Adarsh Library, Jaipur
Su-raj
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स-राज
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सु-राज
हिमांशु जोशी
राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली
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दो शब्द विस्तार की अपनी विशेषता होती है तो नामिन गली में कुछ बहने के प्रयास का अपना महत्त्व। पर विशेष और म-विशेष मे परे एक प्रयास और होता है, अनायाम, जिम महन की संज्ञा दी जागरनी है । महज रूप में कहे गए का अपना एक अलग स्वार होता है-अपना असग मौन्दयं । 'मु-राज' अब लिग रहा था नो लगा कि बिना अधिक विस्तार दिए ही, रचना स्वयं समान हो गई। इस घटना-प्रम यहत सम्बा है, अत: किमी भी सीमा तक इसे विस्तृत रिया जा माना था, किन्तु नम-गे-यम हाम्दों में, अधिर-गे-जधिरः ममेटने के गहन प्रयास में पारण उपन्यास बनते-बनते यह उपन्यामिरा बन गई। लगता है, ज्यों-ज्यों ममय बीत रहा है, 'कवीर'मी गली का प्रभाव भी रही याला चना जा रहा है। या दिना साग-लपेट ये, मीपे-मोघे पदों में पाठर तक बात नहीं पहुंच मानी ? ममय के माय-गाय उपना वा दापरा भी बह रहा हो तो आश्चर्य नहीं ! मण्डैनेवियाई या अन्य यूरोपीय देशों की भाषाओं के माहिर में ऐसे अनेक प्रयोग हुए हैं। अभी कुछ समय पूर्व हेला' में प्रगति मात्र पन्द्रह पृष्ठों की उपन्यासिरा पड़कर मुझे 'अंधेरा और' की याद आई। विविध व्याधियों में घिरा यह रुग्ण गमाज भौनिक उपनप्रियो पश्चात् भी प्रगति के नाम पर, अपनी ही परिधि पर पूम रहा है । निपट बाने के बावजूद, मनुष और मनुष्य के बीच की दूरी निरलर बा रही है । गता, गति, गम्मन्नरा, न्याय- म मात्र मुछ ही लोगों तर मीमित रह गए है। दिन-प्रति-दिन यानी प्रथं की महता अनेक अनपों -- के द्वार खोल रही है। राजनीतिक भ्रष्टाचार, सामाजिक शिष्टाचार का पर्याय बन गया है। ऐसी विकट स्थिति में जो ईमानदार है, ईमानदार बने रहना चाहता है, वह कैसे जिए ? जो असमर्थ है-~असहाय, वह अपने दुर्वल पांव आस्था की किस धरती पर, कहां टिकाए ? 'सु-राज' के गांगि'का या देवा, 'अंधेरा और' के परसिया, 'कांछा' के नायक 'कांछा' के जीवन की क्या यही विडम्बना नहीं ? जो विचार या साहित्य समाधान नहीं दे सकता, वह पंगु होता है- गूंगा । दृष्टि होते हुए भी दृष्टिहीन होता है। जब स्थिति ऐसी हो तो क्या साहित्य का दायित्व कुछ अधिक नहीं बढ़ जाता? मेरे जीवन का आरम्भिक काल कुमाऊं के पर्वतीय प्रदेश, हिमालय की तराई तथा नेपाल की सीमा-रेखा के समीप बीता है। ये तीनों क्षेत्र त्रिभुज के तीनों कोणों की तरह परस्पर जुड़े हैं। 'सु-राज' में कुमाऊं पर्वतीय क्षेत्र, 'अंधेरा और' में तराई का आदिवासी अंचल और 'कांछा' में नेपाल की पृष्ठभूमि है । ये अलग-अलग क्षेत्रों की कहानियां होने के बावजूद इनमें बहुत कुछ साम्य है। सबसे बड़ा साम्य है---जीवन-संघर्ष का । जिन्दा रहने के लिए मरने का। ~~~-हिमांशु जोशी ए-21182, सफदरजंग एनक्लेव, नई दिल्ली अमित. सिदार्य और अमित के लिए
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सु-राज
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'कका, यह घर अब नहा चलगा। 'क्यो-?' सहज आश्चर्य से गागि'का बोले। 'नही, बहुत हो चुका अब !' देवा ने हाथ हिलाते हुए कहा, 'इससे अधिक नही...। 'गागि'का ने अपने गजे सिर से, पतली-सी दोपलिया सफेद टोपी उतारकर घूटने पर रखी । ऊपर से नीचे तक यो हो एक बार घुसले सिर पर हाथ फेरा । असमजस मे देवा की ओर देखा । कुछ कहने के लिए होंठ फड़के, किन्तु फिर भिंच गए। बाहर चाक-बरण्डे मे अभी तक शोर था। बच्चे रो रहे थे। लकडी के कच्चे फर्श पर कोई जोर-जोर मे पाव पटक रहा था जैसे पेट मे झाल (पीड़ा) उठ रही हो। 'ऐमा भी होगा, देव, कभी सपने में भी सोचा नहीं था।' गागि 'का ने मौन तोडते हुए कहा, 'अरे, घर तो चलता है कम खाकर-कपट उठा- कर। एक-दूसरे का दुःस झेलकर। पर यहा तो हाल ही और है। किसमे क्या कहे ?' व हते-कहते काका चुप हो गए। 'घर-वार के जिस मामले में आपने जो कहा, मैंने किया।' देवा बोला, 'हरकी ने देवी की धार के तीन खेत दबा लिए । पच-सरपच सब ने झूठ बोला । सरासर बेईमानी की, उसी का पक्ष लिया-मैं चुप रहा । आनसिंग छोटी गूल का पानी रात को चुपचाप काटकर अपने खेत में लगा लेता है-मैं मुह पर लीसा लगाकर चुप देखता रहता हू । दाडिम का पेड़ हमारा है, पर फल तल्ले घर नरलि काकी तोड़कर ले जाती है अपने ही इस घर में दिन-रात खटने पर भी मुझे क्या मिलता है। हमारे ?
- - . लोकि की मां बीमार पड़ी है । मुट्ठी-भर दूध भी उसने कभी देखा हो. मुझे याद नहीं। छोटी बहू हमारे और अपने बच्चों के बीच अलग-अलग दो हाथ करती है...।' देवा की आवाज में घुटन ही नहीं, दवा हुआ आक्रोश भी था। 'अपने बच्चों को तो छोटी बहू कनक के फुल्के देती है और हमारे बच्चों को मंडुवे की बकोड़-जैसी (पेड़ की छाल-सी) काली रोटियां !' देवा तनिक रुककर बोला, 'गलती किसी की हो, मार हमारे बच्चों को पड़ती है । आपकी इज्जत के डर से कुछ नहीं कहते, नहीं तो कव का भता भंग हो गया होता, इस घर का...! लोकि की मां मैके में ही रहने की बात करती है। हमारे अलावा वहां है ही कौन, उनको पानी औड़ कर पिलाने वाला...!' देवा री में बोलता चला जा रहा था। 'बच्चे तो सब बराबर होते हैं रे ! पांचों अंगुलियां बरोबर ! 'काका बुदबुदाए, 'छोटी को ऐसा अनर्थ नहीं करना चाहिए...।' 'ठुल बोज्यू--- (बड़ी भाभी) के मैके वालों ने कपड़े भेजे हैं। परसों पिपलाटी का मथुरिया दे गया था। छोटी कहती है-उसका भी भाग होना चाहिए। आज यह महाभारत उसी वजह से मचा है।' बड़ी बहू का पक्ष लेते हुए गांगि 'का बोले, 'तेरी ठुल बोज्यू वेचारी तो अभागी है-~-विधवा । उससे किसी का क्या डाह ! उसके गरीब भाई ने खा-न-खाकर कुछ भेजा तो उस पर हिस्सा लेने की बात सोचना भी पाप है- महापाप...।' दर्द के साथ कहते-कहते गांगि'का चुप हो गए। बाहर का शोर अब तक थमा न था। जब वहां बैठना मुश्किल हो गया, तब वह वैसे ही बाहर निकल गए। उन्हें सामने देखते ही छोटी बहू झट से बूंघट काढ़कर, बच्चे को उठाए बुलान की तरफ चली गई। चूल्हा बुझ चुका था। मांज में रखा भात जल गया था-दुर्गन्ध-सी आ रही थी। मंझली बहू-लोकि की मां, लोकि को दूध पिलाती हुई वैसी ही बैठी रही । आंचल नीचे तक सरका लिया-लाज के मारे । बड़ी बहू की आंखों में भुमके फूट रहे थे -बरसात के जैसे परनाले । गालों पर ढुलकते आंसुओं की पिछौड़ी के फटे चाल से पोंछ रही थी-सिसकती हुई।
काका की उपस्थिति में मारा शोर सहसा शान्त हो गया। 'बहान सबमे बड़ी है न!' गांगि'का ने शून्य मे जैसे कुछ टटोलते हुए कहा, 'इमलिए तुझे इन मबसे अधिक सहना चाहिए। छोटी कपड़े के लिए रार मचा रही है तो दे दे। तेरे लिए मैं और सिलवा दंगा।' उनका स्वर उदाम हो आया, 'घर मे तू मदम मयानी है न ! जिठानी ही नही, इनकी माम को ठौर पर भी है। यह बच्ची है-नादान । इसे अकल ही होती तो ऐसा कुपचित करती...?' बढी बहू बहनी नाक पोछनी भौतर गई । काठ के भकार में से नये मिले कपड़ो की गठरी उठा लाई और चुपके से काका के सामने रख दी। गागि'का छोटी बहू की और कपडे बढ़ा ही रहे थे कि नन्दू बाज की तरह झपटा, 'हम मंगते नहीं काका । भीख नही चाहिए हमें...!' 'क्या कहा- तनिक अचरज से गागि 'का ने चेहरे की ओर देखा, 'घर में भीस होती है पगले ।' 'हा, हा, होती है। होती है ! होती है !' नन्दू ने गठरी हवा में उछालकर दूर कोने में फेंक दी। अवाक्-से देखते रह गए काका । देर तक मूर्तिवत् खड़े रहे। फिर चुपचाप लाठी उठाई और पचायतघर की ओर निकल गए। मारा दिन इधर-उधर भटकते रहे, पर रात के अंधियारे मे रास्ता टटोल-टटोलकर जब घर पहुचे तो देखा--- [--घर में मातम-सा छाया हुआ है। अंधेरा। देवा ने बतलाया, 'ठुल बोज्यू से छोटी को कुछ कहा-सुनी हो गई यो। गुस्से में आकर छोटी ने वे कपड़े आग मे झोक दिए । ठुल बोज्यू रोते-रोते बेहोश हो गई हैं । अभी एक घडी पहले होश आया।' जले हुए, काले टुकडे उसने सामने रख दिए । गागि'का का पोला मुह खुला-का-खुला रह गया। जीवन में कभी मन्दिर नही गए गांगि 'का। कभी व्रत नही रखा, न तोरय-बरन ही किया ! पाप-पुण्य क्या होता है, इस पर भी विचार नहीं किया । जब जो काम आया, सहज भाव से कर दिया । उसी को पूजा माना, उसी को , पुण्य जव तक परमानन्द पण्डित जिन्दा रहे-सुई के साथ लगे धागे की तरह आंखें मूंदे-मूंदे पीछे लगे रहे । न दिन देखा, न रात । न भूख देखी, न प्यारा । न वर्तमान देखा, न भविष्य । परमानन्द पण्डित ने जो कहा, उसी को ब्रह्मवाक्य मान कर, उसी का पालन करने में अपने को धन्य समझा। फिरंगियों का राज था, उन दिनों। परमानन्द पण्डित ने कहा, 'हाथ के कते, हाथ के बुने कपड़े पहनो,' गांगि'का ने खादी धारण कर ली। परमानन्द पण्डित ने कहा, 'जब तक देश आजाद नहीं होता, हम आराम नहीं करेंगे । फिरंगियों से मरते दम तक लड़ते रहेंगे।' गांगि'का ने उस दिन से कभी आराम नहीं किया। निरन्तर फिरंगियों से लड़ते रहे। यद्यपि फिरंगी कैसे होते हैं ? क्या होते हैं ? यह अपने जीवन में उन्होंने कभी देखा न था और न देखने की आवश्यकता ही अनुभव की । चूंकि परमानन्द पण्डित कहते हैं, इसलिए उसे सच मानकर, उसका पालन करते रहे। परमानन्द पण्डित ने एक दिन कहा.-.-'अपना-पराया इस संसार में कुछ नहीं होता, गंगानन्द !' इसलिए उन्होंने मान लिया कि अपना-पराया सचमुच में कुछ नहीं होता। बूढ़े माता-पिता को बिलखता छोड़कर वह घर-घर, द्वार-द्वार अलख जगाने निकल पड़े । जहां रात हुई ठहर गए, जहां भूख लगी खा लिया । खाना नहीं भी मिला तो प्रभु का नाम लेकर ठण्डा जल पीकर सो गए। 1942 में 'भारत छोड़ो आन्दोलन चला---'करो या मरो' का नारा! परमानन्द पण्डित हल्द्वानी में पकड़ लिए गए । उनके साथ-साथ वह भी जेल में जा धमके जेल में परमानन्द पण्डित ने पच्चीस दिन की मूख-हड़ताल की तो छच्चीसवें दिन ही उनके साथ गांगि'का ने भी अन्न-जल ग्रहण किया । पन्द्रह अगस्त को जब आजादी मिली, तो एक दिन परमानन्द पण्डित ने बुलाकर समझाया---अव लड़ाई खतम हो गई गंगानन्द ! अंग्रेज़ हार- कर, देश छोड़कर चले गए। हमारा संघर्प अव समाप्त हो गया। तुम भी अपने घर जाओ।' 12 / सु-राज
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जब धनकोट, भिंगराड़ा और रोल्यूड़ा के लोहारों-शिल्पकारों के घर जाकर अन्न खा आते, पानी पी आते, तो भाई-बिरादरी में कम 'थू-थू' न होती। हुक्का-पानी तक अर्से तक बन्द रहता, किन्तु कभी भी उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया । लोग क्या कहते हैं-उन्होंने न इसकी कभी परवाह की, न कुछ महत्व ही दिया। सामने के गधेरे में अपना नौला अलग खोद लिया और वहीं से पानी पीते रहे। तीनों बच्चे बड़े हो गए तो उनके व्याह के वक्त भी जाति नहीं देखी। लड़की सुशील लगी, परिवार संस्कारी-बस, विवाह कर दिया। तन पर खादी के फटे चीथड़े पहले की तरह वह आज भी टांगे रखते । आज भी पहले की तरह दिन-रात काम पर जुटे रहते-न दिन देखते, न रात ! कहीं पटवारी जुलम करता तो सीना तानकर खड़े हो जाते । जंगल का पतरौल गांव की औरतों को परेशान करता तो लोगों को लेकर वहां धमक पड़ते । हरिजनों की वरात में सबसे आगे-आगे लगते । हर दुखी का पर उन्होंने अपना घर समझा। हर असहाय को सहायता पहुंचाई। दुनिया में जिसका कोई न होता, गांगि 'का उसके आंगन में वट-वृक्ष की तरह आ खड़े होते। कहीं को ईट, कहीं का रोड़ा जोड़कर कहने भर के लिए एक 'गृहस्थी' बसा ली थी। किन्तु उम्र-भर रहे-अनिकेत संन्यासी ही। शादी नहीं की, पैसा नहीं जोड़ा-इसका मलाल कभी भी नहीं रहा । अपने और पराये बच्चों के बीच भेद क्या होता है उन्होंने जाना नहीं। आनन्द जब गुज़रा तो दिनों ही नहीं, महीनों तक वह पगलाए-से रहे । बहू को घर पर ही रखा । जो कुछ उसके लिए वन सकता था, पिता की तरह करते रहे। देवा और नन्दू को पिपलाटी की पाठशाला तक ही नहीं, खेतीखान के मिडिल स्कूल तक पढ़ाया-लिखाया-दो आंखवाला बनाया। स्वयं कष्ट उठाते रहे, किन्तु कभी किसी को आंच न आने दी। आज इस ढलती उम्र में भी निरन्तर खेतों में अंटे रहते। चरखा-करघा सब छोड़कर . 14 | सु-राज दिन-रात पसीना बहाते रहत . तोन उस सारी रात गागि'का सो न पाए । तरह-तरह के विचार मन में उठते रहे । परमानन्द पण्डित नै मृत्यु से कुछ महीने पहले कहा था -लड़ाई खतम हो गई गंगा! अंग्रेज हार गए। किन्तु काका को अब भी लगता कि अंग्रेज हार अवश्य गए, किन्तु लड़ाई खतम कहा हुई ? तारा के घर में एक जून भी चूल्हा नही जलता। भवानी का होनहार बेटा दिग्गू पाठ- शाला नहीं जा पाता, क्योकि किताबों के लिए पैसे की व्यवस्था नहीं हो पाती। दिया लोहार की पत्नी कफन के बिना ही जला दी गई। पट- वारी किसी निरपराधी को हपकड़ी लगाकर होलात में ठूस देता है। इत्ती बडी दुनिया में वही कोई ठौर नहीं, जहां आदमी जी सके ! दूसरी तरफ तिनका-तिनका जोडकर उन्होंने यह घोमला बनाया पा-कलह और कुपचित के अलावा यहा क्या है ?भाई के दिल में भाई के लिए दर्द नहीं तो औरों के लिए क्या होगा। उन्हें अजीब-मी रिक्तता का अहसास होने लगा । एक गहरी निराशा -- हताशा का। सुबह उठते ही उन्होने देवा को बुलाया-'छोटी बहू ने क्स को किया, मुझे अच्छा नहीं लगा । आखिर ऐमा भी क्या था, जो कपड़े जला दिए ? नये थे, किसी ने पता नहीं किम भावना में दिए पे-घर में कोई भी पहन लेता । क्या फर्क पडता ! वही बहू विधवा विचारी के मन में या गुजरी होगी...!' देवा सिर झुकाए बैठा रहा। 'मेरी एक ही साध पी देवा तुम लोग मेहनत-मजूरी कर दो टुकड़े आराम से साओ। मिल-जुलकर प्रेम मे रहो। किन्तु मुझे अब लगता है-वह सब मृगतृष्णा थी। छन या। भुलावा था। तुम दो भाई हो कमाने वाले, एक विधवा भाभी तुम्हें भार लगती है ! उसे ही तुम ओख के झाड़ से भी बदतर समझते हो तो दूसरों को क्या नहीं समझोगे! 'देवा, घर-बाहर-हर जगह से मेरा सपना टूट रहा है। मुझे कहीं कोई किनारा नहीं दीखता । धनकोट, रोल्यूड़ा के लोहारों की जैसी दशा अंग्रेजों के समय थी, उसमें आज तक कोई खास अन्तर नहीं आया। आज भी उन्हें दिन-भर मेहनत-मजूरी करके दो वक्त की रोटी नहीं मिलती। आज भी वे वेगारी करते हैं। थोकदार-जिमदार आज भी उन्हें लूटते हैं।' काका ने एक गहरी सांस ली। कुछ रुककर आगे वोले, 'मुझे लगता है, परमानन्द पण्डित भी गलत कहते थे। वह कहा करते थे-फिरंगियों के जाते ही देश मालामाल हो जाएगा । दूध की नदियां बहेंगी । कहीं कोई भूखा-प्यासा नहीं रहेगा। सवको जीने का हक मिलेगा। किसको मिला है जीने का हक...?' काका का गला भर आया-'पटवारी ने डण्डे से मार-मारकर सबके सामने मल्ले घर हेतराम की हत्या कर दी ! किसने क्या कर लिया ?' देवा चुप सुनता रहा। 'मेरा मन उचट गया है देवा ! सब जगह रेत-ही-रेत नज़र आ रही है-~अंधेरा-ही-अंधेरा'!' काका उठ ही रहे थे कि बाहर के किवाड़ की सांकल खड़की । रूपदेव पधान घबराए हुए, भीतर आए, 'हं हो, गंग 'दा, गजब हो गया !' 'क्या-क्या-?' 'देवदार के पेड़ों को चोरी से काटने के अपराध में पटवारी ने हमारे धना का नाम साफ दिया है। अभी चपड़ासी आया था कागज लेकर । कहता था-घना को होलात ले जाया जाएगा।' रूपदेव एक ही सांस में कह गए। 'पेड़ों का ठेका तो खीमसिंग थोकदार ने लिया था न!' 'हां, लिया तो उन्होंने ही था।' 'पटवारी, पतरौल, रेन्जर--सबके सामने पेड़ों पर छाप लगा दी थी - 'हां, गांव वाले भी थे सामने ।' 16 | सु-राज सु-1
'फिर तुम्हारा घना बीच मे कमे आ गया ?'
'योकदार मे
गूल
के पानी के मामले में, पिछले चैत में कुछ कहा-
सुनी हो गई थी। हो मकता है, उसी ने पटवारी के कान भर दिए हों!
और घना को पकाहाने की चाल चली हो !'
'जब तुम्हारे घनश्याम ने पेड काटे ही नही तो फिर कैसे पकड़कर
ले जाएंगे उसे ? हम भेड-बकरियां तो नहीं ! देखें तो, कैसे न्या नहीं होगा
--सरकार-दरवार मे ।'
पधान के साथ ही गांगि का भी लाठी टेककर बाहर की ओर बढ़े।
'पंवी-चादर माप ले जा रहे हैं । कका, कही बाहर-गाव जाना है
वया ?' देवा ने पूछा तो काका ने कोई उत्तर नहीं दिया ।
चार
चार-पाच दिन तक भी काका घर नहीं लौटे तो सबको सहज ही
चिन्ता हुई। आ तो शाम को ही जाना चाहिए था, किन्तु आज इतने दिन
हो गए !
कही दूर तो नही चले गए-चालमी पट्टी की तरफ ।
कही बीमार तो नहीं हो गए-पिछली बार भी ऐमा ही हुआ था।
बाहर सर्दी में निकलते ही गठिया-वात ने घेर लिया था। तब कन्धे पर
जोक (लाद) कर किसी तरह ला पाए थे। पूरे तीन महीने बिस्तर पर
मिड़गू की तरह पडे रहे थे।
धारानी के घने जंगल में बाघ का भी डर था। मेलिया-बाघ कभी.
कभी बच्चो या बूढो पर भी झपट पड़ता है।
काका कमजोर हैं । कही रास्ते में ही टोप न दे दी हो! पके फल को
टपककर गिरने वक्त ही कितना लगता है !
कही किमी गहरे गधेरे में, रान के अधियारे में गिर न पड़े हो । नदी
पार करते समय..
जितने मन, उतनी बातें! जाड़ा शुरू हो चुका था। नदियों-तालावों के किनारे का पानी जमने लगा था। सुबह सफेद पाले से धरती ढकी रहती। लगता-जैसे बारीक सफेद चीनी किसी ने विखेर दी हो। हवा चुभती लगती-तेज धार की तरह छीलती हुई । देवा देवदार के जंगल वाली बटिया को दूर-दूर तक देख आया था। नदी के किनारे-किनारे भी। कहीं काका डूब पड़े होते तो लाश किसी किनारे पर तैरती तो मिलती ! आसपास के इलाके में भी कम पूछताछ नहीं की। पर किसी दूसरी ही दुनिया में था, देवा का मन । उसे न जाने क्यों लगता था-काका भले ही कही हों, अब लौटकर घर नहीं आएंगे। घर में उस दिन जो कुछ विचपात हुआ, उसे देखकर उनका चेहरा कितनी निराशा से भर उठा था ! उसके बाद काका को किसी ने न बच्चों के साथ खेलते देखा, और न किसी स बोलते ही पाया । पधान से भी उखड़ी- उखड़ी बातें की... पिछले महीने एक दिन देवा ने देखा था- काठ के भकार में से पुराने चरखे को निकाल कर वह साफ कर रहे हैं। यह चरखा उन्हें परमानन्द पण्डित ने दिया था कभी। लोग कहते हैं ---कभी काका रोज सुबह ब्राह्म-मुहूर्त में उठकर चरखा कातते थे रोज़ 'बष्णव जन' वाली बापू की प्रार्थना दुहराया करते थे। मंगल के दिन मौन रखते थे । किन्तु खेतों पर काम करने के बाद उनका यह नेम- नियम शनैः-शनैः शिथिल हो गया था। इतने असें वाद काया को चरखे के साथ देखकर उसे कम अचम्भा नहीं हुआ देवा उठा। भीतर जाकर उसने देखा-वह साफ किया चरखा अब तक भी उसी तरह रखा है । उसी के साथ काका के कुछ पुराने कपड़े भी है-~~एक छोटी-सी पोटली में ! देवा उसे खोलने से अपने को रोक न पाया। उसमें फटे-पुराने खादी के कपड़े थे। पीले, फटे कागजों का एक छोटा-सा पुलिन्दा भी। जिसमें 18 | सु-रान . लिये अक्षर अब इतने धुधला गए थे कि पढ़ पाना भी सम्भव नहीं था। सबमे नीचे चरखे को छाप वाला पुराना तिरगा भी तह करके रखा था- बड़े जतन से। उन्हें वैसे ही समेटकर देवा बाहर निकल आया। कुछ और लोग भी दूढने निकले थे, जो अब तक लौटे नहीं थे। पट-आगन में बाहर से आए कुछ मेहमान बैठे थे, तमाखू पीने के लिए । वे कह रहे थे-काका को उन्होने लोहाघाट देखा था कल । कच. हरी को जाने वाली ऊंची मड़क पर लाठी टेककर, हाफते-हांफते चढ़ रहे थे। कुछ परेशान-से लग रहे थे। काका के लोहाघाट जाने वाली बात देवा की समझ में नहीं आई। काका हद-से-हद धनकोट पहुच सकते थे, फिर लोहाघाट कैसे जा पहुचे? देवा भागता-भागता लोहाघाट पहुचा, परन्तु वहा काका न ये । तब तक जा चुके थे। किसी ने बतलाया-काका का झगड़ा हो गया है । नौगाव के थोक- दार-जिमदारो ने नोहार-हरिजनों की जमीन दाब ली है। गोचर का रास्ता भी बन्द कर दिया है। अतः समस्या यह है कि उनके गाय-डगर चरने के लिए कहा जाए? काका ने पचायत वंठाने की कोशिश की। कहते हैं, इस पर कृपाल सिंह धोकदार के आदमियों से कहा-सुनी हो गई। पटवारी-पेशकार भी योकदारो का साथ देने लगे तो काका लोहाघाट की कचहरी में सैप से कह आए हैं कि धनकोट के गरीबो की जमीन वापिस नहीं दी तो झगडा इस बार और बढ़ जाएगा। भले ही कुछ भी कीमत क्यों न चुकानी पडे वे न्या लेकर रहेंगे । अगर सरकार-दरवार मे न्या न मिला तो वे गजार देवता के पान मे जाएंगे, पात हालने..!
