Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Nav Tatv Prakaran
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नवतत्त्व प्रकरण.
गाथा मृल सलग श्रीलाइन पैका टाइपयी
गाथाओना तुटा शब्दोना अर्य, गाथा
मूल, शब्दार्थ गो तश विस्तारार्य
तथा नवतचना तुटा वोल
आरचि चीजी.
उपावी प्रसिध्द करनार,
श्रीआद्य जैन धर्म प्रवर्तक सन्ना
पांजरापोल अमदावाद
अमदावाद-सक्ष्मी मिटींग मेसमा
शा मणीलाल नगरचदे ठगप्यु
सवत १९६७
सने १५२१
किमत आव आना.
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अथ श्रीनवतत्त्वप्रकरणप्रारंभः। .. जीवाऽजीवा पुण्णं, पावाऽसव संवरो य निजरणा बंधो मुख्खो य तहा, नव तत्ता हुंति नायवा ॥१॥ चउदस चउदस बाया, लीसा बासीय हुंति बायाला॥ सत्तावन्नं वारस, चउ नव भेया कमेणेसिं ॥२॥ एगविह दुविह तिविहा, चउबिहा पंच छबिहा जीवा।। रूप
-
Relan
चेयण तस इयरेहि,
चेय गई करण काएहिं ॥३
एगिदिय सुहमियरा,
सनियर पणिदियायसविति
अपजत्ता पज्जत्ता,
क्रमेण चउदस जियहाणा..॥
नाणं च दंसणं चेव,.
चरित्तं च तवो तहा॥
वीरियं उवओगोय,
एयं जीवस्स लख्खणं ॥५
आहार सरीरदेिय,
पूजत्ती आण पाण भास मणे
H
प (३३) BFHORN F " द ६. ratna उ पंच पंच छप्पिय; ग विगला सन्नि सनीणं ॥६॥ आणिंदिय त्तिबलूसा, 'पाऊ दस पीण चउछ सग अठ्ठ इग दुति चउरिंदीणं, असन्नि सन्नीण नव दस य॥७॥ इति जीवतत्त्वम् ॥ धम्मा ऽधम्मा ऽगासा, तिय तिय भेया तहेव अद्धाय॥ बंधा देस पएमा, A परमाणु अजीव चउदसहावा धम्माऽधम्मा पुग्गल, (४.) । नह कालो पंच हुँति अज्जीवा चलणंसहावो धम्मो, थिरसंठाणो अहम्मो य ॥ ९ अवगाहो आगासं, पुग्गल जीवाण पुग्गला चउहा खंधा देस पएसा, परमाणू चेव नायव्वा ॥१०॥ सबंधयार उज्जोय, पभा छाया तवेहि आ॥ वण्ण गंध रसा फासा, पुग्गलाणं तु लख्खणं ॥११॥ एगाकोडि सतसहि, लख्खा सत्तहुत्तरी सहस्सा य॥ दोयसया सोलहिया. आवलिया इगमुहुत्तम्मि॥१२॥ समयाऽवली मुहुत्ता, दीहा पख्खा यमास बरिसा य॥ मणिओ पलिआ सागर, उस्सप्पिणीसप्पिणीकालो॥१३ परिणामि जीव मुत्ता, सपएसा एग खित्त किरिआय। निचं कारण कत्ता, सबगय मियर अप्पवेसे ॥१४॥ ॥ इत्यजीवतत्त्वम्॥
ग
सा उच्चगोय मणु दुग,
सुर दुग पंचिंदिजाइ पणदेहा॥
आइ ति तणू णुवंगा,
आइम संघयण संठाणा ॥१५॥
वण्णचउक्का गुरु लहु,
परघा ऊसास आय वुज्जोयं ॥
सुभखगइ निमिण तस दस,
सुर नर तिरियाउ तित्थय॥१६॥
तस वायर पज्जतं,
पत्तेयथिरं सुभं च सुभगं च ॥
सुस्सर आइज्ज जसं,
तसाइ दसगं इमं होइ ॥१७॥
॥ इति पुण्यतत्त्वम् ॥ नाणंतराय दसगं, नवबीये नीय साय मिच्छत्तं॥ थावर दसनिरयतिगं, कसाय पणवीसतिरियदुग॥१८॥ इग बि ति चउ जाइओ, कुखगइ उवधाय हुंति पावस्स॥ अपसत्थं वण्ण चऊ, अपढम संघयण संठाणा ॥१९॥ थावर सुहुम अपज, साहारण मथिर मसुभदुभगाणि दुस्सर णाइज्ज जसं, थावरदसगं विवजत्थं ॥२०॥ ॥ इति पापतत्त्वम्॥ इंदिअ कसाय अवय, जोगा पंच चउ पंच तिनिकमा॥ किरिआओ पणवीसं, इमाउ ताओ अणुक्कमसो॥२१॥ काइय अहिगरणीआ, , पाउसिआपारितावणीकिरिया। पाणाइवायारंभिअ, परिग्गहिया मायवत्तीअ॥२२॥ मिच्छा दंसण वत्ती, अपञ्चखाणाय दिठ्ठि पुटिअ॥ .
पाइच्चिअ सामंतो. वणीअ नेसत्थि साहत्थी ॥२३॥ आणवणि विआरणिआ, अणभोगाअणवकंखपञ्चइआ अन्नापओग समुदा, णपिज्जादोसेरिआवहिआ॥२४॥ ॥ इत्याश्रवतन्त्वम् ॥ समिई गुत्ति परीसह, जइधम्मो भावणा चरित्ताणि ॥ पण ति दुवीस दस बार, स पंचभेएहिं सगवन्ना ॥२५॥ इरिया भासे सणा दाणे, H (१०) उच्चारे समिई सुअ॥ मणगुत्ति वयगुत्ति, कायगुत्ति तहेव य ॥२६॥ खुहा पिवासा सी उण्हं, दंसा चेला रइ थिओ॥ चरिआ निसिहिया सिज्जा, अकोस वह जायणा ॥२७॥ अलाभ रोग तण फासा, मल सकार परीसहा॥ पन्नाअन्नाण सम्मत्तं, इअ बावीस परीसहा ॥२८॥ खंती मदव अज्जव, (११) मुत्ती तव संजमे अ बोधवे॥ सच्चं सोअं आकिं, चणं च बंभं च जइधम्मो॥२९॥ पढम मणिच मसरणं, संसारो एगया य अन्नत्तं ॥ असुइत्तं आसव सं, वरोअतह निज्जरा नवमी॥३०॥ लोगसहावो वोही, दुल्लहा धम्मस्स साहगा अरिहा।। एआओ भावणाओ, भावे अबा पयत्तेणं ॥३१॥ सामाइ अत्थ पढम, (१०) H उच्चारे समिई सुअ॥ मणगुत्ति वयगुत्ति, कायगुत्ति तहेव य ॥२६॥ खुहा पिवासा सी उण्ह, दंसा चेला रइ थिओ॥ चरिआ निसिहिया सिज्जा, अक्कोस वह जायणा ॥२७॥ अलाभ रोग तण फासा, मल सकार परीसहा ॥ पन्नाअन्नाण सम्मत्तं, इअ बावीस परीसहा ॥२८॥ खंती मदव अज्जव, (११) । मुत्ती तव संजमे अबोधवे॥ सच्चं सोअं आकिं, चणं च बंभं च जइधम्मो॥२९॥ पढम मणिच्च मसरणं, संसारो एगया य अन्नत्तं ॥ असुइत्तं आसव सं, वरो अतह निज्जरा नवमी॥३०॥ लोगसहावो बोही, दुल्लहा धम्मस्स साहगा अरिहा॥ एआओ भावणाओ, भावे अबा पयत्तेणं ॥३१॥ सामाइ अत्थ पढम, ܕ ܀ (१२) 4 छेओवड़ावणं भवेबी॥ परिहारविसुद्धीयं, सुहुमं तह संपरायं च ॥३२॥ तत्तोअ अहख्खायं, खायं सम्मि जीवलोगम्मि॥ जं चरिऊण सुविहिआ. वञ्चंति अयरामरं ठाणं ॥३३॥ ॥इति संवरतत्त्वं ॥ अणसण मूणोयरिआ, वित्तीसंखेवणं रसच्चाओ॥ काय किलेसो संली, णआयवज्झातवो होइ ॥३४॥ .
" (१३) पायच्छत्तं विणओ, वेयावचं तहेव सज्झाओ॥ झाणं उस्सग्गो विअ, अम्भितरओ तवो होई ॥३५॥ बारसविहं तवो नि, ज्जराय बंधो चउविगप्पो अ॥ पयई ठिइ अणुभाग, पएस भेएहिं नायबो ॥३६॥ ॥ इति निर्जरातत्त्वम् ॥ पयइ सहावोवुत्तो, ठिई कालावहारणं ॥ अणुभागो रसो नेओ (१४ 2. M पएसो दलसंचओ ॥३७॥ पड पडिहार सि मज्ज, हड़चित्तकुलाल भंडगारीणं॥ जह ए एसिंभावा, कम्माणविज्जाण तहभावा।३८॥ इह नाण देसणावर, ण वेय मोहाउ नाम गोआणि॥ विग्धं च पण नव दु अ, वीसचउतिसयदुपणविहं ।३९। नाणे य दंसणावरणे, वेअणिए चेव अंतराएअ,॥ तीसं कोडाकोडी, - (१५) अयराणं ठिईय उक्कोसा ॥४॥ सित्तरि कोडाकोडी, मोहणिए वीस नाम गोएसु ॥ तित्तीसं अयराई, आउछिइ बंध उक्कोसा ॥४१॥ बारस मुहुत्त जहन्ना, वेयणिए अठ नाम गोएसु ॥ सेसाणंतमुहुत्तं, एयं बंध ठिई माणं ॥४२॥ ॥इति बंधतत्त्वं ॥ संतपय परूवणया, .." दुवपमाणं च खित्तफुसणाय ॥
कालो अ अंतरं भाग, भावेअप्पा बहु चेव ॥४३॥ संत्तं सुद्ध पयत्ता, विज्जत्तं खकुसुमं व न असंत। मुख्खत्ति पयं तस्सउ, परूवणा मग्गणाईहिं॥४४॥ गइ इंदीए काये, जोए वेए कसाय नाणे य॥ संजम दंसण लेसा, भव सम्मे सन्नि आहारे ॥४५॥ नरगइ पणिंदि तसभव, सनिअहख्खाय खइअसम्मत्ते॥
4 (१७) मुख्खोणाहार केवल, दसण नाणे न सेसेसु ॥४६॥ दडपमाणे सिद्धा, णं जीव दवाणि हुंति गंताणि ॥ लोगस्स असंखिज्जे. भागे इको य सवे वि ॥४७॥ फुसणा अहिआ कालो. इगसिद्ध पडुच्च साइओणंतो॥ पडिवाया भावाओ, सिद्धाणं अंतरं नत्थि ॥४८॥ सब जियाण मणते, भागे तेतेसिं दसणं नाणं॥ to (१७) खइए भावे परिणा, मि एअ पुण होइ जीवत्त॥४९॥ थोवा नपुंस सिद्धा, थी नर सिद्धा कमेण संखगुणा।। इअ मुख्ख तत्तमेअं, नव तत्तालेसओ भणिआ॥५०॥ जीवाइ नव पयत्थे, जो जाणइ तस्स होइ सम्मत्तं। भावेण सदहंतो, अयाणमाणेवि सम्मत्तं ॥५१॥ सवाई जिणेसर भा, सिआइं वयणाई ननहा हुंति॥
इअबुद्धी जस्स मणे, सम्मत्तं निचलं तस्स ॥५२॥ अंतो मुहुत्त मित्तं, पि फासिअं हुज्ज जेहिं सम्मत्त। तेसिं अवडुपुग्गल, परिअट्टो चेव संसारो॥५३॥ उस्सप्पिणी अणंता, पुग्गल परिअट्टओ मुणेअशो॥ तेणंताती अद्धा, अणागयद्धा अणंतगुणा.॥५४॥ जिण अजिण तित्थ तित्था, गिहिअन्नसलिंगथी नरनपुंसा॥
(२०) पत्तेअ सयंबुद्धा, बुद्धवोहि कणिकाय ॥५५॥ जिणसिद्धा अरिहंता, अजिण सिद्धाय पुंडरिया पमुहा गणहारि तित्थसिद्धा, अतित्थसिद्धाय मरुदेवी॥५६॥ गिहिलिंग सिद्ध भरहो, वलकलचीरीय अन्न लिंगम्मि॥ साहू सलिंग सिद्धा, थी सिद्धा चंदणा पमुहा ॥५७॥ पुंसिद्धा गोयमाई, गांगेयाई नपुंसया सिद्धा॥ - (१) पत्तेय सयंबुद्धा, भणिया करकंडु कविलाई॥५८॥ तह बुद्धबोहिगुरुबो, हिया इग समय एग सिद्धा य॥ इग समएवि अणेगा, सिद्धा ते णेगसिद्धाय ॥५९॥ जइआइ होइ पुच्छा, जिणाण मग्गंमि उत्तरं तइया॥ इक्कस निग्गोयस्स, अणंत भागो य सिद्धिगओ॥६॥ इति मोक्षतत्त्वं ॥ इति श्री नवतत्त्वं समाप्तं ॥ --
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॥ अथ नवतत्त्व प्रकरण.॥ गाथा १ लीना तूटा शब्दना अर्थ. जीराम्जीवतत्त्व. बंधो-यावर अजीवाजीरतत्व. मुरको मोदतत्त्व पुएण-पुन्यतच तहान्तमज. पाव-पापतव नवतत्ता-नवतत्वो. पासर-मारतच सबरोन्सारतत्व नायव्या-जाणवा योग्य निकरणा-निर्जरातच जीवाऽजीवा पुरस, पावाऽसव संवरोय निकार- णा ।। बंधो मुरको य तहा, नवतत्ता हुँति ना- यवा॥१॥ शब्दार्थ:-जीव, अनीव, पुण्य, पाप, आश्रा मंवर अन नि. जरा वली वध तमन मोह ए नवतची जाण्या योग्य विस्तारार्थ.-व्यवहारनये करी जे अन्नाशुन्न कर्मोनो कर्ती, हत्ती तथा नोक्ता ठे, अने निश्चय नये करें
झान, दर्शन, तथा चारित्ररूप निज गुणोनोज कती
तथा नोक्ता ठे, अथवा सुख मुख ज्ञानोपयोग लक्ष
एंवत चेतना सहित होय, तथा प्राण धारण करे,
तेने प्रथम (जीवा) जीवतत्व कहिये तेथो विपरीत
जे चेतना रहित जम स्पन्नाववालो होय तेने वीजु
(अजीवा) अजीवतत्व कहिये जेणे करी शुन्न
कॉना पुद्गलोनो संचय थवाथी मुस उत्पन्न थाय
ठे तेने त्रोजु (पुएण) पुएयतत्व कहिये तेथी विप
रीत जेणे करी अशुल कर्मोना पुढगलोनो संचय
थवाथी उख उत्पन्न थाय ठे, तेने चोथु ( पावा)
पापतत्व कहिये जेणे करी ना कर्म वधाय तेने
(पासव) आश्रवतस्त्र कहिये, जेथी आवता कर्म
रोकाय तेने पाचमु (सबरो) सवरतत्व कहिये, जेधी
देश की कोनो क्षय थाय ठे तेने (निकरणा)
निर्जरा तत्व कहीये, नवा कोनी साथे जुना कर्मोनु
मलो जq तेने (ववो) वधतत्व कहिये, अने जे आत्म
प्रदेशथकी सर्वथा कोनो क्षय थयो नेने (मुरको)
मोक्षतत्व कहिये, जैम ए नवत व सिद्धांतोने विपे, कहेला ले (तहा) तेमज समकितदृष्टि जीवोने था (नवतत्ता) नवतत्वो (नायव्या) जाणवा योग्य (हुति) के. आ नवतत्वोमां जीव अने अजीव ए चे तव मात्र जाणवा योग्य , पुण्य, सवर, निर्जी- रा अने मोद ए चार तत्व ग्रहण करवा योग्य वे; अने पाप, आश्रव ने वध एत्रण तत्व तो मात्र स बथा सर्वने त्याग करवा योग्यज ॥१॥ गाथा जीना चन्दस-चौद चउम्चार वायालीमाबंतालीस. नव-नव. दासीच्यामी. कमेणेसिम्यनुकमे करी. वायाला तालीस नेयाम्नेटो मत्तावन्नसत्तापन. हुतियाय वे. वारसम्बार चउदस चन्दस वाया, लीसा वासोअ हुँति बायाला ॥ सत्तावन्नं वारसं, चन नव नेत्रा कमेणेसिं॥३॥ वटा राब्दना अर्थ
(४)
शब्दार्थ-पहेला तत्वना चौद, धीमाना चौट, त्रीमाना वैता-
सीप्स, चोथाना ब्यासो, अने पाचमाना तालीस, नाना
सचावन, सातमाना वार, आठमाना चार अने नवमाना नव
एवा नुक्रमे करीने लेदो थाय रे ॥२॥
विस्तारार्थ-प्रथम जीवतत्वना(चनदस) चौद, बीजा
अजीव तत्वना (चनदस)चेंदि, त्रीजा पुण्यतत्वना
(वायालीसा)वेतालीस, चोथापापतत्वना (वासी)
व्यासी,पाचमा आश्रवतत्वना (वायाला) तालीस,
व्हासवरतत्वना (वारस)वार, आठमा वधतत्वना
(च) चार, अने नवमा मोदतत्वना (नव) नव
एक रीते नगेना (कमेणेसि) अनुक्रमे करी (नेया
नेद (हुति) थाय ले था प्रमाणे सर्व मली नवत-
सना जेदनी सस्या बसेंने ठोतेर थाय ने तेमां
अव्यासी नेट अरूपी ठे अने एकसो अग्यासी
नेद रुपी वे ॥२॥
0 . D 0 0 (५ आ नव तत्वोना नेदनों कोगे. अंक नाम रुपिनेद. अरुपिनेद. देय ज्ञेयादि. २ जीव १४ शेय. २ अजीव ४ डोय. ३ पुण्य ४२ उपादेय. प पाप जए हेय च्याश्रव. ४१ हेय. ६ संवर. उपादेय. आ निर्जरा १२ उपादेय. वध ४ हेय, ए मोक्ष जपादेय. गाथा ३ जीना नृटा शब्दना श्रर्थ. गविह एक विध चयण-चेतना विविविध तसम्स निविहात्रिविर श्यगेदि-इतर (स्थावर) चन्विहा चतुर्विध. पेयम्वद. पचपच (विध) गश्गति. बिहा-पद्विर करण-इश्यिो. जीरानीपतत्त्व काएहिम्काये करीने 0 . . - (६) एगविह विद तिविहा, वनविहा पंच वि- हा जीवा ॥ चेयण तस इयरेदि, वेय गई क- रण काएहि ॥३॥ शदार्थ:-चेतना, स अने स्थावर र भेटोए करीने, वली प्रण वेद, चार गनि, पाच ऽश्यि अने उ काये करीने जीवो, एक प्रकारना, मकारना, त्रण भकारना, चार प्रकारना, पाच चे मकारना, अने उ मकारना जाणवा. ॥ ३ ॥ विस्तारार्थ -(एगरिह) एकाध, (सुविह) द्विविध, (तिविहा) त्रिविध, (चनबिहा) चतुर्विध, (पच) पंचविध, (अविहा) पविध एटले उ प्रकारे ( जीरा ) जीवतत्व वे सर्व जीवने श्रुताननो अनतमो नाग उघामो रहेवाथी तेले (चेयण चेतना लक्षणवान ते माटे एकविध जाणवु (तस) स एटले जेनामा हालवा चालवानी शक्ति के, थने ( इयरेहि ) इतर एटले (स्थावर) एटले जे स्थिरतावान होय ते एम सर्व जीव विविध जा- रणग (वेय ) वेद त्रण स्त्रिवेद, पुरुषवेद अने नपुसकवेद एम स जी विविध जाणवा (ग) " गति चार वे देवगति, मनुष्यगति, तिर्यचगति अने नरकंगति एम सर्व जीव चतुर्विध जाणवा (क- रण) जियो पांच ठे एकेजि, वेजि, तेद्रि, चन रिडि अने पचिद्रि एम सर्व जीव पंचविध जाणवा अने (काएहि) काय ठ ठे-पृश्चिकाय, अप्काय, तेउकाय, वाकाय वनस्पतिकाय अने त्रसकाय. एम सर्व जीव पविध जाणवा ॥३॥ गाथा ४ योना वटा शब्दना अर्थ एगिदिय=एट्रि तिम्तेहि गृहमन्दम चन-चरिदि. इयरा-नर (सार) मन्निसहि अपनत्ता-अपर्याप्ता पज्जता पर्याप्ता. इयरम्नर (अंसदि) पणिदिया पचिंडिय. कमेण अनुक्रमे. मम्-अहित. सारे चन्दसचाँद पिन्वेदि जियठाणा-जीवना स्थानक एगिदिय सुदुमियरा, सन्नियर पणिदिआय सविति च ॥ अपजत्ता पजाता, कमेण चनदस जियगणा ॥४॥ - शब्दार्थ:-सूक्ष्म अने बादर एवा एकेश्यि. बादर वेश्य, तेइ- यि अने चरिश्यि, सो अने अमझी पचिंश्यि ए सात जेद पर्याप्ता अने अपर्याप्ता जेथी अनुक्मे जीवना चौद नेद होय. विस्तारार्थ -(एगिदिय) एकेद्रिना (सुहुम) सुक्ष्म अने (इयरा) इतर एटले वादर एवा घे नेद ठे तेमा सुक्ष्म एटले जे चौद राजलोकमा व्यापी रह्या ठे, पर्वत प्रमुखने नेटीने जाय आवे कोश वस्तुथी वेदाय नेदाय नहि, अग्नि जेने वाळी शके नहि, चर्मदृष्टिए देखाय नहि, मनुष्यादिक कोश प्राणीना उपयोगमा आवे नहि एवा अदृश्य अने निरतिशयी सूक्ष्म नाम कर्मोदयवतने सूक्ष्म कहे ठे अने वादर एटले जे नियतस्थान वर्ती ठे, परतु को वस्तुने नेटी शके नहि, पण जेनो नेदतथा ठेद वीजी वस्तुथी या शके, जेने अग्नि वाळी शके, चर्मदृष्टिनो विषय थऽ शके, जे मनुप्यादिक सर्व प्राणीना उपयोगमा श्रावी शके एवा दृश्य अने सातिशयी वादर नाम कर्मोदयवतने वादर कहे वे अने (पणिदिया) पचिंहिना (सन्नि) (ए) संझी एटले मन संज्ञा सहित अने वीजा (इयर) श्तर एटले असंझी एटले मन संझा रहित एवा बेनेद ठे (स) तेनी साये (वि) वेजिय (ति) तेजिय (चन) चरिजिय ए दरेकनोथ केको नेद मेळवता सात नेद थाय. अने तेमने (पजत्ता) पर्याप्ता अने (अपजत्ता) अपर्याप्ता ग पतां (कमेण) अनुक्रमे करी (जोयगणा) जी वनां स्थानक (चनदस) चौद थाय. वली वीजा मत प्रमाणे जीवना वत्रीस नेद पण थाय ते. ते श्रा नीचेनी गाया उपरथी समजी लेवा. पण थावर सुदुमियरा, परित्तवण सन्नि अ- सन्नि विगलतिगं ॥ इय सोलस पजत्ता अ- पजत्ता जीव वत्तीसं. ॥१॥ अर्थ.-पांच सूक्ष्म स्थावर, पांच वादर स्थावर, प्र त्येक वनस्पतिकाय, सज्ञी पंचिंडि,असंझी पचिंत्री अने विकलत्रिक ए सोलनेदने पर्यातायने थपर्या , साए गणतां जीवना वनीस नेद याय.॥
- तवो तप (२०) गाथा ५ मीना छूटा शब्दोना अर्थ नागान वीरियन्धीर्य. दसण-दर्शन नवोगो उपयोग. चैव-निश्चे चरिक्त चारित्र एअ= ए, आ जीवस्म-जीवन- तहान्तेमन लरकण-सदण. नाणं च दंस चेव, चरितं च तवो तदा ॥वी रियं जवनगोय, एअ जोवस्म लकणं ॥५॥ शब्दार्थ-शान, दर्शन, चारिन अन तप तेमज वीर्य अने उप योग ए प्रकारे जीवन सदण ठे ॥५॥ विस्तारार्थ-(नाण) ज्ञान पाच प्रकारे ठे मति, श्रुत, अवधि, मन पर्यव अने केवल ए पाच ज्ञान समकितवतने कह्या वे अने मति अज्ञान, श्रुत अज्ञान तथा विजगज्ञान ए त्रण अज्ञान मिथ्या खोने कह्या वे ए वेज मळीने आपनी सरया थाय ठे, तेमानु गमे ते एक अथवा अधिक ज्ञान जेमा होय, (च) वली (दसण) दर्शन ते चार प्रकारे ठे चक्षु, अचा, अवधि अने केवल ए चार प्रकारना दर्शनमांनु गमे ते एक अथवा अधिक "
जेमां होय, (चे) निश्चे (चरितं) चारित्र ते
सात प्रकारे वे सामायिक, दोपस्थापनीय, परि
हार विशुद्धि, सूद्मसपराय, यथास्यात, देशविर
ति तथा आवरति ए सात प्रकारना चारित्रमानु
गमे ते एक अथवा वधारे चारित्र जेमां होय, तथा
(तवो) तप वे प्रकारे ठे-एक अव्यथी ते अणश
णादि अने वीजु श्वानिरोवरूप नावथो एमानु
एक अथवा अधिक तप जेमा होय (तहा) तेम
ज (वीरिय) करण तथा लब्धिरूप अथवा बल
पराक्रमरुप ए वे प्रकारना वीर्यमांनु गमे ते एक
श्रथवा वधारे जेमा होय तथा (अवयोगो) उप
योग वार प्रकार वे-पाच ज्ञान, त्रण अज्ञान तथा
चार दर्शन, ए चार प्रकारना साकार तथा निरा
काररूप उपयोगमांनो गमे ते एक अथवा वधारे
उपयोग जेमा होय तेने ससारी अथवा सिद्ध जीव
कहिये आ गुण जोव बिना वीजा कोश्मा होय
नहि (एअ) ए प्रकारे (जीयस्स) जीवनु
3 (सरकण) लक्षण जाणवु गाथा ६ वीना छूटा शब्दना अर्थ. आहार-आहार. | चन-चार. मरीर-शरीर पचन्पाच इदिय-इश्यि । उप्पिय-ठए (पण) पती-पर्याप्ति ग एकेंडियन आणपाण-वामोशम विगलाम्-रिकलेंद्रियन. नासनापा असन्नि असकीने मणे-मन मन्त्रीण-महीने आहार सरीर इंदिय, पहात्ती आणपाण ना स मणे ॥ चन पंच पंच प्पिय, ग विगवा सन्नि सन्नीणं ॥६॥ शब्दार्य -श्राहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, इद्रिय पर्याप्ति, श्वासो- सवास पर्याप्ति, लापा पर्याप्ति, मन पर्याप्ति तेमा चार पर्यामि एकेंशियने, पाच पर्याप्ति विकलेंद्रियने, पाच पर्याप्ति असझीने अने व पर्याप्ति सझी जीगोने होय रे ॥६॥ विस्तारार्थ -पुद्गलना उपचयथी थयो जे पुद्गल परिणमन हेतु शक्ति विशेप, तेने पर्याप्ति कहे. तेना वेद वे एक लब्धि पर्याप्ति अने वीजीक
(१३)
रण पर्याप्ति, जे कर्मना उदयथा आरंलेली स्त्रयो-
ग्य पर्याप्ति सर्व पूरी करी नथी पण करशे तेने
सब्धि पर्याप्ति कहे ते अने जेणे स्वयोग्य पर्याप्ति
सर्व पूरी करी लीधी तेने करण पर्याप्ति कहे .
