Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Upakar Ka Badala [ Part - Vi ]

2011/01

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KAR
|| श्रीहरिः॥
उपकारका बदला
[ पढ़ो, समझो और करो,
भाग ६ ]
AAR
उ०प०१-२-

प्रकाशक-गोविन्दमान-कायांच्या कोरापूर
सं० २०२५
से
EM...
२०४४
पाना
सं०
सटा
१.
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---
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मूल्य दोग
मुद्रक-गीताप्रेम. गोरखपुर

नम्र निवेदन
यद 'उपकारका यदला' नामक पुस्ता प्रसिद्ध 'पड़ो.
सम और करो' का छठा भाग है। पिछले भागांकी नरद
इसमें भी मानव जीवनको सात्त्विकताले लजानेवाले बहुमूल्य
स्वर्णरनीका संग्रह किया गया है । पाठकोंको घक्षा तथा
प्रसन्नताके साथ इन सूत्रोंसे अपने तथा दून के तीन
अलंक्त करना चाहिये।
हनुमानप्रसाद पोद्दार
सम्पादक

प्रभु अपनी कृपाके द्वारा विपत्तियों से उबार लेने हैं
"जीवन में ऐसे भी क्षग आते ? नाम
हो परम पिता परमात्माको भान मार पो.
तत्क्षण हमें अपनी मामयी माग में 7

विषय-सूची বিগ पृष्ट-गच्या १-प्रभु की कृपा-एक आप-बीनी (कुमार श्रीनिजपनिट). २-छोटका बडा मन (श्रीग्न्द्र महता) ३-पीपल--- विश्वर का अचूक इलाज ( श्रीमान्दार नाकिम, पो० नानगर कानपुन ३० प्र०) : ४-आदर्हा मास (गासागवण) '.-मुल्टाजीका मानना ( श्रीमनाएर दाग विगारदा पोल्टारपा). ६-प्रमुवी कृपा (श्रीमती प्रेमरता च वेदी प्रभाकर ) ७-गोलटर (पिन-२) की दवा (भाओवाग्मल पोदार ) ४ ८-आपुकारने प्रागा ( भीमनारमीप्रसाद सिंह, दिल मंजिस्टट एन टिफर बटर) २५ ९- गमय। कृपा (भीगमाविहानी, निमाम्मरी पृ० पारिस्तान) २७ १०-उपकारका बदला (भीभीप आगर ) ११.--'पानवाने की ईमानदारी (मीदिवाय.प्रकाश विवाटी) १६-ईमानदारी तथा मटनाचा आदर्श (श्रीश्रीनिवास गुरु ) ३४ १३-धुबाई के यो माया (श्रीगममार अरबार) १४-विशाट हदप (जीआगोपा' ) १५-निटगान चोगेने बचाया ( भीगमन सियाम ) १६- महात्माकी शान्ति ( गोराटा दी ८०, एएक मी.) ४३ १५-सरदयना भीमटनलाल अग्रवाल ) ४६ १८-मानम-चौपाई का चमत्कार ( धीनाममनोहर प्यार, दी. पी.) १९-मातम वरमा रमा पा(जीटीना मिश्र, आदान्न दो सापदाम । नाराकी आमा (वसीधा नागर) २४ानी मीर (i) की दवा सीपर अपार. पयागपुर दमान) गई दो भाग-टर रिकन (रिप्रसाद दार्मा) ::-प्रतिशत ( प्राचीन) २४-वादी एकीय कामका ( "न...२ ६! ४० ४८ ...

... ६८ .. (६) २५-गजेन्द्र-स्तवन से सकट-मुक्ति ( श्रीरामायण पाण्टेय) २६-दाद-खाजकी अनुभूत दवा (श्रीजयकान्त झा, प्रधान लिपिक हरिश्चन्द्र कालेज. वाराणसी) २७-भला ऊँटवाला ( श्रीचेतराम शर्मा) २८-पढाईकी लगन ( स्वखण्ड आनन्द:-श्रीगोपालदास ) २९ श्रद्धा-विश्वासका फल (श्रीयन्दना) ३०-सच्ची साधुता ( डॉक्टर श्री एस० आर०टी०) ३१-भाईका स्नेह ( श्रीगोविन्दगम) ३२-भगवदर्शन ३३-फिजूलखर्ची का परिणाम ( श्रीजयन्तीलाल लवजी भाई पुजारा) ८. ३४-देवीकी कृपा ( श्रीवेणीराम शर्मा गौड, वेदाचार्य) ३५-दयालु भाभी ( श्रीहरमुखदास गुप्त) ३६-आदर्श मित्र ( पद्मभूषण' आचार्य श्रीशिवपूजनसहायक कथनके आधारपर) ३७-मनके अमीर चपरासी ( अभ्यापक श्रीशिवप्रसादसिंह) ३८-नुन्दर अन्त ( श्रीजैतसिंह, खंडेला) ६९--स्नेहपूर्ण व्यवहार ( श्रीमदनमोहन भागेना) ४०-आदर्श ईमानदारी (२० श्रीरामप्रताप मिश्र) ४१-दरिद्रकी सेवा ( श्रीपरिपूर्णानन्द नर्मा) ४२ लाठनके बदले ईमानदारी ( श्रीरामदर्शन पाटेप) ४३-आत्मसजीवनी ( श्रीविश्वामित्र वर्मा) १.30 ४४-मंद करन में करइ भलाई (श्रीचारुचन्द्र शील) ११० ५-तमता ( श्री मी तगम गा) ४६-आदर्श चित्रो और बायोका प्रभाव ( श्रीदुर्गाशंकर तिी ) १.४ ४७-जगसे कुरुग, गदे पोस्टर और सिनेमाका दुष्परिणाम ( एक भुक्तभोगः दयी छात्र ४८-भगवान्का बग्टान ( श्री जैनमिद खटेलावाला) ४९-मानवता (लेक्षाधि ) ५०-पच्चीकी यातन धनर ( श्रीओमप्रकाश गंदा) १७ २८

श्री
उपकारका बदला
[पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ ]
प्रभुकी कृपा-एक आप-चीती
राग २५ वर्ष पहलेली बात है। बारध्य-सुधारके दिये में
मसरी गया हुआ था। किगोगाम्याका आलम था। होश कर,
जोश ज्यादा । एक दिन 'कामटी फोर करनेके टिये चटा
गया । चोटीपर चहनेकी ठाई। बोटी डी चिकनी और
नुकीली थी । मीनेज, मोजा और मल ने या। जता पानेही
नदन रगा। उन दिनो ईसर में विधाम नेगी बात कौन करे.
नाम लेना मी गुनाह तथा शान के जियान, समान मा । चटन गरा
चन्ता गग । एका-एक पैर फिमला । जुदाने मा. ढकला मन ।
नीने जारी फुटको गराई । नापास हदयो मन
निक:ो नगवान् ! रक्षा की। 52 : या न मने,
नजारही बाकी सर य गर्ग। जिनकेक, मान
मिला। जस पारपार पलनेना। हर में किया ।

८
पढ़ो समझो और करो, भाग ६
टूट न जाय । दूसरा कोई सहारा भी तो नही था। उसनेमें ही
साथी लोग आ गये। उन लोगोंने अपना साका खोलकर नीचे
लटकाया । साफाके सहारे किसी तरह ऊपर आ सका । जाननें
जान आयी। उस दिनसे ईश्वरमें अपार श्रद्धा हो गयी । नियमित
रूपसे संध्या-वन्दना भी करने लगा।
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दूसरी घटना सन् १९५९ के नवम्बर ३० की है । अकस्मात्
अर्धरात्रिके पश्चात् याद पड़ा कि 'आज सोमवती अमावस्या है,
काशी चलकर बाबा विश्वनायका दर्शन और गगास्नान करना
चाहिये।' गाँवसे स्टेशन तीन मील
दूर । कच्ची सडक । गाडीके
समयमें केवल डेढ घण्टेकी देर थी। पैदल ही चल पड़ा । स्टेशन
भानेपर देखा कि जिस प्लैटफार्म पर काशी जानेवाली गाड़ी लगती है,
उसपर एक मालगाड़ी लगी हुई थी । पूछने पर पता चला जिनमें
पानी नहीं है और यह गाड़ी इसी प्लेटफापर रहेगी ।' बनाम
जानेवाली 'देहरादून एक्सप्रेस' बीचबाटी बाइनर आप है।
स्टेशनपर दो ही प्लेटफार्म है । एक अप ट्रेनोंक द्रिय, दूमगाउन
ट्रेनोके लिये । बीचवाली लाइन अरमात कोई गदी आप तो
उसके लिये है। अप प्लैटफार्मपर तो पहले ही मालगाली दी गी।
मैं डाउन प्लेटफार्मपर चला गया । टाउन टापर जाते ही
देहरादून एक्सप्रेस आ गयी । कुछ समय तो दौड़-धूपमें बीना ।
ऊँचे दर्जेके सारे हिच्चे और खिडकियाँ चन्द यौ। एक पटले दक
डिवेकी खिड़की खुली थी। छड़ पकडकर मैं फुटबोटपर चढ़ गर ।
।

पहा । टिकट देखने
प्रभुनी कृपा- अप-चीनी
अंदर एक मनन आराम कर रहे थे। मने पुकारकर दरवाजा
खोलनको का। उन्मान टिकटके विषय में
पश्चात उन्होने द्वार खोल देनेगा वचन दिय । मे आवन्न हुआ।
सोचा अनी ग्योल ही देगे । गाडी तुल गरी । आउटर सिमनट तक
तो गाडीकी गति बीमी दी, परत मिगन ट पार होते ही गति बदी
तेज हो गयी । गारे टा, मेरे र ठिग्ने टने । मैने अन्दरवाल
मजानने दरवाजा खोलनर दिय पुनः प्रार्थना की । इन चार वे कुछ
हल्ला गयं । उठकर उन्होंने दरवाजा खोग्नंगे बजाय विकी भी
बन्द कर दी। दरवाजा दरसे चन्द था। मंग सही-सही आशा
भी नमाम हो गयी। टी यांना लोक और मद्रास मेरे साथ
फिसटने टगे । मुझे पग-पग विवान गो गया कि मंग अन्त अन
निश्चित । मेरे हाय काय हट गये, मुझे चार न । जब मुझे गोदा
आपा को मने अनुमय बिता कि में राउन दानके बीच में पदा
न मिलने की। मैने सामा भूकम्प गे रहा। पिर
विचार या कि कोई गाली नही की। यह भी मार अगवा
कि मै मातीचे गिर गया: । न मिलना बहता ही जा रहा
थापिने में चोट भी आगे भी। दागिने निकाला
का। ये गाजी सोनीपर मोर दवा उनको कोशिसा करने
गा । मन्त्री कपालि ! ऐसा कि किसान मारे नये,
पीचरे का किनारे र दिरे के किनारे ने
एका । उनी ने मय भी।
मिनटवी दर नीलेकर बारामते । नो.
माया लामी दिन
।

पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
--
नहीं पड़ता था। दस-पाँच मिनटके बाद तीन-चार आदमी आते
दिखायी पड़े । एक आदमी आगे बढ़ने लगा तो दूसरेने मना
किया-ए कहाँ जाते हो ! पता नहीं मरता है या बच रहा है !
नाहक थाना-पुलिसके करमें पड़ोगे आगे बढनेवालेने कहा-
'जो कुछ भी हो, मै तो जाऊँगा हो ।' मै पड़ा-पडा सत्र
सुनता रहा । वह व्यक्ति मेरे पास आ गया । मै उसे
नही पहचान सका, किंतु उसने मुझे पहचान लिया । यह
मुझे टाँगकर अस्पताल ला । एक मासतक गयाके 'पिग्रिम'
अस्पतालमें रहा । इतना होनपर भी कोई सांघातिक चोट नहीं
आयी थी । दाहिने हाथमें कुछ चोट आयी थी और सिरमें पत्थर
धंस गया था, जो साधारण उपचारमें ही ठीक हो गया। टास्टर
हैरान, देखने आनेवाले हैरान ! गयाके स्टेशनमास्टर ने कहा-
'देहरादून एक्सप्रेस और बम्बई मेलसे गिरनेवाला तो कोई बचा
नहीं। ये कैसे बच गो? लगता है किसीने खडे होकर बनाया
।' अब आप ही सोचिये, किसने मेरी रक्षा का ? मेरे पास नो
एक ही उत्तर है.--'उन्ही बाग विश्वनाथने, जिनके दर्शनोके दिये
मै जा रहा था ।
--कुमार रणविजयसिंह
* इस घटनाको पढ़नेवाले दो बातोंको जीवनमें उतार -
(१) चलती गाड़ीम कुटयोईपर खडे मनुष्यको दरवाजा गोलकर
अवश्य अन्दर से लें और । २) विपत्तिमें पड़े एएके पास आकर उसे
बचानेका अवश्य प्रयत्न करें।
-सम्पादक

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१२
पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
बुढ़ापेके कारण उसकी कमर बिलकुल झुक गयी थी । सारे
शरीरपर झुर्रियों पड़ी थी । देहको गला दे, ऐसी सर्दीसे कॉपते हुए
शरीरपर एक ही कपड़ा था। उसने जब दो-चार बार इस तरह
करुण आवाज लगायी, तत्र अन्दरसे सेठानोकी जोरको आवाज
सुनायी दी-'इतने सवेरे कौन निकम्मा बैठा है तुझे देनेको ? जा,
चली जा।
'माजी ! भगवान् तुमको.......' उसके पूरे बोलनेके पहले
ही सेठानी चीख उठी---'अरी जमकू ! निकाल, निकाल इसको
यहाँसे, ऐसे न जाने कितने चले आयेंगे.........
और मै मन-ही-मन सोचने लगा-क्या कच्छके दातारोकी
पाली-पोसी हुई मानवता मर गयी ?......"
वहाँ ऑगनमें कूड़ा बुहारती हुई जमकू' माकिनका हुक्म
सुनकर बाहर आयी । मैने सोचा-~-यह अभी भिखारिनका हाथ
पकडकर बाहर ढकेल देगी, पर यहाँ तो इस गरीब नौकरानीके
हृदयमें अचानक करुणाका झरना फूट निकला। उसने भिखारिनकी
रोती सूरत देखकर तुरंत अपने सिरकी ओढनी उतारकर उसके
शरीरपर फेंक दी।
मै देखकर सोचने लगा-नहीं-नहीं, ३ मानयता अभी
मरी नहीं है। किसी-किसीके हृदय में अब भी उस रही है।
(अखण्ड आनन्द)
--वीरेन्द्र मेहता

पीपल-भयंकर-से-भयंकर विषधर सर्पका अचूक इलाज उपर्युक्त शीर्पकसे मेरा एक लेख 'कल्याण' वर्ष ३४, अङ्क २ ( फरवरी ) सन् १९६० के पृष्ठ ७६६ पर पीपल-पत्रके द्वारा सप- विषनाशके प्रयोगके सम्बन्धमें प्रकाशित हुआ था । उसके बाबत मेरे पास सैकड़ो पत्र पूछ-ताछ के लिये आये है । कुछ ऐसे पत्र भी आये है, जिनमें प्रयोगसे पूर्ण लाभ होनेकी घटनाओका उल्लेख है । इस सम्बन्धमें कई सजनोंने प्रश्न किये हैं, उनका उत्तर मै यहाँ लिख रहा है। (१) सर्प काटनेके चाहे जितनी देर बाद भी यह प्रयोग * यह लेख पढो, समझो और करो, भाग ५, पृष्ठ २४ ते ३१ में प्रकाशित हो चुका है । वहाँ देखना चाहिये ।---सम्पादक

पढ़ो, समझो और करो: भाग ६
किया जा सकता है । यदि रोगी जीवित है तो इस प्रयोगसे उसका
विषमुक्त होना निश्चित है।
(२) बेहोशी हो जाने तथा नाकी बैठ जानेके बद भी यह
प्रयोग काम करेगा, बशर्ते कि खूनकी चार बन्द न हो गयी हो ।
मैने नूसानगरके श्रीबद्रीप्रसादजीकी पुत्रीपर सॉप काटने के ६ घण्टे
बाद प्रयोग किया था, उसकी नाकी बैठ यी थी, पर वह सन्छी
हो गयी और आज मौजूद है।
३ ) रोगीको पाँच ही आदमी पक. ----कग-मादा नहीं,
ऐसा कोई नियम नहीं है । अभिप्राय इतना ही है कि रोगी किसी
प्रकार मी लि-डुल न सके, फिर चाहे कितने ।ट पारें।
पाँच आदमियोके पाडनेसे प्रायः प्रत्येक पकाम ना,
इसलिये पाचकी सख्या दिखी गया थी ।
(४) रोगीको स्टिकर या टाकार चाहे जैसे प्रा किया
जा सकता है । पर मेरी साझा बटाकर पत्ते डान कविका
सुविधा रहेगी।
( ५ ) मैने अबतक का सो काटे गरि का
प्रयोग किया है। क्योकि इबर दूसरी तर के मोर है ही
नत:
मैं निश्रित नहीं बता सकता। आप प्रयान बार दे :
(६) मैने मनुष्योंपर श्री हनक प्रयोग यि ! जयरों-
पर कभी प्रयोग नहीं किया । इससे नेग नुमत्र नही । शमी
पशुको सॉप काटनेकी घटना सामने आये तो आप प्रयोग करके
देख सकते है।
।
--

पीपल-भयंकर से भयंकर विपधर सर्पका अचूक इलाज १५ (७) सर्पका विष उतारनेका जैसा यह सिद्ध प्रयोग मैं जानता है, वैसा विच्छू आदि अन्य जहरीले जन्तुओके विपनाशका मैं नहीं जानता । थोड़ा-थोडा जैसे और लोग जानते है, वैसा ही मै भी जानता है। (८) पीपलसे कुछ पत्तोकी एक डाली तोड लीजिये । डाली में जो पत्ते होते है, उनमें प्रत्येक पत्तके पीछे एक सीकके समान डण्डी होती है। जब पत्ते डालीसे तोड़े तो उसे सींक या डण्डीके समेत तोड़ें । उसी डण्डी या सोककी नोकको रोगीके कानमें . डालिये। (९) आप रोगीक सामने बैठ जाइये । अपने दोनो हाथो में एक-एक पत्ता ले लीजिये और दाहिने हायके पत्तकी लीक रोगीके बायें कानमें और बायें हाथ के पत्तेकी सींक रोगीके दाहिने कानमें डालिये। (१०) अनुमानसे एक इंच डालनेकी बात लिखी थी ? असल में कानके पर्देतक नोक पहुँच जानी चाहिये । यदि नोक दूर होगी और जहर होगा तो रोगी चिल्लायेगा नहीं । क न चिल्लाये, तबतक तीकको कानमें डालते रहें । जब चिल्लाना शुरू करे, तत्र रोक दें। (११) जबतक जहर कमर और सीनेसे ऊपर नहा पहुँचेगा, तत्रतका पत्ता काम नहीं करेगा । अतः बन्च बँचा होनेपर आदि जहर रुका होता है तो पत्ता काम नहीं करता । किन्तु चाहे जितना ही बन्ध हो, ीरे-धीरे जहर गन्धको पार करके कुछ देरमें ऊपर अन्य आयेगा। जब पत्ता लगानेपर रोगी चिल्लाने लग

पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
जाय, तत्र उसी समय बन्ध खोल देना चाहिये । अन्यथा
पत्ता बन्धके ऊपरका ही जहर खींच सकेगा ! बन्धके नीचेका जहर
ज्यो-का-त्यो रह जायगा।
( १२ ) मैने हरे पत्तेका ही प्रयोग किया है और मैं समझता हूँ
कि
सूखा पत्ता काम नहीं करेगा ।
( १३ ) जहर कमर और सीनेके ऊपर चढ़ा या नहीं,
इसकी परीक्षाके लिये नीमकी पत्ती रोगीको चबवाइये । नीमकी
पत्ती कड़वी लगे और रोगी थूक दे तो समझिये जहर नहीं है !
चबाता जाय तो जहर है । नीममें भी विषनाशक गुण है । रोगीको
नीमकी पत्ती चबवानेसे जहर मरता है और जहर मरते ही पत्ती
कड़वी लगने लगती है। फिर रोगो उसे चबाता नहीं।
(१४ ) अपने स्थानमें पीपटका पेड़ न हो तो जहाँ पेड़ हो,
वहींसे डाली तोड़कर मँगवा सकते हैं।
(१५) पीपल के वृक्षके नीचे रोगीको ले जानेकी आवश्यकता
नहीं है । जहाँ रोगी हो, वहीं टाठी मँगवाकर पत्तोंका प्रयोग कार
सकते है।
(१६) सर्प काटनेपर घाव न होता । उसे यदि चीर
दिया गया हो तो फिर उन जगहमें कु में डालनेवाली लाल दया
(पोटाश परमंगनेट ) भर देनी चाहिये । दस-पाँच दिनोंमें घाय
आप ही ठीक हो जायगा ।
(१७) रोगीके ठीक हो जानेपर उसे एकसे डेढ़ छटाँस्तक

पीपल-भयंकर-से-भयंकर विषधर सर्पका अचूक इलाज १७ गायके शुद्ध घृतमें १०-१२ काली मिर्च पीसकर मिलाकर पिला देना चाहिये और कम-से-कम ८ घंटे सोने नहीं देना चाहिये। (१८) मुझे विश्वास है कि इस प्रयोगसे अवश्य लाभ होगा। बहुतोको लाभ पहुँचा है, यह मेरा अनुभव है। मैने न तो कोई उनकी सूची बनाकर रखी है और न किस-किसको आराम हुआ, उनके नाम बतानेकी आवश्यकता ही है। आपको विश्वास हो तो प्रयोग करके देखिये । 'कल्याण' में प्रकाशित होनेके बाद इस प्रयोगसे लाभ होनेके मुझे कई पत्र मिले हैं ।* (१९) जिनको फिर भी कोई शङ्का हो, वे मुझसे नीचे लिखे पतेपर जवाबी कार्ड लिखकर पूछ सकते हैं। पर मुझको पत्र हिंदी या अंग्रेजीमें ही लिखना चाहिये। -~-मेवालाल तार्किक, पो० मूसानगर (कानपुर ) उ० प्र० * हमारे पास भी इस प्रयोगले लाभ होनेके कई पत्र आये है । एक पत्र अभी हालमें श्रीवीरसिंहजी चोहान, नया-गॉव, पो० खोड़ (शिवपुरी) का आया है, जिसमें लिखा है कि यहाँ सेट रामसेवकजी गुसकी धर्मपत्नी- को संध्या ६ बजे एक भयंकर काले सपने डस लिया। स्थानीय तथा बाहरी यहुत से जानकार महानुभावोंने सभी तरहके उपचार किये, पर कोई भी लाभ नहीं हुआ। उनको मृतक मान लिया गया। सब निराश हो गये । तव ईश्वरीय प्रेरणासे मुझे 'कल्याणम प्रकाशित प्रयोगकी बात याद आयी । प्रयोग आरम्भ किया गया और करीब १४ पत्ते बदलनेपर वह पूर्ण स्वस्थ हो गयीं । समस्त विर उतर गया जब रोगिणीने स्वय बतलाया, तव सुनकर सभीको बड़ा आश्चर्य हुआ 17--सम्पादक !

आदर्श सास
आशारामजी बहुत पैसेवाले आदमी थे। बड़ी इज्जत थी।
उनकी साध्वी पत्नीका नाम था गंगाबाई । उनके दो पुत्र
मंगलचंद और शिवदयाल । मंगलचंदका विवाह हो गया था।
बहू सीता घरमें आ गयी थी। उसका स्वभाव कुछ रूखा था।
वह बात-बातपर खीझ जाती; पर भली सास कुछ नहीं बोलती.
हँस देती । शिवदयालका विवाह भी हो गया । उसकी पत्नी रामा
भी घरमें आ गयी। रामाके पिता पहले बहुत पंसेवाले थे, पर
देवयोगसे उनका काम कच्चा रह गया। अतएव रामा सदा उदास
रहती। सोचती, घरमें मेरा अनादर होगा। गरीबकी लड़कीका
पैसेवाले नमुगलमें क्यो आदर होगा। परंतु साध्वी गगाने तथा
आशारामजीने अब उसके साथ विशेष स्नेका वर्तात्र आरम्भ कर
दिया । भालचंदका व्यवहार भी बहुत ही सुन्दर या । पति
शिवदयाल अभी पढ़ते थे, पर उनका बर्ताव स्नेदभरा या । परतु
अपह स्वभावश सीता जंठानी बीच-बीच में कुछ ताना मारा करती
थी। बान पर थी कि रामाके विवाद में मुं: दिसणी आदिल ना
हजार च्ये आये थे। वे रुपये उसके पिता के पास थे। पिना
व्यापार में नुकसान हो जानेसे उन्हें दे न मके। अतः मीना
समय-समयमा गमाके माता-पिताके रिय कुछ-न-कुर कर दिया
करती। माल रोकती, पति भी ममतात; पर उनका स्वभाव की
ऐसा था । राना चुपचाप रोया करती। एक दिन भाटी नागिने
अकेले में आकर रानाके डायमें नोटोका बंडल दिया और का कि
'बेटी ! ये रुपये ले जा, लगभग साढ़े दस हजार रुपये है।
इन्हें ले जाकर अपने पिताको दे दे और कह दे कि भाजनमेन

आदर्श लाल --- मैं मर जाऊँ हमारे रुपये लौटा दें। तेरे पिता यह न समझे कि उन्हें दान । या सहायता दी जा रही है। उनको अब जैसे अभी हमारे घरके रुपये देने हैं, इसके बाद मेरे देने रहेगे। जब वे देंगे, तभी मै । ले लेंगी। और बेटी ! मैं भी लेवार तुमलोगोको ही तो दूंगी । अरथीपर बोधकर साथ थोडे ही ले जाऊँगी; अतः अगर और तेरे पिताजीकी स्थिति उसके बाद रुपये देनेकी हो तो वे तुझे दे दें । मै इसमें यह बात लिखकर लायी है, तू जाकर अपने पिताजीको दे दे और समझा दे कि वे एक-दो दिनने ही इनके रुपये लौटा दें। रामा सासके बर्तावको देखकर दंग रह गयी । उसके ऑन बह चले और उसने सासके चरण पकड़ लिये। वह पिताके पास गयी, रुपये तथा सासका लिखा पत्र दे दिया। उन्होंने बडे ही संकोचसे रुपये लिये । दूररे दिन रामाके रुपयोका हिसाब करके उसके ससुरजीको रुपये भेज दिये । गाने यह बात अपने पतिके सिवा बेटासे भी नहीं कही । पतिको तो आजा थी ही । व सीताका मुंह बंद हो गया। रापा सुखी रहने लगी। पाच-छ: वर्से बाद एक व्यापारमें रामाले पिताने रुपये कमा लिये और रामायो सालके रुपये व्याजसमेत लौटा दिये गये बात-बातमें बहूपर अकारण ही खीझनेवाली, ताना मारनेवाली तथा उसके माता-पिताको खोटी जगन कहनेवाली बाकी सासुरों हरपर ध्यान देकर अपने जीवामें परिवर्तन करे। -~-हरनारायण

मुल्लाजीकी मानवता
मेरे स्वर्गवासी पिताजीका देहावसान हुए लगभग बीत वास
अधिक समय व्यतीत हो चुका । उस समय मेरी आयु पाँच
वर्षसे भी कम थी। उन दिनों हमारे परिवार में लगभग ३०-३२
प्राणी थे। कृषि एवं शासकीय सेवाके फलस्वरूप अच्छी आय हो
जाती थी।
कालान्तरमें हमारी गृहदशामें परिवर्तन होने लगा। मुगः
वृद्धि तथा आयका अभाव हो गया ।
एक दिन हमलोगोने मिलकर यह निश्चय किया कि अब
अलग-अलग होकर, भविष्यमें ऋण न बढ़े एवं भूमि भी ज्यों-की-सो
वनी रहे-~-ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये । प्रत्येक सम्पति तीन
भाग हुए और ६००० ) रु०से अधिक जो प्राण हो चुका सा,
वह भी २००० ) के लगभग प्रत्येकको वॉट दिया गया।
मैने यह कल्पना भी नहीं की थी कि सोनार
है। अतः मै व्याकुल होकर किंकर्तव्यविमूद-सा का गया । अन्तमें
मैंने जामघाल-जैसा जघन्य अपराध करनेका विचार किया। मंगे
प० मानानीको या मत्र ज्ञात हो गया और उनि बाई
उदाहरण देकर मुझे इस पारने बचाया!
कुछ खेत ( जो मेरे भागमें आये थे ) न रखकर में
आण-मुक्त होनेकी योजना कार्यान्वित करने लगा। मेरे हिस्से में
ऋण आया था, उनमें ४००) उसी ग्राम एक मुल्वानीके
पर
--

