Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Ramrasayan

2011/07

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भूमिका। जिन्होंने ऐसे परमोदार महात्माको निवास फराय निजव्ययसे लोकहितार्थ उक्त अन्ध मुद्रित कराय प्रसिद्ध किया; ऐसे परोपकारोद्यत श्रीरावत नाहरसिंहजीको शतशः धन्यवाद देते हैं, दीर्घाऽऽयु; जगदीश्वर देवें ॥ श्लोक | श्रीमजानकी दातेन कृत्वा रामरसायनम् ।। भूयास्तच्छ्रेयसे नृणां राघवाय समर्पितम् ॥ १ ॥ उर्वीमंडलंमंडित धनवतां प्रज्ञावतां सौख्यदे कानोडे पृथुमदिरे मुनगरे दंडयान् पुनर्दडयन् ।। नित्यं च प्रतिपालयन् विनयिनः पाखडिनः खंडयन्नस्ति श्रीनृपनाहसिंहसुमतिः सत्प- ण्डितान् मंडयन् ॥ २ ॥ कवित्त ॥ रामचन्द्र वारि ऋतुराज नित पूर चहँ सातसुख लीन्हे मत वेदित अनन्दके । गुरु वेद पितु मातु आज्ञा अनुकूल रहें सुजन कुटुंबी प्रजा मोदरस फंदके । लक्ष्मणसो भाता लक्ष सन्यको सुरक्षन है शाति स्वरूप स्वच्छ अच्छ मनुचंदके ॥ अवध नरेश. वारि विभूति विचार आजु रसिकविहारी सारी नाहरनरेन्दके ॥ ३ ॥ इनि । आपका रुपापान- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवदेश्वर" स्टीम्-यन्त्रालय-मुंबई. इसके आगे श्रीमहाराजजीको संस्कृतप्रशस्निपत्रिका है, अवश्य देखने योग्य है.- ॥श्रीः॥ प्रशस्तिपत्रम् । पृथ्वीमण्डलमण्डनायितमहापाण्डित्यवन्माण्डतोनानादेशविदेशवासिविबुधप्रत्यक्षकल्पद्रुमः । धर्योदार्यपुर्यायशोयमुकळाशाटोर्यशाली सदाश्रीमन्नाहरसिंहरावतमहारानोऽवनान्मेदिनीम् ॥ १ ॥ धन्यं गोवामदं हि भामवलय श्राबेजवापायनं धन्यं तत्कनकं पुरं च विमलः शोशोदवंगः कृती । यत्र श्रीमदुमेदासहधरणानाथात्मनो राजते श्रॉमन्नाहरासेहरावतमहारानोअपराश्रिया ॥ २ ॥ विद्यावृद्धिविवेकनोनिनिपुणःसद्धमविभवान्गोविपप्रियसर्वकार्यकरणे दक्षः सभेयाप्रेयः ॥ श्रीमन्नाहरसिंहरावतमहाराजानुजा भाग्यवान्धोमल्लक्ष्मणासंहाजदिनयता सोभाग्यसपत्तिाभः ॥ श्रीमंताविह मुंबयोगर यदाऽऽयातोतदास्वान्सवादागम्यातेसुशोभित मम महाभाग्येन मुद्दालयम् । दृष्टं सर्वमगह कृत्यभवन सभाषिताः शालिगो मन्य धन्यमिद शुभागमवशाच्छीवङ्कटेशालयम् ॥ श्रीमन्नाहरासेहरावतमहाराजापचिणाः सन्मान्या अतिमानिता इाते यशो लोकत्रयं व्याश्नुते । तचैतादृशसाधुवयंराचेतग्रथमकाशाज्ञया सत्य स्वानुभवमासद्धमिति तान्यन्यांश्च मन्यामहे ॥ ५ ॥ श्रीजानकीप्रसादेन कावेना रचितं शुभम् ! सर्वार्थसाधनपरं श्रीमद्रामरसायनम् ॥ ६ ॥ अस्य प्रकाशनं कर्तुं सर्वोपकरणक्षमः । मपयन्मुद्गागोर श्रीमन्नाहरासंहाजत् ॥७॥ तन्मया मुंदरवर्गः पुपाचकणपत्रके । स्वकीये "श्रीवकटेश" मुद्रायंत्रे मुमादतम् ॥ ८ ॥ एतद्वंयमकाशेन मोदतां सन्ननाः सदा । महाराजयशश्चापि त्रैलोक्यं पूरयत्वलम् ॥९॥ श्रीकृष्णदासतनयः खेमराजाभिधेयवान् । विद्वगुणगणप्रेमी समाशास्ते प्रशस्तिकाम् ॥ १० ॥ महाराजविजयाभिलाषी- खेमराज श्रीकृष्णदास. "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापखाना. मुंबई. -

दोहा-मारग रति जो चहे, अथवा पद निर्वान ॥
भाव सहित सो यह कथा, करै भवग पुटपान ॥
६३ पालकाण्डम् १. ॐ
* श्रीरामपञ्चायतन.*
चौपाई-मनकामना सिदि नरसा । जो यह कथा कपट नजि गाये।
फदहि सूनहि अनुमोदन फरहीं । ते गोपद इव भपनिधि तरहीं।
..

दोहा-माग रति जो चहे, भयरा पद निर्वान ।
भाव सहित सो यह कथा, करै अषण पुटपाल ।
ॐ पालकाण्डम् .
श्री श्रीरामपञ्चायतन.*
गोपाई-मनकामना सिदि नरपाचे । जो यह कथा कपट तजि गावे।
कहहिं मनहिं अनुमोदन फरहीं । ते गोपद इब जपनिधि तरहीं।

---
दोहा-मुनि दुर्लभ हरि भक्तिनर, पावहिं विनाहि प्रयास ।
जे यह कथा निरंतर, सुनहिं मानि विश्वास ।
* अयोध्याकाण्डम् ।
श्रीगमपंचायतन
चौ०-जे असि कथा पाय परि हरहीं। केवल ज्ञान हेतु श्रम करहीं ॥
ते जड कामधेनुं गृहत्यागी । खोजत आक फिरहिं पयलागी॥

दोहा-सो कुल धन्य उमा सुन, जगापूज्य सुपुनीत ॥
श्रीरघुवीर परायण, जेहि नर उज विनीत ॥
--
* आरण्यकाण्डम् ॐ
श्रीरामपंचायतन
चौ०-दहि कलि काल न साधन दूजा । योग यज्ञ जप तप व्रत पूजा
रामहिं सुमिरिय गाइय रामहि । सन्तत सुनिय राम गुण ग्रामहि ॥

V
दोहा-वा', मो वरु होइ घृत, सिकतात वरु तल ॥
विन हरि भजन न भव तरिय, यह सिद्धान्त अपेल ॥
किष्किन्धाकाण्डम् ४ .
3 श्रीरामपंचायतन
चौ०-संशत रोग सजीवन मूरी । राम कथा गावहिं श्रुति भूरी॥
अति हरि कृपा जाहि पर होई । पाँव देह यहिमारग सोई।

दोहा-यह रहस्य रघुनाथ कर, वेगि न जानै कोई ॥
जाने ते रघुपति रुपा, स्वमहु दुःख न होइ ।
सन्दरमा
* श्रीरामपञ्चायतन.
पो०-7गा जाह परु मृगजल पाना । बरु जामहि शश शीश वृपाना ।।
अन्धकार बरु रविहि नशाप । रामविमुख सुख जीव न पावे ॥
---

दोहा-वारि मथे वरु होइ घृत, सिकतात वरु तल ॥
विन हरि भजन न भव तरिय, यह सिद्धान्त अपेल॥
3 किष्किन्धाकाण्डम् ४0
श्रीरामपंचायतन
पजीवन मूरी । राम कथा गावहिं श्रुति भूरी॥
पा जाहि पर होई । पाँव देह यहि मारग सोई॥

ANTARTER
नोक-ज सकाम नर गनहिं जे गावहिं । मुख सम्पति नाना विधि पावहिं ॥
मुर दुलंग मुल करि जगमाहीं । अन्तकाल रघुपति पुर जाहीं॥
उत्तरकाण्डम् .
श्रीरामपंचायतन
बोला-बार पार पर मांगों, हपि देहु श्रीरंग ।।
पद गगंग अन पावनी, भक्ति सदा सतसंग॥

दोहा-समर विजय रघुवीरके, सुनहि जे संत सुजान ॥
विजय विवेक वितति नित, तिनहिं देहिं भगवान ॥
Jan
श्री लक्षाकाण्डम् ६.
र श्रीरामपञ्चायतन.
चौ०-भवजन गंजन संदेहा । जनरेंजन सज्जन पिय येहा ॥
रामउपासक जे जगमाहीं। इह सम प्रिय तिन कहँ कछुनाहीं॥

नीर- मकाम नर गुनहि जे गावहिं । मुस सम्पति नाना विधि पायहि ॥
गुर दुल मुल करि नगमाहीं । अन्तकाल रघुपति पुर जाहीं॥
* उत्तरकाण्डम्
श्रीरामपंचायतन
मा
बोला-बार पार पर मांगी, बपि देहु श्रीरंग ॥
पद गगंग अन पानी, भक्ति सदा सतसंग ।।

दोमा-बिना मार गुति ने माननाद ।।
सिमकिनिति निन सिमनि गनन ॥
ज
* लङ्काकाण्डम् ६.
* श्रीरामपञ्चायतन.
गा--- गंगन नक्षा । रंजन ग-न निव हा ॥
रामउपासक जे जगमाहीं । इह सम प्रिय तिन कहें कछुनाहीं ॥

नो-ने मकान नर मूनहि जगावहिं । मुग सम्पनि नाना विधि पावहि ॥
गरी मन करि जगमाहीं । अन्नकाल रघुपति पुर जाहीं॥
उत्तरकाण्डम् 8
श्रीरामपंचायतन
HET-गार गार पर मांगी, हरि देर श्रीरंग ।।
पर गगन सन पावनी, भकि सदा सतसंग ।।

रामाश्वमेध
प्रारंभः।
पुस्तकमिलनकाठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम् प्रेस-वेवई.

श्रीवेङ्कटेशाय नमः। अथ रामरसायनकी अनुक्रमणिका। विधान विभाग विपय पृष्ठांक (१) ... १ " ... " (२) " ... ... ... " १ वंदना-श्लोक मालिनीछंद रसिकविहारीकृत ग्रंथचक्र ૨ , रसिकविहारीकी कुण्डली खंदना तथा कविके हृदय में भगवत्की प्रेरणा-कथाप्रबंधन १अवधराजश्रीवर्णन १४ २ दशरथयज्ञवर्णन १९ ३ हनुमजन्मवर्णन २१ ४ श्रीराम, लक्ष्मण,भरत शत्रुनकी जन्मकुण्डली तथा श्री- रामचन्द्रजीके व श्रीलक्ष्मणादिके सखायोंका निर्णयचक्र तथा रामजन्मोत्साह वर्णन ३० ५रघुचरित्र वर्णन ५२ ६रावण वृत्तान्त वर्णन... ७ श्रीसीताजन्म वर्णन ६२ ८ शुकचरित्र वर्णन ९ कुलदेवं पूजन वर्णन १ धनुपयज्ञारंभ वर्णन .. ८१ २ विश्वामित्रको अयोध्याप्रति आगमन वर्णन . ८2 ३ विश्वामित्र चरित्र वर्णन 2 जनकपुर दर्शन वर्णन ५वाटिका प्रसंग वर्णन ... ... " . ... (३) ...

