Natya Sodh Sansthan, Kolkata
Gayatri Parinay Natak
Front matter
N.8.8.
1938f407
Aco. No, 1988/407
Dato 24.5.839
Item No B14166 olda
Don, by Bs Mehter
Parinay
Gaayatric
Naalak
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श्री श्री राधारमणो जयति।
गायत्री परिणय नाटक ।
प्रथम
अंक"
नांदी आर्या
होते जिस से जग के, जन्म स्थिति प्रलय
और जिस में । चैतन्य चंद्र सोही, पूरण कर काम
प्रेम विस्तारी
नांदी के अनन्तर ।
मूत्रधार अलं बिस्तरतः । प्रिये : इधर इधर !
नटी-(प्रविष्ट होकर) स्वामिन् ! क्या आज्ञा है ? क्यों
इस समय अममय मे इस दासी का स्मरण किया है ? मेरा
सब काम अधूरा पड़ा है।
नट-मुंदरि ! माजकल स्कूल की छुटिओं के कारगा
बडे बडे अध्यापक पंडित यहां एकत्र हैं। सबके प्रधान महा
महो पाध्याय पडानन शास्त्री जी ने आज्ञा की है कि "मृत्र
धार ! हमारे इन अवकाश के समय के प्रमोद बर्द्धन के लिये
कोई नाटक खेलो,, -मुझे उनकी आज्ञा पालन करनी है। ये
देखो प्रिये कैसा विद्वत्समाज उपस्थित है
'कोई पगडी कमरी पहरै कोई सिर्फ डुपट्टा । कोई डाही
छ मुछंदर कोई मिर सिलपट्टा । कोई लिये तालका पंखा कोई
सघनी दानी। कोई अधिक विनीत पदेह कोई अनपढ अभिमानी
( २ )
इनके मनोरंजन को कोई नाटक खलना चाहिये ।
नटि-ये सब प्रकांड पंडित है हम इनका क्या मनोरंजन
करमर्केगें?
नद--कोई ऐतिहामिक नाटक खेलें
नटी--नाटक तो मब ऐतिहासिकही होते हैं"विक्रमोर्वशी"
"अभिज्ञान शाकुंतल"
नट-ये पुरानी बाते है आजकल की नाटक कंपनियों
में हंसी दिल्लगी है रस वा क्षिशा नहीं होती।
नटी -तब क्या कोई संस्कृत नाटक स्खलें
-नहीं आजकल हिन्दी साहित्य संमेलन' और 'नागरी-
प्रचारिणी' की कृपा से संस्कृत भाषा की कोई कदर नहीं रही
पंडित जन भी संस्कृत छोड भाषा में ही भूल रहे हैं ।
नटी--सोचकर) तो वही नाटक खेलें ।
नट..."गायत्री परिणय" वही ठीक हैं।
नटी....व में क्या ! यह पंडित मंडली के माथ के विद्यार्थि
ओं के कलकलमे तो कानपडी नहीं सुनाई पड़ती है
नट....(हंसकर) इसके चुप करदेने का उपाय तुम जान
ती तो हो।
नटी....क्या?
नट....वही मधुर गान ! जहां तुमने कोकिल विनिन्दित मधुर
स्वर से गान प्रारंभ किया और यह सब हवा बंद हुआ
नटी....तो क्या गान करूं?
नट....यही वर्तमान समय
नटी....गान करती है
देखो ये सघन कैसे बन छाये, छाये हैं धन वन माहि ।
स्यारो पुग्वैया वायू व इ रह्यो, जलधरनभ समाहि । देखोये
चढू दिम दामिनी दमकती गरज गंभीर डराहि । देखोये
बरमन धुरवाधनि पद पदधार धरांहि । देखाये।
सोर करेंदादुर मर दिन नाचत शिाच सुखपा हैं । देवाये
कुसुम कर्दवन डह डहे मधुकर मुदित उडांहि । दवायः
ताल खिजर जामुन पकी डार रमाल झूठाहे । बवाय
हरि हरि दुव धराल नै देखत नयन मिगहि । देवोये
नेपथ्य में
चला मावि वाही नंदनवन भूलें
बोलत मोर चकोर कोकिला मुरमरिताके कले। नंदनवन :
हम पर मंगकी सखी महेली खेल माल मन ले । नंदन -
गामें मधुर मलार मगन मन मामन सब मुख सूलें । नदनवन
नी- उत्कर्ण होकर सुनकर ) आहा गह गायत्री
अपनी लग्वियों महित मदनवनमें झूला झूलने आती है इसका
तेज सूर्य के समान है पाखें चौंधी जाती हैं । चलो प्रिय :
हम यहां से निकल चलें !
चका चौंधी मार्ग भी नहीं दीखता है ।
( प्रांख मांडते मांडले दोनों जाते
प्रस्तावना
स्थान नंदनवन की तमालवाटिका)
(गायत्री झूला झूल रही है सावित्री पंक्ति तृष्ट्रप जगती
आदि सखिए झूला रही हैं
(गायत्री"गाती है)
आओ आओ प्रारी : सखि ! गाऔ गाने मारी
उसी देव-देव सविता की जेजकार मनाओरी ।
वरन योग उम भी लेजको मन लगाय कर ध्याऔरी ।
करै-रणा बुद्धि हमारी विनती यही सुनासोरी ( १ )
१) इसमें गायत्रीका समस्त स्वरूप है बुद्धिमान् विचार लुग
स्क का पद का अर्थ नहीं छूटा है ।
( ४ )
मावित्री-सखि ! पंक्ति ! देख गायत्रीका कैसा मीठ
स्वर है अकेली गाय रही है तो भी कैसी झील की आवाज लगती है
पंक्ति-तरी आवाज क्या कुछ कम है तू भी कुछ गा.
सावित्री-(पंक्ति की वाई भुजा दबाकर ) चल तू ऐसी
ही वातें बनाया करै ! और तौ:
जगती-हां सावित्री ! गावै क्यों न ? योंही नखरे किया
करै है। बडी एक ?