तेमज अपर्याप्ति पण वे प्रकारनी के एक लब्धि
थपर्याप्ति अने बीजी करण अपर्यात भारलेली
स्वयोग्य पर्याप्ति पूरी करे नहि तेने लब्धि अपर्या
प्ति कहे अने जे स्वयोग्य पर्याप्ति सर्व पूरी क
रशे, पण हजी कीधी नथी तेने करण अपर्याप्ति
कहे ठे वैक्रिय शरीरने एक शरीर पर्याप्ति अंत
र्मुहर्तनी होय वे ने वाकीनी पाच एक समयनी
जाणवी. अने औदारिक शरीरने आहार पर्याति
एक समयनी होय वे ने वाकीनो पांच अतर्मुहू
तनी जाणवी उत्पत्ति समयने विपे ए सर्व पर्या
प्ति सर्व जीवो यथायोग्य रीते साये थारने ते पण
पूरी अनुक्रमे करे ठे ते पर्याप्ति ठ प्रकारे ठे. हरे
क जीवने नवांतरनी उत्पत्ति समये जे शक्तिव
आहार सश्ने तेने रसपणे परिणमाववानी शक्ति
(१४) 'विशेष'तेने (थाहार) श्राहार पर्याप्ति कहे ठे. पठी ते रसरूप परिणामने रस, मधिर, मास, भेद, अस्थि, मजा तथा वीर्य ए सात धातुपणे परिण- मापीने शरीर वाधवानी जे शक्ति विशेप तेने (सरीर) शरीर पर्याप्ति कहे वे पठी ते सात धातुपणे परिणमाव्यो जे रस, ते जेने जेटलां व्य ऽजिय जोश्ये तेने तेदला इद्रियपणे परिणमा ववानी जे शक्तिविशेप तेने (इदिय) प्रिय प याप्ति कहे वे (पजत्ति) पर्याप्ति ए शब्द दरेकनी साथे लगायो उपर कहेलीत्रण पर्याप्ति पूरी की बिना कोई जीव मरण पामे नहि माटे पर्याप्ति वचमा कोठे एत्रण पर्याप्ति बाधोने पठी वा सोच्छवास योग्य वर्गणानां दलिक लश् श्वासोच्छवा सपणे परिणमात्रीने अवलवी मूकवानी जे शक्ति विशेष तेने (आपपाण) श्वासाच्छवास पर्याप्ति कहे ठे झापा योग्य पुद्गल सइ नापापणे परिणमा बीने थवलबी मुकवानी जे शक्ति विशेष तेने (नास)जाया पतिकडे ने inte (२५) योग्य पद्गल लश् मनपणे परिणमावीने अवलंबी मूकवानी जे शक्ति विशेष तेने (मणे) मन प- र्याप्ति कहे . एबी रोते ए प्रकारे पर्याप्ति कही ठे थाहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, जिय पर्याप्ति तथा श्वासोवास पर्याप्ति ए (च3) चार पर्याप्ति (ग) एकेजियने होय आ चार पर्यातिनी साथे पाचमीनापा पर्याति जोमीए ते पाच पर्याप्ति (विगला) विकलेंजियने एटले वेद्रिय, तेइंद्रिय तथा चलरिडियने प्रत्येके होय. एज (पंच) पांच पयोति ( असन्नि) असझी पवेजियने होय. अने (वपिथ) ए पर्याप्ति (सन्नी) सझी पचेंजियने होय ॥६॥ गाथा ७ मीना छूटा शब्दना श्रर्थ. 'पणिदिय-याच इहियो. तिवलम्चा बल. सग-सात ऊसास-चासाहवास यान-आठ-आयुप इग-एक डियने •वेश्यिने. पाण-माण ति-नेडियने. चरिविण चाहियने - अठ आठ (१०) समूर्छिम मनुप्य, अने वीजा समूर्छिम तिर्यच, ते- मा समूठिमतिर्यचने तो उपर कहेला नव प्राण होय ठे, एवो नियम ठे- पण समूर्छिम-मनुप्यने वचन वल नहिं होवाने सीधे थाउज प्राण होयठे तेमा पण जो श्वासोच्छास पर्याप्ति वाधतो तो मरण पामे, तो सातज प्राण रहे। अने जे मातापिताना सयोगे करी गर्नने विषे उत्पन्न थाय ठे, एवा म नुष्य, तथा तिर्यच, जे गर्नज जातिना होय, तथा नारकी कुन्नीमा उपजे ठे, ने देवता उत्पाद शय्या मा उपजे , पण मातापिताना सयोगे गर्नमा उपजता नथी, तोपण देवता अने नारकीने सड़ी पचेजियने उपर कद्देखा नव प्राणनी साथे मनोवल जोग्याथी दस प्राण होय ठे ए सर्व अन्य प्राण जाणवा, अने नाव प्राण तो आल्माना ज्ञानादि गुण ते जाणवा ॥७॥ ॥ इति श्री जीवतत्त्व वर्णन समाप्तम् ।।
. AM (१ए) गाथा मीना वृटा शब्दोना अर्थ. . धम्मा-धर्मास्तिकाय. खपाव अधम्मा-अधर्मास्तिकाय. देसन्देश आगामा-आकागान्तिकाय पएसा प्रदेश. विपतिय-त्रण प्रण. परमाणु-परमाणु. नेया लेदो अनीव-अजीक तत्व नवम्तेमन. चन्दसहाम्चनुदमकारें महा-काल. धम्माऽधम्माऽगासा, तिय तिय नेया त देव अद्धाया।खंधादेसपएसा, परमाणु अजीव चन्दसहा ॥७॥ शब्दार्यः-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय अने आकाशास्तिकाय ए अणना खध, देश अने प्रदेश एवा त्रण प्रण नेटो ले एटले ते नव लेद थया तेवीज रोते बसी काल, अने पुलना खघ, देश, प्रदेश तथा परमाणु. ए प्रमाणे अजीव तत्व चौट प्रकारे ठे. विस्तारार्थ.-धम्मा एटले धर्मास्तिकाय, अधम्मा ए- टसे अधर्मास्तिकाय, आगासा एटले आकाशास्ति काय, ए त्रण अव्यना खध, देश तथा प्रदेश, एवा तिय तिय नेया एटले त्रण त्रण नेट होवाथी प्र-
(२०)
त्येक अस्तिकायने त्रणे गुणतानवनी सल्या यायः
प्रदेशना समूहने अस्तिकाय, कहेठे एवो अर्थ, 7-
पर कद्देला त्रणव्याने लागु करवो एत्रण यनो
चौट रज्ज्वात्मक संध कहेवाय ते तेथी का-
श्क जंगे होय अथवा सकल प्रदेशानुगत सामा-
न्य परिणामनी परे अवयव वर्मास्तिकायना जेह
बुद्धि परिकल्पिताद्यादि प्रदेशात्मक जे विनाग, तेने
देश कहीये, अने जे प्रकृष्टदेश अति निर्विनाज्य
अविनाज्य होय, ते प्रदेश कहेवायठे तहेव एटले
तेमज अद्धा एटले काल अव्यनो वर्तमान समय
रूप एकज प्रदेश होवाथी ते अस्तिकाय कहेवाय
नहि, माटे एकज नेद जाणवो एम दस नेद
थया य एटले चकार उन्नयान्वयी अव्यय वे ए.
थी पुद्गलास्तिकाय अव्य लेवु, तेना अखम व्य
रूप आखा पदार्थने अथवा अनतादि परमाणुना
मलेला समूहने खधा एटले खध कहे ते खधनो
केटलोक नाग जेनो खधनी साथे सवध होय ठे
तेने देस एटले देश कहे ते जेनी खधनी साधे
5 (१) निर्विनाज्य कल्पना करी उता खंधनी साथे अ- जिन्न संबंध होय तेने पएसा एटले प्रदेश कहे . अने तेज प्रदेश जो खंधथी जिन्न थाय एवो जे निर्विनाज्य नाग एटले जेना केवलीनी बुद्धिये एक नागना वे नाग थ शके नहिं तेने परमाणु एटले परमाणु कहे वे ए प्रमाणे पुद्गलास्तिकाय अव्यना चार नेट ते पूर्व कहेला दस नेद साथै मेलवता अजीव एटले अजीवतत्वना चलदसहा एटले चौदनेद थाय. ॥७॥ गाथा ए मोना तूटा शब्दना अर्थ धम्मा-धर्मास्तिकाय अमीर-अजीपश्च्य. अधम्मा-अधर्माग्निकाय. चलणसहावो-चलन सनाव- पुग्गल-पुजगलास्तिकाय. चालो. नह-याकागास्तिकाय धम्मो-धर्मास्तिकाय कालो-काल घिसिगणो-स्थिर सस्थान एच-पाच (स्वनाव) वालो हुति-होय छे अहम्पो-अधर्मास्तिकाय. धम्माऽधम्मा पुग्गल, नद कालो पच टुंति (१२) अजीवा ॥चलण सदावोधम्मो, थिर संगणो अदम्मो य । ए॥ शब्दार्थ-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, पुजगलास्तिकाय, आ- काशास्तिकाय, काल ए पाच अजीव इन्य होय ठे तेमा चलन स्वनाव गुणवालो धर्मास्तिकाय ते. अने स्थिर स्वनाव गुणवालो अधर्मास्तिकाय ठे ॥ ॥ विस्तारार्थ-धम्मा एटले धर्मास्तिकाय, अधम्मा ए- टसे अधर्मास्तिकाय, पुग्गल एटले पुद्गलास्तिका- य, नह एटले आकाशास्तिकाय, अने कालो एटले काल, ए पच एटले पाच अजीवा एटले अजीव जव्य दुति एटले ए पाचनी साथे जीवाव्य नेत्याथी पम्झव्य कहेवायठे जेम मांउलाना सचारनु, पाणी ए अपेक्षा का- रण ठे, तेम जीवने तथा पुद्गलने गतिपणे परि- णमता जे अपेक्षा कारण होय, तेने धर्मास्तिकाय कहे ठे जेम पाणी विना माठलानु सचार थर शके नहीं तेम धर्मास्तिकाय विना जीव अने पु- द्गल चाली के नहीं अर्थात् चक्षण सहावो ध-
(२३)
म्मो एटले चलन स्वन्नाव गुण, ते धर्मास्तिका
य जाणवो.
जेम मुसाफरने विसामो लेवाने विषे वृदादि
कनी गया अपेक्षा कारण ठे, तेम जीव तथा पु-
द्गलने स्थितिपणे परिणमतां जे अपेक्षा कारण
होय, अर्थात् थिरसगणो अहम्मो एटले स्थिररा-
खवानो सहजगुण 'तेने अधर्मास्तिकाय कहे ए
बन्ने अरूपी अव्य चनद राजलोक व्यापीठे वर्ण,
गध, शब्द, रूप, स्पर्श तथा रसरहित असंख्यात
प्रदेशी , जे उदासीन वृत्ति होय तेने अपेक्षा का
रण कहे ते थ एटले चकार, पादपूर्णार्थ उन्नया
न्वयी अव्यय ठे ॥ ए॥
गाथा १० मीना
तूटा शब्दना अर्थ
अवगाहो-अवकाश(स्वनारगुण बधा-सर
आगास-आकाशास्तिकाय. देस-देश.
पुग्गल पुद्गलने
पएसा प्रदेश
जीवाण-जीवने
परमाणु-परमाणु
पुग्गलापुद्गल इन्य.
चेव-निश्चे.
चनहा-चार प्रकारे.
नायव्वा-जाणवा.
M (२४) अवगाहो आगासं, पुग्गल जीवाण पुग्ग ला चउहा ॥ खंधा देसपएसा, परमाणू चेव नायबा ॥ १० ॥ शब्दार्य -अवकाश आपवाना स्वतावालो आकाशास्तिकाय जाणवो. पुद्गलो चार प्रकारना ठे ते वध, देश, प्रदेश तथा परमाणु निश्चयथी जाणवा. ॥ १० ॥ विस्तारार्थ -श्रागास एटले आकाशास्तिकाय तेलो- कालोक व्यापी वर्ण, रूप रस, गध, तथा स्पर्श रहित अरूपी अनत प्रदेशी अने साकरने दूधन पेठे जेनो अवगाहो एटले अवकाश स्वन्नाव गुण ठे अर्थात् एक प्रदेशथी वीजा प्रदेशमा जता जे अवकाशने आपे, तेने आकाशजव्य कहीये तेना वे नेद ठे, एक लोकाकाश बोजो अलोका काश, ए विशेषता हवे को अहीं शका करे के अवकाश कोने आपे ? तेनो उत्तर ए , के ग्गल जीवाण एटले पुद्गल तथा जीवने अवकाश थापेठे ते पुग्गला एटले पुद्गल अव्य चउहा एटले चार प्रकारे ठे पूर्वे कहेला स्वरुप पुद्गल प्रव्यना (२५) खंधा एटले खध,देस एटलेदेश,पएसा पटले प्रदेश, तथा परमाणुं एटले परमाणु,एनेद चेवएटलेनिश्चये करीने नायच्या एटले जाणवा योग्य ले. ॥१०॥ गाथा ११ मीना छूटा शब्दना अर्थ. मद्द-शब्द. । वमन्वर्ण अघयार प्रधकार गधगध उज्जोअनुयोत, प्रकाश. रसारम पना-मना, ज्योति. फामा स्पर्श ठाया-चाया, कानि पुग्गलाणं-पुदगलो नोहिन्यातप तु-निश्चे. आम्बा,अथवा. सरवण लक्षण सबंधयार नजोअ, पन्ना बाया तवेदि आ॥ वाम गंध रसा फासा,पुग्गलाणं तुलकणार१॥ शब्दार्थ:-गन्द, अधकार, रत्नादिकनो प्रकाश, चप विगेरेनो काति, ठाया, तमको अथवा वर्ण गध, म अने स्पर्श ए निश्वे पुलोनु लक्षण ठे ॥ ११ ॥ विस्तारार्थ -सचित, अचित, अने मिश्र, एत्रण प्र- कारमाना गमे ते सद्द एटले शब्द, अधयार एटले अंधकार, तथा रत्नप्रमुखनो उजो एटले प्रकार (२६) तथा चप्रमादिकनी पन्ना एटले ज्योति तथा ठाया एटले गया अने तवेहि एटले सूर्य प्रमुखनो श्रा तप,या एटस वा एटले वीजा नीचला पदार्थ पण जाणवा वन्न एटले वर्ण, गध एटले गध, रसाए टसे रस, अने फासा एटखे स्पर्श एवा गुणवालो होय अने जे चौद राजलोकमा व्यापक, सरख्यात प्रदेशी, असरयात प्रदेशी, तथा अनत प्रदेशीनो पूर्ण गलन स्वन्नाववान् एवो अखम पुद्गलास्ति कायरूप खध, ते खधनो एक नाग अथवा का पण न्यून नागरूप देश, तथा जे केवलीनी बुद्धिये पण एक नागनावे जाग थाके नहीं, एवो अति सूक्ष्म खधनोअनिन्ननाग निर्विनाज्यरूप तेप्रदेश, तेनीज ज्यारे खधथी निन्न कल्पना थाय त्यारे ते परमाणु कहेवाय ठे ए पुग्गलाण एटले पुद्गलोनु तु एटले निश्चयपणे लरकण एटले लकण ठे ॥११॥ गाथा १५ मोना लूटा शब्दना अर्थ एगाकोमि-एक क्रोन मनसम्मिमसठ सत्तहुत्तरि-सीत्योतेर साका-लाख (१७) महस्मा-हमारा आवलिया प्रावलिका दोयसया-बसा. ग-एक सोलहिया सोल अधिक. मुहुत्तम्मि-मुहर्तमा एगाकोमि सतसहि, लरका सत्तढुत्तरी स हस्सा य; दोयसया सोलहिया, आवलिया गमुत्तम्मि ॥१२॥ गन्दार्थ.-एक गोम, मम्मठ लाख, मित्योनेर हजार अने सो उपर सोल अधिक एटलो आरलीयो एक मुहर्तने पियायठे विस्तारार्थ -एगाकोमि एटले एक क्रोम, सतसत लरका एटले समस: सास सत्तदुत्तरी सहस्सा ए -टले सित्योतेर हजार, दोयसया एटले बसे अने सोलहिया एटले सोल उपर, एटली श्रावलिया एटले आवलिका ग मुहुत्तम्मि एटले एक मुहूर्त मा थाय ठे य एटले चकार पादपूर्णार्थ उन्नयान्व यी अव्यय हवे एनोनावार्थ कहे -आंखना एक फरणामा अथवा एक चपटी बजामवामा अ- थवा जीर्ण वस्त्र फामवाने वखते एक तंतुथी बीजे तंतुये जाय तथा कमलना पाटमाना समूहने यु-
(२०)
वान पुरुपे नाला साथे विधता एक पादमाथी
वीजे पाटमेनालो पोहोचे, एटला वखतमा असं-
स्याता समय थ जाय, एटले वस्त्र अथवा पत्रं
फामवाना आरलमा सूक्ष्मात् सूक्ष्म क्षणरूप जे
काल होय , जेनो विन्नाग या शके नहीं जेनो
नूत अने नविष्य विपे विचार चाय नहीं एटसे
वन अथवा पत्र फामता प्रथम वर्तमान कालरूप
अति सूक्ष्म कालनु उल्लघन थने ते ग्यारे नूत
काल थयो ? कयो वर्तमान काल ? अने कयो
नविष्यकाल घना योग्य ठे? तेनु अनुमान थर
शके नहीं, तेने सर्व लघुकालरूप समय कदे ने
एवा असग्यात समयने आरली कहे वे एवी
वसेने उप्पन आवलीए एक दुबकनव थाय ठे
ए करता वीजा कोर पण नाना नवनी कल्पना
था शके नहि. एया काश्क अधिक सत्तर कुद्धक
नवमा एक श्वासोछवासरूप प्राणनी उत्पत्ति होय
वे एका सात प्राणोत्पत्ति कालने एक स्तोक कद्दे
ठे एवा सात स्तोक समये एक लव होय ठे ए
समय-समय (ए) ' वा सीत्योत्तेर सवे वे घमीरूप एक मुहूर्त होय ठे- ते एक मुहूर्त्तने विषे पूर्वे कहेली १६७७७२१६ श्रावस्ती होय ॥१५॥ गाथा १३ मीना छूटा शब्दना अर्थ जणिन का आवली यावली पलिया पल्योपम मुहुत्ता मुहूर्त सागरमागरोपम दीहा दिवस. नस्सप्पिणीनुत्सर्पिणी परकाम्पद-पखवाडील सप्पिणी-अरसर्पिणी. मास-महिनो. कालो कालचक्र वरिसागरस. समयाऽवली मुलुत्ता, दोहा परकाय मास वरिसाय॥ नणि पलिया सागर, उस्सप्पि णी सप्पिणी कालो ॥१३॥ शब्दार्थ:-समय, आवली, मुहर्त्त, दिवस, पद, मास, वर्ष, पक्ष्यो- पम, सागरोपम, उत्सर्पिणी अपमार्पिण ए प्रमाणे काल कहो ले. ॥१३॥ विस्तारार्थः-अति सूक्ष्मकालने समय एटले समय कहे, असंरयाता समयने एक आवली एटले, . - .
