठाय और लोगो पी पाह- पराहे नही सुनी? क्या उन्हें यह मालूम नहीं कि जननेता, हथियारसाच प्रोस्पेरो को गिरफ्तार कर लिया गया है ? हो सकता है कि ऐसा कुछ भी न हुआ हो? शायद मैने कोई भयानक सपना देया हो?" सडप ये नुक्कड पर एक लम्प जल रहा था और पटरी ये साय पोडा-गाडियां मतार याचे पडी पी। मालिने गुलाब बेच रही थी और योचवान उनसे बाते पर रहे थे। " उसके गले में पदा डालर नगर भर में से धमीटा गया। मोह, बेचारा।" 'मय उसे सोहे ये पिजरे मे बन्द पर दिया गया है। पिजरा तीन मोटा में महत
No text on this page.
ये ले तीन गुलाब। रोने की कोई बात नहीं। ये लोग विद्रोही है। अगर उन्हें लोहे
के पिजरो मे वन्द नही किया गया तो ये हमारे घर-वार, कपडो-लत्तो और गुलाबा पर कब्जा
कर लेगे और हमारे टुबडे-टुकडे पर डालेगे।"
इसी वक्त एक छोक्रा दौडता हुअा पाम ने गुजरा। पहले तो उसने महिला के सितारा
जडे लबादे को सीचा और फिर लडकी की चोटी खीची।
"अरी प्रो महारानी।" लडका चिल्लाया।
'अगर हथियारसाज प्रोस्पेरो पिजरे म
वन्द है तो क्या हुअा, नट तिवुल तो आज़ाद है।"
श्रोह, शैतान ।"
महिला ने पैर पटके और उसका पमं नीचे गिर गया। मालिन ठठाकर हस
पडी। माटे कोचवान ने इस शोर-शरावे से फायदा उठाया और महिला से घोडा गाडी मे
वैठकर चल देने का प्रस्ताव दिया।
महिला और लडकी घोडा-गाडी में बैठकर चली गयी।
'अरे, जरा सुन तो कूद-फाद करनेवाले ।" एक मालिन ने लडके को पुकारा।
इधर तो आ । तुझे जो कुछ मालूम है वह जरा हमे भी तो सुना
दो कोचवान अपनी ऊची सीटो से नीचे उतरे और बडे-बडे पाच कालरो वाले अपने
चोगो से उलझते हुए मालिनो के पास पाये।
"यह हुमा न चाबुक । बढिया चावुक
उस लम्चे चाबुक की ओर देखते हुए लडके
ने सोचा जिसे कोचवान सटकारता था। लडवे वा मन ऐसा चाबुक पाने के लिये ललक
ठा मगर अनेक कारणवश उसके लिए ऐसा चावुक पाना सम्भव नहीं था।
हा, तो क्या कहा तू ने?" कोचवान न भारी भरकम आवाज़ में पूछा।
'नट तिबुल
अाजाद है?
EPTIBIRHIA
41
,
।
"
'ऐसा सुनने में आया है। मैं बन्दरगाह पर गया था, वही ऐसा सुना..."
'क्या सैनिकों ने उसकी हत्या नही कर डाली?" दूसरे कोचवान की आवाज भी
भारी-भरकम थी।
'नहीं, बड़े मियां... अरी सुन्दरी, मुझे एक गुलाब दे दे!"
'ठहर रे, उल्लू ! पहले तू सारा किस्सा तो सुना..
"हां। तो किस्सा यह है कि शुरू में सभी ने यह समझा कि नट तिबुल मारा गया।
बाद में जब मुदों में उसे तलाश किया गया तो वह नहीं मिला।"
'क्या यह नहीं हो सकता कि उसे नहर में फेंक दिया गया हो ?" कोचवान ने पूछा।
एक भिखमंगा भी बातचीत में शामिल हो गया।
"किसे फेंक दिया गया हो नहर में?" उसने पूछा। नट तिबुल कोई विल्ली का
बच्चा थोड़े ही है। उसे डुबो देना ख़ाला जी का घर नहीं है। नट तिबुल जिन्दा है। वधकर
भाग निकला!'
"तुम झूठ बक रहे हो, घनचक्कर!" कोचवान ने कहा।
'नट तिबुल जिन्दा है !" मालिने खुशी से चिल्ला उठी।
छोकरे ने एक गुलाब झपटा और सिर पर पैर रखकर भाग चला। गीले फूल से पानी
के छोटे डाक्टर पर जा गिरे। डाक्टर ने चेहरे से आंसुओं की तरह खारे छोटे पोंछे और
भिख मंगे की वातें सुनने के लिये करीव जाकर खड़े हो गये।
"
"
- मगर इसी समय कुछ परिस्थितियो ने बातचीत में गलल डाल दिया। सड़क पर एक विचिन-सा जुलूस प्रकट हुा । प्रागे-पागे दो धुडसवार थे, मशालें लिये हुए। मशाले दहाती हुई दाढियो की तरह लहरा रही थी। उनके पीछे-पीछे राज्यचिह्न वाली काली घोडा-गाडी धीरे-धीरे पा रही थी। घोडा-गाडी के पीछे-पीछे चले पा रहे थे वढई। कोई एकः सौ। वढई अपनी प्रास्तीने ऊपर चढाये हुए, काम में जुट जाने के लिये विल्कुल तैयार थे। वे पेशयन्द वाधे थे, पारे और रन्दे उठाये हुए तया बगल मे औजारों के बक्से दबाये हुए थे। जुलूस के दोनो ओर सैनिक थे। उनके घोडे तेजी से दौड़ने को उतावले थे और वे उनकी लगामे खीचकर उन्हे काबू में रस रहे थे। 'यह कैसा जुलूस है ? यह क्या मामला है?" राहगीरो ने उत्तेजित होते हुए एक दूसरे से पूछा। राज्यचिह्न वाली घोडा-गाडी मे तीन मोटो की परिषद् का एक कर्मचारी बैठा था। मालिने डर गयी। वै गालो पर हथेलिया रखे हुए उसके सिर को ताक रही थी। उसका सिर शीशे के दरवाजे मे से नजर आ रहा था। सडक जगमग कर रही थी। काले विगवाला सिर ऐसे हिल रहा था मानो वह निर्जीव हो। ऐसा प्रतीत होता था मानो घोडा-गाडी में आदमी नहीं, कोई पक्षी बैठा हो। 'रास्ते से हट जाग्रो।" सनिक चिल्लाये। 'वढई कहा जा रहे है?" नाटी-सी मालिन ने सैनिको के सरदार से पूछा सैनिको का सरदार उसके चेहरे के निकट मुह करके इतने जोर से चीखा कि मालिन के वाल मानो हवा के झोके से लहरा उठे- 'वढई जल्लादो के तख्ने वनाने जा रहे है। समझी ? बढई ऐसे दस तख्ते बनायेगे !" मालिन के हाथ से रकाबी छूट गयी। गुलाब के फूल बिखर गये। "वे जल्लादो के तख्ते बनाने जा रहे हैं!" डाक्टर गास्पर ने भयभीत होते हुए दोहराया। हा, तख्ते !" सैनिक ने घूमते और मूछो के बीच से , जो बडे-बडे जूतो जैसी लगती थी, दात दिखाते हुए कहा। "सभी विद्रोहियो के लिए तख्ने बनाये जायेंगे ! सभी के सिर धड से अलग किये जायेंगे ! उन सभी के जो तीन मोटो की सत्ता के विरुद्ध सिर उठायेगे" डाक्टर का सिर चकराने लगा। उन्हे प्रतीत हुया कि वे बेहोश हो जायेंगे। 'आज मुझे बहुत-सी परेशानियो का मुह देखना पडा है," उन्होने अपने आप से कहा। 'इसके अलावा मेरे पेट मे चूहे वूद रहे है और में बुरी तरह यक्-टूट भी गया है। जल्दी से घर जाना चाहिए। । - प्रा!" .
. वास्तव में ही डाक्टर को अब माराम करने की बड़ी जरूरत थी। वे उस दिन घटी घटनाओं, देयी और सुनी चीजों से इतने अधिक उत्तेजित थे कि बुर्ज के साथ नीचे जा गिरने, टोप, वरसाती, छड़ी और एड़िया खो देने का भी उनके लिए कोई महत्त्व नही रह गया था। जाहिर है कि सबसे बुरी बात तो यह थी कि ऐनक से हाथ धो बैठे थे। सो व एक बग्घी में बैठकर घर की ओर चल दिये। - . . तीसरा अध्याय सितारे का चौक . . कटर अपने घर लौट रहे थे। बग्घी चौडी-चौड़ी पक्की सड़कों पर से जा रही थी। डाक्टर सड़कें दीवानखानों से भी ज्यादा जगमगा रही थी। बहुत ऊंचाई पर लैम्पो की शृंखला फैली हुई थी। लम्प शीशे के ऐसे गोलों जैसे थे जिनमे मानो सफेद उवला हुआ दूध भरा हो। लम्पों के गिर्द ढेरों ढेर पतंगे उड़ रहे थे, हल्की-सी सरसराहट का गीत गुनगुनाते हुए जल रहे थे। बग्घी नदी के किनारेवाली सड़क पर जा रही थी, पथरीली दीवार के साथ-साथ । वहां कासे के ववर पंजो में ढालें लिये लम्बी-लम्बी जवाने निकाले हुए थे। नीचे गाढ़ा- गाढ़ा पानी धीरे-धीरे वह रहा था, राल की तरह काला-काला और चमकदार। पानी में नगर उल्टा प्रतिविम्बित हो रहा था, वह मानो तैरना चाहता था, मगर नहीं तैर पाता था और कोमल सुनहरे धब्बों में ही धुलकर रह जाता था। डाक्टर की बग्घी मेहराव की तरह खमदार पुलों के ऊपर से गुजरी। नीचे से अथवा दूसरे किनारे से वे उन विल्लियो जैसे लग रहे थे जो झपटने से पहले अपनी लोहे की पीठों में खम डाल रही हों। यहां हर पुल के शुरू में सन्तरी नजर आते थे। वे ढोलों पर बैठे हुए पाइपों से कश लगा रहे थे, ताश खेल रहे थे और तारों को ताकते हुए जम्हाइयां ले रहे थे । डाक्टर बग्घी में जा रहे थे, इधर-उधर देख रहे थे और आवाजों पर कान लगाए हुए थे। गलियो, मकानों और शरावखानो की खुली खिड़कियों और मनोरंजन पार्को से किसी गीत की बिखरी-विखरायी पंक्तियां सुनाई दे रही थी- + . कैद किया प्रोस्पेरो को अब वन्दी उसे बनाया। बैठा लोहे के पिंजरे में अब वह काबू पाया ।।
। नशे में धुत्त एक वाका-छैला भी इन्ही पक्तियो को दोहरा रहा था। इस वा छैन की मौसी चल बसी थी। मौसी के पास ढेरो रपया था और उससे भी ज्यादा झाइया थी। नज़दीकी रिश्तेदार उसका एक भी नहीं था। सो मौसी का सारा धन वारे को विरासत मे मिल गया। इसीलिए अब वह इस बात पर झुझला रहा था कि जनता ने धनिया की सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का झडा ऊपर उठाया था। चिडियाघर मे बढिया तमाशा हो रहा था। लक्डी के मच पर तीन माटे-माटे और झवरीले बन्दर तीन मोटो के रूप में प्रस्तुत थे। एक कुत्ता मेडोलीन पर धुन वजा रहा था। सुर्ख पोशाक पहने, पीठ पर सुनहरा सूरज और पेट पर सुनहरा सितारा लगाये हुए एक मसखरा वाद्ययन्त्रा की सगत मे इस कविता का पाठ कर रहा था- गेहू के वोरो से मोटे तीनो लुढके जाये। काम न कोई इन्हे और ता केवल तोद फुलायें। इनकी अरे समझ पथराई। घडी आखिरी आई। घडी आखिरी पाई।" सभी ओर से दाढियो वाले तोते चीख उठे। भयानक शोर मच गया। पिजराम वन्द तरह-तरह के जानवर भौंकने हूकन, किकियाने और सीटिया बजाने लगे। वदर मच पर इधर-उधर कूद-फाद रह थे। उनकी टार्गे कौन-सी है और हाय कौन से, यह समझ पाना कठिन था। वे दर्शको के बीच कूद गये और इधर-उधर भागने लगे। दशक भी चीख-चिल्ला रहे थे। जो मोटे थे, वे तो खास तौर पर खूब शोर मचा रहे थे। व गुस्से से लाल पीले होते और कापते हुए मसखरे पर टोपिया और दूरबीने फेंक रहे थे। एक मोटी महिला ने मसखरे पर अपना छाता ताना, मगर पास बैठी हुई एक अन्य माटी महिला की टोपी उसके साथ अटक कर सिर से उतर गयी। - दूसरी मोटी महिला जोर से चिल्लाई, क्योकि टोपी उसबै बनावटी बाल भी उतर गये थे। " "ऊई मा माथ-माथ १ २२
८०२
भागते हुए एक बन्दर ने इस महिला की चांद हथेली से थपथपा दी। वह तो वहीं
बेहोश हो गयी।
"
हा-हा-हा !"
"
-
हा-हा-हा !" अन्य दर्शक जो दुबले-पतले थे और कुछ घटिया कपड़े पहने थे जोरो
के ठहाके लगा रहे थे। “शावाश! शाबाश ! इनकी ऐसी की तैसी ! तीन मोटे मुर्दावाद !
प्रोस्पेरो जिन्दावाद ! तिबुल जिन्दावाद ! जनता जिन्दावाद !"
इसी समय किसी ने बहुत ज़ोर से चीखकर कहा
'आग लग गई ! शहर जला
जा रहा है...
सभी लोग बाहर भाग चले , धक्कम-पल करते, वेंचों को उलटते-पलटते। चिड़ियाघर
के चौकीदार इधर-उधर भागते हुए बन्दरो को पकड़ने लगे।
कोचवान ने चाक से सामने की ओर इशारा करते हुए डाक्टर से कहा-
"सनिक मजदूरों के मुहल्ली को आग लगा रहे हैं। वे नट तिबुल को परड़ना
चाहते है..."
नगर के ऊपर, काले-काले मकानों के डेर के ऊपर प्राग को लाल-सालि लपटें दिखाई दे रही थी।
-
A
20
२३
" पूछा। जव यह वग्धी, जिसम डाक्टर घर जा रहे थे , नगर के मुय्य चौक - सितार वे चौक - मे पहुची, तो उसके लिए आगे जाना असम्भव हो गया। वहा ढेरो घोडा-गाडिया और कोचे थी , घुडसवारो और पैदल चलनेवालो की भारी भीड जमा थी। यहा क्या किस्सा है डाक्टर मगर किसी ने भी इस सवाल का जवाब नहीं दिया- सभी लोग चौक मे घट रही घटना को देखने मे इतने अधिक खोये हुए थे। कोचवान भी अपनी सीट पर खडा होकर उधर ही देखने लगा। इस चौक का नाम सितारे का चौक क्यो पडा, इसकी भी कहानी है। इस चौर के सभी ओर बहुत बडे-बडे , समान ऊचाई और बनावट वाले मकान थे जो ऊपर से शीशे व गुम्बज से ढके हुए थे। इस तरह यह चौक सरकस के एक विराटकाय मडप जैसा प्रतीत होता था। गुम्वज के बीच मे बहुत ही अधिक उचाई पर दुनिया का सबसे बडा लैम्प जलता रहता था। यह आश्चर्यजनक बडे आकार का शीशे का गोला था। इसके चारो ओर लोहे का चक्र था। वह बहुत ही मजबूत तारो सहारे लटका हुआ था और शनिग्रह जैसा प्रतीत हाता था। पृथ्वी पर इसके समान दूसरी रोशनी नही थी। इसीलिए लोगो ने इस लैम्प सितारे" की सज्ञा दे दी थी। इस तरह इस सारे चौक का यही नाम पडा गया। चौक , मकानो और आसपास की गलियो को और रोशनी की जरूरत नही पडती थी। यह सितारा पत्थर की ऊची दीवार की तरह खडे मकाना की सभी गलियो, सभी और सभी कोठरियो मे रोशनी पहुचाता था। यहा लोगो का लम्पो और मोमबत्तियों के विना काम चल जाता था। कोचवान घोडा-गाडियो, कोचो और कोचवानो के ऊचे टोपो, जो दवाखाना की शीशियो के सिरो जैसे थे, के ऊपर से नजर दौडा रहा था। "आपको क्या दिखाई दे रहा है? वहा क्या हो रहा है?" कोचवान ये पीछे प्रावते और उत्तेजित होते हुए डाक्टर ने पूछा । नाटे कद के डाक्टर को कुछ भी नजर नहीं पा रहा था। उनकी नज़र भी कमजोर थी। काचवान ने जो कुछ देखा था, सब कह सुनाया। यह कुछ देखा था उसने । चार मे यहुत हलचल थी। विराट गोलाकार विस्तार में लोग इधर-उधर दौड़-धूप पर रह थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो चौक या घेरा हिडोले की तरह घूम रहा था। जा कुछ ऊपर हो रहा था उसे अधिर अच्छी तरह देख पाने के लिए लोग लगातार इधर- उधर भाग-दौड रहे थे। ऊचाई पर सटया हुअा लम्प मूरज वी तरह प्रायो को चवाचीध पर रहा था। पर या मुह उठाये हुए लोग हलिया में प्राखा पर प्रोट किये थे। यह ग्हा वह रहा।" लोग चौग उठे। कोना ? .
"
" यह देखिये ! वहां!"
"कहा? कहां है?"
'वहा, काफी ऊंचाई पर!"
'तिबुल ! तिबुल!"
संकड़ो उंगलियों ने बाईं ओर संकेत किया। वहां साधारण मकान था। मगर छहो
मंजिली की सभी खिड़कियां चौपट खुली हुई थी। हर खिड़की में से सिर बाहर निकले हुए थे।
वे एक दूसरे से भिन्न नजर पा रहे थे। कुछ सिरों पर फुदने वाले रात्रिकालीन टोपे थे;
कुछ नारिया अपने मिरी पर गुलावी बॉनेट टोपी पहने थी जिनमें से भूरे धुंघराले बाल बाहर
२५
. + निकले हुए थे , कुछ रूमाल वाधे थी , कुछ ऊपरवाले कमरा में जहा युवा गरीब कवि, चिन्न कार और अभिनेता रहते थे, सिगरेट के धुए के वादलो में खोये हुए सफाचट दाढी-मूछवाल खुशमिजाज चेहरे और नारियों के सिर भी दिखायी दे रहे थे। उनके सुनहरे चमकदार बाल इस तरह फैले हुए थे मानो उनके कंधों पर पर लगे हुए हो। यह घर, जिसकी सलाखा वाली खिडक्यिा, खुली हुई थी और जिनसे रग-विरगे सिर वाहर झाक रहे थे, एक वडे पिजरे जैसा प्रतीत हो रहा था, जिसमे पपीहे भरे हुए हो। इन सिरों के स्वामी छन पर घटनेवाली किसी बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटना को देखने की कोशिश कर रहे थे। यह उतना ही असम्भव था जितना कि दर्पण के बिना अपने कान देख पाना। अपने मकान की छत देखने को उत्सुक लोगो के लिए चौक मे जमा उन्मत्त भीड दर्पण का काम दे रही थी। चौक मे जमा भीड सभी कुछ देख रही थी, शोर मचा रही थी और हाथ हिला रही थी। कुछ लोगो की खुशी का कोई ठिकाना न था, दूसरे गुस्से से प्राग-बबूला हुए जा रहे थे। छत पर एक छोटी-सी आकृति हिलती-डुलती नज़र आ रही थी। वह धीरे-धीरे, साव धानी और विश्वास के साथ मकान के तिकोने ढालू शिखर से नीचे की ओर आ रही थी। उसके पैरो के नीचे टीन बज रहा था। यह आकृति अपना सन्तुलन बनाये रखने के लिए लवादे को इधर-उधर हिला रही थी, ठीक उसी तरह, जैसे सरकस मे रस्से पर चलनेवाला कलाकार मन्तुलन के लिए पीली चीनी छतरी का उपयोग करता है। यह था नट तिबुल। लोग चिल्ला उठे- शाबाश तिवुल शाबाश तिवुल " 'सम्भलकर बढते जानो | याद कर लो कि कैसे तुम मेले मे रस्से पर चला करत थे 'अरे, वह गिरनेवाला आदमी नही । वह हमारे देश का चार्टी का नट है "उसके लिए यह कोई नई चीज नहीं है। हम अपनी पाखो से देख चुके है कि वह रस्से पर चलने की कला मे कितना अधिक माहिर है शाबाश तिबुल ।" भाग जाओ। बच निकलो। प्रोस्पेरो को आजाद करानो।" कुछ दूसरे लोग लाल-पीले हो रहे थे। वे घूसे दिखाते हुए चिल्ला रहे थे अब तू वचपर कही नही भाग सकेगा, उल्लू मसखरे" शैतान का चर्खा।" "वागी । तुझे खरगोश की तरह गोली का निशाना बनाया जायेगा 'कान खोलकर सुन ले। हम तुझे छन से जल्लाद के तख्त पर खीच ले जायेंगे । क्ल दस तख्न तयार हो रहे है।" " " " " " " २६ " तिवुल ख़तरनाक फ़ासला तय करता गया। "अरे, यह यहां प्रा कैसे गया?" लोग पूछ रहे 1 "वह इस चौक में कैसे प्रा धमका? छत पर कैसे जा चढ़ा? "वह सैनिकों के हायों से बच निकला," दूसरों ने जवाब दिया। “वह भागा , मोझल हो गया और फिर नगर के विभिन्न स्थानों पर दिखाई दिया , एक छत से दूसरी पर कूदता गया। वह तो दिल्ली की तरह फुर्तीला है। उसका हुनर प्राज उसके दायें पा गया। ऐसे ही तो देश भर में उसकी ख्याति नहीं हो गयी!" चौक में सैनिक मा गये। लोग आस-पास की गलियों में भाग गये। तिबुल रेलिंग लांधकर छत के किनारे पर जा खड़ा हुआ। उसने अपना हाथ फैला दिया जिसके गिर्द लवादा लिपटा हुआ था। हरा लवादा झंडे की भांति लहरा उठा । मेले-ठेले के खेल-तमाशों और रविवारीय संर-सपाटों के समय लोग तिवुल को इसी लवादे और पीले तथा काले तिकोने टुकड़ों से सिली विरजस पहने हुए देखने के आदी थे। अब ऊंचाई पर शीशे के गुम्बज के नीचे छोटा-सा, दुबला-पतला और धारीदार तिबुल भिड़ जैसा लग रहा था जो मकान की सफ़ेद दीवार पर रेंग रही हो। जव लवादा हवा में फड़फड़ाता तो ऐसे लगता कि भिड़ ने अपने चमकदार हरे पंख फैला दिये हों। "अभी तू नीचे आ गिरेगा, जहन्नुमी कीड़े ! अभी तुझे गोली का निशाना बना दिया जायेगा!" झाइयों वाली मौसी से बहुत-सा धन विरासत में पा जानेवाले और नशे में धुत्त बांके-छैले ने चिल्लाकर कहा । सैनिकों ने अपने मोचें साध लिये। उनका अफ़सर गुस्से से भुनभुनाता हुआ इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहा था। उसके हाथ में पिस्तौल थी। उसकी एड़ियां स्लेज की पटरियों की तरह लम्बी थी। एकदम गहरा सन्नाटा छा गया। डाक्टर ने अपना दिल थाम लिया जो उबलते हुए पानी में अंडे की तरह उछल रहा था। तिबुल क्षण भर के लिए छत के सिरे पर रुका रहा। उसे सामनेवाली दिशा में पहुंचना था। तब वह सितारे के चौक से मजदूरों के मुहल्लों में भाग सकता था। अफसर पीले और नीले फूलों की क्यारी के बीचोंबीच खड़ा था। उसकी बग़ल में तालाव था और पत्थर के गोल प्याले से फ़व्वारा छूट रहा था। "जरा रुको!" अफसर ने सैनिको से कहा । "मैं खुद इस पर गोली चलाऊंगा। में अपनी रेजिमेन्ट का सबसे अच्छा निशानेबाज हूं। जरा गौर से देखना कि कैसे गोली चलाई जाती है !" चौक के गिर्द वने नौ मकानो से गुम्बज के मध्य मे, यानी सितारे की ओर २७
नी मोटे-मोटे इस्पाती तार तने हुए थे जो
जहाजो को वाधने के रस्मो जैसे लग रह थे।
ऐसा लगता था मानो अद्भुत दहते
मितारे से नौ काली और लम्बी किरणे
चौक के ऊपर फैली हुई हो।
यह कहना मुश्किल है कि इस क्षण
तिबुल क्या सोच रहा था। शायद उसने
यह तरकीव सोची-"जैसे कि मैं मेले में
रस्से पर चलता था, उसी तरह इस तार
पर चलता हुआ चौर को पार कर लूगा ।
में गिरूगा नहीं। एक तार लैम्प तक ले
जाता है और दूसरा लम्प से सामनवाले
मान तक । इन दोना तारो को लाकर
मै सामनेवाली छत पर पहुच जाऊगा और
वच निक्लूगा।
अफ्सर ने अपनी पिस्तौल तानी और
निशाना साधा। तिवुल छन के उस सिरे
पर आया जहा से तार शुरू होता था।
उसने तार पर पाव रखा और लम्प की
पोर बढ चला।
लोगों ने दम साध लिया। वह कभी तो बहुत धीरे-धीरे कदम बढ़ाता , कभी बहुत तेजी से , लगभग भागते हुए। वह अपने हाथ फैलाकर खुद को संतुलित करता। हर घड़ी ऐमे लगता कि वह गिरा कि गिरा। अब उसकी छाया दीवार पर झलकने लगी। वह लैम्प के जितना अधिक निकट होता जाता था, उसकी परछाई दीवार पर नीची, बड़ी और पीली होती जाती थी। चौक नीचे बहुत दूरी पर था। लैम्प की दूरी जव आधी रह गयी, तो गहरी खामोशी मे अफसर की आवाज . गूज उठी- " में अब गोली चलाता हूँ। वह सीधा तालाव में जा गिरेगा। एक, दो, तीन !" गोली चलने की आवाज गूज उठी। तिबुल आगे बढता रहा, मगर न जाने क्यो अफसर धडाम से तालाव में जा गिरा। उसे गोली मार दी गयी थी। एक सैनिक के हाथ में पिस्तौल थी जिससे नीला धुग्रा निकल रहा था। उसी ने अफ़सर को गोली मारी थी। "कुत्ते का पिल्ला!" सैनिक ने कहा । “तू जनता के हमदर्द को मारना चाहता था। मैने तेरा इरादा नाकाम बना दिया। जनता जिन्दावाद !" 'जनता जिन्दाबाद !" दूसरे सैनिकों ने उसका समर्थन किया। 'तीन मोटे जिन्दावाद !" उनके विरोधी चिल्लाये। वे सभी दिशानों में फैल गये और तार पर चले जा रहे तिवुल पर गोलियां वरसाने लगे। तिबुल अव लैम्प से दो कदमों की दूरी पर था। वह अपना लवादा हिलाकर लैम्प की जगमगाहट से प्रांखों को वचा रहा था। गोलिया उसके पास-पास से गुजर रही थी। लोग खुशी से चिल्ला रहे थे। ठाय! ठांय! 'निशाने चूक रहे है !" 'हुर्रा ! निशाने चूक रहे है !" तिबुल ने लैम्प के गिर्द लगे हुए लोहे के चक्र पर पांव रखा। "खर, कोई बात नहीं !" विरोधी दल के सैनिको ने धमकी दी। 'वह उधर सामने की और जायेगा... वह दूसरे तार पर से गुजरेगा। हम वहा से उसे नीचे मार गिरायेंगे!" इसी क्षण एक ऐसी बात हुई जिसकी किसी ने भी आशा नही की थी। धारीदार प्राकृति जो लैम्प के निकट होने पर काली नजर आने लगी थी, लोहे के चक्र के सिरे पर बैठ गयी, " २६ उसने कोई पुर्जा घुमाया, सू-सू और फिर फक की आवाज हुई और लैम्प प्रान की आन मे बुझ गया। किसी के मुह से एक बोल तक न फूट पाया। सन्दूक के भीतर पायी जानेवाली भयानक खामोशी और भयानक अधेरे का सा वातावरण हो गया। अगले क्षण बहुत ऊचाई पर कुछ ठक-ठक और टन-टन हुई। अन्धकारपूर्ण गुम्बज में हल्की रोशनी का एक धव्वा-सा दिखाई दिया। सभी को थोडा-सा आकाश और उसमे दो सितारे नजर आये। इसके बाद इस गगनचुम्बी सूराख मे से एक काली प्राकृति रेगकर बाहर निक्ली। फिर शीशे के गुम्वज पर किसी के तेजी से भागने की आवाज सुनाई दी। नट तिबुल इस सूराख मे से वच निकला था। गोलिया चलने और अचानक अधेरा हो जाने से घोडे डर गये थे। डाक्टर की बग्घी तो उल्टते-उल्टते वची। कोचवान ने लगामे कसर घोडो को काबू मे किया और घुमावदार रास्ते से डाक्टर को पर ले चला। इस तरह एक गैरमामूली दिन और गैरमामूली रात विताकर आखिर डाक्टर गास्पर पानेरी घर लौटे। उनकी नौकरानी, मोसी गानीमेड ओसारे मे ही उससे मिली । वह बहुत परेशान नजर आ रही थी। डाक्टर इतनी देर तक घर नही लौटे थे! मौसी गानीमेड न हाथ नचाये , गहरी सास ली और सिर हिलाते हुए कहा- 'आपका चश्मा पहा गया? टूट गया ? अाह , डाक्टर, प्यारे डाक्टर । अापकी वरमानी पहा गयी? खो गयी ? प्रोह , प्रोह । " "मोसी गानीमेट, इतना ही नहीं, मेरी दोनो एडिया भी टूट गयो है...' 'प्रोह, यह तो बहुत बुरा हुआ 'आज तो इम से भी ज्यादा दुरी बात हुई है मौसी गानीमेड . हथियारसाज प्राम्परा बन्दी बना लिया गया। उसे लोहे के पिजरे मे बन्द कर दिया गया। भौसी गानीमेड को कुछ भी मालूम नहीं था कि दिन को क्या कुछ हुआ था। हा, उसने तोपो यो गरज सुनी थी, मकाना ये पर लाल लपटें देखी थी। पडोसिन न उसे बताया था कि वढई प्रदान चीर में विद्रोहिया के सिर काटने के लिए जल्लादो में नग्न बना रहे है। 'मुझे यहुत दर महमूग हुना। मैने विक्यिा बन्द कर ली और मोच लिया हि पाहा नही गाउगी। हर घटी में प्रापये माने की म्मीद करती रही। बडा ही परेशान रही दोपहर या गाना ठटा हो गया , गाम ये गाने पा भी वक्त गुजर गया, मगर मा नर्ग पोटे. ." उगने पता। गा वीर ी पी। हास्टर माने भी नैयारी करने लगे। " .
डाक्टर ने जो सो विद्यायें पढ़ी थी, उनमे इतिहास भी शामिल था। उनके पास चमड़े को जिल्दवाली एक बड़ी कापी थी। इस कापी में वे महत्त्वपूर्ण घटनाओं के बारे में अपनी राय लिखा करते थे। "प्रादमी को हर चीज़ वक्त पर करनी चाहिए, डाक्टर ने उंगली ऊपर उठाते हुए कहा। थकान की परवाह न करते हुए डाक्टर ने चमड़े को जिल्दवाली कापी उठाई , मेज पर जा बैठे और लिखने लगे। 'कारीगरों, खान-मजदूरों और जहाजियो, - यानी नगर के सभी गरीब लोगों ने तीन मोटों की मत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया है। सैनिकों की जीत हुई। हथियारसाज प्रोस्पेरो को कैद कर लिया गया और नट तिबुल भाग गया। अभी, कुछ ही समय पहले सितारे के चौक में एक मैनिक ने अपने अफसर को गोली से उड़ा दिया। इसका मतलब यह है कि जल्द ही सभी नैनिक जनता के विरद्ध लड़ने और तीन मोटों की रक्षा करने से इन्कार कर देंगे। मुझे केवल तिवुल बारे में चिन्ता हो रही है ..." इसी क्षण डाक्टर को अपने पीछे सरसराहट-सी सुनाई दी। उन्होंने घूमकर देखा । उस पोर अंगीठी थी। अंगीठी में से हरा लवादा पहने हुए एक लम्वा-तडंगा व्यक्ति वाहर आया। यह था नट निबुल। जा
No text on this page.
दूसरा भाग
उत्तराधिकारी टूट्टी
की
गुड़िया
No text on this page.
चौया अध्याप गुब्बारेवाले के साथ क्या कुछ बीती अगले गले दिन अदालत चौक में जोरों से काम हो रहा था। वहां जल्लादों के दस तख्ते बनाये जा रहे थे। सैनिक काम को निगरानी कर रहे थे। बढ़ई मन मारकर काम कर रहे थे। "हम कारीगरों और खान-मजदूरों के सिर काटने के लिए तख्ते नहीं बनाना चाहते !" उन्होने गुस्से से कहा। "वे हमारे भाई है !" 'उन्होंने इसलिए अपनी जान की बाजी लगाई कि सभी मेहनतकशों को आजादी मिल सके!" "चुप रहो!" सैनिकों का सरदार ऐसे ज़ोर से चिल्लाया कि दीवार के सहारे खड़े किये हुए तैयार तख्ते नीचे जा गिरे। “चुप रहो, वरना मै तुम्हें कोड़े लगवाऊंगा!" सुबह से ही विभिन्न दिशाओं से लोग भारी संख्या में अदालत चौक की ओर आने लगे थे। तेज हवा चल रही थी, धूल के वादल उड़ रहे थे, दुकानों के साइनबोर्ड हिल-डुल और खटखटा रहे थे, सिरों से टोपियां उड़कर घोड़ा-गाड़ियों के पहियों के नीचे लुढ़क रही थी। एक जगह पर तो हवा के कारण बहुत ही अनहोनी बात हो गयी- गुब्बारे एक गुब्बारे घेचनेवाले को ले उड़े। "हुर्रा! हुर्रा !" इस अनोखी उड़ान को देखते हुए वालक चिल्ला उठे। वालकों ने खुश होते हुए ख व जोर से तालियां बजायीं। बात यह है कि यह दृश्य तो वैसे ही बहुत दिलचस्प था और फिर गुब्बारे वेचनेवाले को ऐसी अटपटी स्थिति में देखकर बालकों को वैसे भी बहुत खुशी हुई। वह इसलिये कि वालकों को हमेशा इस गुब्बारे वैचनेवाले से ईर्ष्या होती थी। ईर्ष्या करना बुरी बात है। मगर किया भी क्या जाये ! लाल , नीले और पीले गुब्वारे तो बरवस बालकों का मनमोह लेते। हर वालक चाहता कि उसके पास भी एक ऐसा गुब्बारा हो । गुब्बारे वेचनेवाले के पास तो ढेरों गुब्बारे होते थे। मगर करिश्मे , 34 । "वचारो।" तो कभी नही होते वहुत ही आज्ञाकारी लडवे और बहुत ही दयालु लडकी को भी उमन अपने जीवन में कभी एक बार भी लाल , नीला या पीला गुब्बारा भेंट नहीं किया था। अब उसे ऐसा सगदिल होने की सजा मिली थी। वह गुब्बारो वाली रस्सी के साथ लटका हुआ शहर के ऊपर उड रहा था। चमक्ते और ऊचे नीलााश मे उडते हुए गुब्बारे जादुई अगूरो के रग-विरगे गुच्छे जसे प्रतीत हो रहे थे। गुब्बारे वेचनेवाला चिल्ला रहा था। मगर उसे मदद मिलने की कोई आशा नहीं थी और वह अपनी टागो को ज़ोरा से इधर-उधर झटक रहा था। गुब्बारे बेचनेवाला अपने पैरो मे घास-फूम के और माप से बड़े जूते पहने हुए था। जब तक वह जमीन पर था , सब ठीक-ठाक था। इसलिये वि जूते पैर से निकल न जायें, वह पटरियो पर चलता हुआ आलसी व्यक्ति की तरह पैरो को घसीटता रहता था। मगर अव जव वह हवा में उड रहा था, तो यह तिकडम उसके काम न आ सकती थी। प्रोह , बेड़ा गर्क।" उडते हुए और एक दूसरे से रगड खाते हुए गुब्बारे हवा मे कभी एक तरफ को हा जाते थे, कभी दूसरी तरफ को। आखिर एक जूता उसके पैर से उतरकर नीचे गिर ही गया। अरे वह देखो। मूगफली। मूगफली ।" नीचे भागते हुए बालक चिल्लाये। वास्तव मे ही नीचे गिरता हुआ जूता मूगफली की याद दिलाता था। इसी समय सडक पर नृत्य का शिक्षक चला जा रहा था। बहुत ही वाका-सजीला था वह । लम्बा कद , छोटा-सा गोल मटोल सिर और पतली-पतली टागे, वायलिन या टिड्डे से मिलता-जुलता। उसके कोमल कान वासुरी की दर्दीली तान और नर्तको के नाजुक शब्द सुनने के आदी थे। वालको की खुशी भरी किलकारिया और हो-हल्ला वह कैसे सहन करता " चीखना-चिल्लाना बन्द करो।" उसने बिगडते हुए शोर मचाया जाता है | खुशी को खूबसूरत और मधुर वाक्यो मे व्यक्त करना चाहिये मिसाल के तौर पर उसने मुद्रा वनाई , मगर मिसाल पेश करने की नौवत न पा पायी। नृत्य के सभी प्रध्या पका की तरह उसे भी परा की ओर ही देखने की आदत पड़ी हुई थी। हाय, अफसोस । ऊपर क्या हो रहा था, इसकी तरफ उसका ध्यान नहीं गया। गुब्बारे बेचनेवाले का जूता उसके सिर पर आ पडा । उसका सिर छोटा सा था, इसलिय घास-फूस का वडा-सा जूता उसके मिर पर टाप की तरह आकर टिक गया। अब यह नृत्य का सजीला अध्यापक गाय की तरह रम्भाने लगा। जूते से उसका प्राधा घेहग डर गया। लको से कहा। "ऐसे भी कही " , ": 4ะ
No text on this page.
वालक तो हंसी के मारे लोट-पोट होने लगे- "हा-हा-हा! हा-हा-हा!" नाच का शिक्षक , एक-दो-तीन चलता नजर झुकाये। नाक बड़ी लम्बी-सी उसकी चूहे-सा किकियाये। सिर पर टिका फूस का जूता शोभा कही न जाये। , ॥ वाड़ पर बैठे हुए लड़कों ने सुर मिलाकर उक्त पक्तियां गायी। वे किसी भी क्षण बाड़ के दूसरी ओर कूदने और नौ-दो-ग्यारह हो जाने को तैयार थे। “आह !" नृत्य के शिक्षक ने प्राह भरी। “आह , कितने दुख की बात है ! वॉल-नाच का जूता होता, तब भी कोई बात थी ! मेरी किस्मत में घास-फूस का ऐसा गन्दा ही जूता रह गया था!" आखिर हुआ यह कि नृत्य के शिक्षक को गिरफ्तार कर लिया गया। "ए हज़रत ,” उसे डांटा गया , " कैसी भयानक सूरत बनाये फिर रहे हो। तुम ममाज की शान्ति-भंग कर रहे हो। ऐसी हरकत तो वैसे ही कभी नही करनी चाहिये , और आजकल के ख़तरनाक वक्त में तो भूलकर भी नहीं।" नृत्य के शिक्षक ने हाथ मले। "कैसा सफेद झूठ है यह !" उसने रोते और दुहाई देते हुए कहा। कसी गलतफ़हमी हो गयी है ! वाल्ज़ नृत्यो और मुस्कानों की दुनिया में रहनेवाला, मेरे जैसा सजीला-छबीला व्यक्ति - क्या वह भी समाज की शान्ति-भंग कर सकता है ? हाय ! हाय !" नृत्य के शिक्षक के साथ आगे क्या बीती, यह हमे मालूम नही। फिर हमें इसमे खास दिलचस्पी भी नहीं है। हमारे लिये तो यह जानना कही अधिक महत्त्वपूर्ण है कि हवा में उड़ते हुए गुब्बारे बेचनेवाले का क्या हुआ। वह कुकरौधा फूल की पंखुड़ी की तरह उड़ रहा था। 'यह तो सरासर बदतमीज़ी है !" गुब्बारे वेचनेवाला चिल्ला रहा था। "मैं बिल्कुल उड़ना नहीं चाहता! मुझे तो उड़ना ही नहीं पाता... मगर उसकी चीख-पुकार बेसूद रही। हवा और भी तेज हो गयी। गुब्बारों का गुच्छा अधिकाधिक ऊंचा होता गया। हवा उमे नगर के बाहर, तीन मोटों के महल की ओर उड़ाये लिये जा रही थी।
गुब्बारे वेचनेवाले को कभी-कभी नीचे की भी झलक मिल जाती। नीचे उसे छते , नाखूनो की तरह गन्दी-मन्दी टाइलें, साथ-साथ सटे हुए मकान , नीले पानी की सकरी पट्टी, खिलौनो-से लोग और बाग-बगीचो के हरे-हरे धब्बे नज़र आते । नगर उसे मानो वक्मुए मे टगा हुआ धूमता-सा लगता था। हालत ने और भी खतरनाक रुख अपनाया। "कुछ देर अगर और इसी तरफ उडता गया, तो में तीन मोटो के पार्क मे जा गुब्बारे वेचनेवाला यह सोचकर काप उठा। अगले ही क्षण उसने अपने को धीरे-धीरे , बडी अदा और ख वसूरती से पार्क के ऊपर उडते पाया। वह अधिकाधिक नीचे आता जाता था। हवा का जोर कम हो गया था। "मैं अब जमीन पर पहुचा कि पहुचा। मुझे पकड लिया जायेगा। पहले तो वे गिरूगा।"
कसकर मेरी पिटाई करेगे और फिर जेल में बन्द कर देंगे। यह भी हो सकता है कि सभी तरह के झंझट से बचने के लिये फौरन सिर ही कलम कर दें।" किसी ने उसे नहीं देखा। हां, एक वृक्ष पर बैठे हुए पक्षी अवश्य डरकर सभी दिशाओं में उड़ गये। उड़ते हुए रंग-बिरंगे गुब्बारों को हल्की-सी परछाई पड़ रही थी , वादलो की परछाई जैसी। प्यारे-प्यारे इन्द्रधनुप जैसे रंगों की यह परछाई वजरी विछे मार्ग , फूलो की क्यारी , हंस के ऊपर बैठे हुए एक लडके की मूर्ति और ड्यूटी पर खड़े सन्तरी के ऊपर से तैरती हुई गुजरी। इस रंग-बिरंगी छाया से सन्तरी के चेहरे पर कमाल के परिवर्तन हुए। उसकी नाक मुर्दे की नाक की तरह नीली, मदारी की नाक की तरह हरी और फिर शराबी की नाक की तरह लाल हुई। कालेद्स्कोप में शीशे के रंग-बिरंगे टुकड़े भी इसी तरह रंग बदलते हैं। खतरनाक घड़ी नजदीक आती जा रही थी। हवा गुब्बारे बेचनेवाले को महल की खुली हुई खिड़कियों की तरफ़ उड़ा ले चली। उसे तनिक भी सन्देह नहीं था कि वह क्षण भर मे रुई के गाले की तरह किसी खिड़की में से अन्दर जा गिरेगा। ऐसा ही हुआ भी। गुब्बारे बेचनेवाला एक खिड़की में से अन्दर जा गिरा। यह महल के रसोईघर की खिड़की थी। यहा मिठाइयां बनाई जा रही थी। उस दिन तीन मोटों के महल में इस बात की खुशी में शानदार दावत हो रही थी कि एक दिन पहले हुई बग़ावत को कामयाबी से कुचल दिया गया था। दावत के बाद तीनों मोटे , राज्य परिषद् के सभी सदस्य , दरवारी और सम्मानित मेहमान अदालत चौक में जानेवाले थे। प्यारे पाठको, महल के मिठाईघर में जा पहुंचने की तो कल्पना करते ही मुंह मे बरबस पानी भर आता है। यह तो मोटे ही बता सकते थे कि वहां कैसी कैसी चटखारेवाली चीजें बनती थी। फिर आज तो खास दिन था। शानदार दावत का दिन ! आप कल्पना कर सकते है कि रसोइये और हलवाई क्या-क्या कमाल दिखा रहे होंगे। मिठाईघर में जाकर गिरते हुए गुब्बारे वेचनेवाले को जहां डर लगा, वहां खुशी भी हुई। शायद भिड़ को डर और खुशी को ऐसी ही अनुभूति उस समय होती है जब वह किसी लापरवाह गृहिणी द्वारा खिड़की मे रख दिये केक के ऊपर मंडराती है। वह बहुत तेजी से उड़ता हुअा भीतर आया और इसलिये ढंग से अपने इर्दगिर्द नज़र न डाल सका। शुरू में तो उसे ऐसे लगा कि वह ऐसी जगह पर आ गिरा है जहां उष्ण देशों के अद्भुत, रंग-बिरंगे और दुर्लभ परिन्दे वन्द है ; वे फुदकते है, चहचहाते है, चीं-ची करते और सीटियां बजाते है। मगर दूसरे ही क्षण उसे लगा कि यह पक्षीघर नही , फलों की दूकान है जहां तरह-तरह के उप्णदेशीय फल रखे हुए है, और रसीले। .