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अनुक्रमणिका ... . " " " " .... विधान विभाग विपय पृष्ठांक ११ श्रीरघुनाथजीका ससैन्यलंकापयान वर्णन... ३०६ (६) १ रावणसभा मंत्र वर्णन ३०९ २ विभीपणशरणागत वर्णन ३१५ ३ सेतुबंधन वर्णन ३२२ ४ रावणदूत प्रेपण वर्णन ३२६ ५ दलथापन वर्णन ३३१ ६रावणसुग्रीव मल्लयुद्ध वर्णन ७ अंगद रावण संवाद वर्णन ૨૭ ८ नागफांस बंधमोचन રૂર ९ धूम्राक्ष प्रहस्तादि युद्ध तथा वध वर्णन ३४९ १० रावण युद्ध वर्णन ३५२ ११ कुम्भकर्ण युद्ध तथा वध वर्णन ३६१ १२ नरान्तक अतिकायादि युद्ध वर्णन ૨૬૮ १३ इन्द्रजित अंतरिक्ष युद्ध वर्णन ३७३ १४ लंकदहन तथा मकराक्ष युद्ध वध वर्णन १५ मेघनाद युद्ध व वध वर्णन १६ सुलोचना सत्य वर्णन १७ महिरावण वध वर्णन १८ मूलदल युद्ध वध वर्णन ५९ रावण युद्ध कालनेमि वध वर्णन २० रावण युद्ध वध वर्णन 2१२ २१ श्रीसीताराम मिलन वर्णन १२७ १श्रीरामचन्द्र अवध आगमन वर्णन १३३ २ग्रीरामचन्द्र राज्याभिषेक वर्णन 225 ३ श्रीरामचन्द्र गन्चरीति वर्णन 229 १पास्य पिलान पर्गन " ... " ... . ... ... ... . " ... ...

(२) अनुक्रमणिका। पृष्ठांक ... ११६ ૧૨૩ " ... १ " १३८ १४५ १४७ " " " १७६ १८७ १९५ १९८ ... ... " ... १ विधान विभाग विषय ६धनुपभंग वर्णन ७ परशुराम संवाद वर्णन ८ विवाह वर्णन ९ हास विलास वर्णन १० श्रीजनकनन्दनी विदा वर्णन ११ विवाहान्त वर्णन (४) १ श्रीरामवनगमन वर्णन २ ग्रामवधू समागम वर्णन ३ ग्रामवधू विलाप वर्णन ४ ग्रामवधू नेहकथन ... ५चित्रकूट निवास वर्णन दशरथराज देहत्याग वर्णन . ७ रामभरत संवाद वर्णन ८ चित्रकूट चरित्र वर्णन ... ९ मुनिसमागम वर्णन १. पंचवटीवास वर्णन १ सीताहरण वर्णन २ जनकनंदिनी विलाप वर्णन ३ रघुनंदन विलाप वर्णन ४ रघुनंदनका लक्ष्मणसहित वन अटन ५ सुग्रीव मिलाप वर्णन ६ वालिबध वर्णन ७जनकनंदिनीशोध वर्णन ८ हनुमानजीका जनकनंदिनी दर्शन वर्णन ९ लंकादहन वर्णन १० मीता मंदेशवाति वर्णन " " ... ... ... ... " ... . २०४ २१० २१६ २१८ २२४ २३० '२३६ २४९ ૨૧૬ २६३ २६७ २७ ૨૮૮ ... " ... ... २९७ ...

... " ... " ... " " " " ... " अनुक्रमाणका। (३) विधान विभाग विपय पृष्ठांक ११ श्रीरघुनाथजीका ससैन्य लंकापयान वर्णन... ३०९ (६) १ रावणसभा मंत्र वर्णन २ विभीपणशरणागत वर्णन ३ सेतुबंधन वर्णन ३२२ .४ रावणदूत प्रेपण वर्णन ३२६ ५ दलथापन वर्णन ३३१ ६रावणसुग्रीव मल्लयुद्ध वर्णन ७ अंगद रावण संवाद वर्णन ૨૨૭ ८ नागफांस बंधमोचन ३४२ ९ धूम्राक्ष प्रहस्तादि युद्ध तथा वध वर्णन ३४९ १० रावण युद्ध वर्णन ११ कुम्भकर्ण युद्ध तथा वध वर्णन ३६१ १२ नरान्तक अतिकायादि युद्ध वर्णन ३६८ १३ इन्द्रजित अंतरिक्ष युद्ध वर्णन ૨૭૨ १४ लंकदहन तथा मकराक्ष युद्ध वध वर्णन ३७८ in १५ मेघनाद युद्ध व वध वर्णन ३८३ १६ सुलोचना सत्य वर्णन ३९४ १७ महिरावण वध वर्णन ३९६ १८ मूलदल युद्ध वध वर्णन ५९ रावण युद्ध कालनेमि वध वर्णन ४०२ २० रावण युद्ध वध वर्णन ११२ २१ श्रीसीताराम मिलन वर्णन ४२७ (७) १ श्रीरामचन्द्र अवध आगमन वर्णन ४३३ २ श्रीरामचन्द्र राज्याभिषेक वर्णन ४४१ ३ श्रीरामचन्द्र राज्यरोति वर्णन ४४७ ४ वाक्य विलास " .... " ... ... ... ... " ... " ... " ... .... ... " (४) अनुकमाणका। विधान विभाग विपय पृष्ठांक " " ខ។ १७४ ৪99 ४८० ४८३ " ... 7 17 11 ४९८ १ (८) 11 ... ५ सतसंग वर्णन. ६सुग्रीवादि गमनःवर्णन ७न्याय वर्णन ८ लवणासुर वध वर्णन ९ द्विजपुत्र संजीवन वर्णन १० महारावण वध वर्णन . ११ हनुमत पर्यटन वर्णन १२ गौरांग कथा वर्णन ... १ विहारविधाने अष्टयाम रीति वर्णन... २ हिंडोल विहार वर्णन ... ३ रासविहार वर्णन मिथिला विहार वर्णन ५ फाग विहार वर्णन ६कुशलवादि जन्म वर्णन ७ अश्वमेध यज्ञारम्भ सुवायुद्ध वर्णन ८ विद्युन्माली युद्ध वर्णन ९ वीरमणि युद्ध वर्णन १० सुरथ युद्ध वर्णन ११ लव कुश युद्ध वर्णन १२ अश्वमेध यज्ञान्त वर्णन १३ राज्यविभाग वर्णन १४ श्रीरामचरित्र प्रभाववर्णन १५ सुरलोक विहार वर्णन इति अनुक्रमणिका समाप्त ५२८ " " 11 ५६४ ५६५ २७२ ... ५९३ ६९८ ६०० ... " .

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ श्रीरामरसायनप्रारम्भः। श्लोक-मालिनीछन्द । सकलसुकृतसारंचार्थधर्मस्यसारंबहुगुणगणसारंभक्तिसारंचनित्यम् ।। प्रचुरप्रणवसारंसर्वदामोक्षसारंदशरथहदिसारंरामनामैववंदे ॥ १ ॥ पद्य अनुष्टुप्छन्द । श्रीरामसीतयासाईलक्ष्मणेनहनूमता॥ कोटिकंदर्पदर्पघ्नंशिरसा- प्रणमाम्यहम् ।। २॥ गुरुंगणेशंगिरिशंगिरंचगरुडध्वजम् ॥ वाल्मीकि- बुद्धिवंदेकर्विकाव्यकलानिधिम् ।। ३ ।। दृढवद्धौभवाब्धौयद्गाथासे- तृसुविस्तरौ ॥ तुलसीसूरदासाचवंदेतीपुरुपोत्तमौ ॥ ४॥ उपजातिछन्द । अनेकजन्मार्जितदुष्कृतेनतेनोद्भवाःसंतिअपारकेशाः ॥ तेपांविनाशायसुभेपजंसत्सिद्दीकृतंरामरसायनंमे ॥५॥ घनाक्षरी कवित्त । शोभितसतीके सतीभारतीरतीके करसेवित सुतीके सुरतीके नरतीके विमलरतीके विरतकि विरताके दानिशुद्ध विरतीके सुरतीके सुरतीके रसिकविहारी सुगतीकेसुमतीके नित्यकारक पतीके दृढहारक छती देववंदिनीके निमिवंश चंदिनांके युगनीके पदकंज मिथिलेश नंदनीफेहें ॥ातारी ऋपिनारी वज्र अंकुशादिधारी चित्रकूट बनचारी सहचारी त्रिपुरारीके ।। अधम उधारी मुनि मानस बिहारी सारी विपति विदारी पूज्य कपि गिरिधारीके । सोचके सँहारी पाप तमके तमागे

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रामरसायन।
| कहि महंत जानकी प्रसादा नाम पुकारत युत मरयादा॥३२॥
सो यह नाम छंदके माँही कहूँ कहूँ अतिअमिल लखाहीं।।
याते निज कविता मधि राखौं और नाम द्वैसो इत भाखौं॥३३॥
रसिक विहारी नाम उचारो कितहूँ है रसिकेस निहारो॥
मम कृत छंद प्रबंध सुजोऊ । तिन महँ प्रगट नाम ये दोऊ ॥३४॥
दोहा-सूक्षम निज वृत्तांत में, धरो इहाँ इहि हेत ॥
सुनिसजन निजजानि मुहि, करिहै कृपा सचेत ॥ ३२ ॥
पुनि प्रणमा कर जोरिकै, करौ कृपाते धन्य ॥
होसिय सिय वरके सदा, जे प्रिय रसिक अनन्य ।। ३६ ।।
निजनिजप्रकृतिप्रभावमो, औगुण निरखि अनंत ॥
कृपा करी मोपै सदा, दोऊ संत असंत ॥३७॥
इति श्रीमदसिकविहारीविरचिते श्रीमद्रामरसायनयंथे
प्रथमविधाने प्रथमो विभागः ।। १ ।।
१
-
सोरठा-शिव विरंचि सुरराय, नारदादि सनकादिकपि ।।
बंदी मन वच काय, मुनि वासिष्ट कौशिक सकल ॥१॥
राम चरित अभिराम, नाम रूप लीला बहुरि ॥
धाम सहित सुख धाम, वरनों मति अनुसार कछु ॥२॥
राम चरित्र अपार, नेति निगम आगम भने ।
पनिज बुधि अनुसार, कहीं कहें पुनि कहहिंगे ॥३॥
राम चरित अति गृढ, विन हार कृपा जनात नाहि ।।
नो कह जान मृढ, पगे विवाद प्रमादमें ॥2॥
राम उपासक होय, गहें अनन्य उपासना ।।
हारे गुरु कृपा सुजोय, गम चरित तब जानहीं ॥६॥
उपासना ग्रंथ, प्राचीन प्रमाग बहु ।।
राम चरितको पंथ, जातेमाल दिमात ॥६॥
पचे यद मनसंग, कौने रिना न पाईये।
यातें तजि जगरंग,मंत अभंग चित॥७॥