T (३०) श्रावली कहे ठे, एवी १६३७२१६ श्रावलीये मु- 'दुत्ता एटले एक मुहुर्त थाय , त्रीस मुहूर्त्त दोहा एटले एक अहोरात्रिरूप दिवस थाय , पदर अ- होरात्रिये परका एटले पखवामियु थाय ठे वे प- खवामीये मास एटले एक महीनो थाय , वार महिने वरिसा एटले एक वर्ष थाय , ए रीते नणि एटले का ठे, तेमज असख्याता वर्षे एक पलिया एटले पल्योपम थाय, तेवा टस को- का कोमी पढ्योपमे सागर एटले सागरोपम थाय, तेवा दस कोमा कोमी सागरोपम जस्सप्पिणी ए टसे उत्सर्पिणी अने वीजा दस कोमा कोमी सा. गरोपमे सप्पिणी एटले अवसप्पिणी थाय, ए वे मलीने चीस कोमा कोमी सागरोपम कासो ए- टले कालचक्र थाय एवा अनता कालचके एक पुद्गल परावर्त थाय ए सर्व मनुष्य लोकमा व्य- वहारथी कास जाणवो था गाथामां वे ठेकाणे चकार , ते पाद पू. ार्थ उन्नयान्वयी . एनो नावार्थ -पूर्वोक्त जे (३१) • कासना नेद कह्या, तेथी वली वीजा पण कालना नेद घणा, ते पण जाणी लेवा जेमके वे मासे एक ऋतु थाय , त्रण ऋतुये एक अयन, वे अयने एक वर्ष, पांच वर्षे एक युग, चोराशी साख वर्षे एक पूर्वाग, ते एक पूर्वागने चोराशी लाखे गुणता एक पूर्व थाय ठे, प्रत्यादिक कालना अनेक नेद ठे, ते सर्व वीजा शाम्रोथी जाणवा. गाथा १५ मीना वृटा शब्दना अर्थ परिणामी परिणामी. णि नित्य जीवा जीव कारण-कारण. मुत्त-मूर्तिमत. कत्ता-कर्ता सपएसा-ममदेशी. सधगयन्मर्वगत एग-एक. श्पर-इतर (असर्वगत). खितन्त्र. अप्पबेमे-प्रवेशरहित किरीयाय-सक्रिय परिणामि जीव मुत्तं, सपएसा एग खित्त कि रित्राय ॥ निच्च कारण कत्ता, सबगय इयर अप्पवेसे ॥ १४ ॥ शब्दार्थ:-परिणामि, जीव, मूर्न, समदेशी, एक, देव, क्रिया, (३२) नित्यपण, कारण, कर्ता, सर्वगत, एयी उलटा अमवेशी ॥१॥ विस्तारार्थ उप्रव्यमांजीव अने पुद्गल,ए वे अव्य प रिणामी एटले परिणामि, वाकीना चार द्रव्य अप रिणामी, श्दा परिणामनो नाव जाणवो, परतु स्वन्नावे परिणामी तो ठए अव्य, अव्यमा एक जीव द्रव्य,जीव एटले जीवडे,अने वाकी पाच द्रव्य अजीव , द्रव्यमा एक पुद्गलद्रव्य, मुत्त एटले मुर्तिमत रूपी ठे, वाकीना पाच द्रव्य, अमूर्तिमत अरूपी, ठ द्रव्यमा पाच द्रव्य सपएसा सप्रदेशी , अने एक कालद्रव्य अप्रदेशी,ठ द्रव्यमाधर्म, अधर्म अने आकाश ए त्रण अव्य एग एटले एक वे, वोजा त्रण अव्य अनेक ठे, उ द्रव्यमा एक आ काश, खित्त एटले क्षेत्र ने, वीजा पाच द्रव्य क्षेत्री है, उ द्रव्यमा जीव अने पुद्गल ए वे द्रव्य, किरि बाय एटले सक्रिय है, वाकीनां चार अक्रिय , द्रव्यमा धर्म, अधर्म, आकाश अने काल, ए चार द्रव्य णिच एटले नित्य , वे श्रनित्य , यद्यपि उत्पाद, व्यय अने ध्रुवपणे सर्व पदार्थ नित्यानित्य (३३) पणे परिणमे छे, तथापि धर्मादिक चार अव्य सदा अवस्थित, माटे नित्य कह्या, अव्यमांधर्मादि पांच अव्य, कारण एटले कारण के, एक जीवव्य, अ- कारणरूप ठे, अव्यमां एक जीवद्रव्य, कत्ता ए- टखे का ठे, वीजा पाच अकर्ता , अव्यमां एक आकाश, सवगय एटले सर्वगत , अने इयर एटले वीजा पांच द्रव्य मात्र, लोकव्यापी , माटे असर्वगत जाणवा, तथा यद्यपि उ द्रव्य कीर नी- रपरे परस्पर अवगाढ ठे, तथापि अप्पवेसे एटले प्रवेश रहित ठे एटले कोश् पण द्रव्य अन्य अव्य मां-तद्रूपपणे थतु नथी माटे प्रवेश रहित ठे, "सद- सगन्नाव न विजहति" ए वचन माटे ॥२४॥ "अहींयां द्रव्यनु कांश्क विशेष कहे वे खन्नायथो गतिक्रिया परिणत एवा जोच अने पुद्- गल ए वे अव्य ठे. त्यां पोतानाः स्वन्नावने धाखु, पोपवू, तेने धर्म कहीये, अने अस्ति . एटले प्रदेश, तेनो काय एटले समूह तेने, धर्मास्तिकाय कहिये, सातमज़ गति क्रिया परिणत जीव तथा पुद्गलने.
(8) अवष्टंन दोन खन्नावं लक्षण ते अधर्मास्तिकाय व्य कहिये ॥शा तेमज गति क्रिया परिणतं जीव तथा पुदुर्गखने अवकाशदान लक्षणं स्थिति अतर्गत प्रविष्ट कीसक न्याय आकाशास्तिकाय अव्य जा- एवं ॥३॥ तथा समस्त वस्तु समुदायतुं कलन सं- रयान श्रथवा समयावलिकादिके करी सचेतना चेतन पदार्थने जेणे करी कलिये, एटले जापीये, एवो श्रमूर्त, लोकव्यापी, वर्तना लक्षण, असंख्य समयात्मक, नेश्चयिक समय लोकव्यापी, थनत स- मयात्मक कालप्रव्य जाणवें ॥॥ तथा पूर्ण गेलन स्वनाव, ते पुद्गलं अनत अणु स्कधपर्यंत जे पर- मापवा दिक, ते कोश्क अव्यथी गले, वियोग पामे, तथा स्वन्नाव थकी कोश्क अव्य प्रत्ये पुष्टि करे, ते पुदगल अव्य कहिये, तेना जे प्रदेशनो समूह, तेने पुद्गलास्तिकाय कहिये ॥५॥ एथसख्यानत प्रदेश प्रमाण मूर्त्तव्य सकस लोक व्यापी जाणवो तथा इंद्रियादिक दस अव्यं प्राण अने ज्ञानादि चतुष्क नाव प्राण प्रत्ये धारित लक्षणे करी जीव द्व्य नेते - (0) जीव त्रिकाल स्थायी अविनाशी असंख्य प्रदेशात्मक जीवास्तिकाय जाणवो.॥६॥ ए अव्य कह्यां. एमा कास द्रव्यर्नु स्वरूप काश्क विशेषे कहे. काल जे , ते मनुष्य क्षेत्रने विये तद्गतिनव ना- नाविध ठे, यमुक्त ज्योति करंमक ग्रंथे । गाथा ॥ लोयाणु नळणीयं, जोसचक्क नणंति अरिहंता ।। सो कालविसेसा, जस्स गई विसेस निप्पन्नों ॥१॥ अहीयां केटलाएक कहे वे के जीवादिक इव्यने वर्तनाटिक जे पर्याय तेहिज काल जाणवो, ते पृथक् अव्यने हेतुये केवी रीते ठे? तेनुं समाधान करे ॥ 'जीवाव्यने वर्तना, परिणाम, क्रिया भने परा- वर्तादिक, ए सर्व काल व्यपदेशनाक् , तिहाँ जे जीवने साटि 'सातादि चार नेदे वर्तवं, ते वर्तना जाणवी, तथा जे विनसा प्रयोगे जीवजयनी परि- पति ते परिणाम जाणवो; तथा नूत, नावि श्रने नविष्यत् विशेषणवंत जीवने गमन स्थित्यादिक कार्यनी चेष्टा, ते किया जाणवी परापरत्व एटले पूर्वनाविपश्चाद्लावीपरापर ३ त्यादि यदाश्रये द्रव्यने कहेवं ते ए प्रमाणे वर्तना- दिक सर्व अव्यना पर्यायवे से सर्व कालव्यपदेश- नाक के, जेमाटे कथचित्पणे द्रव्यथी थनिन्न द- व्यनामी पर्याय पण कहिये, ते माटे पर्यायने द. व्यपणु करते अनवस्था प्रसग थाय ते माटे, काल ते पृथक् द्रव्य नहीं, वर्तनाद्यात्मक काल जीवा- जीव, द्रव्य पर्यायपणे मानवो, एम जो महिमा- नोये तो श्राकाशनीपरे सर्व व्यापि कालास्तिकाय मानवो? एवो परवादिनो श्राशय ग्रहण करी शि- प्ये पूठयु, त्यारे गुरु उत्तर यहे , के हे देवाए- प्रिये। ए आप्त वचन नहि केमके सिद्धातमा पाच अस्तिकाय कह्या , अने छ कालद्रव्य पृथक् क- यु चे जे प्रदेशनु बहुपणु होय, तेने अस्तिकाय कहिये, अने कालने विपे प्रदेशनु बहुपणु नथी, जे माटे कालने विषे मात्र वर्तमान एक समय प्र- । रूपणा , अने अनागत समयनी अनुपपत्ति . A r गाथा १५ मीना छूटा शब्दना अर्थ. साम्शातावेदनीय । आइम्यादीना. नच्चगोमन्ननगोत्र. तितणुचण शरीर. मणुजगन्मनुप्यदिक नगा-उपांग (अगोपाग मुरझग-सुरद्विक आश्म-आदीम-पहेलं. पचिंदिजाइ-पचेंद्रि जाति संघयण-सघयण पणदेहा-पाच शरीर. मठाणासस्थान सा उच्चगोअ मणुङ्ग, सुरदुग पंचिंदिजा- इ पणदेहा ॥ आइति तणूणुवंगा, आश्म संघयण संगणा ॥१५॥ शदार्थ:-शातावेटनीकर्म, उचगोन, मनुप्यधिक, मुरद्विक, पचें हिजाति अने पाच देह तेमा पहेला त्रए शरीरना अंग अने नपाग, अने पहेलु [ वज्रपलनाराच ] सघयण तथा पहेलु (समचतुरघ) सस्थान विस्तारार्थ -पहे साधु विगेरेने अन्न दीधाथी, वीजें पाणी दीधाथी, त्रीजु रहेवाने स्थानक देवाथी, चोथं सूवाने पाट प्रमुख देवाथी,पांचमु पहेरवा श्रोढवाने वस्त्रादिक दीधाथी,ग्नुते विपेमने करी शुन्नसंकल्प कर्यायी, सातमुं वचने करी स्तुत्यादिक कर्याथी,
(३७)
आठमुकायाये करीसेवा कर्याथी,तथा नवमुहाथे करी
नमस्कारादिक कर्याथी ए नव प्रकारे पुण्य बधाय .
तेने तालीश प्रकारे जीव नोगवे ते कई चे.
। १ सा एटले सातावेदनीय ते जेना उदये जीव,
सुखनो अनुन्नव करे, उच्चगोस एटले उच्चगोत्र ते
जचकुलमां जन्म धारण करीने लोकने विषे पूजा
प्रतिष्ठादिकने पामे ३ मणुदुग एटले मनुष्यहिक
ते जेना उदये मनुष्यनी गति तथा ४ मनुष्यनी
अनुपूर्वानी प्राप्ति थाय जेना उदये ५ देवनी गति
तथा ६ देवनी अनुपूर्वी पमाय ठे ते, (वक्रगतिये
परनवमा जता वलदने नाथ घालीने सीधो चलाव
वानी पेठे जेथी उपजवाने स्थानके पहोंची शकाय,
तेने अनुपूर्वी कहे ) ए सुरदग एटखे सुरहिकरूप
नामकर्म कहिये उपचिदिजाएटले पचेंजिय जाति
नामकर्म कहिये जेना उदये पाच शरीरनी प्राप्ति
व्यायवे, ते कवे.- ओदारिक नामकर्म एटले जेथी
औदारिक शरीर योग्य पुद्गल ग्रहण करीने तथा
तेने शरीरपणे परिणमावीने जीव, पोताना प्र
देशनी साथे मेखते ते ते. एवी-रीते सर्व-शरीरने विषे
योजना करवी. ए वैक्रिय शरीरना वे नेद 2. एक
ओपपातिक ते देवता तथा नारकीने होय ठे. वीजो
खब्धि प्रत्ययोः ते तिर्यंच तथा मनुष्य सब्धिवंतने
होय . १० चौद पूर्वधर मुनिराज तीर्थकरनी ऋद्धि
प्रमुख जोवाने अर्थे एक हाथ प्रमाण देह धारण करे
ते आहारक शरीर ९आहारर्नु पचन करनार तथा
तेजोलेझ्यानो हेतु ते तैजस शरीर, १२ अने कामण
शरीर ते कर्मना परमाणु आत्मप्रदेशनी साथे मल्यां-
ठे एम जाणवू, ए पणदेदा एटले पच शरीररूप ना
मकर्म कहिये जेना उदयथी कहेलां पांच शरीरमाना
आइएटलेयादिनां औदारिक,वैक्रिय तथा आहारक
ए तितणु, एटले त्रण शरीरना वे थाहु, वे जरु, एक
पृष्टिका, एक मस्तक, एक उदर, तथा एक हृदय, ए
थात अंगठे,अने अंगुलि प्रमुस नपांग, तथा रेपा-
दिक अगोपाग , एटले १३ श्रौदारिक अगोपांग, १४
वैक्रिय अंगोपांग, १५ श्राहारक अंगोपांग अने तैजस
शरीर, तथा कार्मण शरीर, ए ने अंगोपांग नथी, ते
(४०) थी पहेसांत्रण शरीरनाज अंगोपांग कह्या ठे, तेने उवगा एटलेभंग,उपांग,तथा थंगोपांगरूप नामकर्म कहिये १६ जेना उदयथी उ सघयमांनु श्राश्म ए टले पहेतु वज्ररुपननाराच नामनु सघयण प्राप्त थाय- ने, तिहा वज्र एटले खोली, रुपन एटले पाटो तथा नाराच पटले चे पासा मर्कटबंध, एटले मर्कटवध ते उपर पाटो ते उपर खीली एवो हामनो निचय एटले समुदाय होय, तेने सघयण एटले अस्थिनिचय सघयणरूप कहिये १७ जेना उदयथी पोते पर्यकासन करी वेग उता समचतुरस्त्र चारे बाजु सरखी आकृति थाय बने पोताना अगुल प्रमाणवमे एकसोने श्रापथ गुलप्रमाण शरीर नराय, तेने सगणा एटलेठसस्थान- मानु पहेतु समचतुरस्त्र संस्थान कहिये ॥२५॥ गाथा १६ मीना छूटा शब्दोना अर्थ चएणचउक्काचर्ण चतुष्क नकोअन्यात अगुरु लहुन्मगुर लघु मुलखगश्शुन विहायोगति निमिण-निर्माण नसासा-श्वासोवास तसदसञसदशक मुर (आठ)-मुरायुष्य. परथा-पराघात. आयवन्यातप 7 (४१) नर (आठ)=नरायुप्य. तिथ्यपरं-तिकर' तिरिआन तिर्यंचायु वरम चनका गुरु खहु, परघा ऊसास आय वुडोअं॥ सुन्नखगइ निमिण तसदस, सुरनर 'तिरिआन तिचयरं ॥१६॥ शब्दार्य--वर्णचतुफ नामफर्म अगुरु लघु, पराघात, स्वासोपास, आताप, नद्योत, इस, पननी पेठे सारी चाल ते गुलविहायों गति, सु घाटरूप निर्माण, सदशक, देव, मनुष्य अने तिर्य- चनु आयुप्य अने तीर्थकर नामकर्म ॥ २६ ॥ विस्तारार्थ -जेना उदयथी १७ श्वेत, रक्त अने पीत रूप शुनवर्ण, १ए एक सुरनि गंधरूप शुन्न गंध;२० आंबिल, मधुर अने कपायल रूप शुनरस, तयार लघु, मृट, उपण अने स्निग्धरूप शुन्न स्पर्श, ए चार पदार्थ पुण्यप्रकृतिने अर्थे प्रशस्त जाणवा एनी प्राप्ति थाय ठे तेने वएणचनका एटले वर्ण-चतुष्क- रूप कहिये २२ जेना उदययीमध्यम वजनदार शरीरनी प्राप्ति थाय, एटले लोहनी पेठे यति नारे पण नहीं थने () श्राकमाना कपासनी पेवेति इसको पण नहीं कितु मध्यम परिणामी होय, तेने अगुरु बहु एटले अगुरु लघु नामकर्म कहिये. १३ परघा एटले पराघात नामकर्म ते जेना उद यथी वीजा बलवानने अति दु सदनीय उतां पोते गमे तेवा वलीयाने जीतवाने समर्थ थाय ठे, एवा व खनी प्राप्ति थाय ते २४ जेना उदयथी सुखपूर्वक श्वासोश्वास लेश काय, कांश पण विप्न पमे नहीं, तेने उसास एटले श्वासोश्वास नामकर्म कहिये २५ अायव एटले आतप नामकर्म ते जेना उदयथी सूर्यना बिवुनी पेठे परने ताप उत्पन्न करवाना हेतु रूप तेजोयुक्त शरीरनी प्राप्ति थाय ने ते २६ उकोथं एटले उद्योतनामकर्म ते जेना उद- यथीचा विवनी पेठेपरनेशीतलताउत्पन्नकरवाना हेतु रूप तेजोयुक्त शरीरनी प्राप्ति थाय ते २७ सुन्नखग एटले शुन्नविहायो गति नामकर्म कहिये, ते जेना उदयथी वृपन्न तथा हसनीपेठे सारी द्र (४३) चलनशक्तिनी प्राप्ति थाय ते. २० निमिण एटले निर्माण नामकर्म तेजेना उदयथी सूथारनी पेठे पोताना शरीरना सर्व अवयव योग्य स्थले गोवववानी शक्ति प्राप्त थाय ते शए थी ३० जेना उदयथीत्रस दसको एटले त्रसादि दस प्रकृति जे आगल कहेवामा आवशे तेनी प्राप्ति थाय ते तेने तसदस एटले त्रसदशक नामकर्म कहिये तेनु विवरण आगलनी गाथामां कद्देवाशे ३० जेना उदयथी देवताना आयुप्यनी प्राप्ति थाय ठे तेने सुर एटले सुरायुप्यरूप कहिये ४ जेना उदययी मनुष्यनाआयुष्यनी प्राप्ति घाय , तेने नर पटले नरायुप्यरुप कहिये ४१ तिरिया एटले तिर्यंचायुप्यरूप कहिये ते जेना उदयथी तिर्यचना श्रायुष्यनी प्राप्ति थाय ते. ४ जेना उदयथीत्रण जुवनने पूज्यपणु थाय , तेने तिष्ठयर एटले तीर्थकर नामकर्म कहिये. एक- मनो उदय, मात्र केवलीनेज थाय ते.
। (1) गाथा १७ मोना बूटा शब्दना अर्थ ' तस-त्रस. सुस्सरसुस्वरः वायरमादर आश्ङ-आदेय पज्जत-पर्याप्ति जस-जम, यश पत्तेसम्प्रत्येक तसा प्रसादि थिर-स्थिर. दसग-दस प्रकृति. सुजन्युज इमा, ए. मुनगन्मौलाग्य होश्- होय , तस वायर पजातं, पत्तेय घिर सुनं च सु- नगं च ॥ सुस्सर आइज जसं, तसा दसगं इमं हो ॥ १७ ॥ शब्दार्थ -त्रम, यादर, पर्याप्ति, प्रत्येक, स्थिरता, युन, सौलाग्य, मुस्वर, आदेय अने जस पुण्यना नेदमा आ उस विगरे दस नामकर्म होय छे ॥ १७ ॥ "विस्तारार्थ -१ तस एटले त्रस नामकर्म ते जेना उद- यथी जीवने चेंद्रियना शरीरनी प्राप्ति थाय, अर्थात् एक इद्रियनु शरीर पामे नहीं २ वादर एटले वादर नामकर्म ते जेना उदयथी चादर शरीरनी प्राप्ति याय, पण जे दृष्टिये करी दे- खाय नहिं एवा सूक्ष्म शरीरने न पामे ते (४५) ३ पजतं एटले पर्याति नामर्मते जेना उदयथी आप थापणी पर्याप्ति पूरी करे ते पर्याप्ति चे प्रकारे है, एक लब्धि, वीजी करण पत्तेथ एटले प्रत्येक नामकर्म ते जेना उदयथो औदारिक अथवा वैक्रिय प्रमुख निन्न निन्न शरीरनी प्राप्ति थाय, पण घणा जीवो वच्चे एक शरीर न पामे. ५ थिरं एटले स्थिर नामकर्म ते जेना उदयधीश- रीरना देतादिक अवयवोने स्थिरतानी प्राप्ति थाय ते. ६.सुन एटले शुन नामकर्म ते जेना उदयधीश- रीरना सर्व अवयव सारा होय, अथवा नातिना उ- परनुं शरीर सारं होय उ सुन्नग एटले सोनाग्य नामकर्म ते जेनी उदय थी सर्व लोकने प्रिय थाय सुस्सर एटले सुस्वर नामकर्म तेजेना जदयथी वाणीमां कोयलनी पेछे मधुरता थाय. । ए आश्क एटले आदेय नामकर्मते जेना उदयथी लोकने विपे माननीय वचन थाय १० जसं एटले यशो.नामकर्म तेजेना उदयथी (४६) सोंकने विये यश कीर्ति थाय एवी रोते तसाईदर्सगं एटले त्रस श्रादिक दस प्रकृतिनुं दशर्क, इमैं एटले ए पुण्यना नेदमा होइ एटले ते ते पूर्वोक्त पत्रीस मालेलीये त्यारे वेंतालीस थाय ए पुण्य तत्वना वें तालीस नेद कह्या वे चकार पादपूर्णार्थे . ॥१७॥ इति श्री पुण्यतत्त्व विचार समाप्त गाथा १७ मीना ठूटा शब्दना अर्थ नाण-शनावरणीय. असाप अशातावेदनीप मिच्उत्त-मिथ्यात्व मोहनीय. थावरदसम्स्यावरदशक. नरयतिंग-नरकत्रिक. बीएचीजा एटले दर्शनावर कसाय-कपाय णीयना पणवीस-पच्चीस नीर-नीचगोत्र. तिरियदुगतिर्यंचदिक. नाणंतरायदसगं, नव वीए नीअसायमि- बतं ॥ थावरदस निरयतिगं, 'कसायपणवीस तिरियंद्ग ॥ १७ ॥ शब्दार्य -शनावरणीयनां पांच अने अंतरायना पाच एम यमे मलीने दस पापकर्पना जेद, वीजा दर्शनावरणीय कर्मना नय अतराय-अतराय. ~ दसग-दामकार. नव-नव M नेद, नीगोत्र पापकर्म, आशतवेदनी पापक्रम, पिण्याल पापकर्म, स्यावर दशक पाक, नरकनिक पापकर्म, पचास फॅप यरूप पापकर्म, यिंचदिक पापकर्म ॥१८॥ विस्तारार्थः-प्राणातिपातं, मृपावाद, अदत्तादान, में: थुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, खोज, राग, द्वेप, कसंह, अन्याख्यान, पैशुन्य, रतिरत परपरिवाद, मायामोसो, तथा मिथ्यात्वशल्यं, ए श्रढार प्रकारे पाप वधाय , अने व्याशी प्रकारे नोगवाय ठे, ते व्याशी प्रकार कहे - १ मति ज्ञानावरणीय पापकर्म एटले जेना जर्दयथी पांच इंद्रिय, तथा मनोधाराए जे नियत वस्तुनुं ज्ञान थाय ठे, एवा प्रथम मतिझाननु जे आठादन यते. २ श्रुत झानावरणीय पापकर्म एटले जेना उदय- थी शास्त्रानुसारे जे ज्ञानं थाय ठे एवा श्रुतझानतुं याबादन थाय ते.. ३ अवधि ज्ञानावरणीय पापकर्म एटले जेना जद- यधी इंद्रियादिकनी अपेक्षा विना, यात्मऽव्यने ले सादात् रूपी अव्यने जाएवार्नु जे ज्ञान था , एवा अवधि ज्ञानेनुं ने श्रीलादन थीय त 1 (४७) " मन पर्यव ज्ञानावरणीय पापकर्म एटस जेना ज- दयथी सझी पप्रियना मनोगत नाव जाणवानुजे झान थाय , एवा मन पर्यव ज्ञानतु जे आधादन थाय ठे ते ५ केवल ज्ञानावरणीय पापकर्म एटस जेना उद- यथी पूर्वोक्त चार ज्ञान रहित जे एक निरावरण ज्ञान होय, एवा केवल झाननु जे आहादन थाय ते. एवी रीते पाच प्रकारना ज्ञानने जे आहादन करे तेने नाण एटले ज्ञानावरणीय पापकर्म कहिये ६ दानातराय पापकर्म एटले जेना जदयधीपोता- ना घरमा देवा योग्य वस्तु उता तथा दाननु फल जाणता उतां पण अापी शकाय नही ते लानातराय पापकर्म एटले जेना जदयथी दातार उता, दातारना घरमा वस्तु उता, ‘मागनार माया उता, पण-जे याचित वस्तुनी प्राप्ति न थाय ते पए नोगातरराय तथा उपभोगातराय पापकर्म एटले जेना-उदयथी पोते यौवन उता, सुरूप car, तथा, लोगोपमोग वस्तुनी प्राप्तिः श्र बता, पण-ते (ए) लोगवाइन शकाय ते पुष्पादि, पदार्थ जे एकवार जोगवाय ठे, तेने नोग कहे ते अने वस्त्रादिक पदार्थ जे वारंवार नोगवाय ते तेने उपलोग कहिए ए वेनो अतराय ते १० वीर्यातराय पापकर्म एटले जेना उदयथी पोते यौवन, रोगरहित, तथा वलवान उतां पण पोतानी शक्ति फोरवी शके नहीं एवी रीते पाच प्रकारे जे आमुश्रावे, तेने अंतराय एटले अंतराय नामर्नु पापकर्म कहिये-पहेला पांच तथा ए पांच मलीने दसग एटले दस प्रकार थया. हवे नववीए एटले वीजा नव प्रकार दर्शनावरणीय कर्मना जाणवा तेमां चार नेट दर्शनना, तथा पाच नेद निद्राना कहे (सामान्य उपयोगने दर्शन कहे।) ११ चक्षुदर्शनावरणीय पापकर्म एटले जेना उद्यथी श्रांखे करी जे रूपर्नु सामान्यपणे ग्रहणन्याय, एवा चक्षुदर्शननुं श्राधादन थाय ते.. १२ थचदर्शनावरणीय पापकर्म एटले जनाउद- यथी, चकु विना चार इंडिय तथा मने करी पोतपो .
