Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Swadhyay Mala Bhag 1

Jain,ratan Kumar · 2011/03

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अहम
भी सम्यग् ज्ञान प्रचारक गडल का तृतीय पुष्प
स्वाध्याय-माला
(प्रथम भाग)
सम्पादक
रत्न कुमार जैन रत्नेश'
साहित्यरता, धर्मशास्त्रो
प्रकाशक
थी सम्पग ज्ञान प्रचारक महल, जोधपुर ।
र सम्पत् ।
प्रथम बार
}
रामूल्य
२५७३
१०००
US

- प्रशन- मनो श्री सम्पग मान प्रचारक मडरा, जोधपुर - १६७ श्री राधा कृष्ण प्रेस, जोधपुर । निवेदन श्री सम्यग ज्ञान प्रचारक मडश का पीजारोपण वाचाय भी रलचंद शताब्दी महोत्सव पर भोपालगढ़ में हुपा था, विधिवत् स्थापना पूज्य श्री इस्तीममजी म० मा० क जोधपुर चातुर्मास में हुई । चातुर्मास में ही विशिष्ट व्यक्तियों के परामर्श से महल का विधान पनाया गया और कार्य प्रारंभ कर दिया गया जैमा कि सबको ज्ञात ही है। फिलहाल महल का माफिम लोधपुर में है। महल को स्थापित हुप अभी केवल एक वर्ष हुआ है। इस अल्प अवधि में ही महल ने जो प्रगति की है. वह पाठकों के समक्ष ही है। मडल के विविध उद्देश्यों में स्थान पर यथासमय स्वाध्याय सघ कायम करना और प्राची1 7 साहित्य की पोज कर उनका समक्ष करना मी प्रमुस उद्देश्य है । माल ने अपने सहे. श्यानुसार जोधपुर म स्वाध्याय मघ और धार्मिक शिक्षण की ध्यवस्था की है। इस तरह की प्रवृत्ति उसको घरावर चालू है। स्वाध्याय सघ की स्थापना के साथ २ महल कोपाध्याय प्रेलिया के लिये एक प्रारमिक प्रथ निर्माण करना भी आवश्यक प्रतीत हा। जिमको पुत्ति धरने के लिये यह स्वाध्याय गाजा का प्रथम पुन पाठकों के समक्ष रपया जा रहा है। इसमें मगृहीत श्री वीर सिास्तव और गौतम-कुजक दोनों ही प्रकरण अप्रका शित है। ये मात्र हस्तलिखित टम्या के साथ ही पलव्य होछे है। अन इनके प्रकाशन मे महज के उपरोन्क दोनों तद्देश्यों की पाशिक पूर्ति हो जाती है।

उपरोक्त दोनों प्रकरण में श्रीगज्नैनाचार्य पूज्य श्री हरता
मलजी म.सा. की कृपा से प्राप्त हुए हैं। महापूज्य ।।
का हृदय से आभार मानता है।
महल की प्रवृत्ति साम्प्रदायिकता मे दुर है। उसका काय
क्षेत्र विस्तृत पैमाने पर है। इसके उद्देश्य चतुर्मुखी हैं। जिन
महान उद्देश्यों को लेकर मंडल ने अपनी प्रवृत्ति पासू की, मारा
है समाज रसको उपयोगी समम पर अपायेगा| मटना को
समाग का सहयोग परावर मिलता रहा तो वह भापती मधि-
काधिक सेवा करने में तत्पर हो सकेगा । सुनपु किं पहुना ।
मपदीय
रन्द्रनाथ मोदी
ऋपमराजवट
BALLB
BALL.
प्रेसीडेट
सेकेट्रो

प्रामुख
यिभ्य के तमाम धर्मा ने स्वाध्याय को जीपा में प्रमुख
स्थान दिया है। जैन प्रयों में तो उसका पिण्द पणा स्या
स्थान पर मिलना ही है, लेकिन गीता, पुराण, स्मृति और
उपनिषदों में भी स्वाध्याय का विवेचन अधिक मात्रा में किया
गया है। स्वाध्याय जीधन का प्रमुग्न अङ्ग है। जीपन को
उन्नत धनाने में स्वाध्याय का म्यान पहुत ऊँचाई। भाइये
श्रय हम पद देखें कि स्वाध्याय क्या है?
स्वाध्याय क्या है ?-स्थाध्याय शुन्द के मामा यता दो
-अ दिये जाते हैं-१ स्वय अध्ययनम्-अर्थात् अपने श्राप दूसरों
की सहायता लिये बिना ही अध्ययन करना । स्थय ही
विचार, चिन्तन और मनन द्वारा उपस्थित समस्याओं को
समझना और उ सुलझाना।
२ स्यस्यारमोऽध्ययनम्-अर्थात् अपने आपका अध्यया
करना । आत्मचि तन द्वारा हृदय के अशुभ विचारो को दूर
करना और शुभ विचारों को पढ़ाना । जैन धर्म में इसे माय
अध्ययन के नाम से कहा गया है। मात्र अध्ययन का अर्थ
अनुयोग द्वार सूत्र में 'अग्म पसाययण' किया गया है । अर्थात्
में कौन हूँ? मरे या गुण ह' मुझे क्या करना चाहिये ? क्या

नहीं? यह जानना और उसके साथ अपने प्रापको उस
व्यापार में प्रवृत्त करना माघ अध्ययन
उपरोक्त दोनों तरह के स्वाध्याय मिलकर ही पूर्ण स्वाध्याय
को बनाते हैं। एक होने से स्वायाय भी लगडा हो जाता
है । श्री उत्तराध्ययन सूत्र में साधु की गत्रि-चर्या
एताते हुए कहा गया है-
पढ़म पारिसि सज्माय, पीय झाण झियायई ।
तइयाए निमोक्ख तु, चउत्थी भुजोधि सभाय ॥
अर्थात्-पहली पोरसी में स्वाध्याय, दूमरी में ध्यान,
तीसरी में निद्रा-त्याग और चौयी पारसी में फिर स्वाध्याय
करना चाहिये।
यहा दोधार स्वाध्याय शब्द का होना उपरोक्त दोनों ही तरह के
स्थाध्याय को सूचित करता है। दोनों ही जीधन में परमावश्यक
। तो अय हम यह कहें कि सदनों का पाचन कर अपनी
आध्यात्मिक शारीरिक, सामाजिक, आथिक और राजीतिक
सभी समस्याओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार मनन और वितन
पर प्रशस्त माग का पता लगाना और उसीका अवलम्बन लेना
स्वाध्याय है।
वचन किसी धम प्रथ के घोडी देर तक पने उलटने से
ही म्याध्याय नहीं हो जाता। ऐमे स्वाध्याय से कोई विशेष
लाभ नहीं हो सकता। झार प्राप्ति के लिये तो ध्यान पूर्वक
म्याध्याय करना चाहिए । म्याध्याय का अर्थ है अपनी विचार
शक्ति का प्रयल कर अपनी स्वतत्र प्रतिभा से प्राभ्य तर और

बाह्य समस्याओं को सुलझाना-हल करना । दूसरों के सहारे से मनुष्य सय तक नासानी से नहीं पहुंच सकता। क्योंकि विचार भिन्नता होने से एक शास्त्र दूसरे शास्त्र का खण्डन (प्रतिवाद ) करता है, एक की धात दूसरे से मेल नहीं पाती। ऐसी हालत में यदि मनुष्य में विधेकपूर्ण विचार शक्ति नहीं हुई- सत्यासत्य का निर्णय करने योग्य घुद्धि न हुई और केवल अध श्रद्धा के बल पर ही अपने पथ पर चलना गया तो धागे जाकर यह अधिकार में गिरे विमानहीं रह सकता। जिससे निकलना फिर दुरूह हो जाता है। अतः यह नहीं मूल नाना चाहिए कि स्याध्याय में अपनी विचार शक्ति को सयल बनाने की सबसे पहली जरूरत है। जैसे २ अपनी विचार शक्ति यढ़ती जायगी, हमारी आत्म भावना मजबूत होती नायगी और हमें स्याध्याय का भी मधुर आनन्द प्राता जायगा। कितु यह ध्यान रहे कि अपनी विचार-शक्ति पुतर्क रूप न हो। पोंकि शास्त्रकार के दृष्टिकोण को अनुमरण करने पाली विचारणाही सस्य को मात करती है, न कि पुतक। विचार शक्ति कैसे बढ़ायें-अप प्रश्न यह पाता है कि विचार शक्ति कैसे पढाइमाय । विचार शक्ति को बढाने के लिये चितन और मनन की जरूरत होती है। इसको अधिक स्पष्ट करन के लिए यों कहें-मान लीजिये आपने मेरे सूई चुम दी । सुई चुमाने से मुझे तकलीफ हुई। इमसे थापने विचार किया कि सूर चुभाने से जप दूसरे की तकलीफ होती है तो अगर मैं मेरे ही घुमाऊँ, तय मुझे भी तकलीफ होगी ही। इससे भागे जय आपने अपना चिन्तन यढाया और यह जानना चाहा कि ऐमा

1
क्यों होता है तो फिर आपको मननाद्वारा यह मालूम होगा
'कि आत्मासयकी समान है। सय दुव से घबराते हैं। सुत्र
चाहते हैं। इतना विचार करने पर फिर भापको प्रश्न होगा
कि-आत्मा दुखि से घराता क्यों ? और सुख को चाहता
पयों ? आप अपनी मनाशचि बढाते जाइये। आपको मालूम
होगा भात्माचा स्वभाव दुःख से छुटकारा पाना और सुखको
प्राप्त करना है। इसलिये स्वाभाविक ही आत्मा की प्रवृत्ति सुख
की ओर होती है। जान धूझ कर कोई भाग में गिरना नहीं
चाहता। यहा तक जय श्राप पहुच गए, तब फिर आप यह
सोचेंगे कि यह सुख कौरसा है? क्या यही भीतिक सुख, जिसे
आत्मा पाना चाहता है या और कोई दूसरा इस तरह क्रमश
आप अपनी चितन शक्ति यढ़ाते जायेंगें तो विचार शक्ति स्वतः
उसके पीछे २ पढती जायगी। चितन के पीछे विचार तो लगा
ही हुआ है। स्वाध्यायी का तो वि तन और मनन को अपने
हाथों में रखन चाहिए । विचार तो उनका कठपुतली है। यह
तो स्वतः उनके पीछे २ चलतीहायगी। यह तो हुई अपनी
पात । लेकिन अब यह देखें किशान क्या कहत है?
स्वाध्याय की आवश्यकता--शास्त्रों ने स्वाध्याय को
जीवनोन्नति का प्रधान साधन माना है। जिस प्रकार यिना पुछ
साये पिये शरीर की भूख नहीं मिटाई जा सकती। उसी प्रकार
बुद्धि की भून भी स्वाध्याय के यिना मिटाई नहीं जा सकती।
पाहार के अभाव में दर का जो दुर्गति होती हे यही दुगति
स्थाध्याय के प्रभार में बुद्धि की होती है। इसलिए हमारे दनिक
जीवन में सम्माहित्य का प्रयया उनादी धारश्यक है

जितना किशरीर को कायम रखने के लिये भोजन । जैनधर्म
में स्वाध्याय को भी एक प्रकार की तपस्या कहा गया है।
उपवास आदि व्रत जहा पाह्य तप में गिने गये है वहा स्थाध्याय
को अतरग तप माना गया है। गीता ने भी इसे तप रूप में
स्वीकार किया है। देखिये-
'स्थाध्यायाभ्यसन वैध धाग्मय तप, उच्यते ।'
गीता २-५
अर्थात्-स्थाध्याय करना पाणी का तप है।
स्वाध्याय का महत्व बताते हुए जैन शान करता है-
सज्झारण नाणावरगिस्त कम्म पवेई
अर्थात्-स्वाध्याय से ज्ञान का अपरोधक ज्ञानापरणीय
फर्म का नाश होता है। सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होती है
"और भात में जीवन के चरम लक्ष्य शुद्ध बुद्ध परमात्मा का
साक्षात्कार होता है । देखिये ध्यास भाष्य में भी लिखा है-
-
स्वाध्याय योगमासीत योगात्स्थाध्याय मामनेस् ।
स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते ।।
योग-१२८ व्यासभाष्य
अर्थात्-स्वाध्याय से योग की उपासना करे और योग से
"स्वाध्याय का अभ्यास करे। स्याध्याय और योग की सम्पधिले
परमात्मा मासा

( सत्पुरुषों के वियोग में उनकी पाणी ही उनसे साक्षात्कार कराने में समर्थ हो सकती है। स्वाध्याय में ही यह ताकत रही हुई है कि पद परोक्ष में रखे हुए महापुरुषों का भी साक्षात्कार करावे। अगर यह ताकत स्वाध्याय में नहीं होती तो भाज दुनिया में ऐसे पुरुष नहीं दिखाई देते, जो महायीर, कृष्ण और घुद्ध के जीयन पर मुग्ध हो अपना मर्यस्थ समपण कर दें। हमने स्वयं तो युद्ध पा महापीर को प्रत्यक्ष देपे नहीं हैं। फिर भी उनकी वाणी पर और उसके मादर्श जीयन पर चलने वाले आज लाखों पुरुष हैं। यह स्पाध्याय का ही परिणाम है जो हजारों साल पीत जार पर भी उहें भूलने नहीं देता। जीवन में स्वाध्याय का स्थान-गृहस्थ के प्रतिदिन करने योग्य छदयातों में स्थाध्याय का यातों में स्थाध्याय का तीसरा स्थान है। कहा भी है- - देवार्चा गुरु शुभपा स्वाध्याय सयमस्तप । दान चेति गृहस्थाना, पट कर्माणि दिने दिन । अर्थात्-देष-स्मरण, २ गुरु सेवा, ३ स्थाध्याय, ४ सपमा ५ तप और ६ दान । ये गृहस्थ के प्रतिदिन करो योग्य कर्तव्य हैं। अतः स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए। क्योंकि स्वाध्याय ही समाज में जागृति की लहर उत्पन्न करता है, और स्थाध्याय ही धर्म स्थानोंका जीवन चिह है। स्वाध्याय दी उदासीन समाज में कतव्य बुद्धि का नय चैत य सचारित करने पाला है, भक्ति के अंग को बढ़ाने वाला है और तीर्थकर जैसे उच्च पद की प्राप्ति कराने पाता है। स्वाध्याय ही गुरुजनों के उपदेश

और शानियों के शान को स्मृति में रखने का प्रधान साधन है।
इसीलिये श्रुति में कहा है-
स्वाध्यायामा प्रमद
अर्थान-स्वाध्याय करने में भूल मत करो। श्रुतिया तो
यहा तक कहती है कि-
तदहरव्राह्मणोभिवति यददः स्वाध्याय नाघीते ।
तस्मात् स्वाध्यायोऽध्येतव्य ।
अर्थात्-जिस दिन स्वा याय नहीं करता उसी दिन ब्राह्मण
अत्राह्मण हा जाता है। श्रत स्वाध्याय नित्य प्रति करना चाहिए।
नीति में भी कहा है-
अन त सशयोच्छेदि, परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्य लोचा शास्त्र , यस्य नास्त्य घ एप स ।
अर्थात्-अन
-अन त सदेहों का नाश करने घाला और परोक्ष
में रहे हुए पदार्थों को दिखाने पाला शास्त्र ही सपका लोचा
नेत्र हैं। इसके अभाव में यह अधा है। उपरोक्त शास्त्र पवन
हमें आदेश करते हैं कि स्वाध्याय नित्य करना चाहिए । इसमें
प्रमाद करना अपने जीवन को नीचे गिराना है।
स्वाध्याय और जैनसमाज-उपरोक्त स्थाध्याय की चाय
श्यक्ता और महत्व को समझ कर जर हम हमारे समाज की
और पफ नजर उठा कर देपते हैं तो स्वाध्याय का एक दम
।

सत्पुरुषों के वियोग में उनकी पाणी दी उनसे साक्षात्कार कराने में समर्थ हो सकती है। स्वाध्याय में ही यह ताफत रही हुई है कि यह परोक्ष में रखे हुए महापुरुषों का मी साक्षात्कार पराये। अगर यह ताक्त स्वाध्याय में नहीं होती तो भाज दुनिया में ऐसे पुरुष नहीं दिपाई देते, जो महाधीर, कृष्ण और घुद्ध के जीवन पर मुग्ध हो अपना मर्यस्य समपण कर दें। हमने स्थर्य तो युद्ध या महापौर को प्रत्यक्ष देणे नहीं है। फिर भी उनकी पाणी पर और उनके आदर्श जीवन पर घलने पाले याज लाखो पुरुष है। यह म्याध्याय का ही परिणाम है जो हजारों साल बीत जाने पर मी हें भूलने नहीं देता। जीवन में स्ना याय का स्थान.--गृहस्थ के प्रतिदिन परने योग्य छठ पातों में स्वाध्याय का तीसरा स्थान है। कहा देयार्चा गुरु शुश्रूषा स्वाध्याय सयमस्तप । दान चेति गृहस्थाना पट कर्माणि दिने दिने । अर्थात्-देष-स्मरण, २ गुरु सेवा, ३ स्थाध्याय, ४ सयम, ५ तप और दान । ये गृहस्थ के प्रतिदिन करने योग्य पर्तव्य है। अतः स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए। पोंकि स्वाध्याय ही समाज में जागृति की लहर उत्पन्न करता है, और म्याध्याय ही धर्म स्थानोंका जीधन चिह। स्वाध्याय ही उदासीन समाज में फ्र्तव्य बुद्धि का नय चैतय सचारित करने घाला दे, मक्ति फे वेग को बढ़ाने वाला है और तीर्थंकर जैसे उच्च पद की प्राप्ति कराने वाला है। स्वाध्याय ही गुरुजनों के उपदेश

(a)
और धानियों के ज्ञान को स्मृति में रखने का प्रधान साधन है।
इमीलिये श्रुति में कहा है-
स्वाध्यायामा प्रमद
अर्थात्-साध्याय करने में भूल मत करो। श्रुतिया तो
यहा तक कहती है कि-
सदहरमाह्मणोभियति यदद्द स्वाध्याय नाधीते ।
तस्मात् म्याध्यायोऽध्येत य ।
अर्थात्-जिस दिन स्वाध्याय नहीं करता उसी दिन ब्राह्मण
प्रमाह्मण हो जाता है। प्रत स्वाध्याय नित्य प्रति करावाहिए।
नीति में भी कहा है-
अन त मशयोच्दैदि, परोदार्यस्य दर्शकम् ।
सर्घस्थ लाया शास्त्र, यस्य नास्पाघ १५ स ।
अथात्-मात मदेहों का नाश करने वाला और परोक्ष
मेरदेहुप पदार्थों को दिखाने याला शासही सयका लोचन
नेत्रा इस अमात्र में पद अया है। उपरोक्त शार पवन
हमें आदेश परते हैं कि म्याध्याय नित्य करना चाहिए । इसमें
प्रमाद कामपने जीया को नीचे गिराना है।
माध्याय और जैनममान-उपरोक्त स्थाध्याय की आप
श्यकता और महत्व को समझ पर जब हम हमारे समाज की
और पप मजर उठा कर देते हैं तो स्थाध्याय का एक दम

भभाष ही मालूम होता है। सत्शास्त्र के पा, पाटा और
चितन की रचि माज अतिशय मन्द दो गामीलिए राम
दिव्याययान सुना याले माइयदिनों में भी ऐसे बहुत पमिलेंगे
जो सामाय (धानिक) प्रश्नों का भी उत्सर दे सर्व कारण
पही है कि ये सुन सो जरूर रोने हैं परन्तु फिर मिन और
मनन नहीं करते। ऐसात मुनिराजों पे ध्याएपानों में जागा
अपना पर्तव्य समझते हैं, पर उन पर चितारना नहीं।गदी
पजद है कि वे सुनते हुए भी सामुने और जानते हुए भी श्रम
जान से बने रहते है। यह याद रखना चाहिए कि म्याध्यापके
पल पर ही कार धामिक सम्प्रदाय कि मरती दे। जारी
पों पहले के तीर्थपरों प महापुरुषों का जो मया परिचय
और तत्वज्ञान हमको उपलब्ध है, यह भी गुर शिप्य परम्परा
से घालू स्याय काही फ्ल। स्थूलभद्र, स्फदिलाचाय और
देयार्धिगणी आदि थाचार्यों न इसा स्वाध्याप से शास्त्र ज्ञान
को सुरक्षित रखा था। अगर ये ऐमा नहीं करते तोहम भाज
पूरे श्रधकार में होते । अतः यह परमावश्यक हो जाता
नित प्रति कुछ न कुछ स्वाध्याय जरूर किया जाय।
जैसे यश करने से फ्लुपित हया दूर होकर घायु शुद्ध हो
जाती है, उसी प्रकार स्थाध्याय भी एक जिमसे आत्मा
में रहे हुए, काम फ्रोधादि विकार दूर हो जाते है और भात्मा
अपने सत् स्वरूप को पहचा लेती है। जैसाकि गीता में
स्थाध्याय हान यसाथ, यतयः सशित प्रताः।
भध्याय ४ रसोक २६ ।

।
-
पुस्तकों की सहायता से या व्यक्तियों की सहायता से कुछ
जानना अध्ययन कहलाता है। लेकिन स्थाध्याय बद है, जिससे
किसी समस्या पर.गम्भीरतापूर्वक विचार करके निष्पत निर्णय
करे और अपने विभ्यासका मजबूत पना।
ऐसा स्वाध्याय ही बुद्धि का भोजन है। प्रात्मोपति का
प्रशस्त मार्ग है श्रीर है सच्चिदानद का पथदर्शक । अवश्य ही
प्रतिदिन मनुष्य को ऐसा सच्चा स्वाध्याय करना चाहिये।
इसी उद्देश्य से प्रस्तुत पुस्तक प्रापके सामने रखी जा रही
है। यह स्वाध्याय महल की प्रथम मापान स्वरूप है। इसमें
पर्णित श्री धीर जिनस्तष और गौतमफुलफ दोनों ही प्राची
प्रकरण है और दोनों ही अपनी २ निजी विशेषताएं रखते
हैं। भाइये अब हम तनिक उन पर भी अपनी दृष्टि डालें।-
वीर जिनस्तव
इस प्रथ का नाम धीर जिनस्तथ है।
जिसका स्वय प्रथफार ने प्रकरण के अंत में 'धीर जिण
शुभमेन' पद से निर्देश दिया है। इसकी मूल मापा मारत है
और गाथाऐ फल २२ हैं। जिनमें भगयान् महावीर के सक्षिप्त
परिचय के साथ उनकी स्तुति की गई है। इसके रचयिता
प्राचार्य अभयदेवसूरि है। जो अपने समय में बड़े विद्वान थे।
उसका समय इग्यारवां शतादी का मत और पारद्वषी का
भारम्म काल है। ये चाद्रकुल के जिनेश्वर सूरि के शिष्य थे।
स० १०८८ में यर्धमान सूरि की अनुमति से इनको श्राचार्यपद
दिया गया था। उस समय आगमों की टीकाऐ प्रायः नष्ट हो-
गई थी। केवल भाचाराग और सूपगडाग सूत्र पर ही उस समय

टीकापे उपलध थी । प्रतिमा सम्पन होने से भापको इस
कार्यकेलिये कहा गया। नापते इसे स्वीकार किया और तपस्याके
साथ टीका निर्माण करने लग गये । कहा जाता है कि इसमें
आपको देवी सदाय प्राप्त हुधा था। स० १९२६ क मास पास
आपने नय श्रमों पर टीकापे घनाई। जो सस्रत भाषा में
श्राज सर्वत्र प्राप्त होती है। इन सिपाप पधाशक भादियों
पर भी टीकापे की।सस्टत की भाँति भारत में भी आपने
का मौति हतियाँ यनाई। भगवती मूध के निथ प्रकरण
पर जो यापन प्राय यनाया, पद प्रायन भाषा पर। उसी
सरह का यह दूसरा धीर जिनम्तय भी है। इसकी भाषा सरल
प्रास्त होते हुए भी ठोस है। भाप मूलानुगामी है। प्राचार्य
अभयदेवसूरि का क्पट पणिन नगर में स० १९३५ में स्वर्गवास
हुमा था।
गौतमकुनम -यद गौतम म्यामी नाम में प्रचलित है।
जैसा कि नाम से ही प्रकट होता है। फिर भी पुछ एक इसे
'लुखानरा भी कहत हैं। इसकी रचनाय और रिसने की
यह शात नहीं हाता । लेकिन इतना तो सुनिश्चित है कि यह
प्रकरण अर्वाचीन महीं मितु माचीन है। इसमें प्रशोत्तर के
रूप में विविध विषयों को हृदयग्राही ढंग स समझाया गया है।
जैसा कि पाठकों को पढ़ने से स्पष्ट मालूम होगा। फिर भी
श्राश्चर्य है कि ऐसा उपयोगी प्रकरण इस समय तक अप्रका
शित ही कैसे रहा ?
उपरोक्त दोनों प्रकरणों की गाथाऐ शब्दार्थ, भाषार्थ और
पियेचन थीमज्जैनाचार्य पूज्य श्री हस्तीमलजी म सा की

फापी से उद्धृत किये गये हैं। छापानुवाद की पूर्ति मान न पत्तियों के लेखक द्वारा हुई है। आशा सहदय पाठक से पसन्द करेंगे। सत महात्मामों की मापा सदेय परिमित प शास्त्रानुकूल ही होती है। लेकिन सम्पादन करते समय उनकी मापा और भायों में पुछ परिवर्तन हो ही जाता है । यद्यपि इस पुस्तक को लिखने में काफी सावधानी से काम लिया गया है, परतु फिर मी त्रुटि रह जाना असम्भव यात नहीं है। अतः सम्पादक का उत्तरदायित्य समझकर दयालु पाउन मुझे क्षमा करेंगे। मोतीचोक जोधपुर विनीत- रत्नकुमार जैन रत्नेश सम्पादक

स्वाभ्याय, प्रेमियों से
११) स्वाध्याय प्रारम्भ करने से पहले शानदाता गुरु को भकि
पूर्षक प्रणाम करना चाहिये । पयोंकि ज्ञान प्राप्ति में ज्ञानियों
का सग प्रधान कारण है। यतः ऐसे परम ज्ञानियों का
अतकरण से सम्मान करना चाहिये।
१२) शास्त्रकारों के मूल आशय को समझने के लिये उनके प्रति
पूर्ण श्रद्धा और शुद्ध दृष्टि होनी चाहिये ।
(३) शास्त्रकार की टि समझकर उसी दृष्टि से उसका अर्थ
करना चाहिये, अन्यथा सत्य की प्राप्ति नहीं हो सकती।
(४) पारका यह अवश्य ध्यान रसना चाहिये कि उसका
स्थान उच्च है। उसका धावरण और त्याग ऐसा होना
चाहिये कि जिस से श्रोताओं के मन में सहज ही आदर
भाष उत्पन्न हो जाय।
(५) मतीद्रिय होने से जो विषय पुद्धि गम्य नहीं हो अथया
युक्ति से बाधित दिखता हो, षदा उन शास्त्रकारों की भूल
दृष्टि समझने का प्रयत्न करना चाहिये। परतु धुद्धिप्राहा
म होने से उपहास कर पैठना अनुचित है।
(६) निम्न पा से गुरू पवन पर स्वाध्याय प्रारभ करिये-
अक्षानतिमिराघाना, घानाअन शलाकया,
चतुरुमीलितं येन, सस्मै श्री गुरवे नम ।
दोहा-परम पुरुष प्रभु सद्गुरू, परम धान मुख धाम ।
जेणे प्राप्यु भान निज, तेने करू प्रणाम ॥
-

(110) 'दैनिक स्तुति पाठ घईते पीतरामाय, सिवाय परमात्मने । ममः थाण सहाय, जिनामा-पालकाय च | थईन् सिद्धति सिद्धति, प्रीतरत्याप यो जपेत् । इन्द्रियाणि सुसयभ्य, स याति परमा श्रियम् ॥२॥ स्मरण जिा देवस्य, विघ्न-बली विनाशनम् । स्मरण देयदयस्य, सर्घ-मगला-कारणम ॥३n चिन्तन घीसगगस्य सर्व-व्याधि निधारणम् । कपायाऽनन नमा, जतूना ताप हारणम्॥४॥ जिो भक्ति जिने भक्ति , जिने भनि भये भये। सामेस्तु सदामन्तु सदामेस्तु क्षणे क्षणे ॥५॥ कोटि-म-फत पाप, जिनेद्र । स्मरणाद्भुमि। नश्यति क्षण मात्रेण, मशयाऽत्र 7 लेशत ॥६॥ इमर पर मत्रम्, दमेर परम घतम् । पीतरागम्य यद् ध्यान, हद्देशे सुविचारत ॥७॥ अन्य दधेपु मे मतिर्न स्यात् स्वप्नेऽपि कचित् । घर प्राण घियोगोऽपि, तय भको भये मम ॥८॥ प्रात स्मरामि भव-ताप-टर जिनेशम् । प्रातनपामि जन-मोदकर मुनीशम् । ग्रामभजामि शुभ-तीर्थकर जोग। प्रात पठामि अग-शानि कर शिवेशम् ॥En

(1)
सर्व देवान् परित्यज्य, जिनेश मज भो मन ।
माताऽयमेय त्या दुपै कपाय विषयोद्भवै ॥१०॥
त्वमेघ माता च पिता त्यमेव
त्वमेघ पधुश्च सपा त्वमेव ।
स्वमेघ घृद्धिस्त्वमेय सिद्धि ।
त्वमेव शाति शरण त्यमेघ ॥११॥