मुल्लाजीकी मानवता
२१
भी थे । किसी समय उनकी दूकान सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी, किंतु
इन दिनो उनकी भी वह दूकान नष्टप्राय-सी हो गयी। कठिनाईसे
तीस-चालीस रुपये मासिक आय हो जाती होगी।
जब मैं ४०० ) उनके सामने रखकर बोला-'मुल्लाजी
साहेब ! लीजिये, ये रुपये हमारे ( सम्मिलित समयके ) खातेमें
जमा कर लीजिये। वे अपनी वही उठाकर पन्ने उलटने लगे।
अचानक उनके हाथ स्तव्ध-से रह गये और न जाने क्यो उनकी
आँखोसे अश्रु-बिन्दु निकलकर श्वेत-श्याम दाढीमें विलीन होने लगे।
मैं समझ नहीं सका कि यह सब क्यो हो रहा है।
जैसे-तैसे उन्होंने वे ४०० ) रु० मेरे हाथमें रखते हुए भर्रायी
हुई आवाजसे कहा-भाई मनोहरलाल ! तुम्हारे पिताजीका
और मेरा बड़ा दोस्ताना था। उन्होने एक बार ३००) मुझे
रखनेके लिये दिये थे, जिनकी कोई लिखावट आदि नहीं है।
तबसे आजतकके सूदको तो मैं नहीं दे सकता, परन्तु अब ये ४०० )
मै तुमसे नहीं लूंगा।' यो कहकर वे गम्भीर हो गये । मैं भी अपने-
आपको संभाल नहीं सका और भीगी आँखोसे घर लौट आया ।
जब कभी भी वे मुल्लाजी मुझे मिले जाते हैं, श्रद्धासे मेरा
मस्तक अपने-आप झुक जाता है इसलिये नहीं कि उन्होने
मेरे रुपये लौटा दिये, परंतु इसलिये कि आजके युगमें भी ऐसी
मानवता वर्तमान है।
---मनोहर दार्मा विशारदा पोटायकलॉ

प्रभुकी कृपा जीवनमें ऐसे भी क्षण आते हैं, जब हम चारो ओरसे निराश हो परमपिता परमात्माको आर्त होकर पुकार उठते है प्रभु तत्क्षण हमें आनी मङ्गलमयी कृपाक द्वारा विपत्तियोंसे उगार लेते है। ३ m ऐसी ही एक प्रत्य घटना है, जो अभी-अ कुछ समय मेरे जोवनमें घटित हुई- नरे पति रोटवे एक उचपदस लर्मचारी हैं। जन उन इस जाका नियुक्ति-पत्र मिला, तर उसकी एक धाग अनुसार एक बड़ी लम्बी धनराशि जमा करनी थी। नियुक्ति की समान धारा स्वीकार करनेवर टी उस पदापर नियुक्ति गई। अर परिश्रम और प्रपन्न करनेके पनात् बड़ी कठिनतासे उगनगायिका केवल आध, नाग दी जमा करवानमा, मेरी उमाधिकाराने एक सा नमा दिसा माना शेत्र बनाता प्रशन्र यहि न पाने गि जायगे ।' पर लाख प्रा. हर न जानाति नोका।नाग दोका चुरा र कमेन एक नी किरण न दिखायी दी। दिशामा दिक या मन मा खिन्न या मकर निश डोभर गंगकर अपने प्रन पुशार रहे थे। जीवन में इतनी निगगा और काकी कटी यानी ।

प्रभुकी कृपा ૨૨ नहीं आयी थी। वापस जाना अच्छा नहीं लग रहा था और यदि दो दिनमें रुपयोका प्रवन्ध न हो सका तो पदच्युत होना निश्रित ही था। मन अत्यन्त उदास था, पर भगवान्के ऊपर हमारा दृढ़ विश्वास था कि कोई-न-कोई दैवी शक्ति हमें इस संकटसे उबार लेगी । ठीक इसी समय, जब हम दोनोंकी मनोदशा दयनीय थी, तभी एक सज्जन हमारे घरपर आये और उन्होने हमारे विश्वास- को बल दिया और यह आश्वासन दिया कि 'चिन्ता त्यागकर ईश्वरसे प्रार्थना करो-प्रभु जो करेगे, वह मङ्गलमय ही होगा ।' हम आत होकर प्रभुसे प्रार्थना करते रहे और उन्होने हमारी पुकार सुनी ही नहीं, हमें आश्चर्यमें डालकर सभी कष्टोको मिटाकर परम आनन्द प्रदान किया । ठीक दिवालीके दो ही दिन बाद एक सूचनाद्वारा यह समाचार मिला कि जिस धनराशिका जमा कराना नियुक्ति-पत्रकी धाराके अनुसार आवश्यक था, वह धनराशि आधी कर दी गया।' इस समाचारसे हमारे आनन्दकी सीमा न रही। उस परम प्रभुकी कृपाके साक्षात् दर्शन करके हम धन्य हो गये । मेरा यह अटल विश्वास है कि प्रभुसे यदि सच्चे मनसे प्रार्थना की जाय और आत होकर प्रभुको पुकरा जाय तो वे अवश्य ही प्रार्थना सुनेंगे । चाहिये प्रार्थनामें सच्ची आर्तता और प्रभुमें अटल विश्वास! -श्रीमती प्रेमलता चतुर्वेदी, प्रभाकर

गॉलब्लैडर (पित्त-पथरी) की दवा
घरमें गॉलब्लैडर ( पित्त-पथरी ) की बीमारी होगी।
गत ता० १३ । ५। ५९ को एक्सरे लिया तो नौ पत्थर थे।
कलकत्ते-बम्बईमें बड़े-बड़े डाक्टरोंको दिखलाया गया । सबने यहो
कहा कि 'आपरेशनके विना रोग अच्छा नहीं होगा। कोई भी दवा
काम नहीं करेगी ।' तदनन्तर लगभग सालभर पहले श्रावगमें
श्रीवैद्यनाथजी वैद्यसे बात हुई। उन्होने कहा-'नारियन्टके :
२१, काली मिर्च ७ के साथ पानी में पीसकर उसे पिठाओ।' दस
महीने लगातार यह दवा दोनो समय दी गयी । किर
बद्रीनारायण-यात्रामें चले जानेसे दवा बंद
दया बंद रही । यात्रासे
लौटनेपर बम्बईमें एक्सरे कराया गया, तब पता लगा कि तीन
पत्थर तो बिल्कुल ही नहीं हैं। दूसरे पत्थर भी विस गये है ।' नौ
पत्थर चनेके दानेसे भी बडे-बड़े थे। सारे शरीरनं खास मारते
छातीमें बड़े जोरका दर्द रहता था। बीच-बीच में हिचकिया आती
यीं । ये सब उपद्रव शान्त हो गये। एक्सरेका परिणाम देशकर
डाक्टग्ने कहा कि हमारे यहाँ ऐसी कोई दवा नती है, जो कने
बडे पन्यरोंको गल्ला दे। वे आर्थर्य कर रहे थे।
जहाँ नारियट होते है, वो नारिपटके फ7 अमानीगे
मिल जाते है । एक बडा सिहा-सा होता है, जो अपने
है। तोड़कर रख देनेसे या पाच-सात दिनों में अपन-अर फट
जाता है । ऐसे एक मिट्टमें लगभग एक सेरमे निकट ने
जो दवा काम लिये जाते हैं।
मैंन यह अपने अनुभवकी बात लिली ।
करके देखें।
---अंशमा पसार

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आर्त पुकारसे प्राणरक्षा
सन् १९४६ ईस्वीका समय था । उस समय बंगालमें
सुहरावर्दीके मुख्य मन्त्रित्वका बोलबाला था। उनके मन्त्रित्वका
मुख्य उद्देश्य था--हिंदुओके ऊपर मनमाना अत्याचार करना,
जिससे हिंदुओंकी जड़ बंगालसे एकदम उखड़ जाय । १६ अगस्त,
१९४६ ई० की उनकी काली करतूत किसी अत्याचारी शासकके
अत्याचारको भी मात करती है। उनका अत्याचार नोआखालीतक
बढता गया । इसका नतीजा यह हुआ कि बगलके प्रदेश बिहार
और संयुक्तप्रान्तमें भी साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हो गये।
उस समय मै मैजिस्ट्रेट था और मेरी बहाली एक वर्य
पहले हुई थी । हमारे शहर में भी दंगा हुआ और हमें सशस्त्र
पुलिसके साथ एक मुहल्लेमें जाना पड़ा तथा वहाँ हमें एक

रामकी कृपा घटना कई वर्ष पहलेकी है। मेरे पूज्य पिताजी, माताजी तया मेरी छोटी बहन नैमिषारण्य तीर्थ गये थे । यहाँसे कुछ मील दूरपर, हत्याहरण-तीर्थ है । वे वहाँ भी गये थे। उस समय बैलगाड़ीपर आना-जाना पड़ता था । लौटते समय बैलगाड़ीवालेने एक नदीके किनारे गाड़ी रोक दी और पड़ोसके गॉवसे सलाई लानेका बहाना लेकर वह चला गया। इधर संव्या हो रही थी। अँधेरा बट रहा था। पिताजी बडी चिन्तामें थे-अधेरी रात है, अभी काफी रास्ता ते करना है। गाड़ीवान लोटा नहीं । केसे गाड़ी चले ! इतनेमें दिखायी दिया कि गाड़ीवान चार-पाँच लटेनोंको लेकर आ रहा है । इस दृश्यको देखर पिताजी घबराये । उन्होने जान लिया कि यह तो हमलोगोको लूटनेकी तैयारीमें है । उस

२६ पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
महीनेतक रहना पड़ा। वहाँ मैंने हिन्दू और मुसल्मान दोनोंकी
जाने बचायीं । इसलिये मुहल्लेके लोगोंने कलक्टर साहबसे कहकर
उस मुहल्लेसे मेरा जाना कुछ दिनोंके लिये रोकवा दिया ।
उस मुहल्लेमें एक दिन मुझे एक सुनसान कोठरीमें जानेका
अवसर मिला, जिसमें कुछ पुराने बोरे भरे थे । मैं दीवालकी
जड़में दरवाजेके मुँहपर थोड़ी देर खड़ा रहा । इतनेमें ही देखता
हूँ कि एक गेहुँचन साँप करीब तीन, साढ़े तीन हायका बोरोसे
निकला । उसे देखते ही मेरे होश उड़ गये । काटो तो बदनमें
खून नही । मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया । किसी तरह वहाँसे
भागनेकी भी सुविधा नहीं थी। उसे मारना भी सम्भव नहीं था।
कोठरीसे भाग निकलनेमें खतरा था कि साँप यह समझकर कहीं
उस न ले कि यह मनुष्य मुझे मारने आ रहा है। करीब एक
मिनटतक इस हालतमें रहा । तब मैने अपने मनमें यह सोचा कि
अब भगवान्को छोड़कर मुझे कोई नहीं बचा सकता और मैंने
निम्नलिखित श्लोकको मन-ही-मन पड़ना शुरू किया ।
या त्वरा द्रौपदीत्राणे या त्वरा गजरक्षणे ।
मय्याते करुणामूर्ते ! सा त्वरा पय गता हरे ॥
एक मिनट बाद ही सॉप वहाँसे बिलमें चला गया, इसके
बाद मै वहाँसे भागा।
।
x
x
x
X
बनारसीप्रसाद सिह, डि. मैजिस्ट्रेट एवं हि कलक्टर
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२८ पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ समय उन्हें भगवान् श्रीरामके आश्रयके सिवा और कुछ नहीं सूझा । उन्होंने राम-नामकी धुन लगा दी और मेरी माता तथा बहनसे कहा कि तुमलोग भी रामका आश्रय लेकर रामनाम-कीर्तन करो। घोर विपत्तिमें धनुर्धर एकमात्र भगवान् राम ही रक्षा कर सकते हैं । सबने मिलकर धुन लगायी। इतने में ही क्या देखते हैं कि दो जवान बहादुर घुड़सवार हाथोंमें बंदूक लिये वहाँ आ गये हैं ( प्रकट हो गये है ) और गाड़ीवानको ललकारकर कह रहे हैं- 'क्यों रे बदमाश ! यात्रियोंको अकेले पाकर गुडोको ले आम और इन्हे लूटनेकी तैयारी की है ?' यो कहकर उसकी पीटपर दो चाबुक लगा दिये और बोले...--'जल्दी गाड़ी जोड़ और यात्रियोको तुरंत नैमिषारण्य पहुँचा, हम साथ चल रहे हैं।' गाड़ीवानके साथी तो भाग गये और गाडीवान काँपने लगा । पिताजी चुपचाप खडे सब देख रहे हैं। वे मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हैं और अपने मनसे वे संकटहारी दोनोंको भगवान्के रूपमें ही मानो देख रहे हैं। उनसे बोला नहीं गया । दृष्टि दोनो तरुणोपर गड़ी रही। है वप्त, फिर क्या था । गाड़ीवानने गाडी जोड़ दी और गाड़ी उनको लेकर नैमिपारण्यकी ओर चल दी । जबतक नैमिषारण्य अत्यन्त समीप नहीं आ गया, तबतक तो वे साथ दिखायी दिये। फिर अदृश्य हो गये । पिताजी वगैरह सकुशल धर्मशालामें पहुँच गये। -~-रामकृष्ण विहानी, निलफामारी (पू० पाकिस्तान) + .. उपकारका बदला घटना १९५७ की है। मैं, मेरे पिताजी, माताजी और मेरा छोटा भाई-हम सब जीपमें बोरदी गाँव गये थे । दुइको वही रसोई बनाकर भोजन किया और वहाँके दृश्य देखे । स्थान बहुत ही पसंद आया । शामको लगभग सात बजे वहाँसे वापस चले । लगभग आधा रास्ता कट चुका था : रास्तेमें एक नाला पड़ता था, उस नालेको पार करती हुई जीप वीचमें अटक गयी। मेरे पिताजी स्वयं ही जीप चला रहे थे । उन्होने इंजन खोलकर खायी देखनेका प्रयत्न किया, पर सब व्यर्थ । अब क्या किया जाय । पिताजी एक टार्च लेकर सहायता प्राप्त करनेके लिये चले । होते-होते पौन घंटा बीत गया, पर पिताजीके लौटनेके चिह्न नहीं दिखायी दिये। हम सब बहुत घबराये । इतनेमें दूर कुछ प्रकाश दिखायी दिया । दो-तीन लारटेने थीं । फिर कुछ आदमी लाठी और लालटेन हायोमें लिये आते दिखायी दिये । वे बिलकुल पास मा गये; तव पत्ता लगा कि पिताजी इनमें नहीं है । इन अदमियोमेंसे एकने कहा- ३० पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ 'सरदार ! भाग खुल गये, जान पड़ता है । अपने-आप ही सामनेसे शिकार हमें आ रहा है। लगता है; सगुन अच्छे हुए।' 'हाँ, रे, ऐसा ही तो लगता है बातचीतको सुनकर हमलोग दंग रह गये । यह तो लुटेरोंकी टोली थी ! इतनेमें उस सरदारने मुझसे पूछा-'क्यो रे छोकरे! तू जानता है कि हम कौन हैं : मैं कालिया है।' मैंने कहा---'देखो भाइयो ! हमारी जीप खराब हो गयी है, मेरे पिताजी मददके लिये गये है।' ओहोता तो तेरा डोकरा मददके लिये गया है, क्यों! तो मुझे अत्र उतावली करनी पड़ेगी ।' यों कहकर उसने मेरी बहिनकी ओर देखकर कहा-'ए मेरी ! तेरे ये गहने उतार दे, जल्दी कर । अभी तो हमें लंबी राह काटनी है।' इतनेमें पिताजी हायमें टार्च लिये अकेले ही आते दिखायी दिये । पास आकर और इन आदमियोंको देखकर उन्होंने मुझसे पूछा-'क्यो, श्रीधर ! यह कहाँसे 'दद मिली? सरदारने भयंकर हँसी हसकर कहा-'तेरी मदद के लिये ही आये हैं हमलोग । कुछ बोझा तो हलका कर ही देंगे । इस छोकरीके गहने तथा तेरी बड़ीका भार कम हो जायगा ।' यों कह- कर उसने लाठी ऊपर उठायी, हम समझ ही नहीं पाये कि अब क्या करना है। इतनेमें ही उस सरदारने पिताजीसे पुछा-'अरे, तू क्या धंधा करता है ! मेरे पिताजीने कहा-'मै जानवरोंका डाक्टर उपकारका बदला ३१ ? हूँ।' यह सुनकर सब एक दूसरेका मुंह ताकने लगे। सरदारकी आवाज बदल गयी-'तो अरे भैया ! पहले ही क्यो नहीं कह दिया ? मै तुम्हें लट्, यह कभी नहीं हो सकता; तेरे बिना हमारा जीना कैसे हो ! हमारे ढोर, हमारी गौमाताको अच्छी करनेवालेका हम एक बाल भी बॉका नहीं करेंगे । भूल हो गयी, वापजी ! मुझसे भूल हो गयी। फिर तो उसने अपने साथियोंको आदेश दिया---'अरे, देख क्या रहे हो ! ढकेलो न इस खटारेको अपने घरकी ओर !' तुरन्त ही सब ढकेलने लगे । वहाँका इनका अतिथि सत्कार तो मुझसे कभी भुलाया ही नहीं जा सकेगा । सवेरे, जीवन में कभी नहीं पिया हो, ऐसा गरमागरम बढिया दूध पीनेको दिया । रातको तो पता नहीं लगा, परन्तु सवेरे पिताजीने ग्रामको पहचान लिया । वे स्वयं एक बार, यहाँ एक गायका बछड़ा जनाने आये थे। इस वातको कहते हुए सरदार बोला--'तुम सच कहते हो । तुम मेरे ही घर आये थे । तुम भूल गये होगे, पर हम नहीं भूलते। उपकार करनेवालेका गुण भूलें तो नरकमें जाना पडे ।' इसके बाद उसने दुपहरको भोजन करके जानेके लिये कहा; परन्तु जब हमलोगोने जानेका पक्का निश्चर बताया, तब उसने हमारी जीपको मुख्य सड़कतक ढकेटवा दिया । वहोसे जाती हुई एक ट्रॉलीके पीछे बौधकर हमलोग अपनी जीप ले गये । 'अखण्ड आनन्द' -श्रीधर कृपालु आयंगर ।

वे पानवालेकी ईमानदारी • बात गत १ आस्तकी है । मैं छुट्टियाँ समाप्त कर कानपुर पढनेके लिये जा रहा था। मेरे साथ मेरे कक्कू ( चाचाजी ) थे । कानपुर कपड़ा खरीदने जा रहे थे। उनके पास ५५०) रुपये थे तथा ५०) मेरे भी थे । सम्पूर्ण ६००) की रकम एक झोलेमें थी। ज्यो ही हम दोनो स्टेशनपर पहुँचे कि भगवान्की अनुकम्पासे बस भी आ गयी। मै शीबतासे वसपर चढ़ गया और करक भी पान खाकर आ गये । परंतु उनके हाथमें झोला नहीं था । इस बातका ध्यान न उन्हें था और न मुझे । बस जब धीरे-धीरे रेंगने लगी, तब वह पानवाला, जिसकी दुकानपर काकूने पान खाया था। दौड़ता दिखायी दिया। वह बस रुकवानेके लिये चिल्ला रहा था। जब बस स्की, तब वह हॉफता हुआ आया और बोला---'दादा !

पानवालेकी ईमानदारी
३३
यह अप अपना झोला लीजिये और अपना सामान देख लीजिये ।'
झोला नाम सुनकर और अपने पास न देखकर हम दोनों सन्न रह
गये । पानवालेका नाम वेदपाल या । वेदपालने कहा, 'जब आप
पान खाकर बसपर चढे, तब झोला मेरी दूकानपर भूल गये
। जब
बस चलनेको हुई, तब मैने झोला देखा । खोला तो रकम देखकर
सन्न रह गया और मै उसी समय झोला उठाकर वसकी तरफ दौड़ा
और आप मिल गये ।
उसकी इस ईमानदारीको देखकर हम दोनों उसके प्रति
इतने कृतिन तथा प्रेम-विह्वल हुए कि मुंहसे एक शब्द भी
नहीं निकला । अन्तमें कक्कू अपनेको संयतकर उसे दस रुपये
देने लगे। तब वह बड़ी नद्रतासे बोला—'दादा ! यह तो मेरा
कर्तव्य था। कहीं कर्तव्य करनेवर पुरस्कारकी आवश्यकता होती
है ! मै उसकी इस ईमानदारीपर इतना मुग्ध हुआ कि मुझसे
बोलातक नहीं गया और मैने यह भी नहीं जाना कि वह कत्र चला
गया । बादको जब कक्कू लौटकर स्टेशन पहुँचे और वेदपालके
बारेमें जानकारी की, तब यह भी ज्ञात हुआ कि इसी वर्ष जूनमें
उसका घर आगसे भस्म हो गया था ।
धन्य है उसकी नेकनीयतको । उसे रुपयेकी इतनी आवश्यकता
थी, फिर भी उसने छ: सौ रुपयेके लोभका सहज ही संवरण
कर लिया । यह आजके युगमें असाधारण बात है । सत्रको इससे
शिक्षा लेनी चाहिये।
-दिगकरप्रकाश त्रिपाठी
उ०प०३-४-

ईमानदारी तथा सहृदयताका आदर्श कुछ समय पहलेकी बात है। एक अच्छे फर्ममें अकस्मात् घाटा लगा। लड़कीका व्याह था । सम्पन्न घरसे सम्बन्ध हुआ था, पर घाटा लग जानेके कारण. विवाहके लिये रुपये नहीं रह गये। घरमें ठोस सोनेका गहना था । एक नेक मित्रके यहाँ चुपके-से बन्धक रखकर अठारह हजार रुपये लाये गये । कोई लिखा-पढी आपसमें नहीं की गयी। केवल गहना तौलकर एक सादे कागजपर लिख दिया कि इतने तोले सोनेका गहना है और अठारह हजारका हैंडनोट लिखकर दे दिया । जिनके यहाँ गहना रखा गया, उनसे कुछ भी नहीं लिखवाया । उन्होंने रुपये वही में नाम लिख लिये और सोनेके वजनका वह पन्ना गहनेके डिब्बोमें रखकर डिब्बे तिजोरी में रख दिये । कन्यका विवाह इज्जत-प्रतिष्ठाके साय भली- भाँति सम्पन्न हो गया। कुछ वर्षकि बाद देव-दुर्विपाकसे गहना बंधक रखकर रुपये लेनेवाले सज्जनका देहान्त हो गया । घर तो गरीब हो ही चुका था । पर उनके कोई पुत्र नहीं था। दो कन्याएँ ईमानदारी तथा सहृदयताका आदर्श ३५ अविवाहित और थीं । कन्याओकी माता बचे हुए गहनेको वेच- वेचकर तथा एक मकान छोटा-सा बचा था, उसके किरायेसे काम चलाती थी। कुछ दिनो बाद तो उसके खर्चकी व्यवस्था भगवत्कृपासे हो गयी थी। पर कन्याओके चित्राहके लिये उसके पास पैसे नहीं थे। वह बड़ी ही चिन्तित थी। पतिने गहने बन्धक रखनेकी बात पत्नीसे नहीं कही थी । यह कह दिया था कि गहना वेचकर रुपये लाये गये हैं। अत: उसको पता भी नहीं था कि कहीं किसीके यहाँ गहना बन्धक रखा गया है। रुपये देकर गहने बन्धक रखनेवाले महाजनको व्याज भी नहीं मिला, पर सोनेका भाव क्रमशः बढ रहा था । उनके हायकी लिखा-पढी कहीं थी नही । वे वेईमानी करना चाहते तो बड़े भावका सारा सोना हडप जाते तथा हैडनोटके आधारपर बहीमें लिखे रुपयोंके लिये नालिश करके कर्जदारका छोटा मकान नीलाम करवा सकते थे, उसके घरके सामानपर कुर्की ले जा सकते थे। पर भगवान्को कृपासे उनकी बुद्धिमें बुराई नहीं आयी । उन्होने किसीसे कुछ बताया तो नहीं, पर मनमें निश्चय कर लिया कि 'सोनेका ३ वहा है, अतएव यह लाम जिसका सोना है, उसीको मिलेगा । उनकी पत्नी तया लड़कियों तकलीफ न पावें, इसकी व्यवस्था करनी है और दोनों कन्याओके विवाह के समय पूरा गहना उन्हें लौटा देना है।' इस निश्चयके अनुसार ही उन्होने मासिक डेढ सौ रुपये कन्याओकी माताको प्रतिमास मनीआर्डरसे, भेजनेवालेका फर्जी नाम-पता देकर, मेननेकी व्यवस्था ३६ पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ कर दी। जबतक यह व्यवस्था नहीं हुई, तबतक तो कष्ट रहा, व्यवस्था होनेके बाद उसका कष्ट दूर हो गया था । पर वह बहुत चेष्टा करनेपर भी पता नहीं लगा सकी थी कि रुपये कहाँसे नियमितरूपसे प्रतिमास आ रहे हैं । वे सज्जन इतना ही नहीं करते थे, उसके घरकी सारी खोज-खबर रखते और जब कभी कोई आवश्यकता देखते, तब उसकी पूर्तिकी व्यवस्था किसी तरह करवा देते । लड़कियोकी अवस्था विवाहके योग्य हो गयी । माता बड़ी चिन्तित थी, पर ये निश्चेष्ट नहीं थे । इन्होंने दो अच्छे सम्पन्न घरके लड़के ढूँढ़कर अपनी ओरसे बातचीत की तथा यह बताकर कि लड़कियोकी माँके पास काफी पैसा है, वे बहुत अच्छी तरह विवाह करेंगी, उनके अभिभावकोको राजी कर लिया। जब यह काम हो गया, तब एक दिन गहनोके डिव्वे लेकर वे उसके घर पहुँचे । वह इनको पहचानती थी, पतिके मित्र थे। परंतु ये एक बार उसके पतिके मरनेपर, बैठनेको उसके घर गये थे, फिर कभी गये ही नहीं। आज अकस्मात् इनको घर आया जानकर वह सहम गयी । इन्होंने लडकियोको बाहर बुलाकर कहा-'बेटी ! मुझे तुम्हारी माँसे कुछ बात करनी है। तुमलोग पास बैठी रहो तो मै उनसे बात करूँ। लड़कियोंके कहनेसे मॉ राजी हो गयी। ये गये- दूरसे प्रणाम किया; क्योंकि वह उम्रमें बड़ी थी । इन्होने कहा 'माँजी! आप मेरे बड़े मित्रकी पत्नी हो, अतः मेरी मौके समान हो; मेरी बात सुनो !' इतना कहकर इन्होने सारा हाट बताकर am- ईमानदारी तथा सहृदयताका आदर्श प्रार्थना की अब यह आपका सोना लगभग पचासी हजारसे ऊपरका है। आप इसे संभालो और आपकी आज्ञा हो तो इसमेंसे चालीस हजार लगभगका गहना वेचकर दोनों लड़कियोका विवाद कर दिया जाय । बाकी गहना भी वेचकर रुपये कर लिये जाय तो उनका व्याज मै दूंगा । आपके कोई दोहित्र हो जाय तो उसे गोद ले लेना । लड़कियोके सम्बन्धकी बात अमुक-अमुकके यहाँ पक्की हो गयी है । अमुक तिथिको टीका दे दिया जायगा ।' लड़कियोकी माता तो यह कल्पनातीत बात सुनकर मानो दूसरे ही लोकमें पहुँच गयी । उसके तथा दोनो सयानी लड़कियोके आनन्दका क्या ठिकाना ! कन्याकी माताने कृतज्ञताके ऑम बहाते हुए कहा-'भाईजी ! मेरे पास शब्द नहीं हैं, मैं आपसे क्या करें । आपको जैसा जेंचे वैसा ही कीजिये ।' गहना बेच दिया गया । अठासी हजार सात सौ रुपये उठे। दोनो कन्याओका विवाह धूम-धामसे हो गया । सब लोग चकित रह गये । इन्होने विवाहकी सारी व्यवस्था कर दी, पर स्वयं विवाहमें केवट वैसे ही भाग लिया, जैसे मित्र-बन्धु, नाते-रिश्तेदार लेते है । कहीं भी विशेषता नहीं दिखायी । इन्होने कोई उपकार किया है, यह बात ये किसीसे कहते तो कैसे, घरवालोको भी पता नहीं लगा। असलमें इनके भले मनमें ही ऐसी कोई बात नहीं थी कि जिससे ये कहीं उपसार जनानेकी कल्पना भी करते ! धन्य ! ( नाम-पते जानकर ही नहीं लिखे गये हैं। ---श्रीनिवास गुप्त बुराई के बदले भलाई कुछ पुरानी बात है। दो भाई थे। छोटा भाई प्रायः बीमार रहता । उसका विवाह हो गया था । माता-पिता जीते रहे, तबतक तो छोटे भाईकी पत्नीको कोई तकलीफ नहीं हुई । व्यापारका सारा काम बड़े भाई ही देखते थे। पर माता-पिताके मरते ही पत्नीके समझाने-बुझानेसे बडे भाईका मन बिगड़ा । इधर छोटे भाईका देहान्त हो चुका था, उसके एक छोटा-सा बच्चा था । बड़े भाईने टोटे भाईकी पत्नीको अलग कर दिया । बडे भाईकी पत्नीने समझाया था 'जब कोई काम नहीं देखता, तब व्यापारमें हिस्सा कैसा ? जायदाद बॉटकर अलग कर दो।' जायदादमें छोटे भाईकी स्त्रीको दिये गये तीन हजार रुपये नकद, इसमें दो हजार उसके नैहरसे.आये हुए थे, एक टूटा-सा दो-तीन कमरोका मकान, कुछ बर्तन तथा कपडे आदि । बाकी सब कुछ बडे भाईने रख लिया । वेचारी सीकी कौन सुनता। वह संतोष करके अपने बच्चेका पालन-पोषण करने लगी । बड़ी बुद्धिमती थी। तीन हजार रुपयोसे अनाजका व्यापार करने लगी- भगवत्कृपासे प्रतिवर्ष रकम बढ़ने लगी । उसने बहुत ही कम खर्च करके बच्चेको पाला, पढाया, बड़ा किया । उसका विवाह भी कर दिया । बड़े भाईने कोई मदद नहीं की। बड़े भाई बहुत खर्चीले थे। उनके लड़के भी वैसे ही निकले । सब शौकीन बाबू । काम कौन करे । भाग्य बुराईके बदले भलाई ३९ पलटा । उनका दीवाला निकल गया। इधर छोटे भाईका लड़का माताकी बुद्धिमत्तासे पल-पुसकर व्यापार करने लगा और खूब सम्पन्न हो गया । एक दिन उसे पता लगा, ताऊजीका बड़ा लड़का बीमार है, उसे टी० बी० हो गयी है तथा एक पावनेदारने डिग्री करवाकर कुर्की भेज दी है । बच्चा कठिन रोगग्रस्त और सामानपर कुर्की । सुनते ही उससे नहीं रहा गया । उसने जाकर ताऊजीके चरणोमें प्रणाम करके कहा-'ताऊजी ! आप कष्ट न पावें, आपके दिये हुए तीन हजार रुपये ही मेरी सम्पन्नताके मूल हैं । आपने कृपापूर्वक ये रुपये न दिये होते तो पता नहीं माँकी तथा मेरी क्या स्थिति होती । यह सब आपकी उदारता तथा आगीर्वादका ही फल है।' यो कहकर वह रोने लगा। ताऊजी भी रो पडे । ताईका मन भी बदला । वह सकुचा तो गयी, पर उसकी आँखें भी इस सद्व्यवहारसे बरस पड़ी । लड़केने कहा- 'ताऊजी मेरे पास जो कुछ है, सब आपका है । आप घर सँभालिये, मुझे पालिये-पोमिये ।' उसने डिग्रीके साढ़े ग्यारह हजार रुपये तुरंत भर दिये । भाईका इलाज कराया । वह अच्छा - हो गया । ताऊजी साथ नहीं हुए, उन्हें बड़ा संकोच था। तब उसने पचास हजार रुपये देकर उनको अलग व्यापार करा दिया। उनका काम अच्छी तरह चल निकला । दुःख पाये हुए थे। सँभलकर चले । कुछ दिनोमें सुखी हो गये। छोटे भाईके लड़केको कितने आशीर्वाद उन पति-पत्नीने दिये, इसकी सीमा नहीं है । धन्य ! --गमछुमार अग्रवाल विशाल हृदय मेरे दादाके जीवन में बना हुआ यह एक प्रेरक प्रसङ्ग है। सतरह वर्षमें मैट्रिक पास करके उन्होंने एक प्राइवेट संस्थामें नौकरी करनेके लिये अर्जी दी। इस जगहके लिये सात-आठ अर्जियाँ आयी थी, परंतु पहचान तया सिफारिशके कारण मेरे दादाकी नियुक्तिका निश्चय हो गया । इस जगहके दिये मेरे दादा- के एक सुपरिचित मित्र भी उम्मीदवार थे और इंटरव्यमें उन्होंने मेरे दादाकी अपेक्षा अनी अधिक योग्यता भी सिद्ध कर दी थी, पर परिचय-सिफारिशके अभावमें वे नहीं लिये गये । उनको बड़ी जरूरत थी, परंतु उन्होने कई जगह ऐसा ही कटु अनुभव प्राप्त किया था। इंटरव्यूसे बाहर निकलते ही मेरे दादासे उन्होंने कहा-~

