Allahabad University, Allahabad

Aachaarya Kshemendra

M Gaur · 2005/12/31

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आचार्य क्षेमेन्द्र ( 'औचित्य विचारचर्चा,' 'कवि-कंठाभरण' और 'सुवृत्त- तिलक' कृतियों का समीक्षासहित-अनुवाद ) ) 3969/8 मनोहरलाल गौड़ एम. ए., पी-एच. डी. (अन्यश, हिन्दी-संस्कृत विभाग, वर्म समाज कालिज, अलीगढ़) प्रकाशक भारत प्रकाशन मन्दिर, अलीगढ़

१० बद्रीप्रसाद शर्मा के प्रबन्ध से
आदर्श प्रेस अलीगढ़ मुद्रिक ।
194113

विषय सूची
D
१-प्राक्कथन
२-भूमिका
जीवन वृत्त १-३। रचनायें ३-१० । व्यक्तित्व १०-१२
सिद्धान्त विचार-(अ) औचित्य १३-३१। (मा)
पाश्चात्य आलोचना में औचित्य विचार ३२-३६ ।
कवि शिक्षा इतिहास ४०-४५। हेमेन्द्र की कवि शिक्षा
४५-५१। क्षेमेन्द्र के बाद कवि शिक्षा ५१-५४ ।
देन ५५-६३। छन्द विचार-इतिहास ६५-६७ ॥
क्षेमेन्द्र का छन्द विचार ६०-७५ । मूल्यांकन ७५ ।
१११
मूलानुवाद
१-औचित्य विचार चर्चा
२-कवि कठाभरण
३-सुवृत्त तिलक
५५-७६
७७-११२

हैं प्रावकन आचार्य क्षेमेन्द्र का संस्कृत साहित्य में अपना एक पृथक ही मार्ग है और पृथक ही स्थान साहित्य की जिस दिशा में वे चले हैं उसमें दूसरा कोई नहीं गया। उनसे आगे बढ जाने का तो फिर प्रश्न ही कहाँ उठता है। उनके दो रूप है-आचार्य और कति। दोनो एक दूसरे से अनुप्राणित है, एक दूसरे से सह-सम्बद्ध क्षेमेन्द्र ने आचार्य रूप में काव्य के जो आदर्श, जो सिद्धान्त स्थिर किये है उन्हीं के अनुसार काव्य रचना की है और जैसा काव्य प्रणीत किया है वैसे ही काव्यादर्श तथा काव्यसिद्धान्त स्थिर किये हैं। वे व्यावहारिक समीक्षक है और सिद्धान्ती कवि । उनको अपनी दिशा है, लोक जीवन की दिशा । जनसाधारण के दैनिक जीवन का चित्रण उसके गुणों की प्रशसा तथा दोषों पर व्यंग्य करना, उसके परिष्कार के व्यावहारिक उपायो का सुझाव, जीवन के यथार्थ विविध रूपों को व्याप तथा विशाल पद्धति से चित्रित करने वाले रामायण महाभारत एव वृहत्कथा का सूक्ष्म रूपा- न्तर उपस्थित करना और जीवन को ही आधार बना कर काव्य के समाक्षा-सिद्धान्त की स्थापना करना आदि कार्य उन्हे साधारण लोकजीवन का कवि सिद्ध करते हैं। उनकी यह विशेषता सस्कृत साहित्य में इसलिये और अधिक महत्त्व पूर्ण बन गई है कि उसमें आदर्श-वादिता, असाधारण के प्रति उत्सुकता, आमुध्मिकता, कला- त्मकता आदि तत्व बड़ी प्रचुरता से संनिविष्ट हैं। संस्कृत के अर्वा- चीन भाग में ऐसे कवि हूँढ़ने पर भी संभवतः नहीं मिले जिनकी रचनाओं से उनके समय के समाज का पूरा परिचय प्राप्त हो सके। क्षेमेन्द्र काल की दृष्टि से अर्वाचीन होकर भी काव्य की दृष्टि से प्राचीन तथा सहज हैं। उनके काव्य अपने समय के सामाजिक जीवन के सजाव इतिहास हैं। यह तो इनके कवि का स्वरूप है। इसी जैसा असा- धारण उनका आचायत्त्व है। आचार्य रूप में उन्होंने तीन पुस्तकं लिखा है-'औचित्य विचार चर्चा' काव कठाभरण' और 'सुवृत्त तिलक' । पहला पुस्तक म सयत जोवन के मानदण्ड ( अ ) भा) । से काव्य समीक्षा का मार्ग स्थापित किया है। वह है औचित्य मार्ग। प्राचार्य ने धाणी के उन सभी रूपों में, जिन्हें काव्य समझा जाता है, औचित्य के र्शन किये हैं। औचित्य के अंतर्गत अलंकार, रस गुण, दोष, भाव, रीति आदि सब तत्वों को समेट लिया गया है। प्राचीन आचार्यों को ग्थापनाओं का खंडन नहीं किया उनका समावेश कर उन सबसे अधिक व्यापक तत्व औचित्य की स्थापना की है। यह तत्त्व जीवनगत है। जो वस्तु जिसके अनुरूप है, सहश है वह उसके उचित है। इसी का धर्म औचित्य है। इसका परीक्षण प्रत्यक्ष जीवन में करना चाहिये। इस प्रकार आचार्य क्षेमेन्द्र ने काव्य की समीक्षा में काव्य को जीवन के प्रकाश में, उसकी सापेक्षता में देखने का मार्ग खोला है। हमारे प्राचीन आदर्शवादी समीक्षा मार्गों के क्षेत्र में यह व्यावहारिक समीक्षा दृष्टि कम महत्व की नहीं है। दूसरी पुस्तक कवि शिक्षा पर लिखी गई है। इसमें क्षेमेन्द्र एक सधे हुये अध्यापक के रूप में विद्यमान हैं। काय कला का अभ्यास करने वालों के लिये सरल, उपयोगी उपाय इसमें बताये गये हैं। ये सौ उपाय अत्यन्त उपयोगी हैं और इनमें संयत जीवन की, अपनी प्राचीन माकृति की, समाजिक मान्यताओं और आदर्शों की स्पष्ट झलक मिलती है। इसके अतिरिक्त काव्य के स्वरूप आवश्यक तत्त्व, उसकी रचना के सरल व्यावहारिक उपाय भी बड़े अनुभव के आधार पर बताये हैं। इनकी उपयोगिता शाश्वत है तीसरी पुस्तक 'सुवृत्त-तिलक' में छन्द विचार है जो अनेक दृष्टियों से नवीन प्रयास है। एक तो इममें उन्हीं छन्दों पर विचार किया है जो साहित्य में व्यवहृत हैं। केशव कवि की भांति जो छन्दों की प्रदशनी लगाना चाहें उसकी बात और है नहीं तो काव्य में कुछ ही छन्दों का प्रयोग हुआ करता है। अतः सब छन्दों के अनावश्यक लक्षण उदाहरणों को सूची देना क्षेमेन्द्र जैसे व्यावहारिक व्यक्ति ने उपयोगी नहीं समझा। दूसरे छन्दों के भाव, सापेक्ष गुण दोष, उनके लिये शब्दचयन तथा उनकी प्रयोग विधि पर मौलिक विचार किया है। यह छन्द विचार का नया मार्ग है। सस्कृत के सभी छन्द प्रन्थों में इस पुस्तक का अपना विशिष्ट स्थान है। जो इसमें है वह अन्यत्र कहीं नहीं। .

- इस प्रकार समीक्षा-सिद्धान्त, कवि शिक्षा और छन्द विचार इन सीन प्रस्थानों पर मौलिक उद्भावनाये देकर क्षेमेन्द्र ने अपने आचार्य स्वरूप की स्थापना की है। वही प्रस्तुत पुस्तक 'श्राचार्य क्षेमेन्द्र' में दिया गया है। इसमें उक्त तीनो पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद है और तीनों प्रस्थानों के विकास तथा समीक्षा पर विस्तृत भूमिका दी है। हिन्दी जगत् के लिये इसकी उपयोगिता स्वतः सिद्ध है। भाषा सरल, सुपठ, बनाने का सजग प्रयास किया गया है। आशा है इससे साहित्य के प्रेमियों को लाभ होगा। लेखक उन सब विद्वानों का कृतज्ञ है जिनके परामर्श, सहायता आदि से इस पुस्तक के प्रणयन में लाभ उठाया गया है। पूज्य डा. सूर्यकान्त जी, अध्यक्ष संस्कृत विभाग हिन्दू विश्व विद्यालय का विशेष रूप से आभार नत हूँ जिसकी क्षेमेन्द्र विषयक रचना से प्रेरणा और सहायता दोनों मिली है। धर्मसमाज कालिज अलीगढ़ के प्रधा- नाचार्य आदरणीय वंशगोपाल जी किंगरन ने 'आर्य भारती के संरक्षक के नाते इस कार्य में जो सत्प्रेरणा दी है उसके लिये लेखक उनका कृतज्ञ है। पुस्तक के प्रकाशक प बद्रीप्रसाद जी भी धन्यवाद है जिनके प्रयत्न से पुस्तक प्रकाश में आ सकी है। के पात्र

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भूमिका. १-जीवनवृत्त क्षेमेन्द्र लोकिक प्रवृत्ति के कवि है। फलतः इनके काव्यों में अनेकत्र ऐसे सकेत मिलते है जिनसे इनके जीवनवृत्त पर प्रकाश पड़ता है, यद्यपि वे इतने पर्याप्त नहीं है कि इस विषय में इदमित्थम् कहकर कुछ निर्णय किया जा सके। 'कवि कण्ठाभरण' तथा 'औचित्य विचार चर्चा के अन्त मे कवि ने ग्रन्थ समाप्ति का समग श्रीमदनन्तराज नृपति का राज्यकाल बताया है। कल्हण की 'राजतरंगिणी' के अनुसार यह ईसवी सन् १०२८ से १०६३ तक है। 'वृहत्कथा मंजरी' में कवि ने अभिनव गुप्त को अपना साहित्य गुरु बताया है। उनकी उक्ति है कि 'ज्ञान के समुद्र विद्या विवृति के लेखक आचार्यप्रवर अभिनव गुप्त से उन्होने साहित्य । सुना था। 'श्रुत्वाभिनवगुप्ताख्यात् साहित्य वोधवारिधे । आचार्यशेखरमणेविद्या विवृति कारिणः ।।' इस श्लोक मे उल्लिखित 'विद्या विवृति' प्रत्यभिज्ञा दर्शन पर लिखी गई टीका है जो सन् १०११ में पूर्ण हुई थी। कविकण्ठाभरण के प्रारम्भ मे मत्र माधना की सार्थकता बताते हुए श्लेष द्वारा क्षेमेन्द्र ने संकेत किया है कि उन्हे कवित्व का लाभ अभिनव गुप्त से हुआ था। एता नम' सरस्वत्यै य क्रियामातकांजपेन् क्षेममैन्द्र स लभते भव्योभिनववाग्मवम् । अभिनव गुप्त का समय निश्चित रूप से ग्यारहवीं शताब्दी का प्रारम्भ है। क्षेमेन्द्र के पुत्र सोमदेव ने इनके ग्रन्थ 'अवदान कल्पलता' का प्रणयन सन् १०५२ में बताया है। इन सब के प्रामाण्य से वे ग्यारहवी शताब्दी के मध्यकाल के ठहरते हैं। गणना से इस तथ्य का भी. अनुमान किया जाता है कि. इन्होंने 'वहत्कथा मंजरी' सन् १०३७ में ... 'समय मातृका' १०५० मे नथा 'दशावतार चरित' १०६६ में लिखे थे।

1 ( २ ) 'दशावतार चरित' इनकी अन्तिम रचना है। अत: १०७० के लगभग इनका मृत्युकाल अनुमित होता है। इसी प्रकार सन् १०१४ मे अभिनव से साहित्य शिक्षा लेने वाले कवि की आयु यदि २५ वर्ष की भी मानली जाय तो के दसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक म सन् ६६० के लगभग उत्पन्न हुए थे। इन सब प्रमाणो से इनका जीवनकाल सन् ६० से १०६० तक तथा काव्य काल १०१५ से १०६६ तक स्थिर होता है। अपने परिवार का परिचय इन्होंने स्वयं दिया है। इनके पिता प्रकाशेन्द्र थे । वे काश्मीर में इतने प्रसिद्ध थे कि उस भूभाग का प्रकाश उन्हें कहा जाता था। उनका यज्ञानुष्ठान निरतर चलता रहता था । उन्होंने ब्रह्माजी का एक मन्दिर बनवाकर उममे षोडशमातृकाओ की प्रतिष्ठा की थी और उसी मन्दिर मे गौ, भूमि तण मृगचर्म का ब्राह्मणों को दान देते देते वे पंचत्व को प्राप्त हो गए थे। क्षेमेन्द्र के पितामह सिन्धु तथा प्रमितामह भोगेन्द्र थे। वृद्ध प्रपितामह नरेन्द्र थे जो जयापीड के कर्मचारी थे। भाई का नाम चक्रपाल था। वैसे तो क्षेमेन्द्र ने अपने को 'सर्व मनीषी शिष्य' कहा है जिससे प्रतीत होता है कि ये गुणग्रहण के लिए दूसरों के शिष्य बनने में अपनी हेठी नहीं समझते थे। अतः सम्मव है कि अनेक विशेषज्ञा को इन्होने गुरु माना हो। पर मुख्य रूप से तीन को इन्होंने गुरु कहा है-अभिनव गुप्त, गगक और सोमपाद । इनके पिता उदार तथा धनी थे। उनके वात्सल्य की छाया में क्षेमेन्द्र ने सुख-सौन्दर्य का जीवन बिताया था। अनेक प्रकार के लोगों से सपर्क प्राप्त किया था। वेश्या, लुहार, चमार, महाजन, शैव, वैष्णव, काश्मीरी, बङ्गाली आदि को बड़े निकट से इन्होंने देखा था। इसलिये जीवन के विषय में इन्हे बड़ा व्यापक, बहुमुखी अनुभव मिला । इनके समय में काश्मीर की सामाजिक दशा पतनोन्मुख थी। वह कवि की प्रतिभा पर इतना शुभ प्रभाव न डाल सकी कि वह प्रशंसक बन जाता। उसे तो समाज में स्थान स्थान पर छिद्र दिखाई दिये । इसलिये वह व्यंग्यों किवा यथार्थ के वर्णन और नीति के उपदेशों द्वारा उसके उत्थान को लक्ष्य बनाकर काव्य रचना करने लगा। बौद्ध धर्म में सामाजिक आदर्श उत्तम थे। इसलिए ग्यारहवीं शताब्दी में भी क्षेमेन्द्र ने शैव होकर 'बौद्धावदान कल्पलता' में भग- ।

। ( ३ ) वान् बुद्ध की प्रशसा की और 'दशावतार चरित' मे सबसे पहले उन्हे भगवान मानकर दश अवतारों में स्थान दिया। यह इनकी धार्मिक उदारता और सामाजिकता का साक्षी है। जीवन का यथार्थ बहुमुखी अथच व्यापक रूप इनके ज्ञानगोचर हुआ था। उसी को इन्होने अपनी रचना का विषय बनाया व्यास, वाल्मीकि, गुणाढ्य के ये बड़े प्रशसक थे। व्यास को तो अपना गुरु मानकर स्वय को 'ब्यासदास' कहा करते थे। इस श्रद्धा का कारण भी यही है कि ये सभी जीवन के यथार्थ द्रष्टा कवि हैं। २-रचनाएँ क्षमेन्द्र की छोटी बड़ी ३३ रचनाओ का पता लग चुका है । इनमे से .८ प्रकाशित है और १५ उनके प्रकाशित प्रथों में निर्दिष्ट हुई है । इन सब को चार भागों में बॉटा जा सकता है. १-पद्यात्मक सूक्ष्म रूपान्तर । २-~-उपदेशात्मक । ३-गीति संबधी। ४-फुटकल। इनमे से एक एक भाग की प्रत्येक रचना का सूक्ष्म परिचय - १-पद्यात्मक सूक्ष्म रूपान्तर इस भाग में ५ रचनाएँ आती हैं। 'रामायण मजरी', 'भारत मंजरी', 'वृहत्कथा मंजरी', 'दशावतार परित' तथा 'बौद्धावदान- कल्पलतिका'। इनका परिचय निम्न प्रकार से है :- (अ) रामायण मंजरी-यह वाल्मीकिकृत रामायण का पद्यों में किया सूक्ष्म रूप है। काव्य कला की दृष्टि से इसका महत्व बहुत अधिक नहीं है। पर ग्यारहवीं शताब्दी में रामायण का पाठ कितना और कैसा था-इसका परिचय इस ग्रंथ से भली भाँति मिल जाता है। (आ) भारत मंजरी- यह महाभारत का सूक्ष्म रूपान्तर है। इसमे भी काव्यत्व के दशन अधिक नहीं होते। पर मूल ग्रन्थ के तत्कालीन पाठ का साक्ष्य 'रामायण मंजरी' से भी अधिक इसमें प्राप्त होता है । क्षेमेन्द्र ने इसमें महाभारत की छोटी से छोटी घटनाओ sawantway ( ४ ) का भी उल्लेख किया है। अत रचना मूलग्रन्थ का सत्य प्रतिनिधि है। इसमें शांतिपर्व के ३४२-३५३ सर्गो के प्रतिपाद्य का किसी रूप में भी उल्लेख नहीं हुआ है। फलतः अनुमान होता है कि वह अश बाद में परिवर्धित हुआ है। (इ) वृहत्कथा मंजरो---यह गुणाढ्य की प्रसिद्ध 'वृहत्कथा' का सूक्ष्म रूपान्तर है। यह १६ लम्बकों में विभक्त है। रचना करते समय मूलमथ कवि के पास था-यह अनुमित होता है। पर पॉचवे लंबक के बाद उसने ग्रन्थ का अनुसरण छोड़ दिया है। वह स्वेच्छा से विस्तार या सकुचन करता गया है। ग्रन्थ में रोचकता का अभाव है। स्थान-स्थान पर कवि ने सालंकार शैली का आश्रयगा किया है पर उससे ग्रन्थ का सौन्दर्य अधिक नहीं बढ सका। (ई) दशावतार चरित--यहाँ विष्णु के दश अवतारो का वर्णन है। पुराण इसके उपजीव्य है। नवीनता इस बात में है कि राम और बुद्ध विष्णु के अवतार रूप में सर्व प्रथम वर्णित हुए है। है। इससे क्षेमेन्द्र के वैष्णव होने का पता चलता है । (उ) बौद्धावदान कल्पलता-यहाँ जातक कथाओ का संग्रह है। कवि को इसकी रचना की प्रेरणा सज्जनानंद, तक्क तथा वीरभद्र से प्राप्त हुई थी। इसमें कुल १०८ पल्लव है। कवि ने कृति को अधूरा ही छोड दिया था। बाद मे उनके पुत्र सोमदेव ने एक पल्लव और लिखकर इसे पूरा किया। ग्रंथ का रचना काल सन् १०१२ है। बौद्ध धर्म के प्रति कवि की उदार श्रद्धा का ग्रन्थ साक्षी है। २--उपदेशात्मक रचनायें इस भाग में इनकी सात रचनाये आती हैं जिनमें से चार मे साक्षात् रूप से उपदेश प्रदान किया गया है। तीन में दोषो पर व्यग्य है जिसका तात्पर्य उन्हे त्यागकर पवित्र जीवन की ओर संकेत करना है। इनका परिचय निम्न प्रकार से है.- ( क) चारुचर्या शतक-यह सौ अनुष्टुप छन्दों मे लिखी छोटी रचना है। इसमें नीति और विनय की शिक्षा दी गई है। (ख) सेव्यसेवकोपदेश - जैसा कि शीर्षक से प्रतीत होता है रचना - ( ५ ) में सेवक तथा स्वामी के सम्बन्धो को स्थायी एवं मधुर बनाने के लिए व्यवहारनीति की शिक्षा दी गई है। इसमें ६१ पद्य हैं। (ग) दर्पदलन—यह अपेक्षाकृत बड़ी रचना है। इसका विषय है अभिमान की निन्दा । इसमे सात विचारक अध्याय हैं। अभिमान के सात कारणो की कल्पना कर प्रत्येक पर एक-एक (अध्याय) लिखा है। ये कारण है-आभिजात्य, धन, विद्या, सौन्दर्य वीरता दान तथा । (घ) चतुर्वर्ग संग्रह -इसमें धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का संतुलित वर्णन कया गया है। काम का वर्णन अपेक्षाकृत अधिक सफल हुआ है। (ङ) कलाविलास-क्षेमेन्द्र की यह सर्वश्रेष्ठ रचना समझी जाती है। कथा नायक मूलदेव है जो अपने शिष्य चन्द्रगुप्त को विविध कलाओ का रहस्य समझाता है। यही ग्रन्थ का ढॉचा है। दंभ तीन प्रकार के है। बक-दंभ, कूर्मज दंभ तथा मार्जार दंभ ' इनके बडे रोचक वर्णन हुए है। दम के अनेक रूप है-शुचिदभ, शमदंभ, स्नानकदंभ, समाधिदभ आदि । पर ये सब निस्पृहदंभ की तुलना नहीं कर सकते । मुण्डी, जटिली, नग्न, छत्री, दण्डी, कषायधारी, भस्म रमाये जोगी, ये सब दंभ के रूप हैं। इसके पिता लोभ, माता माया, कूट सहोदर, गृहिणी कुटिलता और पुत्र हुकार है। विधाता ने सृष्टि की रचनाकर जब प्राणियों को निरालंब एवं धनादि के संभोग से वाचत देखा तो विभूति के लिए दंभ की सृष्टि की। उसने खड़े-खडे ही ऐसा तप किया कि ब्रह्मा जी आश्चय में पड़ गये, वशिष्ठ लज्जित हुये, कुत्स कुत्सित, नारद निराहत, जमदग्नि भग्नवदन, विश्वामित्र त्रस्त आदि। सोच विचार कर ब्रह्मा जी ने उसे अपनी गोद में ही स्थान दिया। वह बडे संकोच के साथ हाथ से पानी छिड़क कर वहाँ बैठा और ब्रह्मा जी से बोला कि आप जोर से न बोलना, यदि बोलना ही हो तो मुंह के आगे हाथ लगाकर बोलिये जिससे आपके मुंह की सास का स्पर्श मुझे न हो। इस पर ब्रह्मा जी हेसे और उसे ससार का प्रत्येक स्थल निवासार्थ दे दिया। यह वचको का कल्पवृक्ष है। विष्णु ने वामन के दंभ से ही तीनों लोको का आक्रमण किया । था।

। । लोभ का घर व्यवसाय है। इसके प्रभाव में शुक्राचार्य जैसे ज्ञानी भी आ जाते है। कपटाचरण लोभ के ही कारण होता है। निर्लोभ व्यक्ति कभी बंचना नहीं करता। कवि ने काम के वर्णन प्रसंग में इन्द्रियासक्त कामुकों, चरित्रहीन स्त्रियो, वेश्याओ आदि के वंचक चरित्र पर बड़े तीखे व्यग्य कसे हैं। राजदरबारी कायस्थ भी व्यंग प्रक्षेप के लक्ष्य बने हैं। वे विष्णु के अवतार हैं क्योकि १६ कलापूर्ण हैं। मद के प्रसंग में शराबियो के खाके भी खूब खिचे हैं। वे मद में अपना मूत्र तक पी जाते है, अपनी पत्नी के सतीत्व का भंग आंखो से देखकर भी नहीं लज्जित होते। अश्विनीकुमारो की कृपा से युवा बने च्यवन ऋषि ने उन्हे जब यज्ञभागी बनाना चाहा और इन्द्र ने इसका निषेध किया तो ऋषि ने कृत्यारूप मद राक्षस को सृष्टि की। वही फिर स्त्री, द्यूत, पान और मृगया में प्रविष्ट हो गया। दंभ की उत्पत्ति और उसके निवास स्थानों को सूची बड़ी रोचक है। गवैये तथा कवि जी भी सुबह के कमाये को शाम तक खर्च कर खाली हाथ सोने वाले जीव हैं, जिनका कभी पेट भरता ही नहीं। 'हा-हा' करने से रात का चोर तो भाग जाता है पर ये दिन के चोर गवैये 'हा-हा' करके ही चुरा लेजाते हैं। नट, नर्तक, कुशीलव, चारण और विट ये ऐश्वर्य की खेती के लिए टिड्डी है। इनसे सपत्ति की रक्षा करनी चाहिये। गवैयो की जो संमिलित ध्वनि उठती है वह मानों अस्थान दत्त लक्ष्मी का चीत्कार है। सुनार चौसठ कला पूर्ण होते हैं। ये मेरु पर्वत के चूहे हैं जो पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। अन्त मे कवि ने उन साधनों की शिक्षा दी है जिनसे वे बिना पापाचरण के आजीविका कमा सकते हैं। क्षेमेन्द्र का अन्त मे उपदेश है कि वचकमाया जाननी तो चाहिये पर उसका आचरण नहीं करना चाहिये। (च) देशोपदेश-यह आठ उपदेशो मे विभक्त वर्णनात्मक रचना है। इसमे काश्मीर देश की दुबेलताओ का चित्रण है। उन पर व्यग्य कसना कवि का लक्ष्य है। पर कृति अधिक सफल नहीं कही जा सकती। व्यग्य कहीं भद्दे हो गये हैं। तीक्ष्णता भी उनमें नहीं है। विषय हैं-कजूस, वेश्या, कुट्टिनियाँ, विट, काश्मीर में पढने के लिए आया हुआ बगाली विद्यार्थी, बूढा वर, कवि, शेखीखोर, वैयाकरण आदि आदि । कला विलास इस दिशा का सफल प्रयास है।

(छ) नर्ममाला -देशोपदेश की भॉति यह भी व्यंग्यात्मक रचना है। इसका प्रधान विषय है धूते कायस्थ । उसके दंभ, रिश्वतखोरा, चालाकी आदि का साक्षेप वर्णन है। उसके व्यक्तिगत जीवनके कुत्सित रूप का भी विस्तार से चित्रण हुआ है। इस विषय मे कवि पक्षपाती सा प्रतीत होता है। बाद में नौसिखिया वैद्य, ज्योतिषी, गुरु आदि के भी साक्षेप वर्णन है। ३ रीति ग्रथ-- रीति ग्रन्थ क्षेमेन्द्र के तीन प्राप्त हैं-'कवि कण्ठाभरण', 'औचित्य विचार चर्चा' और 'सुवृत्ततिलक' । इनमे से पहला कवि शिक्षा पर, दूसरा काव्यालोचन के औचित्य मार्ग की स्थापना पर तथा तीसरा छन्दी पर लिखा गया ग्रन्थ है। इनमें सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण है औचित्य विचार चर्चा। प्रत्येक का सूक्ष्म परिचय दिया जाता है। (क) कवि कण्ठाभरण-यह ५५ श्लोककारिकाओ मे लिखा पॉच सन्धियो का छोटा ग्रन्थ है। अकवि को कवि बनाने की शिक्षा इसमे दी गई है। पहली सन्धि में तीन प्रकार के शिक्षार्थी-अल्प प्रयत्न साध्य, कष्ट साध्य तथा असाध्य बताये गए है। इनमें पहले दो को 'कवि रुचि प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए' यह बताकर असाध्य को अनुपदेश्य कहा है। दूसरी सन्धि में काव्य रचना के कुछ ब्यावहारिक अभ्यास बताकर सौ उपायों का निर्देश किया है जो कवि को कवि बनने के लिए करने चाहिए। तीसरी सन्धि मे कविता में चमत्कार लाने का उपदेश है। चमत्कार को काव्य का आवश्यक तत्व बता कर उसके भेदो का सोदाहरण परिगणन किया गया है। चौथी संधि गुण-दोष-विभाग पर लिखी गई है। काव्य के इस अधिकरण को.सरल तथा सुक्ष्म बनाने की क्षेमेन्द्र की पद्धति अत्यन्त प्रशंसनीय है। पाँचवीं सन्धि मे कवि के लिए लोक शास्त्र को विविध वस्तुओं का परिचय प्राप्त करने की आवश्यकता बताकर प्रन्थ समाप्त कर दिया है। कवि शिक्षा जैसे व्यापक विषय पर इस प्रकार का सरल, सुघटित व्यावहारिक ग्रन्थ लिखना आचाय की परिष्कृत एवं निभ्रांत बुद्धि का परिचायक है। (ख) औचित्य विचार चर्चा-औचित्य को काव्य का आत्म- -- HAR (८) तत्त्व मानकर लिखा गया यह समीक्षा ग्रन्थ है। इसके अनुसार औचित्य रस, अलकार आदि सभी के मूल में अन्तर्व्याप्त है। ऐसे २७ काव्यस्थान गिनाये है जिनमे औचित्य अनौचित्य की परीक्षा की गई है। कुछ और भी काव्याश शेष रह जाते है जिनमें औचित्य की परीक्षा होनी चाहिए पर उन्हे अपरिमेय समझ कर इत्यादि में छोड़ दिया है। एक-एक स्थान का एक-एक कारिको से उल्लेख हुआ है। सर्वत्र औचित्य तथा उसके अभाव के दो-दो उदाहरण दिये गए हैं। उदाहरण देने में क्षेमेन्द्र इतने निभ्रांत तथा साहसी है कि कालिदास जैसे महाकवियो के पद्य भी अनौचित्य के उदाहरण बनाये हैं, पर उदार इतने हैं कि अपने दोष दरसाने में भी नहीं चूकते । - (ग) सुवृत्ततिलक यह छन्द शास्त्र पर लिखा गया मूल्यवान ग्रन्थ है। तीन विन्यासों में यह विभक्त है। पहले में वृत्तावचय अर्थात् छन्दो का सग्रह है। दूसरे में गुणदोषो का वर्णन तथा तीसरे में छन्द प्रयोग का विवेचन है। अन्त के दोनो अध्यायो में छन्दों के सफल प्रयोक्ता कवियों के नामोल्लेख और रस अवस्था तथा वस्तु के अनुसार छन्दो के चुनाव का बड़ा मार्मिक विचार किया गया है। छन्दोविज्ञान पर इस प्रकार का वैज्ञानिक विचार-प्रयास अन्यत्र नहीं मिलता। ४-फुटकल रचनायें- तीन छोटी रचनायें इस विभाग मे आती हैं। इनमें से एक का कर्तृत्व संदिग्ध है। शेष दो अत्यत लघु काम हैं। विवरण इस प्रकार है। (क) लोक प्रकाश कोष--यह क्षेमेन्द्र की संदिग्ध रचना है। वैबर ने इसे क्षेमेन्द्र की कृति नहीं माना। दूसरी ओर बहुलर ने सबल भाषा में इसे उन्हीं की रचना सिद्ध किया है। प्रथ में व्यापारियो के हुण्डी परचों का परिचय, काश्मीरी अधिकारियों की उपाधियाँ तथा वहाँ के परगने आदि के नाम दिये हैं। काश्मीर देश के भूगोल, शासन तथा व्यापार सम्बन्धी विवरण बड़े ज्ञानवधक है (ख) नीति कल्पतरु–यह व्यास के नीतिपद्यों पर लिखी गई टीका है।

܀ meam (ग) व्यासाष्टक-यह व्यास की स्तुति में लिखे गये आठ श्लोकों का संग्रह है। रचना 'भारत-मंजसे' का ही अङ्ग प्रतीत होती है। ऊपर बताये गए प्रथो के अतिरिक्त १४ रचनायें ऐसी हैं जिनका नामोल्लेख क्षेमेन्द्र ने स्वय अपने प्रथो में किया है। एक का उल्लेख राजतरगिणी मे हुआ है। इस प्रकार १५ रचनायें निश्चित रूप से क्षेमेन्द्र की अनुमित होती है जो अब तक प्रकाश में नहीं आई। प०शिवदत्त जी ने 'हस्तिप्रकाश' ग्रंथ को भी क्षेमेन्द्र कृत माना है। इसी प्रकार बहुलर ने 'स्पंदनिर्णय' एवं 'पदसंदोह' को इनका कहा है। इन तीनो के विषय मे कोई निर्णय-जनक तर्क नहीं मिलता। अप्रकाशित रचनाओ के संकेत निम्न प्रकार से है :- क-कवि कण्ठाभरण में उल्लिखित कृतियाँ- (१) शशिवंश महाकाव्य, (२) पद्य कादम्बरी, (३) चित्र भारत नाटक, (४) लावण्य मंजरी, (५) कनक जानको, (६) मुक्तावली तथा (७) अमृत तरंग महाकाव्य । -औचित्य विचार चर्चा में उल्लिखित कृत्तियाँ- () विनयवल्ली, (६) मुनिमत मीमांसा, (१०) नीतिलता, (११) अवसर सार, (१२) ललितरत्नमाला, (१३) और कवि कर्णिका। ग-सुवृत्त तिलक की उल्लिखित रखना- (१४) पवन पंचाशिका, घ-राजतरगिणी की उल्लिखित रचना--- (१५) नृपावली या राजावली। इस प्रकार १६ पथ प्रकाशित तथा १५ अप्रकाशित सब मिलकर ३४ रचनाये क्षेमेन्द्र कृत सिद्ध होती है। रचनाओ की संख्या तो उन्हे महान् कृती सिद्ध करती ही है। रचनाओ के वर्ण्य विषय इतने विविध तथा अछूते है कि कवि की बहुवित् प्रतिभा पर पाठक को आश्चर्य होता है। क्षेमेन्द्र यथार्थ जीवन के कवि है। जिस प्रकार जीवन विविध है उसी प्रकार कवि के वर्ण्य विविध है। इन सब के मूल मे ऐहिक जीवन का परिष्कार कवि का अभिप्रेत भाव है जो उनकी सदाशयता को प्रमाणित करता है। लोक जीवन के दुर्बल रूप का वर्णन वे वर्णन के लिए नहीं करते, परिष्कार की भावना से करते हैं। इसीलिए जीवन की दुर्बलताओ पर व्यंग्य कसकर स्वच्छता की ओर संकेत करते हुए ये सर्वत्र प्रतीत होते हैं। इन्होंने काव्य । - रचना के लिए जिस क्षेत्र को अपनाया है वह श्रामुष्मिकताप्रधान संस्कृत वाङमय के लिये नन्नीन है। इसीलिये कीथ जैसे विद्वान् इनकी काव्य प्रतिभा में बीसवीं शताब्दी की सी आधुनिकता के दर्शन करते हैं। ३-व्यक्तित्व आचाय क्षेमेन्द्र जैसे उच्चकोटि के कवि हैं वैसे ही वे श्रेष्ठ आचार्य हैं। प्राय. देखा जाता है कि व्यक्तित्व के ये दो पक्ष साथ- साथ मिलकर नहीं चल पाते। कवित्व के उत्कर्ष से आचार्यता शिथिल हो जाती है। कवि निरंकुश होने लगता है। इसी प्रकार आचार्यपन भावुकता को सुखाकर नीरस विवेक की वृद्धि करता है। हिन्दी साहित्य में इस प्रकार के उदाहरम अनेकों हैं। मतिराम जितने सहज सरल कवि हैं उतने प्रौढ़ आचार्य नहीं। केशव का आचार्यत्व उत्कृष्ट है, कवित्व निकृष्ट । पर क्षेमेन्द्र में ये दोनो गुण पूर्ण प्रौढ़ है। संस्कृत साहित्य में इसी प्रकार के दूसरे कवि पंडितराज जगन्नाथ हैं। क्षेमेन्द्र का कवितत्व अधिक सरस एवं ललित तो नहीं कहा जा सकता, पर व्यापक है। अनेक विषयो पर इन्होने अपनी लेखनी उठाई है और सफलता प्राप्त की है। संस्कृत साहित्य में इतना विविध लेखी दूसरा कवि नहीं मिलता। काव्य की शैली पुराणों की सी इति वृत्तात्मक है। यत्रतत्र अलंकारों के सफल प्रयोग मिलते हैं। इनका आचार्यत्व और कवित्व परस्पर सम्बद्ध भी है। कवि के लिए जिन जिन श्रादों, विषयों आदि का संकेत इन्होंने किया है प्रायः उन्हीं के अनुसार रचनाये की है। रीति सम्बन्धी इनकी दो पुस्तकें प्राप्त हैं-कविकण्ठाभरण और औचित्य विचार चर्चा । पहली में कवि शिक्षा है दूसरे में एक मार्ग की स्थापना का प्रयत्न है। कवि शिक्षा के अन्तर्गत जिन आदर्शो का इन्होने संकेत किया है, उन सभी का पालन प्रायः अपनी रचनाओं में इन्होने किया है। कवि के लिए इन्होंने (१) लोकाचारपरिज्ञान-लोक जीवन का परिचय, (२) उपदेश विशेषोक्ति-स्थान-स्थान पर उपदेश प्रद उक्तियाँ कहना, (३) इतिहासानुसरण-इतिहास को मानना, (४) सर्वसुरस्तुति में साम्यभाव-सब देवताओं की समानभाव से स्तुति करना, (५) विवि- क्ताख्यायिका रस-उत्कृष्ट कथा साहित्य में रुचि रखना, (६) नाटका- भिनयप्रेक्षा-नाटको के अभिनय देखने की रुचि, (७) काव्यांगविद्या- m- १-समय मातृका धिगम-रीतिशास्त्र का ज्ञान, (6) प्रारब्ध काव्य निर्वाह-काव्य का प्रारम्भ कर समाप्त कर लेने का स्वभाव आदि गुण बताये हैं। एक- एक गुण के अनुसार कवि की रचनाएँ प्राप्त होती हैं। इसका विवरण निम्न प्रकार से है:- १-लोकाचारपरिज्ञान (वैश्याओ के व्यवहार का वर्णन ) २-कला विलास (विविध व्यवसायो का वर्णन ) २-उपदेशविशेषोक्ति १-दर्पदलन (मिथ्याभिमान की निन्दा ) २-सेव्यसेवकोपदेश (स्वामी सेवक के साथ संबंधो का निर्देश) ३-चारुचर्याशतक ( श्रेष्ठ दिनचर्या का वर्णन ) ३-इतिहासानुसरण १-भारत मंजरी (महा भारत का सूक्ष्म रूपान्तर) २-रामायण मंजरी (रामायण का सूक्ष्म रूपांतर ) ४-सर्वसुरस्तुति में साम्य- १-दशावतार चरित भाव (दश अवतारों का वर्णन ) '५-विविक्ताख्यायिका रस १-पद्य कादम्बरी (बाणकृत कादम्बरी का पद्यबद्ध अनुवाद) ६-अभिनय प्रियता १-चित्र भारत नाटक (महाभारत की कथा का नाटक रूप ) ७-काव्याग विद्या का १-कविकण्ठाभरण अधिगम (कवि शिक्षा का वृहत् ग्रन्थ ) २-औचित्यविचार चर्चा (औचित्य मार्ग की स्थापना) ८-प्रारब्ध काव्य निर्वाह १-किसी भी रचना को कवि ने अपूर्ण नहीं छोड़ा है । सभी पूर्ण हैं। औचित्य विचार चर्चा के अनुसार काव्य का आत्मतत्व औचित्य है। इसके बिना अलंकार, रस, गुण, आदि अकिचित्कर है। वे तभी काव्य के विधायकतत्व हो सकते हैं जब कि उनके मूल ।

में औचित्य वर्तमान हो । इस ग्रन्थमें क्षेमेन्द्र का समीक्षक रूप प्रौढ़ एवं गंभीर प्रतीत होता है। वह ध्वनि, रस, अलंकार आदि अन्य काव्य मार्गों के प्रवर्तक आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त तथा दण्डी आदि के समकक्ष ठहरते हैं। यद्यपि वे सर्वथा मौलिक नहीं है। इस ओर भी दण्डी आनदवर्धन आदि ने स्पष्ट संकेत किये है। पर उसे इतना सार्व मौम महत्व किसी ने प्रदान नहीं किया कि वह काव्य कला के समस्त तत्त्वो में ब्यापक अथ मूलानुविष्ट प्रतीत हो। यह आचार्य क्षेमेन्द्र की देन है। दूसरे कवियो की रचनाओ का समादर, समीक्षण तथा विवेचन, और आचार्यों के मतो को स्वीकार करते हुये अपने मत का अतिशय प्रकट करना आदि गुणो की क्षेमेन्द्र ने प्रशंसा की है। इन सभी के दर्शन उनके निबन्धो मे होते हैं। कवि ने अपने समकालीन तथा पूर्ववर्ती कवियों के उदाहरण निष्पक्ष होकर दिये हैं। सभी में यथा संभव गुण अथवा दोषो का सकेत किया है। यहाँ तक है कि अपनी स्वय की कविताओं मे भी दोष दिखाने में भी इन्हे संकोच नहीं हुआ । इससे क्षेमेन्द्र की विशाल उदारता, महाशयता और कला प्रियता का पता चलता है। क्षेमेन्द्र ब्यास जी के परम भक्त हैं। इतने कि अपना उपनाम 'व्यासदास' रखते हैं। उन्होंने व्यास को 'भुवनोपजीव्य' (कवि मात्र की प्रेरणा का स्रोत) कहा है। इसी श्रद्धा से प्रेरित होकर 'भारत मंजरी' का प्रणयन हुआ था। व्यास के कवित्व में जीवन का जैसा बहुमुखी व्यापक रूप व्यक्त हुआ है वैसा ही कुछ कुछ इनकी रचनाओं में मिलता है। वृहत्कथा और रामायण के सूक्ष्म रूपान्तर उपस्थित करने में भी यही प्रेरणा काम करती दीखती है। इससे क्षेमेन्द्र का व्यवहारिक विवेकी व्यक्तित्व अनुमित हो जाता है। छन्दों विधान पर इनका सुवृत्त तिलक है जो अपने क्षेत्र में अद्वितीय कृति है । अभिव्यंग्य भावो के संबंध में छंदों का विचार, उनके गुण दोषों का विवेचन, विशिष्ट कवियो के प्रिय छंद आदि का इसमें उल्लेख है। छदों का इतनी व्यापकता से विचार अन्यत्र नहीं मिलता। औचित्य विचार चर्चा में जो सत्ताईस प्रकार के औचित्य-स्थल दिखाकर संकेत किया गया है कि इस प्रकार के अनेक स्थल और भी हो सकते है-उसका प्रत्यक्ष प्रमाण 'सुवृत्त तिलक' है जिसे एक नाम से 'वृत्तौचित्य' कहा जा सकता है।

४--सिद्धान्त विचार (अ) औचित्य संस्कृत साहित्य के समीक्षा शास्त्र की बड़ी लम्बी परम्परा है। उसका इतिहास भी लम्बा है । यहाँ आचार्यों की दृष्टि काव्य के स्वरूप को पहचानने तथा उसका यथामति विश्लेषण करने पर रही है। इसलिए प्रायः सभी प्राचार्यों ने समीक्षा का प्रारम्भ काध्य के लक्षण तथा उसके आत्मतत्व के निर्णय से किया है। इनमें सबसे पूर्व अलंकारवादी आते हैं जो यह अनुभव करते थे कि काव्य की आत्मा चमत्कार तत्व है और उसका काव्य में स्वरूप अलंकार है। इसलिए उनके मत से काव्य के सभी गुण अलंकार के अन्तर्गत थे। इस संप्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य हैं दण्डी, भामह और रुय्यक । वामन का मत रीति अर्थात शैली को काव्य का सर्वस्व मानकर प्रचलित हुआ। इसके अनन्तर रस सिद्धान्त, जो बहुत पहले भरत मुनि द्वारा नाटक के प्रसंग में स्थापित हो चुका था, पुनः दृश्य एवं श्रव्य दोनों काव्यो की आत्मा माना जाने लगा। इस सिद्धान्त को पुनः प्रतिष्ठा प्रदान करने बाले प्राचार्य साहित्यिक होने के अतिरिक्त प्रौढ़ दार्शनिक थे। उनके द्वारा विषय का प्रतिपादन ऐसा सागोपांग एवं गम्भीर पद्धति से किया गया कि उसके अनन्तर दूसरा कोई मार्ग जम न सका। अभिनवगुप्त दर्शन के महापण्डित थे मम्मट महावैयाकरण थे। विश्वनाथ भी न्याय के तत्वज्ञ थे। अत: इन्होने रसमार्ग को बड़ी दृढ़ता प्रदान की। आनन्द वर्धन ने ध्वनि को काव्य का जीवन तत्व मानकर ध्वन्यालोक ग्रन्थ रचा था पर उन्होंने भी ध्वन्य पदार्थों में श्रेष्ठ रस को ही माना। अत: वे रसमार्ग के अनुयायी ही समझे जाने चाहिये । अभिनव गुप्त ने इसीलिए ध्वन्यालोक पर टीका लिखी थी। आचार्य कुतक ने उक्ति वक्रता को काव्य का मूल तत्व मानकर वक्रोक्ति मार्ग की स्थापना की। ये भी आलंकारिक चमत्कार के पक्षपाती थे। इसी पर उनकी विशेष दृष्टि रही है। अतः वे अलंकार मार्ग को सर्वथा त्याग कर काव्य की समीक्षा करने वाले आचाय नहीं कहे जा सकते । फलतः भारतीय समीक्षा के स्वतन्त्र एवं परि- निष्ठित मार्म जिन्हें कहा जा सकता है वे केवल तीन हैं- अलंकार - । मार्ग, रीति मार्ग और रसमार्ग। इनमें भी अनुवर्तन केवल पहले और तीसरे दो मार्गों का ही विशेष रहा। रीति के अनुवर्तक उसके प्रवर्तक ही रहे। ऊपर जिनका निर्देश हुआ है वे पाँचो मार्ग ईसा की १० वीं शताब्दी तक प्रतिष्ठापित हो चुके थे। उनका अनुवर्तन आचार्य तथा कवि करने लगे थे। आचार्य क्षेमेन्द्र का कार्यकाल इसी समय श्राया। उन्होने अपने काव्यों में जीवन के यथार्थ रूप की व्याख्या की है। अतः यह स्वाभाविक था कि उनकी अभिरुचि पहले के आदर्श- वादी समीक्षा मार्गो से तृप्त न रही। उन्होंने काव्य का मूल्याकन भी यथार्थ दृष्टि से करने का प्रयास किया। काव्यों में उन्होंने समाज की दुर्बलताओं, अनौचित्यों पर व्यग्य कसे है और पवित्र औचित्य- पूर्ण जीवन की और निश्चित संकेत किये है। इसलिए उनकी विवेक- शील मनीषा ने यह मानकर कि काव्य जीवन का ही प्रतिरूप और जिस प्रकार औचित्य पूर्ण जीवन श्रेष्ठ है उसी प्रकार काव्य भी औचित्यपूर्ण ही श्रेष्ठ है-यह सिद्धान्तित किया कि औचित्य काव्य का स्थिर जीवित है भले ही काव्य रससिद्ध हो। 'औचित्य रस- सिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्' स्पष्ट है कि उन्होंने पुरानी परम्पराओं को दूर रखकर नए सिरे से काव्य का विचार किया था। औचित्य तत्व की काव्य में मान्यता तो पहले प्राचार्यों ने भी की थी। पर उसे वे काव्य का एक साधारण सांयोगिक तत्व मानते थे, प्रमुख नहीं। क्षेमेन्द्र ने उसे काव्य के क्षेत्र में आत्म पदवी प्रदान की है। इसलिए इसे मागता प्रदान करने तथा काव्य का यथार्थ दृष्टि से अालोचन करने का श्रेय इन्हीं को है। अब हम पुराने आचार्यों के ग्रन्थो मे औचित्यतत्व का पता लगाते हुये इस सिद्धान्त की स्पष्ट रूप रेखा व्यक्त करने का प्रयत्न करेंगे। भरत-आचार्य भरत ने नाटक साहित्य का विचार किया है। उसे लोक वृत्त का अनुकरण बताते हुए लोक को ही अभिनय के लिए सर्व प्रमुख प्रमाण बताया है। लोक के स्वरूप-रूप, वेष, अवस्था, क्रिया आदि को एकरूप तथा अपरिवर्ती नहीं कह सकत । इसलिये जो जिसके सदृश हो, जब जैसा होता हो, वैसा ही अनुकरण करना चाहिये, यह साराश भरत के नियम का निकलता है। इतना तो स्पष्ट है कि उन्होंने नाटक का निकटतम सम्पक लोक से किया है। उसे परखने के लिए तथा उसके आदर्श के रूप में लोक को ही एक मात्र प्रमाण समझा है। 'जो लोक सिद्ध है वह सब अर्थों में सिद्ध है और नाट्य का जन्म लोक के स्वभाव से हुआ है अतः नाट्य प्रयोग मे लोक ही प्रमाण है, प्रजा का शील एक-सा नहीं होता। नाट्य की प्रतिष्ठा शील में ही है। इसलिये नाट्य का प्रयोग करने वालो को लोक का ही प्रमाण मानना चाहिए। इसीलिये पात्रों के अनुसार भाषा, वेष आदि का उन्होने निश्चय किया है। जो जैसा पात्र हो उसी के उचित उसकी भाषा, वेष, चरित्र आदि होने चाहिए। उनकी स्पष्ट उक्ति है कि 'वय के अनुरूप वेष होना चाहिये, वेष के अनुरूप चलना-फिरना; चलने-फिरने के अनुरूप पाठ्य हो तथा पाठ्य के अनुरूप अभिनय हो।' वयोऽनुरूपः प्रथमस्तु वेष., वेषानुरूपश्च गति प्रचारः । गति प्रचारानुगतं च पाठ्यम्, पाठ्यानुरूपोऽभिनयश्चकार्य. वेष के विषय में और स्पष्ट करते हुए उन्होने कहा है कि देश के अनुसार यदि वेष न हो तो वह शोभाजनक नहीं होगा। यदि मेखला गले मे पहनी जाय तो उससे हँसी ही होगी। प्रदेशजोहि वेषस्तु न शोभा जनयिष्यति । । मेखलारसि बंधेच हास्यायैवोपजायते । इसी विचार को क्षेमेन्द्र ने और अधिक बढ़ाकर कहा है कि- 'कंठ में मेखला, नितंबों पर चंचलहार, हाथों मे नूपुर तथा चरणों में केयूर पहनने से, इसी प्रकार प्रबल पर शौर्य तथा शत्रु पर करुणा दिखाने से किसकी हँसी न होगी। अलंकार और गुण बिना औचित्य के रुचिकर नहीं बनते।' कराठे मेखलया नितब फलके तारेण हारेण वा, पाणौ नूपुर बंधनेन चरणे केयूरपाशेनं वा। शोर्येण प्रणते रिपौ करुणया नायान्ति के हास्यताम् औचित्येन बिना रुचिं न तनुते नालंकृतिर्नोगुणाः। इससे स्पष्ट है कि भरत ने नाट्य के प्रसंग में औचित्य का पर्याप्त आदर किया है। नाट्यशास्त्र सबसे पहला समीक्षा ग्रन्थ है। १-नाट्य शास्त्र अध्याय २६ श्लोक ११३, ११६ । २-बही १४ । ६८ Mana- - वहीं पर औचित्य का इस रूप में समादर सिद्ध करता है कि यह तत्त्व यहाँ के काव्यालोचको की दृष्टि मे पहले से ही रहा है। दण्डी-आचार्य दण्डी ने अमिधा से तो नहीं पर व्यंजना से यह व्यक्त किया है कि काव्य में औचित्य का स्थान है। उपमा के दोषों के प्रसग में उन्हाने बताया है कि यदि धीमान अर्थात सहृदयों का उद्वेग न हो तो उपमान उपमेय के लिंग और वचनों का भिन्न रूप होना अथवा उनका एक की अपेक्षा दुसरे का हीन किंवा अधिक होना कोई दोष नहीं। नलिंग वचने भिन्ने न हीनाधिकतापि वा। उपमादूषणायालम् यत्रोद्वःगो न धीमताम् ।। इससे यही व्यक्त होता है कि दोष के हाने न होने का विनि- गमक सहृदयो का उद्वेग है। स्पष्ट है कि वह अनौचित्य से ही होता है। एक दूसरे स्थान पर उन्होने गुण शब्द का अर्थ औचित्य किया है। 'अत्रत्यं गुणपदम् औचित्य परम् ।' इसके आधार पर पहली कारिका में भी आचार्य का संकेत औचित्य की ओर है-यह कहा जा सकता है। इस प्रकार असाक्षात् पद्धति से दण्डी ने काव्य में औचित्य को स्वीकारा है। आनंद वर्धन-आनन्द वर्धन ने अपेक्षाकृत अधिक स्पष्टता एवं विस्तार के साथ इसका प्रतिपादन किया है। कविता के उन्होंने दो प्रकार के दोष बताये हैं-व्युत्पत्ति (ज्ञान ) के न होने से तथा प्रतिभा के न होने से। इनमें पहला साधारण और आहार्य है। वह प्रतिभा के बल पर छिप भी सकता है। इसका उदाहरण देते हुए उन्होने बताया है कि कालिदास ने शिव पार्वती का जो शृङ्गार वर्णन मानवीय भूमि पर किया है वह परम्परा की अवहेलना करने से अव्युत्पत्ति कृत दोष है। पर उनके वर्णन मे इतनी चारुता तथा स्वाभाविकता है कि वह दोष नहीं प्रतीत होता। प्रतिभा के चमत्कार ने दोष को छिपा दिया। फिर प्रश्न उठता है कि किसी शैली के गुणयुक्त या दोषयुक्त होने का निर्णय किस आधार पर किया जाय उसका विनिगमक क्या हो ? इसके उत्तर मे आचार्य ने बताया है कि वक्ता और बौद्धव्य का औचित्य इसका नियामक है।' १-ध्वन्यालोक ३।५ १ इसके अतिरिक्त विषय के अनुसार शैली का नियमन करते हुए एक दूसरे स्थल पर आनंदवर्धन ने स्पष्ट रूप से रसगत औचित्य का प्रतिपादन किया है। उनका कहना है कि 'विषय सम्बन्धी औचित्य भी शैली का नियंत्रण करना है। निन्न-भिन्न प्रकार के काव्यों मे वह भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। जिस गद्य मे छन्दादि का कोई नियम नहीं होता वहाँ भी वह औचित्य शैली का नियामक बनता है अथवा यो कहना चाहिये कि श्रेष्ठ रचना में सर्वत्र रसगत औचित्य का समाश्रयण होता है। विषय के कारण औचित्य में कभी कुछ भेद श्रा जाता है। अन्त में इस प्रसंग का सारांश देते हुए आचार्य ने फिर कहा है कि 'अनौचित्य के अतिरिक्त रसभंग होने का और कोई कारण नहीं है। औचित्य का अनुसरण करना ही रस योजना का परम रहस्य है।" मुख्य प्रति- इन्होने छः प्रकार के औचित्यो का वर्णन किया है :-रसौचित्य, अलंकारौचित्य, गुणौचित्य, संघटनौचित्य, प्रबन्धौचित्य एवं रीत्यौ- चित्य । इनमे से एक-एक का परिचय इस प्रकार है: रसौचित्य-इसके नियामक सिद्धान्त १० है, रस को पाद्य बनाने के लिए- (१) शब्द और उसके अर्थ का नियोजन औचित्य पूर्ण हो। (२) सुय्, तिङ , प्रत्यय, वचन, कारक, काल, लिंग, समास, आदि का प्रयोग उचित हो। (३) प्रबन्ध काव्य में संधि, संध्यम, घटना आदि का प्रयोग रसानुकूल हो। (४) विरोधी रस के अंग विभावादि का वर्णन नहीं करना चाहिये। (५) विरोधी दो या अनेक रसो का एक स्थल में प्रवेश नहीं करना चाहिये। (६) गौण वस्तु, घटना, पात्र तथा वातावरण का इतना विस्तृत वर्णन नहीं करना चाहिये जिससे मुख्यरस दब जाय । (७) अंगरस और अगीरसः का आपस में सम्बन्ध समान अनुपात से हो । अङ्ग कम तथा अंगी अधिक। १. ध्वन्यालोक ३ । ७-९ - () अन्य रसों की नियोजना में पारस्परिक अनुकूलता होनी चाहिये। (E) प्रबन्ध काब्य या नाटक मे रसका प्रयोग उचित अवसर पर होना चाहिये। (१०) विभाव अनुभाव, संचारी आदि के वर्णन में औचित्य की रक्षा होनी आवश्यक है। अलंकारौचित्य-इसके पॉच भेद हैं। (१) अलंकार का प्रयोग स्वाभाविक रूप मे हो तथा प्रतिभा का पुट वहाँ रहे। (२) अलंकार लाने के लिये जानकर प्रयत्न न करना चाहिए। (३) अलंकार भावो की पुष्टि में प्रयुक्त होने चाहिये। (४) वे काव्य मे गौण रहे मुख्य नहीं। ऐसा न हो कि पाठक का ध्यान मुख्य विषय से हटकर अलंकार के चमत्कार पर ही बना रहे। (५) यमक, श्लेष आदि शब्दालंकार कोरा चमत्कार दिखाने के लिये बाह्य एवं स्वतंत्र रूप में प्रयुक्त न होने चाहिये। वे काब्य के बन्ध में संश्लिष्ट और समन्वित हो । गुणौचित्य-गुणो का सम्बन्ध रसो से हैं, इनकी अभिव्यक्ति विशिष्ट प्रकार के वर्णों द्वारा होती है जैसे कोमल तथा मधुर वर्गों द्वारा माधुर्य की तथा कठोर वर्णो द्वारा ओज की। इसलिए गुणों को प्रकट करने के लिए ऐसे वर्गों का प्रयोग होना चाहिये जो स्वय उनके और रस के अनुकूल हो। संघटनौचित्य-संघटना का आधार गुण हैं और उपास्य रस, यह पदो की उचित रचना है। इसके औचित्य के चार सिद्धांत नियामक है (१) संघटना रसानुकूल हो। (२) पात्र की प्रकृति, स्थिति तथा मानसिक दशा अनुसार इसकी योजना हो। (३) इसके प्रयोग में प्रतिपाद्य विषय का ध्यान रखना चाहिये। (४) काव्य की प्रकृति का विचार कर संघटना का प्रयोग होना चाहिए। नाटक में लम्बे-लम्बे समासो का व्यवहार उचित नहीं।