॥ श्री॥ श्रीमद् अमयदेवरि विरचित- 卐 श्री वीर जिनस्तवन मूल-जाना.समणे भषव, महावीरे जिणुत्तमे। लोगना सयबुद्ध, लोगतिय वियोहिए ॥१॥ धायानुवाद-तर्ज-राधेश्याम- महावीर जिन उत्तम है, ये स्वयं युद्ध जग के स्वामी। देवों से प्रतियोधित जय हो, श्रमण ईश अतर्यामी ॥१॥ भावानुवाद-त्रिलोकीनाथ, स्वय बोध पाये हुए तथा दीक्षा के समय लोकातिक देवों से प्रेरणा पाये हुए श्री अमण भगवान महाधीर जयब त हो। आप धीतरागियों में भी भेष्ठ जिनपर हैं। मूल-चच्छरं दिन-दापोह सरिय जणासए । पाणतिय समाउत्ते, पुत्ते सिद्धत्थरायणो ॥२॥ छायानुवाद देवर धार्षिक दान प्रभु, जग आशा पूरण करते हैं। सीन शान के धारक जिन, सिद्धार्थ तमय कहलाते है।

भावाद-चप भर दान देकर लोगोंकी आशा पूर्ण करने पाले भगवान महावीर, जन्म से ही ती शाा (मति, ध्रुरि और अवधि) के धारक और सिद्धार्थ राजा के पुत्र हैं। भूना-विधा रज वरद च, पुर अतेउर तहा। निमिचो अगाराश्रो, पर अणगारिन ॥३॥ छायानुवाद राज्य राष्ट्र अतापुर तज कर, घर से नाता तोड़ दिया। पुर से निकल मापने जल्दी, मुनिसको स्वीकार किया। भावानुवाद-प्रभु महावार ने राज्य देश, नगर और भर पुर को छोडकर, गृहस्थ जीवन से विमुख हो मुनिपन घार किया। मूल-परीसधाण नो भीए भेसाण समाखमे । पचदा समिइएगुत्ते, यभयारी अपिंचणे ॥४॥ छायानुषाद थी धीर डरे नहीं कष्टों से, दुखों को सहने पाले ई ऐ समिति-गुप्त अरु ग्रह्मचारी,कुछ पास न रखन धाले हैं।' भावानुवाद-फिर धौर प्रभु भयकर कणे से भी नदी ई धे अपार कष्टों को सहन में समर्थ ।। ५ समिति तीन ग से गुप्त ( रक्षिन) ब्रह्मचारी और कुछ भी संग्रह नहीं र से अकिंचन है।

मूल-निम्ममे निरहकारे, अकोहे माणवन्मिए ।
ममाए शोमषिमुछ, पस ते छिन्न बघणे ॥५॥
छायानुषार
ममता मद से है दूर प्रभु मर मोघ मान से न्यारे हैं।
मिलोम, ममापी, शात अटल, कर्मों को काटोपाले ॥५॥
भाषानुपाद-प्रभु कैसे है? ममता और अहकार से
रहित है। मोघ भोर पहप्पन के मद से दूर है। माया और लोभ
से मुक्त तथा शात है और कर्म व धनों को काटने से पधन
मूल-पुक्खरं घ अलेवे य, स्नो इव निरजणे।
जीचे या अपडिग्याई, गयण प निरासप ॥६॥
छापानुवाद
जो कमल पर मम निर्मल है, भरु शम समान निरजन है।
नहीं रफते जीप समान, गगासम, आश्रय होन सनातन है ॥६॥
मायानुवाद- कमल के पत्र की तरह पाए मन से निलेप
शख के समान राग स्नेह के रंग से नहीं रग जान पाले, जीय
के समान प्रतिहत यानी मही कने घाले और धाकाश की
तरह माधय रहित है।
मूल-घाउमा नपहियद्ध पुम्मो या गुत्त इन्दिए ।
विष्णमुफ्त । पिगुच, सग्गिसिंगुब्ध एमगे ॥७॥

सुपर्ण में, पूजा और मपमान में मोक्ष मौर ससार में भी एक
समान रहने वाले हैं।
मूल-नाणेण दसणेणं च, चरिरीण तोप य ।
मालपण विहारेप, मइयेणज्जवेण य ॥१२॥
छायानुवाद
चारित्रज्ञान भरु दर्शन से, निरपवस्थान अनिरुद्ध विहार ।
कोमलपन अरु सरस भाव से, है सप गुण में जिन सरदार ॥१२॥
मायानुवाद-मभु ज्ञान दर्शन और चारित्र से, निरवध
स्थान और प्रतिवद्ध बिहार स, कोमलता व सरलता से
सर्प है। और भी-
मूल-साघवेण घ खतीए, गुत्ती मुंती घणुसरे।
सघरेण तवेण च, सजमेण मणुत्तरे ॥ १३ ॥
छायानुवाद
द्रव्यभाष से लाघवपन है, क्षमा गुमि मनोप महान ।
सवर तप मा सयम गुण से, धीरजगत में सर्व प्रधान ॥१३॥
भावानुवाद-लायर प्रर्थात् द्रव्य और भाप के हरके पन
से क्षमा से गुप्ति और निर्लोभता में सर्व धेष्ठ है। घे लयर, त
और सयम सभी जगत शिरामणी है।
मूल-अणेग-गुण सयाविरणे धम्म मुस्काण भाषए ।
पाइरखएण सजाए, अपतपर-1 ॥१४॥

छापानुषोद-दोहा-
गुण,शत से पाकीर्ण हो, धर्म शुक्र का ध्यान ।
करके प्राति कर्म तय पाये केवल शान n १४॥
भावानुवाद-इस प्रकार अनेक गुणों से परिपूर्ण प्रमु धर्म
भ्यान और शुक्ल ध्यान में तल्लीन रहे थे, जिससे पादि कर्म
"क्षय कर केपला
शान
को प्राप्त किया।
मूख-यीभरागे अनिग्गंथे, सध्यनू सम्पदसणी।
देविंद पाणविदेहि, निम्पित्तिय महामहे ॥१५॥
छायानुवाद
निमय और गतरागी हो, तुम पूर्णज्ञान दर्शन धारी।
सुरमसुर पति ने परम शान को, महिमा की है सुखकारी॥१५॥
भावानुवाद--राग द्वेष से रहित होने के कारण आप धीव-
राग है। साह नहीं करने से निप्रय है। केवल भान प्राति के
समप देध और पानयों के दो से जिनका महोत्सप किया
गया है, ऐसे श्राप सर्पश और सपदी हैं।
मूल-सव्यमालाणुगाए य, मामाए सव्य ससप!
जुगव सव्य जीवाण, हिंदई मिन्न गोपरे ॥१६॥
छापानुवाद
जीपमात्र के विविध विषय सशप सप साथ मिटा देते।
सप जीवों के जो पोध योग्य, भाषा से सब को हपति ॥१६॥

भाषानुपाद-प्रभु सप मापामों का अनुगमन करने वाली अधमागधी भाषा से प्राणिमात्र पे सप सदों को, चाहे घे सशय अलग २ विषय के हो, एक साथ मिटा देते हैं। अर्थात् श्रोताओं के विविध प्रकार के सशय भी आपकी अद्धमागधी, जो सप समभो योग्य भाषा है, उस से एक साथ नष्ट हो जाते है। किसी को कोइ-स देह नहीं रहता। मू-हिए मुदे निस्सेस-कारए स व पाणिण मक्यालि पचेच, पन्नचित्ता सभापणे ॥१७॥ - छायावाद वर वर्णन पाच महायत का, प्रभु ने जग का कल्याण किया। उनमें गुण यन पच घीस कर, हित सुनार्मािण किया। भावानुवाद-भागायुक पाच महावतों का घणाघर के पाप जीपमा के हितकारी, सुप और पत्याए करम पाले होते हैं। अर्थात् आप जीवमात्र के हितकारी और परमाण कर्ता इसलिय है कि मापसभाधना युक्त महारतों से शुद्ध मुनि- माग का निरूपण क्यिा है। मूल-ससार सापर घोरे (पुड़) जतु सताण तारए । जाणुय्य देसिय तित्थ, सपत्ते पचमि गर॥१८ छायानुवाद प्रमु भव सागर में गिरे हुप, जीपों को पार लगाते हैं। नौका सम सत्पथ धवलापर,पिरसिद्धिगतिको जाते हैं।

मावानुवाद-माप समार समुद्र में दूरते हुए प्राणियों को तारने वाले हैं। धापन नीशा की तरह धर्म नीथ को दिनाया, और उसे दिवाकर कि आप पचमगनि-मोक्ष स्थान को भात पर गये । अर्थात् धगती के उपदेश से ससार में करते हुए। प्राणिया को पनाकर आपने मोक्ष प्राप्त कर लिया। मूल-से मिय अगले निच्चे, अमचे अयरामरे । कम्मप्पाच-रिमुक्के, जप पारे जए जिणे ॥ १६ ॥ छायानुवाद शिय, अतर अमर र नित्य, जो निराकार मचाधारी। को पूर्ण धर्म से मुक्त धीर निन, जय जय तरी पतिवारी १ED भावानुवाद-पय मुफ्त दशा का स्वस्प यनाने हैं--मुक्त दशा में यह प्रभु शिव-उपद्रव रहित और शरल है । सदा एक रूप होने से नित्य और रूर रहित है। वृद्धावस्था तथा मरण से छुट जाने के कारण मारामर और कर्म मपत्र से मुक्त पद जिन-गग द्वेष का विजेता धीर प्रभु जपशीत है। मूल-मे जिणे पक्षमाणे अ महागीरे महायमे। असम-दुक्व-चिनारण, अम्हाण देउ निव्वद ॥२०॥ छायानुवाद घद पद्धमा जिाराज यशस्यी, महावीर है सुपफारी । अगणित दु से पीडित इमका, अनिचरा सुन देंदितकारी। मायानुनाद-महापौर और यशस्वी यह धी यद्धमान प्रभु यलय दुतों से पीडिस हम रोगों का निवृत्ति-शाति प्रदान करें।

मूल- परम पमोश्रा सम्रो धीरनाही। परमपसमक्षाणां हि तुलत्तणं मे। असम सुह दुहेसु सम्ग सिसि भयेसु, कपप कयघरेसु सत्तुमिसेतु पाधि ॥ २ ॥ छावानुवाद की मोद पूर्ण स्तुति यो मैंन, प्रमु समता भाष प्रदान करो। मैं रहूं एकसा सुख दुख में, उपशम भायों का दान करी। ससार मोक्ष पा स्वग मिले, मेरे मा में समभाष रहे। हो हेम धूल या शत्रु मित्र सदोष सभी पर पना रहे। भायानुषाद-इस प्रकार उत्कृष्ट प्रमोद भाव से स्तुति किये हुए थी धीर स्वामी उत्तम उपशम भाध के दान से मुझे समता प्रदान करे । जिससे विषय जय सुख और दुखो में स्वर्ग, मोक्ष और ससार में, सुषण और मिट्टी में, शत्रु और मित्र में भी मेरी सममायना पनीरहे। भूल-पयडि अपसदि (ह) पहाण, सीसेहिजिणे सराण सुगुरूर्ण पौर जिरा थुम मेथं पढ़द, व अभयदेव सूरीहिं ॥२२॥ छायानुवाद थे धसतिषास के माधिभायक गणी जिनेश्वर गुरु जिनके। उन अमयदेव ने धीर स्तुति की, पढ़ो टले पातक मन के ॥२२॥ भावानुवाद-पसतियास के मार्ग को प्रकट करनेवाले आचार्य श्री जिनेश्वर सूरिये सुशिष्य श्री अमयदेघ चरि के द्वारा पनाये हुए इस धीर मिनस्तय को सदा पढ़ते रहना चाहिये । इसको पढ़ने से सप दुर दूर होजाते हैं और परमानद की प्राप्ति होती है। ॥ इति श्री धीर जिनस्तषम् ॥

गौतम-कुलक
1
[ भीमद् गजेन्दाचार्यकृत रत्नचन्द्रिय म्याच्या पहित 1
लुद्धा युद्धा य मूढा, मंउत्थामीसगा दिया।
घउह थि नराण, लक्षण कि यियाहियं ।
छायानुवाद
लोमी पडित मूर्स पुरुष, दिये मिथ पतलाय ।
इनके लक्षण किस तरह, यह दीजे फरमाय ।
शब्दार्थ-भगवन् । मनुष्यों के जो आपने चार विभाग
किये हैं। जैसे-(लुदा)-नुघ-लोमी, (युद्धा) विद्वान् , (मूढा)
मूर्ख, (वउत्थामीसंगा) और बौथा मिथ इन (चराह) चारों
(नराण) मनुष्यों के (लक्षण) लक्षण (किं) क्या (पियाहिय)
फरमाये है। यह यतागेपी कृपा करें।
भाषार्थ-भगवन् ! मनुष्यों के जो मापो धार दिमाग
किये हैं। जैसे-लोमी, विद्वान् , मूर्ख, और मिथ (जो लोभी,
विद्वान् और मूर्य मी हो) ऐसे वारी मनुष्यों के लक्षण क्या है।
यह फरमाइये।
भगवानुवाच-मगयान फरमाते हैं-
लुद्धानरा अत्यपरा पति,
मूटा नरा कामपरा इति ।
धुद्धा नरा तिपरावति॥
मिस्सा नरातिनिधि शायरन्ति ॥१॥

छायानुवाद धन सग्रह में सत्पर जो लोभी है। मून कामयश रहने जो भोगी है। क्षमा प्रादिगुण युक्त यहा परिउन है। उपरोक्त गित नर मभी गुणों मे माण्डत है॥१॥ शदाथ-(लुद्धारा) लोगी मप्प (अत्यपरा) धा जोड़ो में तत्पर (इति) होत है। (मूढाारा) मूध मनुष्य (कामपरा) काम भोग में आसक्त होत ।। ( युद्धानग) बुद्धिमान मनुष्य (खतिपरा) क्षमा यादि गुणों में तत्पर है। (मिस्सITI) मिधार (तिनियि) ती लक्षणों का (बायरन्ति) आवरण करते है। भावार्थ-लोभी मनुष्य धा जोइन में तत्पर होते हैं। मूर्य मनुप्य फाम भोग में चामत्त होने है। बुद्धिमान मनुष्य क्षमा आदि गुणों में तत्पर होते हैं। और मिथनर उपगत तीनों लक्षणों का पाचरण पाने है। सिवन -इम गाथा में चार प्रकार के मनुष्य यनाये गए हैं। जो लोभी श्रादि नाम से पदे गये है। उनमें प्रथम प्रधार के लोमा मनुष्य घा जोहन में सदा तत्पर रहते हैं। लोम के चश उनको यह भी ध्याा नहीं रहता कि मरा हित और अदित क्या है ? सागरदत्त सेठ की तरह उनको सघनाश प्राप्त करना पड़ता है । मूख मनुष्य सदा काम भोगमें तत्पर रहते ई कामी मनुष्य हा पाच द्रियों के काम भोगों में तल्लीन रहते हैं। को ४ उत्तम शम्नादि के प्राप्त की इच्छा का काम करते हैं अौर गध रस धादि के उपभोग का भोग करते हैं। - महान से महान शानी का समागम होने पर भी विषयासक्ति के कारण घोध प्राप्त नहीं होता। इस मूर्पता से ही ब्रह्मदत्त पनपनी सानो यर्प के भरत आयुष्य में भी काममोग की. तीव भासक्ति से इतने कम सचय कर लिये कि उसयो सातौं नरक में जाना पड़ा। उसको अपने मोग की एक एक घड़ी पर २१ करोड ४६ लार ७२ हजार ३४३ पाप तफ नरप के महान् दुख प्राप्त हु । ७०० वर्ष की कुल घड़िये १ करोड ५३ लान ७२ हजार होती हैं। कि तु तरफ के दुम साइमसे भी धागे करोड़ों परप पर यह जाने हैं। इस प्रकार विषय भोग के कारण मूर्ख दुर्गति का अधिकारी बनता है। शास्त्र में कहा है कि- जहा किपाक फलाण, परिणामो न सुदरो। एप भुत्ताण मोगाण परिणामो न सुदरो॥ अथात्-जैसे विपाक पल ना से परिणाम द्वितकारी नहीं होता उसी तरह भोगों के भोगो का परिणाम भी सुख- काग नहीं होता है। क्योंकि काम भोग इच्छा मान से भी दुर्गति में गिरा पाने होते हैं। कहा मी है-- समकामा विस कामा, कामा धासीषिसोंचमा। पत्थेमाणा, अक्षामा अति दागह ॥ अर्थात्-पाम भोग मीपे शल्य और विप के समान हैं। तथा ये डाढ में विष रसायाले साप मे भी भयकर है। भोगने की तो बात ही क्या? कामों की प्रार्थना करते हुए भी जीय उनको पिना पाये ही दुर्गति को प्राप्त होते है। इसलिए इनको "खणमित्त सुस्ता पहुकाल दुपावा' क्षण मात्र सुग्नकारा और पहा काल के लिए दुःसदाया कहे हैं। काम माग में सुख तो काम

.
(१४)
सरसों के समान है लेकिन दुख पर्यन के समान है। पिरमी
'मूर्ख मनुष्य काम मोग में तत्पर रहते हैं। परन्तु जो विषक्षण
है ये काम मोग में मामक नहीं होकर गम्बू स्याम तथा पया
शालिमार की तरह विपयों को विप की तरह घोर देत है।
इसके विपरीत विषयों में मूर्षित होकर पुरीक आदि दुर्गति
को प्राप्त हुए हैं। ऐसा समझ कर पाम माग से निवृत्त होने
थाले युद्ध-जागर कराते हैं। इसलिए कहा है कि बुद्धिमान
मनुष्य क्षमा-महनशीलता में तहार होते हैं। उनको भनार्य
लोगो की तरफ से समय पर प्रास होते हैं। किन्तु पेशाको
शान्ति पूर्वक सान कर लेते हैं। क्योंकि ये पास्तय में सत्य के
जानकार है। शारर ने जोय, मनीष पुण्य पाप माधय, संपर,
निर्जग और मोनये नय तत्य यताये हैं। इनवा वितनपरना
हा शानियों न धुद्धि का सार रहा है। जैसा कि कहा है-'युरे
फल तत्व पियारणं च'। उपराक्क उचि के अनुसार सरश
विचारणा में शानी इतन मस्त हो जाते हैं कि उनको अपने
शरीर के सुप दुख का भी भार नहीं रहता। नत महामा
गज सुरतमाल मे मस्तक पर जलते हुए मारे रख देन पर
सोमल ब्राह्मण पर रोप नहीं किया। रितु अपनी अयाधित
भारम शान्ति प्राप्त की। (४) चौथे प्रकार मिश्र मनुष्य धन,
काम और क्षमा तीनों का थोड़ा २ माचरण करते हैं। सामान्य
गृहस्थ धर्मी साधक की तरह। जाकि धन भी गोड़ते हैं,
ससार के विषय विज्ञास भी करते हैं और शक्ति पूर्वक त्याग
सप पक्षमा की आराधना मी करते हैं।
सो पपिष्टत, साधु, शवि शाली और मधु कैसे होते हैं।
उनके लक्षण इस प्रकार पताये हैं-

( १५ )
से पडिया जे घिरया पिरोदे,
ते साहुणी जे समप बति ।
ते सतिषो जे प चयति धम्म,
ते बघवा जे प्रसणे इयसि RI
छायानुवाद
ते घिरोध से दूर यही पण्डित हैं।
समभाषी ही तो साधु गुणों से मडित है।
घर धीर घही ओ धर्म नहीं तजते हैं।
पाप ये दी, जो कठिन समय रहते हैं ।
शब्दार्थ-ते पंडिया-घे परिहत है (जे घिरया गिरोदे) जो
विरोध से दूर रहते हैं। ते साहुणो-साधु घे हैं (जे समय)
जो समता का (चरति) पालन करते हैं। ते सतिणो-शक्ति
शाली ये है (जे धम्म ) जो धर्म को (ण चयनि) नहीं छोड़ते
है। ते पधया-माई घे हैं (जे बसणे) जो विपत्ति के समप
में साधी (ति) होते हैं।
भायार्थ-बिरोध से दूर रहने पाले दो पण्डित है। जो
समता रखते हैं ये साधु हैं। जो घम को नहीं छोडते वे दी
शक्तिशाली हैं। वधु ये है जो विपत्ति काल में भी साथ
विन-घिरोध से दूर रहने वाले ही पण्डित है । अर्थात्
जिससे दूसर को पीडा हो वैसे व्यवहार से पानी अलग
रहते हैं। जैसा कि शास्त्र में कहा है-
एप यु नागीणोस र ज न हिंमद किंचणं
-

शार का सार यही है कि किसी को कष्ट न दिया जाय। इसके विपरीत- कितीए पढियाए पपाणुकोडिए परालभूयाय, ज पत्ताधि न जाति परस्त पीडान कायच्य। अर्थात्-जिम विद्या से मनुष्य हता भी नहीं समझे दूसरे को मg नहीं दना चाहिए, तो पराल के समान निस्सा उस करोड़ों पदयाती विद्या को पढ़ने से क्या सारकुछ भी नहीं। इसलिय ज्ञान पढ़ने का सार यही है कि किसी के कट नहीं दिया नाय । क्योंकि- अहिंसालक्षणो धर्मश्चाधर्म माणिना पयः। तस्मात् पूण प्रयत्नेम, कर्त या प्राणिया !! अर्थात्--धर्म का लक्षण अहिंसा और प्राणियों की दिसा अधर्म है। इसलिए धर्मार्थियों को या पूर्वक प्राणियो की दया करना चाहिये। चाह थाहा पढा हा या अधिक कि तु जो भगवान की आशा के अनुमार पर विरोध से निवृत्त हो चुका है, यी शाना है। यथा -- किरिया काय क्लेिमो नाणभासो तानुगलसोलो। पगएमा दम्मो, उपसम विणा विडम्पया सब्ये। अगत्- विा करना पाया को कष्ट देना है और ज्ञान का अभ्यास कर । ता को सुनाता है। पर उपदेश भी दा । यो उम्शा भाष के सिप विडम्यता मात्र

।
(१७)
पर निवृति का मूल कारण उपशम है। महाराज उदाह राजा
मेसी उपशम भाव से सिधु सौवीर आदि ६ दशों का
राज्य छोड़ दिया और मुनि दीक्षा धारण करती । नीति भी
यही कहती है कि-
पढ़ पढ़ पोथी जग मुया, पदिया न परिष्ठत कार्य।
ढाई अक्षर प्रेम फा, पढ़े सो परिडत होय ।
सारांश यह है कि पैर मिटा कर जग मे प्रेम परीघाला
ही पगिडत है । ऐसे पण्डित तो साधुहात हैं। इसलिए साधुका
लक्षण कहते हैं। साधु घे हैं जो सय जीवों पर समता रमते हैं
और शास्त्रानुसार चलते है । मान, दर्शन चारित्र रूप रन
प्रयी या निर्माण की साधना करने से ये साधु बहाते हैं, जो
समिति पूर्य चलने हैं। जैसे संधक मुनि क ५००शिष्य जो
घोणी में पील दिये गए फिर भी उन्होंन समता नहीं छोड़ी।
यही है साघुना का आदर्श। ऐमी धैर्यता शुकि सम्पग मदी
होती है। प्रत उसका लक्षण कहत हैं। जा विपत्ति के समय
भी धर्म को नहीं छोड़ते घे ही शचि शाली है । जैसे-भरएक
धायक और चद्रातसा राजा हा गय है । श्ररणक को एक
राक्षस ने पहुन कट दिये। यहां तक कि उसके जहाज को
में गिरा दिया, परतु फिर भी अरगुम अपना धम
नहीं छोड़ा। इमी का फहत शक्ति शालीपन ।
सच्चे या घय-यधु पा मित्र स सार में यहुत होते है,
परतु सच्चे वधु घे पदलात ई जो कठिन समय में भी साथ
देते है । हनिदान सानी देता है कि चेडा महाराज को अगरह
देश के राजाओं 1 युद्ध में साथ दिया था, जो कि उनक मित्र
1

(१०)
थे । धास्तय में धर्म ही भारमा का सच्चा मित्र है, जो उसको
दुर्गति में गिरने ही नहीं देता। रितु मोह युक्त मित्रता में भी
येही प्रशसनीय है जो विपत्ति के समय साथ नहीं छोड़ते।
और मित्र की मदद करते हैं।
क्रोध, मान माया और कोम के षश प्राणी को क्या फल
मोगना पड़ता है।
कोहाभिभूया ए सुध लहति ।
माणसिपो सोयपरा इति ।
माया सिणो हुँति पास्म प्रेमला,
लुद्धा महिच्छा नरय उति।३।
छापानुघाद
क्रोधी मनुष्य सुख प्राप्त नहीं कर सकता।
मानी मनुष्य शोकातुर ही निस रहता।
मायाची रहते बास सदा श्रीरों के।
प्रतिलोमी जाता नरक धाम रोरोके ।३।
शम्दार्थ-कोहामिभूषा-क्रोध से अभिभूत मनुप्प (सुद
सुम को (ण सादति) प्राप्त नहीं करत ।माणसिपो-मानी मनुष्य
(सोयपरा) शाप से व्याकुल (यति) रहते है। मायासिण
कपटी मनुष्य (परस्स) दूसर के (पस्सा) दास होते हैं । लुसा
लोभी (महिला) महा इच्छायाले मनुष्य (नरय) नर
(उर्यात) प्राप्त करते हैं।
'भाषाय-बोध से अभिभूत मनुष्य सुख को प्राप्त नहीं कर
। मानी मनुष्य शोक से व्याकुल रहते हैं। कपटी मनुष्य दूस
के दास होते है और लोभी मनुष्य नामको प्रा करते हैं।

(१)
विवेवरोध से यादुल मनुर शाति-सुख को नहीं
पाता। क्योंकि मोघ शरीर को सपाता, रक्त को सुखाता और
आत्मा को अपना मान मुलाता है। क्रोध के समय मनुष्य में
दया नहीं रहती। क्रोधी अनिष्ट पचन सुनकर काले नाग की
तरह विर उगलने लगता है। अनि के समान जलते
प्रोधी के पास जाना भी नाशकारी होता है। कहा मी है-
मोघी मूलमनपाना, शोध ससार पद्धन ।
धमक्षरकर मोघ , ममात् पोध विषर्जयेत् ।
अर्थात् माघ अनर्थ का मून और ससार को मदाने
पलामोध से घम का नाश होता है। इसलिये यो का
स्था करना चाहिये । शास्त्र में कहा है कि काही वीर
पण से.' मोघ प्रीति का नाश करना है। उत्तम पुरुष इसी
लिए मोघ को मन में स्थान नहीं देते हैं। जैसे विकदा है-
उत्तमस्य क्षण कोष, मध्यमस्थ घटी द्वय ।
अधमम्य यहोरात्र
मरणतक॥
अथाम्-उत्तम पुरुष का मोघ कण मर रहता
माम लोगों का घटी। अधम जी का दिन रात और
पारियों का प्राध मृत्यु पर्यत रहता है। ऐसा समझ कर
युद्धिमान को चाहिए कि उदय में पाये हुए बोर का निपल
कर|शिशाघ से सुनी मिलता है। कहावत
प्रनित कि-
मोघ पुर पुड कर मर जैस अग्नि की मन।
क्षमापन गुखिपा गई, पाय मिश्री पाल।
।
पापाना
1
-

।
पथा-प्रवकारी नारीयत् । मोधी मनुष्य
को मान मी
होता है। इसलिये मान का फल बताते हैं। मानी मनुष्य विता
में प्राकुल रहते हैं। क्योंकि मान विनय का मांश करने घामा
जैसा कि शास्त्र कहा है 'माणो विणय नासणो'। जर
शिनय महीं तो जान कहाँ और शान नहीं तो चारित्रसेको
सकता है चारित्र के प्रभाव में मोश नहीं जाता। जय मास
मही तो भात्यतिक सुख पैसे हो सकता:मके यश पूर्ण
समय में याहुयली, मराचि, सिंहगुफायाप्ती मुनि, चाणक्य
दुर्गाधन और राधण मादिक
पुगे म दुप मोर पिता
का अनुभव या है। जो कथानक में प्रसिद्ध हो।
अहकारी मनुष्य को किस प्रकार चिता करनी पड़ती है
इसके लिए राजा पदप्रद्योतन और दशारणमद के उदाहरण
पर्याप्त है। किसी समय महाराज दशारणमद भगवान महावी
का अपनी विस्तीण ऋद्धि साथ धदन करन के लिये गपे।
श्रय दशनार्थियों की अपेक्षा अपने साथ इतना पड़ा ठाटबाट
देखकर दशारणमद्र के मन में अहमारपेश होगया | दशारण
भद के रस मान को हटाने के लिये इस उपाय सोचा
उन्होन ६४६मार हाथी वक्षिप शति से निर्माण किये । दरपक
हाथी के सनका मुख और दातों की मलौकिक रचना की
दिन अपन भी १६ अरव ७७ करो ७२ लाखमा
१६६मार का किये और दाणी भी २१ करोड ७७ ला
ओर २८ हजार रूप यमाय । उस अनुपम ऋद्धि के साथR
आते हुए देपारदशारणमद् राजा यहुत चितित हुआ।
पश उसको अपना मुंह दिखाना भी कठिन हो गया। लेकिन
वह तो विचारक या छत सम्हल गया और सयमीयन गया
जिससे (द्र भी उनके चरणों में नतमस्तक हुमा । परम् उस
साथ ही