गायत्री-( झूला मे झुककर ) नखरे मासरे जाकर करियों
मग्नी महेलियों में क्या नम्बर :
सावित्री-मामरमें वहन : तेरे नवरे होंगे हमारी क्या
है त राजकन्या ठहरी ।।
गायत्री-( अनमुनी कर झूलने लगी )
पंक्ति-सुपर्णी (२) रानी उम दिन दवमै कहती थीं
"गायत्री वड़ी होगई है अब इसके विवाहका विचार करना
चाहिये ।
जगती-देवने क्या कहा ?
पंक्ति --कहा "हमारा विचार इसको स्वयं बरा करने का
है जिम में इसका चित संतुष्ट रहै
जगती-तब क्या स्वयंवर होगा ।
पंक्ति---मा सुपर्णी ने कहा "यह अभी वालक है कबामन
है कोई वातकी स्थिरता नहीं है कभी ब्रह्माको कभी शिव
(२) वैदिक इतिहासमें देवमाया सुपर्णी से छंदोंकी उत्पति हे
गायत्रीकी उत्पति है, इसीसै सुपर्णी गायत्री की माता रूपसै कल्पित है.
देखो यजुर्वेद शतपथ ब्राह्मण कां० ३--प्र०५ब्रा० १ अं०३ । ८
त एते माये अस्ट जन्त सुपर्णीच कद्रूच..."
सामुदासि सस्टजे सागायत्री दिवः सोम माहरत् ।
( ५ ) को कभी विष्णु को देख कर मोहित होजाती है ( ३ ) प्रभात एकका तौ मध्यान्ह दुनरेका गुण वर्णन करनी है इसमे इसका स्वयंवर न कर प्रदान करना ही उचित है । गायत्री- अन्य मुख होकर मुनती है और लम्बे मोटामो मे झूलती है। सावित्री--मीनी विवाह की बातें गुट गुट सुन रही है हा हा हा गायत्री-(क्रोध कर) अव में तुम्हारे साथ झूलने ने प्रया करूंगी! सावित्री-( हंसकर ) अबही नहीं जब विवाह होजाय तब हमारे साथ नही फिर अपने दुल- जीभ दावकर चुप होजाती है] पंक्ति-बम ! जीभ मत चलावे होगई तेरी चबर चवर अवतू गा नही मुझमै बुग कोई नहीं है। सावित्री'" (गुनगुन कर गान आरम्भ करती है और मुम- कुराकर चुप होजाती है ) गायत्री--(झूला से झुककर ) ये अकेली न गावेगी कोई संग गवानी ॥ (३) स्मार्त विधानमें त्रिकाल संध्यामें गायत्री को ब्रह्मा कि शिवकी और विष्णु की शक्ति मानते हैं देखो आवाहन प्रातःकाल-गायत्रीं त्र्यक्षरां वाला साक्षासूत्र कमंडलु रक्त वर्णी चतुहस्तां हंस बाहनसस्थितां..."ब्रह्माणी ब्रह्मदैवत्यां ब्रह्मलोक निवासिनी मध्यान्हमें " बृपभारुढां .."रुद्राणी रुद्रदेव त्यां" सायंकालमें " गरुडासन संस्थितां वैष्णवीं विष्णु देवत्यां वृहत्याराशर---- पूर्वसंध्यातु गायत्री ब्रह्माणी हंसवाहना संध्यामाध्यान्हिकी श्वेता सावित्री रुद्रदेवता बृषेन्द्रवाहना देवी' 'सन्ध्या सायन्सनी कृष्णा विष्णुदेवा सरस्वती । ( २) a जगती--(सावित्री की पीठमें नोंच कर)ले बोलमें गवाती हूं ( दोनों गाती हैं) फूले कदम कुसुम वन पाली हरित छदन मुम भरुन वरनके उदित दिवाकर मनुप्रति डाली। तरुन तमाल श्यामघन मेदुर भई विपन धरना सब काली। अंकुर सघन तृनन तटना तट लमत बलारि बधूगन लाली स्वेत छतान फवी सुन्दर छबि उडगन भूतल करत विचाली ॥ गायत्री-(पर्ण वृक्ष को देखकर ) अहा ! में जब श्येनरूप धरकर तृतीय स्वर्गमै ' सोम , लिये आती थी और कृशानुने वाण फेंका था तब मोमका पत्र मेरा पंख और वांएं, पामका नख कट कर गिर गया था उसीमै यह ' पर्ण ' बृक्ष हुआ है। इसीमे इसके पुष्प श्येन पक्षीके नखके समान हैं इसका रस निश्चय मोम रस है ( ४ ) पंक्ति-सखी ! एक वार तुम देवता और असुरों के विवादमें म यस्थ भी तो हुई थीं ॥ गायत्री-हां में मध्यमें घी एक ओर देवगण और एक ओर असुर थे । देवगण ने अग्नि को दूत बना कर मेरे पास भेजा था और असुरों ने सहरक्षा को भेजा था में अग्नि के ओर गई थी। (५) जगती----( गायत्री का रूप देखकर स्वगत ) आहा ५ ) यत्र वैगायत्री सोम मच्छापतत्तदस्या आहरन्त्या अपादस्ता भ्यापत्य पर्ण प्रचिच्छेद गायत्र्यैवा सोमस्यराज्ञः तत्पतित्वा पर्णो भवत्त- स्मात् पर्णोनाम तद्यदेवात्र समस्यन्यक्तं तदिहाप्यसदिति । यजुर्वेद शतपथ ४ का० ५ प्र० २ वा०३ कंडी (५) देवा श्चैवा सुराश्चोभये प्रजापत्या पस्पृधिरे तान् स्पर्द्धमा- नान् गायत्र्यंतरा तस्थौ । यजुर्वेद शतपथ १ का ० प्र० ३ वा० ३४ कं.