हैं . प्रबन्धौचित्य-आनंदवर्धन का यह प्रसंग बड़ा मार्मिक है। इस औचित्य के नियामक तत्व इस प्रकार (१) प्रसिद्ध तथा कल्पित वृत्तो में समानुपात रहना चाहिये। (२) वर्ण्य वस्तु का प्रयोग प्रकृत रस के विपरीत नहीं होना चाहिये। (३) जो घटनाये काव्य के मुख्य ध्येय में बाधक सिद्ध होती हों, उन्हें परिवर्तित कर देना चाहिये । (४) प्रासंगिक घटनाओ का विस्तार अंगी रस की दृष्टि में रखकर करना चाहिये। ऐसा न हो कि उसके अतिविस्तार से प्रमुख भाव दब जाय। (५) वर्णन विषय से दूर न हटने चाहिये। (६) अंग घटना का इतना विस्तार न किया जाय कि वह अंगी बन जाय। (७) प्रबन्ध काव्य की घटनाओं का निर्वाचन होना चाहिये। प्रकृत रस के अनुकूल घटनाओ का ही वहाँ वर्णन न हो। (८) पात्रो की प्रकृति परिवर्तित न करनी चाहिये। रीत्यौचित्य-रीति का प्रयोग करते समय वक्ता, रस, अलंकार तथा काव्य के स्वरूप का ध्यान सदा रखना चाहिए। इनके अनुकूल वह हो प्रतिकूल। इस विवेचन से स्पष्ट होता है कि आनंद वर्धन ने औचित्य का विश्लेषण बड़ी मार्मिकता तथा विस्तार के साथ किया है। क्षेमेन्द्र को इन्हीं से प्रेरणा मिली थी। इसके अनन्तर वक्रोक्ति मार्ग के प्रवर्तयिता कुतक ने भी इसका उल्लेख अपने प्रथ 'वक्रोक्ति जीवित' में किया है । उन्होने औचित्य का लक्षण तथा महत्त्व दिखाते हुए कहा है कि-'जिसके द्वारा स्वभाव का महत्त्व पुष्ट होता हो अथवा जहाँ वक्ता किंवा श्रोता के शोभातिशायी स्वभाव के कारण वाच्यवस्तु आच्छादित हो जाती हो वह औचित्य है।' यहाँ ग्रन्थकार का यही आशय है यदि किसी वण्य वस्तु का १. वक्रोक्ति जीवित १,३८,३८ ।

, स्वभाव यथार्थ रूप में वर्णित किया गया है तो वह औचित्य है। इसके विपरीत कहीं यदि वक्ता या श्रोता का स्वभाव अधिक महत्त्वपूर्ण होता है और उसकी अपेक्षा में वस्तु का स्वभाव हीन होता है तो वहाँ वस्तु का वर्णन श्रोता या वक्ता के स्वभाव की छाया में करना ही उचित है। स्पष्ट रूप से यहाँ कुतक की दृष्टि वर्ण्य, वर्णयिता और श्रोता पर है। उनके वणन में परिस्थिति पर ध्यान देने का निर्देश आचार्य ने किया है। इसमे औचित्य की मान्यता स्पष्ट है । यद्यपि कुतक आनन्दवर्धन से अर्वाचीन हैं और संभावना होती है कि उनके ग्रन्थ मे औचित्य का विवेचन अधिक विशद तथा विस्तृत होगा, पर ऐसा नहीं मिलता। कुतंक के अनुमार वह शैली के अनेक गुणों मे से एक है, वह भी बहुत व्यापक नहीं है। इस विषय में वे आनन्दवर्धन से प्रभावित प्रतीत होते हैं। आनन्दवर्धन इस संघटना का नियामक ही मानते है। यह बताया जा चुका है। पर उन्होंने बड़े विस्तृत तथा गंभीर ढंग से इसकी व्याख्या की है। कुतक की दृष्टि वक्रता पर इतनी केन्द्रित है कि वे काव्य के दूसरे तत्त्व का महत्त्व नहीं आंक सकते। इसके अनन्तर महिम भट्ट आते हैं जिन्होने अपने 'व्यक्तिविवेक' ग्रन्थ मे ध्वनि मार्ग की खण्डनात्मक आलोचना की है। उन्होने औचित्य के शब्दौचित्य एवं अर्थौचित्य दो भेद बताते हुए दूसरे को यह कहकर छोड़ दिया है कि इसका वर्णन आनंदवर्धन कर चुके है। शब्दौचित्य को फिर उन्होंने पॉच भेदो में विभक्त किया है-विधेयाविमर्श, प्रक्रमभेद, क्रमभेद, पुनरुक्ति और अधिक पदता। ये पाँचो दोष है वास्तव में इन्ोंने औचित्य का प्रसग छोडकर अनौचित्य का वर्णन किया है। विनायकं प्रकुर्वाणो रचयामास वानरम् । फिर भी प्रकृत मे यह कहा जा सकता है कि महिमभट्ट जैसे तार्किक भी औचित्य तत्त्व "अपेक्षा नहीं कर सके। दोषों के द्वारा ही सही, उसका वर्णन उन्होंने किया है, यहाँ विशेष विचारणीय यह है कि महिमभट्ट ने औचित्य को दोषाभाव समझा है। गुणो का भी समीक्षा की परपरा मे कुछ ऐसा ही इतिहास रहा है। रीतिमार्गी लोगो ने इनका पृथक महत्त्व समझा था पर आगे आनेवाले दूसरे लोगों ने उन्हे दोषाभाव मे अन्तःपातित कर दिया। महिमभट्ट से लेकर औचित्य का भी वैसा ही भाग्य बन गया। वह दोषाभाव बनने लगा है। क्षेमेन्द्र ने इसका स्पष्ट 2 ।

खंडन किया है, यह दोषाभाव नहीं है। स्वतंत्र विध्यात्मक तत्त्व है। महिम भट्ट का विचार विमर्श इस सम्बन्ध में अधिक गम्भीर नहीं है। इसके अनन्तर औचित्य की विवेचना और मूल्यांकन क्षेमेन्द्र द्वारा ही हुआ है। उन्होंने इसे समस्त काव्य जात को परखने का आधार मानकर इसपर एक समीक्षा मार्ग की स्थापना की है । स्वतन्त्र पुस्तक इसपर लिखी है। पुस्तक में यद्यपि पर्याप्त विस्तार से विवेचन किया गया है फिर भी वे इसे थोड़ा समझते थे। इसीलिये उन्होने अपनी पुस्तक को चर्चा' कहा है। यह पुस्तक उन्होने बुभुत्सु कवियो की शिक्षा के लिये लिखी है। इसमें विद्वानों का सा वाग्विलास या पांडित्य प्रदर्शन की इच्छा जैसा कुछ नहीं है। पुस्तक का संगठन उपयोग की दृष्टि से हुआ है। फलतः इसका व्यावहारिक मूल्य बडा है । मुख्य विषय पर आने से पहले क्षेमेन्द्र ने लिखा है कि औचित्य रसका जीवित है। यदि वह काव्य मे न हो तो वहाँ अलंकारों का प्रतिपादन करने तथा गुणादि की मिथ्या योजना करने से कोई लाभ नहीं होता। ऐसी रचना काव्य का पद नहीं ले सकती। अलंकार, अलंकार ही है। इसी प्रकार गुण भी गुण हो है । इनका महत्व इतना नहीं कि जिसके आधार पर रचना को काव्य कहा जा सके। काव्य का स्थिर जीवित तो औचित्य है। इस प्रतिज्ञा से स्पष्ट हो जाता है कि क्षेमेन्द्र की दृष्टि में औचित्य गुण और अल कारो से भिन्न तत्त्व है इसका काव्य मे वही स्थान है जो शरीर में जीवित का। जिन लोगों ने यह पदवी (आत्मा) रसको प्रदान की थी उन्हे भी क्षेमेन्द्र ने उत्तर दिया है कि काव्य का स्थिर जीवित तो औचित्य है। रस यदि काव्य मे प्राणपद पायेगा भी तो अस्थिर रूप से। काव्य औचित्य रहित होकर यदि गुण या अलंकारों से मुक्त होगा तो वह निर्जीव ही होगा। अलकार का कार्य है काव्य मे शोभा बढ़ाना। यह तभी हो सकता है जब उसका विकास औचित्य पूर्ण हो। इसी प्रकार गुण भी औचित्य के साथ ही कृतकार्य हो सकते है। इसके बिना अलंकारों को अलंकार तथा गुणो को गुण नहीं कह सकते। औचित्य का काव्य में यह स्थान है । इसके मानने की उपयुक्त आवश्यकता है। ।

लक्षण-इसका लक्षण इस प्रकार किया गया है। 'कोई वस्तु यदि दूसरी वस्तु के अनुरूप सहश होती है तो आचार्य लोग उसे उचित कहते हैं। उचित के भाव तत्त्व को ही औचित्य कहा जाता है। 'उचितं प्राहुराचार्या सदृशं किलमस्ययत् । उचितस्यहि योभावस्तदौचित्यं प्रचक्षते ॥ इसमें आचार्य का तात्पर्य यह है कि काव्य का सर्वातिशायी गुण सौन्दर्य होता है। वह कोई अनपेक्ष असंपृक्त पूर्वसिद्ध वस्तु नहीं है। किसी वस्तु को उसी में सीमित रखकर सुन्दर या असुन्दर नहीं कहा जा सकता। कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् में दुष्यत ने शकुन्तला का चित्र स्मृति के आधार पर बनाकर उसके आसपास का वातावरण इसीलिये चित्रित करना आवश्यक समझा था कि उसके बिना सौन्दर्य की पूर्ण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती थी। इसलिये चित्र में शकुन्तला के अतिरिक्त मालिनी नदी, उसके सैकत में प्रेममग्न हंसों के जोड़े, हिमालय की शाखाओ पर बैठे मृग, मृगियां वृक्ष की शाखा में लटकते हुए वल्कल वस्त्र तथा उसके नीचे काले मृग के सींग से अपना बाँया नेत्र खुजातो हुई मृगी को चित्रित किया। अपने वाता- वरण के साथ अब सौन्दर्य की पूर्ण प्रतिष्ठा हो गई। उसके शिवत्व अथवा अशिवत्व की स्थापना भी दूसरी वस्तुओं के सहसंगठन से होती है। जो वस्तु दूसरों के लिये श्रेयस्कर है वह शिव है अन्यथा नहीं। इसी प्रकार यदि कोई अपने सहयोगी पदार्थों में समंजस रूप से विन्यस्त है तो वह सुन्दर है और आनन्दक भी है अन्यथा नहीं। सुवर्ण के साथ कॉचका सयोग जितना सुन्दर होता है उतना चॉदी का नहीं। रंगो के परस्पर सयोजन से यह बात और अधिक स्पष्टता से अनुभव की जाती है। काव्य में भी सयोजन क्रिया की प्रमुखता रहती है। कल्पना का यही कार्य होता है। जीवन मे अनेकत्र अनेकदा दृष्ट एव अनुभूत पदार्थो का किसी भाव या कथा के सहारे समंजस सयोजन किया जाता है। इस सामजस्य को सादृश्य अथवा संतुलन को ही औचित्य कहा जाता है। यह सापेक्ष वस्तु है। नीम का चारा गौ के लिये असदृश और ऊँट के लिये सदृश है। अधिक भूषणो का उपयोग ग्रामीण स्त्री के लिये उचित एवं नागरिक के लिये अनुचित है। 'भट बायरे ठाकुर एकल को अस एकन को पथु दीजतु है।' इस प्रकार औचित्य एक विध्यात्मक तत्त्व सिद्ध होता है। यही समस्त - सौन्दर्य का मूल है । अतः यह मानना पड़ता है कि काव्य में प्रयुज्यमान पदार्थो का परस्पर में सादृश्य अनुरूपता.हो, यह अत्यन्त अपेक्षित है। लक्षण में क्षेमेन्द्र ने 'आचार्य' शब्द से दूसरे लोगो का भी उल्लेख किया है। इससे अनुमित होता है कि इनसे पूर्व तथा समकाल में समीक्षा की इस दृष्टि की पर्याप्त मान्यता थी। प्रतिपादन में क्षेमेन्द्र की दृष्टि औचित्य तत्त्व को व्यापकता दिखाने पर विशेष रही है। प्रतिज्ञा मे इसे गुण अतकार एवं रस मे विद्यमान बताकर इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए काव्य के २८ अङ्ग गिनाकर उनमें प्रत्येक में औचित्य की सत्ता सिद्ध की है। अत मे काव्य के अन्य अंगो मे जिनका वे नाम निर्देश नहीं करते, इसे व्याप्त बताते है। परिगणित २८ स्थान ये है,—(१) पद, (२) वाक्य, (३) प्रबधार्थ, (४) गुण, (५) अलकार, (६) रस, (७) क्रिया, (क) कारक, (६) लिग, (१०) वचन, (११) विशेषण, (१२) उपसर्ग, (१३) निपात, (१४) काल, (१५) देश, (१६) कुल, (१७) व्रत, (१८) तत्त्व, (१६) सत्त्व, (२०) अभिप्राय, (२१) स्वभाव, (२२) सारसंग्रह, (२३) प्रतिभा, (२४) अवस्था, (२५) विचार, (२६) नाम, (२७) आशीर्वाद, तथा (२८) काव्य के अन्य अनेक अग। इन सब में अन्वयब्यतिरेक शैली से उदाहरण प्रत्युदाह- रणों द्वारा प्रतिपाद्य विषय को सिद्ध किया है। अन्तिम २८वे तत्त्व काव्यांग का निर्देश मात्र करके छोड़ दिया, वे अनत है। कितनों का विश्लेषण विस्तार करते? उपयुक्त २८ काव्य तत्त्वों का श्रेणी विभाजन कर यदि यह परीक्षा की जाय कि काव्यकला का कितना समाव इनके आभोग में होता है तो हम विवेचन को सर्वांगपूर्ण पाते है। प्राचार्य ने काव्य के प्रत्येक अस्र में औचित्य की व्यापकता बड़े वैज्ञानिक ढंग से सिद्ध की है। ये चार :विभागो में विभक्त है-शब्द, काव्यशास्त्रीय तत्व, चरित्र तथा परिस्थिति प्रत्येक मे इस प्रकार श्रेणी बन्धन है :- शब्द-पद, वाक्य, क्रिया, कारक, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात । काव्यशास्त्र के तत्त्व-प्रबन्धाथ, गुण, अलंकार, रस, सारसंग्रह, आशीर्वाद तथा काव्य के अन्य अनेक अङ्ग । चरित्र-व्रत, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, प्रतिभा, विचार, नाम। तत्त्व, - , परिस्थिति-काल, देश, कुल, अवस्था । a CTIONS - इन्हे इस प्रकार देखे, काव्य को स्थूल रूप से अभिव्यक्ति और अभिव्यंग्य दो विभागो में विभक्त कर सकते है। इनमें से अभिव्यक्ति के अन्तर्गत शब्द और अर्थ आते हैं। अर्थ को भी पृथक न माने तो कोई हानि नहीं। उसका विवेचन शब्द के ही अन्तर्गत हो जाता है समूची अभिब्यक्ति शब्द मे समाती है। काव्य की अभिव्यक्ति को साधारण अभिव्यक्ति से विलक्षण, चमत्कारक, रसवती बनाने के लिए काव्य मर्मज्ञो ने काव्य के कतिपय अगो की कल्पना की है। काव्य- शास्त्र उन्हीं के सहारे काव्य की मीमांसा करता है। यह काव्यगत अभिव्यक्ति की साजसज्जा का, आयोजन-नियोजन का साधन है। क्षेमेन्द्र के पहले दो विभागो मे अभिव्यक्ति पक्ष का १७ भागो मे विश्लेषण कर औचित्य को उनमें व्याप्ति परखने का प्रयास है। हमें ध्यान करना चाहिये कि अनेक लब्ध प्रतिष्ठ काव्य मीमांसको ने इनमें से एक-एक शब्द, अलकार, रस आदि को लेकर ही काव्य की मीमांसा की है। उनकी तुलना मे क्षेमेन्द्र की विचार-पद्धति कितनी विस्तृत लगती है ? अभिव्यग्य में हम व्यक्ति और इसकी परिस्थिति को ले सकते है। क्षेमेन्द्र ने चरित्र विभाग से व्यक्ति और परिस्थिति विभाग से उसके सायोगिक वातावरण का ११ विभागो मे विभाजन कर सर्वत्र औचित्य को दिखाया है। इसका अर्थ यही होता है कि आचार्य ने अपने प्रतिपादन मे व्यापक तथा वैज्ञानिक शैली को अपनाया है। रस तथा कारक का अपेक्षा कृत अधिक विस्तार से विचार किया गया है, उसमें भी रस का सबसे अधिक । इसका कारण आनन्द वर्धन तथा अभिनव गुप्त का प्रभाव प्रतीत होता है। कारक तो सात प्रसिद्ध है। प्रत्येक पर विचार करने के विस्तार हो जाना स्वाभाविक है। रसगत औचित्य का लाभ दिखाते हुए क्षेमेन्द्र ने बताया है कि इससे रसकी रुचिरता एवं व्याप्ति बढ़ जाती है। औचित्य संकलित रस भावुक हृदय के समस्त देश में फैल जाता है अन्यथा अनौचित्य अखरता रहता है और ऐसा लगता है मानो हृदय का कुछ भाग तप्त और कुछ अतृप्त रह गया हो। रस गत ओचित्य के रूप अनेक है । योग्य विभाव अनुभाव की योजना, संयुज्यामान भाको का उचित निर्वाचन, पात्र के अनुसार भाव की व्याख्या, आश्रय और आलंबन । की प्रकृति का विचार आदि। भाव वर्णन में परिस्थिति का ध्यान तथा अनेक भावो के परस्पर संमिश्रण में सादृश्य का ध्यान विशेष रूप से रखना चाहिये। भावो के समिश्रण मे व्यास जैसे सहज कवि भी अनौचित्य दोष के भागी दीख पड़ते है। जिस प्रकार भोजन रसो में सब रसो का समिश्रण सब प्रकार से नहीं होता। उसमें कुशलता से अनुरूपता का सरक्षण करना पड़ता है। इसी प्रकार काव्य रसो के परस्पर। श्लेष मे औचित्य की रक्षा करनी चाहिये । अनौचित्य का थोड़ा स्पर्श होने से भी वैरस्य उत्पन्न हो जाता है। इनकी उदाहरण देने की क्षमता भी विशेष प्रशंसनीय है। अपनी प्रत्येक बात के लिये वे उदाहरण तथा प्रत्युदाहरण दोनो देते हैं और मन्तव्य की व्याख्या करते हैं। इस विषय में वे बड़े निःसंकोच तथा उदार प्रतीत होते हैं। जिनके पद्य उदाहृत हैं उनके नाम दिये है। अपने तो प्रथो तक का नाम उल्लिखित किया है। निःसंकोच इतने हैं कि कालिदास, व्यास, राजशेखर जैसे ख्यातनामा कवियो के भी दोष दिखाये हैं। उदार इतने हैं कि अपना दोष दिखाने में भी हिचके नहीं हैं। इस सम्बन्ध में दूसरी विशेषता इनके निभ्रांत निर्णयो की है। जो बात वे कहना चाहते है उसे दो टूक कहते है। विचारणा व्याव- हारिक दृष्टि से की गई है। पाण्डित्य का प्रदर्शन अथवा शास्त्रों का प्रमाण देकर बात सिद्ध करने का प्रयास कहीं नहीं किया गया। वे अपने विचारो की सत्यता में भावुको के अनुभवो का ही साक्ष्य ठीक समझते है। अर्वाचीनों पर प्रभाव--क्षेमेन्द्र के अनन्तर आने वाले आचार्यों पर रससिद्धांत का प्रभाव बड़ा प्रबल था। इसलिये रस के अतिरिक्त अन्य किसी काव्यतत्त्व को उन्होने आत्मस्थानीय महत्व नहीं दिया। फलतः औचित्य मार्ग जो क्षेमेन्द्र द्वारा प्रतिष्ठित हुआ था, आगे चलकर फीका पड़ता गया। उसकी व्याप्ति गुण दोषों तक ही सीमित हो गई। मम्मट ने कहा है कि औचित्य के कारण गुण कभी दोष और दोष कभी गुण बन जाते हैं। यह उसके गुण दोषों की परीक्षा का विनिगमक बनने का प्रमाण है। रसादि से जो उसका सम्बन्ध था वह हट गया।

के भोज ने अपने विस्तृत प्रन्थ 'सरस्वती कण्ठाभरण' में इसका प्रासंगिक रूप से विवेचन किया है। अर्थ दोषो के अन्तगत औचित्य- विरुद्ध नाम का एक दोष उन्होने माना है। इसी का औचित्य के कारण गुण रूप भी उन्होने दिखाया है। एक और स्थान पर अलकार विवेचन के अन्तर्गत औचित्य को भाषा तथा शैली का गुण स्वीकार किया है। वहाँ इसके निम्न लिखित छः भेद दिखाये है। १-विषयौचित्य-जिसके कारण अलंकार यथार्थतः अलकार बन सकता है। २-वाच्यौचित्य-अवसर के अनुकूल संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओ का व्यवहार करना। ३-देशौचित्य-देशानुसार भाषा का व्यवहार । ४-समयौचित्य-समयानुसार भाषा का व्यवहार। ५-वक्तृविषयौचित्य-वक्ता की दशा अनुसार भाषा का प्रयोग। ६-श्रीचित्य-विषय के अनुसार गद्य अथवा पद्य का प्रयोग। विवरण से स्पष्ट है कि भोज औचित्य को काव्य के कतिपय अंशो का गौण अङ्ग समझते है। इसका काव्यात्मा से कोई सम्बन्ध नहीं। हेमचन्द्र ने इसी प्रकार प्रसंगवश काव्यानुशासन में औचित्य का उल्लेख किया है। उन्होने छायोपजीवन को अर्थात् दूसरे कवियों के पद, वाक्य, वाक्याशो के अनुकरण को काव्यानुशीलन का एक उपाय बताया है। इसमें औचित्य रक्षण पर ध्यान दिलाते हुए व्यक्त किया है कि ऐसा न करने से कवि काव्यचौर्य का दोषी बन जाता है। दोषों के प्रकरण विसन्धि अर्थात् संधि न करने को औचित्य वश गुण या दोषाभाव माना है। गुणो के प्रसंग में भी उन्होने प्रतिपादित किया है कि यद्यपि गुणों में भाषा नियत होती है फिर भी वक्ता, वाच्य या प्रबन्ध के औचित्य से इसमें परिवर्तन हो जाता है। अन्त में यह भी साधारणतया कहा है कि दूसरे स्थानो मे भी औचित्य का अनुसरण करना चाहिये। इस विवरण से प्रतीत होता है कि हेमचन्द्र ने औचित्य का विमर्श तो पर्याप्त किया है पर दिया उसे गौणपद ही है। इनके अनुसार इसका सम्बन्ध वक्ता, वाच्य तथा प्रबन्ध तीन तत्त्वों से है।

। विश्वनाथ ने इसे गुण दोषों तक ही सीमित कर दिया है। गुण दोषों का निर्णय इसी के आधार पर होता है। सब के बाद अन्तिम आचार्य पंडितराज जगन्नाथ आते हैं। उन्होंने शब्द सामर्थ्य के प्रसग में औचिती को काव्य का गुण माना है। इस प्रकार सस्कृत के समीक्षा शास्त्र का इतिहास देखने से पता चलता है कि औचित्य का काव्य मे थोड़ा बहुत मूल्याकन सभी के द्वारा हुआ है। दण्डी ने अप्रत्यक्षतः इसका निर्देश किया है। आनंद वर्धन ने इसके व्यापक महत्त्व को ठीक समझकर उसे उचित विस्तार प्रदान किया। कुतक ने इसके महत्त्व को तो पहचाना पर काव्य में उसे गौणतत्त्व ही माना। महिमभट्ट ने इससे भी कम महत्त्व दिया । क्षेमेन्द्र ने उसे समस्त काव्य में व्याप्त समझकर उसके आधार पर एक स्वतंत्र मार्ग की स्थापना की। पर उनका कोई अनुयायी न हो सका। बाद में तो सभी विद्वान् रस सिद्धान्त के एक मात्र स्वीकर्ता बन गए। मम्मट, , भोज, विश्वनाथ तथा पंडितराज जगन्नाथ सब इसी श्रेणी के आचार्य हैं। इन लोगो ने औचित्य की सीमा केवल गुण दोषों तक ही स्वीकार की। ऊपर के इतिहास से पाठक के मन में फिर एक संदेह उत्पन्न हाता है । वह यह कि औचित्य को काब्य के अन्य गुणों के समान एक गुण मात्र मानना ठीक है जैसा बहुत से प्राचार्यों ने किया है या फिर काव्यात्मा मानकर कविता में इसका अनिवार्य महत्व स्वीकार करना उचित है जैसा कि क्षेमेन्द्र और आनन्द वर्धन ने किया है । समस्या पर फिर से विचार करना चाहिये। क्षेमेन्द्र ने स्वयं इसका उत्तर दिया है। राजशेखर के काव्य पुरुष का रूपक लेकर वे कहते हैं कि कविता में माधुर्य, ओज, प्रसाद आदि गुणो का वही स्थान है जो मानव शरीर में सत्यवादिता, उदारता आदि गुणों का है। वे शरीर के विधायक तत्त्व नहीं हैं विशिष्टता उत्पन्न करने वाले समवेत गुण हैं। अलंकार भी इसी प्रकार सांयोगिक पदार्थ है। उसके न होने से शरीर का विद्यमान महत्व घट नहीं सकता। सूना शरीर शरीर ही कहलायेगा कुछ और नहीं। हॉ, विना अलंकार के उसकी शोभा न बढ़ पायेगी । गुणो का अभाव काव्य में कुछ हेयता ला देता है पर वह भी उसकी काव्य संज्ञा नहीं मिटा सकता। उदारता आदि के बिना भी पुरुष को पुरुष ही कहा जायगा।

। इस शैली से रस का भी विचार करना चाहिये । रस काव्य की आत्मा माना गया है। पर क्षेमेन्द्र इस स्थापना से सहमत नहीं । उनके अनुसार रसका काव्य में वही स्थान है जो अन्य रमो का मानव शरीर में है । यो कहना चाहिये कि जीवित रहने के लिये शरीर और आत्मा दोनो की आवश्यकता पडती है। शरीर की रचना पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वों तथा सात रसां द्वारा होती है। ये शरीर के विधा- यक तत्त्व हैं पर आत्मा इनसे भिन्न वस्तु है। वह भी शरीर धारण के लिये अनिवार्य है, रसो का सम्बन्ध शरीर से है। इसके लिये उस का महत्त्व सर्वोपरि है। पर आत्मा शरीर को जीवन प्रदान करता है। काव्य मे रस रसस्थानीय है और औचित्य आत्मस्थानीय । रसके रहते हुए भी यदि औचित्य नहीं तो काव्य निर्जीव है । रसाभास, रस, दोष आदि की यही स्थिति होती है। वे रस गत औचित्याभाव के नामान्तर हैं। इसी प्रकार अनौचित्य तथा दोषों का अन्तर समझ लेना चाहिये। यह काव्य के काव्यत्व का लोप कर देता है, उसके जीवन हर लेता है। दोष केवल सौन्दर्य पर आघात करते हैं। कहीं उसे सर्वथा लुप्त कर देते हैं तो कहीं घटा देते है। पर मनुष्य असुन्दर रह कर भी है तो जीवित ही। औचित्य के आधार पर काव्य मीमांसा का मार्ग दिखाकर क्षेमेन्द्र ने एक और बड़ी विशेषता की है। काव्य कला को जीवन के निकट ला दिया है। रस, अलकार आदि के सिद्धांत आदर्शवाद के सिद्धांत है। साधारण जीवन के साथ उनका सम्बन्ध बहुत कम है। इसीलिये इन्हे माननेवाले कवियो को रचनाओ में अतिवादिता दिखाई पड़ती है। जीवन का यथार्थरूप उनसे बिल्कुल छुट गया है। माघ, भट्ट नारायण, श्रीहर्ष आदि इसके प्रमाण है। इनके काव्यों में जीवन बहुत कम हैं, कला का प्रदर्शन ही सर्वप्रमुख है। औचित्य जीवन प्रसूत गुण है। इसकी धारणा जीवन से प्राप्त होती है। यहाँ उचित और अनुचित का सतत संघर्ष चलता है। उचित ठहरता है और अनुचित तब तक लडखड़ाता रहता है जब तक या तो वह उचित नहीं बन जाता या फिर नष्ट नहीं हो जाता है। इस देवासुर सग्राम में अन्तिम विजय देवो की ही होती है। अनो- चित्य शरीर में विदेशी तत्त्व के समान थोड़ा भी जीवन को विशृङ्ख लित, विचलित एवं अस्वस्थ बना देता है। इस के विपरीत जो उचित है वह सुन्दर मंगल और प्रिय लगता है। यह वह धुरी है जिस पर जीवन-चक्र घूमता है। नियम, अपवाद, विधान, स्मृति, सदाचार, धर्म, नीति अध्यात्मिकता, दर्शन आदि सब इसी के घटे बढ़े उपनाम है। इसको काव्य का मूल तत्त्व मान लेने का अर्थ होता है काव्य और कला को जीवनमय बनाने का प्रयास । इसके सहारे कला आदर्शवाद तथा आत्म प्रधानता (Subjectivity ) के स्वर्ग से उतर कर यथार्थवाद तथा विषयप्रधानता (Objectivity) की भूमि पर विचरण करने लगती है। वह व्यावहारिक बन जाती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण क्षेमेन्द्र के काव्य हैं जिनमें जीवन के यथार्थ रूप की बिवृत व्याख्या है, जीवन को सुघड़ बनाने का विध्यात्मक सुन्दर प्रयास है। औचित्यवादी के लिये समीक्षा के बहुत से झमेले समाप्त हो जाते है। उसका मार्ग सीधा हो जाता है। जो उचित है वह काव्य है। औचित्य की मात्रा पर ही काव्य का अधम, मध्यम, श्रेष्ठ होना निर्भर रहता है। और औचित्य का आधार ? इसका आवार जीवन है जो सबको अनुभूत ओर प्रत्यक्ष है। फिर गुण, दोषों के विभाग उप- विभाग कर लम्बी सख्या बनाने की आवश्यकता नहीं रहती। औचित्य के क्रोड मे ही ये सब समा जाते हैं। कविकण्ठाभरण में क्षेमेन्द्र ने जो गुण दोषो के अधिक भेद नहीं दिखाये, इसका कारण यही है । एक और तरह से विचार कीजिये काव्य का अध्ययन दो दृष्टियो से किया जा सकता है-रूप की दृष्टि से और भाव की दृष्टि से । भारतीय साहित्य के आलोचकों ने यही किया है। रीति, गुण, अलंकार आदि को महत्त्व प्रदान कर काग्य की आलोचना करनेवाले विद्वान् उसके रूप का विवेचन करते हैं। और जिन लोगों ने रस, ध्वनि आदि को प्रमुखता देकर कविता की परख की है वे भाव पक्ष भाव और रूप या अर्थ और भाषा में कौनसा च्याप्य है और कौनसा ब्यापक, इसका विचार किया जाय तो पता चलता है कि साधारण लोक व्यवहार और काम्य जगत् में इस दृष्टि से परस्पर विरोध रहता है। साधारण व्यवहार मे रूप या भाषा व्यापक बनकर आती है। वह अपने मे अर्थ को समाये रहती है। अर्थ की सीमा य के द्रष्टा हैं।

m . ७) भाषा की सीमा के अन्दर रहती है उससे परे नहीं। काव्य का क्षेत्र इसके विपरीत होता है। वहाँ भाव जगत अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत और ज्यापक रहता है । रूप या भाषा उसकी अपेक्षा में व्याप्य या लघुतर होती है। इसीलिये यहाँ लक्षणा तथा व्यंजना का आश्रयण किया जाता है। इन वृत्तियों द्वारा भाषा अपना सीमा-विस्तार बढ़ाती है और भाव सीमा को प्राप्त करने का प्रयत्न करती है। साधारण व्यवहार में इसकी आवश्यकता ही नहीं पडतो। वहाँ केवल अभिधा से ही कार्य चल जाता है। अस्तु कहने का सार यही है कि काव्य में रूप व्याप्य होकर तथा भाव ब्यापक होकर प्रयुक्त होता है। भावुक या विचारक जो यह अनुभव प्रायः किया करते हैं कि जितना उनके मन में है वह सब भाषा में नहीं आ पाया, इसका भी यही अर्थ है। इस प्रकार काव्य में दो परिधियाँ बन जाती हैं-रूप-परिधि और भाव- परिधि। रूप का विवेचन हमारे यहाँ अलकार गुण या रीति के द्वारा हुआ है। इनमें से कोई भी एक इतना पूर्ण नहीं कहा जा सकता कि वह समूचे रूप की व्याख्या करले। इसी प्रकार रस, ध्वनि आदि भी समूचे भाव की व्याख्या नहीं कर पाते। यह गुण तो किसी में भी नहीं है कि अपने क्षेत्र से बाहर की वस्तु को भी ग्रहण करे, अर्थात् रस आदि रूप की व्याख्या करे या अलकार आदि भाव का आकलन करें। समीक्षा ग्रन्थो में जो रसवाद के अन्तर्गत भाषा आदि का और अल- कार श्रादि के अतर्गत भाव आदि का विवेचन किया गया है वह अपने-अपने सम्प्रदाय को पूर्णता प्रदान करने के लिये सांयोगिक सम्पत्ति का किसी न किसी सम्बन्ध द्वारा समाहरण मात्र है। फिर प्रश्न उठता है कि कोई ऐसा भी तत्व आलोचको की दृष्टि में आया है जो भाव और भाषा, रूप और रस दोनो पर समान प्रभाब रखता है ? बह इतना व्यापक हो कि दोनो क्षेत्रो के गुण उसमे समा जाये ? वह तत्त्व औचित्य है। इसके द्वारा अलंकार, गुण, रीति की भॉति रस, ध्वनि आदि सब की याख्या हो जाती है, इसीलिये कहा गया है कि 'ध्वनि, रस और अनुमिति औचित्य का अनसरण करते हैं और गुण, अलंकार तथा रीति के मार्ग बक्रोक्तिमय होते हैं। औचितीमनुधावन्ति सर्वे ध्वनिरसोन्नयाः। गुणालकविरीतीनां नया श्चानजुबाङमयाः।

श्लोक का तात्पर्य यही है कि ध्वनि, रस और अनुमान इन तीनों की व्याख्या एक औचित्य से और गुण और अलंकार तथा रीति की व्याख्या एक वक्रोक्ति से हो जाती है। वक्रोक्ति रूप सपत्ति होने के कारण औचित्य में अन्तर्मुक्त होती है। इस प्रकार सब से अधिक व्यापक तत्त्व काव्य के क्षेत्र में यदि कोई कहा जा सकता है तो वह औचित्य ही है। डाक्टर राघवन ने इसे निम्नलिखित रेखाचित्र द्वारा समझाया है। इससे औचित्य का काव्य मे कितना महत्त्व है-यह स्पष्ट होता है।

। ( ३२ ) (प्रा)-पाश्चात्य आलोचना में औचित्य विचार आजकल समीक्षा की शैली यूरोपीय ढंग की विशेष है। उसमे द्रष्टव्यता की एक कसौटी स्थिर कर कवि या कलाकार को कृति के सर्वांगीणरूपकी समीक्षा की जाती है। भारतवर्ष की समीक्षा शैली प्राय खण्ड-पाहणी है। रीनिग्रन्थकारो ने लक्षणग्रन्थो मे गुण, दोष, रीति, वृत्ति, अलंकार, ध्वनि, रस आदि के लक्षणो के साथ उदाहरण दे देकर छुटपुट ढग से किसी कवि की किसी प्रासगिक उत्कृष्टता या निकृष्टता का संकेत किया जाता है। उसमे कवि का समग्र रूप गृहीत नहीं होता। रस मीमासा अवश्य ऐसी है जिसमे काव्य के वस्तु विन्यास, भावचित्रण, भावो की मात्रा, भाषा आदि का सामूहिक रूप से समीक्षण करने का सिद्धान्त निहित है। पर उसमे भो चरित्र आदि का विचार करने का अवकाश नहीं रहता। अलंकार, ध्वनि, गुण, रीति आदि के सिद्धात रचना के समस्तरूप का स्पर्श नहीं कर पाते। इस दृष्टि से औचित्य मार्ग सर्वश्रेष्ठ है, क्योकि वह काव्य के सब अंगो का स्पर्श करता है। क्षेमेन्द्र के अनुसार द्रष्टव्यता की कसौटी है औचित्य । काव्य या साहित्य मे औचित्य की परीक्षा ही वास्तविक काव्य समीक्षा है। 'यदि कोई महिला अपने गले में तगड़ी, कमर पर हार, हाथ में नूपुर और पैरो में भुजबंध बाध ले, इसी प्रकार यदि कोई अपने सामने झुके हुए व्यक्ति पर बहादुरी आर शत्रु पर करुणा दिखाए ता सब लोग उस पर हंसेगे ही। औचित्य के बिना न तो कोई सजावट अच्छी लगती है और न गुण। कठे मेखलया नितंबफलके तारेण हारेण वा, पाणौ नूपुरबधनेन चरणे केयूरपाशेन वा, शौर्येण प्रणतेरिपौ करुणया नायान्ति के हास्यताम्, औचित्येन बिना रुचिं न तनुते नालंकृति! गुणः । क्षेमेन्द्र का औचित्य विचार, इस दृष्टि से यूरोप के समीक्षा मार्गों के निकट प्रतीत होता है। अब हमे यह देखना चाहिए कि औचित्य की दृष्टि से उधर भी कला के समीक्षण का कार्य हुआ है या नहीं। आश्चर्य है कि उधर यहाँ से भी अधिक इस पर बल दिया गया है।

सबसे पूर्व यूनान में इसका प्रयोग संगीत शास्त्र के सिद्धान्तों के संबंध मे किया गया। आगे चलकर इसका संबंध भाषण कला के साथ जुड़ा । उस समय इसका स्वरूप दार्शनिक अधिक था। व्यावहारिक रूप से इसका अनुवर्तन नहीं होता था। अरस्तू ने भाषण शास्त्र के प्रसंग मे कवि अंश मे इसका विचार किया। उन्होने इसे 'प्रोपेन' नाम से व्यवहृत किया है। अरस्तू का शिष्य थियोफ्रस्टस हुआ। उसने औचित्य को शैली का गुण माना। इसके अनन्तर यह भाषण शास्त्र तथा काव्य शास्त्र के गुणों मे प्रधान तत्व माना जाता रहा। यह स्थिति आगे तक चलती रही। कुछ समीक्षक औचित्य तत्व पर इतना बल देते थे कि शैली तथा उसके प्रकारो को औचित्य का ही रूपान्तर समझते थे। इसी आधार पर दी अनूसियस ने इस प्रसग मे कहा है कि-'लेख के जिस अंग मे औचित्य नहीं होगा, वह यदि पूर्ण रूप से व्यर्थ नहीं है तो कम से कम उसका महत्वपूर्ण अंश अवश्य व्यर्थ होगा।' इसी तत्व को सिसरो ने लैटिन में 'डैकोरम' नाम दिया है और इसकी बारबार दुहाई दी है। हौरेस और विन्तीलिय ने भा औचित्य के सिद्धान्त को बड़ो प्रमुखता दी है। मध्यकाल में श्री एस टौमस इसी सिद्धात के पक्षपाती रहे है। वे सौन्दर्य का 'शुद्ध बाह्य औचित्य' कहते हैं। दांते ने इस सिद्धात को बड़ो गंभीरता के साथ स्वीकार किया था। यूरोप म जब पुर्नजागरण काल आया तो इसका प्रभाव काफी बढ़ गया । क्लासिकल युग मे तो इसी का बोलबाला रहा, विशेषतः फास मे । इंगलैण्ड के पुटेनहम् सिडनी और जौन्सन ने इसी सिद्धान्त का प्रचार किया। आगे चलकर डाइडन ने लेखनकला को विचारो तथा शब्दो का औचित्य माना था। यही बात अठारहवीं शताब्दी मे जौन्सन के द्वारा अधिक स्पष्ट होकर व्यक्त हुई। रोमाण्टिक मार्ग के लेखकों ने भी रूढ़ि पर बल न देकर प्रकृति को महत्व दिया और दूसरी व्याख्या के साथ औचित्यवाद को कला मे स्वीकारा । इस प्रकार यूरोप की कला समीक्षा मे औचित्य की मान्यता बहुत काल तक तथा भिन्न-भिन्न रूपों मे वतमान रहा है । अब कुछ विशदता के साथ एक एक का विचार किया जाय। अरस्तू-सबसे पूर्व अरस्तू का इस विषय में क्या विचार है- यह दिखाने का प्रयास करते हैं। इन्होने कला के विवेचन में दो ग्रन्थ लिखे है। पोइटिक्स और रिटोरिक। पहले मे काव्य कला और दूसरे - ( ३४ ) भाषण कला का उपपादन है। दोनों में ही औचित्य को मान्यता प्रदान की है । पोइटिक्स में घदनौचित्य, रूपकौचित्य, विशेषणौचित्य तथा विषयौचित्य चार प्रकार के औचित्य भेदो का वर्णन किया है। इनमें घटनौचित्य नाटक की कथावस्तु से सम्बन्धित है। इसका दुहरा अर्थ है । नाटक की घटना वस्तु जगत से सम्बद्ध होनी चाहिये। यही घटना उचित है । दूसरी अनुचित । अर्थात् अरस्तू के अनुसार घटना सत्य न हो तो सभव अवश्य हो । यह एक प्रकार का घटनौचित्य है। दूसरे प्रासंगिक घटना मुख्य या आधिकारिक घटना के उचित होनी चाहिये । इस प्रकार घटनौचित्य के दो भेद उन्होने स्वीकार किये है। रूपकौचित्य का अर्थ यह है कि गद्य को प्रभावशाली तथा सुन्दर बनाने के लिये रूपक का प्रयोग किया जाता है। इसके प्रयोग में इस बात की सावधानी रखनी पड़ती है कि रूपक उचित हो। वर्ण्य वस्तु का उत्कर्ष दिखाने में उत्कृष्ट गुणो से युक्त विशेषण तथा उसे ही न दिखाने के लिए हीन गुणो से युक्त विशेषण प्रयुक्त करने चाहिये। रूपक में उपमान और उपमेय का अभेद रहता है। इसमें यह देखना चाहिये कि उपमान उपमेय का समान कोटि, समान जाति तथा समान धर्म का हो । अन्यथा रूपक अनुचित हो जायगा । उषा को 'गुलाबी अंगुली वाली' कहना उचित है, बैगनी अंगुली वाली कहना अनुचित । विशेषणौचित्य मे यह देखा जाता है कि प्रकरण मे जो अर्थ हो उसकी पुष्टि करना विशेषण का काम है। इसलिए इस कार्य के लिए उपयुक्त विशेषण का प्रयोग करना चाहिये । यही विशेषणौचित्य है । परशुराम की निन्दा के प्रसग में उसे 'मातृ हन्ता' तथा प्रशसा के प्रसंग में 'पितृ ऋण का शोधक' कहना उचित होगा। विषयौचित्य का सम्बन्ध भावोचित भाषा से है। भापा भाव व्यजक होनी चाहिये । भाव यदि उदात्त हैं तो भाषा क्षुद्र, दुबेल न हो । इसी प्रकार भाव यदि साधारण हैं तो भाषा मे आज या गाभीर्य अधिक नहीं होना चाहिये। भाषण करते समय अथवा गद्य या पद्य की रचना करते समय इस प्रकार के विषयौचित्य पर ध्यान न रखने वाले व्यक्ति की हँसी होती है। । रिटोरिक मे भी अरस्तू ने औचित्य ( Propriety ) का विशद वणन किया है। यह यथार्थ में भाषोचित्य है । वक्ता का उद्देश्य होता - है श्रोता को अपने वश में लाकर अपने विचारों के अनुकूल बनाना । इसके लिए उसे रसानुकूल भाषा का प्रयोग करना चाहिए। अनादर प्रकट करने में क्रोध की भाषा, किसी की लघुता व्यक्त करने मे हीनता की भाषा एवं प्रशंसा करने में महत्व व्यजक भाषा का प्रयोग करना भाषा की रसानुकूलता है । भाव और भाषा में पूर्ण सामंजस्य होना चाहिये । यह भाषौचित्य है। भाषौचित्य वक्ता को विश्वसनीय और उक्ति को सत्य सिद्ध करता है। इसके अभाव में भाषण का सम्बन्ध कानों से भले ही हो, हृदय से नहीं होता। इस प्रकार पाश्चात्य आलोचना के भरत मुनि अरस्तू ने पाँच प्रकार के औचित्य भेदों का उल्लेख अपने काव्यो में किया है। लागिनम-इसके अनन्तर तीसरी शताब्दी के आलोचक लांगिनस आते हैं, उनका ग्रन्थ 'औन दी सबलाइम् पाश्चात्य आलोचना शास्त्र की मौलिक रचना समझी जाती है। उसमें ग्रन्थकार ने अलंकारीचित्य तथा शब्दौचित्य दो प्रकार के औचित्यो का उल्लेख किया है। वे काव्य में भव्यता (Sublimity ) के पक्षपाती है। उसकी पुष्टि अलकारो द्वारा होती है। अलंकार शब्द तथा अन्यका सौन्दर्य उत्पन्न करते हैं तथा काव्य मे भव्यता उत्पन्न करने में सहायक होते है। दूसरी ओर भव्यता अलंकार के चमत्कार की पुष्टि करती है। इस प्रकार दोनो मे परस्पर का उपकार्योपकारक भाव रहता है । पर यह बात तभी हो पाती है जब कि अलंकार का प्रयोग उचित हो। इस औचित्य का अर्थ यह है कि वह भाव के साथ-साथ ही जन्मा हो। भाव के साधारण होने पर विशेष प्रयत्न द्वारा कवि चमत्कार लाने के लिये अलकार योजना बाद में करे-यह न होना चाहिये। अानन्द- वधन ने जो पृथक-यत्न-निर्वयं तथा अपृथग-यत्न-निर्वर्त्य दो भेद अलंकार प्रयोगों के माने हैं उनमें से दूसरा उचित है पहला अनुचित। शब्दौचित्य को और भी स्पष्टता के साथ उन्होंने दिखाया है। काव्यकला में शब्द की बड़ी महिमा है। उचित तथा शोभन पदों का प्रयोग श्रेताओ के हृदय पर आकर्षण तथा आश्वासन की छाप डालता है। उनमे जीवनी शक्ति होती है। इसके बिना काव्य मृतकसा लगता है। 'सुन्दर तथा उचित शब्द अर्थ का वास्तविक आलोक है।" 1. For in fact beautiful words are the very and peculiar light of thought.

(३६) शब्द का फिर औचित्य क्या वस्तु है इसके उत्तर में उन्होंने विषया- नुकूल शब्द प्रयोग ही बताया है। भव्य तथा महिमामंडित शब्दों का प्रयोग इसी प्रकार के विषयों के वर्णन मे करना चाहिए। इसके विपरीत करने से शब्द प्रयोग उपहसनीय होगा। इससे स्पष्ट है कि लांगिनस काव्य में शब्दौचित्य की महिमा को ठीक-ठीक समझते थे। हौरेस-इनका ग्रन्थ 'आर्ट पोइटिका' है। इसमें औचित्य की मान्यता और महत्त्व अनेकन दिखाये है। कवियों के लिए उसके तीन उपदेश हैं। १-पीक आदर्शों का अनुकरण करना। २-पात्र के स्वरूप की रक्षा करना। ३-काव्य में औचित्य का सदा ध्यान रखना। काव्य या नाटक की कथा दो प्रकार की हो सकती है इतिहास प्रसिद्ध या कविकल्पित । इनमे पहले प्रकार की कथा पर यदि काव्य लिखा जाय तो उसमें इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उसके पात्रों का स्वभाव इतिहास परम्परा में जैसा है, काव्य में वैसा ही चित्रित किया जाय। परम्परा का अतिक्रमण न हो। कथा यदि कवि कल्पित है तो कवि ने पात्रों की अवतारणा जिन-जिन स्वभावों के साथ की है उनको अन्त तक पालना करनी चाहिए। यह नहीं होना चाहिए कि जो पात्र पहले उद्धत स्वभाव का दिखाया गया है उसी को फिर नम्र, शिष्ट अकित किया जाय। इससे औचित्य की हानि होती है। यह तो रहा चरित्र चित्रण के विषय में। अभिनय के विषय में भी उसने औचित्य की रेखाये खींची हैं। इसमे दो बातों का ध्यान विशेष रूप से रखना चाहिए। एक तो अभिनेय भाव के अनुरूप ही चेष्टा करनी चाहिये। दर्शको में यदि उल्लास, आनन्द आदि की भावना जगानी हो तो अभिनेता इन भावों की उत्तेजिका भाषा ही न बोले, उसका मुख भी प्रसन्न और हास्यमय हो । इसके अतिरिक्त नाटक की वे ही घटनायें अभिनेय होती है जो रसानुकूल और उचित हो । नीरस, विरस अथवा अनुचित घटनाओ की, जैसे मृत्यु, युद्ध, दाह संस्कार, मैथुन आदि की केवल सूचना देनी चाहिए। सूच्य का अभिनय अनुचित है। मीडिया स्त्री पात्र ने परिस्थिति वश अपने पुत्रों का वध कर डाला था। यह घटना नाटक में सूच्य है। अभिनेय नहीं। परशुराम का मातृवध, भीम द्वारा दुःशासन के रक्त से द्रौपदी का केशसिंचन आदि घटनायें ऐसी ही है। दशरूपक के अनुसार भी अभिनेय वस्तु के दृश्य, श्रव्य तथा सूच्य तीन विभाग हैं। इसमें औचित्य का सिद्धान्त ही कार्य करता है । हौरेस ने छन्दों के औचित्य का भी विधान किया है । जिस प्रकार का विषय हो उसी के अनुकूल छन्द का चुनाव कवि को करना चाहिए। ग्रीक साहित्य में भावों के आधार पर काव्यों के भेद किये गए हैं, जैसे करुण काव्य ( Elegy ) व्यग्य काव्य ( Satire ) दुःखान्त नाटक (Tragedy) तथा सुखान्त नाटक (Comedy) कहलाने हैं। हौरेस का कथन है कि इन काव्यों के लिये छन्द नियत हैं। उन्हीं का श्राश्रयण कवि को करना चाहिए। यह भावानुसारी छन्द प्रयोग है। भारतीय आचार्यों ने भी इस प्रकार का पर्याप्त विचार किया है। क्षेमेन्द्र ने 'सुवृत्त तिलक' में छन्दगत औचित्य का विचार किया है। संस्कृत में कालिदास और हिन्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने भी भावानुसारी छन्दों का प्रयोग किया है। यूरोप के क्लासिकल युग में औचित्य की पूरी-पूरी मान्यता रही है। इस मार्ग के अनुयायी कवि तथा आलोचकों की दृष्टि में कला के क्षेत्र में अनुशासन की मान्यता वर्तमान थी। शास्त्र तथा लोक दोनों काही अनुशासन कला में उन्होंने माना था । लोक का अनुशासन औचित्य ही है । क्षेमेन्द्र ने काव्य समीक्षा के प्रेरणातत्त्व जिस प्रकार जीवन से लिये थे, उसी प्रकार क्लासीकल समीक्षकों ने भी काव्या- लोचन का आदर्श लोक को माना है। लोक के उदात्त, शिष्ट रूप को आदर्श बनाया है। यही औचित्य की मूल भावना है । यह समीक्षा पद्धति ग्रीक साहित्य के प्रभाव काल में ही रही हो, ऐसी बात नहीं है । उसके बहुत बाद में १८वीं शताब्दी में भी महाकवि पोपने औचित्य पर बडा बल दिया है। उन्होंने अपने ग्रन्थ 'ऐसे ऑन क्रिटिसिज्म' मे भाव के अनुसार वर्णों का प्रयोग करने पर बड़ा आग्रह किया है। उनके अनुसार वर्ण अर्थ की प्रतिध्वनि होना चाहिए। मलयानिल के चलने का काव्य में चित्रण हो तो शब्द भी 'सरसराते, मंदगति से बहते से होने चाहिये। इसके विपरीत प्रचण्ड (३) अमावात के कारण यदि समुद्र की भयंकर लहरों का वणन करना है तो शब्द भी ओजस्वी कठोर तथा सुश्लिष्ट होने चाहिये । संस्कृत के आचार्यों ने प्रतिकूलवर्णता दोष में इसी तत्त्व को समझाया है । वास्तव में यह वर्णों का औचित्य है। इस प्रकार स्पष्ट है कि काध्य कला के क्षेत्र में औचिस्य की मान्यता भारतीय तथा पाश्चात्य आचार्यों ने समान रूप से की है। इससे उक्त तत्त्व की व्यापकता, मूलानुबंधिता एव अवश्यापेक्षा का पता चलता है। यह काव्य का ऐसा मूल तत्व है कि सब की दृष्टि इस पर पड़ी है। उसका कारण है, काव्य की समीक्षा करते समय जिस का भी ध्यान जीवन पर जायगा, जो भी यह विचारेगा कि ीवन का काव्य के साथ अभेद्य सम्बन्ध है तो वह इस साधारण नियम की अवहेलना नहीं कर सकता। औचित्य और कुछ नहीं, काव्य के साथ जीवन के सम्बन्धों का सामान्य वाचक शब्द है। इसे कोई शास्त्रीय ढग से माने या न माने, इसकी आवना को सर्वथा भुला नहीं सकता। जिन लोगों ने औचित्य का नामतः निर्देश नहीं किया है उन्होंने काव्य में जो गुण दोष विचार किया है वह औचित्य का ही विचार है। इसका कारण यही है कि यह काव्य का मूल तत्व है। इसीलिये भारत तथा यूनान के आदि समीक्षक भरत एव अरस्तू की रष्टि पहले अवसर में ही इस पर पड़ी। इतना अन्तर अवश्य है कि पाश्चात्य समीक्षकों ने जो औचित्य का विचार किया है वह अपूर्ण तथा बाह्य है। काव्य के समस्त अङ्ग प्रत्यगों में इसके दर्शन करने की क्षमता उनमे नहीं मिलती। क्षेमेन्द्र तथा आनन्द वर्धन में यह अन्तर्गामिनी दृष्टि विद्यमान है। आनन्द वर्धन का इस विषय का उल्लेख प्रासगिक है। मुख्य विषय है ध्वनि। अत औचित्य का विस्तार वहाँ नहीं मिलता। फिर भी जितना उन्होंने लिखा है वह गम्भीर है और उससे पता चलता है कि वे इसकी गम्भीरता और व्याकता अच्छी तरह अनुभव करते थे। क्षेमेन्द्र ने इन्हीं से प्रेरणा ली। उन्होंने औचित्य की व्यापकता तथा अनिवार्यता बडी व्यवस्था और सफाई के साथ दिखाई है । दूसरे सिद्धान्तों के विषय में उनका विचार बडा स्पष्ट है। वे इस दल दल में नहीं फंसे कि पहले सब मतों के खण्डन पर ही अपने औचित्य

का भवन बनाते। वे तो केवल इतना भर दिखाना चाहते हैं कि काव्य
मे
रस,
अलंकार जो भी रह सकते हैं रहे। वे सब उसकी शोमा
बढ़ावें या उसे स्वरूप प्रदान करें। पर औचित्य के बिना वे सब
निर्थक है, कृतकार्य नहीं। अतः काव्य की समीक्षा करते समय इसकी
उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसीलिये उन्होंने अलकार रस आदि
सब मे औचित्य की आवश्यकता दिखाई है।
,

- (20 कवि शिक्षा काव्य मीमांसा में 'औचित्य विचार चर्चा' की भाँति क्षेमेन्द्र ने कवि शिक्षा पर 'कविकठाभरण' ग्रन्थ लिखा है। कलेवर में यह ग्रन्थ यद्यपि अधिक विस्तृत नहीं है फिर भी ग्रन्थकार ने जिस व्यावहारिक दृष्टि से समस्या को समझा और सुलझाया है तथा इस प्रकार के व्यापक और अस्पष्ट विषय का जैसी स्पष्टता और सूक्ष्मता से प्रति- पादन किया है वह इतना महत्त्वपूर्ण है कि इस क्षेत्र मे भी क्षेमेन्द्र महान सिद्ध होते है। पूर्ण परिचय के लिये इस विषय की परम्परा देखनी चाहिए। काव्य मीमासका ने कवि शिक्षा का दो प्रकार से प्रतिपादन किया है-साक्षात् और परम्परा से। पहली श्रेणी में वे आचार्य जिन्होंने स्वतत्र ग्रन्थ या ग्रन्थ का कुछ भाग इस विषय पर लिखा है। ये हैं काल क्रम से दण्डी, रुद्रट, वामन, राजशेखर, क्षेमेन्द्र, हेमचन्द्र, वाग्भट, अरिसिंह और केशव । ये नौ हैं । क्षेमेन्द्र दो चतुष्टयी के मध्य मे आते है। चार उनसे पहले के और चार बाद के आचार्य हैं। इस स्थिति में तुलनात्मक अध्ययन से इनके कृतित्व की स्पष्ट परीक्षा हो सकती है। दूसरी श्रेणी परम्परा से कवि शिक्षा देने वाले आचार्यों की है। इस काटि मे वे सभी आ जाते हैं जिन्होंने किसी न किसी रूप में काव्य मीमासा पर लेखनी उठाई है। इनका मुख्य प्रतिपाद्य तो काव्य का स्वरूप, वृत्तिया, अलंकार, गुणदोष आदि होते है पर दोषों के प्रकरण मे उनका पर्याप्त विस्तार कर कवियों को उनसे बचने का संकेत वे देते हैं। यही उनकी कविशिक्षा है। आनन्दवर्धन, मम्मट, विश्वनाथ, भोज, जगन्नाथ आदि सभी ऐसे हैं। शिक्षार्थियो के भेद, कवियो के भेद, कवि शिक्षा, अभ्यास के उपाय आदि विषय पहली श्रेणों के आचार्यो के यहाँ प्रमुख होते है। इनके यहाँ यह सब छुटा रहता है । एक-एक को ले। दण्डी-दण्डी ने अपने ग्रन्थ काव्यादर्श में तीन कारिकायें विषय पर लिखी है। इनके अनुसार कवि में तीन गुण आवश्यक है- नैसगिक प्रतिभा, निर्मल श्रुति और अमन्द लगन । प्रतिभा परमेश्वर का दिया हुआ गुण है । यह प्रयत्नों से अर्जित नहीं की जाती। दूसरे दो प्रयत्न लभ्य हैं। निमेल काव्य नाटक, शास्त्र, इतिहास आदि इस - - - का अधिक से अधिक अध्ययन, श्रवण कवि को करना चाहिये। इससे अपनी सस्कृति का परम्पराप्रदाह अवगत होता है और कवि के विचार संतुलित होते है । तीसरा गुण अमन्द अभ्यास का है। इससे वे लोग भो कवि बन सकते है जिनमें प्रतिभा नहीं होती। परिश्रम पूर्वक सावधानी से यदि सरस्वती की उपासना की जाय तो साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी कवि बन सकता है। यद्यपि यह सरस्वती का अनुगृहीत कवि प्रतिभावान से हेठा होगा। रुद्रट-रुद्रट ने अपने ग्रंथ काव्यालकार मे अपेक्षाकृत अधिक विस्तार से दण्डी के समान ही विचार व्यक्त किये हैं। वे शक्ति, व्युत्पत्ति और अभ्यास को काव्य रचना का कारण समझते है। इनमे से शक्ति तो वह स्वाभाविक क्षमता है जिसके कारण नवीन विचारो की किरणे स्वतः बुद्धि मे आती है । व्युत्पत्ति लोक और शास्त्र का ज्ञान है । अभ्यास से इन दोनों गुणो का परिवर्धन तथा परिष्कार हो जाता है। इससे कवि की प्रतिभा निखर कर लोकवन्ध अमर कृतियों की सृष्टि करती है। वामन-आचार्य चामन ने इसे भिन्न शैली से बताया है। उनके अनुसार काव्य के मूलतत्त्व है-लोक, विद्या और प्रकीणे। इनमें पहला है लोक का विवेकपूर्ण पयवेक्षण । इससे अपने समय की स्थिति का पूरा-पूरा ज्ञान कवि को हो जाना चाहिये। विद्या मे व्याकरण, कोश छन्द, कला, काम शास्त्र राजनीति आदि परिगणित है। प्रकीर्ण में अनेक बाते आ सकती है। वामन ने लक्ष्य का ज्ञान, प्रयोग, श्रेष्ठ कवियों का सत्संग, परीक्षा, कल्पना और अवधान ये छः इसमें गिनाये हैं। कल्पना प्रतिभा का नामान्तर है। यह काव्य की जननी है। अवधान चित्त की एकाग्रता है। इसकी साधना एकान्त और ब्रह्मबेला मे हो सकती है। , , । *- राजशेखर-इनके बाद प्रसिद्ध आचार्य कवि राजशेखर आते हैं जिन्होंने इस विषय पर अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ 'काव्य मीमांसा' लिखा है। इनका प्रतिपादन बड़ा विस्तृत अथच वैज्ञानिक है। ये कवि का आलोचक होना भी आवश्यक समझते हैं। काव्य का कारण केवल एक ही है-प्रतिभा। वही कवि में शब्द अर्थ, अलंकार, शैली तथा अन्य गुणो का प्रतिभास कराती है। यह दो प्रकार की होती है- , ( ४२ ) कारयित्री तथा भावयित्री। कारयित्री रचनात्मक शक्ति है, भावयित्री आलोचनात्मक । कवि-कारयित्री प्रतिभा का धनी कवि होता है। यह प्रतिभा जन्मजात, प्रयत्न जात तथा उपदेश जात तीन प्रकार की होती है। राजशेखर प्रतिभा को प्रयत्न तथा उपदेश द्वारा उपार्जनीय समझते है । उनका आग्रह है कि बिना इसके काव्य रचना हो ही नहीं सकती। इसलिये अभ्यास सिद्ध कवियो मे भी इसकी विद्यमानता मानी है। पर इनमें उत्तरोत्तर अपकर्ष है । जन्मजात प्रतिभा वाला कवि सारस्वत है। यह अपनी मनमौज से रचना करता है जो कृषकसे लेकर कलाविज्ञ तक सर्वत्र फैल जाती है। प्रयत्नजात प्रतिभा वाले की क्षमता सीमित रहती है। इसकी रचनाओ की पहुंच पड़ौसियो तथा मित्रो तक रहती है। औपदेशिक कवि गुरुओ के उपदेश द्वारा थोड़ी क्षमता कमा लेता है। इसकी रचनाय सुन्दर पर निस्सार होती है। उनका प्रसार केवल उसके हो घर में होता है। आलोचक-भावयित्री प्रतिभा वाले भावक है। उनके दो भेद है। अरोचकी और सतृणाभ्यवहारी। पहले सब प्रकार की कृतियो से नाक सिकोड़ते है । दूसरे बुरी भली सब प्रकार की रचनाओ पर मुग्ध हो जाते हैं। तिनको समेत भोजन खा जाते है। यायावरीय लोग इनमें दो भेद और जोड़ते है, मत्सरी और तत्त्वाभिनिवेशी । मत्सरी रचना को ईर्ष्या के साथ देखता है अतः उसकी अभिनंदना नहीं करता। तत्त्वाभिनिवेशी मनन करता हुआ रचना के अन्तस्तत्त्व तक पहुँचता है। वह सच्चा मर्मज्ञ है। श्रेष्ठ आलोचक वह है जो स्वयं कवि भी हो तथा गुण-दोष विवेकी भी हो। राजशेखर की मान्यता है कि उक्त आलोचनागुण कवि में भी होने आवश्यक है। तभी वह अपनी और परायी रचना को परख सकेगा। इनमें श्रेष्ठ आलोचक तत्त्वाभिनिवेशी है। कवि को ऐसा ही होना चाहिए। बिना विवेक अंधमधुन्ध रचना करने वाले तो कवि नहीं कपि है। 'कुकवि. कपि रेव वा। प्रतिभा के अतिरिक्त दूसरा सहायक साधन व्युत्पचि है। साधारणतया इस शब्द से ज्ञान सपत्ति का तात्पर्य लिया जाता है पर आचार्यों ने इसके भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं, व्यापक ज्ञान, उचिता- नुचित विवेक आदि । प्रतिभा तथा व्युत्पत्रि मे किस का महत्त्व ~ अधिक है, इस विषय पर भी लोग एक मत नहीं। कुछ पहली को तो कुछ दूसरी को महत्त्व प्रदान करते हैं। समन्वयवादी लोग दोनों के समन्वय को काव्य का कारण समझते हैं। कवियों के भेद-कवियो के अनेक भेद है-शास्त्रकवि, काव्यकवि तथा उभयकवि आदि। पहले शास्त्रो के आधार पर काव्य रचना करते है। काव्यकवि अपेक्षा कृत मौलिक होते है। उन्हे काव्यो से प्रेरणा मिलती है। उभयकवियो में दोनो से अर्थात शास्त्रो और काव्यो से प्रेरणा मिलती है। स्वाभाविक है कि पहला रूक्ष, दूसरा सरस और तीसरा श्रेष्ठ कवि होता है। काव्य कवि के आठ उपभेद है-शब्द कवि, अर्थ कवि, अलंकार कवि, उक्ति कवि, रस कवि, मार्ग कबि और शास्त्राथ कथि। इनके नामो से ही लक्षण जाने जा सकते हैं। काव्यपाक-राजशेखर ने एक और उल्लेख्य दिशा मे विचार किया है। रचना की पूर्णता किसे कहना चाहिए तथा उसका रूप क्या होता है इस तथ्य का 'काव्य पाक' नाम से उन्होने विवेचन किया है। इसके बिना रचना का प्रभाव नहीं पड़ता। इसके विषय में भी प्राचार्यों का मतभेद है। आचार्य मंगल इसे साहित्यिक परिणाम कहते हैं। वृद्ध आचार्यों के अनुसार काव्यपाक शैली की वह पूर्णता है जिसमे शब्द अपरिवर्तनीय होते है। ऐसी रचना में किसी शब्द के स्थान पर उसका पर्यायान्तर प्रयुक्त नहीं हो सकता। इनका कहना है कि जब तक कवि की बुद्धि दुलमिल रहती है तभी तक वह शब्दों को अदलता बदलता रहता है। जब सरस्वती सिद्ध हो जाती है तो पद सदा के लिये स्थिर हो जाते है। अवापोद्धणे तावद् यावद् दोलायते मनः । पदानां स्थापिते स्थैर्ये हन्तसिद्धा सरस्वती। कवयित्री अवन्तिसुन्दरी इस विचार से सहमत नहीं। उसके अनुसार महाकवियो की कृतियों में भी पर्याय क्षमता विद्यमान है। इसके अनु- सार काव्य पाक भावानुकूल अभिव्यक्ति है। कवि शिक्षा-कवि शिक्षा का भी राजशेखर ने बड़े विस्तार से वर्णन किया है। बुभूषु कवि को सर्व प्रथम भाषा पर अधिकार प्राप्त करना चाहिये। इसके लिये संज्ञायें, क्रियायें, कोश, छन्द तथा Windostaneleone अलंकार का अभ्यास करना होगा। कवि के व्यक्तित्व में आठ गुण अपेक्षित हैं। स्वास्थ्य, प्रतिभा, अभ्यास, भक्ति, विद्वत्कथा, बहुश्रुतता, दृढ़ स्मृति और अनिर्वेद । इसके अतिरिक्त कवि को पवित्र रहना चाहिए। यह पवित्रता शब्द, बुद्धि तथा शरीर तीनो की हो । कवि के निर्माण में उसकी बाह्य साधन सामग्री का भी बड़ा हाथ रहता है । उसे एक ऐसा आवास मिलना चाहिए जिसमे साहित्य की प्रेरणा मिले और थोडा भी मानसिक म्लेश न हो। उसके सेवक बड़े विनीत और बुद्धिमान हों, अनेक भाषाओ के गेलने में सक्षम हो । उसका लेखक भी बडा योग्य हो । वह तो आधा कवि हो। लेखन सामग्री सब प्रकार से सम्पन्न होनी चाहिये। कवि के लिये इस प्रकार के राजस जीवन की शिक्षा देते हुए आचार्य की दृष्टि समाज तथा आश्रयदाताओं पर गई है। वे एक ओर कवि से कला द्वारा राष्ट्र के मार्ग प्रदर्शन की आशा करें और दूसरी ओर उसे साधारण सुविधा भी न.प्रदान करें, यह अनुचित है। कवि की भावुकता ओस की बूद हे जो थोड़ी सी प्रतिकूलता को वायु बहने पर धूल मे मिल सकती है। अत उसकी रक्षा का उपाय होना चाहिए। साथ ही राजशेखर यह भी कहते है कि बाह्य साधन सहायक मात्र होते हैं। मुख्य वस्तु तो प्रतिभा है। और भी शिक्षायें उन्होंने कवि के लिये दी हैं। रचना प्रारम्भ करने से पूर्व उसे अपनी प्रतिभा परख लेनी चाहिए। अपना भाषा- धिकार, समाज की तत्कालीन रुचि, अपना प्रिय विषय आदि भी पहले विचार लेने चाहिएं। उसे उचित अवसर पर अपनी रचनाओं का पाठ करना चाहिए। कवि की दैनिकचर्या भी नियमित हो। इसमें कवि का काव्य के सिवाय दूसरी बात पर ध्यान न जाय । ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि राजशेखर ने विषय का प्रति- पादन बड़े विस्तार "और शास्त्रीयता के साथ किया है। पर इसमें व्यवस्था तथा योजना की कमी है। प्रत्येक बात पर मतभेद दिखा कर विस्तार करने की प्रवृत्ति बहुत है। प्रतिभाओं, आलोचकों तथा कवियों के भेद इसका प्रमाण हैं। औपदेशिक कवि को इन्होने इतना हेठा माना है कि वह महाकवि बन ही नहीं सकता। यह निर्णय भी सत्प्रतिपक्ष है। इतिहास परम्परा से कालिदास, भारवि आदि औपदेशिक कवि ही थे। वे महाकवियों के मूर्धन्य माने जाते हैं। कवि के लिये जैसा राजसी जीवन उन्होने बताया है वह भी अव्यवहार्य है। वह अप्राप्य ही नहीं कवि की प्रतिभा के पंखो का भार भी बन सकता है। क्षेमेन्द्र- राजशेखर के बाद क्षेमेन्द्र ने इस दिशा में कार्य किया है। इनकी एतद्विषयक रचना 'कविकठाभरण' है। यह आकार में यद्यपि छोटी है पर अपेक्षित सभी विवरण इसमें विद्यमान हैं। राज- शेखर का सा अतिविस्तार, भेद उदभेदो की अत्यधिक कल्पना का- प्रपंच इसमें नहीं है । ग्रन्थ मे योजना व्यवस्था तथा व्यावहारिकता बहुत है। इस विषय पर बडे ग्रन्थ तीन हैं-'काव्य मीमांसा', 'काव्य कल्पलता वृत्ति' तथा 'कविकण्ठाभरण' । इनमें सबसे अधिक उपयोगी, तथा परिष्कृत पुस्तक इसे ही कह सकते है । शेष दोनो पुस्तकों में इतना अधिक विस्तार है कि ये उनके लिये विशेष उपयोगी नहीं है, जिनके लिये लिखी गई है। -- । शिक्षार्थी का क्रमिक विकास-क्षेमेन्द्र के अनुसार प्रारम्भ से पूर्णता प्राप्त करने तक शिक्षार्थी के पाँच क्रमिक विकास होते है। उन्हीं के नाम पर क वकण्ठाभरण के पॉच अध्याय (संधियाँ) है। इनमें प्रथम है अकवि को कवित्वाप्ति। यहाँ कवित्व का तात्पर्य कलात्मक मनोवृत्ति से है। काव्यादि के अनुशीलन से वह संभव होती है। दूसरा विकास क्रम ज्ञान और अभ्यास का है जिसे क्षेमेन्द्र ने शिक्षा कहा है। इस अवस्था मे पद्य बन्धन की क्षमता आ जाती है। अतः इसके बाद चारुता लाना आवश्यक होता है। इसलिये तीसरे पद क्रम मे चमत्कार प्राप्ति की आवश्यकता तथा उपाय बताये हैं। यहाँ कविता के रूप का जहाँ तक सम्बन्ध है वह पूर्ण हो जाता है। अब कवि को गुण दोषो का । ज्ञान प्राप्त कर उससे कविता को निमुक्त रखने की आवश्यकता होती है। अत चौथे अध्याय मे गुण दोष परिज्ञान का ही विवेचन हुआ है। अन्त में प्रौढता प्राप्त करने के लिए कवि को लोक तथा शास्त्र दोनो का अधिकाधिक परिचय बढ़ाना चाहिये। पंचम अध्याय परिचय प्राप्ति का है। इस प्रकार कवित्वाप्ति, शिक्षा, चमत्कृति, गुणदोष विज्ञान तथा परिचयप्राप्ति इन पॉच विकास कक्षाओ उत्तीण होकर शिक्षार्थी पूर्णकवि बन सकता है। इनमे से एक-एक पर कुछ अधिक विशदता से विचार करना आवश्यक है।

(४६ ) (कवित्वाप्ति-कवित्वाप्ति दो प्रकार से होती है-दिव्य उपायों से तथा मानुष प्रयत्नों से। दिव्य उपाय है ॐ क्लीं सौं ॐ सरस्वत्यै नमः इस मन्त्र का जाप। इससे प्रत्येक साधक को सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। क्षेमेन्द्र का यह अनुभूत प्रयोग था। मानुष प्रयत्न शिक्षार्थी की योग्यता के अनुसार भिन्न भिन्न हैं। शिक्षार्थी तीन प्रकार के होते है-अल्पप्रयत्न साध्य कष्ट साध्य तथा असाध्य । इन्हीं को क्रमश सुशिष्य दुःशिष्य तथा अशिष्य भी कहा जाता है। सुशिष्य को चाहिये कि वह साहित्य के जानकारो की सत्संगति मे भाषा तथा छन्द विधान का अभ्यास करे उत्माह के साथ मधुर काव्यों को सुने तथा अन्य तत्संबन्धी ज्ञान एकत्र करे । उसे शुष्क वैयाकरण या लीरस नैयायिक को गुरु नहीं बनाना चाहिये। द शिष्य को चाहिये कि वह कालिदासादि के काव्यो को देखे महा कवि से प्रेरणा प्राप्त करने के लिए उसकी एक चित्त होकर परिचर्या करे दूसरों के पद्यों के पद. पाद आदि को परिवर्तित करने का अभ्यास करे तथा अर्थशून्य शब्दो को जोड पदा बनाये इत्यादि। नीमरा नाशिष्य है। वह या तो स्वभाव से कठोर हृदय का व्यक्ति होता है अथवा व्याकरण या तर्क द्वारा उसकी काव्य प्रतिभा नष्ट हो जाती है। इसके हृदय मे कवित्व वृत्ति का उदय नहीं हो सकता भले ही अच्छी से अच्छी शिक्षायें वह प्राप्त करे। सिखाने पर भी गधा गाता नहीं है और दिखाने पर भी अधा देख नहीं लेता। शिक्षा-इस प्रकार कवि कीमनोवृत्ति बन जाने पर शिक्षार्थी को सर्व प्रथम छायोपजीवन द्वारा रचना का अभ्यास करना चाहिये। छायोप जीवन का अर्थ है दूसरे प्रसिद्ध कवियो के पद्यों के पद, पाद अथवा समस्त पद्य के अनुकरण में अपना पद्य बनाना । इसके द्वारा रचना कार्य में प्रवेश होता है। इसके साथ साथ क्षेमेन्द्र ने सौ शिक्षायें और दी हैं जो कवि की जीवन चर्या तथा अध्ययन से सम्बन्धित हैं। वे इस प्रकार है-सरस्वती व्रत, यज्ञानुष्ठान, गणेशपूजन, विवेकशक्ति अभ्यास, खोज, प्रौढि, अनम, छन्दपूर्ति, उद्योग, दूसरे की रचनाओं का पाठ, काव्य शास्त्र का ज्ञान, समस्यापूर्ति, कवियो का सत्संग, महाकाव्यो का आस्वादन, शिष्टता, सज्जन मैत्री, सौमनस्य, सुवेष अभिनयो का देखना, सरसता, कवियो को दान देना, गीत सुनना, लोकाचार परिज्ञान, प्रसिद्ध कथाओं का आस्वादन, इतिहास का अनसरण करना, चित्रो को देखना, शिल्पियो के कौशल को देखना N (४७) वीरावलोकन, युद्धावलोकन, शोक प्रलाप को सुनना, श्मशान या अरण्य देखना, व्रती लोगो की सेवा, नीड तथा आयतनो का देखना अच्छा भोजन, धातुसाम्य, (स्वास्थ्य) शोक न करना, प्रभात मे जागना, प्रतिभा, स्मृति, आदर, सुखासन, दिन मे सोना, गर्मी ठण्डक से बचाव, पत्र लेख्य आदि देखना, प्रहसनो का परिचय, प्राणियो के विविध स्वभाव का प्रेक्षण, समुद्रादि के दर्शन, सूर्य चन्द्र तारों तथा ऋतुआ का ज्ञान, मेले, उत्सव आदि में जाना, देश भाषा के काव्यो से भावग्रहण करना, पद रखने व हटाने की बुद्धि, संशोधन, स्वतन्त्रता, यज्ञ, सभा, विद्यालय आदि मे ठहरना, तृष्णा न करना, परोत्कर्ष को सहने की क्षमता, अात्मश्लाघा करने में लज्जा का अनुभव करना, बार-बार दूसरों की प्रशसा करना, अपन काव्यो को सुनाने का साहस, वर किवा मत्सरता का त्याग, दूसरे के उत्कर्ष को सदुपायो से जीतने को इच्छा, ज्ञान के लिए सब का शिष्य बनने की उदारता, कविता पाठ के अवसरो की पहचान, श्रोताओ के चित्त का अनुवतन, इगित तथा आकार से दूसरो के भाव पहचानना, उपादेय का ही काव्य में निबधन करना, कविता के बाच बीच म उपदेश देते रहना, रस प्रसग का अधिक लम्बा न बनाना, अपनी सूक्तियो का प्रचार, चतुरता, पाण्डित्य नि संगता, एकान्त प्रियता, आशा, त्याग, संतोष, सात्विकता, अयाच- कता, शिष्टता, काव्य रचना का आग्रह, मध्य-मध्य मे विश्रामग्रहण, नवीनवस्तु के उत्पादन का प्रयत्न, सब देवताओ की स्तुति पराक्षप की सहिष्णुता, गभोरता, निर्विकारता, आत्मश्लाघी न हाना, दूसरो की अधूर! कृतियो का पूरा करना, दूसरो के अभिप्राय को प्रकारान्तर से अपनी रचना मे व्यक्त करना, दूसरा के अनुकूल भाव व्यक्त करना, प्रसाद गुण वाले पदों का प्रयाग, प्रसंगोचित अर्थ को अभिव्यक्त करना, निर्विरोध रस का वर्णन करना, व्यस्त एब समस्त भाषा का प्रयोग, प्रारम्भ किये कान्य को पूरा करना और वाणी में चमत्कार पूर्ण प्रवाह लाना । ये सौ शिक्षाये है जो कान्य मं रुचि उत्पन्न होने क अनन्तर पालन करनी चाहिये। अभ्यास--इन सौ शिक्षाओ मे आचार्य का तात्पर्य बौद्धिक विकास करने के साथ-साथ काव्य रचना का अभ्यास कराने से है। उन्होने अभ्यास के २३ उपाय बताये है। ये भाषा, भाव तथा कला तीनो में सौष्ठव लाने के लिए है। भाषा सम्बन्धी अभ्यास जैसे दूसरो के (४८) अभिप्राय को प्रकारान्तर से अपनी भाषा में व्यक्त करना, प्रसाद गुण युक्त शब्दो का प्रयाग, भाषा मे चमत्कार तथा प्रवाह लाना आदि । भाव सम्बन्धी अभ्यास अनेक प्रकार से किया जा सकता है। दूसरों के भाव अपनाना, प्रसगोचित अर्थ व्यक्त करना आदि। कला साधना के भी इसी प्रकार अनेक उपाय है-छन्द पूति, समस्या पूर्ति, रचना के मध्य-मध्य में उपदेश, रस प्रसग को अत्यधिक लंबा न करना आदि आदि। बौद्धिक विकास--कोरे अभ्यास से पदयोजना तो हो सकती है पर काव्य नहीं रचा जा सकता। अत. बौद्धिक विकास पर क्षेमेन्द्र ने अभ्यास से कहीं अधिक बल दिया है। इसके लिये ७७ उपाय बताये हैं। यह चार प्रकार की साधनाओ से हो सकता है-ज्ञानवर्धक अथवा भावोत्तेजक कार्य करने से, बौद्धिक शक्तियो को प्राप्त करने और बढ़ाने से, भद्रकाव्यानुकूल स्वभाव बनान से और शिष्ट चर्या और व्यवहार का पालन करने से । इनमें पहले और दूसरे उपाय बौद्धिक विकास के साक्षात कारण है ; तीसरे और चौथे सहायक कारण। पहली श्रेणी के कार्य अर्थात् ज्ञानवर्धक और भावोत्तेजक कार्य २२ है। ज्ञानबर्धक कार्य जैस काव्यशास्त्र का ज्ञान, काव्यो का आस्वादन, अभिनय प्रेक्षण, इतिहास का अनुसरण आदि। भावोत्तेजक कार्यों में ऐसे स्थान तथा दृश्यो का देखना लिया गया है जो भावो का उभारते हैं, जैसे वीरा का, युद्धी, श्मशान, अरण्य, आयतन, समुद्र आदि का देखना आदि । बौद्धिशक्तिय. का उपार्जन करना एव उन्हें बढ़ाना भी बौद्धिक विकास का कारण है। काव को विवेकशक्ति, प्रतिभा, स्मृति, चतुरता, पाण्डित्य आदि गुणो को उपार्जित करना चाहिये तथा उनके संवर्धन का अभ्यास करना चाहिये। चर्या-सहायक साधन बाह्य और आन्तर दो प्रकार के है । बाह्य में चर्या और व्यवहार आता है और आन्तर मे सात्विक स्वभाव की साधना। दिनचर्या के २२ उपाव तथा स्वभाव साधना के २४ उपाय बताये गए हैं । कवि की दिनचर्या सयत सात्विक और कला के अनुकूल होनी चाहिये । सरस्वतीव्रत, यज्ञानुष्ठान, गणशपूजन, विसत्सग, आदि से सात्विकता आती है। प्रभातजागरण, सुखासन, गर्मी, ठंडक आदि से बचाव करने, विश्राम द्वारा श्रम न होने देने आदि से शरीर ।

है । स्वस्थ रहता है। क्षेमेन्द्र के बताये मार्ग पर चलने से शरीर और बुद्धि दोनो स्वस्थ रह सकते है, इसमें संदेह नहीं ! यह बौद्धिक विकास का बाह्य सहायक सावन है। खभाव-आ-तरिक सहाय साधनों के अन्तर्गत स्वभाव साधना के २४ उपाय आते है। शिक्षार्थी कवि को अपना स्वभाव सात्विक, उन्साहपूर्ण, शिष्ट, उदार तथा अंदीन बनाना चाहिये। इसके लिये वह सज्जनो से मैत्री करे, सरस बने, प्रौढ़ तथा स्वतंत्र हो, दूसरों के उत्कर्ष को सहे ओर अपनी प्रशंसा स्वयं न करे। हाँ दूसरो की प्रशंसा खूब करे। अपनो आलोचना यदि कोई करे तो उसे सहन करे। क्रोधा- दिविकार न आने दे। तृष्णा, याचना आदि करना उसके व्यक्तित्व में टाका लगायेगे अत उन्हें त्याग दे । ज्ञनोपार्जन के लिये वह इतना उदार हो कि सबका शिष्य बनने मे उसे संकोच अनुभव न हो। क्षेमेन्द्र का यह विमर्श बड़ा महत्वपूर्ण है । कला साधका के लिये इसमें बहुत कुछ प्राप्तव्य है। क्षेमेन्द्र के मत से कलासाधक का ब्यक्तित्व यदि उच्च नहीं है तो वह उच्च कोटि की कला का स्रष्टा नहीं बन सकता। दिनचर्या और स्वभाव के अन्तर्गत हमें आचार्य के व्यक्तित्व की भी झांकी मिलती है । उन्होने जो स्वयं किया था, उसी का उपदेश दिया है। ऐसा अनुमान होता ६ । ज्ञान प्राप्ति के लिये सब का शिष्य बन जाने की शिक्षा उन्होने दी है। उनके काव्या से यह प्रमाणित होता है कि वे अनेको का गुरु बना चुके थे। सब देवताओ की समान भाव से स्तुति करने को शिक्षा भी उन्हाने अपने अनुभव से दी है। वे स्वय शैव थे, पर 'दशावतारचरित' मे वैष्णव मत के प्रति तथा 'अवदान कल्पलता' मे बौद्ध धर्म के ति श्रद्धा तथा विश्वास उन्होने व्यक्त किये है। डा० सूर्यकान्त शास्त्री महोदय का विश्वास है कि इन सौ शिक्षाओं में पूर्वोक्त पांच विकास क्रमो के अनुसार योजना है। पहली से लेकर तेरहवों पर्यन्त कवित्व प्राप्ति काल की शिक्षाये है। इनसे काव्य प्रणयन को मनोवृत्ति बनती है। चौदहवीं से लेकर इकतीसवीं तक की शिक्षायें शिक्षाकाल की अर्थात् दूसरे विकास क्रम की है। इनमें चौबीसवीं तक जीवनचर्या तथा शेष में बौद्धिक विकास की शिक्षाये हैं। तीसरी कक्षा चमत्कार प्राप्ति के काल के लिय २२ से ४३ तक जीवनचर्या तथा ४४ से ५१ तक बौद्धिक शिक्षाये हैं। गुण दोष परिज्ञान के चौथे विकास (५०) क्रम में ५२ से ७४ तक केवल बौद्धिक शिक्षायें ही हैं। अंतिम क्रम परिचय प्राप्ति के समय के लिये ७५ से लेकर १०० तक जीवनचर्या तथा बौद्धिक शिक्षा दोनों का विधान है। समीक्षा को बाद से इस निर्णय को देखें तो निर्दोष नहीं जंचता। दूसरो कक्षा शिक्षा शाति के लिये १४ से २४ तक जीवनचर्या ही नहीं अभिनय क्षण, लोकाचार परिज्ञान आदि ज्ञानसंवर्धक कार्यों का भो उल्लेख है। इसी प्रकार तीसरे विकास क्रम परिचय प्राप्ति के लिये ३२ से ४३ तक जीवनचर्या ही नहीं, प्रतिमा, स्मृति, नीड आयरनों का दर्शन छादि बौद्धिक अभ्यास गिनाये गये हैं । अतः उक्त निर्णय निदोष नहीं कहा जा सकता। चमत्कार योजना-पीसी विकासकक्षा चमत्कारयोजना की है। इसमें कवि को अपनी रचनाओं में चमत्कार लाने का प्रयत्न करना चाहिये। चमत्कार काय का परिदाय सौन्दर्य है। यह दश प्रकार का होता है : विवादित बय, विचारतरमणीय, समस्तसूक्तव्यापी, सूक्त कदेशव्यापी, शब्यात अर्थगत, उमयमत, अलंकारगत, रसात तथा कथागत। इनमें अविचारित रमणीय चमत्कार पद्य के श्रवणमात्र से ही प्रतीत हो जाता है। विचारित रमणीय अपेक्षाकृत गंभीर होता है वह पद्यार्थ का विचार करने पर प्रतीत होता है। शेष सब का अर्थ स्पष्ट है। गुणदोष परिज्ञान-चौथे विकास क्रम में गुणदोषों का परि- ज्ञान अपेक्षित है। क्षेमेन्द्र औचित्य को काव्य में सर्वोपरि महत्त्व प्रदान करते थे। औचित्य के अन्तर्गत गुण और दोष सभी समा जाते हैं अतः आचार्य ने इस प्रसंग को उतना नहीं बढ़ाया जितना दूसरे आचार्यों ने दोषों के अनेक भेद उपभेद दिखाकर तथा शैली की चारुताओं को गुणनाम देकर बढ़ाया है। इनकी दृष्टि में कलुषता एकमात्र दोष है और विमलता गुण है। कलुषता शब्द, अथं और रस तीन में संभव है अतः शब्दकालुष्य, अर्थ कालुष्य तथा कालुष्य तोन काव्य के दाष हैं। इसके विपरीत शब्दविमलता, अथ- विमलता तथा रसविमलता तोन काव्य के गुण हैं। परिचय प्राप्ति --पाँचवीं अन्तिम विकास कक्षा में कवि को अधिकाधिक वस्तुओं का परिचय प्राप्त करना चाहिये, इसे क्षेमेन्द्र ने कवि साम्राज्य व्यंजन' कहा है। परिचय वस्तुओं में कुछ लौकिक - ७ (५१) तथा कुछ शास्त्रीय वस्तुयें गिनाकर शेष को प्रकीर्ण कहकर संकेतति किया है। प्रकीर्ण में चित्र, देश, वृक्ष, बनेचर, औदार्य, भक्तिभाव, विवेक, प्रशम आदि का परिचय बताया है। उनका तात्पर्य यही प्रतीत होता है कि कवि का उत्कर्ष उतना ही अधिक बढेगा जितना उसका परिचय अधिक होगा। तर्क, व्याकरण, नाट्यशास्त्र, चाणक्यनीति, कामशास्त्र, महाभारत, रामायण, वेदान्त, धातुपरिचय, रत्नपरीक्षा, वेद्यक, ज्योतिष, धनुर्वेद, राज, तुरंग तथा पुरुषो के लक्षण, धूल, इन्द्रजाल तथा प्रकीर्ण में परिचेय वस्तुये गिना दी गई है। हमें ध्यान रखना चाहिये कि सौ शिक्षाओं के अन्तर्गत भी अनेक वस्तुओ की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक बताया है। वे कवि बनने के साधन है। ये कवि को प्रौढ़ता तथा महिष्ठता प्रदान करती हैं। पहली अनिवार्य है। ये अलकारक तथा उत्कर्ष को बढ़ाने वाली। ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि क्षेमेन्द्र ने शिक्षा जैसे व्यापक विषय का प्रतिपादन बड़ी योजना, व्यवस्था तथा व्यावहारिकता से किया है। राजशेखर का सा अतिविस्तार, अस्पष्टता एवं किसी एक तथ्य के निर्णय पर न पहुंचने की अव्यावहारिकता इसमें नहीं है। लेखक योग्य अनुभवी अध्यापक की भाँति विद्यार्थी की बुद्धि सीमा को) पहचानता हुआ सरल उपायों द्वारा उत्कर्ष की ओर उसे ले जाता है। छायोपजीवन, अर्थ शून्य शब्दों से छन्द पूर्ति आदि की शिक्षा का विधान ग्रन्थ की व्यावहारिकता का परिचय देता है। क्षेमेन्द्ध ने सब अधिक बल शिक्षार्थी के बौद्धिक विकास पर दिया है। पुस्तक में पाण्डित्य प्रदर्शन द्वारा कलेवर वृद्धि न कर इन्होने बड़ी बुद्धिमत्ता की है। कवि शिक्षा ही विस्तृत शास्त्र बन जाए तो शिक्षार्थी उसी में फंस जायगा। काव्य रचना का उसे अवसर ही न मिलेगा। 'आये थे हरि भजन को श्रोटन लगे कपास।' इस क्षेत्र मे क्षेमेन्द्र पूर्ण सफल सिद्ध होते है। क्षेमेन्द्र के बाद भी कुछ आचार्यों ने कवि शिक्षा पर लिखा है। उसका विवरण इस प्रकार है। हेमचन्द्र--हेमचन्द्र ने अपने काव्यानुशासन में प्रसंग से इसका उल्लेख किया है। उसमें नवीनता तो कम है केवल प्राचीन मतों का उद्धरणी है। इनके अनुसार काव्य का हेतु प्रतिभा है। वह सहज तथा अजित दो प्रकार की है। आत्मा के मल आवरण के क्षय होने से पहली तथा मंगदि की साधना से दूसरी प्राप्ति होती है। प्रतिभा का 194113 Footindereminine 540 A में संस्कार व्युत्पत्ति तथा अभ्यास द्वारा होता है। ग्युत्पत्ति का अर्थ है लोक शास्त्र तथा काव्य में निपुणता प्राप्त करना। मर्मज्ञ कवि के निर्देशन में बार-बार रचना करना अभ्यास है । शिक्षार्थी के लिए सूक्ष्म में आवश्यक बाते हैं-सत् को छोड़ देना, असत् का निबधन करना, , नियम का पालन तथा छायोपजीवन ।, यहाँ सत् का तात्पर्य चमत्कार- हीन वस्तु अर्थात इतिवृत्त से है । काल्पनिक वस्तु असत् है। वाग्भट- -इनके अनन्तर वाग्भट ने भी अपने 'वाग्भटालंकार' प्रन्थ में इसका थोडा उल्लेख किया है। वे केवल कल्पना को ही काव्य का हेतु मानते हैं। त्युत्पत्ति उसका आभूषण है तथा अभ्यास निपुणता का साधन । इसके बाद उन्होंने कुछ शिक्षायें बताई है जो क्षेमेन्द्र के शतक में से ही कुछ एक का परिगणन मात्र है। अरिसिंह-राजशेखर तथा क्षेमेन्द्र के बाद इस पर पूरा ग्रन्थ लिखने वाले अरिसिंह हैं। उन्होने 'काव्य कल्पलता' नामक ग्रन्थ इस पर प्रणीत किया है। अमरचन्द ने इसी पर 'वृत्ति' नाम से टीका लिखी है। पुस्तक चार प्रतानों में विभक्त है। वितान स्तबकों मे बटे हुये हैं। पहले प्रतान में छन्द, दूसरे में शब्द, तीसरे में श्लेष, चित्र अलंकार तथा चौथे मे उपमा रूपक आदि अलंकार वर्णित हैं । अन्त में रचनाभ्यास के कुछ उपाय भी बताये गए हैं। पर वे मौलिक नहीं ' पुस्तक में अनावश्यक विस्तार, श्रावृत्ति, परिगणन आदि के दोप हैं। मौलिकता का अभाव है। लेखक परिश्रमी अवश्य है। उसने शिक्षार्थियो के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के शब्दसमूह एकत्र किये है। केशव और देवेश्वर-इस विषय के अन्तिम लेखक केशव तथा देवेश्वर हैं जिन्होंने क्रमशः 'अलंकार शेखर' तथा 'कवि कल्पलता' पुस्तकें कवि शिक्षा पर लिखी हैं। पुस्तकें अरिसिंह तथा अमरचन्द का अनुकरण मात्र हैं। समाहार-यह संस्कृत साहित्य की कवि शिक्षा के क्रमिक विकास का सूक्ष्म चित्र है। समूहालंबनात्मक दृष्टि से इसे देखें तो राजशेखर और क्षेमेन्द्र दो श्राचार्य इस विषय में प्रमुख प्रतीत होते हैं इन्होंने अपनी अपनी पद्धति से विस्तार पूर्वक विषय का स्वतन्त्र प्रतिपादन किया है। राजशेखर की विद्वत्ता बहुज्ञना एव विशालता पाठक को विस्मित करती है। क्षेमेन्द्र की व्यवस्थित योजना, अनुभव हैं और निर्धान्त निर्णय हमें मुग्ध बनाते हैं। राजशेखर महान् हैं, क्षेमेन्द्र व्यावहारिका राजशेखर के विपयानगम में प्राजलता तथा व्यवस्था का अभाव है । क्षेमेन्द्र में ये दोनो गुण बहुत बढ़े चढ़े है। - अन्त में एक प्रश्न उठता है। इस प्रकार की कवि शिक्षा से कदि के निर्माण से कतल, उपकार होता है ? प्रश्न को यो समझना चाहिये । काच का ललहेतु प्रतिभा हे ' वह जन्म जात सहज होती है यह सभी मानते है। फिर शिक्षा इसका क्या उपकार करेगी ? कवियो का इतिहास इसकी अपार्थकता सिद्ध करता है। वाल्मीकि, व्यास आदि के जीवन में इस प्रकार का मार्ग प्रदर्शन कुछ था इसमें कोई प्रमाण नहीं है। फिर भी वे कवि ही क्यो कवियों के उपजीभ्य बने फिर क्या यह सब वाणी का विग्लापन मात्र है या किसी आवश्यकता की पूर्ति है ? उत्तर में केवल यही कहा जा सकता है कि जिनमें जन्मजात प्रतिभा है उनके लिये इसका उपकार केवल संस्कार मात्र का है। कला का परिष्कार कुछ नियमो के आधार पर ही हो सकता है। पर यह सब का विचार नहीं। कभी कभी परम्पराओं का ज्ञान स्वच्छन्द प्रतिभा की निसीम उडान को सीमित भी कर सकता है। इतना तो मानना ही चाहिये कि इन सबके अध्ययन से कवि चेतन हो जाता है और भावमग्न हृदय की जो उपचेतना- वस्था होती है, जिसमें श्रेष्ठ कान्य, का.जन्म होता है, वह उसके हाथ में नहीं रहती। अतः यही कहना चाहिये कि सहज प्रतिभा के लिए कवि शिक्षा कोई उपकार नहीं करती। मरियल बैलों के लिए लीक चाहिये । जानदार बछड़े तो अपनी लीक आप बनाते है। शायर तो बेलीक ही अच्छा। पर जो बीच के लोग हैं उनके लिए इसकी सहायता कम महत्व की नहीं। शिक्षण यदि सधे हुये गुरुओ द्वारा हो तो काव्य रचना में रुचि भी उत्पन्न हो जाती है। जिनकी रुचि हो उन्हे सूक्ष्म बनाने में तो इस पद्धति से सतोषजनक सहायता मिलती है। प्रतिभा वाले कवियों की रचना मे भाव की मार्मिकता तथा अनुभूति की व्यापक गंभीरता रहती है। शिक्षा प्राप्त कवियो की कृतियो में कल्पना का चमत्कार, शैली का मजाव शोर पो ला काटि खूब रहती है। हिन्दी मे कबीर नानक, दादू, मीरा बादि केवल प्रतिभा के कवि है। तुलसी, बिहारी आदि (५४) संस्कार प्राप्त प्रतिमा के। केशव अभ्यासजन्य निपुणता के कवि हैं। उनका निर्माण कविशिक्षा से क्षुया प्रतीत होता है। इन सब के कृतित्व का मूल्यांकन किया जाय तो मानना पड़ेगा कि ये दूसरी कोटि के कवि- नक्षत्रों की भी साहित्याकाश में कम चमक नहीं रही। सरस्वती की सेवा भी उनकी उपेक्षणीय नहीं मानी जा सकती। अभ्यास प्रसूत कृतियो में कल्पना का चमत्कार इतना अभ्रकष होता है कि वह मौलिकता की रेखा छू लेता है। श्री हर्ष का नैषधीयचरित' इसी प्रकार का काव्य है। वह सस्कृत काव्यो की प्रसिद्ध वृहत्रयी मे से एक है। हेमचन्द्र तो प्रतिभा के दो भेद मानते है, सहजा तथा औपाधिकी। औपाधिकी प्रतिभा अभ्यासजन्य निपुणता है जो प्रतिमा के समकक्ष ही हो जाती है । मौलिक प्रतिभा के कृती कवियो को यही चाहिये कि वे इस सीमा बंधन में न बँधे । भौरे के पंख मधु मे भीग कर अपनी उडान की क्षमता खो बैठते हैं। htionain ( ५५ ) देन संस्कृत साहित्य में क्षेमेन्द्र का अपना स्थान है जिसका महत्व किसी से कम नहीं। वे कवि, नाटककार, रीतिकार, कोषकार तथा इतिहासकार हैं। इनकी कृतियो मे काव्य, महाकाव्य, समीक्षाग्रन्थ, छंदशास्त्र के ग्रन्थ, नाटक, उपदेश प्रधान रचनाये, तथा महाकाव्य एव इतिहास काव्यों के सूक्ष्म रूपान्तर सभी प्रकार की रचनायें विद्यमान है। इन रचनाओ के रूप भी विविध हैं और विषय भी। क्षेमेन्द्र ने अपने काव्य की परिधि में जितने विस्तृत जीवनक्षेत्र को समेटा है, उतना अन्य किसी ने भी नहीं। संस्कृत साहित्य मे भोज और हेमचन्द दो कलाकार इस श्रेणी में आते हैं। पर वे न इतने विस्तृत ही है जितने कि क्षेमेन्द्र और न मौलिक तथा गंभीर ही। इसलिए जिस दृष्टि से इनका मूल्याकन होना चाहिये उस दृष्टि से ये सर्वश्रेष्ठ ठहरते है। इनके काव्यो को तीन विभागों में विभक्त कर सकते हैं। महाकाव्यों के सूक्ष्मरूपान्तर, उपदेश प्रधान रचनाए और महाकाव्य । इनमें से सूक्ष्म रूपान्तरो में काव्यतत्व नहीं के बराबर है; हो भी नहीं सकता। वहाँ कवि की प्रतिमा विस्तृत वस्तु को सूक्ष्म बनाने में व्यस्त रहती है। पर क्षेमेन्द्र ने जो कुछ किया है वह कम नहीं है। 'रामायण', 'महाभारत', 'वृहत्कथा' जैसे समुद्रकल्प ग्रन्थ साधारण पाठको के लिए सुपार सरिता बन गए। यह साधारण कार्य नहीं है । उपदेश प्रधान रचनाओ के फिर दो उपविभाग हैं। साक्षान उपदेश प्रदान करने वाली और ग्यग्य द्वारा उपदेश देनेवाली। 'चारुचर्या', 'सेव्यसेवकोपदेश' तथा 'चतुर्वर्गसंग्रह' पहली श्रेणी में हैं। इनमें कहावते तथा उपदेश दोनो को साथ साथ जोड़ देने से उनका प्रभाव द्विगुणित हो गया है। जन साधारण को उससे सुधरने का पर्याप्त लाभ होता है। व्यगप्रधान रचनाये हैं-'देशोपदेश', 'नर्भमाला', 'दर्पदलन', 'समयमातृका' और 'कलालिकास' । इनमें व्यंग के लक्ष बने हैं-धूर्त, कृपण, दर्बारी लोग, दृतियों, विट, विद्यार्थी, कायस्थ, वृद्धवर, वेश्याये, साधु संन्यासी, नौसिखिये डाक्टर और ज्योतिषी, गवैये, सुनार, व्यापारी आदि आदि।

। इनकी दुर्बलताा को सेन्द्र ने बड़े निकट से देखा है और उन्हें प्रकट करने के लिए ऐसी चुटकियॉ ली है जो निर्दय भी है और मीठी भी। समाज की ऐसो दुर्बलताये दूर न की जायें तो विष बढ़ने और समूचे समाज के दूषित होने की आशका रहती है। इसलिये क्षेमेन्द्र इनसे बचने के लिए तथा अन्त में इनकी समाप्ति के लिए व्यग- प्रक्षेपो का सहारा लेते हैं। स्वभाव से मनुष्य सामाजिक मान का भूखा रहता है। व्यग उसकी इस कोमलता पर तीखा प्रहार करता है जिससे तिलमिलाकर वह दुर्बलताआ को त्यागने तथा मानपूर्ण जीवन बिताने के लिए बद्धपरिकर हो जाता है। इनसे उदासीन व्यक्ति की इन दुबलताओं के प्रति हीन भावना तथा अपने प्रति गौरव की भावना जात होती है। फलत. साधारण लोग भी इस जाल में फॅसने से बच जाते है। इसलिए मनीषियो का विचार है कि व्यग- विधान समाज सुधार का श्रेष्ठ साधन है जिसे एक साहित्यिक कर सकता है। इसके साथ-साथ यदि कुब रचनात्मक विचार भी उपस्थित किये जाये तो फिर सुवर्ण मे सुगन्धि हो जाती है। क्षेमेन्द्र व्यग योजना ता सफलता स करते ही है, साथ-साथ रचनात्मक विचार भी व्यक्त करते हैं। 'कता विलास' मे उन्होंने ऐसा ही किया है। विविध व्यवसायों के कपट पुणे व्यवहारो का खुला वर्णन कर उनकी हँसी उड़ाई है और अन्त में युवको के लिए निष्पाप आजीविका का उपदेश दिया है। इनके व्यंग्य न तो इतने तीक्ष्ण है कि असह्य हो उठे और कवि को एकागी प्रमाणित करदे आर न इतने कामल ही है कि वे उपेक्षणीय हो जायें। उनमे सामजस्य है आर रचनात्मकता है। इस प्रकार व्यग्यकार के रूप में क्षेमेन्द्र संस्कृत साहित्य में मूर्धन्य है । इसके बाद इनका रीतिकार का रूप भी सूक्ष्मत विचार लिया जाय । इनके अन्तर्गत तीन पुस्तक आती हैं, 'कावकण्ठाभरण', 'औचित्य विचार चर्चा' और 'सुवृत्त तिलक' ! तीनो ही कृतियो का अपने-अपने क्षेत्र में अत्यन्त महत्त्व है। इनके ऊपर क्षेमेन्द्र ने संस्कृत साहित्य को आढ्य बनाया है। नवीन मार्ग की खोजकर उसे पूर्ण प्रतिष्ठा दो है। 'कविकण्ठाभरण' कवि शिक्षा पर लिखा हुआ छोटा ग्रन्थ है। इस की योजना मे कवि ने स्वोपज्ञ मार्ग अपनाया है। परम्परा का पालन नहीं किया। बुभुत्सु, कवियों के लिए चमत्कार तत्त्व को अनि- वार्य रूप से आवश्यक माना है। इसमे वे व्यावहारिक प्रतीत होते हैं।

कवि शिक्षा का प्रकार भी उनका मौलिक है। वह राजशेखर की 'काव्य मीमांसा' से इस अर्थ मे बहुत आगे है कि यह व्यावहारिक है; सर्व साधारण के लिए सुगम है। 'काव्य मीमांसा' पाडित्यपूर्ण ढंग से लिखी हुई आदशेमय रचना है जो सिद्धहस्त कवियो को भी भ्रम मे डालने वाली है । क्षेमेन्द्र ने कविता बनाने का मार्ग सुगम और सरल बनाया है । इस दिशा मे और भी अधिक महत्वपूर्ण कार्य जो उन्होने किया है वह है कवि बनने वालो की मानसिक एव शारीरिक शिक्षा का। उनका कहना है कि रचना की शिक्षा के समान ही कवि की बुद्धि का शिक्षण भी आवश्यक है। इसी सम्बन्ध में वे शारीरिक स्वास्थ्य का भी विचार किये बिना नहीं रहते ) शरीर और बुद्धि के अभेद्य सम्बन्ध को मानकर क्षेमेन्द्र ने कितनी अभिनव मान्यता प्रकट की है ? इस सम्बन्ध मे निराला जी का यह कहना याद आता है कि दण्ड लगाकर बादाम पिये बिना कवि नहीं बना जाता। औचित्य विचार चर्चा में जो समीक्षा मार्ग इन्होने दिखाया है वह सर्वथा नवान तो नहीं है, पर व्यापक तथा गम्भीर बहुत है। इसकी प्रासंगिक चर्चा तो दण्डो, आनन्दवर्धन आदि ने की है पर उसे समीक्षा क्षेत्र मे जो स्थान मिलना चाहिए वह नहीं दिया गया था। गुणदाष के प्रसंग मे आचाय लाग ओचित्य का स्मरण करते थे। दण्डी की अपेक्षा आनन्दवधन ने ओचित्य पर अधिक बल दिया है पर उनके विचार से भी वह ध्वनि का गौण अङ्ग है। काव्य का आत्मतत्त्व तो किसी के मत से अलकार, किसी के मत से रीति, दूसरे की दृष्टि मे रस और तीसरे के सिद्धान्त मे ध्वनि है। क्षेमेन्द्र ने इन सब विचारो को एक ओर रखकर औचित्य को रसादि का मूलतत्त्व सिद्ध किया है। उनके विचार से काव्य की आत्मा औचित्य है और वह भी इसलिए कि औचित्य के बिना रस, अलकार, ध्वनि आदि अकिंचित्कर हैं। वे काव्य के विधायक तत्त्व नहीं हो सकते। इन सब के प्रयोग में औचित्य है तो वे अपना अभीष्ट प्रभाव डालते है अन्यथा नहीं। फलतः यही सिद्ध होता है कि जिन्हे काव्य का मूल समझा जाता है उनका भी मूल औचित्य है। इस विचार से क्षेमेन्द्र बड़े विवेकी सिद्ध होते है कि उन्होंने रसादि के महत्त्व का खण्डन नहीं किया। उनके साथ औचित्य को अनुस्यूत किया है। उनकी प्रतिमा स्वीकारिणी है तिरस्कारिणी नहीं।

औचित्य सिद्धान्त में औरों की अपेक्षा अधिक निश्चयात्मकता है। वह रस, ध्वनि, अलकार, गुण, दोष आदि से भिन्न है और माधारण वुद्धि गम्य है। क्योकि औचित्य का आधार जीवन का स्थूल दैनिक रूप है। जीवन मे सवकी दृष्टि से जो उचित है वही काव्य में भी उचित है। फिर किसी पद्य में एक की दृष्टि से काव्यत्व अथवा रस, ध्वनि आदि है और दूसरे की दृष्टि से नहीं है, इस दुविधा के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता। संस्कृत के समीक्षा अन्थो में अनेक ऐसे स्थल पाये जाते है जहाँ एक आचार्य के अनुसार काव्यत्व है और दूसरे की दृष्टि से उसका अभाव । औचित्य सिद्धान्त के अनुसार काव्य समीक्षा की जाय तो इस प्रकार की सदिग्धता और अनिश्चितता नहीं रह जाती। समीक्षा मार्ग में विषयापेक्षता का अंश जितना अधिक होगा उतनी ही कला लोकजीवन के निकट आ जाती है। वस्तुजगत जो हमारी ज्ञान को परिधि में रहता है, उसके आधार पर कला का मूल्यांकन होने लगता है और वह जन साधारण की पहुँच के अन्तर्गत हो जाती है । यह कला के प्रसार और परिष्कार दोना के लिए ही लाभदायक है। औचित्य मार्ग में यह बात विद्यमान है। उसका आधार जीवन है । इस मत में साहित्य जीवन से ऊपर किसी दूसरे लोक की रचना नहीं। इसी से उत्पन्न विचार सूष्टि है। रसादि सिद्धान्तों के प्रतिपादन के अवसर पर जो जहाँ तहाँ 'सहृदयैकसवे- ग्रता' का पुट लगा मिलता है उसकी यहा आवश्यकता नहीं पड़ती। वास्तव में इस 'सहृदयैकसंवेद्यता' को दुहाई लग जाने पर कला समीक्षक का विवेक हारकर बैठ जाता है। आगे बढ़ने के उसके सब रास्ते बंद हो जाते है। फिर कला के नियंत्रण का अंकुश हट जाता है। वह स्वच्छन्द क्या स्वैरिणी हो जाती है । समीक्षाशास्त्र अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के अति शृगार परक रूप की ओर जो उंगली न उठा सका उनका कारण समूह कुछ ऐसा ही था। कोई कुछ कहता तो असहृदय बनाकर साहित्य की मैफिल से बाहर निकाल दिया जाता। औचित्य को कला समीक्षण का आधार मान लेने पर इस प्रकार की कुञ्झटिका हट जाती है। रस अलंकार आदि के अनुयायी कवियों में जो प्रायशः अतिगामिता दिखाई पड़ती है उसमें औचित्य पर दृष्टि का न रहना (५६) ही कारण है। बाण की रसैकपरकता, माघ की अलंकारैकलक्ष्यता इसमें प्रमाण हैं । हिन्दी साहित्य में रीतिकाल के अलंकारवादी केशव तथा ध्वनिमार्गी विहारी इसी श्रेणी के साहित्यकार हैं। इनमें कोई रस को ही तथा कोई अलंकार को ही कविता का सर्वस्व मानकर रचना करते हैं। इसलिए रसवादी के काव्य मे रस की मात्रा अति तक पहुँच जाती है और दूसरे तत्व अलंकार, भाषा, आदि उपेक्षित रह जाते हैं। वास्तव में जिस प्रकार सामंजस्य जीवन को सुस्थिर एव सुबस बनाता है उसी प्रकार काव्य को भी। सामजस्य औचित्य का दूसरा नाम है । आचार्य क्षेमेन्द्र औचित्य को महत्व देने मे इसी प्रकार की धारणा रखते है। यही कारण है कि उन्होने अपने मत की प्रतिष्ठा मतान्तरों के खंडन से नहीं की। वे समझते थे कि काव्य की शरीर पुष्टि इन सभी से होती है। हां, यह अत्यत अपेक्षित है कि संघटन मे जिस तत्व की जितनी और जहाँ पर आवश्यकता है वह उतना हो और वहीं पर प्रयुक्त हो। इस औचित्य को रक्षा सदा होनी चाहिए । यही उस शरीर के संधारण का एकमात्र आधार है। जिस प्रकार आयुर्वेद के अनुसार बात, पित्त, कफ के सामंजस्य से संघटित हुए शरीर मे यदि किसी एक तत्व की अति वृद्धि हो जाय तथा शेष दो का ह्रास हो जाय तो शरीर ही का वास या विनाश हो जाता है। इसी प्रकार औचित्य मार्ग के प्रवर्तक आचार्य क्षेमेन्द्र औचित्य के अभाव मे रस, अलंकार सब कुछ के रहने पर भी काव्यत्व का अभाव समझते हैं। । में दोष की समस्या भी केवल औचित्य के आधार पर सुलझती है । जो उचित है वह गुण है, जो अनुचित है वह दोष है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं समझना चाहिए कि औचित्य का अन्तर्भाव गुण दोष में हो जाता है। औचित्य इससे पृथक् स्वतत्र तत्व है। समीक्षको ने गुण दोष की पहले पहल कल्पना की तो वे अलंकार आदि की भॉति स्वतंत्र माने गए। पर बाद में जब यह अनुभव हुआ कि गुणत्व या दोषत्व कोई स्थिर स्वभाव के गुण नहीं । जो एकत्र गुण है वही अपरच दोष बन जाता है इसी प्रकार दोष गुण बन जाता है तो फिर टनमें नित्यानित्य की व्यवस्था माननी पड़ी। उसमें भी इदमित्थं कुछ नहीं कहा जा सकता। इसीलिए भोज की तो मान्यता यही है कि सब दोष उचित प्रयुक्त हो तो गुण बन जाते हैं। उदाहरण के लिए च्युतसंस्कृति नित्य दोष है। पर भट्टीकार ने सीता वियोग में विक्लबचेता राम के मुख से व्याकरण च्युत शब्दों का प्रयोग कराकर ही उनकी विक्षिप्तावस्था की व्यजना की है। इस तरह कहा जा सकता है कि गुण दोष व्यवस्था के मूल में एक मात्र निर्णायक तत्व औचित्य ही है और वह इतना व्यापक तथा गंभीर है कि उसके मान लेने पर इनकी संख्या बढ़ाने तथा विभाग उपविभाग करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। फलतः कह सकते है कि समीक्षा क्षेत्र में क्षेमेन्द्र ने बहुत बडे अभाव की पूर्ति की है। समीक्षको की आदर्शमात्र गामिनी दृष्टि को व्यावहारिकता प्रदान की है, उसे समन्वय तथा सामजस्य की ओर प्रेरित किया है। वे काव्य और जीवन को एक दूसरे के निकट लाये है। समीक्षा जैसे व्यक्तिपरक शास्त्र मे विषयापेक्षता का पुट लगा कर उसे जीवन दिया है। काव्य के मूल्यांकन में औचित्य का जो महत्त्व इन्होंने समझा था उसे दूसरे आचार्य अनुभव न कर सके। उनकी दृष्टि उन्हीं पुराने मार्गों के महत्त्व में फिर भ्रान्त हो गई। इसलिए यह तत्त्व उन्होने गुण दोष में अन्तभूत मान लिया। वास्तव मे उससे कहीं व्यापक और कहीं गम्भीर यह पृथक गुण था । आचार्य क्षेमेन्द्र ने भी इसकी चर्चा मात्र की थी। इसकी विशद् व्याख्या में यदि वे अन्य मतो का खडन करते हुए पाण्डित्य पूर्ण ढग से विशाल ग्रन्थ लिखते तो संभवतः अर्वाचीन लोग इनके अनुवतेक बनते और भारतीय समक्षा का मार्ग बहुत परिवर्तित हो जाता। काव्य कला आदश के दिव्य लोक से उतर कर यथार्थ जीवन के भूलोक में आ जाती। फिर भी क्षेमेन्द्र ने औचित्य की इस प्रकार व्याख्या की है कि काव्य के सभी तत्त्व गुण, दोष, अलंकार, ध्वनि, रस, वक्रता, शब्द, अर्थ आदि उसमें समाते हैं। पाश्चात्य समीक्षा में जैसे कला कृतियों पर सर्वाण विचार करने की पद्धति है वैसी भारतीय समीक्षाओ में नहीं है। वे काव्य को खंडश' पकडती है। एक विशेष दृष्टि से कृत्यिो की समीक्षा की जाती है। अलंकारवादी चमत्कार तत्व पर विशेष दृष्टि रखता है। उसी भाव से काव्य जगती में प्रवेश करता है। इसी - प्रकार रसवादी, ध्वनिवादी आदि है। इनकी पहुँच चरित्र-चित्रण आदि तक नहीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि काव्य का स्वरूप इन सबसे बहुत अधिक है। क्षेमेन्द्र ने दृष्टव्यता की एक कसौटी स्थिर की है। उस पर काव्य ही नहीं सब प्रकार की कलाओ को कसा जा सकता है। उसकी तह मे यह मान्यता छिपी है कि काव्य या अन्य कोई कला जीवन का प्रतिबिम्ब है। उसके परखने का मानदण्ड जीवन से लेना चाहिये। कला कला के लिए नहीं, जीवन के लिए है, जीवन से प्रसूत और जीवन द्वारा ही परीक्षणीय है। इस दृष्टि से क्षेमेन्द्र का कृतित्व बहुत बढ़ जाता है । उन्होने समीक्षा की नई रेखाये खींची हैं। क्षेमेन्द्र ने साहित्य की अनेक दिशाओ में कार्य किया है। १-उन्होंने इतिहास दिशा मे भी कार्य किया था। कल्हण ने सूचना दी है कि उन्होने राजाओ की सूची, 'नृपावली' पुस्तक लिखी थी । २-दामोदर गुप्त की परम्परा में व्यग्य काव्य ( Satirical poetry) की दिशा मे भी क्षेमेन्द्र स्मरणीय है। उन्होने अपनी 'कला विलास' रचना में विभिन्न ब्यवसायो के कपट पूर्ण व्यवहारों पर व्यग्य कसे हैं। ३-इन्होने स्वतन्त्र काव्य, नाटक, वर्णनात्मक काव्य, नीति उपदेश प्रधान रचनायें, व्यग्य काव्य, अलकार शास्त्र, छन्द शास्त्र, काम शास्त्र तथा रामायण महाभारत वृहत् कथा, बौद्धावदान, वाणकृत कादम्बरी तथा वात्स्यायनकृत काम शास्त्र के सूक्ष्म रूप पद्य में किये हैं। इनके अतिरिक्त संस्कृत का स्यात दूसरा कोई अन्य कवि फुटकल काव्य का इतना बडा प्रणेता नहीं हुआ। वे बहुज्ञ, परिष्कृत तथा नियमित है । ज्ञान की विविधता और बहुज्ञता ने इनकी शैली में लौकिक सजीवता ला दी है । इनकी मौलिकता के दर्शन उन बड़ी-बड़ी रच- नाओ में नहीं दिखाई देते जिनमें कवि ने परिश्रम किया है, बल्कि छोटी छोटी सहज रूप से लिखी कृतियो मे कवि का श्रेष्ठ रूप व्यक्त हुआ है। कवि प्रकृत्या लौकिक है। लोक को काव्य में उतारने की प्रज्ञा उसमें है। 'समय मातृका' में कुरूप प्रेमियो पर व्यंग्य कसने, वेश्या के कपट पूर्ण व्यवहागे का खाका खींचने, वैश्या जीवन का यथार्थ रूप दिखाने मे कवि पूर्णतः सफल है। अनेक अर्थों में वह भौतिक है। इनकी शैली में तीक्ष्णता, व्यंग्य प्रधानता एवं अन्यता है। हास्यव्यंजक दृश्य घटनायो एवं व्यक्तियों के वर्णन के लिए इनकी प्रतिभा अत्यन्त सक्षम है। लोक व्यवहार मे निपुणता तथा सफलता प्राप्त करने की दिशा में भी कवि की बहुज्ञता ने कार्य किया है । 'सेव्यसेवकोपदेश', 'चरुचर्या' 'चतुर्वर्गसग्रह' तीन रचनायें इसी दिशा के प्रयत्न हैं। इनमे कवि का लोक जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण अत्यंत प्रशंसनीय है। मानव की दुर्वलताओं को कवि ने व्यंग्य का विषय बनाया है। 'दर्प दलन' रचना में उन्होंने मनुष्य के दर्प पर व्यग्य कसे हैं। दर्प की उत्पत्ति जन्म, धन, विद्या सौन्दर्य, वीरत्व दान और तप आदि से होती । पर ये सभी विषय विवेकी के लिए उपहसनीय हैं। 'कला विलास' मेवैद्य, वेश्य, व्यापारी, सुनार, गवैया, शेखीखोर, भिखारी, साधु आदि के दाम्भिक जीवन पर व्यग्य के छींटे छोड़े हैं। 'देशोपदेश' तथा 'नाम माला' में भी काश्मीर के देशीय जीवन का, वहाँ के अत्याचार, दाम्भिक व्यवहार और व्यभिचार का चित्रण है। देशोपदेश रचना में हवा में किले बनाने वाले खल, दीनमलिन लालची कृपण, दूसरों के हाथों में गुडिया की भॉति खेलने वाली बुद्धिशून्य वेश्या, सर्पिणी तुल्य कुटिल कुट्टिनी, भड़कीले वेश में बन्दर सा प्रतीत होने वाला विट, दुर्बल बंगाली बाबू जो काश्मीर की जलवायु के प्रभाव से दुःसाहसी बन गया है, नव विवाहित वृद्ध पुरुष, पतितशैव, धूर्त कायस्थ और उसकी चंचल चित्त पत्नी, चालाक व्यापारी, शेखीखोर रसायनिक, मिथ्या तपस्वी, अहंकारी वैयाकरण आदि के हृदयग्राही रेखाचित्र दिये गये हैं। 'नाम माला' में भी उसी प्रकार विविध रेखाचित्र दिये हैं पर इसमें काश्मीर मे कायस्थों के द्वारा राज्य मे फैलाये व्यभिचार का वर्णन विशेष हुआ है। एक ही कायस्थ अपनी चालाकी के बल से गृह कृत्याधिपति, परिपालक (प्रान्त का शासक) लेखोपाध्याय, गंजदिविर (Chief Accountant) तथा नियोगी आदि बन बैठा है। इन रचनाओं में एक ओर काश्मीर के स्थानीय जीवन का चित्रण है दूसरी ओर जीवन के साधारण रूप के दंभ का भी उद्घाटन किया है। यहाँ भी कवि के व्यग्य कसने का गुण प्रमुख प्रतीत होता है। ।

(६३) समाज के दैनिक जीवन का चित्रण जम्हण (१२वीं शती) ने अपने 'मुग्धोपदेश' ग्रन्थ में किया है । पर वहाँ कवि गंभीर और नैतिक बना रहता है। विषय के उचित निम्न स्तर पर उतर कर उसका यथार्थ चित्रण नहीं करता। इसी प्रकार का दूसरा प्रयास दाक्षिणात्य कवि नीलकठ दीक्षित का 'कलि विडम्बना' है। इसमें भी शिष्टता एव नैतिकता पर विशेष दृष्टि है। प्रतिपाद्य का यथार्थ चित्रण नहीं हुआ। इसमें सफलता जितनी क्षेमेन्द्र को मिली है उतनी अन्य किसी को नहीं। WLON

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( ६५ ) छंद विचार जो एक झटके । छन्दों का विवेचन करने के लिये क्षेमेन्द्र ने 'सुवृत्त-तिलक' ग्रन्थ की रचना की है। इसका महत्व पहचानने के लिये यह आवश्यक है कि इस विषय का इतिहास सूक्ष्म रूप से देख लिया जाय। इतिहास साहित्य के अन्य विषयों की भॉति छन्दो पर भी सस्कृत में बड़ा विस्तृत विचार हुआ है। संस्कृत साहित्य में छन्दो की संख्या संभवतः संसार के सभी साहित्यो की अपेक्षा अधिक है। उनके स्वरूप का विवेचन भी बड़ी व्यवस्था के साथ किया गया है। साधारणतया छन्दों के दो भेद हैं-मात्रिक और वणिक । मात्रिक छन्दो के आकार की गणना उसके अक्षरो से, जिसे मात्रा कहा जाता है, की जाती है। मात्रा उच्चारण की उस ध्वनि का नाम है जिसमे एक स्वर हो और एक झटके मे बोली जाती है। व्यजनो की इसमे गणना नहीं की जाती। हस्व स्वर की एक मात्रा और दीप की दो मात्रायें मानी जाती है । इस प्रकार 'काम' शब्द तीन मात्राओ का माना जायगा। अंतर इन छन्दो का यह है कि यहाँ लघु गुरु ध्वनियो के विन्यास का कोई नियम नहीं होता । केवल मात्राओ को गणना होती है । वर्णिक छन्दो मे लघु गुरु वर्णो के यथा स्थान विन्यास का नियम रहता है। वर्ण भी मात्रा के समान एक स्वर या व्यजन सहित स्वर को कहते हैं । छांदिक लोगो ने वर्णों की गणना के लिये गणो की सूत्रात्मक पद्धति बनाकर बड़ी सुविधा कर ली है। तीन वर्णो का एक गण होता है और वे लघु गुरु के विपर्यय से ८ है। उदाहरण के लिये 'कुमारी' शब्द आदि में लघु तथा दो गुरु वर्णो का यगणात्मक ध्वनि- समूह है। मात्रिक छन्दो की अपेक्षा वर्णिक छन्दो की संख्या तथा प्रयोग सस्कृत मे अधिक हुए है। संस्कृत छन्दो में मात्रा या वर्ण एक से लेकर छब्बीस तक एक पद में होते है। एक छन्द मे प्रायः चार पद रहते है। वे परस्पर में समान भी होते है और भिन्न भी। कहीं कहीं पहले और तीसरे तथा दूसरे और चौथे आपस में समान हो जाते है। इस प्रकार छन्द क्रमशः सम, विषम, एवं अर्द्धसम होते है। ।

, छन्द का जन्म तो साहित्य के साथ ही साथ हो जाता है। हमारे देश के साहित्य में इस पर शास्त्रीय विचार भी वैदिक-काल में ही प्रारम्भ हो गया था। ब्राह्मा, श्रौतसूत्र तथा अनुक्रमणी ग्रन्थो में छन्द विचार के पूरे पूरे अध्याय मिलते है। छन्द को वेदाग माना जाता है, वे उसके पाद है। 'छद. पादौ तु वेदस्य ।' इसके लिये पहले पिगल का 'छन्द-सूत्र' प्रसिद्ध था। पिंगल ऋषि माने जाते हैं और 'छन्द-सूत्र' श्रौत एव गृह्यसूत्रो का समसामयिक समझा जाता । कुछ लोग महर्षि पतजलि को भी पिंगल बताते है पर यह नि सन्दिग्ध नहीं है। भरत ने प्रसंगत. छन्दो के महत्व का उल्लेख किया है। उनके विचार से सारा वाङ्मय छन्द है, 'छन्दोहीनो न शब्दोऽस्ति न छन्द. शब्दवर्जितम् ।' पिंगल महर्षि पिंगल संस्कृत के छन्द शास्त्र के इतिहास मे सर्वप्रथम आचार्य है। उनका ग्रन्थ 'छन्दः सूत्रम्' अपने विषय को पूर्ण और प्रौढ़ रचना है। वह अपने से पूर्व के दीर्घ कालीन विकास की सूचना देती है। यह कहने को तो वेदाग है पर इसमें विवेचन लौकिक छन्दों का ही है। ऐसे छन्दो का भी उल्लेख इसमे किया गया है जो सस्कृत साहित्य की उपलब्ध राशि में कहीं प्रयोग में नहीं आते ? संभवतः वे उस समय जनपद साहित्य के छन्द रहे हो । भरत महर्षि पिंगल के बाद आचार्य भरत आते है। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ नाट्यशास्त्र में (अध्याय १४-१५) छन्दों का विचार किया है। वहाँ लौकिक और वैदिक दो प्रकार के छन्दो का उल्लेख हुआ है। छन्दों की संख्या ६८ है। आर्या छन्द पाँच प्रकार का माना है। भरत का समय ईसा की दूसरी या तीसरी शताब्दी माना जाता है। बाराह मिहिर बाराह मिहिर ज्योतिष के आचार्य थे। उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ घृहत्संहिता इसी विषय की रचना है। पर उसके १०४ वें अध्याय में प्रसंगवश ६३ छन्दों का उल्लेख हुआ है । बाराह मिहिर ईसा की छठी शताब्दी के विद्वान हैं।

(६७) अग्नि पुराण इसके अनन्तर छन्दो का उल्लेख ७ वीं शताब्दी के अग्नि-पुराण में हुआ है ३२८ से लेकर ३३५ तक ८ अध्यायों में पुराणकार ने छन्दों का विवेचन किया है, इसमे छन्दों का विभाजन, क्रम, तथा प्रतिपादन की शैली सब 'छन्द-सूत्र' के अनुसार हैं। श्रुतपोध श्रुतबोध इस विषय की छोटी पर महत्वपूर्ण रचना है। इसके रचयिता महाकवि कालिदास म ने जाते हैं। किंवदन्त है कि उन्होने अपनी पत्नी लीलावती को छन्दो का ज्ञान कराने के लिये यह पुस्तिका लिखी थी। इस कल्पना का आधार पुस्तक की सरस शृंगार प्रधान शैली तथा बार बार प्रियतमा के लिये कहे गये प्रेमप्रवण सबोधन हैं। लक्षण और उदाहरण एक ही पद्य मे आ जाते हैं क्योंकि जिस छन्द का लक्षण किया जाता है वह उसी छन्द मे होता है। यति के विषय में ग्रन्थकार विशेष सावधान है। रचना बड़ी विशद एव सरस शैली मे लिखी गई है। वह शास्त्र होते हुए भी काव्य है । क्षेमेन्द्र के शास्त्र काव्य का यह ठीक उदाहरण है। क्षेमेन्द्र इसके बाद प्राचार्य क्षेमेन्द्र आते हैं। उनकी रचना 'सुवृत्त तिलक' आकार में बहुत बड़ी नहीं है। इसमे कुल १२४ कारिकायें हैं जो तीन विन्यासों म विमक्त है। इन्हीं में छदो का स्वरूप परिचय, गुण दोष विवेचन तथा प्रयोग का विचार किया गया है। लेकिन छदों की जिन समस्याओ को इसमे उाया गया है और उन पर जिस ढंग से विधारणा हुई है वह सब बड़े महत्व का है। पहले आचार्यों ने छंद विचार करते समय उनके लक्षण और उदाहरण हो दिखाये हैं। यह प्रतिपादन रूक्ष भी है और स्थूल भी। क्षेमेन्द्र का विचार बड़ा सूक्ष्म और भावुकता पूर्ण है । उन्होने छदो के गुण दोष तथा प्रयोग विध पर भी बड़ा विशद विचार उपस्थित किया है । छद विमर्श की यह नई दिशा उन्होने खोली है। क्षेमेन्द्र का सर्वतोमुखी व्यावहा- रिक प्रतभा ही इसे पहचान सकी तथा इस पर चिन्तन उपस्थित कर सकी। उनसे बाद के आचार्य इनके मार्ग पर चलने तक का माइस न प्राप्त कर सके । इतनी सूक्ष्मता इस में है। ३ (६८) मथ की योजना इस प्रकार है। इसमें कुल तीन विन्यास हैं। पहले विन्यास में २७ छेदों के लक्षण तथा उदाहरण दिये है। केवल एक को छोडकर सभी उदाहरण कवि के अपने है। छन्दो का चुनाव व्यावहारिक दृष्टि से हुआ है। जिनका कवि लोग प्रायः प्रयोग करते हैं उन्हीं पर विचार हुआ है। इनमें ६ अक्षरों वाले छन्दों से लेकर २१ अक्षरों के छन्दो तक का उल्लेख है। प्रथम विन्यास के अन्त मे कवि ने स्पष्ट कहा है कि 'प्रचुर एवं रुचिर छन्दो का यह वर्णन इस लिये किया गया है कि वे ही अपेक्षाकृत अधिक सरल है, सब प्रकार के काव्यों में इनका प्रयोग होता है। ये ही सुकवियों के परिचित हैं। ये ही कर्ण प्रिय है। इनमें परुप वर्ण, विषम मात्रायें तथा दुष्ट विराम आदि कुछ नहीं हैं। इन्हीं का बिचार जिज्ञासुओ के लिये हितकारक हो सकता है। इति सरल तरत्वात् सर्वकाव्योचितत्वात्, सुकवि परिचितत्वात् कीर्णकर्णामृतत्वात् । परुष विषम मात्रा दुर्विरामोज्झितेयम, प्रचुर रुचिर वृत्त व्यक्तिरुक्ता हिताय । दूसरा विन्यास छन्दों के गुण दोष विवेचन का है। इस प्रसंग में छः से लेकर दस अक्षरो तक के पाँच छन्दो को क व्य के अनुपयुक्त समझकर उन्होंने छोड़ दिया है। जैसे मालनी की बालकली की नोक पर भौरी नहीं बैठ सकती, उसी प्रकार ऐसे छोटे छन्दो पर काव्य भारती विश्राम नहीं करती। न षट् सप्ताक्षरे वृत्ते विश्राम्यति सरस्वती । भृगीव मल्लिका बाल-कलिका कोटि संकटे। दूसरे विन्यास में छन्दों का गुण दोष विवेचन किया गया है। यह सामान्य और विशेष दो प्रकार से हुआ है। सामान्य रूप से छन्दों के विषय में क्षेमेन्द्र का विचार है कि गभीर साहित्य छोटे छन्दो में नहीं लिखा जाना चाहिये। दस तक अक्षरो के पाद वाले छन्द उनकी दृष्टि में छोटे ही हैं। छोटे छन्दो मे गति प्रायः द्रत तथा बड़े छन्दो में विलबिन होती है। इसलिये छोटे छन्दो म समस्त तथा बड़ी में असमस्त शब्दो का प्रयोग होना चाहिये। अवसरवश इसमे अपवाद भी किये जा सकते है पर सामान्य नियम यही है। छन्दों की समीक्षा में प्रारम्भ के चार छन्द छोड़कर अनुष्टुप से लेकर उन सभी छन्दो पर विचार किया है जिनके लक्षण पहले - । (६) विन्यास में दिये गये हैं। समीक्षा में तीन बातों का ध्यान रखा गया है, गति, विश्राम और विषय । इनमें भी पहले दो तत्वो को प्रमुखता दी है। इन दृष्टियो से छन्दो में शब्द योजना का सुझाव कवि ने दिया है। तीसरा तत्व विषय आगे तीसरे विन्यास में विवेचित हुआ है। अच्छा होता यदि वह दूसरा विन्यास बनता और दूसरा उसके बाद आता। इससे समीक्षा का आधार स्पष्ट हो जाता। किस छन्द मे कैसी गति होनी चाहिये इसका संकेत क्षेमेन्द्र को छन्दो के नामों में मिला है। उदाहरण के लिये 'शार्दूल बिक्रीडित' छन्द लिया जाय । इम शब्द का अर्थ है शेर की क्रीडा'। इससे संकेत मिलता है कि इस छन्द में सिंह की क्रीडा की सी मस्त गभीर गति होनी चाहिये। वह समतल और ऊर्ज स्वत हो। प्रारंभ में साधारण पर उत्तरोत्तर उत्कर्ष प्रधान होनी चाहिये। इस प्रेरणा से आचार्य का सुझाव है कि इसका प्रारम्भ 'आ' ध्वनि वाले अक्षर से और अवसान विसर्गों वाले शब्द से होना चाहिये। प्रारम्भ के पदो में हल्की असमस्त भाषा और उत्तरार्ध में समासों का भारापन लिये हुये हो। मध्य में 'ओ' ध्वनि नहीं होनी चाहिये। इससे छन्द का लय चढ़ती उतरती सी है। उसकी समता लुप्त हो जाती है। अपनी बात की पुष्टि में भवभूति का एक बड़ा अच्छा पद्य उदाहृत किया है। रावण को सभा हनुमान कहते है कि 'हे रावण, यदि अज्ञान से अथवा प्रभुता के घमंड में तुमने सीता का हरण हमारी पीठ पीछे कर लिया है तो अव उन्हें छोड़ दो। अभी तो बात मेरे हाथ मे है। नहीं तो लक्ष्मण के उछलते हुए रक्त सने वाणो से जब दिशाएँ ढंप जायेगी तो तुम पुत्रो सहित उन्हीं की छाया में मृत्युलोक को जाओगे।' अज्ञानाद् यदि वाविपत्यरभसादस्मत्परोक्षहृता, सीतेयं प्रतिमुच्यता शठ, मरुत्पुत्रस्य हस्तेऽधुना। नो चेल्लक्ष्मण मुक्त मार्गणगणच्छेदोच्छलच्छोणित, च्छत्रछन्न दिगन्त मन्तकपुरं पुत्रवृतो यास्यसि ॥ इस पद्य मे भाव और छंद दोनों की दृष्टि से शब्द योजना ठीक है। पूर्वार्ध मे क्षमाभाव दिखाया गया है उत्तरार्ध में क्रोध । उसी के अनुसार पहले असमस्त हल्की भाषा और बाद में समासो की गौरवपूर्ण भाषा व्यवहृत हुई है। छन्द की भी यही माग है। इसी शैली से छन्दों की समीक्षा हुई है।

(0) विन्यास की समाप्ति पर बताया गया है कि समीक्षा में गुण दोषों का विवेचन अत्यन्त सुक्ष्म है। यह सूक्ष्म एवम् कोमल प्रतिभा वाले व्यक्तियो के हा अनुभव की वस्तु है। विविध रूप वाल। वाणी के गुण अवगुण जो लोग जानते है, दोषो के अत्यन्त सूक्ष्म रूप को भी.जो अनुभव कर लेते है वही लोग इस विवेचन को ठीक ठीक समझ सकेंगे। तीसरे विन्यास में वर्ण्य विषय की अपेक्षा से छन्दो का विवेचन किया गया है। किस विषय अथवा किस भाव के लिये कौन सा छन्द प्रयुक्त करना चाहिए यह इसका विवेच्य विषय है। इस संबंध में भी उन्होंने कुछ तो साधारण नियम बताये है और कुछ विशेष । साधारण नियम इस प्रकार है. कविता चार प्रकार की हो सकती है। १--शास्त्र २-काव्य ३-शास्त्र काव्य ४--काव्य शास्त्र शास्त्र से तात्पर्य उन ग्रन्थो का है जिनमें काव्य के अंग व्यांगों के स्वरूप तथा गुण दोषो का विवेचन किया जाता है जैसे काव्य प्रकाश, साहित्य दर्पण आदि। इसका अर्थ अधिक से अधिक स्पष्ट हो तभी पाठकों का उपकार हो सकता है। अर्थ की स्पष्टता अनुष्टुप छन्द से अधिक आती है अतः शास्त्र के लिये अनुष्टुप छन्द Ho- उपयुक्त है। काव्य में विशिष्ट प्रकार के शब्द और अर्थ का अलंकारों के साथ मेल होता है । उसमें रस और वर्णन के अनुरूप सब प्रकार के छंदों का यथा स्थान प्रयोग करना चाहिये। शास्त्र काव्य वह है जिनका रूप तो इतिवृत्तामत्क पर विषय काव्य के समान रहे । इसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चतुर्वर्ग का वसन उपदेशात्मक पद्धति से होता है। इसमें भी बड़े बड़े छेदों का प्रयोग नहीं करना चाहिये। काव्य शास्त्र इससे विपरीत होता है। वह रूप में तो ललित एवम् चमत्कार युक्त होता है पर प्रतिपाद्य विषय शास्त्रों का सा रूक्ष होता है। संस्कृत में मट्टिकाव्य तथा भौमक काव्य इसके उदाहरण ( ७१ ) है। भौमक काव्य काश्मीर में लिखा गया था भहि काब्य आज भी पठन पाठन मे आता है। इससे ब्याकरण साहित्य आदि विषयों की शिक्षा ललित शैली में राम की कथा के सहारे दो गई है। कि वदन्ती है कि कभी पढ़ाते समय बिल्ली गुरु और शिष्यों के मध्य से निकल गई थी। इसलिये एक वर्ष का अनध्याय करना पड़ा। गुरु ने फिर रामकथा सुनाना प्रारम्भ कर दिया और उसी में वह सब कुछ पढ़ा गय जो उन्हें पढ़ाना था। इसमे छन्दो का प्रयोग विभिन्न रसों के अनुसार किया जाता है। केशव की कवि प्रिया, रसिक प्रिया आदि काब्य शास्त्र । चौथा प्रकार शुद्ध साहित्य का है। इसमें विशिष्ट शब्द और अर्थ का मेल अलंकार युक्त शैली में किया जाता है। छन्दो का प्रयोग इसमें रस और वर्णन के अनुरूप होता है। इस आनुरूप्य को स्पष्ट करने के लिये क्षेमेन्द्र ने पंद्रह छन्दो के विषय और भाव का उल्लेख किया है। वह इस प्रकार है। १--अनुष्टुप-शमादिका उपदेश २-उपजाति-शृगार के आलंबन-उद्यीपन ३-रथोद्धता--चन्द्रोदय आदि शगार-उद्यीपन । ४--वंशस्थ--नीति ५-वसंततिलका-वीर तथा रौद्ररस का मिश्रण ६-मालिनी--सर्ग के अन्त में । ७-शिखारिणी-युक्तियो द्वारा वस्तुओं में भेद प्रदर्शन। ८-हरिणी-उदारता, औचित्य आदि । ६-पृथ्वी-आक्षेप, क्रोध, धिक्कार आदि । १०--मंदाक्रांता-वर्षा, वियोग का व्यथा आदि । ११-शार्दूलविक्रीडित-शौय वर्णन । १२-स्रग्धरा-पवन आदि का वेग वर्णन । १३-दोधक, तोटक तथा नर्कुट-मुक्तक शैली के सुक्त। यह क्षेमेन्द्र का सविशेष विचार है। साधारण रूप से अपना मंतव्य उन्होने इस प्रकार दिया है। सिद्ध हस्त कवियो के हाथ में पड़ कर सभी छन्द योग्य बन जाते हैं। गोग्रह के संग्राम के समय विराट पुत्र के साधारण अश्व भी अर्जुन के हाथों में आकर विशेष बन गये थे। फिर भी अवस्था । । ( ७२) और भावों के अनुरूप जो छन्दो का प्रयोग होता वह विशेष उत्कर्ष उत्पन्न करता है। यदि कोई व्यक्ति कमर की मेखला गले में पहन ले तो उससे पहनने वाले की अज्ञता ही प्रकट होगी। जिस प्रकार नवयुवती के योग्य वृद्ध पुरुष नहीं हो सकता उसी प्रकार सरस भावो के लिये रूखे छन्द तथा रूखे भावो के लिये सरस छन्द अनुपयुक्त होते हैं। बड़े बड़े महा कवियो ने यद्यपि अनेक छन्दों का सफलता पूर्वक प्रयोग किया है फिर भी उनकी सिद्ध किसी विशेष छन्द मे ही रही है। कवियो को अधिक प्रयोग अपने सिद्ध छन्द का ही करना चाहिये। इस विषय में संस्कृत के कुछ कवियों के नाम लिये जा सकते हैं। जैसे- विद्याधर अनुष्टुप पाणिनि उपजाति भारवि-- व शस्थ रत्नाकर-वसंततिलका भवभूति-शिखरिणी कालिदास-दाक्राता राजशेखर-शादूलविक्रीडित ऊपर जो छन्दो का विषयवार विवेचन किया है वह प्रायिक समझना चाहिये। कवियो का अपने अभ्यस्त छ द का ही प्रयोग करना चाहिये जिनके वश में पाणी नहीं होती वे यदि बारबार छन्द बदलते है तो प्रबन्ध बिगड़ जाता है। सिद्ध कवीश्वर सब प्रकार से सफलता ले लेते है। हिन्दी मे केशव और तुलसी इसके उदाहरण है। केशव ने रामचंद्रिका में छन्दो को शीघ्र-शीघ्र परिवर्तित किया है। इसस रसका संतान कहीं नहीं बंधता। तुलसी ने अनेक छ दो का यथास्थान सफलता से प्रयोग किया है। अपने अभ्यस्त छ द मे विशेष सफलता प्राप्त करने वालो में विहारी, मीरा, महादेवी वर्मा आदि का उल्लेख किया जा सकता है क्षेमेन्द्र क उपयुक्त विमर्श से कुछ साधारण निष्कर्ष निकाले जा सकते है जो इस प्रकार है:- । - १-संस्कृत छन्दों के प्रभाव गति आदि का संकेत उनके नामों मे रहता है जैसे मैदाक्रांता, द्रुत-विलवित, शार्दूलवि क्रीडित आदि। क्षेमेन्द्र ने अपने सुझावो का आधार इन्हीं संकेतों को बनाया है। २-छन्दों के लक्षणो में यति का संकेत प्रायः रहता है। पर इसके अतिरिक्त भी लय में अनेक छोटे छोटे विश्राम रहते हैं जो लक्षणो में नहीं दिये जाते और जिनका परिचय प्रतिभाशील व्यक्ति हो कर पाते हैं। ये विश्राम स्वभावत. एक शब्द के पूरा हो जाने पर आते हैं। समास हो जाने से अनेक शब्दो का एक शब्द बन जाता है और मध्य का विश्राम लुप्त हो जाता है। समस्त पद में, इसी लिये गति द्रुत हो जाती है। क्षेमेन्द्र ने जो छन्दों के प्रसंग से समासों का बिधि-निषेध किया है वह इसी दृष्टि से किया है। पृथ्वी छन्द की गति विस्तृत होती है जैसा कि उसके नाम से व्यक्त होता । असमस्त पदो से उसका स्वरूप ठीक रहता है। समासों से तो वह संकुचित सी हो जाती है। । ३-हृदय भावो के प्रभाव में संकोच विस्तार, शीघ्रता, मदता, आरोह, अवरोह आदि का अनुभव किया करता है । ये ही प्रभाव भाषा में लय, एवं ध्वनियो की विशेष योजना द्वारा भी उत्पन्न किये जा सकते है। इसी तत्व को दृष्टि में रख कर छन्दों और उनके वर्षों की, पारस्परिक उपयुक्तता का निर्णय करना चाहिये। जिस प्रभाव का भाव हो उसी प्रभाव की लय वाला छद उसके लिये प्रयुक्त होना चाहिये । भाषा में ध्वनियाँ भी इसी प्रभाव की हो, इस प्रकार छन्द, भाव और भाषा की त्रयी एक रूप हो जाती है। क्षेमेन्द्र ने 'आ' ध्वनि में विस्तार और विसर्ग ध्वनि में द्र त आरोह का अनुभव किया है। शार्दूलविक्रीडित छन्द के विषय में कवि का विचार है कि इसके पादों का आदि अक्षर 'श्रा' तथा अन्त्य अक्षर विसर्ग होने चाहिये। तभी छंद ऊर्ज स्वित बन सकेगा। इसी प्रकार मालिनी छन्द में आरोह होता है। इसीलिये उसका में सर्गान्त प्रयोग किया जाता है । इस न विसगों से हीन शब्द हों तो वह पुछकटी चमरी गौ की भॉति शोभा हीन बन जाती है।

४- भाषा में गति तथा विश्राम पैदा कर छन्द का स्वभाव बदला जा सकता है। मंद गति के छन्द में यदि त्वरित गति की भाषा प्रयुक्त हो तो वह त्वरित प्रमाव वाले भाव का बाहन बन सकता है। ५-छोटे छन्दों में समस्त तथा बड़े छन्दों मे असमस्त शब्दो का प्रयोग उपयुक्त होता है। ऐसा करने से द्रत और विलंबित गति का क्रमशः उत्पादन हो जाता है। ६-छन्द का निर्वाचन भाव तथा अवस्था की दृष्टि से आवश्यक है पर बल पूर्वक अभ्यस्त छन्द को छोड़कर अनभ्यस्त का प्रयोग करने से अभिव्यक्ति की स्वाभाविकता नष्ट हो जाती है। ७-काव्य के अंगों की समीक्षा का आधार औचित्य होना चाहिये। इसके अतिरिक्त अन्य कोई कठोर नियम आधार नहीं बन सकता। औचित्य आपेक्षिक तत्व है अतएव परिस्थिति के अनुसार अदलता बदलता रहता है। क्षेमेन्द्र के बाद चार आचार्य और है जिन्होंने छन्दों का स्वतन्त्र विचार किया है। बारहवीं शताब्दी के हेमचन्द्र ने इस विषय पर छन्दोनुशामन लिखा है जिसमे प्रतिपादन शैली की सूक्ष्मता विशेष उल्लेखनीय गुण हैं। दूसरा केदारभट्ट का वृत्त रत्नाकर है जो छात्रवर्ग में बड़ा प्रसिद्ध है। इस पर अनेक टीकायें लिखी गई हैं। प्रतिपादन की शैली हेमचन्द्र के अनुमार है । विभाजन में अन्यकार की सतर्क बुद्धि के दर्शन होते हैं। अनुमानतः यह ग्रन्थ चौदहवीं शताब्दी का है। सोलहवीं शताब्दी में गंगादास ने इस विषय पर छन्दोमजरी ग्रन्थ लिखा। यह भी प्राचीन परम्परा का ही अनुसरण करता है। विवेचना आदि की कोई अन्तदृष्टि इसमें नहीं दीख पड़ती। सबसे बाद में 'वाणी भूषण' के रचयिता दामोदर आते हैं उन्होंने छन्द पर यह दो अध्यायों की छोटी पुस्तक लिखी है जो किस नवीन विशेषता के अभाव में पारंपरिक है। m (७५) - मूल्यांकन हेमेन्द्र का 'सुवृत्त तिलक' कलेवर में छोटी रचना है । पर इसका विषय ब्यापक है, प्रतिपादन गंभीर है और संचयन उपयोगी है। दूसरे आचार्यों की भांति क्षेमेन्द्र छन्दों के लक्ष्य लक्षण दिखाकर ही संतुष्ट नहीं होते। वे उनके गुण दोषों का विवेचन करते हैं, उनके प्रयोग के स्थलों का निर्धारण करते हैं। दूसरों की भाँति वे आवश्यक अनावश्यक सभी छन्दो का संग्रह भी नहीं करते। जिनका काव्यों में प्रचुरता से प्रयोग मिलता है, उन्हीं पर अपनी प्रतिभा का प्रयोग करते हैं। इससे उनकी व्यावहारिकता का परिचय मिलता है। इनके छन्द विचार में अंतर्गामिनी भावुकता, व्यापक अध्ययन और संतुलित विवेक के दर्शन होते हैं। क्षेमेन्द्र ने जो कार्य छन्दों के क्षेत्र में किया है वह इतना कठिन है कि बाद के लोग उनका मार्गा- नुसरण भी न कर सके। छन्दाचार्यों के बन में क्षेमेन्द्र अकेले ही साल वृक्ष की भाँति सबसे ऊपर दिखाई देते हैं। 'सुवृत्त तिलक' की शैली भी साहित्यिक सरस है। गुण दोषों के विवेचन में उपमाओं की योजना विषय को अत्यन्त प्राय एवं सरस बना देती है। इसमें उनकी आलोचना की अन्तुष्टि और व्यावहारिक विवेक का तो साक्ष्य मिलता ही है। इसके अतिरिक्त दृष्टि की उदारता भी भलीभाँति लक्षित होती है। वे अपनी मान्यताओं में कठोर नहीं हैं। छन्दो के विषय गिनाकर अन्त में मित्र-भाव से उन्होंने सलाह दी है कि समर्थ कवि अपने अभ्यस्त छन्दों का सबसे अधिक प्रयोग करें और बुभूषु कवि इसमें अपना पथ निर्देश दें । यह केवल सहायक है एक मात्र आज्ञा नहीं।

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भाग २ मूलानुवाद

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१-औचित्य विचार चर्चा मंगल-जिन्होंने शत्रु को ठगने में अपनी दृष्टि को अंजन से मैली बना लिया था उन परम औचित्यकारी भगवान विष्णु को प्रणाम है। प्रस्तावना-क्षेमेन्द्र 'कवि कर्णिका' नाम की रचना में काव्य के अलंकारों का वर्णन कर तथा विद्वानों के हर्ष के लिए उसके गुण दोषों का भी विवेचन कर काव्यानुभूति में चमत्कार के हेतु और रस के जीविन औचित्य तत्व का अब विचार करते हैं। भावश्यकता-यदि काव्य में ढढ़ने पर भी औचित्यक के दर्शन न हों तो उसके अलंकार एवं गुणों की मिथ्या गणना निरर्थक है। अलंकार अलंकार ही हैं और गुण भी गुण हैं। रस-सिद्ध काव्य का स्थिर जीवित तो औचित्य है। काग्य एक दूसरे का उपकार करने वाले शब्दों और अर्थों का समुच्चय रूप है। उसमें उपमा, उत्प्रेक्षा आदि जो प्रचुर अलकार हैं वे कटक, कुण्डल, केयूर, हार आदि के समान केवल बाह्य शोभा के हेतु होते हैं। इसी प्रकार कुछ लक्षणचतुर लोगों ने काव्य के गुणों की रस के प्रसंग में गणना की है पर वे भी अस्थिर होते हैं जैसे श्रत, सत्य,शील आदि मानवीय गुण । औचित्य तो, जैसा कि इसका आगे लक्षण किया जायेगा, काव्य का स्थिर अविनश्वर जीवित है। इसके बिना काव्य निर्जीव है भले ही वह गुण अलकारों से युक्त हो। शृङ्गारादि रस से भरपूर काव्य का औचित्य वैसे ही जीवित है जैसे रसायनों द्वारा परिपुष्ट व्यक्ति के लिए सेवनीय रस की मात्रा का उचित होना जीवित होता है। इसी बात को विशेष रूप में यों कहा जा सकता है कि:- (६) कारिका-अलकार तभी अलंकार होते हैं जब उनका विन्यास उचित स्थान पर हो। गुण भी यदि औचित्य से च्युत नहीं हैं तो गुण होते हैं। वृत्ति-अलंकार तभी शोभा बढ़ाने में समर्थ होते हैं जब उनका विन्यास उचित स्थान पर हो। नहीं वो वे केवल नाम के अलंकार रह जाते हैं। इसी प्रकार औचित्य से युक्त गुण गुणता प्राप्त करते हैं वर्ना वे अगुण ही हैं। जैसे किसी ने कहा है कि- 'कण्ठ में मेखला, कटि में चंचजहार, हाथों में नूपुर और पैरों में केयूर पहने से; (तथा) शौर्य से झुके शत्रु पर करुणा करने से कौन व्यक्ति उपहस नीय नहीं हो जाते। औचित्य के बिना न अलंकार रुचिरता देते है न गुण। लक्षण-वह औचित्य है क्या ? (७) का०-जो जिसके योग्य है आचार्य लोग उसे उचित कहते है। इसका भाव औचित्य है। वृ०-जो जिसके अनुरूप हो वह उचित कहा जाता है। उसी के भाव को औचित्य कहते हैं। भौचित्य के स्थान-अब काम्य के समस्त शरीर में जीवनभूत औचित्य की स्थिति प्रधान रूप से कहाँ-कहाँ होती है-यह दिखाया जाता है। (८-१०) का० -(१) पद, (२) वाक्य, (३) प्रबन्धार्थ, (४) गुण, (५) अलंकार, (६) रस, (७) क्रिया, (८) कारक, (९) लिंग, (१०) वचन, (११) विशेषण, (१२) उपसर्ग, (१३) निपात, (१४) काल, (१५) देश, (१६) कुल, (१७) व्रत, (१८) तत्व, (१६) सत्व (२०) अभिप्राय, (२१) स्वभाव (२२) सारसंग्रह, (२३) प्रतिभा, (२४) अवस्था, (२५) विचार, (२६) नाम, (२७) आशीर्वचन तथा (२८) अन्य काव्यांगो में औचित्य जीवित रूप से व्याप्त रहता है। वृ०-पद आदि काव्य के मर्मस्थान है। औचित्य जीवित बनकर इन सब में व्याप्त रहता है । उसकी स्फुरणा स्पष्ट प्रतीत होती है । इनके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार है :- १-पद में औचित्य-- (११) का०-सूक्ति में किसी विशेष पद का उचित प्रयोग इस प्रकार शोभाकारक होता है जैसे चन्द्रमुखी युवती के मस्तक पर कस्तूरी का तथा श्यामा के मस्तक पर चंदन का तिलक | जैसे:- 'हे देव, युद्ध के समय तुम्हारी इस खड्गधारा में शत्रुओ के कुल डूब गए'-इस प्रकार की प्रशंसा बहुशः बन्दियो से सुन कर;

भोली गुर्जर नरेश की पत्नी जंगल में चकित होकर जल को आशा से पति के कृपाण की ओर देखती है। (परिमल कवि) यहां 'भोली' शब्द से अर्थ के औचित्य का चमत्कार उत्पन्न होता है और गौरागी के मुख पर श्याम तथा श्यामा के मुख पर गौर तिलक की भांति एक विलक्षण विधित्ति उससे अनुभूत होती है। नीचे लिखे पद्य में यह नहीं है। 'सौन्दर्य रूपी धन के व्यय का कुछ विचार नहीं किया; महान क्लेश स्वीकारा, स्वच्छन्द और सुख से रहने वाले लोगो को चिन्ता का स्वर उत्पन्न किया। यह बेचारी भी योग्य पति के अभाव में दुखी है। विधाता ने इस तन्वी को जन्म देने में क्या प्रयोजन सोचा था ? (धर्मकीर्ति) यहाँ 'तन्वी' शब्द केवल अनुप्रास लोभ से (तन्व्यास्तनुतन्वता) प्रयुक्त हुआ है। किसी प्रकार के अर्थोचित्य के चमत्कार को प्रकट नहीं करता। सुन्दरी शब्द का प्रयोग अनुरूप हो सकता था अथवा अत्यधिक रूप या लावण्य के ब्यंजक अन्य पद प्रयुत्त हो सकते थे। तन्वी शब्द तो विरहकृश स्त्रियो के लिये प्रयुक्त हो तो उचित अर्थ का द्योतक होकर शोभाजनक होगा। जैसे:- 'कमल के पत्तों की यह शय्या दोनो ओर पीनस्तनो तथा जघन के संपर्क से मुरझा गई है, शरीर के मध्य भाग का मिलन न होने से बीच में हरित रह गयी है। ढोली भुज- लताओ के इधर उधर फेंकने से जहाँ नहाँ चिह्न बन गये हैं। इस प्रकार यह कृशागी के सताप की सूचना देती है। (श्री हर्ष) यहां 'कृशांगी' शब्द सागरिका की विरदावस्था का सूचक है अतः औचित्य की पुष्टि करता है। २-वाक्यगत औचित्य (१२) का०-त्याग से उन्नत बने ऐश्वर्य एवं शील से उज्वल बने शास्त्रज्ञान की भांति औचित्य के साथ रचा गया वाक्य सज्जनो को सदा प्रिय लगता है। वृ०-जो लोग काव्य के विवेक में निपुण हैं उन्हे औचित्य से रचा गया वाक्य ही अभीष्ट लगता है। जैसे.-- ASON 'देव युधिष्ठिर दयालु हैं, अर्जुन जितेन्द्रिय है, नकुल सहदेव अपने संयम के लिए आदरणीय है-यह कहता हुआ भीम कीचक का विनाश करने वाली अपनी भुजाओं पर हाथ फेरने लगा। वह किर्मीर की जटाओं का विध्वंसक, कुबेर के शौय को शान्ति का उपदेश देनेवाला, कौरवो की अन्तिम रेखा का कृतान्त, हिडम्बा का प्रिय भीम आज अपने यथार्थ रूप में दिखाई पड़ा। (क्षेमेन्द्र कृत विनयवल्ली) यहाँ पर हिडम्बा आदि के निर्देश से भीम के चरित का संकेत देने वाले वाक्य रौद्रास के अनुरूप हैं। वर्णन को सजीव सा बना देते । अतः उचित हैं। अथवा जैसे: 'हे सुन्दिरि, भगवान शिव की चूडा के मणि चन्द्रमा को इधर देखो। यह पुरुवंशी राजाओं का सबधी है । मदन व्यापारो की दीक्षा मे गुरु है। गौरागियों के बदन की उपमा से परिचित है। ताराबधू का प्रिय है। इसकी धुति दाक्षिणात्य तरुणी के हाल मे ही माजे गये दावों की भॉति अवदात है। (राजशेखर) यहाँ शृङ्गार रस के अतरंग भावों के द्योतक कामोद्दीपक अर्थ की सूचना देने वाले पदो से वाक्यार्थ निष्पन्न हुआ है। इसलिये औचित्य के कारण अत्यन्त प्रिय लगता है। यह तत्त्व नीचे लिखे पद्यार्थ में नहीं है- 'दुर्योधन की विक्रमशील भुजाओं पर आश्रित जगत प्रसन्न रहे। ये भुजायें शौर्य के कमल का नाल हैं, युद्ध के वारिधि का विपुल सेतु हैं, खड्ग रूपी भुजग का चन्दनतरु हैं. लक्ष्मी का क्रीड़ा उपधान है। जयकु जर का आलान हैं और सुन्दरियों के कदर्प का दर्प हैं। (राजशेखर) यहां एक योद्धा के कठोर भुजास्तम्भों का उत्कर्ष के साथ वर्णन है। पर क्मल नाल से उसकी तुलना के कारण वाक्यार्थ बड़ा उपहसनीय बन गया है। .

. (७) ३--प्रबन्धार्थ का औचित्य- (१३) का०-यदि कोई विशेष अथ उचित रूप से उपनिबद्ध हो तो उस से समस्त प्रबन्धाथ इस प्रकार शोभित होता है जैसे गुणों के प्रभाव में भव्य बने वैभव से कोई सत्पुरुष शोभित होता है। वृ०-काग्यो में कभी कभी तीक्ष्ण प्रतिभा द्वारा ऐसे अर्थ की कल्पना की जाती है कि वह अमृत का बरसाने वाला बनकर समस्त प्रबंधार्थ को आप्यायित कर देता है। सारा काव्याथ उससे व्याप्त एवं प्रभावित होता है और एक विशेष चमत्कार आभासित होने लगता है। जैसे- 'हे मेघ, मै जानता हूँ, तुम पुष्कर-आवर्तक मेघों के प्रसिद्ध वंश में उत्पन्न हुए हो, अपनी इच्छा के अनुरूप आकार धारण करने वाले हो और इन्द्र के प्रधान सेवक हो। इसलिए अपनी प्रिया से वियुक्त होकर मै तुम्हारा याचक बना हूँ । श्रेष्ठ व्यक्ति से की गई याचना असफल भी हो तो भी वह नीच व्यक्ति से की गई सफल याचना से कहीं अच्छी होती है। (कालिदास-मेघदूत) यहाँ अचेतन में चेतनत्व का अध्यारोप किया गया है। मेघ पुष्करों और आवर्तको के प्रसिद्ध वंश में उत्पन्न है। इन्द्र का प्रधान सेवक है। इससे दुत कर्म की योग्यता का उसमें आधान करना उचित हो जाता है। फलस्वरूप समस्त प्रवन्धार्थ का कल्पित इतिवृत्त संगत एवं रुचिरतर बन जाता है। सब मिलाकर एक निरतिशय औचित्य की द्योतना होती है। अथवा भवभूति कृत उत्तर 'रामचरित' के नीचे दिये गए प्रसंग में देखिए- (नषथ्य में) 'यह अश्व और पताका है अथवा समस्त संसार के अद्वितीय वीर रावण के कुल के शत्रु राम की वीर घोषणा है । लव-(गर्व के साथ) ओह, इन शब्दों से तो संताप होता है। अरे क्या पृथ्वी क्षत्रियहीन हो गई जो तुम इस प्रकार घोषणा कर रहे हो ? (हस कर) अहा, कैसे शस्त्र फड़कते हैं। (धनुष तानते हुए) 'इस धनुष की प्रत्यंचा ही जीभ है। वलयाकार पैनी कोटियाँ इसकी दाढ़ें हैं। घने घर्षर घोष को यह उगल रहा है।

अपना ग्रास खाने मे व्यस्ल तथा हॅसते हुए यमराज के मुख की जंभाई को भी यह अपने विकट उदर से हीन बना देता है। (भवभूति) यहाँ भवभूति ने रामायण की कथा का अतिक्रमण कर राम के पुत्र लव के विक्रम और शौर्य के उत्कप की कल्पना की है। वह दूसरे के प्रताप को न सहन करने से युक्तिसंगत बनती है और प्रबन्ध में फैले हुए रस के अनुकूल बनकर औचित्य की छाया प्रदान करती है। राजशेखर के नीचे लिखे पद्य में यह तत्त्व नहीं है- रावण-'जो धनुष पार्वती के कचो को हठपूर्वक ग्रहण करने में लगे शिवजी के हाथो मे हजारो वर्ष रहा है, जिसका गात्र देवो के सार कणो से बना है और जो मैथिली के मूल्य का धन है वह इस समय तन जाय । जनक-इसके साथ हा अगर्भसम्भवा सीता का भी प्रति- - दान हो ? यहाँ सीता के प्रतिदान की बात जो रावण के प्रसंग से जनक ने कही है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि स्यात् राक्षस को सीता का प्रतिदान करना उन्हे अभीष्ट है। यह समझ में नहीं आता कि कोम- लागी सीता मानवभक्षी राक्षस जाति के रावण को कैसे दी जा सकती है। वह तो राक्षसो का भक्ष्य थी। इस प्रकार यह अनौचित्य चरित्र को विपरीत बनाता है और भावुक हृदय मे बड़ी अरुचि उत्पन्न करता है। कालिदास के नीचे लिखे पद्य में भी औचित्य नहीं है:- 'कुछ क्षणो के लिये शिवजी के नेत्र पार्वती के उरु मूल में बनी हुई नखचिह्नो की पक्ति में लुभा गये। फिर उन्होने प्रियतमा को अपने ढीले वस्त्र कसने से रोक दिया। यहाँ अम्बिका के संभोग का वर्णन है, पर पार्वती के उरु मूल में नखचिह्नो की पक्ति बताना पामर नारियो के योग्य है और उस पर त्रिजगद् गुरु त्रिलोचन शिव का मोहित होना दिखाना परम अनुचित है। इससे यह प्रसग अनौचित्य की पुष्टि करता है। ४-गुणों में औचित्य (१४) का प्रस्तुत अर्थ के अनुरूप गुणों का काव्य में संनिवेश - - ( ६ ) संभोग के अवसर पर उदित हुए चन्द्रमा के समान अमन्द आनन्द प्रदान करता है। वृ०-प्रस्तुत अर्थ के उचित ओज, प्रसाद, माधुर्य आदि गुणों का प्रयोग काव्य में सुभग तथा भव्य होता है। वह चन्द्रमा के समान सहृदयो को आनन्द सदोह प्रदान करता है। जैसे भट्ट नारायणकृत वेणी माधव नाटक के निम्नलिखित पद्य में- 'महाप्रलय के वायु से संक्षुब्ध हुए पुष्कर और आवर्तक मेघो के गर्जन के समान भयावह, सुनने मे आतंककारी और आकाश पृथ्वी के अतराल को भर देने वाला यह अभूतपूर्व शब्द आज समरोदधि से कैसे उठा? यहाँ ओजस्वी श्रेष्ठ योद्धा अश्वत्थामा के ऊर्जस्वित प्रताप का वर्णन है। उसके अनुरूप ही ओज गुण भरे वाक्यो का प्रयोग है। इससे पराक्रम का औचित्य और गौरव सहस्र गुण अधिक बढ़ जाते हैं। वाणभट्ट के नीचे लिखे पद्य में भी यह विद्यमान है:- 'हार, जलाद्र वस्त्र, नलिनी दल, ओस बरसाती हुई चन्द्रमा की किरणे और चन्दन के सरस आलेप जिसके इंधन बनते है वह कामाग्नि किस प्रकार बुझ सकेगी' यहाँ कादम्बरी की विरह व्यथा का वर्णन है। वियोग में उस का धैर्य टूट चुका है। ऐसे भावो के वर्णन ऐसे भावो के वर्णन के लिए माधुर्य, सुकुमारता आदि गुणो का प्रयोग किया गया है। इससे प्रसंग ऐसा आनन्ददायक बन गया है जैसे पूर्णेन्दुवदना सुन्दरी मधुर भाषण से प्रियतर हो जाती है। महाकवि चन्द्रक के इस पद्य में यह तत्त्व नहीं है:- भाग्यचपल युद्धों के विषय मे मै क्या प्रण करूँ ? जय और पराजय तो दैव देता है, पर युद्ध स्थल में आकर मैं यह १-जिसका यह अर्थ है वह पद्य बाण की पद्यबद्ध कादम्बरी से उद्धृत है। यह ग्रन्थ अब तक उपलब्ध नही हुआ । पद्य इस प्रकार हैं। हारो जलाद्र वसन नलिनी दलानि, प्रालेयशीकरमुचस्तुहिनाशुभास । यस्येन्धनानि सरसानिच चन्दनानि निर्वाणमेष्यति कथ स मनोभवाग्निः । २-यह चन्द्रक कवि ईसवी पूर्व पहली शताब्दी मे तुजीन राजा का समकालीन बा। राजतरंगिणी में इसका उल्लेख है।

(१०) प्रतिज्ञा अवश्य करता हूँ कि शत्रु मेरे घोड़ों की जंघाएँ नहीं देख पायेगे। यह किसी योद्धा की उक्ति है। इसे क्षात्रवृत्ति के समान ओज गुण से युक्त होना चाहिये था। यद्यपि इसका अर्थ उचित है पर उचित गुण के अभाव मे ऐसी मन्द पड़ गई है जैसे दरिद्र घर की तेजोविहीन दीप शिखा। राजशेखर के निम्नलिखित पद्यार्थ में भी यह गुण नहीं हैं:- 'इसके कामज्वर को स्नेही जन भी जल जाने के भय से छूकर नहीं देखते । जल तो इस पर उबलने लगता है। चन्दनादि औषधियो का प्रयोग इस पर निरर्थक हो जाता है। यहाँ तक है कि हार और मालाओ की मणियाँ वक्षस्थल से लग कर खीलों की भॉति चटचटाकर फूट जाती है।' यहाँ वण्य है विरहविधुर रमणी की पीड़ादशा उसके अनुरूप यहाँ माधुर्य गुण भी है । पर उसको त्यागकर 'चटचटाकर खील की भाँति फूट जाती हैं ।' आदि वाक्यो में ओज की स्फूर्जना दिखाई गई है। इससे मुक्ति चित्त में इसी प्रकार अनौचित्य का संचार करती है, जिसप्रकार कटु बोलने वाली कोमलांगी सुन्दरी। ५---अलंकारों में औचित्य-- (१५) का०-प्रतिपाद्य अर्थ के अनुरूप अलकार का प्रयोग हो तो इस औचित्य से काव्यभारती इस तरह शोभित होती है जैसे पोन स्तनों पर पड़े हार से सुन्दरी। वृ०-प्रस्तुत अर्थ के उचित ही यदि उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक आदि अलंकार प्रयुक्त हो तो उससे काव्योक्ति उन्नत कुचो पर लटके हुए भुक्ताहार से कामिनी की भांति अत्यत शोभायमान होती है। जैसे- श्री हर्ष के निम्नलिखित पद्यार्थ में: 'अपना उत्सव देखने के लिए उत्सुक होकर वत्सराज काम- देव की भाँति इधर ही आ रहे है। लड़ाई की चर्चा समाप्त हो चुकी है। अतः प्रेमी वे प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करते हुए साक्षात् कामदेव के समान लगते है। यहाँ वत्सराज की कामदेव से उपमा शृगार रस के प्रसग मे बड़ी चारुता उत्पन्न करती है। यह औचित्य चमत्कार का कारण बनता है। । ।

महाकवि चन्दन के नीचे लिखी पद्यार्थ पद्यार्थ में यह भौचित्य नहीं है। 'पक्षियों ने आँतों को वृक्षों की टहनियों पर फेंक फेंक कर भूलासी बना दी है। शृगाली भरपेट मास खाकर रतिखिन्न रमणी की भॉति सो रही है। प्यासा शृगाल रुधिर में सनी तलवार को बारबार चाट रहा है और यह साप बिल की खोज में मरे हुए हाथी की सूड के अग्र भाग में प्रविष्ट हो यहां पुरुषों का मांस खाकर सोई हुई शृगाली की समता सुरत केलि में क्लान्त रमणी से की गयी है। यह अनुचित है । इससे रस वैपरीत्य प्रकट होता है। मालवरुद्र के इस पद्यार्थ में वही बात है। 'शरद के दिनो में उपलों की आग नई बहू के कोप जैसी प्रिय लगती है । बर्फीली हवा कुबड़े व्यक्ति के आलिंगन के समान कर लगती है । सूर्य की कान्ति निधन व्यक्ति की आज्ञा के समान मद पड़ गयी है। चन्द्रमा विरहिणी स्त्री के मुख जैसा मलिन बन गया है। यहां कोमल कामिनी के कोप से उपलों की अग्नि को समता दी गई है। यद्यपि शीतकाल में प्रिय लगने के कारण वह अनुभूति में ठीक है पर रूप में पहले पहल अनुचित लगती है। चित्त में इससे संकोच का अनुभव होता है। कहां नवोढा का कुपित मुख और कहां दहकता हुआ अंगार ? यह समता अनुचित है। अथवा राजशेखर का निम्नलिखित पद्य देखिये: 'चन्द्रमा जलते हुए कामदेव के चिता चक्र जैसा, और उसका कलंक मलिन बुझे अंगारों जैसा लगते हैं। यह जो चांदनी में मिला हुआ पिसे कपूर जैसा सफेद पदार्थ है, वह मानो चिता की भस्म ही वायु से इधर उधर उड़ रही है । इसमें चन्द्रमा की समता चिताचक्र से दीगई है। यह अनुचित । चन्द्रमा आनन्दसुधा का बरसाने वाला है। चिताचक्र कानों को कटु है और चित्त में आतंक उत्पन्न करता है। अतः उक्त पद्यार्थ में अलंकार गत औचित्य नहीं रहा। जो अर्थ हृदय को प्रिय हो और अनौचित्य का उसमें लेश भी न रहे तो वह अलंकार की शोभा को अधिकाधिक पुष्ट करता है । जैसे कवि काटिक के नीचे लिखे पद्यार्थ में :- - उड़द की फली की तरह जाड़े में इठ गया था। चिन्ता- सागर मे गोते खाने लगा। अग्नि ठडी होगई थी। उसे फूकते फूकते होठ खुले ही रहते थे। भूख के मारे कण्ठ भी क्षीण था। निद्रा विमानित प्रियतमा की भॉति छोडकर दूर चली गई और रात्रि सत्पात्र को दान की गई पृथ्वी के समान क्षीण ही नहीं हो पार ही थी। यहाँ प्रतिपाद्य अर्थ हृदयसवादी है और अनौचित्य का थोड़ा अंश भी नहीं है। अत. कविता औचित्य के अभाव में भी रमणीय है। ६-रसगत औचित्य ५६-औचित्य के द्वारा रस और अधिक प्रास्वादनीय बनकर सब हृदयों में व्याप्त हो जाता है। मधु मास जैसे अशोक को अकुरित कर देता है उसी प्रकार यह भी भावुक हृदयों को अकुरित कर देता है। शृङ्गार रसगत औचित्य-- श्री हर्ष का नीचे लिखा पद्यार्थ उदाहरण है - 'इस उद्यानलता की कलिकाये बढकर ऊपर उठ आई हैं। इसकी कान्ति पीली पड़ गई है। जॅभाई लेकर दीर्घ श्वासों से मानो क्षण भर के लिये यह अपनी थकान को प्रकट कर रही है। इसे आज मदन पीडित नारी की तरह देखकर देवी वासवदत्ता का मुख कोपारुण हो जायगा।' इसमें वासवदत्ता के ईर्ष्याविप्रलभ भाव की कल्पना की गई है। नवीन मालती लता को ललित बनिता के तुल्य कल्पित कर उसमें विरह दशा का आरोप किया गया है। इस प्रकार उपमा द्वारा एक रुचिर औचित्य की सृष्टि हुई है और उससे चमत्कार जनक दीप्ति का जन्म है। कालिदास के निम्नलिखित पद्य मे भी यही बात है। 'ढाक के अत्यधिक लाल लाल फूल पूरे विकसित नहीं हुए थे। इसलिये बाल इन्दु की भॉति टेढ़े दिखाई देते थे। ऐसा लगता था कि बन स्थलियों का जो बसन्त से समागम हुआ है उसमें उन्हे सद' नखक्षत लग गये हैं। १-सब = ताजा, अभी हाल का, सस्कृत सधः । - - । १३ ) यह कुमार संभव का प्रसंग है। प्रस्तुत पछार्थ के बाद भगवान् शंकर का पार्वती के प्रति अभिलाषा श्रृङ्गार वर्णित हुआ है। उससे पूर्व यहाँ बसन्त कामुक के और बनस्थली कामनियों के रूप मे कल्पित हैं । ढाक की लाल टेढ़ी कलिकाओ की नवसंगम के नखक्षत के रूप में उत्प्रेक्षा है । प्रस्तुत प्रसंग दूर तक श्रृङ्गार रस का है। उसी के अनुरूप उपमान गत वस्तुसमूह श्रागारिक है। अतः यहाँ औचित्य की उत्कृष्ट चारुता विद्यमान है। उन्हीं के इस पद्य में औचित्य नहीं है। 'कनेर का फूल वर्ण में तो उत्तम था पर गन्ध शून्य था इस लिये चित्त को खेद प्रदान करता था। गुणो के सयोजन विधान में विश्व के सृजनहार की प्रवृत्ति प्राय उलटी रहती है। यहाँ विधाता की निन्दा के साथ केवल कनेर के फूल का वणन है। उसका प्रस्तुत अंगार रस में कोई उपयोग नहीं दिखाया गया। इसलिये उद्दीपन विभाव के उचित कुछ भी नहीं कहा गया। फलतः रसगत औचित्य का अभाव है। हास्यरस गत औचित्य-- उदाहरण-ग्रन्थकार के स्वरचित 'लावण्य वती' नामक काव्य से। 'क्या मदिरा को छलेने के भय से मेरा मुख नहीं चूम रहे ? अपनी नाक क्यों ढकते हो' अरे यह श्रोत्रियपना क्यों बखेरते हो । वेश्या के बिना तुम कुछ नहीं। मद से धूर्णित नेत्रों वाली मालती ने ऐसा कहकर सिकुड़ते हुए अत्रिवसु श्रोत्रिय पर मौलश्री वृक्ष की भॉति भासव छिड़क दिया। इसमें मुख्य रस हास्य है। गौण है शृङ्गाराभास । इसके स्पर्श से मुख्यरस में ऐसा चमत्कारी औचित्य आ गया है जैसा किसी श्रेष्ठ आसव में आम का रस मिला देने पर होता है। इस औचित्य का व्यंजक व्यापार यहाँ है अपवित्र मदिरा के स्पर्श की शंका एवं संकोच से सिकुडते हुए अत्रिवसुश्रोत्रिय पर सुखे मौलिश्री वृक्ष की भॉति सरसता लाने के लिए वेष विलासिनी का आसव छिड़कना । इस प्रकार हास्य रस गत औचित्य यहाँ वर्तमान है। ग्रन्थकार के उसी ग्रन्थ का दूसरा उदाहरण- 'मार्ग में केरल देश की रमणी पैर में केतकी की सुई छिद M- - .

जाने से 'सीसी करने लगी। पर उसके साथी विट ने प्रार्थना की कि.यह चेष्टा अत्यन्त रम्य है। ऐसा ही फिर करो। इस पर वह मुसका दी। क्षण भर के लिए उसके चार दाँतो पर चॉदनी का जो प्रतिबिम्ब पड़ा तो ऐसा लगा मानो वह कान्ता धूर्त के देखने से लज्जित होकर मुख पर श्वेत वस्त्र का चूँघट करती है। यहाँ पर भी हास्य रस में कुटिल विट की नर्मोक्तियो के औचित्य से शृङ्गाराभास का पुट लग गया है। इससे चमत्कार जनक परिपोष मुख्य रस में आ गया है। श्यामल के इस पद्यार्थ में उक्त भौचित्य नहीं है। 'नायक उसके मुखचुम्बन में लगा ही था कि नायिका का दाँत जड़ से उखड़ कर नायक के मुंह में गले तक पहुँच गया। वह खकार कर उसे जैसे तैसे थूक सका। यहाँ हास्य बीभत्स रस से सयुक्त हुआ है। पर वह लहसुन में सने फूलों के गुच्छे की भॉति अप्रिय हो गया है और इस अनौचित्य से काव्य का चमत्कार तिरोहित हो गया है। वृद्ध स्त्री के चुम्बन में और गले तक आए हुए उखड़े दॉत के थूकने में बीभत्स भाव की ही प्रधानता हो जाती है, हास्य की नहीं। करुण गत औचित्य- प्रन्थकार की अपनी मुनिमत मीमांसा से- 'अभिमन्यु का बध उसी समय हुआ था। इस पर सुभद्रा 'हे वत्स | हे पुत्र 11' आदि आदि चिल्ला कर अर्जुन के समक्ष ऐसा विलाप किया कि पत्थर भी पिघल उठे। इसे सुन कर सेना के घोड़ो ने रो-रोकर घास खाना त्याग दिया और कानो को नीचा किये वे निश्चल खड़े रहे। इस पद्यार्थ में कुछ ही समय पहले के प्रिय पुत्र अभिमन्यु के वध से उत्पन्न शोक के स्थायी भाव का वर्णन है। वह पत्थरो तक के हृदय को पिघला देने वाले सुभद्रा के विलाप से प्रतिफलित होकर अर्जुन के हृदय मे उद्दीप्त हुआ है। अतः भावोचित व्यापार की योजना हुई है। इतना ही नहीं। घोडे जैसे पशुओ के हृदय में भी वह संक्रान्त होकर रोना, प्रास कवलो को छोड़ देना, निश्चल खड़े ने ।

(१५) रहना आदि अनुभावों द्वारा प्रस्तुत भाव की अनुभूति को और अधिक तीक्ष्ण और गम्भीर बनाता है। परिमल कवि के निम्नलिखित पद्यार्थ में यह नहीं है। 'हा शृङ्गार तरंगिणी के कुलगिरि, हा राज चूणामणि, हे सौजन्य के सुधानिधान, हा वैदग्ध्य दुग्ध के उदवि, हा उज्जयिनी के भुजग, युवतियो के प्रत्यक्ष कदर्प, सद्वान्धव, कला के चन्द्र, देव तुम कहाँ हो। हमारी प्रतीक्षा करो, हम भी आती है। यहाँ किसी राजा की मृत्यु पर उसके गुणा का स्मरण करते हुए वक्ता में शोक स्थायी भाव की स्थिति दिखाई गई है। विभाव अनुभाव, संचारी भावो द्वारा उसे इस पदवी तक नहीं पहुँचाया गया जोकि उचित था। रौद्रगत औचित्य- जैसे नारायण के निम्नलिखित पद्यार्थ मे 'पाण्डवो की सेना में अपनी भुजाओं पर गर्व करने वाला जो जो शस्त्रधारी है। पंचाल वंश में जो कोई भी शिशु युवा अथवा गर्भस्थ है। जिसने भी उस निंदित कर्म को देखा था और मेरे युद्ध में आजाने पर जो भी विपरीत आचरण करता है, मै उन सब का क्रोधान्ध काल हूँ, भले ही वह स्वयं मृत्यु ही हो। यहाँ रौद्ररस का स्थायी भाव क्रोध अश्वत्थामा में दिखाया गया है। उसके उचित ही शिशु, युवा और गर्भस्थ तक की कर हत्या कर डालने के उद्यम तक ले जाने वाली अश्वत्थामा की प्रतिज्ञा द्राण के वध से उत्पन्न हुए क्रोध एव वेदना से पीडित उसके मन की स्थिरता सूचित करती है। प्रवरसेन के निम्नलिखित पद्यार्थ मे यह औचित्य नहीं है। 'हिरण्यकशिपु के रुधिर मे सने नृसिंह भगवान के भावो की प्रभा देदीप्यमान हुई तो राक्षस भी उससे भयविह्वल होकर भाग गई और इसमें अपने वक्षस्थल से नीचे गिरते हुए वस्त्र को भी संभाल न सकी।

यह पद्यार्थ रौद्ररस का है। पर उसके स्थायी भाव क्रोध की व्यंजना करने वाले व्यापारों का इसमे अभाव है। वास्तव में यहाँ थोड़ा सा तो वीभत्सरस है और व्याकुल होकर राक्षसश्री के भागने में भयानक रस का उसके साथ संकर है। प्रकृत रस जो रौद्र था उसका कहीं मुंह भी नहीं दिखाई देता। औचित्य उसी को पुष्टि मे था। वीरगत औचित्य- जैसे ग्रन्थकार की स्वरचित 'नीतिलता' के निम्न लिखित पद्यार्थ मे। 'ये वही राम है जिन्होने शौर्य से भर्ग की आराधना करने वाले, मर्या के विपरीत शस्त्र प्रहण करने के व्यसनी परशुराम की क्षत्रियोचित सहारकारिणी तीक्ष्णता को थोड़े मे ही रोक दिया था; जिन्होने कान तक धनुष को खींचकर तथा उस पर अपने कुटिल भ्र भंग डाल कर अन्याय का निषेध किया था और भार्गव को शान्ति पूर्ण ब्राह्मी स्थिति का संकेत किया था। इसमें तोता और मैना रावण को दूर से राम का संकेत देती । उनकी क्रोध रहित गंभीर आकृति से जैसा प्रभाव प्रतीत होता है उसी के उचित प्रताप की व्यजना मर्यादा के विपरीत शस्त्र प्रहण करने वाले भार्गव को ब्रह्म वृत्ति का उपदेश देने से हुई है। राम का भ्र भग भी चापमंग के प्रसंग से हुआ। स्वाभाविक रूप में नहीं। वीरका क्रोध में भी विकार उचित नहीं। उसकी तो वृत्ति प्रसन्न, मधुर और धीर होती है। यहाँ उसी के उचित व्यापारों की योजना है। भार्गव के दमन द्वारा भी राम के उत्कर्ष की अभिव्यक्ति की गई है। अथवा राजशेखर का नीचे लिखा पद्यार्थ देखिये :- 'हे लकेश, घूमती हुई गदा के आघात से संज्ञाहीन होकर तुम जिस सहस्राजुन के वश मे हो गये थे और स्त्रियां के बीच में पशु की भॉति वध्य बन गये थे, उसकी भुजाओ को काटने वाले परशुराम को जिसने जीत लिया और ब्राह्मण समझकर मारा नहीं वही राम तापस वेष में यहाँ माये है।

* ७) यहाँ रावण, सहस्रार्जुन तथा परशुराम के शौर्य का उत्तरोत्तर उत्कर्ष दिखाकर प्रधान नायक राम का प्रताप उच्चतम व्यजित किया है। भवभूति के इस पद्यार्थ मे वैसा औचित्य नहीं। 'बड़े लोगो के चरित पर टीका टिप्पणी करना ठीक नहीं, युद्ध होने दो। स्त्री ताड़का का दमन करने पर भी उनका यश अखडित बना रहा और वे महान ही रहे। वे खर राक्षस के साथ युद्ध करने में जो तीन कदम पीछे हटे थे, अथवा मेवनाद के वध मे जिस कौशल का उन्होने प्रयोग किया था, वह सब लोग जानते हैं। यह पद्यार्थ 'उत्तर राम चरित' का है। गौणपात्र लव के वीर भाव का उद्दीपन दूसरो के प्रताप की असहिष्णुता के द्वारा यहाँ किया गया है। पर उसस प्रधान नायक राम के वीर भाव का उसके स्त्री वध, खर के युद्ध से अपसरण, सुग्रीव के साथ युद्ध करते हुए बालि का छल से वध करना आदि लोकापवादो का स्मरण कराकर कवि ने विनाश कर दिया है अतः यह वस्तु योजना अनुचित है। भयानक रस में औचित्य- जैसे श्री हर्ष के इस पद्यार्थ में देखिये- 'यह बन्दर अस्तबल से भाग कर राजगृह में घुस रहा है। अधकटी सोने की साकल इसके गले मे लटक कर घिसट रही है। द्वारों को उलाघता है तो हेला से उछलते समय चलायमान चरणो में किंकिणियो का समूह बज उठता है। अगनायें प्रातकित हो गई है। सईस लोग संभ्रम के साथ उसके पीछे दौड़ रहे हैं। तथा- 'हिजड़े लोग लज्जा न करते हुए भाग गए क्योंकि उनकी तो मनुष्यो में गणना ही नहीं थी। वामन लोग अपने आकार का लाभ उठाकर कंचुकियों के कंचुको के अन्दर घुस रहे है। किरात लोग, जैसा कि उनका नाम है, दूर किनारो पर जा खड़े हुए है और कुवड़ियां धीरे से नीचे नीचे जा रही हैं कि कोई देखनले ।

- () इसमें भयानक रस है। उसके अनुरूप ही बंदरों के तीखे दाँत और नखों की खसोटन से स्त्रियों का आतकित होना, अन्त पुर के वृद्ध कंचुकी, वामन, किरात, कुब्जा आदि का पुरुषो मे गिनती न होने से थोड़े भय से भी संभ्रान्त एवं भयभीत होकर भाग पड़ना आदि ऐसी चेष्टाओ का वर्णन हुआ है जो प्रकृत भाव के अनुरूप होने से रुचिर हैं। फलत' यहा औचित्य विद्यमान है। राजपुत्र मुक्तापीड के इस पद्यार्थ में वह औचित्य नहीं है :- 'जिसे कोमल मोथे के मूठो के कौर खिला-खिलाकर बड़ा किया और शिशुकाल में जिसने होम से बचे जल को कमल के पत्तो के दोनो में भरभर कर पिया था वही हाथी जब युवा होकर मदमंथर हुआ और भौरो का समूह उसके गडस्थल पर चक्कर काटने लगा तो तपस्वी दूर बैठकर उसे आनन्द और भय के साथ देखता है। यहाँ हाथी की किसी आघात कारिणी विकृत चेष्टा का उल्लेख नहीं हुआ । स्थायी भाव भय का बिना अनुभावो के केवल नाममात्र का निर्देश है । फलत भयानक रस के उचित घबराहट का अभाव है। अत. यहाँ औचित्य की पुष्टि नही दीखती । वीभत्स रस मे औचित्य ग्रन्थकार की अपनी मुनिमत मीमांसा के यह उदाहरण देखिए :- 'यह शरीर सब तरह के अपायो का घर है और बुराइयो का खजाना है। इसे तरह-तरह के भूषण, वस्त्र और आनन्ददायी चन्दनादि से सजाने मे क्या लाभ होगा। इसके भीतर तो विष्टा, यकृत कीड़ो का समूह और आतो का जाल भरा हुआ है और वह सदा मूत्रादि से गीला रहता है । अत मे एक दिन कुत्ते और कौवे भी मुंह फेर कर इसे छोड़ जाते है। यहाँ वैराग्य भावना से उत्पन्न वीभत्सरस का वर्णन है। स्थायीभाव है जुगुप्सा। उसी के अनुरूप शरीर मे विष्टा, आत आदि का वर्णन कर उसके प्रति निरर्थक देहाभिमान का वैरस्य व्यजित किया है । वर्ण्य सामग्री भाव के उचित ही है। चन्दन के नीचे लिखे पद्यार्थ मे वह तत्त्व नहीं प्रतीत होता। 'यह कुत्ता कृश है, काना और लगड़ा है। कान और पूछ भी इसके नहीं हैं। भूख से सूखकर रूखा बन गया है।

३ किसी कंकाल के कपाल को चबाने से इसका गला भी दूख उठा है। पीव बहते और कोडो से किलकिलाये घावो से सारा शरीरावृत है। फिर भी यह कुतिया के पीछे भाग रहा है। यह कामदेव भी 'भरे का मारा है। यहाँ कुत्ते के शरीर में अनेक घृणित कुत्साओं का प्रदर्शन हुआ । पर वह तो स्वभाव से हो घृणित योनिका है और अशुचि पदार्थों' के खाने मे इसकी रुचि है। फिर इस प्रकार अत्यधिक निबंध के साथ वीभत्स विशेषणो का वर्णन करने से किस बात की व्यजना हुई ? ये ही सब यदि पुरुषगत होती तो जुगुप्सा में गौरव होता। अद्भुतगत औचित्य है .. कवि चन्दक का निम्नलिखित पद्यार्थ उदाहरण 'मॉ, आज कृष्ण बेलने गया तो इसने अपने श्राप मिट्टी खाई थी।' 'क्या कृष्ण यह सच है ? 'किसने बताया है ? 'बलदेव ने।' 'मॉ, बिल्कुल भूठ है।' मेरा मुँह देख ले । 'अच्छा मुँह खोल ।' इस पर श्रीकृष्ण ने जब मुंह फाडकर दिखाया तो माता उसमे समस्त जगती को देखकर हक्की- बक्की हो गई। वे केसव हम सब की रक्षा करे । इस पद्यार्थ मे पांडुरंग के हाथो के साक्ष्य से उन पर मिट्टी खाने का आक्षेप लगा है। उन्होने भय चकित होकर अपना मुंह खोल कर जो दिखाया तो माता उसमे समस्त जगती का दर्शन कर वात्सल्य विह्वल और विस्मय चकित हो गई। वह भगवान के प्रभाव की तो अनभिज्ञ थी। अतः यहाँ अद्भुत रस का परिपोष उचित ही हुआ है। ग्रन्थकार की अपनी मुनिमत मीमासा के इस पद्याथे मे यह तत्व नहीं है अपार समुद्र समस्त आश्चर्यो का घर है। उससे अधिक अाश्चये यह है कि उस सारे को एक मुनि पी गये और इस आश्चर्य का कहना ही क्या कि वे मुनि एक छोटे घड़े से उत्पन्न हुए थे। ससार तेरी आश्चयमयता की मार कौन कर सकता है। १-अपनी ही रचना में दोष दिखानेवाले क्षेमेन्द्र की उदार दृष्टि प्रशसनीय है। १ PAN इसमें अपार समुद्र का प्रभाव, उसको अगस्त्य मुनि का एक चुल्लू में पी जाना, मुनि. का फिर एक छोटे घड़े से जन्म होना आदि घटनाओं द्वारा विलक्षण विस्मय से अद्भुत रस क्रमशः चढ़ता गया है। पर अन्त में 'संसार ऐसे ही आश्चर्यों से भरा हुआ है तो उक्त घटनाये कोई अद्भुत नहीं सिद्ध होतीं। इस भाव का अर्थान्तरन्यास दिखाया । इससे ऊपर का भाव उतर सा गया और उत्कष तिरोभूत हो गया। शान्त रस में औचित्य मन्थकार के 'चतुर्वर्ग संग्रह' के नीचे लिखे पद्यार्थ में यह विद्यमान है:- 'भोग में रोग का भय है, सुख में क्षय का, वित्त में अग्नि और राजा का, सेवा में स्वामी का, गुणों में खलों का तथा घंश में बुरी स्त्री का। इसी प्रकार मान में ग्लानि का भय है, जय में शत्रु का और शरीर में मृत्यु का । फलतः सभी भय से भरे हैं। कोई निर्भय वस्तु है तो वह वैराग्य है। यहाँ प्राणिमात्र के जो भोग, सुख वित्तादि हैं उन्हें भयदूषित दिखाकर हेय बताया गया है और वैराग्य को समस्त भयों का शमन- कारक म्यजित कर उपादेय दिखाया है। इससे शान्त रस के निर्भीक और स्वच्छन्द रूप का उपदेश अभिव्यजित होता है। वर्ण्य की योजना प्रतिपाद्य के अनुरूप ही है। इसी प्रकार प्रन्थकार की 'मुनिमत मीमासा' के इस पद्य में औचित्य है: लालसा यह है कि-अहि हो या हार, बलवान शत्रु हो या मित्र, मणि हो या मिट्टी का ढेला, फूलो की शय्या हो अथवा पत्थर की शिला, तृण हो अथवा प्रमदायें, सर्वत्र समान भावना से मेरे दिन बीते और किसी पवित्र बन में 'शिव, शिव, शिव' का प्रलाप करता रहूँ। यहाँ जीवन्मुक्त पुरुष के उचित ही प्रिय, अप्रिय, राग-द्वष आदि द्वन्द्वों का उपशम करनेवाला मोक्षोपयोगी साम्यभाव अहि-हार शत्रु-मित्र आदि पर समान दृष्टि द्वारा अभिहित हुआ है । पर पुण्यारण्य की जो उल्लेख है वह भेद बुद्धि का प्रतिपादक और उपयुक्त अभेद भावना का विरोधी है। अत. अनुचित है। जब साम्यभाव धारा- विरुद्ध हो जाता है तो उससे भेदाभिमान की प्रन्थि विगलित हो माती है और सब वस्तुयें शिवमय प्रतीत होती हैं। निर्मल आत्म- शाम से तृप्त ऐसे मुमुतु की तपोवन और नगर के धूरे में समान दृष्टि हो जाती है। फिर पुण्यारण्य की बात कहना अनुचित है। रस की संसृष्टि और संकर में औचित्य (१७) का०मधुर तिक्त श्यादि रसो को चतुराई से मिलाने पर जिस प्रकार एक विचित्र आस्वाद उत्पन्न होता है इसी प्रकार शृङ्गार आदि रसो को आपस मे एक दूसरे से मिलाने पर विलक्षण रसानुभूति होती है। उनके इस परस्पर मिलने मे कवि को औचित्य की रक्षा करनी चाहिए । अनौचित्य का तनिक भी अश आ जाने से वह रस- सकर प्रिय नहीं रह जाता। वृ० चतुर रसोइया चटनी या पना आदि के बनाने में जब मीठे, चरपरे, खट्ट, नुनखरे आदि रसो का चतुरता से संयोजन करता है तो वे विचित्र आस्वाद को जन्म देते हैं। इसी प्रकार अविरुद्ध शृङ्गार आदि रस भी मिलकर विलक्षण रसनीय बन जाते हैं। इनकी अगागि-भाव-योजना मे औचित्य की रक्षा अवश्य करनी चाहिए। वही उसका जीवित है। अनौचित्य की थोड़ी सी धूल भी उसमें पड़ गई तो वह विरस हो जाएगा। शान्त और शृङ्गार रस के संकर में औचित्य का दर्शन भगवान व्यास के निम्नलिखित पद्यार्थ में कीजिये- 'सचमुच तरुणियाँ मनोरम है और विभूतियाँ भी बड़ी रम्य है। पर जीवन तो इतना चंचल है जितना कि मत्त अंगना की अपागमगी। यहाँ पर प्राणि मात्र के हित का ध्यान रखने वाले भगवान व्यास मोक्षोपयोगी शान्त रस का उपदेश देना चाहते है। पर रागी जनों को वह अभीष्ट नहीं है। इसलिए गुडजिहिका न्याय' से उनका मन प्रसन्न रखने के लिए शान्त को शृङ्गार का अङ्ग बना दिया गया है। पर अन्त मे जीवन को चचल बताकर उसकी अनित्यता का संकेत भी उन्होने कर दिया है। और शान्त रस को ही श्रेष्ठता प्रदान की है। -मीठा खिलाते-खिलाते बालक के कान छेद दिए जाते हैं। इसे गुडजिह्विका कहा जाता है।

। ) वीभत्स और शृङ्गार के अंगांगिभाव का उदाहरण प्रन्थकार की 'बौद्धावदान कल्पलता' का नीचे लिखा पद्यार्थ है। 'युवा शव नपुसक की भाँति अचल होकर पड़ा है। श्रगाली रुधिर की कामना से कामातुर सी आसक्त हो उसके गले से लगी है और नखूनों की खरोच की रेखाय बना देती है। दॉतो का व्रणांक दे देकर उसके अधर का बारबार आस्वादन करती है। इस प्रकार सरत क्रिया में संलग्न सी वह उसके अङ्गछेदन मे (अनङ्ग क्रिया व्यस्त बनी अपने रमसत्कर्ष को व्यक्त करती है। यहाँ शुद्ध स्थल में युवा शव का भक्षण करती हुई शगाली का वर्णन है । श्लेषोपमा अलंकार द्वारा उसे कामाविष्ट युवती जैसा चित्रित किया है। शङ्गार और वीभत्स दो परस्पर विरुद्ध रस समान बल होकर यहाँ मिले है। तरुणा शव क्षीब की भॉति निश्चेष्ट पडा है और मुग्ध होकर शृगाली युवनी की भॉति उसके कंठ से लगी है। अनुरक्त कामातुर रमणी की भाँति वह शोगित की अत्यन्त इच्छुक है। अपने नखों के चिह्न शव पर बना रही है। अपने दांतों के व्रण बनाती हुई बार बार उमके अधर का प्रास्वादन करती और अग छेदन क्रिया में ऐसी लग्न है जैमी रति क्रिया में। अपने शरीर को बार बार उपर उठाती है। यहाँ कामिनी और शृगाली की चेष्टायें समान हैं। इसलिए वीभत्स और शृङ्गार भी समान बल है। पर उन चेष्टाओं का वाक्य में कर्ता शृगाली है अतः वीभत्स मुख्य है और शगार गौण । इसके वक्ता भी बोधिसत्व है जो वैराग्य वासना से युक्त हैं। फलस्वरूप कुत्सिन की जुगुप्सा दिखाकर नितबिनी रति की बिडम्बना की व्यजना होती है। भावो के संयोजन में रुचिर औचित्य है । समस्त ग्रन्थ में तो शान्तरस का ही प्राधान्य है पर इस श्लोक के वाक्य मे वीभत्स की मुख्यता है। वीर और कम्ण के सकरौचित्य का उदाहरण ग्रन्थकार की 'मुनिमत मीमांसा' का यह पद्यार्थ है। नवोदित यौवनकाल में ही अभिमन्यु का वध किया गया तो अर्जुन शोक सतप्त हो गए और जयद्रथ के बध रूपी अभिचार यज्ञ में वे लग गये । उनका गाण्डीव नु वा मॅजने लगा। प्रश्न जल में स्नान कर खाएडन वन को अग्नि ।

- से भी अधिक दारुण शोकाग्नि को उन्होंने धारण किया। 'हा वास' हा वत्स' के मन्त्र वे जपते जाते थे। अर्जुन त्रिगर्तों के संग्राम में गया था। पीछे शत्रुओ ने यौवनोदय काल में ही अभिमन्यु का बध कर दिया। इस पर अर्जुन ने अपने अश्र जल मे स्नान कर पुत्र शोक की अग्नि को अतर में धारण कर तथा गाण्डीव को नु वा के समान मांजकर जयद्रथ के बध का अभिचार-यज्ञ प्रारंभ किया जिसमे जय का मंत्र था, 'हा पुत्र, हा वत्स' आदि शब्द । इसमे शत्रु-क्ष्य के लिए दीक्षा के तुल्य व्रत लेने, खाण्डव पद का निर्देश करने एवं शोकाग्नि को प्रचंड बताने से अंगी वीररस की व्यजना होती है। करुण रस मध्य में सहसा आ गया है। पर अन्त में जयद्रथ-बध के अभिचार का उल्लेख होने से शौर्य का ही निर्वाह है। अतः भावों के बलाबल का बड़ा अच्छा औचित्य यहाँ विद्यमान है । उसी ग्रन्थ में शान्त, शृगार, करुण और वीभत्स के संकरौचित्य का उदाहरण जैसे:- 'देखो, मन्द पुरुषो के हृदय स्त्रियों के तीक्ष्ण कटाक्षो से क्षत एव ससार के रागी बनकर क्रोध आदि कर रोगो के असंख्य घावो की तीव्र व्यथा वे व्यथित रहते है। कृमियो की भॉति अपने अंग से ही उत्पन्न हुए पुत्रादि उन्हे स्नेह के कारण चिपट कर खाए डालते है। सासारिक क्लेशो को शय्या पर पड़े हुए वे अनेक कष्ट भागते है। यहाँ अगी रस है शान्त । उसी के उद्दीपन के रूप में स्त्रियों के कटाक्षो से हृदय के क्षत होने, व्यथा पीड़ित बनने तथा पुत्री की स्नेह लग्न कृमियो से समता देने आदि का गौण रूप से वर्णन है। ये भाव शान्त रस के ही मुखापेक्षी है । सेवको की भॉ त उनकी वृत्ति सीमित है । इस प्रकार भाव-योजना मे परम औचित्य के दर्शन होत है। अब आगे ऐसे उदाहरण दिये जाते है जिनमे रसगत औचित्य नहीं मिलता। शृगार और शान्त के सकर में यह अमरुक कवि का पद्यार्थ है। - 'यदि जाना निश्चित ही है तो चले जाना, शीघ्रता क्या है। दो तीन कदम चलकर खड़े हो जाइये, जबतक मै तुम्हारा मुँह देखती हूँ। यह जीबन घटी के छेद में से ( २४ ) बहते हुए पानी के समान है। कौन जानता है, बाद में मेरा तुम्हारा संग़म हो या न हो। इसमें प्रकृत-रस शृङ्गार है । 'जब तक मै मुँह देखती हूँ।' वाक्य की उत्कण्ठा से उसी की परिपुष्टि भी कीगई है। उसका विरोधी शान्त-भाव यहाँ अंग है। पर ससार की अनित्यता के वणेन से जो वैराग्य प्रतीत होता है उससे रतिभाव तिरस्कृत हो जाता है और उससे बड़ा अनोचित्य आ जाता है। संसार की असारता एवं अचारुता के श्रवण से कठोर चित्त लोगो का भी उत्साह भग और उदासीनता हो जाते है । पुष्प के समान कोमल चित्त वाले विलासिओ का तो फिर कहना ही क्या। अन्त मे शान्त-रस का परिपोष दिखाकर यहाँ और भी वैरस्य उत्पन्न हो गया है। प्राचार्य आनन्दवर्धन ने यही कहा है :- 'कोई भाव विरोधी हो या अविरोधी, अन्य रस के अंगी होने पर उसकी पुष्टि नहीं करनी चाहिए। इसी से अविरोध होता है।' इसका उलटा उपयुक्त पद्यार्थ मे हो गया है। इसके विपरीत अंगी रस का विरोधी भाव भी यदि परिपुष्ट न हो तो प्रधान का उपरोध नहीं होता। उदाहरण के लिए राजशेखर का निम्नलिखित पद्य लीजिए। 'मान छोड़ो। अपने प्रिय पर कटाक्ष पूर्ण दृष्टि डालो। पीन स्तनो का स्तभनकारी यौवन पाँच या छ. दिन ही है।' कोयल के इस मजुल स्वर के बहाने से चैत्र महोत्सव ने कामदेव की प्रबल आज्ञा मानी दे डाली है। इस काव्य में मुख्य रस शृगार है। वही प्रारम्भ से अन्त तक व्याप्त है। पर 'यौवन पाँच छ दिन ही है।' इस वाक्य से अनित्यता रूप शान्त रस की बूद उसके मध्य में गिर गई है। फिर भी वह नीरस नहीं बना क्योोके विरुद्ध रस का परिपोष नहीं हुआ है । विरुद्ध भाव के वर्णन के अनौचित्य से तो गड्ढे में गिरे हाथी की भॉति प्रधान भाव फिर उठ नहीं सकता। इस प्रकार से रस के संकर स्थल में औचित्य का विचार विद्वानो को करना चाहिए। रसौचित्य के विचार के अन्तर उद्देशानुसारी क्रम से क्रिया पद के मौचित्य को अब दिखाया जाता है :- 4 ( २५ ) क्रियापद औचित्य (१९) का०-सत्पुरुष की भॉति काव्य के गुण वृत्त (छन्द अथवा व्यवहार) और साधुता तभी अच्छे लगते है जबकि उसकी क्रिया उचित हो। वृ०-- क्रियापद यदि औचित्यपूर्ण होता है तो काव्य के माधुर्य आदि गुण, वसन्त तिलका आदि छन्द और साधुता उसी प्रकार अच्छे लगते हैं जिस प्रकार श्रेष्ठ कर्म करने से सत्पुरुष के विनय आदि गुण, व्यवहार और साधुता (भलमनसाहत) आदि अच्छे लगते है। क्रियापद के औचित्य का उदाहरण ग्रन्थकार की अपनी नीतिलता पुस्तक का यह पद्यार्थ है 'जो सात समुद्रो पर सन्ध्यार्चन करने के कारण अपने वेग के लिए प्रसिद्ध है, जिसमे अपने बाहुदर्प से दुन्दुभि राक्षस का शरीर ककाल बना दिया था, मायावो दानव को पोसकर जिसने पाताल को रुधिर से भर दिया था, वह सुग्रीव की अच्छी से अच्छी संपत्ति को लूट लेने वाला बाली क्या तुम्हें याद है ? इसमें शुक और सारिका रावण को दुर्नय के मार्ग से हटाने के लिए उपदेश दे रहे हैं। यहाँ 'क्या तुम्हे स्मरण है' इस क्रियापद से 'आप भी वस्त्र के एक छोर में बॉवकर बगल में रख लिये थे। यह तथ्य उचित रूप से व्यक्त हो जाता है। श्रीप्रवरसेन के इस पद्यार्थ मे यह औचित्य नहीं मिलता:- 'समुद्र मंथन से पहले बिना पारिजात का स्वर्ग, कौस्तुम तथा लक्ष्मी से शून्य विष्णु के वृक्षस्थल और बाल चन्द्रमा से शून्य शिव के जटाभार का मै स्मरण करता हूँ।' यह उक्ति जाम्बुवान की है और प्रकृष्ट गुणो के कथन का यह प्रसंग है। पर क्रियापद से शरीर के केवल जटाजर्जरित होने की व्यजना हुई है। पौरुष के उत्कर्ष का उल्लेख जो उचित था, वर्णित नहीं हुआ। कारक का औचित्य (२०) का०-जैसे कुल का आभरण ऐश्वर्य उदारचरितों से शोभा- यमान होता है उसी प्रकार उचित कारकों ने साध्वय बना वाक्य M ((२६) शोभा पाता है। कतृ पद का औचित्य भट्टवाण के इस पद्यार्थ में देखिये :- 'राजन, तुम्हारी रिपु खियो का स्तन युगल अश्रु स्नात होकर, हृदय की शोकाग्नि के समीप में बैठकर और विमुक्ता- हार (आहार छोड़कर तथा मोतियो के हार से शून्य बनकर) बनकर व्रतसा करता है। वृ०-यहाँ कहना यह था कि शत्रु स्त्रियाँ व्रत करती हैं पर उसके स्थान पर 'स्तनयुग ही वाष्पसलिल में स्नान कर शोकाग्नि का समीपवर्ती बनकर और आहार या हार त्यागकर व्रत करता है। यह कहा गया है। इसमे कर्तृ पद का विलक्षण प्रयोग है और उससे औचित्य की वृद्धि होती है। परिमल कवि के इस पद्यार्थ में उक्त भौचित्य नहीं है :- 'हे मालवसिह, गुजेरपति न भोजन करता है न जल पीता है। स्त्रियो का सेवन उसने छोड़ दिया है। अन्य विषयो का भी त्यागकर वह बालू पर सोता है और प्रचण्ड धूप का सेवन करता है। मानों यह सब तुम्हारे चरण कमलो के धूलि-कणों का प्रसाद पाने के लिये करता है।' यहाँ प्रतिपाद्य यह है कि गुर्जरपति भागकर मरुस्थल में चला गया है। उसने आहारादि सब छोड़ दिये है और प्रचण्ड धूप का सेवन करते हुए वह तपश्चर्या करता है। इसमे तथ्य निवेदन सा लगता है। इस प्रकार यहाँ कर्ता का प्रयोग नहीं हुआ कि कुछ विशेष अभिप्राय के उचित प्रतीत होता। शत्रु के भय से डरकर मरुवनो में घूमते हुए, विषय भोग परिभ्रष्ट वह और क्या करता ? स्तनयुग को कर्ता बनाकर अचित्य का जैसा प्रकर्ष पहले पद्यार्थ में विद्यमान है वैसा इसमे नहीं है। कर्मपद का औचित्य प्रन्थकार की 'लावण्यवती' पुस्तक के अधोदत्त पद्यार्थ से दिखाई देता है- 'हे राजन्, तुम्हारी तलवार मे स्वच्छ धार' का शैत्य। १-पद्य में श्रोष के द्वारा तलवार के गुणो के लिए ऐसे शब्दो का प्रयोग किया है जिससे उसमे अपने गुणो के अतिरिक्त ठण्डेपन की भी प्रतीति है। प्रत चिह्नित शब्द द्विअर्थक है-धार = तलवार का काटने वाला पैना भाग और जल का बहाव । २-शैत्य पैना पन भोर ठडक ।

वर्तमान है, वह बादलों जैसा चमकता है और मामृतों के बड़े-बडे कटकों को गिराता हुत्रा बहता है। शौर्य के कानों के लिए नूतन कमल पत्रों जैसा वह है। फिर भी आश्चर्य है कि शत्रु के लिए जलती आग का सा संताप देता है। इस पद्यार्थ में श्लेष की सहायता से तलवार के गुणों का वर्णन ऐसे द्विअथक शब्दो से किया गया है जो एक ओर तो उसके पैनेपन आदि गुणों का प्रख्यापन करते है दूसरी ओर उसमें जल के ठंडक बहना आदि गुणों का संकेत देते चलते है। अत: आपाततः तलवार शीतल है यह प्रतीत होता है फिर भी वह शत्रुओं को सताप देती यह आश्चर्य जनक वैचित्र्य है। शीतल सामग्री से संताप जैसे गर्म पदार्थ का जन्म होता है यह रुचिर औचित्य इससे आया। यही बात ग्रन्थकार के अपने 'अवसर सार' प्रन्थ के इस पद्यार्थ में नहीं है। 'हे भुवननाथ, अग्नि जैसा आपका प्रताप भगोड़े शत्रुओं की श्वासों से बढ़कर और काष्ठाश्रयण (दिशाओं में फैलना और लकड़ी का सहारा लेना ) से और भी द्विगुणित होकर मारे गये शत्रुओं की स्त्रियों को संताप देता है।' यहाँ राजा का प्रताप भागने वाले शत्रुओ के श्वासानिल से प्रज्वलित होता है और दिशाओं में फैलकर ईधन से प्रदीप्त अग्नि की भॉति प्रौढ बनता है। वही फिर शत्रु कान्ताओं को संताप देता है । इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? यहाँ रुचिर औचित्य कुछ भी नहीं है। करणकारक का औचित्य गौड कुम्भकार कवि के नीचे लिखे पद्यार्थ में दिखाई पड़ता है। 'हनुमान बानर ने समुद्र लंघन के समय अपनी पूंछ से सूर्य का घेरा बॉध दिया, सिर से चन्द्रमा को छू डाला, सटाओं से बादलों को कपा दिया और डाढ़ो से तारो को उखाड लिया। देखते ही देखते वह समुद्र को लांघ १-क्ष्मामृत राजा और पर्वत । २-कटक-सेना और शिलाये।

" (८) गया। उसके निर्मुक्त अट्टहास की उर्मियों से लंकेश का बढ़ा-चढ़ा प्रतापानल शान्त हो गया . यहाँ बताया गया है कि हनुमान ने समुद्र लंघन के समय अपनी पूंछ से सूर्य का घेरा बाँध दिया, मौलि से चन्द्रमा का स्पर्श किया, सटाओं से बादलो को कंपार्या, डाढों से तारों को उखाड़ दिया और अट्टहास की तरंगों से रावण की प्रतापाग्नि को शान्ति कर दिया । इसमें करण कारक अनेक हैं। इनसे हनुमान के उत्साह की द्योतना होती है। विस्मयानुभूति के शिखर पर चढ़ने के वे सोपान से बन जाते हैं। फलस्वरूप श्रीराम के विजय की ध्वजा के समान हनुमान का औचित्यातिशय इससे प्रकट होता है । वाण भट्ट के इस पधार्थ में इस प्रकार का औचित्य नहीं - मिलता। 'नृसिंह भगवान् की जय हो जिन्होंने भेदन करने की इच्छा से शत्रु के वक्षस्थल पर जो कोपारुण दृष्टि क्षण भर के लिए डाली तो उसे ऐसा बना दिया कि मानो वह भय से ही फट गया हो।' इसमें बताया गया है कि नृसिंह भगवान की क्षण भर की कोपारुण दृष्टि से हिरण्यकशिपु का वक्षस्थल स्वयं मानों भय से फट गया। यहाँ प्रधान नायक नृसिंह भगवान् है। प्रति नायक है हिरण्यकशिपु। उसे उत्साही पराक्रमी और धैर्यशील दिखाने से ही प्रधान नामक के प्रतापोद्दीपन के लिए उपकरण का लाभ हो सकता है। 'भय मात्र से ही वह फट गया' ऐसा कहने से हिरण्यकशिपु की दुर्बलता द्वारा नृसिंह भगवान की दृष्टि का महत्व कम हो जाता है। यह अनौचित्य करण कारक से संबन्धित है। सम्प्रदान गत औचित्य भट्टप्रभाकर के इस श्लोकार्थ में विद्यमान है। 'दिग्गजों तक फैली पृथ्वी की साध सभी करते हैं। यह कहते हम रोमांचित हो जाते हैं कि परशुराम ने उसी पृथ्वी को सिद्ध कर लेने के बाद एक ब्राह्मण को दान में दे डाला। उन्हे प्रणाम है । यह अद्भुत कथा जहाँ से प्रादुर्भूत हुई उसी में अस्त हो गई।

। (२) विस्तृत पृथ्वी को प्राप्त करने की सब साध करते हैं। परशुराम ने उसे सिद्ध कर अन्न मुष्टि की भाँति क्रीडा सी में एक ब्राह्मण को दान कर दिया। इस निरतिशय औदार्य के आश्चर्य चमत्कार से रुचिर औचित्य का जन्म होता है जिसका अनुभव करते हुए हम भी रोमाचित हो जाते हैं। और क्या उन महात्यागी भार्गव को प्रणाम है । इस वाक्यार्थ में ब्राह्मण को यह एक बचन के सम्प्रदान मे चमत्कार के विशेष उत्कष की प्रतीति है। राजशेखर के इस पद्यार्थ मे वैसी बात नहीं। 'पौलस्त्य प्रेम के साथ याचना करते हैं । यह सुनकर मन प्रसन्न होता है । परन्तु शिव से प्रसाद में प्राप्त हुआ यह परशु देने की वस्तु नहीं, इससे बहुत खेद होता है । इसलिए हमारी ओर से दशानन को कहना कि हमने ब्राह्मणों को तो पृथ्वी दे डाली। अब आकाश और पाताल में से जीतकर उन्हें क्या प्रदान किया जाय 'कहें।' रावण का दूत उसके लिए भार्गव से परशु माँगता है। इस पर वे उत्तर देते हैं कि शिवजी से प्रसाद मे प्राप्त हुआ यह परशु देने योग्य नहीं है। इसलिए हमारी ओर से दशानन को कहना कि पृथ्वी तो हमने कश्यप को दान करदी। तुम्हे आकाश पाताल में से क्या चीज जीतकर प्रदार की जाय। इसमें लोकहित में प्रवृत्त मुनि का त्रिलोकी के लिए कटक भूत रावण को इतना बड़ा दान देना अनुचित है। अपादन गत औचित्य मालव रुद्र के निम्नलिखित पद्यार्थ में देखिए 'बादल इस समुद्र से ही जल की कुछ परिमित कणिकायें लेकर आकाश को घेर लेते हैं और पृथ्वी को जलाप्लावित कर देते हैं। विष्णु भी इसीमें घूमते हुए मन्दराचल के शिखरों के परस्पर संघर्षण को देखकर भयभीत नेत्रों वाली एक जल मानुषी को प्राप्त कर श्रीमान बन गए।' जैसा कि पद्यार्थ में कहा गया है, इस समुद्र से कुछ परिमित कणिकाओ को प्राप्त कर बादल संसार भर को जल से भर देते हैं और इसी से समुद्र मथन के समय घूमते हुए मन्दराचल के शिखरों के संघर्षण से भयभीत बनी एक जल-मानुषी को लेकर विष्णु श्रीमान बन गए। इससे सागर के उत्कर्ष की व्यंचना होती है। इस औचित्य की मूल भूमि है, 'इस समुद्र से इतना अपादान कारकान्त ANIMA महेन्दुराज के निम्नलिखित पद्यार्थ में अपादान कारक में अनौचित्य प्रतीत होता है 'इस महाणेव ने चारों ओर की नदियों के मुँह से जल लेकर क्या किया ? उसे खारा बनाया, वडवाग्नि मे जलाया और पाताल की गहरी गुफा मे छिपा लिया।' यहाँ महार्णव के बहाने से अन्याय से धन एकत्र कर बुरी भाँति व्यय करने वाले तथा सत्कार्यों में धन व्यय न करने वाले किसी व्यक्ति का वर्णन है। नदियो के मुंह से जल एकत्र कर अपात्रों को उसे दे डालने के दोष का उल्लेख है। 'पर नदियो से' यही कहना उचित था उसके स्थान पर नदियो के मुख को अपादान बनाने में मुख शब्द निरर्थक हो जाता है । अत अपादान-कारक गत अनौचित्य यहाँ विद्यमान है। अधिकरण कारक का औचित्य कालिदास के कुन्तेश्वर दौत्य ग्रन्थ के इस पद्यार्थ में मिलता है। 'यहाँ पर्वतो का मूर्धन्य मेरु निवास करता है, यहीं पर सातो समुन्द्र अपना अपना भार रखे हुए है । यह धरणितल शेषनाग के फण के स्तभों पर विराजमान है। हमारे जैसो का यहीं स्थान उचित है। किसी महाराज का दूत उसके सामन्त के यहाँ गया। वहाँ उसने अपने स्वामी के समुचित पूजार्ह स्थान पाया। फिर कभी कार्य- वश भूमि पर ही बैठना पड़ा तो अपने गौरव की रक्षा करता हुआ प्रगल्भता के साथ कहता है कि हमारे जैसो के लिए शेष नाग के फणो पर स्थित प्रत' अडिग पथ्वी पर ही उचित आसन हो सकता है। यहीं पर सातो समुद्र तथा मेरुपर्वत स्थित है। उन्हीं के तुल्य हम । यह भाव का औचित्य अधिकरण कारकगत औचित्य से सम्बद्ध है। परिमल के निम्नलिखित पद्यार्थ में यह औचित्य नहीं है । 'हे देव, आपका भृत्य मै चकित चित्त होकर इतने दिन वहाँ ठहरा जहाँ आपका प्रताप सुन्दरियो के कपायमान स्तन तटों पर हारों को चलायमान कर देता है।' . an ३१ ) ( इसमें कहा गया है कि मै आपका सेवक उस देश में ठहरा जहाँ आपका प्रतापसुन्दरियो के कापते हुए स्तनों पर हारो को चलायमान बना देता है, इस कथन से शौर्य और शृङ्गार का गुणोत्कर्ष वर्णनीय है पर अधिकरण कारक के प्रयोग से सर्वत्र दिशाओ मे फैलने वाले प्रताप को सीमित कर दिया गया। इससे व्यग्यार्थ यही आता है कि वह सेवक किसी एक सीमित प्रदेश मे रहा जहाँ पर उसके स्वामी का प्रताप विद्यमान था अन्यत्र नहीं। यदि राजा का प्रताप सर्वगत तो 'सर्वत्र ही मे ठहरा' यह कहना चाहिए था। इस पर किसी एक देश का उल्लेख करने से सीमितता आती है। किसो एक स्थान में तो चोर का भी प्रभाव बढ़ा चढ़ा हो सकता है। यह अनौचित्य अधिकरण गत है। कहना यह चाहिये था कि 'मै वहाँ-वहाँ ठहरा जहाँ-जहाँ आपका प्रताप था'। स्तुति के उचित यही है। लिंगौचित्य (२१) का०--जिस प्रकार साम्राज्य सूचक शुभ लक्षणों से शरीर भव्य बन जाता है उसी प्रकार उचित लिंग के शब्दो का प्रयोग करने से काव्य में विशेष चारुता आ जाती है। उचित लिग से तात्पर्य प्रसंगोचित लिग के प्रयोग से है। उसी से काव्य भव्य बनता है। जैसे ग्रन्थकार की 'ललितरत्न माला' का यह श्लोकार्थ- 'वह निद्रा का स्पर्श भी नहीं करता। धृति को त्याग चुका है। कहीं भी स्थिति नहीं कर पाता । लम्बी कथाओ का न्यथा समझता है। निवृत्त उसे किसी भी प्रकार से नहीं मिलती। रत्नावली की आराधना करता हुआ उसके गुणस्तव और जप ध्यान मे इतना नि सग हो गया है कि दूसरी अंगना का नाम भी उसे सह्य नहीं।' यहाँ रत्नावली के वियोग से दुखी उदयन की काम दशा की सूचना विदूषक सुसंगता को दे रहा है। अन्त मे कहा गया है कि उसे दूसरी स्त्री का नाम भी सह्य नहीं है। इसके लिये निद्रा, धृति, स्थिति, दीर्घ कथा निवृति आदि जिन-जिन वस्तुओ का उसने त्याग किया है वे सभी स्त्रीलिग मे है। इनमें स्त्रीत्व का अध्यारोप किया जा सकता है। फलतः हेय वस्तुओ के लिए स्त्रीलिंग का प्रयोग यहाँ अत्यन्त समुचित है। do- ( ३२ ) उन्हीं की 'नीतिलता' के नीचे लिखे पद्यार्थ में उक्त औचित्य विद्यमान नहीं है :- 'वरुण से रण लेने मे समर्थ, स्वर्ग का भंग कर देने से कृतार्थ, यमराज के नियत्रण में सक्षम, वायु को उखाड़ फैंकने में सलग्न, कुबेर की मृत्यु तक कर देने को उद्यत तथा अग्नि के दलन के लिए प्रचण्ड मेरी भुज-मडली किसी मानव से लड़ने मे लज्जित होती है।' यहाँ रावण अंगद के तिरस्कार से क्रोधित होकर उसके उचित अपना बलशौर्य प्रकट कर रहा है। 'वरुणादि लोकपालो के बलदर्प का विध्वंस करने वाली मेरो भुजमंडली मानव से लड़ाई करने मे लज्जित होती है। यह उसने कहा है। लज्जा का कारण मानव युद्ध की लघुता है-यह अभिप्रेत है। पर 'भुजमडली' मे स्त्रीलिग वाचक शब्द रख देने से त्रिलोकी की विजय के कारण उसका प्रताप जो प्रचण्ड बना था उसकी कठोरता जाती रही। अब तो ऐसा लगता है कि भुजमण्डली मानो अपनी कोमलता के कारण लज्जित होती है। वह स्त्री बन गई। इस प्रकार यहाँ लिगगत अनौचित्य आया। वचन गत औचित्य (२२) का०-काव्य में चारुता उचित बचनों के प्रयोग से आती है जैस अदीन और उदार अन्त करण वाले विद्वानो के मुख उचितवचनो के प्रयोग से शोभायमान होते है। वृ०-जिस प्रकार विद्वान का मुख याचना रहित, उचित सुन्दर एव प्रिय शब्दो का प्रयोग करने से अच्छा लगता है उसी प्रकार काव्य भी एकवचन, द्विवचन, बहुबचन आदि भाषा बचना के समुचित प्रयोग से रमणीय वन जाता है। उदाहरण मे ग्र थकार को नीतिलता का यह पद्यार्थ है। 'पौलस्त्य ने त्रिलोकी पर अनेक आक्रमण किए है, योद्धाओ की अनेक विजय की है, असंख्य रत्नो की प्राप्तियों की है, युद्ध रूपी समुद्र म लक्ष्मी के अनेक स्वयवर जीते है और बली पुरुषो क बहुत स आश्चर्य जनक बंधन किए है। इनके लिए वह प्राख्यात हे। फलतः एक बार ही के श्रम से निद्रा में डूबने वाल विष्णु पर वह नित्य हॅसता है। वृक्ष-यहाँ शुक और सारिकाय रघुपति के आगे रावण के पराक्रम का वर्णन कर रहे है। शेषशायी विष्ण एक बार के उद्योग के श्रम ( ३३ ) से ही निद्रा के आलस्य में आकर समुद्र में जा स्रोते हैं पर पौलस्त्य त्रिलोकी के अनेक आक्रमणो, विजयी, योद्धाओं पर बहुत से विजय, अनेक रत्नों की प्राप्तियो, समर रूपी समुद्र से बहुत बार विजयश्री के स्वयंवरो तथा लोकपाल आदि बलवानों के अनेक बार बन्धन कर लेने के बाद भी सदा जागृत एवं सोत्साह बना रहता है। इसीलिए वह विष्णु पर हँसता है। यहाँ रावण के कार्यों को बहुवचन तथा विष्णु के कार्यों को एकवचन में कहकर दोनों के भेद का औचित्य व्यक्त किया है। यही गुण मातृगुप्त के निम्नलिखित पद्यार्थ में नहीं मिलता। 'स्वामिन, रात्रि के मुख सरोरुह का राजहस और काश्मीरी तरुणी के कपोलतल के तुल्य शरीर वाला यह चन्द्रमा नहीं है। यह तो आकाश में चमकने वाला दुग्ध सिन्धु के फेनपिण्ड की भॉति श्वेत आपका यश है।' इसमे कहा गया है कि यह चन्द्रमा नहीं है बल्कि दुग्धाब्धि के फेन पिण्ड की भॉति श्वेत राजा का यश है। यश का प्रचार अनेकत्र होता है, अतः उसका बहुबचन से वर्णन करना चाहिए। एकवचन के प्रयोग से तो यश का स्वरूप चन्द्रपिण्ड के आकार का सीमित हो जाता है। विशेषणौचित्य (२३) का०-समुचित विशेषणों से विशेषित होकर काव्यार्थ ऐसा रमणीय हो जाता है जैसा गुणी मित्रो से सज्जन । वृ०-काव्य के मुख्य अर्थ की शोभा विशेषणों द्वारा ही होती है जैसे गुणोदार सत्पुरुष की शोमा गुणशाली मित्रो से होती है । उदाहरण प्रन्थकार की मुनिमत मीमासा का यह पगार्थ है। 'चैत्र मास के नवीन यौवन भरे उपवन, आमोद-पूर्ण कमलिनी, चाँदनी की चादर ओढ़े रत्नों की अटारियों के महल, रमणीय युवतियाँ यह सब सुन्दर है। वे किसे प्रिय नहीं हैं। पर जिसमें इनका भोग होता है वह जीवन तो मिट्टी के कच्चे घड़े जैसा क्षिप्रक्षयी है।' महाराज युधिष्ठिर को महान् विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं। मय दानव के बनाये हुए मणिमय सभा भवन पर उन्हे अभिमान भी है। । mega इस पृष्ठ भूमि में उनके विभव का वर्णन करते हुए समस्त पदार्थों के अभाववाद का उपदेश देने वाले महामुनि व्यास के श्राशय का इस पद्यार्थ में विचार किया गया है। वसन्त में अपने पूर्ण यौवन के साथ खिले हुए उपवन, मकरन्द की सुगन्ध से परिपूण कमलिनियाँ, चाँदनी में चमकने वाले अट्टालिकाओ वाले महल तथा रमणीय युवतियाँ ये सब सुन्दर है तथा सभी को प्रिय है। पर जिस जीवन में इनका भोग किया जाता है वह तो मिट्टी के कच्चे घड़े की भॉति निस्सार तथा नश्वर है । यहाँ विशेषणों द्वारा विशेष्यों के उत्कर्ष को बढ़ाया गया है। उससे अन्त मे निस्सारता और निर्वेद की व्यंजना करने वाला औचित्य सिद्ध होता है। यही विशेषता भट्टलट्टन के निम्नलिखित पद्यार्थ में नहीं हैं। 'बड़े-बड़े तालाब संकट में पड़ कर ग्रीष्म ऋतु से द्वष एवं वर्षा ऋतु की याचना करें। पर समुद्र को इन दोनों का विचार भी नहीं आता। उसकी कोख मे मद्राचल छोटी- छोटी मछलियो की भॉति घूमता है और इससे उसके पेट का पानी भी नहीं हिलता।' यहाँ बताया गया है कि संकट में पड़ कर बड़े-बड़े तालाव वर्षा से द्वष करते हैं और जलदागम की याचना करते है। पर समुद्र इतना महान है कि उसे इन दोनो की कोई चिन्ता नहीं। उसकी तो कुक्षियो का जल चलायमान मन्द्राचल से भी नहीं हिला था। इसमें तालाब के दो 'विशेषण सकट में पड़ कर' तथा 'बड़े-बड़े परस्पर विपरीत हैं अतः अनुचित है। जो संकट ग्रस्त है वह विस्तीर्ण नहीं हो सकता। यदि कहा जाय कि कोई तालाब स्वभाव में संकटापन्न तथा आकार में विस्तृत है तो यह बात भी युक्ति सगत नहीं क्योंकि तालाब जैसी निश्चेतन वस्तु का स्वभाव नहीं हो सकता। उपसगौचित्य (२४) काल-योग्य उपसर्ग के योग से काव्य का अर्थ इसी प्रकार और अधिक बढ़ जाता है जैसे सन्मार्ग के आश्रयण से सपत्ति का०-काव्यगत सूक्ति 'उप' आदि उपसर्गों से और अधिक सुचारु बन जाती है। जैसे सन्मागे के गमन से विभूति । उदाहरण के लिए मन्थकार की 'मुनिमत मीमांसा' का निम्नलिखित पद्याथे देखना चाहिए।

। (३५) 'भाग्य विपर्यय हो जाने से जब व्यक्ति सुख के उच्च शिखर से गिर जाता है तो वह अग्नि में गले हुए लोहे की भाँति कर्मण्य बन जाता है। वह आचार का पालन करता है। अभिमान छोड़कर वैराग्य ले लेता है। साथियों का भग हो जाने से उसका उतुङ्ग अभिमान गल जाता है तथा वह तप करना चाहता है।' घोष यात्रा के अवसर पर गन्धर्व बन्ध के कारण दुर्योधन का अभिमान भग्न हो गया था। वह अपने बढ़े-चढ़े राज्य को छोड़कर तप करने को उद्यत हुआ। उस समय के उसके आग्रह का इसमें वर्णन है। वैभव के नष्ट हो जाने पर सुखभ्रष्ट व्यक्ति सदाचार का पालन, मद का त्याग, वैराग्य का समाश्रयण तथा उत्तुङ्ग अभि- मान को गला देने वाला तप आदि सब कुछ करता है। ऐसी दशा में अधिकतर वह गले हुये लोहे के समान कर्मण्य बन जाता है। यहाँ अमिमान को उत्तुङ्ग कहने में जो उत् उपसर्ग का प्रयोग हुआ है उससे तुग शब्द का स्वाभाविक अर्थ ऊ चा द्विगुणित हो गया और उसके फलस्वरूप मद और अभिमान की अभिव्यक्ति में एक प्रकार का भौचित्य आ गया। कुमार दास के इस पद्यार्थ में उक्त औचित्य नहीं मिलता। 'हे नव संगम भीरु सुन्दरि, गाढ़ आलिंगन का त्याग करो। प्रियतम को छोड़ो। अरुण की किरणो का उदय हो चुका है और मुर्गे बोल रहे हैं। यहाँ पति के नवीन संगम में व्यस्त किसी नायिका को संबोधन दिया जा रहा है। प्रभात संध्या में अरुण उदित हो गया है और मुर्गे बोल रहे हैं। उसमें 'बोल रहे हैं के लिए 'सम्प्रबदन्ते' क्रिया का प्रयोग है जिसमें 'सम्' और 'प्र' दोनों उपसर्ग निरर्थक हैं। निपातौचित्य (२५) का०-उचित स्थानों पर नियुक्त किए गए सचिवों से जैसे राज्य व्यवस्था ठीक हो जाती है उसी प्रकार निपातों का उचित स्थान पर प्रयोग करने से काव्य की अर्थ संगति शोभनतर बन बाती है।

काल-संस्कृत के 'च' आदि निपातों से उचित स्थान पर रख देने से काव्य की अर्थ संगति, असंदिग्ध हो जाती है जैसे ग्रन्थकार की 'मुनिमत मीमांसा' के इस पद्यार्थ में । 'जड़ बुद्धि के लोग स्वगे सुख की कामना से सैकड़ों बड़े-बड़े यज्ञ करते हैं । उनका स्वग में बहुत-सा समय बीतता भी है। पर वह आधे क्षण के समान होता है। पुण्य धन के क्षीण हो जाने पर वहाँ वे नहीं ठहर सकते जैसे कामी लोग द्रव्य की समाप्ति पर वेश्या के घर नहीं रुक पाते। इसलिए मोक्षसुख का सहारा लेना चाहिये। अरे वही सत्य है, वही नित्य है। इसमें स्वर्ग-सुख को वेश्या भोग की भाँति अवसान में निरस एवं चंचल तथा मोक्ष-सुख को नि:संदेह एवं निश्चित बताया गया है। उसमें श्ररे' निपात का प्रयोग उचित स्थान पर होने से वाक्याथ में औचित्य आगया है। श्री चक्क कवि के इस पद्यार्थ मे वैसी बात नहीं है। 'श्राप यद्यपि सब कुछ जानते है फिर भी मै नीति की बात कहता हूँ। जालान्तर के राजा से, जो आपका बान्धव है, संधि स्थापित कर निश्चिन्त हो जाइये । फिर म्लेच्छों का विनाश, अपने अयश का निवारण, विश्व भर में यश का विस्तार तथा समुद्र पयन्त फैली हुई पृथ्वी पर से कर प्राप्त कीजिए। यहाँ राजा की स्तुति का प्रसंग है। आप सब कुछ जानते हैं फिर भी इस अर्थ के लिए कवि ने 'देवोजानाति सर्व यदपि च तदपि' वाक्यांश प्रयुक्त किया है। इसमें 'यदपिच तदपि' के मध्य में आया हुआ और अथ वाला 'च' निरर्थक है। एक से अधिक वस्तुओ के सयोग में 'च' सार्थक होता है। यहाँ ऐसा कुछ नहीं है। यहाँ तो 'च' की स्थिति ऐसी है जैसे किसी उत्सव की जौनार मे अपरिचित अनिमत्रित व्यक्ति का पंक्ति में बैठ जाना। यही अनुचित है। कालौचित्य (२६) का०-वाक्य में जब कालोचित अथ का संनिवेश होता है तो वह ऐसा सुन्दर लगता है जैसा अवसरोचित वेष से सत्पुरुषों का शरीर ।

प्रन्थकार की 'मुनिमत मीमांसा' का यह पद्याथ इसका उदाहरण है। 'जो ग्वालों का शिशु, दूध दही का चोर और करसियाँ चुगने वाला था, उसी को जड़ लोग आज जगत्पति, शौरि मुरारि, हरि, श्री वत्साक आदि आदि नामों से स्तुति कर कानो को भरे डाल रहे हैं।' परिवर्तन करने मे निपुण- काल की पाकक्रिया कितनी आश्चयजनक है ? अमर्प को प्रक्ट कर मरने वाला शिशुपाल यह कह रहा है। यहाँ 'था' भूतकाल की क्रिया से आश्चर्य का परिपोष होता है और अधिक्षेप रूप जो वाक्य हैं उनका औचित्य सिद्ध होता है। कवि मालव कुवलय के नीचे लिखे पद्यार्थ में भी वैसा औचित्य है। 'कुन्दों के पुष्प गिर रहे हैं। वृक्ष पुष्पोद्गम के मारे अलस हो रहे है। कोयले स्वर को मन में रखती ही हैं, बाहर नहीं फैलाती। सूर्य की किरणें शीत के बढ़ावे का छेदन तो करती हैं पर थकान देने वाली प्रौढ़ता अभी उनमें नहीं आ रही।' बसन्त प्रारम्भ ही हुआ है। उसमें नवीन रसों के उल्लास से कामजन्य उत्कठा की अनुभूति होती है। इसके लिए ऋतु संधि के इस प्रकृति वर्णन में वर्तमान काल की क्रियाओ के प्रयोग द्वारा हृदय संवाद सुन्दर औचित्य का स्फुरण होता है। वाराहमिहिर थे इस पद्यार्थ में उक्त औचित्य नहीं रहा। 'मास मास में चन्द्रमा क्षीण होकर सूर्यमंडल में प्रविष्ट होता है । किसी एक कला को लेकर फिर दूर दूर हो जाता है। जब किसी प्रकार संपूर्ण होता जाता है तो सूर्य की स्पर्धा करता हुआ उदित होता है । न वह कभी कुटिलता बंद करता है और न कभी दीनता को उसने छोड़ा। यहाँ प्रतिपाद्य यह है कि चन्द्रमा क्षीण होकर प्रत्येक मास में सूर्य मण्डल की शरण लेता है और प्राणदात्री किसी एक कला को लेकर दूर हो जाता है। जब किसी न किसी तरह पूरा हो जाता है तो सुय से ही स्पर्धा करता हुआ सामने निकलता है । इसमें कुटिलता और दीनता चन्द्रमा के दो धर्म सनातन हैं। उनके लिए परस्पर विरुद्ध (1) वर्तमान काल को बंद करता है। तथा भूतकाल की 'छोड़ा' क्रियाओं का प्रयोग विरुद्धार्थ होने से अनुचित है। देशौचित्य (२७) का०-देशौचित्य भी बड़ा हृदय संबादी होता है । इससे काच्यार्थ इस प्रकार शोभा पाता है जैसे परिचय' बढ़ाने वाला सञ्जनों का व्यवहार । भट्ट भवभूति का यह पंधार्थ इसका उदाहरण है : 'जहाँ पहले नदियो की धार वहा करती थी अब वहाँ पुलिन बन गया है। वृक्ष जहाँ घने थे वहाँ कम हैं। जहाँ कम थे वहाँ घने हो गये है। बहुत समय के बाद देखने पर वन और और सा लगता है। हा, पर्वतो का यथा स्थान सनिवेश यह निश्चय कराता है कि यह सब वही है।' बहुत वर्ष बीत जाने पर राम शबूक के वध के प्रसग से इण्डक बन में आए हैं। चारो ओर बन को देखकर वे कह रहे हैं कि जहाँ पहले नदियों का प्रवाह था अब वहाँ तट बन गया है, वृक्षो की धनता एव विरलता परिवर्तित हो गयी हैं। इससे बहुत दिन के बाद देखा गया वन कुछ दूसरा सा लगता है। पर्वत ही इस बुद्धि को स्थिर करते हैं कि यह सब वही है। यहाँ चिरकाल की उलटफेर के कारण परिवर्तित हुए कानन का वर्णन है। इससे हृदय सवादी देश स्वभाव के कारण मडे औचित्य का द्योतन होता है। राजशेखर के नीचे लिखे पद्यार्थ में उक्त गुण नहीं पाया जाता :- 'जो राजशेखर कवि कर्णाटी के दशनो से अंकित हुआ है; महाराष्ट्री के तीक्ष्ण कटाक्षों से पाहत बना है, प्रौढ़ आन्ध्री के स्तनों से जिसने पीड़ प्राप्त की है, प्रणयिनी के भूभगों से भी विभासित रहा है, जो सौराष्ट्र की तरुणियों के बाहुपाश में आबद्ध रहा है तथा मलयालम की सुन्दरियों ने जिसे तर्जनी से भिड़का है वही अब बनारस की कामना करता है। निरर्गल भोगो के अनन्तर पाने वाले शान्तभाव का कवि ने अपने पर घटाकर यहाँ वर्णन किया है। कर्नाटक आदि देशों के १-दो भले मित्र आपस में मिलते है तो अपने पूर्व परिचित प्रसगो की चर्चा करते हुए प्रेम को दृढ बनाया करतें है। भभिमानी मित्र अपनी अपनी नबीच सफलताओं की प्रशसा करते हुए एक दूसरे से पृथक् बन जाते हैं। - । - -- (३६) इन्द्रिय-सुख का भोग कर लेने के बाद जब कवि राजशेखर काराग- मोह गलित हो गया तो वह बनारस जाना चाहता है। इसमें श्रृंगार रस में झूमने वाली अंगनाओ के प्रसंग से मुक्तभोग प्रधान दक्षिणापथ का नामनिर्देश पूर्वक वर्णन करते हुए एक स्थान पर केवल 'प्रणयिनी के भ्र भंगो से वित्रासित' कहना और उसमें किसी देश विशेष का नामोल्लेख न करना विद्यमान देशौचित्य को अनुचित बना देता है। कुलौचित्य (२८) का०-सहृदयों के लिए पुरुषो के समान काव्य का भी कुलोपचित औचित्य विशेष उत्कर्ष का कारण बनता है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति का वंशपरंपरा का उन्नत औचित्य सहृदयों को प्रिय लगता है उसी प्रकार काव्य का भी। कालिदास के निम्नलिखित पद्यार्थ में इसका दृष्टान्त विद्यमान है। 'अब वह विषयो से व्यावृत्त हो गया। सब राजाओं में श्रेष्ठ अपने श्वेत राजछत्र को विधिपूर्वक अपने पुत्र को देकर उसने पत्नीसहित मुनिवनो के तरुओं की छाया का आश्रयण किया। बुढ़ापे में इदबाकुओं का यही कुलवत होता है। यहाँ बताया गया है कि इसके बाद राजा दिलीप ने वृद्ध होकर अपना राज्य पुत्र रघु को सौंप दिया और आप सपत्नीक तपोवन को चला गया। इक्ष्वाकु वंश के लोग अन्त में विरक्त होकर इसी कुलव्रत का पालन करते हैं । ऐसा कहने से एक वश के भूत, भावी और वर्तमान सभी कालों के राजाओं के प्राचार के औचित्य का पता चलता है। कवि यशोवर्म देव के इस पधार्थ में यह बात नहीं है।:- 'मेरी भण्ड कुल में उत्पत्ति हुई। जो पद अभीष्ट था वह भी मिल गया। फिर भी भाग्य से एक बार भी भोग भोगने को नहीं मिले। किसी राजा का समृद्धिकाल में पत्नी से वियोग हो गया। वह अनुताप में कहता है कि भण्ड कुल में अभीप्सित पद की प्राप्ति आदि तो सब मिल गए पर भोग फिर भी न भोगे जा सके। दैवयोग ? इस उक्ति में यह अनौचित्य है कि भण्डकुल काव्यादिकों में प्रसिद्ध नहीं है यहाँ पर बिना किसी उत्कर्ष बाचक विशेषण के केवल नाममात्र से उसका उल्लेख किया गया है। पहले पब में जन्म, (४०) इक्ष्वाकु कुल का भी वैसा ही उल्लेख है पर वह इस कारण उचित है कि उक्त वश त्रिभुवन प्रसिद्ध है। व्रतौचित्य (२६) काल-अच्छे अच्छे व्रतों के औचित्य का गौरव यदि काव्य में उल्लिखित होगा तो वह प्रशसनीय बन जायगा। इससे सहृदयो के मन में इस विच्छित्ति के कारण बड़े सतोष की सृष्टि होती है। जैसे ग्रन्थकार के 'मुक्तावली' काव्य के इस पद्यार्थ में :- 'यहाँ पर ढाक के वृक्ष वल्कल धारण करते हुए, पुष्पों की रेणु रूपी भस्म से भूषित बनकर चंचल भौंरो के वलय की अक्षमाला लेते है तो तपस्वी जैसे लगते हैं। इसमें तपोधनों के योग्य व्रत की ब्यजना करने वाली वस्तुओं का उल्लेख है जैसे वल्कल, भस्म तथा अक्षमाला का धारण करना। यहा अचेतनो में भी वैराग्य काल की विमल चित्तवृत्ति का वर्णन करना औचित्य की सृष्टि करता है। दीपक कवि के इस पद्यार्थ मे उक्त गुण नहीं है । 'स्वाभिमानी प्राणवान व्यक्ति सुधाते हो तो उदर पूर्ति के लिए हाथ मे श्वेत वस्त्र से ढका भिक्षा पात्र लेकर किसी गॉव या पवित्र जंगल मे, जिसके आसपास न्याय वेत्ता ब्राह्मणो की यज्ञाग्नि का धूआं फैला हो, द्वार द्वार पर घूम ले। यह अच्छा। पर समान कुल वालो मे प्रतिदिन दीन बनकर घूमना अच्छा नहीं।' इसमे वैराग्य के निमुक्त रूप का वर्णन अभिप्रेत है पर 'क्षुधात हो तो उदरपूर्ति के लिए भिक्षा-पात्र लेकर द्वार-द्वार घूम लो। यह अच्छा। पर समान कुल वालो में प्रतिदिन दीन बनकर घमना अच्छा नहीं।' ऐसा कहने से सहज शान्ति से निर्मल बने चित्त के विश्रान्त सतोष का त्याग कर तुल्य कुल वालो के द्वष को जीतने को इच्छा अधिक व्यक्त होती है । यह अनुचित है। तत्वौचित्य (३०) का०-कवि यदि अपनी रचना में किसी मार्मिक सत्य का उद्घाटन कर उसके प्रति सहृदयो की धारणा दृढ़ बना देता है तो वह कृति हृदय संवादी एवं प्राह्य हो जाती है। तत्त्वोचित कथन - से कवि की उक्ति इसलिये ग्राह्य बन जाती है कि उसमें सत्य के प्रति विश्वास स्थिर होता है। उदाहरण के लिए ग्रन्थकार की 'बौद्धा- वदानलतिका' का निम्नलिखित पद्यार्थ लीजिये। 'स्वर्ग हो, पृथ्वी हो या पाताल, शैशव हो या यौवन, बुढापा हो, मृत्यु काल हो या गर्भ शय्या का आश्रयण प्राणियों मे सदा साथ रहने वाले प्राक्तन कर्म का विनाश कभी नहीं होता। इस उक्ति में बताया गया है कि कर्म प्राणियों के सदा साथ रहता है चाहे शैशव हो, यौवन हो या बार्धक्य । उसका कभी विनाश नहीं होता। वाक्य मे प्राणिमात्र के लिए हृदय संवादी सत्य का आख्यान हुआ है और उससे औचित्य की स्थापना होती है। माघ के इस पद्यार्थ में यह औचित्य नहीं रहा। 'भूखे व्याकरण नहीं खा लेते प्यासे भी काव्य रस नहीं पीते। विद्या के द्वारा किसी ने अपने वश का उद्धार नहीं किया । सुवर्ण कमाओ । कलायें निष्फल हैं।' उक्ति का तात्पर्य है कि जीवन यात्रा धन से चलती है। अतः धन ही कमाना चाहिये। कलायें निष्फल है। भूस्खे व्याकरण शास्त्र को खाकर तथा प्यासे काव्य रस का पान कर तृप्त नहीं हो जाते। विद्या से भी किसी के कुल का उद्धार नहीं होता। उक्ति से अनुमान होता है कि कवि दारिद्रय देन्य आदि से धैर्य कातर है। यह उसकी भले ही व्यक्ति गत अनुभूति हो पर सत्य इसके विपरीत है। अत. यह अनुचित है। विद्या ही तो सब प्रकार की संपत्ति का हेतु है। वह भी यदि वंश के उद्धार में समर्थ नहीं तो फिर अन्य कौन सी वस्तु होगी। सत्त्वौचित्य (३१) का०- कवि का सत्त्वोचित बचन चमत्कार की सृष्टि करता है जैसे बुद्धिमान व्यक्ति का विचार के साथ किया गया उदार चरित । सत्व का अर्थ है बल, प्रताप, ऐश्वर्य आदि । उसका औचित्य है यथार्थ रूप का चित्रण । कल्पना के सहारे यथार्थ स्थिति का अपह्नव न करना । अन्धकार के 'चित्र भारत' नाटक का निम्नलिखित पद्यार्थ इसका उदाहरण है।

( ४२ ) 'समुद्र का शरीर अनेक नदियों के जल से आपूरित रहता है तथा बढ़ी हुई ज्वालाओं की वडवाग्नि से क्षत भी है। पर इससे उसके विशाल सत्व को न तो दर्प का स्पर्श होता है न दैन्य का। महान पुरुषो में अवस्था भेद से विकार नहीं आता। यहाँ समुद्र के व्यपदेश से युधिष्ठिर के सत्वोकर्ष का वर्णन है कि नदियों का जलपूर समुद्र को उत्सेक देने मे तथा बड़वाग्नि का शोषण संकोच देने में असमर्थ रहते है। अवस्थाओ के भेद से महाशयों में विकार नहीं आता। इससे युधिष्ठिर की गंभीर धीर सत्व वृत्ति उचित रूप से चित्रित हुई है। महन्दुराज का निम्नलिखित पद्यार्थ इस गुण से रहित है। 'वह भगवान् बडवानल आश्चर्य की वस्तु है और वैसी ही आश्चर्य की वस्तु समुद्र है। इनके कर्मातिशय का चिन्तन करते मन मे कप हो उठता है। एक अपने आश्रय को ही खा जाता है फिर भी जल से इसकी तृप्ति नहीं होती। दूसरा भी इतना महात्मा कि उसके शरीर में इससे थोड़ा सा भी श्रम नहीं होता। इसमे बडवानल का सत्व तथा समुद्र का महत्व कथनीय है। इनमें से एक क्षुद्र होने के कारण जलपान से कभी तृप्त नहीं होता दूसरा उसे आश्रय देकर भी कभी खिन्न नहीं बनता। यह दोनों आश्चर्य है, पर अग्नि जैसा संतोष-हीन सतत भक्षी है उससे तो बको लज्जा ही होगी। समुद्र का भी क्या सत्त्व कि वह अपने एक आश्रित याचक की याचना भी न पूरी कर सका। इस प्रकार यहाँ दोनों के सत्त्व की स्तुति उचित रूप से नहीं हुई। अभिप्रायौचित्य (३२) का०-कवि का वाक्य जब बिना किसी क्लेश के अभि- प्राय समर्पण करता है तो वह सत्पुरुषों के निर्मल आर्जव के समान चित्त का आकर्षक बन जाता है। वाक्य क्लिष्ट न हो तो उसका अभिप्राय सरलता से अवगत हो जाता है। ऐसा वाक्य सज्जनों की निर्दोष ऋजुता के समान हृदय को आकृष्ट करता है । दीपक कवि का निम्नलिखित पद्यार्थ इसका उदाहरण है।

'हे माँ, ब्राह्मणों में यह कोई आश्रयहीन क्षत्रिय राजपुत्र है। इसके पंजे के ऊपरी भाग मे बाज के पैर पकड़े रहने से खरौंच आ गया है। पहुँचे पर धनुष की डोरी का चिह्न है। अधर, हाथ, पैर, और नयन-प्रान्त लाल हैं । वक्षस्थल स्थूल है। पुत्रि, यदि ऐसा है तो यह कोठे में भीतर जाए। विशेष अतिथि पुण्य से प्राप्त होता है। इसमें कोई स्वैरिणी सायकाल किसी युवा राजपुत्र पथिक को देखकर माँ से अपना अभिप्राय सूचित करती है। मॉ ने भी उसके अभिप्राय को पूरा करने के लिए अतिथि को घर मे प्रविष्ट कर लेने की बात की। इससे अभिप्राय की स्पष्ट अवगति यहाँ होती है। यह औचित्य है। इसी कवि के नीचे दिए पद्यार्थ में उक्त औचित्य नहीं है। 'अरी विरह भ्रान्ते, तू तो पति के लिए इतनी आर्त बन गई कि देवी के चरणो में एक दम गिर पड़ी। पूजा का थाल स्बय तुमने पास में रखा था। फिर भी उसके किनारों से फटते हुए अपने मस्तक को भी तूने नहीं देखा।' किसी विनीत तरुणी का पति देर के बाद घर लौटा है । पत्नी के मस्तक पर स्वच्छंद विहार के नख चिह्न बने हुए हैं। सखी उन्हें छिपाने का उपदेश देती हुई कहती है कि तू पति के विरह में इतनी उन्मत्त हो गई कि उनके आगमन की प्रार्थना करते समय चण्डी के पैरों में एक दम गिर पड़ी और अपने आप पास में रखे हुए पूजा थाल के किनारों से जब मस्तक फट गया तो उसे देख भी न सकी। इस उक्ति में स्वच्छंद विहार के छिपाने की शिक्षा मात्र प्रतीत होती है। सखी या तरुग्णी का कोई अभिप्राय विशेष नहीं। स्वभावौचित्य (३३) का०-स्वभाव का औचित्य काव्योक्तियो का भूषण है, उसी प्रकार जैसे युवतियों का अकृत्रिम लावण्य विशेष । ग्रन्थकार की 'मुनिमत मीमांसा' का निम्नलिखित पद्यार्थ उदाहरण है। 'सद्यः स्नात युवती, जिसके स्तन कान से ऊपर फैलाए केशपास से टपकते हुए जल विन्दुओं द्वारा हार के समान ढक जाते है, जो शीत से रोमांचित हो 'सी-सी' करती है, काजल धुलने से जिसकी आँखों के कोंए लाल (४) पड़ जाते हैं तथा जिसके केश पाश से जल टपकता है वह किसके मन को भान बना देगी।' व्यास पुत्र श्री शुकदेव जी वैराग्य नि.संग होकर गगन गंगा के किनारे घूम रहे थे। उस समय उन्होने नि संकोच भाव से बैठी नंगी अप्सराओ को देखा। उनका मन वैराग्य से विमल था इसलिए किसी प्रकार का स्मरविक्षोभ नहीं हुआ। यह प्रतिपाद्य है। इसके लिए कहा गया है कि युवतियो के बालो की छोरी से गिरे जल- विन्दु उनके स्तनों पर हार बना रहे थे। शीत के कारण वे रोमाञ्च में 'सी-सो' करती थीं, ऑखों का काजल धुलने से प्रान्त भाग साल पड़ गये थे। और केश पाश से जल टपक रहा था। ऐसी स्नानोत्तीर्ण युवतियाँ किसके मन को गीला न करेगी। वह स्वयं गीली हैं दूसरे को भी गीला बनाती हैं। स्वभाव का चित्रण । प्रन्थकार के ही दूसरे पद्यार्थ में यह तत्व नहीं। 'चुगलखोरों की वाणी में सभी गुण दोष हो जाते हैं। भक्ति कातरता बन जाती है, क्षमा डर और पूज्य की प्रशंसा, धैर्य दारुणता कहलाता है, मति कुटिलता तथा विद्या बल क्षोभ । वे ध्यान को वंचकता, तप को ढगविद्या और शील को नपुसकता के रूप में देखते हैं।' यहाँ बय है पिशुच का स्वभाव । उसमें भक्ति आदि गुण भी विपरीत हो जाते है। इससे उनकी वाणो सभी दोषाद्र हो जाती है। पर जो स्क्यं आर्द्र नहीं है वह दूसरो के द्वारा भी आई नहीं हो सकता। फलतः यह उक्ति उचित नहीं। सार संग्रहौचित्य (३४) का०-सार का संग्रह बताने वाले वाक्य से काव्यार्थ का फल निश्चित हो जाता है और वह शीघ्र समाप्त होने वाले कार्य की भॉति सभी को प्रिय लगता है। वृ०-शीघ्रकारी व्यक्ति के कार्यों की भॉति सारसंग्रह की व्यंजना वाले काव्य. से कान्यार्थ का फल निश्चित हो जाता है। वह सभी को प्रिय लगता है। जैसे ग्रन्थकार की 'मुनिमत मीमांसा' के निम्न- लिखित पद्यार्थ में- (४५) कठिन कठिन अनेक प्रथों के सार भार से लद कर मुनियों ने अभिनिवेश पूर्वक कहा है पर कुछ तत्त्व नहीं कहा। महर्षि व्यास का तो विचार का सुन्दर सार यही है कि अहंभाव भव बंधन तथा उसका अभाव मोक्ष है।' यहाँ भगवद्गीता के सार अर्थ का विचार है। उसमें निष्कर्ष की बात यही है कि अनेक शास्त्रो के भेद-विभेदों मे पड़कर जड़ बुद्धि वाले मुनियों ने अभिनिवेश से भी कोई सार की बात नहीं कही। भगवान व्यास ने तो निर्मल विचारणा के बाद यही निश्चय किया है कि अहंकार ससार बंधन की तथा ममतापरित्याग मोक्ष की मूल भूमि है । अतः संक्षेप में भववधन से छुटकारा पाने का महर्षि का उपदेश अत्यंत सूक्ष्मता के औचित्य से यहाँ प्रकट हुआ है। परिब्राजक के इस पद्यर्थ में वेसा सार संग्रह नहीं है। 'हमने तप नहीं किया उलटे तप्त हो गए। भोग नहीं भोगे उल्टे स्वयं मुक्त हो गए । जरा जीर्ण न हुई हम ही जीर्ण हो गए । तृष्णा न बीती हम बीत गए। इसमे 'हम ही तप्त, मुक्त, जीर्ण बने तथा बीते ऐसा कहने से निःसारिता एवं अचारुता का प्रतिपादन होता है पर वाक्यार्थ का किसी विशेष निर्णय में पर्यवसान नहीं होता अतः पद्यार्थ में कोई सार संग्रह का औचित्य नहीं है। प्रतिभौचित्य (३५) का०-प्रतिभा का औचित्य कवि की कलाकृति का आभरण है जैसे श्रेष्ठ गुणवाले व्यक्ति के कुल का भूषण वैभव होता है। वृ०-प्रतिभा का उचित पुट काव्योक्तियो को अलकृत करता है। श्री भी उज्वल वंश का भूषण बनती है, जैसे ग्रन्थकार की 'लावण्यवती' रचना का यह पद्यार्थ:- 'अरे निर्दय, तू बिंब समझकर मेरे अधर को क्यों काटता है। जा चपल, तू पकी हुई जामुनों की आशा मत कर।' इसप्रकार पात को द्वार पर आया जान प्रियतम के दांतों से क्षत हुए ओष्ठ वाली चतुरा ने तोते को ऊँचे स्वर से , . किसी का पति द्वार तक आ चुका था। उसका अधर किसी अन्य कामी द्वारा खंडित था । इसलिए उसे छिपाने के लिए तोते को सबोधन कर इस प्रकार वह बोली मानो उसे पति के आने का कुछ भी पता नहीं। 'अरे निर्दयी तू बिबफल समझकर मेरे ओठों को काटता है। अब तू पकी पकी जामुनी की भी आशा न कर। मैं तुझे उन्हें भी न दूगी।' इसमें कवि ने विश्वास दिलाने पर्व दोष को छिपाने के लिए प्रज्ञाचातुर्य का चमत्कार के साथ औचित्य प्रदर्शित किया है। भट्टतौत की उक्ति है कि प्रतिभा नई नई सूझवाली प्रज्ञा का नाम है। ग्रन्थकार की उसी रचना के इस पद्यार्थ में वैसा औचित्य नहीं है। 'प्रिय बाहर निकल गया था, घर के सब जाग चुके थे, शृगार शय्या के पुष्पादि हटा दिये गए थे, उस समय प्रात काल ही उत्कट राग वाला दूसरा प्रेमी प्रागया, जिसे भोगावसर नहीं मिला था। वेश्या ने उसे यह कहकर कि- 'मैं तुम्हारे प्रेम में द्वार पर नेत्र लगाए रात भर अकेली सोई हूँ।' इस प्रकार भूमि पर चरणाघात किया कि उसकी नीवी खसकने लगी और कामुक अशोक' बन गया।' इसका आशय है कि किसी वैश्या ने अपने पुराने प्रेमी को संभोग सुख का अवसर न देकर नये प्रेमी के साथ रात बितायी। प्रभात होने पर जब वह बाहर निकल गया तो शृङ्गार शय्या के संभोग चिह्न पुष्पादि हटा दिये गए। अवसर भ्रष्ट पुराना रागी गहरे प्रेम में विक्षिप्त सा होकर आया तो वेश्या ने विश्वास दिलाने के लिए कृत्रिम कोप के आवेग में नीवी सरकाते हुये कहा कि मैं द्वार पर ऑखे लगाये सारी रात तेरे लिए अकेली सोई हूँ। उसने क्रोध का व्यजक पाद प्रहार किया तो कामी अशोक की भॉति फूल उठा। उसका शोक निर्मूल हो गया। इसमें गणिका का सच्चे वियोग का सा प्रदर्शन तथा कामी का गाढ़ानुराग व्यक्त होता है। प्रतिभा से उद्भूत किसी औचित्य की सूचना नहीं मिलती। १-कवि समय प्रसिद्ध है कि सती युवती के चरणघात से अशोक फूल उठता है। यहा अशोक का अर्थ शोक रहित तथा अशोक वृक्ष है ।

अवस्थौचित्य (३६) का०-अवस्था का उचित चित्रण करने वाला काव्य संसार में पूज्य होता है जैसे बुद्धिमानो का विचार से किया गया कार्य । ग्रन्थकार की रचना 'लावण्यवती' का यह पद्यार्थ वैसा ही है। 'उसने गैद खेलना छोड़ दिया है । वाल्योचित चंचलता भी त्याग दी है । भोलापन उड़ गया है। गजगति का आश्रयण कर भौहे नचाने का अभ्यास कर रही हैं। नर्म परिहासों में विदग्धता की बाते वह कहने लगी है। इससे प्रतीत होता कि उसे सौभाग्य का अभिमान प्राप्त हो गया है।' इसमें किसी के शैशव की समाप्ति और यौवन के नवोन्मेष का वर्णन है। उसे प्रौढ़ता प्राप्त किये बिना ही नवसंभोग के सौभाग्य का गौरव मिल चुका है अतः किसी तरुण का अभाव उसे खटकता नहीं। इस वयः सधि की वर्णना मे औचित्य फुरता सा प्रतीत होता है। राजशेखर के इस पद्यार्थ मे उक्त औचित्य नहीं रहा। 'यह प्रौढ़ धन्वी, क्षत्रियो के विनाश में पटु तथा कानपर्यंत बुढ़ापे के सफेद बाल लेकर वृद्ध बना परशुराम उस रामचन्द्र से युद्ध करना चाहता है जिसकी हथेली नवीन धनुर्ग्रहण से लाल ही पड़ी है, जो ताड़का का मारने वाला है तथा जिसके कठ मे अभी मा का दूध भी सलग्न है। उसे लज्जा क्यो नहीं आती।' इसमें चमत्कार पूर्ण ढंग से राघव की अवस्था परशुराम की अवस्था से विपरीत वर्णित की गई है। परशुराम प्रौढ धन्वी हैं, रामचन्द्र के हाथ इतने कोमल है कि धनुग्रहण से उनकी हथेली लाल हो जाती है । जामदग्न्य ने असंख्य क्षत्रियो को मारा है। रामचन्द्र जी केवल ताड़का को मार सके हैं। जामदग्न्य के कानों पर बुढ़ापे के चिह्न सफेद बाल आ गए हैं पर राम अभी बालक है, इस विषमता में युद्ध लज्जाजनक है। यहाँ अवस्था भेद की व्यजना लक्ष्य है। उसमें रामचन्द्र को ताड़का सहारी कहकर वीर बताना विरुद्ध अभिधान है। इस अनौचित्य से चित्त में संकोच सा होता है। विचारौचित्य (३७) का०-जिस प्रकार मनीषियों की विद्या वेदनीय तस्व ।

(४) के अवबोध से और अधिक शोभनीय बन जाती है उसी प्रकार काव्योक्तियो मे उचित विचार का अभिधान होने से अधिक चारुता आती है। उदाहरण के लिए ग्रन्थकार की 'मुनिमत मीमांसा' का यह पद्यार्थ दिया जाता है। 'अश्वत्थामा के बध की बात कहते समय सत्य के व्रत का उत्साह रखने वाले युधिष्ठिर ने भी जो वक्रता से (हस्ती) यह कहा था वह प्रतीत होता है, कमलासना लक्ष्मी का सत्य के चन्द्रमा से अपना विषम वैर सूचित करने के लिए मालिन्य प्रदर्शन था जो उसे कीचड़ मे उत्पन्न कमल के आरायण से प्राप्त हुआ है। द्रोणाचार्य के वध के प्रसग मे सत्य के दृढव्रती धर्मराज ने भी उच्च स्वर से 'अश्वत्थामा मारा गया' यह कहकर धीरे से 'कुजर' कहा था। उस पर कवि की उत्प्रेक्षा है कि पंकजवासिनी लक्ष्मी का चन्द्रमा से पंकज के कारण सदा का द्वेष रहा है। असत्य भाषण में सत्य के चन्द्रमा से बैर की सुचना देने वाली लक्ष्मो का ही यह व्यापार था। अर्थात् लक्ष्मी के कारण दूषित होकर युधिष्ठिर ऐसा कहने को उद्यत हो गये। इसमे लक्ष्मी के स्वभाव को प्रकट किया गया है। तत्त्व का अवगम व्यक्त करते हुए एक फल पयेवसायी विचार उपस्थित है। अत. सहृदय संवेद्य औचित्य व्यक्त होता है। ग्रन्थकार की उसी रचना के दूसरे पद्यार्थ में यह औचिस्य नहीं दीखता . 'बहुत पहले जो पत्नी के केश और वस्त्रो का आकर्षण हुआ था उसके फीका पड़ जाने पर भीम ने दुःशासन पर यदि राक्षसो का सा नृशंस कर कर्म किया तो कुशाओ एवं पत्थरो के कठोर अरण्यो में समय की प्रतीक्षा करते हुए वे जो देर तक रहे तो वहाँ उन्होनें धूप मे हॉपते हुए भैसो के पसीने से मिला हुआ पानी क्यो पिया था।' इसमें भीमसेन के चरित्र का विचार किया गया है। द्रौपदी के केशाकर्षण के तेरह वर्ष पुराना होने पर भोम ने दु शासन पर बाद में भयानक राक्षस कमे किया। यदि ऐसा ही करना था तो उस समय अपराध को सहन कर चिरकाल तक पत्थर तथा दभसुइयो के कठिन बचों में गर्मी के संताप से जल में डूबते हुये भैंसो के पसीने से मिक्षा -- (४६) हुआ पोखरों का पानी क्यों पीया था। अर्थात् यह कार्य पहले ही करना चाहिये था। इससे भीम का कार्य निन्द्य बताया गया है इसमें कारणों पर विचार न कर निर्मूल उपालंभ दिया गया है अतः अनुचित है। नामौचित्य (३८) का०-नाम का प्रयोग यदि उचित होता है तो पुरुष के समान काव्य के गुण दोषो की अभिव्यक्ति प्रसंगानकूल हो जाती । जैसे कालिदास के निम्नलिखित पद्यार्थ में है : 'यह पचवाण, जिसे दुर्लभ वस्तुओ की प्रार्थना से भी नहीं रोका जा सकता, मेरे हृदय पर पहले से ही प्रहार करता था। धीमी वायु से हिलते हुए पत्तो के आम्रवृक्षो पर जब अकुर दिखाई पड़ने लगे तो फिर कहना ही क्या ? यहाँ बताया गया है कि कामदेव दुर्लभ वस्तुओं की प्रार्थना से भी नहीं रुकता। यह पहले से ही मन को खडित कर रहा था। उपवन के हिलते हुये आमों पर नवीन पत्ते आगए तो फिर क्या कहना । इसमें प्रहार करने वाले कामदेव के लिये 'पंचवाण' शब्द का प्रयोग कर्मानुरूप अतएव उचित है। कालिदास के ही इस पद्यार्थ में उक्त सौष्ठव नहीं है 'हे प्रभो, क्रोध को रोको, रोको' ये देवताओ के बचन जब तक आकाश मे फैले कि भगवान भव के नेत्र से उत्पन्न अग्नि ने कामदेव को भस्म कर डाला। कामदेव के वाण मारने पर तीसरा नेत्र उघाड़ कर देखते हुए शिव के क्रोध का इसमें वर्णन है। उसे शान्त करने के लिए जैसे ही देवता चिल्लाये कि 'प्रभु क्रोध को रोकिये' उतने में ही भगवान शिवके तीसरे नेत्र की अग्नि ने कामदेव को राख बना दिया। यहा सहार के समय 'रुद्र' आदि न कहकर 'भव' कोमल नाम का प्रयोग कर्मानुरूप नहीं है इसलिए अनुचित है। आशीर्वचन का औचित्य (३६) का०-यदि काव्य में मनीषियों को संतोष प्रदान करने - - (५०) वाली पूर्णता आ गई हो तो उसमें उचित आशीवचन का प्रयोग होना चाहिए । राजा के आशीर्वाद की भांति इससे अभ्युदय होता है। जैसे ग्रन्थकार के उपाध्याय गगक के निम्नलिखित पद्यार्थ मेः 'प्रणय के परिपाक से प्रकट हुआ मृगलोचनियो का प्रेमा नेत्र विलास आप सबको सुख प्रदान करे। इसके बल को देखकर भुवन विजयी कामदेव के पाचो बाण व्यापार विहीन होकर तूणीर मे अपना मुँह छिपा लेते है।' इसमे असामान्य प्रेम की अभिव्यक्ति करने वाले प्रणयिनियों के कटाक्षो का वर्णन है । वे सुख प्रदान करे यह आशीर्बाद युक्त ही है क्योंकि प्रियाओ के नयन विभ्रम सुख देने में समर्थ हैं । ग्रन्थकार के 'वात्स्यायन सूत्र सार' ग्रन्थ के इस पद्यार्थ मे भी वही बात है :- 'ससार भर को सेवक बनाने वाला, कमल मुखियो के नेत्रान्त का निवासी काम आप सबको प्रीति प्रदान करे। से शिव ने जला डाला था फिर भी अंजन की भॉति उसकी शोभा अधिकाधिक बढ़ गई।' यहाँ काम आप सब को प्रीति प्रदान करे। जिसके जल जाने पर भी अंजन की भॉति अधिकाधिक शोभा बढ़ गई। इस मे प्रीति प्रदान करे यह कहना उचित है क्योकि काम प्रीतिरूप है। यही बात अभरुक कवि के निम्नलिखित पद्यार्थ में नहीं है- 'जिसकी चचल अलकावली हिल रही हो, कुडल भी चल रहे हो, तथा पसीने की छोटी छोटी बूंदो से तिन्वंक थोड़ा पुछ गया हो यह विपरीत रति के अवसान का तन्वंगी का मुख तुम्हारी रक्षा करे। हरि, हर, स्कन्द आदि देवताओं से क्या लाभ" इसमे कहा गया है कि विपरीत रति के अवसान में तन्वी का मुख जिसके बाल बिखरे और कुण्डल चञ्चल हों तथा पसीने की बूंदो से तिलक पुछ गया हो-रक्षा करे हरि हर आदि देवताओ से क्या। यहाँ पर रक्षा करे ऐसा कहना अनुचित है। आनन्द प्रदान करें यह कहना चाहिये। - (५१) दुसरे काव्याङ्गों में भी इसी पद्धति से औचित्य का विचार करना चाहिये । उदाहरणों की बहुलता के कारण सब अंगो को दिखाया नहीं गया है। इतना ही पर्याप्त है। स्वयं परिचय काश्मीर में अपने देश के प्रकाश श्री प्रकाशेन्द्र थे जिनकी संपति इन्द्र के तुल्य थी। उनके घर मे निरंतर यज्ञ चलता रहता था। और उसमें ब्राह्मणों को अग्र आसन मिलता था। उसने श्री स्वयम्भू के भवन मे षोडश मातृकाओ के भित्ति-चित्र बनाये थे और गौ, पृथ्वी, मृगचर्म तथा भवनों का दान देते हुये उसी में शरीर छोड़ा था। सब मनीषियों का शिष्य क्षेमेन्द्र उपनाम व्यास दास उन्हीं का पुत्र है। उसने 'औचित्य विचार चर्चा' लिखी है । जब श्री विजयेश राजा रत्नसिंह मित्र शिव लोक को चले गये तो उनके पुत्र उदयसिंह के लिए यह वाणी विचार किया गया है। यह ग्रन्थ राजा श्री अनन्तराज के समय में प्रणीत हुआ है। उनके शील और शास्त्र-ज्ञान संसार भर में प्रख्यात थे। उनकी वलवार परिवार की सृष्टि करती थी। उन्होने सबके सामने अवनत होकर विशेष उन्नति प्राप्ति की थी तथा उसका प्रतापानल दिशाओं को शीवल बनाता था। -

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२–कवि कण्ठाभरण

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प्रथम संधि
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मंगल
१-भगवान शिव की त्रिपुरदाह के समय की उस मंत्र शक्ति
की जय हो जिसमें अमृत विजयी वाडमय बीज का प्रकाश था, सरस
रूप से उठने वाले काम तत्त्व का अनुभव था, तथा परम धाम रूप में
ध्यान कर लेने पर मोक्ष था। इसका स्वरूप सूर्य चन्द्र तथा अग्नि
था।'
प्रस्तावना
२-क्षेमेन्द्र इस सरस्वती सार 'कविकंठाभरण' का शिष्यों के
तो उपदेश के लिये और विद्वानो के विशेष ज्ञान संवर्धन के लिये
प्रणयन करते हैं।
३-४-इसमें पॉच संधियाँ हैं-(१) अकवि को कवित्व लाभ,
(२) वाणीविद कवि की शिक्षा, (३) शिक्षा प्राप्त होने पर चमत्कार
लाना, (४) गुण दोष परिज्ञान तथा (५) अन्त मे परिचय प्राप्ति ।
इनके यथा क्रम लक्ष्य लक्षण यहाँ कहे गये है।
५-विद्वान लोग इस कवि कठाभरण को विचारे । इस में
उत्तम विभाजन है, अनेक गुण है, सौष्ठवयुक्त पदो से प्रणीत है और
उत्तम वर्षों से संयुक्त है।
१-भगवान शिव ने त्रिबुरदाह करने के लिये अपनी मन्त्र शक्ति को जागृत
किया था। उसी का सकेत मङ्गलाचरण में है । मन्त्र के तीन बीजाक्षर
वाङ्मय बीज 'ऐ', कामतत्व बीज 'क्ली' तथा परम धाम बीज 'सौ'
इसमे वरिणत हैं।
२-पद्य मे भूषण का दूसरा अर्थ व्यक्त करने के लिये सुविभक्ति गुण,
तथा सूवर्ण शब्दो का श्लिष्ट प्रयोग किया है। इनसे भूषण पक्ष में क्रमश
मरिण आदि का यथास्थान विभाजन, सूत्र, हार का चौका एव सोने का अर्थ
ध्वनित होता है।
५५
पदक

६-ॐ7 ( ५६ ) अकवि को कवित्व शक्ति का उपदेश सर्वप्रथम अकवि को कवित्व शक्ति का उपदेश दिया जाता है। पहले दिव्य प्रयत्न तदनन्तर पौरुष प्रयत्न का उल्लेख होगा। दिव्य प्रयत्न जप के लिये मत्र का स्वरूप परिचय इस मगल चिह्न की हम स्तुति करते हैं। यह सिद्ध, अन्तर, आद्य है। अत ईप्सित है। सरस्वती के उदीयमान ओज का प्रदाता है और ऋ, ऋ, लु, लू अक्षर इसमे अंतर्निगूढ़ है। ७-यह एक ऐश्वये सयुक्त, ओजवर्धक औषध है । इसके मध्य में अन्तर्भूत कलाखंडो' स गिरनेवाली सुधा के चिह्न विद्यमान है। ८-चन्द्रमा से नि.सृत जल इसमे' है। यह अज्ञान विनाशक ट, ठ तथा त, थ अक्षगे से संयुक्त है। इसकी प्रकाश किरणें प्रौढ़ एव प्रबल है। ६-इस मंत्र का स्वरूप श्रेष्ठ, फलदायक, रम्य, लघु तथा कल्याणकारी है। यह बीज मत्र से उद्भूत एवं सबके उच्चारण योग्य अक्षरो वाला है। १०-'सरस्वत्येनमः' इस क्रियामातृका मन्त्र का जो जाप करता है उसे अमिनव वाणी के लाभ से इन्द्र का सा क्षेम प्राप्त होता है।' जापप्रकार ११-मूध देश मे सरस्वती का ध्यान इस रूप से करना चाहिये। वह श्वेतवर्णा है, चन्द्र मण्डल के मध्यगत है। अक्षर उसके अामरण है और वाड्मय का अमृत बरसा रही है। १२-आपस में मिले हुए दो त्रिकोणो के मध्य में उसका इस प्रकार ध्यान करो। वह तडित तुल्य है। प्रमोद दायिनी है। स्वर्ग के मागे से उद्भूत है । सर्वोत्कृष्ट तथा अमृत वाहिनी है। १-ॐ के चन्द्र विन्दु को चन्द्रमा की कला का साम्य देकर कहा गया है। २-इस पद्य मे क्षमेन्द्र तथा अभिवन गुप्त के नाम प्रयुक्त हुए हैं। व्यग्रार्थ है कि अभिनव गुप्त की शिक्षा से जैसा कबित्व सामथ्र्य क्षेमेन्द्र को प्राप्त हमा है वैसा मन्त्र द्वारा प्राप्त हो सकता है। , श (५७) १३-निर्विकार, निराकार परात्पर शक्ति के रूप में उसका ध्यान करे। यह बीज त्रयीरूप (ऐ क्लीं सौ) त्रयी वाक् सरस्वती वाणी, काम तथा मुक्ति प्रदान करने वाली है .' १४-बाग्भव बीज की साधना काव्य रचना के इच्छाकुर की मूलभूमि है। इससे मोक्ष तथा विश्रान्ति प्राप्त होती है । कामतत्व बीज की साधना से काममोक्ष तथा मोक्षबीज के ध्यान करने पर संसार मुक्ति की सिद्धि होती है। पौरुष प्रयत्न इसके अनन्तर पौरुष प्रयत्नो का वर्णन है । तीन प्रकार के शिष्यो को काव्यक्रिया का उपदेश दिया जाता है, अल्प प्रयत्न साध्य, कष्ट साध्य तथा असाध्य शिष्यो को । उनमें से पहले को- १५- काव्यशक्ति की उत्पक्ति के लिए किसी साहित्यवित् के पास ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। उसे चाहिये कि वह तार्किक तथा केवल वैयाकरण को गुरु न बनाए। ये सूक्ति विकास के विघ्न हैं। १६-वह व्याकरण से.संज्ञा क्रिया आदि का ज्ञान प्राप्त करे। छन्द विधान मे परिश्रम करे और अखिन्न होकर मधुर काव्यों का । श्रवण करे। १७-गीतो, गाथाओं तथा सरस देश भाषा काव्यों को सुने । चमत्कार कारिणी वाणियो के नए नए अर्थों की चर्चा में रुचि ले। १८-यदि शिक्षार्थी भिन्न भिन्न रसों में तन्मय होगा तथा भिन्न भिन्न गुणो से हर्ष का अनुभव करेगा तो उसके विवेक के सेक रूपी स्वकपाक से अन्तःकरण उद्भिन्न हो जायेगा और उससे अकुर की भांति कवित्व फूट निकलेगा। दूसरा अर्थात कष्ट साध्य शिक्षार्थी- १६-शिक्षार्थी कालिदास के समस्त प्रबंधो को पढ़े और इतिहास देखे । काव्य के अधिवास का यदि प्रथम उद्गम हो अर्थात अभ्या- सादि से कल्पना कर स्फुरण हो तो उसे तार्किक की उग्र गंध से बचाये। १-कारिका ६.-१३ में 'ऐ क्ली सौ ॐ सरस्वत्यै नम'। इस मत्र के स्वरूप जप, महत्व तथा सरस्वती के ध्यान का उब्लेख है। २-स्वकपाक-अपने भाप पकना। मे०-१६ (५८) २०-उसे अभ्यास के लिए अर्थ शून्य पद रख रख कर छेद बनाने चाहिये तथा पुराने पद्यो के पदो को हटाकर उनके स्थान पर उसी श्रथ को पर्यायो द्वारा पूरा करना चाहिये। अर्थशून्य पदो का पद्य जैसे आनद सदोह पदार विन्द, कुन्देन्दु कन्दोदित बिन्दु वृन्दम् । इन्दिन्दिरान्दोलित मन्द मन्द, निप्यन्द कन्दन्मकरन्द वन्द्यम् । परिवर्तित पदो का पद्य जैसे :- वागार्थाविव संपृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वदे पार्वती परमेश्वरौ॥ (कालिदास) - इसके स्थान पर :- वाण्यर्थाविव सयुक्तौ वाण्यथ प्रतिपत्तये। जगतो जनकौ बदे शर्वाणो शशि शेखरौ । इसके बाद तीसरे असाव्य शिक्षार्थी के विषय में- २२-२३-जो स्वभाव से पत्थर के समान है अथवा जिसकी प्रतिमा क्लिष्ट व्याकरण से नष्ट हो गयी है, जो अग्नि का धुआँ फेकने वाले तर्क से जल चुका है अथवा जिसके कानो मे सत्कवियो के प्रबन्ध कभी पडे नहीं, उसे मे कवित्व की उत्पत्ति नहीं हो सकती चाहे कितनी ही विशेष शिक्षाओ का प्रयोग किया जाय । सिखाने पर भी गधा गाता नहीं है और दिखाने से भी अन्धा सूर्य को नहीं देखता। (२४) इस प्रकार पूर्ण पुण्यो के फलस्वरूप शुभ मति वाले 'शिक्षार्थियो को मन्त्र सिद्ध कवित्व प्राप्त होता है। इसके बाद बुद्धिमानो को पौरुष प्रयत्नो से कावत्व का उदय होता है। साधना करने पर जड़ बुद्धि वालो को भी शारदा का स्फुरण हो जाता है। श्री क्षेमे द्र उपनाम व्यासदास के कवि कराठाभरण की 'कवित्व माप्ति' नामक प्रथम संधि समाप्त हुई। - (५) द्वितीय सन्धि शिक्षार्थी -कवि को छायोपजीवी, पदोपजीवी, पादोपजीवी अथवा सकलोपजीवी होना चाहिये। अपने ही उन्मेष से यदि किसी को कवित्व प्राप्त हो जाय तो वही ससार भर का उपजीव्य बन जाता है। छायोपजीवी जैसे भट्टभल्लट का यह पद्यार्थ- हे कालकूट उत्तरोत्तर विशिष्ट स्थानों में आश्रय पा लेने का उपदेश तुम्हे किसने दिया है ? तुम पहले समुद्र के हृदय मे थे। फिर शिवजी के कण्ठ मे आये और अब फिर दुष्टो के बचन में रहते हो।' इसकी तुलना श्रीमान् उत्पलराज देव के निम्नलिखित पद्यार्थ से कीजिये। खलों की दृष्टि मात्सर्य के तीव्र तिमिर से ढकी रहती है। वे किसके चित्त को व्यथा नहीं पहुँचाते । प्रतीत होता है विष शिवजी के कोमल कठ को छोड़ कर खली के बचनों में वृद्धि पाता है। ( इसमें पहले पद्यार्थ की छाया का सहारा लिया गया है।) पदकोजीवी का उदाहरण मुक्ताकण निम्नलिखित पद्यार्थ है- 'क्योकि चलायमान बादलो का धुआँ आकाश के रन्ध्रों को भर रहा है, खद्योत स्फुलिगो का रूप धारण कर रहे है; और विद्युत के चमकने से दिशाये पीली पड़ गई हैं, इससे प्रतीत होता है पथिक रूपी तरु समूह में काम की दावाग्नि लग गई है। इस के एक पद के अर्थ का उपजीवन चक्रपाल के नीचे लिखे पद्यार्थ में है। 'इस नायिका रूपी सरसी में लावण्य का जल उदर वलियों की लहरों से चंचल होकर जघन के पुलिनो को भी उला- घने लगा है। का . चंचल नेत्र रूपी मौनों को थिरकना दिखाई पड़ता है। इससे प्रतीत होता है कामदेव रूपी गज इसमें डूब चुका है। स्तनो के रूप मे उसी का कुम दिखाई पड़ रहा है। यहाँ पहले पद्यार्थ के कुछ पदों का उपजीवन हुआ है। पादोपजीवी के उदाहरण में अमरुक का निम्नलिखित पद्यार्थ है। 'यदि जाना ही निश्चित कर लिया है तो चले जाना। यह शीघ्रता क्यों है ? और दो तीन दिन ठहरिये, जब तक आपका मुख देखती रहूँ। संसार में जीवन घटिका नली से निकलते हुए जल के तुल्य है। कौन जानता है कि मेरा तुम्हारे साथ फिर संगम हो या न हो। इसकी तुलना मन्थकार के इस पद्यार्थ से कीजिये। 'हे प्रिय विवेक, मैंने तुम्हे बडे पुण्यो से पाया है। तुम्हें कुछ दिन मेरे पास से कहीं नहीं जाना चाहिये। तुम्हारी सगति में मै शीघ्र ही जन्म-मरण का उच्छेद किये देता हूँ। कौन जानता है, तुम्हारे साथ मेरा सगम फिर हो या न हो।' यहाँ अन्तिम पद का आश्रयण है। सकलोपजीवी के लिये आये भट्ट का यह पद्यार्थ उदाहरण है। 'मलिन स्वभाव के दुष्ट लोग बेडियों के समान निसर्ग कटु शब्दों से कानो को व्यथा देते हैं। और सत्पुरुष स्पष्ट अर्थ वाले मधुर शब्दो से मॅजीरे की भॉति मोद उत्पन्न करते हैं। इस समस्त का उपजोवन भट्ट वाण के इस पद्यार्थ में है। 'मलिनता प्रदान करनेवाले दुष्ट लोग बेड़िया के समान कटु शब्द करते हुए बहुत व्यथा देते है। सत्पुरुष मणि नूपुरो के समान अच्छी अच्छी ध्वनियों से पद पद पर मन हरते हैं। ससार भर के उपजीव्य कवि, जैसे, भगवान व्यास हैं। इसलिए । कहा है कि:- - 'यह आख्यान ( महाभारत) सब श्रेष्ठ कवियों का उप- जीव्य है।

, (१) जैसे अभ्युदय चाहनेवाले सेवकों का उपजीन्य अभिजात कुल का राजा होता है। अब वाणी प्राप्त किये हुए कवि की शिक्षाओ का उल्लेख किया जाता है। २-व्रत, सारस्वतयाग, सर्वप्रथम गणेश पूजन, विवेचन की शक्ति, अभ्यास, पदों का मिलाना, आत्म विश्वास, न थकना । ३-छदों को पूरा करना, उद्योग, दूसरो को कृतियो का पाठ, काव्य शास्त्र का ज्ञान, समस्या पूर्ति । ३ - श्रेष्ठ कवियो के साथ रहना, महाकाव्यो के अर्थों का आस्वादन, विनय, सज्जन मैत्री, चित्त की प्रसन्नता, सुवेष । ४-नाटको के अभिनय देखना, रसिकता, कवियो के समुदाय एकत्र होने पर दान देना, गीतों से आत्म तप्ति । ५-लोकाचार परिज्ञान, प्रसिद्ध कथाओं में रुचि, इतिहास का अनुसरण, अच्छे चित्रो का देखना। ७ - शिल्पियो का कौशल देखना, वीरों का युद्ध देखना, शोक प्रलापो का सुनना, श्मसान तथा अरण्य देखना। ८-वतियो की सेवा, घोसले से लेकर महलो तक सभी निवास स्थान देखना, मीठा और स्निग्ध भोजन करना, धातु साम्य अर्थात् वात् पित्त कफ की समता, शोक न करना। ६-प्रभात में सबेरे उठ जाना, प्रतिभा, स्मृति, आदर, सुखा- सन, दिन में सोना, गर्मी और ठण्डक से बचाव । १०-~-पत्र रचना तथा भित्ति चित्रो को देखना, गोष्ठियों एवं प्रहसनों की पहचान, प्राणियों के विविध स्वभावा से परिचय, समुद्र, पर्वत आदि का निरीक्षण । ११-सूर्य, चन्द्रमा तथा तारागणो का ज्ञान, सब ऋतुओं का व्यापक अनुभव प्राप्त करना, मेले आदि जन समूहो मे जाना, देश भाषाओं का उपजीवन । १२-स्वीकार तथा अस्वीकार करने की बुद्धि, अपनी रचित कृतियो का संशोधन, स्वतत्र रहना, यज्ञ, सभा विद्या गृहो में ठहरना। १३-अपने उत्कर्ष की तृष्णा न करना, दूसरों के उत्कर्ष को सहना, अपनी प्रशंसा सुनकर लज्जानुभव करना, दूसरो की प्रशंसा बार बार करना।

- १४-अपने काव्य की सदा व्याख्या करना, किसी से बैर या ईर्ष्या न करना, दूसरो के उत्कर्ष को सद्भाव से जीतने की इच्छा, व्युत्पत्ति के लिये सब की शिष्यता स्वीकार करना । १५---कविता पाठ के अवसरो को पहचान, श्रोताओ के चित्त का अनुवर्तन, इङ्गित और आकार को पहचानना, उपादेय पदार्थों का निबन्धन। १६-रचना के बीच बीच मे उपदेशो की विशेषोक्तियाँ लिखना, किसी एक विशेष रस का बहुत लम्बा वर्णन न करना, अपनी सूक्तियो को दूर दूर भेजना दूसरो की सूक्तियो का संग्रह करना । १७-विदग्धता, पटुता, नि संग होकर एकान्तवास, आशा जंजाल का परित्याग, सन्तोष, सात्विकता । १८-याचना न करना, बात चीत मे भी गॅवारू पदों का प्रयोग न करना, काव्य रचना का प्राग्रह, बीच बीच मे विश्राम करना। १६-नवीन कृतियो के लिये प्रयत्न, सब देवताओ की समान भाव से स्तुति करना, दूसरे लोग यदि कभी आक्षेप करें तो उसे सह लेना, गभीरता, निर्विकारता। २०-आत्मश्लाघी न होना, दीन न होना, दूसरो को अपूर्ण रचनाओ को पूरा करना, दूसरो के अभिप्राय को कहना, छायोपजीवन, दूसरो के अनुकूल कना। २१--प्रसाद गुण वाले पढो की योजना, संवाद के अनुसार अर्थ सङ्गत करना, विरोध रहित रसो की अभिव्यक्ति, व्यस्त एवं समस्त भाषा के प्रयोग का सामर्थ्य । २२-प्रारम्भ हुए काव्य को समाप्त करना, भाषा का चातुर्य पूर्ण प्रवाह । अभ्यास द्वारा भाषा पर अधिकार प्राप्त किये हुए शिक्षार्थी के लिये ऊपर के सौ उपाय शिक्षा के है। २३-इस प्रकार विविध शिक्षाओ से कविरूपी रवि के दोष क्षीण हो जाते है। जब वह प्रतिभा के सुप्रभात मे निद्रा त्याग कर सामर्थ्य लाभ करता है तो अपनी सूक्तियो की व्यापक किरणो द्वारा पदार्थ जात के स्वभावों को नवीन बना लेता है।

( ६३ ) तृतीय संधि शिक्षित कवि के लिये सूक्ति चमत्कार का विधान । १-काव्यातिशय का इच्छुक श्रेष्ठ कवि वाणी के सत्कार के लिए सुन्दर सुन्दर वस्तुओ, शब्दो तथा अर्थों का सचयन करता है जिस प्रकार नवीन गन्ध का आस्वाद लेनेवाला भौरा पुष्पो से पूर्ण बन में गन्ध संचयन करता है। चमत्कार के बिना न तो कवि को कवित्व प्राप्त होता है और न काव्य को काव्यत्व। २-अमूल्य मणि के समान एक भी चमत्कार पूर्ण पद यदि काव्य में न रहे तो वह भले ही सर्वथा निर्दोष हो, पर मणिहीन सुवर्ण के समान किसी के चित्त पर नहीं चढ़ता जैसे अंगनाओ का लावण्य हीन यौवन । नीचे लिखा मालवरुद्र का चमत्कार शून्य पद्याथ वैसा ही है। हे रक्ताशोक, लताये तुमसे लिपटी हुई है, तुम्हारे पत्ते हिल, पुष्प खिल, कुन्डल फूट, तथा गुच्छे बढ़ रहे है। तुम गूजते हुए भोरो के क्रीडा विनोद के आकर हो। । तुमने जो यह आडंबर प्रारम्भ किया है इसे हटा लो। मित्र, दया करो। मेरे तो प्राण कण्ठगत हैं । प्रियतम दूर है और तुम ऐसे हो रहे हो।' चमत्कार कालिदास' के निम्नलिखित पद्यार्थ मे है। 'अशोक, तुम अपने पत्रो में रक्त हो। मै भी प्रिया के गुणों मे रक्त हूँ। शिलीमुख (भ्रमर) तुम पर गिरते है और काम धनुष से छूटकर शिलीमुख (वाण) मुझ पर भी । कान्ता का चरणाघात तुम्हे भी हर्ष प्रदान करता है उसी तरह मुझे भी। मेरा तुम्हारा सब कुछ समान है। अतर केवल इतना है कि विधाता ने मुझे सशोक बना दिया।' चमत्कार दश प्रकार का होता है। :- अविचारित रमणीय, विचार्यमाण रमणीय, समस्त सुक्त व्यापी, सुक्त कदेश दृश्य, शब्दगत, अथगत, शब्दार्थ त, अलंकारगत, रसगत और प्रख्यात चारतगत । -कालिदास का नाम भूल से लिखा गया है। प्रस्तुत पद्य यशोवर्मा का है। . के । MIRRORM - ( ६४ ) अविचारित रमणीय जैसे ग्रन्थक र के 'शशि वंश' प्रथ के इस पद्यार्थ में:- 'शूर हजारों है। सुचरित पंडितों से भी जगत् पूर्ण है। कलावान इतने है कि संख्या नहीं। शान्त भी अनेको बन में स्थित है। जो उत्तम मति का व्यक्ति प्राणो से भी अधिक प्रिय अपने धन को त्याग सकता है वह भूमि विभूषण शुभनिधि और भव्य है। संसार में ऐसा पुरुष दुर्लभ होता है। यहाँ चमत्कार की प्रतीति पहली दृष्टि पर ही हो जाती है। विचार्यमाण रमणीय जैसे प्रथकार की 'पद्य कादम्बरी' के इस पद्यार्थ में :- 'उसके अंग में कामाग्नि, नेत्रों मे ध्यान मुद्रा, कठ में जीव, कर किसलय पर दीघशायी कपोल, कधे पर वीणा, वक्षस्थल पर चंदन, और बाणी मे मौन सब स्थित हैं। केवल चित्त ही तुम्हारे बिना स्थित नहीं है। यहाँ विचार करने पर चमत्कार की प्रतीति होती है। समस्त सूक्त में व्याप्त चमत्कार जैसा कवि के 'शशि वंश' के इस पद्यार्थ में:- 'तुम्हारे मुख में माधुर्य का अनुभव होता है फिर भी उसके (मुख के) नेत्र तीखे है । तारे पर्यन्त भागमे है फिर भी राग मे बाँध लेते हैं। वे विवेकी है पर कपन की चपलता नहीं छोड़ते। आश्चर्य है, वे कान छूते है पर मार भा करते है। (काम उत्पन्न करते है तथा चोट करते है।) यहाँ विरोध का चमस्कार सारे पद्य में विद्यमान है। सूक्ति के एक भाग में विद्यमान चमत्कार ग्रन्थकार की 'पद्य कादम्बरी' के इस पद्यार्थ मे देखिये। देव वह तुम्हे हृदय मे बिठा कर पद्म पत्र तथा चंदन से नित्य अर्चना करती है। मन मे तुम्हारी भक्ति और तुम्हारी -~-माधुर्य और तीखापन, दूर रहना और बाधना, बिवेक और चपलता तथा कान छूना और चोट करना का विरोध है। जो अपने कान छू लेता है बहभाग फिर अपराध न करने की प्रतिज्ञा करता है। . , OMG. । ६५ ) ही स्मृति है। तुम्हारे नाम मन्त्र का जप है। उस सुभ्र की तुम्हारे प्रति भावना अत्यन्न ग्राढ है । इन दिनो तुम्हारी आराधना करने में उसे तो जीबन मुक्ति ही मिल गई है। अन्तिम वाक्य मे उक्ति चमत्कार है। शब्द गत चमत्कार जैसे ग्रन्थकार के 'चित्र भारत' के इस पद्यार्थ मे। 'इधर चूतों से च्युत हुये मधुचय को लेकर चतुर समीर दिशा दिशा में भौरो को सन्तोप देते हुये बह रहे है। वे ही निशान्त में कान्ताओ के स्मर समर के केलिश्रम को मुसते हुये और अधखिले कमलो के आमोद को लेकर बढ़ जाते है। यहाँ अनुप्रास का चमत्कार है। अर्थगत चमत्कार जैसे इन्हीं की 'लावण्यवती' के निम्न लिखित पद्यार्थ में- 'तुम्हारी तलवार में निर्मल जलधार का शैत्य रहता है। उसमें धनोल्लास है क्योंकि मामृतों के बड़े-बड़े कटकों को गिरा देती है। वह शौर्य श्री के कानों का नीलोत्पल है फिर भी शत्रुओं को अग्नि का सा ताप उत्पन्न करती है। यहाँ विरोध का चमत्कार है। शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार प्रन्थकार की 'पद्य कादम्बरी' के इस पद्यार्थ में है। 'उसकी भौहो में कामदेव की टेढ़ी धनुर्लता की समता है। निर्मोक्तियाँ हास्य की कान्ति से खिल उठती है। बोलचाल मे प्रगल्भता है। विभ्रमो मे राग और सरसता है। इस प्रकार उस मृगनयनी ने कामदेव की आयु वहुत बढ़ा दी है। १-शैत्य = ठण्डक तथा तीक्ष्णता, धार-तलवार की और पानी की। क्ष्मामृत = पर्वत तथा राजा । श्लेष के सहारे किरोव का चमत्कार है कि तलवार ठण्डी होकर भी अग्नि का ताप देती है।

इसमें शब्द और अर्थ दोनो को चमत्कार पूर्ण ढंग से कहीं गया है। अलंकार का चमत्कार उन्हीं के 'लावण्यवती' के नीचे लिखे पद्यार्थ में है। 'तुम्हारे स्तन कठोर है, नेत्र तीखे है, उदर नीच है, भौहो का स्वभाव टेढ़ा है, अधर मणि ने तो मुनिओ तक को मार दिया है। भाग्य से इतने दुर्जनो के निकट अकेला हार ही गुणी (धागो मे पिरोया हुआ तथा गुणवान) रहता है। वह भी झूला के समान चचल बन जाता है। यहाँ विरोध अलकार का चमत्कार है। रस का चमत्कार 'कनक जानकी' ग्रन्थ के नीचे लिखे पद्यार्थ 'खर दूषण तथा त्रिशिरा के नाद ने जब भुवन भर को सँध दिया और तुम उससे चकित हो गई तो दीर आर्य क्षण भर को रुक गए। उन्होंने अपनी चञ्चल दृष्टि स्नेह, रस, हास, भू भग, स्पृहा तथा उत्साह के साथ तुम पर और उनकी सेना पर डाली। अनेक रसों का एकत्र संस्कार चमत्कार प्रदान कर रहा है। प्रख्यात चरित का चमत्कार प्रन्थकार के 'शशि वंश' ग्रन्थ के इस पद्यार्थ मे है। 'आगे बढ़ो अपनी सेना वश में करो। व्यूह भूमि की रक्षा करो। सेना की गतिविधि देखो। शीघ्र भागो। अपने स्थान को छोड़ो मत । पीठ फेर कर खड़े हो जाओ। शरीर चीरने वाले वाणो की गति बड़ी तीव्र है।' जब अर्जुन ने युद्ध में लोगो को घेरा तो ये शब्द सुनाई पड़े। यहाँ इति वृत्त को चमत्कार के साथ उपस्थित किया गया है। ३-यह विशेष-विशेष चमत्कारो के सार रूप का वर्णन किया गया है। वे अपने भेनो तथा तर्क सिद्ध प्रमाणो से स्पष्ट हो जाते हैं। यह ऐसा ही है जैसे वाणी की मिठास मे थोड़ी कपूर को गध अथवा घासती मद्य में आम का रस मिला दिया जाता है।

(६७) चतुर्थ संधि गुण दोष विमाग. १--कवि रूपी राज हंसो की बुद्धि चन्द्रमा के समान निर्मल होती है। वे काव्य के एक ही पात्र में विद्यमान गुण दोष के दूध में से पानी को पृथक करने में विदग्ध होते हैं। गुण दोषों का विभाग करना वे भली भॉति जानते हैं। काव्य के गुण तीन प्रकार के होते है-शब्द वैमल्य, अर्थ वैमल्य तथा रस वैमल्य । इसी प्रकार तीन काव्य के दोष होते हैं- शब्द कालुष्य, अर्थ कालुष्य तथा रस कालुष्य । इसके आधार पर काव्य पाँच प्रकार के है-सगुण, निर्गुण, सदोष, निर्दोष तथा सगुण दोष। शब्द वैमल्य जैसे ग्रन्थकार की 'पद्य कादम्बरी' के नीचे लिखे पद्यार्थ में- 'उस समय मित्र की मृत्यु हो जाने पर कपिंजल ने 'हा पुंडरीक' यह कह कर ऐसा कुञ्ज व्यापी करुण क्रन्दन किया कि वह स्वयं संज्ञाहीन हो गया। पत्थर फट गए और जीव भयभीत हो गए। उसे स्मरण कर हरिण आज भी घास खाना छोड़ देते हैं।' अर्थ वैमल्य जैसा ग्रन्थकार के 'शशि वश' ग्रन्थ के इस पद्यार्थ में है। 'यदि गंगा के एकान्त तट पर, जहाँ काली चिकनी घास है, फल वाले वृक्षो की छाया धूप को निगल लेती है, चंचल लहरें छल-छल कल-कल करती रहती है, और हरिण एक दूसरे के सम्मुख बैठते है, वहाँ शान्ति पूर्वक ठहर सकते हैं तो लक्ष्मी कौन है ? क्षणभंगुर सुखो से क्या लाभ ? मोह को नमस्कार है। रस वैमल्य ग्रन्थकार की 'पद्य कादम्बरी' के निम्नलिखित पद्याथ में है। 'आज कामदेव का बालसखा रजनी पति चन्द्रमा अपने काले चिह्न के साथ उदय हो गया। उसका काला चिह्न - मानों तारा बधू के लोचनों के चुम्बन काल में लगा हुआ काजल का बिन्दु था।' शब्द कालुष्य तथा छर्थ कालुष्य दोष के भट्ट श्रीशिव स्वामी कृत दो पद्य नीचे दिये जाते है। वे इतने अस्पष्ट है कि अनुवाद नहीं किया जा सकता। शब्द कालुष्य- 'उत्खात प्रखरा सुखासुख सखी खङ्गासिता खेलगा, वैशृङ्खल्य खलीकृता खिलखला खेत्खेटकै ख्यापिता। खेटादुत्खनितु निखर्व मनसा मौयं मुखाल्खक्खटम्, निःसख्यान्वनि खर्वसर्व मणिभूराख्यातु सख्यानि वः । अर्थ कालुष्य- 'पित्रापित्रा मते या न खलु खल घृताज्ञान् मात्रापमात्रा, स्यो न स्यो नस्थिते र नुनयविरमदाम पोशाऽप्य पाशा । वर्षा वर्षाम्बु पातात्रुटित तृण वसत्यश्रियातां श्रियाताम्, सौरी सौरीष्टयान सरदिह जनतां सान वाना नु वानाम् । भट्ट नारायण कृत 'वेणी संहार' नाटक के निम्नलिखित पद्याथ में रस कालुष्य दोष है। दुर्योधन की पत्नी भानुमती ने स्वप्न मे नकुल प्राणी का दर्शन किया है। इससे पाण्डव नकुल के साथ उसके स्वैर बिहार की कामना की व्यंजना होती है वह एक चक्रवती की पटरानी के लिए सामान्य नीच स्त्री का सा व्यवहार सदोष है। सगुण पद्य जैसे यह कालिदास का- 'तुम्हारे शरीर को रात्रियो मे, दृष्टिपात को चकित हरिणियों के प्रक्षण में, कपोल के सादृश्य को चन्द्रमा में, केशपाश को मयरो के पिच्छो मे तथा विभ्रम को नदियो की बड़ो बड़ी लहरो में देखता हूँ। पर चण्डि समूचा, सादृश्य किसी एक स्थान में नहीं मिलता। निर्गुण जैसे कवि चन्द्र का यह पद्य- स्तनौ सुपीनौ कठिनौ ठिनौ ठिनौ- कटि विंशाला रभसा भसा भसा। मुख च चन्द्र प्रतिमंतिमंतिमम्, अहो सुरूपा तरुणी रुगोरुणी ॥ NAGAR - HAN - इसके स्तन मोटे और कठिन हैं। कटि विशाल है। मुख चन्द्रमा के तुल्य है। यह तरुणी सुन्दरी है। सदोष जैसे भट्ट श्री शिव मी का यह पद्य- आद्यत्वाधि शिण्ढशिण्ढदृढता गूढानि गूढेतराम्, प्रौढिं ढौकय पिण्ढि पिण्डि चरुजं रूढापरूढातया । मूढ मृढम मूढयस्व हृदयं लीढ्वाथ मूदवातमः, सोव्यूढामिति च प्रभापरिवृढा व्यूढाढिन्मेस्तुवः । पद्य अनुवाद्य नहीं है। निर्दोष जैसे सधिविग्रहिक श्री भीमसाहिका यह पद्यार्थ:- 'धवल क्षीरोद के फेन के तुल्य, दिशाओं में फैलने वाले, गंगाजल में स्नान करना व्यर्थ ही क्यों चाहते हो। कलि- काल के कल्मषो की स्याही को धो डालने में अकेली ही समर्थ, सातो भुवनो की मदाकिनी आप की कीर्ति विद्यमान है। भट्ट मयूर के निम्नलिखित षद्यार्थ में गुण और दोष दोनो हैं। 'जिसका कार्यक्रम नियमित है, जो अपनो चमकती किरणों से रात्रि को दिन में परिवर्तित कर लेता है, तथा जो दीपक के समान एक स्नान पर रहकर भी समस्त विश्व के अंधकार को प्रकासित कर देता है, त्रिभुवन मे घूमने वाले उस सूर्य का उत्तर दिशा गामी किरणोद्गम तुम्हारा कल्याण करे। इसमें अर्थ तो सगुण है पर शब्द योजना क्लिष्ट अतएव सदोष है। सूर्य का दीपक से साम्य देना अथ दोष भी है। २-यदि कोई कवि ऊपर बताये गुणो को अपनाता है, और कवियों मे चक्रवर्ती बनना चाहता है तो उसे इन दोषो का त्यागकर वर्गों में उत्तम, मध्यम, अधम का विवेक करना चाहिए तथा राजा की भॉति वर्गों में संकर न आने देना चाहिये।

पंचम संधि परिचय चारुता १-यदि कोई कुकवि केवल शाब्दिक अर्थों के बल पर कोरी कष्टदायक काव्य रचना ही में लगा रहता है और अन्य परिचय से हीन रहता है तो विद्वानों की सभा में पूछे जाने पर वह इस प्रकार उत्तर देने में लजाता है जैसे नगर के गलीकूचो मे घिरा हुआ नवागन्तुक ग्रामीण । इनमे तर्क, व्याकरण भरत, चाणक्य, वात्स्यायन, भारत, रामायण, मोक्षोपाय, आत्म-ज्ञान, धातुवाद, रत्न-परीक्षा, वैद्यक, ज्योतिष, धनुर्वेद, गज, तुरग, तथा पुरुषो के लक्षण, जूआ इन्द्रजाल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओ की जानकारी कवि के बडप्पन की व्यंजना करते है। तर्क परिचय जैसा प्रथकार की 'पद्य कादम्बरी' के इस पद्यार्थ में: 'जो न मनोरथो का प्राप्य है न बचनो का, तथा जो स्वप्न मे भी दिखाई नहीं देता उसे भी प्राप्त करने की धुन कामठगे लोगों में हो जाती है। निःसंदेह युवको को आशा की खेती से ऐसे भ्रम का लाभ होता है जैसे अज्ञान के कारण सीपी मे चॉदी का भान या दृष्टिदोष से आकाश मे दो चन्द्रमाओ की प्रतीति । यहाँ तर्काश्रित बात कही गयी है। व्याकरण का परिचय भट्ट मुक्ति कलश के इस पद्याथ में है:- 'घर मे हम पति पत्नी दो हैं तथा दो मेरी गायें हैं। व्यय करने के लिए हमारे पास कुछ नही । इसलिये, पुरुष, तुम वह कार्य सोचो जिससे मेरे पास चावल खूब हो जायं । द्वन्बो द्विगुरपि चाहम् भद्गेहे नित्यम व्ययीभावः । तत्पुरुष कर्मधारय येनाह स्या बहुव्रीहिः॥' भरत परिचय मह श्रीशिव स्वामी के इस पद्याथे में है:- 'भरत के उपदेशो के समान यमुना का जल तुम्हारे अंधकार १-पद्य मे द्वन्द्व, द्विगु, अव्ययीभाव, कर्मधारय, तथा बहुब्रीहि समासों का नाम आया है। - । । ७१ ) का विनाश करे। पहले में नौरसों वाले नाटक स्वरुपों की रचना है और दूसरे का स्वरुप द्रव युक्त है। पहले में बिन्दु अर्थ प्रकृति से आनन्द मिलता है और दूसरे की बूदो का उत्थान आनन्ददायक होता है। पहले मे भावों का विश्लेषण तथा नाटक का तत्व प्रवेशक विद्यमान है तथा दुसरा प्रिय एवं स्नानाथे प्रवेश करने के लिए गुणकारी है। भरत के नाटकों मे गर्म सधि रहती है। यमुना का जल गहरा है। पहले में ऊँची वृत्तिया हैं तथा दूसरा ऊँची ऊँची तरगो से युक्त है। पहले मे नृत्य- कला का विधान है। और दूसरे मे कमलो (पुष्कर) का विकास । पहले में विप्कमक तत्व है और दूसरे मे संसार आवागमन को रोक देने की क्षमता चाणक्य को नोति से परिचय प्रथकार की 'पद्यकादंबरी' के नीचे लिखे पद्यार्थ मे है :- 'राजाओं के प्रमाद से स्वामी, पद से मत्री, कोप से राष्ट्र व्यसन से कोष, छिद्र से दुर्ग, विपत्ति से सेना और लोभ से मित्र क्षीण हो जाते हैं वात्स्यायन के काम शास्त्र का परिचय भट्ट दामोदर गुप्त के नीचे लिखे पद्यार्थ में है ।:-- 'हे सुन्दरि, तुम्हारे अधर पर दंतक्षत, कंठ में ननक्षतों की माला, स्तनो पर नखक्षत आदि पर नखक्षत आदि कामशास्त्रानु सारिणी रति के सूचक है। दन्तक्षत के लिये बिन्दु तथा नखक्षत के लिये मणिमाला शशप्लुतक शब्दो का प्रयोग हुआ है । च पारिभाषिक शब्द वात्स्यायनकृत काम शास्त्र के चौथे तथा पाचवे अध्यायो में वर्णित है। महा भारत का परिचय प्रथकार के 'देशोपदेश' के निम्नलिखित पद्यार्थ में प्राप्त होता है। 'कुट्टनी कुरु राज की सेवा के समान है। वह भग के प्रभाव से आव्य है, सेना भगदत्त योद्धा के प्रभाव से १-कवि ने श्लेष के द्वारा यमुना का जल तथा भरत के नाटको के तस्वो का ग्राथ साथ वर्णन किया है। । । पद्य । - ( ७२ ) सबल है। उसका शब्द कानो मे शल्य जैसा कार्य करता है; सेना मे कर्ण और शल्य के शब्द सुनाई पढ़ते है। पर वह कृपा हीन है। सेना मे भी कृपाचार्य नहीं थे।' रामायण का परिचय भट्टवाचस्पति के इस पद्यार्थ मे देखिये 'में लालसा की मृग तष्णा मं अन्धा होकर अनेकत्र घूमा हूँ। पद पद पर रो रो कर 'देहि यह वचन बोले है। कुत्सित स्वामियो के मुख को देखकर अनेक चेष्टाये की। इस प्रकार मै राम तो बन गया पर इतना भी धन न मिल सका कि कुशल से रह लेता। राम भी जन स्थान जंगल मे सुवर्ण मृग की तृष्णा में अंधे बनकर घूमे थे। रो रो कर हावैदेही' यह बचन पद पद पर कहा था। रावण के दश मुखो पर अपने वाणो की घटनाये की। पर वे राम ही रहे। सीता न प्राप्त कर सके ।' पद्य मे श्लेष के बल से भिक्षुक और राम के धर्मों का समान वर्णन हुआ है। मोक्षोपाय का परिचयों प्रथकार की 'मुक्तावली' के निम्नलिखित पद्यार्थ में है।:- 'निरासक्त भक्ति, विषयों का बाह्य नहीं आन्तरिक संयम, पदार्थों के नश्वर भाव का प्रतिदिन चिन्तन सात्विक लोगो के लिये परम पद प्रप्ति के उपाय है। उन्हे तप आदि की दीक्षा आवश्यक नहीं। आत्मज्ञान का परिचय जैसे प्रन्थकार के चित्र भारत नाटक में- 'बड़े बड़े शास्त्रो की कथा की जुगाली करने से क्या लाभ ? तत्त्वज्ञो को प्रयत्नपूर्वक आन्तरिक ज्योति का अन्वेषण करना चाहिये। धातु परिचय राजशेखर के इस पद्यारी में है। 'नखून से फाड़ी हुई हल्दी की गाँठ के समान पीले शरीर पर विरह से उत्पन्न हुआ सफेद रंग ऐसा अच्छा लगता है मानो सोने के साथ चॉदी रला मिलाकर मृगाक्षी के अंग बनाये गए हों। HAAR - ( ७३ ) रत्न परीक्षा परिचय जैसे मट्टभल्लट के इस पद्यार्थ में:- 'आप जैसा उत्तम मणि जो आपत्तिकाल में धन, उत्सवों में मे भूषण, आत्म भय में शरण तथा रात्रि मे दीपक बनकर अनेक प्रकार के बड़े बड़े उपकार करने मे समथ होता है, कोई कोई होता है। वैद्यक परिचय जैसे ग्रन्थकार की 'पद्य कादम्बरी' के निम्न- लिखित पद्याथे मे.- 'इसका शरीर चन्दन के लेप तथा कमल पत्रों में छिपा है। सताप शाप की भॉति शरीर को सुखा रहा है । कपन को देखकर सखियाँ भी कॉप जाती हैं। श्वासों मे चञ्चल हार ढक जाता है और चीनाशुक हट जाते हैं । इस प्रकार महान दाह तथा पीड़ा देने वाला ज्वर उसे हो गया है।' ज्योति शास्त्र का परिचय विद्यानदन के इस पद्धार्थ में: 'आकाश को देखते-देखते, घड़ियाँ गिनते-गिनते, छाया परखते-परखते और उङ्गलियाँ गिनते-गिनते ज्योतिषियों को केवल कष्ट ही होता है। रात वही धन्य है, दिन वही अच्छा है तथा क्षण वही पुण्य है जिसमें प्रिय अपनी प्रिया की नेत्र सीमा में अनजान मे आता है।' धनुर्वेद का परिचय ग्रन्थकार की कनक जानकी के इस पद्यार्थ - 'खरदूषण तथा त्रिशिरा के सहार के समय मैंने निश्चल हो कर आर्य (राम) की विस्मयकारिणी स्थिति देखी है। उसमें बादलो का सा अस्त्रों का लाघव था। बाण धनुष पर चढ़े थे। वह पिनाकी की वीर स्थिति के समान प्रिय थी और चित्र क्रिया का तो अलंकार थी।' गज के लक्षणों का परिचय जैसे उसी के दूसरे पद्यार्थ में:- 'कुञ्जर के समान राघव ने अपनी प्रियतमा को बन में अकेली स्मरण कर भोग के कवलों को दीघे काल से त्याग दिया और क्लेश की उष्मा से सुखने लगे। कान के पास दुलने वाले चमर से उनके स्वास फैल जाते थे। शंख और छत्र से विभूषित होकर भी वे राज्यविभव से द्वष करते थे। उनके नेत्र बन्द रहते थे। चे०-१८ ।

mot ( ७४ ) अश्व के लक्षणो से परिचय उन्हीं के 'अमृत तरंग' काव्य में- 'मद्राचल पर्वत के विमर्दजन्य खेद के कारणसमुद्र ऐसा होगया मानो घोड़े का आकार बनाने को उद्यत है। उसमें श्रावत (भेवर) थे। घोड़े के शरीर पर भी बालो की मौरियाँ होती । घोड़े के समान ही उसका बल महान था। फेन सा वह श्वेत था । उच्चै श्रवा भी श्वेत होता है । समुद्र का वेग पवन के कारण अढ़ गया था। अश्व का वेग पवन का सा महान था। दोनो के घोष गम्भीर थे। विश्व साम्राज्य का दाता उच्चैः श्रवा अश्व इन्द्र के पास आया। अपनी हींस के शंख तुल्य शब्द से उसने अशेष शुभ की सूचना दी। इन्द्र ने उसे ग्रहण कर लिया। पुरुष लक्षण परिचय कालिदास के इस पद्यार्थ मे:- 'दिलीप का वृक्ष विशाल था। कंधे बैल के से थे। साल वृक्ष जैसा वह लम्बा था। भुजाएँ उसकी महान थीं। ऐसा लगता था कि साक्षात् क्षात्र धर्म ने अपने कर्म के योग्य शरीर का आश्रयण कर लिया हो।' धूत परिचय चन्द्रक के नीचे लिखे पद्यार्थ में 'जहाँ घर मे अनेक थे वहाँ एक ही रह जाता है । जहाँ एक है वहाँ बाद में अनेक हो जाते है। कभी एक भी नहीं रहता। इस प्रकार पाशो के समान दिन रात को तोलता हुआ काल प्राणियों की गोट बनाकर काली के साथ क्रीड़ा किया करता है। इन्द्रजाल परिचय यथा श्री हर्ष के निम्नलिखित पद्यार्थ में:- 'यह कमल पर ब्रह्मा हैं। ये चन्द्रशेखर शिव हैं। चार भुजाओं मे शंख, चक्र गदा पद्म लिये हुए ये विष्णु हैं। ऐरावत पर बैठे ये इन्द्र हैं। तथा हे देवि, चंवल चरणों में नूपुर बाँधकर व्योम में नाचती हुई ये अप्सरायें हैं। इसके अतिरिक्त प्रकीर्ण परिचय में जैसे चित्र-परिचय भगवान ब्बास के इस पद्यार्थ में:- 'विचक्षण लोग झूठे को सच्चा दिखा देते हैं जैसे चित्रकार समस्थल पर भी नीचा ऊँचा दिखाते हैं।' A - ( ७५ ) - - देशपरिचय ग्रंथकार के 'शशिवश' काव्य मे. 'अभिमन्यु के ककण रव को सुनकर भोज लोग पिटने के भय से भाग गये, मालव लोग छिप गए, मद्र लोग पलायन कर गये, मागध मार्ग से अनेक बार हट गये, बंगों का समूह मैदान छोड गया, मोन लाग शरमा गए, और आन्ध्र लोग आपस में मिलकर एक ओर खडे हो गये।' वृक्ष परिचय ही के 'कनक जानकी' काव्य मे 'उसने देखा कि आश्रम, जामुन, कंदुरी, कढम, नीम, मौलश्री, पिलखन, अक्ष, बहेड़ा, दाख, ढाक, कनेर, केला, नीबू, गूनर, संतानक, बेल, विल्व, तिलक, श्लेष्मातक, आरग्वध, न्यग्रोध, अर्जुन, शातन, तथा असन के वृक्षों से काले पड़े हुए थे। बनेचर परिचय उसी में 'उसने सामने पुलिन्दो को देखा। उनके बाये कंधे पर धनुष थे जिनके टेढ़े टेढे कोनो मे नीचे को मुँह किए रक्त टपकते खरगोश लटके थे। हाथो से चमर खसके जाते थे। प्रत्यंचा के सिरे पर जो कबूतरो के बच्चे पिरोये हुए थे उनसे गिरने वाली रक्त बिन्दुिओ मे तूणोर रेंग गया था। कभी हाथी का सिर फटने पर वे जोर से चिल्लाते थे ।' औदार्य परिचय प्रथकार के 'चतुर्वगे सत्रह' में: 'कुलीन मान्य है पर उससे भी अधिक कलावान विद्वान है । विद्वान से भी अधिक सुशील, सुशोल से अधिक धनी और धनो से भी अधिक दाता मान्य है और अयाचक ने तो दाता से भी कीर्ति जीत ली है।' अचेतन में चेतना ध्यारोप का परिचय जैसे प्रथकार के शिष्य श्री महोदयसिंह के ललिताभिधान महाकाव्य में:- 'यह चैत्र का महीना सम्राट कामदेव से मैत्री बढा रहा है। खिले हुए अशोक के बहुल पुष्पों से यह अतिशय रक्त स्निग्ध है। तीनों भुवनो को जीतने के लिए उद्यत है।' । S - - - ( ७६ ) भक्ति परिचय उन्हीं के 'भक्ति भव' नामक महाकाव्य में:- 'भव भीति का. भजन करने वाली वह सन्मति भद्र पुरुषों मे ही उत्पन्न होती है जिससे भगवान शिव में निर्वाध प्रेम से युक्त तथा जन्म से किये गए अभ्यास द्वारा वासित अत.करण को शाति प्रदान करने वाली भक्ति उत्पन्न हो। इस सन्मति से प्राक्तन कर्म के महामोह के अंकुर भी नष्ट हो जाते है। विवेक परिचय थकार के शिष्य राजपुत्र लक्ष्मणादित्य के इस पद्यार्थ मे. - 'आशापास से विमुक्त, शुद्ध सन्तोषी मन हो। सेवा से न थकने वाला निश्छल वचन हो । शिव का अर्चन और गंगा की भाति आत्म शुद्धि करने वाली मत्सगति हो। यह ससार सागर से पार जाने का श्रेष्ठ साधन है।' प्रशम का परिचय प्रथकार के 'चतुर्वर्ग सग्रह' के नीचे लिखे पद्यार्थ मेः- 'ससार का बन्धन तनिक भी न रहे सत्पुरुष यदि नित्य यह विचारे कि चित्त वायु में उड़ने वाले धूलि कणों के समान चञ्चल है, रूप संध्या की धूप है। भोग जीर्ण घरके बन्धों की भॉति चपल है, यौवन पुष्षो का स्मित है, बन्धु समागम स्वप्न है और शरीर सड़क के चौराहे को प्याऊ है। २–वस्तु र चना के साहचये से पवित्र, रुचिर और उचित परिचय प्राप्ति का विभागशः सुक्ष्म रूप मे यह दिग्दर्शन कराया गया है। इस नवीन उपदेश मे थोड़ी भी उपादेयता हो तो सत्पुरुष इसे सुनने का अवसर निकाले। ३-क्षेमेन्द्र ने वाणी लाभ के लिये देव और पौरुष उपायों का अनुष्ठान कर जो अजित किया है उससे काव्यार्थी लोगो को ऐसी प्रामाणिक वाणी प्राप्त हो जो स्वतन्त्र भक्ति और प्रतिभा के प्रभाव से सुभग हो और वाग्भव मत्र के पवित्र श्रोत्रामृत को बरसाती है। यह काव्य श्रीमान अनंतराज नृपति के राज्य में प्रणीत हुआ है। वे काश्मीर के प्रताप सूर्य है, कीतिकिरणो के चद्रमा है, बड़े बड़े शत्रुओं के बन के लिये दावाग्नि हैं। धनद हैं, भूमण्डल के इन्द्र हैं। कलियुग में विराट रूप भगवान विष्णु के मानो रूपान्तर है।

( ७७ ) सुवृत्ततिलक पहला विन्यास १ मंगल भगवान शिव की जटाओं की वक्र चन्द्रकला, जो साँपों के फैले हुए फनों के रत्नों की छाया छटा से लाल हो जाती है तथा पार्वती रतिविलास में शिवजी का जो कचग्रह करती हैं उसमें ईर्ष्या के कारण किये गये उनके नखक्षतों से जो अधिक सुन्दर बन जाती है, वह आप सबका सुख विस्तार करे। २-३-स्वच्छन्द रूप से लघु रूप धारण करने वाले, त्रिज- गद् गुरु, मायावक्र भगवान् विष्णु, जिनका वामन वृत्त स्पष्ट है, उन्हे प्रणाम है।' छन्दों के निधान, सद्वृत्त और प्राचार के ब्रह्मा, तप और सत्य के आश्रय तथा अपरिमित तेज वाले भगवान् व्यास को प्रणाम है। ४-५-प्रस्तावना क्षेमेन्द्र यह सरस्वती का श्रृंगार रुचिर वर्गों का 'सुवृत्त तिलक' अपने शिष्यों के मस्तक पर करता है। उसने गुण दोषों को देखकर तथा सौन्दर्य का विचार कर काव्य कर्म में प्रसिद्ध छन्दों का यह सग्रह किया है। ६-दीर्घ तथा संयुक्त अक्षरों से पूर्व का स्वर गुरु कहलाता है। इसी प्रकार संयुक्त अक्षरों का योग जिसमें नहीं ऐसा इस्व अक्षर लघु कहा जाता है। ७-८-मगण त्रिगुरु, भगण आदि गुरु, जगण मध्य गुरु, सगण अन्त गुरु, नगण त्रिलघु, यगण आदि लघु, रगण मध्य लघु तथा तगण अन्त लघु होते हैं। छद शास्त्र में के लिये 'ल' अथवा लकार एवम् गुरु के लिये 'ग' अथवा गकार का प्रयोग किया जाता है। है-ये मगण आदि अक्षर कभी एक पद में आ जाते हैं कभी- भिन्न-भिन्न अनेक पदों में और कमी सयोग में। १-श्लोक में छन्द और वृत्त शब्द का इच्छा एव पाचरण के अतिरिक्त बन्द पर्थ भी क्षेमेन्द्र ने रखा है।

लक्षण-उदाहरण १०-तनुमध्या तनुमध्या मे तगण और यगण के छः अक्षर तथा इन्ही के पहले दो अक्षरो पर यति होती है। जैसे- तेन प्रवि भक्ता काम वयसा सा। येन प्रविलासं धत्ते तनु मध्या ।। 'वह स्त्री उस यौवनावस्था मे औरो से विलक्षण बनगई और उसी कारण उसमें विलास आगये। उसका मध्य भाग सूक्ष्म होगया।' ११-कुमारललित कुमार ललित में जगण, सगण तथा एक गुरु मिलाकर सात अक्षर होरे । इसमें विराम कहीं नहीं होता। जैसा-प्रथकार का अपना यह पद्य- जनं स्मृति दशाप्त गतानुगांतक. किमु । न शोधति जनोऽय कुमार झलितं तत् ।। 'भेड़ चाल से चलने वाला मनुष्य उस व्यक्ति के विषय मे नहीं सोचा करता जो स्मृति मात्र शेष रह गया है। यह उसका बालकपन है। १२-विद्युन्माला इसमें आठ अक्षर होते हैं। पहले दो मगण और उनके अन्त में 8 गुरु । जैसे- मोनं त्यानं भूमौ शय्या गुरू तस्याः कामावस्था । मेघोत्सगे नृत्तासक्ता यस्मिन् काले विद्युन्माला ॥ 'जब बादलो की गोद में बिजलियाँ नाचने लगती है तो उसकी काम दशा बढ़ जाती है। वह मौन होकर ध्यान करने तथा पृथ्वी पर सोने लगती है। ३१-प्रमाणी प्रमाणी छन्द में भी अक्षर आठ ही होते हैं पर उसमें लघु तथा गुरु अक्षर का आनन्तर्य रहता है। अर्थात् आठो अक्षर लघु गुरु क्रम से आते हैं। इसके कारण उसमें एक प्रकार का काव्य चमत्कार रहता है। जैसे- - ( ७६ ) लघुश्रुतं मदोद्धतं गुरुश्रमाय केवलम् । न यत्परोपकार कृद् वृथैव तत्प्रमाण्यपि ॥ व्यक्ति को मदोद्धत बनाने वाला अल्पज्ञात केवल गुरु के परिश्रम का ही कारण बनता है। वह प्रमाण युक्त ज्ञान भी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का परोपकार न हो।' १४-१५-अनुष्टु. अनुष्टुप् के चारों पादो में पॉचवॉ अक्षर लघु, तथा छठा गुरु होता है। दूसरे और चौथे पाद में सातवाँ अक्षर भी लघु रहता है। इसके अनेक भेद होते है पर लक्ष्य के अनुसार उन सबका प्रधान गुण श्रव्यता है। जैसे भगवान् व्य.स का यह पद्यः- ततः कुमुद नाथेन कामिनी गण्ड पाण्डुना। नेत्रानन्देन चन्द्रण माहेन्द्री दिगलंकृता । ॥ 'इसके अनन्तर कामिनियों के कपोल के समान पीले तथा नेत्रों को सुख देने वाले चन्द्रमा ने पूर्व दिशा को अलकृत किया। १६-भुजग शिशुभृता नगण, नगण तथा भगण नौ अक्षरों के छन्द को छन्दोविद् 'भुजग शिशुभृता' कहते हैं। जैसे ग्रन्थकार का निम्नलिखित पद्यः- न नमति चरणौ भक्त्या किमिति जडमतिर्लोकः । भव भय शमनौ शंभो जग शिशुभृतावन। जड बुद्धि वाला यह संसार शिव के उन चरणों मे क्यों प्रणाम नहीं करता जो ससार के भय को नाश करने वाले हैं और सर्पो द्वारा धारण किये गये हैं। १७--रुक्मवती भगण, भगण, सगण और अन्त में एक गुरु, इस प्रकार दश अक्षर वाले छन्द को छन्द शास्त्री रुक्मवती छन्द कहते हैं। जैसे ग्रन्थकार का यह पद्य:- भग्नमसत्यैः काम सहस्र मोहमयी गुर्वी भव माया । स्वप्नविलासा योगवियोगा रुक्मवती हा कस्यकृते श्री॥ 'सहस्रों असत्य शरीर भग्न हो जाते हैं। संसार की मोहमयी माया गुर्वी है। लक्ष्मी स्वप्न के विलासों के समान पानी-जानी है। यह स्वर्ण मयो लक्ष्मी किसी को भी नहीं होती। - (८०) 400MANDA १८-इन्द्रवजा इन्द्रवज्रा में दो तगण, एक जगण और दो गुरु अक्षर होते हैं। इस प्रकार इसमें ग्यारह अक्षर आते है। जैसे प्रथकार का यह पद्यः- 'तौ जन्मगूढौ चरणेन यस्य कष्टौ निविष्टौ हृदि काम कोपौ। त दुःसहास्ता ज्वलदिन्द्र वज्र पातोपमाः क्लेशदशा विशन्ति ॥ 'जन्म से ही छिपे हुए, कष्ट दायक काम और कोप जिसके हृदय में चरण रखकर प्रविष्ट हो जाते हैं। उस पर इन्द्र के वन के तुल्य कठोर तथा असह्य क्लेश दशाये गिरती हैं। १६-उपेन्द्र वज्रा जगण, तगण, जगण तथा दो गुरु, इस प्रकार ११ अक्षरों का छन्द उपेन्द्र वज्रा है। जैसे प्रथकार का यह पद्य:- जितो जगत्येष भवभ्रमस्तै, गुरूदितं ये गिरिशं स्मरन्ति । उपास्यमान कमलासनाद्यैः, रूपेन्द्र वज्रायुध वारि नाथैः ।। 'उन्होंने संसार के भ्रम को जीत लिया जो गुरु के उपदेश से शिव का स्मरण करते है, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा वरुण भी उनकी (शिव की) उपासना करते है। २०-उपजाति इन्द्र वज्रा तथा उपेन्द्र बज्रा के पदो के परस्पर योग से उपजाति छन्द बनता है। ये योग अनेक हो सकते है अतः इस छद के भेद भी अनेक होते है। २१-दोधक तीन भगण तथा दो गुरु, ग्यारह अक्षरों का छंद दोधक होता है। जैसे ग्रंथकार का यह पद्य. भो भव विभ्रम भंगुर भोगाः, गच्छत नास्त्यधुना मम मोहः, तिष्ठति चेतसि चंद्रकलाभृत्, भक्त जनाभयदोऽथ कपाली। 'अरे संसार के क्षणिक भोगो, चले जाओ। अब मुझे मोह नहीं रहा । भक्त जनो को अभय देनेवाले चंद्रशेखर शिव मेरे हृदय में बैठे हैं। - - । ( ? ) २२-शालिनी एक मगण, दो तगण तथा दो गुरु, इस प्रकार ग्यारह अक्षरों का छन्द शालिनी है। इसमें पहले चार अक्षरो के बाद विराम होता है, जैसे प्रथकार का यह पद्य:- मत्ता गोष्टीगर्भ गूढ प्रलापा, प्रौढ़ा गाढालिंगिता यौवनेन । मध्वाताम्रस्वेदमीलत्कपोला, लोला लीलाशालिनी कस्य नेष्टा ।। 'ऐसी लीला शालिनी युवती, जो मधु पीकर मस्त बनी अस्त- व्यस्त अालाप करती है तथा जिसके कपाल ताबे के से रंग के एवं स्वेद संसिक्त हो जाते है -वह किसे प्रिय नहीं लगती।' २३-रथोद्धता रगण, नगण, रगण, लघु तथा गुरु इस प्रकार के ग्यारह अक्षरी का छन्द रथोद्धता कहलाता है। जैस प्रथकार का यह पद्यः- रम्य नर्म कलभोग तर्जनी, भ्र लतेव तरलारियोषिताम् । वैजयन्त्यभिमुखी रणे रणे, भाति ते नरपते रथोद्धता ।। हे राजन्, तुम्हारे रथ पर फहराने वाली चचल पताका युद्ध में सामने आकर भ्र लता के समान शत्रु की स्त्रियो को शृंगार भोग का तर्जन सा करती है। २४-स्वागता रमण, नगण, भगण तथा दो गुरु इस प्रकार के ग्यारह अक्षरी का छन्द स्वागता है। जैसे प्रथकार का यह पद्य- रत्नभंग विमलै गुण तुगै, रर्थिनामभिमतार्पण सक्तः । स्वागता भिमुख नम्र शिरस्कै, र्जीव्यते जति साधुभिरेव ॥ 'जो सत्पुरुष रत्नो के टुकड़ो के समान निर्मल, अपने गुणों के कारण उन्नत, याचको के अभिमत दातार तथा स्वागत के लिये सिर मुकाये रहते है, संसार मे वे ही जीवित हैं।' ma- HTTEN (२) २५-तोटक मध्य में बिना यति के चार सगण वाला बारह अक्षर का छन्द तोटक कहलाता है। जैसे प्रथकार का यह पद्यः- सरस' म्मरसार तरो वयसः, समय स्मृति शेष दशा पतितः । गलिताखिल राग रुचि विजने, परितोऽट कपालकर. सुमते ॥ 'आयु का वह सरस भाग जिसमे स्मर का सार अधिक रहता है, स्मृति शेष रह गया है। अतः हे सुमति, समस्त राग और रुचियो का त्यागकर हाथ में कपाल लिये निर्जन स्थानो में भ्रमण करो" २६-वंशस्थ जगण, तगण, जगण, रगण,- इस क्रम से बारह अक्षरो का छन्द वशस्य होता है। जैसे प्रथकार का यह पद्यः- जनस्य तीब्रातपजाति वारणा जयन्ति सन्त सतत समुन्नता.. सितात पत्र प्रतिमा विभान्नि ये, विशाल वंशस्थतया गुणोचिता.।। 'मानव के तीव्र संताप तथा कष्टो को निवारण करने वाले सदा समुन्नत सन्त लोगो की जय हो जो गुणो एवम् विशाल वशस्थ' होने के कारण श्वेत छत्र जैसे लगते है। २७--द्रुत विलंबित जिसमे नगण, भगण, भगण, रगण, इस क्रम से बारह अक्षर होते है वह द्र त विलबित छन्द है। जैसे ग्रंथकार का यह पद्यः- नभसि भर्ग गलच्छविभिर्घनै द्र तबिलंबितगै परिवारितः । सितकरः कलहस इवाभितः, तरति संवलितो यमुनामिभि । 'शिवजी के कण्ठ की सी छवि ताले तथा शीघ्र एवं विलंब से दौड़ते हुए बादलो मे घिरा हुआ चन्द्रमा आकाश म ऐसा लगता है जैसे यमुना की तरगो मे घिरकर तैरता हुआ हस । १--विशाल वशस्थ = बडे बाँस पर स्थित छत्र तथा उच्च कुल में अवस्थित सन्त लोग। । - (६३) २८ प्रहर्षिणी मगगा नगर, जगग, रगण तथा एक गुरु, इन तेरह अक्षरों का छन्द प्रहर्पिणी होना है। प्रारम्भ के तीसरे अक्षर पर यति होती है। जैसे प्रथकार का यह पद्य'- - मानौजः सुरभिगुणैर्यशःसितानाम्, निर्व्याजा निज भुज विक्रम क्रमाप्ता । सर्वाशाप्रणयिजनोपजीव्यमाना, भव्याना भवति परमहर्पिणी श्री ।। 'मान, ओज आदि गुणों के कारण यशस्वी बने व्यक्तियों की अपने भुज विक्रम से कमाई हुई लक्ष्मी निर्व्याज होती है। नह सब ओर के प्रणीय जना को आवका एव हर्प प्रदान करती हैं। २६.- वसन्ततिलका तगण, भगरण, जगण, जगण तथा दो गुरु इस प्रकार चौदह अक्षरो का छन्द वसंततिलका होता है। जैसे-प्रथकार का यह AN- तद्भाजि जन्मसचिवे भगवत्यनंगे, प्राप्त लमत्कुसुम मण्डल पाण्डुरेण । भृगावली कुटिल कुंतल सनिवेशा, कान्ता वसन्ततिलकेन विभूषिताभू॥ 'जन्म के मित्र भगवान कामदेव के आजाने पर पृथ्वी रूपी कान्ता स्लेि पुष्पो के पीले वसंत तिलक से तथा भ्रमरो के कुटिल कुतल से विभूषित होगई। ३०...मालिनी दो नगण, मगण तथा दो यगण के पन्द्रह अक्षरो का आठये अक्षर पर वराम युक्त छौंद मालिनी होता है। जैसे प्रकार का निम्नलिखित पद्य- 'ननननमय वाणी मेखला कृष्टि काले, प्रविचलदिव शीलं नोत्सृजन्ती दुकूलम् । स्वैरिणी शंकमाना दिश दिशि कृत दृष्टि मालिनी कस्य नेष्टा ।। 'स्वैर विहारिणी नायिका रतिकाल में मेख खिंचते समय 'न, न, न' करके गिरते हुये शील के समान दुकूल को न छोड़ती हणलवचलनेऽपि हुई, तिनके के हिलने पर भी शंकित होकर चारों ओर दृष्टि डालने वाली किस को प्रिय न होगी ?' ३१-नकुट नगण, जगण, भगण, दो जगण तथा लघु और गुरु के सत्रह अक्षरों का विराम रहित छन्द नर्कुट होता है, जैसे मथकार का यह पद्य:- निजभुज जैविशाल गुण जैविशाल गुह्य कीर्ति भरैः प्रविदधता सुधाशुधवल भवता भुवनम् । कथय कथ कृतेय मति राग वती जनता, चरितमपूर्व मेव नव कस्य न नर्कुटकृत् ॥ 'अपनी भुजाओ के विशाल गुण तथा कीति कर्मों से भुवन भर को चन्द्रमा जैसा धवल तुमने बनाया है फिर भी इस जनता को, कहो, अतिराग बती कैसे बना लिया ? तुम्हारा अपूर्व चरित सब को आश्चर्य में डालता है।' ३२-पृथ्वी जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, लघु तथा गुरु के सत्रह अक्षरो का आठ, नौ पर विराम वाला छद पृथ्वी होता है। जैसे ग्रंथकार का यह पद्य:- जवात्स रजसा युत श्रम विसस्थुलाग. पथा, ब्रजन्सतत सेवक पिशुनधाम वेश्म प्रभोः । कदाचिदवलोकनै पलविवर्जितमन्नत जडः कर समर्पितामिव मदेन पृथ्वी मिमाम् ॥ 'सदा का सेवक वेग के कारण धूलसने पैरों से श्रम शिथिल अगों को लेकर जब चुगलखोरो से भरे स्वामी के घर मे प्रवेश करता है तो उस पर यदि स्वामी की फल शून्य दृष्टि पड़ जाय तो वह जड़ यह समझता है कि सारी पृथ्वी उसके हाथ में आगई।' ३३-हरिणी नगण, सगण, मगण, रगण, सगण तथा लघु और गुरु सत्रह अक्षरों वाला छ द हरिणी होता है। इसमें छ, चार, सात पर विराम रहता है। प्रथकार का यह पद्य उदाहरण है।:- - - यथा (८५) न समरसनाः काले भोगाश्चल धन यौवनम, कुरुत सुकृतं मावन्नयं मावन्नेयं तनुः प्रविशीर्यते। किमपि कलना कालस्येय प्रधावति सत्वरा, तरुण हरिणी संत्रस्तेव प्लवप्रविसारिणी॥ 'भोग का रस हर समय एक सा नहीं होता। धन और यौवन चलायमान होते हैं। जब तक यह शरीर विखर नहीं जाता तब तक अच्छे कर्म करो। काल का यह स्वभाव है कि वह भय में छलाग मारकर भागती हुई तरुण हरिणी की भॉति वेग से भागता है।' ३४-शिखरिणी यगण, मगण, नगण, संगण, भगण, लघु तथा गुरु के सत्रह अक्षरों का छन्द शिखरिणी होता है। इसमे छः ग्यारह पर यति होती है। जैसे प्रथकार का यह पद्य मन्युर्लीनः सचविभवभग्न स्मरपद, स्तथा जाने जाता शम समय रम्या परिणतिः। इदानीं संसार व्यतिकर हरा तीव्र तप से, विविक्ता युक्ता में गिरिवरमही सा शिखरिणी ।। ॥ 'प्रतीत होता है कि यह वैराग्य वेला का रमणीय परिणाम है कि जिस प्रकार क्रोध विलीन हो गया उसी प्रकार स्मर का भी वैभव भग्न हो गया है। अब तो संसार की सब उपाधियों से परे एकांत तथा शिखरमयी पर्वत भूमि ही तीव्र तपस्या के लिये उपयुक्त है। ३५-मन्द्राक्रान्ता मगण, भगण, नगण, दो तगण तथा दो गुरुः सत्रह अक्षरो का चार, छः, सात पर विराम युक्त छन्द मद्राक्रांता होता है। मध्ये भंगी वलनविततापांग संसंग भाजः स्मर्यन्तेते यदि धृतिमुष. पक्ष्मलाक्षी कटाक्षाः । तत्कि मिथ्या नियमनिभृतैः कानने धोमते धीः, मंदाक्रांता दिशति निशिता पन्नगी पाणिसक्ता ।। 'मध्य में तारे के घुमाव से फैले हुए अपागों का स्पर्श करने वाले, धैर्य के चोर तुम्हारे पक्ष्मल कटाक्षो का यदि स्मरण आता रहे तो नियमों में कसे हुए व्यक्ति बन मे जाने का विचार व्यर्थ ही करते हैं। हाथ में लगी सर्पिणी धीरे से सरक कर काट लेती है।

(८६) ३६- शालविक्रीडित मगण, स्गण, जगण, सगण, दो तगण और एक गुरु उन्नीस अक्षरो का बारह, सत्रह पर विराम वाला छौंद शिखरिणी होता है। जैस अथकार का यह पद्य :- माद्यत्सज्ज समाततो सुभटोद्भिन्न भकु भस्थल, श्लिष्यन्मौक्तिक ढन्तुर सरभम्गेद्वल्लद्यश केसरः । श्रू गारम भयकर व्य न कर त्रस्ते समुछाक्षित., शत्रूणा त्वदास करो त समरे शार्दूलविक्री 'डतम् ॥ 'युद्ध के लिये तैयार हुए मद मस्त सैनिको के हाथा के से कुभस्थल फाडकर उनके मोतियो के दतुर बनी, वेग से फैलते हुए यश के केसरो से युक्त तथा जंभाई के समान अपने प्रक्षेपो से सैनिको को डराने वाला तुम्हारी तलवार शत्रुओ के बीच सिंह की क्रीडा करती है। ३७-स्त्रग्धरा मगण, रगण, भगण, नगण, तथा तीन यगणो से इक्कीस अक्षर का प्रत्येक सातवे अक्षर पर विराम वाला छद स्रग्धरा है। जैसे ग्रंथकार का यह पद्य- सारारंभानुभावप्रियपरिचयया स्वर्गरगांगनानाम्, लीला कणवितसश्रियमतदु गुण श्लेषया संश्रयन्त्या। आधाति व्यक्त मुक्ताविच केल लवली वृन्द कुन्देन्दुकान्त्या, त्वकर्त्याभूषितेय भुवन परिवृढ़ स्रग्धरेव त्रिलोकी ॥ 'हे पृथ्वी पति तुम्हारी कीर्ति त्रिलोकी भर को माला की भाति भूषित करती है। यह सार गुणो मे युक्त है एवम् प्रचुर गुणों से अप्सराओ के कर्णाभरण की शोभा प्राप्त कर लेती है। उसकी काति यमकत मोती, सिले हुए लोग तथा कुन्द घुष्प एव चद्रमा के समान है। इस प्रकार जो ऊपर रुचिर छदो को व्यक्त किया गया है वे सभी के हित के लिये है क्योकि वे सरल हैः, सब प्रकार के काव्यों के उचित हैं अच्छे कवियों ने इनका व्यवहार किया है तथा कानों को प्रिय लगते हैं । इनमें कठोर विषम मात्राये या दुर्विशम आदि दोष कुछ नहीं हैं। के (८७ ) दूसरा विन्यास गुण दोष विवेचन १ प्रसिद्ध छन्दों के लक्ष्य लक्षणों का संग्रह कर दिया गया है। अब उनके गुण दोषों का प्रदर्शन किया जाता है। २-छः सात अक्षरों के छन्द पर सरस्वती उसी प्रकार विश्राम नहीं करती जैसे मालनी की बाल कलिकाओं के अग्र भाग पर भ्रमरी नहीं बैठती। ३-छोटे छन्दों की शोभा समासों से तथा बड़े बड़े छन्दों की शोभा असमासों से होती है अथवा उपयोग वश वे भव्य बनते हैं। ४-५. -अनुष्टुप छन्द के विषय में जो वह सामान्य लक्षण कुछ लोगों ने किया है कि उसमें पांचवाँ अक्षर लघु तथा छठा गुरु होता है यह सार्वत्रिक नहीं है बड़े बड़े प्रबंधों में इसका व्यभिचार भी देखा जाता है । इसलिये सार्वत्रिक नियम श्रव्यता ही कहा जा सकता है। जैसे कालिदास का यह पद्य- तदन्वये शुद्धिमति प्रसूतः शुद्धिमत्तरः । दिलीप इति राजेन्दु रिन्दुः क्षारांनधाविव ।। उस शुद्ध वंश में और भी अधिक शुद्ध राजश्रेष्ठ दिलीप उत्पन्न हुआ, जैसे क्षीर सागर में चन्द्रमा उत्पन्न होता है।' इस श्लोक में पहले पाद में 'शु' गुरु है, होना चाहिये लघु । 'धि' लघु है, होना चाहिये गुरु। पर श्रव्यता पद्य में है। ६-उपजाति के विकल्प रूपों में यद्यपि संकर सिद्ध है । फिर भी पूर्व पाद का अक्षर लघु करना चाहिये। जैसे उत्पल राज का यह । --- पद्यः TER हृतांजन श्याम रुचस्तवैते, स्थूलाः किमित्यश्रुकणाः पतन्ति । । भृगा इव व्यायत पंक्तयो ये, तनीयसी रोमलतां श्रयन्ति ।। 'धुले काजल से काले बने तुम्हारे ये मोटे मोटे अश्रुबिन्दु क्यों गिर रहे हैं। लबो पंक्ति वाले भौरों के समान ये छोटी रोमलता का सहारा लेते हैं। इस पद्य का पहला अक्षर 'हृ' लघु है । ७-८-लघु अक्षर से पद्य का मुख धागे के समान तीक्ष्णाग्र हो जाता है। वह कान में निर्विघ्न प्रवेश करता है तथा उसकी सरलता - (८८) भी बनी रहती है। पर गुरु अक्षर से उसका मुख गांठ वाले धागे के समान रुद्ध हो जाता है। ,वह स्थूल होकर कान को कष्ट देता है। जैसे कालिदास का यह पद्यः अस्त्युत्तरस्या दिशि देवतात्मा, हिमालयो नाम नगाधिराजः । पूर्वापगै तोयनिधी वगाह्य, स्थित' पृथिव्या इव मानदण्डः ।। उत्तर दिशा में देवता तुल्य हिमालय पर्वत है। वह पूर्व और पश्चिम समुद्रो का अवगाहन कर स्थित है अतः पृथ्वी का मानदण्ड जैसा लगता है। यहाँ पहला अक्षर 'अ' तथा पू' गुरु है १-दोधक छन्द तीन तीन अक्षरो के योग से बना है। उसमें तीसरे अक्षर पर ही यति हो तो अच्छा लगता है। इससे अधिक या थोड़े अक्षरो पर वह हा तो उसका ताल सा टूटता है । जैसे प्रथकार का यह पद्य:- सञ्जन पूजन शीलन शोभाम, मर्जय वर्जय दुर्जन संगम्। सागर वेगे, मञ्जन कारण वारण मेतत् ॥ 'सत्पुरुषो के सत्कार की शील शाभा का अर्जन करो। दुर्जनों की संगति छोड़ दो। ससार रूपी कठिन सागर में वह डूबने से बचाता है।' इससे अधिक या कम पर विराम जैसे तुजीर के इस पद्य में:- त्वन्मुख चन्द्र निरीक्षण वा, य सुतरामिह निर्मल नेत्रः । सर्वजनस्य पुरः स्थित मेतत्, सोन्तकवर्म न पश्यति चित्रम् ॥ 'तुम्हारे मुखचन्द्र को देखने से जिसके नेत्र भलीभांति निर्मल हो जाते हैं वह फिर सब मनुष्यो के सामने के मृत्युमार्ग को नहीं देखा करता। कैसा आश्चर्य है। इस पद्य में तीसरे अक्षर पर शब्द समाप्त नहीं होते अत. वहाँ विराम भी नहीं है जैसे दूसरे पाद में 'सुतराम' के 'त' पर शब्द समाप्त होना चाहिये था। दुस्तर संसृति (क) १०-शालिनी छन्द का बंध स्वभाव से शिथिल होता है। अतः मन्दी दीप शिखा के समान उसे यत्न से उत्तेजित करना चाहिये। शिथिल बंध जैसे ग्रन्थकार के इस पद्य में:- प्लोष क्लेशं प्रोषितानां दिशन्ती, मान म्लानिं मानिनीनाम् दधाना। गाढं सक्ता सद्गुण ग्लानि दाने, चन्द्रस्य श्री दुजेनस्येव जाता ।। 'चन्द्रमा की आभा दुष्ट की संपत्ति क समान प्रवासियों को दाह का क्लेश दे रही है। मानियो के मान को क्षीण बना रही है और श्रेष्ठ गुणा को कम करने में लगी है।' यहाँ छोटे छोटे शब्दो में शिथिल बंध है, अत. असुन्दर लगता है। ११-यदि शत् प्रत्ययान्त शब्दों के योगस तथा विसर्गों के द्वारा शब्द योजना कर्कश हो जाय तो यह छ द दीप्त हो जाता है अतः श्रेष्ठ है। जैसे प्रथकार का यह पद्य. लज्जा मज्ज ल्लोल तारांत कांता, स्तिर्य नियत्केतकी पत्र तीक्ष्णाः । मगना शिंचते कस्य नियोंति भूयः, प्रेमोन्मील पक्ष्म लाक्षी कटाक्षाः॥ 'पक्ष्मलाक्षी युवतियो के प्रेम कटाक्ष लज्जा से डूबते और 'चल तारो के अत भागसे सुदर हो जाते हैं । तिरछे निकलते हुए वे केतकी के पत्र जैसे तीक्ष्ण यदि किसी के चित्त में प्रविष्ट हो जायें तो फिर निकलते नहीं हैं। १२-शिथिलता के कारण शालिनी का माधुर्य रुक जाता है जैसे किसी मंदाग्नि वाले व्यक्ति की रुचि दूध से और अधिक मंद हो जाती है। १३-रथोद्धता छद के पादान्त यदि विसर्ग युक्त हों तो वह कलाविज्ञ सुन्दरी की भॉति और अधिक आकर्षक हो जाता है। जैसे ग्रंथकार का यह पद्यः- अत्र चैत्र समये निरन्तराः, प्रोषिवा हृदय कीलें पाबकाः ।

। (६०) वान्ति कामुक मनो विमोहना, व्याल लोल मलयाचलानिला ॥ 'यहाँ चैत्र मास से मलयाचल-की हाये निरन्तर बहती है। वे सॉपो की भॉ.त चंचल बनी कामुको के मन को मोह लेती है गौर प्रोषिताओ क हृदयो मे पावक बखेर देती है। इसमें प्रत्येक पाद के अन्त मे विसर्ग है। १४–यदि इसमे पाद के अन्त मे विसर्ग न हो तो वह इसी प्रकार फौकी हो जाती है जैसे बिना प्रार्थना के प्रेम करने वाली मानिनी नायिका। कलश कवि का यह पद्य उदाहरण है:- अंगलौ जलमधीर लोचना, लोचन प्रति शरीर शारितम् । आत्त प्रात्तमपि कान्त मुक्षितुम्, कातरा शफर शकिनो जहौ । 'अधीर लोचना नायिका ने शान्त पर छिड़कने के लिये जल हाथ में लिया। पर नेत्रो के प्रतिबिब स उसमें मछलियो की आशंका से कातर होकर फिर छोड़ दिया।' यहाँ पादान्त मे विसर्ग नहीं है। १५-स्वागता छन्द के पादान्त मे यदि "श्रा' के अनन्तर विसर्ग हो तो उसकी चारुता बढ़ जाती है और वह काव्य सौन्दर्य के लिये अधिक उपयोगी होती है। जैस प्रथकार का यह पद्य- व्यावलन्ति तरला जलधारा पान्थ सगमधृते परिहारा । प्रान्त रत्ननिम विद्युदुदारा, प्रावृषः पृथुपयोधर हारा ॥ 'पथिको के सगम के धैर्य को दूर करने वाली चंचल जल-धार गिरती हैं और बादल वर्षा के हार जैसे तथा उनके प्रान्त भाग की विजलियाँ रत्न जैसी प्रतीत होती है।' यही बात प्रथकार के इस पद्य मे नहीं है. अंबरेम्वु भरल बि पयोदे, मत्त वर्हि रुचिरेद्रिनितबे। पुष्पधामनि कदब कदंबे, का रतिः पथिक काल विलंबे॥ - (११) 'आकाश में जल के भार से बादल लटकने लगे हैं, पर्वतों पर मस्त होकर मयूर नाचने लगे है और एक एक कदंब पुष्पों का घर बन चुका है। 'पथिक, ऐसे समय में विलंब करने से तुम्हारी क्या गति होगी" १५-तोटक छद वह प्रिय लगता है जिसके पदों में रूखे अक्षर हों तथा शीघ्र शीघ्र ताल और लय हों। जो चित्त को नचा सा दे। जैसे ग्रंथकार का यह पद्यः- मद घूर्णित लोचन षट चरणम, घन राग मतंगकरा भरणम् । कमल द्युति मुग्ध वधू बदनम्, सुकृती पिबतीह सुधा सदनम् ॥ 'मुग्धबधू के ऐसे मुख का जिसके नेत्र मद से धूणित होकर भौरे की भॉति घूमते है; जिमका राग धना हो जाता है; जो कामदेव के हाथों में आभूषण बनता है; कमल की सी जिसकी द्य ति होती है और जो सुधा का सदन होता है-पुण्यात्मा लोग ही पान करते हैं।' १७-वंशस्थ छन्द तब अमूल्य बन जाता है जब इसके पादों में असमस्त पदों के प्रयोग से संधि विच्छेद का सौन्दर्य हो या पादों के अत में विसर्ग आते हो। जैसे बाणभट्ट का यह पद्यः जयन्ति बाणासुर मोलिलालिता., दशास्य चूडामणि चक्र चुबन. । सुरासुराधीश शिखान्त शायिन' ॥ तमश्छिद स्त्र्यबक पाद पांसवः ।। 'वाणासुर का मस्तक जिनका लालन करता था; जो रावण की चूडामणियों के समूह को चूमते थे तथा जो सुर और असुरों के स्वामियो के शिर पर लोटते है इन अंधकार को दूर करने वाले शिवजी के चरण रेणुओ की जय हो ।' यहाँ पादान्त म विसर्ग हैं। इसके विपरीत भी उन्हीं का पद्य यह है नमामि भोश्वरणांबुजद्वय सशेवरैर्मी खरिभिः कृतार्चनम् । समस्त सामन्त किरीटवे दका विटंक पाठाल्लुठिता रुणा गुलि ।।

१ 'भवु के चरण कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ निका मुकुटधारी मौखरी लोग अर्चन करते हैं तथा जिनकी लाल अंगुलियाँ समस्त सामंतों के किरीटो की वेदिका पर लोटती है।' १८-द्रत विलं बत तब अच्छा लगता है जब उसका प्रारंभ पदों के द्रत विन्यास से तथा अवसान विलंबित विन्यास से होता है और पादों में संधियाँ नहीं होतीं। जैसे ग्रंथकार का यह पद्यः- कमल पल्लव वारि कणोपमम्, किमिव पासि सदा निधनं धनम् । कलभ कर्ण चलांचल चंचलम्, स्थिर तराणि यशांसि न जीवितम् ॥ 'कमल पत्र की जल विन्दुओ के समान अस्थिर धन की तू क्या रक्षा करता है ? यह तो हाथी के बच्चो के कान की भाति चंचल है। स्थिर तो यश होते है जीवन भी नहीं।' इसमें समास होने पर भी पद संधि रहित है। प्रथकार के इस पद्य में पदों का विलंबित विन्यास है द्रुत नहीं। निपटतां भ्रमतां विनिमजता प्रविशतां परगर शतैरधः। तनुभृतां भव एव भवाण वे भयमये भगवान बलबनम् ॥ 'भय से भरे ससार रूपी समुद्र में गिरते हुये, चक्कर काटते हुए, डूबते हुए, तथा अपने सैकडो परिवारों के साथ नीचे फंसते हुए प्राणियो के लिए भगवान शिव ही सहारा है।' १६-ग्रहषिणी छन्द से तब हर्ष होता है जब उसके प्रत्येक पाद में मन्द लय वाले तीन तीन अक्षरो के पद हों और शेष पदो का लय इत गामी हो । जैसे श्री हर्ष का यह पद्यः- दुर्वारा कुसुम शरव्यतां वहन्त्या, कामिन्या यदभिहितं पुरः सखीनाम् । तद्भूयः शिशु शुक सारिकाभिरुक्तं, धन्यानां श्रवण पथातिथित्वमेति ।। 'कामदेव की असह्य व्यथा को धारण करने वाली कामिनी ने सखियों के समक्ष जो कहा हो उसे तोता मैना के मुख से जो सुनते है वे धन्य हैं। इसके विपरीत प्रथकार का यह पद्य है:- घन संकोच व्यति कर वद्ध भीति लोले निर्याद्भ भ्रमर भरे. सरोरुहेभ्यः। आरब्धः क्षणमिव संध्यया 'जगत्याम्, उत्पत्यै तिमिरस्य बीजवापः। 'संकोच के भय से चचल अतएव कमलो से बाहर निकलते हुए अनेक भौरो से सन्ध्या ने वाण भर के लिये पृथ्वी पर घने अन्धकार की उत्पत्ति के लिये बीज बो दिया। २०-वसन्त तिलका का य द प्रथम शब्द 'आकार' युक्त हो तो उसकी कान्ति और भोज और अधिक विकसित हो जाता है। जैसे रत्नाकार विद्याधिपति का यह पद्य. श्रियं कुवलय स्तबकाभिराम, दामानु कारि विकटच्छवि काल कूटाम् । विभूत्सुखानि दिशता दुपहार पीत- धूपोत्थ धूम मलिना मिव धूर्जटिव।। 'कुवलय के गुच्छों की सुन्दर माला का अनुकरण करने वाले काल कूट से युक्त कठ श्री को धारण करते हुए भगवान शिव तुम्हे सुख प्रदान करे, उनका कठ --मानो भंट की गई जड़ियों के पीने पर उनके धुये से मलिन हो गया था। २१-पहले 'आ' के आ जाने पर भी पद यदि छोटे छोटे हों तो इसकी रमणीयता घट जाती है। जैसे परिमन कवि का यह कठ अच्छासु हस इव बाल मृणालिकासु, भृगो नवास्विव मधुद्र म मंजरीषु। को वन्तिभरपरो रस निर्भरासु, पृथ्वी पतिः सुकविसूक्तिषु बद्धभावः ॥ 'जिस प्रकार अच्छी बाल मृणालिकाओं में हंस तथा मधु वृक्षों की नवीन मंजरियों में भौंरे मन लगाता हैं उस प्रकार रस से पूर्ण सूक्तियो में अवन्ति नाथ के बिना कौन राजा अनुराग २२-मालिनी के पादान्तो में यदि विसर्ग न हो तो वह पुछकटी चमरी और पनकटा बेन को ऑति अच्छा नहीं लगता। जैसे भट्टवल्लट का यह पद्य- करता है ?

भिज्ञ, तुम झुलस जाती न्यस्त (३४) वरमिह रवि तापैः किं न शीर्णासि गुल्मे, किमु दवदहनैर्वा सर्वदाहं न दग्धा । यदहृदयजनौधैवृन्त पर्णान रितर कुसुम मध्ये मालनि प्रोम्भितासि ॥ 'मालति, यदि गुल्म मे ही सूर्य की धूप से या बन की आग से बिल्कुल जल जाती तो अच्छा होता। डंठल और पत्तो को न जानने वाले हृदय हीन लोगों ने तुम्हे दूसरे फूलो में गूथ दिया है।' यहाँ 'दहनैः' 'तापैः' आदि में विसर्ग है। सम्पूर्ण पाद विसर्ग हीन जैसे कालिदास के इस पद्य में। अथ स ललित योषिद् भूलता चारु शृंगम, रति वलय पदाके चाप मासज्य कराठे। सहचर मधु हस्त चूताकुरास्त्रः, शतमख मुपतस्थे प्राजलिः पुष्पकेतु.॥ 'इसके बाद कामदेव चंचल युवतियो की भौओं के समान श्रृंग वाले धनुष को रति के वलय से अंकत अपने कठ पर रखकर तथा अपने सखा बसन्त के हाथ मेश्राम्र मजरी का अस्त्र थमाकर हाथ जोड़े हुए इन्द्र के पास उपस्थित हुआ। इसके पहले दूसरे पद में कहीं भी विसग नहीं है। २३–मलिनी के दोनो पाद यदि द्वितीयार्थ मे समस्त हों तो वह श्रेष्ठ होती है। वे ही यदि प्रथमार्ध में समस्त हो तो वह भद्दी हो जाती है। गान्दिनक के इस पद्यार्थ के पाद का द्वितीया समस्त है।- करतरलित बंध बंध कचुक कुर्वतीनाम् प्रति फालत मिदानी दैप माताम्र मचि.: स्तनतट परिणाहे भामिनीना भविष्य, नख पद लिाप लीला सूत्र पात करोति ॥ 'दीपक का लाल प्रकाश कचुको के बधो को ढीला करने वाली युवतियों के उन्नतस्तनां पर प्रति फलित होकर होने वाली नख- क्षत की लिपि लीला का सुत्र पात कर कर देता है।' राज शेषर के इस पद्य में पाद के प्रथमाध में समास नहीं है।

( ५ ) इहहि नवबसन्ते मजरी पुज रेणु, च्छुरणधवल देहा वद्ध हेल सन्ति । तरल माल समूहा हारि हुकार कठा, बहुल परि मलाला सुन्दर सिन्दु वारम् ।। यहा बसन्त के नवागम में भौंरे मंजरिया की रेणु में घवलित होकर आकर्षक हुकार को कठ में लिये हुए घने पारमल से सुदर बने चचल सिन्दुबार पुष्प पर हेला देकर गिरते है। २४-मालिनी छद मे बेसुरे पन को साधारण भावुक भले ही समझ न सके पर वह सुनकर उद्वेग का अनुभव करता है। जैसे भट्टेन्दु राज के इस पद्य म.- रहसि हृत दुकूला शीलिता तैल दीपे, त्वदुप गत समृद्ध प्रेयसी श्रोत्रियस्य । विकिरति पट वासै हन्ति कर्णावतंस, शमयति मणिदीप पाणि फूत्कानिलन ॥ 'तुमसे समृद्धि प्राप्त करने वाले श्रोत्रिय की प्रयसीको तेल के दीपक का अभ्यास था। एकान्त में उसके वस्त्र उघाड़े गये तो वह मणि दीपकों को भी वस्त्रो से बुझाने लगी, कर्णावतंस उस पर फेंकने लगी और हाथ की या मुंह की वायु से उसे शान्त करने लगीं। २५--इसमे गुरु आदि को व्यवस्था ठीक है पर फिर भी त्वदुप- गत समृद्धेः' वाला पाद कानो को दुष्ट प्रतीत होता है। २६-नर्कुट छंद में तब चारुता आता है जब उसमें पहले दो, फिर तीन, फिर चार और अन्त में पाँच अक्षरों पर विच्छेद हो। जैसे वीर देव के इस पद्य में:- तव शत पत्र-पत्र मृद ताम्र तल श्चरणश, चल कल हस नूपुर वर ध्वनिना मुखर । महिष महासुरस्य शिरसि प्रसभ निहितः, सकल महीधरेन्द्र गुरुता कथमब गतः ।। 'माता कमल पत्र जैसा कोमल एवं लाल तथा कल हंसों की सी मधुर ध्वनि वाले नूपुर से मुखर बना तुम्हारा चरण बलात् महिषा- + DI ( ६६ ) सुर के सिर पर रख गया तो वह समस्त पर्वतों से भी अधिक भारा कैसे हो गया ? उसी का यह पद्य इसके विपरीत है। :- सशिखि शिखेव धूम निचितां जन शैल गुहा, सकपिश पन्नगेव यमुनोन्नत नील शिला ! महिष महा सुरोप हित भासुर शूल करा, बहुल निशेव भासि सतडिद् गुण मेघ यता ।। 'तुम माहेषासुर पर रखे चमकते हुए शुल को हाथ म लेकर अग्नि शिखा स युक्त धूआ भरी अजन पर्वत की गुफा के समान, पीले साप से युक्त यमुना म उठा नील शिला के तुल्य और बिजली की रेखा म युक्त बादलो वालो कृष्ण पक्ष को रात्रि के तुल्य प्रतीत होती हो।' २७-पृथ्वी छ'द स्वभावतः बड़ा है। इसकी शोभा असमस्त पदो से होती है। समासो को अन्थियो से तो वह सकुचित और लघुसा हो जाता है। साहिल के इस श्लाक मे असमस्त पद हैं। कचग्रह मनुग्रह दशनखंडन मंडनम्, दृगचन मवंचन मुखरसार्पणं तर्पणम् नखादन मतनम् दृढ मपीडन पीडनम् । करोति रति सगरे मकर केतनः कामिनाम् ।। 'कामियो के लिये कामदेव रीतकाल म कचग्रह को अनुग्रह, दंतक्षत को मडन और मुखरस के प्रदान को तृप्ति बना देता है। इस समय तिरछी दृष्टि वचना नहीं रहती। नख पीडन पीडन नहीं रहता एव दृढ़ता स आलिंगन की पीडा का न होना ही दुःखदायक होता है। यहा बड़े-बड़े समास नहीं है। बड़े समास प्रथकार के इस पद्य मे है कचग्रह समुल्ल सत्कमल कोष पीडाजड, द्विरेक कल कूजितानुकृत सीतकृतालंकृताः । जयन्ति सुरतात्सव व्यतिकरे कुरगीदृशाम्, प्रमोद मद निर्भर प्रणयचुबिनो विभ्रमाः ।। 'मृगनयनियो के सुरत काल के विभ्रमो की जय हो जिनमे कचं ग्रहण के समय कमल कोष की पीड़ा से पीड़ित होकर कूजन MARAN (३७) करने वाले भौरे के स्वर के समान सीत्कार रहते हैं और प्रमोद के आवेग में जिनमे प्रग्य चुबनी को अधिकता होती है।' २८-इसमे यदि आकार से गंभीर एव ओजगुण प्रधान शब्दो का समास रहता है तो वह और अधिक दीर्घ सा लगता है। जैसे भट्टनारायण का यह पद्य.- महा प्रलय मारुत क्षुभित पुष्करावर्तक, प्रचंड घन गर्जित प्रतिरुतानुकारी मुहुः । रवः श्रवण भैरव. स्थगित रीदसी कन्दर., कुतोऽद्य समरोदधे रयभूत पूर्व. श्रुतः ।। 'महाप्रलय की वायु से क्षुब्ध हुए पुष्करावतेक मेघों के गर्जन का अनुकरण करने वाला, आकाश और पृथ्वी के अन्तराल को भरता हुआ, सुनने मे भयकर यह समर सागर का अभूतपूर्व शब्द आज किधर से सुनाई पड़ा ? २६-शीघ्र शाघ्र जिनमे विच्छेद रहते हैं ऐसे पदो से हरिणी छद शोभन हो जाता है . दोघ समासो को मथर गति के शब्दों से वही फिर निःस्पन्द सा बन जाता है। दीपक कवि के इस पद्य में तरल पदो का प्रयोग है। तनु धनहर कर स्तेनोत्कटां विकटाटवीम्, तरति तरसा शौर्योत्सकात् स्वसार्थवशाज् जनः । पुरवर वधूलीला वलात्कटाक्ष बलाकुले, नगर निकटे पन्थाः पान्थ स्फुट दुरतिक्रमः ।। 'पथिक, घने जंगलों का भयानक मार्ग क्षुद्रधन के चोरों से कर हुआ करता है पर अपने साथियों की सहायता एवं पुरुषार्थ बल से पुरुष उसे पार कर जाता है। पर नगरो के निकट तो यह नागरी वधुओं के लीला कटाक्षो से आकुल रहता है। वहाँ पार पाना कठिन है। भट्टेन्दुराज के इस पद्य में पद मंथर हैं- गुण परिचयस्तीर्थे वासस्थिरो भय पक्षता वपुर तिहढं वृत्तं सम्यक सखे तव किं पुनः । सरति सुमते यस्त्वां पातु दशा विनिमेषया; वडिश विषमं तस्याक्षेपं करोषि सहासुभिः॥ - (८) 'जाल, तुम्हारा गुणो से परिचय है; तीर्थ पर वास है। दोनो पक्ष तुम्हारे स्थिर है। शरीर दृढ़ है और वृत्त भी अच्छा है। फिर यह कितना विषम है कि जो निर्निमेष होकर देखने के लिये तुम्हारी आर बढ़ता है उसे तुम प्राणो के साथ खींच डालते हो।' ३०-यदि तीन पादो में विश्राम वाले पद हो और चौथे. में गति तरल हो तो यह छन्द और अधिक मनोहर बन जाता है। जैसे भट्ट न्दुराज का यह पद्य- उपपरिसरं गोदावर्या. परित्यजताध्वगा, सरणिमपरो मार्गस्तावद् भवद्भि. रवेक्ष्यताम् । इह हि विहितो रक्ताशोकः कयापि हताशया, चरण नलिनन्यासोदचन्न वांकुर कंचुकः ।। 'पथिको गोदावरी की कछारो वाले इस मार्ग को छोड़ दो। आप दूसरा पथ देख ले। यहाँ तो किसी युवती ने, हताश, होकर अपने चरण कमल के आधात से रक्त अशोक पर नये अंकुर ला दिये है। ३१-शिखरिणी, छंद में समारोह होने से भोज आता है। यदि लुप्त विसर्गान्त पदो का प्रयोग हो तो यह अत्यन्त उन्नत हो जाता है। जैसे मुक्ता कण कवि का यह पद्य- यध्रा रन्ध्र व्योम्नश्चल जलद धूमः स्थगयति, स्फुलिं गाना रूपं दधति च यथा कीट मण्यः । यथा विद्युज्वालोल्लसन परि प्रिंगाश्च ककुमः, तथा मन्ये लग्नः पथिक तरुखंडे स्मरदकः॥ 'चलते फिरते बादलों का धुआँ आकाश रंध को, जोभरता है; पटबीजने जो स्फुलिगो का रूप धारण करते हैं और, बिजली, की ज्वालाओं से दिशाये जो पीली हो जाती हैं तो प्रतीत होता है, कि पथिक रूपी तरु समूह में कामाग्नि लग गई है।' यहाँ भाव और भाषा दोनो में समारोह है। भा.श्यामल का पद्य इसके विपरीत है। -पद्य में श्लेष की सहायता से अन्योक्ति द्वारा वचको के चरित्र की व्यंजना की है। अनेक शब्द द्वयर्थक हैं। गुण-रस्सा और सद्गुण । उभयपक्ष -हानि लाम मोर दोवो सिरे । वृत्त-बंट और परिक्ष ।

(1) धृतो गंडामोगे मधुप इव बद्धोन्जविवरे, विलासिन्या मुक्तो बकुल तरुमा पुष्पयति यः। विलासो नेत्राणा तरुण सहकार प्रियसखः, सगंडूषः सीधोःकथमिव शिरः प्रापस्थतिमधो॥ 'जो विलासिनी के गडस्थल पर रहता है, भौरे के समान जो कमल में बंधता है, विलासिनी यदि छोड़े तो मौलिश्री को जो पुष्पित कर देता है, नेत्रों के विलास का हेतु एवं तरुण सहकार का प्रिय सखा उसके आसव का गडूष मधु के सिर तक किस प्रकार पहुँचेगा। ३२-शिखरिणी के पद यदि विभक्त होते हैं तो उसका स्वरूप हीन बन जाता है । जिस प्रकार मुत्तालता में सूत्र न रहने से बिखरे हुए मोतियों का रूप बिगड़ जाता है। जैसे भट्टमवभूति का यह पद्य- आसारं संसारं परि मुषित रत्न त्रिभुवनम्, निरा लोकं लोकं मरण शरणं बान्धव जनम् । अदर्प कदर्य जन नयन निर्माण मफलम् , जगज जीणरिण्यं कथमसि विधातु व्यवसितः ।। 'संसार को असार, त्रिभुवन को त्रिभुवन को रत्नहीन, लोक को आलोक रहित, बान्धवों को मरणशील, काम को दर्प शून्य, जन- नयनों की निष्फल तथा जगत को जीर्ण अरण्य बनाने पर तू क्यों । - तुला है।' यहाँ पद प्राय. विच्छिन्न है एतएव इसमें ओज का अभाव ३३-पद्यार्थ में चमत्कार तथा रस दोनों है पर छंद का स्वरूप अपहृत-सा है। ३४-मन्दाक्रांता छन्द के प्रथम चार अक्षर मद गति के हो और मध्य के छः चतुर विन्यास के अर्थात् न अधिक शीघ्रगामी और न अधिक मंद तो वह शोभायमान होता है। जैसे कालिदास का यह पद्यः- - ब्रह्मावर्त जनपद मधश्छायया गाहमानः, क्षेत्रं क्षत्र प्रधन पिशुनं कौरवं तदू भजेथाः।

(१०) के छ राजन्यानां शितशरशतैर्यत्र गाण्डीवधन्वा, धारासारै त्वभिव कमलान्यभ्यर्षिचन् मुखानि ।। 'जब तुम अपना छाया स ब्राह्मावत मे प्रवेश करो तो क्षत्रियों के निधन के सूचक कौरव प्रदेश में जाना । वहाँ पर अर्जुन ने अपने सैकड़ो तीक्ष्ण बाणो से राजन्या के मुखो को इसी प्रकार मंडित किया था जैसे तुम अपनी धाराओ से कमलो को सींचते हो।' यहाँ प्रथम चार अक्षर 'ब्रह्मावत' मगति के है। बाद 'जनपदमध' मे गति कुछ त्वरित है। आदि और मध्य में समान गति वाले अक्षर कालिदास के ही इस पद्य मे है कश्चित्कान्ता विरह गुरुणा स्वाधिकार प्रमत्तः, शायेनास्तं गमित महिमा वर्षभाग्येण भर्तुः। यक्षश्चक्रे जनक तनया स्नान पुण्योदकेषु, स्निग्धच्छाया तरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु ॥ 'अपने कर्तव्य के प्रमाढी किसी यक्ष ने कान्ताविरह से दारुण, और वर्ष भर के भोग से पूरा होने वाले शाप के कारण महिमा खोकर चित्रकूत्र के आश्रमो मे निवाम बनाया। वे आश्रम जिनके वृक्षो की छाया सघन थी-और जल जानकी के स्नान से पवित्र बन गये थे। ३५-शार्दूल विक्रीडित छन्द के पादान्त अक्षर सविसर्ग एवं 'आ' आदि अक्षरों से प्रारम्भ होने वाले हो तो उसका प्रभाव बढ़ जाता है, जैसे भट्टश्यामल का यह पद्य'- आलानं जय कुजरस्य दृषदा सेतुविपद्वारिधेः, पूर्वाद्रि करवाल चंद्रमहसो लीलोपवानं श्रिय.। संग्रामामृत सागर प्रमथन क्रोडाविधौ मन्दरो, राजन् राजते वार वैरि वनिता वैधव्यदस्ते भुजः ॥ 'हे राजन् आपकी भुजा जय कु जर का आल्लान है, विपत्तियो के समुद्र का पत्थरो का सेतु है, तलवार के सूर्य का पूर्याद्रि है, श्री का लीला उपधान है। सग्राम रूपी अमृत सागर के मथ डालने में मन्द्राचल एवं वैरिवानिताा को वैधव्य प्रदान करने वाला है।' यहाँ पहला अक्षर 'आलान' आकारादि है। पादान्त में सब विसर्ग वाले पद हैं . लाट डिंडार कवि का यह पद्य इसके विपरीत है। ।

(१०१) चित्र ताव दिदं सुरेन्द्र भवनान्मंदाकिनी पाथसा, केनाप्युत्तम तेजसा नृपतिना दमामण्डल मण्डितम् । नातश्चित्रतर निशाकर कला लावण्य दुग्धोधे, भूमेर्यद्भवता ।वरांच नगरी कीर्तिप्नवैः प्लाव्यते ॥ वह अद्भुत है कि किसी उत्तम तेज वाले राजा ने स्वर्ग से लाकर गंगाजल द्वारा पृथ्वो मन को भूषित कर दिया। पर इससे अधिक कोई आश्चर्य नहीं कि आप चन्द्रकलाओ के लावण्य दुग्ध समुद्र बनकर स्वर्ग को पृथ्वी से कीर्ति का बहाव ले जाकर बहा देते हो। ३६-विमर्गों को यदि 'ओ' होता हो तो इस छन्द के पद ऊँचे नीचे होकर पढ़ने में परिश्रम पैदा कर देते है। जैसे मुक्ताकण का यह के पद्य- लीला चामर डंबरो रतिपतेर्वालाम्बुदश्रेयणयो, रागोद्दण्ड शिखण्डिनो मुख विधूभृतास्तमोविभ्रमाः। सौगन्ध्योद्धन धावदाकुल वलन्मत्ता लिमालाकुलो, धम्मिलो हरिणी दशा विजयते सस्तो रतिव्यत्यये ।। "विपरीत रति के समय मृगनयनियो के केशपाश की जय हो। वह उस समय कामदेव का लीलाचमर, मयूरों के प्रेम में उद्धत बनाने वाला बाल मेबो का समूह, मुखचन्द्र से निकला अधकार एवं सुगन्धि से मस्त होकर दौड़ने वाले भ्रमरों के समूह से व्याकुल बन जाता है । यहाँ 'डंबरो' श्रेणयोआद में 'ओ' है। ३७-इसके पूर्वार्ध मे यदि पद पृथक हों और द्वितीया समास वाला हो तो यह अच्छा लगता है अन्यथा निकृष्ट । जैसे भट्टभवभूति का यह पद्यः- अज्ञानाद् यदि वाधिपत्य रभसा दस्मत्परोक्षहता, सोतेयं प्रतिमुच्यतां शठ मरुत्पुत्रस्य हस्तेऽधुना। नोचेल्लक्ष्मण मुक्त मार्गण गणच्छेदोच्छलच्छाणित, च्छत्रच्छन्न दिगन्न मन्तकपुर पुत्र वृतो यास्यसि ।। 'हे शठ, यदि अज्ञान से अथवा राजा होने के गर्व से हमारे परोक्ष में मीता का तुमने हरण किया है तो अब उन्हें मुक्त कर दो। यह बात पान वायुपुत्र के हाथ में है। नहाँ ता लक्ष्मण क द्वारा छाड़े (१०१) गवे वाणों से छलछलाते रक्त के छन्नों में ढके हुए तुम पुत्रों के साथ नरक को जाओगे। रिस्सु कवि का यह पद्य इसके विपरीत है। स्नातु वाञ्छसि कि मुधैव धवल शोरोद फेनच्छटा, छाया हारिणि वारिणि घुसरितो डिंडोर विस्तारिणी। प्रास्ते से कलि काल कल्मष मषी 'प्रक्षालनकक्षमा, कीर्तिः संनिहितैव सप्तभुवन स्वच्छन्द मंदाकिनी ॥ 'क्षीर सागर को धवल फेन घटाओं के समान श्वेत, और दिगंत व्यापी गंगाजल में तुम व्यर्थ ही क्यों स्नान करना चाहते हो। कलिकाल के पापों की स्याहीधोने में अकेली ही समर्थ स्वच्छ मंदाकिनी तुम्हाली कीर्ति की है तो सही। ३८-इसके आदि और अन्त के भाग सर्वातिशायी हो तो उनके उत्कर्ष की कान्ति से छंद भी गौरव एवं उन्नति का लाभ करता है। जैसे कालिदास का यह पद्य.- गाहन्तां महिषा निपान सलिलं श्रृंगै मुहुस्ताडित छाया बद्ध कदंबक मृगकुलं रामन्थ मभ्य स्यतु । विसधैः क्रियता वराहपति भिर्मुस्ताक्षतिः पल्वले, विश्रान्तिं लभतामिदंच शिथिलज्या बद्ध मस्मद्धनुः ।। भैंसे सींगों से बार-बार टक्कर देते हुए जलाशयों में लोट लगावें, मृग छाया मे अँड बाधे जुगाली करें। सूअर विस्खभ से पोखरों में मोथा विगाड़े और यह धनुष भी ढोली प्रत्यंचा में विश्राम ले। ३६-आदि और अन्त में 'आ' न हो और अन्त में विसर्ग भी न हो तो इस छ ट का स्वरूप लुप्त सा हो जाता है। जैसे श्री यशोदा वर्मा का यह पद्य : यत्त्वत्र समान कान्ति सलिले मग्न तदिन्दीवरं, मेधै रन्तरितः प्रिये तव मुखच्छाया नुकारी शशी। ये पि त्वद्गमनानसारि गतयस्ते राज हंसा गताः, वत्सा दृश्य विनोद मात्रमपि मे दैवेन न क्षम्यते ॥ 'प्रिये तुम्हारे नेत्रों के समान काति वाला इन्दीवर पानी में डूब गया । तुम्हारे मुख की छाया का अनुकरण करने वाला चंद्रमा F - बादलों में ढक गया। तुम्हारे गमन का अनुसरण करने वाली गति के राज हंस भी चले गये। दैव यह भी सहन नहीं करता कि तुम्हारे सादृश्य मात्र से भा मैं विनोद करलू'. ४०-इस पद्य में रस सुकुमार है। उसकी रक्षा के लिये, उद्धत प्रकृति का छद प्रयुक्त हुआ है। कवि की परिपक्क वाणी हास छ द लधुबन गया है। ४१-यदि आदि में गुरू युक्त अक्षर हो तथा अन्त में विसों वाले पद हों और मध्य-मध्य में विराम रहे तो स्रग्धरा छद बहुत अच्छा लगता है। राजशेखर का यह पद्य उदाहरण है। तांबूली नद्ध मुग्धक्रमुक तरुलता प्रस्तरे सानुगाभिः, पाय पायं कलायी कृत कदलिदल नारि केली फलामः। सेव्यन्ता व्योमयात्रा श्रम जल जयिनः सैन्य सीमन्ति' नोभिः, दात्युह व्यूह केला कलित कुह कुहा राव क्रान्ता वनान्ताः ॥ 'सैनिको के साथ चलने वाली वनितायें पान की बेलो में बंधे हुए सुपारी के तर कुजों में पत्थरो पर केलों के पत्तों के पात्रों में नारियल का जल पी पीकर यात्रा की थकान के पसोनों को करने वाले एवं दात्युह पक्षियों के कुह कुहा शब्द से आक्रान्त बनान्तों का सेवन करें। चक्र कवि का यह पद्य इसके विपरीत है। सत्यं पाताल कुक्षिम्भरि चिर विल सहि करि प्रीणिताम्र, श्रीगर्भश्वमभ्र लिह लहरि हरिस्थान मप्येत्र किंचित । कल्पान्ते व्याप्त विश्वं परि रटति सरिनाथ पाथस्त्वदीय किन्त्वेतत् कुभ योनेः करकुहरदरी पूरमाचाम तो भूत् ।। 'यह सत्य है कि, समुद्र, तुम्हारा जल पाताल की कोखों को भर देता है। दिग्गज इसमे चिर काल तक विलास करते हैं। थह बादलो को तृप्त तथा लक्ष्मी को अपने उदर में लिये रहता है। यह विष्णु का स्थान है। इसकी लहरें आकाश को चाटती हैं। प्रलय के समय विश्वभर मे यह फैल जाता है। पर आचमन करते समय अगस्त्य की तो अजुलि में ही वह समा गया। ४२-आदि और अन्त में 'आ' अक्षर न रखने से सुग्धरा छद का दोष स्फुट हो जाता है फिर भी आदि अन्त में विसर्गान्त पद हैं तो कार्य चल जाता है। जैसे प्रकार का यह पद्य :- (१०४) शौर्यश्रीकेशपाश' करि दलन मिलन्मौक्तिक ब्यक्त पुष्पः, क्षोणी रक्षा भुजंगः कुल शिखार लुडत् कीर्ति निर्मोक पट्टः। शत्रु वात प्रताप प्रलय जलधर फार धारा कराल, प्रीत्यै लक्ष्मी कटाक्ष. कुवलय विजयी यस्य पाणौ कृपाणः॥ 'जिसके हाथ में कुबलयो और लक्ष्मी के कटाक्षो के समान सुन्दर कृपाण हाथियो का मस्तक फाड़ कर मोतियों के पुष्पो से युक्त हाकर शोर्य श्री का केशपाश बनती है, पृथ्वी की रक्षा करने वाली वीर है, पर्वतो पर लेटती हुई कीर्ति को पताका है तथा शत्रुओं के प्रताप का बुझाने के लिय अनेक बादलो का समूह है। ४३-इस प्रकार सूक्ष्मताः छन्दो का क्रम दिखाया गया है। समझदार लोग इसो दिशा स सब का विचार करले। १ ४४-४५-शालिनी के मध्य में कुछ अक्षर बढ़ा देने से वह मदाक्रांता हो जाता है । इसी प्रकार अन्त मे एक अक्षर बढ़ा देने से वंशस्थ छन्द उपेन्द्रबना बन जाता है। यह सब इसलिये नहीं दिखाया है कि यह तो स्वतः सिद्ध है । छन्दो को न जानने वाला इसे समझ नहीं पाता । जानकार के लिये इसका फिर उपयोग क्या ४६ -छन्द चर्चा के इन अत्यंत सूक्ष्म विचारो में वाणी के नाना गुणों से परिचित एवं दाषो की विविध सूक्ष्मताओं को भी समझने वाले योगियो के समान सूक्ष्म प्रतिभा के लोगो के लिये ऐसी बातें कहीं गई है जो उनको पहुँच के भीतर है।

(१०५)
तीसरा विन्यास
१-मोतियो के समान उचित स्थान पर रखे गये निर्दोष एवं
गुण युक्त छन्दो से प्रबंध की शोभा बढ़ जाती है।
२-वाणी का प्रसार चार प्रकार का होता है-शास्त्र, काव्य,
शानकाब्य तथा काव्य शास्त्र।
३-काव्यवेत्ता लोगो ने शास्त्र उसे बताया है जिसमें काव्य के
सब लक्षण विद्यमान हो । काव्य में विशिष्ट शब्द और अर्थ का
साहित्य रहता है तथा अलकार उसमें विद्यमान होते हैं।
४-शास्त्र काव्य मे प्रायः धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार वर्ग का
वर्णन और सबके लिये उपदेश रहता है। भट्टि तथा भौमक कवि का
रावणाजुनीय काव्य काव्यशास्त्र है
५--कुछ लोग केवल शास्त्र में भी काव्य तत्त्व का प्रयोग
करते है, जिस प्रकार कडुई औषधि के रस से उदग हो जाने पर ऊपर
से थोड़ा गुड़ या चीनी दे दी जाती है। जैसे वाग्भट ने वैद्यक शास्त्र
के इस पद्य में किया है
मधु मुखमिव सोत्पल प्रियायाः
कल रसना परिवादिनी प्रियेव ।
कुसुम चय मनोहरा च शय्या,
'किसलयिनी लतिकेव पुष्पिताम्रा ।।
'कमल पुष्प से युक्त मधु प्रिया के मुख जैसा एवं सुन्दर शब्द
करने वाली वीणा प्रिया के समान होती है। पुष्प चय से मनोहर
बनी शय्या नये पत्ते और पुष्पो से लदबदाई लता के समान हो
जाती हैं।'
६-शास्त्र शैली की रचना का अर्थ यत्नपूर्वक अनुष्टुप छन्द के
प्रयोग द्वारा सरल बनाना चाहिए जिससे वह सबके उपकार के
लिये स्पष्ट रूप से सेतु का कार्य करे।
-काव्य में रस और वर्णन के अनुसार सब छन्दों का प्रयोग
करना चाहिये और प्रतिपाद्य के विभाजन का भी कवि को ज्ञान होना
चाहिये।

के ( १०६) ८-शास्त्रकाव्य में अधिक लबे वृत्तों की आवश्यकता नहीं है। काव्यशास्त्र में भी काव्यज्ञ को रस के अधीन छन्दों का प्रयोग करना चाहिये। c-पुराण समान लिखे गये उपदेश प्रधान सरल शैली के काव्यो मे भी सब में अनुष्टुप छन्द का प्रयोग करना चाहिये। १०--प्रभु के समान सिद्धहस्त कवि के योग से अनेकों अत्यन्त अयोग्य छन्द भी योग्य बन जाते है। ११-महाभारत मे गायो को लेने के लिये विकट सग्राम हुआ तो उसमे समय विशेष के अनुसार जो घाड़े विराट पुत्र के थे वे ही फिर अर्जुन के बन गये थे। (इसी प्रकार छन्द भी योग्य कवि के प्रयोग से अयोग्य भी योग्य हो जाते है।) १२-फिर भी सज्जनों की नाति सुन्दर शब्द एव पदो से युक्त प्रबन्ध काव्य सौदये दशा के अनुरूप छन्दो से ही शोभा पाते है। १३ -अपने स्वेच्छाचार से रत्नी की भांति यदि वृत्तो का अनुचित प्रयोग हो तो वे गले मे पहनी मेखला के समान मूर्खता की ही सूचना करेंगे। १४-रमणीय नेत्रा वाली किनी नवयोवन संपन्न रमणी की रुचि चिरकाल से स्मर व्यापारी को छाडे हुए किसो ऐसे वृद्ध के प्रति नहीं होता है जिसके बाल बुढ़ापे से पक जाते है । १५-इसलिये छन्दो का यथास्थान विनियोग हो इस प्रयो- जन के लिये उदाहरणों से दिशानिर्देश करते हुये उनकी संगति इस अध्याय में दिखाई जाती है। १६-सगेबध के प्रारम्भ , जहाँ विस्तृत कथा का संक्षेप में निर्देश किया जाता है और जहाँ शान्त उपदेशों का वृत्तान्त होता है वहाँ कवि लोग अनुष्टुप छन्द को प्रशसा करते है। भतृ मेण्ठ कवि चे निम्न श्लोक में प्रारम्भ म यही किया है:- आसीद्द त्यो हयग्रीव. सुहृद् वेश्मसु यस्य ताः। प्रथयान्त बल बाह्वो. सितच्छत्रस्मिताः श्रियः॥ 'हृयग्रीव नाम का दैत्य था जिसके मित्रों के घरों में श्वेत छत्र के रूप में मुसकरावी लक्ष्मी उसकी भुजाओ के बल को फैलाती । (१०७) थी। कथा के सक्षेपतः निर्देश के अवसर पर जैसे-अभिनंद का यह पद्य- तस्या निज भुजोद्योग विजितारातिमएडलः। आखडल इव श्रीमान् राजा शुद्रक इत्यभूत् ॥ 'उसमें (नगरी में) अपनी भुजाओं के उद्योग से शत्रु मंडल को जीत ने वाला इन्द्र के समान श्रीमान् शूद्रक नाम का राजा हुआ।' शान्त उपदेश के समय जैसे। पृथुशास्त्र कथा कन्था रोमन्थेन वृथैव किम् अन्वेष्टव्यं प्रयत्नन तत्त्वज्ञ ज्योति रान्तरम् 'बड़े शास्त्र और कवाओ के समूह की व्यर्थ की जुगाली करने से क्या लाभ ? ज्ञानियो को यत्न पूर्वक अपनी आतरिक ज्योति की खोज करनी चाहिये ।' १७-श्रृंगार रस के आलंबन विभाव के रूप मे यदि किसी उदार नायिका का वर्णन हो या चमत्कार के साथ उसके अंग, स्वरूप वमन्नादि ऋतुओ का वर्णन हो तो उपजा ने छन्द का प्रयोग होना चाहिये । रूप वर्णन जैसे कालिदास का-- मध्येन सा वेदि विलग्न मध्या वलित्रय बभार आरोहणार्थ नवयौवनेन, कामस्य सोपान मिव प्रयुक्तम् ।। 'उस बाला पार्वती के मध्य भाग पर सुन्दर त्रिबली पड़ गई। नव यौवन ने कामदेव के चढ़ने के लिये मानो सीढ़ियाँ लगा दो। उसी का बसन्त वर्णन जैसे- बालेन्दु वक्ताण्य विकास भावाद् बभुः पलाशा न्यति लोहितानि । सद्यो वसन्तेन समागतानाम् नखक्षतानीव बनस्थली नाम् ॥ 'ढाक के फूल पूरे विकसित नहीं हुए थे श्रतः बाल चन्द्रमा की भाति टेढ़े वे अत्यधिक लाल वणे के ऐसे प्रतीत हुए मानो वसन्त के साथ नवीन समागम करने वाली बनस्थलियो को उसके नखक्षत लगे हैं। चारु बाला।

anupdate - १८ - चन्द्रोदय आदि उद्दीपन विभावों के वर्णन में रथोद्धता छंद तथा पांगुण्य प्रधान नीति के वर्णन में वंशस्थ छन्द शोभा पाता है। चन्द्रोदय के वर्णन मे जैसे कालिदास का यह पद्य- 'अगुलीभिरिव केशसंचयं सं नियम्य तिमिरं मरीचिभिः। कुद्मलीकृत सरोज लोचनम्, चुंबतीव रजनी मुखं शशी ।। 'उगलियों के समान किरणो से केश जैसे अन्धकार को सम्हालकर चंद्रमा सरोजरूपी नेत्रों को मूंदने वालो रजनी का मुख चूमता सा है। नीति जैसे भारविके पद्य में - श्रियःकुरूणामधिपस्य पालिनीम्। प्रजासु वृत्तं यमयुक्त वेदितुम् । स वाणिलिंगी विदितः समाययौ, युधिष्ठिर स्तवने बनेचर । 'कुरु प्रदेशो की श्री के स्वामी दुर्योधन की प्रजापालन की वृत्ति को जानने के लिये जिसे नियुक्त किया था वह ब्रह्मचारी वेष- धारी वनेचर सब कुछ जान कर द्वैतवन में युधिष्ठिर के पास आया।' १६ - वीर और रौद्ररस के संकर में बसन्त तिलका छन्द का प्रयोग होना चाहिये। सर्ग के अन्त में द्रुत ताल की भॉति मालिनी छ द ठीक रहता है। जैसे वीर रौद्र मे रत्नाकर का यह पद्यः- जुभा विकासित मुखं नख दर्पणान्त, राविष्कृत प्रतिमुर्ख गुरुरोषगर्भम्। रूपं पुनातु जनितारिचमू विमर्श, मुद्वृत्त दैत्यवध निर्वहणं हरेवः ।। भगवान नृसिह का वह रूप आपकी रक्षा करे जिसमें जंभाई लेने में मुँह चमकने लगता था और नख रूपी दर्पण में वही मुख प्रतिबिंबित होकर दूसरा मुख बन जाता था, जिसमें भयानक रोष छिपा हुआ था, शत्रुओं की सेना का जिमने विनाश किया था और उद्धत दैत्य का जिससे वध हुआ था।' - (१७) वर्ग के अन्त में मालिनी कालिदास ने प्रयुक्त की है- अवचित बलि पुष्पा वेदि, संमार्गदक्षा, नियम विधि जलानां वहिषां चोपनेत्री। गिरिश मुपचचार प्रत्यहं सा सुकेशी, नियमित परिखेदा तच्छिरश्चन्द्रपादैः॥ 'सुकेशी पार्वती शिवजी की सेवा करने लगी। वे बलि के लिए पुष्प चुनकर लाती थीं, वेदी को बुहारने में निपुणता प्रदर्शित करती थीं; नियमतः जल और कुशायें लाती थीं। यह सब करने में शिवजी के शिर के चन्द्रमा की किरणों से उनकी थकान कम हो जाती थी।' २०-युक्तिपूर्वक दो तथ्यो के परस्पर भेद दिखाने में शिखरिणी और उदारता के रुचिर औचित्य विचार में हरिणी छन्द ठीक रहते हैं। युक्ति संगत भेद के प्रदर्शन में शिखरिणी जैसे भर्तृहरि की: भवन्तो वेदान्त प्रणिहितधियामत्र गुरवो, विचित्रालापानां वयमपि कवीन मनुचराः। तथाप्येवं ब्रमो नहि परहितात् पुण्यमपरं, नचास्मिन् संसारे कुवलयदृशो रम्यपरम् ।। 'आप वेदान्त का ध्यान करने वालों के गुरु हैं। हम भी विचित्र आलाप करने वाले कवियों के सेवक हैं। फिर भी हम यह कहते हैं कि संसार में परोपकार से बढ़कर कोई दूसरा पुण्य नहीं है और कमलनयनियो से बढ़कर दूसरा कुछ सुन्दर नहीं है। उदारता के भाव में हरिणी का प्रयोग भी इन्हीं का जैसेः विवुल हृदय रन्यैः कैश्चिद् जगजनित पुरा, विधृत मपरैर्दत्तं चान्यै विजित्य तृणं यथा। इहहि भुवनान्यन्ये धाराश्चतुर्दश भुञ्जते, कतिपय पुरस्वाम्ये पुंसां क एष मदश्वरः ।। "कुछ उदार लोगों ने पहले संसार बनाया। कुछ ने इसको धारण किया और कुछ ने इसे जीतकर तिनके की भॉति दूसरों को दे डाला। यहाँ कुछ धीर लोग चौदहों भुवनों का भोग भी करते हैं। फिर कुछ थोड़े से नगरों के स्वामित्व पर लोगो को यह मद-ज्वर कैसा? २१-आक्षेप, क्रोध या धिक्कार के भावों को पृथ्वी छद संभालता है। वर्षा, प्रवास तथा अन्य प्रकार की विपत्ति के वर्णन में मंद्राक्राता छन्द अच्छा लगता है। जैसे आक्षेप में यशोवर्मा का पच- - यस्य । -- दशकंधरं कृतवतोपिकक्षान्तरे, गतः स्फुटमवन्ध्यतामधि पयोधि सान्ध्यो विधिः । तदात्मज इहांगदः प्रहित एष सौमित्रिणा, कसकस दशाननो ननु निवेद्यतां राक्षसः॥ 'दशकंधर को बगल में पकड़कर जिसे समुद्र पर संध्या करने में किसी प्रकार की बाधा नहीं उपस्थित हुई उसी का पुत्र अंगद लक्ष्मण का भेजा हुआ यहाँ आया है। वह दशानन कहाँ है ? उस राक्षस को यह समाचार दे दो। वर्षा प्रवास में मंदाक्राता का प्रयोग जैसे का लदास का यह पद्य-- तस्मिन्नद्रौ कांत चिदबला विप्रयुक्त. सकामी, नीत्वा मासान् कनक वलय भ्रश रिक्त प्रकोष्ठः। आषाढस्य प्रथम दिवसे मेघ माश्लिष्ट सानु, वप्रक्रीडा परिणत गज प्रेक्षणीयं ददर्श ।। 'प्रिया से वियुक्त बने कामी यक्ष का पहुँचा सुवर्ण वलय के गिर जाने से रीता हो गया था। उसने वहाँ पर्वत पर कुछ मास बिताये : जब आषाढ' का पहला दिन आया तो उसने पर्वत शिखरो का आश्लेष करते हुये, दन्त प्रहार की क्रोड़ा में लगे हाथी की भांति दिखाई पड़ने वाले बादल को देखा।' २२ -राजाओं के शौर्य आदि की प्रशंसा मे शार्दूल विक्रीडित और वेगसहित पवन आदि के वर्णन में स्रग्धरा छन्द उचित लगता है। शौर्य स्तुति में श्री चक्र का यह पद्य- नेतुनौभिरिमा न यान्ति इतिभिस्तार्याः कियन्तों हयास्, तज्जानुद्वयसेन देव पयसासैन्यं समुत्तार्यताम् । नांचे गभय द्रु तारि वनिता नेत्र प्रणाली लुठद्, वाष्पाम्भ प्लव पूरितो भय तटी द्रागवत्स्यतीरावती ।। 'हे देव, हाथी नावों से नहीं ले जाये जा सकते । घोड़े भी मशक की नावो से कितने उतर सकेगे। इसलिये सना को शीघ्र तब तक पार कर दीजिए जब तक पानी घुटनो तक है। नहीं तो विनाश के भय से भागते हुये शत्रुओ की वनिताओं के नेत्र जल की नाली के जल से इरावती नदी शीघ्र ही इतनी भर जायगी कि इसके दोनो तट जल में डूबने लगेगे। आवेग के साथ पवन के वर्णन में प्रथकार की पवन पंचा- शिका का यह पथ- -- - (१११) खच्छंखाभिघात स्फुट दखिल चलच्छुक्ति निमुक्त मुक्ता, मुक्त व्यक्ताहासाः स्मर नृप सकल द्वीप संचार चाराः। सर्पकर पूर प्रवणक रचिता दिग्वधू कर्णपूरा, धावन्त्या ध्मात विश्वा रतविधुतवधू वान्यवा गधवाहाः ॥ 'रति खिन्न वधुओं के उपकार करने वाले पवन बह रहे हैं। चलने हुए शंखो के आधात से सीपियाँ खुल जाती हैं और मोती बाहर गिर पड़ते है। इनका व्यक्त अट्टहास मुक्त हैं और कामदेव के सब द्वीपो में इनका सचार है। ये सरकते हुए कपूर के ढेर को लिये हैं और दिग्वधुओ के कर्ण पूर जैस बन जाते है। समस्तविश्व को इन्होंने भर दिया है। २३-मुक्तक स्वभाव के सूक्तों में दोधक, तोटक और नर्कुट छंद का प्रयोग अच्छा लगता है। उनके विनियोग में विषय अथवा अन्य किसी प्रकार के नियम का प्रतिबन्ध नहीं है। २४-और दूसरे छद् जिनका उल्लेख यहाँ नहीं हुआ है वे भी चमत्कार मात्र क साधन है। किसी विशेष विषय का प्रतिबन्ध उन क साथ नहीं है। इसी लिये वे यहाँ नहीं दिखाये गये हैं। २५-वाणी जिनके वश में है और सब छन्दों पर जिनका समान अधिकार है उनके लिये यहाँ छन्दो का विशेष प्रकार का विनियोग और विभाग दिखाया गया है। २६-जिन कवियो ने एक या दो तीन छन्दो में ही परिश्रम किया है उनके लिये ये विनियोग नहीं हैं। वे तो उत्सव में दरिद्रों की भांति के लोग है। २७-कावे को अभ्यास से जिस छन्द में विशेष प्रगल्भता प्राप्त हो जाय उसे चाहिये कि वह अपने प्रबन्ध में उसी छन्द का विशेष प्रयोग करे। २८-पहले कवियो भाभः किसी एक छन्द के प्रति विशेष आदर दिखाई पड़ता है। उनका उस छन्द विशेष में तो बड़ा चमत्कार रहता है शेष में केवल प्रारंभ किये की पूर्ति रहती है। V२६-अभिनंद कवि की वाणी अनुष्टुप छन्द में अधिक अभ्यस्त है। वही छन्द विद्याधर के मुख में तो जादू की गोली का सा प्रभाव देने वाला बन जाता है।' ३०-पाणिनि कांव की प्रशंसा उपजाति छन्दों से अधिक हुई है जैसे चमकते पुष्पो से उद्यान की प्रशसा होती है ।

*.३और सब छन्दों में श्रेष्ठ है। इसका चमत्कार विचित्र है। इसने अपनी छाया से भारवि की प्रतिभा को बहुत बढ़ा दिया। ३२-रत्नाकर कवि के मुख रूपी कान मे जो बाग्वल्ली है वह वसन्ततिलका छन्द रूपी बसन्त के तिलक वृक्ष पर आरूढ और उसका गाढ आलिंगन किये हुए है तभी उस पर चमत्कार की कलियाँ खिल उठी है। ३३-भवभूति की वाणी की निबंध सरिता शिखरणी छन्द के शिखर से प्रकट होती है। उनके घने संदर्भ में वह छन्द सुन्दर मयूरी की भाँति नाचता सा लगता है। ३४-कालिदास के वश में आकर मंद्राकाता बड़े बड़े भाव व्यक्त करती है। जिस प्रकार अच्छे प्रकार के अश्वाशक्षक के हाथ में आकर कबोज (अफगानिस्तान) देश की घोड़ी रंगत दिखाती है। ३५-राजशेखर की ख्याति शार्दूल विक्रीडित छन्द से हुई है जैसे कोई प्रर्वत अपने टेढ़े मेड़े शिखरो से ऊँचा हो जाता है। -14-इस प्रकार पुराने कवियों की गति यद्यपि सभी छन्दों में समान थी फिर भी वे हार मे चौके समान किसी विशेष छन्द में अधिक आदरवान रहे हैं ३७-सुवर्ण से बने हारों के समान अच्छे वर्णनो से युक्त प्रबन्धों में रत्नो की भांति छन्दो का यदि यथास्थान उचित प्रयोग होता है तो उसकी शोभा बहुत बढ़ जाती है। ३८-जिस प्रकार से छन्द स्थापना का यह विनियोग-मार्ग दिखाया है उसी प्रकार कवियों को प्रयोग करना चाहिये। लेकिन जिनका वाणी पर पूरा वश नहीं है उनके लिए यह नियम नहीं। ३६-इस प्रकार मैंने जो कहा है वह बुभूषु कवियों के लिये प्रारम्भ में बड़ा उपयोगी है। वाणी मे जिनकी प्रवृत्ति खुल गयी है उनको इससे विवेक मिलेगा। महाकवियों को भी यह सुक्ष्म तत्त्व- विचार हर्ष प्रदान करने वाला होगा। ४०-इस प्रकार क्षेमेन्द्र ने मित्रों को विपत्तियों को हटाने वाले, आश्चर्यजनक कार्यों के कर्ता, भुवन विजयो -राजा अनन्तराज के राज्य में अपनी शक्ति के कारण वाणी के क्षेत्र में प्रसिद्ध कवियों का संग्रह कर उन छन्दो को प्रदर्शित किया है जो औचित्यपूर्ण रचनाओ में प्रसिद्ध हैं और कर्ण-मधुर हैं।

Aachaarya Kshemendra

Author
M Gaur
Title
Aachaarya Kshemendra
File name
Aachaarya Kshemendra
Text
OCR done
Published
2005/12/31
Publisher
Bharat Prakashan Mandir, Aligarh
Language
Sanskrit
Pages
195
Library
Allahabad University, Allahabad
Classification
Language.linguistics.literature
DLI number
487435
Barcode
5990010098041.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
sIEKG3vb0Jo
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