(५०) ताना विषयनु जे सामान्यपणे ग्रहण थाय, वाथ- चक्षुदर्शननु जे थाछादन थाय ते १३ अवधि दर्शनावरणीय पापकर्म एटले जेना नव्यथी सामान्यपणे जे रूपी द्रव्यर्नु मर्यादापणे में- इण थायठे,एवा अवधि दर्शननुजे थाछादन थाय ते. १४ केवल दर्शनावरणीय पापकर्म एटले जेना - दयथी समस्त वस्तुनु जे सामान्यपणे देखवु थाय- ठे एवा केवल दर्शननु जे थाहादन थाय ते २५ निघारुप पापकर्म एटले जेना उदयथी नि- द्रावस्था थई गया पठी सुख पूर्वक जागृदवस्थानी प्राप्ति थाय ते १६ निखानिखारूप पापकर्म एटले जेना उदयंथी निद्रावस्था थऽ गया पठी 5 खपूर्वक जागृदवस्था- नी प्राप्ति थाय ते १७ प्रचलारूप पापकर्म एटले जेना उदयथावेसे- तां तथा ऊपता निसा श्राव्यां करे १० प्रचला प्रचलारूप पापकर्म एटले जेना उदय- थी हरता फरता पण निना आवे ते (५१) २५ थोपद्वीरूप पापकर्म एटले जेना उदयथी दि- वसनु चिंतवेढुं कार्य रात्रिने विषे निझा समये जा- गृतनी पेठे थाय ते थीणद्धी निद्राना समये पाणी वासुदेवना अर्द्धवलयुक्त होय , अने ते जीव नरक गामी जाणवो. २० जेना जदयथी पोते रूपवान तथा धनवान बता नीच कुलने विपे उत्पन्न याय, तेने नीय एटखे नीचेोत्ररूप पापकर्म कहिये ए नीच गोत्ररूप पा- पफर्म निंदापात्र १'जेना उदयथी दुःखनो अनुन्नव थाय, तेने य- साय एटले अशातावेदनी पापकर्म कहे . श्श मित्त एटसे मिथ्यात्व मोहनीय पापकर्म ते जेना उदयथा वीतरागना वचननी विपरीत स- दहणा याये २३-३२ जेना उदयथास्थावरदशकनीप्राप्ति थाय, तेने थावरदस एटले स्थावरदशक नामर्नु पापकर्म क हीये.तेश्रागल कहेवाशे,माटेवहींनाममात्रदशीव्युते. ३३-३५ जेना उदयथी नरकनी गति, नरकनी था (५) मुंपूर्वी, तथा नरकनु बाउखु प्राप्त थाय, तेने नरय- तिग एटले नरकत्रिक पापकर्म कहिये कसायपणवीस एटले पच्चीस कपायरूप पापकर्म- ना पच्चीस प्रकार वे, तेउँमा सामान्यथी तो पहेला सोल कपाय अने वीजा नवनोकपाय, एवा वे प्रकार ते तेउनु अनुक्रमे वर्णन करे वे ३६-३ए अनतानुवधी पापकर्म एटले जेना उदयथी श्रनत ससार वधाय, एना चार प्रकार ,क्रोध, मान, माया अने लोन ए जावजीवलगी कायम रहे, स- म्यक्त्व आववा न दीये, अने अते नरकने विषेप- होचामे, ए क्रोव पर्वतनी लाटी जेवो , मान पा- पाणना थानला जेवु , माया वासना मूल जेवीने, ने लोन करमजना रंग जेवोठे ४०-४३ जेना उदयथी थोमा प्रत्यारयाननी पण प्राप्ति ने थाय, तेने अप्रत्यारयानीय पापकर्म कहिये- एंना क्रोध, मान, माया ने लोन ए चार नेद वे ए एक वर्षसुधी कायम रहे ठे, देशविरतिपणु आववा दे नहि नेयते तिर्यंचनी गतिनी प्राप्ति करावे एक्रोध, सुकाए-
(५३)
ला तलावनी रेखा जेवो , मान हामकाना थांतला
जेवं ठे, माया मेंढाना शिंगमा जेवी, तथा लोन
कर्दम एटले कादवना रग जेवो.
४- प्रत्यारयानीय पापकर्म एटले जेना उदयची
सर्व विरतिरूप प्रत्याख्यानने आधादन थाय ते एना
क्रोध, मान, माया ने लोन ए चार नेद छे, ए चार
मास सुधी कायम रहे . सर्व विरतिरूप चारित्रनो
घात करे, तथा वद मनुप्यनी गति उत्पन्न करावे.
ए क्रोध रेतीनी रेषा जेवो, मान काटना थांजला
जेवू ठे, माया बलदना मूत्रनी रेखा जेवी , अने
लोन काजलना रंग जेवोठे
9-५१ जेना उदयथी चारित्र धारण करनार थोमुक
दीपे, तेने सज्वलन पापकर्म कहिये. एना पण क्रोध,
मान, माया ने लोन ए चार नेद ले ए पंदर दिवस
सुधी कायम रहे ते यथास्यात चारित्रने यावरण
करे बने देवगतिनी प्राप्ति करावे . ए क्रोध
पापीनी रेखा जेवोठे. मान नेतरना थांजला जेवुठे.
(५४)
माया वांसनी वाल जेवी , अने सोन इलदरना
रग जेवो
एवी रीते चार चार दे कपाय कहेता सोल कपा-
यतु वर्णन कयु. हवे नवनोकपाय कहे ते जे कपा-
यने सहचारी होय ते नोकपाय
५२-एजेना उदययी एक वस्तुनिमित्त तथा वीजीपर
निमित्ते, ए वेप्रकारथी हास्य रति,अरति, शोक,नय
तथा उगठानी उत्पत्ति थाय, तेने हास्यपटपपा-
पकर्म कहीए
एजेना उदयथो स्त्री जोगववानी श्छा थाय तेने पु-
रुपवेदरूप पापकर्म कही
मा
पुरुष न
इछा थाय
तेने स्त्री।
वकरीना
अपमा
एए जेना
(५५) थानुपूर्वीनी प्राप्ति थाय तेने तिरिय दुग एटले तिर्यंच द्विक नामकर्म कहाए ॥ १७॥ गाथा र मीना बूटा शब्दना अर्थ. ग-एकश्यि जाति. पावरत-पापना. बिम्बेद्रिय जाति. अपसथ्य-प्रमशस्त. तितेश्यि जाति. वामचन-वर्ण चतुप्फ चन-चतुरिंघिय जाति. अपदम अभयम (पहेला सि- जाईओ-जातियो. वायना). कुखग-अशुल विहायोगति संश्यणसघयण. उवधायन्नपघात सठाणाम्सम्यान हूति होय ग विति चन जाईन, कुखगइ जवघाय हुंति पावस्स ॥ अपसद्धं वाम चक, अपढम संघया संगणा॥१ए॥ शब्दार्थ:-एकेंझ्यि, बेंझिय, तेरिश्यि अने चौश्यि जातिरूप पा- पकर्म, नट विगैरेनी पेठे अशुन विहायोगति पापकर्म, उप- पात नाम पापकर्म, माठा एवा रूप, रस, गघ अने स्पर्शरूप पापकर्म, तेमज पहेला सघयण अने पहेला सस्थान विनाना बीना सघयए अने मम्यानरूप पापकर्म.
(५४) माया वासनी गल जेवी दे, अने लोन हलदरना रंग जेवो एवी रीते चार चार वेदे कपाय कहेतां सोल कपा- यनु वर्णन कयु हवे नवनोकपाय कहे ठे जे कपा- यने सहचारी होय ते नोकपाय ५२-५जेना उदयथी एक वस्तुनिमित्त तथा वोजीपर निमित्ते, ए वेप्रकारथी हास्य,रति,अरति, शोक,नय तथा उगठानी उत्पत्ति थाय, तेने हास्यपटपपा- पकर्म कहीए एजेनाजदयथी स्त्री जोगववानी श्वा थाय तेने पु- रुपवेदरूप पापकर्म कहीये,एनेतृणनाअग्निनीउपमाळे एए जेना उदयथी पुरुष नोगववानी श्छा थाय तेने स्त्री वेदरुप पापकर्म कहीए, पने बकरीनी सीमीनी अगिनी जपमा ठे ६० जेना उदयथी स्त्री तथा पुरुप, ए वन्नेने नोगव- वानी अनिलाषा थाय, तेने नपुसक वेदरूप पापकर्म कहीए एने नगरदाहनी उपमा ठे ६१-६२ जेना उदयश्री तिर्यचनी गति तथा तिर्यंचनी.
(५७) ६ए-७२ जेना उदयथीचार अशुन्न वर्णादिक एटले कालो रंग अने नीलो रंग, वे अशुनवर्ण, पुरनिगंध, ते अशुनगंध, तीखोरस ने कटुकरस, ए वे अशुन रस, गुरु, खर, शीत तथा लूखो, ए चार थशुन के रस, ए सर्व मलीने नव अशुन्न थाय, पण सामान्ये चार गणिये एजनी प्राप्ति थाय , तेने अपसबवण चन एटले अप्रशस्त वर्ण चतुष्कनामे पापकर्म कहीए. १३-७७ जेना उदयथी व संघयणमांना प्रथम संघय- ण विना पांच संघयणनी प्राप्ति थाय , जेना वे पासा मर्कटवध उपर पाटो ए वे होय पण वन ते खीली न होय, तेने झपन्ननाराच कहे , जेने केवल मर्कट बघज होय पण पाटो तथा खोली न होय तेने नाराच कहे हे, जेने एक पासे मर्कटवध होय, तेने अर्द्धनाराच कहे के, ज्यां मांदोमांहे हामकाने एक खोलीनो बध होय, तेने कीलिका कहे .अने जे खोली विना माहोमांदे अमस्तां अमकी रह्या होय, तेने ठेवहु कहे . ए पाच संघयणनी जेणेकरी प्रा प्ति थाय ठे, तेने अपढमसंघयण एटखे अप्रथम संघ
(५६)
विस्तारार्थ -६३ पृथ्वीकायादिक पांच स्थावरनी जा
तिना शरीरनी प्राप्ति जेना उदयथी थाय, तेने रंग
एटले एकैजिय जातिरूप पापकर्म कहिये
६४ शख प्रमुख जीवोनी जातिना शरीरनी प्राप्ति
जेना उदयथी थाय तेने वि एटते छिय जातिरूप
पापकर्म कहिये
६५ जू माकणादिक जातिना शरीरनी प्राप्ति जेना
उदयथी थाय ठे तेने ति एटले तेजिय जातिरुप
पापकर्म कहिये
६६ वीवी आदिक जातिना शरीरनी प्राप्ति जेना
उदयथी थाय ठे तेने चउजाईन एटले चतुरिजिय
जातिरूप पापकर्म कहिये
६ उट अथवा गधेमानी पेठे सराव गतिन प्राप्ति
जेना उदयथी थाय ने तेने कुखगइ एटक्षे अशुनधि
हायोगनि नामकर्म कहिये
६ जेना उदयथी पोतानां जीन, दांत, हरस, र
सोली प्रमुख अपयवे करी पोतेज हणाय तेने उ
वघाय एटले उपघात नामकर्म कहीये
"
(पए) गाथा २० मीना ठूटा शब्दना अर्थ. थावरस्यावर. अन्नगापि ग्य महुमन्दम उस्सर-स्वर. अर्पङ अपर्याप्त अणाज-अनादेय साहारण-साधारण अजस-अयश अधिर अस्थिर यावरदसगमस्थावरदेशक असुजम्पशुज विवढाय्य-विपरीतार्य थावर सुहुम अपां, सादारण मथिरम सुनज्नगाणि ॥ उस्सरणाइडजसं, थावर द- सगं विवजावं ॥२०॥ शब्दार्थ:-स्थावर नामकर्म, सूक्ष्म नामकर्म, अपर्याप्त नामकर्म, साधारण नामकर्म, अस्थिर नामकर्म, अशुल नामकर्म, दौरोग्य नामकर्म, स्वर नामकर्म, अनादेय नामकर्म, अजश नामकर्म, आ स्थावर दशक ( त्रस दशफथी ) विपरीतार्थ ॥२॥ विस्तारार्थ -१ थावर एटले स्थावर नामकर्म ते जेना उदयथी स्थावरपणु प्राप्त थाय तेथी जो तापादिके पीमाय तोपण त्यांथी खशी शकाय नहीं. सुहुम पटले सूक्ष्म नामकर्म ते जेना उदयथी दृष्टिने अगो चर एवा सर्व लोकमां व्यापी रहेला सूदमपणानी यणरूप नामकर्म कहीए -७२ जेना उदयथी बसस्थानमाना पहेला सं स्थान विना चौजा पांच सस्थाननी प्राप्ति थाय ते. तिहा जे वनवृक्षती पेठे नालिनी जपर सुलक्षण युक्त, तथा नानिनी नीचे निर्लक्षणयुक्त होय, तेने न्यग्रोध परिममल सस्थान कहे , जे नानिनी नी- चेनु अग सारु, अने नानिनी जपरनु अग नरसुं होय ते तेने सादि सस्थान कहे , उदर प्रमुख लक्ष णोपेत अने हाथ, पग, माथु, कटी, प्रमाण रहित होय, तेने वामन संस्थान कहे ते, जे हाथ, पग, माथु, कटी प्रमुख प्रमाणोपेत अने उदर प्रमुख हीन होय, तेने कुब्ज सस्थान कहे , जे सर्व अ- वयव अशुन्न होय, तेने हुमक संस्थान कहे वे ए पांच सस्थाननी प्राप्ति, थाय तेने अपढमसाणा एटले अप्रथम सस्थानरूप नामकर्म कहीए एवी रीते सर्व मतीने पावस्स एटले पापतत्वना व्याशी प्रकार ते दुति एटले ते १५ (एए) गाथा २० मीना दूटा शब्दना अर्थ. थावरस्यावर. उनगाणि-इलाग्य. महुमन्सदमा इस्सर-स्वर. अपना-अपर्याप्त अणान-अनादये साहारण-साधारण अजसम्पयश अथिर अस्थिर. थावरदसगळस्थावरदशक अमुलन्युज विवढयय-विपरीतार्य थावर सुदुम अपडी, सादारण मथिरम सुजनगाणि ॥ उस्सरणाश्जाजसं, थावर द- सगं विवजा ॥२०॥ शब्दार्थ-स्थावर नामकर्म, मूदम नामकर्म, अपर्याप्त नामकर्म, साधारण नामकर्म, अस्थिर नामकर्म, अशुज नामकर्म, दौलाग्य नामकर्म, स्वर नामकर्म, अनादेय नामकर्म, अजश नामकर्म, आ स्यावर दशक (वस दशकथी ) विपरीतार्थ ठे ॥ विस्तारार्थ -१ थावर एटले स्थावर नामकर्म ते जेना उदयथी स्थावरपाणुं प्राप्त थाय तेथी जो तापादिके पीमाय तोपण त्यांथी खशी शकाय नहीं.२ सुहुम एटले सूक्ष्म नामकर्म ते जेना उदयथी दृष्टिने अगो चर एवा सर्व लोकमां व्यापी रहेला सूक्ष्मपणानी प्राप्ति थाय, ते पण पृथिव्यादिक पांचज जाणवा ३ अपऊ एटले अपर्याप्त नामकर्म कहीए, ते जेना जद यथी स्वयोग्य पर्याप्ति पूरी कर्या विनाज मरण पामे. ४ साहारण एटखे साधारण नामकर्म ते जेना उद- यथी अनत जीव वच्चे एक औदारिक शरीरनी पाप्ति थाय, एवी निगोदावस्था ते ५ अथिर एटले अस्थिर नामकर्म ते जेना उदयथो शरीरमा दतादिक अवयव अस्थिर होय ते ६ अशुल एटले असुन नामकर्म ते जेना जदयथी नातिनी नीचेना अगनी नाग सारो न होय, पगादिकने स्पर्शे श्रागलो रोप करे ते ऽदु नगाणि एटले दुर्भाग्य नामम तेजेना उदयथी सर्व लोकने अलखामणो लागे ते उस्सर एटले दु स्वर नामकर्म तेजेना उदयथो कागमादिकनी पेठे कानने कटुक लागे एवा स्वरनी प्राप्ति थाय ते एअणा इक एटले अनादेय नामकर्म ते जेना उदयथी लो कने विषे तेनु बोलवु कोइमान्य करे नहीं ते १० अज स एटले अयश नामकर्म ते जेना उदयथी लोकमा थपकीर्ति थाय, पण कोई यश चोले नहीं ते । ।
(६०) प्राप्ति थाय, ते पण पृथिव्यादिक पाचज जाणवा. ३ अपङ एटले अपर्याप्त नामकर्म कहीए, तेजेना उद यथी स्वयोग्य पर्यासि पूरी कर्या विनाज मरण पामे. ४ साहारण एटले साधारण नामकर्म ते जेना उद- यथी बनत जीव वच्चे एक यौदारिक शरीरनी पाप्ति थाय, एवी निगोदावस्था ते एथथिर एटले अस्थिर नामकर्म ते जेना उदयश्रो शरीरमा दतादिक अवयव अस्थिर होय ते ६ अशुल एटले असुन नामकर्म ते जेना उदयथी नातिनी नीचेना अगनी नाग सारो न होय, पगादिकने स्पर्श आगलो रोष करे ते टु नगाणि एटले दुर्भाग्य नामर्म तेजेना उदयथी.सर्व लोकने अलखामणो लागे ते उस्सर एटले दुःस्वर नामर्म ते जेना नयथो कागमादिकनी पेठे कानने कटुक लागे एवा स्वरनी प्राप्ति थाय ठे ते ए अणा श्क एटले अनादेय नामकर्म ते जेना उदयथी लो कने विषे तेनु बोलवु कोश्मान्य करे नहीं ते १० यज स एटखे अयश नामकर्म ते जेना उदयथी लोकमा अपकीर्ति थाय, पण कोइ यश वोले नहीं ते ।। ।।
। -- एवी रीतेश्रा का जे थावस्दसंगं एटलें स्थावर दर्शक, ते पुण्यतत्त्वमीं कहेलावस दशकथी विव एटले विपरीतार्थ जाणी लेवू ॥ २० ॥ ॥ इति पापतत्त्वविचार समाप्त.॥ ।“ गाथा १ मीना बूटा शब्दना अर्थ इदिय-पश्यि कमा अनुक्रमे कसाय-काय. किरियायो-क्रियायो. अवय-अत्रत. पणीम-पच्चीश जोगायोग इमानन्ध्या; ए 'पंचम्पांच. तामोते चन-चार अणुकमसो अनुक्रमे .तिनि-त्रण इंदि कसाय अवय, जोगा पंच चनापंच तिन्नि क्मा, किरिआ पणवीसं, इमाउ तान. अणुकमसों ॥१॥ शब्दार्थ.-इभिय, कषाय, अत्रत अने जोग,ते अनुक्रमे पाच, चार, पाच, अने त्रण ठे अने क्रियाओ पच्चीस.ठे ए सर्वे मलीने आश्वना तालीश लेद यया. वली क्रियाओ अनुक्रमे -आ हथे पठी कद्देशागे ते जाणवी - (६२) विस्तारार्थः-जेम जे मार्गे करी तलावमा पाणी थावे वे, तेने नाबु कहिये, तेम जेणे करी थात्माने विपे कर्मोनु थावतु थाय ठे तेने श्राश्रव कहीए, ते श्रोत्र, चकु, नासिका, जिव्हा तथा स्पर्शन, ए पच एटले पाच दिय एटले इजियो वे क्रोध, मान, माया,ने लोन ए चल एटले चार कसाय एटले कपाय ठे प्रा यातिपात, मृपावाद, अदचादान,मैथुन, धने परिग्रह, ए पच एटले पाच अवय एटले अव्रत ठे. मनोयोग, वचनयोग, तथा काययोग, ए तिन्नि एटले त्रण जोगा एटले योग ,एकमा एटलेथनुक्रमे सत्तर नेद धया अने किरिया पणवीस एटले पच्चीश पाप क्रिया ताठ एटले ते, श्माउ-या एम वधा मळीने अणुक- मसो अनुक्रमे आश्रव तनना चेतालीस नेद थया. हवे थाश्रव वे प्रकारना ते एक अव्याश्रव थने बीजो नावाश्रव जीवना जे शुभाशुन्न परिणाम ते नावाश्रव कहीए एटले इजियना उपयोग रूप परि णाम तेमज कपाय, अव्रत तथा क्रियारूप परिणाम ते सर्व नावाश्रव जाणवो तथा योग ते मन वचन (१३) अने कायांना आधारभूत कर्म लेवार्नु कारण एकुंजे यात्मप्रदेशन कंपनपणुं तेने नावाश्रव कहीये तेमंज ए नावाश्रवनों निमित्त पामीने तेणे करी जीवने य- टविध कर्मनो आश्रव थायडे तेने व्यावं कहीए गाथा २५ मीना टूटा शब्दना अर्थ काय कादिकी पाणावाय माणातिपातीकी अहिंगरणीया-अधिकरण की आरजिअम्यारजिकी. पानसियामापिकी. पारितावणो पारितापनीकी: परिग्गहीआ-परिग्रहिकी. किरिया-क्रिया-(एशन्द बधा मायवत्तिमाया प्रत्यापिकी. नेलगाडवो) काश्अ अहिगरणीया, पानसिया पारि तांवणी किरिया ॥ पाणाश्वायो रंजिय, परि गदिया मायवत्तीअं॥१२॥ शब्दार्य-फायिकी, अधिकरणिकी, प्रादेषिको, पारितापनिकी, प्राणानिपातिकी, पारनिकी, परिग्रहिकी, अने मायामत्ययिकी. विस्तारार्थ:-पहेली काश्य एटले कायिकी क्रिया ते कायाने अजयणाए प्रवर्त्तावतां जे क्रिया लागे ते.