"
(२१)
स्थान पर यदि कोई दूसरा होता तो समय है यहाँ जीवित ही
गही मिलता। ऐसा समझ कर युद्धिमान पुरुप अहंकार.महीं
-करते हैं। कहा भी है-
सम्पूर्णकुम्भो म करोति शब्द, प्रसों घटो घोषमुपैति नूनम् ।
पुमध-कमक पत्र मलके नहीं, कासी यहु मनमाय ।
ॐष पुरुष बोले मधुर, मीच पो ज्यू वाय ।।
मरिया से झलके नहीं, मलके ते भाषा ।
मानुए ए ही पारखा, पोल्या ने साधा ॥
अर्थात्-मनुष्य की परीक्षा योलने पर हो जाती है।स
प्रकार मान-महकार इस लोक में पिता और परलोक में
मीच पुल भादिका कारण बनता है। मतपय स्थाय है। मानी।
मनुष्य मात्र रक्षा के लिये कपट भी करता है। प्रत मा
काट का पल दिखाते हैं। मायापो दूसरे के गुलाम बनते हैं।
'माया मित्ताणि नासे.' अथान् कपट से मित्रता का नाश होता
है। क्योंकि कपटी का व्यवहार 'पिपकुम्म पोमुखे' के
अनुसार होता है। कहा भी है-
मुख पदलाकार, याचा च दन शीतलम् ।
उदय पतरीयुक्त , विविध धूर्त लक्षणम् ॥
अर्थात्-मुध पर कमल की तरः सुदरता, गणी में
मिठास और हृदय में पंची (कपट) रखनापूर्त का सदण है।
कपट करने से मनुष्य को स्त्रीवेद का पथ करना परता है।
पदि रफ्ट की माधक भएकरना हो तो जीय को पशु गति में
मोगरना पड़ता है। भगशन पालनामा पनि
-

११ . यथा-मयकारी मारीयत् । मोपी मप्य का मान मी होता है। इसलिये मान कामामानी मनुष्य विता में माकुल रहते हैं। वर्गकिमान विनय राम करने बाबा है। जैसा कि शास्त्र का 'मायो पिय मासोर विनय नहीं तो शाम को और मागमा घोत्रि से हो सकता है। चारित्र प्रमाण में मोच महीं होता। जप मार मी तो भापतिक एRETORREE मा परापूर्व समय में बाहुवली, मरीचि, सिंहगुणायामी मुनि, चापर दुर्योधन और गरण प्रादिका पुरुषों में दुध मोर पिता का अनुभव किया है। जो थाना में प्रसिद्ध है। अहकारी मनुष्य को किम प्रकार बिता करनी पड़ती। इसके लिप राजा चनमयोतन और दशाएमआरस पर्याप्त है। किसी समय महाराज दशारभद्र भगवान महावीर का भपनी विस्तीण प्राशिव साप पहन लिये गये। अयशनार्थियों की अपेक्षा अपने साथ इस पड़ा हाटबाट भयका दशारणमद्र के मन में महमाय पेश होगया । दशरथ भद्र के इस मान पो हटान कलियर उपाय सोचा। उहौन ६४ हमाराधीय शक्ति से निमाण किये। हाथाशनको मुख भौरदातों की प्रतीरिक रचना की। { गाय दीपा भी १६ अरब ७७ करोष ७२सान १६हजार रूप दिय यौर पदापी दे भी २१ करोड ७७RIE और १८ हजार रुपयनाये । उस अनुपम द्धि के साथ भाते हुए इनकरशारणमद राजा यहत चिन्तित हुभाबिज घरा उसको अपना मुंह विधामा भी कठिन हो गया । लेकि याला विचारक या प्रत सादल गया और सपनीबन गया जिससे पदमी उसके घरों में नतमस्तक हुमा! पर उस भी ।

कंच पुरुष
(२१)
स्थान पर यदि कोई दूसरा होता तो समय है यहाँ जीवित ही
महीं मिलता। ऐसा समझ कर बुद्धिमान पुरुष भईकार नहीं
करते हैं। कहा मी है-
सम्पूर्णकुम्भो म करोति शब्द, अनों घटो घोषमुपैति नूनम् ।
पुनध-कनक पत्र झलके नहीं, कासी बहु मनमाय ।
योले मधु,
मीच बरे
ज्यू पाय ।।
मरिया से झलके नहीं, झलके से भाषा ।
मानुपए ही पारस्या, योल्या में लाया ॥
अर्थात्-मनुष्य की परीक्षा पोलने पर हो जाती है। इस
प्रकार मान-महकार इस लोक में चिन्ता चौर परलोक में
मीच पुल भादि का कारण बनता है। मतपय स्थाज्य है। मानी।
मनुष्य मान रक्षा के लिये कपट भी करता है। प्रत प्रश
फण्ट का फल दिखाते हैं। मायाथा दूसरे के गुलाम पाते हैं।
'माया मित्ताणि नासे.' अथात् कपट से मित्रता का नाश होता
है। क्योंषि कपटी का व्यवहार 'विपकुम्म पयोमुरो' के
अनुसार होता है। कहा मी है-
मुख पाइलाकार, वाचा चवन शीतलम् ।
हृदय पतरीयुत , प्रिविध धूर्त लक्षणम् ॥
अर्थात्-मुख पर बमस्त की तरह सुदरता, गाणी में
मिठास और हृदय में कंची (कपट) रखनाधूर्त का लक्षण है।
कपट करने से मनुष्य को स्त्रीवेद का यप करना पड़ता है।
परिकपट की अधिक भयकरता हो तो जीव को पशु गति में
मोगरना पड़ता है। भान् मलिना पET

तपस्या से तीधर पद की प्राप्ति करके भी वएट के
प्रताप से
स्त्री रूप में पदा हुए। जप तपस्या जैसे गुम मार्ग मे किया
हुधा सून्म कपट मी पेमा मयार होता है, सय स्वार्य साधमा
में किया हुभाछल कपट माभयकर होगा सका तो संज
ही अनुमान कर सकते हैं। प्राय: काट जिमी किसीलोम
सेया जाना है। इसलिये भरलोभ का पतातेको
लोमीदोता है वापर तृष्णा कारण माप में जाता है।
क्योंकि जो यही इच्छा पाले होते हैं उनकी सृप्या पधाराती
है। ससारा घा तो सण्यात या भसमपात ही, "तु
तृष्णा मनात है। मन त को पूर्ण करमा मतमय है। इसलिये
पहा है।
गगनाऽग्नि-यमो-राला समुद्र मुपर गृहम् ।
सप्तैतानि म पूयन्ते, पूर्यमापानि निस्पक्ष ।
प्रधात्-माश, अग्नि, यम, मृत्यु, राजा समुद्र पेट
और घर प सात जगह सदा मरत हुए भी पूर्ण नहीं होती।
अनन्त पदार्थ रसने परमी श्राकोश में मदा पोल ही पोनरहनी
गाँध भर की घीने जलाकर भी भाग की भूख पनी रहती
है।यणन जीवों को मार लेन पर भी काल का मैं तुला
की रहता है। ऐसही राजा, समुद्र, पेट और घर भी नहीं भरत
है। लोभी पथा २ए सहते है, यह सयका विदिती है।
शानियों ने कहा है कि 'लोमो सय्य विणासो अथात् लोभ
सयको नाश करन वाला है। लोभ प्राग के समाता उत्तम
धर्म रूप धन को जला देता है। इसके द्वारा अपयश धूत्र
की वृद्धि होती है और भय भFA की न फैल जाना।
।
Pr

ज्याला निकलती है। मोह यायु मे प्रदीप्त पनी हुई यह माग
'प्रात्मा का सर्वनाश कर बैठती है। ससार के प्राणी जो लोम
पी भाग में जल रहे हैं, वे इस लोक में श परलोक में भी
दुर्गति भोगते हैं, सभूम चमवर्ती रसी लोम के कारण सातयों
नरक का अधिकारी बना था। पखंड का राज्य मिल जाने
पर भी उसका स तोप नहीं हुआ। उसने चाहा कि मैं सातपा
खर मिलाकर सचा पक्रपती पन। सेवक देषों ने इससे प्रार्थना
की कि स्वामिन् ! मापने छह खड का रोज्य प्राप्त कर लिया
अप अधिक तृष्णा नहीं करनी चाहिये। क्योंकि चक्रपती
छह वह कादी स्यामी होता है। सातये खडको पाने में अदिस
की थाशका रहती है। परन्तु लोमयश चम्पती ने देवों की यात
न.मान पर अपना जहाज समुद्र में बढ़ा दिया। परिणाम या
हुआ कि उसे यही समुद्र में ड्य जाना पड़ा और सातवे वह
के बजाय लोम की भयकरता से सातयों नरक में जाना पड़ा।
इसीलिये कहा है कि लोभी मनुष्य नरक गति को प्राप्त
करता है।
पुनः कोधादिपायों से होने वाली हानियों को प्रकारातर
से पताते हैं-
कोहो विस कि अमय अहिंसा,
माणो परी कि हियमप्यमायो ।
माया भय कि, सग्ण तु सच,
खोहो दुई कि सुहमाहु तुद्वा an
छायानुवाद
विप क्रोध हिसा ही अमृत पहिलानो ।
रिए पर्प मित्र तम भाव को मानो।
1
।

H
।
(२६)
नुगति पर ए नहीं कर पानी वितु अममाद दशा के कारण
डी देशारण भद्र ने द्र को भी ललित पर दिया और पाहू
पली मुनि भी इसी मामाद से रेत को कर गये।
इसलिये कहा है कि सप्रमाद ही मशा हितैषी मित्र है। मित्र
भय से बचाता है। इसलिये प्राचार्य मर का स्वरूप बताते
है कि ५ कपटी भय का स्थान है। काम मायाधी Brot
सदा हरप में चितित रहते हैं। उसको इस बात का हर
समय पियार रहताकिमही मरी यात प्राट न हो जाय।
औरतो या सोने समय भी पटी कोचन म निद्रा नहीं
आती है। भयभीत के लिये शरण की अपेक्षा होती है। इस
लिये प्राचार्य करते कि सरय दो शरण है। क्योंकि सत्य
में ही सय प्रतिष्टित है। धर्म वा सार भी सपही सत्य
के यिना मनुष्य पैसा दो शोमा-दीम दिखता जैसा किजीय
के बिना शीरइसी यात काया है.
काया इस विना नदी जल विना दाता बिना यासका
भार्या भक्ति विना कुल सुत यिना धेनुश्च दुग्ध विमा।
माना रोद पिना पुरनूप पिना पुराय बिना माया
एते सर्वन शोमत विमपर धारदी व सत्यं विनर
सत्य के प्रभाव से अग्नि जल के समान समुद्र दापूक
ममाम, शख्स फूल के समान, पवित्रा क समान, लिभूग
के समान, विर अमृत के समान और मप माला
जात । विषमस्या भी सम बन जाते है।
थदकर कोई शरण नहीं है। इसी सत्य का
अपनी मूल स्वीकार करनाम
-

(२७)
।
।
1 समय के सत्य के कारण उमका उद्धार हो गया। लोम से
यदकर ससार में दुख नहीं है। क्योंकि लोम के पशोप्राणी
सलम और परलोक में विविध प्रकार के क का प्राप्त
- करता है । मरणास्त कई और नरक की यातनाएँ मौसी
होम के कारण प्राप्त होती है। इसलिय लोम भयका दुख का
कारण है। लोम से होने वाले दुध से मुक होने के लिये
प्राचार्य न सतोष को सुख कहा है। सतोप से बढकर
संसार में कोई मुन्न नहीं है। कहायत भी प्रसिद्ध कि-
'सतोप परम सुखम्' कपिल ब्राह्मण ने इसी स तोप के कारण
केपल शान प्राप्त कर लिया था। रामान राज्य त मी अर्पण
करन का पवन दिया, कितु समोर पर मारूद हुए कपिल का
ये पनीरस मालूम दन लगे। उसन यह पायस चरितार्थ
परदीकि-
गोधन, गज धन, रत्न धन, वचन म्यान सुखान ।
जय वाघे सतोप धम, सप धन धूलि समान ।।
युधि आदि से
मनुष्य
को माती है-
बुद्धि अग्र भपर, पिपीय,
कद्र कुसील मपर मक्सिी।
समिम वित्त भयर अमरथी,
सद्यद्विपस्स भयए सिरीन 142
छायानुवाद
14
जोशात और बिनयी उनको मिति भजती।
क्रोधी कुशील का सहा प्रकीर्ति मिलती।

(२८)
भस्थिर चित पाले धीम मदा रहते हैं।
सत्पथ ६ पथिष ममी घरण परते।
+ शब्दार्प-अचर-मोघ रहित तथा (यणीय ) विनयशीक
को (पुरी) युति भजती है। भक्तिी-प्रीति (पु.)
कोषीय (पशील ) कुशील को भजती है। अलसी-दरिद्रता
(समिनधित) चचल और मान चित्त बालेका (मयर)
भजती है। सिगे-सदमी (समि) सत्य मार्ग में
स्थित
पुरुप
मावाय-प्रोध रहित और यिनीत मनुष्य कोथुद्धिमजती
है।साधी और युशील मनुष्य भर्फीति को पान है। चयन
वृदय पाले दरिनादास होते हैं, और सत्यमाग में स्थित
पुरप लक्ष्मी को प्राप्त करते हैं।
विचन--इस गाथा में यह बताया गया है कि युद्धि आदि
पैसे को मजती है ? मय से पहले यह पताया गया किमोध
रविन पिनीत मनुष्य यो युद्धि परण करती है। क्योंकि शाम
प्रालि के थोक कारणों में विनय प्रधान कारण है। प्राचार्यों न
पिनय पाँच प्रकार का कहा ई-गुरुजनों के आने पर उठकर
खदेडोना नअलि जोड़ना २ उनका यैहने के लिये प्रासन
देना ३ मति वरना ४ और माषपूधक सेवा करना ५। इसी--
लिपे शारत्र में कहा है कि-
में कहा है कि--९५ धम्मस्त विणमा मूल पामा
से मोक्खा। मथात्-विनय धर्म का मूल है धोरमोक्ष उसका
पल है। बिनय के कारण ही राजमश्री अमयकुमार घुद्धि का
सागर मममा ज्ञाता था । इसी प्रकार मोघ और युरेाधरण
थाले को अकीर्ति सेधन करती है। अर्थात् जिसमें प्रोध है

(२६) और जिसका प्राचरण गिरा हुभास्सिार में उसकी अकीति अनापास ही फैल जाती है। प्रकीर्ति दरिद्रता की सहचारिणी है। इसलिये कहते हैं कि समिन्नचित यानी चिता से मान हृदय वाले को दरिद्रता भजती है। क्योंकि जिसका चित्त ही स्थिर नहीं इसको द्रव्य-सदमी-धन या भाय लक्ष्मी शान प्राप्त नहीं होता। इसलिये यह दोनों प्रकार की लक्ष्मी से घनित रहता है। इससे प्रतिकूल जो सत्य में स्थित है, इसको लक्ष्मी षरण करती है। राजा विक्रमादित्य सत्यमाग में स्थिर दोन कारण ही पिस्तीर्ण राज्य का म्यामी पना। येतालादिविविधः भय के कारण भी उसका विगाह नहीं कर सके। कौन किसको छोड़ता है- चयति मित्ताणि मरं क्यग्छ, घयंति पाचार मुगि जयत । चयति सुक्काणि सराणि दसा, चपति युद्धी कुविय मणुम्म ॥६॥ - छायानुवाद एतम्न पुरुष दो मित्र छोड़ देते हैं। सयमरत मुनि से पाप दूर माते हैं। सूखे सरयर को छोड़ इस ए जाते स्यों कोधी जन मति-दीन टोकर खाते। शब्दार्थ-मित्ताणि-मिन्न जन (कयग्य) पृतघ्न (नर) मनुष्य को (चयति) छोड़ते हैं। जयत-सयम में यरन करन पाले (मुणि) मुनि को (पापाइ) पापकर्म (चयति)

-
(३०)
। सुक्काणि-प्पे ( साणि ) सरो को (हसा) हंस (धति)
छोरसे हैं। घुसी युद्धि (बुषिश) क्रोधी (मास्त) मनुष्य
को (घयति) छोड़ती है।
भाषाय--नम्न मनुज को मित्र छोड़ते हैं। सपमी मुनि
पाप छोड़ते हैं। सूरो हुए तालाय को इस छोड़ते हैं और
बोधी मनुष्य को युद्धि त्यागती है।
वियेशन--सर्व प्रथम सम्म पुरुष को मिश्र छोड़ देते हैं।
अर्थात् जो किए हुए गुण या उपकार को भूलने पाना है,योग्य
मित्र उसका मग नहीं करत है। क्योंकि हतघ्न का भार पर्षत
से भी अधिक मा गया है। २ प्रयत्नशील साधु को पाप छोर
देते हैं। अर्थात् जो साधु खान-पान, रहन-सहन य मापा
भादि प्रवृत्तियों में सयमशील है उनके पाप शीम कीट जारी
है । ३ सूरो सरयर को इस छोड़ देते हैं। देगा जाता है कि जप
सरोपर में पानी नहीं रहता और कमल आदि सूख जाते ६,
-सप उसके आधय में रहे हुए हस प्रादि पक्षी भी उसे छोडकर
चले जाते कहा भी है-
वृक्ष तीणफ्ल त्यति विगा, शुष्क सर सारसा ।
निर्गध कुसुमं त्यजति मधुपा , दग्ध पनात मृगा।
निदव्य पुरुष त्यजति गणिका , भष्ट नृप सेपकार ।
सधै स्थार्थयशाद् रमति पुरुषा, नोकरश को घनमः॥
अर्थात् -फल रहित वृक्ष का पक्षी छोड़ देते हैं। सस्ने
नालाप को सारस और ग घ रहित फल को भ्रमर छोई जाते
ई। जले हुए यन को मृग छोड़ देते है। द्रव्य हीन पुरुष को
.

।
गणिका, तापदम्रष्ट गाको सेवक छोड़ जाते हैं। क्योंकि
समी म्यासेयश रेमण करते हैं। परतु यास्तव में किमी का
कोई प्यारा नहीं है।
भव गुण की अपेक्षा बौन गुण से मनुष्य का त्याग देता
है, यह पाते हैं। ४ोधी मनुष्य को युधियाग देती है।
क्योकि मोघ कारण युद्ध मलिन हो जाती है और मान ततु.
भी कमजोर हो जाने शससे निरसर प्रोध का पाला
संह हो अपने युद्धि पल कास्त्रो येटता है।
दिन २ को उपदेश देना होता है-
माय अरथे कहिर विलायो,
मंसपदार कहिए पिलायो ।
विक्षित चित्त कहिए पिलायो,
यह पुसिस्मे कहिए पिलायो nn
छायानुयार
बीती पातों का पणन , दुशारी ।
असमय पुरुष को कहा मी दुपारी ।
विक्षिप्त मनु को कहा है दुखदायी
अयिनीशिय-गुमकामा दुपदायी॥
शम्दा-अयप्रत्ये-किमी नौजना जान परया गई
पार के विषय में (कादर) पहना (पिलाया) विलाप का
का कारण है। मसापहार-असमर्थका (raj कहना
(दिल यो) बिमाण का कारण है। पिर्तिचित्त-समान वित्त
पाले का और (बहुकुसिम्मे) अविनीन शिय या गएको कहना
भी (सियो) मिनार का कारण है।

मघु कारण से ही मुर्म लाल हो जाते ।
सभे मुनि सो निज यात्म-सस्य अपनाने ।
शब्दार्थ-दहपरा-साधारण सपा पर विधान करन
थाले (हादिया ) दुस्यामी (पति) होते हैं। विधाहरा-
विधायर (मतारा) मत्र के माधा य प्रयोग में तत्पर (हरि)
होते हैं। मुस्थान-मर्म मनुष्य (कोयग) माध करने में
मोर सुमारणो) मचे साधु (तताग) सत्य विचार
तत्पर (पति) होते हैं।
भावार्थ-साधारण से अपराध पर ही विधान परमे
पाला दुजाहाता विद्याधरमत्र साधन प्रयाग
में तत्पर होते है । मुर्ख मनुष्य छोटासा कारण पाएमा
बिना कारण भीमोघ में लाल हो जाते है
सदा तत्व विचार में प्रयत्नशील रहते हैं।
विधेचम-दूसरों के मनको खिम परमा दुष्टरों का काम
है। इसलिये अप दुए रामा मादि के जमण कहते
गमा सदी दरदन में तत्पर होते हैं। क्योंकि यह समझत
कि मेरे दह की उम्रता से लोग भयभीत रहेंगे और कोई भी
मरे सम्मुत्र पुछ गहीं बोल सकेगा। जिसराजा की जनता पर
घाक म जमी हो यह गजा ही माग मध्य के
अनुसार हर समय पानी दुष्ट नीति का ही प्रयोग करन
रहत हैं। विद्याधर धिना से मत्र साधना में नगर
है। कातिमाघना के द्वारा अधिकाधिक विद्य या मान
करना हो उनका प्रधान लक्ष्य होना है।
और सच्चे साधु
३ मूग गनु पक्रोध पान म न पर हात ६। चाहे उ

(३५)
पोग्य शिक्षा भी दी जाय, घे उसे विपरीत हो समझो है।
रायण ने अपने हित मित्रों को भी इसी मूर्खता से शत्र समझ
लिये ये भौर निमीषण जैसे योग्य सलाह देने घालों का भी
तिरस्कार कर दिया था। इसलिये कहा है कि-
'उपदेशो हि मूर्खाणा प्रकोपाय न शातये'
और मी-मीच उनको दीजिये जाँको सीख सुहाय ।
सीव दीती वानरा को, घर यया को जाय ।
यथा व-उपदेशो 7 दातय पारो तादृशे नरे।
यथा यानर-मूर्खण, सुगृही गृहीता।
इससे यह सिद्ध हो जाता है कि पूर्व मनुष्य पिना कारण
भी कोपातुर हो जाने हैं। और ये अपने सलाहकार का भी
नाश करना चाहते हैं।
४प्रोध को त्यागने पाले सत होते हैं । अत साधुओं का
लक्षण बताते हैं । उत्तम साधु सदा तत्य चिन्तन में तत्पर
रहते हैं। क्योंकि यात्म तत्व आदि पारमार्थिक पातों के सियाय
अय ससार के विश्य उनको नीरम मालूम होते हैं,
और ये ससाग प्राणी सेनानी विशेषतो भी इसी में मममत
कि अधिक से अधिक समय तत्त्व चितन में बिताया जाय।
तत्व चितन मा एक प्रकार की तगस्या है। इसलिये तप
आदि की शोमा दिखान है-
मोहा भये उम्गतयस्म खनी,
Rमादि जोगो उपसमरस सोदा।

नारा सुझारण चरसस्स सोदा, सीसरस सोहा घिराप पवित्तो हा छायानुवाद है कठिन तपस्या शोभित सत्शाति से। उपशम की शोमा समाधियुत् भाषौ से। शुभ-ध्याशान से शोभित किया वखानी। शिप्यों की शोभा विनय-शीलता मानी ॥६॥ शदार्थ -(उगतवस्म)-उग्रतपम्मी की (पती) क्षमा (उपसमस्स) उपशम भाव की (समाहि जोगो) समाधि भाव है (चरणस्स) चारिम की (सुझाए) शुभ ध्यान थोर (ताण) शा से (सीसस्स) शिष्य का (धिाय) सियशीलता से (सोह शोभा (भये) होती है। है भावार्य-उप तपम्पी की क्षमा से, उपशम भाव की स घियोग से, चारित्र धम का शुभ ध्यान और विचार पूर्ण ज्ञा से और शिष्य की विनय शीलता से शामा होती है। विधेचन-साधुपा तप उपशम आदि भानों की साध से दाता है। प्रतपप इस गाथा म पद पताया कि तपर उपशम व चारित्र आदि की शामा किससे होता है। १क्षमा-पाठिन तप की शोभा क्षमा है। जिस तपस्या साथ ५मा नहीं, यह दूपिन तप है। पॉशि तपस्या करके यदि कोथ का नहीं मिटाया तो यह सप कर्म निजरा में स।

नहीं होकर कपाय माय कारण कर्म वध का कारण पन जाता है। इसलिये कहा है कि- फोर यर्पको तप तपे, एक सहे जो गाल । तिण में नफो है घणो, मेटो मन की माल । महामुनि चिस ने उन तपस्या ये साथ क्षमा रखते हुए यही २ सब्धियाँ प्राप्त करती थी। साढे सोहाइ देश को एक साथ भस्म कर देने वाली तेसो लेश्या की शक्ति भी उनको प्राप्त -धो गर थी। परतु उहाने अपमान सहफर भी क्रोध करता अच्छा नहीं समझा। इसी पल मरूप घे थाराधक बने और दूसरे ही भर में मुन हो गये। यह तपस्या के साथ तमा रखने या महत्व। २ उपशममाघ-क्षमा उपशम भार इसलिये उपशम भाष की शोमा पाते हैं। क्षान दर्शन और चारिन की ममाधि उप- शम भय की शामा है । मान शन और चारित्र के प्रभार में दिखाऊ उपशम या शातपाता एयेदिय या सह में भी विद्यमान है। फिर मनुष्य के उस हा शुय उपशम की विशेषता दी क्या? इसलिये क्या है कि पूर्वक योगों की समाधि ही उपशम भाय पी शोमा है। अब यह पताते ६कि उपशम को शोभित करन वाले चारिश की या शोमाई? । ३ चारित्र-शुम ध्यान युत धान से चारित की शोमा होती है। जिस क्रिया में शाा नहीं यह पेयख श्रमान पर है। भूखे प्यासे तो पशु भी कई दिन रह जाते है, वितु यह उाका कहानुभष तप नहीं कहा । इसी प्रकार समारोप छ सी

लिये कई लोग फलाहार पर ही रहते हैं और प्रत करते हैं।
खी समागम भी नहीं करते हैं। कठिन मासगों से जगत में मात्र
की साधना करते हैं। किन्तु हिंसा भृर चोरी और स्त्री सग
के बाह देने पर भी उनकी यह क्यिा चारित्र नहीं रहाती।
क्योंकि उसमें शुभ ध्यान और धान नहीं है। इसलिये कहा है
कि धर्म ध्यान के साथ सहान धाली पिया ही चारित्र है, और
सम्पगमान ही बारिश की शोभा है। विधिपूर्वक चारित्र की
शिक्षा शिष्य पनने से मिलती है। मत मम शिष्य की शोमा
बताते है।
४ शिष्य-विनय शिष्यस्य भूषणम्' अर्थात् शिष्य की शोमा
पिनय से होती है। जहाँ विनय महो यह मान मि की
योग्यता नहीं होती है। जो शान का अधिकारी नहीं या फिर
शिष्य पैसा?सलिये शिष्य को चाहिये कि यह विनय सम्पन्न
रहे। द्रव्य से गुरुजनों की अपेक्षा अपना मालन नीचा रखे
नीचे स्थान पर वेद और मीरा होकर ही धन्दा करे। क्योंकि
शार में कहा है-
विणको जिरा सामरण मूल, विभो निध्याण-साहश्रो।
विण्यायो वि-मुकम्प कधम्मो को तगा।
विणणामा नाण मापात्रो दसण, दमणाश्रो चरण
चरणेदितो माय,
मापसे सह पावाद ।
अर्थात्-विनय जिन शामन बा मूल और चिन
निर्वाण का साधन है। जो पिनय से रहित उमको धर्म का
और तप कहा ? विनय सशान और शान स दर्शन की मा
होती। दशा से बारिश और शरित स मोज मिलता

जिस मोक्ष में निरामाघ सुप की प्राप्ति होती है। इसलिये
मुमुनु शिष्य को प्रिनय के माराधन में सदा यहा करना
चाहिये। पथक मुनि ने इसी दिनय के प्रभाव से शिथिल पने
हुए अपने गुरु का उद्धार किया था। शेला राजर्पि को जिस
समय रुग्णावस्था के कारण पक जगह ठहरना पड़ा था। उस
समय उनके सासारिक पुत्र जो कि राजा थे, उन्होंने महाराज
के औषधोपचार का प्रबन्ध दिया। जिस से कुछ ही समय में
शैलक ऋवि स्वस्थ हो गए। कितु सरस और मादक पदार्थों
के कारण सयम माय की तरफ उनको ऐसी उदासीनता था
गई कि स्वस्थ होने पर भी विहार करने की इच्छा नहीं हुई।
परिणाम स्वरूप अ य ४६ शिष्य शैला राजर्पि को सूचित
कर स्पय देशातर में विहार कर गये। पंधक मुनि ही मात्र
उनकी सेया में रहे। गुरुजी के प्रमादशील यग जाने पर भी ये
रितर उनकी सेवा में तत्पर रहा करते थे। एक समय
चातुर्मासिक पर्यपादित था। पथक मुनि प्रतिक्रमण करके
क्षमापना करते एप गुरु महाराज के चरण स्पर्श किये । चरण
पर हाथ लगते ही शैला रामपि की नाद खुल गइ। उहोंने
क्रोध में पाकर कहा-कीर किसने मुझे असमय में जगा
दिया? पथक न नम्रता से उत्तर दिया-- भगवन् !
यह तो मैं ही हूँ। अाज चौमासी प्रतिक्रमण की
क्षमा-याचना करने के लिये मैंने भापक चरण का स्पर्श किया
। इसलिये क्षमा करें। गुरु ने पूछा-क्या आज चोमासी पर
दै? पथफ ने नम्रता से कहा-हाँ महाराज, आज कार्तिकी
चौमासीका दिन है। गुम्जी सोचने लगे-क्या मैं इतना
शिथिल यन गया हूँ मि चार महिने के लम्बे काल का भी मुझे
पता नहीं। अहो ? फितनी प्रमाद शीलता ? जिस समय म....