(७) गायत्री का कैमा लावण्य है। इस वर्षा के ममयमें इसके गोरे अंगपर लहारिया कैसा फवा है ( प्रकाश ) गाती है । लहरिया झूलत लहरें लेत । गोरे रंग अंग दुति दमकत दिनकर जलद समेत अंचल उडत समीर झकोरन इन्द्रधनुष छवि देत । शोभा जलधि शरीर तरंगत बेनी बंधन सेत । नेथथ्यमें गर्जन ध्वनि सब ऊपर को देखती हैं पंक्ति----यह कैसी डरावनी घटा है देखते देखते सवरे आकाश मे छायगई ॥ सावित्री----हाय विजली कैसी चमकती है। दिनमें ऐसी कौंध! नगनी----गडगडा हट से तो कान फूटे जाते हैं। सावित्री----देख ! गायत्री जी जी कैसी डरप रही है । गायत्री----(प्रवाहि त्याकर ) नहीं मै तो हँस रही हूं ( गाती है) आई सघन घटा नभ कैसी। पंक्ति----चलत पवनपुर वाई सननन दामिनी दमक डग- बत तैसी । जगती----( वर्षा देखकर ) धुरवा पडत हाय धारनस गर्नन प्रलय समय की जैमी। सावित्री----( डरकर ) अवला हमवाला सबवनमें भई दशा कबहू नहि ऐसी॥ नेपथ्यमें भयानक गर्जन ध्वनि होती है सब डरकर भागती हैं । वज्रपात होता है ।
द्वितीय अंक
स्थान देव भवन
कद्र
मुपर्णी कद्रू रुद्राक्ष माला स्फ्टटिक माला संध्या आदि
यथा स्थान बैठी हैं।
देखो जी वर्षा ऋतुकी कैसी शोभा है ।
सुपर्णी-ऐसे मुख और शोभा के प्रावृष समयमे भी न
जाने मेरा मन क्यों अाज उदास है।
रुद्राक्षमाला----रानी जी ! आपको कुछ हृदय का रोग
होगया है मन प्रफुल्लित नहीं रहता है ।
कद्र----देव वारवार बाहर रहते हैं इममे मन उदास
रहता है ॥
मुपी----( हंसकर ) तुमतो बहन : सबका मन अपनासा
जानती हो ।
कटू----मुझे चाहै कोई वर्ष छै महीना छोड कर बाहर रहै
तब भी ऐसी उदास नहीं होती, मैं तो अपने इन बालबच्चोंमें मगन
रहती हूं॥
मुपर्णी----आज सवेरे जबमें सोयकर उठी थी तब मरी
दाहिनी अांख फरकने लगी थी। तबही सै मन उदाम
रुद्र माला----बीवी जी को बुलालाऊं उनसे प्रापका मन
लगजायगा।
कद्रू----आज गायत्री गई कहां है ?
सुपर्णी----सवकी सब झूलने गई है ।
नेपथ्यमें गर्जन ध्वनि
स्फटिक माला (६) ( अपटी क्षेपस प्राकर ) ऐमा
( ६ ) स्मार्त विधानमें गायत्री जप स्फटिक माला रुद्राक्ष माल
पर होता है।
है
() मूसलधार मह बरसता है प्राते प्रात सराबोर हो गई, कार से आंच चौंधगई गरज मुनकर माथा फट गया जाने कहीं विजली पड़ी। नेपथ्यमें ( नंदनवनमें नंदनवनमें ) मुपी-( चौंक कर )क्या नंदनवनमें बिजली पडी हाय ! वत्मा गायत्री वहीं गई है ( अज्ञानमी होती है ) कद-क्या गायत्री झूलने नंदनवन में गई है। स्फटिकमाला-और क्या वहीं का तौ मन मूबा था कद्रू यह क्या हुआ। सुपर्णी....( मूळमें उन्मादसे प्रलाप करती है ) हाय यत्मे : गायत्री ! तेरा कुशल वो है । हाय : यह क्या अनर्थ हुमा। कटू-हैं हैं, है क्या ! तुम क्यों ब्याकुल होती हो । सुपर्णी-(मलापमें ) हावत्से ! गायत्री ! हामाणाधिक- कन्यके ! तू मुझे छोडकर कहां गई । हा देव ! तुम कहां हौ तुम्हारी प्यारी बेटी गायत्री' कहां है? कटू-वहन : थिर होमो तुम सदा अपने मनमें अमंगल ही विचारा करती हो वडी बहमन हो । नेपथ्यमें कलकल ध्वनि सव-चमकित होकर देखती हैं। (मुप्तोत्थित के ममान अद्ध बाह्म ज्ञानमे लटपटाती मायत्री आनी है। मावित्री और पंक्ति उसै दोनो और से पकडे माती हैं। पीछे और सब मखी धीरे धीरे आती हैं) कद्र-रानी जी ! रानीजी ! तुम योंही व्याकुल होती थीं लो देखो वह गायत्री आई। मुपर्णी-गायत्री का नाम सुन अर्द्धवाह्य ज्ञानमें उठकर वैठती है और इधर उधर देखती है (गायत्री को देखकर ) (३)
?
।
(१०)
आवमे ! (गोदमें लेती है
गायत्री-(पूर्वार्द्ध शरीर से सुपर्णी की अंक लेट जाती
है । और मुपी के कंठमें हाथ गेर कर अधखुली आंखों से
देखती है)
सुपर्णी-(हर्ष विषादसे ) वत्से ! क्यों ? क्या हुआ
यह क्या दशा है, कह तो !
गायत्री ( अस्फुट शब्दोंमें ) मा ! में झूल रही थी....सक
महेली.."माथ थीं धुरना
पडने लगे."विजनी चमकी
गर्जन होने लगी अांखें चौंध गई में डरके मारे अचेत होमई ।
ये सब पकड़ कर मुझे यहां ले आई ( आंख मीच कर चुप हो
जाती है )
सुपर्णी ( आश्चर्यमै सखियों की ओर देखती है ।
सावित्री--अव ! जीजी को चेत नही रहा ( लबे स्वास
लेती है ) बड़ा गजब होगया ( रोती है)
कद्र--( मावित्री की पीठ पर हाथ धर कर ) रोती क्यों
है वत्से ! धीरज धर अव क्या भय है।
सावित्री -मा : जो हम सब डरकर भाजे और वजषान
भया हायरे ! (विह्वल होती है)
स्फटिक माला ( धीरज धराकर ) कहो वीबीनी : अक
क्या डर है।
मुपणी-(भीत और व्याकुल होकर ) तव ? तब ?
मावित्री..."जीजी का सिर [ कांपती है आंख मीचती है ।
सुपर्णी"क्या सिरमें चोट आगई ( गायत्री ) देवत्स
कहां लगा?
कद्रवत्से ! सावित्री ! 'सिर' सिर में क्या हुआ ?
?
. (११) मावित्री..." ( भग्न स्वर से ) शरीर से अलग होगया [5) सुपर्णी....[ मूर्छित होकर गिरा चाहती है रुद्राक्षमाला पछि महारा लगाती है] कद्र रानी ! स्थिर होओ अब तो तुम्हारी बेटी गोदी मे है अब क्यों इतनी विकल होती हौ चेत करो चेत करो। दासी-[पंखा करती है जल छींटती है ] नुपर्णी--[ सज्ञान होकर ] सबैरै मै दाहनी आँख फरकती थी हृदय वैठा जाता था वही हुआ ( गायत्री की टोडी १कई कर वत्से : तेरा जीवन पदपद में विपद संकुल है [ लंबी मान लेकर ] हाय ! तब? पंक्ति-वृहस्पति ने अपने हाथों में ले लिया [विवश होती - स्फटिक मालाची बी ! स्थिर होओ ! अब आनन्दके समय उदासी क्यों ? मंगल गाओ अब क्या दुख हे दुःख तो टल गया। सुपर्णी-तब। पंक्ति-हम अब व्याकुल होगई प्रांवों में अंधेरा छा गया न जान उसी समय एक श्यामसुन्दर कमल दल लोचन [७] वषटकारने बज होकर गायत्री का सिर छिन्न किया था। "वषटकारो वैगायत्रियै शिरोऽछिनतस्यै रसः परापतत् तं वृहस्पति रुपा गृह्णात्" कृष्ण यजु संहि० कां२ प्र० १ अनु० ७ खं० १ यही कारण है कि किसी मंत्रका 'शिरोमंत्र' भिन्न नहीं है केवन गायत्री का शिरोमन भिन्न है । जो सज्जन संध्योपासन करते हैं वे जानते हैं गायत्री भिन्न है, गायत्री शिरोमंत्र भिन्न है। वहुतमे नत्वानुसंधानाओंका विचार है कि तंत्र मार्गमें दश महा- विद्याओं में जो एक 'छिन्न मस्तादेवी है वह इसी गायत्री के शिर छेदन मूलपर ।" है
(१२)
गोप किशोर कहां से प्राय गया उसने चट बृहस्पति के हार्थों
शिर ले गायत्री के अंगपर घर न जाने क्या किया जीजी च
जागउठी।
सब-बड़ी प्रसन्न होकर धन्य ! धन्य ! ऐसापगेप
कारी कौन है।
मुपी-जिमने मेरी वत्मा की प्राण रक्षा की है जिस
मेरे प्राणों की रक्षा की है मैंतो उसे पाऊं तो उस पर अपने प्राण
भी न्योछावर कर दूं ।
गायत्री-( अांख मीचकर स्वगत) उम नब जलघर श्या
कोटि कामाभिराम का क्या फिर दर्शन होगा, उनक अभा
हस्तके स्पर्श से जाने में आनंद समुद्रमें डूब गई थी। प्राणबंधो
यदि आपने अकारण कृपास इस दामा को जीवन दान दिय
है तो यह जीवन बृथा न जाय इमे अपने ही चरणों में स्थान
दीजिये ( उस रूपका स्मरण कर आनंद मग्न होती है)
सुपर्णी--वत्से ! गायत्री यह कौन था तू जानती है !
गायत्री-मिचे नेत्रों में मिर हिलाती है।
( अपटि-क्षेपमे विश्वामित्र का प्रवेश )
विश्वामित्र--.-अब गायत्री को उपयुक्त वर मिळ जायगा
मब उठकर प्रणाम करती हैं।
विश्वामित्र----रानीजी ! आजका दिन था तो वडा अमं
गलका पर अब तो परम मंगल का है । मंगल गारो हो
धरामो बतासे बांटो।
सुप ----यह कौन करुणापारावार था जिसने आ
मेरी वत्मा को पुन जीबन दान दिया !
विश्वामित्र----वही मप्तकोटि महामन्त्र मौलि मंत्रराज
मुपण----मंत्रराज कौन ?
विश्वामित्र----अष्टादशाक्षर श्रीगोपाल मंत्र (८)
सुपर्णी----क्या वे इस कन्याको ग्रहण करेंगे ?
विश्वामित्र----मैं तो यही कहने आया था ऐसा उत्तम वर
त्रिजगत् में न मिलेगा!
( देव, चतुरानन, और सुरगणका प्रवेश)
( सुपर्णी कद्र चूंघट खींचती है । गायत्री प्रादि कन्यागरण
एक ओर खडी होती है माला आदि अनुचरी गण दूसरी ओर)
देव----( गायत्री के सिर पर हाथ धरकर ) वत्से ! आज
में निश्चिन्त हुआ।
चतुरानन----मैंने कई वार कहा था इसका शिर च्छेद
होगा, इसके
शिरकृतन ' योग था।
देव----प्रापज्ञान के आदि गुरूहैं।
चतु----यह भी तो कहा था कि यह अमर है।
विश्वामित्र--देव ! मंत्रराज को ही इस प्रदान करना उचित
जान पड़ता है।
चतु०--यह तो निश्चय ही है।
गायत्री- (स्वगत) ले मन! जोतू चाहता था वही होता है।
अब तो जीवन सार्थ होगा।
देव--उनको लावेगा कौन?