विशाल हृदय
४१
'तुमको तो यह नौकरी मिल ही जायगी । परंतु तुम्हें पता
है कि मुझे नोकरीकी कितनी अधिक आवश्यकता है, अतः मेरे
लिये कहीं दूसरी जगः प्रयत्न करना ।'
इनकी परिस्थितिको दादा जानते थे। उन्होने मनमें कुछ
निर्णय करके कग--'तुम्हारे लिये मै जरूर प्रयत्न करूंगा।'
अपने किये हुए निर्णयको कार्यमें परिणत करनेके लिये
दूसरे दिन मेरे दादाने संस्थाके अधिकारी साहेबके पास जाकर
अपना निर्णय सुनाया। उसे सुनकर साहेब अचरजमें भर गये
और बोले- ऐसी नौकरी तुम्हे फिर नहीं मिलेगी, तुम अब
भी विचार करो।'
'ईश्वरकी कृपासे मै दो पैसेसे सुखी हूँ। फिर जान-पहचान
तथा सिफारिशसे मै तो और किसी जगह भी नौकरी पा जाऊँगा;
परंतु मेरा वह मित्र अभावमें है, उसे इसी समय नौकरीकी खास
जरूरत है । फिर मुझे लगता है कि मेरी अपेक्षा वह आपका काम
भी अच्छी तरह कर सकेगा ।' मेरे दादाने कहा।
परिणामखरूप दूसरे दिन मेरे दादाको मिलनेवाला नियुक्तिका
आदेश उनके मित्रके हाथमें जा पहुँचा । मित्र तो अपने नामका
नियुक्तिपत्र देखकर आश्चर्यमें
इब
गये
मेरे दादाने इस सम्बन्धमें अपने मित्रको कुछ भी जानकारी
नहीं होने दी । अखण्ड आनन्द'
- आसोपालवा

- तिलकने चोरोंसे बचाया लगभग तीन वर्ष पहलेकी घटना है । मैं पनासे नासिक जा रहा था । कल्याण स्टेशनके अगले स्टेशनपर हमारी गाड़ी रुकी, उस समय रात्रिका प्रायः डेढ़ वजा था। मैं बैठा था। गाड़ीने सीटी दी कि तुरंत छः चोर हमारे डिब्बे में आ धुसे । डिब्वेमें और सब सो रहे थे। केवल मैं ही जाग रहा था । छः चोरोंको देखकर मैं कुछ बोला नहीं और नीदका स्वाँग बनाकर पाटियेपर सो गया । चोरोने इधर-उधर देखा, फिर वे आपसमें बात करने लगे कि इसके माथेपर तिलक है, इसलिये यह कोई साधु-महात्मा होगा । इसको मत छूना ।' अतएव उन्होंने मेरा तो स्पर्श ही नहीं किया । न मेरी कोई चीज ही ली । मेरी जेबमें उस समय चार हजारके नोट थे। उन्होंने औरोंकी चीजें, चुरायी, पर भगवान्का गन्ध ( तिलक ) मस्तकपर होनेके कारण मेरे हाथ भी नहीं लगाया । इस प्रकार तिलक (वैष्णवके वेर) ने मुझे बचा दिया । सच्चा वेगव होनेपर तो पता नहीं, क्या लाभ होता है। -रामचन्द्र शिवराम व 'महात्माकी शान्ति अभी कुछ ही दिनों पहलेकी बात है—मै ६० के० रोड ट्रान्सपोर्टद्वारा बैजनाथसे आ रहा था। मेरे साथ एक सज्जन और थे । वे सिगरेट बहुत ज्यादा पीते थे । जब हमलोग कॉगड़ा पहुँचे, तब एक भगुवा वस्त्रधारी संत भी मोटरमें आकर बैठ गयें । हमारे ही पीछेवाली सीट उन्हें मिली थी । संतजी सिगरेट के धुएँसे कुछ घबरा रहे थे। मेरे साथीसे उन्होने विनयके साथ कहा कि 'आप यदि सिगरेटका धुओं बाहरकी ओर फेंके तो बड़ी कृपा होगी ।' साथीने उनके कथनकी कुछ भी परवा नहीं की । महात्माजी शान्त रहे । उन्हें दूसरी सीट भी नहीं मिल सकी। पर उन्होने मेरे साथीसे फिर कुछ नहीं कहा, धुओं खूब था । मैं भी बीच-बीचमें कस लगा रहा था । अतः सिगरेटके गदे धुण्से दुखी होकर एक सरदार साहब हम दोनोपर उबल पडे । साथ ही कंडक्टरसे भी उन्होने कहा कि 'गाड़ीमें सिगरेट पीनेवालोको रोको ।' मेरे साथी श्रीलालाजी ऊन खरीदनेके सिलसिलेने आये थे, काम ठीक तरहसे तय नहीं हो सका था। अतः वे क्रोध मरे सिगरेट पी रहे थे और इसपर सरदारजीका बिगड़ जाना तो उन्हे पायपर नमककी तरर काम कर गया । सरदारजी कोई बहुत बड़े मिलिटरी फतर प्रतीत होते थे, अतः उनपर तो हमारे साथी लालाजीका कुछ बस चला - नही । वेचारे महात्माजीपर विगढकर 'हरामजादे, बढतनीज, मेगते, चोर कहींके, लाल कपड़े पहनकर रोटी मोग खाते, पैसे मागते, मोटरमें आकर बैठ गये ।' आदि दुर्वचन बकने लगे। संतजी मुत्तकरा रहे थे। उन्होने कुछ पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ भी उत्तर नहीं दिया । लालाजीने और भी 'वेशरम' आदि कहा, पर जैसे संतजीने कुछ सुना ही नहीं, ऐसे वे चुप रहे । खैर, जिस समय हम पठानकोट पहुँचे, उस समय सभी लोग तेजीसे उतरना चाहते थे । इतनेमें पता नही किस तरहसे हमारे साथी लालाजीसे उनका मनीवेग गिर गया । संतजी अन्तमें उतरे होगे। उन्होने मनीवेग उठाया और खोलकर देखा तो उसमें लालाजीका छायाचित्र सबसे पहले खानेपर लगा था। महात्माजी जान गये कि बटुवा लालाजीका है। उन्होने किसीसे कुछ भी नहीं कहा और वे हमलोगोके पीछे-पीछे तेजीसे चलने लगे रव आवाज भी लगायी। मैने मुड़कर देखा कि वे हमारी ही ओर तेजीसे चले आ रहे हैं, एक हाथमें कमण्डलु था और दूसरेमें उनका अपना वेग । मैंने देखा तुरंत ही चार-पाँच शिक्षित सज्जनोंने आकर उनके पैर छुये और उनसे सामान लेने लगे। उन्होने अपना वेग एक सज्जनको दे दिया और स्वयं कानण्डलु लिये हमारी ओर बढने लगे। हमलोग भी अब कुछ सोचने लगे कि ये वास्तवमें ही कोई संत हैं। और भी कई लोग इन्हें हाथ जोड़ रहे थे। ये उन्हें उत्तर देते हुए हमारी तरफ आ रहे थे। समीप आते ही मैने पूछा-'क्या आज्ञा है, महाराज !' संतजीने लालाजीसे पूछा---'आपका मनीवेग आपके पास है या नही ? लालाजीने जेबमें हाय डाला और नीचेसे ऊपरतका कॉप उठे। महात्माजी फिर बोले, 'क्या था उसमें ! लालाजी सकपकाये बोले-'जी, जी, उसमें लगभग १७०० रुपये थे, में दिल्लीसे आ महात्माकी शान्ति रहा हूँ, ऊन खरीदनी थी ।' महात्माजीने कमण्डलुसे मनीवेग निकालकर लालाजीके हायपर रख दिया और वे चलने लगे । रुपये गिने गये तो सा-सौके सत्रह नोट थे । लालाजीकी स्थिति विचित्र थी । काटो तो खून नहीं । दौडकर लालाजीने संतजीके पैर पकड़ लिये । उनके नेत्र भर आये । कहने लगे, 'आप ही स्वामी xxxx हैं। मैने तो ठीकसे पहले आपकी ओर देखा भी नहीं था । आप अब कृपया मुझे क्षमा करें ।' फिर लालाजीने मुझसे स्वामीजीका परिचय कराया । उनसे सत्सङ्ग करनेपर हमलोग समझे कि कस्तविस्त सच्चा मानव-जीवन तो इनका है । हमारा क्या जीवन है जो दिन-रात व्यर्थके कामोमें नष्ट हो रहा है। फिर हमलोगोने प्रतिज्ञा की कि 'आजको बाद चाहे कोई किसी भी रूपमें हो, हम उसे अबहेलनापूर्ण दृष्टिसे नहीं देखेंगे और न किसीका अपमान करेंगे।' श्रीमहाराजजीने परमात्म-चिन्तनकी एवं धुम्रपान त्याग करनेकी भी हमसे प्रतिज्ञा करवायी ----'धन्य है ऐसी विभूतियोको ।' लाख प्रयत्न करनेपर भी उन्होने हमारा कुछ भी स्वीकार नहीं किया । कहा कि 'जन आवश्यकता होगी तब देखा जायगा ।' केवल बीस मिनट में ही संतजी चले गये । बीस मिनटके सत्सङ्गने ही हमारे जीवनको बहुत बदल दिया । आज भी मुझे उनको कुछ बातें याद आ रही हैं एवं उससे परम शान्ति मिल रही है। -गोपाल कृष्ण वी० ए० लाल० पी० सहृदयता लगभग चालीस वर्ष पहलेकी बात है । कलकत्तेके एक साधारण व्यापारी रामगोपाल थे। उस समय थोड़े खर्चमें घरका काम चल जाता था, चीजें सस्ती थीं और झूठी शान दिखाने की लोगोमें आदत नहीं थी । इसलिये बहुत अधिक पैसोंकी न लोगोको आवश्यकता थी, न लालसा । रामगोपालकी साधारण' दूकानमें खर्च वाद देकर दो-ढाई हजार रुपये सालाना बचत हो जाती थी । इतनेमें ये परम संतुष्ट थे। एक बार अकस्मात् एक फर्म फेल हो जानेसे इनके बहत्तर सौ रुपये उसमें डूब गये । इनके घरकी पूँजी तो थी नहीं । घरका खर्च चलता था और व्यापार में देना-पावना रहता था । इनको लगभग दस हजार रुपये देने थे, इतने ही लोगोमें लेने थे। परंतु सात हजारसे अधिक रुपये एक ही साय इव जानेसे इनको रुपये देने के ज्यो-के-त्यो बने रहे । लेने नहीं रहे । इतने रुपये ये महाजनोंको कहाँसे दें । घरमें कुछ गहना था । साधी पत्नीने गहना दे दिया- बेचकर ये पाँच हजार रुपये सोनापट्टीसे लाये । एक गदाजनके यहो भेज ही रहे थे कि इसी बीचमें इनके देशके पड़ोसी एक एज्जन अचानक इनकी दूकानपर पहुँचे । ये उनसे कुगल-प्रश्न कर ही रहे थे कि वे बुरी नाद रोने लगे-पछने पर उसने बताया कि छोटी लड़कीके या में जोसे रुपयेकी व्यवस्था की गयी थी, वहाँसे रुपये न आनेसे रुपयोकी जरूरत पड़ी, समर था नहीं, एक बड़ी लड़कीका गहना बन्धक रखकर रुपये विवाद में लगा दिये । बढी लड़की ससुरालसे आयी हुई थी । अब वह ससुराल जा रही है । उसके ससुरालवालोको संदेह हो गया है कि गाना इन्होंने अपने सहृदयता काममें ले लिया है । वे आकर बैठ गये है । अब उन्हे गाना नहीं दिया जायगा तो इजत तो जायगी ही, वे पुलिसोस करेगे ! लड़कीका जीवन भी अत्यन्त दुखी हो जायगा । किसी तरह भी पाँच हजार रुपये मिल जाते तो मेरे प्राण वचते ।' पड़ोसीकी बात सुनकर रामगोपालका हृदय द्रवित हो गरा ! इन्होने सोचा, मुझसे ज्यादा जरूरत इस समय इनको है और यह सोचकर तुरंत पाँच हजार रुपये उनको दे दिये । उनकी इज्जत बच गयी । उन्होने गहना छुड़ाकर लड़कीको विदा कर दिया । लडकीके ससुरालवाले शर्मिन्दा हो गये -सोचा, हमने मिथ्या ही भले आदमीपर गरीब होनेके नाते सदेह करके बडा पाप किया । रामगोपालजीको बड़ी कठिनाई उठानी पडी । महाजनोंका कडा तकाजा शुरू हो गया, परंतु इनके मनमें अपनी सहृदयतापर संतोप था और ये प्रत्येक घोर-से-घोर कठिनाईका सामना करनेको तैयार थे । आखिर इन्होने देशमें अपने मकानके पासका नोहरा वेचकर काम निकाला । महाजनके रुपये चुका दिय । इनको दुखिया पडोसीका इतना हार्दिक आशीर्वाद मिला कि कुछ ही दिनो गद भगय कृपासे इनके इवे रुपये भी पा गये । कमाई भी अकस्मात् आशातीत हो गयी। दो ही साटमें इनकी स्थिति बहुत अच्छी हो गयी। उधर पड़ोसी सज्जनने भी रुपये पैदा किये । अत- एव वे भी रुपये लेट गये । मलेका अन्त में फल भला ही होता है। --मदनलान्ट अक्वाल .

मानस-चौपाईका चमत्कार “गत वर्ष मैने बी० एस-सी० की परीक्षा पास की थी । घरके सभी लोगोका आग्रह था कि मै इंजीनियरिंगमें जाऊँ ? आखिर अच्छे नम्बर आनेके कारणसे मेरा दाखला मैकेनिकिल इंजीनियरिंग हो भी गया । किंतु दुर्भाग्यवश नेत्रोंकी कमजोरी और शारीरिक दुर्बलताके कारण मैं उसमें नहीं चल सका और अन्तमें हताश होकर डेढ़ महीने बाद सितम्बरमें मुझे इंजीनियरिंग कालेज छोड़ना पड़ा। अब मेरे लिये चारो ओर अन्धकार था । एम् ० एस मी० के Admission ( दाखले) सब विद्यालयोमें बंद हो चुके थे । किंतु ईश्वरकी कृपासे मेरा दाखल्ला उदयपुर कालेजमें एम् ०एस-सी० (गणित) में हो गया । चूँकि कालेजमें बहुत बिटम्बके बाद प्रकिट हुआ था, इसलिये अध्ययनमें बहुत कठिनाई पड़ी। काफी मात्रा को बढ़ाया जा चुका था । आखिर मैने अब भगवान्का ही सहारा लिया और कल्याण में प्रकाशित एक चौपाईका मानसिक जप करना शुरू ४२ मानस-चौपाईका चमत्कार कर दिया । 'कल्याण' में तो जपकी बहुत विधि लिखी थी, किन्तु मैन मानसिक जप ही किया था । इस चौपाईके बारेमें 'कल्याण' में यह भी छपा था कि यह परीक्षामें पास होनेका मन्त्र है । अस्तु, परीक्षाके दिन आ गये । मैने यथासाध्य अध्ययन भी खूब किया । एम् ० एस् -सी० में चार प्रश्नपत्र होते है । दूसरे नम्बरका प्रश्नपत्र जो गणितकी एक शाखा ( Caldutis) का होता है, इतना कठिन आया कि बहुत-से विद्यार्थियोने तो श्रेणी बिगड़नेकी आशङ्कासे आगे परीक्षा ही नहीं दी । वैसे भी एम् ० एस-सी० ( गणित ) इतना कठिन विषय है कि विद्यार्थी एक श्रेणीमें दो वर्ष लगाते हैं। मैने अब ईश्वरको ही एकमात्र सहारा माना और चौपाईका जप करके दोनों अन्तिम प्रश्नपत्रोको भी दे डाला । वे दोनो काफी अच्छे हुए । जब परिणाम घोषित हुआ. तब विश्वविद्यालयमें सिर्फ करीव ४९ प्रतिशत परिणाम रहा और मेरे नम्बर प्रथम श्रेणीमें थे। मै तो अपनेको प्रथम श्रेणीका आना उस मन्त्रका ही चमत्कार समझता हूँ । अतः इस अनुभवके आधारपर मेरा विद्यार्थीवर्गसे निवेदन है कि वे पूरा अध्ययन तो अवश्य करें, पर परीक्षामें कभी हताश न हो और दृढ़ निश्चयके साथ निम्न चौपाईका जप करके परीक्षामें बैठे। ईश्वर उन्हें अवश्य सफलता देगा । चौपाई यह है- जेहि पर कृपा करहिं अनु जानी। कवि उर अजिर नचावहिं पानी॥ मारि सुधारिहि सो सब भाँती । जासु कृपा नहिं कृपा अवाती॥ -श्याममनोहर या80, बी. एस-सी.

एकान्तरा ज्वरका सफल यन्त्र
'कल्याण में मैने सर्पदंशपर पीपलके पत्तोंका प्रयोग पड़ा।
अत्यन्त प्रसन्नता हुई।*
मै भी आज एक सफल प्रयोग 'कल्याण में प्रकाशनार्थ भेज
रहा हूँ। आशा है, इससे लोगोंका बहुत लाभ होगा।
यह मन्त्र पीपलके पत्तेपर लिखकर दाहिने हाथकी कलाई पर
बाँध दे । मंगलबार या रविवारका दिन हो। बस उसी दिनसे कैसा
ही ८, ११६ हीं भी कितने दिनका भी अन्तर (एकान्तरा )
ज्वर क्यों न हो, नहीं आयेगा । कदाचित
ही ४
ही बॉधनेके दिन आ भी गया तो दूसरी पारीसे
बिलकुल नहीं आयेगा । मंगल या रविवारके
अगर पारी हो तो उसी दिन बाँधे । पत्तेको पाँचवें दिन
खोलकर किसी कु. में फेंक दे; किसीका पैर पड़े ऐसी जगह या
गढी जगह न फेंके।
यह प्रयोग हमारे पूज्य पिताजी राममनोहरगी मिश्र, मु० मढ़ी,
पोस्ट-कनैली, जिला इलाहाबादका अनुभूत है । मैंने उन्हींसे सीखा
और पचासों-एकान्तावालोंका प्रयोग करके सफलता प्राप्त की।
-~-दीनबन्धु मिश्र, आयुर्वेदरत्न, पो० सावठीयाय (वर्धा)
..
* पीपलपत्तीक प्रयोगसे सर्पका जहर उतर जाने के बहुत-से
समाचार मिले हैं।

है
नहरुआकी अनुभूत दवा
निम्नलिखित दवा हमारी भलीभाँति परीक्षित है तया
हजारो-हजारों रोगियोको इससे पूरा आराम मिल चुका
'कल्याण'के पाठकोके लाभार्थ उसे यहाँ लिखा जा रहा है।
नहरुआ बड़ा कठिन तथा कष्टप्रद रोग है । यह अधिकतर
राजस्थानमें हुआ करता है। इसका अचूक इलाज है और हजारों
लोगोपर इसका सफल प्रयोग किया जा चुका है । हमारे यहाँ

५२ पढ़ो समझो और करो, भाग ६ नवलगढ़में दूर-दूरसे लोग इस दवाको लेने आते थे । दवा यह है-सफेद कलीका चूना ( चूना टुकड़ा जो पान बौरहके कारने आता है ) के बडे-बड़े अच्छे टुकड़े और असली तिलका तेल---- (जितने तेटमें जितने टुकडे पीसे जा सकें ) दोनोंको खरलमें खूब महीन पीस लें, जिससे वह मलहम-जैसी बन जाय । दया जितनी अधिक घोटी जायगी, उतनी ही अधिक लाभप्रद होगी। दवा लगानेकी विधि यह हैकका पीला पत्ता लेकर उसपर थोड़ी-सी मलहम लगाकर जहाँ नहरुआका मुँह हो, वहाँ दवा लगाकर उस पत्तेको रखकर ऊपरसे १०-१५ आकके हरे पत्ते रखकर मजबूत पट्टी बाँध दें। तीन दिन बाद पट्टी खोलें। ईश्वरकी कृपासे एक ही बारमें परा आराम हो जायगा । यदि पूरा आराम न हो तो एक बार फिर इसी तरह दवा लगाकर बाँध दें और तीसरे दिन खोलें । निश्चित ही रोग नष्ट हो जायगा । नहरुआपर पानी न टगने पाये । दया मुंहपर लगानी चाहिये, ऊपरसे पीला पत्ता और उसपर हरे पत्ते रखे जायें।* -~-वंशीधर अग्रवाल * नहरआकी एक दूसरी दवा है--आधा पाव कबूतरकी बीटको अच्छी तरह पीसकर एक छटॉक किसी भी चीजके आटमें मिलाकर चूदपर पानी में पकाया जाय । पकते समय उसमें आधा छटॉक शुद्ध तिलका नेल डाल दिया जाय । फिर जब वह पूरी तरह पक जाय तो उतारकर किसी कपड़ेपर रख और उडा होने के बाद बायपर बाँध । तीनही दिनमें नहाआ ठीक हो जायगा। ~पीराम

खूनी बवासीर ( रक्तार्श ) की दवा
रसौत एक तोला और कलमी सोरा एक तोला--दोनोंको
पानीमें खूब महीन पीसकर आठ-आठ आने भरकी गोली बना
एक गोली प्रातःकाल और एक सध्याको टण्डे जलके साथ खिला
दें। यह दो दिनोकी दवा है । इसीसे खून बंद हो जायगा । न हो
तो, दो दिन इसी प्रकार और दे दें। गुड़, लाल मिर्च, खटाई, तेल
कतई न खायें। यह भी हजारो रोगियोंपर अनुभूत है !
-वंशीधर अग्रवाल, पयागपुर (बहराइच)

बुराईके बदले भलाई--हृदय-परिवर्तन कुछ वषों पहलेकी बात है । वायू रामानन्दके बगल में ही एस, सोनारका घर था । सोनार बहुत अच्छा आदमी था, उसको पनी भी साध्वी थी, पर पता नहीं, क्यो बाबू रामानन्दको सोनारके प्रति द्वेप हो गया था। वे चाहे जिससे उसकी निन्दा करते। कोई भी गहना बनवाने आते तो रामानन्द उसकी बेईमानी-चोरी बताकर उत्तमेसे कइयोको लौटा देते । पर वास्तव में सोनार यहा ही ईमानदार था । इससे उसी बहुत अच्छी साख जी। रामानन्दके विपरीत प्रयत्नपर भी उसको बहुत काम मिलता । उसकी लड़कीका व्याह या। पड़ोसीकी महायता करना तो दूर रहा; रामानन्दने अपने दुष्ट खश विवाद में भी कई तरह के दिन अले । बगलियोका अपमान कराया । उन्हें भपकाया भी। विवाद किसी त हो गया । पर सोनारने न कुछ बुरा माना, न रामानन्दका प्रतिकार किया और रामानन्दके माय बाहानी कही साता-कटुता नहीं आने दी। वर कसे ही विनन नया निश्चल बना रहा । एक दिन रामानन्दने कुन्द दे-लेकर गुदेले दाग बुराईके बदले भलाई हृदय-परिवर्तन राह चलते सोनारको गालियाँ दिलवायीं और उसे मरवाया । उसके घर तथा दूकानपर एक दिन गंदा कूड़ा गिरवा दिया । इस तरह अपनी ओरसे रामानन्दने सोनारको नुकसान तथा कष्ट पहुँचाने में कोई बात उठा नहीं रखी । पर सोनार सहज ही शान्त रहा। एक रात्रिकी बात थी, रामानन्द कही बाहर गया हुआ था। घरमें उसकी स्त्री तथा बालक अकेले थे । चोरोने सुअवसर देखकर रामानन्दके घरमें सेंध लगायी । वह धनी था । हजारो रुपये नकद उसके घरमें रहते और गिरवी रखा हुआ तथा अपना हजारों रुपयेका गहना भी उसके घरमें था । ठीक उसी समय सोनारकी पत्नी जाग गयी । उसने पतिको जगाया । तबतक सेंध लगाकर एक चोर अंदर घुस गया था । दो बाहर खड़े थे । उजियाली सुनसान रात थी । माल भी बाहर निकाल लिया था। नकद रुपय तथा बहुत-सा गहना था । वे भागना ही चाहते थे । सोनारने जाकर चोरोंको ललकारा । चोर वहींके जान-पहचानके थे। सोनार उन्हें पहचानता था । उन्होने सोनारसे कहा-'तुमको तो हमारी सहायता करनी चाहिये । तुम्हे कितना रुलाता तथा कष्ट देता रहता है यह नीच रामानन्द । आज वह घर नहीं है, हमलोग सब माल- मत्ता ले जायेंगे तो उसका मिनाज टडा हो जायगा तथा वह सीवा हो जायेगा । तुम्हारे लिये तो यह खुशीकी बात है ।' सोनारने कला--'भाई ! ऐसा नहीं हो सकता। हमलोगोका आपसमें पुश्तैनी भाईचारेका सम्बन्ध है । क्या हुआ, जो भूलसे हमें वह कुछ कह-सुन लेता है; आखिर है तो हमारा पीदियोका पड़ोसी भाई ही। जबतक पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ मेरे शरीरमें प्राण हैं, मै ,पने देखते-जानने नई रामानन्दरः तनिक-सा भी नुकसान नहीं होने दूंगा।' चोरोने चरा निकालकर कहा-'बड़े धर्म पालनेवाले आये हो, हट जाओ यहाँसे, नही तो अभी काम तमाम हो जायगा ।' सोनारकी सी इस बीच में उठकर कुछ ही दूरपर एक वनी सज्जन हरचन्दरायका घर था, उसमें रातको पहरा लगा करता गा, वहाँ पहुँच गयी और पहरेदारको प्रार्थना करके तुरंत याने राबर करवा दी । मुहल्लेमें और लोग भी जग गये । सोनाकी सीके उद्योगसे यह सब हो गया। थानेसे पुलिसके सिपाही चले और मुहल्लेके लोग भी । इधर चोर छुरा मारनेको तैयार हुए ही थे कि सिपाही तथा और लोग समीप आ गये । चोर माल लेकर भागे । सोनारके रोकनेपर एक चोरने सोनारको छूरा मारा, पर का भाग रहा था । सोनारने बायाँ हाय सामने किया तो उसकी हथेलीपर कुछ चोट लगी । इतनेमें पुलिम तथा लोग आ गये। तीनो चोर माटके साथ रंगे हाथों पकड़ लिये गये । गमानन्द वीयः सब देख रही थी। मुहल्लेके लोग सोनारका यह पवित्र भाव तथा मान कार्य देखकर दंग रह गये । म उसकी प्रशंसा करने टो। सनी जानते थे कि रामानन्द योंसे निर्दोष सोनाको बेद मानाना। उन्होंने उसकी खीसे कला--'देखो, अपने पतिकी काली कामना विचार करो और इस सोनारका मला काम देखो। हामीनी ला सकता था और इसकी जान नी जा तानी नी । पर उसने नुः लोगोंको अपनी जान देकर भी बचाना चाला और दोनों की गुरु बुराईके बदले भलाई हृदय-परिवर्तन मिल्टकर आखिर बचा ही लिया ।' रामानन्दकी पत्नी रो रही थी अपने वाले कारनामोको याद करके और सोनार-दम्पतिका अनोखा त्याग तथा प्रेम देखकर । पश्चात्तापके आँसुओने उसका सारा कलुप धो दिया । दूसरे दिन रामानन्द लौटा। पत्नीने सारा हाल बतलाया । मुहल्लेके लोगोने तया पुलिमने भी बतलाया । रामानन्दका हृदय पलट गया। उसके हृदयका सारा विष सोनार-सोनारीके विलक्षण स्नेहामृतसे नष्ट हो गया। वह जाकर सोनार-सोनारीके चरणोमें पड़ गया । उनसे रो-रोकर क्षमा मागो, पर उनके मनमें तो कोई देप था ही नहीं । उन्होने रामानन्दको सरल हृदयसे सान्त्वना दी। पेश चला । चोरोने अपने बयानमें सोनारके कर्तव्य-पालन, त्याग, रामानन्द के प्रति उनके सगाव तया सोनारकी ठोक समयपर काम करनेवाली बुद्धि तथा बहादुरीकी बातें बतायी । मैजिस्ट्रेटने सोनार-सोनारीकी बड़ी प्रशंसा की। चोरोको सजा हुई। सोनारको सरकारने इनाम देना चाहा। पर सोनारने यह कहकर नहीं लिया कि रामानन्द मेरा भाई है । मैंने उसपर कोई उपकार थोडे ही किया है। अपने घरको बचानेकी चेटा करनेमें उपकार-पुरस्कारकी कैसी बात । मै यह न करता तो मै कर्तव्यसे गिरता। किया तो अपने स्वार्थका काम किया--' सब लोग दग रह गये । रामानन्द तो उसका चरणसेफ ही बन गया । परस्पर प्रेमका प्रवाह वह चला। --हरिप्रसाद शमा

र
नत्र
मै
प्रतिशोध
हमारे मकानमें नहर-विभागके पं० xxxx शर्मा र ते है।
उनसे मैने यह घटना सुनी है। आपने बतलाया कि मैं अंगारा
चौकीपर पतरौल था। एक दिन राजबाला मानक
(जि० आगरा) पर जा रहा था तो मुझे एक साधु पुटपर मेंटे
मिले । प्रणाम करनेके पश्चात् में उनके पास बैठ गया; न जाने
क्यों वे महात्मा मुझसे बातें करने लगे। इसी समय मैने उनमे
उनके सायु होनेका कारण पूछा तो उन्होने काफी सम:
करनेपर निन्न शब्दोंमें बताया---
'म कारकत्तेका एक महाजन यार में अपनी बेटी को
साय, जो उस समय १७ वर्षकी थी, एक अंधकारमय ओटे
मकान में रहता था। खोमचेका काम करनेपर में इतने गो की
कमा पाता था कि उदरपूर्ति नहीं होती थी। जीवन दी I
संकटमय था।
।

प्रतिशोध
५९
'भगवान्की लीला अद्भुत है।' एक रात्रिको जब हम दोनों
भाई-बहिन सोनेवाले ही थे कि एक पंजाबीने मकानमें प्रवेश करते
हुए रात्रिनिवासकी अनुमति मांगी। पर्याप्त अनुनय-विनयके पश्चात्
हमने उसे स्वीकृति दी और तीनों उस तंग मकानमें सो गये तथा
स्वप्नोके ससारमें पहुँच गये। लगभग रात्रिके ११ बजे मेरी
वहिनने मुझे जगाया और नोटोका बंडल देकर कहा मैने
इस
सम्पत्तिको उस अतिथिको मारकर प्राप्त किया है, जिससे कि
हमारा जीवन सुखमय व्यतीत हो सके ।' यह सुनकर मै
आश्चर्यचकित हो गया, परंतु पुलिसके भयसे मैने शीघ्र ही एक
गहरा गडढा खोदा और पंजाबीकी लाशको उसमें रखकर मिट्टोसे
दवाकर अदृश्य कर दिया । इसके
अतिरिक्त
चारा ही
-
क्या या।
शनैः-शनैः उस सम्पत्तिसे मेरा कारोबार बढ़ा और मे
एक
अच्छा व्यापारी हो. गया । मेरी बहिन, इससे पहले कि मैं उसका
विवाह कर पाता, स्वर्ग सिधार गयी। परंतु अवस्था अधिक होनेपर
भी मेरा विवाह हो गया और पुत्र भी उत्पन्न हुआ। कालान्तरमें
मेरी पत्नी भी चल बसी ।
'भरण-पोषणका समुचित प्रबन्ध होनेके कारण मेरा पुत्र
( जो मेरी एक कल्पनामात्र या ) दूजके चन्द्रमाकी तरह
विकसित होने लगा। नवयुवक होनेपर मैने उसका एक धनी
परिवारकी सुशीला लड़कीके साथ विवाह-सस्कार कर दिया । परंतु
विवाइके दो वर्ष पश्चात् मेरे पुत्रको रोगने इस प्रकार आ घेरा कि

६० पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
मैं उसकी चिकित्सा करते-कराते सम्पूर्ण संचित बन-सम्पतिसे शाम
धो बैठा, मकान भी दूसरोके हायमें चला गया। परंतु बीमारी
कम न हुई । निराश हो एक दिन मै पुत्र के पास बैटकर और
बहाने लगा। पुत्र हँसा और बोला---'क्या अब आपके पास उस
भी नहीं रहा है ! तो मै इस संसारमें कर नहीं रहूँगा।' मैने
प्यारसे पूछा---'वेटा ! ऐसा क्यो...तथा यह नवयुक्ती वा मेरे
सामने विधवा होकर रहेगी तो मैं कैसे सहन.... ।' करते-करते
मेरा गला रुंध आया | लड़केने कहा- मैं वही पंजाबी जि.का
कल आपकी बहिनके हाथ हुआ या तथा मेरी यह पानी आपकी
वही बहिन है। अब मै इस संसार से इसका लोक ना परोक
बिगाड़कर मुख मोड़ता हूं। मैने अपनी सम्पत्ति इलाको
खर्च कराके बन्छ पायी और आप पहलेकी भांति निर्धन हो गये।'
'मुझे उसकी बातोपर कल ही विश्वास आ गया,
जब कि मेरा बेटा मुझे तया पत्नीको संसारमें दीन तथा निःसहा
बनाकर संसारसे चल बसा । मुझे प्रेरणा मिली । अतः मने
त्यागकर ईश्वरकी शरण ली और अब नगदजनमें सनर मित
रहा हूँ। अब मेरी अवस्था ९५ वर्षकी हो गयी है। मेरे
साय पंजाबीका प्रतिशोध तथा मेरे माधु होनेत कारण ।'
यह साधु श्रीशर्माजीको दिनम्बर ५७ में मिटाया।
आमद करनेपर भी साबुने नान-पना अशात ही रखा। 3.4
नही वह सायु जीति है अथवा नही ।
मामा
...

छोटी-सी लड़कीकी समयसूचकता मेरे मित्रके पिताजी एक बार कलकत्तेसे बम्बई आनेके लिये हवड़ा मेलमें सवार हुए। उस समय जो घटना हुई, उसे उन्हींके शब्दोंमें यहाँ लिख रहा हूं-- मै कलकत्तेसे बम्बई जाते समय हबड़ा मेलमें सवार हुआ। सारी गाड़ीमें बड़ी भीड़ थी । ठीक समयपर गाड़ी खुल गयी। बरसातका मौसम था । बहुत वर्षा हो रही थी। पर गाड़ी इसकी चिन्ता किये बिना ही दौड़ी चली जा रही थी। अचानक इंजिन-ड्राइवरकी दृष्टि दूर हवामें हिलती हुई लालटेनपर पड़ी। उसे कुछ जोखिमकी निशानी प्रतीत हुई । गाड़ी धीमी हुई, स्टेशन नहीं था पर गाडी खडी हो गयी। यात्रियोने बाहर मुँह निकाले । इजिनवाले तथा बहुत-से यात्री उतरकर दूर जहाँ लालटेन दीख रही थी, जा पहुँचे । देखा तो एक दस वर्षकी लड़की हायमें लालटेन लिये खड़ी थी। लोगोने पूछा- 'बेटी ! क्या बात है; गाड़ी क्यो रुकवायी ?' उसने करा- देखो आगे वह पुल टूट गया है। मेरे पिताको इस समय बुखार आनेसे वे सिग्नल नहीं दे सके, इससे उनके बदले मैंने आकर लालटेन दिखाकर गाड़ी रुकवायी ।' इस बातको सुनकर सभीने लडकीकी बहादुरी तया कर्तव्य- पालनके लिये उसे शाबाशी दी। तदनन्तर फर्टक्टासमें बैठे एक डाक्टरने जाकर उसके पिताके इलाजकी व्यवस्था की और गाड़ी वापस कलकत्ते लोटी । 'अखण्ड आनन्द' --टिन. सी. वर

'गजेन्द्र-स्तवन' से संकट-मुक्ति
आजसे कई माह पूर्व एक दिन मुझे मालवीयजी महाराज
द्वारा प्रशंमित लेख' गीताप्रेस, गोरखपुर-मुद्रणालपसे मुनि
गजेन्द्रन्तवनका मित्रा, जिसमें नहान् संस्टसे त्राण पानेकी प्रशता
की गनी गी। मैने भी लिखे मुताबिक उसे अच्छी तरह कण्टस्य कर
लिया, इसलिये कि विपत्ति-कालमें इसकी शक्ति देवूगा । प्रती
इच्छासे थोडे दिनों पूर्व मै संकटमें फैप ही तो गया । तब इस मान
अबका चार बजे रात और निरन्तर हृदयसे उच्चारण करके
प्रयोग किया । मुझे संकटसे छुटकारा मिलनेका आशा नहीं दी,
परंतु आखिरकार में इस लानले प्रतापमे संबटसे मुहर
प्रतना
रामायापार

दाद-खाजकी अनुभूत दवा मूलीका बीज पानीमें पीसकर आगपर खूब गरम कर लेना चाहिये । तत्पश्चात् उस स्थानपर, जहाँ दाद-खाज हो, खूब गरम- गरम लगा देना चाहिये । पहले दिन तो मूलीका बीज खूब लगेगा और मरीजको थोडा कष्ट भी होगा; किंतु याद रखना चाहिये कि दवा जितनी जोरोंसे लगेगी उतना ही अधिक फायदा होगा। दूसरे दिन भी यही प्रयोग करना चाहिये । दूसरे दिन पहले दिनकी अपेक्षा कम तकलीफ होगी और इसी प्रकार तीन-चार दिनांके प्रयोगसे दाद-खाज, चाहे जैसा भी पुराना हो, जड़से आराम हो जायगा । यह मेरी अनुभूत दवा है । आशा है, 'कन्याग' के पाठक एवं पाठिकाएँ इससे पूरा-पूरा लाभ उठायेंगी। -~-जयकान्त झा प्रधान लिपिक, हरिश्चन्द्र कालेज, वाराणसी भला ऊँटवाला । कुछ पुरानी बात है। गजमानमें उस समय ऊँट चलते थे कलकत्ते, बबईसे आने-जानेवाले लोगोंको पचाना कोत पर यात्रा करके रेल पकड़नी पड़ती थी। एक भाई कलकत्तेसे लौटे और उन्होने नायाँ ( कुचामन रोड) में एक अपरिचित ठाकुरका उँट भाडे किया । बीनारोके कारण अचानक विचार हो गया, इससे जल्दोंमें आना पड़ा था, इसलिये अपने को समाचार लिखकर परिचित व्यक्तिका ऊँट वे नहीं मॅगा सके थे। दो लड़कियों के विवाहके दिये कपड़ा-लत्ता, गहना त्या नगद तन नार-कुर पन्द्रह हजारका सानान साथ था । सामान ऊंटो बारेमें रखा गया । उसपर वेलाई सवार हुए। उन्हें तीन दिन तफर करके घर पहुंचना या । पाली पंद्रह कोसकी मंजिल तो ठीक निन गयी। वे लोसल में अनार ठहरे । वहाँले दूसरे दिन चले । गनीको नतिम थी, इसकिय रायो ऊँटकी यान की जाती यो। देवको लीग। रास्तेने उनके पो भयानक दर्द उठा, समीप एक छोटे से गांवमें पेड़के नीचे ठहराया गया । वे नाई सरे । यो सनको कहाँ कोई वैद्य मिलता। उनके पास लोग थी, ऊंटबालेने आता प्रबन्ध करके लीगका काला बनाकर दिया। परंतु दर्द बढ़ता ही गया और इसी दर्दने दोनीन घंटे बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी। गाँववाले बडे अच्छे लोग थे! सबने सहामना कीवासे एक ऊंट लेकर गांका आदनी मार चला और उनके सामानवाले उटपर उनकी लाश कधीः । ।

भला ऊँटवाला ऊँटवालेसे गॉवक एक आदमीने कहा--कुछ माल-ताल पास हो तो लेकर चम्पत क्यो नहीं हो जाता । लाश फेंककर घर चला जा।' उसने कहा-भाई ! ऐसी बात मनमें लाना भी पाप है। इन्होंने मुझपर विश्वास करके अपना हजारोका मालमता तया अपनी जान मेरे भरोसे छोड़ दी। ये तो मर ही गये । अब इनके सामानको लूटकर मैं इनके घरवालोको भी मार हूँ । भगवान् सब देखते हैं। वे मेरे इस पापको कैसे सहन करेंगे। मुझे भी बड़ा दुःख है, तुमने ऐसी पापको बात मुझसे कही ही कसे, तुम्हारे मनमें यह पाप-भावना पैदा ही क्यो हुई और मै इसे सुन भी कैसे सका। मालूम होता है मेरे मन में कही जरूर कोई पाप छिपा है, तभी तुम मेरे सामने ऐसी पापकी बात कह सके और तभी मै सुन सका ।' गाँववालोने यह सुनकर ऊँटवालेकी बड़ी सराहना की और उस आदमीको धिक्कारा । लाश उनके घर पहुंची । घरवालोंके दुःखका पार नहीं रहा, पर जब कीमती सामान तथा नगद रुपयों- की थैलियोको ज्यों-कान्यो पाया, तब उनके शोकमें भी एक हर्पकी लहर उठी। उन्होने ऊंटवालेके प्रति बड़ो ही कृतज्ञता प्रकट की, उसे इनाम देना चाहा । पर उसने भाडेके सिवा एक पैसा भी अधिक नीं लिया और कहा कि मेरे साथ यह जो गाँवका एक भाई आया है, इसका भले ही कुछ दे दिया जाय । पर उसने भी लेनेसे इन्कार किया । पड़ोसीके यहा रोटी-राबड़ीकी व्यवस्था की गयी। उसीको खापर दोनो विदा हो गये । धन्य ! --चेतराम धर्मा उ००५-६-

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पढ़ाईकी लगन
एक दिन सवेरे साढ़े दस बजे अंदाज मैं बम्बईके सेंट में
कालेजके पाससे जा रहा था। कालेजके बाहर दरवाजे के पास
नौजवान विद्यार्थी बात कर रहे थे। उनमेंसे एकने मेरी ओर
और हँसता हुआ मेरे पास आकर मुझसे बोला-नमस्ते भा
पहचानते हो या भूल ही गये ?'
मैने उसको अच्छी तरह देखा और मेरी स्मृति परेप
वर्ष पीछे पहुँच गयी। मै बोल उठा-'अरे, १९५५ में हन्दा
हमलोग साथ थे, वह चन्द्रकान्त तो नहीं हो ?'
'हॉ वही ! हरद्वार में अपने अगल-बगल ही ठहरे थे, कि
वहाँसे साथ ही देहरादून तथा मनरी गये थे'- उसने उत्तर दिया
मुझे याद आ गया—उस समय वह किशोर चन्द्रकान्त आज
जवान हो गया है । उस समय तो यह हाई स्कूलके अन्तिम में
पड़ रहा था।
फिर तो चन्द्रकान्त मुझसे बहुत-सी बातें कह गया। मेरे
कुटुम्बके लोग हरद्वारमें मेरे साथ थे, उन सबके कुशल-समाचार
पूछे और अपने कुटुम्बके समाचार बताये । फिर अचानक अपनी
घड़ीकी ओर देखकर बोला 'दादा ! क्षमा करना,
नोमिक्सका पेपर लिख आऊँ । तुमसे फिर निलंगा।' दुनना कत
कर वह हँसता हुआ कालेजकी ओर चला।
'जरा पेपर लिख आऊँ', इन जरा' गन्दपर जोर देकर में
उससे पूछ बैठा।'
'हाँ, मेरी फाइनल बी० ए०की परीक्षा चल रही है। में यह
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NT
मै
जरा इको.

६७ पढ़ाईकी लगन पेपर देने ही आया है। तो क्या तुम्हे परीक्षाकी चिन्ता नहीं है ? दूसरे विद्यार्थियोंकी भॉति तुम अन्तिम घड़ीतक अध्ययन नहीं करते ? क्या 'नर्वस' नहीं हो जाते ? या फिर पास ही नहीं होना है, जो कहते हो जरा पेपर लिख आऊँ ।' मै एक ही सपाटेमें इतने प्रश्न पूछ गया। 'नहीं दादा ! मे परीक्षाकी चिन्ता नहीं करता । वर्षके आरम्भमें ही मैं ध्यानपूर्वक अध्ययन में लग जाता हूँ । परीक्षाके समय तो खूब आरामसे सोता हूँ और आनन्दमें रहता हूँ और हँसी-खेलमें ही पेपर लिख आता है । इतनेपर भी तुम्हारे-जैसे बड़ोकी दयासे प्रतिवर्ष अच्छे नंबरोसे ही पास होता आ रहा हूँ। इतना कहकर एक मोहक हास्य विखेरता हुआ, फिर मिलना' कहकर मेरी ओर हाथ हिलाता हुआ वह कालेनकी ओर दौड़ गया। 'जरा पेपर लिख आऊँ--ये शब्द मेरे दिमागमें रम गये । हमारा अधिकाश विद्यार्यासमूह तो पूरा वर्ष भटकता हुआ मौज-शौक और उल्टी-सीची प्रवृत्तियोमें ही विना देता है । फिर परीक्षाके समय रातों जागकर स्वास्थ्य विगाड़ता है और परीक्षाके दिन तो नवस' हो जाता है, 'टीप्स'के लिये इधर-उधर दौड़-धूप करता है। अन्तके पाँच मिनटतक मी हायसे पुस्तक नहा उतारता और इतनेपर भी अच्छा परिणाम नहा प्राप्त कर सकते। हमारे ऐसे विद्यार्थी चन्द्रकान्तके उदाहरणसे शिक्षा लेकर शुरूसे ही अभ्यासमें नियमित- रूपसे ला जायँ और हंसी-खेल में धारेसे कहें कि 'जरा पेपर लिख आऊँ' तो कैसा अच्छा हो। -~~अखण्डआनन्द:--गोवालदास श्रद्धा-विश्वासका फल बात १९५५ की है । तब मे कोटा में रहता था, हमारे पड़ोसमें ही एक कृष्णा नामकी विधवा स्त्री रहा करती थी। ऑखें मुंदी-मुंदी, खेत बल धारण किये वह साध्वी एकदम ज्योतिर्मयी माधना सी ही प्रतीत होती थी। वह मुझे भगतजी काला करती थी ! न जाने क्यो, मुझ-जैसे अधमके लिये ऐसा सम्बोधन ! पर खैर, एक र उसका एकलौता बेटा बीमार पड़ा, सल्ल बीमार । घरमें उनकी मां, बहू और उसका पुत्र तीन ही थे। मोको कार या किसी निमें ।