(४०) श्राम शुद्धि करने को तत्पर रहना चाहिये उस समय में सोया पड़ा है। धिकार है मुझे । धास्तव में मेरी इस प्रमादशीलता से दो अन्य शिष्यों ने मुझे त्याग दिया है। श्रम मुझे अपने पूर्व दोषों की शुद्धि फरक यहाँ स शीघ्र ही विहार पर देना चाहिये। ऐसा सोर कर शैलक राजपि ने अपनी शुद्धि करली और जन--- पद में विचरते हुए फिर से अपन सय शिष्यों के साथ पूर्वपत् आत्म कल्याण की साधना करने लगे। इस प्रकार पथक मुनि की अग्तान भाव से की गई सेवा 1 शैलक राजर्षि को पुन जागृत कर दिया था। इसीलिये कहा है कि शिष्य की शोभा पिनय से होती है। शिष्य ब्रह्मचारी होता है। अत अप यह बताया जाता है. कि ब्रह्मचारी पैसे शोभा पाता है- अभूपरणो सोहर यमयारी अकिवणे सोदइ दिक्खधारी। पुद्धिजुश्री मोद्द६ रायमती, लज्जागा सोहइ एकपत्ती ॥१०॥ छायानुवाद सादे पन से शोभित होता ब्रह्मचारी निष्कावन शोभित होता व्रतधारी। है पुशल बुद्धि दी राज्यगत्री की शोभा। सजा से होती पतिव्रता की शोभा ॥१०॥ शब्दार्थ-अमृसणो-आभूषणों से रहित (धमयारी) ग्रह- धारी (सोदा) शोभा पाता है। दिषत्रधारी-दीक्षा घारण (४१) -- किया हुमा साधु (अकिचयो) निलामी पन से (सोइड) शोमा पाता है । युद्धिजुमा-बुद्धि सम्पन्न (राययती) राज्य मत्री (सोइइ) शोमित होता है। पग-पक पतियाली पतिव्रता सी (लजानुमा) लजायुक्त (मोदइ) शोमा पाती है। भाषार्थ-मोना चादी आदिधे गहनों से रहित ब्रह्मचारी गोमा पाता है। दीक्षा धारण किया हुआ साधु घनकनकादि का त्यागी दोपर शोभित होता है। गन्यमत्री कुशत बुद्धि से शोमा पाता है और पतिम्रता स्त्री खजा से शोभा पाती है। विचाब्रह्मचारी पाहिग प्राभूपणों से रहित शोमा पाता है। शरीर को परास्त परने के लिये तोग फेशालकार पखालकार तथा सोा चादी के आभूषणों से देख पा पार करत है। परन्तु ब्रह्मचारी के लिये इन ग्राभूषणों का प्रभाव । यारी अलकार तो उनके लिये पद्दे गये हैं। सावि-- ही शोमा का कारण सुग्णशय्यासन पत्र, ताम्बूल नामसम्। दतकार सुगघ च, प्रहाचर्यस्य दूपणम् ॥ ताम्रा सूक्ष्म परमाणि, स्त्री पथेन्द्रिय योपराम् । दिया निद्रा सदा माघी, प्रतीना पतिताणी पर । अर्थात्-पलग श्रादि सुप-शया मदीन परन ताम्बूल- पान शादि,म्ना मर्दा सपा और सुगन्धित पस्तुचों का सेवा ये ब्रह्मथए ये दूषण हैं।

1
।
(४२)
ब्रह्मचारी दीक्षित होता है। इसलिये कहते है कि "माका
चन शोमते दीदाधारी'। त्यागी मुनि की शीमा अकिंचनपन
है। जहाँ दय सग्रह होगा, यहाखी सगादि अन्य प्रपचों का
यदना सहज है। इसलिये जो दीक्षित हो गया है उसको कांवन
आदि के साहस दूर रहना गहिय । इसी में उनकी शोभा
है । लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि-'साधु कोही रखे तो कोही का।
कान त्यागी की तरह जो धनवनकादि स्वामी है, ऐसे
गृहस्थियों की शोभा बताते हैं-३ राज्यमनी या प्रधात की
शोमा बुद्धि पल से होती है। क्योंकि राज्य का दायभार कुशल
मंत्री के द्वारा चलता है । जिस राजा का मत्री कुशल न हो
उसका राज्य सुरक्षित नहीं रहता। इसलिय कहा गया है कि-
'मनि-दोनश्व यो राजा तस्य राज्य विवश्यति' क्योंकि मत्री
राजा का श्राधा अंग होता है। अतएव उसका अभय कुमार
का तरह घुद्धि सम्पन्न होना ही शोभा का कारण है। ४ पति
मता स्त्री लजा से शामा पाती है। जा ताजा रद्वित होकर
अमर्यादित घूमता है शाफ में यह निदनीय समझी जाती है।
जिसकी श्रॉख में लज्जा है वही पुली स्त्री है। संकड़ों दुराइया
दोन पर भी माजाशील यति सुधार सकता है लेकिन लग्ना
हीन व्यक्ति का सुधार भसभव है। इसलिये प्रत्यक पुरुष
बुरे काय करने में लज्जा करनी चाहिय । यही लजा पतियता
का भूपण है।
अपनी आत्मा ही शत्रु और मित्र होती है। इसको
पतात है-
अप्पा अस होइ अणटिमस्स
प्रपा जसो सीलमयो नरस्त ।
को

की धारमादी शरण और
होनेहा अप्रrrit
भावार्थ-अस्थिर चिस पर मनुहाटी।
शीलपान् मनुष्य की मामाहानिनिही है।
अत्यस्थित मनुष्य की
मात्र दे। बिग
मित्र या शत्रु हरिमाया गुरु
( ४३ )
प्रप्पा दुरप्पा अण्वष्टिमम्म,
अप्पा जिनपा सरण गर ।
छायानुसार
अस्थिर जनकी श्रात्मा ही शत्रु कहानी।
है शीलयान नर की आत्मा या
चचल नर की प्रात्मा ही दुष्ट
है इद्रियजित आत्मा ही शरए ।
शब्दार्थ-गणयविमस्म-अस्थिर निशान
आत्मा (अरी) शत्रु (होर) होनी है। सन्
(नरस्स) मष्य की (अग) aktry का
कारण है। प्रणयटिअस्स--प्रव्यवस्टि)
आमा दी ( दुरप्पा ) दुग मा है।''
(अप्पा) आत्मा दी (सपा) (ई)
गति है।
।
विचा-मनुष्य का अला
यताते हैं।

(४४)
श-धनवस्थित थामा ही अपना पत्र है। पकि
जिसके मा, परन और पाय याग स्थिर नहीं, उसपे नुन
की मी नहीं रहती। रागन था मानसिप चचामा
और परस्त्रीगमन की मापना से डीसीताण दिया।
यदि उसने सीमा EFiftarETो उसे राम और
लक्ष्मण क्यों मारी इसलिये
रायण को मारमे याने
लक्ष्मण नहीं, वितु अरासियस में उसकी सीता ERO रूप
दुर्भावना है।
पश-शोलयान वाधारमाटी यशपापा जिसमें
सदागर कापत है, उसको अपनी कात्तिपेला लिया तो
में घोषणा करने की भावना होती और पैसे धर्य
कर नाम कमाने पीही या होती है। उस पविध साधरण
सुषास से जनता स्थय को जीति परने लगती है। से
सुदर्शन न हमी शील
गुण मे ससार में अपना अमर IIFE
प्राप्त दिया था।
दु-रल वित्त पाते दो यात्माको दुध मारमा
दुर्जों द्वारा होने यालामाश उपायों मे मिटाया जा सकत
परतु अपने विस की लता सोनयाला नाश उमन
लोक में दुरदायी होता है। इसलिये यही सो दुरारमा
शरए-यशम कीगढ़ अपनी धारमा ही
शरण
और उस
गति की कारण है। शाय में कहा कि-
अप्पा गई घेयरणी, भाषा मे पृत-सामती ।
थमा कागा धरण अपो म नदण पण॥
दे

--- -- T अर्थात्-अपनी आत्मा ही पैतरणी नदी और नरक के शाल्मली वृक्ष के समान दुरा देने वाली है। श्रात्मा ही कामधेठ और न इन पन के ममान सुख दनेपाली है। इसलिये दूसरे लोगों पर शत्रु भोर मित्र कोरपना करना व्यर्थ है। अगर अपनी आत्मा को जीत लिया जाय तो मसार में अन्य शभ रहेंगे दी नहीं। इसीलिये कहा है कि जिनेन्द्रियपन ही सशा शरण और सद्गति का कारण है। कन्ध्याकर्तव्य पया है। यह यताते हैं- न धम्मज परमस्थिज्ज, ए पाणिहिंसा परम अकज्ज । न पमरागो परमत्थि यधो, नयोदिलामो परमस्थ लामो ॥१२॥ छायानुयाद ६धर्म काम से पढकर काम कोई। प्राणीषध से पदपर दुधर्म नहीं का॥ , स्नेह-राग मम घडा पथ नहीं दूजा। है योपिलाम सा उत्तम लाम न दूजा ॥१२॥ शब्दार्थ-पम परज-धर्म चाय को घोर घर (पर) दुसरा (काज) कार्य (ण अधि) नहीं है। पाणि हिंसा-जीच हिंसा से पढकर (प) दूसरा (अपक्ष) अकाय नहीं है। पेमरागोपर- प्रेम राग से बढकर दूसग (बघा) पधन नहीं । गोहिलामो- घोधिस्लाम के सिपाय (पर ) दुसरा काई (लामो) लाम (क मयि)महीं है।

(४६)
भावार्थ-धर्म कार्य को छोड कर दूसग काय नहीं है।
प्राणियध से पढकर दूसरा कुम नहीं है। म्नेह न्यधन
से
पदपर दुसरा पचा नहीं और सम्यगमान के घढ़कर दूसरा
लाभ नहीं है।
विचन-जितेन्द्रियपन धर्म का काम है। इसलिये इस
गाथा में पताया गया है कि सबसे पहावाम कौनसा है ?
कार्य-धर्म काम से बढकर अय कोई कार्य नहीं है।
ससार ये करणीय काम तो इस लोक में ही उपयोगी होते हैं,
पर तु धर्म इस लोक और परलोक दोनों में उपयोगी धनता
है। प्रत करने योग्य कामों में धर्मको पहा कहा है। भरत
महाराज को जिस समय प्रायुधशाला में वरन प्रकट होने
की सपर मिली, जा कि वर्ती पद के लिये मगत सूचक
यात थी। उसी समय यह भी खयर मिली कि नगरी के पादर
भगवान् ऋषभदेव पधारे ह । तर उदीने घात्म की सुशी
न मना कर भगवान् अपमदेव को घदा करने के लिये जाना
दी उत्तम समझा । क्यों चक्ररत्न पी
पूजा
के सामने भग
यान ऋषभदेव को धन्दन करना उन्होंने बड़ा समझा था।
अकार्य-जीव हिंसा से पढकर कोइ अकर्तव्य नहीं है। पर्याकि
हिंसा धर्म समाज और राज्य से निपिद्ध है। यह इस लोक में
ही नहीं-परलोक में भी दुपदायी है। क्योंकि हिसा करने में
अय पापों का भी सहज ही सेघन हो जाना है। इसलिये जीध
सा जैसा दूसरा कोई अक्तय नहीं है।
घध-यधन प्रकार के हैं। उनमें स्नेह-राग का पधन
से बड़ा है। स्नह बयन से यदकर कोई अय चयन नहीं
1

(४७)
है। क्योकि लोहमय खलाया तो मनुष्य तोड़ सकता
परतु स्नेह का पचन तोड़ना कठिन है। राय पैमय का
स्याग कर मुनि पने हुए भी भाद्रकुमार मोहयश मयम से गिर
गये और खो केम्ने भाष पर मुग्ध होपर ऐसी प्रतिज्ञा
गये कि जब तक तुमको पुष का अवलम्बन नहीं होगा, मैं साधु
मही धनूगा । प्रतिशा अनुसार जपुन हो गया तय आप
मायु पनन को तैयार हो गये। उनकी स्त्री ने भी अपना सहारा
हर निकाला। जय तर याला योग्य न हो जाय तप तक उसने
घरमा चखाना निश्चित किया। जब उनके पुत्र नेमाको घरमा
चलाते देखा तो उसने अपनी मा से कहा-मा, तुम घरखा
क्यों चलासी हो? क्या अपने यहां पैसे की कमी है। पिताजी
के
से अपार धन मौजूद है। घरों तक यैठे २ याये तय मी
समान न हो। फिर यह गरीवी का धघो क्यों कर रही हो।
मान उत्तर दिया-बेटा-तुम अभी छोटे हो। जेल-कद और
पदार को ही अपना मसार समभते हो, परतु मुझे अपना
ससार चलाने के लिये सबकुछ देखना पडता है। तुम्हारे पिता
तो पल साधु होोधाले हैं। फिर मरे जीपा का सहारा क्या
होगा। अभी नो तुम्हारे पिताजी की मेया से भी मेरा समय
धीत जाना है, किन्तु उन चले जाने पर मैं अपना समय मे
यितागी निकम्मी बैठी रहा है या इधर उधर फिर से
नो ममार मनिश होगी। इसहिये मन सुख र अपना समय
यिताने लिये चरये कामहारा लिया है। श्रय यही मेरी मजा
रमन याला है । पुत्र पोला-मा, फ्या पिताजी दमको डर
चले जायगे १ नहीं, मला ये यहा से कैसे जा सकते हैं। मैं
उहे नहीं जान दृगा। लो अभी उनको डोरो से यांध देता।
पहार बह याने पास में मोटुए पितानी को बच्चे सूत
।

(४८)
से पाचने लगा। भाद्रपुमार भी पालक को पात सुनकर चकित
हो गये । घे मन में सोचने लगे कि यानपा मेरे पर कितना
स्नेह है ? जब इसकी ऐसी इच्छा है तो यह जितनी पारसन से -
लपेटे, उतो घर्ष फिर,यर में रह जाना चाहिये । पालक ने त ।
के १२ लपेटे रागा दिये। उसके ये १२ फच्चे सूत धन भी "
भाद्रकुमार करािये पन्नमय या गये। इसीसे उनको फिर १२
'घर्ष संसार में बिताने पडे । इसलिये कहा है कि स्नद पधन सब
यधनों से यहा है।
लाम-योधि यानी सम्यक्य नाम से पदकर संसार
में कोई काम नहीं है। शास्त्र में कहा है-
लमति यिउला भोप, लमति सुर सपया।
लमति पुत्त मित्ताणि, पगो धम्मो सुदुल्लहो ।
अर्थात्-संसार के विस्तीर्ण भोग जीव को कर पार मिले
है। देयों की सम्पदा और पुत्र, मित्र आदि सयध भी मिल
सकते है। लेकिन एक धर्म पानी सम्यक श्रद्धा रूप पोधि धर्म
का मिराना अत्यत दुलम है। निरतर येले २ तप करके
चारित्र की साधना परो पाला भी अभव्य जीप सम्यक्ष
नहीं पाने स संसार में लटका रहता है। नप प्रैवेयक तक
जापर उसकी प्रगति रुक जाती है। दूसरी तरफ जिसको
सम्यक्त्य का लाभ हो जाता है, पहचारित्र के अमाय में भी
ससार काभत कर लेता है। जैसा कि कहा है-
अतो-मुदुत्त-मित्तपि फासिय हुन्ज जेदि सम्मत्त ।
तेसि अपड्ढ पोग्गल-परियो चेय ससारो।
-

( ४ ) भयात्-जिस जीरो अतमुहून जितो अल्प समय भी “सम्यक्त्य का स्पर्श-लाभ कर लिया है, उसके लिये अर्ध पुद्गल परावर्त काल हो ससार याकी रहता है। यानी सम्यक्त्व पा लेन पर जीर की मुक्ति निशित हो जाती है। इसलिये सम्यक्त्व लाभ को ही सब लाभों से पहा पाई। पिसका ससर्ग नहीं करना चाहिये- म सेपियवा पमया परफ्का, ण सेयियव्या पुरिसा अधिना। न सेवियध्या श्रदमा नदीमा, सेवियपिसुणा मणुस्सा ॥१३॥ छायानुवाद है परनारी नहीं सेयन करने लायक । दीं मूर्ख पुरप भी मगति परोसायक। नहीं नीच हीन र सेवा के है लायक यो युगलखोर भी नहीं मग के लायक ॥१३॥ शम्पाय--परमा- दूसरों की (पाया) खो का (न सेयियच्या) सेवा नहीं करना चाहिये । अविज्गा-मूर्ख (पुरिसा) पुरुप भी (म सेवियध्या) संसर्ग करने लायक नहीं अहमा-अधम-नीच मनुष्य और (टीप) हीन मनुष्य भी (न सेविषया) सेपा योग्य नहीं हैं। तया (पिपुणा) चुगल सोर (मएस्सा) मनुष्य भी (न सेवियया) संगति परोयोग्य करनी चाहिये। कदावत दि-ज्ञान घटेनर मूहको सगत मनुष्य मरगे लायक नहींनीच मोर हीन मनुप्पा ससर्ग यामही कसा चाहिये नवा परिचय करात अपनी पस्तुधों पर ही सतीष कर। दूसरों की सुर चीजे देखकर भी प्रहण करना नदीचा आज तक संसार में जितने भी युद्ध हुये ६ सय घन दारा भीर भूमिके निवास प पय युमिरन कादूर से ही छोड़ देने चाहिये। क्योकिरायण शोर पद्मोत्तरजसराजान इसी पर-खीगमन कीभायनासपने प्राण पराश्यगमा दिये थे। पदसलाक की तरह वह परमोभी दुर्गति का कारण होता।सलिये ( ५.) भाषा-पर स्त्री यासया महाँ परमा चाहिये। मूर्ख है चुगलमोर पादमी भी संगति ल योग्य नहीं है। थियेवा-सम्परय की प्राप्ति से पहात होता है कि पालय में देष और उपाय ! सनिये पहा जिला है। र यो कासेपन TET चाहिये। संसार की शाति सुरक्षित रखने के लिए भी यह मायश्यक है कि मनुष्य कारण ही हुए हैं। जिन पर एक दूसरे की युद्धि विगा जाती है। इसलिये नीतिकारी नाक- परान पर पर च, पर शुप्या परनिय । गर वेश्मनि पाम च, दूरता परिपर्जयेत् । दूसरों के अन्न, पर, शय्या और खी तथा पर घर में - सुद्धिमान को भूलकर भी पर नोवाया नहीं करना चाहिये। २ पर-स्त्री गमन प्रादि दुस्माको भावना सति से होती है। इसलिय कहा कि भूत या प्रसदनान वाले की साति नहीं मुखों को समति से प्रारयता

।
-
1
३मूनों की तरह नीच मनुष्य भी गति करने योग्य नहीं
है। जिनको धर्म अधर्म का विचार नहीं होता ये नीच कहाते
है। उनकी समति से सज्जन भी मलिन हो जाता है । धर्मराम
युधिष्टिर पदि दुर्योधन सी सगति नहीं करते तो जूए में गज्य
गाने का समय नहीं माना। यह कुमगति का ही फल है।
इसलिये नीति कहती है कि-
दुर्जन परिहतम्यो विद्ययाऽलतोऽपि सन् ।
महिनाभूपित सर्प, किमसी न भयकर ।
अर्थात्-दुर्जन विद्या से युक्त हो तो भी त्यागने योग्य है।
क्या मणि से भूपित होने के कारण सर्प की भयकरता चली
जाती है। नहीं। इसी प्रकार विद्यावान भी दुर्जन, दुर्जन
ही रहता है। प्रत त्याज्य है।
४ दुर्जा चुगलखोर भी होते हैं। इसलिये कहा है कि
पिशा यानी चुगलखोर का भी सग नहीं करना चाहिये।
चुगलखोरों के पचा जैसे.मीठे होते हैं वैसे ही उनके काम
भयकर होते है। नीति में उनका स्वरूप इस प्रकार कहा है-
नाजिर समाकारा दृश्यते केऽपि सज्जना ।
अये पदरिकामारा,
यदिरेष मगोरमा ।
अस्-नारियल के समान यादिर से कठिन स्थमाय पारले
कर सज्जन होते हैं, लेकिन दूसरे दुर्जन योर (घेरफा) के
समान ऊपर से ही मनोरम होते है भीतर सो कठोरता मरी
रहती है। दुर्जन का स्थमाय होता है कि यह दूसमें छोटे से
शिव को तो देख लेता है, परन्तु अपन पड़े छिद्र को नहीं देखता।
इसीलिये कहा है-

( ५२ )
खल सर्प मात्राणि, परविदाणि पश्यति ।
प्रारमो विस्यमाचाणि पश्यताऽपि न पश्यति ।
अतएध-परोक्षे कार्प-हतार्य, प्रत्यक्ष प्रिय पादिनम् ।
पर्जयेत्तादृश मित्र विपकुम्म पयो-मुखम् ।
प्रत्यक्ष म मधुर पोहो याले और परोक्ष में काम विगाइने
घाले मित्र कामा त्याग करना चाहिये-
इसगति का निषेध करके अप मुसाति का विधान
करते है-
जे धम्मिया ते प्रलु सेवियम्पा,
अ पडिया त पलु पुच्छिपन्या ।
जे साहुणो ते अभियदियाघा,
जे निम्मा ते पडिलामियध्या।१४।
दायानुवाद
जो धार्मिक मथा करन लायक।
जो पहित ये सग पूछने लायक।
जो साधु हैं घे यन्दन करा लायक।
जो निमम जायही दान के लायक।
शदाथ-जे घम्मिया-जोधार्मिक मनुष्य हैं (ते) वे (बलु)
निश्चय से (सेवियव्या) सेवा के योग्य है। जे परिया-जो
परित है वे निश्चय से (पुच्छ्यिव्या) पूछन योग्य
साहुणो-जो साधु हैं घे अवश्य (अभिवदियव्या) नमस्कार
योग्य है। जे निम्ममा-जो निर्मगये (पहिलाभियावा)
पारमार्थिक दान के सुपात्र
1

भावार्थ-जो धार्मिक पुरुप हैं ये सेवा के योग्य है। जो
पडितजन है ये अवश्य तात्विक विषय में पूछने पोप है । जो
सात महात्मा है ये थरश्य धन्दनीय है। और जो निर्मम-ममता
रहित हैं ये ही पारमार्थिक दान के सुपात्र हैं।
विवेवन-१ जो धामिक पुरुष है ये सेवा करने योग्य है।
क्योंकि धार्मिक पुरुषों की मगति से धर्म भावना का सचार
होता है। यढे २ पापी भी धार्मिक पुरुषों को समनि से सुघर
गये हैं। अर्जुनमाली जैमा प्रतिदिन ६ पुरुष और १ स्त्री की
हत्या करने पाला भी भर सुदर्शी की सगति से तिर गया
और भगवान की
कृपा
को पाकर उसीभव में मोक्ष चला गया।
इसलिये धार्मिक पुरुषों की सेवा करती चाहिये।
• जो तत्यम है उनसे तत्वज्ञान के प्रश्न पूछो चाहिये।
'पडित घेई जो शान के साथ कियाथान है।' ऐस पडितों की
सेया मे हो मन के सशय मिटने हैं। राजा प्रदेशी जैसा पूरा
नास्तिक, जो शरीर से भिन्न प्रात्मा का अस्तित्व ही नहीं
मानता था। यह भी केशीथमण जैसे पडित मुनि की सेपासे
'आस्तिक हो गया। उसने केशीथमण से अपना संशय मिटाया
और फिर राज्य का मोह छोड कर कठिन तप करता स्वीकार
किया। फल स्वरूप दुर्गति में जानेवाली उसकी मात्मा स्वर्ग
में गई । यह परितों की सेवा का ही परिणाम है। ऐसे ही
सुखदेव सयासी ने थावरचा पुत्र से प्रश्न पूछ पर अपना
संशप दूर किया था। इसलिये पहितों से घिनय पूर्वक छ
पूछना
चाहिये।
३ जो सन्त पुरुष हैं उनके सम्मुच जाकर पदन

( ५४ ) चाहिये । क्योंकि ये ही सच्चे पडित हैं। साधु जनों के पदन से कर्मों को महान् मिर्जरा होती है। घदन करने घाला ीय नीचगोत्र का तय करके उच गोत्र काय करता है। शास्त्र में 'वदणरण नीयागोय कम्म प्रह, उशागीय क्म्म नियई- सोग्ग पण भपाहिय प्राणापल निघतेह।' पदन से जीय नीच गोत्र का क्षय करके उश-गोत्र का पध करता है। उससे अप्रतिहत सौभाग्य और अखद्ध माशा की प्राप्ति होती है। कदायत भी है- सनन की सेवा दिये, प्रभु रीमत है माप। जिनके बाल रमाइये, उनके रोझत पाप । इसलिये साधुओं के सम्मुख जाकर वदना करनी चाहिये। ४ जो ममतारक्षित निस्तामी है ये प्रतिलाम देने योग्य है । सत्पु रुयों को आहार आदि देन से दाता को महान् लाभ प्राप्त होता है। इसलिये हमको प्रतिस्लाम कहा है। सगम ग्याले ने यही इच्छा व स्त्रीर पाया थी। लेकिन जिस समय पर खाने को घेटा, उस समय उसकी प इच्छा हुई कि कोई महात्मा आजाय और उनका कुछ देकर स्वाऊँ तो अच्छा प्रण्योदय से उसके यहाँ महात्मा पधार गये। उसो घडे प्रेम से उसको स्त्रीर का दान दिया। थाल पाली हो जाने पर भी इसको दुम्न नहीं हुआ। इसके फलस्वरूप उसको शालिभद्र की ऋद्धि प्राप्त हुई । इस प्रकार सगम की पुण्य वृद्धि का कारण सत्पात्र कादान दी समझना चाहिये।

दान को धेष्ठता का प्रधान कारण भार है। इसलिये प्रय भाव की अपता से पद की समानता दिखाते हैं- पुठा य सीसा य सम विभत्ता, रिसीप देवा य सम विमत्ता। मुफ्वा तिरिफ्ना य सम विभत्ता, मुया दरिदाय सम विमचा ॥१५॥ छायानुयाद है शिष्य और मुत दोनों ही सम जाना । मुनि होते देर समान यात यद मानो। है मून मनुज को पशु तुत्य पतलाया। मृत और दीन जन को इसम समझाया। शब्दार्थ--पुता-पुत्र (य) और (सीसा य) शिष्य (मम धिमत्ता) समान थेणीवाले हैं । रिसी य-मृपि और (दया) देव (समधिमत्ता) समान होते हैं। मुक्खामून और (तिरक्खा) नियंच समान हैं। मुश्रा-मरा दुधा और (दहिया दरिद्र (सम विभत्ता) ममान समझे जात है। भावार्थ-पुध और, शिष्य, प्रापि और गर, भूर्व और तियंच, तथा मरा हुचा और दरिद समान । विधेचन-पुत्र और शिष्य समान नि में दस प्रशारके पुत्र कहे हैं। जिसमें 'म ग्यापी अनयामा यानी शिष्प का भी सम्बर माना हैपंचर से और दूसरे का मान मे है। दानों ही दिन में मुख पाते हैं। दूसरा कारण यह है कि मनुष्य, R और सस्कार -

और
से उत्पन्न होता है। यहाजाम देशयाला शरीर पापिता औr
शिक्षा से सवार देनेयाका पारमा का पिता है। मलिपे पुत्र
और शिष्य समान बह गई।
पेम दो परिमुगि और देव
समान पहे गये हैं। देव विमान आदि प्य शुद्धि पाले हाट
हैं और मुलि माय वृद्धि याने। समरपुमार शमयता के रूप
को देवा के लिये एक देव म घूढे मामण का रूप प्रगापा
सिर पर गठरी लिये हुए पायी २ या हुँया। उमा
हारपाल से कहा कि मार मुझे महाराज के दर्शन करने हैं।
अगर तुम परा दो तो यही एपादो। इस पुढापे में जिदगी
का क्या मरोसा मजाक सासमाय । इसलिये
मेरी या दहा कि मैं से पहले पप चार माराम के
दर्शन कर ल । हिर मर भी गया गा फोगिता की पात
नहीं। द्वारपाल बार महाराज से दिम दिया किन्तु
इस समय सान का समय या महिपे महाग घटेको
युवापर कहा कि यदि तुझे मेरा रूप ही देखना तो फिर
राजसभा में आपर देखना । ममी तो मुझे स्नाादि
निय
टना। यूढा उन्हें देखकर पहा प्रमान गुमा। राज समा के
समय उसको फिर याद किया गया। हरिन स समय घर
पसी को अहकार साधुश था । जय उन्होने पूढे से पूषा कि
फदो रूप कैसा है तब यूढे न सिर धुनार कदा-महाराज
शरीर में तो कीड़े पड़ गये हैं। घायता को शरीर की रस
नश्वरता से पैराग्य हो गया। और पे राज्य छोड़कर साधु
पन गये । पुछ दिन याद यही देय चैध मारूप पर प्राय
और दवा ली दया, यह कहते हुए मुसीको पास से निकला
महाराज ने पूछा-माई, सुम अपनीषा से कौनसा रोग
मिटाते हो? क्या जम मरण वा रोगमी मिटाते दो देव।
1

