Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Hindi Geetavigyanbhashya Bhumika Khand-1
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* सम्पादकीय पक्तव्य और प्रस्तावना
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श्री सम्पादकीयवक्तव्य प्रिय पाठक गया ! भस्मता का विषय है कि पाम हम एक प्रपूषार, एक प्रद्मुम पुस्तक मार लोगों के समक्ष उप िफर कर रहे है। घिरकार से हमा । यह संकरा कि "यपुर के ही नहीं, अपितु ममबस के प्रसिद्ध विद्वान् सशाम पारङ्गत परम प्रदेष श्रीपघुमानमा मोमा के प्रिय एवं प्रधान शिष्य मुधर पणित प्रीमोतीनाममा शाजी द्वारा लिखित श्रीमद्भगमनीता। हिन्दी विमानमाम्य पर करें । भपने इस संकाय का कप में परिणत करने के लिए सब जव शाम्बीनी से प्रस्ताव किया गया, तब तब ही उनकी भोर से मर्पसमस्या की महा बिमीपिका सामने आता रही, मत हमें मपावधि मन मसोस कर ही रह पाना पड़ा । ईपरेफ्टा बास्तव में अघटित घटना पटीसी । । सगमग पार महीने पहिले शास्त्री जी की भोर से हमें पह शुम सन्देश मिला कि "कसा कुछ एक सादिमममियों के मायो- पन से 4 के माननाप पनियों न पोहास इस संमा पिया है, और उनकी यह पेरमाई है कि दिग्दो गीतामा प्रकाशित कि जाय । इस प्रकार शोध ही या समवसर यन नं प्रकारेण दाप माही गया मोर मक्सिम उस भाष्य का प्रकाशन भारभ हो गया' परिणाम समय भागमाष्प की भूमिका का पह प्रथमम्पया आप सोगों के करकमयों में विराजित है। पह किसी से भी तिरोहित नहीं कि गुरसर भी मोमाजी महाराजने परमा सम्पूर्ण जीरन रिकतारबाम्बेषण में लगा कर शताब्दिों से नही, सहसास्टियों से यो परिकरित्राम तरस महान की तमोमप गुरा में रिसीन दोरहे थे उ आलोक गहबाने के लिए शिवाधिक प्रम्प रप र प्रचपा मार्ग का सा प्रया प्रारा फसा रिया । भोर विहानगत् को सजग पर पारे। परम्त हिन्दी मेमार के लिए पर भी परम रोम विपरित समापन गोर की संस्तत मापा लिग जिनमें भी कई कप तो भएर रवमय बसने र - सं.कम्य मोर मी अधिक दुस्मन है। फसता भार का हिन्दी संसार उन से सम्या बधित त कर अधिक साम ठपने में असमर्थ ही बन रहा है। सस्त साहिम को इससे पर ही परमोमसि ।।रो संरहनामी इससे विशेष साम उठाते मही दीयते । फारस इस का पीक वो समता में देर रविगक व उदरापना से ही सम्प मही मिसत्ता । परयदी फुल एक एसे भी संत जविहान है जो इस पित से विमुक्त रहते हुए इस काय में सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। परम्त हम देखते से विद्वान् कामिनी रेमिम विसाम और साप्पाहरा की कविता के रसासादन में सगे राते है। एक पुराने गरे के एमे निशान है जो करन-माटों को उपेक्षा कीर से देखते हुए मौलिक साहिमाश्वेपस में प्रातरवे । करना न हो कि इनका पर बवेषण कार्य पमण-म्पाप-वेदान्त मादि पर ही निभाम किए रजिस दिकसाहिम की तासिक ोन के लिए मङ्गरूप इन पासादि शास्त्रों का उपयोग एमा , मौलिक मेद वो सर्पया संपर ही बात है कि सिपो की भोरगति सना एवं ऐसे पानिक जटिल विषयों का पाना, और उनका प्रचार कर तघरा बनता को सम- मामुपमिनी नाना तोन तीसरी कोटि केमिानों के लिए भी एक मटित समस्याही बना। पर मानिक ससR में हिन्दी की सर्वत्र भाप रूप से प्रधित एप सर्वमान्य तपा कोकपिप कन रसी।। दुतपेग से गाते हुए इस प्रण ने उपकार का तक किया है या बताना कठिन है। परि हिम्दीसंसार दुरा न माने तो इसके सम्मान में बिना लिसी सकोष के यह कहा सस्ता लम्दिी साशिप, एवं हिन्दी साहित्यमान भी मोहिमय से पधित हो रहे है। रिपी ने घटकी, रसीले सर्वमा कम्पित उफ्पासों को हमारे सामने रमते हुए मात्र पाम्पान्तर बगत के उत्पान के स्थान में समाचारस का मस्तिकत कर दिए है। भरपती सवयोकमाम्प पिक का गौतारण चन्द्रकान्त ताम्म, जानेपरीगीता पनि उसकोटि के दाम्त प्रत्य मी हिन्दी का गौरव का हे , मप श्रीमाप्रसादमी बिपी हिसित "पमिदास और मामूनि "साहित्पसीर"मावि प्रपसम्प-साधिप संवच्म्य , को मी उमत बनाने का प्रयास कर रहे हैं, श्रीरामदास गौर की " शानिकी" "मारप पायास्पविमान" "पौतिकविद्वान" भारि हतियों ने विधामनगर में मी कुछ सनसनाहट पैदा की। श्रीरयामसुदरदास बी ए घर मी ' मापानिशान" साहित्यालोचन" ये दो दर कतिए उपसम्म है इस अतिरिक्त समीराधाकृष्ण (माविक्षपुरस्कारप्राप्तकी) धीमगवानदासकेला, श्रीराचन्द गौरीहर भोमा, श्रीमायसवाल, रामचन्द्र बम्मी, कमर रपुराबसिह, मुन्शी देवीप्रसाद, भीमाइमाप सरकार, श्रीरामचन्द्रराम, पीईयरीप्रसाद पारि महामामों के हरा मी इतिहास मापानिझाम, दर्शन, भादि क सोन के सम्बन्ध में हिन्दीसाहित्य को निकास का वक्सर मिला है। यह सब कुछ ठीक मानते पर भी हमें यह सीकर का सेने में कोई भापति मह करमी चाहिए कि मिस मौलिक (रिक) साहित्य पर मार्यमाति का जीन प्रमम्मित है उस भोर से प्रमी तक हम उदासीन की है। फिर बतलाए, ऐसे प्रता- मस में नीमोमांची माराम के प्रन्यों का प्रचार कैमे सम्भव होसकता है। पपपि इस उसमन को सम्माने के लिए भाप के कतिपय उबकोटि के सुप्रसिर पिप्पों में भनेक पान मी किए, भाषा में समय समय पर इनकी भोर से ऊप ममप भी बिस्ले गए, परन्तु मनम्पनिष्ठा से रहित इन का यह प्रयाप भी पूर्णरूप से सफल न हो सका, और फिर सांसारिक कार्यों में अनबरत व्यस्त रह कर कौन किस कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकता है। रियर का नियतिचक्र सचमुच मगम्प है। प्रप मोमासी के जिस बाम्पने हमें निराश कर दिवा पा विपतिका रे अनुप्रा से या निराशा मागे गाकर प्रतीचामपी एग सस्प भाण के मप में परिणत हो गई और मात्र तो उस प्रतीक्षा ने प्रस्पद का ही रूप पा रस कर लिया है। सम्मान दस पना वर्ष के पहिसे की घटना है, जयपुर के प्रतिष्ठित भान् स० मापासपन्दगो शात्री के सपोप पुत्र प्रीमोतीच जमी शाखी ने मीमोम्पनी से प्रेरक विषयों का अप्पयन भारम्भ किया, और साथ ही में उमके प्रचार का कार्यमार मपने उपर सेते हुए हिन्दी में हन अटिन विषयों की विस्तृत विवेचना लिसमा भी प्रारम्भ कर दिया। ३ सम्बचम्म जैसा कि हमने कई बार जप शादीमी के मुख से मी समा , सह ममप साहित्य का गुप्तरणस्प हिदी में यावत् कमी प्रकट नही किस पासमता । फिर मी मित्रर्म की रेय प्रे रणा से एवं “सोमप्रापेवापि सम्परयन् कतुर्मासि" इस मगदादेश की प्रेरणा से वर्तमान जगत् को म पामवृधि को लक्ष्य में सो ए रानी ने दीमापा की भाप लेना मामक समम्म । परिणाम बरूप प्रम समप पीछे की पर्ने नैदिक साहित्य के समसिर मम्प रामपप- बामण का "हिन्दीनिकाममाप्य " मासिक पुस्तकरूप से प्रकाशित करमा भारम्भ कर दिया जो कि पर्पसमस्पा की जटिगता में निरन्तर प्रकाशित म होता जा भी सुनिधा- मुसार मात्र तक अपनी सत्ता सरपत रस रहा है। इसके पतिरिक्त मापने विनिमरिकी पर्यो पर मी भनेक प्रम्प लिसे मन में से बिगत समसर में ही बम्बई की कमेटी की और से रो सपों में निमक, एक सरपृष्ठामा 'इगोपनिपा-गिम्दी-विद्वानमाप्प ' प्रकाशित होकर अपनी अपूर्णता प्रदर्शित कर चुका है। हर इस गीतानिशानम प्प का स्थान प्रापकी प्रकाशित कृतियों में से ( शतपप एष मायापम प को कोर कर ) तम्सरा है । प्रस्तुत पितामाप्प सीन सपनों में साम पा है। पहिला भूमिकाकायर, सम श्रीरुपातसया एवं तीसरा मूममाप्पाया है। पहिया भूमिकापा मी दिलणा- भकर-पहिरपरीवात्मक मन्तरपरीवारमक, एक समसमपरीयामक प्रपमसा में प्रकरणों के द्वारा भीममा मनवा के बाहिरी ऐतिहासिक सहप का दिग्दर्शन परापा गया है। रितीपसपा में इसके समरङ्ग पहप के प्रदर्शन के लिए दार्शनिक पौर शानिकार से भारमपरीक्षा प्रयकर्मपरीवा पर्मयोपरीक्षा बानयोगपरीपा इन विषयों का समावेशामा - यामामी की भोर सरिसीमापा में गो मा पन्ध मिस गर म उनका सचिम परिचय हिम्मी मंसिरा में "परिचयपत्रिम' पर शीघ्र ही अपने पेरमेमी पाठक सामुन पपस्थित करने वाब- मम्पादक सं.परम्प . है। एक तीसरे सपा में मक्तियोगपरीक्षा पुरियोगपरीक्षा, गीतासारपरीरीचा, इन तीन विषयों के ए गीता के साम्तरतम गुम विरों का सीकरणामा। श्रीकृष्णतरस्काण नामक दूसरा काण भी तीन सयों में ही बिमाकपा है। इस में अनेक प्रकरणों के द्वारा गीताचाप श्रीका का शानिक सहप प्रनादित हुमा है। साम्स में मुसमाप्य मानक सीसरा कापा मारे सामने माता है । ०१ सों में विभक्त इस वृतीय म्बमाप्पकापा में २१ उपनिषदों में विमात १६० उपदेशों का मौनिक रास्प निरूपित पपपि संसार में प्रबरक गीताशाख पर भनेक टीए, एक मप लिस्ले गापुर हैं। जिन में कोई फर्मयोग का पाठ पढ़ाने पाला, कोई शानयोग की शिक्षा द रहा है, तीसरा कोई मकियोग का ही उपदेशा बन रहा है। इसके अतिरिक्ष का एक पास गता युक्तियुक्त तीनों का समन्वय ही गीता का मुख्य ठरेश्प माने बठे हैं उनका कहना है कि- "ीिताशाम हमें जान कर्म, एवं भक्तियोग का समानर से पार पहाता । म यह प्रमा अनुम करते है कि शाम और भक्ति के बिना हमें प्रामे कम्म काम ) मे. पिच को शान्ति मही मिती । प्रत्येक कार में पासोक और उरमाह की भावरपाना होता न आलोक प्रदान करता, मागे का मार्ग मृधित करता पुमा हमारे बाप्प का पर प्राक बनता है, एवं भदा मक परीय पसरा दाग कर्ममार्ग में हमारा सामान पासीनतान और भक्ति के साप वर्मक ने बामा सम्लता पासतापपपि पानामताकि इस नियमाण कार्य में अमुक पत्र के प्रारित होगी, जानयोग के कारण मसे बिर पर पूरा भरोसा पता । मत बह मार्म में निरन्तर प्राव बना मा मी निर्मित बनता मा मोहक अधिकार बन जाता है । पर तो या पुराने म्याम्पानामों का यार । मा प्रान मापने ना जरा विचार मोजिए । माग पा गानाशिानमा महिमान तीनों प्रपन दोनों में से म -- - किसी एक का मी निरूपण म पर, तीनों से सर्वपा गपूर्व एक काबदोर से विलुप्तप्राय पोरे मुटियोग" की ही मप से इति तक शिक्षा देवा। गौवाब का पा भपूर्ण पुखियोग बराग्य शान, परवर्प, पर्म इन पार मामों में विमल है। राम्पबुद्धिप्रतिपादिनी रानपिपिण, बानगुद्धिमतिगदिनी सिषिण ऐश्वयु विप्रतिपादिनी रामरिण, एवं धर्मनिप्रतिपादिनी प्रापिण ही गरिता का मुख्य विषय है। भख. इस माप्प में क्या सिएसवा, पर तो पाठक मायावतोरम से ही निवप कर स केगे-"नरकटिकापोदा रापपेन रिमाम्पते" । साम्य पषिक होगया है। अब इमरे प्रिप पाठको पर ही इसकी सपादेयता, किंवा भनुपादेयता का मारगरते हुए इसे हम बी समाप्त करते। प्रसव भूमिकाप्रसमसपा में सम्पादन संशोधन एक प्रकारान पारि के सम्बन्ध में हम से पाक रोसका सापपानी रस्सी !! तपापि कमेटी के AN दोन बाधी स्वरा से, पेस के प्रमाद से, एम्परे बुद्धिदोप से यो बुष्टिएं एगी। उनके लिए सपाद के मतिमत मौर कोन उचरदापी होसकता है। पोर पर सिमा धमा-प्रार्पना कर भी क्या सकती। मता दम भीतर इसी क प्रचलित परम्यात्मक कम्प का अनुसरण किए सेते है। इति गप । विमन- पी-पीनामा सम्पादका बापु८२.-1-1 नवल किशोरशर्मा-कार
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सम्प किसी एक का मी निरूपम न कर, तीनों से सर्वपापपूर्व एव कायोत से ममुप्तप्राय बीचे 'पुरियोग" की ही वप से पति तक शिक्षा देता। गोगा कर परमपूर्ण गुद्धियोग वैराग्य ज्ञान, परपर्य, पर्म इन चार भागों में सिमझ । यग्य विप्रतिपादिनी रानपिरिण, मनमुनिप्रतिदिनी सिरविण ऐरम्या लिप्रतिपादिनी रामपिया, एवं धर्मबुद्धिप्रतिपादिनी भार्पपिचा ही गाना का मुम्म रपय है। पर इस माप्य में क्या नियता , पाये पाठक माध्पाचोकन से ही नियम कर स को-"मकिद्रिकापोदः उपपेन विभाम्पते' ।कम्प प्रषिक होगया है। अब इमरे प्रिय पाठकों पर शासकी वादेयता, किप भनुपासत्य का मार गाते हुए इसे हम यही समाप्त करते।। प्रखव भूमिकाप्रममाया में सम्पादन संशोधन एवं प्रकाशन भारि के समय में रम से पातक ऐसच सापपानी पी । तपापि कमेटी के बारा होन माजी रा से, मेस के प्रपद से, हम्परे पुदिदोष से जो मुटिए र गाई, उनके लिए सम्पादक के अतिरित और करेन उत्तरदामी दोसस्ता और पसिना पा-प्रापना कर मीमा सकता । मवादम भी पर इसी पोक प्रचलित परम्पामक कम्पका भनुम्मर किए सेवे। इति गम् । बिमन- बरपुर २-1-10 नवलकिशोरशर्मा-कार ॐ प्रस्तावना उपय कृष्णावतार पूस पुरप के अनुमा से ही भाज हम अपनं गीताप्रेमियों के सम्मुस गीताविज्ञानमाप्यमूमिका का पहिरङ्गापरीधारमक प्रपमसया उपस्पिस करने में समप होसके है। माशा है, मवीन टि को (नहीं ! नहीं !! सरया प्राचीम एशि को ) पपना सहप बनाने वाली यह माभ्यम् मिक पाठकों के मनोरखन के माप साप ठरें गीता के किसो वपूर्ण सिंधान का अनुग्मी बनावेगी। जयपुर के प्रपान रामपपिटप्स , विषाबावसति , समीक्षार्ण गुरुवर १०० श्रीमघुमुदन नी भोमन के पवित्र नाम से, एष उनकी विज्ञाननिधि से कोई भी भारतीय है द्वान् भपरिचित न होम | भापने भारतीय साहित्य पर, निरोषप्त वैविक साहिस्प पर सात पालमप में पगमग २८८ मतन्त्र प्रम्प लिस्ने ।। १०-१२ ग्रन्पों को छोर का शेप प्रम्प अप्रकाशित समस्या में राते हुए हमें भमिशाप ही दे रहे हैं। पूज्य मोमानी ने गीता पर एक स्वत-प्र भाष्य लिखा है। यह माष्य पर कम्पहरो में बिमकामा सस्प सापक मागायतदप मेद से कापयतुपामास माम्प ने सधमुनर्गता के सम्बन्ध में एक मर्व मुग उपस्थित कर लिया है। जैसा न मान सबसपारस गीता के सम्बन्ध में कर्म. मकि-मानयोग मामक तीरों सिदान्तो में पास्पर अहमहमिका वस दी । इसके निम्म्म माम्पकार की मोर से सर्पया मपूर्ण एवं एकान्तः रहस्यपूण हप्तप्र यमुदियोग सिदान्त स्पापित मा । पौतमदी गोना कोभनयोगशास मान रहे हैं सम्प्रदायिकों की रष्टि में गोता मकि पोशा है एवं पनारमिक कुछ एक पर्वाचीन राष्ट्रवादियों ने इसे कर्मयोग शान मानने का -
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मा प्रस्तावना - पिरित "मगरदीनायसंग्र" नाम की सबसे प्राचीन उस युदियोगानुग्रनिनी पीतम्यास्या पवश्य ही एक मार पात करें। पाठकों को ग नान पर कोई वापय मही करना चाहिए कि गीतातत्व की उपक दर्दम से पुम्म बने हुए भगदीरकर की प्रेरणा से ही श्रीमोमानी के द्वारा कर वितुल योग ना हमारे सामने जाया है । महापुरुषों के परिमाग्मित हान से सम्बन्ध रमने पाली भाषा समका गभीरा क अपने गर्म में रसती ई पति सप्ति होती । इसीलिए सर्वसाधारण उससे साम महीं उठा सकते । फिर धीमोमाभी की कृतियों के सम्बन्ध में तो पा समस्पा मोर मी पटिस बनी। ग्मेवा उपनिषदों का साRT, उपनिषत् वेद काही मन्तिम माय है । मत एक जब वक वैदिकतत्वों का विज्ञानयुक्त शानरसि से पूसतम माछोडन मिठोहन नहीं कर लिया गता, सावक सत्सारमूता गीता का यात समन्वय कर सेना कठिन ही मही, अपितु नितान्त मसम्मा है । पर मिगत शताब्दियों से दिकसाहिल के प्रति मारतीप मिहामों की नो उपेक्षा पसी भा रही है, उससे तो हमारी समस्या और भी अधिक भटिस बन जाती है वहाँ उप- उममाप्य पर्व म्याम्ल्याए शामप्रपामा दर्शनरपि को लिए हुए मनुग्युक्त बन रहे है, वा श्री भोम्पनी का विज्ञानमाप सस्कृसमापा से (पा भी मतिसंक्षिप्त ), व वैदिकविज्ञानप्रधाना गानिकरष्टि से युक्त बमाता मा सर्वसाधारण की कौन को, निगमों तक के लिए एक समस्या बन रहा है। • पम्प गोमाजी रे पतुफाएप्रस्मक माप्य शीपफकाएर, रदस्परा अपपुग्यम्प प.महापना म (ला जनरल प्रेम इसाहाबाद म) मा १०१, १६ में प्रगति हाग। भीमरा भारायशित दादा मम्भवतः बर २० मापन पाया खय भरा भी अप्रकाशित दी, माप दी म भभीत से प्रम्य का रूप भी न मिला है । पर मममप स बीमाम्पग्री प्रावस्प रहता है प्रतण सयभरा (ममचर) नाम पी पप पारे।
मापिस्वावना प्राविया । मापार की रऐ में गीता मोकपर छत इन तीनों निष्ठामों से सर्वमा मिम, मगवान् के-"एर परम्परागमिष रानर्पयो विदुः इन शब्दों में महामारतयुग से मात परिसे रेस सिस्यन् प्रादेमनु, मारतीपमघाद् इवाफ मिपिछेश विदेह नमक इस्पादि रामपियो में ही गुरु-शिम्प परम्परा से पुरचित, किन्तु महामारत समप में सपा A नए, पुन उसी शाक्तार धारा (वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारा ) B वन के प्रश्न उपदिए उस पुरातन योग (राग पिपिवानगत, मका दुरुपोग मामक योग ) का प्रतिपादन करती है। मिसप्रकार देवपुग के मारम्म में मपयोगपकिन मपया तर राप सम्प्रपम Of स्पन के प्रति उपदिश मिनायोग कारदोष से मागे पाकर सपा मर हो गया था, एवं महा- मारत में उस का मन विमेत मे पुरवार एमा वा एबमेश महामारत मोर पर्वमानकात के बीच में मक्कि काम होगाने से वा योग पुना मा हो गपा । पुनः उहाँ छोकप्रपरित कर्म-माननिष्ठामों में मिला उस पुरातन रहस्पयोग का पासनबीन लिया। पी करतो कि महाभारत से लगभग एक सहस्रनों के पीछे से बारम्भ कर मायतक माता पर निस्ने माप, मितमी ग्यास्याए, मिनी टिपसिए ई., मम सब कर्म-मति-काम तीनों से किसी एक की प्रधानता उपम्प होती है। एक म्या स्पाय ने वरप ही इस सम्बन्ध में वाने मुखियोग से काम लिया है। उसने किसी प्यारपता चमनुगमनमकर, लता के मदरों बेगम बना कर मतन्त्ररूप से पिता का समय करने की पेश की, भोर म पुरुषपुत्र भरने इस प्रास में भाशिकरूप से सफर भीमा ताप्रेमी दानों से हम ना करेंगे कि वे मामोधर श्रीमदमिनबगुवपादाचार्प" A सोम मरवा योगो न परम्प (d )। स स्मार्च मात्र पोटक पुरातन । मोऽसि मे सबा पेवि यवतमम् ।। (गी ४३) । ० इमविषमते पोय मोफयानहमम्पयम् (गी)। २ हा प्रस्तावना - रिचित "मगमहीनायसंग्रा' माम की सबसे प्राचीन उस बुदियोगानुपस्मिी गीतापास्या पर वश्य ही एक बार दप्पात करें। पाठकों को यह मान कर कोई वामय नही करना चाहिए कि गीतातत्व की उक्त दुर्दश से तुम्ध बने हुए जयदीश्वर की प्रेरणा से ही श्रीमोमानी के द्वारा बह बिलु, योग पुनः हमारे सामने पापा है। महापुरुषों के परिमाणित झान से सम्बन्ध रखने वाली भाषा समापन गमीराप क अपने गर्म में रसती हुई भनि सपिप्त होती है। इसीलिए सर्वसाधारण उससे साम नहीं उठा सकते । फिर श्रीमोमामी की कृतियों के सम्बन्ध में तो पा समस्या भोर मी बटिस बनी हुई है। गीता उपनिषदों का सार है, उपनिपत् वेद काही अन्तिम माग है। मत पर सस सक पैदिकतनों का विज्ञानयुक्त पानरपि से पूर्णतया माठोडन मिठोडन मही कर लिया गाता, सब तक तवसारमूता गीता का यपावत् सम्पय कर खेमा कठिन ही नहीं, अपितु नितान्त मसम्मन है । इधर विगत शताब्दियों से पैदिकसाहिल के प्रति भारतीय पिडामों की यो उपेक्षा पसी भा रही है, उससे तो हमारी समस्या पौर भी पपिक बटिस बन जाती है यहाँ उप सम्ध भाम्प एवं म्पासाए शामप्रधाना दर्शमटि को लिए हुए अनुग्युक्त बन रो, महा श्री मोमाभी का विज्ञानमाष्प सततमापा से (पा मी मतिसंक्षिप्त ), ब *दिकविज्ञानप्रधाना पैशामिकादि से पुक्त स्मात्मामा सर्वसाधारण की कौन फो, विनों तक के लिए एक समस्या बन रहा। • पम्प प्रोग्रजी रे पतुष्पारपरमा माप्य के शीर्षककार, पदस्परा अपपुरगम्य भी सहायता म (मा जनरल प्रेस इसाहाबाद में) मरा १०४, १६ एठा में प्रकाशित सागए। वीसरा पाया प्रकाशित दादा है। सम्भवतः या २० मे मम्पन धाप पांगारपर- पर भी अप्रकाशिवती, माय टीम अभीतक इसे प्रम्य पहप भी नहीं मिला है। पर उप ममय स बीमामाजी प्रत्यस्य रहत अवय सपकार (ममपर) मम भी पपमा है। .
+ प्रस्तावना दूतावकार सेसक को श्रीमोमानो के मन्तेवासी होने का सौमाग्य प्राप्त है। उसी सीमाग्य के बर पर उसने सह सनस्ण मुरुमाने का समय किण। फससहप तीन कामों में हिन्दीविज्ञानभाप्प यहि मत् की वस्तु बना। रुप्मतसविरेचन-पगैचाकापा-ममकाण्ड मेद से तीन कारों में विमल यह हिन्द मास, कमाए. पृष्ठों में निरूपित पातसविरेचन नामक प्रपमास .... पृष्ठों में निरूपित परीक्षाकापा एष १०० पृष्ठों में निरूपित मुसकाण महमाप्प) समय पॐ में सम्पमाभा प्रथमकम्पा , समो में वित्तीयकार समों में, एक १सयों में (पाठकों की मुविधा के लिए) विमतामा है। गीता एक उपनिषत् नहीं, अपितु २९ उपनिषदों का समाशास्त्र, असा कि गौत्य के इति श्रीमदभगवड़ीवामपनिपर" इस अभ्यायोगमा बाप से स्पर है । सम्पूर ग्ता में पम्पय के विधामाग से समन्ध रखने पारी रामपिविया सिदरिया रामपिया मार्पमिपा इन पार चाों का कमरा (पारम्म से ६-२-५-६ इस मप्याप काम से नि रूपरामा बामो के साप साप सम्पयामा के कर्म से सम्बन्ध रसने पाले रामपि. निबानुगत रेराम्पबुद्धियोग सिविधानुन मानबुद्धियोग राजविषानुगत पेश्यबुदियोग, एक मामिषानुगत इन पम्मबुदियोग पर बुद्धियोगों का निम्पण मा है। योगप्रतिपादिकारिमका चारों विधामों में क्रमशः ५-२-1-७ इस क्रम से २० उप- मियो एक उपनिषत् वातम्यिोपक्रम प्रकरण में, तीम् उपनिषदे पातचिोपसहार प्रकरण में, सम्म्य गोता में १ उपनिषदे प्रतिष्ठित है। एकपनियामक उपनामप्रकार में २ सण्येश बारोपनि पदामिका रामपिनिया में उपनिषद कप मे ५७०११-सम्भू ५. उपदेश । निपामा सिमिया में उपनिषद कम से 11-1-सम्भप १२ उपदेश सुनिषदामिका रामगीचा में उपनिषत क्रम से ११-१५-६ सम्भूय १२ सपकेश, सप्तोगनिषदा मा भार्य निया में सानियत् क्रम से -५-1-२ -२-२-सम्भूप १६ उदेश प्रमुपनिषदात्मक उपसहार प्रकरण में उपानपद कम से ।-२-२-सम्मा ८ उपदेश, इसप्रकार सम्पूछ गौता शारकी २१ सपनिपो में । सत्य उपदेश ६मो प्रकरको 4 तास ४ राप्ती (गीता के ७०० श्लोक) क्रमश १५-१६-५८-१०-१८१-१५-५ इस रखोक कम से लिमालपा तो इमाचार सहमपामक चौबीस बसों में विमा सय विज्ञान म्यम्प का रूपेसाप्रदर्शन | अब पन्द्रह सहस पृष्ठात्मक, एक तीन सडों विमत परीक्षा- अवा के विषयों का दिग्दर्शन कराया जाता है। परीक्षाकायर के प्रपम नगर में बहिरगरवि से गीता की परीक्षा है, नैसा कि पाठक भागे की विषयसूची में देखो । वागे के दोनोलया प्रस्तरारष्टि एप सन्विरसमष्टि से सम्बन्ध रखते हैं । सात सौ पृथRमक द्वितीयसपर में प्रात्मपरीक्षा, प्रमफर्मपरीक्षा, कम- पोगपरीक्षाान तीन प्रकरणों का समावेशामा, एष यही मन्तरगपरीक्षात्मक द्वितीयसम।। पासी प्रधानमक क्तीयसपा में शानयोगपरीदा, भक्तियोगपरीक्षा, बुदियोगपरीक्षा,गी. पामारपरीक्षा, इन चार प्रकरणों का समवेश सभा है। यही सान्तरमपरीधारमक पतीप सपा। इस प्रकार महापात्मक परीक्षाकाण सोसासी पृष्ठों में सम्पम हुमा है। श्रीकृष्णततमिरूपणमक प्रपमकार के प्रपमसफर मै पुष्परुपागम्य प्रम्पककप्ण रास्प , परमेष्ठीतष्परस्प , हापसाप्पारास्प इन चार प्रकरणों का , रितीयामम परास्परकप्टरहस्य , पिररुष्परास्प , पानुपरुणराम्य , सत्यप्यारास्य इन चार प्रकरणों का, एवं पतीपसर में प्रतिछाकष्णरास्प,म्पोविकृप्याराग्य गीतारुणम्प, पानुपोचमप्रास्य, इन चार प्रकरयों का सम्प्रवेश मा ।।तीमा सपा मगमग १९.. प्रमों में सम्पस हुए। गीतामाप्प के माता यतपयनामापरिन्दीविज्ञानमाप्प , बगोपनिपाल दीविनाममाष्प , पिसाप, आदविज्ञानादि इतर प्रपों की पृष्ठसंस्पायो का परि संकलन किया तो पैदिक विज्ञान की ममिति पर प्रतिष्ठित इस साहित्य की सम्मा मगमग " -५० सरस पृष्ठ पर पहुंच जाती है। या निमिद है कि एक साहित्यसेवी महोरात्र माययम सेसनानि में पस्त रहता [मा खप इसका प्रकाशन करने में कभी समर्प मही हो सकता | पी विप्रतिपति को दूर करने के लिए दो वर्ष पहिले मर्ने सपा की यात्रा की . .
स्वापमा । पी। या गोकुल प्रपल एला, पर "कायमा स्पाद, मायाय पा स्पाव" कोही परि सार्प कर सका । बम्बई में पांच सास का मापोगन वा । इसका उपयोग नही की कमेटी पारा प्रकाशन सम्बन्धी सामान ( मशीनरी-ययप थादि ) में भा । उस मार का पाम पर इस प्रग के परियोष की भारपा प्रतीताई। जैसे तैसे करके विगत दो सवरसरों में इसी परियोग के लिए एक सहस पृछामक, दोनों में विभक गोपनिपत्नीन्दी विज्ञानमाप्य प्रकाशित एप । बम्बई कमेटी के रोष प्रण के परिशोप के लिए सामष्ठात्मक दो सपों में निम "उपनिषिधाममाप्यभूमि" का प्रकारान हो ।प्रपमसर समग सामस ।सम्मक्ता पौप मास तक प कार्य पूरा हो जायगा । पुग हमारे सामने ही अपावभीषिका उपस्थित ईहत गतवर्ष में काको जाना पदा । हा से बिसमा योगन हुमा पर बसाने बस जवसर नहीं है। यो इस भापोजन मा , मा परि सफल होगय तो कम से कम गौत्य दोकाम नरम ही सकते की कमेटी की भोर मे प्रकाशित होसकते हैं परम् मित्रों के द्वारा समय समय पर र यो समाचार मिते राते में देखते हुए ममी इस सम्बन्ध में निमित रूपसे पुत्र नही याग सकता । पहिले हो पाई का भापोवन ही म सम्पन है, फिर चमो उसकी भी पूरी सम्माना नहीं, ऐसी दशा में हमें पश्य ही प्रकाशन की सुम्परमा के लिए निकट मनिष्प में और कोई मार्ग निकालना पोप मम्त. प्रस्तुत गीतामाप्पभूमिका प्रथमसणारे प्रका पान का मेप कसाते की कमेटी कोही पत्पमप्यस्प पम्प मापसे मारतो मपान" मनुसार ससम्म भापोजन के लिए भी कमेटी इदय मे अमिनम्दनीय हैदिलीपसया का प्रकाशन होगा इसम हर कासपुरुष पर नि है भपवा सम महामुमायो पर पा बम्बित मोकनामक भारपसनों के साप इस माहिम मनुपमा बने हुए है। प्रस्तुत प्रयास खोकाधि के मनु उपादेय होगा कि नही स प्ररम का सम्रपान करने में हम असमर्प है। जनता इसे मानाचे भपता उपेक्षा करें इस में धनि छाम मानः समाप समसिमषित , भोर पहरण कम हामी साम को Fा प्रस्तावना सक्ष्य बनाते हुए, उसी मामदेवता के प्रति समर्पणमाव मागे करते हुए यह सक्षिप्त प्रस्तावना समाप्त की जाती है। गतः स्वमन पापि मनसेम प्रमादतः। इसन्ति दुर्भनास्ता समादपति समनाः ॥ प्रीफ्तामनेनामदेयतेति-शम् । दिपाशुपर्णिमा वि स १९९६ विधेय- मोतीलालशर्मा-मारदाज (गोड) जयपुर-राजधानी
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* फिफ्यसूची
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क. श्री
हिन्दी-गीताविज्ञानमाण्यमामिका प्रथमखराड की
सक्षिप्त--क्फियसकी
-मास्पनिवेदन 1-30
१-विपयोपक्रम
२-मियमलोकन
-शाखशन्दनिर्वधन
1-गाख का सामान्य नदश्य | ७-१८
५-सस्फारस्वकपर्निधन ।)
६-गीनाकाममीमांसा
७-गीनानापमीमांसा ५१-१४६
८-गीतागात्र को भरना पूर्णता, एवं विमक्ष माना ।७-१६०
1-शानिक विपपविभाग १६८-२१६
१.-सरन्यामिशान २१७-२४४
"-गीतापतिपादित विषा एवं योगश्मृिति २४५-२०६
१२-गीता का मुदियोग
१७-पीनामतिपादित विषा पर योग के ममप में मगवद्गीसा 1०७-१५५
११-महाभारत में गीता का स्थान (ऐतिहासिक सन्दर्भसहति) ३५५३८७
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.श्री. विषयसंग्रह विपयसख्या 6- . ra १६(१) विषय • पास्मनिवेदन १-पिपयोपक्रम २-सिंहावलोकन ५-गानगम्दनिर्वचन ४-शास का सामान्य उद्देश्य ५-संस्कारस्वरूपनिरंचन ६-गीताकाममीमांसा ७-गीवानाममीमांसा ८-गीतावासकी पपूर्णता, पूर्णता एप विसवणवा स-पिनानगीताका विपप रिमाग १०-सम्पारस्प ११-गीवामविपादित विषा एवं पोगविभूति १२-गीता का बुदियोग १५-पीतो रिण एवं योग के सम्बन्ध में मगहीवा- ४-पामारत और गीता (ऐविवासिकसम्दर्मसाति) M - - - -- - ६६ (६) २२० (७) ७१ (८) १२१ (१) ८. (१०) १८२ (११) ७. (१२) ४६ (२) ९०० (१४) -- -- - - -- १४०८-१४
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.श्री. हि गी० वि०मा० मूमिका प्र० की विस्तृत विषय सूची पृष्ठसंख्या प्रसंस्सा विषय १५-पूर्वपधिमकपास २०-मैत्र मापन " १ " " निय मात्मनिवेदन १-३० १-नोकर्सपर ६-मारतीय प्रजा का म्पामोह ३-बसमस्या ४-पापस्मकता की पछि ५-माधिकार की जननी -नबीनबिम्पास -विकास की पोर -बीवनकम्पित एस 1-पपति सापक १०-भौतिक नियमबार ११ पहिनिया १२ सचामय १५-भाविक मास्तिक २४-कामोपमोग १५-भूमानन्द १५-सप्प के पो दिमाग १-मित्र-मस्परेषता १६ मेयी अमरा २ ८ " ३ २१-बाहया भनवन २२-मित्ररूपश्मीषता २३-रादुरूप बम्परेषता २४-मा मरतका २५-शरीररचकपण २१ प्रकारासपण भस्मा -समोसपण शरीर २८-मैन मह काक २४बारह रात्रिकाल 10वसर परकास ३१-अमुरमय रात्रिमा ३२-धक्सपर्ण इम १३-कम्मपणे समय २४-मसिन भास्मा लपरारीर स-निर्मल पारमा रुप्मरारीर ३६-पशि और म पमिमीरेरा भौर परत " 1 7 " १० ६ M विषपदी [२] पप " " h ६५ बानगुपिहानमनग्गीवाशाच ६६-उमतिको मार्ग १८ ६-पहलौकिक सपदि साग राष्ट्रस्तावम्य - पारलौकिक शान्ति एवं समरा, पात्मसाध्य ६-मास्मसात्म्यमुलक यामम -मारी मोडमिद्रा १-परबाकी खानीक्षा ७. प्राचीन म्पामावा और गोपन -पुद्धियोगशाम ७४-मुखप्राप्ति के उपाय w-गीवा की परिमापाए ७६-ताम्पम्पकी रूपरेमा --भारमनिवेदन की पावरफ्कता प्रास्मनिवेदन समाप्त " 1 3-मारममनुग्गमी पूर्वदिश ॥शरोयनुगामी पप्रिमीरेश ४० सस्पषमान पूर्वविश ४१ प्रवधान पमिमीदेश ४२-भीमाना गबान' पणका स्वरूप ४४-ति भेद से पेरामेन -रामेष से पार्शमेद -भारतवर्ष तुमालवा ४ामप्ससमाजकी प्रक्षिप्मा ४५-पत्रिपवर्गशिषिमता -रबर्ग की ऊपपता ५०-गापये की रणलखना ५-प्रवश्यावा बनकमाविकार १४ पुगगवि १- साहित्य में भाव ४-पोकसं पिरोष ५ बिस्तन साहित्य ५-साम्तमुपप भारतीय पादरी २८-भाररो पर भाप समारंप समाधीवाशास्त्र ६-पिएम्मानयोग का दुरुपयोग १. ११-म्पारपाया की मपरमून पसीता का विज्ञानवाद ६५ मप विमान -मास्मरकसान " " M -पोपमामा-६ 7 १ १- प्रस्थानत्रयी २-सम्प्रदायवार (मत) ३-निस्वग्रिामष्ठि ४-सामविनयति -पषम्म ६ वात्पर्यनिर्णायक -गोवन माग . M निपयसषी [३] पृथ्मच्या विषम पृश्सच्या ३ . " " ४ ८-म्यामीरपानन्दजी 1-जीपीजी १०- माम्दापिकभाचर्य ११-विलुप्तवेदाम्प १२-पक्षम्ममाप्य १३ सम्भदायवारान्यौरिष्माहत्य १४--भूमि का उपक्रम १५-सनयुविज्ञान १६-किमन्यै शामविस्तर १जीवोपनिपात् २-शास्त्रराम कीम्पापमया ३-विपिनिपेपारमक मार्ग ४- शास्" H ६-दिगपतनामा ६ " ८-मनिमन्त्रित दुख -अनलबानप (मुख) -प्रविल्लाबेदना (इन्स) ११-मापनमन १-शापनभानम्मप्रवर्तकशास्भपरेरा १३-मकर गीताशाख . २-सिंहासन (क) ३ शास्त्रशम्दचिम (ता शास्त्र का सामाग्य उदेश्य (ग) ५-सस्कारस्वरूपनियन (प) 7 ७ " २ (क)- १-अपौरुषेय देवशास्त्र २- परिपेय गीतारपत्र ३-जीवापासषस्थान ४-कप्त मानवधर्म -भमानाप्छ 1-पूर्णावतार हा -मनीकिक गोवामय १-रामसपहात्मात्र २-त्मकमार्सन -शामका पनापिकार १ प्रजापति २ पाप्मबिमति शामगाराविपिरसा म्यूसरारीरपिकिरमकमायुपशाब ८ सुरमरारीरपिकिरमक नशाम ८ - . " पिपपपी विपप पृष्ठसस्पा म निपय पृष्ट त्या १-घरफरारीपिकिसकारानशाम १०-प्रजापविसंस्मरण १-मबमपीगीवा १५ " १४ २५ ६ " ५ (प)- १-संस्परपडिया -सम्बार ३- समीकरण ५-विपर्या संस्कार गुणरोप का मापकरण -मधिसमूह समार ८-समाबसमूह राष्ट्र -राष्ट्रसमूह विध १०–ोपमार्जनसंसार ११-गुप्सापानसंहार १२-दौमासिकार १३-भास्मसंहार १५-प्र-वरापतिमिर १५-मामाम्पानिधि १६-सम्माचम्कार १५-सपर वापस २-महामारतकाम -वस्त्रतयुग ४-पौराणिक विचमबार ५-मोयुग ६-पाणीमुग -प्राविमुग –मसिनायुग -स्पर्शग १ -ऐवयुग ११-बगरमतीप्रमा १२त्रमा प्रमिशासवान १३-स्वयम्भू प्रमा १४- श्रीबेग्सपि, खोकमष्टि, मनासपि, पर्मयपि १५ चातुर्य चातुरासम्म १.-मारवमाप्ति और मारतवर्ष १८-भौमत्रिलोभी १५-तिग्यानि .०-सानुमान १-मोकपास-पास २२-पगा-सम्राद "सारा लिफ्ट २४-अपराजितापिर २४ बासमा मात्र २५-महापाबामरे n । " " " 6 H . १८ मा , ६-यकामासा 18-५० १वास सम्बन्ध म युगधर्म " 1 दिपपसपी [५] त्रिपय पृष्ठसंस्था , " . " " "" पृष्टसंल्पा -अमस्थान पसोर्षाय ३० २८ -चिकित्सक नासस्प दस २१-पियों की प्रसप २०-ग्राम-नगर-पट-सब ३१ सूर्पसदन नामक विधानभवन ३२-भागम-निगमविम्यान ३३- चतुर्युगम्यवस्था ३१ ३४-काशरा पर्वत ३५ -एशियामाइनर ३६ -एशिया (पश्या) -एशिया भविभि ३८ प्रविमिसत्कार में मात्मसमर्पण ३२ 1-विवस्वाम् रे म्हपुत्रावा ४०-प्रपम भारतीय समाद ४१-भयोम्पा राजपानी ४२-कालाय तस्मै नम ४३-वस्वत् युग ४४-अवनविकास १-संपर्पमुग की शान्ति के लिए वयुग में प्रभावतार ३४ ४६-यस विप्लब की शान्ति लिए त्रेतायुग में रामावतार ४.-कान्तिी शान्ति लिए अपरान्त एवं कति भारम्म में रणावतार ४५-मसभ्य मारतवर्ष -सभ्यवाशितक केतुमासवर्ष ५०-हमारी स्वता ५१-वर्तमान युगरहस्म ३६ ५२-पापाणयुग ५३-पातयुग ५४-विरयुग ४५-पाययुग २८.४ ५६-सूत्रमुग १७-पुराणयुग ४१ ५८-पौवयुग ४२ ५-बहराजवत्रयुग ६ –इस्लामयुग ४३ ८१-अन्ययुग ६२-ब्रिटिशनुग ६५-कासपरिमाण ५४-राष्ट्र कामना ६५-उपसंहार " " 11 , -गतमाममीमांसा १११७ क-विपयारयानिन प-मारपरदस्प कम्मचारियों की मसावधानी स पृष्ठसम्मा में गागा गई । स भाग न पाकर १ भागया है। पाठकमुपारने ।
मिपयसुची पृषसम्पा विषय पृष्टमस्या ग.-गीताशप्पयस्प -४ प-उपनिपणाम यस्त "-." -माडीवापनिपम्नामयस्म ११५ १४३ प-विशम्पनिलपि 7 , फ-(विपयोपानिध)-५१-१२ " XE ५ १६- अविधावरण rv-विद्याम्पाति 15-बुटियागमदिमा १६-हिरण्मयमरा २०-अमृतमस्परम १-मानन्पाति २२-माविमारीर २मामम २४-बापत्प २५-मप्पर मुपर्ण २६-अवस्थात्रयी १७-भारमानम्पमापात्कार २८-पराधिमानि २४-प्रष्टो मुहम । ग्यभाव १-मानमाष -हमवान् 1 -परणवाद मूसक विमानवाद २-परमेष्ठिाशापवार भीडपण २-भगवचा में प्रवियरन ४-वाराष्पपर विप्रविपत्ति -पनिपत नाम पर मारेप ६-नाम समस्या " H २ ६ " :-(मगरपदरास्प)-५५-७५ " --गीतापाइपर " 4-सनावनबीच 1-पोगमापा का प्रामण १.-परिष मते ११-पशिप मगसम्पत्ति १२-सर्कुकरम्पोदि १-ज्योतिपा म्योति २४-भातामापय ३५-पिम्पति २६-पोगबसिरिए ५-सामाविक सिशिएं -प्रयत्न साप सिलिए -अपिमासिस (0 ४०-महिमासिति (२) ४१-रिमासिसि (0) ४५मिमासिसि () M ग १५-पत्पगास्मा विषयसूची विक्य प्रसध्या विषय -(गीताशरदरास्प)-०६-२४ 4-बान सम्म प्रेमनाए ६१-नबीन शाम ७०-पाम में योवा " " ०३-माप्तिसिद्धि) ४-प्राकाम्यसिदि६) 2-रित्यासद्धि (७ ४६--परिवसिद्धि () ४७--अशोमाष ४८-श्रीमाव -राम्यावार भीकम्प ६ ५०-मानापवार भीरुप्प -पेचावार भी.पण ५२-पावार मीरुष्ण ५३-पश और भी अवतार श्रीम. ४-हरिकी पागमायासे विधव्यायाइन, ५-गुणमयी माया ५- मगवारा स्वरूप ५०-युवमगवार ५८-अध्युतमगवाम् "-अभ्युवसम्पति ६०-कृष्णस्तु भगवान समय ६१-उसस्था ६२-पीसस्व ६३- विभूतिमस्था ४-मानसस्यो जीप -मगत रोग ६६. कप्ण की पूरगरता ६. मगबाम गीताभार भगवान् राम, " २-कम को पर्या -मानात्मा-सम्मास्मा ७४-तरमा -मीकृप्पोपा पाग -भोग और परशाम --शाम की पुराता मतारमस्य पीर पर ४-प्रमाणभाष की सार्थका -मुतिप्रमाण प्रस्वाप्रमाण २-सचित्रमा भनुमानप्रमाय ९४-नियमप्रमाण -दमारी भूल 1-मता की प्रामाणिवा पदमति 2-यामकी माक्षिमता 1-पिवा-पिता त्य H भ " . 10 १ किसी [-] विषय पहना " 10ोरगान गीता ५-गिनीवाराम १९-गीवापिरोपबमाका ५-निसगीवा शप्प द " n 4-(अनिफ्णमदास्फ)५-"" स 7 7 ११३-स्वम स ११५-शा मानन्द १५ पुरुपायत्री ११६-फम्र्मनिष्ठा १-सम्पनिष्ठा ११८-मधिनिष्ठा १५-निधारमी १२०-भारश्पकोपनिपात १२१ मुखिोगात्मक योग १२२-मनोम की म्पाप्ति २५ भितसिवायत्पादक १८६ २१-शिया-सा ५-उपनिपद १२३-वीर्यवर कर्म , १२७-अध्यामिक का १२८-प्राधीम सम्पति १०६ १२५-किप्रतिपति ५ कार्य पुरुषार्म १३१-सामन्यकर्म १३२-फानोपनिषत १३५-पुस्पार्पोपनिषत् १५-सामान्योपनिषद १५५सदम्पपार १२५- साए सर्वम् T १४-स्मानीन्पनिमा -वापराधि १५ अपपक पदाम . विशपस्तव १५-उपनिरत् -पारमविपाप मोर १००-"सरदाता ०१-म्बत प्रबफरक १०२-गीतार पूषनिष्ठय १-वाम में मन 100 निजाम की दुर्दशा १५-प्रवादियोमम्ममन्त्र १०६-कर्मयागमतकायन १०-यस्पर्ग नारत्र १०८ "योगशास्त्र प्राप्ति १तमाळम्पवरभाग १०-पतम्पदम्ग १११ विधि, पारम्पनिपत ११ साविक मुख 7 . १. EL , " " M + पिपसपी विपय पृष्टसत्या १७-उस्म-उपनिषद ११८-स्वतन्त्र उपनिषद 8-(भगवद्गीतोपनिपत्-मामरहस्य) ११५ सेपर्यत १५४-माममाहारम्प 1 १ विषय पृष्ठसंख्या १५१-रिझानबार १२० ५५-मन्त्रवाद ५६-मनपाइमपी धोती उपनिषत् ॥ १५७-सदमामयी माची उपमिपत् १" (गीता) ५८ वरीपराव गीता १६-मगवान् की शिक्षा १६० भगवद गीता-उपनिपत् १२२ ५१-म्यहम-सरमाब १५२-परतीचन्द १६३- बिन्दु १६४-मासुर विपुष २४ १६५-लसूप्य १०-समन म्यगेस्पचिपाप १५.-पर्शमाष १-पापानि { पाणपविश १०-प्राप १.१-मो मम्वापा -फोट, सा म्मान १५-मम्पय, मगर हर १७५बरभीष अगा ७-मममा काममार १५१-भगवाम्नरपर त ११०-मामस्मरण ११-राम्दप्रक्ष की अपूर्णता १४२-रहस्पाप १३-उप-मि-पत् १४५-परोचनिय बता १४५-अमि-N-परण, ११६-पति मुन रसनम, १४५-पग्नि, व, पाण १०-पत्रि माय स्पनर १८-स्पमाष में पामोमात ११२-राफिपप गुप्तमाष १५०-बुद्धियोग का गुप्तरहस्प १५५-रापमा 'रहस' मात्र १२१-मोती-माजी उपनिषत् . " 1 " ११० " " १२.
विपसी [] पृथ्यमा ससस्सा " –ोप-गान गौतम १५-योगिगीताराम १. गीता का पिरापणमाक ५-निल रमिता शप * 4-(अनिषदास्प)-" - - D . ७ ११३-सर्म मुस ११४-गायतमामन्द ११५ अपार्यत्रकी १९६-कम्मनिष्ठा १-सम्पमिष्ठा ११८-ममिनिछ ११४-निशाणी १२०-पारस्योपनिपत १२१ पुरियोगात्मक योग १२२-शानदोम की म्याप्ति २५-शिामसिहासत्वबोधक ६ २०-विचा-प्रया ५-उपनिषद १२६-वीर्यस्पर कर्म १२७-माध्यामिक या १२०-प्राबीम सम्मति १.६ १२५-विप्रतिपति ३ -कमर्प पुस्पार्प ३-सामापकर्म १५०-अलापनिपत २१५-पुस्पार्कोपनिषत् १५०-सामान्योपनिषत् १२५-सम्पयार १३५- साधु सर्वम् ६४-मानी उपनियत .५-पराफि १५ प्रबोषक पपाय - निरापतक -उपनिपत 1-भारमविलवप्रक १००-“मगराता ०१-पापमपरक १०२-वापर भपूर्वनिय १ प्रस्थान में मना 1-नियामक मी दुदेशा १०५-पारियो प्रमोशन १.कार्पयागमनमापन १०-पस्पपूर्ण भारत्र १०८ “योगशास्त्रे प्राति ११ वापरभाग १०-चम्पबरम्यग १११ विधि, मारपमा पनिपात " 1८ ६५ १० . " 7 1 4 बिषपसपी [br] विषय पृश्सम्या विषय पृष्ठमस्या ५४४ - H २००-कर्णरापुरती २२१-ग्रहानमन २१२-शावा २२३-उल-मुति २२४-गम्दबननी २२.-भारमा वित २२१-बारमपी गीता २७-उपसदार ६ सत्तरमीमांसा ७-गावरष्टि c-दार्शनिक 1-गीता की निरर्पकता १८-प्राचीनटिसम्मामिपप दिमाग ११-मादरशीप पपपरिमाण १२-पिपापितुति १५-स्पोप १५ ५२ १४६ . " ११-सम्प्रदायों का सम्म १५-पक्ति १६-पुरप्रसह समासा घेय गीतानाममीमांसा ७ १७-मणदरामाब १ ८-ताशाब की अपूर्वना , पूणता , पप सिक्षपता। (१४ मे १६७ पर्पत) १०-ऐनिमष्टि १६-याम्पादोप २०-१६मध्याय २१-सम्प्रदापति ०२जीताचार्य १४८ " 1-नासम्पदमाग २--कर्दम्पदमाग १-मिनि, शापिगम्य, प्यास 1-मीमांसा ५-मप्पमीमांसा ५-मनुष्याण २९-बरा २५...मामाम्प- गिमार १-ऐतिहासिमरण " विषसूची [10] विपप पृष्टमस्या पप पृष्ठम्या २०६ ३७ " । h १२१ D w-पखेरावान-चौर -मेराषिय ११-पाषा २८ -परम्प की पाप्ति ११-राममवियच रत्र-परणयविपर्च २१-पखप भगवान् १८५-परापरणय क्वेशबान् १२-अपरमप मेरा १८६-नित्वमुपती मगवार १५-निस्वान्टी विध १८८-मसपुतनीय १८र-परम्मपरिश २.१-विधानप्रधान जमत २०.उमयप्रषान मीप •१-भूतेषु मूतेषु विचिस्प २.१-सम्पनि ईमर २०५-पाम बीच २०६-गीत-गता २.०-मगवान् या महापरित • -सध्या की पूर्ववा • 1-विराट् पद १०-यून सिद् १३२ १० 1 ४२ - H १०-शिपिविण्या १२२-परकर प्रय २१२-भ--पत् ०१७-श्री- ११-गीता-----ता -शि-पि-कि- २१५-3-4-नि-पत् १९५-य का एकसाद १२४-म-1-1-म म " प-वारदानाशि)१४५ से १४७ १२६-विद सम् ११-बामन्त्री बिर 8-मातमबीबी १२५-मामयी शिविर ०-नामप्रपान ईबर "पोला-दिवा सवाक्यमन ०१९पीपीपरा . . " - भिषपसपी विषय पृम्सम्या विषय पृश्सस्पा ४६ . . " " २००-कपशप्पुती २२१-ग्रडानमम २२२-म्या २२३-हि-श्रुति २२४-गदबममी २२४-मारमा-विस २२५-पास्मयी गीता २२७-उपसहार ६ उत्तग्नीमांसा -वष्टि -दारानिय-टि 1-गीता की निरपकता १ -प्राचीनधिसम्मत विषप माग ११-आदरणीय चपपविभाग १२-विपापिनुति १३-स्पोप ५५ ५२ . " "-सम्प्रदापों का मन १५-पतितुष्टि १६--युरप्रसह समाता चेपरिवानाममीमांसा २५० . ८-ताशाब की अपूषा , पूणता , एवं विक्षपाता। (1१६७ पम्पत) H ७-प्रयदरामार १०-ऐतिपक्ष -म्पाम्यारोप २.-1८अम्पाय २१-सम्प्रापति २२-तापाय ५-मनुप्पाम्ण २१-एप्प २४-मामारप-गामार ६-एतिहासिक " १४८ १५५ H -वम्पवेदमाग २-फम्पवेदमाग 1-अमिनि, शापिम्प, म्यास --पूर्वमीमांसा ५-मम्पमीमांसा , . १४६ .
विषयसूची [१२] विषय पृष्ठसम्पा विषय पृष्टसम्पा . " M " २७-मिक भगवान् १७-बम्पपयुक्तमारपसप्रतिराइक १ शारीरक तत्र २६-देवनन्दन भाभन् १८-सम्म-रिपरि-महोत मम 1.--"बामदेवः सर्पम्" .४८-मम्पयामप्रतिपारकगीताशा १५. ११-पत्रिका 10-सम्पपशि से पूर्ण, बर्व एवं १२-अम्माधि के कारण विपण गीतRORT १५-पादोष ५१-कर्म पासपणा सोम्मनिष्ठा ११ २९-निविप वाप ५२-कर्मपरिमाण योगनिष्ठा ३५-"नाम्पः पम्या" ५३-प्रणिधानहाणा भक्तिनिष्ठा २६-“समिरमम्" -योगायी की पूर्णता १७-"पूर्णमदः पूर्णमिदम्" 1-Aषमता का उदय २१ ५६-योगत्रयी का परस्पर में उपसा १४-मूमामद ५७--मतिमार्ग की दुर्दशा १६-पूर्णसम्पपि १०-वामम की उपरा १०-नामप्रपाम चामपिया 18--दपातु मगधम् ११-कर्मप्रधान दुनिया -भगवान् का काम १२-मात्या की भपूर्णता पूर्णता, एस २१-मतिमी भोर में मनाए १२-ठोपाबमादा की भावना १३-मित ६.नता का संगोषितमार्ग v-गरीक परोनिक प्रामानिक पर ६०-गीता की पूर्वा १५-परप्रतिपादक रोपिकतन्त्र ६५-पूर्णता पर बाप ४६-परहमचरमविपारपाचामिकता ६९-भाषेपसमाधान H . " लिपपसरी विषय पृथ्सच्या विषय पृस्सम्या १६६ ६७- -समासमनाम १८-मात्मदिन ६९- महिम्निा ७.-'पुरुप एपेद सबम्" ७१-खरसारमाविमाम ७२-धानसम्पत् ७३-कर्मसम्पद ७.मनिपारमकपोगणार n . " +-पैमानिकरिपरिमाग १६८ से 10--प्रधाना प्राप्ति "-पापानिनग्रास १२--भायामक ईयर १३-मातीत अम्पय १४-पूर्णपरविरोध १५-विरोध परिहार १६-"वसममा २०-शारीरक-गीता-उपनिपत् १८--मयाप गीवाण -योति,वीर्य, भव २.-माया, कथा, गुड, २१-विकार, मान, बावरण २२-पर-प्राण-पिया २५-मारमा २४-यात्मपरिमा २४-सत्पपर्म २५-पापिटर्म २०-सगुण भामा २०-सरधोपपन मारमा २९-निरुपाधिक मामा ३.--"पारकोगिमममम्" २१६ पर्यन . १९० . १-सिंहाजोकन २-रारक मामा २-गारीरयास १-पदापो का भेद ५-पदायों की रोषवा ६-गपिकयास " " ८-कूटस्म अपर र-सम्वामी , .
विषयसूची [१] बिपय पृष्मस्पा विषय पृष्टांच्या १७५ १७८ 7 १७१ " -प्रजापति १२-पुस्प ५-सम्पपपुप १४-कोशीपुष १५-समप्रयापति १५-यप्रगति २०-याट्प्रयापति १५-मारमन्त्रीबापत १९-स्पारिश " १०५ १०-मन्यात , १२-पादर्शन -परप्रयामविराट्समापति) ५१-नास्विन (१) ५५-भारमपरप्रपामयाप्रम पति (३) २६-रोपिकदशन (२) ५७-परायणपानसमप्रमापति (३) 1-पापानिवसस्यियन () , १५-फेरप्रिमायरी ४) ५०-गारीरकान (२) ६-वलपरीचा (दम) ६२- मीमांसादर्शन १७२ ६५-विज्ञानमुक्त भामराव ६१-चनसमा ५५-दशास्त्रम् १८१ १५-दावणानम १८० ६७-नगासम् ६८-भीमांसायासम् ६-गीवागतम् (पूर्सगासम) १८० ७ दियोमयाबम ७.मानसिनाबम् 7 ११-मसरिता १२-विवि और सपोपपत्र बारम्म १५-प्रयापतिमाह १४-सगुण भरमन्यात ११-पारवपकमाग ४६-निगुण भरमग्राम 10-पनिफ्दमाग 95 -"सर्व दाद मसिदपवि" ४१-पारमपरीक्षा २.-मास्तिकदर्शन ११-मास्तिकादर्शन " " , विषमसपी [1] - विषय पृथ्सत्या विषय पृटसम्या , १८ N " . ७२-उपदेशक बासुदेगहम्ण २३-~परिसी उपनिषत् के ७ उपदेश १९" ७५-सपाहक मर्जुन ११~दूसरी उपनिपद के सपदेश १९० ४५-प्रचारकापणदेपापन 1-सीसरी उपनियत् के ७ उपदेश ५१ ७५--म्यासदेव का उपकर -पोपी उपनिपत् के 1 उपदेश ७६-गातोपदेश पर बाक्षेप १७-पापी उपनिषत के उपदेश १५ -भाक्षरमान्ति २८-छठी उपनिषत् के उपदेश ७८-पवात्मकगीतायात ई-सावनी उपनिषद १ उपदेश ११६ ७२--गीता की ऐतिघमप्पादा १००-पाठनी उपनिषत् के उपदेश १९७ -बिहामगीता १०१ (१) सिदापिया ८१-विधासमपर्यादा का मादर .०२-सिदविपाकी २उपनिपर्दे ८२-'गीता' मुगीता कनम्पा" १८०/ १०-पपिसी उपनिषत् क १० उपदेश,, ८२-~गीवा सुगीता कार्यम्मा" १०१सरी उपनिपत् के उपदेश २०० ८१-५३परलोकारिमा विज्ञानगीनार १०५-२) रामविपा २०२ --महानगीता के प्रकरण १०६-रामविपा की उनिपर्दे ८९-६प्रकरणों में २४ उपनिषद १०७- पहिली पानिपत के ११ उपदेश२०१ ८७-२५ उपनिपों में १६.सपटेश१८८ १०८-दूसरी ठपनिषत् के १५ उपदेश२.१ --विपपरिमागपरिलम १९ १.६-तीसरी उपनिषद के ६ उपदेश२.६ पर-ऐतिहासिफसन्मसति । ११०-(६) मार्पमिया १०-२पासुनियोपक्रम (एक उपनिषत् १११-मापरिपा की ७ उपनिषदें नं २ ठपदेश) ११०-पहिली उपनिषत् कर सपदेश" २१-३)भामर्पिरिण ११३-मरी सपनिपत् के ५ सपरा०१० १२-रार्षिविपा फी उपनिपर्दै १११-तीसरी उपनिद के ७ उपदेश १ , १०८ " " विपस्वी विपप पृष्ठसम्पा षय पृष्ठसम्मा २१८ . ११५-चौपी उपनिषत् के ४ सपरेश २११ ११८-पचिनी उपनिषत् २० उपदेश " ११७-ठी उपनिषत् के २ उपदेश २१५ ११८-साक्षी उपनिवत् के २ उपदेश २१५ ११-(७) उपसारमकरण १२०-उपसहर की। उपनिषदे १२१-पहिसी उपनिपत्रे ४ उपदेश, १२-सरी उपनिपर के २ उपदेश १५१-तीसरी उपनिषत् के २ उपदेश ११६ १२५-(८) मदमसझवि " २१२ " " १२. -"मास्मा मानवम्" 'मानुषपमाप्पापवे" १०-मातिमात्र ११-पक्षिय १० पात्र १२-पागाफ्ल्प सम्पति १५-सप्तदरा सामिषेनी १४-प्रसपापियाम १५-पोम्यसंस्साविज्ञान १६ सदरासम्पाविज्ञान १७-मोविज्ञान की प्रविध १८-"अप" प्रच १५कठ-प-मिन २.नापाप-प २१-१८ पुराण २२-१८ उपपुण्य २.-१८गताम्याप २१-१-मम कर्म २६-मामविभूति २५-रिपतिमूति २७-य-कहामि २८-मि-पास" २५-इविधासम्पर सिख H २२१ १०-सहस्प २१७ से १११ पर्यन्त " " २२२ कारणपाद की व्यापकता २-शामवाद और कमणबाद ३-विषसम्पति मौर सम्पा -मीठि (८)सम्मा --माल (बम) ६-उपम २२३ ७-म्बप्रम प्रशान विषसूची [7] विषय पृष्ठसस्प विषय पृष्ठमस्या २२. " १५-पूर्णान्प का सम षय ५२-अमृत मृत्युका प्रविनामाष १५-नेति नति" रस्प ५५-१० सख्या की पूर्णता १६ १० के १०दो विभाग M २२६ " ५७-योगमाया " ५८-दरामहाविपा M . " " ३०-विशनपण मामा २२१ १-भारमदेवता १२-बिरबासुर १५-देवासुर समाम २४-पता के ऐतिहासिक ६४रलोक १५-रिता के कानिक १२६ श्लोक ६-पूरससस्या की उनता २७-उनसत्या की पूर्णता २०-पूर्णविश्व उम २२५ १९ उन भरमा पूर्ण 10-अपूर्ण निरव १-पूर्ण मारमा १२-मास्तिसा सि १५-अम्बिसार भामा १२-मीना की।६सम्या १५-पिपलपि ५६-मिमा पारमा २२५ ५७-१ सपा की पूर्णता १०-"पणपन्पत् प्यानम्' १९-'शून्पम यत् स्यानप" ५- मस्तापान ५१-एण्य मापुरधाम " न M १९-६ की परपक्ता ६.-श्री विजय-भूति २२७ ६१-दुर्गप्रस्तोत्र ६२-विपद् सम्पत्ति भोर पोगमाया ६५-पोगमाया का प्रदान २२८ ६५-निरव-मारमा ६५-'देशानुपापित" ६६-६ का मौखिक पस्य ६७-नारमा, फरमारमा, मारमा ६५-पाएकसि ६र-सोमसम्पारहस्पोरसहार ३०-सम्यारहस्पग्सेिस ७१-एपपूर्णमारपरिटेग ७२-प्रपमोगपतिठेग ७३-हितीपेसिरिमेय २२९ " 10 . 4 M ३४ विषयसपी [1] निपय पृष्टतम्या १-शनिक वारस २१५ पृष्टसंख्या ७४-पतीयोपपरिपारले २३५ ७५-अन्तिमपपचिपरिस ७६-उपनिपद समस्याग्रस्योपक्रम ७७-अपमप्रकरलोपमिपदसम्मा- " -मामन्दमन मात्मा " " " -दितीयप्रकरणोपनियसम्पा- २३८ एस्प .र वतीयप्रारोपनिषत्सम्म २४E ८.-प्रकरणोपनिपदसम्मा- २४० ३-इसासधा पारमा १-निधम्मक रसकपन मारमा ५-"एकमेवाद्विपीप प्रम कीमप्रालिकाममा ७-क्रीमपटक मात्मा - उपनिषदों से मासि मारमा पर्व , -प्रमोद सर्वम्" "-स-बहकिसान १२-मोहमायकतिकशान १३-सवप्रतिपादक पिता -सपस देवदा मामा १५-चोपहित देश भामा १६-पम्प मारमा १७-शामसंस्था मामसत्पा " ८-मप्रकोपनियतामया " रास्य " १२-पष्टप्रकरणोपनिषत्सम्या- १२ २४० " ८३-मम४ि)सत्या रहस्य- १-गीतापतिपादित रिचा पर्प योग- पिमृति-२४५ से ७६ पर्यत १२-मवाररसस्पा २.-मभप्रपाम चारमा "श्रीप्पप्रधान भारमा २२-मोनियम मामा (:)-नानिपिपिया पिपयसपी [१२] विषय पृष्ठसल्या विषय " " n ()" " २१-पत्पारमा २९७ २५-"ऐनदारम्पमिदं सर्पप" २४८ २५-यारक मारमा २६-भानन्दारमा दोन २७-बनारस २९-मग-मोह २-उमम्मोति २०-मसिनम्मोति २१-विहानाम के दोन २४६ ३२-मनोमय भरमा २३-अन्तर्मन ३४-हिर्मन ३५-भानम्द-बान-ममोमप बारमा ५६-समवानारय मुक्तिसापी २५-सपा-कर्म ३८-नाम-श्रम २५० २९-प्राप-वाक् ४०-रसबहानुगत कामायमा सष्ठिसानी" ४१-कीपुर न्योति २-बायु-सम्म ११वसापान कमारमा ४४-पुरपत्रपी (अनारमा) ०५-प्रकृतिपश्चक (कामारमा ) १६-विरतिरपी (कमरमा) ४७ बारमसस्पानपरिदेस ०८-न्द्राग्निसोममूर्षिशिष टिप्पणी), ४६-पिवपति प्रमा n)" ५०-देवप व विष्ण ()" ५-मूतपति विष १२-गिरोद्यमानतना ५५-दयगुण किया ()" ५१-स्तिगुण प्रर्वदम्म १५-मानवम्बाध्यक्ष प्रामा (" १६-क्रियाकयाम्पच विमा ()" ५७-मयमाप्पद शिव () ५८नामपर्चक शिप पर-क्रिपामरक विष्णु ("), १०-अपपकममा ६९-उपम-साममप मारमा ६२-मारमसरूपप्रतिपादक म्पपार एमबहरों से मारमापनिणप में भामित ६४-भानित का मिराक्रम ६५-प्रात्मा निर्भपा (भम्पपरएि।)" " " " ()" " " " - विषपसूची , " , तपय प्रष्टसच्या विषय प्रष्ट स्पा ६-मास्मा निर्तेपा, सिम्म फळ २५१ ८५-शाबाषित मामा २५७ (अक्षरसहित) ८६-सर्वपर्मयोम्प प्रारम्भ २५८ ६७-मार विभारम्भक प्रात्म ८०-बिदामा धरराष्टि) ८८-विदय, चितामास ६८-मामेब विश्वस्पोक्प प्रमसाम , -१-सर्वम्यापक सूर्य (निमारमा) (विकारवरणित) १ -प्रतिविम्बित सूप्य (विदामास ) ६-भास्मैप विषम (कारिक २५४ २१-भातपहप सूर्ण (पित्य) घराष्टि) १२-सम्पापक ईबर (निदरमा) ..-'यस्पाम" आमा -गरीमम्याग्कम (मिस) ०५९ ०१-मर्म और १५-गारी बीवात्मा । पिदामास) ७२-छपिशिश भामा २५-सादी मुण्ण (चिदरा) ७.-"न पति ने मयि" २५५ २६-मोक्ता सुपरी (विदामास) ३४-पिपिपिचमाव १७-अमिप्र समा ५-पर्ममक परमह ०५६ १८ सम्वेग ७६-पाप्माभों का मास समसमुह १.. मुण्टकमुक्ति २६१ ०८-सौर प्रकाश की म्याप्ति १०१-अमृतपण विदामा -पेपामण १.२-अमावस विंग मलोप १.1-मापण पिशामास ८-उसकाशि से भ्रान्ति १.१- प्रापयन् सबभूवानि" प२-माधि १-परमपरिग -३-गीता का मुफ्य विषय १६ समरिमा ४-गाखानपित मारमा १७-पापानिपतम्प " . " विषयसूची [२१] विषय पृष्ठसश्या विषय पृष्ठसंख्या " " २०४-मास्मविपरित ०१-प्रम्पयास्मपरिमल (1) ११-प्रम्पयास्मपरिमेय (1) १११-प्रवरामपरिसेस (२) ११२ -प्रास्मचरात्मपरिमेख (३) १९५ विकारपरास्मपरिमेस्स (५) १५४ारिकचरास्मपरिमेय (५) १११-सर्वसमा २६. ११६.गूढोत्मा ११७-मावत्य कर्मचाप ११८-जीवात्मा के पाप ११२ दिपा-कर्म .-पम्पपरियापतिपादक मीनाए" -प्रारमविषामकरणम् . " " " १२८-सास्पनिय (१) १९६-योगनिष्ठा (6) १२०-म्पोतिर्षिया (१) १३१-बीयविधा (२) १३२. मनिषाशवगीता (१) १९३- पोगविपाशावता (२) १३४ - योगविया तोन पिषत ३५-चारमयी मावि १३६-सौरीबुद्धि १९७--विधा-अविपास्मिनपुति १३८--भान, बैगम्म, वर्ग ३१-धम्म परा, भो २५०-प्रविणा रागनप प्रमिनिबंश (-अस्मिता अपपरा, अकरमी १४२-मगात्मिका पिया १४४-मोहात्मिका अधिया १४४-पर्म शान, राम्प, ऐपये की विनसभूमि सुप १४४-प्रविया अस्मिता गग-रेप, २६६ अमिनिवेश श्रीविनमभूमि सूर्य yा-पश-अपयश प्रवर्तकाममा १४.-भी मकरमी प्रवर्तक भूपिरा -बुठियोगनिरूपक गीताराम १० १४१-"मरी इसक" १५०-योगमाया मचिम्म १५१-गुण का गौरव ' " H ૨૬ . -२-गीताप्रतिपादित दिविणा- २२१-पिचार १२ -भास्मानिया(१) १९३-विधषिपा (२) १२४-पुष्पपिया (११ १२५--प्रविषिया (२) १२६-मानविया (२) १२०-कर्मविपा (९) " " 4 " .
विषयसूची [२२] पिय पृष्टसस्सा मिपय पसल्या ર २७१ -- - te * १५२-बोपों का प्रमुत्व १५३ सामाषिक परिणा १४-शुमारामसम्म १५-न्ममृत्युका पारम्पप्य १५६म्ममम्तान १४.-महान फोरुपा १६८-म्पारस बोबास्मा १५-मतिलहण मारमान १६०–रियोगास्मा पाय " १७५-दुनिचिका प्रयत्न १७६-प्रयान की व्यर्यता ७ मुद्धियोगसाप्पा रामनियन्त १७८-"वत् स्वप पोगससिदः २७५ १७१-मोहगार १८. पप्पुति १८- चररय पाग" १८२- 'मापते मातो भयाव" २७६ " ५६ " १२-गीता का दियोग-२७७ स १४८ पर्यम्त २७ " • बुदियोग का स्वपनिरन १६१-मामा और मुद्धि का पोग १५२-निमपोग ५३-ऐशियपान १६४-चौरप्रवरा ८५-नामम्पोत का पादुमा १६१-मिमसिद्ध युमिनिया १६५-पिम्प ६०-समपयोग .६९-सामनुप्प १७-.योग में मम्तराप 1७1-मास्ति बुदिरयुक्तरप' १७२-प्रतिरपा और गीता 1.1-जम्मपमधि १०१-"विपस्य विषमीपमा २७॥ ०११) भरापबुद्धियोग+ -मासम्पति और पुरिमोग २. गुदियोमनिष्ठ योग 1-प्रारम्बाम 1- प्रनिष्ठभापि पाप्या" ५-मोपपातिक भारमा ६-गमापा नियन्त्रण २०० " " , 1 ८-प्रारमहों का समावेश है-देण्परिस्थिति मेषयसूची [२३] विपय पृष्ठसंस्था विषय पृथ्सस्या २२७ " . " . " २०० " . १०-मातृमोमन ११-नारी दोष १५-दोषाविर गीवारमा १३-कर्मप्रति १०-प्रेम और स्नेह -मनु बन्धन १५ प्रतिकूल धन ७-गासकि १०-पासति १-उपगम्मिवेद २.-माक्ना-पासना २१-स्पति का उदप २२-भासनिपारा २३ "पषम हिमना" २१-मासति का मसकारण २१-मार्ग ताल २१-मोबदसा मुदि २७-स्नेवारण मन २०-हमारा प्रयास २६-अपेक्षा पेपा २०-पिताकांचा 1-उत्पाप्पाकाश ३२-चिरकालिक धनुप्पाम २२ १५-स्पिरतासषण मनुष्पान ४-काममूनक राग पर-कोषमूराफ रेप २९-मनुप्पानमन्या वासक्ति २८० २७-भारमचोम १५-"प्रशाम्तम्प कुन समू" २६-"हरन्ति असमं मना" ४ -दमाकारा 1१-अपेक्षाविसहरूत मम १२-पम विपाद २०४ ४५-राग्यवृदियोग ४४-सम्योजक मुभियोग ४५-राधेपनिधि ४०चिसमता १७-मानकर्म के उचारचमान २८1 १८-सिदि-बसिदि में समता ११-"रमेयेर फाणि" ५.-"योगस्था कुर काषि" ५१-गीतासम्मति २८९ २८१ " " D " " T - २६२ पिसची विषय पूममम्या पसमा २८७ " • (२) मानदियोग- १२-मोरका प्रतिनी शान 1-अमिषा एक मोहमा पापाप ५१-मुग्णापुद्धि ५५-सम्यमान " " १६-मम्पपम्मान M . ७२-बुद्धिम्यामोह ७५-पुति की स्तम्भता ७१-समोह का उदय -सरप्पारस्पा ७६-मोरकलिठा पुद्धि ७. "शानबुरियोग" ७८-सिद्धविषा ७६-सम्पति ८.-हियोति ८-स्प्प सममा ०२-सम्पाति-परज्योति ५-त्राणपिपा-(दिप्पशी) ८१-अपि और राक्षस -।,) ८५-पिता पौर पिशाप-G) ८६-देवता प्रौर पर () ८७ प्रविपुत्र मनमा ८८-मधि मण-अधिग २०-ममि पम, मादित्य १०-माप, पु सोम m १८-मुकर्म कर्म ५०-अधर्म -बीपमुक सिद योगी ६२-“मानान्मुकि" ६२-"पारुग्छ" ए-'मुपन्धि मन्तरः १५-सपानावर . 7 H D " 11 ६.-माप्रपा " " ६६-माप्यावरण ६-पान-कर्म अ सर्व 4- प्रधिमिता दर-कामसंस्कार पर माकन .दोम का उदय ७१-मापनिक पोम में सम्पना . 1-"मचीति-मधि २१-पतम्पोति विषयसूची विपय पृष्ठम्या रिचय पृष्ठमरूपा J . १४-अनुष्य और गर्म (टिप्पली) २१२ २५-पाम्पपशुपौर मारपपपशु(,, २६- 'पचम्पोनि।' २७-तुष्टिप्राप्ति -नामयोगसिरि . " १.-स्मितमाव (विकास) २१५ ११४-"ऐपप्पबुटियोग' ११५-राजविण ११६-पराभग्पत्त १-मारा ऐमर्म १८-एमर्यहानि ११५-एचस्यमाप्ति शैकिक उपाय २१५ १२०-वास्तविक परिकान १६ १२१-- अविधायुति १०९- मति-माग अंश १२२-"परानुरक्षित २५७ १२३-- मुलितमाष १२५ भवरपरसम्म अम्पयामि २५-प्रम्पममन १५-इन्द्रियमन (टिप्पणी] १२७ -सन्द्रियमन . १२८-पत्रसमन. [] ११~-मान-भक्ति-कर्म १५०-श्योपमीपमन. (पानी) १५१--भगवान की इमा १५२-पम्पमाष •(1) ऐश्वर्यबुदियोग २१ मिसिर १००-ईयर का एसर्प १०१-मर्म १००-कम्मैपर्य १. एचर्य का विकास " " " . , " " २१८ .५-कम्मापक १०१-मर्यक १.७-सत्र, सशक, सरित ईमर १०८-नमय जीव १-मम्पा जसरालि, मावि मीर, ".-ऐमर्य का मामस ११ विमूति का प्रावरण ११२-मस्मिता का प्रारुमण २६ (0) पम्पबुद्धियोग विषयमूची [२५] प्रएसम्पा विषय संच्या t " to. १५७-धर्मनिषा १५८-'पापरिपा" १५-मित्तकर्म २६.-साविकमान १६१-को फेद १६५-प्रारमा का सरूमपर्म १६५-सम्यासम्पन . , M M २ " १५-मसिमुलकमानरूम १३४-मम्तगत् २३५-मारी सहि १३६-परिर्वगत् १२-परीप प्रगत १८-हारतम्प २५४- सस्पसूर्य १४०-ऋम्पिक्सूर्य २४१-बगप्रहर १५-दानीकगत् १४५-ानीय सिम्प -मीप प ४५-"प्रमिनिये -परीप बिभूति १४७-मोरमोरतम्मामा १५.- सुपप स्टमकम्" २४९-बमिनिवेश १५.-सस्कार का भमय २५१-मान्यमकर्म १५१-कम्पकर्म १५-पानस पाप १५४-सर्पम्प ताण १५५-"धर्म १५६-"पर्मबुदि" १६५ मिथ्याचार १६६-काम्पफर्मग्यास ११-पाधि-निराशि १५०-कवारब १५९-गुणपरीक्षा १७.--बमोडेतक युलियोम " " २०० १२- २०४ १५–ीपा एवं योग के सम्बन्ध में मग पीवा-३०१ से ३५४ पन्त H (१)-पिपाविमाम- १-चम्पास -परिधान H विषयसूची [२७] विषय पृष्ठसल्पा विषय पृष्ठसत्पा --ममम्यता ३०१ २५-नाम म्यवहार की उपपति १-माचरण " " " - (१)मपिरिपा २९-सम्पविया २७-ठापि ५६-मनापाक जनक २४-- राजयो विदु" ३०-पपिपिया भीर गोग ३१-योगशाम C " 4 २१२ -अनासक्ति 4-मसम्पति ७-वरानम्यता -नातकर्म -विधानिक १०-जीव की भगक्ता ११--पासतिनिधि १२-मोहनिधि १५-मस्मिनानिहानि १५--ममिनिवेशनिधि १५-वैराग्योदय १६-नोदय १७--ऐसोदय १८-पोदय १६ रास्मता २.--पति २१-पूर्णता २२-शान्ति २३-पिपा पर्व याग २५-संशोधनारा समम्मय , " " " . (२) सिरिया ३२-देवत्रिलोकी ३५-पप्राष्टि, पचिति ३४-अपि पिवर, दवता ३५-मम्मर. मनुष्य २६-मयम्म् पम, द्र ३.-पारपि देवत्तमनु २८-प्रामणी रात्रा २४-समार-ताण्द् विराट ४०-मोर महामोग ४१-पापणी ५२-मार्ण, सार्वमीम ४३-इन महम ४४ -पर्पणी 1-परिसम्म " ५ M " " ३१५ " विषपसूची [२०] विषय पृष्ठसक्ष्या हसम्पा ३१४ " स-ब रेषयोनि ४-अन्तरिषगतिप ४-सिसवाति ४१-पिलमुनि 1-सिख शम का वास १-कर्मन्पासलक्षण सम्मि ५२-अपिमसाम्प " " " ३१६ w-निरपर्वत ५-महाराबास और मटिप्पली) 1-पिता का नाम " ६५-मीमामक $4-काम्बकर्म 1-कम्ममूक्षकसम्म - पार्षविधा -१-कर्मयोग -१- ०[५] स्पष्ठा एवं श्रेष्ठा भगदिपा .५-कर्मत्यागक्षण शानयोग ७-फसानुगममी भळियोग .१-प्राचिमूमक कर्मयोग *-मवामिनिबेरा तीन --मीराहररिपारवयादि -भीमारित मपानादि 4-श्रीवलम-यमानुपादि -पैगम्पनिमस्ति श्री विलुप्ति -प्रस्थानत्रयी में संपर्य २-शाहरमाप ६ साम्प्रदायिकमाम ४-कर्मपान माय -मर्षम्मा मेगा मगदक्षिणा " . . to- ग (१)-रामरिया -मारतय एम-विवीलोक 1-परत प्रति ३०-म्पवाहक अग्नि २१--उपासक राबायोग ६२-ऐषधिया ५-राजविया ६५-मख्यिोग " ग " • (1)-प्रार्परिणा ५-नामपसमाय २-- -पोगविभाग- 1(1)-बानमोगसमर्पकान ३० १२१ विषपसूची [२९] विषय पृष्ठसम्मा विषय पृष्ठसंच्या , " र गीता के विरुद धन -सुसनामात्मक शि १५-पोगप्रपी का समर्थन ६५-विरोधी भगवान् १६-मगवान् के धरा सशोधन १७-अपव वैराग्ययोग ८-दियोग-योग सर-पुद्धियोगशाम १००-राग्यमुस्मिोग (पुद्धियोग ) १.१-बामवियोग (कामयोग) १०२-ऐश्वर्यपश्यिोग मक्कियोम ) ११२ १०३-धर्मभुखियोग ( कर्मयोग ) । ८७-सानयोगप्रपानगीवाशान ३२२ ८८०(२) मतियागममर्षकवचन २२-२३ २४-२५ -मख्यिोगमवानगीवाशाख ३२५ 1 --(२) कम्मयोगसमर्पकापना २७ (१+म्मयागापान गीवाशाम ..) गादियों का साम्यवाद ३२८१० (१)-साम्पवाद ३२८ (१)-सा ययोगशाला (३)-गीसा का साम्यवाद (४)-घरमूलक राजतन्त्र २२ (५)-कस्पित साम्यवाद (६) अनीयरममक प्रजातन्त्र (७)-समानएका म्यामोर (८) मावा का प्रभाव (९) असाम्यवार रूप साम्यवाद (१)-मयाना सरा (१२) निमन्त्रण (पोष) (१२)-गीवाशान पर मार (१२) वभिमपम्मसमयकगोवाशाम (१४)-राममिर कर्म (१५) शासमति का गाना (१९)- मोती प्रमाक मामोर (१५)-बहिरा राहु (१८) विमीपयों का अवतार (१४) अशासीय योग , " १०. 1-राग्यमुनियोगसमर्पकमान ११ से २१७ पपत " राग द्वेष ६-नेपगर्मित राग 4 ... मबE " 1 यामकर्मसमय १.१-"योग "0-“समवयोम" . - पिपसुची विषय पृथसध्या १११-देहमान १२-योग परि शिष्य ११३-प्रारपिकीय १-माधिकारेक मीब "-सनातनविषा १.६-मगपतिया पृष्टमस्या नपय १२७-मोकप्रचलित महिनिष्य १२८-मगवान् का सम्प २८ १२९-महि का रूप १२.-उपासक की पान्ति ११-पाभोपासन ११२-उपासमा का मूलमत्र १२५-मबमा महि ५०१ " " २०५ १७.. (२)सामदुनियोगसमर्षक बचन १५ से ३१ पर्यंत १५१- (१)-मर्ममुखिपोगसमर्पकमचन से ११८ पर्यन्त " १४- . " ११८ बान में बिहाम का समावेश २४. 11-कर्म पर पति १२.-भारमचिन्तन ११-मानीलमहामा १२२-"मानवान् मा मपपवे" १२३-मगधन् कीमाथि १२९-प्पनिक उपकर १२५-कर्मपिमुख्खामी १५५-मनागमपि १.६-कर्मत्रपी ११.-जर्ममा कास 1-पर्मानुष्छन १५६-कर्मकार को काममा १. सियू का प्रमाण १४१-काधिकार १०२-फसामधिकर " . P १५--(8)-ऐवHदुनियोगसमर्पकमान ३०१ से १५पर्यंत -१- विषयसूची पृष्ठसल्या विपन पृष्ठसच्या २४१-१(२)बानबुद्धियोग में राग बुदियोम का समावेश ३६६ १४४-०(0) ऐचर्पमुदियोग में बैराग्य बुदियोग का समावेश ३५० १४- (1) पर्मबुदियोग में गग्य मुढियोग का समावेश ११ २०६-उपसहर २२ " " १५-मरामरत और गीवा (ऐतिहासिकसन्दर्मसङ्गति ) १५५ से ३८७ पर्यन्त १०-अगस्पचरित्र "क्रमपद इलिास १२-इतिहास म बाप १५-अपना साहित्य १४--मरामारत ५-दमित्यमेव ६-रापलिप्सा १७-पितोपदेश की बाश्यकता १८-ऐतिहासिक प्रप १९-नामविज्ञान का प्रमुतकोश २०. -शतपपरमय १५८ २१-द का अन्तिम प्रय २२-रातपप माविमायकार २३-महाभारतका २५-महाभारत और शतपय २.-विज्ञानप्रस्प महाभारत २६ -पौकिकान्य (महामारत ) २७-पीतारस्न २८-महाभारत के १८ पर्व 8-मरामारव गौरव ३.-महामारस का मुख्य उदेश्य ३१ २१-मार्पामा " " " " , १-दोपहरण २-इतिहासपुराण ३-सशि का इतिहास ४-मानव इतिहास -इतिधासमारा ६-पौराविक भास्पन ७-मारपाजेंनी ८-मसदाम्पम (मिप्याकपार) ३१६ २-करिसत भास्यान " " विपसूची [१] पूछसम्पा पिय पृष्ठस्सा " " " " " ३२-देवमातिए १३-मारतसामान्य 1-सपम्पमा २१२ ३५-सपा के मानसपुत्र ३६-प्रदादेवमनु ३७-पतुनदी 15-पुराण की १२-"मनु" पद १०-मामपसमाय ४१औसत मनु १२-रागा राष्ट्र का विकास १-कनिष्ठपुत्र "पम" 10---अपिगम " " . " " १४-देवता देना) ५५-सपद् इन्द्र १६-देवयोनिमय ५७-महान और मम्तरिक ५.-मनुष्पगव १९--- -आवप्रया ६.-माम धर्माण ९१-विगद् सपम्म् ६२- भवगिरि, पनागिर २३-विराट् विष्णु ५१-~-देक्युगकाठीन शासनप्रणाली २१-~मारत सम्राट ६६ भाठपुत्र ६७-ना कस्या ६८-चाकु सम्राट ५-साकुहारा दापरिमाग ७-ऐतिहासिक की प्रान्ति . (टिप्पणी। ७-वयोप्पा रामपानी ७२-माराम भनिमि" 1-सिठपुरोहित ७.रागण गोतम -म . . + + ३१ -प्रि 1-प्राणमीक्षक र्ग 12-परिसेल ५-पितृगए 1-सपिपाता -महोशिपा (पितृमोक) २७. M .
विषयसूची विषय पृष्ठसम्पा पृछसच्या ७१-रागम्पस्थापन 1 ७६-सदानीरा ७७-कोसमविदेह -मम्पनप्रक्रिया ७९-'मिमिका बाविमान " ३७१ " . . . ८७-मापकास ८९-मैपिक्षण -मिपिता ५-चगम्माता गामकी -पूपर भीराम ८-बाहिक सम्मथ ८५-सपत्रबन्धु मिह महापुरुष -सुमित्रमहाराज -सूर्यवंश के समर्प सम्राट २७-रक्तसषद (रेरी) (1) ३७१ २८-निरघदेश मङ्का ( १५-पाहीसागर (रिट्नीयम्सी . (टि०) -सिंगमाप (सीलोन . दि.1, ०१-सिन्धुमद १२-गाछीक (क्लप) १०.-महाराम पुम्म १. ताम्रपर्ण दीप टिप्पनी १.५-"दापूरोमेन'. १०६-यापा. १७-मननिणय में भ्रान्तिका, -गर्पणापतपर्वत १२-सिमामा पर्वत: (,) ११०–रारती नदी.) ११-रापीमदी G) ११२-पस्तान. ११३-काम (.) () ११९ -मारतबर्प की पाप्ति..), ११०-पैविकसम्पति .) - १० - . " २१-गोतमार १२--पूर्णपण का पतन ११-मन्द्रय का विकास 33 १४भाकारापद . -मरतसपा २५-पीतममुद्र (पमोसी) दि), फ्पिसूची [११] पिय पृष्ठसंस्था - . . " , M " विपय प्रमोपमा ११८-प्रतिष्ठानपुर 1०४ ११-ठाको रामधामी १२.-मानसपुत्र २२१-तृतीयपुत्र पत्रि १०२-मत्रिप्राणपरीपक पत्रि १२-विधानपुर के समय में प्रावि - टिप्पणी) १.५--प्राप्पारण गिन],) १२५-प्रचारक धि १७. १२९-मोमबति ११०-सम्पति १२८-पन्द्रग्रहण -मसास्ती मयस्पा १५०-परमव ११-गायन १५-पतित सास्यात्रिय -रेपनि १४-एसमानपत १७५-सम्मरएकपमा " - " १३०-पश्चिमी मिहलों की भान्ति । ११-मारी उदासीनता 10-ौहिण्य दुप " १५-एस (गण २०६ १९१-प्रतापी पुरवा १९५--पर्य सम्राट् पत्रमा १४८-उर्पणी भप्सरा १०-Jषपुत्र पुमा ११८-पुमयपुर [ीपुत्र] महाराय धायु ११t-मा-बनिगममा-प १५ --रेखमावि ४-ममरा १५२ प्रतिश १५१-मगिनौरा -पसर्वशी कौरव-पाएर ४- सोपमा स-पायुपुत्र "मा १४.माषपुत्र पपात" - पपातिपुर पपु पुर्षम पायु xt-मागासपरिवार ११.-और पारा " " " म , ११-प की सपछि M विषयसूची विषय पृष्ठम्या पिपप पृष्ठसंख्या ३८१ १८२-इटिस दुर्योपन १५३-नीतिप्रसार , १६१-सामन्तरागा " " " " 7 " . १९१-पुरु भौर पौरवश १५०----पुहबंशी दुप्पत ११-दौप्यन्ति मरत १५४–भारतवर्ष १६१-पुराय का प्रयलाई [टिप्पणी] १६६-भरवशी "कुर . १६.-कुरुवंशी 'प्रतीप" १५८--प्रतीपपुर "याम्प" १८ -राउनुपुत्र 'देवारत' १०-कामासपिव मद मीम ११---मस्वापा[सत्पपी] १२-चित्रागर और विचित्रवीर्य १५- अम्बा, अम्बिन, अम्मानिन -शास्तमहाराम १७४-हवरात्रपरिमीपिका १४-मीम और सस्पानी प परामर्श, १७.-नियागविपि १-श्रीम्पामगरानयाग 1-पृवयष्ट, पापड विदुरसम्म १८०-सरकापीमागेपण १९१-पाशा और १६१ " " १८साम्राम्प २८ जाहर १८.-यात्राम १कारेश १५-सापटपबम १ - माताधीश ोपन, दो, कर्ष भीम भश्वरयामा १० ११- हस्तिनापुर" १२-"हस्तिनापुर" १५-महोदप शहर १६४-प्राचीनकागजपानी १५ भ्यप्राम १४१-पवनकास महाभारत १९७-मविकास महामारत १५८-शविपरस्प १६५-अयमपरम्प २० --मेनाविमाग २०१-मौदिखी परिमाण " 1 7 म " १८० H
विषयसूची
[१]
पिप
प्रहर्सपाया
२०-मामा
२०५-तपास पुत्रमोद
०४-मारखवैमनपराप्रपाम
२०-
मुरसमुपस्थिति
1-पाजप मन
.0--
समाप्ता ये भाष्यप्रवमलग्रस्य -
विस्तृतविषयसूची
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आत्मानिवेदन
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कप्ण पन्दे जगद्गुरुम् . लो - . श्रात्मनिवेदन फसमा में पोदा भी निरोप न भाये, पर सिद्धान्त एक सामाप मनुष्य के लिए घारप ही एक गटिस समस्या है। भाग हम भी इसी समस्या के सपन हे हैं। हम मानते है कि वर्तमान युग भूमामार को किसी भी एि से पसन्द मही करता । प्रत्येक कर्म में, प्रत्येक विषय में संकोच, एव शीव्रता ही पान का मुख्य युगधर्म है। "काम पोसा करें, साम मधिको । परियम न करना परे तो सबसे मम्मा, परि मक्सर मा मी नाप तो परिश्रम परिश्रम की राशि से न किया जाय। भप्पन कम करना परे, शान विशेषरूप से प्राप्त हो । पदना पोका परे अनुरबम विशेष हो।" पर कुछ एक मुसमन्त्र, जिनके पम्प प्रयोगों से भारतीप प्रमा मात्र म्यामोह में की। परा की इस मनोति के मूस कारण का जब हम प्रवेपण करने घरते है तो इसके मन में हमें "अपसमस्या" रूप विषपीर उपसम्ध होता है। मोर मी अधिक गहराई में आने पर इस विपनीम के भी थीम "मावश्यकताष्टदि" के दर्शन होते है । सरित में मारिकारों पर सिमाम करना पप है। सिदारतबादी कहा करते है कि "प्रापश्यकता मारिष्कार की जननी तसित का तात्पर्य यही है कि संसार में निमप्रति गोमात प्रत माविष्कार हो रहे हैं, सगर-पार-मादि उपयोग में भाने वाले पार्थों का जो दिम दिन मबीन विपास होगा, इसका एकमात्र धरण मारपसारे । मनसमान भयो म्पो सम्यता में भागे माता पाहा,प्पा स्पों उसकी भावरपकमाए बनती बारी है। संसार कम विकास की भोर पादा फसत उसका बौद्धजगत् मी कम बस से उपति पी भोर भनेर से।
नियम मा भाप्पमित्र सम्पा - इस उपति श्रम के साप साप मारपकसमों का परि मी साम्पतिकोइस के साप उपयोग में माने सीमासपक सामग्री में सम्मता विकास के मनुरुप संबोधन भी परम पाएपको। सम्यता को मह में रखने वाली मासयकता अन म्पविष्कारों की बननी है तो पानिकारों को कोई दोष नही दिया चासकता । मपनी भावरक- कताएं पूरी करने के लिए माविकारों से गम सयमा भी भाषरयक ।। या तमी समर ६ बम कि हम अपनी मार्षिक परिस्पिति में विकास करें । सन हम भसम्प पे वो हमारी परपकताएं मी कम पी। इस कमी से मनिकारों कार भी मरम्म पा। फलता परिमित मर्प से ही हमारे जीवन की समस्याए इस होगाती थी। बदम सम्प बन गये हैं अपना बमते मारे। ऐसी दशा में ठप्त मसम्पदण में नील निरि करमामारे लिए असम्भव है। मारय ही भारयकतानुसार में मार्षिक समुपति करनी पड़ेगी। यातमी सम्मब ६ जब कि हम मर्च को ही मपने पीएम का मुसम सप बनावेंगे। इस में भी पानी पि पर सपा सुगम हो । सिनेमा नारक, रेरियो, भोपाटी का समय सेक की मुरादौर, गावामार बाग की सच हवा, देशयात्रा, होटलों में अम्ति पूर्वक मोगन, पापहम की चिरम्तन उपासना, केरा वेश संवरण प सब मी तो सम्पदा के ही अत्यावश्यक मारें । मला परि सम रिन पत भोपार्मन में ही मफ्ना समय सम्प देंगे तो पर सम्पता लिस के नाम पर मासू बहायेगी। एक हो । भान हमारी मुरि विकसित है।हम अपने विषय से बिना मम किए की सब कर सकते हैं। सम्पता की रक्षा के लिए मिष्पाभाषण, बाबसायी बनाष्टी गग, पटवा मारि भाविकार पाप्त है । इन सघरे पोरे भ्रम से हम अर्पसत्य में पूर्ण समता प्राप्त करते गए, उन भावकारों संपरा मपनी सम्पदा से पूर्णरूप से पुरमित रस्ते ए अपने जीवन कोम्पबना सरतेहै। पला न होप हि भाव ऐसे ही मसानुमायों घ इस देश में माधुर्म है। देश मोर मोर मौगिक मापों पर इस प्राय का मामय कैसा राय, किस प्रकार इन प्रपंचासामूतक सम्पवारचक माविकारों से शान्तिसपा मारत देश घण-कौगर वीर्ग वीर्ण बन गया ! .
नियम • माप्पमूमिका ॥ भाविकार इन सम परिहिपतियों की मीमांसा करने का म तो प्रहत में ममसर की एक न इस घातक भीति फे विवेपन की हम योग्यता ही रखते हैं। इन प्रातियों से देश की मो नग्न दश होती है, वही इस सम्यता, शिक्षा, पर्पसअपवाससा, एष माविष्कारों की उपयोगिता में असन्त प्रमाण है। कहना में केस अपने साहित्य के सम्बन्ध में। भारम्भ में "मावश्यकता प्रापिष्कार की मननी" पा सिदान्त बताया गया है। सितम्त एक भास्तिक की शि से सपा नगण्य । कारण स्पर। भारयकता की इदि का मूस कारस मौतिक प्रपत्र है। पणिकरिधाममार मौसिक विज्ञानपाद है। इस से सिम के भौतिक पदापों को प्रोत्साहम मिला है। पदार्थ का सहप पगिक क्रिया से संपमामा है। पणिक- क्रिया मम्याक म्याक भम्पक इन तीन भावों से युक रहती ई नास्तिकपा है। मस्तितत्व शान्ति की परम प्रतिष्ठा है । मह विशुख सचामान ही नम है, जैसा कि वर्तमाम सम्पता के मन्यतम शत्र मारतीम अपि करते *मस्यस्वारोपमद यत् मचामानमगोपरम् । पपसामात्मर्सवेष वशान प्रम समितप । (पचदशी) इसी सपा सके भाषार पर मास्तिरुप भौतिक प्रपत्र प्रतिधिमा मस्तिसम का उपासक एक मास्तिक सचा को मन में रखतामा ही अपनी भावरपक्तामों का अम्बेपस करने के लिए भागेका परिणाम इस सचामुसाबय का होता है कि वह मौतिक विप इस के मतम गत् में विशेष प्रभाव नहीं जमा सकता। शरीरयात्रा मिर्गह के लिए कम से कम संध्या में वितर्ने साधन अपेक्षित होने वाली से पूर्ण पुर रहता था मस्तिमा की उपासमा के बस पर शान्ति से मपमा जीपन म्पपीत कर देता है। मस्तिान वहाँ गति, पि, पति की समिति पहा मासिकप मौति रमणन्ति, षसम्तोप एवं तृष्णा का मुसाभार ।मास्तिक की • सम्पूर्ण मेरमा ने बताया विगुग साचार वा से प्रगपई ही गुरस्कास्प भाव समासाता है।
- भाप्पमित्र मास्ति-प्रति सम्पदा सहा महिनाप से सम्बन्ध रसती है, परियोपासक की सम्पता का मारितरूप भौतिक भिम से सम्बन्ध मौतिक विप का सहप किपा से सरमामा, हिया पणिक है । सीपण भाव के कारण इसमें मामात्र मी प्रविष्ट्य नहीं है। जिसमें प्रतिष्ठा का भावन्तिक समय होता है, उसे "म्प" हा भात ।। मतएव नास्विरूप वध के उपासक नास्तिकोंने निय का-"गन्य शुन्य-पास दुस-समक्षण सक्षण-क्षणिक वणिकर पा सास माना है। ट्रम्पमाष सदा गुम्म । कमी पूरी न चापम्प, या सर्मपा भसम्मा। कृष्णा को मन में रखने से शुम्प हिसमय भौतिक पदार्प, किंवा भौतिक निफर कभी पूर्णवासपण स्वोप, यिा वृप्ति के कारण मी नसकठे । यही नही, मिसप्रकार शिकारी के पास में पति की माग से प्रापा मा मृग जैसे जैसे उस पास से निकलने का प्रयास करवा , बैसे से ही अधिकाधिक उसमें फस जाता है, ठीक उसी सब गम्ति का कि मनुप्प यान्तिवाससा से इन भौतिक पदार्थों में भारत होतामा तरोत्तर प्रयास ही बनता पाता । इसरे राम्दों में या सांसारिक मा प्रणतिरूप भग्नि के लिए भागति मारमा उत्तरोता इसकी गति काही बरण बनता है। जैसा कि मौतिकतिपयों से सत्रस्त मापन ययाति से करा- xन मातु कामा मामानामुपमोगेन गाम्पति । हरिपा प्यनव भूय एवामिरर्दने । मस्तिकरूप वहां भूमा है, नास्तिवन पो मापता से सम्पन्न रसना ।। मास्तिक दर्शन के अनुसार भूमा ही सपा सब, एष मानव द्वारा बेसार x-संसारिक मासिक पामना साब की रात मा अपितु सर बायपार (माति) से ग्रसित प्रमात रोगा। इसी प्रकार पर मैनिक सम्पयाप एपमोन से मरती नहीं है।
निवेदन F1 मान्मभूमिका - भारमा-शरीर . 'यो नै मूमा व मुम्ब, पदम तद् दास, नापे मुस्लमस्ति, भूमानमित्युपास्व" (सा०प० २३१) इस्मादि मोपनिषद सिद्धान्त से स्पर है। मूमा शुस्व का माम है, इस बात का एकमात्र मस्तिसक्षण मारमा के सापही सम्पग्ध है। पता कमी है, इस की प्रतिष्ठा का सम्बन्ध नास्तिसपणा विश्वसम्पत्ति केही साप है। ऐसी दशा में केस मौतिक निरव से भूमाषण वास्तविक मुस की माशा करना दुराशामात्र है । इसी मौखिक रास्प के भाषार पर प्रषियों के "नारतस्वस्य म-पागस्ति पिचन "समा विदितातिमृत्युपेवि नान्यः पन्या पिपते ऽपनाय" यह सिदान्त हमारे सामने माते हैं। उक्त मस्ति-नास्तित्वनिरूप से निष्कप या निकसता है कि विश्व का मानव समान मसि-मास्ति मेद से दो भागों में विमत है, मिमा । क्या विमल पा । भाग तो दोनों का भासन एक ही पक्तिने प्राण कर रखा है । "इठमस्ति' (यह ) इस भविज्ञान का परिचायक एकमात्र सूर्य देवता है। सूयसत्ता ही भस्तिमाष की प्रतिष्टा है। जब सूम मस्त होबात है तो सम्म्ण मस्तिप्रपञ्च नास्तिमान में परिणत होनाता है। निवसता की मी प्रतिष्ठा पही सम्प है एवं हमारी भारमसचा का पाप मी यही सूय्य, सा कि- 'मर्य प्रात्मा नगवस्तस्युपश्च" इस्मादि श्रौत सिदान्तों से स्पष्ट है। सचमुच या काही समकार है कि वो पारमा हमारे भस्तितवण पात्मा की प्रतिष्ठा है, वही मारमा मास्तिरपण शरीर, किंवा भौतिक पदार्थों की मी प्रतिष्ठा है। वही सूर्य अपने एकरूप से हमारा भास्मा बना हुमा, वही सूर्य एक सरे रूप से मौतिक पदार्पो का प्रमप बनत्य मा हमारा शरीर बना हमा। सूर्य के पही दोनों विस्म रूप क्रमश मित्र बरुण माम से प्रसिद्ध है। मित्ररूप से ही हमारामार, बहसरूप से ही हमारा शरीर मौतिक सम्पचि में बिक रावस्म भमतमान की भमना पाण्रम है। ग्छ प्रात्यविवाश परिवान बने सही मनुप्प प पुष्प पाय पाळावा I समानिक समय में इसरे अतिरिक्त मराई मार्म नहीं है। गायतर परामों का पाई।
निरन या मामममिय मास्वि-अस्ति सम्पमा जमिस्तित्र से सम्बन्ध रसती है, यहां शिवोपासक की सभ्यता का मारिताप भौतिक यि से सम्बन्ध है। - भौतिक विष का सरूप विमा से सपनामा , बिया पणिकरे। इसी पण भाष के कारण इसमें भामात्र मी प्रतिष्य नहीं। शिसमें प्रतिष्ठा का मालन्तिक ममान होता है, उसे "गन्य" कहा बाब है । अतएव नास्तिकप सम के उपासक नास्तिको विपक-"यन्ये शन्य-पास दुसं-स्वसधर्म स्पसवण-वधिक पथिक" या सास माना है। गुल्पम्मर सा धन्य है। कभी पूर्ण बन गायप, या सर्व सम्मर । तष्णा को मुरा में रखने वाले राम्य क्रियाश्य मौखिक पदार्म, किं भौतिक विकास कमी पूर्णवाचषण सतोष, किंवा प्ति के कारस मही बनसकठे । यही मही, गिसप्रकार शिकारी के पार में वृप्ति की भाग्य से पापा एमा मृग जैसे जैसे उस पार से किसने का प्रपास करता है, से फैसे ही वा अधिकाधिक उसमें फस गातार टीक उसी तरह शान्ति का कि मनुष्य पम्तिबाबसा से इम मौखिक पापों में मासा होना मा उत्तरोत्र मशान्त ही बनवा पाता ।सरे शब्दों में यह सांसारिक पैमर प्रशान्सिसप अग्नि के लिए भागति पनवा पाइसरोपा इसकी दिका विरण बनता है। वैमा मौविसनिपपों से समस्त महाराय पपाति ने कहा- न मासु कामा नमानामुपमोगेन शाम्पति । हविपा रुप्सनस्र्मेन भूय एवामिटते ।। भारत का सप यहाँ भूम्य है, मास्तिवात या मम्मत से सम्मम रस्ता है। भास्तिक दर्शन के अनुसार भूपा ही सपा मुबी, एप मरवा द्विारा पैसा कि 7 xसारिकमा वाममारे समाव से मी गात होता । अपित मिसनमा बम (ति) से ग्रसित मानत होता है इसी प्ररामविक भयमार पोल से समरही बगी। ४ निवेदन * मान्यभूमिका ॥ पारमा-शरीर , 'यो मूमा वन मुम्म, यदर्प तद् दुःख, नापे मलमस्ति, भूमानमिश्शुपास्व" (St००प० ७२) इस्लादि पोपनिषद सिदाम्त से स्पष्ट है। ममा मात्र का नाम है, इस बाल्प का एकमात्र मस्तिसक्षण भारमा के सापही सम्बन्धमपसा कमी, इस की प्रतिष्ठा कासम्बप नास्तिसक्षणा विरयसम्पति के ही साप है। ऐसी दशा में केयर भौतिक विरम से ममावषय बास्तविक सुस की मात्रा करना दुराशामात्र है। इसी मौविक यस्प के भापार पर प्रषियों के "नामस्वस्य तु-माणास्ति विचन" "तमेस विदिस्वातिमुस्युमेवि नान्यः पन्या पियते ऽपनाय" पर सिधान्त हमारे सामने भाते हैं। सक्त मस्ति-नास्तिवत्तनिरूपण से निम्पप पर निकसता कि विश्व का मानव समाम मस्ति-मास्ति मेद से दो भागों में विमाह है, सिमझ पा विभक्त पा । मात्र तो दोनों का मासन एक ही म्यक्तिने प्रहम कर सा है । "इदमस्ति' (पा) इस प्रतिमान का परिचापक एकमात्र सूय देवता है। सूयसाचा ही मस्तिभाव की प्रतिष्ठा है । पम सूर्य मस्त रोगता है तो सम्पूर मस्तिमपम नास्तिभाव में परिणत होगता है। विश्वसचा की भी प्रतिष्य यही सूम्प । एवं हमारी मारमसचा का भाभप मी पही सम्य 1, मैसा कि- 'मूर्य प्रात्मा भगवस्वस्पुपरप" इस्मादि मौत सिदावों से स्पष्ट है। सपमुष यह बस की चमकार है कि गो मारमा हमारे मस्तिसषण मात्मा की प्रतिष्ठा है, जी मारमा नास्तिवपण शरीर, किंवा भौतिक पदार्थों की भी प्रतिष्ठा । । यही सूर्य अपने एकरूप से हमारा भस्मा बना दमा , श्री सूर्य एक दूसरे रूप से भौतिक पदापो का प्रभव बनब मा हमारा गमि बना हमारास्प के यही दोनों विरुण रूप क्रमश मित्र परुण माम से प्रसिद्ध है। मित्ररूप से यही हमारा मारमा ३, रणरूप से वही हमारा शरम मासिक सम्पति से निम नाम अपमान भी बाम्या परका यह पुरया है। ग्स पावोबादा पवान सेने सही मनुष्य परस्पर सहकारा पारवाई । सुनवारी समय में इसके अतिरिका सराग मात्र मी या तम परायों गया है।
पिरम समाप्पमित्र - मित्रबल है। दूसरे गणे में यो समम्भिर कि मित्रप से बह भारमसरि का प्रावक है, एक परारूप से मूतसरि, धिभषधि का मनक है। उधर-दक्षिण ध्रुप से सभी पाठक परिचित है। इन दोनों पुषों से स्पश करती हई पो रेखा दक्षिणोचर जाती है, मही मप्पामरेता कामाती है । इसी को पाग्योचरसत करा पाता है, पही घुमोठार माम से भी प्रसिद है। यपपि यह बात सहपा में ३६. होते हैं। परन्तु यहा हमें उस पत से प्रयोजन है, जो मध्यरात्रि, एवं मपान से सम्बन्ध रखता है, यो कि मप्पाच भारपानरहस्पमापा में 'उपशी मध्यरा' नाम से प्रसि ।। रही मम्यामार के तल मित्र-वरुणमानों का विमान है। यहीच पूर्व-पश्चिम Pा विभागक है। मप्पाद एव मध्यरात्रि के पर इमर का प्रग ( मिसके पिति पर मर्यादय होता है) पूर्णविक , सपा उपर का माग (निसके वितिय पर सूपास्त होवा 1) पश्चिम्पविक ।। पूना- हिक् पूर्वकपास है, इसी में मप का मित्ररूप प्रतिष्टित । पश्चिमादिक् पश्चिम कपास है, इसी में सूर्य का बरुणलप प्रतिष्टिव है। पेदिक परिमापानुसार एन को वरुण का पाता है, एक स्लेडी को मिन कसा पावा है। सबै मित्र-म्प सदी इस पर्व को प्रकट कर रहे है। स्नेनार्पक "प्रिमिदा" (भिमिया स्नेहने-पा०वि०७४३धा०) पत से मित्र शब्द सपमामा गोम्पति, भपषा जो तब हमारे साप मिलता है हमारी मोर पाता है, हमारे अनुकूस से, उसी का नाम मित्र है। पूर्णमास में राने पण सौरतच हमारी मोर माता पहला है, हमारे साप स्नेह करता राय-हमसे मिचता हसा 1) मतएव एवर्कपागरिकम स्नेही सौरतल को हम भाय ही मित्र करने के लिए तम्पार है। रात्रि के बाहर बाद से दिन के १२ बजे तक इस सौरतल की पही पण राती है। पही तस्वसचा हम्परे लिए न्योति, योति प्रकारा, प्रकाश दीपायट का सूचक मामा गया है। इसी यस्प के मापार पर कानिक महोपन (दिन-न) दिमाग के अनुसार रात के १२ बने से दिन के १२ बजे तक महाकार माना गाता है। इसी को गवणवेच चिनन" (अम का दिन) शब्द से सम्बोधित करते हैं। - . ।
का माप्पभूमिका :- सक्रमापक शुश् चाव से (ह वरणे-पा०मारि०.१८७मा०) से बरुण शम्द निप्पम सभा है। नो पनि प्रयदा को तस्व हमसे नियुक्त होता है, हमसे सिमटता है, हमारे प्रसि क से बही तस्व, किंवा म्पति पास है। पश्चिम कपास में रहने बाग सौरव हम से होता रहता है, हमसे र मागता रहसा है, मतपय तपासावमिम शत्रुमर्षि इस सौर तत्व को हम अश्य ही मण करने के लिए तम्पार है। दिन के १२ बजे से राशि के १० पजे तक इस सौरतस्त्र की यही पण एती है। पर तस्वसवा हमारे लिए तम 1, तम की मात्रकार है, अन्धकार ही पत्रिका का सूचक माना गया है। इसी भाषार पर दिम के १२ बजे से राशि के १२ बजे तकाकार रात्रिकाल माना गया है। प्याकरण लोग इसी को 'मनपवन" (भागामी दिन) करते है। मित्रतत्व ही इन्द। "प रूप मघरा पोमपीति" इस शासिमान्त के मनुः सार इन्द्र ज्योति का पविष्टाता है, परुणदया पानी के देवता माने गए हैं। दूसरे राम्दों में पोतिम्मम प्रास का नाम स्त, एव भाप्यप्राण का नाम वरुण है। देवमति के मूसा धार है, परुण भमरसृति के प्रवतक हैं। दोनों में परस्पर भागमाहिप्य ( सहममेर ) है। पूर्वदिश के दिक्पाल में तो बाण पश्चिम दिशा के विकृपाठमाने पर हैं। महा पूर्व रिण में सूर्योदय होता है, वहां पश्चिम दिशा में सात है। मतप मारमा की प्रतिमा है, वसतल शरीर की प्रतिष्ठा है। शरीर बही उत्तम माना जाता है, गिस में पानी अधिक होता है। मावदार शरीर का ही कुछ मम्म।विट के शरीर का पामी उतर गया, पहरीर निकम्मा है।पामा पही श्रेष्ठ माना पाता, बिस में प्रकास सपण विकास अधिक रहता URकसित मात्मा का ही कुछ मम्प है। मिस के प्रास्मा में से विकास निकम गपा, वरचा है। इस प्रकार सोकसरि पल्स पर निर्भर है, एक तोकी की सटिइन पर निर्भर है। कारण स्पर है। पानी के मप्यत पण ही पानी से सोक निर्माण करते हैं। सातों सोकभापोमेप है। वित पप्पु व मुनम गोरुसमुपविfears भापोममा सरपाः सर्पमापोमयं जगत् । (महामारत)। ।
निवेदन -I मामभूमिम । पिकी में हम यते है, प भी "अदम्यः पृथिवी (३०१०२।१३)" इस तैत्तिरीय सिवात के अनुसार पानी का पिसम हमारगीर भी पानी का ही सपाम्रो । गुम-कोसित दनों मप्रधान है। इन्ही के मिथुनम्मव से समीर कना, सा कि-'इवि तु पबम्पामाइवा पाप' पुरुषवचसो मन्ति" (डा०प शरारा इस पापिविष्यसिमान्त से सर ।सोक, किंवा सरीरमति मर्पसहित। सर्पदेवता मापोमय पसरूप से ही इस भौतिकसृष्टि के भाम्प मिपाता बनते है एक पाने उसी माह से इस मौखिक पर मामा मते है। किया है, वे ही विपक्षप है, वैसा कि निम्मतिसित मन से स्पर शेमावा है- -विश्वरूप रिस मातवदेस परायण पोतिरके सफन्तम् । सासररिमा सतमा पर्चमानः प्रामा समानामुदयस्पैप सूर्य ।। (मानोपनिपत) २--दिलो सम भाषया देविरे भपसरगिभ्राममान । नूनं अनाः स्पेस मरवा मपन्नानि करानपांसि ॥ (5 से.७६०) १-चित्रं देवानामुदमावसुम्मित्रस्प परुणस्पापः । मा मापामापृथिवी प्रम्परिक्ष सूर्य प्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च । (पग्स १२१)। पोरामस्वरूपसपाता, देवाप्सरप्रसक मास्म-मोक प्रमप, म्योति-समोरूप जन्ती मित्र-मरूपों, किंचा त-पायों का स्पीकरण करते हुए निम्न लिखित प्राव कदम हमारे सामने माते हैं। [१-प्रा मित्र (ऐना००१०)। मित्रा-प्रह (०मा..1001 -रामियरुणा (ऐ०मा०४९.1 रुप-रादि २भारपीराणि (मा.रा.), -मैत्रपा प्रहा अहोरात्रे मिबारम्पो- A निवरन माप्यममि - १-माप दा मप्रपन्त, (पेवा०४॥५) २-रामीमाः (भप्रयन्त), (ए) -दिना देवानसजव, वरेवानां देवत्वम् (पर्षियमा०४१) । २-नकमसुरान् (असमव) वदसराणाममुरसम् । । '-अप यद पुरस्तादासीन्द्रो रामा मूनो पासि । (मै०PIRITRI) २-अप यर पश्चासासि वरुणो रामा मूतो पासि । (मै००३२॥२॥ 1-पापो वरुणस्य परम्प मासन् । प्रा०1१)। २-इस पैलोका सरिरप (ससिमम्) । (श०७।५।२।११)। १-प्रसौपाव ज्योविः, तेन सय्य नाविसति । कौ०२०)। ५-सज्योतिपा-अमूमेति, सवेवरभूमेत्येवैतदाइ । (१।१।१५)। २-एप एवेन्द्र , प एप (या) वपति । (शत०२।१३।४।१२) । एक चमत्कार मौर देखिए । इन्द्रका रूपम्पोति प्रधान होने से शुक्स -यव-एक्स, सदेन्द्रम्" (०१२।१।१२) । वरण का रूप तम.प्रभान होने से रुष्णवद -"अप पद कपण, वदपीरूपम्" (२०००)। दोनों प्रपणा दिम्प, एक भासुरी सृधि के, सरे राम्हों में मात्मा, एवं शरीर के प्रमय है। जिसके मारमा में पास की प्रधानता होती है उसकायस्थ भास्मेन्द्र मामस्मान को छोड़कर शरीर में प्रतिष्टित होगायोगास का सामाप भन्तरतस है, इन्द्र की सत्ता महिास्तव में, पर वारणी मृशि का सहप है। इन कर पारमा हम भापोमय वरुण के चरण मनिम राता उपर शरीर शुक्सान्द्र के कारण शुक्स रहवा । सापही में ऐसे पारण मनुष्यों की प्रधान सम पर ही रहती है।भामा चाहे मोर मी मधिक मशिन पर पाप, परम्म गर साफ सपा पिकना पुपका एमा चाहिए।
निबरन भया माप्यमृमिका ॥ मित्र- नसके विपरीत चित के मामा में इन्य की प्रपामा गती, उसके कामवास भाग को भात प्रवेश करने का मासर नहीं मिलवा । भातस्तव में एग का साम्राज्य, परिस्तित में पठण की सच पती है। इन फा पास्मा शुक्स एयरे कारण निर्मल महता, उभर राम गणपणी सपा सेण, मपा गेंदुए मर्ग का होता है। साप ही में ऐसे ऐन्त्र मनुप्पों की प्रधान परि मारमा पर रहती है। शरीर सस्प रहे, इस के पति इन का समरिता से कोई सम्पन्ध मही रहता । यो पदार्प शरीर को बत देते हैं (भएर-मास मावि), किन्तु भारमा को मसिन बना देते हैं, उन की या पेक्षा कर देते हैं। पपी ठरू नियम का पा तत्र देशविरोपों में चारिक रूप से अपवार पर ही रहता पतु सामान्य रूप से पश्चिम दिण में वारणमनुष्यों की ही प्रणनता है, एष पूर्वीप देशों में ऐम्र मनुष्यों की प्रधानता है। वे शरीर से गौर, परन्तु मारमा से मशिन है । या शरीर से एप्स, पिन्त व्यामा से निर्मम है । उन का पास्प मौनिक मव । इन का उपारय मारममय है। रात्रि के अनुपायी , मार (पानरूप पणि विज्ञान) के उपासक है, या महाकरण के अनुपापी प्रकाश (हान) के उगसक है। वे परण पनते हुए वरुण है। पानी का दीयो नाम परुणापतः इस पर माम बरण है। पर मानिस स्पान पर पाप करता है, उस स्थान को चारों भौर से पैर पर अपनी सचा पमा लेता है। पानी भाभी सच मागेमरे का सम्पुश्य सदन मही कर सकरम । फि यह सरासरबर म्याप्त हो जाता, पतएप इस पानी को पर कहा मातामण रादरी परोपप्रिय मानिक पी परोपापा में पास पाता है। मण रद के सी रहस्य का उद्घाटन परती पुरी '(पापः)-पप हमाविष्ठलरामर । या एत परणं सम्स परुया विसापने परोवण। परोवपिपा देवा प्रयधदिप" (गा पू11७)। पापी बादी पारपरता से भपिक नपरे । पत यो इससे व पप, स्पेभान गभ प से हमार मोग मा पानी उसका सार या माप्पभूमिका पूर्व-पत्रिम माम निशान मिय देता है। पानी सम्पमपाद से प्युत , भूमधाम है । इसका कोई निया माप नहीं है। अपने सामारिक पतमात्र के कारण मह अपने लिए कोई न कोई रास्ता निरपरीवारमामयी प्रबा का मी तो यही समान है। बद्रतत्व ही मित्र है। मित्रतत्व अनुछ होता मा मी सत्समाग में प्रतिष्ठित है। सौर रश्मियों को रेसिए न, कैसस निफ्त मान है। एक सिरा मागे रस दीजिए क्या मनात यो रश्मि माना नियत माग कोबकर पर उपर पक्षी बाप । तिस से टकराकर र उसी मार्ग से आपस सोट नासी । साप ही में अपने पोतिर्भाव के कारण पर समाप में मी उप इसीलिए तो इस समस्य को तपम (तपठा इका) कहा गया है। परन्तु यह मपनी इसी सन शाह से दोपों को निकास देता है पाप मिर्मत कर देता है, सचत्र मपमी गति का प्रदान किय करता है। पश्य की तरह यह भवकार में, घोके में की मसवा, मापत सर का विकास कर देता है । ऐन्द्रीमा का भी तो यही सरूप है। दोनों दक्ष प्रमा पूर्ण-पक्ष्मि विक् में निमत है। परिधी देश मन्त-हण, शुक्म है। पूर्ण देश मन्तःशुत बहिण है पाराम देश भौतिकवाद किंवा अपयद का उपासक है। पूर्पदेश भामाद, लिंग चैतम्यवाद का अनुम्यमी है । साम्राग्य तोसुप हैं। इसी पमिमाप से एक स्पान पर पश्चिमी रानाभों की मनोचि का दिग्दर्शन कराती ह युति करती है- "तस्मादेवस्या प्रतीच्या दिशि ये फे पनीयाना रामानोऽपाम्पानो पारा ज्यामिपिम्पम् । स्वरारिमनानभिपिकानापरवे" (ऐ०मा०11) +"पुरोगरी पराकपास रिम्पपत् प्याना मोरीणाम्' (३.मा IITLE)-दिपाण पत्त कम्णम्'-वहरिक्तिपाय शुक्लाव पिकापस मून उहानि । पारुणस्य रूपम् ।" (4 mins मुलिए इसी रास भ समय पारेर लिए उप गरि प्रधान है। पारमा प्रवास रिमा राता है। अन्तिम नतिरे दो साल से पाय नियम वा मायभूमिग- इम्पगौर . निष्कर्ष यहीामा कि सूर्य के देप्रपान ऐग्द्र, किंवा मित्ररूप से भार्यप्रनाकी उत्पति ई', एवं सम्प के भरप्रभान गणरूप से मनामना का विकास भइसी मापार पर पेदयस्पपेला मनुने देश को मार्ग-मनार्य मेदों से दो भागों में बिमल किया है। "न काले , प्रसम्म हैं। ये गौर सभ्य "इस हार का यही सषिप्त इनिासो । मा उन मौतिक भाविष्कारों पर, एम समसे सम्म प रसने ली सम्पदा मारपक सखों पर पशि गदिए। पसदेवा से सम्बन्ध रसने बारे परिचमी देश पदि "पाररपफवापी पाविष्कार की जननी है। इस सिद्धान्त के समय बो वो को भारषय नहीं है। क्योंकि हमको रि पूर्व कपनानुसार भौतिक प्रपच पाहीहै, बोकि मौखिक प्रपत्र, किंवा नाशिाम कम समय के लिए निमोद का कारण ममत्व मा मी मम्वदो गाय बिनाशपही कारण बनता है।पारसमसामों की सत्तचर विही पश्चिमी देशों का मार्ग है। पर ऐन्द्र पय देशों का भादरा इनसे सर्पया मिल। इन की राशि प्रपानरूप से मारमा परमात्मा सय सपर है। उसके सामने भौतिक प्रपाच तम। फलत इस "माद में मारपस्ता एवं बनावटी सम्पता को प्रवेश करने का अवसर ही नही मिवय । 'मारपसामों की उत्तरोचर कमी ही यहां का मुम्प पेप है। यही कारण था कि भारतम्- पपी मारियों को इन पातक माविष्कारों की मारपकता नगई। मोम प्राव कोही अपनी जीवनयात्रा का भासम्बम माना | मारपकवा के प्रमाब से वे अपशिप्सा से पर। मसातवे इस पिता से मुक्त है। पन्स क्योंने इनकी परिमित भारपकवानों का मार अपने कन्नों पर सिमा । इस प्रकार से समपिन्वनिमुक्त मारियाने प्रत्युपकार में भामराव मदुप्प का सस्म मे सामने करना । बोपी विर-पाचे मातरम में कम सी ना भमान हो कोसे परम सिरे सर से पटीने निमसर मितमममा बो समर्ण हो, म पनुप तापात् परब मरतापवा पर आहुति देने की पूर्वमने निकाल लिया है। ऐसे मनुष ग्रे पापामा मामा कया है। ममाव इस भाप अपने पपों पर यात्ले माना।
सा मानमिष । परम्परति । हमारे सामने रम्या । भूपियों की इस मम्प टेन के सामने भैसोप्य का भाभी नगण्य है। नही मन गीतामाष्प के इरा भाम बसमान जप के सामने माने मान है। परन्तु । 1 म न पूछिए 1 इस परन्तु का उत्तर हमारे पास नही ।।सा कि भारग्म में कामी पका, इस सम्बध में हम गोकसंग्रह की रक्षा नहीं कर सकते। भाव का भारतपाईमार राकर फेतुमामर्प मनगया है। पूर्व पश्चिम मन गया है। मारतका माग्य सूम्य पश्रिममें पस्त होगया है। वही सम्पता, वही विहाम, ही भलिप्सा, व्ही पणिक भाष, ही पसन्तोष, बही शरीर चिन्ता, इस प्रकार यह माम सपारमना र पम गया है। माग हम मारतीय अपना भादश सोपेठे है। पूर्फक्त भाविकार सिदान्त का मनुपमन करते हुए भाव हमने एकमात्र अर्थ कोही माना सप बना लिया है। पर्म-कर्म-शाम-देव-नि-गुरु-ग्य भारि का भाग मारी रहि में कोई महत्व नहीं है। मामण समान ने इसी भलिप्सा से घेराप्ति का परित्याग कर लिया है। परिपर्ग अपने स्वापों की चिन्ता में निगम होता एमा-"चतार झिम प्रापत इस्युदना चस्प सम्छो मुरनपु मतः' इस मादरा से पधित होगया है। रपर्ण एकम्मम भर्षपरापण बमता मा सब भोर से निमुस बन मेया है । परप समझता है कि यदि में भर्ष का समाग में उपयोग करने समूगग सो मेरी भावश्यकता पूरी म होंगी। साथ ही में मेरा म्पसिय मी गाता रहेग्य । सधर्मप्युट या महाभाग मी कम उपहासता नही कर रहे । दुभाग्य से कुछ समय से प्रारक नाम का एक वर्ग और वायम होगा। इस ने तो सभी पर आप साफ किया है। इस मोतवादी की रष्टि में पशु मोर मनुष्प की सम्पता में भी कोई मन्तर नहीं है। इस प्रकार हमारा पह पवित्र देश मान द्रुत बेग से नाग की भोर प्रोसर होता, या गान पर, एव देस कर कौन सपा मारतीप दो मासू नबहावमा । पागरिकममुपनपनुसार कामामर की सीमा में मारी।
I मानविका mয়ম भाप सन्यानो भारतका भावपार की जममी मही, अपितु भाव पर मादकार काममा कपमकान है। यामिति विशारद टेक मैतिकों में मापके सामने ऐसी सामग्री रस दी निसके प्रोमन में परे विना माप नही रह सकते । मारत की नि मरियों में प्रधसम्पणि प्रचुरमात्र में निहित रहती पी, भाव भी महियों में हमारी मामामामों को सोगमा देने पर वे माकीचे पदार्थ सनकर सनाश के लिये में निमश्या रहे है। इस निमनस कोर बनाने के लिए पी समापनेता हमारे सामने माते है। "मपदापरति मेस्वचदेवरो मना" भमुसार समार के निक, मुसिप पिस पारहे हैं, साधारर पनता मन्त्रमुग्ध होती सी मपाक पपका मनमान कर दी। इसी ममाम्मरी ने हमारी सत्मसम्पत्ति शास्त्र) को पर्मति कर गया है। ऐसे मपाल पुग में एक पासा पोपा डेकर (सो भी उपन्यास पानी, मप्पापणास्त्र काम करनेत्र में उतरते है तो चारों मरे से "छोट भए, हमें समप नही, इसमें वो पुनकितना फोन पगा। इस पुरस्कार निको समने सौमाग्य प्राप्त होता है। पसरण में हम लोकसमा की का कर तो कैसे करे । यही पटिए समय हमरे बोमका कमल बम सी। और हम समझते है कि हमारा पाचोम इस पुग में रात भी नही हो सकता । पप समम पर भी एकमात्र इसी माम से कि भूमि पर की, सत्य ही में करम्पुरा मी अनन्त ।। इस समय भी एपिसी के किसी स्पस मेमारी कोई म सम्प्रदाय का भमुमामी भिषय मातर में पैदा हो सकता है, इसी से प्रेरित होकर पर प्रपस फिय, बोकमानचासमय मपास कार को निम सूति से पर- ये नाम विना अपपम्स्प। नानम्न वे किमपि ताम् मति नैए पस्न: n रस्पस्यवेऽस्वि मोऽपि समानमा। कामो पं निरपपिपुिसा र पिपी "पाय धर्मा पूजा पीसिनसम्पति उपमोम करवे एस पारमाधिक नियम * माममूमिका . स्वाम्मम्मुखाप मात्मानन्द माप्त करना चाहिए | उसकी प्राप्ति के प्रमुफ सपाय" पियों के उपदेश का यही सपित निदरान है । फेरस इसी सत्य की सिद्धि के लिए पानी के प्रयोग में संयम से फाम सेने बारे सन मितभाषी, एष हितमापी मारियों की भोर से किसना विशाम शम्द प्रपध हमारे सामने भाया , परदेसकर हमें थोड़ी देर के लिए स्तम्ब दो बामा पड़ता है। सदिवा, प्रामण, पारषयक, उपनिपत-कुस ४५२१-पारानार पाम्सौ चौपीस पम्प) इन पार भागों में निवेदप्रन्य, लम्पाकरण, ८ निरुक भनेक शिक्षाए, भनेक छन्दोमग्य, कम्प,१० पुराण, १८-उपपुराण, ६५-स्त्र, महामारत, सिद्धान्त, संशिता, गमर, चामल, दरान, मारि २ पम्पों से मुक्त मापसारिम सचमुच प्राम के भूमामाव को सिय कर रहा है। पोपी सी बात करने के लिए, इतना विस्तार । फिर भी तो संतोप नहीं है। माषान्तर हो तब इन कामकम्य विषय समम भाषे, या मी भनेक मापाों में। माषान्तर का प्रश्न जब हमारे सामने भाता है तो निरवारमप से हममय कम्पित हो जाते हैं। पदि- 'मविनम्पाने मधिनपावर मात्रय लिया जाता है तो माषान्तर करनाम्प ।। यतो एक प्रकार से हम का माषान्तर विना है। यदि सधीकरण करना चाहते है तो एक एक शम के रास्य बतखाने के लिए मारपकता से अधिक विस्तार करना परता है । इस विस्तार कम में पुनहि दोष का मामाना अनिवार्य है। एक ही विषय १० स्पानों में रूपान्तर से कहा बायग्य । परम्त बिना इस पुनरुक्ति के हम विषय का समन्वय मही कर सकते । उपर "विस्तार भप से को इसे परि न देसेगा तो क्या होग" या प्ररम मीर पसी सामने सपस्पित गता है। इन सब मारनों को देखते हुए अन्त में हमें इसी निपप पर पापना परता है कि यह सारा प्रयास महरमा तुलसी की-"स्वाम्वामुसाप मुससी रघुनाथ गायामापानिवन्धपविमाप्तमातनोदि" इस सूति के मनुसार हमारे मध्यपन की ही, कामेर की पसेर ११, समोर १ पर्ग की। सब हरियामन्य ११०१ (प्प गसी माता हो । त्यो रक्षा के साथ एक प्राप एक वारसा एकम्पविपत् १ । रस प्रम इस धागामा प्रस्ट १९११ सा दीइस गरमा सेपेद व १९४सा में लिया होगते हैं।
निवेदन
1 मायभूमिका !
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मामपरितोष की ही सामग्री है। गुरुकृपा से गीताणाम के सम्बध में पप्पयनकास में जो को
निधार भूत दुर है, न चिपिबद कर दिया गया है। प्रभाह के अनुसार उसी मस्तम्पस्त लिपि
ममरको गीतामाय माम दे गा गया है।
मा एक प्रश्न इस समय में परमाता है। उसी का समाभान कर मामनिवेदन
समाप्त किया जाता है। पूर्व में मित्रावरुण सापप से निम दो सशिवानी का रिएक्शन
कराया गया था, उन के म पार पर सहसा हम यह मान लेने के लिए बाप्प होगते । ल में
भारतीय भादश के अनुसार सांसारिक मर का सर्वमा सिकार पर, समय पर नो हसा सूसा
'मझे उमे माकर मोरात्र भात्मज्ञामगिठन में ही मिमग्न रहना चाहिए, केबस भास्मा की ।
'उपासना कानी चाहिए। कर्ममप विश्व शान्ति य कारण है। फसव कर्ममाग का एकान्ता.