श्रद्धा-विश्वासका फल ६९ जाना या । अतएव वह उसे दवा देकर यह कहकर चली गयी कि हर दो बटेसे दे देना । मैंने कहा-'वरपर मैं रह जाऊँगा' पर कृष्णाने कहा-'नहीं, आप कष्ट न करें, जब आवश्यकता होगी, में आवाज दे लेंगी।' मैं घर आ गया, मॉ चली गयी । प्रमोद बुखारसे जल रहा था, वह कुछ देर तो बैठी रही, फिर एकाएक उठकर प्रभुके सिंहासनके पास गयी और सिंहासन लेकर छतपर आ गयी और चरणोमें लिपट गर्या तया आर्तकण्ठसे पुकार करने लगी। वहीं उसे नीद आ गयी । प्रातः ६ बजे में उनके घर गया। उसी समय उसकी मा आ गया, पर कृष्णा दिखायी न दी । हम ऊपर गये तो वह सोयी थी। उसकी मॉने जगाया, पछा---'क्यो दवा दे दी थी न प्रमोदको ?' 'नहीं मॉ।' मोंने डॉटा---एक तो बेटा और तू नेह नहीं रखती, हे भगवन् ! जाने वह जिंदा भी है या नहीं।' उसने उसे बहुत कुछ बुरा-भला कहा । उसने कहा-मा! रखनेवाला तो वह है. मेरे जतन करनेसे क्या होता है, और वह दौड़ पड़ी अपने पुत्रके शाम । हम सब गये तो प्रमोद सो रहा था और बुखार नाममात्रको भी नहीं थी । भगवान्ने बुखार चुरा ली थी। वह दौड़कर ठाकुरके पास गयी और चरणोसे लिपट गयी । सारा सिंहासन आँसुओसे र हो गया। उसके बाद जबतक मै वहाँ रहा, मैंने देखा उसका सिर नी नहीं दुखा और आ तो उस प्रमोदका विवाह भी हो गया है । 'कुन्दन -get- सच्ची साधुता गत १९५७ अप्रैल की बात है । संत श्री....... अपने सा. अपने अन्य भक्तजनोंको और मुझको लेकर चारों धाम यात्रा के लिये गये थे। श्रीजगन्नाथजीके दर्शनोपरान्त इम कलकत्तासे हरद्वारका सीधा टिकट लेकर हवड़ा स्टेशनसे देहरादून एक्सप्रेसमें हरद्वार- बड़ाके डिब्बेमें जाकर बैठे। गाड़ी चल पड़ी । डिब्बा पुरा भर हुआ था, सभी लम्बी सफरवाले मुसाफिर ये । यद्यपि डिब्या १५ आदमियोके लिये था, पर उसमें सब ५४-५५ यात्री थे। ऊपर की सीटें भी सामानसे भरपूर थीं । नजदीक उतरनेवाला कोई न था। जव मुरादाबाद स्टेशन आया, तब वहांसे दो यात्री तन्य दम्पति सुविधाजनक डिचा ढूंढ़ते हुए हमारे दियेके पास आये, त्यो ही गाड़ीने छूटनेकी सीटी दी। उन्होने उकताये उर मारे डिब्बेकी खिड़कीमें सीबतासे बिन्तरा केला और स्त्रीको उठा उसी सच्ची साधुता -- खिड़कीसे डिब्बेमें उतारा । नीचे लोग बैठे थे। विस्तरा और स्त्री उनके ऊपर जा पडे । वे स्वयं भी खिड़कीसे घुसकर चढ़ गये; गाड़ी चल पड़ी । हमलोगोने उनसे कुछ भी नहीं कहा; क्योंकि हमें तीर्थयात्राके नियमोका पालन करना आवश्यक था । यात्रामें क्रोधादि नहीं करना चाहिये । अतः हमारी मण्डली धर्मव्यवस्थित थी । बडी भीड़ थी । कहीं भी जगह नहीं थी, विस्तर ऊपर पडनेसे लोगोंने उनसे विस्तरा हटानेके लिये कहा । नवयुवकने उसे उठा लिया । नवयुवक यक चुके थे। संत श्री...'ने उनकी स्त्रीको अपनी जगह बैठनेको दी। वे स्वयं को ही खडे हुए कि नवयुवकने बिस्तरा संतजीके सिरपर रख दिया । मैने उनको ऐसा न करनेके लिये कहा, इसका परिणाम विपरीत हुआ । नवयुवकने धक्का-मुक्की की। अब विस्तरपर अपना और सामान भी संतजीके सिरपर रख दिया। लोगोंने हटाया । नव- युक्कको समझानेकी चेष्टा की, पर विवाद बढ़ता गया । गाडी कुछ घटोमें हरद्वार जा पहुँची । सभी उतरे । शान्त-मूर्ति संत श्री.. प्लेटफार्मपर उतरे । सभीने अपना-अपना सामान सँभाला। नवयुवक सपत्नीक नीचे खडे । संतजीने पूछा-'कहो भाई ! कुछ सेवा है ! वे दम्पति चिन्तित थे; क्योकि उन्होने गाड़ीमें हड़बड़ा:- हटमें टिकट कहीं गिरा दी थी। पता नहीं था कहाँ गिरी। हमारा डिब्बा हरद्वारतकका ही था, अतः वह कटकर इंजनद्वारा खीचा जा रहा था। नवयुवकने कहा-महाराज ! टिकट खो गया ।' संतजीने -'भाई ! अच्छी तरह तलाश करो।' नवयुवकने कहा-'तुमने - - पड़ो, समझो और करो, भाग ६ ही टिकट ली है, दे दो, नहीं तो पुलिसके हवाले कगा! संतजीने कहा-भले ही; परंतु आपको याद है कि टिकटें काम थी और कब-कहाँ खोयीं। लोग सुन रहे थे। किसीने कहा-'डिन् तो गिरी नहीं ! मुझसे रहा न गया, मैने कहाभले आदमी संतजीने तुम्हें जगह दी, बिस्तर उठाया, भला-बुरा सुना in परिणाममें यह अपराध लगा रहे हो ! हमारी बातचीत हो रही थी, इसी बीच संतनी उक्त दिन्वे तलाशमें गैरेजकी ओर गये, जहाँ डिब्बा काटकर छोड़ा गया गा उस डिब्बेमें दो-तीन आदमी बैठे थे जो रेलवे कर्मचारी थे, : इजनके साथ डिब्बे जोड़ने-छोड़नेका काम करते हैं। उनसे सनी पूछा, उन्होंने तलाश की। ढूँढनेपर टिकटें मिल गर्या, संत उनको ले आये। मैं उन नवयुक्कसे कह रहा या-भाई ! किसी सन्जन व्यक्ति पर यो लाञ्छन लगाना उचित नहीं है ।' काफी लोग इकट्ठे । थे, संतजीने लाकर टिकटें दी और डिब्बे में गिरनको बात बतायी फिर कहा-'और कुल सेवा हो तो कहें । हमें श्रीनद्रीनाएर. जाना है। २-३ दिन इरद्वार में रहेगे। हमारा पता आश्रम, स्टेशन रोड, हरद्वार है। वे रिक्शामें बैठे, चले गये और म मुदर्शन-आश्रम में जाकर टिके। दूसरे दिन वैशाखी स्नान बड़े समारोहसे हो रहा था। रास्तों, वाटों और स्नानस्थलों पर पुलिसकी व्यवस्था थी। आने-जाने टि अलग-अलग रास्ते नियत थे। हम आश्रमसे सुबह ९ बने मन 'श्रीदर्शन- सच्ची साधुता ७३ हरकी पैड़ी जा रहे थे, तो आगे रास्तेमें ऋषिकेश क्रॉस-रोडपर वही नवयुवक अकेले ही मिले । संतजीने पूछा---'कहो महाशयजी, कुशलपूर्वक हो न ?' नवयुवकने कहा--'क्या बताऊँ, एक आपत्ति हो तो कहूँ—नृसिंहभवनमें ठहरनेके लिये कोठरी नहीं मिली, वहीं बाहर ही पड़े हैं । स्त्रीको रातसे गुर्दा-दर्द ( आन्त्रिक वृक्कशूल ) हो गया है। बड़ी बेचैनी है। मैं थैला ले स्नानको हरपैडीपर गया था, वहाँ यैला ही कोई उठा ले गया । उसीमें पैसे थे। बडा परेशान हूँ।' सतजीने कहा-'तो कुछ सेवा करूँ ! नवयुवकने दस रुपयेकी याचना की । संतजीने झट निकालकर दे दिये और मुझको आदेश दिया कि 'आप इनके साथ जायँ, स्रीकी योग्य चिकित्सा करें।' मैने आदेशानुसार उन नवयुवकको साथ लेकर सुदर्शन- आश्रमसे अपनी दवाकी पेटी ली और फिर नृसिंहभवनमें उनकी स्त्रीको अच्छी तरहसे देखा । उन्हें इंजेक्शन दिया और गोलियाँ देकर में हरकी पैड़ी अपनी मण्डलीसे आ मिला । श्रीगङ्गाजीका स्नान कर नित्यनियममें प्रवृत्त हो, पूजापाठसे निपटकर एक बजे वापस लौटे । रास्तेमें ही नृसिंहभवन पढ़ता है। अतः उनसे मिले, उनकी पत्नीके दस्त-पेशाब खुल गया था। वह स्वस्थ-सी दिखायी देती थी। हमें देखकर दोनों नत-मस्तक मिले और अपने पूर्वकृत बुरे बर्तावके लिये अनुनय-विनय करने लगे। वे करुणाभावमें सराबोर थे। संतजीने कहा-'भाईजी । हमें भगवान्ने आपकी तुच्छ सेवाका सौभाग्य दिया, यवपि हम इस लायक नहीं थे । आप कुछ दुःख न मार्ने ।

७४
पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
मनुष्यको जीना है तो मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्राणिमात्रकी से
लिये जोना है, न कि अजागलस्तनकी भाँति व्यर्थ जोवन विताना
है।' 'आप क्या कार्य करते हैं ? संतजीने पूछा । तब उन्होंने
कहा-
'मै राज्य-तहसील-कर्मचारी हूँ। बी० ए० हू और यह भी
पढ़ी-लिखी है। बहुत अच्छा', संतजीने कहा-'ओर कुछ से।
बताइये?' नवयुवकने कहा---'प्रभु ! हमारी सुबुद्धिके लिये कुछ
नियम बतावें ताकि हमारे जीवनका कल्याण हो । मै आपस
कृतज्ञ हूँ।'
संतजी-'लीजिये, यह गीता और रामायणका गुटका । आप
दोनो सुशिक्षित हैं, अतः इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ें और मनन करें।
संत-समागम किया करें । गीताप्रेसकी धार्मिक सस्ती पुस्तकें पड़ा
करें, इससे आपका कल्याण होगा । भगवान् आपको सद्बुद्धि
दें।' नवयुवक-संतजी ! आपसे में गहायात्राके उपलाने प्रतिमा
करता हूँ कि अब कभी ऐसी उद्दण्डता नहीं कलंगा और आपके
} आदेशोका प्राणपणसे पालन कलंगा।'
बादमें हम अपने सानपर लोट आये। ने मुगा होकर अपने
गन्तय स्थानपर चले गये
संतनी..."की इस सची सापुता, ननना, म:-
सर्वति-बुद्धिका नुझे आदिन माण: । न्नरने की
सबके साथ सहानुभूतिपूर्ण महार माग्न नागि । कि
वशीभूत होकर अमानुषी व्यवहार भी नारी करना चागि।
~~~ादरममार, दी.

। . --- भाईका स्नेह रामविलासजी तया हरमुखरायजी दोनो भाई थे। घर सम्पन्न था । किसी कारणवश दोनोने अलग हो जाना अच्छा समझा। बॅटवारा हो गया। दोनों भाई अलग-अलग कारोबार करने लगे। आपसमें बिना सदेह लेन-देन भी चलता ही था। दोनो भाइयोमें बड़ा प्रेम था। दोनोंके लड़के बडे हो गये और व्यापारका काम करने लगे। पर नाग्यकी बात--रामविलासका व्यापार उन्नत होता गया और हरमुखरायका गिरता गया । लगभग सत्तर हजार- से कुछ अधिक रुपये रामविलासकी फर्मके हरमुखरायकी फर्मके नाम पड़ते थे । हरसुखरायका फर्म फेल हो गया । रामविलासको बहुत दुःख हुआ; परंतु सारा कारोबार लड़कोके हाथमे था । अतः वे कुछ कर नहीं सके । जमीन-जायदाद दोनोके पास अभी थी। रामविलास बहुत बूढ़े हो गये थे । उनके मनमें एक दिन यह विचार आया कि हमारी फर्मके बहुत बड़ी संख्याने रुपये भाई हरमुखरायमें पायने हैं। हरमुखराप भी मरणासन्न हैं और मै भी मरणा- सन्न हूँ। हरमुखरायके लड़के गरीबी हालतमें हैं । रुपये यदि उनके ७६ पढ़ो, समझो और करो भाग ६ नाम पड़े रहे और मेरे लड़कोने हरमुखरायके लड़कोंको तग कि: या उनकी जमीन-जायदादपर मन चलाया--यधपि लड़के ऐसे अभी हैं नहीं तो बहुत बुरी बात होगी।' यह सोचकर वे अपने मनमें दृढ़ निश्चय करके एक दिन गही- पर पहुंचे। उनके अपने नाममें लगभग इतने ही रुपये फर्ममें जमा थे, जो मरनेपर उनके लड़कोंकी ही सम्पत्ति होते । उन्होने जाकर मुनीमसे बही माँगी और भाई हरमुखरायके खाते सारे रुपये व्याजसमेत जमा करके अपने खातेमें नाम लिख दिये और इरमुखराय- का खाता चुकता कर दिया । हरमुखरायको इसकी सूचना भी नहीं थी। हरमुख रायको इस बातका पता भी नहीं था। वे पड़े ईमान- दार थे। अपनी जमीन-जायदाद वेच-वेचकर वे लोगोंक रुपये चुका रहे थे। बड़े भाईके ऋणको भी वे एक बड़ी जमीन नया मकान कर चुकानेकी व्यवस्था कर रहे थे। इसी बीच उन्हें पता लगा बड़े भाई साहबने मेरा खाता अपने रुपये देकर चुकता कर दिया है तो उनके नेत्रोसे स्नेइके ऑम् अरने लगे। वे के चरणोंमें आये और बोले-~~-आपने ऐसा क्यों किया ! मनी रूपये दे ही रहा था। बड़े भाई रामविलासके नेत्र भी जाने लगे, उन्होंने भाईको गले लगा दिया। दोनो रोने लगे । यः सुक्ष्य देकर रामविलासजीके गले लाकका दृदय भी द्रवित हो गया। फिरसे दोनो कर्म एक का लिये और आनन्दका स्रोत य: उठा। ----विन्दराम 1

भगवदर्शन
(क)
त्रिभुवननाथ सडकपर खडा हाय ! हाय !' कर रहा था ।
उसकी दशा अत्यधिक दीन थी । बूढा, कम्पायमान, दृष्टिहीन,
डगमग-डगमग पॉव, रक्तहीन, बहुत फटे-पुराने वस्त्र ।
'हाय कपड़ा! हाय कपड़ा !'
मगर किसीको क्या?
उसकी बड़ी चिल्लाहट थी। मैने अपना दफ्तरका काम बंद
कर दिया । उसे अपने पास बुलवाया, उसे बहुत ही सत्कार, प्रेम,
आत्मीयताके साथ कुर्सीपर बैठाया । उसके नेत्रोंका जल रुक गया ।
मैने उससे मिष्ट भाषण किया ।
एक 'दुअन्नी' मात्र मैने 'उसको' दी । अहा ! न तो उसकी'
गद्गदताकी ही कुछ सीमा रही और न उसके आशीर्वादोकी
बौछारकी। उसीको नमस्कार ।
(ख)
यह मेरे जीवनका सबसे खास दिन था। उस दिन उनने'
मुझे निहार कर दिया।
एक आदरणीय पन्यु सम्पादकके नाम आये हुए पत्र ।
-सम्पादक

७८
पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
कुष्ठसे गलित वह बंद कोठरीमें पड़ा या । सटी-पेशाव तर
वहीं । दुर्गन्ध आर थी, मगर मैं उसे सुगन्ध मानता हूँ । उसने
मुझे खयं आवाज देकर बुलाया- 'मुझे जल ला दोगे !'
मै
सन्न रह गया ! 'यह त्रिलोकीनाय अखिलेश्वर है ! मेरी
परीक्षा ले रहा है।'-मैने अपनेसे कहा।
वह बहुत ही कराह रहा था, जिस चारपाई पर वह पड़ा था,
उससे अधिक खराव चारपाई संसारनें न होगी।
मैने सद्भावपूर्वक सावधानीसे उसकी आज्ञा पालन किया
कुल एक लोटा जल बाहर नलसे भरकर ला दिया। उसका टूटा
फूटा लोटा बहुत ही दयनीय दशामें था। उस रोज 'यह' बहुर
उपकृत हुआ । बहुत आशीर्वाद देता रह गया !
(ग)
कल 'वह' चोरी करते पकड़ा गया और वह भी एक लड्डू-
की ! लड्डु के-आटे और गुड़का ।
'वह' बहुत शर्माया और पानी-पानी हो गया ।
हमलोगोने कुछ भी बुरा न नाना ! द्वापरमें 'वह' नावनचोर
था, अब लड्डू चुराता है, तो नयी बात क्या हुई ?
यह उत्त'की रिपोर्ट है। xxx हनें आप यह समझाइये
कि ऐसी दशाने हम उसे आपका प्रणान कैसे निवेदन किया करें।

भगवदर्शन
(घ)
परसो मैने 'उस'का पक्ष लिया और विपक्षियोके प्रति कड़े
शब्दोका प्रयोग किया ।
'वह' बुरी तरह हाँफ रहा था और उसपर मार पड़ रही थी।
उसे ऊपर चढ़नेके लिये बाध्य किया जा रहा था । 'वह' लाचार
था, क्योकि जिस गाड़ीमें 'वह' जुता था, उसपर गन्नेका वे-तोल
बोझ लदा था । हाय ! उस समय 'वह' एक मूक वेवस भैसेके
रूपमें था।
"मैने क्रोधका प्रयोग किया । 'यदि' इसके जिहा होती तो
'यह' तुम्हारे खिलाफ वाणीका प्रयोग करता, यह तुमपर अदालतमें
दावा करता और तुम्हे सजा भोगनी पड़ती ! तुम अन्यायपर
तुले हो ! तुमने दयाको तिलाञ्जलि दे दी है । भगवान्का खौफ
करो।"...मैने उसे पीटनेवालोको चेतावनी दी । वे लोग शर्माये
और हँसे भी । उन्होने अपनी गलती मान ली और उसे पीटना
चंद कर दिया। वह अब स्वयं ही चीर लगाकर ऊपर चढ़ रहा
या। वह मुझे आशीर्वाद देता हुआ प्रतीत होता था। 'उन'को
नमस्कार ! उसकी जय।
मैने उन लोगोसे फिर कहा-- ज्यादा बोझ मत लादा करो।
रहम किया करो, जरा शर्म किया करो ।' उन लोगोने स्वीकार
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फिजूलखर्चीका परिणाम कुछ समय पहले मै न.गपुर गया था। वहाँ मैं एक गुजराती लॉजमें ठहरा । इस लॉजमें बम्बईकी एक कम्पनी में सेल्समैनके पर काम करनेवाले एक भाई ठहरे हुए थे। बम्बईके सेल्समैन श्री- धीरूभाईने जो अपने अनुभवकी बात बतायी, वह बहुत उपयोगी जान पड़ती है। 'पिताजी बचपनमें ही स्वर्गवासी हो गये थे। इससे घरकी सारी जिम्मेवारी मुझपर आ पड़ी थी। उस समय मेरी उम्र सत्रह वर्षकी थी। मेरे मामाका घरका कारखाना था, इससे मुझे नौकरी देनेके लिये मैंने उनसे कहा, पर उन्होने अभी छोटी उन्न है, कहकर मुझे नहीं रखा । फिर बम्बईमें एक सेल्समैनके पदपर नियुक्त हुआ । इसलिये मुझे हरेक बड़े शहरमें जाना पड़ता। अपने एक दूसरे भाई भी बम्बईकी एक प्रसिद्ध कम्पनीमें नौकरी करते थे। उन्हे मासिक ५५०) ( पाँच सौ पचास ) रुपये वेतन ed था, इसके अतिरिक्त उन्हे प्रतिदिन १८) ( अठारह ) रुपये भत्ता मिलता था। एक बार मै कम्पनीके कामसे दिल्ली गया था। वहाँ वे भाई भी आये हुए । मै तो दैनिक १) (एक) रुपया किरायेके कमरेमें ठहरा था; परंतु उन्होने पाँच रुपये रोजके भाडेका कमरा ले रखा था । दोनो गुजराती होनेके कारण हम लोगोंमें बड़ा मेलजोल हो गया। परंतु उनको नव मै पसे उडाते देखता, तब मुझे बड़ा ही दुःख होता । दिल्ली में उन्होंने मुझसे कहा-'चलो, होटलमें नाश्ता कर आयें ? मैं कपड़े पहनकर तैयार फिजूलखर्चीका परिणाम हो गया, तब उन भाईने मुझसे कहा-'इस तरहके कपड़े पहनने- वालोंको होटलमें घुसने नहीं दिया जाता। उस होटलमें जानेके लिये अच्छी-से-अच्छी पोशाक चाहिये ।' मैंने कहा-'इससे अच्छे कपड़े मेरे पास नहीं हैं।' तब उन्होंने मुझे अपने अच्छे कपड़े पहनाये और नेकटाई गलेमें बॉधी। हम दोनों 'अपटूडेट' होकर होटलमें पहुँचे । मैंने अपने जीवनमें कभी न देखी हुई व्यवस्था वहाँ देखी । वहाँ हमलोगोंने आइसक्रीम, चाय आदि खाने-पीनेके साथ ही नाश्ता भी किया। एकाध घंटा वहाँ बीता । फिर होटलका बिल आया । हाथमें लेकर मैंने देखा साढ़े सत्रह रुपयेका बिल था। मैने तुरंत ही बिल उन भाईको दे दिया । मेरी जेबमें तो शायद इतने पैसे भी नहीं थे। उन भाईने बिलके साथ ही डेढ रुपया नौकरको इनाम दिया। इस प्रकार उन्होने उन्नीस रुपये चुकाये । तदनन्तर हमलोग अपने कमरोंमें वापस आ गये। ! इस बातको छः-सात महीने बीते होंगे। मै घूमता-धामता कलकत्ते पहुंचा और वहाँ 'गुजराती समाज' के मकानमें गया । वहाँ मैंने उन भाईको देखा । पर यह क्या ? क्या ये वे ही भाई हैं जो मुझे दिल्लीमें मिले थे ! मनमें शंका हुई । ऑखोंने बार-बार सावधानीसे देखकर निश्चय किया कि 'हैं तो वे ही' । अन्तर इतना था कि आज न तो उस दिन सरीखे कपड़े थे, न सिरमें तेल ही था । आँखोंमें उस दिनकी मादकताके स्थानपर दरिद्रता भरी थी। गोरे मुखपर श्यामता छा रही थी। मैंने पूछा- क्यों भाई ! यो निस्तेज से कैसे

N
८२.
पढ़ो समझ और करो, भाग ६
हो रहे हैं ? प्रथम श्रेणीके लाजमें फर्स्टक्लास किरायेके कमरेमें
उतरनेवाले आप यहाँ कसे पड़े हुए हैं !
उन्होंने धीरेसे कहा-'भाई ! वह नौकरी छूट गयी ! आ मैं
बेकार हूँ। कहीं भी काम नहीं मिलता।'
मैने कहा---'आप इस समय दुखी हैं, इसलिये मेरा आपसे
कुछ कहना उचित तो नहीं है, तो भी मै कहता हूँ कि उस
नौकरीके समय आपकी आमदनी एक हजार रुपये मासिक थी।
उस समय आपने आधे रुपये
बचाये होते तो भी आज आप
२५००० ) ( पचीस हजार ) रुपयेकी बचत कर सकते और उन
रुपयोंसे आज चाहे जैसा रोजगार कर सकते तथा इस वेहाल
परिस्थितिसे बच जाते
उन्होने कहा-'अब तो जो होना था सो हो चुका । इस समय
तो आप मुझे पचास रुपये उधार दीजिये।'
मेरे पास केवल पैंतीस रुपये थे और मुझे पटने जाना था।
सलिये मै उनको उनमेंसे केवल पाँच रुपये दे सका और वहॉसे
चल पड़ा । एकाध महीने बाद मुझे समाचार मिला कि उन भाईने
जगत्से ऊनकर आत्महत्या कर ली।
उन भाईकी यह बात सुनकर मेरे मनमें आया कि समाजका
अधिकांश आज भोगविलासकी अंधेरी गुफासे बाहर निकटनेके
बहले अधिक-से-अधिक नीचे गहराईमें उतरता जा रहा है।'
जयन्तीलाल लवनी भाई पुजारा

देवीकी कृपा सन् १९४२ के जूनकी बात है। उस वर्ष अन्य वर्षोंकी अपेक्षा काशीका तापमान अधिक था। प्रातःकाल ८ बजेसे ही 'लू' अपना प्रभाव दिखाने लग जाती थी। काशी-निव.सो 'लू' की गरम हवाके झोकोसे परेशान थे। बहुत-से लोग तो लूके कारण मृत्युके शिकार भी बन चुके थे। उस भयंकर गरमीके सनय मेरे ज्येष्ठ पुत्र नरेशको, जो उस समय दो वर्षका या, बुखार आने लगा । बुखारके कारण अब वह चिड़चिड़ा-सा रहने लगा। उसके स्वाभाविक मनो- हारी 'हास्य' के स्थानको 'रुदन' ने ले लिया था। उसके लिये माता या गौका दूध भी पीना मुश्किल हो गया था। उसका शरीर दिन- अनुदिन जर्जरीभूत होने लगा । बालककी नन्ही-सी अवस्था और उसके तरुण क्लेशको देखकर मेरा चित्त डॉवाडोल और अशान्त रहने लगा। मैं खिन्नमनस्क होकर काशीके सुप्रसिद्ध डाक्टर सत्येन्द्रनाथ मुक के पास रुग्ण बालकको लेकर गया । डाक्टर साहबने बालकको देखकर दवाकी व्यवस्था कर दी। कई दिनोतक इलाज चलता रहा, परतु लाभके बदले उत्तरोत्तर रोग बढ़ता ही गया। वाटक अत्यधिक कमजोर होता जा रहा था। उसी समय वालकके दाहिने हाथमें एक फोड़ा नी हो गया । स्वरकी वेदनासे तो बालक अस्त था ही, अब रही-सही कमीकी पूर्ति फोडेने कर दी । अब पदो, समझो और करो, भाग ६ बालक अधिक विचलित हो गया । बालककी स्थिति देखकर मेरी बुद्धि बेकाम हो गयी थी। मेरे मस्तिष्कमें बार-बार विभिन्न प्रकारके विचारोंके तूफान उठते थे और ये कुछ देर बाद स्वतः विलीन हो जाते थे। उस समय मुझे अपने शरीरतककी सुध न थी। मुझे किसीसे बोलना-चालना भी एक प्रकारका बोझ प्रतीत होता या, किसी भी काममें चित्त नही लगता था। खाना-पीनातक अव्यवस्थित हो गया था। निद्रा-देवी तो मानो उस समय मुझसे रूठकर कुछ दिनोंके लिये कहीं अन्यत्र चली गयी थीं। एक दिन बालकको अकस्मात् रह-रहकर दस्त आने लगे। अधिक दस्त होनेके कारण बालककी अवस्था विशेष चिन्तनीय हो गयी । यहाँतक कि वह अपनी मातातकको पहचाननेमें असमर्थ हो गया और उसके श्वास आदिकी प्रक्रियाएँ भी अब विरूपतामें परिवर्तित हो गयीं । ऐसी स्थिति देखकर परिवारके सभी सदस्य घबरा गये। मैं मियॉकी दौड़ मस्जिदतक'के अनुसार पुनः डाक्टर मुकनकि यहाँ उन्हें बुलानेके लिये गया । डाक्टर साहब उस समय अपने रोगियोंसे घिरे होनेके कारण विशेष व्यस्त और व्यग्र थे । मुझे उस समय एक-एक क्षण पहाड़-सा प्रतीत हो रहा था । मैं होश-हवाशमें न था । यह नहीं पता था कि मैं कहाँ खड़ा हूं, क्यों खा और किससे बात कर रहा हूँ। किसी प्रकार अपने-आपको सँभाल- कर मैंने डाक्टर साहबसे बालककी चिन्तनीय स्थिति सुनायी और तत्क्षण उन्हें अपने घर चलनेके लिये कहा । डाक्टर साहब तुरंत मेरे साथ घर आ गये। बालकको देखकर उन्होंने कहा-आप - देवीकी कृपा वबराये नहीं, बच्चेको 'टायफाइड' है, शीघ्र ही ठीक हो जायगा ।' डाक्टर साहबके ऐसा कहनेसे मुझे कुछ संतोष मिला । मैं बड़े धैर्य और विश्वासके साथ मनोयोगपूर्वक डाक्टर साहबकी दवा कर रहा था ! परंतु दुर्भाग्यवश बालकको कुछ भी लाभ प्रतीत नहीं हो रहा था । बालककी नाजुक स्थिति देखकर घरके सभी सदस्योंकी राय हुई कि अब किसी दूसरे डाक्टरका इलाज किया जाय। किंतु मै घरवालोके इस विचारसे विरुद्ध था। मेरी इस सम्बन्धमें सदासे यह धारणा रही है कि रोगीकी चिकित्सा अच्छे-से-अच्छे एक ही डाक्टरकी की जाय । हॉ, बीच-नीचमें अन्य डाक्टरोका परामर्श भी ले लिया जाय । मैने अपनी विचारधाराके अनुसार मुख्य चिकित्सक डा० मुकर को ही रखा, किंतु विचार-विमर्शके लिये अन्य कई डाक्टरोंको भी बुलाया । सभी डाक्टरोंने डा० मुकर्जीकी दी जानेवाली दवाकी पुष्टि की। तदनुसार डा० मुकर्जीकी दवा निरन्तर चालू रही। परंतु बालककी हालत उत्तरोत्तर बिगड़ती ही जा रही थी। अब सब लोगोंको विश्वास हो गया कि यह बालक अत्र चंद घंटोका ही मेहमान है।' बालकके विषयमें सभी लोगोंकी यह धारणा देख मेरा रहा-सहा धैर्य टूटना जा रहा था। बालककी माताकी स्थिति तो अवर्णनीय थी। वह तो लगभग दो सप्ताहसे खाना-पीना और निद्रातकको भूल चुकी थी। मै दवासे निराश हो गया। उसे बंद कर केवल भगवान्की शरण ली । भगवत्कृपासे अकस्मात् मुझे अपनी 'कुलदेवी- * देवीकी स्थापना तथा मन्दिर कितने रुव दनवाया, इसका यथार्य पता नहीं है। इनके सम्बन्धमे दो किंवदन्तियाँ नुनी जाती है। कुछ लोगोंका ८६ पढ़ो, समझो और करो: भाग ६ का स्मरण हो आया, जिनकी मान्यतासे हमारे परिवारका सर्वदासे कल्याण होता चला आ रहा है। इनका प्राचीन भव्य मन्दिर नि० रोहतक ( हरियाना ) के सुप्रसिद्ध कवा 'वेरी' में है। वहाँ देवी अपने भक्तोकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाली मानो जाती हैं। इन देवीका विशाल मेला चैत्र और आश्विन-इन दोनो नवरात्रोंमें लगता है, जिनमें बम्बई, कलकत्ता आदि सुदूर स्थानोंसे बड़े-बडे सेठ-साहूकार भी अधिक संख्यामें उपस्थित होते हैं । इन्ही देवीके धाममें जाकर उनकी विधिपूर्वक पूजा करके उनके समक्ष हमारे परिवारके सभी बालकोंके 'मुण्डन-संस्कार' करानेकी प्रथा हमारे वंशमें सदासे चली आ रही है। इधर कुछ समयसे हमलोगोंके यहाँ अपनी 'कुलदेवी' के यहाँ जाकर बालकोंका 'मुण्डन-संस्कार' करना बन्द हो गया था। मैने अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिसे अपनी 'कुलदेवी'की शरण ली और मनौती मानी कि "मैं अपने बालकके अच्छा होनेपर अवश्य ही सपत्नीक बालकको आपके वाममें ले जाकर यथासमय इसका 'मुण्डन-संस्कार करा दूंगा।" साथ ही मैंने दूसरी मनौती प्रत्यक्ष-सिद्धिदात्री श्रीविन्ध्यवासिनी देवीकी, जो कहना है कि इन देवीकी स्थापना महर्षि दुर्वासाने की यी और कुछ लोगोका कथन है कि इन देवीकी स्थापना पाण्डव-कुलभूषण भीमने की थी, इसलिये इनका नाम भीमादेवी पडा-- भीमा देवोति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ।। (दुर्गासप्तशती ११ । ५२) इन देवीके सम्बन्धमे 'कल्याण के विरोपाइ शक्ति- (पृष्ठ ६८४ ) में भी लिखा गया है।

देवीकी कृपा जि० मिजापुर (उ० प्र० ) में हैं, मानी कि 'बालकके अच्छा होने- पर बालकके सहित सपत्नीक आपके दर्शन करूंगा।' इस प्रकार उपर्युक्त सद्यः सिद्धिको देनेवाली दोनों देवियो ( मूर्तियो ) की मनौती माननेके कुछ ही देर बाद एकाएक मैने अपने बालकमें अद्भुत परिवर्तन देखा। वह अब कुछ-कुछ चैतन्यावस्थामें हो आया। शनैः-शनः अपनी माताको पहचानने लगा तथा उसका दुग्ध-पान भी करने लगा। ज्वर कम हो गया और उसका फोड़ा भी फट गया। अब वह विशेप प्रफुल्लित दीख पड़ा । बालकमें आश्चर्यजनक लाभको देखकर मेरे हर्षका ठिकाना न रहा। मै अपनी 'कुलदेवी' और 'श्रीविन्ध्यवासिनी देवी' की अपूर्व चमत्कार- पूर्ण दैवी शक्तिपर मुग्ध हो गया और मेरी उसी दिनसे इन दोनों देवियोपर अटूट श्रद्धा हो गयी। अब केवल बालककी कमजोरी शेष रह गयी थी। दोनों देवियोंके नामोच्चारणपूर्वक प्रसादरूपमें दिया हुआ जल एवं दुग्ध अब बालकके लिये अमृतरूपमें काम करने लगा, जिससे बालक चन्द्रकनकी तरह दिनोदिन स्वस्थताकी ओर प्रवृत्त हो गया, इस प्रकार कुछ ही दिनोमें वह पूर्ण स्वस्थ हो गया । इस अद्भुत प्रत्यक्ष देवी शक्तिको देखकर मेरा सर्वदाके लिये दृढ विश्वास हो गमा है कि-'जो मनुष्य श्रद्धा एव विश्वासपूर्वक देवी-देवताओकी शरण स्वीकार करते हैं, वे अवश्य ही समस्त प्रकारके कष्टोसे मुक्त होकर मानन्दरूपी समुद्रमें गोते लगाते हैं।' - वेणाराम शर्मा गौड, वेदाचार्य दयालु भाभी प्रयागके गत कुम्भमेलेकी बात है-हमलोग जहाँ ठहरे थे, वहाँ उसके बगल में ही एक सज्जन ठहरे थे। उनके साथ उनका दूर सम्पर्कका एक चचेरा भाई तथा एक नौकर था । दो-चार दिन बाद ही उनकी धर्मपत्नी कलकत्तेसे घर जाती हुई कुम्भ-स्नानके लिये पतिके पास आकर ठहर गयी। उसके साथ उसका एक छोटा बच्चा था । वह घर जा रही थी, इससे उसके पास लगभग दस हजारका गहना था, जो एक पीतलके डिब्बेमें बन्द था और वह डिब्बा ट्रॅकमें रखा था। ये बातें मुझको पीछे मालूम हुई । टना ऐसी हुई कि तीन-चार दिनके बाद ही वह गहनेका डिब्बा चोरी हो गया । ट्रंकका ताला ज्यों-का-रयों था। किसीने दूसरी चारी लगाकर ट्रंकसे गहनेका डिब्बा निकाल लिया था। नौकरसे पछा गया, आसपास खोज हुई; पर कही पता नहीं चला। वेचारे दम्पति सिर पीटकर रह गये। कुछ दिनों बाद गहने वेचते हुए कानपुरमें एक आदमी देखा गया। उसपर संदेह हुआ। उससे कुछ भले लोगोंने पूछा, पकड़ानेकी धमकी दी। उसने बतलाया कि मैने तो यह गहना प्रयागमें एक सज्जनसे दो हजार में खरीदा था। खक की गयी पता लगा कि वह चचेरा भाई ही चोर था । भाईको बहुत

दयालु
भाभी
८९
गुस्सा आया । उसने पुलिसमें रिपोर्ट करके चचेरे भाईको पकड़कना
चाहा । पर उनकी पत्नीने रोक दिया और चचेरे भाईको बुलाकर
पुछनेके लिये कहा । उसे बुलाया गया । वह आकर फट-घटकर
रोने लगा । उसने नम्रतासे स्वीकार किया कि 'चोरी मैंने की है
लड़कीके विवाहमें दस हजार रुपये लगे थे, उसमेंके साढे चार
हजार रुपये अभी देने थे। एकका बड़ा तकाजा था, उसके यहाँ
दूसरी लड़कीका कुछ जेवर बंधक रखा था। रुपयेवालेका
तकाजा था तथा लडकीके ससुरालवाले लड़कीको लेने आ गये थे,
उसका गहना देना आवश्यक था, इसलिये मैने गहना चुरा लिया।
गहना कितना या-मैंने देखा ही नहीं । मुझे तो रुपयेकी
आवश्यकता थी, अतः मैने उसी दिन दो हजारमें उसे वेचकर
रुपये महाजनको मेज दिये । अब आप जैसा उचित समझे करें।"
यह सब सुनकर दयामयी उसकी भाभीका हृदय पिघल गया।
उसने पतिको समझा-बुझाकर राजी किया । दो हजारमें गहना
खरीदनेवालेको बुलाया गया । वह भला आदमी या तथा पुलिसद्वारा
पकड़े जानेसे डर भी रहा था। उसने दो हजार रुपये तथा उनका
उचित व्याज लेकर गहना लौटा दिया । उन सजनने पत्नीके
करनेवे अनुसार ढाई हजार रुपये और नी चुकाकर चचेरे भाईको
मण-मक्त करा दिया और उसे अपनी फर्ममें
भी कर दिया। उसने रोम-रोमसे आशी

आदर्श मित्र पुनीत वाराणसी-वासी 'दूजो हरिचन्द' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, खङ्गविलास-प्रेसके संस्थापक, रेपुरानिवासी बाबू श्रीरामदीनसिंहजीके परम मित्र थे । भारतेन्दुजी बड़े उदार थे । उनका सदा ही मुक्तहस्त रहता था । इसमें उनकी सारी सम्पत्ति समाप्त हो गयी, बल्कि डेढ़ लाख रुपयोका ऋण एक सज्जनका रह गया, निसनी चर्चा उन्होंने अपने भाई-भतीजों या दौहित्रसे भी नहीं की थी।

आदर्श मित्र
एक दिन उन्होने अपने अभिन्न मित्र बाबू रामदीनसिंहको
बुलाकर उनसे और सारी बातें बतायी और कहा कि जिनके रुपये
हैं, वे सज्जन कभी मुझसे मॉगने नहीं आये । इस कारण मुझे इस
ऋणके न चुकानेका और भी बड़ा दुःख है ।'
भारतेन्दुके फक्कड़ स्वभावसे परिचित, बाबूसाहबने तुरंत
कहा---'अच्छा, तो यह ऋण चुकाना मेरे जिम्मे रहा । आप इसकी
तनिक भी चिन्ता न करें । इस ओरसे बिलकुल निश्चिन्त रहकर
भगवस्मरण करें।
बाबू रामदीनसिंहकी डेढ़ लाख रुपयेका ऋण चुका देनेकी
बात सुनकर लाखोंकी सम्पत्ति लुटा देनेवाले भारतेन्दुके नेत्र
अश्रुपूर्ण हो गये । इसी दशामें उन्होंने कागजका एक टुकड़ा बाबू
रामदीनसिंहके हायोमें दिया, जिसपर लिखा था--
'मेरी सारी पुस्तको ( १७५ ) के प्रकाशनका सर्वाधिकार
खगविलास प्रेसको ही है।
बाबू रामदीनसिंहने उसे पड़ा और तुरन्त फाड़कर उन्हींके
सामने फेंक दिया और कहा—'यह तो मित्रता निभाना नहीं
हुआ, व्यापार हुआ।
ये दोनों आदर्श मित्र धन्य थे !
पद्मन्पण' आचार्य श्रीशिवपूजनसहायके कथनके आवारपर)

. मनके अमीर चपरासी जिस दिनों १९४७ ई० से १९५० तक---मैं शिक्षा-विभागमें सहायक उपनिरीक्षक पदपर बलिया जिलेमें ही काम करत था, कुछ हिंदू चपरासियोके बाद मुझे एक मुस्लिम चपरासी श्रीअब्दुल रहमान मिले, जो ठाट-बाटमें मुझसे भी बड़कर रहते थे । उन्हे देखकर अपरिचित अध्यापक भ्रममें पड़ जाते थे । मुसलमान सब डिप्टी इन्सपेक्टरोंसे उनकी पटरी नहीं बैठती थी, पर न जाने क्यो मेग जतातक उठाकर सुरक्षित स्थानमें रख देनेने उन्हे संकोच नहीं था। लड़कोंद्वारा साबुन लगानेमें भूल होनेपर वे मेरे कपड़े भी स्वयं साफ कर देते थे । मैं स्वयं तथा मेरे कुछ साथी इन्हें पहले बड़ा घमण्डी समझते थे, परन्तु सम्पर्क में आनेपर हमलोगोंके विचार बदल गये । वे अविवाहित थे । गोलभेज- सम्मेलनके समय किसी अंग्रेज अधिकारीक साथ लन्दन भी में आये थे।