-
कहा-नही महारज में तो शरीर रोग मिटाता हु ! जाम
मरण रोग मिटाना मेरी शक्ति से परे है। महाराज ने कहा-
अरे, इसमें चाहे ? शरीर का रोग तो जरा सा था लगाने से
ही मिटाया जा सकता है। ऐसा कहकर मुनि ने शुष की पर।
अाली अपने शरीर पर लगाई और देव से पूछा-पो प्रय
गेग कहा है ? देर मुनि के अलौकिक तपोयल को देख कर
चक्ति हो गया और मम्कार करने चला गया। मुनि के
तपोयल ने देवता को भी लत्रित कर दिया। इसतिये देय और
ऋषि को समान कद्दा है।
३ मूर्य थोर नियंच समान है। क्योंकि विधेक ने सूय दोने
के कारण मूर्स भी पशु के तुल्य है। पद भावारमात्र से ही
मनुष्य है। नीति में कहा कि-शानेन ट्वीना पशुभि समाना
अर्थात् शाम-हीन मनुष्य पशु के समान है। इसलिये मूर्ण और
पशु समान रहे गये।
४ मृत और दरिद समान है। क्योंकि जीता हुभा भी
साधनहीन होने मे दरिद्र कुछ नहीं कर पाता है। जिन्दा भी
मरे हुए थे समार होता है। इसलिय मृत और दरिद्र को
समान पद्दे गये हैं।
धर्म की सर्वश्रेष्ठता दिगते हैं-
सय्या क्ला धम्मकला जिणाद,
सचा पहा धम्म-कहा जिणा)
मध्य पल धम्म यल जिणाद,
सध्य सुद्ध धम्म सुह जिणार
छायानुवाद

यो समीकला में धर्म का पिजयी । स्यों समी पथा में धर्म का विजयी । सय या काजीते एr धर्म या सशा । सय सुध में सुपर घमासा ॥६॥ शदाई-सप्याकला-सयवमानों की (UFFERI) धर्म पक्षा (जिणार ) जात लगे। सम्याकहा-समाधामों में (धम्म फहा जिणा) घमस्या जययन भौतिक पता पो (धमयल) घम पल जीतता है। धम्मसुद- धर्म से दान पामा सुख ( स प मुद मिला) सप मोतिक सुखों को जीतता। माया-मसार की ममी कसा धर्म कसा + सामने मगरय है। मसार की ममी क्यामों में धर्मस्था प्रधा। ससार भौतिकतो परधर्म पलविता धर्म से होने या मारिमा सुन के सामन अय पौगलिक पुत्र मिरा-समी तुच्छ । - विषयन-१ कला-धर्मकला सयपालामापा जीना चाली है। ससार की ७० बनाए धमकला पिना सारा क्योकि सम लाभों का जानकार मा धर्मका पिता ससार से पार महीं हो पाता।पदा मोहे- सकलाऽपि कला कलायता, विकलाधर्म मा बिना तु। सकले नयन पृथा यथा तनुभाजा दिकनीनिया बिना। इसलिये दाईक- कला योहत्तर पुरुष की, जिणमें दो सरदार। एक जीय प्राजीया, एक जीव उद्धार ।

(५६)
२ कथा-स्त्री-पया भक-कथा, ग-क्या और देश
क्या य ससार में चार कथोरे प्रसिद्ध है। धर्म-पथा उन सब
कथाओं को जीतने वाली हैं।
३ पल-धर्म यात सय यलों में उत्तम है। ससार के धनपल
जनशन और गययन जहाँ वेकार होते है यहाँ धर्मपल समर्थ
रहता है। नीति भी कहती है कि-
चन जने शत्रु जलाग्नि मध्ये,
महाथे पर्यत मस्त था।
सुप्त प्रमत्त विपर्मस्थित पा
रक्षति पुरयानि पुरातानि ।
श्रर्थात्-धन में गा लोगों म, शत्रु जल तथा अग्नि में,
महासमुद्र या पर्वत के शिखर पर माये
हुप, प्रमत्त
बने
'विषम स्थान पर रहे हुए प्राणी की पूधज म पुण्य की रक्षा
परते हैं। इसलिये सय यलो में धर्मपल ही श्रेष्ठ है।
४ सुप-समार के सय सुषों को धर्म मुख जीतता है।
"क्योंकि समार के सुख पोद्गलिक होने से नाशवान है, और
धमका सुत्र आत्मिक होने से अधिनाशी है। जैसा कि कदा
है- सुहाइ सतोस सारा स तोप सुखों का सार है, जो
धर्मरूप है। इसलिये कहा है कि सय सुखों में धर्म सुन बहादे।
सप्त व्यसनों से हो। वाले दुष्परिणाम कोअप दो गाथाओं
में बताते हैं-
जूप पसचस्स घएम्म नासा,
मसे पसत्तस्स दयाए नासो।
हुपया

H (६०) मज्जे पमत्तस्स जसरमगामो, पेस्ता पसत्तस्स कुलस्स नामो।१७१ छायानुवाद जूनारी अपना दय समी ग्योता है। जा मासभक्षी यह दया निमुप होता है मदिरा प्रेमी अपना यश यो देता है। वैश्यागाम का घश नाश होता ॥१७॥ शदार्थ-जूए पमत्तम्स-जूए के ध्यसी को (घणस्स) घग का (नासो) नाश होता है। मसे पसतम्स-मांस भक्षण करन पाने की (दयाए नासो) पया का नाश होता है। मज्जे पसत्तस्स-मध फेन में भामत रहने पाले के (जसस्तनासो) यश का नाश होता है। पेसापसत्तस्स-येश्या-लम्पट के (कुस्साासो) पुरुष का नाश होता है। भागर्थ-जूए के व्यमनी का घन न होता है। मांस मक्षीक हृदय में दया नहीं रहती है। मघ के नशे में शासक रहने वाले का यश नष्ट हो जाता है। तथा यश्यागामी के पुल का नाश होता है। विरेचन-धार्मिक पुरुष व्यसनों से दूर रहते हैं। इसलिये यहायसनों से होने वाला दुष्परिणाम दिसाते है- १ चत-जूश्री पेलन से धन का नाश होता है। दुनिया के लोगों की सदा यह इच्छा रहती है कि किसी तरह धन सचय दिया जाय । धनी हो या गरीय दोनों ही इसके लिये उद्यत रहते हैं। जप उनको यह मालूम होता है कि बिना

(६१)
भयोग पधे के हो अमुक व्यक्ति ने ग्वेज ही खेल में हजारों रुपये
कमा लिये, तो उनकी लालसा और भी प्रयत हो जाती है।
ये मी उस सेल में जिसको जूना कहते हैं, याजी मारने लगते
हैं। जुना में याद कभी पानी जीत गये तय तो इच्छा होती
है कि दूसरी पार फिर और लगात। अगर हार गये तो इच्छा
होती है कि स्त्रोये हुए रुपय तो प्राप्त करतें । अन्यथा लोगों की
मया मुँह दिखायेंगे ? इस प्रकार दोनों हालत में जूमारी को
उस पद से पिर निकलना कठिन हो जाता है। आज भी
थाप सह पालो से इसका पूरा अनुमय ले सकते हैं। संकों
को परमाद होते देख कर भी लोग इसमें फसे जा रहे है।
उनको याद रखा चाहिये कि पूर्व समय में धमगन युधिष्ठिर
और राजा मल जैसे भूपति इसी जूप में अा राज्य सो पेटे
याज भी इस एके कारण अनेकों धीमतों को अपने
माय त्यागी पडे है। वास्तव में यह तदमी और कीति दोनों
का नाश करने वाला है।
२मास-मास भक्षण करायाले की दया नए रोनाती
है।योकि प्राणियों की हिंसा के बिना मांस की प्राति नहीं
होती, भीर हिंसा परम में या बुद्धि नहीं रहती। जैसा कि
स्मृतिकार ने कहा है-ACCIA
ना त्या प्राणिनां हिमा, मासमुत्पद्यते चित् ।।
1च प्राणियघा स्थर्य स्मामाम वियर्जयेत् ।
प्राणिय पिता मासपी सत्पत्ति नदा होती है। प्राणि-
पदिय पाय है, इसलिये मास का त्याग करना चाहिये।
देविये और भी कहते हैं-
..
1

१
( २ )
न ग्राह्यानि न देयानि, पड वस्तूनीह पडितै ।
अग्निमधु विप शस्त्र, मद्य मास तथैव च।
अर्थात्-विद्वानों को ससार में छह घस्तुओं का दान और
ग्रहण नहीं करना चाहिये। जैसे-१ अग्नि, र मधु, ३ विष,
४ शस्त्र, ५ मद्य और ६ मात ।
३ मद्य-मद्यपान करने वाले के यश का नाश होता है।
क्योंकि मद्य बुद्धि का नाश करता है। जिसकी बुद्धि मलिन हो
उसको मला कीर्ति पैसे मिल सकती है इसलिये कहा
मद्य-शराय कीति का नाश करता है।
४-यश्यागामी का फुल ए होता हे। क्यांवि पैश्यावृत्ति
पाले का चित्त सदा अपने घर से विरक्त रहता है। उसका
प्रेम अपनी विवाहिता स्त्री के साथ नहीं होता। इसलिये कुत
वृद्धि में कारणभूत सतान की प्राप्ति भी नहीं होती है। इस
प्रकार घश नाश ही नहीं घेश्यागामी के तन और धन का भी
नाश होता है । जगत में उसकी प्रीति फैलती है। इसलिये
समझदार को पैश्यागमन नहीं करना चाहिये ।
हिंसा-पसत्तस्स सुधम्मनासो।
घोरी-पसत्तस्म सरीरनासो ।
तहा परत्थीसु पसत्तयस्स,
मध्वस्स नासो अदमा गई य।
छायानुवाद
हिंसा करने से धर्मनाश होता है।
चोरी करन से तन यल सप घटता है।

परदारागामी तन धन सप खोता है। पुल धर्म छोड़ गति तीच प्राप्त होता है। शा-हिंसापमतम्म-हिंसा करने वाले के (सुध- मासो) सुधर्म का नाश होता है। चारीपसतस-चोरी करन थाले का (सरीरनामो) शरोर नाश होता है। तहा-घेसे (परस्यो) पर स्त्री में प्रासक्त रहने पाले का (सव्यस्सनासो) रुप कुछ नाश हो जाता है और वे नीच गति को प्राप्त पाते हैं। । पियन-इस गाथा में शिकार करना, चोरी करना और परखी गमन करना श्रादि दुश्मनों का कटु फल मनाया गया है। ५-शिकार करने वाला हिंसा की रसिकता से दया रूप सधर्म का नाश करता है। इसलिय का सारतिष मनुष्य के धर्म का नाश होता है। धर्म के नाश होने पर सुगति पानाश तो अयश्यम्भायी है दी। ६-चोरी करने वाला इधर उधर जगलों में बचाप लिये फिरता।घोर विसानियत स्थान पर सुखस नहीं रह पाता। उसयो भूख, प्यास और सर्दीलामी के विविध कट भी महने पड़ते हैं। अगर पदों भर ग्युल गया सानन घन और कानि से भी उसे पाना पड़ता है। जो की कठिन यातनाएं सहनी पड़ती है।ससि कहा शिघोरी करने वाले के शरीर का नाश होता है। ७-पररनी गमन साना व्यसन है। इस कारण यहे २ । (६४) "पुरप मा पम्यार हो चुके हैं। भाजगी ऐसे अनेकों उशा देशन में भाते हैं, जिन परखी में भासरा बन कर भरत राज्य तक हो वा दिया। प्राचीन समय का उदाहरण : पद्मोतर राशा अपो मत पुर में पनेको रातियों के होने हुए भी सतुष्ट नहीं हुमा। पर द्रोपदी की पुदरता सुनक उस पर मुग्ध बन गया, और वेष शक्ति से दोपदी को अप- महरा में मगया लो। परिणाम यह हुमानिदोपदी को लो- करते हुए धीरण पाहयों को सालिप हुए पदामा पहुँने उदोन पोत्तर स य मला भेगा दिया तो पुर के खि तैयार हो जाया याद्रोपदी बोहमारे सुपुद करो। पनोत्तर अपनी शक्ति के मभिमा से उनथे साथ युर परमार दिया। पुष ही समय में उसी पायां वो परास्त कर दिया तय श्रीकृष्ण स्थय युद्ध भूमि में पहुंचे। उनके धप धदा दी सेना तितरपितर होगी और म्यये पमारा नगर में छिप गया । जय कृष्ण ने भूमि पर जोर से पाय गिरा तो उसके पापात से गरीदकोट नागर गिरी नगे। पनोत्तर ने समझ लिया कि अय पोई गम नही। तत्क होबा द्रोपदी के चरणों में आकर गिरा और मा म लगा। महासती ने मी दया युदि से उसे सा स्यना दी कहा कि अप भी तुम अपनी रानियों सहित श्रीएए- चरणों में अपना सिर मुकादो। प्रभु शरणागत थे पालक "अत निश्चय ही तुम्हें क्षमा कर देंगे। पमोत्तर म सती आदेशानुसार श्रीकृष्ण चरणों में गिरपर क्षमा मागी। कृष्ण ने उसे क्षमा कर दिया। पितु जप पहा के पासुदेव इसका पता लगा सप उसने प्रोत्तरको राज्य से अलग दिया। इसलिये कहा है कि पर स्त्री में प्रामक्त पुरुप

सर्वनाश होता है। मरकर भी दुति को पास होता है।
यहा सा व्यसनों से होन घाती प्रमुख हानिया हो यताई है।
इसी तरह श्रय मी वृद्धिमा को समझ लेनी चाहिये।
प्रत्येक यमन इस लोक की तरह परलोक में भी दुगति का
कारण पनता है। मन पसन माप से घचे रहना ही दित का
किलको पाठिन है-
दाण दरिदस्स गहुस्म पती,
इच्छा निरोहा य सुहोइपरम ।
ताफएणए इदिप-निगहा य,
चत्तारि एया (लि) सुदुक्कराणि रक्षा
छायानुवाद
देश दरिद्र का दान महा दुष्कर है।
सामध्यं शाल को शाति भाव दुष्कर है।
वैभवशाली का इच्छा-सयम दुपर।
यौयन में वरना इद्रियवश अनि दुष्कर
शन्दाथ-दरिद्दस्त-दरिद्र को (दाणं) दान देना (पहुस्स)
समय पुरुष को (साति) क्षमा रखा (य) और (सुहोत्यस्स)
सुयोग्य सामग्री पाले को (इच्छानिरोहो) इच्छा का निरोध
करना और (ताएणप) युवावस्था में (इदिय निरगहो)
इन्द्रियों का सपम रखना ( एयोणि) ये (चस्तारि) चारों
(सुदुक्कराणि) अत्य त कठिन है।
भावार्य-दरिद्र को दान देना.समर्थ परुष को क्षमा रखना,

सुप पोग्य सामग्री सम्पन्न पुरा पोरया-निरोप परना और
युवावस्था में दिपदमा गाभाय तवटिम है।
वियेया-व्यसनो कारयागौ दो दान मादि धामिरगो
का पालन परतासलिए rist अंग किसको कति
यह पताने।
१ दान-दरिद्रपादान परमारठिन है। मामा के सपत्ति
याता पदि नारों का दान करना याटिन महीपर
जो मजदूरी कर अपना नियात, या प्रानी गेटी में
स दूसरोकादाम पाटिमान में कहा-
'तरा रूप समण पा आप पहिलामेमाणे कि पति ?
जीविप चपा, दुचय पति, दुपार करन' मगपती ००७॥
सपा प्रकार के भ्रमण को यापत् दाम बरता हुमाया
छोड़ना
Ho-'गौतम र जीयामाधारको पागता, कठिन
त्याग करता है और दुष्कर करता है। पुराणों में कहा गया
कि युधिष्ठिर मे विजित पक्ष कर रोहों का धग दिया
और सप की आशा पूर्ण की। रि भी उपकी पाशाला में
नयले का शरीर सोने का नहीं हुमा । अषक सेट पे अपो
जीया की परयाह न कर दिये हुए मतीरे के जूठम में उसका
मुंह सोने का हो गया। इस कारण है अहकार रहित
परिट्टावस्था का दान।
२क्षमा-समर्थ पुरुष को क्षमा रखा कठिन है। जिसका
राज्य और समाज में मान ,तथा जोधीपति है उसको किसी
दे अपमान करने पर सहन कर लेना जितना कठिन है, उतना
लाखों का दान करना नहीं।

1
या निरोध-सामग्री सम्पन्न पुरुष के लिये रक्षा का
निरोष करना कठिन है जो साधन रक्षित होने छावा
निरोप करे, इसमें क्या विशेषता है। विशेषता तो कर होती
कि सामग्री सम्पन्न होने पर भी अपनी इच्छाओं को रोके ।
शल में कहा कि-
जे प फ्ते पिए भोर, मई विपिटि पुयाई ।
साहीणे या भोप, सेहु चाइति ध्याई ।
अपात्-मोकात और प्रिय मोगों के मिलने पर पीट
करता है और स्वाधीन मोगों को छोड़ता है पदी यश त्यागी
है। सामग्री के प्रभाष में मोगों से दूर रहना याग महों,
विवशता है। जैसा कि तुलसीदासजी ने उपहाल परते हुए
कहा है-
नारि मरी गृ६ सम्पतिनामी।
मूड मुदाय मये सन्यासी।
ते सरजन सग पाच पूजाधादि।
उमप लोक निज दाध नसायद।
धास्तय में सामग्री सम्पन्न पुरुषकारच्छा दमन करना
कटिन है।
४-द्रिय निप्रह-जधानी में द्रियों को यश में करना
अत्यन्त कठिन है। जबद्रिय धल क्षीण हो जाने पर भी
वृद्धावस्था में पुरुषों को काम माग दोहन वठिन लगने , नय
भर पोयन में दिषों का घश में कर लाजितना टन है?
• सहज ही अनुमान हो सकता है। इस प्रकार दि
--

को दान, समर्थ को क्षमा, साधन , सम्पन को इच्छानिरोध- और जी में इटियों को घश करना ये चार काम अत्यन्त कठिन याये गये हैं। परतु झान और भक्ति का यन्त जिना होता है ये इन हित कार्यों को भी सर दिखाते हैं सगम गगले का गरीषी में दान और समर्थ महावीर की क्षम इसके ज्वलन्त उदाहरण है। महापीक कानों में ग्वाले फीलें ठोकदी था पर तु प्रभु ममर्थ होकर भी उसको सह किया।धे कमजोर नहीं थे, लेकिन उनमा का पालन करत था। यह है क्षमा का श्रादश । शान्ति मद्र सामग्री सम्म होन पर भी अपना इच्छा का निशेयरिया था। उद्वान भए सम्पत्ति और ३२ रियों का मोह छोड़ दिया। जो भागियों बड़े समझे जात ये घे त्यागियों में यहे त्यागी और योगियों घडे योगी धन गये । ऐमहै। जम्मू कुमार न भी योवन यय सनियों को त्याग फर सयम स्वीकार किया था। विधादि दोपर भी उ होन भोग मार्ग में प्रवेश नहीं किया था। E अनुपम पिरति से प्राकपित हो उनके साथ ५-७ जना न सयम स्वीकार पिया था। शय उपमहार में धर्म का उपदेश करते है- श्रसासय जीषियमाहु लोए, धम्म चरे साहु जियोवाटु । धम्मो य ताण सरण गई य धम्म निसेचित्त सुद लहति ॥२०॥ छायावाद मानी जग जीवन घयल यसलाया। जिनराज पित सद्धम करो जतलाया।

-- 4 8 (६६) है धर्म शरण अरु रनक शुभगतिदाता। सो को धर्म-फा सेवा वह सुग्नपाता ॥२०॥ पदार्थ-शानीपुरुष (लोप) संसार में (जीविय भसासय) जीवन को पाशाश्वत (पाद) कहते है। इसलिये ( साहु मिणो पाह) स त पुरुषों से कहे हुए (धम्म)धा का (पर) भाचरण करो। क्योंकि (पम्मोय ) धर्म ही (नाव मरण) प्राय रक्षारय) और (गह ) शाश्रत गति का काररा है। (धम्म निसेवित्तु)-धर्म फो सेवन करने जीय ( सुह) सुर को (लनि) मास करते है। भावार्थ-पानीजन इस संसार में जीवन का अस्थिर करते इसलिये सत पुरुपों से कहे हुए घम का आचरण करना चाहिये पोंकि धर्मे ही मनुष्य का रस भौर अधिवल गास का पाए। धर्म दो सेयन करके जीप सच्चे सुख को प्राप्त करता है। विवेचनजीयन की स्थिरता और धर्म की महिमा समझे यिना कठिन साधा में प्रवेश नहीं होता।लिये यहां जीयापी चचलता दिखा पर धर्म का उपदशग्ने । शासियों में कहा कि ससार में मनुष्य का जीयर अस्थिर है। अंजलि के जर की तरह मनुष्य का जीयन वू१२ होकर घटता रहता है। जैसा कि कहा- चला वक्ष्मी पहा प्राणा, चले जीयितयायने । घालायलेति सताये धर्म एक सुनिधः । अर्धा-हमी और प्राय उचल हैं। जीवन ऐन - - - भी चल से भस्थिर ससार में निध संसार के यमान ममी पाई स्थिर और माधान एक धर्म ती अधिनाशीकात प्रसिद्धी- गढ रहेम पति रहे, हेम सका। दोय रहे 'नृप मान' कहे, की दी निदान । इसलिये जीधन को चचल समझ कर वीतराग सत्य धम का भावरण करना चाहिये। क्योंकि एक की तरह धर्म ही मनुष्य की रक्षा करने वाला है। म शरण और सद्गति का कारण है। धर्म के सामने स सव पदार्थ भकिविका है। शास्त्र में कहा किं पुत्तेहि पियाधि, अरयेण धमिटिपण घाम जो मरण-देख-काले, लोर पालपण कि अर्थात्-पुन मोर प्रिय त्रियों से क्या तथा नि किये हुए धन से भी क्या प्रयोजन जो कि मृत्यु कुछ नहीं कर सकते। धर्म की महिमा शाख ने कर बताई है। सोप में यह इस प्रकार है- धम्मो माल मुकिद, अस्सिा सजमो तवो देवाधि से नमसति, जर घम्मे सयामणी भात-अहिंसा, सपम और नए रूप घम मसार मंगल है। ऐसे धर्म में जिसका सवा मन लगा रहता देवता भी नRETIT करते हैं। फिर राजा महाराजा पात ही क्या? इसलिये धम का माचरण करना है नीति में भी काई- ।

इसलिये कहा है कि जीवन को चचल समझ कर भगवान
-
का पाराधन करना चाहिया काकि धर्म का सेया करके ही
(५)
भनित्यानि शरीराणि, धिमयो ने शाश्वत ।
नित्य सनिहितो मृत्यु, कर्तव्यो धर्मसप्रहा।
मात्-शरीर अनित्य है। धन धेमव भी अस्थिर है।
कास सदा समीप में घूमता रहता है। इसलिये मनुष्य को धर्म
सग्रह करना चाहिये । और भी कहा है-
धर्म शर्म परत्र चेदच नृणा धोंधकार रविः
सांपत्-प्रशम-क्षमः सुमनसा धर्मामिधानी निधिः।
धर्मों यधुरमाधयेतिपये, धर्मा सुहनिया
ससारोरुमकस्थले सुरतर मस्त्येिष धर्मात्पर ।।
अर्थात्-धर्म मनुष्यों के लिये इस लो और परलोक में
सुख का कारण है। धम ही अघकार में सूर्य के ममान और
सभी आपत्तिओं को नाश करने में समर्थ निधि है। सज्जनों
के लिये मधु रहित परलोफ मार्ग में धर्म रूप पधु ही सच्चे
मिका काम करता है । इसलिये ससार के विशाल मरुस्थल
में धर्म से पढ़कर और कोई कल्पत नहीं है। इसलिये
शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिये सदा प्रमाद रहित होकर धर्म
माणी सुख पाते हैं। धर्म के विना शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती।
द्वारा कदे गये धर्म का प्रावरण करो। धर्म की रक्षक
और धर्म का सेवन करा ही मनुष्य शाति साम कर
इति श्री पूर्वावार्य विरचित थी गौतमकुलके
छायावादो विदीच्याच्याच
समाप्तिमगात्।
सकते हैं।

आत्म-पाठ ३ - घौडाई सादि उपयोग ये ६ जीय लक्षण है। अर्थात् मान, दर्शन-विश्वास, शब्दार्थ-पान, दर्शन और चारित्र तथा तप, धार्थ और चारित्र क्रिया, तप और इनकी शनि तथा पार्य के सामान्य विशेष धर्म का विचार रूप टपयोग है, उमो जीप समझना (७२) नाणघ दसए चे, चरिचय तषो तहा! पीरिय उपयोगोय, पय,जीपरम लक्षणम् ॥१॥ चाहिये । रग, रूप, रम, स्पर्श और বঘা एश्य रूप जीयक नहीं है । न य रूपादिका में ही ही है। क्योंकि ये सप जस के गुण काय हैं। फिर- श्रआया उपयोगमयो, पत्ता मोत्ता उ फम्म जोगेण । इस प्रकार यह आत्मा सक्षेप से उपयोगमय है, फिर भी जो पुण्य पाप का वर्मा और सुप दुख का मौका है, यह कर्म के सयोग से है, साभाविक रूप से नहीं। इसलिये ऐसा निश्चय करोषि- एगो में सासयो अप्पा, नाण दसण सजुयो। सेसाये यादिरा भाषा सब्चे सजोग लपत्रणा ॥२॥ शब्दार्थ-ज्ञान दशत सयुक मेरा आत्मा ही पक शाश्वत नित्य है। अन्य मित्र कस्तत्र पुत्रादि ध धन-धान्य, जमीन मादि या शरीर भी मेरे से इतर है। ये सथ मेरे पास भाष सयोग लक्षण याल हैं। अर्थात् धन दारा आदि पदार्थों में जो मेरी स्य स्थामीपन है वह सयोग से उत्पध टुमा मतपय माशयान है। उनके साथ गाद मोह परनानी, ज का कारण है। उसके उच्छेद के लिये अपनी धारमा पर यनु पालन करना चाहिये । उस उपाय इस तरह है- पगोह नरियम को, नाहमनस्ल कस्तई । पघ अमीण मराता अपाणमामासा ॥३॥ शर्य-पकता दूसरा कोई पदाथ मेरा नहीं है। में मी रिमी दूसरे पदार्थ का नहीं। इस प्रकार मा से आत्मा का अनुशासन करो ! कि शाल पता है- श्रा नई घेयरणी, अया मे फूड मामली। सपा मे कामदुहाधेणु, अपाम नदण पक्षा शब्दार्थ-पहात्मा नाक की पैतरणी नदी है और मेरी मात्मा ही कृट शाल्मली-नारकीय त्रिम वृक्ष है । यह यात्मा कामदुदा धेनु हे, और मेरी शात्मा हीनन्दा धन है। इसलिये रमय जायों । यह ध्रुप साप है। क्योंकि- अप्पा पत्ता विचाय, दुदाण य सुदाण य। अप्पा मित्त अमित्त च, दुपद्विप सुटुनी ॥५॥ शब्दार्थ-असलियत में दुग्न और सुप का पता तथा विपत्तां-छेदन करने वाला मारमा ही है। दुष्प्रतिष्ठित मात्मा शत्रु भोर सुमाग में स्थित भात्मा ही मित्र दे। इसलिये-- परम अप्पा दती, सामेण तवेण य । माद परदि दम्मतो, पधणेहिं यहहि य ॥६॥ शदाथ-मार पीट अथवा यधन आदि दुसरे पाह्य- साधनों से अपना दमन न हो सके लिये तप और संपम से

(७४)
डीभपी मारमा का दमन करो।-यही उत्तम है। नोकि
माम विजयी सपको जीतने याला-
एगप्पा अजिए सत्त साया दियाणि य
त जिपितु जहानाय, हिरामि भद मुणीron
शब्दार्थ-नहीं जीता हुमा एक प्रात्मा ही शत्रु है और
चार वयाय व पाच इद्रिया भी शत्रु है। उाको यानी चार
कवाय, पाच दिया और एक पारमा इन दमों को जीतकर
मल्यानुसार यायपूर्वक विचरता हूँ । अर्थात्-मको जीतने
सही प्राणा सुख्ख पूर्वक विचरता है। उनके जीतने का उपाय
यतात है-
।
एगे जिए जिया पर, पचजिए जियादस ।
दसद्दा उ जिणिताण, सभ्यसत्त नियामह En
शब्दार्थ-एक यदिरात्मा को जीतन पाचार पाय जीते
जाते हैं। इन पाच को जीत लेन पर १० जीत लिये जाते
यानी पाच इद्रियाँ भी जात ली जाती है। जिसन पूर्णत
दस शत्रुओं को जीत लिये, उसा सभी शत्रु जीत लिया ।
श्रात्मा को अशुभ कर्म से पचाने के लिये प्रतिदिन ऐसा
चिता करना चाहिये-
जो पुधरता वर रत्ताले सपिए पगमरण ।
कि म फड, सिंच म विश्वसेल, कि मणिज्ज न समापरामि।
शम्दाथ-पूषगत्रि और निजी रात्रि के समय मनुष्य को
अपने प्रापमा मन से अच्छा तरद निरीक्षण करना चाहिये।
-