1" मिर चकरानेवाली मीठी-मीठी सुगध उसकी नाक में घुस गयी। गर्मी और घुटन से उसका दम घुटने लगा। मगर इसी क्षण सब कुछ गडबड हो गया - अद्भुत पक्षीघर भी और फलो की दूकान भी। गुब्बारे बेचनेवाला पूरे का पूरा क्सिी नर्म-गर्म चीज़ पर जा बैठा। गुब्बारे उसने हाथ से नही छोडे , कसकर पकडे रहा। वे उसके सिर के ऊपर निश्चल खड़े हो गये। उसने खूब जोर से आखें भीच ली। यह सोच लिया कि किसी भी कीमत पर आखें नहीं खोलेगा। 'अव में सब कुछ समझ गया," उसने सोचा। 'यह न तो पक्षीधर है और न फ्लो की दूकान। यह तो मिठाईघर है और मैं केक के ऊपर बैठा हू सचमुच ऐसा ही था भी। वह चाक्लेट, माल्टो, अनारो, क्रीमो, पिसी हुई चीनी और मुरब्बो के साम्राज्य म बैठा था , रग-बिरगे और प्यारी प्यारी सुगन्धवाले साम्राज्य के सिहासन पर। उसका सिहा सन था केक। वह आखें बन्द किये हुए था। वह समझता था कि अब उसकी सूव लानत-मलामत होगी, उसे मारा-पीटा जायेगा और वह इस सव लिये पूरी तरह तैयार था। मगर हुआ वह , जिसकी उसने कल्पना तक न की थी। " केक का तो सत्यानाश हो गया ," छोटे हलवाई ने दुखी होते हुए कहा। इसके वाद खामोशी छा गयी। सिर्फ उबलते चाक्लेट मे से फटते हुए वुलबुला की आवाज आती रही।
" . . जाने अव क्या होगा?" गुब्बारे बेचनेवाले ने डर के मारे गहरी सास लेते और मुरब्बे अपनी आंखों को और अधिक कसकर भीचते हुए फुसफुसाकर कहा। उसका दिल ऐसे उछल रहा था जैसे मनीबंग में पैसा। "खैर, कोई बात नहीं !" बड़े हलवाई ने भी कड़ाई से कहा, हॉल में वे लोग दूसरा राउंड ख़त्म कर चुके है। बीस मिनट वाद केक पहुचना चाहिये। रंग-बिरंगे गुब्बारे और इस उड़नेवाले उल्लू का वेहूदा-सा चेहरा बढ़िया दावत के केक की सजावट के लिये बहुत ठीक रहेगा।" बड़े हलवाई ने इतना कहा और हुक्म दिया श्रीम लायो!" और सचमुच क्रीम लाई गई। वस, अव तो ग़जब ही हो गया! तीन हलवाई और वीस रसोइये-छोकरे गुब्बारे बेचनेवाले पर टूट पड़े। अगर तीनों मोटों में से सबसे मोटा इस दृश्य को देखता तो वह भी वाह वाह कर उठता। एक मिनट में ही उसे सभी तरफ से क्रीम से ढक दिया गया। गुब्बारे वेचनेवाला प्रांखें बन्द किये बैठा था, कुछ भी नहीं देखता था। मगर नजारा था देखने लायक। उसे क्रीम से तर-व-तर कर दिया गया। हां, उसका सिर, वेल-बूटो वाली केतली से मिलता-जुलता उसका तोवड़ा वाहर निकला हुआ था। वाकी सारा शरीर हल्की गुलाबी झलकवाली सफ़ेद क्रीम से लथ-पथ कर दिया गया था। गुब्बारे वेचनेवाला और तो कुछ भी हो सकता था, मगर अव गुब्बारे वेचनेवाला नहीं रहा था। जैसे उसका घास-फूस का जूता गायय हो गया था, वैसे ही अव वह खुद भी। कोई कवि उसे बर्फ की तरह सफेद राजहंस समझ सकता था, किसी माली को वह संगमरमर का दुत-मा लग मकना था, कोई धोविन उसे ढेरो ढेर सावून का फेन मान सकती थी और कोई वालक वर्फ का पुतला। ४१ - . - सबसे ऊपर गुब्बारे लटके हुए थे। ऐमी सजावट थी तो गैरमामूली , मगर कुल मिलाकर खासी जच रही थी। "हु।" अपने चित्र को मुग्ध दृष्टि से निहारनेवाले चित्रकार के अन्दाज मे वडे लवाई ने कहा। इसके बाद उसकी आवाज़ पहले की भाति ही भयानर हो उठी और मन चीखकर हुक्म दिया- "मुरब्बे लायो।" मुरब्वे आ गये। वे सभी विस्मो, सभी शक्लो और सभी प्राकारो के थे। उनमे खट्टे भी थे, मीठे भी, तिकोनी शक्ल के, सितारो जैसे , गोल, दूज के चाद जैसे और गुलाब की शक्ल के भी। रसोइये-छोकरे खूब मन लगाकर अपना काम कर रहे थे। बडे हलवाई के तीन तालिया वजाते तक क्रीम का टीला - सारे का सारा केक - तरह-तरह के मुरब्बो से सज गया। 'बस , काफी है।" बड़े हलवाई ने कहा। अव इसे थोडी दे के लिये प्रोवन में रख देना चाहिये ताकि वह जरा जरा गुलाबी हो जाये। ओवन मे?" गुब्बारे बेचनेवाले का दम निकल गया। "यह क्या सुना मैने ? किस प्रोवन मे? मुझे ओवन मे?" इसी समय एक बैरा दौडता हुआ मिठाईघर मे आया। "केक लामो केका" वह चिल्लाया। "फौरन कैक लामो हॉल में केक का इन्तज़ार हो रहा है। "तैयार है।" वडे हलवाई ने जवाब दिया। 'शुक्र है भगवान का|" गुब्बारे वेचनेवाले ने कहा। अब उसने जरा-जरा पाख खोली। . नीली वर्दी पहने हुए छ बैरो ने इस बडी सी प्लेट को उठाया जिसमें वह बैठा हुआ था। वे उसे ले चले। वह मिठाईघर से बाहर आ चुका था जव उसे रसोइयो के ठहाके सुनाई दिये थे। बरे उसे लिये हुए चौडी सीढिया चढकर ऊपर हॉल मे पहुचे। गुब्बारे बेचनेवाले ने घडी भर के लिये फिर पाखे बन्द कर ली। हॉल मे खू व शोर मच रहा था, हसी-ख शी का वातावरण था। वहुत-से लोगो की आवाजें एक्साथ सुनाई दे रही थी, व्हारे गूज रहे थे, तालियां बजाई जा रही थी। हर वात इस चीज की गवाही देती थी कि दावत व काम- याब रही थी। गुव्यारे वेचनेवाले को, नहीं, केक का लाकर मेज पर रख दिया गया । अब गुस्वारे बेचनेवाले ने आखें खाली! उसने तीन मोटो को देखा। वे इतने मोटे थे कि हैरत से उमा मुह खुला रह गया। ४२ " "फौरन मुझे मुंह वन्द कर लेना चाहिये ," उसने झटपट अपने आप से कहा। “वर्तमान परिस्थिति में मेरे लिये अपने को जीता-जागता व्यक्ति न प्रकट करना ही बेहतर होगा। मगर अफ़सोस , मुंह बन्द न हुअा। दो मिनट तक ऐसी ही हालत रही। कुछ देर बाद गुब्बारे वेचनेवाले का आश्चर्य कुछ कम हुआ। उसने जोर लगाकर मुंह वन्द कर ही लिया। मगर तभी उसकी आंखें हैरत से फैल गयी। वह बड़ी कोशिश से कभी अपना मुंह तो कभी अांखें बन्द करता और आखिर उसने अपनी हैरत पर काबू पा ही लिया। तीनों मोटे हॉल में उपस्थित अन्य लोगों की तुलना मे ऊंचे मंच पर , आदर के स्थान पर बैठे थे। वे तीनों ही सबसे ज्यादा खा रहे थे। उनमे से एक तो नेप्किन ही चबाने लगा था। 'आप नेप्किन चवा रहे है... 'सच ? मुझे ध्यान ही नहीं रहा ... उसने नेप्किन रख दिया और उसी क्षण तीसरे मोटे का कान चवाने लगा। यहां यह वता देना भी ठीक होगा कि तीसरे मोटे का कान गुलगुले जसा लग रहा था। सब हंसी के मारे लोट-पोट होने लगे। 'अच्छा , अब मज़ाक़ छोड़ें," दूसरे मोटे ने काटा उठाते हुए कहा । संजीदा रुख ले रहा है। वे केक ले आये है। । "मामला अव 'हुर्रा !" हॉल में खुशी की लहर दौड़ गयी। "जाने अब क्या होगा?" गुब्बारे वेचनेवाला मन ही मन परेशान हो रहा था। "जाने अब क्या होगा? ये तो मुझे खा जायेंगे !" इसी समय घड़ी ने दो वजाये। 'एक घंटे वाद अदालत चौक में सजायें दी जाने लगेंगी," पहले मोटे ने कहा। 'सबसे पहले तो हथियारसाज़ प्रोस्पेरो का ही सिर अलग किया जायेगा न?" प्रतिष्ठित मेहमानों में से किसी ने पूछा। "उसे आज सजा नहीं दी जायेगी," सरकारी सलाहकार ने उत्तर दिया। "क्यों? ऐसा क्यों?" "फ़िलहाल हम उसे जिन्दा रखेंगे। हम उससे वागियों के मंसूबों और उनके कर्ता- धर्ताओं के नाम जानना चाहते हैं।' इस वक्त वह कहां है?" सभी लोगों ने इस बातचीत में गहरी दिलचस्पी जाहिर की। उन्हें तो केक का भी ध्यान न रहा। 11 " ४३ - "यह पहले की तरह लोहे में पिजरे में वन्द है। पिजरा यही महल में, उत्तराधिकारी टूट्टी ये चिडियाघर मे ग्या हुआ है। उसे यहा बुलवाइये "उसे यहा ले मामा" - पहले मोटे ने यहा। "हमारे मेहमान उम दरिन्दे को अधिक नजदीक से देख पायेंगे। में तो आप सब यो चिडियाघर में ही चलने का सुझाव देता, मगर वहा तो बहुत शोर , चीय-चिपाड और बदबू है ... जामो को पनक और फनी की महल से इसका क्या मुवावला 'वह तो है ही। मो तो है ही चिडियाघर जाने में कोई तुक नही . "प्रोस्पेरो को यही बुलवाइये । हम कर पाते हुए उस राक्षस को देखेंगे।" "फिर वेव।। गुब्बारे बेचनेवाला महम उठा। कम्बख्त हाथ धोकर देव के ही पीछे , " 1 " । " पड़े हुए है पटू न हा तो।" " 'प्रोस्पेरो का यहा लाया जाये ," पहले मोटे ने यहा। सरखारी सलाहकार बाहर निकला। दो कतारो मे पडे हुए बैरो ने एक दूसरे से दूर हटते हुए सिर झुवा लिये। ये कतारे नीची हो गयी। पेटू खामोश हो गये। 'वह बहुत खतरनाक आदमी है ," दूसरे मोटे ने कहा। "सबसे ज्यादा ताकतवर है । ववरशेर से भी बढकर। उसको आखा से नफरत की चिगारिया निकलती है। उससे पाखें मिलाने की तो हिम्मत ही नही हो सकती। 'उसका सिर भी भयानक है," राज्य परिपद् के सेक्रेट्री ने वहा। “यह बडा सारा स्तम्भ के सिरे जैसा। वाल उसके लाल है। ऐसा लगता है मानो उसके मिर से आग की लपटें निकल रही हा।" अब , जब हथियारसाज प्रोस्पेरो की बात चल पडी तो पेटुप्रो की हालत ही बदल गयी। उन्होने खाना पीना , मजाक करना और शोर मचाना वन्द कर दिया , पेट सिकोड लिय और कुछेक के तो चेहरो का रग भी उड गया। वहुता को तो इस बात का अफसोस भी हाने लगा था कि क्यो उन्हाने उसे देखने की इच्छा जाहिर की। तीनो मोटे सजीदा सूरत वनाये बैठे थे और मानो कुछ-कुछ दुबला भी गये थे। अचानक सभी चुप हो गये। गहरा सन्नाटा छा गया। हर मोटा कुछ इस तरह से हिला-डुला मानो दूसरे के पीछे छिपना चाहता हो । हथियारसाज प्रोस्पेरो को हॉल में लाया गया। आगे आगे सरकारी मलाहकार था। दायें-बायें सैनिक थे। वे मोमजामे को कानी टोपिया पहने हुए ही और नगी तलवारे हाथ मे लिये हॉल मे आये। जजीरा की खनखनाहट । ४४
No text on this page.
सुनाई दी। हथियारसाज़ के हाथो मे हथकडिया पडी हुई थी। उसे मेज़ के पास लाया गया। वह मोटो कुछ कदमो की दूरी पर रुक गया। वह खडा था सिर झुकाये हुए। कैदी के चेहरे का रंग पीला था। उसके माथे , कनपटियो और अस्तव्यस्त लाल वालो के नीचे खून जमा हुआ था। प्रोस्पेरो ने सिर उठाकर मोटो की ओर देखा। पास बैठे हुए सभी लोग झटके के साथ पीछे हट गये। 'किस लिये इसे यहा ले आये?" एक मेहमान ने चीखकर पूछा। यह देश का सबसे धनी मिल- मालिक था। "मुझे इससे दहशत होती है।" मिल-मालिक इतना कहकर बेहोश हा गया और उसकी नाक फलो की जेली में जा धसी। कुछ मेहमान तो दरवाज़ो की तरफ भाग चले। केक की अव किसी को सुध न रही। 'क्या चाहते है आप लोग मुझसे?" हथियार- साज ने पूछा। पहले मोटे ने हिम्मत से काम लेते हुए कहा "हम ज़रा यह देखना चाहते थे कि तुम लगते कैसे हो। तुम अब जिनकी मुट्ठी मे वन्द हो, क्या तुम्हारे लिये भी उन लोगो को देखना दिलचस्प नही है? "मुझे उबकाई पाती है आपको देखकर । “घवरात्रो नही , जल्द ही हम तुम्हारा सिर धड से अलग कर देगे। इस तरह हम तुम्हे हमारी ओर देखने की जहमत से निजात दिला देंगे । 'बडी परवाह पडी है मुझे सिर की। मेरा तो एक सिर है , मगर जनता के सिर है लाखा। आप उन सभी को तो काटने से रहे।" आज अदालत चौक मे सजा दी जायेगी। वहा जल्लाद तुम्हारे साथियो से निपटेंगे।" पेटुओ ने चटखारा भरा। मिल-मालिक होश में आ गया। इतना ही नही , उसने अपन गाला से गुलाबी जेली भी चाटी। पापको अपनी आप लोगा के दिमागो पर चरवी चडी हुई है," प्रास्पेरा ने कहा। तादा के सिवा किसी चीज़ का होश नहीं है। " . " 'जरा गौर फरमाइये न!" दूसरे मोटे ने विगड़ते हुए कहा। "किस चीज़ का होश होना चाहिये हमे?" 'अपने मन्त्रियों से पूछिये । वे जानते है कि देश में क्या कुछ हो रहा है। सरकारी सलाहकार ने अटपटा-सा हुंकारा भरा। मन्त्रियों ने उंगलियों से प्लेटों पर ताल देनी शुरू की। " इनसे पूछिये," प्रोस्पेरो कहता गया, “ये वतायेंगे आपको... वह चुप हो गया। सभी बेचैनी से उसका मुंह ताकने लगे। "ये आपको बतायेंगे कि कमर दोहरी करके उगाया गया जिन किसानों का अनाज प्राप लोग छीन लेते है , वे ज़मीदारों के खिलाफ़ विद्रोह कर रहे हैं। वे उनके महलों को आग लगा रहे है , उन्हें अपनी जमीनों से निकाल रहे हैं। खान-मजदूर अव इसलिये खानों से कोयला नही निकालना चाहते कि वह सव आप हथिया लें । आप लोगों को और अधिक तिजोरियां भरने के लिये मजदूर काम करने को तैयार नही हैं। वे मशीनों को तोड़-फोड़ रहे है । जहाजी आपके माल को सागर में फेंक रहे है। सैनिक आपके लिये काम करना नहीं चाहते। विद्वान, कर्मचारी, न्यायाधीश और अभिनेता, जनता की ओर होते जा रहे है। वे सभी, जो पहले आपके लिये खटते थे और बदले में कोड़ियां पाते थे, जबकि आप लोग और ज्यादा मालामाल होते जाते थे, वे सभी वदक़िस्मत , सभी अभागे, सभी भूखे , खस्ताहाल, यतीम , और भिखमंगे अव आपके , मोटी तोंदवालो और धनियों के खिलाफ़ , जिनके सीने में दिल की जगह पत्थर है, मोर्चा लेने को डट गये हैं..." " मेरे ख्याल में तो यह वेकार वक वक कर रहा है..." सरकारी सलाहकार ने टोकते हुए कहा। मगर प्रोस्पेरो ने अपनी बात जारी रखी- 'पन्द्रह सालों से में जनता को आपसे और आपकी सत्ता से घृणा करना सिखा रहा हूं। ओह , कितने अर्से से हम शक्ति बटोर रहे है ! अव आप लोगों की आखिरी पड़ी प्रा गयी है.. 'बन्द करो यह अपनी वकवास!" तीसरा मोटा चीख उठा। इसे वापिस पिंजरे में भेज देना चाहिये," दूसरे मोटे ने सुझाव दिया। पहले मोटे ने कहा- "जब तक नट तिवुल को कैद नही कर लिया जाता, तब तक तुम अपने पिजरे में ही पड़े सड़ते रहोगे। हम तुम दोनों को एकसाथ ही जहन्नुम को चलता करेंगे। लोग तुम्हारी लाशें देखेंगे तो एक जमाने तक उन्हें हम से उलझने का ख्याल तक नहीं पायेगा।" प्रोस्पेरो चुप हो गया। उनने फिर से मिर झुका लिया। . लुज-पुज " " .
पहला मोटा कहता गया- "तुम्ह होश भी है कि किससे भिडने की सोच रहे हो । हम तीनो मोटे बहुत सशक्त है, साधनसम्पन्न है। हमी तो हर चीज के मालिक है। मै, पहला मोटा, हमारे देश मे पैदा होनेवाले सारे अनाज का मालिक हू। सारे कोयले का स्वामी है दूसरा मोटा और तीसरे मोटे ने सारा लोहा खरीद लिया है। हमी सबसे बढ-चढकर अमीर है। देश का सबसे अधिक धनी व्यक्ति हमारे मुकाबले में सौगुना गरीव है। हम अपने सोने से जो भी चाहे, वही खरीद सकते है।" अव वाकी पेटुओं को भी जोश आया। मोटे के शब्दो ने उन्हे दिलेर बना दिया। इसे पिजरे में भिजवाइये। पिजरे मे}" वे चिल्लाने लगे। "वापिस चिडियाघर में।" “पिजरे मे" l " । 'विद्रोही" ॥ "पिजरे में।" सैनिक प्रोस्पेरो को ले गये। अब हम केक खायेगे," पहले मोटे ने कहा। 'हाय , अव जान गई।" गुब्वारे वेचनेवाले ने सोचा । मभी की नजर उसपर टिकी हुई थी। उसने पाखें वन्द कर ली। पेटू रग-तरग में मा गये- "हो-हा-हा।" "हा-हा-हा ! क्या गजव का केक है। ज़रा गुब्बारा पर तो नज़र डालिये।" "वे तो कमाल ही किये दे रहे है।" "और यह तोवडा" "इसके क्या कहने है।" सभी लोग वेक की ओर सरक गये। 'इस तोवडे का देखकर वरवस हसी पाती है। जाने इसके अन्दर क्या कुछ भरा हुआ है?" किसी ने पूछा और गुब्बारे बेचनेवाले के माथे पर जोर से चपत जमाया। "मिठाइया हागी। "या शेम्पेन. 'बहुत खूब बहुत ही खूब पहले इसका सिर काटकर यह देखें कि इसके अन्दर से क्या निकलता है. ." लाइय, कई मा U ४७ गुब्बारे बेचनेवाला अपने पर काबू न रख पाया। वह साफ तौर पर चीख उठा- "ऊई मा!" और उसने पाखे खोल दी। जिज्ञासु झटके के साथ पीछे हट गये। इसी समय वरामदे मे किसी वालक की ऊची अावाज गूज उठी- "गुड़िया ! मेरी गुड़िया !" सभी कान लगाकर सुनने लगे। तीन मोटे और सरकारी सलाहकार तो खास तौर पर परेशान हो उठे। वालक का चीखना रोने में बदल गया। गुस्से मे आया हुप्रा वालक वरामदे में पाकर वहुत जोर से रो पड़ा। " 1 'यह क्या मामला है?" पहले मोटे ने पूछा। 'यह तो उत्तराधिकारी टूट्टी रो रहा है !" " यह तो उत्तराधिकारी टूट्टी रो रहा है !" दूसरे और तीसरे मोटे ने एकसाथ दोहराया। उन तीनो के चेहरों पर हवाइया उड़ने लगी। वे बुरी तरह सहम गये थे। सरकारी सलाहकार , कुछ मन्त्री और नौकर- चाकर बरामदे मे खुलनेवाले एक दरवाजे की ओर भागे। 'क्या हुआ? क्या हुआ?" हॉल में सभी अोर ऐसी फुसफुसाहट सुनाई दी। लडका भागकर हॉल में पाया, मन्त्रियों और नौकरों-चाकरो को इधर-उधर हटाता हुआ। उसके बाल इधर-उधर झूल रहे थे और वह चमकते हुए वढ़िया जूते पहने था। वह मोटों की ओर भाग गया। वह सिसकियां लेता हुआ कुछ असम्बद्ध शब्द कह रहा था जो किसी की समझ नहीं पा रहे थे। 'इस लडके की अब मुझ पर नज़र पड़ी कि पड़ी," गुब्बारे वेचनेवाला घवरा उठा। " यह कम्बख्त क्रीम जो मुझे सास लेने या उगली तक भी हिलाने-डुलाने नही देती , यकीनन इसे अपनी पोर खीचेगी। जाहिर है कि उसे चुप कराने के लिये वे केक का टुकड़ा काट कर देंगे और उसके साथ-साथ मेरी एड़ी भी अलग हो जायेगी।" मगर लड़के ने केक की ओर नजर उठाकर भी न देखा। इतना ही नहीं, गुब्बार वेचनेवाले के गोल सिर के ऊपर लटक रहे शानदार गुब्बारों की ओर भी उमका ध्यान न गया। वह फूट फूटकर रो रहा था। 'क्या बात है?" पहले मोटे ने पूछा 'उतराधिकारी टूट्टी क्यों रो रहा है?" दूसरे मोटे ने जानना चाहा। ४८
No text on this page.
- "मेरी गुड़िया, मेरी अद्भत गुड़िया टूट गयी है ! उन्होंने मेरी गुड़िया का बुरा हाल कर दिया है। सैनिकों ने उसमें तलवारें घुसेड़ी है .. वह फिर फूट फूटकर रोने लगा। अपनी छोटी-छोटी मुट्ठियों से आंसू पोंछते हुए वह उन्हें अपने गालो पर फैलाता जा रहा था। क्या ?!" मोटे चिल्ला उठे। " क्या ?!" 'सैनिको ने?" "गुड़िया में तलवारें घुसेड़ी?" "उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया मे?" और हॉल में उपस्थित सभी लोगो ने मानो गहरी सास लेते हुए धीरे से कहा- "यह नही हो सकता!" सरकारी सलाहकार ने सिर थाम लिया। वही कमजोर दिल का मिल-मालिक फिर वेहोश हो गया, मगर मोटे के ज़ोर से चीखने-चिल्लाने के फलस्वरूप फौरन होश में आ गया- "दावत ख़त्म की जाये ! सब काम-काज छोड़ दिये जायें! परिपद् के सदस्य जायें ! सभी कर्मचारियों , सभी न्यायाधीशों, सभी मन्त्रियों, सभी जल्लादों को बुलाया जाये ! आज सजायें देने का काम स्थगित किया जाये ! महल में गद्दार है !'
" पढ़ा था भारी हलचल मच गयी। कुछ ही क्षण वाद महल वे दूत सभी दिशाग्रो मे सरपट घोडे दौडाते नजर आये। पाच मिनट बाद सभी दिशामा से न्यायाधीश , सलाहकार और जल्लाद घोडे दौडाते हुए महल की ओर आने लगे। अदालत चौक में वागियो को सजा पाते हुए देखन के लिये जमा हुई भीड को वापिस जाना पड़ा। डाडी पीटनेवालो ने चबूतरे पर खडे हो भीड को यह सूचना दी कि एक बहुत जरूरी कारण से वागिया को दण्ड देने का काम अगले दिन के लिये स्थगित कर दिया गया है। गुब्बारे वेचनेवाल को केक के साथ-साथ ही हाल से बाहर लाया गया। मान की प्रान म पेटुमा का नशा उतर गया था। उन सब ने उत्तराधिकारी टूट्टी को घेर लिया और उसकी कहानी सुनने लगे। "में पाक म घास पर बैठा था और गुडिया भी मेरे पास ही बैठी थी। हम सूर्यग्रहण के शुरू होने का इन्तजार कर रहे थे। यह बहुत दिलचस्प चीज़ है। कल मैने किताब म जव सूर्यग्रहण होता है तो दिन म सितारे नजर आते है बहुत ज़ोर से सिसकिया लेता हुना उत्तराधिकारी अपनी वात' जारी नही रख पा रहा था। उसकी जगह उसके एक शिक्षक ने सारा किस्सा सुनाया। शिक्षक भी मुश्किल से अपनी बात कह पाया, क्याकि वह डर से काप रहा था। "उत्तराधिकारी टूट्टी और उसकी गुडिया के निकट ही मै नाक ऊपर को किये हुए धूप म बैठा था। मेरी नाक पर फुसी है और मैने सोचा कि सूरज की किरणें मुझे इस भोडी फुसी से निजात दिला देंगी। अचानक वहा कुछ सैनिक सामने आ खडे हुए। काई वारह रहे हागे। वे किसी बात को लेकर आपस मे गर्मागम वहस कर रहे थे। हमारे निकट पाकर वे रुक गये। उनकी सूरत देखकर दहशत होती थी। उनमे से एक ने उत्तराधिकारी टूट्टी की ओर इशारा करते हुए कहा - 'यह बैठा है भेडिये का बच्चा । तीन मोटे सुअरो के यहा भेडिये का बच्चा पाला जा रहा है । ' ओह ! मै तो इन शब्दो का अर्थ समझता था। "ये तीन मोटे सुअर कौन हुए।' पहले मोटे ने पूछा । बाकी दोनो मोटे लाल हो गये। तब पहले मोटे के चेहरे पर भी सुर्सी दौड गयी। अब इन तीनो ने इतने ज़ोर से नाक का इजन चलाना शुरू किया कि बरामदे का शीशे का दरवाजा खुलने और बन्द होने लगा। "वे उत्तराधिकारी टूट्टी के गिर्द आकर खड़े हो गये। ' शिक्षक ने बात जारी रखी। 'उन्होने कहा- 'तीन सुअरो के यहा लोहे का भेडिये का वच्चा पाला जा रहा है। उत्तराधिकारी टूट्टी, तेरे कौनसे पहलू मे दिल है ? ' उन्होने पूछा उसका दिल निकाल दिया गया है। वे इसे बेहद गुस्सल , शैतान , सगदिल और जनता से नफरत करनेवाला बनाना चाहते जब तीन सुअरा का दम निकल जायेगा तो यह क्रोधी भेडिया उनकी गद्दी सम्भाल लेगा।" - " - "अापने उन्हे ऐसी वकवास बन्द करने के लिये क्यों नहीं कहा?" शिक्षक का कंधा हिलाते हुए सरकारी सलाहकार चीप उठा। 'क्या आप इतना भी न भांप सके कि वे गद्दा थे जो जनता साथ जा मिले थे?" शिक्षक की पिम्पी बंध गयी। उसने मरे मरे शब्दों में कहा- 'यह तो मैं समझ रहा था, मगर मुझे उनसे दहशत होती थी। वे बहुत गुस्से में थे। मेरे पास तो सिर्फ फुसी थी, कोई हथियार तो या नही... उनके हाथ तलवारों की मूठों पर कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे। उनमें से एक ने कहा- 'यह देयिये, यह रही पुतली, गुड़िया। यह भेड़िये का बच्चा गुड़िया पेलता है। इसे जीते-जागते वालकों से दूर रखा जाता है। स्प्रिंगवाली गुड़िया इसकी दोस्त है।' तव एक दूसरा सैनिक चीज़ उठा- 'मेरी पत्नी और बेटा गाव मे है ! एक दिन मेरा बेटा तीर-कमान से खेल रहा था। उसके तीर से ज़मीदार के बगीचे में एक नाशपाती विंध गयी। जमीदार ने अमीरों की सत्ता का मुह चिढ़ाने के लिये लड़के को कोड़े लगवाये और उसके नौकरों-चाकरों ने मेरी बीवी की खुले आम वेइज्जती की।' सैनिक शोर मचाने लगे और उत्तराधिकारी टूट्टी और करीव आ गये इसी वक़्त अपने बेटे का किस्सा सुनानेवाले ने तलवार निकाली और गुड़िया में घुसेड़ दी। वाकियों ने भी ऐसा ही किया..." अव उत्तराधिकारी टूट्टी बहुत ही ज़ोर से रो पड़ा। "' ले तू तो मजा चख ले , भेड़िये के वच्चे !' उन्होने कहा। 'वाद को तेरे मोटे सुअरों से भी निपटेंगे! "कहां हैं ये गद्दार?" मोटे चीख उठे। "वे गुड़िया फेक कर पार्क में जा घुसे। उन्होने नारे लगाये - 'हथियारसाज प्रोस्पेरो जिन्दावाद ! नट तिवुल जिन्दावाद ! तीन मोटे मुर्दावाद !" "सन्तरियों ने उनपर गोलियां क्यों नहीं चलाई ?" हॉल में उपस्थित सभी लोगों ने जानना चाहा। अव शिक्षक ने बहुत ही ख़तरनाक खबर सुनाई - "सन्तरियों ने अपने टोप हिलाकर उनके लिये शुभकामना की। मैने बाड़ के पीछे से सन्तरियों को उनसे विदा लेते देखा था। उन्होने कहा था- 'साथियो! जनता से जाकर कहना कि जल्द ही सारी सेना उनकी ओर हो जायेगी..." तो यह कुछ हुआ था पार्क में। ख़तरे की सूचना दी जाने लगी। विश्वसनीय फौजी दस्तों को महल की चौकियों, पार्क के आने-जाने के दरवाजों, पुलों और नगर के फाटक पर तैनात किया गया। राज्यीय परिपद् की बैठक शुरू हुई। मेहमान घरों को चले गये। महल के बड़े डाक्टर ५२ ने तीनो मोटो का वजन किया। मगर अत्यधिक उत्तेजना के बावजूद तीनो में से किसी की रत्ती भर चर्बी कम नहीं हुई थी। बड़े डाक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया और फरमान जारी किया गया कि उसे रोटी और पानी के सिवा कुछ भी न दिया जाये। उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया पार्क मे घास पर पडी मिल गयी। वह सूर्यग्रहण न देख पाई। बहुत बुरी तरह उसका हुलिया विगाड दिया गया था। उत्तराधिकारी टूट्टी किसी भी तरह शान्त नही हो पा रहा था। वह टूटी हुई गुडिया का प्रालिगन करता हुग्रा जार-जार प्रासू वहा रहा था। गुडिया लडकी जैसी लगती थी। उसका कद टूट्टी के बरावर था। वह बहुत ही महगी और बडे कलात्मक ढग से बनायी गयी गुडिया थी और विल्कुल जीती जागती लडकी जैसी लगती थी। अब उसका फ्रॉक चिथडा म वदल चुका था और तलवारो के वारा से उसके वक्ष पर काले-काले सूराख हो गये थे। एक घटा पहले तक वह वैठ सकती थी, खडी हो सकती थी, मुस्करा और नाच सकती थी। अब वह महज़ पुतली थी, चिथडा के सिवा कुछ न थी। अव गुलावी रेशमी कपडे के नीचे उसके गले और छाती का टूटा हुआ स्प्रिग ऐसे खरखरा रहा था जैसे घटे वजाने के पहले पुरानी दीवालघडी खरखराती है । "वह मर गयी।" उत्तराधिकारी टूट्टी ने शोकातुर होते हुए कहा । हाय | कितने दुख की बात है। वह मर गयी।" वालक टूट्टी भेडिये का वच्चा नही था। 'इस गुडिया को ठीक करना होगा," सरकारी सलाहकार ने राज्यीय परिपद् की बैठक मे कहा। 'उत्तराधिकारी टूट्टी के दुख का पारावार नही। हर कीमत पर इस गुडिया को ठीक करना होगा।" "दूसरी खरीद ली जाये," मन्त्रियो ने सुझाव दिया। "उत्तराधिकारी टूट्टी दूसरी गुडिया नही चाहता। वह चाहता है कि इसी को जिन्दा किया जाये।" 'मगर कौन यह कर सकता है?" 'मैं जानता हूँ उसे ," सार्वजनिक शिक्षा के मन्त्री ने कहा। 'कौन है वह ?" "श्रीमानो, हम भूल गये कि हमारे नगर मे डाक्टर गास्पर पार्नेरी रहता है। यह व्यक्ति तो सभी कुछ कर सकता है। वह उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया को ठीक कर सकता है।" परिषद् के सभी सदस्य खुशी से चिल्ला उठे- "हुर्रा । हुर्रा ।" ॥ ५३ डाक्टर गास्पर की याद आने पर परिषद् के सभी सदस्य एकसाथ गा उठे- उड़कर तारों तक जो जाये। दुम से पकड़ लोमड़ी लाये। जो पत्थर से भाप वनाये। वड़े करिश्मे कर दिखलाये। जिसके गुण का वार न पार । अद्भत है डाक्टर गास्पर ।। उसी समय डाक्टर गास्पर के नाम फरमान जारी किया गया- श्री डाक्टर गास्पर आर्नेरी, इस पत्र के साथ उत्तराधिकारी टूट्टी की टूटी हुई गुड़िया भेजी जा रही है। तीन मोटों की सरकार की राज्यीय परिषद् आपको आदेश देती है कि आप कल तक इस गुड़िया को ठीक कर दें। अगर यह गुड़िया पहले की तरह भली-चंगी और जीती- जागती सी हो जायेगी, तो आपको मुंह मांगा इनाम दिया जायेगा। अगर यह आदेश पूरा नहीं किया गया तो आपको कड़ी सजा दी जायेगी। सरकारी सलाहकार, राज्यीय परिषद् का अध्यक्ष ... सरकारी सलाहकार ने हस्ताक्षर किये। वही राज्य की बड़ी-सी मुहर लगा दी गयी। मुहर गोल थी और उसके वीच में ठसाठस भरी हुई थैली बनी हुई थी। महल के सन्तरियों का कप्तान काउंट वोनावन्तुरा दो सन्तरियों को साथ लेकर नगर की ओर रवाना हो गया ताकि डाक्टर गास्पर आनेंरी को ढूंढकर उसे राज्यीय परिषद् का श्रादेश-पत्र पहुंचा दे। ये लोग घोड़ों पर सवार थे और उनके पीछे-पीछे घोड़ा-गाड़ी थी। उसमे एक दरवारी वैठा था। उसकी गोद में गुड़िया थी। गुड़िया का पुंघराले पटोंवाला सिर उसके कंधे से टिका हुया था और बहुत ही करुणाजनक लग रहा था। उतराधिकारी टूट्टी ने रोना बन्द कर दिया। उसे यकीन हो गया कि अगले दिन उसकी गुड़िया भली-चंगी और जिन्दा होकर लोट मायेगी। इस तरह महल में वह दिन बहुत चिन्ता और परेशानी में बीता। गुब्बारे बेचनेवाले का क्या हुआ? वैरे उसे हॉल से बाहर ले आये थे, यह तो हम जानते हैं।
वह फिर से मिठाईघर मे पहुच गया। वहा यह दुर्घटना हो गयी। केक लेकर जानेवाले नौकरा म से एक का पैर सन्तरे के छिलके पर जा पडा। सम्भलना ।" बाकी नौकर चिल्लाये। "हाय , मै गिरा" गुब्बारे वेचनेवाले ने जब अपने सिहासन को डोलते पाया , तो वह चीख उठा। मगर नौकर अपने को सम्भाल न पाया। वह टाइला के मजबूत फर्श पर गिर पड़ा। वह अपनी लम्बी टागा को पटकते हुए चिल्लाने लगा। "हुर्रा रसोइये-छोकरे खुश होकर शोर मचाने लगे। "शैतान न हो तो।" नौकर और प्लेट के साथ ही फर्श पर गिरते हुए गुब्बारे वेचनेवाले ने हताश और दुखी होते हुए कहा। " बड़ी सारी प्लेट के टुकड़े-टुकड़े हो गये। फेंटी हुई फूली-फूली क्रीम के गोले सभी दिशाओं में बिखर गये। नौकर उछलकर खड़ा हुआ और भाग गया। रसोइये-छोकरे उछलने-कूदने , नाचने और शोर मचाने लगे। गुब्बारे बेचनेवाला प्लेट के टुकड़ों, रसभरी के शरवत के डवरे और लव फॅटी हुई वढ़िया क्रीम के वादलों से घिरा हुआ वैठा था। क्रीम के ये वादल खराव हुए केक पर अव पिघलते जा रहे थे। गुब्बारे वेचनेवाले ने यह देखकर राहत की सांस ली कि मिठाईघर में सिर्फ़ रसोइये- छोकरे ही थे, तीनों बड़े हलवाई नहीं थे। 'रसोइये-छोकरों से मै अपना काम निकाल लूंगा। वे मुझे भागने में मदद देंगे। मेरे गुब्बारे मुझे मुसीवत से उबार लेगे।" उसने सोचा। वह गुब्बारों वाली रस्सी को कसकर पकड़े रहा। छोकरो ने उसे सभी ओर से घेर लिया। उनकी ललचायी नज़रें बता रही कि गुब्बारे उनके लिये सबसे बड़ी दौलत हैं। उनमें से प्रत्येक केवल एक गुब्बारा पा जाने का सपना देखता है, वह इसे अपनी बहुत बड़ी खुशकिस्मती समझेगा। इसलिये उसने कहा- "मैं इन जान-जोखिम के कारनामों तंग आ गया हूं। मैं न तो छोटा लड़का हूं और न ही कोई सूरमा । हवा में उड़ते फिरना मुझे पसन्द नही। तीन मोटों से मेरी जान कापती है। दावती केक की खूबसूरती बढ़ाने का हुनर मुझे नहीं आता। मै तो जी-जान से बस यही चाहता हूं कि जल्दी से जल्दी इस महल से निकल जाऊं। रसोइये-छोकरे ने हंसना बन्द कर दिया। गुब्बारे हिल-डुल रहे थे, हवा में लहरा रहे थे। हिलते-डुलते गुब्बारों पर पड़ती हुई सूरज की किरणों से उनके अन्दर कभी नीला, कभी पीला और कभी लाल शोला-सा भड़क उठता। बहुत ही ग़जव के थे ये गुब्बारे । "तुम लोग यहां से भाग निकलने में मेरी मदद कर सकते हो ?" रस्सी को झटके के साथ खीचते हुए गुव्वारे वेचनेवाले ने कहा। "हां, कर सकते है," एक छोकरे ने धीरे से कहा और साथ ही यह भी जोड़ दिया- 'अपने गुव्वारे हमें दे दीजिये। गुब्बारे वैचनेवाला यही तो चाहता था। 'मच्छा, ऐसा ही सही," उसने अपनी गुशी छिपाते हुए मरी-सी आवाज मे उत्तर दिया। " में तैयार हूं। वेशक गुब्बारे बहुत महंगे हैं। मुझे इनकी सख्त जरूरत है, फिर भी " -- " " . मैं राजी हूँ। तुम लोग मुझे बहुत पसन्द हो। तुम बडे खुशमिजाज हो, तुम्हारे चेहरो पर निश्छलता है, तुम खुलकर हसते हो। "तुम सव पर शैतान की मार साथ ही उसने मन ही मन यह भी कहा । 'बडा हलवाई इस समय रसदखाने में है," छोकरे ने कहा। "वह शाम की चाय के लिये विस्कुट बनाने की सामग्री तोल रहा है। हमे उसके लौटने से पहले-पहले यह काम करना चाहिये। 'यह तुम ठीक कहते हो," गुब्बारे बेचनेवाले ने सहमति प्रकट की। “देर करने मे कोई तुक नही।" 'सुनिये तो मै एक राज जानता हूँ। इतना कहकर यह छोकरा तावे के बडे-से देग के पास गया जो टाइलो के स्टैंड पर रखा हुआ था। उसने देग का ढक्कन उठाकर अधिकारपूर्ण ढंग से कहा 'लाइये गुब्बारे। 'तेरा दिमाग चल गया है क्या |" गुब्बारे बेचनेवाला झल्ला उठा। "देग से मुझे क्या लेना देना है ? मै भागना चाहता हू। तुम उल्टे क्या यह चाहते हो कि मै देग मे जा " बैठू?" " "हा, यही तो।" "देग मे "हा, देग मे।" 'और उसके वाद ?" 'उसके बाद आप खुद ही देख लेगे कि क्या कमाल होता है। चलिये घुसिये देग में। भागने का यही सवसे वढिया उपाय है। देग इतना वडा था कि दुबले-पतले गुब्बारे वेचनेवाले की तो बात ही क्या, तीनो मोटो में से सबसे ज्यादा मोटा भी उसमे समा सकता था। 'अगर वक्त रहते मुसीवत से पिड छुडाना चाहते है, तो जल्दी से इसमे घुस जाइये । गुब्बारे वेचनेवाले ने देग म झाककर देखा । उसे उसका तल नजर न आया। उसने कुए की भाति उसमे गहरा काला गढा देखा। "तो ऐसा ही सही," गुब्बारे वेचनेवाले ने गहरो सास ली। अगर देग मे ही घुसना जरूरी है, तो यही सही। हवाई उडान और नीम के स्नान से तो यह कुछ बुरा नही । अच्छा तो नमस्कार, छोटे-छोटे शैतानो। यह लो मेरी आजादी की कीमत।" इतना कहकर उसने गाठ खोली और छोकरा मे गुब्बारे वाट दिये। हरेक को गुब्बारे मिल गये, अलग-अलग धागे से वधे हुए। .