(६) रामरसायन। पूरव ग्रंथ राम चरितको भेद, जब जनि गुरुकी कृपा ॥ तब छूटे सब खेद , राम उपासक होय दृढ ॥ ८॥ यातें लखि उपकार, काल जगजीव उधार हित ।। लघु मातके अनुसार, राम कथाकछु रचतहीं॥९॥ प्रमान, संस्कृत अरु भापा विविध ॥ सव संमत उर आन, रास रसायन ग्रंथ किय ॥३०॥ दोहा-रांम रसायनके विशद, हेरी आठ विधान ॥ प्रति विधान सुविभाग बहु, यथा योग अनुमान ॥ ११॥ निर्णय जन्म रविवाह ३वन ४,अरु वियोग ५पुनि युद्ध६॥ वर अभिषेक ७ विहार ८ ये, आठ विधान विशुद्ध ॥ १२ ॥ हैं बहु गुप्त प्रतक्ष जे, सिय रघुचंद्र चरित्र ॥ पूरव कथित प्रमाण जे, वरणों परम पवित्र ॥ १३ ॥ जन्म कथातें आदिले, मध्य चरित्र अनंत ।। वरण तहौं साकेत निज, गुप्त वास परयंत ॥ १४ ॥ रास विलास हुलास बहु, सुख दुख योग वियोग । यथा उचित सिय रामयश, कहीं सुनौ सत लोग ॥ १५॥ सिय रघु चंद्र चरित्र सुनि, संका करौ न कोय ॥ है प्रमाण युत सत्य सब, वर्णन कीनो जोय ॥१६॥ जे जन कबहूँ नहिं सुने, राम उपासन ग्रंथ ॥ पुनि हग भरि देखो न कहुँ, रसिक जननको पंथ ॥ १७॥ ते सुनि रासादिक कथा, सिय रघुवरकी सोय ॥ करि करि विविध वितर्क मन, चकित रहत चितजोय ॥१८॥ चौ जिनहिकछू शंका जियहोई ते यह यतन करौ सब कोई ॥ सीता राम उपासकहेरोतिनहूँमें अनन्य निरखेरो ॥१९॥ पुनि तिनमें अतिरसिक जु होई रसिकनमें विद्वान सु जोई ॥ ताढिगजाय करौं सतसंगा तनमनधनयुत प्रीतिअभंगा॥२० तव ता मुख अनेक वर गाथा सुनौ चरित जे सिय रघुनाथा ॥ वरणे सुर मुनिः संत अपारा ग्रंथ अमितजेलघुविस्तारा २१॥

रामरसायन।
संस्कृत अरु प्राकृत हैं कोऊ परम प्रमाण वाक्य वर दोऊ ।।
लिखौं नाम ते सकल निहारौ इमि अनेक औरह विचारी॥२२॥
ग्रंथनाम।
चौ हनुमंतसंहिता १ हि लखिलीजेपुनि वसिष्ठसंहितारकहीजे॥
अरु अगस्त्यसंहिता ३विचारौ त्यो निरुक्तिसंहितानिहारो४,२३
लखौ सदाशिवसंहिता हि गुनि रामरसामृत सिंधुभलोपुनि॥
बहुरि चरण चामर ७ वर देखी रामरास तिहि ८ सुंदर पेखो २४॥
वालमीकिरामायण ९ हेरौ सुंदररामायण १० निरवेरौ ।।
पुनि भुशंडिरामायण ११ पेपो बहुरि महारामायण १२ देखो २५
फेरि वालरामायण १३ जानौ पुनि हनुमन्नाटक १४ दृढठानी।
कौशलखंड १५वहोरि विचारो अरु सियगणवल्ली१६निरधारो २६
संग्रह उत्सवसिंधु १७ अनूपा ॐ अरु गुणावली१८सुखदसरूपा॥
(महासुंदरी तंत्र १९निहारो की पुनि नवरत्न२.हि निरखिविचारो२७
इते ग्रंथ संस्कृतके पेखो पुनि पाकृत ग्रंथनको देखो।
अए जाम२१ नामाकृत हेरो तुलसीकृतर२सय ग्रंथ निवरो२८
बहुरिलखी सीतायन २३ग्रंथा कादंबरी २४ विशद शुभपंथा ।।
नेहप्रकाश२५विशद जिय जानी पुनितरंगिनी२६परम प्रमाना२९
इनहि आदि बहु ग्रंथन माही 3 सीताराम चरित्र मिलाही ॥
रास विलास अनेक प्रकारा समयमास ऋतुदिन अनुसारा३०
वरनी कथा पुरातन जोई ६ विरचें राम रसायन मोई ।।
अव इत कछुप्राचीन प्रमाना ही सक्षम धरों करी बहुज्ञाना॥३३॥
प्रमाण-पामाशीय अपोम्पारोडे ।सर्ग२॥
श्लोक-गांधर्वपु भुवि श्रेष्टो बभूव भरताग्रजः ॥
कल्याणाभिजनः साधुदीनात्मा विचक्षगः॥१॥
पुनः। तर मुंदशह! मग ॥ ८ ॥
पिनुर्निदेशनियमेनहत्वायनानिवृत्तवाग्निवतम।।
सोभिन्तुमन्यविपुलेनगाभिमन्यनेतनयाहवार्यः॥२॥

(८)
रामरसायन।
पुनः । तत्रैव ॥ सर्ग ३६ ॥
नमांसराघवो तेनचैवमधुसेवते ॥ वन्यंसुविहितनित्यंभक्तमन्ना-
तिपंचमम् ॥३॥ नैवदंशान्नमशकानकीटान्नसरीसृपान् ॥ राघवोपन-
येद्गात्रात्त्वद्गतेनांतरात्मना ॥ ४॥ नित्यंध्यानपरोरामोनित्यंशोकपरा-
यणः ।। नान्यचितयते किंचित्सतुकामवशंगतः ॥ ५॥ अनिद्रःसत-
तरामःसुप्तेपिचनरोत्तमः ॥ सीतेतिमधुरांवाणीच्याहरन्प्रतिबुध्यते॥६॥
दृष्ट्वाफलंवापुष्पंवायच्चान्यत्स्त्रीमनोहरम् ॥ बहुशोहाप्रियेत्येवश्वसं-
स्त्वा६ मभिभापते ॥ ७॥
पुनः॥ तत्रैव ॥ युद्धकोडे || सर्ग २१॥
ततःसागरखेलायांदर्भानास्तीर्यराघवः ॥ अंजलिंप्रामुखंकृत्वाप्रति
शिश्येमहोदधेः ॥ ८॥ बाहुंभुजंगभोगाभमुपधायारिसूदनः ॥ जात
रूपमयैश्चैवभूपणैर्भूपितंसदा ॥९॥ मणिकांचनकेयूरमुक्ताप्रवरभूपणैः॥
भुजैःपरमनारीणामभिमृष्टमनेकधा ॥ १० ॥
पुनः । तत्रैव उत्तरकांडे ॥ संग १२ ॥
अशोकवनिकांस्फीतांप्रविश्यरघुनंदनः। आसनेचशुभाकारेपुप्प
प्रकरभूपिते ॥ १३॥ कुशास्तरणसंस्तीणेरामःसन्निपसादह । सीता
मादायहस्तेनमधुमेरेयकंशुचि ॥ १२ ॥ पाययामासकाकुत्स्थाशची
मिवपुरंदरः ।। मांसानिचसुमिष्टानिफलानिविविधानिच ॥ १३ ॥
रामस्याभ्यवहारार्थकिंकरास्तूर्णमाहरन् । उपानृत्यश्वराजानंनृत्यगी-
तविशारदाः ॥ १४ ॥ अप्सरोरगसंघाश्चकिन्नरीपरिवारिताः ।। दक्षि-
णारूपनत्यश्चस्त्रियम्पानवशंगताः ॥ १५ ॥ उपानृत्यंतकाकुत्स्थनृत्य
गीतविशारदाः ॥ मनोभिरामारामास्तारामोरमयतांवरः ॥ १६॥
रमयामासधर्मात्मानित्यं परमभूपिता ॥ सतयासीतयासार्धमासीनो
विरराजह ॥ १७ ॥ रमयामासवदेहीमहन्यहनिदेववत् ।। तथातयो-
विहरतो सीताराघवयोश्विरम् ॥ १८॥ दशवर्षसहस्राणिशतानिसुम-
हात्मनोः॥ प्रातयोविविधान्भोगानतीतःशिशिरागमः ॥ १९ ॥

रामरसायन। (९) पुनः॥ निरुक्तिसंहितायाम् ॥ सौगंध्योन्बलसौकुमार्यकलिताकोमल्यदाकेलिदासंगीतामृतवर्षि णीप्रतिपदंप्रेयःप्रयासापहा ॥ एणाशीस्वकटाक्षकल्पितसुरैश्वर्यादिका शक्तिदायद्वंद्याविबुधोत्तमोत्तमशिवाजाभ्यांजयेजानकी ॥ २० ॥ याःसख्याकलिताःसताभगवतागस्त्येनतेकोटिशस्ताभिस्त्वंसममेवना थदयितत्वाहादयंतीरहः ॥ मच्चित्रेस्फुरसुंदरस्फुटगुणस्मेरायमाणान- नानानाभावविनोदिनीहजनकक्षारोदजातेसदा॥ २१॥ कांच्याघार- णनंचरंगकरणमंजीरमंजुध्वनिश्रोतुत्वांरमणोविहारयतितेसामादिगानो गतिम् ॥ संगीतंसुरसेवितंचसमयेसीते विदूरेभजन्व्यर्थतन्नच- सर्वथा सकुरुतेमानाईमानप्रदः ॥ २२ ॥ साधयेयवाप्त मात्ममननात्सर्वात्मनातन्त्रवास्यादित्येवपरीक्षितुंतवसखीः कांतोयदा- शिलप्यति ॥ एकैकांहिविवक्तिचान्यवनितांत्वत्साम्यशंकीतियत्तत्ते मर्मतुदनमर्ममधुरामुग्धासियन्मैथिलि ॥ २३ ॥ पुनः ॥ सदाशिव हितायां ।। उर्वशीमेनकारंभाराधाचंद्रावलीतथा ।। हेमाक्षेमावरारोहा पद्मगंधासुलोचना ॥२४॥ हंसिनीमालिनीपद्माहरिणीमृगलोचना।। रामस्यपरिनृत्यंतिगीतवादिनमोहिताः॥२५॥ पुनः महारामायणं । अनंतसखिभिःसाईरामचंद्रः ससीतया ।। स्वेच्छयाकुरुतेगमंताः कुजागात्रसंभवाः॥ २६॥ मध्योवयःकिशोरश्चानंतरूपोरवृत्तमः॥ किशोर्यःमकलाःसख्योभूपिताश्चंद्रिकादिभिः ॥२७॥ पुनः॥तष॥ मुनिवेपधरंरामनीलजीमृतसनिभम् ॥ रमतेयोपितीभूतारूपंदृष्ट्वाम- दर्पयः ॥२८॥ईपद्धास्यकृतोगमोदृष्ट्वानेपामिमांगतिमाययंपन्यतग नानंमत्प्रसादेनसांप्रतम्॥२९॥रामिनागममृतातेत्रियोरुपाम्नपश्चग्न!! अतोदेवीरमुक्रीडागमनानेववर्तते ॥३०॥ इत्यादि। नी-योंटी अमित ग्रंथविस्तागनिनमह मन्त्रि अपराग। नो प्रमाण मय में फछु भाखो मोपर कृपा नदानवगहोइन। गम रसायन गंध अनुपा प्रगट भयोमन मंगलगमा ।। यद मुबंध पिरलो जिदि मान्न मुनीमकर मरीजमानः - (१०.) रामरसायन। - दो०-येक दिवस मध्याह्न मधि, वालमीकिअभिराम ॥ मैं अवलोकन करतहों, सुंदरकांडललाम ॥ ३४॥ रावण भापित कटु वचन, जनकसुता कृतखेद ॥ सो प्रसंग लखि दुःखते, मो हिय भयो विभेद ॥३५॥ चली अश्रुधारा हगन, शिथिल भयो तनु मोर ॥ कछु आलस आई सुमैं, पौढि रहो तिहि ठौर ॥ ३६॥ नहिं जागत सोबत नहीं, और न कछू प्रतक्ष ॥ स्वप्न नहीं अचरज महां, मोहिं भयो यह लक्ष ॥ ३७ ॥ कानन विशद विशाल तह, यक वट वृक्ष ललाम।। तापर सकल समाज युत, बैंठेहैं सिय राम ॥३८॥ तहँ दंपति ढिग मैं खड़ो, पैकछु जीय उदास ॥ याते हिय अकुलाय मुहि, आई दीह उसास ॥३९॥ सुनि उसास सियराम ज़, विहँसे मोदिशि हरि ॥ इक इक फूल कदंवको, दियो दुहूं मुहि फेरि ॥४० ताछिन आई एक तिय, लिये चारिकपि संग॥ करन लगी कौतुक विविध, वीनःवजाय सुढंग ॥४१॥ पुनि मोसन सो तिय कही, सिया राम गुण गान ॥ तुमहुँ करी हिय हुलसिक. दंपति पद उर आन ४२॥ सो सुनि सिय राम दुहुँ, मोहिंदई मणि एक ॥ कही लेहु यह कल्पमणि, यही विमल विवेक ॥४३॥ ऋद्धि सिद्धि वर बुद्धि बहु, मणि प्रभावते होय ।। इतनेमें मुहि धायक, गहि लीनो कपि दोय ॥ ४ ॥ ताछिन घिरि आये जलद, परनलगी जलधार॥ इने माहिं मोहग सुले, आनंद भयो अपार ।। १०॥ में सटि बैठो चकित चित, कोनों अमित विचार ॥ मिया गम यामधुनी, यही भयो निधार ॥१६॥ यह शिना. पग्नहीं, आनर डर उमगाय ॥ गनमापन नाम दिय, आपति पयोजनाय ।। 20॥