(७) और देखना चामिन भामति का कौनसा कार्य किया है, और इस प्रकार का कोनसा कार्य मुझे करना बाकी है। कौनसा पार्य शक्य होते हुए भी मैं ही करता हूं। और भी- कि मे परोपासावि अया, कियाह वलियन विषजयामि । दोषसम्म भनुपासमाणे, अणागय नो परिपथ कुजा १०१ शया-दूसरे लोग मरे गुण या दुगुष या देखते हैं। और में या देखता हु अषा मेरी मारमा में कौनसी ध्रुटि है जिसे मैं अभी तक नहीं हो सका है। इस प्रकार मच्छी तरह से अपन आपको देखकर भविष्य में दुर्गुणों का सेवन महीं करना चाहिया अन्थेय पामे कर दुप्पत्त, कारण याया यदु माणसेषु । तस्थेर धीरो पहिसाहरिन्जा, मानमो विपमियपधलीय। शम्दार्थ-जहा मन पवाय काया से मात्मा को धुमार्ग में लगा दस पदों पर युद्धिमान को चाहिये कि जैसे जातिमान घोड़ा अपन लहान हुए पाय 1 समाल लेता है, उसी प्रकार यह भी अपने प्रारमा का समाल । सरिसा जोग जिा दिमाप्त, चिमना मुरिसस्सयि । तमा लोए पदिबुद्धजीवी, सोजीष सक्षम जीविएण ॥१२॥ शब्दार्थ-मितदिप भीरधर्ष मगन सिम सापुस्य के सदा से योग रहते हैं उसको इस हाल में प्रतियुद्ध जीधी परते यसयमी जीया व्यतीत करता है। उपदेश और क्ल- मापा धनु सयय रविप्रयाग, सञ्यिादिपहि सुसममातिपदि। अरविषमा नास्पद उयेह, गुरमित्रो सम्पदुदाय मुशर -- - * शार्य-इसलिये शुम समाधि युन सपइन्द्रियों के द्वारा आत्मा की रक्षा कानी वाहिये। पयोति अरक्षित बारमा जातिपथ-जम मरण के मार्ग में ज्ञाता है और अच्छी तरह दुमाग से क्षिन प्रारमा पथ दुत्रों में मुक्त हो FAI | इस लियाई- अप्पा चेव दमय यो, अप्पा दु खलु दुद्दमो। शप्पा तो हो हो, मस्ति लोप पररथ य १॥ शब्दार्थ-मागगामी आरमाही पमा कर योग्य है। एकोकि मारमा थिय से दुदम्य है। जिमा मा दमन कर लिपा पहारमा इस लोक और परताप म सुत्री होता। अतपय भगवान कहत है सयम और तप से मारमा पा दमन करीता शाति प्रातरोगे। इति प्रात्मभावनाऽध्यायः ।

वारह-भावना
प
(अनुशतक-यो. पूनमच द पुदनमल नैन अहमदनगर)
थायक को चाहिए कि पद प्रात काल एवात स्थान में बैठ
कर पवित्र चित्त से अनुपूर्वी का पाच 7 करे और मनको एकाग्र
पर नीचे लिखी हुई बारह भावनाओं का मान करे।
१ अनित्य भागना--
हे जीय तू नजर फोगकर दस कि तरे मामपाम जितो
भी पदार्थ दिखते हैं, उनमें और तेरे में क्या भेद है? जरा
विचार करने से तुझे मालूम होगा कि हर एक पदार्थ जैस धन,
दौलत कुटुम्य परिवार इतना ही नहीं परिक तेरा शरीर मी
पानी परपोटे के समान घिनाश शील है। उसका नाश होगा
दी। क्योंकि उनमें नैसर्गिक नश्वरता है। इन नश्कर पदार्थों के
पोच एक बारमाही अविनाशी है जिसका नाश नहीं होता। इस
लिए इन नाशयत घस्तुमों के मोह में न फसपर तू अपने पारम
स्थरूप को पहचान और इस क्षणिक सुख में मानन्द मत मा
भरत महाराज ने धारिसा मपन में अगुली से अगुठी के गिर--
जाने पर इस 'अनित्य भाधना' के अन्दर छुपकी लगाई थी और
उसके फलस्वरूप ससार समुद्र से केवल भान रूप मोती को
प्राप्त कर लिया था।
२मशरण मापना--
जीय ! अगर तू अपने भविनाशी रूप कोजाति
कोशिश नहीं करेगा तो निधय समझना कि इन उपार्जन,

( ७) हुइ यस्तुओं के नाश के कारण होन पाले वियोग से जो तुझे दुग्ध होगा उस दुख में तुझे किसी तरह से भी विसासा नहीं मिला। जिस समय सप चीजों को छोड़ कर तू परलोक की ओर विदा होगा उस समय कोई भी पदार्थ तेरा शरणदाता नहीं होगा। प्रात्मा के नित्य म्वरूप को जानने वाला धर्म ही एक मात्र सहायक होगा। अगर तुझे शाति पाना है तो आत्म- स्वरूप को समझकर धम की शरण में जा। इसी श्रशरण भावना के बल पर अनाथी मुनि न रोग की भयकर दशा में भी कुटुम्य परिवार को सरक्षक नहीं मान कर 'धर्म ही का शरण लिया और परिणाम स्वरूप पूर्ण शाति के साथ ससार के सच्चे रक्षक घनाथ पन गये । ३ ससार भावना- श्री शालिमद्रजा को ३२ सु दरियों का अ त पुर और अप रिमित वैभव मिला। जिसको देखकर मगधदेशाधिपति श्रेणिक भी चकित रह गया। किन्तु शालिभद्रजी जब यह जान लेते हैं कि मेरे ऊपर भी नाथ है, उस समय उनको दिव्य भोग और अपनी सुन्दर रमणिया भी नीरस मालूम हान लगी। वे समझने लगे कि ससार के सुप दुम्न अपूर्ण और अनित्य हैं । त्याग ही सुख का कारण है। इसी भावना से उन्होंने प्रतिदिन एक र स्त्री को छोड़ते हुए दाक्षित होने की प्रतिज्ञा की। लेकिन घोच ही में घनाजी से उनको घेराग्य में उत्तेजना मिली। जिससे चे साधु यने और आत्मा का परमाण किया। ४ एक्त्व भावना- थी नमीराजपि मिथिला के राजा और हजार नियों के पति सच्चे -

(४)
थे। अब उनके पारपरकी भयकर जलन कोशात करने के
लिए भनेक वैध परकीम घुलाये गये तय उन्होंने भावना बन्दन
को घिसकर लेप करने का हपाप बनायो। रानिया चन्दन को
जिसने बेटी तो उनसयों की चूदियों से एक साथ बड़े जोरों
से मकार का शब्द निकलने लगा। चूड़ियों की यह पनि
अमिराज को असा मालूम ह । उन्होंने मात्री को चुना कर
कहा-'यह मायाज हमे मा दी है। मन्त्री ने राजा की
बात समझ कर मन पुर में सूचना क्राबारानियों ने एक एक
चूड़ी रख कर सब चूड़िया उतार दी। जिससे आपात पर हो
गाई मनिराज ने मंत्री से फिर पूछा-मत्रीजी, आपापसे
दुर? पहले सो यदे जोर का शुम्द हो रहा था। अब यह बिलकुल
बन्द कैसे है।
मात्री मे चूड़ियों की पात बहो। जिससे नमिराज के मन
में विचार मा किघर असल में राग द्वेष के माधन ये पाहरी
पस्तुएँ दी शान्ति का कारण होती है। यह जीय नो अमेला
बीमाया है और अकेला ही जायेगा। इस दुनिया में उसका
कोई सहायक नहीं है। ऐसा समभ पर श्री नमिराजर्षि न
भौतिक विलास से दूर हो साधु पदयो धारण किया और
परिणाम मेरोग-शोक रहित पूणान द की प्रामि की।
४ अन्यत्व भावना-
सुग्रीव नगर के अधिपति राजा बलमद के प्रिय पुत्र मृगा-
पुत्रन पुगयोदय से प्राय सभी सांसारिक मुम प्राप्त किए
१ दिन मणिपन जटित महलों में अपनी स्त्रियों के साथ
रग रास में बटे हुए इहोंने मार मार्ग में चलते हुए शात दान्त

मुसिज को देना मुीि परिचित से मालूम होने लगे। राति उनके मन में तरह २ दापोल पैदा हुए । अन्त में पूर्व का शान हो जाने से उदें मालूम हुघा कि यह मुनि-पद- आत्मसाधना का मार्ग है। प्रात्मा कासया मित्र है। जिस नुमा रहा हू घे धन, दारा, पुटुम्प मप मेरे से मिन ई। मार- मो शुद्ध युद्ध और निकला है। इस पिनार से मृगापु सस को त्याग कर भारमलापन में लग गए और परमपद कोम कर गये। 'अशुचि भावना- धीरे चार सनत्कुमार का रूप इतना सुपर था देवला से देव भी उसे देखा को मापा श्रीर यूढे का रूप कर गज महल के द्वार पर पनुचा द्वारपाल से कदा-म पच से ही महाराज के दर्शाकरन लिए अपने घर से निकला आज किसी तरह इस हालत में यदा मा पहुँचा। क्या महाराज के दर्शाम के लिए सदराने दोगेद्वारपाल महाराज की यात्रा से उसे अदर शाकी स्वीकृति दे६ - स्नान घर में यठे हुए चरपर्ती के अलाररक्षित शरीर देखकर यह ग्राह्मण मुग्ध हो गया। रूप से प्रकार से चम न उसको फिर राज सभा में आने को कहा। जप महाराज सजधज कर सिंहासन पर मा बैठे, तप बह ग्राह्मण भी भ और उसके रूप को देख पर सपना सिर हिलोलगा। महा पूछा-फ्या, क्या यात है ? जिससे तुम सिर हिला रहे बूढ़े ने कहा-महाराज! आपको देश में तो की पैदा हो है। अगर आपको विश्वास हो तो पीकदानी में धूक कर - (१) सीरिये मालूम हो जायगा। मगगज न येमादी पिया की साफ दिया देन सगे। विधान लगेश शितदेहवी मुन्दना ममार में मपम थी, जिसको माफमध्ये प्रद खाद-पान घ यग्बाहारों से सूय पामा पोमा ! उसकी से पदो पर हो सदा गला विध्यसन और अशुचि धर्म थापा। मैंने प्रमामयसरे पीछ श्राज म किनन पाय- पापापकिय प्रारमा के सागर की योनिमी दीदया। घर मेरा कप शिम अघि शरीर से शुधिभूत सयम की माराध पर अपना सच्चा स्यरूप प्राप्त करू ऐमा विगार चमयी मामार वीक्षा धारण की और अनुपम धियों को प्रात पर अत में परमपद की मानिकी। ७पाथव भावना- पासित धायक ने अपन पुत्र ममुहपाल का किसी रूपरती या मे पिचाह कर दिया। एक समय अपामा के भरोसे में यैठे हुए थे। उस समय पय म्यार में सेजाते हुए एक घोर को देना । उसके शरीर पर कान पर थे। लोगों में उसकी निदो रही थी। उसे देन पर समुद्रपाल को विचार हुमा विपापों का परिणाम कैसो मपवरपहिसा, भृट यादि भाशय ही भारमा यो ससार में रुलात है। जप इस लोक में ऐसा भयकर दान होता है तो परलोक में क्या परिणाम होगा? इस तरह पापों के कटुफा का विचार करते हुए समुद्रपाल प्रतियोघ पारसपमी बन गये और तमसयम का प्राराधन करते हुए परम पद की प्राप्ति की।

(२)
सपर भावना-
थो के शीशमण और गौतम स्वामी ने परस्पर ट्रिम,
पाय | मनोनिमा यादि सयरों पर विचार किया और
उसके लिए समुषित प्रवृत्ति को दुराप्रद नहीं करते हुए धारण
की। अर्थात शोधमण ने महायत से ५ महायत रूप धर्म
को उचित समझ कर अपनाया। इस तरह विशुद्धतपर भावना
से दोनों महात्मानों ने अपने आत्म कल्याण की साधना
सफल की।
निर्जरा भावना-
हर रोज ६ पुरुष और १ स्त्रो मारने वाला अर्जुनमाली
सुदर्शन थावल के सहयोग से भगवान महावीर की सेवा में
पहुँचा । पापो का कटु फल सुन कर उसने भी साधुपन स्वी-
कार किया । तप के पारणे के लिए जपचे राजगृह में घूमने लगे
तब कई लोगों ने हंगालिया दी और कई लोगों ने उन्हें
मारा-वीटो भी । लेकिन मुनि अर्जुनमाली सोचते कि मेरा
हो भी क्या बिगाहा ? मैंने तो इन लोगों को पहुसकट
दिया है। कई लोगों को जान से मारा है। ये तो मुझे पेपल
परी कर दी दे रहे है। मेरे कर्मों को निर्जरा में कारण बन
रहे हैं। अगर इन कष्टों को सममाघ पूपर्क महूगा तो मरी
आत्मा मिस्त वन जायगी। इससे प्रतिकूल अगर पिम माय
लाक तो कट के सिवाय कम-मार भी बढ़ जायगा इस तरह
बो में निर्जरा भायना करते हुए छह मास में ही मुनि
अर्जुनमाली न केपलमान प्राप्त कर माम ल्याण कर लिया।
४

१. लोक स्वरूप मावना--
शिर गजपि ने विभाशा से ७ द्वीप और ७ समुद्र तक
ही लोग ऐमा जाना, श्रीर वे उस मिथ्या गान का प्रचार
करन लगे । जस गीतम स्वामी को यह मालूम हुआ नो उदो।
मासन महागीर मे पूछा-भगवन । क्या यह यान मन है?
भगवान महावीरन उत्तर में अमरपात द्वीप और समुद्रों का
होना परमाया। इसको सुनकर जाता शिवराज प्रापिके कथन
का
मिलगी। शिव गज पि इसे सुनकर गिर
करन सगे कि मत्य क्या है? मग मान कहा अमय तो नहीं
हैमा सोचते हुए समया तर में उनका यह पभग शान
चला गया। नव पेस दह निवारण के लिए भगवान् की सेवा
में उपस्थित हुए। शिधरानपिन अपने प्रश्न का योग्य उत्तर
और उपदेश सुनफर भगवान महावीर के पास दीक्षा ग्रहण
करनी। सयम की असा भाराधना के साथ लो म्यरूपया
विचार करते हुए उन समय पर संघात शान की प्राति की
और सम्पूर्ण नाकालाक का मान कर सो शान्ति के अधिकारी
।
११ धर्म भावना-
शोधचि मदागज पे तुम्मे का विपना प्राधार पा
जय गुर पाना से दालन को गय, तब एक दम पर कर
मेरो दाड़ियों का देना। यह न कर उन्होने विचार
दिया कि जब एफ से इतर जीवों का महार होना तो
मन पस डाल दन पर तो अनर्थ हो जाएगा। अमरप जीपों की
याही ६ या जागी। इसलिए अच्छा तो यह है विद्या

धर्म पी माराधना के लिए मैं दीइसे पी जाऊ | पर शरीर तो
एक दिन जान दी घाला है। अगर पहधर्म के लिए काम आये
तो इससे पढ़कर औरचादिप हो क्या? यह विचार कर धर्म
रुचि पि न उस पड्ये तुम्बे का आहार कर लिया। विपक
भयवर परिणाम सपाली प्रयल घेदशा को उन्होंन सममाघ
पूर्वक सहा, और धमभाय में प्राणात पर सर्वार्थसिद्धि के
शात सुनको मात दिया।
१२ योधिवीज भावा-
भगधार पादय ६८ पुनो न सतार ये प्रायः सभी सुख
पाये थे। लेकिन भगवान् पदाक्षित हो जाने पर समय पाकर
ये भी दीक्षा लन या तैयार शुए। उस समय उनके बड़े भाई
भरत न राज्य आदि का भाग-प्रण करते हुए उनसे पदा-पधुभो।
शमी श्राप मिले हुए इन उत्तमोत्तम भोगों कोभागिये और फिर
सयम लीजिये। इस पर पहागे-मादाये ससारके भोग तो
यात्मा को थन तधार मिते हैं। लेकिन इनसे प्रात्मा को कभी
शासि नहीं मिला। फिर उनके मोह में फंसकर अपना अस्ति
करना कहा तक उचित है ? दम तो अप अत्यन्त दुर्लभ इस
बोधि-बीड-सक्ति रस की आराधना करेंगे। मिसकी
एक यार की दुइ आराधना ही जम मरण के फेर को
टाल सकता है। क्या राय भी हम उससे रचित रख
जायसनाह अपन भार भरत का समभा कर सपरघु
और समक्ति रूप बाधिभाषना से सपा परपाए पिया।
-

प्रार्थना-सग्रह (श्री अन व निन स्तुति) अन त जितेश्वर नित नम्, अद्भुत जोत अलेप्प । ना कहिये ना देखिये, जाके रूप न रेन ॥an सूक्षमथी सूतम प्रभू, चिदाद चिद् रूप । पवन शराफाश थी सूक्षम मान सरूप ॥on सकल पदारथ चितव, जे ने सूक्षम होय। तिथी तू सूतम महा, तो सम अपर न कोय ॥०॥ कपिडित कफिहि यथे, शागम अर्थ विचार । तो पण तुम अनुमर तिफा, 7 सके रसना उच्चार मना थाप भणे मुग्ण सरस्सी, देवी श्रापो श्राप कही न सक प्रभु तुम सत्ता, अलप अज जाप Hol मन बुध पाणी तो विषे पहुँचे नहों रे लगार। सात्री लोकालोकनो, निपिप नियिकार ॥ मा 'सुजसा 'सिंहरय' पिता, तस सुस अस्त जिनद । 'विनयचद' प्रय बोलल्यो, सादिय सहजान द ANOn श्री श्रयाप जित सुति) चेतन जाण क्रयाण करन का, श्रान मिरया असारे । शासप्रमाण पिछान प्रभु गुन, मन चन्चल या फर रे॥ श्री श्रेयाम जिनद सुमर रे॥ सास उसास विकास भजन को, दृढ विश्वास पर रे। अजपाऽभ्यास प्रकाश दिये धीच, सो समरन जिन घर रे ॥२॥ कंदप बाघ लोम मद माया, ५ सय ही परिहा रे। सम्यक दृष्टि महज मुख प्रगटै पान "शा अमर रे १३॥

-- मृट प्रपच जीयन तन धन भरमसामनेही घर रे। छिन में छोड़ चले पर भर, बध गुमासुमयिर रे ॥४॥ मानुप जमम पदारथ जिनकी, आशा करत अमररे। त पूरब मुरत करि पाया, घाम मम दिन घर रे ॥५ "विष्णुसन' नृप 'विश्नागपी घानदन त न पिसारे। सहजै स्टेि अशान अयिद्या, तो मुनि पथ पग भर रे ॥ न अविकार विशाराम गुन, नम जमाल न पारे । पुद्गल चाप मिटाय विजयरद न जियन (मेन) अयारे धीयाल मुमररे ॥७॥ श्री महावीर जिन-स्तवन श्री महावीर नमा परसाती शासन हो जागरे मागी। धन धन Rमक सिद्धारथ राना पन त्रिशनात मातरे प्राणी याँ सुत जागाद मिलाय', यधमान विण्याम रेप्राणी। प्रवचन सारया में कार परथ प्रमाण र प्राणी ॥२॥ विनय पानार नास्या चार प्रसार Rमाघ र प्रायो। नरय भय सायरनन्येि प्रातम मा भरघरे प्राणी ॥३॥ ज्यो कानन तिए का कहीजे मरण नाम अनेक प्राणी । यो मजार नराचर जोनी, है चेता गुण एरे प्राण ॥४॥ 'यो श्राप धिर भातम माद हमकारे प्राणी। फेवल ग्रह पदारथरिचय, पुद्गल भरम मिटापर प्राणी ॥५॥ शम कप रस गध न जामें नास परम न छाहर प्राणी । तिमिर उद्योन प्रभा क्छु नाही, श्रातम अनुभम माहिरे प्राणी ॥६ मुम्ब दुप जीवन मरण अवस्था पदस माग सगातरे प्राणी । रणथा चिन्न पिन च रहये, “या जल में जनजात प्राणी -कपिपर ग्रीशियच जी।

(७) श्री अजित जिन-स्तवन पथही निहाल र बीता जिनतणो रे अनिन अजित गुणधान । जे ते जीत्या र ते मुभा जीतियार, पुरुष विश्य मुल नाम ॥१ चरम नयन करी मारग जोवतारे, भूल्यो मयल ससार। जेणे नयनवरी मारग जाइए रे, नयन ते दिव्य विवार २R पुरुष परपर भनुमय जोयता रे, अधावधि पुलाप । घस्तु विगारे रे जा पागमें करी रे चरण धरण नहीं ठाय ॥३॥ तर्क विचारे रे याद रंगरारे, पार न पहोंच काय । अमिमत पस्तुरे घन्तुगते कह रे ते मिग जोय hen यस्तु पियारेदिप नयन तमोर,शिE पडयो निरधार । तरतम जोगे रेतरतम घासनारे घासित पौध आधार कान-लही पथ निहालतुरे ए आशा अयलम्म । पाजी र जिनजी जाण जोरे 'मान घन मत प्रया यी याम-निन-स्तवन सी थेयाम जिन अनजामी, श्रातमगमी नामी 'अध्यातम मत पूगण पामी, मज मुक्ति गति गामीरे धी श्रे०१७ सयल मसारी इन्द्रियरामी मुनिगुण प्रातमरामी रे मुख्यपणे जे भातम हरामी, ने यस निकामी र । भी थे.." नित म्परुपज किरिया साध, नेह अध्यानम सहिये रे जे किरिया परीचउर्गात सा नमातम कहिये रे ०३|| नाम अध्यातम टपण अध्यातम द य अयानम छडोरे, भार अध्यातम तिज गुण माघे, नो नेदशु रथ महारथी शद अयातम श्रर्थ सुगी ने, निर्विकल्य धादरजोरे, शब्द अध्यातम मजना नापी, दान ग्रहरामनि घरजाधीश

अध्यातमी जे घस्तु विचारी, वीजा पा लयासी रे,
पस्तुगते जे यस्तु प्रकाशे, 'मानधन' मत वासी रे। श्री ०६E
भी वासुपूज्य-जिन-स्तवन
पासुपूज्य जिन धिभुयन स्वामी, घननामी परनामी रे ।
निराकार सोकार सचेतन, करम परम पहा कामीरे। १॥
निराधार अभेद सम्राहक, भेद प्राहक साकारोरे।
दशन झाा दुभेद चेता, घस्तु ग्रहण व्यापागरे । २॥
क्र्ता परिनामी परिणामो, कर्म के जीप करिये रे।
पक अनेक रूप नयघादे, नियते नर अनुसरिये २।३॥
दुग्ण-सुप रूप कमला बाणो, निश्चय एक आनदो रे।
चेतनता परिणाम 7 चूके, चेताप जिनचदो रे । ४॥
परिणामी चेतन परिणामो, मान पर्मफ्ल भाषी रे।
शान कर्मक्ल चेतन कहिए, जो हमनाची रे। ५॥
आतमज्ञानी श्रमण पहारे, बीजा द्रयलिंगी रे ।
पस्तुगते जे पस्तु प्रकाशे, 'थामदन' मत सगीरे।६॥
श्रीनमि-जिन-स्तवन
षड् दर्शन जिन-अग भणीजे, न्यास पडग जो साधे रे।
ममि जिनपरना चरण उपासक, षड्-दर्शन श्राराधे रे । १॥
जिन सुर पादप पाय घस्नायु, साप्य जोग दोय भेदे रे।
आतम-सत्ता विघरण परता लहो दुग श्रग असेदे रे ।
भेद अभेद सुगत मिमासक, जिनपर दोय पर मारी रे ।
लोकालोक अयलम्यन मजिये गुरुममधी अपधारी रे।३॥
मोकार्यात
जिनधरनी नश
विचार जो कीजे रे।
तस्य विचार जो बीजे रे, गुरु गम यिन किम पीजे रे।४॥

-
( 8 )
जैन जिनेयर पा उत्तम अग अतरण यदिग्गेरे।
अक्षर यास धरा अराधक, आराधे धरी सगरे।५॥
५ मिनयरमा सघसा दशन छ, दश । जिनवर भजनारे।
मागरमा सबलीनाटनी सी तटिनी मा मागर भजनाका
जित स्वरूप था जिन धाराध से मही जिनयर हारे।
भृगाइतिघान घटाघे भृगी सग जोवरे।७॥
पूर्णि भाप्य सूत्र युति, पृत्ति परम्परा अनुमय रे।
समय-पुरुपना श्रग पधा ए जे छद दुर्मच रे । ८ ॥
मुद्रा पीस धारणा अक्षर, न्यास अर्थ पिरियारो रे।
जेधारते नपि पचीजे मिण थपरक भोगेरे।।
धुत भतुमार पिधारी योलू सुगुरु मथापिध न मिलेरे।
किरिया क्रीवि साधि शक्यि, ए विपयाद चित्त सघले २१०॥
ते माटे उभीर नाडी, जिनवर भागल पहिये रे ।
समय चरण सेवा शुद्ध देजा जिम साधन' लहिये रे ॥११॥
-श्रीमदाउदघनजी म.
श्री पदाप्रभु-जिन-स्तवन
धी पाम जिन गुणनिधि रे लाश,
जग सारष जगदीशरे पालेसर ।
जिन उपगार थकीतहे रे लाकर
भपिजन मिद्धि जगीश रेयालेसर ॥१॥
तुज दरिसण मुज पाइलो रे लाल,
दरिश शुद्ध पपिच रे पालेमर ।
क्षरिशण शम्द नये सरे रे लाल,
समद एघमूत रे बालेसर ॥२॥

(६०) पीने वृक्ष अनतता र लाल पसर भूजल योग रे चालेपर। तिम मुज मातम सम्पदा र साता, प्रगटे प्रभु सयोग रेघालेमर ॥३॥ जगत ज तु कारज चि रे लाल, सारे उदये भाण रे घालेमर । चिदानन्द मुग्लिासता रे लाल, याधेजिनघरमाण रेवालेसर ॥४॥ लम्धि सिद्धि मत्राक्षरे रे लाल, उपोसार सग र पालेतरा सहज सध्यातम तत्यतारे शान, प्रगटे तत्थी रग रे बालेसर ॥५॥ लोद धातु कारन हो रे मान पारम परसन पामी रे पातेसर । प्रगटे अध्यानम दशारे लाल व्यत गुणी गुण ग्राम रे बालेसर॥क्षा श्रामसिद्धि कारज मणीरे गाल महज नियामक इंतु र घालेसर । मादिक जिनगाना रे साल भरलागर माद सतुर वालसर ॥७॥ म्तमन इन्द्रिय योगना रे लाल रत्त ए गुण राय रे पालेसर । 'देवच द द स्नयो रे साल पाप अपए प्रशायर यारोसर था देवच जाम (3) श्री शान्ति स्तवन ॐशाति यति शानिमय मितान्ति दो। घा मेन अविराम दन, सुमिरन सब दुख निकदन । महारानि हो यदा सथ मिल शानियोnॐ शान्ति॥ भातर शानियाहरशानि तुम में प्रानि मुमम शानि। मय में शाति बसाना, सर मिल शाति कहो ॥२॥ विषय पाय का दूर नियारो काम माघ से रोक्नारो। शाति साधना यो हा, सय मिन शनि हो ॥३॥ शानि म जा जपत भार मा विशुद्ध हिय धीरज माई। अतुनि at 7 उमे हो, सब मिन्त शाति कहा ॥४॥ प्रान ममय ना धर्म म्यानम,शान्ति पार करते मृदु स्वरमा उनको दुध नहीं हो सव मिस शानि दो an शान्ति प्रभु सम ममदा कोरियन ओलि हो। 'गन मुनि' सदा विजय हा सरमित शानि कहा ॥६॥ -पू० दम्नीमानीमा प्रार्थना- दयामय ऐसी मति हा जाय । त्रिभुवन पायाण कामना दिन - यदना जाय ॥ दामय पेनी मनि हो जाय। प्रारों टच का तुम्न समझ सुग का उपाय । अगन मय दुयों का महल पर दुग्न महा न जाय दया०॥ भूल भटर उहाटी मति के, जो है जाममुदाय । हे सुमाऊँ सन्यास पथ नित्र सरस्व लगाय दया०॥