(६४) वीजी अहिगरणीया एटले अधिकरणिका किया ते खम्गादिक थधिकरणे करी जे,जीवोन हनन थाथ ते.त्रीजी पाजसिया एटले प्रक्षेपिकी क्रिया ते जीर तथा अजीव उपर देपनी चिंतवना करवी चोथी पारितावणी एटले पारितापनिकी क्रिया ते पोताने तथा परने परिताप जे उपजाववो ते पाचमी पाणा- वा एटले प्राणातिपातिकी क्रिया ते एकैछियादिक जीवने हणवो तथा जे हणावयो ते ठही भारनिय एटले थारनिकी क्रिया ते खेती प्रमुखनी जे उत्पत्ति करवी थथवा कराववी ते सातमी परिग्गदिया ए- टले परिग्रहिकी क्रिया ते धन धान्यादिक नवविध परिग्रह मेलाता तथा तेनी उपर मोह करता जे कि- या लागे ते आवमी मायवत्तीय एटले माया प्रत्य- यिकी क्रिया ते मायाए करी वीजाने उगवु ते मूलमां जे किरिया एटले क्रिया शब्द ठे ते उक्त प्रकारे सर्व शब्दोने जोमवो २२ गाथा २३ मीना तूटा शब्दना अर्थ, मिच्छादसणवत्ति-मिय्यादर्शन पाडुचिप्रमानित्यको. मत्ययिकी. सामतोवणी सामतोपनीपा- अपच्चरकाणीय-अमत्याख्या- तिकी. नीकी नसथ्यि-नैमृष्टिकी. दितिष्ठकी. साहय्यि स्वस्तिकी पुहिध-स्मृष्टिकी. मिहादसणवत्ती, अपच्चरकाणीय दिहि पुहिम ॥ पामुचिअ सामंतो-वणीअ नेसवि सादव ॥ २३॥ शब्दार्य:-मिय्यादर्शन प्रत्ययिकी, अपत्याख्यानिकी, दृष्टिकी, स्दृष्टिकी, मातित्यकी, सामतोपनिपातिकी, नैमृष्टिकी, अने स्वदस्तिकी विस्तारार्थ-नवमी मिहादसणवत्ती एटले मिथ्यादर्श न प्रत्ययिकी क्रियाते जिनवचन अणसदहतो थकोजे विपरीत प्ररूपणा करतां किया लागे ते दसमीअप्पच्च काणीय एटले अप्रत्यास्यानिकी क्रिया ते अविरतिये करी पञ्चरकाण कर्या विनाजे सर्व वस्तुनी क्रिया लागे (६६) ते अग्यारमीदिहि एटले दृष्टिकी क्रिया ते कोतुकेकरी अश्व प्रमुखने जोवु ते वारमी पुडीय एटले स्पृष्टिको अथवा पूठिकी क्रिया ते रागने वशे करीने जे पुरुष, स्त्री, गाय, वलद, वस्त्र प्रमुख सुकुमार वस्तुने स्पर्श कर तेथी जे किया लागे ते अथवा कोई सदेह उ. त्पन्न थयाथी पूठ तेथी जे क्रिया लागे ते तेरमी पामुच्चिय एट से प्रातित्यकी क्रिया ते जीव तथा अ- जीव आश्रयी जे राग ऐप थायठे, एटले वीजाने घेर इस्ती, घोमा, वस्त्र, नूषण प्रमुख देखी प धरे जे ए वस्तु एनी पासे केम' एवु चितवी कर्मवध करे ते चौदमी सामतोवणीअ एटले साभतोपनिपा- तिकी क्रिया ते पोताना अश्व प्रमुसने जोवा माटेश्रा- वेला लोकोने प्रशसा करता जोईने हर्प करवो, अथवा दध, दही, घी, तेल, प्रमुखनु नाजन उघासु मूस्या थो तेमा जे सजीव आत्री पमे ते पदरमो नेसहि एटले नेसृष्टिकी क्रिया ते राजादिकोना आदेश थकी यत्र शस्त्रादिकतुजे आकर्षण करवं, अथना शस्त्र, घमा ववु, वाव्य, कूवानु खनन करावq ते सोलमी साह (६७) कि एटले स्वदस्तिकी क्रिया ते पोताने हाथै अयवा श्वानादिक जोवथी तथा शस्त्रादिक अजीवथी जे शश- कादिक जीवने मारवु अथवा कोश्पुरुष अत्यत अनि मान करीने कोधित चित्तवत थको जे काम पोताना नोकरो करी शके ते काम पोताना हाथथी करे ते॥२३॥ गाथा २४ मीना तृटा शब्दना अर्थ आणवणि माझापनिकी-आ अना-ए मिवाय पीजी. नयनिका पयोगअयोगिकी रियारणियविदारणिकी पिझा मेमिको. अणजोगा अनाजोगिकी दोस ऐपिकी अणवकख पचश्मा-अनवका- शरिया पहिया र्यापधिको- समुदाणसमुदानकी. आणवणि विआरणिआ, अपनोगा अपवकंख पच्चश्त्रा॥ अन्ना पळग समुदा रण पिजादोसेरिया वहिआ॥२४॥ शब्दार्य'-पाझपनिकी, विदारणिकी, अनाजोगिकी, अनवकादा प्रत्पयिकी, ए बिना बीजी ते प्रायोगिकी, समुदानको, प्रेमि की. पिकी, अने र्यापथिकी. का मत्ययिकी ६
विस्तारार्थ-सत्तरमी थाणवणि एटले थाझापनिकी
क्रिया ते जे जीव तथा अजीवने का याज्ञा करवी
अथवा तेउनी मारफते काइ अणाववु ते. अढारमी
विधारणिया एटले विदारणका क्रिया ते जीव तथा
अजीवनु जे विदारण करतु नागवु ते उंगणीशमी.
श्रणनोगा, एटले अनानोगिकी क्रिया ते उपयोग
बिना शून्य चित्ते करी का वस्तु लेवी, अथवा मू-
कवी, तथा उठवू, वेसवु गमनादिक करवु ते वीस
मी अणवकखपञ्चश्या एटले अनवकादाप्रत्ययिकी,
क्रिया ते आलोक तथा परलोकथी जे विरुद्ध कार्यनु
आचरण करवु ते हवे अन्ना एटले पूर्व वीश कही
तेथी वोजी मन, वचन, तथा कायाना योगनु जे
प्रणिधान तेमा प्रवर्तन करखु, पण निवृत्तवु नहीं
ते एकवीसमी पडंग एटले प्रायोगिकी क्रिया वावी
समी समुदाय एटले समुदानकी क्रिया ते एवु मोटु
पाप करे, जे थकी आवे कर्मनु समुदायपणे ग्रहण
थर जाय ते वीसमी पिऊ एटले प्रेमिकी क्रिया
ते माया तथा लोनवमे जे काइ करवु, एटले प्रेमनां
(ए) वचन एवां बोले, के जे थकी रागनी अधिक वृद्धि थाय ते चोवीसमी दोस एटले देपिकी क्रिया ते क्रोध तथा मानवमे एवां गर्वित वचन बोले, के जे थकी बागलाने देय उपजे ते पच्चीसमीरियावहि- या एटले श्यापथिको क्रिया ते केवल काययोगर्नु जे प्रवर्ताव तेणे करी जे क्रिया लागे ते इरियापथि- की क्रिया अप्रमत्त साधुने तथा केवलीने पण होय एटले केवलीने केवल काय योगथी उपजे ठे, तथा समिति प्रमुख साचवतां पण साधुने दोयर्नु पनिक- मद् ते पण ापथिकी क्रिया ॥२४॥ ए पच्चीस क्रिया स्वरूप कहे ठे १ कायिकी क्रिया एटले कायाये करी जे थाय ते. २ अधिकरणकी क्रिया एटले जीव पोताना आ स्माने नरकादिकमा जवाने वास्ते अधिकारी करे ते. ३ प्रदोष क्रिया एटले जेमा प्रकर्षे अधिक दोपए- टले हेप होय ते ४ पारितापनिकी क्रिया ते जीवने परिताप थाप- चाथी उत्पन्न थाय जे क्रिया ते.
(30) ५ प्राणातिपातिकी क्रिया एटले प्राणीउने विनाश करवानी क्रिया ६ आरनिकी क्रिया एटले पृथिव्यादिक उ कायने उपघात करवानुं जे क्रियामा लक्षण होय ते परिग्रहिकी क्रिया एटले विविध उपाये करीधन उपार्जन करवामा तथा धन रक्षण करवामा जे मू- ना परिणाम तेथी उत्पन्न थयेली जे क्रिया ते 6 माया प्राययिकी क्रिया एटले माया वे प्र- त्यय एटले हेतु जेनी, एटले मायानी जिला प्रधान प्रवृत्ति ने ते ए मिथ्यादर्शन प्रत्ययिकी क्रिया एटले मिथ्यात्व जो प्रत्यय एटले कारण जेनु ते १० अप्रत्यारयानिकी क्रिया एटले सयमनाविघात कारक जे कपाय,तेना उदयथी प्रत्यारयाननु नकरते. ११ दृष्टिकी क्रिया ते रागादि क्युपित विते करी जे जीव, अजीवनु देखq ते १५ स्पृष्टिकी क्रिया एटले राग द्वेष अने मोह स
युक्त चित्ते करीने जे स्त्री आदिकना शरीरनो स्पर्श
करवो ते
१३ प्रातित्य प्रत्ययिकी क्रिया एटले पूर्वे अंगीकार
करेलां पापना उपादान कारणरूप जे अधिकरण,
तेनी अपेदाये जे क्रिया उत्पन्न थाय ते
१४ सामतोपनिपातिकी क्रिया एटले (समतात् के०)
सर्व दिशाउथी (उपनिपात के ) श्राववु एटले जे
स्थानमांनोजनादिकने लीधे सर्व दिशाउथी स्त्री आ
दिक जीवोनु थाववु थाय ते
१५ नैसृष्टिको क्रिया एटले जे परोपदेशित पाप
मां घणो काल प्रवर्त, ते पापनी नावथी अनु
मोदना करे ते
१६ पोताना हाथथी जे करे ते स्वदस्तिकी क्रिया
१७ याज्ञापनिकी क्रिया एटले श्री अति नगवा-
ननी थाझा उदघन करी पोतानी बुद्धिथी जीवाजी-
वादि पदार्थोनो प्ररूपणाहारा जे क्रिया ते
२७ वैदारणिकी क्रिया ते वीजाना अठता माग
आचरणने प्रकाश करी तेनी पूजानो नाश करखो
(७२)
तेथी उत्पन्न थएली जे क्रिया ते
रए अनानोगिकी क्रिया एटले (थानोग के)
उपयोग ते थकी जे विपरीत होय, तेने अनानोगक
दिये, तेणे करी उपलक्षित जे क्रिया ते
२० थनवफादा प्रत्ययिकी किया एटले पोतानी
तथा पारकी जे अपेदा करवी, तेनु नाम अवकादा
बे, ते थकी जे विपरीत होय, तेने अनधकादा कहीये
तेज प्रत्यय एटले कारण जेनुं एटले परमेश्वरे क
हेलो जे करवा योग्य विधियो, ते विधियो माइली
को कोइ पण विधियो पोताने अथवा कोई परजी
वने हिप्तकारी वे, ते विधियोमा प्रमादना वशयकी
अनादर करवो ते
२१प्रयोगिकी क्रिया एटले प्रयोग ते एकतो दोम्बु,
चालवं, इत्यादि कायानो व्यापार, वीजु हिंसाकारी
कठोर जुगदिक बोलवु, ते वचननो व्यापार, बीजो
पराजिमोदा अनिमानादिक मननोव्यापार, ए
यणनु जे करवु ते.
२५ समुदान किया एटले जेणे करी विषय ग्रहण
,
(७३) करीये, ते समादान इडिय , तेनो जे देशथी थथ- वा सर्वथा उपघातरूप व्यापार ते २३ प्रेम एटले माया अने लोन तेणे करी जे याय, ते प्रेम प्रत्ययीकी क्रिया २४ प एटले क्रोध, अने मान, तेणे करीजे थाय ते रोप प्रत्ययिकी क्रिया २५ चालवाथी जे क्रिया याय ते यापथिकी क्रि- या ए क्रिया माहेली केटलीएक क्रिया आपसमा सरखी देखाय के तोपण सरखी समजवी नहीं. ए पच्चीस क्रिया कही, ते पूर्वे कहेला सत्तरनेदो साथे मेलवता आश्रवततना वेंतालीस नेद थाय. ॥ इति श्राश्रवतत्व समाप्तम् ।। गाथा २५ मीना बूटा शब्दना अर्थ. समिश्-समिति. चरिचाणि चारित्र गुत्तिगुप्ति पण-पाच परीमह परिसह. तिन्त्रण जश्चम्मो यतिधर्म विसवावीस नावणानावना. दसन्दस.
पच-पाच (१४) बारम्बार एहिम्जेदोए करीने सगवमान्सचावन समिई गुत्ति परीसह, जश्वम्मो नावणा चरित्ताणि ॥ पण ति वीस दस वार, स पचजेएहि सगवन्ना ॥२५॥ शब्दार्थ-समिति, गुप्ति, परिसह, यतिधर्म, भावना, अने चारित ते अनुक्रमे पाच, त्रण, वावीस, दस, वार अने पाच एका दोए करीने सवरना सत्तावन जेदो ॥ २५ ॥ विस्तारार्थ-जे वने नवा कमों थावता रोकाय तेने सं- वर कहे , तेना वेन्नेद वे एक अव्य सवर अने वी- जो नावसवर तेमा नवा कर्मोनु जे रोकावबु तेने जन्य सवर कहिये, अने समिति प्रमुखपणे करी परि- णामने पाम्युं जे शुद्ध उपयोगरूप अव्यपणु, तेथीना वकर्मना रोधक यात्माना परिणाम थाय , तेनेन्जा- व सवर कहिये तिहा सम्यक् प्रकारे जे चेष्टा करवी, तेने समिइ एटखे समिति कहिये ते पण एटले पाच ठे योगनु जे गोपन करवु, तेने गुत्ति एटले गुप्ति क- (७५) हिये, ते ति एटले त्रण ठे, सर्व प्रकारे निर्जराने अर्थे जेसहन करवु, तेने परीसह एटले परिसह कहिये, ते मुवीस एटले वावीस यतिने जे अवश्य आचरवा योग्य होय, तेने जश्धम्मो एटले यतिधर्म कहिये ते दस एटले दस वे मननी चंचलता निवारण करवाने जे नाववं, तेने नावणा एटले नावना कहिये ते वा- रस एटले वार ठे कर्मक्षय यवाने अर्थे अहिसादिक परिणामे करीजे यत्नादिकनु याचवु तेने चरित्ताणि एटले चारित्र कहिये ते पच एटले पांच ठे एवी रीते सगवन्ना एटले सत्तावन नेएहि एटले नेदे करी संवरतत्त्व जाणवो ॥२५॥ गाथा २६ मीना ठूटा शब्दना अर्थ रिया-र्यासमिति मुम्जली जास-नापासमिनि अम्अने-बली एसणाएपणासमिति. मणगुत्तिम्मनगुप्ति आदाणे-यादान निवेपणा बयगुत्तिमचनगुप्ति समिति कायगुत्ति-कायप्ति उच्चार-पारिष्ठापनिका समिति. तहेवय तेमन. समिश्-समिति.
- (७६) इरिया नासेसणादाणे, जच्चारे समिईसु अ मणगुत्ति वयगुत्ति, कायगुत्ति तदेव य ॥२६॥ शब्दार्थ -र्यासमिति, नापासमिति, एपणासमिति, आदाननिक्षे- पणाममिति, उच्चारसमिति ए पाच समिति वली मनगुप्ति, वच- नगुप्ति तेमन कायगुप्ति, ए प्रण गुप्ति नाणवी विस्तारार्थ.-गाथाना पूर्वा करी पाचसमितिनु वर्णन करे ठे समिति एटले सम्यग् चेष्टा तेमा, १ पहेली इरिया एटलेासमिति ते जयणा राखी उपयोग सहित धूसरा प्रमाण नूमिका दृष्टिए जो ने जे चालपानी चेष्टा करवी ते २ बोजी नास एटले नापासमिति ते सम्यक् प्र कारे निरवद्यलाया वोलपारूप जे चेष्टा करवी ते ३त्रीजी एसणा एटले एपणासमिति ते सम्यक् प्रकारे वेतालीस दोप रहित निर्दोष आहार, वस्त्र, पात्र, वसति, सवघी जे निदानी गवेपणा करवी, तेनी जे चेष्टा ते ४ चौथी श्रादाणे एटले थादाननिक्षेपण समिति ते सम्यक् प्रकारे पुजी, प्रमार्जी, आसन प्रमुखर्नु (8) आदान एटले ग्रहण करवानी जे चेष्टा करवी, तथा तेने निक्षेप एटले त्याग करवानी जे चेष्टा करवी ते. था ठेकाणे मुलमा आदान शब्द ठे ते कहेवाथी नि. क्षेपण शब्द पण साथे लेवो. जेम नीम शब्द कहे वाथीजीमसेन समजाय ने तेम अहीया पण जाणी लेवु ५पांचमी (उच्चारे के०) उच्चार एटले मलमूत्रादिक तेने परग्ववु माटे पारिष्टापनिका समिति, ते परवा योग्य जे मलमूत्रादिक वस्तु, तेनु स्थमिल चूमिकाने विपे उपयोग पूर्वक जे मूकवानी चेष्टा करवी, तथा सदोष उपकरणादिकने परवववानी चेष्टा करवी ते. एवी रीते ए पांच समिर एटले समिति ते सु एटले नली परिवृत लक्षण जाणवी, अ एटले हवे गाथाना उत्तरार्धवमेत्रणगुप्तिनुवर्णनकरेते. प्रथम (मणगुत्तिके०) मनगुप्तिएटले मननुं गोपन करवु,तेना त्रण नेद ठे- तेमां अपध्याने करी उत्पन थएली कल्पना जालनो जे वियोग, ते पहेलो नेद वर्मध्याने करी मध्यस्थ पपानी जे परिणति, ते वीजो नेद. अने सर्वथा म- () नोयोग रोकायाथी तेरमा गुणगणाना अतने विषे जे यात्मारामता थाय ठे, ते त्रीजो नेद जाणवो, चीजो (वयगुत्ति के०) वचनगुप्ति एटले वचननु गोपन करतुं तेना नेद वे -सर्वथा वचननो रोध करवाने अर्थे मौननो अन्निग्रह धारण करीने हाथ प्रमुखनी सज्ञा व कार्य करते पहेलो नेद श्रने मौननो थन्निग्र- ह धारण नहीं कयों उता याचना प्रमुख कार्य करती वेलाए मुखे मुहपत्ति देने जे जयणाथी वोलवु, ते बीजो नेद जाणवो, शहा नापा समितिमा तो केवल जयणाये वोलवानुज का वे, अने एमा तो एक स वथा वचननो रोध करवो अने वीजु जयणाये वोलवू, ए जुदा जुदा वे स्वरूप देखाड्या वे ए उपरथी वच नयुप्ति थने नापासमिति एउँमा ए अंतर , एम जाणवु अने तहेव एटले तेमज त्रीजी कायगुत्ति के०] कायगुप्ति एटले कायानु गोपन करवु तेना पण वे वेद - उपसर्ग परिसह थावी उत्पन्न थवाथी पण जे काया स्थिर राखवी, अथवा चोदमे गुणगणे योग निरोधावस्थाये सर्वथा शरीरनीचेष्टानो त्याग करखो, (ए) ते पहेलो नेद, अने शयन, आसन प्रमुखने विषेसू- त्रोक्त विधिये करी चेष्टानो नियम करवोएटले माथा तले हाथ घाली, गृवण संकोची, कृकमीनी पेठे पग पसारीने सूर्यु ते बीजो नेद जाणवो ए समिति अने गुप्तिना अर्थमा श्राटदु विशेष ठे, के सम्यक्प्र- कारे चेष्टारूप जे प्रवृत्ति करवी, ए समितिनु लक्षण ठे. अने शुनस्थानने विपेप्रवृत्ति करवी, तथा अशुन्न स्थानथी निवर्त, एम प्रवृत्ति तथा निवृत्तिरूप गुप्ति नु लक्षण वे ए पांच समिति अने त्रण गुप्ति मली आठ प्रवचन माता कहेवाय ठे ते चारित्ररूप शरीर ने उपजाववा तथा तेनु पालण पोषण करवा माटे माता समान ठे ॥ २६ ॥ गाथा २७ मीना छूटा शब्दना अर्थ खुदा क्षुधापरिसहा भुख अचल-अचलक, वखरहितपणे पिवासा-पिपासा, तरस अर-अरति, पीडा. सी-शीत-टाढ इय्यियो-खी. नएहन्नुपण, ताप चरिया-चर्या, चालवू दसा-दश. निसिहिया-नैपेधिक - (७०) सिका-शय्या वह-वध अकोसम्मकोश जायणा-याचना खुदा पिवासा सी नण्इं, दंसा चेला रई विजे॥ चरिआ निसिहिया सिजा, अकोस वह जायणा.॥२०॥ शब्दार्थ -रूषा, पिपासा, शीत, नण, दस, अचेल, अरति, खी, चर्या, निपद्या, शग्या, आक्रोश, वध अने याचना (परिसह विस्तारार्थ-हवे परिसह शब्दनो अर्थ कहे ,जे जै- न मार्गने नदि मुकवाने अर्थे तथा कर्मनी निर्जरा करवाने अर्थे दु खोने परि एटले समस्त प्रकारे सह एटले सहन करवु पझे तेने परिसह कहीये, व्याकर- णमा खरयुठे के, " परिसहतीति परिसह ' ते प- रिसह सर्व मली वावीस ठे, तेमा दर्शन परिसह अने प्रज्ञा परिसद जैनमार्ग न मुकवाने अर्थे के, अने वाकी वीस परिसद कर्म निर्जरा करवाने अर्थे ठे एवावीस परिसहोना अर्थ सहित नाम तथा थ- नुक्रम ते परिसहोने कहेवाना कारण कहे ठे र खुहा एटले दुधा परिसह ठे कुधा एटले नूख - (१) अने तेथी उत्पन्न थनारी वेदना सर्व वेदनाउँथी अ- धिक ठे, कारण के नूख यांतरमा अने पेटने वाल- नारी , हवे साधु मुनिराजने गमे तेवी नुख लागे, तोपण ते अनेपणीय आहार ले नहिं, अने यात ध्यान पण करे नहिं परंतु रूमे परिणामे जुख सहन करे आ दुधा सहन करवी घणीज उर्लन ठे माटे सर्व परिसहोमा ए दुधा परिसह पहेलो गण्यो वे. २ पिवाला एटले पिपासा परिसह वे ते पहेला कहेली दुधानी पीमा मटामवा सारु उचा नीचा घ रोने विपे विहार करवो पमे तेना श्रमे करीने तरस उत्पन्न याय, माटे दुधा पठी वीजो पिपासा परिसह गएयो वे अहिं साधु प्रासुक एपणीय जसने अन्नावे तरसथी थाकुज व्याकुल थएलो उतो पण अनेपणी- य शीतल जलादिकनी श्छा करे नहि परतु सम्यक् प्रकारे तृपा सहन करे. ३ सी एटले शीतपरिसह ते नूख अने तरसथी पोमाएलाने शीतपणु थाय माटे त्रीजो शीतपरि
(२)
सह गण्यो वे तिहा शीतकालने पेि ज्यारे टाढ
पमे त्यारे कल्पनीय वस्त्रने अन्नावे गृहादिके रहित
एवो पण अकल्पनीय वसनी श्ठा करे नहिं पोते
अग्नि प्रदीप्त करी तापे नहि, तेमज वीजाए सलगा-
वेला अग्निथी पण तापे नहिं परतु अल्पजीर्ण वस्रो-
ए करी सारी रीते टाढने सहन करे
४ नएह एटले नष्ण परिसह, ते उपण कुतु जे ठे,
ते पूर्वोक्त शीत ऋतुनी विपक्षोजूत ठे, माटे शीत
पळी चोथो उपण परिसह गएयोठे तिहा उष्ण का-
लने रिपे रह्यो ठतो सूर्यनु प्रतिविन माथे यावे,एवा
मध्याह्न समये अत्यत आतापना थए थके पण वननी
अथवा लुगमानी वायाने तथा विजणा प्रमुखना वा-
युने अण वाढतो थको तेमज स्नान विलेपनादिकने
नहिं करतो रुमे प्रकारे आतापना सहन करे
५ मसा एटले सपरिसह, ते पूर्वोक्त उष्णकाल
पठी वकाल आवे, ते वखते मास महरादिक
वहु
थाय, माटे उष्ण पठी पांचमो मश परिसह गएयो
(७३) ठे तिहां मशादि जू, मांकम इत्यादिक कुछ जीवो जेम संग्राममां शत्रु वाणनो प्रहार करे तेम ख मारे, तोपण तेना उपवथी ते स्थानक तजीने अन्य स्थानके जाय नहि, अथवा तेने निवारवा सारु पखो करवानी श्छा पण करे नहीं,तथा ते मंसादिक जीवो पोतार्नु लोही पीये, तोपण तेना उपर हेप करे नहीं, एवी रीते सम्यक् प्रकारे मंश परिसह सहन करे. ६ अचेल एटले अचेलक परिसह, ते पूर्वोक्त मशा- टिके परानव पाम्यो थको पण वस्रने वा नहीं, तेथी अचेलक परिसहने हो गण्योठे अचेलक एटले गुं? तो के चेल एटले वस्त्र तेनो अ एटले अन्नाव तेव- चेलक जाणवो अहीयां सर्वथा वस्त्रोनो अन्नाव होय तेनुंज नाम अचेल परिसह नथी, परतु आगममांजे जे वस्त्रो राखवानु प्रमाण कयु , ते प्रमाणे राखे तो तेने अचेलक परिसह कहेवो हवे त्यां शका करे ठे, के जो कांश पण वस्त्र राखे तोपण ते परिग्रहज क्- हेवाय ? त्यां कहे , के जो मूळ सहित वस्त्र राखे (४) तो परिग्रह कहेवाय, परंतु मूळ रहित अपरिग्रहप- णाये शास्त्रोक्त रीते राखे. तो अचेलक जाणवो तिहां साधुने फाटेबु अल्प मूल्यनुं अने जूनु वस्त्र उतां क- ल्पनीय वस्त्र न मले तथापि मनमा दीनता न करे, वली एम पण न विचारे के आज काल को नवा वस्त्रनो थापनार पण मलतो नथी, माटे हवे केम करतु' अथवा आ वस्रो तो समेला अने जूनां , माटे वीजा नवा पहे, एवो विचार पण न करे ए प्रमाणे सम्यक् रीते अचेलक परिसह सहन करे. ७ थर एटले अरति परिसह ते पूर्वोक्त अचेलक अप्रतिवद्ध विहारी उता तेने शीतादिकनासनवे करी अरति उपजे, माटे अचेताक पठी सातमो अरति परिसह गएयो ठे, तिहा जे रमण करते रति अने तेथी विपरीत जे अरमणिकता ते अरति जाणवी. श्रा केकाणे साधुने सयममा विहार करतांबरति उ- पजवाना कारण वने, त्यारे धर्मने विषे रक्त थाय; क्षात्यादिक दस प्रकारना यतिधर्मने ध्यावे, श्री दश- (नए) वेकालिकनी प्रथम चूलिकामा अढार वस्तुनुं चितवन करवाथी अरति दूर थाय ठे, ते प्रमाणे चितवन करी अरति दूर करे ७ इचिन एटले स्त्रीपरिसह. ते पूर्वोक्त सयमने विपे अरति उत्पन्न थवाथी स्त्री निमत्री तेनो थन्नि- खापा करे, माटे अरति पठी आठमो स्त्रीपरिसह ग- पयो वे तिहां स्त्रीयोने दी थका तेनां अग, प्रत्यग, सस्थान सुरति, हसवू, मनोहरपणु ललित विक्रम- विलासादिक चेष्टाउँने अणचितवतो थको रहे, स्रो- योने मोक्ष मार्गमा अर्गला समान जाणी, तेने कामबुद्धिये करी दृष्टि साथे दृष्टि मेलवी जुवे नही, ते स्त्री परिसद ए चरिया एटले चर्या परिसह चर्या एटले चा- लवानु नाम ठे तिहा एक स्थले रहेता मद सत्त्वने पूर्वोक्त स्त्री उपर अनुराग थाय, ते माटे एक स्थानके न रहे, तेथी ए स्त्री परिसद पठी नवमो चर्या परि सह गएयो तिहां आलस रहित थकां ग्राम, नगर .