. पांच देवा धनकोट पहुंचा तो एक और ही नज़ारा दीखा वहां। काका उलैंचा के पेड़ के नीचे, कच्चे आंगन पर फटी चटाई विछाकर बैठे हैं। आसपास कुछ और लोग हैं। काका के दुर्बल पांवों पर पट्टियां बंधी हैं। लोग वतलाते हैं-अंधियारे में, शिविया के आंगन के आगे, कीचड़ पर पांव रपटने के कारण चोट आई है । नमक और कच्ची हल्दी का लेप लगाने से अब कुछ आराम है । सूजन भी कम हो गया है। 'घर-चलो-कका!' देवा ने कहा । काका उसकी ओर देखते रहे-देर तक । फिर किंचित सोचते हुए । बोले, 'यह भी तो अपना ही घर है देवा ! जब गांधि बावा के कहने पर जेल गए थे, तब हमने वरत लिया था कि सारा देश ही हमारा घर है। घर न बसाने की प्रतिज्यां भी तभी ली थी। एक ही जगह पड़ा-पड़ा पानी मैला हो जाता है। उसमें काई लग जाती है। मुझे लगता है, अधिक सांसारिक मोह-माया भी आदमी को अंधा बना देती है। किसी एक ही ठौर पर खूटे की तरह बंधा रहना वैसे भी घातक है । फिर अब उमर ही कितनी रह गई देवा...!' 'लेकिन काका...!' देवा ने अधीर होकर कहा । 'लेकिन, क्या ? अव तुम सयाने हो । नन्दू भी वच्चा नहीं। आपस में मेल-मिलाप से रहो । एक-दूसरे का सुख-दुख देखो । मतभेद भी होते हैं । जहां बहुत बर्तन होते हैं, आपस में टकराते भी हैं । किन्तु थैली का गुड़ थैली में ही तोड़ना चाहिए...! हमारे आनन्द की विधवा बहू अभागन है-वेसहारा। उसकी सहायता करो। घर-गृहस्थी की गाड़ी खींचो । दूसरों पर अधिक निर्भर रहने से आदमी लंगड़ा हो जाता है।' काका बुद- बुदाते हुए वोले। 'नन्दू नादान है कका'"उसकी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए।' 20 | मुं-राज पांच देवा धनकोट पहुंचा तो एक और ही नजारा दीखा वहां। काका उलैंचा के पेड़ के नीचे, कच्चे आंगन पर फटी चटाई विछाकर बैठे हैं। आसपास कुछ और लोग हैं। काका के दुर्वल पांवों पर पट्टियां बंधी हैं। लोग बतलाते हैं---अंधियारे में, शिविया के आंगन के आगे, कीचड़ पर पांव रपटने के कारण चोट आई है। नमक और कच्ची हल्दी का लेप लगाने से अब कुछ आराम है । सूजन भी कम हो गया है। 'घर-चलो-कका!' देवा ने कहा। - पिटाई की-यह ममाचार भी काका तक पहुंचाया। यह पहुंचाना भी न मृने कि काका ने जगवा लोहार की जमीन छुड़ाने के लिए किमनमिंग में जो करजा लिया था, उसके लिए काका की जमीन की दिन-दहाडे कुड़की कराई जाएगी। काका अव दिन में एक ही बार भोजन करते। नीम जनवरी को उन्होंने पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं किया। माम को बामपाम के वन्नी, बूढों को पार विटाकर बोले- 'अब तक में समझा था, मराज आ गया, गाधि बाबा का मुराज! अपने लोगों का राज ! पर अब लगने लगा है, मुराज नही आया, और न फिल. हाल आने ही वाला है। यह पटवारी का राज है। योग्दार-जिमदारों का ! गरीब के लिए. लाचार के लिए यहां कही कोई जगह मुझे नहीं दोपतो... फमल कोई वो रहा है, काटता कोई और है। मेहनन हम करते हैं-मालिक कोई और है। जिनके पास देत नही, कोई और काम धन्धा नहीं, वे कहा जाए ? पेट पालने के लिए माल जाते हैं--तराई- भामर, तो कम जुलम नहीं होते। काम के बदले पूरी मजदूरी नहीं मिलती। वह बेटियों के माय क्या-क्या नहीं होता! 'मैं जब मारी बातें गोचना हू । देखता हूँ कि दोष उनका ही नहीं, आप-हम- मबका है। यदि हम इसी तरह अपने को सताए जाने देंगे, तो वे मताते रहेगे । बैंकर-मजदूरी भी हमे पूरी-पूरी नहीं मिलेगी। पदिया लोहार की ज्वान-जवान बेटी को बम का देसी डराईभर क्यों बरेली मगा ले गया? अब तक सोवनिया की ताश का पता क्यों नही चला दम रुपया करज के बदले भोनाराम क्यों वुधानन्द मास्टर के मेतों में जिन्दमी- भर हल चलाता रहा मरने पर बुधानन्द ने उमे कफन तक क्यों नहीं दिया। काका की बातें मवशी समझ में नहीं आती, पर इतना भर अवश्य लगता कि काका जो भी रहते हैं, भले के लिए। वर्षों नमः मोए मीधे-मादे काका में यह परिवर्तन गहा में आया ? कैमें आया? किमी की ममझ में नहीं आ रहा था। जिन्दगी भर वह परमानन्द पण्डिन का झोला यामे, पोद्र-पोझेनगे म-गज 123 रहे---गूंगे पशु की तरह-लुड़-लुड़। दुबले-पतले मरियल से, दिन-रात मिट्टी में सने रहने वाले काका के आखर सुनकर लोगों की आंखें खुली- की-खुली रह जातीं!. काका जब बोलते तो उनके मुंह से चिंगारियां-जैसी निकलने लगती! रात को गरीबों के बच्चों को पास बुलाकर काका बारह खड़ी और वरनमाला के अक्षर काठ की काली पाठियों पर लिखकर सिखलाते । पढ़ने- लिखने से ही गियान आएगा । और गियान से ही शक्ति ! जिन बच्चों के पास कागज-पेंसिलें न होतीं, पाठशाला की फीस नहीं काका उनके लिए भीख मांग-मांग कर पैसे जुटाते। जब इलाके के अधिकांश लोग जाड़ों में दो रोटी का जुगाड़ करने, धूप तापने, माल-भाभर की तरफ उतर जाते तो घरों की रखवाली के लिए रह गए असहाय वृद्धों, दुर्वल बच्चों और लाचार महिलाओं की देख- रेख काका घर-घर जाकर करते । कई बार तो भयंकर शीत से ठिठुरकर . मरने वाले किसी अभागे वृद्ध की लाश उठाना भी एक समस्या बन जाती थी। पर काका के जीते-जी कोई अनाथ कैसे रहता? आठ - - पूस आधा भी बीता न था । इधर तीन-चार दिन में लगातार बर्फ गिर रही थी। रास्ते, पेड़-पौधे, खेत-खलिहान, छत-आंगन सव बर्फ की सफेद चादर से ढके थे। इस साल पूस में हियां ज्यादा हुई, इसलिए लोगों का अनुमान था कि गियां (गेहूं) की फसल अच्छी होगी। भीगी मुड़ी हुई ररसी की तरह बल खाती, संकरी पगडण्डी पर, बर्फ में अपने को धंसने से बचाती हुई एक क्षीण छाया-सी गांव की तरफ आ रही थी। सूरज डूब चुका था। पहाड़ों की चोटियों से धना कुहासा फिसलता . 24 / सु-राज हुआ, नीचे बंधेरी घाटियो को ओर खिसक रहा पराजित पत्र, हीन ठूठ वृक्ष-दूर कही आसमान में धुत-मित पई हिन नहोर चोटियों के अतिरिक्त कही कुछ नहीं दीखता था। पहाड़ो मे वैसे हो सूरज कम दोलता है, पर बाहों में वो कौर ने कम-और भी ठण्डा । बुझा-बुझा-सा । लोग किवाड़ बन्द किए घरो में दुबके कंडे , ज्ञान के बहाने । इने- गिने कुछ घरों के ऊपर घुआ-सा घिरता दोल रहा था। इसी ने नगर होता कि सम्भवतः इनमे कोई प्रानी रहते हैं । कहीं कोई प्रचान नहीं- अधेरा-हो-अधेरा। 'टिक्-टिक्' द्यार के मोटे घुमरले द्वार पर भी बाहर हुई वो मौतर की किसी गुफा से भयभरा क्षीण स्वर मूबा, 'कोन...'' 'मएं--!' सनमनाती हुई-सी तेज सरसराहट के कारपट कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। दरवाजे के आर-पार लगा काठ का भाड़ा हात हाँ वह पीछे हट गई, 'समुर ज्यू आप-!' फटी पिछोड़ो का बावत ने कुछ और नम्बा करलिया, सकोच ने । तन पर टंगे चीयडों ने लाज इकता ने नि लग रहा था। 'बहू-!' कपड़ो पर जमी बर्फ को नदं की तरह झाडते हुए वह भीतर चाक-बरामदे पर खड़े हो गए। टूटे मिलस्ट के जूतों ने रानी नियर रहा या । मारा शरीर ठण्ड ने थुर-थर कार रहा था । नाम होइन हो मुंह से ढेर सारी भाप बिखर रही थी। 'पिपलाटो जाते-जाते खियाल आपा, बच्चों की मन-बात भी कुछ . सू!' . सामने ही रॉड में आग जल रही थी । उनी के पान स्टी बोरी का अधजला टुकड़ा डाल दिया। तनिक दूरी पर बड़ी बहू अव तक सहनी-महमी-नी वडीयो। 'माल-भाभर जाते वखत नन्दू वतला गया या तिघर के बाह-बट- वारे हो गए हैं !' वह बोरी पर बैठते हुए बोले। 'हा, छोटी ने जिद की तो वे विचारे भी क्या करते ?'
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'न्ना-! बड़ी बहू सिसककर रो पड़ी। 'ऐमे हिरदयहीन खबीस निकलेंगे ये, ऐसा तो मैंने कभी सोचा भी न था।' काका से कराह उठे, 'मैं दुनिया भर में क्या के लिए झगड़ता फिरता हू, और मेरे अपने ही घर में ऐमा अंधेर!' काका की धुधली, बुझी आंखो में रक्त छलक आया। 'माल-भाभर में उन्हें आने दे, मैं सारा बंटवारा फिर कराऊगा । भाभी मा के बराबर होती है। इतने जर्ने होकर एक तुझे नही पाल मकते ?' गागि 'का से फिर रोटी निगली न गई । वैसे ही हाथ धोकर मुह पोछकर वह नाग के पास बैठ गए। 'तू चिन्ता न कर । जब तक मैं जिन्दा हू, तुझे गास-टुकड़े का अभाव नहीं रहेगा। सरकार की तरफ से मुझे जो पिनगन मिलती है, उमे तेरे नाम करवा दूंगा-तरे नोन-तेल का यनोवस्त हो जाएगा हमारा आनन्द कहता था-कका, इस चैत मे दो कमरे और डलवा दूगा । एक आपके पूजा-पाठ के काम आएगा, दूसरा मिहमानों के लिए...! पापी, खुद ही भाग निकला हम सबको मंझधार में डुबोकर...!' काका की बूढ़ी आखो के आगे ठण्डा कुहासा-सा घिर आया। नौ 'कका के वचने के आसार कम है।' किमी ने एक दिन गाव आफर बतलाया। किसी जरूरी काम मे काका को माल-भाभर जाना पडा-वही जर- बुम्बार शुरू हो गया । एक तो वैसे ही दुबले-पतले हड्डियों के ढाचे, उस पर बीमारी! विस्तर पर काका ऐसे गिरे कि फिर महीनों तक उठ न पाए। साधनहीन होते हुए भी गागि 'का हर तरह से सम्पन्न थे। अण्टी में घेला-रका कुछ भी न होने के बावजूद काम अटकता न था । जहां भी स-राज/27 जाते, सब श्रद्धा से देखते । इसलिए वीमारी की इस हालत में भी टहल में किसी ने कोई कोर-कसर नहीं रखी। एक महीने बाद जब मूंग के पानी का पथ खाया, तो मानसिंग वैद किसी तरह उन्हें उठाकर वनवसा ले आया। मानसिंग का पूरा परि- वार गांगि'का की सेवा में दिन-रात जुटा रहा । कहा जाता है कि गांगि 'का और मानसिंग वैद के पिता दोनों मित-भाई थे कभी। काका जव कुछ चलने-फिरने लायक हो गए तो उनके प्राण पहाड़ के लिए खिंचने लगे । धनकोट का मुंहनियां गाय-बछियों के लाने माल गया था। अपने भोटिया घोड़े पर बिठाकर वह काका को घर ले आया। अब तक काका का शरीर भाभर में था, किन्तु परान बार-बार उड़ कर फिर कहीं भटकता रहता । बीमारी की हालत में ही उन्होंने सुन' लिया था कि धनकोट वालों से फिर जिमदारों का मनमुटाव हो गया है। इस बार रार वेनाप जमीन की वजह से शुरू हुआ है । धुनी धार के जंगल लोहारों ने आवाद किए। जाड़ों में गड्ढे खोदकर, खाद डालकर सेव और तुमड़िया नाशपाती के पौधे लगाए। ढलवां जमीन को चौरस बनाया। सीढ़ीनुमा खेतों में बदला और सब जिमदारों का कहना है कि वह जमीन उनके खेतों के निकट है । इसलिए पहला हक उनका है। रात के समय उन्होंने अपने गाय-डंगर छोड़कर, सारे पौधे जड़ से साफ करवा दिए । काका ने अन्त में जव यह सुना तो तड़प उठे। मरते-जीते किसी तरह जब वह धनकोट पहुंचे तो सब झपाझप उनके चारों ओर घिर आए। उन्हें अपने बीच देखते ही सब के मड़छाई पड़े वुझे चेहरों पर नई चमक उभर आई । 'कका आ गए', 'कका आ गए'----गांव- भर में खुशी की लहर छा गई। किसनी की बूढ़ी दादी हाथों से रास्ता मसार-मसार कर किसी तरह आंगन तक आई, 'आपके लिए त्योनरा भाई के थान में सवा का पाठ भाख रखा है..कका बचकर आ गए तो फटकशिला में दस्से के मेले के वखत लाल धज चढ़ाएंगे। हमारी खिमली कहती थी। मरते समय हमारा जोगिया 'कका' 'कका' कहता रहा...।' वृद्धा की धुंधली पलकों पर आंसुओं का झालर लटक आया। 28/ सु-राज 'तल्ले पर किन्ना ने पटना छोड दिया !' उमिया दर्जी के मझले बेटे दलीप ने तुतलाकर कहा । काका ने उसे गोद पर विठला कर चूम लिया। 'कका, हमारे यहा सब कहते है ।' ससुराल से मैके आई विरली कहती-कहती अटक गई। 'क्या कहते है...?' 'गागि 'का वामन होकर भी लोहारो के साथ रहते हैं...!' काका वच्चो की-सी निश्छल हसी मे हस पड़े, 'कहने दे। लोहार नया मानुस नही होते रे ?' किस तरह से धूरा में लगाए पौधे जड़ से उखाड दिए, किस तरह से सारे जिमदार लाठी उचाकर मारने आए-काका ने यह सुना तो देर तक कही गहरे मे डूबकर सोचते रहे । तन में अब इतनी शक्ति नहीं थी कि भाग-दौड कर सकें। कही आ- जा सकें। किन्तु खाली हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहना भी उनके लिए संभव न था। अतः सरकार-दरवार में उन्होने दरखास्त दे दी- -लोहारो ने जो जमीन आवाद की, वह बेनाप को थी-सरकार की। जगल को साफ करके पहले-पहल सेती लोहारो ने की। इसलिए पहला हक इन्ही गरीबो का होना चाहिए। इनके पास दो हाथ अपनी जमीन भी नहीं। दूसरो के खेतो मे काम करके गुजारा चलाते हैं । योक- दार-जिमदार हर तरह से समर्थ हैं--कचहरी-कोरट जा सकते हैं, पर इन बेचारो के पास पैसा कहा ! दिन भर हाड तोडने के बाद भी दो जून रूखी रोटी नहीं जुट पाती । ये गूगे अपनी फरियाद लेकर कहां जाएं ? परन्तु सरकार-दरवार के पास दिल कहा, जो इनकी वातो पर रहम किया जाता ! अतः अन्त में जो होना था, होकर रहा। मामला लोहाघाट की कचहरी मे चला गया। दिन में ही काका को अधियारा दिखलाई देने लगा। ज्यो ही चलने-फिरने की कुछ शक्ति शरीर मे आई, घिंघारू की लाठी टेक कर गांव-गाव घूमने लगे। घेला-टका जो भी चन्दे मे मिलता, झोली मे जमा कर रहे थे। कचरी सु-राज | 29 - के काम आएगा। चन्दे के ही सिलसिले में काका एक वार फिर गांव आए थे वड़ी बहू के तन पर, लाज ढकने के लिए पूरे चीथड़े तक नहीं थे,. इस वार । किसी ने बतलाया-जो भी वचा-खुचा इसके पास था, नन्दू ने वह सव भी छीन-झपट लिया है। बड़ी बहू ने प्रतिरोध किया तो निठोर गाय हांकने वाली लोद की लाठी से बुशेमार मारने लगा। लोग बीच- बचाव नहीं करते तो जाने क्या हो पड़ता !..'वड़ी बहू को दूसरों के खेतों में मिहनत-मजूरी करके भी एक बखत की रोटी नसीब नहीं हो पा रही है। कभी-कभी थोड़ी-बहुत सहायता देवा न करता तो न जाने कब की फांसी लगा कर मर चुकी होती ..! गांगि 'का को आंगन में खड़ा देखते ही बड़ी बहू मैली गठरी की तरह उनके पांवों पर गिर पड़ी। हतप्रभ-से देखते रह गए काका-इन कुछ ही महीनों में सूखकर चिंधारू का कांटा मात्र रह गई है ! आंखें वुझी-बुझी। चेहरे पर काली- काली झांइयां! 'हं ब्वारी, यह क्या ?' काका ने विस्मयं से पूछा। प्रत्युत्तर में बड़ी बहू बुरी तरह फट पड़ी-सिसक-सिसक कर । 'अपनी पिनशन के रुपए भिजवाए थे। नहीं मिले क्या..?' काका ने नन्दू को बुलाया, 'मेरे जीते-जी नदिया, बहू इस तरह अनाथ हो गई तो मेरे मरने के बाद क्या नहीं होगा ?' काका का स्वर भीग आया। आक्रोश-भरी लड़खड़ाती आवाज़ में बोले, 'कहां तो दुखियारी को सबसे बड़ा भाग देते, कहां इसका ही हक तुम लोगों ने गिद्धों की तरह झपट लिया है। अपने ही घर में ऐसा अनर्थ करके कहां जाओगे ? किसी नरक में भी ठौर न मिलेगी। इसके लिए पिनशन के कुछ रुपए भिजवाए थे, वे भी तुमने हड़प लिए...!' इतने में खेतों से देवा आ गया-कन्धे पर कसी-कुदाली रखे। 'देवा', काका ने उसे रोकते हुए बड़ी वेदना से कहा, 'अगर आज तुम्हारी मां होती तो क्या उसे सड़क पर भीख मांगने के लिए छोड़ देते ? यदि कल मेरे बूढ़े हाथ-पांव न चल सकें तो क्या मेरी परवरिश नहीं . 30 / सु-राज करोगे? अगर तुम्हारी कोई वहन होती, अभागन विधवा हो जाती तो क्या उसके साथ ऐसा ही निठोर व्यवहार करते? हमारा आनन्द आज जिन्दा झोता और किसी पर एमी वीतती न जाने क्या-क्या नहीं कर डालता? प्रभागे ने खुद न पढ़कर तुम्हे पढ़ाया। दो आस वाला बनाया और तुम लोगो ने इस अभागन की ऐसी दुरगत कर दी ! यह दो-दो दिन तक भूखी रहे और तुम इसी के सामने बैठकर चौके में रोटी कैमे निगल लेते हो ? -सचमुच तुम राकस हो, राकस"!' काका बच्चो की तरह रो पड़े। उस रात खाना भी घर में उन्होंने नहीं खाया। पानी भी नहीं पिया। 'जिस पर में ऐसा जुलम होता है, उस पर का अन्न-जल में कैसे ले सकता हू?' काका ने कहा और उठकर चले गए। अपनी जिन्दगी में काका इतने हताश कभी नही दीखे थे । तन-मन से अपने को इतना अशक्त, असहाय अनुभव कर रहे थे कि उनसे चला भी नहीं जा सकता था। - 'कव आए दस काका को धन कोट पहुचे अभी पाचवा ही दिन था कि उन्होने देखा- द्वार पर उदाम-मा देवा खड़ा है। ?' 'अभी।' 'घर मे कुसल-बात सब ठीक है न ।' इस रूप-रग मे इस तरह घबराए खड़े देवा की ओर देखते ही, काका ने सहज ही प्रश्न किया। 'हा, सब ठीक है...।' पास ही पड़े फटे फोने के टुकडे पर देवा गुमसुम- सा चपचाप बैट गया। काका के आमपास कुछ और लोग भी घिरे थे। बेनाप जमीन के प्रश्न पर गम्भीर बात हो रही थी। मुकरट की तारीख नजदीक थी। बैठे-बै जब मास दलने लगी, तब देवा ने नहीं रहा गया। काका को तनिक एकान्त में, झोंपड़ी के पिछवाई ले जाकर बोला, 'गजव हा गया कंका..!' 'क्या? क्या?' 'ठुल वोज्यू ने कल रात दुल्ल के पेड़ पर लटक कर फांसी खा ली है। . किसी अपने रिश्तेदार के व्याह में पटवारी चल्यी गया है। कल सुबह तक लोटेगा। लाश अब तक लटक रही है...!' काका की आंखें खुली-की-खुली रह गई। फिर किसी तरह अपने को संयत, सन्तुलित कर बोले, 'यह सव भी एक दिन होगा देवा, मैं जानता था' 'जानता था।' इत्ता कहते हुए काका वहीं जमीन पर बैठ गए, कपाल पर हाथ धर कर । देर तक वह आंखें मींचे बैठे रहे। 'तहकीकात के लिए कोई आया-?' सन्नाटा तोड़ते हुए उन्होंने ऊपर - देखा। 'अभी तक तो नहीं।' 'जब तक पटवारी नहीं लौटता, हो भी क्या सकता है ?' काका ने बुदबुदाते हुए ऐसे कहा, जैसे स्वयं को सुनाकर कह रहे हों। 'लाश अभी तक भी उसी तरह है...!' विवश भाव से देवा बोला। रात के सघन अन्धकार में काका के लिए रास्ता देख पाना सम्भव नहीं था। फिर भी मरते-जीते किसी तरह गांव तो जाना ही था। चीड़ के छिक्कलों को जोड़कर रोकी जलाई। उसी के धुंधले प्रकाश में, ऊबड़- खाबड़, कच्चे रास्ते को टटोलते हुए, किसी तरह आधी रात के समय गांव पहुंच ही गए। लाश के पास आग जलाकर गांव के सभी लोग सारी रात 'पौरा' कर रहे थे। किसी भी समय पटवारी धमक सकता था। चारों ओर दहशत का वातावरण था-घोर आतंक था। पता नहीं पटवारी तहकीकात में क्या-क्या लिख ले जाएगा! पता नहीं किस-किस को दोपी ठहरा कर जेल की सजा दिलाएगा! गांव में कैसी तबाही होगी? कैसी वर्वादी ? इस तरह की मृत्यु का अर्थ था, सारे गांव का सर्वनाश ! काका के पहुंचने पर सवको धीरज बंधा कि पटवारी अब अधिक तंग 32 / सु-राज सु-2 -- नहीं कर पाएगा। काका सज्जन ये। कोई उनके सामने ऐसाबसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। पर यहा सबसे अधिक परेशान या--पधान । देवदार के पेड़ो की चोरी में की गई कटाई के प्रश्न पर पुत्र पहले ही गले-गले तक फंसा हुआ था । अब मामने बड़ी, यह नई मुसीवत क्या करवट लेगी-कहना कठिन या। पटवारी के वदवलन होने से नव और भी अधिक आतंकित थे । गाव में पटवारो-पुनम का आना वैमे भी अगुभकारी माना जाता है। पर इने देखते ही सबके प्राण सामन में पड़ जाते हैं इसके बारे में प्रचलित था कि यह धूस खाता है। देसी ठरुवा भी जमकर पीता है। इसके अलावा लगोठ का भी कच्चा है। का, अब क्या करें? पीताम्बर दत्त हताश होकर बोला। ---गाव उजड गया कका! टिकाराम ने आह भरते हुए कहा । बड़ी बहू का दुखियारा भाई अभी-अनी घर से आया था। बाज के पेड़ के नीचे बटा चुपचाप रो रहा था। नन्दू की बहू घर से बाहर नहीं निकल रहो यो। नन्दू भीड़ की निगाहों से बचने की कोशिश कर रहा था। अभी पो भी नहीं फटा था कि लोगो ने विस्मय से देखा-धरमसिंग पटवारी, अपचे सटवारी हीराबल्लभ के साथ यमदूत की तरह सामने खड़ा है। झोले ने हथकडी की रस्सी वाहर झाक रही है । सटवारी के कन्धे पर दुनाली बन्दूक रखी है। गले पर लाल-लाल कारतूसो की माला ! पटवारी का विस्तरवन्द सिर पर रखे पतिया ख्यांला पोछे खड़ा है। अपने दाहिने हाथ में पटवारी एक मोटा-सा चिकना डण्डा हवा में घुमा रहा है । जिसकी मूठ पर काला चमडा कसा हुआ है। पटवारी को देखते ही मुव चौकन्ने होकर उठ खड़े हो गए-चारो बोर से घिर कर। "सून कब हुआ...?' पधान भीड़ को चीरकर, कांपता-कापता, हाय जोडता ना खड़ा हुआ, 'सरकार माई-बाप "परसों रात दो घड़ी रात गए...।' । हुआ सामने बड़े रहस्यमय ढंग से पटवारी ने होंठ भींचे । डण्डा कुछ और जोर-से. गोलाई में घुमाता हुआ, शाख पर झूलती लाश को देखता रहा। चारों ओर श्मशान का जैसा असह्य सन्नाटा था। सब आंखें फाड़े, मुंह खोले पटवारी की ओर देख रहे थे-देखें, पटवारिज्यू अव क्या कहते हैं ? 