दिया। इसके बाद वह टार्गे अन्दर घुसेड़ते हुए अपने पास भद्दे ढंग से देग में घुसा। छोकरे ने ढक्कन बन्द कर 'गुब्बारे! गुव्वारे!" छोकरे पशी से शोर मचाने लगे। वे मिठाईघर की खिड़कियों के नीचे पार्क में आ पड़े हुए। यहा खुली हवा में गुव्वारों के साथ खेलना कहीं अधिक दिलचस्प था। अचानक मिठाईघर की तीनों खिड़कियों में से तीनों हलवाइयों ने बाहर झांका। "यह क्या हो रहा है ?!" वे तीनों चीख उठे। "यह कैसी वदतमीज़ी है? फ़ौरन वापिस चलो!" हलवाइयो की डांट से इन छोकरों की तो जान ही निकल गयी। डर के मारे गुब्बारों के धागे उनके हाथ से छूट गये। उनकी खुशी हवा में उड़ गयी। वीस के वीस गुब्बारे बड़ी तेजी से चमकते हुए निर्मल नीलाकाश में ऊंचे चढ़ते गये। रसोइये-छोकरे फूलों के बीच मुंह खोले हुए पास पर खड़े थे। सफ़ेद टोपियों वाले अपने सिरों को पीछे की ओर फेंके हुए वे उन्हें ताक रहे थे। पांचवां अध्याय नीग्रो और पत्तागोभी का कल्ला आपको यह तो याद होगा कि डाक्टर गास्पर की हंगामों और ख़तरों की रात का कसे अन्त हुआ था? यही कि उसके कमरे की अंगीठी में से नट तिबुल निकलकर सामने आ खड़ा हुआ था। सुवह होने पर उन दोनों ने वहां क्या किया, यह कोई नही जानता। मौसी गानी- मेड दिन भर की उत्तेजना और डाक्टर गास्पर की प्रतीक्षा से बहुत थक गयी थी और अब गहरी नीद सो रही थी। उसे सपने में मुर्गी दिखाई दी। अगले दिन , यानी उस दिन जब गुब्बारों वाला उड़ता हुआ तीन मोटों के महल में जा पहुंचा और सैनिकों ने उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया मे तलवारे घुसेड़ी, मौसी गानीमेड को एक बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा हुअा यह कि चूहेदानी मे बन्द चूहा निकल भागा। पिछली रात यही चूहा प्राध सेर मुरब्बा चट कर गया था। इस से पहलेवाली रात को उसने कारनेशन फूलों वाला गिलास गिरा दिया था। गिलास चूरचूर हो गया था और फूलों से न ५८ जाने क्या , दवाई की सी गन्ध आने लगी थी। उस भयानक रात को चूहा पिजरे मे पा फसा था। सुबह उठते ही मौसी गानीमेड ने चूहेदानी को हाथ म उठा लिया। चूहा ऐसे निश्चिन्त भाव से बैठा था मानो कह रहा हो कि पहली बार थोडे ही पिजरे में आया है। बहुत ही शैतान चूहा था वह। "जो तेरे लिए न हो, अब तू वह मिठाई कभी न खाना | ' मौसी गानीमेड ने चूहेदानी ऐसी जगह पर रखते हुए कहा जहा से वह दिखाई दे सके । मौसी गानीमेड ने कपडे पहने और डाक्टर गास्पर की प्रयोगशाला की ओर चल दी। वह डाक्टर को यह ख शखबरी सुनाना चाहती थी। पिछली सुवह को जब उसने डाक्टर को यह बुरी खवर सुनाई थी कि चूहा मुरब्बा चट कर गया है, तो डाक्टर ने हमदर्दी जाहिर की थी और कहा था- "चूहे को मुरब्बा इसलिये अच्छा लगता है कि उसम वहुत-से तेज़ाब होते है।" यह सुनकर मौसी गानीमेड शान्त हो गई थी। 'चूहे को मेरे तेजाव अच्छे लगते है अब देखेंगे कि उसे मेरी चूहेदानी भी अच्छी लगती या नहीं। मौसी गानीमेड डाक्टर की प्रयोगशाला के दरवाजे पर पहुची। उसके हाथ मे चूहेदानी थी। अभी वहुत ही सवेरा था। खुली खिडकी मे से हरियाली झलक दिखा रही थी। वह तेज हवा जो गुब्बारे वेचनेवाले को ले उडी थी, वाद मे चली। दरवाजे के पीछे से कुछ पाहट मिल रही थी। 'ओह , बेचारे डाक्टर ।" मौसी गानीमेड ने सोचा। 'लगता है, रात भर विल्कुल सोये ही नही" उसने दरवाजे पर दस्तक दी। डाक्टर ने अन्दर से कुछ कहा, मगर वह मौसी को सुनाई नही दिया। दरवाजा खुला। डाक्टर गास्पर दहलीज़ के पास खडे थे। प्रयोगशाला मे से जले हुए कार्क की सी गन्ध पा रही थी। कोने मे स्पिरिट लैम्प का छोटा-सा लाल शोला झलमला रहा था। जाहिर था कि बची बचायी रात के समय डाक्टर कोई वैज्ञानिक कार्य करते रहे थे। 'नमस्ते डाक्टर ने खुशी से कहा। मौसी गानीमेड ने डाक्टर को दिखाने के लिए चूहेदानी ऊपर को उठाई। चूहा अपनी नाक सिकोडते हुए कमरे की गन्ध को सूघ रहा था। " मैने चूहा पकड लिया।" . . , ५६ "सच!" डाक्टर बहुत यश हुए। “दिपाइये तो!" मोसी गानीमेड खिड़की की तरफ लपकी। "यह रहा!" . था। " मौसी ने चूहेदानी डाक्टर की ओर बढ़ाई। अचानक उसे वहां एक नीग्रो दिखाई दि खिड़की के पास रखी हुई जिस पेटी पर "सावधानी से !" लिया हुआ था, उसी पर सुन्दर नीग्रो बैठा था। नीग्रो लाल विरजस के सिवा कुछ भी न पहने नीग्रो का रंग काला, बैंगनी, वादामी था। उसका बदन चमक रहा था। वह पाइप के कश लगा रहा था। मौसी गानीमेड इतने ज़ोर 'ऊई मां!" कहकर चीख उठी कि वस दो टुकड़े होते होते वची। वह लट्ट की तरह घूमी और उसने कनकौवे की तरह हाथ झटके। यह सब करते हुए उससे कुछ ऐसी असावधानी हुई कि चूहेदानी का मुंह खुल गया और चूहा निकलकर न जाने कहां गायब हो गया। इतनी अधिक डर गयी थी मौसी गानीमेड! नीग्रो ठठाकर ज़ोर से हंस दिया। उसकी लम्बी टागें फैली हुई थी और उसके लाल जूते वड़ी-बड़ी सूखी हुई लाल मिर्चों जैसे प्रतीत हो रहे थे। नीग्रो के दांतों के बीच पाइप तूफ़ान में झूलती हुई टहनी की भांति हिल-डुल रही थी। डाक्टर भी हंस रहा था और उसकी नाक पर टिका हुआ नया चश्मा ऊपर-नीचे हो रहा था। मौसी गानीमेड तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गयी। वह चिल्लाई। "चूहा! मिठाई ! नीग्रो !" डाक्टर गास्पर उसकी ओर लपके। 'मौसी गानीमेड ," उसे दिलासा देते हुए डाक्टर ने कहा। न हो। मैं आपसे अपने नये तजरवे की चर्चा करना भूल गया... मगर आप ऐसी आशा तो कर हो सकती हैं ... मै तो ठहरा वैज्ञानिक , विभिन्न विज्ञानों का विशेषज्ञ , तरह-तरह की अनूठी चीज़ों का माहिर। मैं तो सभी तरह के तजरवे करता रहता हूं। मेरी प्रयोगशाला में नीग्रो ही नहीं, हाथी भी नज़र पा सकता है। मौसी गानीमेड ... मौसी गानीमेड ... नीग्रो की वात नीग्रो के साथ रही, आमलेट की आमलेट के साथ ... हम नाशते का इन्तजार कर रहे है। मेरे नीग्रो दोस्त को बहुत-से अंडों का पामलेट पसन्द है .. "चूहे को तेजाव पसन्द हैं," सहमी हुई मौसी गानीमेड फुसफुसायी, "और नीग्रो को आमलेट पसन्द है..." चूहा! - 'पाप बेकार ही परेशान , M ६० . "हा, ऐसा ही है। मामलेट तो अभी ले पाइये और चूहे की चिन्ता कीजियेगा रात को। रात को वह काबू मे पा जायेगा, मौसी गानीमेड। आजाद रहकर वह करेगा भी क्या? मिठाई तो वह चट कर ही चुका है।' मौसी गानीमेड रोई और उसने नमक की जगह अडो मे अपने ग्रासू मिला दिये। उन में ऐसी तलखी थी कि उन्होने मिर्गों का काम पूरा किया। अच्छा किया कि काफी मिर्च डाल दी। वहुत ज़ायकेदार वना है । " आमलेट को चट करते हुए नीग्रो ने कहा। मौसी गानीमेड ने दिल मजबूत करनेवाली दवाई की कुछ बूदे पी जिनमे से अब न जाने क्यो कारनेशन फूलो की गध पा रही थी। शायद अासुमो के कारण । वाद को उसने डाक्टर गास्पर को गली मे जाते देखा। नया गुलूवन्द लगाये, नयी छडी लिये और नये जूते पहने (बेशक वास्तव मे पुराने जूतो को नयी लाल एडिया लगी हुई थी) वे खू व जच रहे थे। उनके साथ-साथ नीग्रो चल रहा था। मौसी गानीमेड ने कसकर आखें मूद ली और फर्श पर बैठ गयी। वास्तव मे फर्श पर नही , दिल्ली के ऊपर, जो डरकर जोर-जोर से म्याऊ-म्याऊ कर उठी। मौसी गानीमेड आपे से बाहर हो गयी और उसने विल्ली की पिटाई कर डाली। एक तो इसलिए कि वह हर समय रास्ते में आती रहती थी और दूसरे इसलिये कि वह चूहे को भी नही पकड पायी थी। इसी बीच चूहा डाक्टर गास्पर की प्रयोगशाला से भागकर मौसी गानीमेड की दराजदार अलमारी में जा घुसा था और मिठाई की प्यारी-प्यारी याद करता हुआ बादामो के विस्कुट हडपता जा रहा था। डाक्टर गास्पर पार्नेरी छाया की गली में रहता था। वायी ओर मुडकर साधवी लिज्जवेता के कूचे मे पहुचा जा सकता था। वहा से आगे वह गली आती थी जो विजली गिरने के कारण नष्ट हुए वलूत के लिये मशहूर थी। इस गली से पाच मिनट तक और चलने पर व्यक्ति चौदहवें वाजार मे पहुच जाता था। डाक्टर गास्पर और नीग्रो उधर ही चल दिये। हवा तेज हो गयी थी। जला हुआ वलूत हवा के झोको मे झूले की तरह झूल-झूल जाता था। एक इश्तिहार चिपकानेवाले को अपना काम करने मे बड़ी कठिनाई का सामना करना पड रहा था। बडा-सा इश्तिहार उसके काबू से बाहर होता हुआ उसके मुह पर फडफडा रहा था। दूर से ऐसा लगता था मानो कोई व्यक्ति सफेद नेप्किन से मुह पोछ रहा हो । आखिर उसने वाड पर इश्तिहार चिपका ही दिया।
-- " डाक्टर गास्पर ने इश्तिहार पढ़ा जिसमें लिखा था- आइये! आइये! प्राइये! आज तमाशा देखने आइये! तीन मोटों को सरकार ने लोगों के लिए खेल-तमाशे की व्यवस्था की है! जल्दी कीजिये! जल्दी कीजिये! जल्दी कीजिये! चौदहवें वाज़ार में पहुंचिये! अब सारी बात समझ मे आ गयी," डाक्टर गास्पर ने कहा। "आज अदालत चौक मे बागियो को सजा दी जानेवाली है। तीन मोटों की सरकार के जल्लाद उन लोगो के सिर कलम करेगे जिन्होने अमीरो और पेटुअों की सत्ता के खिलाफ़ आवाज उठाई थी। तीन मोटे जनता की आखों में धूल झोकना चाहते है। उन्हें इस वात का डर है कि अदालत चौक मे जमा होनेवाले लोग कही जल्लादो के तख्ते न तोड़ डालें, जल्लादो की हत्या न कर दें और अपने उन भाइयों को आजाद न करा लें जिन्हें मौत की सजा देने की घोषणा की जा चुकी है। इसीलिये उन्होने लोगों के मनोरंजन की व्यवस्था की है। वे चाहते है कि लोग आज दी जानेवाली सजायों के बारे में बिल्कुल भूल ही जायें। डाक्टर गास्पर और उनका नीग्रो साथी बाजार चौक मे पहुंचे। मंडपों के गिर्द लोगों की भारी रेलपेल थी। मगर वहा डाक्टर गास्पर को न तो कोई बांका-छैला नजर आया, न कोई वनी-ठनी महिला, जो सुनहरी मछलियों और अंगूरों की प्राभावाली वढ़िया पोशाक पहने हो। वहा कोई जाना-माना बुजुर्ग भी नही था जो स्वर्णमढ़ी पालकी में बैठकर प्राया हो, न कोई ऐसा सौदागर ही था जिसकी वगल में चमड़े की बड़ी-सी थैली लटक रही हो। यहा नगर के बाहर गन्दे-मन्दे घरों में रहनेवाले गरीब लोग- कारीगर, मिस्त्री, की रोटिया बेचनेवाले , रोजनदारिनें , कुली, बूढ़ी औरतें , भिखमंगे और लुज-पुंज ही दिखाई दे रहे थे। पुराने और जीर्ण-शीर्ण भूरे कपड़ों में कही-कही केवल हरे कफ़, रंग-बिरगे तबाद या रंग-बिरगे रिवन नजर मा जाते थे। बूढ़ी औरतो के पके हुए वाल नमदे की तरह तेज हवा में उड़ रहे थे, में पानी मा रहा था। भिखमगों के वादामी रंग के चिथड़े फड़फड़ा रहे थे। - " जो मायो ६२ . . सभी के चेहरा पर तनाव था, सभी यह समझ रहे थे कि कोई न कोई अनहोनी वात होनेवाली है। 'अदालत चौक में सजायें दी जायेंगी," लोग कह रहे थे, "वहा हमारे साथियो के सिर क्लम किये जायेंगे और यहा मसखरे उछल-कूद मचायेंगे जिनकी तीन मोटो ने खू व मुट्ठी गर्म की है।" 'प्रायो, अदालत चौक मे चलें।" लोग चिल्लाये। 'हमारे पास तो हथियार नहीं है। हमारे पास पिस्तौले और तलवार नहीं है। मगर अदालत चौक के गिर्द सैनिका का तिहरा पहरा है। "सैनिक अभी तो उनका साथ दे रहे है। उन्होने हम पर गोलिया चलाई। पर खैर, कोई बात नहीं। अाज नही तो कल अपने मालिको को छोडकर हमारा साथ देंगे।" “अभी पिछली रात ही एक सैनिक ने सितारे के चौक मे अपने अफसर को गोली का निशाना बना दिया। इस तरह उसने नट तिबुल की जान बचाई।" 'तिवुल कहा है ? वह बचकर भाग गया या नही?"
" . - "मालूम नही। सैनिक सारी रात और पो फटने तक मजदूरों के घरों को आग की नजर करते रहे। वे तिवुल को ढूढ़ लेना चाहते थे। डाक्टर गास्पर और नीग्रो मंडपों के करीब पहुंचे। तमाशा अभी शुरू नहीं हुआ था। फूलों के छापेवाले पर्दो और तख्तों के पीछे से लोगों की आवाजें , घंटियों को टनटनाहट, वासुरियों की गूज और कुछ सरसराने, किकियाने और चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनाई दे रही थी। वहा अभिनेता खेल-तमाशे के लिए तैयार हो रहे थे। पर्दा हटा और एक चेहरा दिखाई दिया। यह एक स्पेनी था जिसे पिस्तौल की निशानेबाजी मे कमाल हासिल था। उसके बड़े-बड़े गलमुच्छे थे और एक आंख की पुतली हिल-डुल रही थी। 'प्रोह ," नीग्रो को देखकर उसने कहा। "तुम भी इस तमाशे में हिस्सा ले रहे हो? कितनी रकम मिली है?" नीग्रो चुप रहा। 'मुझे तो दस स्वर्ण मुद्रायें मिली है!" स्पेनी ने डीग हांकते हुए कहा। उसने नीग्रो को भी अभिनेता ही समझा। इधर आयो, उसने रहस्यपूर्ण मुद्रा बनाते हुए फुसफुसाकर कहा। नीग्रो मंच पर चढ़ गया। स्पेनी ने उसे राज बताया। राज यह था कि तीन मोटों ने सौ अभिनेताओं की जेब गर्म करके उन्हें वाजारों में तरह-तरह के खेल-तमाशे दिखाने और साथ ही अमीरों तथा पेटुओं की सत्ता की बड़ाई और विद्रोहियों, हथियारसाज प्रोस्पेरो और नट तिबुल की बुराई करने का काम सोपा था। " उन्होने मदारियों, जानवर सधानेवालों, मसखरों, विचित्र आवाजें निकालनेवालों और नर्तकों का बड़ा-सा दल इस काम में जुटाया है ... सभी की मुट्ठिया गर्म की गयी है।" 'क्या सभी अभिनेता तीन मोटों की तारीफ़ करने को राजी हो गये है ? गास्पर ने पूछा। स्पेनी ने आवाज़ और धीमी कर ली- "शी!" उसने होंठों पर उंगली रखते हुए कहा। "यह बहुत धीमे से कहने को वात है। बहुतों ने इन्कार कर दिया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। नीग्रो का खून खोलने लगा। इसी समय संगीत गूंज उठा। कुछ मंडपों में तमाशा शुरू हो गया। भीड़ इधर-उधर हिलने-डुलने लगी। 'दर्शकगण!" लकड़ी के ऊंचे चबूतरे पर खड़े हुए एक मसखरे ने चीखते हुए कहा। "दर्शकगण! मैं आपको वधाई देता हूं..." " . डाक्टर " " वह लोगो के चुप हो जाने की प्रतीक्षा करता हुआ खामोश हो गया। उसके चेहरे से आटा झड़ सड़कर गिर रहा था। "दर्शकगण , मैं आपको अाज के विशेष खुशी के अवसर पर बधाई देता है। आज हमारे प्यारे, लाल-लाल गालो वाले तीन मोटो के जल्लाद दुष्ट विद्रोहियो के सिर कलम करेगे वह अपनी बात पूरी न कर पाया। इसी समय किसी कारीगर ने बची हुई रोटी उसकी ओर फेंकी। वह उसके मुह में जा गिरी। ग-ग-ग-ग-ग... मसखरे ने जोर लगाते हुए अपनी वात पूरी करने की कोशिश की, मगर बेसूद । अधपकी रोटी उसके मुह मे चिपक गयी। उसने हाथ झटके और अटपटे से मुह बनाये। "शाबाश! यह इसी लायक था!" लोग चिल्ला उठे। मसखरा भागकर लकडी की दीवार के पीछे गायब हो गया। "कमीना कही का! तीन मोटो का नमक हलाल करना चाहता था! मुट्ठी गर्म कर दी गयी, इसलिये उन लोगो पर कीचड़ उछालना चाहता था जिन्होने हमारी आजादी के लिये मौत को गले लगाया!" सगीत बहुत ऊचा हो गया। अन्य कई आरकेस्ट्रा भी शामिल हो गये -- नौ वासुरिया, तीन विगुल, तीन ढोल और एक वायलिन , जिसके स्वरो से दात मे दर्द की अनुभूति-सी होने लगती थी, एकसाथ बज रहे थे। मडपो के प्रवन्धको ने भीड के शोर को इस सगीत मे डुवो देना चाहा। 'शायद हमारे अभिनेता इन रोटियो से डर जायेंगे," उनमे से एक ने कहा । "हमे तो ऐसे जाहिर करना चाहिए मानो कुछ हुआ ही न हो।" 'आइये! इधर आइये! खेल शुरू होता है एक दूसरे मडप का नाम था 'नोजन का घोड़ा'। पर्दे के पीछे से मैनेजर सामने आया। वह हरे रंग का ऊचा ऊनी टोप पहने था और उसके कोट पर ताबे के गोल-गोल बटन लगे हुए थे। उसके गालो पर बहुत-सा रग मला गया था और वे विल्कुल लाल-लाल दिखाई दे रहे थे। 'जरा चुप हो जाइये," उसने ऐसे कहा मानो जर्मन मे बोल रहा था। "जरा चुप हो जाइये! हमारा तमाशा देखने लायक है!" कुछ लोग चुप हो गये। आज के पर्व के विशेष अवसर पर हमने पहलवान लापीतूप को निमन्त्रित . । " किया है !" 'ता-ती-तू-ता!" विगुल ने मानो नाम दोहराया। 5-1492 वताशों ने मानो तालिया वजायीं। "पहलवान लापीतूप आपको अपनी ताकत के कमाल दिखायेगा..." आरकेस्ट्रा जोर से गूंज उठा। पर्दा हटा। लापीतूप मंच पर आया। गुलावी विरजस पहने हुए यह देव-दानव वास्तव में ही बहुत शक्ति- शाली प्रतीत हुआ। वह फूं-फां कर रहा था और सांड़ की तरह सिर झुकाये था। त्वचा के नीचे उसकी पेशियां अजगर द्वारा निगले हुए खरगोशों की भांति ऊपर- नीचे हिल-डुल रही थीं। सहायकों ने बड़े-बड़े वाट लाकर मंच पर फेंक दिये। तख्ते तो टूटते- टूटते ही बचे। धूल का बादल ऊपर उठा। बाजार के एक सिरे से दूसरे सिरे तक लोगों की धीमी-सी फुसफुसाहट सुनाई दी। पहलवान ने अपना कमाल दिखाना शुरू किया। उसने दोनों हाथों में एक-एक बाट उठाया, उन्हें गेंद की तरह उछाला, साधा और फिर इतने ज़ोर से आपस में टकराया कि चिनगारियां चमक उठी। "देखा आपने!" उसने कहा। "ऐसे ही तीन मोटे हथियारसाज़ प्रोस्पेरो और नट तिबुल की खोपड़ियां टकराकर उनका कचूमर निकाल देंगे।" यह पहलवान भी तीन मोटों की स्वर्ण मुद्राओं के बदले में अपनी आत्मा धेच चुका था। "हा-हा-हा!" अपने मजाक से खुश होते हुए वह ठठाकर हंस दिया। वह जानता था कि उस पर रोटी फेंकने की हिम्मत किसी को नही होगी। सभी तो उसकी ताक़त को देख रहे थे। गहरी खामोशी छा गयी थी। उस ख़ामोशी में नीग्रो की आवाज़ साफ़ तौर पर गूंज उठी। सभी के सिर उसकी ओर घूम गये। 'क्या कहा था तुमने?" मंच की पैड़ी पर पांव रखते हुए नीग्रो ने पूछा।
॥ " - "मैने कहा था कि तीन मोटे हथियारसाज प्रोस्पेरो और नट तिवुल की खोपडिया टकराकर उनका कचूमर निकाल देगे। 'जवान को लगाम दो! नीग्रो ने इत्मीनान और कडाई से, मगर धीरे से कहा। 'तुम कौन हो रे, काले-कलूटे?" पहलवान विगडा। उसने बाट फेंककर कूल्हो पर हाथ रख लिये। नीग्रो मच पर जा चढा। "तुम बहुत ताकतवर हो, मगर कमीने भी कुछ कम नहीं। बेहतर है तुम यह बतानो कि तुम हो कौन? जनता पर फब्तिया कसने का हक तुम्हे किसने दिया? मै तुम्हे जानता हू। तुम लुहार के बेटे हो। तुम्हारा बाप अभी तक कारखाने में काम करता है। तुम्हारी बहन का नाम एली है । वह धोविन है । वह अमीरो के कपडे धोती है। बहुत मुमकिन है कि सैनिको ने कल उसे गोली का निशाना बना दिया हो और तुम गद्दार हो।" पहलवान स्तम्भित रह गया। नीग्रो ने तो सचमुच हर वात सही कही थी। पहलवान की तो अक्ल चकरा गयी थी। "चलते बनो यहा से! " नीग्रो चिल्लाया। पहलवान अव सम्भला। उसका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उसने घूसे तान लिये। "तुम्हे मुझे हुक्म देने का कोई हक नही है । " वह मुश्किल से इतना ही कह पाया। "मैं तुम्हे नहीं जानता। तुम शैतान हो।" 'चलते बनो यहा से | मै तीन तक गिनता हूँ। एका" भीड सकते में आ गयी। नीग्रो पहलवान से कद छोटा और शरीर मे एक- तिहाई था। मगर फिर भी किसी को इस बात म रत्ती भर सन्देह नही था कि अगर हाथापाई की नौवत आ गयी तो नीनो ही वाजी मार जायेगा। वह इतना फैसलाकुन और सजीदा नजर आ रहा था, इतना भरोसा था उसे अपनी ताकत पर। "दो।" पहलवान ने गर्दन तान ली। वह फुसफुसाया। " शैतान ।। तीन " ॥ पहलवान गायव हो गया। बहुत से लोगा ने तो कसकर पाखें मूद ली। उन्हे तो उम्मीद थी कि पहलवान जोर का वार करेगा। मगर जब उन्हाने आखे खोली तो पहलवान को गायव पाया। वह पलक झपकते म दीवार के पीछे जाकर अोझल हो गया था। 5. ६७ .. - " " " इस तरह से लोग तीन मोटों को चलता कर देंगे!" नीग्रो ने हाथ ऊचे कर हंसते हुए कहा। लोगों की खुशी का पारावार न रहा। उन्होने तालिया बजायी और हवा में टोपिया उछाली। 'जय जनता!" शावाश! शाबाश!' केवल डाक्टर गास्पर ही असन्तोष जाहिर करते हुए सिर हिला रहे थे। वे किस बात से नाखुश थे, यह स्पष्ट नही था। "यह कौन है ? कौन है यह? यह नीग्रो?" दर्शकों ने जानना चाहा । 'क्या यह भी अभिनेता है? 'हमने तो इसे पहले कभी नही देखा!" "कौन हो तुम?" 'क्यों तुम ने जनता की हिमायत की?" जरा रास्ता दीजिये! रास्ता दीजिये!" चिथड़े पहने हुए एक व्यक्ति भीड़ को चीरकर आगे बढ़ा रहा था। यह वही भिखमंगा था जो पिछली शाम को मालिनों और कोचवानों से बातचीत करता रहा था। डाक्टर गास्पर ने उसे पहचान लिया। 'जरा मेरी वात सुनिये," भिखमंगे ने चिल्लाकर कहा। क्या आप लोग इतना भी नहीं समझ रहे हैं कि हमारी प्राखो में धूल झोंकी जा रही है ? यह नीग्रो भी पहलवान लापीतूप की तरह ही अभिनेता है। ये एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। इसने भी तीन मोटों का माल खाया है !" नीग्रो ने मुट्ठियां भीच ली। भीड़ को सशी गुस्से में बदल गयी। "विल्कुल ऐसा ही है ! एक वदमाश ने दूसरे वदमाश को भगा दिया है। "उसे डर था कि हम उसके साथी की पिटाई कर देगे, इसलिए उसने हम लोगो का उल्लू बनाया है। 'दफ़ा हो जायो यहां से !" 'नीच!" "महार! डाक्टर गास्पर कुछ कहना, भीड़ को शान्त करना चाहते थे , मगर देर हो चुकी थी। कोई बारह व्यक्तियों ने मच पर प्राकर नीग्रो को घेर लिया। ॥ ? " " " . ६८ "इसकी सू व पिटाई करो!" कोई बुढिया चिल्लाई । नीग्रो ने हाथ बढ़ाया। वह शान्त था। 'जरा इत्मीनान कीजिये !' लोगो का शोर, चीप-चिल्लाहट और सीटिया नीग्रो की आवाज़ में दब गयी। खामोशी छा गयी और उस खामोशी मे नीग्रो ने शान्त भाव से साफ-साफ कहा- " में नट तिबुल हूं।" लोग हक्के-बक्के रह गये। जिन लोगो ने तिवुल को घेर रखा था, वे पीछे हट गये। "प्राह ! " भीड ने गहरी सास ली। सैकड़ो लोग आश्चर्य से सिहरे और स्तम्भित होकर रह गये। केवल एक ही व्यक्ति ने बदहवासी मे पूछा- 'तो तुम काले क्यो हो?" 'यह डाक्टर गास्पर पार्नेरी से पूछिये !" उसने मुस्कराकर डाक्टर की ओर सकेत किया। "निस्सन्देह यह तिवुल ही है।" "तिवुल ! " "हुर्रा ! तिवुल सही-सलामत है ! तिबुल जिन्दा है ! तिबुल हमारे बीच है !" “तिवुल जिदावाद !" मगर खुशी से नारे लगाते हुए लोग अचानक ही चुप हो गये । अप्रत्याशित कोई बुरी बात हो गयी थी। पीछे खडे लोगो मे घबराहट फैल गयी। लोग सभी दिशाओ मे तितर- वितर होने लगे। 'खामोश ! खामोश हो जायो । " 'तिवुल भागो, अपनी जान बचानो!" चौक मे तीन घुडसवार पाये और उनके पीछे एक घोडा-गाडी नमूदार हुई। ये घुड़सवार भे- महल के सैनिको का कप्तान काउट वोनावेन्तुरा और उसके दो सैनिक। घोड़ा-गाडी मे महल का एक कर्मचारी उत्तराधिकारी टूट्टी की टूटी हुई गुड़िया लिये बैठा था। घुघराले कटे हुए वालो वाला गुड़िया का सिर करुणाजनक ढग से कर्मचारी के कधे के साथ सटा हुअा था । ये लोग डाक्टर गास्पर की तलाश कर रहे थे। "सनिक ! " कोई गला फाडकर चीख उठा । बहुत-से लोग पास की बाड फाद गये।
. काली घोड़ा-गाड़ी रुक गयी। घोड़े सिर झटक रहे थे। उनके साजों की घटिया टनटना रही थी, साज लौ दे रहे थे। हवा घोड़ों के सिरों पर लगे हुए नीले पंखों के गुच्छों से खिलवाड़ कर रही थी। घुड़सवार घोड़ा-गाड़ी के गिर्द खड़े हो गये। कप्तान बोनावेन्तूरा की आवाज़ बड़ी भयानक थी। अगर वायलिन की आवाज़ से दांत में दर्द-सा अनुभव होता था, तो कप्तान की आवाज से ऐसा लगता था मानो किसी ने दांत तोड़ डाला हो। कप्तान ने रक़ावों में उठकर पूछा- 'डाक्टर गास्पर पार्नेरी का घर कहां है?' वह लगामो को कसे हुए था। वह हाथों में चौड़े-चौड़े कफ़ों वाले चमड़े के खुरदरे- से दस्ताने पहने था। उसके प्रश्न की मानो एक वुढ़िया पर विजली-सी गिरी। वह बुरी तरह सहम उठी और किसी एक दिशा मे उसने अपना हाथ हिला दिया। 'कहा है ?" कप्तान ने प्रश्न दोहराया। अब उसकी आवाज से ऐसी अनुभूति हुई मानो एक दांत नही, बत्तीसी ही तोड़ डाली गयी हो। "मैं यहां हूं! कौन मुझे पूछ रहा है ? लोग इधर-उधर बिखर गये। डाक्टर गास्पर सधे हुए क़दम रखते घोड़ा-गाड़ी के क़रीब पाये। " आप है डाक्टर गास्पर आर्नेरी? "हां, मैं ही हूं।' घोड़ा-गाड़ी का पट खुला। "फ़ौरन घोड़ा-गाड़ी में बैठ जाइये । अभी आपको आपके घर ले जायेंगे और वहां अापको सारी बात का पता चल जायेगा। एक अरदली घोड़ा-गाड़ी के पीछे से कूदकर आगे आया और उसने डाक्टर गास्पर को सहारा देकर घोड़ा-गाड़ी में चढ़ाया। पट वन्द कर दिया गया। धूल का बादल उड़ाता हुआ जुलूस रवाना हो गया। घड़ी भर वाद सभी लोग मोड़ मुड़कर अोझल हो गये। न तो कप्तान बोनावेन्तूरा और न सैनिकों का ध्यान ही भीड़ के पीछे खड़े हुए तिवुल की ओर गया। वैसे भी नीग्रो को देखकर वे उस व्यक्ति को न पहचान पाते जिसे ढूंढ़ने के लिए पिछली रात वे बेहद दौड़-धूप करते रहे थे। ७० नट ऐसा प्रतीत हुमा मानो खतरा टल गया था। मगर अचानक किसी की गुस्से से भरी आवाज सुनाई दी। पहलवान लापीतूप मामजामे से ढके लकडी के घेरे पर चढता हुआ चिल्ला रहा था- 'जरा ठहरो जरा ठहरो तो, अब तुम्हे मजा चखाऊगा, मेरे दोस्त में अभी सैनिका को जाकर बताता हू कि तुम यहा हो।" इतना कहकर वह लकडी के घेरे पर चढ गया। लकडी का घेरा मोटे का वजन वर्दाश्त न कर पाया। वह जोर से चरमराकर टुकडे- टुकडे हो गया। पहलवान की टाग सध म फस गई। उसने उसे बाहर निकाला और लोगो की भीड को चीरता हुआ तेजी से घोडा-गाडी के पीछे भाग चला। 'रुक जाइये ।" वह भागता हुआ अपने नगे और गोल मटोल हाथो को हिलाता ज़ोर- जोर से चिल्लाता जा रहा था। रुक जाइये। नट तिबुल का पता चल गया । तिवुल' यहा है। मेरी मुट्ठी में वन्द है।' मामले ने खतरनाक रुख ले लिया। घूमती हुई पाख की पुतली और पेटी के साथ टगी हुई पिस्तौल वाला स्पेनी भी सामने आ गया। दूसरी पिस्तौल उसके हाथ मे थी। उसने हो-हल्ला मचा दिया। वह मच पर उछलता-कूदता हुआ शोर मचा रहा था- "उपस्थितगण । हम तिवुल को सौंप देना चाहिए, वरना हमारी शामत आ जायेगी। हम तीन मोटो से नही उलझना चाहिए।" मडप का वह मैनेजर भी उसके साथ आ मिला जिसके पहलवान को तिबुल ने मच से भगा दिया था। वह चिल्लाया- 'इसने मेरा तमाशा चौपट कर दिया। इसने पहलवान लापीतूप को मच से भगा दिया। मै इसके लिए तीन मोटो गुस्से का शिकार नही होना चाहता लोगा की भीड ने तिबुल को अपनी ओट मे कर लिया। पहलवान घुडसवारा तक नहीं पहुच पाया। वह फिर से चौक म लौट आया। वह तेजी से तिबुल की ओर बढा जा रहा था। स्पेनी कूदकर मच से नीचे उतर गया और उसने दूसरी पिस्तौल भी वाहर निकाल ली । मडप का मैनेजर न जाने कहा से सफेद कागज का एक चक्र उठा लाया। सरकस मे सधे हुए कुत्ते ऐसे ही चको के बीच से कूदते है। वह इसी चक्र को घुमाता हुआ स्पेनी के पीछे-पीछे मच से नीचे कूद गया। स्पेनी ने पिस्तौल का घोडा चढा लिया। तिबुल ने समझ लिया कि अब उसे भाग जाना चाहिए। भीड ने रास्ता दे दिया। पलक यपकते मे वह चौक से गायब हो गया। वह वाड फादकर सब्जी के खेत मे जा - - - - पहुचा। उसने सेध मे से झाककर देखा। पहलवान, सेनी और मैनेजर खेत की ओर भागे आ रहे थे। नजारा ऐसा था कि वरवस हंसी आ जाये । तिबुल हंस पड़ा। पहलवान उन्मत्त हाथी की तरह भागा पा रहा था, स्पेनी पिछली टागों पर उछलने वाले चूहे जंसा लग रहा था और मैनेजर पायल टांग वाले कौए को तरह कूद रहा था। हम तुम्हें जिन्दा पकड़ लेंगे!" वे चिल्लाये। "अपने को हमारे हवाले कर दो!" स्पेनी पिस्तौल के घोड़े को खटखटा रहा था, दात किटकिटा रहा था। मैनेजर काग़ज़ का चक्र घुमा रहा था। तिबुल हमला होने का इन्तजार करने लगा। वह भुरभुरी काली मिट्टी पर खड़ा था। उसके चारों ओर झ्यारियां थी। उन में पत्तागोभी के कल्ले थे , चुकन्दर थे, हरे-हरे सिर वाहर निकले हुए थे, डंठल हिल रहे थे और चौड़े-चौड़े पत्ते पड़े हुए थे। हवा मे सभी कुछ हिल-डुल रहा था। निर्मल नीलाकाश खूब चमक रहा था। लड़ाई शुरू हुई। तीनों व्यक्ति वाड़ के करीव पहुंचे। 'तुम यहां हो? " पहलवान ने पूछा। कोई उत्तर नहीं मिला। तब स्पेनी ने कहा- " अपने को हमारे हवाले कर दो! मेरे दोनों हाथों में पिस्तौलें है। ये पिस्तौलें दुनिया की सबसे अच्छी फर्म 'ठग और बेटा' की बनी हुई है। मैं देश का सबसे बढ़िया निशानेबाज हूं, समझे ? " तिवुल को पिस्तौल चलाने की कला में कमाल हासिल नही था। उसके पास तो पिस्तौल थी भी नही। मगर उसके हाथ के पास या शायद यह कहना अधिक ठीक होगा कि उसके पैर के पास पत्तागोभी के बहुत-से कल्ले जरूर पड़े हुए थे। वह झुका , उसने एक गोल और भारी-सा कल्ला तोड़ा और बाड़ के दूसरी ओर दे मारा। कल्ला मैनेजर के पेट पर जाकर लगा। इसके बाद उसने दूसरा और तीसरा कल्ला फेंका... वे लगभग बम की तरह फटे। दुश्मनों के होश हवा हो गये। तिवुल चौथा कल्ला उठाने के लिए झुका। उसने उसे दोनों हाथों मे भर लिया, उखाड़ने के लिए जोर लगाया , मगर नहीं, उसे कामयाबी नहीं मिली। इतना ही नहीं, उसने तो इन्सान की तरह बात भी करनी शुरू कर दी! " यह गोभी का कल्ला नही, मेरा सिर है। मैं गुब्बारे वेचनेवाला हूं। मैं एक भूमिगत मार्ग द्वारा तीन मोटों के महल से भाग पाया हूं। इस मार्ग का प्रारम्भ होता है .