चतु--नारद को भेजा है।
( ८ ] वेदमें प्रजापति ही आद्य और सर्व श्रेष्ठ देवता है।
प्रजापति वैं कः प्रजापतिमुवा अनु र्सेवदेवाः । यजुर्वेदशत० का०१३
प्र० ३ ब्राह्म० ५ कं. ३
एषएव प्रजापतिः सप्तदशः सर्ववै प्रजापतिः
शतपथ प्र० ३ त्रा० २ कं० १०
अष्टादशाक्षर होनेसे प्रजापतिसे आधिक्यके कारण 'मंत्रराज'
वह सप्तदश है "
संज्ञा है।
(१४) ( नेपथ्यमें मंत्रो का अव्यक्त शब्द) चतु७ --( सुनकर ) वो आये ॥ सव--( उत्सुक होकर मार्ग की ओर देखते हैं) ( मंत्रराज नारद और कतिपय मंत्रों का प्रवेश] (मुपर्णी कद्र दोनों रानी और कन्यागण बडी लालसासे मंत्रराज को देखती है] सावित्री-( गायत्रीके कानमें ) ले अब तो सासरे जायगी नम्बरे करेगी। गायत्री....( कृत्रिम क्रोधसे ) चल हट मुझम न बोल । सावित्री-हां बहन ! दुलह मीले पीछे सहेलियों से कौन बोलता है। गायत्री-( हटकर दूर खडी होजाती है ) देव--भगवन ! हिरण्य गर्भ ! माप मेरी प्रोग्स मंत्रराजमे प्रार्थना कीजिये। चतु--मंत्र महेन्द्र ! देव, आपसे कुछ प्रार्थना करते हैं। मंत्रराज--( समंदस्मित ) निःसंकोच ! चतु--गायत्री को आपके समण करते हैं आप अङ्गीकार करें। मंत्रराज--नारद का मुख देखते हैं। नारद--आप सप्तकोटि महामंत्रों के अधीश्वर हैं यह गायत्री आपकी उपयुक्त पत्नी है। मंत्रराज--[ नारद कुछ कहते हैं) सब ( सशंक परस्पर देखते है ) गायत्री (दीर्घ निश्वास लेकर स्वगत) हृदय ! यह तेरी आशा दुराशा है तुझे श्यामसुन्दर की सेवा कहां तू नो इन देवताओं के मोम लाने, और झगडे मिटाने मे ही, जीवन विता, 'वैतानिक अग्निके' तापसे तप्त रह, इस शीतल चरण कमल की के कान में (१५) छाया तेरे भाग्यमें कहां ? नारद--( ब्रह्माजी के कान में) मंत्रराज गोप जाति हैं [२] गोपललना भिन्न अन्य का स्पर्श नही करते ॥ चतु--[ हंसकर ] यह तो आपका स्वभाव है ओ निकट आवे उमे परीक्षा के अर्थ उछयाना [ १० ] में दोनों पक्ष की शंका मिटाता हूं । गायत्री वेव जाति नही है गोप जाति है । गायत्री-[ स्वगत ] मुझे स्वप्नका सा स्मरण है में गोपों के गृह में थी दधि विक्रय किया करती थी, क्या मुझे देव जाति मान कर, यह कोटि कंदर्प सुदंर नवकिशोर त्याग जा- यगा. ऐमा कर ना था तो मुझे जीवन क्यों दिया, 'वपद काग्न बज्र होकर शिर काट कर तो अच्छा ही किया था । यह क्या जो मृतकको जिलाना और उमै आजन्म विरह ज्वालामैं जलाना, यह तो जिलाना न हुमा जलाना हुआ [ लंबे श्वास लेती है ] देव-हां गायत्री तौ गोपांगना है इम की देव जाति तो माया सृष्ट है । देव कार्य साधन को देव जाति कल्पना की गई मंत्र राज-[स्वगत ] हां पान कल्प में जब ब्रह्माने यज्ञ किया था और सावित्री को देर हो गई थी तब इन्द्र इसकी कनिष्ठा भगनी को दही बेचते से पकड़ लाया और ब्रह्मा से गांधर्व वि- . [९] विष्णु र्गोपाअदाभ्यः । ऋगवेद १ मंड. २२ सूक्त म. १८ [१] रासमें गोपियों से कहा 'प्रतियात व्रजं नेहस्थेयं स्त्रीभिः सुमध्यमा" श्री भाग. १० । २९ ।
{ १६) वाह कर दिया था [११] नारद-तब विलम्ब क्यों ॥ गायत्री--[ सावित्री से ] देवी माया ने मुझे भी मोहित कर रखा था, में तो गोपक न्याहूं मामे लाने के लिये ये मुझे पुत्री बना लाये थे। दो सुवर्णकी कुशिओं सै'सोम रक्षित था वे दोनो चक्रके समान भ्रमती घी,वहां जो जाता था बही कट जाता था गधर्व उम पर पहरा देते थे मैंने प्रथम दोनों कुशिओं को तोडा और 'सोम' ले आई [१२] मावित्री--वही तो दीक्षा और तप हैं [ १३ ] चतु--क्या प्राज्ञा है। मराज--जैमी तुमरी रुचि हो ! सब- जय ! जय !! जय !!! | पुष्पवर्षा करते हैं ] [११] पद्मपुराण स्टाटिग्वं. १ : अध्याय... यज्ञ का समय हो गया सावित्री न आयसकी, ब्रह्मा जीने इन्द्र को भेजा कोई कन्या लाकर उसे पत्नी बनाना चाहिये इन्द्रने बढी सुन्दरी गोपकन्या देखी, पूजा तू कौन है, उसने कहा गोपकन्यात्वहं वीर विक्रेतुमिह गोरसं नवनीत मिदं शुद्धं दधिचेदं विमंडकं..." एवमुक्तस्तदा शक्रो गृहत्विातां करेदृढम् अनयत्तां विशात्नाक्षी यत्रब्रह्माव्यवस्थितः रोदमानातुसादेवी क्रोशेती-- पितृ मातरौ "एवंचीतापराधीना यावत्सा गोपकन्याका तावद्वमा हार- प्राह यज्ञार्थ सत्वरंवचः देवी चैपामहाभाग गायत्री नामतः प्रभो । एक मुक्तस्तदा विष्णु ब्रह्माणं प्रोक्तवानिदं । विष्णुरुवाच । तदेता मुद्वहस्वाद्य मयादत्तां तब प्रभ। गांधण विवाहेन विकल्पं मा कृथाश्चरम् । [ १२ ] हिरण्न थ्योर्ह कुश्योरन्तरवहित आस । तेहम्म क्षुरपवी--निमेषं निमेष मभि धत्तो । शतपथ का०३ प्र५ ब्रा० १ कं९ [१३] तयोरन्यतरां कुशीमाचिच्छदे तांदेवेभ्यः प्रददौसादीक्षा अथ द्वितीयां कुशी माचिच्छद तांदेवेभ्यप्रददौ तत्तपः । शतपथ का०३ प्र. ५ वा. १ कं. १० । ११ - (१७) मावित्री-जीमी प्रगाय । यत्री - बहिन्यामै 1 म क्या हुया ? सावित्री -जो चाहते थमी. और क्या ! गायत्री-इंसकर लज्जित होती है देव--गोपनंदन ! यह भापकी बल्ममा गोपांगना आपके करमें समर्पित है ( गायत्री का हाथ मंत्रराम के करमें समर्पसा करते हैं) गायत्री- सगत ) यजमानों को पीटपर वहनकर स्वर्ग ले जाने ले जाने पीठ में टेक पड़ गई हैं । अम ला शांति मिलगा प्राश्वर की मेवाकर मुखमें रहगी पल्लेदागे म तो प्राण बचे (१४) मब प्रानन्द ध्वनि करते हैं। नारद-'मत्यदी परिस्कार करने गया है ! १५] नेपथ्य गल गीत) माही गायत्री मंत्राज चिर जीयो । लख हुलमो विजात देव मनुन ऋषि हाया' ६ मंत्रराज मबके कृतज्ञता भाजन, जिन गायत्री को नीव दान फिर दिया । . [१४] सैषा गायत्री हरिणी ज्योतिष्पक्षा यजमानं स्वर्गलोक मभिवहति । यजुर्वेद शतपथ ११ का. २ प्र. ७ वा. १६ कं, [१५] मंत्रराज और गायत्री के विवाह के अनंतर गायत्री के गर्भसे चारों वेदोका जन्ग होगा । वेदोंके जन्मस पूर्वका विवाह किम विधानस शुभा ! यह हुआ 'सत्य' के विधानसे जो वेद नहीं होसकता है वह मन्यसै होता है । देखो यजुर्वेद शतपथ २ कां.१ प्र.वा.१० कं. यन्नर्चा नसाम्ना न यजुपानिराधीयते थ केनाधीयत इति ब्रह्मणो है ष ब्रह्मणाधीयने बाग वै ब्रह्म तस्यै वाचः सत्यमेव 'ब्रह्म तात्रा पता सत्यमेव ध्यातयो भवति तदस्य सत्य नेवाधीयते ।
(१८)
धर विविध रूप गोविण अमर सुख माधे,
युगमन्वंतर छिन कल्प जगत हित कीयो।
सुन चतुरानन की विनय सकल निज जनही,
गायत्री कर निज अभय इस्तधर लीयो।
हैं बड़े भाग सब ही के पाज सुनो भाली,
यह युगळरूप रम लोचन भर भर पीयो।
चतु-विवाह मंडपपर ये सुवासिनी और कन्यागण मंगल
गान करती हैं विवाह लग्न संनिहित है।
मत्रगल गायत्री का हाथ पकड़ कर जात है पीछ क्रमश
सब नात है।
जवनि का पतन ।
द्वितीय प्रक समाप्त
तृतीय अंक
स्थान भावराज्य
विधि भक्ति राग भक्ति. प्रेम. कंठमाला जपमाला तिलक
मुद्रा नप्तमुद्रा अर्चन बंकन प्रादिका प्रवेश
विधि भक्ति-हम पतित श्वपच चांडाल श्रादिको तारें
जो एक बेर भी श्रीहरि नाम पुकारें।
नहीं धर्म कर्म कुन जाति चरित्र विचा,
सीधापय श्रीहरि चरनन का निरधार ।
मुद्रा-( बलमुद्रास ) बहन ! तुमती द्वारिका श्रीरंगरत्र
मादिक दक्षिण प्रांत में ही विचाती हौ भन्यत्र वो भी
!
(१२)
माती है। सही हो। १६)
स्नमुना-साख ! तुमने भी तो वृन्दावन ब्राउन गाड़
देशका ही अपनी बहाः भूमि करली है, कहीं कहीं गुमान
पंजाब में दीखती हो,( १७ )मद्राम प्रांत में कभी नही आती
मुद्रा-कहां का जन घायु अनुकुल नहीं होता।
निकल-(कंठमाला की ओर देवकर हंसता है।
मुद्रा--( तीलक) दादा ! तुपती सर्वत्र पग्भ्रिम
करत हो:
नित्रक-जाता तो सर्वत्र हूं परन्तु देश देश और समय
समयमें पोशाक बदलनी होती है ( १८)
मुद्रा--माला का तुम्हाग अच्छा माथ है।
तिलक---यह कहीं कहीं साथ भी रहती है कभी मांग
वा माना है ( १६)
गग भक्ति-श्रीमन : भाजही का तो बघू प्रवेश का
मुइन है ?
प्रेम-आहा ! अनंत शक्ति श्री भगवान की अचिन्त्य
बीना है 'वामय मंत्र मूर्तिका सामयी गायत्री के साथ विलाम
(१६) इसी प्रांत के वैष्णव
तसमुद्रा
अधिक धारण करते हैं।
(१७) गादी चंदनसे मुद्राधारण करने का प्रचार इनी प्रांतों में
अधिक है।
[१८ ) सब देश और सब सम्प्रदायों के चैष्णव तिलक धारण
करत हैं। और सब उसका एक ही नाम रखने 'ऊर्द्रपुंड
प्रकार भेद करते हैं यही एक होकर पोसाक बदलना है।
(१६) कोई नैष्ठाव कंटलान { कंठी माला सर्वदा धारण
करते है कोई हृदय पर्यंत,और कोई नाभिपयतकी लंबी माला धारण
मस्त हैं । कंठमाला का साथ रहना' कहा जाता है, लंबी मालाका
'आगे बढ़ना' कहा जाता है।
(२०)
को मानव को कहां कब तुन करत कहा !
निगम अगम लीना मुनत आनन्द होत महा ॥
अमभक्ति---गोपांगना गायत्री के माथ श्रीगोपाल मंबाज
का विवाह भनुपम घटना है।
प्रेम---' यता वाचो निवर्तते अप्राप्यमनमामह
लीला ममन्त वैभा ही भचिन्त्य है न कोई मनसै विचार मक्ता
है न कोई वाणी में कह मका है। · ग्मोम ' श्रीभगनान
हैं : ' मंगवायलकनंदा भवती ' यह जीव ग्मको ही
प्राप्त होकर मानन्द पाना है।
गग भक्ति --मायाने जीप के ज्ञान कामा प्रावग्रह किय
कि यह श्रीभगवान की लीलामें भी विना नक जिव नहीं
मगस्त
-----यही नी जीवका दुर्भाग्य है जो रम्य वस्तु में नर्क :
मिमरी तुम्हारे हार पर है मुम्बमें डालकर आवादन करो।
जो यह नर्क का नेहा "मिनी क्यों मीटी है संभव है कि
नुसन्धारी हो । कही और स्वेत वस्तु मीठी नहीं होता देवी
किटकनी मुहागा मीठा नदी पर निमरी मीठी को हो
माती है । जाता युक्ति के द्वारा मिद्ध न हो मीठी
नहीं मान सकते वह य काहे को मिठान का स्वार
पावेगा । मिमरीका माद यही पारेगा जो हाथ में आते ही मुम्ब
हाल गया । ममस्त जगत एक ओर होकर उसमे पंखना
मिनी के है ! यह कहा है नीठो' को कनाड्यो ? नह
करता है चाव देखो क्या क्या ! का मनवान की भी लीला
आपादन करना चाहिये, उनका माधुर्य पान करना चाहिं
उम गर्क करना ही जीव का दुर्भाग्य है । बुद्धिार रही है
जं. सई लाग कर भगवान् की लीला आस्वादन करें ।
(२१) (नेपथ्यमें) मीदो सुगंध जल मारग गेहद्वार, रंभा सुपूग तरु रोप द्वार द्वार ।। थापा घडाउदकपूरित दीपमाला; श्री मंत्रराज मवा भवन प्रवेश । मव उत्सुक होकर मार्ग की ओर देखते हैं। ( श्रद्धा संध्या यज्ञोपवीत से अनुगम्पमान वर वेपसे मंत्र- गज, और अंथिवंचन सहित अवगुंठनवती ( १६) गायत्रीका ( १९) राग भक्ति और प्रेमके संमुख गायत्री धुंबट काढती हे अर्थात् मुह छिपाये रहती है उनके संमुख नहीं होती । रागभजन-- -निष्ट प्रेमिकजन संध्या गायत्री जप' आदिक कर्म की अपेक्षा नही रखते हैं। क्योंकि वे कर्माधिकार से उच्च भूमि पर हैं । गायत्री के अब गुंटनवती होने का वर्तमान में एक खास कारण भी है। जो उदार आर्यसमाज, भारत ललनाओं का पर्दा उठाता है, पर्दा को ही अवनतीका प्रधान कारण समझताहै,वह भी गायत्रीको पर्दानशीन रखता है । यद्यपि 'लैक्चर के प्लेटफारमपर' 'दीवारोंपर' 'चित्रोंके फ्रेमोंमें गायत्री को खुल मुंह घूमने की इजाजत है तथापि पर्दानशीनी की बला नही टलती । देखो संस्कार विधि प्रथम संस्करण संवत १९३३पृ.६५ पं. १६ तदनन्तर एकवस्त्रसै उसका और अपना शिरसै स्कंधतक ढांकके हाथसे शिष्यके हाथ ग्रहण करके इस मंत्र का उपदेश तीनों वों को पिता करे किंवा आचार्य " देखो संस्कार विधि सप्तम आवृत्ति सं.१९६५ विक्रम पृ.९ पं.३ तत्पश्चात् आचार्य एक वस्त्र अपने और वालक के कंधे पर रख के अपने हाथ से बालकके दोनो हाथ की दोनों अगुलियों को पकड के चे लिखे प्रमाणे वालक को तीन वार करके गायत्री मंत्रोपदेश को इस ३२ वर्षमें गायत्री के नसीव से इतनी आजादी मिली है कि सिरसै स्कंधतक न ढांक कर,वस्त्र कंधे पर भागया है ॥ स्मार्त बांधव तो गायत्री को धोती अगोंछाके पल्ले या गोमुखी से बाहर जाने ही नहीं देते । बस यही अवगुंठन है।
(२२) प्रवेश विधि भक्ति और जपमाला आगे बढकर गायत्री को आवर महिन लती हैं (२०) गायत्री--( मंकुचित होती है ) विधि भक्ति-( गायत्री का अवगुंठन खोलकर मुख देखती है २१] जपमाला--( गायत्री के पीछे होलती है) गायत्री----( संध्याम ) ये सब कौन कौन है : संध्या----ये विधि भक्ति हैं ये ही तुमै लाड करेंगी (२२] ये तुलसीमाला तुम्हारी अनुचरी रहेगी [२३] कंठमाला----बढकर मंत्रराज का साथ लेती है [२४ ] श्रद्धा--( यज्ञोपवीत से ) ये यहां की प्रधान हैं इनका पाद स्पर्श करो ( २५) यज्ञोपवीत-(कंठमाला के पाद स्पर्श करता है) कंठमाला-( यज्ञोपवीत के सिर पर हाथ रखकर ) बड़ा (२०) विधि भक्ति में संध्या गायत्री का विधान है। (२१) निस्कृत्यके समय गायत्री जप कर लनः हः मुक खोलकर देखना है ! (२२) यही लाड करना है कि आन्हिक के पूर्व गायत्री जप होता है। २३ ) स्मात विधानमें गायत्री का जप रुद्राक्षमाला वा स्फ- र्टक माला पर होता है । वहां वे अनुचरी थी, वैष्णव जन तुलसी मालासै गायत्री जप करते हैं इससै यहां यह अनुचरी है। [२४ ] कंठमाला दीक्षा का अंग है मुतरां मंत्र ग्रहण के समय ही गुरुदेव कृपाकर कंठमाला [ कंठी ] देते है। [२५] कंठमाला कंठमें उच्च भूमिका पर है यज्ञोपवीत उसस नचेस्थल पर स्कंध पर लंवित है यही पाद स्पर्श हे।