'कपड़े फटे हैं-तार-तार ! पांवों पर भी खरोंच है ! लगता है, गले पर फन्दा डालकर लटकाने में हरामजादों को बड़ी मेहनत करनी पड़ी है।' 'हजूर सैप, ऐसा नहीं...।' जोधसिंह ने हाथ जोड़ते हुए विनम्र वाणी में कहा, 'यह तो मुंला, खुद ही झुल गई थी-ना-समझ ! जिन्दगी से परेशान थी...।' जोधसिंह की बात अभी पूरी भी न हो पाई थी कि पटवारी ने आव देखा, न ताव ! ठलम्-से डण्डं की भारी चोट उसके नंगे सिर पर दे मारी। जोधसिंह 'उ इजा' कहता हुआ, सिर दबाता हुआ, वहीं पर, वैसा ही बैठ गया। उसकी आंखों के आगे तारे झिलमिलाने लगे थे। 'गले पर नाखूनों के जैसे निशान हैं ! लगता है जमकर छीना-झपटी हुई है...!' पटवारी लाश को निकट से झांकता हुआ वुदबुदाता रहा । सव ऊपर की सांस ऊपर, नीचे की नीचे रोके खड़े थे। 'रस्सी काटकर लाश नीचे गिरा दो...' पटवारी ने भीड़ को सम्बो- धित करते हुए कड़ककर आदेश दिया। रूपराम गोली की तरह दौड़ता हुआ देवा के घर में घुसा और बड़ियाठ उठा लाया। रस्सी काटकर लाश को बड़े जतन से पकड़कर, कच्ची जमीन पर लिटा दिया-घास के ऊपर । शिकारी कुत्ते की तरह पटवारी अब चारों ओर घूम-घूमकर लाश का निरीक्षण करने लगा । 'कपड़ा हटाओ', 'लाश उल्टी करो', 'अब यो सीधा करो', 'यो-यों इस तरह से'~ अनेक आदेश वह देता चला गया। इस बीच उसने सिगरेट सुलगा ली थी। बड़े रहस्यमय अन्दाज़ में आंखें मूंदकर, बड़े संयत तरीके से सिगरेट का धुआं छोड़ रहा या। सहसा . । 34 | सु-राज उसने आखें खोली, 'लगता है कि इम वैचारी के साथ कमीने कुत्तों ने बड़ी बेरहमी से बदफैली को और बाद में लाश को पेड पर लटका दिया !' 'राम-राम', 'शिव-शिव', कहते हुए मनिराम पण्डित ने जाममान को और हाथ जोड़ दिए, 'परमेमर के लिए ऐमा मत कहिए ठाकुर मेप ! हमारे गाव के लोग गरीब जरूर हैं, बदचलन नहीं। फिर यह तो छातछात देवी थी। आंख उठाकर भी कभी इस्ने किसी की तरफ नही देखा।' उसकी बात पर पटवारी एकाएक ताव खा बैठा। बोला, 'चोप्प ! साला पाखण्डो।' पटवारी ने डण्डे से जमे जोर से कोंचा, 'माल्ला, बड़े शरीफो का गाव बतलाता है इमं ! औरत हवा में झूल रही है, इसी से पता चल जाता है कि इस गाव मे कैसे-कैसे 'सन्त' रहते हैं... पोछे बैठे गागि'का तभी आगे आए। उन्होने बीच-बचाव करके सबको शान्त किया। पधान के घर में पटवारी के लिए कासे के लोटे में गरम-गरम 'चा' आ गई। पीतल के भारी गिलास मे उड़ेलकर पटवारी गरम चाय को फूंककर होंठों से किंचित छुआकर पीने का प्रयास करता रहा। 'जर जमीन के मामले में किसी से लाग तो नहीं?' बोला। सबने 'नहीं' की मुद्रा में मौन-भाव मे मिर हिला दिए । "किसी से झगड़ा-फसाद-" 'न-ही।' 'तो क्या साली पागल थी, जो पो ही पेड़ पर लटक गई ?' पटवारी ने अपने भड़कते हुए आक्रोश को तनिक सयत करते हुए कहा । 'पंचायतनामा करके लाश फूंक दो-तियानी में-!'गागि 'का सम्बा मौन तोड़ते हुए बोले । 'पण्डित 'का, आप दाने-सयाने हैं"वुज़र्ग। किसी तस्तीकाद किए विना लाश को जलाना ठीक नही । कल कोई भी बात उठ सकती है। आप यह क्यो भूल जाते हैं कि यह हत्या या आत्महत्या का मामला है।' 'काका कहना चाहते थे, यह हत्या या आत्महत्या का नही, पापी पेट के लिए दो टुकड़े न.जुट पाने के कारण सिर्फ भूस से मौत का मामला है।
- किन्तु थोड़ी देर सोचते रहने के पश्चात् बड़े कष्ट से बोले, 'पटवारिज्यू, जव तक यह अभागन जिन्दा रही, दुख उठाती, रही, पर मरने के बाद भी इसकी मिट्टी खराब हो रही है ! कहां क्रिया-कर्म ! कहां तरपन, सराद !' 'कानून का पेट तो भरना ही पड़ेगा, पण्डित'का ! आप बीच में बोलेंगे तो मुझे तहकीकात में कठिनाई होगी। भला इसी में है कि आप चुप रहिए और पुलिस को अपना काम करने दीजिए।' दोपहर तक स्थिति अनिश्चित रही। पटवारी की अण्टी अच्छी तरह गरम हो जाती तो झमेला नहीं बढ़ता । अन्त में निश्चय हुआ कि चीर- फाड़ के लिए लाश को लोहाघाट के अस्पताल में ले जाना होगा। अब अधिक देर करना ठीक नहीं । लाश सड़ रही है । बदबू के मारे पास बैठ पाना भी कठिन हो रहा है। पटवारी का आदेश सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से कम नहीं था। अत: गांव के लोगों ने मोटी चादर में लाश को लपेटा। उसे एक मोटे- मजबूत लठे से वांधा । आगे-पीछे एक-एक आदमी लगाकर लाश कन्धे पर जोक ले गए.-~-लोहाघाट की ओर। , । ग्यारह चीर-फाड़ के बाद डाक्टरों ने हत्या नहीं, आत्महत्या की ही सम्भाव- नाएं अधिक बतलाई। और क्षत-विक्षत लाश सगे-सम्बन्धियों को सौंप दी। रिखेसर में ही सदगति करके जब सब गांव लौटे तो वहां और नई समस्या उठ खड़ी हुई। पटवारी ने सारी पड़ताल नये सिरे से शुरू कर दी थी। वह बात को जड़ से पकड़ना चाहता था- विधवा दिवंगता का पति आनन्द इत्ती कम उमर में कैसे मरा? क्यों मरा? सबसे अधिक तूल पटवारी ने इसी प्रश्न पर दिया। विस्तार से यह 36/ सु-राज ! भी पूछताछ की कि उससे या उसके परिवार ने किमी का पुराना मुस्तैनी घर तो नहीं था? किसी ने बतला दिया-सदानन्द के ठुल'दा की कका के परिवार ने लगती थी। उसने एक बार कका को किमी मामले में लपेटने की भी कोशिश की पी। टाल (इल्जाम) लगाया था कि उन्होंने किसी औरत को बेचने की कोशिश की थी। इतना मुनना भर था कि पटवारी चुटकी बजाता हुआ उसल पडा-- 'राज की बात अब आई न सामने ! है, हो पधानज्यू, आप क्या कहते हैं ?' पधान बेचारा क्या कहता रातोरात सदानन्द को देवीधुरा से घसीटकर लाया गया। कच्ची जमीन पर डण्डा पटकते हुए पटवारी ने कहा, तुम लोगों का पुराना वैर था, गागि 'का के परिवार से ?' हाय जोड़कर सदानन्द खडा हो गया-कापता-कापता, 'माई-बाप गागि 'का तो हाच्छात देवता हैं-भले मानुन' उनमें फिमकाबर होगा?' 'मुना है, तुम लोगो ने इन पर 'टाल' लगाने की कोशिश की थी...!" 'यह तो सकार बौत-बौत पुरानी बात है। ठुल 'दा जब जिन्दा पे, तव मुना था एक बार योडी-बहुत कहा-सुनी हो गई थी। बाद में तीसरे ही दिन सुलह-मफाई भी...।' "गुस्से में सुना है, तुम्हारे ठुल'दा ने यहा नक कहा था कि हम बदला लेकर रहेंगे !' 'हजूर, योल-चाल के वखत मुह मे निकल पड़ा होगा | तुम वान को भर पन्नीस-छन्चीस साल हो गए हैं।' पटवारी ने तड़ाम से एक डण्डा कमकर उमकी कमर पर जमाया, 'कुतिया के उण्ट ! बदला तो सौ साल में भी लिया जा सकता है ! क्या यह नही हो सकता कि आनन्द की मौत मे तुम्हारा भी हाय हो । हो सकता है कि छिपे तौर पर तुम लोगो ने उसे धमकाया हो। और दहात के मारे उसके प्राण निकल गए हो । मुना है रात को विस्तर पर वह मरा हुआ पाया गया था। बाद में उसकी विधवा को भी तुम लोगो ने मिलकर सूब दुरगत को हो-क्या यह नहीं हो सकता..?' पटवारी ने पच्च-मे जमीन थूकते हुए, अजीव कड़वा-सा मुंह बनाया, 'स्ववीसों की औलाद हो तुम सव! देवीधुरा में भी तो तुम लोगों ने भेदुवा डाक्टर को जूते से पीटा है अभी!' सटवारी की ओर मुड़कर बोला, 'इस सुंगर के बीज को हथकड़ी लगाकर नीचे गाय-डंगरों के गोठ में बन्द कर दो। असली हत्यारा यही - पूरे हफ्ते-भर से भी ज्यादा दिनों तक सारे गांव वालों की इसी तरह, एक-एक कर धुनाई होती रही। हत्या और जुर्म के अपराध कई सिरों पर मढ़े जाते रहे। जब तक पटवारी की दोनों जे भली-भांति ऊपर तक गरम नहीं हो गईं, वह लोगों को चूटता-पीटता चला गया। गांगि'का से रहा नहीं गया । ज्यों ही क्रिया-कर्म का काम समाप्त हुआ, वह सीधे पटवारी के डेरे में जा धमके। बोले, 'अब भी कोई और जुलम करना बाकी है सरकार ?' 'पण्डित 'का, यह क्या कह रहे हैं ?' 'हैं-हे करता हुआ पटवारी उनके और पास सरक आया, 'कका, यह क्या?आप नो पितर तुल्य हैं...!' काका खून का चूंट पीकर रह गए। हांफते हुए बोले, एक गहरी सांस लेते हुए, "भगवान ने मेरे साथ यही तो जुलम किया है-~-हं हो धरमसिंग यही पाप ! काश, मैं राकस होता, राकस हो पाता और तुम्हें यहीं फाड़कर खा जाता!' काका के होंठ फड़क रहे थे । धधकती हुई आंखें बुरी तरह जल रही थीं। भीतर उमड़ता हुआ आक्रोश दवाते हुए बोले, 'तुम यहां से अभी चले जाओ, इसी वक्त ! नहीं तो कोई विचपात हो पड़ेगा। मैं नहीं चाहता लोग। उनका यह रौद्र रूप देखकर पटवारी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। नीचे की सांस नीचे! 'तुम में कुछ भी इन्सानियत होती तो ऐसा जुलम न करते । तुम्हारे घर में बहू-बेटियां नहीं...?' हिकारत ने देखते हुए काका चले आए। , 38 | सु-राज - इन्ही भेडियो के हाथ मे राज सोपने के लिए हम जेल गए पे! अपना मद कुछ गवाया था-य -यही दिन देखने के लिए! हताश होकर काका बिस्तर पर ऐमे गिरे कि फिर दिनो तक उठ न पाए। वारह 'ठुल वोज्यू की अस्थिया हरदुआर ले जाए ?' डरते-डरते देवा ने पूछा। काका मौन-भाव से देखते रहे। 'सुना, ठुल बोज्यू मरने से पहले लछमन की काकी से कह रही थी...।' 'मुझे सब मालूम है देवु !' काका तड़पकर बोले, 'सब मालूम । रत्ती-रत्ती, पाई-पाई ! जब तक अभागन जिन्दा रही, तुम लोग मताते रहे । एक गास रूसी रोटी के लिए भी किसी ने भूलकर नहीं पूछा। नदिया ने उम विचारी पर हाथ उचाया । ऐसी अधेरी कोठरी उसके भाग मे दी, जिसमे जानवर भी नहीं रह सकते। इत्ती बडी दुनिया में अगर किसी का भी आसरा होता तो वह ऐसे मरती...? अब तुम कहते हो, उसकी अस्थिया हरद्वार में वहाए ! ये नदी-नाले क्या कम पवित्तर हैं इन्ही का जल बहकर तो जाता है हरद्वार । ...फिर वहा उसकी हड्डिया ले जाने में क्या मोक्ष मिल जाएगा उसे ? जिस दिन गले पर उसे रस्सी बाधनी पड़ी, उसी दिन दिला दिया तुमने मोक्ष... इन मुर्दा हड्डियो को यही कही नदी में डाल आओ । मिट्टी में अब'''रया रखा है...!' विराग भाव से काका देखते रहे, 'आदमी में बड़ा खतरनाक जानवर और कोई होता है, इस ममार मे"ओह, काश, यह दुनिया कुछ भी जीने लायक हो पाती..!' आखें मूदकर काका, पता नहीं किस समाधि मे लीन हो गए ! 7 तेरह लोहाघाट की अदालत में जिमदारों की हार ने मामला और भी उलझा दिया था। वेनाप जमीन का केस पिथौरागढ़ की बड़ी अदालत में चला गया था। काका को लग रहा था-खीझे हुए जिमदार कहीं कोई हिंसक वार- दान न कर बैठे ! यह जानते हुए कि पटवारी उनसे मिला है, न्या नहीं करेगा---उन्होंने आगाह करा दिया था। वृद्ध काका को घेरने के लिए नित नये-नये जाल रचे जाने लगे। देवदार के पेड़ों की चोरी के मामले में पधान के बेटे घना के बदले अव देवा का ही नाम लिया जाने लगा था। धना को चश्मदीद गवाह बना दिया था। ऐसे और भी कई लोग तैयार करवा दिए थे, जो कहते थे कि देवा को रान के अंधियारे में पेड़ काटते उन्होंने स्वयं अपनी आंखों से देखा था। इतना मव अभी चल ही रहा था कि एक दिन सुबह-सुबह लोगों ने देखा-पटवारी-पेशकार ने देवा का घर घेर लिया है। मामला क्या है-देवा की समझ में नहीं आया। विछोने में घसीटकर उमे वाहर लाए और हाथों पर हथकड़ी डाल दी। 'मेरा क्या कसूर है..?' देवा ने आश्चर्य से पूछा, 'आखिर यह सब क्या..?' पेशकार ने अपने भारी-भरकम बूट से एक ठोकर मारी, 'हरामजादा, हमसे पूछता है-~-क्या कसूर है ? कमीने, कतल करते समय अपने बाप से नहीं पूछा था कि यह सब क्या है...?' दूसरी ठोकर लगाई तो मुंह के बल मैंड के पत्थर पर जा गिरा । होंठ बुरी तरह कट गए और मुंह से खून की धार गिरने लगी। 40/ सु-राज पटवारी ने उसकी अधनंगी देह पर नहातड़ डण्डे जमाने शुरू किए तो वह यर-थर कांपने लगा । दोनों हाथ बंधे थे। मुंह भी पोंछ पाने की स्थिति में नही पा । हय- कड़ी की रस्सी रगकर लाल हो गई थी। गाव में गिरदम्म मच गया। भयत्रस्त, आतकित स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चे, मब हाय का काम छोड़ दोड़े-दौड़े आगन में आ जुटे । 'सरकार, क्या भूल हो पड़ी हमारे देवा मे-" वृद्ध पधान ने हिम्मत वाधकर पूछ ही लिया। 'कमीना, धर्मात्मा बनता है ! वनवसा में जोती परसाद की हत्या में भी इसका हाथ बतलाया जाता है । फारम में पूरी मजदूरी न मिलने के कारण मजदूर नाराज थे । अपने फारम के मकान में जिस रात उसको हत्या हुई, उम रात यह भी वही था। हत्या जो हुई, सो हुई, अठारह-बीस हजार की नकदी भी नदारत है...!' 'यह तो इन दिनो माल-भाभर की तरफ गया ही नही !' पधान हाथ जोडते बोला। 'अवे, जादों में तो गया था स्साला! तीन-सवा तीन महीने वहा रहा।' पटवारी ने नडकते हुए उत्तर दिया । लोहाघाट की हवालात की तरफ जब देवा को बंधी गाय की तरह हांककर ले जाने लगे तो मझली बहू, बच्चे सव डाड मारकर रो पडे । काका भागते-भागते जब तक लोहाघाट पहुचे, तब तक देवा को पूछताछ के लिए नैनीताल ले जा चुके थे। - चौदह लुटे-लुदे-ने काका गाव पहुचे तो देवा के नन्हें-नन्हें बच्चे उनसे तिर पड़े।
-- कोरे आकाश से एक दिन ऐसा बजरपात भी होगा-उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। रात को नन्दू को बुलाकर बोले, 'अव तू ही इस घर में सबसे सयाना है नदिया..! तू ही बड़ा, तू ही सबसे छोटा। तेरे होते हुए हमारे देवा के बच्चे बेसहारा नहीं हो सकते । खाना पहले उसके बच्चों को देना, फिर अपने । देवा के साथ ही नहीं, यह जुलम हम सब पर है । विना अपराध के देवा को फांसी लग गई तो हम सब कहीं के भी नहीं रहेंगे । घर में घुसकर, ये राकस एक-एक कर सबको मार डालेंगे। काका का गला भारी हो आया। मंझली बहू टुल-टुल रोने लगी तो काका को जैसे होश आया, 'बहू, तू क्यों रोती है पगली ? तेरे लिए तो अभी हम सब हैं। देखना हमारा, देवा एक दिन ज़रूर छूटकर आएगा." देख लेना...!' घर में जो कुछ भी गहना-पत्ता, पैसा-पाई बचा था, मंझली ले आई । बच्चों के हाथों में चादी की धागलियां थीं, पतली डोर-जैसी, उन्हें भी उतार लाई। गांगि'का के सामने रखती हुई वोली, 'इसके अलावा 'घर में और कुछ भी नहीं...! जैसे भी हो उन्हें छुड़ा लाना...।' मंझली की आंखों से टप-टप खुन की बूंदें गिरने लगीं। काका टूट सकते थे, झुक नहीं। कमर बांधकर सुबह फिर निकल पड़े। . पन्द्रह धनकोट पहुंचे ही थे कि सबने घेर लिया । 'देवा के साथ अन्या हुआ कका, घोर अन्या''यह कैसा राकस राज काका कुछ क्षण चुप रहे। 'आप तो कहते थे कका, गरीबों के लिए अब अच्छे दिन आएंगे ! सबके साथ न्या होगा ! पर यह क्या न्याय है, जहां कोई रो भी नहीं सकता !' + 42 / सु-राज
'देवा के मायने हो जोरेनमान्दार
काका बोले, 'ऐने हजारो देवा है. गरिने
लिए फासी परसुता दिए गये है...!'
'आप अब रही एकात कर सकसीर
अलम तो हम पर पहले भी होते . सभी होई
नही कब तक होते रहेंगे! इन्ही कार कुल व
इस तरह झमेलो में डाल रहो है हैन नि महा-
जगराम ने सुझाया तो काका हंन पड़े, दिनकर
यह बाज नहीं तो कल होगा या निकालनको
आवाज उठानी ही होगी। तुम्हारे हरिया के बहाने
क्या फर्क पडता है ! किमी की बनि तो माहो.''
कुछ रुककर काका आगे बोले, 'यह बाब और मानन्द र
और अधरम की लडाई है । पाप और पुन्न है। सरकार
भी तो हम ऐने ही लड़े ये...।'
"पर कका, दूसरो की आग में बाप नेहरा बन
बैठे बुधराम ने शंका प्रकट की।
'अपना-पराया तो सब मन का मेद है नन्द
कोई आन-औलाद तो थी नहीं-फिर विर बन्द
मे सड़ते रहे ! डपडे खाते रहे !.."समोर
काका चुप हो गए।
सोलह
पिथौरागढ की अदालत का
महल
गया तो जिमदारी के पावॉ को जीत दिलाई।
उन्होंने मामला ननीठान की दन्दन
दिया, पर लोहारो के सामने सिर पर
. का खरचा कहां से आएगा ? गांगि 'का ने सबको बुलाकर 'पंच-फैसले' की योजना बनाई। जिमदारों को और चाहिए भी क्या था? उन्होंने वात झट से मान ली। दोनों तरफ से दो-दो पंच रखे गए हरसिंह नायव मास्टर और पानसिंह दुकानदार जिमदारों की ओर से । ज्वालादत्त और उर्वासंकर धनकोट के लोहारों की ओर से । मानी पण्डत को सर्वसम्मति से सर- पंच बना दिया। तीन दिन पंचायत बैठी, पर किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाई। जिमदार-ठाकुर किसी भी कीमत पर अपने आसपास की बेनाप जमीन' लोहारों को देने के लिए तैयार न थे। अन्त में काका से रहा नहीं गया, 'आखिर ये बिचारे भी तो इंसान है यार ! धनकोटवालों की ठौर पर यदि आप होते तो क्या करते ? गौचर का रास्ता तो सरकार-दरवार ही नहीं, परमेसर के यहां से भी मिलता है. ये विचारे बिना ज़मीन-जायदाद के हैं-आप सबके जूठे-पीठे पर पलने वाले ! सरकारी, बेनाप जमीन में से कुछ ये भी कपोर लें तो क्या हरज ! आप लोगों के पास तो डांडा पड़ा है--पूरा पहाड़ ! 'लोहारों की आवादी हम अपने बगल में नहीं चाहते !' फनककर मोतीसिंग बुंगियाल बोला। 'तो इन्हें सामने का डोडा आवाद करने दो। आपसे बहुत दूर रहेंगे। इनकी परछाई भी आप पर नहीं पड़ेगी...।' 'आप बुढ़ा गए हैं । बुद्धि भरस्ट हो गई है कका !' नाथसिंह जोश में आकर कहने लगा, तभी तो उल्टी-उल्टी बातें करते हैं ! हमारे खिलाफ इन्हें भड़काते रहते हैं। अगर ज्यादा करेंगे तो देख लेंगे। लाश का भी पता नहीं चलेगा...!' गांगि'का हमेशा की अम्लान हंसी में हंस पड़े, 'ज्यादा खाने वाला अन्त में कुछ भी नहीं खा पाता बेटा ! भगवान से कुछ तो डरो...!' अन्त में फैसला जिमदारों के ही पक्ष में हो गया। मानी पण्डत पैसा खाकर बहक गए । लोहारों के खिलाफ उन्होंने फैसला ही नहीं दिया, बल्कि अब तक का हर्जा-खर्चा भी उनके माथे ठोक ! 44 | सु-राज दिया। लोहारो की आबादी गई मारी जमीन जिमदारों ने हथिया लो। गोचर का रास्ता भी जब हमेशा-हमेगा के लिए वन्द करवा दिया तो काका सीधे अदालत में पहुंचे लोहाघाट की । डिप्टी कलेक्टर के पास जा कर हाथ जोड़ते हुए बोले, 'हजूर, गरीवपरवर, अब आगे अदालत में जाने के लिए लोहार वैचारों के पास कानी कोड़ी तक नहीं । जिनके पास दिन-भर मिहनत-मजूरी करने के वाद, एक छाक खाने के लिए रोटी नही, लाज ढकने के लिए फटे-पुराने कपड़े नहीं, वे न्या के लिए किनके द्वार पर जाएं ?.."जिमदार अपनी पौंठ निमारने लगे हैं, अब वे पेट पर लात मारने पर आमादा हैं। यदि गरीबों की जमीन उन्हें नहीं लौटाई गई तो में यही-इसी अदालत के सामने अपने शरीर पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आत्मदाह कर लूगा।' काका की यह चेतावनी डिप्टी कलेक्टर को ऊपर से नीचे तक हिला गई। कहते हैं-पुल-हिडोला में हुई मार-पीट के मामले में ऊपर के अफ- मरों से उमे बड़ी झाड़ खानी पड़ी थी, इसलिए इस वार तत्परता दिख- लाते हुए चम्पावत के तहनीलदार को शीघ्र मौके पर जाने का आदेश दे दिया। तहसीलदार ने एक-एक जगह जाकर, सारी स्थिति का खुद जायजा लिया और किसी तरह समझा-बुझाकर जिमदारों से कब्जा छुड़वा दिया। दवाव में आकर कम्जा तो उन्होंने छोड़ दिया, पर अव वे लोहारो के ही नहीं, गागि'का के भी खून के प्यात हो उठे। जिन-जिन लोहारों के पास जितना कर्जा या, जिमदारों ने उन सब पर एक साथ दावा दायर कर दिया। अन्त में अदालत से कुर्की करवाकर कटोरी, करलो तक सब एक- एक करके नीलाम करवाने लगे। नु-राज/45
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सत्रह
जो कुछ जमा-पूंजी थी, उसे लगाकर भी गांगि'का देवा को न छुड़ा
पाए । अनेक वार नैनीताल गए, पर अन्त में सब व्यर्थ रहा ।
जिन लोगों का हत्याकांड में हाथ था, वे निर्द्वन्द्व होकर घूम रहे
थे, और कुछों को बलि का बकरा बनाकर, वध के लिए इस तरह तैयार
किया जा रहा था। लोगों का कहना था हत्या तल्ला चाराल के देवा
ने की थी, पर पुलिस ने इस देवा को लाग के कारण फंसा दिया है।
देवा के खिलाफ हत्या का ही नहीं, चोरी-डकैती का संगीन मामला
भी बना दिया गया था।
अदालत में देवा ने सिर्फ इतना ही कहा-
-मैंने हत्या नहीं की। चोरी भी नहीं। मुकदमा लड़ने के लिए
मेरे पास पैसा नहीं है।
लगभग दो साल तक केस चला।
अन्त में हत्या के मामले में तो वह बरी हो गया, किन्तु चोरी-डकैती
के अपराध में सवा तीन साल की कठोर सजा हो गई।
आगे अपील कैसे करता? न साधन थे और न किसी की सहायता
ही । अतः चुपचाप जेल की सजा काटने के अतिरिक्त और रास्ता भी क्या
था!