" एक देग से और अन्त होता है यहा। वह माग जमीन के नीचे लम्वी बात की तरह फैला हुआ है तिबुल को अपने काना पर विश्वास नहीं हुआ। पत्तागोभी का कल्ला इन्सान का सिर बन गया था। तिबुल तव झुका और उसने ध्यान से इस करिश्मे की ओर देखा। उसे अपनी प्राखा पर विश्वास करना ही पडा। वह व्यक्ति जो रस्स पर चल सकता है, उसकी पाखें धाखा नही खा सकती थी। उसने जो कुछ देखा था, उसम पत्तागोभी के कल्ले जैसी काई चीज़ नही थी। यह गुब्बारे बेचनेवाने का गाल मटोल तोबडा था। सदा की भाति वह बेल-बूटा और पतली टूटी वाली केतली के समान लग रहा था।
40 " । गुब्बारे बेचनेवाले का सिर जमीन से ऊपर को उठा हुआ था और उसकी गर्दन के गिर्द काली, सीली मिट्टी का कालर-सा बना हुआ था। 'यह भी खूब रही ! " तिबुल ने कहा। गुब्बारे बेचनेवाला गोल-गोल आंखों से तिवुल की ओर देख रहा था जिनमें निर्मल नीलाकाश प्रतिबिम्बित हो रहा था। " मैने रसोइये-छोकरों को अपने गुब्बारे दे दिये और उन्होंने भागने में मेरी सहायता की. वह देखो, उनमे से एक गुब्दारा उड़ भी रहा है. तिबुल ने उधर नजर दौड़ाई और वहुत ऊंचाई पर नीले आकाश में संतरे रंग का एक छोटा-सा गुब्बारा उड़ता हुआ देखा। यह उन गुब्बारों में से एक था जो रसोइये -छोकरों ने उड़ा दिये थे। उन तीनों ने भी जो बाड़ के पीछे खड़े हमले की योजना बना रहे थे , गुब्बारा देखा । अव स्पेनी तो सब कुछ ही भूल गया। वह जमीन से ऊपर को उछला , उसने अपनी आंख की पुतली घुमाई और निशाना साधने को मुद्रा बना लो । उसे तो निशानेबाज़ी का जनून था। 'उधर देखिये," वह चिल्लाया। 'दस बुों की ऊंचाई पर वह निकम्मा गुच्वारा उड़ रहा है ! मै सोने की दस मुहरों की शर्त लगाने को तैयार हूं कि उसे वीध डालूंगा। मुझसे बेहतर निशानेबाज ढूढ़े नहीं मिलेगा!" कोई भी उससे शर्त लगाने को तैयार नहीं था, मगर इस से स्पेनी के जोश में कमी नही आई। पहलवान और मैनेजर तो गुस्से से लाल-पीले हो उठे। पाजी !" पहलवान चिल्ला उठा। 'एकदम पाजी! यह गुब्बारो को निशाने बनाने का समय नही है। पाजी न हो तो! हमें तिवुल को पकड़ता है ! वेकार कारतूस बरबाद न करो।" मगर इस से कोई लाभ नही हुआ। यह वढ़िया निशानेबाज़ किसी भी तरह अपने पर काबू न पा सका। निशाना लगाने के लिये गुब्बारा बहुत ही आकर्षक था। स्पेनी ने अपनी धुमती हुई पुतलीवाली प्राख बन्द करके निशाना साधना शुरू किया। जब तक वह निशाना साधता रहा, तिबुल ने गुब्बारे बेचनेवाले को जमीन से बाहर निकाला। कैसा दृश्य था वह ! उसके कपड़ों पर क्या कुछ नही था ! कही कुछ क्रीम लगी थी और कहीं शर्वत , कही कीचड़ चिपका हुआ था तो कही फलों के मुरचे के बने सितारे ! उस जगह , जहां से तिबुल ने उसे वोतल के डाट की तरह खीचकर वाहर निकाला, वड़ा-सा काला सूराख रह गया। उसमें मिट्टी भर गई और ऐसी आवाज हुई मानो छत पर बरसात की मोटी-मोटी वूदें टपटपा रही हों। स्पेनी ने गोली चलाई। गुब्बारे को तो खैर , वह निशाना न बना पाया। प्रोह ! उसकी गोली तो मैनेजर के हरे टोप में , जो खुद भी एक बुजं के वरावर ऊंचा था, जा लगी।
'भागो, " तिवुल ने सब्जी के खेत को वाड फादी और नौ-दो-ग्यारह हो गया। हरा टाप गिर पड़ा और समोवार की पाइप की तरह लुढकने लगा। स्पेनी के हाथो के तोते उड गये। उसकी बढ़िया निशानेवाज होने की ख्याति मिट्टी में मिल गयी थी। इतना ही नहीं, वह मैनेजर की नजरो में गिर गया था। "अरे उल्लू " मैनेजर आपे से बाहर हो गया। उसने कागजी चक स्पेनी के सिर पर दे मारा। कागज फट गया और स्पेनी के सिर के गिर्द दातेदार कागजी कालर-सा बन गया। सिर्फ लापीतूप ही मुह ताकता हुअा खडा रह गया। गोली दगने की आवाज़ से आसपास के कुत्ते भडक उठे। उनमे से एक कही से भागता हुआ आया और पहलवान की पोर झपटा। भागो बचकर लापीतूप ने चिल्लाकर कहा । तीना सिर पर पाव रखकर भागे। गुब्बारे वेचनेवाला अकेला ही रह गया। उसने बाड पर चढ़कर इधर-उधर नजर दौडाई। तीना मित्र एक हरी-भरी पहाडी से नीचे लुढक रहे थे। लापीतूप एक टाग पर उछल रहा था और दूसरी मोटो टाग को उस जगह से पकडे हुए था जहा से कुत्ते ने उसे काट लिया था। मैनेजर एक वृक्ष पर जा चढा था और उसके साथ लटका हुग्रा उल्लू जैसा लग रहा था। स्पेनी कागजी चक्र मे से अपने सिर को हिलाता-डुलाता हुआ कुत्ते पर गोली चलाता था और हर वार खेत मे खडे कनकौवे को ही वीधता था। कुत्ता पहाडी के ऊपर खडा था और ऐसा ही प्रतीत होता था मानो उसने फिर से झपदने का इरादा छोड दिया हो। कुत्ते को लापीतूप की मोटी टाग से जो मज़ा मिला था, वह उस से सन्तुष्ट नज़र आता था। वह अपनी चमकती हुई गुलाबी जवान वाहर निकाले पूछ हिला रहा था और खुश दिखाई दे रहा था। छठा प्रध्याय अप्रत्याशित परिस्थितिया तिथल से जब यह पूछा गया था कि वह काला कैसे हो गया है तो उसने जवाब दिया था कि " 'डाक्टर गास्पर आनेरी से पूछिये"। मगर डाक्टर गास्पर से पूछे बिना भी कारण का अनुमान लगाना कठिन नही है। हमे याद है कि तिवुल लडाई के मैदान से बच निकलने में सफल हो गया था। हमे इस ७५ बात का भी स्मरण है कि सैनिक उसकी तलाश करते रहे थे, उन्होने मजदूरों के मुहल्ले जला दिये थे और सितारे के चौक में गोलियां चलाई थी। तिवुल भागकर डाक्टर गास्पर के घर में प्रा छिपा था। मगर यहा उसे किसी भी क्षण पकड़ा जा सकता था। खतरा इसी बात का था कि यहा उसे बहुत बड़ी संख्या में लोग पहचानते थे। हर दुकानदार तीन मोटो का हिमायती था, क्योकि वह खुद भी मोटा और धनी था। डाक्टर गास्पर के अड़ोस-पड़ोस में रहनेवाले धनी लोग सैनिकों तक यह खबर पहुंचा सकते थे कि तिवुल डाक्टर गास्पर के घर में है। "पापको अपनी शक्ल- सूरत बदलनी होगी," डाक्टर मास्पर ने उस रात को कहा जब तिबुल उनके घर नमूदार हुआ। डाक्टर गास्पर ने ही उसे नीग्रो बना दिया था। उन्होने कहा था- "तुम लम्बे-तड़गे हो। तुम्हारा सीना उभरा हुआ, कधे चौड़े-चौड़े, दात चमकते और वाल सख़्त , काले और धुघराले है । अगर त्वचा गोरी न होती तो उत्तरी अमरीका के नीग्रो जैसे लगते । हा, यह खूब सूझी! मैं तुम्हे काला बनने में मदद दूगा। डाक्टर गास्पर प्रारी को सो विज्ञानों की जानकारी थी। वे बहुत ही गम्भीर, मगर उदारमना व्यक्ति थे। काम के वक्त काम और येल के वक्त प्रैल ही होना चाहिए। " . " इसलिए वे कभी-कभी अपना जी भी वहलाते । मगर विश्राम भी करते तो वैज्ञानिक की भाति । तब वह गरीव यतीम वालको के लिए उपहारस्वरूप पानी मे भिगोकर उतारी जानेवाली तस्वीरे, अद्भत फुलझडिया, खिलौने, गजव की और अनजानी आवाजो वाले वाद्ययन्त्र और नये रग बनाते। "यह देखिये," उन्होने तिबुल से कहा । 'इस वोतल मे रगहीन तरल पदार्थ है। ख श्क हवा मे जिस भी शरीर पर इसे लगाया जायेगा, वह काला हो जायेगा , सो भी कुछ कुछ बैगनी-सा- नीग्रो जैसे रग का। और इस वोतल मे वह पदार्थ है जो इस रग को साफ कर देता. तिवुल ने रग-विरगे तिकोनो से बनी हुई अपनी विरजस उतारी और कार्क की वदवू तथा जलन पैदा करने वाला तरल पदार्थ अपने तन पर मला। एक घंटे बाद उसकी त्वचा का रंग काला हो गया। तभी मौसी गानीमेड अपना चूहा लिये हुए आई थी। इसके बाद की कहानी हमे मालूम है। अब हम डाक्टर गास्पर की ओर लौटते है। हमे याद है कि कप्तान बोनावेन्तुरा उन्हे महल के कर्मचारी के साथ काली घोडा-गाडी मे विठाकर ले गया था। TRE घोडा-गाडी उडी चली जा रही थी। यह तो हमे मालूम ही है कि पहलवान लापीतूप उस तक नही पहुच पाया था। घोडा-गाडी के अन्दर अधेरा था। भीतर जाने पर डाक्टर ने शुरू में तो यह समझा कि उसके पास बैठा हुआ कर्मचारी अस्तव्यस्त वालो वाली एक बालिका को अपनी गोद मे लिये है। " कर्मचारी मौन साधे था। वालिका भी। 'क्षमा कीजिये , आपके लिये जगह थोडी तो नहीं हो रही डाक्टर ने टोप उतारते हुए शिष्टतावश पूछा। कर्मचारी ने रुखाई से जवाब दिया- आप चिन्ता न करे।" घोडागाडी की छोटी-छोटी खिडकियो से कुछ-कुछ रोशनी छन रही थी। कुछ क्षण वाद आखो को अन्धेरे मे नजर आने लगा। तब डाक्टर को लम्बी नाक वाला कर्मचारी, । ७७ जो अपनी पलकों को कुछ-कुछ मूदे था, दिखाई दिया और बहुत ही सुन्दर फ्रॉक पहने प्यारी-सी बालिका की भी झलक मिली। बालिका वहुत ही उदास-सी प्रतीत हुई। सम्भवतः उसका रंग जर्द था, मगर अंधेरे में यह तय करना मुमकिन नहीं था। "वेचारी वच्ची!" डाक्टर गास्पर ने सोचा। 'ज़रूर यह वीमार है।" उन्होने फिर से कर्मचारी को सम्बोधित किया- 'सम्भवतः आप मुझसे मदद लेने आये है ? लगता है यह वैचारी वच्ची वीमार हो गयी है?" "हा, आपकी मदद की जरूरत है," लम्वी नाक वाले कर्मचारी ने उत्तर दिया। "निश्चय ही यह तीन मोटों में से किसी एक की भतीजी या उत्तराधिकारी टूट्टी की कोई छोटी-सी मेहमान है।" डाक्टर ने अनुमान लगाया। "इसकी पोशाक बढ़िया है, इसे महल से लाया जा रहा है और सैनिकों का कप्तान इसके साथ आया है। जाहिर है कि यह कोई साधारण वालिका नही है। मगर जिन्दा वच्चों को तो उत्तराधिकारी टूट्टी के निकट ही नहीं आने दिया जाता । तब यह नन्ही परी वहां कैसे जा पहुंची ?" डाक्टर अपने अनुमानों में ही उलझ गये। उन्होने फिर से लम्बी नाक वाले कर्मचारी से बातचीत शुरू की- 'कहिये तो बच्ची को क्या बीमारी है ? डिफ्थीरिया तो नही?" 'नहीं, उसकी छाती में छेद है।" 'आपका मतलब है कि फेफड़ों में कुछ गड़बड़ है?' 'उसकी छाती में छेद है," कर्मचारी ने दोहराया। डाक्टर ने शिष्टतावश वात को गोलमोल ही रहने दिया। "वेचारी वच्ची!" उन्होने गहरी सांस ली। "यह वच्ची नही, गुड़िया है," कर्मचारी ने कहा। इसी समय घोड़ा-गाड़ी डाक्टर के घर के सामने जा पहुंची। कर्मचारी और कप्तान बोनावेन्तूरा डाक्टर के पीछे-पीछे उनके घर में गये। डाक्टर उन्हें अपनी प्रयोगशाला मे ले गये। 'अगर यह गुड़िया है तो भला मै आपको क्या सेवा कर सकता हूं? कर्मचारी ने सारी बात स्पष्ट की। मौसी गानीमेड सुवह की घटना को अभी तक नही भूली थी और उत्तेजित थी। उसने छेद में से, भीतर झाककर देखा। वहा उसे डरावना कप्तान बोनावेन्तूरा दिखाई दिया। वह अपनी तलवार की टेक लगाये खड़ा था और घुटनों तक के मुड़े हुए किनारों वाले बड़े- बड़े बूट पहने अपने एक पैर को हिला-डुला रहा था। उसके बूटों की एड़िया दुमदार तारों I " " ७८ - 4 मगर... जैसी थी। मौसी को वढिया गुलाबी फ्रॉक मे उदास और बीमार वालिका भी नज़र आई जिसे कर्मचारी ने आराम कुर्सी पर विठा दिया था। वालिका का अस्तव्यस्त बालो वाला सिर झुका हुआ था। ऐसा लगता था मानो वह फुदनो की जगह लगाये गये सुनहरे गुलावो वाले प्यारे-प्यारे रेशमी सैडलो की ओर देख रही थी। तेज हवा के झोके हॉल के शटरो को खटखटा रहे थे और इस से मौसी गानीमेड के बातचीत सुनने मे बाधा पड रही थी। फिर भी कुछ न कुछ तो उसकी समझ में आ ही गया। कर्मचारी ने डाक्टर गास्पर को तीन मोटा की राज्यीय परिपद् का फरमान दिखाया। डाक्टर ने उसे पढा तो उनके हाथो के तोते उड गये। "गुडिया कल सुबह तक ठीक हो जानी चाहिए," कर्मचारी ने उठते हुए कहा । कप्तान बोनावेन्तुरा ने एडिया वजायी। मगर..." डाक्टर ने हाथ हिलाये। “मैं कोशिश करूगा, मगर वादा नही कर सकता। मै इस जादुई गुडिया के कल-पुर्जो से अपरिचित हूं। मुझे उन्हे देखना- समझना होगा, यह मालूम करना होगा कि इनमे क्या खराबी हुई है और नये पुर्जे तैयार करने होगे। इसके लिये बहुत काफी वक्त की जरूरत होगी। हो सकता है कि यह मेरी समझ मे ही न आये... मुमकिन है कि मैं इस खराव की हुई गुडिया को ठीक ही न मै विश्वास के साथ नही कह सकता, भद्रजन... इतना थोडा समय है ... केवल एक रात... मै वादा नही कर सकता ... कर्मचारी ने उन्हे टोका। उगली उठाते हुए उसने कहा- "उत्तराधिकारी टूट्टी के दुख का पारावार नहीं, इसलिए देर नही होनी चाहिए। गुडिया कल सुबह तक ठीक-ठाक हो जानी चाहिए। तीन मोटो का यही हुक्म है। उनके हुक्म अदूली करने की किसी को जुर्रत नही हो सकती । कल सुवह आप ठीक-ठाक और भली-चगी गुडिया लिये हुए तीन मोटो के महल मे पाइयेगा।" मगर... मगर डाक्टर ने विरोध किया। "यह 'अगर-मगर' वन्द कीजिये। गुड़िया कल सुबह तक ठीक हो जानी चाहिए। अगर आप यह कर देगे तो आपको इनाम दिया जायेगा, अगर नहीं, तो कड़ी सजा। डाक्टर के तो होश हवा हो गये थे। वह मिनमिनाये। 'मगर इतना तो समझिये कि यह बहुत अधिक जिम्मेदारी का काम है।" 'वेशक" कर्मचारी ने फौरन कहा और उगली नीचे कर ली। "मैने प्रादेश आप तक पहुचा दिया, आपका काम है उसे पूरा करना। नमस्कार!" कर पाऊ... , " । " " " - "मैं कोशिश करूगा, - मौसी गानीमेड दरवाजे से पीछे हटी और अपने कमरे मे भाग गयो जहा कोने मे खुशकिस्मत चूहा चीची कर रहा था। डरावने मेहमान बाहर निकले। कर्मचारी घोड़ा- गाड़ी में जा बैठा , काउंट वोनावेन्तुरा अपनी चमक-दमक दिखाता उछलकर घोड़े पर सवार हो गया। सैनिकों ने अपने टोप नीचे को कर लिये। सभी वहा से रवाना हो गये। उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया डाक्टर को प्रयोगशाला मे रह गयी। डाक्टर ने मेहमानों को विदा किया, फिर मौसी गानीमेड के पास आये और असाधारण कड़ाई से वोले- "मोसी गानीमेड , ध्यान से मेरी बात सुनिये। लोग मुझे बुद्धिमान व्यक्ति मानते है , डाक्टर के नाते मेरी अच्छी ख्याति है और मुझे निपुण कारीगर भी माना जाता है । मैं अपनी ख्याति को वडा महत्त्व देता हूं। इसके अलावा मैं अपने सिर को भी सही-सलामत देखना चाहता हूँ । कल सुबह मेरी ख्याति को भी वट्टा लग सकता है और सिर भी कलम किया जा सकता है। आज रात भर मुझे बहुत मुश्किल काम करना है। समझी?" डाक्टर ने तीन मोटों को राज्योय परिपद् का फरमान हिलाते हुए उसे दिखाया। "मेरे काम में किसी तरह का खलल नहीं पड़ना चाहिये ! शोर-गुल नहीं होना चाहिये। तश्तरियो को नहीं वजाइयेगा। चूल्हे पर कुछ नही जलाइयेगा। मुर्गियों को आवाज नहीं दीजियेगा। चूहे को मत पकड़ियेगा। आमलेट, फूलगोभी, मिटाई और दिल को ताक़त देनेवाली दवाई की बात नहीं कीजियेगा! समझ गयी?" डाक्टर गास्पर बहुत गुस्से में थे। मौसी गानीमेड ने अपने को कमरे में बन्द कर लिया। "मजीव पातें हो रही है, बड़ी ही अजीब बाते!" वह बड़बड़ाती रही। भी तो मेरी समझ में नहीं पा रहा... पहले तो वह नीग्रो कही से आ टपका, गुड़िया पौर मय यह फ़रमान... मजीव वातें हो रही है प्राजकल !" अपने को भान्त करने के लिये वह अपनी भतीजी के नाम पत लिखने बैठ गयी। गृत यहत सावधानी से लिखना पड़ा ताकि कसम की मावाज न हो। वह नहीं चाहती थी कि डास्टर बिगड़ उठे। एक पटा गुडर गया। मौसी गानीमैड लिये जा रही थी। वह यहां तक लिय धुको भी कि में उस मुबह को रास्टर को प्रयोगशाला में मचानक ही एक नीग्रो नमूदार हुमा पा। उमने मागें लिया- ...वे दोनों बाहर गये। रास्टर महल के एक कर्मचारी पोर सैनिकों के साप लोट पाप । कर्मचारी पोर मनिक एक गुरिया मैकर पाये जो वितुल जिन्दा लड़की लगती है, मगर नौगो उनके माप नहीं लौटा। यह रहा चना गया मुझे मालूम नहीं.. . .4 "
No text on this page.
No text on this page.
डाक्टर ? नीग्रो, जो वास्तव में नट तिवुल था, कहा चला गया था, यह सवाल गास्सर को भी परेशान कर रहा था। गुडिया की मरम्मत करते हुए वे लगातार तिवुल के बारे म सोचते रहे। वे झुझला उठे। अपने आप से बात करने लगे- "हद हो गयी लापरवाही की भी। मैने उसे नीग्रो बनाया, उसे अद्भुत रग से रगा , ऐसा बना दिया कि कोई भी पहचान न पाये, मगर चौदहवे बाजार में उसने खुद ही अपना भडाफोड कर दिया। उसे तो गिरफ्तार किया जा सकता था | अोह | कितना लापरवाह है वह क्या वह लोहे के पिजरे मे वन्द होना चाहता है?" डाक्टर खीझ रहे थे। तिवुल की लापरवाही, फिर यह गुडिया इसके अलावा पिछले दिन की परेशानिया, अदालत चौक मे जल्लादो के दस तख्ते 'बडा भयानक वक्त आ गया है। डाक्टर कह उठे। डाक्टर को यह मालूम नही था कि उस दिन दी जानेवाली सजायें रद्द कर दी गयी हैं। महल का कर्मचारी नपी-तुली बात करनेवाला व्यक्ति था। उसने महल में घटी घटना के बारे मे डाक्टर को कुछ नही बताया। डाक्टर उस वैचारी गुडिया की ओर देखते हुए सोचने लगे- 'इस पर ये वार किसने किये है? ज़रूर किसी हथियार से, शायद तलवार से ही। इस गुडिया, इस प्यारी वच्ची पर वार किये किसने ऐसा किया? किसे हिम्मत हुई उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया को तलवार से बीधने की?" डाक्टर यह अनुमान नहीं लगा पाये कि सैनिको ने ऐसा किया था। उनके दिमाग मे यह वात नही पा सकती थी कि महल के सैनिक भी तीन मोटा का साथ देना बन्द कर जनता की ओर होते जा रहे है। अगर उन्हे यह मालूम हो जाता, तो कितनी ख शी होती डाक्टर ने गुडिया का सिर हाथो मे ले रखा था। सूरज खिडकी मे से झाक रहा था। गुडिया उसके प्रकाश मे खूब चमक रही थी। डाक्टर उसे गौर से देख रहे थे। "अजीव वात है, बडी अजीव वात है," वह सोच रहे थे, 'यह चेहरा तो मैने कही पहले भी देखा है हा, ज़रूर । मैने इसे देखा है , मै इसे पहचान रहा है। मगर कहा देखा था मैने इसे? कव देखा था? वह जीता-जागता चेहरा था, एक जीवित बालिका का चेहरा, वडा प्यारा-सा, मुस्कराता हुआ, तरह तरह के मुह बनाता, गम्भीर होता, चचलता दिखाता और उदास होता हुआ हा, हा इसमे रत्ती भर भी शक शुवह नहीं हो सकता । मगर मेरी कम्बख्त कमजोर नजर चेहरा को याद कर पाने मे बाधा डालती है। डाक्टर ने गुडिया के घुघराले सिर को अपनी आखो के निकट कर लिया। "कैसी कमाल की गुडिया है । कैसे सधे हुए हाथो ने इसे बनाया है । साधारण गुडिया जैसी तो उसमे कोई वात ही नहीं। गुडियो की आम तौर पर फूली फूली नीली आखें होती है , उन - ? - 61492 . , ... " में इन्सानी आखों जैसी कोई भी चीज़ नहीं होती, वे भावनाशून्य होती है, उनकी छोटी- सी नाक , फीते जैसे होठ और बेढगे से भूरे वाल होते है मेमने के ऊन जैसे। गुड़िया वैसे तो सुखी दिखाई देती है, पर वास्तव में होती है भावनाशून्य . मगर इस गुड़िया में ऐसी कोई भी चीज़ नही है । कसम खाकर कहता हूं कि यह तो बिल्कुल ऐसी है मानो किसी लड़की को ही गुड़िया में बदल दिया गया हो ! " डाक्टर गास्पर अपनी असाधारण रोगिनी पर मुग्ध हुए जा रहे थे। उनके दिमाग में लगातार यह वात पा रही थी कि कभी , और कही तो उन्होने यह पोला-सा चेहरा , गम्भीर भूरी पाखे और कटे हुए अस्तव्यस्त वाल देखे है। सिर को हिलाने-डुलाने का ढंग और अाखों का अन्दाज तो खास तौर पर जाना-पहचाना प्रतीत हुआ। वह अपने सिर को जरा- सा एक ओर को घुमाकर डाक्टर को झुकी झुकी नजर से, बहुत गौर से और शरारत भरे ढग से देखा करती थी... डाक्टर अपने पर काबू न रख पाये और उन्होने ऊचे स्वर में पूछ ही लिया- क्या नाम है तेरा, गुड़िया?" मगर लड़की चुप रही। तभी डाक्टर को एहसास हुआ कि गुड़िया ख़राब हो गयी है। उसकी आवाज़ लौटानी है, उसके दिल की मरम्मत करनी है, उसकी मुस्कान लौटानी है। उसे नाचना और इसी उम्र की लड़कियों के समान व्यवहार करना सिखाना है। "देखने में कोई वारह साल की लगती है। इत्मीनान से काम करने का वक़्त नही था। डाक्टर काम में जुट गये "मुझे इस गुड़िया को जिन्दा करना है ! मौसी गानीमेड ने ख़त खत्म कर लिया। दो घटे तक जैसे-तैसे ऊब बर्दाश्त करती रही। अब उसे कुरेद हुई - " जाने ऐसा क्या काम है जो डाक्टर को फ़ौरन करना चाहिये? जाने वह गुड़िया कैसी है? वह दवे पाव डाक्टर की प्रयोगशाला के दरवाजे पर आयी और उसने दिल की शक्लवाले छेद में से झांकने की कोशिश की। श्रोह ! वहां तो चावी लगी हुई थी। उसे कुछ भी नजर न पाया। इसी समय दरवाजा खुला और डाक्टर गास्पर वाहर आये। वे इतना अधिक परेशान थे कि उन्होने मौसी गानीमेड को उसकी इस बेहूदा हरकत के लिये डाटा-डपटा भी नही। मौसी गानीमेड के तो डाट-डपट के बिना ही होश-हवास उड़ गये। "मौसी गानीमेड , में जा रहा हूं," डाकटर ने कहा , 'लगता है कि मुझे जाना ही होगा। बग्घी ले पाइये।" वह चुप हो गये और फिर हथेली से माथा सहलाते हुए बोले- " " . ८२ " "हा, . " में तीन मोटा के महल मे जा रहा हूँ। बहुत मुमकिन है कि मै वहा से लौटकर न आऊ। मोसी गानीमेड को तो जैसे धक्का लगा, वह एकदम पीछे को हट गयो- 'तीन मोटो के महल म?" मौसी गानीमेड। मामला बहुत टेढा है। मेरे पास उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया लायी गयी है। वह दुनिया में सबसे अच्छी गुडिया है। उसका स्प्रिंग टूट गया है। तीन मोटो की राज्यीय परिपद् न मुझे कल सुवह तक इस गुडिया को ठीक ठाक करने का हुक्म दिया है। मुझे कठोर दण्ड दिया जायेगा मौसी गानीमेड तो रुपासी हो गयी। "मैं इस बेचारी गुडिया को ठीक नही कर पा रहा हूँ। मैने इसकी छाती म छिपे हुए स्प्रिग को खोज निकाला है, उसके सभी राज़ समझ गया है और इसे ठीक भी कर सकता हू। मगर वह तो छोटी-सी चीज़ है | वडी मामूली-सी चीज़ के कारण मैं इसे ठीक नहीं कर सकता। इस रहस्यपूर्ण स्प्रिग मे एक दातेदार चक्र है जो टूटा हुआ है वह बिल्कुल बेकार हो गया है | नया बनाने की ज़रूरत है मेरे पास आवश्यक धातु भी है, चादी जैसी मगर काम शुरू करने से पहले यह ज़रूरी है कि मैं इस धातु को कम से कम दो दिन तक तृतिये मे भिगोये रखू। समझती है न, दो दिन तक गुडिया तो कल सुबह तक तैयार हो जानी चाहिये। 'क्या कोई और चक्र नहीं लगा सकते?" मौसी गानीमेड ने झिझकते हुए पूछा। डाक्टर ने निराशा से हाथ झटकते हुए कहा- मै हर तरह की कोशिश कर चुका हूँ, मगर वैसूद । पाच मिनट बाद एक वन्द बग्घी डाकटर गास्पर के दरवाजे के सामने आकर खडी हो गयी। डाक्टर ने तीन मोटो के महल मे जाने का इरादा बना लिया। . मगर यह . " "मै उनसे कह दूगा कि कल सुवह तक गुड़िया तैयार नहीं हो सकती। फिर वे जैसा भी चाहें, मेरे साथ सुलूक कर सकते है..." मौसी गानीमेड अपने पेशवन्द का छोर चवाने और सिर हिलाने लगी। वह तब तक सिर हिलाती रही जब तक कि उसे उसके अलग होकर गिर जाने की चिन्ता न हुई। डाक्टर गास्पर ने गुड़िया को अपने पास विठा लिया और वग्धी रवाना हो गयी। सातवां अध्याय अजीब गुड़िया की रात . ॥ पा डाक्टर गास्पर के दोनों ओर सीटिया वजा रही थी। सान रखनेवाले द्वारा छुरी हा तेज़ करते समय जो अावाज पैदा होती है, हवा की शू-शां उस से भी ज्यादा नागवार लग रही थी। डाक्टर ने कालर से कान ढक लिये और हवा की ओर पीठ कर ली। तब हवा ने सितारों से खिलवाड़ शुरू किया। वह कभी उन्हें मानो फूंक मारकर बुझा देती, कभी उन्हें झूला झुलाती और कभी काली तिकोनी छतों के पीछे छिपा देती। जब यह खेल खेलकर उसका मन ऊब गया तो वह बादलो से उलझने लगी। मगर बादल पुरानी मीनारों की भाति इधर-उधर बिखर जाते । तव हवा गुस्से से एकदम सर्द हो गयी। डाक्टर को लवादा प्रोढ़ लेना पड़ा। आधा लवादा उन्होने गुड़िया को प्रोढ़ा दिया। जरा तेजी से हाकते चलो! भई कोचवान , जरा तेजी से ! " न जाने क्यों डाक्टर को डर महसूस होने लगा और वे कोचवान से घोड़े को जल्दी- जल्दी हाकने का अनुरोध करने लगे। सड़कों पर अन्धेरा था, वे वीरान-सुनसान थी और वातावरण दिल में दहशत पैदा करता था। केवल कुछ ही खिड़कियो मे से लाल-लाल सी रोशनी छन रही थी, बाक़ी बन्द थी। लोगों को भयानक घटनायें घटने की आशंका थी। इस शाम को बहुत-सी बातें गैरमामूली-सी लग रही थी, वे मन में तरह-तरह की शंकायें पैदा कर रही थी। डाक्टर को ऐसा भी लगा कि अन्धेरे में इस अजीव-सी गुड़िया की मांयें कहीं दो पारदर्शी पत्थरों की तरह चमक न उठे। उन्होने गुड़िया की ओर से नजर बचाने की कोशिश की। "वकवास है ! " उन्होंने अपने को तसल्ली दी। "यह तो महज़ मेरे दिल की कमजोरी है। यह हर शाम जैसी शाम है, केवल राहगीर कम हैं। सिर्फ हवा ही उनकी - परछाइयों से ऐसा खिलवाड़ कर रही है कि हर राहगीर रहस्यमय लवादे मे लिपटा- लिपटाया किराये का हत्यारा प्रतीत होता है ... और चौराहो मे जल रहे लैम्पो की रोशनी भी बड़ी अजीब तरह की नीली-नीली है. काश कि हम जल्दी से तीन मोटो के महल मे पहुच जायें!" डर से निजात पाने की एक बहुत अच्छी दवाई है - सो जाना। कम्वल से मुह-सिर ढक लेना तो विशेषत वहुत लाभदायक रहता है। डाक्टर ने भी यही दवाई आजमाने का निश्चय किया। कम्बल की जगह उन्होने अपना टोप नीचे की ओर खीचकर आखें ढक ली। और ज़ाहिर है कि जैसे होना चाहिए था, उन्होने एक सौ तक गिनना शुरू किया। मगर इस से कोई फायदा न हुअा। तब उन्होने ज्यादा कारगर तरीका आजमाया। उन्होने मन ही मन दोहराना शुरू किया- एक हाथी और एक हाथी-ये हुए दो हाथी। दो हाथी और एक हाथी-ये हुए तीन हाथी। तीन हाथी और एक हाथी-ये हुए चार हाथी..." इस तरह गिनते-गिनते उन्होने हाथियो के झुण्ड तक गिनती कर डाली। एक सौ तेईसवा काल्पनिक हाथी तो सचमुच का हाथी बन गया। चूकि डाक्टर यह न समझ पाये थे कि वह हाथी था या गुलावी पहलवान लापीतूप , इसलिए जाहिर है कि सो गये थे और सपने देखने लगे थे। जागृत अवस्था की तुलना मे सोते हुए समय कही अधिक तेजी से गुजरता है। पर खैर, सपने मे डाक्टर न केवल तीन मोटो के महल मे जा पहुचे, बल्कि उन्होने यह भी देखा कि उनके खिलाफ मुकदमे की कार्रवाई की जा रही है। हर मोटा उनके सामने हाथ मे गुडिया लिए ऐसे ही खडा था जैसे जिप्सी नीले लहगेवाली वन्दरिया को उठाये रहता है। वे किसी तरह का हीला-हवाला सुनने को तैयार न थे। 'तुमने हमारा फरमान पूरा नही किया," वे कह रहे थे , “तुम्हे इस के लिए कडी सजा दी जायेगी। तुम्हे गुडिया हाथ में लिए हुए सितारे के चौक मे कसे हुए रस्से पर चलना होगा। मगर पहले तो तुम अपना चश्मा उतार लो..." डाक्टर ने क्षमा कर देने की प्रार्थना की। उन्हे सबसे ज्यादा फिक्र तो गुडिया की थी उन्होने कहा 'मैं तो गिरने का आदी हो चुका हू अगर मै रस्से से फिसलकर नीचे तालाव में जा भी गिरा, तो कोई खास बात नहीं। मुझे इसका तजरवा है- मैं शहर के फाटक के करीव बुर्ज के साथ नीचे गिर चुका हू.. मगर गुडिया, बेचारी गुडिया का तो ख्याल कीजिये! वह तो चूर-चूर हो जायेगी... कृपया इस पर रहम कीजिये . मुझे - देखिये, . . - " यकीन है कि यह गुड़िया नहीं है, जीती-जागती लड़की है, बहुत ही प्यारा-सा नाम है इसका , जो मै भूल गया है, जो मुझे याद नहीं पा रहा. 'नही !" तीन मोटे चिल्लाये । “नही, तुम्हे हरगिज़ माफ़ नही किया जायेगा! तीन मोटो का यही हुक्म है!" वे इतने जोर से चिल्लाये कि डाक्टर की प्राय युल गयी। "तीन मोटो का यही हुक्म है !" किसी ने डाक्टर के कानों के पास ही चीखकर कहा। डाक्टर अव सो नही रहे थे। वास्तव मे ही कोई ऐसे चिल्ला रहा था। डाक्टर ने अपनी आखो से , शायद यह कहना ज्यादा सही होगा, अपने चश्मे से टोपी हटाई और इधर-उधर नजर दौडाई। जितनी देर वे सोये रहे थे, इसी बीच रात की चादर और अधिक काली हो गयी थी। वग्धी खडी थी। काली-काली प्राकृतिया उसे घेरे हुए थी। इन्ही के शोर ने डाक्टर का स्वप्न भंग कर दिया था। वे लालटेने हिला रहे थे। इसी से हिलती-डुलती परछाइयां नज़र पा रही थी। " यह क्या मामला है ? डाक्टर ने पूछा। हम कहां है? ये लोग कौन है ?" एक आकृति निकट आयी और उसने डाक्टर के सिर तक लालटेन ऊंची करके डाक्टर पर प्रकाश डाला। लालटेन हिल-डुल रही थी। लालटेन वाला हाथ चौड़े कफ़वाले चमड़े के खुरदरे दस्ताने से ढका हुआ था। डाक्टर समझ गया- सैनिक है। "तीन मोटों का यही हुक्म है," उस आकृति ने दोहराया। पीले प्रकाश मे यह आकृति टुकड़े-टुकड़े सी हो गयी। उसका मोमजामे का चमकता हुया टोप रात के समय लोहे का प्रतीत हो रहा था। "किसी को भी महल के करीब एक किलोमीटर तक निकट जाने की इजाजत नही है। यह हुक्म आज जारी किया गया है। शहर में गड़बड़ है। आगे जाना मना है !" 'पर मेरा तो महल मे जाना बिल्कुल लाजिमी है।" डाक्टर झल्लाये हुए थे। सैनिक ने वहुत कडाई से कहा- "मै सन्तरियो का कप्तान सेरेप हूँ। मैं आपको एक कदम भी आगे नही जाने दूगा! वग्धी लोटामो!" उसने लालटेन तानते हुए चीखकर कोचवान से कहा। डाक्टर का अब तो दिल ही बैठ गया। मगर फिर भी उन्हें यकीन था कि सैनिकों को जब यह पता चलेगा कि मैं कौन हूं और किस लिये महल में जाना चाहता हूं, तो वे फौरन आगे जाने की अनुमति दे देंगे। में डाक्टर गास्पर प्रानेरी हूं," उन्होने कहा। ॥
सकता। ॥ 'क्या 71" " क्या 71 जवाब में जोर का ठहाका गूज उठा। सभी ओर लालटेने हिलन-डुलने लगी। "देखिये हज़रत , ऐसे खतरनाक समय मे और इतनी देर से रात को हमे हसी- मजाक पसन्द नहीं," सन्तरियो के कप्तान ने कहा । "मै आप से कह रहा हू कि में डाक्टर गास्पर आनेरी हू।" कप्तान भडक उठा। उसने हर पाद धीरे-धीरे और तलवार टनकारते हुए कहा- 'महल में पहुच जाने के लिए आप झूठे नाम का सहारा ले रहे हैं । डाक्टर गास्पर पानेरी राता को सडका पर नही घूमते। आज की रात तो खास तौर पर ऐसा नहीं हो इस समय वे एक बहुत ही जरूरी काम में लगे हुए है-वे उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया को ठीक-ठाक कर रहे है। वे तो कल सुवह ही महल मे आयेगे। और आपको में धोखेवाजी के लिए गिरफ्तार करता हूं।" अब डाक्टर के भडकने की वारी थी। वह मुझ पर यकीन नही करना चाहता? खैर, मै अभी उसे गुडिया दिखाता डाक्टर ने गुडिया की ओर हाथ वढाया - मगर गुडिया अपनी जगह पर नही थी। डाक्टर जब सपने देख रहे थे, उसी बीच गुडिया वग्घी से नीचे जा गिरी थी। डाक्टर को ठडे पसीने आ गये। शायद मै सपना देख रहा हू डाक्टर के मन में यह खयाल आया। प्रोह नही। यह तो हकीकत थी। 'तो अव कहिये।" दात पीसते और लालटेन को उगलिया के बीच झुलाते हुए कप्तान वडवडाया। " जहनुम मे जाइये । आप जैसे सिरफिरे बुड्ढे से माथापच्ची न करनी पडे , इसी लिए छोड़ देता हूँ जाइये यहा से।" अव तो कोई चारा ही नहीं था। कोचवान ने वग्घी मोडी। पयिो ने चर्र-मर्र की, घोडा हिनहिनाया , लोहे की लालटेने आखिरी बार लहरायी और वेचारे डाक्टर वापिस हो लिए। वे अपने को बस में न रख पाये और रो पडे। ये लोग उनके साथ बहुत बुरी तरह पश पाये थे, उन्हे सिरफिरा बुड्ढा कहा था। इतना ही नही, उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया भी तो खो गयी थी। इसका मतलब यह है कि अब मेरा सिर गया। वे आसू बहाते रहे। उनके चश्मे के शीशे धुधला गये थे और अब उन्हे कुछ भी नजर नही पाता था। उनका मन हुआ कि तकिये मे सिर छिपाकर ख व रोयें । मगर कोचवान तो घोडा कुदाता जा रहा था । दस मिनट तक डाक्टर का ऐसा ही बुरा हाल रहा । मगर जल्द ही उनकी सामान्य समझ-बूझ लौट आई। " ?" ८७ " "मैं अभी भी गुड़िया को खोज सकता हूं, डाक्टर ने सोचा। आज रात सड़क पर बहुत कम लोग आ-जा रहे हैं। ये सड़कें तो वैसे ही हमेशा सुनसान रहती है । मुमकिन है इस बीच वहा से कोई भी व्यक्ति न गुजरा हो..." उन्होने कोचवान को आदेश दिया कि घोड़े की चाल धीमी कर दे और सड़क पर नजर गड़ाये रहे। 'क्यों, कुछ नजर आया? कुछ दियाई दिया?" वे हर क़दम पर पूछते थे। 'नही, कुछ भी नजर नही आया, कुछ भी नही," कोचवान जवाव देता। कोचवान ने सड़क पर पड़ी ऐसी वेकार चीजों के नाम लिए जिनमें किसी की दिलचस्पी नही हो सकती थी। उसने कहा- "पीपा पड़ा है। 'नही. यह नहीं 'शीशे का अच्छा और बड़ा-सा टुकड़ा पड़ा है। - " " नही। " 1 'टूटा हुआ जूता पड़ा है। "नही," डाक्टर की आवाज अधिकाधिक धीमी होती जाती थी। कोचवान तो सचमुच ही अपनी पूरी कोशिश कर रहा था। वह आंखें फाड़-फाड़कर देख रहा था। अन्धेरे में भी वह इतनी अच्छी तरह देख पाता था कि मानो वन्धी का कोचवान न होकर महासागरीय जहाज़ का कप्तान हो। "आपको कहीं कोई गुड़िया... गुड़िया नजर नहीं आ रही है ? गुलाबी फॉक में?" "गुड़िया तो नजर नही आ रही," कोचवान ने भारी और दुःखद आवाज मे उत्तर दिया। 'इसका मतलब है कि वह किसी के हाथ लग गयी... अब और तलाश करने मे कोई तुक नही। इसी जगह मेरी आंख लगी थी... उस वक़्त तक तो वह मेरे पास बैठी थी... आह !" और डाक्टर का मन फिर से रोने को हुआ। कोचवान ने सहानुभूति दिखाते हुए कई बार नाक सुड़की। "तो अव हमें क्या करना है? "मोह, नहीं जानता... मै कुछ नही जानता... डाक्टर हाथों में सिर थामे बैठे थे और दुख तथा बग्घी के धचकों से उनका सिर हिल-डुल रहा था। "मैं समझता हूं, सव समझता हूं," उन्होने कहा। "यह जाहिर है ... विल्कुल जाहिर है ... पहले से यह वात मेरे दिमाग में क्यों नही आई ! वह भाग गई, भाग गई वह गुड़िया... मेरी आंख लग गई और वह खिसक गई। मामला विल्कुल साफ़ है। वह गुड़िया नही, जीती-जागती " ८८ " । लडकी थी। मुझे तो देखते ही यह वात महसूस हुई थी। मगर इससे तीन मोटो की नजर में तो मेरा अपराध कुछ कम सगीन नही हो जाता अव अचानक डाक्टर को जोर की भूख महसूस हुई। वे कुछ देर चुप रहे और फिर उन्होने बहुत गम्भीरतापूर्वक कहा- "मैने आज दिन को खाना नही खाया। मुझे नजदीक के किसी भोजनालय मे ले चलिए।" भूख ने डाक्टर को शान्त कर दिया। वे देर तक अन्धेरी गलियो मे चक्कर काटते रहे। सभी भोजनालयो के दरवाजे बन्द पडे थे। उस रात , उस खतरनाक रात को सभी मोटे पेटवाले परेशान थे। उन्होने नये ताले लगा दिये और दरवाज़ो के पीछे छोटी-बडी अलमारिया रख दी थी। उन्होंने खिडकियो मे परो वाली गद्दिया और धारीदार तकिये ठूस दिये थे। उनकी आखो से नीद गायब हो गयी थी। जो मोटे और धनी थे, उन्हे उस रात हमला होने की अाशका थी। उन्होने अपने गुस्सल कुत्तो को सुबह से ही खाने-पीने को कुछ नहीं दिया था ताकि वे ज्यादा होशियार रहे, भूख से तिलमिलाते हुए आग-बबूला हो जायें। मोटा और धनियो के लिए भयानक रात थी। उन्हे यकीन था कि लोग किसी भी क्षण फिर विद्रोह कर सकते है। सारे शहर मे यह खबर भी फैल चुकी थी कि कुछ सैनिको ने तीन मोटो के साथ गद्दारी करते हुए उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया पर तलवारा से वार किये और महल छोडकर चले गये। इस खवर से धनियो और पेटुना के पैरा तले की धरती ही खिसक गई थी। "वेडा गर्क ।" वे परेशान होते हुए कह रहे थे। 'अव तो हम सैनिको पर भी भरोसा नही कर सकते । कल उन्होने जनता की बगावत कुचली और अाज अपनी तोपो के मुह हमारे घरो की ओर मोड देंगे।" डाक्टर गास्पर को इस बात की उम्मीद न रही कि वे अपनी भूख को शान्त कर सकेगे, थोडा सुस्ता पायेंगे। आसपास की किसी चीज़ में कोई हरकत न थी, जिन्दगी के कही कोई आसार न थे। "तो क्या अव घर ही लौटना होगा?" डाक्टर ने दुखी होते हुए सोचा। मगर वह तो बहुत दूर है मेरी तो भूख से जान निकल जायेगी अचानक उन्हे किसी भुनी हुई चीज़ की गध आई। हा, गध बहुत ही प्यारी थी, शायद प्याज के साथ भूने गये भेड के मास की। कोचवान को इसी समय थोडी-सी दूरी पर रोशनी नजर आई। प्रकाश की पतली सी रेखा हवा में हिल-डुल रही थी। यह रोशनी . कैसी है।
" " लगता है कि काश , यह भोजनालय हो डाक्टर ने खुश होते हुए कहा। वे निकट पहुंचे। मगर यह भोजनालय नहीं था। कुछ छोटे-छोटे घरो से जरा परे एक ख़ाली मैदान पड़ा था। वहा पहियों वाला एक घर खड़ा था। उसी के कुछ-कुछ खुले दरवाजे में से प्रकाश की रेखा छन रही थी। कोचवान अपनी सीट से नीचे उतरा और जाच-पड़ताल करने के लिए चल दिया। डाक्टर सभी दुर्घाटनानो को भूल-भाल कर भुने हुए मास की गन्ध मे खो गये । वे गुनगुनाने लगे, चहक उठे और उन्होने खुशी से प्रांखें मूद ली। "मोह यहां कही कुत्ते न हो!" कोचवान अन्धेरे में से चिल्लाया। यहा कुछ पंड़ियां-सी है ..." मगर अन्त अच्छा ही रहा। कोचवान पंड़ियां चढ़कर दरवाजे के पास पहुचा और उसने दरवाजे पर दस्तक दी। "कौन है ?" प्रकाश की पतली-सी रेखा चौड़ी और चमकती हुई चौकोर में बदल गयी । दरवाजा खुला। दहलीज़ पर एक आदमी नजर आया। इर्द-गिर्द के अन्धेरे और इस व्यक्ति के पीछे चमकते हुए प्रखर प्रकाश के कारण वह काले कागज़ का पुतला-सा प्रतीत हुआ। कोचवान ने डाक्टर की अोर से जवाब दिया- 'डाक्टर गास्पर आनेरी। आप कौन हैं ? यह पहियो वाला घर किसका है?" 'यह चाचा विज्ञाक का मेलों-ठेलो में घूमनेवाला पहियेदार घर है," दहलीज पर नजर आ रही छाया ने उत्तर दिया। यह छाया अव खिल उठी थी, उत्तेजित सी प्रतीत हुई और हाथ हिलाती-डुलाती वोली- “पाइये, पधारिये सज्जनो! गाड़ी में डाक्टर गास्पर आये है यह हमारा धन्य-भाग्य है।" यूव ही बढ़िया अन्त रहा! बहुत काफ़ी भटक लिये थे रात के अंधेरे में! चाचा विजाक की गाड़ी जिन्दावाद ! यहां डाक्टर, कोचवान और पोड़े को पनाह मिली , खाना और पाराम मिला । पहियों वाला पर मेहमाननेवाज था। इस मे चाचा व्रिजाक का घूमने-फिरने वाला कलाकार-दल रहता था। कौन भला चाचा विजाक के नाम से परिचित नही था! कौन नहीं जानता था मेला-ठेलों में घूमनेपाली दम गाड़ी को! पर्वो-त्योहारों के अवसर पर साल भर इस पहिया-गाड़ी के कलाकार बाजार के चौकी में अपने येल-तमाशे पेश करते थे। कैसे कमाल के थे इस दल के कलाकार! क्या बढ़िया होते थे इनके तमागे! सबसे बड़ी बात तो यह थी कि दनी दल में होता था रस्नं पर चलनेवाला नट तिवुल । यह तो हम जानते ही है कि तिवुल देश के मदमे मन्छे नट के रूप में प्रमिट था। उसरी फुर्ती तो हम यद भी मितारे के चौक में देय मुके हैं। हमें याद है कि सैनिको की चाचा विज़ाक की ६० गोको काम . भा- " Fran समारपोस में करगरगा पाई गमी 1 र मानिमा राशर मनन गाो । नार, मी मा.स पारस, कोयी पोर मीमी भाग गो नम पार-रमेंस बार नारा भ... मगर पर दुगनापोर नारा रा पानेगा गटन पर हम उमर निए नाना पात पौर पर यह हमारे ही कार मोर्या में रहा है। नर frपुन ने पापा frnर रो परिमा. गादी नारा गाद लिया मा पोरगम पर वह गाड़ी गुनी-मूनी हो गई पी। हामटर गागर ने गरी गई पर्मा नही कि विरार माप सा पीती थी। उन्होंने सगधिरारी ही सी गुड़िया का भी कोई शिक नहीं रिया। डास्टर गासर ने मंगा-टना में पूमनेपाली दम गाड़ी, ग पहिवार पर के अन्दर करा देगा? डाक्टर को बड़े-से गुर्गी ढोल पर बिठाया गया जो जाल के ममान गुनहरी मालरखाले तिकोने नान कपडे मे मुमज्जित या। यह पहियेदार पर गाड़ी के डिब्बे की तरह बना हुमा था। पन्यास के पर्दे सगाकर धने ईपी में विभाजित कर दिया गया था। रात काफी चीन पुगी थी। इन पहियेदार पर के निवासी सो रहे थे। दरवाजा योलने और परछाई-सा प्रतीत होनेवाला व्यक्ति बूढा मगपरा अगस्त था। इस रात यह ड्यूटी पर था। डाक्टर जब इस पहियेदार पर के निपट पहुचे थे, उस समय वह अपने लिए रात का याना पा रहा था। पास्तव में ही यह प्याज के साथ भेड़ का माम तल रहा था। डाक्टर ढोल पर बैठे हुए इर्द-गिर्द नजर दौडा रहे थे। लकड़ी के बक्से पर डिवरी - . जल रही थी। दीवारों पर वारीक सफ़ेद और गुलाबी काग़जों में लिपटे हुए चक्र, धातु की चमकती हुई मूठों वाले लम्बे धारीदार चावुक टंगे हुए थे, कपड़ों के रंग-विरगे टुकड़ों, सुनहरे छल्लो, वेल-बूटों और तारों-सितारों से सुसज्जित चमकती हुई पोशाकें लटक रही थी। वहां तरह-तहर के नकाव भी नज़र आ रहे थे- कुछ सीगों वाले , कुछ अजीव लम्बी नाकों वाले और कुछ के मुंह कानों तक फैले हुए। एक और नक़ाव था बड़े-बड़े कानों वाला। सबसे अजीव वात तो यह थी कि उसके कान थे तो इन्सानों जैसे , मगर बहुत ही बड़े-बड़े । कोने में रखे पिंजरे में एक अजीबोगरीब जानवर बैठा था। एक दीवार के पास लकड़ी को एक लम्बी मेज़ रखी थी। उसके ऊपर दस दर्पण लटके हुए थे। हर दर्पण के पास एक मोमबत्ती खड़ी थी, अपने ही मोम से जमी हुई। ये मोमबत्तियां बुझी हुई थीं। मेज़ पर तरह-तरह के डिब्बे , तूलिकायें, रंग, पाउडर-पफ़ , गुलाबी पाउडर और वनावटी वाल पड़े थे; जहां-तहां रंग-बिरगे धब्वे सूख रहे थे। 'आज हमने सैनिकों से बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई," मसखरे ने कहा। बात यह है कि नट तिबुल हमारे ही दल का कलाकार था। सैनिक हम को पकड़ पाना चाहते थे। वे समझते है कि हमने उसे कही छिपा दिया है," बूढ़े मसखरे ने बहुत उदास होते हुए अपनी वात जारी रखी 'मगर हम तो खुद नहीं जानते कि नट तिवुल कहा है। शायद उसकी हत्या कर दी गयी या उसे लोहे के पिंजरे मे बन्द चर दिया गया। मसखरे ने गहरी सांस ली और पके वालों वाला अपना सिर हिलाया। पिंजरे में बैठा जानवर विल्ली जैसी आखों से डाक्टर की ओर देख रहा था। "बड़े अफ़सोस की बात है कि आप हमारे यहां इतनी देर से आये ," मसखरे ने कहा। "हम आपको बहुत प्यार करते हैं। आप हमें कुछ तसल्ली , कुछ दिलासा देते । हम जानते है कि आप गरीबों के, जनसाधारण के दोस्त हैं। इस सिलसिले में मैं आपको एक घटना याद दिलाना चाहता हूं। पिछले वर्ष के वसन्त में हम कलेजी बाजार के चौक में अपना तमाशा पेश कर रहे थे। मेरी बेटी ने वहां एक गीत गाया था... "हां, हा ... डाक्टर को याद आया। वे अचानक उत्तेजित हो उठे। 'याद है न आपको? उस समय आप भी वही थे। मेरी बेटी ने उस कचौड़ी के वारे में गाना गाया था जो किसी मोटे कुलीन के पेट में जाने के बजाय चूल्हे में ही जल जाने को अपना सौभाग्य मानती थी...' 'हां, हा... मुझे याद है... तो आगे क्या हुआ था? 'कोई कुलीन महिला, एक बुढ़िया यह गाना सुनकर नाराज हो गयी थी। उसने लम्बी नाको वाले अपने नौकरों को हुक्म दिया था कि वे लड़की की पिटाई करें।" ॥ " . " " ६२ "हा, हा, मुझे याद है। मैंने उसे ऐसा नहीं करने दिया था। मैंने नौकरो को भगा दिया था। उस महिला ने जब मुझे पहचाना था तो उस पर घडो पानी पड गया था। ऐसा हो हुआ था न? "हा। बाद में जब आप चले गये तो मेरी बेटी ने कहा कि अगर उस कुलीन बुढ़िया के नौकरी ने मेरी पिटाई की होती, तो मैं शर्म के मारे किसी तरह भी जिन्दा न रह पाती... आपने उसकी जान बचाई थी। वह आपका यह एहसान कभी नहीं भूल सकेगी।" अव आपकी बेटी कहा है ? " डाक्टर ने पूछा। वे बहुत ही उत्तेजित हो रहे थे। बूढे मसखरे ने कन्वास के पर्दे के निकट जाकर आवाज़ दी। कुछ अजीव-सा नाम पुकारा उसने। दो ध्वनियों का कुछ ऐसे उच्चारण किया मानो लकड़ी की गोल डिविया का बड़ी मुश्किल से खुलनेवाला ढक्कन खोला गया हो - "सूत्रोक " कुछ क्षण बीते। कन्वास का पर्दा हटा और उसके पीछे से लडकी का अस्तव्यस्त वालो वाला कुछ-कुछ झुका हुआ सिर नजर आया। वह अपनी भूरी आखो को कुछ-कुछ झुकाये हुए बहुत ध्यान से और कुछ-कुछ शरारती ढग से डाफ्टर की ओर देख रही थी। डाक्टर ने उसकी ओर देखा तो सकते में आ गये- उनके सामने उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया खडी थी!
No text on this page.
तीसरा भाग सूओक
No text on this page.
भाठवां अध्याय हां . छोटी-सी अभिनेत्री की कठिन भूमिका यह वही थी! मगर शैतान जाने, वह यहा आ कहा से गयी थी? करिश्मा? इसका क्या सवाल पैदा होता है ! डाक्टर गास्पर अच्छी तरह से जानते थे कि करिश्मे नहीं होते। उन्होने समझ लिया कि उनके साथ धोखा हुअा है, छल-कपट हुआ है। गुडिया वास्तव मे जीती- जागती लडकी थी और जब वे असावधानी के कारण वग्घी मे सो गये थे, तो वह शरारती लडकी की तरह वाहर कूद गयी थी। "ऐसे मुस्कराने से कुछ हासिल नहीं होगा! आपकी मासूम मुस्कान से आपका जुर्म कुछ कम सगीन नहीं हो जायेगा , डाक्टर ने कडाई से कहा। "आपको तो अपने किये की खुद ही सजा मिल गयी है। सयोगवश मैने आपको वहा पा ढूढा है, जहा ढूढ पाना शायद असम्भव था। गुडिया आखें फाड फाडकर उनकी ओर देख रही थी । फिर वह छोटे-से परगोश की भाति पाखें झपकाने लगी। उसने मानो कुछ न समझते हुए मसखरे अगस्त की ओर देखा। उसने गहरी सास ली। "कौन है आप? साफ-साफ वताइये!' डाक्टर ने अपनी आवाज को यथाशक्ति कठोर बनाया। मगर गुडिया इतनी प्यारी थी कि उससे नाराज़ होना बहुत मुश्किल था। "तो आप मुझे भूल गये," उसने कहा । "मै सूत्रोक हू।" 'सू-प्रोक. डाक्टर ने दोहराया। मगर अाप तो उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया है !" "कैसी गुड़िया! मै तो साधारण लडकी हू .. क्या? नही, नही, आप वन रही है।" " " “ " 7-1492 . नज़र आ रही थी। ? गुड़िया पर्दे से बाहर आ गई। लम्प की तेज रोशनी अव उस पर पड़ रही थी। वह मुस्करा रही थी, उसका अस्तव्यस्त वालों वाला सिर एक ओर को झुका हुआ था। उसके बाल किसी भूरी चिड़िया के वच्चे के वालों के समान थे। पिंजरे में बैठा हुआ झवरीला जानवर गुड़िया की ओर बहुत ध्यान से देख रहा था। डाक्टर गास्पर कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे। पाठकगण , थोड़ा सब कीजिये , सारा राज आपकी समझ में आ जायेगा। मगर इस समय हम एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण वात की मोर पापका ध्यान आकर्षित करना चाहते है, जो डाक्टर गास्पर पार्नेरी की नजर से चूक गई थी। बात यह है कि आदमी जब उत्तेजित होता है तो ऐसी बातें भी नजर से चूक जाती है जिनकी अोर सामान्यतः वरवस ध्यान जाता है। वह बात यह है - पहिये घर में गुड़िया बिल्कुल दूसरी उसकी भूरी आखों में खुशी की चमक थी। वह गम्भीर और सतर्क प्रतीत हो रही थी, मगर उसके चेहरे पर दुख-उदासी का नाम-निशान भी नही था। इसके विपरीत यह कहा जा सकता था कि वह ऐसी शरारती लड़की थी जो शर्मीली-लजीली होने का ढोग कर रही थी। बात यहीं ख़त्म नही हो जाती। उसका वह शानदार रेशमी गुलावी फ़ॉक क्या हुआ सुनहरे गुलाबो वाले सैडल कहां गये? उसकी पोशाक की चमक-दमक , सज-धज , तड़क- भड़क क्या हुई ? उन्ही चीजों की बदौलत कोई भी लड़की यदि राजकुमारी नही तो नये साल के फर-वृक्ष पर सजाने के बढ़िया खिलौने जैसी तो अवश्य वन जाती है। अब गुड़िया बहुत ही साधारण पोशाक पहने थी। जहाजियों के नीले कॉलर वाला ब्लाउज़ , पुराने-से संडल जो कभी सफ़ेद रहे होंगे, मगर इस समय मटमैले-से दिखाई दे रहे थे। वह जुराब नही पहने थी। मगर इस से आप यह न समझ वैठियेगा कि इस साधारण पोशाक से गुड़िया बदसूरत नज़र आने लगी थी। इसके विपरीत, यह पोशाक उसे सूब जंच रही थी। कभी-कभी कोई लड़की इतने बुरे ढंग के कपड़े-लत्ते पहने होती है कि उसकी ओर देखने तक को मन नही होता , मगर जरा ध्यान देने पर बिल्कुल दूसरा ही रूप सामने आता है। वह तो बहुत प्यारी, राजकुमारी से भी अधिक प्यारी होती है। फिर, जैसा कि मापको याद होगा, सबसे बड़ी बात तो यह है कि उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया की छाती पर बहुत भयानक काले कटाव थे। मगर वे भव गायब थे। यह तो बड़ी खुशमिजाज , बड़ी स्वस्थ गुड़िया थी! मगर डाक्टर गास्पर का किसी भी वात की अोर ध्यान नहीं गया। बहुत मुमकिन है कि अगले कुछ क्षणों में अक्टर यह सब कुछ भाप जात , मगर तभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। अब मामला और भी उलझ गया। गाड़ी में एक नीग्रो ने प्रवेश किया। भी गुडिया काप उठी। पिजरे मे बैठा हुअा जानवर अजीबोगरीब विल्ली की तरह घुरघुराने लगा, यद्यपि वह दिल्ली नहीं था। हम जानते है कि यह नीग्रो कौन था। डाक्टर गास्पर भी उसे जानते थे। उन्हाने तो तिबुल को नीग्रो बनाया था। मगर और कोई इस राज़ को नहीं जानता था। यह परेशानी, यह उलझन कोई पाच मिनट तक बनी रही। नीग्रो की हरकत भी बहुत ही भयानक थी। उसने गुडिया को हाथा मे लेकर ऊपर उठा लिया और उसके गाला और नाक को चूमने लगा। गुडिया अपने गाला को बहुत जोर से दाये-वायें हिला रही थी ताकि नीग्रो उन्हे चूम न पाये। नीग्रो उन्ह चूमने की कोशिश करता हुआ ऐसे लग रहा था मानो धागे के साथ लटके सेव को चखना चाहता हो। बूढे अगस्त ने आखें मूद ली। डर के मारे उसके चेहरे का रग जर्द हो गया। वह उस चीनी शहशाह की भाति सिर हिला डुला रहा था जो यह तय कर रहा हो कि अपराधी का सिर कलम करवाये या उसे शक्कर के बिना ज़िन्दा चूहा खाने की सजा दे? गुडिया का संडल पर से उतरकर लम्प से जा टकराया। लैम्प उलटकर बुझ गया। एकाएक अन्धेरा हो गया। भय और भी बढ गया। तभी सब ने यह देखा कि पौ फटने लगी थी। दरवाजे की दरारा में से प्रकाश की रेखा छनने लगी थी। "सुबह होने को है," डाक्टर गास्पर ने कहा । मुझे उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया लेकर तीन मोटो के महल म पहुचना है।" नीग्रो ने दरवाजा खोल दिया। धुधला-सा उजाला भीतर फैल गया। मसखरा पहले की तरह पाखे मूदे बैठा था। गुडिया पर्दे के पीछे जा छिपी थी। डाक्टर गास्पर ने तिवुल को झटपट सारा किस्सा कह सुनाया। उन्होने बताया कि उत्तराधिकारी की गुडिया कैसे खो गयी थी और कैसे खुशकिस्मती से इस पहियेदार घर में मिल गयी थी। गुडिया पर्दे के पीछे सब कुछ सुन रही थी, मगर उसकी समझ कुछ भी नही पा रहा था। 'डाक्टर इसे तिवुल के नाम से सम्बोधित कर रहे है ।' गुडिया हैरान हो रही थी। 'यह भला तिबुल कैसे हो सकता है ? यह तो भयानक नीग्रो है। तिबुल तो खूबसूरत, गोरा चिट्टा है, वह तो काला नही है तब उसने पर्दे के पीछे से बाहर झाका। नीग्रो ने अपने लाल पतलून की जेब से एक लबोतरी-सी बोतल निकाली, उसका कार्क खोला , उसमे से चिडिया की ची ची सी हुई। नीग्रो ने इस बोतल मे से निकलनेवाला तरल पदार्थ अपने तन पर मलना शुरू किया। कुछ क्षण वाद मानो करिश्मा हुआ। नीग्रो गोरा चिट्टा और सुन्दर हो गया, काला नही रहा। अव तो कोई सन्देह वाकी न रह गया- यह तिबुल ही था। 74 88 'हुर्रा !" गुड़िया चिल्लाई और पर्दे के पीछे से लपककर तिवुल की गर्दन से जा लिपटी। मसखरे ने तो अपनी आंखों से कुछ नही देखा था। इसलिए उसने यह समझ लिया कि बस अब तो कुछ बहुत ही भयानक वात हो गयी है। वह अपनी फ़र्श पर जा गिरा और निश्चल-सा पड़ रहा। तिवुल ने उसका पतलून पकड़कर उसे सीट से नीचे उठाया। . अव गुड़िया अपने आप ही तिवुल को चूमने लगी। 'यह तो कमाल ही हो गया !" उसने खुशी से हांफते हुए कहा। "तुम ऐसे काले कैसे हो गये थे? मैं तो तुम्हें पहचान ही न पाई..." 'मूग्रोक !" तिवुल ने कड़ाई से कहा। वह फ़ौरन उसकी चौड़ी छाती से नीचे उतरकर टीन के वने फ़ौजी की भांति उसके सामने सावधान खड़ी हो गई। 'क्या वात है ? " उसने स्कूली छात्रा की भांति पूछा। तिवुल ने उसके अस्तव्यस्त बालों वाले सिर पर हाथ रखा। सूत्रोक ने अपनी खुशी से मचकती हुई भूरी आखों को जरा ऊपर उठाकर उसकी ओर देखा। 'डाक्टर गास्पर ने कुछ देर पहले जो कुछ कहा, वह तुम ने सुना था?" 'हा। उन्होने कहा था कि तीन मोटों ने उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया ठीक करने के लिए उनके पास भेजी थी। वह गुड़िया बग्घी में से उतर भागी। उनका कहना है कि वह गुड़िया में हूं।" 'यह तो वे गलती कर रहे है ," तिबुल ने कहा, "मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि यह गुड़िया नहीं है। यह तो मेरी नन्ही-सी दोस्त है, छोटी-सी नर्तकी सूत्रोक है, सर्कस के करतवो में मेरी विश्वसनीय साथी।" "विल्कुल सच!" गुड़िया ने खुशी से तिबुल का समर्थन किया। “देखो न हम दोनों तो अनेक बार एकसाथ रस्से पर चले है।" तिवुल ने उसे अपनी विश्वसनीय साथी कहा था, वह इस बात से बहुत सश हुई थी। "प्यारे तिवुल !" मूग्रोक फुसफुसाई और उसने तिबुल के हाथ से अपना गाल रगड़ा। 'यह कैसे हो सकता है ?" डाक्टर ने हैरान होते हुए कहा। लड़की है ? मूमोक... यही बताते हैं न आप इसका नाम ... हा! हां! आप ठीक कहते है ! अब सारी बात मेरी समझ में आ गई है। मुझे याद आ गया है... इस लड़की को में एक बार पहले भी देय चुका हूं। हा... मैने इसे उस बुढ़िया के नौकरों से यचाया था जो डडे से इसकी पिटाई करना चाहते थे!" अव डाक्टर ने अपने हाय लहराये- . 'क्या यह जीती-जागती हा... १०० ལྟ་ ་
No text on this page.
" ॥ . . - . . 7॥ "हा-हा-हा ! हा, अब समझ मे आया। इसीलिए मुझे उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया इतनी जानी-पहचानी लगी थी। दोना हू-ब-हू एक जैसी है। यह एक अद्भुत घटना है। अव सारी बात साफ हो गई थी और इस से हर किसी को बहुत यशी हुई। उजाला बढता जा रहा था। निकट ही एक मुर्गे ने बाग दी। डाक्टर फिर से उदास हो गये। "हा, यह सब कुछ तो बहुत खूब है, मगर इसका मतलब है कि उत्तराधिकारी की गुडिया अब मेरे पास नहीं है। इसका मतलब यह है कि मैं सचमुच ही उसे खो बैठा हू "नहीं, इसका मतलव यह है कि आपको वह मिल गई है," लडकी को प्यार से अपने साथ सटाते हुए तिवुल ने कहा। क्या मतलब?" 'वही, जो मैने कहा है . . सूत्रोक , तुम तो समझती हो न मेरा मतलब लगता तो ऐसा ही है," सूप्रोक ने धीरे से उत्तर दिया। "तो क्या ख्याल है? तिवुल ने पूछा। 'मैं तैयार हू," गुडिया ने कहा और मुस्करा दी। डाक्टर के पल्ले कुछ नही पडा। 'इतवार के दिन जब हम लोगों की भीड के सामने अपने करतब दिखाते थे , तब भी तुम मेरी बात माना करती थी। ठीक है न? तुम धारीदार चबूतरे पर खडी गा || तुम से कहता था- 'चलो | ' तव तुम तार पर चढकर मेरी ओर आती थी। मै भीड के ऊपर बहुत ऊचाई पर तार के मध्य मे खडा होता था। तब मै अपना एक घुटना झुकाकर फिर से तुम्हे कहता था- 'चलो '-तव तुम मेरे घुटने पर पैर रख मेरे कधे पर चढ जाती थी. तव तुम्हे कभी डर महसूस हुआ था क्या "नहीं। तुम मुझ से कहते थे- 'चलो - इसका मतलब था कि मुझे शान्त-स्थिर रहना चाहिये, किसी चीज़ से नहीं डरना चाहिये। "हा, तो, अब मै फिर तुम से कहता हू -- 'चलो। ' - तुम गुडिया बनोगी। "ऐसा ही सही, मैं गुडिया वनूगी। 'गुडिया?" डाक्टर ने पूछा। पाठकगण , मै अाशा करता हूं कि आप सब कुछ समझ गये है। आपको तो डाक्टर गास्पर के समान परेशानियो और हैरानियो से दो-चार नही होना पडा। इसलिए आप तो ऐसे उत्तेजित नहीं है और वात को अधिक आसानी से समझ सकते है। जरा ख्याल कीजिये - डाक्टर पिछले दो दिनो से थोड़ी देर के लिए भी ढग से नही सो पाये थे। इसलिए उनकी काम करने की इस हिम्मत को देखकर तो केवल हैरानी ही होती है। मैं । 7" " - " 2" क्या मतलब १०१ + मुर्गे के दूसरी वांग देने के पहले ही सब कुछ तय हो गया था। तिवुल ने पूरी कार्य- योजना तैयार कर ली थी- " सूत्रोक, तुम अभिनेत्री हो । उम्र की छोटी होते हुए भी तुम्हें अपनी कला में कमाल हासिल है। वसन्त में जब हमारे दल ने मूक-नाटक 'बुद्ध वादशाह' पेश किया था तो उसमें तुमने पत्तागोभी की सुनहरी जड़ का बहुत अच्छा अभिनय किया था। फिर बैले मे तुमने उतारनी तस्वीर का अभिनय किया था और मिल-मालिक से केतली में खूब ही बदली थी। नाचने में तुम सबसे बढ़-चढ़कर हो और गाने में भी। तुम दूर की कौड़ी भी खूब लाती हो। सबसे बड़ी वात तो यह है कि तुम साहसी लड़की हो, बहुत समझदार भी हो।" सूत्रोक के चेहरे पर खुशी की लालिमा दौड़ गयी थी। इतनी अधिक प्रशंसा के कारण उसे तो लज्जा भी अनुभव हो रही थी। हा तो, तुम्हें उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया की भूमिका अदा करनी होगी। सूत्रोक ने तालियां बजायी और वारी-बारी से तिबुल', बूढ़े अगस्त और डाक्टर गास्पर को चूमा। 'जरा रुको," तिबुल ने अपनी वात जारी रखी। "मुझे अभी कुछ और भी कहना है। तुम्हे मालूम ही है कि हथियारसाज प्रोस्पेरो तीन मोटों के महल में लोहे के पिंजरे में वन्द है। तुम्हें उसे आज़ाद कराना होगा।" 'क्या पिंजरा खोलना होगा?" "हा। मै वह राज जानता हूं जो प्रोस्पेरो को महल से निकल भागने में सहायता देगा।" " "हां। वहा एक सुरंग है।" तिबुल ने गुब्बारे वेचनेवाले का सारा किस्सा कह सुनाया। इस सुरंग का मुह किसी देग में है। यह देग महल के रसोईघर में होना चाहिए। तुम्हें इसे ढूढ़ना होगा।" "ठीक है।" प्रभी मूर्योदय नहीं हुआ था, मगर पक्षी चहकने लगे थे। गाड़ी के दरवाजे में से बाहर हरी घास नज़र पा रही थी। उजाला हो जाने पर पिंजरे में वन्द रहस्यपूर्ण जानवर रहस्यमय न रहा। वहा साधारण लोमड़ी नज़र माने लगी थी। प्रय हमें वक्त नही गपाना चाहिए ! बहुत दूर जाना है।' डाक्टर गास्पर ने कहा- 'मय माप अपना सबसे मुन्दर फ्रॉक छाट लीजिये..." 1 " १०२ सूोक अपने सभी फॉक निकाल लाई। ये सभी बहुत बढिया थे, क्याकि उसने खुद ही उन्ह तैयार किया था। सभी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियो की भाति सूमोक की पसन्द भी बहुत बढ़िया थी। डाक्टर गास्पर देर तक रग विरगे फॉका को ध्यान से देखते रहे। "मेरे ख्याल मे तो यह फॉक ठीक रहेगा। टूटी हुई गुडिया के फ्रॉक से यह कुछ बुरा नहीं है। इसे पहन लीजिये। " सूत्रोक ने यह फ्रॉक पहन लिया। वह गाडो के बीचोबीच खडी थो, सूर्य की पहली किरणो मे नहाती हुई सी। एकदम अनुपम थी उसकी छवि, उसका रूप। उसका फ्रॉक गुलावी था। मगर सूमोक जव हिलती-डुलती थी तो ऐसा प्रतीत होता पा मानो मुनहरी बरसात हो रही हो। फ्रॉक चमकता था, सरसराता था और उससे प्यारी-प्यारी सुगन्ध माती थी।
"मैं तैयार हूं," सूग्रोक ने कहा। घड़ी भर में उन्होने विदा ले ली। सरकस में काम करनेवाले लोगों को टसुए वहाना पसन्द नही होता। वे तो अक्सर अपनी जान हथेली पर लिये रहते है। फिर कसकर आलिंगन करना भी ठीक नही था कि फ्रॉक में सिलवटें न पड़ जायें। 'जल्दी ही लौट पाना!" बूढ़े अगस्त ने कहा और गहरी सांस ली। "मै अब मजदूरों के मुहल्लों में जाता हूं। हमें वहां अपनी ताकत का अनुमान लगाना चाहिए। मजदूर मेरा इन्तजार कर रहे हैं। उन्हें मालूम हो गया है कि मैं जिन्दा और आज़ाद हूं। तिबुल ने लवादा लपेटा, चौड़ा-सा टोप पहना, काला चश्मा चढ़ाया और बनावटी लम्बी नाक लगा ली। यह नाक 'काहिरा की यात्रा मूक-नाटक में तुर्क बादशाह का अभिनय करते समय काम में लाई जाती थी। अब कोई लाख सिर पटकने पर भी उसे पहचान नही सकता था। यह सच है कि बड़ी-सी नाक से उसका चेहरा भयानक हो गया था, मगर उसके लिए सुरक्षित रहने का यही सबसे अच्छा तरीका था। बूढ़ा अगस्त दहलीज पर खड़ा रहा। डाक्टर, तिबुल और सूत्रोक गाड़ी से बाहर निकले। " अव पूरी तरह दिन निकल आया था। जल्दी कीजिये , जल्दी कीजिये!" डाक्टर ने उतावली मचाते हुए कहा। एक मिनट बाद वे सूत्रोक के साथ बग्घी में जा बैठे। "तुम डर महसूस नही करती?" डाक्टर ने पूछा। सूत्रोक जवाब मे मुस्करा दी। डाक्टर ने उसका माथा चूमा । सड़कें अभी भी सुनसान पड़ी थी। लोगों की आवाज बहुत ही कम सुनाई देती थी। मगर अचानक कोई कुत्ता ज़ोर-ज़ोर से भौकने लगा। कुछ देर बाद वह ऐसे गुर्राने और चीखने लगा मानो कोई उसके मुह की बोटी छीन लेना चाहता हो। डाक्टर ने बग्घी से बाहर झाका । जरा गौर कीजिये, यह वही कुत्ता था जिसने पहलवान लापीतूप को काटा था! मगर बात केवल इतनी ही नहीं थी, डाक्टर ने यह दृश्य देखा। यह कुत्ता किसी व्यक्ति से उलश रहा था। व्यक्ति लम्बा और दुबला-पतला था। उसका सिर वहुत छोटा-सा था। वह सुन्दर मगर अजीव-सा सूट पहने था और टिड्डा-सा प्रतीत होता था। वह कोई गुलावी, सुन्दर और समझ में न आनेवाली चीज़ कुत्ते के मुह से छुड़ा लेने के लिए जोर लगा रहा था। सभी दिशानों में गुलावी टुकड़े उड़ रहे थे। १०४ आदमी जीत गया। उसने वह चीज़ कुत्ते के मुह से छुडाकर छाती के साथ चिपका ली और उस दिशा में तेजी से भाग चला जिधर से डाक्टर की बग्घी या रही थी। यह व्यक्ति जव वग्घी के बराबर पहुचा, तो डाक्टर की पीठ के पीछे से झाकती हुई सूत्रोक ने एक भयानक चीज़ देखी। यह अजीव सा आदमी भाग नहीं रहा था, छलागें मारता हुग्रा वैले नर्तक की भाति मानो हवा म तैर रहा था। उसके फ्रॉक कोट के छोर पवन चक्की के पखा की भाति हवा म लहरा रहे थे। और वह अपने हाथा मे अपने हाथो मे काले काले घावा वाली एक लडको उठाय था। "यह तो मैं हू" सूत्रोक चिल्ला उठी। वह अपनी सीट पर पीछे को हट गई और उसने मखमली तकिये से मुह ढक लिया। चीख सुन, भागते हुए व्यक्ति ने मुडकर देखा। अव डाक्टर को उसे पह्वानन म देर न लगी। यह नृत्य शिक्षक या, श्रीमान एक-दो-तीन ।
नौवां अध्याय तेज़ भूखवाली गुड़िया उत्तराधिकारी टूट्टी छज्जे मे खड़ा था। भूगोल का अध्यापक दूरबीन में से देख रहा था। उत्तराधिकारी टूट्टी यह माग कर रहा था कि कुतुबनुमा भी लाया जाये। मगर उसकी जरूरत नहीं थी। उत्तराधिकारी टूट्टी गुड़िया के लौटने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा था। वह अत्यधिक उत्तेजित रहा था, इसलिए उसे वहुत गहरी और मीठी नीद आई थी। छज्जे से नगर के फाटकों से महल की ओर जानेवाली सड़क साफ तौर पर दिखाई दे रही थी। नगर के ऊपर चढ़ते हुए सूरज के कारण आखें मिचमिचा रही थी। उत्तराधिकारी हथेली से पाखों पर प्रोट किये हुए था। वह अपनी नाक को सिकोड़ रहा था, छीकना चाहता था, मगर उसे छीक नहीं प्रा रही थी। 'अभी तो कोई भी नजर नही भूगोल अध्यापक ने कहा। इसे यह जिम्मेदारी का काम इसलिए सोपा गया था कि भूगोलविज्ञ होने के कारण वह फ़ासलो, विस्तारों और हिलती- डुलती वस्तुओं को सबसे अधिक अच्छे ढग से समझ सकता था। "माप यकीन के साथ कह सकते है कि वहा कुछ भी नहीं है?" टूट्टी ने जोर देकर पूछा। 'मुझसे बहस नहीं कीजिये। प्रा के " दूरवीन के अलावा मेरे पास ज्ञान है और मैं चीजा का सही अनुमान भी लगाना जानता हूं। मुझे चमेली की लता दिखाई दे रही है जिसका लातीनी भापा म सुन्दर , मगर मुश्किल-सा नाम है। उसके आगे पुल है और फिर सन्तरी नजर पा रहे है जिनके इर्दगिर्द तितलि- या उड रही है। इनके वहुत ही . ग्रागे सडक है रुकिये। रुकिय तो।। उसने दूरवीन का शीशा घुमाया। उत्तराधिकारी टूट्टी पजा के बल खड़ा हो गया। उसका दिल ऐसे उछल रहा था मानो उसने पाठ न तैयार किया हो। "हा," अध्यापक ने कहा। इसी समय तीन घुडसवार महल के पार्क से सडक की ओर जाते दिखाई दिये। कप्तान बोनावेन्तूरा अपने घुडसवारो के साथ उस बग्घी की ओर जा रहा था जो सडक पर दिखाई दी थी। "हुर्रा" ।" उत्तराधिकारी इतने जोर से चिल्लाया कि दूर-दूर के गावो में कलहस को क्लिक का राग अलापने लगे। छज्जे के नीचे कसरत का शिक्षक इस बात के लिए तैयार खडा था कि अगर उत्तरा- धिकारी खुशी के कारण पत्थर की मुडेर से नीचे जा गिरे, तो वह उसे हाथो मे साध ले। हा तो, डाक्टर की बग्घी महल की ओर जा रही थी। अब न तो दूरवीन की जरूरत रही थी और न ही भूगोल के अध्यापक के ज्ञान की। अव तो सभी को बग्घी और सफेद घोडा नजर आ रहे थे। बड़ी खुशी की घडी थी! वग्धी आखिरी पुल के पास जाकर खड़ी हुई। सन्तरी हट गये। उत्तराधिकारी जोर से दोनो हाथ हिलाता हुआ उछल रहा था, उसके सुनहरे वाल लहरा रहे थे। आखिर उसे वह चीज़ दिखाई दी जिसका इन्तजार था। छोटे कद १०७ , का एक व्यक्ति वूड़े की तरह धीरे धीरे बग्घी से बाहर निकला । सन्तरी तलवार पर हाथ रखकर सम्मान प्रकट करते हुए दूर खड़े थे। इस नाटे व्यक्ति ने एक अद्भुत गुड़िया बग्घी से बाहर निकाली। यह रेशमी फ़ीतों में लिपटी हुई ताजा गुलावों के गुलदस्ते जैसी लग रही थी। सुबह के नीले-नीले आकाश और घास तथा किरणों की चमक में यह दृश्य तो देखते ही बनता था। घड़ी भर बाद गुड़िया महल में पहुंच गई। वह अपने आप ही चली जा रही थी। अोह , खूब बढ़िया निभा रही थी सूत्रोक अपनी भूमिका ! अगर वह सचमुच की गुड़ियों में जा पहुंचती, तो निश्चय ही वे उसे अपने समान मान लेतीं। सूअोक विल्कुल शान्त और स्थिर थी। वह अनुभव कर रही थी कि उसे अपने अभिनय में सफलता मिल रही है। इस भूमिका से कही अधिक कठिन काम करने पड़ते है," वह मन ही मन सोच रही थी, “जैसे कि जलती हुई मशाल लेकर वाजीगरी के करतब करना या दोहरी कलाबाजी लगाना.. सूत्रोक ने सरकस में ये दोनो ही काम किये थे। मतलव यह कि सूत्रोक का दिल मजबूत रहा। इतना ही नहीं, उसे तो यह अभिनय पसन्द भी आया। डाक्टर गास्पर कही अधिक चिन्तित थे। वे सूत्रोक के पीछे-पीछे जा रहे थे। सूत्रोक छोटे-छोटे कदम उठा रही थी, पंजों के बल चलनेवाली वैले नर्तकी की भाति । उसका फ्रॉक हिलता-डुलता, लहराता और सरसराता था। पालिश किया हुआ फ़र्श चमचमा रहा था। वह इस फ़र्श की सतह पर गुलावी वादल की तरह प्रतिबिम्बित हो रही थी। बड़े-बड़े हॉलों में, जो चमकते हुए फ़र्श के कारण और भी अधिक बड़े और दर्पणों के कारण और भी अधिक चौड़े लग रहे थे, वह बहुत ही छोटी-सी लग रही थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो स्थिर विराट जल-विस्तार पर फूलों की एक छोटी-सी टोकरी वही चली जा रही हो। सूत्रोक ख श-ख श और मुस्कराती हुई चली जा रही थी, सन्तरियों के पास से , कवचधारी और चमड़े की वर्दी पहने हुए लोगों के करीव से जो उसे स्तम्भित-से देख रहे थे। वह गुजरी महल के उन कर्मचारियो के पास से, जो जीवन में पहली बार मुस्कराये थे। ये लोग सूत्रोक के पास आने पर आदरपूर्वक उसे रास्ता देते। ऐसा लगता मानो वह इस महल की स्वामिनी हो, इस पर अधिकार पाने के लिए आई हो। ऐसा गहरा सन्नाटा छा गया कि सूग्रोक के हल्के-हल्के कदमों की आहट भी साफ़ सुनाई देती थी। यह पाहट जमीन पर गिरनेवाली पंखुड़ी के समान हल्की थी। . १०८
No text on this page.
No text on this page.
नीचे भागा पा रहा था, इसी समय सूत्रोक के समान छोटा-सा और कान्तिमय वालक चौड़ी-चौडी सीढियो से गुड़िया का स्वागत करने के लिए। यह था उत्तराधिकारी टूट्टी। इन दोनो का कद एक जैसा था। सूग्रोक रुक गई। "तो यह है उत्तराधिकारी टूट्टी!" उसने सोचा। उसके सामने एक दुवला-पतला-सा लड़का खड़ा था, किसी गुस्सैल लडकी से मिलता- जुलता। भूरी पाखो वाला, चेहरे पर कुछ-कुछ उदासी की छाप लिये हुए। उसका अस्त- व्यस्त वालो वाला सिर एक अोर को ज़रा झुका हुअा था। सूत्रोक को मालूम था कि टूट्टी कौन है। वह जानती थी कि तीन मोटे कौन है। उसे अच्छी तरह ज्ञात था कि गरीब और भूखो मरते लोग जितना लोहा, जितना कोयला निकालते हैं, जितना अनाज पैदा करते है, वह सभी तीन मोटे हथिया लेते है। वह उस कुलीन महिला को नहीं भूली यो जिसने अपने नौकरो को उसकी पिटाई करने के लिए भेजा था। वह जानती थी कि तीन मोटे, कुलीन वृद्धाएं, वाके-छैले, दुकानदार और सैनिक- - . १०६ - . वे सभी जिन्होने हथियारसाज प्रोस्पेरो को लोहे के पिंजरे में वन्द किया और अब हाथ धोकर उसके मित्र नट तिबुल के पीछे पड़े है, एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। सूत्रोक जब महल की ओर रवाना हुई थी तो उसने सोचा था कि उत्तराधिकारी टूट्टी बहुत भयानक व्यक्ति होगा, कुलीन बुढ़िया जैसा। फ़र्क सिर्फ इतना कि उसकी लम्बी और पतली-सी लाल-लाल जवान हमेशा बाहर लटकती रहती होगी। मगर नही , सूत्रोक को उसमें ऐसी कोई भयानक वात नज़र न आई। सच तो यह है कि टूट्टी को देखकर उसे खशी ही हुई। वह अपनी ख शी से चमकती हुई भूरी प्रांखों से उसकी ओर देख रही थी। 'अरे, तुम हो गुड़िया?" उत्तराधिकारी टूट्टी ने उसका हाथ छूते हुए पूछा। 'मोह , अब मैं क्या करू ? " सूत्रोक को डर महसूस हुआ। क्या गुड़िया बातें भी किया करती है ? अाह , मुझे तो किसी ने पहले से कुछ बताया ही नही ! मुझे तो मालूम नहीं कि सैनिकों ने जिस गुड़िया को तोड़ डाला था, वह क्या कुछ कर सकती थी..." - डाक्टर गास्पर ने स्थिति को सम्भाला। " श्रीमान जी ," डाक्टर ने रस्मी अन्दाज में कहा, "मैंने आपकी गुड़िया को ठीक- ठाक कर दिया है ! जैसा कि आप अपनी आखों से देख रहे हैं मैने केवल उसमें फिर से जान ही नहीं डाली, उसे पहले से ज्यादा सजीव बना दिया है । यकीनन यह पहले से बढ़िया गुड़िया बन गई है, उसका फ़ॉक भी बदल दिया गया है, जो कही अधिक सुन्दर है। मुख्य बात तो यह है कि मैने आपको गुड़िया को वाते करना , गीत गाना और नाचना भी सिखा दिया है।' "यह तो कमाल हो गया !" उत्तराधिकारी ने धीरे से कहा। 'अव मुझे अपना फ़न दिखाना चाहिए!" सूत्रोक ने तय किया। अब चाचा विज़ाक कलाकार दल की छोटी-सी अभिनेत्री ने नये रंगमंच पर अपनी पहली भूमिका खेलनी शुरू की। यह रंगमंच था महल का मुख्य हॉल । वहां ढेरों दर्शक जमा हो गये थे। सभी ओर उनकी भीड़ लगी हुई थी। वे सीढ़ियो के सिरों पर खड़े थे, बरामदों और गैलरियो में जमा थे। वे गोल खिड़कियों में से झाक रहे थे, छज्जो में भीड़ लगाये थे। इसलिए कि अधिक अच्छे ढंग से देख-सुन सकें, वे स्तम्भों पर चढ़े हुए थे। बहुत ही रंग-विरगे सिर और पीठे सूर्य की प्रखर किरणों में चमचमा रहे थे। मूोक अपने इर्दगिर्द वहुत-से लोगों को देख रही थी। उनके खिले हुए चेहरे उसे ताक रहे थे। । . - .