पारम्पार दना पारिए।
परि सचमुब मारतगसिपों का यही पारातोपदर से ही प्रणम्य । यदि योगी
के लिए गर्म पागसपण इस विराद मामाद को उगप भी मान लिया पाप तो कर्म
(सशिन कर्म) ITI से कर्ममय मिस में उ पम होने वसा, एक कर्मसापक कइयों को
पग्म से ही साप रखने वाला पुरुष सांसारिक कामी एकान्ता परित्याग करव, मसा
मसभा है । एमा, समान माछम सामानिक मिपत्रण, सम्परस्पा भादि के विमा संसार
मेगान्ति मारह सानी) उपर मामगदी को शि से पास मशान्ति र मस है। ऐसी दण
मे से गहना निर्म पागसन पाम यह केस पुल कीमतु। उसे म्यार
हारिकपनी रिग बासमता मतमोग्ला मे मीपभिमभादरी पराम
परम पावा।
सीमrAtोरन के निराश हमारे सामन बाप्पा मारण
कोटि मे पायही माम- INTRपनुरापा, जैसा Eि-"न ५ सम्म
गरेर मिदिमपरिगाति'-'
नयापारम्माकम्प पुपोऽनुने ' पk
गिलातों में बसपा सपनिमा के भगवान् महारा।"
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निदेन का माप्यमिको | निरूपणीय विषय दुर्मपि से कुछ शताब्दियों से मारतीय विद्वानों में विशुद्ध हानयोग का दो प्रतिपादन किया है। कसित जगन्मिथ्यावाद के प्यामोह में रात कर हमें कर्मसम्पत्ति से गून्य कर दिया गया है। उसी साम्प्रदायिक दुरपदेश से भाप्मसन्तान ने कर्म से मुख मोर लिया। सभी प्रास्न निस्पता का मुरा राम मासापने समे। सब के भम्त करयों में "संसार मिप्या, कर्म छोड़ो" इस लिप बीन ने अपना पर कर लिया । परिणाम इस का पद मा दि इस देश ने अपना सारा बैमव कर्मठ बातियों के मेट बना दिया । सतलत मारत अपनीासी मपार भूख से सदियों के लिए परतन्मतारी अधीरों से बकर रिपा गया । म्यारूपाला विधानों की सीखा यही समास मही। चों में भी उनों ने यही साप मगा दी। कुछ म्यामा नामों में वो गीता से बुद्धियोग- शास्त्र तक को शानयोग के रंग में रंगने में कोई कमी म की। मस्त म्पारमादोप से किस प्रकार बमारे सम्माया लिहल गर है, यह मीसा करने का प्रस्त में मासर नही है। पाठकों को इस का उपरतो सर गीतामाम्पही देदेमा हमें यक्ष कर यही कानाकि गीताशसकी रशि में कम्मरपागसपण शानमार्ग का कोई माल नहीं है। वो क्या मिता कर्मपरिमारक्षण विशनबरसा प्रतिपादन करती है। स्पा गीता में बम ए पादेश दिया है कि हम दिन दिन नए नर पातक माविकार भावे गाय, एक उन के द्वारा अपनी भावरपकतार पूरी करते चापपा गाता पूर्ण से हमें पश्चिम की भोर.सेगाना चाहती है। क्यापिका ने पारमसक्षण हान से बाधित रचे हुए हमें हमन की मोर भाकर्षित लिप्य १५ नही कमी नाही सवपा नहीं !!! जिस प्रकार कामयागापण विगुदाममाग गीता की पि में हेप उसी प्रकार कम्मरिमालपण विशुद्धविधाम माय मी तुम्म बस्तु है।विस महान (कम्म) के मस में शाम नहीं हता, मिन पसिक बनता इमा हमारे नाश करही कारण बन पाता है। विशुरु तिमान पपाप में मतमाग की समतिका कारण बनता एमा मी गाविसपण मामा के भनुमासे.पमित रहतामा अन्त में क्रान्ति का जनक बन जाता है। फलत या कम्मसपस शिरवानपाद मी पापापपप में महाप्रतिपक सिर होनाता है। , *माप्पभूमिका - शान-म्म भेद से उन्नति के दोही सत्र मार्ग है, एक पूर्व क नानुसार मेता दोनों काही विशेष परती है। ऐसी मास्या में शिसा शेती हेलि गीता काती क्या है! उपर मीतय सेतीपूषिए । मेता भारती, शान-कर्म का समन्वय, मान पिमान का एकीकरण, माम्म-विश्व का सम्मिमण । विश्वविद्वान उच्चम, परतु भक मूल में प्रारमा प्रतिष्ठित है। भारमझान सर्वश्रेष्ठ, परम्त विज्ञानमा विभनिमृति का उछेव न हो तप । ऐसा नियम बोभारम प्रशान्ति, किंवा र मणन्ति का कारण , सर्वमा त्यस्य है। ऐसा मामजान को निबसम्पति का भी स्याम्प है। हम मात्ममूहक पारितोषिक इस बार है, और मारप चाहते हैं। दूसरे शब्दों में भी हमाय परमपुरुपाप भी है। परन्तु हम पर कभी महीपाते कि उस परम्पुरुषाप के मप मपमा ऐहिसौकिक सार्प सपाखे। सचम मोरन, सुन्दर पेशमूषा, प्रजापति, सपर मम, पबसचा, सामाग्प सुखोपभोग, माम, मगर, राप, Rय कसा, पसिम्प, मादि समी फल हमें चाहिए । परसे एसोरिक सम्पलि, फिर पारलौतिक पुरमाप । परिते हा सपरि, फिर पहा मानन्द । हम मानन्द के उप- सकाइम पाा मी दुसी क्यों रहे । मानन्द इम्परा मग्म सिह मधिकार, सामाग्प सब हमारी बपौती, स्वत्रता हमारा धाराम्भमत्र है। हमारी मात्ममावना से अमुषित बाम उठाते ए पदि कोई नरास हमारी सायना पर, हम्परे साप्राम्प पर, हमरे ऐौकिक मों पर, 'हमारी शान्ति में, हमारी उपासना में समाजाची में, हमारे बाशिम्प में, हमारे कला-कौशल प, सारी सम्मका में किसी प्रचार का हस्तक्षेप करेगा तो हम पोड़ी देर के लिए सम-सपासना सबा दोरगे । वस समय सब से परिज, एक मुम्प करम्प हमारा ही होगा, मोहिबई- म्प यमन के स्मारिकार से मधित मर्नुन के सामने मगवान के भाया पा, एष मिस परम्प के बस पर योगी मन मे पुना मपना पम्यरमा प्राप्त किया था। उस समप हमें हमारी- "पुदाय स्वनिमया" इस शास्त्राम से कोई भी मरगण सकेग्य । क्योंकि हम मानते है, परन्त्र पर कई धर्म नहीं, ये शास्त्र नही। उसे पक्ष भर मी एस नही । गुणम प्रपा पार्म, क्या पास्त्र, स्या सम्पवा, स्पा मारकम्पएं। परि । मणिमूमि मोहनिद्रा - माम मात्र के लिए कुलो मी तो इन से हम साम क्या उप सकते हैं। सा प्र-परसन की यह थीम्सा शावकारों में हमारे सामने रखी है। देखिए ममवान् मन इस समन्ध में क्या कहते हैं- पपत् पररस फर्म वापस्नेव वर्जयेत् । पपदारमा स्पाचपद सेपेव यत्नव । सर्व परपय दास सर्वमारममय मुस्लम् । पतद्विपात् समासन सतण सुख-दुःखयो । (मनुः ५८-१५६) पब मुखी राना हमारा उद्देश्य है तो फिर हम पहा मी हासी क्यों हैं। प्रस पर मामाद सरूप ६ बबप नियकम्म में निरन्तर रत रहता एमा मी मिल्मपुती है जो उसे के भरारूप हम स्पों पिस से ग्णानि करें। भपश्य से हमे उस उपाय का मन्वेपस करना पडेगा, निसके प्रमाव से विधासप्लिम्स न वो भाक्रमण करे मही, एवं निबसपत् सम्बपी सुबह नहीं 141 उपाय एकमाम शान-विधान की समएिरप बुद्धियोग । उस पर मपकर-एफमाष गीताया। हम जानते हैं कि हमारी मोहमिता से परमभकोने पाप्त पाम सयमा है। हम यही समझ गए हैं कि हमारे मतीत सामाम्प भन को सामाम्प विस्तार को, सम्पता को, मगनमय को कापमा दे का मदरों से रका गपा।हम यह सममने में भी मर पीछे मरी. हमारे अतीत का मो इतिहास हमारे सामने रस्सा गया है, जो भौतिक परिस्थिति कालाई गई १, ५ साम्राम्पसि-सा की कसित हावा है । पर इस समम के साप साप हम पर भी प्रतिम कर कि पपने इस मुश्योगणार (गीवाणास्त्र) के बस से उन मिप्याप्रचारकों से पुन पुन कर मागगे। समप माने पर भापतान कमी प्रतियोन से पाये मरटेगी। परिने पर ऐसौकिक मम्पदप को अपने मधिकार में करेगी, पीछे पारबौकिक ससकी पिता करेगी। उसी शुभम को शीघ से शीम उपस्पित करने के लिए रारमियों के सामने पर- मापा में ही या विशनपप्प नए फसेर से गया सन्देश सुनाने के लिए उपस्पितामा है। एमपूतने के एक कोने में बैठकर इस संदेश को विपिस कर देना प वरीय प्रेरणा मिपदम या माम्पभूमिका प्राचीन हो या गट के कोने कोने में म्याप्त होमाय, इसके लिए इमरीय प्रेरणा का पता राष्ट्र मीही बनेंगे। हमारा विश्वास है कि या माप मारतीय संसहति को सुरक्षित रखने में पूरा सफर होगा । कारण इसमें देवर प्रमाणबाद काही मायय नहीं लिया गाभपित प्रमाण प्राशुपके साप साग युक्ति पद, तक, बिशनमार, दरानमार भादि का मी समन्वय करने की मेरा गई। मा सहर से यह मी बाम सेना भारया होगा कि इस माप की नवीनता का पिकोण क्या होगा। दूसरे शम्दों में या प्राचीम म्यास्पावामों की अपेक्षा क्या नवीम बान अवमान ? प्राचीन म्पान्यातामों में गाणब के १० मप्पायों को ६-५-६ इस क्रम से तीन मागों में विमल करवे ए गीता कोवानपोग-म कपोग-कम्मपोग का निरूपा माना है। एक प्राचीनों को सर में गोल विगुरहानयोगान्पो म एक साम्प्रदायिक इसे विरार मकि पोगणन मानते हैं, एक कुछ एक राष्ट्रप्रेमी इसे फम्मयोगयास मानने का अभिमान करने बगे दरमिक पशि से सभी प्राचीनमव सम्पमित है। परत गीता दर्शन (पान ) प्राण नी, पपत कानपुक्त दिवानम प है। बामशि से उक्त दोनों हा योग भयोग है। पाटकों यो निगम परना चाहिए कि गीय जान-माह-वर्म वीमों में से एक का भी निरूपण मही भती भाप यो बुदिपोग म्यास्पातामों की शि से परोड रहा है, मीताशास्त्र उसी , नयाप से एकमात्र उसी का निरूपर कर सा है। अतएप हम पान-मशि-कर्म विसी माम से पालन कर बुदिपागास 'माम से ही सम्बोषित होग्य। मुरिपोगाशि से गीता को चार मार्गों में नमक माना पासपता है। कारण इस का यही कि पुदिनय पैराग्य-मान-ऐवर्ण-पम्प मेद से चार मगों मिताल पारों का सका बताने बासी चार विपाएं अमरा रामपिपिपा, सिदपिपा, समपिपा, पापविषा इस माया से प्रसिद। भारम्म के ६ पापापों मे राम्पबुदियोगप्रमाविका रामपिपिपा का, मागेको भणयों (७-८) में मानमुदिपोगप्रतिका सिटपिपा का, मागेकी १ मप्य ।
निवेदन * माणभूमिका ।। गपरेमा - यों (९ १० ११ १२) में ऐयबुद्धियोगप्रवर्षिका रामविया का, एव अन्त की ६ अपार्यो में धर्ममुदियागप्रवर्तिका वापरिया का निरूपण हा है। इन नियामों के रहस्य अवसाने माशी २१ उपनिपद इस साल की महानिरोपता है । इन २९ उपनिषदों में १६. उपदेग पए है। यही पिताणा का नियपदिग्दर्शम है। गीताशाम हमें सुखी बनामा चहता है । इस सुख के प्रतिवनक, एक क्लेश के प्रय संकगिने गिनाए पार की रातु है। वे धारों पासक्ति, मोर अस्मिता अभिनिषेण इन नामों से प्रसिद्ध हैं। भासप्तिमाव रागामक्ति, देष सक्ति मेद से दो मागों में विमत। पदि इनकी पृषक मिरक्षा की जाता है तो चार के स्थान में पांच स्टेश होगाते हैं जैसा कि-"मरिया- स्मिवारागदेपामिनियापचानेगाः' (पा यो० सू. २१) इस योगशि से स्पष्ट है। परस्त विधानशि से राग-देप दोनों एक है। मनुकूसम्धन राग है, प्रतिकृतवन पो अधमता दोनों में समान है । कपनता ही भासक्ति। प्रतएष गीताशाबने दोनों का भासशिराम्द से ही पास कर किया है। मासक्तिक्लश की रिफिरसा रम्यमुनियोग , मोह- पश की निविरसा झानपुरियोग है अस्मिताक्लेश की चिकित्सा ऐषयपुदियोग है, अभिनिवेशस्लश की निकिरसा पम्मडदियोग। चारों में से एक के मी अनुष्ठान से शेष तीनों सैश निमत्त हो जाते हैं। यही सम्पूर्ण गीताशाख का रास्पार्प है। मात्मनिवेदन पावरकता से अधिक विस्तृत हो गया है। बस्तु पर गठक या भाशा कर रहे होंगे कि इस मिवेदन के अम्पादितोपरकार की गीताभाष्य उनके सापने मामा या। पम् भी उन्हें पोर पोड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी । इस प्रतीक्षामा करण यही है कि गीता मिशन है। शिानराश की कुछ एक सतत्र परिमापा ९मा फरता है। दिना उन परिमापामा फरहान प्राप्त कर समर्म सब अवशान बना रहता है। इस परमार के परिचय के लिए माप्प से पहिले कुम शिबना भोर आश्यक बन गया है। इस परिमापा प्रसार को यों तो भनेर मागों में विभक्त पित्या गसकता है, परम्स प्रधान से इसके तीन ही मधिररण बनते हैं । पहिसा अधिकार तो पापा १ पा । - नियन नामाप्यभूमिक) I रूपाला सन्ध रखता है, शेष दोनों अधिकरण मूसमन्य से सम्बन्ध रखते है । मुसमय की मुस परिभाषाए तो सप मुम्नेषप से समबरसती है, २ का परिमापाए निशासिम्मान से समाप रमती है इस प्रकार ऐतिहासिकपरीक्षा निपयपरीक्षा मेद से बपक परिमा पाभो । दो मधिारण बन गाते है । इसी रएि से हमने इस परिमाग प्रकरण को दो मागों में बिमाल करना पापरफक समम् ।गता का मुच निपय नितना रहा। उससे अधेिर दुधिय गीतोपत्रेय मीहए । हप्स के जीवन में हम भमन्त विसर मात्रों का समन्य णत है। एक मोर मा युवतियों के साप रास बिहार दूसरी पोर गीता काउपदेश । एक मोर पत्रिका मार, सरी भोर विवरूप प्रदर्शन । एक भोर अभ्यारमबाद की परालय, दूसरी मोर को- परम । सपमुम रण कोई भगेनिक सापों तो गीता अपने लफ्य की माला से ही एकमलोकिक पम्प है परन्तु पीता की स्पाति का प्रमान श्रेप एकमात्र मसौकिक हप्प के ht। बिमा पोहे समप का उपदेश प्रौकिक है, उसका पूर्ण सरूप कसा मदभुत होग! यह एक मिमिशास्स विषय है। इसी मिशासा को पूरी करने के लिए मिगुर मिशि से मौत प्रमाण के मधार पर सर्पग्राम गीतापाप काबरूप प्रतिगदित प्रमाणापामक भी कृष्णस निरूपण मामका पही प्रपमाण । पापात्मक र प्रपरकास जगमम १५०. पृष्ठों में सम्पमामा ।। मूमिका प्रपमस्या प्रकरणम के मनन्तर क्या प्रकाशित होग! इस प्रश्न का मार सप गताचार्य कीचा पर भी निर्म। मम्पनी मनपर हमारी परि पर की सापाय परिमापाभों पर, नाम पर, रचना कास पर, धूपरूप से प्रतिपाच विपप पर, ऐतिहासिक घटनाभों पर बाती है। इसके मनम्तम मूसहिषय से सम्बन्ध रखने पानी मन्त्र परिमाषामों पर एि गाती है। इस बासा कोणत करने के लिए वासरा पीताकापर हमारे सामने भाता है। एक इसे हमने गतिविशाम माम्पभूमिका" मामसे सम्बोधन किया है । परीक्षाकादर नाम की या मूमिका बलमा १६ .. पृष्ठों में सम्पमाई, एवं इसे तीन गपों में लिम्क किया गया है। प्रथमस्या बहिण रप्रिपाम बनातामा ऐतिहासिकपीवात्मक वागेरोनों अरहरसिपमान होने दुए वियपपरीधारमक।
निवेदन अमान्यभूमिमा अपरेसन पहिरङ्गापरिमापात्मक भूमिका प्रपमलण में बिन विपर्यों का निरूपण हुमा, उन की विस्तृत सूपी समा के प्रारम्भ में ही उसत हो धुकी है। पाठक के परिचपाप भन्तरण 'परिमाषामय इसरे-तीसरे स्यों की मी सषिप्त विषयसूची तृमृत कर दी जाती है- गी विभा दिख० की सक्षिध विषयसूची * पिपयप्रवेश १-दार्शनिक दृष्टि से श्रात्मपरीक्षा क-मारतीपषड्दर्शनबाद () -शारीरकाम्यास सत्रसम्मतवात्मपरीक्षा स-मारतयशदरदर्शनाद (१२) -प्राधानिका कपिड)सम्मतमात्मपरीक्षा ग-मारतीयमयदरदर्शनवाद (१८) म-पैरोपिक(कणाद तन्त्रसम्मतमात्मपरीक्षा भ-मारतीपषट्त्रिंशदर्शनपद (1) -सर्वदर्शनसमन्वय मा-दर्शम सम्मत भारमा का मौशिकरस्य २-पेज्ञानिक दृष्टि से श्रात्मपरीक्षा फ-पारमप्रतिपादक गीताणस्म प-भारमानन्दमीमांसा ग-निर्गुण-सगुणमीमांस घ-अपवात्मपरीक्षा -पास्मपरीपा -मात्मपरीक्षा मरामदासस्य अ-बीचमम्मरहम प-मोटोपसंहार ३-बझकर्मपरीक्षा क-शिम्बसपमकदरावादरास्म स-त्रिसप्तपदामकर्मबमपरीक्षा 4-सिमबाद(सरसा)परीपा प-मशिदपरीचा -मादपरीक्षा प-सिद्धान्तबासरीक्षा " निवेदन 4 माप्पभूमिका CE (२) सम-मियामीमांसा । (1)-कर्मशाल के निर्णायक १-फर्मयोगपरीक्षा -~-पोगसति )-कर्ममार्ग की दुरूप बम्पसम्यारिडान (समता भएपरि। । निधि। (1) मी-रिसिमसामष्टि । (1-सानुग मिनी बसम्पपस्मा। (१)-समायानुगामिनी पापापा । (0-परम्परस्मा में सामाजिक कप त्रयम् । 10) सिविम म सम्म से अपना कर्म के (८-समेवमुलक वार्ममेद (२)-सम्पसरप के सपन्ध में पश्चिमी रिधानों के विचार +-प्राप्रममिशान पसरधिान (पत्र-परता की परिमापा । (1)-संस्करणम्यास्पा (२)मर लभूत और उसकी प्राप्ति के उपाय (२-संस्कारों की सर्वम्पापकता। (१)-भारतीय प्रौतस्मा १२ सा। (१)-प्राणि (४)प्रामसत्कारविज्ञान। ()-भाममनिम्नने का मौशिक रहस्य । (४) देशसस्काविसमा कम्वन्ध का वर्गीकर- (१) कर्मनिममीपसा (५)-गीवानिमाम पदकम्म । (२) संतामनियापन पदकम्म । (८)-निबन षट्कर्म । (१)-उदनियम पदकर्म । (७-मोकवनिमयन पदकर्म (0) आत्मनिस्चम पट्कर्म (e)-नियनिस्पन कर्म माप्पममिका-दितीयखण्ड समास २ निवेन |माप्पभूमिका * पस्या २--ज्ञानयोगपरीक्षा- क-टोकप्रचलित सत्पिनिष्टय योननिष्ण मक्तिनिम्ना ध-निकष्टकर्म मलि-माननिय (करिस्ता) र-हेपवर्म-भक्ति-मानमिष्ठा (शाखीया) च-उपादेयकर्म-मशि-माननिष्टा (सशोषिता) छ-भाराष्ण बुद्धियोगनिष्ठा (मगवसम्मता) ज-मिकाम-सकाममीमांसा म नफम्पस क्षण बानयोग ३-भक्तियोगपरीक्षा क-भक्तिका प्रचलिताप स-देवयुगकालीन भरिमार्ग ग-परयुगकासीन मक्तिमा प-बिरयपगमसम्मन भक्तिमाग -पौराणिक मार्ग च-दानिक मतिमार्ग परिवादमम्मत महिमाग म-उपासना के विविध सपण म-मलती उपासना प्र-मगमती उपासना ट-अन्यक्ती उपासमा ट-प्रतीकोपासमा T-प्रसिलपप्रतिमोपासना -मारमयी प्रतिमोपासना रस-निटानोपासना -मर्निनिर्माण रहस्य प-गौता का सशोषित भक्तियोग ४-चुदियोगपरीक्षा- ब-दियोग का सत्य नियमन म-मुनियोग के माविमाषक ग-मुनियोग का प्रमाणात ध-खियोग की परम्परा रवियोग का प-योमाष प-मर्मसपण मुनियोग २१ माप्पभूमिका कि सपरेत (२) सल-मिष्यामीमांसा (1)-कर्मतल निर्यापक । १-कर्मयोगपरीक्षा क-योगसङ्गति (1) कर्ममा की दुरूपता। मार्सम्यस्पाविधान (१) बमन मासष्टि) 1-निरसि। (1) अविति-नीतिमसारसमष्टि । (t-सानुग मिनी बसम्परस्पा । (8)-समाजानुगामिनी गईम्याम्पा । (३)-बसम्पास्मा में सामाजिक निपत्रपण। 10)पर्यविम म बामसे, म कर्म से (२)-सम्पास्या के सम्बन्ध में परिधी विधानाबार। क-पासमविद्वान प-सस्कारक्षिान (१)सातन्त्र-परवनता की परिमाण । (१) सत्कारणम्दयस्य। (२)बर को विभूति मार सकी पनि केटपाय (२-संस्कारों की सर्वम्यापकता । (३)-मारतीय प्रौतस्मा १२ सका। (0-मानि 11)प्रामसंस्कारविधान। (0)-माममविभागो का मौशिक सत्य । (५) बमकमाराम। कम्मेदन का वर्गीकरण- (1)मनिसपमीप्रसा। (५-तानिधन पद्म । (२) संस्करनियम्भन पदकम्म । (६)--हानिकपम पट्कर्म । (१)-उदनिकपन पकर्म । (७-सोकोदनिकाधम पट्कर्म (8) बरमनिबम्पम पट्कर्म (6)-विनिमन कर्मगाव माध्यममिका-द्वितीपखण्ट समाप्त २ निग्न |माप्पभूमिका ॥ परखा २--मानयोगपरीक्षा- " कोस्प्रचलित साक्ष्यनिष्ठा योननिय मक्तिमिष्ठा घ-निकष्टकम्म मक्ति-माननिष्टा (कविता) -इफ्कर्म मक्ति-माननिष्ठा (शाखीया) प-उपादेयकर्म-मकि-माननिष्टा (सशोषिता) छ-भागष्ण पुद्धियोगनिष्ठा (भगवसम्मता) ब-निष्काम-सकाममीमांसा म फम्पटक्षण झामयोग ३--भक्तियोगपरीक्षा- फ-भक्ति का प्रचलितप्प स-देवयुगकालीन मक्तिमार्ग ग-परयुगकासीन मक्तिमार्ग घ-हिरवपगमसम्मत भक्तिमार्ग -पौरासिक मतिम च-पार्शनिक भक्तिमार्ग प-समिपावसम्मत मतिमाग म-उपासमा के विविध सपण म-मक्सी उपासमा ज-मारती उपासना -न्यक्ती उपासना ट-प्रतीकोपासना प्रतिसपप्रतिमोपासमा ट-माण्मयी प्रतिमोपासना -निटानोपासना त-मूर्तिनिर्माण रहस्य प-गीता का सशोषित भक्तियोग - ४-बुदियोगपरीक्षा- क-पुरियोग का सम्प मिलन मछियोग के माविमापक ग-भूपियोग कर ममस्वर परियोग की परम्परा र-भुद्धियोग का उदय-रोमाब -धर्मपण मुदियोग
नियंदम
on मायभूमिका
परया
-ऐमप्यसपस पुदियोग
ब-बानण्पक बुद्धियोग
म भाग्यमय गुदियोग
प्र-गीतासिदान्तविमर्श
-
५-गीतासारपरीक्षा-
माष्यमार्मिका तृतीयखराड समाप्त
३
बहिरा-भरतपरिमापानिरूपणरमक (भूमिकास्प) तीन सपने में विमत इस सर
परीक्षाकाणा पावर बापा हमारे सामने भावा ।।२१ उपमिपदों की अपेक्षा पर
मूलभाप्प २१ सपो में विमल किया है। इम २४ उपनिषदों के नाम, उपनिषदरों में प्रतिमा
शित लिपप सबका प्रम् भूमिकामा लिपपविमानप्रकरण में विदर्शन करा विणा गण
है। सब मिलकर शाममाप्प लगभग ७... पृष्ठों में सम्पमाना। जो कि भूप्रमको
पासक मरवर्ष की में सक्षित ही कहा जायगा। यही हमारे परमनिवेदम की माममम्मि ।
२५
MPA नियम A 13A PIN - मायभूमिका निवदम की माता उक्त भारममिवेदन लिखने का एक विशेष कारण है। सकारख के परिषय से पाठक साये इस निवेदन की मारयकता का अनुभव करेंगे। कितने ही महानुमानों में साचाद रूप से, एव कितने ही सहयोगियों ने परशराम या सूचित किया है कि तुम्हारे लेस में मस्तार पावरप- कता से अधिक रहता है। साप ही में विषय भने मार (पद पर पर) दोहराया गया है। ऐसी पुस्तके सोकपि का कारण नहीं बन सकती। सन्मित्रों का मुम्ब भारय ही सामयिक है, इसीलिए उणदेय भी करा पासकता है। परम्त इस सम्बन्ध में हम उन के इस अनुशासन को न मानने की धूपता कर रहे है।फुटनोटों की शिक्षा में विधासम्पति से पश्रित रसती है। यदि हम प्रायसाहित्म का खरूप मापसन्तान के सामने रखना है तो इसके लिए हमें भार्पपसि काही मनुगमन करना पडेगा। हमें अपने मस्ति- एक से फुटनोटों की बदबू निकास कर उसे स्मृति मेमा-मनीपा-प्रभा भावि बिम्प संस्कारों से शुक्त करना पडेगा। मधुकरराति का एकान्तत परिस्पा करना पड़ेगा। 'सेकिएर गपेग (800 ond LongTRO) संका पी" केवल यह काने भर से काम न घटेगा । भोपार्यन के लिए समयको निपत्रित करमा परेगा। इस लिए अपनी पारपकताए कम परनी होगी। साम्पायको मुरूप बनाना पडेगा । तमी मार्यसाहित्य के मास्तविक स्वरूप का परिचय प्राप्त होसकेगा महोरात्र दूसरे मरे कार्यों में संत्रस्त रहते हुए, समा, सोसास्टी, टीपार्टी गिरनार्टी मावि में सबम्न रावे एए साहित्पवान से कमी वाम मही वठया जासकता । भाप तो विस्तार और पुनरुमि की करते है, हमारा तो पह मी विश्वास है कि भार्यसाहित्य को हिन्दीमापा का रूप देना भी एक पातमा पाप है। परन्तु क्या करें, परिस्थितिवश ऐसा करना पाया है। मम्पपा हिन्दीमापा पारा शाम का मास्तविर मर्म गन सेना मीहमारी रि में ममम्मद साही। मपुकरपिके मनुयमी ममय ही पाटे छोटे ट्रक्टों से समाज की कवा (साग) मिय सकते हा परस्तु हम से ऐसी माण करमा म्पर्य है । बिसे साप्पाप से प्रेम होगा, उसके लिए पर विस्तार भौर पुनाक्ति उपादेय सामग्री होगी। यह हमारा सौमाग्य है कि ऐसे वातावरण में भी * माप्पभूमिका - मिरन की प्रापरता एक पति हमें ऐसा मिला है, जो जीवनमर पधिमी शिक्षा र अनुगमन करता हुमा भी हमारे इस विस्तार को घोर भी मधिक विस्तृत देखना चाहता है। मपुरम्यूनिप के क्यूरेटर प्रतिर साहित्यसेपी श्रीवासुदेवशरणबी एम ए एस् एम बी में शपपपमाप्य के दो पा प्राप्त करने परम लिम्मा पा- कर किसे मविपापविषय का प्रोर भी प्रपिक विस्तार र। कारण ऐसा पापोमन प्रवादियों में की एक पारसी सा"। पोरी दा के सार म.नसौबिए, हम इस कार्य में भयोग्य है । हमें सक्षेप से जिसमा मही मावा, मापा मी मार है, पुनरुक्ति को मो भामार।। परन्तु क्या एक ही पशि से सब माणए करना सपितामहोरात्र श्रम परके विकसियोका सकसन करें, भषसमस्या से एम परत जैसे तैसे प्रकारान का भायोजन कर | उस पर भी सारा दार हमारे ही हिस्से में। क्या समान का को काप महीं है। क्या फाक सेती के साथ साप पीम पर, पानकर रोटी पनार थपर्ने हार्यो भारके मुम्न में सब सोय ! ममम माप मोहन ३, म सक है।हमने मम सत्यना रिपा, पब उसे परफल बनाकर मोम्म पोग्य बनाना भापकर पम्प है। पा, मि, समान क, बार र माको किन, कोटे को ट्रेस लिमें, समाों में पीधर करते हैं क्या पर मपतियुन मनुष्य के लिए पा सर डा मम्मर। पिनन ही मोन पर मी संत पिया है कि तुम इसमय पासो, सापही में समासी पन नामो, तब काम होसकता मागतम् दोनों के लिए हम तो समय पानेर पाइपदी मपस पगे। परन्तु पर सब कुछ कर ठेने पर तो सतोर होनापणा । इससे पहिले क्या भपनी प्रापासणी पो मी पो दिपा गाय ! क्या बिना इस पो, भोर कपारंगे साहित्यो- सर पर पोई माप मर्ग मी! "न ग्नपनियति मापवे हि सत्" इपिए पाना जसे हमारे लिए भार मारप समझने , से मममी बनाने में भाप उत्सव मना .
का माप्पमूमिका नियरन की प्रापश्यावा रहे है, वैसे मापका भी तो कुल कचम्प होमातामा सात साहित्य भापकी पौती नाही है"क्या माप दिवाति मही' क्या माप मपम्पास महीं कर सकसे । मस्तु वर्तमान में तो हम मौर हमारी या साधारण विपि तो है, वैसी है। जिनकी रुचि हो ये मानावें, नहीं तो मास्तिगद (नास्तिरपद) का मूलमन्त्र है ही। इसी समन्त्र के सष्टीकरण के लिए भाषरपक निवेदन करने की मारपझनाई। भारत साहिल प्रेमी हमारी सरमारिता के लिए हमें क्षमा करेंगे। पिनीव- मोतीसामगर्मा-गौडा जयपुरीप
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१-फिफ्योपक्रम
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ॐ PRORM reat पुनीमूत मेमगोपागनानी मूर्चीमूव मागपेय यानाम् । एकीमत गुप्तपित्त श्रुतीनां श्यामीमूत प्रम मे सनिषाम् । वा, उपनिपत, म्पासम्म (वेदान्तदर्शन) इन तीन शाखों का समुबय द समाम में "प्रस्थानमयी" मान से प्रसिर । भुवि-पवि-पुराखपसक सना तमधर्मसभाटू की प्रधागा में सुपतिष्ठित मितनी भी सम्प्रदाएं मारत में प्रय जित है, उन सब की मसप्रतिष्ठा नही प्रस्थानगी है। इसीलिए प्रायः समी सम्प्रदायाचार्यों में प्रस्थानत्रयी पर अपने भपने स्वतन्त्र माय सिखे । बिना प्रस्थानवमी का मानब लिए कोई भी पपमी सम्प्रदाय को सुरक्षित नहीं रससकता । इस सम्बन्धे में हमें या स्मरण रखना होमा कि चिन भाचार्यों ने प्रस्थानत्रयी पर माप लिने है, उन की पर तात्कालिक परिस्पिति की भोर की विशेषरूप से यही । । देश-काल-पात्र को पोग्यता को सस में रखते हुए, दूसरे शब्दों में सामयिक परिस्पिति को सक्ष्य में रखते ए नाचायों में माप मिले है। यही कारण है कि हमारी इशि में पा सम्प्रदायबाद "पर्म" सब से सम्मोपित में होकर "म" राम से ही सम्बोधितामा प्रारतिसिर निल शिवमनिमायापित होने से रावत है। इसीलिए"सामवासबावन, सवाय अनुदार से सनाउनसम्म हा मासा है। धमपिक परिमति के अनुसार मत पस समस र हा उपयुक्त मस्तिपिसेव बनाए गए रास्ता नियमों को धमधि 'मवार" है।वम एष मठ में नही अन्तर है। भात मारत में गे बर्मन नेवा चता है पथकामद पण ममता पाए । अब बार में हो या प्रस्थान प्रारम्सा है। प्रनिराद विषम "मेवाम् सपम्मे" (tal Rइलादि रसीक माप में देखना पीए ।
रिफ्पोपाहम माप्यममित्र - प्रस्थानत्रयी मन का कि मत्तम्प की पसना से सस्प है, माएष मा प्रत्येक दम में भनेक ही होते है। धम्म महाँ भमिलना पर प्रतिष्ठित मामा मा एक मत मिलमार को भपना भागर मनाय हुमा मानाबाद से ही समाप रहता है। दूसरे शब्दों में में सम- मिए कि धर्म पी म्स प्रविष्य यहां प्रतिसिद्ध निल विज्ञान है यहाँ मनवादों की भापारभूमि सामयिक रएि से सम्बन्ध रम्ने माग वगन । मिशन का ईश्वरीय जगत् से सम्बनी दरान का मानानुद्धि से समय है। वरीप मिशन को सम्पूण मित्र के सिर एक है, जो मानबदरान प्रान्तीय मेदमित्र मानबसमान की परिस्पिनियों के में से अनेक है। माने अपने परातल पर दोनों ही सम्पस्फ्रेिं। मारत भारया में गई सामयिक परिस्थिति के भनु सार विभिम पों का अनुगमन करने मामी निमिा सम्प्रदाय का सशान किया है उनोन निमविशनसिद्ध पाव को भी पूणरूप से पुरक्षित रक्ला है । भनेरल के साप साप एका को भरमाए सहमा ही मरतीय पर्म, एक सम्प्रदायों की निगा ।सो शामतपम की का से सत्या पृपा २ पाने म.सी मी सम्प्रदार मारतय में मदर की राशि से देना गा है। सम्बगों का यह भादर माप ठह प्रस्थानत्रया परहीमसम्पिटीक इसके विपरीत पदि लिसी मन्दबुद्धिने प्रस्पानश्यी व एकान्तन निरादर करते हुए, पपग मीमांसा समा मसर उपोदमात पदवा, परसर, निहकरप, उपक्रम पसार मावि वात्पपापनिया- पर निपों की उपेक्षा करते हुए, सायना से मनमाना सर्प करते हुए किसी सम्प्राय को पणने की पेय की दोपहभाने इस प्रयास में सपा मिस हुमा। उदाहरण के लिए गौमत को हरी सीनिर । भगवान् बुर उस समय की असामान्य निमून की इसमें कोई सन्देश माही । साप ही में भपने सम्प के महामुपारस पे यह मान सेने में मी को मारचि नहीं। इनकालीगेतर गुणों से प्रमानित होकर सनातनपम्पिोन इनका मस्सारशद से सम्मान भी किया । परन्तु इनकी पा सम्प्रदाय प्रस्थानत्रपी का निरादर करने बासीई, मुद्रको मेदिक गह निर प्रसर तिरेय पनिरिमाबम पमिकाम्तन मा पनि काम प्राममाया में देखना चाहिए।'
विपापक्रम 8। मामममिका पुर-नयानन गांधी पसत कर साहिल निरपक प्रतीत एमा, इमों में सथ शब्दों में वेद की निम्दा की । बस फिर क्या था (पेदमा मायजाति दुर की इस उससता को सहन न कर सकी 1 परिणाम इसका यह हुआ कि अवतार कोटि में प्रतिष्टित रहने वाले यही युर भागे जाकर "नास्विफ" शब्द की उपाधि से दिर मर मायाति को उनका मादेश भणुमात्र मी मान्य मरस । यही अवस्था परम सुगरक भी सामी दयानन्दची के सम्मध में घटित हुई । सामी दपानम्द वेदों के विद्वान् पे या नहीं इस सम्बन्ध में हमें विशेप फम्प नहीं है। सामीजी के सम्म प में या बात नि संदिग्ध पी वि ये हिन्दू गाति के परम हितैषी मे । दिदुस्स की दुदण से उनका अन्तस्तस तुप्प था । रूदिवादों से नजरित मृतप्राय रिन्दुस्प को पुनरुतीवित करने के लिए सामीची मागे । अपनी इस नवीन सम्प्रदाय के निमाण में स्वामी बीने सुर की तरह प्रस्मानप्रयो की उपेक्षा वो म की, पर तु मय के सम्म ध में मपनी कम्पमा का धामय लिया। चिरम्तन पदतियों की उपेक्षा पर मपनी कल्पना से नबीम परतियों का निम्पण कर किपात्मक सनातनधर्म का गा पोट गला । मृतपितृमार जैसा दिककर्म भी इनकी दशि में प्रवैदिर रहा । परियाम इस उसलता का क्या हुमा ' यह हमारे सामने है । भायसमान को जन्म लिए मान एक राताम्दी मी नहीं हुई, और उसके सिर्वात उसी के अनुपापी विद्वानों की आदि में खोसले मपर्ने सगे । और भागे परिए । महात्मा गांधी मगवान् की देन है, इसमें कोई सन्देह मही । हिन्दू जाति को अपनी इस धरोहर पर पूर्ण भमिमान है। राजनैतिक क्षेत्र में हम महात्माची को सोच भासन देने के लिए तम्पार है। परन्तु धार्मिक क्षेत्र के सम्बन्ध में जब हम महात्मा भी का निर्मप देखते हैं तो सहसा त्कम्प होगावा है। प्रस्थानत्रयी में सनमान्य गीताण महात्मा नी का, एर उनके भनुपायियों का परमाराष्प प्रय है। इस शि से महास्मानी रे शास्त्र मात, एवं पक्के भरवादी है । परन्तु प्रताप करने में उन्होंने भी अपने बुद्धिवाद पाही समा- भय सेने की मनधिकार पेश की है। परत इस सम्माध में ये भी मुर-दयानन्द की सरह विफल मनोरथ हो रहे हैं। तापप फहने का यही है वि सम्प्रताप निर्माण में मीमांसा समतार्थ युक्त प्रस्थानमपी का अनुगमन प्रस्पेक दशा में मारपक है। शकर-रामानुम-भरमम निम्पार्क । ३ रपयोपक्रम । माप्यमूमिका प्रामानवी मत का कि मतप को कश्यना से सपन, मत्सएक मा प्रत्येक दश में अनेक दी होते है। पर्म ना भाममनाव पर प्रतिष्ठित होता मासा एक, हा मत मिलमार को भफ्ना मागर बनाता हुफ मानाबाद से ही समाघ रता है। दूसरे शब्दों में में सम- मिए कि धर्म की मूस प्रविछ यहाँ प्रतिसिद निम मिकान। यहाँ मनमर्दो की भाधारभूमि सामयिक परि से सम्बन्ध रखने पसा दर्शन । । विज्ञान का ईश्वरीय अगत् से समय दशन का मानबबुद्धि से सम्व है। ईमरीय मिशन पा सम्पूण विप के लिए एक है, वा मानपदर्शन प्रान्तीप मेशमिम मानवसमान की परिस्पितियों के मद से अनेक । माने अपने पराक्स पर दोनों ही सम्पत्ति है । मारतीय भाषायों में ना सामयिक परिस्थिति के अनु सार लिमिम पर्षे का मनुगमम करने वाली विभिम सपा का सहागन विमा l उन्होंने निमविहानसिम धर्म को मी पूर्णरूप से सरचित रमणा है । भनेर के साप साप एकल को भरनाए राला ही मरतीय धर्म, एक सम्प्रदाय की ग्रेगता है। इस सममम की करा से समपा पृपा २ जाने वाली में सम्प्रदाए मारत में मादर की परि से देशों पर है। सम्प्रदापों कापा मादर माष प्रस्थानत्रया परतीमम्मित टीक इसके विमीत पवि किसी मन्दबुम्मिने प्रस्थानत्रयी का एकान्ता निरादर करते गए, पणा मीमांसा समर मसर उपोद्यान, हवा, मवसर, निहाय, उपक्रम, उपसार मादि तात्पमानिसा फक नियमों की उपेक्षा करते हुए, सायना से मनमाना करते हुए किसी सम्प्रलप को पाने की पेशा की तो अपने इस प्रयास में सपा विकतामा मौसमत को ही सीमिए । भगयम् पुर सस समय की असामान्य विमूति दी इसमें कोई सन्देश नही । साथ ही में दे पपने समप के मामुषारक पे र मान लेने में भी को मारपि । इसके एगी सोकोवर गुणों से प्रमानित होकर सनातमपम्पिोन इमका प्रचार शम्द से तमाम भी नित्या । परन्तु इनकी पा सम्प्रदाय परपानरमी का निरादर करने वाली हई, पुद को वैविक | उद्यहार के लिए आप पर निवेचन पमिमम ममूमिकाम्वर्गव या पनि कम प्ररमोमाता पमा परिए।
विपयोपकम का माध्यमूमिका विज्ञानमार की सुधि कर सकता है। साप ही में वह अपनी इस संकुचित दृष्टि से रुपाकयचित् अपना कल्याण भी कर सकता है। परन्तु विज्ञानमाप्य सर्वहित का सशासक है। यदि पर्तमान में प्रम्पानप्रयी पर एक भी सवाममाप्य नहीं है, अतएव इस पर विशनधि से विचार करमा मात्र स्यक समम्म गपा है। इसी भावश्यकता की पूर्ति के लिए सक्षमपम शतपथविधानमाप्प का कुल भरा पाठकों के प्रमुख रमसा गया । मनन्तर दशोपनिपत् विज्ञानमाप्प का प्रकाशम हमा । यपपि सोकरधि की प्रधानता के कारण सबसे पहिले गीतामाष्य का प्रकाशन ही न्याय प्राप्त या । परन्तु इस महान के प्रकाशन में हम मसमर्प पे । मातएव भक्तक या काम रुका रहा। यह इस भाष्य का सौमाग्य है कि इसे कसको के कुछ धनिर्मों के धरा परेसान मिछाने, फस सम्प इस का श्रीगणेश पर दिया गया है। मूमिका विसमा भामकस की प्रचलित प्रणासी है। इसी प्रणाली का अनुरोध मामते हुए हमने मी इस सम्बन्ध में कुष्ठ विचना प्रापरयक समझा।मारे विचार से किसी मी प्रप की भूमिका में शासोपेदष्टा पाधाप, शासपत्ति का मुख्य पश्य, गामविपारित मचान मपान निपयों का सामानगम्प स दिग्दशन शास से सम्म प रम्बनें गमे मिम भिम भ्यासपातामों के पिपार पर्षक उनके विचारों की मत ममामोचना इत्यादि लिपयों का समावेश रमा पावरपक होमाता है। इन विषयों में से शाबोपदेष्टा भाचाय के सम्बध में भूमिका प्रकरण में कोई विचार न किया जायगा । इस के लिए हमम "गीता के प्राषाय श्री रुप्पण" नामसे एक सत्र प्र पशिसना पावरपक सममा है। मासर मिषने पर वर मी पाठकों के सम्मुस उपहिपत करने की पेश की जायगी। ममी हमें रोप विपयों का ही दिग्दरान करना है। इस सम्बन्ध में भारम्म में ही हम पह स्पए कर देना अपना मावश्याप्प समातेर कि प्रस्तुत भूमिका में जो विचार प्रकार किए जायगे, उम का दार्शनिकमाषों से निरोग समन्ध न रोगा । ऐसा करने का मुख्य कारण यही है कि दरान काबान से सम्बन्ध है। एक झाम को उदेश्य मान कर गीता के सम्बन्ध में चितना विचार विमर्श अपेक्षित है, पर दरामक प्राचीन भाप्पकारों, एप म्स्पाताों के शगता हमारी पि में प्रवाशास मगवान् रे "माने तst समिमान मिर पियोपहर - साप्मभूमि . सम्मान माप मादि सम्प्रदाए इसी पप का मनुगमन करने के कारण भान तक जीवित है। पूर्व की पट्टियों से पाठकों को यह सवितामा होगा कि प्रस्थानत्रयी पर भार मि माचारों क माम्प उपरम्प होरहे है, उन सबा भिममा मलिका दारानिक परि से ही सम्बन है। हमारे विचार से पाप हो इन मन्यो पर विज्ञाम माप्य रहे होंगे । गीता मोर म्यास्त्रों के पोली देर के लिए कोर मी दिए जाप, तब भी उपनिवत्, एव इतर वेदमाग के सम्बन्ध में के विशनमाप्यों की सजा का किसी दृष्टि से प्रभाव नहीं माना जासकता । वे पेदमाप्प राप्पान्न, निदानन्य, गायानन्य कम्पानन्य, निविदा प भावि नामों से प्रसिद से होगे, इस अनुमान को पा निमा नी माना जासकता । यह मार्यात का दुर्भाग्य है कि काय उम वानिक पम्पों में से एक मी व ससे उपाय नहीं होता है। सम्ममा साम्प्रदायिक युग से पहिसे परिये ही पा उपपतिपय स्मृतिगर्म में विसीन होगए होंगे । यही कारवर किसी में सम्प्रदायिक नाचार्य के साम्प्रदायिक माप्प में दानिक रवि सिरिक Ant "तिहासादि अन्य मावों का विचार उपाय नहीं होता। उपनिषद्-गीता-याससूभ इस को पर कितने यी माप्प हमें उपसम्म होरहे हैं, उन सबका एकमात्र दानिक परिसे ही समय। पर मारग्म में ही निवेदन किया गया कि दार्शनिक रणि का मेदवाद से सम्भव है। ऐसी दण में साम्पदायिक ठि से मपने अपमे रष्टिकोण से अपनी अपनी सम्प दाप की पुशि के लिए समपा उपयोगी होते तर मी मा दायनिक माथ्य साविशिक नाही का सकते । साहित्य के सम्बन्ध में, किंगा मार्यसाहित्य के सम्बन्ध में भगवान् मनु कम सर पराव प्रसिरपति" यह अपन, एक भार्यसाहित्यवेता भारतीय प्रमों के माल को प्रकार - एतरेयमस्वस्म सनणादाम मना मन परिव शिधरन पपिम्या सा मानमा र बबन प्रस्थान को केवल दानिक दरि प्रभाम मामन से पद्यपि परिताप मही हो सकस्य । उपचों को चरितार्प मारने के लिए हमें एकमात्र महानिक शिकार भाप सेना परेन । पोनि मन में सम्प्रदाया का समापेर ना ममत विभूति ।। उससे मनुष्पमात्र कामपाय साया है। सम्प्रापमान्य साम्प्रदायिक करने पाण-
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विपयोपक्रम
2 भाष्यभूमिर्ग :-
पिसामवाय
पापाम्पोपता" इन शब्दों में बानयुह लिहानशा है। इसीलिए गीतामाप्य का हमने "मगर
दीवापिसानमा य' माम रसमा भम्पर्य समम्म है। हमारा विकास है कि पर भूमिका गीता
प्रेमियों के सम्मुख एक ऐसे सक्या नूतन, नहीं नहीं पतिपुरावनभाव को उपस्थित करेगी विनिस
के आधार पर वे-“गीवा मुगीता करीम्या किमन्या कामविस्तरे" इस प्राचीन सूक्ति को
भवरण चरितार्थ करने में समर्थ होसकेंगे।
इति माण्यमूमिकापा-
विषयोपक्रम
-१
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२-सिंहावलोकन
३-शास्त्रशाध्यमिक्न
--शाम्न का सामान्य उद्देश्य
५-संस्कारम्वरूपनिर्वचन
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* श्री २-सिंहावलोकन- मा-ग्रामपरूप अपौरुषेय वेदशान को छोड़कर और नितने भी शाम, उम सब का कोई न कोई मका (कपा) मारय मापौरपेय पेट से किसी ष्टि में कम महस्य म रसता मा मी गीताणाम श्रीरुप्स द्वारा प्रवृत्त होने के कारण पौरपेय करता। विश्व के सबभेष्ठ महापुस्प रण ने गीता का उपदेश दिया है इसलिए गीता का महत्व नही है। मपितु गीता वेद के शेषतः घेद के अन्तिम मागरूप उपनिषत् के झामसाइत विद्वान तत्वों को बोधगम्प शम्दों द्वारा हमारे सामने रखती है, इसलिए गीता साँच भासन पर प्रति- ति। भोपनिषद तलों का वैसा लिरलेषण ग्ता में रामा है, वैसा पम्पा देखने में नही पाता । यही कारण है कि अपने अधिकार सिर मति शए की उपेक्षा कर गीता भान उप निषत् नाम से प्रसिद्ध शेरीरामायसारिस्म में निसने मी शाम उपसम्ध होते हैं उन सब के निर्माताभों की अपेक्षा गीताशर के निर्माता भगवान् पण का भासन सोच। । इस धरातल पर अष्टि के पारम्भ से भवतक नितने मदापुरम भक्तीर्ण गए हैं, उन सब में मुख्य स्पान गीतापार्य को ही दिया गया है। यही मही, भवतार पुस्यों में भी एकम'प्रहण को। "पूर्णावतार" शब्द से संबोधित किया गया है। इस प्रकार सबप्पापक सबिदामाद ब्रम के पूर्णावतार, महामहिमणसी मप्पुट भगान् (कृष्ण) के मुमपान से विनिःसत वेदतम्बप्रद- शकवास भरपरीवेतिरिक्त इतर सर्मशामो दी सुसमा में सावरपाम प्राप्त करने का परिकार रहता है। हम यह मानते है कि मानबीसशि की उत्पत्ति का सेसा प्रातिक निपम , उसी के भमुसार कस के मारामास में सौररामबानों से निर्षित देवी ने गभ में प्ण ने मम्म लिया पा। हमें यह मान सने में भी कोई भापति नहीं कि प्य में मासप्रातिमुसम मृचिका मदण, माखनचोरी, कम्दुककीरा, पाभगोष्ठी में विपरगा भारि मासोषित समी पम्म विप माम पे । साप ही में दाम्पत्पमार सनानोस्पति देव-द -गुरु-गान प्रारि में पूर्ण निष्ठा, समपोषित नीतिमाग का परमम्पन, प्रापचिकाम में पन्पुरर्ग की रक्षा पात्रम परिणE समाप्पभूमिका राघरानियम - पर्म का पयामिपि परिपामन, समय समय पर मुख-दुःखादि इदमार्यो का छद्रेक, पपाकाम मौतिक गरीर का परिमाग, मावि मामा पुराम पो का मी रुप्प के बीच में समाप पा । इस प्रकार मामबमम्मों के सरमना विधमान पते हुए भी गप्प कैसे प्रमानव पुग्प मान लिए गए ' किस भाधार पर सन अपवार कहा गया ! क्यों उन्हें पूर्वप्रम नाम से सम्बोधित किया गया । "गीता के प्राचार्य श्रीहा' मामक सम्म प्रम्ब में ही प्रश्नों की मीमांसा की गई। प्रस्मदारि साधारण जनों की परि में श्रीकृष्ण एकोकिक मनुम्प की भारी प्रतीत होते हुए मी किती गुप्त कारणों के कारण प्रयोकिक पुरुष थे। ऐसे मसौकिक पुरुप का पर अन्य गीता मी पदिम में मौकिक मामा जाप तो इसमें क्या मार्य है। । ३-शास्त्रशनिवचन श्रीमदभगबगीता पनिपन शाहगरत खस्पार्य (यनिक मब) को म सामने के कारण भाग हमने इस गम को संस्कृत ग्रामप मारतोय प्रम्पो कापीमाबमान रहा। यस्तुनः देखा जाय तो शाखा राम्द के निर्मपन लिबान के प्रमुमार थार्यसाहित्य की तरह ग्रीक, मरिन, पी, फारसी, ई, हिन्दी, तमग, नारी, गुजराती, पासा, परतो, मारवाड़ी पारि सभी भापामों के साहिस्पिक प्रयों को 'शास" राम से सपोधित पिया पा साता।"ऐसा करने से माम होगा, ऐसा न करन से पनि रोगी"-"ऐसा करने से सन्नरोगी एमा म फरने से माप होगा' 'पेसाफरो, पेमा मत करो" "इस करो, इस रा मन करो इस प्रकार के+लिपि एष निधारमस बबनों का संमह ही पास कराता ।।तचन्तिपों की पूर्ण परीक्षा करने से जिन मापुरुषों में भपन विपातिक भनुमत्र से (परीक्षा करने में असमर्प हमारे जैसे साधारण म्पटियों के कापड के लिए) शब्द भरा गो पप हमारे सामने रफ्ण, मपि निषामक, पर्ण परीचित, म०प समाम्प शमाशिरूप नही पप हमारे लिए शास। xबाग रस र मा परिरह - म प्यभूमिका शास्त्राचिन - । शाम्" का अपमादेश मावा, हिदायत । 'प्र" का मप है, मादेश के पापन की विधि, माग, पति, परीका । भादेश की पद्धति का प्रतिपादक शम्द समा ही "गाम-पम्" के अनुसार "शवम्" ।। उद् मुहावरे के मुभाशिक भाप को इस तरह समाना पाहिए कि- "एक नातभकार की तरक्को के लिए उस की यादी के लिए, उसे जानवर से इसाम बनाने के लिए, उसे पाक साफ करने के लिए एक तर्पकार मानिस मोर मालिम सुदापरस्त रागस के सरिए बतौर सहाम के तमाई गाविस पमित हिदायतों 4 उन के इस्तेमाल के तरीकों का मनमुमाही 'गरम'शास्त्र), हिदायतनामा ही शास्त्र।। अब देखना यह विशाल शम्द की उम्पारुपा में गीता का तक सफसमा है। इस पातस पर भन्म लेने वाला प्राणी माने जन्मकास से, सम्मकास से ही नहीं, अपितु गमकर मे ही पारम्म र मृत्युपप्यन्त निरन्तर भुस की काममा किया करता है। भूस कर मी बार कमी दुःसारमण कीम्मा मही करता 1 पातु भाथप कि सर्पपा अमेदिक या दास निम्त्रण की कोई अपेक्षा न रमता हुमा पद पद पर इसे परिपीडित किया करता है। इस प्राकृतिक परिस्पिति के माधार पर हम इस परिणाम पर पहुपते है वि दुपका परपरी पिसी प्राकृतिक पात्र से सम्मापामगदु समोग में हम परत तो बिना किसीवर्क-वितर्क के हमें यह भी परमान सेना चाहिए कि दुम के साप साप समय समय पर परमर के लिए मो हमें मुसकर मनुमनामा बरता मी प्राति दबी का ही अनुपा है। न हम इमारी म्छा से दुखी होते, एवं न इम माया से ममी बनने । यदि पुखप्रालिका इमार दासातमपक साप सम्बन्ध होता तो मेसार में कोई भी प्रागी हासीन रहता। भनिया से उपस्पित होने वास दुखों को सभी व्यक्ति प्मा से प्राप्त होनबी समापना गाठ पुणों की बस पर भगाने में समर्प होगात । इस दिन सेना म यी कि दुलार्णव में निमान मनुष्य को विपुष्पपटात जो पणिक एप का मनु मन मा करता है, ५ मा परमार्थकोट में बात नही है। इसीलिए प्रत्रियों में यहाँ दुःप को प्रतिवेदना का ६, या या पणिक पुष ( सांसारिक वपिन पुन ) अनुफत देना गम से सम्मोचित मा है। उमपरिष इस मका मम प्राण या ममत ।
परिया भावभूमिका राशरदचन पर्म का पयामिपि परिपामन, समप समप पर पुख-दुःसादि दमायों का मेक, पपाकाम भीतिक गरीर का परिमाग, मावि मामा मुगम धर्मों का मीरण के बीवन में ममयप पा । इस प्रकार मानवसम्मा के सीरममा विद्यमान रहते हुए भी प्ण केसे प्रमानर पुम्प मान लिए गए किस पाशर पर उन्हें परतार का गम ! क्यों उमें पूर्वप्रम माम से सम्बोधित किया गया । "गीवा कापार्प श्रीका' नामक खतन्त्र प्रप में इन्ही प्ररनों की मीमांसा की गामस्मदा सापारण जनों की रि में धीहप्स एक मौफिर मनुष्म की मति प्रतीत होवे एए मी रिती गुम कारणों के कारण मसौकिक पुरुष थे। ऐसे मसौतिक पुरुप का पद मामी पनि सच में मतोधिक मामा जाप तो इसमें पा मार्य है। ३-शास्त्रशब्बनिर्वमनल श्रीमद्भगवटीता उपनिषत् शास्त्र है। स्त्र के रहस्पाप (मानिक मप) को म जानने के कारण भार हमने इस पद को सहन बामप मारतोप प्रपों काही माचा मान रहा। परतुन दमा वापतो शाब शम्र के निधन मिलन के भनुमार मार्पसाहित्य की सद ग्रीक, मटिन, पी, पारमी, ई, हिन्दी, नेपण, नारी, गुमरागी, पासा, परतो, मारवाड़ी भादि सभी मामा के सादिपिक मन्पो को 'ग्राम' से सम्बोधित किया पा सम्म। पेमा करने से माम रोगा, पेमा न करन मे पनि गी"-"ऐसा करने से सनि रोमी पमान पाने मे माम गा' 'माफरो, ऐमा मन करो" "इस तरारो, मनरामनारा इस प्रकार के+निरिएर निोपामा पवनों का समागम करवावा सातवीपों की प्य पश करन पटे बिन मदापुरमों में पान पिरमातित अनुमा से परमा परने में असमर्थ परे असे साधारण म्पनियों के कम्पा शि) घगो पर हमारे सामने रण,AN निरोपामा, पूर्ण पावित, मम सर्वपाम्प शशिप ही पप मार दिए। * रिना | पहिलो -01 मायमूमिका प्रजापते भूत बीप्रमापति में ये सब कवाए विपमान है जो कि दशा में निय प्रतिनि । 'म वा पप पात्मा गारमप माणमयो मनोमयः" (शत• प्रा. १११७२।६१) इस ब्रमण सिमान्त के अनुसार मामा में मन-माग्य-बार यह तीन पसार प्रतिष्ठित हैं । इन तीनों यामकतामों का मध्यात्मसाया में क्रमशः कारणगरीर ( मन ), मूक्ष्मगगेर (मा), म्पूमगरीर (चाक) रूप से विकास रमा ।। प्रज्ञामाप्रामप मनोमय प्रात कारगर है, देवमात्रामप प्राण प्रपत्र सूदमशरीर है पर भूतमात्रामय बार प्रपन्च स्यूसशरीर है । सत्र के उपर स्यूसशरीर का वेएन है, इसके भीतर मूनसरीर प्रतिदिन , इस के भीतर कारणशरीर की सचा, साम्स में समानातम विगुर पामा प्रते है। प्रारम्यता के निकावि-सोराधिक मेद से दो विवर्न माने गए हैं। विशुद, निष्कस, एफस पारमा निरुपाधिक है। इस के सम्म में शामोपदेश पुगिया है। कारण रम का मही , वि शम्दावीत इस विशुद मारमा का शम्झारमक शास्त्र न कोई उपकार पर सकता, न पपकार कर सकता। पह तो सदा ही निस्मशुद्ध, निममुर निस्समुक्त, एष मनम्तममाणगुणाकर है। यही मारमा मापा फमा गुणा, रिकार मनन, भाषण इन उपाधियों के कारण सोपाधिक बनता हुमा वा मन-प्राण-बामा तीन सस्थामों में परिणत हो जाता है। भाग्मा की यह सीनों मरपार जमरा भास्मा-मागा-पगु इन नामों से भी म्पयन है। मास्मा मनोमप बनता शुभा रानप्रधान है, यही कारण शरीर है। प्राण प्राणप्रधान पनता मा झियाप्रधान है, यही म्परारीर है। पशुमाग गाइमप बनता मा भर्पप्रभान ।, यही त्यूनगरीर है। प्रास्मान पर मनेनन् प्रपम्' (गुन १३) इस मौत सिमान्त के मनुसार माग्मनप कारणशरीर, मायमर सून्मरारीर पवादमय एप्सशरीर तीता के समुपय को एम भाग्मा राम से सम्बोधित फर गरमे है। इसी मापार पर -"प्रास्मा रे सन् (गरीरम)" (गन ६PTI),-'पा रमना नामानि सागपमानि ममरन्ति" (गन),-'प्राग्यो मन(पास्मा)" (AN 01,-"पापा में पगुः" (पा मा...) पारि निगग गमन प्रतिष्ठित .
महिणार
21 माध्मभूमिका
शास्त्रका माम म्याप
प्रमिमापा करने पर मी शापत मुस पाप्त पयों नहीं होता ! शाषन मुल की मालिका
उपाय पपा कौन से फम्म निरप सुख के प्रविषयक ? में कौन मे सम्म गर्ने
पाहिए, पर फोन म कम्म नहीं करने चाहिए ? नो प्रय इन प्रश्नों का समुचित उपर दने में
समर्प १ पदीस परसाता। गोपनिषत् इस सम्बन्ध में पूर्ण समसमा है। इस ने मधि-
निषेपामर फर्म परर्म का पूरा विरसेपण परते हुए शमन की प्रालि का उपाय बताया
कम से मारप ही शान शप से सम्मानित पर मस्ते ।।
भार प्रकार की विपादियोगनिष्टा के विश निरपण के साप साप मपान ने
सलमाजिके म फतम सामनरूप १६० उपश गीता द्वारा हमारे सामने रप । भोर
भोर तिने भी शाम है ये अन-कम्म के म्पतिप्रम के कारण म । पिसी में केस मन
का प्रधानता है, एक कोई ममाग कोही उपाठप रहा था। मेरे शने में यो सममिर
कि. मि.मी ने शनपक्षको महल दिपा तो किसी ने बम का पा मारी पपा । पान्त
पिताणस जाम का सम्पद निरूपण करता रमा रानशामा मा भी इस
में पूणा से निरसय मान्नन्सर दशम सम्ममता Aन दोनो सम्पा
निमारता मा घिमि पर गाव पारपदी सामिर खाताना।
-
र-यास का मामान्य उदेश्य
.
0 में मानापुप मा एपायों का मेरा उना परिपालन
बमान से गरम पारागपणाम सम्पप में मनाया
frAN-निपापा मम का उपाय पापमुकामको प्रमुापाम
करबरो, पारामारा पा TAL१ समता प्ररमोबामभान ५५
पर भाप्यार देग, सगरमभ मानसिह भी मन मे rमाप्रपोजन
front मा २५ो गम ना भनारपामगाtural
परियार -DI मायमूमिका प्रमापन्वे भून जीप नापति में ये सब कमाए मिपमान हैं जो किपर में नि य प्रतिष्ठित हैं। 'मा पप पारमा पाश्मप माणमयो मनोमय" (शत. प्रा. १७RI1) म मण सिरात के अनुसार भारमा में मन-माग्म-बार यह तीन कमाए प्रतिष्टिम है । इन तीनों पारमकसामों का अप्पास्मसंस्था में क्रमश फारणशरीर ( मन ), मुस्मगरीर (मामा), स्पूनगरीर (पाफ) रूप से विकास हुपा है। प्रज्ञामात्रामय मनोमप प्राच कारणमीर १, देवमात्रामय प्राण प्रपत्र सूक्ष्मशरीर है o भूतमानामप वाक्प्रपा स्यूसशरीर है । सब के उपर स्पूसरारीर का पेटम है, इस के भीतर मून्नीर प्रतिष्ठिन है इम के भीतर कारणशरीर की सच, सन्ति में सगन्तरतम विमुख मारमा प्रति ऐन है। भाममा के निम्माधिर-सोपाभिक भेद से दो दिवस माने गए हैं। विशुद्ध, निष्कल, एकल पारमा निरुपाधिक है। इसके सम्बन्ध में शानोपदेश पुगिटन है। कारण इस का पही है कि शम्दातीत इस शिशुस्मा'मा का शम्शामक शास्त्र न कोई उपकार कर सकता, म भपकार पर सकया । पर तो सदा ही निस्शुर, निम्ममुर निस्यमुक्त, व मनस्तापासगुणाकर है। पही मामा मापा पमा गुण, रिफार, अमन, प्रापरण इन उगलियों के कारण सोगपिक बनता इमा व. मम-प्राण- बार तीन सत्यामों में परिणत हो जाता है। मामा की पर तीनों मस्पाप मामरा प्रारमा-माण-पगुइन नामों से भी म्पदा है। मात्मा मनोमय पमता उमा शानप्रभान है, यही कारण शरीर है। प्राण प्रासप्रधान बनता मा प्रियाप्रधान १, पही मूदमयरीर पशुमाग यात्मप पनवा मा पप्रधाम है, यही स्पूसघरीर है। 'पारमा उ पप गनगन प्रपम्' (न०१३।२) इस श्रोत सिदारत के मनुसार मामम्प कारणशरीर, प्रायमर सूदमराती एव पाड्मय स्थूसरारीर ती 1 समुबप को हम मारमा म से सम्बोधित पर मरसे है । इसी पाभार पर-"प्रास्मा नै सन् (गरीरम)" (न. ६011),-'मा रमनापामानि मागपानि अमरनि" (गत २३५),-'भागों में मम (पारमा)" (गत 01),-"प्रापार पगुः" (पीग्रा. ७)पादि निगग पर प्रतिदिन . - पहिर । माध्यमिक शास्त्रका मामय गोप अमिमापा करने पर मी शाषन मुस पास पयों नहीं होता शाबत मुस फी माप्ति का पाप क्या! फोन से फम्म निरय एस के प्रतिबम्पक में कौन से कम्म करने चाहिए, एवं फोन से कम नहीं करने चाहिए ! जो मम्प इन प्रश्नों का समुचित उचर दने में समर्प है, वहीं ग्रास कामाता है। गीतोपनिषत् इस सम्बन्ध म पूर्ण समसमा है। इस नमकि- निषेधात्मक कर्म भकर्म का पूरा विरलेपण करते हए शाश्वत सुख की प्राप्ति का उपाप बसमाया , प्रतएव हम इसे मारप ही गास शमसे सम्बोधित कर सका। चार प्रकार की समाबुस्यिोगनिष्टा के मिशन निरूपण के साप साप ममाम् ने एसमाप्ति के अपतम सापमरूप १६. उपदेश मा बारा हमारे सामने रक्स है। मार मोर जितने भी शाब प्रम-कम्म के म्पतिक्रम के कारण अपूर्व । किसी में केवल प्रम की प्रधानता, एष कोई ममाग को ही उपाय बता रहा है। दूसरे शों में यो सममिर विलिसी में घनपद को महत्व दिया है तो किसी ने कम का पहा मारी रस्मा है। परन्तु प्रशासन शान का सम्पा निरूपण करता हुमा दयनशाम, सामान का मी इस में पूर्णरूप से विरतपणापा है। अमम्सम शन, एब मम्मम्पर विज्ञान दोनों का सम्पा निरूपस करता हुमा पि.निषेधात्मक यह शासमवश्य ही समलिए शास का जासकता है। ४-शान का सामान्य देश्य - बसा नि में पा माधुरा अादेश गायों का संग्रह व उनके परिपासन की लिपि मासाने वाले शम्पसमा का ही नाम है। इस समय में प्राम उपस्थित होता किलिपि-निवभारमक इस गीताशाखमा उद्धेश्य क्या है अमुक काम को ममुकाम मत करो, पर शाबादेश माप क्या उपकार पर सस्ता इन प्ररमों का समापान पाप पर भाप्प पर देगा, तबास सदम सङ्गति के लिए यामी सपेप से शाम मा प्रयोमन, किय गाय के सामाम्प उद्देश्य को गान सेना मनास्पाम होगा । भिरममापनिकेश १ परिमा । माप मूमिमा प्रमापते भूत जोनापति में ये सब कचाए मिपमान में जो कि पा में नि म प्रतिनि। 'मरा पप पारमा पारमप प्राणमयो मनोपप" (शत. प्रा. ११७२।६।) म प्रमण सिदा त के अनुसार मा'मा में मन-माण-बार यह तीन पसार प्रतिनि। । इन तीनों पारमफसामों का अप्पास्मसाया में प्रमशः फारगरीर (मन ), मूक्ष्मगगेर (प्राम्स), स्पूनगरीर (चाक) रूप से विकास रचा है। प्रनाम ग्रामय मनोमप प्राच कारमशीर , देवमाषामय प्राण प्रपत्र सूक्ष्मशरीर है एवं भूतमात्रामप बाप्रपा स्थायरीर है । सत्र के उपर स्यूसशरीर का वेटम है, इस के मीर मुनगरी प्रतिष्ठित है इम के भीतर कारणगरीर की सचा , सन्ति में सगन्नातम विगुद मामा प्रतिस है। मामोसा के निम्माधिक-सोराधिक मद से दो विकस माम गर । , निकस, एक्स मारमा निहाधिकास के समाध में शाखोपदेश पुगिर है। कारण इस का यही ६, वि शम्दावीत इस विगुन मामा का शम्दामा शास्त्र न कोई उपकार कर सकता, न भपकार कर सकता। यह तो सदा ही निस्पगुद, निमपुर निस्पमुक्त, एष पनरतायाणगुणाकर है। यही मारमा माया फमा गुमण, विकार प्रजन, मारण इन उपारियों के कारण सोपविक बनतामा सामन-प्राण-बाम्प तीन सस्पामों में परिणत हो जाता है। भारमा की यह तीमो माया प्रमश प्रास्मा-पागा-पगुइन नामों से भी पराल है। पास्मा मनोमप ममता दया धामप्रभाम , यही कारण शरीर है। प्राण प्राणप्रधान बनता मा क्रियाप्रभान है, यही मृदयगरीर है । पशुमाग माइमय बनता गुमा भर्पप्रधान है, यही भूमपरीर ।। पर मोदन प्रप' (जन. ३२) इस प्रोत मिदा के अनुसार माग्मन ए कारगर, प्राणवर सारीर, परवाइमप स्थूसशरीर तीनों के समुदाय को हम माना गम से समोधित पर मामे है। इसी पापार पर-"प्रास्मा रे तन् (गरीरम)' (गन०६111),-'मा रमना मा पानि सबागपमानि पमरन्ति" (गन ० ०२५)-'पायों में प्रम (पास्मा), (Rato0,-"प्राप्पा पगृः" (फा प्रा.) पारि निगम बसन प्रतिष्ठित भास्मान पदिरहरी । मधमूमिका ॥ पतिमा हैं। तम् (यूसशरीर), एक ब्रह्म (सूक्ष्मयरीर) को भी श्रुतियों में भारमा शम्द से सम्बोधित किया है। म सोनों समरि एक मामा है, पही सोगाधिक माम् । सम्पाधिक माग्मा से निर्षि रोष पाहाता है, परमेव विमल सोगाधिक नही मारमा सपिशप साया है। पदी सविशेष मात्मा वेद में ममापति शम्द से सम्मोपितमा है। मारमा-प्राण शुकी समति की प्रगति है। उस मापा-कला भारि परिमहों के मगन से यो निर्षिया प्रमापी निकम, निर्गुण भरिकारी निरमन, एवं पाप्मामों से शून्य था, वही 6 परिमों से युक्त होकरसविरोष बनता एम्मा प्रजापति नाम धारण कर मापी, सफम सगुण ससिकारी माभन, एव पाप्माओं से पुक्त होगाता है। परिमायण में माम्मा को पातविक नम्पोति बाविशेभान होजातामविय सत्र एक भारमा के इस मलिन प्रकार से से मन पास्मा (विज्ञानामा-दुदि) एक नियमपासक मानास्मा (सन्द्रियमन) दोनों मतिम होगाते हैं। मन दम्पाकरम्परिक बात बताई। ऐसी दश में पप तो मनुष्य किंम्पपिर बन मम्मा अपना मुख की लालसा से रोग- मानावाकरण बनवा मा, उत्पपा का मामय सेतामा पौर मी परिज पर में निमत से मावस भापपिके निराकरण के लिए भात्मा पर मापे गुर मापारि परिग्रह दोपों को हटा मा नितान्त भापक है। जिस प्रक्रिया (नरी) मे पर रोप परिमार्जित होत है उस प्रक्रिया को ही शास्त्रों में "सस्कार" कहा पायो। मारतर्प के समी शाशे का एकमात्र मुम्प गरय प्रास्पसस्कारी।कामा मग्न किस गरम में नाशा ने प्ठी समता प्राप्त की, पंसी सफलता में भम्प शाम पीरहे। प्राचीन शासमप्पाना के अनुसार मा मा की स्पृरारूप स्यूसरीर के मस्कार के लिए भावमा बाद मापुडगाम प्रासमा है। प्रागकणारूप सूमिगरीर के संस्कार के लिए मनाविपर्मागास प्राच पुर। मनोमय कारणमरूप मामा के संस्कार के लिए पनिपशप एस कम्पापपानमूत शारीरफगास (प्प्यसपन) प्राच हुए हैं। मतानों गोमोसमयावी शरीरों को मुफ्प मानते हुए सरनो शरारों की रपा का भी पूरा प्पाम एच परवा मारणार सदा पर पान रमलंग्न कि स्पराम के ति सापकही सूक्ष्म ।
धगिरष्टि - माम्पमूमिका .. पानमसरकार एक कारणशरीर पर मापात न होगाय । एवमेव सूक्ष्मणरीर के संस्कारक धर्मरासको सस्किपम्परा व्यक्ति की रिदया, एक मारमनिष्ठा को सक्ष्य में रख कर ही पर्म देशों का विधान करना परेगा। इसी प्रकार उपनिषधास्त्र, किंषध वेदानशास्त्र अधिकारी मेद से ही मारमनिष्ठा का विधान करेगा। प्रस्पेक शास्त्र को अपने मूसस्तग्म की रश के लिए इतर दोनों स्तम्मों की रक्षा का पूर्व म्याम रसना परता। यही व पर्य है। यही कारण है कि कारणशरीरसंस्कारक पेदाम्स्यास्त्र साप सापही में मानना की पकि- प्रथा, एक स्पूसरारीर की (स्नान-माहार विहार मादिरूप नियन्त्रण नारा) बहिदको मापरपक सममता है। इसी प्रकार धार्मिक संस्कार मी मायमसंस्कार देगसंस्कार भूनसस्कार भेद से तीन ही भागों में विभक माने गए हैं। यही स्पिति मायुशास्त्र पी।सदर पपपि वीमों ही णास्त्र वीनों गरीरों के उपकारक बनते हुए 'मजापरिसस्कार"माम से प्यार होसकते है।तपापि धीमों के समुचप की शि से हम इतर दोनों शास्त्रों की अपेक्षा गरशास्त्र को प्रपामरूप से प्रयापतिसरकारणास्त्र पहना उचित समझते हैं। कारस दस का यही है कि दास्त- शास्त्र प्रधानरूप से मारमसंस्कारकी, गेप दोनों मामों में यह मप्रधान है। धर्मशास्त्र प्रधानरूप से प्राप्मसंहार है, येरमारों में गौस है, मामु शस्य प्रधानरूप से पकारक (भूतसंस्कार, क) रोपमान में गौण है। इधर मारा गीताशास्त्र भारमा-मास-पगु तीनों का समानरूप से मस्कारक बनता पा मारप ही तीनों से अधिक महत्व रखता है। गीताणास्त्र पर पशि गठिए। पहा माप को मा विस्तार के साप मूतमय स्पसगरीर के सकारक मार-विहारावि का परिपूर्ण विधान मिलेग्य । प्राणमप सूरमशरीर के संस्कारक मामाधि, सावसंशुदि, भारिताप मादि का उपहण उपत्तम्ब होग्य । एक मनोमय कारसगरीयरमक मारमोपपिक पुनियोग्यवि संस्कारों का प्राचुर्य मिटेग्म । यी तो इस शस्त्र की सर्मशास्त्रापेक्षा उत्तरता, महता, एवं मपूर्वता है। निफर्म पीमा कि "मामा नाप-पगु समएिरुप (कारण-सक्ष्म-स्यूमशरीरस्म) सचिरोप मा मा का सस्कार करना ही शान का सामान्य नरेश्य है। एवं अपने इस ऐप में यह गीवाणान इतर शाखों की अपेक्षा सस्मिना सफमामा है। , बहिणाष्टि माप्यममिका - । . ५-सस्कारस्वरूपनिर्वचन- किसी दोपयुक्त वस्तु को मिस प्रक्रियाविशेष से मिदोर बनाया जाता है, पर प्रक्रिया विशेष ही सरकार है। बिना सम्बार के मत का प्रविस्तिक मरूप विनातीय पमा दोपों) के कारण Aषम बना राता। पियमता टिसता है, इस मुटिसा से उसके एक्समावर दिनारा होमाता। परमाणुसंघ हिम मिम होमाता ।, मानामाबरूप मृत्यु (नाथ) का उदप होगा। ठीक इसके विपरीत समता एकत्वमाष की प्रवर्तिका बमती ई एकत्वमुखक प्रसव भाष की सरूपसमर्पिता बनती हुई एकापमुक्तक अमृतम्पच (मातस्त्रकपरपा) की सापिका मन बाती। रिस प्रक्रिया से पम्पुइप एवं नि प्रपसम्हास समता का रसरे सम्दों में एका का सदय रोगको प्रक्रिया 'सम्-म्पर" भाव की जननी बनती ई सस्कार शम्द से सम्बोधित |"समिमेकीमापे" इस निरत सिधास्त के अनुसार "सम्" शम्द एकरण का पोना। "सम्" एसी एकल ही समरस समभाव को सम्पारित करने बाची प्रतिमा ही सकार । । मुगगम से सार ही साकार रूप में परिणत होगा । पर ऐसी कौनसी प्रक्रिपा ६ निससे पदाप की प्रतिमा विषमता रहेगाती है, एवं सम सिमबक समपयोग का समय होता है। इस प्ररम के समाधान के लिए रोपमार्मन, गुणा पान हीनापति इम कर्मों को दी सामने रसमा परे । एमी तीनों प्रक्रियाभों से पदापों में सत प्रतियप यापन होता है। 'सबसे परिस रोवमान कोही सोचिए। दोषी कोई निफ्त परिमापा बना गतमा मी एक पटिस समस्या है। किसी भी राशि में एक धर्म दोष , की धम किसी भाप काल में गुण है। सप शासों में भी दग-कम-पार-म्प-प्रदा के तारतम्य से गुण-दोषों का पासर में सर म्पहार देखा गया है। उदाहरण के सिर सजमापण गुण माना गया है। परतु-पणिना दिवसो पप नव साक्ष्पन्न बहेन्" इस्मारिका से इस नियम का भी पत्र तत्र पद मिलता। 'मा रिस्पाद मरा भूतानि" के भमुसार भरिसा गुण , हिंसा दो। परशु- 'तम्मापो रोड' मावि रूप से परिप पीसा को गुण माना पहिरहर - मानभूमिका । गुपोष गया है। ऐसी दण में गुण-दोर का कोई पापक सक्षम बना गवना एक प्रकार से भसमा सोमाता या सब कुछ होने पर भी प्रयास करने पर एक सपण परप ही बन जाता है, कि हम गुण-दोपमायों का सामान्य सपण कर सकते हैं "मिन फारमों से अपने अन्त- रास्मा में दुःख, ग्लानि दोम, मणम्ति मादि मावों का उदय होवा है, पर हमारे निन कामों से दूसरे मालियों में सादि माों का रोक होता है, ये सर फारस "दोप"गम से सम्ोषित किए मासकते हैं। कितने ही कर्म एमे हैं, जिनसे हमारी तो उमति होती, परन्तु मरों को उनसे कट होता है। ऐसे खापमूसक सभी कर्म वैपलिक मुसके कारण बनते हुए भररूप शेष ही माने नामे जैसा कि-"मुमते तेस्लप पापा य पपरपा स्मकारणा" (गीता इमारिपन से सारण इसका यही कि मनुष्य एक सामानिक प्राणी है। उसे समाज में करीभग्नी जीवनयात्रा का निर्वाह करना है। ऐसी स्थिति में इसके सिर यह भावरपक होगाता है कि यह मानी शान्ति पुस के साथ साप समय की वि, पुपका मी पूरा पान रखने वैयक्तिक सार्यमावना ही मागे जाकर समाज की पछान्ति का कारण बन जाती है। विचार करने से प्रतीत होमा कि पक्षियों के सम् का ही नाम समान है, समाग समति ही राष्ट्र है, एक राष्ट्रसमरिसी विए। इन चारों में सूबवरातबम्पकिगारही परिसमी म्यति पाने अपने हितों को ही प्रणमता देते नाय तो इन सापी पतियों का सपठित समाग मी सार्थी बनता मा पा के नाश का कारण बन बाप । राष्ट्रविनारा मन्प गलों की प्रशान्ति का भरण पनता एमा मस्ततो गा मिच मणन्ति को भपमीनिमाममूमि माजे । इसप्रकार पारम्पत्तिसाप, सिंग म्पमिसालय परम मान्ति व कारण बन गया है। ऐसी रण में केपट प्पतिक दिवसाधक कारणों को कभी गुण नहीं मामा मासकता । हमारे कामों से इम मी सीन दूसरे मी हसी नहरों प्रस्मुत हमारे उपकार के साथ साप सरे भी हमारे मापों से उपाल हो, यही गुफमार करावेगा । धेफ इसके विरीत 'पिन कारणों मेडम - - पीरही का माणभूमिका गुपच मी दुलो र, दूसरे भी इसी गं, वे सब कारस दोप माने जायगे" गुण-दोष का पही सपण शाखसम्मत है । "पस्मानोद्विमवे मोको, सोफामोदिमते प य" (मीना- १२।१५) "परस्पर माश्यम्ता प्रेयः परमवाफ्यप" (मीवा०।१११) इसारि मात्रा शिवान्त उहापों का ही समापन कर रहे हैं। उक्त दोष बिन कारणों से हमारी मध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित होगये है, उन कारणों को भविष्य के लिए रोकना, एक साथ ही में परिते से सबित संवारूप दोषों को समूस नए कर गबना ही परिचा एक मुप्प दोपमार्मनसंसार ।बिन कारणों से मल पण गुणमाम परिने से पात्मा में प्रतिष्ठित है, उन कारणों को सबस बनाते ए साप ही में उन सपत कारयों के द्वारा मोर मोर नए गुणों का मारमा में मापान करना ही दूसरा गुग्णापामससार ।निस पदार्थ का मा मह पता। उस की पूर्णता पिता है। यदि एक कुर्सी का पाप्प टूटा जमा है तो सर्पपा निर्दोष होती ह भी मा पपूर्ण परको साफ सुपरी १. दोपमागन सरध होसा। पालिस होगी। गुणापानमस्कार भी विपम्पन है। परन्तु मा भा से दोनों सरकारों से गाने पर मी कुर्सी प्रभी, भाणनिरक है। यही दया मासस्पा को सम- मिर । मारमा सर्वपा निदुए, साप ही में उस में अच्छे गुण मी काम है। परत परि मास्मा मामिक तोपा मण। वो पम प्रगपति (मात्मा) के भनेक भागते । जातक वे सब यह पूर्ण नही रहते तब तक प्रयापति मपूण रहता है।भपूणा पास को मन्दिम कर देती है। सबसस भावान केन्द्र के माधीम , एम मारमयूसवा पर कम्यभाव का विकास पाचम्मित है। महीन मनाने से पास उदिम होमवा, पास की उदाम्ति से पूजन्म का उपर होगा ।। परि सङ्गचिवोरमार के पूणेदय के साप मारमासमा पूर्ण उदय है। ऐसा बसधन भारमा ही महानास्मा, प्रि महारमा फासावा है। पूजत्यसपप मारमात्र ही इसका मा माराप (बड़ा पापा माराय) हीमा माति (rilporer) tोप मी नहीं है, मात्धेतपिक बहिरंग गुणों का मी पापान है। परन्तु इससे होममी पर सत्याप्रमीचमा, दमा, करुणा, निप्रद, भनुपर, विदिशामा सरूफ.
पहिगारपि •माप्पभूमिका मस्कार धर्मस्थानीय प्रात्मा के भन्तरण प्रमों की प्रतिष्ठा मोर मपेक्षित है। कोप, इप्पा, मोम, मोह, मा, मात्सय, हिंसा परनिदा, टोपण भादि मिन कारणों से मारमा के वक्त अन्तरङ्ग भङ्ग नए होगाते हैं, उन कारणों को ना करने के लिए इन के प्रतिद्धन्दी गान्ति, निवार्यभाव, उतारता मुक्तास्तता, मारममयम, निरमिमानिवा, सर्परितरवि, मरिसा, पागुणमगसा, गुग्मदयन प्रादि भरपरक कारणों को उदित कर दना ही तीसरा हीनापति सम्कार ।। इन तीनों संस्कारों से संस्कृत भारमा सब तरह से परिपूर्ण, एव मुसमद बनता हमा पपने पुरुषार्पसप जीवन के मुरूप उद्देश्य को सफस बनाने में समर्प मम पाता है। निपप यहोहमा फि भात्मा के पूर्ण अभ्युदय के लिए टाल धीनों सस्कार, दूसरे शब्दों में त्रिपमा एक ही मास्मसत्कार का अनुगमन करना माश्यक होनाता है। हम तीनों में दोषमान सस्कार मुम्प माना गया है। कारण इसग पही है कि यब तक मारमा, दोप नहीं हटा दिए मासे, तब तक न तो उत पर पम्प गुणों का भाषाम होसमता, एवं म होनागपूर्ति ससार को ही प्रमश करने का भवसर मिना । म एव पिकने यन पर रत- पीत-हरितादि रगों का मापान तम तर सर्वपा असम्भय है, मग तक वि बन पर धोइए दोपरूप मस पप पिनाई को मय दिया माय | या दोष भारमा के अन्तम्पस में प्रति मित्र गुणों के महाप्रनिया है । माक्षिक प्रकार के लिए यह निमिर है। पर दोप भाग्मा एक मारमगुणों क पत (मध्य में) प्रतिप्रित होगते । अतएव हमें सास साहिन्म में "मन्त -प्रपति-गछति" इस निधन के अनुसार अन्तराप कहा गया है । यह भाम प्रकाश को मनिन करते हुए मुदि-मन-इन्द्रियादि पारमपरिग्रहों को भी मलिन कर रावते है। सीनिए-"अन्नगविमिरोपशान्तये" इस्मारि रूपसे दोपमा अन्तराप को सिमिर कसा गया है। बिना इनके इटाए सब प्रयास म्पथ है । इमी पापार पर तीमो सस्कारों में शान दोपमान सरकार को ही विशेष महल दिया है । यद्यपि शाम वर दोनों सरकारों का मी प्रति पादन करते हैं परन्तु मुस्प सक्ष्य दोषमामन सरकार ही है, एवं अपने इस मुस्य सोप में हमारा गीताशाब सब तरह सफल हुमा है। यह तो ई सपार शम की सामान्य निठति।
• माम मूमिका शास्त्रका गीत साकार गौरप मदिराटि- मारे सामने पे सस्तार र गते, पिणे सनातमधर्मी श्रीव-स्मात्तसंस्कार का करते हैं। सह मौत स्मार्ट संस्कार १८ मार्गों में विम माने गए हैं। इनमें २२ श्रौत Hant एक १६ स्मासिस्कार है। इन संस्कारों से ही निमाति का विवादित सम्पम होता है। बिना संस्कार के यो मान्य एक काष्ठ के घोरे का है, पही पम्प मका दिनातिका माग मो शरतम में पम्मम्पतिकम देखा जाता है, इस का मा काय संस्कारों का ममाव ही है। संस्कारदोष से ही हम भाग मवर्म को धर्म मान ग, एक धर्म का तिरस्कार कर रहे हैं। माय इन सब गौस- स्मार्य संस्कारों का भूमिकाद्वितीयसपणास्तर्गत कर्मयोगपरीक्षा माम के प्रकरण में विस्तार से शानिक निरूपण किया जाने वाला है, प्रत प्रकल में इस सम्बन्ध में विशेष फल म काकर अन्त में यही बताण देना चाहते हैं कि भारमसंस्कार करना ही शानों का मुत्य सत्य है, एक भारमा के स्पून सूक्ष्म-कारण इम वीतो पो का संस्कार करता मा गीताशा प्रबरप ही कर भारमसंसारक मों को भपेक्षा उपय।।
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६-गीताफातमीमांसा
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६-गतिकालमीमांसा
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* श्री ६-गीताकालमामासाज- उक्त शीर्षक के माधार पर सम्मत पाठक पह अनुमान सामे मगंगे कि हम इस प्रक रण में गीताम प का पनासह बवसाने वाले हैं। इस सम्भावना को निर्मूच करते हुए मिष पारम्म में ही हम यह स्पष्ट कर देना चाहते है कि गीतापस से हमाग ममिप्राय पुगधर्म है। निस पति से मार्यप्रणाली में फासनिमय करने का निपम है, उसी पति से यहां भी निरूप किया जापग्ण | प्रस्तुत गीतामा भगवान् ग्यास की रचना है, एवं ग्यास का समय महाभारत- समकासीन है। फसतः स सर्वविदित गीतमासनिमय के सम्बन्ध में कुछ करना पिरपेपण है। पास मे अपने शम्दों या मगवान् का उपदेस म्पत किया है, पर उपदेशसमा । सविक गीताराम महत प्रकरण में हमें उसी मुरगीतास के काम के सम्बन्ध में मिपार करना है । भगान् की पारतविक मिता का उपदेश सर्वप्रपम कब एमा! पहील पारणीय है। पपपि सय गीता मे- "इम पिरस्सवे योग मोकमानामग्ययम् । पिप स्वान् मन मार मनुरिमाकपनबीन ।" (०.यो.) इत्पादिरूप से मूपरिवोपदेशकासनिर्सय के सम्बन्ध में फुल समेत किया है। परन्तु बिस प्रकार महामारतकार सर्वसाधारण को विदितपाय, पैसे वैक्सतयुग का सर्वसाधारणको परिचय नहीं है। कारण इसक्न यही है कि वसतयुग का युग से सम्बन्ध , देवयुम का वेदयुग से सम्माधी, एव वेदयुग का पैविक इतिहास से सम्बन्ध र भारतीय विनों में कुष समप से पेर में इतिहास का ममात्र माम रक्खा फसता परवधिक निलय से सहकासनिणप से सर्वसापारण तो स्या, मिद्वाम् मी मधित है । इसलिए नाम के सम्मम्प में हमने कल मीमांसा करमा भारयक समम्म। 1
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परिपारष्टि - माप्य भूमिका 18 प्रतीमुग - . . ३-धादियुग- प्राप्त देगी की मनुकम्पा से भागे नाकर मनुष्प की मुदि में पोका मा विकास गुमा। यो यो हन की मुदि विकसित होने सगी, त्यो त्यों इनोंने अपने जीवन में क्रमिक सुधार करना भारम्म किपा । मग्न राने में इम्होंने सजा का अनुभव किया । इन की रपि सर्वप्रथम परामों के शरीर पर गई । इमोंने देखा कि पाभों की गुप्ते िदए प्रकृतिवाय धर्मवेपन, एष पुप से टकी सती है। इसी पशुशिक्षा के माधार पर होने मी प्रवकर, गुष्कपत्र, पशुधर्म भारि से अपने अधोभाग कोकमा भारम्भ किया । भातप-वर्षा से बचने के लिए इमोन पदियों के घोसलों से शिक्षा सी, पामी-स के घोसलेनुमा मकान बनाए गए पशु-पक्षियों के पार स्परिक सपठन को देखकर इनोंने अपना मी सघटन मारम्भ किया, चकमक प पर से मति का माविष्कार किया, कन्चे मांस के साप मुना इमा मांस मी म्पबहार में बने सगे/ राहियों के मामूपणों का उपयोग भारम्म मा, पशुधर्म के पेपन से वापरिरोष (टोसक) बना कर सामुहिक विनोद की शिक्षा प्राप्त की, पशुगमन प्रारम हुमा, भरी अपनी छोटी छोटी खतम्भ मासिए बनाई गई, इन का एक एक मुसिया बनाया गय, मय- सम मादि से सबरी का काम लिया जाने पगा, हिंसक पशु, एम शत्रुदस से प्राण पाने के लिए पापाण-सोर भादि के मपरिपत शस्त्रों का मी उपयोग होने लगा । इस प्रकार इस गुम में मनुष्य की सम्पता का भीगणेशामा । इसी लिए हम इसे मादियुग माम से म्यरत करते इसी युग का प्रापागप रा । इस युग के स्मारक भी भाव में माङ्गस प्रदेशों में प्रधुरमा में उपबम्प होवे। जारों यौवक ४-मणिजायुग इस युग में मामयसम्पता का एक प्रकार से पूर्ण विकास मा । मामनिर्माण, अपि कर्म, कपास रेशम मादि के मों का निर्माण, पनापती म्मास्था, सोकसधारमा गसम (म दिया । भाप्पभूमिका प्रयोग भाणी युग मागे जाकर जीवसर्ग का विकास मा । पिसी अपि पति की मामस प्रेरणा से राम्पत्यमावारा जब चेतनरूप पातु मूस-बीच माम के तीन पीसों का विकास हुमा। इस युग के सम्प प्रासी पशु हो माने गए । क्योंकि इस पुग के मनुष्यों के गुरु यही पशु थे। इसी रपि से इस युग को हम परयुग मी कर सकते हैं । इस युग के सम्बन्ध में हमारे बाम ने शेर भारग्म की। उडी मम्वेषस के माधार पर हम इस अनुमान पर पहुंचे कि भारम्भ में मनुष्य का पीन पशुओं की मति ही म्पतीत होता था। दूसरे शदों में इस युग में पशु ही मनुष्य के शिक्षक थे। पर सपा नम रहते हैं, परस्पर में सदा करते है, सरस पशु मिषस पशुओं को मार कर पानाते वर्ष-प्प भारि के भमण से बचने के लिए पो की बापा, पर्पत कदाभो भूमिगों का मामय हेते है। बासी मास, फस, पचे पानि होइन की भोप्रम सामग्री है। तकसीन मनुष्यों में भी इन पशुधम्मो कोशी अपनी जीवात्रा का सापक नापा । इस युग रे मनुम्प सर्पमा मम पते थे। पराभों का, एक मनुष्यों का क्या मांस, गाजी कर-मस फर इन का भोगमपा। भूमि इम की सप्पा पो। परस्पर में बात बात पर पाठे मगरते रहना इन कर साभाविक धर्म था। मपनी सग्वानों को लिक पगुभों से बचाने के लिए पर पतिकरदराभो, पाखामो, एवं गट्दो माथिका मात्रम लिपा करते । भाषा का प्रयोग सर्मपा प्रस्फुट पा । स पशुओं की परिवार की तर "मा-मा----" मारि सकितिक मात्रा के छग ही इन के म्पहार सम्मानित पे । गोरेपा शिम्पाखी कमानुप, सिंह, म्णप्र, क्या मावि रिमक पाभों से परिपण, महामपान, दुस्तर उन भफ्रिका के जंगलों में बने धणे, नहाण, सपा नम, पूर्ण मसभ्य, एवं मरम्पसमपी मंगली मनुष्य भाग भी उस पुग की पाद रिग हे । ममुप्प की मास्प मी हगारों लो तक ही होग, क्योकि मानवीय सम्पता निकासमा हो पा करम है। .
पहिरष्टि * माप्पमूमिका - परियुग - ३-श्रादियुग प्रकृति देवी की मनुकम्पा से मागे गाकर मनुम्प की मुदि में पोहा सा निकास पुमा। यो पो इन की बुद्धि विकसित होने सगी, पो त्यों हमोंने अपने जीवन में क्रमिक सुधार करना भारम्म किया । नग्न रहने में इनोंनें बजा का अनुभव किया । इनकी घधि सर्वप्रपम पशुओं के शरीर पर गई । इनोंने देखा कि पशुओं की गुप्तेदिए प्रसिद्धाय धर्मोएम, एवं पुष्प से उकी रहती है। इसी पशुशिक्षा के माधार पर इनों मी सकस, गुप्फपत्र, पशुचर्म मारि से भपने भयोमागोकना भारम्भ किया । मातप-वर्षा से बचने के लिए पनि पपियों के घोसों से शिक्षा सी, पामी-इस के घोसछेनुमा मकान बनाए गए पशु-पक्षियों के पार स्परिक सफ्ठम को देखकर मन मपना मी सघठम भारम्म किया, पकमक प पर से भग्नि का माविष्कार किया, कन्चे मांस के साप मुना मा त मी म्पबहार में पाने खगे, राहियों के पाभूषणों का उपयोग मारम्म रामा, पशुधर्म के वेपन से भापरिशेप (टोसक) बना कर सामुहिक पिनोद की शिक्षा प्राप्त की, पशु गतम मारग्म मा, मामानी छोटी छोटी सवन्त्र माथिए बनाई गई, इम का एक एक मुसिपा पनाया गया, भय- सम मादि से सपरी का काम निपा जाने सगा हिंसक पशु एक पदस से वाण पाने के लिए पाषाण-चोर भादि के मपरिक्व शस्त्रों का मी उपयोग होने लगा । इस प्रकार इस युग में मनुष्प की सम्पत्य का भीगणेशामा । इसी लिए हम इसे पादियुग नाम से म्यवान करते हैं।नारों यो वक इसी पुग का प्रापाम्प रहा। इस युग के स्मारक मी भाग में मानस प्रदेशों में प्रचुरमात्रा में उपखम्म होते है। ४-मगिजायुग इस युग में मानवसम्पत्य का एक प्रकार से पूर्ण विकास हुमा । प्रामनिर्माण, कृषि कर्म, कपास रेशम भादि के रसों का निर्माण, पचापती म्परस्पा, सोकसत्तात्मक णसम (प्र मा माध्यमिता - मपिसाग पाक्य), पपीतागादि का निम्माण, सपान उपबन मादि की पवरपा गाविग्रह पति, मान-किया-मय-गिरस के भागार पर मानासमार का चार भागों में विमान AAN शानिक माविकार पादि इस युग की प्रधान प्रपान लोपसाए है।न्दी विनामों के एररा इस युग को हम पुणसम्पयुगा सकते है। इसे तो यह मान में भी कोई सकोग नही पनि प्रिम सम्पना साहति महाम पर माय परिचमी देश पमिमान कर रहे इन सब सियों में मणिमापुग कहा भगवा मा म । U मलिग नामक तत्वामीन मानव समयम की व चारों सए एस युग में शमश माप्प, पारानिक. मामास्तर नुपित इन नामों से प्रसिद्ध पी : देवयुग में पबित होने पसी मामाया मा मत पही पर ग्रेणिए पी । इस पापा की तुसना करते हुए हमें इस निफर्ष पर पापमा पा है कि परम निर शनप्रभान जप उस युग के मामण थे । पर मप्रतापी, मारनवर मायनिक उम युग परिप पापि, गोरखा, अणिम्प में दव, पूर्ण सम्पम माम म्पर उस युग मेर। शिविणा में पारात समामा में निम्पा पुद्धि से सास सुषित उम पुगवे यासाइन चारों गालियों का नेता सापति के नापो मामानी म प्रतिभास से इमी साप मावि ने प्रातहतों की परीशयम प्रगम पापा (पमाChamitra) भारिपार निपा पाणीदाय मामिन पापिया के साभार र मग मार (युग में) भीम गप्पापा के प्रारक प्रमाके से उन के गपुर अपना नाम्न बनाएर गरिमोकी में पापामा प्रसार रिया पार देयुग म पदिमे मा मापों पारा प्रमुष्प पा, साप 10 में पासपी मोम हमानों के frain भी प प पर पपपादिप में "पुरदिपा पानाओं से प्रसिद । मामाईमा पर firमन प्यादिपिकान Trमा गरम मसारी मानिने को मिला ही न माप्पो पारमिन FEETINRARों से बनाउन नमो rathमरद पेशाब रन पर मनुम भी मम्मीर बगिरधि माप्पभूमि स्पायुग सकता है। हम विज्ञान के प्रापार पर मषीन सूर्ण, पनमा मादि भी पमा सकते हैं। पर प्रति परीपिप्रपत्र का पर्यरसान होगाता है तो ऐसी रण में समा म्यय प्रकृति से मतिरिक्त एक सतन्त्र ईबर की काममा में अपने मौद अगत् की शक्ति क्यों सर्भ की नाप । कि तत्कालीन महारारिक-मामास्वरादि इतर मातियों पर इमों का पहुरा बा, सबली के मादेश पर पसते थे, भतएव यह मणिमायुग साप्ययुग माम से मी प्रसिद्ध हुआ। मणिजा उस समय में मानम समान की सामाग्प संहावी । यहविषा में निष्णात, या से ही माफम्मों का सम्पादन करने वाली इसी साम्पनाति का सरूप मतसाती नई यःशुति करती है- रोन पनपयात देवास्वपनि धाणि श्यपायासन् । देह नाकं परिमान' सचन्न या पूर्व साध्याः सन्त्रि देगा । (पजु। सहित) देवयुग में या से ईघर का पमन किपा मावा पा 1 परन्त साम्य सोग या से पाकात पान करते थे। एसरे शमों में वे निशान से पिान का ही प्रसार करते थे । इन की सन- मणानी में प्रगात प्रामक गणतन्त्र की ही प्रधानता थी । इस युग का प्रभुत्व पूर्व के पुग्में की अरेचा मरिक समप तक रहा। ५-स्पर्द्धायुग - पूर्व में पतलाया गया है कि सम्पता, संस्कसे, एवं विधाम की पराकाष्ठा पर पहुंचे हुए भी साप्प एकेबरमार पर, किंवा बरसत्ता पर विचास नहीं रस्ते पे | इस अनीपरमादप्रधान परिकनिधनपाद की प्रबत का भागे बाकर परिणाम २ मा कि हन का मतपद पम्ही के पारस्परिक विरोष का कारण बन गया। गनगास्मिका सनप्रणाली मी इस विरोध की उसे मक पनी, फसतः सपि के सम्र में 10 मपातर मत प्रचलित होगए । मो फया पर ा माध्यमिक महिमायुग बास्त्र), वापी तापदि का निर्माण, उपान उपवन प्रादि की व्यवस्पा, गायनविषा पति, पान-किया-मप-शिल्प के पधार पर मानवसमाग का घार मागों में सिमामन भविष वानिक माविफार मादि इस युग की प्रधान प्रभान विशेषताए हैं। हनी विशेषतामो के कारण इस युग को हम प्रशसभ्ययुग कर सकते हैं। हमें तो या कहने मे मी कोई सकोच नही होता कि जिस सम्पदा सस्कृति एवं निशान पर माम पश्चिमी देश ममिमान कर रहे है इन सब विरों में मशिमायुग कही मागे बदामा पा । मगिगा नामक तत्कालीन मानव समार की वे चारों वेसिए उस युग में क्रमश साम्य, महाराणिक, प्रामास्वर, नपिन इन नामों से प्रसिद पी । ऐक्युग में माविका होने बासी बाम्यवापा का मूस पही चार ग्रेशिए पी । इस पापा की तुबमा करते [ए हमें इस निष्कर्ष पर पाबना पता कि परम पानिक शामप्रधान साप उस युग के पक्षण थे। पर मप्रतापी, महाधनुर महाराविक उस युग के पत्रिय ५ । कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य में रप, पूर्ण सम्पम मामासा उस युग के रपये। एशिनिया में पाहत एमा मसेरा में निखार्म मुधि से सम्म तुपित उस युग के याये। इन पारों गाति का नेतृत्व साप्पमाधि केही सापों में पा। मामी भपूर्व प्रतिमा के बस से इसी साप गावि ने प्राकृतिक दलों की परीक्षारपसर्ग प्रथम पारिया (केमेस्ट्री Chumi tra) का भाविकार किया था। इसी के द्वारा भारिपात पापिया के भापार पर भागे मार (देशयुग में) भोपसम्पा-पा के प्रयाक प्रमाकेमादेश से उनके अपेष्ठ पुत्र प्रपा ने मन को म्स बनाते हुए देवत्रिलोकी में पाक्षिा का प्रसार किया था। वे युग से परिते सम्पूण पिच में साप्पों का ही प्रमुख पा, साप ही में या बरवादी मौम देसामों के विरोधी मी चे मार पर मारपसाहिस्प में "पर्षे देवाः "मरदिपा" त्यादि नामों से प्रसिद ए । साप्पमादिमिरसता परसि म पा। पाहेर प्रतिसिदि पणिक शिाम के उपासर पेजोस्न माम पणिनिधानपदी मास्तिकों को मिल रहा, पीरपान साम्पों का पान का मभिमान पानि माता नियमों से भिरपनाउन मियों को मसीजन मान कर टीक पति में काम करने पर मनुष्य भी नगीन विनिर्माण कर ६४ पहिबारह - माम्पभूमिका & देगयुग है। यही क्रान्ति मागे बाकर शान्ति की मुसप्रतिष्ठा बन जाती है। इन प्राकृतिक सिमावों के मनुसार साप्यों के भविषेक से फछे हुए मतबद ने चोम उत्सम किया । इस कोम ने महाग स्तिपरायण शिल्पोपचीची तुषितों में भी संघर्ष उत्पम कर दिया । मषिप्त नाति का उस समय मही महल पा बो कि महत्व पाम दक्षिणमारत के गमों का है । पाठकों को यह मन कर माचर्य होगा कि इसी तुषित मातिने एक ऐसे मापुरुष को मन्म दिया, बो कि शान्ति का दूत बमकर मागे जाकर विषणन्ति का कारण पमा । उस महापुरुपने सबसे पहिले प्रचलित सिमिम दस पादों पर कुठारापात करते हुए एकल मूबरू प्रसाद की स्थापना की । इसी महापुरुप की कृपा से सबसे पहिसे एकैघरबाद मक रामवन्त्र की स्पापमा हुई। उस विभूतिने यह घोषणा की कि यदि इन १० सो मतों का कोई एक मूल भाधार नहीं माना जाता है तो पह समी मत सर्वपा मिप्पा है। ईरसचा के लिना इन की प्रतिष्ठा किसी भी भवस्था में मनुष्य नहीं रह सकती। इसी मम्तम्प मापार पर इसने दसों बादों की प्रतिवन्द्रिता में सिदान्दपाद की स्थापना की । महापुरस के इसी प्रापमिक पुमार को ग्यप में रखकर मन्त्रनुति करती है- नासदासीमो सदासीचदानीं नासीइनो नो म्योमा परो यत् । किमावरी। कर कस्य शर्मालम्मा किमासीद्गान गमीरम् ॥२॥ न मुम्पुरासीदपव न वर्षि न राश्या मह मासीत् मफेवा। भानीयात खपया पदक तस्माद्धान्पन्न पर किञ्चनास ॥२॥ दम मासीचमसा गुम्ममोऽसकेत सप्लिस सर्पमा इदम् । सुप्ठेपनाम्वपिहिवं यदासीव तपस्तन्माहिना जायतकम् ॥३॥ (भा १०११२२।१-२-)।
बहिर - मायभूमिका - युग सम्प्रदायों में देखा गाम है वही कसा साम्प्युग में म्पाप्त होमगा। सापकासीन देही १० मत अमेहिता में सदाद प्रसदाद, सदसदार, पोमवाद, पपरनाद, रमोमाद अम्मो बाद, पापरणमाद, पोराबाद, सम्यगाद इन नामों से प्रसिद्ध है। साप सिद्धान्त सदा कता, निरपबिहानबक सस्य सिमाम्त में निरोगकामासर नहीं है। इस साम्प १० मत मानते थे। परिणाम इस का याामा कि इन विमिन मसरदों की करा से तत्कालीन मानक समान में सर्प उत्पन होगा। इस सर्व का भूस फारस भनीबाबादमूक प्रचातन्त्र ही मा। इसी सपर्म ने त कालीन संगठन, एक शॉम्ति में ठेस सपई, कता का साम्राज्य होमपा । इस प्रकार एक बार इस सी मनिक सम्पता ने पिस के सामने उसी प्रकार एक महा संकट उपस्थित कर दिया, वैसा कि सफर भसोर शिानमाइमच राष्ट्रों की का से भाग उपरिका दोहा।इस संकट की निरधि को ! या मागे की युगमीमांसा से विरित पोम । इस समयुग को हम सपपपुग, विरोरपुग कमायुग, प्रणाम्यपुग, अन्तियुग, रिप्तवपुग, इस्पानिमामों से भी सम्बोधित कर सकते हैं। (-देवयुग-- शान्ति पती, पोम उत्पम करने के लिए । पोम होता, शान्तिप्रसार के लिए। शान्ति प्रन्ति की मममी , प्रन्ति णन्ति की नमी है। संयोन बियोग का बना है, वियोग सग का जनक मार ममात्र का सूचक है, प्रभाब भाग का सहप सम्पादक है। सभी स्तन की पा, फतन उमति की पगा! । मुसका बास, हुस कर मत एस भग्म मृत्यु का कारण समय जम्मका कारण सहनतीजान्ति की ननी हम रसापानामा मोटरसाई प्रणाली माया पर मोमुरमा o ! सप कप शयिामारण पाय बनाए।
पदिनारधि - भाप्पभूमिका C- देषयुग है। यही क्रान्ति मागे माकर शान्ति की मुसप्रविष्ठा पन माती है। इन प्राकृतिक सिवानों के मनुसार सापों के पवियेक से फसे हुए मतबाद ने पोम उत्सम किया । इस पोम ने महाण स्विपरायण रिपोपनीची सुषितों में भी संघर्ष उत्पम कर दिया । तुषित पाति का उस समय नही महस्स पा बो कि मात पाम दपिणभारत के पदों का है । पाठकों को पह मन कर मार्य होगा कि इसी तुषित भातिने एक ऐसे महापुरुष को जन्म दिया, जो कि शान्ति का रस बमकर भागे जाकर विभान्ति का कारण बना। उस महापुरुपने सबसे पहिले प्रचलित विमिम दस पादों पर कुठाराघात करते हुए एकत्व बरु प्रमपद की स्पापना की । इसी महापुरुप की रुपा से सबसे पहिले एकपरमाद माफ रामतन्त्र की पापना हुई। उस मिसिने यह घोषणा की कि यदि इन १० मतो का कोई एक मूस प्राधार महीं माना जाता है वो पह ममी मत सर्वपा मिप्पा है। ईरसचा के बिना इन की प्रतिष्ठा किसी भी मनपा में मनुण्ड महीं रह सकती। इसी मम्तम्म भाचार पर इसने दसों पदों की प्रतिक्षिता में सियान्वपाद की स्थापना की । मापुस्प के इसी प्रापमिक पुपार को पप में रसकर मन्त्रमुति करती है- नासदासीमो सदासीचदानी नासीद्रमो नो म्योमा परो यद । किमावरीया फर कस्य शर्मालम्मा फिमासीहगान गभीरम् ॥॥ न सम्पुरासीदसत न दिन राम्या महमासीत् प्रकता। भानीव्या स्वपया पदक तस्माद्धान्पन पर किञ्चनास ॥२॥ दम प्रासीचमसा गुम्ममग्रेऽपकेस ससित सर्वमा इदम् । उपलेयनाम्पपिहित पदासीव तपस्तन्माहिना जायतकम् ।।३।। (पफूस १२२१-२-10। २७ परिपाटि -al मायमूमिका देवमुप प्रति इसी महापुरपने सवप्रपम प्रमशाद की स्थापना की पी, मत एक सकसीम निपम के अनुसार पह"ममा उपाधि से निषित किए गए । यही रमा देवयुग के भाव प्रबक्षक माने गर, पैस कि "प्रमा देवानां मयमा सम्पभून विश्वग्याचा मुरनस्प गोप्या" (मुण्डकोपनिषत् ११११) इस्मारि पबम से स्पर है । उस युगमे या निपम पा कि वो विदाम् मिस कल की सबप्रथम परीक्षा करता था सप्से उसी माम से विभूषित किया जाता था | बसिष्ठ, परस्प, मत्स्य, भपि, मगु, मङ्गिय भारि भाप नितमें माम सुनते हैं बस्तुन पा सत्र न्यों के नाम है। बिन महापुरुषोने इन तलों को परीक्षा की, ये, एक उनके परामर मी ममी नामों से प्रसिद्ध इए, हा विश्वपिसम्पादि प्रम्य नियमों में विस्तार से प्रतिपादित - मस्तु प्रहात में पतम्याश यही है कि भरवारविहान के अनुसार प्रथा का परम प्राधि कारिक पा, प्रकृतिसिद पा। पतरस या पारिता "लपम्मू" नाम से प्रसिद्ध ाए । एमेजर पाद की स्थापना के समस्तर प्रमा मे प्रतिसि नित्य प्रना के अनुसार पर्या भी बार प्रकार की एशिसंस्पाए प्रतिष्ठित की। निरपसिन मपीरपेप वेदम्प भापार पर दमाप प्रकटाए, परिसी मेदसशिकरसाद निस्पसिर सोप के अनुसार इसी पिली पर रोक म्पमापा की। पपिपी को पद्म माम कर इसे माठ मागों में विमत दिपा गपा । पही पापिय माग पुगों में "पापमुरनकोय" माम से प्रसिदामा । इस विभाग में देवपितोकी एवं भामरमिमोकी माम की दो संस्थाएं बनाई गई यही दूसरी मोकमणिकाई । इसी प्रकार पक्षिति, पचान, पदरपणी मादि रूपसे मनापदि की प्यास्पा की 1 सम्व में प्रतिसिट निस्प बर्मपर्म के सार पातुसम्पर्म को प्रकट किया गया। इस प्रवर से प्रतिसि नित्य प्रभा के प्राण्मुस से पपौरपेय वेसी भापोमुच मे होऊमति, पमुष से प्रगषि, भमनि ममामुन से धर्म- नमार साम्रो परम्म पार्षमान प्रान रेहानो माग कमरा मुरमवीर पापमुबोग, बप मुपयोग माया प्रतिर है। इस प्रतियR Aरेन पुपणास पर परापपषिमातम प्य नुवीय में नमन। (1 परिधि * माम्ममूमिका - रेगयुग . " . सधि, उसी नियम के अनुसार पुष्कर (घुवरा) में उत्पन होने माझे इस सपम्मू प्रमा ने भी मन्त्रात्मक वेदरष्टि, देवप्रियोकी-मासुरनिहोकीका सेक्सष्टि, प्रगाविमागरूपा प्रमापति, एक प्रमाको प्रकृति के नियमानुमार पसाने के लिए धर्मसूरि की। प्रतिषत् प्रमि, एड, परुण मावि मौमदेवताभों का विकास किया गया । राय, फालकेय, दौडद, मौर्य, सूत्र नमुषि, स्वष्टा सुपारूपि भारि मसुरों की म्परस्मा हई । ब्राह्मण, सपिय, परप, यूद इन पार बरणों का, एव अन्त्यम अनपापसायी, दम्यु, म्हइन चार मवाणों का विभाग किया । चातुर्वण्य के साप साप म्पति का उपकार करने पासी ग्रामपर्म, सस्प पानसस्प, सम्पास इन चार माअों की म्यास्पा की गई। १० अंग्रारमक भारतप को देवत्रियोकी का मनुष्यसोफ माना गया । बिस भारतवर्ष की मप्परेसा उम्मेन है, पूर्वीसीमा चीम समुद्र (पसोसी-पीतसमुन्, पविषमसीमा महासागर (मरिट्रेनिएप्सी MadetaronLon Sea) , दपिससीमा मिपाच स्थानीय तह, उत्तरसीय रार्ममावत (शिवाष्टक) १११ , ऐसे इस महानणास मारतवन के सम्राट् पैपस्मतमनु बनाए गए। मनु के सम्मान से ही पा सोक मनुष्पसोक, एव यहाँ की प्रमा माभव माम से प्रसिदई। भग्नि देखना यहां के प्रतिष्या (मभिष्टाता) शसोमपात् (अपसराप ) बनाए गए । मनुष्य सोक का भरण पोपण करने के कारण ही या परिन "मारव" कागए । बैसा कि-'मग्ने पा प्रसि मामय मारवेति" ( स० ) इस्मारि पशुमन्त्र से सिद्ध है। मारत पनि पर शसित होने से ही यह सोक भारतवर्ष कासापा पा, एव पहा की प्रमा मारतीप करवाई। एप्पमारत पर्वत से भारम्म कर दिमासप तक का सारा प्रान्त मीमत्रिसोकी काम- Rष मोक माना गया । पाय यहां के रासोनपात् बनाए गए । पाहा की प्रग पर रापस गर्म पिणाप, गुणक, सिख, किमर भावि विभागों में निमक की गई। पदी मानतरीप प्रना वियग्योनि काई । एप्रसिद मन्यमान, काननकन, पैमागगन, उमाक्न, स्कन्दकन पारि महापन इसी चोक की योमा बहाते थे । अप्रसिर नाम्पुप माम का पुषण इसी स्पान कर प्रेरणा बीख नाम प्पभूमिरा- रिमामयप्रान्त एक प्राम्मेर (पामीर) पहा का सासोकामा । इन्द्र यहाँ के सरसो वगत् बनाए गर । यहाँ की प्रणा देवता कामाई। सापही में इसी इन्द्र को स्पतिविमाम कर जोपास, एक पूरा का रिशस बनाया मया । परण को पानी के विमान का सोपार, स परिषम दियण का PH स बनाया गया । पन्द्रमा को भोपधि-भामणमम का सोकपास, (4 उत्तरश का दिशाम बनापा गए । यम को बनस्पनियों-पितरों का लोकपास, एवं दक्षिण रिण का ति बनाए गया । मनमूसह राजतन्त्र को मा सम्राद बाराद सिराट मेर से पार श्रेणियों में विभक्त किया गया । प्रगान का समूस मिनारा किण मपा । इसी प्रका प्रमिधा ममेरिका योरोप माम टीम महाप्रान्त अनुरों को दिये गए जी मारपिसोकी कामाई। पाने ज्येष्ठ पुर मपी को प्रयोरिपा परिसा शिपमनाया। पायों में सरराती मदी के समीप सर्वप्रपम यह की पापमा की । यह स्पाम सग मम जा पग पर पाता है। प्रयाग के समीर रिंगनक्षेत्र में तुम होने पसी समा सरस्वती, एवं तापमभारत की प्रासीमा पर गित पुिनद के उस पार बसष्ठ मम के समीर गाने पसी भाषी सरासी, इन दोनों सरस्पतियों से पा सरामी भिम है। इस की सत्ता लगभग समस ३१ । देवमासंग इसी में भरपस्नान ( पयाम्तलान)लया करते थे । पा) पाविरोधी पर मारमा परने में प्राप असमर्प जी, मत एक पापान "मपरामितारिक" माम मे प्रसिद एमा I इस साम्ती में भारतर सात पग मPिए मिती है। यही मदी वर्तमान ३ 'पानम्गमीम" नाम से प्रसिदार्गशय प्रत सारस्वत पारेपर देना सोग अमरों को समप समर पर परास्त करने में समर्पए है। सब से ही विरामय उस पुगरापापी मारतीप प्रमाकापर्म देवानी से A गरित होगा। इस प्रतिसत में भारतीय प्रणा की मोगम, पापादन म्पराग, सिमिरमा, भाप पारपापमो पा मार रागात्र पर मारा प्रसिनीमार पाके माम पिीक पा माले) माप घे। पमोपारा में तीन बजर कप मलि एला । पाप्रसार के लिए तीमा सोकों में करपा, बरिष्ठ परिपर - मायभूमिका । पहिरा, पगु, मरदाम, पनि, मादि प्रमुच फुलपतियों की पप्पड़ता में प्रलपर्पर्दै, एक माणसाए मुम्पस्थित पी। रामवत्र को सुपरिपत रखने वाले प्राम, नगर भाट, सर्व मारि का निम्मा मा पा । सेमा, सेनाप्पद, प्रामणी, सूत, पासास पणा मादि १० रम रामतन्त्र के संचालक थे । वैज्ञानिक तत्वों की की परीक्षा के लिए सिम्मुनद से पधिम भाम में वसिष्ठमण के समीप प्रशहित होने पसी सरस्वती नदी के समीप एक महानिशानामा पी। पा छावा "सूर्यसदन" "विज्ञानमपन" मादि माों से प्रसिद थी। सौम, प्लम, दिम्प, मूक, पर, इत्यादि स्पस गस नम संपारी विविध विमानों के माविकार का पाइसी विधानभवन को मिमा पा । निगम-मागम मेद से विधानों के दो विमाग भी इसी युग में हुए थे । १-पेर --उपवेद, ६-दाम, 1-उपराज इस प्रकार निगम को १८ मार्गों में विभात किया गया था। १८ सहिवार, १४ सिदान्त ६ सय, १० पामम, सामर, ६47, सम्प १२. मागम के भवान्तर विमाग हुए थे। महासटिका की म्पपमा के लिए निरप सिम कत, द्वापर, कमिमेर से चतुर्पी का भाविकार माना। प्रेवा इस प्रकार उस महातन्त्रायी महमर के महालिरब के गुप्त खस्यों के मापार पर भगवान् सामने इस भूसोक में ही सब कुछ परिपत कर दिया । इन्होंने मामा निपस स्पाम फाकेयश परत बनाया । यही स्थान पान "एशिपामाइनर" ( Aslaminet ) नाम से प्रसिद्ध है । इसे ही दारहिया (छोटी एशिप) भी कहा जाता है। प्रक्षा के सम्बन्ध से ही देवोक्स, एष एसिपामाईनर एण्या रूप में परिणत पारे । एशिपा राम्द एरपा का ही बिस्तरूप है । सम्पूण एशिया उन सोगों की प्राविधिक संपति (मोरुसी मापदाद) है, जो कि ईशमा के, एक इनके रा मानिपल वेदधर्म को मामने वाले हैं। - - इम (मारतीय) एशिया के है, एव एशिया इमारी है। मागर महानुमाव हमारे एव हमारी एशिया के प्रतिपि है। मतिपिसेवापरायड भाप माति ने उन का, एवं उन के वरानों का पर्याप्त मातिथ्य कर दिया । यहाँ तक कि लों ने भपने लिए, एवं मपमी सन्तति के शिरमी पुन धोका । उपर भतिवि महानुभाव प्रतिपि की कौन हो,विपि की सीमा का भी ठासषम परिफर - माममूमिका फर मर, किंगा कर रहे हैं। हर मार्पयाति को यह मी विविध म बाकि यह भारत महानुम्बर पातल मेंम्बरे मतिपिपा मचाओ, मार्यवान बम तक अपने सरूप को न पीपाम ले, तवे पाने मान की रक्षा के लिए परेशकी फलका सिमर मिति परसे। की रेस म हो कि पप शस्तमाति उपना कर पिक के लिए एक महासकट उपस्थित पोएमा देवयुगम्पास्मा का निदर्शन, मा प्रसका अनुसरण कीथिए । समाम् मनु के विमान नाम के पुत्र पर विक्सान - पुत्र, एष १ कम्प। इनमें पेष्ठ पुत्र स्वाकु नाम से, एवं कम्पा इमा नाम से प्रसिद्ध है। यही दोनों का सर्प रा, एष पन्द्ररश के मा पकाए। निरसान् की मिपपात्रामा कम्पा पानिया में मा निष्णाव भी 11 महाविदुषी के द्वारा पारिका को पूर्ण प्रोत्साहन मिछा पा, पतएर पार्म में इस परकरूप शापायन नामक कम कर लिराम किया गया । थपप शिबान ही मा रतन के प्रपम सम्राट् भे तपापि पा की भारत म भार । इस बीक्ति दण में ही, इमोहरा म्पेष्ठपुष इधक को उस पिचर प्राप्त आमा । उस मभिधार को सार भारत में मानेचते सूर्पक राम्पों में यही पदिसे सपाट । बम ही अयोध्या माम की राजधानी स्पापित की नैसा कि मागे ऐतिपपकरण से सट होशयम । माल देवपुगाभास से ना पाठकों को यह विदित रोगपा रोग्य कि मानमुदि बितमा सकास कर सकती है, देवपुग में पर विकास परम सीमा पर पहुच पुका पा । नारा पत्रमा की भवरमयुधि ने मागे जाकर देवयुगकागन म्पस्या का सारमना उदद करते हुए सध के लिए अपने मास पर पाका टीकागा सिपा। माग देवम्पास्पा सुप्तप्रायम मानी मममा से मान सब कुन बैठे है। जिन (भारतीप) मसम्म मनुष्यों के पूर्व में किसी समय समस्त वि को एक बार सभ्पता, पति, मान, सम्प, सामादि का पार पापा पा, माम उही पूपों का स्वामों को उम्प पनामे का वे मददग्पा बारा मभिमान कर दे. जा तो ससा हमारे मुम से निकल पाता-"कामाप ताम ममा" । महाभारत पुर में पहिगाशी माप्पमूमिका गीधाकान सूर्यमशियों की भोर से भयोप्पा नरेश महाराय सुमित्र शामिल हुए थे। मुमित्ररान विबलान की १२- मी पोती में माने गये हैं। भगवान् रामचन्द्र नियमान् से ६३वी पीढ़ी के मारतीप सम्र दये। उत परिस्थिति को सामने रसते मतगीताकार की मीमांसा कीगिर। भावान् ने कहा है कि मैंने सत्र से पहिले मिसान् को मीता का उपदेश विपा है। निसान् ने मनु को, मनु ने इसाक को, इस प्रकार परपरपा या गोग पत्ता मापा पा । पर पुकानदोष से यह सुप्त होगया नाम उसी विलुप्त यो धरहम तुझे बसता रहा हूँ"। पाठकों को यह स्मरख रखना चाहिए कि सम्पर्ण गीता भगवान् का मामा उपदेश नहीं है । मगवान् का भपना मत भमरम्म के ६ सम्यादों में प्रतिपादित केस रामपिरिपा है। सिरिया, रानरिया, भाररिया हम तीनों का संशोषितरूप मनमान् मे मीता में समानित कर लिया है ऐसी रक्षा में हम भगवान् की मत गीता केस रानषिविधा को ही कामे । “पर परम्परामाप्तमिर्म समर्पयो निः" से भी पी पनि निकाती है। मारपदी प्रपने किसी मम्प सरीर से पह महानामा देवपुग के भारम्म में विमान होगा एवं विजन न ने इस का शिपप स्वीकार करते हुए उस अलौकिक गीतायोम का गदरा लिया होमा । हमारी रशि में राबपिपिपारिममा नसमीता का पही समप होना चाहिए। महाभारतकात में तो ममग्रन् उस पूरदिए योग का सलारमान कर रहे हैं । रही मीतारतोकों पात, मे तो समविदित है पीतारसोक म्पास का मुनिमर, इसे कौन मही नाना । "सब से पहिले ममपान ने बिषसान् क कहा" इस उति के सम्बन्ध में कार का विक्सान का पुए थे। स्वारि प्ररनों के समाधान की निमम सामासिक पी। इसी एशि से में युगपम्मों का दिग्दर्शन कतामा पगा। इसी सम्बन्ध में हम अपने कुछ स्वतन्त्र उदार भी प्रकट करना चाहते हैं। उस देवयुग पासीन पवस्था के माधार पर पाठकों को सम्मता पर स्वीकार करने में वो कोई भापति म होगी कि हमारा सोमतिकार देवयुग था, जिसका कि महामारतपुम से कई सरस वर्ष पूर्व होमा नापित है। महामारतकार को तो समविकासन का कर एक प्रकार से हम हमारामा मविपत हरी करेंगे। माई माई में पोर नुवा, परम्प सम्पति-सा, निम्दनीप पूनार्मद्वारा पर- बहिट या मायमूमिमा प्रसयुग सरापररण सम्प कासाने दामों का भनि- पिन कम्मो का सम्पाम, सम्पायी में एक निरपराध मार्यसम्ना के सतीच पर मारमण मादि कर्म इस युग को निहाके सम्त उदाहरण है। जिस प्रकार सम्पयुग पान्तर होने वाले सेपर्ययुग के उपग्रम के लिए दरयुगसंस्थापक सपा प्रदा का पारामा पा, प्रेतायुग में उपम रापसपिप्ता के रमन के लिए मगधम् राम का प्रसार मा पा इसी प्रकार द्वापर के पास में, एक कान के माम्म में दयुगमहप इस मीपणमुग की मपदर माम्ति का दमन करने के चिरतीरामविविधा के पुम स्मारक सघर मगअन्तण का पूर्सतारामा धर्मग्लानि ही मनपर का कारण है। इस पशि से मौहम महामारतयुग को मामति काम कर सके। मधमारत से पहिले हजारों सा देवयुग देवयुग से पासे सरसों दरों तर मंगर्षपुग रहा। इससे पहले सास्रो पातक साम्पयुग, किंवा मथि मायुग का प्रमुख रहा । इस परिले पिरकास तर धादियुग का मासस से पहिले पशुयुग की प्रतिभा रही। मनुपने तगाइए महाभारत से कितने हमार वर्ष पहिसे मनुप्पसम्पता का कास होगा टेग । मा भारत को भाव सगमग र सास पर्व हुए । पूर्व कपनानुसार महामारवकास में तो हमारी सम्पा का एक प्रकार से पस ही होगपापा । पश्चिमी मन गासे (महामात पस से, अपना भक्ति से पविक ममामारत से पुष नामियों परिसे से) हम र इतिहासमा भारग्म मानते हुए हमारी सम्पा-मम पता को कसोटी पर कसने कर भ्यर्थ कर साहस करते हैं, हम कर सकते है हमारे पैछि प्रपों (वेद-पुराणादि) के भाचार से प्रकार तो हमारा मतपत। हम क्या थे और पा होगए, इस परन की मीमांसा के लिए वो ५ सास वर्ष परिस के देवपम, पर सायपुगकापीन इतिहास का ही पोपण करना पोगा । इस शा • अनुग प्यास्प प्रविन स Terg पर समान में विमक्स । प्रारतिक मान नीष मसरामविक पुणे प्रगमनका सपना परवा पिन पुसासन मनन्तरएस में देखा पाए।
पहिप माणभूमिका ta कन्यताप्रपात दियों से सम्माध रसने बाटे शिवासेखों, सिक्कों, टिव माण्डौ, विदेशी यूनसोग मादि या त्रियों के भ्रममवतों, एवं कासनासिक कुछ एक परिश्रमी विद्यानों से (हमारे साहित्लान्वेषण के सम्बन्ध में निस्से पर कल्पित प्रम्पों के पागर पर हमारे मौलिक इतिहास का यपाप पान लेना कठिन ही महीं, अपितु असम्भव है। -वमोपुग ----+++++++++++++++1 २-पाणीपुग •मसभ्ययुग, पशुयुग, परयययुग । -प्रादिपुग →सम्पमरम्मयुग, संपठनयुग । -परिसमापुग- पुग्णसभ्ययुग, पिगुदपिझानयुग । ५-स्पदापुग -सर्पपयुग, साम्प्रदायिकयुग, पिप्तमपुग, झाम्लियुग ६-देवपुग -~ग्रामपुग, मानविज्ञानयुग, (पूर्ण प्रभ्युदय) महामारतयंग (ड्रासयुग) उचित पावि युगचचा को यही समाप्त कर प्रात विषय का अनुसरण किया नावा। परस्त भपने मनस्तापर्म की सामाविक प्रेरणा से, प्रामकर्ण में बने बासी सहर सिर चपखवा की मोदना से, साप ही में मारपीव रास्यनमिड कापानिकों की रूपा से उत्पम पोम की वर्षमा से हम अपनी प्राप्ति का सपम नहीं कर सकते। हमें सम्यता च पाठ पढ़ाने वालों में मनुमा पर में हम्परे पस्तविक इतिहास के शिक्षा की मोमसीम कृपा की, उसका को सपम्पद अपस यते हुए उनके प्रति ता प्रकार करना भी हम अपना मारकम्प समाते है। १ परिणाम माप्यमूमि । पापाययुग मामय सम्यता के इतिहास पर पथिमी विहानों में पास्वप में पूर्ण परिश्रम, एष विपुषश्न म्पपलिया है इस में कोई सन्देह नही। यानी के सम्पर्य प्रम की कमाका फरकबार एक ऐसा राष्ट्र सन का सेवक बन पा है, मित्र ने कि मामी मौशिकता केस पर निसी सम्प सम्पूण विध पर मफ्ना एकमात्र शासन प्रतिष्ठित कर रमसा पा । तो तुसनारमक पशि के विचार सौवर्य के लिए पह जाम सेना माश्यक होगया है कि इन पुरुष में में हमारी, किंम मानवसमाय की मौलिता के सम्बन्ध में अपने क्या महार प्रकट किए हैं। पमान इतिघसामों के भम्वेवस के अनुसार मानपुन को ११ भानों में निमक किया गासकता है, एक उन म्पायों को कम। १-पापाणपुग, २-पानुपुग, ३-द्रविड़पुग, -प्रार्ययुग, ५-सनपुग ६-पुराणयुग, नौययुग, ८-नामपूतयुग, हस्सामग, 1.-पम्मयुग, "-पिटियपुग इन मामे से सम्मेषित किया गासकता है।इम सब पुग्ने का उन्हीं के विम्प एक सपासप प्रमों में विस्तार से निरूपण हो । मता प्रात में पिर वेषय की कोई भाग्यकता मही। प्रकरण सङ्गति के लिए, साप ही में रायमीत विशारद इन बमतिको के पिसी गुप्त रास्प को सर्पसापारस के सामने रखने के लिए संकेर से हम का दिग्दर्शन करा दिप पाता है। १-पापाणयुग मनुष्य को प्रापमिक मबस्पा का इसी पुम से सम्बयस युग के पूर्वपापाचपुग, एप उपरपापासपुग मेव से दो दिमाग किए गए है। बहसी पशुओं का मसमपण, मरमस मय, ममावस्या, पर्वतकदराभों, मूमिगलो, पापा में विमाम, भावि धर्म दोनों पाषाण पुणे में सामान है। दोनों में मार पास भी कि पूर्व रामायण में मनुष्प रिसक परामों के माम्मर मरने के सिर साधारण (मारुतिक) पत्तरों (देशों) का उपयोग करते थे, इस समय नेमक्षिका पता न पा, कायामास ही इस की मषण सामग्री पी, ग्राम पर भाप्पावन का सर्वपा ममाव पा । उत्तरपाषाणयुग में पोका सा अपार मा। उसी पुग में एषोंने पामक पहिरका * मायमूमिका II भाभावियुग पापर से भाग पैदा करमा सीसा । इसी मग्नि की सहायता से कच्चे मांस के साप सार मुमा प्रमा म भी पहर में माने हगा। नग्नता को पर करने के लिए पास-पातुबर्म-गुफपत्र मादिका उपयोग भारम्मामा प्राकृतिक पापायसोप्टों के मन में साधारण परिकार के साथ पापाय के राम पनने बगे । इस समय तक इनों ने यस्कगति से केरल गुप्त माह का ही मेएन किया था, इसलिए एक प्रकार से इस रचर पापाणयुग को मी हम ममयुग ही कोये । २-धातुयुग दुद्धि के सामाविक क्रमिक विकास से मनुष्य ने समप्रपम मोर पिचप, फॉस्प (सोबा-पीतस-सा) इन तीन घातुनों का पता लगाया । इस युग की यही प्रधान विशेषता थी। इसी मापार पर हम इसे पातुयुग कर सकते हैं। इसके अतिरिक्ष का समय में ही इसे साम का भी पता सप गमा । इन घरों पातु मों में कामयाबी विशेषरूप से उपयोग में भयो, मवरम इसे कास्यपुग नाम से मी सम्बोधित किया गया । सौर के सर एक मासूपण बनार गए । बा-पीतम के मेट से करेंसी के नन बनाए पर । मिही की दीगरों के पाधार पर पपर के मकानों का मानिफार गुमा । पशुपालन प्रारम्म मा । साधारण रूप से मेसी मी की गाने लगी | कस एवं गुफपत्रों के स्थान में धर्मबलों का विशेष उपयोग होने लगा। सामान्यरूप से छोटे छोटे गिरोहरों के रूप में संगठन भी भारम्भ [भा। इस प्रकार इस पात युग में मामासान उमति की मोर मप्रेसर होने लग्न । ३-दाविदयुग इस युग में सम्पता विशेषरूप से विकसित हई । पूर्वणपासंयुग को यहाँ हम नितान्त असम्पपुग, समरपापाणपुग को प्रसभ्ययुग, एवं धातुयुगको सम्पवारम्म{ग कर सकते हैं, विग मर्दसम्मवापुग का मासकता है। इसी युग में मामपनापतीम्सक प्रजातन्त्र ३.
पीपी या मायमूमिका मा प्रतिकार एम, प्रम बनाए गए, पपायतियों का सपठन हमा, शासन के लिए पंचा पतियों के लिए एक एक मुसिया बनाया गया, मिजी-टो के सामरस मकान बनने म्मे, सपारी के लिए पोरे, रस मादि म्पबहार में माने खगे। पम्म के सम्बन्ध में नोन परिचास काही अनुगमन किया । सिर सेग पों का मन करते थे, सों को अपना माराम देक्वा मानते थे पितरों के निमित्त प्रदान करते पे, मूत-प्रेतादि पर विश्वास करते थे, साल ही में इनके मप से कम्पित रखते थे। इस प्रकार पारिकरूप से सम्प होसे पर मी नियोग प्रापा मसभ्य, अन्धविश्वासी, एस मूर्स ही थे । ४-प्रार्ययुग पापही काम्पनिक मीण युग है, जिस की पनाने हमारी मौलिकता का सर्म 'नारा किया है। पाषाणयुग की तरह इस युग के मी पूर्वमाययुग, एवं उच्चरमार्ययुग मेद से दो दिमाग माने मए है। भग्वेदनिर्माण पूर्वपापपुग की सबसे बड़ी, एक महत्वपूर्ण विशेषता है। अम्वेद माया का सबसे प्राचीन सभ्यता प्राप। भागे पाकर सी युम में जमा पा- भएर सामवेगम के सम्पत्य प्रमों की रचना हई । अपरिद स पूनमारमुग की मन्तिम रण ।।इन चार वेद प्रमों के कारण ही हम इस पूर्णयुग को पेदयुग मी का सकते हैं । इस युग में माय सोग प्रापि, वायु म्य्प, पानी, नक्षत्र, प्रा पनि प्राविक पदार्थों से प्रभावित होकर इनको रतिया करते थे । इमें प्रसम पाने के लिए पग में पी-तिस-सोमरस मादि विविध दम्प गग करते थे, इसी प्रडिया को पे या करते थे गर या मम्मियु-सूर्यादि पदापों को देवता मानते थे । इन देमामों को प्रसम करने के निए ये फा में समय समय पर पशुपति में पावे पे । इस पग्नि में गबने से बोस बनता पा, उसे प्रणम्त पवित्र मानते हुए रेष्ता का प्रसाद समम कर खाते थे। इस मार्पगतिने समय समय पर कारों को मी तापम निप्प । मोतबात को मापा का पपपि कामपचाऊ शिस रोगय पा, परन्तु समका का इस पुग में सर्वपा ममात्र पा । उस समय को ।
पहिली मा मायभूमिधा- भार्ययुग सिपि म पी। जिम वेदप्रपों पर पूर्व में उल्लेख किया गया है, उनकी रचना केपस माणी से होईपी, परस्पर की थुते श्राप से ही साय काय चसा था, इसी लिए वेद को अति . करा गया। म इन की मुष्टि का योग विकास मोर मा तो इन्होंने एकेबरबाद का परिचय प्राप्त किया । इससे पहिले पूर्ववैदिक्युग में यह भनेक देवताओं पर ही निवास करते थे। "सम्पूर्ण बिस का सम्बाबन कोई एक सफ, एवं पा सासकाईपर' पर विदित न पापस मिस युग में एोंने एकेश्वरवाद का पता लगाय, मी भुप उचरमार्यपुग, किंवा उत्तरपैदिककास नाम से सम्बोषित हुमा । इस सुप में मार्यों में मास्मनिवास के सम्बन्ध में मच्छी उमति की । लिपि का मी इसी मुग में विकास मा । तस्करसीन रहन सहन, रीति रि वान, देक्यस्तुति, शासकों के चरित्र, परस्पर के गाई गो कीरों की गाथाएं पा पारि के प्रतिपादन के लिए ही उक्त पारम्प प्रचलित हए । इस प्रकार दो युगों में विभक्त इस भार्यपुग में मगर पनामा, खेती करना, सुन्दर म फान बनामा, कास-रेशम के म रमाना, सिसना पाना, शासन करमा, मारि बातों में माप सोग नपुस होगए ।मी सत्र विशेषतामों से हम इस युग को सम्पयुग कर सकते है।मायों का मूस निधस (वचा में) पामीर प्रदेश में पा । सम्पमविकास के साप साप जब इन की बन सच्या पने बगी तो इराने के साए भन्य स्पान सोमने की मारपकता प्रतीत हई । फलतः (उचरस्म) माने मानिस पामीर से माय स्रोग पूर्व-पश्चिम-दपिण इन तीन विश्यमों में विमा गए । मो मार्य पूर्व में भाकर, कह के मादि निवासी मसभ्य मनुप्पों को युद्ध में परास्त कर यहां सदा के लिए बस गए, पी भाग पोनी, नागनी भादि नामों से प्रसिर है। पश्चिम प्रान्त को अपने अधिकार में करने वासी भार्पजाति युरोपिपन कासाई । दक्षिण में बो मार्य पाए, उन्होंने यहां के मूल निवासी मनापों पर घोर भस्माचार किए। सम्पता का भणुमात्र मी प्याम न रस्ते ए इन म पोमें पसास्कार से समाति के मानयोचित पपिपर मीदीन लिए । उनका सबवर बहिपार किया गया । उमें मीषण परिणारि +ा माप्पमूमिन IIE साबुन । पत्रमार दी। मार्प का सामना करने पर इन गरीब असमय अनार्य के कानों में मरम सीमा सवाया नया । म.पं का स्पश करने मात्र से मनापों को प्रामदए तक दिया गया। भान माने प्रभाचारों की सीमा पी पर समाप्त म बी, अपितु पाने मन्तिमन्पों में (मनु. स्पति मादि धर्मपत्रों में ) सदा के लिए बसी ही अमानुषिक भावाए विपिनद्ध कर दी। इस प्रकार हम प्रतिपि मार्फमें दक्षिणस्य अनार्य के पातिथ्य के पुरस्कार में सदा के लिए उनके साप दीनकर उमें पशु पना टासा । यी मार्य +मारतीय कासाए । यदावारमक, कपा सरिताकासाला पूममाफ्युन एक उपनिषदकास मक उच्रमाययुग का योसपिम (किन्न कपित) दिन है। ५-सूत्रयुग- पानीर से क्स कर व मार्प सोग मारतवर्ष में पाकर बस नए को क्रमश मोर पवित्रता की रेसिपत से मरना साम्प निस्तार करना प्रारम वित्या ।यों इन साम्राज्य समर बनता गया, स्पो त्यो इन के साहित्य में मी कमिा विकास होने सना । परि माम सहप इसी साम मयुग में मुपसिर कपिक प्रमादि मास्तिक दर्शनों करमा । सम्प-कपिल-पोग-मीमांसा-तम-पासो की रचना कार के सम्पन से ही पा TA SP पटोपो पा रमरण रखना चीर न परिचमा सबभने पार से दलित में मरने पनाह पर एन एस मग प्रस्तावान का परिपत वाता चा, पायाम (में मसाला पा) ने कर विर पने का उपम्प प्रथम दिया तम्पस परिपत तिर मी ममता में राम प्रसार ग्न सारामत बन रहा। नगरेमा में पोपा ममेर । । । 1-10 मि मान र? | तुर शाक (पाच) प्रचानिज (तापमान) रानी (hines) सन माला की WTR ल सारिस र पान मा.सामान र वर्णन करता है। इन मा. समरिन बम मिलन "रामा प्रामपणा' प्रभास कमा । " परिहार्य an माप्पभूमिका - पौराणियुग पुग सूपपुग पासापा । इस प्रकार इस युग में अपने रास्यविस्तार के साप साप मायने पाप्यात्मिक क्षेत्र में पूर्ण उमति करते हुए साहिल का विस्तार किपा । इसी क्रम में सुप्रसिद्ध पाल्मीकिरामायण की रचना हुइ । इसीलिए इस युग को रामायणगात मी का मासकता । दानिक सूत्रों के साप साप पार्मसूत्रों की रचना मी इसी युग में। ६-पौराणिकयुग । इस युग में बनायटी कपाभों के शरा साधारण जनता का अनुरक्षन करते हुए भापो में अपने धर्म का प्रसार करना भारम्म किपा । धर्मप्रसार के लिए राष्ट्रमाताम, क साहित्य पूर्णता निता त मपेक्षित है। सूमयुग में दोनों कमिए पूरी होती थी। फसत इन का धर्मप्रसार की मोर प्पान माना यावश्यक पा । उत्तरमार्ययुग में उपमिपम्ममा पिस मारमविषा का मकास एमा पा, पर इस युग में एक प्रकार से दस गया । इस पा मुस्प कारण पा प्रामण समान । मारतीय फर्मठ ग्रामों के हार में समाम का नेतृत्व मागया। प्रत्येक काम में मामलों का शासन चराने सगा। यहां तक कि एक सम्राट् को भी इन के भनुशासन से मनुणसित होना पहा । दाविधान में मामलों का धामिक निर्मप सा माना गाने उम्प । सार्पणय तत्कालीन निगायक प्रमों ने वियों, एक शों के सम्बन्ध में बड़ी की माहाए निकासी । भो भरमा पार भाषा में पारम्म में ना नानि पर किए थे, उन से मी की अधिक मायाचार शूद्रों पर शेने मगे, वे मन माने जाने सगे मामह के साधारण से भपमान पर ऐसद या नाने नग्य सामान अधिकारों से करें पक्षित किया गश पाकर्म के पहाने मसंध्य पशु यति दान की थे पर पाए गाने सगे । इस प्रकार समाग पर इन पर्मट प्रावणों का निराग मन प्रतिदिन होगया । इम की पद परता ईगतारिन्पोतमामा ताप नाप करती रही। - पहिणार * माप्पमूमि II पत्रणाए दी। भार्य का सामना करने पर इन मरीष मसमप धनार्म के कानों में परम सीमा समाय नम्। भापकर शरमेने मात्र मनापों को प्राखदय तक दिया गया। भापनि पाने पप्पाचारों को सीमा यहीं पर समाप्त न की, भपितु माने नीतिमयों में (मनु सति पदि धम्ममयों में) सदा के निर बेसी ही प्रमानुषिक मात्राए लिपिबद्ध कर दी। इस प्रकार इन पतिमि भापनि दक्षिणस्प ममा के पातिव्य के पुरस्कार में सभा के लिए उनके सस्य धीनकर उ पशु पना गण | यही मार्य +मारतीय करसाए । घरघरमक, किंषा सहितायतात्मा पूर्वमाफ्युन एक उपमिपास स्मक उत्पमाषपुग का कोसकिम (मिन्तु परिपत) दिगई है। ५-सूत्रयुग-- पामीर से पा र सपा होग मारतवर्ष में भाकर बस गए तो प्रमश लान एकजेतानिपत से माना साम्प्रम्प बिस्तार करना प्रारम्भ किया । यो यो इनका सामान्य समर बना नया, स्पो त्यो इन के साहित्य में मी रमिक विकास होने का । परि बाम सरूप इसी सामाग्मयुग में उपसिह कारक कणादादि मास्तिक दर्शनों की रचना । सम्प-कपिल-योग-मीमांसा-तम-पासमूत्रों की रचना कार से सम्पप से ही या इम सम्बन पठ मोगा यरप रखना चाहिए जीविगार पर परिचया पकाने पाए। पविर में ये पनि प्रापबाई विकास पर से ऐसे मरद प्रत्यासित समा चा, पापों ( म मसरामयों) एमे पूर मारने का सबम प्रयन लिया CE गिर पडतस्प नरपत गति पय मी मारमा पारमा उन सालिरामिशनका बार। xसनगासरे महायपो मममेर १५-14 वर्णन मना? । सुम रमाल (प्फा) का सपना देशात (पास) वन का समर एसगार HT सरिक समन मालिक सम है । इस प्रकार नराम Hin राब Aषा मापारा "पाराविमामपाका प्रमपम wti " पहाट । माप्पभूमिका - इस्लामयुग राशि के लोण होमे का एकमात्र कारस पा, सम्प्रदायवाद । शव-शात-कापालिक-बाम मादि विभिन्न मतादों पे राष्ट्रसर दिम मिन होगपा । परिणाम में मणतनामक रामाभों को पूर्ण उग्छ सन धमने का मासर मित्र गपा । हम विभिन्न शासकों की ठगसपता से प्रभा में मरान्ति ग्याप्त होगई। मापसम्पता पुन' एक पर निपत्ति में फस गई। पपनसी पप्पु से ही प्राय इस गणतम्प्रयुग का भारम्भमा । समाज का प्रयवन, गरीरवन, पेपर्यपत, विधानस तपोपस सम कुछ म होगया। प्रयनस्ताम्सक, किंचा बरानकतामूलक जातिदेप ने राष्ट्र में गुरुक्साका योग वपन कर दिया । सब कपनी मरनी महम्मयता के मद से पराक को जग्जरित करने सगे। राजासोग इद्रिय परायण वन पपे । राबरा सी मातों पर मारतो ममेको रामा मापस महीनामाकरमानी शक्ति का नाश करने सगे। इस प्रकार बम एव शासन के नाम पर प्रमा का रसायोपण होने सम्म । -इस्लामयुग "रिस्सियों की मापस की फर पग्दर या हितसाधन फाती" पर कहानी प्रसिद। भारतवर्ष को भागे जाकर इसी कहामीमा शिकार बना पदा । भारतवर्ष की उपक पत्तनावरपा से विधर्मी मुमबमानों में पूरा पूरा नाम उयया । इतिहास प्रसिद्ध मोह-मद की प्रसिमति, सोनुए मुरम्मदगोरी ने सम्य मारत पर माक्रमण कर ही तो टासा । उस समय भारतमा का टिमटिमाता दीपक एकमात्र पीगमनौरान मारतीपों की पायपभूमि बना रमा था। परतु भारत के दुभाग्य से मपोगिता के ममापिर प्रेमपाश में मम पृथिवीपर गौरी द्वारा परास्त गए। इस पड़ी से भारत का सौमारपसूप सदा के लिए मस्त दोगया। भारत की फर ने जपचन्द से पुनों यो मगे पर सतना का उग्म्सन पर डाला। म मत मागोरी न वापस और पर गुलाम कुलपुदीन को मारता सम्राट यता फर मेगा, इलामयुग का यही पक्षिण भारतीपसम्राट था। इस प्रकार पास के पक से कमरा गुमाम सिननी तुगपफ, गग्पा, मापी यह पाप पमनसरा मारताप की गपश्ची का भार करते है। पीस कर मन्तिम सम्राट् इति- पास प्रसिद इमारीपपापी पा । तिहासामिद मुगठसाम्राग्पनरपाम मीर यापर नेइमा - परिक्रष्टि माप्पभूमिका . बीउनुभ ७-बौदयुग पौराणिक्युगकासीन ब्राह्मणों के मिरदुरा भाभिपरप से अब तत्कालीन सम्मान पुश्च होगया, पर पशुपति की पति सीमा का अविश्मय कर गई तो समान में एक ममीन क्रान्ति का बग्म हुआ। इस कान्ति को प्रोत्साहन मिशाग्य की प्रतिमुर्ति गोतमबुद्ध से। हनों ने संसार के सामने अहिंसा का एक ममीन ही भादश उपरिपत किया । गोतममुय के उपदेशों से प्रमाणित होकर समाज ने वैदिकधर्म, किसा पाएसपर्म का तिरस्कार करना भारम्भ किया । परियामसरूप भागषम्म की इतिश्री के साथ साथ पशुपति, एवं मामलों की नियुसत्य का भी भरत होगा, वैदिकधर्म मस्तप्राय होगमा, मामलों का महत्व जाता रहा, एक प्रकार से सम्पूर्ण मित्र इस मीन बौख मत में दषित होगपा । सामान्य जनता की कौन को, काय गमाओं सम्राटों तक ने इदमत का अनुग्म्मम किया । सच पूटा पाप तो करना पड़ा कि मौसमत के इस महानिस्तार का एकमात्र अप राम्पामय को ही पा । भारतवर्ष के मस्विम सम्राट् देशनामियदर्शी प्रशोक ने मी कनिङ्गनिमय में होने वाली माहिंसा से सास्त होकर बुममत का माश्रय सेशिया था। सर्य सम्राट घरमा के मद्यप्रचारक ये जैसा कि उन के पुत्र-कन्या के प्रचार, एवं शिलालेखों से स्पर है। करना मन कि कई शताडि यो तक भारत इस ( महानिक ) मत का भाक्रमण साता सा मागे जाकर भगवान् बाराचाय ने उत्तरमार्ययुगकामीन, मापात्मपदम्बक इसी सत्यस बर मात्रय लेते ए मोहमत को विष मिम किपा । वत्तासीन कुपारिखमा तलिप मगनमिक भावि कार्मठ प्रापों के सयोग से, एक शहर के उपदेशों से पुनः एक बार भारत आपस पर्म का मनुयायी बन गया। हुराजतन्त्रमुग समता मारत में मौवयुग का मामास या तबका साम्राग्पशासनप्रणामी एक प्रकार से सावित रही। पास्तु भागे बाहर पर सामाग्यपद सर्पपा उधिम गया। सामाग्य बरिहरष्टि या माध्यमिक जिटायुग , . ११ वृटिशयुग परमप्रतापी, भतुलसाहसी, पूर्णसम्प, दुर्दप बधानिक निटिश सोगोंने देखा कि मारत पर्प भार महादु सी बन रहा है। स्वदेशोप पपरों का पाक्रमण, विषमी मुसलमानों का मस्या पार, परमार सोर्गों की भर्यसाससा भादि से भारतीय प्रजा भान संत्रस्त है । फलसरूप दया की प्रतिमा उन सम्मों के एय में कलसा का स्रोत उमा पा! पपपि इन की महापहामी मही भी कि हम अपने सपरसाम्राज्यमुम को छोडकर रानी र भाकर म्पर्प का सकर मोस से । परतु उमसे या नरेण गपा कि हमारे ही समावीप मनुष्म इस प्रकार दुस पापा करें, सम तटस्प बने हुए पानन मनाते हैं । बस, मस एकमात्र इसी उपकारमानना से प्रेरित होकर नमोंमें प्रदेश के सम्पूण सुखों को प्रगति समर्पित कर मारतकसम्परा के पदस्पस पर परे ही गुम मुकूल में पादार्पण करने का कर करी तो गता । यहाँ भाकर उम रूपामुमो रित्या स्या! मुनिए । सबसे पहिले उन्होंने मागकता दूर की। सर ससोर करने वाले रामों का दमन किया । मुसलमानों के मीपस भस्माचारों से सप्रस्व प्रना का नाम किया। नित ग्रामों को पात्रप रिया । देश की पार्मिक उचति के लिए अवैधानिक कमा-कौरत कर सम्स बिमारा कर शानिक प्रणालियों का प्रसार किया । बिन मन्दमुदियोंने इस शुम काम में पाया गसी, उनको ऐसा मपर रण दिया गया कि फिर को मविप्प में इस प्रकार उमवि में पापा सपने का साहस मकर सघापासपातियों को फांसी के तम्ले पर सटकाया गया। पाता यत की सुविधा के लिए सा बनवाई, तसाप सुपाए ।पा की समुमति के लिए बोबो फॉोग स्मापित किए । रपा के लिए समावि सेना रस्सी ग्६ । कपएमी धरा शासनप्रणासी में पूण सुधार किया गया । योग्य म्पहियों को विशुद उपाधिशन से सम्मानित किया गया । इस प्रक्चर इम महापुरुषोंने नि साप माष से, निषय ही न म्यापमात्र से म्परतपरकी, एवं मार वीप प्रमाकी उस रिसयुग से रश की । रोर-बारी एक शट पानी पीने सगे । सत्र प्रन्तिका सामाग्य स्थापित होगया । मानो एक बार फिर से समयुग गया । हम भारत ।
परियाची मानमूमिका अन्ययुग हीम को मुख में परास्त कर भारत के पार से अपने मस्तक की शोमा माई, यही परिग मगर बादशाह पा। बारने म्पने मम्पपराम से निस मुगलसाप्रामा का कीमपन किया पा, रागनील निमरद, समपरहस्य पेच प्रकार ने उसे पुष्मित, एवं पनक्ति किया। एक पी- मिमानी पोरकमब ने मानी हुर्मति से मुगासामा पाएको दिम मिम किया । सही से इस्ताम्युम का पतन भारम्म होता है। शाह गरी से भारम्म कर मोरङ्गमेव तक इस्सामयुम का प्रमुत्व रहा । इस युग का सहप क्वमने के लिए परिचमी ऐतिहासिकों में वितमें काम करने किए होंगे, उन सपनों के सामने सम्ममता उनका इतर सारा साहिम भी कुछ न होम्म । सब पूछा बाप तो उन की बिास जिसने की शक्ति का पूर्व भाम्पप इस्थाममुग के विास में बीमामात विचार दानों को पर मदिव होगमा कि इस इनिस का मिलना महल है, इसमें कितनासा भरा सम , एस किानासा महकत्रित है। . १०-अन्धयुग स्थाम, पप डिटिएपुग के मप्प में एक अन्ययुग मौर भाता है। इसे हम विपारयुग भी कर सकते हैं। परिमों की लूटमार, माने की उपासन्ता, भीर, सम्सी, कम, मति पार मुटेरों का दोर दोरा इलादि इस युग की प्रधान विशेषताएं इस युग में रामतन्त्र पा, ममतन्त्र पापा तो एकमात्र सेपाय किंचाम्पनिमात्र । सर्वत्र अति प्राधिमार्गमाद एनाई परता पा, मपातीप प्रग म्हाद सी पी ए पारवी पी इस भीषणयुग में भाक मणकारयों से उसकी पा करे, उसरी मशिया, मसम्यता दूर करे । परम्त उसके देश में पिसी ने उसकी मरण पुम न मनी । सुनी तो किसने ! समुपार सने पसे टिमसिंहने। ४४ परिणी नया माम्पमूमिका बिटियुग ११-वृटिशयुग परमप्रतापी, मतुतसाहसी, पूर्णसम्य, दुईर्ष वैज्ञानिक मिटिश सोगोंने देखा कि भारत वर्ष मात्र मादु सी मन रथ है । सदेशीप कारों का पाक्रमण, विधर्मी मुसतमानों का मस्या 'चार, पुर्वम्पस सोगों की भर्पाससा भादि से मारतीप प्रमा माग सत्रस्त है | फवसरूप दया फी प्रतिमूर्ति उन सम्यों के रस में परसा कासोत उमा पदा। पथपि इन की पहरका कमी नीबी कि हम अपने इसपरसाम्राग्यमुस को पोसकर इतनी दूर जाकर म्पर्य का सकर मोस से । परन्तु उमसे यह न देण गया फि हमारे ही समातीप मनुष्य इस प्रकार दुस पाया करें, एक हम तटस्प बने हुए पामन्द मनाते हैं। बस, ह बस एकमात्र इसी उपकारमानना से प्रेरित होकर ठमोनें सदेश के सम्पूर्ण मुसों को भगवति समर्पित कर मारतबसम्परा के पपस्पर पर पो ही शुभ मुश्त में पादार्पण करने का कर कर ही तो गसा । यहाँ भाकर उन पामुमो ने किया क्या। मुनिए । सबसे परिछे ठम्होंने परामकता दूर की। लूट एसोट करने पाले टाकुनों का दमन किया । मुसलमानों के मीषण भस्माचारों से संत्रस्त प्रजा का त्राण किया। निर्मत रायगमों को पापप दिया । देश की पार्पिक उमति के लिए पौधानिक कसा-कौशस का समूल निमारा पर पामिक प्रहाशियों का प्रसार किपा । बिन मन्दादियोंने इस शुम काम में बाधा गयी, उनको ऐसा मपहर दण दिया गया कि फिर कोई भविष्य में इस प्रकार उमति में मापा गरने का साहस मकर सघ । विवासरातियों को फांसी के बस्ते पर पटकाया गया। पाता पात की मुविधा के लिए सारें बनवाइ, जवाब सुभए । शिक्षा की समुमति के लिए बोयो कोदेग स्थापित दिए । रषा के लिए समाति सेवा रस्सी ग्द। कम्पनी 3 शासनप्रणामी में पूर्ण पुपार किया गया । योग्प पक्षियों को विशुद्ध उपापियान से सम्मानित किया गय । इस प्रकार इस महापुरुषोंने निःसार्थ भाव से, नियम ही मि सापमान से म्परताप की, एवं मार वीय प्रमा की उस विसरमुग से रक्षा की । शेर-बकरी एक पाट पानी पीने हगे । सर्वत्र शान्ति का सामाग्य स्पापित होगा। मानो एक बार फिर से सम्मयुग पगए । हस म्परनच , ।
परिवटि या मायभूमिम प्रामा सियों के सौमाम्प से सन् १८८१ तक प्रिनिश साम्रय अतुम्णरूप से शान्ति का मोत दावा हा। परम्त न मासुम इन मारतीयों को प्रसे बैठे स्पा सनक सबार होगई कि एकाएक सन् १८८४ में कांग्रम माम की एक सपा को नम्म देही तो रासा । सोग करते हैं पी से प्रिटिश म पवनपुग का मारग्म होगापा कहते होंगे, एवं करते हैं। हम तो इस कपन मेको विशस नहीं रहते। हमें दो त्रिटिश साम्राज्य के पशुबस पर भान भी + + म + + रो++ सा + + ...+++8...+1हम या माश्य ही नहीं जानते कि पशुबस पर चारमपस की प्रतिस्पना में कौन कि: विज्ञान के परिव ही देसकते है। हमारी शि में प्रिटिशपुग का मही संक्षिप्त इतिहास है। माये क्या होगा * उत्तर कामपुरुप से पूर्षिए, भपा माने ग्मों से पूछिर-"तस्मै मप कर्मो ।धिक विज्ञासा होतो कमयस्म प्रतिपादित गीवाशास को अपमा गुरु बनाइए । प्राप्त कर सत्ता सका चर तोक्नो गयमा प्रसङ्गोपात या मी विचार कर सीनिए कि उक्त युगों की गणना के सम्मान में उन ऐतिहासिकों का क्या विषार । । सन् १८१७ से परमशान्तिसंगक निरिगपुग का भारम्भ होता है। इसरि से निरिणयुग का प्रसार हुए ममता मगमग १ वर्ष होवे है। सन् १७ ७ में मोरङ्गामेन की मृत्यु रोती है। जी से प्रमुग भारम्म होता है। इस के भनुसार जगमग १५ वर्ष तक मवयुग की सत्ता सिद्ध होती है । सन् १२०६ के बगभग मारामतत्रयुग किंध रामप्तयुग का भारम्भ होता है ।पही से मुहम्मदगौरी की कपा से इस्मामपुर का भारम्म होता है। पचत इस्थामयुग . . वर्ष तक मारतवर्ष में प्रति प्टित माना जासकता है। सन् ५४२ मगमग हर्षवर्धन की मृत्यु होती है। यही से पाराम वरपुग का माम्म होता है। मुग तगमग ५५० र्पतर मनी म्माधि रखता है। ई सम् से पूर्व ५५७ (टी० सी ) में गौतम बुद्ध ने जन्म लिया । यहीं से पौदपुग का पहिरष्टि । मामभूमिका । प्रासङ्गि भारम्म माना जाता है। इस प्रकार गमग ११०० वर्ष पक्त इस गन्तयुग का प्रमुल प्य। ईसमी सन् से ५... वर्ष पूर्व क्रमश भार्ययुग, मुमयुग, पुराणयुग का प्रमुख रहा । पात् भाप से मगमग हमारवप परिसे से प्रार्ययुग का माराम हुमा । एवं सगमग ॥ हमार तक सक्त तीनों युगों का क्रमिक मोग सिमामा । ईसा से गारवर्ष पूर्व इमि युग की सच मानी गइ । मर्यात् भाम से १० हमारप पहिले विसपुग का प्रारम्म एमा, एक गमग गार वर्ष पर्यन्त प्रतियों का प्रमुख मा । मब पाहपुग, एन पापाणपुग पर दो युग बन जाते है। इन दोनों का काम अभी तक मनिषित सा। इस प्रकार उनके मनुमान मानवसम्मता के क्रमिककास का सक इतिहास १०-१५ मारपयों के भीतर मीतर समाप्त होनाता है। म व्यत्पम्प इस का यदामा कि मारतर्स की, भारतवर्ष की ही नहीं अपितु संसार की सम्पता के विकास का इतिहास १०-नार वर्ष में समाप्त है। पर मारत में मार नियस करने वाले मार्यों का सम्पुश्यकास केरस - सहस वर्ष पहिले से सम्मान रखता है। साप ही इम का पह भम्युश्य केस मरमा से ही सम्बन्ध रसता है । सौकिक विषयों के सम्पुदय में, गहोमति के समय में मारतीप मार्य प्राय मसमर्प ही रहे हैं । म उम में प्रयों में उन का कोई कमबन इतिहास , म इस समय में पुगतन निभागकी मोर से ही कोई प्रमाण ही मिसा है। इन सा परिस्थितियों के भाषार पर हम सस्ते है कि मिठे उमति, किंवा मास कहना चाहि ए, सस का भार्य माति में, दूसरे गाने में मारसपासियों में प्राय प्रभाष ही या है । इमी प्रभाव से पहभपने सामाग्प समातम में असमर्थ बनते हुए मरों का मामय सेना पापरयक सममले परियार ril माणभूमि ta प्रास युगतालिका 1-पृषपापासपुग--नितान्तमसभ्यपुग -पापाणपुग २-उधरपापासपुग-प्रसभ्ययुग --.प्रनिमित २-मानुपुग---कास्यपुग, सम्पतारम्भपुग } ३-विरयुग--- *प्रर्दसभ्पतापुग सेप्सा सा०पू० भारम्म (२०००) -- ६-पुराणयुग -- 1-पूर्वमायपुग--ऋग्वेदकाम-बहुदेवतायुग -आर्यपुग-~< २-उत्तरपार्यपुग-उपनिषदकास एके परपुग | F०पू०५स. ५-मूत्रपुग "दर्शनकास, रामापणकास से प् मा पगुगमियुग, प्रामणकाम- (४५०) ७-नौदपुग-मसिापुग, पैदिकधर्महासपुग } --१.०५५० स (११०) ८-रामतनपुग रामपतपुग, सभ्यताहासपुग } ----६१२स (५५) -'मामपुग-प्रत्यापारपुग --१२ ६ (५०) •विष्मयपुग, कान्तिपुग -.१२.७० (५) "-मिटिगपुग---गान्तिपुग, तमसपर-सम्पयुग १८५७ (१०) १०-भरपुग परिणाष्टि माप्यमामका 8. सिक उक्त युगों में कितमा तथ्यांग है एष कितना मश कानिक है, इसकी मीमांसा करने का न हो प्रकृत में मासर , एवं न इस विषय के रीकरण की हम योग्यसा ही रसते । इस समय में यह स्वीकार कर लेने में किसी मातीय का कोई प्रापति मही करनी चाहिए कि मिटिश बातिने मामयसम्पता के सम्बन्ध में युगधों का मोन्यरुप हमारे सामने रक्सा है तबतक हमें ससके सम्बन्ध में किसी तरह कीटका टिपणी काने अधिकार नहीं है, जबतक कि हम भएमा मोर से इस सम्बध में प्रमाणों के माधार पर अपने युगधों का सारीक ण न करदें। मान लीविर, उनोन मो पुष लिसा गमत लिखा । परन्तु मापने क्या किया, न तिसा, न पा, सपा वमर्मस्प बने रहे वृटिशनाति एक कर्मठ जाति है, उसमें सदेश प्रेम र र र भरा है और या प्रेम वहां केवल मादर्श को ही पल मही है। गा पीरनानि अपने कर्सयों से अपना प्रदेश प्रेम प्रक्ट कर रही है। किसी भी जाति दोरों की मीमांसा करते हुए उसके गुणों की उपेक्षा कर देना तानता है, पाप है । और फिर गुणत्रपमुठा प्रकृति के सामाग्य में विचरण करने बामा कीन । मनुष्प दोषों से बचा है- ' सौरम्मा ति दोपेण धूमेना परिपाहता"। परि समासोबनामक दर से हम विचार करते है वो हमें निपपात को कर करमा पगानि गुण-गेप की तुनमा में उगीका पासम सर्वोग्य है । उनका शर्मम उनका देश प्रेय उनका कम्पपासन उनकी उदात मावनाएं, हम मतपसि के लिए शिक्षासूममी कई रातादियों तक उमसे हमें सीखना हे । उनका मादरीगद पर्म को अपने गम में गता , और हम निगुर पारीपदी है। योभा शगर पधार की वस्तु म बने उस मा. दरा का क्या महापा हमारे पितामह ऐसे थे,बमे पै" इस निरपकमागरम्पर से मारा कोई कल्याण नही होसकता । मभी हम मे है, किधर गारेसतमान स्पिनि मापन पानी में समान सा के साप तुलना करमी होग मौर विभप रूप से इस तुमना में माग भासन उनकी अपेक्षा नीचा ही देगा। . ४॥
परिणाम माप्पभूमिना ! प्रासी -- -- युगतालिका १-पूर्वपाषाणयुग--निवान्नमसभ्यपुग -पापापपुग- २-उत्तरपापाणपुग-पसम्पपुग २-पातुपुग- फास्पपुग, सम्पतारम्मयुग } ३--विपुग मर्दसम्पनापुग पाव प्रनिधित -सेप्सा सर०पू० प्रारम्म(२०००) '-परप्रायपुग--भेदमान-पादेववायुग) '-मार्पपुग--- २-उत्तरमार्ययुग-उपनिपतकात एके परपुग ई०पू०५सं. ५-सूत्रयुग--"दर्शनकास, रामायणकाम- से पू पा ६-पुराणपुग- पशुपसियुग, मामणकाम ७-नोदयुग--मसापुग, पदिफसम्माासयुग मे (११..) ८-रामतम्भयुग-राम पुतयुग, सम्पताहासपुग } ----६१२स (१५०) -स्मामपुग-परपाषारयुग -~१२ से (५०) १०-युग-विष्णमयुग, क्रान्तियुग, -.१७ (१५) -प्रिटिगपुग--गान्तियुग, पुग्णसपद-सम्पपुग} १८५७ (१००) --६०.५५० परिपरहि १ माघभूमिका ne- प्रासनिक कि महोंने केवल एक से मन्त्र में राष्ट्र के सम्पूर्ण प्रम र कर गये हैं। मन्त्र का सप निम्न लिखित है- - मा ममन् ! प्रामणो प्रवक्सी नायताम् मा राष्ट्र रामम्पाशुर इपम्पोऽतिम्पापी मारयो मापनाम् ! दोग्धी पेनु, बोगनमान, प्राशुः सप्ति, पुरभिर्योपा, मिप्य रयेष्ठाः ! समयो युपास्य पममानस्य पीरो मायभम् । निकामे निकामे नः पर्जन्पो पर्पत ! परयो न न पोपपया परपन्ताए । योगक्षमो नाकल्पवाम् ! (यपुर्वेदसंहिता २५८०२२म०1 मन्त्र का भवराप पही कि-"हेमन् ! ब्राह्मण प्रसववस्ती उत्पम हो । राष्ट्र में पत्रिपर्ण बम, धनुरी, नीरोग एवं महारपो सत्यम हो। गाय दूध देनेमासी, बस बोम ठोहने माग पोका तेज परने बाबा की रूपगुणक्सी, रवी अशीस सत्यम हो । परमान का पुरा पुत्र समाप्रिय, एव पीर सरनो। समय समय पर पनन्य भी करता । हमारे लिए भोपपिए फसमती मम कर सकती हैं। (इस प्रकार हेमान् ! आप हमारे लिए) योग-तेम का निकाह करते हैं"। मर इस सास्तिक अर्पका विचार कोमिए । राष्ट्र की सबसे पहिली माग बमवर्चस्वी प्रामण । पान का वषिष्टावा वर्ग हो सासण! ! वि.सी मी गट के सम्पबस्थित रसने के लिए यह वारपक है कि उसकी बानराति कोसामना सुरक्षित रस्सा नाय । पाणिचित राष्ट्र न बीर बन सकता, न सम्पतिशासी बन सकता । शान को मूड में रखकर ही राष्ट्र अपना वम्युल्य कर सकता है । मयबस (धनबस) ही पत्रास (क्रियारासि), एवं विद्वस (भर्पराति) की uta या मायभूमिगत पाकि इम मारतीय गो प्रमिमम के साप पहारो किामारारिक साहिल ससारका सर्वश्रेष्ठ सारिम। हमारी फिसफो (दर्शन' सर्वोत्कृय है । पररात हिन्द मादय का मयोगान करने बारे सम्पतामिमानी उन भारतीय विद्वाना, एक राष्ट्रीय नेतामों से हम पूसते हैं कि रनोने अपने साहिम की रक्षा के लिए क्या प्रयम मिण भौर क्या कर रहै हम तोरेको है कि हिन्दुत्व का अभिमान करने वाले पे नेता का प्रयान के स्पान में वैदिक साहिम को निमम बनाने काहीचय प्रम करो। उमकी शि में गनिम्मान में मारतीय म्या प्रतिस्परु बन रहे हैं। सपने मौलिक सादिस्य की उपेक्षा करने बासा राष्ट्र क्या अपना भादरा कमी मरपित सकता। सम्मक । र ए का क्या सरप ! राए करे किन किन राशियों की पर श्पकता है कोन सा पर सपर राए काम को उम्त बनाने के लिए किन किन उपार्यों का प्रयासमा अपेचितमपरनों का करपत सम्मान करने से ये गीय मेठा गएका कोम सा सपकार !मारी समझ में म मापा और मम की भारपकता । जब किम का रानिमाण हमारी *दिक राष्ट्रनिर्माण सति से ठीक उसय है। वैदिकसाहिम को, किंच भारतीय शाल को गोमति में बाधक समझने माझे "अम्पेना भीयमाना पपान्या" नीति का अनुसरण करने पसे उन राष्ट्रीय नेतामों को या सण रखना चाहिए कि वैदिकसादिम सेक्स परसोक सम्बन्धी अप्पारमा प्रतिपादन मही ६ मपितु पाहमारी ऐसौनिक मारपकताभों का मी मेप पदको । उदाहरस के हिर एक मात्र उमके सामने उपरिपन रिया गाता। उसी के माधR पर वो माम देना पाप कि दिवसाहिम का मिजा वैरिक मानुग्मी गीताशा का रानिमीण में कितना उपयोग है। एकमा ! सम्मनः इस प्रश्न ये समाधान के निर भाग के राम पगियों को एक महायोग मिलना पड़ेगा, भौर सम्भवत पा मी पर निर्म ए की पूरी पूरी प्याम्ण पाने में समर्प ही रहेन । उपर मारियों की प्रमौपिक पाणी का पद बमकर ४ बहिरमरष्टि • भाप्यममिका . मासङ्गिक पत्रिबग ब्रह्मवर्चस्वी प्रामण के पादेश पर चतता पा राष्ट्रपा में पूर्ण समर्प गम जाता है 'गुर पम्पोऽतिम्याधी महारयो मायताम्"। राष्ट्र को प्राभण के हार। बानशक्ति मिली पश्केि द्वारा क्रियाशक्ति मिली, मम सर्व प्रघाम धर्षल की समस्या राष्ट्र के सम्मुख उपस्थित ई। प्रम-पत्र गोता है, मर्प गुप्त है । इम दोनों रचकों से अपवस मुक्षित रक्षा मा उत्तरोतर समय मनताराता है। यही मर्म मब राष्ट्र की तीसरी मांग है, बिस की कि रक्षा करता मा प्रासण-पप्रियपर्ग सय मी वपने सरूप का रक्षा करने में समर्थ होता है । जिस राष्ट्र का मर्प सपर एव सतन होगा उसी गर में शाम का विकास होगा, एक बही राष्ट्र शासमदम का समापन करने में समर्ष होसझेगा । अपपरतन्त्रता ही राष्ट्रपरतम्यता का मस कारण है गष्ट की अर्पक कपि, गोपण, म गिज्य इम सीन म ग में विमत है। इन तीनों कर्मों का संचालन करने बाग मी एक स्वतन्त्र वर्ग अपेक्षित है। भाम्यात्मिक, अविदानिक भाक्रमको से राष्ट्र की रक्षा करने वाला मामरावर्ग माधिमौतिक (ग्नु ) माकमों से गए की रक्षा करने में गस्त पत्रिपर्व दोनों पक्षसापक रुपि गरेपा-वाणिज्य मार सकते, मोर नहीं करना चाहिए । परपी इस त्रिविध मर्म-कर्म के लिए राष्ट्र का एक स्तन्त्र समुदाय निपत करना पड़ेगा, एव ही वर्ग 'रय कराएगा "कपि-गोरख-याशिम्प बायकम्म समापमम्' । धर्मस्पानीप भतएव शर्मस्पानीप भतरह भाक्रमस एपक प्रामण वर्मपानीय बारित माक्रमण रषक पत्रिए, इन दो रपकों से रहित मेश्य गुप्त रोगा, सुरक्षित रोग्य । परिपम्पापमानम्मी एक पोपण दस और निफ्त करना पडेग्म ही राष्ट्र का सेवाबब होगा, एव पही"प्राशुद्रनि' (संघमाव के लिए मन्दी से बन्दी दौर पड़ने वाला) इस निगमन अनुसार यह कावारण ! बराक से ही समन्ध रखने वाला राष्ट्र का कमा-कौशम इस चौथे वा के लिए नियत करमा परेग्म “परिपस्यात्मक कम्प शास्पाप समावमम् ।
बपि - माम्पमूमिका मासी में मस प्रतिष्ठानो पस की तक्षा करता है वह अपने साफ साप म्हरेस नारा का मी निमिरा कमाता ' पाप बामणो प्रपरसी मारनाम"। देवानल से ही समझ नहीं सकता या भी निमित है क्योकि समृद्धिसम्ममा फेस कर्म किया गापगा, तब समन्दिोमोनर्मशाम पता निमोदीकर्म मी करने मे, यह समझ नही। का मन्वेषण शाहकीमेन रस्ता । ससा- रिफ कम्मो में म्पस्त ने बाबा कर्मठ पति कभी राष्ट्र को बानपान नही कर सकता । ससका को एकमात्र काम होगा, उदकिता से मुल होकर मनम्पमा से बात कर अनुवन का एकादरा देना, मर्म ससाना । ऐसी दण सानोगसक प्रगती यमपर्म के अतिरिक्ष मह को एक ऐसा है और चाहिये, यो समस' भादेखनुमर राजद प्राय गह का सबबन करता है पीपिकाम्मरम्म । यी सम्परे राष्ट्र की सरी मांग होम-"मा राप रामप" । जिस प्रकार राष्ट्र के मापसर्ग को प्रसन्नी दोन मारकी, एकमेष वर्ग पत्रित भी में मी बनिरोश पोपतामों का रामापावरपकासबसे पहिली मोम्यता है "या" । पत्रिप गरेर से बसान होना चाहिए । निवड एप्रिय कभी राष्ट्रगृष्ठि ममी कर सकता । दूसरी योग्यता सम्पा' का सीरवा रामबा में तबकमसमर्प। जबतक मा पास में महो। शासही मरता प्रसR का कारसपतीसरी योग्यता है-"प्रतिम्पापी"। उरीर मी बस बरस मी पम्फेस । परन्तु सम्प प्रसमप ३ पनि रोगों का मामला होता रहेग्यो एक बापान पत्रिप मी बस में काम न सकेन । इसलिए सम्परे साप साम इसे पावि ( रोग से मै रहित गहरा बदिए । चौपी योग्यता 1- महारब"। पापन, मयुक्त, मान पश्यि को गरका सिर र दूर तक अनुपालन करना परता बिना काम (रप नौका मोत-ना-तुरग मादि) के इसका यह मनुपान कर्म सम्पच ही हो सकता । एमपुर के लिए पापन सम्पत्ति का होगामी प्रतिमापोइन पार मायों से मुक्त । ११ बहिणाराष्टि - भाप्पभूमिका छ. प्रासङ्गिक पत्रिपर्ण प्रसस्वी बामण के पादेश पर पसता मा राष्ट्रका में पूर्ण समप मम आता है 'शर पम्योऽतिघ्यापी महारयो जापताम्"। राष्ट्र को प्रामण के द्वारा जनसक्ति मिली पत्रिके द्वारा क्रियाशक्ति मिली, भव सर्व प्रधान वर्पस की समस्या राष्ट्र के सम्मुख उपस्थित हुई। प्रम-पत्र गोप्ता , मर्प गुप्त है । इन दोनों रथकों से भर्यक्स मुचित रता हुमा उत्तरोत्तर समर ममता राता है। यही मर्य बम राष्ट्र की तीसरी मांग है, जिस की कि रक्षा करना पुमा ब्रामण-क्षत्रिपर्ण मय भी अपने सरूप की रक्षा करने में समर्थ होता । मिस राष्ट्र का पर्वया समृद् एव स्वतन्त्र होगा उसी राष्ट्र में शाम का विकास होग, एव पही राष्ट्र शासनदर का समापन करने में समर्थ होसकेगा । मथपरतन्त्रता ही राष्ट्रपरतन्त्रता का मा कारण है गर की वर्षशक्ति कपि, गोपश, पणिज्य इन तीन म में में विमत ।। इन सीनों कामों मा संचालन करने वाण मी एक स्वतन्त्र वर्ग अपेक्षित है। पाप्यात्मिक, भाषिविक माकमणों से राष्ट्र की रक्षा करने वाला मासमर्थ माधिमौतिक (शत्रु ३) माक्रमों से राम् की रक्षा करने में गस्त पत्रिकर्म दोनों अपरालिसापक कृषि गरचा-याविम्य माी कर सकते, मोर नहीं करना चाहिए । पश्य ही इस त्रिविष भर्म-कर्म के लिए राह का एक सप्तन्त्र समुदाय निपत करना पड़ेगा, एव यही वर्ग "श्य' कराएगा "रुपि-गोरक्ष पाशिम्प वैग्याम्म स्वमापनम् । पर्मस्पामीप एव शर्मस्पानी मन्तब माक्रमण एषक प्रापण, वर्मस्वामीय बहिण माक्रमह रक्षक पत्रिए, इन दो रक्षकों से पितरप गुप्त रोगा, सुरक्षित रहेगा । परिवपापम्मानुगामी एक चौपा दस और निफ्त करना परेग दी पट का सेवापर होगा, एक कही भी मारा बनि' (सेवामान के लिए सम्दी से जल्दी दौर परने वाग) इस नियम के अनुसार या कामाए । बराल से ही सम्बन्ध रसने वाण रा का कमा-कोश इस बोये का के लिए ही मिफ्त करना पड़ेग्ण "परिपस्यात्म सम्म शहस्पाप समावमम्"।
बहिराष्टि -21 माष्यभूमिका ।। बासहित (पासिस) भारि साकामिक रोग तो प्रमय ही प्रकृति को दूपित करते देखे गए हैं। पदी का पक सदाहरण यह सिर करने के लिए पर्या प्रमाण है कि हमारा दोप संक्रमणभाव के कारण मागे गाकर प्राति भएस को दूषित करने का कारण बन पाता है। यदि किसी राह में सम्प पर बार नहीं होती, गोपविए फरफ्ती नहीं बनती रोग से मानव समाम संवन्त राना शिश कि प्रकार मृत्यु गे जाती है तो हमें कपास करना चाहिए कि माश्य ही हमर्ने, हमारे राष्ट्र ने भए संचासक रामा ने, राष्ट्र के माननीय व्यक्तियों में प्राप्त विम्स कम्म किया है। कार प्रकृमिहस्यनेचा प्रामण से निदान कामा चाहिए, एक प्रहतियोमणन्ति के लिए शान्ति, तुष्टि, पुष्टि भारि विकिरसा करानी चाहए। फ्रारी का बसा सरूप है प्रकृति का पैसा नियम है उन नियों का सही दय, एवं उस समातनाव के वे सनातन प्राविकपम पम्म' किंवा 'सनावन- पर्म है। साममधम्म ही इस धर्म की मोनिक प्यास्या है। पही गीतायात का (यमे दामुसार मषिवरी मेद से निपत भषम्म । सम्मानुशम्य कर्म में लिप्त रहना ही प्राममु चवना है। जो राप इस अनुझसमाव का वमुग्यमी 'श्री प्राविसंयुक्त ब्रह्म से "निकामे मित्रमे ना पमन्यो अर्पत फमपसो न प्रोपपय पश्यन्ताम्" र करने का अधिकार रह सकता । यह इन सब बारम्बरों से चाहता पा!' इस प्रश्न प एक मात्र उत्तर । 'योग' घमो ना करपनाम" । गर भपनी सरूपरण करता या मोम चाहता है, और बम बाइल मिर प्राप्ति योग । प्राप्तीमय का स्थिर रहना म है। इसके अतिरित गर की मांग मोर हो भी क्या सकती । एवं नैदिक साहिम के अतिरिक्ष यर को इस पोग-बम सोच पति बताने पछा सा भी इसा कौन। वाम हमारा राए क्या कर रहा है। यह मी देम बीथिए । बामप्रधान प्रमाण विपाप्रधान पाठ दोनों माय मुप्त ! बात है-अर्पवान हिया और सेगप्रमान शूद्रबळ ।
पहिरवष्टि • भामभूमिका - प्रासादिक बामसापक वैदिकसाहिम मी मग्धकार से भारत हो रहा , परिणामतः तदमुयायी बामणवर्ग भो वेदगुप्ति का परिस्पाग करता हुमा सो रहा है । शस्त्रानुगामी प्रियमग मी पौरुप हीन मन रहा है, और दोनों का मासन प्रहण कर रहा है रपवर्ग, एवं प्रवर्ग में 1 बाम वैश्य हमारे भमिगन्ता (पथप्रदर्शक) बन रहे है शह हमें सम्मार्ग वारो है रक्षितवर्ग रक्षक बन रहा है । प्रातिनिरूर मार्यों से युक्त स मराठ, किंवा कुश्मित गत बन रहा है । भाग हममें- 'य यषा मा प्रपचन्वे वास्तपम ममाम्पार" ( जैसे के साथ तैसा ) इस भादेश के पालन करने की शक्ति नहीं है। हो मी से सक्सी है, मव की ममस्थानीय रय हमारे अमिगता बन रहे हैं। भान हमारे एक गास पर को तमाषा बगाता है तो हमारे ममिमावफ हमें या शिक्षा देते हैं कि तुम फोरन दूसरा गछ मी उन मातायियों के समने कर दो इसके पति शित मेनिस को भी तो क्या करें, जब कि इनोंने प्रज्ञापराप से तमाथे का प्रत्युत्तर देने माले प्रम-मात्र बस का तिरस्कार कर रहा है। पर हमारे राष्ट्र का बारित तप । मोर ऐसे जर्जरित गष्ट्र का भमिमान करते हुए ही हम उनकी समालोपना करने के लिए भागेर माते है । रायमीति की बातें तो पत्र नैतिक विद्वान् ही जाने । समके सम्बन्ध में हमें या भय ही बाला एव मानना पड़गा कि, निस मारतीप साहिस्म के आदर्शवाद की प्रपा में हम सामा पसीना बहाते रहते हैं, उस सा दिस्त की रक्षा का मोस्तुस्म प्रयास पश्चिमी विदामों की मोर सेलमा १ रहा है, उसे देख कर कहना परता है किपास्तव में ही वर्तमान युग के भाष है। मनको कामे जिन अछम्प मापों का हमें दरान करने पर सौमाग्य प्राप्त दमा है, प्रत्पुपकार में हमारे पास कोई ऐसी वस्तु नही मिसे हम उनके मेट गरम फिर भी समारतवर्ष उनकी इस उपकाराति को कमी मुसा नही सकता । भौर पर होरात्र 'धर्म-धम्म आगरा-मादरा वेद वेद, वित्त हिस्सा' का पीत्कार करने पाले हमन क्या किया, या स्पर है। इसलिए हमने कि हमें उमकी सोग की समालोचना करने का तब तक कोई परिकार नही १ स तक पहिले हम म म बन चाँप । युगतर्मसभापी प्रासहित पम्प समाप्त करते हुए अन्त में हमें इस युगधर्ममीमांसा से पही बतमाना है कि सापयुग के प्रमतर सपम्म्ममा के द्वारा भामि पर देवपुग का मारामकास ही गीतोपदेश म प्रापमिक पास, मोर पही गातासमीमांसाका सक्षिप्त निदान है। .
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७-गीतानामीमासा
१- भगवच्छब्दरहस्य
२- गीताशब्दरहस्य
३- उपनिपटरहस्य
४- भगवदीतोपनिपत्-नामरहस्य
५- गीतानामनिरुक्ति
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७-गीतानाममीमासा म विवाम का प्रम कोरा हमारा गीताणाम भार विस में "गीता" नाम से मसिद है। पति गीता निझामशास है, एवं विधानधाय कारणमाद को लेकर ही प्रवाहित होती है, इसलिए गीताराम के नाम के सम्बन्ध में भी में वि ज्ञानदृष्टि से ही कारणबाद ही मीमांसा करमी परेसी । परमेष्ठीरुपम के पूर्ण पार महापुरुप भगवान् पाटेराप्ण के मुखपत्र से मस्मिक रूप से विनि घन, एक रुपण पापन महामुनि प्यासदेप की स्लैसिनी से पन्दोवर यने हुए इस गीतागस का 'मगीतोपनिपत" यह पूरा माम है। यही माम संकोषमार के कारण भागे जाकर "गीता" इम दो भदरों में परिसत होगया है। उक्त नाम में मगरव-गीना-उपनिप यह सीन बिमाग है। इन तीनों ही निमायों के समय में तबादी प्रश्न उठा सकता है। पासुदेव पण ही मगगन् हो प बात नहीं हैं। रुपानी पाम-कपिप्स फणाद-पतमस्ति मादि मनेक महापुरुषों को सुनातनभर्पोिने ममात् शद से सम्मानित दिया है। पातु हम रेसते हैं कि भार कम के गीताशा को कोषकर भगान् पास, भगवान् कपिटादि इतर महापुरुषों के मितने प्रस्प है, उनमें से विमी के भी भारि में मगाद राष्ट्र का समय नहीं देखा गाता । म्यास विरचित परामारत पुराणादि को कोई भी मम पदमहाभारत भगवतपुराग्य नहीं करता । मीकिपिरित एमापण का पारतकमा पनगमायण या नाम न सुना गया। फिर क्या कारण है कि भार्प साहिल में एकमात्र गीता नाम ही 'माता' एवारि कर से भारत् नाम कि प्रमिद हुया । भारपा समाधी इस मपावाप्दम्पबहार का कोई मौलिक रहस्प रोना साहिए। पही माणा गीवा राप्त की है। परि गीता गन् का भप गन (गायन), तब तो इस गम का गीता माम सवमा मनामगिक है । पपी यह टीम किसी गुम कारस के पहिरङ्गराए माप्वभूमिका - मामास अनुसार उप सभी का महाप्रेमी थे । म्थप गम्तिारणाम में भी विदाना सामपटोरिम" पर करते ए भगवान् ने अपना समीतप्रेम प्रकट किया है। यही नहीं, पीमसगिनी बसी र प्रेम भी इस विषय का पोषक है। परन्तु युद्धकाल में समुपस्थित रमेश अर्षन को ममान् ने बाबरिगेपों के भाषार पर ग्म माकर भम्पास्मरिमका उपदेश रिया होम, या एक मासास्पद कम्पना है। यदि गापनपक म मान कर गीता शन्य को 'कथिवा"-"वका” इस प्रकार उति परक माना जाता है तो फिर इस लिक प्रासापाम की कोई पापकता मही रामाती। फिर तो सीधे से गम्दों में "मगमत्फपिया"- 'मगगदुत्ता"-"भगपद्विरपिता" इनमें से किसी एफ नाम को पुन लेना सरस पस्ता । फसतः पिता शम्द मी परप ही किसी गुप्ठ यस्पोद्घाटन से सम्बन्ध रसने मामा सिद्ध होता है । म्यासने विसी शिक्षण के लिए पार प्रति प्राणायम किया है। उपनिपत् शब भी यही घटिस समस्या उत्पम करता है। सदिता, ग्रामसभा रएपक, उपनिपत मेद से प्रपोपय के के विमाग माने जाते है । उपनिषद मेद का परितम माग है, पतएव इसे पदाम्न का चाता है । वेद के मम्तिमभाग में ही उपनिषत् राम्द (मापीमों की हरि में) निहत माना गया है। गीता मेद वा मन्तिम माग मी, पार मी सपनिवित है। उपनिषत् शद का श्रुतिशास से सम्पर गीताशाब मौततायों का अनुसरण परता पुमा स्पतिशासकोर मी मारतीय वान् मसा पो मुनिनाम कि वारा मन्तिम भाग मानने के लिए प्यार नहीं है। इन सब स्वर परिस्थितियों के गले हुए भी गीता से स्मृमिशन को एकम्पन अविणाम में निकर उपनिषत् शम से पैसे एक म्परत पिया "पा । इस प्रसर गौताशाम के मगरद-गीता-उपनिषत् या तीनों ही शम्म हमारे सागुरु एफ सरिस समस्या रहे है । इस समस्या को सुबमाने के लिए दी गीता मामासाप्रकरण पाठकों के सामने मापा । इसमें प्रमरा सह तीनों विभागों के स्पापो कर ही निरूपण हो ।
दसरष्टि 81 मामभूमि मगपाम् १-भगवच्छब्दरहस्य सब से पहिले हमें यही विचार करना होगा कि शाजाने "मगपान" शब्द का क्या अप किया है । किन गुणों कि शक्तियों से म्पतिविशेष मगवान् काहाने सगते हैं। वैसे तो बार्पगति भगवान् शम्द से प्रधानरूप से विकर्मा ईमर काही प्राण करती है। ईमरतस्व गीता के-"यो मोकप्रयमाविश्य पिमरम्पप विरा" (गीता ।।१७ ) इस सिद्धान्त के अनुसार भव्यय पुरुष का पापकरे । या भम्पप पुरुष, किंवा ईसर सम्पूर्ण विष में व्याप्त राता पुमा भी मसह, मविकल है, सर्वत्र एकरूप से म्याप्त है। जैसा कि गोपपअति कासी- सरगं निपु सिरेपु समास प विमचिपु। पचनपु ष सर्वेपु यम पेति तदव्ययम् ॥ (गो०मा०पू० ॥१६॥ इस प्रकार सखरूप से एकरूप से म्याप्त रहता शमा मी परम्पापक मम्पय योगमाया की कपासे भनेक रूप धारण कर लेता है। योगमाया इसे सण्ड सणहप में परियत कर गस्ती है।वही पारूप, किंवा मरारुप "नाम" नाम से प्रसिब हुए हैं, जैसा कि-'ममयांशो नीर लोरे भीरभूतः सनावन" (गीता०१५७१), 'प्रयो नानाम्पपदेशात्" (ममम्०२।३ १२) हरयादि वचनों से सिर । इसी मणमा के कारण भम्पय की प्राविधिक शक्ति तिरोहित होना है। योगमाया ही मध्यपवरूपदरान की महाप्रतिवन्धिमा ।।ईवरकोचीव ममा कर, बीन को ईसरमाव से पुत करने बासी यही पोगमाया है। योगमापा के भाषरण से ही जीप भपने प्रातिस्विक पापक पराम्पसमाव के दर्शन में असमर्थ होता हुमा दुःस पाया करता है, जैसा कि-"नाई मकारा सर्वस्य पोगमाया समार" (गीता०७२) इस्पादि बचन से स्पए है। इसी मोगमापा ने चीन को मगपञ्चति से पश्चिन कर रहा है। उक्त मगति को प्राप्त करने के लिए पोगमाया का भावरण स्टामा भारश्यक है। इस भाषरस के हटते ही उसी प्रकार भम्पप की प्राविस्तिक शक्तियों का विकास होना, से बहियररि का माप्पभूमिका भगसम्पचि दि मेघावरण हटने से निम्प प्रकाशित सूर्य प्रकहोगाता है। बस विस भीर में बिना किसी प्रयास के बग्मकास से ही योगमाया का मामरण हयामा रही बीच मपनी शक्तियों के प्रभाष से ममान कासाने लगता है। ऐसे ही जीप मापुरुष प्रमानवपुरुप, प्रातार मादि मार्गों से सम्बोधित ए है। मध्यप पुरुष में प्रधानकर से छानकि, क्रियाक्ति एवं सक्ति (मपंति) या तीन महाराकिए प्रतिष्ठित है। भवान्तर सब शक्तियों का ही तीनो शक्तियों भन्तमात्र है। इसी शक्तित्रयी का दिग्दर्शन कराती हुई उपनिपछुति करती है- न वस्प फाय फरणं च रियने न वत्समधाम्पपिकप भूयते । पराम्प शक्किविक्षि श्यते स्वाभाविकी ज्ञान-बल क्रिया च ॥ (ता. रप ६)। परिमापानिधन के भनुमार पर राम्द सम्पय का बाधक है, मतएप सम की उक्त गाना दिशासिए परायक्ति नाम से म्पपलाई। इन तीनों में प्रत्येक की मद्यस्तर भनेक शाखाए हैं। इस प्रकार इन तीन काम्गे नाकर मनन्वतियों पर पर्परसाम होता है। इसी शम्स्पानम्त्य को सषित करने के लिए "विविष पते कहा गपा है । इसौखिर भम्परेभर मनन्तराफिम्पन् करता है। इन अनन्तराधिों में ६ एप्तिरी 'मग' नाम से प्रसिद्ध है। एही ६ मों के मापार पर भगवणम्द प्रतिष्ठित है। मगमत्सरूपसादिका भगामिका नीमों विशेष यक्तियों का उन्लेप करते हुए अमियुक्त यते- ऐषर्यस्प समग्रत्य, पर्मस्प, यशसः, श्रिपः । मान-राम्पयोथैर पपण मग इवीरणा ।। सम्पूर्ण ऐगर्य, पर्म, पण, श्री, मान, पैराग्य, पातिए ही 'मम" कासी है, एक मित्र में यह मग रहते हैं, या भगशन करसाता है। एक यर रातिए पम्पपेडर की प्राप्ति सिलिए है एक-परः सरमन ना हरेरोऽर्जुन विष्ठति' (गौवा १०६१) अनुसार बा, पेतन सर मौतिक पदापा के केन्द्र में मगणी चारपय प्रतिष्ठित है। इस एशि से विम के समी पापो को हम मगमन् पा सकते है। समरिम्परि रूप से उमपपा सा पुष गप का .
परिगष्ट का भाप्पमूमिका मगसम्पम बी पमप है । "सई स्वनि प्रम"-"वांप्रमेव सर्वप्" इत्पादि युतिए इसी ब्राम्यापकता कर स्पीकरण रही हैं। ज्योतिविधान के अनुसार भारमन्योति सर्वोरकर य्योति मानी गई है । कारण इस का यही है कि मूरप-ना-प्रमि-विद्युत-तारक मादि भूतम्पोतिए नहाँ प्रकाशित वस्तुओं का ही झाम कराने में समर्प है, वो चारमम्योति ( मग्योति) प्रकाश, ए मधकार दोनों का मान करवाती है। भूतप्रकाश पीसचा में भाप मधकार नहीं देख सकते । पर तु प्रारमप्रकाश में भाप दोनों का काम प्राप्त कर रहे है। साथ ही में भूनप्रकाश की प्रविण भी भारमप्रकाश ही। शान ज्योतिभापार से ही सस्त पाचो भूतग्योतियों का परिवान होता है । मतएर हम इस माना स्मक भामण्योति को श्योतिषां श्योति करने के लिए तम्यार हैं। जैसा कि पुति करती है- न म मुर्यों माति न धरतारा नेमा विद्युतो मान्ति कुतोऽयपनि । वमेष मान्तमनुमावि सर्प सम्प मासा सर्पमिदं निमाति ।। (मुगटफो०१२) ज्योविपा ज्योतिर्मचगा भारमग्मोति सर्व प्रकाशित है, प्रतएव हम इसे सज्योति काने के लिए सम्पार है। बस जो तत्व सूर्य की मति अपने माप मासता रहता है, अपने पाप प्रकाशित रहता है, वही तस्व (मास्तम्योरी, "मास' के अनुसार "भम्" नाम से प्रसि ।। भपा नित तप के भागमन से मनुप मायुक्त (पेतनायुक-प्रकाशपुक्त-पोतिष्मान् ) बन पाता १, गो तब मनुष्प में प्रथिए होकर उसे तेमस्ती बना देता है, यही तल यिनासौ मावि" इस म्युत्पति से "मम्' कराता है।भारमग्योति का ही नाम "भम् ।। जिस के द्वारा यह "मम्" प्राप्त होता दूसरे शब्दों में गो शक्तिपरोप "मम् ' प्राप्ति के साधक है उन शक्ति निरोपों कोही-"येन म प्राप्पत" इस म्युरपति से "मग" कहा जाता है। धर्म-ग्रन-वेयाय ऐप-या-धी ६ चम्म ही म प्राप्ति के धार है।एही ६ों के कारण ममुप्प में मात्र को प्राप्त होता है। ऐसी दण में हम भरप ही मप्रापिसाधनभूत रकमों पग्मों को मग शम्द से पहिवरष्टि शामाप्पभूमिका ॥ प्रदमी म्बोधित करने में सिर तप्पार है। निम में या मग विकसित रहोसीमापुम्प मम- गन् फरमाता। पूर्वकपमानुसार मम समी प्राणी लपस्प भागासी मम्पय प्रतिष्ठा के कारण मगगन् है, तो इस मावत् शम्द में प्य निरोपता इस निहासा को यात परने के लिए भग के प्रति म्दीभाव का स्वरूप बाम सेना माश्यक होगा। राग-देप, समोर, अस्मिना प्रमि निवेश इन चारों की समरि भमिपामुळे व पैराग्य, मान, ऐश्वर्य, पम्प इन चारों की समाधि निपामुदि। यम्यपारमा के पिया (ज्ञान) एष कम्म माम के दो पातु है । विभाउमर्षि भन्यपा- मा ही हमारा प्रस्पगास्मा , इसी का नाम लपस्प घर"इस के प्रतिसन्निकट विद्या नास्मा नाम से प्रसिद्ध पुद्धि प्रतिष्टित है। इसी बुद्धि में उस चार विषाभाष, एपार मनियाभार म्पटिकम से प्रतिष्ठित रहते है। बुद्धि में मारपदी निपा (मान) परिभा (मशाम) दोनों में से एक मात्र निस्प प्रतिष्ठित हेन । साप ही में यह भी स्मरण रसना चाहिए कि सम्पयारमा के विधाम्पग से पुदि का विषा माग प्रमचा रहता है, पर्व कर्मचात से मुधि का भविपामाम प्रमा यता है। इसी प्रकार बुद्धि के विपामाग से भन्पय का विषापात प्रसम रहता है, एवं बुरि के पविषामाग से भठपय का फर्म पाठ असम रहता है। यदि पैगग्य दान, ऐमप्य वर्म इन चारों चामुन्द्रियों का द्विपातुमति भम्पय के विधामाग के साप योग करा दिया जाता है तो पुदियोगनिष्ठा प्राप्त हो जाती है। टीक इस के मरीत यदि रागोप, संमोह पस्मिता, भमिनिवेश इम चारों भविषाबुलियों पर दिपावनि भम्पप के कर्म माम के साप योग होजाता है तो मुशियोगमिष्टा गिर जाती है। पुदि मौर प्रत्यगारमा के मप्प में भविपासप पाप्मा का भावरण होगाठाापी भरिपावरस दुस कर मर कारण।इस पारस को हटाने की यह एकम्पत्र बुनियोग की हसतमुदिपोग से कर्म से सापम होने वाले मविपाविरूप पाप्यामों में सप्तम मारण अपने मार गिात होगाबरम्प बुद्धियोग से राग देषात्मक भाषरस पानयुरियोग से समो रात्मक भानावरण ऐमय बुझियोग से मस्मिताबाण मारण, एक धर्मबुदिपोग से ममिनिमेश- परियार का माम्बभूमिघ्र II परमात्मम्पीति उपस भावरण हट माता ।इस मविपारमक भावरण के हटने का परिणाम यह होता है कि मन्ययाग्मा में प्रतिष्ठित मग नाम के मो सरूप धम्म है, वे पावरण से रहित होते हुए विधानास्मा पर पूर्ण अनुमह कर टासते हैं, यही चात्मसाक्षात्कार दिसहरूस कम्मामा का मुदियोग द्वारा प्रत्यगात्मसम्पद प्राप्त कर लेना ही मारमसाक्षात्कार है। कारमा सक्षण जीव पर प्रत्याप स्मसमस मगधर्मापछिम उदयस्प मगशन का यही अनुपा है। इसी मनुप्रा से मम्पय की मग- सम्पति का उपभोग करने में समर्थ वनता पा युदियोगस्प कास्मा महापुरुषकोटि में भाता मा भगवान् यन गाता है। प्रत्यग्यरमा का मह प्रकाश पुन भारमा के विधामाग से इसी युदिये ग शरा प्रादुर्भा होता हममें कहा है कि सूम्प-चन्द्र-विपुवादि पापों मूतम्पोतियों की प्रतिष्ठा प्रत्यगात्मन्यो ति। इस सम्बम्प में यह पौर मामलेना चाहिए कि प्रकृति मास में प्रस्पगारमशक्षण या पर मारमग्योति सरपषम विय केन्द्रस्प सम्पोतियन स्प्य में ही भवतीर्ण होती है। इसीलिए पांचों भूत ज्योतियों में सूर्यग्योति को ही मुरूप माना गया है। सूर्पमचा भास्मसधि की परिचायिका है, एप सुम्पीभाष प्रसपकास का सूपर है। वह परमात्मम्योति पहिले सूम्य में भाती है, सूर्मरश्मिशारा पर हमारे मूत्परमा नाम के कारमा में प्रतिष्ठित होतो है। करने का तात्पप्य पाएमा किद पपईमर का हमारी मापारमसंस्था के साप साक्षात् समाप न होकर सम्य के द्वारा ही होता है। सौरप्रिलोकी नाम की रोसी चिसोकी में मितने प्राणी है, उन सब की मुखप्रतिष्ठा सूर्पही है। इसी पारम्परिक मास्मसम्बन्ध को बताती श्रुति करती है- १-दरएमये परे कोरा पिरम प्रम निप्पलम् । पछुभ्र पोतिपायोचिरायुर्गेपासतेऽभूवम् ।। (मुण्डको० २१E) २-पप्रा सुपर्णा प्रपतस्प मागमनिमेप विदयाऽमिसरन्ति । इनो पिषस्य भुगमस्य गोपाः स मा धीर पाकमन्दापियेग ।। (भक सं० २६१२१)।
परिपाट भी मायभूमिका मुफ्त ५-यस्मिन् दृवे मग्नः सुपर्यो निषियन्ते सब पापि दिये। तस्पेवाः पिप्पम स्वास्ने सनो नरापः पितर न पेद ।। ( स० ११६१२)। "तपहियामाधीनमादिसात् समै बन्पायुनाप्तम्" (गत० १.१५11) इस निगम के अनुसार सूर्य से नीचे नी सारा प्रपत्र मस्पुप्रधान है, एक सूर्य से उपर ऊपर का सारा विस्त मतप्रधान । मिस प्रकार एक एपण (पदी ) भपने पड़ों से भाकाश में भी दूरतक दोर तपसा रहता है, एवमेव सम्पनिम्ब को भागार मान कर चारों मोर मोकासोक स्पाम तक प्याप्त राने बारी सूर्यरश्मिए अमृत एवं मत्फ्सोक में समाप निप्प करती है। इसी संचरस सारप को सम में रसकर इन रश्मियों को मुपस कहा गया है। सूर्ण से उपर राने वाला प्रमूवमाग भारमग्योति । स भोर जाने बासी मूम्परस्मिए अमृतारमा के भग्रहप बामन्योति को अपने उर में लेकर उसे सिमरा सूर्येम्पोत में प्रविष्ट करती रहीं है। यह प्रक्रिया भारत पसती रहती। भागे बाहर यह इन (सूप्य) पनी रिमों के माय अपने से नीचे प्रतिष्ठित परपुमोक के भौतिक रस का सर्य मी पान करता यता, एम इस मौतिक रस से मृत्युदोक में राने पडी प्रथा का मी पोपण किया करता। इस प्रकार रश्मिों का उपर से अपतरस एम मीचे से मर्परस दोनों को सेकर मपत-पस्थप स्नतामा सर्प मिस के मध्य में अपनी सास दिनों से तप या प्रस्त बोकास मानम्पोन्धि से पुल पर सूर्य सिमारा इस पृपिवीचोक मे बुद्धि का प्रतिक माता गमा बुनिरूप से ही हमारी मप्परमसत्ता में प्रतिर होता है। भपूतसोकस्म विदारमम्पोखि सूर्य में मार सूर्यस्य मूतम्पोत से सरिसर बनकर मतम्योतिप्रधान बन पाती ।। पही सौरमतमोति पूपिणीयोकल्प मनुष्यशरीर में रशिपशरा प्रपिट होकर पुमिरूप शानम्पोशिस रूप में परिपत हो जाती है। बरपर्य यही मा कि सूर्य से उसपार पानग्पोत, इस मोर हमारा मौतिकरारी है, दोनों के मप्प में सूर्य । शानन्योति सूर्य में भान वदप में परिणत रोजाती। स परिणाम है। माममूमिका :- सुपर्ण यहां से पानग्योतिगर्मिता को मतग्पोस रश्मिशारा हमारे भौतिकरारीर में माती है, वही बमारी मापारिमक बानग्योति करतातो है। "यमा मुप:०" सादि मन्त्र का यही निफप है। प्रमावत्प कपाश्वस्य मेद से प्राध्यामिक विज्ञान में दो वृक्ष माने गए हैं। प्रामा. यस्थ का ईश्वरतन्त्र, किंवा प्रकृतिसत्र से सम्म । एष कर्माचस्प का मौप्तन्त्र, किनकि कृतितन्त्र से सम्म है। इन दोनों में से “यस्मिन हवे मजदः एपर्णः" इत्यादि मन्त्र में जीवसस्पा सम्बन्धी कर्मरकप का ही प्रहस है। सरित कम्मों के माधार पर नग्मकास में नवीन नवीन कर्म सस्कारों का सचव, पुन बग्म पुन सस्कार, रकात् परिवर्तित इस फर्म सवान का ही नाम कमायापार है। इसी कर्मवक्ष पर जीवात्मा प्रतिष्टित यता है । इस पष पर प्रतिष्ठित बीमामा शुमागुभकर्मो का फस मोम करता है। अतएव इसे मना करा गया है। बुदि भोपतापन है । या दुरिताप साजर मामा मकसूर्य । इस माध्यामिक सूब से दो प्रकार की रश्मिए निकलती है। रश्मिए एक ही तरह की है। केस मोगमद से इन की दो मवस्थाए से माती हैं । बामदवस्पा में यह रश्मिए रवान्तर्गत महिना विपयों का रसास्वादन करती है । एक सप्तकार में, (पब कि इन्द्रियसहित मन भरने ऐन्द्रिपक विपयों से पट कर पुदि में बिसीन शेगाता है पर बुदिादिमए मारमा में मिसीन होती है। रिगुर भारमा का ही उपभोग करती है। मानन्दानुमर का तमार से सम्बन्ध है । पर , पुप्ति में दैतमान तिरोहित हो जाता है। मतएव जैसा अनुमत्र नामबाणा में हम विपयामन्दो पभोग में होता है, वैसा भनुमत्र सुषुप्ति में पारमामदोरमोग में नही होता । दूसरे राम्दों में मामदयस्पा में सपमानपद , सुप्ति में शन्तानन्द ।। परिण मानन्द विषयानन्द । दूसरा मामानन्द परिण मानन्द भगाम्ति का मुह इसरा घानन्द गान्ति का पूत है। पहिसे पानन्द से पकान होती है, दूसरे मामन्द से पकान मिटती है। मप मुदिरश्मिए मारमा नन्द में बिसीन होगाती है तो मुनि से बाती है। नामदनस्पा के उपक्रम में पुन वे रशिमए मिस की भोर प्राच होती ह स स ऐन्द्रिय विपपग्रहण में सहान पन जाती है। निस की पुदि अपने विज्ञाननमक उस मारमतरस को मुस बना कर पियों में प्रमासक्ति पूर्वक प्राच परिपाट - माध्यमूमिका विवरणस्मा रोती है, उसे गुम फल मिलता है । टौफ इस वपरीत बिस को मुनि मपने मतर प्रात्मा को विस्मत करके सिक्यों में भासविक मार होती, उस उचम फर को प्राप्त करने में मसमर्प यता है। दूसरे शहरों में मामानुग्णमिनी बुद्धि मनदसमपसम्पादिका से ही म्मकियों को प्रस्तात्मा का शालरस मिसता है। गुरु मोग्गनुपामिनी पुदि ममसम्पति से पुत कर देती है। दोनों पशिस्तीकों का सटीकरण करती हुई मुति करती है- पराजि खानि म्यतृणद स्यम्मस्वस्मात परात् पश्यति मान्तरारमन् । अधिदीर मजगारमानमहायचचक्षुरपुवतमिफन् । (कमेप० २।७।१)। माम्मा के साप पुदि का मोल करादेने से ममामम्द सम्मति मातहोगाती है, मनात पद प्राप्त हो जाता है, यही निष्पक्ष। ट्रिीप म इसी मफ का प्रतिपादन कर इस मालम्प से एमसीभाति सिख शेगाता है कि ममतपस्युम्य विकेन्द्र में प्रतिष्ठिन, मत अन्तमापुमप सूप्प प्रचिती तोकस्य मनुष्य म बुदिरूप से (रश्मियय) प्रवेश करता है। पर मुदि मेरा रिहाना है । इसी शान के बल पर में अपनी रिपात्रा का समान करने में समप बनाया कि पुष्टि का उपायाम सम्य, मतएम युटि में पाट प्रकार के धर्म तत्पम शेगाते हैं। मप्प में जितना सा ममतामबक भवाग है, उस से दो सम्प-नानादि पार प्रपर के विधामाप उगम होवे है। जितना सा मपमाग | उस से गगरेप-मोहादि चार प्रकार के भविधामात्र विकसित होते हैं। क्रमप्राप्त परिले मनाच सम्मक नियाद भापोकाचार कीजिए। परती मधाबुद्धि पराग्यसपसा है ।पुष, कम, बन्पु,अनुचर पप, बी, सरित, गग्परमर पत्र, प्रमागदि तोकिकसमुमतिमसक भौतिक परिकरों के प्रति मनी मुद्धि को सपा उपेपणीप मना गधना ही बाप । यो म्पमि इन किक मोमोश से पेमामास कानिए उस कामामा सम्पूर्ण बमो से निणय फिरने ही ममुप्प दस ६ परिपत्र शामाप्पमिका रूपमे के साम से ही प्रसन्न हो पाते हैं। कितने ही ऐसे मी है, बिन की में दस सास कमी कोई माप्त नहीं है। मानना पोया कि इन की भारमा मधिक विशाय है। ऐसी दशा में मिसने पंसार के सम्पूर्ण मत्र का विकार कर रासा, उस की माता का वो खाना ही पहिली मानव सम्पति। संसार काम निस महापुरुष की शि में सपपा नगाप, पर भारयाही मगवान् । एसरी विपापुनिशानमवणा।।पों तो सभी को पोदा बाद मान ६, परन्तु न तो हम इस सामान्य ज्ञाग को मग ही कह सकते एष म ऐसे हानी को मगवान् ही कहा बासकता यपि मन की मने पारा ६, परन्तु अभी दो शानभाराभों की भोर दी पाठकों का प्यान माकर्षित किया जाता है। एक स्पमतगण शान है, दूसरा सविलक्षण बान है। प्रत्यक्षार माम परिण कान है, पर राप्रपम्पमानित बान स्थतिषण शान ।"पुर में बनी है, पा शक्ति है, इतने समय में इतनी सच होती" या धन लेमा सतिसपणाम है, एप सप परीक्षा मारा प्रस्थान प्राप्त करना पहिबाबान ।। प्योरी 'Theory गाम लेना इसपशाम है, टिकापर्क Practical rork पदिसा बाम | RANI भाममाश्य किया हुमा वाम प्रापमिक , एवं युतिकान एसरा है। इन दोनों में प्रथम झाम को 'मग" करेंगे। मस्मदारि साधारस मनुष्यों का ज्ञान माशान है। हमने केवल एम कर ही उस विषय पर लियास कर लिया है कभी परीक्षा महकी । इसीलिए हम भगवान् नही कर सकते। मनुष्य निस मर्थ का रा (परीक्षा-अनुमती-सापादकपा) होता, या उस भ में वा मरान" करवाया।वही उस विषय के निर्गप में प्रमाण माना जाता है। ता मनन् र महा, "उसमें प्राप" भाप शम माल का सूपक है। किसी विषय को जामने बासा उस मपए की मपेक्षा से सभी महान करता सफ्ता है बाफिए उस पप का सापार पला पहुंचपन कोडी सपतसालिप प्राप्त कराता है, प्राप्त को ही मात कसा वावा एक मनुष्य ने पारमसावाद कर रखा है, दूसरे ने राम्दारा पुन मर क्या है। दोनों में सापात्कार करने बाबा सीता मगन् कदा नायगा, एए मममममप में इसी भात का गदेश पहिबार Tा भाप्पभूमिका - प्राप्तपुरुप सपमान्य होग्य । भामपिपा के साप ही तत्र मवान् मूनक माप्तमान का समय नहीं है। मपित संसार के समी मनुप्प अपने अपने दृष्ट्वास पण बान की अपेक्षा से वा मवान् बनते हुए मात १, पौर वे मारप ही उन तम निपों में प्रमाण है। कोसी, चमार, भोमी नाई, पोर मेश्या गर सर अपने अपने निपयों में तत्र मवान् है ।मास शद का किसी नियत पक्ति, किंवा नियत पिप के साप ही सम्बन्ध नहीं है । अपित यो मिस पिप का द्रण है, (चाहे पकिसी नाति का हो) उस विषय में यी भाप्त है। इसी ममिप्राप को म्पक करते हए-"प्राप्तोपदेश शम्द" इस गौतमसूत्र का माप्य करते हुए वारस्यायन करते है- "प्राप्तः स्वमु सावाठातपम्मा, पपापापल्यार्पस्य पिस्याप पिपया मयुक उपदेष्टा । सादात्रकरणमर्यस्पाऽऽप्ति । तया प्रय वे इत्याप्तः । अप्पार्पम्मेछानो समान सक्षम, दया प सपा म्पबहारा मवर्ग" (पा.मा०-११) इति । उक पत्तषण शान को मी हम दो मार्गों में निम करेंगे । एक प्रतीन्दिपपदाप इस्वपक्षण शान है, इसरा इन्द्रियसापेक्षपदार्पद्रप्हलपक्षण झान है। माप्तता दोनों में ही समान है, परन्तु मगरता में निपमता है। बहुरादि इस्त्रियों के प्रयास से निसान का प्रपद रिया जाता है, पर इन्द्रियसापेच बाम है। मौनिकापस से सम्बन्ध रखने वाले नितने भी पालि प्कार है सब का इसी से समय । परम्त यहा इमारी घोम्बिएं काम नहीं देस कती यहाँ पर शम म्पप सिद्ध हो जाता है। भूत-मपिप्पल-स्वर्ग-नरफ-पास्मा परपारमा भाविक पदा- चवीपचिपा है। इन के सम्मान में भौतिक मिशन ग्राम्य पानस तपोम्या पोरामाणि ही सफल होती है। इसी को रिम्परपि, मापारि मादि नामों से सम्बोधित किया गया है। यही जान "मग" कमाएन । यो मपनी दिम्पटि से सपा परोप, एक इन्द्रियावीत वियों का सापात्कार करने में समर्थ है, उसी का पालन मतीनियपदापाट्रक्सपण शान है। यही काम मग पाद से अमिप्राप्त है । ऐसे शामी हो मगवान् करसाते है। इसी विम्पपरि का सहप मतमाने ए भमियुक्त करने है- 110 माप्यमृमिका ॥ भारमयत मापिमूतप्रकागानामनभिप्मुतचेतसाम् । अवीवानागवान प्रत्यक्षान रिमिप्यते ॥१॥ अतीन्द्रिमानसंधान पश्यनस्यार्पण चतुपा। ये भावान, पपन पो नानुमानेन पाप्यते ॥२॥ . सीसरी विधायुमि पेषग्यसतसा है। स्वत सिद, एव पोगसिद्ध मगिामा, महिमा, गरिमा, मधिमा, प्राप्ति, माकम्य, ईशिष्ष, नशिस्त्र इन माठ सिद्रियों की समार ही ऐवग्न नाम का तीसरा भग । पातुप्त इन मामें काईबरसस्पा से ही सम्मम पसतस्य को मामा, व वित्तमेद से दो भागों में बाटा बासकता है। मामबस सन्यवर, मितपत मानित बर। शरीर वैकि मारमा का विच है, भारमा की सम्पति, भवएप शरीरबस का विचार में बीमातर्भन मान लिया जाता है। इन दोनों में मामरस ऐप है, एवं वित्तवर को भी का नाता है।बर समाल से ही या मारमवत ऐचय माम से सम्मोपित हुमा है। यही ईसा पोट से योग कीटाणु पनामा है, यही इसका परिणमामा पही महाविश्व रूप में परिणत होरहा , पदी सफा भूमामार है । संसार में जो भारी से मारी पदाप है, पर भी ईश्वरीय शक्ति हीद, एन एसी से सबको यस्तु मी नही है । पर पक स्पाम पर मेयरमा ही सम्पूर्ण पाषा को मपनी सीमा में लिए हुए हैं, पहीमाप्ति मार है। पहबार भीतर सब स्पामो में ययेण्ट विहार कर रहा, यही इसका माकाम्य मार है । पर अन्तर्यामी सप का रास्ता पन रहा है पही इस का ईशिव है । उस मा स्माने भपने पति से सर को पराची मना सना है, यही इस पा शिष्य है। पीर म मण से पण बन सकता, म महान् से महान् बन सकता । सीवरमा (मनुष्य) परमी शशि से उतना ही रहता है, जितना पिब उसके त्रिगुणमहान् में पहिरो से निपत रस्ता । पदि किसी मनुप्प में पर शक्किए मार से दी देशी गाती है तो उसे मनुष्य म कार पर ईसर हा माना है । परि किमीने योगप्रक्रियाविशेष से उक्त सिन्दिप ॥
पहि या माम्पमूमिमा सिडिमिम प्राम की तो उसे योगी का काम है। ईमर की इन मायें सिद्रियों का देखयोगियों पर अनुग्रह होता है। पद राक्षस-पिगारवान्पर्व-पिवर-पेन्द्र मामापख-पास इन पाठों देवयोनियों का निवासस्थान पानमराता है। इन में जन्मास से ही यातिदिए मिपमाम एती है। मनुष्य मी प्राय विशेष से प्राप्त कर सकता है, साथ निम्न लिखित निदानों से सर है। १-प्राणिमा पशुता कोही पणिमा करते है सामान से कोर से छोटा शरीर बना देना शिमा सिद्धि योगयामोह मन स्पमसे यह सिद्धि प्राप्त हो सकती है। इमी सिद्धि केस पर पवनपुत्र म मति (इनुमान ) मी सूक्ष्मशरीर मा कर मुरसा के शरीर से बाहर निकराने में समर्म हुए थे। इसी पर से रापों की शि से करते हुए उन्होंने गा में सीता का अन्वेषण किया था। २-महिमा- महिमपसिदि मसिम के टीकमपरीव शरीर को पपप बहा सेमा की महिमा है। बाप मचतर में होने वास मप्रसय में मस्परूपधारी मौम विष्णुने इसी के प्रमान से पति शीप्रमपना महाविणार र पमा राग पा । इसी शरीर के धामित गने पाठीमौका पर बठकर बतिपय महर्षिों के साप पाप मनुने मसौष (समुठी वचन ) से प्रास पाया पा ( देखिए EPI) के प्रमाक से हनुमान ने मुरसा की गगर दि के साप अपना शरीर वाया था। ३-गरिमा गम को पपेमा भारी ना माही गरिमा । मावा कुस्ती एस सीरवी के साप पानों पागप के लिए, पन में निकल गए थे। परिभ्रमण करने करने या मोग पहिरका माप्पभूमिका मिशिमिवर्शन एक बार एक ऐसे सरोवर के पास गा निकले, निसमें एक सुन्दर कमर का पुष्प तर रहा था। दोपदीने सालसा प्रकट की कि मेरे लिए पुष्प चोर भामें घाहिए । इस नारीहट के कारण भीम को पाना पड़ा । सोज ही सोब में या निपर पर्वत पर बा पहुंचे । यहाँ मारुति पहिले से ही बैठे थे । उन्होंने अपने बरपुत्र भीम के वसामिमान को दूर करने के लिए इसी गरिमा का मामप लिया । अनुमान ने अपना शरीर इतमा चोमस मनाया कि दशसहस पापियों के बस का पमिमान करने पाले मोटे ताजे मीम से मम्पकाय मारुति टस से मस न किए नासके । महेश की रानसमा में इसी के प्रभाव से पानिपुत्र युवराज भगद का पर विसी से स्पानप्पुत म मा । इसी सामाणिक नस के कारस मगवान् सपाने महाकाम, एष महावसिष्ठ पाएर बसे योदा को परास्त विया - ४-लधिमा शरीर को पपेट मायु से भी इसका बना लना सधिमा है। इससे पाविमाकर्षण का को मसर नहीं पता । सिद्धि को प्राप्त कर लेने बासा मनुष्य विमानादि मापनों के बिना भीमाका में विघर सफता है। भोपदेवता इसी सिद्धि के पाधार पर भाकारा में घूमा करते थे। इसी के प्रभार से हनुमान समुदोम्सघन में समय ए थे । इसी के प्रभाव से परममाग या मारद पाकारा मार्ग में पिचरते हुए मगवान् पप्ण के समीप, एवं चन्याय स्थानों पर पहना करते पे । पारमा-यान-समाधि मेद से योग के तीन भन माने गए है। दीघ फास ता भादर पर इन तीनों का पम्पास करत राने स फासातर में सीनों कर सपम हो साप्ता, पीसपम" | "कापासागपो समयसपमाद, मपुत्मसमापतधाका गगमनम्" इस पातङ्गत सिमान्त के अनुसार शरीर का माफाश के साप पूण सयम होगाने से शरीर गुस्साकर्षण से मिमुक्त होता मा सन (8) के समान इसका से माता है। ५-प्राप्ति - एक रपान पर मेरे ए २००, अपग मषिक र पर स्पिन बानु को माकरण रारा परिपाटि । माम्पमूमिका - सिविवाशर । अपने पास मगा रुमा की प्राप्ति । पर्वत के शिसर पर फस ग रहे हैं। इस विपा से सिब योगी मूवस पर सो सडेती फससा रहे है यही प्राप्ति । ६-प्राकाम्य पृथिवी, बसवेन, वायु, स्मादि मौतिक पदार्थों में बो ममिमात पता है या इस सिद्धि से हट जाता है । इसके बस से योगी पानी की तरह पृपियी के मन्तस्तस म प्रवेश पर सकता है, महाकठिन पाषाणावि शिसामों में प्रति हो सकता है। निरकास पर्फत्त पोछ पानी की गहरा" म राने पर भी इसका दम मही घुट सम्सा । ममि इसे नहीं समा सक्सा । सात सालों में नियमित सवा पा भी यह महरय हो सकता है। चयसंघ के प्राकस्मिक मा कमय धोने पर इसी शक्ति के प्रमात्र से मगधन् कृष्णने सन्द्र में बसी ई दारिका में एक दिन के भीतर सप यादों को पहुंचा दिया था, एष युद्ध लिए उसी दिन सौर भार थे। महा राम मस भी इस सिन्दि में निष्णाप्त थे। प्रासाद का द्वार चाहे कितना ही छोट्य कर्मों न हो मत इए बिना हीनस सममें प्रवेश कर पाते थे । रित घट उम की रिमाप्रसे मसपूर्ण हो जाते या षष्ठ साना वामात्र से प्रनित होमाता पा । महारान अतुपण के सारपि को ए मस जिस समय दमयन्ती सपम्बर में पहुंचे तो महासती दमय-तीने अपनी दामी केशी कने सारपीके पास (टम की जांच करने के लिए) मेगा । कारण इस सन्दर का एकमात्र पा अनुपण का इसने शोर सपम्बर में पहुच पाना ! उसने विचार किया । रिहो म दो सामि के रूप में भायपुर हो। म उस समय स्प होकने में महान माने मावे थे। देशी र पहुचती है, पर न के उन मामुत चरित्रों को देख कर स्मित हो जाती है। तुरन्त पापस सौटती है और दमयन्ती से करने हगती है- । समासाप सवार नासो पिनमते इपित ॥ वटा पपासामुस्तपति पपाएसम् ॥१॥ संकरेऽप्पम्प तु मान सिगे मापतऽपिकर।। ताप महामनापार्य मुम्मसभोपानिपता | परिप माध्यमित्र - सिद्धिनिपशेन से सेनादिताः कुम्माः पूर्मा एमाममस्ततः । समुहं समादाप सरितुस्वं समादम ॥३॥ पथ पत्रसितसा सासा एम्पसहनः ।। चमुत ट्रा विस्मितारपिममता ॥ स्प०मा०पनपश्म०)। -ईशित प्लौकिक फर्म करने योग्य प्राप्त शक्तिविशेष ही शिस्य मणिमादि सिदियों को दूसरों में देना ही इशित है। इसी शिस्त्र के प्रभाव से भगवान् कप्ण ने सचिमा प्रवेश से गोक्दन पर्वत को इसका बना कर उसे कन्दुक की हभपनी प्रगुती पर उठा लिया था, परिका में बठे ठे?ए ही द्रौपदी का पीर मारिया पार पर रोजाना भी इसी सिद्धि के मातर्मत है। c-वशिल अपने से प्रबस बसणसी को भी परा में कर लेना बक्षित है। इसी सहमसिद्धि के प्रमाण सेरा कालिया येसूद परे थे, एक विपर सौ का दमन कर गज का ती सिन्दि के प्रभाव गे महर्षियों के तप प्न पनिम भाप्रमों में हिंसक पशु परसर में पमिल मिश्र मने रहते थे। . । चौपी पिपापुद्धि पम्ममक्षण। प्राइतिक मिप नियों की समष्टि ही मर्म मर्म पी पसरूप की प्रतिष्ठा है। मापियों में इस वर्षमूतक नित्याग के पाशर पर प्रसिर गण श्रमपम्म की प्यम्पा काही म्पपाशात धर्मशाट नाम से प्यरत हुए हैं। मिस म्पति की जम्मका से ही धम्म की मोर स्वाभाविक प्राति हो, जिस के जीवन की प्रस्मेव किपा सप्त एवं सम्मपए का अनुसरण करवी हो रही परमपम्मिट कहा है। ऐसी सामाविक मर्मसि ही मग कराती है। जप तक धम्मरणा है, तभी तक पार्म की स्वरुपराधीशय पारय किया इमा मम्म पम्मी को धारण करता है। पम्म र यदि परित्याग कर दिया जाता है तो वह
परिजाष्टि
एमाप्पभूमिता -
पोपट पार्म उस पर्मी कामिनासकर गसता है। इसी मभिप्राप से म्यासदे करते।-
पीपुतः सन् पारयते स पर्म इति कथ्यते ।
धम्म एलोपनि पम्पा रदन रतित
पास मन पर । पर इस क्ष दिपेन के साप सम्कर नही, तपासमनार
सप सम्रा में इस समारप ही उरोग दोनो एक ARE सैम्प प्राय।इस
का प्रमा पदमा ।। पम्मा के रेन, अटा, पम या तत मनता मानेनर है। जिसकी
सापानरम में परमर पर मारा जन्म से प्रति राहीने में परातीदोप।
दम
पनि पहिरोम बाप करतेपात र परा नही मिन्ता ।
पीमही, मीनी सोइन पम्मको पुरस्कार पे मार भी मिस नाम है। सरितमें।
पीसे मी निराकारस, अपच सागर पार से भी निशान
भागर पर मामला पातामामारपदरीमान से सम्मानिस में पर प्राय
और पासी गनिम में पाए मोटार प्राधिकार
मानापारीमनेग।
भीमा Aruntinute
tranRamrikोमीरप पOrt
mraj TOPारा भी कीमतो gs
Parmantarai मासपेरिग प्रभाएगी
महिनाहि सामाणमूमिमा पा-श्रीमाव अभी इस सम्बन्ध में हमें यही करना है कि जिस में उक्त मासम्पपिए जन्मकार से पिना प्रयास के सत विषमान रहती है वह मानव शरीरपारी होगामा मी मगवान् कराता है। मा मेसमा में यातिहण में भगवन सम्पादक मा भग , भमया नहीं। सबसे पहिले क्रमप्राप्त पैराग्य को ही सीनिर । निस भाचार्पने राष्परियोगमग गर्षि निया के उपदेश से मजून को राग-द्वेष रहित ममा गमा, पासप कैसा होगा, यह विधारही प्पर है। "नानराधमाप्तम्य पर्च पप व फर्मणि" यही बाप वैराग्यमग का सूचक है । पे पाहते तो एक मासाम्राग्य का निर्माण कर सकते थे, परत नहीं । नमोंने ऐसी राम्प- निम्सा की कमी वासना भी न की। कंस का साम्राम्प सन की निजी सम्पचि होगई पी, परन्तु चमोंने क्या किया, यह सर्वविदित है। पही भस्मासन की पी । पब रुष्ण की वानराशि की मोर परि गाती तो हमें स्वप्प पाना परवापान मा के सम्बन्ध में गीतागातही पपाप्त प्रमाण । दिसताशय का मम्बन करते करते मयन् पक गए है, जो विशास्त्र समस्त शिका भाराप्प देव पन रहा है, उसके सपदेश के धाम की मीसा करना अपने मार को प्राधित भागी बनामा। ऐधर्म के समय में भी रोप बसम्प महा । ऐवर्यपोग के प्रपम प्रतिक मा- छन् शार यहाँ पोगेवर कामाते है, यहां इस योग के परमाचा पण योगीपर माम से प्रसिद्ध योगाचार्य पर ये तो बोगियों के प्राचार्य रुप्स पे। बाम्यावामा में समय समप पर भगवान् ने भपने इस ऐवर्षमाप को प्रकट किया है। दुर्योधन की रागसमा में लममा मसी योग का दिग्दर्शन गुमा है । अपनपाष के सम्बन्ध में मस भूमि की प्रक्षिा रक्षा के लिए इसी पोग का माप लिया गया है। नियट्सकप दरान भी इसी योग का सूचक है। इसी प्रकार बम्म के भी पण मापक्षपाती है । पीममम्तक पम्म, एवं प्रतिपादक मग दोनों के या भगन्म मत । "वस्माफास प्रमाण दे." मावि रूपसे परेमा पेरा के अप भगवान् ने भरमी पर्मनिष्ट प्रकर की।
परिवार मायमूमि योगमाया पश और श्रीमाप मी परतम है। पानिमय का मेप किसे मिला, उग्रसेन की राय पुनधि के परा के मागी कौन थे । बास, पर पुवा, मादि सभी भाषा के प्रासी पिस की सरसमाधुरी से मोहित पे । इस प्रकार हण में मेंहों मगों की पूर्ण म्याति मिल रही ।प्रतएक हम भारम ही में मगगन कर सकते है । भगवान् नहीं, अपितु सप्ण को प्रापुनमगवान् कदा मासकसा ।। पण एप भी के दिग्दरान के साप साप चतुर्विध विपादियोग का दिग्दशन कराय गया । मा क्रमप्राप्त धनुर्विध प्रतिपादियों पर भी एक पशि गस मा भनुचित न हो। पायक पान मते होंगे कि पूर्व में प्रमत-मापु नामक दोनों मानों का समावेश है । इनमें से भपतमाग ही वह चतुर्विध विवादियों का स्वरूप सम्पादक है । इस सूर्य में निराला सा मर्यमाग है, यही पनि भविषा युदियों का सरूप सम्पादक है|य का प्रतिद्वनी राग-देप, बान का प्रतिदमी समोर है, ऐप का प्रनिम्मी परिमता , एक धर्म का प्रति- होममिनि । मिस प्रकार निपामुविचारयी, हिंध ६ गलियों में ' भग" शब्द नि. स। एपमेन इस प्रतिपादितण्यी में "योगमाया' शद निहर। महामापा से निम्म मुक्त बने के कारण ही इम हरिमाया को योगमाया करा पाता है। नानामाव मूत्पुम्पन । जैसा कि- 'मरपो स पस्युपाप्नोति यानानेर परपति" ( कटोप ...) इस्पारि भूवि से सप । । योगमाया ही मामामाररूप मृत्पुमाव की प्रतिष्टा है। स्पुतब ही पूर्वकपम- नुसार परिप युधिों का चमक । अतएव मृत्युप्रषान इम प्रतिपापायी को हम मनरप ही 'योगपापा" गन्द से सम्बोषित कर सकते है । 'योगमापा भवद तया समोमवे जगद' (सप्तशती) इस स्मात सिद्धान्त के अनुसार यही योगमाया मृत्युतषण मोह की प्रक- सिमा मानी गई है। योगमाया मोर मग दोनो प्रविशादीमान है। होता परक योगमाया की पा से पुदि कर एकलसपण म्यवसाय धर्म नपिम दोभाता । मामासषण मनिषा के समापेरा से इन्दि भनेक सत्रों में परिणव ऐ गाती है । परी इस पुष्ट्रिय माणसपस मम्पक - 1 पहिरष्टि 110 मायभूमिका मगवता साप है । इस मम्यवसाय से न्यबसायारिमका एस युद्धि का विकास दर मावा है। फसत युविसविसर प्रमृतारमा का विपामाग परराक्किों से निस सपम राता हुमा मी प्रकाशित नही रासा । इसीलिए साधारण मनुप्प पारोह में पड़ते हुए सर्वम्याक्तम्प लियेक से प्युत रोगाट हैं। यही इनके दु ख का मह कारस । इसी मभिप्राय से भगवान् का है- घिमिर्गुणमयमापरेमि सर्वमिद वतम् । मोदित नामिनानाति मामेभ्य परमम्पयम् ॥ (गी. ७)। । ठीक इसके विपरीत मा नाम के चतुर्विध विषाबुद्धियोग के उदय से पश्चिाबुदिए पचायित हो पाती है। भविषा मावरण के हटते ही मुद्धि में स्वस्थता उत्पम हो जाती है ।युद्धि * सममान में परिणत होते ही मात्मा के विधाप्रकाश का सुदि पर अनुमा हो जाता है। यही इस का मरमसापाकार , पा) मगसम्पत्ति की प्राप्ति है, पही इस की भगवा है। मगणसी बनते ही मे ममन्त मालराहिए अपने माप प्रकट होकर इस भगवान् को सर्मा बना गसती हैं । इसी मगसक्षणा सबलता से या मतीत अनामत सब कुछ जान लेता है। नस्पति, प्रसप, प्रागति, गसि, विपा, प्रविधा सम कुछ इसके लिए प्रमापवत् हो बाते हैं । इसे पाने पूर्वजन्मों का पूर्ण परिवान हो पाता है यही गाविस्मरता है। इसी मा धार पर मगवान् ने अजुन के 'प्रपर भावो नन्म पर भन्म विवस्वता" मह निकासा परने पर- 'पानि मे म्यतीतानि मन्मानि तर पार्जुन । वान्या व सराणि न स्व पेस्प परम्तप' यह समाषाम किया है। वितरितम्य "सी भगवान् का सक्षण करते हुए भमियुक्त का है- - उत्पत्ति प्रमय पर मूवानामागति गतिम् । रेचिरियामपि च स पाप्यो भगवानिधि । मगलान् किसे कहा जाता है। इस प्रश्न का समाधाम हो पुका । भव प्रात Aषय में साप ठक समाधान कर समम्बम कीजिए ! विवाद इस समय पुद्धियोगनिष्टा सम्बन्धी पराग्य, पान, .
पहिक - मायमूमिप्र । पेपप, पम्मान पार मार्गों पर मचाया।हमारे मादकपा में इन पारों मार्गों का विका सपा, मतपय इहें मगवान् माना गया । अपने कनारम्त को पुरियोग द्वारा प्रारमपामापस सम्पप में प्रतिष्ठित करते हुए सममाष में परिणत फर लेना हीमपुतभाष । "प्रग्पयारमनिष्ठ परमप्पुरत्वम्" इस स्पस के अनुसार मम्पयारमनिष्ठा ही मम्युनिष्टा है । कस्तुवन्तु मम्मुत- भाव का "बुरियोगनिष्ठ पमपुत्सम्" यही सपण समझना चाहिए । कारख इस का पही कि बिना दुनियोगनिय के समतासवणयोन का उदय नही होता एष बिना समता के भात्मा के पत पर्म का विकास नहीं रोता । फसत बुद्धियोगनिम्न कोही अभ्यप्तमा के प्रति कारगता मिर दोजाती है। पर मप्पुताप का पुद्धियोगनिष्ठा के साप सम्बन्ध । सो एक रिप्रतिपदि उपस्पित होती। पेदप्यास रुक्मि-करमावादि मार्पियों को भी इस शि से पप्पुवमगवान् कहा जाना भारिप । क्योकि वैराग्यमान ऐवर्ष-मर्म इन चारों पुद्धियोगनिष्टानों में से इन मार्पियों में भरप ही एक एक दो दो बुद्धिनिए नियमान थी । जय कि इन में पुरियोगनिष्टा थी, एवं बुष्ट्रियोगनिष्टा मतप्राप्ति का कारण तो ऐसी दण मे हम एप हीएम अभ्युतमगवाम् कर सकते सनप्रतिपति के नियम में हमें केवल यही बताना।कमध्युव शम्द चारों मों में ही पोगहरीर में संगों परतुर उत्पम होती है परन्तु पर केवल कमली करसावासी प्रकार मुहियोगनिमी के कारण समी मगधनों के सम्पुत रहने पर भी मम्मुख नही कासावा निस में विचारों मुशियोग होते हैं। बस्तुमस्तु बिना पारौं बुदिपोगों की समीके मत माकच तत्पमीमहीना। कारण इस बय यही है कि बार परेश प्रत्ययामा की पति के साकारण है। पब तक चारों में से एक भी वसा रहेगा, तम तक पूर्णरूप से मध्युतमात्र का उदय में होम । पूर्णता में ही पमाप कास सम्भव, ज्यातिष्य ही पूण समता की प्राविका पूर्णसमता की मध्युतमाम की जननी है। मवि पारों में एक मुनियोग है तो एक पोर ऐगा। शेष दोर मों के त्यों नही तो पाशिकरूप से प्रसप येंगे । नब तक बोर्मे का प्रपर भी निपमा तक एक । । । २ विशामरहि 8 भाष्यभूमिका - मोबसेस्था । अप्पुतमाव के भागने पर मी पूर्णमायुतत्व असम्भव है। पूर्णता तो पारों निष्टामों को समष्टि पर मासम्बित है। ऐसी दशा मेम उसे ही एकमात्र मत भगवान् कोगे, जिस में विचारों निष्ठय मों का बम्मकार से ही पूर्ण विकास होगा । वेदव्यासादि में एक एक दो निष्टाए सीपी, मतएव वे फेस मास्वान करवाए, परन्तु रुप में चारों का पूर्ण विकास था, मतएव ये अभ्युतमम्यान कर गए। इतर भगवानों की अपेक्षा करा की मगवचा में मही विशेषता है। सय वेदम्पासादि मगवामों में-'कृप्यात भगवान लयम्" यह करते हुए कप्त की अभ्युतमाचा स्वीकार की है। रण में चारों मग ये, या तो विशेषता हो। परन्तु इसमें साप ही सब से बड़ी विशेषता यह कि उक्त पारों बुद्धियोगों का सरूप सम से पहिले पण ने ही संसार के सामने रक्या है। इसीलिए ऐ मम्तमगवान् के साप साप बगद्गुरू मी माना गया की पदे जगद्गुरुम् ) । मभ्युतमगावली महापुरुषमान का घोतक है। यह जीव की भपेक्षा निसपा धर्म है। विपासमुचित कर्म तारतम्य से भीम को सात सेस्पार हो जाती है। प्रमि-बापु इन तीनों के तारतम्य से कर्मप्रधान स्वनिम, मिज, जीवम मेर से असह, मन्तःसन, ससस नामकी तीन सीक्सस्पाएं प्रकट होती है। मग्नि का कर्म से सम्बन्ध, एष भमि-मायु बतीनो एकही भाम की बन सरस-विरब नाम की तीन भास्पाए है। मादन पीनों मी संस्थानों को हम कर्मप्रपान करने के लिए तप्यार है। उस तीनों बीमर्मस्पामों में से समझ नाम की तीसरी संस्था के सम्मात्मसस्था, पिदा स्मसात्या, पिरसंस्था मेद से भवान्तर तीन तमाग होगाते हैं। हम तीनों में कम्मरमसस्प ससंद जीव कर्मप्रभान है, पिदारमसंस्प समाव उमय (सिपा-कर्म) प्रपान, एवं तीसय ईमरसंस्थ समेहमान लिया प्रधान है। सीनों में से घिरसस्य ससेजमाष पुमा उसस्थ, श्रीसस्प, एवं पिमतिमाप मेर से सीन मामों में मिल पा तीनों ही मास्मवि विपाप्रधान है।
विज्ञानट - मान्यभूमि मरा सप्तसंस्थो जीव (१)।-बानरामि तस्या-प्रसा -- खनिज ---फर्ममपान (६)। '-(२)२-मसवापुसंस्था ----मन्त सझा-ग्दभिना-~म्पपपान' (८)। (१)-प्रामास्मरुपेन्द्रसंस्पा-ससड़ा-मीरग' ---फर्ममपान: (७)। (३)-कम्मात्मसस्पा- - फम्ममपानः (६) २-(४) -बिदामाससस्पा निघामपानः ५ फम्ममपानः (५)। (५)३-विरसस्प --विपापपानः ५ -- ---+ (५)-उन्मस्पा- (६)२-श्रीसंस्थ'- (७)३-विमूवितस्प -बिपामषाना ३ •विपामपानः २----- (२)। पिपाषान ()। -un- निन जीवा'मामों में मई-श्री-विमृतिस्परा ६या, ७ माग विकसित राता १, धीवात्मा स्वरा माने जाते है पही इनकी माहौरिखता है। ऐसे ही पशि प्रम्ययपुरुष के माशिक विकास के कारण के महापुरुप कातातेह पैसा नि मगवान् फरते है- यपद्विभूमिसन भीमतिमेव मा। तत्तदमाग स्वं मम मोऽशसम्मबम् ।। (गीवा०1०11९ मपने एक ही रूप से अनेक मारमसरूपों में म्याप्त रहना चर च विनिमार है। म त्रिमूर्ति सम्मान से महामा पाश्परिणाम विषमर मापय पोगमायझिम बीगमानों के साप उसी प्रवर पुक्त हो रहा है, असे पि एक ही सूर्प योगमापावपिन मपने पत्र पागद प्रतिषियों के साप मातारा निभूति सम्बन्ध से व्याप्त रहता है । भगवान् रण सत्पात्मा के अश्वार थे, मात बाहिर माम्ममूमिका - मगरम-गस्त . एव उस सस्पारमा की तरह यह भी सर्पसोकसादी बनते हुए विमति सम्बन्ध से जीवमात्र म्याप्त थे। इस दृएि से अपरप होने पर कहा जासकता है । इसी ममूतिमात्र का दियदर्शन कपर पापन करते हैं- गोपीनो त्यतीनों व सर्वपामन देवीनार । योऽन्तभरति सोऽध्यक्ष मीनेना देशमार ॥ मनुप्राय मूताना मानुप देोमास्थित' ।। मनवे नारंगी मीरा याः श्रुत्वा तत्परो ममेत् ॥२॥ (श्रीमद्भागवत् १..)1 बरम्प-नान-ऐमर्यादि ६ प्रकार के मगों की समरि ही भीतत्व । यह दमों भाव मी श्रीकृष्ण में पूर्णरूप से विधमान थे, जैसा कि पूर्व में कहा जानुका । । इतर साधारस भास्मामों की अपेक्षा गो भात्मा असाधारण बस से मुक्त रहता है, वही सतिशयमावयत भास्मबत उपवस है । मगधन् कण में यह उमस भी पूणरूप से नियमान वा । इन सब फाखों से भगवान् कपणा अम्मुतमगमत्स मसीमति सिर होगाता है। इसी भदौकिक माव फ कारण श्रीकृपा परबत् उपास्य मान गए । इसी विशेषता के कारण इतर भगवानों की प्पपेक्षा इनरत विरोप मात्र माना गया । इसी विशेषता को सूचित करने के लिए गवान के साप मगात् शम्द का सम्बध बोला गया । इसी वैशिष्टध के कारण गीताणस भगीतो पनिपत् नाम से प्रसिद्ध मा । समी सास तास, परम्त भूपाबवास ही तास कामाता है। रीर पही बात यह। सममिए । मनेक मगवान् है, परत ठमके सामने पण की भगवता व सुर्विध पुरियोग के कारण सभेष्ट बन गई । इन की मगाणा के सामने प्यासादि की मारता नीची ग्रेणि में ही सगई । फसता मोर रिसी मागन् का शाम मगात् माम से म्पवात न होमर वेक्स गीताणही मागत् माम से सम्बोषित हुमा । मगीता क्यों मगाड़ीता का बाबी है. इस प्ररन का पही सषित उचर है। इति मगवछन्दरहस्यम् । १ पहिणार 81 माध्यमिका पर जीवनात । ६-गीताशब्दरहस्यम् - पा उपनिषत् भगवान् के द्वारा की गई । रुपा ही सम्पपात्मप्राप्तिसापनमा बुद्धिपोनिष्टय के प्रथम द्रय है। इस प्रपद्रष्टापाय पशि के सम्पप से दम भरप इस उपनिषद को 'ममरहीवोपनिपत" (मगता बीड़प्पन पिता कपिता महा-मोळा-उपनिषद-मा पान् भीकण के बरा कही गई उपनिषद) इस माम से सम्पोषित कर सकते है। कर प्रपन प्रम-कम्म मेद से दो मानों में निमत।हम में प्रमतो मी तीन वित है, एवं कर्मवय की मी तीन शाखाएं हैं। सम्पपपुरुष, प्रवरपुरुप, परपुप या अस है, किंग एक ही प्रम के तीन रूप है। मेरोपिक एएन ने पास कर निरूपण किया, सांसदर्शन ने माराम का निरूपम दिया है, एप पेदान्तदर्शन में मम्पपर्मित भवन का निरूपण किया है। किसी शाप ने बिगुल बप्पय का निरूपस नही क्रिया । इस कार्रम्प की पगितामा ने ही की है। बिस मम्पय को कोई नहीं जानता पा, मानवा पाको तटस्थ मुधि से, पिता ने उसे अपना मुफ्प सप बनापामयप का प्रपमरण गीतामात्र इसी प्रकार कर्माता के शानयोग (नितकर्मयोग), कर्मयोग (प्राधिकर्मपोग), मफियाग (उमपयोग) तीन विभाग है। इस तीनों से सपा विधपण एक चौपा बुद्धियोग। प्राचीन गारों की बानसामा उहतीमो योग पर सात सम्पदरान ने बानमोग का प्रतिपादन किम , योगदर्शन ने कर्मपोग का प्रतिपादन किया शापिसम्म दाम में मुधि पोग का प्रतिपादन लिया है। परन्तु पुरियोग गीता के परिल स्पतिगर्म में 0 सीन रण।मुदियोग के प्रमपम बीकण ही है। इस योग में ज्ञानवर्म-मकि तीनों का समय है, औसा कि गे के प्रकरणों से स्प होप । इस प्रकार प्रमविर का सम्पपतिल, एवं कर्म- नि का बुद्धिपोग मर्प इन दोनों को संसार के सामने रखने का एकम्पन पण कोही। मम्पपास एष मुनियोग प्रतिपादक पिताशाच मगगन् की भपनी सम्पपि, मपना मत है। गीता पिए नहीं, अपित मानाव।सय भगवन् ने अपने मुख से परोपणा श्रीगीता मे मत। देनिए ! 01 बहिण - माम्पभूमि ne प्रम-कम्मै ये मे मतमिद निस्पमनुतिष्ठन्ति मानवा । भदामन्तोऽनुमयन्तो मुप्पन्वे तेऽपि फर्मभिः । (गोवा०३।११) प्रकारान्तर से विचार कीथिए । ममपान् ने "ये मे पवमिद निस्पमनुविष्ठन्ति" का दिया, इसलिए हम भोस मीच कर मोता को भपूर्वशास्त्र मानसे यह ठीक नहीं है। सामान्वेषण शरा पाप को यानियय करमा चाहिए कि क्या वास्तव में गति से मतिरिक्त मन्य दर्शनों में सम्पयाम, एक मुदियोग का निरूपम मही। हमारे विचार से पर्याप्त परिश्रम करने के पीछे भाप को भी इसी विषय पर पहुचना पदेन कि सचमुच इस सम्बन्ध में गीता भारतीय शास्त्रो। यदि पाठक नबधान पूर्वक विचार करेंगे तो हमें इस लिस में, एष नियाहस्पति- पादक शास्त्रों में प्रापिपा एवं कर्मपर्या इन मावों के अतिरिक्त तीसरी वस्तु का भाम न्तिक भापही मिलेग्य । ससार में पा सो रुम माना जाता है, अषमा कुष किया जाता है।"भाना भावा" पावास्य प्रम का सूपक है । "किया जाता है। यह वाक्य कर्म का बोतक है। प्रम-कर्म के भतिरिक्त, दूसरे शब्दों में धान-क्रिया के प्रतिरिक पास्तम कुछ नही । "आफ्वे-किपते, किधितापते, किषित-क्रियते, कुछ पाना बावा 1-30 कुस किया जाता है। इस शाम-किस की पारम्परिक पास के अतिरिक सपमुप भन्य बस्तु का भमान सा है। अप का मान होसकता , वर्णा नही । फर्म की पा सम्मान है, मानमान में प रणति नहीं । प्रम का विमा से सम्बन्ध , काम का योग से सम्घ है। ग्राम प्रम पिपा, कर्म योग है। पूर्व कपनानुसार समिधा के मी मम्पप-माघर पर माम के तीन नित, एष मोगपर्या के मी शाम-कर्मो-पास्ति नाम के तीन नि है। दसरे शब्दों में मो मी कसा पासकवा म मानास्मा , कर्म कर्मारमा ! । पान्परमा मी तीन है, काय मी सीन है। प्रत्येक स्त प्रम-कर्मम है। इन दोनों के निर्वहै । इसी मा- भारपर “पादकौशिकमिदं सर्वम्" पह अनुगम प्रसिद्ध है।
पहिया 2। माममूमिका पर मीगजात ६-गीताशब्दरहस्यम् पर उपनिषत् भगवान् केशाय की है। हप्स ही भम्पयारमप्राविसायमा अभियोगनिष्ठा के प्रपम दरा है। इस प्रपमद्रष्ट्रापापण शि के सम्बन्ध से हम मर ही रस उपनिषद को 'मगाद्रीयोपनिपत" (मगाता श्रीकृष्णेन पिता कपिता ओला-उपनिपद-मा- मान् भीकम के रा की गह उपनिषद) इस माम से सम्बोभिवर सकते है। इभर प्रपत्र प्रा-कम्म मद से दो मामों में हिमान में प्रभपके मी तीन निवर्त है, एवं कर्मत की भी तीन शाखाएं हैं। सम्पयपुरुष, भरपुरुप, घरवरप पर तीन अप, किंवा एक ही मवीन रूप है। गेपिक परान ने परमस का निरूपण किया है, सांस्पदर्शन ने भापरणम का निरूपय लिया है, एक वेदाम्वदर्शन में सम्पपगर्मित माह का निरूपण किया है। किसी कार ने हिंगुर पम्पय का निरूपस नहीं किया है। इस कम्पकी पनि गीतायड ने ही की।निस मम्यप को कोई नहीं जानता पा, बामवा पा तो तटस्म मुदि से, रिता ने उसे ही पपमा मुस गप बनायामयप का प्रपमा मनास्त्रही। इसी प्रकार कर्मतस्य के मानयोग ( निकर्मयोग ), कर्मयोग (प्राधिकर्मपोग), भकिपाग (उममयोग) तीन नमाग है । इन तीनों से सपा विषय एक चौपा मुदियोम है। माधीन यारों की मानसीमा र तीनों योगों पर । सम्पदर्शन ने पानगर प्रविवादम लिया, योगाम ने कर्मयोग का प्रतिपादन लिया है, पणपिम्प दरान में बुद्धि पोगका प्रतिपादन विश है। परन्तु युधियोग पीला के पति स्पतिगर्म में ही पादियोग के प्रपाम बीण दी। इस योग में शान-कर्म-मति तीमों का समनप पैसा हि मागे के प्रकरणों से स्प होम । इस प्रकार प्रतिमा का सम्पनियत एवं कर्म- विर का मुदियोग मि इन दोनों को मंसार के सामने खने का एकमात्र पहम्ण कोही।। मम्पपाय एवं अभियोग प्रतिपादक गीताण माता की परमी सम्पति , मपना मत है। दिना पिए शव मnt, अपितु नवीनरामय भगवान ने अपने मुष से या पोरसा बीमिता मे मतानिए!
पहिण आ माम्पभूमि ne- प्रप-कम्म ये मे मतमिद निस्पमनुतिष्ठन्ति मानवाः । प्रदामन्तोऽनुम्यन्तो मुष्यन्ते सेऽपि कम्ममिः ॥ (गोवा०॥३११) - प्रकारान्तर से मिपार कीजिए । मपणान् ने "पे मे मवमिद निस्यमनुविष्ठन्ति" कह दिया, इसलिए एम मोखमीच कर गोता को भर्पशास मानसे यह ठीक नहीं है। शबान्वेपण सारा पाप को यह नियय करना चाहिए कि क्या वास्तव में पता से अतिरिक्त मन्य दर्शनों में मन्पपत्राम, एष मुधियोग का निरूपण नहीं है। हमारे विचार से पर्याप्त परिश्रम करने के पीछे भाप को भी इसी विषय पर पहुचना परेग्म कि सचमुच इस सम्बन्ध में गीता मद्वितीय शास। परि पाठक नबधान पूर्पक चार करेंगे तो उन्हें इस बिम में, एक निमरहस्पति पादक शास्त्रों में प्रमरिया एव फर्मपर्या इन दो माषों के सिरिल तीसरी वस्तु का माम तिक मान ही मिलेगा । ससार म वा तो इस माना पापा , भपया फुफ किया बाता । “माना जाता है" यह बास्य प्रम का सूचक है । "फिया माता" ह वाक्य कर्म का पोतक है । प्रम-कर्म के मतिरिक, दूसरे गमों में शान-क्रिया के अतिरिक्त मास्तम कुछ नही है। "माफ्ते-क्रियते, किवि-साप्ते, किषित-क्रियते, कुछ नाना पाता 1-31 कुल किया पाता।" इस बाल-क्रिया की पारम्परिक धारा के अतिरिक सम्मुच भाप बतु बममपब सा ही है। - अम कर शाम होसकता है, पर्पा नहीं । कर्म की पO सम्मन , मानमान में प रिणति नहीं । अझ का मिपा से सम्बन्ध है, काम का योग से सक्छ । प्राप्रम पिपा, कर्म योग है। पूर्व कपनानुसार प्रसानिया के मी मम्पप-अप पर नाम के सीम वि., एष पोगपर्पा के मी बाम-को-पास्ति नाम के तीन नि । दसरे शब्दों में पो मी करा पासकता है कि ग्राम पानास्मा , कर्म कर्मारमा । । ममारमा मी तीन है, फर्माता मी तीन है । प्रस्पेक वस्तु सम-कर्ममप । इन दोनों के लिर्स हैं । इसी मा- परपर "पादकौशिकमिदं सर्वम्" पह मनुगम प्रसिद्ध है।
पाय • भाषभूमिका tre- सापामा गीताणाव से पहिल ठह तीन बाना मागों में से क्षरामा एक मादामा का ही प्रा- धान्य पा, मध्यपारमा सपा निगूड बना हुआ था। कमानों के समय में साम्य नाम से प्रसिद्ध शानयोग, योग नाम से प्रसिद्ध कम्मपोग ही प्रचलित थे। मक्लियोम कारिक बना उमा पा । एक दस करवा पा हान प्राप्त करो, जाना, कर' मत | दूसरा दस कहता पा कम परो, शान के लिए प्रयास म्पर्प है। परम्त गीताशामने- पर्फे साम्य प योग च प' परपति म पश्यति' करते हुए पानगमित कर्मयोग का सहप सभापम ससार के सामने रखा । यही योग पुनियोग नाम से प्रसिद हुमा । इस मपूत्र योग * साप साप मगवान् मे बानान्मामों में से पापपामा का महप भी हमारे सामने रक्सा । प्राचीनों गो मार पर ही विग्राम मान लिया, मोना मम्मय की भोर हमारा पान भाकर्षित करती है। मोर मोर ग्राओं की तर गीता केक्स सिवात बताकर ही चुप नहीं हो जाती । अपितु उन सिवान्सों मा म्पाग हारिक रूप भी पिता हम्परे सामने रसती ।। मरे गग्दों में पो समझिर रि इतर माग्म- विपाशाम केयर सिमान्त वतला ए बा दरानशास होगी शाम सिद्धान्तों के साप माप उनका म्पापारिक सरूप बताने के कारण विद्यमशासम्पपास्मा विधाम । मिपाएं कि मेराग्य, शान, ऐपर्य धर्मभेद से चार । मतएव तत्समय से विचाबुदिए मी चार ही मागों में लिमल हो जाती है इन चार बुझियोगनिष्टानों से अम्पय कर विभाग प्रसन्न होता, प्रतएम में विधायुदि कर दिया गया से प्रान्त में हम पही कामा कि अम्ययपुरुषपणा अमनपा एव इदियोगचपणा योगषया इन दोनों के भीतप्योपा होने से, एक नदी के उपरान भाष से लोक में प्रचलित होने से हम पश्प ही इसे मगधन् की गीता कर सकते हैं। मग- माम् हरी इसोप्रय है, भगवान् ही इसके बस्न है। उपा शम्द का मर्प सपकम । प्रपमा रम्भस्पा पोरी उपक का पाता है। पाणिनीप प्याकरण का प्रपारम्म पाणिनि से तमा १ मतरण पाकरण गाय पाणिन्युपन करता । मोण नामके परिमाण (बोर)शेष के प्रम मापस नम्द ये। मतएप नोएपरिमाण योक में मनोपन पनपा।। भन्सम - राहत बीफरष्ट मामायमूमिफा l मितिपत्ति - . अम, एवं नदियोग का प्रथमारम्भ रुप से ही एमा पा, अतएव उनके इस गीतायात को भवाम री कृप्योपान करा यासकता है। इस सम्बन्ध में एक विप्रतिपति स्पस्थित होती है। साप से में यह विप्रसिपपि ऐसी है, बिस का निवारण करना कठिन हीं नहों, अपित असम्भव है। पूर्व में यह करा गया है कि भारत में नितने मी दसनग्रम्प उपसम्म होते हैं, उनमें किसी में भी मध्यपत्रम का, एवं बुद्धियोग का मिरखेपा अपठग्ध नहीं होता। भश्य ही दर्शनशास्त्रों के सम्बन्ध में उस हेतु बाद का पार किया जासकता है। परन्तु वेद के अन्तिम मापसप उपनिपठारत के सम्बन्ध में यह भपूणता किसी भी दपि से परित मही होती । सपनिषदों में, नवस उपनिपटों में, भमित भारण्यक, ग्रामण नाम से प्रसिद इतर वेधिभाग में, एम सहिताभाग में भी भम्पपनिष्ठा का निरू पण मा बुद्धिही भव्यपारमसापात्कार का उपाय है, इसीका नाम युदियोग है। इस दियोग सम्पति से भी पैविक साहिल धित नहीं है । तभी वो भगवान् मनु की-"सावेदात् मसि संपति" पा सूक्ति परिता होती है। "णास्त्रीय एवं मौकिक अमुक विषय वेद में मही" या काना नेद की पूर्णता पर व्यापात करमा है । प्रात में हम कुछ एक ऐसे बचन उक्त करेंगे कि बिनसे पाठक यह अपने माप निणय कर ॐग कि वेद में पम्पयनस का, एवं मुनि पोग का निरूपख मा , भएप नाही । पहिसे क्रमप्राप्त सहिताभाग को ही सीजिए । पनि यस्तत्वम्म पछिमारमोस्य जस्य पे किमपिस्सिदकम । (अकस.०६४)। २- स न करें-अव्यय पवित्र पाच पारया । (चरु०६UCErri)| २-पुनानो पे अव्यये पिता अपमिश्रियः। (AII) -~यस्माम भावा परो भन्यो अस्ति, य मानिरेश मुमनानि विमा । (यजुः ८३६)। ५-पियो यो नः प्रचोदयात् । (पास ) ६-पुरुप एपेद सर्पम् (पास)। ut का भावभूमिका me प्सोपा गीत - गीतागार से पहित उत दीन कामामाभों में से परामा एक मामा कासीमा जान्न पा, मन्पपारमा सर्वपा निगूर मना मा पा । कर्मस्मामों के समय में साम्प नाम से प्रसिदानयोग, योग नाम से प्रसिद्ध कर्मयोग से प्रचनिन थे। महियोग मानिक बना उमा पा र एम दस काता पा जान प्राप्त करो, गानो, फरे मस । दूसरा दस कहता पा कम क्रो, काम के लिए प्रयास म्पर्प है। परन्तु गीताने-'एक सांस्य प योग या परपति स पश्यवि" करत ए बानगमित कर्मयोग का सहप सर्वप्रथम ससार के सामने ससा । यी योग पुद्धियोग नाम से प्रसिद हुमा । इस पर्व योग के साप साप भगवान् मे शानात्माभों में से प्रापयान्मा का सहप भी हमारे सामने रस्सा । प्राचीनों ने ही मदर पर ही विग्राम मान तिय, महोगना भम्पय की मोर हमारा पान माकर्षित करती है। मोर मोर गायों की तरह ता केक्स सिदान्त बताकर ही चुप नहीं हो पाती । अपितु उन सिदाम्तों का मान हारिक रूप मी गरिता हमारे सामने रसती है। दूसरे राम्दो में यो सममिर कि इता मारम- निपाणन केवल सिदान्त बताते ए हा दर्शनणन है पोताराम सिदान्तों के साप माप उनका पासारिक स्वरूप स्तनाने के कारण विमानशाम।। सम्पपास्मा विषाम है। विचार पनि वैराग्य भान, ऐश्वर्य धर्मभे से चार ।, अतएव तत्सम्बन्ध से लिवायुदिए भी चार की भागों में विभक हो जाती है इन पार बुद्धियोगनिष्टयों से मम्यप का विधामाग प्रसम होता, मतरन एक विषायुद्धि का दिया गया है। यह रिम्न से महल में में ही करना कि अम्पपपुरुषक्षमता प्रामलिया, एवं पुदिपोगसपणा मोगपया इन दोनों के पीहष्णोप होने से, एक इन्दी के उपकरण मार से सोफ में प्रचलित होने से हम मश्य ही इसे मगधन् की पता कर सकते ह । भग- पाम् ही इसके गम है, मायान् ही इसके पत्त । उपद छन्द का भी उपक्ष्म । प्रपमा रम्माप पोत उपाकरा नाता है। पागिनीप म्पारण कर प्रपमाएम्म पाणिनि से एमा मार पाकरण णम पाणिन्युपत्र कागबमोण नामके परिमाण (तो) शेष के प्राय मापन मन्द थे। मतपत्र द्रोणपरिमाण सोक में नन्दोपा कराया है। मम्पप परिपाटि मामाम्मभूमिका 1 मितिपचि मम, एक बुदियोग का अपमारम्भ रुप से सहमा पा, प्रतएव म के इस पीता को भव:परी कृप्योपन कम जासकता। इस सम्बन्ध में एक विप्रतिपत्ति उपस्थित होती है। साथ ही में बह विप्रविधि ऐसी है, जिस पर निराकरण करना कठिमीन, अपितु असम्मम है। में यह कहा गया है कि भारसकप में जिसने भी दसरप्रन्प उपसम्म होते है, उममें किसी में भी मम्ययाझ का, युनियोग मिरलेपण उपलब्ध नही होता परय ही दर्शनशास्त्रों के सम्बन्ध में उक्त हेतु पाद का मार लिया बासकता है। परम्त मेद के अन्तिम मापरूप उपनिपटास्त्र के सर में यह भपूसता किसी भी एि से घटित नहीं होती । सपनिषदों में, मक्स उपनिपदों में से भपित भारपयक, मामण नाम से प्रसिद इतर विभाग में, एम सहितामाग में मी मम्मपनिष्ठा का निक पण मा बुद्धिरी अन्ययात्मसापात्कार का उपाप है, इसीका मामघुदियोग है। इस पुद्धियोग सम्मति से मी पैविक साहिल पबित नहीं है। तभी दो भगवान् मनु की-“सा पेदा मसि पवि" पा सूक्ति परितार्थ होती है। "शास्त्रीय एव सौविक अमुक लियय वेद में मही" या कहना बेद की पूर्णता पर पापात करमा है । प्रात में हम कुछ एक ऐसे पचन उद्धत परेंगे जिनसे पाठक यह अपने माप नियप कर सेो कि घेद में सम्पयमक्ष का, एवं मुरि योग का निरूपण एमा, पपमा नहीं । पहिले क्रमप्राव सहितामाग को ही सीजिए । 1-पि यस्वस्वम्म पळिमा रमास्यजस्य पे किमपिस्सिएकम । (घकस०१६) २-स न करें-श्रव्ययं पविन पाम पारया । (१०६/०६/४)। -पुनानो पे अव्यये रिचा अर्पमिश्रिपा । (श्वर सा६।।)। -पस्माम भावः परो प्रन्यो अस्ति, प माविवेश मुवनानि विषा । (यजुः १३६)। ५-पियो यो नः प्रचोदयात् । (पास )। ६-पुरुप एपेद सर्वम् (पशुःस०)।
संहिता में दोनों काही निरूपणमा सीमामा मामा मामी
पर-मन-मष्पपपसरप मक्कापक्कासार
२-भारण्यक-१-स पप पुरपा समुद्रः (ऐ०मा०राम)।
२-ज्योst मेऽसी, योऽसौ सोशाम । (ऐ००२
१-बाझगा-1-प्रम पा भजः (शत०६१r
३-पपम्पेवि पदम्पयम (गो०मा०पू०१६॥
-दिम्पो मर्च पुरुषः स पानाम्पम्बरोपमः।
६-पुप्पाम पर विधि साकाष्ठा सा परामक
- निष्कर्म पापमानः।
मोऽसन पारपानानि नदिप्यो परमं पदम् ॥
बहिप
मायभूमिया
हिसित वचनों से स्पष्ट हो जाता है।
२-पुरुषो हिमनापतिः (मु०१५)
३-उपनिपत्-'---प्रपालो ममनाः गोजरात परत पर'
Ar)
२-पराम्प स्किरिविषय खूप स्वामाविकी शानवमनिश "
-परात्पर पुष्पमुपति विष्पम् ।
-परेऽम्पप सर्व एकी मम्ति।
-पिपारिप गते पस्त सोपा
-तमा विदिताधिपस्पति।
१०-सदिशानन परिमापन्ति पीरा।।
"-पातु पितानवान मपनि युक्तन मनसा सदा।
पहिफा 21 मायभूमिका निराकरण १२-तपापेम्झान भास्मनि । १२-प्रपमचेन पेदम्प शरवतम्मयो मपेत् । . निदरानमात्र है। वैदिक साहिस में विशेषत मारमोर उपनिषधाम में पर पद पर पर-प्रम-पुरुप-सम्पयादि सप से भम्पपत्रम का, एक दिनारा मुद्धियोग का निह पण उपबम्घ होता है। ऐसी दशा में तस्मादिक गीमायास को किसी भी पति से बीकप्लोज नहीं माना जासकता । मगवान् ने पेसिक विषय का ही अपने शब्दों में निरूपण किया। पता में विमलपों का निरूपण भा है, मे वेदणससिर ।, भपूर्व मही माना चा सकता । "arमाछास्त्र प्रमाणे ते । इस उशि से मी हम इस निण पपर पहपते है कि मग पान्मे कोई नई बात नहीं की है, अपितु शाबसिन विषष का 0 मिमाण किया है। ऐसी दण में "ये मे मतमिद" इस का तात्पर्य भी यही सगामा परेगा वि वेदसिद भम्यगाम, एवं विधामपोग ही मगवान् को मप प्रिय है, मगधन् इसी मन से सहमत है। उपर "गीता" शय उपजमाव से सम्बन्ध रसता जाम गीतानिपय के प्रपमोदेशा मगधन् नहीं , तो इसे ध्योपा मही मामा पासकता । विना इस उपश्वा के इस शाम को "मगननोवा" (मगवान् से कही गई) नाम से सम्बोषित नहीं किया जासकता । बाद पास्तव में यपाथ है। मरप ही उपनिपदों में सम्पयाम, एव मुछियोग का निरूपण हुमा है । यह भी निर्विवाद । के गीताने उपनिषत्सिव विषप का ही निरूपम किया है । फिर मी गाता की भपूर्वता में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। उपनिषदों में सम्पप का निरूपण मी मा साप ही में पुरियोग का मी । परन्तु पार प्रकार के पुषियोगों द्वारा पम्पपप्राप्ति का उपाप बतलाना गम्तिा की ही मपूर्वदेन है। इस पशि से भरप ही इस शाब को रष्णोपत्र कहा बासकता है। उपनिषत् ने मिस मुनियोग का मिरूपस किया पा उस का भय निशुद्ध वामयोग समझा गया । इस भान्ति का निराकरण सब से पहिले भगवान् नही किया "मुद्धियोग शाम-कर्म दोनों का समुचप , एव पह वैराग्य-हाम-ऐचर्म-धर्म मेद से चार प्रकार का है। इस लिपप के E महिपनि * मानमिया मतिपति पर प्रम-मध्यप का सरगद सम्पप कषक है, एकधीशद इशिव सपक है। संहिसा में दोनों का ही निरूपणमा है। बीमस्या प्रामस भाम की 1, असा निम्- निसित वधर्मों से सरोपाता। १ ब्राह्मण '-या पापना (शत०६१wr २-पुरुपो दिप्रमापति' (०७IPur -पप्र.म्पति वदम्पपम् (गो०मा०पू०१॥२६॥ २-प्रारण्यक-१–स एप पुरपा समुद्रः (ऐ०मा०२।२१)। २-यो स्प्रेऽसौ, योऽसौ सोशम । (ऐ० प्रा०२), ३-उपनिपत्-1-प्रमाणो ममनाः गुम्रौपदरात परवः पर २-परास्प शक्तिरिदिपा धूपवे सामानिकी शानामनिया । ५-दिम्यो पमू: पुरुपा स पायाम्पम्वरो प्रमः । '-परात्पर पुरुपमुपैति दिम्पम् । ५--परेऽम्य सर्व एक महि ६-पुरुषाम पर विभिन सा पा सा पग मतिः। •~निपारिप गते यस्तु सोऽम्पः मे विदितातिपस्पुमति । -सवरत निप्पन पापपाना। १.-दिसानन परिपरपम्ति पीरा। 1-पस्तु विज्ञानवान मावि युक्तेन मनसा सदा । मोडलना पारमाप्नोनि वहिप्सो परम परम ।
पहिप -माप्पमित्र निराकाए १२-तपोन्मान प्रास्मनि । 1-अपमचेन बेदम्य शरवनन्मपो भवेत् । निदशनमात्र है ।दिक साहित्य में निरोपत भारमोग उपनिषायाम में पद पद पर पर-पम-पुरुष-पम्पयादि रूप से मम्पयाम का, एव विक्षनशाय मुद्धियोग का निरू पण उपबम्ब होता है। ऐसी दशा में सम्मारिकगीमाशाम को किसी भी दृष्टि से श्रीकृष्णोपन मही म्पमा पासकता । भगवान् ने वे सिर नपय का ही अपने शब्दों में निरूपण किया। गीता में जिन पर्यों का निरूपण हुमा है, वे वेश्यामसिद्ध है। मपूर्ण महा माना जा सकता । "स्माप्यास्त्र प्रमाण वे' इस उक्ति से भी हम इस मिण पपर पहनते है कि मग पामने कोई नई बात नही कही है, अपितु शाबसिन विषप का ही निकरण किया है। ऐसी पण में "ये मे मतमिर" इस का तात्पर्य मी यही सगाना परेगा कि वेदसिद्ध मम्यानम, एष विहानयोग ही भगवान् को विशेष प्रिय है, मगवान् इसी मन से सहमत है। उधर "गीवा" शब्द सपथम्पब से ही समाए रखता है। न कि प्रताविषय के प्रपमोदेगा मगवान नहीं है, सो इसे रुप्योपा नहीं माना जासकता । बिना इस उपास्ता के इस शाम को "भगवद्रोवा" (भगवन् से कही गई। माम से समोषित महीं किया जासकता । बात मास्तर में पपार्ष। भारप ही उपनिषों में भम्पास, एव पुलियोग का निरूपण पुमा है । यह भी निर्विवाद ! के पीताने उपनिपसिन विषय का ही मिरूपण किया है । फिर मी गीवा की अपूर्वदा में को पापा उपस्थित मही होती । उपनिषदों में सम्पप का मिनपण मी मा । साप ही में बुदिपाग का भी । परन्तु पार प्रकार के मुशियोगों द्वारा भम्पयप्राप्ति का उपाय पससाना पता हीही मपूर्वदेन है। इस रशि से मारप ही इस शाब को एष्णोपड़ का बासकता है। उपनिषत् ने निस पुद्धियोग का निरूपण फिया पा सस का भय निशुख शानमोग समम्म गया । इस भान्ति का निराकरण सब से पहिले भगवान् मे ही किया "युनियोग प्रम-कर्म दोनों का समुचय , एव पह मैराग्प-धान-ऐमर्म-पर्म मेद से चार प्रकार का इस लिपप के पशिष्ट • भाप्पमूमिका निराकरण -- प्रयमो ण एकमात्र श्रीकृष्ण की बनें | पनीरे उपरा से युरियोग का उस सरूप सो में प्रचनितामा । यदि उपनिषों में चम्पपानविया, एवं युद्धियोग की सत्ता मान भी सी पाती है, तब भी हम के समय में इतना वो मारप ही कहा गसकता है रिक्त पिपप सम्पा निगर ही यावेस उपनियों के पापार पर प्रयन सामों से भी माप इन दोनों के वास्तविक समय परमही पदुम सका । इस का एकमात्र श्रेय गीताणत्र कोकी। एस इसी से हम इस शास्त्र कोरगोश मानने लिए सम्पार है। सी एकमात्र भरता के कारण गीता को उपनिषद कहा गया है, जैसा कि उपनि माय में मार से बनाया जाने माग। सरधर्म के परिज्ञाम के लिए प्रमाण कणा स्परत होती है। बिना प्रमाण के प्रमाता प्रमिति का भावकारी नहीं यन सकता, बिना प्रमिति के प्रमेय की सिद्धि नहीं हो सकसी । प्रम्पण हाग ही प्रमिति पर पहुचताएमा प्रमाला प्रमेप पान प्राप्त करने में समर्थ पनना है। प्रमाण से ही अर्पप्रतिपति (निमय) होती है। साप में पर भी निति र निजता प्रमेय पार्य का हमें सम्पर शाम मोता, तक उस प्रमेप में हमारी प्रतिभा मारोती । यदि प्रमेप में प्रमाता की प्रति हमारो प्रमपनिवाससिदि कोकादीपुर।इम प्रधिका बयापार प्रमाण है। सरप्रपा प्रमाण क मापार र प्रमि हती है। प्रमिति से पाग गरर प्रमेय में प्राकिती, यही प्रमेयपाधि साम्स में कप्त कीबननी बनती। मार में रितने हा पदार्प य है, स्पाग्य है प्रकार एवं किन परापा दप प्रापी मर।सेर पो कोही प्रमेय पापा। परमारनप्रति तभी होती कि हमें पर मासूम होगपशि पर प्रमप पत्ता मे मारे लिए बाए है। इस म पम प्रमित (सम्पाद्वान) पर लिभर है। पसल सपान क सपाप में प्रमाएकी भारपाना मना मिस गाली। रियो मे गरएि "एनते ही प्रयोगाम में क्या ? उस गप सपने 4 प्रकारे सामने सारिप nt नाम ८१ विज्ञान मा मासूमिका । - प्रमायबार पैर के उस प्रयोग से कई म्पतियों का मर मिटा 1 फर्मत भौषधिविज्ञान में भाप्त भए का बचन ही हमारे लिए उक्त विज्ञासा में प्रमाण बन जाता है ।पही प्रमाणमाव की सार्थकता है। सी प्रमाण रास्प ने समय पे रस कर प्रमासबादी कर है- “प्रमाणवोऽर्थप्रतिपची प्रवाचसामादर्थवत् प्रमाणम्" ( "प्रमाणमन्तरेसनामविपचिः । नामविपत्तिमन्वरस्य प्रशचिसाम रीमाप्रमाणन सम्पयशापाऽयमुपमम्प तमममीप्सति, भिमसति गा। वस्पेप्सा मिपसा-पुकस्य समीरा चिरिस्पुप्यते । सामर्थ्य पुनरस्या फसेनाभिसमपासमीरमानस्वमर्पपमीप्सर, मिहासन् ग्रवमयाप्नोनि, मावि मा । प्रर्थस्नु मुख, इसलिम । इसा, द्वासोतुम । सोऽय प्रमाणार्थोऽपरिसमपेपा-माणमृद्मदस्पा- परिसंस्पेपस्वाद । ++++ । प्रपति च प्रमाणे प्रमाता, भमेमें, समितिरिस्पर्षपन्ति समम्मि । कस्मात् मन्पसमापायेऽर्थस्यानुपपचे । चा यस्पेप्सा बिहामा प्रयुकम्प प्रतिस प्रमावा । स येनार्य मिणोवि वर पमाणम् । योऽयः मपीयवे वद पमेपप । यर्यविना न सा ममिविश्वासपु म विधाससथवास परिसमाप्यो" (परस्स्या- पनमाप्य) इति । प्रमेपसिदि का मूसभूत पा प्रमाण प्रस्पक्ष, अनुमान, शाम मेद से तीन भागों में से भत है।रएि, श्रुति, रवि, निषप इम चारों प्रमाणों का उक्त तीनों प्रमाणों में ही भाताव रपि प्रत्याप्रमाण। अति-स्मृति शतप्रमाड, व नियम भनुमानप्रमास है।सीनों में प्रस्य चप्रमाण ही मुम्प प्रमाण है। क्योंकि इतर प्रमाणों की प्रामाणिकता प्रत्याचप्रमास पर ही बस- पित है। यदि किसी म्पक्ति से पह प्रश्न किया जाता है कि तुमने अमुकदेशमा कोजेर माते 1
पहिरका
का माध्यमूमिका -
एतमार
डापार तो उच्च में यह कहता है रिमने म्यय तो महीं देखा, परस्त रामनार से मुना था । रानास
से पूछने पर "पदस से मनायाया उत्तर मिस है। इस प्रश्नाव की या विमसा जातक
साप्त नहीं होती, बदमक शिर एमाव पर इस का मामा मही पहुच माता । उसने उससे, उसने
उससे उस पारागारिक क्रम के अन्त में जब इसे 'भमुक ने दहा पा" या पता सग बागी वो उसी
समय इस की निसा शस्त हो जाती है। इसी प्रापार पर इतर प्रमानों की मपपा शिकार इस
प्रपद प्रमाण को हम मुम्य मानने के निर तप्पर है। इस प्रवण की प्रामाणिस्ता पदभाव पर
निम, चुकी प्रामाणिस्ता सयभाष पर निर्भर है। प्रानि में सूप्पमता सम्पले भतार
है। इसी सोरता से मनुदिप का निर्ममामा।।मतण चतु को अपरप ही सपा
ना साधा। इसी पद या विरहन करानी शुशि कहती है-
"मस्पर्क पक्षुः । सस पितुः । तस्मात-पदिवानी दो रिषदमानाया।
पामारामापौषमिति । य एष मृपादाम, मिति तामा एस अदप्पाम"
(गनमा)+++ पद मनुष्यपु सस निति, यवतु । तस्मादापसाबमा
पगवमिति । य य स्वय परपति, न मानो पान्येपा प्रदरम्यान । तस्मादि
पहलीमेर नापन् । मयोतरादास्प यागुदिना मानि (पारगय)
.
पुतिमा मगर Arun theArसामन्तु सपन
मम पन मा योग प्रानरमी का माया पाचार
किन मी नमाजोपमा पर पारसको पाठ।
इन प्रमा परेकामगार पर अपना
नमामिपनि मेने
मनोमr
समाजोपाल पर मबारमग्न राम
नरमपEAनगरिसर ताण
In Amमोनमामो भारत
सरकारने
(
Oratanitarit मा ।
पियामरधि मा माप्य भूमिका - रा-भूर्षि पाप - के सामने दो व्यक्ति को है। एफ द्रण है, एक मोता है। एक करता है, मेमे अपनी मांस से ऐसा देश है, दसरा कहता है, मबी मैने सुना है । इस प्रकार परस्पर में विविधमान इन दोनों पक्तियों में से जो भ्यशि-मैने देसा है, या कहता है, उसी पर हम विपास परेंगे । पारस पतु सम, चतु भरय ही सप्प ।।+ - + । मनुप्मों में पा साक्षात् सन्म है, जो कि घनु है । इसी लिए जो यह करता है कि मैने देखा, उसी पर भदा की बासी है । यो सय देशकर फारसा , उस एक ही का कपन उस सम्बम्न में प्रमाण है। इसके सामने बहुत से, एक दूसरों के कपन का कोई मम्म महीं। इसलिए मनुप्य को चाहिए कि वा विपक्षणरती (भांसों देसी) मास ही बोले । ऐसा करने से उस की बागिन्द्रिय सरोवर सजवस से मुह होती मापी"। पूर्व में हमने झुति को शासप्रमाण करा पा । परन्तु इस प्रकार के सम्बन्ध में पान पम इसे प्रमय प्रमाण ही करेंगे। कारण इसका यही है कि जैसे, एक नो प्रामारिकता प्रमाक्षामिका रटि को है, वही प्रामाणिकता परिमसक पाप में मी नियमाम महतस्तु रएि प्रमाय नहीं है, रहिमूसक वाक्पही प्रमादप्रमाण है। मैंने देखा है' यह बा कर वाक्य है। यह वास्पती प्रत्यक्ष प्रमाग का गसकता है। प्रश का पाक्य मोता के वाक्य की मपेक्षा अधिक प्रमाण ६ एवं दय के माप की अपेक्षा खप देसमा अनुभवपुक्त सम प्रलप प्रमाण है।अपनी प्रामाणि पता के लिए अन्य शस्दप्रमाण की अपेक्षा न रखने वाला शद ही सहेतमापा के अनुशार -"शुधि' करणया है। ऐसा निरपेक्ष शब्द केवल प्रपा का ही गम्द होसकता है। कारण स्पर है। जब तक सुनने पाछे हमें कुछ सुनाते रहते है, तब तक "पिससे पुमाग इस पाप की अपेक्षा बनी रहती है। परन्तु जहां एक -"मैंने ममा नहीं देसा" पर बोस पड़ता है, खास का निवासा शन्त हो मासी है। फिर भम्पपाप की अपेक्षा नहीं पाती। इसी रास्य को लक्ष्य में रखकर मी साग्रसने श्रुति (वेद) के-"क्य श्रुतिः"-"निर पेघो रसः श्रुति मापस किए है। . प्रमाण का जो बाप हमारे लिए गुट होने से प्रति है, वही उस द्रण के लिए ६ परिणी - माम्पमित्र - शिमुनि परि है। मग मफ्नी रएिका निस नाम्प से अभिनय करता है, या भमिनीयमाम पास वहाँ उसके सिर पर ही हम सुनने वालों के लिए सुति है। हम अपनी अपेक्षा से जिसे युति करते हैं, वस्तुतः च की अपेक्षा से पटिहै। फबता मन्ततोगत्व पनि- मुति अमिम पदार्थ न नाते हैं। दष्टि प्रत्यक्ष है। फसता मुति भी प्रत्यक्ष है । प्रकारान्तर से पों सममिए शिसमस्पप का नाम है। प्रत्यापण प्रवामपने प्रलय का बिन हम्मों से ममि- मय करता है, यह शरद भी इसकी शिनी। हमारे थिए पास्पसमा कारपि परप्रस्पयाम इसे मन परान प्राप्त करते है । मतएव द्रा की रशिप इस वाक्य को हम अपनी मपेषा से मुनि ही करेंगे। देसने बासा माने,रह भयं को करता है एव समने बसा उसे समता है। मोत्य के सुनने के कारण ही या दाम्प श्रुति करवाया है। जिस प्रकार प्रप्य की रति सत' प्रमाण, एपमेव परिणतिपादक प्य का मास्प मी स्वत प्रमाण की। अपनी मांसों देसी पातु के लिए जैसे अन्य प्रम्पण की मारपस्ता नहीं बसी, एवमेव मासों दरने पास के मास्य पर भी भरिपास नहीं किया बासमत्य । मनमामणरुप बाम्प प्रथमहर्षियों के पास है। भस्म दारि मसापावावधमा सामान्य मनुष्यों के हित के लिए सापादातवमा मारियों में अपनी दिम्परवि से प्रतीद्रिस्तावों । साचात् कर निम मत्रपापों को हमारे सामने रस्सा,पी हमारे लिए मत.प्रमाण युति ।। मन्त्रामणामा पद सापावासपमा शमा पियों की रवि का ममिनय करने बासे है। मतप "प्रप वि स मत समय के अनुसार हम भारप ही उक्त वेदराशि को सत. प्रमाणतियात करने के लिए तपार है । वेद का मपर मदर हमारे लिए साक्षात् प्रपतप्रमाण है। उसके यस्य को न पानने पर भी उसके मागेकोम मप्रमाण नही मान सकते। पर प्रमाण पर यही मक्षिप्त निदान है। •सापरली पात्रोमनापासवर्गम पपन पत्यार सप| (भारनियम)।
बर्गर का माम्य भूमिका रमिति भब अनुमानप्रमास का विचार कीजिए । "श्रौतुस्प स्पतिः" इस भपण के मनु सार योता कम पम्प मप्रा ही सति करता है। मनुभमहित मस्कार को ही "स्परि" कहा मध।बम अनुमवाहित संस्कार पासना करता है । म बासनामस्कारपुल दी मागे माकर स्मृति का स्नक बनता है, मतपय सापपन्याप से पासनासंस्कार को भी सिसिका दिया जाता है । भोला बोपदमनसा है, उस न लिपय का उस के प्रहानमन पर संस्कारो माता । मापे जाकर मत्ता जब कभी कुछ मोसता है तो अपने मस्कारों को ही माधार बनाता है। मेस्कारात्मक मैचित विपस का स्मरण कर केही पर उपदेश देने में समर्प होता है। इसी स्मृति किंवा स्मासमा के कारण मोता का पास्य मा 'सति" काचाता है। दसने माले का बास्प यहां भूति है, वहां सुनने वाले का वहिपाप हमारे लिर स्पति । । श्रुति सताप्रमाणतो सति परत.प्रमायो। प्रणा का अमिमय हम मोतामों के लिए श्रुति है। भोता का प्रमिमप मम श्रोतामों के तिर पति है। दया भपने बाप में से 'तममान' नता हुमा भात है से प्रोता मपने भास्प में मसरमपान ।, ममता प्राप्त हारा भुन भर्य का स्मजा माम है। दूसरे शब्दों में १उसका प्रस्तक नहीं है, भपित प्रचक भाम के काम का मि तामाय । इसीलिए इस अभिनेता की बात तमी प्रामाणिक मामी गसकती। जबकि पर बनाता के अनुक्स हो। प्पात् झोता की बात पर पूरा नियाम तभी होता है मारिया मपने त भर्य को प्राप्तप्रमाण से मुक्त मतवा देता है। मोटा मोकदमाता, उसकी मपमी मोम नही है। मपितु या परप्रत्यपरीका भमिनपरतारामतएप इस न पद मास्प मप्रमाण के लिए बारणतरप्रमाण (तिमप) की पपेश रमतामा पासप्रमाण ही माना जापायाभुत प्रत्यपालिका रशि से सम्म या, स्पतिकी से सम्बन्ध है । मापक रम से अनुम्पमप्रमाण १६ सका है। पारग्म में परि प्रपद मनुमान निकष पद पार ममाग्न पनवार 07न में ररि तोहाभों के लिए ही प्रमाण है। मप दासकर, परीक्षा कर के ही उसमरपदी मापता पर पहुगत है। अधि प्रापएममारा, सति भनुमानप्रमाण। -- पीपी - माप्पभूमि प राय, निबन्ध । निपसिन्यु पमसिम्पु, प्रविफ, मापारविषक, स्मार्चसंग्रह, स्मारकरफ शुद्धिमप्स मारि प्रत्यी निवन्ध नाम से प्रसिद। । श्रीत- स्मार्ट पपनों में हमारी माता कारण गोहमे भरोष प्रतीत होता है, उसे तक-न्याय द्वारा दूर कर मो एक मिति म्परपा हमारे सामने एक्सी जाती, या परमासमायण मी निबमारे सम्पूर्ण कर्ममा म निब पापों पर मम्मिा । सलमान की सिद्धि के लिए इन चारों प्रमानों के भाव प्रमश का सर्पमा समाधी समझना पाहिए । यो विषय टत पारों प्रमायरों से पिता का भापमम्तान की जि में सर्वपर उ मत प्रसाप ६ मतपय सर्वथा त्याम्प है | मरतर्ष । उह चारों को समझान में प्रमाण समता हो, परमव मही।। अपितु ससर का सारा सम्प सम्यग समनिसप मेंनी प्र भागों का शिष्य है। मी प्रमहरि को सबभेष्ठ प्रमश मामा । उनने वाले के आप की पपेश देखने वाले गलको विशेषरूप से प्रामाझिक मानता है। उनने वाले वाक्य पर पतमी मिपास करता देख उस पा माप देसने वाले के मास्य के अनुकूल होता है। यदि दोनों में परस्पर को निरोज प्रतीत होत तित-पाप की कसोटी से एक सत्र लिन्तु मनुमस निमप निकाला। इस प्रकार प्रमाणाने में हम एक है मत मार्मों में मन्तर है। मारतच के मायिन निशानारि से इको रि-श्रीमान नाम रमर, स्वर देलों में इस मुसाशिका मा। । देव का मामय होने से भी मति मोत्य का पाने से सवाति- स्मति मामों का ही गुप्त वापर मनचले पथिमी महान् इस सस्प को न बामन के कारस मुति शद के सम्बन्ध में अपने या उभार प्रकट करत वेदकास में सिपा समाप वा । मालोग कण्ठ करके हरी, एम मना काही वेद की रक्षा करते थे, मारक समकार सम्पापम्प (वेद) भुरी माम से सम्बोषितामा ! Raरास्पार्प से लापाठकों को शिक्षित रोगपा होय कि इस सम्मान में पमिमी विशमान रितली मपार मूत की।। मार्पियों में किसी गुत पस्प को मुक्ति करने लिए वेद को निस मुति शम्द से समोधित किया, उस - पहिणी l माप्पभूमिका - पिमातिपात - के सम्बन्ध में वेदववरहस्पामभिन्न पधिमी विद्वानों में उठ काग्ना की। मा धर्म है इनकी पान मुरि पर, एक महा पाथय । इन की हां में मिसाने बासे उपर मोगी पपमा मा रतीयों की समुमि पर । उक्त प्रमाणचएपी के भाधार पर मैं भय या चार कहना है कि गीताशाम मत प्रमाण ६ प्रपया परताप्रमाण । यपपि गीता प्राचीनों की ररि में विशाल ही मामा गया है, और यह मत्तम्प किसी ए से ठीक मी है। फिर भी अपने चतुर्विध पुद्धियोग क सम्बन्ध में हम गीता को मुविमर्यादा से मी एकाम्वतः बाहर नहीं निकाल सकते । गीता- मिपपरेका भपूर्व रा है, एवं दया का पाप ही पूर्वोक्त पणानुसार मुति।। फसत भुतिस्थानीय गीताशर का सत प्रमाण सिम हो जाता है। यही कारण है कि वह सामान्य घि से गीता स्मृति करती है, वह इसे उपनिषद नाम से मी सम्बोधित किपा गपा है। प्रा पीमों के मतानुसार उपनिपत् शम्द एकमात्र वेद के अन्तिम भाग का बाधक है। गीता को उपनिषत् करमा हो पा सिर करने के लिए पर्याप्त प्रमाणवि इसके प्रपम प्रमाता श्रीरप्प हो । नब गीताशास्त्र भीरुप्योपड़ी तो भवरय ही इसे भाबडीत करा मासकता है। मिनिवेश की विकिसा वय प्रक्षा मी नही कर सकते । यही दणीय शम्द के सम्बन्ध में है। पपि विप्रविवि का उक्त कपम से मसीमति निराकरण हो पाता, फिर मी वेदामिनिविए निवाम् इस निराकरण ने मानने के लिए तप्पार मी। उन घ वो यही दगमा है कि गीता में मगधम्ने बिस मम्पयाम, एव पुरियोग का निरुपम किया है, ५ पहिले से ही उपनिषदों में मिपमान है । मगपन्ने भपूर्ण कुन्द नही करा, अपितु वेदसिर पप काही उपमृरण किया है। सब गवाण मीहप्पोपड़ नही है तो इसे मगहीता मामसे सम्बोधित करना भी सचित म। । इस प्रकार गीता नाम के सम्बंध में उल विप्रतिपदिक स्ये "पुनम्तवानपमितो पेनाम " पा सक्ति म गाती है। पेदमाशों का कहना है कि गीता की तरह सपनियों में मी सम्पयाम, एक मुन्द्रियोग का निरूपण भा है । परम्प काप है, मक्षरान कारय ।। मम्पग्राम कार्य है, एक म १ - प्रतिपय वरप - मानभूमिका मगरको। इसी मापार पर-न करोतिन मिप्पो" (गीताश.) यह करा गाता । "नवस्प काप फरण घ विषवे" या उपनिप्रकृति मी पट शब्दों में अपना रणातीत इसी भम्पप का रहस्य बता रही है। भा, मुग, स्वा, पर जना, प. या मोक है।६ भों की मूसप्रतिष्ठा सस्मारमरूप भम्पप है। इसी के भापार पर एको रस प्रतिमित है। पी सस्मात्मा मध्यपपुष जैसा कि-"यो लोकनयमाविश्य रिमर्सम्य पर" (गो०१६पारस्पादि से पर है। उपर-"ममस्प पे किमपिस्सिंदेकर ' (ए संदिग) इत्यादि मन्त्रभुति भी इसी अर्प का समयन पर रही है। "प्रमोऽपि सम म्पपास्मो" (गीता ४६/--- ) के अनुसार अब शद मम्वप पासप्रकार मत पम पर, अपत पदाप भवरापम्पय म् एव सम्पत दोनों से परे ।। मरे राणे पर मपर है। पर से पर, एष मम्पप से मार, अतर पर माम से प्रतिम भर मप्र में है। मदरसे पर, अतएप पर माम से प्रसिम मम्पप उत्तम टि में प्रतिष्ठित । “परस्तस्पातु मागोऽम्मा" (गीता. २01)- 'उपमा पुरुपातम्या" (10) 'पस्माद रमनीतोऽमरादपि पोचम" (मी०१५1१1) 'अम्पकोऽवमिसाए' (सादि सपन नाप कर ही धरण बरहे। उपर- 'प्रपा परत पर" (मुगका २१।२०-"परेऽम्पये सर्व एक मान्ति" इसादि उपनियम भी इसी सिसात पारित कर रहे है। गीता सम्पप के समय मोक्ष कर रही या सब उपमिप में परिसे से विपदम है। पही भाषा मुहियोग काममय के साप मुखिया योग करमा पुरियोग ।मरे गणे मुक्षिा पपप के दर्शन कर मना दियोग ।। स से सत्रिभ ब-यमित रोबर्मा मुपिनी मुहिगार कि. गामो समुपमाप परमापित है। मपा पीरा रिमाप प्रा पनि प्रामा। नपर विक्षिणानिमापनि माम्पः पन्या रिपोऽपनाप । परति गौरमापरित, पारिवान् ।
परिपाटि *Blमाध्यमूमिका । निराकरण -- स्प दि शम्द मुदियोग ही सूपक हैं । वेद भी गीताशाम की सरह केवट साम, व केपस कर्मपद का लरोमी १ । प्रत्येक कर्म के उपसगार में एवं विक्ष" (ऐसा पानने वाग) इस पानसूपक वाक्य का सन्निवेश रहता है। यही नहीं, मिस गीता ने "एक सास्य च योग चपः परयवि स परयति" (गीवा० ३।४।) "न फर्माणामनारम्माभैप्फम्र्प पुरुपोशनुते" (गीता०11) पारिरूप से सांख्य-(हाम)-पोग-(कर्म -सपण मिस मुखियोग को मास्मोप पारक पतसाया, सय उपनिपत ने भी स्पष्ट शनी में सी उमपसक्षण पुदि रोग का समर्पन किया है, जैसा कि निम्न लिखित उपनिपाचनों से सरको बाता- कृष्णा-मजा-मयं-दास शिपदो हप एप प । एमिपिपिनिर्मुक्तः स भीषः शिष उप्यते ॥१॥ सस्माहोपविनाशापमुपार्य क्पयामि ते ॥ ज्ञानं कपिदन्यम फेयम वन सिदय ॥२॥ योगोऽपि भानहीनस्तु न समो मोपकर्मणि ॥ तस्माम मानं च पोग प मुमुखरमम्पसेट (योगशिसोपनिषद) इस प्रकार उपनिपदों में विस्पष्ट शब्दों में सम्पनमविषा, एवं मुदियोगनिया के सिप माम राते हुए पपमपि तत्माविक गीतासचे श्रीप्योर महीं मामा बासका। सपमुप विद्वानों का उक्त वेदाभिनिपेश भौतिय से समाप रमता हम भी वेद मात माते इस मौलिकता का पूर्ण समर्थन करते हैं। वास्ता में गोतोक विषयों का निपदों में प्रप्पात निरूपण मा। ऐसी दण में प्रतारापम्पहार पो रक्षा के लिए समाप ही पिसी पम्प उपाप पर पामय सेना देय पर उपाय भीती उपनिषत् एव स्माची उपनिपत् फा पृषाण । भामनिपा को उपनिषद का गाता है । इस उपनिषद्ररूपा मारमनपा का प्रतिदक शान भी उपनिर राम से ही पानामा पर उपनिषत् श्रीती, स्माची मे
परखी
का माम्पमूमिका
ATATU
.
कार। इसी मापार पर-"न करोविन पिप्पते" (गोनाशरा) या करा गाव
है। "तस्प काप करण च वियते" या पनिण्कृति भी १४ शम्दों में काम कर
रातीत इसी सम्पय का रहस्य बता रही है। मू, मुा, स्वा, पा जना, पप
मोकरम है। यों की मसप्रतिष्ठा समारमहप भम्पप है। इसी के माधार पर को रम
प्रतिमि है। यही सस्थामा भम्पपपुस । जैसा मि-"यो मोकायमारिय विमत्सम्य
पर" (गो०१७स्पदि से । उपर-"ममस्य रपे किमपि विदेशम् ' (कर
महिप) इस्पादि मन्त्री भी इसी मप का सपयन कर रही है । "प्रमोऽपि सम
प्पपात्मा" (HI Y६.) अनुसार मा शम भम्बप का हक है। सीप्रकार
KE A पर, अम्मा पाप पदर। पम्पप य र सभ्यत दोनो से परे है।
हमरे
घर पर है। घर से पर, एक भम्पप से पार, मार परावर मान से प्रसिम
भार माप रे । मन्नर से पर, मारव पर नाम से प्रसिद्ध भम्पप उत्तम बोटि ३ प्रति पुन
। “परमामातु मानोऽभ्य (1001)- 'रामः पुरुपान्या" (110)
'पस्मान घरमतीतोऽरयवरादपि पोषम ' (गी.११) 'मम्पत्तोऽमिसाए:
सापन सानप या शरण बरस । तपर-"परान् परव पर" (मुग।
२१२२-"परेऽप्यपे मर ए0 मान्नि" सारिवानिएपन मीसी सिमाप्त पाए
रामम्पयरे सब मे मो पुल करीस उपनियों में परित से
पिपर
पही माण पुदिपेग की । बसप माप युरिना योगदानापुरिये
।। मरे पण में पुािरा प्रत्यय रन पर सेना हरा पाया है। इस से सकिर
- Hrma कर्म का सपिराधिपेगापिक
बरगी मुबयर पर मासिर ।
मा पागे रिमाग भुन माप्रपा
नपर शिदनानिमायुपनि माप: पम्पा रिपोऽपनाप ।
पर पर, वरनिगामापीठ, पाitie'।
.
पीपरी आमाप्पभूमिका II रस्य.दि सम्म बुद्धियोग के ही सूपक है । वेद भी गीताशास की तरह के हाम, ९५ फेवस कर्मवाद का विरोधी है। प्रत्येक कर्म के उपसार में एवं नि" (ऐसा बामने पाण) इस बानसूरक नस्य का सन्निवेश रहता है । यही मही, मिस गीता ने "पर्क सास्य च पोग चप परपति स पश्यति" (गीवा०३।११) "न कर्मणामनारम्माष्पय पुरुषोनुवे" (गीता०11३) इत्यादिरूप से सांस्य (काम) योग (कर्म आपण जिस बुद्धिमोग को भामोप कारक बताया है, स्वप उपनिषद ने भी स्पर शराम सी उमयक्षपण पुदिरोग का समर्पन किया, जैसा कि मिम्म विसित उपनिपायों से सपो जाता है- एप्णा-मजा-मप-पास विपदो हप एव च ॥ एमिदपिरिनिर्मुकः स जीपा शिम अप्यते ॥१॥ सस्मारोपरिनायायमुपायं कपपामि से ।। ज्ञानं कपिदन्यम फेबम धम सिद्धये ॥२॥ योगोऽपि शानदीनस्तु न समो मोचकर्मणि।। तस्माम् मानं प पोग प मुमतमम्पसेत् (योगशिसोपमिपत्) इस प्रकार उपमिपदों में बिस्पष्ट शब्दों में सम्पयामविषा, एव मुश्यिोगविष्ठा के विष माम यते एमपि तवमादिक गीताशाबो श्रीप्णोपत्र नहीं मामा सकता। सचमुच विद्वानों का उक्त वेदाभिनिमेश मौखिकत्ता से सम्बन्ध रखता है।इम मी वेद भाल के माते इस मौलिकता का पूर्ण समर्थन करते हैं। वास्तव में गोतोल विषयों का उपनिपदों में प्रप्याप्त निरूपम मा है। ऐसी दण में गीताशम्दम्पसार की रक्षा के लिए म ममय ही किसी पम्प उपाय का मानप लेना पड़ेगा । यह उपाय भौती उपनिषत् एन स्मार्ण उपमिपत् का पृपकरण । भात्मनिषा को उपनिषत् कहा माता है । इस सपनिषद्रपा मात्मनिपा का प्रतिपादक णन भी उपनिषद राद से ही पाताभा । पर उपनिषस् प्रौवी, स्माची मेद .
दिगार - मायमूमिक से दो भागों में निमत माननी पड़ती है। वेद को मन्तिममानहरा ई-केन-कमदि हायमेद से मनेकपा निमक्षा उपनिषत् मोती उपनिषत् है । गीता यथपि स्मृति है, परन्तु जिस गीताधार्य ने अपने फम्मों से अपने माप को एक मनोकिक मामय पुरुष सिद्ध किया। उसके द्वारा कही गई मीता उपनिषत् से कम मत नहीं रखती। मपश्य ही गीतामिवय के भगवान् प्रत्पषमष्य थे। इसी मादरमाव के घरण मध्यात्मविपाप्रतिपादिका मीतोपमिप स्मार्ण उपनिषत् करने पोम्प है। इस प्रकार हमारे सामने दो प्रकार की उपनिषद उपस्थित हो जाती है। इन दोनों के पृषक करण के विरही इसे मगरमोवोपनिषत् नाम से म्ययन करना मानश्पक समा गया । भौती उपनिषदे सामा नियत समय से सम्मान रहती है। ऐसी दशा में परि गमता का केस उपनि पत्" पाही नाम रस दिया गया तो श्रम होने की सम्भावना थी । अस्पुक्त भात्मविपाका प्रतिपान करने के कास पर उपनिषत् माम से पश्रित नहों की मासस्ता । साचात् मुवि न होने से इसे केरस उपनिपद शब्द से भी प्यास मी किया जासकता वस्तुणस्तु भीती तपमिपों में भी पार स्पारक मे प्रदर्शन के लिए प्रत्येक उपनिषत् के साप ई-केन-कठ इत्यादि शब्दों को म्पसार में गया गपा है। इसी मैदम्पबहार की सूचना के लिए अत्यपानुसारसी इस स्माचा सपनिषत के साप भी मगपत् -मिता इन दोनों शब्दों का योग करना मावरपक बोबावा।। माप परम करेंग कि परि "गीता" शब्द का एकमात्र पडी प्रयोगमपातो फिर इस उस भनोस्पान में ' मका-कपिता ' इत्यादि सरस शम्दों में से ही पिसी एक का सम्बप क्यों नही मोरपिा गया ! इस के सत्तर में भी पुषयरप।। गीता राम्द का अर्थ है गाई"परिसे से मिपान पप में सरकारी सतरने से बड़ी पप गप रूप में परिणत रोपाय है। 'गीविपु सामा मपा" इस दशमिक सियाव के ममुसार गेयभाग सामवेद, स एन्दोबत पप सम्मे।। एकही मन्त्र को निगुपित करने से भी सम्मन्त्र साम बन जाता है। मितने समय में एक अामन्त्रमा उपारणोता, टीक उस से निगुणित समय में परिमाप नस पकही मन्त्रका सवारण करना ही प्रमाय प्रस्नम्म म पग कर साममन्त्र करतापगा, जैसा कि- "मुपपूर साम गीपने" "ममा सम मेने तस्मात् साप" "पिप साप" इत्यादि सिद्धान्तों ११ पारिकरधि -I माप्पभूमिका निराकरण - से स्पष्ट है । संकुचित भाव को फैगामा ही पन है, पप को फैलाकर घोसना ही तो गान है। मन सन्द प्रत्येक दशा में संकोच को मसप्रविष्य बनाए रसता है। यह सच है कि भगवान् ने मपनी इस स्मार्थी उपनिषत् में नमोन कुछ नही पतसाया । पास्तु फिर भी यामान लेने में किसी को कोई मी भापति मही हो सकती कि घौती उपनिषदों में जो विप० सूक्ष्मतम भाषा में निरूपित एमा, सस का मग गन् मे म्यावहारिक रूप देते हुए बड़े मिस्तार से निरूपण किया है। उपनिपत् का सप वहाँ सम्पूर्ण भास्मप्रपञ्च है, वह गीता का मुख्य भक्ष्य पम्पय है। यदि सरी पि से विचार किया पाय तो उपनिपदों का प्रधाम सक्ष्य परात्पर ही। मम्यप को प्रधान साक्ष्य बनाने पासी, एव चतुर्विधनुपियोग का पूरा स्पष्टीकरण करने वासो तो एकमात्र पह स्माची सपमिपत् हो।के भीकृष्ण इस के द्रण थे, इसलिए तो इसे उपनिषत करना पाय संगत है । साप ही में पद श्रीहप्सोपा ही नहीं है, इसलिए इसे गोता कहना म्पायप्राप्त है । गीताराम्द लितान (फैसामा माग का ही पोतक है। जो मध्यप ब्रश, एक जो चतुर्विध पुद्धियोग भीती उपनिपदों में सर्वपा संकुरित होने से पपरूप बन रहा पा रही मगवान् के द्वारा विस्तार में पाकर गेपरूप बन गया। बस इसी वितानमाव का सपित करने के लिए इसे कपिता, उता, इस्पादि अन्य किसी शम्दों से म्पपात न कर विसानसूस "गीता" शम्द सम्बोधित किया गया। स्मरण रतिए, गीता शम्द सर्वपा पौगिक है। पारिषद इसे मोगरट नहीं माना जा सकता। पर जिस प्रकार कमलपुष्प का माम मामा गाता है, से "गीवा" इस का माम मही है। पिता का मर्प है भगवान् श की गई । गीता सय किया गम्द है, एक पौगिको। मत एष इसे उपनिपत शब्द का विशेषण ही माना जासकता है। वयं म्पास ने एक स्पान पर गीता के इसी विरोपखभाष को प्रकट किया है। दखिए ! समुपोरेपनी कुरुपापरपपोपे । प्रजुने विमनस्के प गीता मगवता सयम् ॥ (म० शब)। पही कारस पि मण्याप समाप्ति पर-"मगरनीवामपनिपत्सु" पर निदिए पता है। यदि गीताराम कट होता तो "भगवद्रोसायामुपनिपत" यह मास्य यता । इस प्रकार 1
परिणाष्टि
10 माप्य भूमिका
मिरासरण
ग्वायम्द के मा निर्वचन के अनुसार पपपि मा शम पौगिक मा हुमा रोषणही,
तपापि अपनी मपूर्णता के कारण या भागे पाकर इस स्माची उपनिषत् में निस्ट भी बन
गप। इसीलिए विवसमाम में पर "गीता" नाम से भी प्रसिब होगई है। केरत गीता
का नाम लिया जाता है, पहा मागीता, समता, शिषगीता माति मम्प किसी गोवा पर पान
म पाकर एकमात्र मगवडीतोपनिषत् की मोर ही हमारा ध्यान माकर्षित होता है।
इति-गीताशब्दरहस्यम् ।
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परिपपी मा भाप्पभूमिका । उपानिपत् ३-उपनिपन्छन्दरहस्यम् - इस सम्बन्ध में हमें विशेष घलन्स मी है। कारय उपनिपदिशानमाम्यभूमिका में उपनिपत् शम्द पर पूर्ण प्रसारा गया बापुकारे । केवल प्रकरणसङ्गति के लिए सक्षेप से कम कर देना ही पर्याप्त होम् । पूर्व के गीतानामरहस्य में यह पतलाया गया है कि निस सकार इश-केन-कठ मावि उपनिपर्दे औती उपनिपर' करती है, एकमेव वाया को हम 'स्मार्ती पनिपत' कर सकते हैं। इसी समय में मारे सामने एक प्रश्न उपस्थित प्रोब है। मास्मानिया जिस पन्थ में स्तवाई गाय, ही मन्य उपनिषत् । श्रौती उपरिपर भारमविषा का निरूपम करने के कारण। 'उपमिपत्' माम से म्पकात रें। दूसरे शम्में पों करना चाहिए कि मास्मनिपान की उपनिपट सन्द का भवरेरक है । मेरक तत्व को भिपछेदक फहा मासा है। मेदक दी उस पदाथ को मन्य पार्यों से पृपक करके दिस- माता है। पदि भेदक म हो तो किसी पदार्थ का सरूपवान टीम से । सर्वसम्मत न्यापास के "यकिचित्पर्पितापरदकापकिय सदस्य शक्ति" इस सिदान्त के अनुसार प्रत्येक शम्र किसी न किसी पदार्फताबदकापक्षिम में ही सम्पर बनी। उदाहरण के सिए गो शब्द को ही सीचिए । गो इस लिए ये है कि द इतर पदार्प नहीं है। मिस मानने गो को इतर पदार्थों से पृपा कर के हमारी प्रवीति का विप बना गठा, पहरी मार मेरक, मादक, किया प्यापक करवाएन । ममय ही गो पदाप में कोई ऐसी विशेषता है, जिस कारण तारक गोशम्द उसे पम्प पदार्प महीनने देता । वही निरोक्ता म्पायस में --सम्पूर्व प्पविषयों पर 'उपनिषदिशानम प्यभामका" भाम का एक सत्र पस मन है। वा अन्य दो भागों में एक साम पूर्भ में प्रकाशन हुपा है। मापमूमिन "क्या उप निपद पर है। इस प्रश्न का मामांसा में से विस्तार के साप पानर राम रहस्सा प्रातिपा- पिता है। निरोष पिता रखने पाहों वही पराप बना चाहिए ।
परिकारी । माप्पमूमिका - मात्मारमा 1 - 'गो' (लोपना) नाम से प्रसिद्ध है। ग्रेच क्य बस्तु है, इस का उत्तर 'सास्नापानसमस्वप' है। प्रीवामानास्प स्मास्ना (सो), व पुलमाव की प्रेकच मोज । यी मोपकर इतर पदापों से मेद करवाया है। मोशम्द सारनासाहलमच मोल में ही अपनी सकि रम्मा है, मोल ही मोरामद कर मादक है। इसी मादक से पदम पाता राम मोपदार्म गो शम्द के पति और किसी शब्द से अभिनय में महामासक्ता । निदान मात्र माप निव, भी शम्द सुनते हैं, बामते है, पता है उन सब के साप (प्रत्येक साक) एक एक स त्र मारक बगामा है। पह मारक ही शब्द की महामफादा।। मोरक के मत पर ही मप्रिम शम्द को किसी निपत भय का प्रतिपादन करमा परवाए। इससे हम इस लिथप पर भी पहुच गाने है कि ससव साहिम में जिसमें मा शम्द , सब स्तम्भ माँ बापक है। कमरा शरदसरूपमेद पाछेदकमेद का हेतु एष भरपदक- मैदही तबघ मेदक है । ऐसी दण में सप्दों का परस्पर में पप्पाप सम्म माम मैठना -पाय एष विज्ञानर्भर से सबपा मगुर है। बो एम्द सिमर्प का मचक है, उसी मर्प कर मापक है। समस्त पिप में ससके गोर का सी माव कोम्यक्त करने बाग भम्प शादमही मिलेगन । यम पौर दागरपि कमी भमिप्र.क नही बन सकते । इन्द्र और हत्या को कमी पर्याप नहीं मामा जासकता | मप्णु और मापक को एक साता समकना मपाः भूव। मिथ्या एप ममृत का पर्याय सम्मान कमी बन ही मही सकता । मूर्य एस सरिता को पर्याप माममा पिसी मि से टीम नहीं। यस्तु प्रान्त में उह मरफेरक मीमांसा से पतमाना ही है कि उपनिषत् शम का पो को मारक होम, उसी के अनुसार उसी मादकप्पिम का षिका (उपनि- पत्गद को) बावक मानना पडेगा। इति उपनिषदों में प्रमानाप से भामभषा का निरूपण दुपा, मन भास्मविपार को राम उमतिपत्र मागोदर मानने के लिए स्पार है। इस से जो भी मप मामनिया का निम्म्ण करेगा बही उपनिषत् नाम से म्पका हो सकेगा। पनि दमों में भी मामनिया का रूप मा, परन्तु दरामापिसे । परान भौर हिसार में पीररि मा माप्पमूमिका - पदाम्तस्व महा मम्ता है। ऐशो दशा में मायरियाव के साथ हमें मनशम्द मोर जोबना परेन । विज्ञान समास प्रामविपान कोही उपनिषत् का मादक कसा मापन । यह भबछेदक मयादा जिस प्रकार यश-केन-कठ प्रादि उपनिषदों के सम्पम्प में घटिन है एवमेव विमानसात मामविया के निरूपण के कारण ही मर्यादा उसी प्रकार गोतासास में मो चरिताप हुई है। मत हम अवश्य ही मीना को स्मार्ण उपनिपत् कर सकते है। इस प्रकार पोपी देर के लिए पदि रिशानसात माग्मविपाल को उपनिषत् का भव परक माम लिया जाता है तो गीता को उपनिषत् माम से पास करने में कोरे भापति मही रहती । परन्तु ऐसा माम लेना प्राचीमर से सषपा मसगाव है । यह ठीक है कि उपनिषदों में विज्ञानसात भात्मनिषा का ही निरूपम मा ।पा मी ठीक है कि जैसा भी इसी माननिय का निरूपण कर सी है। फिर भी गीता को उपनिषत् नही कहा जासकता । कारण रपए है । उपनिषत् राम्द का भरपेदक है वेदान्तत्व । मन्म-वासर-मारण्या- उपनिपट सप से मन्त्र-मसारमक घेद के चार विम्ग मापे गए हैं। मत्रमाग विज्ञान- स्तुति-रविदास का निरूपक है, अक्षण कमकाण का, मारण्यक उपासनाकाका, एक उपनिषत् बानका का निरूपण करत है । पूकि झनयोगप्रतिपादक उपनिषत् वेद का अन्तिमभाग है मतएव इसे–'सबै पेदान्ताः' इस्मादि रूप से म्पासादि प्राचीन पाधापों ने पेदान्त नाम से सम्बोषित किया है। व्यास विरचित सुप्रसिद्ध शारीरकसूत्र इन वेदात स्सों (उपनिषतयों) का समयप करने के कारण ही वेदान्तदशन नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रकार उपनिग्रत् राम्द एकम्पत्र मुप्रसिम् वेद के पतिम मारूप परिगणित इणादि उपनिषदों में ही नि। पर गीतागास उस वेदांत मपादा से सपा बहिर्मत है । गीता कमी वद काम तिम माग मही है। ऐसी ही में वेदोत्स्व भर केदक की मर्यादा के कारण हम किसी भी हा- सत में गीता को उपनिषत् नहीं कर सकते । इस मप्रतिपछि के समय में विशेष न कर कर में केवल यही कहना है कि गीचा विस म्पति के द्वारा उपदिएई, यह को सामाम्प म्पत्ति नहीं है। उपनिषत् को वेद के अन्तिम माग में ही निरुत मानने पाले मप म्पासादि ने परिपाटि • माप्पभूमिका - अरमाया 'गोल (मोपना) नाम से प्रसिद्ध है। मोव क्या बस्तु है, इस का उत्तर 'सास्नापासमतप' है। मामामस्प स्मास्ना (सोस), व पुपमात्र ही मो का मोला। पी मोपदावर पदापों से भेद करवा रहा है । गोशम्य सामाग्रहसमय मोच में ही अपनी शक्ति रम्मा है, सोच ही मोराद का मादक है। इसी मादक से पादिम काता मा पदार्य गो राम्द के मतिफ और किसी शम्द से भभिनय में नही मासक्तः । निरन मात्र है। माप मितनं मी शम्द सुनते है, मानते हैं, अपना है, उन सब के साग (प्रस्पेक साप)एक एक ना सत्र मवरक मा पुमा है। यह मारक ही राम्द की महामया। मापक यस पर ही मामिम शम्द को किसी नियत भर्प की प्रतिपादन करना पड़ता है। उससे हम इस नियम पर भी पहुंच जाते हैं जिससात साहिस्स में मिले भी शप बस रक्तान भषों के ही पक। कारण राम्दखलपमेद मादकम का हेतु, एष मादक मददी वस्तुनाव का मेदक है। ऐसी दशा में सदों का परस्पर में पप्पाप सम्पप मान बैठना त-म्याप एक विमान से सम्मा भगुर है । रासद सि मर्म का समरे, र उसी मर्ष कर काचक है। समस्त विस में उसके गोकर उसी मात्र को ग्यान करने काग भम्प गद नही मिलेगन । राम और दाशरवि मी अमिम.पक नही बन सकते । गा और या को कभी पर्याप नहीं मामा जासकता । विष्णु मोर मारपस को एक वस्तुका सामना भयार भूरो। मिम्पा एय भक्त ध पयाप सम्ममा कमी ममी नहीं सकता । मूर्प एस सामना को पपाय मानना किसी शि से टक नहीं। मस्तु प्रहात में एक मदरू मौम से मसाना यही है कि उपनिषत् शम्म कामो को मारक होम, उसी के अनुसार उसी प्राकानपिनका विष का (उपनि- पतराम को) प्रबक मानना पड़ेगा। कि उपनियों में प्रधानमप मे मामनिया काही निरूपण उमामा मामनिवार को ही हम विपत् का मादक मानने के लिए सम्पर है। इस लिमे जो मी प्रत्य मामीचा का निवास करना ही उपनिषत् नाम से पास हो सकेगा। पपरि दरामों में भी मामनिया का निरूपण है परम्त दण्माधि से । दराम और निशान में परिमा ॥ माममूमिका :- बभयोग मुस से पार्निश गीता का माम्प प्रकट होता रहता है, वे मो म्यासपीठों पर प्रतिष्ठित होकर उप देश देते हुए सज्य का अनुमब नही करते।यवस्था इतर कणों की है। गतामात विन्य राष्ट्रीय मेवा ने स-समानुस म्यवस्था पाने के लिए उचोग किया । “गीता निष्कामकर्म फा नप- देरा देवी याद रखिए केवल या सिधात गप ही हमारा काय मी कर सकता। हमें यह निथप करना परेकि हम किस वर्ष में है एव तदनुसार हमें कीम सा कर्म करने का अधिकार है। 'निप्काम कर्म करो" इस उपदेश की पार में सर्पपा ममपिस्त उसन- कम्मों में प्रात खते हुए गीता की कशित व्यारूपए बना लेना ही क्या गीतरप की इतिश्री है। अभी कुछ समय पहिले एक ऐसे ही भ्यक्ति ने गीता के सम्बन्ध में मनधिकार धेश की। पश्चिमी पूर्वीय साहित्य की तुसमाधि से यपि उस का प्रपस स्तम्प है । परन्तु गीता के मस उद्देश्य के सम्बम्प में उसने बड़ी भान्ति की है। देश के कम्पित कर्मपद के प्रया में पर कर उसने गीता को फम्मयोगणस्त माम शिया है। उन की ति में पिता भात्मविपाशाब नहीं ६, पिन कर्मयोपणामपनी इस सत्पसिविलिए उगों में उपक्रम-उपसंहार का पर्याप्त मस मगाया है। मश्य ही यह इन की मनधिकारचेष्टा है। यदि गीता कपोग शान होता तो इसे कमी उपनिपत् राम्द से सम्बोक्ति न किया जाता । कारण स्पष्ट।। कर्म-उपासना-भान इन तीनों का प्रतिपादन पूर्व कपनानुसार क्रमशः वेद के प्रामण-भारण्यक उपनिपत् मागों में हमा है।कर्मपोग का सम्मन्न एकमात्र मत माग के साग है ।पनिषत् मानयोग का सूचक है। तब यो गीता को बानयोगोपयिक उपनिषत् शम्द से म्यात म कर कर्मयोगोपयिक भवयम्द से सम्बोधित करते हुए "मगरदीग्रामण काना आदिए पा घर गीता के प्रत्येक मप्पाय के भात में "वि श्रीममगहीनाम्पनिपस प्रमपियायो योगशाले" इस्पादिरूप से उपवित शपदमा सम्बन्ध सुना जाता है। उपनिषत् क्योंकिवानपोगशास्त्र, एक गीता भी क्योंकि उपनिषत् है। ऐसी दण में हम इसे शनयोग, किया मुदियोगशास ही मामने के लिए तप्पार । कदाचित् माप प्ररन करें कि उपनिषत्सु के भागे "योगणसे यह सामान्य सप- मार है । एवं मोगराम्द "सोकेऽस्मिन द्विविधा निष्ठा पुरापोका मयानप" इस वा सि. " परियार मांसाहस मा मानमिष उसे पूणावतार माना है। पदय मारियों से मी उस का भासन उपा। उसके बा उप Pए गीता का माप प्रौती उपमिषर से विसी रठि से मी कम नहीं माना जासकता । गीता- प्रतिपादित प्रामविधा का मावान् ने साधारकार किया है। इस घटि से गोता या पास है। इसी साधार्य को सेका, साप में एक पूणाक्तार के ERI उपदिर होने के कारण म गीता को परि उपनिषत् कर देते है तो कोई विशेष मिप्रतिपपि नही । इसी साबम्य को सप्प मे रसकर मीता को (स्मृति होते ए भा ) प्राचीनोन उपनिषद नाम से सम्बोधित कर दिया । पुति परिगणना में यह नहीं है, साशी में भौती उपनिषत् की तुना में इस मा महान भी कम नहीं है, अतएव से 'स्मावी उपनिषद' कामा प्रत्येक टिसे म्पापसगत होगता है। गोताख पर पाम मरतीयों की अपूर्वनिष्ठा देसीजाती है।सबसे बरासीमाम्प वाहमारा पर है पि मापसाहित्य को राष्ट्रपति का महाप्रतिबन्धक मानने वाले राष्ट्रीय नेता, एक तदनुगामी सपा- रक भी पता का पूरा पूरा मादर करत है। इस मादरमाव के कारण उनकी भोर से मी गातार्थ करनेका प्रयासमा है। परंतु द्वार के साप कानापाना है कि भार्यसाहित्य (वैविकासाहित्य) से से मी परिचय प्रास न करने वाले इन महानुपायों का वक प्रयास मई के स्थान में मनर्मचारी पीनबफन कर पाई।हम उस पाना का स्मरण है कि सा देश के एक पूम्प नेता ने गीता के “शुनि पैर भपाके प परिवाः समदर्शिनः" इस सिद्धान्त को भागे रखते हुए अपने पा उपर प्रकट किए पे कि गता के अनुसार भन्स्पयों को प्ररथरय मानना शालिमास प्रकार मिस चातुर्वर्पधर्म का par में विस्तार से निरूपय हमारे उस का किस प्रकार इम राणीप नेताओं के द्वारा दसन किया जा सार परमी दिपा भामही है। सधर्मपासन पीकी माशा देने वाली गीता की मार केसी दुर्दशा की पारी १. पर एप कार में मना रह पाना पड़ता है। उदाहरण के लिए रपार्म कोही मानिए । “कृपिगोरक्षपाणिग्य कर्म स्वमारणम्" के अनुसार सती पालन, प्यासाय परवीन पैश्य गति के सामाविक कम है। पातक मर्पसिसा, एवम्पतिक सार्पम्स म्पसाप को दोरगर भाग कपि, गोरक्षा का "R भी राप माँ पर सीमा सम्पम नहीं हो पाती। रितने एक ममिमानी प्रप, जिनके - 20 परिपट 1 माणभूमिण सातम्प म्य - जासत्य । परि मगवान् को ज्ञानयोग, लिंग सम्यास माप ही ममीए होता तो ये फसी बन्योल की निन्दा, एक कर्मयोग की स्तुति म करने । देसिए । भगवान् क्या कावे है। "न प सन्पसनादेव सिदि समधियति । नियस कुल सम्म स कर्म ग्यायो पम्मग्ला । कर्पग्णन दि ससिदिमास्थिता मनस्यदयः । न कर्मणामनारम्मायकम्प पुष्पोऽश्नुते । नावाप्वमाप्तम्प पच एव च फर्माणि ॥" तक पपनों के भामार पर नो हम इसी निधप पर पहुंचते हैं कि गीता मारय कर्म- पोग का ही पवारात करती है। ऐसी दशा में पदि हम गीता के 'योगास' को 'कर्मयोगे" का उपोबलक मान तो कोई म्यपत्ति नही । मत पाने में बड़ी सुन्दर है, साथ ही में युक्ति ५ प्रमाण युकभी । फिर भी गीता को कर्मयोग नहीं करा यसकम्प । कैसे ? मुनिए । हम बता पाए हैं कि बेद के मन-सामगप्प दो दिमाग है। इन दोनों निमायों की म्तनिष्ट आन पर्व कम है। बिना मन के कर्म समय नहीं है । इसी दरि से महर्षिोंने जा सम्य-व्त मेद से वद को दो मार्गों में विमल किया है । कुछ विपय जामने के है, एष व विपय करने के हैं। विनाम-मुति-तिहास यह तीम विषय हातव्य है । मन्त्रमणने इन तीन बातम्म विषयों का ही निरूपम किया है । कम्य विषय कर्म-उपासमा-मन मेद से तीन माग्ने में दिमक । मामणमाग गी कसम्म विपया का निरूपण करता है। जो प्रभसमाय कम्म का निरूपण करता है, यह रिपि माम से, उपासनानिकपफ प्रामसमाग पारपयक नाम से, एम बामनिरूपक बापणमाग पनिपद नाम से प्रसिद्ध है । इन तीनों कतष्यों में से कम एव शान के मध्यपतित उपासना पोग ही पुदिपोनिष्य ह । इन तीनों में कम्योग यमधरा प्राप्त होने बने ऐरतोकिक विजय का माग बससाता है । मुन्दियोग इधरानुरक्षि द्वारा पारतो किक शामत मुसमाप्ति का उपाय बतसाता है। एष तोसरा झामपोग लिगुर प्रम का निरूपक पनता मा परामुक्ति नाम से प्रसिर फैकपमुक्तिपप का मनुगामी बनाता है। यह हमारे यही परिसर या माम्पमूमिका बुरिम सान्त के अनुसार कर्मयोग का सूचक है। ऐसी दस में ममश्य ही मीता को कमपोगशाल करा सकता है। इस प्रश्न के सम्बन्ध में यी कानातक योग गप बस कर्म कर ही माचक है, पर किस पाधार पर मान लिया गया | सस्प शद के साप जा। मेस शम मात्य, मारप ही योग्राद बर्म का मघर परंतु मात्र सप से उपाच पोशारद कमी कम्म कर सूरक नहीं माना जासकता । भापको स्मरण रखना चाहिए कि गीता में चा पहा मातम रूपसे योग राम्द पार पाया वह सर्वत्र कर्मममित पानयोग, किंश पुद्धियोग का सूचक है। एक स्थान पर दो- 'रेण पर फर्म बुदियोगादनम" या करते हुए भगवान् ने पुस्तियोग के सामन कर्मयोम की निदा तक कर रसी: । 'योगा काम यसम्" "योगपुक्तास्मा योगी मराजुन' 'सपोगी परमो मतः" “योगी नियतमानस " "योगी विगतकल्मप" "योगिन मुस्लमुत्तमम् ' "योऽयं योगस्वया मोका" "स योगी मपि पच" 'फम्पिम्पमापिको पोगी" स्मादि स्पों के पोग, एव योग्ी हर बुद्धियोग पत्र बुद्धियोगी के ही सूचक है । “दशापित मूदियोग" के अनुसार माचन् की मोर से मुद्धियोग कर दी र प्राप्त हुपा है । ऐसी दश में उक्त "योगशाने" इस उपसहर बाम को कमी कम्मयोगारक मही साप्रपा बासमता । भम्युपगमाद का माभप सते ए पोपी दर के सिर पर मान भी सिपा बाप किया। का योग शब्द कम काही सूचक है तो पूविप्रतिपत्ति का निरासरण करना अमम्मर ॥ माता ६ । उपनिषद शर हानयोग, निगा मुनियोग के साप ही समर कर्मयोग का सम्बन्धी तो मानण शद है। पोरगान से 'कर्मयोगगास" की अभिप्रेत होता तो "तिप्रीमदभगवदीनपुवामगेपु पोगगान' पर सपसहार रहता । पनि पोम्पाने के साप उपनिषत् का समय है, एक उपनिषत् गर दुनियोग र समभी है तो देसी रण में उपनियम ए पोगमाने को कमी फमपामगार परक मी माना पासना ग सपमुप ए रास्यपूण्यात है । इसके बास्तविक माग पर पदुम बाना कोई इसी मत मही कमयोपवालियों का करना। रिगीमा भी शानयोग राम नही माना रदिपरति -al माध्यमित शासम्प-कम्प चासत्य । पदि मगमान् को पानयोग विष सन्यास मर्म ही ममीट होता तो वे कमी शान्योम को निन्दर, एक कर्मयोग की स्तुचि न करते । दखिए ! भगवान् स्या रहते हैं। "नए सन्यसनादेव सिदि समषिय इति । निपर्व कुत फम्म स्वं कर्म ग्यायो धर्मपणः । फर्पणन र ससिद्धिमास्थिता ननस्यदयः । न कर्पग्मनारम्भायफम्प पुरूपोऽश्नुते । नावाप्पमराप्तम्प पच एक प फर्पमि " उक्त मचनों के भामार पर तो हम इसी नियप पर पहुंचते हैं कि गीता प्रवरय कर्म योग का ही पक्षपात करती है । ऐसी दशा में परि हम गीता के “योगग्रार" को "फर्मयोगे" का रोगसक मान तो कोई प्यपत्ति नहीं है । मात करने में बड़ी सदर ६, साथ ही में अधिक ए। प्रमाय पुछ भी । फिर भी ग्रीतम को कर्मयोगशाच नहीं करा सकता । कैसे ? पनिए ! हम बतसा भाए हैं कि वेद के मन्त्र-बामगप्प दो दिमाग है। इन दोनों विमानों की मूमप्रतिष्य प्राम प कम है । बिमा बाम के मर्म समय नहीं है। इसी टि से मार्पियोंनेगा तम्य-कप्त मेद से वेद को दो भागों में विमल किया है । कुछ पय पानने के है, एक फुल विपन करने के है । विमान-स्तुति-विहास पर तीम विषय हावम्म । ममापने इन तीन बातम्य रिपयों की निरूपण किया है ।कम्प लिपय कर्म-उपासमा-गम मेद से सीन माग में विकासयमाग मी कपन्य विषयों का निरूपम करता है। जो प्रमणमाय कम्म का निरूपण करता है, पिपि नाम से, उपासननिरूपा प्रमसमाग भारपपर माम से, एवं दाननिस्पक मामणमग पनिपट माम से प्रसिदरे । इन तीनों करमों में से कम एव बान के मष्मपवित उपासना योग ही बुद्धियोगनिष्टा । इन तीनों में कर्मयोग पर प्राप्त होने पले एसोविक रिश्प का माग बताता है । पुदियोग ईमरानुरहिवारा पारसी मिक शावत मुखप्राप्ति का टपाय बतसाना है । एक तोमरा मनपोग पिशर मम का निवपक वनवा मा परामुक्ति माम से प्रसिद्ध फैकम्पमुक्तिपप का मनुगामी बनाया है। बस हमारे यही पहिया जा मामभूमिया ॥ दुपियार तीन फुगा है। तीन से पतिहि मम्युदय निमस पागने वाले उमप पर काम- पत ममाव। - तीन से पतिक चीमा पुस्पार्प नी, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण । सोकम्पनर | सांक में उमति के सम्मान में या तीन निष्टारही प्रचलित है। सी-पुत्र-सम्पत्तिमाय-मनुपर-शीर सुसमग भादि सब सौकिकालायिक पुसल सौफिक प्रसों की कामना से मुक मनुष्य प्रमोश नित्य, ममितिक काम्प सम्भों में प्रवत होता है। पानिधि कर्म करने से उसे र काम्पफस मिस झी गाते। यो मारपी सक फाकामनामय नितिष कमो में प्राच गते । परिसी सम्मनिष्ठा के मुख्यासही गावी है। उस सम्पूर्ण कर्मकों को मोर से गिस बानीको पम मेरम्प बोमपा, यो संसR को पतन की सामग्री समम कर स से हिराम कर मेता, सीसरी कर्मःपासपणा मानमिष्ठा, किंवा साम्पनिष्ठा ऐसे पानमर्षि सन्यासी से 0 सम- गध रखती है। मम्प का उपासमायोग स्वतन्त्र पाता। कि उपासनामक इस दुन्दियोननिया की सचाकर्मप्रतिसपर निहा, एक कर्म भितिपय सांस्यनिष्टा दोनों के मध्य में 1, मत इस में "वम्मध्यपविवस्वग्राणेन समवे' ग्स म्पाप के अनुसार कम्मान दोनों का समाविमा सिद्ध होगा। कर्मयोगनिम्न में निप, नैमिविक, बाम्पमेद से मितने कम्मो का मामा । सब म इलियोगनिष्ठा में भरतर्मत है । मन्तर योगों में केस मी कि उस में फरकामनामयी मुदि की प्रधानता श्री एवं इस में निकाम हुम्ल की प्रधानता है। फि इस में समय कम्मों का निप्पाम मुखमा पास है, मतपम इसे बम प्राविनिष्ठा करने के लिए तम्पार हैं। इसी शि से इस काम कर्मयोग में मना- मात्र मानन रहिए तयRt। सम्पनिष्ठा में कर्म का परित्याग है तो इस मिष्ठा में कामना का । परिस्णा है। परि याग ही सम्पनिष्ठा का स्वरूपवर्म । कामनापरिपाग सम्बाप से मुदियोगमिष्टा में मितिमा का भी समायोसी रशि से हम इस निष्ठा का समय निष्ठा में भी पन्तमान मानने के लिए त पारस प्रकार कर्मपरिक्षा समय से कम्मपोरन व कामलापरित्याग से कानपोगाण दानों के समावेश से इस मम्पपमित पोग पा उमपपोगन सिरोमाता।
परिपाठ का माम्पमूमिका पुरियोग । मुद्रियोग में सर्वविषपर्म म्यवस्थित हैं, दूसरे शब्दों में कर्मे में पूर्ण प्राति है, फिर भी कामना के मरने से कर्ममनित बासना संस्कार का इस योग के मनुगमन में मारमा पर सेप नहीं होता । अपेक्षामुदिसाका कर्म ही सहकारछेप घ कारण , एक काममा ही अपेक्षा इदि की बननी । काम के प्रभाव से बुद्धि में टपेक्षाभाव का उदय हो जाम है। सपेचमुनि- सामनकर्म कभी संस्का लेप के फारस मही पमते । फहत इस बुद्धियोग का मेकर्पपण अनयोग के साप साधर्म सिद्ध हो जाता है।नयोग में कम का भाव है । मुदियोग में कर्म २, पस्तु र्मफल रुप सरकार लेप के न होने से इसका होन्म न होने के समान है।सची से मारपी या बुद्धियोग एक प्रकार का बानयोग बन जाता है। अन्ततोगत्वा हमारा यह बुद्धि- योग मानयोग में ही सीन होमाता है। यपि कर्मप्राति के कारण इसे कर्मयोग भी कहा जा सकता पा । परम्त कि इस का उदकं शान से ही सपन्ध रखता है, मत इसे कर्मयोग का सम्बन्धी नहीं माना गया । कर्मयोग कर्मसस्कारसचा पर निर्भर है बानयोग मैष्कर्म माब पर महावित है। मपपवित मुन्द्रियोग में कर्म के रामे पर भी कर्मसस्कार नहीं है, इसलिए इसे कम्मपोग तो नहीं करा सकस्य । परन्तु कर्म रने पर भी इसमें मैष्कर्म भाव मारपी, मत पानयोग में भय ही इसका अन्तमात्र हो जाता है । सप महर्षिोंने मी ऐसा ही माना है। दुनियोगाय मम्पनिष्ट्य का मापस्थ मारण्पकभाग निहाय करता है । मम्पपवित होने से इस में यपपि कर्मप्रतिपादक प्रामण एव झामनिरूपक उपनिषत् दोनों का ही सम्मवेश। फिर भी अपियान मारण्पकका कर्मप्रतिपारफासण के साप सम्बन्ध न मान करान प्रतिमा दक उपनिषत् के साप ही सम्बन्ध माना है, मैसा कि-"पदारणपकोपरिपत्" इत्यादि सेकर म्पकारों से स्प है । इस प्रकार पुग्मियोग के उमपधर्मावधिम होने पर भी इसकी प्रामयोग प्रधानता ही सिद्ध होती है। पचपि बुद्धियोग है सम्म पस्त, परन्तु अन्तर्माव पदि ऐसकता है तो ज्ञानयोग में दी। कामनामा भासक्ति से युक्त ऐहिक तुप फर से सम्पम्प रसमे से कमपोग की भपेश से, एवं सब कम्मों के मास्पन्तिक परिमागरण बानयोग की अपेक्षा से बुद्धियोग ही मग- पहिणार zा मान्पमित्र पुरोष मान् की इशि में सर्वश्रेष्टमोग है। ममानानयोग के पाती है। पन्त र हासा सोपन करना चारते है। वे करते हैं कि जिस बासना-सेप मप से भू म म कम्मा परिस्मग करना चाहते हो, ना मप कार्मस्पातपण शानयोग से कमी र महीं सकता। इसके लिए सर्व कामना का ही परिस्पा करना पगा-"कम्पानाकर्पणन्पास सन्मार्स फायो नि!" परि कम पो दिर, म कामना मी तो या सम्पास मिम्प पर हैं। ऐसे सन्पास से इसे कभी सिहि महीं मिल सकती-"न प सन्पसनादेश सिदि समधिगति" यदि कानाका परिस्पाग कर दिया तो कर्म होने की कोई मास्माता माह नही । हम मानते कामना परिया के मनन्तर तुम्हारा कोई करम्प शेप नही रह जाता। फिर मी चा कम से तुमारी शामिनी, एक नेक का करि तमन्नेमाटि से ही सन्त पने निपत फर्म में पागाराना पाहिए-"निपतहरुकर्म त कम्म म्यापो पर्मग्णा" "मोसंग्रामेगापि सपरपन् क पसि"-"नानपापपात पसर कर्मशि" | मस सनयोग में मा संशोबन कर ही उसे एस शिण मुखियोग का हर दिया गया । इरियोग्य मम इसी संशोभित हानयोग का महत्व सूपित करते हुए ममतान् ण पार म दियोगाटनाप । पुसी गरण ममिक रुपमा फम देवः ।। पुदियुतो भानी मे मात दुहते। मस्माचोमाम पुण्यात पोग: कर्माम पौगमम् । परिसम्पोऽपिको पागी झानिश्पर मतोऽपिका। मम्पमापिको पोगी हमापोगी मानुन । करने को प्रापसमा प्रामण, भारम्पक उपनिषत् र हा दिमाग है। बस पनिण, उपनिषद या दो माग मुस्प है। इसी प्रकार पाने का बर्म उपासमा- जान तीन नमाग ! 1 मा कर्म-शान हो माग है ! समा मर्मना-दि ।
परिषद का मायमूमिका रिपोग निष्ठा शाननिष्टा पर तीन निठाए भी करने के लिए है । वस्तुत्र कर्म-एव शान मेद से दो निप्यए मुरूप है। बातमी ऐसी ही। उपासमास्मिका पुरियोगनिष्टा में कर्म-धान के अतिरिक और है क्या । फसत इसे सतत्र निष्टा मानना किसी भी ष्टि से उपित मही ममता । परि गुदियोग माम की तीसरी खात्र स्वतन्त्र निष्टा मामी पाणी तो निम्मतिसित गीता सिद्धान्त के साप विरोग उपस्थित होगा। दो निष्ठामों को मी मुख्य निष्य मानते हुए भगवान् कावे हैं- सोऽस्मिन् द्विपिरा निष्ठा पुरा पोका मपानय । पानयोगेन सांसपाना फर्मयोगेन योगिनाम् ।। अब पुम्पियोग नाम की कोर सतन्त्र निष्ठा नहीं तो भवरप ही उक्त दोनों मिप्यमों में से किसी एक में ही इस का मन्तमात्र मानना पडेगा । बस इसी मिन्दु पर मारे कर्मपद पातियों में भूब की है। कर्मयोग विपापक बयों का वास्तमिक मर्म न समझ कर सासा ये पर मान मेरे कि गीता का बुद्धियोग फर्मयोग में ही मन्तर्भूत है एव ग्रता कर्मयोगशान हो । से मूब गए कि दुनियोग को परि कम्म में भम्तमत मान लिया बायग्न तो- 'पदारण्यकोपनिषत् इस म्पबहार का कोई मूम्प नी रहेगा। साथ ही में कामिनिवेश में पर कर वे यह भी भूस गए कि परि युरियोग को सिंच उपसंहार में प्रयुक्त योगशाले" पाले योग को कर्मयोग परक माम लिया जायगा तो गीता का उपनिषत् पहार प्रयत्न सहस्रों से भी सहित म सफेन । यो कि पूर्व कपनानुसार उपनिषत् का धाम के साप सम्बाप है। उधर पुखियोग नष्कर्यशक्षस शान का साधक बनता एमा मारपी उपनिषत् शम्द का सम्बनी बन सकता है। निष्कर्ष यही हुमा कि गीता मुडियोगनिष्ठामक ग्राम योगनियमपी है । मतपत्र इसे बानयोगणाम, किंवा पुहियोगशाम ही माना जासकता है। किसी भी रति से, किसी भी प्रभास से किसी भी वर्ष से गीता कर्मयोगशाम नही माना जासकता । शानयोगपही गीताशाम के स्माती उपनिषत् म्पसार में मस कारण है। । . गीता वेदका अन्तिम माग महोती मी उपमिपए से प्रसाद । इस प्ररम का एक बीपष्ट - माध्यमिr- सम्मान पारकों के सम्मुख रस्सा गया । पस्तु एक हानिक तह सम्प्रधान से कभी सन्तानही हो सस्ता हरि यह तो गीताविहान मापस की तो प्रत्येक मीमांसा विज्ञान से ही पादिए । मारतीय प्राधीन निधन् यहां क समाधान कर तिमाम शे सेते ,मा एक हानिक मस्तिफ उस प्राचीन विधामभूमि के पानी न की भारम्मभूमि सममना है। प्राचीनों की पै मपास्मविपाप, पितर मजे ही पनिषत् राम्द का पाक हो । परन्तु वैधानिक इन दोनों को ही जानिषत् का भाषेक मानने के लिए सम्पार महा। उसकी रपि में निशा- नसिवागतही उपनिषत् का मादक है। - 1 विस प्रकार गोला धन्द कायाम्वर में प्रवास में निरूट बन गया, एपमेष पापाव मौनिक विज्ञान सिद्धान्तों से सम्मान रखने वाला उपनिपट शरद मी कासार में ई-मेग-कठ भावि वेद के मन्तिम माग में निबत होगा। एताता उपनिषत् की उस सम्माप्ति को लिप्सी रवि से नहीं हटाया जासकता । कर्मयोग हो, उपासनापोग हो, अपना शानयोग हो सबके साथ उपनिषत् छ सम्भकर्म-उपासनापान समी अपनी मानी सतन्त्र उपनिपद रखते हैं। पली उपनिषों के माधार पर कर्म का कम उपासना का सपसनल, एवं धन का नाम प्रनिनिबिस कर्म उपासना, मन की कोई उपनिपर नहीं, वा कर्म-उपासना-नान तो निरर्पक है। निस प्रकार मा, एक विषामान लिन्सी निपप की प्राति में मुम्प कारण से ही उस विषय की उपनिषत् मी ससकी प्रकृति में मम्मतम कारण माना गमा। उस दिपप साप गुणमि से मन का योग कर देना । 'भदा"।मदा एक प्रकार का स्निग्मरस है। पीठस पप एष विपपीच परसर में अनिष्ठ सम्बप बराती है। बिना यश के रिस पिप में मोभामा प्रपो, उसीपयरे साप उस मामा का कमी समयमा कार्यकारगम्य परिपालपप प्राति में नहा के साथ सापकावरण सम्भव पांचाल मी माल स्पसायी परिमन मदिशामातापिंधमदासिसाम्पा का वनको मिपा से भी कर मार्प की राह मनुमान होता है। इसी मनुमान के बर पर हम उस कचम्म कर्म में प्राच ।
भाप्पभूमिका स्माती उपनिषत् . होचाते हैं। तीसरा प्रहास का मग्यतम ह उपनिषद्भाव | उस कक्षम्य कर्म का, किंवा निस मिपप में हम प्राप्त होना चाहते हैं उप विप का मौलिकाननिय मौलिरुविज्ञान के माधार पर होता है, यही मौलिक विद्वान उपनिषत् करना है। सय उपनिषत् शम्द भी अपने इसी पर वेदक को व्या कर रहा है। उपनिषत् शद में उप नि पद या तीन दिमाग है। उप का मर्य समोप नि का पर्व है निमप, पत् का पर्य प्रतिष्ठा। जिम मौलिक उमपति के भाचार पर हमारा भारमा जित लिपप के समीप निभय रूप से वैर माता पामौलिक उपपतिती "सर निसरीति यया" इस निपन के अनुसार अनिपत् नाम से पास है। पह एक निधित सिदान्त है कि जिस विषय का हमे रहस्पवान, किंग मौखिक उपपत्ति मालूम हो जाती है, उस विषय में हमारी पूरी निगाहो पाती है। वही निष्ठा उस विषय में हमारी श्रा करवाती है। दो पपीत धारण करने का को रहस्य है। यदि वा हमदम बान लेते है तो पोपवीत पर हमारी पूरी मकि हो जाती है। पर इसी माह से माकर्षिरममा बन कर हम अपनी इश से बिना किसी की प्रेरणा के पोपीनारण करने में प्राच पाते हैं। उपनिषत् शम का यही रहस्प। । साधारण रवि से हम यह मानते मारहे हैं कि ममय संसार, एवं सांसारिक कम्म चपन के कारण। । इसी प्रकार श साप पक-ता-दानादि कम्म पकवर्गादि मुसरे कारण पमते दर मी परिणाम में शापत मा'मानम के सिवातक ही हैं। इसी कन्धित कर्मों पनिषत् से हममें कामयाग को नि प्रेपसमाप्राप्ति का मुझप कारण मानते हुए कम्ममाम का निरस्कार, एक बानमार्ग का भादर पर रस्सा है । इस सम्बन्ध में गीतायाम कम एप डान, की मस्तविक उपनिषत् बतसामा हुमा हमे जानमय, मतए पुदिपोगहरण कम प्रास करता है। गीताने शान-कर्मोमपामक निस मुदियोग पी मौलिक उपपत्ति पतलाई, पदि उसे हम जान सेते है तो म कर्ममाग पर ही हमारा ममदा शेती, एक न उसे हम हानिकर ही सममने । पूकि गीताशास बुद्धियोग का मौलिक रहस्य बताता है एवं इसके परिवान से । मारा भाग्मा बुद्धियोग के समीप (ठा) नियम (नि) रूप से पैर (पत्। बाता है, प्रतएव गुद्धि योगास्पप्रतिपारिका गीता को हम परश्य ही माती ठानिपत कर सकते हैं। उदाहरण - पीष्ठि 31 माप्म मूमिका पुरियोग समाधान पाठकों के सम्मुस रस्मा गया। परन्तु एकदानिक उक्त समाधान से कभी सम्तानी घे सकरा । फिर यह तो गीतानिशान मापसको तो प्रस्पेक मीमांसा विज्ञानपरि से ही पाहिए। मारतीप प्राचीन विशन् मा उह समापान कर के सिमाम से सेते है, यहाँ एक शानिक मस्तिष्फ उस प्राचीन लियाममूमि को अपनी गति की मारम्मभूमि समम्मा है। प्राचीनों की में मप्पात्मनिपात्य, पिवेतम मते ही उपनियत् छन्द का मरको । परन्तु निक इन दोनों को ही उपनिषत् का मारक मानने के लिए तम्पार मही। उसकी पशि में विशा- नसिसामलही उपनिषत् का भाव। विध प्रकार गोता शम्द कासान्तर में गौमाणब में निहरमन गया। एवमेव पथपत् मौखिक विधाम सिवान्तों से समय रसने पसा उपनिषत् गम्द मी कासम्तर में ईवन-कठ भारि वेद के अन्तिम माग में मिरुन होगा। एताता उपनिषत् की उस सम्पाप्ति को किसी गि से नहीं हटापा जासकता। कर्मयोग हो, उगसमायोग हो, भएमा कानयोग हो सब क साप उपनिषत् का सम्बन्ध है। धर्म-उपासना-बान सभी अपनी मामी सवत्र उपनिपटते ।। पती उपनिषदों के मापार पर धर्म का कर्मस रासना पसनल, एष शाम का मामल प्रतिष्ठित है। निस कर्म, उपासना, शान की कोई उपनिषत् नही, या कर्म-पासमामान नों ही निरर्पकरें। निस प्रकार भदा, पर मिपामाप किसी विषय की प्रावि में मुख्य कारण है, वैसे ही उस विषय को उपनिषत् भी उसकी प्रापि में मन्यतम कारण माना गया है। उस लिपप के साप गुणमि से मन कर योग कर देना की "मदा' ।। भवा एक प्रकार का स्निग्धरस। शीइस विपप एप लिपपी का परसर में शनिस सम्बध कराती है। बिना अशा निसनिपप में जो भागम प्राता। उसलपम के साप उस मामा का कमी सम्मान नही होगा। कार्यकारयमाण परिवान होना प्राधि में प्रवासाप साप अर्पवाण सम्बन्ध परिधान भी मार रबकासी पशिाम मनिपसमापरिकामविसापाबमापासे मी कर- पकापकी राशि का मनुमान होता है। इसी भमुम्पन देना पर हम उस कचम्म कर्म में प्राप पीपति का माप्पमूमिका उपमेपत् निष्कप पहीमा कि जितनी भी यतिकसम्पसाए हैं, उन सब का प्रतिसिन कोई म कोई मौलिक रहस्म मपश्य है। यह मौलिक विश नही सवत् कम्प फम की उपनिपत है। यही उपनिषत् फरव्य कर्म में भदा पूर्वक प्रहत्त कराने का मुम्य हार है। प्रमाण भक्त प्राचीन म्पासपाता उपनिषत् शन्द के पूर्वतमय को मप्रामाणिक मान बठेग, इसकी हमें निम्ता नहीं है। हम कर सकते हैं कि उपनियत का बो सीमित भर्य उनों में मान रस्ता , मह समय हरी प्रमाणामाब से भप्रापाशिक माना जासकता है। परन्तु जिस विज्ञान सिद्धान्तत्व को हमने उपनिषत् का मादक माना है, उस की प्रामाणिकता में कोई सन्टेर नही किया मासकता । यही नही, र प्रमाण मी खप प्राचीनों के ही मुख से निकला ऐगा । शारीरक सूत्रों के माप्पकार भगवान् श्रीशगधाम कहते हैं- "पारगयामिपान पुनरेयादिपुपनिपदिति पस्तानसेभ्यो निपमो विपीयते"। (शारी० ३२४६८)। सरु बचन का तात्पप यही है कि "सम्णसी सब परिग्रहों को भोरकर जमकन में पक्षा माप तो वापस न होटे, सम्पास की यही उपनिषत् ।' यहाश-केन-पादि घेद के मन्तिम मार्गों का पास है। मी तो किस माधार पर भापने (मापीनों म) घेदान्तल करे सपनिपर का भाम्पेक मान लिया । मौर सोचिए- नाना तु पिया पारिया च । म यदेव विषया परोवि, प्रदमा, उपनिपग, तदेव पीपरचरं माति ' । ((०प ११४१०)। 'भो कम्म निपा, पदा, एक उपनिषत् पक्षक चित्पा जाता है या अधिक सता "इस छान्दोग्य वपन में किस पभिवाय से उपनिषत् शब्द का प्रयोग हुआ है। यह विचार पीदिए । प्रबरप दी यहा का उपनिषत् गण एकमात्र मौलिक साप काही पापक है। इसी प्रकार अपने इसी रहस्यार्प को अपने गभ सिता रमा उपनिषत् राम पर स्यसत्रियों में प्रयुतामा है। वन से सन्तोष के विरकर एक पन या उस्त कर रिए चाते हैं।
बहिदि ती मायभूमिका ne- पनिषत् के लिए यालिमा कोही सोनिर । पाकर्म की सिद्धि के चिर बेदि का निमास है। गा पल-पारसनीय-दक्षिणामिनकुण्ड बनाए जाते है।म सब का माफर सम्निषेठ सम्पा निपत है। पाहनीय कुस्त पतुष्कोण होता है, इसे वेदि के पुत्र माग में बनाया गया है। गाइपम कुण गोगकार, एष वेदि के पश्चिममा में प्रतिष्ठित यता । दक्षिणामकुहर देखि के दक्षियमाग में, येदि के मम्प मान के सामने हवामा प्रश्न करेगे, ऐसा क्यों है क्यों नहीं माईपक मनुष्फोहा एक महनीय मेराफर बना लिया माता न सब प्रमों का उधर नही मौसिक पव।स या कामरूप निम्माण पुरुषमा ( मनुष्य) के प्राचार पर दुमा पुरुपया का ता साम्प है, सा ही सरूप स प पा का बनाण पाता है। बम या की उपनिषत् पुरुषपद है। मेसा कि-"पुस्पो र या'-'यशो रे पुपमा" स्मादिनों से पर। । मनुष्य एक भाप्पामिर यासस्पा । पार्पिय पग्निही नापति। परनिस स्पान में प्रतिष्टित राता मी गाईपस्सए है। शरीर के पश्चिम ममग में नाभि से नीचे पल बस्तिगुरा गईस सी में प्रपान नाम से प्रसिद पप्पाग्न प्रविष्टिा।बतुपरस शिरो- भाग ही पनुकोण पाहनीय है।म में विध्य प्रशानि प्रतिनि। साप प्रात इसी अनिमें पापामिक प्राणदेतामों को तृप्त करने के विर ममाहुति दी जाती।सी प्रकार सर रुप वेदिके दक्षिणमाग में प्रभारिपाक करने पासा गाठरापिमा प्रतिष्टित है । इसी को पिचा- शप खते है। इसी प्राप्पास्मिकी यामेपनिषत् के माधार पर पूर्जेस यङ्ग का सरूप सपम होता है। मनुष्य के मामिक पका सहप ऐसा कैसे बमा । इसका उत्तर प्रारमि पसर । सासरह ही मानिस पा। चैमा सामान टीम 80 पापा पाप्पात्मिा याबासका मेमा भागार साभार इस प्राधि भौनिक पानामाधिभौतिक च) पड़ी उपनिरत् प्राप्पामिकया। भापीमा पर बी उपनिषत् प्राधिका पाप माविक पापी पनिषत् समात्र सत्र ईम वीमात्र प्रक्षा।
नीति- - मप्पभूमिका । कम्ममेर मी प्रमणमष, एक कोई भी भारम्पक माप उपनिषत् नाम से सम्बोधन में नही माता । ऐसी दश में पिरकार से क्ले भाने वाले इस साम्प्रदायिक पदम्यपहार के माधार पर हमें शीनामा परता है कि उपनिफ्ट का एकमात्र प्रवेश हानपोगपूबकाप घेदाम्प ही।। शनपोग के निरूपण के साप माय इसरि वेदान्य वेद के अन्तिम भाग होमें से दाव है। फरत ने ही उपनिषत् शब्द से सम्बोधन करना म्यापसिर हो भाता है । पपपि वा के साप वदान्त का सम्बन्ध डाग नहीं होता फिर भी ज्ञानयोग का निरूपण करने के कारण, साय ही में पूर्णफ्तार कृष्ण के ग उपदिष्होने के कारण मौता उपनिषत् के समकप मम मते हुए मादाभाव को म्पक करने के लिए म्पासादिने (इसके उपनिषद न होने पर मी) पीता को उपनिषत् कर रिहै। प्ररन बमा सुन्दर । परन्तु उत्तर के सामने इस का सारा सौन्दप विसीम हो जाता है। माम्यबहार विरोधी नहीं है। सम्भवत पाप से अधिक हम प्राचीन सम्परापपरम्परा का सादर करते हैं । फिर मी वेदान्तस्य को हम कभी उपनिषत् का प्रारक मानने के लिए तप्पार मी है। हमारे इस दुर प्रा का समाधान मागे की पष्ट्रियों से भसीमाति हो जाता है। मौतिक रास्प विमान को हमने उपनिपत् का है। कर्ममेद से इस उपनिषत् के तीन विमाग हो जाते हैं। कुछ फर्म तप कुष्ठ कर्म पुष्पा है। तीसरा विमाम सामा य रूप से पर्मस्पेन कर्म है। जिस कर्म से हसे फस मिसाई पुरुपाप कर्म है। फसप्रगम करने पण कर्म एक महाकर्म है। इसी को सकेत मापा में ऋतु का बाता है। अनेक मोठे को कम्मा से इस महा कर्म का सरूप निर्माण होता है। बस बिन मा कम्मों से एक माही स्तु का सरूप निष्पम होता है, वे मङ्गम्न भव स्तर को कोट सम्म ही (ऋतु के लिए भास्मसम- पंस करने के कारण) कलर्ष कहलाते हैं । वर्ष-एष पुस्पार्प दोनों कम्मों का फगमिसधि से समय है। पताकाधा मोर देने पर इन का कम्पप पुरुपायरुप (प्यक्तिकमात्र सम्बन्धी) विशेष माव हर बाता है। उस समय हमें केस "कर्म" शर से ही म्पमाल किया जाय। इस प्रकार कर्म के सर्प, पुरुपाय, सामान्यकर्म मद से तीन माग हो जाते हैं। - मीराष्टि भना माप्य भूमिहा । उपरिपत् 1--तस्य मा एक्स्पानेागेपोपनिषत् । (रात 110) २-मपादेगा पनिशम् (शव० १०५ १) -प्रय ससिप सरस्पै पार उपनिषत् । (ऐ० मा १२५) दस्पोपनिपत सस्य, दानस्योपनिपामः । दमस्पोपनिपहान दानस्योपनिपचपः ॥१॥ मपसोपनिपापाग स्मागस्पोपनिपन् सम् । मुखस्योपनिपद स्वगः, स्वर्गस्पोपनिपाठमः ॥२॥ (महा. शारिवा० मोब० २५१ भ० ११-१२ मो.)। उपनिषत् शब्द के उक्त वैज्ञानिक भर्प से किकतम्यानम्र बने हुए प्राचीनों के स सब पार पद होगाते है यो अपने इसी चोम में इस समय में हमारे सामने एक प्रश्न सहिपत कर देते है। प्रश्न का स्वरूप पाश-केन-कल पारिको उपनिपर शप से सम्बोधित करमा पिरन्तन सम्प्रदाय । समी विशन् एक खर से पह मानते भारहे हैं कि कर्म प्रतिपादक बेद भाग मामण नाम से उपासमा प्रतिपादक वेदमाग भारयपक माम से, एप भानप्रतिपादक मेद माग उपनिषत् माप से प्रसिदौ । विस प्रकारणामण शम्द शपप-तापत्प गोप भाति वेदप्रायों में ही निहत से भारयपक राय पेनरेप-चरीप गडापन मारि कामों में ही निस्ट , एकमेव उपनिपट उम्द को ईश-केन-ब-मन-मुगरक-मा. याप मादि वेद के मन्तिम प्रमों में नित मानना की पर प्यबहार से सर्वसम्मत है। परम्पहार ही फ्रिमारक म्याकरण-उपम्पन-कोश मायादि में शिरोमणि माना गया रामपरप ही इस परम्पसारमा पिरन्तन प्यार में मस न । परि दाता उपनिषद का भरकम शेकर उपविशन ही निपद का भादक होता तो गति उपनिष भीतर शपथ-पतरेपारि मामण-मारएप माप मी उपनिषत् शम्द से सम्बो- पित देने एने पाते क्यपि इन दोनों ही वेद भागों में पद पर पर प्रककर्म का मौतिक रहरप प्रतिपादितहमा है। परन्तु हम देगले है कि केरस पगदि उपनियोकोहार को परिक्रष्टि सामानभूमिका II । रेसी उपस्थित होती है कि जिसका निराकरण प्रयत्न सहस्रों से भी नहीं सकता | बेदमतों को यह लिदित है कि इशोपनिपत परिसी उपनिषत् है । यह उपनिषत् पयुर्वेदसहिता का १० मध्याप है। निसे भाप वेद का मन्तिम माग करते हैं, या मन्त्रात्मक घेद का माग बनवा एमा मादिमाग बताए मारका घेदान्ताप कहां गया । भूपियों ने तो मन्त्रमाग तक को उपनिषत् शब्द से सम्बोधित करते हुए यह सिद्ध कर दिया है कि उपनिषत् शम्द काम पवेदक पेदान्त नहीं है। अपितु मौलिक विमान सिदान्त का ही नाम उपनिषत् ।। पोर में- थिए । शवपयधामण प्रामणमयों में मति प्रसिद प्रन्य है। यह वेद का दूसरा माग है। माप को यह एनकर कोई मार्य नहीं करना चाहिए कि सतपपनामण नाम के पेद के द्वितीय भाग के . काण का ही नाम सुप्रसिद्ध 'बादारयकोपनिषत् है। मामणभाग में उप- निपत् का समम्पप ! राम !! राम !!! कैसा अनर्थ । इस भनष का सचर उसी परम्यवहार से पूछिए। हम तो समयते, उपनिपत् की इसी सपम्पाप्तिको सिद्ध करने के लिए प्रपियों में देवच मपणसम्म में ही प्रामस-पारएया-उपनिपत् तीनों का समन्बय कर दिया। रावपयाभण घन्टामोप पूर्णक मामण । साप में उसी मो के साथ शतपए के १३ पायों में प्रामर की प्रधानता है, एव ११६ कार में मारपपा-उपनिपत का प्रवचन है। इन सब विस्पर परिस्पिनियों के रहते भी गो प्राचीन वेदातल को ही उपनिपत का भालेर मानने का पमिनिवेश कर रहे हैं उन के सम्बम्ब में-'पुरातमिरेर न साघु सम्' इस पूरिकका स्मरण हो भाता है। उपनिषद शब्द को ऐसा रिए पनाने की कोई मारपकता नहीं है। यानी माग निसे "मन" पाती है, पायाम जगत में जो मिसिपप्त (Principle ) कासरता है, टीक उसी पप में उपनिपत शब्द प्रयुक्त हुमा है। उम्स एक प्रिंसिपिस राम्द निधन प्रणाली से गूप रहते हुए प्रशानिक शब्द है । पर हमारा उपनिषद् शर निवचनमाव पारस देशनिक राम है। यही वो सत्ता मापा का महत्व है।
परिपरि कामाप्पमूमि - कम्मापन सहक नीमा कर्मों की उपनिपद सर्यमा मिन मिमोसप कम्मों की उपविपरीत खरूर पृपा । पुरुषार्थ कम्मो को पनिपरों का सरूप पूर्व से भिम , एवं सामान्य कामे उपनिपर्दे अपना सहप नवप्र रहता है। कलय कम्म महमूत होने से संसद में विशेष हैं। अतोपायन, मप उपपर्य, प्राममन, मानपाम, ब्रह्मपरण, दीवा, पुरोगयसम्पाद पपामोपरान, रमसमान भारि छोटे दो निमें मी काय कर्म है उन सम की उपनिारे (मौखिकठपपरिस) वो नप प्रामण भाग में मसन कम्मो के सापही मतता दी गई है। कि पासा उपनिपटें कम्प्रपान प्रमाण की प्रधानवा से पमिभूत है, अतएव में विशेष रूप से उपनिषत् हम से म्पत करने का मनसर मही मना । पुस्पा करमों में से एपकी उनिपर्दे के सप प्रमण मे हो । एक दिन का महानिझम से सम्पन्न पा, उन का उपनिषद् भाग में निरूपस किया गया है, 'सासि उपाइरस सहित उपनिपदिशानमाप्यमूमिका में कहा दिया गया है। जो पुस्पार्षकम्मोपनिपद ग्रामस माग में भागद है, न को भी करवकोपनि दो की तरह उपपित् शम्द से म्पमाल करने का भयममही है। शर सती. सामान्यकोपनिषदें । बोभसौर्य के लिए काणिक मार्षिोंने उनका सतन्त्ररूप से निहपण कर लिया। वही सतन्त्रमन्य वेद मन्तिम माग होने से बेदान्त नाम से, एन उपनिषत् प्रभान होने से उपनिषत् नाम सेम्पवास एहैं।कर्म किपाक्यों भापास की अनि शान मोदर मिना णमत शान्ति मी मिसस्तो, एग बिना कर्म के नाम का टदपीसकता । पिन कम्मो से शाम का उदय होनाकम का अनुमान जिस प्रकार करना पारि सेस्कार जनक कर्मा का सरकारलबिस माप सेयया आसकता। उपनिपटमम्ब र प्रमों का समाधान करता मा धान को किना पुद्धियोग को अपना समय बनाता है। इसी पापार पर उपनिषत जानयोग का प्रतिपादक मान लिया गया है । परन्तु इससे मा कमी सिदि मही सकता कि उपनिषद भाषेक एमात्र मामलवाय, किंग वेदान्तारी। पोपी देर के निर हम मान सेते उपनिषत् कामापोरदाता दी। गरिमाप ही उपनिाद कर सकते हैं। पदि ऐसा है तो एक प्रिनिवि हमारे सामने बारपट मामाप्पमूमिका - ऐसी उपस्थित होती है कि जिसका निराकरण प्रयत्न सहस्रों से भी नही होसकता । वेदमतों को यह विदित है कि श्योपनिपद पहिली उपनिषत् ।। या उपनिपस् पजुर्वेदसहिता का २०भप्याय है। मिसे मार वेद का भन्तिम माग कहते हैं, वह मन्त्रात्मक वेद का माग बनता हमा मादिमाग है।बताए मारका वेदान्तब कहां गया । श्रपियों ने तो मत्रमाग तक को सपनिषत् शब्द से सम्बोधित करते हुए यह सिद्ध कर दिया है कि उपनिषत् शब्द का म पच्छेदक वेदाम्तस्य मही। भपितु मौलिक विमान सिद्धान्त पा ही नाम उपनिषत् ।। मोर से- गिए । शवपपग्रामण बामणमयों में भति प्रसिद प्रश्य है। यह वेद का दूसरा भाग है। भाप को यह एनकार कोई मामय मा करना चाहिए कि शतपपत्रामण नाम के वेद के द्वितीय माग के काम का ही माम मप्रसिद 'पवारयपम्पनिपत है। प्रामसमाग में उप निषत् का समय राम !! राम !! कैसा ममर्प । इस ममर्प का उचर उसी परम्पयार से पूछिए । हम तो सममने है, उपनिषत् की इसी सपम्पति को सिद्ध करने के लिए अपिषोंने पर मामणसम्म में ही प्राण-प्रारण्यक-उपनिपत् तीनों का समन्वय कर दिया है। सतपयमामय पम्टाशेष पूर्वक प्रामस । । साप ही में उसी मोर के साप शतपप के ११ काणों में प्रामण की प्रधानता है, एव ११ में काग में भाररया-उपनिपत का प्रवचन ।। इन सब निस्पट परिस्पिनियों के रहते भी यो प्राचीन वेदांताब को ही उपनिषद का भवन मानने का अभिनिवेश कर रहे हैं उनके सम्बन्ध में-'पुराणपिसप न साघु सम्' इस मूहिक का स्मरण हो पाता है। उपनिषत् राम्द को ऐसा सिए बनाने की कोई मारपकता नहीं है। पानी मापा निसे "उम्म" करती है, पापात्म जगत् में गो मिसिपम (Principle ) कामाता है, टीक ससी मप में उपनिषत् शब्द प्रयुक्त पुमा है । उमूल एव प्रिंसिपिस शब्द निवचन प्रणाली से गुप रहते हुए वैज्ञानिक शक हैं। पर हमारा उपनिषत् शन्द निकपनमा के कारण देशनिक शम्द । यही तो सहन भाषा का महत है।
पापिष्ट
मायमूमिका
सदमसममि
पूर्व सदम से जम यह निर्विवाद सिद्ध होगा कि उपनिपत् शब्द का प्रयदेदक
मौलिक विनाम सिनम को भब इस मीताणत को उपनिपन करने में कोई भापत्ति नही
की नासक्ती । म पयामा, एक मुहियोग मीवाणान इन दोनों मा मौलिक न स्वगता
है। न केस विशाल ही मतमाता, अपितु साप साप उसे प्यार में लाने का वास दिन
सम टपाप भी स्वात। ऐसी दन में मीता मिसी मारयेतर की अपेक्षा म रसती ।
मतरत्र रूप से वरप ही उपनिषत् है।
इति-उपनिषच्छब्दरहस्यम् ।
--३--
पहिण या पाप्पमित्रा समर्माह 8--भगवद्गीतोपनिपत्-नामरहस्य :- म्परिरूप से पाठकों के सामने मीतानाममीमांसा रस्सी गई । अब सेल्माविधान पूर्वक समरिरूप से उक्त नाम की मीमांसा की गाती है । एक दर्शनमत के लिए जहाँ यह मीमांसा फेवस पम्पना का साम्राग्य है, पी एक बैवामिक की रष्टि में इस मीमांसा का या महत्व है। मपश्य ही एक दासनिक, किंम एक साम्प्रदायिक मतबाद के मभिनिवेश के कारण अपनी पम्पना के विपरीत कुछ पुनमा पसन्द नहीं करता । पर तु विज्ञानष्टि को प्रभानता देने वासा, प्रस्पेक मिपय की उपपति जानने की घेवा करने वाला एक विवाशास वैधानिक प्रातिसि नित्यधम्म का मनु यायी बनवा इमामपायही इस मामसा को अपने सारिस्पाग्वेपण में सहायक समझगा । नाम प्रहाम्प कितनी विशिएता रसना पहबतबाने का मकसर नही।माम जो भारतवर्ष में ध मरवा हो रही है, उस का मुम्प मेप नामस्मरण को ही है। सय वेद ने भी माम (राम्द) को साधत ग्रहमा सरूप माना है। मोर किसी साहित्य के सम्प प में तो हमें कुछ करने का अधिकार नहीं है, परन्तु संस्कृत साहित्य में सम्पप में तो हम पर नि मोष का मक्ते है यि इम में तो सम्पूर्ण वैज्ञानिक सस्य शो में ही भरा पड़ा है। महर्षियों ने उनी शब्दों का उनी मामों का प्रयोग किया है, जो अपनी मन्या व भयपनिवेश मान की विसषमता से ही महानिक मानों को प्रकट कर रो।।कही नहीं, वैदिक माहिप की तो या भी प्रतिहा है कि यदि कोई यहि गर ब्रम का वास्तविक रूप जान सेता है तो उसे बिना किसी अन्य प्रयास के परमक्ष का बोध होगता है। नाम तरब को इसी विसजाता को प्रकट करत ए पि करते है- ६ बार ग्रमणो रूपे शम्माल पर २ यत् । गादे ममणि निप्सातः परं प्रमापिगच्छति ।। भारतीय वैज्ञानिक प्रयों के पप, रसोक, राक्प, शगे की क्या तो दूर है। उसका तो मन्येक मदर मी किसी गुप्त रहम्प से सम्बध रखता है । विना प्रपोजन के एक सर, मात्रा, पर्स का भी प्रयोग नही सुपा है। अपने इसी भतिशप के कारण शम्दविशामवेचामों (पेप्याकरों) में पहिणी का माम्पमूमिमा परममवत् राम्द को निस्प माना है। इसी विरूपणता के कारण परमज्ञानिक बैदिक साहिद अपौरुषेय करवाया है। कि मीता शिामा, एक विज्ञान में कोई बस निरर्थक नही हो सकसी ऐसी दण में हम करेंगे कि "मगनोवोपनिपट" इस मामबा, मान से सम्बन्ध रसने पाची मर सम्मा का प्रवरस की कोई मौसिक रहस्य है । उसी सस्प का संप से निम्न काना इस प्रकरस का मुस्प बस है। सामान्य पछि से विचार करने पर गीता नाम का अर्थ करत ए हम इस पर पर पकते हैं कि- 'यह स्माती उपनिषद भगवान् के मारा गाई गई (विस्तार से कही मई, एक या "मगपट्टीवोपनिषत्" नाम से सम्बोभित । पूर्वकमनानुसार एक सम्प्रदायिक मारय इस पर्प से सातुर हो जाता। परन्त रहस्या के बिना एकामिका के हर्ष सेती सम्सोप नही हो सकता। पूर्व के सपनिमारस्प प्रकरण में पर Rap से क्तसापा पाया कि मौखिक सस्प, मौशिकपिधान, किंग मौलिक म्पपति शी उपनिषद करा जाता है। किसी भी विषम के, किंवा कर्म के मौशिक रहस्य का जब द पवार्यत्रम हो जाता है, दूसरे शदों में पर हम किसी तपसका साविक रूप समम लेते है वो उस निसय में हमारी पूर्ण प्रमा, म पूर्ण विकास ते नाता है। "मिस रहस्पतिशान के परिधान सेम बिस विपप के निरतम उस की गारा में पापने में समय से माते हैं, पारस्पान ही उस रिपय की पनि पर कामाची उपास मजहीर)-नि- किस गराई में)-पत (पापने का दिया मैटने का सापन) ही उपनिपत रायडान ही उपनिषत् है। रहस्प शप्प मी फम रास्य नारसवासस्प सापक मोवा गमों में प्रत्यक्षाप से प्रतिपादित न होकर परोपमात्र से सम्पन रमा। मार को पा माम करमाधकिरिक साहित्य में सत्रों से निसने भी माम प्रयुक्त ए. उन सब परोप मात्र से ही सम्पमापग्नि म पम्ण प्रमि, पम्यु रपम्पर, भारि जितने भी माम मार हमने 1, सब में पोरमा का समाव।मास्तविक नामा बने विश कर परोतप्रिय पिकानों म -
पहिरवार
- मामममिका 11
परोपमाव
उन स्थानों में परिमनन्दादि शदों का म्यवहार किया है। उक्त मामों के पास्तविक माम क्रमशः
भनिएप, नरम, पति, मुम्पु, रसतम है। यही वैदिक साहित्य का रहस्यमाद , असा
कि निम्न लिखित मचनों से स्पष्ट हो जाता है।
१-श्रमिह तमग्निरिस्पाचपते परोच, परोक्षकामा हि देगा।
(शत..1
२-इधारय तमिन्द्र इस्पाचचते परोच, परोदफामा टि देगा।
(शत०६२)।
२-वपा एत वरण सन्त चरुण इस्पापक्ष परोवम् ।
परोक्षकामा देखा प्रस्पधदिप । (गो० प्रा०पू०१७)।
अतिरीप नामवद्यदात्ररिति । (शत०४।२०)।
५-६ मा एवं मुच्यु सन्त मृत्युरित्यापश्ते परोक्षम् ।
परोदपिया र दिपा मपन्ति, अस्पतद्विप । (गो००१७)।
६-रसतमापतद रथन्तरमित्यारतते परोक्षम् ।
(गस०२।१२।१६।।
सक्त बनों से हमें फसे उदाव खोकरदास का मादेश मिखत्म है, यह भी ध्यान
मेरसना चाहिए । सम्पत्सित परियया बनाने वाले प्रशासनिक की सपा से मान हम
परोपमा से सबपा पीर पर ह । हमने इसी में अपना महस समम रहा है कि प्रत्येक
विपय का, प्रत्येक काम का रिपिटम घोष भरत दुए ही मागे बरें। हमें या पप नही
कि निस लिपप को रहस्प में मही रस्मा माना, वह भारमशक्ति से पशित होता गुम्म नियस
पर बाता है। पर्यो वे मारमा मापा परोक्ष। पसत सपना काम करतो मी मामरिक
मस्यप में नहीं भाती । हमारा प्रापेक कार्य सस्प में होना चाहिए । मन्त्रणा ही वर्तम्प कर्म
का जीरन है। पिया मही, घोषणा सारे मिस में कर दी, यही हमारी मानन्ति का मत
बरिष्ट । मायभूमिमा पसशाम %3D ५ कारण ।। सचमुच भाव हम मिस फोण होगर है। भाचार, व्यवहार, सम्माषण सा में सत्मता का पुट साते हुए भाग हम निबग्ग बन गए है, परोदमान सर्वपा को विपारे, मर्यादा को बस प्रति समर्पित कर दी है। इसी महाबपक्ष्मा ने हमारे अन्तर्जगत् को सोकसा कर राम है। स्मरण रखिए भार अपने कतम्य मे मितने ही गुप्त रोगे, भाप की भात्मशफ्रि वतनी ही भषिक विकसित होगी । शक्लिादि के लिए परोक्षभाष से बार मन्य उपाय का भभाव। मात्र प्रसा या पा कि मापसाहिल के प्रत्येक शद में गुप्त सस्प राहता। एप का गुप्त रहस्य ण वो ईपरवत विम्य मसौकिक प्रतिमा से पुरवित रहता है, भपवा गुरुपरम्परा मे भरचित रहता । अपने परिमित सामान्य मन से बिना किसी गुरुपा भाभप लिए केस राम्दों के माधार पर उस रहस्य पर भाप का मामा कमी नही पाच सकता । यो मक्तिम पने विवाद के भभिमान में परमर सम्प्रयाप की उपेक्षा कर भरने माप ही शानो के गुप्त रात को मानने को पेश करता है उसका या प्रयास सर्वया म्पप पा बाता है। गुरु हमे दिम्पष्टि प्रदान करते है । उसी रशि के बस पर हम गुप्त रहस्पों पर पापने में समझ बनते है । मन पैसा महामुदिमान् मनुष्य भी तक्तक उस मुखियेग को, भगवान् के उस गुप्त रहस्य को न समझ सका, म देस सका, गम तक कि मगान् ने उसे दिम्पशि प्रदन नाकर 0 । सपिप्प भवन सद्गुरु जमण के अनुमा से ही तोरमिपद माम क रहस्प शाम के सम्पन परवान का अधिकारी बन सका । इस परिस्थिति से पहना हमें यही लि सेक्स माप्प, टीका, टिप्पणियों के मापार पर विना गुरशीश के रहस्प हासों का मान प्राप्त कर सेना सप्पा भसम्मत्र है।माएर भागमण ने दीपा को ही वामप्राप्तिका मुपदार मामा है। पत्र की परि से मीधित मनुप्प किसी भी पान का अधिकारी। रहस्य यस्य, एम्स की मा, गुप्त निषि है। सभी मनुष्य इस के अधिकारी नही बन सकते । यही कारण है कि देवयुगपत में होने बासी अनपर्षदों में किसी कुलपति के चपदरा परमे पर परि कोई हम्पनी बात मानावी पी तो पुसपनि गुरू सब के सामने उस पापिष्ट | पापभूमिका छ- एस्पशास्त्र को प्रकट न कर अपने जिम्मा प्रिय शिम्य को हाप पकड़ कर एकात स्थान में लेगाते थे, ९५ तस राम का उपदेश देते थे। महर्पि गार्य मे अपने सच्छिप्य प्रभातशत्रु को इसी प्र पारो से रहस्य का उपदेश दिया पा [देसिए शत. १९] | रहस्प परिहान हसि [एकान्त] में होने से ही सस्प कालाता, एब उसके लिए प्रत्येक दण में गुरुपरम्परा का मामय ही पपक्षिस है। इसी मभिप्राय से अभियुक्त करते हैं- '-पाछेय. स्पाभिक्षित हि बन्ये शिष्यस्तेज शापि यो वा प्रपमम् ।। (गीता०राज)। २- एमाप मया तेऽप योग प्रोक्त पुरातन । मकोऽसि ये सवा घेवि रहस्य अवदुचपम् ।। (गीता २१) | ३-वदिदि प्रणिपावेन परिसरनेन सपया। चपदेस्यन्ति वे मान मानिनस्वरमशिन' ।। (v३। सचमुच गीता एक सस्प शाम । हरपान ईमरीय मन होने से इमर की दन है। न्मीलिए वो इस रास्यमय वेद] को महपियों में भापौरुषेप का है। अपियों के पवित्र मन्त:- करण में दन के अजय तप.प्रमाब से मिस मप किक रहस्य बाम का, किंवा ईमरीय बाम का उदय हुमा उसी को उम्हों में मन्त्रयाग मेस्मा के सामने रक्सा । पहाइमपम, पाक साफ गए पाक साफ साम। यही वेद ह । घर हम्मा गीमशम यचपि मेद नही । परन्तु रास्महामारमा पर गीताराम मी श्रुति से कम माप नही रसध्ध । तभी तो यह स्मृप्ति होते ए मी उपनिपत् शर से सम्बोधित हुआ है। । नौती उपनिषद, एनस स्माती गीतोपनिषत् में विज्ञान पति से यपपि समानता है। तपारि बावष्टि से दोनों में महोरात्र का मस्तर है । इसी मातर के कारण इसे मपीरुपेय नहीं माना गया, इसीलिए इसकी गणना मुसिशस में नहीं की गई, अतएव इसे पेय म्बत प्रमाण मही माना गया । भौती उपनिषत् का जहां विशनवार से सम्बम्प है, वह इस रमावी गीतोप परिष्ट । माय भूमि पस्वशासन , कारण है। सपमुच भाम हम शिकुछ फोय होगए हैं। माचार, म्पबहार, सम्माषण सत्र में समता का पुट सगाते हुए माम हम निमम बम गए है, परोक्षमाव सपा घोर दिया है, मयादा को जाति समर्पित कर दी है। इसी महारामयामा ने हमारे मतगत् को लोकमा कर गमा है । स्मरण रसिए भार अपने कर्तम्य में जितने ही गुप्त रंगे, भाप की भारमशक्ति उतनी ही अधिक विकसित होगी । प्रतिदि के लिए परोक्षमार से बहकर अन्य उपाप का ममाव।। भात प्रसह या पा कि मार्यसादिम के प्रस्मेक शम्द में गुप्त रहस्य रहता है। एक गुप्त रास्स ग वो ईपरदा दिम्प प्रमौफिक प्रतिमा से पुरवित रहता है, भवमा गुरुपरम्परा म सुरक्षित यता । अपने परिमित सामान्य मन से बिना किसी गुरुपा प्रामप लिए केक्स राम्दों के आधार पर उस रहस्य पर भाप का भाग कमी नही पा सकता । यो म्पक्तिम पने मुदिपार के ममिमान में परकर सम्प्रदाय की उपेक्षा कर भरने माप ही शाम के गुम यस को जानने की पेश करता है उसका या प्रयास सर्पण म्पर्य या माता है । गुरु हमें दिम्पाहि प्रदान करते है। उसी राशि के बस पर हम गुप्त रहस्मों पर पापने मे समय बात है। भर्नुन असा महामुदिमान् मनुष्य मी तक्ता उस मुछिपेग को, भावान् के सस गुप रहस्य को म समम सका, न देस सका, पब तक कि भगवान् ने उसे दिम्पाटि प्रथम नही कर री । सपिप्प भमुन सत्गुरू कप्स के अनुपा से दी गीतोपनिषत् माम के रहस्य शाम के सम्पन परिधान का अधिकारी बम सका । इस परिस्पिति से जाना हमें पर केर माप्प, टीका, टिप्पणियों के मापार पर बिना गुस्रीया के रहस्प साों का मान प्राप्त कर सेना सपा मसम्मव।माएर भागमणब मे दीक्षा को होमप्राप्ति का मुहार माना है। तन्त्र की रह से मीधित मनुष्य किसी भी जान का अधिकारी ना। पस्प रहस्प है, एकाम्त की बत, गुप्तमिनि ।समी मनुष्य इस के अभियरी मही बन सकते । परी कारण है कि देस्युगकास में होने वाली प्रसपर्पदों में किसी सपनि के उपदेश करने पर परि कोई रास्प की बात मागासी भी तो पुसपति गुरू सबके साममे उस - पहिंगरधि Pा माप्पमूमि- रामवा . वाणा का शम्दवार से सम्मध है। इसीलिए हम गीता के रखोकों को मन्त्र न कर कर रखोक शब्द से ही सम्बोधित करते है। निह प्रकार घेद का पारायण एक विशेष महत्व रखता है, वैसे गीतारखोकों के पारायण का कोई विशेष महत्व नहीं है, इम के जप से कोई विशेष सिदि नहीं है। यपपि शम्दविधान के अनुसार पारायण मी कामान्तर में माश्य ही पतिराय का कारण बन नाता है, इसीलिए गीतामाहात्म्य में पीतापारायण को भी महत्व दिया गया है, तथापि विशेष साम गीतार्थ के अनुसरण पर ही भवम्बित है । मन्त्रवान का शम्द मी उपयोगी है, परन्तु शम्द पान का भय ही प्रधानरूप से हमारा उपकारक मनसा है। पुखियोग शद मुमने से ही हमारा कम्पारण नहीं हो मासा । अपित इस के लिए हमें पुरियोगसम्पसि पास करनी पड़ेगी । विज्ञानमा, पप सम्मान में यही मासर है । इसी मम्तर ने गीतोपनिषत् को धोती उपनिषत् से पृथक् कर रस्सा है। वेद जैसे ईबरकत है, तथैव गीताबान मी ईसरावतार श्रीरयाद्वारा उद्भानित है। मनुष्यों के द्वारा विरचित शास्त्रों के शब्दों में मम ही कर विशेष रास्प न हो, परन्तु इमरीय गीता रासमवश्य ही किसी निग्रह रहस्य से सम्बन्ध रसता है। परिवाशाम चतुर्विध पुरियोगा के द्वारा चतुर्विध क्लेशों को हटासाइमा मारमा में धर्म- प्राम-वैराग्य ऐवय इन चार भगों के उदय का कारण बनता है। गीता एकमात्र क्लेशनिधिपूर्वक भाप्राप्ति का उपाप पतहासी है। निस मनुष्य की पुष्टि में भग प्रतिदिन रहेगा, पर उपनिषत् उसो की उपनिपत् होगी गीता भगवान् की है । जो इमे अपनी मुसप्रविण बना लेता है, वह पम्मी प्राविधिक भगसम्पति से युक्त होता हुमा माश्य ही भगवान् बन जाता है। "ता मग प्राप्ति का उपाय क्या कर जी को भगवत् सम्पति से मुक्त कर देती है"। इसी रहस्प को मूपित करने लिए पास ने इसे 'माहीतोपनिपर" {मगमत् प्राप्ति का उपाय बताने पासी गीतोग निपत्] नाम से मम्बापित परमा पावरया मममम है। । भगसम्पसि का प्रया या गीतागास पर विधि-निषेपामा शास ही मही है । ममें मयादि पम्प स्पतियों की तरह "या फरो पर मनफरो"-1B प्रकार का माश पानिपों का ही सपा महीं है । अपितु इस सम्बन्ध में भो ऐसी भीती उपरिपत् की , २०
पमानिए पनमूहको इस सम्एप मे मनधिकवरी माना है। यह
पर
HI मायभूमिका -
दिकाशमसे सम्बप।पिता को मन्त्र पहा मत्री परिवार के
पमराति पिंगन दर पर रिम रस, मि उमाघमा से, रिस मासात
से प्रारी में सन्निवर है, टीक तरी की प्रतिशत पर निस मस्का मनिवेशासाहीर
मानसन्माननी है टमेही मन्त्र कहा जाता है।
मालमत्रतिरप मिनपका,
यही माल दयाका मन्यमा यही मयमा मनाउदा नि मीमय कोही
मनि । पमित्रभान मा गम है। वह पापी दर से प्रान्त राव है। प्रपत्री मन्त्र उन
गमपची तपकी प्रतिरोन्यत्री मन्त्र में रसो मनुसार उगार म्परों सपा
है। उस गायत्री दाना को मा मा प्रपामागद में प्रतिष्टित कामा बनते है गयी
मरवारीविरार पर उम को प्रनतर मारपस के परम र म सपना
এ ধিল লুণ জন্ম নিশ লা লা জ ন ম সপচিশ দিন।
यदि पार ममत्रप्रयाग में एक माग को, घर को पाक मी श्रुति कर सो तो सम्बन्ध
चायग, ये उस " में मही मत्र पम्पु-पके स्पान में नाका कारण मन बापमा। साथ ही में
मार कोप भी पान रखना पहन कि, पारसपत्रीक्षा के अधिकारी है,
हेसपा सभी गायत्री या करना पापमा सिके मन्तवमा में जन्म म बीज का
इस मा भने प्रतिष्टा होता है, की द्विजाति सनी इस दीशा का अधिकारी है।
न्वरूप सम्पा नितिम उस के उसी रूप से प्रपेग करने में सामानको माग
मासम्म उस कामरकरने दुमरस करता है तो यह उसकी भान्तिमा
सोग महामन्त्र मन रास्पविधान की प्रतिमापा मग मीम्सयार दने से का
यदए।वाता. अमक्तास्पान मभनिष्ट जनकबम जाना 1 परामसर
है
पानी
में श्रुति क्या कहती है-
तु या स्वरतो बनो पा मिय्यापपुक्तों न वयपा !
स वाइम्रो यममान हिनरित ययेन्द्रगः स्वग्नोऽपगपात ।।
.
परिणाष्टि मायभूमिका । रायपरमप सयसम्बन स्फोट एक तीमग ही तस्व है । म्यबन मद्धमात्रिक है, स्वर मात्रिक , व स्फोट सम्पनिक है । म्यदन की प्रतिष्ठा स्वर है । इम का प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि बिना सर को याधार बनाए मार पिशुस् म्यनन का उपारस नहीं कर सकते । इसी प्रकार सर की प्रतिष्टा स्फोट है। इसी से प्रय स्फुट होता है। यह एक वा ही चमत्कार है कि जहां म्याधन भपनी प्रतिष्ठा, किंप स्पिति के लिए फेवस एक विन्दु की अपक्षा रखता , पर सप्रतिष्य के लिए २ विदुओं का मायप लता हुमा र बिदुपों को मपमा स्थाप्ति स्थान बनाता है। र विदुर्भो में से ५-६ इन दो विदुषों पर तो स्वय सर उस्थ [मूसलिम्ब] रूप से प्रतिष्ठित रहता है. एक शेष ७ बिन्दुओं में [. पूर्व की विदुओं एव ३ उत्तर पी सिग्दुओं में] वही सरताप भर्फ (ररिम) रूप से म्याप्त होता हैं।भपन मीमो ने माघार पर स्वर प्यों को अपने पगतस पर प्रतिष्टित रखता है। मार का ऐसा मारा क्यों है, यह विदुओं में मपमी म्याप्ति क्यों रम्मता, मनन क्यों नही विना सर के उच्चारण का विषय बनता । इन सब प्ररनों की उपनिषद् मूर्यदेवता। छन्दोविज्ञान के अनुसार सूप्प पृावीर पर प्रतिष्ठित सना गया है। अन्तिात में सात भोगवास माने गए है । एमी को पूर्णपाच मी कहते हैं। सातों को महाम भाषा में दक्षिण से भारम्भ कर क्रमश: गायत्री, टरिणा, अनुष्टुप् पृहती, पट्टि प्रिष्टुप, नगती उन नामों से प्यमहत किया जाता है। यही सूप के रिमय [मग्निमय ] रप के सातों भम है मय कोही न कहा जाता है। पद पर ही प्रारतिक मता प्रतिष्ठित रहते है। - . सातों बन्दों में मप्प का बन्द सबसे वसा, मतएप इसे पाठीचन्द कहा जाता बाघ । इमी को मामुर योतिष में पिपुषरत, किंवा विषहच का गया है। पदी पा- भाव माषा में स्वेटर (Equator) नाम से प्रसिद्ध है। गायत्री के ६ पदर है, उ प्णि ७ असर का, मनुष्टुप् ८ भएर का है, एवं वृहतीहन्द र मदर का माना गया है । मनावर बहतीहन्द ही सूर्ण्य की प्रतिष्य है। इसीलिए सूम्प को 'पात्" मी कहा जाता है, ૧૨૨ परिक्रष्टि - मप्यमूमिका ! उपपश्विास यही शंसी इसकी मी है । मयादि स्पतियों का कस्सम्य केक्स विधि-नियवमाने पर ही सम्पन्न हो जाता है। व धम्म का मौतिक रास्प वनहाने में सस्प है। यदि उनसे कोर हाय कान सी निकासा परता है तो उनकी मोर से इस निशा को- 'धर्म निमासमानानां ममास परम शृति या उत्तर मिसवा । । उचर का पमिप्राप पही कि यदि तुम धम्म के रास्य- शान को बिलासा रखते हो तो इस के लिए तु वेद की शरण में ही गाना चाहिए । यही मौखिक रहस्य का उगराह । टीक यही हियरी गीता की सममित षि-निषेधमानों के साप साप गीता ये पर अपना मर न मोकार-इसलिए ऐसा कगे, इसलिए ऐसा मत करो" इस्ादि उपपसिए भी सप बना देती है। मौलिक उम्पधि दी तोहानकर्म का रहस, सस्य हो तो उसमिप ह । इसीलिए अपने प्रिमि-निषेषमाओं के कारण पा) गीता की भनुमान प्रमाणरूप स्मृतिहास में गणना की है या विषत् गहस्पशन का प्रतिपादन करने के कारण "मे उपनिषद् मी पहना रचित मान लगा गया है । इस प्रकार मगवत् शम्द मगमार का मूपर, गीताराप्र शम्दगार पापक है, एक उपनिषत् राम रहस्य जान का परिचालक ।। गीताराम्भ मे मगाात्र की प्राप्ति होती है इसलिए या मगरत् । । यह शान सम गाश्मपर, इसलिए पर गीता है। यह शख रहस्प का प्रतिगदक, सहिए यह उपनि पत् है । इस दरि से “मगीतोपनिपत" 19 माम फा "भगवाफ्युपायभूतरा पवार मपरसम्यगास' यही निपप निरखता है। मही "स माम पी रितीय म्पाम्पा है। १-मगाण्युपापम्त या पम् →मगर ) -गदारपये शास्त्रम् --- गीवा -"भगवद्गीतोपनिपत् शास्त्रम्" नास्पज्ञानमपगानम् •एनिपन् -- प्रमाणपतर मे पार दानिर । पारस्पोन्म मिमोको पारिरित पभन मिनपसरप मदर तप है। दोनों भामापन, मत
पहिरकर
- मायभूमिका 11
स्यर यादि
व मार-म्यान निदराम से पारकों को यह मी विदित हो गया होगा कि एक सर की
छन छापा में १२३४५६७ तक म्पनन प्रतिष्टित रह सकते हैं। यदि वा म्पनन पावेगा
मो
यह एप पर उसे मायय दने में मसमर्थ दो नायगा । तत्काल मरा खर मानदेगा । उता
रण के लिए "ज्य" शब्द को सीजिए । निम्न सिस्थित परिलेस में पारक दसगे कि वर एक
१, जम्पशन सात है। एक ही माने ७ म्पन्धनों का मार पपने भा मा पा ले रस्सा है।
उरपम्
.
ग
श्र
Pl
रम
परम्पादि
"
पीपरी का माप्पभूमिका । मृलापमा सा -"स्यों परवीमपरस्तपति'-"शाद बस्यौ मुगनपता"-'पिम्रा सात पिपतु" इस्मादि सपनों से पर है। मुश्तीछन्द के दो प्रदरों में ता खप सूप्य भिम प्रतिष्ठित है। एष शेष ७ माघरों में सूप्प की रश्मिए म्पाप्त हैं । इस प्रकार मदररूप वृहती को र विन्दुओं में सौ( सत्या प्रति- प्टिव । इस की रश्मिसपा में ही पिम्पादि उपमह प्रविष्टिय है। "निरेशयागमन मय घ" इस यासिकान्त के अनुमार सूम्प में अमृत-मायु दोनों मार, जैसा कि पूर्व के भगपएम रहस्य में विस्मर से बरसाया पादुका है।यतम नमसह मिर्पमाग ससा । सस्मा मम्प माग से ही पृथिवी टयम है। अमृत ही मर्यभार की प्रतिष्य है। प्रसव मम पूपिणी अमृतसूर्य की अमृतरपिम्पों के भाषण से ही स्वस्थान पर (क्रान्तिदत्त की परिधि पर) प्री हिन रहती ई माने प्रभा (सूप) के चारों पर परिक्रमा समती रहती है। भमृत स्थ्य से ही पकानकार-उकारादि स्परों का निरासामा । पर मी पृथिवी से ही कार-पवार-टापरि म्पहनों की उत्पत्ति है। जिस प्रकार अमृत सूप के मयमाग से उपम पृपिम पमृतप्प के बिना समरूप से प्रतिष्टित नही रह सकती परमेय अमूमूपी मक सरोक मिना मम्प पृावम्यात्मक मान उबारण विषयमी बन सकते । “स्व रामाः मर्प " इसावि रप मे सूप च सरस स्पष्ठ है। इसी खरमार के कारण सप व मोक स्यग भारि नार्मों से प्रसिद है। सर का पि अमन प्रसङ्ग सूर्य से समय है, मत म भरों को समया मसह पाने है।रोचारण कास में हमारे कार- तापनि का एग महा होता । पही सर का प्रसङ्गमा । उपर पहनों का समर मूपिर' से सम्बन्ध । माप उबारणवस में हम म्पनों को सपा समझ पाते है। प प्रनोबारणकार में पाया ताम्बादि का स्पर्श वा । यहाँ म्पन का समागम्यम, नियम 4- मार है । मी मापार पर-"कादपो मारसाना स्प" यह पन प्रसिद्ध है। पाती एन्द मम्मन्य स भूप धूनि मबाएर में अपनी पाप्ति रहता है, मतएष वदमिम सर मी र शिमों में ही मामी व्याप्ति समय है। पर उबारणका ।
पहिगाची । मायमूमिका पुरुषार्थ - . शम्दाम के स्फोट, स्वर व्यङ्गम स्थिर्ग की रेह परमय के भी अपय, अत्तर, वर या तीन से मिस्त है । अपमान र विमति, क्रियानचान भक्षर पुरुप विश्व का निमित्त कारस है, एव ज्ञानति अव्यय विस का मासम्बन है । अक्षर क्षर की प्रतिष्ठा, म पय मप्रतिष्टा है । मौतिक क्ष छक विष परामक है, यह माध्यन , मर्प है, मनिल है। चणिक, मौतिक, बाम, मर्पप्रधाम, विपत्ति परकट की मासम्बनभूमि प्राणमय क्रिपान चान पक्षापुरुप है। दोनों का पासमान मनोमय झानप्रघाम प्रम्ययपुरुष है। भम्पप निस', घर भनिस्स , मम्पपतित मक्षर दोनों धम्मों से भाक्यम्त रहता एमा निस्मानिस है । म तीनों में बम्पप को स्फोगापानीय सममिण, अक्षर को आरस्पानीय मानिए. एष पर को पस के सम कर सममिए । तीनों की ससखि यो परमल मालिए । सी परराम से भागे जार पर, जीव, जगत् म तीन स्वतन्य मायामों का उदय होता है। इन तीनों में घिर मगवान् , नीम क्सरावान् है एक विश्व पसरामति । मम्मरम पीप बता स्लरामपि विध कर (भौतिक मि पप गामा पा) अनुचर पन्ध रहता है, तब तक इस स्लरसम्पत्ति के लप से यह क्लेशगन् यना पता है। यही या स्लर पिच से परामुप बन कर मगमचि ईयर का मनुग्ममी बन माता है तो उस भगवन् की भगवरम कर इस पर भनुमा होजाता है। उस समय पा भपने मीपसस्य सम्बन्धी बलश मन् जीवन का परित्याग परता मा भगवान् बम जाता है । यही इस मा पामिक पुरुष का परम पुरुपाप है। पर मघर के गम , अपर मध्यप प गम में पदि पसा जाता है तो भव्ययपुरुष प्रधान बन जाता है स द पप्पप का पूर्ण विकास रहता है। "विमसम्पय पर" (१७)स मीता सिद्धान्त के अनुसार सम्पप मानात पर है। हम इमर की सरता पर अपर के गौणमा पर दी पाम्पिन | मायक्षरावरणमित भव्यय कोही हम पर पिया मगगन मानन के लिए तप्पार परमम्पप के गम में,पभम्पप भदर के गम में परि ममाविष्ट तो मन्नर पुरप की प्रपानता हो जाती है । इस दशा में मार का वियप पता है । "भीषमूर्ता महामारो०७) इस गीना मिदात के मनुमार परामहवि नाम से प्रसिद पर मरही पहिरपाटि का माप्पभूमिका । सम्पर मन-र-यन-पर इस सप्तम्याङ्कन समटि का मासम्बन सकार है एक प रस समरिका (म्पननयुक्त सरका) भाप्तम्बन ममरपारीण माशम्नतम वही तीसरा स्फोट है। पर मोर सपा मिस्प है । मन सपा भनियो, एव मप्पाप खर स्फोट से अनुमा से निस्य, म्पानोपाधि से भनिम्प बनतामा नित्यानित्य है। तीनों को मार ही शम्दाम है। पारण इस शम्दाम में स्फोट की भाराधमा करते हैं। पुति रफो निप, पन निस्पस्फोटानुपामी पाकरों की दृष्टि में शम्द निस्य है । मौतिक पदार्प मर्पमात्रप्रधान है। उधर म्यान मी पूर्ण कपनानुसार माय । इसीलिए पता दिपा के मापार्य मैग्णायिकों का प्रधान उपास्म म्यान भाग है । म्यनन कि भनित्य । मतएव यह शब्द को मनिम्प मामते हैं। दोनों ही मत फोट, गय म्पन्न दृधि से सपा माम्प है। पसी शम्दाम के समामघरात पर परमात प्रतिक्षित है।सा मेरबान क्रम शम्दापका 1 टकसा ही अम परमस का दाम ही परब्रश का बाधक है।'मोम् ' इस्माका र राम से ही परब्रह्म का भभिनय किया जाता। सानि.-'तस्म बाबा प्रण" (पा. पो० १।२७)- 'भोवतसदिवि निर्देश प्रमानिमिमः स्मृत" (10१३) मारि से स्पर है। प्रोम् ' याद में एक महर, किंवा मोम्" सय एकादर ।। 'लराऽधरम् ' इस प्रातिशास्य सिद्धान्त के अनुमार सर को ही घर का सा। भोम्" ही उसरा पारक है इस लिए मोमिस र मापय भास्मानम्' इमान रूप से मोहार ही मामानस परस्म की सपासना का विधान है। बाष्प वाचक से भमिम ।।एर पपक राष्ट्र प्रम एक बाप्प पात्रम दोनों का ममेर सिक हो पाता है। शम्दानिस्मा का यी मौहिक रहस्य सी रास्प मापार पर बापक शम्द एक बाप मप का प्रोत्पतिक सम्बन्ध माना गया (दलिए पूर्वमीमासा ।।१)। इसी भगार पर दापीपुत्र भगवान् पाणिनि का सर्वे समाप पायान" पा सिदान्त प्रनित है। शमन से समातित परताप का पपपि भागे के भा त्मपराण में विस्तार से निरूपस पाने बासा । मापि प्ररणामही कशिए पहा भी उस पा सरूप से दिग्दरान करा मा ममासयरमा । १२५ भारत - भाप्पभूमिका 1 मुमकुम ही वैराग्य-न-ऐपर्म-धर्म मेद से चार मामों में विमल है। यही चारों साक्षात् मग है । तान् इबर पारप ही मगवान् है । जिस जीव ने प्रकृति के इस गुप्त रहस्य को समझ कर मगरजा प्रा सकर सी, यह सचमुच पका भाग्यवान् ।। उपर मगवान् (ईपर), घर सेय (विध), मप्प में सदस पतित सेशवान् (पीर) ।। दि इस सेशवान की प्रतिमेशरुप विश्व की भोर है तो यह सेवा है । पदि पुनि योग का भाजप सता हुमा, सारा सम्पपात्मा का साक्षात्कार करने में पह समर्थ हो जाता है सो इस मारमझान के प्रमाग से इस का कमामा मत एम के समय लिन से पगमुस बन जाता { फसता मलयेरवर की मगाता के अनुग्रह का सत्पात्र ममता मा यह मगधन् । म गवान् ने संशयान् को भगवान् नमाने के लिए तो गीतायोम का सस्करण किया है। दूसरे रामों में गो सममिए कि बामप्रधान ईबर निम मुसी है, अभप्रधान विन हुन पनि मप्यपतित जीव समपानुसार दोनों से युक्त तारमा कमी पुसी है तो कभी दुसी है। सका यह पणापायी मुस मी रागात्मक बनता मा पतन बोमरूपा मशान्ति काबीन नक मन माता । ऐतिक मुसारित के लिए तो हमे उस पम्पोवर की शरणागति ही भ पेषितोही हसे नेपामा समुवर्ण मत्युससारसागरार" पर भारगमन मिल सकता है। बर-बी-र तीनों ही पपपि परम के विकास है। परन्त मागे बाकर पास पापि केवल बिर के लिए नियत हो जाती है। कारण इसका यही है कि सकेसमापा के अनु सार पर पद पम्पप का माधक परावर राम पर का, एवं भार शम्द पर का गचक है। पचपि तीनों । सस्पानों में पर मम्पय, परावर पक्षा, अपर पर तीन प्रतिनिहै। ऐसी पण में नामों को ही परमम, परावरमा मपरणम इन तीनो नामों से ही पास किया जा स पता है। पापि सब भापर-बर की प्रमिक प्रधानता से परम पद सम्पपप्रधान ईरबर में हो, परापरणमाद मदरप्रधान बीप में, एवं भवरणमा प्रधान लिएर में ही मिस्त बन गया म तीमो सस्मामों में से प्राम में पस्सम माम की बरसपा काही दिग्दयन कराय जाता। । १२॥
परिपरि का माप्मभूमिका - भिमुख पीनामा, किंवा पेसम्प्रारी का सरूप समर्पक है। परमगसक्षम भम्पयसम्पति से मुत भाष इस जीन को हम परप ही सरावाम् काने के लिए तम्पार है । पम्प भर के गम में, एक मघर पर के गर्भ में यदि वसा बतातो पर पुस्प प्रफम भासन मार कर सेना है । उस परिस्थिति में वर का पूर्ण विकास रहा है।'सर सशणि मनानि '०१० १६) इस गीना सिरात के अनुमान अपरामावि नाम से प्रति यह रही बिल, सिंगा निसाहरूप सम्पक है। यही नवमान वीर के मसेरा का कारण है, मतण भूतात्मक इस पर को, यि परम विज मोहम मारह से करने के लिए तप्पार है। इस प्रकल निपुरप के तमतम्प से एक ही परमसन तीन ससप धारण कर सम्मे है। पचपि तीनों मसले में (प्रत्येक में) मष्यप-प्रवर-वर तीनों पुरुष प्रतिष्टित । परत प्रानता सीनों ने क्रममा मफ्य-अदर-पर की ही है, एक तबादपाय के अनुसार भम्पप को बिर, भार को जीन एव परविण मास शिपा जाता है। साक्षात् परमस यो उ तीन मरूपों में कारणस होन की मारपकता । इस प्रश्न की उपनिषत् पी गुिणमामयी माण, किंवा प्रहत है। प्रकृति का सबभाव ईमासष्टि का,रमोमा नीसपिकावमो नाम विधा का प्रसक बनता है। मरमपप को सस रूप से मामा राते हुए भी इसी दुरस्पमा माना की या से चर-जीपीय इन तीम स पों में परिणत होना पड़ना । अस R-"मनोऽपि समम्पयामा मूवाना मीरपरोऽपि पन्' । मह स्वामभिष्ठाय सम्भरापास्यपापया" इस्मादि गीता सिम्स स सातम है। सम्पूण विच तमोगण मन माता मा लेगसप है। तम दिया। मरिया मागी रागोप, मोह, पस्मिना, पमिमिवेश मेद से कार भागों में विभक पही सामान्य । गोमेशों मारमय से मीगरमा दुम पामा करता है। सामान मेराने पल, पिया सप्तः (विपासात) मोगमात्र रजोगुराप्रमान बनते हुए सेवान राम की कामनामयो प्रतिक मूस, पाममा होसियासहि की अननी सी प्रकार में अप से पसहमगि माम पर सत्वगुणप्रणाम बनतामा मालान् ।। सही मि। नियामाग । ।
परिपत साममर्मिक प्राधिपते - मास्मा (माध्यमिक एकर), शारीरक मात्मा (जीवरमा), एवं शरीर पर तीन विमाग है। इन तीनों का एक दोनों मानिदैविक सस्थानों से सम्बयो। पम्पयसस्पा प्रमग्परम्म की, प्रवरसम्वा गरीरक भ्यस्मा की, एवं वासस्म शरीर की प्रतिष्ठा है । जय तक जीवात्मा घरसस्था में प्रतिष्ठित ३. तक इसे चम-मृत्यु के प्रथा में प्रवाहित गना परस्म है। परसस्पा से पृथक् होकर चब पर पचासत्या में चला जाता है तो परपम्पिविमोक से पा मुक्त हो जाता है, यही इस की सामो- क्य, सामीप्प, साम्प्प, सापुभ्यसपणा अपरामुक्ति है । उसी पुदिपोग की रुपासे बर या उस परसपण सम्पपसरपा पे पहा जाता है तो "परेऽम्पपे सर एकी मरन्ति" "परा -स्पर पुरुषमुपैति दिन्पम्" इस्पादि प्रीत-सिद्धान्तों के अनुसार पर मभ्यय में सीन होता प्रभा समसपम्पत्र को प्राप्त हो जाता है, वही मनरप्रन्थिविमोकसपणा परामुक्ति है। सीधी मापा मैं यों समविर कि पर तक जीम्ममा चन्द्रगर्भिता पृथिवी के मारपण में है तब तक वह पर, सरयु म्पब से यात्रारत है। मुम्प में पहुंचने के मनम्तर पर मुहहै । एक सूर्य से उपर जाने पर यह बस में मीन है। ऐसे म्मम्पशासी नीयामा कोही सूप्पमेदी का माम। मिस का बीमत्मा । आपट ( शिर:कपा) मेदन करता [भा निरसता है, हमारय ही सूप्पमेदी बनता है। भागे के परिलेसों से उस वियप का मसीमति स्परीकरण होमाता है। . 1-फोट ममात्रिक (सबाबम्बन ) -सर्वथा निस्य (मम्पप ) -२-मा -→मात्रिक (पनगसम्बना )-निष्पामिरप (मकर) 'शब्दमझविवर्त्त ३- नाममात्रिक (म्पबहारासम्बन) पनि य 1-सम्यपा-सम्पत्रिक -सपासम्बनः लिस्पा- -मपूत-यानम् २-२-महार मात्रिक-परासम्बन निरयानिम्या-मृत्युगर्मिनोऽमत • क्रिया -परवझविवर्ष -पर-पर्यम्पत्रिक -विसायमना-मनिस्य -पस्यमय --भः - .
৪ मा भापमित्रा - विसमा परमतत्व लिस से समव करके प्रमापति रूप में परिणत होजाता है। इस प्राय पस्स दशा में ही परमाम ईश्वर कामाता है । लिगुरदय में वो उसे या परप्रय शम्द से । पुकारा पायगा । करस इसका यही विपरशम्द साकार है। शासन करने वाले प्रमु को ही इय, किंवा रिम करा जाना है। इस सम्द उनसे ही किसका ईए ! पा लिासा होतो है। पर-पौर मदर तो मम्पय की भतरह प्रकृतिए , खमात्र है, पर सो शासन के बार है । भवरप ही शासित होने वाले पदार्थ पर भवर से पृथक् होने चाहिए । विमा ठन के सम्बय केशवर की विरता भपूर्ण है। इस कमी को विश्व ही पूरा करता है। उदाहरण के लिए मम्पारमसंस्था को अपने सामने रलिए । इस समय में मामा और करीम या दो माग है। मामा इस शरीर का प्रमुहै, ईबर है । यही दो विमाग भापको पनि दैविक सस्पा में मानने परेंग । महानिस उस का शरी, विभक में प्रतिष्टित राने का परापरगर्मित ही भम्पप इस का मामा है, दोनों की समधि रो। हम बिस मानिमक दशन कर रहे सापाव इवर के दरान है। शरीर की पतु का विषय बनता है, मामा पास से देखने की मस्तु नही । इस रवि से पियप ईयर के शरीर के दरान करना पर का प्रस्मथ कहा जासकता है। इसी वियफरीर के कारण उसे रिफास्पा, विचार, मादा पार मगभियन्ता मगदीचर विनम्मर मावि आभियों के विभूषित किया गया । मय दया पर किम परमय इस बरस में रिम रूप से प्रतिष्ठित होता है। उत्तर सट है । प्रय परणाम के वियरमा ) जब सम्पप, मावा, तर पा तीन रूप सो विप में इन तीन रूमो के भनिधिह उसकी प्रतिमा का सहप मोर माहो सकता। विधि से ही तीन मत्याए कमा प्रम्पकसम्पा, म्यताम्पकसंस्था, म्पकसाया इन माझे पी अधिकारिणी है । सपम्म-परमेष्ठी पर पर्व माणसमस्या से, सर्पम्पन्नम्यासपा मे, पर्ष पन्द्रमा एप्पी पास्पा से सम्बन्ध रपये है। प्रपम संस्था मम्मपप्रधान , सरी भवर प्रधान , पवतोसरी परमपान । पापमान स्पा में मपत की, परमधानसपा में भूपुकार भरमपानरपा में अमृत-माप दोनों की प्रतिमा। मप्पामरा में प्रस
परिपाटि
को प्राप्पभूमित्र -
प्रवियर्स
परब्रह्मसंस्थानपरिलेख
(सपा-मपिपतसंस्था)।
1-1-स्वयम्मू
- सस्पगुणपिकासमूमि:--अम्पतसंस्था -प्रध्ययममाना।
२-परमेष्ठी
F
२-'-मप-रगोगुणनिफनसमृपिा-म्पकाम्यकसंस्पा-प्रक्षरमपानम
है
५-१-चममा
मोगुणरिकासमूमिा-ध्यकसस्या-
-घरमपाना
२-पपिपी
--परममास्मिका प्रम्पतसंस्था --प्रम्पपमपाना-अरपगास्माविठामृमि:
--परमभास्मिका-पताम्पकसस्पा -प्रवरमपामा-गारीरकास्ममविष्ठामूपिर
-परमप्रारिमका-प्यासस्या -घरमपाना-परीरमविष्ठामूमिः
१-मरपगास्मा---
-~-प्रायास्मिकः परमात्मा
0.-गरीरकाम्मा-गोसारमा
१-गरीरम--पाप्यारिम पिपम्
सैपा-पप्पास्मसस्पा
परिष्ट
8! माप्य भूमि
१-अव्ययप्रयानोऽम्पप भम्क्या
१-२-सम्पपप्रधानोऽबर-मन्यप'
•घरावरगर्मितोऽम्पपपुस्प-भगवान परना
३-मम्पपप्रधानापर --मम्पर
१-मपरप्रमानोऽपर महरा
२-२-भपरप्रमानोऽपय अपर पराम्ययगर्मितोऽवरपुप केशवान-परावरबस
३-मचरणपानापर-पर
१-पान पर -हा
1--2-परमानोऽपर -घर
१-परमपानोऽम्पय -पर.)
+सम्पपावरगर्मिता दरपुस्पालेय अवरना
1-परामतोऽम्पपपुरुष अपनर --मगा-सपमति -निम्पसग्गे
१-२-यापपर्मितोप-पर-योग-लेगमान्सकोमनि -गीत
1-पप्पप सरपति पापु-नगर-ए-तमोपनी-मिप्पा गी
पीपारि माप्यभूमिका द्र प्रतरविभूते . - महामायावविहम, पञ्चपुडीमक सहन बक्शामान प्रधाचत्य ही महालिया है। पही उस त्रिपुरपामा, परप्राममनि, सम्पयरक्षण, ज्यापक ईश्वररमा का शरीर है । मा, मूव, स., इस सीन म्हाग्यासियों से युक्त उक्त महाविध में या ईरसरामा भविभक्त रूप से व्याप्त हो रहा है। यह ईश्वगमा अम्पपप्रधान है। दूसरे शब्दों में यों समझिए कि इस प्रथमसरा में पार पर गम में हैं, एत्र भव्यय पूणरूप से विसित है । भम्यप का पूण विकात हरी चतुर्विध मग की मुमति है। प्रसरण इस परिक्ष मारनी को हम पर ही भगवान् कहने के लिए त पर हैं । यही भगवान् शम्द भागे नगर मग स्वरूप में परिणत हो गया है। कारस २५ ।। मिया को ही शान शब्द से सम्बोधित किया गया है। उधर मनोमय समय सामशक्तिमन मन- मामा विधाप्रपन है। यह विषा उस विधामप प्रायय से भिन्न है। विधा शशि, म 'पप गतिमान् । शहि शमिमान से उसी प्रकार अमित जसे कि तापराशि शक्तिमान् पनि से अभिम है। स्तएक विपाशक्किमप मम्पप को हम पारय ही पिपामति करने के लिए सगर है। हम सम्पपरिया र बेग्य हान पर्य-धर्म मे मे चार हैं। यही सिपा के पार पाम पार विधापा मम्मच से मम्पयप्रक्ष घनुगामध। एक पक पाद एप एक मन , मगर मम्पय इन चार पदों के कारण चतुरबर।। परक्षा निघणाद प्राप्यप मन मे ही ग्राम द्वारा रागान मे मारी समि द गा कि-मपा पमण परुति भूपत म घरापाम पा सरस्य पर 'मन ममी -"प्रमः प्रनयमा निपान पीमपम्पपम्" इत्यादि गीतासिमा तो । शुष्पा पम्पप प्रत के तीन महर, ाि तीर पा सम्म रहने है पेपर पर दी पार गरिधारा में रापुरा रमता । मपम मम्पति उमपा दी म पर गावित है। गर तीन पातर अमृतसर मे माषा असन रहने हैं या पि "पिपाद बुदन गुप पादोऽपरामरन् पुन' (प) स्या? मगम मे पर है। गुलर र कदीमाग गुमप विश्व में रहना। पदी असर मध्यमार मे गपिच पन परमप्पो सो गाना मर गुरु मनमय न सा
पदार्थ
- मणमूमिमा
समः स्फो
1-पग्येष्ठिगर्मिता पम्मू-प्रम्पय
-प्रपतमृत्युपप मर्यः
मधर -वन्समा पर:
-पनगमिना पपिपी
घर-~दवसमो बम
पिग्गग्म
इधरापमा
प्राम्मा
प्रारमन्त्री
ममावित
पियकारी मरी रि से रमापनिर | मारप-पदा-सरबी ग
माम प्रगतीपी प्रधान तम भापतितमयप मा,
नी पापिसभाम्पा बाप मागिरापर भीगरपा, गीमापामिक पापा
बागा मिरिशमा? ही पारिमानिस भापा,
ITERATiमोदी Irप प्रगती।
मामाभागामी
पेला परे पापा-Ter
रोगा।
नएमटि म माप्पभूमिका महाविभूते . महामायावविहम, पाचपुरती गमक सामानामगि प्रयापम्प ही महाविम है। पही बस त्रिपुरुपामा, परप्रसार, मम्प्यलक्षण,म्पारक ईश्चरारमा का शरीर है । म , मूग, स्त्र, इन तीन मदाम्याइसियों से युक्त उक्त महाविच में यह ईश्वरामा मविभक्त रूप से व्याप्त हो रहा या भामा सम्पपप्रधान है। दूसरे शब्दों में यो समझिए पि म प्रपमसाया में पर मदर गम में १, एव भव्यय पूणरूप से विकसित है। भम्पप का पूण विकात ही चतुधि भग की ममप्रसिम्य है। प्रसरण इस पहिल मानची यो हम प्रवरय ही भगवान कहने के लिए त मार हैं । यही भगवान् शम्द मागे नाफर मगर म्यरूप में परिणत हो गया है। कारण सा है। मिचा को ही शान शब्द से सम्बोधित किया गया है। उधर मनोमय माप मानशक्तिवन यन- मा निपाप्रधान है। यह विपा उस निवामप अध्यय से मिच। निषा शशि, भ- म्पप शक्तिमान् है । शक्ति विमान मे उसी प्रकार अमिन, जमे र तापराप्ति शक्तिमान् ममि से पभिन्न है। अतएव विपाशक्तिमय भम्यय को हम पर ही विद्यामूर्ति करने के लिए सम्यगर हैं । इस अध्ययविषा के मैन्य बाम एवम्य-धम्म मे से चार पत्र है। यही विद्या के चार पार । इन चार विपापादों के मम्मच मे अल्फ्यप्रन घणाम है । एक एक पाद एप एक वा, सिंगर मम्पप इन चार पदों के कारस पसुरवर है। - पतुरक्षा, किंवा चतुष्पाद् अम्यप प्रम मे ही भात बारा परोपान से मारी सहिए हर मेमा कि- 'मपा पक्षण प्रतिः सूयते स घराचम्म '- 'मा सर्वस्प पमा "मत मर्म प्रयते' -"प्रमयः प्रनयस्यान निधान भीममभ्ययम् ' "त्यादि पीतासिदान्तों से स्पर । चतुष्पाद् अम्पप प्रम के तीन असर, किंमा तीन पार पतन रहते है देव एक ही पार समिधा में सयुक्त बनता है। सणि मत्य है । इस मत्यष्टि में उसका एक ही प पर समानिए है। शेष तीम अदर अमृतरूप से सपा मसह रहते हैं बैमा वि "त्रिपार्भ संद पुष्पः पादोऽम्पेरामवत् पुनः" ( प १) प्यारि मन्त्रीमन मे स्पष्ट है। वापर कर एक ही पदर से मृत्युमप विश्व में पाप्त रहता है, यही भदर मीमाय से सदिय बन कर मदर मपीदा से पुत हो जाता है, पारा महर विशुर अमृतमय न पर पहिरपति A मा पर्मिया भाररिपती तीन मर मान रहते है। ती सादस्पो मले सस में रसकर उसे तीन मफरों के मान से ही सम्बोधित किया गया है। इस सन्द में भी सीन ही मर है, एक मगान् राम् ।। भी वीनही मपर। "स्वरोऽसर साविम्यमनः" इस प्रातिशाख्य सिदान्त के अनुसार मार को दी पर कहा बाता है । सापही महार से पवन परिगृहीत रहते हैं, एक मदरगणना में उन पी सतन्त्र गम्मना नहीं की जाती । सदाहरण के लिए सप भत्ता र कोही सीजिए। इस में पपपि पण 'म-क-श-प्र-र-भ-" यह परम्तु मक्षा (सर) दीन है। एक "भक्षरमिति" (प-म्-ति) पवरम(ता.1४३) के भमुमार भदर कीन ही पाने पाते हैं। पर सपद में--प्र-प्र-१ प है, परन्तु मला दार से का एक से पर माना जाता है । "पानिमदरम् ' [ATIPRIपसी मदर रहस्य को स्थित करता है। इसी मापार पर परानेकता के रहने पर मी 'मोस्" को एकसार ही माना गया है। इसी पुति मिस विशालसिद्धान्त के माधार पर मगगानगर मगर सम्दों रहा "म्-म-ग-म- म-प- (मगगन्।------र-म: "(रिR "-म-ग-म-प- भग- पद स्मारिका से प्रसय ८८, वर्ण है वहां माता दीन तीन दोनों ही या *-ग-पान, -4-7, म-1-पत् इस कर से पापही मिपुर मम्पपाप की विगविभूति ।।पही पहिली भाविदेशिक सस्पा ।। पोगमापारिहम प्रणामक कमासपकप पाश्रमीनिक पर सेपि नीयम्मा का Ant पम्पक-एगर्मित भवानुगतानस मामति कार्मारमा ही जीनामा समें भएर का wिat | इस पर यापपर माग परमति रस की मोर मुकाम सी र यर मारावान् बन । यही मी पापालिक सपा । रिपु पापरिदम निमाग्निमय मनिक पिपा शिपिपिटरामा पा Rh म्पप पपरमितामगहीत रिनिपेय प्राणानि स शरीर पर मामाहीतीमरीमा पिसोनिक सवाई।
नेप मा माप्पभूमिका भारमन्धी । म्यवमभान चिरामा--माधिदैविकसस्था २-अधरमपाना- -- तदिदं सर्वम् एणमाना -नीपारमा -पाध्यात्मिकसस्था -शिपिविशरमा -प्रापिमौविकसस्था । 1-1-अग्रचरगर्भित -अम्पयाम्मा- -मास्मा २-वामान अमावस्यास्मर्फ पिवम् -शरीरम् मारमनीरा ० २-पराम्पयगभित -भदरम्पा- -मास्मन्मी-मीर २-घरपपार्न कमवत्यास्म शरीरम् -गरीरम २-१-अप्पयावरगर्मितः धरास्मा- -चरमपानविस्पामिपिएर --भास्पा --मारमन्त्री थिपिपिएर गरीरम् ईबर बानप्रधान है, शिपिविधारमक भगत मिशानप्रभान है मम्पत्य जीव समयात्मक है। धनप्रधान मारमा मगवान है, पर उस कोर में है, पही प्रपमपर्व है। विानप्रमाम विश्न मन्तिम पर्व है । यह विश्व ही उस नमूर्ति भगवान् की उपनिषत् (बैठने की बगव) है । परि भाप मग- मान् से सादात्कार करना चाहते है तो भाप को विश्वास उपनिमत् की ही माराधना करनी पोग्गी निराकार मावान् की प्राप्ति साकार बिर की उपासना से ही होगी। यह भाप को मिसेस पाप, परम्प यही, इसी शरम में, इसी निरस में, भारतात हली मौतिक पदापों में । "एप सीट - । माप्मभूमिमा पत्रमा मरपु ममेपु गोमा न मकागने यनरम्पया मुदपाश्मया हमदगिमि " (स्टोर १।३।१२) के भनुमार पापही भूतों में प्रतिष्ठित है। मुदिप ग ही उस के दर्शन का सम्पन्न उपाय।। 'भूनेषु भूतेषु रिमिग्य घोरा' मेत्यास्माल्लोकादमता भवन्ति" (नोर २१३) पनुमार धीर युरियोगो न भूतों में ही उमे पार मुक्त होते हैं । यदि माने यहीं, इसी गरीर मे उसे प्राप्त म रिपा तो विनाश है। इसी जगह दिए । मिझेग्य पप निसंग । परि मापने ] उसे पा लिया तो मामायन पम्प है। भूतानिश इसी भगवदुनिया का माम्प बनाते हुए पिपरत- के पेदगदि मा शरीरम्य विनम' । प्रय मा मनो मरति प्रम प्रमसम नुत ।। उम पार भगापति? इस भार उपनिषत्मपति , मप में जीवसति । और क्या है ? म का उar टमी मूस भगगन का पितान । मग गन् का गीत (नित मार1)ी "एकादमि पर सर्वम् के अनुमार बह एक होमर) मा पों में (नाम्यापों में परिणत हा पर सपा जीप पति । परमय मन मप को CART में परिणत करमपा से ही नीति का लिान परता, मा दि 'य: नागप ननामा पानि बनायुक्तियों गेहर'मा याममा गधा पुरो पान ममापनि पासिटात भी पानापन गरी प्रमोपरि मान ! मपame TART FRI, मेरित गर । पर वमी या रबार, मारमा मातमार दीन, रिगान माती के गीगागद पाया पुग! | पापा जी गणमा सरकार होमपान सपनो जीवनमा साना पा । परत 'पप्पाप मामिपरमपगमरमर पनुपार मपनी ममीमार बहिगिरी मापमित्रा - भजपशास्त्र -2 में परिमत होती है, जैसा कि-"मीवभूतां महाबाहो ययेद पार्यते मगत्" इत्यादि पपन से पर।मदा कोही पूर्व में हमने जीसत्या का सरूप समपक तक्षाया है, एक-"क्याऽऽ- चरादिरिया सोम्प !माग मगायन्त ता पापियन्ति" मादि अति भी उक्त कपन का ही समर्थन कर रही है। यह भएर उसकी पराप्रकृति है, यही दीपका जीवन है। इसी बीमार पान भक्षरपतिमाव के कारण रम यशनि जोर को मीत २ का कर भगवान् की मीता काहेंगे। मगबहोता बाप हस्तानो उपनिषत् बाक्प स्वतन्त्र है। मगमन् की उपनिषत् मी विध ही है, एम नावारूप जीव की उपषित् भी निधी । मन्तर दोनों में केस मही उसकी उपनिपट वा महाशिमा इस के गर्भ में प्रतिष्ठित एवं इस की उपनिषत् या छोट्यसा शरीर ।, यह इसी के गम में प्रतिष्ठित है। मर गाभिपनी वानिपत (वि का सदुपयोग कर तामा नित्यमुक्त, कहाँ बीच अपनी उपनिषत् (शरीर)को विपपासक्त माता हुमा बर है। जीव के इसी बापममान को हटाने पे लिए भगवान् की या सगनिषत् हमारे सामने भाई है। शामोपदेश एकमात्र मनुष्य से सम्बाघ रसता है। मनुष्यावपिन नीवाभा को सन्मार्ग स्वमाने के चिर ही समयास्त्र का सकसन मा है। इस प्रकार बीवारमा ही शान का प्रधान सत्य है । पीना- शाच मी उसी मम्पादय से भारत है। माता सर्वपापेभ्यो मोव पिप्यामि मा शुभ" पर प्रविशा उत सिद्धान्त का ही समर्पन कर रही है । पूकै श्रीधरा मदरप्रधान , एक पही गीताण का मुस्प सप है, ऐसी दण में हम इस गीताय को भरप ही 'भधरण" कहा सकते हैं। यही कारण है कि भगवत्-गीता-उपनिषत् तीनों में से केक्स गोता एम्दीमागे जाकर रूस बना । मगात् सम्द से, एवं केवर उपनिपत् शम्द से कभी गीतायातका बोष नदी होता । परमाय गोवा राम्द सुनने से सबकास हमारी पशि गोताख पर पर पसी जाती है। प्रवासद पीपाश्मा का सूचक, यह कहानी जानुका है। इस प्रकार पपपि गीता का पपरशाजस्व ही सिर होता है, परन्तु साप साप गीता मे भगवासपण मम्पप, एप लिय का भी पुलिण्य निरूपण किया है। इस रष्टि से हम इसे बीमाठि । मायभूमि पाप-पक्षमा सपशाच, किंए पूर्णशाब भी कर सकते हैं। "फिपन्यैः शाजविस्तरः" का यही मूल है । इसी पूर्णता को पार करने के लिए पा मगवद्गीवोपनिपट इतने परे नाम से सम्बोभित ई। भगवगीतोपनिषद एकमात्र मगात् मीता-उपनिषत् (र- मीगत् । इन तीन दिनों का ही रिसेपय करती है। सर्व नाम ही इस गा के प्रतिमाप विषय पर स्पष्टीकरस कर रहा है। का मापस्प जीव को उसकी मारमसम्पति का परिचय कराती है। तोगदेश म पस्प मी को जान (मगवत-विहान (उपनिषद) द्वारा समस्योग पर से बाती है। - ईपर मोर शिपिविष्ट यह तीन माय । इन तीनों के पक प्रमश! मनात्-पिता उअमितत् पा तीन शम्र है। ये मर्पभाष क्रमश पपा, पचर, पवार । मतएव तापक राम मी मय ऽपदा सदर चतुरबर दी है। वा मावि में 1, शिबिर अन्त में है, बीत्र माप में। । इसी क्रम के अनुमार रिमार्यवाचक भगवत् राष्ट्र को मादि में, सपिसिनार्थ- पाषा उपनिषत् राम्द को मात में, एक मीरावाचक गीतारामद को मप में रखते हुए रिफर पी-शिपनियामक इस स को मारनोवोनियन करा गया है। गीता को हमने पूर्ण यात्रा का। चारयोय नाप या कि प्रधान से पूर्ण क्या तत्व है । संसे से सच मी वर पाम कर लेना चाहिए । “शून्यमन्पव पान, पूवमन्यत् स्थानम्" इस प्राप्त सिमान्त के अनुसार परनाम के शूम्प-पूर्व दो स्थान माने बाते है। एप स्पान की पर स्पाम की प्रतिष्ठा है, प्रणय ही म्यमार की मममी है। मतरण गुस्प को पूर्ण करा माता 1, एष पूरा को गुम्प कसा माता है । सस्पाविज्ञान के अनुसार र समय को पूर्ण सपणा माना गोपि लोकशि से १ सपा पूरी, एक सम्प भी ।। पास्तु विमानरपि से २ को दी पूर माना गया है। कारण इसका पीर पूराठा मे पागे सम्पन्न र गाता है, प्रागमन हरु माता है। मपूर्णता में भगे से सम्पन्न बना पता है। इसीतिर दाम सम्पन्न में 1-11-21-1१-१.१-१... मही परस्पा पती परिप का माम्पमूमिका 18- पूर्णमाष । गई है। परसोकग प्रेतास्मा का उसके सम्बन्धियों से विछेद रोमाता है, प्रतएव ततृप्तिसपण पारसम में 1-10-१०० इस प्रकार से पूरी ही दक्षिणा का विधान है । भगता-पी समि की चमनी है । पुरुष पुरुष का समन्वय पूण-पूर्ण का समन्वय है। इससे सरि मही होस कती । स्त्री पुरुष का दाम्पममात्र अपूर्ण है, न्यून है । "न्यूना प्रमाः प्रमापन्वे" इस सि- दान्त के अनुसार पदी म्यूनम्पप प्रमावस्तुनितान [सन्तान] प्राति का कारण है। इन्दी सप र- एस्पों को सप में रसार मानिने म्यूनमात्र को पूर्ण माना है । इसी माधार पर अपरार सल्या को पूर्व सपा मामा गया है।र-११-१९१९ इस विक्रम से सम्पामात्र का विराम र पर हो जाता है पही इस सपपा की पूर्णता है। , दणचरहन्द को विराट् कहा जाता है । पदि एक, मपणा दो भएर निराद् में से कम होगाते है तो वह निषदिराद् कासावी, एव एक भपन दो पचर भभिक होगाने से पही मुरिनिराद कबाली है । प्रदोमात्र में यह सामाम्प निपम सममाना चाहिए। नर पकेग परेक छन्दासि पियन्नि, न दाम्पा" [२००१।६।२।१७] इस सिदान्त के अनुसार एको मावर कम, भपा अधिक हो पाने पर मी पैदिक पदों के ससा की कोई हानि नही मामी जाती । बस यही शास्त्रकारों को कोई रास्प बताना होता है, का इस सम्याक्रम का भाग्य शिया करते हैं। गीताशात पूर्ण है। इस की पूर्णता पूर्वकमनानुसार १ भदरों पर निमर है । नाचाहन्द म्यून विराट् । म्यूनमात्र पूर्णमा है । इसी गुप्त रहस्य को स्मित करने के लिए परमधानिक भाचार्यों में इसका "मगवता-उपनिषत्" यह ए मा कर माम रक्सा है। इस प्रकार समणिरूप से निराहारा अपनी पूमना प्रकट करता पुमा, एवं पशिरूप से सिर-जीव-शिदिपिाद्वारा भरमी पुणता प्रकट करता मा मगहीतोपनिषत-गाय पाठकों के सम्मुस भाता है। १४१ परिष्ठ माप्पभूमिका भूम्प-पूरमार सक्शाव, पि पूर्णशान मका सकते हैं। "फिमन्या शासविस्तर" का यही मूस है। इस पूर्णता को म्या करने के लिए यह मगपद्गीतोपनिपद इतने बो नाम से सम्बोधित ई। मगीतोपनियत एकमात्र मगवत् गीता-उपनिषत् (सर-भीमगात् । इन तीम पियों का मितपण करती है। सपनाम ही इस शसके प्रतिसाच विषय पर स्पष्टीकाग कराti वा मापस्य गीत को उस की भावसम्पति का परिचय कराती है। मोपदेश मम्पत्य जी मन (मावत्-विशन (उपनिपद) प्राण समाग पर हे गाती । चिर गोर शिपिविष्ट या तीन भइन सीना के प्रत मया मना-पीना उपनिषत् या तीन सन्द हैं। ये मर्पभाव क्रमश पचर, सहर, चतुदर है । मतस बार र मीरा उपचा दमदारपर ही नवा मादि में 1, शिथिए अन्त में बीर माप में। । इसी कम के भनु पार रिमार्थापा मगर शम को भाति । शर्पि पालक पनि शद को मत्व में, एक भीमाात्रा प्रकाराम्द को सम्प में रखे हुए एम पोष-शि पनियराम शसको मगमगीतोगनिषत् कसा गया है। गीता को हमने पूर्ण शाब कसा । चारणोप नियाकिबामा से पूर्ण क्या सच ह । संक्षेप से इम का भी सत्तर एयङ्गम कर लेना चाहिए 1 "शूग्यमम्पद स्वान, पूपमन्यन म्यानम्" इस प्राप्त सिद्धान्त के अनुसार पानस के एप पूल दो माम माने गाते हैं। एप पान ही पण स्पन की प्रतिभा, पूलता ही गुम्यमार की पनी है। भएर एम्प को पूर्ण करा माता है, एक पूर्ण को शुम्प कसा जाता है। सानिधान के अनुसार र पूर्ण सम्या माना गया पापि १० सक्ष्णा पूरा, एसप भस । । परन्तु मानाभि मे र फोही पूर माना गयो।कास इस छापी है कि पूर्णता मेम्पो का समय र माता ?, भागसन कमाता है। पपूणता में भ.गे से सम्बन्ध बना एप है। मीनिए दाम सम्पन्ध में-१-२१-१-११-१..पही यमाया एती सरुपको परिपाटि W! माम्पमूमि - पूर्वमाप । गई है। परसोकगार प्रेतात्मा का उसके सम्बन्धियों से विखेद हो जाता है, अतएव तततितपस मादकम में 1-10-१०. इस प्रघर से पूरी ही दपिया का विधान है। अपूर्णवादी सहि की जननी है। पुरुष पुरुष का समन्वय पूर्ण-पूर्ण का समनप है । इससे सापि नही होस कती । स्त्री पुरुष कर दाम्पसमाव मपूस है न्यून है । "न्यूनाद ममा: प्रभायन्ते" इस सि- दान्त के अनुसार यही म्म्ममाव प्रमावस्तुलिवान [सन्तान] प्राति का कारण है। इन्ही समर- इस्यों को गएर में रखकर शानिकोंमें म्यूममार को पूण मामा है। इसी माघार पर भपूर्ण र सध्या को पूर्ण सरूपा माना गया है। 1-1-२५५६ इस्मादि कम से सम्पामात्र का विराम र पर हो जाता है, यही इस ससपा की पूर्णता है। । दशवरबन्द को विराट् कहा जाता है । परि एक, अपन दो भएर मिराट में से कम होगाते हैं तो यह निषद्विराट् करावी है, एष एक अपना दो महर भषिक शेगाने से नही परिनिराद करवाती है । दोमात्र में यह सामान्य निपम समममा बाहिए। न पकेन परेल यासि विपन्ति,नदाम्पाम" [२०४।०१।१२।१७) इस सिदान्त के अनुसार एक दो अपर कम अपना अधिक हो जाने पर मी वैदिक पदों के समय की कोई हानि महीं मानी चाती । बम वहां शास्त्रकारों को कोई रहस्प गतवाना होता है, पर वे इस सम्मानम कादरी माप सिपा करते है। गीताशाम पूर्ण । इस की पूर्णा पूर्वकम्नानुसार अपरों पर नर है । ममापाइन्द म्यूनविण्ट है, 'यूनमाप पूर्ममा है। इसी गुप्त रहस्य को सनित करने के लिए परमवैवानिक भाचार्यों में इसका "मगवद्गीता-उपनिषत्" पहर महर का नाम रस्था है । इस प्रकार समधिरूप से निराद्वारा अपनी पूना प्रकट करता [मा एवं परिझप से पर-मीव-शिहिपिसारा अपनी पूर्णता प्रकट करता मा मगहीतोपनियत्-ग्राव पाटकों के सम्मुस माता है। १४५
पाहिए
मा माप्पमिका -
T
१-ईश्वर -----------
२-भगवत (म्-प्र-ए) म-) म-(1)--, शम्दाम
.१-जीष---
(f4-~~-परमान
२-गीता--(गमा
-~-सम्मान
१-शिपिविष्ट -(ए)-६-५-२-पर-ए-पा-~-परब्रम
२-उपनिषत्----------गम्वरम
१
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ध्यवरा-नवर दयदर -जीर चतुरचर।-शिपिविष्टा (म्)-मर)-म ( )- ८) i ( सत्)मा 13 ()-मरनाप) मत् । भगवत् -गीतान --उपनिषत् ३ २ ४ ६ -विरादपुरुप -पूर्णपुरुप -उपनिषत् भगवत्- गीमा- परप्रपत्र मध्यप्रणाम मना पानम् अमृतम् मीपप्रपत्र- भधरमपान प्राय .. - निया -शिपिविष्प्रपत्र दरम्यान पाक अर्थ: मृत्यु पागा प्रमुखमुत्यू | मोहयोग बामयाग भर्दिषतम्- मायामम् - यत्तस्यषाचा-|-बारवा -मधिमूतम् "पत्तवपपाद पर (प्रग्यप यो दिति नस्पतत् (एसरररोषावर प्रका) दुनियागो गानाशायनिकष इतिगीतानाममीमांसा-मगरनीसोपनिपमामराम्पम्
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॥ श्री ॥ ५--गीताशदनिरुक्ति नाममी-सा समासप्राप। पहि, एवं समरिरूप से उमपपा नाम का रास्प पाठकों के सम्मुस रस्सा जानुष । भर इस समय में कोई विशेष बलम्प नहीं है। पर केस गीता शम्द के सम्बन्ध में दो मदर घोर करने हैं। प्रतिपादित गवारदहस में पा बतलाया नातुका है कि मा कोदर राम नहीं है । जिस प्रगर श्रीमद्भागवत, गेपिकदर्शन, सांसपटरान, पापदर्शन भादि प्रम तभदायों में ही निकट है, ऐसे गीता राम्द नामममादा में भागमा मी वस्तुतः इस प्रन्य का नाम नहीं है । इसम्म प्रस्थप प्रमाण है परम्पहार । मता के प्रत्येक अम्पाप के उपसहार में 'इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्स" यह उम्लेख मिलता है । मदि गीताराम्द भीमदूम्पगवत्परि की इस प्रप का नाम होता तो “इति श्रीमद्भागवत महापुराम' इस दिसत इस प्रप के मपापों के उपसहार में भी "इति भीममगदीवायासे उपनियम' पर पधन रयत रहा । फबत पूर्व उम्स के मनु- सार मीता शम्द का पौगिकलही सिर होता है। इस सत्र में नितमी मी उपनिषदें । वे सब मगान के द्वारा गाइ गई (काही गई) हैं एकमात्र इसी हेतु से इसे गीता कहा गया है। ता राप्य पदापक "" घासु से निष्पम [पा -(के में शम्दे पा० धातुपा० मारि)। ऐसी दशा में मुराण के अनुसार मो मीटर राम्द का 'फपिवा-मोका-गन्दिता-उता' या पौगिकाम की सिब होता है। या एक मोर पमकार है कि उक शम्न में से किसी का प्रयोग न कर म्यास ने प्तिा सम्म ही प्रपोग किया है। एक रास्स तो इसके पूर्व में बसाए पापुके है।भब एक रास्म का रिबन और कराया जाता है। शम्द को बारिश से पार निकालेर माम ही शम्दम्पहार, किंवा कपन है । इस कपन का पतल से पनिष्ठ सम्बन्धी समुद्र में उत्पन हम बासी बीपिए () ही राष्ट्र की पनमी है। बोसने से सर्वप्पापक बासमुद्र में गहरें पैदा होती है, वे ही पहरें कपराधी पर माके यहाँ बैठे हुए प्रशन मन से परिग- परियार का ममम्मित - पागनि रात बनकर शरवार की जनमी बनती है। यही सम्मान प्रति है। इसी प्रकार हम बो शम्द मुग से बोसते हैं उसकी बमनी भी बाकी है। सोम, एवं मसामों को छोड़कर हमारे समाई शरीर में पैमानर पनि पधक सा है। इसो भनि को "वस्प पा पवस्यामेबागेगेपनिषत् ' (रात.०१.११) के अनुसार पा करा जाता है। यही नागमि मन की प्रेरणा से पापु बारा प्रमाहत बनकर मुण्ार से मिरुसती पर रायप में परिसन होती है। ममिमयी मूब पाक ही राम्दामिका वस बार रूप में परिणत होकर एप स्पान से पतकर मुखस्पाम में में प्रवरा करतीसा रि-" 'मनिर्वाग्ममा मुल मारिरात्" ऐ उप २) इस्मादि से स्पष्ट है। पाणिनीप शिवाने मी समो पत्ति का पही कम माना सदसिए पा शिवार-१०॥ तत्पम्प करने का पनि सम्मत उकि-श्रुति मे से दो मागों में बिक हम को ए मुस से बोसो वा नाप शब्द है । एव मो शम हम कानों से सुनते हैं, या अविरूप है। दोनों का मग बाक्लय हो।।मातर दोनों में केस ही तिरूप सम्म का माध्यामिक मागमि से सम्पपीन श्रुतिरूप शा का भापितविक बागग्नि से सम्बन्ध है। शरीर में राने वाला बागग्नि माध्यामिक 1, एन इस रिशस माकाश में सर्वत्र समुद्रसर में व्याप्त बागम भाविक । पूर्वउपनानुमार माप्यास्मिर पानि की तरंगों से समिरूप एम्द उरम होता । ट का उस मानिस गमि पर भाषाहता है। इससे उसमें रंगें पैग हो पाती है । पपी तरंगें पूर्वपनानुमार कान पर पाकर श्रुतिरूप पद की गनमा फ्नही है । उमपपा सदसरा की जमली है, पासिद विषय है। में गीताशाम पाम, रामवावधान ! उपर भौती उपनिपरों का शिान ममप , जमा कि पूर्व के गीत राम्दारम्प में कहा गया है। सी पात्र को मपित परन के लिए इसे "क" कविता परेपसमकाता से नि शकिपा पापकरभार हा जीनगरमा का सूप बा गातारा पारमा पोषक है। वारपार बीस्पना से पास गप क्या पर भी नाम सेना भारयक होग्य । दम लता मा कि गीता में मारमा-विर (म-विशाम ) रोगो बनाए दहिकरी का माम्पभूमिका 11- वाम्ग्यामि हमा है। गीतायास दोनों का निरूपण करता है, वामप गीताशम्द के प्रयोग का यही कारस है। माग्मतत्व के अनेक शेते हैं। उन सब का पपाशस्य भाग के पारमप्रकरण में नि रुपम किया जायण । यहाँ इस सम्मान में केवल यही जान सेना बस सेग्न किभास्मनार के पिस, विधामा, विश्वातीत या वीन प्रपान निवर्य माने गए हैं। मानद-भिमान-मनो सप बही भारमा विश्वातीत है । एन-माण वामप यही भारम्य विमात्मा है, एक पार-भाए- मयिमय वही भामा विमान तीनों में विशातीत मारमा शम्दातीत मनताहमा शमान धित है । रोग रखते हैं विवाग्मा, एव बिच । इन दोनों भारमनिपत के मध्य में दोनों से स मच रसने पासा प्रयतम से है। मनापाण गप विश्वामा भी बाक् से सगीत है, एक बार पाप-प्रनिमय बिम भी बार से ही परिगृहीत वा सारापतित है। इस प्रकार उपमयनिष्ट पर सतत म्या-लिप दोनों का सम्राहक यन रहा है। भारमा बानमप है, समयोग का इसी से सम्म व है। मप्रसिद्ध सौम्यमिष्ठा का मूता भार कानमूर्षि पही मामा है । जिस कम्ममय है, कम्मयोग का इसी से सम्म । मसिद्ध यो गनिमा (कर्मयोग) का मसागर कम्ममर्षि मही विद्या । उधर मायस्प गाय मारमा के बान मे अनमय, एप विश्व के कर्म से कममा मनवा मा भनकर्ममय है । मपान् को ए में मिशुर बानयोग मी मला नहीं है, क लिगुर कमपोग को भी पर पुग समान है । इनका प्रधान विपप !-मानकम्ममप दुझियोग । भगान् पुदि का योग चाहते हैं बहिरंग प्रकृति माण-पाप-पा-मम-प्रमाद भद मे पाच भागों में विमा है। इन पत्रों का क्रमश लिमामा के पदपवा विम के सम्म परमेष्टी सूप्प-पामा-पिकी इन पाशा पर्यों से समान है। सूर्य से मीचे कर भाग माय विन। मूम्प से उपर विचातीत भाग्मा है। मप्प में सूप है । इस प्रातिकम सम्म मुतारी बात ही बारमप पही सूर्य मुद्धि का प्रमा है। भतएम हम पुनि को धारण ही पारमपी कहने के लिए तत्पर है । मीनाशाम धूकि महमयी, किंवा अप्रतिक पुदि- पोग का निकरण परता है, वास्तव राम की मूस प्रतियपब गीता राम दाग -" मै ।
पा गीताशानिरुक्ति अकरमपसहर मानाप्पभूमिका माराम से सम्ममा, ऐसी रण में इस APR को "गीता" हद से सम्बोनिस फरमा सर्पया नसता -रिपारमा (ननयोगमविए) --'- उमपमिष्टागर (मक्रियागमतिष्ठान- इदिगेगनिष्ठा Pोवायासमिना --विर (कमयागमविष्ठा) ए से मास्मा (हानयोग) तरंगें ६ बनती दियोगः दि (मकिपोगा) चोरप (कर्मयोगा) . पाने के लिए इस शनिपाएर है।बामपानी हमबनतामा नाममीमासा
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८-गीताशास्त्र की अपूर्वता, पूर्णता एवं विलक्षणता
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48 श्री गीताशास्त्र की अपूर्वता, पूर्णता, एव विलक्षणता- निस शास के नाम में ही प्रपत्र मौलिक रास्य दिपा तुपा है, उस शास्त्र का प्रति- पाप विषप कैसा रहस्यपूण होगा ! यह प्रश्न पूर्व की माममीमांसा से ही गताप है । सचमुच गीताशास इतर शाओं की अपेक्षा पूर्व, पूण, एव विस क्षस है । पीय विषय मिस टि से भपूर्ण । फसे पूण है । स्य मितपयसा है ! प्रात प्रकरण में प्रदेश से एली प्ररमों के समाधान की घेरा की जायगी । - गीता की भपूर्वता, पूणता, एक विचक्षणता का एकमात्र विज्ञान रवि से ही सम्मम्म है। बिना नहानपि के हमारी एि में गीता का कोई महत्व नही रहसा । यदि प्राचीम म्या- म्पातामों के अनुसार गीता को विशुद्ध दरान प्राय माम लिया जाता है तो पीता एक सवस्त्र प्रप न राकर गतानुगतिक शाम रह पाता है । प्राचीन स्त्रों में समरि, एवं म्पटिरूम से मामकम्पारण के लिए बान महि-कर्म नाम के तीम योपों का निरूपण पिया। शास्त्रों का कहना है कि मनुष्य अपनी योग्यता की परीक्षा करता तुमा धान-महि-कम्म तीनों में से किसी एक का (भहरी भद से) चाय लेवामा अपना हित सापन कर सकता। तीनों ही करपाण के पप है। क्योंकि तीनों समग वेद सम्मत है। भेद का मामणमाग मनुष्य के पर्सम्म की शिक्षा देता है । मनुप्प काम्प माप कारी मेद से कम्म-मति-बान मे से हीन भामों में बट हुमा ।इसी लिए देश के नाम भाग के निषि-भारम्प-सनिपत् पर तीन पवारतर रिमाग उपसम्म होते है । विधि भाग कम्म का गुप्त रहस्प मतदाता मा कर्मयोग का, माश्यपफ माग उपासना, किंजा भक्ति का गुस यस साता [मा महियोग का, एक उपनिषत् माग शान का गुप्त सस्य मतमता एमा भानयोग का निरूपण करता। rसीन वेद भागों पा भमिनि, शापिरस्य एवं व्यास ने तीन सतम्य दरान लिसे है ।मिनिमशीव मीम'मादरान प्रामणो कम्म की मीमांसा करता है । प्रामणमाग पनि पूर्वभाग है, भारत पर दण्न पुरमीमामा नाम से प्रसिदपि भादरा ६, माय पोरना बहिषरष्ठि आमाप्पभूमिका II गीता की मपूर्णता (प्रेरणा) है। यही इस पूर्णमीमांसा का मुम्प वियप है। इसी प्राचार पर मीमांसा ने धर्म का- 'पोइनामतोऽर्पोपम्भा" (पू० मी.. m) यह सपण किया। । शातिर प्रणीत शापिम्पदर्शन भारतको महि की मीमांसा करता है। ईयर के साथ मनु- रहिही परामहि । इसी माधार पर शारिप एन का प्रारम्भ मापरानुरकिरीपरे" (") से हमा है। म्यासप्रणीत शारोरकर एन उपनिषदुत मन भी मीमांसा करता है। उपनिषत् पूनि वेद का उत्तर एक मन्तिम भाग है पतरस तमीमासक इस ध्यासन को उचरमीमांसा, बेदान्त मावि कहा गया है मन प्रम का सूचक है। बम फम्म प में दिम्पम्" में शाम से अभिप्राप से ही प्रम सम्द प्रयुक्त एमा। उसी धावार पर पानप्री- पादक वेदान्तदर्शन कर पारम्भ भपातो वा मिनासा" (म्पास सू. ११) इस रूप से मा ।इस प्रकार वेद का कम्य मा प्रतिवादर प्रामणभाग (विधि-मा'यपा-उपनिषद माग ), एस तमीम्साहप तीनों दानशा मणः कर्म- मयान का सत्र रूप से निमपस कर रहे है। १-बिपि -भारसपका ३-उपनिपद मध्यमाग रचरमाग: पूर्षमागा कर्मपतिपादक महिप्रतिपादक कानमकिपाकर मैमिनिदर्शनम् पुषपीपीसा म्मयोगा शापिरस्पदशनम् मन्यमीमांसा म्पासवर्शनम् उचरमीमांसा मानयोगः मझियोग साएप मक्ति योग निष्ठा निष्ठा मिष्ठ वातीपानि-पाध्यास्मिानि मीणि शाशामि परिगरि • माप्यमिधा । गीता की भपूर्वता पदि उक्त शासन को प्रधानता देते हुए हम विदाशनिकले से ही पीता के प्रतिपाप विषय का विचार करते हैं तो इसमें हमें कोई भक्ता नही मिसती । तब तो हम गीता के सम्मान में केवल यही का सकन है कि जिन कम्म-मक्ति-यानयोगों का येद के पृषक पृपय दीन भागों में निसरण हुमा है एवं बिन तीनों का तीन भाचार्योन पृषक् पृपक् निरपण रिमा १, मगवान् ने केरस एक ही शास्त्र में सीनों का समद कर लिया है। गला शास्त्र काम-महिमान अधिकारी मेद से तीनों काही निरूपण करता है । एसी दश में गीता शास्त्र एक प्रकार से सपा पथ, एम केवल पिरपेषण रह जाना है । समी तो तीनों के अधिकारी नी, एम तीनों का निरूपण पूर्व से सिर है। फिर पास को रस स्वतन्त्र रचना की कोई भरपरला म पी । गहम्पी पूमी सायुक्त विधिमागाग कर्मकाए- में, बान प्रस्पी मापनीमेसायुत पारपरमागराग महिमा में, ष सम्मसी उत्तरमीमोसायुक्त उपनि पत् मागधरा कान कारा में प्राच होता मा बिमा गीता के मी माने पुस्पाप को सिर कर सकता पा तो फिर गीता का एक मार मोर हमारे माये टास देमा कोई महल नहीं रखता। जब हम प्राचीन म्यारूणतामों से इस प्ररन का उत्तर पूछते हैं तो वे मौन पारस करलेते हैं। भारत उनकी टि दरानमात्र से सम्बन्ध रखती है । एक दासनिक र मे "वीनों का एक तरी अन्य में निरूपण इमार" इसके अतिरिक्ष भो। उचा बन नही सकता। पीता की मिपपसगरी प्राचीनौने इसी रूप से हमारे सामने रखी। प्राचीमों के पतानमार भारग्म के पाप ज्ञानयोग का नियमले हैंमाप के पप्पाप ममिशेग के प्रतिमरक है, न भन्त कमायानो कम्मपोग का निरपरामा है। पानयोगपति पारिका पायावी वसपार्यों में मह १-रिपादयोग, २-सांम्पपोग १-कर्मयोग -मानार्ममन्पासपोग -कम्पमन्यासयोग, ६-मालसपमपोग इन ए पोगों का निपर मा। प्रापेक में प्रमशः ४,००४३ ४२५२१४. हमने इलने, साम्प २८० १ . ४ रसोप। 10 बरिपशि मामाप्यमूमिका :- गीता की पूर्वमा -- (प्रेरणा) है। यही इस पूर्वमीमांस) का मुम्प पिप है। इसी प्राचार पर मीमांसा में धर्म का- 'पोदनामदयोऽर्पोपम्मा' (पू. मी. ") यह सण किया । विद्याप प्रणीत रिम्यदरान मारयरफोह मशि की मीमांसा करता है । ईसा के साप अनु रक्ति ही परामधि है । इसी प्राधार पर शारिपशन फा बारम मापरानुरक्तिरीभरे" (1) से जमा है। म्पासप्रणीत शरीरका शन उपनिपत मानवी मीसा करता है। उपनिषत् पति वा का उत्तर एक मन्तिम माग है भतरस तमीमापक इस ग्पामरान उत्तरमीमांसा, मेदान्त मादि कहा गया . अन अन का सूचक है। अप कम्म प म दिम्यम्" में जान के पमिप्राप से ही समसद प्रयुक्त हमारासी माधार पर कामप्रति- पादक पदार्शन कर भारम 'प्रयातो ग्राम मिशासा" (म्पास सू. 17) इसका से पा है । इस प्रकार वेद का बम्प मPा प्रतिपादा मामणम्पग (विकि-मा यथा-उपनिषत् माग ), ए१ तमीम्म सारूप तीनों दण्नशाम क्रमय कर्म-मा-मामा मात्र रूप से निरूपण कर रहा - २-मारस्यका -उपनिपन १-विधि: पूर्वमागा मध्यमागः सचरमागा कर्मपतिपादका मतिमतिपादक कानपतिपातक ममिनिनम् पूर्वमीमांसा एम्पयोग: शापिडरपदशनम् मप्यमीमांसा मफियोम म्पासदर्शनम् उचरमीमांसा मान्योग सरप भक्ति योग निमा निष्ठा निष्ठा क सानीमानि-माप्यास्मिकानि नीणि शाखाग्नि प्राचीनदृष्टिसम्मतषिपविभाग - मानम्मायाम् ३R८० -रिपादयोगः सांख्ययोग -पर्पयोग:- मानकम्मसन्यासयोग१२ -फर्मसम्यासयोगः २६ -प्रात्मसयमयोग पानयोग्यसिपादिका परप्यापी এদিন - -- मक्तिमगठम् ७ (१)-भानपिमानयोगा २० ८ (२-असरप्रयोग: र (1) सामगुपयोग 20(6)-विमखियोगाः ४२ (५)-विस्फरगनयोग ५५ १२६-पक्तियोग महियोगप्रतिपादिका परण्याची मफिनिश मा फर्गाकारम् (१(कतिपुरुषविभागयोग । ४२,गुणप्रयपिमागयोग २७ १५(३)-पुरुषोत्तमयोगा- (1)-देवासुरसम्पचिपोगा २० (२०४५-प्रदाश्ययोग २८ -सन्पासपोग कर्मयोगपरिपारिका परप्यापी पोनिश स एप गीतागास्मनिप्पोदशगनिक/४० पहिरकारटि ** भाप्पभूमिका 18 गीता की अपूर्णता मतियोगप्रतिरादिका पाय को पापायी के मापायों में प्रमश -भानपान- योग २-प्रवरमहायोग, ३-रामगुपयोग, -विमतियोग, ५-पियरपरगनपोग ६- भक्तियोग गन २ योग का निर पण मा राप्रपर में प्रमश १० २८५४० १२ इतने इवने, सम्म्य २ ६ रसोक है। . कर्मयोगप्रतिपादिया मास की पाप्यायी के ६ अध्यायों में क्रमश १-प्रकृतिपुरम मिमागयोग, 1--गुग्णप्रपरिमागयोग ३-पुरुषोत्तमयोग -दशामुरसप चिपोम, ५- मदापपयोग, ६-सन्यामयोग न ६ पाने का निरूपण पधारे। प्रत्येक में कम्प *, २० २५ २८,७८ तन इतने मम्भूय २११ रसोफ है। इस प्रकार कार यय में निमत ७०० रोकने का पह गीता शास्त्र तीन ममे काही निरूपण करता है । प्राचीन म्यास्पाताभाने वह पिय विभाग को ही प्रधानता दी है। पसत उनके अनुपापी मारतीय निशान भी इसी पयका अनुगाम कर रहे पर पिपप सम्प्रदायमाद का मनक बना। इसी निमहिने सम्प्रदायों में कसा का मोज बपन दिया ।। प्तता , साधारण तोटिक ममुप सेक्स इसी निमति पर विश्लम रस 1 पास्तु एक बेशनिक "स पिय विभाग को किसी भी प्ठि से उपयोगी मही मान समता, बंसा कि म.गे पाने वाले विपपविभागमदर्शन में बिरवार से बताया जाने बाबा।
प्राचीनदृष्टिसम्मतविपयविभाग शानकायम् -रिपादयोगा -सांस्ययोग -कर्मयोगः दानकर्मसन्यासयोग.२ -कर्मसंन्यासयोगः २२ -मात्मसयमयोगः २८० बानयोगप्रसिपादिका पाध्यायी सोन्याने १७ २५ मकिफागतम् (१)-बानविज्ञानयोग: १० ८ (२-अक्षरममयोगः ९ (१)मामगुपयोगः १०(6)-विमूतियोगा (५)-विश्वरूपदरानयोग ५५ १२६-मक्तियोग २० - २०६ भक्तियोगप्रतिपादिका परभ्याची भक्तिनिष्ठा फर्मकायम १३(प्रकृतिपुरुपषिमागयोगः३४ १४४२), गुणप्रयपि मागयोगा २७ १५(३)-पुरुपोचमयोगा-- २०२५ ६(४)-देपासुरसम्पचिपोगः २४ ०१५-प्रदाप्रययोगः २८/ (E)-सन्यासयोगः कर्मयोगप्रतिपादिका परप्यापी पोनिष्य स एप गीवाशास्मनिष्फोदार्शनिफा७०० परिपाटि - माप्पमूमिका । गीता की पूर्णता भक्तियोगप्रतिवादिषा मप्प की पापापी के ६ भापायों में कम पानपान योग २-प्रक्षरप्रह्मयोग, -राजगुपयोग, 1-विमृतियोग, ५-विश्वापदशनपोग :- भक्तियोग इन योगों व निरूपण एमा प्रत्येक में क्रमश ३० २८ ॥ ४२.४२ इतने इतने, सम्म्य २ १ रसोक है। ७ २ कर्मयोगप्रतिपादिका मन्स की पप्यायी के ६ मायामों में क्रमश १-प्रकृतिपुरुष निमागयोग, २-गुग्णप्रपरिमागयोग, ३-पुष्पोत्तमयोग -देवामुरसपचिपोम, ५- भदायपोग, ६-सम्पामयोग न ६ योगों का निरूपण माहै । प्रत्येक में क्रममा ४२७, २. २४ २८, ४ातने इतने सम्म्य २११ रसोक है । इस प्रकार काण्डवप में लिमा ७०. रसोकों का पा गीता शास्त्र तीन यो करी मिपण करता है । प्राचीन म्पास्यातामा उक्त विषय निमाम को ही प्रधानता दी है। पसत उनके अनुपाची भारतीय निम्न मी इसी पय का अनुगमन का है । यह प्रिपप सम्प्रदापबाद का पनक बना। इसी निमलिने सम्प्रदायों में कार का बीच पन किया । । सकता है, साभारया भौतिक मनुष्य रेक्स इसी निमलि पर विश्वम करस ! पाम्तु एक केमिक इस विप विभाग को किसी भी धि से उपयोगी मी मान सकता, असा B मग माने बारे सिपपरिमागमदर्शन में निरतार से बताया जाने वाग।
पहिणारी || मायभूमिध 112 गीता की अपपता . गीता का उपदेश महामारत युद्ध के समय हुआ था। युर प्रसङ्ग से भगवान् म्यास ने प्रामारत प्रम्प लिखा । अनि गतोपदश भी इस ऐनिसकास से सम्मान रखता पा, भतएव उसी विनास प्रम्प में म्यासने अपने शब्दों से गोता का मी समावेश दिया । किसी कारणविशेष से महामारत में १८ प रस्ने गर है। यह प्रशदरामान इतिहास मर्यादा का सुपर माना गया पेसा कि मगे भानेयस संसम्पाविज्ञान में सत्तार से मना जाने कासा है । ऐतिम मम्यादा के रपरू, साप ही में परोवप्रिय म्पासने इछास पि को प्रधान सर मामते हुए गीय को मी १८ ही अपार्यो में विमल किण । गीता का वास्तबक विपातर स्पों विवेरित होगपा, रसव एक कारण म यह ऐल्पिमान है । महा दूसरा कारण म्याम्यातामों की सेर ति दुराने पहिले पाना एक सिमान्त निषित कर निश, मनन्तर स्वसिदाम्ता- नुसार गीता के भय करने का प्रयास किया है ।गता शमली है, इसकी उपेक्षा कर म्या स्यातानि-"हमने जो समय रस्सामर गोतामे, भपण मही" स पि मे गीता की म्याम्प्य की। यही कारण है कि भाव सगमग समी म्बाम्पार (भमिमगुमावार्य की म्यया बोहोरकर ) सी ऐतियारिमस दारानिक रंग से रंगी हुई है। इसी म्याम्पादेप मे गोदावर शिनरहस्पतिरोहित होता। गीता इतिहास में उस्त है, इस परि से इसके १८ पायाय रोना न्यायसमत है। विस्त कमान इसी रेत से गीता को रिपामयादा से पृषा मही विपा मासक्ता । विपा का गुर सिप्प सम्प्रदाप से सब भ है, तताण सिन् विपा के उपराई । पता ने "शिप्पस्वे गाभिमा सोमपमप". 'पदेचपति से मान मानिनासादागिन" पनि रूप से सर यजमाने भार को बम नपामाप मनसा है तो ऐसी दशा में से केवल एनिन्दप्राण नही मामा जामाता पिततः एम रहिमे गीता शाम भान १० मापापो, परं राम तीनो बानी को साप सेता या नहीं ऐतिहासिर, का इतिहास प्यार से भाराव दापि, गाभानी परिधत रिपा, एक पतुर्विध पापुरियोग निम्परा के पाए मारपरी निशानो महानुभाष इतिहास, दरान, सम्प्रदापगद केम्स, टन के सिर पहिरजापति माप्पमूमिम गीता की अगवा प्राचीन म्यामातामों का उक्त निपप विभाग, एष मप्पाप मिमाग सवा निर्माण हो या बार दो महीपरप ही ऐतिहासिक राशि से पिता के १८ अप्पाप मानमा, एष दानिक रपि से गया के कापा मानना एक प्रकार से युक्तिसत मत पादरणीय है। सर्वसाधारण शिए पी विषय विभाग सान रूप से माम मी है। सभी म्पक्तिमान के अधिकारी ही बन सकते । फवट चिमसम्मत विषय विभाग सर्वसाधारण का उपयोगी नही मन सहना । "कधिपति सिदये"-भिन्मा रेचि वष" के अनुसार गीता के वैज्ञानिकतास को समझने माने बिरसे ही मिस्ते हैं । यी कारण था कि मनोरदेशका से पहिले कई ना. दियों तक यह मिपावत्त सबया विलुप्त ही बना रखा । उस समय विशन् न ये यह बत, थी। परन्तु वे इस सस्प को मूले गए थे। “स सम्मान माता पोगो नः परन्तप ।इनादि से मगधन् सर्प यह सिद्ध कर रहे है कि मैंने दस्युग में जिस गीताविज्ञान का, किसान- कर्महप दुनियोग का उपदेश दिया पा पाम होगया है। यतादियों से सोक में शान एवं योग माम श्री दो सतत्र निवाए प्रचलित है ।हान-कम्म की समुचयापा दुरियोगनिष्य को सोग भूब गए है। में भाग तसे वही बिरामयोग (मपना प्रिप समझ कर) बता रहा। क्या माप , मगमन् कापा उपदेश फुल समय तक तो पपावत् पस्ता रहा हो एवं पुन इसने उनी मोकमिष्टामों का रूप धारण कर लियो। माधय नाही, ऐसा बीमा । विवासमय (मध्यभारत) में परेपने के कारण भरपही गीताणास मागे जाकर म्यासमा तामों के बारा पुम निवास रोगया है। फिर मारवर्ष में बही समय एवं कर्मनिमा पनप गई है। परसाम मरूप मान मरतन में अनेक सम्प्राए उत्पन होगई। । ताबा साबई मिसिदान्त ममता मूतई। मौत पक्षपाती म्पास्पायमोंने उसे फेमस बार प्रधान प्राप मान विपा है । पाम्सम-रामानुर-मिम्बक-मापारि प्णयों ने इसे पकमात्र मझिम प मान निय। एवं पर कुछ समय से कुछ गवारपाने अपनी कम्पमा के मस पर इसे कर्म योग की उपाधि से विभूषित कर गा ।इस प्रकार ना मार म्पतिविवरण बमठी मारप ही भपनी म्पापा दुनियोगनिष्ठा से रमित होगी।
पहिणी || मायमूमिन्न गोवा की अपूर्णता गीता का उपदेश महाभारत युद्ध के समयमा पा । पुर प्रसङ्ग से मगवान म्यास मे महामारत प्रत्य लिखा । कि गेतोपदेश भी इस ऐतियकार से सम्माच रसता था, भतएक उसी इतिहास सम्म में ध्यासने अपने शब्दों से गोता का मी समावेश करदिया । किसी कारणविशेष से महामारत में १० पब रमने गए हैं। यह प्रशदशमाव इतिहास मर्यादा का सूचक माना गय है, जैसा कि भगे भानेवाले संसयाविधान में विस्तार से बनाया जाने वाला है । ऐतिम मयादा के रथक, साप ही में परोदप्रिय म्यासने इतिहास ररि को प्रधान सम मानते हुए गोता को भी १८ ही अपायों में निमत किया । गीता कर वास्तवक विपातर स्मों तिरोरित होगया, इसका एक कारण यहां यह ऐशियमाव है । बहा दूसरा कारण पाम्यातामों की संपु पित पुर। उसने पहिले पाना एक सिशन्त निषित कर विष है, मगन्तर ससिद्धान्ता नुसार गीता के अप करने का प्रयास किया है । वाम काली है, इसकी उपेक्षा कर म्या स्पातामोने-'हमने गो समय राम गोता में है, मपण नहीं" इस शि से गीता की म्मास्पा की है। पी कारण है कि भाजगभग सभी वारपार (ग्रामिणगुप्ता पाप की म्पाच्या को छोड़ कर ) सी ऐविपछिमस दाशनिक रंग से रंगी हुई है। इसी म्याम्यादप से गोवा कर विधानरहस्य तिरोहित शेखा। गीता इतिहास में उस्त है। इस रपि से इस के । मापाप होला म्यामसात ।। किन एकमात्र इसी हेतु से गीता को विधामप्यादा से पृथक् महाविया बासकम । सपा का गुरु सिप्प सम्प्रदाप से समप, तप्तदशी विशन् विपा के उपाएँ । गीता ने "शिप्पो शापि मा समपन्न"- 'उपदेचयति ते मान मानिनस्वरमदर्शिना" इत्यादि रूप से स्पष्ट शों में अपने माप को मा नियामम्प बताया है तो ऐसी दशा में इसे केवल एविधाप नहीं माना जासकता । फसत एक मि से गीता शव भपने १८ मायायो र उक्त तीनों काप, को साप सेवा मा यहाँ ऐतिहासिक, किंध इतिहास मम्पादा से भाचत दाशनिकाम्प, पहा अपनी बदविधा विधा, एष चतुर्विध वयानुदियोग निरूपण के कयास भरप ही म सिमानणर है। यो महानुभाव इविएस, परान, एव सम्प्रदायवाद के मात्र हैं, उन के लिए बार । माप्प भूमिका गीता की पूर्णता दार्शनिकगीता एव प्रचलित निपय विमाग भादरणीय है, परन्तु को पिपा के अनुयायी मदकी कबिस् मयादा से युक्त विशन् हैं, उन की अप्ति में म प्रपति भण्याय क्रम का ही ऊर मूम्य है, एक न सवत्र तीन काशों का ही कुछ महत्व है। रिपोप का सा क्रम है, उसी के मनु सार एक विशन् गीता का विषय विभाग करेग्य । एक उसी विषय विमाग के बस पर बारिता की उतर ग्रामों की भपेषा पर्वता, पूर्णमा, एक सिपपता शिव करेगा । सापती में उस का मा सिदिमात्र विद्यालगत् के सिर मारव ही एक अपूर्व, पूर्ण, एन बिसयस बस्तु होगी। गीता पर पीछे पनि सानिए परिसे म्बय गीताचार्य की ही परीक्षा कीमिए । भगवान् कृष्ण भार्यनाति के परम उगा देव है इस पे कोई सन्देह नहीं । पास्तु हम देखते हैं कि उम की पह सपासना मी मात्र दो मागों में स्टी हुई है। मान ही क्या, पर उपासना विष पिर पास से घसा पाया है। इस देषीमावा मुस्प कारण सय मगगन का दैविपी । भगन् का पोषम मनुष्पमाप, ईपरमार मेव से दो मार्गों में क्या हमा है। पाबमुसम साधारण परिज, मिभगोष्ठी, मुमप्रसंगों में सहयोग, दूतभाष, विशा पुत्र का संगति, भावि मनुप्प सुबम माप भी हप्ण में विधमान थे, साप ही में पिरासरूमदशन पगिता परमैवय, परमराम्य भागोप, घमोदप, भावि ईश्वरानुगत धर्म मो इन में पूर्णरूप से विकसित भे। मगवान् भाषिकारिक चीन पे । सोफाम्पाय के लिए मगवान् का भक्तार हुमा पा | सोक सामान्य, एक निरोपमायों से दो मागों में निमक है । भगवान् को दोनों काही कम्पास भभीष्ट था। मठएम उनें अपने जीवन को दो मागों में विमक्त करमा पा । पपने मनुम्मसप से महा सोने ग्राहकों, गियों, एवं सामान्य मनुप्पयों का सम्माण किया यहां भपने ईपरमार से बे पोगियों की उपासना के परावस बने । मगवान् एनी दोनों रूपों को हम कमण ऐतिहासिक, एवं शामिकरूपका सकते हैं। "तिहासप्पा भगवान् ने एक स्थान में बम्म लिगा पा एस सपने मसविरु गुणों, एक भनित राशियों के भाभार पर दुर्गे का दमन किया पानामपि से पह सम्पूर्णविध मारमा मम मददम्पति मी मगयन् के इन सर्पया सोनों रूपों को देख कर कमी कमी पामो में पापाते थे। सापरसरूप से मम्दापति ने अपना प्रिय बाराक सममाने थे । मगणाम् मी - मा मायभूमिका - गीता की ममता रोगमायादारान की इस प्रसस्यभ्यवना को सुरक्षित स्सवे थे। परन्त मिहोने इस सामा य रूप से पण को देखा था, वे भी कमी कभी इन के उन भद्भव ईशीय परिमों को देख कर मवार र जाते में । पोसी देर के लिए ये मपमा पा सबामात्र मूस नाते ये । परन्तु तवकास भगवान् योगमापाशारा तमें विस्मति के गर्म मसल देखे थे। भगवान् के यही दोनों सरूप हमारी रहि में नन्दनन्दन, पब मसुदेवनन्दन इन नामों से पास होने पारिए । परिण कप मनुप्यविध । ऐतिहासिक है। दूसरा रूप मामिष ६ मानिक है। यही कारण था कि जिस मायु तक मगवान् नन्दनन्दन बने रहे, तभी तक उन में मानुषमानों की प्रधानता रही। जिस पस में गोकुर से मोट कर उन्होने बमुदेवनन्दन का बाना पहिना, उसी पण से उन का जीवन एक गम्भीर भाव में परिणत रोपपा । इन दोनों में परिले रूप के उपासक भभिक संरूपा में है परन्तु दूसरे रूप के उपासक परिगणित हैं । मन्दनन्दन को सभी पानवे, एप मानते हैं वासभाब समी को प्रिय है। परन्तु यामदेवकृष्ण का सरप मानने वाले वानिक दुर्सम ही मही, अपितु मुटुसम है । "बामुदेपा सर्पपिवि स मात्मा सर्ममा"रत्यादिसूप से सर्व मगमन् ने अपने इस बासुदेवरूप को स्वामित्व मतगया है। उक्त निदराम से प्रात में हमें यही बतणाना है कि भिम साम्प्रदायिरों की यि कप्ण के ऐतिहासिक मानुप सप पर है, सरे शब्दों में जो मन्दमन्दम के उपासक है, वे भरय ही गना के इतिहास सम्बार मध्याय लिमाग का मानप सते हए केवा भवराय शरा, मपमा गीता पारायण से सम्तोप कर सकते हैं । परम्नु जिम की रहिरण के वैज्ञानिक स्वरमान पर है, जो पसदेवसम्यकृष्ण को म्यापक सममने है, टम के लिए विज्ञानमाव ही सम्तोष का कारण बन सफ्ताही वापिकशि से गीता का विचार पर सकते हैं। सनी की शि में प्रवाशाख इतरगानों की अपेक्षा मप्प, पूर्ण, एष मितपण हो सकता है । साथ ही में हमारा पर निशान माप्य भी उनी की राशि कर सकता है । विद्यमशि को प्रपाम मामने से गीता में कपा मपूर्णता भाजावीसी प्रश्न का समाधान कर यह प्रारण समास किया जाता है।
परिपरि 1 माप्यमूमिका गीता की अपूर्णता माग्मतस ससरूप से सपा मानन्दमन है। इसका प्रसाद प्रमाण यहोलिपामा कमी भूल कर भी तुम की कामना नहीं करता । इस प्रकार भपने रूप से निप्मानन्दस्न मनव्य मा भी पा मामा सत्कार विशनों की कम से दुध पाप करता है | पो साकार कर इस की नग्मप्रति के कारण। सति सरकारों के मोगरे किरहरी से सधन (अचानन) ससार में नीरूप से माना पाहै प्रारविमा के पापाव से बारित, एक पोगमापारेर कपन से सपा परतन्त्र बनता मा भानादमप (मी) माना सोहोमाता है । इस सांसारिक ससस को हाका मारमा को उसके वास्तविक (शान्ति सहस ममाप) मानन्द स भनि कार दिखाने के लिए ही हमारा गीतारास प्रामा है। 'मपने प्राप को पहिचान सेना" दूसरे शब्दों में "पारमा के पार्म सरूप मा परिमान फरमेना" ही भीतरमा का परम पुर- पाप है। मामा के सहरबान से मोह की ऐकान्तिर मिवृत्ति रोमाती है । मोहनिधि के मम्म परितोत्तर कार में ही दुमय को (माध्यामा-माधिमक-माविमविक दालों की) सांग नति दोजाती है। बिना भारमा कर बान प्राप्त किए टु सानाति सपा असम्भव है । "वमेष विदित्याविपस्मेति नान्यः पन्या वियतेऽमनाय' स पड. अति के अनुसार मा-माम अटिकि शामवति के लिए मम्प उपायका ममतामयी। "सा पतरसम्" इस म्यमाणक के मनुसार सप्ता, किंध पूर्णता पासहि (बार कोनो)-भाग पर निमसी मापार पर सोक में सर्वाधिपत के सम्बन्ध में "अमुफने पारी कोनें रोक मिए"-'अमुक नगरों फू रोकमी पर पा सरे का मरेश प्रसम्मम 1"- 'अमुक न अमुक पारों साने पिस फर गया 'प्रमुफ का वो राम्प पारों विगामों में फैमा हुमा" इस्मादि किंवदन्तिए प्रचलित हैं । इसी मामार पर वैद का "पत एप बाइ सबम' [की. यह मनुगम प्रविष्ठित है।माम को "पूर्णमा पूर्ण मिदं पूर्णत पमुदम्पते" के अनुसार पूर्ण माना जाता है। पूर्णता, किंवा साना मलि माप पर किंवा पर्षसचा पर निर्भर है। मिथर यह प्रस्तुत है कि मामा की पारी बनिए कौनसी है, जिसके सम्म से - परिपशि । मम्पभूमिका गीता की अपूर्पता घारमा पूर्स ममा हुमा 'एन मारमा की बिन चारों प्रकियों के सम्यक् परिहान से अपने मपूर्ण कारमा का उस चतु पछि पूणरमा के साप सम्बन्ध कराते हुए हम पूर्णमाष को प्राप्त कर पारमसपण, भवरण पूर्व भूमानन्द के अधिकारी बमजाते हैं। विशानवेनापि उत्तर गते है कि मामा में विवापुष्टि के सम्बध से मारमा में पहले से प्रतिष्टित, पूर्णता सम्पादक राग्याम-रेवधर्म इन चारों विपासम्मतियों का उदय होमाता है। इन चारों विधामों सम्पर परिवान, एक सम्पन मनुप्सन से ही मास की पूर्वसा का परिहान, एव पूर्ण मात्मा की पूणसम्पत्ति का कम्मामा में उदय शेता। कि गाय-शनादि इन चारों विभानियों से मामा की पैराग्य-मानादि भारों विधाओं का विकास होता, अतएव साभकरूप इन विपायुरियों को हम अवश्य ही मास्म विधा करने के लिए तप्पार है । पपी चारों भारमविवाए चार प्रकार के विवादियोगों की पूतप्रतिष्टा है। भास्मपिपा ममप्रधाना है, मुनियोम कम्मप्रधान है।बान-कम्म दोनों ही मारमा की प्रातिनिक (निनी) सम्पति है। इन दोनों भारमविगत में से भारमपिचा नहाँ मात्मा के शन माग को विकसित करती है, वो पुहियोग भारमा के कम्ममाग को पूर्णरूप से विकसित कर देवा है। इस प्रकार मात्मनिषारपणा विद्या एव मुनियोग सक्षणयोग पर दोनों उपापभान फर्ममप मामा को सामना प्रसन्म कर देते हैं । संसार के पचयापत् भौतिक पदायों की अपेक्षा मात्मा की पही अपूर्णता, पुणता, एव मिवक्षमता है । ष इन तीनों मामों का एक मार श्य हमारे इस गीताशाम को हो। हमाग गीताशास क्रमश ५-२-१-६ इन मामामों से यहाँ भामविपारस्प प्रति पारिघ राजपिरिपा, सिदारिपा, रामरिया मार्पपिपा एम पार भारमनिपाभों का परि जाम, एप अनुमान का उपाय बताता है, वहाँ यही गीताणस उसी जम मे, नहीं मप्यायों के द्वारा कमरा वैराग्पबुदियोग मानदियोग, ऐपधुद्धियोग, पम्मवृदियोग इन मामकम्मों का सम्पन परिशन करवाता हमा, एनके सम्पर घनशान का उपाय बताता है। गीता में पूर्णसम्पपिता, पारमा की पूण सम्पपिए तमाता मा हमारे कामास्म को परिफारि I माप्पभूमिका । गीता की अपूर्णता भारमतत्व सखरूप से सर्मपा मानन्दपन है। इसका प्रसाच प्रमाण यही है कि प्रत्य कमी भूस कर भी दुःस की कामना नहीं करवा । इस प्रकार भपने रूप से निस्मानन्दपन बना मा भी यह मामा सरकार विरोधों की कमा से दास पापा करता है। यही सस्कार विशेष इस की चम्मप्रचि के कारण है। सति सस्कवरों के मोग के लिए ही से दुसपन (साफ्न) ससार में जीररूप से माना पाता है । प्रहार विधाःस के मामात से तारित, एक योगमाया केस धन से सपा परतत्र बनता हुमा भानग्दमय (मी) माना दुलो होजाता है । इस सांसारिक इससघ को हथकर मारमा को उसके मास्तविक (णन्ति सण म.मरूप) मामम्द का मभि- कार दिखाने के लिए ही हमारा वारा प्राणमा है। 'मपने पाप को पहिचान सेना" दूसरे शम्दों में "माम्मा फे यमार्प सप का परिज्ञान फरसेना" ही जीवमा का परम पुर पाप है। मामा के सामान से मोह की ऐकान्तिक निति होजाती है। मोहनिधि के मम परिवोतर कार में ही दुसरप को (भाप्यात्मिक-माधिदैविक-माधिमौविक दुखों की ) सर्वमा निसि होगाती है। बिना मान्त का मान प्राप्त किए दुसनिधि सपा पसम्भव है । "तमेव पिदिलाविमृत्युपेविना या पन्या बियतेऽपनाय" इस पडः मुक्ति के अनुसार मामान के प्रतियिा शान्ति शिए प्रम्प उपायबामस्मतामाही।। "सा पतुरसम्" इस मामाणक के भनुसार सर्वता, पिप पूर्णता पम्मति (चार कोनो)-पर पर निमर है। इसी माघार पर सोक में सर्वाधिपस्म के सम्बन्ध में "भमुखने पारों कानें रोक मिए"-"अमुक न गारों को रोकनी पर परा दूसरे का भोग प्रसम्मन "-"प्रमुक ने पमुसको पारों स्वाने पिच पर समा" "अमुक का तो राम्प पारों दिगामों में कमा हुमा " इस्मादि किंवदन्तिए प्रचलित हैं। इसी माधार पर वे का "पतु पवार सरप' [को० प्रा. 01 पर मनुगप प्रतिष्ठित है। मामाको "पूर्णमदः पप मिदं पूर्णात पण मुदप्पते ' के यमुसार पूर्ण माना AIt पूर्णता, डिा मरता १ सहित भार पा, पिप बगवा पर मर है। भिचार यह नुन है कि मामा की पवारों मझिए कौनसी है, जिनके सारा परिप का मम्ममिक || गोवा की पूर्वता घारमा पूर्ण पना मा ! एव भास्मा की दिन पारों सखियों के सम्पक परिहान से अपने भपूल कम्मरमा का उस चा कि पूणरमा के साप सम्बन्ध कराते हुए हम पूर्णमाघ को प्राप्त कर पामतक्षण, मतपय पूर्ण भूमानन्द के अधिकारी चनजाते हैं। किसानषेधानहमि उत्तर ते है कि-मा'मा में विधामुति के सम्बन्ध से प्रारमा में पहिले से प्रतिष्टित, पूर्णता सम्पादक पेराग्य मान-ऐपर्म-धम्म इन पारों विधासम्पतियों का उदय होगाता है। इन चारों विधामों के सम्पक परिक्षान, एष सम्पत् अनुष्ठान से ही मामा की पूर्णता का परिझान, एव पूर्ण मारमा की पूर्णसम्पति का कमारमा में उदय होता है। कि पैाग्य-मानादि हम चारों विषादियों से मामा की मैराग्य-मानादि चारों विपाभों का विकास होता है मतप साधकम्प इन विधामुदियों को हम भबश्य ही प्रात्म विपा कहने के लिए सम्पार है। यही पारौं मात्मविषाए चार प्रकार के विधायटियोगों की मूसप्रतिष्ठा है। भारमनिया हानप्रधाना है, मुडियोम कामप्रधान है।न-कर्म दोनों ही मारमा की प्रासिलिक (निगी) सम्पति है। इन दोनों मारमरिता में से प्रारमविषा यहाँ पारम्प के पान माग को विकसित करती है, वहाँ पुद्धिपोग मारमा के फर्ममाग को पूणरूप से विकसित कर देता है। इस प्रकार मारमनिवारणा लिपा एप युखियोग सक्षणपोग पर दोनों उपाप शाम फर्ममय मारमा को सदरममा मसम कर देते हैं । संसार के यायावत् मौलिक पदापोंकी अपेक्षा भास्मा की यही ममता, पूणवा, एप विवाहणता । एव इम वीमों माओं का एक मात्र आप हमारे इस गोतामको हो। हमारा पीसायात मश६-२-१-६ इन मण्यायों से नहीं मामविचारहस्प प्रति पारिका रामपिरिपा, सिविया, रामरिका मार्पपिपा इन भार प्रारमविपार्यों का परि हाम, एम मनुष्ान का उपाप बताता है, यहाँ यही गीताशाम उसी बम से, वही अध्यायों के हारा क्रमश बैराग्यमुदियोग मनमुदियोग, ऐषप्यमुरियोग, पर्मादियोग इन भारमकम्मा का सम्पर पारवान कराता हमा, एनके सम्यक् मनुष्टाम का उपाय करता है। पीवशासम पूणसम्पति दना है, मामा की पूस सम्पपिए मतसाता मा हमारे कार्मास्माचे १२८ पाकि । माष्पभूमिका । गीता की अपूषता । पूर्ण बनाता है। भवा हम "स शाम को ममयी इतर शसों की अपेक्षा भपूर्ण, पूर्ण, एक विसपण मानने के लिए सम्पार हैं। गीताशाब के पतिरिक मोर मोर शारिक, रोपिक, प्राधानिक जितने मी माम- शाम, किंवा मामदर्शन है, वे सब इस प्रयन में पाशिक रूप से ही सफल हुए है, जैसाकि मागे के प्रात्मपरीक्षामकरण में विस्तार से यामाप्य माने वाला है। प्रात में लिपप सति के लिए मेरस पी नानसेना पर्यास होगा कि शेषिक दर्शन परस्य कोगमा मामता है। इसीलिए उसने थामा को भी दम्प शम्द से सम्बोषित किया है। प्राथामिक (सांरूप) शराब की टि पम्पत माम से प्रसिद्ध महावस्त्र पर है। एव शरीरकदर्शन परयुक्त भवर को प्रम (मामा) मानत्य है। गाम्नदशन का नाम पदाथ कभी शव पदार्प मासका कारण स्पर है। मध की रिममा शस्त करने के लिए प्यासनें “म माघस्य यत" "मुसमन्वयार' या कहा है। इन सूत्रों का तात्पर्य यही है कि जिससे जम्म, स्पिति, मग की प्राप्ति होती है, जो समनप के कारण विस की बम, स्पिति, मग का कारण बनता है, पी अमरे । पा सण परयुक्त भएर परीपरिताप होता है। अग्म स्पिति-भाग से समरसने हा भारमा कभी मुम्प मारमा नहीं मामा मासकता । उपनिषत् सिमरत के अनुसार मामा तो भगर, पमर, ममप, माठीत है। उसका पम मोग-मायु से क्या समाप । परापररूप भरमा पापप्रधान बनवा दुमा संसार में माता संमार से जाता 1 मसार में आ कर अनुरसबेनामक मुखों, एप प्रतिवे मामक युगों का भोग रिया करावासा इसी मारमा पर अपने प्रतियप पिप को समाप्त कर देते हैं। उनकी रहि मुम्प पारमा पर बाती हीमही । मिस मग्मा के साप नाप्सर जम्म- रिकी-भाबमा पुमानों का सम्मान पा रहे है उसे हम किसी भी रिसे मामा पाने के लिए उम्पार मी। पितर मानों ने पार को मामा कहा है, साप में उस साप पापुदी का सम्बन्ध मी माना एवं मामा इस पधुरपी से सपा मगर १. मी दण में हम इस एप पर पचने म मामा मारपतीपर-मपर से कोई पहिसरत माम्पमूमिका I गीता की अपूर्णता । श्पक तत्व है। यदि उस का हमें परिवार है तो पवरप ही हम नीम्मुल है। मामा वही भाप का सुप्रसिब "मम्पयपुरुप" है । यही विदाकर्ममय है यही मुख्य मामा । भन्यासों में निन पर-अधरों को भारमा मान रस्म है, वे दोनों तो गीतासिद्धान्त के अनुसार सम्यपारमा की अन्तरमा प्रातिर । भक्षर परामकत है पर मपराप्रकृति है। इन सेनों का शाा है-अम्पय पुष्प । पुरुष शम्द मात्मा का सम्बन्धी सम्पय मार-दर इन सीनों में पुरुष-कासाने योग्य केरस भम्पप हो। प्रकृतिरूप मवर तर इस पुरुष के समाव है, इसलिए गौण छ से मीता ने 'दामिमौ पुरुपौ सोके वरमाक्षर एष प" इत्यादिरूप से पुरुष कर पर दिया है । वस्तुग पुरुपरान्द भम्पपात्मा में ही निहट। यह माम सेने में हमे भगुमात्र मी संकोच नहीं होता कि इस अम्पपामा का सहप इसने विस्पष्ट रूप से एकमात्र गीताशात नेहीममारे सामने रमता है । गोता से अतिरिक्त भोर मोर नितने मामशान 1, वे इस सम्बन्ध में सटस्पात हो रहे है । धि भम्यय पूर्णपुरुष ६, स्वर भास्माओं से अपूर्व ( मनावि-सवादि ) है, सर्पय राता मा भी लिप्त न होने के कारण इतर पदापों की अपेक्षा निकषण है एक रिता शाम ने होम्स मपूर-पूण, एव विसषय भम्पय कल रास्पोपाटन सिया है। दूसरे शग्दा में भास्मतिपादन भभ्यप का सबप्रभम गीताने स्पष्टी करस किया है। पम्पपविपानिरूपणात्मिका इसी म्पूर्णता पूलसा, एष विसरावा के कारण हम इस रिता शव को रोपिकावि इतर मामणाघों को सुखना में घपूर्व, पूर्ण, एवं निवारण करने के लिए, तपार है । इसी रधि से सम्पप मचर पर इन तीम विचाओं में से हम गीसायास कोपभ्पयविपाशाख, धि प्रामरिपायास नाम से सम्बोधन करने के लिए क्यार है। लिपा निपारमक मन्पप) पशि से पता पपूर्णता का विष रमिया गया। मा योग (कम्म) पिसे सम्बाध रखने वासी विशेषता पर एि गलिए । जिस प्रकार सम्पयन मन मामबाम, भारमखहप) के सरूप निवारण में असमर्थ रहे है इसी प्रकार वे कर्म के समय में भी अपूर्ण ही रहे । कम्पमाग का ही नाम कर्म है । प में हमने इस कम्पमाग को भाषीनों की पि से मान मकि-मर्म मीन मार्गों में विमल बनसाया है । इन तीनों के सम्म परियार र माप्पभूमिका ! गमता की पूर्णता में प्राचीनों का मन्तव्य सरपा अपूर्ण है। उनकी दृष्टि में सक्कमसम्याससपमा सम्पनिय भानयोग है,कर्मपरिमहसनणा कारनामयो कर्मनिष्पा कर्मयोग है एक उमपरमीयम, निम्न परानुमहरू परमो मुमा परमणिपानसता मक्किनिष्य मत्तियोग है । सीमों का परातम सर्वपा सतर है | शानयोग्मनुपापी दामोरिक पारमोरिक सभी कम्मा को होने में माना परम पुण्याप समझ रहे है । कर्मपोगी कामनामयी पतासदि को भागे कर कर्म में प्रारणे है । एक मझियोग्ने ईमानुपाहरफस की कामना से बर होहे है। एक में मानासक्ति है, एक में कर्मासकि, एक में ईरामति है। मासक्ति को रष्टि से सीनों ही योग कम्मनामप।। जो कामना है पा सस्कारला है। नहाँ सरकारलप, मामा बन्षन में । एष बपन ही मात्मा की पूर्ण है । परम्त प्राचीनामित तीनों फोनों की भस्यता सिम होनासी । इसी मपूर्णता के कारय तारा की ये उक्त नोनों ही योग मामा की पूर्णता को उससे नियुक्त करों के कारण बनते हुए भयोग, किंचा भरपोगा। एक देहधारी के लिए सम्म का एकान्त सम्पास सर्पया महम्मत, समिर तो प्राचीनों की सौम्यनिष्ठाघ कोई मात्र महा माविष्ट कर्म मालियनवे पर मुफिट के स्पाम में पपन के कारण इसलिए उसकी इस कम्मनिता का भी मरमणि से कोई महा नही । उपर महिमोगमिष्टा मीरमर प्रासिरूपफर को मनुममिनी स्नप्ती उपस नही रहती । तीमा र अपूरा माता पिता की जननी है । निपमता समय की पा Rat | समता का भाव ही पारस्परिक केरा का यि मतामिनिवेशक चनक १ ।। कारण है कि उक्त तीनो नियमों के अनुपापी तीनों दस एक दूसरे की निष्ठा के मागे एक दूसरे की निष्टा को निन्दनीय मा ए परस्पर ममगावे व सम्मनिष्ठ मनी कर्म- निष्ठ कर्मठ को, साप ही में उसकी मोगनिमाचे, व महिनिष्ठ मत को, साप 04 मति- AST को, देय मतना । मतिसमानुगाम्म बाल-कर्म को तिरस्कार की राशि से देस से है। एक कर्म समी- मत का महास कर रहे है।
প্তি +8। माम्पमूमि गीवा की अपूर्णता भार्य तो यह है कि मात्र या दोनों अपूर्ण योग मी खखला से सरक्षित नहीं है। पकाने भर को मान मक्ति ने मारय ही भरना प्रमुख जमा रक्सा है। झान-कम्म कर कही पता मी मही है। बासन-पुश-की-धनिक-निधन-मूल-मिटान् सम भपने भारका भारान मानने का दम मा सहै। कम्यकर्म में असमर्प भान का मारतर्षभरने मागस्प को मक्ति के पर्दे से ढकने का प्रपास कर रहा है। पयानमधर्म का मात्र कोई महत्व नहीं है। हमारा तो विश्वास है कि यदि शाम कुछ भी सप्लता है, यदि "ख से कम्मण्य मिरवा ससिदि समवे नर " इस भगवश में कुछ भी सप्प है वो शाश्वप्रविपिर भाम की मति का कोई मास नही ।। स्मरण रसिर सय बोड़ देने से ही भगवान् कभी हमारे पाप पमा नहीं कर सकते । मैं पपने ताकत का फल भवरप ही भोगना पोगा । भगवान के दर्शन से, माम स्मरग्स से पापरनित हु सों को भोगने के लिए, मारमा में एक प्रकार का यस भपरप भावाता है । परम्त मगाम् ऐसे दपास नहीं है कि हम रातदिन अपम्प सांसा रिफ सापों में लिप्त रहे, पूरा पिपासत बने रहें, भोर मन्दिर में पाकर हाप जोक्कर-2 मगगन् । तू बहा दयालु है, हमारे पाप षमा करना" या कर दने मात्र से, अपप सोम स्पाति के म्यान से भटे दो घने के लिए प्रम-ममरिनोसक-करतास से कर पुपुरू बांध कर हरे राम, हरे ग्रम का सेने मात्र से मगान् हमारे उपर सपमुप प्रसम हो आप । गमा मिमा पास है। हमारा तो यह भी बियास है कि ऐसे उत्पषगामी मग गन् के पवित्र नाम की मोट में भोप्ती जनता को म मोह में पास कर मामी वासमा को भीर मी भपिक सणेनित करते हैं। महिमामास पीर नहीं है। पात की वस्तु है । मयश्री मापु तुकाराम, जानेपर माराम, समय रामदास सामी, नरसी मेहता, मक्तिपरायगा मीरा, मादि महापुरुषों के उदाहरण हम समारियों के लिए कोई काम नहीं ह सकत । मे इनके परिमों की पोट में माठि का सांग भरने का कोई अधिकार नहीं है। यदि सबसे ही मन भाय, वा सोक-गाल ११२
गीगर
। माप्ममूमिका
गांता की अपूर्णता
-
मर्यादा की वहसना की शासकती है। मगवत् सम्पचि से यह महापुरुषों का पाचरण हमा
लिए प्रमाण ना, अपितु उनका पादेश ही हमारे लिए हितकर है। दिसिए भी हमारा
१० स्कन्ध पु० २३० ३०-११-१२ रहो ।
मस्त, पळम्म यहीवि शाबान्तरों में जिम बान महि-मर्मनियमों का निरूपर
मा', वे सम पूर्वकपनानुसार मपूर्ण है। पर हमारे गीताशाम ने इन तीनों की माया सर
पित रस्ते हुए, सीनों के समष्टिरुप, मतव तीनों की सपा सपा अपूल बुद्धियोग क
उपद रिया , बोलपम्पशाओं में सबया मनुपरम्प है। भगअन् ने-"म पम्मणामना
रम्मानकम्य पुम्पोऽनुतेन च सम्यसनादन सिदि समपिगम्यति"-"कम्मोसन
समिदिमास्पिवाननझाइया" “निपत फरु कर्म व फर्म पायोगसम्मा" इत्यादि का
सेबर भावेश के साथ प्राचीनामित सर्वकारपातसन्मास सषण माननिष्ठा का एकाम्पत
सपान करते ए, पापी ३ "गुएपरिपया पेदा निसिंगुरपोमगार्जुन' - 'फामामाम
मागपरा।' “भोगे परंपमसकानो" “स गम्तिमाप्नोति न कामामी" इत्यादि रूप
प्रतिप्रधान नैविककर्ममपफर्मयोग का सपान करते आए, साप ही में मतियोगनिष्टा की फा
प्रति का एकरसत निरोप करते हुए, इस महाम-राग्य का समावेश करते हुए नियम
मिलित रूप से कोमारोप के साप दुनियोगनिष्ठा का उपदेश दिया है।
कर्मययेवाधिकारस्वे मा फमेषु कदापन ।
मा कम्पफमोतुसिकोऽपमणि ॥1॥
दोष पर कर्म बुदिमोगायनमय ।
पदी शरवममिण रुपणार फमोवा २॥
रेण पर कर्म मुरियोगादनाप ।
बुदिपुक्को भावीह मे एकतने ॥३॥
कर्प परिपुका दि फम स्पश्ता पमीपियः ।
मन्मापपिनिर्मुफा को गपनयनामपम् ॥ ४॥
बहिणाष्टि का माप्मभूमिका - गाता की अपूर्णता पदा ते मोदकनिम मुदिर्पवितरिष्यति । सदा गन्वासि निषेद प्रोसम्पम्प भुवस्य प।५॥ इस प्रकार गतागास त्रिा में से प्रापय प्रम का, एवं त्रियोग से विशेषण, सपा भपूर्व बुद्धियोग का निरूपण करता पा भारय ही इतर शारों की अपेक्षा भपूर्व, पूर्ण, एव विसाक्षस। इस सम्बन्ध में एक भार उपस्थित होता है। गीतायात पूर्व प्रम्पपामा का, एव सर्वया पपूर्व मुदियोग का निरूपण करता इमा अवश्य ही अपूर्ण, एर विमक्षपणास माना जा सकता है । परन्तु मिन धर-प्रक्षर नाम के दो मास्मामों का, एक मिन मान मक्ति-कम्प पोगों का पेपिकादि अन्य शास्त्रों में निरूपण दुपा है, उन का कि गीताशाख निरुपण नही करता । ऐसी दशा में गीता फो अपूर्ण, एम पिसक्षण शान मानते हुए भी हम इसे पूण, सिरा सर्पशास नहीं मान सकते" । कहना नहीन्य कि उक्त मादेप का गीता की रि में कोई महत्व नहीं है। केक्स इसी मापे के बह पर गीता की पूर्णता की कोई क्षति नहीं होती । यदि गीताने मास्मविषयों में से भम्यामिमध का एवं योगचिवों में से मुदियोगविस का निरूपण कर दिया वो कुछ भी शेप मही रहा । पर-अमरादि इतर सरणमामों की मुबप्रतिष्ठा परमात्मा नाम से प्रतिर मम्पयपुरुष ही है । "मत्तः परतर नान्यत् किषिदस्ति पनमय"-"मपि सर्वमिद मोत ने मणिगण" "परमारमेति पाप्पुको दोऽस्मिन् पुरुषः पर"-"गतिमानमः साधी निरासा एरण चात् । प्रमबः प्रतपस्यान निरान पीममम्पपम्" "यो मोका- यपाविश्य पिमर्यम्पप विर'-"मबन्धि भागा मूवाना मस एप पपग्विा" "मया पक्षण प्रतिः ध्यते स घराघरम" "मई सर्वस्प ममयो मत्त सर्व प्रपो" इस्लादि रूप से गीताणब ने स्पष्ट शब्दों में भययामा को ही वर मारमप्रपत्र की मुराप्रविष्य बत साया है। वास्तव में कोणामक मम्पयनस सबम्बन है। समय के सुप्रसिद्ध वे पांचों को मानन्द विज्ञान-मन पास-पास ( उप०००) नामों से प्रसिद्ध है। पर अपरामा, एम १४ पहिफ्रष्ट मा मन्पमूमिक गीता की अपूर्वता पचास परात्मा दोनों की प्रतिय यही पत्रकार सम्पप है । प्रदरममा, एवं क्षरमाण कम्पप के मानन्दमयकोश से गृहीत है। अक्षरविष्ण, एवं घरमाप सम्पप के विनमयकोश से गृहीत है। प्रवरान्द्र, एवं घरमार प्रत्यय के मनोमयकोश से संगीत । प्रवरसोम एक घर मम मम्पप के मममयकोश में अन्तर्मत है । प्रधर, प्रपि, एक घर प्रमाद सम्यप के प्राण मयकोश में मन्तमुक्त है । इसप्रकार भइर-कर दोनों पचास भम्पप से सहीत है। पति सपसम्बम सम्पय को पारशिया तो बाकी का रह गया । ससम्मम मम्पय की इसी सर्वता, किंध पूर्णता का दिग्दरान कराती हुई उपनिष छुरी कहती है- पवदासम्मन श्रेष्ठमेवदामम्पनं परम् । पक्दासम्मन मास्या यो पदिति तस्य तत् । कठ १२.)। पपिप मारमा के मम्व-प्रम-शुक मा तीन मित्त माने गये हैं। पार-पाप भपि पावन एक हैं। गुरुयप की समधि ही भूतास्मा । माय-पाप-पार प्रम-प्रभाव पर पांचों बहिरङ्ग प्राशियों की समाधि प्रम । प्राणप्रम पम्पकास्मा 1, भापोमम मा नात्मा है, बाग्लम किनारमा [धि] १, ममाम प्रामारमा [ मन] 1, एष मदनम माणात्मा (कम्मरमा बीबरमा-शारीरकभारमा) ।। भम्पप, अपर, घर की समपि अपवम् । ममुवामा पुरुपारमा, किंप पुरप। महात्मा मारुवात्मा किंग मरुति है। एन शुभारमा कारिकभास्पा, किंवा रिकवि । शुक्ररूप कारिक भारमा, किंवा भूतात्मा की प्रतिमा समुत्पत्मा का पर माग है-"पर सवाणि भूतानि ।। अमरूप पांचों प्रास्वामानों की प्रतिष्ठा ममवात्मा कर मपराग है- 'मतर ग्रम परमम्" । सप भपतारमा भम्पपप्रपा है। मानन्द मिशन-मनोमति ममामा मापप सर्प परमी प्रतिष्टा है- सेमरिम्नि मतिष्ठितः' । इस मानारमक भम्पप से या प्राणमर्षि सम्पप मदा का प्रवक है, एक बाति सम्पप पर का . •म ने पिळ करावामियोपनिषदिशाममाप्य । समाना सर।
पहिप्परधि 11 माम्पमूमिका - पाता की भर्वता । प्रवर्तक है। इसप्रकार मन्ततोगत्वा वही भम्पय मत ६ वही भम्पय मम है, वही मध्यप गुफ भएतास-गुक्रामक भव्यप में सब कुछ अन्तर्मत है । जिसने अभ्यय को पहिचान लिया, उसने सब पुष जाम लिया । मम्मप की इसी माता को सपप में रहकर महर्षि कठ कावेर- "कर्ममूमोऽशाल एपोऽवस्म सनातन । तदेसराक, साम, तदेयामृतमुन्यते । तस्पिल्सोका' मिता से सदुनावि धन । एतद तत्" (को० ॥१)। पुरुप एवेदं सर्वम् - प्रउपय २ ५ प्रानन्द विधानम् -मन: माला पार प्रापयविकासमूमि:- भूमिः मूममविष्ठा A प्रवरकि कासभूमिः वररिकन समृमि शुभम्-मवात्मा ग्राम-पारुवात्मा प्रपतम् पुरुपास्मा •रित मारु /-प्रामा पापा वरबिर- -प्रम्पकारमा-पाण: २-पानात्मा-पाप' -विधानास्मा पाए र-मानारमा-प्रभम् मागास्मा-प्रमाद चा अपि [३] मपि रुपामार विचित् (साकायसा परागी प्राप -जमम् [] -पुषिषी [] माक् पहिपष्ट II मनमूमिक गीता की अपूर्णता पसकसपमा दोनों की प्रसिष्य यही पत्रकार सम्पप । भारतमा, एम सरमाण मम्पप भानन्दमयकोश से गृहीत । प्रारविष्ण, पदरमापभम्पप के विमानमयकोश से गृहीत है। मदरन्द, एवं परमार मभ्यय के मनोमयकोश से सगीवर । प्रवरसोम, एक घर पम पम्पप के मनभयकोश में अन्तर्मत है । अक्षर, प्रति एष चर ममाद मम्मय के प्राय मयकोरा में मन्तमुक्त है । इसप्रकार महर-कर दोनों पाकर मम्पप से संग्रहीत है। समसम्बन मम्पप को पसलिया तो बाकी क्या रह गया । सलमान मध्यम की इसी सर्वता, पिा पूपता का दिमशन कराती हुई उपनिष छुचि काती है- पवदामम्पन श्रेष्ठमेतदापम्बर्म परम् । एवदाममन प्रास्ता यो यदिग्छवि तस्य तत् । कठ०१२ || पपिच पारमा के प्रमत-गम-एक यह तीन मिस माने गये हैं। पाद-पाप भमि या सीन शुक्र है । शुक्राप की सममि ही मूनास्मा है। मामा-माप-पार मम-प्रभार या पाचौ बहिरङ्ग प्राधिों की समशि प्रम।। प्राणत्रय प्रम्पकास्मा , मापोनम मा नास्मा ६ बागबम विमानारमा [धि] है माय प्रशानारमा [ मन] , एष मादाम मावास्मा (कर्ममरमा-बीवरमा-गारीकमारमा राममय, भपर, पर की समाधि प्रपतम् है। ममतामा पुष्पारमा किंध पुरप।मझारमा माहवात्मा किंय मकवि। एवं सुषमा पंपरिकपास्मा किंवा सिरुति । शुबरूप मेकारिक प्रामा, किंवा मूवारमा की प्रतिमा प्रपतारमा का पर माग है-"पर सवाणि मृतानि । प्रारूप पापों प्राक्तारमामों की प्रतिमा मतारमा कामहरमाण है- 'प्रधर प्रम परमप" | सप ममताम्य भम्पयाधारभानन्द शिाम--मनोभूति नामा पम्पप सप अपनी प्रविष्य है- से मीम्नि प्रतिष्ठिता" । इस मानामक मम्पप से पुत प्रापमति भम्पप पर का प्रक, एक बार्ति चम्पप पर का T । • Aai RR मनको ईशोपनिपादियाममाप्प समा)२ चम पारिश
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पहिणार्थ ा मागमूमिका गीताम पपिप सम्पपनिरूपक गौवनात ने-"दामिमी पुस्पी सोके परमापर एक "-"द्रियेभ्यः पर मना मनमस्तु परा बुदिः" इत्यादि रूप से साएशम्दों में इतरा- रमामों पर मी पूर्ण प्रकाश टासते हुए पानी समानता को सामना परिसार्य किया है। यही रिमति दियोग की है। मगन् ने बड़े सस्तार के साप मन-मधिकर्म तीनों योमी का निरूपस करते हुए, सीनों में संगोपन कर, बुद्धियोग का माना पहिलापा है । भगवान् की गि में तीनों ही योग सतत रहते राम-कर्म की नियमता के कारण मेपोमात्र के स्वान में प्रेप के ही कारण बनते हैं। न की विपमा समरम्मचकणम्तिमान की प्राविरोधिनी है। इसीलिए भगयन् ने वीमों का धमाप करते हुए अपूछियोग का सार हमारे सामने रस्सा है। वो पापा , पर तो पहारी, पस्तु को मापन नही । मी यो नियमान है। इस प्रकार मात्मामों में मध्यपत्मा को, योगों में मुशियोग को मरमा प्रधान सस्प बनाय उमा रमणाम इतर गो में प्रनिगादित मान-पोने का संग्रह करता मा अवश्य ही पूर्ण शास। भामविपा अनविषा पहीनसम्मत् ।। युबपोश योग है, पी कर्मसापत् । चर्षिय भारमनपा की से ग्ता प्रमामिपायात है, एक बर्षिअद्रियोग की पि से गीता पोगशान है। गीता दोनों का निवपण कर रही है। इसीलिए अध्यायोर संहर में- "इति श्रीमदभगोवामपनिपरमप्रममिपापो योगशाले" यह उस्त राता है। मप्याप समाप्ति सूचक वपन मी गीता की इतर शओं की अपेक्षा भता, पूर्णा, एवं शिक- पसतारा सिहरसा। , है-विज्ञानमाता का विषय विभाग
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ह-विज्ञानगाता का विषय विमान
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-विपयविभागप्रदर्शन गीताशास्त्र की इतर शास्त्रों की अपेक्ष्य ममता, पूर्णता, एप रिसक्षमता बताते हुए पूर्व के प्रकरण में हमने मामशाओं को परोपिफ मापानिक, शारीरक इन तीम भामों में विभक्तबरसाया है देखिर ८प्रकरण पृष्ट स. ११० से।६७तक । यदि मस्तविक विहान रशि] से विचार किया गाय तो इन तीनों शाशों में से हम शरीरकशाब (पेदावरीन) को से प्रनामहप से भारमय व कोये । कारण इसका यही है कि रोपिकास पात्मा का निक पण करता, पत्र प्राधान्नकणाम भरविशिए पक्षामा का निरूपण करता है । इन दोनों में घर को मुरूप भारमा किसी भी से नहीं माना जासकता । गा भारत मातर । पर मी प्रकृतिमान के कारण व्यापक मारम की विभूति से पधित रहता हम भारममप्यादा से बहि मत की । इसीलिए सांसपने प्रतिशरीरमें मिम मिम भारम्म माना है । 'मुक्त भत्तर वास्ता में प्रविशरीर में मिम मि है।पही शारीरक गाभिमानी) भारमा है। इस धि से सम्प का प्रतिशरीरमिमतागण माममेद सपा मुग्यास्थित है। यही भास्मा मुस्त-दुस-पुराम-पाप सब-नीच मादि इममात्रों का अधिकारी है। इसी शारीरक मारमा के साप एक मसगास्माका मौर समद राता है। पासपत्र समानरूप से पककर से प्रति रत है। इसी को साही कहा जाता है। सांस्पदशम माँ शारूपमूतारमा को ठोरय बनाकर महारूप शारीरक भारमा कमिपान करता है, वहाँ शामिकतन्त्र इस पारीरकभारमा को नाप ममार सके स्पान में सपत्र समरूप से म्पाप्त प्रमगामा का विधान करता है। पदामों में परस्सर में मो मेद देसा नाता, वही तपत पदायों की शपता है। पग्रमेर ही नियता का भरण है । भौतिक मण, किंवा परमाणुषों की विरोपता ही मत भौतिहप पदापों की विशपता है कि कणाददर्शन इसीरा निरूपण करता है, मतएक इसे (मिग्रप मात्र प्रापक प्रापार के कारण) पिरणाम करोगप्प है। ११
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परिप -माप्पभूमि पिपयर्षिमाग । दातदरान शारीरक को आरय मानकर उसके स्थान में प्रत्यक्षक्षण इसी प्रत्यगजम का निधान करता है। कि इसका प्रधान उमेरप शारीरक का कल्याण करमा है, अतएव ास दशा को शारीरकदशन कहा गया है। पूर्व के प्रकरण में हमने शारीरक को अक्षरप्रतिपादक पतसाया था। एक या! प्रस्यगामलक्षण भम्पपप्रतिपार तसा रह हैं । इसमें कोई विरोप नही समझना चाहिए । शारीरक सम्पप का निरापण करता है, परन्तु म परमाधि से अप्पारम का यक्षरसे सम्बन्ध है। "महरमिया "त्य दि शारीरक सिमान्त के अनुसार इममें घम्पप को पाना का रूप दिया गमा। विना अक्षर सम्बन्ध के शारीरशास्त्र पर विनिशास्प मापदाय 'मन्यापस्य यत के मनुमार भी ज मस्थिति मग का कारण नहीं यमसमता । भम्पपनस मा प्रकृति के साप युक्त होकर ही म मारि का का या बनता है । इसी प्रतिभाव को मचित करने के लिए म्पासने मागे नाफर-"वससम वयात्" यहा। चुकि महावारा इमने भम्पयामा का निरूपण किया है इसलिए तो हम इसे प्रदरणम का सस्ते । साप में पदर दाग या तटाप पुदि से मागप्पान प्रस्पास्मसत्ता पम्पय की भोर भी धार्षित कर रहा ., सखिए इमने इसे यहा भम्पयशान कर दिया है। मारप से शारीरकरार अपययुक्त मदरशा है, प्राभामिन पाया है, एक पिकास परशा है । सीमों में सम्पय हो मुम्प मारमा । । गोणप से ही सही, पर तु शरीरपनें मम्पप का एस मश्य निया ६। ऐसी दण में इन मीमो शामों में बारिश को हम प्रधानलप म भास्मशान पदने के लिए प्यार है। . शारीरकशायरे पर मामा पा निशाण पररासी मानीटनिपत प धातीउपनिरत् भोर परमाती है। स्मारी उपनिषत् गीता । मौनी उपनिषत् एग पन-रठा ५ माम में प्रमिस वर पा पनि भाग 1 इस प्रकार मामा का मिपा परगान हमारे सामने गारीरकनगन गीता उपनिपत् पर तीन गन उचित है । म तीनों में से किसी कारण Aगर को सदर में रए पर दमने मप्पाप नागाणात कोटी तर म 130 परिष्टि का माप्य भूमिका पिय दिमाग परकूट ही विगैप है । इस निराप का पप्पा मघर है। परमाशुमों को एक सूत्र में मदत में पिस्टहप दना इसी मक्षर का काम है । प्रत्येक पदाप के केस में भेटयामा पही मकर मपनी प्राणराति से उस पदार्प के परकर का नियमन किया करता है, अतएर इस विधा भवर को अन्तयामी कहागता है, जैसा कि "वस्प वा पतस्य प्रवरस्य मगाराने गागि ! मुठ्या पन्मसी मिश्वी तिष्ठत " [Vत. ११६११) हमादि मे स्पष्ट है। महर की इसी फरमाता को पदप में रराकर--"कूरवोऽचर परमा" या कमा प्रमा है । यह रप भारती लिब का पाण।। परकप लिया है। इस कार्य की पूछ बस्पा कारखरूप पर भापक प्रचार कम्पनिय का निर्माता बनता, सानि 'पम्पकाम्यकपा सर्ग ममपम्याराग" इस सिसात से स्प है। इसी कारलता को सचित करने के लिए अपर मो प्रकृति को प्राक्-पते पापस्य पूनावस्था) कहा गया। वियरचना में इसी की प्रधानता है। प्रतएय से प्रधान कहा जाता है। प्रक्षर-प्रम्पक- मकवि-पान समसद प्राय समानार्थक हैं। पहीमपर परापत है। "जीपमूता माा- पाहो । ययेद पायवे नगत्" इस सिद्धान्त के अनुमार पहा महाप्रति प्रतीशरीरमिन बीमामा की मरूपसमर्पिका बनती है । सरपञ्चासका सय प्रालि किंवा मदरकम पाई वीमाम्म एमवएम इस शाम को "पापानिन" करा मपा है। अधर का मासम्मन प्रयय है । भय की प्रतिमाया, यि प्रतिबिम्ब ही पापा मिक ईश्वर है। इसी पाण्यालिक ईबर को प्रसनारमा प्रस्थात्मा शरीर में एता (भा मी अपने विभूचिमा पर सहर । पर किसी प्राध्याभिकार से किसी भी प्रकार का सामान नहीं रखा । 'प्रसौमपं पुरुपो न समते, नम्पयते, म रिप्पति" 'न भायो मिपावे का कापियार्य मूम्मा मनिता पान भूप । प्रभो निया शावतोऽय पुराणो न सम्पन्पमाने गीर 'वारि मौत-प्रमालों के अनुसार वास्तव में यह निदातीत है । यही देहस्पित, किन्तु ग्रामिमामाप पर पुष्प , पैसाकि-"उपणनुमन्ता मचा मौका मोबर । परमारमति पाप्पुको दोऽस्मिन् पुरुपा पर" मावि से स्पए बाहिर - माम्पमूमि lig विपयार्यमाग है। वेदान्त शन शारीरक को मारय मामकर उसके स्थान में परयसपण सी प्रमजम का विधान करता है । कि सपा प्रघाम उदेश्य शारीरक का पम्पास करना है, मतपय इस दशाम को शारीरकर्शन कहा गया है। पूप में प्रकरण में हमने शारीरम मक्षतिपादक बताया था। एक यही प्रमगरमसक्षण सम्पयानिकारक बनसा रह है । इसमें कोई विरोर मा समममा पाहिए । शारीरक धन्यय का निरूपण करता है परन्तु मम मारि मे । अप्पारम का अरसे सम्म है। "मवरपिया."इस दि शारीरक सिदान्स के अनुमार उममें प्रन्यय को पन्ना का रूप दे दिया गया है। बिना अक्षा सम्बध के शारीरक शाम र मिविज्ञास्य मम पाप जमायस्प यव " के मनुमार भी जम-स्पिति मग का कारण नहीं ममसक्ता पम्ययनयमाव प्रति के साप मुक्त होकरी न मारि का कर ण मनता है । उसी प्रतिभाष को सपित करने के लिए म्पासने मागे जार-हत्तसपरयात्" यह कहा है। कि मारा मने मध्यपाम्मा का निरूपण किया है इसलिए तो हम इमे पक्षरणम का सरते है । साप ही में पहा am या वरय बुद्धि से हमाग पान प्रस्मगामसप्तण भम्पय की मोर भी भारपित कर रहा ., सिसिए हमने इसे यहा भयपणन कह दिया है। समएस से शारीरका परययुक्त पक्षरण है प्राधानिरणम भरणारे, पिणन परशन नीनों में मध्यप हो मुम्प भागमा । गौखरप से ही सही परन्तु शारीरक मत्यप का परा भरम रिश है। ऐसी रण में इन तीनों गात्रों में शारीरपणास को राम प्रधामरूप मे पात्मगान्त पदने के लिए तम्या है। शारीरकगारतो कीरिक मामा त निकरण बनेपाती रमानांतरनिपत, पप पातीनिषत् मोरवपाती है। स्माची उपनिषत् गीता । ग्रीती उपनिषत् इग-फेन-कग द नाम ग प्रमिद व पा मन्तिम भाग। इस प्रकार मामा का निरपरा परनयन हमारे सामने गारीरफनगन-गीता-उपनिपन पर बीम गाव उपन। मानों से मिसार को सपा में एसपने माप मारणार को तामा पीपापि • मायभूमिका विषय विमान - शासों की अपेक्षा अपूर्व, पूण एक विस्प का है। भामाहा की घरमसीमा पर पहुचने माल पानिकों में भामसरप शाम के समय में हमारे सामने ज्योति-पीय्य प्रन पर तीम तल रमले हैं। इन तीम तयों के समय से एक ही मारमा की मनेक, किंगा प्रभानरूप से तीन संस्पाए बनाती है। मानस किंग पित्तत्र का ही नाम पाति है। पम पाण-किया ग िविवधनामों से प्रसिभ गतित्व पर ही नाम पीये है। मायावस की कृपा से उमूठ, मायायुक्त सा गुण विकार अमन-पापरण समधि ही मम ।। दूसरे शब्दों में यों सममि कि शामरूप योति की विकृतपस्या की गयी रुपनीय है, एष पसरूप बीप्य की विश्वावस्था की मायकमाविरूप मम।। उक्त टीमों तयों में से रसग्क्षण म्योति, एक समय , इन दोनों को समणि तो निगुर मारमा है। यह विशुद मामा सर्वपा निर्गुण परग्राम्य, मतएष शास्त्रानकित है।पी मुम्प मामा है। तीसरा समतल माम्ममाप्यादा से सपा वरिपत है। इसी को भास्मविच किंवा पारमपरिग्रा या बाता है। कि यह परिमा मामा का भोग्य है, एक मोम्य पदार्थ को ही शिानमाग में पम पमा भतार, भतरण हम इस परिमाको भरपही "म" शम से सम्बोधित करने के लिए उम्पार है। मामरूप पा पारमपरिग्रा प्राव परिग्रा, हिपरिप्रा मेद से दो प्रकार के माने गए है। मापा-कमा गुण यह तीन तो मत परिणा है, एक विकार, भामरण, पहन पर तीन यी परिश। मापारि तीनो मन्च परिग्रह मामा के सम्पपर्म कासावे , एष निकारारि वीमा पनि परिमा भाम्प २ प्राभिवपर्म नाग१ । सरूपपरमाधिम योति-पीप्पापण नियम मारमा सोपाधिक ममता मा-"सगुनमारमा" कराने हगता , एक मासिवायपिम पही सगुण मारमा “पम्मोपपमा नाम से पा. होने सगा। इस प्रकार मात्र, शि परिमा विप्प से समिरोप, निच स्पाभिक भामा दोनित गाते वीसरा एकति सर्पमा सन्त निम्याषिक परमाता है। समाधि पहिप नया मापभिन्न I विषय विभाग पर से ज्योति बीर्य मम के सम्बन्ध तारतम्प से निरूपारिक, सोपविकसगुमा, सोपापिफसर- धम्र्मोपपम यह वीम मास्पस्पाए थे जाती है। तीनों में निरूपाविक मारमा पर रामद की गति मसम्मा। फसता उस का निरूपण करमा शम्दाम के लिए असम्भव है। रोप रहते हैं सोपा विक दोनों विट । मो शास्त्र इन दोनों का, अपच दोमों में से एक का निरूपण करता है, उसी को भस्मास का वाता है। --उपोनि-भागम् (रस:) -निर्षिरोप प्रास्मा-परापर -परमेपरः २-पीरपम्-क्रिस (बसम्) । lahaa २-कप्ता -प्रमा अर्यः (विकनिः) - सविशेष प्रात्मा-पिवेभर पम्पपति २ माया । - अन्तःपरिग्रहात्ममममम् । [३-~गुणा (पन्धविचम) -विभागा । - पादकोशिकमानम् २-~-प्रावरणानि गरि परिग्रारमकममम 11-प्रमनानि । (पहिर्मिचम्) निविरोपा.-सर्मविपधम्म-(सरपाभिवपर्म)-पिररिता-निर्गुण प्रास्मा-विधानीवा २-मम्तरहररिमामकलापपरिछप -सगुण प्रात्मा-विपास्मा)। सपिरोपा १-रिपरिग्रसरमकाश्रितधम्मारविमा सरपोपपमा विश्वमपि । ६मों परिमहों के समन्स की लिसपसवा पा परि विचार किप चाय तो समिरोष मारमा के ६ विपर होनाते हैं। इन ६ मारमपित्तों में पार तो ममापविलिप एप दो पुरुपवित है । साप ही में इवना और प्णन रखिए रि उचर उत्तर के भाग्मविरत के साप पूर्व पूर्ण के मामनिरस का पनिष्ठ सम्बाध रहता है। दूसरे शब्दों में कों समझिए दि माप्रिवधामी । ।
बहिरमा माम्ममूमिका the विषय विमा उचर के मात्मविर्स का खरूप पूर्व के भारमविपर्व को भपने मर्म में रखकर ही मामा सहा प्रतिसित रउने में समय होता है । पूष पूर्व का मान्मपित ही उर उचर के मारमविश्वका कारण ६ एष उर उचर का भात्मवित ही पूर्व के मारमविश्व का काप है। कार सण से ही कार्य की सरूपनि पति होती है। इसी प्रापार पर-"वत्सहा वदेशानुमामिगत्' पर सिमान्त प्रतिष्टित है। रसरूप योस, एम एसम्पनीप्य की समशिदी निमाधिक, सर्वधर्म बरिफत परा स्पर है। इसी का पतकिश्चित् प्रदेश मापा नाम के प्रथम परिमा से युक्त होल 'पुरुष" (निगुर मम्पपपुस्प) नाम धारण कर समा है। पह पुरपामा ममा माम के दूसरे मत्साह परिप्रा से युक्त होकर "पोहशीपुरुप (पशकत नम्पप पचास भवर, पचकम पर, परा पर के सम्बन्ध से पो-शी, किंम पोस ) माम से प्रसित होता है। वही पोपीपुष गुण माम के तीसरे भन्तरङ्ग परिप्रा से युक्त होकर “सत्यप्रजापति" कासाने जाता है। पही सस्पप्रभापति रिकार नाम के पौधे मनिह परिमड़ से युक्त होकर "यज्ञप्रजापति" कहनाने लगता है। यही याप्रजापति प्रावरण माम के पांच यविरह परिमा से पुल होकर “बिराद मभापति" कागने मगता है । यही विराट् प्रमापति अमन नाम के ६ हे बहि परिप्रा से युक्त होकर "विश्वप्रजापति” नाम मे सम्वोभित होने लगता है । इन २ मो भारमसम्पामों में से पुष्प, पोरशी ससपमापति इन तीन मामनियों का समुबप तो "सगुण मा-मा", या विराट, पिश्व इस तीन मनमनियों की समनि 'सरपर्मों पपममारमा" है। सरा वही निरूपापिक, मायाविरहित विमुर कल है । उस एक की या सात संस्थाए है, जैसा कि- 'ऐतदारम्पमिद सर्वम्" इत्यादि मौत सिगाव से स्प। प्रात्मन सप्तसंस्थापरिलेख (तदाम्पमिद समिया)। १०.1-निम्मापी-स पप मारमा पापका [१] परात्परः 4. निर्गुण प्रात्मा- ११ मायापरिग्रासमपात् स एव [२], पुम्पा ५२० कलापरिग्रासमन्मात् स एप [v] पोरणी ३ ३-गुणपरिप्रइसमपाद स एम[v] ससपमापतिः . विश्वातीत सगुण मात्मा- विश्वात्मा
परिक्रति
- मप्पमूमिक
विषय षिमाग
विकारपरिग्रहसमधाद स एच [२] यसप्रापतिः
२५२ श्रावरणपरिग्रहसम्पन्मात् स एम [६] विराट्मभापति ! मघम्ोपपन्ना
विश्वम्
६-अमनपरिप्रासमन्त्राव स एर [७] विममभापति
१
परारपर
परस्परा
निर्गुल मारमा पिश्चात
२-|| पगारपरगभिंत
पुरुषः
ऐतदारस्यमिद सषम्
पुरप-परस्परगता
पोडशापुरुषा
पोररी पुरुप परात्परगर्मित
विचारमा
सगुबमास्मा
सस्प प्रजापीत
५
सरप-पोरणा-पुरप-परात्परगर्भिता
पामापतिः
६.
पप सस्प पारशी पुरष-परारपरगर्मिन
विरारपसापांना
पिराट्या-सत्य पोशी-पुष्प पगरपगर्मि।
पिप्रजापति
परिपरि । माप्पभूमिका बिप विमान - मा सात भारमपितों में से परस्पर नाम के पहिले मिगुम मामा कर तो सम्दया से किसी प्रकार का मी सम्पयन। दो भात्मनि का सामे यो विहार के साथ निरूपणमा है। जिन शास्त्रों ने इन । भामसम्यामों का निरूपम किया है, वे की माम विन मारतवर्ष में (मिशन सम्प्रदाय में ) पास्मगात माम से प्रसिद्ध है। देखना था। विकिस भास्मशाबने किस मामपि का लिप सर से निरूपण किया। शक मनुः, साम, प्रर्या (शाखसहित) हम चारों वेदों की समरिहप मन्त्रसाद यामाग एमपि माम का पक्षणमाग प्रपामरूप से प्रभापतिपय मम्मोपपा मारमा का निरूपण करता है । पिप, पिराद् या, इम तीन प्रमापतियों की समष्टि ही "सर्वपो पएममामा" वेदने (मत्र मौर विधिमाग ने ) इस महमा के विम-विराट- पपिण्य निरुपण किया है। यही वीन प्रजापतिसंस्पाएं इसके प्रमान उरेरण है । इन तीनों को उप मान कर तीनों के स्थान में सगुण भारत के पम्तिमपर रूप गुणात्मक ससममापति का निपान करमा सके माग का मुएप उदेश्य है । दूसरे शब्दो में बस का सम्पद निरूपण कर इस की ओर से हमारे कर्मात्मा को विराट् की भोर, विराट् से या की मोर, एका से सम की भोर माना ही इस ग्राम प मुफ्प गरम ! | "सत्यनापति रेसे पापना पविर में परिणत होमाता है ? "पा पदममापति स बिरादरमापति कीपति का भरण मनगपा ?" 'विराट् ममापति से सम्पर्क विरण से उत्पन होमया" ! "एप विराट् स सत्पत्र विश्व का क्या परपस मामाल विज्ञान से इस से पया माम रटा सकते है। इन सब प्रश्नों का सम्यक् सम्पधान करता मा पा मारा यह शाब में सन पर प्रतिप्रितम देता है । कि इसमें प्रजापति वर्ष की ही प्रमानवा ६ मारण हम इसे "प्रमापविणार" किंवा "मामापरणार सफ्वेद के इस माग का प्रभाग निरममा प्रबारविही है। इसी मत्ल को यह करती मति करती है- ममापवे नलदेताम्मन्पो विधा पाणि परितापमूर । पद कामास्व हामस्वभो मष्ट पप स्माम पतपो स्पीणाम् ॥ (मठा-०२१६) पारिजरष्ट - माध्यमूमिका & विपय विमा दूमग है सगुण भा'मा । इसके पुरुष-पोग्गी-सस या तीन विव। सरूप धामो पन (मापा-कला-गुणपरिमासम्मो रसम भारमा का निरूपण पारगयफ गर्भित घेइ के उपनिपत् मागने किया है उपमिपणास सगुण मामा को भरना मुम्य उद्देश्य मानतामा भनरम ही "सगुण पास्मगान"। यह शख सस्प-योग्शी-पुरुष [फलश भविकारी भेद से] इन तीनों सगुणारमसस्पाभों को नरेश्य मानकर, इनो स्पान में उस निगुण, विश्वातीत परात्पर का विधान करता है। दूसरे शब्दों में यों समिए पि यह हमारे कर्मास्मा को सस्प से पोशी पर लगाता है, पोग्गी से विशुद्ध मध्यपपुरुष पर नेशर होर दता । यहाँ पहुंच पाद [पम्यप को प्राप्त किए भार] विना प्रयास के माने मार यह पुरुप उस पग पर में सीन होता है। उपनिषत् वय पुरुष को परात्पर पर पहुंचाने में असमप है। क्योंकि शादा रमक उपनिषत् शाम की बह! गर नहीं है। यह तो पुल पर पहुवा मात्र पता है। परापर के रस की चोर में 'नायमारमा प्रयपन सम्मो न पेषया न पाना भूतेन । पो- हणमे सेन मभ्यः" यही उत्तर मिसता । rस प्रकार मग्न वैषि, भारएक-उपनिषत् सर पेशाप्र शप सम्पग्स मा मरियम गाय मा बात है। मश्र-विधिमाग मान-मानस वा परिमायुक्त सविमान मामा पर निकरण पर सना है, एत्र धारण -उानिरव भाग गुण-रसा-नारा परिमायुक्त समस माना का निर्माण कर सता है। पामर में दो ही मामाप विषय भे, व दोनों सदी मय-विधि-मारएपक-निप रूपयेदमागने निहारमा बाकी पया मी तो इस पौरपेय शाप के समर-सरदार प्रमिदपत" [मनु. २२७) पर सिर । 지 म . . पनि मामा के सम्मान में पप । विगा उप्त रूप से यद मेरा पूरी हो जाती तो सोना मामपिकनिका असोग इसपरत सम्पर "मात्म परी पोदीस पाटा सामुग अस्पतपरगे। समापन समारोमा पा, उसे सरसाभार रेलिर सुग्न बनाने के लिए ही ला पायो प्राधि पहिरपरि माप्पमित्र - पिपरिमाग है। इसी भाधार पर हम सम शाहओं को 'मास्मपरीघण्णा" कर सकते है। या भारमारीक्षा शान विधान मे से दो मागों में नमक है।बामाभित्र परीक्षा को ही दर्शन का नाता है, एवं मिामाभिक परीक्षा ही शिान शम्द से सम्बोषित है। इस राशि से मारमपरीक्षाशा मागे पाकर दो भागों में विमाको गया है। पहिले रानात काही विचार कीमिए । दर्शन याड के शारीरक, मापानिक मेरो पिका पादाद पैनाशिक नौकापविक मेह से श्मेद मानें है। प्राचीन सम्प्रदाय के मनु पार म्याय, मीमांसा, (पूर्वमीमांसा), योग के समावेश से ६ मास्तिक दर्शन माने गए, एक पारीक, माध्यमिक, योमागार, सोमानिसक, पैमापिक, प्रावि पा६ मास्तिमान मा गई है। परन्तु शिामल से पाप-मीनीसा-योग तीनों निमत से मरिफत है। एवमेव उक्त ९ मास्तिकदर्शनों का मी स्यााद, सौघपतिक, रैमाणिक इन तीन स्विकदनों में हमन्वभाव हो जाता है। मास्तु इन सब विषयों का विशद निरूपण मागे माने पर पात्मपरी पापकरण में किपा गाने पाता है। प्रशा में केवल पी समम सेना पर्याप्त होगा कि पूर्वकपमा नुसार ३ भास्तिकयश, २-नास्तिम दर्शन, सम्मूप कुल १ दर्शन है। विषानिमक नास्तिक दर्शन ने साबन भारमा [लिय] की परीक्षा की। मास्तिक दरानों में से परिये पैशेषिक दर्शन ने शराप्रपान विराट्पमापति, एक याप्रमापति की परीक्षा की है। मापानिक [मान्य दर्शन ने पयकरप्रधान सत्पामापति की परीक्षा की है, एक गरी रकरीन ने मप्यप गर्मित भवप्रवान पोरीपुरुष [गम की परीक्षा की। इस प्रकार दर्शन की पीला रणि पोग्गीपुरुष पर समाप्त रोनाती है। तत्वपरीक्षा को दी दर्शन करते। यह सप पीपा पशिानप्रभामा है। इससे क्स क्याान होता है। बिसवान के लिए पापारपमापा में 'प्पोरीटिकमनॉमेम' [Thoritical knowledge.] सन्द प्रयुक्तामा , उसी मर्य में हमारा दर्शन हम निस्त। यह तो ईशान परीक्षा । दूसरी विानपरीवा। पह परीषा म्पधार से सम्म रखती।बिसे पथिमी निराम् “मेशिकममामेभ" (Practical knowledgs) शम्द । १ पहिरि । माप्पभूमिका विषय विमाप सम्बोधित करते हैं, ठीक उसी मप में मीमामा शम्द प्रयुक्त पुमा है । दर्शन जाँ मनप्रधान है, वहां मीमांसा विशावप्रधाम है । दसन ग बा फिलॉसफी [Phelechapr] ३, पहा मीमांसाशाम साफ्स [ Suneno 1 है। प्रसिद मीसा [पूर्वमीमांसा दमन ने अपने १० मध्यायों से भामा की विनरष्टि से परीक्षा की पतएव इसे हम रिमानयुक्त प्रारपपरीदायास कर सकते है । इम सब के मन्त में मनायास हमारे सम्मुख उपरिपत होता है । समुपभूत मिस मायी ममप पुरुष पर पूष के किसी भारमग्रा, किंवा मात्मपरीक्षारप्रस्त्र ने विशेषरूप से प्रकाशक गया था, गीसा ने प्रभानरूप से उसी सम्पयपुरष को अपना प्रधाम सक्ष्य बनाया है। सब से बहा मास तो इस शास्म का या कि भारमशयों में बिन विषयों का निरण्य किया है, एव भारमपरीपकरणों में जिन विषयों की परीक्षा की , मपपनिरूपम के सय साप वन सर पर भी गीता प्रम में समायेशामा है। इसीलिए तो ये यत् हम इसे सपणास्त्र करते हैं । इसीलिए तो वेद न होने पर भी इसे उपनिषत् शब्द से सम्बोधित किया गया है। निम्न लिखित रसोकों पर रटि टासते नाइए, एवं गीता की माता का पशोगान कस्ते बाए, सम्प्रधान हो मायगा । ९-विश्वप्रजापतिनिरूपक वचन- १-पया सक्षमिद सपै मगदम्पफमृचिना । मत्स्पानि सर्पमतानि नचाई वेषपस्थितः । [४] । -भूमिरापोनसोऽायुः स मनो दुदिरप प । पाहार इसीय मे मिना प्रकविरएषा ॥ [१] २-विराट्प्रजापतिनिरूपक वचन -परमेतपमास्प समात्मानं परमेश्वर । प्रष्टुमिफामि के रूपपर पुरुपोचम ॥ [१] १०॥
पदिरा नाममूनि- विमदिमाग २-पोकर मगधकत्तन पायाप सपरापरम । मम दो गुगरा । यचा प्रमिग्वामि । (110) ३-पत्रप्रजापतिनिरूपक पचन 1-साझा प्रमाण पुरोनाच मनापतिः। मनने ममरियषप पोतिएकामधुर ।। मी १. २-पर्म व्रमोदमा सिद्धि प्रमावरसमुदभम् । हरमाद सर्पमत निम को पतिप्तिम १-स्त्यप्रजापतिनिरूपक वचन - १ अपि निति बनना न मिदुरासुराः । नोपं नापि पाचारोन सस्प पिपहे. २-प्रससमाविष्ट ते अगदास्नीचरम् । अपरम्परसम्मत किमन्य कामोतकम् ॥ ८॥ पोडशीनिरूपक वचन 1-प्रापिपी पुस्सौ सो घरमादर एर। पर: सर्वासि मूतानि स्वरयोऽवर उम्पते । २चमा पुपक्षपन्य परमात्मेदाः । यो मोकायमाविश्य सिमर्नम्पयः॥१शा। १५.
परिणी का मन्पभूमिका ITE पिपपविमाग ६-अव्ययपुरुपनिरूपकवचन-- -गविमर्श प्रमु सादी निकासा शरणं मुरात् । प्रमप ममपस्यान निपाने वीजमम्पयम् || (Earex २-उपरानुमन्वा च मर्चा मोका मस्परः। परमात्मेति पाप्युफो देऽस्मिन् पुरुप पर ॥ (१३३२२२)) मामगार के मतिरह दरान ने विस मन से मात्मा की परीश की है, एवं मीमांसा ने बिस विमानाधि से भारमा की परीक्षा की है, उन दोनों का भी-"हानst सविनाममिद वक्ष्याम्पोपट । यमनात्मा ने भूयोऽन्पसमावष्यमशिप्यसे" इत्पावि रूप में गीता में पूर्ण समामेरा है। ऐसी अवस्था में परि इस गीताशास्त्र को (सपसम्मियम के पारस) सपशास्त्र को तो कोद अयुक्ति न होगी। फसत पेद (मन्त्रमाग, एष विषिमाग, पेदान्त [मारण्यकमाग, एव निपतमाग], दशन [२ भास्तिकदशन, ३ नास्तिक दरान ], मीमांसा, गीता मेद मिसन पार्थो भास्मयायो, एव पाप्मपरीवाशाओं में गीता की ही सोररुपता सिद्ध होती है। १-वेदशास्त्रम् (मन्त्र विधिभागात्मकम)-- यात्मशास्त्रम् । १-सस्पप्रभापनि । सर्वध - सगुणाबयर रिपेयर म्मोपप- [विकारयुक्ता] १ पापनापति नात्म [भापरणोपेत ] २-विपद्समापति -सपपम्मोपपमा उदेश्य शास्त्रम् [ममनोपेनः] -रिश्वपनापतिः
पाहिपरपि
* माप्पमिता -
विपरिमाग
२-वेदान्तशास्त्रम् (भारण्यक-उपनिषभागात्मकम्) धात्मशास्रम्।
.
-परात्पर
}--निर्गुण -बिया
[मायो'']-पुरुप
- सगुणात्मशास्त्रमा
सगुण -श्या
[फसोपेतः]-पोरपी
[गुणोपेत]-सरपमनापति
३-दर्शनशास्त्रम् (पदर्शनशास्त्रम्) श्रात्मपरीक्षणशास्त्र ज्ञानप्रधानम्
-शारीरफदर्शनम्
-सम्पमिगधरपरीक्षागावप पोहाणखम
२-प्राधानिकदशनम् - अक्षरपरीक्षाशास्त्रम्
-सत्यममापतिशास्त्रम
1-4 परगनम्
1-परपरीक्षागानम् विराट यज्ञाच्यासम
मास्तिकवनिए
नास्तिमननस
१-स्पादाददर्शनम्
• पनाशिनम्
३-सौकापविकवर्शनम
* सिकारवरपरीवाणनम्-विश्वपमापनिगानम
१-मीमांसाशास्त्रम्
भास्मपरीक्षपशास-विधानमपामम् ।
-11
परिया नामाप भूमिका ॥ विपयार्यभाग ५-गीताशास्त्रम् अव्ययामपिपात्मक मुखियोगणनम् । न-सिमानमय सर्वशास्त्रम् ।। मानन मामारत नाम के सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक प्रन्य से पृथक् करके निकासा हुमा अजुन के प्रति उपविष्णु भगगन फप्स का उपदेशसमहात्मक शब्द प्रपच ही गावागास है । इस अन्य में ७०० रसोक है। इन इसोकों के रचमिता मगवान् रुदैपायन है । गीताप्रतिपा वित ऐतिहासिक लिपप को कोर कर शेष सम्पूस पैदानिक निपय कि भगवान कृष्ण की मौ तिक सम्पचि है मतएव इतिहास नम्यादा से सीमित मनता एमा मी, एष सोमठपा म्यास की रचना पनता मा भी या शाम 'मगरीयोपनिपत" नाम से ही प्रसिद्ध मा । महाभारत समर के उपक्रम में में ग्यमा गापम मनन को सधग्मशिक्षण के लिए १६० उपरेशात्मिका जिम २४ उपनिपटों का भगवान्ने उपदेश रिया या, उन का ग्यास ने अपनी प्रानस मापा द्वारा उपपृष्ण विण है । मगदुरदेशों का पही उसहितकर पिर समान में गीताशास नाम से प्रसिब है। बिसपकार प्रौसी उपनिपट सकुपित अप को वितत करने के कारण “गीता" कराई, एममेव महाभारताम्तर्गस म्यास विरचित रसोकसमहात्मिका इस उपसम्भ गीता को हम उम मगवद्गीता की गीता काने के लिए तम्यार हैं । सकुचित मपका निस्तार ही उसका उपवृष्ण है । छप्णने निस सक्षे मापा में पोरे ही समय में निस गोवा रहस्य का उपदेश दे रहा पा, उसको इतना सप्र समम लेने का अधिकारी तो एकमात्र म न ही पा । परि ध्यासदेव हमारे सामने भपनी पाचना के द्वारा गोता का उपसम्म मिस्वत रूप म रसकर उस सक्षिप्त मापा की पुमरासि न करते तो गोवा हमारे सिए एक विस- मस्या बन नाधी। सणासमयी गीता देवमयो हसि । सर्वरीमपा गङ्गा सपपेनमयो मनुः । [म०मी०३३ माशोक]। 6.
बरपर्य माप्पभूमिका विषयषिमाग माज कितने एक मनचल समन यह मीमांसा किया करते है कि विस समय कुरुक्षेत्रके उस मिणास प्राङ्गण में महासमर की हैप्पारिए हो रही हों, युद्धोपकरणों की मुसम्पनियों से पा) +ा पवारण सर्वया भणन बना हुमा हो, सप मोता (भर्नुन) महा युस के मावी परिणाम से शोकमस्त बमा हुमा हो, ऐसे विषम समय में मीता से उस भगाधान का उपदेश देने के लिए भगवान् को मवसर मिस गपा यह बात मसम्मा सी प्रतीत होती है। मालूम होगी, म्यासदेव ने बीमप्पास्मविपा के शिक्षण के लिए भगवान् के माम से म्पने ऐतिहासिक प्रन्प में इस का समावरा कर लिया। कामा म दोन कि ऐसी कुबुद्धियों का मार्यताम की शि में कोई महत्व नही है। एसी समसोधनाए मार्पसास्पिामभिः एक मनार्य केदय में ही स्थान पा सकती है। परि पण हमारे असे सामाम्य पुरुष होते, मयमा भर्नुन पदि हमारे मैसा ही मन्दमुनि बोता तो भापनि की उत समाना को पपाकवि मामर मित सम्ता पा । परन्तु मन पुलकियों को पानी मुत्ता देना पाहिए कि कृपण मा साझाव मारायण के मस्तार होने से मतोकिक पुरुष ५ मा धनुन मर का प्रपरा पा । नोरण मानी योगमाया । मास की मास्या में शक टासर का बस पर सकले बोण मपनी जन्मसिद योगसिद्धिवारा पारिश को उठा सकते हैं या ना का ज्यामोहन कर सकते है, जोरप माने विण्पप्रशन से हरिद्वोपन नेत्रतपर सपने मोपण एक ही समय में मात्र पारानियों के साप रहते हए मक पर मार को मामय में जसको , जो कृष्ण पोगमापाशय पर्याप्त फर अर्जुन की प्रतिमा पूरी पा सकते हैं उनके निर पि.सी मी प्रमर की मानमर्म सम्बन्भिनीणा सपना भर ने भारको प्राविसका माग्ने बनाना है। पारी पुदायमर पर मगान् ने गीता का उप PURया पा। हम हम समय में मार्पमातिाक मगगम् पाठ के प्रति मा प्रस्ट मिर मिा महासको नियों ने मि मानी योगमार मे उस उपरेश पो पाने मात करण महिनामी सोपोरवाणी से पप रूप मेहम तक पहुंचाने का अनुमा किया।
परिगाष्टि -माम्पभूमिका - पिपयामाग गोताम य मुकि इतिहासमा के मध्य की वस्तुमानी इस रेमिय्यादी को घर- वित रसने के लिए ही ममगन् प्यास ने मिहानमोवा में अपनी मोर से का एक ऐतिहासिक रखोको का समावेश करना मगरयक समय है। इसी पर से गवामय के इम ... रसोको को हम इविरास विज्ञान मैद से दो मामों में निमत कर सकते हैं। ६४ रसोको का इतिहास से सम्बन्ध है, एव शेष १३६ रसोकों का विज्ञान से सम्मान है।भारम्भ के ६२ रखोक मीतातिपय की उत्पनिका है।"गीतोपदेश की भाररपफवा फ्यो ! कप एष किसके मति हुई। इन प्रसों के समापन के लिए ही मौनिक विषय से कुछ मी सम्बन्ध म रखते एमी ६१ रखोक म्पास ने अपनी मोर से गीता के भारम्म में उदत कर दिए हैं। इस चा पष्टिरसोकरिमका गीता को दूसरे शब्दों में गीता के प्रस्परा को हम "एतिहासिकगीता" नाम दे सकते हैं । भागे के ६१६ रसोकों में भगवान् की भोर से धानगमित विज्ञान का निरूपण पुमा है। पता इस मस गीता को 'विमानगीवा' माम से म्यवाल लिया गा सकता है "मनशान प्रमसमितम्" (पञ्चदशी के अनुसार पान ही नस है, यही मम्पय पुरुष है । पुद्धियोगसक्षण कम्म इस सम्पयपुरुष का कम है। पुरुष ज्योतिरूपण, योग वीप्य सक्षण है । विज्ञानम्वताने हम दोनों का निरूपण करते हुए मपने "इति श्रीमद्भगरीवास्- पनिपस्य प्रमविपायर्या योगशाले" इस मण्यायोपसहारमपम को चरिताप कर रक्सा है। सम्पूर्ण विशामगीता में भापको मप से इति तक मम-एक योग की ही मीमांसा उपगम्भ होगी। भूपि हमारा मिशानमाध्य विज्ञानाशि से ही गीता के भय करने के लिए मामा , पता प्रचलित दानिक मिपय विमाग कम की उपेक्षा कर हमें महानाशि से ही इसका विपपतिमाग परमा परे । इस मिपप विभाग में रसोकों का क्रम यही रहेग, पस भप्पापकम में परिण घनशेगा। प्राचीन पाम्पाता एतिहासिक ति को प्रभामता देते हुए, ए इतिहास मप्यादा मे साप रराने पाठे पापापों से समादर बल ६-६- इस काम से जातिको (शन-मलि-कम्मपोग की मौत से) तीन कारों में समा बले है, हा विज्ञानष्टि से पहिरपि सा माप्यभूमिका - विपरविमान ३-५-६ इस प्रम से गीता काम समम गरिए । प्रपमकाया में रामपिरिणा, एक पैराग्पमवण दुनियोग का, द्वितोपकाया में सिदरिया एस शानसाण्डदियोग का मृतीयका में रामरिया, एव ऐपर्यपक्षण दियोन का घर्षकाण में भापरिपा, एक पर्मसवण दियोग का मिरुपमामा है। गीता एक उपनिषत् मही', अपितु गीता में पनेक (२१) उपनिषों का निरपण हमा है। इन भनेक उपनिषों के कारण ही "गीवाद (मोकास ) उपनिपत" या का गया है। चूकि गवारण में मनेक उपनिषदें है प्रतए। इसके सम्बन्ध में निम्न लिक्षिा बन प्रसिद्ध है। गीवार पुगीवा कचम्पा किपन्या शास्त्रविरतरा। पास सर्व पपनामस्प मुसपनादिनि:सार । रिया पर पोग ताप स्पीकरण के लिए मगन् ने यो मौलिक रहस्य, किस विद्वानसिमान्त क्तसाए , उपनिषद पद के निधन के अनुसार ही रहस्य उपनिपत है। सम्पूर्ण महान गीता में एसी कुल २५ उपनिषद हैं। गौना एक उपनिषत् मही, भक्ति गीता में सपा पतन्त्र २० उपनिषदों का निरूपण माहै | BF से पिता को हम २५ उपनियर बपि महाभारत में परमात पाउ से स्थान में मात्र गीतामगीतामा." हम मी००) यानि कप मे पम्पमाप्त पाठ ही मिलता है। परन्तु पर संगोप का रोल पमझना चाहिए। कमाई गाभप्पायोसा में "गीताम पनि पस्तु' पद पापपातपार मिलता तो प्रबरपरी उस पचन गरचनात पा गा। इमीभापार पर भीपरसामी ने अपनी प्याम्पा में 'ययोर्क गीतामागसम्ये "गीता मगीवाचम्या 'रमादिकप मेगनात पाठीमपरिपाराम पापपषममा परम भीपा मम पान स्पिाजाममा पापत्मप्यासे गता एसपनिमगार पाम एरपोरे साप मेल एक पापमानसमारपीमागेगारर पपवमान पाठग पाईप का भाप्पभूमिका & विपय विमाग मन्पों की समशि कर सकते है। संहिता प्रम्प के गाया मेद से११३. संख्या में विमत मोती परिपर्दो में जो कुछ करा गया है, उन सब का सार इम घोगीस उपनिषदों में भागावा, बसा कि निम्न निसित समाहार से सिद्ध है। सर्योपनिपशे गायो दोग्पा गोपशमनन्दनः । पार्यों मस्सा सुपीर्मोका दुग्प मीतापत महत् ॥ [गी माहारम्प] । ६५६ रसोकात्मक इस लिहामगीता में निम्नलिखित कम से ६ प्रकरण सममने चाहिए। --1-उपक्रमपकरण ----+ ५२सोफ । २-१-रामपिपिपापकरण-१६चोक 1---सिदनियामकरण-१८ श्मोक |-३६ श्लोकात्मिका विज्ञान- 1-1-रानापियामकरण १५. श्सोक ५-४-भार्पविधामकरण- १८श्लोक गीता। ६-१-उपसारमफरण ५श्लोक उरु २४ उपनिपर्दे उलमों प्रकरयों में कमरा से किमतीं। उपनिषत् [मौलिकास्प] को स्पट करने के लिए. मौखिक रास्प को म्यानहारिक- रूप देने के लिए भगवान् ने वो पतन्त्र विहान मवाए हैं, उसी का नाम उपदेश । पर उप देश कुस १५० [एकसौसाठ] है। पदि । प्रकों की मि से विचार किया जाता है वो यह उपदेश वनभों प्रकरणों में २२ - इस क्रम से [१६० उपदेश] ३ १ परि २९ उपनिपदों कम से इन का निमायन किया जाता है तो पातुम्पिोपक्रमप्रक- रस की १ उपनिपत् में ३ उपदेश । रामर्षितचा की ८ उपनिपर्यों से सम्माष रसने माले. २ ३ ४ . . पबिपाय -----परेशा इस रूप से निमत है । सिम उपदेश क्रममा पीपारि का माप्यमूमिका I विषषिमाग पनिषद विधा की २ उपनिपदों से सम्बन्ध रखने वाले ११ उपदेशन रस रूम से गि मत है। रामनिया की ३ उपनिपदा से सम्बन्ध रस्में बाह १२ उप- १२३ग्पानगर ३ ११-या ३२ इस मम से नमक है । अमिपाकी ७ उपनिपदों से सम्बन्ध रस्ने बाले १६ वपदेश १२५५३३७पानमः -र-२०-२-२ प रस कम से निमत हैं । एव पाक्पिोपसहारप्रकरण की । उपनिपदों से सम्बन्ध रस्ने बारे ८ उपदेश १ २ ३ पनि। २२ पेपर इस क्रम से बिमल है। इस प्रकार प्रम (मम्पप) योग (पुस्तियोग)-प्रकरणामक इस विमान मोवाशाब में ११६ रोक है । इन रसोकों से ६ प्रकरण है, ६ प्रकाणों में २१ उपनिषदें है, २४ उपनिषदों में १९० उपदेश है। यही इस विहानगीता का संक्षिस विषय विमाग है । हमरा विश्वास है कि यदि पाठक इस कहानिक निफ्पविभाग को सामने रखते पर मीता के मदरों पर पर रहेंगे ते उमें गीताप सम्मने में विशेष विप्रतिपति का सामना न करना पड़ेगा । , प्रकरण विधाम उपनिषदों में उपदेश मोकामविमाग उपानेपन् एतिहासिकसम्दमप्रकरण . . (२) धातुर्विपोपत्रमरकरा २ , (२) C १.२३.५६७६ अशाचा रागरेपविनाशक पर ग्य मुदिये गडक्षण रामपिरिणाप्रकररम समहरिमाश कहानमुद्धियोग- | सक्षण सिदपिपापकरण ६२४ Y २ १०. ३० mins अस्मितापिनाशक ऐपफ्युद्धि ३ | योगक्षण रामपिपापकरण वमिनिमेराविनाशकभर्ममुदि योपण भापपियामकरण ४६ १८१ १७.1010p १ (७) || पानुरिपोरसंहारप्रकरण २२ ' (८) ऐनिमासिक सन्दर्भप्रकरण . २५ ७.३ विस्तृतविषयविभागप्रदर्शन सात सचित विपपरिमाग को देसकर पाठकों के पदय में यह बिबासाहो सकती। किम चारों विपामों, विचारतात उपनिपदों, एक सपनिपदम्पगत उपदेश के द्वारा मावान् ने कपा लिपप हमारे सामने रस्त है। इस प्रश्न का पपा समाधान तो पप गीतामा पहीक- रेगा । पहो पाटकों के परिवप के लिए संता से गौवाप्रतिपाप लिपपों का दिग्दरान करा दिया जाता है। 1-ऐतिहासिकसन्दर्मसङ्गति (१) १-ऐतिहासिकसन्दर्मसङ्गति- १९ से १ पर्यन्ट [ १२ को मोम] २१ पातास पल- २-चातुर्विद्योपक्रम (२) १-चातुर्विद्यापफमरूपा "मोरचोपनिपत" (I, ११431 ११, २२, )। १-01-गपग-प्राइकियोकप्रदर्शन–(१-उपदेश) । (१।१५, १३४७)। २--(२) २-परेश-माविकोकनिराकरणोपक्रम-2-उपदेश) (२१, २२ । ३-राजर्पिविद्या (३) १-वैराग्यघुद्धियोगप्रवर्तिकाराजापविधायमा(उपनिषत) (२।१ से । मप्पप सम्माप्ति पर्पत)। (१) १-पनिपद-वर्मपरिमागसपण म्पिमित्र में मनुकम्पप ! " से २३० पर्याय) एन २१३)।
पहिरष्टि । माण्णमूमिन पिपपमिमाय (३) २-उपनिपत्-धुदियोगी को कामासक्छि छोर देनी चाहिए । (२।३६ से २२०२५) (७) ३-उपनिपद-वियोगी को कर्म नहीं पोरना चाहिए । (३१ से ३।१२ प)। (O-उपनिपत्-मुद्धियोग के विरोभी दोष छोर देने पाहिए।(३१५ से १४१प)। (१) ५-उपनिपत-नियोग प्रीकृष्ण का निमी मत है । (५१ से पर्यन्त)। (७) ६-उपनिपत-भूरियोग से विरोध न रसने वाले शान-कम्मों में प्राय रहना चाहिए। (११० से ११.२ पत)। () -उपनिपत-मुद्रियोग में पान-कर्म दोनों का समावेश ।। (श से मारप)। (१) ८-उपनिषत्-मुनियोग सापक कम्मों में प्राचराना चाहिए । (६।१० से ६/७५)। १-कर्मपरित्यागलक्षण सांख्यनिष्ठा में अनुशोक व्यर्थ है। (७-उपवेश) १--1) -उपदेश-सोविय कम्मा से बहिमत, असा बाम (मम्पय, सपया निस्म है। देहपारण एवं देह परिस्माग का उस पर कोई मरमही होता। ऐसी दशा में समरविमाश के भय से पुरारि सौकिक कर्म छोड़ना चम्या नहीं। १११, १२, १३) । २-(१) २-उपदेश-शरीर के नियमान रने पर प्रज्ञा-प्राण-मूतमात्रामों के समय से भाकम करने वाले मुस-सों की भावरक प्राति को जब हम रोकने में मसमप है तो ऐसी दशा में इनसे गोकाकुचित होना म्- पता है। (४, १५, २०१६)। २-(५) ५-उपग-आस्मा पा कभी नाश नहीं हो साता, शरीर भी निम बन मही सकता, ऐसी दशा में अनिम शरीरन के भप से शोक करना म्पप ( २,१८, २१)।
परिया विपधिमाग (२) १-उपदेश F-मम्पपामा में घर-अक्षर माम की प्रतियों से नग्म-मृत्यु का प्रवाह निम प्रवाहित रहता है। परन्तु भन्मय इस प्रवाह में रहतामा मी निर्विकार है। फस्त शोक करमा म्पर्ष है। (२।२।१२।२।२२) ५--10) :-उपदेश मापयामा गुण्-मण महाभूता से सबका पृथक् है । ये पदार्थ नबर है। बस इनसे अतीत तो उसका नारा असम्मब है। प्रत नाशप्रयुक्त शोक करना म्पप है। (२।२३ , २।२० २।२५५) । ५-८) -उपदेश सम्म मामुपने से युक्त मोममा में नेमले जन्म मृत्यु-सुग्र- दासादिनामा को जब रोका नहीं जासकता तो इनके लिए शोक म्पर्ष । (१२६ २।२७, २।२८)। .१) -उपदेश-मिम आमा बनिस्म शरीर-प्रसङ्गममा, ससह शरीर दोनों कर स बन्ध बन नहीं सकता परन्तु बन रहा है यह सचमुच एक पापर्य कर पिय है। परन्तु इस सम्बन्ध मे इतना Aपित किमारमा का कमी बप ना पिया जासक्ला । फरत शामयोमी (साम्यनिष्ट) की परि में गरीरमारामपगनित सोने का कोई मात्व नहा रहता । (4॥२९, २१३०१ २१111) सप्तोपदेशयुक्ता १ उपनिपत् समास । ११२
बरिसरवि
* भाप्यमूमिका
विषयषिमाग
२-बुद्धियोगी को कामासक्ति छोड़ देनी चाहिए । (७-उपदेश)
८-१०) १-उपदेश-कर्मस्मागसक्षण बानयोग की अपेक्षा फरमागसक्षण बुद्धियोग को
ही घट समझना चाहिए । (२३९, २।१०], २)
1-11)-उपरेश-फल कामासक्तिप्रधान तचम पदिक कम्म भी बधन के ही कारण
है। अतः इनका मनुष्टान फरट कामास छोड़कर ही करना चाहिए।
(२।१२, २०१३, २११४, १५, १९८)।
10-(१२) ३-उपदेश -पालक मासक्ति छोरकर पिया हुआ माधिकारिष काम युदियोग का
उपोद्दलफ यनता हुआ पाप है। २४, pree, २४६२२०, २५१)
११-(१३) १-उपदेश-पुयियोगनिण प्राप्त करने के लिए अपनी प्रज्ञा को हिपर करना आर
श्यक है। (५२, २५)।
१२-(1)-उपदेश-वैराग्ययुदियोग सम्वम्धिनी रिपतप्रता के ६ खरूप है । (२५४
१,५६, २५७, ५८, २।५।२।६.२।६१०)।
१३-(११) ६-उपदेश-मग, काम झोव, समोर सतिश यह सम युद्धियोग के विरोधी धम्म
है। (२६,६३॥
५-१६) ७-उपठेरा-गोपमनित बासना आय युनियोग के प्रभार से मार हो जाती है तो उस
समय पर योगी मामी स्थिति में प्रतिष्टित हो जाता है ।(२०६५),
श६५,२२६६, २६०, २०६८1, २६६, २१७०, २७१,
२१७२१)-(दितीपाप्याप समाप्त)।
सप्तोपदेशयुक्का २ उपनिषत् समाप्त
पारियो , मानभूमिका । विपयविमाग ३-बुद्धियोगी को कर्म नहीं छोड़ना चाहिए । (७-उपदेश) १५-१७) १-अपदेश -कम्मसन्यासमपन सम्यास (पानयोग), एक कम्मारम्मला योग (कम्म- पोग) दोनों में मुद्धियोग नाम का योग ही श्रेष्ठ है । (11, १२, १३)। १६-१७) २-उपदेश-१ मध्यप हेतुनों के कारस पर्म का परिष्माग नहीं किया बासकता। (श, शश२६, २७, २८) । १५-(11)-उपदेश-प पाकम्म कमी कम्पन के कारण नहीं बनने। २१ ११, ११२। २१३१, ३।१११, १५, १५) १८-(२०)-उपदेश-उपेशाबुदि से किए गए कर्म कमी क्वम के कारण नही बमते । (शाच, ११, १२२०)। १८-(२१)-उपदेश-रोकसमहति से किए गए कर्म कमी मन के कारण नही नवे । (१२०, २१, २२२२, २३२३१, २२१, २२, २२६)। २०(२२) ६-उपदेश-प्राकृतिक कम कभी मपम क कारण मही पनवे । (२७), १।२८ २९, ३०)। २१-(५३) ७-उपदेश-मारी (भगवान् की] नि में धर्म का परिवाग कमी नही करना चाहिए । [१॥३१॥ ॥१२॥ सप्तोपदेशयुक्ता ३ उपनिपत् समाप्त । ४ चुद्धियोग के पिरोधी दोप छोड देने चाहिए । (३--उपदेश) २२-२४) १-उपदेश-परेप बुदियोग के मा प्रतिपक का परमाग करना चाहिए | [, )। २१-(२५)२-उपदेश-राग-रेप के बाक्रमण से भम्पप की बालम्पोति मशिन बन जाती है। पस्ता ऐसा पति मुरे कर्मों में प्रात होगावा ।। [शा, १॥२७॥ १८, २९, ३४०]।
पहिण
मायमूमिका ||
विपपषिमाग
२१-(२६) ३-उपदेय-इन्द्रिय, मन, युद्धि मार्यों के संपम से राग-देपादि पुद्धियोग के प्रतिकारक
धर्म मष्ट हो जाते है । (श, श,
तृतीय अध्याय समार।
ज्युपदेशयुक्ता उपनिपत् समा ।
५-धुद्धियोय भगवान कृष्ण का अपना मत है । (३-उपदेश)।
२१-२७) १-उपदेश-टम बुद्धियोग के प्रथम द्रय भगवान् ण है। [१, २I, VARI]
२६-२८-उपदेश-पनेक विग्रह पारण करने वाले प्य पि पप्पुत भगवान् ये, धत
एष विपास करना चाहिए कि उन्हें पूर्व जन्मों की सारी परिस्पिनि
विदित पी। 10 HI] ।
२६-२८)-उपदेय-भगवान् कृष्ण भाधिकारिक पुरुष मे । अण्व में सामाप मनु-प न
ममम कर अपय का भवतार समझना चाहिए । [स, ७,
न] .
इयुपदेशयुक्ता ५ उपनिपत् समाप्त ।
१-बुद्धियोग से विरोध न रखने वाले ज्ञान कर्म में प्रवृत्त रहना चाहिए।
(५ उपदेश)
२८-१०)१-उपदेग-मम्पपामा का अनुगमन काने पाले पान-काम-भकि तीनों ही
पोग उपाय है। (1104, ११, १२)।
२१-१५)-उपदेश-चातुर्म कौ का पति भम्पयामा से सम्पन्ध , मन इनमें प्रवृत्त
एना चाहिए । (१११, शर)।
२.-१२)३-उपदेश-निचरम्म पनि म पपग्मा के मर्नुगमी है पता नमे प्रथम रपना
चाहिए।६, १७,८,१२.
गर, २३||
नारपट
- माप्पमूमिका
मिएपविमाफ
३१-१६) -उपग-1 प्रकार के याकाम सम्पयामामुगामी घमसे हुए प्रबन्धम है, अता
इनमें प्राच रहना चाहिए । (रशाश, ४२५, २६॥
121, २८, २, ३, ६१३१॥ २२)।
३२-३६)-मपदेश-सम्पूर्ण याकम्मों में पानपाकर्म को ही सर्वश्रेष्ट समझना चाहिए ।
(४.net,.५, ३६,११,
erro, ४९११२)
(चतुर्थ अध्याय समास)
पञ्चोपदेशयुक्ता ६ उपनिपत समाप्त ।
७-पुद्धियोग में ज्ञान-कर्म दोनों का समावेश है। (-उपदेश)।
1-(२३१-उपदेश-कम्मयोग, एकानयोम दोनों में कौम श्रेष्ठ है। यह प्रश्न मचारीय
।(१)।
२२-(१६) २-परेश-कम्म-मान दोनों का दियोग में समावेश है। मत तीनों में इसे से
सत्सम समझना चाहिए । ( 11, २, ५६,
१०,
शरा, १०, २॥११॥ ११॥ Uml
३२-(१७) ३-उपग-गोपनियत निगुम मम्पपा मा फोसा एक ग्स सममना पाहिर ।
(१,१११६)।
२६-१७) --पदेश-संसारिक मुर के सामने माममन को मन मानकर उसी का मन
ग्यमी बनना चाहिए । (५०, ११, १६, ५।२।।
५२१, २००
१७-(३५)५-उपदेश-नागदपासारित भाम्पोन समत भा'मानन्द के अधिकारी
बनते हैं। (श२०, २१,२५ २६) ।
पाईरहाट
- मायभूमिका
।
विपरयिमाग
.
३८-(१०)-उपटेग-मारमसम्पत् प्राप्ति के लिए पुदियोगानुगामी योगाम्यास करना भाव
स्पक है । (२७,२८1, २२१)।
(पञ्चम श्रध्याय समाप्त )
२२-(४१) -उपद-पुन्दियोगी वर्मपरिणा से कर्मयोगी, एव कामना के परियाग से शामयोगी
बन जाता है। (६१,६२, ६३, ६१)।
१ (१२)-उपदेग-जो अपने मामा प विजय प्राप्त कर सेना ६ यह शमत मानद
का अधिकारी बन जाता है, एक मानहान से पवित मनुष्य दुसा
पत्र में निमन रहता है । (६,६६)।
81-१३) १-उपदश-वर्मयोग की अपेक्षा युद्धियोग सक्षण भानयोग को ही उसम समम्ना
चाहिप । (६७६६)।
नोपदेशयुक्ता ७ उपनिपत् समाप्त
८-चुदियागसाधक कम्मों में प्रवृत्त रहना चाहिए । ( उपदेश)
५२-(११) -उपदेश-पोगाम्पास ही खुदयोग गप्ति का समय उपाय है।
(१1१०1६११,६२,६/१३) ६१४,६१५)।
1-(१)२-उपटेश-पोगाम्पास से विरोध मने पल, पब अनुकूलता उपन करने वाले
अम्मा को साय में गम कर ही पोगाम्पास में प्रात होमा पाहिए ।
(६/१६६।१७)।
22-(१०३-उपदेश-विस में परिगणित निशेष गुसों का उदय टग्यो, सममतो उसने बुद्धि
योगनिष्टा प्राप्त करसी । (६।१८,१६)।
१५-(५७) -उपदेश-मिस योग में मारमा सवा प्रसन्न रहै, उसी योग (कर्म) को दियोग
सममन्ना भाहिए । (2015२१,५॥११,१२३) ।
पहिरजापति
मा मानमूमिका
विपरिमाग
१६-(१८) ५-उपदेश-दुनियोग प्राप्ति के लिए प्रविधात योग र मन्यास विशेष नियों से
करना चाहिए । (५।२१,६२५,२६,९।२,६२८) ।
४०-(१२)६-उपदेश दियोग पे साधनकास में समता का मम्पास करना परमारक है।
(२।९।२०,६।११,५५)।
१८-(५०)-उपदेश-मुनियोग की रिपति के लिए मन संयम प्रत्येक दण में अपेक्षित है।
(श६१,६५४,६५६) ।
16-(११)-उपदेश-निस मनुप्प में परिगणित समय देसो समझ लो उसने पूर्व जम्म
में बुझियोग का मनुष्शन किमाना। (६३,८,६३९
६।१६११२,१३,६४,६१)।
२.-(१२)-उपदेश-कर्मयोगी पोपोगी, पानपोगी इन तीनों को मपेक्षा से वो बुझियोग्य को,
एब इस की अपेक्षा प्रदायुत बुदियोगी को श्रेष्ठ समझना चाहिए ।
(६।४६,६७१)।
(पष्ठ अध्याय समाप्त)
नवोपदेशयुक्ता ८ उपनिपत समाप्त
उपनिपयुक्ता,५० उपदेशगर्मिता, २१६ श्लोकात्मिका
राजर्षि विद्या समाप्त
परिपट
या मममूमिका -
विषयविभाग
४--सिद्धविद्या
(e)-२-ज्ञानवृद्धियोगप्रतिपादिका सिद्धविद्या दितीया (२-उपनिपत)
( से मा०, ८ अध्याय पर समास) ।
१-१०) १-उपनिपत्-सपूर्ण विश्व प्रकृति पुरुष का ही ठीमाक्षेत्र है । (६९ से १२८५)
२-११)२-उपनिषत्-म-कम्म, महोगन, सर्ग-प्रलय, एष मक्तियोग ही प्रीति का प्रकृतिल
१। (३९ से समपास समाप्ति पर्वत)।
१-सम्पूर्ण विश्व प्रकृति पुरुप का ही लीलाक्षेत्र है । (१० उपदेश)।
१-(५३) १-उपदेश -सम्पयामा के साक्षात्कार के लिए शामयुक्त विज्ञान का मामय सना
बकायम है। (७,५२, ज.)।
२-५४) २-उपदेश-बयप पुरम के सम्पर परिधान के लिए उस के पराप्रतिरूप-अपर
का, एक अपराप्रतिरूप पर का शान मावश्यक है। (जर, अ)।
३-६५५) ३-उपदेश-प्राति को सम्पूण विश्व का उपादान, एक पुरुष को सम्पूर्ण लिम का
गाउम्पन सममना चाहिए । (७६, ७७)।
४-(५६) ४-उपदेश-एक ही पुरुष को भार प्रकृति के सहयोग से १५ स्पानों में निमक
सममाना चाहिए । (८, ७, १०, १00।
२-(५७) ५-उपदेश-प्राति से सम्म्म रखने वाले मितने मी पदार्प र, मे सब प्रातिरा
पुरुप का यक्ष्य बना रहे है । (१२)।
६-(५८) ६-उपदेश-देवीमाया, एव मामुरीमाया की प्रसिन्दिता में दैनीमाया परास्त हो रही
है। मासुरीमाग्य को ही बारम साषात्कार में मह प्रसिपक समयना
चाहिए । (१३३, जार ७१९)।
परिरापि
- मायमूमिका -
पिपषिमाग
७ (१५)-उपश्य-अननि मल को सचिम समाना चाहिए । (६) ७)
ब, अ)।
८-६०) -उपग-आप्पामिक देवता की माराधना करने वालों को दबपद मिचता है,
प्प मामा की उपासना करने वाले को आत्मपद मिसता है।
(०२०, ७२,७/१२)।
२-६१)र-उपग-पोगमापा की पासे ग्रस्त भामरमरप को देखने में असमप म्पति ही
देवता की उपासना करत हैं। (२३, २४) ।
' (६.).. उपत्य-गग-देष के हट गाने पर मनुष्प आमसाबादकार करता मा प्रक
छा न गाता है । (२६, ७,७२८)
दशोपदशयुक्ता १ उपनिषद समाप्त
०-
२-ब्रह्म-कर्म, अहो रात्र, सर्ग-प्रलय, एवं भक्तियोग ही प्रकृति का
प्रकृतित्व है। (६-उपदेश)।
1-(६३) -उपवेग-मामा के १२ भापतनों में से किसी एक का भाप सेने से
भारमसा पाटकर हो जाता है। (३०)।
(सातवा अध्याय समाप्स)
१२-(६१) २- उपदेश-प्राति के माम-चम्म मादिति भाभिमौधिक, माधिमाजिक-माप्पा
Pमक दृष्टि-प्रसप मुत-मुक्ति, गति-मागी इन १२ को
जान सेन से प्राति पर मषिकार होचता। (111)
१-६)-उपदेश-स-स पानुसार कर्ममा अचम-मम्पम-प्रथम सोकों में बापा
करतrt (१५/६८७) ।
18-01-TRI-सम्मात्मस्प पिराम्पप साचादकार से प्राधिदैविक पराम्पप की
प्राप्ति होती है।(RIC/101)।
बहिन
Sो मायभूमि
विषपषिमाग
१५-६७)५-उपदेश-"मोम्" इस एकादर की उपासना सेवामा माधिदैविक पदर
भाव को प्राप्त होता है। (१,१२,१३)।
१६-(६) ६-उपदेश-मिशुद्ध सम्पपारमा का उपासक जग्म-मृत्यु से सदा के लिए विमुक्त
होता मा परामछि का मागी बन जाता है। Melti)
१७-८२) ७-उपदेश-भर की उपासमा करने वाला लौकिक पुरुष मन्म-मृत्यु-प्रवाह में प्रमा-
हित रहता है। (१६,१७,१८१९)।
१८-(७०) --उपदेश-प्याक परप्रपत्र की उपेक्षा कर मम्यक्त महर, किंवा महा-म्पकातीत
अम्पय की भाराधना करने माछा समवलयमाष को प्राप्त हो जाता।
८।२०,१२,१२२० ।
१९-(१)र-उपदरा-विपासापेष प्रतिकर्म करने वाले देवयान मार्ग से सर्गलोक में जाते
है, एक विषानिरपेक्ष सत्कर्म करने वाले फ्तियास द्वारा पिक्सोक
में पाते हैं। (२३,२४,२८२६,२७)।
(पाठवां अध्याय समाप्त)
नवोपदेशयुक्ता २ उपनिपत् समाध
२-उपनिषयुक्ता, 18-उपदेशगर्मिता, ५८ श्लोकात्मिका
सिद्धविद्या समाप्त
पापिर
मा माप्पमूमिका -
पिपविभाग
५-राजविद्या
(५)-३ ऐश्वर्यबृदियोगप्रतिपाधिका राजविद्या तृतीया (३-उपनिपत)
(२।' से १२ मप्याय पर्पत)
(१२) १-उपनिपत्-घर के सहपान से ऐसयसिदि मिलती है। [१ से ३०
(1)२-उपनिपल-पसर सम्बधी योग एवं विमृतिविज्ञान ही रमाबप्राप्ति में मुख्य
कारण है १०१ से ११ जपाय पप्पत्त] ।
(१)-उपनिप-दागर की उपासमा हो रिसरमाषप्राप्ति का पम्यतम ER |
[१२-सम्पाप] ।
-11
१-ईश्वर के स्वरूपज्ञान से ऐश्वर्यसिदि मिलती है । (११-उपदेश)
1-01] १-उपदेग-बान-शान सहिता रावरिया का सम्पर परिबान होवर के स्वरूप का
साबादपार है। [१, रारा ६] ।
२-[१] उपरा-भत्र्यामचि बर ही अपने प्रातिमार को भागे कर सम्पूर्ण हिम
पर निर्माण करता है । रात, राप, राधा, राजरा
सरा, 1.1]
1-[४] ३-उपदग-भामरीमाया के समावरा से मर्म सोग ईयर होईपरता जानने में अम
मप है। [११, १२] ।
--[21] --उपदेग-बीमारे मनुमा मे सारिसर मनुप्प परता पर पहुंचते हुए समार
कर से दम्परिम्प से हार की उशसमा किया करते,
२१५]।
परिपाटि ममाप्यममिका 18 विषपविमान [७] - उपदेश-उस ईयर की यह, पुरुप, वेद, प्रकृति आदि किसी भी मप से मार- पना की ना सकती है । कारण पे सर उसी के रूप है। [स१६, १७] । ६-५-देश-एक है ईजराभ्यय की उसके गति, मी, प्रमु, साही नियास, गरम, साद, प्रमम प्रसय, स्थान, निधान, चीन इन १२ क्विनों में से किसी एक को प्राधार मानकर उपासना की पासकती है।१८] । -[७८७-उपदेश -ससार में नितने मी इन्द्रमान है, उन सभ को ईयर की विधि सम- मते हुए से भी प्रात्मकायाण किया जासकता है। [१] । ८-७९) --उपरा-सांसारिकफलों की कामना से पाकर्म करने वाले कर्मठ ईबर को ठोरप मान कर पाकम्म करते गए मुक्त हो सकते हैं । (१।२०।- रा२] । 8--(c.)-उपदग-पतुर्विध सप-राज-मन्त्र-ठयोगमिघ] मनियोग के अनुपापी ईमग- म्पमप्राप्ति मतमप ही रहते हैं । ।२२। रा२३, २४, २०२५ ..-(C).. उपदेश-अपने सम्पूर्ण कर्मों को ईश्वसर्पगपुरि से करवा इमा कर्मठक स्ट पाता है । [१।२६।, २२७, ९२८] । १९८२) ११ उपदेश-निर्गण मन के उपासक ज्ञानयोगियों की प्रारममति सधष्ठ है। [रा२। २१३०1, ६।३१, रा ] (नवम अध्याय समाय) एकादशोपदेशयुक्ता ७ उपनिषत् समास २०३
परिसर
। मायमूमिन -
पिपरविमान
मम्म,
२-ईश्वर सम्बन्धी योग एवं विमृति विज्ञान ही ईश्वरभाषप्राधि में मुख्य
कारण हे । (१५-उपदेश)
१२-(८१)१-उपदेश-दमनमति के परिवान से मारमा सब पापों से निमुह होवामा भूमा-
माव को प्राप्त होनाता UP011, १२, १00 ।
१५-८१)२-उपदेश-बुद्धि, बान, समोह, सम्प, सन, दम, राम, मुस, हुस, मष, मात्र,
भरिसा, समता, तपि, तप, दान, या, या, अपश इस सम्पूर्ण
अप्पारिक सदस्यमापों की प्रति प्राधिदैविक ईबर ही है।
[१.11, ..]
१०-(१)-फोग-अपि, मनु, प्राण प्रादि मादिमिक मानसभाष ईपरम्पप के मा-
पार पर ही प्रतिष्ठित है। (१०९।)।
१५-(८८) -उपदेश-बिर के योग, पूर्व मितिमाों के सम्पन नजान से ऐरवाला
दुनियोगनिष्ट प्राप्त हो जाती है। [rovi]
१६-(८७)-उपदरा-नवर के सायातकार के लिए ऐपम्पुत्रियोग मापक।सकी
प्राप्ति के लिए इसके साधक उपायों का मनुगमन करमा बारक
है।[१. WEL, 101१०1 १०११]।
1--1)-उपदेश-प्रापेक म्पति को अपने पारमकल्माण के लिए पराम्पप की हिम्म
विभूतियों को जानने का प्रयास करना चाहिए । [१.१२
[१०१, १९४१, १०१५), १०१६, १.१०, १011]
१८-(८) पाग-दबर का विमूविम्पप समारमा २मारि-मप्प-मत, एरिष्ण, नि
मीन, पाणी, सामवेद, पासप, रमन, १०वना १ १णार,
१श्वर, १३पापक, 'मेर, शास्पति, १५कम्प, १०सार,
१८पण, एकाप, २.अपा, २१विमाम्प, १२मबत्ता,
परिसररि
- माम्पभूमिका ।
पिपयपिमाग
२२नरद, २४चित्ररय, २५फपिल, २६ भ्रषा, ५७ऐराक्त,
पराया, २थम, ३०कामघनु, ३१कन्दप, ३२वासुकि ३३म
मन्स, ३१वरुण, २५मर्पमा, ३६यम, ३७प्रम्हाद, ८काठ,
समगेन्द्र ४गर, पान, १२यम, १३मकर, १४,
१५मापन्त, १६सम्परममिचा, १जद, चिकार,४इन्द्र, ५००
क्य, ५'पावा, ५२मृत्यु, ५५उद्भव ५८कार्ति श्रीवाक्तमृति-मेघा
भूति-पमा, ५५थान्साम,५६गायत्री, ५७मागशीप, ५८सन्त,५२पूत,
६ तेम, ११जप, ३२व्यवसाय, ६४सव, मासुदेव ६५भन,
६६न्यास, ६७उराना, ६पदफ्ट, नीति ७०मीन, ७१
७शन,
७२मीन ससर में इन ७२ माबों में प्रधानरूप से विमक्क है । मो
पुरुप इनका रहस्प मान लेता है, वह ईभरसमकप मनमाता है।
[Poरा, से २०१४२ तक] ।
(दशम अध्याय समाप्त)
१९--(१०) ८-उपदेम-प्रस्पेक म्यक्ति को इमर की उल विमूतियों के सम्मक परिहान के
शिए उसके विराट् सहप को पहिचानने का प्रयास करना चाहिए ।
[.११, १११२, १३, १९१४] ।
२०-६१)-उपदेश-विराट्मरूप के परिज्ञान के सिए योगप्रक्रिया द्वारा दिम्यरि प्राप्त
करना भारपफ है। [११, ११६, १७/१८]
२१-१२).-उपदेश-योगविधा के प्रभाव से उसी प्रकार मनुष्य सप मो अपने नाप को
मिगसरूप में परिणत कर सफता है, जैसे कि योगेश्वर प्ण ने
मपना विराट् स्वरूप बमा लिपा था । (११९ से ११ पत)।
२२-(२१) ११-उपदय-विराट्स्वरूप से चमदात अर्जुन की तर प्रत्येक म्पफि को
उस रूप की स्तुति करमी परती है (२११५ से ११३५०)
२०५
पहिरपरि
माप्पभूमिका 10
विषयषिमाग
२५-१९१२-उपदेश-विराटसरूर के दर्शन से स्वयं सिद्पुरुष की भोर से कम्य
कम्म के लिए बल प्राप्त होता है। (११३३२, १३, १४३१)
२१-(५) १३-उपदेश-बो म्पत्ति विराट्स्वरूप के दशन से पहिले ममनमश ईभरतप की
उपेका किया करता है, सिरदर्शन के ममन्तर भ म की मति उस
के पशोग्गन (स्तुति) में प्राच हो जाता है। (११३५ से ११
२५-(११)१-उपदेश -मार की इम मदावधियों से माकषित मराट् पुरुप की भोर से
उसे पूर्ण भारवासन मिता। (१११४७, १४८, १४६
२६-८७) १५-उपदेश-विरकहपटर्शन से मपत्रस्त बने हुए म के भय को दूर करने के
लिए विराट् पुरुष को अपने इस मामापावधिमाप का परिणाम
कर योगमायामय सिमा से महके सामने सपरिपत होना परदा
है। (१०५० से ११५॥
एकादश अध्याय समाः ।
पञ्चोपेदशयुक्ता ४ उपनिपत् समास ।
३-ईश्वर की उपासना ही ईश्वरमावप्राप्ति का मुख्य द्वार है । (६उपदेश)।
२७-(७)-पदेश-उपासमातरम के पायान के लिए सगुण, एप निमुप दोनों प्रकार की
उपासना बालने का प्रयास करना चाहिए । (१२।११)।
२८-६९) २-उपग-मोफममा कर्मठ मनुष्य के लिए सगुण-निर्गण दोनों सगुणे
पासना ही श्रेपकर।(१२)।
२५-१० ) ३ उपदेगापि मिर्गुणोपासना का पयामा से समाप , पता माय
ममुप्प प्राप' इसके मनधिकारी दी। (२१,१२,१५१५)।
परिपाठ
श्रा मप्पमिका
विपपायमाग
३.१०२) र उपदेश ईबरा पय के प्रति अपने सम्पूर्ण फर्मों को समर्पित कर देना सर्व
श्रेष्ठ उपास्ना । (१२६६,१२,१२)।
३१(१०२) १ उपग सम्पूर्ण उपासनायोगों में, सब की अपेक्षा कर्मवत्यागलपस कच
प्पकमानुष्ठानरूपा, बुद्धियोगलषया निष्कामोरासना ही भेष्ठ है।
(1016 से १२।१२ पपन्स)।
३२-(१०१) ९ उपटेश-उगसना की सिद्धि के लिए विशेष नियमों का मनुगमन धारक है।
(
१३ मे १२२. पर्यन्त)।
(दादश अध्याय समास)
पष्ठोपदेशयुक्ता ३ उपनिपत् समाप्त ।
३ उपानिपयुक्ता, ३२ उपदेशगर्मिता, १५१ श्लोकात्मिका
राजविद्या समाप्त
पहिया
माम्पभूमिका
विषपविभाग
६-श्रापविद्या
(६)-1-धर्मवुद्धियोगप्रवर्तिका श्राप विद्या चतुर्थी । (७-उपनिपत)।
(११ से १८१५६ पर्यन्त)।
(१५) उपनिषद-प्रति-पुरुप क्षेत्र पेत्रा, जान-बोय ही धर्मबुखियोग की प्रतिष्ठा है।
(१३-१५ पर्यम्त)।
(१६)२-उपनिपद-सत्वनव-स्तमोपरा गुराश्यी ही धर्मबुद्धियोग की प्रतिष्य है।
(से १२० पर्पत)।
(१७).-उपनिषत्-अमत्याही धर्मपुस्तियोग की प्रतिष्ठा है।( से १३।२०)।
(१८) -उपनिषद-देवता, एवं मार से सम्पम्प रसने पासा भूतसग 0 धर्मति
पोग की प्रतिछ ।।६ से २१ पर्यत)।
(१९) ५-उपनिपन-गुण, एवं कर्म का प्रथप ही धर्मबुनियोग की प्रतिष्य है।
(1७१ से १७११. पम्पन्त) ।
(२.)-उपनिपद-मापाप कम ही पदियोग की प्रतिमा है।
(१ से १९४८ पर्यन्त)।
(1)-उपनिपत् -मनावरक कम्मी पर्मबुदिमाग की प्रतिष्ठा है।
(11६ से १८५५ पप्पत)।
।
१-प्रकृति पुरुष, क्षेत्रक्षेनन, ज्ञान-ज्ञेय ही धर्मादयोग की प्रतिष्ठा
ह । (-उपदश)।
१-१०४)१-उपदेश-मर्म के मास्तविक सम्मान के लिए भर्नुम की तर प्रत्येक म्पस
बारपारि - भाप्यमूमिका विषयषिमाग को प्रकृति-पुरुष, क्षेत्र-क्षेत्र, ज्ञान इय इन ६ मानों का मौलिक बस्य पामने का प्रयास करमा चाहिए । ११)। २-१00५-उपदेश-धम्मस्वरूपवान के सम्बन्ध में क्षेत्र-पत्र का, मूतग्राम-विहानारमा का, शरीर-शारीरफमामा का विवेकवाम मारपक।। (१३३२,१२।१५)। १-१०६) ३-उपदेश-धर्मस्वरूपड़ाम के लिए अध्यात्मसंस्पा से सम्बध रख बासी - पुरियों का स्वरूप मानना भावरपक है। (१३॥ ४ से १३१७ पर्यन्त)। 1-(१०७) १-उपग-धर्म के स्वरूपवान के सिर २० मागों में विभक्त झानविषय का स्वरूप जानना पारपक है । (श से १० पर्यन्त)। ५-(१०८) ५ उपदरा-धम्मस्वरूपरिवान के चिर परमसनाम से प्रसिद सेप अम्पपपुरुष का स्वमा बानना मावश्यक है। (१३०१ से १६ पम्स)। ६-१०१) ६-उपदग-धम्मम्वरुपपरिधान के सिए प्राति-पुरुष का सम्पम् शान परम भाक- श्यक है। (१२० से १२१ पन्त) । ०-११०)-उपदेश-धर्मस्परपरिहान के लिए मृत्युपारा से मुक्त करने वाले पुरुषो पासनामेदों का ज्ञान प्राप्त करना मारयको। ११२५,२६)। ८-(1)८-उप गु-धम्मस्खलपपरिसान के लिए सतनाम से प्रसिर प्राणी की क्षेत्र क्षेत्रा के संयोगरूप उपाधि का ज्ञान प्राप्त करना मावश्यक है। ( १२७)। १-१२)-उपदेश-धम्मस्वरूपपरिज्ञान के लिए परमेश्वर, पिर, परमात्मा, विमानारमा इन चारों भात्मविषयों का परिहान माश्यक है ।(१०२८ से १४.५ परयन्त)। (त्रयोदश अध्याय समाप्त) नवोपदेशयुक्ता १ उपनिपत् समाप्त परपरि माप्पभूमिमा विपषिमाग २-सत्व रज-स्तमोलक्षणा गुणत्रपी ही धर्मबुद्धियोग की प्रतिष्य है। (५ उपदेश)। ..-1)-उपमेश-देशापुरम में विशेषता उत्पम करने बाग,गुणत्रयमर्सि मान ही सम्पूणमूर्ती की योनि ।। [27 से 1 पम्पस] । ११-११४) २-मंश-मादाम के स्करमान के लिए उसके सत्व रम-राम तीनों गुकों का मौलिक स्मस नामना मारक है।(शसे-११२ प)। १२-११०३-उपदेश-गुणप्रय के सम्यक् परिवार के लिए गुणातीत भारम्म का समय बानमा परम मापक १।(१४.१ से १४०२५ पर्यत) । १२-(1)-उपरेश-मयपरमनिष्टरूम ममम्प मक्ति से ही गुहातीत मामा मामा पासका है।(१४१२५) १५-६११७) --पोग-जीपशरीर में प्रतिष्टित हर-मवर-मम्पप-पराम्पर-निनिरोप- न पाया की प्रतिष्य शिम के का पांचों पर है। (१०७)। (चतुर्दश अध्याय समाप्त) पञ्चोपेदशयुक्ता २ उपनिपत् समाप्त । ३-अश्वत्थपत्त ही धर्मबुद्धियोग की प्रतिष्ठा है । (७-उपदेश)। १५-(110)-उमेश-कर्म के रूपकान लिए प्रमाणप का लरूप सामना मपरक । (' से १ )। १६-१२)२-उपदेश-प्रसावत्प का साक्षात्कार करने के लिए कवियप विशेष उपायों का मामय सेना मारक (१९५६)। १०-१२) ५-उपदेश-यापक बम्पापक सम्पप ही योगमाया के समय से कम बत्यसपण बीपसहिचाय बनता है। ( 111) १५-१२-परश-माने प्रमक प्रभावत्व (पर) से पृषक होने के कारण दीपा कर्मा-
पहिपाठि
-ला मपमित
पिपपषिमाग
सत्य (जीब) कम्मफसमोक्ता बनता है।(१५ से १११ पर्यन्त)।
११-१२०)-उपवेश-एक ही ममस्थप रिगुणमान के मठग से अनेक रूपों में
परिसत हो रहा है। (
१२ से १५५ पयरत)।
२०-१२१) ६-उपदेश-ही परवान्यय सम्पूर्ण सिम का एक (अमिन ) पमा है।
(१५२१)।
२१-(१२) ७-उपदेश-एक ही ममत्वाम्यय घराघर के सम्म से भेदम्पबहार की मूल
प्रतिष्टा बम गया है । ('१६ मे १९२०)।
(पबदश अध्याय समान)
सम्मोपदेशयुक्ता ३ उपनिपत् समाप्त
र-देवता एवं असुर से सम्बन्ध रखने वाला मृतपर्ग ही धर्मयुद्धि-
योग की प्रतिष्ठा है । (१-उपदेश)।
२२-(१२५) १-उपदेश-ज मसिर, देशमुरमावासक गुण-दोष पापमप्रानि के
मुम्प अनुकम है।(६१ से १६५ पर्यन्त)।
२१-२६)-उपदेश-असुरप्रधाम मनसर्ग में विषा-(पान)-निरपेक्ष भसद्गुण कम्मों की
ही प्रधानता रहती है। (१६ से १६.१२ पर्यन्त)।
५१-१२७) ३-उपदेराबारीसम्पत्ति के माघार पर प्रतिष्ठित काम-कोप-छोम ही पतन के
मुरूप करण है। (१३०,१६।२१) ।
२५-(१२८)-उपदेश-अपने मात्मकल्याण के लिए देपासम्पर की भायधना मावश्यक ।
पचास के लिए शाब में पूर्ण निष्टय भपेपित है। (१९६२।०६२३)।
(पोडश अध्याय समाप्त)
पतुरुपदेशयुका ४ उपनिपत् समाप्त
.-
२११
परिवरि
। माप्पभूमिका 16
विपमिमा
५-गुगा-कर्म का प्रवय ही धर्मबुद्धियोग की प्रतिष्य है । (२०-उपदेश)
२६-१२१) १-उपदेश-गुसत्रको मद से मनुष्यों में तीन प्रकार के महामार सत्यम में
बाते है । १५१ से १०१६ पर्यन्त] ।
१७-१३.)२-उदेरा-गुणत्रपट से मनुप्पों का भागार तीन भागों में निमक है।
[१४७ से १०० पर्यन्त] 1
२८-[१११) ३-उपदेश-गुणत्रय के भेद से मनुष्यों का पाकर्म तीन भामों में मत।
१७११ से १७१ पफ्त ।
२२-१२२) ४-उपदेश-गीर अमनोमेद से मापामिक तप, कापक-परिक-मान
सिक में से तीन भागों में निमक है। [१७१९ से १७११६५]
२०-(१५३)५-नफरा-गुणत्रप के भेद से भाप्पात्मिा तपटीन मामों में विभक It
से (१११२ पयत।
११-(१३१) ६-पेय-गुणत्रप के मेद से दानकर्म सीन मागों में विभत ।(१७२० से
१७२० पर्पत)।
१२-(११५) ७-उपदेश-गुसप से मुक्त कर्म का प्रतिन ब्रह्म है, संबह सातलो--
तत्-सत् मर से तन भागों में विभक है ('१२३से१७२०८]
(समदश अध्याय समास)
१५-१६) -सपोरेग-गुएर्म के परिधान के लिए सम्मसन्यास एवं कमायाग कर
मेदवान वापरपक।। [१-१ से १८५ पर्यन्त ।
१५-१७)-उपदेश-गुणत्रयमे से सागकम्म तीन मागो मेमतो। [१८७ से १ml
१५-(१५८). उपग-गुणत्रपमे से कम तीन मार्गों में निपल [२]।
14-(१९९) १ उपदेश-प्रपिछन, चा, करस पेण देव या पाच वर कर्मसिदि में
रपोबर।(१८१५से १८११७ पर्यन्त)।
૨૧૨
7
पदिएर
माप्यभूमिका
पिपपषिमाग
३०-(१०) उपरेय मान कर्म नीत्रिपुटी (धान-नेप-परिझाता, परण-पम्म-पा)ी
फर्म पा स्वम्प सपादन करती है। १८110)
३८-१४१) १३ उपदेश-गुणप्रपमेद से शान-कम्म की दोनों रिपटिए तीन तीन भागों में
विमत है। (१८९)।
३६ (१२) १५ उपदेश गुणप्रयमेद से शामतस्य सीन भागों में fier है। (१२. से
२२ पपस्त)।
16-(१४) ५ उपदेश-गुण अपमद से कम्मरस तीन भागों में पिमा है। (१८२३ से
१८२. पपरत)।
५१-१४५) १६ उपदेग गुणत्रपमेद से वसा तीन भागों में रिमा (१८२६ मे १२८)
२-(१४१)१७-उपदेश-गुणत्रयमेद से पुदित तीन भागों में पिमत । (१८२८ से
१८३२ पपत)।
२३-(१५८) १८ उपदेग गुणरप के मेद से पतितस तीन मागों में विभा।(
१५ से
१०.३५ पपस्त)।
५५-(10) उपदेग-गुराप्रपमेद मे गुण्नस तीन भागों में मित है। (१८१६ से
१९ पपन्त)।
r-(10)२० उपग-सम्रा पिरप में गुसप काही सापाप है । (१८110)।
विशत्युपदेशयुक्ता ५ उपनिपन् ममाप्त
६-त्याज्यकर्म ही धर्मबुद्धियोग की प्रतिष्टा । (-उपदेश)
4-01-उपदेण-गु-
सम FAT II में fire
(१८ से १८ सपना)।
पहिरष्टि
| मायमूमिका
विषयविमाग
80-(१५०)२-उपदेश-आधिकारिक कम्मों को दोर्मों के रहते ए मी नहीं होना चाहिए।
(१८१५ से १८१८ पयस्त)
दयुपदेशयुक्ता ६ उपनिपत् समाप्त
७-अनानरक कर्म ही धर्मबुद्धियोग की प्रतिष्य है। (२-उपदेश)
४८-१५)"-उपदेश-कामना परिष्मानपूषक कर्म करने से नफर्य सिद्धि प्राप्त हो पाठी
है। [१८१६ से १८५३ पयात] ।
१६-१७२)२-उपदेश नैपर्म काम के प्रमाव से मात्मा कर्मण्यम से विमुक पोसा
गमा परराम [सम्पयाम) पद में छीम हो जाता है। 10 से
१८५६ फ्पत] ।
दयुपदेशयुक्ता ७ उपनिषत् समाप्त
इति उपनिषयुक्ता,४९-उपदेशगर्मिता, १८८श्लोकात्मिका
आषिविद्या समाप्त
रियष्टि allमाणभूमिका I विपरिमाग ७-उपमहार प्रकरणा (७) १-चातर्विद्यापसंहारप्रकरण-(३ उपनिपत्) (१८५७ से १८७३ पर्यन्त) (२२)-१-उपनिपत-सम्पूर्णकर्म अव्ययारमा में समर्पित कर देने पाहिए। [१५५७ से १८५ पर्यन्व] । (२३)-२-उपनिपत्-बारमामय ही परमोहार है। [१८५६१ से १६६पप्यन्त] । (२४)-३-उपनिपत-गीताज्ञान सोकर शाम है। [१८६७ से १८७३५पन्छ । १--सम्पूर्णकर्म अव्ययात्मा में समर्पित कर देने चाहिए। (४-उपदेश) १- (१५३)-उपदेश-छोकोतर गुणों से युक्त असामान्य अधिकारी को रानपिपासिद्ध वैराग्यसपण युद्धियोग का ही अनुष्ठान करना चाहिए । [१८५७ से १८.५८ पत], २-१५७)२-उपदेश-प्रथमाधिकारी को सिद्धविधासिर हानलक्षण युझियोग का अनुमान करना चाहिए । [१८५५] । 1-(५५) ३-उपदेश-मप्यमाधिकारी को राजविघासिब ऐपर्यटक्षण मुद्धियोग का अनुष्टयाम करना चाहिए । [१८६०] 1 ४-(१५६) १-उपदेश-तृतीय अणि के अधिकारी को भापविषासिद धम्मसपण युखियोग का अनुष्टान परना चाहिए । [१-६॥ १८६०, ११६]| चतुरुपदेशयुक्ता १ उपनिपत् समाय । २-श्रात्मायय ही परमोद्धार है । (२-उपदश) (110)१-उपरेश-अपने सम्पूण कर्मों योदयस्य मारमदाना में समर्पित करते हुए सापपुद्धि का परिमाग कर देना पुरुष का परम पुरुपाप है।
परिहार
En माम्पमिला-
विपार्षमाग
[१८१६, १८९२, १८६६] ।
२-(१९८)२-उपदेश-साधारण मनुष्य इस शाम के मभिकारी नहीं है । मत अधिकारी
की परीक्षा करके ही उसे या रहस्प बताना पाहिए।[१-१९७],
दपुपदेशयुक्ता २ उपनिषत् समाप्त ।
10
३-गीताज्ञान सर्वोत्कृष्ट ज्ञान है । (२-उपदेश)।
'-(५६) १-उपदेश-मगाद्गोवा में प्रतिपारित पणे का चिन्ता रमण करने से कारण
न्तर में अपने भाप इस शाम के मनुष्टान में प्राधिहो पाती है।
[१५८ से १८७१ पर्यन्त |
२-(१६०)२-उपदेग-स विज्ञानगीता पटिहास प्रकरस में समावेगा। [resh
10]
युपदेशयुक्ता ३ उपनिपत् समाप्त ।
८-सन्दर्मसङ्गति
()२ एतिहासिकसन्दर्भसङ्गति(०(१८५७४,'६७५,
(अष्टादश अध्याय समान)
इति-विज्ञामगीताया।
8
व
RAME
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१०- संख्यारहस्य
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१०-सख्यारहस्य “नाकारण दिशासेऽस्ति धर्म मुक्ष्मोऽपि मामले" इस भगवदुति के अनु सर बिना कारण के मंसार में काई व्यवस्था पस्थित नहीं है। प्रत्येक कर्म भरप ही भपनी कोद उपनिषत् (मौलिक कारण) रखता है। दशनमामादा में मले ही इस कारणटावार की मीमा मान की जाय, परन्तु विहानमम्मादा में पद पद पर हमें कारणता का धावप लेना पडेगा। विज्ञान शान के सी सामाविक नियम के अनुसार गोताणसमम्न्वी लोकसंख्यामों के सम्बध में भी हमें करणता का अन्वेषण करना पगा। विधानप्रधान गीतायात के ७०० सोक भारस ही पिन्सी गुप्त रास्प से समाध रखते हैं। सम्मानिशान भारत वर्ष को पात पुरस्मी देन है । वेद के मामणमाग में वो पद-पद पर मस्या जरा सम्पति का प्राय बताया गया है। उदाहरण के लिए कुछ एक संस्थानों का सरप जान लेना पप्याप्त होगा ८० मंण के लिए वेद में 'भयोनि 'शर निपत है। उपर इसो ग्द को अम का सूचक मा माना गया है। मोबनार्थक भगृ धातु से ही पति शम् निप्पम हमारे । मोग्य पदार्म कोही मन कहा जाता है । इमी भाभप्राय से येह ने मम को भीति शम् से समोधित किया। हायस्य मनोऽग्छिन्न ग्न्द्र (प्रशप्रासामा सन्द्रिय मन) को मारमा (प्रजानामा) महा गाता, मसावि-"माणोऽम्मि मसात्मा । तमामायुरममि पुपारप' (कोपीतकि उप०३) स्यादि से स्प।म प्राणामक मनोमप भारमा से ही मामाणमादियों का विकास होता है। वाग्मेन्द्र मे हुए रहने के कारण ही बनु-प्रोत्र-मादि में "इन्द्रिप' पहा माता है। से, मिस मग से गो प्राण निकलते हैं, उमें भाषा में "म" कहा जाता , पण ११ मा स्पान 'मय" नाम से प्रसिद। पशु-मोगादिन्दिए मी रूप-समाविमा पराकी प्राठिका होने से खतन्त्र उमप है। इस सब इन्द्रिय उपयों का मतममा यही प्रशनारम् । .
गाईपरष्टि II माप्पभूमिका समारास्प एक हम इसे-"पापप" कह सकते हैं। इसी मामिपाप से "मात्मा मानुषम् ' (सत.१० १|| स्पावि रूप से इस प्रारमा को महदुस्प कहा गया है। महदुरपम्प, इन्द्रारमक, मनोमप इस मारमा पुधि अशौप्ति (ममा मात्र पर ही निर्मम है। मशीसि से ही महदुस्प तप मामा (मन) सासरूप में प्रतिष्ठित पता है !"प्रममय हि मोम्प मन " (at-rप.)इम सितम्त के अनुसार मन मनमय है। फलत इस की भीकन सत्ता किंवा सहरमा जमाइत पर ही सिम हो जाती है। “मशीतिभि मानुषपपाप्यायते" इस प्रोत सिदान्त के प्रमुमार महदुस्परूप मारमेन्द्र को तृप्ति मनीति से ही होती है। दूसरे गर्ने मैं यो समझिए कि मनोमप (प्रशामय) इम्ब की तृप्ति का साधन अनीति (अम) ही है। इस सम्पम्प में पाठक विज्ञासा करगे विवेद ने इन्द्राति र लिए "मन" से सास सन्द का प्रयोग न कर 'मशीति" वैसे कठिन शब्द का प्रयोग क्यों किया ! इस विज्ञासा का सपर ही संन्याविधान है। मशीति शम्द यहाँ मम का पाचको पूर्व कपमानुसार पा ८० सम्या का मी सूचक है। अपि परोतप्रिय होत है, 'पैसा कि पूर्व के नामराम्य में सगया बा- पुरा है। वे पह टोक नहीं समझते कि इन्द्र से पूज्य देवता के सम्बाप -"हम भाप के लिए माम प्रयान करते है। ऐसा ममपरित पाप बोला भाप । मत इन्द्र के लिए नियम से माहुति दी मानी है उस २८ अपर मना दिए जाते हैं। अपना भपात सापक सूत्र में मन्त्रों का समावेश कर दिया जाता है। करने को ८० संस्पामक मत परन्तु पास्तव में अपि पीररिस पशक्ति संम्पा द्वारा पाम पर।स प्रकार वेद ने २० संख्या को अशोति (मम) का माफ मामा। पार्म में १. पात्र रम्ने भाते हैं। इन १८ सरयामों का भी बेद ने नरोप प्रयोजन बनाया है। १० पपरदे मन्दमा ही नाम विराट् ।। मिरान ही प्रसन कर्म कर (उत्पति का) सापा। उपर पाकर्म देवारमा की पति के लिए कोरिया माता है । इसी प्रजननसम्पत्ति मा परोपमाप से पाहम्म में समावेश करने के सिर १• पात्र लिए जाते है । पदकर्म में १७ सामिनी का हवामानापप सम्मति से परिमारे लिप दी १७का प्रयासी परिकार माप्पभूमिका - सस्पारास्प - सम्पारहस्प को ठप में रख कर श्रुति करती है- १-"दन्द पापाययुवाहरति-रूपं चाग्निहोपापसी च, स्फप प पासानि घ, शम्पा घ कृष्णामिन ध, उखुखल-मुसस, दपत् उपप्ते । सदरा । दशाक्षरा पिराद । पिराद पेपनः । तद्विगजभेषयामभिसम्पादयति । प्रय पद्धन्द-दन षीर्य्यम् । यदा दौ सरमेते, भय तद् वीर्य भमसि । इन्द में मिपुन ममननम् । मिथुनमे- तव ममनन पिपते ।" (१२५)। _"पौर्णमासेपि में १० पात्र रस्से बाते हैं। इन में दो दो को मिलाकर ५ युग्म मनाए नाते है। इस १० संध्यासे विराट् सम्पत्ति प्राप्त हो माती है एव विराट् से प्रजनन सम्मति प्राप्त से माती है। दो के मेस से बस का विकास होता है। इस बीप्यमान की प्राप्ति के लिए भी दो दो पात्र रक्से जाते हैं । अपिच दो के मिथुन से प्रगमनकर्म निष्पन्न होता ही इस या कर्म से ममिग्रत है । इस लिए मी यहां दमाप का समावेश किया गया है।" यहाँपर २, एष १० के ग अपि का सदप मिथुन-बीप्य विराट् सम्पपिए है । मियुनादि सम्पत्तियों का काम सुरुमा मे सिया गणराम विषय की विशेष मिहासा रसने बालो को शवपपविमानमाप्प देखना चाहिए । २-“स एप सरस्सरममापतिः पोडशमात । तम्य राप्रय एव पपदण्कमा । धांपास्प पोशीकमा । सोऽमावास्या राप्रिमेतया पोरया कमया सरमिद मास मृदनुस रिश्य ततः मातजाप" (गृत ३।२२।)। २- "सक्सरप्रयापति १६ फसामों से युक्त है। पक्ष की १५ गरिए हो कला है। प्रतिपत् (पा) माम की धारारि सोतही यसा है । वा पपनी इस मुग रात्रि मे पदरानियों में प्रवेश पर वारा समी प्राणियों में प्रपिर होता हुमा प्रान किस प्रकर होता है।" २-"तस्प ममग सापि यः । सपदगो सवत्सरः । द्वादग मासाः, पपतर समत्सर , ममापति । प्रजापनिरग्नि । यारानग्निपारस्यस्य मात्रा वारमन बदिरसर - माप्पमूमेन I संरपारास्प - मेलव समिन्दे । यदेव सप्त- । सप्तदशो में पुरुष -दरा माणा पसार्यहानि भत्मा पथदराः, ग्राना पोटग्या, शिरः सदग पुरुप प्रजापतिः । ममापतिर मिः। यानानमित्पिस्प मामा तानमेवन समिन्दे" । गत दशपर)। ३- अफ्नया के कम्मविशेष में १७ सामिभेनी मन्त्र होते हैं। इस संध्या का रहस्य पही मि समत्सर प्रमापनि में रखनी सम्पाए है । १२-महिने, ५ ऋतु, ही सरासर प्रमापति ।। प्रगपनि पग्नि । मितना भनि , नितमी इस का मात्रा (सपा) सही से इस जाम को समिद (पीस) किप । भपिच समदश समया का दूसरा स्पष है कि पुरुष (मनुप्प) १० प्राण, -मग, मामा, १-पीवा, शिरो मेदसे सप्तदशा। पुरुप प्रमापति है । प्रजापति प्राप्ति है। इस सप्तदएकल पुरुषामि के सपा के लिए भी १७ सम्पायुक्त सामिषेनी मन्त्रों का पाकरम में प्रयोग किया गप्प है। १७ सम्पा सूचित कर रही है कि हमारा लक्ष्य सप्त रास प्रागापाप मामि। उल निदरानों से मित्र पाठकों को पा लिरित होगप्प होम मि इनित (एयारे ) से ही भनेर रहस्यों का परिधान कराने वाले महासम्म खधी अपियों का संत्या कम ममपी पिसी मौठिक रहस्प मे सम्बन्ध रखता है। वैविक पन्दोविधान की तो मम्प्रतिष्ठ यही मेस्पाशिान । भूति पद का सम्या विमान से घनिष्ठ समापी, एव इधर हमारा गोवाशाख मी के समकप बनवा मा एक विज्ञानशास।ऐसी दण में इसकी ७ सपा का मी भरप ही रिसी मीधिक एस्प से सम्बन्ध माममा बगा। रूप भगछन् म्पस ने अपने महामारत म्प में इस संसानियान को प्रभान माना है, नसा निम्न लिखित पचम से सर- नारापर्ण नमकस्प मर र नरोचमम् । देवी सरस्मनी पर वो "जय" मुदीरपत् ।। महामारत जयप है। पापात्रों के मेम्प सम्पम्प से इसे ममाप करना पापि ठीक हैवापि अपरामद की सीमा यही पर समाप्त नहीं मानी चासकती । "क-ट-प-प-मीशान के मनु- ૨૨૦ बाहिरी * माम्पमूमिका । सग्यारहस्य सार सकार संस्था का एक यकार १ मख्या का सूचक माना गया है । “मान पामो गवि"इस सिदम्त के मनुसार जयोपाक्षिा १ संसा का । सर। इस प्रकार चयशम्द १८ सपा का सूपक वनता मा महाभारत के 1 पों काही पोनको । फलतः "नको भयमुदीरयेत" का-"मादरापास्मफ मारामारत पढ़ना पारिए" या निर्ष सिम हो जाता। प्राचीन प्रणामी के अनुसार विधा रेतिहासिक मम्यादा के वनुमार मीणाम अपायों में विमत है। मायसाहित्य में इस १८ संख्या का मी या महल है।१८पुराय, उपपुगण, १८ पौराणिक विषय, महामारत के ८ पष, गीता के ८वप्याप अयुक्त पभरकर्म, १६ यामविवर्य इस प्रकम भणदश संध्या का वि मनेक स्पामों में उपसम्म होता है। इसकी पई एक उपपरि है। इतिहास-पुराण की सम्पम मन्यादा मामी गा है। दोनों में अन्तर यस उसमा होकि बिस मप में मनुप्पचरित्र गौण, एव सहि का इतिहास प्रभान हो या पुषण है। एवं विस में सुधिचरित्र मौस, एव मनुष्यपरत्र प्रधान हो वह तिहास है। पुराण में भी मनुष्य परित्र है परन्तु गोणरूप से । इतिहास में मी सपिचरिम, परम्त मौखरूप से । मनुप्पपरित्र के सम्बन्ध से पुराण को इतिहास कहा जासकता है, एवं सम्धिरिम के सम्बन्ध से इतिहास को पुराण करा पा सकता है। दोनों एक प्रकार से समानभारा में प्रवाहित होते हए समान विषयक है दोनों ही वेदार्थ के उपडाक है, भैसा कि-"इविसपुराणाम्पा वेद समुपश्येत् । इत्यादि से स्पर है। पुगणणा प्रधान रूप से सपि प्रतिमुधि, श, पानपरित, मन्यन्तर, माम्यान, गाथा पशुद्धि सिदान्त, संहिता, गमा, नामस, नत्र, मोतिषक, (खगोल), मुंबन कोण (भूगोल, बेद, पुराण इन भटयारह मपों का निरूपम करता है। इसी विषय गम्प को एपित करने के लिए म्पास ने पुरास शाम को मागों में विभक्त किया है। पकि महाभारत प पुराण समक, साप ही में मनुष्यचरित्र साप साप इस में पुराणोळ १० विषयों का भी लियद निरूपणमा है, इसी रहस्य को सरप में रख कर व्यास ने महामारत के भी 15 । उपास्पाम, - ૨૨ परिक्सी ा मममूमिका समपारस SARA रस्से है। मीताशा मी इसी ऐतियाप्पीदा से मात्रस्त है, इसलिए गीता के मी १% ही मप्पाय एक्ले गए। मपिन १८ सपा विजयमाष से सम्बन्ध रहती है। पाठकों को यह विदित है कि यदि मंगवान् को मोर से मन को मोपदेश न होता तो पायायों का जय मसभा का । पराम विषय का मुम श्रेप एकमात्र गीनाशाख को ही है। इसमयमापको सूपित करने के लिए भी ऐति हासिक राशि से गीता में '८ मापायों का समावेश करमा पाय प्राप्त था । तत्पस्य करने का यही किसानों में वो सम्पाकम रक्सा गया है, उस में प्रश्पही कोई कोई गुप्त रहस्प प्रति- हिनाकसमा एसिको के लिए या सस्यानिशान बहा केक्स कल्पना, किंम कसफ्ना (पीरित- होना) है, यहाँ एक यानिक की एि में सम्माधिान परम भापक, मापन समपा उपादेव तक। , १-श्लोकसल्याहस्य करता मानिक रवि से - अप्यायों का विशेप महत्त मही। फसत स कम की उपेचा कर सममिल्स से गीतासोको का सस्या हत्याहीप बोरि में प्रनिए राता । ताशास्त्र परमा का सहप बतलाय हुमा विरमस्वरूप की ओर मोहमरा प्यान माति "ममा (पैराग्य)-मम बान)-मगः (परवय्य)-मगा (पर्म)" या चारों मामबिमू निए । क्शा (मासकि) लय (मो) क्लेशः (मग्मिता)-सा (प्रमिनिरेश) या चारों बिके भूखापार है। संसार एक प्रकार का पुक्षेत्र १, कमाभूमि है नानास (निम्नता) की प्रतिय। परस्पर में राग-रेप रसना पुत्र-का-सपचि मादि की वप्मा के पीले अनुमान करते रहना, महोरात्र मृगमरीचिका के पीछे परते र माशान्त पने पायुप्रधान सम्प विष का प्रातिसिक सम्प । क इसके विपरीत भारमा एक प्रकR पर याम्सि, इस में कहा की मास्वमिवर मिति है एकरा का सामान्य है। "माम ऐसा इमा, कर ऐसा रोग भाग या करना ६, कम या परमा " इसी रहमा, यही २२२ पारिवाडि । माघमूमिन संम्पारास्प - लेता राजा इति का नाम-"इति-न-मास"है। यही प्रति मिझा है, यही इविसतिघस मर्यादा का सेगमक विम के साप ही सम्बन्ध है उम्पावत्र सांसारिक मानों की उपेक्षा करते हुए सदा एक रस रामा, यही विमानमार है, यही मारमविभूति है । इतिघससपण रिम, पत्र शिानठपण मारमा दोनों में प्रतिस्पर्श होती रहती है। चतुर्षिय मगशाली भामदेवता, एप चतुर्विध सेण्णासी विचार का माम ही मनादिकास से चण माने षामा देवासरसग्राम है। गानाशास्त्र इतिधसभात्रमप विप का भी निरूपण करता है, एष विज्ञानभावमय भारमा का मी रहस्योद्घाटन करता है। इन दोनों विस्त मात्रों का विवेक (छोट) करने के लिए ही हम गीताशास्त्र के ७०० रसोरा को क्रमश ६४-६३६ इन माग्य में विभक्त करने के लिए बाप्प। ६१ रसोरों से गीताशास्त्र एतिथ मप्यादा का आश्रय लेठा आ विम-प्रशान्ति कर साल सिर शोक मा निमपण करता है एवं रोप ६१६ श्लोकों से विधानमम्यादा का माध्य सहनसिम् भग का रहस्योद्घ टन करता ष्ण शोकनिति का उगय बतलाता है। यपि पाने को विश्व का साप बसी विशाल है | परन्तु महतोमहीयान् उस पारमदेवता के सामने सि की महत्ता सपया नगगर है । चतुष्पद मामा का केवध एक मरा ही विव बनता है-“एमांगेम जगत सर्व' । विश्व प्रसपान है. विधापेक्ष्या मारमा मासो महीपान् है। इसी रहस्य को सूषित करने के लिए षिमस्वरूप प्राशन के लिए नहीं ६. सोय रकारे है, हा जास्मसका प्रदान के सिर १३६ रोक उपस्थित हुए है। परिवार के ७०० श्लोकों को १५-६१६ इन दो दिमाग में निमा क्यों माना गया इस प्रश्न का समाधान समाप्त हुमा । अब इस सम्बध में दूमा प्ररम या समित होगा कि ऐतिहासिक गीता के ६५ रोकने की १-१, समसामों का, एत्र विशनगारे ६५६ रखोकों की ६ . ६ सत्याभों का क्या रहस्य है। इस प्ररन के समाधान के लिए पूर्व के नामस्य में बताए गर गुप-पूर्णमा को मो ही टि टाछनी परेगी। यहाँ तटापा गया कि पूण सम्पा उन है, एक उन मम्मा पूण है । "म्पका कारण पी मरा दिया गया है। इन दोनों मालों का सम्पप कमरा लिख एष मामा के साथ। ૨૩ पर - मायमूमिन- मस्यास्प विश्व पूर्ण है, सरए यह उन है। पारम्न उन है, इसलिए यह पूरा है । पूरा :भ में आगे विकास का प्रमाण है, जैसा थम गण, सदा के लिए पैसा ही बन गया । फि विश्व में विवस बन ममाव , मतएव यह पूर्ण विष मर्ण है। यही पूरीठा, किन्तु उनत्य, दूसरे शों में गूपता बताने के लिए विप से सम्बन्ध रसने बासी रसोकसम्मा का ६-. यह कम सा गया है । १-१ की समटि है, यह पूर्ण सम्या है, इसमें नगे किस का भमान है। बात्र म्यवहार से यहाँ यह सम्या पूण। बहा मिशनरि से यह अपूर्ण व नती ई, ऊन किंवा शून्य है। इसी माधार पर निपतच निससक मास्ति दरान न मिय का- गन्प-शन्प" यह पस लिया है । “वरः सर्वाणि भूतानि" इस गीता सिमान्तक मनुमार मी मित्र मौखिक है। मूत पदार्प ठम्य । गुणटो द्रम्पम्स पतिक सि सात के भनुमार गुण का समूह ।। दम्प है । क्रिय तत नास्ति-प्रस्वि-नास्विमानों क सम्बम्ब से मालिमार है।नास्तिमाब ही त्यो यही सम्युवती, यसरम का प्रति- सिपाही सत्र काणा से हम विजय का अश्य ही शूम्प मामने के लिए तपार।। यही भवम्पा १ सपमा की।१. पर सस्या समाप्त है मागे पास का ममा। पाकि- पूनाई प्रमा' प्रमापन्" "म भौत सिरन्त के अनुसार प्रामन कम्म न्यूनमान में ही समन्ध रखता उपर आमा मिस की मूसमसिष्टा है। भाग्मा के इसी विकासभाष को पित करने के लिए तमसपाक खोका का ६-१-८ यह क्रम पण गमास में मम्प की ३ सम्या प्रधान है। मपम तत्व ही निधि में प्रधान माना गया है। मन -प्राणामप पाम विकत ।। या मौलिक अपूर्ण विश्व के गर्म में निगा रहता है जाएष इसे 'गोमा" हा बाता है। का सरूप माया-फमा-गुण-विकार-पावरप-अमन इन पर महों से सम्पन्न मा ८ स्पति पूष के विपपरिमाममदर्शन प्रकरण में विस्तार से सम्ममा रस विप सनिय शानिक विरेचन गोपनिपदिानमाप्याम्तर्गव "यापान प्पेनान् म्यवपाधापतीम्मा समाम्पः" इस मन्त्रमाप में देखना चाहिए। २२७ परिषद मायभूमिका सप्पाररस्य जापुका है। रम्ही ६ परिप्रभा के कारस पिस पाट्झौशिक व ता है। मप में निकल मामा 1, इसके दोनों घोर, किंवा पागे मोर पादकौशिक घिव का भाषण | भी विभ, उधर भी विश्व, मप्प में बारमा । पा६, उपर ६ माप में पातो "स"।। ६६ सम्याए इसी रहस्य को हमारे सामने रसती हैं। ६-१ का मकान र होता है । यह न्यन मापा है, मतएक पोत परिमापा के मनुसार यह पूर्ण सम्या है । सम्या में भी र सम्पा + ही पूति परिमाषा के अनुसार या पूस माया । सम्णा में २ मम्पा पर ही इसर सम्पामों का विश्राम माना गया है। पाटकों को रममाण होगा कि नामराम्य में हमने 'भगाहीताउपनिषत् ' में १ सम्मा बागवे Tाण की पूणता सिर की थी । जिस प्रकार अपने नाम से गीताणत्र मपनी पूर्णता मिद कर , उसी प्रकार बिहान प्रभाम ६९ गोरमक यह गीताशाम (मिशनगीता) पानी +++K) स रखोकसम्या मे भी अपनी सा सिद कर रहा है। उक्त मयारहस्प मागे के परिसम मे पर हो जाता। प्रकारवर से सम्मानिधान का ममममीनिराएतहामिागीता के ६० रखरों पर रहस्प-विपकी पालिक निग्यता पर मना। "पूर्ण मन्यत् स्थान शम्पम पम् स्यानम्" गौतमिरात के अनुसार orth आमा पूण शुन्य मे से दो स्थान (प) मन पर है।सीमामा म्पोति पण रमसि से पूस है, एक पही पीप्यसपण पर से गुप है । पमृतभार पूरा, पमुभाष गुप। "मनार मापोरपतं पापारमनमारिनम्" इस गानश्रुति मनुस मन्तगरतरीमार सुम्मर से रोनापकमरे में मोतपातपूर्णपदो की स्थान मपी निन्द (पान्ट) में प्रतिष्ठित । जो पा (मपनास), वही गम्प (गुणादा रम्प है, ही पूर्ण । सीमापार पर यौनिशान न गम्प पोश से पास किया है। एमति गति न पप अप के लिए-"नति मनि" बदाम यो पुष्प दापुरे, दग नगगे रहर पीरियम है। +१ मंगेर मे १.पा मगरनिगमा।.. गारामसभाम प्रण २१॥
बाईपी का मापभूमिका सम्भाव । पिण् । यह बिरामभापति ही महान नाम के पम्तिम परिग्रह से पुल होकर विषय नापदि का उपादान बमता है। (सिर गी०म० मिषपनि ०प्र०1७४०)। दूसरे शब्दों में विकारपरिग्रहमुक्त पाममापति पर प्रतिष्ठित भावर परिण मुक्त सिमगापति ही प्राम परिमाको भागे कर विरवरूप में परिणत होर है। १०+ यह दो विमाग सममिए । इन दोनो में पूर्णमान से सम्बम्प ६. एक (बिन्दु) का ट्रम्पमाव से सम्पर है। यह मृत्यभाव ही योगमाया का प्राविस्तिक पसी योगमाया से सीमित बनवा मा संसपातीत यह मामता र ससा में परियार होता मा सिम्मति बन1 मिमीबन पोगमाया के मापार पर ही मर है। योगमाया से पश्चिम मसंस्पारमक रिपही उपसिर दण्महामिपा (एस मागों में रिमाल सरिनिबा) का मन , वैसा कि मम्या (दशमहानिबारहस्य) निरूपित है। विगु का मापार मान कर उसके भागे १, २, ३, इस क्रम से २ तक सम्या रस्ते भाए । र पर पर सम्पाकम समाप्त हो गायन । यो दिनु भवतक इन सप्ल्यामों के पापी, परमागे जापमि, १० का सहा सम्म हो मापग्म । पुनः मिन्दु के भागे B.---१५ कम पर पड़ेग्म । इसी क्रम से संख्या का प्रस्तार करते जाइए । सत्र समी प्रस्तारों में प्राप को र सफ्यात्मक निगमनापति को ही प्रधानता मिलेगी । यही र सम्पा उत्तरोतर नवीनरूप धारण करती हुई मिलेगी । इस सत्या के इसी मीनरूप को हाप में रसकर पिर्योन इसे "मर' बद से सम्बोधित पिया है। जब राम नवीनता काही सूबक, जैसा कि-"मको नको मपविभापमानो" मारि मन्त्रासन से स्प। आगे जागे नवीनता साप ही में पूर्णता, भी वो इस म्यूनसम्या की पूर्णता है। तमी तो परियोनें म्यून को पूर्ण करा देखिए न की प्रमिकवाय में भी परिणाम में रही रोग रहते है।र, १८होते है+', र हवे। पहीम २७-२+५-३६-२, PL-11-11१-५+५-2 ५५-५+३-२८-+-+ १५-१-. इस प्रकार मागे मागे परषों से उक्त सम्पा के पूर्ण-म्पमानों का स्पपीरारोबाय।। । ૧૨ माप्पामेका । सेक्पारास इतिहास प्रतिपादक महामारत जय प्रन्यसा कि आरम्म में कहा जापुका है। पाणविजय ही अपरान्द का मुख्य सत्य है। इस विषय के द्वारा पाणा में, विभागीतोप देश से उपदिए धनुनने अपना मोया हुआ सम्पबमक शिर से प्राप्त किया । रायरमा पिरम सम्पति । सिसम्पत्ति में १० मार से सम्बन्ध स्मने वाली उनमव गमिता पूराम है। सी ऐतिवसा को सूचित करने के लिए इतिहासपता के खोकने का ६+०(१०) यह शम रममा पया है । श्री-गिनप-भूति तीनों ही विश्व की पूर्ण रिमूलिए है।६+४ यह दोनों • सस्पाए उस सत्याहम नुमार पुणता की सूपक हैं । इस पूसता को स्पित करने के लिए यहाँ ६+४ इन दो संख्यामों का निर्देश बां-पोगमापा के अनुसार स नावर विरार पुरुष का मम्म हुमा। प-Jणार की प्रालिका पोगमापा की पूणना की किंगाराम्पोमा की जननी है मगरपको ६+४ पा सकरन रूप पण पर विराट् पुरुष सूचित करता है। महामारतदेचामों से प विदित है कि महाम्परतन्तर्गत मीम जिस अपार से (म मा० मीष्मप. २६4. से) मिनाप्रम्प का मामला है उससे पहिले के अध्याय में प्रतराष्ट्र एष सजप का सार है। इससे पहले के २१ १ भम्पाप में दर्गस्तोम का निरपर है।पुर के लिए समर रपारूर भजन को भगवान् भारेह रेले है- श्रीभगवानुवाच-गचिमूसा माना ! समामाभिमुख स्पिा । परामपाप गरण दुर्गस्तोत्रमुदीरय ॥१॥ सजयनाव-----समुपस्योऽजुना समय वामदेवेन धीमना । पानीपरयात् पाय स्तोत्रमा सामयिका (म भीप्पप० २०म०।-र.)। उह उरणों से प्रल मे हमें यही यवधानानि पुरारम्भ से पासे पिसत् की परिात्री, पोगमापापिणी जगमाता दुग्प की मुति मगवान्ने भावर पक समास सविराट से म्पास पही मूपित करना पाहले म मागे बार मनन मिसगिट्मम्पनिको । २९० पहिगाष्टि का माम्ममिका सम्पारासस प्राप्त करना चाहता है, उस की मुरूप्रतिष्ठा योगमाहीम मापदादेश को शिरोधाप कर चगनमता की स्तुति करता है। स्तमानम्तर योगमाया परप्रदान करती है। परप्राप्सातर समय-मृतपटमा समाप्याय हमारे सामने भाता है । सबादाम्पाय के सम्परहितोचरकाम में "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षत्र" मारिरूप से चतुःपशिसोकस्मिका ऐतिहासिक गीता का प्रारम्भ हो जाता है। इन ६१ लोको की सम्या सूचित करती है कि-"महामारत समर में मीतोपदेश के ममाप से पर्युन ने विराट् सम्पचि प्राप्त की थी। मरिम्प में मी भो म्पकि इस उपदेश का अनुगमन रेगा, मग मिराट्सम्पत्ति प्राप्त करने में समर्थ होगा" ऐतिहासिक पिता के ६४ रटोकरी क्यो रक्से गए ! इस प्रश्न का पही सक्षित उत्तर है। + ऐतिहासिक ता के भनम्तर शिानगीवा का मारम्म होता है । इसमें १३६ रसोक है।बाप-विज्ञान के समन्वय प्रदर्शन के लिए ही उत सम्याक्रम र गण! जानपद का मनिसबरमार से पक्षिानपद का सबरमाग से सम्बन्मान मारममय है, विज्ञान विड मय है। लिप एच मामा की समरि ही-सबम्'। इस साल का मिरुपर करने वाला गीताशार समरप ही सर्पाच। । मात्मा एव विप के मरेक करने से हम इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि भारम्भ शिकत है एक ही मात्मा विचमचि बन कर पका है । मियका से मनः-पाव-पार मप बनता हमा किस , सदिया मैं मन -प्राण-वासमूचि इस सृष्सिापी त्रिका अमा में मन से रूप का, प्राण से कर्म का, एक बात से नाम का विकास होता है। माम-रूप-कर्म इन तीन मानों को अपम कर र विकस बारमा-"वव बना देषानुपाविराद" इस सि सात के भनुसार उक्त तीनों मामो में प्रविय होगी इसका सोपामिक स्वरूप है। भारमारे इस सारूप में मन' पाण-चार-प-कर्म-नाम पर ६ गए है । पदका २२ पीष्टि हा मम्मभूमि ॥ सम्यारहस्य यही सपम्प 'विज्ञ" नाम से प्रसिद्ध है। निकाधिक आरमा भारमा है, या त्रिभर है। सोपाधिक यही मारमा विश्व है, यह पदकास है । अपने पदस सोपाधिक रूप में यह निरु- पाधिक त्रिफस म्पाप्त हो रहा है। सोगनिक विच की कगए उस पोर, ६ मखाए इस भोर, मप्प में प्रिकस मारमा । उपर पट्कल विय, इधर पदकास मिश्थ, मप्प में विकल भारमा । ६ २-६ का यही मौसिक रहस्प है। - प्रकारान्तर से संक्ष्याफम का समग्यप कीथिए । भारमा से विश्व मष्पपपुरुप का प्राण कीजिए। यह निशुर मम्पयपुरुष अपने प्रतिरिवारूप से मानम्दविहानरुपण मानारमा मनोसवय झामात्मा, प्राण-अक् सक्षण कास्मा मेद से विकल है । यही इसका निरु- पिक रूप है । भागे माकर इसमें सोनाविक विभहप ६ भाव और उत्पम हो जाते है । मन माण-पाम् पहिला सोपाधिक रूप है, नार-पाप-प्रप्ति दूसरा सोगधिक लपी इन ६ भों में मन -प्राणमाड्मय सोपाधिररूप विचारमा है, याक्-पाप-अनिमय दूसरा सोपाधिकरूप विप है। विष उसफा शार विपक्षमा इस विषय का मारमा है । विच-विचारमा एक बरत है । मन इस परणमदि विष-भागमा को हम प्रवरप ही विच शद से सम्बोधितमा सकते हैं। मान द-बिझाम-नोमप निरुपाधिर भामा प्रसारूप से विश्व में व्याप्त है। या किस मप में है, दोनों मोर पास किस कामावरण है। मयमा प्रकारान्तर से देखिए । मन -प्राण-वामप विश्वामा के भी मन -माण-गफ् नाम-रूप बग्म यह ६ मा । एष बाफ-मापो-अग्निमय विश्व के मी अमा-मायु मेद से ६ दी सप है। बार-माप अमि को ही एक कहा जाता है । मीन ही अपतसुक है तीन दी मयाक है । आनन्द-विगन-मनोमय, दारापाशस्प प्रिफर निरुपाधिक मामा के उस मोरे सोपाधिक पिरपपट्क है । घर भी ६ है, घर भी ६ हैं, मप्प में बप विकस निम्पाभित मारमा प्रनिरित माया-फलानि ६ परिग्रहों के सम्प ध म भो ६३६की उपपति मामी गई, जिसमा कि ग्दिशन प्रकरणारम्भ में ही कराया जामुख है। १२६ पहिराए । माप्यमूमिका । सप्पारदस्प सत सम्म्या क्रम में मावेश करतादरि- "मास्मान पक्षण ग्रापत मानन्द की माधि के लिए तुम विष का परित्याग करने की पारश्यकता नहीं है। हम विष में राव हुए भी यथारर्म या पाश्रम निष्काम पुदि से पर्मानुष्ठान में प्रयत्व गते हुए, मम्पम्य मारमा को अपना प्रमान पचप पनाने हुप अपना जीवन पय पना सकत हो"। सम्पूर्ण निशान गीता का यही मौलिक रास्य है। सीएम्प को परोपनिवि से मुक्ति करने के लिए उन पानिकों म (मायान् ग्यास ने) विमपिता के ६१६ लोक बनाने , हमार सामने ६-(मिरय) - (मामा) ६-(लिर) या कम रस्मा ।बिहानता की ६३६ मोरया फ्पा रमवी ग । इस प्रश्न का यही सचित उत्तर है।
शून्यपूर्ण-पूर्णमावपरिलेखः . मृत्यु अमृतम एम्पमन्यत् राम्यमन्यत् पूर्णमम्पत पर्ममन्यत् पूर्णमम्यत गुम्बमन्यत् शून्यमायत् पूर्ण गुम्यमयत् गुम्पमन्यत् पूर्णमन्यत पूर्णमन्पत पूर्वमन्यत् सैषा-मारमस्थानयो-अविनामृतेपूर्व-गन्ये शूभ्य-पूर्मयोचिम्मसमेतत्सर्वं यदिदकिच शम्पमापत् सम्पमन्यत् पूणमम्पत् गम्यमन्यत् पूर्णमाम्यत् पूर्वमन्पद अमृतम् शापमम्यत् मृत्यु १०२ स एप शून्य-पूर्ण-पूर्ण-गुम्पसको विराटनगपतिन- मकसो पोगमायावनिमो शिवाधारो रिमनि
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संख्यारहस्यपीरलेख --
१ ૨ २ ४
क्लेश क्लेश क्लेशः स्लेशा
૨
मग
भग
मगः
मग
मासक्ति मोह | अस्मिता मभिनिषेध
वैराय
पानम् | ऐमर्य
भाम:
पिणा-
-मारमा
मुरमूमि
शान्तिमृमि
काहनिचिः
एफचम्
मामात्वम्
इतिहास
विधामम्
६+४-१०
+३+३-१
७००
म्यूनमाया
पूर्णमाप
गीवालोकसंस्पनिफर्म
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१-प्रथमोपपत्तिपरिलेख
१-१-~मन
रूपम्
[षिश्यम्
सोपाधिकमास्मरूपपद्कगेपेतम् ६.
१-ग्राया
-फर्म
वाक्
नाम
44
२-पाप
५-वाक्
-निरूपाधिकधारमा विकल।
[विश्वारमा]
.
-नाम
१-वाक्
२-कर्म
१-प्राण
२-पम्
१-मन
[विचम्]
- सोपापिकमारमरूपपट्कलोपेतम् ६
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३-तृतीयोपपचिपरिलेस
1-1-मन
सपम्
-+सोपानिकारगारमाषट्कस ६ (भारमन परता)
-१--वाक
२--पिझामम
[Mait]
-निरूपाधिकारमाप्रिकर
1-1-प्रपठापाम्
२-२-अमृताप्रापः
३-३-प्रयताऽमि
-मर्यापार
५-२--पस्पा मापा
६-१-मायोऽमि
मियम
सो गधिक पिडपट्कलम् ६ (वारमन :)
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३-तृतीयोपपत्तिपरिलेख
-मन
-रूपम्
--भाग
।
[विश्वम्]
-+सोपाधिकाचारमापदफन ६ (वात्मन परत)
-
-२ -कम्म
-1-वाक्
-w
-मानन्द
२-पिज्ञानम्
बिबारमा]
निरुपाधिकारमाप्रिकट
-१-अपवारा
२-२--प्रसूतापापा
२-३-प्रपतोऽमि.
-१-मायापार
५-२--मस्पा पापा
६-३-मायोऽपि
[विचम्
सोगाधिक पदकम् ६ (भारमम रत:)
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४-अन्तिमोपपत्तिपरिलेख
--माया
पद्परिमहा नियसपाः विचम्-परता
२-२-कमा:
1-1-गुणा।
५-१-विकारा
५-२-पाररम्मानि
६-१-मभनानि
१-मम्यय
२-प्रदर'
मनिरपाधिक मारमा त्रिकस -
६५६
--प्रास्मवर
६-१-प्रऽमनामि
५-२-पारगानि
४-१-विकार
1-1-गुणाः
२-०-मा
पद्परिपथ नियसपा विरस त ।
१-१-माया
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पगार । माप्पभूमिका - संख्यारास्प २-उपनिषत्सस् पारहस्य/- ६३६ रटोकामिका रस विज्ञानधनाके पातुनिवोपक्रम, रामपिरिया,सिदिविषा गमरिया, पापपिया, धातुर्मियोपसार नाम के प्रकरण हैं । इन ६ मों में क्रमश इतनी उपनिपरे है । सब मिसा का कुल २१ उपनिषदें हा मासी है । यदि रलोसम्म में कुछ मालिक रहस्य है, तो यह उपनिषतसम्पा भी रहस्प से बञ्चित नहीं है। भाप ! पहिम म्यनिरुप से ही उपनिषत् सम्या का विचार करें। ४ ३ २ ७ क-प्रथमप्रकरण ५ रसोकाामक चातुषियोपश्म प्रकरण में १ उपनिषत् (मोकाचोपनिषत् ) रमवी गद है । गताणत्र मरमा एवं विष दोनों का निम्पण करता है, जैसा कि पूर्व के रसोक मप्पा पकान में विस्तार से पतसाया जाता है। भनिण से यह शास्त्र प्रह्मविपाशास्त्र कासापा । परिवनिकरण मे योगया प्रकासामा है । मारमा मी (म पप) अपने चारों भनों के कारण चतुपात है, एव विश्व भी अपने चारों मुडियोगों के कारण चतुष्पात् ।। चतुष्पाद सोगविध कामा पय चतुपात पिस, दानों उस की विमस ममा केवित है। 'रम पाद वि पर समम् ' इस अमिदान्त के अनुम र बह की मस प्रम उक्त माठ वसपो में परिणत हा । चारा पिपामा-(मामपिपायों), एवं चारों योगों (विश्मयोग्य) की मुलप्रमिष्ठा मूस उपक्रम of ही प्रम। एक ही निहाधिक भरमा है। पता पी २. उपनिषा ही मूग मोपनियत् का मिलान है । पर मनी बाग्मोपनिषत् आगे की २३ उपनिषदों का उपक्रम है। इसी गहम्प को गपित करने के लिए पारिपप्रकरण के उपरम स्थानीय प्रपम प्रकरण म, सर शाम में सितारे पाम में 10 उपनिषद रापी गर। २१७ परपी माम्मभूमि संपायरस ख-दितीयप्रकरण चातुर्रियोत्रम प्रारम भान्तर १११ रसोकामा ग्यमुशियोगप्रवर्तक समर्षि निषा प्रकरस हमारे सामने माता ।स में ८ सपनिपर्ने मसी गा है। गीतागास्त्र का मुएप पप सम्पप ब्रम, एवं मुनियोग है। पचपि माता में चार प्रचार के बुद्धियोग, एक बार प्रकार की प्रात्मविधाओं का निरूपणमा है, परन्तु इन चारों में समर्पिमिषा माम की ममपिपा, ब राम्पादियोग नाम पर बुद्धियोग ही प्रमान है। रोग तीनों मामिविधामों एक तीनों बुद्धि पोगों का परम्न से सम्बप है, एक रागपिविषमक मेरम्प पुद्धियोग भगवान् का अपना मन १, साम-"ये मे मतमिद निस्पम्' -“इम रिपसे पोग माकमानापम्पपम्" इत्यादि पचमों से सर १ । बान का सम्पिनिष्टा से सम्प, या कापिकनिष्टा है। ऐवर्य का सतिनिध से सम्पब, पर राममिष्टा है । धर्म का कर्मनिष्य से सम्बन्ध है, यारयम- गमनिटा है। यही सोकमसिन मानयोम मतियोग कर्मयोग है । गीता से पीस इन मीनों का सामाग्य था । मगवान् न न नीनों से अतिरिक्त एक मन मुटियोग का मालि फार किया । वही दुनियोग पराम्पबुरियोम माम से प्रसिद्रामा । लोकमामाक भगवान् में सोकप्रक्ति सह कर्म पासण माननिष्ठा, सकाममक्तिनिष्टा, एक कामनामयी कर्ममिष्टा या मी प्रिमरप में समावेश किया, परन्तु सोरम के साप । मानमिष्य में कर्म का समावेश फिया, महिनिष्ट में निकाममात का, 4 पर्मनिष्ट में फसासतिरपाग का समावेश किया । पही सोषित तीनों योग बुद्धियोग के ममारेरा से दुनियागरूप में परिणत होगर । उक्त चारों मुछियोगा का, एक पारा भामनिपामों का एकमात्र भेप गर्विनिया, एवं पाप मुनियोग कोही सी पिपा, एव योग के मार पितान है। चारों में इमी की छाप सगी, जैसा कि पाठक बिनम प्प में तच रफ्मों में अनुमत्र करेंगे । ऐसीप में दम कर सकते है कि गीताप्रतिपादित पनि मानिया, पचनधि पोग न भाय की मूए प्रतिष्ठा पराम्पमुशिपोगप्रगरिंका गपिपिपी । यही कम । कि रानपिपा ने पो काप-मगसमान्पनी मा मनिषा पर पुरियोग का प्रभान BY से पण लिया, कामापमिका । सप्यारास्प - इसी प्रकरण में शेष तीनों विधामों, एप तनों पोने पर मो गौसरपसे १ गठी है । राजवि पा का पाम्म के मप्यायों में निरूपम इमादन ६भों अध्यायों में ही पायक पत्र तत्र साम्पमूलक धानबुझियोग, महिमूळक ऐपये पुरियोग, एवं कम्ममुलक घम्मबुडियोप पानि सरस देखेंगे, जैसा कि निम्म लिमित बनों से स्पए है- मानमुदियोगः-१-एपा सेऽभिहिता सस्पेि । (२।३ सोपनिष्ट)। ऐपय्फ्युद्धियोग:- :-२-पदावान् मन यो मार (१।१७) । (मलिनिष्टा) । धर्मयुहियोगः--कर्ममेव हि समिरिमारिया 1 (२०)। (कर्मनिष्टा) 1 इस प्रकार रम्फ्युदियोगप्रवर्तिका हमारी यह गमपिक्यिा नाम को पहिसी विपा पारों भाग्मविपामों पर चाय बुनियोग से मुक्त स्नती गायत्रसम्पचि से सम्या से) युप्त हो रही है। राबपिपिपा की स्त्री प्रयदर (टाम्प -सम्पति को सूचित करने के लिए उसरे शब्दों में रामपिनिया भी इस तीन बरमसियामों का, एक पैराग्यपरिपोग इतर सीनों बुद्धियोों का मूह है, यह सूचित करने के लिए इस मे ८ उपनिप रखी गई है। ग-तृतीयप्रकर्म सुटियोगपरिका सिसपिपा ही हतीयप्राणाध है । यह साम्यनिष्टा का ही मयो- रित रूप है। संम्पशास के मरताप पुस्प एष प्रति है। प्रापानिक मोग प्ररन से पिच की रचना मानते हैं, पुरुष को पुपरपवाशरत निसंप परते ! 'मा कि उनके- 'मरुति की, पुषस्त पुष्करपमापलिप फिस्तु पेनन" सारि मिरत मे पातखमम्यान ।। महल का मान है । तबसम्पानमिट प्रतिमासहप परिषरही पुरुषपमान का फर •"मराव गायत्री म मिसान्त के पनुमार गायत्रीयमपाठ अपएबमा वही पाठमा मिस पार भयो प ममावरा रदगा पगाषिशान भनुमार न मा म्पो गापप्रमपवि से मुक्त माना आपग्म ।"
परिपाल नाप्पभूमिका मरमारात्म बनता है। दूसरे शब्दों में तापमम्म्यान पारगमना) से प्रति-पुटप का नियम होता है। चपि पुरुष परिधन तपस्यान पर निमर ।। "सम्पात सिर शान" म पिन के अनुसार इसे साम्य करा मावा ।र्म पुरुष मान्य (सन), किंवा मान िहै । प्रारी उसका तप है। मी तन्त्र सलिममान का काम हो। "स प्रकार म सक्षम शान के पुरुप-महति दो दिन होगाते हैं। सभ्य की पहीरोटामिया (मप्रतिष्ठाए है। मी रास्प को सूपित करने के Aए साम्पनियामक सिरमिपाकरण में २ उपनिषद पी गई है। । ममा में घ-चतुर्थप्रकरण एमपुद्धियोगप्रतिपरामिया अनुभप्रकरय है। यह मनिया काही सोभित अप। मलित र मदा निकता है। पक्तिकाही दूसरा म म उपासना स उमा पास्प-उपासक-उपासनासारन या तीन दिमाग निलम्पपिता दिप के मति नही मी सस्ती। उपारय एर, उपसरनी है। पोगप्पम रसिधान, परानति अरि उपासना के सामन सापनों में तपामा ट्याम्प का मांग (मधि प्रग-जापव) यावा हुमा ईमफेसप्प से मुक्तामा मचिनिष्टा प्राप्त कर संता। उपम्पमानित है उपामनामापन मषिभूत है, एक संप उपास्प मापम । मधिमून रा अभ्याप का दिमत के साप सम्ध करा देना ही आपना, सिंगा मतिर । उपास्प की उपासमा तमी सिम ऐ सक्ती ६, बम बिपदमपने कायिक-गापिक-नसमाषा का पारया-प्यान-समापिवाय उस प्रसर स्वर के साप समय कायिक अधिक मानसिपनों मार मीम्मम्म से सम्माध रखते है। उमाश से उपास्प मी विसापरयप्पाम-समाधिठीमा उपासना के सापन सछि से सास भी किएवं उपास्प ईयर मी विही, असा नामरास्पात मग- पिरहि भीमाप्पभूमिका । संस्पायस्य पम्कन्दराम्य में विस्तार से बतलायम बाचुका है। इस प्रकार हमारा यह उपासना कापा उप स्प-उपासक-उपासनासाधन तीनों ही रशियों से निकल बन जाता है । कि राबविषा इसी महिनिष्य का लम्प हमारे सामने रसती है, पप इम की उपनिषद (ममिति) तीन रे, मतएप इसमें तीन उपनिषदे सम्सी गई है। 101 ह-पचमप्रकरण पर्मबुद्धियोगप्रवर्तिका मार्पविषा ही परमप्रकरणा है। यह कम्मनिष्टा का ही सयो- षित रूप। विस में मितने यी नर-वेतन पदार्थ है, सबके कम्म नियत हैं। इन नियत प्राकृतिक कम्मों को ही विज्ञानभाषा में “पम्म' शद में सम्पो पत किया गया है। कर्म ही उस पदार्थ कर धर्म है, कर्म ही उस पदार्य को ससम्स में धारण किए रहता है। पर मनुष्य कर्म (नेप्य) शून्य होगता है तो मनुष्प खर उत्पात से नाता है । कम्म ने ही पदापों को पा- रण कर रस्सा है, अतएव वैज्ञानिकोंने धम्प का-"पारणादर्ममित्राः' यह सपस किया है। धाएव विशनप्रध न भारतीय प्राम्प प्रमा में भी प्राइमी का फरम (कर्म) हो सस धरम (ध-म)। "परम-परम झिमा या नी" इस्लादि विदन्तिए प्रचलित है। कर्म ही धम्म , एवं पम्भ ही किम की मूहप्रसिष्टय है, जैसा कि-"चम्मों विशस्य भगवा मतिय" इस्मारि पचम से स्पर है। सम्पूर्ण निस कम्मप्रभान बनता पा धर्मप्रधान है-“कम्पपान रिएर करि रासा' (सी)। सएिशन के अनुसार भी वारमा जहाँ पोतिर्मपण बनता इमा शतप्रपाम है, art विश्व पीपभाषण रमवा मा कर्मप्रधान है। कर्म ही विस उपादान कारण है। उपा दान कारण अपने क्यम से बमिम , इस से कर्म ही विश्व है। कर्म भूमि धर्म । बसएम धर्म ही मिष है । भर्ममति, किंवा कम्ममति सि ही उस सत्यमूर्ति, किंवा ज्ञानमत्ति विगरमा का मब है, तभूति ६ महिमा , परा है। सपचर की यह पर्ममयी-गोकपिति २४१ वरिषधी समानभूमिका ॥ सस्तारास मूर-भुग-स-मर-मना-उपा-सस्पम्-मेर से सात निमामों में बिमल हैं। यह सास- सोक ही सात वितरित है। दमी सात विसस्तियों के सम्बन्ध से उस सम्य समूहातमा म को "सप्तपितस्विकाप" कसा मया है। बर्मरस विश्व के यही सात पर इन सात म्पष्टि पों के माधार पर ही समष्टिपम्म प्रतिष्टित ।। समरिमर्म की यही सातसोक सात उपनिषद (मृतप्रविष्टाए) है। पविया में इसी पम्पस काम का निरूपण है । पछि पम्म की उप- भिप,मतएक तत्प्रतिपारिका इस पापा में सात ही उपनिषा की गई। । च-पष्ठप्रकरण सन्त रे "रोकारमक धासुपिपोपसार नाम का या प्रकरण हमारे सामने माता है । मूलनासही दवरूप में परिणत शेती, या प्रकरणासम्म बाधुमारमात्मा होस बनकर "सर्वम्" बन गया है । मवावस्पा में ही मारमास एक है, वावस्था में ही पात्मप्रय वीम है। माम्मा एक होकर तीन ममता है-सरिदशा में मामा रोग होकर एक ममता है-मुसिदण में, जैसा कि-"प्राम्पात एक सन्नेक्रमपम्"-अपं सदेशमप्पास्मा" इमार हतारम्पक गुति से सामूस भात्मा सोपापिकी तीनों मिरी मा पास्मा- पर्द-पुनापर-नन नामों से प्रसिर । प्रत्येक पातु में भाप इन तीनों का सापकार कर सकते है । उदाहरण के लिए मप्पामसस्था में ही डानिए दय में बारमा प्रतिप्रित है। शरीर पद है, इसी में स्परप उम्परूप मामा माप से प्रपोप्रामप्रपति के कारणहीमको पात्रा भाग। इस स्वारीर को मेन बनाने एएसीर तक चारों पर एक प्रासमपाए भोर रहता है। इसी प्राणमापत को महिमामपास परा जाता है। दयस्प मामा पहिले शरीर में मात्र, पुन महिपरूप से इस प्राणमपास में प्रपन होता है मतपत्र से पुनपरका गान तीन मिती रम्ब कारण मामा की तीन पाए । स्थप मनपान मारमा एप में प्री- बाहिर माष्यभूमिका सम्पारस्प - ठिन राहता मा पारमा कालाता है। प्राणप्रधान मारमा पद कहलाता है, एव माझपान बही मात्या पुन पद कहता है। यही मामा के सीन समप हैं। पठरिया के अनुसार प्रामा इवष्ठ है, पर पन्त पृष्ठ है, एव पुन पद परि पृष्ठ पदविधा के अनुसार भामा प्रताप ६, पद यजुर्मपय है, पुन पद शिषमय है । प्रक्षर- विपा के अनुसार भामा प्राममय है, पद पिपएमय है पुन पर शिममय है। प्रसपपिया के अनुसार मामा भकार है, पद उफार, पुन पद मकार है। इन तीनों सोपाधिक, मत एव मूरपुमा पारमविश्तों से अतिरिस होया (तुरीप) निकाधिक विशुद्ध एक मारमा मद मात्रय, किंवा ममात्रा है। महा में समा मविभूति से हमें पतवाना यही है कि मामण में भारमा के तीनों निस एक बन जाते हैं, यही मुक्तिरण है। ष विहमदा में बह एक ही तीनमप पारण कर लेता है, पही सष्ठेदण है । विद्यम विहान निरायन का कारण ६ मिगुर मान विरम- सम्पति का एट है । अबएर दोना ही पच भरस है। दोना पह चाहिए कि सांसारिक मम से भी हम रमित न रई, साप ही में यम्भन में मी म प । या तमी सम्मन है, जब कि हम में रहते ए मिशनमय विध में प्रवृत्त । स एकप पक्षण नयुक्त विस्य रक्षण मिशन की उपासना से न ससर का मर हमसे दूर रहता, म मामसम्पत्ति मे इन पवित रहते । भगवानने भरने विज्ञानगीनाश स्त्र द्वारा “मान तेडा सविधानमिद वल्पाम्प गेपत" करते ए इस सम्भव में हमारे लिए सचमुच एक मम मार्ग रम्मा है। पानी पानगीता के उपक्रम उपसहार से मगधन्ने यही सिर किया। उपक्रम में १ उपनिपत है ।ससे भगवान् या मादेश कर रहे हैं कि तुम बिसपम्म मे प्रारणे हो, उसके मन में ज्ञानसपण एकरम को प्रतिष्ठित करो। उपसंहार प्रकरण में ३ उपनिषत् है । इससे भगवान् यह मूषित कर रहे हैं कि उस एक शन पर ही पास मत फो । मपित विकास विज्ञानमार पर उस क का पयरसान कगे । एक को मस मान कर न की मायपना मोबान को मापार मनासर विज्ञान का मनुगमन करो । पही मय, पापा १ । उपसहार प्रकरण में ३ उपनिपरें क्यों रसपी गई। इस प्रश्न का यही मषित उच मान को मूब परपर गमावभूमिमा वापस छ -समष्टिरहस्य सभूय उत ६ प्रकरणों की २१ उपनिषद हो जाती है । २१ मुम्या मे मामा एक FO (बान-शन) दोनों परिगहनासरिस्थिान के अनुसार प्रपत्री कोही नियमनिष्टा माना गया है। करण उसका यही है कि अक्तव की उपनिषत् ममि है । मनि गात्रीइन्द मे पनि में सोमामि दोन से ही AT का निम्म्मम् -'प्रमीपोमात्मा पग" । मामयी, किस भग्निपी गपी के २१ सपा है । सी रहस्य को धित मग्न चिर पर प्रतिक म्यपत्रीपद में २१ मवर रड | इस पशिलपरा गणपती से पमिनीपमान पानी ही पा सक पुरा, ममाथि उपनिपाति पती- "गापप्री पार सब मून, परिद किए । पाम गापमोपामा ६ सय मृतम् । गापति प, बायो प" (छो• उप १११)। भर पानी मि सदा मोमगर्मित बतायोकि पाद अनि अपन गम में मममोम को प्रतिलिसि बिना पर पण भान-माप से प्रतिष्टितमनगमकता मत पनि कोम्म स्मगर्मि मान के निर तप्पा । प्रसन गायत्री मम्पदा म पनि मोम दोनों पर मरेश मिय होगा। दोनों हों येही मग मम्प पन्द्र पा निमम मा म्य परिप्रभान है, कद्रमा सोनप्रभान है । मुम्प ही पुम्बिनता है सम्मा मन बना है। पुलिदानप्रधामा , मन म मरधान माप मनोमय प्रशामाम्म गोकताबका पाना, एकान परपिता माम मे प्रसिद कान की मम्मपटियर तुशान भा मा । 'मा परियभान ६ वि मोमप्रधान सेनों को ममधि 'माम्पही नियमहरा ग्यत्री नगीनाम ही नोमों का मनपण परते दुप मामी स्यात्तता मिस सबमार, सिंध गामार मपित करन के लिर विहाना में मरिरप मे 02 उनिप गर्म गो। उस सम्मानित यही समाम नहीं हो पाता । उपनिष र उपग उपयों के पान्तर प्रकटरा भयन्तर, प्रकरणों के एसोक रखोरों के माप, माम्पों के प, पों के भवर, माननें के पण प्रपा की मम्या में मुहम पर मौलिर प रस्सा गिन माप पर-वत्र सम्पय में हम सम्पन भोर मे तो पोजाबात प्रकाश गोगे ही, परम् गों को पय मी इम माप में मग्ने बुदियोग से काम लेना चाहिए । ।
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श्री 23 सागास सेशनिति के लिए प्रवचमा । वह भारमा को चारों क्लेशों से पपक कर उसे यावत मानन्द में प्रतिष्ठित कर देता है । वात पुनने में प्रिय होती मी मापा से नहीं बच सकती । भारतीय विद्वानोंने हमारे सामने बारमा का जैसा स- रूप सा 1, ठसके भाधार पर तो आक्षेप मोर भी समठबन भाता है। नित्या मन्दमनमति आमा इस कैसे पाता है सचमुव बह एक मटेश समस्या है भारमा ससरूप से व्यापक रे, निर्मक , रसायन है। फिर इसके साप दुम्स का सम्बन्ध कैसा ' उचर बहुत ही सरल है । “ऐतवारम्पमिद सम्" या पोटी सी श्रुति की उस जटिल समस्या को दूर करने के लिए पाप्त है। प्रारम के प्रातितिक सहा का दिग्द शम राती युति-"एकमेवाद्वितीय प्रभवो नानास्ति किमन" पर सिमान्त हमारे सामने रसती है। पारमा समातीम गातीय रम्पत मेद राष्प होता पणा सर्वपा एकरस है। कह सर्वपा निर्लेप है। उसका सिधि के साप कोई सम्बन्ध नहीं है। न कह मका है. न की । उस म्यापक वामम में दप नहीं, पाम्पब से मन माी, मन के भभाव से का मा मही, कामना के ममाव से उससे विश्व की प्राति सभप मही-एक सिमान्त । भावही उपनिषद उक्त सिद्धान्त से ऐकातिक मिरोन रसने मछे "ऐतदारम्पमिद म्' 'प्रमोद साम् ' या सम्पूर्ण विरप भारमय है की यह सब कुछ ना सिरन्त हमारे सामने रसती है । साप ही में बड़ी पेदशास्त्र भामा का-'यस्य परंप प्रमसत्, साम स्याव स वस्मात्मा" या पय करता मा बामा को उप (प्रमय प्रम (प्रतिष्ठास्पान), साम (परापयस्वान) रूप बदलते हुए मात्मा को ही मानामा किंवा मानाभावरूप विश्व का संबासातसा रहा। इसीप्रकार पदि भी मी गहरा विचार किया जाता है तो भारमसका प्रतिपादक सर्य पिदों में ही बनेक भान्तिए उपलम होने की बाणा हो मावी है। सबमुष वायपि से पर करने पर ऐसे विष हमारे सामने भावे है, पाश बाम शिान का मामय सेते २४
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११- गीता मतिपादित विद्या एवं योगक्मृिति
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श्री # । वाशात क्लेशनिधि के लिए प्रातमा है। प्रारमा को बारों क्लेशों से प्रपक कर उसे शायत भानन्द में प्रतिष्ठित कर देता है । वास सुनने में प्रिय होती हई मी भाप से नहीं बच सकती। भारतीय मिसानोंने हमारे सामन आरमा का जैसा स्न- सप सा 1, उसके मावार पर तो नाक्षेप भोर मी उमस मन चावा है । निस्मा नम्दधनमति आमा दुम कैसे पाता है 'सपमुष यह एक जटेत समस्या है । पारमा समतप से म्यापक है, निर्मक । सकपन है। फिर इसके साप दास का सम्बध कैसा ' उचर गात ही सास है । “ऐतदारम्पमिद सम्" या छोटी सी श्रुति ही उस पटिस समस्या को दूर करने के लिए पर्याप्त है। बारम के प्राधिक सहा का दिग्द शन करती ॥ श्रुति-"एकमेवाद्विवीय प्रम- नानास्ति किषन" मा सिदाम्त हमारे सामने रहती है। पारमा समातीय, हिमातीप स्थगन मे एम्प होता एमा सर्पपा एकरस है। बह सपा निप है । उस का निससष्टि के साप कोई सम्बन्ध नहीं है। मबह मोका हैन फा है। उस म्यापक धारमझ में पदय नाही, यामाव से मन नाही, मन के प्रभाव से का- मना नहीं, काममा के ममाव से उससे विष की प्रावि सभत्र मही-एक सिमान्त । पापही उपनिषद उक्त सिद्धान्त से ऐकान्तिक विरोष रखने असे 'पेवदाम्पमिद सर्मम् ' 'प्रमोद साप' (पा सम्पूर्ण निरम भारमय है-म ही पा सम कुछ बना है ), , ऐसे सिरन्त हमारे सामने रसतो है । साथ ही में ही वेदशास्त्र मा मा का-'यस्प परप सत्, प्रमसत्, साप स्पात स स्पास्मा" यह सहण करता हुमा आत्मा को उप (ममा स्थान), प्रम (प्रविष्ठास्पाम), साम (परापणस्थान) रूप बसगो हुए मामा को ही नानामाव मुरार, किया मानामावरूप रिष का सपासक बताता रहा है। इसीप्रकार यदि भो भी गहरा विचार किया जाता है वो मामलरूप प्रतिपादक सप उपनिया में ही बनेर भान्तिए उपहास होने की बाद हो पाती है। सचमुव बाटि से मेवर करने पर ऐसे विरोम हमारे सामने भाते है, परन्तु जब हम विमान का मामय सेते .
परिसररि । मायमूमिका । मात्मरिया ए मताधि से विचार में प्रवृत्त होते हैं तो सारी समस्पाए इस हो जाती है, रोप साग में विलीन हो पाता है। इस विरोध पर परिवार प्रत्यारमा के समय निरूपण मानसा गीता- पास में मा हैसा पम्प शास्त्रों में उपसम्घ मही होता। पदि भामा विगुर रसमति (विशुद्ध व ममनि) ही रोता, तब तो विरोध का सर भासमला था । परन्तु गीताने भात्मा को उमपयुक्त म्यम कर सारे सराप विष भिम कर गये है। मामा के के ही दोनों पर रस-पस, पाम प्रभ, उपोवि-नीय, प्रपन-मृत्यु, दान फर्म, प्रम-माया, पुरुष-मनि, सद-मसन, इस्मादि रूप से मिम मिम स्पों में मिम मिम नामों से सम्बोधित है। भाति । परम्त सचा पक। । एसी हिपति में सत्यमेवमा रतवार को प्रतित होन का मकसर नही मिसना । साप ही में रस सर्यप निष्क्रिय, तो मस निम कुर्मदा है नानामापापम है। इस यज्ञ की अपेक्षा से प्रो- र सर्पप" कहने में कोई विरोध नहीं माना । रसरमा भारमा मर्पपा निसंप है, बसष्टमा पही भामा पिसमति है । कुदप करों के भपिछता मायावत्र की सपा से बरपम्पिपों में तारतम्प उपम हो जाता है। इन बस-सपम्पा के तारतम्भ से ही नामामारा विच उदान प्रभा । रस प्रत्येक दश में निप. बस महाम यावधिम बनकर सहर । रस पूर्ण । बस गुप। । गुस्पक्ल पूर्णरस के अनुपा से पूर्णचत् प्रतीत हो रहा है, पूर्णरस गुम्पक + बेन से तिरोहितप्राय कर रहा है। रम बस के इस विवेक फा समझ लेना तो भारमशाम १, पही नो मोहनारा का मुम्य कासर, तत्कारणप्रतिपादन ही तो गीताशय का मुख्य विषप है। भवत्वनिषा को मुख में रपते हुए गीताश न मामा के समय में तीन संस्था को प्रधानता दी है। वाइरस के लिए एक पति आपके सम्मुख (मस से पुसभित) मारे। माप इस एफसी म्पति पर तीन तरह से सी टास सकते है । देवद द स्मार सामने सहा है पर पहिली परि। इस पि म मा एक राम का पार्षप नीमपित हम समुत शरीर को देवदच समभर है। बो मे पुक देवच सरा। म सरी है। इस
परिपरी
माप्पभूमिका
मात्मदिरा
त्रि में यह और शरीर का पापेक्य हम अपनी मुदि में भारय समझ रहे है, परन्तु पयों को
सर्वपा पृषक मही कर रहे हैं । पलों से सर्दया रहिन फेरन शरीर ही देवदच है, यह
ती रो रशि।
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यही क्रम प्रामविगत क सम्बय में समंमिए । शरीर पर मात्मा का पार्याय न कर
विशिए को प्रारम्म सममाना पहिली "ए है। शरीर को साप रखते ए भारमा को मारमा सम
मना दूसरो पशि । एव शरीर को सरम छोड़ते हुए विशुद्ध मारमा को मारमा सममन्ना
तीसरी रिहै। यही तोना अPमर्मस्पाए क्रमश गुकास्मसस्पा, प्रमात्मसंस्था, ममता
स्मसम्या नामों से प्यान हा । शुभसंस्था प्रममपान । यही अमनाम है । प्रमसंस्था वीर्य
धान है, यही बीयपत्रम है। अमृतमस्या ज्योति मषान, यही ज्योतिमाही मारमा
मापाबत कोकम मे अमृत है, वही प्रम , वही शुक्र है । रसापेक्ष्या तीनों ममिन, फ्छा
पेक्षया दोनों मिम है। मेरसहिष्ण ममेद का यही तो मौतिक रहस्प है। इन तीनों की समय
दीमयप मामा है। इसी समय का निरूपण करसे एप महर्षि कर करते है-
"ममोऽभागाम्म एपोऽपत्य सनातन ।
तोय शुक तद प्रम तदेवापामुग्यो ।
सस्मिन् पाका प्रिना सेन तदु नास्यति मन ।
एनद वन" (कटोपनिपत् ६१)।
१-सपिररितगीरम-नमा रष्टि प्रपतास्मसम्पा।
२-खोपापिक गरीरप -प्रापमा रएि- प्रापास्मसस्था ।
-सबस शरीरस-प्रयमा रष्टि!-शुमात्मसंस्या।
१-गरीररिरहिन'-पात्मा (भपतम्)-ग्यावियमापुपास्म । !
--गरीगेपाधिका -मारमा (प्र.) -नीरय प्रमेयुपास्य ।
-अश्वत्थ'
-प्रगरीरा- ----प्रात्मा (शुषम)-प्रत्रं प्रसपान ।
२४.
हा +91 माप्पभूमिका एनी तीनों प्रामसस्मामा को अप में सार सपा बिरूद प्रतीत होने बारे । फेन्तु मातामा सर्वपा मरिसद निम्न लिसित बबन हमारे सामने भाते है- -"प्रसङ्गो प्रयमारमा, न सम्मत, न भ्यपते, न रिप्पति' -सका प्रय पुरुपो नापमानः शरीरममिसपघमान पाप्ममिः) प्रम समग्यते । स उसकामन म्रियमाण पाप्मनो निमावि -पामा सना शुक्रम मपतम् पेतदाम्पमिद समम् प्रकारासर से विचार कीजिए । सर्पक्सगर्मित विगुखरस म्पापक मामा ।वही माया प्रा मे मुक्त होकर नामि (दप) प्रपि (परिधि) इन दोधों से युक्त होता हुमा पशनापा गममा) से युक्त होकर समिति का कारस बनता है । मापावष्पिाद इस पुरुष समन्धियों सटप नहीं होता, तब तक तो भपने म्पोटिसपण रस की अपेक्षा से नियम निन्नमपि।बसों की भरिचति से नाद ही विमान सप में परियन हो पाता है। शाम ही मागे जाकर मनोरूप धारण कर सेता है। रस सहकीप्रपानझभप्रपामवासेइन नो के दो विमत्त हो जाते हैं। रसमपान मानन्द निरुपाधिक वामा की विकासभूमि परी शान्ति, पी पिपरम्प भारमानन्द किंग शान्यानन्द बममपान मानन्द पाषिक (पापिर) भामा की प्रतिष्ठा है या समदि है, यही विषयक विमानन्द किंग मयानन्द है। गम्ति में निस्मता , सपदि में पोम है । शान्ति निमानद , समदि शिकानन्द । इस प्रकार मानन्दामा रे दो निरोपावे।। दूसरा विमानास्मा । पदी प्रहसमस्या में प्रतिष्ठित पदमपी बुदि से सशिप होकर माम से भी प्यमाने हता। जैसा कि भागे के प्रबरस में मार से मापा ने बताए । मुदिपुप्त (रिंचा पुदिनाए ही) पर निशानामा मम-मोर माम की दो निभूतियों मुक्त हो जाता है। मा उम्पोति , रसपान है । मोह ममिमग्पोति है, पर पहियष्टि माप्पमिका - मात्मविद्या बलप्रधान है। रसप्रधान पाएष उप्रम्पोतिर्मय विज्ञान निस्य विज्ञान है, मत्मविज्ञान है। इस के उदय से भारमा में स्वरूपशक्षण मूत मुक्तहेतुमूत निस्म शान्तानन्द का उदय होता है। बढ़ प्रधान, अतएव मलिनज्योतिर्मय यही विधान पपिक विज्ञान है, नियविज्ञान है ।इस की उपासना मे मारमा में सम्पधर्मविघातरक्षण पनहेतुभूत पणिक समुदान द का उदय हता।। म प्रकार मामविज्ञान भी रस क्त के तारतम्प से दो मागगों में विभक्त हो जाता है। तीसरा मामधिपत मनोमय है । विभप्रकार विज्ञान का वाक्प्रतिक मुदिक साप मम्बन्ध रहता है, एवमेव इस माममन का अचप्रतिक मान (मद्रियमन) के साग घनिष्ठ समन्धी । इसा प्राधार पर इम इस भाग्मान को प्रज्ञान शम्द से भी व्यकाल कर सकते है। इस अPममन के, किंवा तत्य मम प्रज्ञान मन के अन्त पति रूप से दो मेद हो जाते हैं। रस प्रवाम पपी मन अस्तमन है । यह मामा के रसप्रधान निस्प न र, एवं रसप्रधान मगलास निशानिझाम का उपकारक है। यमप्रध न ही मन बहिर्मन |ससे बारम के बलप्रधान पणिनन्द, एष मोइसक्षम षिक विज्ञान का उदय होता है। निफ्प या मा कि रस पर बम को पिति शेन से एक ही रसधन आग्मा के पा नन्द रिशान-मन यह तीन विपत्त से माते है।यपि इन तीनों में पान दरसप्रधान है, विशाम रस-पस 41 साम्यावस्पा , मन वतप्रधान है । इममें मी शातार रसप्रधान !, सपानन्द यसप्रधान है। निस्पनिङ्गान रसपान । पणिक विधान यसप्रधाम है । अन्तर्मन रसप्रधान है, महिमन यसप्रध न है । तपापि मागे के मा मविवर्ष की अपेक्षा थपि मानद-विज्ञान मन में (म फी हो प्रधानता रहती है, मतः हम इन तीनों की समरि को सात्या किंमा मानात्मा ही पोगे। अन्तर्मन का सहामारमा में ही जगतमाव है। एप पहिमन आग के भाग्मनिर में मतभूत माना जाता है। महिम्मन हानाम्मा की मपदा बमप्रभान है । मी मन से काम (सटिपरम) बाट दप होता है। यही मन रूपों का प्रथम है। इस पर मठ पी विति मौर होती है। इस पिनि से मन माण नप में परिणत हो नाता है । सप प्य फम्म की आपरभूमि यही मन है। और ।
पोरगाह । मानमूमिका मात्मर्षिा यस पिति होनी है। ही प्राण इस बचिति से मारूप में परिणत हो जाता है । भय एवं नाम की प्रतिमा यही बातय है । इस प्रकार रस मा के तारतम्प से बहिर्मन मन माण-पाद रूप में परिणत हो माता है । इम वीनों में मन रसप्रधान है प्राण रसबा की साम्पावस्या है, बार यसप्रधाना है । मन में शान योति का सदय है, अतएव इम इसे म्पोति पा सकते हैं। प्राण में कियामाप का उदय है, अतएव इम इसे पीर्य कर सकते है । एवं बार में प्रभाव का उदय , तब हम इसे प्रमकह सकते हैं । इसापार पपपि मना प्राय वामय यह दूसरा बारमनि परि मानन्दविधाममनोमय शामामा की अपेक्षा से बसप- धान है इन तीनों में भी रस-चस के तारतम्य से मन रसप्रपाम होता मा । नमचि, प्राय रसबक की सम्वा से शियामति बाद इस की प्रपानवा अपमपी १, तपापि बगे के परमविवत्त की अपेक्षा से हम इस म पमित भामिवियत को उस भोर के रसानुग्रह से इस मोर के गणनुमा से साम्पर कामा-मा ही कहगे। पही परमात्मा एरिसादी आरम्य का लाता है। पहिता पान रमा मुक्तिसावी मामा है। सचिसापी बारमा के गामाग के दो नप है। प्रशुराग बाक् तो कामामा में । मन्तभत है। विकाग्युक्ता बही मार सशिरूप में अन्तभूत मानी जाती है। इस मैकारिक नाक पर बों को चिति होती है। फसल इस चिति से बही वाक्प सप में परिणत होगती।। मौर बापिति होती है ही भा भमिका में परिणत हो जाती है । विपुद एवं ज्योति का पार से सम्बध पाप (शिवपु-रातभार) व सोप का मापः से सम्पप। बापु (हदगा उमापु) एक प्रादिस का अग्नि से अश्य है। इन तीनों में पाए रसप्रधान है भापा सास की साम्पारस्पा १, मिरमान है। परन्तु उहाक मास्मा की अपेक्षा से वीनों की समरिनए पा सएि पबप्रधाना हो समझनी चाहिए । यही तीसरा बसप्रपाम कम्मास्मा है। उस निरराम से पारा को RO मा होम मि एकम्पन ममममियों की कग पाही मिपुर भामा विभागरम (कास) होता आ मानापा-सपास्मा-कारमा भेद मेसीन मरपामों में रिमाह दो पाता है।रममा तीनों एक बसप्पा तीनों मिल है। जाना ही प्रमता पा! काम ग्मा ही प्रयामा । पम्मामा ही मारमाही ममत दीपबही गुफ।। मामा उ पका सकता अप सदमयमात्मा" (ud. १) पर श्रीन मिIF, उस दरमाही पनीरण करना।
श्रात्मविपरिलेस १ निस्पानन्द (रसप्रधान) २ चणिकानन्द (यशवधान मामन्द मामानम्म (ग्मप्रधान ) गति निरपाधिकामविकाम मदि-पयिकात्मविकामा २ १ नित्यविज्ञानम् (रमधानम्) (पिशाम म्युटि " १-भग'-उनम्याति पाणिकविज्ञान । (रमवलयो माम्यापश्या) -माह -मन्दिनग्यामि' (बलप्रधानम) ३ मसर्मन (रसप्रधानम् (मन प्रनामम् x +xx (बल प्राधाम्पम) +xxx १ मार-गुवमत्वगुणपिकाम २+x ++ + x + xx xxx + २ परिमन रमपमानम् १ मन म्योतामरूप (रममपानम) काम सन्निनमन्वगुग्गविकाम त्रिगुणमटिकामारमोमप्प्रधान सरिसवमम्झिानारमा रसप्रधानो मुक्तिसापी-'अमृतम्' सादी 'प्रमा "शुक्रपा तमोमति सम्मास्मा बसप्रधान सष्टि २ प्रारंभीर्य नप फम्म १-विचपसागुग्गविकाम १ पिण्ठावार १प्रावरणम-समागुरमविकाम' (पक्षप्रधाना) पापम्न मम नाम +x- (यसपापाम्पम) Ca २ विकारिकीपार आई बारू भ्याति रेमोक) सवधर्मोपम ..- - आप माप माप, वायु (शिप)माम (उमयारेक) "ब्रह्मधे सर्पम्" -31 प्राप्त अग्मि मापुरल) चाहिन्यः (पसार)
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पहिरपरि 21 माप्पभूमिका मात्मविया उक्त नामपिण्य का प्रकारम्तर से निरीक्षण फीलिए 1 अन्यफ, मध, घर, की समरि प्रपतास्मा, है । पाण,-पाप-पार-प्रम-महादाम पांच विकारघरों की समरि वापास्या है। बाक्-माप-ममि इन तीम चरिकपरों की समरि शुमात्मा है। पूर्णप्रदर्शित अमृतास्मर्मस्पा के मानन्द भाग के साप भम्यप का, विज्ञान के साप मन का, एष मन के साप पर का सम्बन्ध है । मन -प्राण-पामयी प्रमाामसंस्था के मनोमाग से प्रास माप का, प्राण माग के साप पार कर, बार भाग के साथ अमममाद का सम्पर है। तीसरी संस्था के साम समानता, भसा मिन सिसित परिलेस से स्पष्ट हो पाता है। . १- मानन्दा-मम्पयमपानर -विज्ञानम्-प्रदरमपानप -प्रास्पधरमपानम् १-पना- मागा:-प्राप: अमृतात्मा ज्ञानात्मा (मानम)। -मागा:-पाक ब्रह्मात्मा कामात्मा(प्रिया) ३-चाम्-भम-ममाया पाक-साफ ९-माप'-भाग -प्रति-अमित गुकात्मा-कर्मात्मा (प) इसी रिपति को सम्प-र-दर-इन सीन दिमागों में भी विमल वित्या जासकता १। पीसा माग भम्पय प्रपाम है, दूसरा दिमाग मदर प्रपाम है मधीसग तिमाग पर प्रभान चम्पय ग्राममनि, रसमति है। पपर उमपमूर्ति है, रसपमूर्ति है । पर पर्य- पति सममिपवारमसरपा का माप अपनी अमृतसंस्पा का बारम्बन है, पर मसेस्पा का संपातकीर गुमर्मस्या का समय है । इस प्रकार निम्न लिम्मित भए से भी उस तीनों संस्पामों के दर्शन किए गसकते हैं।
पहिगाची
या भायमूर्मित
मात्मा
--मानन्द
-पिशानम
-प्रम्यपमपानसत्या धानास्मा मम्पपा)-ममूवम
-
-मन
२- मासा
-प्रदरमपानसम्पा (कामामा प्रदर' नाम
१-पार
२-प्राप
-चरमपानसंग्या (फामा घरा)-क्रम
-प्रपि
• प्रसग्गगत यह भी जान बना चाहिए किपम्पय माग प्रमावर का मम्बपी
महरक साथ विष्णुकासम्मम्मर साप माम्निसोमति शिव मम्मम् । मान
मप प्रभाविपति शिवामम विष्णु देवपति, पर्ग पर्षमय शिव भूतपति है। अध्यात्मस
स्था में प्रणा शिरोहा में प्रविष्ठित राव यही सावत्र । विष्णु लय में प्रतिष्ठितराव!
मी निमाशिष मुसन्धि में प्रतिष्ठितयते यही पवतन्त्र सुषुम्णालय सरत्र
में प्रतिष्टितया शिवसाय पश्चिमापन करते हैं। इसी लिए मूलस्थान : प्रमडम्पि । माम म
पगात होता है। इस स्थान पर मारे झानपति प्रथा भूयो के संचालक बनते हुए सरियल
मावसे युक्त हो जाते हैं। इसी प्रकार सपुम्या सरा म्मरम्मत्वमपति शिव समर बहस समा
फारा में विहार करते रहते हैं। इस स्थान पर माके भूनपवि शिब शान के संचालक बनते हुए
शाममूर्वि पालाने भगवे -"मानमिन्परेचरात्" । इन दोनों का सम में पचन होता है।
पवन दीपा है, पर ही विष्णु है, यही सामत मरवान् "मापे वामनमासीन स देवारपासवे।
के अनुसार ही बगत के पालक। संपाविज्ञान के अनुसार सप्लाटप्रदेश शिवस्थाम
माना गया है । म मरेरा प्रस्थान माना गया है, एम मामिरेश विप्गुस्पान माना गया है,
जैसा कि सम्पाद्विान मामक अन्य में विस्तार से लिहापित है।
२१२
परिशी माप्यभूमिका I- भास्मविभ । प्रकरण के भारम्म में बतलाया गया है कि उस्य-प्रम-सामभावमय तत्व को ही मात्मा कहा जाता है। इस समय के बनुसार भक्षर का उपप्रम-सामरूप भव्यय मी मामा कहा जासकता है। घर का उपप-मस-सामनए मवर मी मामा कहा जा सकता । विकारपरसंघ का ताप प्रम-सामम्प मास्मघर मी भारमा कहा जा सकता है। विकार मंघरूप विष का उम्म--सम-सामरूप विकारक्षर भी मारमा कहा मा सकता है।मस्मदादि सत्वों (प्राणियों) का उस्य-प्रम-सामरूप विष मी मात्मा का जा सकता है।स प्रकार पव्यय, अक्षर भारमहर विकारघर, पिप इन पांचों संस्थानो को ही हम मात्मा शम्द से सम्बोषित कर सकते हैं। इन में से- 'भामा सर्वया निर्मेप है, निष्क्रिय है, एफपेमाद्वितीय प्रम है, मम स्तारोपमेदस्प है। पर मकर मपपरष्टि से कहे जाते हैं । "प्रामा निर्मेप है, किन्तु विसादी विषकई पर अपर प्रवररष्टि से कहे जा सकते हैं । "मामा दीपिण का भारम्मफ (उपादान)" पर अपर प्राप्मक्षष्टि से कहे जाते हैं । "मामा रिम का परम-प्रम-साम (पथम-प्रविष्ठा-परायण)" यामपर रिकारवररधि से कहे जाते हैं। "मारमा हा चि" यह महर विकारसघष्टि से कहे जाते हैं । इस प्रकार पांचों पवहार उपपम हो जाते है । किसी में 'कोष का मक्सर मही। इन पांचों संस्पामों में से मध्यप-मवर-घर को समष्टि पतामा है विकारवर की समणि प्रमामा , कारिक पर समधि शुक्रामा है। हमरा भामा विम है शुक्ररूप विम का पारमा विकारपर नकार मा मम (पभप्राति) का भारमा अम्पपदराबामति पोशी है -"ऐवदाम्पमिदं सर्वप्" । १ -"मामा सबया निरोप , निकिप , एकमेबहिर्व य प्रम"-सम्पपष्टि -"मात्मा निठपः विस्तु विषसाक्षी, नियका" भिक्षरशः भमवारमा 1-"मामैव विधारम्मा (उपादानकारसम्)' मामदरश --"मामेर पियस्योरप प्रम-साम- --विकारघरदृष्टि }-म २ -अमास्मा बहिणी माप्यमूमि ॥ भारमविपा 1-"भारमष नियम्" *काकिइरपरि ३ शुकास्मा भब हमारे सामने प्रश्न उपस्थित पहाकि गीता मे उरु आरमसस्पामों में से किस भारमा का निरूपण किण है। इस प्रश्न के उत्तर में हम यही कांगे कि प्रमानरूप से सम्पपास्मा को बस बनाते हुए गीताने आत्मा की सभी सत्पाभों का किस्सा, एक सर्वामि संदिग्प मिरूपय किया है। दूसरे शब्दों में यों समभि कि गीताने बारमसम्बन्धी किसी रन को नहीं बोला है। इसी लिए तो हमने गीता को सब गायों की मपेवा भपूर्व नवपण, एम पूर्ण का। पाठकों को स्माय हा कि पूर्व के माया-कवादि परिमाओं के सम्बन्ध में हमन नामसरूप पर प्रकाश राठा पा । हम सममते है कि कितने ही विपया में हम पुनरहि कर रहे। फिर मी लिपप की बटिम्ता के कारण से नवश होकर पुनरुति का माप सेना परता है। मस्त आत्मविचार के सम्बन्ध में निर्मक सर्पपोपपम मेद से पदिसे दो भास्मविनों को अपने सामने रसिए । इन दोमो में पहिला को पस्तुमा बामग्रम्द से सम्मोरित महीं होना चाहिए, क्योंकि "भारमा" शम शरीर, किंचा परिपसापेच "मास्मा" पहनते किसका मास्मा पालिसा होती है। "निसका यह मान सीमामात्र से सम्बन्ध रखता है। उम्र विगुर रसरूप, प्रतएव समपा निर्गुण, प्रतएव निर्विरोष मिधर्मक बल मापारि परिग्रहों से संवा महिमत होना हुमा सौमामायाम्प है। इसी मसीमाके कारण यह निमर्मक तत्त शाबानषित , बत्राममनसगोचर , नेति नेति शब्द से निर्धात ।इसकी पर्चा कौन कर सकता है।इस मोवोमनामना ही इस का मानना है- 'पापामत वस्य मवम् । मर्म राम्द से ममता भमित ।।इस बम का समयमा के साप दोहर सेहोसकता है । सम्पूर्ण बछ भास्मा में रहे, पातु उमपों का उस (सरूप सारमा के साप २४ पाराष्टि An पाप्यममिका - प्रारमविपा कोई सेप न हो, यह एक स्पिति है। एक कम एक रस अन्तमि सम्बध से भारमा के साप पद हो जॉय, यह कहिपति है।रो के इन दो सम्बन्धों के कारण सर्वपापपन्न नामा समरे भन्मनिष के-समपम्मविशिए, सरपम्मयोग्य पर दो भवान्तर मेद हो जाते हैं। इन दोनों में सबसम्मतिशिए मामा मी निरिशेषगर म्यापक है।बत ससग मश्य है। परन्तु बिना पिम्पन के रहता ममी बस उस रस का भमग भामा पर किसी प्रकार पालेर मही कर सकता । उस पापक रससमुद्र में अनन्त मल तरषद उपापभाव से इतस्तत सम्पमारस होते रहते हैं । पम्नु र पूर्वमाण, पपस समुद्रगट सर्वमा शान्त रहना । इस प्रकार इम सर्पयसम्प सम्म रण में भी मामा पान प्रातिस्विकार से सर्पप निर्धम्मक ही रहता है। इसी रहस्म को मप में रख कर मगाम्यासने "सम्मापप" (१०८० ॥२७) यह कहा है । एका से निधर्म की पोर ही सदप रिपागा है। न स्परपुते मयि" के अनुमान पर इसके गम में गाते हुए परस्त्र वारय है, परन्तु इन सब बातों को अपने गम में रगन गा र रमनप अपनी पापका से केमे परमत्रहोस मा मिसान्त के अनुसार सर्पधम्मरण में भी हम सवारि शटरसम्प इस प्पापक भामा को मिसम्मक, एक निप ही मानेंगे । जिस प्रकार निशुर रसमर्ति निशिर म्यारस्ता कामरा आमनसोपर होता मा शारयान मिल पा, पमप सरपिपिररसमति, करने मर के दिए समरिणिय, परन्तु परमात निधर्म या पार, समय, आमा भी पसी मलम भगमनमगोपर दोता वानपिस्त है । इस प्रकार निर्मम्मक, सधार्मा पाप के सरपम्परिगिए, पर मरेपम्पयोपाम तीन Real में से निधम्म (निरिया), पसरपरिगिटन से ता निपार मा पोर ना चाहिए । कारण पूर्व की गापनि क्ति में पद यागा गणार यतोको पाता, पारसी। मथ पाता है। पर परो, पर मत पगे, इस रागने से मन गमो, म गरे । राम, इम प्रार में लिप-निए परमा दोशन का पास एप ग्राम पर पारा • माप्पभूमि मायाम मशिन, एक फ्ल्पर के समय में तटसहित है।हम में सब उसा में है। उस के पन्ध में किमका विधान किया काम किसका निषेध किम नाम । - आ शास्त्राविषय, अतएष मीमास्प मच जाता है एक मात्र सर्वपापम पास्मा । धम्म काही माम परिग्रह है। यह धर्मसमरूप एव अमित मेद से दो भागों में निमः १सा कि द्वितीय सस के धर्म मेद प्रकरण में सार पिया जापान । सरूपधर्मपोम्फ पही पारमा "पोग्गीपुरुप” कालाता है। माभिसमर्मयोग्य वही आमा "भभापति" करलाता ।।प्राणादि पत्र प्राति, एक प्रगति तीन गुकों की समष्टिी प्रयापति एवं एतर्विशिष्ट पोगी ही साम्" है । परिग्रहों की कग से है योगम्पपक्षिम बनता एमा यही म्यापक माम मध्यरमसम्बा में प्रविष्ट होकर तसचख, एक सगुण निकर सारण साखन बनना इमा सशिप नामसे म्पपत होता मा "मी" माम से सम्बोषित होन समता है। यह पीएमा पाप्मामों को से ज्योतिरूप अमन्दसरूप से मात शेतामस पापा पर विशाल सिरक विम्यापर मापा पर विसीम में रहने वाले दुस मसा दोर कोई प्राकमण नहीं कर सका। पर भी पिघास रति किम (जार) उसी के मा है वही है, फलन हमें भी दोरमूलक दुग्न से पृषक हरी गाना चाहिए म । पस्तु होता स्या है, मुनिए। लोप में सौरप्रकारा पाप्त है। यही मग्न्योति आपत्मससा में मारा से प्रबिट होर पारिदिप की समयसमर्पिका बनाती है । सूष्य मणी , पनु भयो । परम्प गेसारूप योगमाया माय से सूप्परूपा घनु पनि अपने ससेक्प स्मारक सौन्योतिसा भए को भूट रही है। इसका परिणाम होता है पि मा सर्प मोर चतुरे मम्प में मेष तर मागान तो हम मानिारा यह करने साते है कि-'मेयो ने मर्प को कमिया"। पनु भय, मुत्य दपि। मम्प में सूर्प का भाषण।। या मापण सौरप्रकार की न बागमती • माणभूमिका मात्मविया अपेक्षा मन्द-मन्ता-मन्दतम परिविज्ञान के अनुसार सो से बड़ा मेघसया १२मोशप र्यन्त मानो म्याप्ति रसद्य है। उधर सूर्णप्रकाश श्रेखोस्य में व्याप्त है।ममा ऐसे पापक सौर प्रकार को साधारण मेघसर कैसे भारत कर सकता है। पतु से वदपिष्टम सौर म्पोति मा- पत होरही है । इसीलिए हम उस म्यापक प्रकाश से बाधित होवे हुए तमोरूप दुस के मधि- की बन रहे हैं। बैंक पही दश मारमण्योति के सम्बन्ध में सममिए । महामायापन्थिम भामा विश्वम्या- पक है। हम उसी के मंड। मह दरपिता है, हम रा है। दोनों के मप्प में मोगमापारूप भावरस जा रहा है। इस भावरस से हम सूर्पस्पानीय म्यापक मारमा को भारत सममने बगते है । वस्तुतः या पापण हमारे मून्यस्मा के साए समय है । इस हस्प को न जानने के कारण छोक में जैसे-“मर्यो मेघेनार" (सूर्म को गासोंने उक शिया) यह मिथ्या प्या पार प्रचलित है, एवमेव भारमा के बस्तविक संरूप को न वामन के कारण-पारमा दोपणा सूत (भरमा को दोषोंने दक लिया। पद मिथ्या व्यवहार से सारे । “ पपासूकोऽप मर्यम्पोतिनपश्यति' या प्रसिद ही है। निम्मानन्दमति । तो हम भी निस्सानन्दमूर्ति दी। उसो मौर हमारे बीच में गो मापारूर मिशा परिमारूप धारण भागर है, उन्होंने वो हमें उससे बधित करते हुए हु सा बना रस्सा है। इसमक, किंवा मुसोदय के हेवभूत मनिपालव इन महादोषों के शमन का उपाय बतलाना ही गीताण का मुस्प विषय है। या आमा सम्पम्मोपपमही है। यही गाता का प्रधान बचास्मा है। । . 'निर्धर्मका, समक्षण, निर्गुणः निर्विरोप विशुपरसमूचिः सर्वातीत -शाखाना- र-सपर्मविशिष्ट, बिमचष, सर्ववमरिशिष्टरसभूति:-विश्वातीत कती । सर्वधर्मायोग्या-दैवलक्षणा महामायापछिमा विश्वात्मा } पानापिया ग परिपरि - माप्पमूमिका चामविका - (३)-१-सर्वधर्मयोग्य 1-प्रम्यपापरामदरफामूचिमाामापी-विचारमा (अपवम् ) नानारमा -पत्रपतिविधियो योगमायी --विषार्ग (प्रम)-फामारमा ३-शुक्रप्रपपिगिप्टो योगमापी -विचारम्मका (शुम्कामा ५-योगमापापविमोगको जीप-कम्मामा ( समष्टि-सपए गतोपदेश, किंवा गीतोपदेश हमारे (जीवात्मा के) उपकार के चिर प्राचामा । मत पायमा हसरा मुस्स सत्य होना चाहिए । प्रयाहमर्पस्पा (जीसस्पा ) सम्पशाम के लिए हमें मारमा के पिदामा,विदेश, बिहामास ल सेन सरूपों पर पिरानी परे । इन तीनों के यपापारवान के लिए शान-क्रिया-पर्यपन सम्म देव को अपने सामने रखिए । सप्पमतान् सज्योति से प्रेसोप में म्मान है। कहीं भी सूम्प का समान मही है। सोय पापक ही सूर्य सर्वत्र रहता था मौ प्रतिबिम रूप से नहीं विसित पवा है, यहाँ कि दर्पण स्फटिकमपि पानी पाति सूर्यप्रतिविमाया पदाप रिपमान पते हैं । इन प्रारक पापों में स्प्प का दो से सम्पप होता । पदार्थ के पवन के अनुसार सूम्प प्रति विम्म रूप से पदामों में प्रतिष्ठित हो गया है। प्रतिविम्ब के अतिरिक्ष भावप (धूप-प्रकारा) रूप से मी इन पापों के साप सम्प का सम्बन्ध होता है। प्रतिविम्दित सूर्य प्रतम समय से प्रतिष्ठित पता भासपात्मक सूर्य बहिपाम सम्बम्प से प्रतिष्ठित पता। इस प्रकार एक ही सौरव म्पापक मूर्य, पदार्म के साप प्रसंग अप से (प्पोमबत) सम्बर पावपाप पूर्ण, पदार्थ के साप कामे मर को ससगरूर से सम्म प्रतिविम्ति सूप्प मेर से तील सरूप धारण कर लेता है। ठीक यही स्पिति मामा के सम्पम्प में सममिए । "पो मोकरायपाविश्य विमसम्पप पर सपा सिरान्त के अनुसार सप्तधोका माम माम्बा र ममाप्यातयों से भापिम माविप में पिर नाम से प्रसिद्ध सूर्म- खानीय पोरगी प्रयापति समान रूप से म्पा होस।।पही परिता सम्म्यापक, किं पहिषधी माम्पमूमिका 112 भात्ममिपा विसम्मपक पिदामा है। सर्वत्र म्याप्त रहता गुमा भी पह चिदात्मा नहीं प्रकट होता है वहां मप्-वायु-सोम रूप चिप्राइफ पदार्प विषमान रहते हैं। यह सीन हाँ सब विप्राहक हैं। भतएव जीवसृष्टि माप्प, पापम्प, सौम्य भेद से तीन ही भागों में निमत देसी नाती है। इन तीनों पदापों में चियामा ज्योतिरूप से मी प्रतिष्ठित होता है, एवं प्रतिविम्यरूप से मा प्रतिष्ठित देता है। ज्योतिर्म्यग विदामा प्रसंग है, म्योमबत् निसपी प्रतिविम्मित निदामा सस्प है स्प। यही दोनों कमरा पिद, एव पिदामास नामों से पास होते हैं। भपा प्रकारन्म से यों सममिए कि विश्वव्यापक प्रारमा पिदामा है। एवं शरम परिशिष परी पारमा चिवरा है। इसी के मन्तीम, महिप्पीम सम्बन्ध मेद से दो मेद हो पाते है । बन्तम सम्पन्धानमिन चिदस शारीरक भामा है, यही चिदामास । पहियामापनि चिदश मजगात्मा ८ पही चिदंश है । यह दोनों एक ही स्थान पर (दप) प्रतिष्ठित है। एकही साम में प्रतिष्ठिर भातपसप प्रलगामा के सादी है, प्रतिविम्वरूप शारी- एक भारमा भोका है। सादी माग शरीरसंस्था में प्रतिष्ठित वर है। इसी के लिए-बिर' सर्वभूताना देशेऽर्जुन ! विपरि" यह कह यया है। इसी मरीरक परमर तप का सन्दप साताये हुए मगधन् करते हैं- । उपद्रटानुमम्ता च मर्ण मोक्ता मार । परमास्मेवि पाप्पुको देोऽस्मिन् पुरुपा पर' ॥ (लीवा १३ । २२ ।) मोहा माग मीर। इसी के लिए भगवान् मनुने का मीपसोऽन्तरात्मान्पा सामा सर्पवेदिनाप । येन नेदयते स स दुल प सम्मम् ५ (पनुः १२.)। पेद सहितामे पिदरारूप ससपी परमात्मा को “साधीमपर्ण" नाम से, एव विदरारुप मोहन बीगारमा को "मोकामपर्ण" नाम से सम्बोधित किया , जैसा कि निम्न मिसित पवन से स्पष्ट हो जाता है- पहियाष्टि या मायभूमिमा मात्मरिया दामुपमा सयुमा सखामा समान एवं परि पलनाते। त्योन्य पिप्पम स्वादस्पनम्नमन्प। ममि पानीविचक १६०२०) दानों सुपर्स पर ही (माकप पाटेर है। दोनों भमिम, जो मित्र है। दोनों का मसप एक साप, एक ही काल में प्रार्मश परन्तु भाथ्य है कि दोनों में से एक मो ससफर का मोग का रहा है, एक इमरा निा मसापीर उस गाने मेने पास की चौरमी वर या प्रभामा से सरिसर मरीनपामा प्रबलक इन्द्रियों के समय से निपयों का अनुग्गी ना राता है तब तक इसे मान ठस मप दयाप प्रमगा मा का सहप नाम नहीं होगा। मगिरीए'मा इन्द्रिपारामता का परिस्पाग कर अपने शिान को पिया से हटाकर मददप की मोर ठे माता ह तो स रिमममनु के प्रभाव से इस पर गारीमक मामा को उस रिपरनपदपस्प प्रमामा के दम हो ।पी इस गोरएमा मी सायतनिधिमी स्किन का दिम्दान कराती हुई उपनिषधि काठी- - पराधिलानिपतृण्वस्तपम्मूम्सस्मात् पग पम्पति नान्तरात्मन् । विदीर प्रमगामानमवदारचरनुपपमिग्छन् । (२।१।। प्रमभा को मन ज्योति(माता एक सशक अल्म को प्रतिविम्वरूप कागा है। ज्योति ही मम" नाम से प्रसिद्ध है। मही अमोल मामाकरण, सिंच पामीप जैसा कि-"प्रजापतिरसेमो पीप्प रुसम" (U०६) पारि प्रमाण से सरह रस्म पर परिणाम होता मा भी अपने भागमा काम उस योनिन शिमा की तम्पापकही। समाप, किंग यविका प्रक्रमा के इसी म्यापक सरूप का मि- नप करन के लिए भूतने “कस्मो समु" (रान ०१२) पाविरूप से इसेसमन माम से सम्बोधित रिपार प्रतिविम्याप जीवाम्म समरूप, रिया समारबपने इस प्रक- समसरूप को पहिचान सेवा हो दुरामा से एसात पिमुक्त हो जाता है। इसे खत्म को ज्य में रखकर अति करती है- पीसी - Bा माणभूमिका I मात्मविपा - , - समाने हवे पुरुषो निमग्रोऽनीरापा योगवि मुभमान' ।' नुष्ए यहा परपमन्यमीशमस्व महिमानमिति बीवयोक गा यदा पइप पश्यने हरमर करिमीश पुरुप ममपोनिम । बदा रिदान पुरपपा विध्य निरमन परमं साम्पमुपैति ॥२॥ (मुगरक. १२-३) । 'बिस नवाप पर पर ईश्वर प्रतिष्ठिा है, उसी पर, उसी स्थान में या पुरुष (जीव प्रति ठित है। बतर दोनों में बेबस पही है कि वह बह नित्य जागृत है, वहां पह मोहनिद्रा में निगान सी मोहरूप बान से मपने उस ईश माप को भूसता मा यह शोकका अनुगामो बन रस।निस रिन यह पुरुप अपने से सपा समर उस दूसरे ईश को देस नेता, पहिचान लेता है, उसी दिन उस की महिमा का अनुगमन करते हुए यह वीतराग बनता हम पीतयोफ बन पाता है। यह प्रण भीवात्मा चव उस समयोनि, की, सींग, समपर्ण दरी पिता को देख खेता ६ तब मामस्वरूपवित् यह बीमारमा पुस्म-पाप को फोर पर (इस प्रस्प ग्यत्मा के साथ अभिम बनता हवा इस के एस) उस म्पापक निरखन विदामा के साप सम भार को प्राप्त हो जाता।" वह मन्त्रों का यही बत्पर्य है । इस प्रपत्र से प्रस्त में हमें पही पहना है किमही पाक मारम्म फेछ योगमाया के प्रभाव से मिदास्मा-पिदश-पिदामास रूपों में परिणव हो पाता है । इन तीनों में विदामा "ममृतम्", विदय प्रतिमाप से मुक होता मा “प्रम"। इसी लिये मुपरकति में इसे "प्रमपोनि" कहा।। एवं पि दामास भूतमाग से संसार होता मा 'शुक्रम्" । पिदारमा बानप्रभान है, पिदरा किया प्रधान है, इसीलिए इस के लिए "भ्रामयम् सर्वमुवानि" पह का गया है। पिदामास मप्रधान है। अध्यात्मसस्थापक्षया त्रीण्यात्मविषानि- (सूर्य)-पिशमा (विवम्यापका-पोग्शी)-विपास्मा (विशरमा)-मस्तम्-सानामा परिज या माध्यमूमिका । भास्मपिया (भाव)२-प्रत्पात्मा (शरीरावरिममनिपा-परमात्मा (चिदरा) ---काममा (प्रतिविम्ब )२-शारिरक्यम्प ( पाप्ममिपुक्ता-सपा--जीपास्मा (विदाम्पस)-म्-परमा पूर्व में हमने अमृत-प्रम-शुक इन तीनो के सम्बन्ध में अनेक मितवाये है। सभी वि पररसर में कोई शिरोप मही रस्ते । ममा पों कीये कि सब में विरोषसहा मविरोध है। इन दोनों भागों में भोप का भरा बस की महिमा ११ मविरोध का मश रस की म- हिमा है। रस मस दोनों ही भारम्म के वसपर्म हैं। सब को सर म्ममा बा सकता। सप को सस से पक भी माना जा सकता है। इसी भधार पर पूक्प्रतिपारित समी मारमनिस 4पा उपपम हो जाते हैं। इसी भामार पर से सपिवादका दासीपुषस्य पापिने" बात सिमान्त प्रतिष्ठित है। समी अपेक्षया झप, वरपर 1, मन ६ प्राणी, पा, अपत है, प्रम है, शुक्र है माना है, कामात्मा है, कमात्मा है। हो सस मोर का एकस्म, इस मोर का एकहप कारप ही निफ्तम्पक से सम्बन्ध रखता है, जैसा कि मागे । ठानियों से स्पा हो जाता है। - - बीपी का माम्पभूमि मात्मविपा समाने से पुष्पो निमनोनीराया गोषति पुपमानः । सुष्ट पदा परपसन्यमीरामस्य महिमानमिति बीवयोकामा यदा पहप पश्यते रुक्माकारमीश पुरुष प्रायोनिम । बदा रिदान पुयापापे विपूय निरमन' परम साम्पमुपैति ॥२॥ (मुरारक ११२-३)। "विस असत्य प पर ईर प्रतिष्ठिा है, उसी पर, उसी स्थान में यह पुरुप (जीम प्रति हित है।मम्सर दोनों में देख यही है कि वह वहां निरय बागृत है, वहां यह मोहनिया में निमग्न है । इसी मोहलप वान से अपने उस ईश माप को मूसता तुम पह शोकका मनुग्यमी बन रहा है। जिस दिन यह पुरुष अपने से सर्पमा सम्पर उस दूसरे ईए को देस लेता है, पहिचान सेता , उसी दिन उस की महिमा का अनुगमन करते हुए यह भीतराग बनतामा गीतशोक बन जाता है । यह वय भीवरमा भग उस प्रमयोनि, कसी, सर्वेश, मर्ग दर्श पिता को देस सैल . तब भरमसम्पवित् मह जीगत्मा पुस्प-पाप को कोर कर (इस रप गमामा के साथ पमिम बनवावा इस के रा) उस प्पापक निरखन विदारमा साप सम भाव को प्राप्त हो जाता" उस मन्त्री का यही तात्पर्य है। इस प्रपत्र से प्रास में हमें यही कहना है कि पी म्पापक सम्म केक योगमाया के प्रमाण से पिदास्मा-पिदरा-पिदामास रूपों में परिणव हो आता है। इन तीनों में पिदारमा "मसतम्"१ विदरा प्रतिमान से पुस ऐप हुमा “प्रम" है । इसी लिये मुररकमुति ने इसे "मपोनि" कहा है। एप पि दामास भूतमाग से संमए होता हुमा "गुम" है। पिदारमा बामप्रषाम, विदय क्रिया- प्रधान है, इसीलिए इसके लिए "भ्रामपन सर्पमतानि" या कर गए है। एप पिदाभास - पर्षप्रपान । अध्यात्मसस्थापक्षयात्रीगयात्मविनानि- (सूर्य)-पिदामा (विषम्पापका-योग्यरी) विधामा (विदारमा)-भरतम्-मानामा पहिखरष्ठ - मायभूमिका प्रारमपिया (वासप )२-प्रत्यगामा (सावधियो-निपा-परमास्मा (विदरा)--कामामा (प्रतिबिम्ब )३-गारीकास्मा (पाप्ममिर्पता-सपा---नीवास्मा (विदामास)-गुम्कामा पूर्व में हमने अपव-प्रम-गुरु इन तीनों के सम्बन्ध में बनेकवितामये है। समी मि परस्पर में कोई विरोध नही रस्ते । नपया यो कहिये कि सब में पिरोषसहिष्ण भविरोध है। इन दोनों मामों में मिरोष का भाव की महिमा । एष अविरोष का मय रस की म. हिमा है। रसमस दोनों ही मामा के सरूपधर्म है। सा को सब मामा चा सकता है, सस को सबसे प्रषा भी माना जा सकता है। इसी मापR पर पूप्रतिपादित सभी मामनिवस 4पा उपपम हो जाते है । सी अाधार पर 'सपै सपिचापका दादीपुत्रस्प पादिने एमाप्त सिमान्त प्रतिष्टित है। सभी मपेक्षया माप, मचर पर मन ६, प्राण, मार, मस्त है स है, गुको नामाहमा , कामात्म, कमामा है। उस बोर का एकस्म, इस मोर का एकरूप ममप ही नियतम्पक से सम्बन्ध रस्ता है, जैसा कि भागेकी तालिकामों से स्पोमा । " १-अव्ययात्मा-(अव्ययाक्षरात्मतरमर्चि) (मरमा सर्वपा निर्सेप , निष्क्रिय "एकमेवाद्वितीय प्रम"-अव्ययष्टिः)। मम्पयविभूतयः मम्पया भामदर भमूवो मम मों प्रमा अध्यय:- नाम-नारमा- अमृतम् विहानम् | अमृतोत्राविष्ण, मपी इम्माविष्णु - प्राण क्रिया-कामारमा- मम अमृतौ भग्नीपोमो मस्या-पानीपोमो । - वाक् - अप - कामीरमा- शुक्रम् मन: अमृतोपमा मर्यो प्रमा -कम्पप:- मन हाम-बनारमा - ममृतम २ प्रायः भरतौ नाविण मायो इन्दाविप्रा -मदरस- प्राण क्रिया-मारमा अव्ययात्मविवर्तम् प्रपती-मन पोमो | मापी भग्नीपोमो -पर - पाक् मय: करमामा- शुक्रम् मों प्रमा मम्पयः, मना हानात्मा- ममृतम् आप ममतो-प्रमा ममतौ इन्द्राविष्ण, मय-सम्माविष्ण अमृतौ भनीपोमो मय भग्नीवोमो -मपर,-प्राण - प्रिया-कामारमा- अझ ३ अनि -पर- वाक्- मप - फम्मामा- राक्रम्
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(क)पकरान्तरेणाव्ययात्मा द्रष्टव्य 2.
1-मानन्द
२-विज्ञानम्
रसोद्रेक
प्रध्यय , मना, मान, ज्ञानात्मा, मनम् १
१-मन
२-मागा
उमयोद्रेक
'प्रधर, प्राणा, फ्रिया, कामाष्मा, प्रम २
अव्ययात्मविवर्त्तम
१-पाक
२-माप:
बसोद्रेका
-: पाक, प्रथा कास्मा शुक्रम्
"
-ममिः
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-अचरात्मा-(पचराम्यगन्मतरमूर्षि) (आरमा निठेप किन्तु मिश्वसाधी, विरक्कनी अत्तरदृष्टि)। भदरारमा मम्पयरमा वामदरात्म 1 वस्तो प्रमा भानन्। मर्यो प्रमा - मष्यया मना, धान, शानामा, प्रमूवम् । अपतो-नीप्णु विज्ञानम् मरयों नष्ण २ ३ मन मर्त्य इम्बा मदरा, माण, क्रिया कामास्मा, प्रम-२ अचरात्मविवचम् समता सोमः प्रास मर्त्य सोम → चरा पाक, भर्ष, कर्मात्मा, शुक्रम, अमृप्तोऽग्नि मोऽपि ।
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1-श्रात्मतरात्मा (प्रात्मवरीवकारतरातराव्ययमूर्तिः)-(अरनैव विश्वरम्मक (उपादान कारणम्)-"श्रात्मतरदृष्टि)। मारमधरा पिकारवर ' मत। ५ मम्ययः मत्या प्रमा | विशुद मारः प्रमतो प्रमा मानन्द २ | मार्यो विष्णुः| वियदा प्रापः | अमृतो विप्णा शिानम् मध्यय , मना, माने, मानास्मा, ममतम् १-१ मर्म इन्द्रा विशुद्धा पार | प्रपत इन्द्र। | मनः प्रवरा, माया, क्रिपा, कामात्मा, प्रम -२ आत्मतरात्माविवर्तम् भपत सोमः। मार मः सोमा | पिरादमभम् ५ | मयों ऽग्निः | विशुदोऽनादः | अमृतोऽग्निः | पार वरः, वार, पर्यः, कारमा, एकप }-1
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४-विकारतरात्मा-(विकारक्षर वैकारिकत्तर श्रात्मवर अत्तर अव्ययमूर्ति ) मामा विश्वस्योपथ प्रम साम (विकारतरदृष्टि")। विकारतरा५ वैफारिकवरा५ पारमतरा५ प्रवरा ५ मध्यय: ५ विगुदा मावः | पधीरुवा माणः मयों प्रमा प्रयतो ग्रंशा मानम्म +मपय ,मनःशानशानारमा, अमृतम् २ | विशुदा पाप पपीकता मापा पत्या विष्णु ममतो विष्णु विज्ञानम् 1 विशुदा पार पपीकता पाइ म इन्द्रा प्रमतान मना प्रवरा, प्राणः, क्रिया,कामात्मा, प्रम} विकारकतरात्मीववचम् विगुदमनम् । परोसनमभम् | मर्पः सोमः | अमृता सोमः यिदोऽभार पयोहतोऽभाव मस्र्योऽग्निः अमृतोऽग्निः पाक् PRH, पाक, प्राकम्मात्मा, शुफम्
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५-वैकारिकतरात्मा-(शुक्र-चैकारिक्षर-विकारत्तर-प्रात्मत्तर-श्रत्तर-श्रव्ययमूर्ति ) मारमेव विश्वम्-"वकारितरदृष्टि" शुमाणि ६ कारिचरः विकारचरः प्रामवर। भचर मम्पय: १-२ मन-(स्यमूमौ) पथ्यो याम् रिशु नाम् | मर्यरत प्रम इन्द्र मन १प्रस्तावार (स्वयम्मुम्मा | पम पाण: विशु.माय: मार्योत्रमा प्रम प्रमा| प्रानन्द' १ प्रपता मापा(परमेष्ठिममाः) पधी मापा रिशु प्रापः मयोंविण भर विष्णः विमानम् अन्यप , मन ,बान, बा- ३ प्रमूसोग्नि नात्मा, अमृतम 1- अपर, प्राण', क्रिया, | मर्या पापः (चन्द्रमूमा) पदी ममम् यि प्रभम् | मर्पः सोमः मप सोमः प्राण कामात्मा, मम -२ पर्यावार-पृपिलीममा) पक्षी प्रमाद विय प्रसादः मोऽग्नि भए पग्नि | वाक पर , वाक्, अर्थ, क- म्मामा, राक्रम् कामिक्षगस्मा -३ ? ५ ६ पादकौशिकमिदसर्वमित्यभियुक्ता पाठ
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पहिपष्टि मात्मविश माप्पभूमिका - सर्वसप्रह १ पयपरावणिम पडझाऽम्परपुरुप-मध्यपारमा १ १२-परात्परावच्छिम पमझोऽत्तरपुरुप -अपरामा ३-परात्पयपरिक्षामा पाससपरपुरुप-भास्मपरामा पोरशीपुरुप -प्रपसारमा २ ४-पोखरीपुरुषानच्छिमा पापकृतम --विकाराजगत्मा २ पमपातपा-म्रमारमा ५-पुरुपमहत्यबस्विभानि माणि एकारिण-कारिकमयमा प्रीति गुमाणि-गमात्मा 01 प्रात्मसरूप के सम्बन्ध में पिताशाख की अपेक्षा से) हमे मो कुछ कहना था, सोप से सब कुछ बता दिया गया। पूर्व के निरपण से पाठकों को विरित एमाहोगा वि समिशेप मारम- भिक्यों में से बन्फ्याचरात्मरूप मिपुरुष पुस्चारमक एक बारमा ही "गरोस्मा" है।पही हमारा (जीवसस्था का) प्रमग रमा नाम का मुस्प मरमा है । मिस भरत्याए पर यह मपमे मित्र शारीरक मारमा के साथ बैठा है, उस भवत्व के शान-कम्म रूप से दो भेद है। बानमय अमत्य प्रमापस्य नाम से, एवं कर्ममय भवस्य फर्माचस्प नाम से प्रसिद्ध है । महमायावधिम पत्रपुप्पीरास्मक महेपर के साप (पापक विदात्मा के साप) प्रसारकप का सम्बप, एस यो गमाणपश्चिम पसरगमक प्रमगरमयुक्त शारीरक मारमा के साप कर्मवत्प का सम्बन्ध है। कर्मसतान, किंवा कर्मपरम्परा ही कमावल्प है । इसी कर्मसम्तान के यह से जीनामा जन्म लेता है, मरने के लिए । मरता है, यम्म लेने के लिए । प्रसारण से निमसम्बद्ध फम्मा रखत्य के साप सम्पप रसने पाठी महामायी ईरर फी प्रतिरूप भविषा के मामय से इस बीयत्मा में प्रपिपा-अस्मिता-राग-देप-प्रमिनिपरो नाम के पाच सेय, ६ तामिए, ६१ पस्पार, कर्मपिपाय, मारापादि दोष सारे पाप्मा गाते रहते है, भाकर प्रवाह रूप में परिणत होवे राते हैं, परस्पर में मोरयोत होते रहते हैं।
रदिए मा माध्यमिक बुधिषिण पोग्वीपुरुश्चन्तर्गत मध्यपपुरुष के सिपा-यब कर्म माम के दो भातु है ।पानम् मिशान मन ल तीनों पों की समणि शिपाम्पर । पति पर मालम्पमा ज्योति प्रधाम बनता स्वा प्रतिवास्प मधेकार को मा करता मा मुतिसादी है, त भविषामिकारकलेन हम प्रसपीस पपी के 'रिणा" नाम से पपा कर सकते हैं। मन -भावना की समधि कम्यम्पप है। यह सम्ममा बीमपान बनता गुमा सरिसादी बनता है, मतः कर्म- मप बस की अपेक्षा से उक्त पत्रयी को हर मारप ही "कर्म गम्द से सम्मोभित का सकते हैं। परिम्ह की कृपा से प्रात्मा के पिपा (मान)-कर्म इन दोनों के प्रमरा सम्पयान, भन्मपाडान, प्रदान, मुकम्प, किम्म, प्रकर्म पाम तीन भवस्थाएं हो पाती है। इन ६ मों में सम्पान, भौर मुकर्म शामितपण भान-द के घाण । एवं रोय पारों पोमालय दुसरे कारण इस प्रकार परिमारा सोपाधिक गरम में बो इससक घोप भागाते हैं, उने एकाम्वत ए करने के लिए, साप ही में बिबादि गुणों का मारमा में भागान करने के लिए ही हमारा AON प्रातामा है । निफ्ष यहीमा नि- 'गीता शास सभी प्रामामों का निरूपण करवा पा श्रव्ययात्मा को अपना भपान सरप बनाता है। इति-श्रात्मविद्याप्रकरणम् २-गीतामतिपादित वादविधा गम्य विपाशा भास्पमिया, वितपिपा मेद से दो माह में मत है।मामनिषा पुरुपनिषा ६ परिपा परिपा । पुस्पानमा धानविपा, महत विमा कम्मरिया मानसिपा सस्पिनिष्ठा ६ कर्मनपा पोगनिष्ठा है। समिनिष्टया मकर पुतीचा दोस्पोतिरिया । योगनिधारिमका प्रतिनिपा ही वीर्पविषा है। ज्योतिर्विपापे पप गीता मरियायत, बीम्पषिपापेक्ष गौतारपच पोगणात, साति में २५४ पीररि - मायभूमिका ! पुलिविया विस्तार से बाल पा जा चुका है। पुरुषविषा अध्यय, प्रक्षर, घर-मेद से तीनों मार्गों में लि मक्का, मी तीन बारमविपत है । गीता इन तीनों व स्मामों में से किप पारमा को, किंग भास्मविचा को चपना प्रधान सदा बनाती है। इस प्ररन का समाधान पूर्व प्रकरण में किया इसो प्रस्तर प्रति विद्या किंवा कर्मविपापरपाक योग वा प्रानयोग, मतियोग कर्म पोग, मेद से तीन भागों में विमल ।।गीता इन तीनों योगमिष्यमों में किस बोगनिष्ठा का निरूपण करती है। यह प्रश्न हमारे सामने टरपित है। इस प्रकरण में इसी प्रश्न का सहित समाधान सत्य है । उत्तर स । गीता तोनों से भपूर्व पुदियोगनिष्ठा का निरूपण करती है। का सुदिक्पा बस्तु ! इस प्रश्न का उत्तर पारमयी प्रकृति ही है। पोग्श पुरुपात्मक पुरुष की बहिरग प्रा त पाण, माप, पक, बन्न, पानाद मेद से पाच भागों में लिया है। इन पाचों प्रकृतियों से क्रमश खपम्म, परमेष्ठी, मर्य चन्द्रमा, पपिवीन पाम पुरों का विकास होता है। यही पचों माफरिमा पुर मारमसस्या में प्रयरूप से प्रति ऐन होकर पम्पक पान्, बुदि पन, पाखात्मा इन नामों से प्रसिद्ध है इस स्थिति से पाठकों को भर विदित होगा योग्य कि वमपी तीसरी प्रात ही सूर्यसा में परिसित होकर युदि-नाम् से प्रसिर होती है । सूम्प मे उन परमेष्ट्री एवं स्वयम्भू में प्रप्त तरल की प्रषामता है, एक सूर्य से नीचे पृथिवी चन्द्रमा में मृत्यु की प्रधानता है। मप्पस सर्प में ममत-मृत्यु दोनों का सम्ध है-'निवेशयममव मस्र्य च। असताना, पिपा है। पापु सम्म है, प्रतिमा है। सूप में दोनों का सम्बन्ध है। फलत सौरी पुदि में मी पिपा-परिपा दोनों धम्मों की सवा सिर हो जाती है लपा प्रविया दोनों ही ६-६ मार्गों मे निमत है। विधा के रूप मान, पैराग्य, पेय पण श्री इन नामों से प्रसिब हैं । लिपा के ६ रूप भरिया, राग देप, पमिनिपेश, अस्मिता, अपपश, अमली इन मो से प्रसिर है । ६ मो विधामाग मग माम से सिद है, ५६मों प्रविषाम ग मोर नाम से म्पवात् पर है, मसावि ममि पुसकहते है- - २.५ पहषधी माप्पमिश्र पुतिषिय पर्याय सपनस्प पर्मरप यमसा लिया। वाननराग्पयोग पर मग वीरया।। मक भी मन एष मो मोहों में से पम्म मन, राम्प, एम्प इन चारों मनों की, सभूमि सूर्य है । एक इन चारों के प्रतिवदी भरिमता, मषिया, समझेप, अस्मिता यामा समय पारों भवियामान भी सूर्य से ही सम्बन्ध रस्ते हैं। पश एक भापत का पनामा से सम्बोसमी एप मामी का मापोमय परमेष्ठीमपास से समय। मध्यात्मकम के भनु सर मों समिए कि ममी रूप कान्ति का, एक की हीनता का, स्पसगीर से सम्माया और माण्य का मन से सम्बन्ध एवं सेव चारों मग, एवं पारो में हों का मुदि से सम्माप है। कारण स्पर। सूर्य ही मुनि का उपादान है। ममाही मन कर पम है। परमेष्ठी का बाप । “प्रदूम्मा पूपिणी" इस मौत सिशस्त के मनुसR पित्री बना है। पिषी ही स्पूपयरीर का प्रमा।। इस प्रकार १-४, १-१, १-१, इस हम से १२ मग मोह सया विमत इसका प्रत्यक प्रमाण यही है कि लोक में धर्मामादि का रस कने गरेका मी मपपरा देखा गया है। साप ही में समय एस विदों में प्राच मनुष्य को भी पाकी देसा १-१-पम- -प्रमिनियरा (१). २---ज्ञानम् ----अश्यिा ३-३-पैगम्ब------यगोपी ४-१-ऐप -----मस्मिता -मय (युदो प्रतिनि) ५-1-यरा ----अपयश प --मममी (0 -पता मनसि प्रतिष्ठिती) -परमष्ठितः (शरीरे प्रतिष्ठि) (भवापूपियीस्मानव माविषी प्रपोमप' परमठी मन् पत्मी कमी) पारिधि । भाप्य भूमिका मुरिविषा हमारा गीताशाम पुट्रियोगनिष्य का निरूपण करता है । एव पूर्व कथनानुसार मुखि के सार चार दिपामाष, पार प्रविधामामों का ही समय है। अत यो नि भाठ माबों का है निरूपण हुमा है, शेष चारों को छोर दिया गया है। इन मार मागों के सम्बन्ध से एक ही पुदि की पाठ अवस्पारे रो भाती है। यही सांस्यामिमत- 'मष्टो दुदय " I बार विधा पुदिए अमृत प्रधान होसी र बिमात्मिका पार अक्षिा बुधिए पस्युप्रधान होती बपि- पामिका है। इस प्रकार भग मेद से एक ही मुदियोगनिना चार माणों में विभात हो माती है। भव्यपारमपा के साथ साप गीरा इन चारों मुछियोगनिष्टाघों का मी निमपग्म करती है। रिमर की पोगमाया यही विचित्र है । दुःस मिना प्रयास के भी आ जाता है, मुस प्रयास करने से मी नहीं मिलता । क में भी तो हम ऐसा ही देखते हैं। प्रभाव के लिए सम्प पन्द्रादि के उदय की भाषश्यकता होती है, परन्तु अपकार मिना किमी काय करणमाव के अपने वापरीवपमा वपिकार पमा वा ।। उसे के लिए दीपक की अपेक्षा है, अंघरे के लिए कोई कोशिश मही परता, फिर भी वह भाक्रमण कर भेटमा है । फर से पौन कहता। कि भाप उन सच महाधिकामों में पारिए, एष यहां की स्वहता दूर कर सब प्राङ्गणों को मसन कर दीमिए । परन्तु माप बिना प्रफ्न केही पसल पावे,और बड़ी प्रमुना से किरा- जमान होगाते हैं। उधर ला वरने बाप नहीं रहती । इस के लिए प्रपम करना पड़ता । दुघरी देनी पाती है स क मी पाती है। स्यो । उत्तर प्रकृति में प्रमिए । प्रति समान से ही दोषों पर भविक रुप रपती है, गुण पर प्राय भाग रसती है।कारण प्राक निक विष का मूस ही तमोगुण है । पसर तमोमप विस में लोगों का ही साम्राम्प होना समासिद है। पूर्वोक्त इसी सामानिक नियम के अनुमार हमारी मुदि मं मी अपिपायुप्ररूप चारों सेगों का बना सामाविक बन जात है। परिचा (शबानाभार), अस्मिता (मामसकोच), राग-देप (पाप्तति), प्रमिनिय (दुरामह-रटधी) , यह धारों बिना किसी प्रप्पस के अपने भाप हमारे पर के प्र पुणिक (पाहुने) में रहते हैं। हटाने के लिए हमें - .
परिसर । मायभूमिका विविध प्रयास करमा पडेगा । यह प्रशाम होगा उक्त पारों मेशों के प्रतिवन्धी ज्ञान, ऐषर गम्प, धम्म इम पारा माों घ दुन्द्रि में विकास काना । किम करण से कौन सा दाप का पुर पर भाषण पम्ता हुणा मणको मसिन बना टखनास प्रम का उत्तर देना मानी- जति से बाहर है। अधिक से अधिक इस समय में कहा जासकता है कि मनुम जैसे शुमागम कर्म करता है उन कामों का उम के अन्तापटस पर मा ही सरकार होत गम्ता है। एक संस्कारिक गर्म का फल भोगने के लिए हम संसार में भार मरे शब्दों में हम स्पशरीर धारण किया इस शरीर से हमने मेर मेरे कर्म कर ट है । परिणाम पहरामा कि पर पूर्व संम्बर के बस से सपम शरीर के ("स संसार मोगममाप्ति पर ) नाय का ममप मापा उम सम्म ऐसा नवीन कर्म संस्कार उपना से प्रस्मा मोर प्रतिदिन हो गया, बिस के मात्र मे पूसरपारन मनन्तर उचर पर का प्रण करना (बम्म सेना) भा परयक हो गया । इस प्रकार मामारिक कर्म मे उमग्रीम द्वारा बने से कर्मों की कग से मापु सम्म पन्यु सम्म पर परम्पग मिरर बन्ती रहती है, गम्ममृत्युवमत इस सोचारक पर्मपरम्परा का ही नाम "कम्माचस्प ६ बसा कि पूर्व में बरसाया जा चुका है। इन सा मरिक को को ना से जम्परपुगण में मद, मतप सांग परतन्त्र इस प्रामा में संस्कर पण पपा मप भरपालि दोषों का बुद्धि मा मात्रमय हुण बला। इन परियों से मलती दुदि भी भविषामिका वा गाती है। इस भरपा पुद्धि के समय से मारमा पा विधा माग मातहो पाता है। विधा के निर्वस होते ही, मिरा भारत होते ही प्रापपादि दोवा को प्रतिमा दुविशारा भा मा पर भारममा करने का भरसर मिल जाता है। जिस प्रकार एक पति मपनी धरोहर को कहीं रण र मूस गाता है, इस मूग से म में ही की मशव स्थामने परोदर के पोसमे पर भी म भान को कम से मन्यमनस्क बनता एमा माकुस एक दुसी होना मा उम परोहर की योग में हम उपर ममता मा "तुमे मासूप । स्पा' "तुमने मी रस्तु दसी रपया' इस प्रकार इतर म्यक्तियों से परा करता है, एक महा-"नहीं मन नहीं देखी' "में ना मानम" इस प्रकार के मियाम्प उप पुन का 114 पीराररि । - भाप्पभूमिका । मुधिमिरा और भी अधिक दुस पापा करठा ६ ठीक वही परिस्थिति उस पक्ति की होती है, जो कि पनिषा से माक्रन्त है। । शान्तिठवण मारमानम्दरूप धरोहर इसी के पास है, इसी के म में प्रतिष्ठित है। परम्त भविषा के बाक्रमण से यह अपनी उस मानन्द सम्पति को भूल गावा है । यही परोहर इसका भीषन , मत इस के बिना इठे क्षणभर भी चैन नहीं पाता । फलतः मालबश मह में परकर इसी मानन्द की खोज के लिए इन्द्रियों केरा यह गैकिक विषयों के पास मरकता किया है। उधर नियों में मानन्द का । ये तो स्वप गारुप होते दए भारमानन्द से बधित है। फलन विषयों में अभीरिसत मानन्द के न मिषने के कारण यह और मी भविक म्पाकुर हो जाता है। बीमा की हम भागन्तुक वेदना को दूर करने के लिये, वेदनाम्समूत भरिपा दोषों का समल स्निाश करने के लिए प्राच होने गण गीतपणाम मनि पा से उत्रम शोकनिय रणार्य मारय छषण विपादि दोों को हटाने का उपागमात्र बन, जाना है। उपाप है-मर्म अनादि सप विधामावों का उरकप । विषा निन उपरों से प्रस्ट हो जाती है, उन उगायों का सकरम करना ही तो गीसा का मुल्प सप है। उन उपार्यों से होता क्या है चतुर्विध युन्दियोगनिष्ठामों की प्राहि । पम्मदिरोग से प्रमिनि पो की, मानदियोग से मोह सपा प्रविपा की, रायपुरियोग से रागरे वरूप मासक्कि की, ऐपपदियोग से परिमता की निति हो जाती है। मायरस हट गावा, भारमयोषका का उदय हो जाता है शारखत शान्ति प्राप्त हो जाती है । इस प्रकार माग्मविपा में जैसे गीता प्रम्पप को मुख्य सएप बनाती है, एममेव प्रतिक्रिया किं मुद्धिविषा में पता मुदियोग को पपना प्रधान सप मानती है। 1 घाद्धयोग का स्वरूप निर्वचन क्या अरमा के साप युदि का पोग नहीं रहता शिान सिEPA के अनुसार वो हम यही करेंगे कि यदि मामा के बिना क्षणमात्र भी सस्वर से प्रतेलित मही रह सकी । इन्दियों' + २॥
परिक "मानमिन ॥ युधिषित का पिापों के साप समम्म रहता है। इन्द्रियों में जो एमियम रहता है, उसी से तण निपयों का साशारकर रोना है। विषयमय के हेमून निश्यक जन की प्रतिष्धा एक प्र मेर सम्झियमन माम से प्रसिद प्र नम्म माम का बयस्त मन ही है। प्रामाणात्मक इस मनरूर उप से निकचने वाले मकाँ का हो नाम इन्दिए हैं। दूसरे शब्दों में मन पदि दीर बिम्ब (दीर कीबो) तो इगिर इस बिम से माने पाठी समिए है। फसला इणि यो का मन के साप निरय सम्म रहना सिद्ध हो माता है । मन पदमा से निमा, बुधि सूर्य से उत्पमई, मा कि पूर्व में कहा जा चुका है। जिस प्रकार ईमासस्य में चममा सूर्य प्रकाश को सेफर री प्रकाशित सता एवमेव जीवम पा में वरूप मा सूर्य कप बुद्धि के प्रकाश को लेकर ही प्रकाशन रहता है। इसी पौरप्रकाश पा से इन्द्रिम- रामद होने पर नासपा में परियत होता मा मन अपने सारिक मानस विषयों के साप की शिल्पा करता है। बाम मामात्म्य के साप पुरीति माही में भार न्योक्ति- मन मारमा में मपीत हो गाती । (ख पाती ।) तो बुद्धि से प्रारा प्रम्स करने बासा मन प्रशम्प होपमा सुपरपरस्पा में परिणतो मावा है। फसत मनपा पुनि के साप पनिष्ठ सम्मन्य होना सिरोपाता । मुग्नि में मो पिप्रकारा पा भी उस का अपमा प्रकाश नहीं है। कारण दुरि नामान्तिक होती ई स्वस्मरूप से सवमा बामशक्ति स दुनिरूपा प्राप्ति में मारप, उपर पुष्प स्मा नाप से प्रसिद पिदामा निष्किर गुर मास मरूप है। इस विशमा के विदण को लेकर ही पुल में शामन्योति का प्रामपर हमा जसा गि-4ति की, पुरुपात पुहरफमाधिपः इमानि मामानिक सि रात मनुसार स्पर है। मसा नो बुद्धि प्रारमा के पियको हेमरी अपना दुनिम्ना मरि रमने में सर्प होगी 1, उस पुम्द कर मामा के साप योग न हो, या फैसे माना जा सकता है। भाप ही मामा (महदबपिम पुस्पास्मा) का पुद्धि के साप सापात्सम्मान है। मन के साप मुरि हरा भरमा का समय है।इनियों के साप युम्नि-मन मात्मा का -- है। मुदि-मन-इन्द्रियों के 1 परम्परया मारमा कात्रियों के साप मी समर।
पा सापायमूमिका । दिपिया . समी तो मो पश्यामि, प्रो शृणोमि मा पदामि, मो हामि मह रिचारयामि इगटि कर से इनिप-मन-बुद्धि के भ्यापारों के समय में मानप पात्मा का भमिनय विपा मारा १। इसी पारस्परिक सम्बन्ध का दिग्दर्शन कराते हुए मगवान् कहते है- इन्द्रियाणि परापयाहुरिन्छियेम्प पर मन।। मनस्तु पग पुदियों पुदे परसम्तु सा गी• min इस प्रकार उक्त निदर्शन से या भीमति सिद्ध हो पाता है कि पुद्धि का भार के साप बाप ही निस्म योग है ऐसी हिपति में हम प्ररन कर सकते है नि, ना पुरि का भारमा के साप पोग रहना प्रारी सिदो तो मगवान् ने पुदियोग नाम की बिस अपूर्व निष्ठा का प्रविगान किपा, मगवान् मे हमें कपा नई मात सिमसाइ ! प्ररन पपा है । सपमुर युद्धि का योग प्रति सिम है । भर केल यह है कि प्रत मिद पोप निरामयोग, एम भगमन् ने समधयोग का उपोस दिया है। मारमा सर्वत्र सम है । लि पुनि मन इन्द्रियों के पहारों में विषमता पो ! मानना परेमा कि समधमागान बामा के साप मुद्धि भारि का विषम योग होता है। इस विपमा का क्या कारस रसना पाहगा कि माम्म एम बुद्धि बीरमाने पाले भविषा के मारणने ही रस योग को निपम बना रस्ता मी मिपम- योग मे हमें (बारमा को) मोह में गत रखा है।ग्मी स्पिति पा सीकरण परते हए मग पाम् का है- इन्द्रियाणि मनो मुदिरम्यापिठानमुग्यते । एनरिमोत्परपेप मानपात्य देहिनाप । (गी पर)। कमरस देखते है कि परि एक रोग्य मनुष्प पुल भोजन परतामोद उस लाहित म करते हुए महिन ही परता है। इस का भोजन करना भोरम न करने के समान है। परि हम विपमता से रिसी से मिलते हैं तो हमारा पर मिलना न मिटमे के समान है। पदि दो प्रेमियों के मध्य में कोई पनागप है मो उनका मेखना न मतमा ही कहा जापाः ।
पति -B। मायभूमि विविध " - एक सिंह के सामने मोए पर पशु को पदिमा पास लिसाते है तो क्या या लिबान सिसाना कनवाए। ठीक यही दरा पा सममिर । पर बुद्धि और मामा ? साप भावास केसराप से निपम योग है तो क्या वह योग योग कामाएगा । पदापि नी । मगमान पा तक मन है कि मवि पुद्धि का मामा के साप मपम्पोग वो ए पोम पोम मही, एक पर पुम्धि बुद्धि नही- नारितादिरयुक्तस्य , न पापुक्कस्प मारना से एवं सांस्कारिक कम्मों के प्रमान से भने पछे दोरों में पुदि की प्रातिसिक प्रतिमा का माश परते शान-विहान दोनों ना सनरा नए कर रहा है। म हम पुद्धिपोगनिछ हेभित कर रखा । मुनिए ! ममपान क्या कहते है- तस्मातमिम्म्यिारयादी निपम्प मरतर्पम ! पाप्मान प्रमति मेन मानवियनारानम् ॥ (गो ।।४१)" प्रमेनानिपते पहिगाों मप्लेन ॥ पयालेनारतो गमस्तपा तनेदमाहनम् । (गी ३१८)। पाहत नमन मानिनो निस्परिणा । कामरूपेण काम्य दुम्पेरणानमन घ ॥ (गी ।।१६ ॥ पूर्व में हमने माता का मशाखता भनेक प्रकार से सिद्ध की है। दो शरों में यहां भी इस सम्बन्ध में कुछ निवेदन करना चाहते है । मीना को म.प 'प्रमरिया' सममिम। मम हम्द के मनेर पहुए हैं। परन्तु म + समय में हम प्रा से 'मम्यप पुम्प" हण करेंगे, कारण प्रेमा का पही प्रधान सत्य है । म अम्पप प्रम की लिपा पुष्प विपा महनिपिपा मैद से दो मार्गों में सिमझ है। मक्य पुरुप से ही समय रमने बासी मम्पय की मति ( माग भरा-अपर ) पा, मात्र भामग्पणा माममयी विपा पुस्परिणा सम्पप अप को परिठी रिया।प्रहति से सम्परमने बासी, महति को मकरूपा, मारप्राति सपसा प्रानिमपी रिपा दूसरी पाहिरिण है। प्रम्पयमकिपा, प्रसाएर पारसलपा इस पुरुपरिपा, राि प्रामरिण में बुदिमकिपा, मसएप विसपा इस मानिरिपा । . - ૭૨ पहियष्टि •r11 मान्यभूमिका युविविधा का योग हो जाना ही बुद्धियोग है। मरे गन्दों में सूम्पसदण घुद्धि का विषम पोग से रफर समा बसपा से अभ्यय के विषा भाग के साप सम्बध कर लेना ही पुद्धियोग है। योग पहिल मी पा परन्तु वा विपम या अतपय पूषकफ्नानुसार मह योग प्रयोग पा | समाप्त सपणा बुद्धि का घरमा के साय योग होना ही वास्तविक बुद्धियोग है, मुदियोग का यही स्वमपनिमर्थन गीता को प्रधान रूप से यपपि युदियोग का उपाप ही पतसाना है। ऐमी स्थिति में इसे पेवर योगशास ही कहा जाना चाहिए था । परन्तु जिस वारमनन के साथ, विधा भारमविषा के साप युदि का योग यतमाना है. उस भाग्मा का सहप पनवाना मो गीता का पावरपर कतम्प जाता है । फरत जहाँ गीगा न मुस्योग का प्रतिपान फरने से योगयाग्न पो उपाधि प्राप्त की है, वही योगाधारभूमि आरमग्राम का निवपण करने के कारण "मरिया' उपाधि से भी जाने को मुह फरत हुए अपनी सासता को चरिताप किया है। मामषिपा , साप पुर का योग चार प्रसार मे हो सकता है। पार प्रकार से समस्ययोग उपपम रोता है । मत मुदिपेग पर प्रकार के जाते है। फागण सा है। जिन के कास युद्ध में विमपता फा उन्य होता है पम्वय चार भागों में विमा है । विषमतामसक स्लों को पुरियोग दाग हटाना है। इन बाते पैकि घार है, अन घटा ने वाल भी पार ही होने चाहिए। प्रनिन्दिता में समानता ही पदित । भापको यह मामना परेण किदुस को पाप उपम नहीं परो अपितु दय का मूत प्रशनि है। मसा निसके कारण आप नही, उस माप हटा मे सकते हैं। मो सिए सो मापको प्रगति की दी गरण में नाना पाग्य । ऐसी मवम्पा में प-ि कोई तिमी इगों से प्रम्स होपर उन्हें हर कान पे टिए प्रति विरोधी मान परिपत कारणों का भाप सनातो कम होने के रपान में उसो इस चोर पसे ही है । प्रपति ने १० दिया है, प्रति सुधारिए । प्रति में गुण भी है, दोष भी है। सरे राने में पा सममिर कि निरम प्रारी भी प्राम, मम प्रात भी प्रातिनिपम को सपमे नपा वासका है। पानी प्राीगे विमा १-"रिपाप रिमापरम ' काय कार मे निबस सका है। पर सोनिया ने 1 परिसर का माप्पमित्र बुरिधि के लिए पाप हाप दूसरे पटि के प्रयोग में मिमिव बन सकते हैं। भाप सप पदिापों से (मिन कटि के सहारे ) कोटा निकासना चाहेंगे तो परिश्रम म्पर्ष गापगा। एक मात्यादि के मामात से वा सूक्ष्म कारक इतस्त होकर मोर मी गहम् में माता मा अषिक बेरमा का कारण बन पायगा । कचरा साफ करना है तो उस कमरे का (तसमह सप मुमीका) भाभप सीभिए । य िमोटे पर मिमी (मैम) गमई तो मिट्टी से भय कीमिए । मिमी पाने पाप जमी थी महो ही उसे हटाएगी। क्या बिना सामुम पामीरे माप महका मैस दर करसते !!। बस टक यही दशा पा सममिए । दुपा, मरिधान दोपों से , मिपम प्राय से । इसे स्टाने के लिए भारको सम्प्रकृति का ही मामप लेना पडेग्म । मापका काम बस इतमा ही कि वियप्रमातिरूप मिन मनिपादि प्रास्त दोषों में भाप को दुलो कर रक्सा है उन दोनों के प्रतिस्दी विषाद गुण सपरिपत करदें । निस प्रकार प्रकाराभाबाने से प्रकाश का प्रतिद्वन्दी सपकार पाने माप मिलान हो जाता है मिना प्रकाशमाए डास चेप्य करने पर मी प्रान्त सिद तम नहीं हट सकल । एकमेव जिस रिमाप का मुस्लिम मनिपा दोषों को प्रतिमिनी निषा का उदय हो नाया, उस दिन दुरसम्ला भरिया परने मार नित हो शायनी । हा भाप प्रयान में ममप मतन्त्र निधि के प्रपरल में माही, "पित हुन निाच करने बाठो प्रकृत करे भरमसात् करने के प्रपाल में मिली ही छोरे का मैप साफ करेगी। प्रकृति की ओर से पहिले से पानिया कि इतने बस प्रयोग से मि चोटा साफ कर देगी । अप उतमा बम पदि १० मिमिट में ही सगा देंगे तो दस मिनट में होटा सारोगाएगा। पदि २ पटे में भपेक्षित बस करेंगे तो साई भी उतना ही समय लगेगा । बट प्रयोग भाप निकम में, साई प्रकृति के भरिका मा साप ही में यह मी निरपत है कि परि माफ्ने अपेक्षित प्रयोग करना तो प्राति सरपण मपमे माप सफाई कर देगी । इसी प्रकार समत्स्योग में मितमा स हिना मामसपम, बितनाइदिप निम्न मपेचित है, सय, भार्थ, अपचर्य, मस्,ि मर्षमृती मादि मो मो नियम अपेक्षित है इन को भाप निकना ही सम २४ दिनापी भामानमूमिका बुद्रिविण . . सफ्म कर देगे, सिद्धि उतनी ही भपिक निकट बाजापगी । इसी रहस्प को सएप में रख कर मगवान् कहते है- "सद स्वय योगससिद कासेमात्मनि विन्दति ॥ (गी० ॥५८) यदि वाम प्ररन करें कि हमें समस्ययोग को प्राप्त करने में कितना समप लगेगा। अपना कितना बउ पर्ष करना पडेगा ! वो हम कहेंगे अपने कम्मो से पंथिए । " भिवना गुर राप्तो जवना माठा" किंवदन्ती प्रसिद रामापके मात्मा में जितमा कर्म लेप ६ मा सर निस दिम एकाम्सत निको पायगा, गुद्धियोग सिद्ध हो जायणा । परीक्षित की मुक्ति सात दिम पारापण सुनने से हो सकती है। आप बरसों मागमत सुनने वाले, स्वम मपने को मलतापाय मानने वाले कपापापक भी राम-प से युक्त देसे गाते है होसफखा -आप माम ही मुक्त हो जाप, समव है भनेर सम्म में मुक्ति हो। कर्मपितारतन्य, साप ही में प्रपाल त्परताप ही उक्त प्ररन का समापान कर सकता है। फिर भी मास्मसिरि के सम्बन्ध में म कह सकते है कि अनेक जन्म का प्रयास ही इस सिदि की प्राप्ति का कारण है। पोकि इस मायामय दोपमति निर के कुपों में बम पहिसे तो कोई प्रपत दी मी करता । एगरों में एक माघ म्यक्ति प्रयास करता भी है सो मोर नाच इसे पर पद पर सस्पप्युत पनान के लिए सामने मात्य है । फाटतः प्रपतमिलों में भी कोई विरता र माग्यमान् परस सक्ष्य पर पाप सफता है। मनुष्याणां सहसपु कपिपतति सिटय। पनतामपि सिटाना फसिम्मा पचि तस्तका (मी Om) । पहना जम्मनामते मानराम्पा मपपने । पामा सरपिति म पामा मम ॥ (गो. ११) पनामम्मससिदप्लवो पानि परा गनिए "तुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग परस्त करयो वदन्ति" क्या इसी एकमात्र विभी िरागे र उस दियो मिटर मार्ग पोर।
लिपी मायभूमिका 18 पुतिविषा मही। ठीक है कि पूर्णप्ति फेट मर गस पीने से ही होमी । परस्त एक पुसमा पानी भी प्पासे के मामा को मशिक प्रन्ति पाषा सकता है। हमें एक सम्या नहीं मिल सकता इसलिए क्या दो चार आने सोगर्दै । पर मासिक वेतन २०. न मिस तो ५०-६०६) उपैषा का मर्मस्य वमते हुए मा अपने कुटुमा को मोर मी पिकासी करने के कारण बनें। कौन बुद्धिमान् इस युक्ति का समर्फन करेम्प । उत्तम कर्म सद्य उत्तम ही रहेम्य । पूर्ण न मी, पातसही, गात म सही पोहा सही। "सही" उपादेवी, गमती" मनुपादेव।माम प्रत्येक दशा में छाम है। ऊ मी म करने से काना मया मानाग या है। व-मूद करते घट कालान्तर में पह से परिपूर्ण हो जाता है। वापरे वाप ! भनेक जग्म, मोर कैसा भपकार मतिपत्र न म से या कभी न होगा" पर अकम्मर्यों की मामी है।"मिवना, मेसा बन पड़ेगा, उखना पसा करेंगे, भौर परश्य करेंगे'-पा कर्मवीरा का समोष है। पी ठोप सिमि का मूसार है। न हि फरस्यायात कचिद दुर्मति सार! गछति । स्वल्पमप्पस्प मर्मस्प मापते पालो मयाव । निकर्म यही मा कि-"प्रास्मरिया में बुद्धि का समभाव से पोगो मान) ती मुदिपोग।। या पोग पार मार्गों में विमत है । गीवा पास्मरिण के साथ सार इनी पारा योगों का उपदेश देती है" जैसा र पाठक भाग के प्रकरण में देसम
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१२-मीता का कुछियोम
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.मी. - ९-चैराग्य-बुद्धियोग पूर्व के गीताप्रतिपादित प्रा मरिपा, गीतापतिपादित युदियोग, एव मुदियोग- शब्द का स्वरूपनिषन इन तीनों प्रकरणों से पाठकों को यह विदित होगया होगा कि गीता शम ने भरमा केबान माग के सम्बन्ध में तो चार विधानों का निन्दपण किया ,एव मारमा के कर्मभाग के सम्बन्ध में चार मुदियोगों का निरूपण किया है । गीताप्रतिपारित बारमा मध्ययपुरुप है। मब दारा बयपमतिलादणा मात्मविषा की भोर मारा ध्यान आकर्षित किया गया है, एक महिला प्रतिमरिक-( बामकृतिम क्ल)-सक्षमा बुद्धि की मोर पुद्धियोग द्वारा हमारा पान वार्षित किया है। इस प्रकार प्रकृति-पुरुष के समवितरूप का निरूपक यह पता शाम अवरप ही एक पूर्ण एव महोविक प्रम्प कहा जासकता है। शनिधि ही गीता शास का मुम्प सरेस्य , तदर्य पगसम्पति प्राप्ति का उणय मतवाना हरी गीता का मुख्य विषय है। बिहान प्रसासी के नए प्राय हो जाने से वान पित् समान में फ्लैश को हुसका पाय, एव मग को ऐपर्य का पप्पाप समझा मारहा है। वस्तुप्त सेरा दुस का कारण है, एष मग ऐषादि का क रम है। परिपा पस्मिना राग-देप प्रविनिमेय इन पौधों के लिये सेय शम्द निपत है। इन सणों के भागाने से दुःस का उदय होता है। इसी प्रकार पम्म मान-राग्य-पेश्चर्य इन चारों के लिये भग शरद निपत है। इन के म गम्म से शान्तिपस मामानन्द का विकास होता है। वानन्दबण मगप्तम्पति को प्राप्त करो, मग के प्रतिद्वन्दी सरा निाव हो मापगे, सानिध से पोमोदण दुस अग्ने मार निचो मापाप । सप मगसम्पति का माम मुदियोग है। मगठमति प्राप्ति के प्रकार । तरफीब ) का माम रिण है। इस प्रकर चार पुदियोगों के कारण तत्पाप्तिप्रारम्ता विपाएं मी चार ही हो जाती है, जैसा कि मागे की तालिका से सर दो मापगा। इन चारों प्रकारों में से एक भी प्रकार का मनुष्ठान मप्यारमसस्पा की शान्ति का कारण बन पाता है। यदि चारों का ही विकास । तब तो कहमा ही क्या है। पतुर्विध युझियोगाविष्टाता पुरुष पुरुष नही, सादात् परमन का प्रस्तार है।
पाईपची मापमित्र - गम्ममुनिमेग इदियोम-निया पतुप्पी 1-वैराग्प योग रामर्षिनिष-a -मझेप नतः (१) २-पानमुद्धियोग-सिविषा-Par-मनपापमोहनिपि (२) १-ऐचर्यबुदियोगः- रामनिपातित-महिमतानिपि.) ए-पानिपोग्य-माविधा--Fan -अभिनिवेशनितिन पपपि सप मुखमाम्य में उक्त योगी, पलियामा म्वार से मिनपण होने पास है, पर तुप्रकरसमति के लिए संप से इस उपोाव प्रकरण ममी क्रमश इन का स्वरूप मान सेना बनारपक म दोन । पहिले रामपिपिपा माक रेराग्यवृदियोग को ही पीलिए । रामदेपसमय सारा से उत्पन होने वाले नेक को रोकने वाम कारण ही राम्पवृदियोग है, एष इस कारण घसरूपान कराने की प्रक्रिया ही राम्य रियामाही नियम वा में रामपिपिपा नाम से म्पात। पूर्णमास कम्मों की रुपा से उत्पम सरकार हमारे इस प्रारम्भ वन्म के कारण बनते है। सस्कारक कर्मानुसार ही हमें प्रामण-पषिय-वैश्मण इन चारों परों में से किसी एक भीम जम्म लेना पाता है। पापक वात्मा का कर्मश शरीर मन में भा जाना पही पारमा की परिशी परतम् । उनी सरचारिक कर्मों के प्रमा मापात से, प्रया प्रेरणा सेकाम यो ए मी-"अनिश्चमपि मागेप नमादिव नियोभिव" इस मित अनुसार सांसारिक द्वापर तत् मोगों में प्रार होना भारमा की दूसरी परतता। पिता के यम, माता के शोभित में मौपपातिक रूप से कमरा प्रतिष्ठित होकर गमाशय पत्र में नियत्रित होना भी एक महा परत वा । माता पिता के सक्रिमिक दोपों का उम के पुत्र होने के नाते अधिकारी पनना ही एक मात्र मा ग्य है। प्रतिमाससस्म रनों की सच में गमाग्य में लाने से ततद् प्रहों के लिए प्रामों से मुक्त होकर उनकी हा का मामन बमाना भी काम पर तत्रता नहीं है । मिस देश में हम मगम सेते , उस पारिष्टि । माममूमिका पैगम्पतियोग देश की अनुकूम प्रतिकूल परिस्थिति मी हमें निप नहीं छोर देती। पार्पिक परिस्थिति के अनुसार, किंवा शिवा की कमी के कारण माता को जैसा मोमन प्राप्त होता है, उस विकत भागात मोबन के रस से नामिनाट हारा गर्माशय में प्रतिष्ठित हमारा वो पोपण होता है, इस रसपोरस से होने वाले मोगुण दोष है, मन का मी हमें हिस्सेदार बनना पड़ता है। इस प्रकार गुफदोप, शोसिवदीप प्रदोप, नाहीदोप, देमदोप, प्रभदोप, फम्मदोप, भरीरदोप अदि भनेक दोषों की चहार दीवारी से घिरता हुआ यह जोषमा कम्ममस भोगने के लिए परातस पर भक्तीर्ण होता । होम क्या है.-सहजसिद सांस्कारिक कर्मों की परतन्मतारा इसे उपक दोषों को स्मे निवस होरर मपनाना ही पड़ता है, परन्तु इन से अतिरिक्त अपने इनि यहोणास प्रचार प (मासमी ) से या मोर मोर मी दोपो को बटोर लेता है। पहिले केसमाप्त नहीं होते, पोर समित हो जाते हैं। सनित मरियादिदोष एष प्राप्नकम्मान सस्किारिक दोष पोवारमा के जोतेमप विधामाग को सब भारत कर लेते हैं । यही इसके दुसी रहने का मुल काम है। किन कारणों से यह दुमी रहता है। इस प्रश्न के समाधम के लिए हम पहिले रागयों-ट्रेप माम की दो प्रसिद्ध अपाविभूतियों को ही पटकों के सम्मुख उपित पर है। - इन्द्रियों के द्वारा मन से सांसारिक रियपोगों में प्रात होते हैं। सापटी में यह भी एक सिर पिपप है कि कितने ही पलों के साप तो हमागम होता है, किानों से बम बरस रहता है। मेम चोर इप दोनो ही म्याणरों में दमाग मम सन रिपों में पर से जाता है। जिस के साप हम प्रेम करते हैं उस प्रमी के भाकार से हमारा मन आकारित रहता है। साप ही में मिस के साप रेप करते हैं, उस कर माम मामन्त परत पर परि त रहता है । यु एक मित्र रोनों मन पर पड़े रहते हैं । आपय तो यह है क प्रेमी मित्र भी मुगापा भी जासकता है, परम्नु एक प्रपन शपु साने, पीले, मोते, उठने, परते सार मारी राशि पर पड़ा रहता है। रिमो रग्गु (रस्सी) में सीधी मंठ मारना गग है, उष्टी गठ एपमा रेप है। गानुपरिमारा के अनुमान प्रनुपरधन राग , मनिपरपन देष है। पक भादमी माप के सामने महा, दोनो के रागर का रपरा नहीं है, बस र काम - भाप्पमिका । मैगम्याटिकग - मध पर माप को दस रहा। बाप उसे देख रहे हैं। दोनों का मम्प परत एक दोनो का सहयोग हो रहा है शरीर से पृथक् रहते हुए मी दोनों का बस एक बन रहा है। इस मुस-सांमुख्य का ही नाम "राग' । ठीथिए भ प दोनों ने मुस यो मौटा दिया। पीठ से पीठ मिणा दी। परिणाम म्ण हुमा-माप को रधि पूर्व में है तो दूसरे की रष्टि पभिम में है, दोनों के गप मित्र मिल है। यान रनिए यम दोनो के परस्पर में मिले हुए हैं। सदमाग में अपहयोग । सम्बन्ध में असमन्ध । मेस में वेमेव ।।इस प्रतिइन सहमोम काही न म "देप" है । राग में विषय का वागमन होते हुए धन है, एप प म मिपय के म माने पर भी बम्धन । सप विप, fमक प्राणी भारि से हम कोसो र मागते हैं । पिर मी इन के साथ मम का योग रहता है। कानून के गनन वासों को या मालमोजिचोरी करने पले पोर की अपेक्षा घोरी की माणा रसने बसे को बधक दण मिस्सा है। हीदया पहा है। मन का विषय के साप समर कामे से देषानुपापी कर मन उस मनिपपप के सापासप से मर रहता । सा एक रेप दोनों ही प्रासक्ति के कारण है । अपाभास तिरागासकि एर पासक्ति मे से दो नि । भारने मार्ग में पाते हुए एक सुन्दर रप देखा।रप की वतिरायमुम्दरता से भारका मान सस भोर विरोध रूप से भार्पित हो गया। तर उपमम्पिद प्रमाव से उस रस की साप मापके मन पर सग गई । भार आगे निकल गए, परम्त मन में बीरप पा एमा मन रपाकाराकरित बन रहा है। मन पर रप की गो धार (जो कि सस्कार मार से प्रसिर ) ही "बासना" नाम से प्रतिप संस्काररूप से मन पर बस माता , भतार इसे पासना कमा ममप होता है। पर वासना सस्कार पाता क्या है। मुनिए! माप पर सर आते हैं। परन्तु भापको यह मामस सत्तार "पमें, फिर एकबार उस रयको दसे पर विचार उपम दिया करता है इस पर्वणा से मन उस लिपप के साप पद हो जाता है। बापना की सति की बननी है पति की राप्रसतिरप मिपमापन की चममी पर मासक होती का? पर भी विचारगीप प्रम।। पदि मार पर बोट । २५० माम्पमूभिन्न - गम्परियोग कर कमान्य कर्मों में व्यस्त हो जाये तो सति का उदय न होगा । फलतः प्रसमा सरकार को वत्सप्पी विषय की मोर यम को से गाने का प्रासर न मिलेग्म ! यदि पाप मोर किसी कार्य में प्रत न होकर चार बार उसी लिपप का चिन्तन करते रहे तो इस प्यान के पिरकाळ से भश्य ही स्मृति का उदय होगापामा फस मम भासहिपाश में बम होसम्यगा। भापको यह नहीं भूलना चाहिए कि ' पबन मनः कप्य ! प्रपापि पसमद् सम" के मनुसार सकम्प-रिकत्सात्मक (प्राण-परस्पागधम्मापच्छिम ) मन पि.सी पियपर पर पिर कार तक रिपर नही रह सकता । पणमर इस विषय पर, पणमात्र उस विषय पर, कमी उसको लिया, इसको छोरा, कमी मन्य को लिण, मन्प को छोदा पदमन का सामानक धर्म है। मग मन निकाल तक किसी विषय पर हिप नहीं रह सकता हो यह मान ऐना पर ता है कि पासक्ति के मण्हेतु चिरकालिकान में पक्रय ही मन को किसी वग्य सहयोगी की सधपता सेना पारक हो जाता है। लिगुर मन रिरकास तक एक ही लिपप के मनुप्पान में सर्वपा मसमप । सायोमी है-पुदि । पुदि स्पिरपसा है। मुनि के सहयोग से मन में स्पिर तय का उदय होता है। फलत मुदि सहरुव मन चिरकाल तक उस विषय चिन्तन में समर्प हो जाता है। मन स्क्य स्निग्ध पदार्प है।कारण मन का निर्मपस ममा पासोम से हमा है। बामसोम भार्गक वस है। पगु तेगोरुप है। इस अपने स्ने गुण से तेजोपणा बुद्धि की स्पिरम को सेपर सम विषय में प्रासत हो जाता है। मनुष्मान ही लिपपसग का कारण है। इदि के इसो सहयोग को छोकमाषा में "सयात" करते हैं। तपास युदि का प्यापार है । परि मन कर बार उस विषय का तपास करता रोग्य, पुदि की मदद लेता रहेप, तो बमय ही परमपपासक्ति में फस जापान । पदि आपने प्रयास ( युनि) हटा सिपा तो बासकको अवसर न मिले। पुदि तव भपधा पेदा मेद से दो मार्गों में निमत है। मन मोर मुदिका सयोग होता है । इस सयोग में परिपुरि मन के माधीन है, तो अपेक्षा है। यदि मन मुदि के भाधीन है, तो अपेक्षा है। उपेक्षा मुनि उम्पिवाफारया (मपने भाप व्यस्थमानिया, ६८१ पहिरो माप्पमूमिग रम्यवियोग मात्मा - के उस भोर नियमस्पान में प्रतिष्ठित विषयों के ससन से मारमरुप समता से पुन होता पिचममा मुसक पाद से मुह होगात्म है। इसी प्रकार मासमरा विषयों सेइप करवा राम से इस मोर हटवाइमा भी विवाद के कुबक में फस माता है। दोनों (रागप) में ही स्थानविम्युम्न है, दोनों में ही पोम सपणा अशान्ति है, जैसा कि परिसेम से स्पर है। करना क्या चाहिए । कसे भासधि हटाना चाहिए । उचर ही सुप्रसिदपैराग्पबुरि योग है।पासक्ति को भाप नहीं हटा सकते, अपितु आसक्ति का प्रतिशम्मी ममासहिषपस पराग्य ही इसे हटा सकता है । रमा मासतियप भरिपायुक्त पुदि में रागापनिाति तषण वैराग्यमान उपम म किया पापमा उपतक कपनानुमार सारे उपाय म्पप जागे । जिस दिन गुदि , किपा मुखिसहान्त मन में मेराग्य का उत्प मापन, उस दिम यासक्ति अपने मार हट जापी । ऐमी वैराग्यमावोपेता पुदि का आमपिपा के साप को योग होग, रहो बरम्पनियोग कासारेग्य । नाम्प को बुदियोग नरी कहा गया है। स्किा (कामा के साप ) योग तो मतः मिर है, जैसा फि पूर्ण के बुदियोगनिधन में विस्तार से बतलायाणा उ । मतः सिद पुद्धियोग प्रारूप मारण से भामम्पोति मे रियुक्त होता माविप मसाला कारण बन जाता है। भारतिरूप वैराग्य क मा पाने से यावरण एt, सम- सपनामा से मुक्त मुद मामयोनि से योग करती प्रमा?मार को प्राप्त हो जाती है। ऐमी मरम्पा में "पराम्पदियोग" का "राम्पहनुम्यूदियोग" ही वापप्प समाना पादिर । बुद्धियोग सिम पाप है, राप साप्प है। इस माप्प की सिद्धि के लिए, दूसरे शने में आप उप के नर पिसने उपायों का बाभय सेना पाता है। वह उगप सपह यफरिया है, पही गपिरिपा ।यविरिया में भगवान ने प्राप से ममासम का उप दिया है, जिन इतिपों से शिम उगपों मे पाम्प रा प से विमुक्त होता उगप बना है। प्रमुप म्पक में गानुक दियाग का सपथ लिमही, पर इस वा निम कामा हो तो उस पर मावि (पर्वमाबदार ) पर हर दीरिया पहिउग मिति की गति में ममता है, पर उस महा में "मराठी काई करता है, इसरातीको राग (विषाद ममि) पोगम्युति रागसक्तिः 6 निप मता . म ता D 6 म् ( समत्वम् ) योसिदि:- क छपम् मम - 1 आमस्पानम् (प्रसादभूमि:) . म व म स नि 6 य ID से . देषासति योगविपुति (विषादभूमि) देप
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पहियष्टि मा मायभूमिका । बुद्धियोग . - करावा है । दुनिया के काम ऐसे ही बनसे के ऐसे ही बिगरोइन मावों की मप प्रधानता देते है, तो विपास कर लीजिए! उसने वैराग्यमुछियोगनिष्य में सिद्धि प्राप्त कर भी, यही इस योग की पहिचान है। एक हीरा मिस गया तो दर्द मही, ह नए हो गया तो सोम नहीं । न किसी से राग, न किसी से रेप, इसी का नाम समता है। कार्य सिर हो गया तो ठीक है मसिड समावो ठीक यही समलपोग ।। समय समय पर मान-कम्म के बारा मास्मा में उबे नीचे मात्र उत्पम मा करते हैं । कमी हमारा ज्ञान हमारे बानन्द का फरण बनता है, कमी हमारी सपम हमें दुम देने लगती है । कमी केई फर्म हमें असम कर देता है, कभी किसी कर्म को करके दम परताने साते हैं। मान-कर्म के यह उपायमान हमारे मन में होम उत्पम करते पते है। किसीने माके कह दिपा निवझे ममुकम्मकि एक सहस रुपये देग्न । दी निए सुनते ही बोरगत् में एक वाम सरा हो गया । जिस प्रका एक रोग मनुम्प को गाना पीना कुछ ममा मही सगा, वह रोमवेदना से पटपटाता रहता है, ठीक नही दण इस की ो वाती है। अपसाबसा सब कुष मुखा देती है। इसी प्रकार किसी ने कर दिया कि माम सेतुमे सेवा कर्म करमा परेगा, पीलिए समय उत्साह मन्द होगया । यसमो पुस्पाम बान- कम्भ इन चापमा में सतत प्राच रहता इमा मी निस्य निई हत्या,मोन कमी माहास करता, म कमी अनुपात करवा, विपास कीलिए उसे राम्पबुखियोग मिल गया । ऐसे भीर की प्रका (पुम्बिसहरु मन ) सर्वमा स्पिर हो जाती है, क्या कि उसने प्रधिम्पग छोरते गए माम- प्रविध को भपमा लिया है। ऐसे म्पक्ति की बुरि मन के माधीन हो जाती है, उपेक्षा- माप का उदय हो जाता है। फसत सतत पियों में प्राच रहता इमा भी यह निर्मित रात है। इसका वपमा इपासमान्य टूट कर ईपरेचा में अन्तत हो आता है। इस वो "भिया फर्मालिन फरोविम तिप्यते" या भवस्था हो जाती है। इसी मैराग्पादि योग का विदर्शन कराते हुए मायन करते हैं योगस्था फरु फर्माणि सह स्पसा पनमप ! सिदपसिदयोः समो मुस्सा समर्स पोग रयते ।। (२२)। १ २० परिसर का मप्पिभूमि - - - पतनिय सर्गों पेषो साम्पे स्थिते मन' । निदोष हि सम प्रम तस्माद्ब्रमणि स्पिवाः ॥ (१)। 1-समृनस्पमात्मानं सर्वभूतानि पापनि । दिवे योगपुकारमा सीप समान ॥ (२३)। भास्मौपम्पेन सर्मप्र सर्म पश्यति योऽर्जुन! सुसमा पनि पादप स योगी परमे मवः ।। (१)। है भनुम तुम प्रासटि छोर पर (पैराग्यसपत्ति प्रार करते हुए ) योग (युकि- योग) में प्रतिष्टिव हो पायो। सिदि पर असिमि में पपने भापको सम ना हो। क्योंकि समय ही योग कहा मता है। माद निस नि राग-पकिर पासलको बोरते र म पग्पतमसुरियाग का भयप स सोग, उस दिन वह मिसरहा मम पोगा मामा में प्रतिष्ठित होगपगमे। उस दशा मेन सिद्धि से तसे होग, मसिद्धि में प रोग, पर्पोकि योग की यही महिमा है। प्रात्मयोग सपमुष समागम उस पर प्रतिलिन हो जाने से नियम को अक्सर ही मिलता। नि मोगियों का मन समत्स्योग में प्रतिष्टित हो गय, मोंने इसी सोक में, इसी शरीर से सम्पूर्ण Rिपर विजय प्रास्त कर लिया। पारण स्पछ । दपस्प अव्यया। “सम समपु मूव तिष्ठन्त परमरपरम" के अनुसार सव सम , भविषादि दोषो से एका हता विनिर्मुल ।। पि गए मपनी पुरि का जिन्होंन इस दयस्प सम एवं नियम सांप योग कर दिया, जो प्रम में प्रतिष्ठित हो गये भरपी मिसमासपण सि पर लिपप रापिरिपाक सपा अनुमान से पहेतु उभियोग करे सिद्ध करने वाला, तर "पोगपुक्तारमा' मम स प्रमिला योगी सौर ममानम्मा से कर्मानुष्टान में प्रत रहता मा भाने माप को सम्पग भूतों में प्रतिदिन ऐसता है, एक सम्पूण भूतों को अपने पारमें प्रति ता । तारपथ्य पामिनिस का निराक भ परम सम्पूर्ण मरस में परिपाटि माप्य भूमिका ॥ मानबुद्धियोग , पास है, एक सम्पूर्ण विरण उसके गर्म में प्रविध है, इसी जास्मीयता से पैसे उस का किसी के साप म राम है, नप है, तब वैराग्यमुनियोग राबव्यय का साशत् करने पासा गोवारमा (शारीरका (मा) बम्पप के साथ सममात्र को प्राप्त होता हवा दम्ममावों से पृपा हो जाता है। हे गर्डन ! जो (महापुरुप ) अपने ही समान सर्वत्र देखता है, निम के दुसहो पपना पास सममता, विरम के सुर को अपना मुस सममता हैवही मेरी ष्टि मे श्रेष्ठ योगी है। अर्यात मान-ऐश्वर्य - धर्ममुदियोगों का धनुगन करने पाशे भी योगी माश्य कहलाते हैं। परन्तु इन सबकी अपेक्षा समरसपस राग्यपुद्धियोग से सिद्धि प्राप्त करने पासा पोी ही सपश्रेष्ठ कहा जायगा । गीताप्राप्तिपादित रामपिपिया धारा सिल पैराग्यबुदियोग का पही संहित सरूप गिर्वचन है। - ९-नान-चुद्धियोग जिस प्रकार राग-देपरूपा पाससिका प्रतिद्धन्दी माप "रोग्य" नाम से प्रसिर 8, एबमेश मोर का प्रतिद्धन्दी मात्र हान है। दर्शन ने बान के प्रतिभी इस मोह को “परिया' सर से पास किया है। यपपि दशनमयारा के अनुसार बान के प्रतिद्वन्दी फो मषिपा राप से पास करना भसहर प्रतीत नहीं होता, पर विमान अपादा के मनुसार इसे मरिया ने कर र मोह शब्द से ही पास करना चाहिये। कारस मोह- मस्मिता-मासतिन-ममिनिशम पारों का ही नाम अमिपा । भविषा राम्द से चारों पा प्राण होता है। इस शि से नो अस्मिता मी भपिया है, अभिनिवेश भी भविपा है, नासक्ति भी पविषाद, मोह भी भपिपा है । परन्तु जर पाएँ रे पपक मामों पी एम गणमा भरेंगे तो उस समय मोद को मोह ही करेंगे। विज्ञानपर में-"प्ररिपा-स्पिता- गाईपा-मिनिरेगा: परगा' सि पाने में "पोस्मितारागापामिनियापथ फेगा" होना चाहिये । मातु हमारी मुदि में मेरश, राि प्रति पीना से मोर फा सामान्य रहता है। इस मोह के समय मे पुरि मी मुग्ध बम बाती, मुद बाईस * मापभूमिका सहियक नए हो माग है। हमने पूर्व प्रकरणों में भारमा को शानकर्मस्य पाया है। साप दी में पह भी बताया गया है कि पाप्मा की कग से कान के सम्पान, मन्पयामान प्राान मे से तीन पर, एक पर्म कभी समर्प, पिफर्म, माम्म भेद से तीन । प है। नियर ज्योति मभ्यमान है, इसका उत्तेजक किंवा अन्य करत मुकर्म (निधि एपण नियम पम्म) IBाम कर्म के प्रभाव से जिस में इस निरापरस र ज्योति मप सम्यान का उदय हो जाता है उसे ही जीवन्मुफ, विदेशमुस "मुस्कास्मा" का माता है।गताबी परिमा।मुमार यही "मिद" करता है । इसी सिशस्पा के सम्मम्म में-- "पहनी जन्मनामन्त शानदान मा प्रपपते" मानान्मुकि" "शानाम्नि सर्व फम्माणि भस्मसार पुम्नेऽमुन" 'उदाराः सप पर्वते हानी सास्मर मे मतप" इत्मारि सिमाम्त प्रसिद है। मलिन ज्योति कम्पपा मान । यही साप्पारस्या है। इस मास्पा मे मुप्त म्याट फोही गीता ने "पारसतु" । भावरण पान है। यह मामापा है। प्रमाण का (बामग्पो का ) दोनों से सपा भात हो जाना पहामाकम्पा है, भानामार ना माम महान महीपति मान समास्तर भारत शनीका माम माम। सी मशमारत रान को, चि मारणयुक्त मान को "मो" कय जातामा कि भमाननादत मानं तेन मुपम्ति ना' 'पादि से सर । का प्रारम्पोति का रासा मभिमा है। मानणे "प्रपेनस'' 4 । यि सौरिक, केरल भादानियामपमैथुना। मामRक नियों को ही परम पुरुषाप मानने वाले एसे मरमाप सामो के रिपे ही मगधन् को “मशानरिमासान् विदि मष्टानपासः" इस बनु शले का प्रदेशबाना पामे मतानियों से तो गारयोरा घर से रेत भरगप रोमी बनता है। निगई माया में भारत की कमी रहती है, उनकाशन मागिका से IMP म पनि मरि तो सदामों में प्राविमी।ब सपही में भाभी, इस पिपिगम सपका भी उप महाराही साम्पारपा. म | नागो मोह। मराशनमुदियोग रगे रायता । पिर । .
दीपाहि मायभूमिज :- समन मुवियोग । - - २-- मोहापापम विशुद्ध बानियों की चिमिसा सर्वपा मसभा है । बानमुदियोग के प्रमाम से गम मोह रूप भावरण की एकान्तत: निति हो पाती, तो अन्तति का उदय हो चाय है। यही सिद्धावस्या, किंम पुक्तावस्पा है। इस प्रकार मन कर्म के तारतम्प से चीर भास्पार हो जाती है। १-१-गुरज्योति (गुरसर) सिदास्पा ( युक्तयोगी) मुक्कामा २--महिनज्योति ( मलिमसत्व:) साम्यावस्म (पुचानयोगी )- भारुरतुः ३-मारसम् (पिपुर तम) गैफिकावस्या मयुक्त) यम्पुक्त -सम्यग्बानम् सकर्म (विकसितः) मोहाल्पन्तिकनितिः २-मन्पचासनम् निकर्म ( चिकिरस्य) मोहस्पोशात्मना प्रवेश ३-महानम् मकर्म (मसाप्प )- मोहायन्तिप्रवृष्टि उरू वानों पानपर्यो, एम सीरों कर्मपयों का परस्पर में सर्प होता रहता है। हम पर प्रपत्र में अनुमस करते हैं कि कमी क्षणमात्र के लिये हमारी घुरि में सालिक विपार भाते है, कमी मदिन विचार प्रयहित रहते हैं। कभी हम सर्पमा मद (बहानी) रन माते है। बुदि फुस्मिठत हो पाती है। नी तीनों विचारों के माधार र कमी एम सकर्म की मोर, कभी निकर्म की भोर प्रात होते है। कमी भवान के प्रमाव से "पा करें कोई काम ही नहीं दीखता" ऐसे मदरों का प्रयोग करते हुए सर्पपा मकर्मपय बन पाते है। इस प्रकार हमारी मुदि किसी एक शान-मन्यपाहान-महान-मुर्म-विकम्म-कर्म पर निर्मर मरह पर समप समय इन बों के सपर्प में पी रहती है। प्रारतिक विज्ञान के अनुसार सर्प सा पोम का कारण है। उदाहरण के लिये यो सममिले कि हम किसी स्त को प्राप्त करना चाहते हैं। उस बात की भोर हमारा मम मुक रहा पही काम है। भा उसी वस्तु को दूसग भी चाह रहा है। एक पातु पर दो म्पकिमों के काम ने माफ मरा कर रमन दोनों काों के सपर्ष का परिणाम यह होता है कि दोनों पकियों एक पूसरे के प्रति कोष उत्पन हो जाता है। इस कोष से "इम प्रमुफ पिपप को पारत ६ २८ ना मायभूमिका " इस मानस सरकार र पाघात होता है। हमें यह प्रति ने बगता है कि अमुक पकि हमारे ममिसपित पदप को लेना पासा है। यदि वह न हो तो हमारी इदा फोर्ड याधा न पी । इस सस्कार के मामत से मन हम्म हो जाता है। मन के पोम से बुद्धि मुम्भ हो जाती हैं। वर्गम्यापरम्पविवेक माता रहता है। स्म भुयात् म गाते हैं। अ फोर काम नहीं करती। सामने फोर साह,अपचा नहीं पर मी मान नझे सता, जागते हुए भी सोस । इस प्रकप अनकम्म मिल संभप से उपमर्पित, काम से उत्पा मोष के प्रवेश से समर्षित सस्कारों में जो एक पोम उत्पम होता है, उस बोम से बुद्धि में नो एक स्तम्भ पतिका उट्य होता ही मोहस्पिा समोर माम से प्रसिब है। मगगन प्यास ने इसी को मम्पापम्पा"का है। 'मुग्पेऽर्मसपचि परिपात' (ण स् मनुसार इस मोहालस्पा में भावी वामपस्पा रहती र भाषी समास्मा रावी । जाम- पस्या में चढ- मुम्तमा पीयो चेयए हैं, वे भी या उण्टम होती है। एक सप्ता- कम्पा कमिसमारस्पा जो पाया है, वे मी पहा विचमान है । गत मुग्भारपा में दोगे भास्पापों के मौसम मावा है । यही मित्त ( मन ) परिय। यही कि- प मोह है। इस मेह से भूमि का जो सालाप विपामाग है, इभान हो जाता है। परि साम इस का परम में कामय का गान महा राग) : भारमा यह राकिमी न मा पुगलिया तो हम मादुरी हो जाते हैं। पहानारत मान- कप सार्वजनित मोह में पर पर पा सत्ययुत पिया परता। बिस नि हामोन्य मे मोद नित्त हो जाता है उन नि दम साप निरमात्र पो प्राम हो जाते है, मामा- पम् परत 41 औमिर्म पुदिम्पनिमरिष्यति । भदा गम्तागि निर प्रोतम्याप शुतस्प प ।। (गी०१५) In arरण मेहमामा म से जाम नो शोर, उसपी नितिक मामि भार प्रमिएम हानाठियोग (महेनुप पुदिया ) दिशा - पहिररधि । मापभूमिका मानयुरियोग अदि में इस मान का उदय कैसे, किन उपायों से, कब सम्मय है। इन प्रश्नों के समाधान के लिए मगवान् ने गो सप्तर दिये हैं, उनका संग्रह ही सामपिया है। पानोदय से सिद्धार्थस्मा का उदय होता है, अतएव इस ज्ञानमिया को सिदपिया मी कशा भाता है। जिस प्रकार मनासप्ति पैराग्यविधा का रहस्प पा, एपमेव इस शान बिमा का मुख रहस्य अन्तर्योति है। केराग्य से जैसे आत्मा में अनासरित्रमाव का उम्प होता है, एवमेव शान से अन्तर्पोने का उदय होता। पोतितत्व अन्त'- मेद से दो मामों में विमझ है। दोनों के रक्सपश्चम के लिये सूर्ण्य पन्द्रमा को सामने रसिये। सूप्पे ज्योतिर्मन है चन्द्रमा मी योनिर्मप है। परन्तु दोनों में वा अन्तर है। सूर्य चारों ओर से ( बाहर भीतर सब भोर से ) प्रमाणित है। इसे भपने को प्रकाशित करने के लिये पन्य प्रकाश की अपेक्षा नहीं है। यह अपने ही प्रकाश से पार भी सवात्ममा प्रकाशित है, एष इसने अपने प्रकाश से वोस्प को भी प्रकाशित कर रक्सा है। मवरव सूर्य को "सम्पोति' कहा माता है, यही अन्तर्योते है । घग्नमा पनि के पुत्र माने गए हैं। प्राविहामx के अनुसार अत्रि प्राप्त पाकता का प्रतिबंधक बनता - 1 दा • प्राथमिपा दीदेविया है। बेन में म प्राणो पर बड़े गम्भीर यस्पा का प्रतिपादन हुमान प्राणों की प्रधान रूप से । मादि मानी गा। इन में प्राणो दिमाग है । रान्न परम्पर में रिया भविषा चतुएमी की तरह प्रतिाम्दी है। पि पहिला गम मुम्न्य प्राण है। इसका प्रतिाम्मी सप्राणपिर शापण फरना इम प्राए का मुम्प काम ३। जून को सफेर पना पर प्राणी का निगम करना इमी माण का अन्यतम पम्प है। स्मूलफार प्राणी भी गपसपा के प्रारोमाने पर विप्लस पीला पा जाता है। पहरा मफेर हा जाता है। पिप्राण के निर्ममा जान पर भी गनसमाण का प्रवेश परन सबमर मिनभाता है। मग पितरमासमरा प्रतिश्मदी पिशापमाप है। माम पर भारमण कर उम मुग्गा देना "मका कापरे । पिशित माम का नाम है। पिशितमधति" मुमार पिशित पर भाम्मरण करन पासा प्राण दी पिणापामा प्रारमण से ही निकल पाती है। मीरा सनम फा रोग फग नाता है। नीमय देवमाणमा पनिारो प्रमुग्माय है। परिजन २६ परियार मापमिका ! भानपुबोम - हैं प्रमा धामबद फापों का उत्पादक माना गया है। मार-पापा-मस्ति नाम के तीन सुरें से पामपद विश्व का निमास , वैसा कि पूर्व के मामविपाप्रकरण में विस्तार से मत- माया या है। यही तीनों मामश: प्रषि, मुगु अगिरा नाम से म्याए इन तीनों में गिरा नामक मग्निगुक मी अग्नि-पम-प्रादित्य मेद से तीन भाग में निमक है। ण नामक भाप गुफ भी प्राप:-वायु-सोप मेद से तीन भागों में निमक है। परत पत्रि नामक माग तीन मही है,माएष "न प्रि: इस निधन से इसे अधि कय मात्य है। मरिन पह सौरम्पोति को वापता, अपने पारदर्शकता प्रतिबन्धक धर्म के प्रमाण से जिस पदार्थ में निवास प्रमन रूप से रहता है, उसके बवारपर रहिम्पों को मरा बाने देता, स्क्य नको पी जाता है। इस म्येि मी "प्रवीति-मनिस नियम से इसे त्रि कहा जाता है। सबा हा मा में मविप्राय की ही प्रधानता है। सरेशम में मात्र प्राय मागमन से पामगर चम्ममा का स्करस निमम एम है। मतएव इसे बोपुर मानना म्पायसगत होता है । इसी पति की पा से बनाम में थाने बाम्म सौरप्रकाय भारणा म न कर प्रतिक्षित होता पा वपस गेट बाता है। पन्द्रमा का यो का सर्प का ही प्रकाश है। हाल ही में यह प्रकारा मातर्मुस मी, अपित पहिर्मुस है। इसी म्पेि पम्म को "परम्पोति" कहा जाता है यही पदियोंति है। , -- की दो विमग भा मप्रपा सम्मान में समझिमे । मात्मम्पोति ही मारमा पकवि भेद से दो मागों में निमल हो पाती ।। भारमम्पोति (भम्पयन्योति) मतो की शाम्पोति है। प्रकृतिम्योति परिम्पोति ।, या मूतम्पोति है । सूर्प-पत्रमा-विमुत-तारक- रमा, बुद्धि पर माममम मम इस म मुम्म कर्म है। वीवा मनुप्पमाण है। इसका मणि मी पापप्राण है। मरने से मनावर भारी बो भवस्था रावीपही गापमान है। इस मन पर माश्मण ऐवा है। पापा प्राम्पपशुमाया। इसम मविही पारफ्पपराप्राप है। इन सब प्राय माविषेषन प्रत में ही किया जा सम्वा । इसके लिये पिणस्यापि मच दरम्प। २०१ पाईगाट an मापभूमिका 1 ऐचबुद्धियोग भनि पाहि सब का इस भूतपोते में ही वन्तमात्र है। "मर मान्तमनुमावि स वस्प मासा सरमिद विपावि" इस मोपनिषद सिदान्त के अनुसार ज्ञानम्मोति महा भूसम्पोति की मतपतिया है, वहां "पबम्पोविरयं पुरुप " इस ब्रामस सिदान्त के अनुसार बिना भूत ज्योति के ज्ञानज्योति मी स्वसरूप से विकसित नहीं हो सकती । दोनों का परस्पर में उपका योपकारक सम्बध है। सूर्पम्पोतिहप भूतम्पोति से पुदि का, एव चन्द्रश्योतिरूप भूतज्योति से मन कर समए निम्माण हुधा है । फलस भन्मारमसस्पा में इन दोनों को हम भूतम्योति कह सपते हैं। इनके साप दपस्म मन्तोतिपन सम्पपामा का सम्बन्ध रहता है। यदि इन दोनों म्योतियों के मन में मोह मामक सय प्रमिएको माना है तोमन्तम्पोति भावो गती है। रात बुद्धि मन्तम्पोति से पत्रित होती ई, केवल मतम्योति के पक में भर होती हई चोम का कारण बम नाती है। यही चोम मोह है, पही मान , पानभ्योति- विहीना पुरि का यही अविधाभास है। ऐसी स्थिति में सम्पपमिपा में पुद्धिविधा को बिना किसी रुकाक्ट के मुक्त करने के लिये मोह की निति अपेक्षित है, एव तदप मासोतिसपरबान का मामय अपेक्षित है। वही शान मोह को हटाषेप्प, फलत निराकरण बुर मपनी शान सम्पति से विकसित होती इमारमविधा के साप योग कर सेगी । यी दूसरे पानमुदियोग का सचिस स्वरूप निदर्शन है। इसपेंशन ही प्रधान दम, प्रतण भगवान् ने इस बान विपापरपायक सिरसिपा में प्रधान रूप सेशान विज्ञानापण मन्तम्पत्ति के स्वरूप, एष ताप्रा- स्पुपापों पर री विशेष प्रकाश रावा।। तुष्टि ही इस योग की सफलता की पहिचान है। दुरितच १७ मागों में विमल है। जिसमें मार इन तष्ठियों का विकास देण, पिरपास कर गेमिये, उसे शामयोगनिष्ठा प्राप्त हो गई। ३-ऐश्वर्य-पुद्धियोग मानन्द-विवान गर्भित, मन -प्राण-वनप, अपर-परपुरुष से नित्य सम्बर, बहिरंग पथप्रतिनिशिय, गुण्यावपिलम विचमति का री नाम "पिर' है। इस वर की ईश्वरता पीपर - मायभूमिमा पशुद्धिोग का ही नाम "ऐश्चय" ।। ऐसफ, किला इन्ता मान-नर्म-पर्प में से तीन तयों में बिमल है। कान उसका पहिठा ऐमय है, कर्म उसपर दूसरा ऐमर्म है, एक मर्ष उसका तीसरा ऐप है। इन तीनों ऐपयों से किंग किया ऐषय से ईम सा का शिका (सामी- अप्पच ) ममता एप सम्पूर्ण लिम में विकसित हो रहा है। ऐसाठी इसी इमर के भरा का नाम जीनामा । फस्त इस में भी उन ईपरीयसम्मों का भागमन सतासियो।द ने सिर की पिता के समय में नवान-मर्म-अप यह तीन न मने । यहाँ उपवेद भूत वायुर्वेद ने ली सीनों को कास-कम्म म नामों से न्परा किया है। मन - रमकort, पही कारक है, सिरोपत्र ही इस की प्रतिष्ठा है। प्रण काम है, यही प्रसाद, दयपत्री इसकी प्रतिष्ठा। पर ही वर्ग, पी विष्णु, मामिपत्री इसकी प्रविष्ट है। इस प्रकार अभ्यामसेस्य के तीनों क्यों के सरा हम ईभर की यरवा के साचाद परान कर रो। -ामम् (कास)कासपकम (रत-शिवा) मन २-किया--(कम्मम्मकाम् (फर्म- 1-मा)-प्राम "प्रयंसदेकमयमात्मा' -:-(प)-अपरम् (म-Aणा)माफ मनमामबामप ईमा प्रयपति जसे पान से सगा, हिपा से समयक्तिमान, एप अप से साबित बनता हमा समर्गि, सिंच पुमति मन परामृत मनाप्राण- बामप जीप्रमापति भी "पूर्णमदः पूणमिदम् । यदेपावरमुख पदमुव तदनिा" "पोऽसी, सोडा-पोन सोसा" इत्यादि प्रमाकों के अनुमा इम की शान-किया-पर्ष तीनों हम मियों से पूछ। पशभून मीर में किसी बात की की नही ।। परन्तु थाप दाई शिश के इन तीनों ऐसा से निप पुलिसवामा मी बीमामा मत्सम मसति, एवं अर पित् पनामारे पर मान समय में नहीं मानी, हम उस काम करने में मममम हम्परे पास उस साधन की कमी है इस प्रकार पर अपने जीवन दाम-शिपा-मपटाना पारिजाष्टि -SI मायमूमिका ऐषयपुरियोग विभूतियों की कमी का अनुभव करता रहता है [पान या नहीं, कस पामही, पर्याप्त मग्य नहीं, पर्याप्त मन मही, पर्याप्त गृह नहीं, वहीं से बह मिय गाय, काहीसे पर कुछ दे माफ, इस 'प्र- कार यह निम्तर पब के पीछे अनुधापन करता रहता है पा सब क्यों होता है। इस प्रश्न का उपर पम्मिा नाम की मरिया भाग्मा के वास्तविक विकास को, पारमा के ऐसय को को रोक्ने बाचा माव की परमिता है स्मिपरसने" के अनुसार विकास ही स्मितमात्र है। खिला हुमा पुष्प स्मित है, हसता हुमा मुख स्मित है । मुकुलित पुस्प बस्मिता के मुम्नपामा चेहरा भास्मता है। बुर में नम इस मस्मिता केश का मागमन हो जाता रहता वा मी वारमविकास र गाता है। इस अस्मिता से मनवसपण शोक का उदय से ग्रा, सदा मन मुर्माया रहता है विच अशा राता इस शो को हटाने का ठपाप १ मस्मिता मय को हटाना । मस्मिता तमी ट सकती , जब कि पस्मिता का प्रतिद्धनी ऐर्य गुद्धि में उदित हो । बस मिस उप य से पुदि मफ्ने निपारूप एवर्य से मुक्त हो जाती 1, मिस ऐपर्य के माने से मनचर्यमसिका प्रतिपा अपने माप हट पाती है, उम उपायों का महती ऐवविधा है । इसी को रामपिया करा जाता है। रामनिपा से ऐश्पहतक मुरियोग का उदय हो जाता है, जिस प्रकार हामनियापरपयापक सिद्धविधा कर मौलिक (इस्म बम्तम्पति पा, एकमेव इस ऐपरमपनिया का मौलिक रहस्म ईपरानन्पस्त ही सममना पाहिए । हमारे और उसके उसके मष्प में अस्मिता का भापरण बागया है। इसी लिए इस बाने मसी किरमता को भूत हेहम भूस पाते हैं कि हम उसके एक भरा है, माग है, वपा, पुर। हम यह प्रपद देखते है कि यदि हमें हमारे पास्तमिव एविस कप पा छग तारोहमारे नारमा मैं अपने पाप नीन बार संचार हो पाता है। उदाहरण के लिए भाममारतार्य को सीमिए । हमें अपने मौलिक स्परूप सत्य इतिहास से पमित रसते हुए भारम्भ में ही मिप्या इतिहासों के द्वारा हमारे यो सरकार बना दिए गए कि "इम पहिले, पूर्वयुग में मन पे, अमुम्प थे, बहसी ये, जा पदापा की उपा सना करने वाले थे, विधानशून्य घे"। परिणाम यह एमा कि माम इस मिथ्यासस्कारमाप मंस्मि- परिणाम मा मायभूमिका एपरिश पारण से हम अपने इस पर्व ऐर्य को भूखते हर समयश मस्मिता प्रचारको कर 0 गुणगान करने मो। यदि कोई पुरुष और हमें सत्साहिप (परिक विमानARI PI सम्प इतिहास का पहला देव तुम ऐसे न ये से थे, सो तवकास हमारी - मिता र गती मिस दिम में अपने भासनिक साप का पता ष्ण गाता है, उसी दिन हम अपने मामा में एक मर्ष स का मनुमा करने गते है। इसी बियस के बस पर हम वाने स्प्रेर.ए, एवं हिने ए, पिपीने गर ऐश्वर्य को प्राप्त करने में समर्प होगाते है। दो प्रतिवन्द्रियों में से पारित होने वाले पशि कान में पदि "रे तुम तो अमुक के पराम हो, कोई पह मही रे ! ति से मुक्तता करो' यह मदर पर गाते है तो अपने बराबों कारा पागा होता है, बत्मिा पछापित होगाती है। इस प्रकार ऐसे सको स्परबत बार बासस्ते है, दिन में अस्मिता के प्रभार से रहता हम भी क्व-पौम्स दबा रखता , हो बास्तविक ऐप के परिक्य का देने से आपोप विकसित हो पाटीक पही दशा पर सममिव । सीराम अस्मिता के मामय से भाने मप्रमा ईएम के ऐब से पनि दोवा मा गोरमस्त बन सा । मर एणे म यो समझिए कि प्रतिमा की स्पा से भन्पतियुत मंबामा बुद्धि मी परिमत्यरप मनपा से प्राप्त हो रही है। इस प्रतिपा के प्रमाण से मुष्टि में माने माला पम्प का पेमय भारत सरासत मपादिका अपपप विपा के साप योग मी दोरा । यही इस गीगमा ऐक्य से निप्पुति है। इस के लिए इसे बुद्धि की सीमता बटनी पोरगी। माप में अस्मिता स्टाने के लिए इसे रिसर कोपनम्य उपासना परनी पी। पिसाप तक शन-विधानमविईबर कर मनुष्यान करना पाय । इस उगना के बस से न्यों मों जीवामा इयर के निकट पपुषता बापग्न रयों पों दुदि से पस्मिनपा पविधा का भाषण या भायगा । जिस दिन उपासना सिर को मापार, बीराम सामना उस का भक्त (मग-मरा ) न जापप, उस दिन पुदि से भरिमता र Par ना हो गापार, तर इदि में एसप सप हो जायगा । मी वर्षपणा बुद्धिवासम्पपास रे साप जो योग शेण, ही गर्व मामा मुलियोम कर ।
प्रदिपजी पाणमूमिका I ऐपयायोग सास्य । पर मनन्तवन है। इस की उस मनन्तशति यामागीदार पमने के लिए "सा परानुरक्तिरीपरे" ( याशिससूम ) अनुसार जावे, पीते सोते, उठने, बैठो, चउते सदा उस रिसर में परानुरक्ति (पनन्यमाव से ईरकर की भोर मन फळे बगाना, मनन्वयमाव से पात्म समर्पय ) रसनी पड़ेगी, इससे उस शक का इसमें प्रवेश होपा । मिस प्रकार एक नि- मातीप अपरिचित के पने से एक पावक कुण्ठित हो जाता है, एस समातीप बन्धु के माने से उसकी मुसित वृत्ति उहिय होयाती है । एवमेय अस्मिताहा निजातीय मेय के मामाने से हमारी पुटि कुपित हो जाती है । समातीय रबर बन्धु के संसर्ग से हमारा यह मुकुलित माव दूर हो जाता है, हम अपने वास्तविक रुप को पहिचान सवे है। इस पुनियोग का प्रधान बातम्वन इमर की अनन्य उपासना ६, इसी सिए मगवान् ने ऐमिषापरपापिका इस गारिया में प्रधान रूप से हान-मिशानसयुत, उपासमा लक्षणा रियर की अनन्यभक्ति का ही निरोप रूप से प्रतिपादन किया, मसा कि विधामाप में स्पष्ट हो मक्पा । इस उपासमा का फस, भवर-परस्पण सम्वपप्राप्तिगरा फर्गमाव की सिद्धि । सम्पपपुरुष के विचा-काम-कर्म पर तीन रूप म मे गए है।मानन्द विमान पिपा स्पप से ही पराम्पप का बासकता है। प्राण-पाक् कम्माम्पय है, पेही भर भरपरकता बासकता है। दोनों के मध्य में पोषसीयस नामका मन मतिष्ठित, यही कामारमा है। मन । • विहानग्राम में मनम्वत्त पार मायों में बिमल है। दूसरे शब्दों में भम्पारमसंस्था में प्रषः प्रपा नाम-रूप कम्मबाजे पार मन प्रविष्ठित है । सुख-सुम का अनुमप करने पासा, निपत विप कारण इन्द्रियकोटि में दो पर्वमूत सपेरनीय मन पहिला मन है। इसे ही गन्द्रय मन मी मामाया है। इसी के लिए भपर्वदिवाने "मन पणाद्रियापि' (मपर्षस०) पा मारे। पाए माप-बयु मोर-मन इन परि इन्द्रियों में पो पापी मन है, पर यही पेजमीब मन है। इसी प्रेम परिर्मन सकते हैं। उसपानियों का सबालन करने वाला, अवस्व संबन्दिप नाम से प्रसिन, किन्तु इनिय न होने से प्रनिन्द्रिप नाम से प्रसिद्ध मतान्द्रय मन ही दसरा मम है। यही नाम से भी प्रसिख। इसे हम मम्तमा नाम से मी म्पबात कर सकते है। वीसरा मन मासात्मकइसे दीपिकमार-सत्त प्राम . - परिणामी ir माममूनि वर्षबुनियोग कर दोनों से समय है। पदि मन भर मम्पप की मोर है तो संसार है परमम्पप को भोर । तो मुक्ति है, मफ्ने स्पान पर है तो दोर्मों का समय है। पर-पार-मनो मेदसे भम्पपरपा केहीन - गाते हैं। इन्हीं तीनों के भाषार पर प्राचीनने के शान-मत्ति-कम्ममायके तीनों योग प्रतिष्ठित है। मगर सांसारिक मों में लिप्त राम कर्मयोग है। इसका सारी प्राणममय पर पप है। सारिक कम्मा कर एकता परित्याग करते हुए कर्म- परिस्यागसपण सपास र अनुगमन करना कानयाग है। इस क साही भागदमानमर पराम्पप है। कर्म सम करते रहना, परन्तु इसके निमित, यही मतियोग, रिया सपासना - गुण पारि विविध मामा सेम्पताल मिया सवारचन्द्रपानप्रेम प्रक्ष्मनमन सम्पमसे पार रुपए है।सूर्पस्मानीय विज्ञान (पुखि) प्रकाश सयर प्रमशित होता है। पस मा तत्व इस म्यान माय विनामोलिन मानधनावादही सीमरा पिताम्प म मन है।मम्र इमा हीनदी सभासम्पन भम्पय मनीषसीपममनामीविवाग्मातम स्पसमा इत्यादि मामास मी म्पबात किम माता । परिये ही मनरपाई पीया मन मारमार है। इस पर सम्वमिति, परिणिति मेहसरो प्रभर प्रबितिम होती है। माम विमान की पिनि हरी पतमिति है। प्राण-बाकी पिति ही परिणिति है। अतमिविरुप सम्पपदी पर है,पही मुखिमादी', पी माना है। परिधिविरुप सम्पप सी भरपी गपिमाल पीपममा रे। रोनों मप्प में प्रतिषित, पण मयपादिम मनरी प्रम्पारे। १-पिशामा-माम्ययमन -पोषम्पस प्रम प्राधमनमनः भाममन' चारमा -पितम् मारमन -गुणामामन-मनमन 1-प्रज्ञानम्-मभिमन-मनिन्तिपममा मनिमिपमना दिमन 1-पानीमनप्रियमन -प्राणमन्ः सपा में से प्रतारामन में पिपामा मामा मनका सिर करना परनामी पपना पिताना पानिपप्ररणामी विधम कामा पग में AA(पप पिनिगमन)मा पाइमा प्रमाण प्रतीमारी प्राम्य मारा में 'मरेत् (रकम मपनि-पालनिगमाया भरान्ति)मा माना है। मम्तमनः करगानि - x x ६१.
पराधी नामाणमूमिका पाम मुशियोग समा माफी मप्पस पपप मन है।इस में पर अन्यप के कान माम का मी समावेश बम बम्पर के कर्म माग का मी समावेश है। बतएव भक्तियोगारपर्यायक इस उपासना में कर्म मी किया जाता ६, रारानुपानलपण बान की भोर भी प्राति रक्सी बाती है । या मन मप्पपतित होने से बान-कर्म ( पर-बर) दोनों की महि (पापन ) बना मा है। इनियमन फा प्रहाममन में समस्य करते हुए, दूसरे शन्दों में इन्द्रियसपमतपण योग का मनुशन करने पर विचार मात्मा को इस पराक्रवचस महिए मन के ताप एक कर देना ही भनियोग है। पही मतिनिथ्य की सिदि।कर्म कर रहे हैं पस्तु मारमय, पप । मतएप या कर्म कर्म होता मा भी फर्मकोटि में प्रविए हो माता। १. -भानमः (बानापान ) कर्मनिस्किएको धानयोगः । २-विधनम् -पराभ्यय २. --- उमयाम्पप (कामराना ) उमपनपयो मकियोग । । -वफ्रान्यप (कर्मप्रधान ) फर्मप्राक्लियो कर्मयोगा। मिस पशि में माप मा-पराम्पमसमन्वितरूप कर्मानघनतपण नफर्यभार देख, सिपास कीजिये । उसने ऐरर्पमुरियोमनिया प्राप्त करती। ऐसा म्पति प्रत्येक कर्म में "मग पान की ऐसीरी इप्टा पी" ही पि रसल है। कर्मसिदि पर म पहर्म प्रकट करता, गर्म की बसिदि में व पोम प्रकर रवा, पही तो मैफर्यसिदि है। इस मसरे ऐरवर्ग पुद्धियोग का यही सक्षित सहपनिदर्सम है। ४-धर्म बुद्धियोग प्रातिमुलक बाम एवं कर्म मतगत् की उत्पति के कारण बन गाते हैं। विधान पर यह एक माना हमा सिरत है कि हम जो कुछ तोचते है, जो कह देसवे परम्परा मनापासुभाही पन्द्रमा प्रयिपी माझा प्रा नवम-नव-नदी-प्रोपपिपनस्पति-पग-पकी .
पीरापर- का माप्पभूमिग पर्मबुद्धि -- शामि-कीट-मनुष्प स्पादि इत्पादि नितने पावेतन्मपविष पदापों को हम अपने धर्मों से देख रहे हैं, वे सब दीपने बारे पदार्य हमारे बनाए हुए है। प्रत्येक व्यक्ति अपने भरने निर्मित पदामों को ही वेस सम्वा, एष देस रस । बात चापटी सी मासूम होतो है। सूर्ण शदि मारे बनाए पार, मा इस बात पर कौन विरमान करेगा। परन्तु वानिक करते है कि तुमय ही विपास करना पड़ेगा। इस विश्वास के हिपेम वर्मगद एक परिर्मगत मेद से भारत के दोनि मानने पोगे। प्रत्येकम्पनिकामतनगर सपा मिश्र एम नियत एव बहिर्यगत सत्र के लिये एक है। पतक भापका मन म्पाप्त है l सक मापका मतगत् ग्याप्त है। इस समीप (सपछी) मतमत में अनेक प्रकार के (मा:- मामासमा सकारात्मक ) पदार्प हे ए है। इसी प्रकार प्रत्येक म्पत्ति कर मनीयमगत नया स्त्र। कोई मी पहिसरे के सामीपप्रगत् के पापा को नहीं देख सकता। मापके पास में क्या है मापके लम्वगत् में कौन कौन सम्कार'हम यान मान सकते, में देख सकते । इसी प्रकार पास भी हमारे सपा को मादी जान सकते । माप, एम हम उसी को जान सकेंगे, उसी को देख सकेंगे, जो कि विपम भाप के एप हमारे अमावस पर माता उमा भाप की एप हमारी प्रातिहिया सपवियन भाएगी। जिस प्रकार हमारा शाममपास हमागमतनगद एकमेव यहाँ तक सिर कान पास है, मकरबर का मस्त- मत् है। सपू सिय ईचर कर मनमपात है । सम्पबादि सारे पदार्प इमरानमरण में प्रतिष्ठित है। महा मब हम एक मनुष्य के बानीपसगवरूप मतगत् को नहीं देख सकते, वो सिरके उस पानीपमतमप विश्व को, किंवा विरवातर्गत पूर्णात सूर्यचन्द्रादि पदापों को कैसे देख सकते है। इसी प्रत्यापिधान के भाषार पर हमें मान सेना पबना किनमो पुरते है, हमारा नापा मा देख्ने । हमारे समय की अपेपा र काम स्वगत भी गरिनगत , एवं मप म्पतियों के मन्तमगर भी बहिर्जगत् ।। गरिनगरमापार परम्परे मन्तगत का निर्माण होतामही हमारी शारिप है। पान पपा बानियों का कानाकीपनगर में सूर्ण पिली से सहम गुना पा 10.
विराट- । मायमूमिका धम्ममुद्धियोग पाइमने कमी भाबी बांसों से सूर्य का इतना बड़ा भाकार देगी । बसमम । नग हम सूर्य का पावासविक प्राकार मही देस सकते तो किस भाषार पर हम यह अभिमान कर सकते है कि हमने सिरनिर्मित सूर्य को देस सिया । यही अवस्था मन्य ईश्वरीय पदा- पों के सम्बन्ध में सममि। सूर्य का प्रतिबिमभाव से बतुपटत के साप सम्बन्ध होता है। पा ने मिस सम्पप्रतिविम्ब का पारण किया है, वह उस महाकाय सम्म से सर्वमा भपूर्ण पर है। इस मामर का बना एकमात्र मारा चढ़।। धनु द्वारा प्रतिविम्बित सूर्य का प्रहानमन से सम्बन्ध होता है। पाठ से निम्मित प्रदान पर माए हर इसी बानीय मूर्य लिये बम ‘में मूर्य देख गाहू यह करते हैं । पहान पर प्राण मुथा यही सूर्म्य सांस्का- रिक सर्प सप्कार के जनक हम हैं, सास्फारिक सूर्य के जनक भी कम है, एव यही हम देख रहे है। बिस वस्तु की मत पटसे पर सस्काररूप से मागति नहीं होती, इसरे शम्दा में हमारा मन मिस का निम्म पमही करता म उस का हमें पान ही होता म उसको हम देश ही सकते । इसी माधार पर "पाप मग और भग परम-(प्रमप)' पर किंबदन्ती प्रथसित - । या सांस्कारिक जगत्वान-कर्म भेद से दो मागों में विभक्त है । हम बिनाकर्म किये ए टाली बैठे कुछ सोचा करते हैं नवीन नवीन कारनाए किया करते है। यह कसना पर्प मही माती । इसकी मन प छाप डग माती है इसी का माम बामनित सस्कार है, इसी को गानों ने “मापना' नाम से प्यवान किया है। इसी प्रकार कर्म करने से भी आत्मा पर उसी प्रकार से एक पाप सग मानी है, जैसे कि बाल मिही पर पैर रसने से एक टप्पा ठग गाता है। यही कर्मननित सस्कार है, इसी को "पासना" माम से म्पररत किपा है। मारना-पासनामक सस्कारपुन ही हमारा अम्त बगद है। इन सस्कारों की आधारभूमि बाह बंगाल के पदार्प ही है, पर मान लने में कोई भापति नही है। उदाहरण के सिपे हम पान शन से पपने मान के पातस पर ही एक मकान बनाते है । मकान बन कर तैपार हो जाता ६ पापानीय मकाम है । इसमें बहिजगत् ( शरीपनगत् ) के ईद परमर रस कर इसे हम २०१ पहिरमति माष्पमूमिका है पर्मयुनियाग बहिर्जगत् का रूप दे गमता। यदि शनीय माम की सीमा से बाहर कोई १ फत्पर ( शिल्पी के दोष से ) सम माता तो उसे या तो हम निकाग देते हैं यदि उसका मि- कसना अमुलधाममकantarपहईट पत्थर समरे मम में स्टा करता है। इसी प्रकार प्रपने हातीय पिपासस्कारों को बनिगत् की क्तनाने के लिये हदे कागर, स्पाही,सिनी लिपीच का भाजप सेना पड़ता है। सीबस्तुभो में जीवरि दोमो हिरियों शिम का समय है। एक मगसी पर विशुबईम का न हमारे मन्तमगत् में प्रतिष्ठित ची सास्कारिक नगशी पर विराट जीन का रिम्प है। हमने माने इस क्तगत् के पर के पधार पर काटमार कर उस ईश्वरीप ष का सत्कार कर उसे मापीये के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। इस परिसर में दोनों के शिम्प है । प्राकृतिक पदायों को दो कर मनुष्य मि बित मितने भी पदार्थ है सव में दोनों का समय है। बस इसी तमाक्ना का नाम प्रमि निदेश। पाहमने किया है, यह हमारी रचना है यह हमारी कारीगरी, पर हमारा सेको पाएमारा पुत्र पा हमारी सम्पत्ति ! पादि भावेणे कोही अमिनिवेश करा पाता है। बस्तुत देखा जाय तो उस ईररय जगत के सामने हमारा एव हमारे मन्वनगर का कोई माप नही ।।हम उससे कोई पक् पदार्प मही है। हम उसी के भय, ही है। मिन बुधि, मन इन्द्रियों के बा पर हम हमारे मन्तवत् का निर्माण करतेवेसम फरण ( मापन ) सरीप सूप्प पत्रमा भग्नि-वायु पन्द्र मास्कसोम दिक्सोम के प्रपण। गिस शरीर को हम अपनी सम्पत्ति सममाते हैं, परीप पार्पिक पदार्प का प्रत्परामात्र है। गुस-योपित समन्वय से उत्पच बिन पुत्रादि को हम अपना सममने का अमिमान करते है इनके मूब मत गुरु गोपित रिपरीप मोपषि-वनस्पतियों के प्रत्यछमात्र । मिदर्शनमात्र है। मम्पारमसस्पा के परमाणु परमाणु का निराकान कर गहिये । सर्वच भापको ईश्वर की विमति के दो दर्शन होंगे। फिर हम क्या रहे हमरा वतर्मगद क्या रहा संस्कार क्या ये फक्त अमिनिवेश का क्या मृत्य रहा। - माप्पभूमिका पम्ममुग्विार रो' । - - घोर-पोरतम इस प्रमिनिश नाम के पाप्माने ही हमें उम से पृपा कर रखा है। मन कर्मम नस मावना-वासनामकामा अभिन्नवेश न ही हमें " बसुश्व कुटुम्बकम परीप विभूति मे पछिन कर रस्सा है। चमिनिशखमएस गदक इन सरकारों की जननी है “ममि" । प्रवृत्ति से ही पारमा में संस्कारों का उदय होता है | "पर हम स प्रनगर, एम उस अपना नाम तो प्रम्छा प्रमुक मस्त पारो पन माप सो माया " यही प्रवृति है । इसी से संस्कार का उन्य होता है । मनोचि का मावेशप्तक तसद् विषयों के माप प्रहार होना ही प्रासि है। यही प्रवृति धन का मुस कारण है। उक्त मारेशम लिस इस प्रवृत्ति मे हा मस्कारा ठप्प होता है, टीम इससे पिपरीम निति रूपमा पेश से कम्म करते रहने पर भी सरकार उप नहीं होता। ऐसे साड़ों रराम पाटयों के सामने रम्ये जासकते हैं कि जिन में प्रकृति के कारण सस्कार देना गया है, एष मिदृषि के पारण सरकारों का प्रभार देया गया है। संमार में हम हजारों पदाप देखते है परन्तु ममी का सम्मार अरमा पर ही नहीं होता । निम पार्य के माप मामा का पारेशता, पी स्मृनिपटठ पर दिन होता है। प्रतिदिन साविक भोजन करने है । मुबह का बाम ग्राम को भी याद नहीं रहता । परि रिसी पापविरार पर मन का अधिक मुना हो जाती है वो उस पाप का सरकार आमा पर जम जाता है। जितनी भी नये है सब निर म्तर अपना पाना काम करती रातो है । भास निरन्तर कुछ देगमी गती है, प्रोत्र निरन्तर पुरु पनत रहने ।, प्राण निरन्तर पुर मना रहता है मन निरम कुन निम्तन करता रहता है पुदि सतत दुष्प विचार किया करती है । परन्तु सादीन से सरकार उरम महीने मर्ग में रन ए रम देय भी है, सुनते भी है, मने भी है मनन मी बाग पहने विचार भी पिया करते हैं, फोरकरण पुर पार नही है । परनुममा म्लों का राका, माता, समपारों का घर माने पर में स्मग मी नहीं रहता। पद निरिकी महिमा परि मी मामियर पर शामिरपाधगिर पर, वागविरार पाम चापेश माप मन । प्रपोग करते है तो प्रतिमा आगरा मे तय नन गप गे पो बनना चपगर मित गना। - बर्दियापि ना मायभूमिका पम्मबुद्धिपाग. पाठकों को यह स्मरण रखना चाहिए कि कम्म मा धन का कारस मही है। अपितु कर्मयनित साकार घन का मुस है। प्रत्यक्षप्रमास यही छोक मे बाकर्म में नियत अधिक की कोई निम्दानी होती । कारस उसकी प्रति मारने की माया अपने अधिकार कर्म का पालन कर रहा है। समी इन्दिए सतत कर्म कर रही, पिर सस्कार क्यों नही होता क्यों नही विमा सरकार के इम में पोम का उदय होता! मों सस्कारमात्र से बिना मी कर्म के पोम उत्पम होगा नी सारी परिस्थितियों से हम इस निषप पर पाको । लि ही कर्म प्राथिम्स क यमता हुमा बन्धन का कारण 1, एकही कर्म निधिबक बना हुमा पान । कम्पपेन कर्म अनुध्यान करना ही नितिकर्म है। निहरिमान को प्रधान मानते हुए पदि माप फोर से पोर पातक कर्म कर गमेंगे, तब मी बाना न होगा । परि गान यूम का कोई म्पक्ति निसी पर पापाण से प्रहार करता हो वह दसटप सममा नाता है। मनाने पाद उसके हाप से धोके से कोई मर भी जान तो म्पापासप उसके दया पर सावधानी से विचार करता है। एक बालक की बसावधानी सदा बम्प मानी जाती है। चोरीने पाठों की अपेक्षा पोती की म शाहरसने पालेको विकण्ट बिपा माता है। अपरागों पर मशाह को निरोप महल दिया जाता है। सब का मूठ पस्प पही है कि कामनामय सस्कार पवन मिस है, एक में ही प्रापिम मापेरा के गमक है। हम तो ऐसा ही कोंगे--पारा कौन क्या निगाड़ सकता है। इसी का माम माने। यह उम सकारों की प्रेरणा है। पी भाषेरा मिनिमेरा, यही ठपद , पदि दुराग्रह है। इस टोप को खोने महामाया माना है। मिमिति की निरिसा करमा साधारण काम नहीं है । "तुम कुछ भी कहो, हम नहों मानते" इस दुरामह की मा निरासा को गाय । मा मोर मोर शावकारों में "न म प्रतिनिविष्टमूस बनषित मारापपेद' का कर ममिनिवेश की विपिसा सवा पासमा बचा दी है, हमारा PAR पर्मशुद्धियोग्याप इसकी मी विकिस्सा मतस्ता ला समिप बन रहा है। प्रारतिक चिम्पनियों के संघका ही माम "प" दूसरे शब्दो में प्राकृतिक कर्म ०४ पदिणाधि l माप्यभूमिका घम्मधुरियोग या का ही नाम पर्म है, एवं प्राकृतिक नियमों से तरस जाना ती अधर्म है। यही धर्मसस्कार ममिनिवेश का जनक है। हम मही है, हम अपनी भोर से कुछ नही करते, सब कुछ यही कर रहा है, वही करपा सा है, यही धर्म है। हम करते हैं, हम ते 1, हम देते हैं, प्रहति मरुद महता ही धर्म है | मधर्म से अभिनिवेश का उदय होता है। प्रमिनिवेश के भागने से पुदि का प्राकृतिक धर्ममाव पाहत हो जाता है। ऐसी मनिषामुनि प्राति की जननी वनती गई सस्कारोदय का कारण बन पाती है। यही साकार बम्पन के कारण बनते हुए भारम प्रणान्ति के कारण पन जाते हैं। प्रमिनिवेशसषण केरा से सत्पन इस शोक के तत्पन होने का प्रतिव धक यही हमारा सुप्रसिद्ध पर्ममुदियोग है । पुस में धर्म का उदय से, किन सपायों से, एक का हो। इन विषयों का समाधान करने वाला विषाभाग ही "पम्ममिया' नाम से प्रसिद्ध । यही निषा मीता में "मार्पविणा" माम से ध्याताई। जिस प्रकार परानन्पमकि ऐरपर्यपिया का मौलिक रास्य था, तपैक इस बिपामा मौखिक रास्य निहत कर्म है । निचकर्म ही प्राकृतिक है, येही सहन कम्म ,एक पही धर्म है । म्पों पों माप नितकर्महप पर्म का माचरण करते गयगे, स्पो स्यों बुरि से भमिनिवेयरुप सस्कार हटते नाफो। इस चिरकालिक धर्मानुष्ठान से सब संस्कार एकारतात' हट जाते हैं, एवं इसी पर्मरुप निार कर्म के प्रभाव से मविष्य में सस्कारों का उत्पम होमा माद हो पाया। तो उस समय मुनि सर्मपा निर्मड बनती हुई इसी धर्म के प्रमाण से उस पम्पयारमविधा के साप योग करती हई पूर्ण प्रसादमाव को प्राप्त हो जाती है। दूसरे शब्दों में यों सममिमे कि निस्तकर्म से धर्म का मत मरता है, अधर्म निर्यण यमता है। अधर्म के एकान्तवा उद से सम्बक मभिनिवेश मा हो जाता पम्पुतियोगमिष्य प्राप्त हो जाती है। मिसे माप वाम ममम जय परामप-मचेरे सब मानों में पूर्ण प्रसन्म देस, मिस की बाप सदा साविक कम्मों में सामाविक प्रापि देखें, समझ सीनिये उसे धर्मयुनियोगनिष्ठा प्राप्त हो गई। यही इसकी पहिचान है। इस दिवा सम्बन्ध में पदि को पार रन करे कि, बिन कामों से सरकार होता है, परिणाम न्या माध्यमिक पम्मडियाम उन कम्मा को ही क्यों न दोष रिया बाप । न ऐग्य वास, म बजेगी बोमुरी। इसी माघार पर प्राचनों ने मर्पकर्मास्याग सपण समास को उगदेय मी माना है। इस प्रश्न काम सोप्छेद करते हुए मगवान् कहते है न कम्मग्यामनारम्माकम्प पुरुपोप्रनुते । न पसन्पमसादय सिदि सपपिगछति (गी." पर्म छोर देने से कमी नैष्कम्पसपण धान का उदय सम्मन नही है। कर्म पर माग सपण सन्यास से को मो मायसिदि प्राप्त नही कर सकता। कारण है। से एन मारमा का स एषमेर माम्म मी भरमा का स्पर्म है। कम्म छोरना बामा कर मायामा है। भला भरमा कर भी कमी माशमा! मामा मरिनानी, अनुमिति मर्मा है। फसत हमके शान-कर्म दोनों मापा मी वविनाशी है। मिस प्रकार जाम कमी मामा से उपर नही होता एमेर्म को मी भारमा से कभी पूपर मारिया जा सकता। जो पूत पक-'हमने तो सब छोड़ दिया, कर्म से हमारा | समन्द, हम सोपीराम सम्यामी ।" गबर पर मनता को प्रोग्य देते है, महापाकीस्वप पाने वाग्मा को भोप दे क्या उन की इन्दियों में काम करना छोर पाये गोपीनही ! किमि भापार पर पर्म होने का अभिमान पर है। पारसी बामनिवारण सपास का रिपिासपोर करते हैं, उनकी चिरे धनसे भी अधिक रित १ को प्रात काम में लाकर सपालोर रि, मीतर सणा पमही है। परमानम पार पोर मी मानहाविपत वादिग्दरान बनाए । - मगगन् पाते। उम्मेन्द्रिपाणि अपम्प प प्राले पनसा परन् । इटिपाणन पिमहापा पिरापारा म तपो ॥ (गी। माम सम्पमी पम्मों में गाली से भी भागेपी पासरीमोरसेकर, दगर सप मान पा रामापे पर, क्या सीमा सम्पासास परिप्रति 9 भाष्यभूमिका II धर्मयुतियोग गलियों से हम भात्यानसपणा मुशि की भाषा कर रोहै। बड़ी विरम्बना बिरामबान !! बड़ा भम || कर्म पिसी हासत में लूट महीं सकता, इस लिये सोधी नहीं ना सकता । उभर कर्म सस्कार का बनक होता हा वषन का भी कारण है। ऐसी स्पिति में कोई ऐसा माग निक- मना चाहिए कि हम कर्म में रत रहते हुए मी सस्कारों से बच बाय । इसी मार्ग का दिग्दर्शन कराची गई उपनिपाति करती है कुर्ममयो कर्माणि मिमीरिपेठ समाः । एसं त्वयि नान्यतोऽस्ति न कर्म मिप्यते नरे ।। (ईशोपनिषत) कम्पमुल्य प्रति कोर कर पापरवीन कर्म करते सना ही स्न्यास है। कर्म- सन्यास का माम सम्पास नहीं है, अपितु- 'काम्पाना फर्मण न्यास स यास फायो पिदुः" के अनुसार काममा सन्यास का माम सम्पास है। इसी का स्पीकरण करते हुए भगवान् कहते हैं- यस्पिन्द्रियाणि मनसा नियम्यारमतेऽर्जुन ! फर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिम्पते ॥ (गी० १७)। मम्मादिधर्माचार्यों ने- 'पहचं घनिष्ट प द्विविध कर्म पैदिकम्" (मनु।१२।८८1) प्यादि रूप से वैदिक कम्ों को प्रापकर्म, किंवा प्राधिकर्म, निविकर्म किंगा नितिकर्ममेद से भागों में निमक माना है। इनमें प्रातकर्म मइय ही संस्कारों के बमक बनते एक मिनिवेशभषण पविधा के उत्पादक है। इसी वैदिक कम्मों में से पनि प्राप्ति को निकास दिण जाता है तो ये ही निकर्म वम मावे है । कतकरगोवत् पह सांस्कारिक मर्ग को मध हम मन्त्र पानीति धर्मनीति विमाननीति मेव से दीन भर्ष हो । राम मैतिक मम्मों का स्वशरीर से पार्मिक कमों का सूरमशरीर से, पर्व शानि (प्राकृतिक) कम्मो का परपशरीर रूप मारमा से सम्बन्ध है। इन सप विपर्यों की विशेप मिडासा रमने बालों को गिोपनियाशिवाममाप्य १ पण देखना चाहिये।
पहिरष्टि 4 माम्पमूमिका धर्मबुखियोग करते र स्य मी मम्तींन होगाते हैं। ऐसे धर्म सर्मपा मान्य है।सा कि पूर्व में कहा मा भुका -माविया इसी निातकर्म का स्वरूप बताती है। इसी कर्मसापपरिचय के लिप मगलान् ने प्रारकर्म- निकर्मक कि करते ए मनेक प्रकार से समस्तमो गुणों की परीक्षा की है। बिना पुगपरीचा के, एवं कर्मविवेक के निातकर्म का रहस्य सिदित मही हो सकता । बस इस चौपे पर्मबुदियोग, किंग पम्मीतकमुदियोग का यही सवित स्वस्म निर्वचन है।
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१३-विद्या एवं योग के सम्बन्ध में मगवद्गीता
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*श्री ॐ १३-विद्या एवं योग के सम्बन्ध में भगवद्गीता प्रितमप्रतिपाद मुश्यिोग पैराग्य-मान-ऐभर्य-पर्म मेद से चार मार्गों में विभक्त है। इन चारों पुद्धियोगों की प्राप्ति का उदय बतगने पासा बार ही विपाए है । वैराग्यविधा पहिली विधा है, यही गमपिपिपा है। इस विधा के अभ्यास मे युद्धि से राग-ट्रेपमपापा सकि निश्च हो पाती है, पैराग्पदिपोग का इद्धि में उदय हो जाता है। नरिणा दूसरी विधा है, यही सिर मिपा है इसके सम्यक् परिमान से बुद्धि से अमिपा (महान) मृमक मोह निार हो जाता है, मानदियोग का युधि में उदप हो माता है । ऐषम्पपिपा तीसरी विधा है, यही रामपिया है। इसको अर्गम्यता से प्रस्मितामृमक अनार्य मुद्धि से निपत हो जाता है, ऐश्पय्पमुखियोग का मुनि में उदय होगा। बीपी पर्मविपा, पही प्रापरिया है । इसके कारण से प्रमिनियामक प्रपर्म मुरि से निकल जाता है, एष धर्ममुदियोग का बुदि में उदय हो गया। उक्त चारों विधामों में क्रमश अनासक्ति, अन्तर्योविषिरामन्पवा, निसचफर्म इन पार रहायों का निरूपणमा ।भारमविधा की उपनिषदे महापार विचार है, वहाँ हन उपनिषदों की उपनिषद रहस्प) यह चारो मावहै । दूसरे शम्दों में ये ही पारों पार विपाों के निफर्म है। हम चारों में से यदि एक का मी मनुष्यान सफल हो जाता है तो सारीरक मात्मा (चीवात्मा ) देहास्पत प्रत्यगारमा । सम्पयात्मा) के साप (उस सिब पुद्धियोग के मारा ) युक्त होता मा जप की मगसम्पधि प्राप्त कर लेता है। उस दण में पहुचे बाद नीव जीवन र कर मगलान बन पाता है। जब एक एक ही मुनियोग में इतना सामर्प है तो मिस महा पुरुप में इन चारों का, सो मम्म से ही उदय रहता हो, उस की महत्ता का सो कहनाही । A गाय का अभ्यास होता है। B सान का परिक्षान स मम्म। 0 ऐश्वर्महपा मलिका मनम्रता से सम्बर।। D पर्मनमाचरण से सम्बन्म।
बारडराष्ट माध्यमका मुनि विधा क्या है । साप ही में ह भी ए, मिद विषय है कि देवयुग से आरम्म कर पाबता पाय एकमात्र हमारे चरितनायक, पिसोपदेष्ठा भील को ही मिला है। तमी तो वे चारों विपामों, एक पारों पुदिमागों के प्रा कई भात है। तमी मो उन की यह रास्ये पनिषत् “भगवणीनो पनिपत' नाम से प्रसिदई । १-पैरा गमिका प्रपमा मैषा रामपिंधिया -ता-गरपनुखियोगसिदि । २-पानविषा द्वितीया सा सिद्धविधा--तत पानमुनियोगसमि । ३–रेसप्यमा तृतीया' सेवा राबविधा -तत - ऐपयेमुशियोगसिदिः । P-धम्मनिपा चतुर्षी सवा अर्पविधा सता- पम्ममु अयोसिद्धि -वैराग्यविधाम्यासेम मासलेम्दय-तत -बासशिनिचि । २-मानविपापरिधानेमन्तोतिरुवेका- तल-मोहनिधिः । -एपविधामन्पतपा बरामम्पतापाप्त -तत: -अस्मितानिाति । 1- धर्मविपारणेन-बिचकर्मणिप्राति-तत मिनिपेशनिहाधिक। -~ -आसक्तिनिवती 1- गोपपिनाश -सतमा राम्योदया-पता । -मोरमाणे वरियाकिनाश -सब-मोदया -प्तिः। 1-मिसमाचौ-मनपीपमापनम् तनय ऐश्वर्योदय - पूर्णता । -भम नवेशनिगमरम्मों कामित ततधोपोनपा-शामित । में का उपदेश महामारतास में मानसबवित है। महामारत पुरपसा ताप्माम से मगवान् ने बिन चारों विमानों का एप पारों मुश्यिोगों का भर्गुन के प्रति रूप देश दिया है। उपदेश सर्वथा गपूर्व नहीं माना जा सकता | मनुता महाभारत से सास वर्ष परिसे देवपुग के मारम्भ में ही टह चारों विवाए, एवं चारों योग विमान में। भगवान ने पिता में ।
पहिरपनि गा माध्यममिका ५ राजपिविगा उनका एक ही स्थान में ( कुछ सशोधन के साथ ) समायपमान किया है । यह सशोधन, एष सम- माप अवश्य ही एक मप्र वाप्त है। इसी भपूर्वता के कारण पूर्व प्रकरण हमने गीताशाहो इतरशरों की अपेक्षा मपूर्ण, पूण, एव विसरण कहा है । पर इस सम्बन्ध में हमारे सामने प्रश्न पह उपस्थित होता है कि इन बिपायों को समर्पि, सिद्ध, राम, मार्प इन मामों से पचान करने का क्या कारण है। प्रकृत प्रकरण इसी प्रश्न का सक्षिप्त समाधान करने के लिए पारों के समान उपस्थित कुमा। १-वैराग्य चुद्धियोगप्रवर्तिका-"राजर्पिविद्या"-प्रथमा झाम निशान रहस्यवेत्तामों के मतानुसार रामपिविधा माम से प्रसिद यह सम्पत्रिपा प्रभानरूप से प्रारमस्वरूपवेत्ता, रिंधा मोपनिपदात्तवेता रामपियों में ही मिशेष रूप से प्रच लिन पा। गीताफ ममीमांसा नाम के पूर्ण प्रकरण में जिस देरयुग का दिग्दरान कराया गया है उसी युग में सम्पपारा इस विधा का माविष्कार हुमा पा । इतिहास प्रमिर विषपान स्म गीय देवता पे । मगवान् कृष्ण ने ( शमन्तर से ) सर्वपषम विवस्वान् को ही इस राग्परिपा का उपदेश दिया पा, जैसा कि - "इम रिसबने योग मोफगानापम्पपम्" इत्यादि बचन से सिर । विस्वान् यपपि गया ये, मर्पयशियों के मूलप्रपर्सक ये । परन्तु इस भगवदुपदिश राग्यविषा के प्रमाव मे इन का पारमा अपि तुस्प बन गया था। पारमतरय कान्होंने सापाए फर पर सिया पा । किपरिमापानुमार साक्षात्कचा ही अपि करता है, यही अपि ।सी लिये विवस्वान् राजा राने हुए मी गमर्पि कासार । यही राजर्षि इस पैराग्यविधा के सम्मायत्तक हुए जिन जिन सूप्पाशी रामाभों में इम पिपा का अनुगमन मिया, मनु : साकु, मनक मा परि मा रागा रामपि की उपाधि से रिषित हुए। इस प्रकार इस गर्मियों की सम्प्राप में विशव मप से प्रतिष्टत होने के कारण, साप ही में इनके पारादी सोक में प्रवृत्त होने के कारण इस मगदिपा ने पागे भाकर रामपिरिपा नाम पारण र सिपा। राजर्षि ही इसके विग्रप बाता एवं प्रवक, मी अभिप्राप से भगान् ने परम्पराममिम रामपपो पितुः बसा है। - ३१ ना माप्मभूमिम ॥ मिविया रापिपिपात्मक रम्य दियोग 'योग" नाम से प्रसिद्ध एला । रिता में यहाँ मी ही गोग शम्द प्रयुक्तामा है, सर्वत्र उसे एकमात्र मैगपातस पुद्धियोग, किंवा सामाम्पत बुद्धियोग काही पथक समममा चाहिय । केक्स इसी परिभाषा के मापार पर प्रापगता के वास्तविक मम्म पर पहुपने में स सता का प्रमुभवमा सकते है। प्रस्तु हम्म यही कार्पियों के समय से at पर विपा रागनिया काहसाइ, एक्मे योग्णत की परिमाषा के अनुमार पही मुखियोग्य मिका विपा योग नाम से भी म्पस ई है। गीता का पयोग हतप्ररित शान,मक्कि फर्म स्प से क्लिपण है, मतएक इसे इन तीनों से पृपा बताने के लिये प्रेता ने इसे बन "योग" नाम से ही म्पमहत किया है। प्रेता महानयोग को प्रगान ठल्प माती, म मति एवं कर्मफेग को। गीता का प्रपान सप-पर 'पोग। तभी से या योगासनाम प्रसियी। से सपम्मू पम, २-ज्ञानबुद्धियोगप्रवर्तिका-"सिद्धविद्या"-दितीया स्म्यम्म् मनु द्वारा उमाविर देशपुग में देवरियो पृविती, प्रवरित, पी मेदवे तीन भागों में विमल पी । कम्सीन मानवसमान को स्पाम् अन्ना ने पचपि पदिति, पद्यर्पणी, पचमन भादि अनेक मागों में शिक्य किया था। पि पितर देशवा मसर, मनुष्य न पात्रों की समपि पचरुष्टि की।इम पाचों कमरा इन पामि वनवमनु भापा पे। पैसे सत्पत्र पाइलको प्रधान पीविका पी। अतएव यह पवाएि माम से प्रसिदए । प्रामणो रामा प्रसाद, सारा, विराट इन पापों की समति पधिति नाम से प्रसिद्ध पी । पा पिपी के अधिपति पे । इस विस स- समय से ही पक्षिति नाम से म्पत किया गया । जिसे भाग साप रप समीदार करा गागदी देवपुग में प्रामणी (गारका मा विम) कसा माता पा । राजा की मोम, मामोम मे से दो भेखिए वी , समाट् की पार बनी, सामीम में से रोमेखिएं दी। स्पण्ट को इन्द्र, पाम्म्र मेद से दो मेसिए की, एक बाहरारदि माप्य भूमिका I सिमिया मिराट् की प्रमा, विष्णु मेद से दो श्रेणिए पी । ग्रमा म्पपि, देव ग्रामस, मिम इन पांचों की समरि ही पचपर्पणी पी। बिसे नगेकमाषा में "समाव" का गाता है, 'मनुष्य" कहा जाता है, वेदभाषा में उसी के लिए "पर्पणी" शम्द प्रमुक्कामा है। -(देखिये यजुःस०१७३३सा भाष्य )। जिन मनुष्यों में शाम क विकास ( प्रधान रूप से ) रहता है, मनुष्यों में वही मनुप्प करवाते हैं। बान की मानपभूमि प्रामण है। इसी के सह पांचों मेद है । बम्मना प्रमख विप्र है। गाव मामण मामय, शासहानपूर्वक कम्म में प्रहच प्रामण देवता है, भूदेव है । प्रात- सितलों का परीक्षक मामय अपि , सरिहस्पवेत सपा प्रामण बसा है। इस प्रकार विमा (बान ) के तारतम्प से पपड़ी के पांच विमाग हो जाते हैं। पुरु, यदु, मुसु, अण, हुए इन पापा की समरि पवनन नाम से प्रसिर पी । १---ऋषिय (सपा अध्यक्षा) २-पितर । ( यम -चप्पच ) २- देवा (इम -मायच ) 1-मारा (पारुपि -मध्यपः) ५-मनुम्या (वैवसतमनु -अपच ) -पथऋष्टया -प्रामणी--(प्रामाधिपतिनामीदार ) २-राजा - (देशपिति -मोन,मद्यमोगा) -सम्राट् --( राष्ट्राविपति-पती, सार्वमौम) महेना) ५-बिराद -(साषिपप्ति झा, विण ) -+पञ्चक्षितयः -गोत्याधिपति बहिणधि सिमषिफ - मायमूमित्र - -विप्र (बाया मामण') २-अपसर गाजवितामण') (कर्मठपण) ५-ऋषिः ( परीपकसामस ) (सबामणः) - पचचर्पणी -पुर २-पर १ -पवजन ५-मा सपा विमागों में से पारि माम के प्रपम सिमाग में देतामों का जो तीसरा माग, देवपुग में उसी की जमतर देश-देशपानि मेद से रो मसिए पी। तम में रहने पासी प्रमागि "देवना" नाम से प्रसिद पी, गर्पणाव पा से भारम्भ कर हिमालय पर्वत हिमाय मी जोगियों में निएम करने वाली गाविसपोनि माम से प्रतिद पापी दाग में मतरिच बोकपा । इस ARE में रहने वाली यह देवयोनि त्रिपा पर, अप्सरा, पर गवस, गर्म किपर, पिया, गुवरसिद नामों से प्रसिम थी। मारला मन पसी मान प्रवा, परसर्ग मेने पास दमामों के पास शिक पगारादि पर मेवानली मापाप पयोनियों मामा सामान गातियों में "मिर" माप का माल में दो समिपम प्रदेश महामुनि पारिता मामा भा। नमो गिर" ममी म्पनिकामी पनि गसी परिणि पहिर माप्य भूमिका ।। सिविपा . का पोतक है। यह दोनों ही शरद प्रातियों के सूपक है। जिस प्रकार प्रामण माति में मुस- विद्वान समी तरह के म्यकिरहते है, एवमेव सिद्ध शति में भी मूस विद्वान् समी नगर के म्पति थे। साधारण मनुष्यों में सिम राम्द का जो यौगिक अर्थ समझ रस्सा है, अन्तरिक्ष में रान पासी सिर जाति के साप उम यौगिक प्रर्य का कोई सम्बन्ध नहीं है। इसी मिद गति में एक ऐसा म्पक्कि उसन एष, जिसने कर्मवाद का विरोध करते हुए विशुद्ध शानयोग की स्मा पना की । वही मादि पुरुष फपिममुनि नाम से प्रसिद हुए । भागे जाकर इनके हगारों अनु यापी बन गए । वे भी कपिस नाम से ही प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार यो कपिस शब्द मारम्म में म्य वापक था, वही कालान्तर में जातिवाचक बन गया। दूसरे शब्दों में भादि कपल ने कम्म स्न्यास आपण मिस सांस्प (शामयोग का उपदेश दिया पा उस योग के अनुपायी कपिस माम से प्रमिय हुए । कपिठ घकि सिय माप्ति में उत्सम हए थे, मतपय इम को यह मानरिया मी सिदरिया माम से ज्यवान हई । महामारत शास्तिर्ण मोच धर्म की ३०० सप्याप से बारम्भ कर प.. मण्याप पर्यन्त इस कापिलसांप का विस्तार से निरूपणमा विशेष निजामुमो को वही प्रकरण देसमा चाहिये। पास में इस सम्मम्प में हमें केवट पही पतामा है कि महाभारत समकालीन गीतो पदेशकारगारों वर्ष पहिले देक्युगकाठ में समर्पिमिपा के मनम्तर मन्तरिच में रहने गाठी सिद्ध गाति को असहत करने वाले महामुनि कपिल ने सर्पकर्मसम्पासपणा विस सौम्य निष्ट का माविष्कार किया था, एक रिसके भनुपापी "समय" नाम से ही प्रसिद्ध पे, ही मिष्ठा सिरपिचा नाम से प्रसिदईशानयोगामिमामी सिदों में ही इसका निरोप प्रधार एमा। योगशाल की मप्यादा पनुसार यही विधा "मानयोग" मामक योग कासापा। गगर्षि- विषा पदि स्वर्गीय विषा पी, तो पर सिविषा मन्तरिक्ष की मिपा पी। निपट पर्वत से उपर "असुरों के प्रबल मात्रमणों से अव महाराम मुम्म म पम पाम अब बा समा- भार मा कि 'असुरों न सिन्युन राफ विमा सारी रेवभूमि समसापित दाई? मग का माम्मभूमिका ।। गपिन मरिचको सीमा में सामूमि के प्रति समिक्ट ही कपिल का वाम पा । पिए मप्र मिद कुमार गुम पा, जिसकी मा से मारपीको स्मी से मुमपास पर माना पकापा। ३----ऐश्वर्यबुदियोगप्रवर्तिका-"राजविद्या"-तृतीया- अनरिप के बाद मरताप का नम्बर माहै। देवपुग कार में मारत पूपिया रोक कामाता पा । परि अपलों में दौम्पन्ति मरत के मामसम्म से इस देश का नाम भा- रतर्प माना है, परन्तु बस्तुल अम्मि सम्पाप से ही इस देश का नाम मारतर्ष मानमा म्याप मन्त प्रतीत होता है। देवेन्द्र की मोर से भारत के रासोनपात् मम्मि बनाए गए थे। यही भग्मि मारताप के मरणपोषण करने के करण ' मारत" माम से प्रसिदए, जैसा कि- 'प्रग्ने माँ प्रमि प्रामण मारवेवि" पदि मन्त्रमुतियों से स्पर है । भारतीय प्रणा कीरण परना, एवं यो से कर महय कर सग में दाभों के पास गुपाना ही इमके मुम्प कम थे, बैसा कि- 'एपरिदरम्याप भरति' से सिर । मारतर्ष में मनु बारा वर्षाधम म्प सिनमा । भारतीय को प्रपण-पत्रिय-रप- पारगयों में पिमल किपाण्या। चारों पण में पत्रिपोष्ठों के अधिकार में मास Pपा गया नरागमों के प्रभान शास्ता सर्व बातमनु ये सर शम्ने में ही भारत के सम्राट् पे देवेन्द्र रवा गद पे मा विष्णु रिगट पे। भारतीय रागों की प्रधान प्रातिरसरोगसना को मोबी। समामों में समा का विरोग बारण। काशीराम प्रतान, पहागर केप मामा रतीय गमा प्रसिर अगसक हो गए है। इन का सिमान्त पारि सम्पूर्ण कर्म सिमुन्दि से भाभीर मी पानी में निमानसमा पानी में गिरा मिना रिपामाप शोमपपरिण" कोम अपने नाम पमप विमान ममीन दिन मीतर मौतर एम पाम पर पनि रिम पपन पर मायम विनाम रिया परी पवन "याम्पादन एव म निसन अनुमार विर मान मिरामा । बा१४मूठ में विमार माम भापकर पितापनि मात्र सपनाम"नि" बन गण।
पीपयर का माम्पमूमिका पम्मेबुखियोग ही बग्ने पाहिए । फसत नके इस मझियोग्मपर सापक उपासनायोग में जाम-कर्म दोनों का समय पा । इस पापना में फर का समन्ध पा । उपासना सारा पर, एक तदशभूत देवी-देवताओं से विष फडों की भाषा की जाती थी। माज मी भारत में उपासना का यही स्वरूप प्रवलित है, जो कि गीताशा से सर्वथा विस्त ।। उपासना के सर या उपासक विविध ऐक्यों के फसमोसा बनते थे, इसी लिये यह दिया ऐश्वर्यपिया माम मे सिखाई। कि इसक विशेषत रामाभों में प्रचार पा, अतएव इसे रामरिपा नाम से भी म्पमत किया गया । योगशास्त्र की मर्यादा के अनुसार यही भक्तियोग नाम का योग कहलाया। प्र ५-धर्मपुद्धियोगप्रवार्चिका-"पार्षविद्या"-चतुर्थी हम कर पुके हैं कि भारत में राजाओं के अतिरिक मामणसमाग मी एक प्रति टितवर्ग माना जाता था। इनकी पि में न शानयोग का महत्त्व पा न भफियोग का । पा निशुद्ध कर्मवाद को ही प्रधान मानते थे । फा-तप-दामपण, भिगुणभावाफम रिक कमों का सतत अनुमान करना ही इनका परम पुरुषार्प पा । परममामांसक, कर्म को ही ईरपर मानने पाहे इन कर्मठ मारतीय प्रवियों में बस भावेश के साप भारतस्य में कर्मयोग काही प्रचार किया । कर्म (पा ) बस से ही इम्हों में सफो से जनता को निमोहित किया । "पोरे प्रष्ठतम कर्म" " स्पोविटोमेन खमकामो पमेव" इत्यादि रूप से कामनाप्रपान पाादि कम्मों को दी इन्हों ने अपना प्रधान रप बनापा । इनका कहना बाकि वर्णनुसार निस वर्ग के योनिपत कर्म है उनका मनुष्मन ही धर्म है। इसी धर्म से सब कुछ सिर हो जाता है। इसी कर्ममृतक धम्म के समय से या बीपी विपा पर्म नाम से प्रसिदई । कि पर भारतीय प्रवियों में ही प्रधान रूप से प्रतिष्ठित भी, पतरण इसे भापरिपा (अपिों की विषा) माम से म्पपात पा गया, एष पोगशाब की माश के अनुसार यही कर्मयोग नाम का योग कराया । ।
सीरचय - माध्यमिक - मगतिमा + * . - - - - ज्येष्ठा एव श्रेष्ठ भगविद्या इस प्रकार गीताशास से बात पहिल देवयुगकार से ही चारों विभागों का प्रचार पसा आता है। गौनाने कुछ अपूर्ण मही बाछाया , अपितु निरास, से प्रचमित पारों मिया मों का परिष्कममात्र किया है। पर परिफार प्रवरप ही गीता की अपूर्णता कही बासकती है। इन चारों योगों में से पुद्धियोग नाम का राग्ययोग सबसे बड़ा है, सब से श्रेष्ठ है, एवं पही पिता का हदय ।। स एप को निकाल देने पर मीका एक निरपक शामर गयौ मा कि उपसप्प माप्य एवं टीकानों से प्रपच है। मा वि ष में सगा मया , रा- म्पाययोग से अतिरिक्त कर्मम्पामद मानयोग, फमामुगामो मक्तियोग, अमसिम्मक कम्मयोग तीनों ही योग चिरकाल से च भारो है । साथ ही में तीनों के अनुपपी सिब रामा बामणा म प पर सी ची मारही पूर्ण मतामिनिवेश। । तीमी मेने अपने योगों को सर्वश्रेष्ठ, एक सर्पम्पेष्ट बनाने का पा ममिमान करते हुए इतर पोर्गों को अनुपयुक्त मानने का पर्व का साबस करवे मए हैं । इसी सस्कार न मारत यानों पर भी अपनी बाप मगाइ । फसवरूप भारतबप के मिशन भी हम चिरकातिक समारों के मारेश में पर कर दीन दसा लिमात हगए। सवमीशकर-पारपपारि मामाोंने कर्ममागहाण सम्पास को सर्प मष्ठ मत रापा । गुमारिए-पान-उदयनादि कर्मों में प्रवृत्तिमसर कर्मपोग को ही अपना साराम्प बनापा । प रामानुग-काभ-निम्बाक-मापारि साम्प्रदापिक भाषाोंने महिमोग कर ही गुवानुमा किया। नित्पनिपति से युक्त ईयर मी इन माहों का परि में मन तकम्माणगुणाकर दयासु कारसिक अनुमा करने वाला बन गया । इनका यह भर सकारमात्र से पापों को मांत्र में पोने लगे। इस प्रकार अपनी देवयुगकाठीन सम्पनिमृति में पुत्र प्रमाण मारत- पप तीन नियत्रयों से निपनियन बन गण प्रमाण शिर महानुभाषोंने गनिफ्त- प्रासम्म-गीता का मामय लिया । समीने साभिमत योग की प्रामाणिकता सिद्ध करने के हिप प्राने अपने सतना मप लिए इन मां से उन भर्ष करने वालों का असा ठपकारमा - T - - बडिगारपि मा मायभूमिका 1 योगामिनिवेश भयपनी, यह विचार तो छोपिए | इस सम्बन्ध में बतमा निश्चित है कि इन विस्य भयों से सामान्य बनता भवश्य ही सत्ययुत हुई है। गीता का शहरमाप्य उयकर देखिए, आप को डानयोग का ही साम्राज्य मिळेगा । भक्त-पर्म के प्रतिपादक बधों के सम्बन्ध में गौणमा का समावेश मिळेगा। माम्प्रदायिक भाम्प यह रहते मिलेंगे कि गीता केबस भक्तितस्व का निहपण करती है। कही कहीं मग पान् ने जो शान-कर्म का प्रादेश दिया है, या मक्ति का सहायकमात्र । उमर कर्मप्रधान माप्प “यहो दान तप कर्म न साज्य फायमेव तत्" इस्मावि का उद्घोष करते हुए गीता को मिशुव फर्मयोगदास मानने का ही पपामिमान करते हुए मिलेंगे। उधर जम एक साधारण व्यक्ति गीता के मदरों पर रष्टि गमता है सोपा उसे सभी तरह बधन उपठम्भोते है। भाप्प अपनी अपनी करते है सय गौता तीनों का प्रतिपादन कर हमें धौर मी म्यामोह में पाठ रही।म तो पीर ही क्या है सप पर्नुन मी एक बार वो म्यामोह में पागमा पा। यह कहने पाप पा कि मगवन् ! कमी पाप धान को श्रेण यतसाते, कमी फर्म को । में तो भाप के इस विम्म उपदेश से उहटा ठठमान में पा रहा ई० ) भाग हम मी पाठकों के सामने गीता के उन बचनों को उदृत कर देते हैं जिन से वास्तव में स्माम्प नम्म म्यामोर म परे बिना नहीं रा सकत | सपमुप केवब उन वाना के मापार पर हम पह निभय नही कर सकते कि, गीता वास्तव में किस योग का उपदेश देतो। पहिसे प्राचीनामित तीमों योगों के समपफ पचनों पर ही क्रम राशि सहिए- - *-म्पापमी चेत् कमणम्ने मता बुटिनाइन ' वस्ति कर्मणि पोरे मा निमोहमपि शव म्यामिणब माश्येन बुलिं मोइपमीव | तरेर निमिस्प येन में मोजमाप्नुयाम ।। मम्पास कम्मण रुपए पुनर्योगं ५ राससि । समय पतपारेक तन्मे प्रतिमुनिमितमा पीपप मायभाममा । भानयोगमापन १-बानयोग के समर्थक वचन- गुण्यरिपया बेदा निस्प्रेगुल्यो मबार्जुन ! निम्तो निसससस्पो नियोग चे पात्म्मान || १ २-मावि पदा कामान सर्वान् पाप मनोगतान। प्रास्मन्येवात्मना सुष्टः स्यामासदोष्पते ।। (२०५५) २-परमात्मरतिरेक म्यादास्मन मानष । पारमन्न प सतस्तस्य कार्य न पिपते ॥ ६॥९७), १-पीतरागमपझोपा मम्मपा मामुपाश्रिताः। परबो मनवपमा पूता महमाबमागत (ADIH -प्रमार्पण समाविमापी समस्या हुन । पर वेन गन्त मर्मसमापिना || Com ६-सर्याणीन्द्रिपदम्माणि पाणि पापर । प्रास्पसंयमपोगापी शुरुति शानदीपिते ॥ १।२७ ७.पाम् प्रम्पममपामानयाा परवप ! सर्वकालि पार्य माने परिसमाप्यते |) -मपि देसि पापम्या सम्पा पापरुषमाः । सर्वहानप्पा मिन मनरिप्पसि ।। (40) 1-पयासि समिदोऽपिमस्मसात मन ! द्वानामि सम्माणि मम्मसाद कुरो तया ॥ (३७)। १०-नदिशानन सरी पवित्रमित पिपत । दव खर्य योगससिर कामेनापनि चिम्दति ॥ (AES) ११-प्रदात्पमते शान वस्पर संपवेन्द्रिया। शान मममा परी माविमधिरापिगम्धति n care Re बहिणार का भाष्यभूमिका ।। मानयोगवपन १२-योगसन्यस्तकर्माण मानसहिनसंशयप । प्रास्मयन्त न कर्माणि निवप्नन्ति पनमय ! (1४.)। २३-तम्मावानसंमत हत्स्य शानासिनात्मनः । छिन्न सशर्य योगमाविमोचिष्ठ मारत ।। (10२)। १४-सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते मुल रशी । नबदारे पुरे देही नैव नकारयन् ॥ शा। २५-नादसे फस्पषित पाप न न त निमुः। प्रझानेनारत जान तेन मुमम्ति मन्वयः (५) १६ मानेन तु वदमानं येषां नाशिवमात्मनः। तेपामादिसरगान प्रकाशपति मह परम् ॥ (१६) । १७-त मुदपस्तवामानम्तमिष्ठास्वत्परायणाः। गरछन्मपुनराति माननिपूसकरमपाः ।। (५।१७।। १८-मोकार यसवपसो सर्पलोकमरेवरम । साद सर्पमताना शास्वा मा शानिपछसि ॥२२)। १६-रदारा सर्प एवे शानी तास्मेष म मतम् । प्राम्पित स हि पुकारमा मामेभानुचर्मा गनिम् ।। (७१८) । २०हूना मन्मनामन्त मानवान् मा पपपते । पामुदमा सर्ममिति स पास्मा एदुर्समः ।। (१८) । २१-नेपामेमानुकम्पार्पमहममानन म । नारायाम्पास्ममावस्यो शानदीपेन भावना ।। (2011१)। २२-द मानमुपाश्रिम मप सापमागताः। सगऽपि नोपनापन्ते प्रमये न म्पयन्ति च ॥ (३२)। ३-इति वे ज्ञानमाम्या गुपाद्गुपतर मपा। १२१ बहिबारमि मा माष्यममि ॥ महियोगमन पिपयनशेपेण पपम्हसि तया कर (१८६1)। २१-प्रध्येप्पने प य इम पर्प समादमाग्यो । मानयोन तेनामिष्टा स्पामिति मे मतिः ॥ (१८५७०)। उह बों को देखने से पाठक इस निरषय पर पायेगे कि भगवान् ने भारम्म से मस्त तक मवामपरिमागलपणानयोग सल्पि) को ही मुशि का अपतम सापक - बाप है। अपि च प्रशोच्यानपगोषस्व प्रशानदाय मापस' अपने उपदेश के इस बारम्म से मी मालान् यही सरित करते हैं कि पान की कमी से पशमननित मोह से ही मनुम्प का विक नए रो नाता कम्पकम्पबान माता रहता है। इस भरिया को हटाने के लिए रान का ही उप मारपक है । इसी ठोरय को सामने रसकर सापमस्म से का कर्म-मति का गौसरूप से प्रतिपादन करते हए मग पन् ने मर तक पानयोग पर ही विशेष गोर दिया है। इसीलिए मतोपदेश के भनम्तर गर्नुन के मुख से-"नयो मोरा पति- मम्मा सरपमा सम्मपाप्पुत' मा भर निकले है । गीता मिस मनानमनितमोर को दूर करने के लिए अर्जुन के सामने भाई पी, गौर का उद्देश्य सफल हुमा । मधुन का मोह मय होगया । मोहसरा भनुन विस भारमान से बमित होगया पा र उसे फिर प्राप्त होगा । इस प्रकार उपक्रम उपसंहार से मी गाता का शानयोगप्रतिपाइकल ही सा हो । २-भक्तियोग के समर्थक पचन -समूतम्पित यो मा मेमसकालमास्पितः । सबपा पर्चमानोऽपि स पोगी पपिपने ॥ (६५)। ५-सपम्पिम्पोऽषिको योगी शानिभ्योऽमिमतोऽपिकः । कम्मिम्पचारिको पोगी तम्मायोगी मानुन ॥ (६१) योगिनामपि सा पडतेनान्तरास्मना । प्रसारान् ममते यो मा स मे युकदमो मतः ॥ (EPS) ૧૨૨ पविरं चष्टि माप्पभूमिका मफियानवयन 1-सुपिघा ममन्ते मा जनाः एफविनोऽर्जुन ! प्राों मिहामुग्यार्थी जानी च मरवर्पम ।। (७१६)। ते मानी निसयुक्त एकपतिरिगिप्पते ।। प्रियो शानिनोऽयमा स प मम पिय ।। (१७)। ४---यो यो यो यो वर्नु मक्तः अद्यापितुमिच्छति । तस्य तस्याचा अदो सामेष सिपाम्पाम् ॥ (२१) । ५-अन्तयत्तु फम तेपी नद्माणस्पमेघसाम् । देशान् देवयमो या न्त मदमका यान्ति मामपि ॥ (२) ६-प्रयाणकामे मनसायपेन ममस्या पुको योगपमेन पर। भुगेमागे पागामाश्य सम्पन स त परं पुरुषमुपैति विरूपम (104 --मनन्पताः सततं यो मां स्मरनि निस्पगः । तस्पार मुमम पाय निरयपुक्तस्य योगिन ॥ (१५)। ८-पुरुपः स पर पार्य! माया प्रभ्यस्स्वनन्पपा । पम्यान्त स्यानि मृतानि पेन सर्वपित नतम् ॥ (८10)। -सतम कीलयमो मो पनन्तम सव्रता । नमस्य म मा मररया निस्यपुका उपासने ॥ (११) • -प्रनम्याचितयन्तो मां ये मनाः पयुपामते । नेपा नित्पामिपुताना पोगवेग बाम्पाम् ॥ (६।२।। "-पेडपम्यदेमतामका यमन्ते प्रदयाग्मिता । तेऽपि मामेर कॉन्सेय ! पमन्स्परिपिपूर्वकप ॥ (२।२०)। १२-पर्भ पुप्पं फर्म मोप यो पे मरया पयग्छति । तर मास्युपहनमरनामि मयताम्मन u(१।२६।)। १३-अपि पेन सदुरापारो ममने मामनन्पमा । मापुरेप स मन्तप्पा मम्यगम्पपसितोरिस(13)। ३० बपि - माप्यममिका ।। ममिपागलपन -विम मपति पन्मिा गरजान्धि नियन्छति । कोन्तेय ! मतिमानीत नसे मकः प्रणश्यति ॥ (HI) १५-पा हि पापम्पपाधिस्य यऽपि स्पुः पापपोनय । खियो परपास्तपादास्तेऽपियानि परी मविम् ।। (६)। ६-मन्मना मर मदमको मपानी मां नमाकुरु । मामेरप्पसि पुपमाम्मान मन्परापरण - सर्पक्ष्य प्रमरो मन सब पपई। इति मम्मा मान्ने मां दुपा मावसमन्निनाः ॥ (..1001 १८-मयप्पा सनन्यया सरप प्रामेबरिपोऽर्जुन । जात द्रष्टुं प वस्न मपेप प परवप ॥ (111) ११-मग्यावश्य मनो ये मा नित्यपुक्ता उपासवे । अट्या परमोपेताम्वे म चुकनमा मताः ॥ ( १२।२।" २०-ये सबागि कम्पाणि मपि सम्यस्य मम्परा। मनन्यनेर पोमेन मां पायन्त परासते ।।१२१६)" नेपाम समुदापत्युसंसारसागरात् । मामि नपिरात्पर्य ! यस्पावेशितपेतसाम् ।।(१२101)। ११-सएर सर्व योगी पनामा सिनिया । मर्पपिवमनोबुदियों ममका सपे मिया ॥ १ || २२-पेतु पामतमिद पयोर्क पर्युपासते । भाषाना मत्परमा मक्कालेऽधी मे पिया (१२/२. २१-पपि पानम्पपोगेन मकिरम्पमिचारिणी । विविक्तरेयसेपिस्समरविश्रमसंसदि । (३.1) २५- प पोऽम्पमिपारेण पहियोगेन सेरहे।
मार .. भाष्यभूमिका मकियोगवन । स गुणान् समतीस्पैतान ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ (१४ । २६)। २५-यो मामेरमसमूहो जानाति पुरुपोत्तमम् । म संविद ममति मा सर्पमायने मारत ॥ (१९१९)। २६-प्रत्ममूतः प्रसपारमा न शापति न फांधति । समः पषु मृतेषु पदमति लमते पराम ॥ (१८५४।)। २०-मक्स्पा पाममिमानति पागन्यथास्मि वस्वत । सनो मा तत्सतो माता पिरावे मदनन्तरम् ।। (८) २८-ममना भर मदमको मयामी मो नमस्कुरु । मामीप्यसि सरप से मतिमान मियोऽसि मे (१८१६५। । २६-सर्वपम्मान परिस्पम्प मामेर्क गरण प्रम । परसा सपापेभ्यो मोसपिष्पामि मा गुर १८।६।। ३०प इद परम गुप ममक्तेलमिपाम्पति । मक्ति मयि परी फत्वा मापेपप्यत्पसरापः ॥ १८१६८१)। वह बपनों के देसन मे ऐसा मासम होता है कि मानो सम्पूर्ण गीताशव अप से पति तक मशिरस से आप्साबित हो रहा है। एक स्थान र तो भगवान में उम्मी-पानी-पोमि इन सब से मात को उपाचार पर सिम् कर दिया है कि, एकमात्र मगवान् की मनम्पमकि ही उसार का अनम्य साधन , मान-कर्म एर राग्य तो भक्ति के साधनम्पर है। भगवान् की नरधामति ही भारमात्मण का अन्तिम, एन सर्वश्रेष्ठ पाय ।। गर्नुन साधारण जीव पा। पर तु मगरान् ने अनुपह पर उसे पपनी मनम्यमति प्रदान की । मतिरह से ही पान मगधन् के उस विराटनप को देखने का अधिकार प्राप्त कर सका, निसा को शन मर्म-तप का अनुपापी म भार तर देश सका था, म मरेप में कोई दम हो सकता । पभनापति कादीप्रमाल पारि मगधन ने भान पवार में मरने मनम्प मत भर्जन मेहता के मक्तियोग का उपदेश दिया | HAT का मस पर महिपेग दी, २४ गी +7 माप्पभूमिका कम्योपान मही बात सरित करने के लिए मगर न् ने पम्पसम्मप्ति में 'मक्ति पपि पर सामामोप्पत्प मगप' स्पादि सर से स्वर सदों में इतर योगों की अपेक्षा महियोग की ष्ट माना। ३-कर्मयोग के समर्थक वचन- १-म्पपर्पमपि पारप न विकम्पिनुपासि । पादि युदायोऽन्यत् सपियरप न विषते ॥ २॥३१॥ मकर्मणामनारम्माभिकम्प पुम्पोऽनुते । न सम्मसनादेव सिदि सपपिगमति । (art)। हि कधिन घणमपि भातु निष्ठसकर्मरत् । कार्पते पररा कम्प सः प्रहनिमर्गुणः। ॥५.)। -निपत पुरु पर्म सं कम्म म्यायो प्रकर्मणः । शरीरपाचापि पसे न सिदपेवकर्मणः ॥ (श)। ५-पनापदि कम्पमयोऽयम भोकोऽय धर्मबम्पना । (३६) नदय कर्म कौनय ! मुक्तसत समापर : (गई । ६-म्पसन दि ससिदिमास्पिता मनकादयः । मोमग्रामवापि संपश्यन् कपासि ॥ (2001 0- मे पापास्तिकतप्प विपु मा पिन । मानवासासम्म मा एक प कम्पाणि ।। (ग)। ८- मासा जन सम्म परपि मुमत्तुपि । कुममा वस्पात । पूसरे कलम । (at) । 1-माग्प दोपपदिम पम्प मापनीपिणः । पासाननपसम्म न साम्पपिति वापर । (Em)।
हिराष्टि मायमूमिका I कर्मयागरपन यमवानतपाकर्म न माग्य कार्यमा सत् । यो सब पर पारनानि पनीपिणार ॥1) ११-पतः पचिताना येन सर्पमि ततम् । स्वर्षममा तमम्पर्य सिदि रिम्नति मनमः ॥ (१६) १०-प्रेयान् सपो पिगुणः परपाद स्वनुष्ठिनात् । स्वमापनियतं कर्म तमावाति फिलिपप ।। (1८11)। २१-साम फर्म भेन्त ! सदोपपि न सचेत । मौरम्मा रिबोफ्ण मेनापिरिरावताः ॥ (१२५) । २४-सरकाएपपि सदा कुर्वाणा पदम्पपाप्रयः । मतपसादापाप्नोति शाबत पदयम्पपम् ॥ (१९५६) । ५-समारजन फौन्तये ! निपदः सेन कर्मा। हमु नेकसि क्मोन परिप्यस्पोऽपि वद । (१८६.1) 1 क बन स्पए शब्दों में विशुद्ध कर्मयोग की मोपणा करते हुए प्रतीत होते रामगवान में स्पए शब्दों में पाबम्जीवन वेदविहित (भातुमयय) कर्म के अनुमान की भाशा हमें यह बतलाया रिपा कि प्रत्येक पर्ण को अपना अपमा कर्म कमी नहीं करना पादिए । कर्म करता मा ही मनुप शामत सम्पय पद को प्रामो जाता है। कर्म किसी रासत में नहीं छोड़ा नासकता । नी पचनों के भावर पर कम्मठों ने प्राविसपण यन- सान तपोबप कर्मयोग को ही गीता का प्रधान प्रतिपाप विषय माना है। इन का सम्मोकि गीता का उपदेश किस लिए प्राच मा, या निधार लिए । हुन पुद्ध कर्म के लिए संग्राम में उपस्थित हुआ पा । भिपने कुतक्ष्य की वाश से यह कर्म से हटन क लिए उपन मा । बजुन को इस प्राति को रोपने के लिए ही भगवान् को कम्मोपदेश करमा पा। रिप्पे पचन त" काता इम्प भर्जुन पुरवर्म में प्राच गया । इस मकर उपरोपसंहार से भी हम इसी परिणाम पर पहुंचते हैं कि पीना मशुद पर्मपोगमा । फरारूप १२० * याममूमिका सागमा - ही है। एक मकि इसक महापामात्र है। कर्म से हो कि उत्पम बोदी,कर्म से है हान का उदय होता है। शान एक मक्ति तो साम्य है, एर इनका सापक कर्म है। दि कर्मही तो कुल मही . 8-राष्ट्रवादियों का साम्यवाद इकर का स्यय से मिराज रागनीति के अनुपापी हमारे गागदी प्रचलित कार्यय तामो ही पोनों से सपा भिम एक मीन "साम्पबाद" की कसना कर गीता को साम्पयोगशाख' मामने का अमिमान कर है। और सामाकि समतामक बुनियोग- प्रतिपादक हमारे इस माम्प का भी वे सी तात्पर्क सगाने खगे कि सेसाने मुनियोम के पास से हमारे साम्पपद का हो समर्पन किया । ऐसा दश में यह मारकोनाता कि हम मीतक साम्पबादम्बक पुदिमोगा एवं कारपत साम्पमद का अन्तर सष्ट करदें । "सम सपु मतेषु तिम् परमेमरम्"- 'शुनि पेप पारेपपपिता सम दरिना" "समर्म योग पवे' -निक सय प्रम"- 'समोst सर्वभूतेषु' सम पापन सर्व"-"सम सर्वेषु भूतेषु"- 'समः शमी चमि"-"सर्वमतेपु परम" मस्थित यो माम"-"सरस्प चार दि समिसिए:'- 'समासपस: सस्या मावि रमिता सिवानों के अनुसार सम्पूर्ण निब में, लिब मेंने बाली चेतम पम मधेतन प्रजा में सर्वथा समरूप से म्यास उस म्पापक परमारमान को नप में रसाए, इसी भय के म धार पर किसी से राग-रेप न रखते [ए, नमानों का एकान्तत परिमाग करते ए, गोक- माह को मूग बनाते ए पापीन निकामभाव से नाममममीनु भपने अपने भाषि कारक कर्म-काम-मलियोगो में प्रा मना ही गौता र समयमोप मा पहियोग विसका क भूमिका तृतीयस के "बुदियोगपरीक्षा' मामक प्रकरण में विस्तार से निरूपण होने वा।
परिक्रष्ठि * माप्यमिका साम्पवाद "सम्पूण लिन का कोई एक तम्प्रायो है, वहीं मन्नयामीरूप से प्राणिमात केदयों म प्रतिष्टित होकर उनका उनका सवाहन पर रहा है, एक वास्त्रापी 'परिमक पिमक्तपु' * अनुसार इन तिमिम पदायों में अभिमहर से । समरूप से ) प्रतिष्ठित है" इस इमरानुगत भारमसाम्यवाद, किंवा बामप्यापकताव द को माधार बनाते हए भरने समामानुएल कम्मों में प्राव रहना ही समयलक्षण मुदियोग है। ईपरमसक रामतन्त्र ही स साम्पवाद का प्रतिष्ठा है। राष्ट्रवादियों के मल्पित साम्पत्राद का तो गीठा में गन्ध भी नहीं है । कारण इन्होंन गीता की शास्त्रीय मादा का सर्वपा तिरस्कार कर अनीमरवादमुक प्रणातन्त्रमाद किंवा गणतन्त्रात्मकसद की काल्पनिक मिसि पर साम्पबाद का माविरकार किया है। इनके साम्य- बाद का भारमसाम्प से कोई सम्बन्ध नही है। 'सवको समानरष्टि से देखो" इसका तात्पर्य ये महानुभाव या सगाते हैं कि सब को मय फम्म करने का अधिकार है। सबको वनाप्रममप्पादा का (बो दि गीताशाम की मुखप्रतिष्ठा बना उभा है) परित्याग कर मेद म्यवहार घटा देना पा हिए । सान-पान-बिगाह आदि की भर्गवाएं सवपा तोर देनी चाहिए । सब का म्पकिस्व स तन्त्र । को किसी नियन्त्रण में मही रहसकता । प्रग का मघठन ही शासन का मूस सूत्र है। फसत इमो साम्पबाद का पह निष्फष निकला कि "मयारा' नाम की कोई मत मेसार में नहीं है। समयादित पशुमो की तरह उमर घने रहना ही मयादा है । यही साम्यवाद, और गीता इसी निरूपण करती है। कहना न होगा वि राष्ट्रवादियों का उत्सव असाम्यवादरूप साम्यपद निमशान्ति की रशि से पप मयानक खतरा है। हम उन सहयोगियों को निमन्त्रण देते हैं कि उन्होंने गीता मापार पर निस कस्पित साम्यबाद की घोषणा करने का दुस्साहस क्पिा है ये पा प्रमा सित करें कि गीता के प्रमुक सपन हमारे साम्यवाद का समर्थन कर रहे हैं। भम्पपा उमें दयाकरके गीताशाम को कहत करने का प्रपास छोर देना चाहिये । बानी हया से में कुप मी माना,एवं किया करे । परन्तु दु स का विषय तो यह है कि रिता नसे पवित्र शाब को भागे कर मोपी जनता को पोके में गा पारह है।चो गीता पद पद पर वाप्रमधर्म के ૨૨૧ परिवरष्टि | माध्यमिया ॥ तुलना अनुगमन का प्रदेश दे रही है, जिस गोताने अर्जुन को पात्रधर्म पर बाहर रने के लिये उप- देश रिया है चो गीता बामणादि पारों बयों के नियत कर्म वतमा रहो , निम गोता का मुख्य दोश्य शाससिकम्मों का प्रतिपादन 1, उस गीता को नपानमधर्मकामों से सपा बार निकालते हुए मपनी सार्यसिदि का साधन बना तेना सचमुच एक महापाप है । और उसी पाप कर पा फल है कि पोपत्र गीता गोता' का उद्घोष करते हुए मी उन राष्ट्रपरिक के साप साब राष्ट्र की मर्यादा, उस का मारवीपाय, नगदगुरुय मी शनै शनै स्मृविगर्म में विकीम होता चारहा है। प्रदानु भारतीय प्रणा निवी से अवश्य ही सावधानी रहती है। परन्तु मा उसके सामने कल्पित छान्नमति का बाना पशिन कर कोरमा उपस्पित होता है जो शामक्रि से मोटी प्रमा म्पामोह में पा यती है और भार यही हो रा है। बहिरा रा से बम सार पान रहते है परन्तु पर ही में बप विमीयों के भतार में सगे तो मिर मगमान् ही रक्षक है। उसी मगदश से 4 प्रापना करते हुए कि मगइन् । देवयुगकालोन मिस गीतायोग का माघमारत काल में पत्रुन को निमित्त बना कर मारने उयार किया पा काण्दोष से पुन पार पा सुप्त हो गया है। सापी सोग सार्यसिदि के लिए भापकी इस प्रतिमा कोप मचत कर रहे है। ऐसे विषम साप में पुन: वपने राज्यसपर सत्रमूसक, समाषण युरियोग का उबार करने के लिए भापका मानिमाण होना चाहिए । मातु सम्पारा यही प्रपत्रित साम्पबार सपा निमुन मनए इसके सम्मान में गीता का कोई बचन ठवृत नाही हो सकता। इसी मानापमान से यह योग सपा प्रपोगकोटि में प्रमर होकर अप्रामाणिक समय हमा एकान्त ठपेहर्णय ।। परस्पर सापा विम्य मान-मरि-कर्मयोगों का प्रतिपादन कर पाते उस पचनों की तुलनामा समालोचना करते हुए हम इस नियम पर पड़ते है कि मगवान् बनसा पारश में प्रचदिन नेगों भी मी चौर नही मी । मगवान तीनों योगों को ।
बहिण मा माध्यमिका ।। गौवायोग परप मानते है, परन्तु प्राधोनों ने इन का जैसा सरूप समम रस्सा हे, उस के मगवान् पूर्ण विरोधी है। मकर्ममागलप बानयोग में वे यह मैसेवन चाहते है कि कर्म का माग मत करो, कामना का परिस्पाप करो। कामना के परिमाग से कर्म करते हुए मो यह मोग पानयोग बन गया। इसी प्रकार सकाम मक्कियोग में मो ये कामना का रिस्माग चाहते है। इसी प्रकार प्रतिमूलक कर्मयोग से मी प्रवृत्ति का परिमाग चाहते हैं । कामना-प्राति को पोरते हुए भगवान् ने तीनों योगों का भादर करते हुए, लोकसंग्रह को सुरक्षित रसते हुए अपनी मोर से एक चौपे सर्पपा भपूर्व पैराग्पयोग का उपदेश भोर दिया है । इसे मगवाम् अपना मत मानते हैं, असा कि अनुपद में ही स्पा होगपगा । यही गीता का बुदियोग है। इसे भगवान् ने गीता में मुदियोम-योग इन दोनों नामों में से म्पपात किया है। पपि प्रकरणविभाग के अनुसार या योग भारम्भ की ६-अप्पायों में ही प्रसिपा- दित हवा है, पर कि पा मगवान् का अपना मत ६ मगवान् इसे सप्रघान मानते है सीलिए बारम्म से अन्त तक स्पान स्थान पर इतर योगों के मप्प में इस का सम्बन्ध कराना भाव श्यक समा गया है । इसी मुपियोम के सम्बन्ध से गीता के इतर तीना सथोधिन योग मी मुहियोग नामों से ही प्रसिस हो गए हैं। फसत यह सिर जाता है कि मीता एकमात्र पुद्धियोग का, दूसरे शम्दों में बुद्धियोगरूप योग पानयोग, भक्तियोग कम्मपोग का दरी निरूपण करती है। गीता राग्यमुद्धियोग , शानयुखियोग , ऐपर्यमुनियोग, धर्मबुद्धियोगभेदामेम चारों इद्धियोगों का निरूपण करने वाला "बुदिपोगगा"। मारमकल्याण के लिए पीता निम्नलिखित धार युदियोगों को ही हमारे सामने रसती है- १-राग-रेप का परित्याग करते हुए भासक्ति का सपा परित्याग कर यात्रीपन मनासत. मात्र से काम करते रहो। (वैराग्यमुद्धियोग)। -अविषा मामक मोह का परित्याग करते हुए, शरीरयात्रा निमारक कम्म करते हुए मतपविठसहान के उदय में प्रयत्नशील बने रहो। (कानपुरियोग) । - मायभूमिका प. मुर्दिमागलपन १-मस्मिष्ठा का परिस्पाम करते हुए, किमी मी फर की आकाक्षा न करते हुए भन्ने समान कम्मों का अनुष्यन करते हुए, साथ ही में इस काम के समान में- " परता दासी कगाह मावना रहते हुए समईया निम्तन में निमम्न रहो। (ऐसार्यपुद्धियोग । 1-पभिनिमेश का परियाग करते सेक्स पम्पबुद्धि से निहित यादि कर्मा का माप वन भनुष्मान करते रहो। (धम्मबुदिपोग) इन्ही मारी बुद्धियोगों के समर्थक सपन पाठकों के सम्मुस इम्या उपस्थित किए माते है। टन क्यों के भाषार पर पाठक स्क्य निर्णय कर गेममा पीना का म्य , किंवा प्रनिगप विप क्या है ? आरम्भ से ६ अप्पाप पप्पात सर्वमुन्य एक सपष्ट राग-उपपरित्यागपण, सर्वकर्मप्रणबदस बराग्यादियोग का प्रभाररूप से निमपसार है। पहिसे इसी एमक वनों पर दहि रापिए--- १-वेराम्यवदियोग के समर्थक पचन १-पानास्पास्त कौन्तेय 1 शीतोप्पमुखासदाः । पागमापापिनोऽनिम्पा निविधस्स मारव ॥ (२।१।।) पनि म्पपपम्पले पुरुष पुरपम ! सपासमुख पीर मोऽपवसायकल्पते ।। (२१)। 1-प्रतिपन्त इसे देश निरपस्पोका शरीरिण । मनागिनोऽममेयस्प तस्मापुरचस्व मारत ।। (२८)" .---वापिनागिन निस्र्प य एनमनमप्पयम् । कम स पुरुपा पार्य क पातपति हन्ति कम् ॥ (२॥२१)। -सापर्पमपि पावल्प न पिकम्पिनुपासि । भोलि पुरापोऽन्पत् पनियस्य न विपत ॥ (13) महराष्टि 4 भाप्यमूमिका ॥ २० पुरियोगवचन ६-सम्पदाले समे रुस्सा सामाप्तामौ मयामपौ। वसो पुदाय पुग्पस्स नै पापमपाप्पसि ।। ( २१| ७-एपा केऽमिरिता सांस्य बुदि,-पोंगे स्थिमा शृणु । मुद्धपा युक्तो यया पार्प ! फर्मपन्य महास्यसि ।। ( २।३१।)। ८-स्पषसापात्मिका बुदिरेको कुरुनन्दन ! पहुशालापनन्ताश्च पुट्योऽम्पपसायिनाम् || (२१)। १-भोगैश्पर्य्यमसकार्ना तयापाहतचेतसाम् । म्यवसायास्मिका बुदिः समापौ न विधीयते ।। (२।०)। 10-गुरपपिपपा पेदा निरगुपयो भपार्जुन ! निर्दन्दो निस्पसमस्यो निर्योगक्षेम पात्मवान् ।। (२ । ४५ । )। "-कर्मपपेपापिकारस्ने मा फलेषु कदापन । मा फफिलहेतुर्भूमा वे सङ्गोऽस्वफर्मणि ॥ (२।७।। १२-योगस्पा कर फाणि सरस्यपस्या पनमप ! सिम्पसियोः समो मृत्वा समम योग रपवे । ( २ । ४८) १३-दरेण पर फर्म दुदियोगादनमय । मुदौ शरणमनिक रुपणाः फमावः ॥ (२11)। १५दियुको नहावीर उमे मरुतते । तस्मापोगाय पुस्पस्प योग फर्मामु फौराप्तम् ॥ (२।५०)। १५-कम्मन सुदिपुका हि फम स्पस्या मनीपिसः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पर्द गम्मनपनामपम् ।। (२।५)। १६-अदिविमविपना वे पदा स्पास्पति निभसा । समापारपसा बुदिस्वदा योगपमाप्स्पमि ॥(1)। १९-१ सेप्चनुदिम्नमना एसपु विगतः ।
वीरा । माम्पमूमिका - ० युनियन पीतरागमपालोपा स्थितपीमुनिरुत्पते । (२।५६)। १८-या सर्वमान मिस्नम्नवत्वाप्प रामागुमम् । नामिनन्दति म देएि सस्य मा मतिष्ठिना । (२१५७१)। २९-राग-देपबिपुतनु पिपपानिन्द्रिय धरम् । पात्यायरियामा प्रसादमधिगच्छति ॥ (1६11" २.-नास्ति बुदिरयुकम्प न पापुकत्य मारना । म चाभारया शान्तिरशाम्तस्य कुवामुलम् ॥ (२०६८) २१-परित्तद्रियाणि मनसा निपम्पारमेवऽर्जुन ! कर्मेन्द्रियः कम्मयोगमसका स निशिम्पते ।। (३।। २२-यादि कर्मणेऽन्यत्र मोकोऽप फात्मनः । सद कर्म कम्तेप! मुक्कसङ्गा समापर ॥ (३।२।। २३-तस्मादसफा सर्व कार्य कर्म समाएर । पसको पापरन् कर्म परमाप्नोति पुपात (IREI)। २४-सलाः कर्मपपगिसो पवाकर्षन्ति मारव! कुपाहिस्तिपासतापकीर्पोकसताम् ॥ (३।२५।)। २५-इनिपस्येन्द्रियस्पार्प राग-देपो म्पपस्थिती पोर्म पगमागोचौ स्प परिपम्बिनी ॥ (३।१४।)। २६-काम एप झोप एप रजोगुण समुमकः । महारानो महापाप्मा पिदपेनपि वैरिणम् ॥ (१।१७।)। २७ तस्मासमिन्द्रियापपादौ निपम्प मातम ! पाप्मान पमहिने शानविज्ञाननारामम् n()। २८-म विवसते योग मोकपानामम्पयप ।
पासष्ट का मायमूमिका २० दुनियोगपकन विवस्वान् मन मा परिक्षाकरेऽप्रवीत् ॥ (४१)। २५-एवं परम्परामासपिर्म राजर्पयो पितुः। स मानेनेह पत्ता योगो नष्टः परवप ।। (४२)। १०-स एपाय मया तेऽप योग मोकः सनातन । भक्तोऽसि ससा वि राम्प पेचदुत्तमम् ।। (४।३।। ३१-ममा कर्माणि सिम्पन्ति न मे कर्मफले स्सा इति मा पोऽमिमानाति धर्ममिन स यते । (vii) १२-फर्मएपफर्म या परदकर्माणि कर्म य: स बुदिमान मनुम्पेषु स युक्त सम्नकर्मठत ॥(४।१६।)। 1-पत्या कर्मफसासह निस्पतम्रो निरामयः । फर्मयपमिप्रचोऽपि नैप किधित करोति सः॥(४।२०)। ४-योगसम्पस्वकार्य शानसबिमसंग्यम् । प्रात्मपम्न न कर्मासि निवानम्ति पनप (1) ३५-उस्मादज्ञानसंमत इसपशानासिनास्मनः। हिस्पैन संसर्प योग-मातियोचिए मारत ॥ (१।४।। .६-पास निस्पसम्पासी यो न देष्टि न काचति । निईन्दो हि महाबाहो मुस बन्पात प्रमुस्पते ॥ (५) ३७-पव सांस्पैःमाप्यते म्पानं तपोगैरपि गम्यते । पके सांसप प योग च यः पश्यसि स परपति ॥ (५५)। 1८-यागयुक्तो निशुदामा रिमितामा मितेस्ट्रियः । संस्मतास्ममूवात्मा फुर्वनापि न लिप्यते ।। (१७) बादला .* माम्पमिया ॥ ह-प्राण्यापाप कवि सईबासा करोति यः। मिप्यते न स पापेन पमपममियाम्मसा ।। (.)। ० -सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते पुर्वपशी। नबदारपुरे ही नेव कुर्वन्न कारयन् ।। (१५)। नीर नितः सर्गों ये साम्ये स्पिवं मनः। निदोंप वि सम मम तस्माद ब्रमपि स्पिताः ॥ (१८) 10- मापत दिर्य प्राप्य नोद्विगत् पाप्प पापियम् । स्विरदिरसमूरो मसविद् प्रमति स्पित ॥ (०२०)। 1-गरुनोतीष पर सोई मावशरीरविमोक्षपात् । कामलोपोमव ग स युक्तः स मुखी नरः ॥ (२३)। २५-यवेन्टिपमनोबुधिर्मनिोक्षपापणः । विगतकापपझोपी या सदा मुल्क एव म । (२८)। १५-अनामित कम्फम पि कम्म करोति यः। स सन्यासी स योगी च म निरपि पाकिया । (६१) । v६-य सम्पाप्तमितिमायोंग व विद्धि पाय ! मसम्यवसकरपो पोगी मावि मन ॥ (ER) I १७-सम्मित्रायुदासीममम्पस्पदेप्यान्पुपु । साधुपपि प पापेषु समपुद्धि-रिधिपते ॥ (६३)। ४८ तत्र व युदिसंयोर्ग ममते पादरिकम् । यवने पवतो भूया ससिदी कुरुनन्दन ॥ (IN)। तपसिम्पोऽपिको योगी ज्ञानिम्योऽपि मतोऽपिका । कम्मिम्पररामिको योगी ठस्माद्योगी भवाजुन ॥ (IVE) | बहिरट - माप्यममिका - २० बुद्धि ५०-ये मे मतमिदं नित्पमनुतिष्ठन्ति माना । अठायन्तोऽनुम्यन्नो मुम्यन्ते तेऽपि कर्ममि ॥ (३।३१।। ५.-पे खेतवभ्यमपन्तो नानुतिष्ठन्ति म मतम् । सपनानपिमूस्तान् विदि नश-पेतस ॥ (11३२1): "राग-दप हीमधनरूपा आसकि के कारण हैं। इस वासक्तिमप भविपा के प्रभाष से पुदि का स्वामानिक पराग्यमात्र अभिभूत हो जाता है। ऐसी मुराद का परमपिचा (मम्ययारमा) क साप योग नहीं हो पाता ! यहो दास का मूल कारण है। पर्मित रागही काम कोर का ननक है। यह हमारा (णमा क्य) सब से पका रुनु है । इन गुभों का दमन करते हुए, "न्द्रियसयमपूर्वक सोसपा को बप में रसने हुए, साय हो में शानविदित फम्म को भ- पना परम धाराप्प समझते हुए हमें याबग्बीयन कर्ममार्ग में प्रात रहना चाहिये उक्त रचोक इसी सिदान्त का स्पष्टीकरण कर रहे हैं। यही सम्मा सन्पास है, यही सम्घा कम्मयोग है। अपने इस परम्परियोग में मगन् ने प्राचीनाभिमत कामस्यागसपणा सस्पिनिय (हान योग), एव प्राप्तिकर्मसपणा योगनिष्टा ( कर्मयोग ) को पर्याप्त ममालोचना करते हुए पन्त में यह निर्णय किया है कि इन दोनों को प्रपत् ममना बड़ी भूम है। दोनों क समन्त्रित सूप ही कल्याणकर है। इस प्रकार इस मैराग्यानियोग में बान कर्म दोनों का ममप दधा है। प्रचलित कान-मति कामपोगों से पृषक वासाने के लिये भगान् ने इसे केवल- 'योग" शब्द से पचास किा है इम शान-कम्म दोनों ममरूप से प्रतिष्ठित है। मत एव यह "ममतयोग' नाम से मो सम्बोषित हुआ है। समय ही सपा पोग है, सम्पूण कर्मों में पो ही परम उपादेय है। सनकादि रामर्षि इसी योग के अनुष्ठान से कम्मों में सतत प्राच रहते हुए भी बीमुक्त भने है। पतएव में "रियर का उपाधि से विभूषित कि पा गया है। इस योग के पहिले शिप्प मित्रान् मनु पे । देवयुग के मादिक इसका मग- वान् शरा उपवेश हुमा पा, इसी छिपे हम इसे मारपेष्ठ पोग कर सकते है । साथ ही में ।
बहियष्टि मा माध्यमिक - - पर भगवान तरयोगों के प्रवर्तक कपिल रामा-बामणादि पारसिकमोर ( मनुष्य ) पे, एष (स पोग में प्रपर्पस प्रापिम्परिकलीन (अवार) ! इसी लिये यह साश्रेष्ठ मी । मादिकास से पते भाने के कारण इस राम्पपिया को 'सनातनरिया" कहा गया है-"योगः पोका सना वन" (IN) राषियों की इसक विशेष प्रधार रहा है।सलिये हम इसे "रामणि पिया" नाम से भी म्पमाल कर सकते हैं 'एप परभराप्तमिम रामपो विदा । स्वप मपुतमगताम् इस के भादिपक प, इसो लिये पे मगाइपा मी कहा जा सकता है "ये पे मतमि निष्पयनुविष्ठन्ति मानगाः'। भगवान् का मुरूम प्रति राप विषय पही योग पा । पालना गीता में उन्हें पचपि इसी योग का प्रतिपादन करना चाहिए पा सोकसम के सिपे धरातल पर भावीर्याए । उम समय (मरामारास मेमोक में मान मकि कर्म मेड से तीन मार्ग बनममा में प्रचलित थे। एकातर वैराग्पमोग कारी प्रतिसदन करने से मुम्मद उत्पम होने को पाणला पी इस लिए भगवान् ने परिसे तो सर्व- श्रेष्ठ सम्पेष्ठ गग्ययोग का ही प्रति गइन फिपा, और बाद में लोसमा को सुरक्षित रखने के लिये कम्य। तीमो पोगों का प्रतिपादन किया । हो, इसके सम्पद में भगवान् ने सोमन म परप किया । भगवान् के द्वारा सशोषित या तीमो योग भी बुयोगका में ही परिणित होगर। उनी सपोषित रूपा के समर्पक बबन क्रमशः पाठ के समय उपस्पित किये जाते हैं २- ज्ञानघुद्धियोग के समर्थक वचन-- १-मम्पासक्तमना पार्व! योग गुरुमम् भदाप्रयः । प्रसंग समन मा पया ज्ञास्यसि तण ॥ (१॥A ) २-भान dst सविानमिदं वचपाम्पोपवः । पगाला नेह भूयोऽम्पम् शावम्पमागिप्पवे ।। (७।१)। -मनुप्पा सानेपु कपिपतवि सिरये । पतगमपि सिद्धानां कमिम्मा वेपि तसता ॥ (७)। 4 रहियष्टि नामाप्यभूमिका । मानबुद्धि ५-मिमिर्गुणप्यारेमिा सर्वमिद सतम् । मोहित नामिमानानि मामेभ्यः परमम्पयम् ।। (७७)। ५-दमी पेपा गुणमयी मम माया दुरपया ने मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेवा वरन्ति से ।। (९९१)। - मां दुष्कविनो मूगा प्रपपन्ते नराधमा । पापयापहनज्ञाना मार मारमाश्रिता ॥ (७।१५।) 0-तपो मानी निस्पपुक एकमकिपिशिष्यते । पियो विनिनोऽपयमई स च मम भियः॥ (७।१७।। -सदाराः सप एमवेशानीस्वास्मैच से मवम् । मास्थिवः स हि युक्कामा पामेवानुत्तमो गतिम् ॥ (७।१६।। १- पाना मन्पनामन्ते झापान मा पयते। पासुदेवा समिति स महास्मा सुदुर्ममः ।। (७।९।। 10-पम्पकै भ्यकिमापन मन्यन्ते मामबुद्धय । पर माषमानानन्वो ममाम्ययमनुचमम् ।। (७।२०।)। 1-ना प्रायः सर्वस्प योगमायासमास । मृरोऽय नानिमानाति लोको मामजमम्ययम् ॥ (७।२५)1 १२-मरामरणमोशाप मामाश्रित्य यतम्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदु फस्स्नमध्यान्म कर्म पाखिमम् । (७१२। .-साधिमूवाधिदेव मा सापिपई प ये नियुः । मयागकामेऽपि पाते चितुर्पक्तगेतसः ॥ ७।३०)। १५-पन्तकामे प मामेव मरन गुरुम्पा फमेररप । या प्रयाति स पगार यानि मारमा गगपः ॥(८५) १५-अभ्यासपोगगुफेन गा मागगामिना ।
परियष्टि माम्पमिका शानदार परम पुरुप दिम्प पाति पार्यानाचिन्तयन् ॥ (८।८।। १६-मामुपेस्य पुनर्जन्म दुःसामपमणापतम् । नानुगन्ति मारमानः ससिाद परा गवा n (८५) १७ परेप पर तपास पर दानेषु यह पुगयफर्स पदिएम् । प्र पनि सदसर्वमिद विदित्त्वा योगी परस्यानमुपैनि पापम् ॥(८५८) "शान के साथ विज्ञान का समालेरा' ही इस शानयोग में प्रधान सम्रोषम है। जान मामसमधी AAP बिम्समाधी 1ANIर्म पर शि रसाए मात्मचिन्तन करते रहना ही समा गानयोग है। सांसारिक मम्मों से स्टम्प गए, सपही में सामा रिक को स स नियत कर्म पर भारत राने का मादेश देते हुए पानोपपिक को । अनुष्ठान करते रहना ही शानयोग है । भारत के सीमाम्पसे कुछ समप पूर्व ही समर्यश्री रामदास स्थापी, सन्य तुकोबा सभीशाने परमाराम मादि का एक मारम्न ऐसे ही शनयोग के उपासक हो गए हैं। यह सांसारिक कामों से सपा तटस्प र पुरा मात्मपितम में निमम्न थे। परन्त साप ही में समान को पाममानुस कम्मों में प्रातराने का मादेश भी करते थे। यहा प्राचीन छोम सय कर्मों का एकाम्ठत परिस्पाम कर ससार को भी कम होने के लिए पाप्प परते ए साना असमन शानयोग का उपदेश दवे पे व भगवान् का निषेध करते हुए इन पानयोगियों के सामने यही सशेषन उरिफत किया कि कर्म से मागला नाही चाहिए । कम्म बिर की विमूतिमभिक से अधिकतम सांसारिक (ग्राप) कम्मा के कोर सकते हो। साप ही में तुम सम को कर्ममार्ग पर भाबर रखना पड़गा। इस प्रकार मगनाम् न सोषित योग कामरूप हमारे सामने रस्सा। मगगन मनासा कम्मतपय राष्पादियोग के मनाप पक्षपाती मे। सी लिए मोफसमापि से उमने शान पागका प्रतिपादन तो लिषा परतु इस पर विशेष जोर नही दिण । पी नही-"पततामपि मिदाना कधिन मा बधि तमत" "पहना मन्मनामन्ते ज्ञानाम् मा प्रपपत" इत्यादि पर से मापा ने इस समय में अपनी मचि ही प्रकट की बात परकमानयोग कम्मत्याग पहिरकारि - माम्पमूमिका . ऐ० मुठि के साप म्पत्रिभाव की प्रधानता है। इस योग से केवल एक ही म्पक्ति का उपकार संभव है। ग्घर सांसारिक कम्मा में ममासक्तिपूर्वक प्राच एने पवे वैराग्प-मुदियोगी से विष का कल्माण होता है। इसके अतिरिक अम्पक धान की उपासना की सफलता में भी यहा सग्देह राता है। कारण स्पूसकर्म के परित्याग से स्यूसजगत् की मोर मुके हए युद्धि मन का संपम साधारण बात नहीं है । इसा सिए मगवान् को कहना पड़ा है कि "गारों मनुष्यों में कोई एक वो इस अनसिर के लिए यत्न करता है, एक कम करने वाले सिदो में से भी कोई मि रग की मेरे (वम्पप के) तात्विक सरूप को परिधान ने में समर्प होता है" 'सुरम्य पारा नि शिवा दुरस्पपा दुग पयस्सत् कायो पदन्नि" | उघर फग्ममप वैराग्फ्योग स्थूळकर्मपरिग्रह से सपा सरळमार्ग बन जाता है। पिच वैराग्यपोगी साई बल एक ही सम्म में विदेो मन ताइमा वात्मनिष्ठ्य प्राप्त कर लेता है, वहां कर्मविमुख शानी को मारमप्राप्ति के लिए अनेक गम्म योग साधन करमा पड़ता है-"बानो मम्मनाममेत मानवान मा प्रपपते"। अपनी इसी अनमिरुचि (मरुपि) को बतलाने के लिए भगछन् ने केबस २ अध्यायों में ही इसका निरूपण किया है। इसपे तो मशिमार्ग की मधिक सरस है। इसी सिए मगवान् ने इसका १ भम्पायों में निरूपण किया है, जैसा कि तपोगनिरूपण में स्पए हो जायण । इस योग के मुहमपटक सिनजाति में उत्पथ कपिससिर थे, अतएव इसे हम "सिदपिया" नाम से म्पत कर स कसे हैं। इससे ज्ञान का उदय होता है। दुमि हाममपी बनकर मोह का विनाश करती गई मामा के साप पुको माप्ती है। अतएव इमे मानदुद्धिपोग नाम से भी सम्बोधित किया मासकता है। . ३-ऐश्वर्य बुद्धियोग के समर्थक वचन- १-द वे गुपवर्म प्रमरपाम्पनुस्यो । पान विधानसहित परमासा मोपपसेरामात् ॥रार ।
बहिरगाह - मायमूमिका २-राजविद्या रामगु पविभपिदमुत्तमम् । प्रसवारगम पाय पसल तुमम्पयम् ।। (२) । मत्पानि सर्वभूतानि न पार पपरिया। न प मस्पानि भूतानि परप मे योगमेश्वरम् ॥ (५)। ४-मममानन्ति मा मरा मानुपी तनुमाभिवम् । पर मारपमानम्तो मम मूतमारपरम् ।। ( 1111 ५-मारमानस्तु मा पाय ! महतिमाप्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ (1)। ६-सतत कीर्तयन्तो । यतन्तच हवृत्वा । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ।। (१) --मानपोन पाप्यापे यजन्तो मामुपासते । एकस्पेन पपस्मन पापा सिनतो मुखम् । (१) ८-पाम्यहमा पप नियाम्पसमामि । अपर पैप पम्पस सबसम्पाइम न ।। (1) 8-अनन्पापिन्वयन्तो पो ये जनाा पपुपासते । तेपा नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं पहाम्पाम् ।। (१२२)। १०-गुमारामफमेरे मोस्पसे कर्मपम्पनी। सन्यासपोगपुफास्मा विमुक्तो मामुपैप्पसि ।। (१२८) । ११-समोश सर्पमतेपु न मे हेप्योऽस्विचन । ये ममन्तिम मश्या मपि ते सेए पापहम् ॥ (ER)। १२-मपि बन पाराचारो ममेत मामनन्यमाए । सापुरेप स मन्दम्पा सम्पर भ्यवसितो हि सः ॥ (13.। १४२ परिजरष्टि का माप्यभूमिका ॥ ऐ० बुद्धि १५-वि भवति धर्मात्मा शपशान्ति नियमति । कौन्तेय ! प्रविजानीहि न मे मक्का प्रणश्यति ॥ (२१)। १४-किं पुनर्बाह्मणा -पुण्या-भक्ता-राजर्पयस्तथा । भनिसमएल सोशमिम प्राप्य मजस्व माप ।। (३)। १५-पम्मना मम ममको मयामा मा नमस्कुरु । मामेपैष्पसि युम्पमास्मान मनपरायणः ।। (४) १६-मा सर्पप्प मममो मचः सर्व पपर्यते । इति मत्वा ममन्ते मा बुषा भाषसमन्विताः ॥ (1०1८)। १७-मधिना पगतप्राणा पोषयन्तः परस्परम् । फयपवरच मा निम मुप्पम्ति प रपन्ति ए 10t)। १८-पपदिमम्मित्सत्व श्रीममिवमेष पा। सचदेवावगपछवं मम तोऽशसम्ममम् ॥ (१.४१ १६-न तु मां शक्यसे द्रष्टुमननेर स्व पशुपा । विष्य ददामि ते पच पश्य मे योगमैश्वरम् (11)। २.-मरसा सनन्यया गस्य भामरे पियोऽर्जुन ! साढे दर प तस्लेन प्रदेष्टु प परंतप ॥ (१५)। -पेतु पामवमिदं पपोत पर्युपासते । पापाना मस्परमा मकाम्सेऽतीच मे मिया (१२।२०) । छोक में प्रचलित मक्तिनिष्ठा का यह मर्म समा जाता है कि "हमें अपने दुमकी निति के लिए भगवान् की माराधना करनी चाहिए । भगवान् यो दयासु है , काया की मृति है। वे हमारे समपराध, सब पाप पमा कर देते हैं, हमारी सब फाममाए पूरी कर देते है। इसी माफ्ना से प्रेरित होकर मात लोग अपने सल-रब-तमोगुणमानों के अनुसार विष्णु नपा-रव-कासी-मरण-हनुमान् नामनपणा मादि मिम मिम देवतामों की उपासना किया २.
पीपरीष्ट माप्पमूमि - बुर्मिक करते है । परा आपति पाने पर देशामों के माम प्रसाद बोला करते है। विपत्ति दूर होने पर उत्सव मनाते हैं। इस प्रकार इन उपासकों की या उपासना मप से इति पप्पात कामना से भोतमोत ।। परप ही सोनोगसकों को काममामयी तदुपासमाओं से सवाल प्राप्ति हो जाती है। परन्तु यह फममुखी उगसना पसिक मुसका कारस बमती हुई ग्रामत भानरासन से सर्वमा प्युत है । इस में परामित रहना पस्दा, पद पद पर दयता से मप सामा पस्ता, नाम का सामरिक ऐचर्प दस हत्या प्रत्येक कार्य की सिद्धि के लिए अपने माप को असमर्थ पाइए म देवता से मोस मम्स करते हैं। मगमान ऐसे महियोग में भी शानयोग की वरइ सशोषम पाहते है। भगवान् काते है कि तुम उपासना लसी मी देवता को को परन्तु देतमुधि को कराया मा समयो कि तुम पपक हो, उणस्प देवता पपा ।उसे अपने से पमिन समम्मे यही मनम्योपासना वास करोकि तुम उस म्यापक के ही एक भरा बनते हर उससे ममिन्नणे, समी देवा तुम हो। मात्माधि से निकामयुप्मा उगसना करो, उपासना को अपना कम्पकर्म (नित्यकर्म ) सममो इसे काम्प क्त बनायो । “व्यापक की शक्ति हम मागीर बनें" पही उपा- सना का एप बनाभो। उस से म मग ये क्या हो। उसने तो परिने से ही तुम सब एक दे रहा है। केस तमारे और उस के बीच में अस्मिता का अबरस पास।ऐच दुरिपोगनपस महियोग से उस भाषण को हटमा है। एतदम सतत उस पर परि मात्र रसना पर्याप्त है ।यो ममुप्प देवता को अपने से प्रपन समार मामी अपेक्षा उसे समय समझना मा काम्परवि से उसकी तपसना करता है, उपासनातल से पचा मति है। तुम सूर्य थे, तुम मनु बो ठम पनि ऐ मी सब सहो। पही तपाना कब ममन्त्र है। इसी का सीकरण करती ई मनमानसमातिएं करती है- --मा मनुरमा सूर्यमा धीरा पिरस्मि पिमः। मा सरसमा नेपं पृोडा कविझाना परपना मा ॥१॥ मा मूमिमददार्यापार एिं दारापे मस्पाय । - पहिरस्पष्टि +9:माणभूमिका ॥ पनि प्रामपो प्रनयमापणाना मम देवासो मनु केवमायन् ॥ २॥ (एफस० ११२६11-२)। २-प्रारमैनापस्तादास्मोपरिष्टादास्मा पश्चादारमा पुरस्तादात्मा दक्षिण भारमो- तरत प्रात्मैवेद समिति । स पा पप एव पश्यमेर मन्मान एवं विमान मास्मरविरामफ्री प्रास्ममिपुन पास्मानन्द स स्वरार मरति, वस्प समें सोफेषु कामरारो भवति । भय येऽन्यथाऽतो विदुरम्परामानते चम्पसोका मगम्ति, वे सरेपु मोफेवफामचारो माति"। (1 उ ७।२५।२१)। ५-तान्यस्यतानि कम्मनामान्येव । स योऽत एकैकमुपास्ते, न सरे । प्रकृत्स्नो प्रेपोत पनि मपति । प्रास्पेस्मोपासीत । प्रत प्रेत सर्प एफ भवन्ति । अनेन प्रेवत् सर्प पेद" (पादारण्यक०)। मागपत्सोधित इस मखियोग से ऐबर्य का उदय होता है बस्मिता का विनाय होता है।ईभर के साप मापता सम्बन्ध र ण से स्पामित किया जासकता है। मवएन यह योग "नरपामति" नाम से मी प्रसिर । हिज में ईघर र स्मों से प्याप्त हो रहा है, दिन का कि निराद निरूपय भाषापरहस्प में उपमृहित है । इस योग का रागालोगों में विशेष प्रचार रहा है, भतएव यह योग "रामपिया" नाम से म्पपात किया मासकता है। ४-धर्मयुद्धियोग के समर्थक वचन- १- पिपिपा गीत आन्दोमिनिषिषः प्रपा । व्रमम्मपदेय हेसुमठिविनिक्षिका ॥ (३४)। •ास उपासमायोग कोही रामसपा, किंजा ययोग हा मावा है ।यो उत्सवण रामयोग प्र मनुष्मान नहीं करते दे रामभाष से भुगत होते हुए अम्परामाभोस शासित रहता है।
खदिराष्टि + माध्यम्मिम ।। पभुषित 2-प्रमानिसमदम्मिम्पमस्सिा चाम्विरामीम् । पापापोंपायन गोर्ष स्पर्यमापरिनिद्रा (१७)। पिपारणले रेतः महविरुष्यते । पुरुप सम्पदासाना मोकृत रम्पते । (५।२०) ४-पुष्पा मरुविम्यो हिमो प्रकृतिमान गुणान् । पर गुणमहोय सदसपोनिमम्म (111) ५-प एवं पेपि पुरुष मपि गुर। सा। सर्वया वर्चमानोऽपि न स मृगेऽमिमाप (1) ६-प्रम्प तेवमभानम्बा अलाऽम्पेभ्य उपासते । केपि पावितरम्स्पैर पस्प अतिपरायणा ॥(१।२५)। -हस्पैष व कर्माणि शिपमापानि सर्वगा। पा परपति तपास्मानमकर स पश्यति ॥(11)। -प्रनारिवाणिसात परमात्मापमम्पपः । गरीरोऽस्ति प न करोविन लिप्यते ॥ (१३१ सात्तिक निर्स फत्तप। रमसन्त फस दुस-पान वमसा फमम् ।। (१९।१६।)। १०-उपमसमपन्यासमवप मारम्पयम् । धम्दासि पस्प पनि पर्व वेद स पेषित् । (५)। ११-अपमोर्ष प्रतास्तस्प याला गुरुमादा विपपमपामाः। पषम मूसाम्पमुसंववानि कम्मानुवन्धीनि मनुष्यतोके (0) १२-ऐवैविमुकर म्वेम! मोदारशिमिर्नर।। -कर्ममा मुकृतस्याः बीष्टि ७ मापभूमिका He- बठि. प्राचरत्यात्मन अयस्ववो याति परां गतिए ॥(१६।२२)। १५-तस्मागका प्रमाण कार्पाकार्यम्यबस्थिती। प्रास्मा सनिपानो कर्म कर्तुमिहासि |(10) १४-मो व सदिवि निर्देशो ब्रह्मपतिविपिरस्पता। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विदिताः पुरा । (१७१ २३)। १५-तस्मादोमिस्पदाहस्प यवदानतप किया । पार्चम् विपानोकाः सततं प्रमादिनाप ॥ (७१२४१)। 1-दित्यनमिसपाय फस यावपाक्रिया। दानक्रियाय विपिपा क्रियम्ते मोचम्मरधिमिः । (101 २५) ७-सदपाने साधुमारे च सदिस्पेवन प्रपुष्पते । मराम्ते कर्मणि दया सहमा पार्ष पुग्यवे A ( २६।। २८-पो तपसि दाने प स्पितिः सदिवि पोम्पवे । कर्म पेम तदीय सरिस्पेशामिपीपवे ॥(१७। २७11 २स-पादानवपकर्म न स्णय कार्यमेव तत् । यहोदान तपमेव पारनानि मनीपिणाम् ।। ( १८१५)। २- नीमता राप स्पक फम्पिपता । पष्ठ कर्मफमत्यागी स स्पागीस्पमिपीयते । (१५)। २१-बामणघनिपनियां पठाण प परंवप ! कम्माखि परिमकानि समावममपैर्गुणैर ॥ (१)। १२-खे स्खे कर्मरमिरवर ससिदि समवे नरा। सकर्मसिदि पया विन्दवि समृण ।। (I) २३-प्रेयान स्वपो रिगुणः परपाव सनुष्ठिवाव । समावनियत कर्म चाप्नोति फिलिपप ।। (४७)। २४० पहिखटि कामाप्पभूमिका ॥ २०-साम फर्म कौन्तेय ! सदोपमपि न नशेत । सर्गरम्मा हि दोपेस प्रमेनापिरिवानाः ॥ (१८)। २५-सर्पकमापयपि सदा कुर्वाणो मदम्पपाप्रया । मतमसालदवाप्नोवि शाब परमम्पयम् ॥ (५६)। २६-पदरकारमाश्रिय न योस्स्य वि मम्मसे। मिध्यप म्यवसायस्ते प्रकृतिला नियोक्ष्यति ।। (२) २५-खमाबमेन कौन्तेय! निबदा मन कर्मणा । कर मेसि मम्मोहात फरिप्यस्परोऽपि तत् ॥ १६)। सोम में मन्त्ररूप से प्रमरप करने से मन माममाविषोंने अपोस्येप मन्मयाक बेद के मापार पर भौतामार्च धम्मों का पानिकार किया । हा धर्म भागे गगार पाडीपकर्म नाम से प्रसिव इए । यही कर्म शूषिसम्प्रशप में "कम्मपोग" नाम से सम्बोषित मा । ये ग्रामसिब कर्म एपियों की पति में विणसापचपचिसकर्म, विणा- निरपेवमधिसम्म मे से रो माग में निमक हुए । पुत्र-राज्य-पर-सर्गरि मुसा बनभूत पार्म दानकर्म एम पापर्म पर तीनों निवासापेक्ष कर्म करताए । Ser दस पापूर्व पर वालो नपानिरपेच धर्म कागए । अपियों ने आदेश दिया कि बम्भवप पारने मारो ममुप्प को समानुसार पानीकन प्राबिस व्हकमों काही मनुअन करना चाहिए । गाविपिन निम्मा ९ महितप्रतिषिदमकम्मो (निरर्पक काम) का परिलाग करना चाहिए, यही मनुष्य का परमपर्म । एवं धर्ममठक कर्म ही मम्वर का परम सापक है। मावान् में इस परिमार्ग का मी मादर किया, पर-त संगोपन के साम । भगवान् में इस सम्बन्ध में सेक्स प्राधिमात्र का सयभन लिया । यारा मगधन ने बनाया कि वर्ममापी कास के लिर पावि कामों का अनुष्यान मारप करना चाहिए, परस्त फाप्रति पोटाए। मगनाम् का पराप पहीद कर्म कमी प्पर्प नही माता । मदि उस समना अनुमान १५८ पहिरष्टि * माप्पभूमिका । पानवार कर लिया वो फल निश्चित है। ऐसी स्पिति में कर्मकास में यदि फरकी कामना की वायपि को कर्मठाधक मुद्धि-मन के (फस को भोर) मुक माने से कर्मेसिद्धि की मोर उदासीनता मा मामी । इससे एक दो कर्म की सरूप निम्मचि ही न होगी । यदि पपा परित् पूर्णबछ प्रयोग से कामना रहते हुए भी कर्म सिब हो गया तो कामना से भासक्तिरूप संस्कार का उदय रोगापा । पा सरकार बास्मा के वास्तविक परप को (ज्योतिर्मय विघाम ग को) मात करता सपा मुक्ति से पधित कर देगा । इसलिए एकमात्र कर्म पर अधिकार रसते हुए प्रतिमा काममा का एकान्तत परिम प कर देना चाहिए, वहीं समा कर्मयोग- होगा। पूति इसयोग के मूल प्रवर्तक ऋषि पे-भतएव इसे हम "मारिया' नाम से म्यवान कर सकते है। इससे धर्म का सदप होता है, मसएप इसे पम्पबुदियोग कहना भी मन न गाता है। - इस प्रकार भगवान् ने क्रमश बार बुद्धियोगों का निरूपण किया है। पैसा कि प्रक- रण के प्रारम्भ में बताया माधुकरी मगान् प्रधानरूप से पैराग्यबुदियोग के ही पक्ष पाती है। रागद्वेष रहित बनकर, इन्द्रातीत होवे र मनासक्तिमाष को मागे कर पायपीबन कर्म करते रामा ती भगान् को प्रिय।।पही कारण है कि इवर योगों में संशोधन करते हर मगवान् मे सर्वत्र अपने ममिमत इस वैरम्पयोग का मीच बीच में समाने कर दिया है, जैसा पाठक निम्नलिखित वचनों से सर्य मनुम्पन बगा लेंगे- . - 3 २-ज्ञानघुद्धियोग में वैराग्यबुदियोग का समावेश -चापसमुत्पेन इन्दमोहेन मारव ! सामूदानि समोई सर्गे याम्ति परवप।। (ज२०) । -पूर्व कथनानुसार इस पोग में भगवान की भबि । पतएव इस प्रकरण में गम्य पुखियोगपत मी अस्पस्पसंस्था में 17 - बद्रिय का माध्यमामध॥ ऐसी २-पेपी स्वन्तगर्त पाप मनाना पुपपकर्माप । हे दन्द्रमोहनिर्मुक्ता मभन्ने मा मा It (AR६) | 1-प्रनम्पपेवाः सर्व यो मा स्मरवि निमेशा। मस्या पुसमा पाएं । निमपुतत्य यौगिंगा tvji ३-ऐश्वर्यबुद्धियोग में पैराग्यधुद्धियोग का समावेश १- ममो सानि काणि नियामन्ति पनमय ! उदासीनवदासीनमसक्क तेषु कर्मठ (ER) २-नेपा सनवदुकानो ममता प्रीतिपूर्वकम् । बदामि पुदियोग तं येन मामुपपान्ति ते ॥ (१०१०)। -पर्मान्मत्परमो पद्मला सहपरिवा। निरा सर्वप्पु या स मामेति पापरल ।।(११)। ५-पादेश ममो पे मो नित्ययुक्का पासते । मदया परयोपेवावे मे युक्ततमा मता (१५)। ५-सनिपम्पेश्यिाम सर्वच समबुद्धयः। दे मापुरन्ति मामेव सर्पमताते रता ।। (१२५) ६-पे व साथि कर्माणि मपि सन्यस्य यत्परोः । ममम्पनर पोगेन मा ग्यापम्त उपासवे ॥ (१२।। ----पप्पे पर भापत मपि पुदि निवेशय। निवसिष्यसि मम्पेग भव कर्म म सराप ।
-- पहिर आमाप्यभूमिका - पनि ८-प्रदेष्टा सर्वाना मैमा करण एवं पा निर्ममा निरस्कारः समदु खेमुखः धमी र-संतुष्टः सर्वत योगी पतामा सनिश्पयः । मप्यर्पितमनोबुद्धिों में मछः स मे प्रियः ॥ (१९१६) । १०-अनपेच यदिव नदासीनो गतम्पया। सर्वारम्भपरित्यागी यो ममतः स मे मिया ॥ (१२१५ । ११-यो नापविन देछि म शोषति न कांवति । रामारामपरिगी मकिमान्य स मे पियः ॥ (१२११७)1 १-तुस्पनिम्दास्तुविमानी सतहो येन केनषित । पनिकता स्पिरमतिमधिमान्म मियो नस ॥ (110) - -- ५-धर्मपुद्धियोग में पेराग्यमुखियोग का समावेश १-नम्यिा वैराग्यपनाकार एव च । मम्मपाएमराम्पापिदासबोपानुदर्शनम् ॥ (१०८) २--प्रसफिरनमिपङ्गः पुनरागादिपु । निच समर्पिचसमिपानिरोपपरिपु ॥ (10) .-सर्म पु मोप विप्ठम्तं परमेश्वरम् । विमायास्वविनरपन्त या पश्यति स पश्यति ॥ (१३।२७) v-गुणानेतानतीस मीन देही देशसमुदमवान् । मम्मपल्पमरादुरलैपिनुकोऽपतमरनवे ॥ (१४।२०)। * मानापमानयोस्तुस्पस्तुल्पों मित्रारिपर्दयों। सपरिम्मपरिमागी गुणातीता स सम्यते ॥ (0 .
पहिषष्ठि -सा माप्रमूमिका । ६-निर्मानमो जितसहदोषा पापात्मनिला मिनिटचामा। इन्दरिमुकार मुसदाससौगन्समूहरा पदपव्यय वद ॥ (श)। ७-काम्यान कर्मणा म्पास मन्यास भयो रिः । सम्पफमयाग पाहुस्यार्ग पिता (२)। ८-एवान्पपि । कर्माणि सो मासा पानि । कंचम्पानीति में पाप निश्चित पतमुचमम ॥ ( १६॥ -कार्यमिमेव यद सम्म निपत क्रियते न ! यस्ता फस पर स मागः सातिने म॥100 १.-नियत सदगविमरागदेपतः रुपए । प्रफलमेमना कम्म पच्च सालिकमुष्यने । (११)। "-प्रसकादिः सर्वत्र मितास्मा विगतम्पा। नष्कर्पसिदि परमा संग्पासनापिगवति ॥ (१-४)। १२-१म्पा विशुदपा पुको प्रमास्मान निपम्प । शमादीन रिपोस्स्यक्ता रागद्वेपी पुषस्य ।। (१८५२)। "-विरकसेवी समागी पवनाशायमानसा। प्पानपोगपरो निरपराम्पं समुपामिनः।। (१९५२)। १५-पार पर्म दप काम झोप परिप्ररम् । विमुप्प निपमा गान्तो प्रमभूयाय बरसते । (१५)। १५-तसा सरगर्माणि पपि सन्याप मतपरः । पुद्धियोगमुपामिस मपिता सर्त मा ॥ (१८५७)। . - धनरादित स्टोररोप प्रमाण से प्रात में से रेपर पदोशना किला में पप (-२-1-६ इन मार्यों में प्रमा परि चार बुदिपो कालपण मा।
सार , माप्पमूमिका उपहार तपामि इन चारों में मेराग्यबुद्धियोग नाम का प्रपम मुशियोग ही स्वर तनों पुदियोगों की वपेचा पेष्ठ एव भेष्ठ है। साथ ही में यह भी मानने में कोई पाधि नहीं की जासकमी कि बादि से पन्त तक रायपुरियोग को अपना प्रधान लक्ष्य बनाने माला गीताशाम प्रधा नल्या पैराग्पमुदिपोगगास्त्र है।इसे ही निष्कामकर्मपोग,पुदियोग पोग, समसयोग मगरमिष्ठा यादि भनेक नामों से प्यपात किया जासकता है । साप ही में प्रसगोपाच यह भी प्पान में रखिए कि प्राचीन शत्पातामों ने धर्मनिदर्शनानुसार गीताशाब की १८ अप्पाए ६-६-६ इस क्रम मे सीम मारें में मिल मानी है। उनके अनुसार कमराः प्रपमाप्यायपदक में कर्मयोग का (प्रवृत्तिमूलक कर्मयोग का द्वितीयाप्प यषट्क में भक्तियोग का (मेममा पप पति का ), एष पतीपाप्यापपटक में शानयोग का (सर्पकर्मपरिस्पागलपण सम्पास का निरूपण पुमा है । यदि थोड़ीर के लिए प्राचीमों के तीनों पोगों का ( पम्पुपगमवाद से ) भादर कर लिया जाय तब मी इन के वक्त क्रम का तो भी किसी भी पशि से समादरमही किया पासकता । इन योगों के मिमानी प्राचीनों को हमारी रवि से कर्म-भक्ति-गान या कम म रस कर मान-मकि-फर्म यह क्रम रखना चाहिए था। मस्तु इस पराधिकारी में हम पाठकों का भषिक समय मष्ट नही करना चाहते । प्राल में हमारा सप मानिक कम है । उसी का दिग्दर्शन हमारी रि में माम्प है। । -प्राचीनामिमतविपयविभाग - 1-अपमाम्यायपदक ( ६ ) कर्मयोगः ( प्रतिक्षण) २-दितीयाप्यायपन (६) भक्तियोगः (प्रेमापण ) -सरया-भनुपादेया तम्या पापपटक (६) बानयोगः (कर्म पागलाषा) 3 . २-वैज्ञानिकाभिमतविषयविभाग " 1-बुदियोगो वैराग्यनिषा ( रामपिलिपा -रापमुद्धियोगः ( से ५ पयस्त ।।
परिहार उपमा II मायमूमिका २-शामयोगो बालमिया (सिम्बया )-नदियोग (७ से ८ परत ) । ३-मझियोगो ऐपपरिपा (रामनपा ) ऐचर्यपुरियोग ( (रसे।" पम्पन) १-म्मयोग्ये धर्मरिया (मालिया -धर्मपुरियोग (11से १८पत)। गरता के बहिरङ्गमारों से सम्पन्न रसने पाले माप समी पियो पर पोहबान प्र. काश राग गया । हमें पाया कि इस बहिराचर से गटर प्रस्तुप गातानिशानमा परे प्रतिपाच विपयों पर पहुंचे सकेंगे । अब इस सम्बन्ध में रेस क निकासा बाकी हत) है, एष उस निकासा का इतिहास से सम्बन 11 श्लोक मिक्य विज्ञानगीवा में २१ रसोय मिका ऐतिहासिकगीवा का भी समावेश है । इस इतिहाससदमपरिधान के लिए या चानना भी भारपर हो जाता है कि गीतोपदेश की मारपाला यो एप बस इसी प्रश्न का समाधान कर प्रपमसपा समास किया जाता।
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१४- महाभारत और गीता (ऐतिहासिकसन्दर्भसङ्गति)
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पण दुबा । इसोचिए पौराणिक मारपान आठ मार्गों में बिमत माने गये हैं। ॥श्री॥ १४-महामारत और गीता (एविक्षासिकसग्दर्भसङ्गति) "इतिहासपुराणाम्यां पेई समुपाये" (म. प्रावि० १ २६७ रखो. ) इस देवि सिदान्त के अनुमार अपौरुषेय वेदशास के यथार्थ परिधान के लिए पुराण पत्र इतिहास व मनन सपा मपेक्षित है । सधि का इतिघस बताने वाला, दूसरे शब्दों में पुष्टि कर यो ? कैसी पनी ! किसने मनाई ! क्यों बनाई ! कां बनाई किसमे बनाई । कर सक रोगी ! कर नए होगी ? इस्पादि प्रश्नों का विशदरूप से समाधान करने पाण गाव ) पुगण कहलाता है। एव मानव का इतिहास यतताने पाला, दूसरे शब्दों में राम्पशासन के अनुसार मुवनकोश (भूगोल) का सरूप बतलाते हुए गगंश, देवरा, प्रामणश, सपि परा, पैश्याग, छपरा आदि का इतिहास बतलाने वाला याम ही 'इतिहास' का- इस का यह तात्पर्य नहीं समझ लेना चाहिए कि स्पीतिप्रतिसादक पुराणों में मनुष्पपरित्र नहीं है। पपवा मनुम्येविसप्रतिपादक इविक्षासमन्थों में सृष्टिपरित नहीं है । रोनों में भपने अपने मपतिपय के निरूपण के अतिरिक्त इतर दोनों विषयो का भी नि जाना है। पाठों भाल्यान क्रमश --प्राविधिक २-मायास्पिक :-प्रापिमौतिफ, "-मापि विशाम्पास्मिक, ५-माभिदविवाभिमौतिक ६-प्रापिमौतिकात्यारिपरु, ७-भाभिदै मिका मास्पिकाधिभौतिक, ८मसदारूपान इम नामों से प्रसिद्ध है। पौराणिक परिमापामों से सर्वथा अपरिचित कई एप मापनारसि पायाम विशन् एव सानुयायी उरिहए मोगी कसिपय भारतीय मिशन पौराणिक मान्सानों के लिए पो गर्न से-“पाइयामॉमी" ( Mythaloji ) +-नन भाग भारमानों का विशद निरूपण 'पुरासरस्प में अपना चाहिए । शतपय मामपहिलापमानमाप्प में भी यत्र तत्र इन मपिम निरूपण मारे।
पोरस 20 भाप्यभूमिका . मनमामि पद की मोषणा करने में अपने मन की सीमा समान कर देने है। उगें माPिaati कि मापाचानी का तो एक समन भाठा विमग है, जिसे कि हम मसदाल्पान" नाम से सम्बोधित करते हैं । अरप ही पुराणों में कई कपाए ऐसी है निकायस कम्पना से उदाहारा लिए प्रतिसापाम्प के भयोकिक रहस्यों के बोनसाकम्प के लिए नक्षत्र-मा-मा- भारि को मापार बनाते हुए निदानरिया के प्रमुमार परपी अपियोंने कई सिता सपान बनाएं है। परन्तु इस बयना भरा हमें उन मसानों का परिखाना, निस प्रम के लिए सम्मान पश्चिमी विद्वानो र बामनिर राम मी भसमर्ष ही रहता है। असदाप्पान मिथ्या कपाएं है पर सम्मान का परिहान कराने वाली । प्रस्त, प्रात में सब विषयों का स्वीकारा नहीं किया मासका | पहा हमें बस यही बतलाना है पुराग्य अनारा का भी निरूपण सवा परम्त उसे शिान का सपर माम काही भान्यान सीमिए । गम्मन जसपास पानी का शोषक।श्म कप को पुराणन ममुम्प के साथ सम्बा किया है। इसी प्रकार खिास मी सपिरहस्प का प्रति पादम करता है। परन्तु इतना विवेक मरम ही कर लेना चाहिए कि पुराण में परिवरित की प्रधानता, एष तिवास में मनुष्पचरित्र का प्राधान्य का एक पश्चिमी निशानों का यह भी पाप कि मरतीय सोगारको क्रमम विास नहीं मिला। सच बात तो पापमोरात्र पामचिन्तन में सानिमान रामें मासे मारतीपो म न कमी एमम्प राय पापित किया गबन उमें मिाम शिसम की मारपकता हो । मारतीय साहिम का पोपण लिए बिना कारे बटकर मनमामी इमा पर सेना इमरी बात, एवं साहिमा वेषण करने के पपात सप्रमाण पुम कामा दूसरी बात । मस्त थे, पर उनके अनुपापी ममी मानते १ करते हम तो केवल अपने सारिम पाषार पर हमारे इलियास का विचार करना है। हम परमुमापेथी महीहमें पम्पों के परहिरहि का माप्यमूमिका 12 सम्पर्ममाति साधम भपेक्षित नहीं है, यदि पाहें तो यहीं से कुछ ले सकते हैं ( एष रहे हैं 111 )। तिाप्तयों में नाम दिन महाभारत का पासन सब से ऊंचा हैं । यह एक गुप्तरहस्य है, कि, यहाँ भगवान् म्पासन पुराण १८वनाए हैं, यहाँ महामारत के मी १८ही गई रक्स।। १८ की सम्भा से पासदेव को विशेष प्रेम या, ऐसा मालूम होता है, जैसा कि मागे चाकर स्पर रोपायरन । 'इविपास" (ऐसा ही पा) इस नियम के अनुसार मतीत मानव चरित्र का "दमित्यमेव ' (यह ऐसा ही पा) इस रूप से प्रतिपादन करन पासा पम्प ही “इतिहास" सपाता है। आम से तगमग ५ सान वर्ष पहिले कौरप -पापरयों में मिस राम्पलिम्मा के कारण मायुद्ध प्रभा पा, एम जो महायुर मारतधी के सर्वनाश का कारण बना पा, उस अद की पटनामों का (वारम्म से अन्त तक का) म्पासने मिस मप में निमपत किया है, पीय महामारत नाम से प्रसिव है । यह सम्प 'इति मम स मर्यादा से युक्त मत इसे हम पारप हो इतिहास शम्द से सम्बोधित कर सकते है । गीताशा के सम्मान में गीसोपदेश की प्रावश्यकता क्यों हुई १ का ई ? का हुई ! किसके प्रति हुई मादि ऐतिहासिक प्रश्न हमारे सामने उपस्थित होते है । साप ही में गीता महामारत का ही एक प्रस्परा ।। ऐसी दण में ऐतिहासिक मय के माप में भागने से) गीता को एतिहासिक मप्यादा से पृपक मही किम नासकता । इसीलिए गीता में मूसविषय के पतिरित ऐति पासिक सन्दभ का प्रतिपादन करने बासे ६१ रोकने का म्याससमावेश मा ।। रसी भाभार पर ६१ रसोकास्मिका गीता को हमने "ऐनिगसिकगीता' माम से, एक ९३६ रसोकामिका गीता को विज्ञानगीवा" नाम से प्यार वित्या है । (देसिप पृरसत्या २२. ) ऐसी परिस्थिति में रात ऐतिहासिक प्ररनों के समय में मी पप करना भावश्यक होमाता है। महाभारत पप एतिहामिप मम होना था में मान मिशन का एक बस फोश है। हम तो यह भी करने में किसी सदोष का वनुमा नहीं करते दिमाश पहिङ्गाष्टि D मायभूमि मनमसन एक और है, एत्र 'पपामा महामात ती पोर है। तमों की उना में महामारत का दी भाषा मानमा पोगा । हमारी शिस उसासन का रोग कम गतपर- याभण । प मापण मामणम-पो में म।। या पेट का भन्तिपग्रम्पस सिप इस में सप से सभी तालों का निम्पण भास की माया मी सातमापा से मिली दुखती है । वैरिक साहित्य पर पूर्ण परिकार प्राप्ठ करने के लिए शपपप का अप सेति तक अस्पन का रोना पप्प्यात है।न केबसाइस में पदार्पनेपाक होरिश्लेषणा पतु पदार्पत्रिपा के साप साप इस में हािसशिप रागनीति,धर्मनीशिवादि सभी विषयों का समावेशामा हाइम भपूर्व प्रश्य के निर्माता है मगान् पाहवरसप । कृषिकाम्यापीमादपोत । एता इस माम्प दिग्रो न पबन्त" ( गव० मा २ क )स बचन के अनुसार हम पर कर निम्माणकास उगमग मामारत के समकालीन मानने के लिए तयार । प्रताप करता। पि-"कनिका नक्षत्र में प्रापाभ्यान करना चाहिए। पयोकि या नक्षत्र पूर्ण विशा को नहीं जो इस कपल से विदित होता है कि शतपपात में सतनकारक पुरि काति रुपिका नपा पर ही अपनसम्पात पा । परम्तु हम दस किमाम अपनसम्पाव इविध को फोर कर सन् १६ १० ) जगमग र म (A) हट पुस । साथ ही में यातिणना कनुसार यह मी सिद विपप है कि एक भय के हरने में सामग ७५ वर्ष बात है । इस हिसाब से विकासपातमा सन् १९०० से पहिले छगभग ११५ (बर चार मोसी पैसठ ) पीछे जाता है पही समय महाभारत का यात। इसी मापार पर राम या दोनों प्रमों को ( महामारत एवं शतपप को ) समकालीन मानने लिए प्यार है। इस समय मैं पर ध्यान अपरप रसमा चाहिए कि वपन प्रय मामरत से पुछ समय पहिले मामा, एष महाभारत का निर्माण कुछ समय पीपे मास । इसका प्रत्यय प्रमाण यही है कि महामारत में मप से हवि पन्त प्रमाणपनों में लान स्पन पर "इवि गावपपी मुवि" "इवि शावपपी प्रति स्पादि रूप से सतपप के बरनों का रम्स मत पवि पाठक भाषानप्पक महाभारतका बादि से मत तक पका करेंगे पहिसार l माध्यमिका । सामसत्र । . वो उन्हें पह माम लेना पड़गा कि म्यास ने महाभारत के प्यार से सम्पूर्व प्रताप का अनु पद कर गया है। वपिच मनपारस्पतषाद में सप भागमाय ने बमक से कहा है कि मैने शतपथ बनाया है। इस पारम्पार से तो यह सा ही सिद्ध हो जाता है कि रातपय अवश्य की महामारत में कुछ पहिले बना होगा, जैसा कि निम्न लिखित पपा से स्पथ है- स्वः शतपथ कृल्स माम्प ससंग्राम । चक्के सपरिरोपं । म परमेण ॥१॥ का शवपय घेदमपूर्व व कृत मया । पयामिमपित मार्ग तपा तचापपादितम् ॥२॥ (महामा० शा. मो. १९८) कहना हमें केवल यह कि महामारत एक ऐतिपमन्य होता हुमा भी शतपय के सम्बन्ध से विज्ञानगम्य है। इसकी महत्ता का दूसरा कारण !, गीताप । भगवान् ने यमुन को हान-विहानामा निस मलौकिक एवं अपूर्ण बुशियोग का उपदेश दिया था, म्पासने पानी माषा में १८ वपायों में उस का निरूपम किया है । इम्ही सम विभूतियों के कारण महामारत सपमुष एक मलौकिक प बन गया है। इतर सारे प्रन्थों को छोरदीनिए, केवल माहामारत ही हमारे सब समय दूर पर भारतीय शास्त्रों के पपार्प स्वयप को हमारे सामने प्रत्यक्ष बत् उपस्थित करने के लिए पर्याप्त है। महाभारत मगाम समुद्र है । उसके अमठ रनों की कान्ति से माम मी भार्यसाहित्यभवन प्रकाशित हो रहा है। भारत को ही नहीं, अपितु समस्त विश्व को अपने अलौकिक मागेक से भासोकित करने वाला पाता गीवारर । मी इसी समद को नि1ि1पों के समय से (1+0१) सप्या में परिसत होता मा पर माप भारस ही पारमा की पूर्ण निति का निस्पक १८ का मकेत बतया साई म्याम ने इस में १८ पुराणों का सार रस दिया है, पेद-प्रामण-उपनिषत् नादि का मामीन निकाल कर प्रपा रख दिपा । । साप ही १+ सकसनगप १ भागों के सम्मको म्या करता मा यह प्रम्प यह भी सिर कर रहा रिमैने इतिहास के साप साइनस 1 ३२५ मार्मसात माप्य भूमिका .. पहिरराष्टि त विहभर का भी निरुपण किया है, एक यही निरुपण गाता द्वारा उपवृहिनामा है। सपमुम इस से उपहाण में अरुप्प पीपायम से मी मागे स गए हैं। सप म्पास ने माने F का माल स्वीकार किया है। मस्पेक प्रायममान से हम भार करेंगे किया अपना काम्वपिक सस्प परिचय माप्त करने के मिए, अपने पर फी भमुस्प निपि का गयोग करने के लिए पापोपाम्व इस प्रयका प्रपेन मीपन में कम से कम एक बार प्रपश्य प्रपक्षप प्र पपन करमे महाभारत की प्रसौनिकता शान न-विधानप्रतिपरक, मार पूसवा निम्न मिसित सपनों से स्सए सिर दो बी- पुराणसरिता पुरयाः फवा पर्विसंश्रिताः । तिवर्ष नरेन्द्राणापपीणां च महात्मनाम || म मादि.११)। उगाप स मावेमा प्रामम् परेमग्रिनम् ।। ही मयेदं मगरान् काम्म परमपूनितम् ॥२॥ प्रपन् ! वेदराब पचाम्पत् स्थापित मया। साहोपमिपा चैप वेदानां विस्तक्रिया ॥३॥ इतिहासपुराणानामुम्पप निर्मित प यत् ॥ भूत मम्मे मपिम्प पिचिप फामर्सशिवम् ॥५॥ मरापस्युमपम्पापिमानामावविनिमय || निविषस्प प प म्प माप्रमाणे पमहणम् ॥१॥ पातुमयपपिपान प पुराणार्मा पस्नगः ।। मपमो प्रापपर्पस्य पृपिम्पायनर्ययोः | ग्राननमनाराण प्रमाण पपुगः सा॥ मषो पनपि मापानि रेहास्याम नप पा म्पापगियाधिकिम्सा पठान पाशुपत तथा । तुमेव सम बन्प रिम्पमानुपसशिवम् ||प्या पाटि माप्प भूमिका समसावि वीर्यानां पर पुरयाना देगाना पर कीचनम् ॥ नदीनां परसानां च पनाना सागरम्य च ॥१ पुराणां चप दिग्पाना फल्पानी युदकीगमम् ॥ पाक्यमातिविणेपाच मोफयानामश्च य: nok यचापि सांग पस्तु वा प्रतिपादितम् ।। पर न मेखकः कश्चित-एतस्प मुधि विषये ॥1॥ "पनि बस्ति तद पभ यास्ति न कुप्रचित्" प प्रा १६१-७ श्मोक )। भर्पणखमिद मोक पम्मशास्त्रमिद पाद । कामशासमिद मोक्तं व्यापेनामित बुदिना ॥२॥ पो रिपाचतुरो पदान् साङ्गोपनिपयो द्विमा ।। न पाम्यानमिद पियामेर स स्पादिचक्षणः ॥ ३॥ ( म स प सग्रा)। निषाभों के सम्बव में युगों की चर्चा करते हुए हमने सापपुग के मनन्तर देवयुम की सचा बतलाई है । देवयुग की सभ्यता का भारम्म काम ही मार्यइतिहास का मारम्म काय 21 महामारत ने अपने इतिहास का भारम्भ इसी देवपुम से किया है। देवयुग से भारम्भ कर महामारत पर्प विहार का तिजमिग निसा कमा ही महामारत का मुस्म उदेश्य है। मोर अपने इस उदेर में महामारत समारमना सफल [मा है। वापरामवश को हम अपने ऐतिहासिक प्रन्यों के माधार पर सूर्यपंग, पम्य, अग्निरंग मेद से तीन मागों में विमल कर सकते है । देवपुगाल पे देक्लोक में (सर्ग में । मादिश्य-सूर्य इत्यादि नामों से प्रसिम इष्ट पाता, मग, पूषा मम्पमा स्पष्टा पम्म, भेगु, विवस्वान्, सनिता, विष्णु मित्र, ये १२ देवजातिए समसिम पी। इन १२ सूपयों, किंवा मादित्यों में विस्तान नाम की भाति को निरोग गौरत्र प्राप्त पा । इसी मानिनिरोप के पुरुषों को बामो बाकर मारतर्म का सामाम्प मिसा पा । एसी विवस्वानों में से प्रश्न प्रतापी स्वयम्यू
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प्रसिद हुए। - मनाप पाकर्म में रत रहते थे, पोवाधार पर बनाइटि, दुराल महामारी आदि भोप ॥ मायमूमिका समर्मसङ्गति कन्छ । पमुरत्रिलोकी से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है । देवत्रिकी में रहने वासी प्रजा के प्रवर्ग वनाए । घे ही पांचों वर्ग पि, पिनर, देवना, देवपोनि, मनुष्प नाम से -अपि प्राकृतिक प्राणवरण को भूपि कहा जाता है। पही प्राणनस्व सरे का मुसबक -दिसिर शतमा ६।१11)। पही अषिप्राण "विरूपास इद पयस्त हम्मीरपसा" (प्रक्स० १० १६२।५) के धनुमार मनन्त प्रकार के है । पसिष्ठ, विवामित्र, करपप, मुगु अहिरा गारद बातलिया, सनक सनन्दन, सनवकमार, ममदग्नि, पर म्पति, आदि भाप मितने मी म म सुनते हैं, वे सब प्राणारा अणि हैं, सटप्रवर्तक मौलिक तोप है। बिन बिन पुरुषपुनि जाने निरकाठिक तपोयोग से निग शिन प्राग्लाम : ऋषियों की परीक्षा कर विश्व में उनके द्वारा पूर्व विद्वानों का आविष्कार किपा, रे पुरुष उन उन भविप्राणों के नाम से ही प्रसिद्ध हुए यह मनुष्य ऋषि प्रणभूपियों के प्रणा (परीक्षक) थे , एवं सवतन्त्रस्कमात्र थे । पृपनी (मारतार्ष), अन्तरिय वर्ग तीनों लोकों में बसन्तप से विवरण करते हुए, पपामिरुपि तीनों मोकों में माने प्राधम बनाते हुए विधा एव तपोपोग से लोफर पास करते रहना ही इनका मुस्स कम्मे पा । निपावारतम्प से इन अपियों के प्रमा-पि-प-ग्राममा-विप यह पाप भाका पर विमाग थे । ब्रामणकुल में जम्ममात्र सेने बाजे बायोपभीगी बामण रिस कहलाते थे। इसकी सम्पा में नशेष प्रनिष्ण न पी । यो प्रामस शारों के परिवाना पे, वे प्रामाण ही कासाते ये । केबस शाब पर सेना, एवं अपय मापापति में आहूर रहना ही इन मुम्य धर्म का । जो मामण गामार के साप साप ही प्राकृतिक प्रदेशमाओं के मापार पर मातक मामणों से प्रभा की रक्षा किया करते थे, ऐसे गर्भट पाहिमाबण ही "देव" 11 बहिणधि माप्यभामा समर्मसाती से प्रना के मानसपुत्र स्वापामुत्र नाम के विवस्वान् माविस्य सूर्यवरा के मादि प्रमक हुए ! इस स्वायम्मुत्र विस्वान् मनु के प्रदादेव ब यम नाम के दो पौरसपुत्र उम्पम हुए। यही क्षण माहरणारि प्रपों में प्रदादेव माम से प्रसिद्ध -"प्रदादेबोरे मनु" (जत ।' ११११), पुराणों में प्रायदेष नाम से म्या हुए। जिस प्रकार पैरिक "पह" मदी पारोतों से "पतु" सर में परिणत होग, एकमेव भादेव शम्द मी सम्मेषक के प्रम मायदेव रूप में परिक्षत हो गया है । सप-मूत्रपा की मनुम से, एष साप ही में भाग पेठपुर होने से म्यापत प्रदाय को ही "मनु' बनाया गया । "मनु" किसी म्पलिमयेर का नाम नहीं है, अपितु भारतीय प्रमा पर शासन करने बाठे सम्राट् । माभिकारिको सम ही मनु है । इसी मनु के सम्बन्ध से मरतीय प्रजा मनुष्प, किंग पाना माम से प्रसिब हt, या मी नि सदिय विषय है। मदाय को मनु बाम गपा, इसा वापर्य पही मानि भ्भरतवर्ष के सम्राट् प्रदादेव ही बनें । विस्मन् के पुत्र होने के कारण ही "यसवमनु' नाम से प्रसिदए । 'रामा 'राम्द का पहिय भाविकार परत के लिए ला, पण प्रतीत होता है। यही भारत वर्ष के पहिले सम्म्द हुए। जिस प्रकार स्वयम्मुष विस्वान् के ने पुत्र प्रदादेव मनुप प्रथा के शासक ये एकमेव मिस्लाम् के कनिसपुत्र मारण पेलत नाम से ही प्रसिद्ध पम वितरण के असक बनाए गर, भैसा कि निम्नलिलिल वामिभुति से - "मनुवस्स तो रामेम्पार। तरूप मनुप्पा विगः(मा)।वमाप्रासतइनमोनिया पामेपिन उपममेना मास्ति । पमो समतो गया । वस्प पितरो पिया, परमऽपासननिस्परिरा स्पसमेता मन्ति(शान.माइति॥ माम समान की सम्पपस्या के लिए भगगन पाम् बनाने (मिहोने कि कारण पार को भानी भावासभूमि बनाया पा) वेद-पोस-ममा-धर्म इन चारों को सम्पति • परी मरम्म परयुगप्रथम म्पपस्पापम्यापर याम्य म्पतिमा को अपना पण पुत्र माना तथा बजारमा पुर पुगानानिहाम में मामम" नाम मे पमिशा पारा पचारमाधप परम्प भाग गरप्रणा मानमपुत्र प्रमान लगे।
भोर -BI मा पमूमिका मन सहामि 1 किया । अमुरत्रिलोकी से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है । देवत्रिलोकी में रहने वाली प्रजा के पचि पप बनाए । वे ही पांचों वर्ग पि, पिनर, देखना, देवयोनि, मनुष्प माम से प्रसिदए। १ अपि . - प्राकृतिक प्राणतत्व को यपि कहा माता है। वही प्राण तल सारे का मसमपर्वक 1-दिसिर रानमा ६.11)। यही ऋषिप्राण 'विरूपास द अपयस्व इद् सम्भारपसा" (अक्स० १० १६२१५) के मनुमार मनन्त प्रकार के है । पसिध, विश्वामित्र, करयप, मुगु पकिरा नगद पातलिम्या, सनफ सनन्दन, सनतकुमार, ममदग्नि, पर पति, भादि माप जिसने भी मम सुनते हैं, वे सब प्रामारमा अपि है, सोप्रवर्तक मौलिक तय है । चिन निन पुगपुगने जाने विरकाशिक तोपोग से मिन मिन प्राणाम अषयों की परीक्षा कर विप में उनके द्वारा वर्ष विद्वानों का भाविकार किश, वे पुष उन उन शपिप्राणों के नाम से ही प्रसिदए यह मनुष्प ऋषि प्रणऋपियों के द्रा (परीक्षा) पे, एर सबस्वतन्त्र थे । पृपनी (मारतर्ष ), अन्तरिय स्वर्ग तीनों लोकों में स्वतन्त्रमा से विपरण हए, पपामिरुपि तीनों मोकों में मरने भानन बनाते हुए लिपा एप तयोयोग से खोरम पाप करते रहना ही इसका मुख्य कर्म था । निपातारतम्प से इन पियों के प्रमा-पि-क्षेप-ग्रामगा-दिप यह पाप मा ला दिमाग थे। मानसकुल में जम्ममात्र सेने पासे नारपोप भी मामण विकागते थे। उनकी समान में विशेष प्रतिया न पीओ प्रामण गानों के परिवाना ये, ये प्रापण ही फासाने थे। केरस शाम पर मना एक अपय गापारमाधि में भारत बना ही इनम्न मुम्म कम पा । जो मामण गामान के साप साप ही प्राति एमाओं के प्राधार पर परनार पार्म में रत रहते थे, पो रे मापार पर अनापरि, दरात मामा मारि प्रारतिक मामलों से प्रभा की रक्षा विपा करते थे ऐम वर्मा पनि माधवी देव" परिष्ठ का मागमूमिका सन्दर्मसात । नाम से प्रसिद्ध थे। यही वर्ग मूमर मदेव भादि नामों से प्रसिद्ध पा । इन्हीं मामणदेने के सम्पब में शुम करती है- या देशाः । देवा मार देशः (मारुतिका निसदेश)। भाप ये प्रामणः शुमासोऽनूपामास्ते मनुप्पदेवा" (गत प्रा २२० । "म मौसिक प्राकृतिक प्राणवालों में से एक एक दो दो प्राणों की पीका कर उसका सापात करने वाले प्रमस अपि नाम से सम्बोधित होते पे । यही सम्पदा मी पहाते थे । जैसा कि-"मपयो म भद्राशरः । साधावकमा श्वपपो बाः" इस्पादि से सार । ऐसे अनेक पि विछ एक महापुरुष की भम्पचता में प्राप्मपरीक्षा निया करते थ, यही पुसपति "वमा" नाम से प्रसिद होते थे पपी प्रभपपत् के अपच माने गाने । वायुग में ऐसे कई प्रमा पे । १ तो प्रधान हो बसपदि पी, जिनका कि निहूपर कि- स्तरमिपा प्रान्त में नहीं किया जासकता । इसी प्रमपदवी करे सर में रखक पुराणों में न भपाण श्वेते पुराण निसर्प गवा"प कहा गया है। इसी प्रालन माविमाग का शिदर्शन रानी भी करती है- 'सामाजिरीप्यानहनो णापाथकार । सम्पनिक पारित पाम । एतद म तत् पैपी हवाना पारपगमेकपनमुपाहिल मपति । समाय विभ्यतो नान् दीपानी बामणान् मीपिदा कोरपाबामो पापपत्रमा प्रवपुषः (शतप्रा.११)। इन पांचों रेणियों में से प्रमार्पत का अप्पर कुलपति प्रवर्ग भावपरीक्षक पिरत पाने तो मावा खाम्न थे। बस अपाम् का हसन इन पर सपा । इन पर मारनीप प्रमानों का कोई प्रमुष्प म पा। यही नहीं अपितु भारतीय रामामों पर एक ये * अप ले पनुप्पदेश, प्रापमाः (पामा । पन र प्रताडो याद प्राणाः । ( HIT II)।
अनियष्टि माप्पमामका . प्रकार से ये शासम करते थे। अब मा भारतीय राग धर्मनीति से पिमुस होते थे, तब तब ही पदोनों वर्ग का दमन कर देते । प्रबळ सदा पवस पर पिनय प्राप्त करता था । माराम वेन नीषियों हरा सिंहासन से भ्युत कर दिए गए थे । इमामी की कामना करने वाले नाप काली पापियों के दण का शिकार होना पड़ा पा । पाम्माधिष्टाता देवपग, सावनिष्ठ बामसर्ग इन दोनों र पनामा का माधिपम पा । कामा अभिमहर्षि के पोरस पुत्र थे, अतएव बारमा बामण थे। स्वम्भूने में समादिणका दिपाव बनाया, मोषधि एक पैर पक्षणों का लोकपास बनाया । भारतीय कर्मठ मूदेप, एव गावनिष्ट मापस दोनों को परमा के शासम में पसना पड़ता था । भारतीय इतर राममों का इन पर कोई शासन ने पा, नेसा कि-"सोमोऽस्माकं प्रामणानां राजा ' इस्मादि मपणन से स्पए है । पर चारों ही वर्ष घोत्रिय थे। चारों में मातमनु के शासन से पृथक् थे। पत्रिका पथामात भतएप भयो- त्रियका मनु की प्रना थी। पत्रिप-रप-शाहू-अवरक्यादि भारतीय इतम अमोत्रिय गृहमेधी मनुष्रों पर पैसे मनु का शासन था, एवमेष रम भमोत्रिय गृहमेधी वनों को मी मनु के शासम से से शामित रहना पड़ता था, यह पांचों ही एक प्रकार से भारतवर्षीपर्ग पे १- ममर्म- मुखपविः ग्रामपर्पदयपः प्रमा) २-२ अपि (पपि) स्वसम्मा (स्वयम्मरपान) - -~-माणपीपक -- अपिवर्ग-60 २- देवर्ग पाकर्मसभापक ४-२-प्रमण .यामे पारणत हामण) परम शासिता १.१-विधी.. -यपामाप्तो बास्पोपनीची (विमा) ममुमगार २-~-पितर मोतिक प्राण को हमने अपि का है। इसी ऋषिप्राण का माम यजुम्मस यो पत् व दो निमाग है। पत् गतितरक है, यही प्राण है। स्थितितरस, पहीबार प्रास मे महिनाष्टि • माम्पमिन I अपि के प्याप र से भर ही दृत होकर अयसकार में परिसा हो जाती है । परी ऋषिप्रस की यौगिक भवस्या है। अनेक मौष्टिक । अषि ) प्राओं के रासायनिक सयोग से उत्पन होने मला पौगिक भापप्राय, किंवा सौम्फाण पर।पि से समपम इस सौम्यास सा पिता का विकास होता है। यही पितरमाय मैथुमीसरि का मुखपाक से को प्रति है। सात पी तक एक पिलर प्राण का शिाम होता है, इसी आधार का "सर पिएप साप्तपीरुपम' 'सपिसतातु पुप सप्तरे मिनिपते" पप I APPR पिता के नाम्पमुस, पार्षण, सम्मुन मेद से तीन धर्म है ही रे मागे जाकर पग्निवाला सोममन, मिर्पित, पाम्पपा, सोपपा निर्मु कानी भादि अनेक मेह होगाते हैं। इन सब विपर्य के लिए सतत्र प्रन्य अपेक्षित है। इस समय में सिप सिसा रमने बालों को "श्रादविज्ञान । नामक मय ही देखना बासि । प्रत में केस ही कलाना मिनुप्पों में से ति मनुषों के पातमा इतर प्राणों की अपेश पिरप्राय रोषरूप से निकमि का केही मनुप्प देवयुग में * पिवर नाम से प्रसिद्ध पे। यह एक मात्र जाति पी। यही पितृमोर भार दिन "पद्रोमिया" नाम से प्रसिद्ध है। इस पित' प्रमाज सापम्मु मिसान के कनिमपुत्र देवगन यम का प्रसन पा। अपि से पितर प्राण का किम एला । यह पिनर प्राय स्नेह-दमो मेद से दो मापों में विमहापा । नेता गुबहलाया लस भीग करताया। गुजारिशेपटर प सोम के मामय से प्रतिरोऽग्नि ही प्रगति होम सूपए में परिणाम इस सौगरिमाप म्पोनित सोपारा का नाम ही देखना या देवमासी पागे मार ८ " म १२ पालि प्रगति-रस्कार मै मेरमागों में परिण मा I पही १५ मानिक भाप प्राददेशमा कप।लि मनुयों के अन्तयामा में जिस प्रास्ता म मरण पावे मी मात्र में प्रमिर । निम गुग में सपा के पारा पद भरी 4.
दिक्रष्टि 911 माप्यमूमिका 1 समर्मसावि चरण होकर पृषिषी पर मनुष्यों में ही देवम्यवस्था प्रतिष्ठित हुई, वही युग देवयुग माम से पका हमा, जिसका कि दिग्दर्शन पूर्वप्रकरणों में कराया नाचुका है। हिमालपपर्वत की दशियों से उस पर ( YO| प्रधाशा से १० पर्यन ) का स्पान स्वर्गलोक कासाया, जैसा कि "उसरे हिसात् पार्षे पुपये सगुणान्वित" इत्यादि मारतबधनों से स्पष्ट है । इसी सर्गशोक में यह जाति निवास करती थी । १२ भादियों में से इन्द्र नाम की प्रसिद्ध देवनाति के म्पति रोष (इन्द्र ) ही समय समय पर सीध्यक्ष बनाए जाते थे। इन्द्र किसी म्यक्ति नाम मा १ अपितु गति का नाम है । पही इन्द्र शम्द भागे जाकर सभ्याचपदमी में निहट हो गया है। यह इन्द्र मर्ग के "स्वाराद" शासक थे । ४-देवयोनय विधापर, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, गर्म, फिनर, पिशाच, गुण्फ, सिद से र गालिए अन्तरिक्षमोक में निवास करती थी । इन्हें ही देवयोमि एव तिपर गति का माता था । जिस पर्वत से ( एर्यगायतसे ) राती (राषी ) नदी निकलती है, उम से भागे (उत्तर की भोर), एव हिमालय से इमर इमर का साय प्रान्त इन की भाषसभूमि थी। अप्रसिट नन्दनान नामपन, काननमन, उमाग्न स्कन्दवन मादि महावन इसी मन्तरिक्ष लोकमे थे । इस प्रणा के शासक गपुदेवता थे । ५-मनुष्या - बमोत्रिय बिम नाम के प्रामण विविध प्रमिप ममन्दन के पराब औरय, सफ्ट, मन्त्पम, मम्स्पापसापी मेद से मनुम्पप्रमा ६ भागों में निमत थी। इसी पर प्रदादेव नाम के बखत मनु का गसन का । मानवधर्मगारा इस प्रथा का शासनम्न पा । यह धर्मसत्र मेक्स मारतीप मनुष्पप्रमा का ही निपत्रण कर सकता था। श्रोत्रिप चारों मामणवर्ग, देवपोनिवर्ग, पही राप्पणावत पाय रे पट्लम् में "शिनासा" माम से मसिर है। ६० बहियष्टि • माप्यामा मममसति देवर्ग, स निफ्यम से बाहर थे। इसीलिए तो बारिश में रहने वाले गम्पों कमर जन्मदाने गुरुपत्नो ताप के साप गारभविगाह करना अनुचित म सममा पा । इन पांचों विमार्गों के शाता मारत विराद नाम से प्रसिर मगान सपा प्रमा, ५ उत्तरदिशा में निरव से ठीक सामने मगिरि एवं पन्द्रगिरि नाम के दोनों पत्तिों के मध में निवास करने बासे भगवान् विष्णु ५। भारतीय प्रमा पर मब को सदर माता पा वो या राणा की समय में माती पी रामा परि मरने को मसर्प पाठा पा तो या भरतीप देव-अपि वादि की रण में जाता पा । पे देतामों का मनसेने मे । देखना पसमर्प होते हुए मामा के पास गाते थे। मना मिणा से परामर्श कर सब सम्पास्पिर कर देते थे। यह बी उस युग की शासनप्रणाली ! एसपन बैमर !! भपूर्व सम्पुदय ॥ देवयुग से प्रारम्भ कर महामारत काल से जगमग '५००० वर्ष पूर्व तक या परस्पा सम्मास्थित रूप से बसती सी । मागे नाकर परे चरित नायक बनमा की पा से (नागारण प्रसङ्ग से) देवाय नष्पाप हो गया मसुरों द्वारा पासाबक सोमाप (सोमाली ) हिम मिम कर दिया गय । सम्पूर्ण देवत्रिलोकी पर मसरों ने भाषिपस्प कर लिया। ३-गा -- १-भूपपा (मोक्पपिपरणगीमाः सर्ववम्प्रसवम्बा)। २-पितर (.----...-.यमो पैवस्वा यासका)। (मोकरपाः इन्द्रा ग्रासकर)। १-देबयोनयः (अन्तरिधमोफस्पा... -पापुः शासका)। ५-मनुप्या (पपिपीपोकस्पा-मारवीपा:-प्रदादेगे मनुः शास)। आ निदर्शन से प्रात में हमें केपद पदी बनाफरलतमना महादेव) वा- पम्मुष विमान् नामक सूर्म के पुष । मारतवर्ष के सम्राट् भाम्प बन गये । परस्त सापीरूप से हमोंने मारत म कमी निगास न किया । मोरम पर्पत मपनी गम्मभूमि थे परिमार सामाप्यभूमिका । मदमसागि उचर कुपेत्र (सर्गोक-देवलोक ) में हो रहे । इन्होंने अपनी भारतीय प्रमा के शासन के लिए अपने पुत्रों को ही निपत किया । इनके रवाफ नृग, पृष्ट संकि, नरिष्यन्त, प्राशु, नामानेदिष्ट, रुप, पृपध्र, मुन्न नाम के 10 पुत्र थे, एव अमा" नाम की एक कन्या थी। पष्टपुत्र स्वाकु से मी बरी पी। क्योंकि यह सही विवस्वान् सूप्प के पौत्र (पोते) के क्त एव ये, एक इनके पशपर सूर्यवंशी पत्रिग कागर इसी ए से वैपसात मनु (प्रशादेव) को ही सूर्यवंश का मुछपुरुष माना जा सकता है सापही में भारतवर्ष में एकर साम्राग्य सभा- बन करने पासे पहिले मनु पाकु ही हुए । इसीलिए-"इचाकुकुमम्य सन्तते।" ( रघुपश) दत्यवि के अनुसार इराक भी सूHश के प्रवर्तक माने गए हैं। पात्मनु ने अपने ज्येपुत्र रता को मारतवर्ष का मसु बनाने पर यह मादेश दिया कि सुम ग्यायपूर्वक भापस में मारत- र्ष का बिमाय करलो , भावानुसार मैवस्वत के दिवगत होने पर इसाफ ने दापारधर्म के म 1 • श्री जयरेच विद्यामधारने "भारतीय इतिहसीरूपरेवा" नामका एक ऐविहामिक मम्ब लिखा है। भवस्य ही सिने ही शो में भाप इस पपस्न में सफल भी हुए हैं। परन्तु हमें चाहते हुए दुल होता है कि पक ऐतिहाकि सत्य पटना के सम्बम्प में माप देन री गार पर किए हैं, भार्यसाहित्य से परिपय म रखने वाले कतिपय प ममी पिदाम् पौपिक भारपाना पना बताया है । जिम इसा का भाम्पान स्वर मेर मे निरूपित है, उसी समय में मोसमे अपन ये विचार प्रकट किया कि "एक रपांग पानी प्रासर कि मनु की महकी साधी जिसने सोम (चन्द्रमा) एप से समागम हरपुररणाका सम्म दिया था। मकरानीवर पेश राप की पाम्पा करोगरा गा पती (मा. इ.स. २रा शपू. १२८) । इस सम्बन्ध में हम अपवनी को कोई दोप ही देव वैदिक साहित्य प्रम्पयन की कमी से साप दही में पनिमो विधनों की सानुमति प्राप्त रन के उदय मे मारतीय विधनों का यह संम्पसा बन गया है कि मारतीय संस्कृति पापाय बना हुए मी समाप के प्रवाह मे पाकर उनकी दर में ह िमिलाने में ही पपन्य गौरव सम मन बगा। पह मति हमारे लिए सीही पावक इम सतन्त्र होकर निप्पपपात पन कर अपने मयों के भाधार पर अपने इविराम का भम्पण करना पड़ेगा । वम इम सत्यविभूति पास करने में समर्थ होमगे।
पहिरबाट मा मायभूमिका - मन्दर्ममहान नमार मास को १. मागों में विभक्त किया, असा निम सिषित बचन से स्पर- पनिट तु मनी धाव ! दिसात वदा। दरामा तप वन क्षेप्रमकरोत् पृथिवीं मनु (शिपु उमार्स०१६) एगा कि सम्राट् थे, एप प्राप के पेरपुत्र थे, एक भागे जाकर पर भी मनुनाम से ही प्रसिमाए। पिता रे बाणानुसार मूलोक को विमत कर इगाकुन गहा से पूर्ण प्रयोप्पा मार की गजपानी स्वामित की । पही सूर्यगणी रागामों की पवित्री, प्रधान एष श्रेष्ठ पत्रवानी करवाई। पाक के अतिरिक्त शेष १ श्राहामोने अपने अपने सतत्र म पनिक पम्प सापित लिए । इस प्रचार सूर्पण मागे नाफा कर रमसामों में विभत हो गया। इन सब में पना मंगर बोडी प्रतापी हए । इसानु भनेक पुषों में से ज्येष्टपुन विधि को भोपा का राम्प मिसा। विकृषि के प.सिद कास्य नाम का पुत्र उपम उपाइनके समय से पता दुशम कास्प नाम से मी प्रसिदार, चैन "कामपा मोकगता नृपाण मन पदुमतीनिरागम्' (श मावि इलाकु मिपुत्र इतिहास प्रसिद्ध महाराज "निमि पे इनमें और इनके बड़े माई में किसी कारण निरास से मस होगमा फसव मिमि भयेप्याबोरेर मौनात भारण कर निकल गए । मा तक इन अपुरोहित वसिष्ठ ही ये परन्तु निमि मे रम्प पोपवे समप पगम गोदम को अपना पुरोहित कमावा, इने साप सकर निकल पड़। मत्स्योगमा पोम्पा और रेणासी मप्प में असमास्ति भूमि को पात्रिय या कर दी गहों में मपमा मया राज्य स्थापित किया । पहा मार ल्होंने मफ्ना मौनरोका। इनके राज्य की मन्तिम सीमा "सदानीरा' नाम की प्रसिद्ध मदी हई । पाी निर्मि कमविदेशों के मुखपुरुष माने गए । मसिपाप से इन का शरीर पर गया । मागे आकर मपनप्रत्रिपा बारा इन पीति मया गया । मम्बनप्रक्रिया से उत्पन होने के कारण निम का यह रू परता मिधि माम से प्रसिन एमा।
प्रकट या माध्यमूमिका ॥ सन्दर्भमावि एस मिपि राजा के परावही मापन काहाए। यही मापन हम्द प्रागे जाकर मैयिन रूम में परिणत हो गया-( देखिए शत० प्रा० १११।१।१)। महाराज मिचि के सम्म न्ध से ही यह नगगी "मिथिमा" माम से प्रसिद हुई, एव यही पा नफ नाम से प्रसिद एमा। इसी पश में माता जानकी का प्रादुर्भाव हुमा , एए इनके साप अयोध्या नरेश दशमय के पुत्र भगवान् रामचन्द्र का विवाह हुमा। या प्पान में रखने की मत है कि उस युप में गगों के वैवाहिक सम्बन्ध पुरोहितों के गोत्रों में होते थे। अपोमा के पुरोहित का, एष मिपिता पुरोहित का गोत्र मिला कर या विवाह सपन हुमा था। अन्यषा पर विवाह ममय दिन पा कारण पालघर विकृति की शाखा में उत्पम पारप एक मावशन निमि की सा में उत्पम विवो मनक सत्रम्भुपे । पातु इसी लिमिण मागे गाकर सीर पन, उनसेन अनदेव, पम्मेलम रिटरमादि कई महापुरुष उत्रम ाए । इनये विदेश जनक याताय शिष्य थे, पब इनके समय में प्रमनिया का बड़ा प्रचार था, मैसा कि यात्र पतप निर्मित शतपपासणक विदोह- पायसवालों से स्पप है। इसोप र निमिषय का विदर्शन कराना पड़ा । अब पुनः विकुपिया की मोर पार का न माफर्पित विपा गाता है। बसत मनु से आरम्प कर महामारत कालीन महारास मित्र पर्य पूरा (R कुधिर किस स्पररा) बतुपण बना रहा । इसने समय में १६९ पीर भयोग में निमि राम्य किया । इतिहास प्रसिद्ध पहा पुग्नास यौनाच मापाता, समपदी की मन सगर अगुमान, भगीरय मतपण दिनीप, रघु पर, देगरप, मगरान् राम का पारि कई एक मामलोंने इसी परा को मोम्ति दिया । मजस्थान से ६. पीटी भावम् रामचन्द्र का पतार इमा । एमबस्ताम् से १६० बी पी में महाराज अधि ने भपोष को दीको सोमित रिया । यही मर्पण के अन्तिम समाये । यह महाभारत पुर में शमिर VL Ire पुग में पुरुषश उसपर का, भाप मित्र को भी इससे मनु शासन में बसना पप भित्रयों के ही मागे नामर मिपारिश की स्थापना में परिकारष्टि माम्ममिका . भगमेमन से ई । इसी गावे गोनमद ने भन्म लिया । बस यहां पाकर सूर्यारा अपने उम्नासन किर गपा । पापरान मों के मुरासिद मुम्पारा का यही सचित इति है। चन्द्रमश... - पूर्व में पाठापा गा नुको किसान मनु के पनाक मादि १. पुत्र में, एक इता नाम की सम्मेष्ठ एक कम्पा पी । यद्यपि मानापम्मण के भनुमार पिता की सम्पति पर कन्या का कोई अधिकार नहीं माना मासा, वर्तमान मिन्दुसग (Hinda LAW. मी इसी पद का समर्थन करता है। वर्षमान कानम के महापपिस्त प्रीपीकोसिश के मन मानमाप स० मीमुम्लासाहिबनेको युशियों से पूर्व सिदान्त को होरिनुपर्म के भमुस माना है। तथापि यहादेव कीनियर प्रीतिमायना होने के कारण से मी दाबाद में मूसया दिया गया कि इसा सीबी मारण या राम्यप्रकाध में असमर्प पी1 मतएकरपा की अनुमति से सबसे कनिष्ठ माता मुगुम्न नेकाका सम्पमार पपनेहाप मे रक्स। B मरतबके मप्प में सपसिद सिन्धुनद से परिचमबासीक नगर 1 Ath-Hindu Lew by Right I nounblo Sur Dinshab Fridaof Malla K TO LE... A. L.LD (Edition ( 1938 ) Page 39)। Bमाजमर्ने अपने पुसिकोप से भारतीय इतिहास से अपरिचित यत हुप, माम ही में पमिमी विशनों के प्रा लिखे गए कल्पित ऐतिहासिक प्रन्यों का पाप मानते हुए उम पोटे से हिन्दुस्तान ने मजसर, निा मारतवर्प मामने की मार मत कर रही है। हमें माय पविहामिर, मौगोलिक निरूपण पर बतलाता है "मारतवर्ष की पूर्व सीमा यमामी (YelixSon-पीन का पाठसमुद्र गिसे कि पास पीसासगर मी गाता है, पर निमे मणतमासागर पसन)। पमिमी सीमा रेसी ( Red Sea-रसमुद्र बिमा साहसापर, मरीष्ठि से पौराणिक मदाबाग, मिसे कि मेडिरे येम्सी Med. Teromen Bas पहा गावा)। गरिस सीमा निरपदेश (मरा) है। भाव पारा समुहगर्म में विलीन है। यपि पार सीलोन कोलहा बताया भाया परन्तु मारतीय मुबन मेरा के अनुसार बह मत मरपा प्राम्विपूर्ण है। भारतीप डीपगणना में समाप की प्रथम गमनागपी कीप प- परियार माध्यमूमिका 1 मन्दसति ३ (योकि बाहीम मात्र पप्लस नाम से प्रसिद्ध मधुम्न का निवास था, ऐसा प्रतीत होता है। ठा । रामों में वामपर्य किंवा साम्रपणी नाम से भी मसिद्ध है । तामपर्य ही वियर कर पाम "राए- रोष" म्प में परिणत हो गया है यपुरोक्न राम के प्राधार पर यह मीकापना की गई है कि "यही स्थान सय था। सरा राम्य के निवास कारण यह यापूरावन (यषण के रन के टापू) का साया है। 'गाय टापुही "यपू यगए न कर पात्र "टापुमन" क्न गमारे कानान होग किसम अपना में भी कोई वष्य नहीं है। पर राम "टापुनवस" का पपर्धरा नहीं है, अपितु वाप- पस" भपभशप्रथयमय गषण ने अपन विहार के लिए सिंहलाठीप में स्थान पना लिया हो, और इसी मम्मन्प से यह स्थान “यपराबरण" किंवा यपूरोवेन पहलाने लग गया परमी सम्भव है। परन्तु खत इसी सम्भावराम सिंदलीप को खा मान मेन्य प्रार है,गा कि महावीपी सिंहलदीप से पृथक् गणन्य हुआ है। इसके अतिरिक्त बारह कारण पेस चौर, जिनसे सिंहस (सीलोन ) कमी साश नहीं मारा प्रसस्वा । भरतु पचम्पाश यही है कियोबा भाव ममुद्र में विलीन है वही भारतवर्ष की दक्षिण सीमा मानी गई है। रचरसीमा राणावत परव (जाकिर ग्नि सिपालक माम स प्रमिट है, एक मिमसे परापती-गपी-नदी निकलती है)। यह सीमा, किंवा सीमाविमा राप्पणावप पर्वत निरा देश से मग मग या भाशि पर है ।रान (मायोपण) प्रस्तान काल (आमा), कम्पार (गम्भार), पतन ( मादी जो कि मुग में बहण की यजपानी पी) दुपाप (पुकर,गो किनमा की निवाम भूमि थी) मावि मप माम्स मपरतवर्ष के प्रत्यय १, मारवरप की मोरूमी जागवार (पैत्रिक सम्पशि)२ामने अपनी मूर्खता मे भार अपनी या मारी मम्पिशि पावतापियों कहा ममर्पण कररी और फरव गागरे। मारपी रमी सीमापनुएपीका दिग्दराम मय हुए अमियुत कहत है। १-"पना भारत प पतामम्पानसमितम् ।। दक्षिणापरवो पाप प प महोदपिः ॥ दियमानुलेरणास्प यम्मुरप पपा गुगा (मागरेपपु.५०), २-"प्रासमुदाणु प्रसादाममुद्रानु पधिपाद ।। वयोरेगन्नर गिरीरापार प्रयतने ( मनुः ॥२२)।
परिक्रष्टि मायभूमिका मगमेमाव हुई । इसी पण – गोरमबुद मे सम्म निप्प । बस यह भारत सूर्पश अपने उन्मान से भिम गम । मायरानों के मुरसिद सूर्यपरा का पही सक्षिप्त इतित है। चन्द्रमश पूर्व में बालापा गा पुरे मिलन मनु के इलाकु भारि १० पुत्र थे, एक इसा नाम की सर्पपेष्ठ एक करपा पो । यद्यपि मानवधम्माल के अनुमार पिता की सम्पति पर करपा का कोई मधिकार नहीं माना नासका, वर्तमान हिन्दुरग (HIoda LAY. मी सी पच का समर्थन करता है। मान कानून के महापपिस्त, प्रीपीकोंसिल के सब माननीय स० भीमन्सासाहिबने कई मुक्तियों से पूर्व सिम्त को हिन्दुमर्म के अनुच्छ माना है। तपापि महान का विशेष प्रतिमानना होने के कारण इसे मी दाया में भूगा नया गया। चूकि इसा सीकी भएन यह राम्पमध में मसमर्प पी। एकप की मनुमति से सबसे कनिष्ठ भ्राता मुगुम्न ने साका गम्यमार अपनेहाप में रक्खा B मातसमप्प में सुपसिदसिन्युनर से पश्चिम पारीक मार ARRIQ-Hinda Luw by Right H nourable Sur Dlosbab Fradunfa Blolle, RTO LEM.A. L.LD (Bdition ( 1938 1 Page 89)। Bार इमने अपने पुखिोप से मारतीय इतिहास से अपरिचित यो हुए, साथ में पमिमी विद्वानों के प्रय सिले गए स्पित पविधसिक प्रन्यों को पाप मानत पास बोटे से हिन्दुस्तान में दो मरतनप, विवा मारतवर्ष मानने से पहर मह र रक्सी है । इम माग परिसिक, भौगोलिक निरूपण या बदलासा "मारती पूर्वी सीमा मलामी (Yel win-पीन का पीवसमुद्र निमे ल भार पीनासपर मी या गावा, एवं निमे प्रयासमासागर मी पसर) है। पमिमी सीमा रेसी ( Red Bea-समुद्र किया साससाप, सरी घरि से पौराणिक महासागर, रिसे कि मीरे पेप्सी Md. Teromco 8. हा गावा)। क्षिण सीमा निरत देश (बा) पार पा र समुद्रगर्भ में विलीन है। पद्यपि भाग सीलोन को लाश पक्षमापा जाणारे परम् भारतीय मुखमकोय के अनुमार या मत मर्षमा प्राधिपूर्ण है। मारदीप पगणमा में सिप की पूष गणना की जीप ५
परिसर
माप्पभूमिका
सन्दर्यसहति
३(योकि धान्नीक माग बसरल नाम से प्रसिद्ध) मधुम्न का निवास था, ऐसा प्रतीत होता है । इटा
राम में साम्रपर्ण किंवा अपनी नाम स मी सिद्ध है। सासपर्य ही बिया कर पात्र "रा
बाप में परिणव हो गया?
टापूवेन राम मापार पर यह मी कम्पना की गरेक"यही स्थान सर था।
सरायण के निवास करण ण यवन ( रापण क गन टापू) कह साया है।
रक्स टा" | "टापू यषण करायपुरन बन गया सनान ोग्य कि इम
सम्म में भी घर पथ्य की है। पद राय "टापराषम" पपश नहीं है, अपित ताम्र
का अपभ्रश है । अमय नाथ एवण ने मापन विहार के लिए सिमीप में स्थान
पना किरा हो, और इमी मम्पन्द सपा पान “टापरावण" किंचा टापूरोन हकाने लग गया
या मी मम्मच है। परस्त वक्ष इसी सम्मान से सिंहलदीप को हर मान सेना भराद्ध
बस कि महापाप से परगणम हुई है। इसके अतिरिक्त पारद कारण ऐम
और बिनय सिंहल (मीलोन ) कम मावा नहीं माना असन्य । प्रस्तु. रक्तम्यांश यही है
गि मधमाज समुद्र में विलीन है वही मारतवर्ष की पक्षिण सीमा मानी गई है।
रघरमीमा शर्यवापद पर (बासि भाव दिन शिपाल माम म प्रसिद्ध है, पण
निमसे परापती-गली-नदी निवासी है)। पर सीमा किंध सीमाविमामा रापणावत
पर्वत निराश से मग मग या माय पर न (भाप्यायण) अपस्तान, काबुल
(मा), कपार (गपार, परब ( बारीक मोकि रेषयुग में पण की रामपानी
थी), पुरोहित्रमा की निवाम भूमि थी) प्रापि मम माम्त मारमा प्रपत्र
२, भारतवर्ष की मौम्मी पायराव (निए मम्पति) दमने अपनी मूबता मे पास अपनी
या मारी मम्पिति पाततापियों के हापा ममपण कर दी और करत भाग। मारलापही
मी सीमापनुमपी का रिगएराम पव दुप पमियुष परत है।
१-"प मारत बप पतासम्पानमशिवम् ।।
सिगारनो यस्य पूर्वया पोदपि 111
दिसरानुनेरणास्प सम्मुरप यया गुण' (माकगरेयपु०५१०)।
२-'मासमुगादाममुगनु पमिसार ।।
-
दयोरेगनर गिरापरिन प्रवचन " ( मनुः ॥२॥
परिक्रष्ठि -AL माष्यभूमिमा सम्पर्ममा को दाया में दो प्रान्त मिला वही +मविशनपुर नाम से प्रसिदामा । मधुमन इन के राम्र प्रम के लिए मागे गाकर यही बस गए । इसीलिए पुराणने प्रतिष्ठामपुर को कही मन की राबमामी सख्यया , एकही इज की एमपानी बसष्म्या है। चिस प्रकार ऐधर्य समम्म में स्पाम् प्रम के विमहान् पदि कर मानमा ये एक मेर निया के सम्बन्ध में भी नोंने कई अपियों को अपना मानसपुत्र बनाम पा । इम मानस पुत्रों में (क्यिापुर्षो में) परीचि, पहिरा प्रपि, पुमस्स पुमा, कन व पुत्र म मा प्रसिब हो गए, वैसाकि निम्नलिखित मन से स्प- प्रमखो मानसा पुत्रा रिदिवार परमार्पः॥ मरीचिरहिराप्रमि' पुनसः पुमाकतु ॥ ॥ मस्त पाए पुमा भूयन्ते मनुमापिप ! से पदविक्षः सिदा शान्तारमानो मार्पयः ॥२॥ (म०प्रा.१६६५) उस ६ मो मानसपुत्रों में से मातानिबासी मात्र तीसरे पे मत यह प्रति माम से प्रसिधार जैसा कि "भा हतीय मर्मस्व मावति स कीमते" (प्रभारपु०- १०) इमानि मन से स्पष्ट है। या मति प्रापलिम पनि के प्राण (परीवक-माने हमक) पे, भाएष या मी पनि नाम से ही प्रसिदए । मा की मार से सब से पाये •मतिकानपुर के सम्बन्ध मेंपथिमी विधय में पक प्रामिर फैला रमली है। पा स्वरूप सरनुस्मयी भारतीय इतिहासबचा भी इसी मन्तिम अनुसरण करने दिललाई देगी। तिने ही मानुभाष प्रयाग के समीप प्रतियनपुर मत्सा मजा ।सिने ही परामराव में प्रतिष्ठानपुर में सत्ता सिट पाने में म्पम है। किसने हो के मतानुसार इम्मिनापुर के समीप हीसी प्रविधानपुर प ऐना सियाना म रोगालि पर समीमत प्रान्ति पूर्ण । बस्तुर मिन्पुना से पलिम, सिन्धुमाव पर कोरा परिश्म के पासने पर मार्णपण नाम से अमित पभिम मारताप में ही प्रविशनपुर था। इस विपक्ष प्रवियर विरेचन श्रीगुम्मणीत मनिवास" भाममबसाप्रकरण में देखना चाहिए।
मन्दर्मसानि दिशाधि का माप्यभूमिका ।। . पनि ही वेदप्रचार के लिए नियत किए गर या पनि शम्द मागे माकर परम्परा में निस हो गया । देवयुग में भाप्रेम प्रश्न पत् के प्रमश पोपप्रशि, मस्पिप्रमि नाम के दो पनि धपसि भनें । पहिले कुपतिमे पारदराकाप्रतिवन्धक चन्द्रग्रहणाधिष्ठाक्षा भूमिगत पत्रिपास की पूर्ण परीक्षा कर प्रहसनिया का सबसपम पाविष्कार किया भतएप ये भीमामि नाम से प्रसिदए । पम्ही भोमाप्रि से महासती अन ममा के गम से पन्द्रमा का सम्म भा। दूसरे सास्यामि ने उच्च मपरस्प नादमिक भभिप्राण को परीक्षा की। जिस प्रकार मोम- मपि से चन्द्रमा उत्पम दए, एवमेव सम्पत्रि के गांवापन उमए । पह गदा ही धार्मिक मा । सांसपने बहुत उपयश रिया परन्तु इनका यह उपदेश सर्वया पर्ष गया फसता निराप को सम्पिमे सिन्धुदेश में देवमिकाय नाप 5 पर्यत में (जोकि पर्वत समेमान' नाम से प्रसिद्ध है। निवास कर लिया । पर तत्पुत्र शान्वायन एवं तामा धम्मभ्युत हो गए पानदरा के ( पीकवर के)दि प्रबतक बन गए । इस प्रकार सांझपनि का मश छिम प्रायोगा। मौमत्रिपुर चन्द्रमा सोमबासी की रक्षा लिए रामबनाए गए एवं उचर रिणा है दिक्सास बनार गए । यह प्रापण होकर रामा बमें, अतएव तत्ममप में या राना माम से ही योक में प्रसिदए । इनकी भी रोहिणी थी । चन्द्रमा मे तारा के गर्भ में चुप का पम्म भा एवं पहरोदिणेप माम से प्रसिख पा 1 धूफि पर गमा के पुत्र थे , अतएव ये रामपुष नाम से भी प्रसिद्ध ए । भतरव तनपर रामपुर नाम से म्पबाल हुए । यही गमपुत्रशद बागे गार "रामप्न" ममें परिणत हो गया । इस सिर मामा कोम जानने के पास कितने ही पथिमी नशाम् भारतीय चमिपाश की समासाचना करत एकामे ने हिरासपूत पत्रिय महीपत्रिपों मरतमी तो मन कर रामन पसा जाता है।" । सचमुच अपने स्तर्षिक तिहास से पवित रहने के कारण न मालूम ऐसे ऐसे विनमें मिप्या मापों का हमे शिकारबममा परहा है। गमपुर रोहिसेप चुप के साप पक्षात् पुपी पा का विकासमा भरि राय - परियष्टि SI माप्यमूमिका सन्दर्मसात . . इसा का पा, भाएर तत्समय से यह परा "ऐम प्रसाण । दुध से इसा के गर्म में मुम सिब प्रतापी 'पुरवा" उत्पम हए । पुमता के पिता दुभ के साप गन्धों का अभिक सम्पर्क पा । कारण पत्रमा गम्बों के सबाट मे एस पी मसरामों का निवास पा । पतरण उसी गति में उत्पन होने वाली, मतएव उर्वशी नाम से प्रसिद एक मप्सरा का दुमपुत्र पुरुत्वा के साप सम्बन्ध रोग्या । इन के सम्बन्ध से महाराज "मापु" हत्यमाए । मौमाति व्रमा के मानस पुत्र थे, चन्द्रमा भत्रि के मौरसपुत्र थे, एष बुध मौमात्रि के मौरस पुत्र थे। इस परि से प्रमा-मपि-पदमा धुप पा पारों ही पनगरा के मापुस्प माने मामाते है। मी पन्द्रमा-बुर तीनों ममुप पे पल इन का निवास मारत में न रहा । यह मनुप्प न करण देवा ही करनार • मिस प्रपर सूपारा में से भारत के परिते समाद रसाये एक्मे रस कयरा के प्रपम सम्राट् महारान पुरुरवाही हुए । इक ये इसा की सन्चन पे, ववएष वनरापर ऐममकवि नाम से स्पाइए , जैसा कि भमिपुरत प्रथा पानिमम एवं पुपसेवे देवासम्मरणदिमताः । यमप्यते मानवाः फितु हेऽम्पुर सर्गे मवे मारदोषी मनुष्याः ॥१॥ प्रमादीना पाखाना म मनुम्पसपिघ्पन। वनोऽप्रे पन्द्रायोयमल प्रकृतिरुप्पो । ॥ (श्रीगुरुप्रसीत भनिस्पाति)। यह ऐतिहासिकरियरम से पाठकों को विदित हो गया होणक माई काश (m कुग) मारतार्य में सूर्पदंश कासाया, एक दिन का अंश (ग) बस नाम से प्रसिस उभा । हमारे इवास के चरितनाप कौरव-पारण मी इसी बन्दसरा में मातम ए , मत एव इ-"सोमका" नाम से सम्बोषित किया है, जैसा की पापन कहते हैं- कर्य पुपुपिरे पीराअम्पाएरपसोपन्नः। पाणि समास्मानो नानादेण्सपागता (ममी म । हो इतिहासकम पर पाहिए । पूर्व में कहा बाबुकाम दुभएपदा के सम पीपष्ट का माध्यमूमिका मन्दर्मसामि न्य से पुरुरवा, एव पुमपा से पाय उत्पम हुए । मायु से मप्रसिद्ध नाप सापम हुए। मार प रागानों में ये ही एकमात्र ऐसे माम्पशाटीरामाथे, दिन कि कुछ समय के लिए स्वर्ग काशासक पद ( पपद) मिक्षा | मरान नाप के परम प्रतापी पक्रवर्ण ययाति उत्पन हुए । भासियों में पहले पती सम्राट् पपति हरीए । भारत में मास का विशेष वि घस पालि से दी पारम्भ हुवा, पत भामे गाकर पति मी पन्द्रमश के मूतपुरप मान गार्ने हो । पयाति के परम मसापी यद, पुरू, सु, अणु द्वापु नाम के पांच पुन उस्यन इए । न पचों के कारण चन्द्रमश भनेक शाखामों में विमान होता मा सम्पूर्ण भारतवर्ष में पास होगम । पपपि पापत! पापों में से सम्माधिकारी म्पेष्टपुत्र पदरीचे, परन्तु पिता (पान) की पपिस्वप्ति के लिए भायुप्रदान न करने के कारण पदु राम्पाधिकार से पचित्त कर दिर गये इसी पद से भागे जाकर प्रसिद्ध पादपरा का प्रवास पुमा, जो कि पन्द्र- परा की दी एक शास्त्र मनी गती है । भगवान् के अपार से पर श धन्य बन गया । पिता की भाहा को रोपार्य करने वाले कनिष्ठ पुत्र पुरुने पिता को अपनी पुरावस्या समर्पित करने मे मिासन प्राप्त किया । रोप वर्षमु-अणु-दृप वीनों मार्यो, अपर्ने । पर्ने सत्र मापरिक पम्प स्पापिन मिस । इस प्रकार पुरुही पद्रवरा की मसगी के से सब रह गए इसीलिए हमके रावर पोग्य नाम से प्रसिर ए सी पुस्पेश में भागे बापर इतिहास प्रसिद्ध दुप्पन उपम ए प समय के लिए पुरुष विपिन परगपा पा । परतु पीर दुपात में सिपोराय को एकसार बम दिया । तब से रक्त मी पुरम के मारि पुरुष पर पीरों के परानापक मने गाने गगे। जैसा किनिम्न उचित पपन से स्पर पौरयाणा मंगको अपनो नाप बीपवान् । पिम्पासातुनया गाला मरतमन (म.मा मा०६८०)। दुपात से रास्ता भ में एपसिर पयोमति दीपनि मान से बस में मान तिा मे मी मागे वार । पटी नदी, मागे गार पुकार माय से प्रसिदमपं माला ने निगमे पान रपाम पर मालमनप' मारन! मन परिम Kा माप्यममिंग 10 सगममा पम । इस्पादि मामों पे मर्जुन को सम्बोधित करते हुए मरत को रवासन प्रदान किया है। • पुराण के एकोशी मतानुसार तो मरत के समय से ही यह मनुप्पोक मारलार्य करण्या ।स्स म्यासमरा लिमित एतिहासिक प्रत्य मी मरत के सम्बन्ध से मममारन" मातम्या |सी मरत का पशोपन करते हुए म्यास करते है- दुप्यन्तस्तु मो रामा पुर्व शास्तम वा मरत नामतः इस्ता यौवराम्पऽभ्पपेपपद ॥ स रामा चन्दवमासीत् सार्वभौम प्रतापवान् । •पस्न म परान मारप माम मयुग में ही प्रमिशगया था। रेणुग में पति- पीला रासम्पनपान् मारत भाम ममि -(परिम्प अम०४।२५।४।। सम्पम्प से पनार माप सम्पया । भरत नाम मे मा पुयान मारनप नाम की पतिमलाइ मारमा पल भरती कीर्तिमान बरन निमकी ऐमा मान लिया गया है।मका प्रपा प्रमाण पहीलीप्पम्ति मरत पनिरिता पात्र मामपुर पम्प परल मनपसे मी भारताप शप की उत्पशि मानी गामा निम्न सिवितरपना स सष्ठ- 1-पानीघ्रमनोनामेन वपमोऽस्त नो दिम । पमान परतो पो पीस पुगता मावि मरताप पिता दी। सम्मान भारत मध्य भाम्ना मदाम्पना नामः पुषम्प पम पमाद मरतोऽमात् । तस्प नाम्मा सिप भारत पेनि करो ॥ (मा. ७.)। १- सपाप दुप्पमो दुप्पम्नाद् मरतोऽमान । गाम्नपा उपयी पम्प नाम्ना तु माग्मा ॥(प्रपि २०८.)। इन पालो माघ मममम मापार पर ममम पिपरिगल परम पुणगरपी पम्प प्रमों में परे। - - परिपाधि माप्यामका & सपमावि मरवादभारतीकीर्विनर मारन कुमम् ॥ ॥ (म मा प्रादिप ७१ म)। इसी सुप्रसिद्ध मरतारा में भागे माकर महाराज कुर सत्यम हुए । पा मी भरने पुग में परास्वी हुए । फलसरूप आगे का पश इन्ही के नाम से (कुरुक्श नाम से ) प्रसिद्ध एका । रापरयुग के बरत में इसी फुलपश में महाराज प्रवीप से शाम्तनु का जन्म मा । पा से हमारे गीतासम्बन्धी इतिहास का मूखमोर प्रवाहित होता है। शाम्तन से गहा के गम में देकमर्सि, किंग वमुर्ति देपना उत्पम ए । भीरकम्पा पत्स्यगंधा को भपनी माता (पिय शान्तनु की पम्मपना ) बनाने के सम्बन्ध में "न म मामन्म पिसार करेंगे, एवं न सिंहासन पर पैठेगे' प्प मगार प्रतिक्षा करते ए पी देशात 'भीम' नाम से प्रसिद्ध हुए । पही महापुरुष मागे जाकर 'कुरुकुम पितामर" नाम से सम्बोधित हुए । शान्तनु से मस्पगधा के गर्म में (जो म भागे नाकर "मरपवती" नाम से प्रसिद R) रिशन्नद एक रिषिमपीप मा दो पुत्र उत्पन हुए गन्तनु की मृत्यु के पोरे समप पीछे ही राम्प ने उत्तराधिकारी पित्राङ्गद गधों के हाप से मारे गए। फात कनिष्ठ भाता विनियोग्य को सिंघामम पर बेटा कर सय भीष्मपितामह पम्पम्यपरण का सबसन करने सगे। रिटीप माह के योम्प १५ सो भीम काशी पहुंचे एर म्यम से अम्मा प्रमामिका प्रमिका नाम का तीनों पम्पाों का अपहरण कर हस्तिनापुर भाप। इन तीनों में समा - अपने मन में मगन पपा परपा कर भी?" ८६ करने पर एमति भी म उ मादर शिक्षा पर लिपा , पप रोष दोमों पम्पामों का पिसीप स प विवाद पर या । दुभपाय योग प्रस्त होने Tv Aचित्रीय बगार में मयुक मास यन गर । पुरुष एकवार शिधार में पर गया। महामा मामा सपना हम मालिसे परे वितित । अस सम्पती परापण गे माय को सरे भारति पास में पुरसंग दीरशनिपो गरिधि का पारा । भातातोतामोद मिनिसी AAN से बादामोशी समर) पर ग मागन पाम का प्राधमा म ॥
पहिरष्ठि भामायभूमिग्न - सनर्मसात भायाम ने माता मरपाठी को मदान दिया पा कि "दि तुम पर कमी क विपत्ति माने तो उम सम्प मेरा स्मरण कामा" | फसत म पनि काम में म्पास काम्मरण किया गण । म्पाठ उपपित हुए । सारी परिस्पिनि इन क सम्मुख रस्सी गई । सम्बन्ध मर्याने अनुसार म्पास मा पप भमालिका देवर होते थे, एक भापति में पसरवा मिर दर से रिपोग पनि । पुपोषम करना मानबप मरणय से मी अनुमोदित टेलिए मनु । . मात्र सीमावर्मको सदय में रखकर माता की मात्रा सेम्पास नियोगपिपि में प्राचार। मा तपोयोग में प्रात्त पने पाया म्पास का शरीन महामोहापा। लियो विधि में प्राव नेटो बा पम्मिान कार देख पा राई, उसने मप से नेत्र र विर। परिणाम माप कालान्तर में सरे सपा पुत्र उत्पमा, चोषि भवराष्ट्र नाम से प्रसिदए । मस ने पापा पा के नेत्र बन्द करने के कारण इसके माप सम्तान हो। ऐसी पर लिपी में काम भी क्यों फि यान के अनुसार पापा म्यति राम्पसिंहासन का भभि ही बन BRL I इस मति को र करत निर छोटी पर निमोजिम प्रत। उसने मार्ग तो बदनी, पाम् मप से हमका गरी पीसा पर गया। पास ने पर दिया कि इस के भी ग सान , पर जब से ही पापागा, एवं रोमानला रोमा सम्मानों से निराश तो मरपती ने अभियान को FRAP मोसाहित किया। उसने कहा मोनोर कर दिया पग्न मगर पर मप न वाम दामी मान बताभूपणे मे भारत का मेनपा । रामी पासपो मबार मी नमसर पाम मे पदार iratो परम धार्मिक, मागत मगम पाम बुदिपान ६ परम सागर पुर उपम और दारिदर माग से मिब HTI पासन PM TRAIमय मे पहा नाकर भी दागेर मेरे परिसराम An पाग कोही Are Nagt मप माप Arung भी Tere पारे FRAaratरापी सरकारमा पहिणी मा माप्यभूमिका । सन्दर्ममहावि माय मारत समाम हा से पुष्पित एव पल्लवित शुभा ।। सराद को पोड़ी बहु । माया यह पीक परि मेरे पहिले सन्तान हुई तो उसे राम्य मिन भायगा । परन्तु अब उन्होंने या सुना कि "कुती के गर्म से देवताओं के बाहाम से पांच पुत्र उत्पन हो गर है" पोइन की ही सी आशा पर भी पानी फिर गया। समय भाने पर लगा के भी महासती प्रभारी के गर्म १.१ पुत्र उत्तम हुए । पाणपुर पाल कहगर, प्रतराए पुप्र कौरव बताए । दुर्योधन का कुटिल नीतिक पा । ठमने अपने बापको “माग्य से प्रसिर फिया । इस से प्रजा में यह पर पीनारोपण करना चाहता पा कि पुला कुरुपरा में मेष्ठ २ एस एम ठगी की सप्तान है। सतपुलकर के पैत्रि भाग्य के मधिकारी एकम्पन हम ही है। सी दुरमिसधि में कर अपने मातुल शकुनि के कुधक का सहारा लेते हुए दुर्योधन में धर्माम परापुत्रों के साप पा क्या मायावा दिए, पर सर्वविदित है।०४ वर्ष तक बनमस का फट माने के अनन्तर युधिएिर समाधव वारस सोते । परन्तु इतना सम्मा समप पाकर दुर्योधन पूरी तरह संमत कपा। भवतोमन से उमने अपने सामन्त गगों ने मुही में रविण पा । इसरों की बात तो जाने दीपिए, भीष्म जैसे तरच शक्ति भी इस भपति के शिकार पर पुरे थे। उस समय की गफम्या देम पर दोनों तले अंगुप्ती दवा लेना पाता है। परि दुर्योधन में मरा मी पम्मपुद्धि होती तो नि मह का मरने इस मुद्धि कौरव से पुकारा को कई शादियों के लिए उमम बना सकता था। दुर्योधन के शामन कस में पुरसाम्राम्प प्रमुव-प-पधिम-नर-दक्षिण न पाप प्रास्तों में बिमा पाइन पांचों में प्रमुग्णात "गमार" (हीनापुर ) माम मे प्र. मिर पा । मगणान् सपा पम्पास IPL सार एमप (देहसी ) से ६.कोम उतर के समीतिमापुर पामार मानी गहा के उदर में समा ग स्पान 'म मार पर महादो । म मात्र मारिए दी रिमी ममप पुमाप की प्रधान रामपानी पीनापुर र मत पुरमादम माम से, पका प्रान्त का पायाम माम मे पपिम म पर माम मे, पिता A ग्रागरसन नाम - १८१ परिवष्ट्रि - माममूमिका " " -- - " n T से प्रसिद था । इन पांचों प्रान्तों की समष्टि री कुरुमारास पा, इस के सम्राट् सक्रार थे, एष प्रान्ताधीश ( गवर्नर ) प्रमशा दुर्योधन, भीम छोय कर, अपस्थामा थे। अके मी की राबधामी "म" देश मा । -हस्तिनापुर-अमुस्समिशनी दुर्पोपन (प्रतापीश)। २-रुपायाम-नास्तिनापुर से पूर्व होग -कुरुक्षेत्र पप्रिमर उत्तर मीप " ५-सारण दक्षिण प्रात्यामार हिमामय प्राव से मो तापी पार कर गए बाते में एक स्थान पर रहा मारा पाउन अंगली सपियों को पात बनाया जाता था। यही प्रम 'हस्तिनापुर" (पापियों का नाम ) माम से प्रसिद्धामा । यो सपियों को मने प्रोमनों में गाकर हावियों को पकानें मासे "मा-मा-ग-द।" इस प्रकार के विचित्र भापों से विमाप से पैरमार कर हापियों को यहाँ बाया करते , दूसरे शब्दों में प्रोमनों द्वारा हापी इस प्रम में पुणर गाते थे, अतएव या प्रम-"पाहाम्चे गमा प" इस निर्मकन के अनुसार गमाइप नाम से प्रसिधाम । मामारत में स्तिनापुर के मान में सात स्थान पर "गमाइर" सम्द का ही प्रयोग हमारामबाप साप्रामीन माम पा, पीगगे गार हस्तिनापुर रूप में परिणत रामा, एक कागर में मकर की मिठासे हो गने से ही हिनापुर माम से प्रति हो गया । इप्रस पमुना के किनारे पा तो पति पुर गातट पर पा । र माप से पहिसे इन मरवाशों की राम्याना कार्यापरा (ईरान-पथिममारत ) प्रान्तर्गत महोदय नाम का शहर पा । सब के समय में इन मिसि II तोलाने पूर्णव मारत वन मना किनापुर प्रवेश में ही अपनी नवीन राजधानी बनाई । इस स्माधिों को हटा कर इन के लिए एक साता प्रम मनाया गप्प । पी ग्राम "म्मप्राम ' (पिमो का प्राम। माम से प्रसिद रामा-दिसिए पदोम्मठ बाममाया)। इस प्रकार हस्तिनापुर हरष्टि हा मायमूमिका &. मनमसमावि एक सुपपन राम्य होगा। यह राग २२ कोटे (करोड) को रिपामर मानो जाती थी समुद्र-सोकीमा की च से यह मारताप का पूर्ण अभ्युदय कास था। महामारतकाठ मारतवर्ष का समुमतिकार मी कहा मासकता है, एक पतन काठ भी। परम रागनीतिा महरमा विदुर, परम धम्मा'मा परमादो युपिष्ठर, बीरामणी अजुन, भीमप्र मश, विरितोदितम्य, बामनवारी, प्यतत्ववेत्ता देवव्रत, पाचार्य द्रोण पूर्णावतार भगवान् श्रीरुप्या इमादि मारत की दिग्यविमूतिए उसी युग में विपमान पी। एक साप ही में स्वार्थ की परम सीमा पर पहुँचने वासा कुटिस नीति दुर्योधन, सतीत्व का अपमान करने वाला दु गापन अपनी कुन्धि नीतियों से मात के समय भव का नाश कमाने वाला दुर्मति सकुमि मादि मापुरी मूतिर मी उसी युग में अपमान थी। कौरव-पाएरयों का समाम क्या था, देशभर ममाम था । यही संग्राम मातीमत के नाराका कारण बना । पपपि भघम्मानुषायी कारणों के पास ११ भदौहिणी सेना पी, इधर धमारमा पारेनों के पास ७ भदौहिणी ही सेना थी । फिर भी धर्म के प्रमात्र से बसपची पायानों को ही मिनी 11 चौहिणी सेना के संपर्ष में मप मम पापडों को ही हुमा । इसी प्रतिनीमार को सूचित करने के लिए णम ने इस पम्प के १० पर्व बनाए। या पाठकों को लिदित कि ११ भदौरिणी सेना को अपने अधिकार में रसने वास पुठ माता दुर्योधन सदा प्रशन्त रहे, घर वा ७ भदौहिणी के अधिपति धम्म नीतिक पुधिष्टर सदा शान्त , । इसी रहस्य को मपित करने के लिए पासदेवने भारग्म में "पो ता तो भयान्तिमाव को प्रधानता दी), एस.२२ से १० पर्व तक शन्धिमान फो प्रधान रक्सा है। १२ पप गान्निपम है। समय में जो कुम सत्पात सोना चाहिए पा, इस मे पहिसे पदिले हो जुस है। इस से मागे पर्मगर मुधिष्ठिर के शानिमप धर्मयुग करीमामास प्रकार ११-७के सर्व में नप के परिकारी युधिष्ठीमन गाने है। यही मूरित करने के लिए समाप का नाम "मप रममा गया है। सम्पतिशम के भनुमार अगर ८ म्यापा, पर १ मेम्पा पर बात है।
पादियाठि - मा पमूमिका समर्ममा . मे प्रड्डाना मामतो गति' के अनुमार १rt। यही परहस्य है। इस गलाम के मास्तम्भ है- भगवान रण । पदि भगवान् बनुन को उपरेशम देते सो पाशुष्क तिमी हो उसी पी। । साम का एकमात्र धेष मिता कोही। इसी रहस्य को जार में रखकर मासने ना के 1 मायाय रखते हुए पर मूचित किया कि । मगरको सेना के सर्प में इस तोप से ही, दूसरे शम्दों में गीता के 1 पापों में प्रतिदिध मुपयोग फेबर पर ही पाराय १८ सस्या से भमिमीत सम्म करने में समर्थ हुए। हम कर चुके हैं कि महाभारतपुर से परिसे मारत पूस सपस पासासा का प्रमाण १८ पक्षोीिसी सना है। मिस राए में बात की बात में इतनी सेना एक स्मामपर नीबोनाम, उस राष्ट्र के मन का ण पाना । पाठकों अनुमान के लिए हम प्रसहो पाच मौषिणी का स्वरूप संपन से उदृत कर देते हैं। गम्य की प्रधान बङ्गमता सेना पति मेनामुम्ब गुस्म, गण पाहिनी, ना, प. भनीस्निी प्रचारिणी मेद से मो मों में श्रिमात मानी गई है। रस, १गर, र पैदल पोहा १ कोडे पा सब मिर एक पनि है। ऐसी तीन पतियों की समणि (प, यश, रबोरे) एक सेनाममा ऐसे तीम सेनामुसों का समुशाम (१रप गम पोश, २७ मोरे एक गुम है। ऐसे तीन गुस्मों की समस(२७ रप जाग १५, योगायोग) एक गम है। ऐसे तीन गस Fमत 1 ( ८१२५, २०५ पो २१मोरे । एक पाहिनी है। ऐसी तीन चाहनियों की १९४५प ब १२१५, मोखा, २८ बोरे) एक पुरना है। ऐसी तीन प्रतिमाएं (रप, ०२९गर पोडा पम् ।। ऐसी तीन चम् की ( २१५७ रस, २१८७ गा , पोय, ६५५१ बोके) एक मनीकिनी है। ऐसा १ अनीमिली मिल कर एक अधीहिणी कराती है। In श्रम से एक अमोहिणी सेना में RA: २१८७४ (कास हजार, माठ सौ सत्तर ) रप, १८. (कास हमार, माठ सो, सत्तर) गा । ५५० (एक शाम तो गर न सौ पचास ) पैदछ पोशा एक १८६१. (सर हगर, दत्तो यस) को दो गाते - २१.० परे) एक महिपरटि सामाप्पभूमिका सदसति हैं। पैदस सेना के अतिरिक्त प्रत्येक ग्य, प्रत्येक गज, एवं प्रत्येक मत्र के साप एक एक रया सोही पोदा, गमारोपी योद्धा, प्रभारोती योदा का समावेश और कीनिए । इस क्रम से 'मदाति योतामों के । पैदल सेना के ) अतिरिक २१८७० रपारोही योदा २१८७० गना रोगी पोदा, पम ६५६१० अमारोही योसा मौर हो जाते हैं। इस प्रकार मोहिणी के स पक्ष पोदामों का निम्न लिखित कम हमारे सामने उपस्थित होता है- २-पचि + रय, ' गज. ५ योटा पोदे। २-सेनामुख- रय, ३ गम, १५ योदा ६ पोदे। ----- र स्य, गा, ४५ योदा, २७ पोरे। --- २७ रप, २७ गन (१५ पोदा, ८१ पोहे। ५-वाहिनी- - ८. रय, . गम ०५ योटा, २४५पोरे। ६-पृतना- - ५,२०० गम,०१५ योदा,०२६ पोड़े। - २६रय, ७२६,६५ योदा, २१५७ घोड़े। ८-मनीकिनी- २१८७ रथ, २१८७गम १८६५ पोदा, ६५६१ पोहे। प्रदौरिणी २१८० रय २१८७ मन १०६५० योदा,६५६१. पोरे। -गुरम- ७-चम्न -पारोही योदा- १८७० (इक्कीस मार पार सौ सपर) २--मारोती पोदा-10७० ( 1-प्रभारोपी पोदा-६१. (मठ मार छस्सी दम ) ५-पानिपोरा--१.५०( एफ माम्ब नौ मार तीनसी परास) " -दौरिणी-१८ (ो मार प्रगर हमार सान मा योदा) गरियाष्टि -al माप्पभूमिका 15 सन्दर्ममा - । पर वो उम पनसरमा बम विचार मा, गो सा से सुसमित कर रहे लिए समय सी थी । इस समस्या के अतिरिक्त युद्धममि में परिकरा मी अपने प्राओं को एपठी में शिर उपस्थित रहता है। प्रत्येक रय के लिए एक एक सास्पी का रोना आरक है। प्रत्येक सभी के लिए एक एक गमकाक (महात)मपेक्षित है । प्रत्येक भर के लिए एकएक मापरिबारक (सस । मारपकमर पविरित रप एक बापियों की समाव पर पक पक रयपरिबारक, एष एक एक गमपरियारक भी भारको विकासकाम करणा- स्वकार्ग, माइकर्म गुप्तबरग, पोदामों का पात्पर्ग, बाप्रकर्म, पूषासंचासकर्भ मादि मावि परिकरणों की गणना पर। दो साल सेना के लिए इस परकर की सध्या मी २५गर से कम नही मानी गसकती। इस प्रकार एक कोहिली सेमा की जनसत्या पार करने पर निम्न सिसित क्रमममे सामने मत है। १-खकरने पाले मोबा२१८७० -रवर(सारबी)01. ३-साफ (मशत) iran परबपरिचारक २१० -गजपरिवारक १ -अपरिचार- -परिबर्ग -तीनलाखठिन हजारसातसनिल -- 1-पठौरिळी सना की मनसंसपा ९५७६० - इस संमण को १८ से गुणिन कीथिए । कौरव-पापा सेमाम में ८९४२२२ (मसमाधाप मास्सीम हमार दौसौ बीस ) म संम्मा हो जाती है बममाण रे भरित निस माम मे ३६५१५. (तीन र निरनगर दस्सो सरहपी २८६. (तीन सयरानो बार दस्मो मर) रप रों, एवं ११.१८ ( पागम मस्सीगार पहिरष्टि माम्यभूमिका 10 सन्दर्मसारवि मौसी वस्सी) पोदे हों, उस संग्राम की, एष साप ही में उस युग की समद्धि का क्या वर्णन किया जासकता है। दोनों भोर से जब सैन्य संग्रा रहा था, उस समय मन्तिम यार शान्ति की चेय के लिए भगवान् सपा शान्ति के दूत बनकर हस्तिनापुर मार भगवान् ने साम-दाम-दयर- मेद से दुर्योधन को पात समप्रपा । परन्तु 'हम पांच ग्रामतो पण पिना पुर के मचिका मर भूमि मी देने के सिये तय्यार नहीं है" यह उत्तर मिया । स्त्रय म्यासने पुधमोहग में पतित प्रवराष्ट्र को रोकने के लिए प्रेरित विमा परम्त सारा परिमम म्पर्य गपा | मारत के माय में जो कुछ होना लिखाबा, दोनों मोर से उसी की सप्यारिए होन बगी। म्यासदेवके-"यदि तुम पुर देखना चाहो तो हम तुम दिग्परयि मदान कर सकते है" यह करने पर धृतराष्ट्र मे करा कि मगरम् ! में इन प्रसों से अपने परा का भय नही देखना चाहता । नाप किसी ऐसे म्यक्ति का प्रबन्ध कर दीलिए, जो मुझे युद्ध की प्रत्येक पटना सविस्तर मतमाया करे । प्यास ने समय को दिम्पति प्रदान की, एष उमें इस कार्य के लिए नियत किया । कुरक्षेत्र के मैदान में एक मोर " अक्षौहिणी सेना, दूसरी मोर ७ मोहिणी सेमा मोचा बांध कर सही होगई । पब पुर के लिए सारी सामग्री उपस्थित हो गई तो धृतराष्ट्र समप से पूछने सगे- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समरेता पुपुत्सवः । मामा' पायदपाश्रम किमत समय । 0.4 बहिरङ्गपरीचात्मक-प्रथमखयह समाप्त
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