(२३) सौम्पत्रालक है यह इतना कृश क्यों है ? श्रद्धा-ब्रह्मचर्य के क्लेशसे, अब भाप इमें भागरत धर्म शिक्षा कीजिये ये कुछ दिन आपके निकट रहेगा ( • विधि भक्ति-भ्राता भगिनी में ऐसा ही स्नेह होता दोनोंएक साथ रहेंगे अच्छा है ( यज्ञोपवीतम ) तुम्हारी बहन का भी मन ळगा रहेगा। बज्ञोपवीन-जो आज्ञा ( मंथ्या ? इन सबक तन मग हृदय कांपता है। संध्या-तुम इधर भाओ ! यज्ञोपवीत को विधि भक्तिक पीछे कर देती है [२७] गगभक्ति-मंत्रराज के तेज मे नववधूटी गायत्री ऐमी लीन होगई है जैसे सूर्या लोकमे तारामंडल। नेपथ्यमे जय जय जय गोपतनय मंजगज गज सप्तकोटि महामंत्र समुदय मिताज। कर्मनिष्ठ ईष्टी कर यज्ञरूप ध्यामे. झान निष्ठ मत् चित् कहि ब्रह्म तत्व गा ॥ योमनिष्ठ, परमात्मा कहि ममाधि धारें वधमत, देवदेव विष्णु कहि पुकारें ॥ गगभक्त, अजपतिसुतरूप ध्यान लावै रमिक जनन प्राणम्ममा बिनुन आन प्रावै ॥ मंत्र देव एक रूप मंत्रम सोई १ [२६] भावभक्ति निष्ठ साधक, जब 'अवधूत' येत्र ग्रहण कर वर्णाश्रमाचार अतिक्रम करते है तब यज्ञोपवीत त्याग देते हैं, पर कंठ- माला नहीं त्यागते यही यज्ञोपवीत का कंठमालाके निकट'कुछ-दिन' रहना है।
( २४, ? वैष्णव गुरु करुणा बिन पावत नहीं कोई ॥ प्रेम-भाहा ! मर्षि नारद वीणामें मंत्रराज का स्तवगान करते भावावेश में मत्त डगमगाते आरहे हैं। नारद जी का प्रवेश नारद-आदि गुरु चतुर्मुखने मुझने कहा है अव-नानुसो मृष्ठिका समय प्रति सन्निहित है। मनुष्यों के धार्मक माणा- जिक और नैतिक समस्व तच्चों के मूल वेद हैं । यह गायत्री वेद माता है मंत्रराजके और गायत्री के संमिलन से ऋक यजु- साम और अथर्व वेद का जन्म होगा। पाहा अब हम रेदके मंत्रों को वीयामें मिलाकर भगवान का स्तब किया करेंगे (आ. गे बढकर ) यहमंत्र राज और गायत्री का नव युगल है (अ. भिनिवेशसै देखकर ) मंत्रराज के श्याम तेज में गायत्री विद्युतके ममान झलमलाती है । कभी अदृश्य होती है कभी दृश्य, यही तो शक्ति और शक्तिमान का अचिन्स भेदा भेद है। मंत्रराज-सुरर्षे! अब तौ प्रसन्न हुए नारद-मैं और मेरे जनक कमन्नासन भी। मंत्रराज-वेदोंके प्राकट्य को हिरण्य गर्भने यह कौशल किया है। यह 'गायत्रीका उदाह' चतुर्मुख की और तुम्हारी प्रीति के लिये मेने किया है । और तुम्हारी क्या प्रीति कर ! नारद-इससे अधिक हमारी और क्या प्रीति होगी कि हम भावराज्य में प्रवेश कर आपकी इस परम रहस्य लीलाके दर्शनके अधिकारी हुए। तथापि यह प्रार्थना है। जी कर्मनिष भ्रमते कबहू न जाने, निग्रंथ मुक्ति पद त्याग मदेव वांछै। जोवैध रागभजनाव-निविष्ट भोग्य, वोप्रेम नाम मसुरै कलि जीब पामें । मंत्रराज-बथास्तु नारद-यह अन्तःपुर का द्वार है श्रीपाद प्रवेश कर वि- वाह के उत्तगंग मंगलका सम्पादन करें सब जाते हैं निका बान
केवल परोपकारार्थ
प्रकरध्वज रस
आयुर्वेद की यह सर्वोत्तम औषधि कलकत्ता, बम्बई
आदि नगरो में अधिक मूल्य से मिलने के कारण साधारणज़न
इसका लाभ नहीं उठा सकते हैं। हमने ब्यय मात्र मूल्यनिर्द्धार
कर गरीबो के लिये वांटने का प्रवन्ध किया है केवल ३२) रु.
तोले ॥
मोमि आई
गिरकर मार्छत होना, चोटसे मूर्छित होना, दुर्बलता हृदय
के रोग, मृगी, आदिको अद्भुत उपकार करने वाली यह औषधि
हकीम जालीनूस के विधान से बनी है केवल ५) रु. तोले ।
सुधा
साठ रोगोंकी एक अव्यर्थ महौषधि मूल्य १) शीशी
सोमांजन
एक मलाई एक आंख में लगाईये जब उसकी ज्योति उस
ही समय अधिक होजाय तब दूसरी आंख में लगाना
इत्य ।) शीशी
शुश्रूषा
जीब मात्रकी शुश्रूषा करना श्रीवैष्णव धर्म का एक अंग
। धनी निधन सब को कठिन रोगो की औषधि विना मूलक
दन की जाती हैं।
मैनेजर वैष्णव संदर्भमदन
बृन्दावन
दी इम्पीरियल ल्फौर और औइल मिल बृन्दावन धर्म और स्वास्थ्य की रक्षा करने की अ- भिलाषा हो तो उक्त मिलका पवित्र पुष्टिकर सर्वदा ताजा प्रस्तुत पाटा वेसन हर किस्म का तेल और खल ब्यवहार करियै । यहां तयार माल मिलता है और उचित दर से माल पीस और पेल भी दिया जाता है। मैनेजर से पत्रद्धारा या स्वयं श्राफिम में आकर विशेष बृत्तान्त जिज्ञासा कर सकते हैं।