.
अठारह
---गांगि'का की कुछ अज्ञात लोगों ने कल रात हत्या कर दी।
आग की तरह यह समाचार सारे इलाके में फैल गया।
46 | सु-राज
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उन्नीस
विना अपराध की सजा काटकर देवा जव लौटा तो वह कोई दूसरा
ही आदमी या । बढ़ी हुई दाढ़ी, कठोर चेहरा, धधकती हुई आंखें ।
इन सवा तीन सालों की घोर यंत्रणाओं ने उसे बहुत कुछ सिखला
दिया था । अन्याय का प्रतिकार न करना, अन्याय को बढ़ावा देना है-
जेल में चक्की चलाते-चलाते, रामवांस कूटते-कूटते इस रहस्य को भी वह
आत्मसात कर चुका था।
वह सीधा धनकोट पहुंचा।
उसे देखते ही लोग जिज्ञासा से निकट आए।
-~~~-कका इस मड़य्या में सोते थे देवा !
-~~~कका के पहनने के कपड़े हमने अब तक सम्भालकर रखे हैं !
-~-इस छोटी-सी पीतल की थाली में कका खाना खाते थे !
-~-मरने से दो-तीन दिन पहले धार वाले चन्दन'का से कह रहे थे-
अब यह चोला अधिक चलने वाला नहीं है चना ! शायद उन्हें मरने का
आभास हो गया था। गांव जाकर एक बार फिर बच्चों से भी मिल आए
---
---राम-राज का सपना अधूरा ही रह गया.---कका अक्सर कहते
रहते थे--अजुध्या में रावणों का राज हो गया है।
---पिछले साल से कका का अन्न टूट गया था। दो-दो दिन तक
गास नहीं तोड़ते थे।
-~~~-कका की हत्या किसने की, सब जानते हैं देवा, किन्तु डर के मारे.
कोई कुछ बोल नहीं पाता!
'किसका डर?' देवा अट्टहास कर हंस पड़ा, 'इतने जुलम सहने के
वाद भी डरते हो ? इससे अधिक और क्या हो सकता है तुमारे खिलाफ?'
देवा क्या कह रहा है ? विस्मय से सब देखते रहे ।
।
48 / सु-राज
सु-3
1 'कला की हत्या किमने की? मुझे बताओ। मैं कहता हूं, चौबटिया पर बड़ा होकर। धाध लगाकर। गला फाड़कर!' देवा ने दहाड़कर कहा तो सव मन्न रह गए। कुछ देर उनको भयग्रस्त, अचरज में डूबी, वुझी-बुझो आकृतियों को ओर वह कुछ टटोलता-सोजता हुआ देखता रहा । फिर तनिक सयत स्वर में बोला, 'का जोगो घे-परमहंन । इस धरती के परानी नहीं हमारी धमनियों का रक्त बोले का पानी नहीं । जो हमें जीने नहीं देंगे, हम उनका जीना भी कठिन कर देंगे।: वका की हत्या क्यों हुई? क्या दोप या उनका ?विना अपराध के मैं जेल में नारकीय जातना क्यों नहता रहा? आप लोगों पर आए दिन ऐसे-ऐने जुलम क्यों होते हैं ? कमलु'का के बच्चे घुट-घुटकर, तडप-तड़पकर क्यों मरे ? इन पर विचार करना होगा। तुम्हे जो भी सहायता चाहिए में दूगा"। तुम मुझे सहारा दो, मैं तुम्हें मुक्ति दूगा..! अपने परानों की आहुति भी देनी होगी तो खुशी- मुशी से दूगा।' देवा का रौद्र रूप देखकर सब मे दहशत छा गई। पर लोटने पर देवा ने न बच्चो से कोई बात की, न पत्नी में ही कुछ बोला, नन्दू को घर का भार सोपकर, रात के अंधियारे में, सिर पर कफन वाधकर चुपचाप निकल पड़ा-किसी सुबह की तलाश में ! * म-राज 149
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अंधेरा और
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। कटीले तारो की तरह उलझी वैत को घनी झाड़ियों को भीरता हुआ, जद वह आगे बढ़ा, तो बुरी तरह हाफ रहा था। शरीर जगह-जगह ने लहू- लुहान था। वायें पाव के तलुवै की मोटी खाल, मूखे वास का खूट गह जाने से मूली के दिक्कल की तरह एक और लटक गई थी, जिससे निरन्तर रक्त यह रहा था। कन्धे पर पड़ी सिमरिया तार-तार फटी, कमर पर कौपीन की तरह बधी चौकट घोती पर जगह-जगह लहू के निशान थे- काले-काले घम्वे! मूरज उगा नही था। पौ फटने मे अभी देर बहुत थी । इसलिए आस- मान को छूते, लम्बे-चौड़े दैत्याकार हल्दू, गाल, शीगम के धने वृक्ष वडे भयावने लग रहे थे। डाल पर बैठे पक्षियो के पंख फडफड़ाने मे कभी-कभी डरावना-मा स्वर निकलता। आकाश पर अटकी प्रेत-छायाओं का-मा भान होता। जमीन-आसमान, जहा तक दृष्टि जाती अर्धरा-ही-अंधेरा ! उसके नथुने फड़क रहे थे। धधकती रक्तिम आखो मे गजब का आतक पा । भागते हिरन की तरह चौकन्ना होकर वह बार-बार सशकित भाव से इधर-उधर देखता। पेड़ों से उलझी धनी लताओं के झुरमुट मे तनिक-सी भी उन-मन की बाहट हुई नही कि वह चौकडी भरकर भागने लगता। अभी-अभी दूर कहीं गोली चलने की-सी आवाज शून्य मे गूजती उसे साफ सुनाई दी थी। तब के उसका हृदय धौंकनी की तरह धडक रहा था। शंका से इधर-उधर देखता हुआ सोच रहा था-- कही उसके मन का वहम तो नही मह ! इस विकट वन में, इस अधेरी रात में गोली की आवाज भला कहा से सुनाई देगी? पता नही उसे अव जो कुछ क्या हो गया है ? एक विचित्र-सी दहशत उसके मन में घर कर गई है। भी वह सोचता है, उसे लगता है, वह सब आंखों के आगे घटित हो रहा है । कभी उसे घास-फूस के घर दिखलाई देते-धूं-धूं कर जलते हुए। कभी सुतरिया नदी में तैरती-उतरती लाशें ! कभी सेमल के बूढ़े वृक्ष तले पड़ी कोई निष्प्राण आकृति । गोबर-मिट्टी से लिपी देहरी पर कील वाले भारी-भरकम काले बूटों के गहरे निशान । कच्चे किवाड़ों पर खून से रंगे हाथों के छोटे-बड़े अनेक लाल धब्बे ! पूरा-का-पूरा भदरपुर गांव मुर्दो से पटा दीखता । कभी-कभी एक और आकृति उभर उठती। सफेद कपड़ों में लिपटा कोई दैत्य, बैलगाड़ी हांकता हुआ, उसी के शरीर पर गाड़ी के पहिए चढ़ाने लगता तो कुचलने के भय से, दोनों कानों को हथेलियों से दवाकर, बुरी तरह चीख उठता ! "का हुआ रे परसिया ?" चौंककर कंचनियां कहती तो वह काठ की तरह उसके भयग्रस्त चेहरे की ओर देखता रहता। "मैंने गलत देखा कंचनियां ! वह वइल-गाडि नाहिं, सर्दार सोहनसिंग का टरक था, टरक, जो मोरे सीना से पार निफर गया...!" कंचनियां समझ न पाती, "का कहत हो ! सोहनसिंग अव हिंया कहां? टरक-ठेला गाड़ी कहां? कोई सुपना देखा हैगा जागते मां !" "हेइs राम! सपनांहि होता जोन देखा ! जेहि रोजहि देखत हूं।" इतना कहकर परसिया जाने लगता तो कंचनियां उसका हाथ पकड़ लेती। इस पर वह तमकता हुआ मुड़कर देखता-- "पुलस पीछे परी है-बन्दुक तानि के । जब तक ई मुसीवत नाहिं निकर जात, का हो सकत है ! फारम वारे विरजवासी ने म्हारे आधे खेत हजम करि डारे, अब पूरे निगलने के वास्ते मुंह खोलि के बइठा है ! खेत-घर छाडि दें तो तू हि वता, कहां रहें ? .. जौन बात सच नाहिं, उहाको सुपनां देखना भी पाप है, घोर पाप !" परसिया कह ही रहा होता कि कंचनियां स्वयं को रोक न पाती, "नीका सुपना भी तो तू देखत है -जागत-सोवत! उसे देखना भी का पाप है ? अगर पाप है तो फिर पुन्न का है रे ?" कंचनियां का स्वर उदास - 52 | सु-राज हो आता। उसकी ठोड़ी पर अकित गोदने के तीन नीले-नीले चिन्दु और गहरा जाते। "पाप का है ? पुल का? हम नाहिं जानत..!" "हम जानत हिया से कहिं दूर चले जात हैं । कालि नदिया पार नेपाल मां वसि जात हैं । हुआ किसी की चाकरी करि के, धान कूटि के, जगल मां वांस-लकड़ी काटि के दो परानियो का पेट तो अघा ही जाएगा ना!" "तू तो निरी-निरी पगली है । नाहिं जानत !" हवा में हाथ हिलाता हुआ परसिया कहता, "दो का हि झझटा नाहिं । जोन चार परानिया और है, उन्हें का धतूरा कूटि के पिलाइ दूं? मुतरिया में मुह वाधि के फेकि "उनका भी होइ जाइ! तू काहे को चिनता करत है !" "चिनता उनकि नाहि, पुलस को है। फारम वारे विरजवासी को है'! तू नाहिं जानत । जे राकस है राफस-चारो ओर घेरि के खडे है मुह फाडि के।" "मरद होइ के का बात करत हो ?" कचनिया की वुझी आखो मे सहसा आग की लपटें उभर आती। दाए हाथ से हवा में उड़ती वित्त भर की ओढ़नी ममेटती हुई कहती, "मनुस बार-बार तो नाहिं मरत, नाहिं...!" "जे तू कहत है कंचनिया ?" परसिया का बुझा-बुझा चेहरा दमक आता । मन का सारा सताप जैसे लहर छूकर वह गया हो । अबोध शिशु की तरह कचनिया की हिरनी-जैसी बड़ी-बड़ी कजरारी आखो में आखें डाले, जाने क्या खोजने लगता! गोदने का नीला रग कितना निखर आया है ! कानो में दूव के तिनके-जैमी पतली-पतली चादी की बालियो का गुच्छा हया मे हौले-हौले तरता हुआ कितना भला लग रहा है ! माथे पर विखरी स्याह लटें एक साथ कई चितर बना रही हैं । परसिया के फौलादी हाथो को जकड़ न जाने कब, कैसे इतनी गहरी हो जाती कि कचनिया की मुकामल कलाइलो पर गहरे निशान से छूट जाते। ज्यों-ज्यो दवाव बढ़ता, कचनिया भी त्यो त्यो बदलती जाती। तो धीरे उसका साहस पिघलकर पानी बन जाता। एकाएक भावुक होकर कहती, "तू जंगल मां रहत है। दिन-रात भागत-फिरत है । पुलस तोहार पीछे है । हमहिं जहर दे दे परसि ! जी के का करि हैं ?" कंचनियां का गला भर आता । परसिया के सीने पर दुवककर वह चुपचाप सिसकने लगती। परसिया का मन डूबने-सा लगता तव । ऐसा कब तक चलेगा, उसकी समझ में न आ पाता। आखिर इस सवका अन्त क्या होगा? कैसा होगा? कब होगा? एक बहुत बड़ा प्रश्न-चिह्न उसकी आंखों के सामने उभर आता। सूखा, ठण्डा भात पड़ा रहता । कंचनियां दवे पांव भीतर जाकर, चुपके से परात में ले आती। साथ में मछरिया का थोड़ा-सा वासी झोल भी। आंखें बन्द किए, गूंगे पशु की तरह वह चुपचाप भकर-भकर खाता रहता। कुछ देर बाद नीचे जमीन पर विखरे सूखे पयार से यों ही हाथ पोंछता हुआ वह उठता और चुपचाप अन्धकार में कहीं खो जाता। कंचनियां कुछ पूछने के लिए कभी-कभी आगे बढ़ती, परन्तु प्रश्न गले में ही भंवर खाकर रह जाता। दो लगातार पानी वरस रहा था-कई दिनों से। गरज-बरज के साथ झमाझम बारिश हो रही थी। सुतरिया नदी का मटमैला पानी तट के बंधन तोड़कर दूर-दूर तक खेतों में बिखर गया था। गांव के पीछे खादड़ में छोटे-छोटे तालाब जो गर्मियों में सूखकर चटक गए थे, ऊपर तक लवा- लव भर आए थे। कई झोपड़ियां कमर-कमर तक डूबी थीं । बीच में भंवर की तरह मटियाली मिट्टी मिला गंदला पानी घूम रहा था। दइया के घर 54 / नु-राज - । में बर्तन-भाडे तर रहे थे। परमिया की कोठरिया में गाव-गराम में लोग जुटे थे। रोने-मिमकने का दवा दृा स्वर गूज रहा था। पिरथी नाम को गाय-डगरों को लाने जगत गई थी, और लोटी न थी --आज मात दिन हो गए ये ! भी धारू ने खटीमा जाकर थाने में रपट दरज कराई पो। पर अब तक कोई पता-पानी मिल न पाया था। ममरू ने जगल छान मारा था। बिहारी मुतरिया नदी के किनारे. किनारे दूर तक देख आया था। मफेद के नये जंगल तक ! कहीं बन मरी हो । परन्तु प्रश्न यह था कि वह डुबने क्यों लगी? चनकइया के परधान के घर भान हो गया था। अगले चैत में तो शादी ही तय पो ! भोवू के लिए दिन में ही तारे छिटक पाए। इकलौता वेटा परमिया गांव गया था, कही दूर, अब तक लोटा न था। लड़को की कही कोई योज-सवर न यी! इस माल पता नहीं क्या सोचकर चकरपुर माही में पिरयो के न्याह के लिए कपड़ा खरीद लाया था। फसल पर हाप पले पे, शायद सोचा था कि उधारी में तो यही अच्छा है, वक्त पर काम आएगा। घर में किमी मे रार-रज नहीं। किमीने अगड़ा-फसाद नहीं। किसी किसम की कोई दुख-तकलीफ नहीं ! फिर वह बारमघात क्यों करने लगो? तराई में शेर-बाघ नया वन-हाथियों का अधम आए दिन रहता है। किन्तु बाघ-भालू भी उठा ले जाता या पागल हायी पावों तले कुचत डालता तो क्या रक्त, मांम, हड्डियो का या पहनने के चीथड़े का- कोई निशान ना कही दोषता ! यानेदार हरपरमाद नहकीकात पर गाव आया था।पिरथी के लापता होने के लिए मारे गाव को जिम्मेदार ठहरा रहा था। उसका कहना था कि भी धारू ने अपनी जवान बेटी पिसी परदेसी के हाप बैच दी होगी-गाववालों की मिली-भगन ने । नहीं नो लहरी एकाएक कहाँ गायव हो गई ! डूबी नहीं, कोई भगाकर ले नहीं गया, किसी जिनावर ने चौरा नही, फिर? कुछ माल पहले भी पाम के ही गिवपुरा गाव में ऐसे ही एक लड़की अंधेरा और / 55 लापता हो गई थी। बाद में पूरे दो महीने बाद पता चला कि उसके मां- वाप ने सितारगंज के किसी फारमवाले के हाथ, थोड़े से टके के लालच में बेच दिया था। भीखू ने दहाड़ मारकर परमेसर की सौगन्ध खाई थी कि वह ऐसा घोर पाप केसे कर सकता है ! अपनी बेटी को-~-अपनी ही सगी वेटी को गाय-बछिया की तरह कैसे वेच सकता है ! उसे अपना परलोक विगाड़ना है ? राम, राम ! ऐसा पाप !छिः ! जब थानेदार किसी भी तरह टलने को राजी न हुआ तो अपनी फटी मिरजई में से मुड़े-तुड़े, मैले-कुचले कुछ नोट निकालकर, गिड़गिड़ाते हुए वह थानेदार के बूटों पर माथा टिकाकर रो पड़ा था, “देवता, ऐइसा नां कहो ! कलपानत होई जावेगा। सरकार-दरवार ही ऐइसा कहेगी तो दुनिया का नहीं कहेगी?" "स्साले, कमीने ! छोकरी वेचकर खा गया और हमसे कहता है, दुनिया क्या कहेगी?" उसकी झुकी कमर पर ठोकर मारकर थानेदार चला गया। थानेदार को थी भी कुछ जल्दी । शाम हो रही थी । खटीसा पहुंचते- पहुंचते अंधेरा हो जाएगा । लड़की खो गई तो क्या हुआ? दो-चार दिन में मौज-मस्ती करके घर लौट जाएगी। नहीं भी आएगी तो क्या गजब हो जाएगा ? लड़कियां तो आए दिन भागती रहती हैं ! भीखू बरसात में भीगता हुआ, लाठी टेकता फिर बाहर निकल भाया । कहीं-न-कहीं तो कोई खोज-खबर मिलेगी ही! रात घिर आई तो वह मडैय्या में लोटा । किवाड़ के सहारे बांस की लाठी टिका ही रहा था कि बिन्दा टूटी लालटिनियां लिए भागता-भागता आया। वोला, “पिरथी की लाश बूढ़े सेमल के पीछे पड़ी है काका बंजर धरती मां, चील-गिद्ध लगे हैं। तमाम वास आ रही है-दुरगन्ध !" लालटीन के सहारे, अंधियारे में रास्ता टटोल-टटोलकर भीखू के साथ-साथ सारा भदरपुर उमड़ पड़ा था। -हियां तो हमने पहिले भी देखा था-कल, परसों ! -हो सकता है, घास में लाश छिपी हो, निगाह न पड़ी हो ! - 56 } सु-राज -लगता है, नाज ही किसी ने फेंको है। -एक मोटर-ठेला चकरपुर की तरफ जा रहा था, यहा पर भी कुछ देर रुका । जे रहे पहिए के निशान ! इतनी बारिश के बावजूद भीगी मटियाली ठोस धरती पर, पहिए के निशान साफ दीख रहे थे। --पागल हो तुम ! कोई मारि के लाग हिंया छोड़ि जाएगा-गाम के पास ! मुतरिया में बाढ आई है। उसी में नाहिं वहा गाता था ! जित मुह, उत्ती वा ! "पचाइतनामां करके लाश को रात में ही जला दिया था। गाववालो को डर था कि कही फिर पुलिस आई तो फिर मुहराम मचेगा। । तीन जब में मोहनसिंह का ट्रक बनवसाआता-जाता, रात-विरात, भदरपुर रुकने लगा था, भीखू के मन में नाना प्रकार की गकाए उगने लगी थी। धरमू पधान का छोरा झन्नू चाल-चलन का ठीक नहीं-पचायत ने भी सरेआम ऐलान कर दिया था। शरसी जब लापता हुई, तब सवम पहला सन्देह सन्न पर ही हुआ था। पूरे दम दिन के बाद जब एक रात भग्वी, तन पर नाममात्र के कपडे लटकाए लौटी तो उसे पहचान पाना कठिन था। फिर उसने जो राम-कहानी कही, उमे मुनकर तो सबके रोगटे खड़े हो गए थे। उसने रोते-कलपते बताया था कि किम तरह में गहर में 'मेला' दिखाने का लालच देकर अन्नू ने उसे जबरदस्ती 'टरक' पर विठलाया। जाड़ा खूब था । हवा देह को लगती थी। इसलिए अपना आधा कम्बल उसके ठिठुरते शरीर पर सपेटे रहा-नन्ही चिडिया की तरह अपने सीने से दुबकाए कि कही सर्दी न लग जाए ! बहंडी पहुचने पर 'मेला' तो क्या दिसलाना था, हा, उसे ही एक मेला अवस्य बना दिया था।किसी सपरल अंधेरा और / 57 वाले पुराने मकान के अंधेरे कमरे में वन्द करके, जवरदस्ती देसी दारू गले में उड़ेली और सारे कपड़े उतारकर, उन्हें किसी दूसरे कमरे में छिपा दिया था, ताकि बिना कपड़ों के कहीं बाहर न भाग मके ! उसे होश नहीं, क्या-क्या जुलम उसके साथ होता रहा। सातवें दिन, रात के घुप्प अंधियारे में जब खूब पानी बरस रहा था, बिजली कड़क रही थी -मौका मिलते ही फटे टाट का चीथड़ा देह पर लपेटे बाहर निकल आई थी। बाहर कड़ाके की सर्दी थी। वह भागती हुई डामर की पक्की सड़क तक आ गई थी। सड़क के दूसरे किनारे पर कोई टरक-ठेले वाला ठेला रोके खड़ा था । बनवसा की तरफ कहीं जा रहा था । उसे पता नहीं, क्या सोचकर दया आ गई ! उसने चुपचाप ठेले पर विठला लिया-सामान के -बीच में थोड़ी-सी जगह बनाकर । दो-तीन दिन तक अपने पास रखे रहा। फिर जाती बेर, तन ढकने के लिए अपनी फटी लुंगी और पुराना कुरता दे दिया और रात को यहां तक छोड़ गया-~-सुतरिया के पुल के पास, नीम के पेड़ के नीचे... भीखू ने देखा था। जगह-जगह उसके शरीर पर नीले निशान थे। घाव थे। दिनों तक वह विस्तर पर पड़ी रही। बाद में पता नहीं, क्या हुआ उसे, वह पगला-सी गई थी। अपने शरीर के कपड़े वह स्वयं फाड़ने लगी थी। अपने वालों को बुरी तरह नोचने लगी थी। कभी-कभी जब पागलपन के लम्बे दौरे पड़ते तो वह अपने कपड़े उतार- कर, पोटली की तरह उन्हें सिर पर रखकर, वीच गांव में से छाछट नंगी निकल जाती थी। सुतरिया पर नहाने जाती तो सारे कपड़े किनारे पर ही छोड़ देती । निमय्या गांव का गराम-सेवक लल्लन एक बार उसे ऐसा बहकाकर ले गया कि फिर कभी वह गांव लौटी न थी । बनवसा के बाज़ार में लोगों ने उसे देखा था-ठेला डराइवरों की भीड़ में "टेशन पर छुक- छुक गाड़ी में लकड़ी का लदान करने वाले मजूरों के साथ .. अन्त में किसी ने बतलाया कि वह चकरपुर से महेन्दर नगर-नेपाल की तरफ भाग गई है, किसी मुसलमान फेरीवाले के साथ । यह नियति कोई नई नहीं थी। पहले भी ऐसा ही होता था गांव में, । 58 | सु-राज . जब भी छोटा या-तब भी इसी तरह लोग मताते थे।पनमी काराको दूसरे व्याह की नई-नवेली बहू मिनदूरी के माय, पुलिस का मुछन्दर मिपाही हर हफ्ता पटीमा मण्डी ने आकर दिन-दोपहर उनको अपडिया में घुमकर बदफैली करता था। जिस दिन यह आता, काका उस सारे दिन स्टे-बटेने बाहर रहने-ननाव में मछरिया पकडने के बहाने । गाम तक जाल में जितनी भी मरिया आती, वे भी मब मुछन्दर के पेट मममा जाती। जब रान हो आती तो पचमी काका के कधे पर कुटे हुए माफ चावन, मावुत उरद की दाल के थैले के माय-माय कुमडा या कद्दू भी लदवाकर अपने माथ डेरे तक ले जाता । बदले में मतजुगी काका को क्या मिलता? कभी लात, कभी कोई गन्दी-गी गारी पूरे मान माल तक वह इस पाने मे रहा, और उमका यही मिलमिला चलता रहा। लोग कहते हैं कि पचमी काका के तीनो छोरे उमी मुछन्दर पर गए थे। और ये जो तिजारय वाले पधान-माहूर जाड़ी में पहाड़ में उतरकर थड़वाट में आते है, वे भी क्या कुछ नहीं करते ! पण्डत सीसराम पधान से पाच वीसी रुपये करजा लिए थे उसने । हर साल एक वीसी ब्याज के चुकाता रहा । साय में चावल, धान, दात का सीधा अलग में । सारी जिन्नगी-भर इतना चुकाने के बाद, बाब भी साबुत पाच बीसी रुपये ज्यो के त्यो उसके मिर पर है करज के। सीसराम वामन माथे पर लाल चन्दन का टीका लगाकर, घोड़े पर सवार होकर आता-~अकड़ता हुआ। जब भी वसूती पर गाव बाता साहूकार बनकर, उसी की अपडिया में दिनो तक हैराडाते पड़ा रहता। उसकी जवान विधवा भावज को, रात के अधियारे में अपने बिछौने पर घसीटते उसने कई बार देखा था । हरामी कही का! खटीमा मे कुत्ते की मौत मरा था। बड़ी माता निकल बाई थी। सारा कोई उठाने वाला तक न मिला तो कहते हैं, जमादारों ने घसीटकर गगा में बहा दिया था सुसरे को। बधेरा और / 59 । - - चार परसिया जब गांव लौटा, तव मातम छाया हुआ था। पिरथी का दाह- संस्कार हुए अभी हफ्ता भी वीता न था, किन्तु सारे घर में पिशाच- छाया-सी मंडरा रही थी। परसिया को न रात नींद आती, न दिन को ही चैन । हर समय. बेचैन-सा, वावला-सा घूमता रहता, अपने ही घर के आंगन में, चिड़िया- घर के पिंजड़े में बन्द चीते की तरह । परन्तु जिस दिन से उसने पिरथी के हत्यारे का पता लगा लिया, अपना आपा खो बैठा था। थाने में बड़ी उम्मीद लेकर गया था वह, परन्तु वहां उसे बुरी तरह घुड़क दिया था। गांव के लोगों से, पंच-सर- पंच सबसे कहा उसने, पांवों पर टोपी,धरकर, पर कोई सुनने को तैयार न था । सबने डरा-धमकाकर वापस भेज दिया था। रात के अन्धकार में एक दिन, फिर पुलिया के पास, नीम के पेड़ की छांह में सोहनसिंह का ठेला रुका था । झन्न के घर में देर तक कच्ची छनती रही, भात के साथ कुकड़ी भी तली गई थी। दावत कव तक चलती रही, किसी को पता नहीं । किन्तु सुवह पौ फटने से पहले ही सारे गांव के लोग जाग गए थे। पुलिया के पास खड़े टरक से आसमान को छूती लपटें उठ रही थीं और पास ही सोहनसिंह की लाश तीन टुकड़ों में कटी पड़ी थी-खून से लथपथ । दोपहर तक पुलिस का फौज-फरी आ धमका था । सारे गांववालों की सामूहिक पिटाई चल रही थी। गरदन झुकाए, हाथ बांधे सव खड़े ये-केवल परसिया के अलावा । कल रात तक वह यहीं था। सोने से पहले पंचायत-घर के चबूतरे पर पधान ने स्वयं उसे देखा, पगलाया-सा घूम रहा था। फिर सुबह कह गायब हो गया, यह रहस्य किसी की भी समझ में न आ रहा था। 60 / सु-राज घर के आगे आम के पेड़ में भोखू को कसकर वाधा गया था। थाने. दार उसकी झुकी हुई नंगी पीठ पर झपाझप सोटी मारता चला जा रहा था और वह दहाड़ मारकर चीख रहा था, कसाईखाने के जिवह होते पशु की तरह-गला फाड़-फाड़कर । परसिया फरार था, इसलिए हत्या का सारा दोप भीखू के सिर पर मड़ा जा रहा था । पर भी वार-वार यही कह रहा था कि हत्या में उसका हाथ नहीं। जब रही कोई मूराग न मिला तो वन्त में भीखू को ही नहीं, भीखू की घरवाली अमिया और छोरी चंदरिया को भी वाधकर थाने ले गए थे। आठ-नौ दिन हिरासत में रहने के बाद जब वे गाव लौटे तो उनका हुलिया हो बदला हुआ था। भीलू के घुटने टूटे हुए थे, उमसे चला तक नही जा रहा था। गाव के लोग कन्धे पर उठाकर किसी तरह घर लाए ये । अमिया अपने को मुह दिखलाने लायक भी नही समझ रही थी- साज-धरम के मारे। चंदरिया की फूल-सी देह मुरझा आई थी। आखों के नीचे कालीकाली झाइया। देह में दरद के मारे चला तक नहीं जा रहा था। पुलिस के डर से कोई भी सहानुभूति जतलाने घर नहीं आया था। तीनो मे ही रोते-कलपते सारी रात पड़े रहे मईय्या में । पांच "जे गाम छाड़ि के चले जात हैं।" "कहा-?" "कही भी। हिया पुलस रोज-रोज परेशान करत है। हर हफ्ता पाना मा डियूटी। हर हफ्ता मार-कुटाई। हम बादमी हैं कि जिना- वर..?"