मनके अमीर चपरासी ९३ । निरीक्षण-कालके दौरेमें नदी पार करनेपर मल्लाहको पैसे अवश्य देते थे, ठीकेदारको भले ही न दें। अनेक बार ऐसा देखने- पर मैने इसका कारण पूछा-तो कहा, 'मल्लाह गरीब आदमी है, ठीकेदार मालदार है ।' मेरी विस्मृतिका रुपया भी उनके पाससे पुरा लौटता है। बलिया स्टेशनपर सम्पन्न धरानेका एक लड़का नैजिस्ट्रेटी चेकिंगमें पकड़ लिया गया । उन दिनोंके मजिस्ट्रेट छात्रोपर १०१) अर्थ-दण्ड करते थे । लड़केके रोने-गिड़गिड़ानेका कुछ भी प्रभाव उनपर नहीं पड़ा। हुक्म हुआ 'तुरंत रुपया दो या जेल जाओ ।' स्टेशनपर सैकड़ोकी भीड़ थी। लड़का छुटकारा पाते ही तुरंत रुपये मेंगा देनेकी बात कहता था, पर किसीके कानपर जूं न रेंगी। हमारे उक्त चपरासीने साहबसे कहा-'साहब ! हमसे रुपये ले लीजिये और लड़केको छोड़ दीजिये ।' साहबने कहा-'तुम इसे पहचानते हो ? चपरासीका उत्तर या-'नहीं' इसपर साहबने कहा--'तो क्यों रुपये चुकाते हो ! वापस नहीं मिलेंगे।' श्रीरहमानका उत्तर' या, 'कोई चिन्ता नहीं ।' रुपये देकर ज्यो-ही लड़का छुड़ाया गया, त्यो-ही घरवाले आ गये । रहमानको रूपये मिल गये, परंतु सब लोग उस गरीब, परतु मनके अमीर चपरासी- को मानवताको देखकर दग रह गये । अब्दुल रहमान, अब भी बलिया-शिक्षा-विभागमें चपरासी-पदकी मर्यादा वढा रहे है ।' -~-अभ्यापफ शिवप्रसाद सिंह . सुन्दर अन्त प्रायः लोग संशय किया करते हैं कि मरनेके समय कर्मानुसार पार्षद, धर्मराजके दूत या यमदूत प्राणोंको लेने आते हैं या नहीं और अजामिलकी कथाको पौराणिक गल्प बता देते हैं। नीचे दिखे मेरे प्रत्यक्ष अनुभवसे मुझे तो पूर्ण विश्वास हो गया है कि अवश्य कर्मानुसार दूत आते है। सं० २००१ के मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमीकी रातकी घटना लिखता हूँ । महाराज बुद्धसिंहजी बीमार थे । उन्हें Carbia Asthma यानी हृदयरोगसे दमा और बुखार या। शुरू कार्तिकमें वे बीमार हुए थे, परंतु किशनगढमें डाक्टर-हकीमोके इलाजसे कोई फायदा नहीं हुआ । मुझे समाचार मिलनेपर मै किशनगढ़ ग्या और उन्हें डा० हैलिग ( जर्मन हृदय-विशेषज्ञ ) का इलाज कराने जयपुर ले आया । डाक्टरने देखकर कहा कि मेरा इलाज आन ही शुरू कर दो तो आठ दिनोंमें काफी ठीक हो जायगे।' परंतु ९५ सुन्दर अन्त भावी प्रबल है । उनके घरवालोंको यह अँची कि वैद्यका ही इलाज कराया जाय । मैंने भी सोचा कि 'भावी तो टलेगी नहीं, जिस समय जो होना है, होगा ही, उसे एक सेकेंड भी कोई टाल नहीं सकता ।' जयपुरके एक प्रसिद्ध वैद्यका इलाज चला। बीमारी उत्तरोत्तर बढ़ने लगी । तीन दिन बाद फिर डाक्टर हैलिगको बुलाया तो उसने कह दिया कि अब इलाज नहीं हो सकता । वैद्यजीकी चिकित्सा चलती रही । मार्गशीर्ष शुक्ला ५ को वैद्यने भी जवाब दे दिया और डाक्टरने भी कहा कि आजकी रात नहीं निकलेगी । रात होनेपर उनके बडे लडके मा० सरदारतिहजीको जो साथ थे, मैने सो जानेको कह दिया और मै उनके पास बैठ गया । श्वासकी गति बहुत मंद हो गयी थी और वे अचेत अवस्थाकी तरह सो रहे थे । रातके बारह बजे करीव कुछ वचपनकी बातें याद आनेसे तन्द्रामें ही बचपनके साथी बालकोके नाम लेकर, जैसे बचपनमें किया करते होगे, खेल-कूदकी बातें करने लगे। मैने यह समझकर कि इनके प्रयाणका समय आ रहा है और अन्त मता सो मता' उन्हें जगाया । चेतनावस्थामें आनेपर मैने उनसे कहा- 'महाराज साहब ! इस समय और सब ध्यान हटाओ, 'श्रीनाथजी' 'श्रीनाथजी' कहो ।' उनके इष्टदेव या कुलदेव श्रीनाय नी थे, जैसा कि किशनगढ़ राजघरानेमें हैं। उन्होंने आँखें खोलकर मुझे देखा और 'श्रीजी-श्रीजी' चार-पाँच दफा बोलकर रह गये । पलँगके पास बॉयी ओर बैठा उन्हें देखता रहा । अन्तिम श्वास ये। किसी भी समय हिचकी आने या प्राण जानेके लक्षणोकी ? ? ९६ पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ सम्भावना देख रहा था । चार बजे सुबह उन्होंने फिर आँख खोली और सिर धुमाकर बायीं और दायी तरफ देखा और बोले 'थे कुण हो, ये कुण हो । पीताम्बर पहरय्याँ हो, तिलक लगान हो । ब्राह्मण हो ? मनै लेबा आया हो ! चाल हूं भाई, चाल है। ( आप कोन है ! आप कौन हैं ? पीताम्बर पहने हैं, तिलक लगाये हैं । ब्राह्मण हैं ! मुझे लेने आये हैं ! चलता हूँ भाई, चलता हूँ !) इतना कहकर हमेशाके लिये ऑखें बंद कर ली। मुझसे उनका बड़ा प्रेम था । अतः उनकी मृत्युसे दुःख भी हुआ, परंतु यह सद्गति देखकर चित्तको सान्त्वना भी मिली । इस घटनासे मुझे यह विश्वास हो गया कि 'अन्त मता सो मता' और प्राणान्तके समय पार्षद, धर्मराजके दूत या यमदूत अपनी करनीके अनुसार अवश्य आते हैं। यह करनी एक दिन एक महीने नहीं, सारी आयु महाराज बुद्धसिंहजीकी तरह सरल चित्तसे उनका होकर रहे तभी सिद्ध होती है । नहीं तो, अन्त समयमें भगवान्का नाम मुंहसे निकलना कहाँ रखा है। जनम जनम मुनि जतन कराही । अंत राम कहि आम नाहीं ।' उन्हें अन्त समयमें डर न लगा, न वे घबराये, न चिल्लाये, न चीखे । शान्तिसे सोते रहे और जैसे गलाकी लहर शान्तिसे आकर विलीन होती है, यह जीवन समाप्त किया। बोलो, श्रीराधा- सर्वेश्वरकी जय! --तसिंह (मंडेला) स्नेहपूर्ण व्यवहार एक दिन में हरगॉवसे ट्रेनद्वारा सीतापुर जा रहा था । दोपहरके लगभग साडे बारह बजेका समय था । वर्षा ऋतु थी। जिस समय ट्रेन स्टेशनपर आयो, वर्षा हो रही थी। जिस डिब्बेमें चढ़ा था, उसमें कुछ सम्भ्रान्त घरानेकी लड़कियाँ बैठी यी । जैसे ही ट्रेन चली, उसी डिव्वेमें एक ग्रामीण ली भागते- भागते चढ़ी । उसकी गोदमें एक छोटा बालक था, जो वर्षासे बिलकुल भीग गया था। उसकी कमीज भीगी होनेके कारण उस स्त्रीने निकाल डाली थी। बालक ठंडसे कॉप रहा था और जोर- जोरसे से रहा था । ग्रामीण स्त्री चुपानेका प्रयत्न करने लगी और उसने उसको अपनी धोतीमें लपेटना चाहा; परंतु उसकी धोती भी सारी भीगी थी। अतः बालकको आराम न मिला। इतनेमें ही उन सम्भ्रान्त घरानेकी लडकियो से एकने अपने बक्समेंसे एक कुछ पुरानी धोती निकाली और उसमेंसे एक बड़ा टुकड़ा फाड़कर उस स्त्रीको दिया । पर वह स्त्री सकोचवश कपड़ेमें बालकको लपेटनेमें झिझकी । मैने तथा अन्य यात्रियोने उसे कपदा लपेटनेको कहा, इतनेमें उस लड़कीसे न रहा गया और वह वय वाटकके पास गयी और उसको गोदमें लेकर, कपड़ेसे पोंछकर उसमें पेट दिया। बालकने आराम पाकर रोना बद कर दिया । से बात है बहुत छोटी, परतु मेरा हृदय उब कुलकी लकीले उम प्रामीण बालकके प्रति स्ने पूर्ण व्यवहारसे दक्ति होगा। उ०प०७-८-- आदर्श ईमानदारी जामडोवा कोलियरीसे एक मीलकी दूरीपर इमरी न० ? कोलियरीके एक सज्जन श्रीअनूपसिंह नामक निवास करते अच्छे व्यापारी हैं। उनके यहाँ इमरी न० ७के रहनेवाले श्रीजग- नारायण उपाध्यायने चौदह हजार रुपये धरोहरके रुपमें रख दिये थे। इस बातका पता उन दो व्यक्तियोंके अतिरिक्त और किसी. को भी नहीं था । भावीवश श्रीजगनारायणजी उपाध्यायकी अकस्मात् मृत्यु हो गयी। तदनन्तर श्रीअनूपसिंहजीने उनके घर- वालोंको बुलाकर चौदह हजार रुपये उनको दे दिये । वे सभी दग रह गये। -~-पं० रामप्रताप मिश्र दरिद्रकी सेवा घटना अटीगढ़की है । सत्य कया है, कपोलकल्पित नहीं । एक विद्वान् पण्डितजीने मुझे बताया कि एक संध्याको वे अलीगढकी नगरीमें एक पानकी दुकानपर खड़े थे। एक हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मण उनके पास आया । पण्डितजीके सामने हाथ फैलाकर उस ब्राह्मणने कहा- 'चार पैसेका गुड़ दिला दीजिये ।। पण्डितजीको बुरा लगा । उन्हे विक्रमादित्य तथा कालिदास- की कथा याद आ गयी। विक्रमके दरबारमें नर-बलि करनेवाला एक राक्षस आया । उसने नर-बलिकी अनुमति चाही । भला, ऐसी आज्ञा कैसे मिल सकती थी ? उस राक्षसने कहा कि या तो अनुमति दो या मेरे प्रश्नका उत्तर दो'- 'नष्टस्य कान्या गतिः ?' 'जो नष्ट हो गया है उसकी और क्या गति होगी ?' इस टेढे प्रश्नका उत्तर देनेके लिये विक्रमने सात दिनका समय मांगा। यह भार कालिदासपर सौपा गया। सातवें दिन प्रातः- काल संध्यावन्दनके समय कालिदास एक भिखारीके वेपमें उस कर्मकाण्डी राक्षसके यहाँ पहुंचे और भिक्षा माँगी । राक्षसने पूजन- पाठके समय एक हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मणको भिना मॉगते देखकर उसे फटकारकर कहा- 'तुम्हे लज्जा नहीं आती कि इतने दृष्ट-पुष्ट ब्राह्मग होकर प्रातःपूजनके समय भीख माग रहे हो?' उस ब्राह्मणने कहा-

पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
'महाराज ! मै जुआ खेलता हूँ।'
'ब्राह्मण और जुआ। धिक्कार है तुमको।'
'जुआ खेलते-खेलते मैं मदिरापान करने लगा।
'हे भगवन् ! तुम्हारा इतना पतन ।'
'मदिरा पीनेसे वासनावृत्ति जागी । अतएव में वेश्यावृत्ति
करने लगा हूँ।
'उफ, तुम्हारे पतनकी सीमा नहीं है !!
वेश्यावृत्तिके लिये धनकी आवश्यकता होती है । अतएर मे
चोरी करने लगा।
'तो फिर तुम ब्राह्मणत्व बिलकुल खो बैठे ।'
'चोरी, वेश्यावृत्ति, मदिरा, जुआ---मैं दर-दरकी ठोकरें
खाने लगा।
'तब तुम भिखारी बन गये छिः।'
राक्षसने घृणापूर्वक कहा।
तब भिखारी ब्राह्मण बोला----
'नष्टस्य कान्या गतिः?
राक्षसको उसके प्रश्नका उत्तर मिट गया। मिस मग
इतना पतन होगा, जो एक कुमार्गपर चलेगा उसे अनगिनत
कुमार्गपर चलना पडेगा । वह नष्ट होकर रहेगा और उनको अल्म
गति क्या होगी। यह दर-दर की ठोकर खायगा ।
हमारे विद्वान् पण्डितजीने सोचा कि ऐसी ही कोई बात ।
ब्राह्मणके साथ भी होगी।

दरिद्रकी सेवा
उन्होने उस ब्राह्मणसे कहा-
'भाई ! तुम हृष्ट-पुष्ट हो, कोई कारोबार करो । भीख
मॉगना बड़ा भारी पाप है।'
भिखारीने पण्डितजीके नेत्रोमें नेत्र गड़ाकर एक क्षणके लिये
देखा । फिर दृढ स्वरसे बोला-'हो सके तो गुड़ दिला दीजिये।
नहीं तो, स्पष्ट उत्तर दीजिये । मै ऐसे उपदेश रोज सुनता हूँ।'
पण्डितजीको उसकी बातोंमें ऐसा लगा कि वह अपढ नहीं
है। उन्होने फिर कहा-
यदि स्वयं नहीं कमा सकते तो तुम्हारी सन्तान तुम्हारा
पालन-पोषण क्यो नहीं करती !
-
भिखारीने सौम्यभावसे कहा-
गये । बोलो, गुड़
'पत्नी, सन्तान सभी निकम्मे निकल
खिलाते हो या नहीं ?
अब हमारे विद्वान् मित्र उसकी स्थिर मुद्रासे इतने प्रभावित
हो चुके थे कि उन्होंने पैसे निकाले, गुड़ खरीदा । जबतक वह गुड़
खाकर पानी पीता रहा, वे उसकी ओर दखते रह । पानी पीकर
वह आश्वस्त हुआ । फिर उसने पण्डितजीसे कहा कि 'जरा दूर
मेरे साथ चलिये ।' पासमें ही एक उद्यान था। वहाँ पहुँचकर यह
भिखारी ब्राह्मण कुछ क्षण मौन रहा । फिर एकाएक उस आशु-काथि
पण्डित भिखारीने कहा-~-

१०२ पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ विद्या सत्कविता तथा सुजनता सेवापि च प्रार्थना पञ्चताः परिणिन्यिरे जनयितुं वित्तात्मजं यत्नतः । व्यापार सकलं विहाय नितरां तत्रैव रेमे नुतुः किं कुर्वे कुटिलाशयेन विधिना पञ्चापि वन्ध्याः कृताः ॥ 'उस ब्राह्मणने कहा कि मैने अपने जीवन में पॉच शिवाइ किये। विद्यासे मै पण्डित हो गया। कवितासे मैने अच्छी कविता करना सीख लिया । सुजनतासे मैं बड़ा अच्छा जीवन, सदाचारी जीवन बिताने लगा । सेवासे मैने नौकरी भी की। प्रार्थनासे मैने चाटु- कारिता तथा प्रार्थना भी काफो की । इन पाँचों लियोके साथ मैने सर काम छोड़कर दत्तचित्त हो रमण किया । पर अपने कुटिल नामको क्या कहूँ कि ये पाँचो लिया क्या निकलीं । इनसे कोई सन्तान नहीं हुई जो मेरा पोषण करती । यानी सब कुछ करके देख लिग, मेरा भाग्य ही साथ नहीं देता । अतएव भीख माँगता फिरता है।' प्रयत्न या परिश्रमसे बनकी प्राप्ति हो, ऐसा नहीं है ! भाग बड़ी भारी वस्तु है । इसके एक ही झटकेसे सब करे-बरेपर पानी फिर जाता है। मनुष्यके जीवन में भाग्य बड़ी भारी वस्तु है। दरिद्रता दुर्भाग्यके कारण होती है। अतएव भाग्यके लिये मायके खामी भगवान्को शरणमें जाना चाहिये । किंतु, धन उसीके पास आता है जो दूसरेके दुमोको समझता है, पहचानता है या जानता है । जिसके मनमें दमरेके दुर्भाग्यके प्रति कोई सहानुभूति नहीं, उसका जीवन अन्ततोगरा भाग्यशाली नहीं रह सकता । हमारे भाग्यका विद्याता ददि।

दरिद्रकी सेवा १०३ दूसरेकी दरिद्रता है। जो दरिद्र होता है, वह संसारको अधिक अच्छी तरहसे पहचानता है । वह संसारसे अधिक परिचित है। इसीलिये तो लिखा है- भो दारिद्रय नमस्तुभ्यं सिद्धोऽहं त्वत्प्रसादतः । पश्याम्यहं जगत्सर्व न मां पश्यति कश्चन ॥ 'हे दारिद्रयदेव ! तुमको नमस्कार । तुम्हारे प्रसादसे ही मै सिद्ध हो गया हूँ। मैं दरिद्र हूँ, मेरी ओर कोई नहीं देखता है, पर संसारभरकी ओर देख रहा हूँ।' एक दरिद्रको जब संसारमें जीवितोकी वस्तीमें कहीं सहारा नहीं मिला, तब वह मरनेवालोंके स्थानपर गया । वह श्मशान जा पहुँचा । वहाँ उसने देखा कि एक शव बड़े आरामसे लेटा है । विश्राम कर रहा है । उसकी यह शान्ति तथा सुख देखकर दरिद्रने उससे कहा--- उत्तिष्ठ क्षणमेकमुबह गुरुं दारिद्रयभारं सखे श्रान्तस्तावदहं चिरं मरणजं सेवे त्वदीयं सुखम् । इत्युक्तो धनवर्जितेन सहसा गत्वा श्मशानं शवो दारिद्रयान्मरणं वरं वरमिति सात्वैव तूष्णीं स्थितः ।। "हे सखे ! जरा एक क्षणके लिये उठकर मेरी दरिद्रताका बोझ संभाल लो । मै इसे ढोते-ढोते थक गया हूँ और तुम आरामसे सो रहे हो। श्मशानमें जब शवने दरिद्रकी यह बात सुनी तो उसने सोचा कि दरिद्रतासे कहीं अधिक अच्छा है मर जाना।' यह

पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
सोचकर व चुपचाप लेटा ही रहा। उसने दरिद्रकी प्रार्थना
कोई उत्तर ही नहीं दिया।"
जब दरिद्रता इतनी बुरी चीज है तथा दरिद्रका साबी गर्दा
भी नहीं है, तब हम अपने सीमित साधनोमें उसकी सहायता को
कर ही सकते हैं । भिखारी हमसे भीख नहीं मॉगने आता।
तो हमें सीख देने आता है कि 'दो, भाई ! दो। दान दो । ना
दोगे तो हमारे-जैसे हो जाओगे।'
याचन्ति शिक्षयन्ति गृहे गृहे।
देयं
देयं पुनर्देयं
न देयं
फलमीदृशम् ॥
इस संसारमें जो कुछ प्रकाश है व वनी तथा समृद्धिको
ज्योतिसे नहीं, पीड़ित तथा परित्यक्तकी ज्योतिसे है । गदि
अन्धकारसे प्रकाशमें आना है तो दरिद्रकी आत्माको पहनानना
भिक्षुका नैव
होगा।
4
क्या खबर सितम नवाज बेखबर जहानको ।
दिल जलोकी आहसे हो रही है रोशनी ॥
मृत्यु एक निश्चित सत्य है। अमीर हो या गरीब, मरना
सभीको है। यदि नरना निश्चित है तो फिर धनकी गठरी भी
क्या काम देगी। वन मंत्रय करनेवालेने यदि केवल उसका मना
किया और दूसरेकी सहायता नहीं की तो निश्चय ही मृगुके तमा
उसके प्राण बडे संकटमें रहेंगे।
पूछत पूत कपूत बाबू केतना कहा।
परे पोकरे न हाँ करे न ना करे ।
धन
मान

दरिद्रकी सेवा १०५ जीवनके उस पार धनका नहीं, निर्धन तथा परसेवापरायणका महत्त्व होता है । यही सद्गुरु हमें सिखाते हैं, अन्यथा उस पार क्या है, कोन जाने। उतते कोउ न आइआ जासे पूछू धाय । इतते सब कोई जात है भार लदाय लदाय ॥ उतते सतगुरु आइआ, जाकी बुधि है धीर । भवसागरके जीवको खेइ लगावे तीर ॥ बाबा कवीरकी यद् वाणी याद रखनी चाहिये । हमें दूसरेकी या अपनी दरिद्रतापर दया नहीं, संकोच करना चाहिये । उसे कर्म तया भाग्यका फेर, दोनों ही मानना होगा । भाग्य तथा कर्म सद्गुरुकी कृपा तथा उपदेशसे सुधरते हैं। पर, अपने सुधारक साथ दूसरेके सुधारकी बातें भी सोचनी चाहिये । मानव-जीवनका पहेलीको यदि सही ढंगसे सुलझाना है तो अपने तथा परायेके भाग्यको समान रूपसे सवारना होगा । केवल अपना-अपना करनेसे कुछ नहीं होता । जीवनमें साहसके साथ, श्रद्धाके साय, विश्वासके साथ, नगवान्में आस्था रखकर जो व्यक्ति जीवन मिताता है, उसीका जीवन सफल होता है, अन्यथा वाल्मीकि- रामायणके अनुसार- निरुत्साहस्य दीनस्य सर्वार्था व्यवसीदन्ति 'जो पुरुष निरुत्साह, दीन सन काम निगड़ जाते हैं और वे

लालबके बदले ईमानदारी
गत २३ जुलाईकी बात है, मै और मेरे पिताजी श्रीमती
पाण्डेयजी छपरासे आ रहे थे। छपरामें हमलोग श्री रत्० एन०
राजा एक्सपोर्टके यहाँ आ रहे । छपरामें नगवान बाजार
स्टेशनपर चढ़े । वहॉसे हमलोगोंको मोतीहारी आना था।
लोगोंके पास करीब छ: सौ रुपये थे, जिसमें सौ मेरे पास
पाँच सौ पिताजीके पास थे। पिताजीने उन रूपयोको अपनी
ऊपरवाली जेबमें रख लिया था। ट्रेनमें अधिक भीड़ होने के कारण
पिताजी ऊपरके पाटियेपर, जिसपर सामान रखा जाता है, वह
गये और बिस्तरा बिछाकर सो गये । उनके चढ़नेके समय ही हो
जेबसे निकलकर नीचे एक बंगाली महिला बैठी थी, उसके परोपर
गिर पड़े थे। उस समय तो उस महिलाने कुछ भी नहीं कहा,
किंतु जब गाड़ी मुजफ्फरपुरमें पहुँची और हमलोग अपने विस्तरोगों
सँभालकर चलने लगे, तब उस महिलाने पूछा कि 'आपका दुई
छूटा भी जा रहा क्या ?' पिताजीने देखा तो उनको कुल गाळून
नहीं हुआ। उसने नोटोका बंडल निकालकर दिया और नोट से
कब गिरे थे यह सुनाया। पिताजी बहुत प्रसन्न हुए और उन
देवीका परिचय प्राप्त कर हमलोग प्रसन्नतासे अपने घर लौटे।
उन देवीका नाम श्रीविमला कुमारी था। वे कलकत्तामें रहती है।
उनकी सदाशयता और महानताके हमलोग सदा कृतज्ञ हैं।
-रामदर्शन
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आत्मसंजीवनी दि० १९-३-६१ रविवारको प्रातः अपने ही विषहर जंगल डभौरा ( रीवॉ ) म० प्र० में चलते हुए कुटियासे लगभग सौ गज दूर पेड़के नीचे मुझे लकवा हो गया । एक घटेभरमें धीरे-धीरे होशमें ही पॉवसे सिरतक सारा दक्षिणाङ्ग गतिहीन-शून्य हो गया । मैं घबराया नहीं, संसार मिटटी और जीवन निःसार प्रतीत होने लगा, समझा कि देहत्याग होगा; क्योकि लकवासे ग्रस्त होकर वैज्ञानिक इलाजसे लोगोंको बरबाद और मरते देखा था, अतः स्वयं अस्पष्ट लाचार वाणी बोलते और कलम पकड़नेसे लाचार होकर दूसरेसे मायाफोड़ करते हुए करीब पचास पत्र मित्रों, स्नेहियों और पत्रकारोको लिखवा दिये । आधा अङ्ग बेकार जडवत् होनेसे मै सालभरके बालकसे भी गया-बीता था । लोग मुझे देखने आते, तेल-मालिश दवाकी राय देते, डॉक्टर अस्पतालकी बात करते।

१८८
पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
.-
क्या डाक्टर, अस्पतालके लोग रोगी नहीं होते, नहीं करते।
दुनियामें सचमुच रोगकी दवा होती तो लोग रोगी न होतो
और न मरते । दवा प्रायः अन्धविश्वास और अधिक रोगी बनाने
लिये धोखेका सौदा है
में उसी पेड़के नीचे, खुली वायु और धूपमें पड़ा रसा, भोजन
त्याग दिया, केवल गरम पानीके बाह्यान्तर प्रयोग करतः सा ।
रोगके आक्रमणकी क्रिया जड़ता तथा आमनिमित्ताने क्रमश:
अङ्गोमें स्पन्दनका अनुभव मैने दिन-रात करते हुए देखा है कि
शरीरमें आत्मा कैसे कार्य करता है । तुलसीदासजीने का है--
'कहिअत भिन्न न भिन्न
प्राचीन उपनिषत्कारोने कहा है-
यस्मिन् विज्ञाते सर्व विज्ञातं भवति ।
जिससे सब ज्ञात हो सके वही विज्ञान है।
सूर्य आत्मा जगतस्तस्युपश्च ॥
सूर्य स्थावर-जंगमका मूल है।
।
व आत्मसंजीवनी मेरे जीवनमें स्वयंसिद्ध प्रमाणित हुई। मैं
चार दिनमें स्पष्ट बोन्दते हुए, अब लिखता-पढ़ता चार दिनों में
चलने-फिरने लगा है। कल ही एक फलोग चला था । रोग मारा
शत्रु नहीं, वरं हमारे विकारके रूपमें हमारा विकिसक मित्र,
तन-मनका शोधक है । इतना ज्ञान और आमसुधार योग कर म
तो संसारमें रोग न हो। परंतु हानिकाने आत्मशोध न करने

आत्मसंजीवनी १०१ परमाणु और कीटाणुओंकी शोध करके वैज्ञानिक खेतीद्वारा संसारसे रोग-दुःख मिटानेके और उन्नतिके नामपर रोग बढ़ाये और विनाश- की स्थिति उत्पन्न कर दी। विज्ञानमें आत्मा नहीं, प्राण नहीं । वैतानिका बतावें कि दो नथुनोसे श्वास चलनेका रहस्य क्या है ? ओषधि कही जानेवाली वस्तुएँ जड़ और विपतुल्य है, उनमें जीवन नहीं । वोखेका सौदा है । लकवेसे अथवा अन्य रोगासे ग्रस्त लोगोको वेज्ञानिकोके आश्रममें चिकित्सा कराते देख लोगोको बरबाद होते मरते हुए मैने देखा है । आत्मज्ञान-आत्मशोधके विना विज्ञान भीका और नपुसक है । जो लोग इतर चिकित्सा-पद्धतियो- को अवैज्ञानिक करते हैं, प्रकृतिको शरीरका शत्रु कहते है, वे पहले अपनी वैज्ञानिकता सिद्ध करे । विज्ञानसे प्रकृति पैदा हुई या प्रकृतिमेसे विज्ञान पैदा हुई। आज बारह दिनमें, किसी विकृत ज्ञानकी ओषधि विना मै लकवासे मुक्त है, दूसरे लोग भी मुक्त हो सकते है । विज्ञानकी शरणमें गये हुए लोग बारह महीनेमें बहुत धन व्यय और लगातार अनेक विद्युत् और चमत्कारी प्रयोगसे अच्छे न होकर, बरबाद हुए । ईसामसीहने कहा है- अपग बने हैं Creator is He that is in you Than that which is in tue world. Neirer is lle, than your hands and ſeet इसको सिद्ध करो, यही जीवन है। वित्र

मंद करत सो करइ भलाई
लगभग चालीस सालकी बात है। रामतनु चाटुर्ये हाली
जिलेके एक छोटे-से गॉवमें रहते थे। उनके पिता पुरोहिती
काम करते थे। पर उनकी इच्छा लड़केको पड़ाकर उसे अधी
नौकरीमें लगा देनेकी होनेसे उन्होंने रामतनुको इंटेसकी परीक्षा
पास करवाकर कलकत्ते भेज दिया और वहाँ एक सरकारी महकमें
नौकर रखवा दिया। वे वहाँ पड़ते भी रहे। धीरे-धीरे ए० ए.
कर लिया । उन्नति करते-करते दो सौ रुपये महीनेपर १२,
सरकारी स्कूलमें हेडमास्टरी करने लगे। उस जमानेमें दो सौ रुपये
महीनेकी नौकरी बहुत बड़ी चीज थी। इससे रामतनु बाबुमा
गॉवमें गौरव बढ़ गया था। गॉवमें उनका एक पड़ोसी अपवाद
था। वह रामतनुकी इस उन्नति और गौरवसे बहुत जरता या
और समय-समयपर रान्तनुकी बदनामी करने, उनपर सन्न
लगाने तथा नुकसान पहुँचानेकी चेष्टा किया करता था ! समनत
तया उनकी ती दोनोके खनार बहुत अच्छे थे। अमिनन

मंद करत सो करइ भलाई, १२१ तो करते ही नहीं, किसीका बुरा कानेकी कल्पना तो उनके मनमें कभी आती ही नहीं, वे गॉवभरका सहज ही मल, चाहते थे और यथासाध्य किया भी करते थे। इससे गाँव- उनकी शोभा-कीर्ति और भी बढ गयी थी। यह भी अवरचन्द्रकी जलन बढानेमें एक खास कारण या । रामतनुको उसकी इस मनोवृत्तिका कुछ भी पता नहीं था। एक समय छुट्टियोमें रामतनु गाँवपर आये हुर थे । अधर- चन्द्रने दो-तीन गुंडोको पहलेसे ही तैयार करके एक दुष्ट-योजना बना रखी थी । बाहरसे किसी एक आवारा स्त्रीको वहाँ बुला लिया था । स्कीम थी कि किसी दिन वह स्त्री व्यर्थ ही हो-हल्ला मचावे, रामतनुपर लाञ्छन लगावे और उसी समय वे गुडे तथा अधरचन्द्र उस स्त्रीकी रक्षाके बहाने रामतनुपर टूट पडें । स्कीमके अनुसार ही काम हुआ। एक दिन रामतनु कहीं बाहरसे घर आ रहे थे। दुपहरका समय था । एक छोटी-सी सुनसान गली थी। निश्चित स्थानपर वह स्त्री खडी थी। रामतनु उसके पाससे निकले कि उसने बडे जोरोसे चिल्लाकर पुकारा–छोड़ दे, छोड़ दे-- बदमाश कहीका--'हाय ! हाय तू ! ब्राह्मण मास्टर होकर मेरा शील टना चाहता है। अरे कोई वचाओ ।' रामतनु तो को-नके रह गये । वह रामतनुके बिल्कुल समीप आ गयी थी । कपड़े अस्त- व्यस्त कर रखे ये उसने । अवरचन्द्र तो गुडोको ठिये छिपा सा ही था। तुरन्त आकर हल्ला मचाने तया रामतनुको गादियों कते हुए उन्हे मारने लगा। गुंडे भी प्रहार करने लगे। गमतनुकी तो ।

थे तो ११२ पढ़ो, समझो और करो भाग ६ कुछ समझमें नहीं आया कि यह सत्र क्या और क्या है। हल्ला सुनकर आस-पातक धरोमेंसे लोग निकल आये , ने भीड़ इकट्ठी हो गयी । गाँव के लोग तो रामतनुके खभावसे परित और उनके प्रति अत्यन्त सहानुभूति तथा श्रद्धा रखते थे। प्रायः गर्न उनसे उपकार पाये हुए । रामतनुके उपकार अवतार भी कम नहीं थे। पड़ोसीके नाते वह बीसो बार उनकी सहा प्राप्त कर चुका था। एक बार तो अवरचन्द्रको प्लेग होगा डबल गिल्टी थी। सारे गॉवमें प्लेग फैला या। वरखाले मोना अधरचन्द्रको छोड़कर चले गये थे। उस समय एक रामतनु । ऐसे थे जो अपने पड़ोसी अधरकी सेवामें चौबीसो घंटे लगे रहे, दा- दारू की और उसे बचाया। घरवाले तो दस दिनके बाद लौटे थे पर कृतघ्न तथा दूसरेको दुःख देनेमें ही सुखका अनुभव करनेवाले अधरचन्द्रपर रामतनुके उपकारोका कोई असर नहीं या । इसी दूर स्वभाववश वा आज अपनी आसुरी क्रिया में लग रहा था। उसने तो हो-हल्ला इसलिये मचाया था---गाँववालाको वः अपने TA कर ले । रामतनुके प्रति वे सब नाराज हो जायें नया ग रामतनुकी बदनामी हो जाय । पर भगवान् नो तब देखते ही ।। वहाँ एकत्र हुए गांववालोमें एकाधको छोड़कर प्रायः सभी गम नि सच्चा सत्पुरुष तथा निर्दोष मानते थे और अवरचन्द्रको दोगी। अवरचन्द्र के दुष्ट स्वभावसे नी परिचित थे ! उनसे पकने । स्त्रीको भी पहचान लिया, वह समीपके गाँवकी ही एक नाम दुश्चरित्रा थी। उसका पेशा ही या । गुंटे नी पश्यान ।

मंद करत सो करइ भलाई ११३ लोगोंने तुरन्त रामतनुको बचा लिया । गुण्डोपर तथा अधरचन्द्रपर उनको रोप आ गया । वे सब इनपर टूट पड़े पर सात्विक हृदयके श्रीरामतनु महाराज इसको नहीं सह सके । उन्होने हाथ जोड़कर खयं अपनेको बीचमें डालकर उन सबको बचाया। हालांकि उस समय उनके सारे शरीरमें मारके कारण बड़ी पीडा हो रही थी। कनपटीके पास तथा बॉयें कन्धेपर लाठीकी चोटसे खून बह रहा था । पर वे इसकी परवा न करके अपने स्वभाववश उन दुष्टोको बचानेमें लग गये । आखिर अपनी शपथ दिलवायी तया मारने- वालोंकी मार स्वयं सहनेको तैयार हो गये । तत्र उन दुष्टोकी जान बची । वह स्त्री तो पहचाने जाते ही भाग गयी। इधर यह सब देखकर दो आदमी भागकर दो मील दूर एक गॉवमें थाना था, वहाँ खबर देने पहुँच गये थे । उनसे इस जुल्नकी बातें सुनते ही दारोगाजी सिपाहियोको साथ लेकर तुरत चल दिये । दारोगाजी भी भाग्यसे रामतनुजीके द्वारा उपकृत थे । रामतनुजी विद्वान् तथा उच्च पदपर नौकरी करते थे, इससे सरकारी क्षेत्रमें उनका बड़ा आदर था, सभी उनकी इज्जत करते थे। उन्होने ही आरम्भमें दारोगाजीकी नौकरी लगायी थी । दारोगा नीने पहुँचते ही जॉच की और गुण्डोसहित अधरचन्द्रको पकड़ लिया । पचामो आदमी गवाही देनेको तैयार थे । सिपाहियोको भेजकर दारोगाजी- उस आवारा स्त्रीको भी पकड मँगवाया । उसने आते ही अपरात्र खीकार किया और बताया कि वह तो अधरचन्द्रके द्वारा पंढद् रुपये पाकर उसके कथनानुसार करनेको आयी थी । उसे और ने ११४ पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ करनेको अवरचन्द्र ने कहा था, वैसा ही किया । उसे यह पता नहीं था कि ये लोग रामतनु गाबुको मारेंगे। गुंडे भी पुलिसके भयसे ढीले पड़ रहे थे। यह देखकर अवरचन्द्रके होश हवा हो गये । वह बिलकुल घबरा गया, कोने लगा और उसकी आँखोसे ऑतुओकी धारा बह निकली। इता देखकर रामतनुवाबू बहुत दुखी हो रहे थे। उन्हें .पने मान तथा चोटका कट तो भूल गया । वे अवाचन्द्रके दुःखसे दुरी होकर उसे छोड़ देनेके लिये दारोगाजीसे विनम्र अनुरोध करने लगे। दारोगाजीने बड़े आदरसे, परन्तु कड़ाईसे कहा कि रामतनु- बाबू ! आप पुलिसके काममें दखल न दीजिये । हनने दुष्टोको रंगे हायों पकड़ा है और हमारे पास इनको सजा दिलाने के लिये साना तया गवाह मौजूद हैं। अपराधका घटाना पुलितका कर्ता है। अपराधोंका घटना अपराधियोंको सजा मिलनेसे ही सम्भव है। इस सम्बन्धमें आपका कोई अनुरोध नहीं सुनना चाहते।' रामतनुजीने फिर बहुत कहा, तब दारोगाजीने कहा कि-मने तो आपके घावो तथा चोटोकी जॉच करके रिपोर्ट देने खि हुगलीसे सरकारी डाक्टरोको बुलवाया है और आप इन दुष्ट हो छुड़ाना चाहते हैं।' पुलिसवालोंने रामतनुवायूको आदरसहित उनके घर मचा दिया । वहाँ एक सिपाही इस कामके लिये बैठा दिया 11, it डाक्टर आनेगर उनकी रिपोर्ट लेकर थानेपर आ जाए। ith वहुत-से लोग रानतनुबाबूने घरपर जमा हो गये । मन नामोरे - मंद करत सो करइ भलाई २१५ दुष्टोंको दण्ड मिले । पर रामतनुवाबूको बड़ा मानस-क्लेश हो रहा था। वे किसी भी उपायसे अवरचन्द्रको बचाना चाहते थे। बड़ी व्याकुलता थी उनके कोमल हृदयमें-- 'पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता ।" वे गाँववालोसे बोले-'देखिये, मनुष्य अपने-अपने स्वभावके अनुसार बर्ताव-व्यवहार करता है। परंतु दुःख तो सभीको होता है। आज मेरे कारणसे अधरचन्द्र तथा उसके परिवारको कितनी पीड़ा हो रही है । सचमुच उनकी इस पीड़ामें मै ही कारण हूँ। किसी भी हेतुसे हो, अधरवावू मेरे कारणसे दुखी थे और उस दुःखने ही उनसे ऐसा व्यवहार करवा दिया । वस्तुतः मुझपर जो मार पड़ी, वह तो मेरे अपने ही पूर्वकृत कर्मका फल है । मेरा प्रारब्ध ऐसा न होता तो अधरचन्द्रमें क्या शक्ति थी कि वे मुझको कष्ट पहुँचा सकते । यह तो मेरे ही कर्मका फल मुझे मिला । वे भूलसे इसमें निमित्त बनकर अपना बुरा कर बैठे, यह उनकी भूल है । भूला हुआ आदमी दया तथा क्षमाका पात्र होता है । वह तो पागल है न ! अतएव मेरी प्रार्थना है--एक बार हमलोग चलकर दारोगाजीसे प्रार्थना करे कि वे इस मामलेको आगे बढावें ही नहीं । वे न मानें तो फिर ऐसी व्यवस्था करे कि अधरचन्द्रके विरुद्ध कोई भी भाई गवाही न दे। मैने तो अभी बयान दिया नहीं है । मै अपने बयानमें कह दूंगा कि पैर फिसलकर गिर पड़नेसे मेरे चोट आ गयी। 'आपलोग एक वातपर और विचार कीजिये--अबतक अपने

पढ़ो, लमझो और करो, भाग ६
गॉवका यश सर्वत्र फैला है। किसीको भी किसी अपरामपर कमी
सरकारी दण्ड नहीं मिला। कभी अपने गॉवके नाम पर दाग
ही नहीं । अब यदि अधरबाबू दण्डित हो गये तो गॉवसर Tr
जायगा । लोग चर्चा करेंगे कि उस गॉवमें ऐसे लोग रहते हैं।
प्रकारान्तरसे गाँवका ही नाम बदनाम होगा । आगे चलकर इसने
कुछ लोग अनुचित लाभ उठाकर गाँववालोंको परेशान भी कर सकते
हैं। अत. इस भावी विपत्ति तथा कलंकके ठीकेसे बनने के लिये ।
अघरबाबूपर कोई कार्यवाही नहीं होनी चाहिये और ने निर्दोष ही
छूट जाने चाहिये । गॉवभरको निष्कलंक बनाये रखने के टिो ११
बड़ा आवश्यक है ।' गाँववाले तो यह सब सुनकर दग ये।की।
मन-ही-नन रामतनुवाबूकी प्रशंसा कर रहे थे और कोई-कोई उनकी
इस ट्याको कायरता, देश-काल-पात्रका विरोधी आचरण, अपरा
बढ़ानेकी चेष्टा और मूर्खता बतला रहे थे । रामतनुबाबुकी ने
परदुःखकातरताके कारण ऑस बह रहे थे !
उधर पुलिस के आते ही गॉवभरमें समाचार फैल गया!
अवरबाबूकी स्त्री बड़ी घबरा रही थी। वह भली गी, :
पतिको 7: सब दुष्कर्म करनेसे रोका भी करती नी । पर :
खट-हृदय उनकी बातको मानता नहीं था । गमलनुगापूती ।
अबलासे उनकी बहुत प्रीति नी । रामतनुवाकी पनी-मोर.
कर पि. कही आवेशमें आकार गायक लोग अधाना की ।
परेशान न करें--दौड़कर उमो आने घर ले जाया गी"
उसको समझा दिया कि हम योग द्वारा नाम:

मंद करत सो करइ भलाई १२७ अनिष्ट नहीं होगा।' वह अपने भले पति रामननुवाबूके सम्भावसे परिचित थी और इस स्वभावके रक्षण तथा संवर्धनमें उनकी सहायक भी थी। अस्तु ! इस समय रामतनुवाबू गाँववालोसे जो कुछ कह रहे थे, सब अधरचन्द्रकी स्त्री सुन रही थी और उसके हृदयमें रामतनु तथा उनकी पत्नी अब के प्रति श्रद्धा वढी जा रही थी और अपने पतिके दुष्ट स्वभावके कारण अपने प्रति लज्जा और घृणा! गाँववालोंमें श्रीहरिपद नामक एक सात्त्विक स्वभावके वृद्ध सज्जन थे । उनको रामतनुकी बातें बहुत अच्छी लगी और उन्होने रामतनुवाबूकी प्रशंसा करते हुए तथा उनका समर्थन करते हुए गाँववालोको समझाया । गाँववालोका मन कुछ पलटा । इतनेमें आक्टर आ गये । डाक्टर भी रामतनुवाबूसे परिचित तथा उनके प्रति श्रद्धा रखते थे । रामतनुबाबूने समझाकर डाक्टरसे यह लिखवा लिया कि उन्होंने सब जॉच कर ली है। रिपोर्ट पाछे देंगे।' रामतनुबाबूने अधरचन्द्रके अनुकूल रिपोर्ट लिखनेके लिये डाक्टरसे बहुत अनुरोध किया, पर डाक्टरको उनकी बात नहीं जॅची । आखिर वे इस बातपर राजी हो गये कि हम रिपोर्ट अभी नहीं दे रहे है। इस बीच आप दारोगाजीको राजी कर लीजिये, केस ही न चले तो फिर हमारी रिपोर्टकी आवश्यकता ही नहीं रहेगी। सारा मामला ही समाप्त हो जायगा ।' इसीके अनुसार उन्होने रिपोर्ट पीछे देनेकी वात लिख दी थी।

१२८ पढ़ो, समझो और करो, भाग ६ डाक्टरके लौट जानेपर रामतनुबाबू गाँवके चार-पाच स वृद्ध पुरुपोंको लेकर थानेपर गये। दारोगानीको सब बातें स और रो-रोकर श्रीअधरचन्द्र तथा उनके साथियोंको मिना रेन चलाये छोड़ देनेका अनुरोध किया। दारोगापर रामतनु के इन विलक्षण व्यवहारका प्रभाव पड़ा। उस दिन भाग्यसे याने में पुलिस सर्किल इन्सपेक्टर प्रमथबाबू आये हुए थे। वे भी यह सब सुन-देव। रहे थे । उनपर प्रभाव पड़ा। दारोगानीने उनसे बात की। ये सारी बातें अवरचन्द्र तथा उनके साथी भी सुन रहे थे। मारने भी रामतनुकी चेष्टा तथा वाते वे देख चुके थे। अतः उनका श्य अपने दुष्कर्मपर पश्चात्तापकी आगसे जल रहा था और यह मशः हुआ जा रहा था । जो काम बड़े-बडे दण्डो त जेलोंसे नहीं हो सकता, वह रामतनुजीके सव्यतारसे अनशन हो रहा था ! प्रमथवावूने बीचमें पड़कर गाँववालोसे कहा-पाती! आपलोग एक अपराधीको जो अपराध करते समय पयागला, बचाने जाकर अपराध बढ़ाने में सहायक बन रहे हैं और प्रतारातर- से समाजका तथा अपने गांवका अहित करने जा रहे है। ऐसे अपराधीको जरा भी दण्ड नहीं मिलेगा तो अपग करने हो लोगोका दुःसाहस बढ़ेगा जो समाजके लिये का घातक होगा। रामतनुवाबू साधुदय हैं, ये इस बातयो नही समाजाने। पर आपलोग इनके इस पागलपनका साथ क्यों दे रहे हैं। इसपर श्रीहरिपद तया रामतनुवाबुने अनेकों युक्तियोग प्रा. बाबूको समझानेकी चेष्टा की कि वास्तव में दण्डने अपराध नही । बदलकर निर्मल - तो मंद करत सो करइ भलाई १२९ अपराध घटेंगे तो प्रेम तथा सहानुभूतिसे ही घटेंगे । कटके समय अहेतुक सेवा प्राप्त करनेपर ही अपराधीका हृदय-परिवर्तन होगा। फिर उन्होने यह भी कहा कि 'हमलोगोने निश्चय किया है कि न तो आपको अधरबाबूके विरुद्ध एक भी गवा मिलेगा, न कोई साबूत ही । तब आप क्या करेंगे? प्रमयबाबू प्रभावित तो पहलेसे ही थे। अब उनपर और भी प्रभाव पड़ा। पर उन्होने जरा रुखाईसे कहा-'देखिये, मुझे आप- लोगोंके प्रति आदर है-आपकी उदारताका मै सम्मान करता हूँ, पर इस प्रकार सहसा अपराधीको छोड़कर हमलोग कर्तव्यविमुख नहीं होना चाहते । हम सोचेंगे-क्या किया जा सकता है। आपलोग अभी उन्हे छुड़ाना चाहते है तो हमलोग अस्थायीरूपसे इन्हें छोड़ देते हैं, परंतु कोई इनकी जमानत देनेवाले आपलोगोमेंसे तैयार हो जायें। इसपर रामतनुबाबू तुरत बोल उटे-'महागय ! मै जमानत मुचलका जो कुछ आप कहें, देनेको तैयार ।' यह सुन-देखकर इन्सपेक्टर प्रमयबाबू तया दारोगाजी दोनोका रदय द्रवित हो गया। वे भी आखिर मनुष्य थे। उन्होने अधरचन्द्रको बुलाकर कहा-~~ देवा तुमने ! सुनी सब बातें: कहाँ तुम और तुम्हारा बर्ताव और कहाँ ये और इनका वर्ताय ! अब तुम क्या करते हो? अधरचन्द्रकी ऑखें तो सावन-भादोके बादल बनी हुई थी। उसने रोते तथा 'हुजूर । पश्चात्तापकी आगने मेरे दिनांक याते दर

।
T
"
१२०
पढ़ो, समझो और करो, भाग
खाक कर दिया है। मे प्रत्यक्ष देख रहा मलिश :
महान् संत हैं, देवता नहीं, देवताओके भी पूजनीयर
मै बचना नहीं चाहता। मुझे आजन्म का ना
पर मेरे अपराधोंको देखते तो आजन्म कारापान ।
होगा। मैने जीवनभर अपराध-ही-..पर किये ।
करनेवान्टोका भी सदा बुरा किया है। यदि उनमें
हृदयकी सारी कालिमाका विपभरा कहा ::
इसीसे मै बचना नहीं चाहता। आप मेरा बना
स्वयं अपना अपराध स्वीकार करूंगा।'
यह सुनकर रामतनुबाबू रो पड़े आर पार आने
अधरचन्द्रको हृदयसे लगा लिया और उसके आसू पोछने लगे।
--
प्रमथवाबूकी रायसे दारोगानीने उन टोला तो कोई दिः ।
सब कागन फाड़ दिये गये । सत्र तानन्द विदाए । प्रमाने
तथा दारोगाजीने गमतनुवाबुकी चरण-धूलि दी । गमन त ।
बड़े आदरसे अधरचन्द्रके गलेमें हाय डाले चले जा रहे थे।
रामतनुवाबूका चेहरा खिल रहा था और उनके नेत्रों में से न
| अघरचन्द्रका सिर नीचा था, मुख उदान या जो मेरे
चात ऑसुओकी धारा बदरी यो। काँचपाले धेरै च.
थे । गुंडे भी भले मानव वनकर घर लौट रहे थे।
--चावा."

कृतज्ञता मोहनलाल बड़े गरीब घरका लड़का था । उसके माता-पिता मर गये थे। उसकी जातिके ही एक धनी सजनने बच्चेको अनाथ समझकर अपने पास रख लिया। नौकरकी भॉति नहीं, बच्चेकी भॉति । मोहनलाल उनकी सभी प्रकारकी सेवा बडी प्रसन्नतासे करता और वे उसे बड़े प्यार-दुलारसे पढ़ाते, खिलाते-पिलाते, सार- सँभाल रावते । बड़ा होनेपर उसे एक कपडकी दूकान करया दी। समयकी बात, कुछ समय बाद उन सज्जनकी मृत्यु हो गयी। विधवा पत्नी रही और एक लड़का यामलाल रहा । लड़का सुशील या । उसका विवाह हो चुका था । यह अपना कारोबार सँभालता या। गोदाममें माल रहता । एक दिन रातको अकस्मात् गोदाम में आगला, गयी । उस समय बहुत कम लोग बीमा कराते थे। साई तीन लाखका गोदाम में माल या । दमकट टेरसे पहुंची । गोदानका सारा माल देखते-देखते जलकर खाक हो गया । उद लाल रूपये तो उदो घरके थे। दो सारा दोगोने देने थे। कुछ ओर देना-

।
१२२ पढ़ो, समठो और सगे, भाग।
पावन था। सब मिलाकर लगा दी...
इसी बीच श्यामलालतो चिन्ताके नारे टी० की
गयी और दो ही महीनेमें उनका देवासमान ::
उसकी विधवा माता तया युक्ती वा ! तीन मीने दर;
सब अनर्थ हो गया।
मोहनलाल कित्ती कामसे देश गया ना क 3-2 ,
हो गयी । इससे वह विशेष अशक्त हो जाने 17
आया नहीं। कुछ अच्छा होनेपर आया और उसने ३....
गोदाममें आग लगने तथा उसके देहान्ती गाने
तो वह सन्न रह गया । काटो तो खून नहीं : नुरन ::
घर पहुँचा और मॉकी गोदनें पड़कर रोने लगा । उसे
पश्चात्ताप इस बातका या कि इस सारी अनर्गमी दुटिना ;
वह दूर रहा और जान भी नहीं पाया कि क्या होगा।
उसकी दूकान अच्छी चल निकली थी । ति आदि ।
गये थे। उसके पास साठ-सत्तर हजारकी गंजी भी हो गया की।
उसने रोकर कहा-माताजी ! श्यामलाल भाई तो जाता रहा, पर
यह अभागा छोटा बेटा मोहनिया अनी जीवितामयी
पति तो मैं नहीं कर सकता, पर मैं जबतक नी, नको
भी कष्ट नहीं होगा। मेरे पास अपना कुछ भी न ।
शरीरकी प्रत्येक खूनकी धुंद वर्गीय पिताजीकी देन है । मैं ।
बदला सौ जन्ममें भी नहीं चुका सक्ला । चुकाने की कामना ना
नहीं करता । मैं बड़ा अभागा है जो तुगको और पी:

कृतज्ञता १२३ भाभीजी-भाई श्यामलालकी पत्नीको इस अवस्थामें देख रहा हूँ। मै अब यहीं तुम्हारे चरणोमें रहेगा। सेवा करूँगा । तुम्हारी छोटी वह तुम्हारी तया भाभीकी चाकरी करेगी । जो कुछ रूखा-सूखा भगवान् देगा, सब मिलकर खायेगे । मै कमाकर सारा ऋण चुकाऊँगा, यह नहीं कि यद् सत्र में पिताजीके उपकारका बदला चुकानेके लिये करूँगा । बदलेका तो सवाल ही नहीं, पर मै ऐसा किये बिना रह नहीं सकता । अतः अपने सुखके लिये ही करूंगा ।' यो कहकर वह फुफक-फुफककर रोने लगा। वे दोनो सास-बहू भी रोने उगी, मोहनलालकी सी भी रो रही थी । श्यामलाटकी मानाने मोहनलालको हृदयसे लगाकर उसके ऑसू पोछे । तबसे मोहनलाल और उसकी स्त्री खरीद गुलामकी तरह उनकी सेवा में रहने लगे । उन दोनोके सद्व्यवहारसे वे अपना दुःख बहुत कुछ भूल गयीं । मोहनलाल की कीर्ति फैली, इज्जत बढी तथा साथ ही कारोबार भी। दो ही साल्टमें श्यामलालका सारा ऋण ब्याजसमेत चुका दिया गया। अपनी दूकानका नाम नी पश्टकर उनका कर दिया तथा दोनो पति-पत्नीने दोनो सास-बहुओकी निर्दोष सेवा में लगे रहकर अपना सारा जीवन पिताया । मोहनलालके एक लड़का था, उसको श्यामलालकी बहको गोदमें दे दिया । अपना नाम मिटाकर मोहनलालने अपने धर्मपिता नया भाई श्यामलाटका नाम यशपरम्परामें चलाया । धन्य ! I

आदर्श चित्रों और वाक्योंका प्रभाव
S1
आदरणीय शम्भूसिहजी कौशिक में नि:
भ्रमण कर रहे थे। एक दिन में एक अथले ...
घर निमन्त्रित किया । वह दिन रक्षिारक Ai
घर गये। बैठकमें हमने महापुरुषोंके नित्र :
लगे हुए देखे तो मन प्रसन्न हो उठा। देर १-३....!
होती रही तो वे सन्नन कुछ फल लेकर आने, ..
था। हमसे उन्होंने फलाहार करनेका आम किया, ''
जीने उन्हें भी फलाहार करनेको कहा।
इतनेमें ही उनका ९ वर्षीय पुत्र का आ
कौशिकीका आग्रह सुना तो दोनालकी और शाम को
अपने पितासे बोला, 'दादा ! अपने गहा दा
खाता है वह चोर है। इसलिये ये अकेले नहा लाग, में कोई
२
हमने उधर दीवालकी ओर देखा, वापर टा.
कंवलायो भवति केबलावादी।'
( जो अकेला खाना है, वह चोर है।)
अनायास ही हमारे दिमागमें आदर्श बत्रा ।
वास्यामें
लिखने एवं निरन्तर उम
बामायण
उनका क्या प्रभाव होता है, यह समझमें कि
प्रमाणकी आवश्यकता ही त्या है
दुमा
.
.
३
१
है

जरा-से कुसंग, गंदे पोस्टर और सिनेमाका दुष्परिणाम छः साल पहलेकी बात है । मै........में पढ़ता था। बी० एस-सी० फाइनलकी तैयारी कर रहा था । एक दिन दुर्भाग्यवश एक छात्र मित्रके घर चला गया। वे सिनेमाके शौकीन थे। मैं अबतक कभी मिनेमामें नहीं गया था, उस ओर न मेरा कभी ध्यान गया था, न मेरी रुचि ही थी। पढ़नेमें ही मन लगा रहता गा । इसीसे मैं अबतक सदा प्रथम श्रेणीमें ही उत्तीर्ण होता हा । उन मित्रने मुझको साथ ले जाकर पहले तो कई ऐसे पोस्टर दिखलाये, जिनमें सिनेमा-तारिकाओके प्रायः नग्न-से चित्र थे। फिर लौटकार दो-चार सिनेमासम्बन्धी पत्र दिखलाये, जिनमें बहुत मी तरुणी अभिनेत्रियोके विविध भाव-भगिमाओके चित्र थे और उनका वर्णन था । तदनन्तर उन्होने सिनेमाकी मौजका वर्णन किया और गंदी बातें न मालूम क्या-क्या कह गये । मै ऊपरसे 'ना ना' करना रहा, पर मेरा मन उन बातोको सुननेके ठिये विंच रहा. या । मैं उस दिन लोट तो आया, पर मेरा मन अब काबू नहीं रहा। दूसरे ही दिन सिनेमा पहुँचा । ऊँचे दर्जेका टिकट लिया और देखने जा बैठा । उसी दिनसे मेरा जीवन बदल गया। अब तो मे रोज सिनेमा देखने लगा। किसी दिन नहीं जा पाता नो बड़ी वेचैनी रहती । एक दिनकी बात, मैं सध्याके नमय देखने गया था । मेरे बगलमें ही एक अपरिचित सुन्दरी नरुणी बैठी थी । पीछे पता लगा कि वह भी एक कालेजकी छात्रा थी। उन दिन सिनेमामें कुछ ऐसा दृश्य.था कि उसे देखकर में पागल-सा हो गया।

•.
क
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4
१२६ पढ़ो, समझो और करो, भाग ६
मेरा मन बेकाबू हो गयः । यही दशा उस तकनी पर .
हुई । खेल समाप्त होते नी परस्पर संकेत है ।।
दिये किती अज्ञात स्थानको । कहाँ गये, क्या कि
आवश्यकता नहीं । पर हम दोनोका ही पतन 2.
लिखाई तारो चौपट हो गयी। मैं परीक्षाने फेः !
सिनेमाकी प्रवृत्ति और साय-ही-साय पाप-सरिता नेह' 11
बढ़ती गनी । संक्षेपमें..-परिणाम यह हुआ कि उi
इसी वर्य टी० बी० की बीमारी हो गयी और
रुलाकर चल कशी ! मैं जिंदा तो रहा, पर मेरा नौ
गया । मै शरावी-कवावी भी हो गया। चोर नी सन १
बुरी हालत हुई। दूसरी बार परीक्षा दी, उस्में भी फेनी !
हमारे एक मामाजी हैं । वे बड़े बुद्धिमान हैं। इन
बीमारीको पहचाना और गत-वर्ष जुलाईसे ने मेरी
विशेष ध्यान रखने लगे। बड़े प्यारसे वे मुझे कुयो ?
चेष्टा करने लगे । फलतः मेरा सिनेमा जाना कुछ ।
फिर वे मुझे एक दिन....... के पास ले गये। उन्होने
बहुत अच्छी तरह समझाकर मुझसे प्रतिज्ञा करमा ति में
अबसे सिनेमा नहीं देगा, शराब आदिका स्पर्श
करूँगा । फिर उन्होंने निन्नासे होनेवाली बुराइको ने
एक किताव पड़नको दी। मैं तो स्वय ही सिनेमाकी
शिकार था। इस पुलिकासे नुझे बड़ी सहायता मिली। मेरे किसने
मुझको डॉटा-फटकारा नहीं, पर बड़स्ने से रो-रोकर मनाया...
से तबसे मेरी प्रतिज्ञा निनसीई। मैंने इस मुभाग कर

जरा से कुसंग, गंदे पोस्टर और सिनेनाका दुप्परिणाम १२७ देखा, मेरे-जैसे हजारो युवक-युवतियोका सर्वनाश हो रहा है । वे यह मीठा विष पीकर जर्जरित हुए जा रहे है । मैं भगवान् से प्रार्थना करता हूँ, वे सत्रको सुबुद्धि दें । सरकारसे भी मरी प्रार्थना है कि वह मरे-जैसे लाखो तरुण-तरुणियोकी जीवन-रक्षा तथा चरित्र-रक्षाके लिये बहुत-शीघ्र ही या तो देशका सर्वनाश करनेवाली सिनेमा- संस्थाका उन्मूलन कर दें य इसमें पर्याप्त सुधार करके इसे दशोपकारी । पर जबतक यह प्रचुर धन पैदा करनेवाली चीन रहेगी और इसमें तरुणी स्त्रिया नाग लेंगी तबतक सुधार होना वडा कठिन है --एक मुक्त भोगी दुखी छात्र बना दें ५ उपर्युक्त पत्रको सक्षिप्तरूपमें छापा गया है, नाम-पते मीनही छाप जा रहे है । सिनेमाका क्या दुष्परिणाम होता है, इसका यह एक छोटा- सा उदाहरण है। सिनेमासे कितने प्रकारके और अनर्थ हो रहे , उनकी तो चर्चा ही यहाँ नहीं है । सिनेमाके द्वारा होनेवाले सर्वनागकी कोई सीमा नहीं है। यह देश के लिये एक भयानक अभिशाप बन रहा। पता नहीं, इसका क्या भीषण परिणाम होगा । अवश्य ही सिनेमाके रद होने की वात सोचना वर्तमान वातावरणमे एक व्यर्थ चिन्तन और सिनेमाका विरोध करना भी अरण्यरोदन-सा ही होगा। परनु यह उपेक्षाका विषय भी कदापि नहीं है। हमारे पास ऐसे अनेक भुनभोगियों के पत्र आते है, जिन्हें पढ़कर हदय कॉप उठता है । सामान्य सत त्रीविनोवाजीने गदे-पोस्टरों के विरुद्ध आन्दोलन चलाया था। हम चाहते है सरकार कानून बनाकर उनका प्रचार बंद कग दे। माथ ही सिनेमाने होनेवाले भयानक दुष्परिणामपर भी गम्भीरतासे विचार करके कुछ टोस उपाय सोचे। --सम्पादक *- . भगवानका वरदान वह किधर गये', 'वह फिचर गरे पेशद हुई घोषित की गयी नेरी माताने चौका लगाई नगरको ऑखें खोलकर दाहिने और वा सिर धुमाकर बने रा मेरी दादीने, जो पास ही बैठी रो रही थी, प्रान art होकर पछा---'वीनणी ! किसे पूछ रही हो, तो हो ।' माताजीने कहा---'श्रीकृष्ण-अर्जुन किधर गये !' सोमाने 'श्रीकृष्ण-अर्जुन यही कहाँ है ! तबीयत तो ठीक ... कमजोरी बढ़ेगी ।' उन्होने ( दादीजीने ) स., Rai ! पुनर्जीवनकी खुशी में दादीजीने पुण्य संकल्प किन र नरे. . को मनिमें सूचना दी गयी। और्षदेहिककी साम गयी और डाक्टर तथा वैद्यने जो बाहर निमें ये, बनाने । बीमार माताजीको देखा तो हृदयकी गति ठीक न त जीवित होनेपर आश्चर्य करने लगे। म और मेरे दी गई एक बहन एक कमरेमें पड़े रो रहे थे, सोना • उठलने-कूदने लगे । वटे-दो-घटे सुस्तानेके बाद मेरी ... घरकी सब नौकरानियों के सामने मेरी दादीसे करना शुरु भानीमा ! मुझे भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन मात्र हैं, मुझे ऐला माउन हुआ कि मै यहाँ पर या .. चल रही है। चारो और भुआंधार- तासा बादल फट गये और म हरी-हरी घाससे की . लगी ! एक पगडाडी दिखायी दी और उसपर दम । दूर चल्नेपर एक शहाका परकोटा दिखायी दिया जा - ।

- 7 . ; भगवान्का वरदान ।। २२९ उस परकोटाके, दरवाजेकी ओर जाती दिखायी दी । दरवाना भी दिखायी दिया । बहुत भूख होनेके कारण कुछ खानेके अभिप्रायसे मैं आगे बढ़ी, पर साय ही विचार आया कि पैसे तो पास हैं नहीं, कोई कैसे देगा, खैर, किसीसे मांगकर ही योड़ा खाऊँगी । परतु बड़े घरकी स्त्री होकर कसे मालूंगी । मांगा तो नहीं जायगा ।' इस उधेड़बुनमें चली जा रही यो कि अचानक रास्तेके बीच दो सावु एक सिंहको साथ लिये आकर खड़े हो गये । मैं सिंहको देखकर डर गयी और ठिठककर खड़ी रह गयी । श्याममूर्निने मुस्कुराते हुए कहा-'डरै मत, यह सिंह हमारा पाल्तू है, खायेगा नहीं । तू कहॉ जा रही है ?' मैंने प्रणाम कर हाय जोड़कर कहा- 'मै दो महीनेसे बीमार थी, मुझे डाक्टरोने कुछ खानेको नहीं दिया, सी महाराज..मै बहुत भूखी हूँ । इस शहरमें जाकर कुछ खाऊँगी।' श्यामवर्ण महात्माने कहा, 'यह तो धर्मराजकी पुरी है। वह देख वह पुरद्वारपर बैठे वयोवृद्ध सफेद दाढ़ीवाले धर्मराज है। परतु तुझे अभी वहाँ नही जाना है। तेरे बालक अभी छोटे-छोटे है, जबतक बड़े न हो जायें तुझे वापस जाना है ।' मैने कहा, 'महाराज ! मै तो दो महीनेसे १००-१०० दस्त रोज होनेसे बहुत दुखी हो गयी है । मै अब वापस नहीं जाऊँगी ।' श्यामवर्ण महात्माने फिर कहा 'तेरे वाटक अभी छोटे हैं और तेरा समय भी अभी नहीं आया है। तू जा, तुझे अब दत्तोंकी बीमारी नहीं उ०.९-

२३० पड़ो समझो और करो, भाग ३
होगी और समयपर तेरी सहन न होगी। इस
जानती है हम कौन हैं ? मैंने कहा, 'महाराज ! में सोना :
दूसरे महात्माने कहा, 'ये तो श्रीकृष्ण है और में अन्न :
कहते ही वे दोनों आँखोंसे ओझलझे गये और उसे रे ..
हुआ कि मैं नीचे गिर रही हूँ। और तुली नो र ने
दिखायी दी । दर्शनोंसे बञ्चित होनेके कारण मरे ।
था कि वह कहाँ गये ?
तबसे उन्हें दस्तोंका रोग आजीयन ना i ! |
घटनाके समय में कोई पाँच वर्षका या, परंतु मेरी
होना तथा पुनः जीवित होना नाक-सात गाद
मेरी दादी भी हमें कथाके रूपमें कहा करती नी भार!!
भी जब हम कौतुहलपूर्वक परते तो का हरती की।
तीस वर्ष पीछे दो-तीन दिनो लोसे जुगार होनेपर :
करते माताजीकी आँखें निर या भारतीय मार
पति, पुत्र, पुरा, पोते, पानी, पोन ही
डाक्टर कह रहे थे हार्ट रेट, प
...
सफर कर द-मन्द मुस्वाद या जत्थान ,
।

भगवानका वरदान १३१ देशभक्त तथा भगवद्भक्त श्रीरामगोपालसिंहजी* खरवा जिला अजमेरकी छोटी बहन थीं और खडे ठा ( जयपुर ) के राजा सजन- सिंहजीकी धर्मपत्नी या-बोलो श्रीराधाकृष्णकी जय --श्रीजैतसिंह खडेलावाला * खरवाके रावसाहब श्रीगोपालसिंहजी बड़े भन्न थे। उनकी मृत्यु भी भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन करते-करते हुई थी। उस समयके कल्याण मे १० सावरमल्लजी शर्माद्वारा लिखित उनकी सफल मृत्युका पुण्य विवरण छपा था--सम्पादक

मानवता
एस० एस० सी० का रिजल्ट निकला। उस दिन में
छोटी-सी कागजकी पुर्जी लिये वर का हार गरे ।
और बोला, 'भाई ! जरा या नम्बर तो दो।'
मैने पुर्जाम दिखा नम्बर प और राजोट ।
अखबारके पन्ने उल्टकर नम्नर खानने १
बड़ी उत्सुक दृष्टिसे आलक मेरी और देश : या मो
देखा और
पछ
बैठा-'किसका नम्बर है।
आतुरता नही रोक सकता हो.---इस नामे उसने ।::
'तुम पहले नम्बर देख दो, पीछे म सब सातः , ।'
में इस ट्रक-बाइबरसे परिचित है, तो नि ।
हम दोनों एक ही गांक्के निवासी है।
मकर ..
नौकरी कर ली और इसने कुछ होनेपर art
।

मानवता
१३३
.
,
आनेसे किसी प्राइवेट ट्रक-कम्पनीमें काम करना शुरू कर दिय ।
अकेला फक्कड़ है, न कोई आगे, न पीछे । खाता-पीता है और
जितना कमाता है, उतनेमें मौनसे जिन्दगी बिताता है।
वह बहुत खुश था, उसके चेहरेपर मनके आनन्दकी रेखाएँ
स्पष्ट दीख रही थीं । उसने मुझे जो नम्बर बताण या, यह नम्बर
एस०
० सी० की परीक्षामें उत्तीर्ण छपा था । मैने उनसे कहा
कि 'वह उत्तीर्ण हो गया है'-सुनते ही उसने गद्गद होकर कहा-
एस०
--
'आखिर प्रभुने - उसकी ओर कृपादृष्टि की तो सही भाई !'
और उसकी आँखें डबडबा आयीं ।
'तू किसकी बात कर रहा है ड्राइवर ?' मैने पहा
और.
वह भूतकालको याद करके कहने लगा-चार वर्ष पहले एक
दुर्घटनाका केस हुआ या न ! उस दुर्घटनाके नामले में मैं निर्दोप
छूट गया था भाई ! परंतु मुझको उसी समय यह नाल्न हो गया
था कि जो आदमी उस दुर्घटनामें मारा गया था, वह वेचाग एक
मिलमें मजदूरी करके मुश्किलसे अपना गुजरान चलाता या । उसकी
साइकल तोंगे और ट्रकके बीचमें आ गयी थी--सीसे उसकी
मृत्यु हो गयो । इस मामले में मै निर्दोष छूट गया, पर जब मुझे
यह पता लगा कि इसका एक लड़का अंग्रेजी तीसरे पास होकर
चौथे दर्जेमें आया है और अब उसे पढ़ाई छोड़कर मजदूरीमें उगना
पड़ेगा, तब ईश्वरने स्वाभाविक ही मेरे मनमें उसको मदद करनेकी

.
पदो, समझो और करो, भाग ३
प्रेरणा की. उजले रंगका वह ताका मा पर जाने ।
नहीं था, अतएव उसे कहींसे कीसके पैसे मिल
जाकर
हो जाय--इसकी सम्भावना नहा यो। मेरे मन आaini
कोई नहीं है, उसका यह ट्रक-बाइबर है।
मैंने उस लड़केसे कहा--भाई ! (निरि
पढ़ !....तुझे फीस, पुस्तकें में दूंगा, गो चार मुन्दु से नि
जायेंगे,... उसकी माँ इधर-उधर दल-पीसकर पेट मरती है।
आज नेरी खुशीका पार नहीं है । मेरा मनोगत
क्योंकि वह पास हो गया....' इतना कहकर कुछ लो
टूक-ड्राइवर कुछ गहरे विचारमें डूब गया । फिर बो... मामा
ईश्वरकी लीला है भाई ! नहीं तो कहीं में, का दुनाने
गया मिल-मजदूर और कहाँ उसका यह मैट्रिक पास होने
वन्वा । निमित्तकी बड़ी बात है भाई..... (बड अनन्द)
नेहा

बच्चीकी वातका असर में सिगरेटका शिकार हो चुका था। मेरे घरके सब लोग मुझे इस आदतको छुड़ानेके लिये लाख-लाख प्रयत्न करते रहे, पर मैं टस-से-मस नहीं हुआ। मेरी पत्नीतक भी हार गयी। मेरे मित्र भी हार गये, पर मेरा दिल न पिघला । मैंने यह बुरा व्यसन नहीं छोड़ा! एक दिन में सध्याके समय बैठकमें बैठा चुपचाप सिगरेट पी रहा था कि अचानक मेरी लड़की लज्जा कमरेमें आ गयी और मेरी गोदमें बैठकर मेरे गालोको सहलाती हुई बोली-'पिताजी ! आप सिगरेट क्यो पीते हैं ! मास्टरानीजीने मुझे पढ़ाया है कि जो लोग सिगरेट पीते हैं वे जल्दी मर जाते हैं। आप भी जल्दी मर ज.येंगे, पिताजी ! आप न पीजिये न ।' इतना कहकर वह रोने लगी। अपने आँसुओको यामे रहा और उसको पार करते हैं: मेने कहा-'बेटा ! मै अबसे सिगरेट नहीं पीऊँगा । यह मुन्सर यह प्रसन हो एकदम अपनी मौके पास गयी । में प्रभुको धन्यगद देने पढ़ो, समझो और को भाग ६ लगा कि हे प्रभु ! तेरे बच्चे साना हाने. ; अनुत है । तेरी ति को तरी ति को जाता है। साल की गये है, आज मेरा ही काफी नीको । उसे देखना तो हे प्रा. मनमें करता दयालु है। --भी - * भारतमे गत वर्ष ३२०२ करो सिगरेट बना ! सन् १९५२.५३ में केवल १८०० रोददी बनी गों कि तम्बाकू का प्रचार दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है ही नहीं वरन इस युग वैवानिकोने तम्मान म' ! लगाया द--(१) निकोटीन, (२) प्रेसि । ५ (३) (४) कोलीटीन, (५) एमोनिया और (६)न मन: । और भी बहुत से विष । म dिot writ.८६० से आज वैनिक एक पाउण्ड तयाकूमेसे इतनातिन in hi, . . ! ३०० मनुष्योकी मृत्यु दो सहभाति भौतिक दी। इन व्यर्थ हीनदी सामाजिक it : एन. तितीर. :: .. इसने किसानों के प्रति ? • गा मा - ji ::: फगदा विदेशी मुद्रा तथा कर दो...' ....' दोषी: । यी ती उताबाट म • A. 4 441 समदार इ. पिन तथा रिचार को सार ही चा , TR{ दिनमा म:.; !! देशका दुभांग। . " 1 -- 4 . . . . mah

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Upakar Ka Badala [ Part - Vi ]

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Upakar Ka Badala [ Part - Vi ]
File name
Upakar Ka Badala [ Part - Vi ]
Text
OCR done
Citation
1976
Published
2011/01
Publisher
Geeta Press Gorakhpur
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548814
Barcode
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Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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