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अपनी खवर राजवागल प्रकाशन राजकगल
पिनी
खबर
पाण्डेय वेचन शर्मा 'उग्र'
सेमर के अव तर मनात
प्रारम्भिर वप
CHUDIO राजकगल
पिनी
खबर
पाण्डेय वेचन शर्मा 'उग्र'
सेमरप्रय तर मनात
प्रारम्भिर २१ वप
राजपागल प्रकाशन
Fulhd
राजकगल
+
પની
खबर
पाण्डेय वेचन शर्मा 'त्य'
नव वे प्रपतक अनान
प्रारम्भिर
वप
४५० रूपए
प्रथम सतरण १९६०
० १९९ पाण्डेय बेवन गर्मा उत्रिी
प्रार
सवमन प्रशासन प्राइवेट लिमिटेस्सिी
हारा पार प्रम मरबाजार त्रिी
दिवगप्त श्री महादेवप्रसाद सेठ को सादर समर्पित
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करता जमा किरजगलस्त-लस्त हो
-
सामान
मुत ई है चारको मेहमा किए ए
मोशे दह ले बज्म चरागा दिर र
माहुपा है'दावते मिशगां मिरर
निए वज-र-एहनिमालसे रुकने लगा है म
बरहोर है चाक गरीमा लिए हुए
झिरपुरसि शे-जराहने-दिल को चला है इश्क
सदहजार नमकदा किए
मिस शौक कर रहा खरीद की तलम
अर्ने मुतार-अक्लो-दिलो-जा कर र
इक नौ बरानाज को लोके । किर-निगार
नेहा फोगे-मम ले गुलिस्ता किए बुर
फिरजी में है कि दर पर किसी के पड़े रहे
सा जेरे- बार- मिन्नते-दबा दिए हुए
जी ढुंटता है कि ही फुर्सत,कि राज दिन
बैठे रहे तमन्नु जाना दिए हुए
गाभिन न दे कि भलोण कसे
है हम तहम-ए-वफर किए हुए
man
हुए
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मुद्ध हुई है पाएको भेटमा किए हुए
जोस कदर बज्म चरागा दिए हर
फिजी में है कि दर पर किसी के पड़े रह
दरवा दिए हुए
करता हूँजमा झिर जिगरे लख्त-लत्ताको
सामान
उए
मर्स पोरदायत मिशागा मिर हुए
मिर बज-ए-एहतिमालसे रुकने लगा है हम
सरोहर है याक गरी माँ लिएर
फिरपुरसिपशे-जराहते-दिल को चला है इश्क
सद हजार नमकदा किए
मिर गौर कर रहा खरीशा की तलम
प्रजेमता-ए-मक्लो-दिलो-जा किए हुए
इक नौ मनाज को ताके किरनिगाह
चेहरा फोगे- मम ले गुलिस्ता किए बुर
जी ढुंटता है फिर कही फुर्सत,कि रान दिन
बैठे रहे नसन्नु जाना किए हुए
गाभिम' में न दे कि, भरजोरों अरकले
अटे। हम तहम-ए-तूफर किए हुए
retsman
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दिग्टगन
प्रवेश
अपनी पर
धरती और धान
चुनार
नागा भागवतदाम
राममनाहरनाम
१०
१७
३२
१२
भानुप्रताप तिवारी
.०
पच्चा महाराज
प० जगन्नाथ पाड
नाता भगवान 'दीन
५० रानगव विष्णु पगटकर
१०६
वावू शिवप्रमा- गुप्त ११५
प० कमलापति त्रिपाठी ११८
पनारम और वक्ता १२३
जीवन-मथप १३१
अमर गान १३६
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। दिग्दर्शन "मैने क्या-क्या नही किया ? किस क्सि दर की ठोकरें नही खाई ? किस किसके आगे मस्तक नहीं झुकाया? मेरे राम आपको न पहचानने के सवव 'जन जनमि-जनमि जग, दुख दसहू दिसि पायो।' "पाशा के जाल में फैम, 'योर मोस्ट ओवीडिएण्ट सर्वेट' बन, नीचो को मैन परम प्रसन्न प्रेमपूर्वक प्रभु । प्रभु पुकारा । मैंने द्वार-द्वार बार-बार मुह फलाया दीनता सुनाने, लेकिन किसी ने उसमें एक मुट्ठी धूल तक नही डाली । 'भोजन और कपडे के लिए पागल बना मैं यन-तत्र- सवत्र भर मारता फिरा, प्राणा से भी अधिक प्रिय आत्म- सम्मान त्यागकर खला के सामने मैंन साली पेट खोल-खोल- कर दिखलाया। "सच कहता हूँ कौनसा एसा नीच नाच होगा जो लघु लोभ ने मुझ वैशरम वा न नचाया हागा 1 किन्तु लालच से ललचाने के सिवाय नाथ हाथ क्छु नहिं लग्यो । तुलसीदास (विनय) याह । 1
प्रवेश
चन्न ही महीने पहल निहार के विदित प्राचाय श्री शिव
पूजन महायजी (पद्मभूषण) प्राचाय ननिन विलोचनजी
गर्मा तथा श्री जनद्र कुमारजी मेर यहाँ कृपया पधारे थे।
साय में पिहार व दो-तीन तरण और भी थे । याता-ही-बाता
में श्री शिवपूजन सहाय । मुभम कहा- उग्र, अब तुम
अपने मम्मरण लिप डाला।
मैंने कहा- लिग तो हात रिन जीवित महाया की
विरारी -मध भक्त विरारो-या बडा भय है । बहुता के
बारे में मर प्रकट हो जाए तो उनर या पोर जीवन या
चिराग हा तुप्-नुप् करन नगे। कुछ तो मरने मारन पर भी
मामाला हा मान हैं। उगहरणत पर जगह या मोरीय
रामायण मुरमा की पया में मरे एप एम मित्र भी
उपयित थ जा हनुमानजी प्रच मस्त ५। लवा में
मन्गरी या गार दम्परर
। गममा गाता
चाहगरा सl
की
।
१
निग्न
पानमानम
मारपदरचना
परन बामवर दर
. "लेकिन क्था वाचक के मुह से यह अथ और हनुमानजी के लिए वदर और पूछ का प्रयोग सुनते ही वह अध भक्तजी भटक पडे । यहा तक कि उस दिन की कथा ही हजरत ने भग कर डाली। इसी तरह यदि मैं लिखू वि दिग्गजाकार महाकवि निराला' पर क्लक्त्ते एक मूपकाकार प्रकाशक ने सन् १९२८ ई० म बडा वाजार की अपनी दूकान में काठ की तलवार से कई प्रहार किये थ एसे कि निराला' भी हतप्रभ होकर प्राय रोकर रह गए थ, तो सत्य की तह तक गय वगर ही 'निराला' भक्त सनसना झनझना उठेंगे।" 'लेकिन घटना तो सही है" प्राचाय शिवपूजन न कहा। इसके बाद उपस्थित मित्रा यो मने दो मस्मरण सुनाये- (१) 'निराला' जी पर एक प्रकार द्वारा प्रारमण, फिर उस प्रकाश पर 'निराला' जी का प्रहार, वीच में उग्न का उत्त- जक्-पाट और (२) 'निराला' के पुत्र के व्याह में, लखनऊ म, वतवढाव में, भरी मजलिस में क्सिी वहस्ते प्रकाश पर एक दहफ्ते समालोचक का प्रारमण और उसके बाद का भूतनाथ की वागत वाला कोलाहल । साथ ही इस दुघटना के विवरण में वहा उपस्थित न होन पर भी 'उग्र' की वदनामी। उक्त दोना उदाहरण तो निराला विषयक हैं । मेर खतर- नावप्राय जीवन में ऐसे कोलाहलकारी सस्मरणा का भरमार है शह यदि रेकाड पर उतार दिया जाए तो सम्बधित महानुभाव फरिश्ते नही आदमी नजर आने लगें । लुमान विशुद्ध प्राथतिय रूप में, बाल और पूछ के साथ ऐम नज़र पाएँ पि अघ भक्त लोग भडकपर रह जाएँ । ऐन-ऐसे लोग वम्ब' म, पलकत्ता में इन्दौर में, उज्जन में, बनारम में, पटना में और अव तो दिल्ली में भी हैं। टॉस्टर जीपल मिस्टर
प्रवेश
चन् ही महीने पहले बिहार के विदित आचाय श्री शिव
पूजन सहायजी (पद्मभूषण) प्राचाय नलिन विलोचनजी
शमा तथा श्री जनेन्द्र कुमारजी मेरे यहाँ कृपया पधारे थे।
साथ में बिहार के दो-तीन तरुण और भी थे । वातो-ही-बाता
में श्री शिवपूजन सहाय ने मुभमे कहा- 'उन अब तुम
अपने सस्मरण लिप डालो।
मैंने कहा-लिस तो डालू लेकिन जीवित महाशयो की
विरादरी- --अध भक्त विरादरी-
का बडा भय है । बहुतो के
बारे में सर' प्रस्ट हो जाए तो उनके यश और जीवन का
चिराग हा लुप-सुप करने लगे। कुछ तो मरन मारने पर भी
आमादा हो मरते हैं । उदाहरणत एक जगह वाल्मीकीय
रामायण सुटर काठ की क्या म मेर एक एसे मिय भी
उपस्थित थ जो हनुमानजी के अघ भक्त थे। लवा में
मन्दादरी का रोती हुई देवकर हनुमानजी ने समझा सीता
जी है उनका साज सफल हुई । और वह सहज बन्दर की
तरह प्रमन चचल हरक्तें करने लगे
प्रास्फोटया माम चुचुन्य पुन्छ
ननद चित्रीड जगौ जगाम।
स्तम्भावरोहनिपपातभूमी
निदायन स्वा प्रकृति कपीनाम् ।
यानी हनमानजा उमाह में अपनी पूछ चूमते हुए पटरने लगे।
मारे हप वह पवन चनन उनन-यूदन सम्मा पर चढन
उतरन स्वाभावित बन्दर-लाला करन लगे।
दस
लेविन कथा वाचक ये मुह से यह अथ और हनुमानजी के लिए बदर और पूछ का प्रयोग सुनते ही वह अध भक्तजी भडक पडे। यहां तक कि उस दिन की क्या ही हजरत न भग कर डाली। 'इसी तरह यदि मैं लिखू कि दिग्गजाकार महाकवि निराला' पर कलकत्ते के एक भूपकाकार प्रकाशक ने सन १९२८ ई० में वडा बाजार की अपनी दूकान में काठ की तलवार से रइ प्रहार किये थ मे कि 'निराला' भी हतप्रभ होकर प्राय राकर रह गए थ, तो सत्य की तह तक गये वगर ही निगला' भक्त सनसना झनझना उठेंगे।" "लेकिन घटना तो सही है" प्राचाय शिवपूजन न कहा। इसके बाद उपस्थित मित्रो को मने दो मम्मरण सुनाये- (१) 'निराला जो पर एक प्रकार द्वारा प्रारमण फिर उस प्रकाश पर 'निराला' जी का प्रहार बीच में 'उन वा उत्ते जव-पाट और (२) 'निराला' पे पुत्र के व्याह में लग्ननऊ म, पतवढाव में, भरी मजलिम में क्सिी वक्ते प्रकाशन पर एक दहकते समालोचर का प्रारमण और उसके बाद का भूतनाथ को वागत वाला योलाहल । साथ ही इस दुघटना के विवरण में यहाँ उपस्थित न होन पर भी 'उग्र' की बदनामी। उक्त दोना उदाहरण तो निराला विपयर हैं । मेरे गतर- नापप्राय जीवन में एसे कोलाहवारी सम्मरणा की भरमार है जिह यदि रेवाड पर उतार दिया जाए तो सम्बधित महामाप फरिते नहीं पादमी नजर अाने लगे। हामान विशुद्ध प्राकृतिा म्प में, बाल और पूछ ये साय ऐसे नजर माएँ कि अघ भक्त लोग भडपकर रह जाएँ। ऐसे-ऐसे लोग यम्बई में, यलपत्ता में, इन्दौर में, उग्जन में, वनारम में, पटना में सौर पर तो दिल्ली में भी हैं। टॉस्टर जीपल मिस्टर - पारह
प्रवेश
चन्द ही महीने पहल विहार के विदित आचाय श्री शिव
पूजन सहायजी (पद्मभूषण) प्राचाय ननिन विलोचनजी
शर्मा तथा श्री जनेद्र कुमारजी मेरे यहाँ कृपया पधारे थे।
साथ में विहार के दो-तीन तरण और भी थ। बातो-हीचाता
में श्री शिवपूजन सहाय ने मुझसे कहा- उन अब तुम
अपने मस्मरण लिख डालो।
मैंने कहा- लिख तो टालू लेकिन जीवित महाशयो को
बिरादरी-अध भक्त विरादरीका वडा भय है । बहुता के
बारे में सर प्रक्ट हो जाए तो उनके यश और जीवन का
चिराग ही लुप-नुप करन लगे। कुछ तो भरने-मारन पर भी
प्रामादा हो मक्ते हैं । उदाहरणत एक जगह वाल्मीकीय
रामायण सुन्दर कान की क्या में मेरे एक एसे मित्र भी
उपस्थित थ जा हनुमानजी के अघ भक्त थे। लका में
भन्दादरा या राती हुई दपकर हनुमानजी न समझा मीता
जी ह उनकी माज सफल हुई । और वह सहज बन्दर की
तरह प्रमान चपन हरक्त परन लग
मास्फोटया मास चुचुम्ब पुन्छ
ननद चिद्रीड जगौ जगाम।
स्तम्भावरोहग्निपपातभूमी
निदायन स्वा प्रकृति कपीनाम् ।
मानी नुमानती उन्नाह अपना पूछ चूमते हुए पटकने लगे।
मार हा वर चचन चनन उसन-यूटन सम्भों पर चढन
ततरन, स्वानाविर बटर-साला करन लगे।
'लेविन कथा-वाचर के मुह मे यह अथ और हनुमानजी
के लिए व दर और पछ का प्रयोग मुनते ही वह अघ भक्तजी
भहक पढे । यहा तक कि उस दिन की क्या ही हजरत
न भग कर डाली।
इमी तरह यदि में लिखू कि दिग्गजाकार महाकवि
निराला' पर कलकत्ते के एक मूषकाकार प्रकााकने सन् १९२८
ई० में वडा वातार की अपनी दूकान में काठ की तलवार से
कई प्रहार किये थ, रोमे कि 'निराना भी हतप्रभ हाकर प्राय
राकर रह गए थ तो मत्य की तह तक गय वगर ही 'निराला'
भक्त सनसना भनभना उठेगे।"
'लेक्नि घटना तो सही है" आवाय शिवपूजन न
कहा।
हाइड बाहर समाज म सुवण के भोले मृग की तरह दिमायो
देने वाले अन्न पालनमि जिहें मैं बहुत निकट स जानना
हूँ एसा के बारे में अपन सस्मरण यदि कमी मैंन लिख तो
उमका उद्देश्य भण्डाफोड या यक्तिगत विद्वप नही होगा । उद्देश्य
होगा यह प्रमाणित करना कि कुछ सत्य एसे भी होते हैं जिन्हे
कल्पना तक छू नहीं सक्ती जसे दिग्गजाकार निराला पर
मूपकाकार पनिार का आक्रमण कर बठना ।
अपनी याददाश्त पलि की जानकारी के लिए लिखने
में प्रात्म प्रामा और अबार प्रदशन का बड़ा खतरा रहता
है। एसे सस्मरणा में विमा एक मद घटना के कारण अनक
गुण-सम्पन्न पुग्प पर अनावश्यक प्राच भी पा सकती है । मन
प्राग लिखा है कि अाज सम्पादक वरिस्टर श्रीप्रकाशन
मेरी पहली कहानी बिना पढ़ ही कूड की टोकरी में डाल दी
था। इम एक ही वारये से पादरणीय श्रीप्रकाशजी को गलत
समझना उजलन भी हा मकती है। बाद में श्रीप्रकाशजी मेरी
रचनामा २ प्रापर प्रामर रहे और आज भी मुझ पर तो
उनका प्रमाद ही रहता है।
इन मम्मरणा को पान पर किसी को ऐसा लग कि मैंने
निन्ग या बुराइ किमानी का है ता यही मानना हागा नि मुझ
ठोर तरह म निपना माया नहीं। टूमरा तक यह कि प्राइन
में अपना मर दम्प काई यह कह कि दपण ता उसगा निदर
है दुष्ट दाप-गार ता ठार है । और अफ्माम की बात है
कि दपण अधा पयर नहीं दबता दियाना दरमा-दरमाता
दपण है।
मरे प्रार' नाम से यति में भी अपन सस्मरण
पनिारा व वार में लिम्बू ता कम-म कम पाच सौ पन या
पाया प्रचपत प्रस्तुत हा--महान मनारजक । मरे घारापता
प्रथम पनिर श्री पन्नानार गुप्त नामक एक सज्जन थ । बारह
गाते । बनारस म नीची बाग में उनकी छोटी-मी दुकान थी । पन्ना नालजी मुझे दो रुपये रोज देते और मैं उह 'महात्मा ईसा' पटक वा एक दश्य लिखकर देता था। दूसरे प्रकाशर 'मतवाला' के संचालक श्री महादेव प्रसाद सेठ थे, जिनकी मुस्य लत थी गुणिया पर आशिक होना। मुशी नवजातिय लाल, ईश्वरी प्रसाद गमा, शिवपूजन सहाय, मूयवान्त त्रिपाठी निराला' पाडय बेचन शर्मा उग्र' आदि में, जिमम जा भी खूविया थी उह खूब ही सहृदयता से परख, खूब ही प्रम मे पूजा महादेव सेठ ने । महादव वाचू 'निराला' जी पर एसे मुग्ध य पि उह गुलाब के फूल की तरह हृदय के निकट बटनहोल में मजाकर रमत य । अघाते नहीं ये महादेव सेठ उदायमान रवि निराता गुण यह तव की बात है जब निराला को काइ कुछ भी नही समझता था। अाज ता बिना कुछ समझे व कुछ समझने वाल समीक्षक स्वयमेवफा की भरमार- सी है। महादेव प्रमाद सेठ के सहदय बटनहोल में निराना मुझे ऐस आरपा लगे कि देखते-ही-देयते उसमें म ही में दिखायी पडन नगा । महादेव चायू से मरी पहली गत यह थी कहिए प्रापध, पि वह पच्चीस रुपये माहवारी मेर घर भनेंगे और स्वय जो पाएँग मुझे भी वही सिलाएँग दूरार दिन दोपहर म जय सेठजो अगूर साने घटे तव टमानदारी म अपन अा में प्राध अगूर उहाने मेरे सामने पण क्यि । इस पर मारा- याना दा से मैंने यहा यह गलत है।" "गनन क्या महा. गज' विम्मित हा पूछा प्रेमी प्रकार 71मन कहा "मेरी पापी यह गत नहीं थी कि मैं आपनी पूराक आधी पद। गत है कि ना पाप साएँ वहीं में भी माऊँ। आप राज प्राधा सरह पाय अगूर गात हैं ता प्रापा ही पाय मेरे लिए भो माया
करें।" मेरे इम उत्तर पर महादेव प्रमाद थ सो जान मे
कुरबान ।
महादेव प्रसाद मठ साहूकार वश में उत्पन हा यापारी
गादी पर बठन पर भा फला से लदे रसिक रमाल जसे थ
जिह अपन फन लुटापर द्विजगण का क्लरव श्रवण करना
ही रुचता था। लेकिन आदमी का सुख विधना का पहा
मुहाता है । मोमम वदना फन भड द्विज-दल उड-न स्वर
न गान न मण्डली न क्लरव । अप्रत्याशित पतझड पाया
महादेव मठ रूपी रमान अकाल ही सूप गया। पुण्य प्रनाशक
दिवगत महादेव प्रसाद सठ का चरिय परम उदात्त जिसके
लिए पन्ना नहीं पाथी चाहिए।
फिर भी यह सब म अाज लिख रहा हूँ विवेक का ठका
लेकर । जन तक महादव प्रसाद सठ थे में (गजल + माशूका
की तरह) उह गालिया हा देता रहा । और वह थ कि मेरा
मुह न दव मुझम जो कलाकार या उसी का सराहन चाहत थे।
लैक्नि दवन नहा थ महादेव मेठ । वह दाशनिय की
तरह अनादर ग्रादर के ऊपर हो रहत थ। बस एर हा दिन
उन्होंने मर दुवचना का विरोध किया और मुझ एठकर रप
दिया था। महाराज उन्हाने हुको की वा का घुना लम्बी
मूडा स डाइते हुए रहा पाप गाली एस को दिया कर जो
प्रापको उगा उत्तर द । म चुप रहूँ आप गालियाँ दन रह
माप कायर हा नाएंग।
महात्व प्रसार मठ के दम अहिंसक वाण न मरे प्राणा
वा पा रिता नरमारकर ग्य दिया। हम दाना एक ही
कमर म पात्र गउ पामर पर साया करत थ । पिछता रात
न मना रहा । मन में मन उह जगाया ही- महा
दव या मैं माता मारा मागता मझ ना नहीं पा रहा
प्रार" पारमा है उम तजम्बा परि न मरा चौटह
उग्रता पर सान धरते हुए आशीर्वाद के स्वर में कहा था, 'ये बडे आदमिया के लक्षण हैं।" 'निराला' ने जव उस पब्लिशर पर प्रत्याक्रमण किया तव वह मतवाला' कार्यालय ही म रहा करते थे । वह प्रकाशक पाया था उन दिना खूब ही विक्ती उग्र लिखित पुस्तका का प्राडर लकर। उसी वक्त मेरे किमी तीव्र ताने से तनकर मेरे ही टेबल पर से बडी छुरी उठावर 'निराला' सनमनाते सडक पर चले गए थ । 'मतवाना ऑफिस स सौ ही डढ सौ गजो की दूरी पर उन्होंने प्रकाशक पर पानमण किया । भगवान् न रक्षा की- दोनो मेरी छुरी साल ही रह थ कि पास- पडोस वाला ने उन्ह पक्ड लिया । इसके बाद निराला' ता 'मारकर टर रह' लेकिन वह प्रकाशन पलटकर पुन 'मतवाला' कायालय म पाया और महादेव सेठ पर गडगडाने लगा कि तुम्हा ने मेरो दुगति कराई है । जब वह नव भककर चला गया तव 'निराला जी पाये । निराला को देखते ही दृढ गोध से कडकर महादेव सेठ ने पहा, मेरे यहाँ कोई विजनम करने आयगा तो आप उसे मारेंगे। यह मैं वरदाश्त नही कर सकता । आप अपना विस्तर यहां से ले जाइए।" नतीजा यह हुआ पि वोरिया-बंधना सँभाल महाकविजी उस वक्त चलते फिरते नजर आए। अब पुन मेरी बारी पाई। मैंने यहा, "महादेव बानू । विस्तर आप मेरा भी बंधवाएँ क्यावि मेरी उत्तजना से 'निराला ने अपन अपमान या बदला लिया था । कानून हाथ म पर प्रकाशक ने पहले निराला' पर अपमानव प्रारमण क्या किया, सामवर अपनी दकान में ? मारी मडर पर पापा विजनम नही हाता । उहान 'मतवाला कार्यालय से काफी दूर पर स्वाभिमान का पह हिगाव सेटन रिया था। मो भी हाल में नहीं, मेरा पेनो
में। यह अगर गलती है तो उन की है 'निराला की नही।
और अन्त में महादेव प्रसाद मेठ ने महसूस किया कि
मावेश म प्रिय महारवि को विस्तर गोन करने का हुक्म
देकर उन्हान रिजनम की भावना पर तरजीह दी थी। वह
'निराना की वडी कद्र करत थ । भाग भाग उनके नय स्थान
पर गये । चरण पाटकर भावुक सहृदय सुपठित प्रकारक
महादेव प्रसाद सेठ ने महाकवि स माफी मागी।
निराला ने मतवाला के दरवाज पर आरर मुझ
बुनाकर गावागी के लहज म कहा तुम मद हा
निराना यक्ति पर भी सस्मरणा की निहायत चुस्त
पुस्तिका प्रस्तुन ग जा सकती है-उस रग की जिसस यह
भनके रि यह धरता है हमी आपमें से सपने सिद्ध न
दिउम रग का पिसम यह जाहिर हा कि वह पागमी तो है
अपाला और भीम जम पिन न ता उनमें हड्डी है और न
वान । वही हामानजी पिना पूछ के ।
२५१२
पाण्डय वचन गमा उग्र
कृपएनगर
दिना
सोरह
अपनी खवर
मनविवेचन पांडे, बल्द वजनाय पाडे, उम्र साठ साल,
क्रोम यरत्नन, पेगा प्रखयार-नवोसी और अफमाना
नवीसी, सादिन मुहहला सदपुर चुनार, जिला मिर्जापुर
(यू० पी०), हात मुशाम कृष्णनगर, दिल्ली ३१, प्राज
जिदगो के साठ साल सकुशल समाप्त हो जाने के उप
लक्ष्य मे उहें, जो कि मुझे रम या देग जानते हैं, अपने
जीवन के पारनिर बीस बरसोंदी घटनायासे मसनसातो
कहानी सुनाना चाहता हूँ ।
विरमीय मरत के १९५८वं वप के पोप गुत्ल
अप्टमी को रात साढे आठ बजे मेरा जम यू० पी० के
मिर्जापुर जिले की चुनार तहसील के सददूपुर नामय
मुहल्ले म वजनाय पाडे नामक पौशिक गोत्रोत्पन सरयू
पारीए ग्राह्मण के घर पर हुमा । मेरी माता का नाम
जयवली, जिसे विगाडवर लोग 'जयपल्लो' पुकारते थे।
मेरे पिता तेजस्यो, सतोगुसो, वणव-हृदय रे थे। मेरी
माता ब्राह्मणो होने के बावजूद परम उप्र, परान-पनापी
स्वभाव को थों । मेरे एक दजन वहन नाई थे जिनमे
अधिपतर पदा होते ही या सात-दो माल य होते होते
प्रभु के प्यारे हो गए थे। पहले भाइयों के नाम उमाचरण,
देवोधरण, श्रीचरण, 'यामाचरण, रामाचरण प्रादि थे।
इनमे अधिकतर बच्चे दगा दे गए थे, प्रत मेरे नाम पर
कोई सास उत्साह नहीं प्रस्ट रिया गया । गायद थाली
भी न यजापो गई हो, नौवत और गहनाई तो दूर की
गर
1
बात । मैं भी कहीं दिवगन अग्रजो को राह न लगू, अत
तय यह पाया कि पहले तो मेरी जम कुण्डली न बनायो
जाए, साथ ही जन्मते ही मुझे बेच दिया जाए। सो, जन्मते
हो मुझे यारो ने बेच डाला । और किस क्रीमत पर?
महज टके पर एक उसका भी गुड मगाकर मेरी मा ने
खा लिया था। अपने पल्ले उस टके मे मे एक छदाम
नहीं पड़ा था, जो मेरे जीवन का सम्पूर्ण दाम था।
अलबत्ता 'जन्मजात विका' या पिल्ला-जसा पाम तोक
की तरह गले मढा गया-चन । वेचन नाम ऐसा नहीं
जिसे प्रोमप्रकार की तरह भारत प्रचलित कहा जाए।
यह तो उत्तर भारत के पूरबी जिलो मे चलने वाला नाम
है, सो भी अहीरा, कोरियो, तथाकथित निम्न वर्गायों
मे प्रचलित । साह्मण के घर मे पदा होने पर भी मुझे
यह जो मद नाम बरगा गया उसकी बुनियाद मे मेरी
पहबूदा विदगी दराज की कामना हो यो। किसी भी
नाम से वेटा जिये तो । प्राज जीवन के ६० साल में
में साधिकार कह सकता हूं कि मुझे ही नहीं, मौत को
नो यह नाम नापस द ह । लेकिन, अब, इस उम्र मे तो
ऐसा लगता है यह नाम नहीं, तिलस्मी गडा है जिसके
मागे कान पा हपाण्डा भी नहीं चल पा रहा है ।
इम तरह-मैं गिरायत नहीं करता-देखिए तो
जहा मैं पदाहुना वह परिवार तो गरीय या नाम भी मुझे
जग नाच भुवन पर, राोपर, धनीराम, मनीराम
सूपनारापए सुमिनानादन सच्चिदानंद हीरानद
यात्स्यायन जरा नहीं मिला। गौर गोया इमस भी मेरे
दुनाब का मन्नाप नहीं हुप्रा ता मैंन प्रभा तुतलाना भी
नहीं गाया था कि पिता का स्वायाम हो गया। इसके
यार में पावर ना अरमप्राया जो विवाहित थे
और पिता के बाद घर के पालक थ । मेरे बटे भाई ने विधि से कुछ भी पढ़ा नहीं था, फिर भी बुद्धि उनकी ऐसी तीन थी कि वह हिदी तो बहुत ही अच्छो, साय हो सस्कृत और बगला भी खासो जानते थे, वद्यक और ज्योतिष मे भी टाग अडाने की योग्यता रखते थे। वह समस्या पूर्ति-युग के कवि और गद्य लेखक नी सासे थे। प्रूफ-शोधन तथा पत्रकार-कला से भी उनका धन- घोर सम्बध था। मेरे यह बडे भाई साहब जब जवान थे तभी सनातन धर्म के भाग्य मे, परिवार पद्धति के भाग्य म, सवनाश की भूमिका लिखी हुई थी । अतएव जाने अनजाने युग के साय भाई साहब को भी इस सव- नाग नाटक मे अपने हाथों पाव मे कुल्हाडी मारने का उन्मत्त पाट अदा करना पड़ा। हम नजदीक थे, अत भाई साहब का काम मे अधिक दुपदायी एव बुरा लगा। लगा दुनिया मे उन जसा बुरा कोई था ही नहीं। लेकिन जरा ही ध्यान से देखने से पता चल जाएगा कि मेरे घर मे जो हो रहा था वह अकेले मेरे ही घर का नहीं, क्मो- देश समाज के घर घर या नाटक था। और मैं उम लो की कहानी बतला दू जिसमे मैंने जन्म लिया था । सद्पुर मुहल्ले की एक गली-मन- टोली । गली के इस सिरे से उस सिरे तक ब्राह्मणों ही पभमान एक तरफ और दूसरी तरफ भी एक तेली तथा दो-तीन कोरियों के घरों दोहोड यारी जमीनें ग्राह्मणों फो। दो तीन घरों को छोड बाको सभी ब्राह्मण साते- पोते सासे । एकाध तो पूगोवाले भी। दक्खिनी नारे पर नानुप्रताप तिवारी, जिनके बडे-बडे दो दो मारा। फिर गगेच मुमई पाठर, फिर मेरे पिता की योग-भेम उन्नीम गृहस्यो, पचा भी हमों-रो, लेस्नि वद्य होने से उनके
हाथ मे कल्पवक्ष को डाल-जसो अलौकिर विभूति हमेगा
ही रही जिससे यह प्रभाव वाले और प्रभावहीन थे।
इसके बाद हमारे पट्टीदार भाई विध्येश्वरी पाडे का परि.