" "दूसरे गांम मां जाकर का पुलस छोड़ि देगी ? हुआं से भी थाना मां बुलावेगी !" भीखू ने कहा । "तो कहीं दूर चले जात हैं बड़ी नदिया पार । पुलस-हाकम को जहां पता भी नाहिं चलै !" समर्थन पाने की डूबती आशा से अमिया ने पति की ओर कातर दृष्टि से देखा, "हुआं कौन जानत है हमें-उस मुलक मां ! हम कऊंन हैं ? का करत हैं ? "अपन गांम छाडिना इतना आसान समझत हो ?अपन घर-दुआर! खेत-खलिहान-" यह सुनते ही अमिया व्यंग्य से हंस पड़ी, दर्द-भरी हंसी में, "गहने- पत्तर गए। भाने-बरतन नाहिं रहे । खाने के लिए नाज का दाना तक नाहिं छोड़ा राकसों ने। वचा खेत-खलिहान फारम वारा किसी दिन हड़प लेइगा, जइसे संखी के बाप का हड़पा था। फिर वचा का है हिया-सिवा घास-फूस की टूटी मडैय्या के !" "तू तो निरी-निरी पगराय गई है । अपन पुरखन की जमीन छाडि के कोन ठौर है हमहि ? हम हिंया हि मरेंगे--इसी मट्टी मां।" भीखू ने तनिक आवेश में कहा तो अमिया सहम गई। 'एकहि पुत्तर है-फरार । कउन जाने जिन्ना भी है या'..! पुलस का का भरोसो। अपन करम ही काने हैं तो कउन का करि सकत है ?" गहरी सांस भरती हुई अमिया बोली, "कउन जाने का लिखा है, अपन कपाल मां ? धतूरा खाई के सोइ जाहिं तो तरान मिलि है।" "हमार परसिया हिंया कभी जरूर आवेगा, जिन्ना रहा तो-तू नहिं जानत है।" भीखू छत की ओर देखता-देखता सहसा चुप हो गया था ! उसकी आकृति में अजीब-सी विवशता का, कातरता का भाव था । सुबह कंचनियां चुपके से आकर कुछ दाने चने के दे गई थी। उन्हें ही तवे पर भूनकर, ढेर सारा ठंडा पानी पी लिया था। चंदरिया का हाथ पकड़कर वह अपने घर ले आई। झिझने कपड़े में बंधी, पिसी हुई हल्दी की गीली गांठ को आग की आंच में गरम कर, सेंकती रही सारा दिन । कसाइयों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जांघों तक में सूजन थी। . । 62 / सु-राज.
छह परसिया के फरार होने के बाद पुलिम चुप नहीं बैठी थी। मामपाम के सभी थानों में उसका हुलिया पहले ही भेजा जा चुका था, परन्तु वह तराई के बीहड़ वनो मे ऐसा लापता हुआ कि फिर मिला नहीं। उसे गिरफ्तार कर पाने के सभी प्रयास विफल रहे तो पुलिस ने उनके घरवालों को और अधिक परेशान करना बारम्भ कर दिया । गत में खड़ी फसल एक दिन जला दी। मईय्या के वाम छिटकाकर नीचे फेंक दिए। भीखू की फिर पेशी हुई और चदरिया को हर हफ्ते बुलाया जाने लगा, तहकीकात के नाम पर। तभी एक दिन सारे थारू इलाके में फिर जलजला आया, जब पुलिस के एक मिपाही की रक्तरजित लाश मुतरिया नदी में बहनी दिखताई दी। भदरपुर गाव के निवासियों का कहना था कि इस दुर्घटना के दो. तीन दिन पहले, रात के अधियारे में छिपकर परमिया घर आया था। जमनिया ने खुद अपनी आखों से देखा था। कचनिया की झुपड़िया के पिठवाड़े, पयाल की देरी के पास बैठा भान मा रहा था । ज्यो ही आहट आई, सन्धे पर कुल्हाडी लिए सेतो की ओर भागा और फिर वहा में जगल की दिशा में। पुलिस का आक्रोग अब कचनिया पर भी उतरने लगा था। पाने- दार गाव में आकर नावनी दे गया था कि जो परमिया को पारण देगा, उमं भी हवालात में बन्द कर दिया जाएगा। उसे खोजने का दायित्व गाववाली पर भी राल गया था। अगर वे उमे दूदकर नहीं लाए तो गाव का गाव उजाड दिया जाएगा। गाव के कुछ जवान-अधेडो को वह स्वय जगल की ओर खदेड गया था कि उसे खोजकर लाएं, अन्यथा गांव ही न लौटें- सात आसपास खड़े वृक्षं सत्रमुच दैत्य जैसे लग रहे थे-बड़े-बड़े ऊंचे-ऊंचे! गंदला आसमान बादलों से घिरा था। कभी-कभी विजली कड़कने के पश्चात् अंधकार और भी घनीभूत हो आता था। सहसा तभी हवा की सनसनाहट बढ़ती तो वांस की झाड़ियों से सीटी का जैसा शोर उठने लगा। आपस में रगड़ खाने से बांस की टहनियां विचित्र-सा स्वर गुंजा रही थीं। लगता था इधर, अभी-अभी शाम को वारिश हुई है, इसलिए कहीं-कहीं गड्ढ़ों में पानी भर गया था। नई उग आई घास से जंगल के पगडण्डीनुमा रास्ते भी ओझल हो गए थे । केवल अनुमान के सहारे परसिया अंधियारे में चल रहा था, चलता जा रहा था -हांफता हुआ-एक सुर लय, में-कांपता हुआ। बांस की घनी, कंटीली झाड़ियों से तनिक परे हटकर, जमीन पर तिरछे झुके खैर के पेड़ के नीचे, कूरी के पास एक विशाल पत्थर पड़ा था-हाथी की पीठ जैसा खुरदरा । उस पर बैठकर वह सुस्ताने लगा। बाएं. पांव के तलवे से देर तक हथेली से दवाए रहा, शायद खून का वहना . कुछ थमे। सियारों के रोने और झींगुरों के झिंन्-झिन् के अतिरिक्त और कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था अव । तभी सहसा बैंत की झाड़ियों से किसी के कूदने की आहट आई । उसने आशंका से चौंकते हुए इधर-उधर देखा और एकाएक उठ खड़ा हुआ। एक ही कदम अभी आगे बढ़ा था कि एक सफेद-सा खरगोश कान -खड़े कर, विजली की जैसी तेजी से दौड़ता हुआ वगलवाली झाड़ी में कहीं ओझल हो गया। 64 / सु-राज सु-4 एक बार उठकर बिर बंजा सलिए असम्भव था। बैठते समर घुटनो में अजीव-जी टीम ली, इसलिए उसने आगे, और आगे बढ़ने का निश्चय किया, जब तक कि मिर हिराने के लिए कही ठीक-सा प्रेरन मिल जाए उसके कन्धे पर कुल्हाड़ी उसी तरह अब तक रखी यो। फेड- धागे नीचे की ओर लटके हुए। पागलों की तरह, वह विना सोरेन लगातार जाने बढ़ रहा पाजंगल और घने जंगल में, जहाकार माया उछ तकनमक। उसे लग रहा था, पीछे से कही मौत उमरूर पीछा कर रही है इसके पोछे-पीछे बेतहाशा भागकर आ रही है। उससे बच निकतम और कोई चारा नहीं। भी वह नदी का पथरीला रोखड पार कर हो हाइकई गरी के गले पर वधी घण्टी की जैसी आवाज सुनाई दोने के भूकने का स्वर ! एक बड़े पत्थर पर बडे होकर देवा जलती दिखलाई दो उस पार । चारे के लिए इधर-उधर भटकने वाले पुनन्तुमः- लगता है। वह चुम्बक की तरह सिंचता हुआ वदने ना। कुछ ही दूरी तय करने पर लगा, उसका अनुपन भने वृक्ष के नीचे ढोर-डगरों का गोल है। उसी के कई तीन भादमी वैठे शुल्कई पी रहे हैं । ज्यों ही गुत्ने । हैं, पर एक तपट-मी उठ रही है। जरूर मांगलर हेर! "कौन-?" नीचे झुकी टहनियों के हित में देना। "मय-!" परसिया ने हाफते हुए कहा, “है। "कहा जात हो?" "ऐइसे ही दोर-डगरन की खोज ! फेन की बालक इधर लोटि आए!" "सुनत नहिं वे सेर को जवाब ! पारवहन बन्दगट रहित हैं।" बीच में बंटा व्यक्ति बोला।
वह क्षण-भर चुप रहा-कान लगाकर । रौखड़ की दिशा से ही घर्र - घर की आवाज़ आ रही थी, ठीक वैसी ही जैसी बड़े वर्तन में मट्ठा बनाते समय वांस की भारी मथनी के लगातार घूमने से आती है। शुल्फई में एक लम्बी दम लगाकर वह भी अभी पांव पसारकर बैठा ही था कि ग्वालों ने दोर-डंगर हांकने आरम्भ कर दिए, नये चरागाह की खोज में। आठ परसिया को मालूम था उसे पकड़ने के लिए पुलिस गांव वालों की सहायता ले रही है । चौथे दिन वह नाला पार कर ही रहा था कि विरजा पधान सामने खड़े दीखे--. "कहां भटकत हो परसुआ ? गांम तवाह है। औरतन की इज्जत नांहि वची। पुलस डण्डा चलाय रहि है। तुम का घर-घर, द्वार-द्वार ढूंढत रहि हैं । तुम गांम चलो।" परसिया चुप-उनके चेहरे की ओर देखता रहा । "तुम्हार घर कछु बचि नाहिं । झुपड़िया तोड़ि डारी है। भीखू भीख मांगत है। चंदरिया की लाज तोहार हाथ है । तू घर चल !" इस बार भी वह कुछ बोल न पाया। "पुलस नाय करन को वोलत है, तोहार साथ । तू चल । तोहार मदद हम करि हैं—सारे गांम-गिराम के लोग...।" "पुलस कब नाय करत है ?" परसिया तुनक कर बोला, दवे आक्रोश के स्वर में, "वह तो खुद हि अनाय कराय रहि। हमार गय्यन-भैंसन को जे फारम वाले टरक मां धरि के ले जात हैं, तब पुलस का करत है ? हमारि बहू-बेटिन को लोग घसीट के लेइ जात हैं, जोर-जबरन करत हैं, तब तोहार पुलस कहां जात है ? चोर हर साल डाका डालत हैं। करछी-कटोरी-सब उठाय के ले जात हैं, को कछु नाहिं सूझत हमारा खेतन मां - तव पुलस ? 66 / सु-राज
फारमबारे कमा करि लत हैं, तब पुनम किसका माय देत है ? ऐमा पुल.
सिया परहमार भरोसा नाहि, नोहार है तो तुम जाओ""
"तो का तू गाम नाहि वलि है ?" कड़ककर विरजा पधान ने कहा
तो परसिया गहमा सन्नध हो उठा 1 कुल्हाड़ी के बंट पर हाथों की पकड़
तनिक तेज करता हुवा वोला, दात पोसता हुआ, "काका, रार नो
मचाओ! पर मानत हो तो लौटि जायो । नाहि तो हम कुछ भी कर
बूढ़े विरजा को फिर हिम्मत न पड़ी।
परसिया कन्धे पर कुल्हाड़ी रखकर फिर आगे बढ़ा, मिट्टीरोदता हुआ।
कुछ कदम चलकर एकाएक स्का, "फारमवार विरजवासी से कहि देना.
सन्न ने भी, तोहार भी दुई टुकड़े नाहि किए तो हमार नाम परपुरा
नाहि ! फारम जलाय के हि हम फांसी पर झूलेंगे । अन्नाई दैत कहो के।"
परमिया फिर वर्षों तक गाव लोटा नही ।
पूरे पाच माल बाद रात के अधियारे में एक दिन उने का
को मईय्या का द्वार सटपटाया।
"कळं-न-?" बीमार-सा नारी स्वर था।
"कानयातू-!"
वह निनिमेष उसके चेहरे की ओर देखना हो
निशानबाज कहीं भी दोस न रहे थे।
बड़ी हुई काली दाढ़ी! फटे कपडे । शिर
"काका किधर हैं ! हमार झुपडिका रहा है-
रहा था कि कंपनिया ने चुपके से पूरे विकार
के लिए इशारा किया।
"काका"नाहि रहे-?" इसने किया
"कइसे कइसे ? का भवा?" परसिया का मुंह खुल आया अचरज से । "पुलस की मार-पीट से परेशान होइ के, अऊर तोहार जिन्नगी वचाने के खातर काका ने थाने मां बोलि दिहा कि सरदार सोहनसिंह का कतल हम करि है। पुलस का सिपाही हम मारि है। फारमवारे विरज- वासी को भी। विरजा काका ने गवाही दे डारी और काका को फांसी होइ गई, गए चैत मां." परसिया देर तक स्तब्ध-सा खड़ा रहा। अपने को सम्भालता हुआ फिर वोला, कुछ सोचता हुआ, "अम्मा किधर है ? चंदरिया-?" "गांम छाडि के सब निकरि गहे । अव कोइ नाहिं हिंया । झुपड़िया की ठौर मां संखिया के बाप ने ऐहि फसल मां धान वोडारा है। देखत नहीं, घेर-बाड़ लगा है ?" कोने में मिट्टी तेल की ढिवरी भभक रही थी। उसी के पास वांस की चटाई पर कोई नन्हा शिशु गहरी नींद में डूबा था । "जे कौन--?" इस प्रश्न का कंचनियां कोई उत्तर न दे सकी। कभी वह बिछौने पर सोए शिशु की ओर देखती, कभी परसिया के बुझे हुए, आतंकित चेहरे की तरफ। कुछ क्षण यों ही प्रस्तर प्रतिमा की तरह निस्पन्द खड़ा रहा परसिया। सहसा न जाने क्या सोचता हुआ मुड़ा, तो कंचनियां ने टोका, "कहाँ जात हो---इत्ते अनेरे मां...?" प्रत्युत्तर में परसिया कुछ भी बोल पाया। अंधियारे में चुपचाप चलता रहा, कन्धे पर कुल्हाड़ी धरे ! - 68 / सु-राज कांछा
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सनसनाती हुई तीखी हवा की तेज धार बर्फ गिरने के जैसे आमार । तन का जो भी हिस्सा खुला रह जाता है, पहले लाल, जामनी, फिर नीला पड़ने लगता है--निष्प्राण होता हुआ। इन जाडो मे इतनी किल्लकारी को ठण्ड इसमें पहले कभी भी नहीं पड़ी थी। नगे पाव धरती पर पड़ते ही उक-ता चुभता-प्राण निकल जाते। बोज के छिक्कल-जैने खुरदरे, रूखे हाथ-पांवो पर, चेहरे पर, जगह-जगह दरारें-सी पड़ जाती, जिनसे कभी-कभी रक्त उभरने लगता। सोने से पहले, वर्तन-भाडे माजने के बाद काछा जब अगेठी मी माग के पास बैठा, अपने थुर-पुर कापते, निर्जीव नन्हें हाथ सेंक रहा था, कारी ने काठ के कठिया मे से, करछी में खोप-खोपकर, एक डली च्यूरा की उसकी ओर चढाई थी, "गरम करके हाथ-पांव पर पल ले काछू.." दरद कुछ कम होगा "लहू नहीं चुएगा...!" सुनकर भी जैसे उमने सुना नही। मन कही और थाहापोह में। नौनी-सी मुलायम, हिम-सी सफेद डली-छोटी-सी हथेली पर धरी, धीरे-धीरे घी की तरह पिघलने लगी। भीतर जाकर काकी ने दूसरी तरफ का दरवाजा महाक से बन्द करके अलगनी लगा दी, तो वह अकेला रह गया, छोटे-मे चॉक में। बाहर के किवाड़ पहले में ही बन्द थे। पानी बरसने लगा था मायद । नभी पाचर विछे जागन मे तड्-नद आवाज आ रही थी! सरसू की लकड़ियां धधक रही यो। च्यूरा पिघलकर, तेल की तरह । -- वह गया था-नन्हीं अंगुलियों की जड़ों की दरारों से । भीतर के कमरे में पहले हमने-वोलने का स्वर-~-सम्मिलित स्वर देर तक गूंजता रहा था। पर अव चनक वन्द थी। मिट्टी तेल का लम्फू भी बुझ गया था । लगता था- सव सो गए हैं-सारी दुनिया। हां, कभी-कभी बाहर कहीं, ठण्ड से ठिठुरते कुत्ते का कर्कश स्वर अवश्य गूंज रहा था । जगह-जगह से छलनी हुआ, मिलिटरी का फटा खाकी कम्बल लपेटे वह एक किनारे पर लुढ़क गया था-बंधी गठरी की तरह । उसके चेहरे पर धीरे-धीरे आतंक का भाव गहरा होता चला जा रहा था। उसे लग रहा था…वही वीभत्स, डरावना सपना वह जागी आंखों से फिर देख रहा है--स्वयं अपने को टुकड़ों में कटता हुआ.. बिल्ली की-जैसी नुकीली मूंछों वाला यह 'भेड़िया' कभी भी उसे अच्छा नहीं लगा वैसी ही लाल-लाल आंखें । वैसा ही डरावना चेहरा । कम्वल कसकर लपेट लेता है वह । उस दिन भी इसी तरह बर्फ गिरी थी "तीन दिन तक लगातार" उसका मन उदास हो जाता है। उसकी आंखों के सामने पहाड़ के ढलान पर बसा दूर-दूर छितरे घरों वाला एक छोटा-सा गांव घूमता है- देवदार के घने वनों से घिरा । चीड़ के पिरोल की नुकीली पत्तियों से छंहा, एक टूटा छप्पर । छप्पर की छांह में रहने वाले तीन प्राणी । पांवों के पास बंधी मिमियाती वकरीचीतल की पाठी की तरह मटमैली ! भोली ! जिसके सींग भी अभी तक फूटे न थे। अपना माथा, उसके माथे से टिकाकर वह कभी-कभी खेल में जोर आजमाइश किया करता था-बकरी की ही तरह ठेप देकर, हल्की-सी आक्रामक मुद्रा बनाता हुआ माथे से माया भिड़ा देता-ठप्प-से । पहले तो बकरी बालिश्त भर पीछे हटती-~-मोर्चा जमाने के लिए, पिछले दोनों पांवों पर तनिक अधिक बल देती हुई, फिर वह भी उसी तरह हमला कर देती, ठीक उसके माथे पर अपने माथे का निशाना साधती हुई- गरदन किंचित् पीछे की ओर टेढ़ी मोड़कर-ठप्प की आवाज़ के साथ दोनों भिड़ जाते। एक आक्रमण के बाद, फिर सहसा सहसा पीछे हट जाते दोनों-दूसरे आक्रमण के लिए मोर्चा सम्भालते हुए। - 70 / मु-राज नरह बटकर यह आक्रमण-प्रत्याक्रमश का कम नब ना चलता, जब तक कि दोनो या नहीं जाते ! वकरी के गले में रामवाम की पतली-सी रस्मी बाधे वह नीचे नीला की ओर दौड़ता हुआ ले चलता है-पानी पिलाने के लिए। मोतीनुमा मेतों के मेड़ों पर उग आई नरम-नरम, हरी पाम अपने नन्हे हायो मे नोच- नोचकर, उखाडकर, उसको आटी बकरो के मुह को और ले जाता है... उमकी छोटी-मी घुमली पीठ पर हाथ फेरता हुआ, जब तक वह एक. एक तिनका भली भाति खिला न देता, सामने में हटता न था। "शिवरात' के मेले में चार कोट दाहिम चार यह पीतल की छोटी- मी दन-इन् घण्टी लापा धा -परीदकर । दिनो तक उसे बकरी के गले पर वाघे रहा । दलवहादुर की शादी की रात, भीड भटक्के में न जाने कौन उसे उतारकर ले गया था! नव मा की फटी घाघरी की गोट पर लगा, लाल कपडे का बिनभर का टुकडा चीरकर, रस्सी की बकरी के रीते गले पर चौध दिया था-फोते की तरह। वह रंग-बिरंगा टुकडा कितना अच्छा लगता था ! ' ले ले !' पहना हुआ, जब वह दूर में आता दिखलाई देता, तब वह अपनी नन्ही- सी रोएदार पूछ आममान की ओर खडी कर, फर-फर इधर-उधर हिलानी हुई मिमियाने लगती। अपनी दाहिनी हथेली में वह रोज उसके सिर पर, दोनो गानों के चीच महला-सहलाकर देखना-अनुमान लगाता-मीगो की जगह अर कुछ-कुछ उभरी मी लगती है-सूटे की नरह। लगता, अब मीग फूटने ही वाले हैं। न्यफा, काजु, धार्माल, गारु, रोज अपनी वारियों के सम्बं कान पका कर धमीटने रहते हैं परन्तु उसने ऐमा कभी भी हो न पाता उसके हाप कापते। लगता, इमारह जोर मे कान बोचने पर जड में उमड़ गए तो! बिना कानो के बरी कसी लगेगी। फिर उमे दरद भी तो सूब होगा न | उमकी बकरी अभी कित्ती छोटी है। स्वर को दरद देना उमं स्वोसार पा, पर अपनी बकरी को नहीं।
बुला उसके नन्हे प्राण कहीं नन्ही वकरी में बसते थे शायद ! अपने मामा के घर-पानिधार से लाया था, वह इस बकरी को। साल-सवा साल तक उसने मामा की गाय-बकरियां चराई थीं--स्वांला के वीहड़ वनों में । उनके पास ग्वाला नहीं था, इसलिए मां से कहकर उन लिया था-हाथ वंटाने के लिए। पिता के लापता हो जाने के बाद, मामा के घर का ही कुछ सहारा बचा था। कालि पार, हिन्दुस्तानी-राज में पिता, आसपास के अन्य डोटियालों के साथ मेहनत-मजदूरी करने गए थे। साल-दो साल बाद और तो लौट आए, पर वह आज तक लोटे न थे। कुछ लोग कहते हैं- नदी पर पुल बनाते समय वह गए। कुछ लोग कहते हैं-वरमदेव मण्डी में हैजे से मर गए । दुल्लू-दैलेख की तरफ भी किसी ने देखा था। कुछ का कहना था कि किसी विधवा से व्याह करके नया घर बसा लिया है उसने-कंचनपुरा की तराई की तरफ। पर यदि सचमुच जिन्दा होते तो क्या एक बार भी कभी घर न आते ! फिर भी वह जिन्दा हैं-~यही मानकर मां ने अपने गले में चरेऊ का पल्ला अव तक बांधा हुआ था । चूड़ियां भी उतारी नहीं थीं। पर बड़े वेटे जेठा के गुज़र जाने के बाद से अपने को हर तरह से असुरक्षित-असहाय अनुभव करने लगी थी। जेठा छोटा होने के बावजूद थोड़ा-बहुत हाथ तो वटा ही देता था... मामा के घर आकर भी सुख मिला नहीं । गाय-बछिया के पीछे-पीछे दिन-रात जंगलों में भटकने के पश्चात् भी भरपेट भोजन नहीं। सबके खाने के बाद जूठा-पीठा जो भी वचता, उस सवको एक बर्तन में डालकर, उसके सामने रख देते -पशुओं की तरह । और वह दिनभर का भूखा उन जूठे टुकड़ों पर टूट पड़ता। मामी ने कभी एक बार भी नहीं पूछा कि कुछ और चाहिए? या इत्ते से पेट भर जाता है कांछा ! रात को कभी-कभी उसके पांव दुखने लगते । असह्य पीड़ा होती। धौलि गाय इधर भागती, तो कालि खेतों की तरफ। बछड़े तो एक पल के लिए भी एक स्थान पर टिके नहीं थे। डेढ़ सींगवाला बैल और भी विचित्र था। लंगूरों को देखते ही, पूंछ हवा में सीधी खड़ी कर, आंखें मूंदे 72 | सु-राज सरपट भागने लगता। लगभग सवा साल इसी तरह बीता। तभी एक टिन घर मे मा जाई और उसे साथ ले गई। कर्कशा मामी को जाते समय न जाने क्या सूझा! वकरी की यह पाटी भी साथ वाध दी थी।मा मना करती रही, पर वह न मानी, "वरम- भर मिहनत के बाद इत्ता तो ले जा!" दो मूज की रस्सी गले पर चुभती थी, इसलिए उसने बाड़ म लगा हरा रामवास कूटा और उसकी रस्सी बना ली। गहत-भट् के नुने जा भी दाने खाने को मिलते, पहले वह बकरी के मुह की ओर ले जाता, फिर युद साता। जाड़ो में पता नही, कहा-कहा से बटोरकर हरी धाम के तिनके साता। रात को अपने फट कम्बत का एक हिस्सा उसकी पीठ पर डाल देता, जब तक यह चुपचाप बैठी रहती, किंचित् ताप मिनना, किन्तु ज्यो ही हटती कम्बल भी खिसक जाता। उमके धूप तापने के लिए जागन में, वित्ते भर की जमीन उसने साफ कर दी थी । अपने छोटे-छोटे हाथों से उसे गोबर से लीपकर, उनके टीक बीचोंबीच जगूठे के बराबर एक यूटा गाढ दिया था, जिसके महारे बकरी पंधी रहती थी । ज्यो ही धूप का टुकडा मरकता, वह उने दमरी जगह वाघ देता था। रात को आग के पास बैठी मा महवे की काली काली रोटिया सेंकना तो वह उसे गोदी में विठाए हलिया गरम कर, सहलाता रहता । करो जाउँ भूदे चुपचाप बैठी रहती। भीषण नर्दी के पारण भामर बगे को नाक छोटे बच्चों की तरह बहती"चूल्हे के पास में ठण्डे पानी रा छोटा कभी भूल ने भी शरीर पर पड जाता तो उर्ररं-मे गारे वान गरे कर स्वयं झटपट उठ पडतो... । काडा । 73 - उसके दाहिने पांव का आगे वाला आधा खुर जोगिया रंग का था। त्रिरशूली थान का बूढ़ा पुजारी कहता, 'यह पाठी तो देवी को चढ़ेगी।' देवी को तो नहीं चढ़ी वह, हां, देवी गुरंग एक दिन अवश्य खा गया 'था उसे! दूर का रिश्तेदार था-हिन्दुस्तानी फौज के गुरखा-रेजीमेंट में सिपाही। रिटायर होने के बाद अब अपने घर आया था-डोटि-नइपाल । खेती- पाती करके अपना जीवन-यापन करता था। एक-दो बार पहले भी वह यहीं से होकर कहीं गया था और रात को रुका भी था । मां के हर काम में रुचि लेता। कहता, "मानवहादुर जिन्दा होता तो क्या अब तक घर नहीं आता ? वरमदेव मण्डी में ही मरा था वह । हमारे 'डम्बर बहादुर थापा ने अपनी आंखों से देखा था। उसकी लाश कालि -गंगा में वहा दी थी उसने..." इस पर मां दुल-ढुल रोने लगती, "वह कोई और होगा और होगा। 'परदेस का मामला है। हो सकता है, कहीं नौकरी-चाकरी में हों। जब तक टका-दो-टका पास नहीं होगा, लौटेंगे किस मुंह ! खेत गिरवी हैं । रहने को यह टूटी झोपड़ी ! वर्फ के भार से किसी दिन बैठ गई तो, दवे पड़े मिलेंगे।" "तू तो निरी पगली है। इत्ते साल हो गए । अब तक तो लोग सात समन्दर पार से भी आ जाते हैं। तू मान क्यों नहीं लेती कि वह मर गया है, जब सारी दुनिया यही कह रही है...!' मां का रुदन तव और बढ़ जाता । "मेरे होते हुए तू क्यों चिन्ता करती है।" उसने मां का ठण्डा हाथ अपने हाथ में ले लिया था । पर मां वैसी ही चुपं आंसू पोंछती रही थी। रात को आग के पास बैठे वे पता नहीं कव तक बातें करते रहे थे! और पता नहीं कब कांछा को नींद आ गई थी ! रात शायद अधिक बीत गई थी। आग बुझने पर तनिक सर्दी-सी लगी तो सहसा उसकी नींद उचट गई थी। उसने देखा था-एक कोने पर विछी फटी चटाई पर मां और देवी गुरंग, एक ही पंखी में लिपट कर सो रहे हैं—एक होकर। ऐसे ही हम सब भी " 74 / सु-राज
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नोला के सामने घास उगी थी-विच्छ के बड़े-बड़े काँटेदार पौधे ! नीचे कीचड़ था । बच्चे नौले के पानी में डूवे पत्थरों से गनेल पकड़ रहे थे। कांछा की जेब में भी एक गनेल के सींग वांध लिए थे । अव उसे वह पत्थर पर चला रहा था." साँझ के अंधियारे में जब वह घर की ओर बढ़ा, तो आंगन में ऊंची आग जलती दीखी। ज्यों ही आँगन की सीढ़ियों पर पाँव रखा, उसने देखा-बकरी का धड़ एक और लुढ़का पड़ा है। जलती आग पर रखकर, जिसकी खाल के सारे बाल जला दिए हैं। पतली-सी लाठीनुमा लकड़ी के नोक पर बकरी का कटा सिर अटका है। गुरंग धधकती आग में उसे भून रहा है। जमीन पर चारों ओर खून-ही-खून विखरा पड़ा है, जो मिट्टी के साथ सनकर काला हो गया है। कांछा चीख पड़ा । उसने आवेश में एक जलती लकड़ी उठाई और जोर से गुरंग पर दे मारी। गुरंग का हाथ झुलस गया था। चिंगारियां गिरने से कालर के पास से ऊनी कोट भी कुछ जल गया था। मुंह पर भी कुछ चोट लगी। गुरंग ने वाज़ की तरह झपटकर उसे इतनी जोर से चांटा लगाया कि वह जमीन पर औंधे मुंह गिर पड़ा था। "मेरी बकरी तुमने क्यों काटी ? क्यों काटी ?" वह पागलों की तरह लगातार चीसे चला जा रहा था। वह फुफकारता हुआ फिर उठने लगा था कि मां ने पास पड़ी लकड़ी से उसे तड़ातड़ चूटना शुरू कर दिया, "मरता भी तो नहीं राकस ! इसी के लिए जी रही हूं, पर यह है कि किसी और को जीने भी नहीं देता ! पैदा होते ही मर मुकता तो आज यह संकट तो न होता! दो रोटियां तो कहीं से भी बटोर लेती! इत्ती बड़ी दुनिया है...!" कहती-कहती वह स्वयं भी रो पड़ी थी-दहाड़ मारकर । 76 / सु-राज तीन आप पर रखी पतीली में बुबु माम पर रहा था। वातावरण में तीखी गन्ध विखर रही थी। समीप ही कामात-सानीया पापीठ पर, भुटनों पर, जगह-जगह लकड़ी की मार के नोतं निगान पे । वाईकुहनी से लहू बह रहा था। "ये काछा, ले रोटिसा से...!" माने आपाउ लगाई तो उसने जैसे सुनकर भी सुनी नहीं। वैसा ही पड़ा कराहना रहा। गुरग पास ही बैठा अगारो पर रखकर कलेजी के टुकड़े नन रहा पा। उन पर नमक मिलाकर, बड़ा स्वाद लेकर चला रहा था । पाम हो पीतल का गिलास पा, जिम में घूट भरकर वह कुछ गट क रहा था। माने मड़वे की एक मोटी काली रोटी, और एक कटोरी में गरम- गरम मान उसके पास रख दिया, जिसे काछा ने एत्रा तक नहीं। रोटिया बन चुकी तो दोनों पास बैठकर साने लगे। "अरे, तू नमक के साथ क्यों पा रही है---शिकार ने ले !" गुरंग ने कहा तो वह जैसे किसी दूसरी दुनिया में सोई हुई थी "माज बरत हैन । गिकार नहीं चलेगा ।" "हो-हो," करता हुआ गुरग हम पड़ा था, "तो मब मुझे ही साना - पड़ेगा?" मा ने पहला कोर तोड़ा ही था कि नहना हाथ ठिठक गया, "कांछु, रोटि खा ले बबु ! एक-दो बार उसने ये ही शब्द अनुनय ने और दुहराए तो गुरंग को न जाने क्या सूझा! कम्बल का कोना पीचकर, उसे कोरता हुना तड़ककर बोला, "ये हरामि माला, खाता क्यों नहिं ?" कटोरी से उठाकर एक बोटी उमके मुह पर रबरदस्ती लगाने ही वाला या कि काछा चिल्ला पडा, "महि, नहि, मुझे नही साना"मेरी वकरी तुमने क्यों मारी क्यों ?" सचमुच वह फिर रो पड़ा। "मेरे घर से ले आना हरामि...!" "मुझे नहीं चाहिए और ! बस्स, मेरी ही बकरी मुझे दे दो।" फटी, काली आस्तीन से वहती नाक पोंछता हुआ, वह सिसक पड़ा। मां ने उसके माथे पर हाथ लगाया, जो तप रहा था, "कुछ खा ले कांछा.. दिन-भर से भूखा है । शाम तो कह रहा था-बड़ी भूख लगी है मां !" तन पर कम्बल लपेटे कांछा कुछ क्षण बाद चुपचाप उठा और बाहर निकल गया-~गहरे अंधेरे में। मां बाहर आई। गुरंग भी। पर वह अंधकार में ऐसा खोया था कि कहीं कुछ अता-पता ही न मिला। थककर, हारकर दोनों भीतर चले आए थे। कांछा पड़ोसी के जानवरों के गोठ में जाकर चुपचाप छिप गया था। कुछ देर अंधियारे में बैठा रोता रहा । फिर तनिक भय-सा लगा तो उठ खड़ा हुआ। खूटे के आगे अंधकार में कुछ हिलता-डुलता-सा लगता। सांकल खोलकर दवे पांव बाहर निकल आया। अपनी मडैय्या के कच्चे किवाड़ के पास आकर ठिठक गया- हल्की पीली आग उसी तरह जल रही है। भीतर से खिलखिला- कर हंसने की आवाज़ "गुरंग झगड़ा कर रहा है-हंस-हंसकर हाथा- पाई. 'लोग ऐसे भी झगड़ते हैं ! क्यों झगड़ते हैं ? उसकी समझ में नहीं आ पा रहा था. 'मां के शरीर पर नाम मात्र के कपड़े भी उघड़े हुए वैसा ही गुरंग" कांछा ने आंखें मूंद ली। उसकी समझ में कुछ भी न आया, फिर भी उसे यह सब अच्छा नहीं लगा। सांकल खोलकर वह फिर पशुओं के गोठ में घुस गया। मुड़े हुए घुटनों पर सिर टिकाए कछुए की तरह, हाथ-पांव सिकोड़े वैठ गया और सारी रात इसी तरह बैठा रहा... 78 / सु-राज चार मुबह दूध दुहने आई पडोमिन ने देसा तो जनरज में पड़ गई, "अरे, काछा, तू यहा क्या कर रहा है ?" काठा उसी तरह बैठा रहा । मूजी हुई लाल-लाल उनीदी आगों में अपलक देखता रहा। इतने में उसे सोजती-योजती मा भी ना पहुंची। पुवकार कर घर ले गई, "नू तो निरा-निरा पागल है रे काय रात साना भी नहीं साया, और म ठण्ड में यहा पाकर छिप गया है ! कही तुझे बाप या सियार उठाकर ले जाता तो..." काछा वैसा ही गूगा बना रहा । आंगन पर आकर उसने देसा- ताजी कुछ हड्डिया विसरी हैं-नारगी के पेड़ की जड पर-मिमुड़े के पोध के पास । उन्हें ममेट कर उसने मुट्ठी में दबा लिया। जहा पर बारी । यूंटा गडा पा, वही पर उन्हें रख दिया मिट्टी और हरे पती मे, वरे जतन से ढक कर। "क्या कर रहा है काछी" मा ने मुडकर देखते हुए पूछा-गहर जिजामा में। "कुछ नहीं बकरी को वो रहा हूँ"यहा पंड उगेगा, जिसमें बकरिया लगेंगी...!" "हो-हो-हो-" गुरग भीतर से मुह फाइकर हमला हुआ आया, "इसी के साथ-माथ तुझे भी वो दू तो हरामि !" मां को गुरग का यह व्यग्य अच्छा नहीं लगा। काधा का हाय पर- कर वह भीतर से गई। "तेरे भाग का शिकार रखा है, कटोरी में साएगा नहीं ?" पर 1.
कांछा प्रत्युत्तर में कुछ बोल न पाया। डबडवाई आंखों से देखता रहा" गुरंग इस बार पूरे नौ दिन रहा। कांछा ने देखा-~गुरंग खुश है। दिन-रात मुंह फाड़े हंसता रहता है-बात-विना बात । इस घर के हर काम में अपने घर की तरह दखल देने लगता है। मां भी प्रत्येक बात में उसकी राय लेती है। जो कुछ वह कहता है, वही होता है । हमेशा गुमसुम-सी रहने वाली उदास मां में भी उसे बड़ा परिवर्तन लगता है । गुरंग जो नए कपड़े लाया था, उन्हें बड़े सलीके से पहनती है । वालों को चुपड़कर रखती है । माथे पर लाल पिट्ठयां लगाती है. जब तक वाप था, मां ऐसे संवरकर कभी भी न रही। दोनों प्राय: एक-दूसरे से झगड़ते रहते । वाप को शुल्फई पीने की आदत थी, जिससे मूखकर जंग लगी काली कील-सा रह गया था। इसी बात को लेकर घर में आए दिन कुहराम मचा रहता। "तुझे तेरे देवी चाचा अच्छे नहीं लगते ?" मां ने एक वार पूछा तो उसने मात्र सिर हिला दिया था-~-आक्रोश में। इसके बाद फिर कोई प्रश्न पूछने का उसे साहस ही न हो पाया। पांच कार्तिक का महीना बीत रहा था। वृक्ष एकदम सूखे लग रहे थे---एक भी पत्ता कहीं दीखता न था। चारों ओर वीरानी-ही-वीरानी-डरावनी उदासी का विकट साम्राज्य ! नदी, नालों के किनारों का पानी जमने लगा था । ठोस, पारदर्शी शीशे-से कांकरों पर पांव पड़ता तो कर्र र से टूटने-चटकने की आवाज होती। बच्चे बच-बचकर किनारे पर चलते। कहीं स्वच्छ जल से कोई वड़ा-सा, चौड़ी थाली-सा कांकर तोड़कर, धूप में वैठकर चूसने लगते-ठण्ड से ठिठुरते हुए। रात को पाला इतना गहरा पड़ता कि सुवह सारी धरती हिम की 80/ सु-राज सु-5 तरह मफेद लगती। जिन ठण्डे स्थानों पर धूप न जा पाती, वहा दोपहर तक भी सफेदी छाई रहती। कुहरा झुर रहा था। उगता टण्डा मूरज कही मोटे-मोटे बादलों के बीच ऐमा घिर गया था कि उसके अस्तित्व का ही आभास न हो पा रहा था। सभी चीड के कच्चे किवाड़ सड़खटाने की आवाज सुनाई दी उने। फटी हुई, चीकट, काली गुडिया लपेटे वह बाहर की ओर नपगा। साकल खोली ही थी कि मामने गुरंग खड़ा दिखाई दिया। "अरे, काठा कैसा है तू...?" गुरंग ने उमे अपने दोनों वलिप्ठ हायो से ऊपर उठाकर जोर से चूम लिया था। परन्तु गुरंग का यह लाड उगे रंचमाय भी अच्छा नहीं लगा था। बिल्ली की जैसी छिनरी मूछे चुभी थो । गाल पर लगा गोला निशान उसने उतरते हो, अपनी फटी आस्तीन मे रगड़-रगडकर पोछ लिया था। गोदी में उतरने ही वह झटपट दूर भाग खडा हुआ था। जब-जब गुरग आता, पता नही क्यो उमे एक विचित्र-सी बेनी घेर लेती थी। उभे गुरंग ही नहीं, कभी-कभी तो मां भी अच्छी नहीं लगती थी। पता नहीं क्यों एक अदृश्य शंका उसके मन के किसी कोने में पर कर गई थी—एक मूक वितृष्णा। कभी-कभी वह परेशान-सा हो उठता। दूसरे दिन गुरग पास के ही गाव के किसी रिश्तेदार में मिलने गया था। मा घर के जूठे बर्तन समेट रही यो, "कांछा, तेरी तबीयत तो ठीक काछा ने जैसे सुना नहीं । अपनी छोटी-मी गुलेल पर वह रुसकर तागा बांघता रहा। "अपने देवी चाचा के साथ चलेगाउनके घर? वहाँ गार है। मेस हैं। तेरे खेलने के लिए बकरिया भी हैं-छोटी-छोटी...।" कांछा इस बार भी उसी तन्मयता में लगा रहा। "तेरे चाचा कहते हैं, वहां पक्का मकान है। नम्बा-चौड़ा आगन । दाडिम, बसोड़, सन्तोल के पेड़, हैं." काठा/ 1
......"
"और कुछ भी न मिला तो कम-से-कम भरपेट रोटी तो मिल
जाएगी---दो छाक । तन ढकने के लिए फटे-पुराने कपड़े: यहां किसके
सहारे रहें रे? तेरे पिता को गए, इत्ते दिन हो गए. जिन्दा होते तो
क्या अब तक घर न लौटते...?" मां का गला भर आया था।
"तू जा''मुझे फहीं नहीं जाना।" वह अभी गुस्से से कह ही रहा
था कि मां उसके भोले-भाले चेहरे को, उस पर उभरती-उतरती गुस्से
की रेखाओं को देखती रही। फिर झट-से उसे प्यार से चमती हुई बोली,
"यहां क्या अकेला ही रहेगा?"
"हांs।" उसने दृढ़ता से कहा ।
"क्या खाएगा? किसके पास रहेगा?"
"स्याना सेठ की नउकरी करूंगा..."
मां जोर से हंस पड़ी, "क्या कहा, तू नउकरी करेगा? पगला !"
"तो मामा के घर चला जाऊंगा...!
मां और भी जोर से हंस पड़ी थी।
छह
पीठ पर बंधे वांस के लम्बे डोक्के में कपड़े-लत्ते, बर्तन-भांडे, समेटकर
वह आगे-आगे चल रही थी। उसके पीछे पिळू लटकाए, बांस की लम्बी
लाठी टेकता हुआ देवी गुरंग। सबसे पीछे, अपने टखनों तक बाप का
फटा सूती कोट लटकाए कांछा -जाड़े से थर-थर कांपता हुआ-पीठ
पर पोटली वांधे।
सारी वटिया सफेद पाले की मोटी परत से ढकी थी। उस पर
चलते-चलते उसके मुट्ठी के बराबर छोटे नंगे पांव सुन्न हो रहे थे ।
वह बार-बार किसी पत्थर पर, पांव झटकते हुए तलुवे रगड़ रहा था,
ताकि संज्ञाशून्य होते पांवों में तनिक ताप आए !