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(७६)
कुलादिकने विपे विहार करवो, तेने अव्यथी चा
कहीये अने जो एक स्थानके मास कल्पादिके रहे.
ता पण अप्रतिवद्ध ममत्व रहितपणु अगीकार करतुं
ते.नारथी चर्या कहीये
१० निसिहिया एटले नेवेधिको परिसह ते पूर्वोक्त
प्रामादिकने विपे जेम अप्रतिबद्ध विहार करवो, तेम
देहादिकने विषे पण अप्रतिवद्ध स्वाध्यायने अर्थ नैपे-
धिकी करवी, ते माटे चा पठी दसमो नेयेधिकी
परिसह गएयो वे जे निषेधिये तेने नेपेधिकी कहीये
तिहा एक पापकर्म, वीजु गमनागमन, तेहीज नि-
पेध करवानु के प्रयोजन जेनु तने नेपेधिक कहीये
अहियां शून्य घर श्मशानादिक सर्प विल सिह गु-
फाकिने विपे कायोत्सर्गे रह्या धकातिहा नाना प्र.
कारना उपसर्गना सञ्जाचे पण अशिष्ठ चेष्ठानो नि-
पेध करतो, अर्थात् माठी चेष्ठा न करवी, तेने नैपे-
विका पारसह कहीये अथवा कोई काणे निपद्या
परिसह पण कह्यो , ते नषद्या एवु रहेवाना स्था-
, (७) नकनुं नाम ठे, त्या स्त्री, पशु पंक वर्जित स्थान- मां रहेतां थकां जो इष्टानिष्ट उपसर्ग थाय, तोपण पोताना चित्तमां चलायमान न थाय, परतुं ते सर्व उपसर्गने उग रहितपणे सम्यक् रीते सहन करे ते नैपेविकी अथवा निपद्या परिसह ११ सिका एटले शय्या परिसह ते पूर्वोक्त नैपधि- कीये स्वाध्याय करी, शय्याये यावे, माटे अगीयार- मो शय्या परिसह गएयो जेने विपे शयन करी- ये तेने शय्या कहीये, तिहां शय्या ते वसति, उपा- श्रये उचो नीची नूमि होय, अथवा कठिन आसन पामीने तेने सारु अथवा मातु कहे नही, उलेग करे नही, परतु मे प्रकारे ते उखने सहन करे, ते शय्या परिसह १५ अकोस एटले थाक्रोश परिसह ते पूर्वोक्त श- य्याये रहेलाने शय्यातर एटले शय्याना आपनार अ- थवा वीजो आक्रोश करे, माटे शय्या पठी वारमो याकोश परिसह गएयो ठे ते एवी रीते के, क्रोधने . (७) वश थएलो को अज्ञानी पुरुप कोश् यतिने तिरस्का- रना वचन बोले, तेने देखी तेनी उपर दृढ प्रहारीनी पेरे कोप करे नहि, परतु एवं विचारे के था पुरुप, खराने वास्ते मने अनिष्ट वचन कहे, ए महारो उ- पकारी ठे कारण के मने ते या प्रमाणे शिखामण आपे ठे, तेथी हुँ एवु काम फरीथी करीश नहीं थ- थवा ते पुरुष जे कहे ते तेदु करतो नथी, तथापि महारे एनी उपर कोप करवो ते युक्त नथी, एम चिं. तवी क्रोध न करे एम सम्यक् रीते आक्रोश सहन करे. १३ वह एटले वध परिसह ते पूर्वोक्त थाक्रोशनो करनार जे होय, ते वध पण करे, माटे थाक्रोश पठी तेरमो वधपरिसह गएयो , तिहा कोऽ पुरात्मा आची ने साधुने ढीका, पाटु, चावक, कशादिकना आकरा प्र- हार करे, अथवा वध करे, तोपण खधकसूरिना शि- प्योनी पेचे तेना उपर विलकुल रोप थाणे नहि, परतु अकलुपित चित्तवत थको एवी चितवना करे, केएम- हारु शरीरतो पुजलरूप , एतो अवश्य नाशवत , (नए) अने मारो आत्मा तो ए थकी जुदोज , कारण के श्रात्मानो तो कोइ नाश करी शकेज नहि तोआ श- रीरना संवधी मने जे दुःख थाय , तेतो मारां करेला कर्म उदय थव्यां ठे, तेनु ए फल ठे एवी रीते वध परिसहने सहन करे १४ जायणा एटले याचना परिसह. ते पूर्वोक्त उ- परथी दणाणाने ओपधादिकनी याचना करवार्नु प्रयोजन थाय, माटे वध पठी चौदमो याचना प- रिसह गण्यो वे जे वीजा पासेयो याचीये तेने याचना कहीये ते आ प्रमाणे.- यतिये वस्त्र, पात्र, अन्न, पान, उपाश्रय,प्रमुख को- ३ पण चोज अर्थात् एक शली जेटली चीज पण माग्या विना लेवी नहि तो पण पोतानी शोला रा- खवाने अर्थे मागे नहि, तथापि पोतानु प्रयोजन हो- य त्यारे लळा मीने याचना करे परतु रांधेला धा- पने अर्थ लला माणसने घेर जा याचना करवी एवं चितवे नहि. ते करतां तो गृहस्थावासमा रहेवू (एक) जनलु, के ज्यां श्रापणा जुज दमना पराक्रमथी उपजाव्यु जे अन्न, ते दीनहीनादिकने आपी, पठी जमीये, एवी विचारणा करीने गृहस्थपणाने श्छे नदि,अथवा याचना करता कोश्यापशे किवा नदि आपशे ? तो हु या गृहस्थने घेर जश् लासनो मर्म गमावीने शीरीते याचना करुं? इत्यादिक चितवना न करता याचना करे ॥२७॥ गाथा २७ मीना दृटा शब्दना अर्थ पन्ना-पा रोगराग अनाण-अज्ञान तणफासाम्तृणस्पर्श सम्मत्तम्सम्यक्त मलमल सकार-सत्कार वावीसचावीस परीसहा-परिसह (ए शन्द. परीमहापरिसह धाने लगामवो) अलान रोग तणफासा, मल सकार परी- सहा ॥ पन्ना अन्नाण सम्मत्त, श्अ बावीस परीसदा ॥ ॥ अलाजम्पलाज श्य-ए मकारे
(ए)
शब्दार्थ:-अलान, रोग, तृणस्पर्श. मल, सत्कार, मझा, अज्ञाना
अने सम्पक्स ए पकारे वावीस परिसह जाणवा.
विस्तारार्थ-२५अलान एटले अलान परिसह तेपूर्वोक्त
याचना कर्या उतां पण लालांतरायना उदयथी माग्यां
उता पण मले नही, माटे याचना पठी पदरमोथला-
न परिसह गण्यो वे ते था प्रमाणेः-साधुने को
पण चीजनी श्वा होय अने ते वस्तु गृहस्थना घरमां
पण घणीज होय पण ज्यारे ते मागवा जाय उतां
गृहस्य आपे नहि त्यारे ढढण कुमारनी पेठे उद्वेग
करे नही, विपाद न करे मुखराग फेरवे नही, न
आपनारनु मातु चितवे नहि, दुर्वचन चोले नहीअने
समता धारण करी विचार करे के आज नहि मत्यु
तो काले मलशे ज्यारे मलो त्यारे लश्शू ए प्रमाणे
असान परिसह सहन करे
१६ रोग एटले रोग परिसह ते पूर्वोक्त अलान
थकी आतप्रात नोजने करी रोगनी उत्पत्ति थाय,
माटे असान पनी सोलमो रोग परिसह गण्यो .
तिहा साधुने ज्यारे कास, श्वास, ज्वर, अतिसारा- दिक रोग उत्पन्न थाय, त्यारे जे गवाहिर जिन- कल्पी साधु होय, ते तो चिकित्सा करवानी श्या पण करे नहीं, अने पोताना कर्मनो विपाक चितवे, परतु स्थविरकल्पी गहवासी साधु तो थागममा कदेला विधिये करी निरवद्य चिकित्सा करावे मनमा कर्म विपाक चितवतो रहे, पण हायवोय करे नहीं, जो अत्यत वेदना थती होय, तो पण वार्तध्यान करे नहि परतु सनत्कुमारनी पेठे रुमी रीते वेदना सहन करे १७ तण फासा एटले तृणस्पर्श परिसह ते पुणे- त रोगीने शय्यामा सूता थका तृणस्पर्श थाय, माटे रोग परिसह पठी सत्तरमो तृणस्पर्श परिसह ग- ण्यो वे तिहा गवनिर्गत साधुने तृणनाज सथारो कह्यो, पण गमवासी साधुने तो सापेक्ष सयम थाय ठे, माटे ते वस्र पण लेठे परतु ज्यारे जमीन नानी होय अथवा बन जुनु थयु होय अथवा चोरे (ए३) चोरी ली, होय, त्यारे माननो श्रढी हाथ प्रमाण संथारो करे पण तृणना अग्रताग तीखा होय, ते शरीरने लागे, तेथी पीमा उत्पन्न थाय तो पण मु.ख चितवे नहि अने समाधिनो त्याग पण करे नहीं १७ मल एटले मल परिसह, ते पुर्वे कहेला तृण स्पर्श करी परसेवाने सयोगे मल उपजे, माटे तृण पली अढारमो मल परिसह गण्यो वे अहींयां परसे- वाना पाणी वमे साधुना शरीरमा रजनो कविण मेल बधाइ जाय, ते मेल जपणकालनां ताप वो परसेवाथी नीजाश्ने दुर्गधे गधाय, तो पण ते दुर्ग- धताने दूर करवा सारु स्नानादिकनी श्वा करे नहीं वली ए थको क्यारे हु मुक्त यश एवी चित- वना पण करे नहीं १ए सकार एटले सत्कार परिसह ते पुर्वोक्त मल व्याप्त पुरुप, को पवित्र अगवालानो सत्कार थतो देखी काश्क पोते पण सत्कारादिकनी वांग करे, (एव) माटे मल पनी उंगणीसमो सत्कार परिसह गण्यो ते ते या प्रमाणे. साधुने कोश्ए स्तवन, नमन, च- रणस्पर्श, सन्मुस जवु, उजु थावु, आसन देवु, अशनादिकनु दान देवु, अथवा को मोटा राजा दिके निमत्रणादिकनु करवं, एवो सत्कार पोताने थतो देखीने मनमा हर्य आणे नहिं, अने सत्कार न थवाथी मनमा खेद पण पामे नहीं २० पन्ना एटले प्रज्ञा परिसह ते पूर्वोक्त सत्कारना जयथीप्रझाने वाहूल्ये गर्व न करवो तेमज प्रज्ञाने थ- नावे खेद पण करे नहीं माटे सत्कार पठी वीसमो प्रज्ञा परिसह गण्यो , ते श्रा प्रमाणे जेणे करीव. स्तुनु तन (प्र) एटले प्रकर्षे करी (5) एटले ज- गाय, तेने प्रज्ञा कहिए, ते प्रज्ञावत साधु, घणा श्रुत- नो जाण उता में नवातरने विषे रुमी रीते ज्ञान था- राधन कयु , माटे हु समस्त मनुष्योमा जाण तु, सर्वेना पूठेला प्रश्नोना उत्तर हु आपुलु ? एवो गर्वन करे, अने प्रज्ञाने अन्नावे मनमा उद्वेग पण न करे, ते , (ए) एमके, हु मूर्ख हुँ, कांश पण जाणतो नथी, सर्वने परानपर्नु स्थानक तु, कोइए पूठयां थकां जीवादि पदार्थनां नाम पण जाणतो नथी, एवी दीनता मन- मा न करे, परंतु पूर्वे करेला कर्मनुं स्वरूप चिंतत्रे, तो परिसह पीमे नहि. २१ अन्नाण एटले अज्ञान परिसह ते पूर्वोक्त प्रज्ञा- नोपेरे अज्ञान पण सहन करवु, माटे प्रज्ञा पठी एक- बीशमो अज्ञान परिसह गण्यो ठे. श्रुतझानथी वस्तु- नु तत्व जणाय डे, अने तेनो जे अन्नाव ते अज्ञान प- रिसद कहीए ते आवीरीते -साधु मनमा एमन जाणे, जे मे अतिपणु त्यागीने बतिपणु अंगीकार कर्यु , तोपण हु कां पण जाणतो नथी, तेमज में नद्रा महा- नादिक तप पमिवज्यां तथा उपधान जे श्रायविल प्रमुख अने मासिकादिक प्रतिमा वही,एवी रीते कि- याये हुँ चालुलु, तो पण हुँ सारु मातुं कांश जाणतो नथी केमके हु आगम शान रहित ९, माटे निरक्षर ऋदिलर एवामने धिक्कार .एवी दीनता न करे,परंतु २ (ए) हवे सात परिसह चारित्र मोहनीयना उदयथी थाय , ते कदे - १ क्रोधना उदयथी आक्रोशपरिसह थाय ठे. २ अरति परिसह ते थरति मोहनीयना उद- यथी थाय ठे ३ पुरुष वेदना उदयथी स्त्रीपरिसह थाय ले. ५ नैपेधिकी परिसह ते नय मोहनीयना उद- यथी थाय ने ५ जुगुप्सा मोदनीयना उदयथी अचेलक परि- सह थाय ठे ६ याचना परिसह ते मान मोहनीयना उद- यथी थाय ठे 9 लोन मोहनीयना उदयश्री सत्कार पुरुषकार प- रिसह थाय ठे तथा १ दुधा, शपिपासा, ३शीत, ४ उष्ण, ५ दंश, ६ चयी, ७ शय्या, ७ मल, ए वध, १० रोग, ११ तृण- स्पर्श, ए अगीयार परिसह, वेदनीय कर्मना उदयथी (एए) 'थाय ठे, शेष कर्मोने विषे परिसहनो अवतार नथी. एक वावीस यया. हवे चोद गुणगणाने विपे परिसहोने समवतारी देखामे , तिहां ए क्षुधादिक वावीसे परिसह यावत् बादर सपराय नामा नवमा गुणगणा सुधी थाय ठे, अने सूक्ष्म सपराय नामा दसमे गुणगणे ता पूर्वो- क्त चारित्र मोहनीयना क्षयोपशमना प्रतिवधयो त- था सात परिसह तथा एक दर्शन मोहनीय प्रतिवद्ध मलीने आउ परिसह न थाय, शेष क्रुधादिक अनुक्र- मे पांच परिसह, ६ चर्या, ७ शय्या, ७ वध, ए अला- न, १० रोग, ११ तृणस्पर्श, १५ मल, १३ प्रज्ञा, २५ अज्ञान, ए चौद थायवे वली अगीयारमा उप- शातमोह अने वारमा क्षीणमोह गुणगाणे पण पूर्वे कहेला चौद परिसहज थाय ठे हवे तेरमे सयोगी तथा चौदमे अयोगी ए वे गुणगणे तो अनुक्रमे दु- धादिक पाच, ६ चर्या, ७ वध, G मल, शय्या, १० रोग, ११ तृण स्पर्श ए अगीयार परिसह मान वेद- (१००) नीय कर्मना प्रतिवद्धथी थाय ठे ए वावीस परिसह मांदेली शीत थने उप्ण तया चर्या के० (चालवु) बने निपिद्या के० (रहेबु) ए चारे समकाले वर्ने नहिं, परतु एना प्रतिपक्षी वे परिसह समकाले वर्ते, माटे उत्कृष्टथी एक प्राणीने विपे स. मकाले वीसपरिसहनो उदय थाय, अने जघन्यथी तो शीत अथवा उष्ण तथा चर्या अथवा निपिद्या, ए चार माहेला एकनोज उदय थाय, केमके ज्या- शोत होय, त्या उप्ण न होय अने ज्या चर्या होय त्या निषिद्या न होय इत्यादिक माहेलो एक थका देनो अन्नाव होय ए परिसह माहेलो एक स्त्री, वी. जो प्रज्ञा, त्रीजो सत्कार, ए त्रण परिसह, अनुकुल जाणवा अने शेप उगणोश परिसह प्रतिकूल जाण- वा. वली स्त्री, तथा सत्कार ए वे नाव शीतल परि- सह के, अने शेष परिसह उष्ण ने, इति परिलह विचार सपूर्ण ॥
खती मा. (१०१) गाथा श्ए मीना टूटा शब्दना अर्थ. बोधव जाणवा अजव आर्यन सच्च-सत्य. मदव-मार्दव सोअ-शीच. मुनी मुक्ति. अकिंचण अकिंचन. तवन्नप. बजम्ब्रह्मचर्य सजम-सयम. जश्चम्मोन्यतिधर्म खंती मद्दव अजय, मुत्ती तव संजमेष बोधवे ॥ सच्चं सोअ आकिं, चणं च बंनं च जर धम्मो ॥२५॥ शब्दार्थ:-क्षमा, मार्दव, आनंव, मुक्ति, नप, सयम, सत्य, शौच अकिंचन अने ब्रह्मचर्य ए दस प्रकारे यतिधर्म जाणवो. विस्तारार्थ -क्रोधनो जे अन्नाव, ते पहेलो (खती) एटले क्षमाधर्म माननो जे त्याग ते (मद्दव) एटले मार्दव धर्म, माया एटले कपट तेनो जे त्याग ते जोजो (अव) एटले आर्यव धर्म, निलोन्नता ते चोथो (मत्ती) एटले मुक्ति धर्म, पांचमो (तव) एटले तपो धर्म ते श्वानो निरोध करवो प्राणा- (१०२) तिपातादिक पाचनु जे विरमण, तथा पाच जि योनो निग्रह, चार कपायनो जय, अने त्रण दंग- नी निवृत्ति ए सत्तर नेदे हो (संजमे) एटले सयम धर्म सत्य बोलवु ते सातमो (सञ्चं) एटले सत्य धर्म तथा हाथ पग प्रमुख जे शरीरना अवयवो पवित्र राखवा अनेनात पाणी प्रमुख वेतालीश दोप रहित आहार लेवो, ते सर्व अव्यथी शौच थने था- स्माना जे शुद्ध अध्यवसाय कपायादिके रहित शुद्ध परिणामनी वृद्धि ते नाव शोच, अथवा मन, वचन, अने कायाने शुद्ध राखवा, संयमने विषे निरतिचार- पणु तथा जीव अदत्त, स्वामी अदत्त, गुरु अदत्त, अने तीर्थकर अदत्त, ए चार प्रकारनी चोरीनोत्याग करवो, ते थाउमो (सोथ) एटले शीच धर्म सम- स्त परिग्रह त्याग रूप मुर्ण रहित थबु, ते नवमी (अकिचण) एटले अकिंचन धर्म नव प्रकारे औ- दारिक, अने नव प्रकारे वैक्रिय सवधी मैथुननो त्याग करवो, ते दसमो (धन) एटले ब्रह्मचर्य धर्म एवी रीते (जधम्मो) एटले यतिनो धर्म (११०३) ते उपर देखामेला दस प्रकारनो (बोधवे) एटखें जाणवो ए दश गुणे सहित होय, ते यति जाणवो. आ आर्यामां त्रण चकार ठे, ते पाद पूर्णार्थ तथा उन्नयान्वयी अव्यय .॥ ए॥ गाथा ३० मीना बूटा शब्दना अर्थ पढममयम. असुश्च-अशुचित अणिव-अनित्य आसव-आश्रय. असरण-अशरण. सबरोन्सवर. संसारो ससार तह-तेमज. एगया-एकत्व. निडरा-निर्जरा अमत्तम्-अन्यत्व नवमी-नवमी हवे वार नाववानु वर्णन करे - पढम मणिच्च मसरणं, संसारो एगयाय अमत्तं ॥ असुश्त्तं आसवसं, वरो अ तह नि जारा नवमी॥३०॥ शन्दार्थ:-पहेली अनित्य, वीजी असरण, त्रीजी ससार, चोयी एकत्व, पाचमो अन्यत्र, ठी अमुचित्व, सातमी आश्रव, आठमी सबर, तेमज नरमी निर्जरा लावना जाणवी.