रामासायना (११) तब मिय रघुवरकी कृपा, बढ जानी सब भाँति ॥ वर्णन लागो विमल यश,गुप्त प्रगट गुण पाँति ॥१८॥ ची. यातेंहें यह ग्रंथ अनृपा सब सुखदानि सुमंगलरूपा ।। जो इहि बांच सुन सुनाव दुहूँ लोक आनंद सुपाचे ॥१९॥ सहित प्रतीति प्रीति युतनेमा में पड़े सुने हो सब क्षेमा। विरुज अंग बल तेज अपारा वृद्धि हं संतन परिवारा ॥५०॥ विद्या विजय विभूति बडाई ? सुयश सुबुद्धि सुकृत शुचिताई ॥ लहि सुख भोगि लोक इहि माही अंतकाल हरिरूप मिलाही५१॥ रामरसायन मंगलकारी तन मन धन सुखदानि निहारी।। जो यह पढे सुन चितलाई रामकृपातिहिपर अधिकाई५२॥ यामें बहु ग्रंथनके अंगा धरे यथोचित निराखि प्रसंगा। छंद अनेक नायिका नायक अलंकाररसजोजहँलायक५३॥ भाव विविध ध्वनि व्यंग्य घनेरी कोप व्याकरणशब्द निवेरी॥ निज लघु मतिकी गति अनुसारा विरचों ग्रंथ समेत विचारा५४॥ पनिज बुधि भरोसं नहिं आवे ॐ लाख स्वमंदता हिय सकुचावै ॥ सजन समुदाई के दीन जानिके करौ सहाई।।५।। अनुचित मोर क्षमा सब कीजो जहँ अशुद्ध तहँ शुद्धकरि दीजो॥ पै यह सुधि राखियो सदाही पक्षपात नहिं रंच वनाही॥५६॥ याते विनय करी करजोरी क्षमियो सकल ढिठाई मोरी॥ प्राकृत और संस्कृत दोऊ : कविता भेद लखे जो होउ५७॥ पुनि बहु ग्रंथ प्रसंग निहारे पक्षवाद जिन दूरहि टारे॥ जे ऐसे जन सुमति उतका शुद्ध करें ते याहि निशंका ५८॥ मैं यह ग्रंथ रचो करि हेतू सुखी होहिं सुनि बुद्धि निकेतू।। सो सब मैं अभिलाप पुजावों ॐ दीन जानि दाया दरशावो।।५९॥ दोहा-पुनिसबसज्जनजननतें, विनय करौं करजोरि । रामरसायन देखिकै, मोहिं न दीजो खोरि ॥६०॥ रघुवर प्रेरित शारदा, आय वसी हिय धाम ॥ सोई वर्णन करतहै, सिय सियपति गुणग्राम ॥ ६॥ याते सब - (१२) रामरसायन। यही भाँति पूरव रचे, बहु विधि ग्रंथ अनेक ॥ प्रथम भागके चक्रको, निरखे होत विवेक ॥६२॥ तिनहूँ ग्रंथनके रुचिर, निज विरचित बहु छंद ॥ यथा उचित या ग्रंथ में, धरिहौं निराख प्रवंद ॥ ६३॥ औरहु विविध प्रसंगके, नूतन छंद प्रबंद ॥ रचिहौं प्रेरित भारती, राम चरित निरद्वंद ।। ६४ ।। प्रगट कियोहै शारदा, पढ़ें सुनें हरि भक्त ।। सिया रामजूकी कृपा, ग्रंथ प्रकाशै जक्त ॥६५॥ अब बंदी श्री अवधपुर, मन वच कर्म समेत ।। जो सियराम विहार थल, नित्य धाम साकेत ॥६६॥ परहते पर अवधपुर, जाते परे न और ॥ वर प्राचीन प्रमाण है, वर्णनीय बहु ठौर ॥ ६७॥ प्र०-अथर्वणवेदे श्रुतिः। यायोध्यासर्ववैकुंठानांमूलाधारः मूलप्रकृतेःपरात्परातत्सद्ब्रह्ममया विरजोत्तरादिव्यरत्नकोशाढ्यातस्यांनित्यमेवसीतारामविहारस्थल- मस्तीति ॥१॥ पुनः ॥ पद्मपुराणे ॥ श्लोकः। श्लोक-विष्णोःपादमवंतिकांगुणवतींमध्येचकांचीपुरीनाभौ द्वारवती तथाच हृदये मायापुरींपुण्यदाम् ॥ग्रीवामूलमुदाहरंतिमथुरानासाग्रया राणसीमेतद्ब्रह्मपदंवदंतिमुनयोयोध्यापुरीमस्तके ॥ ३१ ॥ मथुरायाः पुरःसर्वाअयोध्यापुरदासिका ॥ अयोध्यामेवसेवंतेप्रलयेप्रलयेपिच ।। ३२॥पष्टिवर्पसहस्राणिकाशीवासेपुयत्फलम्। तत्फलंनिमिपानकली दाशरथीपुरी ॥ ३३ ॥ पुनः ॥ महारामायणे ॥ गोलोकाचपरंज्ञेय साकेतान्तःपुरंप्रियम् गोप्यागोप्यतरानित्यासायोध्यातीवदु- लभा॥ ३४ ॥ इत्यादि ॥ दोहा-पुनि वदी सरयू सरित, राम रूप अभिराम ।। सफल सरितकी शीश मणि,विशद विदित गुणग्राम ६८॥ सो सरयू तट विशद पर, द्वादश वन अभिराम ।। विमल विशाल अनृप अति,सकल समै सुखधाम ॥६९॥ ॥

सनसान
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द्वादशवननाम ॥ कान्यछंद ॥
प्रथम-अशोक १ प्रमोद २ बहुरि-संतानक ३ जानौ।।
पारिजात ४ मंदार ५सु-चंदन ६ चंपक ७ मानौ ।
रमनक ८आम्र ९ पलास १० कदम ११ सोहै-तमाल १२ घन॥
ये सरयूके तीर अनूपम द्वादश वन ॥ ७० ॥
दोहा-मृदुल भूमि शुचि पुण्य थल, सुंदर दोऊ तीर ॥
सुर पावनकारी सदा, निर्मल सरयू नीर ॥ ७१॥
नाम लेत नियरात सुख,दुख दुरात दरशात ।।
परसत पाप नशात जिहि, मज्जत राम मिलात ॥७२॥
श्रीसरयू जलपान करि, वसत अवधपुर माँहि ॥
धन्य अवधवासी सकल, जिनलखि देव सिहाँहि ॥७३॥
अवधपुरी सरयू नदी, अवध निवासी तत्व ॥
विदित प्रमाण पुराणमें, वर्णो महत महत्व ॥ ७ ॥
पु० ॥ अगस्त्पसहितायाम् ।।
अयोध्याचपरब्रह्मसरयूःसगुणःपुमान् ॥ तनिवासीजगन्नाथःसत्यं
सत्यंत्रवीमिते ॥३५॥ यथासर्वावताराणामवतारीरघूत्तमः ॥ तथासर्वे-
पुतीथेपुपावनीसरयूसरित् ॥ ३६॥ यावन्नजायतेतस्यांनानपाननि-
पेवणम् ॥ तावन्नजानकीनाथेप्राप्यतेभक्तिरुत्तमा ॥ ३७॥
पुनः ॥ पद्मपुराणे ॥
मन्वंतरसहस्रपुकाशीवासेनयत्फलम् । तत्फलंसमवाप्नोतिसरयू-
दर्शनेकृते ॥३८॥ प्रयागेयोनरोगत्वामाघानांद्वादशंवसेत्।। तत्फला-
दधिकंप्रोक्तंसरयूदर्शनेकृते ॥ ३९ ॥. मथुरायांकल्पमेकंवसतेमानको
यदि ॥ तत्फलादधिकंप्रोक्तंसरयूदर्शनेकृते ॥ ४० ॥ गयाश्राद्धेन
यत्पुण्यपुरुषोत्तमदर्शने ॥ तत्फलादधिकंगोतंसरयूदर्शनेकृते ॥४॥
पुष्करेपुनरोयांतिकार्तिक्यांकृत्तिकायुते ॥ तत्फलादधिकंपोक्तंसरयु-
दर्शनेकृते ।। १२ ।। इत्यादि ।।
दोहा-चाँही अमित प्रमाणहै, वेद पुराणन माहि ।।
ग्रंथ अपार अपार वन, कइँली वणे जादि ॥ ७ ॥

(१४) गमरसायन। maanneKIAL नाम रूप लीला बहुरि, धाम राम गुण ग्राम ॥ अमित अपार विचार कछु, वरणी यश अभिराम ।। ७६॥ सिय रघुवर वर चरित बहु, सुर मुनि किये बखान ।। ग्रंथ लखौ प्राचीनते, जानी परम प्रमान ॥ ७७॥ इति श्रीमद्रसिकाविहारीविरचिते श्रीमद्रामरसायने प्रथमविधाने द्वितीयो विभागः ॥२॥ इति श्रीमद्रामिकाविहारीविरचिते श्रीमदा- मरसायने निर्णय वर्णनोनाम प्रथमोविधानः॥१॥ अथ जन्मविधानप्रारंभः। दोहा-श्रीसीतावर सहित पुनि, लपण समीर कुमार ॥ पुर परिजन संयुत सबहि, वेदों वारंवार ॥१॥ चौ०-अब वणतही कथा प्रसंगा जाते होय अनंद अभंगा ॥ बीच वीच पुनि थल अनुमाना धरिहौं वर प्राचीन प्रमाना ॥२॥ नाय संत गुरु द्विज पद माथा विरचौं सिय रघुवर गुण गाथा॥ सकल दोप दुख विन विहाई राम कृपा सदग्रंथ वनाई ॥३॥ दोहा-प्रथम करौं श्रीरामकी, वंशावली वखान || ता पाछे पुनि होय बहु, विशद कथाको गान ॥४॥ अथ वंशावली। नारायण १ की नाभिते-कमल २ प्रगटभी आन !! ताते पुनि- ब्रह्मा ३ भये, विरचो सकल जहान ॥ ५॥ ब्रह्मातेसु-मरीचि ४ मे, तिनके-कश्यप ५मान ॥ कश्यपके-सुरज ६ प्रगट, सूजरके-मनु७ जान ।। ६॥ मनुकेहैं-इक्ष्वाकु ८ सुत, तिनके-कुच्छ ९ विचारति- नके भये-विकुच्छ १० पुनि, तिनके-बान ११ निहार ॥७॥वान पुत्र-अनरन्य १२ नृप, तिनके-पृथु १३ पृथिपाल । तिनके भये- त्रिशंकु १४ जो स्वतनुस्वर्गगे हाल ।। ८॥ धुंधुमार १६ तिनके भ- ये, तिनकेहैं-युवनाश्व १६॥ मांधाता १७ तिनके सुजिन; भजीधरा सरवस्व ॥९॥ तिनकेंभये-सुसधि १८ पुनि, तिनके-ध्रुवसंधि । ॥१९॥ तिनके-भरत २० सुजासुकी, फैलि रही यशगांध।। १०॥

(१६) रामरसायन। येद्वै गुरु प्रोहित सुवे. मन्त्री आठ महान ॥ दश दशरथ महाराजके, राज काज कर जान ॥२७॥ सुरपुर नरपुर नागपुर, अवध नाथ आधीन॥ सकल सुखी सब भाँति नृप, आज्ञा पाल प्रवीन ॥२८॥ श्रीदशरथ महाराजको, अनुपम साज समाज ॥ तेज स्वरूप प्रताप बल, शोभित सुयश दराज ॥२९॥ घनाक्षरी कविता जाको नाम प्रगट प्रताप तिहुँ लोकनमें रहत सशंक दिगपाल लोकपाल सब ॥ चलत चमूके हियहके होतभूके अति उठत भभूके शेपजूके शीश हाल तब ॥ राजनके राजा महाराजा दश स्यन्दनजू कढत सवारी घनी शस्त्र नोकशाल जब ॥ रसिक विहारी अवधेश चक्क वैनरेश सोहै और कोहै जौन जोहै झोकजाल अब ॥३०॥ कर कर होतहै कठोर पीठ कच्छपकी थर थर कॅपतहै ग्रीवा अहिराज की । तर तर शब्द होत दाढतें वराह हूके धर धर छाती धरकात गज- राजकी ॥छाय जात धूरि नभ मण्डल छिपाय जाति आसन डगाय जात शिव सुरराजकी ॥ रसिकविहारी जै जै सोर सरसाय जात कढत सवारी जब रघुकुल राजकी ॥३१॥ जाकी ओर भूलिहू कृपाकी कोर कीनी भूप ताके दुख दारिद परायकै जनी भये||जाहीके भरोसे सुरपालहूं निशंक रहैं जाके तेज पुञ्ज शेष सहस्र फनी भये ॥ रसिकविहारी ऐसे भयेहैं न हैहैं अब जैसे अवधेश धर्म थपन पनी भये । जाकी प्रभुताई दई पाई प्रभुताई सब जाके धन दीनेसे कुवे- रहू धनी भये ॥३२॥ सो०-ऐसो अमित प्रताप, श्रीदशरथ महाराजको । सो कौशलपुर आप, रैनि दिवस पालत प्रजहि ॥३३॥ चौ अवधपुरी दशरथ रजधानी जिहि लखि अमरावती लजानी।। चहुँदिशि विशद विचित्र ललामा सदन सरित सरमग आरामा ३४ उत्तर अरु दक्षिण दिशि माँही * योजन तीन प्रमाण रहाँही । पुनि पूर्व पश्चिम दिगजोहै द्वादश योजन अवध वसोहै ।।

रामरसायन। (१९) रुद्र याम लहि देखिये, तहँ बहु करि निरधार । अवध नगर वृत्तांत सक, लिखो सहित विस्तार ॥१७॥ प्र.रुद्रपामले। अयोध्यायांप्रदृश्यतेपंचकोटिशतानिच ॥ प्रासादाश्चमहाभागेअ- बुदान्येकविंशतिः ॥ १ ॥ तन्मध्येराजराजस्यराजतेराजमंदिरम् ।। सुविभागमहाकांताराणामिव चंद्रमाः ॥ २॥ इत्यादि । दोहा-वर्णन कौशल नगरको, करौं कहा : मैं मंद ।। शारद शेप गणेशहू, भापि न सकहिं सुछंद ॥५८॥ जहाँ चक्रवर्ती नृपति, श्रीदशग्ध महाराज ।। धर्मराज संतत करत, सकल भूप शिरताज ॥२२॥ पुर परिजन संयुत नृपति, रहन सदा सानंद ॥ विपुल विलास विभूति मय, राज्य करत निरवंद॥६०॥ इति श्रीरामरसायन वि० वि० अवधराज श्रीवर्णनोनाम प्रथमोविभागः ॥१॥ दोहा-धर्म धुरंधर भूपवर, दानी परम प्रवीन । प्रवल चक्रवर्ती सदा, तिहुँ पुर जिहि स्वाधीन ॥ १॥ चौ सोइकदिनदशरथमहिपाला मुकुरलखोनिजवदनविशाला॥ वृद्ध वेस चिह्नित तनु देखी नृप दिय चिंता भई विशेखी।।२।। बीती वय किशोर तरुणाई आय वृद्धता अंगन ठाई ॥ अजहूँलों सुत एकहु नाही पुत्रहीन यह राज्य वृधाहीं ॥३॥ इमिससोच नृप सचिव समेता आतुर गये वसिष्ट निकेता ॥ गुरुदिपूजिपरिनिज शीशा विनय फरी कर जोरि महीशा सुनिनृपविनयमुदितमुनिज्ञानी में बोले त्रिकालज्ञ वर यानी ।। विद मूल तर पुत्र भवाला हई अति ननिधि यह काला सुनि परपचनामुदितदियभप गुरुहि बंदि भूपति गृह गयः॥ नदी सुमंत रदाति लखि भूषा वर्गी पर क्या अन्ना ॥६॥ अंग देश तुर मुसा मुदेशागेमाद घटत ना ॥

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रामरसायन। (२१) . अश्वमेध मख सविधि करायो पुत्र हेतु पुनि यज्ञ दिढायो॥ वेद मंत्र मय आहुति दीनी सकल सुरीतियथोचितकीनी२१॥ सो०-ता छिन समय निहार, अग्निदेव नररूप धरि । लैकर पायस थार, यज्ञ कुण्डते प्रगटभे ॥२२॥ ऋपिहि दयो सो आय, ऋपि दीनों नरनाथको ॥ भूपति उठि हरपाय, लीनों शीश चढाय कर॥२३॥ सो पायस ले भूप, चारि भाग कीने उचित ॥ यथायोग लखि रूप, तिहुँ पटरानिनको दये ॥२४॥ सव पायसको अर्ध, सो नृप कौशल्यहि दियो । शेपरहो तिहि अर्ध, दयो कैकयिहि मुदितद्वै ॥२५॥ शेप रहो पुनि ताहि, करि द्वै भाग महीप मणि ॥ दयो सुमित्राहि चाहि, लहि तिहुँ तिय प्रमुदित भई॥२६॥ संयुत प्रीति प्रतीत, रानी कौशल्यादि तिहुँ ।। पायस पाय पुनीत, भई गर्भवती रुचिर ॥२७॥ जादिनते नृपतीय, तिहूँ गर्भवती भई ।। ता दिनते सब होय, पुर परिजन प्रमुदित महा||२८|| शिव विरंचि सुरराय, संयुत सुर ऋपि नाग सब ॥ नित प्रति हिय हुलसाय, रामदरश आशा लगी॥२९॥ अमित देव नर नारि, धरि मानुप वपु अवधौ ॥ बसे अनंद विचारि, राम जन्म सुख लखन हित ॥३०॥ इति श्रीरामरसायन वि० वि० दशरथयतवर्णनो नाम द्वितीयोधिभागः ॥२॥ चौपाई-अव वा सो सहित उमंगा विधि प्रेरित जो देव प्रसंगा। जब दशरथ नृप यज्ञ सुटाना अन्वमेव पर विधि अनुमाना || तवते प्रथम विरंचि विचारी प्रगटे राम अवर सुखकारी॥ तिहूँ लोकको सब दुस हरिहं अतिविचित्र लीला बहु कान्ह|२|| यातें सुर गंधर्व मुनागानिज अंशन युत सकल समाना।।

२२) रामरसायन। प्रगटि वसैं महि जहँ तहँ जाई के वानर ऋक्ष मनुज समुदाई॥३॥ जो विचारि विधि आयसुदीनी सो सब उचित शीश धरि लीनी।। रूप तेज गुण वल जिंहि जैसे प्रगटे विविध अंशते तैसे ॥४॥ दोहा-प्रथम भये विधि अंशते, जाम्बवंत ऋच्छेश ।। वाली सुरपति तेजते, कपिपति प्रगट सुदेश ॥५॥ भानु अंश सुग्रीव भे, सुरगुरुते कपि तार ॥ बहुरि गंधमादन लखौ, अंश कुबेर सुढार ॥६॥ विश्वकर्माके अंश नल, अनल तेज कपि नील ।। हैं अश्विनीकुमार ते, द्विविद मयंद सुशील ॥७॥ पुनिसुखेन वर वरुण ते, शंभु अंश हनुमान ॥ धीर वीर तिहुँ लोकमें, जा सम कोउ न आन ॥८॥ इच्छा तनुधारी सकल, तिहुँ पुर चारी कीश ॥ यदपि तदापि हनुमंत गुण, सवते अधिक सुदीस ॥९॥ अतिसमर्थ वल तेजनिधि, कपि केसरी कुमार ॥ जन्म कथा तिनकी कछू, कहीं सुमति अनुसार ॥१०॥ चौकपि बलवंत केसरीनामा तिनकी तिय अंजनीललामा ।। वर वानरी स्वइच्छाचारी एकदिवस सोहर्पितभारी ११॥ करि गार मानुपी रूपा विचरतही गिरिशिखरअनूपा ।। नखशिख सफल अंगशुचिसोहे कतिहि लखि पवन देवमन मोहे १२ आय वेग करि तिहि तनु परसो मनसिजअंगअंगअति सरसो।। तिनहिं दलि अंजनी रिमानी बोली बिलखि क्रोधमय वानी १३ देव मंदमति यह कह कीनो सब मम कर्म धर्म हरि लीनो ।। रही मुनि अंजनि वानी तुम सुंदरी वृथा रिस ठानी १४॥ नभवन रियो तुम पाँदी पतित्रत भंग भयो कछु नाहीं ।। धु मुदित पद नन बरदाना पदो मुत मोसम बलवाना१५|| पानलन मुनि मरि नाग ॐ मानी प्रगट हिये मुद भारी ।। ईम गर्न अंजनी सही प्रतिदिन द्विगुनतेन तनु तयहाँ।६।। 4.

रामरसायन। (२३) योहीं गर्भ समय सब बीता आयो कातिकमास पुनीता ।। तिथी चतुर्दशि मंगल वारा आसित पक्ष दिन अंत विचारा१७॥ स्वातीनखत लगन शुभ मेपा १ ग्रह बलिष्ठ सब योग विशेपा ।। भई अंजनी तवहिं प्रसूता प्रगटो सुंदर पुत्र अभूता ॥ १८॥ कंचन वर्ण सुअंग अनूपा ॐ अतिचंचल तनु पुष्ट सुरूपा ॥ लाख अंजनी पुत्र हरपानी से जानी सत्य पवनकी वानी ॥१९॥ प्रसवअंत लगि क्षुधा विशेखी अंधकार कानन निशि देखी ॥ विन जल फल सवनि बिताई प्रात होत आतुर उठि धाई ॥२०॥ सुतहि त्यागितह जाय उताला* खोजत फिरत अहार विहाला ॥ सरस पत्र फल फूल सुहाये 9 इत उतधाय उदर भरि खाये २१॥ इत विन मात वालकपि रोवै * विलम भयो बहु क्षुधा विगोवै ॥ ता छिन प्रगट भये रवि आई अरुण वर्तुलाकार सुहाई ॥ २२॥ अंजनि पुत्र क्षुधातुर भारी * लखे पक्क फल सरिस तमारी॥ तडकि तडाक भानु गहि लीनो वाल बुद्धि भ्रम कछु नाचीनो२३ जाछिन रविहिगहो कपिवाला ताछिन रहो ग्रहणको काला॥ आयो भानु निकट द्रुत राहू ॐ सो लखि भयो क्रोध उर दाहू२४ पैलखि पवनपुत्र बल भारी ॐ गयो इंद्र ढिग वेगि मुरारी ॥ कहे सुरेशहि वचन रिसाई कै अव विरंचि नव सृष्टि बनाई॥२५॥ दूजो राहु आज रवि तोप्यो मेरो सकल पराक्रम लोप्यो।। सुनि सुरपतिलै कुलिश कराला चढि ऐरावत चले उताला २६ संग राहु वासव तहँ आये जहँ केशरी सुवन रवि छाये॥ दूरहिते लखि राहुहि श्यामा कपि तिहि फल जानाअभिरामा२७ रवि तजि गहो राहुको धाई सो लखिकै धाये सुरराई॥ आवत उम्बल गज कपि देखोऐरावतहि शुभ्र फल लेखो ॥२८॥ तजि सिंहिका सुतहि तिहिं ठाये सुरपति गज गहिवेको धाये। आवत देखि बाल कपि योधा मारो कुलिश इन्द्र कार क्रोधा२९॥ वत्र घात पीडित कपि वाला आय गिरे गिरिपर बेहाला ।। लागत सुरपति कुलिशअभंगार किंचित भयोवाम हनु भंगा३०॥ १२१ (२२) रामरसायना प्रगटि वसैं महि जहँ तहँ जाई वानर ऋक्ष मनुज समुदाई॥३॥ जो विचार विधि आयसुदीनी सो सब उचित शीश धरि लीनी।। रूप तेज गुण वल जिंहि जैसे प्रगटे विविध अंशते तैसे ॥४॥ दोहा-प्रथम भये विधि अंशते, जाम्बवंत ऋच्छेश ॥ वाली सुरपति तेजते, कपिपति प्रगट सुदेश ॥५॥ भानु अंश मुग्रीव भे, सुरगुरुते कपि तार ॥ बहुरि गंधमादन लखौ, अंश कुबेर सुढार ॥६॥ विश्वकर्माके अंश नल, अनल तेज कपि नील ॥ हैं अश्विनीकुमार ते, द्विविद मयंद सुशील ॥७॥ पुनिसुखेन वर वरुण ते, शंभु अंश हनुमान ॥ धीर वीर तिहुँ लोकमें, जा सम कोउ न आन ॥८॥ इच्छा तनुधारी सकल, तिहुँ पुर चारी कीश ॥ यदपि तदपि हनुमंत गुण, सवते अधिक सुदीस ॥९॥ अतिसमर्थ बल तेजनिधि, कपि केसरी कुमार। जन्म कथा तिनकी कछू, कहौं सुमति अनुसार ॥ १० ॥ चौकपि बलवंत केसरीनामा तिनकी तिय अंजनीललामा । वर वानरी स्वइच्छाचारी एकदिवस सोहर्पितभारी १२॥ करि शृंगार मानुपी रूपा विचरतही गिरिशिखरअनूपा ॥ नखशिखसकल अंगशुचिसोहे की तिहि लखि पवन देव मन मोहे १२ आय वेग करि तिहि तनु परसोमनसिजअंगअंगअति सरसो।। तिनहिं देखि अंजनी रिसानी वोलीविलखि क्रोधमय वानी १३ देव मंदमति यह कह कीनो सब मम कर्म धर्म हरि लीनो ।। पवन कदो सुनि अंजनि वानी तुम सुंदरी वृथा रिस ठानी१४॥ हीन अधर्म फियो तुम पाही पतिव्रत भंग भयो कछु नाहीं॥ लेहु मुदित यह मम वरदाना ने पैहो मुत मोसम बलवाना|| पवन वचन मुनि केसरि नारी से सकुची प्रगट हिये मुद भारी ।। भई स गर्भ अंजनी जवही प्रतिदिन द्विगुनतेज तनुतवहाँ १६।।

- (२३) रामरसायन। । । ही गर्भ समय सब वीता आयो कातिकमास पुनीता ॥ तथी चतुर्दशि मंगल वारा असित पक्ष दिन अंत विचारा१७॥ वातीनखत लगन शुभ मेपा ग्रह बलिष्ठ सब योग विशेपा ॥ नई अंजनी तबहिं प्रसूता * प्रगटो सुंदर पुत्र अभूता ॥ १८॥ कंचन वर्ण सुअंग अनूपा ॐ अतिचंचल तनु पुष्ट सुरूपा ॥ लखि अंजनी पुत्र हरपानी * जानी सत्य पवनकी वानी ॥१९॥ प्रसवअंत लगि क्षुधा विशेखी अंधकार कानन निशि देखी। विन जल फलसवरैनि विताई प्रात होत आतुर उठि धाई ॥२०॥ सुतहि त्यागितहँजाय उताला खोजत फिरत अहार बिहाला॥ सरस पत्र फल फूल सुहाये इत उत धाय उदर भरि खाये २१॥ इत विन मात बालकपि रोवै * विलम भयो बहु क्षुधा विगोवै ॥ ता छिन प्रगट भये रवि आई अरुण वर्तुलाकार सुहाई ॥२२॥ अंजनि पुत्र क्षुधातुर भारी * लखे पक फल सरिस तमारी॥ तडकितडाकभानु गहि लीनो वाल बुद्धि भ्रम कछु नाचीनो२३ जाछिन रविहिगहोकपिवाला ताछिन रहो ग्रहणको काला ॥ आयो भानु निकट द्रुत राहू 8 सो लखि भयो क्रोध उर दाहू२४ पै लखि पवनपुत्र वल भारी गयो इंद्र ढिग वेगि मुरारी॥ कहे सुरेशहि वचन रिसाई * अव विरंचि नव सृष्टि वनाई॥२५॥ दूजो राहु आज रवि तोप्यो मेरो सफल पराक्रम लोप्यो॥ सुनि सुरपतिलै कुलिश कराला चढि ऐरावत चले उताला २६ संग राहु वासव तहँ आये जहँ केशरी सुवन रवि छाये॥ दूरहिते लखि राहुहि श्यामा कपि तिहि फल जानौअभिरामा२७ रवि तजि गहो राहुको धाई सो लखिक धाये सुरराई ।। आवत उज्वल गज कपि देखो ऐरावतहि शुभ्र फल लेखो ॥२८॥ तजि सिंहिका सुतहि तिहिं टाये सुरपति गज गहिवेको घाये ।। आवत देखि बाल कपि योधा मारो कुलिश इन्द्र करि क्रोधा२९॥ वत्र घात पीडित कपि वाला आय गिरे निरिपर बेहाला ॥ लागत सुरपति कुलिशअभंगा किंचित भयो वाम दनु भंगा३०॥. ६२१

२४)
रामरसायन।
दोहा-वन देखि निज सुत विकल, अंक उठायो धाय॥
तिहि लै बैठे कुपित है, गिरि कन्दर दुरि जाय ॥३३॥
मरुत कोपते जीव सव, विकल: भये तिहुँ लोक ॥
प्रलयकाल आयो अवै, यों अकुलात सशोक ॥ ३२ ॥
सब इन्द्रिय मग रुद्धभे; नेक न पवन प्रचार ॥
प्राण कण्ठगत छिनकमें, भये जीव गणझार ॥३३॥
सकल सुरासुर विकल है; आरत करत पुकार ॥
लखि कलेश सव अमर युत, वेगि चले करतार ॥३४॥
जहां पवन निज पुत्र युत, रहे कन्दरा धाम ॥
शिव विरंचि आदिक सकल, सुर आये तिहिं ठाम ३५॥
पवन हेरि सुर मण्डली, उठे सुतहि लै अंक ॥
करि प्रणाम विधि चरणपै, पुत्रहि धरा निशंक ॥ ३६॥
तव करता करिकै कृपा, कर फेरो शिशुमाथ ॥
पुत्र भयो प्रमुदित पवन, जान्यो जन्म सनाथ ॥३७॥
अति प्रसन्न वायु तब, कियो लोक सञ्चार ॥
विरुज भये सब जीवगण, लहों अनन्द अपार ॥३८॥
मुदित देव गण जीव सब, जाने विगत कलेश ।।
स्वारथ परमारथ मिलित, वोले वचन सुदेश ॥३९॥
सफल देव मिलि दीजिये, मारुति हित वरदान ॥
तव मघवा बोले मुदित, संयुत अर्थ प्रमान ॥ ४० ॥
वंक भयो हनु वत्रते, याते कपि सुत नाम॥
ख्यात रहे हनुमान इव, होय तेज बल धाम ॥४१॥
पुनि प्रसन्न मम दत्तवर, यह हनुमत हित जान ॥
अमर सदा मो वत्रते, रहे अमित बलवान ॥४२॥
पुनि दिनेश निजकलन ते, दीनों मन कल अंश।
परमप्रगशित अंगभो, हनुमत कपि अपतंश॥४३॥
कहो नानु पुनि होय जर, मत वर्ष अनुमान ॥
नव दम देई इनदि वर, साल मुविद्यादान ॥ १४ ॥

रामरसायन। (२५) प्रमुदित बर दीनों वरुण, हनुमन्तहि सुखदाय॥ जलते अरु मम पाशसे, रहे अवध्य सदाय ॥४५॥ यम बोले हरपाय नित, निरुज रहै वलवन्त ॥ पुनि अवध्य मम दण्डते, विचरै सकल दिगन्त ॥४६॥ हनुमन्तहि पुनि विशद वर, दीनो मुदित कुबेर । चण्ड गदाते अमर कै, कपि विचरै चहुँ फेर ॥४७॥ हैं त्रिशूल आदिक विविध, जो मम शस्त्र सुझारि ॥ तिन सब ते कपि अमर यों, वर दीनो त्रिपुरारि॥४८॥ कहो विश्वकर्मा हरपि, मम कृत जिते हथ्यार॥ अमर होय तिन सबनिते, सन्तत पवनकुमार ।। ४९ ॥ वर विरंचि दीनो हरपि, ब्रह्मदंड सव जोय ॥ हनूमान तिनते सदा, अवशि अवध्य सुहोय ॥५०॥ पुनि विधि वोले मरुत प्रति, हो तव पुत्र अजेय ।। चिरजीवी बलवंत शुचि, रहै सदा मति श्रेय ।। ५१ ।। मित्रपाल होवे अमित, कामरूप रिपु शाल ।। वर विलोकगामी प्रवल, पूज्य अंजनी लाल ॥५२॥ याविधि सुरवर दै कपिहि, गये सु निज निज धाम ॥ वन विचरत निशंक नित,पवनपुत्र अभिराम ॥५३॥ चौपाई-देवरदान गये सुरजवते प्रतिदिन बढ़े तेज वल तवते ।। हनूमान निज इच्छाचारी विचरत चहुँ नित विपिन मझारी५४ कपि चंचल पुनिवालनिशंका वर प्रभाव अतुलित बलबका ।। जाय नित्य शिशु केलि कराही सो लखि वनचर अपर डराही ५५ तरु उखारिनभ ओर चलाधरि इलाय गिरि शिखर ढहावै ॥ कूर्दै किलकि चढ़े दुम जाई मंथै सर सरिता जल धाई ॥५६॥ जाय मुनिनके आश्रम माही . लैवल्कल मृगचर्म पराही ॥ काहू परन कुटी झकझोरं काहू नीर पात्र गहि टॉर ॥२७॥ काढूकी पादुका बहावे काहके फल फूल नशा ।। जो कोऊ पि रंचहु डा ती तिहि चाय कोप करि कार्ट२८ (२६) रामरसायन। भय वश हैं सबै चुप साधी पवनसुवन नित करें उपाधी॥ भये विकलपिगण वनवासी भृगु अंगिरा आदि तपरासी॥१९॥ ते त्रिकालदर्शी मुनि ज्ञानी * ज्ञान दृष्टि कपिवर गति जानी॥ रहे मष्ट कछु दिवस बहोरी ॐ हनूमान निज वानि न छोरी ६०॥ सबही भयेविकल अतिजवहीं दीनों शाप क्रोध कार तवहीं ॥ पवनपुत्र बल विस्मृत रहई * संतत सरल चित्त निरवहई॥६॥ जब कोऊ बल सुरति करावै तबहिं वीरता कपि तनु आवै॥ इमि शापित है पवनकुमारा भूले निज वल सकल अपारा ६२॥ शांत रूप विचरै वन माहीं कबौं न कछु मुनि विघ्न कराँही॥ इहि विधि सप्त वर्ष वय बीती ॐ रहत सदा शाखामृग रीती ॥६३॥ अष्टम वर्ष प्रवेश विचारी बोले पवन समय अनुहारी॥ जाहु पुत्र दिनकरके पासा 8 करौ सकल विद्या अभ्यासा॥६४॥ तुम्हैं जबहिं सब सुरवर दीना तबहीं यह दिनेश प्रण कीना ॥ हम वर विद्या सकल पढ़ेहैं * वेद शास्त्र गुण विविध सिखैहैं ६५ सुनि पितु वचन मौन हनुमाना सो लखि पवन आचरज माना । बोले मरुत सुवैन बहोरी जान्यौ बाल केलि मत भोरी६६॥ पुत्र सु बाल बुद्धि परिहरहू * विक्रम बल विद्या उर धरह ॥ यदपि देव वर विदित प्रभावा बालकेलि कल्पित तुम पावा ६७॥ तदपि परम उत्तम यह बाता रवि ढिग जाहु पढ़न हित ताता॥ लै मम सुत मोसम बलवाना *रवि ढिग गमन सुनत चुपठाना६८ केलि कलोल वीरता करहू * रवि तम गज गहिवे नभ चरहू॥ विद्या पढन हेतु हरि पासा जात होत हिय अधिक हिरासा६९ सुनि पितु वचन वीरता वाढ़ी ॐ भई पुच्छ रोमावलि ठाढ़ी ॥ नभ दिशि देखि हर्पि हनुमाना तमकि गगन कूदेवलवाना७०॥ परे जाय उदयाचल वंका तेज पुंज कपि निपट निशंका।। औचक देखि दिनेश डराने ॐ पुनिधरि धीर भानु पहिचाने७१ धाय गहे रविपद् हनुमंता दिनमणिआशिप दीन अनंता॥ कर जोर केशरी वारे * मृदुल नम्र वर वचन उचारे७२ रामरसायन। (२७) तु सिखदै प्रभु पास पठायो गुरुपद रज सेवन में आयो॥ खि सेवक हरि कृपा करीजे विद्यादान मुदित मुहिं दीजे७३ नि कपि वचन प्रसन्न तमारी एवमस्तु पर गिरा उचारी।। गपति बोले वचन बहोरी पवनपुत्र तव वय अतिथोरी७४ म रथ कबहुँ रहत थिर नाही अमित वेग वर वाजि चलाहीं॥ लत संग अतिही श्रम पैही 8 किहि विधि विद्याचितदेहो७५ घनाक्षरी कवित्त । नाम क्रोध लोभ मोह विवश प्रमादी मूढ़ संतत दरिद्री दुःखी मत्त द भावहै ।।मानी अभिमानी व्यग्रचंचल अयान अतिकृपण कुसंगी जोच सकुच रहावैहै। आलसी अभागी अनचाही अनाचारी बहु स- ज अनौसरी अधीर अकुलावैहै । रसिकविहारी भनै भानु हनुमान नौ येतनको पूरी वर विद्या नाहिं आवैहै ।। ७६॥ सो०-भानु वचन सुनि वीर, नाय शीश कर जोरि दुहुँ । बोले हरपि सुधार, नाथ कही सो सत्य सव ।। ७७।। मो लघुमति अनुसार, मैं निज हिय दृढ़ कीन यह ॥ गुरुकी कृपा अपार, अगम होय सो सुगम अति ॥७८॥ मोहिं दास हढ़ जानि, नाथ साथ निज लीजिये। वर विद्या शुभ दानि, कृपा दृष्टि करि दीजिये ॥ ७९ ॥ यौंही बहु वतरात, वात जात अति दूरलौं । पिछले पगन चलात, गगन गये रवि संगही ॥ ८० ॥ सो गति देखि दिनेश, कृपा सहित अति मुदितह ।। करन लगे उपदेश, वेद शास्त्र विद्या विशद ।। ८१ ॥ रवि रथ आगे वीर, चलत पाटिले पगनते ॥ विद्या पढ़ी सुधीर, स्वल्प दिवसमें पवन सुत ॥ ८२॥ सामादिक चहुँ वेद, व्याकरणादिकशास्त्र पट ।। संयुतं सकल विभेद, पटि रविते कपि निपुणभे ।। ८३ ।। विद्या विशद अनूप, तेज धाम कपिको दई ।। सुमति तेज बलरूप, लखि सब देव सराहही ।। ८॥

(२८). रामरसायन। MAH पुनि आदित्य दयाल, कह्यो जाहु कपि निज भवन ।। वर विद्या सबकाल, अनभ्यास जनि राखियो । ८५॥ गुरु आयसु धरि माथ, चरण वंदि बुधिमंत कपि ।। कही जोरि युग हाथ, नीत प्रीत संकोच युत ॥ ८६॥ दोहा-नाथ कृपा करि मुहि दई, विद्या विमल अपार ॥ गुरुतें उरण तौन जो, सेवौं जन्म हजार ॥ ८७॥ पैमर्याद प्रमाण यह, प्रभुहि विदित सब सोय ॥ विन दीने गुरु दक्षिणा, विद्या सफल न होय ॥ ८८ ॥ याते प्रभु करिकै कृपा, यथाशक्ति अनुमान ।। लीजे कछु गुरु दक्षिणा, मुहि निज सेवक जान ॥ ८९ ॥ पवनपुत्रके वचन सुनि, बोले तेज निकेत ।। सत्य धर्म मर्याद यह, भापी सुमति सचेत ॥९॥ निरखि शक्ति तुव पवनसुत, हम जो करहिं रजाय ।। देहु वही गुरुदक्षिणा, मम हिय अति हुलसाय ॥ ९१॥ अंशुमान हनुमान प्रति, भाषो सहित सनेह ।। वीर धीर गुरु दक्षिणा, प्रीति सहित यह देह ॥ ९२ ॥ घनाक्षरी कवित्त। दुष्ट दल दंडिवेको रहियो उदंड चंड मंडितद्वै कीजो वल खंडित सुरारीको ॥ सकल दराज साज साज राम काज काज संयुत समाज सुख दीजो धनुधारीको ।। तुम हनुमान बलवान वर बुद्धिमान हुजो अनुरक्त भक्त जक्त रखवारीको ॥ देश परदेशमें हमेश सब भांति घनो राखियो आनंद सदा रसिकविहारीको ॥ ९३॥ चौ०-यौं कहि पुनि बोले दिनराई परम प्रीति संयुत हुलसाई ॥ यह रजाय दृढ गही हमारी येही गुरु दक्षिणा तिहारी ॥९॥ सुनि गुरुआयसु कपि गुणवंता दृढ करि हिय धरि लई तुरंता ॥ निरखि दिवाकर कपि धुरधर्मा प्रमुदित वर दयो सुपर्मा।। ९५ फलित होय विद्या तुव कीशा पूरण कृपा करें जगदीशा ॥ जे जन तुब सेवा चित ला ते सब निज इच्छित फल पाव९६ रामरसायन। (२९) यो कहि कपि शिरपर कर फेरो कृपा सहित सिखदै बहुतेरो॥ विदा किये हनुमंतहि ईशा चलेहरपि गुरुपद धरि शीशा९७ कूदि कुधर अस्ताचल पाही नम मारगहकै छिन माहीं॥ आय दुहूँ पद माथ नवायो पितुजननी सुतलखि सुख पायो विचरत सुख युत इच्छाचारी ॐ तिहूँ लोक मुद मंगल कारी। रामचंद्र दरशनकी आसा * लागिरही गुरु वचा विश्वासा९९॥ गुरुसिख हिय धरि अंजनिलाला रसिकविहारी पाल कृपाला ।। इमि हनुमंत जन्म गुण गाथा वर्णि यथाश्रुतभयो सनाथा१०० अब हनुमंत जन्म तिथि मासा है प्रमाण पूरख जो खासा ॥ उत्सव सिंधु ग्रंथके माँही है सो लिखौं सत्य इहि ठाँही१०१ म० ॥ उत्सवसिंधी। ऊर्जस्यचासितेपक्षेस्वात्यांभौमेकपीश्वरः॥ मेपलग्नेञ्जनागर्भाच्छिवःप्रादुरभूत्स्वयम् ॥ १॥ दोहा-लिखो हनूमत जन्मको, है इतिहास पुरान ।। चैत मास पूनौ तहांसोऊ वाक्य प्रमान ।। १०२।। कल्पभेदसों जानिये, यामें कछू न फेर ।। वर्तमानके कल्पको, निश्चय यही निवेर ॥ १०३॥ उत्सवसिंधु सुग्रंथ अरु, वाल्मीकि ये दोउ ॥ होत एकता वुद्धिते, लखौ सुबुध सब कोउ ॥ १०४॥ वाल्मीकिमें है सुकछु, लिखों इहां लखि लेहु ॥ शब्द अर्थ भावार्थतें, निश्चय सकल फरेहु ।। १०५॥ म. ॥ वाल्मीकोपे। उत्तरकाण्डे ॥ सर्ग ॥ ३५॥ शालिशुकनिभाभासंपामतेमंतदांजना ॥ फलान्याहतुकामानि कांतागहनेवरा ॥२॥ एपमातुर्वियोगाचक्षुधयाचभृशार्दितः ।। रुरो- दशिशुरत्यर्थशिशुःशखणेयथा ॥३॥ ततोयंत विवस्वंतंजपापुप्पोत्क रोपमम् ।। ददर्शफललोभाचात्पपातरविंप्रति ॥2॥ बालाकाभिमुखो वालोवालाकइवमूर्तिमान् ।। गृहीतुकामावालाकैप्शवनेंबरमध्यगः॥५॥ यमेवदिवसीपगृहतिभास्करप्लुतः। तमेवदिवसंगनिवृक्षतिदिवाक- रम् ।।६॥ इत्यादि।

(३०) रामरसायन। दोहा-जो पूरणिमा कहिय तो, सूरज ग्रहण न होय ।। याते हनुमत जन्म तिथि, असित चतुर्दशि सोय ॥१०॥ पुनि स्वाती नक्षत्र सो, ज्योतिप गणित प्रमान ॥ आवै कातिक कृष्ण तिथि, इमि चतुर्दशी जान १०७॥ इति श्री०रा०र०वि०वि० हनुमन्जन्मवर्णनोनाम तृतीयोविभागः ॥३॥ चौ-अव वर्णों सो सकल प्रसंगा राम जन्म रस रंग उमंगा ॥ जिहि उत्सव हित सुर मुनिझारी अमित दिवस आशा उरधारी ॥ अवधपाल दशरथ नृप रानी कौशल्यादि .तिहूँ सुखदानी ॥ जबते भई सगर्भ अनूपा 8 तवते प्रतिदिन बढ़त सुरूपा २॥ पुरवासी सब मगन अपारा घर घर होत. मंगलाचारा ॥ सुख संपति निशिदिन अधिकाई राजमहल शोभा सरसाई ॥३॥ राम जन्म औसर नियरायो तिहूँ लोक आनंद उमगायों ।। लंका त्यागि और सब काहू जड चेतन तनु भरो उछाहू ॥ ४॥ घनाक्षरी कवित्त। और ठौर मंजुल रसाल और और फूले तरुण भयेहैं नव पल्लव लहे लहे ॥ मुदित मलिंद डोले निर्तत मयूर चारु करै कमनीय कीर कोकिल कह कहे ॥ रसिकविहारी सुखकारीहै तयारी सब देव नर नारी भारी आनँद डह डहे । औसर विलोकि राम जन्म को त्रिलोक चहूँ आपहीते होन लागे मंगल गह गहे ॥५॥ राम : सुखके निरंतर विलोकिको आनंद सुमिर देव हृदय उमाहहैं ।। पछितायें रहिजायँ अकुलायँ फेरि वार वार अवध निवासिन सराहहैं ॥ रसिकविहारी आयो औसर आनंदकारी सब सुर झारी भारी भरत उछाहैहैं ॥ विधि विधिताई त्यागि वामदेव भयो चाह शंभुतजि शंभुता वशिष्टहोनचाहिहैं ।।६।।

रामरसायन।
(३१)
दोहा-राम जन्मते प्रथमहीं, लीनी विरचि विरंचि ॥
चहूँ बंधुकी पत्रिका, धरि राखी अति संचि ॥ ७ ॥
सो चतुरानन समय लखि, शेष रहे दिन तीन ।
चारु चारिहूं कुंडली, सुरगुरुके कर दीन ॥ ८॥
कही विधाता देव गुरु, ये पनी सुखदाय॥
शुभ दिन आज वशिष्ठको, देहु अवधपुर जाय ॥ ९॥
सुर मंत्री सुनि मुदित है, चले अवध चित लीन ।
वेगि आय वर पत्रिका, चहूं वशिष्ठहि दीन ।॥ १० ॥
पितु विरचित लखि कुंडली, अति वशिष्ठ हुलसाय ।।
सुर गुरु संयुत वेगहीं, अविलोकत चितलाय ॥ ११॥
कुंडलीवर्णन-घनाक्षरी कवित्त ।
चैत सित नौमी सोम नपत पुनर्वसू है शूल योग, कौलव करण
शुभकारीहै ।। कर्कहै लगन तहां सोहें गुरु चंद्र दोऊ शनि तुलाके
धन केतु रिपुहारीहै ।। भौम, मकर मीन कक मेप भानु देख मि-
थुन पहें बुध साथ तम भारीहै ॥ रसिकविहारी राम कुंडली
अनूप ऐसी विशद विचित्र या विधाता निरधारीहै ॥ १२॥
दोहा-भरत जन्म ग्रह रामतें, ध्रुव न्यारे ध्रुव एक ।।
यह विभेद सो जानिहैं, जिनके विमल विवेक ||१३
चैत शुक्ल दशमी नखत, पुप्य भौम दिन जान ।।
गंड योग तैतिल करण, भरत सुजन्म प्रमान ॥१४॥
राम धर्म सो भरत तन, खेचर एक समस्त।
भरत कुंडली कल कलित,विधि इमि लिखी प्रसस्त१५॥
पुनि लछमन रिपुदमनको, जन्म येकही संग ।।
याते एकहि लग्न ग्रह, एक पांचहू अंग ॥१६॥
चैत शुक एकादशी, अलेपा बुधवार ।।
वृद्धियोग गर करणमें, दुहू जन्म निरधार ॥ १७॥
लपण शबदन लग ग्रह, राम सरिस सब टान॥
चहूं कुंडली याहि विधि, विधि विरचित शुभ दान ॥१८॥

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रामरसायन। (३३) औचक उजास विकास विमल प्रकाश दश दिग आसभो। तिहुँ भास भो महि खासभो अहिवासभो आकाशभो ॥२२॥ तिहि देखि शेप महेश अरु अमरेश अति चित चकितमे ॥ सब देश सहित नरेश भेस दिनेशकै थिर थकितभे ॥ नहि शेप कहुँ तम लेश सकल कलेश गो असुरेशमें ॥ रसिकेश रूप रमेश मोद प्रवेशभो अबधेशमें ॥ २३ ॥ पुनि सवहि जानो हर्प मानो राम रूप प्रकाशभो ॥ जै जैति अवध किशोर शोर त्रिलोक सहित हुलासभो ।। नभ जायः देव वजाय दुंदुभि सुमन झरि बहु लावहीं ।। पुनि आय कौशल नगर लखि सुखदाय आनंद पावहीं ॥२४॥ गंधर्व किन्नर करहिं गान सु अप्सरा गण नाचहीं॥ सव अंग पूर उमंग ढंग अभंग रंग सुराचहीं॥ सुत मुख विलोकत कौशलाके हीय सुख न समात है। मानहु निहारि मयंक पूरण सिंधु अति उमगातहै ॥ २५॥ नृप नारि सब सानंद अति मुख चंद लखि रघुवंदको । मणि वसन भूपण वारि परसहि अंग सुत सुख कंदको ।। दासी जुखासी दासि दासी तेउ सुवन निहारिक ॥ पावं सु औरहु वार डारें वित्त वित्त विसारकै ॥ २६॥ तिहि समय दशरथ राज हियको अमित सुख को कहि सके । है अकथ वरनन न जाहि वरनत शारदा रमना थर्क। जिहि भाग्य प्रभुता हेरि लघु लागत विभव सुरगजको । तिहुँ लोक पति भी पुत्र सो महाराज सम है आजको ॥२७॥ सब अवधवासी सुतरासी हिय हुलामी धांवहीं ॥ आनन्द भरि भरि दान करि करि अमित वित्त लुटावहीं । प्रति सदन शोभित देमकुम्भ पताक बन्दनवार है ।। घर नारि गावहिं सोहि ले यदु होत मंगलवार ।। २८ ।। यदु भोर भागे भूप द्वार सुले गैंडार अपार है ॥ जन देत दान यथेच्छ रेन न देत सफल उदादि ।।

रामरसायन) चहुँ नृत्य गान अनूप अगणित वाजने बहु बाजहीं ॥ छायो सु दुंदुभि शोर मानहुँ घोर धन धन गाजहीं ॥२९॥ आनंद परमानंदके मधि और महदानंद भो ॥ सुत तीन प्रगटे बहुरि रघुवर वधुवर निरद्वंदभो ॥ है एक राम समान श्याम जु दोय और सुरूपहैं॥ तनु तेज शोभा सरस चारहु सुवनपरम अनूप ॥ ३०॥ सुललाम सब सुखधाम शोभित कौशला सुत रामहैं । छवि मन हरत बहु भरत कैकेयी सुवन अभिरामहैं । पुत्र लछमन शत्रुहन सुठिहैं सुमित्राके भले ॥ कल्पलतिकामे यथोचित सरस फूल मानहु फुले ॥३१॥ चहुँ वाल सुंदर तदपि सवते सरस शोभा रामकी ॥ जिहि निरखि लागत चंद मंद लाग छबि शत कामकी ॥ सुनि जन्म उत्सव अवध आवे देव दशरथ द्वारपै ॥ अति होत मोद विनोद भारी भीर भूप अगारपै ॥ ३२ ॥ घनाक्षरी कवित्त । प्रगटे अनूप पुत्र चारि अवधेश जूके जैजैकार जोर चहुँ ओर सोरहै उतंकु ॥ भारी भीर भूप द्वार भवन भंडार खुले दान भो अपार कोऊ जगमें रहो न रंकु ॥ दिवस भयो सो येक मासको अभूत हेरि रसिक विहारी गुणी गणक गहें अंकु ॥ रंचहु न पा भेद अधिक अचंभा जानि हेरि हेरि भानु फेरि फेरि कै मिला संकु ॥३३॥ दोहा-भयो अमित आनंद चहुँ, प्रगटे चारि कुमार ॥ किये विधान अनेक वर, लोक वेद अनुसार ॥ ३४॥ छठी दिवस उत्सव महा, भयो यथोचित जान ।। भूप भवन रनिवास मधि, अति अनंद उमगान ।। ३५।। सो०-अमित नारि नर बूंद, साजि साजि वर साजबहु॥ आयहि अतिसानंद, राम बधाई हित हरपि ॥ ३६॥ पनाक्षरी कविता नीर भरे विशद विचित्र कुंभ कंचनके शोभित सपल्लव सदीप शीशधारद । थार बर वानिक जड़ाऊ मणि माणिकके लीने सान

रामरसायन।
(३५)
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मंगल जे पूरित सँवारेहैं ।। रसिकविहारी सुख दैनी गुणऐनी तीय
नख शिख अंग शुचि सफल सिंगारेहैं । मंजु मृगनेनी पिकवनी कल
गान कीने वृंद वृंद आवें नित कौशिलाके द्वारे ॥३७॥
दोहा-इमि एकादश दिवस जव, बीते सहित हुलास ॥
नामकरन हित सफल जन, जुरे आय रनिवास ।। ३८ ॥
तब वशिष्ट शुभ समय लखि, भूपति रुचि अनुसार ॥
अर्थ सहित चहुँ सुतनके, कीने नाम उचार ॥३९॥
वहुरि चारिहू सुतनके, विधि विरचित ग्रह जोय ॥
सविधि पुजाय नृपाल युत, सबहि सुनाये सोय॥४०॥
ग्रह फल सुनि प्रमुदित नृपति, सहित सफल रनिवास ॥
दोऊ गुरु द्विज वृंद युत, पूजे सहित हुलास ॥११॥
पुनि आनंद उछाह अति, दान मान बहु कीन ।
पाय एकते एकसो, अपर एक इक दीन ।। ४२॥
सो-जैसो दान अपार, देत नृपति सुत जन्म सुख ॥
ताहूत अधिकार, होत सकल निवास नित ॥१३॥
इत नृप उत नृप नारि, पुर परिजन सेवक सखा।
निज निज वित्त विमारि, करतं दान नव मानयुत ४४
नृपदशरथ मजिसाज, करी सभा आनंदमय ।।
गजें सकल समाज, यथा उचित मर्यादयुत ॥ १५॥
देश देशके भूप, आये रघुवर जन्म सुनि ।।
सब महिं मुठि रूप, अवधनाथ दरवार विच ।।१६।।
पनातरी कविता
काशलाधिराज सो मदित समाज साज गंजे द्विजगन दाऊ
विधिले मदेशते । मंत्री वसुन देश देश नरेश नहुँ टखत निदेश
देशशोभित सुरेशने । रसिकाविहान धना धनेश को
शेष रोप तोप कारक जलेशने ॥ दशागज मदागजी मुनाने
भूप भाजन नेश गनेशने दिनभने ॥१७॥

(३६)
रामरसायना
सो o-या विधि अवध नरेश, विशद सभा बैठे रुचिर ॥
राजत मनहुँ रमेश, देवमंडली मध्यमें ॥४८॥
नृत्य गान रसरंग, होत कुतूहल विविध बहु ॥
सब उरभरे उमंग, राम जन्म आनन्द अति ।। ४९ ।।
ताही छिन तहँ आय, द्वारपाल कीनी विनय ॥
सादर शीश नवाय, महाराज अवधेशसों ