Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Manav Dharmsar Adhyay-i

Muni, Kapil, Babu Sah Prasad Singh · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

मानव धर्मसार- 3 प्रथम अध्याया मनुमेकायमासीनमभिगम्य महपयाला प्रतिपूज्य यथान्यायमिदम्वचनमब्रुवन् ॥ १ ॥ मनुनी एकाग्रचित्त बैठे हुग थे महर्थियों ने उनके राम नाके और यथान्याय प्रतिपूजा करके कहा ॥ १ ॥ २) भगवन् सर्ववर्णानां यथावटनुपूर्वगः ॥ अन्तरप्रभवानाञ्च धान्ने वतुमर्हसि ॥ २ ॥ हे भगवान सब वों का और अन्तरप्रभवों का धर्म क्रम से ठीक ठीक हम लोगों से कहिये ॥३॥ (३) सते: पृष्टस्तथा सम्यगमितीजा महात्मभिः ॥ प्रत्युवाचार्य तान्मवीन्महीन श्रूयतामिति ॥ ३ ॥ जब उन महात्माओं ने महातेजस्वी मनु जी मे यह पूछा तब मनु जी ने उन सब महर्पियों की अच्छी तरह पूजा करके कहा कि मुनिये ॥३॥ (४) पासीटिदन्तमाभूतमानातमलक्षणम् ॥ अप्रतवमयिनेयं प्रमामिय मर्वत: ॥ ४ ॥ ना ऊंचे वर्ण के पुरुष और नीचे वर्गा की विवाहिता स्त्री से उत्पन्न हो उमें अन्तरमन कहते हैं।

(5.) Then the sole self-existing power
undiscerned, but making this world discount
five eleinents and other principles of nature.
with undiminished glory, capanding his iilen,
pelling the gloom.
(6.) 'He whom the mind alone can perceive, vrlose
essence eludes the external organs, who has no visible
parts, irho.exists from eternity; meren lie, the soul of
all beings, whom no being can comprehend, shone fort]
in person.
CHAPTER 11.
(7.) The scripture, the codes of law, aprover
usage, and in all indifferent cases self-satisiction, the
wise bave openly declared to bc the quadriyle descrip
tion of the juridical system.

(8)- यह सब जगत पहले तमामय अर्थात् अंधेरा था न वह जाना गया था नउसका कुछ लक्षण थान वह तर्क करने के योग्य था न जानने के योग्य था मानो नींद में सो हुआ था॥ ४ ॥ (५) ततः स्वयम्मभगवानव्यक्तोव्यञ्जयन्निदम् ॥ महाभूतादिवृत्तीजाः प्रादुगसीत्तमोनुदः ॥ ५ ॥ (ॐ फिर तब महाभूतादि अर्थात् पृथ्वी अप तेज वायु आका- शादि से प्रकट हे प्रभाव निसका तम का दूर करनेवाला अव्यक्त स्वयम्भू भगवान इस नगत को व्यक्त अर्थात् प्रकट करता हुआ आप प्रकट हुआ (६) योमावतीन्द्रियग्राह्यस्सूक्ष्मोऽव्यक्तसनातनः सर्वभूतमयोऽचिन्त्यस्सराव स्वयमुट्वभौ ॥ ६ (e) ना भगवान इन्द्रियों की शक्ति से परे सूक्ष्म अव्यक्त सनातन अचिन्त्य सर्वभूतमय हे सोई आप से आप प्रकट हुआ ॥६॥ = द्वित्तीय अध्याय ॥ (6) वेदः स्मृतिस्सदाचारः स्वस्य च नियमात्मनः ॥ एतच्चतुर्विधं प्राहुस्सानाद्धर्मस्य लक्षयाम् ॥ १२ ॥ (6) वेद और स्मृति लोगों का आचार और अपने आत्मा का प्रिय ये चारों साक्षात् धर्म के लक्षण कहे हैं ॥ १२ ॥ (6) अपने आत्मा का प्रिय अर्थात् जिस बात में अपना अन्तःकरण कोई बुराई न देखे और मला समझे वह साक्षात् धर्म है वेद और विद्या का एक ही अर्थ है जिसे अंगरेज़ी में Knowledge नालेज कहते हैं और स्मृति स्मरण को कहते हैं श्रुति और स्मृति अर्थात् सुना हुआ और स्मरण क्रिया हुआ ।

($:): Let hin lionour all his food, and eat it without contempt when he sees it, let him rejoice and he calm, and pray that he may always obtain it. (9.) He must beware of giving any man what lie leaves ; and of eating anything hetween mor orning and evening: he must also beware of eating too much, and of going any whither zvith a remnant of liis food'unswallowed, () जयेदंशनन्नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् ॥ दृाप्ट्याहृप्येत्प्रसीदेच्चप्रतिनन्देच्चमर्वशः ॥ ५४ ॥ (८) प्रतिदिन भोजन का आदर करे और उसकी निन्दा कभी न करे भोजन को देखकर प्रसन्न होये और हर्ष करे और ऐसा कहे कि हमको यह भोजन नित्य मिला करे ॥५४॥ (e). नाच्छिष्टकस्यचिट्टा नाद्याच्चैव तथान्त । नचैवात्यशनड्कीनचोच्छिष्टः क्वचिव्रजेत् ॥ ६ ॥ (e) जूठ किसी को न देना सायंकाल और प्रातः काल के मध्य में भोजन न करना (अर्थात् तीन बेर भोजन न करना) अति भोजन (अर्थात् बहुत भोजन) न करना जूठे मुंह कहीं न जाना ॥, ५६ ॥ . (८) अर्थात् जेसा भानन मिले वैसा ही प्रसन्न होके मंताप के साथ खा लेये यह न कहे और न मन में लाये कि खाने को अच्छा नहीं मिला अथवां रुखा फीका है ॥ (६). अर्थात् जो मनुष्य जूठा खाने योग्य नहीं है उसे जूठा न, देना अथवा अच्छा कहके जूठा न देना अथवा अच्छा दिया जा सके तो जूठा न देना परंतु डाम चमार इत्यादि जो सदा ही जूठा खाया करते हैं उनको उच्छिप देने में तो कुछ अधर्म नहीं जान पड़ता क्योंकि अन्न नष्ट करने से तो उसका किसी भूग्वे के मुंह में पड़ जाना ही भला हे ॥ B (8 :) (10.) Excessive cating is prejudicial to health, to fame, and to future bliss in heaven ; it is injurious to virtue, and odious among men; he inust, for these reasons, hy all ineans avoid it. (11.) The muptial ceremony is considered as the complete institution of women ordained for them in the Veda, together with rererence to their husbands, dwelling first in their father's fainily, the business of the house, and attention to sacred fire. (12.). At the beginning and end of the lecture be must always clasp both the feet of his preceptor, and he must read with both his lands closed (this is called scriptural homage). 1 (13.). When he is prepared for the lecture, the preceptor, constantly attentive, inust say hoa ! read;": and at the close of the lesson he must say "take rest.

(१०) अनारोग्यमनायुप्यमस्वय॑ञ्चातिभाननम् ॥ अपुग्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ ५० ॥ (Po) अति भोजन, आयुप आरोग्य स्वर्ग पुण्य इन सवों के हित नहीं है और लोक में निन्दित है इसलिये अति भानन नहीं करना ॥ ५० ॥ (११). वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारों वैदिकः स्मृतः ॥ पतिसेवा गुरौ वासे! गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥ ६० ।। (११) स्त्रियों का विवाह यही वैदिक संस्कार है पति की मेवा यही गुरुकुल में वाम है गृह का काम काज यही अग्नि की सेया है ॥ ६० ॥... (१६) ब्रह्मारम्भे ऽवसाने च पाटी ग्राह्यो गुरोस्सदा ॥ संहत्य हस्तायध्येयं सहि ब्रह्माञ्जलिः स्मृतः ॥ ०१ ॥ (१२) प्रतिदिन प ठ के प्रारंभ में और समाप्ति में अपने दोनों हाथ से गुरु के दोनों पैर को ग्रहण करे और दोनों हाथ नोड़ के पाठ पढ़े हाथ का जोड़ना ब्रह्मान्जलि कहाती हे || ११ ॥ (१३) अध्ये प्यमागान्तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः । अधीष्व भी इति ब्रूयाद्विरामास्त्विति चारमेत् ॥ ३ ॥ (१५) अर्थात् व्यही हुई स्त्रियों का यही धर्म है कि पति की सेवा करें र.घर का काम काज ॥ (१२) अर्थात् निम से प.ट पढ़े उसकी बड़ी प्रतिष्ठा करे और ठमे माझे ॥

(14.) In restraining the organs, which run wild among ravishing sensualities, il wise man will apply diligent care like a charioteer in managing restivc horses. : (15.) The nose is the fiftli, after the ears, the skin, the eyes, and the tongue; and the organs of speech are reckoned the tenthi, after those of excretion and generation, and the hands and feet. . (16.) Fire of them, the ear and the rest in succession, learned men have called orgaus of senses ;- and the others organs of action. (17.) The heart must be considered as the elevenths, which, by its natural property, comprises, both sense and action, and whichi being subdued, the two other sets, with five in each, are also controlled.

(१३) शिष्यों के पढ़ाने के समय गुरु ऐसा बोले कि अधीप्व भा (अर्थात् पढ़।) तब शिष्य पढ़े और नब कहे कि विरामस्तु (अर्थात् बस करो) तब शिष्य चुप रहे इसका तात्पर्य यह है कि गुरु की आज्ञा मे पढ़े और चुप रहे ॥ ३ ॥ (१४) इन्द्रियाणाम्विचरताम्विपयेष्वपहारिपु ॥ संयमे यवमारिष्टेद्विद्वान् यन्तेव वानिनाम् ॥ ८ ॥ (१४) विषयों से इन्द्रियों को रोके नेसे सारथी कुचाल से घोड़ों को रोकता हे ॥ ८८ ॥ (१५) श्रोत्रन्त्वक चतुपी चिहा नासिका चेव पञ्चमी । पायूपस्थं हस्तपादम्वाश्चैव दशमी स्मृता ॥ १० ॥ (१५) श्रोत्र त्वक् चक्षु जिहा नासिका पायु उपस्य हस्त पाद वागी ।।६० ॥ (१६) बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैषां श्रोचादीन्यनुपूर्वशः ॥ कर्मेन्द्रियाणि पञ्चेपाम्पावादीनि प्रचनते ॥ १ ॥ (१६) इन मत्रों में पहिली पांच ज्ञान इन्द्रिय कहाती हैं टूमरो पांच कर्म इन्द्रिय कहातो हैं ॥ ११ ॥ (१८) गकादशम्मनो नेयं स्वगुणेनाभयात्मकम् ॥ यस्मिन् बिते नितातो भवतः पञ्चको गगो। ॥ १२ ॥ (१३) अर्थात् ना काम करे मो गुरु की प्रानानुमार (१४) हम नहीं जानते कि जो लोग सिन्दू कहलाते हैं ये मनु जी के रम वचन पर क्यों नहीं ध्यान देते ।। करें।

(18.): A man by the attachment of his organs to sensual pleasure incurs certain guilt, but having wholly subdued them he thence attains heavenly bliss. (19.) Desire is never satisfied with the enjoyment of desired objects; as the fire is not appeased with clarified butter ; it only blazes more vehemently. (20.) Whatever man may obtain all those gratifications or whatever man may resign them completely, the resignation of all pleasures is far better than the attainment of them. --- (१०) ग्यारहवां मन है अपने गुण करके दोनों (अर्थात् पांच ज्ञान इन्द्रिय और पांच कर्म इन्द्रिय) कहाती हे मन के जीतने से ये सब दसा नीती जाती हैं ॥ २ ॥ (१८) इन्द्रियाणाम्प्रसङ्गेन दोपमृच्छत्यसंशयम् ॥ सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिन्नियच्छति ॥ ३ ॥ (१८) , इन्द्रियों के प्रसंग से जीव दापी होता है और जो इन का निग्रह करे (अर्थात् विषयों में न लगावे).तो जीव सिद्धि को पाता है ॥ ३ ॥ (१६) न जातु कामः कामानामुपभागेन शाम्य ते ॥ हंविधा कृष्णवर्तीव भूय एवाभिवर्द्धते ॥ ३४ ॥ (५६) . जिस वस्तु में मन की इच्छा है. उस वस्तु के मिलने से मन को तृप्ति है। से कभी नहीं होती जैसे घी को पाके अग्नि बढ़ती ही है ॥ ४ ॥ (०) यश्चेतान्प्राप्नुयात्सर्वान् यश्चमान् केवलांस्त्यजेत् ॥ प्रापणात्सर्वकामानाम्परित्यागी विशिष्यते ॥ ५ ॥ (२०) निस मनुष्य को मन का इच्छित पदार्थ सब मिलता है और जो मिले हुए पदार्थों का त्याग करता है इन दोनों में त्याग करनेवाला बड़ा है ॥ ६ ॥ (१०) धन्य हैं वे महात्मा पुरुप ने। इन्द्रियों का निग्रह करते हैं जो लोग केवल. नाम के व्राह्मगों को दही पेडे खिलाके सिद्धि को ढूंढ़ते हैं उन्हें मनु जी के इस वचन को अच्छी तरह पढ़ना चाहिये । (१६) अथात् सामारिक वस्तु की इच्छा करना वृथा हे ॥ .

( 11 ) 1 (21.) The organs heing strongly attachedto sensual : delights, cannot so effectually he restrained by avoiding incentives to pleasure as by a constant pursuit of divine knowledge. (22.) To a man contaminated by sensuality'incither the Vedas, nor liberality, nor sacrifices, nor strict observances, nor pious austerities eror procure fclicity. (23.) He must be considered as really triumpliant over his organs, who, on hearing and touching, on sceing and tasting and smelling what may plense or offend the senses, neither greatly rejoices nor greatly repines, (24.) But when onë among all liis organs fails, bir that single failure his knowledge of God-passes away, as water flows through one hole in a learliern bottle, (25.) Having kept all bis members of sense and action under control, and obtained also command over his heart, he will enjoy every advantage, even though he reduce not his body by religious austerities, (६१) न तथैतानि शस्यन्ते सन्नियन्तुमसेवया ॥ विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः ॥ ६ ॥ (२१) विषयों की सेवा न करने से उनका ऐसा त्याग नहीं होता जैसा ज्ञान से होता है ॥ ६ ॥ (२८) वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च ॥ न विप्रभावदुष्टस्य सिद्धिङ्गच्छन्ति कर्हि चित् ॥ ६ ॥ (२२) जिसका स्वभाव दुष्ट है उसको वेद दान यन्न नियम तप ये सब भी सिद्धि को नहीं दे सकते ॥ ६ ॥ (२३) श्रुत्वा स्पृष्ठा च दृप्याच भुवा घ्रात्वा च यो नरः ॥ न हृष्यति ग्लायति वाम विज्ञेयों जितेन्द्रियः ॥६॥ (२३) नो मनुष्य मुनके छूके देखके भोग करके और संघको न हर्ष को पाता है और न इसके बिना शोक को पाता सा जिते. न्द्रिय कहाता है ॥३॥ (२४) इन्द्रियाणान्तु सर्वेषां योकं करतीन्द्रियम् ॥ तेन स्य क्षति प्रज्ञा दृतेः पाचादिवोदकम् ॥ ६६ || (४) सब इन्द्रियों में से एक भी इन्द्रिय अपने विषय में लगी तो जीव की बुद्धि जाती रहती है जेसे मशक में ग्रक छेद होने से भी पानी निकल जाता है || ६६ ॥ (५) वशे कृत्वेन्द्रियग्रामं संयम्य च मनस्तथा ॥ मान्संमाघयेद नानिएवन् योगतस्तनुम् ॥ १00 ॥ (८) अर्थात् सुभाव का दुष्ट होना बहुत ही बुरा हे इम लिये मनुष्य अपना स्वभाव अच्छा रखने का बड़ा यन करें। .

3 (26.) Let not å sensible teacher tell any other what he is not asked, nor what he is asked improperly ; but let him, however intelligent, act in the multitude as if he mere dub. (27.) When a superior sits on a couch or bench let not an inferior sit on it with him, and if an inferior be sitting on a couch let him rise to salute a superior, (28.) A youth who habitually greets and constantly l'everes the aged obtains an increase of four things life, kuowledge, fame, strength. (29.) Letą learned man ask a priest when he meets him if his devotion prospers; a warrior if he is unhurt; & merchant if his wealth is secure; and one of the servile class if he enjoys good health ; using respectively the words, kus'alam, anámayam, kshemam, and arogyam.

(२५) उपाय से मन और सब इन्द्रियों को बस करके जिस में शरीर को दुःख न होने पावे येसी रीति से सब अयों को सिद्ध करे ॥.१०० ॥ (२४) नापृष्टः कस्यचिद्व्यानचान्यायेन पृच्छतः ॥ जानन्नपि हि मेधावी जड़वल्लोक पाचरेत् ॥ ११० ॥ (६) . विना पूछे कोई वात किसी को न कहना अन्याय से पूछे तो भी न कहना जानता हुआ भी बुद्धिमान लोक में जड़ की नाई रहे ॥ ११० ॥ (२०) शय्याऽऽसनेऽध्याचरिते श्रेयसा न समाविशत् ॥ शय्यासनस्यश्चैवैनं प्रत्युत्यायाऽभिवादयेत् ॥ ११६ ॥ (२०) बड़े लोग जिस आसन पर वा निम शय्या पर बैठे हैं। उस पर न वेठे और आप शय्या अथवा आसन पर बैठा हो तो उठके बड़े लोगों को प्रणाम करे इससे भला होता है ॥ १६ ॥ (२८) अभिवादनशीलस्य नित्यम्वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्यवर्द्धन्ते श्रायु विद्या यशो वलम् ॥ १२१ ॥ (२८) नो मनुष्य बड़े (अर्थात बूढ़े) लोगों को नित्य प्रणाम करता है और सेवा करता है उसके विद्या आयुष यश वलं ये चारों बढ़ते हैं ॥ १२१ ॥ (२६) ब्राह्मणकुशलम्यूछे त्तत्रमन्युमनामयम् ॥ वैश्यं नेमं ममागम्य शूद्रमारोग्यमेवच ॥ १० ॥ (२६) समागम होने पर ब्राह्मण से कुशल क्षषिय से अनामय वेश्य से नेम शंद में प्रारोग्य पूछना चाहिये । १२० ॥

( 13 )... (30.). To his uncle paternal and malerunt, to his wife's father, to perfornicts of the sacrifice, and to spiritual teachers, lic iust' say *Jam such a one"-rising up to salute them, cren though younger than limuselt. (31.) The sister of his mother, the wile of his maternal incle, lois own wife's mother, and thic sister of his father, must be saluted like the wifcof his father or pre- 'ceptor ; they are equal to his father's or lis preceptor's wife, . (82.) The wife of his brother, if sholic of the same class, mist be saluted every day; but his paterual and maternal kinswomen nced only be greeted on his return; from a journey. (38.). With the sister of lis fathcrandof his mothier, and with his own elder sister, let him demean bijnself às with his mother, though his inother be more venerable than they. (34.) Fellow-citizens are equal for ten years ; dancers and singers for five; lcárned theologians for less

(20) मातुलश्च पितृव्यांश्च श्वशुरानृत्विना गुरुन् ।
अमावमिति ब्रूयात्तत्यय्याय यवीयसः ॥ १३ ॥
(३०) मामा चाचा श्वशुर ऋत्विज (अर्थात् यज्ञ करानेवाला)
गुरु ये सब अपने क्य से छोटे भी हो तो इनको में अमुक
हूं ऐसा कहकर टठो प्रणाम करे ॥ १३० ।
(३५) मातृष्वमा मातुलानी श्वनरथ पितृष्वमा ॥
सम्पच्या गुरूपबीयत्नमास्ता गुरुभार्यया ॥ १३१ ।।
(६१) ममी मामी सास फुफो ये सब गुरु की स्त्री के सम
हैं इसनिये गुरु की स्त्री को नाई इन मव की पूना करना
उचित हे ॥ ११ ॥
(es) भ्रातुमायापमड्याच्या सवर्णाहन्यन्यपि ॥
विप्रोप्य तूप याद्या ज्ञातिमम्वन्धियोपितः ॥१३॥
(२) बड़े भाई की है। सवर्णः स्त्री है (अर्थात् टूमरे वर्ग
की नहीं ) टमको पैर छूझे नित्य प्रणाम करना और नाति
मंबंध की ना स्त्री हे उमको विदेश से भाके पर छूने प्रयाम
करना अपने देश में रहे तब.पेर को न छुए प्रणाम मात्र
करे ॥ १३ ॥
पितुर्भगिन्याम्मातुश्च व्यायस्याञ्च
स्वमपि
मात्रदृत्तिमातिटेन्माता ताभ्यो गरीयसी ॥ १३ ॥
taa) फुफी मामी बड़ी बहन इन भव को माता के ममान
जानना यदापि माता एन मत्रों से बड़ी है ॥ १३ ॥
(६४) नाटाययम्पोरमध्यं पड्डादायलाभृताम् ॥
त्रन्टपूर्व योपियामा स्वल्पेनापि स्वयोनि ॥ १४ ॥

(14) 1 than three ; but persons related by blood for a short time, that is, a greater difference of age destroys their equality. (35.). Wealth, kindred, age, moral conduct, and fifthly divine knowledge entitle men to respect; but that which is last mentioned in order is the most respectabile. (36.). Whatever man of the three highest classes possesses the most of those five, both in number and degree, that man is entitled to most respect; èvení a S’údra, if lie have entered the tenth decade of his age, (37.) Way inust be made for a man in a wliceled carriage, or above, ninety years old, or afficted with disease, or carrying a burden ; for a woman; for a priest just returned from the mansion of his preceptor; for å prince and for a liridegrooın.

. (३४) एक याम वा एक पुर का रहनेवाला गुण से रहित हो और दश वर्ष नेठा हो तो उसके साथ मित्रता का व्यवहार होता है और गुणी हो पांच वर्ष जेठा हो तो भी मित्रता ही का व्यवहार होता है और वेद पढ़ा हो तीन वर्ष जेठा हो तो मित्रता ही होती है और संबंध में हो ते। थोड़े ही काल में मित्रता होती है सर्वच जो काल कह आये हैं उसके ऊपर ज्येष्ठता का व्यवहार होता है । १३४ ॥ (३५) वित्तम्बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी ॥ एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम् ॥ १३६ ॥ (३५) द्रव्य वन्यू वय कर्म विद्या ये पांच मान्य के स्थान हे इस में पूर्व पूर्व से उत्तर उत्तर वड़ा है ॥ १३६ ॥ (३६) पञ्चानान्तिपु वर्णेषु भूयांसि गुणवन्ति च ॥ यत्र स्युः सोच मानार्हःशूद्रोपि दशमीङ्गत: ॥ १३ ॥ (३६) ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य जिस में इन पांचों से जितनी अधिक वस्तु रहे वहा उतना मान के योग्य है नब्बे वर्ष के ऊपर वय हो तो शूद्र भी मान के योग्य है ॥ १३ ॥ (३०) चनिया दशमीस्थस्य रोगिया भारिणः स्त्रियः ॥ स्नातकस्य च राजश्च पन्या देयो वरस्य च ॥ १३८ (३५) अर्थात् विद्या सब से बड़ी है और विद्यावान् पुरुप सब से अधिक मान्य है ॥ (३६) यदि वैश्य विद्वान् हो तो वह मूर्य ब्राह्मण से अधिक मान्य होगा।

(15) (38.) K A mére úchárya or a teacher of the guyntri only surpasses ten upådhyáyas; a father, a hundred such úcháryas; and a mother, a thousand natural fathers. (39.) A Brahman, who is the giver of spiritual birth, the teacher of prescribed duty, is by right called the father of an old man, though himself be a child. (40.) Kavi, or the learned child of Angiras, taught his paternal uncles and cousins to read the Veda, and excelling them in divine knowledge said to them " little sons."

. (३०) . जो रथ पर चढ़ा है और जो नव्वे वर्ष के ऊपर का वयवाला है ना रोगी है जा चोझ लिये है जो स्त्री है जो ब्रह्मचारी है जो राना हे जी विवाह करने के लिये जाता है इन सब के लिये राह छोड़ देना (अर्थात् इन सबों में से कोई एक ओर से आता है। और उसके समीप दूसरी और से कोई आता हो तो वह इन सबों के जाने के लिये राह छोड़ देवे ॥ १३ ॥ (३८) उपाध्यायान्दशाचार्य प्राचार्य।ण शतम्पिता ॥ सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेशाऽतिरिच्यते ॥ १४५ ॥ (३८) उपाध्याय से दश गुण आचार्य बड़ा है प्राचार्या से सो पिता बड़ा है पिता से हज़ार गुण माता बड़ी हे ॥ ५४५ ॥ (E) ब्राह्मस्य जन्मनः कती स्वधर्मस्य च शासिता n: वालायि विनो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ॥ १५० ॥ (३६) अपने वय से छोटा है और पढ़ाता है और धर्म को सियलाता है तो वह भी धर्म का पिता कहाताहे ॥१५० ॥ (४०) अध्यापयामास पितॄन शिशुराङ्गिरसः कविः ॥ पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्म तान् ॥ ११ ॥ (४०) अंगिरा के लड़के ने अपने चचाओं को पढ़ाया और बेटा ऐसा कहा क्योंकि ज्ञान में वह बड़ा था इसलिये १५१ ॥ (३०) धन्य हैं वे जो इस वचन को मानते हैं भार पिता माता की सेवा करते हैं । 4 D

10
(1.) For an unlearned man is in truth a child, and
he who teaches him thë: Veda is his father; holy sages
have always said child to an ignorant man and father
to a teachièr of scripture.
(42.) Greatness is not conferred by years, not by.
gray hairs, not by wealth, not by powerful kindred : the
divine sages have establislied this rule:----Whoever has
read the Vedas and their Angas he ainong us is gi'eat.”
(43.). A man is not therefore aged because his head
is gray.: him, surély, the gods considered as aged who
though young in years has read and understands the
Teda..
ba
(44.) Good instruction must be given without pain
to the instructed; and sweet, gentle speech must be used
by a preceptor who cherishes virtue.
(45.) He whose discourse aud heart are pure and
eyer perfectly guarded attains all fruit arising from
his complete course of studying the Veda.

(४५) अज्ञो भवति वै वालः पिता भक्त मन्त्रदः ॥ : अनं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ।। १५३ ।। (81) : ना कुछ नही जानता वही बालक है और जो मंच देता है वही पिता है क्योकि ना अज्ञ है वही छोटा है और जो मंच देता है वही बड़ा है ॥ १३ ॥ (४२) न हायनैर्न पलितैन वित्तेन न बन्धुभिः ॥' पयश्चक्रिरे धर्म योनचानः सना महान् ॥१५४ ॥ (४२) वर्ष और केश का पकना द्रव्य और संबंध इन सबों से मनुष्य बड़ा नहीं होता पि लोगों ने यही धर्म हा है कि हम सब में पढ़ानेवाला ना हे माई बड़ा है ॥ १५४ ॥ (४३) • न तेन वृद्धो भवति येनास्य पालतं शिरः ॥ यो वे युशप्यधीयानस्तन्देवाः स्थविरम्बिदुः ।। १५६ ।। (४३) केश के पकने से वृद्ध नहीं कहलाता है युवा है और पढ़ा है तो उसका देवताओं ने पद्ध कहा है ॥ १५६ ॥ (४४) अहिंसयैव भूतानां कायं श्रेयानुशासनम् ॥ वाक्चेव मधुगलक्षणा प्रयोज्या धर्ममिच्छता VE (४४) जिस में किसी नीव को पीड़ा न हो ऐमा कन्यागा करने वाला जा कर्म उम कर्म की प्राजा देनी चाहिये और मधुर दिवाण वाणी बोलनी चाहिये धर्म की इच्छा करने. वाले का ॥ १५ (४५) यस्य वाङ्मनसी शुद्दे सम्यगुप्त च सर्वदा ॥ सवै सर्वमयानोति वेदान्तोपगतम्फलम् ॥ १६ ॥ (४५) जिसकी वाणी और मन शुद्ध हे पार सर्व फाल में रनित से ही येदांस के फल यो पाता है ।। १६० ॥

DEVARES
(17)
(46.) Let nota man bc querulous even thougli in
pain; let hiin not injure anotlier in deed or in thought;
let him not even utter a word by which his felloiv-crea.
ture may suffer uneasiness, since that will obstruct liis
own progress to future beatitude.
.
(47.) A Brahman should constantly shun worldly
honor as he would shun poison ; and rather constantly
seek disrespect as he would seck nectar.
(48.) Let him abstain from honey, from flesh meat,
from perfumes, from chaplets of flowers, from sweet
vegetable juices, from women, fi'oni all street substance
turned acid, and from injury to animated beings.

। नारुन्तुदःस्याटातापि न परद्रोहकर्मधीः ॥ ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यान्तामुदीरयेत् ॥ १६ ॥ (४६) दुःखित हो तो भी ऐसा वात न बोले कि जिस से किसी को मर्म-धाव हो, दूसरेकेद्रोह कर्म में बुद्धि कोनरखे जिस बात से किसी के जीव को उद्वेग हो ऐसी बात न वोले ॥ १६१ ॥ (४०) सन्मानाट् ब्राह्मणोनित्यमुद्विजेत विषादिव । अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥ १२ ॥ (४७) सन्मान से ब्राह्मण विप की नाई डरता रहे और अपमान को अमृत की नाई इच्छा करे ॥ १६२ । (४८) · वर्जयेन्मधुमांसच्च गम्धमाल्यं रसान स्त्रियः ॥ शुक्तानि यानि सर्वाणि प्राणिनाञ्चैव हिंसनम् ॥ १७ ॥ (४८) मधु मांस गंध माला रस स्त्री और शुक्त (अर्थात् जो से मधुर है काल पाके खट्टा हो जावे) प्राणियों का मारना इन सब को छोड़ देना चाहिये ॥ १७ ॥ (४) खेद की बात है कि अब के ब्राह्मगा इस वचन पर कुछ भी ध्यान नहीं करते ॥ यह वचन और ना आगे लिखे ज़ाते हैं ब्रह्मचारी अर्थात् विद्यार्थी के लिये हैं जब कि वह गुरु के यहां पढ़ता हो ॥ मधु मांस इत्यादि का त्याग इस कारण कहा कि जिस में इन्द्रियां प्रवल न हों नहीं तो फिर पढ़ने में काहे को जा लगेगा और नवे छाते इत्यादि का त्याग इस कारगा कहा कि जिस में उसे धूप में चलने का अभ्यास हो और निरा सुकुमार न बनजावे नहीं तो फिर उस से कुछ काम काहे को हो सकेगा। स्वभाव (४८) (18). (49.) From unguents for leis limbs and from black powder for his eyes, from wearing sandals, and carrying án umbrella, from sensual desire, from wrath, from coretousness, from dancing, and from rocal and insiritmental music. (50:) Froin gaming, from disputes, from letraction, and from falsehood; froin embraciug or wantonly looking at women, and from disservice to other men. (51.) Let him always keep his rightarın uncovered, be always decently apparelled, and properly composcil; and irhen his instructor says " be scatel," let him sit opposite to his vencrable guide. (52) · In: the presence of his preceptor let him always eat less, and wear a coarser mantle with worse appendages ; let him rise before and go to rest after his tutor.

॥ (४) अभ्यङ्गमलनञ्चाक्षशोरुपानच्छवधारणम् ! कामङ् कोयञ्च लामञ्च नर्तनङ्गीतवादनम् ॥ १८ ॥ (४६) अक्टन काजल जूता छाता काम . क्रोध लोभ नांच गीत वाना ॥ १८ ॥ (५०) यूतञ्च जनबाटञ्च परिवादन्तथाऽनृतम् । स्त्रीणां सम्प्रेक्षणालभमुपधातम्परस्य च ॥ १६ ॥ (५०) बुआ झगड़ा पराये का झूठा दीप कहना स्त्रियों को देखना उन से मिलना पराये का नाश इन सब बातों से वचा रहे । 1980 (५१) · नित्यमुद्धनपागि:स्यात्साध्वाचारः मुसंयतः ।। प्राम्यत मितिचेोक्तम्सन्नासीताभिमुखड्गुरोः ॥ १३ ॥ (५१) आढ़ने का ना कपड़ा है उसके बाहर दहने हाथ को सदा निकाल्ने रहे साधु की नाई आचार सहित रहे चंचलता को छोड़ दे वेटो गेसी आज्ञा गुरु की हो तब उनके मन्मुख वेठे RED (५२) हीनानवस्त्रयेपास्यात्सर्वदा गुरुसन्निधौ॥ उतिष्ठेत्प्रथमञ्चास्य चरमञ्चैव सम्बित् ॥ १४ ॥ (५२) गुरु के समीप सर्वकाल में हीन अन्न और हीन वस्त्र से और हीन स्वरूप में रहे (प्रथात् जेसा अन्न गुरु भानन करें बड़े खेद की बात है कि प्रब लोग इस प्रकार गुरु के घर रखो अपने लड़कों को नहीं पढ़ाते श्रागे श्रीकृपयाचंद्र इत्यादि ने भी इसी तुम से विद्या उपार्जन की थी।

approaching inom
( 19 )
(53.) Let him not answer his teacher's orders, or
converse with him reclining on a bed, sitting, nor
eating, nor 'standing, nor rith an averted facc.
(54.) But let him both answer and contersc if his
preceptor sit standing up; if he stand advancing towar:)
if he advance meeting liim; if he run biastening
after him.
(55.) If his face be averted going round to front
him, from left to right; if he be at a little distance
if reclined bending to him; and
if he stand ever so far off running toward him.
hiin ;
(56:.) When his teacher is nigh let his couch or
his bench be always placed lov: when his preceptor's
ėye can observe him let him not sit carelessly at ease.

उस से निकृष्ट अन्न भोजन करे और जैसा वस्त्र गुरु पहने उस से निकृष्ट वस्त्र प्राय पहने और (जेसा स्वरूप गुरुवनाये रहें उस से निकृष्ट स्वरूप अपना बनाये रहे) गुरु के जागने को पहले जागे और गुरु के सोने के पीछे सेवेि ॥ १६४ ॥ (५३) प्रतिश्रवणसम्भाये शयानो न समाचरेत् ॥ नासीन। न च भुनाना न तिष्ठन्नपरामुख: ।। ६५ ॥ (५३) सोता आसन पर बैठा भोजन करता और विमुख (अर्थात् मुख फेरे) गुरु से न बोले और गुरु की बात न सुने किन्तु॥१६॥ (५४) श्रासीनस्य स्थितः कुर्यादभिगच्छंस्तु तित: ॥ प्रत्युद्गम्य त्वाव्रजतः पश्चाद्धावस्तु धावतः ॥ १६६ ॥ (५४) गुरु बैठे हैं तो आप खड़ा होकर गुरु खड़े हों तो आप उनके साम्हने आनकर गुरु आते हों तो सन्मुख जाकर और गुरु दौड़ते हो तो आप भी पीछे दौड़कर वाले और बात को सुने ॥ १६ ॥ (५५). पराङ्मुखस्याभिमुखा दूरस्थस्यत्य चान्तिकम् ॥ प्रणम्य तु शयानस्य निदेश चैव तिगृत: ॥ १६ ॥ गुरु विमुख हों तो उनके सन्मुख जाकें और दूर है। तो समीप नाके और सोए हों तो प्रणाम करके आज्ञाको सुने ।।१६०॥ (५६) - नीचं शय्यासनञ्चास्य सर्वदा गुरुसन्निधौ । गुरोस्कु-चक्षुर्विपये न यथेपासना भवेत् ॥ १८ ॥ गुरु के समीप अपनी शय्या और आसन को नीचे रखे गुरु के देखते हुए जैसा चाहे तैसा आसन करके न रहे (अर्थात गुरु के साम्हने पांव फेला अथवा सहारा लगाके न बैठे)॥ १८ ॥ . (५५) (५६) . D . ( 20 20...) (57.) Let him never pronounce the mere name of his tutor, eyen in his absence; noi ever mimic bis gait, his speech, or his manner. (58.) In whatever place either true but censorious or false and defamatory discourse is held concerning his teacher, let him there cover his ears or remove to. another place, (59.) He must not serye his tutor by the interven-, tion of another while himself stands aloof; nör must he attend him in a passion, nor when a woman is near; from a carriage or raised seat he must descend to salute his heavenly director. (60.). This is likewise ordained as his constant. behaviour toward his other instructors in science ; toward his elder paternal kinsmen; toward all who may restrain him from sin, and all who give him salutary advice, (५०) गुरु (५०) नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम् ॥ न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभापितचेष्ठितम् ॥ १६६ ॥ के पीछे भी केवल उनके नाम को न लेवे और गुरु के गमन भापण चेष्ठा की नाई आप इन तीनों कमी को न कह • (५८) गुरोर्यच परीवादा निन्दा वापि प्रवर्तते ॥. की तपिघातव्यो गन्तव्यम्वा ततान्यतः ।। २०० ॥ (५८) जहां गुरु का सच्चा वा भूठा दीप कहा नाता हो वा निन्दा होती हो तहां कान मूंदना अथवा वहां से उठ जाना ॥ २० ॥ (५६) दूरस्थो नार्चयेदेनं न क्रुद्धो नान्तिके स्त्रियाः ॥ यानासनस्थश्चवेनमवरह्याभिवादयेत् । २०२ ॥ (५६) गुरु की पूजा'टूर से (अर्थात् किसी से पूजा की सामग्री भेज के) न करनी और क्रुद्ध होके न करमी अपनी स्त्री के समीपं हो तो भी न करनी आप सवारी पर हो या आसन पर बैठा हो तो.सवारी से उतर के और आसन को छोड़ के प्रणाम करे ॥ २० ॥ (६०) विद्यागुरुवेतदेव नित्या वृत्तिः स्वयोनियु ॥ प्रतिषेधत्सुचाधान हितञ्चोपदिशत्स्वपि ॥ २० ॥ (६०) इसी प्रकार से आचार्य को छोड़ कर उपाध्याय आदि जो दश गुरु हैं और संबंधी जो चचा आदि हैं और जो अधर्म से बचाते हैं और जो हित वात का उपदेश करते हैं उन सब से. सदा गुरु की नाई सारा व्यवहार रखे ॥ २० ॥ (६०). हे परमेश्वर फिर भी कभी ऐसा दिन पावेगा कि हमारे स्वदेशीइस प्रकार अपने गुरुको मानेंगे और उनकी सेवा करेंगे।

( 21 ) (61.) Toward men also who are truly virtuous let. liim always behave as toward his prcccptor; aud in like manner toward the sons of his teacher, who are entitled to respect as older men, and are not students; and toward the paternal kinsnien of his venerable tutor. (62.). The son of his preceptor, whether younger or of equal age, or a student, if he be capable of teaching the Veda, deserves the same honor with thc prcccptos: himself, when he is present at any sacrificial act. (63.) It is the nature of women in this yrorlil to cause the seduction of men; for which reason the wise are never unguarded in the company of females. (64.) A female, indeed, is able to dray from the right path in this life not a fool only but even a sage, and can lead him in subjection to desire or to wrath. :(65:). Let not a man, therefore, sit in a sequestered place with" his nearest female relation : the assemblage of corporeal organs is powerful enough to snatch wisdom from the wise.

हैं और ने। गुरु
(६५) श्रेयस्सु गुरुवदृत्तिं नित्यमेव समाचरेत् ।
गुरुपुत्रपु चार्येषु गुरोश्चैव स्ववन्धुपु ॥ २० ॥
(६१) जो बड़े लोग हैं और श्रेष्ठ जो गुम्युच
के बंधुजन हैं इन सब से गुरु की नाईं आचरण करें ॥ २० ॥
वालः समानजन्मा वा शिष्यो वा यज्ञकर्मणि ॥
अध्यापर न गुरुमुतो गुरुवन्मानमर्हति ॥ २० ॥
(१२). गुरु का पुत्र अपने से वय में छोटा हो अथवा समान
हा अथवा शिष्य हो और पढ़ाने में समर्थ हो तो यत्नकर्म
में उसका मान गुरु की नाई करना चाहिये । २०८ ॥
(६३) स्वमाव पां नारीणां नराणामिह
दूपणम् ॥
अतान प्रमान्ति प्रमदामु विपश्चितः ॥ २१३ ॥
(६३' मनुष्यों को दूपित करना यह नारियों का स्वभाव ही
हे इसलिये पण्डित लोग नारी के विषय में सावधानता से
रहते हैं ॥ १३ ॥
(६४) त्रिद्वांसमलं ले.के विद्वांसमपि वा पुनः ॥
नमदा झत्पयन्नेतुङ्कामक्रोधवशानुगम् ॥ २१४ ॥
(६४) काम काय सहित हो, पण्डित हो चाहे मूर्ख हो,
निषिद्ध गह पर ले जाने को स्त्री समर्थ हैं ॥ २४ ॥
माचा स्वम्रा दुहिचा या न विविक्तासनो भवेत् ॥
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांममपि कति ॥ २१॥
(४५) माता भगिनी लड़की इन संघों के साथ भी एकांत में
न रहना इन्द्रिय मब बलवान हें पगिडतों का भी सोच लेती
हैं ॥ १५॥

(22) 1 (66.) As ho who digs decpi with 2 spade comes to a spring of sväter, so tlie student who bumbly serves his teachers attain the knowledge wlich lics deep in his teacher's mind. (67:) If a roman ora südro perform any act leading to the chicf temporal good, let the student be careful to emulate it; and lle may do whaterer gratifies his heart, unless it be forbidden by law. (68.). The chief temporal good is hy some declared to consist in virtue and wealth ; by some in realth and lawful pleasure; by some in virtue alone; by others in wealth alone ; but the chief good here below is an assemblage of all three: this is a sure decision. . (69.) Therefore a spiritual and a natural father, a mother, and an elder brother, are not to be treated with disrespect, especially by a Brühman, though the student be grievously provoked.

। (६६) यथा खनन खनित्रेण नरोवाय्यधिगच्छति । तथा गुरुगताम्विद्यां शुश्रपुरधिगच्छति ॥ १८ ॥ (६३) जिस प्रकार कुदारी से खोदते २ जल को मनुष्य पाता हे तिसी प्रकार सेवा करते २ गुरु की संपूर्ण विद्या को शिष्य पाता है । २१८॥ (६०) . यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयः किञ्चित्समाचरेत् ॥ तत्सर्वमाचरेद्युक्तो यत्र वास्य रमेन्मनः ॥ २२३ ॥ (६०). स्त्री अथवा छोटा मनुष्य कोई अच्छी बात करता हो तो उस बात को ग्रहण करे अथवा जो कर्म शास्त्र से अविरुद्ध है उस में पुरुष का मन संतृष्ठ हो सो करे, २२३ ॥ (६८) धावुच्यते श्रेयः कामाथों धर्म एव च ॥ अर्थ रवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इतित स्थितिः ॥ २२४ ॥ (६८). किमी के मत में धर्म और अर्थ यह दोनों कल्याण करनहार हैं किसी के मत में अर्थ और काम कल्याण करनहार हैं किसी के मत में धर्म कल्याण करनहार है अब अपना मत कहते हैं कि धर्म अर्थ काम ये तीनों परस्पर अविरुद्ध हैं ॥ २४ ॥ (e) 'प्राचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः । नातनाप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषतः Mean (e) प्राचार्य पिता जेठा सहोदर भाई इन तीनों का अपमान आप दुःखित हो तो भी न करें व्रालण को तो अवश्य यह वात चाहिये । २६ (64) अर्थात् धर्म के साथ अर्थ काम यह दो सकते हैं इनका परस्पर विरोध नहीं है ( 23 ).. (70.) That pain and care which a mother and father undergo in producing and rearing children cannot be compensated in a hundred years, (71.). Let every man constantly do what may please liis parents, and on all occasions vhat may please liis preceptor :: when those three are satisfied, liš trhole. course of devotion is accomplished: (72.) Due reverence to those thice is considered as the highest devotion; and without their approbation he must perform no other duty. (73.). Since they alone are held equal to the three Forlds, they alone to the three principal orders ; they alone to the three Vedas ; they alone to the three fires.

(co) यम्मातापितरी शं सहते सम्भवे नृणाम् ॥ न तस्य निष्कृतिः शश्या कर्तुम्बर्षशतेरपि ॥ २० ॥ (60) मनुष्य के उत्पति समय में लोकेश माता पिता सहते हैं ठस में मनुष्य से वर्ष में भी उरिण नहीं हो साता (इसलिये) ये देवता रूप हे इनका अपमान कदापि न करना चाहिये) ॥ २२० ॥ (०१) · तयानित्यप्रियङ्घोदाचार्य्यस्य च सर्वदा ॥ तेवेव विपु तप्पु तपः सर्व समाप्यते ॥ २२८ । (८१) माता पिता आचार्य इन तीनों का प्रिय नित्य ही करना इन तीनों के संतुष्ट होने से सब तपस्या पूरी है। नातो २२॥ (२) तेषां प्रयाणां शुश्रूषा परमन्तप उच्यते । नतेरभ्यननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ॥ ८ ॥ (२) इन्हीं तीनों की सेवा परम तप है इन्ही को आना विना कार दूमरा धर्म नहीं करना ॥ २ ॥ (३) त एव हि श्यालोकास्त राय पय पात्रमाः ॥ त एव हिपयो दास्त गोताम्तयोग्नयः ॥ २०॥ (c) तीनों लोक वोनों पात्रम तीनों वेद तीनों अशिये ही तीन । २२० । ---- (00) धन्य थे लोग जो मन वचनों का याट रग्मयों माता पिता की सेवा करते (24) (74.) All duties are completely performed by that man by whom those three are completely honored; but to him, by whom they are dishonored, all other acts of duty are fruitless: (75.) As long as those three live 80 long he must perform no other duty for his own sake; but delighting in what may conciliate their affections and gratify their wishes, he must from day to day assiduously Fait on them. (76.) A believer in scripture may receive purc ckiio. ledge eren from a sudra ; a lesson of the highest virtue even from a chándála ; and a womau bright as a gem erèn from the basest family, * (77.) Even from poison may nectaz be taken ; eren from a child gentleness of speech ; even from a foe prudent conduct; and even from an impure substance gold.

- (०४) : सर्वे तस्यादृता धमा यस्यैते घय आदृताः ।। : अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याऽफलाः क्रिया ॥ २३४॥ (०४) जिस मनुष्य ने इन तीनों का आदर किया उसके सर्व धर्म आदर को पाचुके और जिस मनुष्य ने इन तीनों का आदर नहीं किया उसको सब क्रिया निष्फल हुई ॥ २३४ ॥ (०५) यावत् चयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरेत तेव व नित्यं शुश्रपाङ्क-त्मियहिते रतः ॥ २३ ॥ (०५) जब तक ये तीनों जीते रहें तब तक स्वतंत्र होकर टूसरा धर्म न करे इन्हीं की सेवा और इन्हीं के हित और प्रिय को करता रहे ॥ २३५. ॥ (६) प्रवधानःशुभाम्विद्यामाददीतावरादपि ॥ अन्त्यादपि परन्धर्म स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ २३८ ॥ (es) श्रद्धा करके विद्या नीच से भी लेनी और परम धर्म चंडाल से भी लेना और स्त्री रत्न दुष्ट कुल से भी लेना ॥ २३८॥ (७०) विपादप्यमृतङ् ग्राह्यम्बालादपि सुभाषितम् ॥ विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ २३ ॥ (०७) : विष वालक शत्रु अपवित्र इन सबों. से काम करके . अमृत सुंदर वचन सुंदर आचरणा सुवर्ण इन सब को ग्रहण ‘करना ॥ २३६ ॥ (c) अर्थात् बालक और शत्रु भी अच्छी बात कहें अथवा अच्छा काम करें तो उसे मना करना अनादर कदापि न करना ।

( 25 ) (78.) - From every quarter, therefore, must be selected women brightas gems, knowledge, virtue, purity; gentle speech, and various liberal arts: (79.) In case of necessity å student is required to learn the Veda froni one who is not a Bráhman, and as long as that instruction continues to bonor his instructor with obsequious assiduity. : CHAPTER III. (80.) Married women most belonored andadorned by their fathers and brethren, by. tlieir husbands, and by the brethren of their hushands if they seek ahundant prosperitý. (81.) Where females are honored there the deities are pleased ; but where they are dishopored there all religious acts become fruitless. (82.). Wheie female relations. are made miserable, the family of bin who makes them so very soon wholly perishes; but where they are not unhappy the family always increases.

(८) स्त्रियारवान्यथा विद्या धर्म: शौचं सुभाषितम् ॥ विविधानि च शिल्पानि समादेयानि.सर्वतः ॥२४॥ (or) स्त्री रब विद्या धर्म पवित्रता सुंदर वचन और नाना प्रकार की कारीगरी इन सब को जहां से मिले वहां से लेना ।। २४० ।। (0) अब्राह्मणादध्ययनमापत्काले विधीयते ॥ अनुव्रज्या च शुप्रपा यवदध्ययनङ्गरो..॥ २४ ॥ (c) आपतकाल आके पड़े तो क्षत्रिय आदि से ब्राह्मण पढ़े जव तकं पढ़े तव तक उस गुरु के पीछे चले और सेवा करें ॥ २४१ ॥ ॥ तृतीय अध्याय ॥ (८०) पितृभिभातृभिश्चैता: पतिभिर्देवरैस्तथा ॥ पूज्या भूपयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सु भिः ॥ ५५ ॥ (८०) बहुत कल्याण की इच्छा करनेवाले ना पिता भाई पति r देवर हैं से सब वस्त्र और आभूषण से स्त्रियों की पूजा करें ॥५॥ (८१) यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ॥ यतांस्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तवाफला: क्रियाः ॥५६॥ (८१) 'निस कुल में स्त्रियों का आदर होता है उस कुल में देवता रमण करते हैं और नहां स्त्रियों का आदर नहीं होता वहां सव क्रिया निष्फल होती हैं ॥ २६ ॥ (८२) शोचन्ति नामयो यच विनश्यत्याशु तत्कुलम् ॥ न शोचन्ति तु यता वढते तद्धि सर्वदा ॥ ५० ॥ (८२) जिस कुल में स्त्री दुख पाती हैं वह कुल झट पट नष्ट हो नाता है और जिस कुल में स्त्री दुख नहीं पाती हैं यह कुल सदा वढ़ता हे ॥ ५ ॥ (co) अर्थात् स्त्रियों को प्रसन्न रखें ॥ (८१) अर्थात् स्त्रियों का अपमान कदापि न करना चाहिये । + . क

(26 :)
(83.)". On whatever houses the women of a family,
- not being duly honored, pronounce an imprecation, those
houses, with all that belong to them, utterly perish, as
if destroyed by a sacrifice for the death of an enemy.
a by
(84.) Let those
women, therefore, be continually
supplied with ornament, apparel, and food, at festivals
and at jubilees by men desirous of wealth.
(85.). In whatever family the husband is.contented
with his wife, and the wife with her husband, in that
house will fortune be assuredly permanent."
(86.) Certainly if the wife be not'elegantly attired,
she will not exhilarate her husband, and if her lord
want hilarity offspring will not be produced.

-- (८३) -- , (८३) . नामयो यानि गेहानि शपन्न्यप्रतिपूनिताः ॥ तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥ ५८ । घूजा बिना पाये स्त्री जिस कुल को शाप देती हैं वह कुल चारों ओर से नष्ट हो जाता है ॥ ५॥ (८४) तस्मादेता: सदा पूज्याः भूपणाच्छादनाशनः ।।:: भूतिकामर्नर्नित्यं सत्कारपत्सवेषु च ॥ ५ ॥ (८४) इसलिये विभूति की इच्छा करनेवाला जो सो वस्त्र और भोजन से सदा स्त्रियों की पूजा करता रहे.॥ ५ ॥ (८५) . सन्तुष्टो भार्यया भी भा भायी तथैव च ॥ यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणन्तत्र वैध्रुवम् ॥ १० ॥ (८५) जिस कुल में स्त्री से पति प्रसन्न रहता है और पति से स्त्री प्रसन्न रहती है उस कुल में ध्रुव करके कल्याण . .. . (६). यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमादयेत् । . अनमोदात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्तते ॥ ६१ ॥: '. (EE) जब स्त्री प्रसन्न नहीं रहती तो पति भी प्रसन्न नहीं रहता और जब पति प्रसन्न नहीं रहता तो संतति मी नहीं हाती ॥ ६१ ॥ (८२) . इस्से अधिक स्त्रियों को सुखी और प्रसन्न रखने का और क्या वचन होवेगा॥ (८४) अर्थात् स्त्रियों को गहना भोजन वस्त्र सदा देता रहे। (८५) अर्थात् जहां पति स्त्री में लड़ाई झगड़ा नहीं रहता। उसी जगह कल्याण है। :

(27) (87:) A wife being gaily adorned her whole house is embellished; but if she be destitute of ornament all will be deprived of decoration. (88.). That órder, therefore, must be constantly sustained with great care by the man who seeks unperishable bliss in heaven; and in this world.pleasurable sensations, an order which cannot be sustained by men with uncontrolled organs.. (89.) Shares of oblations to the gods or to the manes utterly perish when presented through delusion of mind; by men regardless of duty, to such ignorant Brábmån as are mere ashes. (90.): Grass and earth to sit on, water to wash tho feet, and, fourthly, affectionate speech are at no time deficient in the mansions of the good, although they may be indigent.

की इच्छा (८०) स्त्रियां तु रोचमानायां मर्वन्तद्रोंचते कुलम् ॥ तस्यान्त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ १२ ॥ (८०) स्त्री के प्रसन्न रहने से कुल प्रसन्न रहता है और स्त्री के अप्रसन्न रहने से सब कुल अप्रसन्न रहता है । ६२ ।। (८८) ससन्चार्य: प्रयत्नेन स्वर्गमनयमिच्छता ।। सुखं चेहेच्छता नित्यं यो ऽधार्योदुर्वलेन्द्रियैः।। ७६ ॥ (८) ' परलोक में अक्षय स्वर्ग की और इम लोक में मुख करनेवाला पुरुप उस गृहस्थाश्रम को नित्य ही धारणा करे को दुर्वल इंद्रियवालों से धारण नहीं किया जा सकता ॥ ६ ।। (E) नश्यन्ति हव्यकव्यानि नराणामविजानताम् ।। भस्मीभूतेषु विप्रेषु माहादृत्तानि दातृभिः ॥ ६ ॥ (८६) भस्मसदृश ब्राह्मण में (अर्थात मूर्ख ब्राांगा में) देवता और पितर के निमित्त जो वस्तु अज्ञान से दाता लोग देते हैं मो सब नष्ट हो जाती है ॥ ६॥ (E0) तृणानि भूमिस्टकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ॥ गतान्यपि सताङ्गेहे 'नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १०१ ।। (e) तृणभूमि जल और मीठी वागी इन वस्तुओं से सज्जनों का गृह कभी मना नहीं रहता ॥ १०१ ॥ (८८) चिक उन लोगों को जो वाल बच्चों को छोड़कर बालस्यो हा घाहर निकल जाते हैं अथवा छापा तिलक लगा निस- दामी छ। बैठते हैं और घर घर भीख मांगते फिरते हैं। _ (८८) न नानिये लोग फिर क्यों ऐसे मयों को दही पड़ेखिलाते हैं। -: (0) अर्थात् घर पाये को जल से पांच धुलाक प्रासन पर बेठाने और ठम से मीठी बात करने में सन्जन पुरुप बाभी नहीं चूकते ॥

(28)
.
(91.). No guest must be dismissed in the evening
by a housekeeper : he is sent by the retiring sun, and
whether he come in fit.season or unseasonably he must
not sojourn in the house without entertaininent.
(92.) Let not himself eat any delicate food without
asking his guest to partake of-'it: the satisfaction of a
guest will assuredly bring the housekeeper wealth,
reputation, long life, and a place in heaven.
(93.) To a bride and to a damsėl, to the sick and
to pregnant women, let him give food even before his
guest without hesitation.
(94.). As inany mouthfuls as an unlearned man shall
swallow at an oblation to the gods and to ancestors, so
many red-hot iron balls must the giver of the Sraddha
- swallow in the next.world.

(en) अप्रणोद्योऽतिथिःसायं मूर्योटो गृहमेधिना ॥ काले प्रान स्त्वकाले वानास्यानश्ननगृहे वसेत् ॥१०॥ (३) दिन का थका मूर्य के अस्त समय में अतिथि आया हो तो उसका मानन जल अवश्य देना भोजन काल में प्राप्त हो अथवा दूसरे काल में प्राप्त हो परंतु भोजन किये बिना गृह में न रहने देना गृहस्यों का धर्म है ॥ १० ॥ .. (ER) · न वैस्वयन्तदश्नीयादतिथिं यन्न भोजयेत् ।। धन्यं यशस्यमायुप्यं स्वय॑ञ्चातिथिपूजनम् ॥ १०६ ।। (२) ने वस्तु अतिथि को भोजन न करावे उस वस्तु का आप भोजन न करे और अतिथि को भोजन देना यह तो धन यश आयुष स्वर्ग इनका साधन करनेवाला है।॥ १०६॥ (e) सुवासिनीः कुमारीश्च गर्भिणीरोगिणी स्त्रियः ॥ अतिथिभ्योग एवेता भाजयेदविचारयन् ॥ ११४ ॥ (es) सुहागिन कुमारी रोगी गर्भिणी इन सब का अतिथि भोजन के पहिले भोजन देना इस में विचार न करना. ११४॥ (६४) यावता ग्रसते यासान् हव्यकव्यप्वमन्त्रवित् ॥ तात्रता असते प्रेत्य दीपशूलष्टय योगुडान् ॥ १३ ॥ (६४) देवता और पितरों के अन्न को जे पास मर्व ब्राह्मण भाजन करता है ते बार श्राद्ध करनेवाला अग्नि से ता शूल और वष्टि (अर्थात् दुधारा, शस्त्र) और लोह पिण्ड इन सब को भोजन करता है ॥ १३३ ॥ (६२) अर्थात् ऐसा न करें कि अच्छा २ ते। आप खा जाये और बुरा .. बुरा अतिथि को देवे ॥ (६४) न जाने लोग फिर क्या मूर्य ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और ब्राह्मण किम कारण लिखने पढ़ने में मन नहीं लगाते ।। - 1: CHAPTER IV (95.) Let a Brahman having dwelt with a preceptor during the first quarter of a man's life pass the second quarter of human life in his own house when he has contracted a legal marriage. . (96:). - Let him if he seek happiness be firma in perfect content, and check all desire of acquiring wore than he possesses, for happiness has its roots in content, and discontent is the root of misery (97.) Let him not from a selfish appetite. be strongly addicted to any sensual gratification"; let him by improving his intellect studiously přeclude an excessive attachment to such pleasures even though lawful.

स ॥ चतुर्थ अध्याय ॥ (६५) चतुर्थमायुपो भागमुपित्वाधारे। द्विजः ।। द्वितीयमायुपो भागतंदारो गृहे वसेत् ॥ ५ ॥ (६५) श्रायुप के चार भागों में से पहिले में गुरु कुल में. जाके वास करे दूसरे भाग में विवाह वारके गृह में रहे (इस स्थान में यह संदेह हो सकता है कि.आयुप का निश्चित काल परिणाम तो जान नहीं पड़ता चार भाग का पहिला भाग किम प्रकार से जाना जाय कदाचित् कहा कि शत वर्ष के पुरुष होते हैं यह श्रुति में लिया है तो २५ वर्ष '. चौथा भाग हुआ तो मनुजी ने छत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य करना यह कहा है इसके साथ विरोध पड़ेगा इसलिये जब तक ब्रह्मचर्य हो सके सोई आयुप का चौथा भाग है ) ॥ ५॥ (६६) सन्तोयम्परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् ॥ सन्तोपमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ॥ १२ ॥ (६६) परम संताप को पाके सुखार्थी संयम (अर्थात् इंद्रिय निग्रह) करे क्योंकि मुख का जड़ संतेय हे दुःख का जड़ असंतोप है ॥ १२ ॥ (E) इन्द्रियार्थपु सर्वेषु न प्रमज्जेत कामत: ॥ अतिप्रसक्तिञ्चैतेपाम्मनमा सन्निवर्तयेत् ॥ १६ ॥ (६) इच्छा से रूप रस गंध स्पर्श शब्द इन सत्र में प्रसक्त न होवे इन सब में अति प्रसक्ति को मन से निवृत्ति करे ॥ १६ ॥ (६५) ये वचन ब्राह्मणों के लिये हैं ॥

(98.). Each day let him examine those holy books which soon give increase of wisdom, and those which teach the means of acquiring wealth, those which are salutary to life, and those Nigamas which are explanatory of the Teda, (99.) Since as far as a man studies completely the system of sacred literature, so far only can he become eininently learned, and so far may his learning shine brightly. (100:) 'Let no priest who keeps house, and is able to procure food, ever waste himself with hunger; nor, when he has any substance, let him wear old or sordid clothes. (101.) His hair, nails; and beard being clipped, his passions subdued, his mantle white, his body- pure, let him diligently occupy himself in reading the Veda; and be constantly intent on such acts as may be salutary to him.. (102.) Let the housekeeper wake in the time sacred to Brahmi, the goddess of speech, ---that is, in the last watch of the night: let hiin then reflect on virtue and virtuous emoluments on the bodily labour which they l'equire, and on the whole meaning and very essence of the Veda.

(१८) बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च ॥
नित्यं शास्त्राण्यवेक्षत निगमांश्चैव वैदिकान् ॥ १६ ॥
(१८) बुद्धि को बढ़ानेवाला जो शास्त्र है और घन को देने
वाला जो शास्त्र है.और हित करनेवाला जो शास्त्र है इन
सब को देखना और वेदार्थ का बतलानेवाला ना ग्रंथ है
उसको भी नित्य ही देखना ॥ १६ ॥
(a) यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति ॥
तथा तथा विजानाति विज्ञानज्ञास्य रोचते ॥ २० ॥
(EE) मनुष्य जैसा जैसा शास्त्र का अभ्यास करता है तैसा तैसा
विशेप करके जानता है और उसे ज्ञान भी रुचता है ॥ २० ॥
(१००).. न सीदेतस्नातको विप्रः क्षुधाशक्ततः कथञ्चन ॥
न जीर्यामलवद्वासा भवेच्च विभवे सति ॥ ३४ ॥
(१००) समर्थ जो स्नातक ( अर्थात् गृहस्थ ) है से। भूख से
कभी दुःखित न होवे अर्थात् भूखा न रहे और विभव
रहते जीर्ण और अस्वच्छ वस्त्र न पहने ॥ ३४ ॥
(१०१) ल्कप्लकेशनखश्मगुदीन्तः शुक्लाम्बरः शुचिः ॥
स्वाध्याये चैव युक्तः स्यानित्यमात्महितेषु च ॥ ३५ ॥
(१०१) वेदाभ्यास में और अपने हितकर्म में नित्य युक्त
रहे और कैश नख दाढ़ी इन्हें छोटा किये रहे श्वेत वस्त्र
यहने पश्चिता से रहे इन्द्रियों को निग्रह किये रहे ॥५॥
(१०२) ब्राह्म मुहर्त वुध्येत धर्मार्थो चानु चिन्तयेत् ॥
कायकशांश्च तन्मूलान्वेदतत्वार्थमेव च ॥ २ ॥
(१०२) पहर राचिरहतेउठके धर्म और अर्थ इन दोनों का चिन्तन
करे और धर्म अर्थ का नड़ ना शरीर फ्रेश है उसको भी चिन्तन
करें और वेद का जो तत्व अर्थ हे उसको भी चिन्तन करे ॥९॥

. ::: 31. :) (103.) Let him not bathe having: just eaten, nor while he is afflicted with disease; nor in the middle of the night, nor with many clothes, nor in 'n pool of water imperfectly known. (104.) Let him say, what is true, but let him say ; what is pleasing ; let bim speak 10 disagreeable truth, nor let him speak agreeable falseliood; this is a primers] rule. (105:) Let him not insult those who want a limb or have a limb redundant, who are unlearned, who are advanced in age, who have no beauty, who have no wealth, or who are of an ignoble race. (106) Let him be intent on those propitious obseryances which lead to good fortune; and on the discharge of his customary duties, his body and mind being pure and his members kept in subjection, let him constantly, without remissness, repeat the Gayatri, and present his oblation to fire. (107.)" At the beginning of each day let him discharge his feces, batle, rúb his teeth, apply à collyriuin to his eyes, adjust his dress, and adore the gods."..

: (१०३) नसानमाचरेद्वका नातुरो न महानिशि ॥ न वासाभिस्सहाँजसं नाविज्ञाते नलाशये ॥ १२६ (405) भोजन किये हो और आतुर हो तो स्नान न करे वस्त्र सहित वारंवार भो स्नान न करें अर्द्धगत्र में और जो नलाशय जाना नहीं गया है उस में स्नान न करे ॥ १२ ॥ (१०४) सत्यम वयात्मियम् व्यान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् ॥ प्रियञ्च नानृतम् ब्रूयादेष धर्मस्सनातनः ॥ १३८ । (१०४) सत्य बोलना प्रिय बोलना सत्य भी हो और प्रिय न हो तो उसको न बोलना प्रिय भी हो और सत्य न हो तो उसको भी न बोलना यह नित्य धर्म है ॥ १३८ ॥ (१०५) हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान्विद्याहीनान्वयोधिकान् । सुपद्रव्यविहीनांश्च नातिहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥ २४ ॥ (१०) हीन अंगवाला अधिक अंगवाला मूर्ख वृद्ध कुरूप हीन नाति हीन दृश्यवाला इन सबों की निंदा न करनी (अर्थात् काणा है तो उसको कारण कहके न पुकारना) ॥ १४ ॥ (१०६) मङ्गलाचारयुक्तःस्यात्प्रयतात्मा जितेन्द्रियः ॥ जपेच्च जुहुयाच्चैव नित्यमनिमतन्द्रितः ॥ १४ ॥ (१०३) मंगल आचार से युक्ता रहे भीतर जितेन्द्रिय होके जप और हम करे आलस्य को छोड़ देवे ॥ १४५ ॥ (१००) मैत्रम्पमाघनं स्नानं दन्तधावन मञ्चनम् ॥ पूर्वाह एव कुर्वीत देवतानाञ्च पूजनम् ॥ १५२ ॥ (१००) विष्ठात्याग देहप्रसाधन (अर्थात् शृंगार आटि) प्रात: स्नान दंतधावन अंजन देवता का पूजन इन सब कमी को पूर्वाह्न काल (अर्थात् दिन के पूर्व भाग) में करना ॥ १५२ ॥ बाहर से शुद्ध रहे H soine' way behind theni. . (1.32 (108.): Let him humbly greet venerahle men who visit him, and give thein his own seat; let him sit near them closing the palms of his hands; and when they depart, (109.) Him by. whom he was invested with the sacrificial thread, him who explained the Veda or even a part of it, his mother and his father, natural or spiritual, let hiỉ never opposé, nor priests, nor cows, nor persons : truly devout. (110.) Denial of a future state, neglect of the scripture and contempt of the deities, envy and hatred, vanity and pride, wrath and severity; let him at all times avoid. (111.) Let him not when angry throw a stick at, another man, nor smite him with anything, unless he be a son or pupil: those two he may chastise for their improvement in learning. .: :

सन्मुख खड़ा रहे (१०८) अभिशदयेदृद्धांश्च दद्याच्वासनं स्वकम् ॥ कृताञ्जलिरुपासीत गच्छतः पृष्ठतान्वियात् ।। १५४ ॥ (१०८) अपने गृह में आये हुए वृद्धा को प्रणाम करे अपना प्रासन बैठने के लिये देवे हाथ जोड़ के चलने लगे तो पीछे पीछे (कुछ दूर) आप भी चले । १५४ ॥ (१०६) प्राचार्यञ्च प्रवक्तारम् पितरम्मातरङ् गुरुम् ॥ नहिंस्यागाह्मणान् गाश्च सर्वांश्चेव तपस्विनः ॥ १२ ॥ (१०६). आचार्य वेदाध्ययन का कहनेवाला पिता माता गुरु ब्राह्मण गौ तपस्वी,इन सब में से किसी को भी न मारे ॥१६॥ (११०) नास्तिक्यम्वेदनिन्दाञ्च देवतानाञ्च कुत्सनम् ॥ द्वेपन्दम्भच्च मानञ्च क्रोधन्तेक्षण्यञ्च वर्जयेत् ॥ १६३ ।। (११०) नास्तिकपना और वेद देवताओं की निन्दा और शचुता- .... दंभ और मानक्रोध और तीक्ष्णता इन सब को न करना । १६३ ॥ (१११) परस्य दण्डन्नोद्यच्छेत् क्रुद्धो नैनं निपातयेत् ॥ . अन्यत्र पुत्राच्छिप्याद्वा शिष्ट्यर्थन्ताइयेत्तुंता ॥ १६४ ।। (१९i) क्रोध पाके दूसरे के मारने के लिये लाटी न चलावे और न दूसरे को किसी प्रकार से मारे परंतु पुच और शिष्य इन दोनों को सिखाने के लिये ताड़ना करे ॥ १४ ॥ (१०६) गो से इस देश में बड़े काम निकलते हैं अत एव रक्षा के योग्य है॥ (११०) जो लोग हिंदू कहलाते हैं उनको यह शनोका मदा स्मरण रखना चाहिये ॥ (१११) काशी के कितने ही हिंदूत्रों ने इसका अर्थ विपरीतममा क्या है क्योंकि उनकाबर्मविपरीतदिखलाई देता हे पंडित को चाहिये कि इन महा पुस्पों को सीधा अर्थ समझा टेमें ।

(33) . (112.) Iniquity committed in this world produces not fruit immediately, but like the earth, in due season, and advancing by little and little it eradicates the inni who coinmitted it. # (113.) He grows rich for a while through wrighteousness, then he beholds good things, then it is that he Tanquishes his foes, but he perishes at length from his whole root upwards. . (114.) Let a man continually take pleasure in truth, in justice, in laudable practices, and in purity ; let him chastise those whom he may chastise in a legal mode; let him keep in subjection his speech, his arm, and his appetite. 21 (११२) नाधर्मश्चरिते। लोके मद्यः फलति गौरिव ॥ शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥ १०२ ।। (११२) अधर्म शीघ्र ही नहीं फलता गो (अर्थात् पृथ्वों) की नाईं (जैसे पृथ्वी वीज बोने से शीघ्र फल नहीं देती किंतु काल पाके देती है) अधर्म करनेवाले का धीरे धीरे सर्व- नाश हो जाता है ॥ १२ ।। (११३) अधर्मेणेधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति ॥ ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ १४ ॥ (५१३) अधर्म करनेवाला पहिले बढ़ता है फेर कल्याण को देखता हे फेर शत्रुओं को जीतता हे पश्चात् मूल सहित नष्ट हो जाता है ॥ १४ ॥ ".. (११४) सत्यवमार्यवृत्तेपु शोचे चवारमेत्सदा ॥ शिष्याश्च शिप्याद्धर्मेण वाम्बाहूदरसंयतः ॥ १० ॥ (११४) भले लोगों का आचार सत्य धर्म पवित्रता इन सब में सर्वकाल रति करे भाया पुच दास छाच इन सब को धर्म से शासन (अर्थात् ताड़न) करे वाणी वाहु उदर इनका संयम करे (वाणी का संयम सत्य भापण से होता बाहू के बल से किसी को पीड़ा न देवे तव बाहु का संयम होता है जो कुछ थोड़ा सा मिल जाय उसी के भोजन से संतुष्ट रहने से उदर का संयम होता है) ॥ १०५ ।। (११३) अर्थात् अधर्म करनेवाला चाहे जितना बढ़े परंतु अन्त उसका बुरा है मूल सहित नप हो जावेगा ।।

( 34 ) (115.) Wealth and pleasures repugnant to lair let him shun, and even lawful acts which may cause future pain or be offensire to mankind. (116.) Let him not have nimble hands, restless feet, or voluble eyes; let him not be crooked in his ways; let him not be flippant in his speech, nor intelligent in doing inischief. (117.) Though permitted to receive presents; let him aroid a habit of taking them ; since by taking many gifts his divine light soon fades. (118.) The man who knows not that lar, yet accepts gold or gems, land, a horse, a cow, food, raiment, oils, n** clarified butter becomes miere ashes, like wood consumea by fire.

. (११५) परित्यजेदर्थकामा यो स्यातान्धर्मवर्जिता ।। धर्मच्चाप्यमुखोदक लोकविकुष्टमेव च ॥ १६ ॥ (११७) धर्म से वर्जित का अर्थ काम है उमका त्याग करना और जो धर्म से वर्जित नहीं हे परंतु लोक से विरुद्ध हे और पानेवाले काल में दुःख का देनेवाला है उसका भी त्याग करना ॥ १६ ॥ (११६) न पाणिपादचपला न नेचचपलोऽनृजुः ॥ न स्याद्वाञ्चपलश्चैव न परद्रोहकर्मधीः ॥ १० ॥ (११६) हाथ पांव आंख वाणी इन सब को चंचल न रखे टेढ़ा न रहे परद्रोह कर्म में बुद्धि को न लगावे ॥ १०० ।। (११०) प्रतिग्रहसमयोपि प्रसङ्गन्तत्र वर्जयेत् ॥ प्रतिग्रहेगा तस्याशु ब्राह्मन्तेनः प्रशाम्यति ॥ १६ ॥ (११०) दान लेने में समर्थ हो तो भा न लेवे दान लेने से ब्रह्मतेज शांत होता हे ॥ १८ ॥ (१२८) हिरण्यम्भूमिमश्यामन्नम्यामस्तिलान् घृतम् ॥ प्रतिगृहन्नविद्वांस्तु भस्मी भवति दास्वत् ॥ १८८ । (१५८) स्वर्ण भूमि घोड़ा गो अन्न वस्त्र तिल घृत इन सर्व में से कोई गक वस्तु का प्रतिग्रह करने से मूर्ख ब्राह्मण लकड़ी की नाई भस्म हो जाता है ॥ १८ ॥ (११८) हमारी नान में जब मूर्ख ब्राह्मण यह सब देने से मस्म होता है तो देनेवाले को भी पाप लगेगा क्योंकि ब्राह्मण का भस्म करना कदापि श्रेय नहीं ना लोग घाटिये गंगा पुत्र गया बाल और पंडों को दान देते हैं उन्हें इस वक्षन पर ध्यान भी रखना चाहिये।

( 35 ): (119.) A twice-born man void of true devotion, anı not having read the l'eda, yet eager to take a gift, sinks down together with it as with a boat of stone in deep water, (120.) Let no man apprizeri of this law present err'i Tater to a priest who acts like a cat, not to lim vrho acts like a bittern, nor to him who is unlearned in the can. (121.) Since property thongh legally gainel, iſ it be given to either of those thrce, becomes prejudicial in the next world both to the girer and receiver. t (122.) As he who tries to pass over dccp mater in a boat of stone sinks to the bottom, so those two ignorant men, the receiver and the girer, sink to a region of torment.

.(११E) अतपास्त्वनधीयानः प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः ॥' श्रम्भस्यश्मणवेनेव सह तेनैव मन्नति | 0 | (११३) तप और वेद से रहित है प्रतिग्रह में रुचि रखता है ऐसा ब्राह्मण दाता सहित डूबता है जैसे जल में पत्थर की नौका ॥ १६ ॥ (१२०) न वार्य्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालतिके द्विजे ।। न बकवतिके विग्ने नावेदविदिधर्मवित् ॥ १२ ॥ (१०) वैडालव्रतिक बकवतिक और मूर्ख इन तीनों ब्राह्मण 'को धर्म जाननेवाला पुरूप जल मात्र भी न देवे ॥ १६२ ॥ (१२५) विष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनायर्जितन्चनम् ॥ दातुर्भवत्यनाय परचादातुरेव च ॥ १६३ ॥ (१२१) विधि से अर्जित धन जो इन तीनों को देवे तो परलोक में वह दानदाता और प्रतिग्रहीता दोनों के अनर्थ का हेतु होता हे || १६३ || (१२) यथा प्लवनोपलेन निमज्जत्युदो तरन् । तथानिमज्जतेऽधस्तादची.दातृप्रतीच्छको ॥ १६४ (१२२) जिस प्रकार से पत्थर की बनाई हुई नाव पर चढ़कर जल में डूबता है उसी प्रकार से दांता और प्रतिग्रहीता दोनों मर्ज नरक में डूबते हैं ॥ १६४ ॥ (16) ने। लोग लौकिक में नाम पाने के निमित्त इस काल के ऐसे ब्राह्मणों को 'कि वेद का एक अक्षर भी नहीं जानते और प्रतिग्रह में जो देते हैं, धन वांटा करते हैं उन्हें! ने क्या कभी यह वचन मनुनी का नहीं सुना ॥ (१२२) हे हमारे देश वासियो कान खोला और इसको मुना॥

(36) (123.) A covetous wretch-ho continually display, the flag of virtue, a pretender, a doluder of the people is. declared to be the man, ifhoncts like i cat : he is an injurious hypocrite, a detractor from the merits of all men. (124.) A twice-born wan, vith bis cores dejected, morose, intent on his own advantage, sly, and falsely demure, is he, who acts like a bitteru, (125.) Such priests, as live like bitterns, and such as demean themselves like cats fall by that sinful conduct into the hell called Andhatáinisra, (126.) Giving no pain to any creature, let him collect Firtue by degrees, for the sake of acquiring a companiou to the next world, as the white-ant hy degrees builds his nest.

(१३) धर्मध्वजी सदा लुब्यशछद्विको लोकदम्भकः ॥
वैडालअतिकोनेया हिंसः सर्वाभिसन्धकः ॥ १५ ॥
(१३). धर्मध्वजी (अर्थात् जो नाम पाने के लिये मनुष्यों
में अपने को बड़ा धार्मिक प्रसिद्ध करता है लोभी वहाने
से चलनेवाला वंचना करनेवाला घातक (अर्थात् घात करने-
वाला) सब की निन्दा करनेवाला ऐसा जो है सो वैडाल-
व्रतिक कहलाता है (अर्थात् बिल्ली की नाई उसका आचरण
हे ) ॥ ६॥
(१२४) अधोदृष्टिनेंष्कृतिक: स्वार्थसाधनतत्परः ॥..
शठो मिथ्याविनीतश्च बकवतचरो द्विनः ॥ १६६ ॥
(१२४) . नीचे देखनेवाला (निष्ठर अर्थात् दया शून्य) अपने
अर्थ के साधने में तत्पर टेढ़ा रहनेवाला झूठी नम्र-
तावाला ऐसा जो हे सो वकन्नतिक कहलाता हे (अर्थात्
बकुला
को नाई उसका आचरण है)॥ १६ ॥
(१२५) ये बकतिनो विप्रा ये च माजारलिङ्गिनः ॥
ते पहन्त्यन्धतामिस्र तेन पापेन कर्मणा । १६०
(१२५) बनतिक वैडालन तक ये दोनों अपने पाप से
अंधतामिम नाम नरक में जाते हैं । १६ ॥
• (46) धम्म शनेस्स चनुयाद्वल्मीकमिव पुतिका ॥
परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीड़यन् ॥ २३८ ॥
१६) किसी जीव को पीड़ा न होने पावे ऐसी रीति में
परलोक के सहाय के लिये धर्म को बटोरे से दीमक
वल्मीक (अर्थात् अपनी वांबी) को बटोरती है ॥ २३८ ॥

37.) (127:) For in his passage to the next world, ucither his father, nor his mother, nor luis wife, nor luis son, nor his kinsmen, will remain in his company : his virtuc alone will adhere to lini. . (128.) Single is cach man born ; single lie lies single he receives the reward of liis good, and single the punislument of his evil rleeds. (129.) When lie leaves his course, like a log or a. lump, of clay, on the ground, lis kindred retire with ayerted faces; bui liis virtue accompanies his soul. (130.). Continually, therefore, by degrees let him collect virtue, for the sake of securing an inscparable companion ; since with virtue for luis guide, he will traverse a gloom, how hard to be traversed: ...(131.) He who perseveres in good actions, in subduing his passions, in bestowing largesses, in geritleness of manners, who bears hardships patiently, who associates not with the nialignant, who gives pain to no sentient being obtains final beatitude.

(५२०) नामुच हि सहायार्थम्पिता माता च तिकृतः ॥ न पुचदारन्न ज्ञातिधर्मस्तिपुति केवल: ॥ २० ॥ (१२०) माता पिता पुत्र भार्या नाति ये सब परलोक में. सहाय के लिये नहीं रहते केवल धर्म ही रहता है ॥ २३ ॥ (१२८) एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते ॥ एकोनुभुक्त सुकृतमेक एव च दुष्कृतम् ॥ २४०॥ (१९८), 'अकेला ही उत्पन्न होता है अकेला ही नष्ट होता है अकेला ही सुकृत (अर्थात् पुण्य) को भोग करता है अकेला ही दुप्कृत (अर्थात् पाप को भोगता है ॥ ४० ॥ . (५२९) मृतं शरीरमुत्सृज्य काठ लागसमं निता ॥ विमुखा वान्धवा यन्तिधर्मस्तमनु गच्छति ॥२४॥ (१२) काठ और ठेले के सदृश मृत शरीर को पृथ्वी पर त्याग करके वांधव लोग सब मुंह फेर लेते हैं परंतु धर्म उसके पीछे २ लगा चला जाता है ॥ २४१ ॥ (१३०) तस्माद्धर्म सहायार्थन्नित्यं सञ्चिनुयाच्छनैः ।। धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुम्तरम् ॥ २४२ ॥ (५३०) इसलिये सहाय के अर्थ नित्य ही धीरे २ धर्म को बटोरे धर्म की सहायता से दुस्तर नरक को तरता है ॥२४२॥ (१३१) दृढकारी मृदुर्दान्तः क्रूराचार रसम्बसन् ॥ अहिंस्रो दमदानाभ्यां जयेत्स्वर्गन्तथावतः ।। २४६.H (१३१) दृढकारी अर्थात् जिस क्रिया का आरंभ किया उसको समाप्त करनेवाला कोमल स्वभाववाला शीत घाम आदि जा दुख है उनको सहनेवाला इंद्रियों का विषयों से रोकनेवाला कराचारवाले पुरुषों के साथ संबंध को छोड़देनेवाला हिंसा से निवृत रहनेवाला दान करनेवाला स्वर्ग को पाता है ॥२४६ ॥ - , ( 38 ) (132.) For he who describes himself to worthy men in a manner contrary to trutli is the inost sinful wretch in this world; he is the worst of thieves, a stealer of minds. (133.). All things liave their sense ascertained by speech; in speech they have their basis, and from speech they proceed; consequently, a falsifier of speech falsifies every thing. CHAPTER V. (134.) While he who gives no creature willingly the pain of confinement or death, but seeks the good of all sentient beings, enjoys bliss without end. (135.) -Flesh meat cannot be procured without injury to animals, and the slaughter of animals obstructs the päth to beatitude ; from flesh meat, therefore, let man i abstain.

. का - (५३२)... योन्यथा सन्तमात्मानमन्यथासत्सु भाषते ॥ स पापकृत्तमा लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥ २५५ ॥ ५३२) 'जा सन्जनों के मध्य में अपने को छिपाता है अर्थात जेसा है वैसा नहीं बतलाता सो. लोक में बड़ा पाप करने, वाला है और चार है (अर्थात. अपनी आत्मा को चुराता है। ॥ २५५ ॥ (१३) वाच्या नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिः सृताः ॥ तान्तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २५६ ॥ १३३) नितने अंर्थ हैं सो सब वाणी में रहते हैं वाणी उन मूल है वाणी से निकलते हैं उस वायी को जिसने चुराया (अर्थात् ना. भूठ बोला) सेा सर्व वस्तु का चुराने- वाला हुआ ॥ २५६ ॥ .पञ्चम अध्याय ॥ (९३४) यो बन्धनवघल्लोशम्प्राणिनान्न चिकीर्यति ॥ स सर्वस्य हितप्रेप्सु : सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ ४६ ॥ (१३४) जो सब जीवों को बंधन और वध का क्लेश देने की इच्छा नहीं करता से सब का हितकारी है और अति सुख को पाता है॥ ४६॥ (१३५) नाकृत्वा प्राणिनां हिसाम्मांसमुत्पद्यते क्वचित् ॥ . न च प्राणिवधः स्वय॑स्तस्मान्मांसम्विवर्जयेत् ॥४॥ (१३३) प्राणियों को हिंसा बिना, मांस नहीं मिलता और प्रागियों का वध ता स्वर्ग के हित नहीं है इसलिये मांस का त्याग ही करना ॥ ४॥ (१३५) अर्थात् मांस न खाना ॥ .

(39) (136.) Attentively considering the formation of bodies, and the desth or confinement of embodied spirit, let him abstain from eating flesh meat of any kind: (137.) Not a mortal exists more sinful than he wlio, without an oblation to the manes of the gods, desires to enlarge his own-flesh with the flesh of another creaturé. . (138.) Bodies are cleansed by water ;' the mind is. purified by truth ; the vital spirit by theology and devotion ; the understanding by clear knowledge. ; . (139.) She must always live with a cheerful teinper, with good management in the affairs of the house, with great care of the household furniture, and with a frugal hand in all her expenses.

: (१३६) · समुत्पत्तिश्च मांसस्य वववन्धौ च देहिनाम् ॥ प्रसमीक्ष्य निवर्तत सर्वमांसस्य भक्षणात् ॥ ४६॥ (१३६) मांस की उत्पत्ति और प्राणियों का वध और बंधन इन सब को देखकर सर्व मांस का भक्षण त्याग करे ॥ ४ ॥ (१३०) स्वमांसम्परमांसेन यो वर्द्धयितुमिच्छति ॥ अनभ्यर्च्य पितॄन्देवांस्ततोऽन्योनास्त्यपुगयकृत्।।२। (१३०) · पराये के मांस से अपना मांस बढ़ाने की जो पुरुष इच्छा करता है और देव और पित्रों की पूजा नहीं करता उस से अधिक दूसरा कोई पापी नहीं है ॥ ५२ ॥ :. (१३८) अद्विगीचाणि शुध्यन्ति मनस्सत्येन शुध्यति ॥ विद्यातपोभ्याम्भूनात्मा बुद्धिज्ञानेन शुध्यति ॥ १०६ । ११३८) जल से शरीर सत्य से मन ब्रह्म विद्या और तप से भूतात्मा (अर्थात् लिंग शरीर सहित जीवात्मा ) ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है ॥ १० ॥ (१३६) सदा प्रहृष्टया भाव्यगृहकार्यपु दक्षया ॥ मुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ॥ १० ॥ (१३६) स्त्री सर्वकाल में हुए और गृह कार्य में दक्ष रहे गृह की सब सामग्रो मुंदर प्रकार से बनाये रखे और यथा योग्य . व्यय करे ॥ १० ॥ [१३६) अर्थात् किसी प्रकार का भा मांस न खावे ॥ (१३०) क्या प्रण्डितों ने मांस अहारी हिन्दुओं को यह वचन कभी नहीं मनाया ॥ -

(40)
(140.) Though unobservant of approved usages, or
enamoured of another woman, or devoid of good qualities,
yet a husband must constantly be revered as a god hy
a virtuous wife.
(141.) No sacrifice is allowed to women apart from
their husbands, no religious rite, no fasting; as far only
as a wife honours her lord, so far is she exalted in hicaveu,
(142..): A faithful wife who wishes to attain in heaven
the mansion of her husband must do nothing unkind to
him, be he living or dead.
mummimaan
CHAPTER VI.
(143.). Let him not wish for death; let him not wisiz
for life; let him expect his appointed time, as a hired
servant expects his wages,

(१४०), विशील: कामवृत्तो वा गुणैवी परिवर्जितः ॥ उपचार्य:स्त्रिया साध्या सततं देववत्पतिः ॥१५४ ॥ (१४०) शील से रहित पति हो अथवा दूसरी स्त्री को साथ प्रेम रखता हो किंवा गुणों से वर्जित हो तो भी जो साध्वी स्त्री हैं सोनित्य ही देवता की नाई पति-की सेवा करें ॥ १५४ ॥ (१४५) नास्ति स्त्रीणाम्पृथग्यज्ञो न व्रतन्नाप्युपोपितम् ॥ पति शुभपते येन तेन स्वर्गे महीयते ॥ १५ ॥ (१४१) स्त्रियों का यज्ञ व्रत उपवास पृथक् नहीं है केवल ,': पति की सेवा ही से स्वर्ग में पूनित होती हैं ॥ १५ ॥ (१४२) पाणिग्राहस्य सा साध्वी जीवतो वा मृतस्य वा ॥ पतिलाकमभीप्सन्ती नाचरत्किञ्चिदप्रियम् ॥ १५६ ॥ (१४२) पति लोक की इच्छा करनेवाली साध्वी स्त्री जीते अथवा मरे पति का अप्रिय कुछ भी काम न करे । १५६ ॥ . ॥ पष्ठ अध्याय ॥ (१४३) नाभिनन्दत मरणन्नाभिनन्देत जीवितम् ।। कालमेव प्रतीक्षेत निर्दृशम्भृतको यथा ॥ ४५ ॥ (१४३), मनुष्य मरण और जीवन इन दोनों में से किसी की भी इच्छा न करे केवल काल ही की प्रतीक्षा में रहे निसरीति से मृत्य स्वामी की आज्ञा को प्रतीक्षा करता है ॥ ४५ ॥ (१४३) अर्थात् ना कुछ ईश्वर की इच्छा है उसी में संतुष्टं रहे और आप कुछ भी न चाहे ।।

(144.), Let him advance, his-foot purified by looking down, lest he touch anything impure; let him drink water purified by straining with a cloth, lest he hurt some insect; let him; if he choose to speak; utter words purified by truth; , let him by all means keep his heart purified. (145.) Let him hear a reproachfuil speech with patience; let him speak reproachfully to no man; let bim not, on account of this frail and fererish body, engage in hostility with any one living. (146.) With an angry man let him not in his turn be angry; abused; let him speak inildly ; nor let him utter a word relating to rain illusory things and confined within seven gates, the five organs of sense, the heart, and the intellect; or this world, with three above and three below it., (147.) By the coercion of his members, by the absence of hate and affection, and by giving no pain to sentient creatures, he becomes fit for imrs. 'tality. (148.) When, having well considered the nature and consequence of sin, he becomes averse from all sensual delights, he then attains bliss in this world ; bliss which shall endure after death, in this worla;

मानव धर्मसार ४१ . ...(१४४) : दृष्टिपूतन्यसेत्पादम्बस्त्रपूतञ्जलम्पिवेत् ॥ सत्यपूताम्वदेवाचम्मनः पूतं समाचरेत् ॥ ४६॥ (१४४) (धरती पर) देख के पांव रखे जल को कपड़े से छान के पीये सत्य करके पवित्र वाणी को बोले मन पवित्र रख के सारे काम करे ॥ ४ ॥ : (१४५) · अतिवादास्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन ॥" . न चेमन्देहमाश्रित्य वैरात केनचित् ॥ ४० ॥ (१४५) दूसरे मनुष्यों को बुरी वाणों को सहे किसी का अप- मान न करे किसी से बैर न करे ॥ ४ ॥ (१४६) क्रुध्यन्तन्न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलम्वदेत् ॥ साद्वारावकोणीच न वाचमनृताम्वदेत् ॥ ४ ॥ (१४६) अपने ऊपर कोई क्रोध भी करे तो उस पर आप क्रोध न करें अपनी निन्दा भी कोई करे तो आप उसं में अच्छी याणी से बोले सप्त द्वार से निकले हुए वचन को अनृत न वाले ॥ ४८॥ (१४०) इन्द्रियागा नरोधेन रागद्वेपक्षयेन च ॥ अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते ॥ ६० । (१४५)- इंद्रियों का निरोध राग द्वेय का क्षय अर्थात् त्याग सब जीवों की अहिंसा इन से मनुष्य मेोक्ष के योग्य होता . (१४८) यदा भावेन भवति सर्वभावयु निःस्पृहः ।। तदा सुखमवाप्नोति नेत्य चेहच शाश्वतम् ॥ ८० ॥ १४८). सब परमार्थ से विषयों में दोप भावना करके सब वस्तु में इच्छा से रहित होता है तब इस लोक में और पर लोक में मुख ॥ ८० ॥ को पाता है ( 42 ) 7 3 (149.) By Bráhmans, placed in these four orders, à tenfold system of duties must' ever be sedulously practised: (150.) Content, returning good for evil, resistance to sensual appetites, abstinence from illicit gain, purification, coercion of the organs, knowledge of scripture, knowledge of the supreme spirit, veracity, and freedom from wrath form their tenfold system of duties. CHAPTER VII. (151.) All classes would become corrupt, all barriers would be destroyed, there would be total confusion among men, if punishment either were not inflicted or were inflicted unduly.

मानव धर्मसार ४२ (१४६) चतुर्भिरपिचैवैतेर्नित्यमामिभिर्द्विजेः ।। ''दशलक्षणको धर्म:सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ १ ॥ (१४६) चारों आश्रमवाले नित्य ही दश लक्षण वाला जो धर्म उसका सेवन यन्त्र पूर्व करें n E१ ॥ (१५०) धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।। धीविद्या सत्यमक्रोधे। दशकं धर्मलक्षणम् ॥२॥ (१५०) धर्म के दश लक्षण कहते हैं १ धृति (अर्थात् संतोप) २ क्षमा (अर्थात किसी से अपकार पाकर उसका अपकार न करना और बुराई के पलटे भलाई करना) ३ दम (अर्थात् विकार करने वाला विषय पाकर मन में विकार न होने देना) ४ चारी का त्याग ५ पवित्रता ६ विषयों मे इंद्रियों का रोकना ● शास्त्र आदि का तत्वज्ञान ८ आत्मज्ञान : सत्य १० क्रोध का हेतु रहते भी क्रोध न करना ॥ ३२ ॥ १ -- ॥ सप्तम अध्याय ॥ (१५१) दृष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिधेरन्सर्वसेतवः ॥ सर्वलोकप्रकोपश्च भवेट्टण्डम्य विभ्रमात् ॥ २४ ॥ (१५१) दंड के विभ्रम से (अर्थात् दंड के योग्य कोन दंड देने से और दंड के योग्य ना नहीं है उसको दंड देने से) संपूर्ण वर्ग दोयो हो नायंगे और संपूर्ण मर्यादा टूट जायगी संपूर्ण लोक को क्षोभ हो जावेगा सब बिगड़ जावेगा ॥ २४ ॥ (१४६) जो लोग हिन्दू कहाते हैं वे नेक अपने मन में सोचें कि इस धर्म के सेवन का अर्थात जिसे मनु जी ने दश लवण कहके बतलाया हे क्या यत्र करते हैं। (१५१) यह अध्याय राजा के वास्ते है।

23:) (152.): From those who know the three Pulas let him learn the triple doctrine comprised in tbem, together with the primeval science of criminal justice and sound policy, the system of logic anil metaphysics, anil sublime theological truth: from the people he must learn the theory of agriculture, comnierce, and other practical auts. ! (152.). Day and night must, lic; strenuously exert bimself to gain complete victory over his own organs ; since that king alone, whose organs are completely subdued, can keep his people firm to their duty, (154.) With extreme care let lim shum eighteeri vices, ten proceeding from love of pleasure, cight sprinsing from wrath, and all ending in misery. (155.) Since a king addicted to vices arising from love of ipleasure inüst lose both his wealth and his virine, and addicted to vicés arising from anger he may lose even liis life from the priblic resentment, 1.

मानव धर्मसार '. (१५) चविदोभ्यस्त्रयाम्विद्यान्दण्डनीतिञ्च शाश्वतीम् ॥ आन्वीक्षिकीञ्चात्मविद्याम्वातारम्भांश्च लोयातः॥४३॥ (१५२) तीन विद्या के जानने वाले ब्राह्मण से तीन विद्या, और सनातन दण्ड नीति और तर्क विद्या और ब्रह्म विद्या और (धन मिलने के उपाय जानने वाले) लोगों से कृषि वाणिज्य पशु पालन आदि वाती को सोखे ॥ ४३ ॥ (१५३), इन्द्रियाणाञ्चये योगं समातिष्ठेटिवा निशम् ॥ जितेन्द्रियो हिं शनाति वशे स्यापयितुम्नाः ॥ ४४ ॥ (१५३) गधि दिन इन्द्रियों के जीतने में उद्योग करे जिते- न्द्रिय राजा संपूर्ण प्रना को आपने वश में रख सकता हे ॥ ४४ ॥ : (१५४) दशंकामसमुत्यानि तथाटो कायजानि च । व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ ४५ ॥ (१५४) · काम से उत्पन्न दश वस्तु और क्रोध से उत्पन्न पाठ वस्तु इनका यन से वर्जन करें ॥ ४५ ॥ .., (१५५) कामजेपु प्रसतो हि व्यसनेयु महीपतिः ॥ पियुज्यतेऽर्यधर्माभ्याङ् क्रोधजेप्वात्मनेव तु ॥४६॥! (१५५) काम से उत्पन्न वस्तु में प्रसक्त होने से राजा धर्म और अर्ध से रहित होता है और क्रोध से उत्पन्न वस्तु में प्रसक्त होने से तो श्राप ही नष्ट हो जाता है || ४६ ॥ (१५३) खेद की बात है कि प.रडत लोग दान दक्षिणा मिलने की कथा तो नित्य सुनाया करते हैं परंतु गेसे २ श्लोक हमारे राजा महारानों को कभी नहीं समझाते । .

( 44 14:3) (156.) Hunting, gaming, sleeping by day, censuring rivals, excess with women, intoxication, singing, instrumental music, dancing, and useless travel are the tenfold set of vices produced by love of pleasure. (157.). Tale-hearing, violence, insidious wounding, envy, detraction, unjust seizure of property; refiling, and open assault are in like maïner the eightfold set of vices to which anger gives birth. (158.) A selfish inclination, which all wise men know to be the root of those two sets, let him suppress witli diligence'; both sets of vices are constantly produced by.it. (159.) That king who, througli weakness of intellect, rashly oppresses his people will, together with his : family, be deprived both of kingdom and life.

मानध धर्मसार ४४ वृथा घूमना : (१५६), मृगयानो दिवा स्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः ॥ तोर्यन्तिकं वृथाट्या च कामना दशको गणः ॥ ४ ॥ (१५६) - अहेर और पासे का खेलना दिन में सोना पर का दोष कहना स्त्री की सेवा मुरापान नाचना गाना बनाना ये दश काम से उत्पन्न है ॥ ४० ॥ (१५०) पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्या सूयार्थदूयणम् ॥ वाग्दगडनच्च पारुष्यं क्रोधनापि गयोऽटकः ॥ ४८ ॥ (१३) किसी का दोष किसी से कहना बल से काम करना कपट से वध दूसरे के गुण को न सहना पर के गुण में दोष निकालना अर्थ को चुराना अथवा देने योग्य वस्तु को न देना वाणी से कठोर वोलना दंड से ताड़न करना ये आठ क्रोध से उत्पन्न हैं ॥ ४८ ॥ (१५८) द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः ॥ तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभी गणे॥ ४६ ॥ (१५८) दोनों गणों का मूल लाभ है उसको यत्र से जीतना इसके जीतने में दोनों गण जीते जाते हैं इस बात को कवियों ने कहा है ॥ ४६॥ (१५६) मोहादाजा स्वगष्ट्रयः कर्पयत्यनवेक्षया । सेचिराद्मश्यतेराज्याब्जीविताच्चसबान्धवः ।।१११५ (१५) जो राना मोह से, बिना देखे अपनी प्रजा को पीड़ा देता है सा थोड़े ही काल में प्राण राज्य वांधव सव महित नष्ट हो जाता है १११ ॥ क्या अच्छी बात होती तो हमारे देश के राना लोग अपनी बड़ी बड़ी मुहरों में इस श्लोक को युदया लेते और सदा उसके अर्थ को चिन्तन करते रहते ॥ । (२५)

(15)
(160.) As hythe loss of bodily sustenance the lives
of animated beings are destroyed, thus, by the distress
of kingdoms are destroyed cyen the lives of kings.
مرده است. به محمد بن
CHAPTER VIII,
(161.) Either the court must not be entered by
judges, parties, and vitnesses, or law and truth must be
openly declared : that man is criminal who either says
nothing, or says what is false or unjust.
(162.) Where justice is destroyed by iniquity, and
truth by false evidence, the judges who bascly look uit
without giving redress shall also be destroyed.
(163.) The only firın friend wylio follows 12 :1 eren
after death is justice : all others are extinct ith the
body

. मानव धर्मसार ४५ (१६०) शरीरकर्षणात्प्राणा: क्षीयन्ते प्राणिनां यथा ॥ तथा रानामपि प्राणा: क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात् ।। ११२ ।। (१६०) जिस रीति से शरीर को कष्ट देने से सब इंद्रियों को कष्ट होता है तिमी रीति से प्रजा की पीड़ा से राना का प्राण पीड़ित होता है ॥ १५२ ॥ " . ॥ अष्टम अध्याय ॥ (१६१) . सभा वा न प्रवेष्टव्या वक्तव्यम्वा समन्जसम् ॥ अब्रुवन् विब्रुवन्वापि नरो भवति किल्बिषी ॥१३॥ (१६५) या तो सभा में जाना ही नहीं और जो जाना तो यथार्थ ही बोलना नानके न वोले अथवा विरुद्ध बोले तो पापी है ॥ ५३ ॥ (५४२) यच धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यवानृतेन च ॥ हन्यते प्रेक्षमाणानां हतांस्तव सभासदः ॥ १४ ॥ (१६२) जहां अधर्म से धर्म और असत्य से सत्य मारा नाता है और देखने वाले उसको निवारण नहीं करते तहां 'मभासद भी मारे गये हैं ॥ १४ ॥ (१६३). एक एव सुहद्धम्मो निधने ऽप्यनुयाति यः ॥ शरीरेण समन्नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥ १० ॥ एक धर्म ही मित्र है क्योंकि वह मरे पीछे भी साथ जाता है और बाकी तो सब शरीर के साथ ही नष्ट होते हैं.। ( कदाचित् कहो कि मरे पीछे तो अधर्म भी (१६०) अर्थात् राजा अपनी प्रजा को प्राण समान जाने ॥ (१६१) अर्थात् झूठ कभी न बोले और काम पड़ने पर सच को कभी न छुपावे । .

(164.) Of injustice in decisions, one-quarter falls ni the party in the cause, one-qnarter on his sitness, one quarter on all the judges, and one-quarter on the king. (165.). From the limbs, the look, the motion of the body, the gesticulation, the speech, the changes of the eye and the face are discovered the internal workings o the mind. (166.) But a witness rho knowingly says anything before 'an assembly of good meu different from thiet he had seen or heard shall fall bieadlong after death into a region of horror, and be debarred from heaven..

मानव धर्ममार साथ जाता है तो वह भी मिच होना चाहिये सिसका समाधान यह है कि धर्म इष्ट.फल देने के लिये नाता है और अधर्म अनिष्ट फल देने के लिये नाता है तो ना इष्ट फल देने के लिये नाय साई मित्र कहलाता है और भाया पुत्र प्रादि ते। शरीर के साथ ही छूट जाते हैं इसलिये पुध आदि में स्नेह करके धर्म को न मारना ॥ १० ॥ (१६४) . णदोऽधर्मस्य कतीरम् पादः मानियामृच्छति ॥ पादः सभासदः सान्यादा रानानमृच्छति ॥ १८ ॥ (१६४) अधर्म का चार भाग होता है एक एक भाग को कती साक्षी सभासट (अर्थात् मुन्सी मुत्मट्टी इत्यादि) और राजा ये चारों पाते हैं ॥ १८॥ (१६५) आकारैरिङ्गितर्गत्या चेष्टया मापितेन च । नेवळविकारश्च गृह्यतेन्तर्गतम्मनः ॥ ६ ॥ (१६५) प्राकार इंगित गति चेष्टा भाषित और नेत्र और मुख का विकार इन सबसे भीतर का मन जाना जाता है॥२६॥ (१६६) माती दृष्टगुतादन्यद्विब्रुवन्नार्यसंसदि । अवानरकमभ्येति प्रेत्य स्वगीच हीयते ॥ ५ ॥ (१६६) नो साक्षी भले लेगों की सभा में मुनने से और देखने में विरुद्ध बोलता है (अर्थात् भूठी गवाही देता है) मे प्रयो मुग्म (अर्थात् नोचे मुष) होकर नरक में जाता है और परलोक में स्वर्ग को पाता है ॥ ५ ॥ (166) हमारे पंडितों को चाहिये कि इन श्लोकों को एक यार उन्हें मुना देयं । हिन्दू कहलाते है और नित गयाही देने को कचहरी में जाया करते है।

(-.47 :-)
(167.). When a man sees or hears anything without
being then called upon to attest it; yet, if he be afterwards
examined as a witness, he must declare it exactly as.it
was seen, and as it ica's beard.
...
(168.). By truth is å witness cleared from sin; by
truth is justice advanced: truth must, therefore, bespoken
by witnesses of every class.
(169.) The soul itself is its own witness; the soul
itself is its own refuge : offend not thy conscious soul,
the supreme internal witness of men.
sees us.
: (170.). The sinful have said in their hearts: "None
Yes; the gods distinctly see them, and so does
the spirit within their breasts.
(171.) On all sides of a village or small town let":
space he left for pasture, in breadth either fou hindrer

मानव धर्मसार ४ .. (१६०). यानिबद्धोपीक्षेत शृणुयाद्वापि किञ्चन ॥ पृष्टस्तत्रापि तद्रूयाद्यांचा दृष्टं यथा श्रुतम् ॥ ६ ॥ - (१६०) तुम इस में साक्षी हो ऐसा नहीं भी कहा गया है और व्यवहार को उसने देखा है और फिर वह बुला के पूछा नाय तो जैसा देखा हे और सुना है तैसा ही कहे, ॥ २६ ॥ .(१६८) सत्येन पृयते साक्षी धर्मः सत्येन वद्धते ॥ तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ ३ ॥ १६८) सत्य से माक्षी पवित्र होता है और मत्य ही से धर्म बढ़ता है इसलिये सर्व वर्ग में साक्षी को सत्य ही बोलना चाहिये ॥ ३ ॥ (REE) आत्मैव ह्यात्मन: साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः ॥ मावसंस्थाः स्वमात्मानं नृणां साक्षिणा मुत्तमम् ॥ ८४ ॥ (१६६) आत्मा का आश्रय और साक्षो आत्मा ही है इसलिये मनुष्यों के उत्तम साक्षो अपने आत्मा का अपमान मत करा॥ ८४॥ (१००) मन्यन्ते वे पापकृतो न कश्चित्पश्यतीति नः ॥ तांस्तु देवा: प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुयः ॥ ५ ॥ (१००) : पाप करने वाले यह मानते हैं कि हमको कोई नहीं देखता है पर उस पाप को देवता और अपने भीतर रहने वाला ही पुरुष देखता है ॥ ८५ ॥ (१०१) धनुःशतम्परीहारो ग्रामस्य स्यात्समन्ततः । शम्यायंतास्त्रयो वापि चिगुणा नगरस्य तु ॥ २२० । - 31

( 48 )
cubiis, or three casts of a large stick; and thrice that
space round a city or considerable town.
(172.) He who forgives persons in pain when they
abuse hin, shall on that account be exalted in heaven;
but he who excuses' thein. not, through the pride of
dominion, shall for that reason sink into bell..
V.
CHAPTER IX.
(173.) Their fathers protect them in childhood
their husbands protect them in youth; their sons protec
them in age: a woman is never fit for independence:
• •

मानव धर्मसार ४. (१०१). गौ के चराने के लिये ग्राम के चारों ओर से धनुष '. तक (अथात् धार सो हाथ तक) खेती न करना अथवा हाथ से लाठो फैकना जहां जाके लाठी गिरे उतनी भूमि की तिगुनी भूमि तक खेती न करना और नगर के चारों पार तो जो कहा है उसका तिगुना छोड़ना ॥ २३ ॥ (१०२) य:निलो मर्पयत्यातस्तेन स्वर्गे महीयते ॥ यस्त्वं श्वनिक्षमते नरकं तेन गच्छति ॥ ३१३ ॥ (१०२) दूपित मनुष्य से निषिद्ध भाषण को पाके नो क्षमा करता है. से स्वर्ग में पूजित होता है और जोगेश्वर्य पायो क्षमा नहीं करता सो नरक में जाता है । ३१३ ।। .. ॥ नवम अध्याय ॥ (105) पिता रक्षति कौमारे भत्ती रक्षति यौवने ॥ रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ ३ ॥ ०३) बाल्यावस्या में पिता युवावस्था में पति वृद्धावस्था में 'पुच स्त्रियों की रक्षा करता है स्त्री स्वतन्त्र (अर्थात् अपने प्राधीन होने के योग्य कभी नहीं होती ॥ ३ ॥ (१०५) क्या अच्छी बात होती जो हिंदू ज़मींदार लोग अब भी ऐसा ही करते और अपने गाय बेलों को बढ़ाते क्योंकि खेत में गोबर अधिक पड़ने से अन्न बहुत उत्पन्न होता है: और गाय बैलों को बहुतायत से दूध दही घी, और हल गाड़ी चलाने और खेत सींचने का भी सुभीता पड़ता हमारे देश वासी जो यह बात कहते हैं कि आगे से अब : पृथ्वी में अन्न बहुत कम उपजता है उसका बड़ा कारण यही चराई न रहने से गाय बेलों का घट जाना है। : an ( 19 ) (17.1.) Let the husband keep his wife employed ítr the collection and expenditure of wealth, in purification and female duty, in the preparation of daily food, and the superintendence of household utensils. (175.) Drinking spirituous liquor, associating with evil persons, absence from her husband, rainbling abroad, unseasonable sleep, and dwelling in the house of another are six faults which bring infamy on a married woman. (176.) She who deserts not her lord, but keeps in subjection to him her heart, her speech; and her body shall attain his mansion in heaven, and, by the virtuous in this world, be called Sádhvi, or good and faithful. (177.) But it is better that the damsel, though mar riageable, should stay at home till her death, than that he should ever give her in marriage to a bridegroom yoic of excellent qualities:

मानव धर्ममार ४ (१०४) अर्थस्य सङ्य हे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् ।। शौचे धर्मेन्नपत्त्याच पारिगाह्मस्य चेनणे ॥ ११ ॥ (१०४) अर्थ का संग्रह व्यय कर्म ( अर्थात् घर का खर्च ) पवित्रता धर्म अन्न बनाना गृह की सामयो को देखना इन सव कामों में स्त्री को अधिकार देना ॥ १९ ॥ " . (१०५) 'पानं दुर्ननसंसर्गः पत्या च विरहोटनम् ॥ स्वनोन्यगे हवासश्च नारीणां दूषणानि पट् ॥ १३ ॥ (१०५) मद्यपान दुर्जन संग पनि का विरह इधर उधर घूमना अकाल में माना और के गृह में वास ये छ: नारी को दूषण हे ॥ १३ ॥ (१०८) पति या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ॥ मा भर्तृलोकानाप्नोति मट्विः साध्वीति चोच्यते ॥ २६ ॥ (१०४) . मन वाणी देह से संयत (अर्थात् दोष रहित) होकर जो स्त्री अपने पति को छोड़ दूसरे पुरुष का संयोग · नहीं करती से भर्तृ लोक का पाती है और इस लोक में भले लेग उसको साध्वी ( अर्थात् पतिव्रता) कहते हैं ॥२६ (१००) काममामरणात्तिष्टेनहे कन्यर्तुमत्यपि ॥ न चैवैनाम् प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥ ८॥ . (१००) ऋतुमती भी कन्या होकर गृह में मरण तक रहे परंतु उस कन्या का गुणहीन पुरुप को कभी न देवे ॥८॥. (१०४) आमदनी और ख़र्च का हिसाब स्त्री तभी रख सकेंगी और धर्म अधर्म का भेद भी तभी जानेंगी जब पढ़ी लिखी होंगी अत एव स्त्रियों को पढ़ना लिखना अवश्य सीखना चाहिये।

(50.) (179.)" Gaming eithèiwith inanimate or with animated things, let the king exclude. Tholly from his realm: hoth these modes of play cause destruction to princes. (179.) Such play with dice and the like, or by matches betireen rams and cocks, amounts to open theft; and the king must ever be vigilant in suppressing both modes of play. (180.). Gaming with lifeless things is known among men by the name of dyúta; but samáhvaya signifies a match between living creatures. 1 (181.) Let the king punish corporally at discretion both the gamester and the keeper of a gaming-house, whether they play with inanimate or animated things; and inen of the servile class, who wear the string and other marks of the twice-born. (182.) Eren in a former creation as this vice of gaming found a great provoker of enmity: let no sensible man, therefore, addict himself to play, even for his amusement.

मानव धर्ममा "५० (१०८). यूत । (१०८) · द्यूतं समाहयच्चैत्र राजा राष्ट्रानिवारयेत् ॥ राज्यान्तकरगावेतो वो दोषौ पृथिवीक्षिताम् ॥२२॥ और समाहय इनको राना अपने राज्य में नं होने दें ये दोनों राज्य का नाश करनेवाले हैं ॥ २२१ ॥ (१८६) प्रकाशमेतनास्कयं यदे॒वनसमायो । तयानित्यम् प्रत घाते नृपतिर्यत्नवान् भवेत् ॥ २२२ ॥ (१०६) ये दोनों प्रगट चारी हैं इसलिये इन दोनों के नाश का राना यत्न करे ॥ २२ ॥ (१८०) अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमुच्यते ॥ प्राणिभिः क्रियमाणास्तु स विज्ञयः समाय: ॥२॥ (१८०) प्राण रहित (पासे आदि) से दाव लगाके कोड़ा करना चूत कहलाता हे और ग्राण सहित(लाल वुलबुल मेढ़े भैंसे घोड़े इत्या- दि) से दाव लगा के क्रीड़ा करना समाहृय कहलाता है ॥२३॥ (१८१) यूतं समाहयञ्चैव यः कुर्यात्कारयेत वा॥ तान्सर्वन् घातयेदाजा शूद्रांश्च दिनलिङ्गिनः ॥२२४॥ (१८१) द्यूत और समाहय इन दोनों को ना करें और करावे तिम का और ब्राह्मणा 'क्षत्रिय वैश्य के चिन्ह धारण करने वाले शूद्र को राजा नाश करें ॥ २२४ ॥ (१८२) द्यूतमेतत्पुरा कल्प दृष्टं वैरकरम् महत् ॥ तस्मात् द्यूतन्न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान् ॥२२॥ (१८२) यूतवड़ा वैर कराने वाला है यह पूर्वकाल में भीदेखा गयाहै इसलिये बुद्धिमान पुरुषहंसी के अर्थभी इसकासेवन न करे॥२२०॥ .. (१०८) अव तो राजा भी द्यूत और समाहृय करने लगे । (१८२). आश्चर्य है कि ऐसे ऐसे वचन के रहते मी हिन्दू ब्राह्मण पण्डित और राजा लोग जूआ खेलें ॥

(51)
(183.) He who shall drop dirt on the higlivay,
except in case of necessity; shall pay. two panus and
immediately remove the filth.
(184.) Let him; though frequently disappoiuted,
renew his operations, hów, fatigned soever, again an
again; since, fortune always attends the man who, having
begun well, strenuously renews his efforts.
11
(185.) All the ages, called Satya, Tretá Dvápara,
and Kali, depend on the conduct of the king, who is
declared in turn to represent each of those agés.

मानय. धर्ममार (१८३) · समुत्सृजेदात्रमार्ग यस्त्वमेध्यमनापदि ॥ मंद्वी कापीपणो दद्यानमेध्यञ्चाशु विशोधयेत् ॥ २८२ ॥ (१८३) विना आपतकाल के राज मार्ग ( अर्थात् सड़क ( में अपवित्र वस्तु (अर्थात् कूड़ा कर्कट इत्यादि) डाले से दो का पंण दंड देवे और अपविच वस्तु जो डाली है उसे उठा कर शीघ्र राज मार्ग से वाहर ले जावे ॥ ५८२ (१८४) प्रारभतेव कमाणि प्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः ॥ कमाण्यारभमाणं हि पुरुपं मोनिपेवते ॥ ३०० ॥ (१८४) काम करते करते थक जावे ते! फेर भी काम का प्रारंभ करता ही रहे.क्योकि काम करनेवालों की सेवा लक्ष्मी करती है ॥ ३०० (१०५) - कृतं घेतायुगञ्चैव द्वापर कलिरेव च ॥ राजीवृत्तानि सणि राजा हि युगमुच्यते । ३०१ ॥ (१८५) कृत घेता द्वापर कलि ये ही चारों युग हे सो नहीं किन्तु जैसा आचरण राजा करें तैसा युगे होता है (अंधात राना ही युग हैं) ॥ ३० ॥ (१८३) . जे सरकार अंगरेल बहादुर ने इस वचन पर ध्यान धंरा होता तो फिर कोई नगर हिन्दुस्तान में मेला और अपवित्र न रहता ॥ (१८४) अर्थात् काम करने से कभी न घबराव चाहे वह सिद्ध हो चाहे न हो काम करता ही रहे यदि हमारे देशवाले मस वचन के अनुसार चलते और पालम्यी और निस्दामी न हो जाते तो प्रान इस दशा को क्यों पहुंचते ॥ (१८५), अर्थात् जहां जय राना अच्छा है वहीं तव सत युग वर्तता हे। Y (52) (186.) Of geins, pearls, and coral, of iron, of woren cloth, of perfumes, and of liquids, let him (thie Vaisya) Well know the prices, both high and low. (187.) Let him be skilled-likewise in the time and manner of sowing seeds, and in the bad or good qualities of land; let him also perfectly know the correct modes of measuring and weighing. (188.) The excellence or defects of cominodities, the advantages and disadvantages of different regions, the probable gain or loss on vendible goods, and the means of breeding cattle with large augmentation, (189.) Let him know the just wages of servants; ths various dialects of men, the best way of keeping goods, and whatever else belongs to purchase and sale. .

मानव धर्मसार . 28) मणिमुक्तावालानां लोहानान्तान्तवस्य च । 'गन्धानाञ्च रसानाञ्च विद्यादर्घबलाबलम् ॥ ३२६ ॥ (१८६) वैश्य, मणि माती मूंगा लोहा सूत गंध रस इन सभी का देश काल समझ के न्यून अधिक मोल जाने ॥ ३८६ || । (१८०) बीज़ानामुग्निविच्च स्यात्नेच्दोषगुणस्य च ॥ 'मानयोगञ्च जानीयात्तुलायोगांश्च सर्वशः ॥ ३३० ॥ (१८५) खेत का दोष और गुण बीन बोना प्रस्थ द्रोण प्रादि मान योग मासा ताला आदि तुला योग' इन सभों का मानने वाला होवे ।। ३३० ॥ (१८८) सारासारच भाण्डानान्देशानाञ्च गुणागुणान् ।। लाभालाभञ्च पुण्यानाम्पशनाम्परिवर्द्धनम् ॥ ३३९ । (१८८) भागड (अर्थात् -पाच) का सार प्रसार देशों का गुण 1. अगुण बेचने योग्य वस्तुओं का लाभ अलाभ पशुओं का बढ़ना इन सब बातों को जाने ॥ ३१॥ (१८e). भृत्यानाञ्च मृतिम्विद्याभाषाश्च विविधा नृणाम् ।। द्रव्याणां स्थानयोगांश्च क्रयविक्रयमेव च ॥ १२ ॥ (१८८) मजदूरों की मजदूरी मनुष्यों की नाना प्रकार की माया द्रव्यों की स्थिति के उपाय और बेचना मोल लेना इन सब बातों को जाने ॥ ३३२॥ (१८८) यदि हमारे देश के बनिये महाजन दुकान्दारं मनुनी के इन सब वचनों को माने और अपने लड़कों को ये सब बातें और नाना प्रकार की भाषा सिखलावें तो फिर क्यों न धन धान्य से पूर्ण हो जावें परंतु जब उन्हो ने अपने ही धर्म शास्त्र से विरुद्ध काम करना और लड़कों को मूर्ख रखना स्वाकार किया तो फिर विपत और दरिद्र का मुख देखकर क्यों न बिल . : .

( 53
(190.) Pure in body and mind, humbly serving the
three higher classes, mild in speech, never arrogant, ever.
seeking refuge in Brahman principally, he (the 'Sudra.)
may attain the most eminent class
interioman
CHAPTER X:
(191.) . Avoiding all injury to animated beings, vera:
city, abstinence from theft; and from unjust seizure of
property, cleanliness, and command over the bodily
organs, form the .compendious system of duty which
Manu has ordained for the four classes.
minna
CHAPTER XI,
(192.) Killing a Brahman, drinking forbidden liquor,
stealing":
adultery with the wife of a
father, natural or spiritual, and associating with such as
commit those offences, wise legislators, iniist declare to
he crimes in the highest degree,
animais
(193.) False boasting of a high tribe, malignant
information before the king of a criminal whio must suffer
death, and falsely accusing a spirituál preceptor, are
crimes in the second degree, and nearly equal to killing
a Brahman.

मानव धर्ममार (५८०) शुचिरुत्कृष्टशुअपुर्मुटुवागनहङ्गतः । ब्राह्मणस्याप्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते ॥ ३३५ (१६) पवित्रता बड़ों की सेवा कोमल बोलना अहंकार न करना ब्राह्मणों के नित्य प्राश्रय में रहना ये कर्म शूद्रों के उत्तम नाति देने वाले हैं ॥ ५ ॥ । दशम अध्याय ॥ (81) अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ॥ सर्व सामासिक धर्म चानुयये ऽब्रवीन्मनुः ॥ ६३ ॥ (१६१) ... अहिंसा सत्य चोरी न करना शौच इन्द्रियों का रोकना यह संक्षेप धर्म चारों वणी का हे ऐसा मनु जी ने कहा ॥ ३३ ॥ ॥ एकादश अध्याय ॥ (१३) ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः ॥ महाति पातकान्याहुस्संसर्गश्चापि तेस्सह ॥ ५५ ॥ (१०) ब्रह्महत्या मुराप न चारी गुरुपत्नी से संभोग ये चार महापातक हे महापातकी के साथ संसर्ग करना यही यांचगं महापातक है.॥ ५५ ॥ (६३) अनृतञ्च समुत्कर्ष राजगामि च पैशुनम् ॥ गुरोरचालोकनिर्वन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥ ६ ॥ (१३) नीच जाति होके हम बड़ी बात है ऐसा भूठ बोलना राना के समीप (जिम में उसका मरण हो) ऐसा किसी का दोष कहना गुरु से झूठ बोलना ये सब ब्रह्म हत्या के समान हैं. ५६ (१६०) अर्थात् इन कमाँ को. शूट भी करे तो उसे उत्तम जातिवालों के समान मानना चाहिये ।।

No text on this page.

--
श्रीः
दयानन्द मत मूलोच्छेद ॥
साहित्याचार्य पण्डित अम्बिकादत्त व्यास जी
सम मनोहर वसा से भूपित जो बांकीपुर
गवर्मेण्ट कालिम में ता. १६-१९८५
को हुई थी।
खजवितास यन्त्रालय और नत्रियपत्रिका
के कार्य मम्पादक
U
'बाबू साहवप्रसाद सिंह
डारा लिग्निता
PRIXTER & POLISTED BY mul- .ATARINASAN DINDIA
KIRATRAVILAS PRESS, RANKITORE.
'1885.
sull rights rescrizit.
1-1 clition 1000 copics
jorie'. 1. annas
चमचERRENT

No text on this page.

उपक्रम ।
परमेश्वर को माया कैसी अपरम्पार ी अद्भुत
है जिस के तत्त्व का अणु मात्र भी पाण्डित्य किसी
को नहीं है। हम लोग नब लोकदृष्टि ही से संसा-
र की ओर देखते हैं तो उस महामाया को कैसी
विलक्षण महिमा देवपड़ती है। कभी साधारण पु.
मप भी दिगन्त में प्रसिद्द होजाता है। कभी बड़ेर
प्रतापी श्री विद्वानों का भी नाम अस्त होने लगता
है औ कभी मनातनधर्मरूप शार्दूल के ऊपर भी
बंदूकें भरी जाती है ।। देखिये अभी थोड़ा समय
हुया है कि दयानन्द नामका एका पुरुप होगया है
इम में हमारी समझ में दोचार गुगा वहुत अच्छे घे
कि यह पुरुष कुछ नितेन्द्रिय घा-परियमी घा-
दंगोपकार की वहुत वासना मन में रखता घा-
श्री जैमा कुछ समभा या उस ने उपदेश में पीछे
पैर नहीं करता था। पर इस में कोई बात ऐमी
नबो कि हम वतही प्रगंना करें। दम का उप.
देश पालकट माघ- पण्डिस अम्बिकादता व्या.
म---वा. केशवचन्द्र भेन-पयवा बायोकपा
मन्न मैन ऐमा तय ग्रानी नहीं होता था। इस का
-
ran mara

यह न्याय के ग्रन्थ में हैं तब उस का अन्त न होगा [ २..] व्याकरण को पाण्डित्य इतने हीं से प्रगट है कि प. ण्डित अम्बिकादत्त व्यास से इस से संवत १६३७ में काशी में जव शास्ता हुआ था तो क्षण जगो अशुद्ध बोलता था पर जव उस विषय में अपना पच दबा तो व्यास जी के भाषण में एक दम बोला. कि "हां हां आप ने तं विना कहा सो सर्वथा अशु- द्ध है” व्यास जी ने कौमुदी की पङ्क्ति कही तो बोला कि हम कौमुदी को प्रमाण नहीं मानते यो चतुराई से मुख्य शास्तार्य का विषय बदल दिया (ऐसीही युक्तियों से वह अपना विजयघोष इधर उध- र करता था) व्यास जी ने समझा कि जब यह एक विषय में दव चुका तव दूसरे विषय में गया है श्री अब चाहता है कि कौमुदी प्रमाण कि नहीं प्रमाण इस विषय पर शास्त्रार्थ हो उस में दबेगा तो जि- न अनुमानः अथवा युक्तियों से शास्त्रार्थ होगा कदा- चित् कहवैठे कि हम इन्हें भी नहीं मानते क्यों कि इस लिये इस समय इस के धौर्य मे न आना चाहि. ये ।। व्यास जी ने कहा अच्छा मानिये कि हम से एक अशुद्ध हुई पर जो वाद हो रहा है उसी पर चलिये यदि आप से भी दैवात् एक अशुद्धि होजाय- है

[ ३ ]
गी-तो मेरों औ:आप को पटनायगी. वेदान्ताचार्य
वावा मोहनलाल जी प्रभृति जितने सभ्य इकट्ठे थे
सबने स्वीकार किया फिर शास्त्रार्थ आरम्भ हुआ ।
इस.पुरुष का मुख तो अशुद्धि का निधान था साथ
हो - उसने कहा: "ट्रव्या:" व्यास नी ने साथ ही
कहा कि लीजिये इस शब्द के कहने में आप व्यर्थ
पुस्त्व का धारण करते हैं नापुंसक्य स्वीकृत कीजिये
औ
अंशुइ पट गई। इस का सन्यासी बाबा ने खो-
कार किया आगे चले तो:भट "सेवति'. बोले श्री
व्यास जी ने टोका थोड़ी देर में यों ही दो अशुद्धि
उन की और हुई औ व्यास नी चिताते गये तब
भो भीड़ की भीड़ इकट्टी थी उस ने इन का यह
ऊपर का ढकोसम्हा देख कुछ हास्य श्री स्मित किया
वर्तमान भारतजीवन के सेम्पादक वाबूरामकृष्ण व.
र्मा आदि ने उस नगिक तरङ्गको शान्त किया श्री
फिर शास्त्रार्थ के सुनने को उत्कण्ठा : दिखलाई
पर स्वामी जी ऐसा मौका कव छोड़ने वाले थे भट
मख बदल दिया औ बोले कि वाह जी बोलने में
क्या ? बोलने में तो सभी से चुति होजाती है-ऐं'
अरे- हमारे लेख में कोई अशुदि निकाले -वस
नाभो ऐसा धूम धड़के का शास्त्रार्थ इम नहीं करना
*Ulastic car. The's are **
H

[ ४ . चाहते औ झट उठ खड़े भये व्यास जी औ वावृ रामकृष्ण वर्मा ने भी साथ ही कहा कि बहुत अ. च्छा अब आप के लेख में ही अशुदि निकाली नांय- गी। व्यास जी ने समझा कि इन के पुराने ग्रन्थ में अशुद्धि निकालने में कहीं यह न कहैं कि यह हमारा लड़कपन का लिखा है,इस लिये उसी सम- य नवीन एक ग्रन्थ "संस्कृत वाक्य प्रबोध' नामक दयानन्द जौ का बनाया छपा था व्यास जी ने उ. सो में पचीसों अशुद्धियां दिखलाई। और बाबूरामकृष्ण जी नै भूमिका आदि लिखी श्री शीघ्र ही वह ग्रन्थ प्रकाशित हुआ औ. पहले दयानन्द जी को औ पी- छ अन्यान्य आर्यसमाजी तथा उत्साहियों को दिया गया जिस के उत्तर के नाम पाजतक. शत ध्वनि होरही हैं जिस में ये अशुद्धियां दिखलाई गई हैं उ- स ग्रन्थ का नाम "अबोधनिवारग" है इस के देखने से एक बालक भी समझ सक- ता है कि बाबा दयानन्द को सन्धिप्रकरण भी नहीं आता था। अच्छा अब यदि इन्हीं मुण्डी बाबा का न्याय का पाण्डित्य. देखते हैं तो और भी आश्चर्य मालुम होता है औ स्पष्ट प्रगट होता है कि यदि एफ ए बीए के विद्यार्थीलोग भौ किञ्चित् सोचें तो इन के अनुमानों में सैकड़ों दोष निकाल सके हैं इसपर अ- धिक क्या लिखें इसी "पं० अम्बिकादत्तव्यास "नी के लेक्चर के देखने से मालुम होगा। :. यदि माना जाय कि सांख्य योग वेदान्त ही की वड़े पण्डित थे. तो वह भी नहीं; क्यों कि इस का वित्त ईश्वरप्रणिधानप्रणाली का अनभिज्ञ नहीं होसतो औ उस पाण्डित्य : कोः रख कर कौन :ऐसा है नो वेद के मन्त्र से रेल चलाना भो तार में खबर देना निकालें ।। .. कोई कहै कि मीमांसा जानते थे तो भला ऐ- सा कभी होसती है कि स्वयं मीमांसा शास प्रवल युक्ति यों से जिन श्रुतियों को जो अर्थ करता है प्रा. म उसी से उलटे रहै ? . साधारण लोग कहते हैं कि वे वेद अच्छा ना- 'नते थे.भला कहिये तो उन्हें तो यह भी नहीं मा- 'लुम.था कि वेद कहां से कहां तक है। वे कभी क. 'हते थे कि वाम्हण में बहुत अंश लोगों ने बना के मिन्तादिये हैं जो वेद नहीं है फिर कहने लगे कि वाह्मण को हम वेद नहीं मानते पर उपनिषद हैं:- well as kinetic energy. These are J . WE फिर अनेक उपनिषदों से भी निर्वेद हुआ । और भी लोगों ने वेद को पोथी में देखा होगा कि शब्दों के नीचे ऊपर लाल चिन्ह रहता है। यह चिन्ह स्वर का सूचक होता है कि किस शब्द पर औ किस अचर पर किस स्वर से उच्चारण करना चाहिये ये वर श- ब्दों के अर्थ को ऐसा बांध लेते हैं कि वही शब्द दू- सरी व्युत्पत्ति से यदि दूसरे अर्थ में माना जाय तो झट दसरा स्वर होजायगा औ यदि स्वर न बदलें तो अर्थ नहीं बदला जासत्ता ।। पर अवधूत बावा ने समासादि बदल अर्थ तो चाहे सो किया है औ स्वर पर कुछ ध्यान ही न दिया जिसका खण्डन पण्डित गोविन्दराम जी पूरा पूरा करचुके हैं। फिर इन को वेदजता कहा रही ? यदि कोई हठ से कह उठै कि ये कोष के बड़े पण्डित थे तो इस से बढ़कर प्रमाद प्रलाप कुछ न- ही होसता कि जो इतना भी नहीं जानता कि वि स्तर शब्द पुंलिङ्ग है कि स्त्रीलिङ्ग औ विस्तर शब्द का अर्थ शब्दकलाप है कि विछाने का गलीचा ? उसे कोशत कहैं। वे काव्य भली भांति जानते थे यदि कोई यही अडङ्गा लगावै तो यह उनमत्तवचन माना जागा ܕ G [] क्यों कि उन ने अपनी भूमिका के प्रारम्भ में एकठी अनुष्टुप् लिखा सो भी न वना, औं अशुद्धियों से भर गया. क्या काव्य जानने वाले से एक. अनुष्टम् भी न वनेगा? - . भले ही वको कि वे संस्कात शब्द का हिन्दी में अच्छा तरजुमा करसते थे पर क्या "नित्यः" के लि- ये."अोज़ का".श्री. "उपासीरन्केलिये "उपासना करो। लिखने वाला झवी न समझा जायगा ? ऐसा तो जिस ने दो वरम भी. संस्कृत पढ़ा होगा वह न कहेगा । इसी:भरोसे से आप वेद का-तरजु, मा करने लगे घे.? .. :: . अच्छा इसी ताल पर अपने तबले की परंन पूरी करो कि वे सन्यासी अच्छे थे तो यह भी कहने ही को बातें हैं क्यों कि हम लोगों ने स्वयं उन की प्रारम्भ में ऐसा, देवा था कि केवल एक लँगोटी औ सर्वाङ्ग में धूल । पर पीछे हमने लोगों ने डुपट्टे औ चोगे ओढ़ते तथा हाथी दांत की मूठ वाली छड़ी ले चुटीला मुरेठा वांध टहलते देखा था। जैसा ही पहले त्याग वैसा ही पोके संग्रह || । भला यही शङ्ख धुधुवायो कि उन की वोल चाल बड़ी. कोमल धो तो यह कव हो सक्ता है ? जिस स- • Hu Exanee

है
?
[ J
मय राजा शिवप्रसाद औ दयानन्द जी से प्रश्नोत्तर
होते थे हम लोगों ने स्वयं देखा था कि राजा साहब
की ओर से परस नसता से भर शनिवेदन नामक ले.
ख छपा था औ इन की ओर से सहसों गालियों से
भरा भमोच्छेद नामक लेख छपा था क्या यही भले
आदमी का काम
यदि इसी पर तान तोड़ो कि उनमें बड़ी चतु-
राई से अनेक मतों का खण्डन कर सत्यार्थप्रकाश
ग्रन्थ बनाया है श्री इसी पर हम बलिहारी हैं ।
तो भला कही तो उस में कौन सा नया काम कि-
या है ? आपुस में मतों का विवाद प्रायः रहताही
इस कारण एक मत टूसरे मत पर आक्षेप करते
ही रहते हैं इन्हीं आक्षेपों को एकत्र कर श्री कुछ पू.
बंपर का संगठन कर कुछ छाप देना कहिये कोन ब-.
ड़ा अपूर्व काम हुआ ? 'गुरु परीक्षा, राम परीक्षा
'सत मतनिरूपण, आदि ग्रन्थों में पादरियों ने हम
लोगों के राम कृष्णादि पर बड़े बड़े आक्षेष दिये
हैं वेदान्तादि दर्शनों पर पादरी नीलकण्ठ शास्त्री
में जितनी युक्तियों से प्रति बाद किया है उन से
कौन नवीन वात खामी जी ने निकालौ ? पर उस
से भी प्रौढ़ भाषण में कम ही रहे जैन बौद्धादि का
d

? तव [] खण्डन आज तक क्या नहीं किया गया है पिष्टपेषण में अपूर्वता क्या ? उस ग्रन्थ को हम लो- गं आद्यन्तं देख गये हैं सूची में तो नान पड़ता हैं कि बड़े बड़े खण्डन मण्डन हैं पर आगे चल के देखते हैं तो मन मानें प्रश्न उत्तर । तनिक गम्भी- भाव से सोचिये तो 'किं केन लग्नम् । भला दे. खिये तो आपने नानक नो के मत खण्डन में लि- खा है वे संस्कृत के पण्डित नहीं थे क्यों कि निर्भय ले ठिकाने निर्भी लिखा है औ.धनाब्य औ रईस नहीं थे । कहिये तो सनातन आर्य गण ! इस से उन के उपदेश में क्या दोष पाया ? स्वामी जी 'चं पनी ओर तो देखते इसी ग्रन्थ की सूची में जहां मुहं मे संस्कृतं निकाला कि बस लीजिये वोल उठे “ईश्वरभिन्नस्याः" कहिये आप इसी भरोसे नान. काजी को अपण्डित कहते हैं ? चाय से देखिये ती उन ने भाषा में संस्क त का अपभ्रंश शब्द कहा है वह संस्कृत शुद्ध न हो तो विशेष क्षति नहीं पर था. प तो अपने को पंण्डित लगा कर संस्क त छांटने ल- गे हैं आप को क्या हुआ ? उन को आप ने लिखा • है धनी श्री रईस न घे, यह इस मत खण्डन मंडन में स्वामी जी की नयी रीति पाते हैं कि मत की [ १०.] 7 समालोचना में सताचार्य के मुख धन आदि की भी समालोचना कर जाते हैं क्या स्वामी जी की सम- झ में रईस वावू लोग क हैं. सोई अखण्डनीय है पर शोक है कि इस पर भी चाप स्थिर नहीं है ऐ. सा ही होता तो काशी के प्रसिद्ध रईस तथा धनि. क राजा शिवप्रसादसाहब से क्यों कुस्ती लड़े थे ? विशेष क्या लिखें ? सूक्ष्स वुद्विवाले तो इन मर्मों को आप समझ जायगे श्री जिन की विशाल बुद्धि है वे तो खामी जी का विशाल स्वरूप औ सत्यार्थ- प्रकाश की विशाल जिल्द देव सोहित हो ही जाय। गे। इस का भी आदि से अन्त तक पूरा पुरा खण्ड- न शुद्ध हिन्दी भाषा में कियागया है जिस से लोगों के अनेक अम दूर होंगे अभी उस के छपने का प्रब- घ. होरहा है। यदि कोई कहै कि उन के मत में महाराणा साहव उदयपुर प्रभृति अच्छे अच्छे मान्य लोग श्वे तो समकक्षा फेर है इस विषय पर भारतसुदशा- प्रवर्तक ने एक वेद सोकझाक से ऐसा लिखा था कि सर्वसाधारण लोगों को एकाएको यही विदित हो कि श्रीयुत महाराणा साहव बहादुर उदयपुर सौ नवीन धार्यसमाज में मिलगये तथा दयानन्द । ११ ] जी का जैसा ढांचा है कि जाति भेदं कुछ नहीं, औ मूर्तिपूजन कुछ नहौं तीर्थयात्रा कुछ नहींनी श्रादत- । पं कुछ नहीं वैसे ही हमारे जीवन धन हिन्दुपति. पातशाह महाराणा साहब का ढांचा भी बदल गया पर यह लेख देखते ही सोहिलाचार्य श्री पण्डिन अस्विकोदत्त व्यास:सम्पादित वैधावपबिकासे नर- हा गया औ इस विपंय के निर्णय के अभिप्राय से उस ने निज १ भाग ७ सङ्ख्या में (मि० वैशाख शु. ११ संवत १९४०) एक साश्चर्यखेदशीर्षक प्रस्ताव लि- स्वा पर उस पर भारतमित्र में पूर्णतया. विना समझी कुछ, प्रतिवाद अपने ३१ मार्च ८३ के पत्र में किया. पर जब वैपावपत्रिका में निन संख्या ८ में उसका साङ्गोपाङ्ग सन्तोष कर यों लिखा कि (मित्र भारत- मित्र) "यह पाप की आर्यता है कि वैष्णवपत्रिका के भ्रमनिवार- लिये पाप ने श्रम किया पर प्रियं ! तत्वं तो यह है कि दयानन्द सरस्वती देगदेशान्तर में प्रतिमा पूजन के खरडकों में प्रसिद है, जब किसी सामान्य को भी यह सुनपड़ता कि दया। नन्द भनक गगर में गये तो इतने ही में लोग समझ लेने है कियां न सरस्वती मूर्तिपूजन के विरुद्ध धूम मदाने होंगे और यों ही साधारण लोगों को जाब विदित होता है कि मुकामुक दयानन्द को शिष्य होगये तो लोग समझ जाते हैं कि ण [ १२ ] - अवश्य ये भी मूर्ति निन्दक होगये । कात एय जैम दयानन्द स्वा. ज्य वैमे ही ये भो आर्यसनातग धर्म यो ल्याच्य हुए। तब कहिये यदि सर्वसाधारण को शैवाविरुद्ध महविषा व बीयुरा महाराणा साहब बहादुर या दयानन्द का शिष्य होना विदित किया गया ( और यह स्पष्ट न कहा गया कि दयानन्द ने अपने बाने का कोई उपदेश नहीं किया और मूर्ति पूजनादि का प्रान्दो लन नहीं किया) तो सुनते ही सर्वसाधारण के मन में क्या बात भावेगी० जो मुग्ध लोग दयानन्द के मूतिसम्बन्धी कपोलक ल्पित पर विश्यब्ध हो रहे हैं उनको कैसा झूठा विश्वास होगा कि एक बड़े महाराज भी हमारी ही मण्डली. के हुए और जो सनातन सद्धर्मावत म्बी हैं उनको खेद भी कैसा होगा कि एक महाराजाधिराज हाथ से निकम्त गये । इसन्तिये " मर्यादा के बाहर क्या समझ के प्रतिष्ठा की गई" इस प्रश्न के उपक्रम से सर्वसाधारण को ठीक कारण का निर्णय करा देना यइ. सन लोगों का प्रधान कर्म है जिन को सर्वसाधारण का धैर्विमन्त क विक्षोभ सह्य नहीं है ॥ दयानन्द सरस्वती किसी भाषा वा शास्त्र का पूरा विद्या- न नहीं है इसका आप भी अई स्वीकार करते हैं । पर भा. सु० प्र० ने अपने लेख से इन्हें विहान् मल का सर्वसाधारण को धोखा देना चाहा । तो कहिये एक साधारण बात हो तो खेद न भौ हो पर यदि एक पत्र सम्पादक [जिसका मन्तव्य सहसों मन्तव्यों को अपना अनुयायी बनाता है ] ऐसे छला. बिन लेख लिखै तो क्या खेद न हो ? । वैष्णवपत्रिका सर्वयकहती है कि महाराजों के फसानुमेय । -- थेष में वैष्णव और प्रन्यों को भी स्वीक्कत है । बस [ १३ ] प्रारम्भ होते है. तम महाराजा साहब ने गौरव की तो इसे नैतिक निदर्शन से और भी वृद्धि होती है। आप ध्यान देके देखिये गौरव पर इस पत्रिका का भी प्राक्षेप नहीं है। मर्यादा से बाहर प्रतिष्ठा.भई सो पाप को स्वीकारती है प्राप निज महान्त में लिखते हैं किसहन शीलतादि शब्दों से वैष्णवप- त्रिका ने भी दयान्द जीका वास्तविक स्वरूपही झनकाया शेष में वैष्णवपत्रिका.पाप के अपक्षपात कथन पर अधिक सन्तु ए होती है और प्रायोर्वाद देती है कि प्राप चिरनोवी रहैं. और मिन कर्तव्य को न भूलें ॥ प्रिय पाठकगण ! यदि आप सुनें कि अमुक पुरुष एके 'ग. वैये से शिक्षा लेता तथा उपदिष्ट होता है तो आप अवश्य स. मझेंगे कि वह गाना सौरखता होगा परन प्राप को किसी कार विदितं होगा कि में गवैये ने कुछ गणित सिखता- या तबसी पापे का दूसरा भाव होगा । सो अव पाप निश्चय समझिये कि जैसे दयानन्द सरस्वती म्लेच्छ मन देशों में 3. कू छल को "दुरगा मुरगानो चाहै सो बकते थे वैसे उद. यपुर में बनने नहीं वका और मूर्ति सम्बन्धी विषय छोड़े पौरर राजधर्मादि कहे और उपदेश दिये। तो मूर्ति नण्डक अथवा पण्डिसम्मन्य दयानन्द को नहीं पर नोतिधर्मोपदेशक दयान- न्द को योयुत ने सन्मान दिया और हम आप भी अनेक ध. न्यवाद देते हैं:" ॥: . ::- तव यद्यपि इतना सुन भारतमित्रने स्वीकारकिया पर कुछ काल के अनन्तर आर्यसमाज के प्रधान बाबू समर्थदाननी से न रहोगया औ उन में दयानन्द नी [ १४ ] के गुणों का पुनः चर्वितचर्वगा गान करके वैषणवप- त्रिका पर आक्षेप किया तव यद्यपि वैषणवपत्रिका के पूर्व ही लेख से यह वात स्पष्ट थी पर अनुग्रह कर के वै. प. ने फिर अपनी उसी वर्ष की १०संख्या में "चिरंजीव चिरंजीव” इस शीर्षक लेख में- इदमीदृगऽनौ दृगाशय: प्रसभं वक्त मुपक्रमेत कः " 'बाब समर्थ दान जी ! पापने केवल वैष्णव पत्रिका के गि- वेदनार्थ अति परिश्रम से भारतमित्र में दयानन्दजी के गुणा. नुवाद. गाये हैं आप धन्च हैं । यह पाप के ऊपर श्रीद. यानन्द सरस्वती. ही के पूरे अनुग्रह का फल विदिव होता है कि आप भी परिश्रमी और परोपकारी हो चले। अच्छा आयुष्मन् ! तनिक जी लगाकर सुनिये ! मानिये कि किसी श्रीमान के यहां एक पुरुष रात को हारपान का काम करता है.पर दोपहर को वही प्रति दिन पाक मी यनाता है । देवात् किसी दिन प्रमाद से हारपाल हार, पर सो गया तो उस द्वारपाल को दण्ड हुवा पर उसी दिन.. उसने पाक क्रिया में बहुत कौशल दिखनाया सो उस पातकर्ता की बहुत प्रशं. सा हुई और पारितोषिक मिला। देखिये यहां एक ही पुरुष दो काम से दो व्यक्ति की भांति व्यवहत होता है अघोत् यद्यपि वह एक ही है पर पाक के गुणों से हारपाल गुणी नहीं कहता. सतापौर द्वारपाल के दोषों में पाककर्ता दोषो न- हौं ठहराया जा सकता। क्योंकि पाककता और द्वारपाल ये दो पुरुष समझे जाते हैं । ( जासिम नौरिम और मिसूर - -- 1 - [-१५] नौरिम् दो. समभा के अमृतबाजारपत्रिका ने तम्या सेख लि. है: :सो कदाचित् पाप ने देखा हो:) | .:.'' -ऐसेही इन दिनों दयानन्द भी दो हैं एक नोस्तियों को ११ विवाह तक करना. नाति-भेद कुछ,नहीं सब एक में हिल- मिल धमचीत कर देना, शूद्रों को ( करते हैं कि शूद्र काम अर्थ है महा मूर्ख ,जी.पढ़-लिख न सके.) वेद पढ़ाना, देवमूर्तियों का पशन, न करना, पुराणादि गप्प है, मन्दिर तीर्थादि ब्राह्म णों का छन है, वेद में लिखा है कि रेमा चलाना तार चलाना" इत्यादि कोलाहल मचाते हैं और जो वेदभाव के नाम में महा. अशुद्द गपशप लिख कर पांच' 'संधार में एक सवार बनते और जिनके लिये दयानन्द मुखपेटिका, प्रबोधनिवारण, महामो विद्रावणादि पनेक गुन्य बने हैं। .:. ::: :: दूसरे दयानन्द वो हैं जो एक उत्साही, परियमी, सहन- शीत, प्रसन्नवदन, ऐक्यवईनतत्पर, प्रस्त्रैण, राजनीति आदि के उपदेशक, वैदिक चर्चा के जीर्णडात्कारक तथा अन्यन्त. उद्योगी और साहसी हैं। श्रीयुत शुमोदकं समर्थदान नौ! चाहै वैष्णवपंत्रिका को अथवा कोई भी प्रार्य सनातनधर्मावलम्बी हो पर प्रथम दयार नन्द के पाचरण मे तो कोई भी प्रमन न होगा क्योंकि इस दयानन्द ने “येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुपीभवेत्" यर मूल गन्न थामा है, एक स्थान में निरुत्तर होना तो दूसरे स्थान में . कोलाहल करना यह रावणी सम्प्रदाय पकड़ी है, प्रशुद्ध लिवर संस्कृत भाषा का नाश करना पारम्भ किया है, चिट्ठी सर्टिफि- के ट् दिनमा २ मुग्धों को ठगना अपना प्रधान कृत्य ममझा सभ्य पुरुषों के साथ भी असभ्यता का भाषण करनाही सांगत स्थानापन्न किया है । इत्यादि यदि श्रीयुत कुमार श्रीकणप्रसव. मेन महोदय प्रथवा श्रीयुत राममित्र शास्त्री महाशय ऐसे सभ्य पुरुष मध्यस्थ हों तो हम स्वयं . पत्र द्वारा प्रथवा साक्षात् बड़े । हर्ष के साथ इस दयानन्द की शङ्कात्रों के समाधान करने को उद्यत हैं।" इत्यादिबहुत दिखलाया जिसे पढ़ उन ने भी गरुड़ मुद्रा ही की ।। उदयपुर के राजकीय पत्र " सज्ज- न कीर्ति सुधाकर सुधाकर" में स्वयं यह. कई बार झलका- या है कि सरखती ने यहां राजधर्म भाषोन्नति पा- दि छोड़ और कुछ न कहा और उसी वर्ष महाराज बहादुर के जलझूलनी एकादशौं आदि का अति वि स्तार से बर्णन किया औ मिति १७-४-८३ में लिखा कि “ जो मूर्ति को माने ही नौं उन के नास्तिक होने में क्या बाधक रहा' ! इल्यो दि ॥ अ- धिक क्या इस छोटे से विषय पर लिखा जाय श्री महाराणा साहब ने जो स्वामीजी को पत्र लिखा उस के ऊपर भी निज पूजनीय मूर्ति का स्मरण लिखा “श्री मदेक लिङ्गेश्वरी जयति ” (भा मि. ताः १० मई ८३ देखिये ) फलतः यही समझ लीजिये कि समुद्र मूठी में नहीं छिपसंकता जिसे सन्देह हो अ- बही निर्णय करले कि उदयपुर से मूर्ति पूजादि उ. ठादिया गया कि नहीं। .' ..

? भया प्यारे यदि कोई यही ढोल वजावे कि हम ने दयानन्द दिग्विजय नाम ग्रन्य देवा अब हम और कुछनहीं मुनना चाहते वस इ.सी पर कुर्वान हैं तो इस काभी वृत्तान्त सुनिये पर इस पर कुछ कहते हमें बड़ा हास्य होता है कि पूर्व में जिस की विद्या का ऐसा चरित कह आये हैं उस पुरुष का दिग्विजयो हो- ने का जिन शिष्यों ने घण्टा घोष किया औ नगार- रखाना. खोल के वैठ गये वे भी दाल भात खाने वाले दो ही हाथ पैर के मनुष्य हैं कि कोई दिव्यभोगो चतुर्भ जी मूर्ति हैं ? हम क्या इस विषय पर लिखें औ क्या न लिखें ? यह उन आर्य समाजियों का प्रत्य- क्ष आंख में धूल डालना औ विचारे अल्पज्ञ लोगों को वञ्चित करना है। इस ग्रन्थ को देख दयानन्द जी.के आडम्बर के ज्ञाता लोग तो अवश्य ही हंसें- गे पर हां विचारे थोड़ी बुद्धि के ग्राम्य जन अथवा केवल अगरेजी फ़ारसी के अभ्यास से निज धर्म न जान ने के कारण जिन को वुहि पहले ही से कबड्- डी खेलती है श्री स्नान पूजा आचार आदि से गला छुड़ाना चाहती है वे सनातन मर्यादा के अविश्वा. सौ लोग पाश्चर्यपूर्वक प्रसन्न होंगे । हम बघार्थ- भाव से भी कहेंगे तो नवीन आर्यसमानियों को

Manav Dharmsar Adhyay-i

Author
Muni, Kapil, Babu Sah Prasad Singh
Title
Manav Dharmsar Adhyay-i
File name
Manav Dharmsar Adhyay-i
Text
OCR done
Citation
1891
Published
2011/03
Publisher
Calcutta., Ramnarayanpal
Language
Sanskrit
Pages
118
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550799
Barcode
4990010031603.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
sD8vEHIR5gF
Download PDF

Manav Dharmsar Adhyay-i