श्रमी, प्रसा परिवार । फिर ब्रह्मा मिथ यो हवेली। जय
मङ्गल त्रिपाठी का घर और प्रत मे बेच पाडे का सहन ।
एक भानुप्रताप तिवारी को छोड़ बाकी सभी ब्राह्मण
जामानी यत्ति वाले थे। हवेली वाले ग्रह्मा मिथ की
जजमानी सबसे ज्यादा थी । वा दगीचे, सेती-बाटी,
लेन देन भी होता था। वेचू पांडे उनक प्राधे के भागादार
थे। हम लोगा की जजमानी यू ही जयसीताराम थी।
कहिए हम शासदार निसारी थे । भिसारी सडक पर
कपडे फला या गलियो मे हाथ पसारकर भोस मागता
है लेकिन हने गरीव और ताह्मण जानकर जाने लोग
हमारे घर नीरा पहुंचा जाते थे। यह भीख भी गानदार
थी, तब तक ज्व तक ब्राह्मणा के घर मे ब्राह्मण पदा
होते थे । लेकिन जब ब्राह्मणो र घर मे ब्रह्मराक्षस पदा
होने लगे तब तो यह नगमानी वत्ति नितात क्मीना
पधा-स्थय नोचातिनीच होरर भी दूसरा से चरण
पुजवाना-रह गई थी। यह क्या प्राज से ५५ वप पूर्व
को है । तभी तयारथित सनातन धर्म के नाग का प्रारम्भ
उसी के अनुगामिया-धम के ठेक्दार ब्राह्मणों द्वारा हो
चुका था। मानो तो देव नहीं पत्यर | घम विश्वास पर
पनपता है । जिस जनरयन म मेरे बङ भाइ साह्य पदा
हुए थे उसरा विश्वास घम से उठ रहा था । मुहल्ले के
हर घर में एक्-न-एर ऐमा वान पा हो पुरा था
जो पुगना मपादाना और घम ने तार पर रसर
उतुल प्राचररा मे रत रहा करता था। और घर
यार मार मार परियार दे उम प्राणी का विरोध
।
बीग
करने में असमर्थ थे । शास्त्रा मे विधान है कि कुल धम विरुद्ध आचरण करने वाले को सडी अंगुली को तरह फाटर समाज-तन से अलग कर देना चाहिए। हम जब तक ऐसा करते रहे तब तक समाजमा स्वास्थ्य चुस्त- दुरस्त था। गलतीवश, मोदश, दुर्भाग्यवश जब से हमने गलि- ताग को अपना अग जागकर काट फेंकने से इकार कर गले से लगाना शुरू किया है, तभी से विप सारे गरीर मे व्याप्त हो गया है। अब से पचास साठ वप पहले अखिल भारतीय स्तर पर सहरू सहस्र ऐसे ब्रह्मराक्षस पदा हुए थे, जिहोंने कुपा के स्लो-पायजन द्वारा मारते-भारते सना तन धम को मार हो डाला । इस पूणता से कि वह सातन धम तो अब पुन जागने जीने वाला नहीं जिसके सरगना ब्राह्मण लोग थे। ब्राह्मण कुल मे मैं भी पदा हुआ हूँ। कोई पूछ सकता है कि सनातन धम या ब्राह्मण घम के इस विनाम पर मेरी क्या राय है। मेरी क्या राय हो सकती है ? मैं कोई व्यावसायिक 'राय' साहब नहीं । जो वस्तु नष्ट होने योग्य होती है, जिसकी उप योगिता सवथा समाप्त हो जाती है, वही नष्ट होती है, उसी का प्रत होता है। रहा मेरा ब्राह्मण बुरा मे पदा होना, सो उसे मैं नियति को भूल मानता हू। जब से पदा हुआ तब से आज तक शुद्र का गूद्र हू । 'जमना जायते शूद्र', मनुपावाश्य है कि नहीं-"सस्कारात द्विज- मुच्यते ।" जन्म से सभी शूद्र होते हैं, बाद को सस्कार द्वारा नव प्रज्ञा प्राप्त कर द्विज बनते हैं। यह सस्कार पाण्डेय वेचन शर्मा के पल्ले न तो बचपन मे पड़ा था, न जयानी मे और न प्राज तक । प्रादि से आज तक एर दिन भी जो ग्राहमण रहा हो उसे फिर मनुष्य-जन्म मिले, । इक्कीस फिर टट्टी की हाजत सताए, फिर राम राम के पहर आवदस्त लेने को घृरिणत घडी उसके हाय मे पाए। और अब इस साठ वप की वय मे यदि मैं शिकायत कर कि हाय रे, मैं सारे जीवन शूद्र-का-शूद्र हो रहा तो मुभ-सा मतिमद टाच लाइट लेकर ढूढने पर भी दुनिया में नहीं मिलेगा। सो, जसे मैं स्वय को बुरा नहीं मानता, वसे ही शूद्र को भी नहीं मानता। मैं जसे स्वय को भला ही समझता हू, वसे ही शूद्र को भी भला ही समझता हूँ। शूद्र द्विज (या ग्राह्मण) का पूर्व रूप है, वसे ही जसे मूर्ति का पूर्व स्प अनगढ पत्यर । और मैं अपनी शनगढता को गव से देखता हू, इसलिए कि जब तक अनगढ हू तभी तक विश्वविराट की मूर्तियो की सम्भावनाए मुझमे सुर- क्षित हैं। गढा गया नहीं कि एकरूपता, जडता गले पडी । श्रीकृष्ण की मूर्ति का पत्थर श्रीकृष्ण हो की मूर्ति भावना का प्रतीक रह जाता है । उसे राधा बनाना असम्भव है। सो, लो । मैं ऐसा अनगढ पत्थर जिसमे रूप नहीं, रेखा नहीं। और न ही विकट विकट भविष्य मे कुछ बनता-बनाता ही दिखायी देता है। फिर भी, मैं परम सतुष्ट इस कल्पना-मार से कि मुझे कोई एक बडा-से-बडा रूप नहीं मिला तो वला से मेरी, मैं अपनी अनगढता ही से खुश हू । यह अनाढना जब तक है तब तक कोई भी यानी सभी रूपमुभमे हैं । सर इन बातो मे क्या घरा है । मैं यह कहना चाहता था कि आज भी, में निस्सकोच शूद्र हू और ग्राह्मणों के घर म पदा होने के सवब-माधारण नहीं--प्रसाधारण गूद्र हू । ब्राह्मण ब्राह्मणी से मुझे शूद्र शूद्राणी अधिक प्रापपर, के, मालूम पड़ते हैं । यहा तक कि आज भी जब मैं खानाबदोगों, बजारों जिप्सियों का गदगी, जवानी, अपने प्रग बाईम - नादू और मूसता से भरा गिरोह देखता है तब मेरा मन करता है कि ललककर उही मे लोन हो जाऊँ विलीन । उही फे साथ आवारा घूमू फिर, फिसी हर जाई, पायारा, वजारन युवती के मादक मोह मे~~ नगर नगर,शहर शहर, दर-दर -छुरी, छुरे, मूंगे, कस्तूरी मग के नाफे, शिलाजीत बेचता । मेरा खयाल है अक्षरारभ से पहले ही मेरे कान में 'वेश्या' या 'रण्डी' शब्द पड़ चुका था। मैं पांच हो-छ साल का रहा होऊँगा जब मेरे घर में मिर्जापुर को एक टकल वेश्या का प्रवेश हुआ था। पुरुष वेश मे धूडीदार चपकन और पगडी पहनकर वह बाहरवाली कोठरी मे रात मे प्रायी और तब तक रही जब तक मेरे चाचाजी हाय मे खडा लेकर उसे मारने को झपटे नहीं- यथायोग्य दुवचन सुनाते हुए । मुहल्ले के प्राधे दजन मनचले ब्राह्मण युवक उस वेश्या से मिलने मेरे यहां पा जमते थे। मकान पे प्रदर को ग्रामरिणया मेरी मां शोर भाभी किकतव्यविमूढा हो गई थों। भाभी तो रोने भी लगी थी। पर ये कुलीन औरतें मुखर विरोध करने में असमय थी, इसलिए कि मेरे उमत भाई साहब एफ ही लाठी से दोना ही को हाक्ने मे कोई ग्लानि या हानि नहीं समभते थे । वसे यह मद जमावडा मेरे घर हुअा था, लेकिन हमप्याले लोग पडोसी ही थे । नेता ( यानी मेरे पिता) के उठ जाने से मेरे घर मे प्राण्ड प्रराजपता यो । लेफ्नि वश चलता और मजदून सर- परस्तों का शासान होता, तो दूसरे यार भी अपने घरों मे येन्या को टिवाकर सुरा सुदरी-स्वाद लेने से बाज न माले । पाप पर मोहित सभी थे । सभी थे तत्वत घम से पिरहित । जुना तो प्राय मुहल्ले के किसी भी ऐईस फिर टट्टी को हाजत सताए, फिर राम राम के पहर प्रावदस्त लेने की घृणित घडी उसके हाय मे पाए। और प्रब इस साठ वप की क्य मे यदि मैं शिकायत कर कि हाय रे, मैं सारे जीवन शूद्र का-शूद्र हो रहा तो मुभ-सा मतिम द टाच लाइट लेकर ढूढने पर भी दुनिया मे नहीं मिलेगा। सो, जसे मैं स्वय को बुरा नहीं मानता, वसे हो शूद्र को भी नहीं मानता। मैं नसे स्वय को भला ही समझता हू, वसे ही शूद्र को भी भला हो समझता हूँ। शूद्र द्विज (या ग्राह्मण) का पूव रूप है, वसे ही जसे मूर्ति का पूर्व स्पअनगढ पत्थर । और मैं अपनी अनगडता फो गव से देखता हूं, इसलिए कि जब तक अनगढ हू तभी तक विश्वविराट की मूर्तियों की सम्भावनाएं मुझमे सुर- पित हैं। गदा गया नहीं कि एकस्पता, जडता गले पडी । श्रीकृष्ण को मूर्ति का पत्थर श्रीकृष्ण हो को मूर्ति भावना का प्रतीक रह जाता है । उसे राधा बनाना असम्भव है। सो, लो । मैं ऐसा अनगढ पत्यर जिसमे रूप नहीं, रेखा नहीं । और न ही विकट विक्ट भविष्य मे कुछ बनता-बनाता ही दिखायी देता है। फिर भी, मैं परम सन्तुष्ट इस कल्पना-मान से कि मुझे कोई एक बडा-से-बडा रप नहीं मिला तो वला से मेरो, मैं अपनी अनगढता ही से खुग है। यह अनगढना जब तक है तब तक कोई भी यानी सभी स्पमुभमे हैं । सर, इन बातों मे क्या धरा है । मैं यह पह्ना चाहता था कि आज भी, मैं निस्सोच गूद्र हू और ग्राह्मणों के घर म पदा होने के सवर-माधारण नहीं -प्रसाधारण गूद्र हू । ब्राह्मरण पाहारगी से मुझे गूद्र-गूदारणी अधिक प्रारषक, अपने अग के, मातम पड़ते हैं। यहां तक कि आज भी जब मैं सानाबदोगों, बजारों मिप्सियों का गदगो, जवानी, । बाम नादू और मूसता से भरा गिरोह देखता हूँ तब मेरा मन करता है कि ललककर वहीं मे लोन हो जाऊँ, विलीन । उहों के साथ आवारा घूम फिर, पिसी हर जाई, मायारा, बजारन युवती के मादफ मोह मे-- नगर नगर, बाहर शहर, दर-दर-छुरी, छुरे, मंगे, पस्तूरी मग के नाफे, शिलाजीत बेचता। मेरा खयाल है अक्षरारभ से पहले ही मेरे कान में 'चेश्या' या 'रण्डो' शब्द पड़ चुका था। मैं पाच-ही-छ साल का रहा होऊँगा जव मेरे घर मे मिर्जापुर की एक टकल वेश्या का प्रवेश हुआ था। पुरष-वेल में घडीदार चपकन और पगडी पहनकर वह बाहरवाली कोठरी मे रात मे आयी और तय तक रही जब तक मेरे चाचाजी हाय मे खडाऊ लेकर उसे मारने को झपटे नहीं- यथायोग्य दुवचन सुनाते हुए । मुहाले के प्राधे दजन मनचले याह्मण युवक उस वेश्या से मिलने मेरे यहा पा जमते थे। मकान के प्रदर को ग्राह्मगिया मेरी मां और भाभी विक्तव्यविमूढा हो गई थी। भाभी तो रोने भी लगी थी। पर ये कुलीन प्रऔरतें मुपर विरोध करो मे असमय यों, इसलिए कि मेरे उमत्त भाई साह्य एक ही लाठी से दोनों ही को हॉपने मे कोई ग्लानि या हानि नहीं समभते थे। वसे वह मद जमावडा मेरे घर हुमा पा, लेकिन हमप्याले लोग पडोसी ही थे । नेता (यानी मेरे पिता ) उठ जाने से मेरे घर में प्राण्ड पराजरता थी। लेकिन वा चलता और मजयूत सर- परस्तों का शासन न होता, तो दूसरे पार भी अपने घरों मे ये या यो टिराफर सुरा-सुदरी-स्वाद लेने से याज न माते। पाप पर मोहित सभी थे । सभी थे तत्त्वत पम से विरहित । जुमा तो प्राय मुहल्ले के किसी भी
घर मे सिलाया जाता था, जिससे उस घर के किसी-न
किसी प्राणी को नाल के रूप मे एक-दो रपये भी मिल
जाते थे। मेरे घर मे जुआ अक्सर हुमा करता । अक्सर
जुए से जब नाल को रकम वसल होती तब मेरे घर मे
भोजन की व्यवस्था होती थी, पाटा, चावल, दाल और
नमक पाता था । मेरी मां और भाभी को मकान के
पिछने खण्ड मे कद कर मेरा भाई बिचले खण्ड मे जुए
का फड डालता, जिसमे मुहल्ले, कस्बा और प्रासपास
गावो के भी शातिर जुमारी जुडते । चरस और गाजे को
चिलमे लपलपाती, यौडा यानी विक्ट देसी दारू की
दुग वनयी बोतलें खुलती । जय भी मेरे घर मे जुमा
जमता भाई की प्राज्ञा से दरवाजे पर बठकर में गली के
दोनो नाके ताडना रहता कि पुलिस वाले तो नहीं आ
रहे हैं। जहर इस ड्यूटी के बदले पसान्दो पसा मुझे
भी किसी परिचित जुमारी से मिलता रहा होगा । जुए
को इस जबरदस्त जाड मे मेरा भाई इस बदर पड़
गया था कि भाभी के सारे गहने बिक गए या प्रत मे
विम जाने के लिए गिरवी रख दिये गए। फिर मेरी मा
के गहनो की वारी प्राई । जिसने अपना सचय सौंपने मे
जरा भी हिचर दिखलायो उसे भाई साहब ने जूता,
थप्पों, घूसों, लातों से पूरा-प्रक्सर गांजा चरस या
गराव के नगे मे । या तो भाई मुझे भी मारता पोटता
था, येसवय, बहुत बुरी तरह अक्सर लेकिन वह जब
मेरी मां को मारता और यह अनाया विवमा रोती
घिधियाती ( लडा अपना ही था, प्रत खुलकर रो
घिधिया भी नहीं सक्ती यो) तब भाई का प्राचरण
मुझे बहुत ही बुरा मालूम पडना या।पर मैं कर ही क्या
सरता था । चार-पाच साल का बालक ! उसके सिर पर
चौबीस
-
घर को सरदारी पगडी बांयी गई थी। परिवार का नेता था वह । अनदाता था वह । सो, मेरी भाभी- प्राई के गहने जब जुमा यज्ञ मे स्वाहा हो गए तब घर के वरतन भाडों की शामत आई। जितने भी काम या दाम लायक बरतन थे, या तो प्रडोसो पडोसी के घर गिरों घरे गए या पांच रुपये की वस्तु रुपया दो रुपया मे वरवाद की गई। इसके बाद बाहरण के घर मे जो दो-चार धम- प्रय थे-भागवत, गण्डपुराए, रामायण, गोता-मेरे भाई ने एक एक पो दोनो हायों से बचकर प्राप्त रकम को या तो जुना मे अयवा गाजा चरस के घुमा दिया। इसके बाद दो चार बोधे दान-दक्षिणा मे मिले जो सेत थे उनकी नौबत आई । खेती को भी बपक या भोग घर रखकर भाई साहब ने रपये उतारे और उनका दुरुपयोग निस्सकोच भाव से किया। और कर्ज और पज और पद्ध! भाई के राज में परिवार ने जव जो भी पाया साया कर्जा। उहों दिनों, एक दिन, छापा मारकर चुनार को पुलिस ने सद्पुर मुहरले के जुआरियों और उनके सगियों को रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया था। जुमा उस दिन मेरे घर में नहीं मेरे घर के पिछवाडे अलगू नामक कुम्हार के घर मे हो रहा था। उस दिन मेरे भाई साहब शुए मे शामिल नहीं थे, एक दोस्त की यठक मे उपन्यास पढ रहे थे। लेकिन पुलिस छाप के ठीक पहले अलगू के पर यह सूचना देने गये थे वहीं से पपर-सूराग पार कि भागो, पुतिस मा रही है, कि पुलिस वाले माहो धमके। मायद सबसे पहले मेरे नाई साहब ही पुलिस की पकड में माये थे। गिरफ्तार दर्जन भर जुमारी हुए होंगे। फिर भी, कई जान लेकर जूते छोडरर भाग गए। उन जूनों पच्ची
की लम्बी माला अलगू कुम्हार से ही तयार कराने के
बाद उसीके गले मे डालकर, जुलूस बनाकर जब पुलिस
वाले राजपय से जुआरियो को हवालात की तरफले चले
तो बघुनो मे मेरा भाई भी था । उस भयकारी जुलूस
के पीछे काफी दूर तक अपने भाई या अनदाता के लिए
रोता
हुमा मैं भी गया था। फिर घर लौटने पर देसा
प्राई और भाभी रो रही थी। काफी दिनों मिर्जापुर में
केस चलने के बाद उस मामले मे भाई को पचास रुपये
जुरमाना हुमा ।
और चुनार मे रहने का अब कोई तरीका बच नहीं
रहा । और कजदातानों से बेइज्जत होने का प्रसग पगे
पो प्रस्तुत होने लगा । और घर मे अबलाएं और बच्चे
दाने-दाने के मोहताज हो गए। तब और तभी मेरे बडे
भाई को देस छोड परदेस जाने और कमाने की सूभी।
फलत वह पहले काशी और बाद मे अयोध्या की राम
लीला मडलियो मे एक्टिग करने लगे । तनखाह पाते थे
दोनों वक्त फी भोजन और तीस रपये मासिक । इन
रुपयों मे से दस पाच अक्सर वह चुनार भी भेजते थे।
पर चुनार मे अवसर नहे डड ही पेला परते थे, या
जामानी से भिक्षा मिल जाती थो, या मेरी आई क्सिो
को मजूरी पर फूट-पीसकर लाती यो । बडो मुरिलों से
सुबह खाना मिलता तो गाम को नहीं, गाम मिलता तो
सबेरे नहीं । जहाँ भोजन-वस्त्र के लाले वहा शिक्षा-दीक्षा
यी क्या हालत रही होगी, सहज हो अनुमान लगाया जा
सस्ता है । पिपा-दीक्षा दूर, मेरे सामने तो पाखें खोलते
हो जीवन प्रपका जोपाठ पहा वह गिक्षा-दीक्षाकोचौपट
करने वाला था। जीवन को स्वग और नरक दोनों हो
या सम्मियण कहा जाए तो मैने नरक के प्रायपक सिरे
एबीस
से जीवन-दशन प्रारम्भ किया और बहुत देर, बहुत दूर, तक उसी राह चलता चला । इस बीच मे स्वग की केवल सुनता हो रहा मैं । मेरी कोशिश सही न होगी, स्वग जीवन मे मुझे कहीं नजर आया नहीं। और नरक को तलाश मे किसी भी दिशा मे दूर तक नजर भटकाने की जरूरत ही नहीं पड़ी । सो, समय पर न मिले तो स्थग के लिए भी कौन प्रतीक्षा करे । नरक लाख बुरा बदनाम हो, लेक्नि अपना तो जीवन-सगी बन चुका है, सहज हो गया है, रास प्रा गया है । डालडा साते खाते जसे शुद्ध घत की सुध बुध भी समाप्त हो जाती है, पह चान परस तक भूल जाती है, वसे ही लगातार सुलभ होने से नरक भी धीरे धीरे परिचित, प्रिय, प्रियवर पानी प्रियतम हो जाता है । ग्रालिब ने अपने ढग से पहा रे-"क्यो न फिरदौस को दोजख से मिला दें या रख ! सर के वास्ते थोडी-सी फिजा और सही।" जब मेरे पिता जीवित थे तभीनजाने फसे मेरे दोना बडे भाइयो को रामले ला मे पाट करने पा चस्का लग गया था। ये किशोरावस्था ही में ऐसे चैपहे हो गए थे कि कुल और पिता को पता बताकर चुनार से मिर्जापुर भागकर रामलीला में राम-लक्ष्मण का अभिनय करने लगे । प्रोध और भविष्य के भय से कापते हुए पिता, जव मिर्जापुर पहुंचे तो क्या देखते हैं हि दोनो सपूत राम- लम्मण मने रगमय पर शोभायमान हैं । पहते हैं यह दृष्य पिता से देखा न गया । जनता को भूल, स्टेज पर भपद लाहों के माये से मुकुट किरीटादि नोच-फेंक यहीं रो उहें मपन्यिाते भूले वाहों को तरह यावकर घुनार ले पार थे। पिता ये देहान्त के बाद धुनार को विनय सताईरा दामो बातो सोना में, अक्सर वह कोई-न-कोई पाट । हो 'प्ले' किया करते थे।धुनार हो में एक दो बार सीता बनाकर मुझे भी बडे भाई ने इस घाट पर उतार रखा था। जब वह अयोध्या की रामलीला-मडली में थे तब मुझे उहोंने बनारस की एक लीला-मडली में अपने किसी खत्री मिन के हवाले कर रखा था। तब मैं पाठ साल का रहा होऊँगा या नौ का । जुल्फो में तीन-तीन फूल चिडी बनाता था। काफी तेल लगाने के बाद बालों में सस्ती वेसलिन भी लगाता था । वह वेसलिन, जिसकी गव पिला हाउस (बबई) या सरक्टा गलो (कलकत्ता) को सस्ती वेश्याओ के अग से पाती है । कुछ ही दिनों बाद भाई साहब ने बनारस वालो को मडली से मुझे भी साधुओ को रामलीला-मडली में बुला लिया था। भाई साहब की नजर में मेरे उनके सग रह्न में अनेक फायदे थे। पहले तो घर में कोई शरारती नहीं रहेगा, दूसरे उनको निगरानी में रामलीला वालों को बुरी हवा से मैं बचूगा तीसरे ब्वाय सरट' चौबीस घण्टे हाजिर-बिला तनसाह । ऊपर से रामलीला में लक्ष्मण और जानकी बनकर पाठ दस रुपये मासिक क्मा कर देने वाला। उन दिनो रामलीला के निश्चित पाटों के सवाद वाजवान करने के अलावा भाई का एक मिन वरागी पखावजी मुझे ताल और स्वर यानी पक्के रंग के सगीत को शिक्षा भी दिया करता था। उहीं दिनों नाचना नहीं, तो नाचने को चुस्ती से चचन चरण चलाना, ठुमुक्ना, यिरक्ना, बल खाना वगरह भी मुझे सिखलाया गया था। छुटपन में मेरो गिया विलकुल प्रार भिक क ख ग दरजा तक हुई थी। अभी थोडा हो बहुत मक्षर-गब्द ज्ञान हो पाया या कि मुझे ऐसा लगा कि यह पड़ना-पाना मेरे बलबूते की बात नहीं है। मगर इससे अठाईरा गला छूटे तो कसे? सुना था हनुमानचालीमा का पाठ करने से सारे दुप दूर, मसले स्वयमेव हल हो जाते हैं । लेकिन हनुमानचालीसा मेरे पास कहा ! साथ ही पास में 'पोसा' कहा कि हनुमानचालीसा खरोदा जा सके। मैं जिस दरले में पढ़ता था उसी में एक काला सा लडका था किसी छोटी जाति का । वह अपने बस्ते में रोज हनु मानचालीसा की एक प्रति ले पाता था। और मैं ललचा- पर, तडपकर रह जाता था उस दो पसे को निस्यात पुस्तक के लिए । अन्त में मैंने चोरी करने का निश्चय किया । मैं ऊँच लडका, वह नीच, लेकिन मैंने उसकी हनुमानचालीसा धुरा ली और बडे चाव से मैं उसका पाठ करने लगा । मुभमें जो ग्राह्मण है यह आज भी यही सोचता है कि वह हनुमानचालीसा ही का प्रभाव था कि स्कूली शिक्षा से हटाकर मुझे रामलीता-मडली में डटाया गया । यहा पर मेरा परिचय श्रीरामचरित. मानस से होना ही था क्योंदि मैं जानकी, लक्ष्मण और भरत तक का पार्ट किया करता था। रामलीला-मड- लियों ही में मैने सुलझे सापुत्रों के प्रत और निष्ठापूर्वक नवरात्रियों के नौ दिनों में रामायण का पाठ होते देखा। सुना, ऐसे पाठ के फल अनन्त । सो, मैंने नौ-दस ग्यारह पो यय में सामर्थ्यानुसार श्रद्धा भक्ति से रामायण के नवाह पाठ पिये। एक नहीं, अनेक। इन लोला पारियों फोमडली में फुरसत फे प्रसरों में लोग प्रत्याक्षरी-सम्मे- लन भी अक्सर दिया करते थे, जिनमें ज्यादातर तुलसी पृत रामायण से ही उदाहरण दिये जाते थे। इन सम्मे लनों से भी मुझे रामायण का स्पा अधिकापिर होने सगा था। उन दिनों रामायण के निविय ना मेरे कठाप, जिद्वाप रहा करते थे। और उन दिनों बनतीस
रामलीला में अभिनेता सवाद फसे रहते थे ? पहले
रामायणी चौपाई या दोहा अघ स्वर में सुनाता, फिर
अभिनेता उसका (रटा या ज्ञात) अय जनता को सुना
देता था। रामायणी कहना-देवि, पूजि प रमल
तुम्हारे, सुर नर-मुनि सब होहिं सुखारे । तब सीताजी
कहती-हे देवि ! तुम्हारे सव-पूज्य पद कमलो को पूज
पूजकर सुर, नर और मुनि सभी सुख पाते हैं । सवाद
की इस विधि में अक्सर अभिनय और उसके प्रभाव
का खून हो जाता था, पर जो जनता लीला देखने
प्राती थी वह रामलीला को थिएटर न समझ किसी भी
भाव, भाषा या भेस में भगवान् भगवतो की भावना
मान से प्रभावित होने वाली होती थी। एक बार कहीं
भरत का पाट करने वाला हमारा सगी बीमार पड गया।
अव मुश्किल यह सामने आई कि भरत का कठोर काम
करे तो कौन ? इस पर मेरे बडे भाई ने मडली के
मालिक महत को वचन दिया कि वह चिन्ता न करें,
भरत का काम वेचन कर लगा । मुभसे उहोने गांजे के
नो में चूर पाखें दिखाकर पहा-भरत के काम में
जरा भी भूल को तो याद रहे, लीला भूमि से ही पीटते
पीटते तुझे डेरे पर ले चलूगा । उनसे पिटने का मुझे
इतना डर था कि भरत तो भरत वह धमकाता तो मैं
कमसिनी भूल दशरथ का पाट भी अदा करके रख देता,
रावण का भी । उस दिन राम के वन-गमन के बाद
ननिहाल से बेहाल लौटे भापुर भाई भरत का सवाद
या कौगल्या के प्रागे । वसिष्ठ को सभा में परम साघु
बडे भाई के मोह में भरत को रोते चिरित दिया है तुलसी
दासजी ने । मुझे रोना पाया या बडे भाई के वर भय से ।
और मैंने बहुत ही सावधानी से भरत का अभिनय किया।
तीस
रामायण मुझे याद हो यो, सो बिना रामायणी का मुष देखे सवाद की चौपाई पर-चौपाई, दोहे-पर-दोहे अर्थ- सहित मैं सुनाता गया । मैं रोता था भाई के भय से, जनता ने समझा भरतजी अभिनय रला का शिखर छू रहे हैं । खूब ही जमा मेरा काम । महतजी प्रसन्न हो गए और स्टेज ही पर दस रुपये इनाम, तथा एक रुपया महीना तनसाह बढ़ने की घोषणा हुई । बधाइयां और इनाम के रुपये भाई साहब के पल्ले लगे। पांव तो उक्त दिन भी में भाई साहब के दाबता रहा तब तक जब तक वह सो नहीं गए.-हा उस दिन उहोंने नित्य की तरह, पाव दववाते दवयाते दो चार लातें नहीं लगाई कि में ठीक से क्यों नहीं दबाता कि मैं झप- शियां क्यों लेता ह?