(१२) सत्य धर्म हो सत्य को मत्य ध्येय पन जाय। सत्यावेपण में ही'प्रमी' जीयन यह लग जाय ॥दया०॥ -धी माथूरामजी 'प्रेमी श्री पाच-जिन-स्तवन थामाजी को प्यारो पारस पारस सो दुलारो रे। विश्वसेपुल कमलदिवापर मैन का उजियारो रे ॥१॥ सुजस प्रभुको तीर लोक में डाय ग्यो विमतारो रे ॥२॥ मोह परम पश मरमयो भरमाध्या पाप हजारो रे ॥३॥ तुम शरणे थायो नहाँ प्रभुर तिणरो सोच विचागेरे ॥४॥ पुगप जोग मुँरण भय माही रसा पितामणि पायो रे ॥५॥ हजड मूरपक्क 7 देऊ, पारस मासरो थारो र ॥६॥ द्वार खडा 'रतोश' रपानिधि, सणजे मोहमगारो रे ॥७॥ तू करणानिधि सायय मारो, सीजे पार उत्सारो रे ॥शामाजीn -०३० रत्नेश (३) स्वाध्याय-ग्रन्थ म्वाध्याय प्रेमियों के लिये प्रय हम यहा र प्रयों की सूची उपस्थित करो है, जिसमे पानी रुचि अनुसार स्थाघ्यार प्रथ चुनने में कईचा होगा। सार्वजनिक पावन योग्य पुनः- १ सेठ सुदर्शन २ सेठ धना ३ सनी चन्दनयाला ४ सती राजेमती ५ सुपादुकुमार ६ सनाथ अनाथ निर्णय ७ धायक का - - २ 1 अदिसा ग्रठ घाट । - ममिराज भ. महापौरका बार Tak Pos ट १० जम्यू कुमार २१ महापीर पाणी १२ आत्ममयोध १३ मानद की पारि १४ सम महामन १५ मायना शत- १६ पश्य कोमा M for " " (६४) २७ सामायिक स्वरूप धी नााचदजी महाराज - स्थानकवासी जैन इतिहास भी शरीचन्दजी भडारी १४ तार चार मोग धीयालयदजी श्रीधीमाल २भाग २१ सामायिक प्रतिषमण सार्थ विशेष श्रेणी की पुस्तक- १ निर्म थ प्रवचन (भायसहित) प्र. ५० चौधमला महा० २ सानार्णव (ध्यान सयधि) श्री शुभव द्राचार्य ३ कारण सम्याद ४ सयाद और ईश्वर शतावधानी प रत्नवदनी म ५ उत्तराध्यन (हिन्दा) थी सतपालजी ६ जैन तत्व प्रकाश पूज्य अमोलक पिजी म ७ ध्यान दरपतर उत्तराध्यन (हिन्दी) उपाध्याय आत्मारामजी म. ६ देशाधन घ १० उपासप शाक थी घासीलालजी महाराज २१ दशमालिक सूम पूज्य स्नीमाजी महाराज १२ गन्दी सूत्र १३ तत्वार्थ सून प० सुग्वनामजी १० धर्ममय १५ श्राचाराग (हिन्दी) थी सन्तयालजी १६ सूचनाग सूत्र ४माग (सटीक) पू० जयादिरलालजी म. १७ स्थाद्वादमजरी (मानुपाद) थी जगदीशचन्द्र एम०८ = लोकाशाह मत समयन श्री रतनलालजी डोर्म २६ मुखयस्त्रिका सिद्धि " "

(५)
- विनयचन्द चौधीमी
स्तयन तरगिणी
मा०१,२,३,
सुधायक विनपचन्दजी
पूज्य माधय मुनिना
मरी मावना
श्रानन्दया पद सग्रह
गुस्त रोमायण
२,२,३ माग
भी मुख्सारनी
रेमानन्दघनजी
श्री शुक्लचहजी महाराजा

परिशिष्ट -
गौतम-पुलक से सम्बन्ध रखने वाली कुछ कहानियाँ हम
भ्यदाँ उद्धृत कर रहे हैं। पाश है नधीन पाठकों को इससे कुछ
लाभ ही पहुंचेगा।
१-सागरदत्त सेठ
कई दिनों पहले की बात है। किसी गाय में एक मोरपति
सेठ रहता था। उसका नाम था सागरदत्त । उसके चार सड़के
थे। सेठ ने चारों लड़कों के विवाद कर दिये थे। पुन पधुथों के
घर से भी यहुत धन-मान मिला था। लेकिन या सेठ पहले
नम्बर का फजूम । विद्यादा जान पर उसने सोचा-अगर
नके पेठे २ हा खाते रहेंगे तो एक न एक ति मेरा खजाना
ग्पाली हो जायगा। यह सोचकर उसने अपने लड़कों को बुलाया
और विदेश मे धन कमाने के लिये जाने को कहा। लड़के अपने
पिता के स्वभाव से परिचित थे। अत लाचार होघे चुपचाप
विदेश चले गये । उनके चले जाने पर घर सुनसा दो गया।
सेठजी अहो रह गये । पुत्रयधुऐ उच्च कुल की थी। पति की
मौजूदगी में तो ये किसी तरह अपना मन बहला लेती थी, परन्तु
अय उाका कोई सहारा नहीं रहा। सय तरह से उनको कठिा
या दो गई निसाने को अच्छा मिलता था पक्षाने को ही इस
तरह चारों पुत्र रधुऐ दुःख से अपने दिन व्यतीत करने लगी।
एक दिन की पात हे चारों पुत्रवधुऐ अपने काम धधे से निपट
कर झरोखे में घेठी हुई आपस में बातचीत कर रही थी-पड़ी
धधु
ने कहा-पहिन । सेठजी की कृपा से लूया-मुम्बा तो हमें

मिलता हाफिर पायपित क्यों नहीं पर हिया करें।
मान समका र गई। अपये रोज आयवित तप परने
मगा। तपस्या प्रमाय से देवी प्रसन्न हुई और उसा
उनको आफाश-गामिनी विधा प्रदान की।
क्रिया या पुत्र यधुमों के दिन पत्नटे । शाम साते ही ये
सय एक बड़े राय पर पेठी और पाणी-घसा रत्नाप?
इतना कहत ही विद्या के पक्ष से पहलकद माकाश में उदने
लागा और रसद्वीप में जाकर रुक गया। पुप्रयधुऐ उतरा
और रत्नदोष में घूमने लगी। पहा चारों तरफ सतही रल
दिनाइ दत थे। पुत्रवधुएं कुछ देर तक घूमती रही और
फिर पर २ 11 लेकर वापिस अपने घर लौट चार घर
आफर उ दोन अपनी दासी का एक रन देकर इलया के पास
भेजा और यह पहानाया कि हम जो कुछ तुम्हारे समगाये
यह तुम भेजा करना । जय तुम्हारे पैसे इम रत्न से अधिक्ष दो
जायगे, तय हम तुम्दारा हिसाय कर देंगे और हमारा रत्न
लेलेंगे। तब तक यह रन तुम अपने पास रखो। दासी की यात
सुनकर हलवार पड़ा प्रसन्न हुश्रा और यह रत्न से लिया।
पुत्रपधुएँ इच्छानुसार तरह तरह की मिठाइसा मगाने लगी।
अब उनको किसी तरह का तकलाफ 7 रही। कुछ दिनों पाद
इलयार न सोचा सेठजी तो एक नम्बर के फंजूम है। वे मेरे
रुपये पया देगे १ कदी पुत्रपधुएँ मुझे धोखा नो नहीं दे रही
है? उन्होंने जो रत्न मरे यहा जमा कराया है म जान पह क्या
है १ श्रीरक्तिनी कीमत का है ? में ता सेठजी के पास जाकर
अपा रुपये जे श्राऊँ और यह रन दे पाऊँ । पेमा सोच कर
या सेटनी के पास गया और रन देकर पोला-यह आपका

(८)
ग्ल ममामि ग्रोमरे पर दीजिय! मेठजी न रत्न देना नो
याच में पाये ! जहान पछा-या त हा मे माया,
CI ने मयमा पान पद दी। महजी उमा रपय
देकर बह रत्नले निगामा होसमाज तक नहीं दमा
था। ये सोचन लग-पहा पुत्रवधु वहा से लाद इसकी
खोन करनी चाहिय । अपच पराया अपनी पुत्रघधुओं का ध्यान
रस्त्री कागे । १५ दिन शामका मजा नाप्रियधुर घर
में नहीं घर कामराम चारों त दवा सपन पाडे में
मी देम्या, लेकिा यहाँ भी पुत्रपधुर महीं मिली। पाटे में एक
बटालार भी गापय था। जिगेगा सठजी यिनार में
पड़ गय । कुछ ममय बाद जय मटमी प्रपन घर में साये तो
पुत्रवधुप घर में मिली शोर या लपा भी पथा-स्थान पर
पाहुया पाया । उमे देनका मटजीका द निश्चय हो
गया कि पुत्रयधुऐ इस लपक पर बैठ रहा पहीन पटीं
जाती हैं।
दुमा दिल मेटजीन सुधार को पुनोपा और उस
रुपकट का पाला कर नीरे पर जालादार पियाइ यमयाया।
जिसे बाद मामानी से नहीं देख सकता था। शाम होने दी
सेठजी उम नरक में या गैटे। रोज की मौति आज पुत्र
पधुपे पार और उस लफापर पेठ गर । विद्या का स्मरण
करन ही यह उहा घार ननदोष जा पहुँचा। पुप्रयधुणे
गेश की नर नागोर बरफ जाकर बठगा। सउना
ने शहर में निकाला ता घागे तर ही रत्न दिनार
दिये। दान थपा ममें मेमरी
घधुएं विसनो मूब
ऐसी जान मिलम पर भी एक र ? सो, में भाज
-

गत सारे रन इकट्ठे कर लेता है। देमा सवार बदल
निकले और चुपरे से रत्नों को पीकर सारा मार दिया)
इतन पर माउस तोप नहीं घुमा । इसलिये दो चारभनी
क्षेत्र में और दो चार भान दाय में भी ले लिपे। फिर झटपट
अपना पुत्रपधु पो से चाय पचान हुए उम REE में बैठ गये।
१छ देर बाद यधुरे मार और एक २ रस्त हो गई । साना
रामकिन भाजप मार सेनीयाराथायर
उनमें एक न कछा-बदिता माज तो नीचे जा रहा
दूला पाली-पदि नीचे ज्ञाता है तो छोड़ो। ITAL
यो । विद्या के पल से चली जायगी । RTी 14
सा ये गिड़गिड़ाते हुए पाले-भरी 1 छोड़ा गत ! भीतर में :-
तुम्हारसुसार तीसरी म पहा-घरातो भयाप्रमर
मिला है। दूसरी बोली-देखती क्या हो? फिरक्य ऐसा
मौका मिलगा ? फिर क्या था ? धागे । पुषयधुर लार
को छोड़कर उड़ गई । उनले उपने ही सप नारे समुद्र में
श्रागिरानी के साथ लोभीमापरत सभी सinrn
दूर गया । इस तरह भत्ति कोमकान का उस घर फरक
प्राप्त हुधा
२-जम्य सामी
राजगृही नगरी में प्रारममा म के एक मेट रहन धे।
गा पुत्र का नाम हमार थी। जिस दिन जम्पशुमार
पाठ कन्यानो क साथ वियाह पर घरपाय, मी दिन के
घर पर प्रभा शादि५०० गोरों का मारा। अम्पार
पीसगलस14ent fhram

(१००) में हो रया हुआ ध । प्रभय हुक्म से सर चोरों ने अपनी २पोटलिया वाधड़ी। जम्मूमार अपन महल मे चोरों का दख रहे थे। यह हाल देखत हुए उनये मन में वैराग्य उत्पा हो गया और उ हात माधु पनो का दृढ निश्चय कर लिया। नीच ज्याही चार चलन को तयार हुए देव माया से उनके पाँच जमीन सचिपक गये। प्रभा-जाते क्यों नहीं हो? प्रय क्या देख रहा। चारोंन पहा-घले से हमारे पाय तो जमीन से चिपक गये हैं। हम मिल भी नहीं सकते है। प्रत्रय सुपर पकायका गया। कार से धीमी घागज प्रारही थी। पर उसी फोलयर ऊपढन लगा। ऊपर पुमार अपनी पाठों का पत्निया साग विद कर रहथे। पत्नियाँ कुमार म कह रही था-जय धार दीदाधी लेना चाहते थे तो हमारे साथ विवाह यों किया पया हमारी जिन्दगी घरपाद कर लिय आगाविाह किया कुमार ने कहा- मेंन सा यह यात पहल ही पह दी थी, इसमें मरा पया दाप है? अगर तुम्हारा और मरा परम्पर सचा रियाद है तो हमको पैसा प्रयत्न करना चाहिय कि निससे फिर भी इम इन झभटों में ही नहीं पर। - प्रभच कान लगाकर इन बातों को सुन रहा था । उसके हदय पर इसका घडा असर पड़ा। यह साचन लगा कि एक तादमाममा परधन भार पर खिया की हो पाज किया करत है, और एक य कुमार को प्राश सम्पत्ति शोर सुख- विलास को चोट कर सयम ल रहे हैं। ध य कुमार को ? एसा सोचकर वह कुमार के परों में जागिरा और अपन कार्या कापसापकर यहन लगा-कुमार कृपा कर मुझे भी अपन

सायमाझिये प्रमय साथ उस ५०० माथी मो जम्बू
Tमार साय दीक्षित हुए और माल पल्यार में समास
गये।
३-घमा सेठ
भासदार वर्ष पहखे गमगी में धमाजी
माग परेदी माग्यशान और मम्पत्तिशाली सेठ थे। उनी
पानी का माम गुमना था। यह पोद मेट सीमा मी
शानिमकी दिन भोपानिपपा माने पनि घमाजी
रही थी नप उसका अपन भादवी पाद
महाबिगर शादी उसी दासी भर मा मोरयामा
भासू पETam n | प्राओं को दुध गरम २ यूद सेट
को पीटपरमा गिरौं । मेटणी न सिर उगापना पो तरफ
पामा मुमद्रागारदीगी। समा। 7 या-तुम .
हा गुमदार पानबार मासिक REATE'तुम्
हिमपातमीजास तद अधीनदोहो?
गुममा वामपट से पE-TA सिदान की।
स्यामी'पासी हाममा मा ति गुम
मा की या भागाधी TMCER मारशामीमतदान
हानको सम्पर पर प्रतिदिन पर नीया छ
इसी काम ममराहदयपादिया मगर
मनीमधमाशी पास पर नापासाय
श्रीरामा जम्दै समार दाना दोहर
Freeोरपा २ को माता की मार
मामी,

(१०२)
लगे-हो
में
धाजही
मेठजी की बात न मुभद्रा के घाय पर नमक छिड़का।
धहरोप में थाकर बोली- ससार को त्यागना कोई हसी-खेस
नहीं है। कहना पहा श्रासान है पर करना यहाटेडायाम है।
सेठजी को सुभद्रा की यात चुमगर । त्याग की भाषा
उनके हृदय में घर कर गर । ये तुरन्स उठ गडे हुए और कहने
तुम सभी को छोड़ दिया। भाज से तुम
और तुम्हारी अप सौतें, सभी मेरे लिये यहिन तुरय हैं।
सुभद्रा का कहना थर थर कापने लगा। पह अपन किये
पर पछतान लगी। धनाजी से शनुनय बिय परम लगी।
लेकिन घमाजी का मातो त्याग की नरगों में हिलोरें रो रहा
था। उस एक न सुनी। उधर स सुभद्रा की मान सीतें भी
सागर । सयन घन्माजी को चारों तरफ से घेर लिया। ये
सप गेराकर उन्हें मनान लगी। रोकिन धनाजी अपने बचन
से विमुग नहा हुए । उन कहा-अगर तुम मुझ से सच्चा स्नेह
रखती हो तो तुम भी मर साथ दीक्षित हो जानाधयथा पक
नदिन तुम्हे पद ससार छोड़ देगा।
धनाजी की बात सुनकर उनकी पत्तियां भी उ माथ
हो गई। मयको माथ ले में अपने माले शाशिमद्र के घर पहुँचे
मायाले-शात्तिभद्र अच्च काम में तनायिकाम्य क्यों ?
शालिभद्र जय उदे देखा तो ये भी उनके साथ हो लिये।
अत में सपन एक साथ धीर प्रभु से दीक्षा प्राण की और
ससारमोग विकासोको ठोकर मार कर शुद्ध चारित्रका
पामान किया। इस प्रकार सपने मोक्ष माग पथि घनकर
अपाजीपन का पत्याए किया।

( १०३ ) ४-कुण्डरीक REITR मापन के दो पुत्र थे। एक नाम या पुराह- कचौरमा पुगगी। दिन मुशि का उपाय मुमार यादीत नागा भार अपना प भार बड़े पुत्र पारी को साप दिया 1 दिनों पार जप पे मुमि पुन या पधार तो पुपरी गृहस्थ धम अंगीकार किया और पुगपरोक दीक्षा धारण दी। एएटरीच दीदिनों में पागों का गमीरमान प्राप्त कर लिया। सपरपया मी उगमीटर धीपारणे Eि जैसा लूगा सूत्रा माहार मिमना मासे थानामियो कर लेते ये सारण उन शरीर में परदीपीमारी पेश ग साप पार स्थविर मुखियडरी को साथ स उसी गगर में चल मारे। महागज पुगहरीको ज्योती मुनि मागमन की पथर मिमी,धेसा में उपस्थित मोर पोरयापधार लिये भूमि का प्राय मानीगरों में मा। स्थविर मुनि एगाकर पाम-माधुरीको छोरापन विहार कर गये। पुपरी मुनिमीप दिनों में पूर्ण योगये। मदिन म्यtar भी उनका या विहार सोही Time IN Rio मुरर म्यादिध मोगा की Hiसनिगम पर धिrir जमा लिया। पुगे अपना का ये मुनि य निट माय और गायु जीमन को मे BREALकान परमपन जीवन की रियासाने लगे।राहीको मुनघर पुगहरी मुनि मन ही मन समित हुन और यदा सरिर यिर मुनि नेपाल पर

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घा सरल होना चाहिये । पर व्यापारीको
था।घसघ से पहले धणि काक गामजान
गनियों के पास कम्पनों को भेजे गनिहन्द महत पसद
किया। लेकिन एकम्बल की कीमतहीRPमहर था।
कीछ दासियों ने नो पनघटमाश भारदी थी
उद देखा। व्यापारी उदास थे, या कामामीनताका
कारण पूछा। उनमें से एक व्यापारश्याच दिशा-तुम्हे
क्या काम इससे? चलो तुम नामरामि पर
धणिक राजा का माम सनरपदाकारये। लेकिन रात
एक पम्बन तक ही खरीदाराशहो यानि
यात
को मासिद्ध विमान में पहरा दिया यह निविगद
सिद्ध होता है हिजो विषय पामनामों के दाम हो जाता है,
उनको घेसी ही गति होती है। जी किण्डरी गौर।
५-गातिमद्रवी
धेगिएक-विरसार मगध देश के राजा थे। उनकी नगरी
राग्रही में गेरर्धन नाम के एक बरे मे बहन यदि
भद्रती उन्हीं के प्रिय पुत्र थे। उन पाम अनार
दिन की यात है कि कुछ र न पम्पलों क TT गा में
।
देयान एक पान कम्बत ग्वरीदाम कम नहीं चलना या
प्र व्यापारियों को निराश हो लौट जाप
प्रात काल जय वे राजगृहो ये जान भने, त्य शान्तिम
दासी ने उनसे पहा-बार गाम का जापानी
उसने बदा-यदिन, हम बन्न
am
जाना पड़ रहा है। यही कारण मा मामी

( १०६ )
पल यही यात है। चलो हमारे सेठजी से भी मिलन
घे तुम्हें ऐसे ही हा लौटने देगं । वहा जो कोई भी प्राप्ता है
घाली हाथ नहीं जाना है। व्यापारी तो चाहत दी यही थे।
छ
तुरत उना साथ हा गये।
सेठजी के घर में प्रवेश करत ही व्यापारियों की श्राखें
चकरान लगी। चारों तरफ दीवारों पर हारे पने जड़े हुए
थे। माल का था मा देवपुरी ही दुनिया में थी। दासियों
शालिभद्र की माता भद्रा से व्यापारियों का परिचय काराया।
भद्राने व्यापारियों से कहा-रम्यल क्तिने । व्यापारियों ने
उत्तर दिया-सोलद और एक २ की कीमत है समालास्त्र
स्वर्ण मोहरें।
में बीमत नहा पूलती है। मुझे तो ऐम ३२ कम्बलों की
प्रायश्यकता थी। पर 'मुगिजी, इनको बीस लाख मादरेंदेकर
कम्यता लेहो।
भद्रा का उदारता और भसूट मम्मति देव का व्यापारी
उनी प्रशसा करत मुए पास पिदा हुए।
HIT भद्रा 74 २ करपा के दो टुक कर अपनी ३२
ही चुाको यार दिय पात्रों ने एक दिन श्रोदकर सरे
दिस अपना र शरीर पोंछ कर महलक पीछे फक दिय । महे
नराना महल साफ करने आई। न बन सभ्य का उठा
लिया और अपने घर गई। ग्रही मदेतराणी राजमहल में
नौ माह लपाती थी। एक दिन यह रन पल ओढ़कर
राजमहल में भाट, दरही थी। इसने में रानियों ने उसे देश
विया ! रातियों ने उसे पास युमाकर पूछा-भुमो यह कम्बल

(१७)
से मिला महतरानी ने साराहात कह सुमाया। रानियों में
राशा से यह यात कही और शालिमद की सम्पति की सरा
हना की। रामारोशालिगद से मिलने की ठानी। उसन एक
दिन उसको अपन महलों में
बुलाया,
लेकिन
मद्रा न कहलाया
कि मेरा पुत्र किसी स मिलना जुलना नहीं है। अगर राजा
चाहे तो मैं उपस्थित हो मकनी मय राजा स्य शानिमद्र से
मिलन के लिय याये। मदा ने उनका पड़ामान सामा किया।
महल को देवघर गजा पक्ति हो गया।
राना को रत्न जहित सिंहामन पर येठार मद्रा अपने
पुत्र को नीचे बुलाया । शालिम 7 जयाय में कहा-गा, यदि
मामाची माह दे तो माप उस परीद ल।
मैं सा पुल समभना दी।
माना ने कहा-नहीं ऐश थगि पीयन की चीज
नहा है। यह सा अपन गजा। जरा नीचे आकर मिल
साला।
निमदनी शाय। राजा 1 उपा सिर
चूवा
और
अपनी गोद में येडासिया । बुखदेर बातमीन पर शालिमद्र
31 अगर पने गये। लेशिया यात 37 हप में काट की
APE गुम गाकि गर भी मारामा १ सय तो मुझे
एमा काम करना चाहिये कि जिमसमरा कोई नाही:
रविचारों ने शालिमद के उदय में पैराग्य का थपुर
पा कर दिया। जब उन्हॉन भगवान महापार का उपाय
गुम तो उनकी यह मामा मार अधिक प्रपज हो गई। फिर
गया? प्रपती टूट सम्पनिका ठार मारकर घेघनाजी

के साथ माधु पन गये और सयम पालन करते हुए मोक्ष मार्ग
के पधिक यन।
६-महात्मा गजसुकुमाल
मुनि गज सुकुमाल श्रीकृष्ण महाराज के छाटे भाई थे।
इनका रूप पड़ा हीसुदर या। श्री महाराज ने अपने
भाइ के अनुरूप ही सुदर घ बुद्धिमती सोमिल ब्राह्मण की
कन्या के साथ उनका सवध निश्चित कर लिया। एक दिन की
घात है भगवान अरिपनेमि गा१२ विचरण करते नए द्वारि-
काम पधारे । नगरी के सर लोग प्रभु के दर्शनार्थ गये।
गजमाल भी साथ रे। भगवान ने अपने उपदेश में कहा
कि मसार के सुम्ब भत्र पाकिफेन की तरह क्षणिक है।
इनसे पचन कलिये फेवन गाय ही एक पसा साधन है जिसमें
किसी तरह कामय नहा। कुमार पर यह उपदेश असर पर
गया। उनके हृदय में दीक्षा भारतीय रूप से हो पाये। घर
आवर उन्होने अपने माता पिता से Pीक्षा की अनुमति मागी ।
कुमार की यातें सुनकर सको यड़ा स्मिय हुआ। सब लोग
उसममान लगस्य कृष्ण महाराज ने श्राकर समझाया।
लेविन कुमार अपने निश्चय से तिल भर मा नहीं हटे। आखिर
बार माता पिता के अनुरोध से एक दिन के लिये राज्य विद्यालन
पर बैठ कर दूसरे दिन होन प्रभु के समाप दीक्षा ग्रहण की।
दीक्षित होते ही उन्होंन प्रभु से प्राज्ञा ली और महाकाल नामक
भपान स्मशान में तप करने के लिये चले गये। पदा होने
रात भर ध्यानारूद हो खड़े रहने की प्रतिज्ञा की। चारों तरफ
शाति थी। मुनि ध्यान में सलग्न हा नटे थे। इतने में ही उनका

( १०६) भाषी सुर मोमिल माह्मण यन मोमिल ब्राह्मण पन लिये ममिधा को लेकर उधर से आ शिला। यह कुमार को साधु मेप में देखकर भाग पहला हो गया । योगा-परे निर्निज ! अगर यही दोग करना था तो मेरी शिदीप कम्पा के साथ सम्पन्ध क्यों दिया? इसका फला धमी मैं तुझे चम्नाना है । यह कहकर उसने पास ही के जलाशय से कुश गिली मिट्टी ली और मुनि के सिर पर पाल बाघार उसमें धधकने हुए अंगारे डाल दिया। मुनि को असा घेदना होने लगी। सिर जमो लगा। शीर पी नस तान लगी। लेकिन फिर भी मुनि अघि ल खड़े रहे। उनके मन में सौमित के प्रति तनिक भी मोध पैदा नहीं हुमा । इस प्राणान्तक दुख को भी मुनि नदसते २ सहर किया। परिणाम-वरूप उनकी आत्मा अपने शरीर को छोडकर मोक्षपुरी में विराजमान दागर ७-महाराजा उदाई भगवान महायोर के समय में लिधु नदी के किनारे घास- भयपाटए नाम कसुर गर था। महाराजा उदार पदा के राजा थे। ये बड़े ही धमामा थे। मगवान महावीर का उपदेश सुनकर उनको वैराग्य पैदा हो गया। उडॉन मगवान पाम दाक्षित होने की ठानमी । परन्तु राजकाज की चिन्ता उनको मनातलगी। ये सोचने लगे कि जिस शाम को में समझ कर छोड़ रहा है, उसी काम का मैं मेरे पुत्र को मे सोपू ? ऐसा सोचकर उन अपना राज्यमार अपने भानजे को सौप दिया और म्यय पार प्रभु के पास जा दीतित हो गये। पिता के इस शुभ कार्य को धन धुरा सपमा पाउस मगरी छोड़कर अन्यत्र चला गया।

1
-
(१९०)
महाराजा उदाइ शुद्धमाय से सयम का पालन करते हुए
एक दिन अपना मगरी में भी आ पहुँचे । उनके भानजे को
प्रारगिली ना उदोन समझा कि मेरे मामाजी मुझ से राज्य
'छीन कर पुश अपने पुत्र को दो के लिये भा रहे है । इसलिये
उहोंने अपने राज्य में घोषणा करादी कि कोई भी मनुष्य
उदाइ मुनि को गाहार पानी नहीं पहराये और 1 ठहरने को
ही स्था। जो इम हुक्म का पालन नहीं करेगा उसका
'माणात कर दिया जायगा।
मुगिरी में पधार। अपो मास खमण के पारने के
लिय घर २ घृमन लगे। लेकिरानाशा के अनुसार किसी 1
उनको आहार-गानी नहीं पहराया ! मुनि एक महीने से भूखे
तो थे ही फिर गृष्म 'छतु की धूप ने और विहार की थकानट
ने मिलकर उनका शह ज्यर पैदा कर दिया। मुनि की यह
"शा देख कर पक कुम्हार से न रहा गया । उमारानाशा को
कुकरा दी और यहे ही प्रेम स मुति को अपने घर जाकर
श्राहार पानी का दान किया। मुनि के दायर की नयर जय
गजा को हुई नप उसन एक घेद्य को बुलाया और कहा कि तुम
मुनि को दया के बहान विष देकर उनका काम तमाम पर डालो।
अन्यथा तुम्हें कार में पोन दिया जायेगा। पंद्य मुनि के पास
गरा और पिता पूर्वक उनका हाल पूछने सगा। मुनि को मया
गेगमे पाहि जानकर वैद्य ने उन्हें तत्काल अपनी औषधि
मेग्न करने को कहा। मुनि निस्सकोध हो इसत २ दया
थद्वान उस इलाहल जहर का पान कर गये।चिपकी गरमी से
मुनि का दाह पर और भी बढ़ गया। लेकिन फिर भी उनके
मन में किसी के प्रनि तनिक भी वुर भाव पैदा नहीं हुए। इसी

भाषशुद्धि के कारण मुनि का अयधिज्ञान पदाहागया ! उम धाम
से जहान यह भली मोति जान लिया कि गजामा से धन
मुझे जहर पिला दिया है। राजा के इस कार्य की प्रशता करते
हुए ये पहने तग कि मैंने तो अपने भानजे के साथ घोर अन्याय
कर उमे राज्य भार सोपा था लेकिन उसने मेरे माथ फैसा सद
ध्यपहार क्यिा ? उसने मुझे ऐसा विष पिलाया कि जिसे
वीपर में अपनी जिदगी शान ही समाप्त कर स! | लेकिन
मैंने तो उसे पेमा विष पिलाया दिपदसते २ उसे पीमा रह
और जमजमा तरों तक उसका भोगता रहे। मैं उसक
साथ पहा अन्याय किया है । इसका जितना भी दड मुझे मिल
उतना ही थोपा है। इस प्रकार उदार पापी प्रत्यालोचना
परम २घासान की प्राप्ति गर। उहान उपशम भावोस
अपनी भात्म शुद्धि कर शिष सुन का प्राप्त कर लिया।
८-याणक श्रावक
चम्पापुरीनगर में शरण म एक भयशाली वेश्य
रहत थे। पे चढ़े ही धर्मात्मा थे। धम पर गकी अदद भसा
थी। एपदा की यान है कि दुरुध्यारियों के साथ जहाज
मेंट पर विदेश जा रहे थे। छ दूर समुद्र में जा पर
एक देव न अर कीपीक्षा परनी चाही। उसो अपना
मायाजास पनाया । समुद्र म तूप घान लगायनमोर धर्म
प्रारम्भ हो गर | ante में बिजलियों चमका लगी। चारों
और देयता क कई रूपनगर बात मागे । उममें से एक महाथ
में तलवार ले अरण से पता-नरक ? सम्हला । प्रय
भी समय है, यह कवि शिधर्म भग है। परना अभी
+A

( १९२ )
मौत के घाट उतार दगा। तेरे कारण इन चार दूसरों को भी
ये मौत मारना पड़ेगा।
भरणकन कहा-देव। तुम क्या म्यय इद भी क्यों न
'आ जाय और चाहे जितना प्रलोभन क्यों न दें, तब भी में अपने
घमको सत्य नहा कद सकता।
देव तो कद्द ही रहा था पर उसके साथियों ने भी डर के
मारे उससे बहुत कहा। डाट-डपट भी बताई। लेकिा भरणक
पर कुछ असर नहीं पहा। देर न कई उपाय किये। भीषण रूप
धारण कर डराया, धमकाया भी। लकिन फिर भी काम
घना । अरणकान धम पर दये। आखिरकार उसो जहाज
का उठाया और आप में ले उहा। परगणक साथी फूट फूट
कर रास लगे। क्सिो को अपन जीवन की भाशान रही। सय
प्राणास अनुराय विनय कर रहे थे और यह समझा रहे थे
कि किसी तरह यह कददो कि म मेराधम छोहता हूँ। लेकिन
अरणक पर कोई रग नहीं जमा सका। देव हार गया । उसने
अपनी माया समटी और अपना असली रूप धारण कर
अरणक सामने उपस्थित हुभा । उसा अपन अपराधों की
क्षमा मागी शारदो पुल की साड़ी भेंट पर स्थान को
चला गया। भयरविपत्ति आने पर भी अरणक श्रासन
अपना धर्म नही छोडा । इसस उनकी विजय हुई ।
है-बाहुबली
भगवान रामदेव के यदे पुत्र का नाम था भरत और
छोटा नाम था पाहुयली । भरत जय छह खड पृथ्वी का

(२१३)
राय जीनकर भागये तय वाटुयली ने उह अपने से युद्ध करने
को ललकारा और फिर वमती नन को कहा। व्यही
दोनों सेनामा सहार का सार कर भरत और पापली का
ही परस्पर युद्ध तय किया गया। पापली बलवान ये । श्रम
भरत उहें परास्त नहीं कर सके। यद्यपि युद्ध में पाहुबली
विजयी हुए लक्नि तत्काल उन्हें इस राज्य भय मे विरक्ति
हो गइ । व अपन पिता ऋषमदय के समीर गये और दाताल
घोर तप में लीन हो गये।
कुछ दिनों बाद भग्न मा समार स चिरत हा दीक्षित हुए
और बाद दिलों में दीपा शुद्ध भागों से केवल पान को प्राप्त
कर गय । भरत का वेधल शाहुमा जानवर सय लोग उन्हें
यदन करन पाये । लेकिाशपती हा पाय । उन मन में
पह अहकार समाया हुआ था कि में मरे से छाट भाइयों का
वदना कैसे करू ? यम, इसी विचार से वे अपन ध्यान में रहे
बहोर तपस्या करत रहे। लविन हदय स मान कोनहीं
स्यागाभगवान ने अपने सात से पाहुबली के भाषों को जाना
और उन्हें सममान के लिये अपनी वया ब्रानो मोर सन्दरी
कोडा पाम भेजा। दोनों सतियों न पाहुयला के कठिन सप
का सराहना करत एप कहा-पघष अमापाप नहकार रूपी
हाथी पर सवारी प्रिय हुए हैं, इसलिये अब तक अापका
सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकी है। हमको भगवान अपमदघन
माप पास भेजी है। श्रत अपन दृदय से मान का निकाल
बाहिर करिय बार अपन माइयों काय इन करन पधारिये।
यादुपली ने जय अपनी पहिन प्राली धीर सुदरीये
शब्द सुन हा ये मन ही मन बहुत पश्चाताप करा लग।

(11)
पश्चाताप मा जाता है या फिर माम नहीं पाताया-
बली में सही अपाय भरतादिभाइयों का पदम बरन
लिये भागे बढाया, सदी को मी यलमान होगया।
.-मरीचि
भगवान ऋषमय कोयराबान हो जाए पर ये ग्राम २
पिचर फर उपरेश मोरागे। विचरने २ ए दिन ये माया
नगरी में पधारा भरम महापग भादि उनका धन्दमा परने
गये।यम कर मगधान Rur 7 पछा समयान !
पया पोई यहा भी ऐसा प्राणी जो आगे जाकर आपके
समान तीर्थ बने और धर्म की प्रभायना मगधाम न
कहा-भरत, तुम्हाग पत्र मावि दीपमात्र ऐमा जीपी
भागे जाकर बीयीमयों सीकर पनगा। भगवान के पचम
সুল সবে মাসি ননী এ ঋ ঋী গা যুদ্ধ
माविको भाषी तीथंकरसमस कर नमस्कार किया। इसस
मरीचिम में अहकार वागया। यह गला २ में पिर
कर पातमा हि-मैं तीर्थंकर पनू गा, मनीयंकर बनूगा ।
इसी माघशीभूत हो मरीचि अपन पुर की कायम
किया। जिलो फास्यरूप उन्हें कुछ कान के लिये प्राणी के
पेट में रहना पड़ा। जयकि सप तीथर क्षत्रियकुरा में ही
पाते हैं।
११-भगवान मल्लिगाय
महाविद क्षेत्र में बीतशोका TIR की एक नगरी थी। पहा
महापशना राज्य परता था।उसल
i
UTTT

पसु, वैधपए और अमिचन्द्र मरे छुट मित्र थे। एक दिन
उसने अपने मित्रों से पहा-मित्रों में अयमसार से ऊप गया,
इसलिये मेरी इच्छा सयम लेने की है। भाप तोगों पी क्या
इच्छामित्रो न -महाराज म तो बचपन से ही
आपके साथ रहे है। इस सयममार्ग में मी साथ ही रहेंगे।
महापल गना ने राज्यमार अपन पुत्र को सीप पर ही मित्रों
के मायक्षता धारण करती । दीक्षा लेपर सातों न या प्रतिक्षा
की किम सप समान रूप से ही तप करेंगे। यह प्रतिज्ञाले थे
अनेक प्रकार की तपश्चर्या करने लगे। किंतु महायान विचार
किया कि मैं सब से पढ़ाई अत: मुझे अधिक तप करना
चाहिय, नहीं तो भविष्य में सप समाउदी रहेगे। मरा पहप्पन
नहीं रहेगा। ऐसा सोचार महापक्ष मुनि पारणे के दिन प्राज
मेरा सिर दुसता है-श्रान मेरा पट दुग्यताई शादि महाना पना
कर पारणा नहीं करत और तपस्या योगे पढ़ा देते थे। इस प्रकार
मुनिन अपने घोर तप से तीर्थकर नाम कम का उपार्जन ता कर
लिया, लेकिन कपट से तप करन के कारण मुनि सी का
मध किया। जिसके फलस्वरूप महापता मुनि १६ घेती-
कर मलिपथ स्त्री रूप में पैदा हुए। श्रता कपट-पूषक तपनी
करना चाहिये।
१०-कपिल प्रालय
कपिल ब्राह्मण कोशायिन गमी रहने वाले थे। इनके
पिता का नाम काश्यप और माता का नाम महाया पापन
से दी इनके पिता के गुजर जाउ मेनका पतन पोहनकी
माता किया था। जब कपिल पुछटोमामा की प्रशा

ले थावस्ती में रियाध्यया के लिये गये। विद्यार्थ्ययन करते
हुए यहा पर दापी से प्रेम हो गया फसत ये उसके प्रेम पाश
में फंस गय । दिन 1गर की महिलायें सतोत्सनमा
जा रही थी। कपिल की प्रेमिका भी गह। लेकिन दरिद्रता
कारण उसके शरीर पर न तो कुछ अच्छे पर ही थे। कुछ गहने
ही। दूसरी त्रियाँ यड़ी सज्धन प्राइभी। उसो देखा
पद सजायशयाप्ति आगह, तथा थोपा का कारण
कपित को कह सुनाया। कपिल मी विघश था। जहाँ पर
को भी पूगन हो पा गहनों की क्या पान ? कपिल की प्रेमिका
ने एक बात पताई । उसो कहा कि यहाका गजाप्रतिदिन दो
मासा सोना दोर देता है। अत' याप उसको पाने का
मयान करें।
प्रेम का भूषा या नहीं करता कपिल ने याद भी किया।
लेकिन एक दिन भी उसको दान नहीं मिला, पाकि उसके
पहले ही कोई कोई राजा ६ पास पहुँच कर दान प्राप्त कर
लेता था। इसलिये पदपक दिन, रात को घर से निकम
पड़ा। गत अधिक होने से कोनघाव रे घोर समझ कर उसे
पर लिया और सुबह राजा के सम्मुप उपस्थिन किया जा
पूलन पर कपिधन सच २ यात दी। राजा पहुन खुश
दुमा और उसकी सचाई पर प्रसग होकर घर मागने को
कहा यि तोकपिल थो
खुशी का ठिकान रहा । घर
मोचनगा कि २ माशा सोने से क्या होगा? राजा प्रसार हो
कर देता है तो सो मोहरें क्यों न माँगलू । लेकिन सो
मोह भी वब तक चलेगी, ये भी पुत्र दिनों में समान हा
जायगी। श्री राजा या राज्य ही मांग ल । लेकिन राय भी

( ११७ )
कामरागमा छीन ले तो इस प्रकार अपने मन में शिवार
करने र भागनार पलटी भोर मोम को छोड़ कर यात्म शुद्धि
में सा गई । जो कपिन राज्य मागने को उतारू हो रहा था
घही अपनी मारमा को घिरता हुअा अाकाल में ही
धातराणी बन गया। परिणाम स्वरूप दमते ही देखते उसको
केलशान की प्राप्ति हो गई। घर इपिल पलीयम गये।
वाध्ययन पत्र का भाटका अध्ययन इनका दो उपदेश है।
पहा जाता है कि जगत में चोरी को समझाने के लिये होने
उसका उपदेश दिया था।
११-चिच मुनि
प्राचीन समय में काजी को धाराणसी नगरी करते थे।
पक समय यहाँ शस रामा राज्य करते थे। मूचि का
प्रधा धा ।गमा की रानी के साथ प्रधान का व्यवहार
"छा था 1 दिसयक्ष गुप्त यात राजा घोमाम हो
गई। उसने नमूचि को प्राण्ड थी मजा दी। नमूधिको
फामी दयावार्यदभूत गएडाल को सौपा गया।
ममूधिया का नबरामनामून को धन
कालोम दिया और कहा-मगर तुम मुझे मागे मारोगे तो मैं
तुम्हारे को को कलाओं में निपुण कर दूगारभून ।
उसे ना मारा और पोपा में रख लिया। नमूचि उसके पुत्र
ति और सभूमि का पढाने लगा। थोड़े ही दिनों में उसने
कलामों में निपुग्ध कर दिया। पर तो इन्दभूय उसका
हा मासा मानने अगा।
1

( १९८ )
एक दिन गिन बीसी के साथ मी ममुचि का प्रमद्
ध्ययवार देख लिया गया, जिस एमभूत राहाम कर सका
और उसन उसका मारमा चाहा। लेकिन हदभूत के पुत्रो से
गमूवि को इस बात का पता चल गया। सय यह मरने के मय
से यहा से भाग पर दस्तिनापुर चला गया और यदा रासा
सागार चलायती दामना या पटा। घर पित्त और
सभूनि जो सगीन विद्या में पूर निपुण हा गये थे, गाते गाते
गायक विचरते लगे। मगीत में ऐसा जादू था कि जहा
भी य गात हुए किराते, जाता अपना पETA छोड़ कर
थाहिर निकल पद्धता । खियाँ भार पिशप कर पुलीन घराो
की स्त्रिये तो घर से निकन करतदनुरूप माय 1 am
जाती थी। कुछगों को यह यात पस , ना मा । उदार
राजा से जार उनकी शिकायत का राजानपिना कुछ सुरा
ही उन चाली कागर सेतियासित कर दिया। इस अपमान
म उ है गहरी घाट पहुँचा। ये प्रामहत्या कालिय एय
पहाड़ पर चढ़ गय, महा हूँ काइदख न सके। लेशमी
उहे दुनिया में रहना बाकी था। नत पदार पर एक सयमधारी
मुनि से उनकी भेंट हो गई। मुनि के सदुप३श से चित्त और
मति न दीक्षा अगोकार करलाभ कठिन सप करते दुप
इधर घर वितरम लग।
एक दिन ये घूमते २६स्तिापुर में आये। उस सि उन
दोगों के मास घमण का पारणा था! मूचि र उनक पाने
को अपर मिली। उसे भय ना कि हा ये मरी पोरा नहीं
खोल दें। इसलिये उसोभान नौकरी ले कहा
कि
तुम
समायो
और उन मुनि को मारपीट परयाहिर निकाल दो। ममुक्षिपी

मासा से नौकरों ने उसे बहुत मारा पीटा। महामुरी चित्त के
मामैं सो तनिक भी रोग पैदा नहीं हुमा, लेकिन सभूति यह
सहा नहीं कर सके। उन्होंगर पर तेजोलेश्या का प्रयोग
पिया। निमसे चारों तरफ धुमाशी धुश्रा फैल गया। चित्त
मेहभूति को बहुत साझाया, तय की वेशात हुप । प्रातिर
में दो सथारा ग्रहण कर लिया। जय यह समाचार
जापुर के सम्रा को मालूम हुए तो ये सयुटुम्य मुनियों के पास
साप और मधी अपराध की क्षमायाचना करने लगे।
रानी ने अप सिर मुशियों के चरणों में मुकाया। उसके बालों
मधुर मुगध वित्त को उलझाम कसा लिया। बस
तरह सुप भय पर मुग्ध पर गये। ने निदान किया
दिर मेरी पग का कुछ फल हो तो में भी ऐसा ही
सम्राट पार सुग्य भव की प्राप्त करूं । चित्त 7 अपने
भाई को यहुत समझाया और कहा कि इस तरह तुम भी
अमूल्य तपस्या को कोदिया क मूल्य में मत पेचो, लेकिन
मभूति पर पूछ असर नहीं हुआ। पनत सभूत मुशी का जीय
अपन मिशा के अनुसार ब्रह्मदत्त चमवर्ती 1 और वित्तपक
से४ यहा पुत्र रूप में उत्पन्न हुप्रा समय पाकर सेठ के पुत्र
दीक्षा प्रण को और मुनि मार्ग का अनुसरण करते हुए
अपनी आत्मा का कल्याण किया। उघरसभूति का जीव पक्ष
दत चमवती बना और विषयों में लीन रहने के कारण रक
-काममाापना।
१२-सेठ
सुदर्शन
सेठ सुदर्शन चम्पारी के निवासी थे।.
ही सम्पदि धी । उनको पतिमता खो कर नाम
.

( १२० )
जिनसे उनके पार पुत्र पैदा हुए थे। लिता की तरह पुत्र मी
पड़े ही रूपयान और कात्तियार थे। सेठनी वारा-पुरोहित
के साथ पदा प्रेम था। एक दिन पुरोहिशजी कहा वाहिर गये,
हुए थे। पुरोदितानी मेडमी के रूप पर मुग्ध यी दुई थी।
खसा अपनी दुर्भायता पूरी करने के लिये सुदर्शन को पहला
भेजा कि पुरोहितपी राहत गीमार है, ये ग्रापाशी पुला रहे
यह सुनते ही मेसी दौर थाये और पुगेहितजी को देने
खगे। लेकिन घर में तो मलाही वृष और शा। उन्होंने
पुरोहितानी से पूछा-बाहों परीक्षितमी ? सण उनकी तपिपत
मी १ पुरोहितानी सेठजी कापत हुर अपन मन
की बात कही। सेटजी दी थे। परदार मग त्यागा
थे। उ दोन पुरोहितानी को पहुस समभाया, पातु चिकन घड़े
पर पानी का गूदों की तरह उस गर का ARर महो दुधा।
आखिरकार जय सहजी फार चारा नहीं देना ता पर
पुरोहिताजी सपहा मरे म तुम क्या चाहती डोमिशागपु
सका। यह सुनकर पुरोदितानी ढील पद गय । उसने
सेठजी को छोड़ दिया। सेठगी सुशी२ घर आप और अपने
भाग्य की सराहना करालग।
एक दिन सेठानी अपने पुत्रों को लेर किसी उत्सव में
जा रही थी। राजमहत्तों से रानी समय ह जाते पुप देखा।
पुत्रों की सुन्दरता को देखकर यह मुग्ध हो गइ । जय य पालक
इरान सुदर सो इनके पिता स रूपवान होंगे यह विचार
रानी कगन में समा गया। उसने पास में पेटी हुई पुरोहितानी
से पूछा-ये पुन किसके है ? पुरोहितानी न मुंह पनारा-
श्राप जिरो सती कहकर तारीफ करती है ये उसी मनोरमा दे

1
( १२१ )
पुत्र रानी ने कहा-तो क्या तुझे उनसतीत्व में सदेह है?
पुरोहिता ने कहा-श्रापको क्या मालूम गनीजी ? उसका पति
सुशार तो हम है। यह ६ कहानी है न ? रानी म पछा।
नय उसापनी सारी घटागनी को कह सुनाई। पुसकी बात
पो सुराती हमी भार पाती-तुझ में श्रदमी को फता।
की कला ही सु.र्शन बसी होशियारी से तरे पजे से मिक्स
मागा। देखना में अब उस अपने पजे में फंसा पर तुम यता
ऊँगी । पुरोहितानी ने उसे उत्तेजना देते हुए कहा-मती
श्राप के उस पार पजे में फमानी है ? रानी सुदर्शन पा
फंसाने कमर देखने लगी।
एक दिन नार के समी त्र-पुर नगर के पादर कौमुदी
उमा मना रहे थे। सुदर्श की पी मरमा भी थान पुत्रों
महित मह मर मनान गई लेकिन सटजा अपनी औषधशाला
में पोषाले धानन्य घटनुप थे। राजा रानी मे पादिर चलने
को कहा। लेग्नि जय रानी न यह मुना कि सुदर्शन याहिर
नहीं गया है तो उसन भी पर दुखन का बहाना कर बाहिर
चलन सरकार कर दिय राजा अपन दरपारियों सहित नगर
के बाहिर आ गया| Rलों में गा के सिवाय श्रोर कोइन
रहारानी कीदासिया यथासमय सुशन को उठाकर अपन
महलों में ले पाई । मुदशन या में था । १६7,सुया शरीर
से जोर कान में उसका व्रत मग होना था। अन बहमपन
व्रत में बीत रहा।
रासी तरह २२ घरवालयारों से सुसजित हो सुशन के
सामा उपस्थित हुइ बार अपनी तरफ ति करन
लगी। लेकिासुरान अपने ध्या में लीन रहे। राणी का कोई
।

( १२२ )
यश उ7 पर न चला। सागर हो उमने पारेदारों को विल्लाले
हुए कहा-पकड़ो-पकहो, यह पापी सुरसा मेरा सतीत्य भग
परने के लिये महलों में घुस आया है। यह सुनते ही पहरेदारों
मे सुदर्शन का फैद कर राजा के सम्मुख उपस्थित दिया। गजा
के काध की सीमा न रही। उसातुरत सुदशन को शूली पर
चढ़ा डने की भाशा देदी। नगर में तहलका मच गया। सेठजी के.
शीलवत की चारों तरफ मदिमा फैली हुई थी। सभी 7 मठमी
को पचान के लिये राजा समार्थना की।रोकिन राजा ने किसी
की न सुनी। सेठजी को शूली पर लाया गया। शील का पसंद
तेज उनके माथे पर चमक रहा था। उन्हें इच मान भी दुख
नहीं था। नकार-मत्र का स्मरण कर मन ही मम सबसे
क्षमा याचना कर रहे थे। लविया कमी सत्य को धेरे
में रचा जा सकता?सहसा एक देवी घटना घटी। शील
प्रमाय से सुदर्शन की शूक्षी सिंहासन पा गई। ऐघताओं ने
पुष्पवृष्टि पर जय जयकार किया। लोगों की सुशी का पाराधार
न रहा । राजा ने अपनी भूल स्शकार कर क्षमा मागी। इस
प्रकार सुदर्शन के सत्यशाला की विजय हुई। यह है शीया का
प्रभाव।
१३-शर्नुनमानी
महाराजा धेणिक की राजगृही नगरी में शर्जुन
नामक व माली रहता था। पद शरार से सुडान सुन्दर
तगा सस्थ था। उसका पफ बगीचा था जहाँ मुद्गर-पारिए
यक्ष को एक प्राचीन मूर्ति थी, अर्जुनमाल पचपन से ही
उसकी पूजा विसरता था। उसी नगरी में ६ गुडे रहा
करते यजनकी धान सारी नगरी में पेशी हुइ थी।

-
( १२३ )
एक दिन नमानी अपनी स्त्री पधुमती पे साथ
अपने गीचे में श्राया और यकी पूजाघरन लगा। योही
अर्जुनमाता यहा की पूजा करा में मग झुधा त्योंही उन
पदमाशों ने उसको पर पाघ दिया। धुपसी प्रोली
थी, पदमाशों ने उसके माथ मTATTI अत्याचार किया।
अजुमा दीयामा ससूरा घरम रहा था। उसो ती
प्रांवों के सम्मुन पेसा पत्यानार रखकर थम सी मूर्ति पर
सनि मी थक्षा नहीं रही। बदमनदीमा यक्ष को बुरा भला
पहर दुम्ब कान लगा । उसमें मूनि अघिद्यायक यक्ष का
शासन मह उसन अजुगाली के शरीर में प्रवेश किया।
उसके प्रयेश होते ही अजु के सर पघा टूट गये। उसने एक
सापहीलोद मुनगर में अपनी स्त्री पार उम ६ही पदमाशों
कायाम तमाम कराया।रतन पर भी उसका कोघ शात नहीं
दुमा । यह प्रतिदिन नगर ७ध्यमियों की घात फरस लगा।
लोग डरक मारे हैरान थे। शिक्षा की हिम्मत नगरी में पादिर
जानेकोनहीं होती थी।
देव योग से उही दिनों मगधार महापार मी पिचरते २
राजगृही नगरी बाहिर पधारे । जय र सुदर्शन को यह
रायर हु तो यह प्रभु राम लिए तथा उन। सुदर्शन के
माता गिमा न डायन रोका और मर्नुनमाली कामय
दिनाकर नाश्या, शिसुदर्श की मति मायल
थी । घेशिमामाह माता पिता की अनुमति दर्शन को चन
दिये । मार्ग में उहें देखते ही अर्जुनगाली मुद्गर
से दोहा
श्रापासुशी उस समय मभु या समस्कार पर नागारी
17 साप ध्यानाथ गड़े दो गये।
।
M

।
( १२५ )
सपा मुद्गर उन पर उठाया, सुदर्शन थे सप और तेज
सम्मुख यह ऊपर ही रह गया। नीचे नहीं प्रासका। यक्ष
अपनी शनि पर लजित दो अर्जुन के शरीर से भाग निकला।
अर्जुन निर्यल हो घरती पर गिर पड़ा । सुदर्शन ने जय समझा
किया उपसर्ग शा त हो गया है, तप उसन अपनी
प्रतिक्षा का पालन किया । अर्जुन पो होश आते ही यह भी
सुदर्शन के साथ प्रमु महावीर के दर्शन को चल पड़ा।
उस भगवान का उपदेश सुन कर दीक्षा धारण करलीre
जो म म मनुष्यों की बात करता फिरता थापही अर्जुन माज
सरसगति म पच महावतधारी मुनि पन गया। मुनि मन
पर अनु ने तपश्चर्या करगी मारम की। मिक्षा जाते
समय लोग कई प्रकार से उसका अपमान करते और
साइना तराना भी करते थे, लेकिन मुनि ने सबको दृढता
से सहन कर ६ महीने में ही केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया।
१४-परदेशी राजा
लगभग सत्ताइस मौ वर्ष पहले सिताम्पिका (पेशावर) में
परदेशी रामा राज्य करता था। यह बड़ा नास्तिक था। दया
धर्म क्या होता है। यह जानशादीम था। प्रात्मा परमात्मा
पुण्य, पाप, स्यग-नरक यादि को पद पोरीपनादीसम
मता था। विस उसका प्रघात-मत्री था। एक बार राजा
परदेशीम अपने परम मित्र अजिसशत्रु को कुछ यहुमूल्य चीजों
को भटकाने के लिये अपना प्रधान को भेजा। अजितशत्रु फी
नगरा में स्योगयश पेशीधमण नामके मुत विराजमान थे।
उनके उपदेशों को सुगौसिये हजारों की मी नगी रहती
यी। रिसको मी अनापास ही मुनि का उपदेश सुनने को मि
गया। चित्त पे हदय पर मुनि कामगिट प्रमाय पहा । उसने

1
-
( १२५ )
पहर शारिता या गृहस्पधर्म धारण किया, और मुति से
मिताम्पिका पधारने की विनती की। मुनि मी जगद२ घूमते
हुए एक दिन सिताम्पिया पधार गये। मत्री को इस बात की
सूचना मिली। सारी जनता मुनि दर्शनाय जारी मत्री
भी मन ये बहार राजा को लेकर बाहिर निकाला। अपने या चे
में गोगों की भीड़ दबकर गजा ने मत्री से पूछा श्राज यहा
इतनी भीर क्यों लगी हुई ह ? म त्रो न पहा-माज यहाँध
मुनि पधारे हुए हैं। ये स्पग पर शादि को मानने वाले है।
सही के दर्शनाय पान यही भोर लगी हुई है। राजा ने कहा-
तप तो हम भी चरों और मुनि से पूरे कि धर्ग-7रक कहाँ ?
जरा पता तो मदी।म श्री तो चाहताही पदोधारयदराजा
कोमुनि क पास ले गया। राजा ने मुनि से पूछा-महाराजा या
सग और तर हे ? गार है तो मेरे दादा मुझ से भी अधिक
पापीये। प्रापको मा यतानुसार ये अवश्य पर में गये होग,
और महान दुपों का सामना कर रहे होगें। क्यों नहीं बाहर
मुझे अपना हाल सुनात १ जिससे में फिर दिसा न कर।
मुनि ने कहा-राजन् ! अगर तुम्हारी रानी के साथ कोई
दुर्यवहार करे तो तुम क्या फरोगे?
राजा--मैं उसे तत्काल जान से मार दूंगा।
मुनि-अगर यह कुछ समय का पयकारा चाहे तो "
उसे जाने दोगे।
रापा-नहीं, पदापि नहीं। मैं उसे तत्काए मार डालू गा।
मुनिज तुम अपन अपराधी को एक मिनट भी छोड़ा
नहीं चाहोगे तो तुम्हारे दादा को, निॉने श्रोशे पाप क्येि
६, रह से उन्हें कौन यहा धाो देगा?
राजा ने फिर दूसरा प्रश्न पूछा-महाराज! मेरी दादी

पड़ी धर्मात्मा थी । पर अवश्य स्वर्ग में गा होगा। घर पर्यो
नहीं धाकर मुझे पाप वर्म से रायती ?
मुमुनि कहा--राजन् ! बोर मनुष्य नहा धोकर सध्या
पदन यादि शुम मृत्यों के लिये जा रहा हो और उस समय
पदिपक भगी पापाने में उसे पात मेरा पाने को युलापता
पया वह पहाँ जाना पसन्दरोगा?
गजा-नहीं।
मुनि-यम, यही दाल अपनी दादी का मी समझो।
राजा ने फिर मुनि से तीसरा प्रश्न पिया~महाराज' पग
पाप मात्मा को दिखा सकत है?
मुनि नपा-राजन् ! ये मामने गए के पचे किम
हिल रहे है।
गजा-च्या से।
मुनि--पया तुम दया को देख सकते हो।
राजाना।
मुनि-अब तुम ऐसी स्थूल बी को भी अपनी माला से
नहीं देख सकते, नव पारमा जैसी मरूपी चीज को कैसे देय
सकते हो?
राजा-मछा महाराज! ये दाधी का भात्मा चीटी
शरीर में से चला जाता है।
मुश-राजन् ! जिस तरह एक कमरे में एक दीपक के
आसान से सारा पमरा प्रकाशमान हो जाता है और उसी
दीपक पर यदि एक दर्तन दाद दिया जाय तो इसका पद
प्रकाश पतन में समा जाता है। उसी मार हाथी की
थात्मो कसरध में भी जान लेना चाहिये।
इस प्रकार अन प्रशोचर परराजाने शत मे अपनी हार
संजूर
दी मोर मास्तिर पर जैनधर्म को स्वीकार किया।

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Swadhyay Mala Bhag 1

Author
Jain,ratan Kumar
Title
Swadhyay Mala Bhag 1
File name
Swadhyay Mala Bhag 1
Text
OCR done
Citation
1946
Published
2011/03
Publisher
Jodhpur,shri Gyanpracharak Mandal
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551900
Barcode
4990010032595.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
sE1JcTdh0ov
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