82 / सु-राज
,
मुह ने गहरी भार उठ रही थी, हल्के गुहाग की तरह । फोट की लम्बी बेबो में उसने अपने दोनों हायों को कन्द मुट्टियां म एगी पी, बार-बट्टे की तरह वाहिनी और के अलिम मिरे में राममनीपतमी- मी रस्मी का यह टुकड़ा भी था, जिसमे यह कभी अपनी दिवंगनाबारी कोबांधा करता था! ठीक मकई के मेत पर रखवाली के लिए मई दिए गए पुतले देगा लग रहा या वह गुरग इसमें पहली बार उसके लिए जो कपड़े लाया पा, उमने गए तकन। कहा जा रहे हैं ? किघर? उसकी ममा न बापा रहा था। नीच, गहरी, अंधेरी पाटी पी और मे तीनों चुपचाप आगे बढ़ रहे पे। रास्ता बह-सारड़, कच्चा ! सारे वन मधुध-मी छाई पी~-सफेद धुआं जैसा ऊपर की ओर उठ रहा था। किमी पक्षी का 'पप्पू' उदार स्वर विसरकर, वातावरण में और भी उदासी बिगर रहा पा । बर्दिया के किनारे-किनारे एक लोमड़ी अपनी मम्मेदार दुम दवाए भाग रही थी। कुछ कदम चलने के बाद, पलटकर फिर पीछे देगनी, और उमी गनिने लपक लपककर दोस्ती हुई आगे बनी। लम्बी पूछपाना एक बरागा रंग-विरगा पक्षी वुरोज की एक टहनी ने उहकर मण-मे दूलरी पर बैठ गया था... काछा को ठोकर लगी, वह गिरते-गिरने का कि तभी गरग ने गुम्म से देषा, "आप देखकर नहीं चलता कानि का छोरा ! मरने पर ही नाम है तो कुत्ते के पिल्ले, नीचे नदी में छाल मार ले !" काम के पाव का एक नागन नीला पड़ गमाया। अमाप वेदना में वढ़पता हुना वह किसी तरह बानू रोके रहा-गुरपरी मारके भय में -- . सात नया इलाका। नया गांव । नया घर । नया पिता। नया परिवार- उसे अजीव-सा लग रहा था-एकदम अपरिचित । वेगाना। मकान पक्का था-पत्थर का। नीचे गोठ में पशु वंधते, ऊपर की मंजिल में लोग रहते । घर, कांछा के अपने घर से बड़ा था, पर यहां रहने वालों की संख्या भी कम न थी। घर की मालकिन के अपने ही सात बच्चे थे-वह स्वयं मां से अधिक दादी लगती थी। सुरकने वाले कपड़े के बटुए-जैसा मुंह था, जो दिन-रात हर समय खुलता-बन्द होता रहता। गालियों का सिलसिला.भी अबाध चलता। जव से मां के साथ वह पहुंचा है, कहते हैं, उसका तीखा-कर्कश स्वभाव और भी तीखा हो गया है। घर में हर समय युद्ध की-सी भयावह स्थिति ! उसके नये पिता ने गलत नहीं कहा था। नीचे गोठ में बादामी रंग की बूढ़ी वकरी अवश्य थी, जिसकी तीन पाठियों में अव मात्र एक ही शेप यी-जिसकी चमकीली, चिकनी पीठ पर काले रंग के बड़े-बड़े चकत्ते थे। खुरों से ऊपर तक चारों पांव भी एकदम स्याह काले। किनमोड़े की कंटीली हरी पत्तियों को चवाती हुई वह दिन-भर मिमियाती रहती। शायद मां का सारा दूध दुह लिया जाता और उसके लिए कुछ नहीं पाता। घास भी भरपेट नहीं। तभी तो पीठ से पेट मिला रहता था! खूटे-जैसे सींग निकल आए थे, पर किसी को मारती न थी। जिस खम्भे के सहारे बंधी रहती, उसे ही कभी सींग से खुरच लिया करती थी। इसके साथ खेलने को कभी भी उसका मन न हुआ। जैसे घर की अन्य वस्तुएं पराई लगीं, ठीक उसी तरह यह वकरी भी। अतः दूर से ही देखकर रह जाता-अजीब-से विरक्त भाव से। मां के प्रति भी अव कहीं उतना अपनापन नहीं रह गया था। कहीं दरार-सी पड़ गई थी-दूरी की। उसे लगता उसकी अपनी अन्य वस्तुओं भी बच 84 | सु-रांज की तरह मा भो तो छिन गई है। रात को कभी नीद उचटती तो भर- सा लगता । विठोने पर यह अपने को अकेला पाता, पता नहीं मां उटर कहां चली जाती थी! पर का कोई भी बच्चा उसके माय संसता न पा । पर दूर-दूर से हो, अचरज से उसकी और देगा करते, में यह कोई जवा ही। इन अनजान, अपरिचितों के घर में उसे क्यों ले लाई मा? पहा रहार उसे क्या सुस मिलता होगा? इसमे अच्छा था, जपना वही पुराना पर! कम-से-कम जपनापन तोया। मा प्यार तो कर लिया करती पी। काजु, प्यों के साथ खेलता हुआ वह अपने को कितना गा अनुभव करता पा! पडोस की बुडि आमा कभी-कभी अपने पेट से तोडकर रान्तीम दे दिया करती थी... उसे लगता उसकी इन मारी परेशानियो का कारण मात्र यही ब्यक्ति है, जिसने अपने भारी-भरकम चूटो से उसके नन्हे परौंदी को कुचत दिया है। बिल्ली की जैसी मूछो वाला यह व्यक्ति उसे कभी भी अच्छा नही लगा था। उसकी बकरी पाने के बाद तो बिलकुल भी नहीं ! इतना सब होने के बाद भी भरपेट खाने को नहीं । "कल से काछा गाय-बकरियो को चराने जगल ले जाएगा।" उमने एक दिन नड़कते हुए आदेश दे दिया था। उसे गाय-बछियो को चराने से उतना भय न लगता, जितना वहा के भीषण, अधेरे वनों से । कहते हैं, मेनिया साथ हर रोज किमी रा पशु उठाकर ले जाता है-दिन-दोपहर--सबके सामने । सुबह मा ने विरोध किया। वाप-भाल वही इसे ही उटाकर ले गए तो वह क्या करेगी? इस पर नये बाप ने मुह फाडकर हसते हुए रह दिया या, "ले ही जाते तो क्या अच्छा नहीं रहता ! इन करनउने का क्या करें? घिम-घिन कर चन्दन लगाए, क्यो?" अभी तीसरा दिन भी वीता न था कि मनमुच एक वाप दुधारू गाय को उठाकर ले गया था। यह समाचार मिलते ही घर में भूचाल बा गया या।हर कोई काडा पर बरस रहा था, "मो गरा होगा कानि राछोरा ! तभी तो वाघ उठा ले गया। जागा होता तो शोरगुल न माता । आग
न जलाता। और तव जानवर डरकर भाग न जाता!"
रात को खेतों से लौटने के वार नये वाप ने इतनी बेरहमी से मारा
कि उसके नवनीत से सुकोमल, गोरे गालों पर पांचों अंगुलियों की छाप
पड़ गई थी।
"हरामि का छोरा, अव और लापरवाही करेगा?"
"न"ही..."
रात को रूखी रोटी भी न देकर उसे गोठ में- पशुओं के साथ बन्द
कर दिया था।
खाना खाकर जव सव सो गए, तो गाय-बछियों को घास डालने के
बहाने मां नीचे उतरी । कांछा पयाल के ढेर के ऊपर गुमसुम-सा लेटा था।
"कां--छा--?"
...."
मां ने हाथ में थमा धुंधला लालटेन ऊपर उठाकर देखा । कांछा
के मुरझाए चेहरे की ओर क्षण-भर देखती रही अपलक। बगल में छिपाई
दो सूखी रोटियां उसकी ओर बढ़ाई । उसके बर्फ-से ठण्डे माथे को प्यार
से सहलाया, "तुझे सचमुच यहां अच्छा नहीं लगता रे...?"
...."
"अपने मामा के यहां जाना चाहता है ?.. वहां भर पेट रोटी न
भी मिलेगी, पर मार तो नहीं पड़ेगी...!"
...."
"तो चल, अपने गांव लौट चलें? दो-चार खेते हैं रूखे, सिर छिपाने
के लिए छानी । जैसे अब तक गुजारा चलता था, आगे भी चला लेंगे..."
-
"अरे, तू रो रहा है कांछी ?" उसके माथे पर अपना माथा टिका
कर मां रो पड़ी-जोर से।
35 / सु-राज
आठ दो-दाई महीने ही अभी बीते होंगे। जाडा जा रहा था, पर मूरज यंता ही टण्डा था-बुना हुआ। हया भी वैमो ही मनमनाती हुई, छीलती। पर धीरे-धीरे पहाडों का रग बदलने लगा था। वाज, गरम्, बुरांश के मोटे-मोटेपुरदरे पतों के म्यान पर अब फिर नई-नई कोपलें थी । गारो ओर हत्ती-हल्ली हरियाली उभरती हुई। मा एक दिन पशुओं के लिए पाग काटकर लाने उगल गई थी कि छिछन्नी चट्टान पर विछ नीड के घुसने पिरोल पर-पाव फिमता और वह घास के गट्ठर के माय गठरी की तरह मुदती-दुलाती गहरी, अंधेरी घाटी में समा गई यी-जहा छन-छन, मन-मन करती नदी रहती धी। ऊचे-ऊंचे पहाड़ों में घिरी पातात-सी गहरी पाटी के ऊपर बोलें उडती तो डर लगना, कही गिर पडी नो । दूसरे दिन किमी तरह गाव के तोग नीचे उत्तरे तो वहा क्षत-विक्षत अवशेप मिले। शव को ऊपर लाकर भी ना करते । अन' वही नदी के किनारे पर बह कर आई चीड को नाडियों के ढेर में उमे बना दिया। लोगो के माथ-माय काछा भी मय के पीछे-पीछे नीचे उतर आया था। अपनी मा का शव देवकर, वह फूट-फूटकर रोने लगा तो पाम खड़े किमी व्यक्ति ने हाथ पकडकर शिडक दिवा पा--"कानि का छोरा--!" उपेक्षा में गाली फंककर आग न रोने को नेतावनी भी दे दी थी। काछा दूर खड़ा मजल नेत्रों में देयता रहा- मां के रक्त-रजिन, सत-विक्षत शव को मफेद कपडे में मपेटते हुए नदी के किनारे उठाकर ले जाते हुए"मर को पानी में धोते साड़ी के ढेर के बीच मा की लाश को रखने हए"और अन्न में 1.4 कर काठा | 87 जलते हुए। दाह-क्रिया में ही सांझ हो गई थी। नहा-धोकर सब घर की ओर बढ़ने लगे तो उनके पीछे-पीछे उदास कांछा भी चलने लगा तीखी चढ़ाई में हांफता-कांपता हुआ.। हताश । निराश। सव अपने-अपने घरों में चले गए, पर कांछा देर तक बटिया पर ही खड़ा रहा-किंकर्तव्यविमूढ। किस के घर जाए ? कहां? उसकी समझ में नहीं आ रहा था। पत्थर के जिस मकान में मां एक दिन उसे लाई थी, उसने कभी भी उसे घर नहीं माना । पर अब तो मां भी नहीं रही,! किसी वीरान घर के दालान पर वह बैठ गया। सारी रात घुटनों में सिर छिपाए, ठण्ड से ठिठुरता हुआ वैठा रहा। नो सुबह उदो-उदो से पहले ही वह निकल पड़ा। सामने जो भी रास्ता दीखा, बढ़ता चला गया। भूखा-प्यासा! थका-मांदा ! सारा दिन वह चलता रहा। रात के अंधियारे में जिस घर के कच्चे आंगन में उसके पांव ठिठके, वह किसी हद तक परिचित था। पहले भी यहां रहा था। मां तव स्वयं पहुंचा गई थी... उसे देखकर मामा का मन पसीज उठा,पर मामी का व्यवहार सहसा कटु हो आया, “यह वला भी हमारे ही गले अटकनी थी! अपने ही बच्चों को पालना कठिन है, उस पर यह मुसीवत !" "अरे, गाय-डंगर चरा देगा। घर का भी कुछ काम-काज कर देगा कभी ! यह मुला-टुला अकेला कहां जाएगा?.."फिर यह भी तो सोच कि एक नोकर मिल गया मुफत का।" 88 | सु-राज
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"कुल्ली, मजदुरी, नउकरी।"
"मेरे को भी कुल्ली, मजदुरी मिलेगा...?" कुछ अतिरिक्त उत्साह
से वह वोला।
वह अभी कह ही रहा था कि सब एकाएक हंस पड़े, "तू करेगा कुल्लि-
गिरी? घुघता साल्ला..."
वह अबोधभाव से उनके हंसते चेहरे ताकता रहा।
"यहीं मजूरि क्यों नहीं करता?" गोल दायरे में आग के किनारे बैठे
तरुण ने सहानुभूति से पूछा।
अपने छोटे से हाथ नचाता हुआ वह बोला, "यहां कहां नउकरि-
चाकरि?.. दिन-रात काम-काम ! उस पर मामी रोटि नहीं देती।"
वह रुआंसा हो आया।
"आमा नहीं-?"
"नां..."
"वाज्या-बाप...?"
"नहिं ।"
"भाई-बहन ?"
उसने सिर हिलाकर 'नहीं' कहा।
अन्तिम सिरे पर बैठे अधेड़-से व्यक्ति ने सहानुभूति से देखा,
-सकेगा, उतनी दूर?"
"हआंऽ।" उसने उत्साह से कहा । उसके कहने में बड़ा आत्मविश्वास
"चत
'था।
"हमारे साथ चलेगा तो मेरा मामा मारेगा नहीं ...?"
"नहिंऽ।"
"तो चल फिर...!" कुछ देर सुस्ताने के पश्चात् वे चलने लगे तो
वह भी वैसा ही पीछे-पीछे हो लिया । गाय-डंगरों की तरफ उसने एक
बार मुड़कर भी देखा नहीं।
90 | सु-गज
दस तेल्या, पुन्तरिगड, अंगायो, लमभावर. ज्यो-ग्यो वह आगे बढ़ रहा था, त्वोस्थो कही वडा हत्कारनन्मा लग रहा था उने । जमे बहुत बडी मंद ने मुक्ति मिली हो-मान मेने के लिए एक बुला हुमा अनन्न नाममान | पान के बारजूद भी वह अपने को बहुत हल्का अनुभव कर रहा था। रास्ते मे मभी बातें करते जा रहे थे-बढ़त मुप है यहा! मिहनन मजूरी के बाद भरपेट माना। कपडा-लत्ता ही नहीं, कार ने तनसा भी। नौटते ममय नन-तेल, कपड़ा वर्तन-भाण्डे..." हिन्दुस्तानी राज में अच्छी नौकरी मिल गई तो बूट-पट्टी कोट- पतलून "सुपरी लटकाकर चउकोदारी रात को मीटि-टा, दिन को मउज-मनती... मुनहरे माने ! मुनहरी जिन्दगी! मारे रास्ते भर चलते-उठने, बंठते सोते उन्होंने कितने हो किस्ने मुनाए पे-परिचितो के । अपरिचितो के। धरामी का परम बहादुर कंग पर मे भागकर गगा पार हिन्दुस्तानी राज में गया पा। तीन-चार माल बाद पर लौटा था-निर में पांव तक एकदम लकदक । मिर पर नमः का साको टोप, लम्बे बूट, कमर मे चमड़े की चौडो पेटो, नाये गा आदमी के बराबर ऊना रोना लाया था। चमचम अपडे, चूडि-निन्दा, फलछाप लोहे का वडा वरमा.. रल रात जोगवडा में मोते समय नरसिंह ऐत्री बतलाना पा-चार- पाच माल पहले उडेलधुरा के वडा हाकम के साप वह महेनार नगर गया या-सामान ढोते हुए। वहा डिट्ठा के यहा राव नात मिला था। रोटी मिली थी। दो बयत चीनी कोचा। बीडी। पूरे दम दिन रहा पा। हे काटा / 1 मजे थे वहां । गुड़ भी खाने को मिल जाता था बड़ा हाकिम के साथ लौटना न होता तो वहीं रहता एक अनोखा संसार लग रहा था उसे स्वप्नमय ! महेन्द्रनगर देखकर तो आंखें खुल आई थीं। भय लगा था। बड़ा बाजार। अफसर-हाकम। दहशत-सी हुई थी। सड़कों पर इत्ती सारी भीड़ ! ये लोग कहां जा रहे होंगे ! महेन्द्र नगर से आगे- इतना लम्बा, पक्का पुल उसने ज़िन्दगी में पहले कभी भी नही देखा था। बनबसा, खटीमा, चकरपुर । लोहे की गाड़ी! मोटर-टरक। दो पहिए. वाली, सड़क पर भागने वाली लोहे की घोड़ी। दो-तीन साथी महेन्द्रनगर में ही रह गए थे-किसी के फारम में । कुछ टनकपुर मण्डी की तरफ चल दिए थे। एक वनवसा में लकड़ी के टाल पर"जवर बहादुर के साथ कांछा आगे बढ़ा, काम की तलाश में । - ग्यारह "अए, डोटियाल दाइ, नौकरी करेगा?" खटीमा बाज़ार में अभी प्रवेश ही किया था कि नुक्कड़ की दुकान पर पाल्थी मारे बैठा मोटा-सा हलवाई बेरुखी से वोला। उसने मुड़कर देखा- मिठाइयों के ढेर के बीच बैठा लाला उसे बड़ा सौभाग्यशाली लगा। इत्ती बड़ी दुकान ! ढेर सारी रंग-बिरंगी मिठाइयां । मोटा-ताजा । खाता- पीता । तोंद कुछ-कुछ आगे की ओर निकली हुई। ऊपर वांहकटी पहने है। दोनों आंखों पर गोल-गोल दो दरपन के जैसे टुकड़े... "करेगा, लालाजि, करएगा..." जबरवहादुर हाथ जोड़ता हुआ, विनम्र भाव से समीप आया था। दुकान के आगे त्रिपाल का पुराना चीथड़ा टंगा था, स्लेटी रंग का, फटा हुआ-रस्सियों के सहारे हवा में - 92 | सु-राज , । मूलता हुना। वे दोनों उनके नीचे नर व पाए। "वोल, या लेगा?" "जो मजदुरी लालाजि देगा, नर नंगा।" दोनों हायों को परसर मलते हुए, उसने दीन-भाव ने मुरुकर कहा। कमाईवे बकरे गरीदता है, लाला भी लगभग मी ही उपयोगिता पी दृष्टि में उन दोनों को तोलता रहा । कुछ सोचना हुआ बोला, "बड़े को नहीं रणगा। छोटा ठीक है। दुकान में पानी भरेगा!बन-गठन मार करेगा?" प्रत्युत्तर में गहना दोनों कुछ न बोले तो लाला ने तनिक स्वर में कहा, "क्यों रे, करेगा कि नहीं ?" "करेगा, लालाजि, जपर करेगा।" जबरबहादुर ने उत्तर दिया, "यह छोरा गरोव है । प्रामा-या कोई नहीं...।" फिर मुडकर काठा की ओर देसा, "क्यो कांछा, लाला की नसरी करेगा?" काठा ने मौन स्वीकृति में सिर हिलामा । "क्या लेगा महीना भर का?" ताला ने पूछा। "जो माई-बाप देना, हनुर लेद सेगा।" जबरबहादुर ने उत्तर दिया। "नरुद चार रुपिया महीना देगा । साना-पीना देगा। कपड़ा-लता देगा। चाय-साय, बढी-सीढ़ी मय देगा।" लाला जितना-जितना रहता जा रहा पा, कृतमना के भार ने दोनों पुरते जा रहे थे। "क्या नाम है दाइ तेरा " लाला को मे कुछ पाद थापा। "काया।" "काडा ?" लाला अपना पोला मुह फुलाता हुमा जौर मे हम पहा, "यह क्या होता है ?" "नाम है हनुर'" जवरवहादुर ने कहा। "तो अब पड़ा क्यों है ? काम पर लग जा भी ये । नोररी परको...।" लाला ने सामने रखी रोनी वाल्टी को बोर इगित किया, "इसे बाहर कमेटी के नल पर लगा दे। भर जाए तो उटा देना।" उसकी ओर देखते हुए तनिक रुककर कहा, "उटा सकेगा?" कांठा उसकी भापा अधिक समझ न पाया। फिर भी इवना तो माता पल्ले पड़ हो गया कि लाला वाल्टी भरने का आदेश दे रहा है। लाला को जैसे कुछ स्मरण हो आया । तनिक पसीजता हुआ वोला, "छोकरे, पूरी नहीं उठा पाएगा। इसलिए आधी-चौथाई ही लाना, समझे !" 'समझ' पर जितना अधिक जोर था, उससे अधिक सहानुभूति ! "लालाजि, यह गरीव है.. अब आप हि माइ-बाप हो...!" हाथ जोड़ता हुआ जवरबहादुर बोला, "जैसे तुम रखेगा, यह रहेगा"।" "अरे, हम कौन कह रहे हैं कि यह अमोर है। तुम फिकर मत करो। छोकरा अपने घर की तरह रहेगा. "हां, चोरी-चकारी तो नहीं . करेगा?" "न्नां, न्ना सेठजि ऽ । ऐसा नहीं। छोरा इमानदार है । चोरि नहिं करेगा। तुम तो माई-बाप हो। चोरि करेगा तो परलोक नहीं बिगड़ेगा। नर्ग में नहीं जाएगा!" हाथ जोड़कर जवरवहादुर ने उत्तर दिया। "तुम क्या करेगा?" "नउकरी-सौकरी करेगा--कुल्लिगिरि...!" हाथ जोड़कर वह चला -- गया। कांछा का सारा दिन जूठे बर्तन मांजने, जूठी पत्तले उठाने में ही वीत जाता । लाला ने अपनी उतारी हुई फटी कमीज़ दे दी थी---जिसके अन्दर तीन व्यक्ति आसानी से समा सकते थे। सामने 'शर्मा रेडीमेड वस्त्र भण्डार' से नीली जीन की एक हल्की-सी जांघिया खरीद दी थी। एक नौकर और था, इससे कुछ वड़ा, जो लाला के बगीचे वाले घर में ही रहता या अव । एक दिन कांछा घर से लाला के लिए दिन का भोजन ला रहा था, तो शरारत से उसके कान के पास मुंह ले जाकर बोला, "लाला अच्छा आदमी नहिं । बीवी को ससुराल में ही छोड़ रखा है ..।" वह अपने आप हंस पड़ा था। जिस दिन रात को लाला अधिक देसी पी लेता, दुकान पर ही सो जाया करता था। इस चमक-दमक के बीच कांछा के अबोध मन में कहीं विरक्ति का भाव भर रहा था-वितृष्णा का। ऐसा सब क्या है ? क्यों?--उस अबोध की समझ में नहीं आता था। 94 94 सु-राज
वारह
मारी रान पानी बरमता रहा था। मतमो पुराने टीन मेट्रो
इत जगह-जगह में पिरती रही। जिस कारण पाहामोन पापा।
मुबह जैग ही आग लगो शिरिनी ने बार-बार में रिचार माहाए ।
बचाकर जागा यह । देगा-चौगानेदार नहमद और बनियान पहने
सामने चट्टान को नरह लाला सरा है बाए हाय में ली हरी पाने
पानी में नर लाल-लाप पात्रों ने घर रहा है।
आरों मलना हा वह अभी देश हो रहा पाकि नाना ने बार देगा
न नाव । तार एक वाटा उसके गाल पर लगा दिश, “बनाने की
बोलाद. तू जब तक नो रिया है । दिन कर का निग्न बाया ग
के सारे पिमिनार आज हाप में निकल आएगे। पारी मारी गई.."
काटा भौचर-मा गाल मलता रहा, “वाचू मार कर पानी
आता रहा-अइने : 'कमे" लोटे-ग हाथ नमानमाकर यह
बतला ही रहा था कि लाला ने दूसरा चाटा ह दिवा पानी के नये,
अव बहाना बनाना भी मीरा गया है।"
बाटाइननी जोर का लगा कि उमरा माया नना आया । न
मेनगे पाय घर-घर यापन लगे । आमा के प्राधेरा।
अपने दानो हाय ओहना हुआ समा-मानना के सर म बोला,
"परम.गली होइ गिया। मासी गरम }"ममा कति र नया
बाया।
"मूरज उन पर वह आया । टेमन की पारी मार्गाने पर
गल गई। आज दोनारी गाहसी तेरी मा की...।"
लाता ने मुर्दिया के पाम ही बटन दबाकर, सरन गौतोवरी न
कर दी। परनी नुकीली नोकरी नरक में स्किार महारे सरी यरी
कर दी, "बर को मार देता है गमई! बा, सन्दी-जलो
दरवज्जे खोल । बुहारी लगा।" अभी वह सिरकी से सड़ाक्-सड़ाक् झाड़ लगाकर धूल उड़ा ही रहा था कि खादी के मैले झाड़न से तराजू और बट्टों पर जमी धूल झाड़ते हुए लाला ने कहा, "बछिया के ताऊ, जल्दी-जल्दी हाथ चला"अच्छा, ठोड़ इसे । बाद में आंगन पै बुहारी लगइयो, पैले अंगीठी सुलगा ' कोले डाल...' कांछा ने रोज़ की तरह पहले अंगीठी में लकड़ी की छोटी-छोटी. गिट्टियां लगाई। फिर उसके ऊपर पत्थर के टूटे कोयले । पर आग थी कि आज जलने का नाम ही नहीं ले रही थी । गीली लकड़ियों से केवल धुआं उमड़कर रह जाता । अंगीठी के पास बार-बार मुंह ले जाकर फूंक मारने से आंखें लाल हो गई थीं। उनसे पानी बह रहा था। मैली, फटी आस्तीन से लगातार आंखें पोंछता हुआ, वह बहती नाक सुड़क रहा था। - - लाला गुल्लख के पास, गद्दी पर बैठा, देर तक यह तमाशा देखता रहा-भीतर-ही-भीतर सुलगता रहा । तभी एकाएक पता नहीं क्या क्रोध चढ़ा उसे । विदके सांड की तरह उछलता हुआ कूदा । अंगीठी पर लात जमाकर उसकी ओर मुड़ा । दो हाथ उसके लगाकर, पिल्ले की तरह कान घसीटता हुआ, सड़क के उस पार तक छोड़ आया, "ससुरा, कम- जात ! खावे हैं किल्लो-किल्लो भात भकर भकर ! काम के नाम पर जे हाल ! अंगीठी भी सुसरे को जलानी नां आवे हैं ! ...निकल्जा." निकल्जा साले ! अब इधर फटका तो हरामजादे को दोनों टांगें तोड़ दूंगा...!" आसपास की दुकानों के लोग, सड़क पर चलते सभी मुसाफिर इकट्ठा हो गए थे----लाला हरदुआरी लाला का तमाशा देखने के लिए। तहमद की लांग ऊपर बांधकर लाला स्वयं अंगीठी सुलगाने में जुट गया, गालियां बकता हुआ। सड़क के दूसरे किनारे पर, वगीची की दीवार के पास, अमियों के बूढ़े पेड़ के तले, पत्थर पर बैठा कांछा कुछ देर तक सिराक-सिसककर रोता रहा । बारिश की बौछारें जैसे ही फिर तेज हुई, वह पेड़ से सटकर 96 / सु-राज सु-6 महा हो गया। पानी की मोटी-मोटी लकीरें शासाओं ने सरसकर तने को भिगोने लगी तो वह दौड़ता हुमा मन की ओर मुसा । प्लेटफार्म के नीचे गड़ा होकर भय ने नारो ओर देखने लगा- तेरह प्लेटफार्म के किनारे, समतल जमीन पर, दूर तक लोहे की दुहरी पटरिया विछी हैं । उनके दोनों किनारों पर पत्थर की छोटी-छोटी गिट्टिया विछी हैं-धून, राय और कोयले के कारण एक्दम कालो लग रही है। बहुत से कुल्लि अपने कन्धों पर चिरी हुई लकड़ी के शहतीर उठाए, पटरी पर रसे लोहे के खुले हिन्बों में चढ़ा रहे हैं नीचे बल्लियों का मड़ा पुल- मा बना रखा है, जमीन में डिल्ले तक चढ़ने के लिए। दूसरी ओर की पटरी पर भी कुछ मुले डिच्चे हैं, जिनमें मजदूर गोल-गोल, बड़े-बड़े सफेद चिकने पत्थर भर रहे हैं। ऐने पत्थर तो नदी के किनारे-किनारे कितने विन्चर रहते हैं, कोई पूछना तक नहीं। फिर इन्हें इस तरह कहा ले जा रहे होंग? क्या करेंगे इनन ?..'दाहिनी तरफ लकड़ाया-दी-लकडया! तरकीब से, अलग-अलग चट्ट बने हैं। जगल मे तो ऐसी कितनी लकड़ी पड़ी रहती हैं।"एक मरियल-सा कुत्ता कूड़े के ढेर मे पतलें नोच रहा है। बरमा के पानी में भीगे कुछ मजदूर सिर छिपाने के लिए, दौड़ते-हाफते उम ओर आ रहे हैं, जहा वह बैठा है... शाम तक वैसा ही नखा-प्यासा वह वंठा रहा । जब-जब उसे अधिक नूग लगती, मा की याद आ जाती । मा खुद नूसी रहकर भी उसके लिए आते में गेटी छिपाकर रसती यो। रोटी न हो तो मकई होती । काड़ी मूनी, दाडिम-मोह-पता नही रहा-कहा में मागकर, बटोरफर उसके लिए रसती थी। जब ने जेठा दाइ मरा उसके प्रतिमा की ममता और भी अधिक वट आई थी। लोग कहते, उसका बड़ा भाई बीमारी में मरा था, पर मा का कहना था कि वह भूख ये मरा था। बीमारी से ठीक होने के बाद पथ्य में देने के लिए उसके पास दो दाने चावल के भी न थे। उसने चुपके से पता नहीं क्या खा लिया था, जिससे उसी रात उसकी मृत्यु हो गई थी.. बारिश अब बन्द हो गई थी। तापहीन धूप का टुकड़ा, फटी चादर की तरह मटमैली धरती पर विछा था । बादल अभी तक छाए हुए थे आस- मान पर । पहले वह देर तक प्लेटफार्म पर ही इधर-उधर भटकता रहा । पांव थक गए तो प्लेटफार्म की छत से लगे लोहे के गोल खम्भे के सहारे खड़ा हो गया। फिर बैठ गया। वैठे-बैठे पता नहीं कितना समय वीता ! उसकी पथराई पलकें मुंदने लगी तो वित्ते-भर की.जगह पर, कपड़े की गीली पोटली की तरह मुड़ा-तुड़ा वह सिमटकर सो गया। देर तक सोया रहा। तभी किसी ने डण्डे से कौंचा तो वह हड़बड़ाकर जागा । देखा- सामने लम्बा-चौड़ा आदमी खड़ा है-बूट-पट्टी कसा हुआ,"हियां क्या कर रिया रे, जिनावरऽ!" देखता "देखता किया है ? उठ हियां से !" उसने डण्डे को हल्के से ऊपर- नीचे हिलाते हुए कहा, "चोर-उचक्के सभी कमजातों के लिए यही जगे है..." ....." "उठ-उठ् ।" डण्डे की नोक से कौंचकर उठाने लगा तो वह डरे हुए कुत्ते की तरह चुपचाप बाहर निकल गया। वत्तियां जल चुकी थीं। पीलीभीत की तरफ से आने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा में बैंच पर बैठा फौज का एक जवान यह सब देख रहा था। पुलिस का सिपाही चला गया, तब भी वह लड़का प्लेटफार्म के बाहर, नीम के पेड़ के नीचे वैसा ही बैठा रहा। उसके सामने ही बरखा के पानी के कारण हयेली के बरावर नन्ही-सी तलया बन गई थी जिसमें फुर- पुरी चिड़ियां नहा रही थीं। बादल घिर-घिर रहे थे। ज्यों ही फुहारें शुरू हुई, वह थर-थर कांपता फिर प्लेटफार्म की छत आंखें मलता वह रहा। 98 / सु-राज
की धारण में पाटिका-भव में, आपका से इधर-उधर मारता हुआ
कि कही बूट-गट्टी वाला डा उठाए फिर न आ धमके !
"ये डोटियाल दाइ"!" संनिस ने न जाने क्या मोचकर उने
बावाज दी।
अगुली का इगारा देखते ही वह नहमा-मा, सिमटा-सा पान वा
गया । रे, इसके भी वंमी हो बूट-पट्टी!
"वैठ बा..."
काठा सिमेण्ट के ठग फर्श पर बसा ही मकुचायामा बंठने लगा
तो, "नहीं, नहीं, ऊपर बंठ," कहते हुए संनिक ने बैंच पर ही बैठनेरा
इगित किया।
वह और भी सकुचाया और लोहे की वेंच के दूसरे मिरे पर थोडी-
सी जगह में समाकर बैठ गया।
"कहा का रहने वाला है?"
कांछा की ममझ में न आया।
"मैं पूछना हूं. पर कहा है वेरा?" सैनिक ने कुछ ऊचे स्वर में
पूछा।
"डोटि-नइपाल।"
"कहा-?"
"डडेलीपुरा के पान"गहरढोटी मे आगे..."
"यहा कैसे आया?"
"नउकरी-चाकरी."पुस्ति-मजदुरी"!"
"कहा करता है नौकरी?"
वह मौन देखता रहा।
"अरे, मैं पूछना हूं, नौकरी किसकी दुकान में करता है ?"
"लाल्सा की..."
"फिर यहा क्या कर रहा है?"
"नास्ता निकाल दिया."
"क्यों निकाल दिया?"
"नौकरी करेगा?"
उसने स्वीकृति में सिर हिला दिया।
"पहाड़ चलेगा, हमारे साथ-?"
उसने उसी तरह फिर सिर हिलाया-"हां।"
"कितना रुपया लेगा महीना का, वोल?"
कोई उत्तर न दे पाया वह ।
तनिक सोचते हुए सैनिक ने कहा, "हमारे साथ गांव चल । वहीं
रहेगा । खाना-पीना, कपड़ा-लत्ता, वीड़ी-तमाखू सब मिलेगा । तनखा
ऊपर से।"
अभी तक उसी अवोध मुद्रा में बैठा वह देखता रहा।
"रोटी खाई-?"
उसने मात्र सिर हिला दिया, "नहीं।"
-
"खाएगा?"
"हांड।"
सामने खड़ी रेड़ी से कुछ पूरियां और सब्जी ला, पत्तल उसके सामने
रख दिया।
आलू की सब्ज़ी और गरम-गरम पूरियां देखकर उसकी भूख और
बढ़ आई। अपने दोनों हाथों से बड़े-बड़े ग्रास तोड़ता हुआ वह खपाखप
खाने लगा। जैसे महीनों से अन्न का दाना देखा ही न हो ।
खाना खा चुकने के बाद वह मालू के फटे पत्तल पर लगी सब्जी
चाटने लगा-चट-चट् लम्बी जीभ निकालकर ।
"और लेगा क्या?"
"न्नां..."
"तो जा, सिमेण्ट के चबूतरे के भीतर वह नलका लगा है, पानी पी
आ..."
लौटा तो उसके मुरझाए मुखड़े पर सन्तोप का अपरिमित भाव था।
"बीड़ी खाएगा..?" सैनिक ने एक वीड़ी उसकी ओर फेंकी।
100 / सु-राज
बौदह जैसे अपने गाव वह फिर पहुंच गया हो। यहा आकर उसे वैसा ही लगा। से ही जचे-ऊचे पहाड़-बर्फ से ढके। वैसे ही पत्थर, वैते हो देवदार, चीड़-वाज, दुरोंज, खरसू के पेड़, फंइया को पूरी डाल पर दिडो फूलों की चादर। रामबास, कुइया, चिंगारू, किनमोड़े, दाडिन, असोड़-ब कुछ वैसा ही। मैदान की अपेक्षा एकदम सर्दी। फर्-फर ठन्डी हवा चल रही थी। धीरे-धीरे कंपकंपी-सी लगने लगी उसे। ठण्ड में शरीर पर काटेने उमर बाए थे। जब-जब ऐसा होता है, उसे सहना मा की याद जानी है। इसके ठिठुरते हुए, कापते हाथों को, अपनी वरदरी, रस्तहीन होनियों नह. लाती हुई चिन्तित स्वर में अक्सर कहती थी, "काछ, तू इवना हुबर- पतला है कमजोर "इस निठोर दुनिया मे तू में जिला - का आई स्वर कपकपाने लगता !"उमरी कालो-काजीनिहर आगे घुआ-सा छाने लगा। एक क्षण कुछ नांवदा दाह घटके से सिर हिलाता हुआ बागन ने गा गया । अब तक पाव नही दंग ने जमीन पर नहो रहे । रहा था, रिंगाई-जैसी आ रही यो। लोहे के बडे-बडे को एक दूसरे में जुड़े-खड़खडाते हुए आगे मरने का मास्टर गाड़ी सड़क पर धूल उड़ाती हुई वटीना र न्हाई देसा या बहुत बार "दरते-डरते छत्रानी का कारक हिम्मत नहीं हुई यो"इस वार व बेत्र नोकरी कर जैसा अहसान हुआ था घुमावदार जाह-वावड मोहों पर हीट आ मूद लेता। वही गाडी नीचे वाले रि- . 1 देवदार के पड़ों के पास एक समतल-सी जगह पर गाड़ी रुकी। कुछ लोग उतरे तो उनके साथ-साथ वे दोनों भी नीचे उतर पड़े थे। धूल से अंटे किसी आदमी ने गाड़ी के पीछे लगी लोहे की छोटी- छोटी सीढ़ियां चढ़कर सामान नीचे उतार दिया था। गाड़ी धूल उड़ाती हुई फिर आगे चल पड़ी तो वहां पर वे ही दो लोग रह गए थे। उसके सिर पर छोटी-सी टिन की वक्सी, और अपने कन्धे पर खाकी किरमिच के गोल, लम्बे थैले को रखकर वह मिलिट्री के बूटों मे वजरी रगड़ता हुआ आगे बढ़ने लगा था। "कब आए भौंना?" किसी बुजुर्ग ने कहा तो "पैलांग" कहते हुए उसने गरदन किंचित् नीचे झुकाई थी। "मल्ले घर का भवानसिंह सिपाही घर आया है ।" चारों और यही चर्चा शुरू हो गई थी। अपने घरों के आंगन की तीर पर खड़े लोग जिज्ञासा से, किस तरह से देखने लगे थे-उसे आता हुआ "ले, तेरे लिए इस बार एक नन्हा-सा नौकर ले आया हूं-हाथ वंटाने के लिए !" कन्धे का सामान नीचे उतारते हुए भवानसिंह ने कहा था। । सामने खड़ी औरस हंस पड़ी थी, "नोकर कहां, यह तो नौकर की पोथि है-छोटा-सा छौंना । किस घोंसले से उठा लाए...?" "अरे, जैसा भी है, है तो आदमी का ही वच्चा ! कुछ तो हाथ वंटाएगा । घर में तू अकेली रहता थी न ! अब यह साथ हो गया।" औरत और जोर से हंस पड़ी थी, "इस बच्चे का साथ ? हां, उठा कहां से लाए ?" "खटीमा टेसन पर भूखा पड़ा था, उठा लाया।" यह सब सुनकर वह संकोच से और सिकुड़ आया था! "अरे, खड़ा क्यों है ? बैठ! वैठ !” महिला ने तनिक सहानुभूति से पाहा था। वह वैसा ही, वहीं पर चुपचाप बैठ गया था। "क्या नाम है तेरा?" 102 / सु-राज "काला।" "कानछा ?" वह हस पड़ी थी। "ले, ये ना का गिलास धो ला"" कुछ रुककर उसने कहा था "फिर तू भी कटको लगा लेना ! ठण्ड लग रही होगी. कोई बनीन- मनीन नहीं, पहनने के लिए? ऐमे तो तू मर जाएगा..." कुछ ही पल बाद, इम अपरिचित घर में उसका एक अनाम-सा रिस्ता जुड गया था-का, याकी का! कारी और उसकी दिवगता मा की आकृति में कितना साम्य था ! वैसे ही चलनी, बोलती भी ठीक वैमे ही थी। दो महीने की छुट्टी बिताकर भवानसिंह जब पलटन मे लौट गया तो पूरे घर में वे ही दो वाणी रह गए थे । ऊपर की मजिल में वे रहते और नीचे गोठ मे गाय-बछिया." काकी अपने बच्चे की तरह ही उसे सुलाती, खिलाती-पिलाती उसका ध्यान रखती थी। उसके लिए लोपाट के बाजार से वही के मोलियो का बनाया, सिलपट का एक छोटा जूता उसने मगा दिया था। मोटे भोटिया ऊन की एक वनीन भी स्वयं वुन दी थी~हल्दी रंग की, जिने पहने वह हवा में उड़ता रहता था। इननी उम्र होने के बावजूद काको के कोई बच्चा नहीं था, शायद इमीलिए बच्चों के प्रति इतनी ममता थी। दस्से के मेले में गाव के प्रायः सभी कोतिकिया लोग गए तो काकी के माय जिद करके वह भी चला गया था-रगीन वनीन और गवरून का पंजामा झपकाए । भैयादूज के मौके पर काफी मैके जाने की तैयारी करने लगी तो चुपके- में उसने भी अपने बालो में तेल चुपड़ लिया, ".. मैं भी चलूगा काकी!" "गाय-बछिया को पानी कौन पिलाएगा? घाम कौन डालेगा?" "तल्ले घर वाली पानि आमा डाल देगी। जब वह अपनी बेटी के पर गई पो गहतोड़ा, तब हमने ही उसके ढोर-डगरी की किनी देखभाल की थी...!" काकी के चेहरे पर उभरते भावों को वह अपनी ऊपर उठी निरीह आंखों से परखने लगा। दाएं हाथ की अंगुलियों को पकड़कर झूलता हुआ बोला, "यहां अकेले मुझे डर नहीं लगेगा..?" काकी मना न कर सकी अव । टाट के झोले में काकी ने अपने दो-तीन कपड़े डाले तो उसने झोला कन्धे पर उठा लिया, "नहिं मैं पकड़गा!" "तो मैं हाथ में क्या ले जाऊं...?" . "खाली चलो-मेरे साथ। बड़े लोग सामान थोड़े ही उठाते हैं...!' उसकी अवोध आकृति की और ताकती हुई काकी हस पड़ी, "बहुत सयाना हो गया है, जल्दी...! कहीं लकड़ी के ठेकेदारों के साथ टनकपुर मण्डी की तरफ न भाग जाना...!" "तुझे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा काकी !" अपने दोनों नन्हे हाथों से उसने काकी के पांवों को शोर से जकड़ लिया था। - पन्द्रह यहां आकर कांछा सबके लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र बन गया । बड़ा हंसमुख ! बड़ा चटपट । नेपाली-डोटियाली के साथ जल्दी ही उसने पहाड़ी बोली भी सीख ली थी ! सबसे जल्दी ही घुल-मिल गया था वह । काका-काकी, मामा-मामी के रिश्ते यहां भी जोड़ लिए थे उसने । यहां गाय-भैंसों से भरा गोठ देखकर बहुत अधिक प्रसन्न हो उठा या वह । एक कोने पर मिमियाती बकरियां थीं-छेलि, हेल्वान, पाठियां ! हेल्वानों से ठेप देता हुआ वह, माथा भिड़ाकर सींग लड़ाता। "ले-लेऽ" कहता हुआ कभी उनके माथे पर अपने सुले पंजे से प्रहार करता-अपने दोनों पांच दीवार से जमाकर । "बकरी की एक छोटी-सी पाठी, चीतल के जैसे रंगवाली, को वह गोदी में उठा लेता । जब तक कि 104 / सु-राज नियातो हुई, वह उछलकर नीचे ने कूद न पाती, छोड़ना मुण्ड-का-मुण्ड हाकता हुआ बंगल ले जाता, और सांस गए ने पहले टितानपावर कुछ दिन वहां रहकर जब वे लौटने लगे तो हिवरते-हिरवे काफी बोला, "इस पाठी को हम अपने माय घर ले गाए का? वहा पानी नौले के पान खूब हरी-भरी पास होती है। वही चराएंगे।" काकी के वृद्ध पिता नारियल की काली त्रिलम की मूठ दोनों हायों में पकड़े, दरवाजे के पास बैठे, खासते हुए घुआ उगल रहे थे। बोले, "अरे, से बारे मना ले जा"हा, ध्यान रखना, वही लोमहो-सियार न ठा कर ले जाएं..!" "ना-ना" कहती हुई भी अन्त में कानो उमे उठा ही लाई, "काया दिन भर खाली रहता है। इसे ही चराएमा "'" सोलह मान-भर से अधिक अर्ना बीत गया था, परन्नु भवानसिंह इन बार पनन ने सालाना छुट्टियों में गाव न मा पाया था। पहले उनी चिट्ठी बाई यी। लिसा या-चत में आएगा। फिर जेठ र आने को लिखा और बब मावन बीत रहा था. एक दिन ग्राम को सीमानन्द के आगन में, नल्लं घर, मल्ले घर समान लोग बैठे तमावू पी रहे थे। करममिह मारा के बेटे हवानसिंह की पत्तटन ने चिट्ठी आई यो। लिया या हमारे भवान'दा का पने पिनी नारी सिपाही ने भगडा हो गया था। रान वो उसे न जाने क्या मूझा? अपने मोए हुए टमी सायी को उसने गोली ने उड़ा दिया । अब पनटन को होलान में है। कहते हैं, उसे फांसी होगी या उमर कैद। हमातनिह मवानसिंह की ही बटालियन में या। लोगों का कहना या-वायद सिर फिर गया हो वैचारे का ! कुखों का सोचना था कि विधवां भाभी ने जो घात डाली थी, सम्भवतः उसी का प्रभाव हो । झक्की तो वह बचपन से ही था, पर ऐसा गैरजिम्मेदाराना काम भी करेगा-कोई सोच नहीं सकता था। पिछली लड़ाई में उसे सरकार की ओर से इनाम भी मिला था। काकी ने सुना तो उसकी आंखें खुली-की-खुली रह गईं। अब क्या होगा? कैसे ? समझ में न आ पा रहा था। मैके जाकर उसने चिट्ठी लिखवाई, पर उसका भी कोई उत्तर मिल न पाया था...! फौज से पैसे आने भी अव वन्द हो गए थे, जिससे गुजारा चलाना और भी कठिन हो चला था। वक्त-वेवक्त मां कुछ भेजती रहती थी, अन्यथा चूल्हा जलाना भी कठिन हो जाता... काकी का वुझा-बुझा चेहरा अव उसे वैसा ही लगता, जैसा उसके पिता के घर न लौटने पर मां का लगा था। दिन-रात आंखें झरती रहतीं। जाड़ों के बाद फिर जाड़ों का मौसम शुरू हो रहा था। काकी की ग्यांलि गय्या विक गई थी । एक दिन कोई बछिया भी हांककर ले गया था। नाम मात्र के गहने-पत्ते पहले ही गिरवी रखे जा चुके थे । काकी की सूनी कलाइयों में पीतल की दो चूड़ियों के अलावा अब कुछ भी शेप न था । मैके से भाई आया था-बुलाने के लिए-जाड़ों के कुछ दिन वहीं कट जाएंगे, पर उसने मना कर दिया था। आसपास के अधिकांश लोग तराई की तरफ कब से निकल चुके थे-छ महीने के लिए मेहनत-मजूरी की तलाश में। सारी वस्ती उजाड़-उजाड-सी लगती-इक्के-दुक्के लोग ही कहीं- कहीं दिखलाई देते थे। एक दिन शाम को वह अंगेठी में आग सुलगा रहा था। आग में जंगल से बटोरी चीड़ की बकरियां भरक रही थीं। तभी उसने कोई पोछे खड़ा है। लम्बा-चौड़ा। पलटनियां-जैसा । तीखी, तिरछी लम्बी मूंछे-भेड़िया-जैसा! कांछा को झटका-सा लगा। - मुड़कर देखा- - 106 | सु-राज - काकी ने मंकोच मे पिछोड़ो का चाल सम्बा सोचते उसके चंठने के लिए दरी बिछा दी थी। "यह कौन है काकी ?" उपने चुपके में पूछा तो पहले काकी चुए रही, फिर कुछ मोचती हुई बोली, "पाहना है-दूर का रिस्तेदार। तेरे कारा का भाई..." उम रात वह वहीं रूसा था। कुछ सप्ताह बाद वह फिर आया था। दो दिन तक जा रहा था। रात के अधियारे मे, मवके मोराने के बाद, भीनर वाले कमरे ने काकी के रोने और उसके मनाने का स्वर देर ना गूजता रहा था" महीना भी अभी नीता नहीं था कि वह पर के आंगन में फिर मड़ा दिपलाई दिया था। उसके माय मामान की एक बड़ी पोटतो भी पो इस बारा उसकी मिचीमिची काया आले, भों पर देर नारे वाल, छोटे-छोटे कान | काला को यह व्यक्ति कनई भी अच्छा नहीं लगा था। न इसका आना ही। जब भी वह इमे देसता, एक तरह की दहात-सी होली मन में। काकी दम बार इननी उदान नहीं लग रही थी। एक दिन काडा वाहर ने लौटा था। उसने देखा था-दोनो माग के पाम बैठे वनिया रहे हैं। कामी को वह अपने साथ, अपने गाव ले चलने के लिए मना रहा है। सामने पोटली खली है। काकी के लिए वह नये कपड़े लाया है । चूडिया लाया है । फुन्दे-नुमके लाया है. पर काकी चुप है। असमजम मे डूबी आनमान की ओर देगती हुई... शाम को, आगन में बंटा कांडा अपनी बकरी को पाम खिला रहा या तो उसने कहने नुना, "क्यो रे काटा, तेरी बकरी नो अब साने लायक हो गई है. क्यों?" व्यग्य ने देवता हुआ वह 'हो हो हम पड़ा था। यह हमी कितनी कप्टकर और भयावह लगी घी मे ! सहमा मन में नया सन्देह भी उपजा था -कही वह पहले की तरह पानी लाने नोला गया तो, पहले की ही तरह लौटने पर आगन में जलती आग न दोसे ! उसकी नन्ही-सी बकरी को गरदन एक ओर कटी और यह भेदिया -मे बार में भूनता हुआ । बकरी से वह क्षणभर के लिए भी अलग न हो पाया था। काकी ने एक-दो बार किसी जरूरी काम से बाहर जाने के लिए कहा, पर वह जान- यूझकर टाल गया था। उसके सीने में रह-रह के भूचाल धरक रहा था। रात उससे खाना भी निगला न गया था। वैसा ही उसने परे रख दिया था। इतनी सर्दी के बावजूद उसे ढंग से कपड़े लपेटने का होश न था। उसके मन में बार- बार एक ही शंका उठती रही-~~कहीं फिर सब वैसा ही, वैसा ही, वैसा ही तो नहीं हो रहा उसकी पुतलियाँ खुली की खुली थीं। सारा शरीर ठण्डे पसीने से नहा आया था। यह छोटी आंखोंवाला खूख्वार भेडिया कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो निरसों फिर बकरी को मारकर खा जाएगा. फिर एक दिन, पहले की तरह काकी के साथ-साथ उसे भी हांककर अपने घर ले जाएगा। वहां इसकी चिड़चिड़ी, बुढ़िया-सी पत्नी होगी। ढेर सारे बच्चे । वे बच्चे उसके साथ वैसा ही दुर्व्यवहार करेंगे। यह आदमी नहीं, नहीं-नहीं, भेडिया उसे उसी तरह पीटेगा--बिना बात । काकी गूंगे पशु की तरह सब सहती- देखती रहेगी.''और फिर एक दिन वह ढोर-डंगरों के लिए घास लाने जंगल जाएगी और वहीं किसी छिछली चट्टान से ''मां का रक्त से सना क्षत-विक्षत शरीर 'धूं-धूं कर आग की लपटों में जलता शव "उसे कहीं साफ दिखलाई दे रहा था। सहसा वह जोर से चीख पड़ा ! "नहीं"नहीं कम्बल परे पटककर, बदहवास-सा वह उठ बैठा, "नहीं, ऐसा नहीं होगा 'नहीं, नहीं...! " मुट्ठी भींचकर, दांत पीसकर अंधियारे में छटपटाने-सा लगा। वाहर हल्की-सी आहट हुई। उसने देखा- सुबह होने को है। बाहर सारीधरती वर्फ से ढकी है । जहां तक दृष्टि जाती है सफेदी-ही-सफेदी। सांकल खोलकर काकी शायद पानी के 108 / सु-राज
पास गई है। ताजी बर्फ पर पायों के धनने के गहरे निशान है:
दवे पांव वह भीतर की ओर मुड़ा--किवाड़ धोरे ने उड़ाकर। तेर
हवा बह रही थी।
भीतर का दरवाजा यां ही बन्द था।
घोड़ा-सा सोलकर दरार से उसने शारा-
भेड़िया मुर्दे की तरह लम्बा लेटा सर्टि भर रहा है."
उसको टटोलती निगाहें इधर-उधर मुड़ी । दाई और दीवार के सहारे
मोटे पत्थर की भारी, चपटी शिल खडी करके रखी यो"।
काछा को न जाने क्या मूझा !
कहा उसमे इतनी शक्ति आई!
उसने अपने दोनों हाथों में भारी-भरकम शिल ऊपर तक उठाई और
सोए हुए भेड़िए के सिर पर धम्म् मे दे मारी...
जल्दी मे, हाफता हुआ फिर वह बाहर की ओर दौड़ा । अपनी बकरी
की रस्मी खोली और उसे गोदी में उठाए, रास्ते में बिछी बर्फ को रौंदता
हुआ, पहाडी के दूसरे ढलान की और निकल भागा-जहा लम्बी-चौड़ी
सड़क थी, और भी कई रास्ते, जो उसे बही भी ले जा सकते थे।
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