- - - इस भीड मे हलवाई थे जिनकी उगलियो से शाख से वहनेवाली राल की भाति लाल शरवत या वादामी रग की गाढी-गाढी चटनी वह रही थी। यहा मनी भी थे जो मुर्गों के समान रग-विरगे फ्रॉक कोट पहने थे और बन्दरो की सी हरकते कर रहे थे। इस भीड मे तग फ्रॉक कोटो वाले छोटे-छोटे और मोटे-मोटे वादक, दरबारी लोग , कुबडे डाक्टर , लम्वी नाको वाले विद्वान और लहराते बालो वाले हरकारे भी थे। यहा मन्त्रियो की तरह ठाठदार कपडे पहने नौकर-चाकर भी उपस्थित थे। ये सभी लोग एक दूसरे से चिपके खडे थे। सभी एकदम खामोश थे। वे दम साधे गुलाबी गुडिया को देख रहे थे। यह गुडिया भी विल्कुल शान्त थी और वारह साल की लडकी के अनुरूप गरिमा से इन सैकडो नजरो का सामना कर रही थी। वह ज़रा भी शर्मा या झेप नही रही थी। यहा के दर्शक चौक के उन दर्शको से अधिक माग करनेवाले नही थे जिनके सामने सूत्रोक लगभग हर दिन अपना कला-प्रदर्शन करती थी। प्रोह , वे तो बहुत कठोर दर्शक होते थे- वे तमाशाई लोग, फौजी, अभिनेता, स्कूली छात्र और छोटे-मोटे दुकानदार। सूत्रोक तो उनके सामने भी कभी नहीं घबराई-डरी थी। वे कहा करते थे- " सूत्रोक दुनिया की सबसे अच्छी अभिनेत्री " और उसके कालीन पर अपनी जेव का छोटा-सा आखिरी सिक्का तक फेंक देते थे। बेशक यह सही है कि उस सिक्के से कलेजी की कचौडी खरीदी जा सकती थी जो जुराब बुननेवाली किसी औरत के लिए नाश्ते , दोपहर और रात के खाने का काम दे सकती थी। इस तरह सूत्रोक ने एक वास्तविक मुडिया की भूमिका अदा करनी शुरू की। उसने अपने पजे जोडे , फिर पजो के बल खड़ी हुई और अपनी झुकी हुई वाहो को ऊपर उठाया । वह चीनी राजा की भाति अपनी कनिष्ठानो को हिलाती हुई गाने लगी। उसका सिर गीत की लय के साथ-साथ दायें-बाये हिलने लगा। सूत्रोक की मुस्कान में शोखी थी, शरारत थी। मगर उसने लगातार इस वात की कोशिश की कि सभी गुडियो की भाति उसकी आखें गोल-गोल और फैली-फली-सी रहे । गीत यह था- किसी अजब विज्ञान-ज्ञान से मुझे तपाकर भट्ठी मे। नयी जिन्दगी दे डाली है प्यारे डाक्टर गास्पर ने॥ सुनो, आह अव मै भरती हू देखो तो, मै मुस्काई। फिर से हसी-खुशी की मैने - " नई ज़िन्दगी है पाई। तेरे पास पहुंच पाने को बहुत बार पथ में भटकी। भूल न जाना नाम वहन का "सूमोक" रहे मन में अटकी ।। फिर से जिन्दा हो जाने पर सोई तो सपना पाया। अपने लिए तुझे सपने में जार-जार रोते पाया ।। देखो तो पलके हिलती है कुंडल मेरा लहराया। भूल न जाना कभी बहन को प्यारा नाम "सूमोक पाया। 'सूप्रोक.. टूट्टी ने धीरे से दोहराया। टूट्टी की प्रांखें डवडवायी हुई थी और इसलिए वे दो नही, चार लग रही थीं। गुड़िया ने गीत ख़त्म किया और श्रोताओं के सम्मुख सिर झुकाया। हॉल में उपस्थित सभी लोगों ने प्रशंसा करते हुए गहरी सांस ली। सभी हिले-डुले, सभी ने सिर हिलाये और अपनी खुशी जाहिर करते हुए ज़बान से चटखारा भरा। वास्तव मे ही गीत की धुन बहुत प्यारी थी, यद्यपि ऐसी कमउम्र लड़की की आवाज के लिए कुछ कुछ उदासी लिये हुए थी। उसकी आवाज तो बहुत ही गजब की थी। ऐसा लगता था मानो चांदी या शीशे के कण्ठ से निकल रही हो। 'फ़रिश्ते की तरह गाती है," खामोशी में आर्केस्ट्रा कंडक्टर के शब्द सुनाई दिये। "हां, पर इसका गीत कुछ अजीव-सा था, " तमगे लगाये हुए किसी दरवारी ने वस , आलोचना तो इतनी ही हुई। तीन मोटे हॉल में आये। इतनी भीड़ देखकर वे आग-बबूला हो सकते थे, इसलिए सभी लोग दरवाजों की तरफ भाग चले । इस हड़बड़ी- गड़बड़ी में हलवाई ने शरवत से सना हुआ अपना पंजा किसी सुन्दरी की पीठ पर लगा दिया। सुन्दरी चीख उठी। उसके चोसने से यह भी स्पष्ट हो गया कि उसके दात बनावटी हैं, क्योकि वे निकलकर बाहर आ गिरे थे। सैनिकों के मोटे कप्तान का भद्दा-सा भारी बूट इस खूबसूरत जबड़े के ऊपर जा पड़ा। वनावटी दात कचकच की आवाज करते हुए पिस गये। और प्रवन्धक ने फ़ौरन घूमकर डाटा- . कहा। ११२ " "कैसी शर्म की बात है। यहा अखरोट विसरा दिये । परो तले पाते है। वनावटी जवडा खो वटनेवाली सुन्दरी ने चीखकर शिकायत करनी चाही। उसने हाथ भी ऊपर उठाये , मगर जबडे के साथ ही उसकी आवाज़ का भी दम निकल गया था। उसने कुछ कहा, मगर किसी के पल्ले कुछ नहीं पड़ा। क्षण भर बाद सभी फालतू लोग हॉल से जा चुके थे। केवल बडे-बडे अधिकारी ही वाकी रह गये। अब सूपोक और डाक्टर गास्पर तीन मोटो के सामने खड़े थे। ऐसा लगता था कि पिछले दिन घटी घटनाग्रो से तीन मोटो को कोई परेशानी नहीं हुई थी। वे तो पार्क में डाक्टर की देख-रेख मे गेद खेलते रहे थे। शरीर मे चुस्ती- फुर्ती लाने के लिए वे अक्सर ऐसा करते थे। वे बहुत थक गये थे। पसीने से सराबोर उनके चेहरे चमक रहे थे। उनकी कमीजें पीठो से चिपकी हुई थी और पीठे हवा से फूले हुए पालो जंसी लग रही थी। इनमे से एक मोटे की प्राख के नीचे चोट का नीला-काला-सा निशान था जो भोडे गुलाब या खू बसूरत मेढक के समान था। दूसरा मोटा इस भोडे-से गुलाब को सहमी-सहमी नजर से देख रहा था। 'यह तो इस दूसरे मोटे ने उसके चेहरे पर गेद दे मारा है और चोट का खूबसूरत निशान बना दिया है," सूत्रोक ने सोचा । वह मोटा जिसे चोट लगी थी, गुस्से से फू-फा कर रहा था। डाक्टर गास्पर हतप्रभ मुस्करा रहे थे। मोटे गौर से गुडिया को देख रहे थे । ख शी से चमकते हुए उत्तराधिकारी टूट्टी के चेहरे को देखकर मोटो का मूड ठीक हुआ । 'हा, तो," एक मोटे ने कहा, पाप है डाक्टर गास्पर पार्नेरी?" डाक्टर ने सिर झुकाया। "गुडिया कैसी है दूसरे मोटे ने पूछा। 'बहुत ही खूब है " टूट्टी खुशी से चिल्लाया। मोटो ने उत्तराधिकारी को इतना अधिक खश कभी नहीं देखा था। "यह तो बहुत खुशी की बात है। गुडिया वास्तव मे बहुत ही सुन्दर दिखाई दे रही है. पहले मोटे ने माथे से पसीना पोछा और चीखकर कहा- 'डाक्टर गास्पर, आपने हमारा फरमान पूरा कर दिया है। अब आप अपना इनाम माग सकते हैं।" खामोशी छा गयी। " ?" 8-1492 " " लाल रंग के विग लगाये हुए नाटा-सा मुशी अपना पेन तैयार किये हुए था ताकि डाक्टर जो इनाम मागे, वह उसे झटपट लिप ले। डाक्टर ने यह कहा 'कल अदालत चौक में विद्रोहियों को दण्ड देने के लिए जल्लादों के दस तख्ते बनाये गये थे "उन्हे अाज दण्ड दिया जायेगा, एक मोटे ने टोका। "मैं भी इसी की चर्चा करने जा रहा हूं। मेरी आप से यह प्रार्थना है कि प्राप सभी बन्दियो की जान बख़्श दें और उन्हे आजाद कर दें। मेरी प्रार्थना है कि आप सभी को माफ कर दें और तस्ते जलवा दें... लाल विगवाला मुशी तो यह प्रार्थना सुनकर काप उठा और उसके हाथ से पेन गिर पड़ा। पेन की निव बहुत ही तेज़ थी और वह दूसरे मोटे के पैर में जा घुसी। वह दर्द से चीख उठा और एक पैर पर लट्ट की तरह घूमने लगा। पहला मोटा, जिसकी आख के नीचे चोट का निशान था, दुर्भावना से ठठाकर हंस दिया। उसे अब बदला मिल गया था। " - 'वेडा गर्क !" पाव से पन निकालते हुए दूसरा मोटा चिल्लाया। कम्बस्त विल्कुल तीर के समान है। "वेडा गर्क | ऐसी प्रार्थना करना अपराध है। आपको ऐसा इनाम मागने का अधिकार नहीं है लाल वनावटी वाला वाला मुशी अपनी जान लेकर भागा। रास्ते में वह एक फूलदान से टकराया जो वम को सी आवाज करता हुआ नीचे गिरा और टुकडे टुकडे हो गया। अब तो यहा अच्छा-खासा हगामा ही हो गया था। मोटे ने पेन निकाला और भागे जाते मुशी की ओर फेंका। मगर ऐसा मोटा आदमी भला खाक निशानेवाज हो सकता है। पन एक सन्तरी की पीठ में जा घुसा। पर चूकि वह असली फौजी था, इस लिये टस से मस तक नहीं हुआ। जव तक पहरा बदला नही गया, पेन उसी जगह पर लगा रहा । "मैं आप से अनुरोध करता हूं कि उन सभी मजदूरा की जान बख्श दी जाये जिन्हे मौत की सजा दी जानेवाली है और जल्लादा के सभी तख्ते जलवा दिये जायें।' डाक्टर ने धीरे से, मगर दृढतापूर्वक दोहराया। जवाव मे तीनो मोटे ऐसे चीख उठे मानो कोई तख्ते तोड़ रहा हो। "नहीं नहीं नही । ऐसा हरगिज़ नही हो सकता। उन्ह जरूर सजा दी जायगी।" मरने का अभिनय कीजिये," डाक्टर ने फुसफुसाकर गुडिया से कहा । सूत्रोक वात को फौरन भाप गई। वह पजो के बल खडी हुई , दर्दभरी आवाज म कराही और लडखडाने लगी। उसका फ्रॉक पकड ली गई तितली के पखा की भाति फडफडा रहा था और उसका सिर लटक-सा गया था। ऐसा लगता था कि वह अभी ढेर हुई कि हुई। उत्तराधिकारी उसकी ओर लपका। "हाय हाय । " वह चीख उठा। सूग्रोक और भी ज्यादा दर्दीली आवाज मे कराही। आप देख रहे है न?" डाक्टर गास्पर ने कहा। 'गुडिया फिर से दम तोडने जा रही है । उसके अन्दर लगे हुए पुर्जे बहुत ही सवेदनशील है। अगर आप मेरी प्रार्थना पर कान नहीं देंगे, तो वह बिल्कुल बेकार होकर रह जायेगी। मेरे ख्याल में तो अगर श्रीमान उत्तराधिकारी की गुडिया वेकार का गुलाबी चिथडा वनकर रह जायेगी, तो उन्ह बहुत सदमा पहुचेगा। उत्तराधिकारी तो आपे से बाहर हो गया। वह हाथी के बच्चे की तरह पैर पटकने लगा। उसने कसकर पाखे बन्द कर ली और सिर हिलाने लगा। " हरगिज ऐसा नहीं होने दूगा। हरगिज नही ।" वह चीख उठा। डाक्टर का अनुरोध पूरा किया जाये। मैं अपनी गुडिया को नही मरने दूगा। सूत्रोक सूत्राव वह फूट-फूटकर रोने लगा। " " .
" । ज़ाहिर है कि तीन मोटो ने हथियार फेंक दिये। फ़ौरन हुक्म जारी कर दिया गया। विद्रोहियो को माफी दे दी गयी। डाक्टर गास्पर पश पुश घर चल दिये। अब मै घोड़े वेचकर सोऊगा," डाक्टर रास्ते में सोचते जा रहे थे। घर लौटते हुए उन्होंने नगर में सुना कि अदालत चौक में जल्लादों के तख्ते जल रहे है और धनी लोग इस बात से बहुत नाराज है कि गरीबों को माफ़ कर दिया गया है । इस तरह सूग्रोक तीन मोटो के महल मे रह गई। टूट्टी उसे साथ लिये हुए वाग मे पाया। उत्तराधिकारी ने पैरों से फूलो की क्यारियों को रोदा, वाड़ के काटेदार तार से टकराया और तालाब में गिरते-गिरते बचा। खशी के मारे उसे मानो अपनी सुध-बुध ही नही रही थी। 'क्या वह इतना भी नही समझ पा रहा कि मैं जीती-जागती लड़की हूं? सूग्रोक को हैरानी हो रही थी। "मै तो कभी किसी के हाथों ऐसे उल्लू न वनती।" नाश्ता लाया गया। सूत्रोक ने पेस्ट्रियां देखी और उसे याद आया कि केवल पिछले वर्ष की पतझर मे ही उसे एक पेस्ट्री खाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। और सो भी बूढ़े मसखरे अगस्त ने कहा था कि वह पेस्ट्री नही, मीठी पाव-रोटी है। उत्तराधिकारी टूट्टी के लिये लाई गई पेस्ट्रियो की तो बात ही निराली थी। मधुमक्खिया उन्हें फूल ही समझ बैठी थी और दसेक उनके इर्दगिर्द मंडराने लगी थी। 'हाय , मैं क्या करू?" सूअोक व्यथित होती हुई सोचने लगी। "गुड़िया भला कभी खाती भी है ? मगर गुड़िया तो तरह-तरह की होती है ... प्रोह , मेरा बहुत मन हो रहा है पेस्ट्री खाने को! " सूत्रोक अपना मन न मार सकी। "मैं भी थोड़ी-सी पेस्ट्री खाना चाहती हूं..." उसने धीरे से कहा। उसके गाल लज्जारुण हो गये। 'यह तो बड़ी अच्छी बात है !" उत्तराधिकारी बहुत खुश हुआ। “पहले तो तुम ने कभी कुछ खाना नही चाहा था। तब मुझे अकेले नाश्ता करते हुए बड़ी ऊब अनुभव होती थी। मोह , कितनी खुशी की बात है ! तुम्हें भूख लगने लगी है.. सूत्रोक ने एक टुकड़ा खाया। उसके बाद एक और, एक और, फिर एक और। अचानक उसने देखा कि उत्तराधिकारी की देखभाल करनेवाला नौकर जो कुछ दूर खड़ा हुअा था उसकी ओर देख रहा है- सो भी साधारण ढग से नही, सहमा-डरा-सा। वह मुह वाये हुए था। नौकर का ऐसा करना स्वाभाविक ही था। - - उसने भला कब अपने जीवन मे गुडियो को खाते देखा होगा सूयोक सहम उठी। चौथी पेस्ट्री उसके हाथ से गिर गयी , सबसे अधिक क्रीम और अगूर के मुरब्बेवाली। मगर मामला विगडा नहीं। नौकर ने अपनी प्रायें मली और मुह वन्द कर लिया। उसने सोचा- "यह तो मुझे भ्रम हुअा है। गर्मी की मेहरवानी है। उत्तराधिकारी लगातार बोलता-वतियाता रहा। अाखिर थककर चुप हो गया। गर्मी के इस वक्त गहरी नीरवता छाई हुई थी। जाहिर था कि पिछले दिन की हवा पख लगाकर कही दूर उड गई थी। अब एकदम शान्ति थी। और तो और पक्षियो ने भी पख समेट लिये थे। ऐसी नीरवता में उत्तराधिकारी के निकट घास पर बैठी हुई सूओक एक अनबूझ- सी आवाज सुन रही थी, वार-वार एक ही समय दोहरायी जाती हुई। यह ध्वनि रूई मे लिपटी हुई घड़ी की टिक-टिक के समान थी। अन्तर केवल इतना था कि घडी "टिक- टिक" करती है और यह ध्वनि धक-धक"की। 'यह क्या है ? " सूत्रोक ने पूछा। क्या ?" उत्तराधिकारी ने आश्चर्य से एक वयस्क की भाति अपनी नज़र ऊपर उठाई। 'यह धक-धक की आवाज... शायद यह घडी है? तुम्हारे पास घडी है क्या?" फिर से खामोशी छा गई और इस खामोशी मे फिर से यह धक-धक सुनाई दी। सूत्रोक ने उगली उठाकर चुप रहने का सकेत किया। उत्तराधिकारी ने भी ध्यान से इस आवाज़ को सुना। 'यह घडी नहीं है," उत्तराधिकारी ने धीरे से कहा। "यह तो मेरा लोहे का दिल है जो धडक रहा है " दसवा अध्याय चिड़ियाघर दो बजे उत्तराधिकारी टूट्टी को पढाई के कमरे मे बुला लिया गया। पाठ का समय हो गया था। सूत्रोक अकेली रह गई। किसी को इस बात का सान गुमान भी नही हुआ कि सूग्रोक जीती-जागती लडकी है। शायद उत्तराधिकारी टूट्टी की असली गुडिया जो अब नृत्य-शिक्षक श्रीमान एक-दो-तीन के पास थी, सूप्रोक की भाति ही सजीव लगती होगी। निश्चय ही किसी बहुत बढिया कारीगर . " के निपुण हाथो ने उसे बनाया होगा। हा, यह सच है कि वह पेस्ट्रियां नही खाती थी। मगर शायद उत्तराधिकारी टूट्टी ने सही कहा था कि उसे भूख ही नही लगती थी। तो खैर, इस तरह सूत्रोक अकेली रह गई। स्थिति खासी उलझी-उलझायी थी। वहुत वडा महल , भूल-भुलया से ढेरों दरवाजे , वरामदे और सीढ़ियां । दहशत पैदा करनेवाले सन्तरी, विभिन्न रंगों के विग लगाये हुए अनजाने-अपरिचित कठोर लोग, खामोशी और चमक-दमक । सूत्रोक की ओर कोई ध्यान नही दे रहा था। वह उत्तराधिकारी के सोने के कमरे में खिड़की के पास खड़ी थी। 'तो मुझे अपने काम की योजना बना लेनी चाहिये ," सूत्रोक ने तय किया । "हथियारसाज प्रोस्पेरो लोहे के जिस पिंजरे में बन्द है, वह उत्तराधिकारी टूट्टी के चिड़ियाघर मे रखा है। मुझे किसी तरह वहां पहुचना चाहिये। यह तो आप जानते ही हैं कि जीते-जागते बच्चों को उत्तराधिकारी के निकट भी नहीं फटकने दिया जाता था। उसे तो वन्द घोड़ा-गाड़ी में भी कभी नगर नही ले जाया गया था। वह तो महल में ही बड़ा हुआ था। उसे विज्ञानों की शिक्षा दी जाती थी , जालिम वादशाहो और सेनानायकों के बारे मे कितावे पढ़कर सुनाई जाती थी। उसके आसपास रहनेवाले लोगों के लिये हंसना-मुस्कराना मना था। उसके सभी शिक्षक और अध्यापक दुबले-पत्तले थे, ऊंचे कद के बूढ़े थे, कसकर भीचे हुए पतले होंठों और मटैले चेहरों वाले । इसके अलावा उन सब के हाजमे भी खराब रहते थे। गड़बड़ हाजमेवाले लोग भी कभी हंसते है! उत्तराधिकारी टूट्टी ने कभी जोर को हंसी, गूजते हुए ठहाके नही सुने थे। हा, कभी-कभार नशे में धुत्त किसी कसाई या अपनी ही तरह के मोटे-मोटे मेहमानों की दावत करनेवाले तीन मोटो के ठहाके उसे जरूर सुनाई देते थे। मगर इन्हें प्यारी हंसी थोड़े ही कहा जा मफता था! यह तो भयानक चीख-चिघाड़ होती थी। इस से मन खिलता नहीं, दहल उटना था। मुस्कराती तो थी केवल गुड़िया। मगर तीन मोटे गुड़िया की मुस्कान को गतरनाक नही मानते थे। फिर गुड़िया बोलती तो थी ही नहीं। यह उत्तराधिकारी को उन बहुल-मी याता के बारे में कुछ नहीं बता सकती थी जो महल के पार्क और लोहे के पुनों पर पहग ले ए मन्नरी उमकी नजरों से दूर रयते थे। इसी लिये यह जनना, गरीबी, भूगे पन्नो, कारगनी, गानो, लगानी और किमानी के बार में कुछ नहीं जाना था। इसी निये उमं यह मालूम नहीं था कि धनी लोग गरीबों को मेहना करने - . , उसे यह " के लिये मजबूर करते है और गरीबो के थके-हारे हाथो द्वारा तैयार की जानेवाली सभी चीजे हथिया लेते है। तीन मोटे अपने उत्तराधिकारी को बहुत ही क्रोधी , बहुत ही यूर बनाना चाहते थे। उसे बच्चो से दूर रखा गया और उसके लिये चिडियाघर बना दिया गया। 'अच्छा यही है कि वह दरिन्दो को देखा करे," उन्होंने तय किया । निर्जीव , हृदयहीन गुडिया दे दी जाये और उसके लिये जगली दरिन्दे जुटा दिये जाये। यही उचित है कि वह शेरो को कच्चा मास खाते और अजगर को जिन्दा खरगोश निगलते देखे। यही ठीक रहेगा कि वह दरिन्दो की दिल दहलानेवाली आवाजें सुने और अगारो की तरह जलती हुई उनकी लाल-लाल पाखें देखे। तभी वह निर्दय , तभी वह सगदिल बन सकेगा। मगर तीन मोटो के मन के चीते न हो सके। उत्तराधिकारी टूट्टी मन लगाकर पढता , वीरो और वादशाहो के बारे मे रोगटे खडे करनेवाली कहानिया सुनता, अपने शिक्षको की फुसियो वाली नाको को नफरत से देखता, मगर वह सगदिल न बना। उसे दरिन्दो की तुलना में गुडिया कही अधिक अच्छी लगती थी। वेशक आप यह कहेगे कि बारह साल के वालक के लिए गुडियो से खेलना शर्म की वात है। इस उम्र मे बहुत-से तो शेरो का शिकार करना चाहेगे। मगर उत्तराधिकारी सिलसिले मे इसकी एक खास वजह 1 वक्त पाने पर आप को उस कारण की जानकारी हो जायेगी। फिलहाल हम सूत्रोक की ओर लोटते है। उसने शाम होने तक इन्तजार करने का फैसला किया। उसे दर असल ऐसा ही करना भी चाहिये था। जाहिर है कि गुडिया का दिन-दहाडे महल मे अकेले इधर- उधर घूमते फिरना बडा ग्रजीव-सा लगता। पाठ के बाद वे फिर दोनो इकट्ठे हो गये। "तुम्हे एक वात बताऊ," सूअोक ने कहा, जव मै डाक्टर गास्पर के यहा वीमार पड़ी थी, तो मैंने एक विचित्र सपना देखा था। उस सपने मे मै गुडिया से जीती-जागती लडकी मे बदल गई. मुझे दिखाई दिया मानो मै सरकस की कलाकार थी। मैं अन्य कलाकारो के साथ मेलो-ठेलो मे धूमनेवाले पहियेदार घर मे रहती थी। यह गाडी एक जगह से दूसरी जगह जाती, मेलो-ठेलो मे ठहरती और हम बडे-बडे चौको मे अपने खेल- तमाशे दिखाते। में रस्से पर चलती, नाचती, वाजीगरी के मुश्किल करतब करती और मूक नाटका मे तरह-तरह की भूमिकाए खेलती " . " ॥ यह बात उत्तराधिकारी अांखें फाड़-फाड़कर उसे देखता हुअा ये बातें सुन रहा था। "हम बहुत गरीव लोग थे। अक्सर दोपहर का खाना नहीं पाते थे। हमारे पास एक वड़ा-सा सफ़ेद घोड़ा था। उसका नाम था अनरा। फटे हुए पीले कपड़े से ढके उसके चौड़े जीन पर खड़ी होकर में वाजीगरी के करतब दिखाती। फिर वह घोड़ा मर गया, क्योकि पूरे एक महीने तक हमारे पास उसे अच्छी तरह से खिलाने-पिलाने के लिये काफी पैसे नही थे ... "गरीव ? " टूट्टी ने पूछा। मेरी समझ में नही आती। आप लोग गरीव क्यों थे?" 'वात यह है कि हम गरीबों के सामने अपने खेल-तमाशे पेश करते थे। तावे. पीतल के छोटे-छोटे सिक्के ही हमारी ओर फेंकते थे। कभी-कभी तो ऐसा भी होता था कि तमाशे के बाद मसखरा अगस्त अपना टोप लेकर दर्शकों के सामने चक्कर लगाता और टोप विल्कुल खाली ही रह जाता, उसे एक कौड़ी भी दर्शको से न मिलती।" उत्तराधिकारी टूट्टी कुछ भी न समझ पाया। सूत्रोक शाम होने तक उसे ऐसी ही बातें सुनाती रही। उसने उसे गरीबो के कठिन जीवन , बड़े नगर और उस कुलीन वृद्धा के वारे में बताया जो उसकी पिटाई कराना चाहती थी। उसने चर्चा की उन अमीरों की जो जीते-जागते वालकों पर कुत्ते लुहा देते है। उसने जिक्र किया नट तिवुल और हथियारसाज़ प्रोस्पेरो का और यह भी बताया कि मजदूर, खनिक और जहाज़ी धनियों और मोटों की सत्ता का तख्ता उलट देना चाहते हैं। सब से अधिक तो उसने सरकस का जिक्र किया। धीरे-धीरे वह अपनी बातों की तरगों में ऐसी वही कि यह तक भूल गई कि वह सपने की चर्चा कर रही है। "मैं बहुत अर्से से चाचा विजाक के पहियेदार घर में रह रही हूं। मुझे तो यह भी याद नही कि किस उम्र में मै नाचने , घुड़सवारी करने और कसरती झूले पर तरह-तरह की कसरतें और करतव करने लग गई थी। प्रोह , मैं कैसे-कैसे बढ़िया करतब करना जानती हूं!" उसने हाथ बजाते हुए कहा, 'मसलन, पिछले इतवार को हमने बन्दरगाह में . . १२० अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया। वहा मने प्राड प्रा की गुठलियों पर वाल्ज की धुन बजायी..." 'पाड ओ की गुठलियो पर? वह कैसे?" "श्रोह, तुम यह भी नही जानते । क्या तुमने आडू की गुठली से बनाई गई सीटी कभी नहीं देखी? यह तो बडी मामूली-सी बात है। मैने बारह गुठलिया जमा की और उनकी सीटिया बना ली। जब तक उन म सूराख नही हो गया, उन्हे पत्थर पर घिसती रही, घिसती रही...' "वाह, यह तो वहुत दिलचस्प बात है। " "केवल बारह गुठलियो पर ही नही, मै तो चावी पर भी वाल्म की धुन वजा . . सकती हूँ. " "चावी पर भी? वह कैसे? जरा वजाकर दिखायो। मेरे पास बहुत बढिया चावी है .. " इतना कहकर उत्तराधिकारी टूट्टी ने अपनी जाकेट के पालर का बटन खोला और गले मे से एक पतली-सी जजीर निकाली। इस जंजीर के साथ एक छोटी-सी सफेद चावी लटक रही थी। " यह लो!" 'तुम इसे इस तरह छिपाये क्यो रहते हो?" सूत्रोक ने पूछा। " मुझे यह चाबी सरकारी सलाहकार ने दी है। यह मेरे चिडियाघर के एक पिजरे की चाबी है।"
" . " , तो क्या तुम सभी पिजरो की चाबिया अपने पास रखते हो? " नही। मुझसे कहा गया है कि यह सबसे महत्त्वपूर्ण चाबी है। मुझे इसे बहुत सम्भालकर रखना चाहिये . सूत्रोक ने उसे अपनी कला दिखाई। उसने चावी का सूरालवाला भाग होठ के साथ लगाकर एक प्यारी-सी धुन बजाई। उत्तराधिकारी ऐसा मस्त हुआ कि वह चावी जो उसे बहुत सम्भालकर रखने के लिये सौपी गई थी, उसे उसकी सुध-बुध ही न रही। चाबी सूत्रोक के पास ही रह गई। उसने अनजाने ही उसे लैस से सुसज्जित गुलाबी जेव मे डाल लिया । शाम हुई। गुडिया के लिये उत्तराधिकारी टूट्टी के सोने के कमरे को बग़ल मे ही एक विशेष कमरा तैयार किया गया था। उत्तराधिकारी टूट्टी को सपने में अद्भत चीजें दिखाई दे रही थी- लम्बी-लम्बी नाकों वाले ऐसे नकाब कि देखकर वरबस हंसी आये ; अपनी नंगी पीली पीठ पर बड़ा-सा चिकना पत्थर लादे हुए एक व्यक्ति और एक मोटा जो इस व्यक्ति पर अपना काला-सा कोडा बरसा रहा था। उत्तराधिकारी ने चिथड़े पहने एक छोकरे को आलू खाते देखा। उसे सफेद घोड़े पर सवार एक वनी-ठनी बुढ़िया भी नजर आई जो आड़ों की बारह गुठलियो के सहारे वाल्ज की कोई भद्दी-सी धुन वजा रही थी... इसी समय इस छोटे-से शयन-कक्ष से काफी दूर, महल के पार्क के एक कोने मे कुछ और ही घटनायें घट रही थी। पाप घबरायें नहीं, पाठकगण , वहां कोई भयानक वात नहीं हुई थी। इस रात केवल उत्तराधिकारी टूट्टी ने ही सपने में अजीबोगरीब चीजें नहीं देखी थी। ऐसा ही अद्भत सपना देख रहा था वह सन्तरी जो उत्तराधिकारी टूट्टी के चिड़ियाघर के फाटकवाली चौकी पर पहरा देते-देते ऊंघने लगा था। सन्तरी जगले के साथ टेक लगाये पत्थर पर बैठा था प्यारी-प्यारी नीद का मजा ले रहा था। चौड़ी मियान में बन्द उसकी तलवार घुटनों के बीच रखी हुई थी। काले रेशमी रूमाल के बीच से पिस्तौल बड़े इत्मीनान से उसकी बगल में लटक रही थी। उसके निकट ही बजरी पर जंगलेवाली लालटेन रखी थी। सन्तरी के बूट और उसकी प्रास्तीन पर पत्तों के बीच से या गिरनेवाला तितली का लम्बा-सा लार्वा लालटेन की रोशनी में चमक रहे थे। एकदम शान्तिपूर्ण वातावरण था। हा, तो सन्तरी सो रहा था, अजीबोगरीब सपना देख रहा था। उसने देखा कि उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया उमके पास पाई। वह हू-ब-हू वैसी ही थी जैसी कि मुबह के ममय , जय डाक्टर गास्सर मानेरी उसे लेकर आये थे। वही गुलाबी फांक , वही रेगमी . १२२ . , फोते , वही बढ़िया लैस , वही चमक-दमक । मगर अब सपने वह जीती-जागती लडकी प्रतीत हुई। वह मनमाने ढग से हिलती-डुलती थी , दाये-चाये देखती थी, चौक उठती थी और होठो पर उगलो रख देती थी। उसका छोटा-सा शरीर लालटेन की रोशनी मे चमक रहा था। सन्तरी तो सपने मे मुस्करा भी दिया। इसके बाद उसने गहरी सास ली, अधिक सुविधाजनक ढग से बैठ गया, कधा जगले के साथ टिका दिया और नाक जगले में बने हुए लोहे के गुलाब पर रख दी। मूग्रोक ने सन्तरी को सोते देखकर लालटेन उठाई और पजो के वल बहुत सावधानी से बाड को लाघ गई। सन्तरी खर्राटे ले रहा था। नीद मे उसे ऐसे लगा मानो चिडियाघर मे शेर दहाड रहे हो। किन्तु वास्तव में गहरा सन्नाटा था। जानवर सो रहे ये लालटेन की रोशनी तो वहुत ही थोडे फासले तक पड़ रही थी। सूत्रोक धीरे-धीरे वढती जा रही थी, अधेरे में इधर-उधर देखती हुई। ख शकिस्मती ही कहिये कि रात एकदम अन्धेरी नही थी। झिलमिलाते सितारे और इस जगह से कुछ दूर, वृक्षो की चोटियो और छतो पर से पडती हुई पार्क के लम्पो की रोशनी इसको कालिमा को कुछ कम कर रही थी। लडकी वाड लाकर एक तग-सी वीथी पर चल दी, सफेद फूलो से ढकी छाटी- छोटी झाडियो के बीच से। कुछ देर बाद उसे जानवरो की गध मिली। वह फौरन इसे पहचान गई। बात यह है कि एक बार शेरो को सधानेवाला एक व्यक्ति अपने तीन शेरो और एक ग्रेट डेन कुत्ते के साथ उनके सरकस-दल मे प्रा मिला था। सूत्रोक खुले मैदान में जा पहुची। उसे अपने इर्दगिर्द काली-काली परछाइया-सी नजर आई मानो छोटे-छोटे घर खडे हो। "ये रहे पिजरे,' मूग्रोक फुसफुसाई। उसका दिल जोर से धडक रहा था। उसे जानवरो से डर लगता हो ऐसी बात नही। बात यह है कि सरकस में काम करनेवाले लोग तो यो भी बुजदिल नहीं होते। उसे चिन्ता थी तो केवल इस बात की कि उसके पैरो की ग्राहट और लालटेन की रोशनी से कोई जानवर न जाग उठे और शोर मचाकर सन्तरी को न जगा दे। वह पिजरो के निकट गई। "प्रोस्पेरो कहा है। सूत्रोक चिन्तित हो रही थी। १२३ वह लालटेन ऊपर उठाकर पिजरों को देख रही थी। कही भी कोई चीज़ हिल-डुल त रही थी, नीरवता छाई थी। लालटेन की रोशनी पिंजरों की सलाखों से विभाजित होकर असमान हिस्सो मे पिजरी में प्रवेश करती हुई जानवरों पर पड़ रही थी। उसे झवरीले मोटे कान नजर आये, फिर कोई फैला हुआ पंजा और फिर कोई धारीदार पीठ दिखाई दी... उकाव पंप फैलाकर सो रहे थे, प्राचीन मुकुटों जैसे लग रहे थे। कुछ पिजरो के अन्दर अजीव-सी काली प्राकृतियां नजर आ रही थी। पतली रुपहली सलाखो वाले पिंजरों में ऊंची-नीची शाखाओं पर तोते बैठे थे। जब सूत्रोक इस पिजरे के करीव खड़ी हुई , तो उसे लगा कि सलाख के विल्कुल करीव बैठे हुए बूढे और लम्बी लाल दाढ़ी वाले तोते ने एक प्राख खोलकर उसकी ओर देखा। उसकी आंख नीबू के बीज के समान थी। इतना ही नही , उसने झटपट वह प्रांख वन्द कर ली और ऐसे जाहिर किया मानो सो रहा हो । फिर सूत्रोक को ऐसे प्रतीत हुआ मानो वह अपनी लाल दाढ़ी में मुस्कराया भी। " में तो निरी वुद्ध हूं," सूमोक ने अपने को दिलासा दिया। मगर उसे डर महसूस हुआ। वास्तव में ही उस ख़ामोशी में कोई चीज़ हिलती-डुलती, सरसराती और हल्की-सी चरमर की आवाज़ करती... कभी रात को अस्तबल या मुर्गीखाने मे जाइये। वहा की खामोशी अापको आश्चर्यचकित कर देगी। मगर साथ ही वहा आपको अनेक हल्की-हल्की आवाजें सुनाई देगी - पख की फड़फड़ाहट , घुरघुराहट , तख्ते की चरमर और कोई बारीक-सी आवाज जो मानो किसी सोई हुई मुर्गी के कंठ से निकल गई हो। 'कहा होगा प्रोस्पेरो?" मूग्रोक ने फिर से सोचा। मगर इस बार वह बहुत चिन्तित थी। 'अगर आज उसे दण्ड दिया जा चुका और उसके पिजरे में उकाव विठा दिया गया होगा, तब?" इसी समय किसी की फटी-सी अावाज सुनाई दी- - “ " सूत्रोक ! इसी समय उसे किसी की भारी और तेजी से चलती हुई सास और कुछ ऐसी आवाजें सुनाई दी मानो कोई बड़ा-सा बीमार कुत्ता कराह रहा हो । 'प्रोह ! " सूोक चौक उठी। उसने उस तरफ लालटेन को जिधर से आवाज़ आई थी। वहा दो लाल-लाल चिंगारिया जल रही थी। पिजरे में भालू के समान कोई बड़ी-सी काली आकृति खड़ी थी, सलाखों को थामे हुए, उन पर अपना सिर टिकाये हुए। १२४ "प्रोस्पेरो।" सूत्रोक ने धीरे से कहा। इसी क्षण उसके दिमाग म ढेरा ख्याल कोध गये- "वह ऐसा भयानक क्या है? उसके तन पर भालू की तरह बडे बडे वाल उगे हुए हैं। उसकी ग्राखा म लाल लाल चिगारिया है। उसके नाखून लम्बे और खमदार है। वह नग धडग है। यह आदमी नही, वनमानस है सूत्रोक रुपासी हो गई। 'अाखिर तुम आ गई, सूत्रोक ,' इस अजीव से जन्तु ने कहा। मुझे यकीन था कि मै तुम्ह देख पाऊगा। 'नमस्ते। मैं तुम्ह आजाद करान पाई हू,' सूत्रोक ने कापती हुई आवाज़ में धीरे " से कहा। . 'मै पिजरे से नहीं निकलूगा। मेरी आखिरी घडी आ पहुची है। फिर से भारी भरकम और खरखरी सी आवाज सुनाई दी। यह जन्तु गिर पडा, फिर से उठा और उसने अपना माथा सलाखो के साथ सटा दिया। "मेरे करीव आरो, सूअोक । सूग्रोक करीव गई। वडा भयानक सा चेहरा उसकी ओर देख रहा था। निश्चय ही यह किसी इन्सान का चेहरा नहीं था। वह तो भेडिये की थूथनी जैसा लगता था। सबसे भयानक बात तो यह थी कि इस भेडिये के कानो की बनावट इन्सान के काना जैसी थी यद्यपि वे छोटे छोटे सख्त वालो से ढके हुए थे। सूत्रोक का मन हुआ कि अपना मुह ढाप ले। लालटेन उसके हाथो मे हिल डुल रही थी। इसके फलस्वरूप हवा मे प्रकाश के पीले पीले धब्बे चमक उठते थे। 'तुम्हे मुझसे डर लगता है सूग्रोक। मै तो अब इन्सान जैसा नहीं लगता हू । डरो नहीं। मेरे नज़दीक प्रायो तुम कितनी बड़ी हो गई हो। तुम बडी दुबली पतली हो । तुम्हारा चेहरा बडा उदास है वह वडी मुश्किल से ही वोल पा रहा था। वह नीचे ही नीचे धसकता जा रहा था और आखिर अपने पिजरे के लकड़ी के फर्श पर लेट गया। वह वडी तेजी से सास ले रहा था, उसका मुह खुला हुआ था और लम्बे लम्वे पीले दातो की दो कतारे दिखाई दे रही थी। 'मेरो आखिरी घडी करीब आ गई है। मगर मैं जानता था कि मरने से पहल तुम्ह एक बार फिर देखूगा।" । १२५ " उसने वालो से भरी हुई वन्दर जैसी वाह फैलाकर कुछ टटोलना शुरू किया। वह अधेरे में कुछ ढूढ़ लेना चाहता था। तख्ते में से एक कील निकालने की आवाज़ हुई और नव वह भयानक वाह सलाखों के बीच से बाहर आई। इस जन्तु ने एक छोटी-सी तख्ती आगे की ओर बढ़ाते हुए कहा 'इसे ले लो। इस से सब कुछ तुम्हारी समझ मे आ जायेगा। सूरोक ने तख्ती अपनी जेब मे छिपा ली। "प्रोस्पेरो!" वह धीरे से फुसफुसाई। मगर कोई उत्तर नहीं मिला। मूग्रोक लालटेन करीव ले गई। जन्तु का मुह अव हमेशा के लिए खुला रह गया था। उमको ज्योतिहीन पाखें सूग्रोक को ताक रही थी। "प्रोस्पेरो!" सूग्रोक हाथ से लालटेन नीचे गिर गई। "वह मर गया! यह मर गया ! प्रोस्पेरो!" नालटेन बुझ गई।
चौथा भाग हथियारसाज़ प्रोस्पेरो
No text on this page.
ग्यारहया अध्याय चिडि . ... मिठाईघर का बुरा हाल हो गया -डियाघर के जानवरो ने खूब शोर मचा दिया। इससे उस सन्तरी की नीद टूट गई जिस से फाटक पर हमारा परिचय हो चुका है और जिसकी लालटेन सूत्रोक उठा ले गई थी। जानवर चीख-चिघाड रहे थे, दहाड और गुर्रा रहे थे, पिजरे की सलाखो पर जोर- जोर से अपनी दुमे मार रहे थे, पक्षी पख फडफडा रहे थे सन्तरी ने अपने जबडे वजाते हुए जमुहाई ली, जगले पर मुट्ठिया जमाकर अगडाई ली और आखिर होश मे पाया। तब वह एकदम चौककर खडा हुअा। लालटेन गायब थी। सितारे धीमे धीमे झिलमिला रहे थे। चमेली की प्यारी-प्यारी खुशबू फैली हुई थी। “बेडा गर्क 1" सन्तरी ने गुस्से से थूका। उसके थूक ने गोली का सा काम किया और चमेली के एक फूल को डाल से नीचे गिरा दिया। जानवरो का सहगान अधिकाधिक ऊचा होता गया। सन्तरी ने खतरे का सकेत दिया। घडी भर बाद लोग मशालें लिए उसकी ओर दौडते हुए आये । सन्तरी गालिया वक रहे थे। मशालें चट-चट की आवाज़ कर रही थी। कोई सन्तरी अपनी तलवार से अटककर गिर पड़ा और किसी दूसरे सन्तरी की एडी से टकराकर उसने अपनी नाक घायल कर ली। "कोई मेरी लालटेन चुरा ले गया।" "कोई चिडियाघर मे घुस आया है।" 'चोर" 'विद्रोही 91492 १२६ टूटी नाक और टूटी एड़ीवाला सन्तरी तथा अन्य सन्तरी भी अंधेरे में मशालें लहराते हुए अनजाने शत्रु की खोज करने चल दिये। मगर उन्हें चिड़ियाघर में सन्देह पैदा करनेवाली कोई चीज़ नज़र न आई। शेर अपने दुर्गन्धवाले मुंहों को खूब खोल-खोल कर दहाड़ रहे थे। ववर बेचैनी से अपने पिंजरों में इधर-उधर चक्कर काट रहे थे। तोते टी-टीं और टांय-टॉय कर रहे थे। वे पंख फड़फड़ाते हुए इधर-उधर फुदक रहे थे और इस तरह उनका पिंजरा एक शानदार रंग-विरगा हिंडोला-सा लग रहा था। वन्दर अपने झूलों पर झूल रहे थे। भालू भारी-भरकम आवाज़ में गुर्र-गुर्र कर रहे थे। रोशनी और हो-हल्ले से जानवर और भी परेशान हो उठे। सन्तरियों ने हर पिंजरे को बहुत ध्यान से देखा। उन्हें कहीं भी कोई गड़बड़ दिखाई न दी। उन्हें तो वह लालटेन भी नहीं मिली जो सूत्रोक ने गिरा दी थी। मगर अचानक घायल नाकवाले सन्तरी ने कहा- "वह क्या है ? " इतना कहकर उसने अपनी मशाल ऊंची की। सभी की नजरें ऊपर को उठ गईं। वृक्ष की हरी-भरी चोटी आकाश की छाया में काली-सी लग रही थी। पत्ते गतिहीन थे। वहुत ही शान्त रात थी। " देख रहे हो न?" सन्तरी ने ऊंची आवाज़ में पूछा। उसने अपनी मशाल हिलाई। "हा। वहां कुछ गुलाबी-सा है...' "कुछ छोटा-सा..." "वहां बैठा हुआ है...' "अरे उल्लुओ! इतना भी नहीं जानते कि यह क्या है ? यह तो तोता है । यह पिंजरे से उड़कर यहा आ बैठा है। ओह, इसे शैतान ले जाये!" वह सन्तरी जो ड्यूटी पर था और जिसने खतरे का सकेत दिया था झेंप-सी अनुभव करता हुमा चुप खड़ा था। "इसे नीचे उतारना चाहिए। इसी ने सभी जानवरों को परेशान कर डाला है।" "तुम ठीक कहते हो। वूर्म, चत्तो, चढ़ो वृक्ष पर। तुम्हीं सबसे छोटे हो।" वूर्म वृक्ष के करीव गया। वह झिझक महसूस कर रहा था। ऊपर जामो और उसे दाढ़ी से पकड़कर नीचे घसीट लामो। तोता बड़े इत्मीनान से बैठा हुआ था। घने हरे पत्तों में उसके पंख मशाल की रोशनी में पूब मुलावी नजर आ रहे थे। । - " । धर्म ने अपना टोप माथे पर झुका लिया और अपनी गुद्दी खुजलाने लगा। "मुझे डर लगता है... तोते ऐसे जोर से काटते है कि नानी याद आ जाती है।" उल्लू न हो तो!" आखिर वूमं वृक्ष पर चढ चला। मगर आधी ऊचाई तक जाकर रुका, कुछ क्षण तक ठहरा रहा और फिर नीचे उतर पाया। "मैं किसी भी हालत में यह करने को तैयार नही हू" उसने कहा ! "यह मेरा काम नहीं है। मुझे तोतो से लडना नही पाता।" इसी समय किसी की वुढाई-सी गुस्से से भरी आवाज सुनाई दी। कोई व्यक्ति चप्पल फटपटाता हुआ अधेरे मे से सन्तरियों की ओर भागा पा रहा था। "इसे मत छेडियेगा ! " वह चिल्लाया। 'इसे परेशान नही कीजियेगा।" यह व्यक्ति था चिडियाघर का मुख्य कर्मचारी। वह बडा विद्वान और अच्छा प्राणिविज्ञ था, अर्थात् जानवरो वारे मे वह सभी कुछ जानता था जो जानना सम्भव है। वह शोर सुनकर जाग उठा था। यह मुख्य कर्मचारी चिडियाघर में ही रहता था। वह विस्तर से उठा और ऐसे हडबडाकर भागा हुआ पाया कि रात की टोपी भी उतारना भूल गया, इतना ही नही, उसने अपनी नाक पर से चमकता हुआ बडा खटमल भी नहीं उतारा। वह बहुत नाराज़ था। ऐसा स्वाभाविक ही था- कुछ फौजियो ने आकर उसकी दुनिया मे दखल देने की जुर्रत की थी और अब कोई बुद्ध, उसके तोते को दाढ़ी से पकडकर नीचे घसीटना चाहता था! सन्तरियो ने उसे जाने का रास्ता दे दिया। प्राणिविज्ञ ने अपना सिर पीछे की ओर कर ऊपर देखा। उसे भी पत्तो के बीच कुछ गुलावी-सा नजर आया। "हा," उसने कहा, "यह तोता ही है। यह मेरा सबसे अच्छा तोता है। वह वडा मनमौजी है। पिजरे मे टिककर तो वैठता ही नही। यह मेरा लौरा है... लौरा ! लोरा!" वह उसे वारीक-सी आवाज़ में बुलाने लगा। "इसे यही पसन्द है कि प्यार- दुलार से बुलाया जाये। लौरा, लौरा । लौरा!" सन्तरियो ने मुह बन्द कर अपनी हसी का फव्वारा रोका। यह नाटा-सा बूढा फूलदार छापेवाला गाउन और चप्पल पहने था, पीछे की ओर सिर किये था तथा उसकी रात की टोपी का फुदना जमीन घूम रहा था। वह लम्बे-तडगे सन्तरियो, जलती मशालो और चीखते- चिघाडते जानवरो के बीच बडा अजीव-सा प्रतीत हो रहा था। . .
- मगर सबसे दिलचस्प बात तो कुछ क्षण बाद हुई। प्राणिविज्ञ वृक्ष पर चढ़ने लगा। बहुत फुर्ती दिखाई उसने इस काम में । जाहिर था कि उसे इसका ख़ासा अभ्यास था। एक, दो, तोन! उसके गाउन के नीचे से उसका धारीदार पाजामा कुछ बार दिखाई दिया और यह प्रतिष्ठित बुर्जुग ऊपर चढ़ता चला गया। आखिर उसका छोटा-सा, मगर ख़तरनाक रास्ता तय हुग्रा। 'लौरा!" उसने प्यार से और मुंह मे मिसरी घोलते हुए फिर से कहा। अचानक उसकी चीख गूज उठी। वह चिड़ियाघर से बाहर पार्क और आसपास कम से कम एक किलोमीटर के फ़ासले तक सुनाई दी। "शैतान!" वह चिल्लाया। सम्भवतः वृक्ष पर तोता नहीं, कोई राक्षस बैठा था। सन्तरी एकदम वृक्ष से पीछे हट गये। प्राणिविज्ञ तेजी से नीचे की ओर लुढ़क चला। ख शकिस्मती ही कहिये कि एक छोटे-से , मगर मजबूत तने ने उसे नीचे गिरने से वचा लिया। वह वही लटककर रह गया। काश! अन्य वैज्ञानिक अब अपने सम्मानित भाई को इस हाल में देख पाते ! निश्चय ही वे उसके बुढ़ापे और उसके ज्ञान का सम्मान करते हुए जान-बूझकर दूसरी ओर मुंह फेर लेते! तने से लटकता हुआ उसका गाउन बहुत ही अटपटा लग रहा था। सन्तरी सिर पर पैर रखकर भागे जा रहे थे। उनकी मशालों की लपटें हवा में लहरा रही थी। अन्धेरे में ऐसा प्रतीत होता था मानो दहकते हुए अयालों वाले काले घोड़े भागे जा रहे हों। चिड़ियाघर में शोर कम हो गया। प्राणिविज्ञ लटका हुआ था, न हिलता था, डुलता था। मगर उधर महल में शोर मचा हुआ था। वृक्ष पर रहस्यपूर्ण तोते के नमूदार होने के कोई पन्द्रह मिनट पहले तीन मोटों को बहुत ही दुरी खबर मिली थी। 'शहर में भारी गड़बड़ है। मजदूर बन्दूकें और पिस्तौलें लिए हुए है। वे सैनिकों को गोलियों का निशाना बना रहे हैं और सभी मोटों को नदी में फेंक रहे है। 'नट तिबुल आजाद है। वह इर्द-गिर्द के लोगों को जमाकर अपनी सेना तैयार कर रहा है। "बहुत-से सैनिक मजदूरों के मुहल्लों में चले गये हैं। वे तीन मोटों की नौकरी नहीं बजाना चाहते। कारयानों की चिमनियों से धुनां नहीं निकल रहा। सभी मशीनें ठप पड़ी हैं। पनिक पानों में जाकर धनियों के लिए कोयला निकालने से इन्कार कर रहे हैं।" . १३२ - है 'किसान ज़मीदारो से जूझ रहे है। मन्त्रियो ने तीन मोटो को उक्त समाचार दिये थे। सदा की भाति इस बार भी तीन मोटे सोच सोचकर मोटे होने लगे। देखते ही देखते उन मे से प्रत्येक का प्राध पाव वजन बढ़ गया। 'मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता एक मोटे ने कहा। "मै और बर्दाश्त नही कर सकता यह मेरी सहनशक्ति से बाहर अोह, पोह। मेरा गला घुटा जा रहा है इसी क्षण उसका बर्फ जैसा सफेद कालर चटक की आवाज करता हुआ ख ल गया। "मैं मोटा होता जा रहा दूसरा मोटा चिल्लाने लगा। 'मुझे वचाइये" तीसरे मोटे ने क्षुब्ध होते हुए अपने पेट पर नज़र डाली। इस तरह राज्यीय परिपद् के सामने दो सवाल उठ खडे हुए - पहला ता यह कि किसी भी तरह मोटो की चर्वी को वढने से रोकना और दूसरे- नगर मे हो रही हलचल को शान्त करना। पहले सवाल के बारे मे उन्होने तय किया- - । "नाच नाच। हा, नाच ही। यह सबसे अच्छा व्यायाम है। "घडी भर की भी देर न होने जाये और फौरन नृत्य-शिक्षक को बुलवाया जाये। वह तीनो मोटो को बैले नाच की शिक्षा दे।" "हा, यह सही है," पहले मोटे ने कहना शुरू किया, मगर "शहर में भारी गड़बड़ है। मजदूर वन्दूकें और पिस्तौलें लिए हुए है। वे सैनिकों को मगर सबसे दिलचस्प बात तो कुछ क्षण वाद हुई। प्राणिविज्ञ वृक्ष पर चढ़ने लगा। बहुत फुर्ती दिखाई उसने इस काम में । जाहिर था कि उसे इसका खासा अभ्यास था। एक, दो, तीन ! उसके गाउन के नीचे से उसका धारीदार पाजामा कुछ वार दिखाई दिया और यह प्रतिष्ठित बुर्जुग ऊपर चढ़ता चला गया। प्रापिर उसका छोटा-सा, मगर ख़तरनाक रास्ता तय हुमा। 'लौरा !" उसने प्यार से और मुह में मिसरी घोलते हुए फिर से कहा। अचानक उसकी चीख गूज उठी। वह चिड़ियाघर से बाहर पार्क और आसपास कम से कम एक किलोमीटर के फ़ासले तक सुनाई दी। 'शैतान !" वह चिल्लाया। सम्भवतः वृक्ष पर तोता नहीं, कोई राक्षस बैठा था। सन्तरी एकदम वृक्ष से पीछे हट गये। प्राणिविज्ञ तेजी से नीचे की ओर लुढ़क चला। खुशकिस्मती ही कहिये कि एक छोटे-से, मगर मजबूत तने ने उसे नीचे गिरने से बचा लिया। वह वही लटककर रह गया। अन्य वैज्ञानिक अब अपने सम्मानित भाई को इस हाल में देख पाते ! निश्चय ही वे उसके बुढ़ापे और उसके ज्ञान का सम्मान करते हुए जान-बूझकर दूसरी ओर मुह फेर लेते ! तने से लटकता हुआ उसका गाउन बहुत ही अटपटा लग रहा था। सन्तरी सिर पर पैर रखकर भागे जा रहे थे। उनकी मशालों की लपटें हवा में लहरा रही थी। अन्धेरे में ऐसा प्रतीत होता था मानो दहकते हुए प्रयालों वाले काले घोड़े भागे जा रहे हों। चिड़ियाघर में शोर कम हो गया। प्राणिविज्ञ लटका हुआ था। डुलता था। मगर उधर महल में शोर मचा हुआ था। वृक्ष पर रहस्यपूर्ण तोते के नमूदार होने के कोई पन्द्रह मिनट पहले तीन मोटों को बहुत ही बुरी खबर मिली थी। काश! न न हिलता था, " गोलियों का निशाना बना रहे हैं और सभी मोटों को नदी में फेंक रहे हैं। 'नट तिवुल आजाद है। वह इर्द-गिर्द के लोगों को जमाकर अपनी सेना तैयार कर बहुत-से सैनिक मजदूरों के मुहल्लों में चले गये हैं। वे तीन मोटों की नौकरी नहीं वजाना चाहते। "कारखानों की चिमनियों पनिक खानों में जाकर नियों के लिए कोयला निकालने से इन्कार कर रहे हैं।" धुआं नहीं निकल रहा। सभी मशीनें ठप पड़ी है। १३२ "किसान जमीदारो से जूझ " सकता, है " मन्त्रियो ने तीन मोटो को उक्त समाचार दिये थे। सदा की भाति इस बार भी तीन मोटे सोच सोचकर मोटे होने लगे। देखते ही देखते उन मे से प्रत्येक का प्राध पाव वजन बढ गया। "मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर एक मोटे ने कहा। "मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकता यह मेरी सहनशक्ति से बाहर मोह, मोह। मेरा गला घुटा जा रहा है इसी क्षण उसका वर्फ जैसा सफेद कालर चटक की आवाज करता हुआ खुल गया। "मैं मोटा होता जा रहा दूसरा मोटा चिल्लाने लगा। 'मुझे बचाइये।" तीसरे मोटे ने क्षुब्ध होते हुए अपने पेट पर नजर डाली। इस तरह राज्यीय परिषद् के सामने दो सवाल उठ खडे हुए - पहला तो यह कि किसी भी तरह मोटो की चर्बी को बढने से रोकना और दूसरे- नगर मे हो रही हलचल को शान्त करना। पहले सवाल के बारे में उन्हाने तय किया- " नाच | " "नाच नाच । हा, नाच ही। यह सबसे अच्छा व्यायाम है। "घडी भर को भी देर न होने दी जाये और फौरन नृत्य शिक्षक को बुलवाया जाये । वह तीनो मोटो को वैले नाच की शिक्षा दे। 'हा, यह सही है," पहले मोटे ने कहना शुरू किया, मगर " - -- ठीक इसी समय चिड़ियाघर से प्राणिविज्ञ की चीख सुनाई दी जिसे वृक्ष पर अपने प्यारे तोते लौरा की जगह शैतान दिखाई दिया था। पार्क में इधर-उधर दौड़ते हुए लोग बुरी तरह हांफ रहे थे। सबसे खूबसूरत काली और नारंगी रंग की तितलियों के तीस जोड़े डरकर पार्क से उड़ गये। . ॥ " मशालों का सागर-सा लहराने लगा। सारा पार्क धुएं की गन्ध में डूवा और दहकता हुआ ऐसा जंगल बन गया जो अन्धेरे में भागा चला जा रहा हो। जब चिड़ियाघर के फाटक से कोई दस क़दम का फासला रह गया, तो उस ओर को भागे जाते सभी लोग अचानक ही रुक गये, मानो किसी ने उनके पैर काट डाले हों। वे सभी मुड़े और चीखते-चिल्लाते , एक दूसरे के ऊपर गिरते-पड़ते , दायें-बायें मुड़ते , पीछे की ओर भाग चले। वे सभी अपने को वचाने के फेर में पड़े थे। मशालें जमीन पर पड़ी थी, उन से लपटें निकल रही थी और काले-काले धुएं के बादल छा गये थे। 'ओह !" ग्राह “बचाइये!" लोगों की चीख-पुकार से पार्क में हंगामा मचा हुआ था। हवा में ऊंची उठती हुई चिंगारियां इधर-उधर भागते और परेशानहाल लोगों पर लाल-लाल रोशनी डाल रही थी। चिड़ियाघर की ओर से शान्त , दृढ़ और बड़े-बड़े कदम बढ़ाता हुआ एक हट्टा-कट्टा व्यक्ति चला पा रहा था। इस रोशनी में लाल बालों और चमकती हुई पाखों वाला यह व्यक्ति फटी-सी जाकेट पहने भयानक छाया की तरह पा रहा था। वह एक हाथ से चीते के गले में पड़ा हुआ वह पट्टा थामे था जो जंजीर के टुकड़े से बनाया गया था। पीले रंग का यह पतला-सा दरिन्दा भयानक पट्टे से निजात पाने के लिए वेकरार था। वह उछल-कूद रहा था, गुर्राता था और किसी सूरमा के झडे पर बवर की भाति अपनी लम्बी लाल जवान कभी बाहर निकालता तो कभी अन्दर कर लेता। भागते हुए लोगों में से कुछ ने पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत की तो उन्होंने देखा कि वह व्यक्ति अपने दूसरे हाथ में एक लड़की को उठाये हुए है जो चमकता हुआ गुलावी फ़ॉक पहने है। लड़की सहमी-सहमी सी गुस्से से गुर्राते हुए चीते को देख रही थी, सुनहरे गुलावों वाले सैडलो को परो से चिपकाये थी और अपने दोस्त के कंधे से सटी जा रही थी। 'प्रोसेरो!" भागते हुए लोग चिल्लाये। १३४ "प्रोस्पेरो! यह तो प्रोस्पेरो है!" 'वचाइये!" 'गुडिया!" "गुडिया!" अव प्रोस्पेरो ने दरिन्दे को छोड़ दिया। चीता पूछ हिलाता और बडी-वडी छलागे मारता भागते हुए लोगो के पीछे दौड चला। सूत्रोक हथियारसाज के कधे से नीचे उतर गई। दौडते हुए लोग घास पर बहुत-सी पिस्तौलें गिरा गये थे। सूत्रोक ने तीन पिस्तौलें उठा ली। उसने दो पिस्तौलें प्रोस्पेरो को दे दी और एक खुद ले ली। पिस्तौल उसके कद की आधी लम्वाई के बरावर थी। मगर वह उस काली और चमकती हुई चीज़ का इस्तेमाल करना जानती थी। उसे सरकस मे पिस्तौल से निशाना लगाना सिखाया गया था। "आओ चलें।" हथियारसाज ने आदेश दिया। पार्क के अन्दर क्या हो रहा था, इस बात मे उन्हे कोई दिलचस्पी नहीं थी। उन्होने इस वात की ओर भी ध्यान नही दिया कि चीता वहा क्या गुल खिला रहा था। उन्हे तो महल मे से निकलने का मार्ग ढूढना था। उन्हे तो यहा से वच निकलना था। वह वाछित देग कहा है जिसकी तिवुल ने चर्चा की थी? वह रहस्यपूर्ण देग कहा है जिसके द्वारा गुब्बारे वेचनेवाला बच निकला था " रसोईघर की पोर! रसोईघर की ओर ।" रास्ते मे अपनी पिस्तौल हिलाते हुए सूत्रोक चिल्लाई। वे विल्कुल अधेरे में झाडियो के बीच से भागे जा रहे थे, सोये हुए पक्षियो को जगाते हुए। प्रोह , सूत्रोक के वढिया फ्रॉक की अव कैसी दुर्गति हो गयी थी। 'किसी मीठी-मीठी चीज़ की गन्ध आ रही है," जगमगाती हुई खिडकियो के नीचे रुकते हुए सूप्रोक ने कहा। दूसरो का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए लोग आम तौर पर उगली उठाते है । मगर सूत्रोक ने इस समय उगली की जगह पिस्तौल ऊपर उठाई। सन्तरी इनके पीछे भागे आ रहे थे। मगर ये दोनो वृक्ष की चोटी पर जा चढे थे। वे पलक झपकते मे खिडकियो को छूती डालो के सहारे मुख्य खिडकी मे जा पहुचे थे। यह वही खिडकी थी जिसमे से एक दिन पहले गुब्बारे वेचनेवाला भीतर जा पहुचा था। यह मिठाईघर की खिडकी थी। वेशक रात काफी जा चुकी थी और खतरे का सकेत दिया जा चुका था, फिर भी यहा खूब जोर-शोर से काम हो रहा था। सभी हलवाई और सफेद टोप पहने उनके सहायक - १३५ चुस्त छोकरे इधर-उधर दौड़-धूप कर रहे थे। वे उत्तराधिकारी छुट्टी की गुड़िया के लौटने की खुशी में अगले दिन के खाने के लिए फलों की एक विशेष जैली तैयार कर रहे थे। इस बार उन्होने केक न तैयार करने का फैसला किया था। इस बात का भला कैसे यकीन हो सकता था कि फिर कोई उड़ता हुअा मेहमान कही आ धमकेगा और फ्रांसीसी क्रीम तथा अद्भुत मुरब्बों का सत्यानाश नही कर डालेगा। मिठाईघर के बीचोंबीच एक बड़े-से टब में पानी उबल रहा था। सभी ओर सफेद भाप का बादल-सा छाया हुआ था। इसी बादल की छाया में रसोइये-छोकरे मौज मना रहे थे-जैली के लिए फल काट रहे थे। हां तो... पर तभी भाप के बादल और मौज-मेले में से हलवाइयों ने एक भयानक दृश्य देखा। " . खिड़की के बाहर शाखायें ज़ोर से हिली, पत्ते ऐसे ही सरसराये जैसे कि तूफ़ान आने के पहले और फिर खिड़की के दासे पर दो व्यक्ति नजर आये - लाल बालों वाला देव और एक वालिका। "हाय उठाओ!" प्रोस्पेरो ने कहा। उसके दोनों हाथों में पिस्तौलें थी। 'खबरदार, कोई भी अपनी जगह से न हिले!" अपनी पिस्तौल ऊपर करते हुए सूत्रोक ने ऊंची आवाज़ में कहा। प्रोस्पेरो और सूग्रोक को अपना आदेश दोहराने की आवश्यकता नहीं हुई। दो दर्जन सफ़ेद आस्तीने ऊपर को उठ गई। इसके बाद पतीले इधर-उधर फेके जाने लगे। चमकते हुए शीशे और तावे , प्यारी-प्यारी और मीठी-मीठी गन्धवाली मिठाईघर की दुनिया का अव अन्त हो गया था। हथियारसाज बड़े देग की तलाश कर रहा था। सिर्फ उसी के मिलने पर खुद उसकी और उसकी नन्ही-सी मित्र की जान बच सकती थी जिसने उसे बचाया था। उन्होने बर्तनों को उलट-पलट दिया, कड़ाहियों, चोगियों, तश्तरियों और प्लेटों को इधर-उधर फेंक दिया। शीशे छनछनाते हुए फर्श पर गिर रहे ये ; प्राटा सफ़ेद बादल बनकर उड़ रहा था-सहारा रेगिस्तान की रेतीली प्राधियों की भांति; सभी ओर वादाम, किशमिश और चेरियों का तूफ़ान वरपा था; ऊचे ताक़ों से शकर जल-प्रपातों नीचे गिर रही थी; फ़र्श पर फैला हुआ मोठा शर्बत टखनों को छू रहा था; पानी छपछपाता था, फल इधर-उधर उछल रहे थे, तावे के ढेरों वर्तन इधर-उधर लुढ़क रहे थे... सभी कुछ उपल-पुथल हो गया था। कभी-कभी सपने में ऐसा होता है और चूकि यह मालूम हो कि यह सपना ही है तो पादमी मनमानी कर सकता है। समान ..
No text on this page.
No text on this page.
- कोशिश की। दो और सन्तरियो ने मदद की। उन्होने ज़ोर लगाया और मरे हुए चीते 'वह जिन्दा है। वह जिन्दा है। मैंने उसे बचा दिया। मैंने जनता के मित्र की "मिल गया!" सूत्रोक चिल्लाई। " यह रहा जिस चीज़ की उन्हे तलाश थी, वह मिल गई थी। देग का ढ - फूटो बीजा के ढेर में जा मिला था। वह चिपचिपे लाल, हरे और पीने शर्वल भगि । प्रोस्पेरो को तलहीन देग दिखाई दिया। 'जल्दी करो।" सूत्रोक चिल्लाई। "तुम चलो, मैं तुम्हार पाउ गात हू । हथियारसाज देग मे उतर गया। जब वह उसके भीतर जाकर गायब हो गया ता -उसे मिठाईघर के लोगो का शोर सुनाई दिया। सूत्रोक देग मे उतर न पायी। चीता पार्क और महल में प्रातः फैतान के बाद महा आ पहुचा था। सन्तरियो की गोलियो ने उसे जहा-जहा से घायल कर दिया था, हा-वहा उसके तन पर खून के लाल धब्बे लगे हुए थे। हलवाई एक कोने में सिमट गये। सूत्रोक को अपनी पिस्तौल का ध्यान न रहा और सने चीते पर एक नाशपाती फेंकी। चौता सिर के बल प्रोस्पेरो के पीछे देग मे कूदा। वह अधेरी और तग सुरग म सके पीछे-पीछे लुढकता गया। उसकी पीली पूछ देग से बाहर हिलती-डुलती नज़र प्रा ही थी। फिर वह भी गायव हो गई। सूत्रोक ने हाथो से आखें ढाप ली। "प्रोस्पेरो। प्रोस्पेरो!" वह चीख उठी। हलवाइयो के पेट मे हसी के मारे बल पडे जा रहे थे। इसी समय सन्तरी मिठाईघर या पहुचे। उनकी वर्दिया तार-तार थी, उनके चेहरो पर खून नजर आ रहा था और की पिस्तौलो से धुआ निकल रहा था - वे चीते से जूझते रहे थे। 'प्रोस्पेरो तो अव जिन्दा नहीं बचेगा। चीता उसके टुकडे-टुकडे कर डालेगा। लिए सव वरावर है। तुम लोग मुझे गिरफ्तार कर सकते हो।" मूग्रोक ने वडे इत्मीनान से अपनी बात कही। वडी-सी पिस्तौल थामे उसका छोटा-सा उसकी बगल में लटक रहा था। तभी गोली दगी। प्रोस्पेरों ने सुरग मे चीते पर गोली चलाई थी। सन्तरी देग के इर्दगिर्द जमा थे। शरवत की झील उनके घुटना को छू रही थी। एक सन्तरी ने देग मे झाका। फिर उसने हाथ अन्दर डालकर कुछ बाहर खीचने जो चोगे मे फसा हुआ था, पूछ से पकडकर बाहर खोचा। वह मर चुका है," एक सन्तरी ने माथे का पसीना पोछते हुए कहा। प्रव । वचा दी है। " १३७ 16 . ऐसे खुश हो रही थी सूत्रोक, वैचारी छोटी सूत्रोक, जिसका फ्रॉक फटा हुआ था और जिसके संडलों और वालों में लगे हुए सुनहरे गुलाबों का बुरा हाल हो गया था। खुशी के मारे उसके चेहरे पर सुर्जी आ गई थी। उसने अपने मित्र नट तिबुल द्वारा सौंपा गया कार्यभार पूरा कर दिया था- उसने हथियारसाज प्रोस्पेरो को आजाद करा दिया था। "हा, तो अब हम भी देखेंगे," सूत्रोक को हाथ से पकड़ते हुए एक सन्तरी ने कहा, 'अव हम भी देखेंगे कि तुम्हारा क्या होता है, मशहूर गुड़िया ! देखेंगे...' 'इसे तीन मोटों के पास ले चलो. "वे तुम्हें मौत की सजा दे देंगे। " उल्लू, " अपने फ्रॉक की गुलावी लैस से शरवत का धब्वा चाटते हुए सूत्रोक ने इत्मीनान से कहा। यह धब्बा उसके फ्रॉक पर तब लगा था जव प्रोस्पेरो ने मिठाईघर में तोड़-फोड़ की थी। " " बारहवां अध्याय नृत्य-शिक्षक एक-दो-तीन सओक अव गुड़िया नही रही थी। उसका क्या हुआ , फिलहाल हम इसके बारे में कुछ नहीं जानते। इसके अलावा हम अभी यह भी स्पष्ट नहीं करेंगे कि वृक्ष पर किस किस्म का तोता बैठा था; बूढ़ा प्राणिविज्ञ जो शायद अभी तक रस्सी पर सूखने के लिए डाली गई कमीज़ की भाति लटका हुआ था, इतना अधिक क्यों डर गया था; हथियारसाज प्रोस्पेरो कैसे पिंजरे से निकल भागा, चीता कहां से आया और सूत्रोक हथियारसाज के कंधे से कैसे जा सटी ; वह भयानक जन्तु क्या था जिसने इन्सानी आवाज़ में सूग्रोक से वातचीत की, उसके द्वारा सूत्रोक को दिया गया लकड़ी का टुकड़ा कैसा था, और वह जन्तु मर क्यों गया था... समय आने पर इनमें से प्रत्येक गुत्थी सुलझ जायेगी। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि कही कोई करिश्मा नहीं हुआ और हर चीज़ का ठोस कारण था। इस समय सुबह का वक्त है। आज तो प्रकृति बहुत ही निखर उठी है। प्रकृति के इस जोबन का एक कुमारी बुढ़िया पर, जिसकी सूरत वकरी से मिलती-जुलती थी, ऐसा मसर पड़ा कि उसके सिर में वचपन से रहनेवाला दर्द गायब हो गया। इस सुवह को ऐसी गाय की हवा थी। वृक्ष सरसरा नही रहे थे, बच्चों की सी खुशीभरी प्रावाज में मा रहे थे।
ऐसी सुवह को हर कोई नाचना चाहता है। इसलिए इसम आश्चर्य की कोई बात नहीं कि नृत्य शिक्षक एक-दो-तीन का हॉल लोगो से खचाखच भरा हुआ था। जाहिर है कि भूखेपेट तो कोई नही नाचता। यदि मन भारी हो, तब भी काई नहीं नाचना चाहता। मगर भूखे और दुखी केवल वही थे जो आज मजदूरो के मुहल्ला मे तीन मोटो के महल पर फिर से धावा बोलने के लिए जमा हो रहे थे। मगर बाके-छल , धनी महिलायें और पेटुओ तथा धनियो के बेटे-बेटिया खूब मजे मे थे। उन्ह इस बात की खवर नही थी कि नट तिवुल गरीबो और भूखे कारीगरा की फौज तैयार कर रहा है। उन्ह नही मालूम था कि छोटी-सी नर्तकी सूत्रोक ने हथियारसाज प्रोस्पेरो को आजाद करा दिया है जिसकी जनता को बेहद जरूरत थी। नगर मे हो रही हलचल को वे बहुत महत्त्व नही । देते थे। " " " यकीनन । " - "यह सब बकवास है 1" एक प्यारी सी, मगर तीखी नाकवाली नवावज़ादी ने नाच के सैडल तैयार करते हुए कहा। अगर वे फिर से महल पर हल्ला बोलेंगे तो सैनिक उन्ह पिछली बार की तरह पीसकर रख देंगे। एक जवान बाके-छैले ने सेव खाते और अपने फ्रॉक कोट की जाच करते हुए खिलखिलाकर कहा। " इन खनिको और गन्दे-मन्दे कारीगरो के पास न तो वन्दूकें हैं, न पिस्तौलें और न ही तलवारे। दूसरी तरफ सैनिको के पास तो तोपे भी है। खाते-पीते और निश्चिन्त लोगो के जोडे एक-दो-तीन के घर चले आ रहे थे। उसके घर के दरवाजे पर यह साइन-बोर्ड लगा हुआ था- नृत्य-शिक्षक, श्रीमान एक-दो-तीन केवल नृत्य हो नहीं, बल्कि नजाकत, नफासत , फुर्तीलेपन, शिष्टाचार और जीवन के प्रति काव्यमय दृष्टिकोण को भी शिक्षा देता है। दस नृत्यो को फोस पेशगी ली जाती है गोल हॉल के शहदरगे लकडी के सुन्दर फश पर एक-दो-तीन अपनी क्ला सिखा रहा था। वह काली बासुरी बजा रहा था। इसे तो करिश्मा हो कहना चाहिए कि वह उसके होठो से लगी रहती थी। कारण कि वह लैस के कफो और सफेद नर्म दस्ताना वाले अपन हाया को लगातार हिलाता जा रहा था। वह बार-बार झुकता, मुद्रा वनाता, पाखें घुमाता १३६ A और ताल के साथ जूते की एड़ी वजाता और रह-रहकर दर्पण की ओर भागा जाता। वह दर्पण में अपना रूप निहारता , इस बात की जांच करता कि उसके तन पर जहां-तहां बंधे रिबनो की गाठे तो ठीक-ठाक है, उसके फुलेल लगे वाल तो चमक रहे हैं.. जोड़े नाच रहे थे। उनकी संख्या बहुत अधिक थी और वे पसीने से तर-व-तर थे। ऐसा लगता था मानो कोई बहुत ही बढ़िया रंगतवाला, मगर बदज़ायका शोरवा तैयार हो रहा हो। इस भारी भीड़ मे चक्कर लगाता हुआ कोई वांका-छैला या कोई सुन्दरी कभी तो बड़े. बडे पत्तों वाले शलजम जैसी दिखाई देती, कभी पत्तागोभी के पत्ते जैसी या फिर ऐसी ही कोई समझ में न आनेवाली, रंगीन और अजीब-सी चीज़ लगती , जो शोरवे से भरी तश्तरी में नजर आ सकती हो। एक-दो-तीन इस शोरवे में कलछुल जैसा लग रहा था। ऐसा तो इसलिए और भी अधिक सही था कि वह लम्बा , दुबला-पतला और लचीला था। आह , अगर भूप्रोक इन नृत्यों को देखती तो उसे बरबस हंसी आ जाती। उसने जब मूक नाटक 'बुद्ध वादशाह' में पत्तागोभी की सुनहरी गाठ की भूमिका अदा की थी, वह तब भी कही बढ़िया नाची थी। फिर उसे तो नाचना भी पत्तागोभी की गाठ की तरह था। नाच को यह महफ़िल जब अपने रंग पर आई हुई थी तो चमड़े के खुरदरे दस्तानों से ढकी तीन बड़ी-बड़ी मुट्ठियों ने नृत्य-शिक्षक एक-दो-तीन का दरवाज़ा ज़ोर से खटखटाया। ये मुट्ठिया देखने में मिट्टी के जगों जैसी प्रतीत होती थी। शोरवे का नाच बन्द हो गया। पाच मिनट बाद नृत्य-शिक्षक एक-दो-तीन को तीन मोटों के महल में ले जाया गया। तीन सैनिक उसे लेने आये थे। उनमें से एक ने उसे अपने घोड़े पर विठा लिया पूछ की ओर उसका मुंह करके , यानी एक-दो-तीन उल्टी दिशा में सवारी कर रहा था। दूसरे सैनिक ने उसका गत्ते का वड़ा-सा बक्सा उठा लिया। उसमें वहुत-सी चीजें समा सकती थी। आप समझते ही है कि मेरे लिए कुछ सूट , वाद्ययन्त्र और विग , स्वर-लिपिया तथा मनपसन्द गीत अपने साथ ले जाना बिल्कुल ज़रूरी है," एक-दो-तीन ने जाने की तैयारी करते हुए कहा। "कौन जाने , मुझे कितने दिनो तक महल में रहना पड़े। मैं तो नफासत और पूबसूरती का दीवाना हूं और इसीलिए अक्सर कपड़े वदलता रहता है।" नाचनेवाले जोड़े घोड़ों के पीछे-पीछे दौड़े, उन्होने रूमाल हिलाये और एक-दो-तीन के सम्मान में नारे लगाये। मूरज आकाश में ऊंचा उठ चुका था। एक-दो-तीन इस बात से खुश था कि उसे महल में बुलाया गया था। उसे तीन मोटे इसलिए पसन्द थे कि सभी अन्य मोटों और धनियों के वेटे-बेटियों को वे अच्छे लगते थे। “ " , १४० धनी आदमी जितना अधिक धनी होता था, एक-दो-तीन को वह उतना ही अधिक अच्छा लगता था। 'वात दर असल है भी ऐसी ही," वह सोचता, “गरीवो से मुझे भला लाभ ही क्या है ? वे नाचना-वाचना तो सीखते नही। वे तो हमेशा काम-काज मे जुटे रहते है और उनके पास पैसे भी कभी नही होते । जहा तक धनी व्यापारियो, धनी वाके-छलो और महिलामो का सम्बन्ध है, उनके पास हमेशा ढेरो पैसा होता है और करने-धरने को कुछ भी नही। जाहिर है कि एक-दो-तीन अपनी अक्ल के मुताविक बहुत समझदार था, मगर हमारी दष्टि मे बुद्ध।
" "बड़ी बेवकूफ़ है वह सूत्रोक !" नन्ही नर्तकी का स्मरण करते हुए वह हैरान होता । 'वह ग़रीबों, फौजियो, कारीगरों और फटेहाल वालकों के लिए क्यों नाचा करती है ? वे तो उसे बस चन्द कौड़ियां ही देते होंगे। स्पष्ट है कि अगर इस बुद्धू एक-दो-तीन को यह मालूम होता कि उस नन्ही-सी नर्तकी ने गरीबो, कारीगरों और फटेहाल बालको के नेता-हथियारसाज प्रोस्पेरो-को बचाने के लिए अपनी जान की भी बाजी लगा दी, तो उसे और भी अधिक हैरानी होती। घोड़े सरपट दौड़े जा रहे थे। रास्ते में बहुत-सी अजीव घटनाएं घटी। दूरी पर लगातार गोलियां दग रही थी। घरों के दरवाजों पर उत्तेजित लोगों की भीड़ जमा थी। कभी-कभार हाथों में पिस्तौलें लिये हुए दो तीन कारीगर भागते हुए सड़क पार करते ... ऐसा प्रतीत हो सकता है कि दूकानदारों के लिए आज हाथ रंगने का सबसे बढ़िया दिन था। मगर उन्होने तो खिड़कियां बन्द कर ली थी और झरोखों के साथ अपने चर्वीचढ़े चमकते हुए गाल सटाकर बाहर देख रहे थे। भिन्न-भिन्न लोगो की ज़बानी एक के बाद एक मुहल्ले में यह ख़बर पहुंचती जा रही थी- "प्रोस्पेरो!" 'प्रोस्पेरो!" 'वह हमारे साथ है !" 'हमारे साथ है !" रह-रहकर काबू से बाहर होते और झाग उगलते घोड़े पर सवार कोई सैनिक तेजी से गुजरता । जव-तव कोई मोटा हांफता हुआ किसी सड़क पर से भागता हुआ जाता। उसके दायें-वार्ये लाल वालों वाले नौकर होते जो अपने मालिक की रक्षा करने के लिए हाथों में लाठियां लिये रहते। एक जगह नौकरों ने अपने मालिक की रक्षा करने के बजाय अप्रत्याशित ही उसकी पिटाई कर डाली। इससे सारे मुहल्ले मे ल व शोर मचा। एक-दो-तीन ने शुरू में तो यही समझा कि वे लोग सोफ़े को झाड़कर उसकी धूल-मिट्टी निकाल रहे हैं। नौकरों ने अपने मोटे स्वामी को कोई तीन दर्जन सोटियां लगाई। फिर बारी-बारी से उसपर थूका , एक दूसरे के गले में वांहें डाली और सोटियां हिलाते तथा यह चिल्लाते हुए कहीं भाग चले- "तीन मोटे मुर्दावाद ! हम धनियों की नौकरी नही वजाना चाहते ! जय जनता !' इसी बीच लोग लगातार चिल्लाते रहे- "प्रोस्पेरो!" " १४२ "प्रो स्पे रो।" थोडे मे यह कि बहुत ही भयावह वातावरण था। हवा मे बारूद की गन्ध फैली हुई थी। आखिर अन्तिम घटना घटी। दस सैनिको ने अपने उन तीन साथियो का रास्ता रोक लिया जो एक दो तीन को लिये जा रहे थे। ये पैदल सैनिक थे। रुक जामो उन दस मे से एक ने कहा । उसकी नीली आखे गुस्से से जल रही थी। "कौन हो तुम लोग?" 'अधे हो क्या? उस सैनिक ने भी ऐसे ही गुस्से से पूछा जिसके पीछे एक-दो-तीन " " बैठा था। " - सैनिको के घोडे जो पूरी ताकत से दौडे जा रहे थे, अव काबू से बाहर हो रहे थे। उनके साज़ हिल रहे थे। नृत्य शिक्षक एक दो-तीन की टागें भी डर से हिल रही थी। यह कहना मुश्किल है कि साज ज्यादा जोर से हिल रहे थे या नृत्य शिक्षक की टागें। "हम तीन मोटो के महल के सैनिक है।' 'हम महल में पहुचने की जल्दी में है। फौरन हमारा रास्ता छोड दीजिये।' तब नीली आखो वाले सैनिक ने अपनी पिस्तौल निकाल ली और कहा- 'अगर यही बात है तो अपनी पिस्तौले और तलवारे हमारे हवाले कर दो। सैनिको के शस्त्रो को केवल जनता की सेवा करनी चाहिए, तीन मोटा की नही ।" इन दस के दस सैनिको ने अपनी पिस्तौल निकाल ली और घुडसवारो को घेर लिया। घुडसवारो ने भी अपने शस्त्र सम्भाल लिये। एक-दो-तीन वेहोश होकर घोडे से नीचे जा गिरा। कब उसे होश आया, यह ठीक-ठीक कहना मुमकिन नही। मगर इतना निश्चित है कि ऐसा तभी हुआ जब उसे लेकर जानेवाले और उन्ह रोकनेवाले सैनिको के वीच लडाई खत्म हो गई। शायद रोकनेवालो की ही विजय हुई थी। एक-दो-तीन ने अपन निकट उसी सैनिक को पड़े पाया, जिसके पीछे वह वैठा था। यह सैनिक मरा हुआ था। "खून," एक-दो-तीन पाखें मूदत हुए बुदबुदाया। घडी भर बाद उसने जो कुछ देखा, उससे तो उसके दिल को बहुत ही जोर का धक्का . लगा। । उसका गत्ते का बक्सा टूटा पड़ा था। उसका सारा माल मता वाहर निकला हुआ था। उसके वढिया सूट, गीत और विग सडक की धूल चाट रहे थे... 'माह लडाई की गर्मागर्मी मे उस सैनिक ने वह वक्सा नीचे फेंक दिया था। वह पत्थर पर गिरकर टूट गया था। 10 १४३ "आह ! पाह!" . एक-दो-तीन अपने माल-मते की पोर लपका। उसने पागलों की तरह अपनी वास्कट, फॉक कोट, जुरावें और सस्ते, मगर पहली नजर में सुन्दर दिखाई देनेवाले वक्सुमों से सजे हुए जूते समेटे और फिर से जमीन पर बैठ गया। उसके दुप की तो कोई सीमा ही नहीं थी। सभी चीजें , उसको सभी पोशाकें ज्यों की त्यों मिल गई थी, मगर मुख्य चौज गायब थी। इसी बीच जवकि एक-दो-तीन अपनी पाव-रोटी जैसी मुट्ठियां नीले माकाश की ओर उठाये बैठा था, तीन घुड़सवार बहुत ही तेजी से घोड़े दौड़ाते हुए तीन मोटों के महल की ओर बढ़े जा रहे थे। इनके घोड़े लड़ाई होने के पहले उन घुड़सवारों के कब्जे में थे जो नृत्य-शिक्षक एक-दो- तीन को अपने साथ ले जा रहे थे। लड़ाई के वाद उन तीन सैनिकों में से एक मारा गया था और वाकी दो ने आत्मसमर्पण कर दिया था। वे भी जनता के पक्ष में हो गये थे। उसी समय विजेताओं को एक-दो-तीन के टूटे हुए बक्से में मलमल के टुकड़े में लिपटी हुई कोई गुलाबी चीज मिली। तव उन दस में से तीन फ़ौरन छीने हुए घोड़ों पर उछलकर सवार हो गये और उनके घोड़े हवा से बातें करने लगे। सबसे आगे-आगे था नीली आखों वाला सैनिक । वह मलमल के टुकड़े में लिपटी हुई कोई गुलावी चीज़ अपनी छाती के साथ चिपकाये था। रास्ते के लोग एक ओर को हट जाते थे। सैनिक के टोप पर लाल फीता बंधा हुआ था। इसका अर्थ था कि वह जनता की ओर हो गया है। इसीलिए रास्ते में मिलनेवाले लोग (अगर वे मोटे या पेटू नहीं थे ) उसके पास से गुजरने पर तालियां बजाते । मगर गौर से सैनिक की ओर देखने पर वे हक्के-बक्के रह जाते। कारण कि सैनिक जो बंडल अपनी छाती से चिपकाये था, उसमें से एक बालिका की टांगें लटक रही थी। वालिका अपने पैरों में सुनहरे गुलाबों के वक्सुओं वाले गुलावी सैडल पहने थी... तेरहवां अध्याय विजय हुई प्रभ भी अभी हमने उन असाधारण वातों की चर्चा की है जो उस सुबह हुई थीं। अब हम जरा पीछे लौटकर उस रात का उल्लेख करेंगे जो इस सुबह के पहले बीती । जैसा कि आप जानते ही हैं उस रात को भी कुछ कम अनहोनी बातें नहीं हुई थी। १४४ इसी रात को हथियारसाज प्रोस्पेरो तीन मोटो के महल से भागा था और सूप्रोक रगे हाथो गिरफ्तार कर ली गई थी। इसके अलावा इसी रात को तीन आदमी ढकी हुई लालटेनें लिए हुए उत्तराधिकारी टूट्टी के सोने के कमरे मे आये थे। यह घटना उस समय से लगभग एक घण्टे वाद घटी जब हथियारसाज़ प्रोस्पेरो ने महल के मिठाईघर मे तूफान मचाया और सैनिको ने सूत्रोक को सुरग के नजदीक गिरफ्तार किया। उत्तराधिकारी के सोने के कमरे मे अन्धरा था। बडी-वडी खिडकियो मे से सितारे झाक रहे थे। लडका गहरी नीद सो रहा था, धीरे धीरे और चैन की सास नेता हुआ। कमरे मे आनेवाले तीनो व्यक्ति अपनी लालटेनो की रोशनी छिपाने की भरसक काशिश कर रहे थे। उहोने क्या किया , यह हम नहीं जानते। सिफ उनकी कानाफूसी सुनाई देती रही। सोने के कमरे के दरवाजे पर पहरा देनेवाला सन्तरी ऐसे खडा रहा मानो कुछ हुआ ही न हो। सम्भवत उत्तराधिकारी के शयन-कक्ष मे आनेवाले इन तीना व्यक्तियो को यहा आने का कुछ विशेष अधिकार प्राप्त था। यह तो आप जानते ही है कि उत्तराधिकारी टूट्टी के शिक्षक दिलेर लोग नही थे। गुडियावाली घटना तो आप भूले नही होगे। वाग मे जब वह भयकर काण्ड हुआ था सनिका ने गुडिया के तन मे तलवार घुसेडी थी, तो शिक्षक का कैसे दम निकल गया था। आपको याद होगा कि तीन मोटो के सामने इस काण्ड की चर्चा करते हुए शिक्षक की कैसे जव घिग्घी वध गई थी। इस बार जो शिक्षक डयूटी पर था, वह भी ऐसा ही बुज़दिल साबित हुआ। जब ये तीनो अपरिचित लोग लालटेनें लिये हुए शयन-कक्ष मे आये तो शिक्षक कमरे म ही था। उत्तराधिकारी की नीद म कोई खलल न पडे , वह इसी बात की देखभाल करने के लिए खिडकी के पास बैठा था। इसलिए कि कही प्राख न लग जाये , वह सितारा को देखता हुया खगोलशास्त्र की अपनी जानकारी को ताजा कर रहा था। मगर इसी समय दरवाजा चरमराया, रोशनी हुई और तीन रहस्यपूण आकृतिया कमरे में नजर आई। शिक्षक पाराम-कुर्सी म दुबक गया। उसे सबसे प्यादा फिक तो इस वात की थी कि कही उसकी लम्बी नाक उसका भडाफोड न कर दे। वात दर असल थी भी कुछ ऐसी ही। सितारा से विलमिलाती खिडकी की पृष्ठभूमि म यह अनूठी नाप एकदम स्याह नजर आने लगी थी और इसकी ओर फौरन ध्यान जा सकता था। 10-1492 १४५ "ठीक है.' " " " मगर इस कायर ने यह सोचकर अपने दिल को तसल्ली दी-"शायद वे इसे पाराम- कुर्सी के हत्थे की सजावट या सामनेवाले पर की कार्निस ही समझेंगे। लालटेनों की हल्की पीली रोशनी में कुछ-कुछ नजर आती हुई ये प्राकृतियां उत्तराधिकारी के पलंग के करीब पाई। कोई फुसफुसाया। "सो रहा है, दूसरे ने कहा। शी!" "परेशानी की कोई बात नहीं। वह गहरी नीद सो रहा है। "तो काम शुरू कीजिये। कोई चीज़ छनकी। शिक्षक को ठण्डे पसीने आ गये। उसे लगा कि डर के मारे उसकी नाक लम्बी होती जा रही है। कोई फुसफुसाया। "तो शुरू कीजिये।" फिर से कोई चीज़ छनछनाई, किसी तरल पदार्थ के वोतल में डालने की आवाज़ हुई। अचानक फिर से खामोशी छा गई। 'कहां डाला जाये इसे ?" " "तैयार है, " कान में।" " वह करवट लेकर सो रहा है। यह स्थिति अधिक अनुकूल भी है। डालिये कान में " " मगर बहुत सावधानी से। एक-एक बूंद करके।" 'ठीक दस बूदें। पहली बूंद बहुत ठण्डी लगेगी, मगर दूसरी बूंद डालने पर कोई अनु- भूति नही होगी, क्योकि पहली बूंद फ़ौरन असर करती है। उसके बाद तो कुछ महसूस ही नहीं होता।" इस तरल पदार्थ को ऐसे डालने की कोशिश कीजिये कि पहली और दूसरी बूंद के बीच वक्फा न पड़ने पाये।" 'वरना लड़का ऐसा अनुभव करेगा मानो किसी ने वर्फ़ छुआ दी हो और जाग जायेगा। "शी! तो डालता हूं... एक, दो !" और अव शिक्षक ने पोस्त के फूलों की तेज गन्ध अनुभव की। यह गन्ध सारे कमरे में फैल गई थी। ॥ १४६ " " " "तीन, चार, पाच, छ विसी ने धीमी आवाज़ में जल्दी जल्दी गिनती की। 'डाल दी दस बूदें। 'अव यह तीन दिन तक गहरी नीद सोया रहेगा। 'और उसे यह मालूम ही नही हो सकेगा कि उसकी गुडिया का क्या हुमा "उसकी तभी आख युलेगी जब सब कुछ यत्म हो चुका होगा। 'वरना वह रोने और पैर पटकने लगता। तब तीन मोटे मजबूर होकर लड़की को माफ कर देते और उसकी जिन्दगी वस्य देते ये तीना अजनवी चले गये। तव कापता हुमा शिक्षक उठा। उसने नारगो रग के फूल की तरह जलनेवाला छोटा-सा रात्रि-दीप जलाया मोर पलग के रीव पाया। उत्तराधिकारी टूट्टी लसवाली सुन्दर रेगमो चादर मोड़े हुए मो रहा था, छाटा-सा मगर रोवीला-सा प्रतीत हाता हुमा। अस्तव्यस्त सुनहरे वाला वाला उसका मिर बडे-बडे तकिया पर टिका हुमा था। " .. १४७ - " शिक्षक झुका और उसने लैम्प को लड़के के पीले चेहरे के करीव किया। छोटे से कान में तरल पदार्थ की बूंद ऐसे चमक रही थी मानो सीप में मोती। वूद में से सुनहरी और हरी प्राभा एकसाथ झलक दिखा रही थी। शिक्षक ने कनिष्ठा से इस तरल पदार्थ को छुया। छोटे-से कान से बूंद गायब हो गयी, मगर शिक्षक की सारी बांह बर्फ की तरह सर्द हो गई। लड़का गहरी नीद सो रहा था। कुछ घण्टों के बाद उस शानदार सुबह का प्रारम्भ हुग्रा जिसका हम पीछे वर्णन कर चुके है। यह तो हमें मालूम ही है कि उस सुवह को नृत्य-शिक्षक एक-दो-तीन के साथ क्या बीती थी। मगर हमारे लिए यह जानना कही अधिक दिलचस्प है कि इस सुबह को सूत्रोक का क्या हुआ। हमने उसे तो बहुत ही भयानक स्थिति में छोड़ा था ! शुरू मे तो यह तय किया गया कि उसे तहखाने में डाल दिया जाये । पर यह तो बहुत झंझटवाली बात होगी," सरकारी सलाहकार ने कहा। "हम झटपट उस पर न्यायपूर्ण मुक़दमा चलाकर उसे सजा दे देंगे।" "हां, यह ठीक है। लड़की को लेकर ज्यादा झंझट करने की ज़रूरत नहीं है," तीन मोटों ने सहमति प्रकट की। मगर आपको यह नही भूलना चाहिए कि तीन मोटों को चीते से बचने के लिये भागते समय बहुत परेशानी हुई थी। इसलिए यह जरूरी था कि वे कुछ देर आराम कर ले। उन्होने कहा- 'अब हम थोड़ी देर सोना चाहते है। सुबह मुकदमे की कार्रवाई होगी।" इतना कहकर वे अपने अपने सोने के कमरे में चले गये। सरकारी सलाहकार को इस बात में तनिक भी सन्देह नही था कि अदालत गुड़िया, यानी बालिका को मौत की सजा देगी। इसलिए उसने उत्तराधिकारी टूट्टी को गहरी नीद सुला देने का आदेश दिया ताकि वह अपने आंसुओं से कठोर दण्ड को हल्का न करवा दे। जैसा कि आप जानते ही हैं लालटेनवाले तीन व्यक्तियों ने यह काम पूरा कर दिया था। उत्तराधिकारी टूट्टी गहरी नीद सो रहा था। सूत्रोक सन्तरियों के कमरे में बैठी थी। उसके सभी ओर सन्तरी थे। अजनवी यहा पा जाता तो देर तक यही सोचकर आश्चर्यचकित होता रहता- यह प्यारी-सी, उदास-से चेहरे और सुन्दर गुलावी फ़ॉकवाली लड़की सन्तरियों के वीच क्या कर रही है ? वह जीनो, वन्दूकों और वीयर के गिलासों के अटपटे वातावरण में बड़ी अजीब-सी लग रही थी। - अगर कोई . १४८
No text on this page.
No text on this page.
। सन्तरी ताश खेल रहे थे, उनकी पाइपो से नीला-नीला कड या धुना निकल रहा था। वे एक दूसरे पर चीखते-चिल्लाते और हाथापाई भी करते। ये सन्तरी अभी तक तीन माटा के प्रति वफादार थे। वे सूत्रोक को अपने वडे-बडे घूसे दिखाते , पैर पटकते और तरह-तरह की मूरते बनाते। नग्रोक ने उनकी इन हरकतो की ओर ध्यान न दिया। उनसे पिड छुडाने और उन्हे मजा चखाने के लिए वह अपनी जवान वाहर निकाल और उन सभी की ओर मुह करके वंठ गई। वह घण्टा भर ऐसे ही बैठी रही। कठौने पर बैठे रहना उसे काफी आरामदेह प्रतीत हुआ। यह सही है कि इस तरह वैठने से उसके फ्रॉक मे सिलवटें पड रही थी। मगर वह तो वैसे भी अपनी पहलेवाली खूबसूरती खो बैठा था। शाखायो में उलझकर वह जहा-तहा से फट गया था, मशालो ने उसे कई जगह से जला दिया था, सैनिको ने उसमे ढेरो सिलवटें डाल दी थी और उस पर शरबत के धब्बे लग गये थे। सूत्रोक को अपनी कुछ चिन्ता नही थी। उसकी उम्र की लडकिया असली खतरे से नही डरती। अपने सामने पिस्तौल तनी देखकर उन्ह भय अनुभव नही होता, मगर अधेरे कमरे मे अकेले रहते हुए उनकी जान निकलती है। सूत्रोक सोच रही थी- " हथियारसाज प्रोस्पेरो आजाद हो गया। अब वह और तिबुल गरीवा को साथ लेकर महल पर धावा बोलेगे। वे मुझे आजाद करा लेगे। इसी समय जब सूत्रोक इस तरह की वाते सोच रही थी, तीन सैनिक सरपट घोडे दौड़ाते हुए महल की ओर बढे जा रहे थे। हम पिछले अध्याय में उनकी चर्चा कर चुके है। जैसा कि आपको मालूम है उनमे से एक, यानी नीली पाखो वाला सैनिक एक रहस्यपूर्ण बडल उठाय हुए था। इसमे से सुनहरे गुलावो वाले गुलाबी सैडल पहने दो पैर बाहर लटक ये तीना घुडसवार जव उस पुल के निकट पहुंचे जहा तीन मोटो के प्रति वफादार सन्तरी खडे थे, तो उन्होने अपने टोपो से लाल रिवन उतार लिये। ऐसा इसलिए करना ज़रूरी था कि सन्तरी उन्हे रोकें-टोकें नही। अगर सन्तरियो को लाल रिवन दिखाई दे जाते, तो वे उन पर गोलिया चलाने लगते । लाल रिवन तो इस बात की निशानी थे कि इन्हे लगानेवाले सैनिक जनता की ओर हो गये है । वे बहुत ही तेज़ी से सन्तरियों के पास से गुजर गये। सन्तरियो का सरदार तो जरूर कोई बहुत ही जरूरी सन्देश लेकर जा रहे होगे," नीचे गिरा हुआ अपना टोप उठाते और वर्दी से मिट्टी झाडते हुए सरदार ने कहा। " रहे थे। गिरते-गिरते बचा। " 1-1492 १४६ N " इसी समय सूत्रोक की आखिरी घड़ी निकट आ गई। सरकारी सलाहकार सन्तरियों के कमरे में पाया। सन्तरी उछलकर अटेंशन खड़े हो गये। लड़की कहां है ?" अपनी ऐनक ऊपर करते हुए सलाहकार ने पूछा। 'इधर आरो!" मुख्य सन्तरी ने सूत्रोक को आवाज़ दी। सूत्रोक कठौते से नीचे उतरी। सन्तरी ने बड़े भद्दे ढंग से सूत्रोक की पेटी पकड़कर उसे ऊपर उठा लिया। " तीन मोटे अदालत-भवन में इसका इन्तजार कर रहे है," ऐनक नीचे करते हुए सलाहकार ने कहा। "लड़की को मेरे पीछे-पीछे लायो। इतना कहकर सरकारी सलाहकार सन्तरियों के कमरे से वाहर चला गया। सूत्रोक को एक हाथ पर उठाये हुए सन्तरी सरकारी सलाहकार के पीछे-पीछे चल दिया। ओह , सुनहरे गुलाव ! प्रोह , गुलावी रेशम ! निर्दयी हाथ की बदौलत इन सवका बुरा हाल हुया जा रहा था। सूत्रोक पेटी के सहारे सन्तरी के हाथ में लटकी हुई थी। उसे दर्द महसूस हो रहा था, बड़ी तकलीफ़ हो रही थी। उसने सन्तरी की कोहनी के ऊपर चुटकी काट ली। उसने चुटकी इतने जोर से काटी कि सैनिक की वर्दी की मोटी आस्तीन के वावजूद वह दर्द से तड़प उठा। "सत्यानाश हो!" उसने गाली दी और सूमोक उसके हाथ से नीचे जा गिरी। 'क्या कहा?" सलाहकार घूमा। इसी समय सलाहकार के कान पर अप्रत्याशित ही ऐसी ज़ोर की धौल पड़ी कि वह जमीन चाटने लगा। उसके फ़ौरन वाद वह सन्तरी भी जमीन पर पड़ा दिखाई दिया जो कुछ ही क्षण पहले सूत्रोक को पेटी से पकड़कर लटकाये लिये जा रहा था। सन्तरी के कान पर भी धौल जमायी गयी थी। सो भी कैसी! जरा कल्पना कीजिये कि कैसी जोर की होगी वह धौल जिसने ऐसे हट्टे-कट्टे तथा क्रोधी सन्तरी को जमीन पर गिरा दिया था! इससे पहले कि सूत्रोक मुड़कर कुछ देख पाती, किसी के हाथों ने उसे फिर से झपट लिया और उठा ले चले। हाय तो ये भी कठोर और मजबूत थे, मगर दयालु प्रतीत हुए। उस सन्तरी के हाथों की तुलना में जो अब चमकते हुए फर्श पर पड़ा था, सूप्रोक को इन हाथों में अधिक पाराम अनुभव हुआ। "डरो नही !" किसी ने फुसफुसाकर कहा। १५० . मोटे बहुत बेचैनी से अदालत-भवन मे इन्तजार कर रहे थे। वे चालाक गुडिया के मुकदमे की कार्रवाई का खुद सचालन करना चाहते थे। उनके इर्दगिर्द कर्मचारी , सलाहकार , न्यायाधीश और मुशी बैठे थे। सूरज की किरणो मे रग विरगे - गुलावी , जामुनी , भडकीले हरे, लाल , सफेद और सुनहरे-विग चमक रहे थे। मगर दिल खुश करनेवाली सूरज की किरणे भी इन विगा के नीचे उनके गुस्से से फूले हुए तोवडो पर रौनक नही ला सकी थी। तीन मोटो का पहले की भाति अब भी गर्मी के मारे बुरा हाल था। उनके माथे से मटर के दानो की भाति पसीने की बूदें टपटप नीचे गिरती थी। इससे उनके सामने पडे हुए कागज़ खराव हो जाते थे। मुशी लगातार इन कागज़ो को बदलते जाते थे। 'हमारा सलाहकार बहुत इन्तजार करवाता है, ' पहले मोटे ने फासी पर लटके हुए व्यक्ति की भाति उगलिया हिलाते हुए कहा। आखिर प्रतीक्षा का अन्त हुआ। तीन सैनिक भवन मे आये। उन में से एक लड़की को हाथा में उठाये था। ओह , कैसा दर्दनाक था लडकी का चेहरा । उस गुलावी फ्रॉक की, जो केवल एक दिन पहले अपनी चमक-दमक और वढिया कलात्मक सजावट से आश्चर्यचकित करता था, अब बहुत बुरी हालत हो गई थी। सुनहरे गुलाव मुरझा गये थे, चमकता हुआ सलमा और सितारे गिर चुके थे और रेशमी कपडे मे सिलवटें पड गई थी। लडकी का सिर सैनिक के कधे पर निर्जीव सा लटका हुआ था। लडकी का चेहरा एकदम जर्द था और उसकी शरारती भूरी आखो मे से चमक गायब हो चुकी थी। रग विरगे विगो वाली महफिल मे बैठे लोगा ने नजरे ऊपर उठाई। तीन मोटो ने हाथ मले। मुशियो ने अपने लम्बे-लम्बे कानो से लम्बी-लम्बी कलमे निकाली। "हु," पहले मोटे ने कहा। "सरकारी सलाहकार कहा है वह सैनिक जो लडकी को उठाये हुए था, आगे आया और बोला-- 'श्रीमान सरकारी सलाहकार जव इधर पा रहे थे तो रास्ते मे उनके पेट म जोर का दर्द हो गया। सैनिक ने जब ऐसा कहा था, तो उसकी नीली पाखें चमक रही थी। इस उतर से सभी सन्तुष्ट हो गये। मुकदमे की कारवाई शुरू हुई। सैनिक ने वेचारी लडकी को न्यायाधीशो की मेज के सामने खुरदरी-सी वेंच पर विठा दिया। वह सिर लटकाये बैठी थी। पहले मोटे ने पूछ-ताछ शुरू की। मगर अब उन्हे बहुत बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा- मूमोक एक भी सवाल का जवाब नहीं देना चाहती थी। 2" 11 "तो ऐसा ही सही!" एक मोटा खीझ उठा। "तो ऐसा ही सही! जवाब नहीं देना चाहती , तो न दे। इसी को इससे हानि होगी... हम इसे उतनी ही कड़ी सजा देंगे!" सूत्रोक तो हिली-डुली भी नहीं । तीनों सैनिक उसके आस-पास बुत बने खड़े थे। " गवाहों को बुलाइये!" मोटे ने हुक्म दिया। गवाह सिर्फ एक ही था। उसे लाया गया। यह वही प्रतिष्ठित प्राणिविज्ञ था, चिड़ियाघर के जानवरों की देखभाल करनेवाला। उसने सारी रात तने पर ही विताई थी। उसे अभी- अभी नीचे उतारा गया था। वह उसी हालत में यहां पा गया- फूलदार गाउन, धारीदार पाजामा और रात की टोपी पहने हुए। उसकी टोपी का फुदना प्रांत की भाति उसके पीछे-पीछे जमीन पर घसिटता चला पा रहा था। सूत्रोक को बेंच पर बैठी देखकर प्राणिविज्ञ डर से थरथर कापने लगा। उपस्थित लोगों ने उसे सहारा दिया। "जो घटना घटी है, हमें कह सुनाइये। प्राणिविज्ञ ने कहना शुरू किया। उसने बताया कि मैं वृक्ष पर चढ़ा और वहां शाखाओं के बीच मुझे उत्तराधिकारी टूट्टी की गुड़िया दिखाई दी। पर चूकि मैंने कभी जीती-जागती गुड़िया नही देखी थी और इस बात की कल्पना तक नहीं की थी कि गुड़िया रात के समय वृक्ष पर चढ़ सकती है, इसलिये मै वेहद डर गया और वेहोश हो गया। " उसने हथियारसाज प्रोस्पेरो को कैसे अाजाद कराया?" 'मुझे मालूम नही । मैने न तो कुछ सुना और न देखा ही। मेरी वेहोशी बहुत गहरी थी।" "अरी ओ दुष्ट लड़की , तू हमे बतायेगी या नही कि तू ने हथियारसाज़ प्रोस्पेरो को कैसे आजाद किया?" सूत्रोक ने कोई उत्तर न दिया। 'इसे हिलाइये-डुलाइये। "खूब अच्छी तरह से!" तीन मोटों ने आदेश दिया। नीली आखों वाले सैनिक ने लड़की के कधे पकड़कर उसे झकझोरा। इतना ही नहीं, उसने उसके माथे पर जोर की चपत भी लगाई। सूत्रोक अब भी मौन साधे रही। मोटे तो गुस्से से फू-फां करने लगे। भर्त्सना करते हुए लोगों के रंग-विरगे विगों वाले सिर हिलने लगे। "ऐसा लगता है कि हमें कुछ भी तफसीलें मालूम नहीं हो सकेगी," पहले मोटे ने कहा । " - १५२ - . - यह शब्द सुनकर प्राणिविज्ञ ने माथा ठोकते हुए कहा- मैं जानता हूं कि हमे क्या करना चाहिये। हर किसी के कान खडे हो गये। "चिडियाघर म तोतो का भी एक पिजरा है। वहा बहुत ही दुलभ और बढिया नसल के तोते है। आप यह तो जानते ही है कि तोते व्यक्ति के शब्दो को याद रख सकते है , उन्हे दोहरा सकते है। बहुत से तोतो के कान बहुत तेज होते है और याददाश्त बहुत गजव की मैं यह समझता हू कि उस रात को इस लडकी और हथियारसाज प्रोस्पेरो के बीच चिडियाघर मे जो वातचीत हुई, तोतो को वह सब याद है इसलिये मै यह सुझाव देता हूँ कि मेरे अद्भुत तोतो म से एक को यहा गवाह के रूप में लाया जाये। उपस्थित लोगो के अनुमोदन की हल्की-सी अावाज सुनाई दी। प्राणिविज्ञ चिडियाघर की ओर गया और जल्द ही लौट आया। उसकी तजनी पर वडा- सा और लम्वी लाल दाढीवाला बूढा सा तोता बैठा था। आपको उस समय का तो स्मरण होगा जब सूत्रोक रात्रि को चिडियाघर मे घूमती रही थी। याद है न? उसे एक तोते पर सन्देह हुआ था। यह भी याद है न आपको कि कैसे उस तोते ने सूत्रोक की ओर देखा था और फिर मानो सोने का बहाना करते हुए वह कैसे अपनी लम्बी लाल दाढी मे मुस्कराया था। अब यही लाल दाढीवाला तोता प्राणिविज्ञ की उगली पर उसी तरह आराम से बैठा था जैसे कि तव पिजरे के रुपहले छड पर। इस समय वह खुले तौर पर मुस्करा रहा था, इस बात से खुश होता हुआ कि बेचारी सूत्रोक का भडाफोड कर देगा। प्राणिविज्ञ ने जमन भाषा मे तोते से वातचीत शुरू की। तोते को लडकी दिखाई गई। तब उसने पख फडफडाये और वह चिल्ला उठा- 'सूत्रोक | सूत्रोक उसकी आवाज़ उस पुराने फाटक की चरमराहट जैसी थी जो हवा के कारण अपने जग लगे कब्जे पर हिलता-डुलता है। सभी लोग खमोश थे। प्राणिविज्ञ खुशी से फूला नहीं समा रहा था। तोते ने अपनी मुखविरी जारी रखी। उसने सचमुच ही वह सब कह सुनाया जो उस रात सुना था। इसलिये अगर आप हथियारसाज़ प्रोस्पेरो के आजाद होने की कहानी जानना चाहते है तो वह सब ध्यान से सुनियेगा जो तोता कहेगा। प्रोह ! यह सचमुच ही बहुत बढिया नसल का तोता था | सुन्दर लाल दाढी की तो । १५३ वात ही एक तरफ रही जो किसी भी जनरल की प्रतिष्ठा बढ़ा सकती थी, उस तोते की असली खूबी यह थी कि वह इन्सान की कही हुई बातों को दोहराने की अद्भुत क्षमता रखता था। " " . "तुम कौन हो? उसने मर्दाना अावाज में कहा। इसके फ़ौरन बाद लड़की की आवाज की नकल करते हुए उसने वारीक आवाज में उत्तर दिया- "मैं सूग्रोक हूं।" " सूमोक! 'मुझे तिबुल ने भेजा है। मैं गुड़िया नही, जीती-जागती लड़की हूं। मैं तुम्हें आजाद कराने आई हूं। तुमने मुझे चिड़ियाघर में आते नहीं देखा?" "नही। मैं शायद सो रहा था। आज वह पहली रात है जब मेरी आंख लगी है।" "मैं तुम्हें चिड़ियाघर मे ढूढ़ती रही हूं। मैंने यहां एक भयानक जन्तु देखा जो इन्सान की तरह वातचीत करता था। मैं समझी कि वह तुम ही हो। वह जन्तु मर गया 'यह तूव था। तो क्या वह मर गया?" "हां, मर गया। मै डरकर चीख़ उठी। तब सन्तरी भाग आये। मैं वृक्ष पर जा चढ़ी। मैं बेहद खुश हूं कि तुम जिन्दा हो! मै तुम्हें आजाद कराने आई हूं।" 'मगर मेरे पिंजरे में तो बहुत बड़ा ताला लगा हुआ है।" "मेरे पास ताले की चाबी है।" तोते ने जब यह अन्तिम वाक्य कहा तो सभी उपस्थित लोग आग-बबूला हो उठे। "मोह, दुष्ट लड़की!" मोटे चिल्ला उठे। अब सारी बात समझ में आ गयी। उत्तराधिकारी टूट्टी के पास पिंजरे की जो चाबी थी उसने वह चुरा ली और हथियारसाज को आजाद कर दिया। हथियारसाज ने अपनी जंजीर तोड़ डाली, चीते का पिंजरा तोड़कर उसे जंजीर से बांध लिया ताकि अहाते में से बिना रोक-टोक जा सके। ऐसा ही है !" ऐसा ही है !" ऐसा ही है!" मगर सूपोक चुप रही। तोते ने मानो समर्थन करते हुए सिर हिलाया और तीन बार पंख फड़फड़ाये। मुकदमे की कार्रवाई ख़त्म हो गई। यह फैसला सुनाया गया- "वनावटी गुड़िया ने उत्तराधिकारी टूट्टी को धोखा दिया। उसने सबसे बड़े विद्रोही और तीन मोटों के सबसे बड़े दुश्मन - हथियारसाज प्रोस्पेरो-को आजाद " " ।
. . किया। इसी के कारण बहुत बढिया चीता मारा गया। इसलिये इस धोखेवाज लडकी को मात की सजा दी जाती है। दरिन्दा से इसके टुकडे करवाये जायें। पाठकगण, तनिक कल्पना कर मृत्यु-दण्ड की घोषणा होने पर भी सूप्रोक न हिली, न डुली। हात में उपस्थित सभी लोग चिडियाघर की ओर चल दिये। पक्षियो को ची और चहक तथा जानवरा की चीख चिघाड ने इन लोगा का स्वागत किया। सबसे अधिक परेशान तो था प्राणिविज्ञ। ऐसा स्वाभाविक भी था - वह चिडियाघर की देखभाल जो करता था तीन मोटे, सलाहकार, कमचारी और अय दरवारी मच पर जा चढे । मच के चारा ओर लोहे का जगला लगा हुआ था। वडी प्यारी-प्यारी धूप खिली हुई थी। आह , आकाश कैसा नीला नीला था| तोतो के पख कैसे चमक रहे थे, वन्दर कैसे कलावाज़िया लगा रहे थे और हरी हरी बलक देनेवाला हाथी कैसे नाच रहा था। वेचारी सूत्रोक | इन चीज़ो की अोर तो उसने आख तक उठाकर न देखा। वह तो सम्भवत सहमी-सहमी आखो से उस गन्दे से पिजरे की ओर देख रही थी जहा कुछ कुछ झुके हुए शेर इधर उधर दौड रहे थे। वे वरों से मिलते-जुलते थे, कम से कम उनका रग तो ऐसा ही था- -पीला-पीला और वादामी धारिया। वे गुस्स से लोगो को देख रहे थे। जब तब उनमे से कोई अपना खू न जैसा लाल मुह खोलता जिसम से कच्चे मास की गध पाती थी। वेचारी सूत्रोक अनविदा सरकस , चौक , अगस्त , पिजरे मे बन्द लोमडी, प्यारे, हृष्ट-पुष्ट और साहसी , तिवुल। " नीती आखो वाला सैनिक लडकी को चिडियाघर के मध्य मे ले गया और उसे तपते तथा चमकते हुए सीसे पर लिटा दिया। म निवेदन करना चाहता हू, अचानक एक सलाहकार ने कहा । आपने उत्तराधिकारी टूट्टी के वारे भी कुछ सोचा? अगर उसे यह मालूम हो गया कि उसकी गुडिया के शेरा से टुकडे करवाये गये है तो वह रो रोकर जान दे देगा।' साथ बैठे हुए व्यक्ति ने उसे चुप रहने का सकेत करते हुए कहा । शी। उत्तराधिकारी टूट्टी को सुला दिया गया है वह तीन दिना तक या इससे भी ज्यादा वक्त तक गहरी नीद सोया रहेगा शी, १५५ अव सभी लोगों की नजर उस दर्दनाक गुलावी चीज पर टिकी हुई थी जो पिंजरी के वीच पड़ी थी। इसी समय जानवरो को सधानेवाला व्यक्ति अपना हंटर सटकारता और पिस्तौल चमकाता हुआ आया। वैडवालों ने एक धुन बजानी शुरू की। इस तरह सूत्रोक आखिरी वार दर्शकों के सामने आई। 'हुश!" सधानेवाले ने कहा। पिजरे का लोहे का दरवाजा चरमरा उठा। शेर विना शोर किये और भारी कदम रखते हुए पिंजरे से बाहर निकले। भोटो ने ठहाका लगाया। सलाहकार खिलखिलाकर हंसे और उन्होंने अपने विग हिलाये। हंटर की आवाज सुनाई दी। तीनों शेर सूग्रोक की ओर लपके । सूत्रोक निश्चल पड़ी थी और उसको भूरी गतिहीन आखें आकाश को एकटक ताक रही थी। सभी लोग उठकर खड़े हो गये। जनता की इस छोटी-सी मित्र के शेरो द्वारा टुकड़े होते देखकर सभी लोग स शो से चिल्लाने को तैयार थे... और शेर... निकट आये। उन मे से एक ने अपना चौड़े माथेवाला सिर झुकाकर सूत्रोक को सूधा, दूसरे ने अपने विल्ली जैसे पंजे से लड़की को छुया। तीसरे ने तो उसकी . " ओर ध्यान भी नहीं दिया, पास से गुजर गया और मच के सामने खडा होकर मोटो पर गरजने लगा। तव सभी को यह बात स्पप्ट हो गई कि यह जीती-जागती लडकी नही, गुडिया थी, फ्टे-से फॉक मे पुरानी गुडिया, न किसी काम की, न काज की। सभी लोगो के दिल वैठ गये। प्राणिविज्ञ ने तो परेशानी में अपनी आधी जवान ही काट ली। जानवरो को सधानेवाले ने शेरो को पिजरे में वापिस भेज दिया और घृणा से वेजान गुडिया को ठोकर मारकर नीली और सुनहरी डोरिया वाली अपनी समारोही वर्दी उतारने चला गया। सभी लोग पाच मिनट तक खामोश रहे। यह खामोशी बहुत ही अप्रत्याशित ढग से भग हुई। चिडियाघर के ऊपर नीले आकाश में तोप का एक गोला फटा। मच पर खडे सभी दर्शक लकडी के फर्श पर झटपट लेट गये। सभी जानवर अपनी पिछली टागो के वल खडे हो गये। फौरन बाद दूसरा गोला फटा। आकाश मे सफेद धुए का गोल- गोल बादल छा गया। 'यह क्या माजरा है? यह क्या किस्सा है? यह क्या है?" सभी लोग चीख उठे। 'जनता धावा बोल रही है।' जनता के पास तोपे है 'सैनिक जनता के साथ मिल गये है !!" 'मोह' आह ।। अोह ।।1" पार्क मे सभी पोर शोर, चीख-पुकार और गोलियो की ठाय-ठाय सुनाई देने लगी। जाहिर था कि विद्रोही पार्क मे घुस आये थे। सभी लोग चिडियाघर के फाटका की ओर भाग चले। मन्त्रियो ने मियानो से तलवारे निकाल ली। मोटे गला फाडकर चिल्ला रहे थे पार्क मे उन्हे यह दृश्य दिखाई दिया। सभी ओर से लोग वढे पा रहे थे। बहुत बडी सख्या थी उनकी। वे नगे सिर थे, कुछ के माथो से रक्त बह रहा था, कुछ को जाकेटे तार-तार थी , फिर भी उनके चेहरे पर ख शी नाच रही थी ये थे जनसाधारण जिनकी आज विजय हुई थी। सैनिक उनके साथ मिल गये थे। उनके टोपो पर लाल रिवन लगे हुए थे। मजदूर भी सशस्त्र थे। वादामी रग की पोशाकें और लकडी के जूते पहने हुए गरीबो की पूरी की पूरी सेना बढी पा रही थी। उनके दबाव से वृक्ष झुके जा रहे थे , झाडिया टूट रही थी। "हमारी जीत हुई है।" लोग चिल्ला रहे थे। तीन मोटो ने समझ लिया कि अव बचकर निकलना मुमकिन नहीं । " . १५७ - 'नही! ऐसा नही हो सकता!" उनमें से एक चिल्लाया। "सैनिको, इन्हें गोलियों से भून डालो!" मगर सैनिक तो गरीबों के ही साथी थे। तव सारी भीड़ के शोर-शराबे को शान्त करती हुई एक आवाज गूज उठी। यह आवाज़ थी हथियारसाज प्रोस्पेरो की- 'अपने को हमारे हवाले कर दीजिये ! जनता जीत गई है! धनियों और पेटुओं की सत्ता का अन्त हो गया ! सारा नगर जनता के क़ब्जे में है। सभी मोटों को गिरफ्तार कर लिया गया है।' रंग-बिरगे कपड़े पहने उत्तेजित जनता की मजबूत दीवार ने तीन मोटों को अपने धेरै ले लिया। लोग लाल झंडे , लाठियां और तलवारें हिला रहे थे, चूंसे दिखा रहे थे। इसी समय एक गीत गूज उठा। तिवुल अपना हरा लबादा पहने प्रोस्पेरो की बगल में खड़ा था। उसके सिर पर चिथड़ा बंधा हुआ था जिसपर खून के धब्वे नजर आ रहे थे। "यह तो महज़ सपना है !" हाथों से प्रांखें बन्द करते हुए एक मोटा चिल्लाया। तिवुल और प्रोस्पेरो ने गाना शुरू किया। हजारों लोगों ने इस गीत में अपना स्वर मिलाया। यह गीत छा गया विराट पार्क के ऊपर, नहरों और पुलों पर। नगर के फाटकों से महल की ओर बढ़े आते लोगों यह गीत सुना, तो वे भी इसे गाने लगे। यह गीत समुद्री लहर की तरह बढ़ा चला जा रहा था सड़कों पर, लांघता जा रहा था फाटकों को, लहरा रहा था नगर में, सभी राहों और रास्तों पर जहां मजदूर और गरीब बढ़ रहे थे महल की ओर। अव सारा नगर ही इसे गा रहा था। यह गीत था जनता का, उस जनता का जिसने अपने उत्पीड़कों पर विजय पाई थी। इस गीत को सुनकर केवल तीन मोटे ही अपने मन्त्रियों समेत भेड़ों के रेवड़ की भाति सिमटते-सिकुड़ते और एक दूसरे के साथ सटे जा रहे थे, ऐसी बात नहीं थी। इसे सुनकर नगर के सभी वाके-छैले, मोटे दूकानदार, पेटू , व्यापारी, कुलीन महिलाएं और गंजी चादवाले जनरल डर और घबराहट से घर-थर काप रहे थे। ऐसे लगता था मानो वे गीत के बोल नहीं, तोप के गोले हो । ये लोग अपने लिये छिपने की जगह ढूढ़ते थे, कानों में उंगलियां ढूंसते थे पोर दिया, कढ़े हुए सिरहानी में अपने सिर छिपाते थे ताकि गीत के शब्द उन्हें सुनाई न दें। प्रापिर हुआ यह कि धनियों की भारी भीड़ बन्दरगाह की मोर भाग चली। इन लोगों ने जहाजों में बैठकर उस देश से भाग जाना चाहा जहां वे अपना सभी कुछ पो बैठे थे- अपनी सता, धन-दौलत और हरामखोरी की मजे की जिन्दगी। मगर बन्दरगाह पर उन्हें .
जहाज़िया ने घेर लिया। धनियो को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होने माफी मागी और कहा- " "हमे मारिये-पीटिये नही । हम अब आप लोगो से अपने लिये काम नहीं करवायेगे मगर जनता ने उनपर एतवार नहीं किया। कारण कि धनी लोग गरीबो और मजदूरो को कई वार धोखा दे चुके थे। सूरज शहर के ऊपर काफी ऊचा चमक रहा था। आकाश नीला-नीला था। ऐसे लगता था मानो लोग बहुत वडा और अभूतपूर्व पर्व मना रहे हो। अव सभी कुछ जनता के हाथो मे था- शस्त्र-भडार, वारेक, महल , अन्न-भडार और दूकानें। सभी जगह सैनिको का पहरा था जो अपने टोपो पर लाल रिवन लगाये थे। चौको मे लाल झण्डे लहरा रहे थे जिनपर ये शब्द अकित थे- जो कुछ गरीवो के हाथो का बना हुआ है, उसपर गरीबो का ही अधिकार है। जय जनता! कामचोर और पेटू मुर्दावाद! . मगर तीन मोटो का क्या हुआ? उन्ह महल' के बडे हॉल मे लोगो को दिखाने के लिये लाया गया। हरे कफा वाली सलेटी रग की जाकेटे पहने मजदूर बन्दूकें लिये हुए पहरा दे रहे थे। हॉल सूरज की किरणा से जगमगा रहा था। प्रोह , कितनी बडी भीड थी यहा लोगा की। मगर बहुत ही भिन थे ये लोग उन से जिनके सामने नन्ही सूत्रोक ने उस दिन गाना गाया था जव उत्तराधिकारी टूट्टी से उसका परिचय हुआ था। यहा वही दर्शक जमा थे, जो चौको और वाज़ारा म सूत्रोक का कार्यक्रम देखकर तालिया बजाते थे। अब उनके चेहरे खिले हुए थे, उनपर खुशी झलक रही थी। लोग एक दूसरे के साथ सटे हुए थे, रेल-पेल और हसी-मजाक कर रहे थे। कुछेक की आखो म तो खुशी के प्रासू भी थे। महल के समारोही हॉला मे ऐसे मेहमान कभी नही आये थे। इनके ऊपर मूरज भी कभी ऐसे तेजी से नहीं चमका था। शो!" चुप हो जाइये।" " ॥
था "चुप हो जाइये!" जीने के ऊपर कैदियों का जुलूस दियाई दिया। तीन मोटों की नजरें झुकी हुई थीं। सवसे आगे-आगे था प्रोस्पेरो और उसके साथ-साथ तिबुल। ख शी भरे शोर से हॉल के स्तम्भ हिल रहे थे और तीन मोटों के कान फटे जा रहे थे। उन्हें जीने से नीचे लाया गया ताकि लोग उन्हे निकट से देखकर इस बात की तसल्ली कर लें कि ये भयानक मोटे वन्दी बनाये जा चुके हैं। "हां तो..." स्तम्भ के पास खड़े होकर प्रोस्पेरो ने कहा। उसका कद विराट स्तम्भ की आधी ऊंचाई के बराबर था। उसका लाल बालों वाला सिर सूरज की रोशनी में अंगारों की भांति दहक रहा था। "हां तो..." उसने कहा,"तो ये रहे तीन मोटे। ये जनता को लूटते-खसोटते थे। ये हमें खून-पसीना एक करने के लिये मजबूर करते थे और हमसे सभी कुछ छीन लेते थे। आप देख रहे है न कि कैसे उनपर चर्वी चढ़ी हुई है ! हमने इनपर विजय प्राप्त कर ली है। अब हम खुद अपने लिये काम करेंगे। हम सब समान होगे। हमारे बीच न धनी होगे , न कामचोर और न ही पेटू। अब हमारी जिन्दगी खूब मजे मे गुजरेगी, हम सभी के पास पेट भरकर खाने-पीने को होगा और हम सभी धनी होगे। अगर हमें बुरे दिन भी देखने पडेगे तो भी इस बात का सन्तोष होगा कि ऐसा कोई नहीं है जो मोटा होता जा रहा है जबकि हम भूखों मर रहे है... 'हुर्रा! हुर्रा !" सभी लोग चिल्ला उठे। तीन मोटो ने नाकें सुड़की। आज हमारी जीत का दिन है। देखिये तो, सूरज कैसे चमक रहा है ! सुनिये तो, परिन्दे कसे चहचहा रहे है ! फूल कैसे महक रहे है ! इस दिन, इस घड़ी को सदा याद रखियेगा!" - " " . १६० प्रोस्पेरो ने जव "घडी" कहा तो सभी लोगो का ध्यान उस तरफ गया जहा घडी लगी हुई थी। दो स्तम्भो के वीचवाली जगह पर घडी लटकी हुई थी। यह वलूत की लकडी का बहुत बडा वक्सा था, सुन्दर मीनाकारी और नक्काशी वाला। मध्य मे आकडो वाला काला सा चक्र था। " अचानक " 'सूत्रोक ।" । । 'क्या वजा है इस वक्त?" हॉल मे उपस्थित हर व्यक्ति ने सोचा। और अचानक (हमारी इस पुस्तक मे यह अन्तिम अचानक वलूत के वक्से का दरवाजा पूरी तरह खुल गया। वहा घडी के कल-पुर्जे नजर नही आये , उन्हे निकाल दिया गया था। तावे के स्प्रिंगो और चको की जगह इस छोटी-सी अलमारी मे गुलाबी-गुलावी और चमकती-दमकती सूत्रोक वैठी थी। सभी लोग आश्चर्यचकित रह गये। 'सूमोक" वच्चे चिल्लाये । 'सूत्रोक। सूत्रोक | सूत्रोक |" तालियो की गडगडाहट गूज उठी। नीली पाखो वाले सैनिक ने बालिका को वक्से से वाहर निकाला। यह वही नीली पाखा वाला सैनिक था जो नृत्य-शिक्षक एक दो-तीन के गत्ते के वक्से मे से उत्तराधिकारी टूट्टी की गुडिया उठा ले गया था। वही उसे महल में लाया था, उसी ने धौल जमाकर सरकारी सलाहकार और उस सैनिक को पौधे मुह जमीन पर गिरा दिया था जो जीती-जागती वेचारी सूत्रोक को पेटी से पकडकर उठाये लिये जा रहा था। उसी ने सूत्रोक को घडी के वक्से मे बन्द कर उसकी जगह बेजान और खस्ताहाल गुडिया रख दी थी। याद है न अापको कि मुकदमे की कार्रवाई के समय उसने कैसे इस गुडिया के कधे झकझोरे थे और फिर उसे दहाडते हुए शेरो के सामने फेक दिया था लोग सूत्रोक को वारी-बारी से अपने हाथो मे लेने लगे। ये वही लोग थे जो उसे ससार की सर्वश्रेष्ठ नर्तकी मानते थे, जो अपनी जेब का आखिरी सिक्का तक उसकी दरी पर फेक देते थे। वे अव उसे गोद मे उटाते थे, “सूत्रोक I" - धीरे से उसका नाम लेते थे, उसे चूमते और गले से लगाते थे। इन लोगो की खुरदरी, फटी और कालिख तथा तारकोल पुती जाटा के नीचे धडक रहे थे उनके यातनाए सहनेवाले दिल, उदारता और कोमलता ? से प्रोत-प्रोत हृदय। स्त्रोक हसती, उनके अस्तव्यस्त वालो को थपथपाती और अपने नन्हे-नन्हे हाथो से उनके चेहरा का ताजा लहू पोछती, वच्चा को गुदगुदाती, तरह-तरह के मुह वनाती, खुशी के ग्रासू वहाती और अस्पप्ट-से शब्द बुदबुदाती। १६१ " 'इसे इधर बढ़ा दीजिये ," हथियारसाज ने कांपती हुई आवाज़ में कहा। बहुत-से लोगों को उसकी आखों में आसू चमकते प्रतीत हुए । इसी ने मेरी जान बचायी थी!" इधर बढ़ाइये इसे! इधर!" एक बड़े पत्ते की भाति अपना हरा लवादा हिलाते हुए तिबुल चिल्लाया। 'यह मेरी नन्ही-सी सहेली है! इधर आओ, सूत्रोक !" दूरी पर भीड़ को चीरते और मुस्कराते हुए जल्दी-जल्दी वढ़े पा रहे थे नाटे कद के डाक्टर गास्पर... तीन मोटों को उसी पिंजरे में वन्द कर दिया गया जिसमें हथियारसाज प्रोस्पेरो को बन्द किया गया था।
एक उपसहार वर्षे बाद नगर में हसी-गुशी का राज था, जशन मनाया जा रहा था। लोग तीन मोटा के जुए से मुक्ति पान की पहली वर्षगाठ मना रहे थे। सितारे के चौक में चालको के लिये तमाशे की व्यवस्था की गयी। सूमोक का नाम इश्तिहारा को शामा वढा रहा था- सूत्रोक! सूत्रोक! सूमोक। - हजारा बालक अपनी प्यारी अभिनेत्री के मच पर पाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। पर्व के इस दिन वह मच पर माई, मगर अकेली ही नहीं। उसके साथ एक छोटा-सा लडका भी था, बहुत कुछ उसी से मिलता-जुलता। फर्क सिर्फ इतना , कि उसके वाल सुनहरे थे। यह उसका भाई और कुछ समय पहले तक उत्तराधिकारी टूट्टी था। नगर ठहाको और गीता से गूज रहा था, झडे फडफडा रहे थे, मालिने अपनी झोलियो में से पुष्प-वर्षा कर रही थी, रग-विरगे परा के फुदना से सजाये गये घोडे उछल-कूद रहे थे, हिडोले घूम रहे थे और सितारे के चौक मे नन्हे-मुन्ने दर्शक दम साधे तमाशा देख रहे थे। तमाशा खत्म होने पर सूत्रोक और टूट्टी को फूलो से लाद दिया गया। वालको ने उन्हें घेर लिया। सूत्रोक ने अपने नये फ्रॉक की जेब मे से एक तख्ती निकाली और उसपर लिखे कुछ शब्द वालका को पढ़कर सुनाये। हमारे पाठका को इस तख्ती का ध्यान होगा। यह तख्ती एक भयानक रात को चिडियाघर के एक पिजरे मे बन्द दम तोडते हुए उस रहस्यपूर्ण व्यक्ति ने सूत्रोक को दी जो भेडिये जैसा लगता था। उसपर यह लिखा हुआ था- "तुम दो थे, वह्न और भाई - सूत्रोक और टूट्टी। 'जब तुम दोनो चार-चार वर्ष के हुए, तो तीन मोटो के सैनिक तुम्हे मा-बाप के घर से उठा लाये। हू तूब, एक वैज्ञानिक । मुझे महल मे बुलाया गया। नन्ही सूत्रोक और टूट्टी को "मै मेरे सामने लाया गया। "तीन मोटो ने मुझसे कहा - इस वालिका को देख रहे हो, न हू व-हू ऐसी ही एक गुडिया बना दो।' में नही जानता था कि किसलिये उन्हे ऐसी गुडिया की ज़रूरत थी।
" मैने ऐसी ही गुड़िया बना दी। मैं बहुत बड़ा वैज्ञानिक था। मुझे ऐसी गुड़िया व का आदेश दिया गया था कि वह जीवित लड़की की भाति बढ़ती जाये। सूत्रोक की : पाच वर्ष की हो तो गुड़िया की भी। सूत्रोक बड़ी हो, प्यारी और उदास-सी लड़की बने । गुड़िया भी। मैने ऐसी ही गुड़िया बना दी। तब तुम दोनों को अलग कर दिया गया। गुडि के साथ टूट्टी महल मे ही रह गया और सूग्रोक को बहुत बढ़िया नसल के लम्बी ल दाढ़ीवाले तोते के वदले एक चलते-फिरते सरकस को सौप दिया गया। तीन मोटों ने : आदेश दिया- 'लड़के का दिल निकालकर उसकी जगह लोहे का दिल लगा दो।' मैने ऐ करने से इनकार कर दिया। मैने कहा कि इन्सान को उसके इन्सानी दिल से वचित कर ठीक नहीं। किसी भी तरह का, लोहे , वर्फ या सोने का दिल, इन्सान के साधारण अं असली इन्सानी दिल की जगह नहीं ले सकता। मुझे पिंजरे में बन्द कर दिया गया ग्रं लड़के से झूठमूठ यह कहा जाने लगा कि उसका दिल लोहे का है। वे चाहते थे कि लड़का इ वात पर विश्वास करे और ज़ालिम तथा संगदिल बन जाये। मैं आठ वर्षों से जानवरों बीच रह रहा हूं। मेरे शरीर पर लम्बे-लम्बे बाल उग आये हैं और दात लम्बे-लम्वे श्री पीले-पीले हो गये हैं। मगर में तुम लोगों को नहीं भूला। मैं तुमसे माफ़ी चाहता हूं। ह सभी तीन मोटों के कारण बदनसीब वने , धनियों और पेटुओं के उत्पीड़न के शिकार हुए मुझे क्षमा कर देना टूट्टी, जिसका गरीबों की भाषा में अर्थ है - 'जुदाई'। मुझे क्षम कर देना सूत्रोक , जिसका अर्थ है- 'जीवन भर के लिए'..." .
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.