धरती और धान
"अरे बेचन | न जाने कौन आया था-उद जी, उद जी,
पुकार रहा था
ये शद मेरी दिवगता जननी, काशी मे जमी
जयफ्ली के हैं जिहे मैं 'प्राई' पुकारा करता था ।
यू० पी० मे माता या माई को प्राई शायद ही कोई कहता
हो। महाराष्ट मे तो घर घर मे माता को प्राई हो
सम्बोधित किया जाता है । कसे मैंने माई को प्राई माना,
धाज भी विवरण देना मुमकिन नहीं। लेकिन बम्बई
जाने पर जब लक्ष लक्ष महाराप्टियो के मुह से 'प्राई'
सुना तो मेरे प्रातरिक हप की सीमा न रही । जो हो।
मैं यह कहना चाहता था कि मेरी जननी इस क्रदर अन
पद थी कि जो साथक्ता उहे 'उद'जी मे मिलती थी
वह 'उग्र जी मे नहीं। बिलकुल नहीं। उनसे जब मैंने
अपने जम के समय के बारे मे पूछा तो उहोंने बतलाया
कि पौष शुक्ल अष्टमी को रात मे जब तुम्हारे पिता
विहारीसाहु के मदिर से पूजा करके लौटे थे तब तुम
पदा हो चुके थे। दूसरा पता उहोंने यह दिया कि तुम्हारी
बारही के दिन माता दयाल का जन्म हुआ था। यह
माता दपाल मेरे भतीजे थे। पिता दिवगत वजनाय
पाडे चुनार के सासे घनिक वणिक बिहारीसाहु के राम
मन्दिर मे वतनिक पुजारी ये । वेतन या रपये पाच माह
पार । साथ ही चुनार मे जजमानी-वृत्ति भी पर्याप्त
पो। उहों में एक जजमान बहुत बहा जमादार या
बत्तीस
जिसके मरने के बाद उसके दोनों पुत्रों मे सम्पत्ति के लिए घोर अदालतो सघष हुआ। उसी मुकदमे मे जमींदार के बडे लडके ने पुल-पुरोहित की हैसियत से मेरे पिता का नाम भी गवाहो मे लिसा दिया था, गोकि उोंने भाई के दृन्द्र में पड़ने से बारहा इन्कार किया था । नये जमीदार ने मेरे पिता को प्रलोभन भी 'प्रापर' दिये। लेकिन वह भद्रभाव से अस्वीकार ही करते रहे कि समन प्रा धमका । लाचार अदालत में हाजिर तो वह हुए, पर पुकार होते ही उहोने कोट से साफ साफ कह दिया कि उहें माफ करे छोट, उनको गवाही उस पार्टी के विरुद्ध पड़ सकती है जिसने गवाह बनाकर उहें अदालत के सामने पेश कराया है । सब तो आपकी गवाही जरूर होनी चाहिए, अदालत ने आग्रह किया और गवाही हुई। कहते हैं उसी गवाही पर कोट का सारा फैसला प्राधारित रहा । बड़ा भाई हार गया । वही जिसने मेरे पिता को गवाह बनाया था। जोत छोटे भाई को हुई । इस सबमें पिता के पल्ले सिवाय सत्य के और कुछ भी नहीं पडा । घर की बुढिपा इसके लिए वजनाय पांडे को बराबर गव से पोसती रही, कि उसने जरा भी टेढ़ी-मेढ़ी यात न घर खरे सच के पौधे एक अच्छो जमींदारी हाय से खो दी। चुनार मे बजनाय पांडे की जजमानी पोरी हो पो। रिक्टस्य जलालपुर माफी गांव में जमीन भी पद बीघे थी जो-और पुछ नहीं तो साल का खाने भर अनाज और पशुओं के लिए मुस पर्याप्त दे सक्तो यो । यस इतो में हो वजनाय पांडे अपने पुनवे पासच अपने दायरे में मजे में चला लेते थे--यहां तक मते में दि सारी जिदगो विहारीसाहु के मन्दिर में वेतन- भोगी पुजारी रहे, पर वेतन लिया फनी नहीं और मर वैती भी गए । बजनाथ पांडे सस्कृत के साधारण जानसार, जजमानी विद्या निपुण, साथ ही गीता के परम भक्त, शव परिवार में पदा होकर भी वएव प्रभाव भाय सम्पन थे। कहते हैं बजनाथ पांडे सम्यक चरित्रवान, सुदशन और सत्यवादी थे।वहते हैं वह चालीस वप ही को उम्र में बकुण्ठ बिहारी के प्यारे हो गए थे। कहते हैं इतनी ही उम में वह बारह बच्चा के जनक बन चुके थे। मेरे कहने का मतलब यह कि वजनाथ पाडे अच्छे तो थे-बहुत-लेक्नि अन-बलेस्ड भी कम नहीं थे। सो उह क्षय रोग हुआ, जिससे असमय में ही उनके जीवन-स्रोत का क्षय हो गया। कहते हैं क्षय में बकरे की सनिकटता, बकरी का दूध, उसी के मास का स्वरस बहुत लाभदायक होते हैं । हमारा परिवार शाक्त, हम छिपकर मासादि ग्रहण करने वाले, फिर भी बजनाथ पाडे ने प्रारणो के लिए अवष्णवी उपाय अपनाना अस्वी कृत कर दिया । अपने पिता की एक भला-मात्र मेरी प्रासो में है । मदिर से आकर ब्राह्मण-वेश में किसी ने मेरे मुह में एक आचमनी गगाजल डाल दिया, जिसमें बताने धुले हुए थे। मैं मा का गोद में था। उसने बतलाया, चरणामत है बेटे । क्तिना मीठा । मैंने अपने पिता को धुरो तरह बीमार देखा, घर में चारो प्रोर निराशा ! पिता का मरना आई का पछाड सा साकर रोना मुझे मजे में यार है । यद्यपि तव में बहुत छोटा रोगीला, वेदम-जसा याला था। जब मेरे पिता का देहान्त हुआ मैं महज दो साल और छ महीनों का या। यानी मैंने जब जरा हो प्रांखें खोलकर दुनिया को देखा तो मेरा कोई सरपरस्त नहीं । प्राय जमजात अनाय-ऐसा- जिम पर क्मिी का भी वरदहस्त नहीं रहा । पिता भाई । चौंतीस ।
बहन मिलाकर हम चार जने, भाभी और माता को
अनाय कर दिवगत हुए थे । बहन बडो पार पाहता
थी, फिर भी घर मे खाने को थे प्राधा दजन मुख और
पमाने वाला हाय एक भी नहीं था । खेतीवाडी इतनी
ही थी कि वर्ता हो उससे जीवन-यापन कर सरता था।
इधर मेरे दोनो भाई रामलीला फरने पर प्रामाश थे।
कलिकाल विकराल पा रहा था--भागा भागा, सनातन
धम, कमकाण्ड, वरण व्यवस्था, सारे-का-सारा मण्डल जा
रहा था भागा भागाधम कालोप हो रहा था। परिवार
दूर रहा था। प्रथ-टका युग का उदय हो रहा था।
जब पिता का देहात हुमा मेरा बडा भाई वाईस वप का
रहा होगा । उसका विवाह हो चुका था। मेरी भाभी
घर पर ही थीं । मभला भाई सोलह-सतह साल का रहा
होगा, जो पिता-मरण के कुछ ही दिन के अदर बड़े
भाई और भाभी से लडकर घर से अयोध्या भाग गया
और साधु बनकर रामलोला-मडलियों में अभिनय करने
लगा था। तब में चार साल का था। सारे तन मे पेट
परम प्रधान । मेर देह मे बह रोग था जिसमे प्रायुर्वेदीय
चिकित्सक लोह पो भस्म या मडूर पिलाते हैं। मेरी पाई
के मरे और जीधित अनेक बच्चे थे, पर चाची के एक
वन्या के अलावा कोई भी जीवित न था। सो, उनके मन
मे पुन का मोह था। दोनो घरों मे सबसे छोटा वालक
में ही था। चाची मेरी माई से तो पसार भगडती यों,
लेकिन मुझे उनका वात्सल्य प्राप्त था । पाते हो प्यार से,
पुचकार से यह मुझे कुछ न कुछ साने को देती । लेकिन
इसपा पता लगने हो मेरो पाई परित्री परवठ पसारे
हए पायों पर मुझे पट लिटा, देवरानी को दिसा दिखा,
पतीय मुना-सुनायर धमार की धुन मे धमकती यो। एक तो
३
।
ग्राह्मण क्रोधी होता ही है, दूसरे हम परम क्रोधी कोशिश
यानी विश्वामित्र के गोत्र वाले, तीसरे मेरी प्राई अनायास
हो भयानक क्रोध करने वाली थीं। मैं सोतह साल का
हो गया था तब भी वह मुझे मारने को ललक्ती थीं।
एक बार तो अनेक झाड उहोने मुझ पर भाड भी डाले
थे । मभले भाई श्रीचरण पांडे तो प्रोधी नहीं थे,
लेकिन उमाचरण और बेचन अपने अपने समय पर परम
क्रोधी व्यक्ति बने । हम सबमे माता के स्वभाव का
प्रभाव खासा था। लेकिन क्रोध माता करे या पिता,
पति करे या पत्नी, बालक करे या युवा, होता है--पाप
फा मूल । 'जेहि वस जन अनुचित करहिं चरहि विश्व
प्रतिकूल' । सो, माता के क्रोध का कुफल माता को मिला,
भ्राता के क्रोध का भ्राता को। खुद वेचन पाडे को प्रोष
का कुफल जो मिला उसे मैं ही जानता हूँ और अच्छा करता हूँ
कि डायरी नहीं लिखता, वरना दुनिया जानती। अपने बारे
मे दुनिया को क्या जनाना चाहिए क्या नहीं, इसी का
नुस्सा 'विनय' मे गोस्वामीजी ने खूब बतलाया है । 'क्येि
सहित सनेह जे अघ, हृदय राखे चोरि, सग बस क्येि
गुभ, सुनाये सरल लोक निहोरि ।' यानी परम प्रेम
पूवर क्येि हुए प्रचण्ड पापा को तो हृदय को प्रघ
कोठरी मे छिपा रसाा, लेकिन किसी दूसरे के सग मे
होने के कारण भी कोई भला काम बन पडा हो तो
उपका ढोल मूसतों पोटना । चार सौ वष पूर्व ही जसे
महारवि ने बीसवीं सदी के उत्तर का साना खींचकर
रख दिया हो । मेरो पाई परम प्रोपिनी यों, साय हो
परम भोली । जव भी उहोंने रिसी बेटे को रुपया
भुनाने को दिया होगा बेटे ने साढ़े पद्रह प्राने हो लौटाए
होंगे । इस पर दूसरे बेटे ने कहा होगा-मां, बडे ने
धनीस
पसे गलत तो नहीं गिने ? ला तो, फिर से गिन दू । और फिर से गिनने मे वह साढे पन्द्रह पाने की जगह पद्रह प्राने ही को सोलह बतला मां को दे देता । और वह रख लेती। वह परिश्रमी भी जबरदस्त थीं। हमारे लम्बे चौडे दरिद्र कच्चे घर को होली दिवाली पर वह अकेले हो कछाड बाँधकर पोतनी या पीली मिट्टी से दिव्य पर देती थौं । फटे पुराने कपड़ों को फया बहुत अच्छी तो नहीं, फिर भी ऐसी सी देती थी जिसे सरवी के दिनों में वरदान की तरह लोग प्रोढ़ते विधाते थे। पाराज गला पल्प बना उसको भद्दी टोकरियां बना लेती थीं । सीप वेपसेतो सासे बना लेती थीं। व्याह-गोना, क्या यगरह में सामयिक गीत गानेवालियों में वह प्रागे ही रहना चाहती थीं । मेरा भाई जब परदेश होता और घर में भूनी भाग भी न होतो, तब आई मुहल्ले-टोले से मन- प्राध मन गेहूं ले पातों, एक निहायत फरण गीत गाती- गातो मेरी तरपी भाभी के साथ उसे पीसती । तब पुछ पसे मिलते, तब हमारे घर चूल्हा चेतता, मुह नियाले लगते । मैं खुश हो चहकने लगता और प्राई पहायत सुनाफर पुग हो जाती-'पेट में पटा पारा, लो नाचे . लगा पेचारा"
चुनार
रामवद्र भगवान् सरयू नदी के किनारे पदाहुए थे, मैं पदा
हुआ गगासुरसरि के किनारे।मुझे सरयू उतनी अच्छी नहीं
लगती जितनी नर, नाग, विवुध बदनी गगा । रामचन्द्र
भगवान अयोध्या नगरी में पदा हुए थे, जो पवित्र तीय
मानी जाती है । मैं चुनार में पदा हुआ, जो काशी के कलेजे
और गगातट पर होकर भी निशकु को साया में होने
से तोय नहीं है। इतना ही नहीं, तोथ का पुण्य हरण
फरने वाला भी है। फिर भी, चुनार मुझे तीय
प्रौर अयोध्या और साकेत से भी अधिक प्रिय है। यह
अपनी जन्म भूमि चुनार के बारे में पाण्डेय वेचन शर्मा
'उग्र की राय है। अपनी जमभूमि अयोध्या के बारे में
रामचन्द्र भगवान् मर्यादा पुरुषोतमको राय थो-'पावन
पुरी रुचिर यह देसा, जद्यपि सब वकुठ बसाना, वेद
पुरान विदित जग जाना । अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोउ।'
फिर मैं क्यो न पहूँ कि मुझे चुनार जितना प्रिय है उतनी
अयोध्या नहीं ? राम भजिये अपने राम को अपने राम
जितने पसद हैं उतने मर्यादा पुरुषोतम राम यानी रघुपति
राघव राजाराम भी नहीं।
यानि, रय, कुञ्जरो वाले महाराज दशरथ पे काल
में अयोध्या कुछ और ही यो-अमरावती से भी बढी
चढ़ी नगरी । उसका वणन वाल्मीकि रामायण मे पढ़िए
और वतमान अयोध्या को जाकर देसिए । वसे ही जसे
मेरे लण्डदादे ने घी साया, मेरे हाय सूधिए । न यहीं
मन्तीम
साकेत, नकहीं स्वग ! चतुर्दिक सधन रज तमस तक मुझे तो सरयू भी मटमैली, रजस्वला, नजर आती है। फुजा प्रयोघ्या, फुजा चुनार । अयोध्या तीय, घुनार तीय-तेज को नष्ट करने वाला। अयोध्या मे सम्राट, चक्रवर्ती, अवतारी लीलाधारो लास हुए हों, लेकिन वह पुरी प्रकृति की उस प्रफुल्ल कृपा, वरदान से बिलकुल विरहित है जो चुनार को अनायास ही प्राप्त है। आप जाइए अयोध्या, भाग पायेंगे भाग मनाते । श्राप माइए चुनार, क्या मजाल कि घटे भर के लिए पधार- फर कई दिन न ठहर जाएँ । अयोध्या मे फभी हरिश्चन्द्र अज थे, सो अव नहीं रहे । दिलीप थे, रघु थे, भगीरथ थे, सो भी नहीं रहे, इक्ष्वाकु, दशरय, रामचन्द्र कोई नहीं रहे। एक सरयू है मटमली फली, अपने भूत को छाया से भीपण बाधित। असल में प्रयोप्या प्रादमी के बनाये बनी हुई थी, भले वे पादमी राम-जसे शक्तिमान क्यो न रहे हो। इसे मादमी नहीं रहे तो अयोध्या राड हो गई। पुनार मे प्रादमी रहें या न रहे, उसे प्रकृति-दत शोभा सुलभ है। मादमी पाएंगे, पादमो जाएंगे, लेक्नि प्रादमो या कोई भी जीव जय चुनार के प्रागे पाएगा तो यह वहीं कुछ दिन तरु बसना, रमना चाहेगा । एक तरफ गगा भागीरयो, एक तरफ जरगो विध्य-यालिश, घुनार दोमाया । फकट फेरिए तो विध्याचल प्रचण्ड पहाड फे प्रांगन मे गिरे । घुनार विध्याचल पाप्रांगन ही तो है। मोठे जीवनप्रद पुएँ, निमल नोरपूरण तालाय, याव- लियां, बाग, उपवन, वन, सहस्र-सहा वर्षों के इतिहासों के चरण बिह्न पुनार मे धतुर्दिक । रामचन्द्र को प्रयोप्या उनतानी मे इनमे से एक भी नहीं, यस राम का नाम है।
।
चुनार से सटी विध्याचल को सुसद घाटियों मे
पारिजात के, पलाश के, बहेडे के, महुवे के धन के वन । जब
शरद ऋतु मे सारी घाटी पारिजात पुष्पों को सुखद सुगध
से भर जाती है, लगता है, यही तो नदन वन है । चुनार
इतना रमणीक कि पहले सारे भारत से जो श्रद्धालु
तपस्या करने के लिए काशी या प्रयाग पधारते थे, वे
तत्वत तपते थे चुनार या मिर्जापुर विध्याचल को उपत्य
काओ हो मे। कहते हैं किशोर राम ने ताडका और
सुबाहु को चुनार के निकट ही कहीं मारा था । क्रान्ति
कारी ब्रह्मपि वतानिक विश्वामित्र का सिद्धाश्रम चुनार
के निकट ही है । मेरा खयाल है अयोध्या के पास-पास
चुनार जसा कोई महामनोरम स्यान नहीं था-राम के
जमाने मे भी। तभी ऋषि विश्वामिन राजा दशरथ से
प्राग्रह करके राम और लक्ष्मण को चुनार दिखलाने को
ले गए थे। राम चुनार न गये होते तो शायद ही राम
होते क्योकि विश्वामित्र ने चुनार ही के पास पास उहें
वे विद्याएँ दी थों-स्त्रास्त्रो के प्रयोग की शिक्षा जो
सारे जीवन रघुनन्दन के काम आती रहीं । श्या है राम
को अयोध्या मे' पुरी कहलाती है बडी। अयोध्या मे मदिर
हैं, मूतिया हैं । यानी पत्थर हैं अयोध्या मे । मैं कहता हूँ
सारी अयोध्या मे जितने गढे-गढ मदिर-मूर्तिया हैं, उतनी
और ऊपर से उतनी ही और चरणादि (चुनार) की
प्रनगढ़ पावतीय विभूति के वाएं चरण को सबसे छोटी
अगुली के नापून से निकाली जा सकती हैं।
आपने अयोध्या देखो है नहीं? और चुनार वह
मी नहीं ? बना तो चुनार ही की मिट्टी है एक पोर,
तया दूसरी मोर दिगोरावस्था मे, साधुनों को रामलीला
मडती मे जानकी बनकर सावन के मूलनोत्सव मे । चालीस
। अयोध्याजी में झूला भी झूल चुका है । सो, ऊपर चुनार के साय अयोध्या का नाम फोकट-फीके नहीं लिया गया है। प्रेता मे जिस अयोध्या में राम बाम दिसि जानकी विराजा करती थी, कलिकाल मे उसी अयोध्या में, राम- लीला मे ही सही, कुछ दिना वेचन पाडे भी सोताजो बना परते थे। और हजार हजार लोग-लुगाइया, हजार हजार मेरे फिशोर सुकुमार चरणो की धूल प्राली मे प्राजा करती थीं । सो, जिसकी अपनी जोरू जिदगी भर नहीं रही, वह जिन्दगी के प्रारम्भिक वर्षो मे ही राम को जोर बन चुका था। यानी यह जो आज बडे तीसमारखा वजते हैं पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' दरअसल जोरू हैं राम फो। मगर क्या होंगे ! राम की जोरू थे क्वीरदासजी बालम ! प्रायो, हमारे गेह रे । तुम बिनु दुखिया देह रे । सब कोई कहे तुम्हारी नारी । मोहि होत सदेह रे । एक्मेक ह सेज न सोहे तब लगि कसो नेह रे? है कोई ऐसा पर-उपकारी प्रिय सों पहै सुनाय रे ! प्रय तो बेहाल 'कबीर' भये हैं विनु देखे जिय जाय रे। बालम, मानो हमारे गेह रे ! अयोध्या (जिससे युद्ध न किया जा सके-प्रजेय) का घणन करते हुए प्रादि कवि ने बतलाया है कि उस वर-नगरी के सभी निवासी धर्मात्मा, बहुश्रुत, अपने-अपने धन से सन्तुष्ट, अ-लालची और सत्य-वक्ता थे । उस नगरी हसतानीम मे साधारण विभूति याला कोई भी नहीं था, क्म परिवार कुटुम्ब वाला कोई नहीं था, ऐसा कोई नहीं था जिसको मनोकामनाएं पूर्ण न हो चुकी हों या जिसके पास गाय, घोडे, धन धाय का प्रभाव हो । उस पुरोमे कामी, कापुरप, क्रूर, कुबुद्धि और नास्तिक चिराग लिये ददने पर भी दिखायी नहीं देते थे। वहा कोई भी मस्त कुण्डल, मुकुट और माला बगर नहीं दीखता या उस नगरी मे असत्यवादी, अविश्वासी और प्रबहुश्रुत आदमो एक भी नहीं था। न कोई गरीब था, न विक्षिप्त, कोई किसी प्रकार से भी दुखी नहीं था। अयोध्या के चारों ओर पाठ कोस तक एक से एक हाथी ही-हाथी नज़र आते थे। अतएव उसके नाम का अर्थ होता था-अजेय । इक्ष्वाकुवशी चक्रवर्ती सम्राट दशरथ को अयोध्या का यह वरपन प्रादि कवि के श दो मे है-बालकाण्ड मे । अयोध्या काण्ड के प्रारम्भ मे, रामचद्र के युवराजतिलकोत्सव को तयारी के सिलसिले मे भी, महाकवि ने प्रपोघ्या की महत्ता का वणन गौरवशाली किया है जब पुर वासियो ने सुना कि प्राज ही रामचन्द्र का अभिषेक होने वाला है तो सर लोग अपना अपना घर सजाने लगे। घवल मेघ के शिखर की तरह शुभ्र देवालयो, चौराहो, मागों, यागीचा अटारिया, विविध वस्तु भरे बाजारों, परिवार भरे नवनो, सभी सभा भवनो तथा ऊचे ऊंचे वृक्षों पर सचिह्न और अचिह्न पताकाएं फहरायो गई राज-माग जहा-तहां फूल-मालाए सजायो गई यों और सुगधित धूप जलायी गई यो। रात्रि के समय रोगनी के लिए गली कूचों तक मे दोपको के वृक्ष जगमगाए गए थे इद्र को अमरावती पुरी के समान सुन्दर अयोध्यापुरी एकत्रित जन-समुदाय से मुख रित होकर जल-जन्तुओं से परप समुद्र के जल-जसो जान बयालीम
पड़ने लगी
मयरा ने देखा, चारों ओर अमूल्य
ध्वजा-पताकाएं फहरा रही हैं, रास्ते साफ-सुथरे हैं
चदन का छिडकाव चारो तरफ हुया है, स्नान के बाद
चदनादि लगाए अवधवासी परम प्रसन्न मटरगश्ती कर
रहे हैं । ब्राह्मण हाथ मे माला और मोदक लिये मनो-
च्चार कर रहे हैं, मारे के सारे देव-स्यान चूने से उज्ज्वल
पर दिये गए हैं । साथ ही सभी तरह के गाजे-बाजे
बज रहे थे हाथी घोडे हैं, गाय-बल भी प्रसन्न वोल
बोल रहे हैं। प्रमुदित पुरवासी ऊंची ध्वजाएं फहराते
दौड रहे हैं।
इतने बडे उद्धरण का अभिप्राय यह है कि महाकवि
ने पुरप रचित जिस अयोध्या का वरणन क्यिा है वह
वस्तुत प्राज नहीं, त्रेता युग की है। फिर भी, उसकी
सफाई, रोशनी, छिडकाव, जनता को तरह-तरह से
सुख पहुंचाने का सक्रिय निश्चय प्राज के क्लबत्ता-
वम्बई ही नहीं लदन-न्यूयाक के म्यूनिसिपल कार्पोरेशनों
के प्रागे प्राज भी प्रसन चुनौती-जसा है ।
अव मेरे चुनार का अहवाल सुनिए । नेता नहीं,
द्वापर भी नहीं, चुनार की कहानी फलियुग की है । सन्
१९०५ ई० म चुनार मैंने पसा पाया था, (तव में महज़
पाच वप का था) उसका वरणन भी आज पचपन वष
बाद एम मनोरजफ नहीं है । तब वह छोटी-सी यस्ती
पांच-सात हजार प्राणियों की रही होगी ।चुनार मे चरण
को प्राकृति की एक पहाडी है, जिसका तीन भाग गगा
मे है और चौथा धरती की तरफ । इस पहाडो के कारण
चुगार पा नाम 'चरणादि नो सस्कृतनों से सुना या ।
इसी पहाड़ पर एक परम प्राचीन दुग है। उसका
ननालीम सम्बप द्वापर युग के प्रसिद्ध सम्राट् जरास च से जोड़ा
जाता है। किले मे एक विकराल तहसाना है-बडे
विस्तार अपार अधिकार वाला। कहते हैं जरासघ ने
पराजित करने के बाद सोलह हजार राजानो की
रानिया छोन उहें चुनार दुग के तहसानो मे पद पर
रखा था। फिर, कहते हैं, उज्जयिनी के सम्राट विक्रमा
दित्य ने अपने राजा भाई भतृहरि के लिए इस दुग का
पुनरद्धार कराया था। क्लेि मे योगिराज भतृ हरि को
समाधि है। किले के बाहर, दक्षिण तरफ, पहाडी
मे गगा-तरग क्ल सीकर शीतलानि के निकट एक
गुहा है। कहते हैं राजपि भतृहरि उसी मे तप
स्वाध्याय निरत रहते थे। विश्वासी लोग प्राज
भी भतृहरि को प्रात्मा का प्रावास चुनारगढ
के पास पास मानते हैं। इस दुग का इतिहास सवथा
फौतूहल एव रहस्यमय है । पाल्हा ऊदल नाम के वीर
बहादुर दोनो भाइया का भी इस किले पर कब्जा
था-विदित बात है । वीर रस ये विख्यात हि दो-काव्य
आल्हा रामायण मे इहीं भाइया के गौय को गाथा है।
इस रिले से सम्राट हुमायू, शेरशाह सूरी, वारेन
हेस्टिग्स विद्रोही राजा चेतसिंह, पजाव को महारानी
जिदा वाजिद अली शाह का भी सम्बध रहा है । गत
द्वितीय महायुद्ध के युद्ध-बदिया को ब्रिटिश सरकार इसी
क्लेि म रखती यो । सन् ४२५ भारतीय महाजागरण
के राष्टीय कर्मों भी इसी रिले में यद रखे गए थे।
फिर स्वराज्य होने के बाद बगाल के पुरुषार्थी चुनार
ग मे बसाये गए थे। हिंदी में प्रादि-उपन्यासकार
वायू दवीन इन सनी ५ परम प्रसिद्ध उपयास 'चन्द्र
कान्ना और चदाता सतति एव 'भूतनाय मे इस
रिले का ऐसा महामोहर वरएन है कि पढने वाले के
चवातीस
हाय से उपयास छूटते नहीं । चुनार दुग के बाहर, पूर्व तरफ, प्राय पाव कोस पर, एक प्राचाय कूप है। कहते हैं, श्री वल्लभ महाप्रभु जर भारत भ्रमण को सपरिवार निक्ले थे तब, चुनार मे उनके पुत्र विठ्ठल महाराज का अवतार हुआ था। कहते हैं श्री यल्लभाचाय ने नव जात शिशु उसी फूप को सौंप दिया था कि तब तक वही उसका लालन पालन परे जब तक प्रभु देश भ्रमण से लोट नहीं पाते। कहते हैं प्रभु वल्लभाचाय कई वप वाद जय लौटे तब उस कूप ने उनका पूत उहें सही-सलामत सौंप दिया, जो पर शिशु नहीं, कई वप का फिगोर था। चुनार वल्लभ सम्प्रदापियों के पुण्य तीयों मे है। मुस्लिम जमाने मे चुनार के किले मे हजरत मुहम्मद की दाढी का पवित्र माल भी सादर सुरक्षित रहता था। चुनार के दानीय स्थानों मे एक दरगाह भी है- मशहूर मुस्लिम वली हजरत कासिम सुलेमानी को । मेरे छुट- पन मे दरगाह पा मेला हर साल जोरदार होता था, जिसमे बिना भेद भाव मुमलमान हिदू, गहराती देहाती सभी गामिल होते थे। मेरे बचपन म चुनार का प्रावादी में रपये मे पांच पाने मुसलमान थे, जिनमे रईस, साहवे. फन और नवाबजादे भी थे। उन दिनों दिलों को पद यो प्रत चुनार मे प्रप्रेज माये । जर मैं पाच-सात सात काया तव घुनार के किले में गोरा तोपताना पलटन रहती यो। रहते थे गत-गत अग्रेज सोल्जस और पाते-जाते रहते थे। चुनार के पिते के पीछे एक पुरानी पर गाह है जिसमे देखिरा तो ग्रिटेन में अनेक स्थानों के प्राणी पर ये दफ्नाये दम-ब पुद पड़े हैं। यया पर पनालीरा उनके नाम-पने पदपर ताज्जुब होता है नियति के
विलास पर, जो इ ग्लण्ड को मिट्टी को चुनार मे दफनाने
का विधान करती है । बहुत दिनो तक चुनार मे रिटा
यड गोरे सपरिवार रहा करते थे। 'लोअर लाइस'
नामक अपनी एक बस्ती उहोने कालो के स्वे की
पिछली सीमा पर बसा रखी थी। साथ ही, गगा तट
के निक्ट बडे बडे पाक बंगले बनवाकर उनमे समथ
अग्रेज अधिकारी या उनके गोरे सम्बधी रहा करते थे।
ये बंगले नम्बरो से नामी थे, जसे बंगला न०१, न०८,
न० २० । सन् १९०५ ई० मे चुनार की पाच सात हजार
की आबादी के सिरहाने दो दो गिरजाघर थे । एक परेड
ग्राउण्ड की क्वगाह के पास जमन मिशारियो का रोमन
कथलिक चच और दूसरा प्रोटेस्टेप्ट चच गहर के बीच मे
था। ईसाई या अग्रजो की सरया शहर मे चाहे जितनी
रही हो, पर उनका प्रभाव स्तिना या इसकी सूचना ये
घच देते थे। मेरे स्वर्गीय पिता जिस मदिर मे पूजन
क्यिा करते थे उसके चबूतरे पर खडे होकर, पांच-सात
की वय मे, मैंने गोरे सोल्जरों के तोपखाने की माच मजे
मे देखी थी। क्लेि से परेड ग्राउण्ड तक ये गोरे सिपाही
माच करते हुए अक्सर जाया करते थे। मदान मे मिलि
टरी बण्ड वालों को परेड तो मुझे प्राज भी भूली नहीं
है । पई प्रकार के बाजे वाले सभी गोरे, ड्रम-प्रोह !
स्तिना बडा ! इन वण्ड वारो सिपाहियों के बीच मे वाघम्बर
धारण रिपे हाय मे गदा-जसो कोई वस्तु हिलाता चलता
था एक नाटा, गुटठल-सचमुच व्यानमुन कोई दत्य-देही
गोरा'तर चुनार वालों को ये गोरे महाकाल के दामाद दसर्वे
प्रह-जसे लगते थे। अक्सर लोग इनको छाया से भी दूर
भागत थे। लोपर साइस से गुजरने वाले गरीय ग्रामीणो
या चुनारियों को ये रिटायड या सिपाही गोरे कारण
।
पानीस
अकारण वेंतो से बुरी तरह सिटोह दिया करते थे। औरतें तो लोअर लाइस मे जाने की हिमाकत कर ही नहीं सकती थीं। जरगो नदी पार से शहर को विविध वस्तु बेचने प्राने वाली अहीरिनो, कोरिनो, चमारिनो, को अक्सर, उन्मत्त गोरे दौडा लेते थे, रगड सगड देते थे पशुरत-रेप । सो, क्रिश्चियनों के मुहल्ले से कोई भी देसी स्त्री गुजरने की हिम्मत नहीं करती थी । इस राह के बराबर, दूर के रास्ते, देर के रास्ते से बाजार पहुचती थीं। उन दिनो नित्य ही सदद्पुर मुहल्ले की बभनटोली गली से सोल्जस, एग्लो इण्डियन गोरा-काला पादरी, और वह घोडी सवार मेम विधवा मिसेज विल्सन गुजरती थी। भयभीत कौतूहल से मुहल्ले के हम अधनगे बच्चे 'साह्य, सलाम' और 'मेम साहब, सलाम!' दिया करते थे । मेम साहब घोडी को एक तरफ पठी, रोज ही बाजार लेने स्वय जाती थी । वह घोडी पर चढी ही चढी सारी चीजें खरीदती यों । मछली, मुर्गा, मास, तीतर-बटेर, साग सब्जी, ऋतु-फलो का उन दिनों चुनार मे ढेर- हो-ढेर लगा रहता था। तब घी रुपया सेर विक्ता था। लेपिन घी खाने योग्य पसे तब अपनी गिरह मे थे ही नहीं । घी जब इतना सस्ता था तो अनाज भी तो भूसा भाव रहा होगा । अनाज, गुड, खाँड, चीनी, सभी पानी पे मोल थे, फिर भी, अपने लिए दुलभ थे। 'सुरसरि, तोर बिनु नोर दुस पाइहै, सुर-तरु तरे तोहि दारिद सताइहै-तुलसी बाबा वाली बात हमारे सामने थी। दारिद्रय मे पप्ट होता है यह जानने लायक तो में हो गया था, पर, दारिद्रय मे अपमान भी कुछ है, मुझे मुतलक पता नहीं था। सहामीस चुनार यो एप क्या तो मैं भूल ही गया। उन दिना
बगाल या काशी से एक से एक भद्र बगाली परिवार दो
चार महीने रहकर स्वास्थ्य लाभ के लिए अक्सर चुनार
प्राते थे। अनेक बगाली जन तो पत्र नन बंगला या घर
बनाकर बस भी गए थे। साल मे कम से कम आठ महीने
ये बगालो चुनार के हर खाली मकान मे किरायेदार
बनकर टिक्ते, जिससे कतिपय लोगा को कुछ प्रामदनी
भी हो जाती थी। चुनार मे अक्सर बगाली सयासी या
दाशनिक सानद रहा करते थे। उनका वहा को जनता
पर प्रेमपूरण प्रभाव था। एक दो बगाली वावुमा का
एलोपथी दवाखाना भी था। एक-दो बगाली महाशय
प्रोफेशनल न होने पर भी होमयोपथी या आयुर्वेद के
अच्छे अभ्यासी थे, जो लोगो का प्रेम से इलाज करने मे
सुस पाते थे। मगर मुझे वगाली बघु उनने याद नहीं
पाते, जितने भयकर प्रचण्ड प्रताप वाले गोरे और उनके
अनेक रिटायड परिवारी। वह प्रायरिश बूढा मिस्टर
पलाय जो देहाती मजूरो से अच्छी हिदी बोलता था
और बागवानी तथा सेती कराता था। चौते सो पाखें,
हनूमान-सा मुखडा । क्सी हिंदी बोलता वह कि मनो
रजक और मिस्टर फूम जो लोअर लाइस का जनरल
मचॅट था । वे चीजें जो फ्लस्त्ता-बम्बई-बनारस
इलाहावाद ही मे मिल सक्तो यों मिस्टर कूम के स्टोस
मे भी होती यो । मिस्टर कूम रिटायड सेना अधिकारी
थे। उनका बडा भारी यंगला लोपर लाइस के नाके
हो पर या । मिस्टर कूम कुत्तों के बडे गोकोन थे और
जव घूमने निश्लते थे तो उनरे साय चार छ किस्म
के कुत्ते जर होते थे । म साहा अक्सर
हाय में गेंद लेकर निकलते । गेंद वह दूर सुदूर भरपूर
जोर से रेत दि कुता प्राए और कुत्ता गेंद ले प्रहनावीस
आता साहब । और हम प्रधगामडिये छोपरे हैरत से
हैरान रह जाते 'साहब, सलाम । 'म साहब के स्टोर्स
में एक से एक शरा मिलती थीं। उनके बंगले में गोरों
के लिए एमजसो होटल-जसा था ! मिस्टर प्रोप्रायन
नामक एक बूढे हयक्टे गोरे सिपाही को याद पाती है
जो नेवीक्ट दाढी रखता था। चुनार नोटिफाइड एरिया
का वह सुप्रिटेण्डेण्ट था। नगर की सफाई वगरह उसी
ये चाज में यो । उसका एक हाप बिलबुल कट गया था।
कोट को दाहिनी प्रास्तोन यो ही लटकती रहा करती
थी। वह वाएं हाथ में उत लेकर मिलिटरी फुरती से चलता
था। किसी भी काले प्रादमी को गली में बहार लघु-
शका वगरह करते देखते ही देवेंत दे चैत । मिटोहर घर
देता। फिर रिपोट, ऊपर मे जुर्माने होते थे। मेरी गली
के चिगन तेली पर मिस्टर प्रोग्रायन यात पई वार
बरसा था , श्योंकि चिगन तेली सरेराह बठकर पेशाव
करना अपना जमसिद्ध अधिकार मानता था। इस
तीखे अग्रेज को देखकर मेरे तो होश फापता हो जाते
थे। मैं उससे कम-से-कम बीस गज दूर रहने को कोशिश
करता था। चिट्टा गोरा बिलाड जसे सूट पहन ले । वाहना
हाय टूटा । बाएं में चमडा-मदा बेत । तेज, चालाक
पाल १ सपने मे जसे प्रेत ! 'टुटया साहब हम उसे समय
पुकारते थे। अपने लिए टुटवा साहब-जसा हेय प्रयोग
सुनते ही रहने वाले यो, खाह यह यूटा हो, जवान या
पिना पक्डे, दिना पोटे, ये सताये यह छोडता
नहीं था।
घोडो पर सवार गली से बाजार गुजरने वाली
पूरोपिया विषया मिसेज यिल्सन का नाम प्रागे प्रा चुपए
सापाग है। एक दिन की बात है, मेरे चाचा पत पर बने पूजा-
.
वालक,
।
घर में ठाकुर की सेवा के सिलसिले में पूजा पान
वगरह धो रहे थे कि मिसेज विल्सन अपनी घोडी पर
छत के निकट से गुजरी । दुर्भाय से उसी समय ऊपर से
गदे पानी की धारा यूरोपियन महिला पर बरस पडी।
फिर क्या था । मेम साहब मेरे चचा पर बेहद गरजा,
बरसी-लडी, डम फूल तक प्राइ । दचा से वरदाश्त
नहीं हुआ। वह स्वाभिमानी और प्रच्छे वद्य थे।
चुनार में उनका आदर मान था। मेम साहब को डाट
के स्वर में उन्होने कहा--सबरदार, जो वदजबानी की।
इस पर मेम साहब बकबकाती चलती बनी । लेकिन दो
ही घटे के भीतर पचा साहब को पुलिस थाने में हाजिरी
देकर विलायती मेम के दबदबे से दवना पडा था।बीसवीं
सदी के प्रारम्भ में गोरी सेना, रिटायड अग्रेज और
ईसाइयो के सबव वज्र ग्रामोरण चुनार का एक भाग बम्बई
और कलकत्ते के क्सिो स्वच्छ भाग की तरह तत्कालीन
प्रआधुनिकता से मडिन था। नोटिफाइड एरिया की ओर
से सारे चुनार में अगर दो सौ लम्प पोस्ट सडे क्येि गए
हांगे तो उनमें से सौ से ऊपर फेवल लोअर लाइस में
लगाये गए होंगे जहा गोरे वसते थे । छोटो बस्ती, सुयरी
सड गाति-सुख निवास की तरह छोटे छोटे हरे भरे
बगले, वजनी और लके-फुलके फरनीचर, फगानदार परदे,
दरिया, गलीचे, अच्छी तरह पहन सा पीर लोप्रापोग्रा
गोरे बच्चे। गुडिया को बोरियों-जसे हाथीदात के बने
यूरोपियन बालक । गुनेल, तमचे, यदूर्फ, रक्ट, बट,
फुटबाल, स्टिक । सेक्से कुत्ते । पक्टि डाग फारस
टेरियर प्रल्पेनियन बुलडाग । कुत्तों को रसवाली पर
नियुक्त नौकर-चमार, भगी मेहतर-जिना तन पर
ऐस साफ कपडे जमे हमारी बभनटोली में एक भी
पचास
ज्ञान
नहीं । मेरो स्थिति तो कुछ पूछिए ही मत । सिवाय मली,
मारकोसो, मुफ्त मिली धोती और एकमात्र कुरते के
बदे के सिर पर तो दो पसे वाली दुपलिया भी मुहाल
थो। न हो बरसा में चमरौधा हो। पर उक्त स्थिति
शिकायतजनक प्राज मालूम पड़ सकती है । उन दिना
तो घनघोर अभावो में भी मैं दुसी था, ऐसी वात नहीं।
बल्कि सुसी ही था। बचपन और यौवन शायद स्वय
में इतने भरपूर होते हैं कि उस पालम में प्रभाव भी
भावो भरे भासते हैं । असल में अज्ञान में बडी
गुजायश होती है । मेरा ज्ञान मेरे गले पडा -लिखा कवि
'देव ने-"याहि ते मैं हरि ज्ञान गंवायो" । गाया गोस्वामी
तुलसीदास ने-( यह ज्ञान ) "परिहरि हुदय कमल
रघुनाह बाहर फिरत विफल भपो धायो ।
सौमित होता है जब विज्ञान की (ईश्वर की तरह)
कोई सीमा नहीं । समझिए तो, जीवन में जितना भी मुस
है अज्ञान ही में सबब होता है। देखिए तो, जगत में
ज्यादातर जीवधारो प्रज्ञानो हो होते हैं । फिर इस ज्ञान
की कोई गारण्टी नहीं कि कब प्रजान न सावित हो जाए।
विलोक्येि प्राधुनिकतम विज्ञान की तरफ । फल तक
पृथ्वी भ्रषों को प्रोर नारगो-जसो चपटी मानी जाती थी,
लेकिन अब पता चल रहा है कि विश्वगोलक का नक्शा
पुष पोर हो तौर का है। पृथ्वी सन्तरे-सी नहीं, सेय
नसी है। ज्ञान के गिरगिटपन के ऐसेनोमे शत-शत उदा.
हरण सहज ही पेश किये जा सकते हैं। जीवन में
परेशान होने के लिए पान पा जिलासु, मेरे जाने,
अपनी प्रांखें अजान में खोलता है, मूदता है प्रान अपनी
प्रनत प्रनाग प्रज्ञान में।
मात्र
रापावा
।
नागा भागवतदास
यह सन् १९१० ई० है । और यह नगर ? इसका नाम है
मिण्टगुमरी मिण्टगुमरी? यह नगर कहां है रे बाबा यह
नगर इस समय पश्चिमी पाकिस्तान में है, लेकिन जब की
बात लिखी जा रही है तब ब्रिटिश भारत मे पजाब मे
था । और यह सब क्या है ? यह सब रामलीला को
तयारी है। कई दिन से अयोध्याजी से कोई रामलीला
मण्डली पायी हुई है। इस मण्डली ने पहले सरगोधा
मण्डी मे लीलाए दिखलापी थी, जिससे वहा को हिदी
पजाबी सिख जनता बहुत ही धन्य हुई थी। सरगोधा
मडी से इस रामलीला-मडली की प्रासाएँ भक्त दशको
से सुनने के बाद मिण्टगुमरी के भक्त दशनाथियो ने
वहा जाकर सारी भडली के किराया भोजन भर रकम
पेशगी देकर दस दिन मे रामलीला दिसलाने के लिए
उत्साह, श्रद्धा और प्राग्रह से अपने यहा प्रामनित किया
था।
ये लीलाधारी जय स्टेशन पर उतरे तभी मिष्टगुमरी
के दानाथियों की भीड-सी लग गई थी। क्तिना
सामान दस बडे बडे काठ के वक्मे, बोसिया लोहे के ट क ।
सबमे रामलीला को प्रावश्यक वस्तुएँ । लीला भूमि
बनाने का वास पल्लो पटरे वगरह सामान, समूह भोजन
जिनमे सिद्ध होसके ऐमे पोतल नोरतारेक बडे बडे बरतन
भाड, टेण्ट छोलारिया । अयोध्यावासी ये लीलाधारी
सरयायताम और दस और एम-कुल मिलार सना
बावन
तीस थे। छत्तीस थे प्रौढ पुरुष, अधिकतर साधु-महा मामओ की ड्रेस में, दो-चार छल चिकनिया भी जो दूरही से नाटकीय दीखते थे। दस थे दस से अटठारह को वयं के बालक और युवक । सारी जमात में मुश्को रग का पाठो गाठ कुम्मत एक घोडा भी था। असल में नागा महन्त भागवतदास महाराज को यह जमात थी पजाब भ्रमण पर पटिबद्ध । जमात में विविध पदा के निशानधारी और वेनिशान नागा साधु थे। पजाबी माताएं श्रद्धालु होती हैं, प्रदेश धन धान्य से परिपूरण है, यह सब मजे में जानकर ये साधु लीलाधारी उधर जाते थे और जाकर कभी पछ- ताते नहीं थे। घोडा या महत भागवतदासजीका । दाढी- पारी, छापा तिलकधारी, उजले वस्नधारी महन्तजीपाखो पर चश्मा चढाए, हाय में बेंत की छोटी चंवरो लिये जब उस घोडे पर सवारी करते थे, बडा चमत्कारी दृश्य उप स्थित हो जाता था। भागवतदास महन्त एक प्राख के काने थे। उन्हें धगड वरागी 'भागवतदास कानिया कहकर मन्द माना घरते थे, क्योंकि त्यागी-बैरागी होकर भी भागवतदास पसा-जोड थे, पोनी पक्ड । साधु-जमात और रामलीला-मडलो को भूतियो की सम्यक् प्रायिक व्यवस्था महन्त भागवतदासजी के हाथों में थी। स्थान
बड़ी श्रद्धा से स्मरूको तया प्रय सापुमो के लिए
दूध, दही, मक्खन, मठ्ठा, लस्सो, गुड, बताग लड्डू
अन, वस्त्र, पुष्पल दे जाती थीं। सीता, राम, लक्ष्मण,
भरत, गनुघ्न, वगरह बनने वाले बालको को मडली वाले
अपनी भाषा में स्वरूप' या 'सरूप' कहा करत थे।शृगार
के साथ हम स्वरूपो को भक्तों के हाथ से दूध पिलवाने
या प्रेमियो के घर भोजन कराने के लिए महन भागवत
दास पजाबी भक्तो से मोटी रक्में उतारते थे। भक्त
लोग अक्सर साघुप्रो को जमात का भडारा अपने घर
करते, तब महत के दल के नागा लोग सूरत के बने जरी
के काम के खूबसूरत निशान, पताका, भाला, तलवार,
तुरही से लस बारात बनाकर भक्त के दरवाज पर जाते
थे । बडी अभ्यथना, बडी पूजा, भक्त लोग इन साघुमो
की करते थे। फिर पगत बठती थी, यानी जमात भोजन
पाने बठती। माल, मलाई, मिठाइया मालपुए, तरह
तरह की सजिया, जिहे साधु लोग साग नाम से भजते
थे, परसी जाती। फिर एक मुख्य साधु पगत में टहल
टहलकर 'जय' बोलने बुलाने लगता। यानी वह बोलता
नाम दूसरे बोलते 'जय ' चारो धाम की जय | सातो
समुद्र को-जया सातो पुरिया को-जय श्री हनुमानजी
को-जय । थी सुप्रीवजो को-जय । श्री अगदजी
को--जय
यह जय-जय घोप कभी-कभी तो पूरे
एक घटे तर होता, जिसमें महन्त के गुरु को तथा स्वय
महन्त नावगतदास की जय भी पुकारो जाती थी।महतको
माना से जमात को सादर भोजन देने वाले भक्त के नाम
को जय भी युलवायी जाती। मालपुए ठडे हो जाते,
मलाई पर माखो भिनकने लगती, बढिया से पढिया यना
हुमा सालन भी इस घटे भर को जयवाजो में ठडा पड
चौरन
कर सचमुच साग बन जाता था। जय बोलते बोलते मारे
थकावट और भूख के मुझे तो नोंद आने लगती थी।
क्सिी एक दिन को बात । उस दिन धनुष-यज्ञ और
लक्ष्मण परशुराम सवाद को लीला होने वाली थी।
मडली वाले मेक अप रूम या ग्रीन स्म को शृगार घर
कहते थे। 'शृगारी होता था वहा का व्यवस्थापक, जिस
के चाज मे वस्त्र, आभूषण, मुखौटे, दाढी, मूछे और
मेक अप का प्रावश्यक सामान होता था। हम सरपो के
चेहरों पर मुसख और लाल सिमरिव के रग वाक्रायदे
चढ़ाने के बाद गालो और माथे पर चमकती डाक और
सितारों से, गोद के सहारे वह शृगार करता-फूल या
मछली बनाता । इस भृगार मे कम समय नहीं लगता
था। फिर हमारे मस्तक पर ऊन के काकपक्ष या जुल्फें अलक
दार लटकायी जाती, कानो में कुण्डल और मस्तक पर
मुपुट किरीट-चन्द्रिका क्सकर बाघो जाती। फिर नीचे
और ऊपर के वस्त्र पहनाए जाते । साधारण लडके को
देवता की तरह सजाकर सडा कर देना शृगारी का काम
था।
धनुष-यज्ञ में मेरे बडे भाई साहब दो दो काम किया
करते थे। वह पहले तो राजा जनर के बदोजन बनकर
पाते थे और हिदी, अप्रेजी, वगला, फारसी वगरा पई
भाषामों में जनफजी को प्रतिज्ञा बडे रोव से सुनाते थे ।
फिर, धनुष टूट जाने के बाद वह परशुरामजी बनकर
प्रात थे, तुलसीदास के क्यनानुसार स्पधर प्रश्न नयन,
भकुटो कुटिल गौर सरीर भूति भलि भ्राजा, भाल
विसाल निपुण्ड विराजा, सीस जटा सहज चितवत
मनह रिसाने । पुले विगाल कधे, एक कंधे पर दिव्य
जनेऊ मोर माला मौर मृगधाला। कमर में मुनियों के
पचपन
वल्क्ल वस्त्र, कधो के पोछे दो-दो तुरणोर-तकश, हाथ
में धनुष और बाण तथा वाम रचे पर विस्यात परशु ।
पहले तो सहज ही देश मे अपने भाई को देखते ही मेरी रह
फना होती थी, तिसपर परशुराम का मेर अपाप्राय उनके
रग-मच पर आते ही मेरी सिट्टी गुम हो जाती थी और
अच्छी तरह याद किया हुआ सवाद भी सफाचट भूल
जाया करता था। या लक्ष्मण का सवाद चोरतापूर्वक
न कर केवल घिघियाया करता था।पाट भूलत ही परशुराम
वेगधारी मेरा भाई स्टेज हो पर मुझे धमकाता कि चल
अदर, तेरा भुरकुस न कर दू तो मेरा नाम नहीं । और
परदा गिरते ही शृगार मे ही परशुरामजी लक्ष्मएजी
पो पोटने लगते । परदे के पीछे वाले उस परशुराम से
लक्ष्मण को रक्षा राम हो नहीं राम के बाप दशरथ भी
नहीं कर सकते थे। सर इस धनुष-यज्ञ में बडे पेट वाले
राजा फा मजाक्यिा काम करो वाला एक्टर भी मेरा
भाई ही था--मझला श्रीचरण पांडे जो साघु-कण्ठी
धारी बनकर अब सियारामदास हो गया था। जहा
तर एक्टिग का सम्बध है, मेरा बड़ा भाई मझले से
थेप्ठतर अदाकार या । लेविन स्टेज पर प्रसिद्धि मनला
ही विशेष पाता था, ययारि उसे नाचना गाना, यजाना
तया जनता को चुटरिया लेना सासा प्राता था । 'नाचे
गावे तोडे तान तिसवा दुनिया रासे मान' कहावत
उन दिनों काफी प्रचलित यो। घर में न सही परदेस
-रामलीला-मण्डलिया-में हम तीना भाई साथ ही
साय रहे और काफी प्रेम से। घर में प्रेम इसलिए
नहीं था कि साना नहीं था। जब 'भूसे भजन न होहि
पहावत है तब भला भूसे प्रेम क्या होता। रामलीला
मण्डली में, दोनों ही, अपनी अपनी स्वतत्र कमाई कर
छप्पन
लेते थे । ऊपर से बुनियादी राशन मण्डली के पचायती
भडारे से मिल जाता था। बुनियादी राशन यानी साग
दाल, चावल, बड़ी-बडो रोटिया दोपहर को तथा घुइया
का साग और छोटी छोटी पूरिया रात के व्यालू में।
मेरे बडे भाई की तरह शोकोन एक्टर अपना खाना
विस्तर या प्रासन पर लेते, जो महत भागवतदास को
बहुत बुरा लगता । वह चाहते कि जिसे भी भडारे में
खाना हो पगत में वठकर जय बोलने के बाद प्रसाद
पाए । जो पगत से चूके उसका भाग भडारे के प्रसाद
में नहीं । वहायत मशहूर-डार का चूका बदर, पात
पा चूका बरागी । मो, जो एक्टर पगत में न शामिल
होना चाहता वह अपना प्रबध अलग करता। महन्त
भागवतदास मेरे बडे भाई को बद्र करते थे, क्योकि
वह उनका पत्र व्यवहार सुदर प्रक्षरों, उत्तम हिदी में
पर देते थे। फिर भी, नागा कानिया महत से दहशत
सभी साते थे। यह भर में पाने पर अच्छे अच्छो पर
हाय भाड देते थे। कोई भी एक्टर भागवतदास के
सामन जाने में एक बार झिझकता था।
जमात के अधिकारिया में महतजी के अलावा एक
'मुठारी' जी थे, जिनके चाज में अन, घृत, वासन,
चसनादि वस्तुएँ होतो था । उहें 'अधिकारीजी' भी
कहा जाता था । मण्डली में भागवतदाम के बाद
अधिकारोजी का ही मान या ।वह सापुई क्तेि से पहनी
हुई लुगो और यगलवन्दो धारण परते थे, दाट पे जूते
पहनत थे, ऊध्वपुण्ड सह-यो माथे पर लगाते थे, जिसका
फताव उनकी नासिका तर होता था । यह बहुत
प्रध्ये रामायण नत्त भी थे। शृगारी की तारीफ पाप
सुन ही बुरे हैं। पुटारो, शृगारी के बाद भण्डारीजी
ससीवन
थे, जिनके हाय में सारा भोजन भण्डारा होता था।
भडारी अक्सर उसी नागा साधु को बनाया जाता था
जिसमें, आवश्यक्ता पड़ने पर, सौ सवा सौ मूर्तियो के
पाने (खाने) योग्य प्रसाद अकेले तयार करने की क्षमता
होती थी । वमे साधारणत उसको सहायक साधु स्वय
सेवक सुलभ रहा करत थे। मडली की हर मूर्ति का
आवश्यक कतव्य माना जाता था भडारी को हर तरह
से सहायता करना। साग अमनिया वरना पुष्कल
आटा गूधना इधन का लक्फड चीरना, जल जुटाना,
और सबके ऊपर भोजन के बाद बडे-बडे कडे जले बरतन
माजना-चमाचम । मजे वासना को कानियों भागवत
दास पास पर सोन के फ्रेम के चश्मे चढाकर देखते
और खरा भी मलीनता या मल मिलते ही माजने वाले
वरागी को चवरी-मढे बॅत मे मारत मारते आदमी से
टट्ट बना देते थे-टुटरुटू ।इ ही सब फजीहतो दिक्कता
मे बचने के लिए मेरे भाई-जसे शौकीन अपना साना अलग
बनाते थे। इससे इनको प्याज लहसुन वगरह की
सुविधा भी मिल जाती थी, जो नागानो के भडारे में
प्रसनव थी। एसे लोगा का जमात के विधान से स्वतन
प्राचरण महत नागवतदास को भला नहीं लगता या
फिर भी नान वरागिया से इतनी प्रासादी वह दे
ही देते थे। महन्त भागवतगस हिम्मत वाले, जीवट
वाले साधु महात्मा थे। तभी तो सन् १९१० ई० में
सीमान्त प्रटेग ये विण्यात गहर बनू में जाकर रामलीला
रिसाने की जुरग्नत की उहाँने । उन दिना बन्नू तक
रल लाइन तयार नहीं हो पाइ यो । मिटगुमरी से
कोहाट पहुंच यहा से तागों स गायर दा दिन को यात्रा
के बाद मण्डली वन्नू पहुंची यो। तांग दिन में चलते
-
अट्ठारन
और सायकाल किसी डेरा या 'खेल' पर विश्राम करते।
निशानेबाज, खूपवार सरहदी डाकुओ का बड़ा भय
था। मुझे याद है वनू की गह की किसी सराय में
घोडे को लोद-भरी कोठरी में सोना । मुझे मजे में याद
है शौच के लिए पहाडियों में जाने पर फिसो महाभया
नक पठान को देखते ही विना निपटे ही भाग पाना।
मुझे बतलाया गया था कि सरहदी बदमाश लडको को
सास तौर पर पक्ड ले जाते हैं । बन पहुंचने पर भी
शहर देखने, घूमने फिरने, बडे लोग ही जा पाते थे। हम
लडके तो उसी प्रहाते में बद रखे जाते जिसमें रात
को फाटय यद पर, पेचल सौ-दो सौ हि दुनो को उप
स्थिति में रामलीला दिसायी जाती थी।
बन्नू के भक्ता से विदाई में दक्षिणा भारी मिलने
वाली थी, इसलिए विशेषत महन्त भागवतदास पसा
पक्ड मडली लेकर वहाँ गये थे। लोटे भी अच्छी रकम
बनाकर । रुपये, पशम, ऊन, काठ का सामान, चादी
के पार, सोने के ग्राभूपरण।
बन्नू हम गये थे कोहाट की तरफ से, लौटे डेरा
गाजीपा की तरफ से।
मेरे बडे भाइ-जसे हजरत छिपे छिपे फुसफुसाते कि
महन्त बटुप विलासो है। इसका कारण यह था कि
स्वय साढ़े चार बजे सवेरे स्नान परने के बाद महन्तजी
उन लड़को को भी उसो वत्त नहलवाते थे जो स्वरूप
(राम-लक्ष्मण-सीता) बना करते थे। सरदी के दिनों
स्नान के बाद गीत से मापते उन विगोरो को प्राय नियम
से महन्तजी अपने कोमल इटालियन पम्बल में बुला लिया
फरते ये-एक, दो, तीन को-और उनके गास हो
लियो से रगड रगउपर गरमाया करते थे। मेरे मते यह
1
जागठ
क्रोधी, कठोर स्वभावो महत का महज निर्विकार कोमल
पक्ष था। महत भागवतदास सिद्धात और लगोट के
सच्चे थे।
बन्नू में अनेक सरहदो सौगात सग्रह करने के कारण
बडे भाइ और मैं इसके बाद घर यानी चुनार लौट
पाए । हमारे अाग्रह करने पर भी, माता के लिए भी,
मझले साहब ने मडली छोडकर चुनार आना स्वी
कार नहीं किया।
राममनोहरदास
महत भागवतदास 'कानिया को नागा-जमात के साथ
मैन पजाब और नायवेस्ट फ्रण्टियर प्राविस का लीला
भ्रमण किया । अमृतसर, लाहौर, सरगोधा मण्डी, चूहड
कारणा, पिंड दादन खां, मिटगुमरी, कोहाट और बन्नू
तक रामलीलाओं मे अपने राम स्वरूप की हैसियत से
गिरफ्त करते रहे। यह सब सन् १९११ १२ ई० को
बात होगी । मेरा खयाल है उहां दोनों बरसों में कभी
दिल्ली में वायसराय लाड हाडिग पर बम भी फेंका गया
था। उसकी चर्चा रामलीला-मडली वालो मे भी कम
गरम नहीं रही । मष्टियर से चुनार लौटने के बाद शीघ्र
ही हम दोनों भाई पुन प्रयोध्याजी चले गए थे। इसका
सास सबब था चुनार प्राते ही बडे भाई साहब का
पुन जुमा-जगाडी जमात में जुड़ जाना, जिससे सोसा
पटते जरा भी देर न लगी। कारपदाताप्रो के मारे जब
घुटन महसूस करने लगते, तभी भाई साहब चुनार घोड
दिया करते थे। अयोध्या से मभले भाई श्रीचरण पांडे
उफ सियारामदास ने पत्र दिया था कि वह इन दिनो
महन्त राममनोहरदाग की मडली में है। महतजी
मालदार हैं, साथ ही भागवतदाम कानियां से कहीं
उदार । एफ्टग पी तनपा पुष्ट, तुष्टिकारय हैं।
ममले ने बडे भाई से प्रापह रिया था कि यह भी राम
मनोहरदास यो माली मे मा जाएं। सो, हम जा ही
पहुंचे । राममनोहरदासजी पी मरली पे साथ मैने
सगर
सी० पी० के कुछ नगरो तथा यू० पी० के अनेक नगरो का भ्रमण किया। मेरा काम था रामलीला में सीता और लक्ष्मण बनना । इस तरह अयोध्या, फजाबाद, बारावकी, परतापगढ, दलीपपुर, अलीगढ, बुलद शहर, मेरठ, दिल्ली दमोह, सागर, गढाकोटा कटनी आदि स्थाना में रामलीला का स्वरूप बनकर ग्यारह बारह साल की उम्र में बदेसां ने सहस्र सहस्र नर नारियो से चरण पुजवाए हैं। इससे पूर्व ये हो चरण पजाब और सीमाप्रान्त के मण्डी नगरो में भी पलिक द्वारा परम प्रसनतापूवक पूजे जा चुके थे। चरण ब्राह्मण के छ साल की उम्र हो मे चुनार में कुमार पूजन के अवसर पर बहैसियत ग्रह्मकुमार मेरे चरण अक्सर पूजे जा चुके थे। ग्राह्मण ने कसा रग समाज पर बांध रखा था। भीस लेता था तनकर । दान देते समय दानी भिखारी चेहरे नहीं, चरणो की तरफ देसता था । राममनोहर दास को मडली का सारा रग ढग कमोवश वही था जो भागवतदास की मडली का, इस फर के साथ कि पहली मडली मे साधुग्रा की सख्या नब्बे प्रतिशत थी, पर दूसरी में सौ में न एक्टर यावसायिक आवारा मिजाज लोग थे। स्वय भागवतटाम राममनोहरदास + मुकाबले में कहीं अधिक चरित्रवान् थे। राममनोहर वास, वरागी होने पर नी, रहते थे गृहस्था क याने मे। पहनते थे कुरता, मोज, घोती, कोट, मोटे चश्मे काली दाढी, प्रलस्ट क्ट, दह गुटठल, चेहरे पर बाइ तरफ निस्ट बडा-सा मस्मा । राममनोहरदास मनजर अच्छे थे । उनको मडली अधिक उत्तम ढग से रामलालाए दिखातो यो। लक्नि लगोट के वह कच्चे थे-भद्द ढग स । वह क्मिा-न क्सिी सुदर 'स्वरूप' नारक । बासर पर रीझकर पहले सोने के गहना से उसे लाद देते (दे नहा डालते, केवल पह्नने की सहूलियत देते) । फिर उसी को लोहे के कश वापस को कुजो भी दे देते। सेक्रेटरी और शिष्य के बीच के काम उससे इतना लेते फि अक्सर यस्पर वह उही थे गुदगुदे गदेले पर रात काट देता था। और सपेरे मडली वालों में अनतिक कानाफूसी चलती। फिर भी वातावरण ऐसा था कि स्वरप-मडली के सभी बालक मन हो-मन महत राम मनोहरदास की कृपा के प्राकाक्षी रहते थे। एक बार पह प्रकट हो जाने पर कि अमुक स्वरपमहत से 'विलर' गया, मटली के दूसरे मनचले अधिकारी, भण्डारी, शृगारी, लोलाधारी भी मौके-ध-मौके उस पर जरूर लपफ्ते । फ्लत स्वस्प को कुरुप बनने में कुछ भी देर न लगती । मैं बच जाता था इन दुष्ट लोलाधारिया से अपने दो-दो बडे भाइया क सरव जो तेजस्वी अदाकार और तगडे जवान थे। फिर भी, मैं विगडा नहीं, ऐसा कहना 'बनना होगा, जो मेरी वान नहीं, बाना भी नहीं । असल मे स्वस्पा यानी लडों के रहने-सोने का प्रयाध अलग ही हुआ करता था। और मैं सोता था स्याटपा मे हो । नतीजा यह होता या कि बडा द्वारा पुरप बना हुमा स्वरुप बेहिचर, म्प को निहायत नगी परि- भापा भोले सगिया को पढाता था। यानी सरपूजे से परयुजा रग पडता ही था। इस तरह राममनोहर- दाग यो राम-मडली जबरदस्त पाप पार्टी भी थी। मेरा ययाल है इर क्या है, इसका पता मुझे इमो मडली में यारह साल को यय म लग गया था। बारह साल की उम्र में में सगह सात को एक अभिरामा ग्यामा पर ऐमा नागिन हो गया था कि 'सोने मे जम कोई दिल तिरगर AL
।
यो मला कर हे' का अनुभव मुझे तभी हो गया था ।
उस सुदरी के लिए मै सारा दिन बेचन रहा करता था
कि कब रात हो, कब उसके मादक स्वादक मयक मुख
के दशन हो । मेरा प्रथम और अन्तिम प्रम भी वहा था।
उसके बाद जो मामले हुए उसी शाश्वत साहित्य के
सक्षिप्त, सस्ते सस्करण मात्र थे।
हा तो लीला वाराबको में दिखायी जा रही थी।
प्रोग्राम एक मास तक का था । लोला भूमि मे महि
लामो के बठने का प्रबध लीला मच के बहुत ही निक्ट
था। उही में वह सत्रह साली निरालो "यूटी वाली,
कमल-सोचना भी गस लाइट मे प्रफुल्लित नजर आती
थी। उसी कामिनी में कुछ देखने काबिल भी था, यह
मैंने जाना मडली के दिल फेंक एकरो और अपने बड़े
भाई को भा उसकी तरफ बार बार देखते देखने के बाद।
वाल-उत्सुक्ता यश, सीताजी के मेक अप मे ही, रग मच
से हा, मैं भी उसे देखता और दसता और देखता ।
देखती थी वह भी मेरी तरफ । शायद वह भी ताक
भाष वाली आली थी । सो मैं देखता ही रहा, मत्र
मुग्ध, लग्नि ऐग्यारा ने डोरे डाल, भक्ति भावना म
वहवा परदे व पाच नजदाक से रामजी के दान कराने
के बहाने अदर ले जा, पहले महतजा मे उमका
सयोग करा दिया। राममनोहरदास ने उसको एक
महगी बनारसी साडा दी, जिमे उसने ले भी लिया । बस
यौवन ३ जादू का भाव खुर-जसा गया । लेकिन वह
वेश्या नहीं था। उसका पनि साल म दस ग्यारह महीने
बर्ष रहा करता था। सो, यौवन का महावष्टि में
उमा चलन को क्यारो फूटकर यह चला था। लक्नि
बदमाग तोताधारिया क चक्र मे पडत हा पाठ ही दस
चौसठ
दिनो मे वह भयानक यौन रोग ग्रस्त हो गई थी। और
सयोगवश इसी बीच उसका पति बम्बई से पा गया ।
शक्की मद उसी रात अपनी देवी की देह दशा ताड गया ।
सदिग्ध भाव से घर मे और भी कोई प्रमाण तलाशने
पर बनारसी साडी भी उसके हाथ लगी। सुना,
इसके बाद वह मद कुछ ऐसा उत्तेजित हुआ कि रसोई
बनाती रामा रमणी को बाहर घसीट, मुह मे कपडा
ठूस, नगी कर, हाथ पांव वांध, उसे एक खम्भे से बाघ
दिया। इसके बाद चूल्हे मे लोहे को छड लाल करके
पिशाच के उल्लास से वह तरणी का अग अग दागने
लगा। सारे शहर में कोहराम मच गया । बडा होहल्ला
मचा । मरने के पहले उस औरत ने बयान दिया था कि
उसे रामलीला वालो ने बरबाद किया है। लेकिन
महन्त राममनोहरदास बडे काइयाँ थे । जहा भी मडली
जातो पहले वहां की पुलिस से ही प्रेम बढाते थे। फिर
राम का बलवान नाम लीलाधारिया के साथ था ।
साथ ही यह आदमी कोई बडा श्रादमी नहीं था । सारा
दोष उसी के माथे मढा गया। पाखण्डी लीला वाले फिर
भी पुजते रहे । औरत अस्पताल में मर गई थी।
यह सब सुनकर पुलिस से प्रेम होने पर भी महत
राममनोहरदास मन ही-मन डरे, साथ हो, कम्पनी के
प्रय छिपे रस्तम भी प्रबम्पित हो उठे। फ्लत येनकेन
प्रसारण प्रोग्राम पूरा पर मनोहरदाम मडली के साथ
वाराययो से सागर प्रस्थान पर गए। फिर भी, मारी
जाने, मर जाने, भस्मीभूत हो जाने के बावजूद पारायकी
वालो को यह बाँकी छवि, यह मादप, छलरतो, छाती
को छूती, प्रादती जयानी की हवा मेरे हृदय से न गई,
न गई । और मैं उदास उदास रहने लगा, प्रेत-बाधित
पमठ
1
जसा । मेरी चचलता कम होने लगी, भीड छटने लगी।
अब ध्यान होता सनह साल वाली का -और बारह साल
के वेचन पाडे होते । और बेचनी होती । ऐसा मचलता
मन होता जिसका पता न चलता कि वह आखिर मचल
रहा है क्या? वही उस्ताद वागेर दिलेनादा तुझे हुआ
क्या है ? प्रातिर इस दद को दवा क्या है ? लेकिन मैंने
पहले दद जाना, दवा के लिए तरसने का रस चखा,
गालिब' का गेर तो इस वाक्या मुद्दतो बाद
मैंने सुना। फिर भी क्माल | सारी गजल दिल को छूने
वाली-
हम हैं मुश्ताक और वह बेजार
या इलाही । य माजरा क्या है ?
ये परो चेहरा लोग कसे हैं ?
गम्ज्ञा प्रो इश्व प्रो अंदा क्या है?
सब्जा प्रो-गुल कहा से प्रात हैं ?
अम क्या चीज है? हवा यया है
या इलाही । या इलाही । या इलाही | 2 माजरा
क्या है ? उसके सवना पर मेरे सीने में दद क्या हुआ
जो हो वही मेरे सीने म मुह यत की प्राग कुछ
एसी जगमगा गई, जो किसी कदर आज तक मुझे
गरमाती, तपाती, जलाती यानो जिलाती रहती है । और
मेरे सलोने सौभाग्य म बारह बरस का ही वयम मुहल्यत
बदी यो । उस गायर ने मूठ कहा होगा जिसने कहा,
मेरा मिजाज सडकपन से ग्रागिराना था लेस्नि मैं
सच कहता हू । काइ पूछ मरता है-इससे मेरा फायदा
हुप्रा या नुक्सान ? यह सवाल यही परगा जिसे
मुहरत राहोरस्म का इल्म मुतलर न होगा।
मुहरत सामारिप हानि-लाभ क तराजू पर तौली पान
?
दियामद
?
योग्य जिस पदापि नही । इसका तो जीवन के सुदुलभ
सुधा-मधुर स्वाद से सम्बध है। कहा उस्ताद ने इश्क
से तबीअत ने जोस्त का मजा पाया, दद की दवा पाई,
दद बैदवा पाया । इम दे ऋतु के प्रेम ने मुझे अकारण
प्रेम के माग पर कुछ ऐसा उतार दिया पि अाज तक मैं
मन के मचलने से नहीं न जाने क्यो-किसी को प्यार
करता हूँ। बकौले दिल चाहेगा जिसको उसे चाहा न
परेंगे, हम इश्को हविस को कभी इक जा न करेंगे। मैं
महसूस कर रहा हैडूबकर निकलने वाले दोस्त
पूछना चाहते हैं कि साठ के हो गए अाज तक जनाब
दिल फेंक हो हैं ' जो हा । मैं बरसो से उम्र क्यो गिनू
जीवन की गति से क्यो न जांच? अभी मेरी भावरें
नहीं पड़ा । विवाह नहीं, सगाई नहीं। उस बाराबंकी
वाली से दिल लगने के बाद मैं घरावर कुरा हो
रहा हूँ। लानत है साधारण गिनती पर जोड, बाकी,
गुरगा मेरे भाग मे भगवान् को दया से कभी नहीं रहे।
मयमेटियस मे मैं इतना मद कि साठ का हो जाने पर
भी गधापचीसी के प्रागे जीवन जोडने की तमीज
बिलकुल नहीं। प्रादमी के चेहरे की यह मूछ-दादी,
मेरे मते, व्ययित को बजरता विदित करने वाले कुरा
कास हैं । पास पास देवतामा की मूर्तियो मे उनको वय
गिोर और युवा हो क्या यतलायी जाती है ? इसो
लिए कि परम भागवत-तत्त्व व्यक्ति मे तभी तर रहता
है जय तर मूध-दादी नहीं रहती । पर्यादा पुरुषोत्तम
होने पर भी राम या नगवान्स्वय कृष्ण की मू और
दाढ़ी रिसी ने देखी हैं ? इतने यिस्ट भयर प्रलयर
होने पर भी पर ये विग्रहो मे दादी-मूछ यहाँ होतो
है ? क्यों ? इसका प्रप यही है कि कोई कृष्ण की तरह
अमत रास करने वाला
हो
या शकर की तरह प्रलयकर
ताण्डव सष्टि और नाश, दोनो ही प्रादमी के हाथ मे तभी
तक रहते हैं जब तक उसे मूछ-दाढी की दिक्कत दरपेश
नहीं पाती। यह मूछ दाढी मूढ मानव के बाहर तो बाहर,
अदर भी निकलती है। इनमे अदर वाली को आदमी
सावधानी से साफ करता रहे तो बाहर वाली उतनी
भयावनी नहीं साबित होती।
भानुप्रताप तिवारी
बचपन मे मेरे मुहल्ले में दो हस्तिया ऐसी थीं जिनका
फ्मोवेश प्रभाव मुझ पर सारे जोवन रहा । उनमे
एक थे भानुप्रताप तिवारी (जब में सात बरस का था, वह
साठ दे रहे होंगे), दूसरे महादेव मिथ उफ बच्चा महा
राज, जो उन दिनो चालीस के भीतर की उम्र के रहे
होंगे। भानुप्रताप तिवारी के अच्छे अच्छे दो-दो मकान,
पर वह स्वय मुख्य मकान के द्वार देश की सडास के
सामने की अध अंधेरी, सोलन भरी बदबूदार कोठरी मे
रहा करते थे। पहनते थे गाढे के चारखाने का लम्बा
रईदार फोट और पुराने ढग का पाजामा-रुईदार हो।
भानुप्रताप तिवारी के ब्रह्माण्ड या योच सोपडी में कोई
ऐसा पण हो गया था जिसके सवय अधेड अवस्था हो मे
वह सहज, सामाजिक जीवन के अयोग्य हो गए थे। रोग
असाध्य था, कम भोग दारण, फिर भी, तिवारीजो सारे
जीवन-दप से डटे हुए मरण से लोहा लेते रहे । कुछ
नहीं तो तीस चालीस परम उहनि उमी बदबूदार अंधेरी
फोठरी मे काटे । उस घोर दुस को बडी ही गान से यह
सुटलाते रहे । मस्तिष्क मे ग्ररण होने के बावजूद पण्डित
भानुप्रताप निवारी अधेरी कोठरी मे, साट पर रजाई
मोढ़े तीस चालीस वरम तर या तो उत्तम, गभीर प्रयों
पा अध्ययन किया करने के प्रयया रिसी सदप्रय का
मनुवाद, भाष्य, समोसा प्रादि । कहते हैं सिर मे धाव
उनहत्तर
पदा होने से काफी पहले से रहें लिखने-पढ़ने का मौक
था। मिर्जापुरी चोली म उहाने तुलसीया रामायण की
एक टोका भी तभी शुरु कर रखी थी । भानुप्रतापजी
ने रामायण की अपनी टीका मे रघुन दन राम को
तुलसीदास की तरह परब्रह्म स्वरूप नहीं स्वीकारा था।
बुस या लोअर लाइस के अग्रेजो को सगत से मुहल्ले
के ब्राह्मणो की दृष्टि मे भानुप्रतापजी नास्तिक बन
चुके थे । रामायण की उस टोका मे अनेक अवसरों पर
उहोने ऋषि मुनियो को खिल्ली भी खूब उडाई थी।
कहते हैं चुनार मे एक बार कोई सत अयोध्यावासी
आये और सयोग से भानुप्रताप तिवारी तक उनको
रसाई हो गई। तिवारीजी महात्मा को छेडछाड की
अदा मे निजात तुलसीकृत रामायण की टीका सुनाने
लगे। उसमे बालकाड मे मिथिला की महिलाप्रो ने
ब्रह्मपि विश्वामित्र को इसलिए मला तुरा कहा था कि
उनकी दृष्टि म चक्रवर्ती दारय राजमहल के सुखो से
छुडा जगल जगल बहकार किशोर कुमार राम-लक्ष्मण
के साथ उहोंने क्रूरता दिखलायी थी। ऋषि विश्वामिन
के प्रति भानुप्रतापजी की छिछली मावा भापते ही
वह अवघवासी महात्मा मार रोप के स्वयमेव क्रोधी
कौगिक बन उठे-चपल चाण्डाल उहोने गाप दिया
था-' इस टीका का समाप्ति के पूर्व ही तेरी टीका
विदीरण हो जाएगी। और वह महात्मा वहा से प्रवि
लब चलत बन । और अनतिदूर भविष्य मे ही मानु
प्रतापजी को खोपडी के मध्य म वह घाव अनायास ही
प्रक्ट होने बढने, रिसन, जिदगी हराम करने लग पडा
था।
तिवारीजी पिना सरकारी नौररी मनाजिर
थे। उनकश तहसील चुनार मे पाटर-मार था । स्वय
सनर
भानुप्रतापजो भी चुनार के किले मे कोई अधिकारी थे । अवश्य हो उहे प्रारभ हो से लिखने पढने का व्यसन रहा होगा । वह अरबी, फारसी, उदू, अग्रेजी, ब्रजभाषा एव सड़ी बोली ये मर्मी ज्ञाता थे। जब बना रस में 'भारते' हरिश्चद थे, तभी चुनार मे भानुप्रताप तिवारी जवानी पर रहे होगे। तिवारीजी के दोनो घरा मे कुछ नही तो दम हजार जिल्द पुस्तकें विविध भाषाम्रो की, बहुमूल्य एव अमूल्य, सग्रहीत रही होगी । उनकी अघ अधेरी कोठरी मे तो चारो ओर किताया से भरी पानमारिया और रेके ठसी थीं । उनकी लिखी एक- पिक छोटी छोटी किताबें बीसवीं सदी के प्रारम्भ के पहले ही छप चुकी थी, म्बात सुखाय, अमूल्य वितरणाय । उनमे एक पुस्तक चुनार पर थी। चुनार का सक्षिप्त इतिहास और समसामयिक नागरिक कुलो का परिचय । उस पुस्तक मे भानुप्रतापजी ने मेरे सानदान को चचा भी फुध तो उसको विधिनता के पारण और कुछ इसलिए को है यि यह हमारे यजमान थे। भानु प्रतापजो थे हम पुरोहित थे । उसो पुस्तक मे तिवारोजी ने मेरे एक प्रपितामह का वर्णन किया है, जो पढे लिये मतलर नहीं थे, फिर भी प्रसिद्ध सिद्ध थे । हमारी पल-देवी नगवती दुर्गा दुग विनाशनी सुदान पाडे-~यहो उनका नाम या--पर रीझ गई थी। सो, मेर प्रपितामह ये सर्वत-माग से राजहार का भसा शास्त्राय फरने कारिल हो जाता था। सिद्ध सुदशन पांडे अपने घर की टूटी चारदीवारी पर कठे दातुन पर रहे थे निशिसोने सुनाया रि कोई भारी सिद्ध उनमे मिरने को सिंह पर सवार, हाय मे सब का वायुप लिये प्रा रहा है । सुनते हो सुदगन पांडे ने टूटी चारदीवारो को एड लगाई- Phone "चल तो । महात्मा का इस्तक्वाल आगे बढकर करें।" और चारदीवारी उहे लेकर चल ही तो पडी। मेरे परदादा का प्रतापो चमत्कार देख वह सिंह सवार सिद्ध उनके चरणो मे लोटने लगा था। वही अनपढ सिद्ध सुदशन पाडे एक दिन स्नान सध्या के बाद घुटनो तक गगा मे खडे सूय को अध्य दे रहे थे कि बीच धारा से तत्कालीन काशिराज का राज बजडा गुजरा। अमित तेजस्वी ब्राह्मण पर नजर पडते ही राजा ने जलयान-चालको को उधर ही चलने का इशारा किया। राजा के निकट कोई ऐसा भी था जो सिद्ध सुदान पाडे से भली भाति परिचित था। उसने देखते ही काशिराज को बतलाया कि वह तेजस्वी ब्राह्मण है कौन । दुनिया की नजरो म महामूख, मगर भगवती का भारी साधक--सिद्ध। सुदशन पाडे के निकट जा राजा ने पूछा-"महाराज, गगा गभ में क्या क्या चीजें हो सकती हैं ?" 'गगा गभमे" चमत्कारीसुदशन ने सुनाया--"गगा-गम मे सरगोश का बच्चा होता है। और क्या ?" खरगोश का बच्चा गगा राजा बनारस को ऐसा लगा गोया ब्राह्मण ने उनका उपहास किया अनुचित प्रसम्भव उत्तर देकर । राजा क नयने ईषत् फूले, भवें तनी होठ असन्तुष्ट फड "महाजाल डाला जाए गगा मे और जाचा जाए कि क्या पानी के प्रदर खरगोग का बच्चा भी वसता है ? एक बार जाल डाला जाए, दो बार, तोमरी बार भी अगर सरगोग के बच्चे का सुराग न लगे तो राज अपमान के लिए धष्ट ग्राह्मण का मैं गासन करना चाहगा।' सो महाजाल डाला गया- एक बार, दो वार । लो, तीसरी बार जगोजाल में फंसा सुन्दर परगोग का वच्चा | राजा ने स्तम्भित हो दाता 2 के प्रदर 7 बहत्तर
अंगुली दाबी और सुदशन पांडे को एक सौ पाठ बोघे
जमीन, जिसमें चार कुएं और दो ग्राम की बगिया, उसी
समय दान मे दी। इस घटना के बाद सुदवानजी जब
घर लौट रहे थे तो राह के जगल मे एकाएक किसी ने
तेज चाटा उनके गाल पर जडा । "भूख कहीं के । देख
तो मेरो चूदरी चिदी चिदी हो गई कटोली भाडियों
मे खरगोश का बच्चा ढूढते-ढूढते।" चक्ति सुदशन ने देखा,
सामने चियो चूदरी पहने खडी कुमारी के रूप मे स्वय
जगज्जननी वात्सल्यमयी सबक्ल्यारणी सवमगला को ।
पह सच भी है, जिसका इशारा भानुप्रतापजी की
पुस्तक मे भी है कि मेरे खानदान के लोग हरसू (पाडे)
नामक ग्रह्म के वश के हैं, जिनका परम प्रसिद्ध स्थान
उत्तर प्रदेश बिहार को सोमा पर स्थित चनपुर मे है ।
इहीं हरसू ब्रह्म को स्वर्गीय परम विद्वान डा० रामदास
गोड पादर से मानते थे । इन हरसू ब्रह्म को तो सोलह
पेजी जीवनी छपकर भक्त जनता मे सहस्र-सहस्र की
सस्या में विक्त्तो है । कसो जीवनी ! मेरे विख्यात पिता
मह हरसू पांडे जिस राजा के राजपुरोहित या गुरु थे,
एक बार उसने नयी-नयी कोई गादी की। रात को जब
यह चौमजिले के रनियास मे गया, विलास का अवसर
माया, तय अचानक नयी रानी को नतर सामने मगर
दूर से प्राते प्रकाश पर पडो, जो राजभवन के बराबर हो
रिसो महल के चौमजिले को पिडकी से पा रहा था !
"यह विसको पिडको है मेरे कक्ष के सामने"
जरा रोप मे रातो राजा को और भी रमणीय मालूम
पडी। "यह प्रशा मेरे युल-गुरु हरसूजी पे निवास
को लिडको से पा रहा है।"
गर "राज भवन के बराबर महत बाहरण था भवन !
छि । "मगर?" "वया अगर 7 वया मगर "वह परम सिद्ध पुरप-हरसू पाडेजी-हमारे पुरोहित, पिता से बढकर हैं।" "पिता से बढकर कोई परम पिता हो, परन्तु शयन कक्ष के सामने किसी की भी खिडकी दरवाजा मुझे नापसद है। सामने वाले घर का एक खण्ड पहले गिराया जाए, फिर प्राप राजा, फिर में रानी ।" "स्त्री " रानी के बिगडे दिल पर राजा के मुख से 'स्त्री' शद, होन भाव से निकलते ही साप सा लोट गया । वह फूल-सेज से सपिणी-सो सरककर कक्ष से बाहर जाने लगी |~~"आप मेरे प्राण ले सकते हैं-राजा हैं, म अबला हूँ पर मुझे अपने मन के खिलाफ आचरण करने पर विवश नहीं कर सकते । मैं बाजार से सरीदकर नहीं लायी गई हू-पाणिगृहीता कुलीना, राज्य क्या है। अभी मेरे पिता जीवित और समय हैं।' यहते हैं कई दिन तर रूपवती यौवनगविता रानी ने हठ नहीं छोडा । तब, विवा हो, काम-मोहित राजा ने पुरोहित हरम पाडे से पूथा कि रानी पो प्रसन करने क लिए यदि वह अपने भवन का एक सण्ड गिरा दें तो कोई बडी हानि होगी क्या "हानि " तेजस्वी हसू पाडे ने दुहराया- "दामिनी का प्राग्रह रहे गुरु को मर्यादा चन्द भाड मे जाए-इसमे कोई हानि ही नहीं ? मैं कहता हूँ औरत के मोह से जिस राजा को मति मलीन हुई उसके नाश म अधिर देर नहीं लगती।" राजास्तव्य, सुन, चुप रहा। चौहत्तर प्रचण्ड पुरोहित के प्रागे विशेष बोलने को उसकी हिम्मत न हुई । हरसू पाडे का सारे राज्य मे दिव्य ब्राह्मण होने के कारण बडा मान था। उनके दशनो मे बरक्त मानी जाती थी। बचपन ही से राजा के मन में हरसू जी के प्रति श्रद्धा थी। लेकिन नयो रानी, कल की पायी। उसे तो अपनी सौतों को यह दिखलाना था कि राजा पर उसोकाएकाधिकार है ।सो, दिनों तक पींचातानी चलती रही । न गनी ने स्त्रो हठ छोडा, न हरसू पाडे को ही अपना मान मदित कराना मजूर हुआ और न राजा हो की हिम्मत पड़ी कि रानी के लिए पुरोहित भवन का एक पण्ड बलात् गिरवा दे। लेकिन एक दिन जो न होना था वही हुप्रा और राजा ने पुरोहित भवन का एक सण्ड बलात् गिरवा दिया। इसको अपमान मान राजपुरोहित हरसू पांडे ने राज-द्धार पर प्रामरण प्रनगन ठान दिया था। अनान के इक्कीसवें दिन हरसू पाडे के प्रारण जाते रहे थे। प्राण त्यागने के थोडा ही पहले राजा को पहली रानी को क या के हायों कटोरा भर दूध ग्रहण करते हुए हरमूजी ने राजपुत्री को प्राशी दि दिया था "जा, केवल तेरा वश बचेगा।" विख्यात है पि हरसू पांडे मरने के बाद प्रचण्ड ब्रह्म प्रेत हो गए । साथ ही, सहसा, पडोसो राजा ने उस राजा पर चढाई पर दी। उसको पराजित कर, सारा राजपाट, ठाठ-बाट विध्वस्त, अग्निसात कर दिया था। उसी ध्यसावरेप के बीच मे हरसू यह को भारत प्रसिद्ध समाधि है। हरन ब्रह्म बिहार और उत्तर प्रदेश २ प्रनेर भागो मे देवतामों से भी अधिक पुजते हैं। थुरा-से-धुरा भूत प्रेत-याधित व्यक्ति हरम ब्रह्म जाकर पपहार चगा हो जाता है । हरसू ब्रह्म के मेले मे सारे देश से प्रेत- -
बाधित प्राणी-प्राय स्त्रिया--हर साल आते हैं।
वीरान-उजाड मे पचासो हजार प्रादमियो को भीड लगती
है, लासो का यापार धधा होता है, दसो हजार रपये
वहा के पडे प्राप्त करते हैं। ऊपर से माल मलाई,
रेशम, कम्बल, रजाई भी। मैं पाण्डेय बेचन गर्मा 'उग्र'
हरसू ब्रह्म के कुल का हू-निस्सदेह । विदित विद्वान,
प्रेत पडित रामदासजी गौड ने लिखा है कि हरसू ब्रह्म
के यज्ञोपवीत संस्कार में गोस्वामी तुलसीदासजी शामिर
हुए थे।
लेकिन ब्रह्म या प्रेतात्मा अथवा भूतो के अस्तित्व
पर मेरा विश्वास जरा भी नहीं। ससार का सबसे
भयानक भूत म पचभौतिक आदमी को मानता हू । मने
भयानक-से भयानक भवन, सनाटे से सनाटे मदान
कजड वीरान मे भी ढूढने पर जब एक भी भूत, भुतनी
या भूतनी कुमार को नहीं पाया, तब भूतो पर से मेरी
प्रास्या भले ही न उठ गई हो, पर यह विश्वास दृढ हो
गया है कि प्रादमी से भयभीत हो भूत भी भागा भागा
फिरता है।
पर, मैं भानुप्रताप तिवारी की चर्चा कर रहा था।
तिवारोजी जिस कोठरी मे रहा करते थे उसके पूरबी
द्वार के सामने ही बडा भारी पीपल का पेड या । चिल
क्ती दुपहरी या चमरती चादनी मे पीपल के पेड के निकट
सडे-सडे पेगाव करते हुए भानुप्रताप तिवारी पूरे प्रेत
मालूमपडते थे-हड्डोले रक्तरहित, उजले-घमी पाखें,
चेहरे पर सारी सष्टि के लिए 'मगानी गाप । मले
चारपाने का रईदार पायजामा और उसी रग का लम्बा
दगला सइदार । बहुत लडकपन म मैं तो तिवारीजी के
सामने तक जाने से डरता था और यदि उस गली से
छिहत्तर
गुजरना ही होता, तो जहा तक उनका मकान था उतनी
गलो में भयभीत दौडता पार पाता था । लेकिन
जब भी उनकी कोठरी में नजर जातो वहा कोई साहब
अप्रेज बठा होता, या मेमसाहव गोरी होती, या बगाली
मोशाई होते । तहसील के अधिकारी या ईसाई मिशनरी
या साधु या फकोर । और भानुप्रताप तिवारी उसी
डेस मे खाट पर प्रध-पडे फर्राटी इगलिश या हिदुस्तानो
गडगडातो ग्रावास में बोलते होते । भानुप्रताप तिवारी
जब तक जीवित रहे, चुनार मे विश्वकोश माने जाते थे।
क्वीर, दादू, दरिया, मलूरदास, रदास प्रादि प्र-ब्राह्मण
सतों के प्रति उनका अनुराग दिप या। इनकी रच
नानों को उहाने टीकाएँ तथा समीक्षाएं लिखी । तुलसी
की रामायण पर भी जिल्द-को जिल्द, रजिस्टर-ये रजि
स्टर भरे । एक-दो नहीं, पचासा पुस्तकें उहोंने स्वात
सुग्याय, चिद्विलास के लिए लिखों । प्राग तुक विद्वानो से
उही विषयों पर तिवारोजी चतुर चर्चाएं चलाया करते
थे। मैं काफी बडा होने पर स्कूल में दाखिल हुआ। चौदह
साल की उम्र में नेहरू जवाहरलाल लदन म शिक्षा
पाते थे, लेकिन बचन पाहे का नाम चौदह साल की उम्र
मे चुनार क चमिगन स्कूल मे, थड क्लास मे लिखा
गया । तब मुझे पुरोहित-या का जानकर-न्या पयों-
भानुप्रतापजी ने मुशो मयुराप्रसाद रचित मिलिगुअल
डिपानरी दी थी। यह प्राज भी मेरे घर को पुस्तकों मे
हो तो ताग्नुव नहीं। तिवारीजी को दो-दो व्याहता
बेटियों यों-मना और गिरजा । एषमान पुन था
रामगुलाम तिवारी, जिसका पुशरने का नाम 'मलुक्को'
था। मिडिल पाम रामगुलाम तिवारी तमीली रजि
सतहत्तर
स्टार का पता था । रामगुलाम तिवारी विवाहित था।
भानुप्रतापजी की पत्नी तगडो, मालकिन मुखो, निहायत
नेक दिल थी। लेकिन मारे दुलार के उहोने अपने पुत्र
रामगुलाम तिवारी को बरबाद कर डाला था। मारे मोह
के वह माता अपने बिगडे बेटे को दारु पीने और जुमा
तक खेलने के लिए रुपये ही नहीं देती थी बल्कि दूसरे के
घर मे जाकर पूत सक्ट मे न पडे, अतएव अपने दूसरे घर
मे जुए की फड लगाने देती यो। उस दूसरे घर मे मलुक्को
कुछ भी करता था। इस लडके को लेकर भानुप्रताप और
उनकी पत्नी मे प्राय विवाद होता । भानुप्रताप शासन
करना चाहत (असाध्य रोग पीडित खाट पक्डे प्राणी)
पर पत्नी के आगे उनकी एक न चलती-सिवाय जबान
के । और तिवारीजा सारी जिदगी अपनी पत्नी को
धारावाहिक भाषा मे गालिया सुनाते रहे । रामगुलाम
तिवारी भानुप्रताप के सामने ही पहली यार जुए मे
गिरफ्तार क्यिा गया था, लेकिन भानुप्रताप के प्रभाव
से तहसील के नेक दिल अधिकारिया ने उसे बचा दिया
था। इसके बाद भानुप्रतापजी का देहात हुआ और
रामगुलाम तिवारी सरकारी स्पयो से जुम्रा खेलने के
बाद अमानत म सयानत गबन मे गिरफ्तार हुआ।
मुक्दमा बरसा चलता रहा। दरमियान मे राम
गुलाम की पत्नी मर गई । पुलिस को बेटे का फुगल क
लिए रिश्वत दती-देतो मोहमया माता मालग्नि से
भिमारिन बन गई, फिर भी, इस भ्रम
कि उसक
पास छिपा धन है एक पुलिस अधिकारी ने उस बेचारी
को वो-यो गालियां सुनायों, एसो एसी कमीनी धमक्यिा
दी कि सारा मुहल्ला नस्त हो उठा । अन्त में जिस
बेटे मोह में वह माना मर मिटी उसको दो यप से
सल सजा हा गई । इसौ बाव में भानुप्रताप तिवारी का
महत्तर
सारा बहुमूल्य पुस्तकालय, उनको लिसो पाण्डुलिपिया
वेचकर मलुक्को ने जुना खेल लिया था। उसके जेल
जाते ही वह मोहमयी माता मर हो गई । ऐसे भया
नक दुख से विदोरण होकर भानुप्रताप का मकान भी
'भहरा' पडा, जिसकी एक एक इट या ढोंका दुनियादार
पडोसी चुन ले गए।
अन्त मे जुगाडी कुलागार रामगुलाम तिवारी का
एक पुत्र बच रहा था-मदन-तेरह चौदह साल
का,जो दिन में सज्जन पडोसियो के यहा पशुवत परिश्रम
करने और रात मे दुष्टा के साथ कुक्म करने पर
टुक्डे पाता था। देखते ही देखते भानुप्रताप तिवारी के
वश का ऐसा हाल हुअा कि जिनके महलो मे हजारो रग
के फानूस थे, भाड उनको कद्र पर है और निगां कुछ
भी नहीं।
भावप्रसापनीती परतो सगी माग्नि गुपी निरामा रति पारिन मारे गारो भो पुत्र रामगुगाम शिपारी यो परमार परापा। मारे मोर पर माता प्रपो गिरे पेट पोरा पो प्रौर जुगा तर तो लिपोपही देता पो यदि दूसर पर मजार पूत राष्ट मपर प्राण्य अपने गरे घर म पुए पोपा सगाो देतो पो। उग गर घर म मनुरागी पुप भी परता था। इस सार यो सेरर भानुप्रताप पौर उनरी पत्नी म प्राय पियार होता । भानुप्रताप पारान मरना चारत (प्रमाप्य रोग-पोषित पाट पारे प्राणी) पर पत्नी माग उनको एर न घलती-सियाप बयान और तिवारीनी सारी जिनगी अपना पत्नी को धारावाहिर भाषा मे गालियां मुनात रर । रामगुलाम तियारी भानुप्रताप के सामने ही पहनी चार जुए म गिरफ्तार दिया गया था, लेपिन भानुप्रताप के प्रभाय से तहसील पे नर दिल अधिकारिया ने उसे पचा दिया था। इसर वाद भानुप्रतापजो का देहात हुआ और रामगुलाम तिवारी सरकारी रुपयो से जुमा सेलने । बाद अमानत में समानत रावन में गिरफ्तार हुमा । मुक्दमा बरसो चलता रहा। दरमियान मे राम गुलाम की पत्नी मर गई। पुलिस को बेटे की कुगल के लिए रिश्वत देती-देती मोहमयी माता मालकिन से भिखारिन बन गई, फिर भी, इस भ्रम मे कि उसके पास छिपा धन है, एक पुलिस अधिकारी ने उस बेचारी को वो-वो गालिया सुनायीं, ऐसी ऐसी कमोनी धमकियों दा कि सारा मुहल्ला त्रस्त हो उठा । अत में जिस बेटे के मोह मे वह माता मर मिटो उसको दो वप रो सख्त सजा हो गई । इसो बीच में भानुप्रताप तिवारी का -- भठहत्तर --
सारा बहुमूल्य पुस्तकालय, उनको लिसो पाण्डुलिपिया
वेचकर मलुको ने जुना खेल लिया था। उसके जेल
जाते हो वह मोहमयी माता मर ही गई । ऐसे नया
नर दुप से विदोए होकर भानुप्रताप का मान भी
'महा' पडा, जिसकी एक एक इट या ढोंका दुनियादार
पड़ोसी चुन ले गए।
अन्त मे जुगाडी कुलागार रामगुलाम तिवारी का
एक पुत्र बच रहा था-मदन---तेरह-चौदह साल
सा,जो दिन में मज्जन पडोसियों के यहा पशुवत परिश्रम
करने और रात मे दुष्टो के साथ युक्म करने पर
टुमडे पाता था। देखते-ही देपते भानुप्रताप तिवारी के
वा का ऐसा हाल हुआ कि जिनके महलों में हजारो रग
के
फानूस थे, झाड उनको कम पर है और निगां कुछ
भी नहीं।
बच्चा महाराज
"बायू !' या सहप पृद्ध, परि और पुत्र
यत्रात पिता को सम्बोधित पिया।
• पचया !
"मिर्जापुर में पुलिस राम पेस्टर को गौर री मेरा
एक दोस्त जो कि पुलिस म मुझे दिलाने को तयार
है। क्या यहत हो?'
"यभाग्य, यचया !" प्रसन्नप्राय पिता ने
सुनाया, "पुलिस मे तो हयलदार भी हो जाना घर में
लक्ष्मी या पाय तोडरर घटना होता है।'
"दोस्त ने लिया है कि सब इन्स्पेक्टरी तो घरा-जसी
है, लेरिन
"लेपिन पया बचवा"
"कोगित-परयो मे कुछ तो खर्चा या लगेगा ही।
रपये डेढ सौ लगेंगे, तब मैं सब इन्स्पेक्टर बन सकूगा।
मेरा चेप्टा भरसक यही रहेगा कि चुनार हो मे मेरा
नियुक्ति हो।
चुनार म अपना बटा छोटा दारोगा होगा, इस कल्पना
ही ने बद्ध पिता को कुछ ऐसा गुदगुदाया कि तिजोरी
खोलकर उसने उसी समय डेढ़ सौ लोईदार विक्टोरिया
रुपये बेटे क आगे गिन दिए । बेटे राम उसी समय दुघडी
साध दो ही दिन बाद लौटने का वामदा कर मिर्जापुर
को रवाना हो गए । एक दिन, दो दिन, तीन और चार
दिन जब गुजर गए और पाचव का भी प्रभात हो गया
मस्सा
7
तव पिता का माया ठनका । उसे दाल मे काला ही.
धाता दिखायी पटने लगा। तब तक एक जाने-पहनाने
महागय मिर्जापुर मे याये, जिनमे वृद्ध व्याकुल वाप ने
पूछा, "क्या नाई, मेरे बेटे का नी पोई सोज-पता है ?"
'क्यों नहीं | उसरे तो गुलछरें है भाजक्त ।"
पिता को पूरा विश्वास हो गया कि उसका पूत निश्चय
ही सब इसपेक्टर-पुलिस हो गया।
"गुलहरें ? तो हो गया वह सब इन्सपेक्टर-पुलिस
भई, क्या सवर तुमने सुनायो है चलो मेरे घर, तुम्हारा
मुह मोठा पराऊँ।"
"मगर कोन नकुवा सर-इन्सपेक्टर-पुलिस बना "
हैरान परिचित ने पहा, "वह तो पिछले पाच दिन से
मिर्जापुरी इरके पर दो-दो तवायफें बठाए, अफीम के
ऊपर राव चढाए वहाँ के ऐय्याला चुनार काममा
फहरा रहा। जारर देखिए
इस पर हाय-तौरा करता हुआ बूढा लालची बाप
जब तक मिर्जापुर पहुंचा तव तक पुत्र महागम हेद सौ
तो उडा हो चुके थे, ऊपर से रण्डी भडयों के पचास
रुपया के पजदार भी हो चुरे थे। लाचारी थी, बेटा
प्रपना था, बदनामी का बडा भय या । प्रत पिता ने
पचास रपये और पानी में डालर बेटे का उद्धार
रिया । पिता का नाम था ब्रह्मा मिश्र, पुरवा महादेय
मित्र उफ बच्चा महाराज।
मुहल्ला मद्पुर ये सवम अधिर धन-पुष्ट ब्राह्मण
रे ब्रह्मा मित्रा हमारे बच्चे मराना में परम परोहवेती
एर उहाँ पी थी। पहली पत्नी से बच्चे न होने के सवय
प्रल्हा निधन दुमरी गार्ग को यो । तर महादेय मिय
दम्यामो एस नाई तया तीन वहन पदा हुइ । महादेय मिथ 5
सध्या महाराज ) मा पा पा पर पड़ा पा गुझे
मान भी यहीं पर सारे जोया या प्रपम श्रेणी
पपूत, एम्पार, पारा पगा। मे। पर उग गामा
दुष्ट थे जिरा एप हो ना मागे सदस्य गगामा
हतमा शुरु हो जाता है। पर परत पारपर या गुगे।
परम रगोन मिजाज परम एतरार सपभो रायपाली
मौर भगयान भूठ न परतापे-राय गोगी थे। जया
म पहाने घेधा का टोपालगान यासरयारीसपेटर
फा काम पुष बरसों पिया पुष यरमा पुनार र धच
मिशन स्कूल में सस्कृत रिदी टीचर रह । गप सारा
जीयन यच्चा गुर ने मद्भुत प्राफ्षर मायारणी म
विताया। बच्चा महाराज प्रभी गत यस तर जोयित
रहकर प्राय नवे वप यो दोष उम्र म मरे । प्रत पात
तर उनकी रगीन मिजाजी उनके साथ रहो । यच्चा गुर
मेरे पिता के समययस्थ, मेरे बड़े भाई को चौपट
घाट उतारने वाले और मेरे तो गुरु हो थे । चच मिगन
सूल, चुनार मे तीसरी से छठी पतास तर ५० महादेय
मिथ से मैं योस को किताब की हिदो पढता था । बच्चा
गुर प्रध्यापयो यो करते थे कि रिसो पसे वाले छात्र को
दक्षिरणा लेकर मानीटर बना देते थे। इसके बाद क्लास
मे पाते ही यह तो पुरसी पर यठे-बठे टेबल पर पाय
पसार अफीम के नोम प्रध सो जाते और राज करता
था मानीटर । मुहल्ले का होने से उसको शराय-क्वाय,
जुमा मण्डली मे लघु सेयर की तरह उपस्थित रहन
वाले की हैसियत से, मुझे भी गुरुजी ने मानीटर बना
दिया था।
गुरजी मजबूत कमजोर दोनो ही प्रकार के घाना
से ऊपर की आमदनी करना सनातन धम कोर से अपना
बयासी
जन्म सिद्ध अधिकार मानते थे। चवन्नी से लेकर दस पाच रुपये तक सामथ्य ताडकर बच्चा गुरू छान या उसके पिता से ले लेते थे। दक्षिणा के बाद कल भी लेने मे उहे सकोच न होता। गरीब छात्रों से गाय का घो, शहद, नया गुड, तेल के अचार, ईस का रस, बाजरा, अरहर, जो भी सम्भव होता ले लेते। मानीटर की हैसियत से मैं भी कमजोर कामरेडो से मुफ्त की मिठाइया और पल खा लेता था। हत्येन चढ़ने वालों को स्थय साधारण छान होने के बावजूद गुरूजो को कृपा से मैं मार तक बठता था। बच्चा महाराज महा भयानक, साथ हो, महा विचित्र व्यक्ति । भयानक भी विचित्र होते ही रसज्ञों के देसने फी वस्तु एक रस हो जाता है । है कि नहीं? बच्चा गुस् टीचर रहे हो या वक्सिनेटर, सरकारी नौकरी मे रहे हो या प्रध-सरकारी, अफीम, शराब, वेश्या और जुना हमेशा उनपे सग रहे । साय हो, नित्य नेम से पूजा-पाठ भी । युगा तफ वह मिट्टी का महादेव बना, हाथ का अर्घा, पायि-पूजन किया करते थे । दुर्गासप्त- गती का पाठ भी उहे प्रिय था। वह स्तुति के 'लोक इत्तनो त मयता से, भावुरता से, स्यर और विरामयुक्त रहते थे कि लगता था इष्टदेव से प्रत्यक्ष बातें कर रहे हैं। गराचाय द्वारा प्रस्तुत भगवती को गिरणी छन्द वाली स्तुति का गान यह भाव विभोर होकर करते य। गौतगोविन्द के पद और विनयपत्रिमा क अनेक पद यह बहुत ही तेजस्थिता से उपस्थितपरते में ज्योतिष और घार, तोर मत्रों में भी उनको मार्मिक गति थी। यह मात चालमिकोई तब पिपरा, कोई ग्लोरल्यण्ड, निरामी कोई दोहा-चौपाई, गेर या पहायत जोडने में निहायत - । .
पाना महासा मे नया पापा महागामा मुझे
मान भी गहरा पर सारे जोपा पा प्रपम श्रेणी
से पूस, एयार या परमापर उग गामा
दुष्ट पे निगर पर हो ना माग सदायमा
हमारा जाता है। पर पहस पारर या गुगे।
परम रंगीन मिना परम गागर गयभागी गयपापी
पौर भगपाइ भूठ उपरलापे-राप भोगी थे। जया
मोघेघर पा टोरासगापास सरसारोसपेटर
पायाम पुप यरमों रिपा, पुष यरगा पुर र घच
मिना स्यूस म सरहत हिदी टोधर रहे। प सारा
जीयन यच्चा गुर 1 मद्भुत, मापपर मायारगी म
बिताया। यच्चा महाराा प्रभी गत पल तर जोयित
रहकर प्राय नग्ये यप पी दीप उम्र म मरे । प्रत पाल
तप उनी रगीन मिजाजी उनसे साय रही । यच्चा गुर
मेरे पिता के समययस्या, मेरे बडे भाई को घोपट
घाट उतारने याले और मेरे तो गुरु हो थे । चच मिगन
स्कूल, घुनार मे तीसरो से छठी क्लास तर ५० महादेय
मिथ से मैं पोसकी रिताय की हिदी पड़ता था। बच्चा
गुर प्रध्यापयो यों परते थे कि किसी पसे याले धान को
दक्षिणा लेकर मानीटर बना देते थे। इसके बाद क्लास
म पाते हो यह तो पुरसी पर यठे-बठे टेबल पर पाय
पसार प्रफीम नगे मे प्रध-सो जाते और राज परता
या मानीटर । मुहल्ले पा होने से उामो शराय-ययाब,
जुमा-मण्डली मे लघु सेवय की तरह उपस्थित रहने
वाले की हैसियत से, मुझे भी गुरुजी ने मानीटर बना
-
दिया था।
गुरजी मजबूत कमजोर दोनो हो प्रकार के छात्रो
से ऊपर की प्रामदनी करना सनातन धम कोरू से अपना
बयासी
जन्म सिद्ध अधिकार मानते थे। चवनी से लेकर दस
पाच रुपये तक सामग्य ताडकर वच्चा गुरू छान या
उसके पिता से ले लेते थे। दक्षिणा के बाद कज भी
लेने मे उहे सकोच न होता । गरीव छानों से गाव का
घी, शहद, नया गुड, तेल के अचार, ईस का रस, बाजरा,
अरहर, जो भी सम्भव होता ले लेते । मानीटर को
हैसियत से मैं भी कमजोर फामरेडो से मुफ्त की
मिठाइया और फल खा लेता या हत्येन चढने वालों को
स्वय साधारण छान होने के बावजूद गुरूजी की कृपा से
मैं मार तर बठता था।
बच्चा महाराज महा भयानक, साय ही, महा
विचित्र व्यक्ति ! भयानक भी विचित्र होने ही ग्मनों के
देखने को वस्तु एक रस हो जाता है। है कि नहीं?
बच्चा गुरु टीचर रहे हों या वक्मिनेटर, मार्ग
मे रहे हों या अध-सरकारी, अपोम, गव,
देर
जुमा हमेशा उनके सग रहे । माय, नि:
पूजा-पाठ भी । युगों तक वह मिट्टी म र
हाय या अर्धा, पायि-पूजन शिया का Riti
गती फा पाटनी में मित्र या
इतनो त मयना म, मात्रा में, entre
पहले ये दिगना या पत्र में
हैं। गागचाय द्वारा rtone
पर गाम्मुनि काठnratrimes
थे। गाना mar
पर वायनaferrzinari
प्रोवर, Amzine
पाinrnirmrritoriamar
शिगी
remirmins
from।
मेलिना गोगा वि मामो मं?
पा, aint lन भामे मा महो गोवार fr
भगया। भी रोग पोगाना गा है।
गापही पर पारापर भगयााो भी पार पा सारी
है। मुझे पाा भी मा म पार पा र भाप
जो पर जुमा म मोटी-सी पिपरी पर पर प्यरा
पिया परसे। रे पाय' पर भगपाा पोसम्यो
पित पररो-"पर भूल गए पासो ! दाग यो प्रभो
दोनय पो, दया परो!' और पौरी-पप्ता पपने काम
परते हो यह तापार पिायपत्रिमा गुगने सगने
जयति राग राजेद्र रागीय सोचन राम, नाम पति
पामतरु साम गाली । ऐलपा दलित भूभार भारी !
उन दिना घर, मदार गगा मे पाय पर, पास में
गांया म, जहाँ भी गुप्रा होता यच्चा गुर उसमे जहर
उपस्थित होते । इस तरह गुरजी ने इतनी बडी जिदगी
मासिर बितायी पसे ? जुमा के लिए पुप्पल पसे
प्राय यप होते हैं । ठीक है । बच्चा गुर ने उसको युक्ति
सोच रखी थी। पहले उहाने सासी सम्पत्ति में जो
उनका हिस्सा था उसे चुपचाप अपने छोटे भाई के नाम
लिख दिया और फिर सूदखोर बनियों से उसी सम्पत्ति
पर प्राण पर ऋण लेना गुरु किया । कलई पुली तब
जय पिसी यनिये ने दावा किया । पुर्वी लेकर आने पर
पता चला कि बच्चा गुरु का तो परिवार को सम्पत्ति से
अरसे से कोई वास्ता ही नही । मैने यहा है, चुनार मे
बच्चा गुरु की सबसे ज्यादा जजमानी थी और उन दिनो,
फिर भी, क्से भी, ग्राह्मण को क्प्ट देते हुए सेठ-साहूर,
श्रीमान्, कम्पित होते थे। सो, साहूकारो ने कई हजार
चौरासी
रपये बट्टखाते डाल, कान पक्ड,
जीभ दाबपर मजूर
किया कि चुनार मे कोई गुरु है तो वह हैं १० महादेव
मिश्र उफ बच्चा महाराज । हजारों वाले तो बच्चा गुर
को ग्राह्मण जान गम पाकर रह गए, लेकिन एक कोई
यनिया ऐसा भी था जिसने सौ पचास रुपये के लिए पेस
चला, डिग्री करा, अदालत के अहाते हो मे गुरु को घर
परडा था। निरषय था कि या तो वे रपये देते या जेल
जाते । बच्चा गुरु को जब हथकडी लगने लगी, उन्होंने
अधिकारियो से अपने घर चलने को कहा, ताकि यह
रुपये दे सकें। धाडी पहने हो सिपाहियों के साथ अपने
मुहल्ले मे लाये गए, लेकिन इस शान से उनके पाने का
समाचार सुनते ही उनकी मालदार माता ने एक दमडी
भो न देने का निश्चय कर घर का मजबूत दरवाजा
अदर से पद पर लिया था।
लेविन, गुस्जो गुरु ही थे। चारो तरफ से हताग
होने पर उहोने पाण-दाता हो को दबोचा--"चल, नोच
बनिये । ॐ फट स्वाहा । कर ब्रह्म हत्या, पयोंकि जेल में
मुझे अफीम मिलेगी नहीं और बिना प्रफोम मैं एक
सफण्ड जो नहीं सकता। चल, में ब्रह्म राक्षस बनकर
तुभमे न निपटू तो ब्रह्मा मिश्र का नुत्फा नहीं ! अभी
तुझे पता नहीं ह दि ग्राह्मण पसा होता है । बच्चूजी!
अब तुम पडे कठिन रावण के पाले । और पाठय विश्वास
परें, यह पनिपा भी पन घटकर रह गया था, लेकिन
गुरुजी से घाम भी उसके पल्ले न पडा था । और साहब,
सारे जीयन पोई-न-कोई मतिमार, गांठ का पूरा, उनमे
हत्ये बराबर पढ़ता ही रहा। प्रफोम के ऊपर गांजे को
सम्बो चितम एक हो हाय यो मुठ्ठो से पुषफुपर सप
पिचागी सपाते हुए बच्चा गुर निहायत लापरवाह भाव से
मा भे-प्रगर यम । गमागे मुशिमा नाम !
भोगे पगड m I गिम पर ना प्रिया
ममम मार गयी उस पगागा गुरमे
तुमा पम पर दिया था। प्रय या मारग + nि
पेन्या-पाजार दास
मोगरा गागागरा
जाता-यूभा पा) प्रापाप या गए । माय ग प्राय
म्ये पो उम्र सरगुती, माग मारग जाता है
सारे माारसी पन्यामा यिदा भाचाय मे। हर
येन्या पारती मि पर उसी र घर पर रापर पाधि
गुरजो गुदरी स्त्री पोर यायों भित्तो-गर तर
मारपष प्रसनतापूयय या जाते थे। यह येन्यामा के
घर जप-पूजा, सत्यनारायण, दुर्गासप्तशती पाठ सलर
पर परते । उनये यच्चा की जाम पुण्डलियो बना देते
दलदार गयर यनारसिया से उनका प्रोपेपण्डा पर देते।
यह ये या यो यार ये यहाँ और मालदार प्रासामी को
तयायफ ये यहाँ स्वयसेयो की तरह पहुंचा देते । यच्चा
गुरु को यह विशेषता थी कि उनको सहानुभूति ससार
के हर जीव से थो। रिसो या कोई भी काम (सेवा
नहीं) महत सहज रूप से मानन-फानन मजाम देने को
वह सदा ही तत्पर रहते थे। मुहल्ले के पुछ
मानते कि वच्चा गुरू को परोपकार-तत्परता दलाली
कमाने मात्र की थी और यह दो उलझनो में निक्ट
पाटियो को पूणत उलझाकर अपना उल्लू सीधा किया
करते थे। हो सकता है, उनको नीयत यही रही हो
लेक्नि आज मुझे लगता है कि जन-सेवा-सारी युरा
इयो के वावजूद-उनको जान मे घुली मिली हुई थी।
गीता मे 'पडित' उसे माना गया है जो विद्या विनय छियागी
लोग यह
सम्पन ब्राह्मण, गौ, हायी, कुत्ता और चाण्डाल को भी समदर्शी भाव एक नजर सेवरावर देखता हो । यथाशक्ति सवका कल्याण साधने प्रेकच्चा गुरु समदर्शी थे। वाह्मण को सहायता करते हुए पदि कभी उह चाण्डाल दुख- ग्रस्त नजर आया होगा, तो उसी प्राग्रह से उसके लिए भी उहोंने सोचा होगा । भले ब्राह्मण का काम करते समय गुरजो गगा के गुण-गान करते स्वत्तोरेवसत स्वदम्पु पियत और भगो-मेहतर की मदद करते समय उनो लिए बुरी-युरी गालियां मुह से निकालते । यच्या गुरु सौ मे नये बार निविधार लच्छेदार गालियां सुनाया परते थे । और तो और, गुरुजी जिहें गालिया सुनाते थे वे भी सहज प्रसन हंसा परते थे। चाहते थे कि गुरुजी और ध। और अब मेरे सामने चित्र प्राता है गुरजो की विवा हिता धम पत्नी गुलजारी चाची का । शायद वही बच्चा गुरु के जीवन की प्रादि या युनियादो ट्रेजेडी रही हो । वह बडी फुस्पा थीं । उनका मुह चेचा के दागों में भरा, गोल, नाक छोटो, होठ मोटे, छरहरी-लम्बी गुलजारी चाची। यह गायद येगाकर स्त्री भी थीं। कहा बच्चा गुर जसा रगीन मिजाज वाममार्गी, कहां गुलजारी चाची जमी रगर्भागना यामागिनी । सो, जर विस्फोट हुमा होगा । बच्चा गुर गुलजारी चाची को अपने शयन-कक्ष में भी न बुलाते, बगलें वि अफोम विषपर कोई हाजत न हो और घद सरणों के लिए भी पात्रो को देखते हो यह तोर-शोर से चोपते, ताफि सारा मोहल्ला सुने और जाने पि पच्चा गुरु अपनी पत्नी को लताड रहे हैं। वह उसे चुरो-रो-युरो गालियां सुनाते । और वह भी थी कि अपने दुर्भाग्य ही जसी, चोर मे पूरे ढोल-जमे कम से पुछन
ललकारते थे-प्रगड बम ! कमाये दुनिया पाएँ हम !
भोले प्रगड पत्ता | चिलम पर चढापर फूफ दिया
कलकता ।
मैं समझता हू साठ वर्ष की उम्र म बच्चा गुरु ने
जुना कम कर दिया था । अब यह बनारस के विण्यात
वेश्या बाजार दाल मण्डी के (जिसका चप्पा-चप्पा उनका
जाना-बूझा था) प्राचाय बन गए। माठ से प्राय
नब्बे की उम्र तक गुरुजी, सारा बनारस जानता है,
सारे बनारस की वेश्यात्रा के विदित प्राचाय थे । हर
वेश्या चाहती कि वह उसी के घर पर रहा करें, क्योकि
गुरूजी सुदरी स्त्री के पोर-बावर्ची भिश्ती-सर तक
प्राक्पक प्रसनतापूयक बन जाते थे। वह वेश्याग्रो के
घर जप पूजा, सत्यनारायण, दुर्गासप्तशती के पाठ ललक
कर करते । उनके बच्चो को जन्म कुण्डलिया बना देते
दलदार गबरू बनारसियो से उनका प्रोपेगण्डा कर देते।
वह वेश्या को यार के यहा और मालदार प्रासामी को
तवायफ के यहा स्वयसेवको की तरह पहुंचा देते । बच्चा
गुरू की यह विशेषता थी कि उनको सहानुभूति ससार
के हर जीव से थी। क्सिी का कोई भी काम (सेवा
नहीं) महज सहज रूप से आनन फानन अजाम देने को
वह सदा ही तत्पर रहते थे। मुहल्ले के कुछ लोग यह
मानते कि वच्चा गुरु को परोपकार-तत्परता दलाली
कमाने मान की थी और वह दो उलझनो के निकट
पार्टिया को पूणत उलझाकर अपना उल्लू सीधा रिया
करते थे। हो सकता है, उनकी नीयत यही रही हो,
लेकिन आज मुझे लगता है कि जन-मेवा-सारी बुरा
इया के बावजूद-उनको जान मे घुली मिली हुई थी।
गीता मे 'पडित उसे माना गया है जो विद्या विनय
छियामी
।
सम्पन्न ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल को भी
समदर्शी-भाव एक नजर से वरापर देखता हो । यथाशक्ति
सवका कल्याण साधने मे बच्चा गुरू समदर्शी थे । ब्राह्मण
को सहायता करते हुए यदि भी उहे चाण्डाल दुख
ग्रस्त नजर आया होगा, तो उसी प्राग्रह से उसके लिए
भी उहोने सोचा होगा। भले ब्राह्मण का काम करते
समय गुरुजी गगा के गुण-गान करते स्वतोरेवसत
स्वदम्बु पिक्त और भगी मेहतर की मदद करते समय
उनके लिए बुरी बुरी गालियां मुह से निकालते । बच्चा
गुर सौ मे नम्वे बार निर्विकार लच्छेदार गालिया मुनाया
करते थे। और तो और, गुरुजी जिहे गालिया सुनाते
थे वे भी सहज प्रसन्न हँसा करते थे। चाहते थे कि
गुरूजी और के।
और अब मेरे सामने चित्र प्राता है गुरुजी को विवा
हिता पम पत्नी गुलजारी चाची का । शायद यही बच्चा
गुर के जीवन को प्रादि या बुनियादी ट्रेजेडी रही हों।
वह बडी फुरपा यों । उनका मुह चेचक के दागो से भरा,
गोल, नाप छोटी, होठ मोटे, घरहोलम्बी गुलजारी
चाची। यह शायद पेशऊर स्त्री भी थीं। यहाँ बच्चा
गुरु-जसा रगीन मिजाज वाममार्गों, पहाँ गुलजारो चाची
जसो रगभगिनी यामागिनी । सो, लहर विस्फोट हुप्रा
होगा । बच्चा गुर गुलजारी चाची को अपने गमन-यक्ष
में कभी न पुलाते, मात पि अफोम यिषयर सोई हाजत
न हो और घद क्षणो के लिए भी चाची को देखते ही
बडे जोर-जोर से चीपते, तापि सारा मोहल्ला सुने और जाने
शिरच्चा गुरु प्रपो पलो को लताड रहे हैं । यह उसे
युगेशे-धुरी गालियां सुगते । और यह भी थी कि अपने
दुर्भाग्य हो जसी, बीच मे फूटे ढोल-जसे पाठ से पुधन
समामी
--
कुछ कु भाषा बोल ही देती । बच्चा गुर गुलजारी चाची
को अक्सर मारते और अपनी जननी को भी परम प्रशो
भन प से डाटते-फटकारते थे।
गुरुजी जिस भी वेश्या के घर मे कुछ दिनो टिक
कर रहे होगे, जरूर कोई न कोई बहुत सूबसूरत देख लेन
के बाद । यह वेग्या को नवोढा बेटी को मद्द-नजर रख
उसकी माता से मुह बत करते थे। फिर उसे समझाते
कि फला ढग से अगर यह लडको पूजन अनुष्ठान करे तो
लखपती तो फंसा ही धरा है। और रग बाध, रण्डी
को धूतता मे बाध, उसी के घर मे कम-से कम इक्कीस
दिन का अनुष्ठान शुरू करते ।
अब आप बच्चा गुरु का हुलिया नोट कर लें-पौने
छ फुट लम्बे, छरहरे, गेहुआ रग, बडी-बडी भावुक पाखें
हमेशा मुखरित होने को फकते प्रोष्ठाधर, साधारण
मूछे, धुटी दादी, सिर पर इगलिश क्ट केश । बच्चा गुरू
फेल्ट टोपी, बनियान, कडे कालर-कफ की कमीज, गेर
वानो, नफीस धोती, जुर्राब और पम्प शू या विलायती क्ट
बूट पहना करते थे। नाक पर हमेशा चश्मे, हाथ मे
बराबर छडी । अगुलियो मे अगूठिया, जेब मे रेल-गाड
घडी (जो उहोने जुए मेक्सिो जुनारी गाड से जीती थी),
एक हाय मे मलाई का पुरवा दूसरे मे नमकीन और मिठाई
के दोने । साथ मे एक-दो गए या चेले। अफीम, गाजा
या मदिरा, अथवा इनमे से दो या तीना के नशे में धुत
वह जब रास्ते मे चलते थे, सारी राह पावो से कहीं
श्यादा तेज बच्चा गुरु की जुबान चलती थी।
अब जब चर्चा चल ही पडी है, तो और एक चित्र
गुरुजी का निसलाऊँ । वच्चा गुरु बाहरण-वेग मे चदन
और चम्मे चढाए, उत्तरीय प्रोडे, ऊन के आसन पर नगे
अट्ठासी
स्व० बालमित्र श्री विश्वम्भरनाय शुक्ल र साय १८ वर्षीय उप्र जो (दाहिने)
मामन गुट पर
परम प्रतरगी विनोद
गवरजी ग्यासक साथ २५
वर्षीय उप जी (सुले सर)
उपर
उप जो सन् १९५७ ई
(क्लस्ता)
नाचे
या
सन् १९३१ई
(बम्बई फिल्म-कम्पनी में)
गण् सन् १९२० ई. (बनारस)
重 गगा-स्नान से लौटते तरूण उग्र और विनोदगार जी M
मध्य भारत हिदी साहित्य- rint
बरसों टिकपर आगमन mr fry
१९४०६.) ४० वर्षीय r riram
पोद विजया पामन fretire
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मतवाला' यास्वी सम्पादक और
मतवालामण्डलायोगविगत याबू महादेव
प्रसाव सेठ जिहे यह कृति समर्पित है।
1
सतातीस वर्षीय
उग्र भी बम्बई म
पकन
12M
अंग
२२वाय 'उ'जो मोर पानी
वाराणसी के गहरेबात पालिटी
गियन १० कमलापति त्रिपाठी
सड माधव प्रडतालोस वर्षीय उग्र जी कागी को साहित्यिा मण्डली में। पौर अनुजजी पा राजकुमार काला कोट पहने धी शिवमूति मिः । वैट स्व० इन्दुकुमार श्री वघड'जी श्री पुरुषोतम जोगी श्री उन श्री बढव बनारसी प्राचाय सीताराम चतुर्वेदी श्री करणापनि त्रिपाठी प्रत म प्राचाय गातिप्रिय ग्वेिदी।
में चाक जमे कोई मात्र कई बार जपने के बाद सामने
बठी युवती की पोर फूकें मार रहे हैं। युवती गुरू की
चहेती घेन्या की बेटी है। नयुनी अभी उतरी नहीं है। वह
सुमुसी, सुनयना, गौरी, मतवाली-गुर की नजरों मे
ब्लक सेविल जानीवापर हिम्को की उल्लाम-लासमयो
प्यालो । युवती सुनयना को उसकी माता को हिदायत
थी कि वह बराबर गुरजी की तरफ देखती रहे, ध्यान
से, ताकि पूरी तरह लाभ हो मात्र अनुष्ठान से ।
वेश्या-बाजार मेयार की तरह, ऐयार कीतरह, तनी
की तरह, मनी को तरह, युग की तरह, बाबा की तरह,
तरह-तरह की सूरतें हर तरह से देखते जिदगी के
राजपथ से बच्चा गुरू लहर-हर प्राय नव्वे फी उम्र मे
गुजरे । अन्त में वे धनुप को तरह झुककर चलते थे ।
परन्तु उनको पाखें योलतो, बडी और अावाज कडक्दार
अन्त घडी तक वसी हो रही । बच्चा महाराज किसी का
भी बुरा नहीं चाहते थे, फिर भी, उनके विचित्र चरिन
के प्राक्पण से मुहल्ले के तरुण बरबाद हो गए। कुछ नहीं
तो साडा तरणा पो उहोंने हराम घाट पर इस उत्साह
से उतार दिया होगा मानो राम हो या काम प्रजाम दे
५० जगन्नाथ पांडे अब मैं चौदह साल का हो चला था कि रामलीला मडली से छुट्टी मनाने बडे भाई के सग चुनार प्राया। इस बार अलीगढ मे किसी बात पर महन्त राममनोहर- दास और मेरे बडे भाई मे वादविवाद हो गया था, जिस पर भाई ने लीला मे स्वय काम करने या मुझे करने देने से इन्कार कर दिया था। महन्त ने धमकाया था कि लीला में विघ्न पडा तो वह हमे पुलिस के हवाले कर देगा। सो, अलीगढ से भाई साहब रामलीला-मडली जीवन से ऊबकर पाये थे। जानकार जानते होगे कि चौदह-पद्रह साल को वय मे जवाहरलाल और श्रीप्रकाश लदन मे शिक्षा पा रहे थे-उत्तम-से उत्तम । लेकिन उसी उम्र में मुझे क्या शिक्षा मिली थी, मेरा जी ही जानता या। सच तो यह है कि गद शिक्षा मेरे निकट पाते पाते भिक्षा बन जाया करता था। रामलीला मडली की प्रावारगी से मैं उतना नहीं परेशान था, जितना कि बडे भाई के गाजा-मत क्रोधी स्वभाव से । उनको मेरी सगत साई पक्रे का साय । कसाई भी वह जिसके बारे मे कहावत है- खस्सी जान से गया, कसाई को कोई जायका हो नहीं मिला । सर । इस बार जो हम घर पर प्राये तो न जाने क्या मेरे सौभाग्य जागे कि मेरे पुत्रहीन पितव्य (चचा) ने, चाची को सलाह मानकर, मुझे गोद लेने का इरादा मेरे नन्वे बडे भाई पर जाहिर किया। इस प्रस्ताव से बड़े भाई का गला ही टूटता था, सो उन्हें राजी होने में देर न लगी। मैं चचा को गोद चला गया। अब उहाने, यापायदा, मेरी शिक्षा-दीक्षा का निर्णय लिया। फ्लत चौदह वप को चय मे चुनार के चच मिशन स्कूल में मेरा नाम थड पलास मे लिखाया गया । और मैंने स्सूल का मुह देना । यड हो क्लास में दुनियादारी, ऐयारी और पारी में मैं टीचर की कुरसी पर पासीन होने योग्य था । यड, फोय, फिपय पास कर सियस मे मैं पहुंचा ही था कि मेरी चाची के एए मुदर-सा पुन पदा हा गया । सो, चचा चची का पात्सल्य-बाजार- भाव गिरते देर न लगी । गोद मो मैं जुबानी लिया गया था, विधि चिरहित, सो मुझे पुन फ्लोर परती पर घम-से पटक देने में प्रदूरदशियों को देर न लगो। चचाजो अपने परिवार के साथ काली चले गए। मैं पुन उमी भाई के गुर जिम्मेदार चगुल मे लाचार जकडा गया। पुनि मो पहें सोइ दिन, सोइ रातो।' फीस की क्मी, पडों को फमो, रामान को कमी । प्राधिषय उपदेशों और पिटाई को! घामन भुस खरहरा दस बार। इस सबके ऊपर पप्टदायी या भाई या बराबर जुमा- रत रहना । जीवन को सम्या एम के सहारे न छोह भाई साहब ने जुमा के पासरे घोड रसा था । इसी योच स्कूल में एक घटना घटी। मौलयो तियापत प्रत्तो नामक एक फ्ठमुल्लाजी य, जो उडू, फारसी और भयमेटिए सात माठवीं पतासों को पढ़ाया बरते थे। उनके विचार उस समय को हवा के अनुसार हिंदू- भाषना विरोधी थे । कई बार पतामा में पढ़ाते-पढाते समानदे पर कोई ऐमो यान यर जाते जिसमे हि विद्यापियों को
मार्मिक चोट लगती । उनको इन हरकतो से हिद्द विद्यार्थी
सिन्न और ऋद्ध होने पर भी विवश थे । इधर मैं अपने
भाई के अनुचित प्रावरणा से प्राकुल हो विद्रोही बनने
को ललक रहा था कि मौका पाया । मौलवी ने एक
दिन सेवय क्लास में सुनाया कि हिंदुओ के देवता तो
मेरे पाजामे मे बद रहते हैं। उस दिन क्लास के बाद
कुछ लडके बहुत हो नाराज नज़र पाए। तय पाया
कि मौलवी का इलाज करने के लिए बनारस के जय
नारायण हाई स्कूल के प्रिंसिपल साहब को तार से
कठमुल्ला के दुयवहार को सूचना दी जाए। लेकिन
अपने नाम से तार भेजन को कोई तयार नहीं था।
बिल्ली को घण्टी बाधने मे भय था रस्टिकेशन (स्कूल से
बाहर किये जाने) का। मैंने सोचा, रस्टिकट होने मे यह
लाभ रहेगा कि पढ़ने से जान बचेगो, सो तार मैंने
अपने नाम दिलवा दिया-"मौलवी लियाकतअली,
मिशन टीचर इसल्टस प्रवर रिलिजस फीलिंग्स, नो
सेटिसफफ्टी इन्क्वायरी।-चन पाडे।" असल में
चुनार का चच मिशन स्कूल काशी के जयनारायण मिशन
स्कूल के अधीन था।प्रत तार पाते ही अग्रज प्रिसिपल
साहब चुनार में, और यन्देखा स्कूल से ग्रायव । क्योंकि
रस्टिपेट होना और बात यो और बॅत साना बिल
फुल हो और बात । विद्यार्थी को डिसिप्लिन मे रहना
चाहिए । मैंने डिसिप्लिन के खिलाफकाम किया था। पाते
तो ये मुझे प्रादश बनाने के लिए सारे स्कूल के सामने
बेतियाते । नहीं पाया, तो रजिस्टर से मेरा नाम ही उडा
दिया। लेकिन वचे मौलवी साहब भी नहीं । प्रिंसिपल
ने उनसे सस्त तम्बोह को। सयोगवशात उही दिनो
कागो मे चचा के यहा उनको लडको का गौना पडा,
बान
जिसमे सम्मिलित होने के लिए हमारे घर वाले भी वना
रस गये थे। मौका पार, वहीं, चचा से में गिडगिडाया
कि वे मेरी भी पढ़ाई का प्रबंध करें, नहीं तो मैं कहीं
पर भी न रहूंगा । उन गिनी चचा साह्य को चलती
थी। सासी प्रामदनी और पाया पदा था । कागी में
उहीं ये व्यय से जामा दामाद पड़ता था और एक साला
भी । मुझे तो पद ही महीनो पहले यह चुनार म पढा
ही रहे थे। उहान मुझे भी काशी मे रहकर पहने की
इशाउत्त दे रो। वच मिदान स्कुरा सुनार से मुझे जो
सर्टिफिकेट मिला उममे कडक्ट फेयर लिया गया।
पर बनारस में विस्मात हिंदू (कालिजिएट) मूल
में छठे दरजे में ले लिया गया। उस समय स्थानापन
प्रधानाध्यापक के पद पर देवसुल्य बालरों हितपो
श्री कालीप्रमन्न चरवर्ती महोदय थे । चक्रवतीजी ने
जय मुभने सटिफिट म पडक्ट फेयर का समय पूधा
तर चल वाचालतापूवर मैने बतलाया या, क्योकि वह
क्रिश्चियन स्कूल था और मैं मा ब्राह्मण, प्रत यह
स्थिति उत्पन हुई । और लियातमलो का पिस्सा भी
मैं सुना गया था। मैंने लिया है ऊपर, चायतों महाग
याता के यरदानो हितपो ये । घरपटर मेरा बड नो
लिसा होता तो भी भरसर यह सरस्वती मन्दिर से मुझे
पिम्य न फेरते । उनका बडा मान पा, महामनामान
वोपजी को नजरों मे, जागो के बडे-बडों में । हिन्दू
सूत मे एटो और सातवों क्लास चचा को पा से मैंने
पास पों। इस माद धचा ने बागी सोय
मुहल्ले म एफ् मान सरोदा मोर भदनो से यहीं जाकर
रन मगे, हमे अपने अपने रस्ते सान का संरेत पर।
निरानर में प्रम निराधय होन में यार, लक्ष्मीपुर २
विख्यात लक्ष्मी-मदिर मे अपने जलालपुर गाव के काका रामानद दुवे के साथ रहने लगा। रामान दजी ब्राह्मण वृत्ति से चार पसे कमाते थे। अनपूर्णा मदिर में भी उनका प्रवेश था। मेरा सयाल है, उदार श्री कालीप्रसन्न चक्रवर्ती हो ने दिवगत दानवीर बाबू शिवप्रसादजी गुप्त के नाम एक रुका लिखकर मुझे दिया था, ताकि बाबू साह्न मेरी फीस और भोजन की व्यवस्था कृपया कर दें। रुका लेकर मैं सेवा उपवन' गया-ढाई कोस पदल, नगे पाव । शिवप्रसादजी-जसे बडे प्रादमी मुझसे क्या मिलते- अलबत्ता काम मेरा हो गया और मैं 'सेवा उपवन' से महीने भर खाने काबिल पाटा, दाल, चावल, तेल, नमक और लक्डी के कुछ नक्दपसे शायद लेकर यानी सिर पर लादकर नगवा से महालक्ष्मीजी आया। साल भर तक इसी तरह मैं 'सेवा उपवन' के अन्नसन से सामग्री सिर पर लादकर ले पाता। तब मैं पाठवें दरजे मे था। तब स्कूल के हेडमास्टर श्री गुरसेवक सिंह उपाध्याय थे। महामना मालवीयजी ने उपाध्यायजो को शिक्षा सम्बधी योग्यता से मुग्ध होकर उहे सरकार से हिदू स्कूल का प्रधान बनने के लिए कुछ वर्षों के लिए उधार माग लिया था। गुरुसेवकजी सरकारी डयूटी से ताजा-ताजा पाने सबब श्रेष्ठ हेड मास्टर होने पर भी 'छुट्टी पर डिप्टी कलेक्टर' भी थे। प्राते हो उहाने विद्यायियो पर नियंत्रण का नीरस पजा -सिर पर टोपो क्यो नहीं है ? ये जुल्फें सवरी क्या हैं ? बोलते वक्त मुस्कराते क्यो हो ? रामू यामू के गले में हाथ डालकर क्या चला १ सबरदार जो कोई विद्यार्यों किसी के गले में हाय डालकर चलता पाया गया । ठोर नहीं होगा। क्या जनानी सूरत बना सा- चौरानने
रखी है ? मदों की तरह रहो।
उपाध्यायजी की बातें सौ मे-सौ ठीक होती यो...
मापद कहने का ढग या उस ढग मे स्नेह-सचार
सम्यक नहीं होता था। प्राज तो मैं यही मान गा वि उनको
चाते टोर थी, हमारी ही बुद्धि विपरीत यो, खासकर
मेरो। एक दिन विद्यायियों और अध्यापकों को एक
गोप्टो मे तुक्यादी पढकर उपाध्यापजी के लहजे हो मे मैंने
सुनायो जो नितान्त अनुचित वात थी, भयानक दुस्साहस
या। जब मैं वह तुम्बदी पढ रहा था 'अनुचित-अनुचित
भाव मे कई प्रध्यापक पुरसो से उचक तक पढे थे। दूसरे
दिन स्कूली पढाई समाप्त होने के बाद ही उपाध्यायजी
ने मुझे हेडमास्टर के क्मर मे बुलाया । चाहा उहोंने
कि मैं क्षमा चाहू वसो तुपय दो, उस भाव से पढने में
लिए । तेरिन मैं ढीठ ही रहा, धृष्ट भी। दूसरी ओर
यापित परीक्षा में नी पेल हो गया। परीक्षा में फेल
होना समाधारण दुर्भाग्य प्रब बाबू शिवप्रसाद गुप्त
के सत्र से न तो प्राटा मिलने की प्राा, न दात । फीस
तर मोहाल । सो, मैंने बनारस में निरापार ठोकरेंसाने से
बेहतर अपने घर की लातों को समझा। मैं भाई के यहाँ
पुनार भाग प्राया। यहे भाई साहव मालगुजारी को
तहमोल वसूली के सिलसिले में गाँव (जलालपुर माफी)
गये हुए थे।
दूसरे दिन गांव को रिसीमहीरन ने मुझे दस रुपये
का एक नोट दिया कि मैं भाभी को दे दू, भाई साहब ने
मेजा है। दस नाट हाय लगते ही भाई के भय के
मारे- िमुझे परहमा सुनार यह क्या न कर डाल
में मात्र पोती-धमीज पहले और एक अंगोधा लिये
पिरानर चुनार स्टेशन पता प्राया । समय साप, पहली ही ट्रेन
है
से कलकत्ता भाग जाने के लिए।
कलकत्ता शहर मे पहली बार में भूसे, निराश्रय,
भगोडे की तरह पहुंचा था । क्लत्ते मे मेरे पडोसी भाई
विश्वनाथ त्रिपाठी रहते थे, जिनका (सन् १९१६ के प्रत
म भी) "विश्वमित्र' के विज्ञापन विभाग से तेजस्वी
सम्बच था। मुझे मालूम था तब विश्वमित्र नारायण
बाबू लेन अफीम चौरस्ता स निरलता था। वहीं पहुंचने
से विश्वनाथ भाई के डेरे का पता चलता। हवडा पुल
पार दाम पर सवार हो मैंने नारायण बाबू लेन का
टिक्ट मागा, तो क डक्टर ने मुझे नीचे उतार दिया।
क्तिना भटका मैं महानगरी के महा मकानो के वन मे
'विश्वमिन' कार्यालय दूढता और पानी बरसने लगा।
जब मैं मधुप्रा बाजार क्साईपाडे मे भटक रहा था
बरसात का पानी पावो के नीचे घुटने घुटने बह रहा
था । बडी मुश्किला, बडे फेरो के बाद मैं 'विश्वमित्र
कार्यालय के द्वार पर पहुवा था । सामने सीढिया का
सिलसिला। दफ्तर ऊपर के तले मे था। नीचे रककर
पहले मैंने तरबतर धोती और कमीज निचोडी, तन का
जल भी यथासाध्य सुखाया। फिर गोले ही कपडे मैं
ऊपर की तरफ बढा। विश्वमित्र के विख्यात सचालक
बाबू मूलच दजो अप्रवाल स मेरी पहली मुलाका। इसी
ठाट में हुई थी। मैंने उनसे कहा था-"मैं चुनार से प्रा
रहाहू । विश्वनाय त्रिपाठी का पता चाहता हू ।' "विश्व
नायजी तो," निराण, मगर सदप, अग्रवालजी ने
बतलाया, "क्ल हो रात चुनार चले गए
-
दियानवे
-
लाला भगवान 'दोन'
अरसा हुआ वाराणसी के दनिक अखबार 'आज'
मे प्रादरणीय प० श्रीकृष्णदत्तजी पालीवाल की चर्चा
करते हुए मैने लिखा था कि मेरे पाच गुरु है, जिनमे एक
पालीवालजी भी हैं। उन पाचो मे मैं अपने उन ज्येष्ठ
अग्रज को भी मानता हूँ जिनकी पिछले पृष्ठो मे मैंने भूरि
भूरि भत्सना को है। बेशक वह गर जिम्मेदार, बदमाश
बदचलन, जिरफुल बद व्यक्ति थे, लेकिन जब मैं क ख ग
लिखना भी नहीं जानता था, तब उहे साहित्य पढने हो
नहीं यथाशक्ति लिखने का भी शौक था।तत्कालीन समस्या-
भूति ('रसिक रहस्य', "प्रियवदा' प्रादि) मासिक पत्रो
में अपने तो अपने मेरी भावज के नाम भी रचकर
समस्यापूतिया प्रकाशित कराते थे। एक बगाली डाक्टर
को हिदी पदाते पढाते उहोने वगला भापा सहज ही
सोख ली थी।फ्लत बॅगला पुस्तको के सस्ते सस्करण तथा
'भारतवप नामक विख्यात बॅगला मासिक पत्र भी वह
मंगाया परते थे। वह हमारे सामने यठकर पवित रचते
लेख लिखते । प्रत्यक्ष न सही, लेग्नि अप्रत्यक्ष रूप से
भाई साहब ये इस विद्या व्यसन का वैवन पर बहुत
शुभ प्रभाव अवश्य पडा होगा । सो, यह सराव प्रादमी
मेरा यश भाई-मेरा मादि गुरु था । पाली
यालजी ये दशन तो बहुत याद मे प्राप्त हुए । बीच मे
५० पागोपति त्रिपाठो, लाला भगवान 'दीन' और पडित
यापूराव विष्णु पराडपर ये गुभ नाम हैं। यानीपति
साबे
त्रिपाठी और लाला भगवान 'दोन' मुझे तब मिले जर
कमलापति त्रिपाठी से मेरा परिचय हुमा ।बसे पमलापति
जी हिदू स्कूल और मेरी ही कक्षा म पढते थे, लेकिन में
था फटे हाल प्रदना वालक और कमलापति थे प्रतिष्ठित
पसापति-पुन । याह्मण हमार हो रग क तेक्नि अधिक
चटकदार । सरयूपारीणो म पत्ति, यानी परम श्रेष्ठ ।
कमलापति धवल-नवल वस्त्र धारण कर माथे में भस्मी
लगाए स्कूल पाते । मैं जाता होन दोन मलीन कपडे पहने
–धूल उडती चेहरे पर । मुझमे और कमलापति मे ऐसा
कोई भी साम्य न था कि हम मिलते । वह तुग हिमालय
शृग, मैं धूलि धसी धरती को । लेक्नि एक घटना घटी
जिससे मैं रातो रात हिदू स्कूल के विद्यार्थियो मे विशेपत
विज्ञापित हो गया।
उन दिनों प्रधानाध्यापक थे रतिलालजी देसाई
महोदय । प्रत गाधीजी का जन्म दिवस स्कूल मे अधिक
उत्साह से मनाया गया था । सचाखच भरे हाल मे सभा
हुई थी, निमत्रित एव स्कूल के विद्वानों के गाधोजी
के आदर्शों पर भाषण हुए थे। उसी सभा में महात्माजी
पर मैंने एक तुकबदी (रोला छद मे) पढी थी।
बिलकुल गलत-सलत, रद्दी। लेकिन उसमे गाधीजी का
नाम था साथ ही विदेशियो के विरुद्ध पिचार थे। बस,
फिर क्या था वह तो राष्टीय भावना से भरी सस्था
थी हो । हो हो हा हा 'तालिया की गडगडाहट । और
दूसरे दिन बेचन पाडे हिंदू स्कूल मेमाननीय कवि बना
रस के स्कूली प्रतिभागालियों की काव्य शक्ति को उस
परीक्षा मे, जिसमे परीक्षा पत्र की तरह रचना लिखकर
पास्वी महाकवि सुमित्रान दन पन्त, शोल्ड और प्रथम
पुरस्कार जीतर ले गए थे उसीमे मेरी तुकरदी मुका
1
प्रदानवे
बिले मे दोयम मानी गई थी। मुझे भी द्वितीय पुरस्कार
प्राप्त हुआ था। यद्यपि रचना श्रेष्ठ पतजी की थी,
मेरी कुछ भी नहीं थी, लेकिन स्कूल मे प्रतिभा का प्रभाव
होने से मुझ अधे के हाथ भी बटेर लग गई थी। इन्हीं
घटनाग्रो के निकट भी कमलापति त्रिपाठी से मेरा
परिचय हुआ होगा, जो मान परिचय नहीं, हम दोनो
हो के जीवन मे जबरदस्त मोड बनकर रहा । मेरा और
कहा, ठिकाना कहा, सो, बरसो मैं कमलापति हो के द्वार
पर पड़ा रहता। विख्यात नाटककार श्री लक्ष्मीनारायण
मिश्र भी उही दिनों कमलापति हो के विशाल भवन मे
सभवत फिरायेदार की तरह रहा करते थे। कमलापति
के पाटक वाले कमरे मे विशेषत उहाँके घर की पुस्तकों
से हमने एक पुस्तकालय सोला या- -श्री लक्ष्मीनारायण
पुस्तकालय । यहीं से हम 'उग्र' नाम का एक हस्त
लिखित, सचित्र मासिक पन भी प्रकाशित करते थे।
कमलापति के घर मे मेरी अद्र पहले उनके बड़े भाई
काशीपतिजो ने समझो ही नहीं, यों विघोषित किया कि
उनके परिवार मे और पडोस मे और परिचितों मे भी जिक्र
मेरा मुभमे बेहतर प्रमाणित होने लगा। काशीपतिजी
को हम सब 'प्रडके भया कहा करते थे। उनके गुरु-
देय ये गदाधर गर्मा नामक सत्पुरुष, जिनका देहान्त
हो चुका था। गदाधरजी यो कागोपतिजी परम भावु
पता से स्मरण किया करते थे। उनरा प्रभाव उहें
जसे सटकता था। उहाँको वापिक तिथि पाई और
उस अवसर पर काशीपतिजी को प्रसन्न करने के लिए
मैने घनाक्षरीद मे गुरजी के पारे मे, कागोपनिजी
को प्रोर से एक पवित्त रचा-
निमारे पाहू परसो को मैं न रही, पर, जाको कृपा
तनु-तरु माहि बुद्धि पाई सुधा फर सो।
नेह दिन दूनो रात चौगुनो ठयो जो रह्यो
भूलिहू न जाको दृष्टि मो प भई पर सो ।
वासना जहर-सी, हर सी यो फामवासना न,
रही मुख मण्डल प छटा गदाधर सी।
बरसी गयी है बिनु जाके मम पास लता
ताहि गुरुदेव जू की प्राई आजु बरसी।
लेकिन यह अध्याय काशीपतिजी अथवा कमला
पतिजी का नहीं यह तो श्रद्धय गुरुदेव लाला भगवान
'दोन जी का अध्याय है जो मेरे भाई के बाद, दूसरे पथ
दशक थे। असल मे कमलापति के यहा पहुचने के कारण
ही मैं लालाजी के निकट पहुंच पाया था अत पति
भाइयो को चर्चा इस प्रसग मे आवश्यक हुई।
बात यो बनी । मैंने ध्रुवरित पर एक खण्ड का य
निखा था फर्म सवा फर्मे का। कमलापति को विदुपी
भानजी स्वर्गीया श्यामकुमारी मिश्र ने उसे छपाने योग्य
रुपये दिये थे। पाण्डुलिपि और रुपये लेकर जब मैं
भूमिहार ब्राह्मण प्रेस मे गया, तब उसे देखने के बाद प्रस
के योग्य सचालक ने बतलाया कि रचना मे दोप अनेक
हैं, अच्छा हो छपाने के पूर्व सशोधन करा लिया जाए।
सो, मैं स्वरचित 'ध्र व धारणा को पाण्डुलिपि लेकर
जगनाथ शर्मा के बडे भाई चण्डिकाप्रसाद शर्मा के साथ
लालाजी के डेरे पर गया।
लाला भगवान 'दीन'जी को पसनेलिटी उनके
उपनाम के अनुरूप ही थी। मुह पर चेचक के दाग,
पका रग, ठिगनाक्द, मटमला, भद्दा मुगियाना लिबास ।
अलबत्ता लालाजी जब बोलने लगत थे तब उन यक्तित्व
की असाधारणता स्पष्ट हो जाती यो । लालाजी
सो
ने कई दिन तक परिश्रम कर मेरा सण्ड-काव्य प्रेस
योग्य तो बना ही दिया। वह काव्य महाकवि अयोध्या-
सिंह का प्रिय प्रवास परम प्रेमपूवर कई बार पढ़ने के
बाद प्राय उहीं हदों में लिखा गया था। प्रारम्भ हुप्रा
था कमलापति को सुगामद से----
जिम प्रकार पयोदधि मे सदा
कमल-लोचन श्री युन शोभते
यस, उसी विधि से उर 'उग्र' में
निवसिये यसिये पमलापते ।
लाला भगवान 'दीन की हाबी' थी पढाना पढना,
पढना पढाना । एक विद्यालय खोलकर नियम से वह
विधाथियो को उसमे सम्मेलन का मोस, निप्वाम पढाया
परते थे। लिखने-पढने मे फुरसत पाते हो लालाजी
विद्यार्थियों को घर पर भी पढाया करते । हिदू विश्व
विद्यालय के लेक्चरर तो ये ही। लालाजी प्रसाडिया
स्वभाव के दगली विद्वान थे। भाष्य, समीक्षा, निरघ,
काव्य-इन सब क्लानों मे लालाजी गम्भीर निपुण थे।
सबसे पर उनका हृदय सहज-कोमल स्नेहमय था।
प्रसन्न-बदन "विनयपत्रिका विद्यायियों को पढ़ाते-पढ़ाते
तानाजी भक्ति विभोर, सजतन्नयन, गद्गद गिरा हो
जाते थे। प्राचाय विनायप्रसाद मिश्र, सलोने लेखप
श्रीकृष्णदेव प्रसाद गौड 'वेढय', फोर स्य. मुलगी
पालिकाप्रसाद लालाजी के शिष्यों में से हैं । मुभमे यदि
कुष प्रतिभा पो तो उसे लाताजी के मात्र प्राीर्याद
पा पोप प्राप्त हुमा । पदावर मुझे न पाए।
पढ़ा भी यहीं हर जन्म मे जाता है ? विसो जम
मे पढ़ लिपा-यस, जम-जमातरों के लिए यह शे
एक सौ एक गया । 'गुरु-गृह गये पदन रघुराई, पत्यकाल विद्या सव
पाई' गाया गोस्यामोनी ने। तुलसी के राम सारो
विद्यामा रो पूय (जम के) परिचित थे, सो उ मल्प
पाल ही में सारा शान उपस्थित हो गया था। दूसरी
पात यह रि यदि प्रम ये महज ढाई अक्षर पढ़ लेने से
पण्डिताई या बिल्ता मिल सस्ता हो तो दाई हजार
पुस्तकें पढ़ने के बाद हजारीप्रसाद बने यह मेरा मत
लब वही जो अक्ल का जहाज हो ।
एक बात बताऊँ ? मधुर महापवि थो जयशकर
प्रसाद को तम्बाकू-जर्दा को दुकान वेश्याओं के मोहल्ले
के सिंह द्वार पर थी। प्रसादजी को दूकान पर प्राध
घटा बठने ही से वेश्या बाजार को बानगी बहुत-कुछ
मिल जाया करती थी। लाला भगवान 'दीन का भाडे
का मकान तो बिलकुल हो पिछवाडे था, उस प्राक्पक
दाल मण्डी के । जयशकरजी वसे गोवधन सराय मे रहते
थे, लेकिन दूकान से प्राते जाते शत-शत मगला-मुखियो
का दशन वेश्यागामी का बिल्ला लगाए बगर ही मिलता
था । लाला भगवान 'दीन' हमेशा तम्बाकू जयशकर ही
को दुकान को पीते थे। 'प्रसाद जी जब-जब दुकान पर
होते तब-तब सुखद हास्य-व्यग की दो दो चोचें जरूर
होती थीं।
मुझ पर तत्कालीन महारथियो की कृपा भूरि भूरि
थी। 'ध्रव धारणा' के बाद दूसरो कृति जब मैंने 'महात्मा
ईसा के स्प मे प्रस्तुत की तब उसका सभ्यर सशोधन
लालाजी ने किया था । पुनर्वाचन प्रेमच दजो नै ।
प्रेमच दजी ने वह राय लिसो ईसा नाटक के बारे में
दि कोई प्राज भी पुस्तक के प्रारम्भ मे पढ ले । श्रद्धेय
सम्पूर्णानदजी को स्पष्ट सम्मति भी छपने के पूर्व ही
मुझे प्राप्त हो चुकी थी। पहले सौ-मन्सौ साहित्यिक एसे ए सौ दो
होते थे जो कहीं ज़रा भी प्रतिभा, जरा भी प्रसाद देखते हो उसका यथोचित प्रादर करते थे। आज जसे वह चीज चलो हो गई है। प्राज भी पाडेय बेचन शर्मा 'उग्न' को लिखना खाक पत्थर पाता है, आप जानते हैं- लेकिन आज से प्राय चालीस वप पूर्व विख्यात पनगर और क्लाममा 'अभ्युदय' के संपादक ५० पृप्यकान्त मालवीय महोदय जब मुझ पर मुग्ध हुए तव काशी आने पर 'मर्यादा' कार्यालय, ज्ञान-मण्डल, बुलवाकर उन्होंने थद्धेय सम्पूर्णान दजी से प्राग्रह किया था कि वह मुझ पर कृपालु रहें, "क्योंकि इनमे जो लेखक है वह असा धारण है।" उही दिनों एक घटना और विचिन ही घटित हुई पो । कानपुर से, 'प्रताप' पर से, श्री बेनीमाधव खना नामफ रिही सज्जन ने हिदी-कवियो से एक राष्ट्रीय- गान रचना प्रतिद्वद्विता मे शामिल होने का प्राग्रह किया या । विजयी को हजार रुपये पुरस्कार की घोषणा यो। प्रतियोगिता के जजों मे प० महावीरप्रसाद द्विवेदी, गणेशशर विद्यार्थी, (सी० पी० के ), जग नायप्रसाद 'भानु, रामदासजी गोड-जसे परमाचाय लोग थे । इस प्रतिस्पर्धा के लिए सालाजी ने भी जव एक गान प्रस्तुत किया, तब मेरे मन में भी पाया विधेरे मे एक तीर मारने मे घाटा ही क्या है । मैंने भी एक गीत गढकर भेज दिया। जब परिणाम प्रस्ट हुमा, तव जजों ने एफ भी रचना राष्टीय गान होने योग्य नहीं मानी । यसे हजार रघनामों मे धार रचनाएँ एष श्रयो को मानी गई थी। उन चारों रचनाकारों के प्रय नाम सुनिए- मथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय, पुत पहाट पर सो सान ये एर कोई विषुमार गर्मा, और पाप्ठेप येचन गर्मा .