(१०४)
विस्तारार्थ.-(पढम) एटले प्रथम (अपिच्चं) एटले
अनित्य नावना ते लक्ष्मी, यौवन, कुटुव, परिवार,
तथा बाउखा प्रमुखने विवेजे अनित्यतानी नावना
करवी, एटले ससारना सर्व पदार्थ ते कुशाग्रस्थ
जल विंदुनीपरे अनित्य अस्थिर जाणे
२ (असरण) एटले अशरण नावना
मरण समये चक्रवत्ती, स, अथवा तीर्थकर
प्रमुख गमे तेवो मोटो पुरुष होय, तेने पण धन
कुटुवादिक कोश्नु शरण मलतु नयी, ससारमाहे
जन्म, जरा, अने मरणना नयथी राखवाने एक
धर्म विना वीजु कोइ शरण नथी, एवी जे जा-
वना करवी, ते
३ (ससारो) एटले ससार नावना
माता ते स्त्री याय, स्त्री ते माता थाय, पिता
ते पुत्र थाय, पुत्र ते पिताथाय, श्यादिक या जीवे
ससारने विपे सर्व नावनो अनुन्नव को ठे, एवी
जे लावना करवी, ते.
" (१०५) ४ (एगयार्य) एटले एकता नावना ते श्रा जीव संसारमा एकलो आव्यो, एकलो जशे अने एकलो सुख तथा ऽख लोगवशे. परंतु कोई साथी थवानो नयी एवी जे नावना करवीते. ५ (श्रणत) एटले अन्यत्व नावना ते आत्मा ज्ञान स्वरूप , अने शरीर जमठे माटे परस्पर निन, आत्मा ते शरीर नथी ने शरीर ते थात्मा नथी, आत्माथी शरीर अन्य , तेमज धन तथास्व- जनादिक पण अन्य ठे, एवीजे नावना करवी ते. ६ (असुश्त्त) एटले अशुचित्त नावना ते रस, सधिर, मांस मेद अस्थि मजा वीर्य परु तथा आंतर मा इत्यादिक अमेध्य वस्तुथी शरीर नरेढुंठे अने जेना नव द्वारो सदा घरना खालनी पेठे वदेता रहे है. ए शरीर को काले पण पवित्र होतुं नथी एवी नावना करवी ते ७ (आसव) एटले आश्रव नावना ते मिथ्या- स, अविरति, प्रमाद, कपाय तथा योग, ए पांच
(१०६)
प्रकारना आवे करीने कर्म वधाय अथवा दया
दानादिके करि शुन कर्म बंधाय ते अने विषय क.
पायादिके करी अशुन्न कर्म वधाय , एवी ना-
वना करवी ते
७ (सवरों) एटखे सवर नावना ते जे जे सवर
थकी जे जे श्रव रोकाय, ते ते आश्रवनु रोकवु,
अने ते ते सवरनु जे आदरखु, एटले जेम क्षमादिक
संवरको क्रोधादिक आश्रव रोकाय ठे, त्यादिक
नावना करवी
ए (पिजरा) एटले निर्जरा नावना ते (तह)
एटले तेमज सकीर्ण स्थानकने योगे जेम थाम्रफल
पाके ठे तेम वार प्रकारना तप करीने कर्मने पचा-
व अर्थात् पूर्वे सचेला कर्मनु सामवु, ते रूप निऊ-
रा, सकाम अने काम ए वे नेदेठे एवी नावना
करवी आ गाथामा वे चकार वे ते पाद पूर्णार्थ तथा
उन्नयान्वयी अव्यय ठे ॥३०॥
(१०७) गाथा ३१ मीना छूटा शब्दोना अर्थ. लोगसहावी लोक स्वनाव. अरिहा अरिहतादिक. बोडी बोधी. एमाओ-ए. अलहा-उर्सन. जावणामोनावनाओ. धम्मस्स-धर्मना. जावयवा-नावी साहगा-साधक पयत्तेण-मयले करीने. लोगसदावो बोही, उल्लहा धम्मस्स सा- हगा अरिदा ॥ एआज नावणाने, नावेअचा पयत्तणं ॥३॥ शब्दार्य-दसमी लोक स्वनाव, अग्यारमी बोधी उखन, वा- रमी धर्मना साफ अरिहत मलवा उर्खन . ए नावना प्रयत्न करीने जाववी विस्तारार्थ.-दसमी (लोगसहावो) एटले लोकस्व- नाव नावना ते केम उपर वे हाथ दश्ने तथा वन्ने पग पसारीने उन्लेला पुरुपना जेवो जेनो समथाकार पम् अव्यात्मक , पूर्व पर्याय विणसे नवा पर्याय - त्पन्न थाय, अने व्यपणे निश्चल होय,उत्पाद व्यय, तथा ध्रौव्य स्वरूप चौद राजलोक . तेनु नीचेनू (१०७) तलीयु उधा वालेला मलक (चपणीया) सरखु . तथा मध्य नाग मालर सरखो , अने उपरनो नाग मृदंग सरखो एवो शाश्वत वे इत्यादिक लोक स्व- रूपनी नावना करवी अगियारमी (चोही एटले) वोधि पुर्वन्न नावना ते जीवने ससारमा नमतां अनता पुजल परावर्त यश् गया, तेमा अनतीवार च. कादिक जेवी शद्धि प्राप्त यश, तथा यथा प्रवृ- त्तिकरणने योगे करी अकाम निर्जराव पुन्यना प्र- योगथी मनुष्य नव, आर्य देश, निरोगीपणु तथा धर्मश्रवणादिकनी प्राप्ती था, तथापि सम्यक्त्व प्राप्त थवु अति दुर्लन्न , एवी नावना करवी ते अने जे दु खे करीने तरी शकाय एवा ससार समुखमाथी तारवाने वहाण समान ते श्री जिनेश्वर नगवाने कहेलो दस प्रकारनो जे क्षमादिक शुद्ध धर्म, तथा ज्ञान, दर्शन, चारित्र, ए रत्नत्रयात्मक धर्म, ते पामवो दुर्लन ने तथा ते धर्मना (साह- गा) एटले साधक (अरिदा) एटले थरिहतादिक ते पण था ससारने विपे पामवा (दुलहा) एटले (१०ए) उर्लन लें एवं जे चितव, ते वारमो (धम्मस्स) एटले धर्मनी नावना ए रीते सम्यग् दृष्टिये ( पय- ण) एटले उद्यमे करीने (ए थान) एटले ए कहेली (लावणा) एटले वार नावना तेने प्रमाद- रहित थश्ने शुद्ध मने करी (नाचे अव्वा) एटले नावबी,तथा पाच महानतमाहेली एकेका महानतनी पांच पांच नावना मलीने पञ्चीश नावना ते पण एमां अताव ले तथा मेत्रो, प्रमोद, कारुण्य अने उपेक्षा ए चारनी साथे पूर्वोक्त वार नावना मेलवि- ये ते वारे सोल नावना थाय ठे तेनो विचार जपा- ध्याय श्री विनविजयजीकृत शात सुधारस ग्रंथ थकी विस्तारे जाणवो॥३१॥ गाथा ३२ मोना यूटा शब्दना अर्थ. सामाश्-सामायिक वी-बीजु. अय्य-अहीमा परिहारविमुघीय परिहारविधुदि पढम-पहेलु मुहुम-मूक्ष्म. योवारणछेदोपस्थपनीय तह तेमन जन्ने.. सपगय-सपराय + (१९०) हवे पाच प्रकारना चारित्रनु वर्णन करे ते समाइ अचपढम, वेबछावणं नवेवी- अपरिहार विसुद्धीअं, सुहुमं तह संप- रायं च ॥ ३३॥ शब्दार्थ -अहिं पलु सामायक, वो दोपस्यापनीय, त्रीजु परिहारविशुदि अने तेमज चोयु मदमसपराय चारित्र. विस्तारार्थ -या उपर कहेला पाच चारित्रमा (अछ) एटले अहीसा ( पढम) एटले पहेलु चारित्र (सामा) एटले सामायिक , तेनो अर्थ करे वे. सामायिक ए शब्द सम अने आयिक ए वे पदोनो वनेलो वे अहीं सम एटले रागय रहितपणाने माटे आप एटले गमन प्रयाण ते जिहा ते सम कहिये, ते ज्या उपन्यु ते सामायिक, वली सम ते ज्ञान, दर्शन तथा चारित्र, तेनो यायिक जे लान्न ज्या थाय ठे ए टते जेणे करी ज्ञान, दर्शन, तथा चारित्र, एत्रणेनी प्राप्ति थाय , तेने सर्व सावद्ययोग त्यागरूप, अने नि- रवद्ययोग सेवनरूप सामायिक कहोये. श्रावकने (१९९) देश विरतिरूप सामायिक अने साधुने सर्व सावद्य विरतिरूप सामायिक होय, तेना वेद वे तेमां नरत ऐवतादिक दश क्षेत्रने विपे पहेला तथा ठे- हा जिनना वारामां सर्व विरति सामायिकदंगकनी जच्चार करावे, ते श्वरिक उठगमण कर्या सुधी जे रहे, ते श्वरिक एटले स्वल्पकाल नावी सामायि- क कहीये, अने वचला वावीस जिनोना वारामा तथा माहाविदेह क्षेत्रमा यावत्कथिक एटले सामा- यिक उच्चर्या पठी निरतिचारज पाले , तेथी तेने जामण नहिं होवाने लीधे जाव जीव लगे रहे, माटे यावकथिक चारित्र कहीए. एने सम्यक् चा- रित्र पण कहे वे ए सामायिकचारित्र जीवने प्राप्त यया विना वीजां चारित्रोनो लान्न थाय नहि, माटे एने आदिमा का ठे (वीय) एटले वीजु (ठेउवछावणं) एटले छे दोपस्थापनीय चारित्र (लवे) एटले ठे, ते पूर्वे क- हेला सर्व विरति सामायिक चारित्रने ज वेदादि
(१२)
विशेषपणे विशेषीये, तेवारे शब्दथी तथा अर्थथी
नाना प्रकारपणु नजे, तेवारे वेदोपस्थापनीय चारि-
त्र थाय तिहा ठेद पटले पूर्व पर्यायनो वेद करवो.
अने उपस्थापन एटले गणाधिपे यापेतु पच महा-
व्रत रूपपणु जे महानतने विषे होय, ते वेदोपस्था-
पनीय कहिये, एटले ज्या नवा पर्यायोनु स्थापन
करवु, तथा पच महाबतनो उच्चार कराववो ते पण
वे नेदे एक सातिचार ते मूलगुण घातीने प्रायश्चि-
त रूप अने वीजो निरतिचार, ते श्वर सामायिक
वंत नव दीक्षित शिष्यने उजीवणीया अध्ययन -
एया पठी दोय, तथा वीजो तीर्थ धाश्रयी ते जेम
श्री पार्श्वनाथना तीर्थथी वईनान स्वामीना तीर्थ
यावी चार महानत रूप धर्म त्यागीने पच महानत
रूप धर्म आदरे, तेने होय
३ (परिहार विसुद्धीथ) एटले परिहार विशुद्धि चा
रित्रना पर्याय कहीए बीए तिहां (परिहार) एटले
तपो विशेप, तेणे करी विशुद्धि एटले कर्मनी निर्जरा,
(१३)
जे चारित्रने विषे होय तेने परिहार वैशुद्धिक चा-
रित्र कहीये, ते वे नेदे ले तेमा पहेलुं जे चार जण
विवक्षित चारित्रना आसेवक ए कल्पमा प्रवर्तता
होय तेनु चारित्र ते निर्विपमानसिक परिहार विशु-
द्विक चारित्र जाणवू, अने बीजु जे चार जण तेना
अनुचारी होय तेने निर्विष्टकायिक परिहार विशुद्धि-
क चारित्र जाणवु, ते यावी रीतेः-नव जणानो गह
जूदो नोकले, ते तिर्थकर पासे अथवा, पूर्वे जेणे ती.
थैकर पासेथी ए चारित्र पनिवज्यु होय, तेनी पासे
ए चारित्र पमिवक्के हवे ते नव साधुमा चार जण
परिदारक एटले तपना करनारा थाय, ते निर्विपमा-
नसिक जाणवा, अने चार तेना वैयावञ्चना करनारा
थाय, ते निर्विष्टकायिक जाणवा. तथा एकने वाचना-
चार्य गुरुस्थानके उरावे पठी ते चार परिहारक ठ
मास सुधि तप करे, तेमा ऊष्णकाले जघन्यथी चोथ
मध्यमथी ठह अने उत्कृष्टथी अहम एवु तप करे,अने
शीतकाले जघन्यथी वह मध्यमथीथम,अने उत्कृ-
थी दशम करे, तथा वर्षाकाले जघन्यथी अहम
मध्यमथी दशम, अने उत्कृष्टथी दुवालस तप करे,,
पारणे यांबील कल्प स्थितपणे नित्य करे एमबम--
( १९४) हिना तप करे, ते पठी फरी चार तपस्याना करनार, तेवैयावच्चीया थाय, थनेवैयावच करनारातपिया था- य, ते पण ठ मास लगे तप करे, ते पूर्ण थया पठी जे गुरु यया होय, ते उमहिना तप करे, त्यारे तेथाव मांदेलो एक गुरु थाय,वाकीनावेयावञ्चकरे एम अढार महिना सुधी तप सपूर्ण करी, पठो जिनकल्प थादरे, अथवा गठमा पण थावे. तप जे प्रथम सघयणी, पूर्वधर ल- धिवत होय ते प्रचुर कर्मना परिपाकने अर्थे अगी- कार करे, ए चारित्र, पाच जरत, पांच ऐरवतमा प- हेला थने ठेक्षा तीर्थकरना तीर्थमा होय ए परिहार विशुद्धि चारित्रनो सपथी विचार कह्यो. (तद) एटले तेमज चोथो (सुदुम ) एटले सूक्ष्म वे (सपराय) एटले कपाय ज्या तेने सूदमः संपराय चारित्र कहीये, ते उपशम श्रेणिये कर्म उप- शमावता होय तिहां नवमा गुणगणे लोजना सं- रयाता खम करी तेने उपशम श्रेणिवालो जे होय ते उपशमाने अथवा पक होय ते खपावे ते सं- ख्याता खम मांहेलो जैवारे ठेखो एक खम रहे, तेना असख्याता सूक्ष्म खम करीने, दशमे गुणगणे उपशमावे, अथवा पेक होय ते खपावे, ते दशमा - (१९५०) गुणताणानुं नाम सूक्ष्मसंपराय, अने, चारित्रनुं नाम पण सूक्ष्म संपराय जाणवू ए चारित्र वे दे , एक श्रेणि चढताने विशुद्ध मानसिक होय, बीजोज- पशम श्रेणियी पमताने सलिष्ट मानसिक जाणवू. योपशमिकने ए चारित्र आखा संसारमा पांचवार अने एक नवमां ववार आवे ॥ ३ ॥ गाथा ३३ मीना तूटा शब्दना अर्थ तत्तोतेवार पठी | चरिकण-आचरीने अहरखाय-यथारपात मुविदिया मुविहित साधु- खाय-मसिद्ध अपरामर-अजरामर सबमि समस्त गण-स्यानकने जीवलोगनिम्जीवलोकने विपे । वञ्चतिम्पामने तत्तोष अदरकाय, खायं सर्वमि जीव- लोगंमि ॥ जं चरितण सुविहिआ, वच्चंति अपरामरं ठाण ॥३३॥ शब्दार्य. चली त्यारपठी सर्व लोकमां प्रसिद एवु पाचमु , यथा- ख्यात चारित्र हे के, जे चारित्रने पालो मुविहित पुरुषो मे.- इस्थानने पामे ठे ॥ ३३॥ विस्तारार्थ-(तत्तों) एटले तेवार पठी पांच, (श्रद काय) एटले यथाख्यात चारित्र, ते ज्यां ( एटले यथाविध करीने अकपायपणु अर्थात् ज्यां सं. ज्वलनादिके करी सर्वधारहितपणुं (रयात) एटले कहीये, ते यथाख्यात चारित्र जाणवु तेना ये नेद एक गद्मस्थिक अने वीजु कैवलिक, तिहा उद्म- स्थिक ते व्यस्थ थोपशमिकने अगीयारमे गुणगणे होय, अने रुपकने वारमे गुणगणे होय, वीजो जे केवलीने तेरमे अने चउदमे गुणगणे होय, ते कैव खिक जाणवु ए चारित्र (सबमि) एटले समस्त एवा (जीवलोगमि) एटले जीवलोकने विषे के चे तो के (खाय ) एटले प्रसिद्ध वे हवे ते केवी ते प्रासक ठे ते कहे (ज) एटले जे चारित्र प्रत्ये (चरितण) एटले थाचरीने (सुविहिया) एटले सुनिहित साधु ते (अपरामरगण) एटले अजरा- मर स्थानक प्रत्ये (वचति) एटले पामे ठे, एटखे जन्म, जरा भने मरण तेणे रहित एवु जे मोक्षरूप स्थानक, ते प्रत्ये पामे ॥ ३३ ॥ शंतश्री सवरतत्त्व विचार समाप्त. ॥६॥ गाथा ३४ मीना बूटा शब्दना अर्थ वारधार. वयो-वधतत्व विह-प्रकारे विगप्पो-विकल्पो. जिराय-निर्भरा पपईन्मकृति. चन-चार तवोप + हि स्थिति जेपहिलेदवडे. अणुनाग-अनुनागरस. नायचो-जाणवो. पएस-प्रदेश अथ निर्धारातच विचारः प्रारज्यते ॥ वारसविदं तवो नि,काराय बंधो चल विग- प्पो अ॥पयई हिअणुनाग, पएस नेएदि नायबो॥ ३४॥ शब्दार्य-या उपर कहेलो बार मकारनो तप ते निर्जरा जाणवो. अने वध ते चार प्रकारनो ठे, ते प्रकृतिवध, स्थितिषध, अनु- जागवध अने प्रदेशवध एवा लेदोए कीने जाणवो ॥३॥ विस्तारार्थ.-गाथाना पूर्वार्द्धमाना एकएक वाक्येकरी निर्जरातत्वनु वर्णन करे . निर्जराना वे प्रकार वे एक अव्य निर्जरा, वीजी नाव निर्जरा, तथा सकाम अने अकाम एका वेनेदे पण निर्जरा ठे, ते कहे - अव्यनिर्जरा एटलेपुगलकर्मनु सामवुअनेयात्माना शुद्ध परिणामे करी कर्मनी स्थिति जे पोतानीमेलेपाके. अथवा वार प्रकारना तपेकरी नीरस कर्या एवाजे कर्म परमाणुतेजेनायोसमे,एवाजे आत्माना परिणाम थाय तेनावनिर्जराजाणवी तथा तिर्यचादिकनी पेवेश्चावि- (१७) ना कष्ट सहनकरताकर्मपुजलनुजेक्षपन थाय, तेने छ- व्यनिर्जराअथवाअकामनिर्जराकहीये,अनेसयमीथकां वार प्रकारना तपे करी कष्ट सहन कर्या थकी जे कर्म परमाणुउनु पण करवु अथवा साम्बु,तेने नाव नि. ऊरा अथवा सकामनिर्करा कहीये, ए वे निर्जरामा भावनिर्जरा अथवा सकामनिर्जरा श्रेष्ट ठे, ते (णि- ऊराय) एटले निर्जरातत्त्व (वारसविह) एटलेवार प्रकारना (तवा) एटले तप, तेना देकरी का ठे एटले अनादि सवध सर्व कर्मोनु परिशाटन बार प्र- कारना तप कर्याथी थाय ठे, तेनेज सातमु निर्जरा तत्व कहे ? अथवा (बारस विहतवोणिजराय) ए- टले वार प्रकारनो तप जे आगली गाथाये कद्देशे, ते तप, निर्धाराने अर्थे । हवे गाथाना पूर्वार्द्धमाना "वधो” ए शब्दथी बधतत्वनो आरन थाय ठे, (वधी) एटले वयतत्व एटले कर्मनु बांधवु ते (चविगप्पो) एटले चार नेदे , ते आ प्रमाणे १ (पयई) एटले प्रकृतिबंध ते कर्मनु स्वन्नाव परिणमन रूपले २ (क) एटले स्थिति एटले स्थितिबंध,ते क- .
(२१ए)) मर्नु कालपरिमाण रूप . ३ (अणुन्नाग) एटले अनुन्नागवंध, ते कर्मनुं ती- व मंदादि रसपरिमाणरूप ने ४ (पएस) एटले प्रदेश एटले प्रदेशबंध ते कर्म पुदगलना प्रदेश परिमाणरूप . ए चार (नेएदि) एटले नेदोए करीने वधतत्वने सम्यक्दृष्टि जीवे (नायबो) एटले जाणवो॥ ३४ ॥ गाथा ३५ मीना तुटा शब्दना अर्थ. असणअनशन सलिण्यासलिनता ऊणोमरिया कणोदरिका. वज्जो वाद्य. विचीसखवणचिसकेप तवो-तप. रसचाओ-रसत्याग होई-ठे. कायकिलेसो-कायहेश अणसण मूणोअरिया, वित्तीसंखेवणं र- सच्चान॥ कायकिलेसो सलि, एआय बजो तवो होई ॥ ३५॥ शब्दार्य: अनशन, उनोदरिका, वृत्तिसकेप, रसत्याग, कायक्लेश, अने सलीनता ए ठ प्रकारे वाह्य तप होय हे विस्तारार्थः-पहेलु (अणसण) एटले अनशन तप ते थाहारनुं त्याग कर, तेना बे नेद ठे-एक श्व -
(१०)
श्रने धीजो यावत्कथिक. तिहां खा तीर्थकरने वारे
बक, अहमादिकथी मामीने मासी पर्यत, अनेक वि-
धिये जे नियमयुक्त श्रनशननो त्याग करखो, ते श्वर
अनशन कहीये
अने यावत्कथिक ते जावजीव अनशन ग्रहणरूप
तेनावेद -
एक पादोपगम, वीजु नत्त पञ्चरस्काण ए वन्नेना
वली निहारिम अने अनिहारिम, ए वे बे नेद ने,
तिहा अनशन कीधा पठी शरीरने वाहिर काढवु
पमे, ते निहारिम अने अनशन कीधा पठी तेहिज
स्थानके रदेवु, परतु शरीरने त्याथी बहार काढवू न
पमे, गुफादिक माहिज राखवु पमे, ते अनिहारिम.
वीजु (उणोअरिथा) एटले जणोदरिका तप ते
अशन प्रमुखनी न्यूनता करवी, तेना वेज्नेद वे एक
व्यथी, वीजु जावयी, तेमाना इव्य जणोदरिना वे
नेद वे एक उपकरणनो न्यूनता करवो चीजु नात
पापोनो न्यूनता करवी तथा नावथी जणोदरी ते
रागादिक क्रोधादिक अप करवा, एटले तेनी
न्यूनता करवी
त्रीजु (वित्तीसखेवण) एटले वृत्ती सक्षेप तप तेना
(११) पर नेद है. एक अव्यथी, वीजु क्षेत्रथी, त्रीजु का- थी, अने चोथु नावथी. ए चार प्रकारे वृत्ति एटले माजीविका तेनो संदेप करवो, एटले अन्निग्रह क- चा नियमादिक धारवा. चोथु (रसञ्चार्ज) एटले रस त्याग तेनीवी तथा वीलप्रमुखनुकर, विगयादिक रसनोत्याग करवो. पांचU (कायकिलेसो) एटले कायक्लेश तपते सोचादिक कष्टनु सहन करवु, कायोत्सर्ग करवो,तथा उत्कटादिक वासननु करवू ब्तु (संलीया) एटले सलीनता तप ते अंगो- पांगादिकनु सवरलु, गोपन कर तेना चार नेद. पहेलु इजिय सलीनता, वीजु कपाय सलीनता, त्री. जु योग सलीनता अने चोथु विविक्त चर्या सलीनता, एटले एकांत वस्तीये रहेतु ए रीते ठ प्रकारनो वाह्य तप, ते सर्वथी तथा देशथी एवा वे नेदे जाणवू जे कप्टने मिथ्यात्वीयो पण तप करी माने, जेने लोक पण देखी शके ठे, जेथी कष्ट घणु ने लान अल्प थाय, अने वाह्य शरीरने तपावे, तेथी ए ठ प्रकारनो (वडो) एटले वाह्य (तवो) एटले तप ( होइ) एटले . .
तो-तप. (१२) गाथा ३६ मीना वृटा शब्दोना थर्थ. 'पायचित्त-प्रायश्चित डाण-ध्यान. विणमो-विनय जस्सग्गोविय-कायोत्सर्ग वेयावच-पैयाहत्य अल्लितरओ-अन्यतर तहेव-तेमन. 'सजायो-स्वाध्याय होई-३ प्रकारना अन्यतर तपनु कथन करे ठे पायवित्तं विणन, वेयावच्चं तदेव सजा- न॥ जाणं जस्सग्गोवित्र, अग्निंतर तवो होई॥ ३६॥ शब्दार्थ -मायश्चित, विनय, वैयाढत्य, तेमज स्वाध्याय, ध्यान अने कायोत्सर्ग ए अन्यतर तप होय डे ॥ ३६॥ विस्तारार्थ- पहेन्बु ( पायचित्त) एटले प्रायश्चित तप ते करेला अपराधनी शुद्धि करवी, कोइलागेलादोपने गुरु आगल कपटरहितपणे प्रकाश करी तेनी गुरु पासे बालोयणा लेवी तेना दस नेद वे मात्र गुरुनी आगल'पोताना करेला अपराधनु कथन करवु, तथा गोचरी प्रमुखनु जे आलोचतु ते १ थालोचन प्रायश्चित पूज्या विना मातहें प्र- मुख परग्ववाथी मिठामि उक्कम देवु ते प्रतिक्रमण प्रायश्चित. शब्दादिक विषय उपर रागादिक कर्याथी तेनुं बालोचन करवू, अने वीजें मिछामि कम पण देवू, एटले वन्नेवानां करवां ते. ३मश्रप्रायश्चित अशद्ध जात पाणी प्रमुखनो त्याग करवो ते ४ विवेक प्रायश्चित ५ कायोत्सर्ग प्रायश्चित ते कुस्वप्न दीवाथी का- योत्सर्ग करवो ६ तप प्रायश्चित्त ते पृथ्वीकाय प्रमुखनो सघट थ- वाथी नीवी प्रमुख जे मासी पर्यंत तप करवो वेद प्रायश्चित्त ते पृथिवि आदिकनो सघट थ- वाथी कांक दीक्षा पर्यायनी न्युनता थइ होय, ते अपराधनु निवारण करवा माटे जे दुर्दम तप करवाते. ७ मुल प्रायश्चित ते मूल गुण जग थवाथी सर्व- थावत पर्यायर्नु वेदन थवाथी फरी जेमहाबत खेवांते. ए'अनवस्थाप्य प्रायश्चित ते अति सक्लिष्ट परि- पामे करी कोनो घात पात थई गयो होय, तो सूत्रोमां कहेला विधि प्रमाणे तप करवो थने त्यार पठी फरी महानतनो जे थारोप करवो ते ११० पारांचित्त प्रायश्चित एटले
थाववु ते
(१२४)
राजानी राणी प्रमुख स्त्रीने विपे संभोग थयाथी
चार वर्ष पर्यंत क्रिया सहित अने सिंगादिक नेदे
रहित तीर्थ प्रत्नावना करी, फरी दीक्षा लश् गठमा
वीज (विण) एटले विनय तप ते गुणवता-
दिकनीक्ति करवी,तथा अशातना टालवी, इत्या-
दिक एना सात नेद वे तेमा प्रथम शाननो विनय,
पाच नेते
१नक्ति विनय ते मत्यादि पाच प्रकारना शाननी
बाह्यथी सेवा करवी ते
र बहु मान विनय ते पाचे ज्ञाननु अतरग प्रीति
सहित वहुमान करखु ते
३ जावना विनय एटले पाचे झाने करी दीला
जाणेला पदार्थोनी सम्यक् प्रकारे जे अनुजवथी
नावना करवी ते
४ विधि ग्रहण विनय ते पाचे ज्ञाननु विधिये
करी ग्रहण करखु ते
५ अभ्यास विनय ते पाचे ज्ञाननो जे अन्यास
करवो ते
वीजो दर्शननो विनय वे प्रकारे ठे उचित कि-
(१२५) यार्नु साचवद् ते पहेलो शुश्रूषा विनय अनुचित क्रियाथी निवृत्तबु ते अथवा आशातना करवी नहीं ते, वीजो अनाशातना विनय एवी रीते दर्श- ननो विनय वे प्रकारे ए वे प्रकारनो विनय कोने विपे करवो ते कहे जे जे साधु अथवा साधर्मी पोताथो दर्शन गुणे करी अधिक होय, तेने विफे शुश्रूपा बिनय करवो ते शुश्रूपानुं स्वरूप दश प्र- कारे २ ते कहे ठे १ सत्कार एटले स्तवन तथा वंदनादिक करवां, २ अन्यवान एटले आसनथी उठवु, ३ सन्मान एटले वस्त्र तथा पात्रादिके करी पूजा करवी ४ आसन परिग्रहण एटले अति आदरे करी - सन लावी आपीने स्वामी आ आसन उपर वेसो, एम मुखथी कहेतु ५ आसननु प्रदान एटले मुखे कहेवुएटज नर्दी पण ते प्रमाणे यासन देव. ६ कृतिकर्म एटखे वदना करवी, ए साधु प्रमुख- नी अपेक्षाये जाणवु. बजली ग्रहण एटले हाथ जोमवा. , (१५६) जावतानी सामे, जबु ए वेलानी (पर्युपासना) एटले सेवा करवी, १० जनाराने वोलाववा जव हवे वीजो अनाशातना विनय तेना पिस्तालीश नेद वे, ते कहे - १ रुपन्नादिक चोवीश तीर्थंकर, २ जिनप्ररूपित धर्म, ३ धर्माचार्य अथवा प्रव्रजाचार्य ४व्याख्यानकरनारतथावाचनानाथापनारवाचक. ५ क्य, पर्याय तथा श्रुत, ए त्रण प्रकारना थिविर. ६ कुल, ते चासादिक एक श्राचार्यनी संतति, गण, ते पोतपोतामा सापेक्ष कुखनो समुदाय कोटिकादिक ७ सघ, ते ज्ञानादिक गुण सहित साधु समुदाय, अथवा गण समुदायरूप तेने विपे ए सानोगिक, ते एक मामलीमा जे साथ व्यव- हार होय ते २० क्रियामा जे पोताना सरखी कियावाला होय ते एमनी साथे मति ज्ञानादिक पाच झान मेलवतां पदर थया तेने विये १थाशातनानो त्याग (१२५) करवो, २नक्ति सहित वटु मान करवू, ३ वता गु- पवर्षवीने यश कीर्ति दीपावबी ए रीते पूर्वोक्त पंदरने एत्रणे गुणता अनाशातना विनयना पिस्ता- लीशलेद थाय ठे त्रीजो चारित्रनो विनय, पांच नेदे ठे, ते कहे के. सामायिक प्रमुख पाच चारित्रोनी सद्दहणा कर- वी, तेमज कायाय करी फरस, आदरखु, पालq. तेमज नव्य प्राणीनी श्रागल प्ररूपणा करवी. त्रण प्रकारना योगनो विनय कहे जे आचार्या- दिकोनो सर्व कालने विपे मन, वचन, तथा कायाये करी विनय करवो एटले मने करी मातु चिंतवद् नहीं, वचने करी मातु वोलवु नहीं, तथा कायाये करी मावी प्रवृत्ति करवी नहीं तेवी रोतेज ते था- चार्यादिकने विपे मन, वचन अने कायाने शुज प्र- वृत्तिनां उदीरवा प्रवविवा ए रीते त्रण प्रकारे यो- गनो विनय ते पूर्वोक्त त्रण विनयनी साथे नेलवतां ठनेद विनयना थया. सातमी लोकोपचार विनय सातन्नेदेठे, ते कड़वे. १ गुरु, प्रमुख जे श्रेठ पुरुष होय तेनी स- मीपे वसवु.
(१७) २ थाराधवा योग्य पुरुपनी श्वाये प्रवर्तवू ३ पोतानी उपर उपकार करे, तेनी उपर पाठो प्रत्युपकार करवो, एटले गुरुने जो हु विनये 'करी प्रसन्न करीश, तो ते मने शास्त्रदान देशे, एवा थ- निसाये करी गुरुन नातपाणी प्रमुख लावी देवू ४ तेमज ज्ञानादिक जे कार्य तेनु कारण जेना- तपाणी प्रमुख, तेनु करवु एटले देदु ५ तथा अखे करी पीमाएला जे ग्लानी तेनी औषधादिके करी गवेपणा करवी ६ तेमज देश अने कालने जाणवा जे अवसरे जे उचित होय ते अवसरे ते कर, वमिलो सवधि सर्व कार्योने विषे अनुकूल- पणुं एटले तेमना कार्य करवामा उजमालपर्ण राखवु शतिनाव एवी रीते लोकोपचार विनय सात प्रकारे ठे एम विनयना सात नेदे करी वीजो विनय तप जाणवु जो के विनय तो एकज , तोपण ज्ञान दर्शन, चारित्र, मन, वचन काया अने लोकोपचार, ए सात विषये करी विनय करीये, तेथी ए वीजो विन- य तप पण सात प्रकारनो कहो. त्रीजु (वेयावच्च) एटले वैयावृत्य तप ते नात (ए) पाणी प्रमुख मेलवी आपवारूप उपटन देय, ते दश प्रकारनाठे यथा-आयरिय उवमाए, और तबस्सी गिलाण सेहाण ॥ ताहम्मी कुल गण सघ, वेयावचं हवइ दसहा ॥ श्राचार्य ते जेनी पासेथी धर्म प्राप्त थाय ने ते. उपाध्याय, ते जे विद्यायल्यास क- रावे ते ते. स्थविर, ते ज्ञान, पर्याय, तथा वय, ए त्रण प्रकारे तपस्वी, ते श्रम प्रमुख तप करनार होय ते. गिलाण ते ग्लान एटले रोगी होय ते सेहाण, ते शिष्य नवी दीक्षा लीधेला होय साहम्मी, ते स मान धर्मवान् होय ते कुज, ते चमादिक कुलवान् दोय ते गण, ते कोटिक प्रमुख. सघते समुदायरूप होय ते एवी रीते ए दशनी अशन, पान, वस्त्र, पात्र, तथा औषध प्रमुखे करी यथायोग्य सेवा करवी तेने त्रीजो वैयावृत्य तप कहे . ( तहेव ) एटले तेमज चोथु (समाज) एटले स्वाध्याय ए नामनु तप, ते पांच न्नेदेठे यथा “वा- यणा पुषणा चेव, तहाय परिघट्टणा, अणुप्पेहा धम्म कहा, सका होइ पचहा" (वायणा) एटले वाचना ते पोते नणबु, शिष्यादिकने नणावतु, तथा वाचवु... (पृधना) ते जे सूनार्थमा सदेह पम्याथी गुरु था (१३०) दिकने पूवु, ते (तहाय) एटले तेवी रीते ज (प- रियणा) एटले परिवर्तना, ते पूर्वे शीखेलो जे अर्थ तेने फरी सन्नारवो ते (थनुप्रेक्षा) ते पू धारेला अर्थनु चितवन करतु ते (धम्मकहा) एटले धर्मसं- वधी कथा कहेवी अथवा धर्मनो उपदेश करवो ए प्रकारे स्वाध्याय तप पाच नेदे थाय ठे, ते कह्यो पाचम् (काण) एटले ध्यान ते मननु एकाग्रताये अवलवन ते ध्यान तप, ते चार दे ठे तेमा पहेलु थार्तध्यान तेना चार नेद वे- माता, मित्र, स्वजन, माता, पिता, सुहृद्, नृत्य,तथा पशु प्रमुख जे पोताने इष्ट एटले अति प्रिय होय तेमनी तथा शातावेदनीय, तेनो वियोग थवाथी जे चिता, शोक,अथवा विलाप करवो,ते पहेलु श्ष्टवियोग था- ध्यान मनने अणगमताजे विषय, अन तेनायाधार- नूत जे गधेमा कोढीयाप्रमुखअशुननो सयोग थवाथी तेने विपे लेप करी, जे वियोगनु चिंतबन करवं ते वीजुअनिष्ट सयोग थार्तध्यान शरीरने विपेको रोग नी उत्पत्ति थयाथो तेनासवधी जे चितादिकनुं करवु, ते त्रीजु रोगचिता आर्तध्यान अमुक समयाव्याथी दुथाकार्यकरीश इत्यादिक-नविष्यकालनीजे शोचना - करवो, तथा दान, शीत, तप प्रमुखे करीने पठीतेना फलनी जे श्ठा करवी, अथवा आ जवने विपे में एवो जपतप को ठे, माटे यावता नवमां मने अमुक वस्तु मलजो एबु जे नियाणु वाधवु, ते चौथु अग्रशौच आर्तध्यान कहीये वीजा रोज ध्यानना चार नेट .- हेपेकरी प्राणीने मारवानीअथवा वधनादिक क- रवानी जे चितवना करवी, ते पहेलु हिंसानुवधी रोज ध्यान.पैशून्यादिक असत्य असद्भूत वचनबोलवाना तथा उसादिक करवानाजे अध्यवसाय, ते वीजु मृषा- नुवधी रोऽध्यान क्रोध तथा लोन्नादिकने वश थश्ने वीजानु अव्य हरण करवानी जे चितवना करवी, ते जीजुस्तेयानुवधी रौऽध्यानते शब्दादिक विषयनु साँ- धननूत जे धन, तेना रक्षण करवाने अर्थे सर्व सं. वधीयोने विषे जे पुष्ट चितवन करखु ते, जेमके जो आ सर्व जीवता हो, तो माझं धन लश् देशे मार्ट जोते मरी जाय, तो सारं थाय एवी जे पुष्ट चितवना करवी, ते चोथु सरक्षणानुबंधी रौऽध्यान कहीये ए थार्त श्रने रौद्र बहुध्यान संसार संबंध फलना देनारले (१३२) त्रीजा धर्मध्यानना चार भेद - झान, दर्शन, चारित्र, तथा वैराग्य नावनाये- करी वीतरागना वचन उपर जे सद्दहणा, एटले श्र- द्धान राखनु, आपणी मति तुठठे पण केवली जा- पित सर्व सत्यज वे, एवी जे चितवना करवी, ते पहेलु श्राझा विचय धर्मध्यान राग देपादिक जे श्रा- श्रव , ते इहलोक परलोकने विपे अपाय नूत एटले अनर्थरूप के, एवी जे चितवना करवी, ते वीजु अ- पायविचय धर्मध्यान सुख उखादिकनो विपाक आवो प्राप्त थयाथी तेनो हर्ष शोक न करता तेने मात्र पूर्वकृत कर्मनु फल जाणवु, ते त्रीजु विपाक विचय धर्मभ्यान चोथु सस्थान विचय धर्मध्यान ते जिनोक्त पम्पव्यना लक्षण सस्थानादिकनी जे चितवना करवी ते चोथा शुक्लध्यानना चार नेद ठे-प्रत्येक अ- व्यने विपे उत्पादि पर्यायना नेदपणानु चितवन करवू, शब्दथी शब्दातरे तथा अर्थथी अर्थातरे अने अव्यथी अव्यातरे सक्रमण करवु, तथा एक योगथी वीजा योगने विषे एटले मनोयोगथी वचनयोगने (१३३) विषे, वचनयोगथी काययोगने विषे संक्रमण करयु, इत्यादिक ते पद्दे पृथक्त्व वितर्क सविचार शुरु- ध्यान ए ध्यान नागिक श्रुत पाठीने त्रणे योग - तां थाय ले ए प्रथम नेद. २ उत्पादादिक एक पर्याये करी निर्वात स्थान- कना दीपकनी पेठे निष्प्रकप चित्तवान् थश्ने पूर्व- लाथी विपरीत रदेवू, ते चीजें एकत्व पृथक्त्वम् विचार शुरु ध्यान ए ध्यान गमे ते एक योग थकां थाय ते. या वे ध्यान, यद्यपि पूर्वगत श्रुतावलंबोने होय , तथापि मरुदेव्यादिकने श्रुत विना पण थयां इता, ए विशेषता . ३ तेरमा गुणगणाने अते मनोयोग, तथा व- चनयोग रुध्या पठी काययोग रुधता होय, ते त्रीजु सूक्ष्म क्रिया अनिवृत्ति नामे शुक्लध्यान, या ध्यान, एकला मात्र काययोगेज थाय ठे ४ शैलेशी गुणगणे गये थके क्रिया बिछेद थइने जे पालु पम्वु नहीं, ते चोथु व्युछिन्न क्रिया अप्रति- पाति शुमध्यान कहीये, ए ध्यान योगना अजावे थाय ठे पूर्व प्रयोगवझे ध्यानपणु थाय , जेम दंग- (१३४) वझे चक्र फेरवीने ते दम काढी लीधा पठी पण पू- वना प्रयोगथी चक्र फरतुज रहे , तेम जाणबु ए चार ध्यान कह्या, पण अन्यतर तपमा मात्र धर्म भ्यान अने शुलध्यान, ए वे उपयोगी ठे, केमके ए के मोक्षना कारण नूत ठे ए पाचमोध्यान तप थयो तु (उस्लग्गोविध) एटले कायोत्सर्ग तप पण अव्यथी तथा नावथी वे दे ठे तेमा द्रव्योत्सर्गना चार नेद , अने नावोत्सर्गना त्रण नेद ने तिहा प्रथम द्रव्योत्सर्ग कहे वे १ गहनो त्याग करी जिन कल्पादिक जे आदर- वो, ते पहेलो गणोत्सर्ग, २ अणसणादिक व्रत सश्ने शरीरनो जे त्याग करवो, ते वीजो देहोत्सर्ग ३ क- रूपविशेष उपधिनो जे त्याग करवो, ते त्रीजो उप- ध्युत्सर्ग, ४ अधिक अशनादिक लेवानो त्याग करवो तथा अशुद्धमान नातपाणी एटले अशनादिक चारने खेवानो जे त्याग करवो, ते चोथो अशुद्ध नत्त पाण उत्सर्ग ए चार प्रकारे व्यथी उत्सर्ग जाणवो उ- सर्ग एटसे त्याग करवो, ए अर्थ समजवो हवे नावोत्सर्गना त्रण नेद कहे ठे (१३५) १ क्रोधादिक चारनो जे त्याग करवो, ते पहेलो कपायोत्सर्ग.२ नरकादिकना नवर्नु आउखुं वांधवा- ना कारण, जे मिथ्यात्वादिक , तेनो जे त्याग, ते बीजो नवोत्सर्ग अर्थात् ससारोत्सर्ग ३ वधना हेतु जे ज्ञानावरणीयादिक कर्म ज्ञान प्रत्यनिकपणादिक ने तेनो जे त्याग, ते त्रीजो कर्म उत्सर्ग कहोये ए जावथी उत्सर्ग त्रण नेदे कह्यो, एथी कर्मनी निर्जरा थाय वे ए रीते ठ प्रकारे (अषितरतबो) एटले अन्यतर तप (होई) एटले ते ए मजेदने सम्यग् दृष्टि जीव, तप करी माने एम ए वार प्रकारना तपे करी निर्जरा तच का. ॥ ३६ ॥ इति श्री निर्जरा तत्व गाथा ३७ मीना बूटा शब्दना अर्थ. पय-प्रकृति अणुलागो-अनुनाग सहावो-स्खलाव रसो रस कुत्तो कह्यो ने नेओ-जाणतो विश्-स्थिति पएसो प्रदेश कालावहारएकालनु अर दलदल. धारमा सचोपचय.
(२३६) पय सहावो वुत्तो, दिई कालावदारण अणुनागो रसो नेन, पएसो दल सच ॥३॥ पूर्व कही गएला वध तत्वना उ नेदतुं वर्णन चाले ठे शन्दार्य. प्रकृति वध ते स्वनाव, स्थितिलाव ते कालनो निश्चय, अनुनाग वर ते रसजाणवो अने प्रदेश वध ते दल समूह जाणवो विस्तारार्थ.-अहीया पूर्वोक्त चार प्रकारनो जे वध ते मोदकने दृष्टाते जाणवो जो सूठ प्रमुख वस्तु नां- खीने मोदक कर्यो होय तो ते वायुरोगने मटामे ठे, जोरु प्रमुख नाखी मोदक कों होय, ते पित्तरोगनु हरण करे , आ प्रमाणे जे जे द्रव्यना सयोगथी मोदक बन्यो होय ते मोदक, अव्य गुणानुसारे वात, पित्त, तथा कफादिक रोगोनु हरण करे , ते तेनो स्वताव जाणवो तेम ज्ञानावरणीय कर्मनो ज्ञान अपहारक स्वन्नाव वे दर्शनावरणीय कर्मनो स्वन्ना. व सामान्य योगरूप जे दर्शन, तेने नाश करवानो ले वेदनीय कर्मनो स्वन्नाव अनत अव्यावाध सुखने टालवानोठे मोहनीय कर्मनोस्वन्नाव सम्यक्त्व तथा चारित्रने टासवानोठे आयु कर्मनोस्वन्नावअक्षय स्थि- 4 तिने टासवानो ने नाम कर्मनो स्वन्नाव शुद्ध अव- गाइनाने टासवानो ने गोत्र कर्मनो स्वन्नाव अात्मा- ना अगुरु लघु गुणने टालवानो वे अने अनतदान, अनत लान, अनंत नोग, अनंत उपनोग, अनत चीर्य, तेने दाखवानो अंतराय कर्मनो स्वन्नाव . तेम श्हा प्रथम (पय३) एटले प्रकृति वध ते क- मैना (सहावो के०) स्वन्नावने (वुत्तो) एटले कहो ले. २ स्थिति एटले मोदक प्रमुख वस्तुनुपद, मास, वे मास, त्रण मास, तथा चार मास रदेवानु काल- मान होय ते. तेम को कर्म पण जघन्यथी अंतर्मु- हूर्त स्थिति रहे, अने उत्कृष्टताये सित्तेर कोमा को- मी सागरोपम प्रमाणे स्थिति रहे, ते स्थितिनी वचमा जे कर्म जेटली रदेवानी स्थितिए बांध्यु होय ते कर्म तेटलो वखत रहे, तेने (कालावहारण)कालतुं अव- धारण एटले कालनो निश्चय करवारूप (वि) एटले स्थितिवध कड़ीये. ३ जेम को मोदक मीठो, कमवो, तीखो होय है, वली कोइमोदकनो एक वाणीयो, वे वाणीयो रस होय ठे, इत्यादि अनेक प्रकारे थल्प विशेषत्व होय,