'उग्र' लालाजी की रचना रसज्ञो को स्पशन कर पायो। मेरा नाम बडे-बडो के साथ विनापन मे पाया। इस वाक्या से गुरू गुड ही रहते हैं, पर चेले के चीनी बन चलने की चाशनी मे तार पर तार पडने लगते हैं। नोचे म उस काल को लिखी एक दो घनाक्षरिया उद्धत करता हू, मिह जरा इधर या उधर छूकर लालाजी ने चमका दिया होगा, साथ ही, जिनमे न जाने क्या पाकर वह मुझ पर वरद हो उठे होगे। सुख का पता बागन में, वारिज मे, वल्लरी मे, वापिका मे, बौर मे, वसत छमहू के खोजि डारयो म । वादावन कुज, वर व्रजवनितान पुज, गुजरत मजुल मलिद पखि हारयो म । वाराणसो धाम, वामदेवजू को नाम, दिय देवसरि धार मे न देखि निरधारयो म- विश्व बीच है न सुख । 'उग्र, पर इते माहिं कारागार शृङ्खलानिहार मे निहारयो म । ज्ञानमण्डल 'उग्र तप करि क उदारता रिभायो विधि मागो वरदान- --'मोहि अमर बनाइये। बोले कमलासन-'न मेरो अधिकार इतो' जाइ, पति क्मला सन विनय सुनाइये। रहे हरि तूठि-'हर पास चलि जाच किन ?" गम्भु भाले 'शिव परसाद' पास जाइये।' १ विस्थात रिवगत दानी समाज सुधारक ज्ञानमहल के संचालक सस्थापक । एक सो चार
शिव परसाद-'एवमस्तु !' फहि बोले,
'अब, पठि ज्ञानमण्डल अखड गीत गाइये।'
बफ और परस्ती पूर्ण रूपक
पाम गरमी मे दिखरात वह ज्योही 'उग्र',
त्यों ही चलि जात मन पाइवे को ललचात ।
दरस परस मे सुरूपवान, सोतल है,
होतल मे जाइ-अनुभावी कहें-होत तात
अधर लगाइ रस लेत ठरि जात रद,
युध यतराव छुइवेते गात गरि जात !
प्पास न बुभात, अधिकात दिन रात बरु,
यरप हमे तो पर-नारी सम है जनात ।
[पे फयित्त सन् १९२१-२२-२३ को रचनाएं हैं।
ज्ञानमण्डल याला छन्द गणेशजी द्वारा सम्पादित
'प्रताप मे छपा था।]
प्र० वावूराव विष्णु पराडकर
यह चर्चा सन् १९२० और २१ ई. के बीच को
होगी। यह सब मैं स्मरण से लिख रहा हूं, क्योकि डायरी
रखने की आदत मैंने नहीं पाली, इस खौफ से कि कहीं
राजा हरिश्च द्र की तरह अपना ही सत्य या तेज, अपने
ही को भस्म न कर डाले यह चर्चा तब को है जब ब्रिटिश
गासन के विरुद्ध उपवास करके आयरलड के महात्मा
मकस्विनी शहीद हुए थे । उन दिनो देश मे राष्टीयता
को लहर तेज प्रवाहित हो रही थी, जिसमे मेरे भी प्राण
प्रसन्न डुबकिया लगाने को लालायित रहते थे। मैंने शहीद
मकस्विनी पर एक लबी कविता लिखी । वह हिदू स्कूल
के तेजस्वी हिदी अध्यापक प० सावलोजी नागर को मैंने
मुनायो । सुनते ही वह प्रसन्न हो उठे। बोले-चलो, ज्ञान
मडल, पराडकरजी से कहूगा कि वह यह कविता
'माज' मे छा। उन दिनो ज्ञानमण्डल भाडे के बंगले मे
दुर्गाकुण्ड मुहल्ले मे था। शिष्य-वत्सल वेचारे नागरजी
पक्के मुहल्ले से पदल प्राय एक कोस चलकर मुझे ज्ञान
मण्डल ले गए। वहा पहुचने पर मुझको दरवाजे हो पर
रुक्ने का सक्त कर वह अन्दर गये, जहा उस समय शिव
प्रसादजी गुप्त और श्रीप्रकागजो बठे हुए थे। नागरजी
का, उत्तम शिक्षक के नाते, काशी में आदर था।
अच्छे अच्छे जानते-मानते थे। नानमण्डल का श्रेष्ठिवग
भी उनका सम्मान करता था। उहोंने गुप्तजी और
धीप्रकागजो को सम्मिलित सबोधित करते हुए कहा एवं सौ छा
-
,
-श्रीमान जो, मेरा एक शिष्य एक कविता लेकर
प्राया है । सामयिक है । कहिये तो उसे अन्दर बुलाऊँ।
और अविलय मैं बाबू शिवप्रसाद गुप्त और बरिस्टर
श्रीप्रकाशजी के सामने उपस्थित हुमा। नागरजी ने
कहा-"सुनाप्रो अपनी पविता पढकर ।" मेरा दिल धडक
रहा या साहस बटोरकर काशी के उन दिग्गज श्रीमानों
को मैंने अपनी कविता सुना हो दी। और रग जम
गया। गुप्तजी भी प्रसन्न हुए, प्रकारानी भी। गुप्तजी
ने मनेजर से पूछा-"पया सवेरे निरलने वाले 'माज'
मे इतनी बडी कविता के लिए स्थान निकल सकता है ?
पूछो फोरमन से।" फोरमन ने बतलाया कि सातवें पृष्ठ
के अन्तिम बालम मे चाहें तो कयिता दी जा सकती है।
'माज' म यह मेरी पहली पविता छपी थी । इस वाया
से कुछ ही दिनो बाद मैंने पहली कहानी लिसी-'गाधी
प्राथमकि 'प्राज' हो मे छपे । 'प्राण' एक सह
पारी सम्पादन श्री हरिहरनाथ जी बी० ए० थे। बडे ही
सरल चित कायस्थ । उहोंने पढ़ने के बाद वादा किया
जि पहानी पपर में छपाने पा उद्योग करेंगे। पूछना था
श्रीप्रयागजी से। मैं यठा प्रतीक्षा परता रहा। श्री
प्रमाजी प्रापे रात मे प्राठ-सादे पाठ बजे। उन्हें
देसन हो उनये रोब दे मारे में उनकी कुरसी में ठोर
पढे ही अस्वीकृत कर दी। उनका निणय सुन उनके
पीठ पीछे मैं सुन रह गया। लेकिन जय हो मुशी हरि-
हरनाथ की । उहोने वह कहानी मुझे लौटाई नहीं,
बल्कि पण्डित बाबूराव विष्णु पराडकर के सामने उसे
रख दिया । पराडकरजी ने रचना पढी, प्रावश्यक सुधार
क्येि, छपने को दे दी। छपने के बाद मुझे पता चला
कि मेरा दिल टूटे नहीं, इसके लिए हरिहरनाथजी ने
क्या उपाय किया था। वह कहानी पाडेय बेचन शर्मा
'उग्र' के नाम से नहीं, मेरे एक अय-शशिमोहन
शर्मा-नाम से छपी थी। तब तक मैंने 'उग्र' उपनाम
नहीं रखा था । 'उन' उपनाम तो मैने राष्टीय गान द्वन्द्व
में सम्मिलित होने से पूर्व चुना था। आज मुझे अपने
लिए उपनाम चुनना हो, तो सभव है-बुरा न होने पर
भी-'उग्र' मैं न चुन । लेकिन आज से चालीस वष पूर्व
राष्ट भक्त लेखक ऐसे क्का उपनाम इसलिए चुना करते
थे कि बलवान ब्रिटिश साम्राज्य के नशस शासक नाम
ही से दहल जाएं । शायद शक्तिहीनता छिपाने के लिए
लोग प्रचण्ड नामोपनाम चुना करते थे ,
जसे-'निगूल',
जसे 'वज्रपाणि', जसे 'धूमकेतु', जसे 'भीष्म', 'भीम',
'भयकर', 'प्रलयर' या अपना ढाई अक्षर का 'उग्र' ।
क्या हुया कि पण्डित पराडकरजी मेरी लेखनी की
तरफ आकर्षित हुए-मुझे पता नहीं। वह रूखे दोखने
वाले महापुरुष थे, प्राय चुप रहने वाले। मेरी लेखनी
में अग्रेजी राज के प्रति घोर घृणा तथा क्रातिकारियो
के लिए तरल महामोह जो था-मैं समझता हू-उसी
पर वह मुक्त प्रारण महाराष्टीय मोहित हुए होंगे । उहोंने
वे-वोले हो मानो मुझे गोद ले लिया। सारे ज्ञानमण्डल
को कानाफूसी एक तरफ रख, अपना काम छोड, घटों एक सौ पाठ
तक वह मेरी कहानियों को व्याकरण की पटरी पर लाते, गलत-बयानियां सुधारते, बदशक्ल शब्द या मुहावरे काट-छाटकर, सुन्दरता सवारकर वह मेरी शूद्र रच नामो को दिव्य द्विजत्व दिया करते थे। जब वह मेरी कहानी पढते पढते हंसने लगते प्रयवा सजल हो उठते, तय मुझ में, विना बोले हो, आत्मविश्वास घट घट उडेल देते थे। अक्सर मैं घोर राजविद्रोह लिख मारता था, जिसे पढ़ते ही अस्वीकृति से माथा हिलाते वह कहते- "नहीं, नहीं, आपने लिसा सुदर है, सच है, पर पानून लोचदार होता है । सस्था श्रीमानों की है । इस तरह पाप सबको सफ्ट में डाल देंगे।" फिर पराडकरजी उस रचना रुपी बिच्छू को सुधारते यों कि पिन्टू का रूप तो बदल जाता, लेकिन शदों के (फामाफ्लाज) माया पाल में मारक डस और विष बना-या-बना ही रहता। अक्सर मेरी रचनामो को झान्तिकारी उपता से चमर- कर धीमान् लोग सावधान करते पराडकरजी को कि कहीं 'उप' को लेखनी सस्था को खडडे में न खोंच से जाए। फिर भी, पराडकर जो छापते। यह द्वन्द्व तव तक चलता रहा-चार-पाच परसों तर-जब तक पराड परजी की कृपा से रचनाकार की हैसियत से मैं अपने परो पर खडा नहीं हो गया । इस परसे में उत्तर प्रदेश का यह जो भारत प्रसिद्ध दनिय प्रसवार "प्राज' है, मेरे प्रम्यास पा पूण साधन यना रहा। इसके प्रमाणों से 'माज' को फाइलको फाइल भरी हुई है। मेरी लिखी पहली समालोचना मर्यादा' मासिर में ही दिनों छपी पो, जिरारे सम्पादर थे श्रद्धय सम्पूर्णानदजी । गर्याल सम्पूर्णानन्दजी के मान पिनान घाँले घामों में भी परमो नौ मेरो लेगनी के लिए स्नेह पर्याप्त था। मैं पहानी,
पढ़े ही अस्वीकृत कर दी। उनका निरणय सुन उनक
पीठ पीछे मैं सुन्न रह गया। लेकिन जय हो मुशी हरि-
हरनाथ की । उहांने वह कहानी मुझे लौटाई नहीं,
बलि पण्डित बाबूराव विष्णु पराडकर के सामने उसे
ररा दिया। पराडकरजी ने रचना पढी, आवश्यक सुधार
किये, छपने को दे दी। छपने के बाद मुझे पता चला
कि मेरा दिल टूटे नहीं, इसके लिए हरिहरनाथजी ने
क्या उपाय किया था। वह कहानी पाडेय बेचन शर्मा
'उग्र' के नाम से नहीं, मेरे एक अय-शशिमोहन
शर्मा—नाम से छपी थी। तब तक मैंने 'उग्र' उपनाम
नहीं रखा था । 'उन' उपनाम तो मैंने राष्टीय गान द्वन्द्व
में सम्मिलित होने से पूर्व चुना था। आज मुझे अपने
लिए उपनाम चुनना हो, तो सभव है-बुरा न होने पर
भी-'उन' मैं न चुनू । लेकिन आज से चालीस वष पूध
राष्ट भक्त लेखक ऐसे ककश उपनाम इसलिए चुना करते
थे कि बलवान ब्रिटिश साम्राज्य के नशस शासक नाम
ही से दहल जाएं । शायद शक्तिहीनता छिपाने के लिए
लोग प्रचण्ड नामोपनाम चुना करते थे, जसे-'निगूल',
जसे 'वज्रपारिप', जसे 'धूमकेतु', जसे 'भीष्म', 'भीम',
'भयकर', 'प्रलयकर' या अपना ढाई अक्षर का 'उग्र' ।
क्या हुमा कि पण्डित पराडकरजी मेरी लेखनी की
तरफ प्रापित हुए-मुझे पता नहीं। वह स्से दीखने
वाले महापुरुष ये, प्राय चुप रहने वाले । मेरी लेखनी
में प्रप्रेजी राज के प्रति घोर घृणा तया क्रांतिकारियों
के लिए तरल महामोह जो था-मैं समझता हूं-उसी
पर वह मुक्त प्राण महाराष्ट्रीय मोहित हुए होंगे । उहोंने
बे-बोले ही मानो मुझे गोद ले लिया। सारे ज्ञानमण्डल
शकानाफूसी एक तरफ रख अपना काम छोड, घटों सो पाठ
तक वह मेरी कहानियो को व्याकरण की पटरीपर लाते, गलत-बयानिया सुधारते, बदशक्ल शब्द या मुहावरे काट छाटकर, सुन्दरता सवारफर वह मेरी शूद्र रच- नामो को दिव्य द्विजत्व दिया करते थे। जब वह मेरी कहानी पढते पढते हँसने लगते अथवा सजल हो उठते, तब मुझ में, बिना बोले हो, आत्मविश्वास घट घट उडेल देते थे। अक्सर मैं घोर राजविद्रोह लिख मारता था, जिसे पढ़ते ही अस्वीकृति से माथा हिलाते वह कहते--- "नहीं, नहीं, आपने लिखा सुन्दर है, सच है, पर फानून लोचदार होता है । सस्या श्रीमानों को है। इस तरह प्राप सबको सक्ट में डाल देंगे।" फिर पराडपरजी उस रचना रूपी बिच्छू को सुधारते यों कि बिच्छूका स्प तो बदल जाता, लेकिन शब्दों के (कामाफ्लाज) माया जाल में मारफ डन और विष वना-याचना हो रहता। अक्सर मेरी रचनामों की प्रातिकारी उग्रता से चमप- फर श्रीमान् लोग सावधान करते पराडकरजी को कि यहीं 'उग्र' को लेखनो सस्या को खडडे में न सींच ले जाए । फिर भी, पराडकर जी छापते। यह द्वन्द्व तब तक चलता रहा-चार-पांच बरसों तक---जवत पराट करजी की कृपा से रचनाकार की हैसियत से मैं अपने परो पर पडा नहीं हो गया । इस प्ररसे में उत्तर प्रदा वा यह जो भारत प्रसिद्ध दनिर अपगर 'प्रान है, मेर प्रभ्यास का पूरा साधन बना रहा। इमरे प्रमारों में 'माज' यो फाइल-को पाइन मरी हुई हैं। मेगेनिन पहली समालोचना 'मर्यादा' मामिक में रहीं ग्लिोनी पो, जिसरे सम्पादप ये प्रदेय मानतीन सम्पूर्णान दनो के जान यिनान-नगर प्रो. एक सौ नौ मेरो लेखनी लिए स्नेह पपान !*
कविता, हास्य, आक्रमरण, जो भी लिखता था वह पराड
करजी के प्रसाद से तुरत ही पब्लिक के सामने आ जाता
था। 'ऊटपटाग' गीपक से बरसो मैंने हास्य-व्यग पे नोटस
प्राज' में लिसे हैं-'अष्टावक्र' उपनाम से ।
इस लिखने लिखाने को मजदूरी मुझे शुरु गुरु मे दस
पाने कालम के हिसाब से मिलती थी। वह भी इस शत
के साथ कि तीस रुपये मासिक से अधिक कालम में न
लिखू । सौभाग्य का तेवर तो देखिए । बाल अभ्यास के
लिए पांच लास का प्रतिष्ठित दनिक पर बाबा के माल
की तरह अपना, पर जेब खच के लिए रपये तीस
मासिक से अधिक की गुजायश नहीं । लेकिन 'आज की
वजह से मेरी वह प्रचण्ड पलिसिटो हुई, नगर मे, प्रदेश
मे, हिदी हद तक सारे देश मे कि ज्ञानमण्डल के वरदानो
फो म चादी के बटसरो से क्या तोलू?
आपने पढ़ लिया विम शिवप्रसादजी गुप्त के
'सेवा उपवन से भीख के अन सिर पर लादकर ले प्राता
था । ज्ञानमण्डल और 'माज' भी उही देवता-स्वरूप
शिवप्रसाद के दिव्य प्रसाद थे । (हैं भी।) लेकिन शिव
प्रसादजो मुझे 'पाज' मे उस प्रोजसे न लिखने देते जिस
तेज को महाराज पराडकर ने सुविधा दे रसौ थी।
मौलिकता न हो न सही, पाठकों को नीरसता भग करने
के लिए तर के 'माज मे प्ररागित दो वार कविताएँ
महज स्मरण से यहा उपस्थित करता है।
परतत्रा
प्रभु परतत्र हैं हम प्राज ।
दलित हैं पर-पद प्रवल से गलित हैं सब साज । प्रभु
देश पर, निज वेग पर, सर्वेश पर का राज,
एक सौदस
।
पर-वृपा निभर स्व-पूजा, ध्यान और नमाज । प्रभु०
पर उदर निज अन से भर हम रहें मुहताज
पर कुशल, निज अपकुशलहित देव विविध सिराज ।
प्रभु०
अपर पर-बस जग न हम सम दास गन सिर ताज ।
प्रभु०
(सन् १९२०-२१-ई०)
कामना
-
भयकर ज्वालाएं
जाग उठे सब ओर भाग को हो जाये नरभार !
मपुर रागिनी नहीं चाहते~
भौर न स्वर सुकुमार
पन्न नाद-सा बोल उठे हम सरपे उर का तार
पायस को धनघोर घटामों-मी
चारामार नभ में धुएं को राशि व्याप उठे,
मौर उसमे से हमारी दिव्य प्राणगाएँ
घचला-सी घमर्फे अनन्त चिनगारिया।
ऐसे समय
पो हो हो ! मा हा हा
उप-रप विश्वामित्र,
दुष्ट-दल-नागरु भृगु,
रावण-दप-हारो राम,
पुस्चत-बन-दायानल, पमवोर-यप्ण ऐसा,
प्रपया पिनारी भूतनाय धी पालभृत
ऐसा योर भारत हमारा उग्र नाच उठे !
एयमातु ।
(मा ई० १९२० २१)
व्यग
'मिस' माधुरोको मुस'लोफर' निहारि, हारि,
फोके पड गये मुह नोके-नोके गुल के ।
वसन सफेद वाके तन की सफेदी देस
मलिन बना ही रहा-साठ चार घुल के ।
चल्हे पडे, जले, काहू काम के रहे न फिर,
देखि हलकाई वाको फूले फूले फुलके ।
'काऊ', 'किड', 'चुत' के, हरिन चुलबुल के,
सुजात गडि पायन चरम बुलबुल के ।
हास्य
सेत-सेत साद साय तपके तमावू हुआ,
गया परदेस, कहो कसो बुद्धिमत्ता है ?
विक्ट मेशीन बीच पड उडवाया लता,
बना सिगरेट, फिर लौटा कलकत्ता है।
हाट मे विकाया, पाया हाय मे उसोक फिर
खाक भी हुआ, तो होठ ही पे क्या महत्ता है !!
'सता' हुआ 'मिस' पे बेचारा कवि 'लोफर भी
बोल उठा विश्व यह प्रेम अलबत्ता है !
पूज्य पराडकरजी या बगाल के बडे बडे बमबाज
योगी मिजाज क्रान्तिकारियों से सम्बघ था। दिल्ली
के दफ्तर मे यह जो साक्षात् शहीद है गुप्त ममयनायजी
यह भी मेरे पलास भाई हैं । हिन्दू स्कूल के मन्मथनाथजी
भी विद्यार्थी थे । प्रचण्ड प्रोर दानिक पडय अकारियों
से मेरा सम्पक भी कम नहीं था, लेकिन पराडकरजी
या मन्मयनाय के सबब नहीं। मेरी लेखनी से विन
गारियां झडते देस दियगत श्री गचीद्रनायजी सायाल
मोर फांसी पा जाने वाले गहीद श्री राजेद्र लाहिडी एक सौ बारह
ने ललफकर मेरा सग्रह किया था। शची द्रबाबू ने
राजेद्र लाहिडी को मेरे घर भेजा, मेरी उग्रता को
गहराई को जाचने के लिए। मेरे स्वभाव मे उत्सुक्ता,
भावुक्ता जितनी गम्भीरता, दृढता, उतनी नहीं थी।
फलम से लिखकर 'रिस्क' लेना हो तो (कायर होते
हुए भी) शहीदो का पीछा म काले कोसो तक न छोड़।
फलम से मारना हो तो सारे विश्व के अनाचारियों को
बिना नरक भेजे मन मान , लेकिन बदूक, तलवार से
प्रारण लेना हो तो वह मेरा शेवा नहीं ।
मेरो परिभाषा चाणक्य ने नद साम्राज्य का
नाश कर दिया लेकिन अपने हाथ से किसी को एक
थप्पड भी लगाए यगर । और मुझे बुलाया गया । तीन
और घगाली जवानों के साथ बनारस से इलाहाबाद
सचमुच कोई पड्य प्रकारो उपद्रय राजनीतिक डावा
सालने के लिए ! चला तो गया म बंगालियों के साथ
बनारस से इलाहाबाद, लेकिन वसे हो जसे काली
मदिर मे नहलाए जाने के बाद वलि पशु यूप की तरफ
नाता है । इलाहाबाद मे चौबीस घण्टे इन्तजार करने
पर भी अन्य आदमियों के साथ जव योगेश यावू नहीं
माये तय एए प्रकार से जान-अची-लासों-पाये भाव से
हम तीनों छोटी लाइन से पुन बनारस लौटे। लकिन
बोच के एक जपान पर यनारस से माने याली गाडी
म प्राधा दजन तगडे पोरों के साथ योगेग वायू नजर
पाए । उहोंने हमे अपने डिवे मे बुलापर इलाहाबाद
लोट चलने का जय प्रादेग दिया तब बदेगा बेगम
यहाने बनाने लगे कि भाभी से दो ही दिनों में सौट
माने का यवन देवर माया हूँ। इस पर बहादुर योगेश
एर मी तरह गायू ने जिस पुसा भरी दृष्टि से मेरी तरफ तरेरकर
ताका था, वह आज भी मुझे भूली नहीं है। दोना
बगाली बहादुर इलाहाबाद लौट गए। म बनारस बच
पाया । फिर भी श्रीशची द्रनाय सायाल तथा क्रान्ति
कारी मण्डल मेरा आदर करता था। शचीन बाबू ने
तो अपने सस्मरण मे एकाधिक बार मेरी चर्चा भी की
है। यह मेरी लेखनी मे जो प्राग यो उसीसे परम सतुष्ट
थे। मुझमे जो नहीं था उसके लिए तिरस्कार सान्याल
महागय के दान मे नहीं था। सान्याल बाबू दुखों के
दाह से सुवरण की तरह दप-दप दहकते दाशनिक थे।
कसौटी की तरह श्याम । बडी-बडी डोरीली, करुण, पाखें ।
वावू शिवप्रसाद गुप्त तो ? तो क्या बाबू शिवप्रसाद गुप्त को भी स्वग के फाटक से नहीं गुजरने दिया गया ? बाइबिल मे लिखा है सुई के सूरास से अंट निकल जाए-भले, परन्तु धनवान स्वग के फाटक से त्रिकाल मे भी नहीं गुजर सकता। बाबू शिवप्रसाद गुप्त गर-मामूली धन घान-कहते हैं करोडपति-जमीदार-साहूकार पे उत्तरा धिकारी थे। अगर मुझे मजे मे विदित न होता रि दोष देवतानों में भी होता है, तो दिवगत वायू साहय को म आदमो न कह देवता ही कहता । लेकिन जहाँ तक मुझे मालूम है देयतानो को दिल नहीं होना और मादमी यदि भरत बन जाए या बुद्ध, ईसा या श्री राम- कृष्ण परमहरा या गाधी तो वह सर-से-पांव तक दित हो दिल दिय्य दिसलाई देता है। सावन के सघल धन को तरह शिवप्रसादजी सहन स्वभाव से सभीके लिए जीयन-मय-सजल थे। उनके रहते 'सेवा उपयन' एक विगाल प्रतिथि निवास था । किसी तरह का भी गुरपी हो गुप्तती के मन मे उसके लिए उदार प्रादर भाय सुरक्षित था। विद्यार्थियो को, विद्यालयों को, समाज सयको को, राष्ट्र-कमिया को, नेताओं को मालवीयजी पौर गाघोजी को बायू शिवप्रसाद गुप्त मुक्तहस्त दान दिया करते थे, यह भी नायपूरण भक्ति से । महामना मालयीयजी पर तो यह लोटपोट-मुग्ध पे, उहें पिता एर गोप"ह अपने दो पुत्र भौर गोयिद मालपोप यो भाई पहा
करते थे। मालवीयजी भी बाबू शिवप्रसाद गुप्त को
इतना मानते थे कि काशी में उन्होंके यहा रहते, उहीं
का अन पाते थे। ज्ञानमण्डल को ज्ञान-मण्डल बनाने
मे शिवप्रसादजी के लक्ष-लक्ष रुपये अलक्ष हो गए।
माज' को 'आज' बनाने मे। 'भारतमाता का मदिर'
की भव्य कल्पना को दिय प्राकार देना, काशी विद्या
पीठ की बुनियाद डालना दिवगत गुप्तजी हो का प्रसाद
है । काशी मे जो भी राष्टीय चेतना जागृत हुई उसको
प्ररणा मे गायोजी के बाद वायू शिवप्रसाद गुप्त हो
का नाम लेना मुझे समुचित लगता है। शिवप्रसादजी
के प्रसाद का पुण्य प्रकाश सारे उत्तर प्रदेश मे, सुशबू
सारे देश मे थी। शिवप्रसादजी इतने मोटे थे कि लगता
था उनका विशाल हृदय यूभकर ही विधाता ने वह
वडा घर उहें वरशा था। शिवप्रसादजो का बगला
वडा, मोटर बडी, कसे बडे-बडे वायलर घोडो की जोडी
यो उनकी, जिसके पीछे वर्दी धारी दो-दो साईस राह
गोरों को तेज स्वर से सावधान करते रहते थे। गिव
प्रसादजी साने और खिलाने के भी बडे शौकीन थे। घर
की बात अलग, यात्रा में भी उनके साथ पूरा भण्डारा
चला करता था। काली में प्राकर कोई भी बडा
प्रादमी सेवा उपवन' ही मे सुविधा, प्रातिथ्य और
सुख पाता था। प्रक्षरश रईस थे श्रद्धय मिवप्रसादजी
गुप्त । ऐसे जसे को जेल तो पदापि नहीं होना चाहिए
यो । लग्नि भला अग्रेज क्ब छाडने वाला था। उसे
भी सोखचों में बन्द क्यिा हो गया । शिवप्रसादजी-जसे
रईस को जेल देना पासो देने के बराबर था। हृदयहीन
कानून ने ऐसा समझा ही नहीं । वह जेल ही में बीमार
पड़ गए । छूटे, तो उन्हें फालिज मार गया। फालिज एक सौ सोरह
7 7 मार गया? शिवप्रसाद गुप्त फो? ऐसे नेक दिल आदमी को जिसको तुलना देवता से भी करने को म तयार नहीं ? तो यह सारे का सारा उत्तम अभियान, विधिविहित दान, सबकी पूजा, सवका सम्मान, सबके लिए अपार मोहमय प्यार सदाचार नहीं, अपराध या क्योंकि शिवप्रसादजी को विकराल, भयानक दण्ड मिला-जिसे छ महीने को फासी कहते हैं । जिस 'सेवा उपवन' मे उहोंने सारे ससार को सेवा को यो उसीमे बहुत दिनो तक वह पक्षाघात से परम पीडित पहियादार गाडी पर झुभलाते, खुनसाते धुमाये जाते थे। यह अक्सर बनारसी बोली मे व्यथा विह्वल दोहा- इयां दिया करते थे-"रमवा, रे रमवा ! कौन गुनहवा परली रे रमवा !' तो? तो पया याबू शिवप्रसाद गुप्त को भी स्वग के फाटक से नहीं गुजरने दिया गया बाइबिल मे लिखा है सुई के राख से ऊंट निकल जाए-भले, परन्तु पनवान स्यग के फाटक से निकाल मे भी नहीं गुजर सकता। यापू शिवप्रसाद गुप्त के जीवन और मृत्यु से जब म यच्चा महराज के जीवन और मरण को तुलना परने चलता है तो मेरी मति हैरान परेशान रह जाती है । यद्यपि मनुष्य की दृष्टि से दोनों में कोई भी तुलना परना अनुचित-जसा लगता है, लेकिन दययोग से मेरे तो दोनों हो गुरजन थे। यच्चा महराज ने हारफर कभी राम को पुरार नहीं लगाई । असल में यह अपने प्राइ बेट प्रक्षेपस मे राम को भी दस्तदाजी नहीं चाहते थे। पौर जसे राम को भी यज्वा गुरु को यह सवतत्र स्यत पता मोहद मालूम पड़ती थी। तभी तो माराम पण मोगह भरा जीयन उन्हें परदान मिला था। - --
प० कमलापति त्रिपाठी
सो, तुम जीते-क्मला, और बहुत खूब जीते। अभी
गत कल ही को तो बात है। तुम प्रादेशिक साहित्य
सम्मेलन के अध्यक्ष बने थे (सन् १९४८ ४६) । उही
दिना लखनऊ मे मैं भी मोहक मिनिस्टर श्री केशवदेव
मालवीय का मेहमान था । अत , सहज हो, उस जलसे
में हाजिर था जिसके तुम जनाब सद्र थे। पहले दिन
की कारवाई सत्म होने के बाद ही मच से दशको के
बीच मे आने पर मुझे पहचान तुमने मेरे गधे पर परि
चित हाय रसा था और-परिचित ही अदा मे-मैंने
गुजारिश की थी हि० सा० सम्मेलन के अध्यक्ष से कि
आगामी क्त के जलसे मे मुझे भी चद अल्फाज बोलने
को इजाजत दें। लेकिन तुमने तद्दन ना कर दिया था
"तुम न जाने क्या बोलो-मैं तुम्हें बोलने नहा दूगा।"
तव तुम मिनिस्टर नहीं-~महज एम एल ए थे,
लेकिन तब भी तपना तुमने प्राय मिनिस्टरो की तरह
हो शुरू कर दिया था। मैं रहता था मिर्जापुर तथा 'मत
वाला' वाले महादेवप्रसाद सेठ के योग्य पुत्र के करते
फिर से प्रकागित 'मतवाला' वा सम्पादर था। दूसरे
दिन तुमने सभा में मुझे बोलने नहीं दिया था। पाचवें
दिन अपने पेपर मे मैंने तुम्हारे दान को, भाषण को,
हिन्दी साहित्यिर प्रासन पर से पालिटोनियन मुख्यमत्री
पन्त के पद पल्लव पड़ने के प्राचरण को भत्सना की
पी--जरा भी अपनत्व दिखाये बगर । इसके बाद
एक सौ
भठारह
मिर्जापुर से बनारसा जाने पर, जान-बूझकर, तुम्हारी प्रतिक्रिया ताडने के लिए मैं तुम्हारे घर गया था । दर- चार तुम्हारा भरा था, मैंने देखा । मुझ देखते ही चेहरे पर प्रहकार तुम्हारा उभरा था। मेरो तरफ से दोल हटा, पीठ दिखाते तीन तिरस्कार मे तुमने कहा था "कोई मुझसे पालिटिक्स मे भिडावे (फिर देखे )।" उस समय मैंने नहीं समझा था कि तुम्हारे इस पालि टियस परिज्ञान-अहकार के पीछे इतना फूट प्रभुत्वपूरण 'पावर' था । तुम सिंचाई मत्री बन गए जव तव भी मने महफार योग्य बोई सुसूसियत तुममे नहीं देसी थी। लेकिन जब काल ने तुम्हारे पक्ष में 'किक' मार सी० पी० गुप्त को पाताल पठाया और सम्पूर्णान द को प्रान्तीय प्रभुत्व के प्राकाग की तरफ उदाला तर जसे रातारात तुम्हारा साइज पू० पी० के पाताल से (नक्षत्र ग्रह-बगार-मण्डित) प्राण तक विराट हो गया था। तुम्हारा मह विराट रूप मुझे बहुत ही भाया। जीया मे जीवट से डटने की क्षमता, बल, 'पावर' मुझे बहुत ही सुहाते हैं। मने फहा, 'भाते हैं', 'सुहाते हैं। 'सुभाते' ये मुझे उतना नहीं । देखो तो, जब से तुम 'पायर में हो मेरो-तुम्हारी भेंट तक नहीं । लसनऊ तो दूर म यनारस भी नहीं गया, मिर्जापुर नहीं गया। तब से जय से तुम यसे नक्तिगाली बने जिमको कल्पना तर मन पर पा सका था। वसे हो-ठोर बसे हो पमता-जसे प्रतिफ सला ये दोन प्रलादीन को अपने हो हाय के चिरारा मे प्रचण्ड नतिगाली 'जिन' के होने को कल्पना तक नहीं हो। विश्वास रमो, म तुम पर एए प्रपर भी न लिपता--यह सब तो अपना एर मो उन्नीग महबार प्रष्ट करने के लिए लिसा है-पासपर प्रान्त
थे उन साहित्यिकों, प्रसम-याना, प्राचार्यो, तयाकथित
प्रतिभाशालियो पर जो माज तुम्हारे प्रसाद से प्रसादी
लाल बने हुए हैं । मेरा दावा है माज यू०पी० के जो
भी तुम्हारे सामने भयरर सम्पूर्णानबित हैं ये सभी
मेरे सामने भी सरासर भरे हुए हैं । याद तो क्रो
सन् १९२१ ई० को घटना । गायोजी फाशो पाये हुए
थे और टोचस ट्रेनिंग फालेज के दुमजिले पर हिंदू
विश्वविद्यालय के एक से एक विवेको प्राचाय को प्रसह
योग का प्रोग्राम सुतकित रीति से समझा रहे थे। और
तुम थे। और म था। हमने तय किया कि महात्माजो जब
गोष्ठी वाले कमरे के बाहर निकलें तब अचानक लपक
कर पावन चरण-स्पश किया जाए। और हम कर
गुजरे लड़कपन । बडे-बडो के आगे आगे आते गाधीजी
के गतिवान धरण एक अोर से तुमने और एक ओर
से मने पकड ही लिए थे। गाधोजी चमककर शान्त रह
गए थे। मुझे याद है मेरे हाय मे उनका दाहिना
चरण पाया था और तुम्हारे वाया । युग पुरुष के वाम
पद को विभूति अगर यही है जिससे तुम मण्डित हो
कमलापति पण्डित ! तब महात्मा के दक्षिण पद को
विभूति मे क्या होगा उसको कल्पना की अनुभूति भी ग्रह्म
पद प्रसूति मालूम पडती है। महात्मा पद रज-ग्रहण के
चद ही दिनों बाद इस बात पर मेरी-तुम्हारो शत लगी
यो पाच-पाच रुपए की कि प्रागे जेल कौन जाता है।
जेल तुम भी गये, मेक्नि म तुमसे पहले पहुंचा था।
पोर हम दोनों एक ही भाव मे, एक ही वरण मे, एक
हो 'झिरो' मे, एक ही जेल मे सन् उन्नीस सौ बीस
और एक मे ये ! उसो जेल मे उसी समय कृपलानीजी,
सम्पूर्णानन्दजी और सारी यू० पी० के कई सौ पोलि एक सो बीस
टिक्ल वदी भी थे । आज यह सब म इसलिए लिखता
हूँ
कि तुममे जो श्रेष्ठ है, तेजस्वो ह, उसमे म हूँ। भले
म ही न होऊँ तुम्हारे पूज्यपिता परम पडित थे, तुम्हारे
भारत विग्न्यात नानाजी परम पडितये। लेकिन जेल
तो म ही तुम्ह ले गया, अखबार नवीसी की तरफ तो
म ही तुम्हे ले गया। मतलब महज यह कि तुम्हारे
गुन मे मेग अनुराग प्राज भी है और अशुभ मे भगवान्
न करें क्मिी का अनुराग हो। हरिश्चन्द्र ने कहा-
कोई हमसे सत्य मे भिडाये, रामचद्र ने कहा, कोई
हमसे मर्यादा मे भिडाये, गौतमबुद्ध ने कहा, कोई मुझसे
करुणा मे भिडाये, लेकिन कमलापतिपडित ने पलटा लेकर
कहा, कोई हमसे पालिटिक्स में भिडाये । तो क्मला
इम पालिटिक्स म तुम्हारे सत्य, मर्यादा और करणा ता
होगी ही? या माडन पालिटिक्स उक्त गुणा से विरहित
होता है ? भाई रे, दोहाई है, इतना बड़ा हो गया
चुनार का पंडवा, पर, पूछो तो पालिटिक्स का 'प' भी
लिखना मुझे नहीं पाता। जब तुम कृषि या सिचाई
मत्री बने थे, म सयोग से लखनऊ मे था। तुम्हारे
पहा गया जो तुम अदर थे, बाहर दरबार लगा था।
तुम बाहर प्रापे तो स्व० परमहस राघवदास ने तुम्हे
सुनाया था कि उपजी कह रहे थे कि काम प्रभी छोटे
नाई कर रह हैं बडे भाई का नम्बर बाद में प्रायेगा।
गायद परमहसजी या क्यन तुम्हें सुहाया नहीं था।
म दूसरे दिन गया तो तुम तपलिये मे सुलभ हुए थे।
इसक याद म उत्तर प्रदेश पे यार-हो गाहर रहा ।
प्रमर पत्रो में पढ़ता तुम्हारे बारे में। फमाल मेरे
नाई ! तुमने फरसे दिशा पिया लिविन पिसको दिप
लामा तन कोपरियारिमा को रिप्लेदाराको
मो
नकतर-तक उसे जो आत्म सतोष होता है वही सतोप
चुनार से बदमाशी सोखकर पाने के बाद बनारस के
एक-से एक प्रतिभाशाली, भाग्यशाली, बदमागो को
देसने पर मुझे हुमा । फलत मन से हीनता की भावना
थुल-सो गई । लगा, यहाँ यही सही दि फरो कुछ,
यतामो कुछ । या करो भी बतानो भी। डरो, क्यो?
पालोचक ऊपरी मान होते हैं-चलते नहीं तो यहा
दूसरे की खबर लेने जितनी फुरसत है किस भले आदमी
को सामने पडे, झट से राय दी, आगे बढे और भूल
गए । सो, छान ! छान ! किसी रडी भडवे को न मान!
काशी को हवा मेज्ञान इस कदर कि गकराचाय से वहां का
चाण्डाल बहस कर बठा था, मडन मिथ को मजदूरन
दो चार सुना गई थी, काशी के तोते तक शकराचाय
से सस्कृत मे टरर-टरर करने की हिमाकत कर सकते
थे। जब मैं विद्यार्थी था तब को काशी मे प्रियवदामजदूरों
थों, चार्वाक चाण्डाल थे, टरर-टरर तोता रटत
श्रुति धारी द्विज थे-अलबत्ता नहीं थे तो करुणामय
सयासी दाशनिक दिव्य गकराचाय महाराज । कुछ लोग
कमजोर भी होते हैं और कुरुप भो । कमजोरी भी अगर
'कट' वाली हो -प्रदा वाली--तो क्लामयी हो उठती
है। मेरे एक परम आदरणीय वपु थे। अच्छे पढे लिखे,
खासे खाते पोते। कविता का शौक, कसरत का शौक,
दिलफेक यार । जवानी मे एक हाको खिलाडी नौजवान
को सुगठित देह देखो और फिदा हो गए । बरसो उनको
भावुक्ता उस देही के गिद भ्रमराती रही। व्याह मौर
दो-तीन बच्चे तक हो जाने के बाद जनाव को नमकीन
निगाहों मे दालमडी को एक तवायफ नाच हो गई। हज
रत का रोम रोम गा चला वसन्त बहार ललकार,
एक सौ
चौबीस
ललशर! पत्नी से भी जनाय ने बतला दिया कि उनको जान को राहत तो फलो जान हैं । वह मुझसे उन मे दूने रहे होंगे-~~-जियादा हो, लेक्निघटे घटे भर वह उस तवायफ के नार नकश के फसाने मजनू-मुस बनाए गाते रहत । बात यह थी कि औरत वाले दिसने पर भी वह दिल ही फेर सकते थे-दिरमोदाम नहीं। और वह थी रडी । मजनू को भी सालो हाय देस झाड, उठाने वालो और नामानमसा पर नी टके पाते ही टक- टकी लगाने वाली। सो, मेरे यार का इक बेकरार वसन्त बहार के प्रागे न जा पाता । श्रीमान् माप को तरह सज-धजकर दाल महो जाते ! यया साज-याज! घन्टे भर मे दादी बनाते, प्राधे घटे तर मूछों का क्य' या वोपन संपारते, होय देखते, नासिका पर सपाटक हाय फेरते, कपड़ों पर इस्तरी-प्रश पर भूल जाते-~- फिर करते। जियादा समप यह पूजा मे लगाते थे या अग्रेजी यूट पर पालिग करने मे, कहना पठिन है। इसके बाद महफिल मे जिस माहिस्तगी से उन दिनों तवा- यफें सजा करती थी उसी पाराम से लस हारुर, हाय मे घडी, सर पर प्रतीनुमा टोपी पोहे महापामजी दालमडो को उस तवायफ के दीदारों को चलते, जेर मे हदस हद रुपया पाठ पाने को सेरपी लिय। उस ये या मे ठीक सामने पाती पानों को दूपान पर दो पसों को गिलोरियो साने ये माद यह मेरा बारा यार नौ बजे से बारह बजे रात तक उस मगतामसी पो तरफ देखता हो ! जमे सूरजमुखी देखे पूरज की तरफ, मनयरत, एए पाय पर पुसरित गात, पात-पात । रहते तो नहीं पे, पर सोचते यह मन मे यहीये हि पसे नहीं हैं जेब मे तो वपा सरोकाया तो है, पडी मार, परीसरी मूतो हैं।
फिर विश्वनाय अनपूर्णा दशन के पुण्य, पूजा-पाठ का
प्रभाव । वह सोचते कि प्राखा हो से उस वार वनिता
को प्रश से फश पर खोंच लायेंगे I लेकिन पसे से खिचने
वाली ऐसे-बसे जसे-तसे से क्से खिचती? मेरे मित्र के
इस फोकट इश्क पर उनका भानजा खूब ही हंसता ।
वह भी जवान, तगडा बनारसी था। उसने मामाजी के
प्रेम को नामों का प्रेम बतलाया । वह किसी दिन जब
मामाजी पान को दूकान पर सडे वेश्या को घूर रहे थे
तब, दस-बीस रपये लेकर, उसी रूपा के कोठे पर चढ
गया। इसके जरा हो बाद फश से मामाजी ने देखा कि
उनका योग्य भानजा उनके सपना को रानी के गाल से
गाल सटाये सुशहाल निहाल प्रा पर था। इस पर
महानाय फा दिल कुछ ऐसा चकनाचूर हा कि तबीयत
हरी रखने के लिए हजरत ससुराल चले गए । आठ वरस
से नहीं गये थे जहां । यहा जाकर क्या देखते हैं पाठ
साल पहले उनकी जो साली दस साल की थी वह अय
अट्ठारह की हो गई थी। व्याह उसका पई वप पूव हो
चुरा था लेकिन पाराम से उस पर निगाह बनारसी
रसज की पर पडी थी। प्रो हो । इसका नवगा वही है
जो उस वेश्या का दोनों ही जसे गुलाब के फूल, इस फक
ये साय कि दे या का रस सूख रहा था और साली सरा
सर रसाली यो। मेरे मित्र बाता के सौदागर होने के
सवय प्रभाव सामने वाले पर गुरपाई भरा फौरन डाल
दते थे। उनका साला चेले की तरह उनके प्रभाव मे
था । सो, उहाने साले से कहा-साफ गदों मे-वि
उन्हें उसी छोटी बह्न जंच गयी है, सो उसे उनके पमरे
मे यह रिमी बहाने भेजे । और समझदार पटेलिसे साले
न-प्राचरण पर सदह क्यि यग्रर-छोटी बहन को
एचीम
7 बडे बहनोई के कमरे मे भेज दिया। और हिमालत यह कि ससुराल से लौटकर उहोंने अपनी पत्नी को भी पतला दिया। छोटी-बहन विजय की वार्ता पलत इसके तीसरे ही दिन जेठ को दुपहरी मे दुछत्ती के कमरे में भाकने पर बनारसी रसनजी ने देखा । पया देखा? देसा उनकी पत्नी उही के तगडे, सुदशन, फुबारे छोटे भाई पा अधरपान कर रही है.-पिपासाकुल । मुझे यहना चाहिए कि वह 'स्पोट' थे। चुपचाप, दवे पाव, छत से वठक मे आ रहे । मुझे कहना चाहिए कि वह साधु थे। सारे का-सारा यह फिस्सा उहोने 'सरल सुभाव छुआ धन नहीं' मुझे सुना दिया था। मुझे पहना चाहिए, ऐसे अल्हड विल्हड प्रादमी ऐयो के बावजूद मुझे बहुत ही पसद पाते हैं । कौन है वे ऐब वे-ऐव-यस एक रसुदा की जात है । सुदा ? जात याभन ये हाय को लेपनी भूल हो जाती है कि यह एटम युग है और राकेटो मे फुत्त और यदर प्रतरिक्ष की तरफ उडाये जा रहे हैं-अल्लाह के प्रासन की तरफ्-भूक्ने, बदर घुडकियां दिखलाने के लिए। यनारस देखने के बाद चुनार वाली इनफोरिभारिटी पामालेबस मेरे मन से जाती रही-इस चर्चा में यह पणन हुमा है । चुनार मे, फिर भी, लुरे छिपे जुप्रा होता, सेक्नि बनारस मे तो बागों मे, बंगलों मे, यजडों पर एक तरह सुले माम तुमा होता, 'राय होती, सुदरियां होती, पार-नारी, जार नारी ।चुनार मे तय दो ही चार वेश्याएँ घोडचठी रही होगी । सो भी गहर से दूर, सराय नजदीय । बनारस मे पब्लिक-परियाँ यीच गहर म गत- दात को सग्या में प्रस्ट येन्यालयों में भी पौर त हो ससान गत सम्या में प्रप्रस्ट पेयालयों में। ऐसी रसोलियो एक सो
को कमाई चुनार मे सम्भ्रातो को नहीं बदमाशों
और प्रिटिश टामिया को थी जो इहे 'लाल बोवी' कहा
करते थे, लेक्नि बनारस की बिगडी औरतो की गहरी,
सही कमाई वहा के छिपे प्रक्ट रुस्तम मनचले युद्धि और
धनपतियों की थी।
कलकत्ता
"यद्यपि विश्वनाथजी त्रिपाठी चुनार चले गए हैं
फिर भी चुनार ही के एफ मुशोजी उहोंके साथ रहते
हैं, वह होंगे, मैं आपको अपने प्रादमी के साथ त्रिपाठी
जी के स्थान पर सिंघोबागान मे पहुचवा देता हूं।"
मुझे निराश हताश देख, सभवत मेरी दिक्क्त समझ
पर सहृदय मूलचदजी अग्रवाल ने कहा था। विश्व
नाय भाई के साथ चुनार के जो मुशीजी रहा करते
थे वह मेरे परिचित ही नहीं यजमान भी थे। उसी दिन
उहोंने चुनार सूचना भेज दो कि बेचन भाग पाये हैं।
एक हो हपते बाद विश्वनाथ भाई भी चुनार से पा गए
थे । उहें मेरा वहां प्राना और रहना, उनको सुविधानों
मे सलल डालना, सुहाया नहीं था। फिर भी, तिरस्कार
उहांने नहीं किया । एक 'यासे' वाले को कहकर मेरे
खाने की व्यवस्था परा दी । जल्द ही उहाने मेरे लिए
एक नौकरी भीतलाको-प्रार० एल० वमन कम्पनी मे।
एक रपया रोज पर मैं उस कम्पनी के दफ्तर
के बाहर की तरफ तन पर बठकर ग्राहकों के पते
छपे फामों पर लिसा करता। विश्वनाय त्रिपाठी जब
विश्वमित्र' के लिए विज्ञापन दूढने निकलते तर अक्सर
मुझे भी साय ले लेते ताकि यह पपा भी में समझ की
रोपड़ी में दूस तू। उहीं दिनों सन् १९२० वालो
।
एमसी
भट्ठाईस
मशहूर महा काप्रेस हुई थी जिसके अध्यक्ष थे लाला लाज
पतरायजी । उसी काग्रेस सेगन मे असहयोग का
प्रस्ताव पास हुमा था। प्रस्ताव के विपक्ष मे बोले थे
मालवीयजी, मोतीलाल नेहरजी, विपिन चद्रपालजी।
क्सा जोग, कसा खरोश, कसे कसे हृदयस्पर्मी भापरण
हुए थे । क्तिनी इचत थी गायोजो को। प्रेसिडेट
होने के बावजूद लालाजी महात्माजी को पखा नल रहे
थे। राष्टीय महासभा के उस प्रातिकारी अधिवेशन के
दानों ने मेरे मन मे जसे राष्टीय नशा भर दिया था,
प्रारणों मे एक सपना गौरव ! मुझे लगा बनारस
घोड राष्ट्रीय रग के इस मौके पर कलकत्ता में अकारण
हो पाया ! मुझे पुन बनारस ही लौट जाना चाहिए ।
यनारस मे फिर भी मेरा व्यक्तित्व विक्स रहा था।
लेफ्नि प्रपार फ्लपत्ता मे तो मैं फुलोगोरी करने काबिल
भी कायापारी नहीं था। क्लस्ता जाने पर, नौकरी
तलाशने पर मुझे पता चला कि मैं किसी भी काम काविल
नहीं था। राष्ट्रीय भावना के साथ इस नाकाबलियत ने
भी पलपत्ता छोडने को मुझे फम उत्साहित नहीं किया।
तय तर चुनार से यडे भाई का पत्र विश्वनाय नाई पर
प्राया रि यह मुझे बनारस भेज दें-टिफ्ट के रपए
समय पर मिलने वाला उपार । तब तक मैं एक मास
फे वरीय पार० एल० यमन २० मे एड्रेस लिसने की
नौकरी कर चुका था । लेगिन विना नोटिस जो मैं घोड
चलन पर मामादा हुमा तो कम्पनी यालों ने नो तनपाह
के नाम अंगूठा दिखा दिया । यिन्वास करें-विदगो
मे यही मेरी एकमात्र नौररी यो जिसपा येतन प्राज
तर मुझे नहीं मिला है। फिर मेरे पिता को सुगति
उनतीग विचारिए जो सारी जिन्दगी पुजारी को नौररी करते
रहे, लेकिन तनखाह के रुपए मन्दिर-मालिक सेठ हो के
यहा समय पर लेने को छोड देते थे। लेकिन जब समय
प्राया, वह बीमार पडे, तब साहूर ने रुपए न दिये।
न दिये मेरी भगिनी की शादी मे-पिता दिवगत हो गए।
रुपए मिलते ही रहे।
जीवन-सक्षेप
सन् १९२१ ई० म जेल से पाने के वाद नितान्त
गरीबी मे, गरीब रेट पर, 'प्राज' मे मैं सन् १९२४ के
मध्य तर राष्ट्रीय प्रादोलन के पक्ष मेप्रचारात्मक पहा
निया, कविताएँ, गद्य काव्य, एकाकी, व्यग और विनोद
परावर लिखता रहा । सन् २३ मे 'महात्मा ईसा'
नाटक लिसा, 'भूत' नामक हास्य-पत्र मेरे सम्पादन
मे चाल हुा । मेरी समाज सुधारप पहानियों पर
फागी के कुछ गुण्डानुमा पडे सख्त नाराज हुए, हाथ
पाव तोड देने की धमक्यिा मिलने लगीं। बीच बचाय
कर रक्षा की श्री गिवप्रसाद मिश्र 'रद्र' के पिता श्री
महावीरप्रसाद मिश्र ने जो कागो के विख्यात डण्डेबाज
दलपति तो थे ही, साय ही, उत्तम साहित्यिक रचि के
पुरप भी ये । 'रद्रजी के पिताश्री मेरा बहुत ही प्रादर
परत य और जब-जब म उनरे यहा जाता और प्रक्मर
जाता तय-तब चकाचक जलपान यह परात, साथ ही,
चलते समय रुपया-दो रुपया पान साने को भी देते थे।
पियप्रसाद का यह 'रुद्र' नाम मेरे हो सक्त का परि
गाम है । सन् '२४ के मध्य तर में हिंदी मे कापी
चमोला यन घुफा था, लेग्नि जीवन यापन भर रुपये
कागो मे कमाना प्रसभय या । इम सन् मे में कारनाडा
पांग्रेस में भी शामिल हुप्रा था। यहां से पलरत्ता लौटने
पर एस मित्र पे साय 'मतवाला-माल' देपने गया ।
सनीम 'मतवाला' में मेरी भी कई रचनाएँ प्ररागित हो चुसी
एक मो
थीं । सन् '२४ ही मे 'मतवाला' मण्डल मे ही पहले
पहल (प्राचाय) शिवपूजन (सहाय) और 'निराला'जी
से मेरा आकषक परिचय हुना था। सन् '२४ के
प्रारम्भ मे गोरखपुर के विख्यात साप्ताहिक 'स्वदेश'
के दशहरा अक का सम्पादन भी मने किया था, परम
भयानक । पर छपा था प्रेमच दजी के सरस्वती प्रेस मे।
सारा प्रक विस्फोटक प्राग्नेय मनो से भरा था। जसे
अनूप शर्मा की यह घनाक्षरी-
क्राति की उपा से होगा रक्त भारतीय-व्योम
ताप भरा तेह का तरणि तमकेहीगा।
भारो राजनीति के उदधि के उभारिवको
चारु कालचक्र च द्रमा सा चमके होगा।
वरियो का दमन गमन होगा शक्ति ही से
युद्ध घोषणा को कोई घर घमकेहीगा।
कायरो । क्यों लेते हो क्लक को प्रकारय हो
भारत के भाग्य का सितारा चमकेहीगा।
उतावले 'उग्र' द्वारा सपादित 'स्वदेग' मे सन् '२४ मे
प्रचण्ड निटेन के विरद्ध कहा गया कि 'युद्ध घोषणा
कोई कर धमकेहीगा।' राष्टीय काग्रस ने इसके दो चप
बाद सन १९२६ ई० ही मे लाहौर मे, पूरण स्वतत्रता का
प्रस्ताव पास किया था। स्वटेग के उस पर को लेकर
गोरी गवनमेट मे तहलका मचा, गवनर इन कौसिल
ने फेस चलाने का निग्चय दिया। प्रेमचद के
नाई महताराय परडे गए सरस्वती प्रेस के प्रिण्टर।
दारयप्रसाद द्विवेदो गिरफ्तार हुए 'स्वदेग' के सचालक,
स्वदेश प्रेस रौंद डाला गया। लेकिन वदेसा तब तर
मतवाला -मण्डल मे क्लरता ये। गोरसपुर का यारण्ट
जय क्लस्ता प्राया, म बबई भाग गया।क्लस्त्ता पहली
एक सो
बत्तीस
यार म घर से भागकर पाया था। बबई पहली बार
फ्लक्त्ता से भागकर पहुंचा । और एक सगी के सग साइ
लेन्ट फिल्म कपनी में काम करने लगा। पीछे वारण्ट
था दफा १२४ ए वादगाह के विरद्ध राजद्रोह (डिस
प्रफेक्शन) फलाने के जुम का, लेकिन सामने थी ववर्द,
फिल्म-कपनी, शराब, कवाव और जनान क्या बतलाऊँ।
म भूल ही गया जवानी के जोश मे कि प्राणों के पीछे
वारण्ट था जिसमे फंसने पर वडी-से वडी सजा भी सहज
ही मिल सकती थी। पाचवें महीने पुलीस सी आई डी
ने मालाबार हिल पर मुझे गिरफ्तार किया । तव
गृहस्य बनी हुई एक वेश्या मुझ पर प्रासक्त थी और
एक अधवेश्या पारसोक परम सुदरी पर म स्वय तुरी
तरह मोहित था। पांव मे बेडी, हाथ मे हयक्डी, भुजा
पर सूती रस्सा बंधवाए तीन-तीन सशस्त्र पुलिस थालो
के साथ मैं ययई से गोरखपुर भेजा गया। तीन महीने
तक पेस चलने के बाद मुझे नौ महीने फी सख्त सजा
मिली । 'स्वदेश सचालक को उसी फेस मे २७ महीने
की सस्त सजा मिली थी। सारी गलती मेरी थी, पर
चूकि म नाटा-नहा-सा दादी-न-मुछ था और दशरथ
प्रसाद द्विवेदी उम्र रसीदा दाढी वाले सज्जन थे, प्रत
लोमर कोट से हाईकोट तक ने असल अपराधी बेचारे
दारथप्रसाद द्विवेदी को माना। तब अदालत ने मेरे
यारे में घोषित किया था
"यह तो इक्कीस साल फा
लल्ला है" (He is a lnd of twenty one rears)
सन् '२७ मे जेल से पाने के याद मने 'प्राय
मे 'युढ़ापा' लिसा था और रपया' । सन् २६-२७
को जेलों में होने पर भी प्रारए मेरे प्रप्रसन्न नहीं थे।
तेतीग देसिए, जेल में यया-यया है-
एरो
थीं । सन् '२४ ही मे 'मतवाला'-मण्डल मे ही पहले
पहल (प्राचाय) शिवपूजन (सहाय) और 'निराला'जी
से मेरा प्राकषक परिचय हुअा था। सन् २४ के
प्रारम्भ मे गोरखपुर के विख्यात साप्ताहिक 'स्वदेश'
के दशहरा प्रक का सम्पादन भी मने किया था, परम
भयानक । पन छपा था प्रेमचदजी के सरस्वती प्रेस मे।
सारा प्रक विस्फोटक प्राग्नेय मत्रो से भरा था। जसे
अनूप शर्मा को यह घनाक्षरो-
क्रान्ति को उपा से होगा रक्त भारतीय-व्योम
ताप भरा तेह का तरणि तमकेहीगा।
भारो राजनीति के उदधि के उभारिवको
चारु कालचक्र च द्रमा-सा चमकेहीगा।
वरियो का दमन शमन होगा शक्ति ही से
युद्ध घोषणा को कोई घर घमके होगा।
फायरो । यो लेते हो कलक को अकारथ ही
भारत के भाग्य का सितारा चमकेहोगा।
उतावले 'उग्र' द्वारा सपादित 'स्वदेश' मे सन् '२४ मे
प्रचण्ड ब्रिटेन के विरुद्ध कहा गया कि 'युद्ध घोपरणा
कोई कर घमरेहीगा।' राष्टीय काग्रस ने इसके दो वप
बाद सन १९२६ ई० ही मे लाहौर मे, पूरण स्वत नता का
प्रस्ताव पास किया था। स्वटेग' के उस प्रक को लेकर
गोरी गवनमेट मे तहलका मचा, गवनर इन कौसिल
ने पेस चलाने का नि'चय दिया। प्रेमचद के
भाई महताराय परडे गए सरस्वती प्रेस के प्रिष्टर।
दसरथप्रसाद द्विवेदो गिरफ्तार हुए 'स्वदेग' के सचालक,
स्वदेग प्रस रौंद डाला गया। लेकिन बदेस तन तक
'मतवाला-मण्डल मे क्लबत्ता थे। गोरखपुर का वारण्ट
जव क्सत्ता प्राया, म बबई भाग गया क्लस्त्ता पहली
ए सो
वत्तीम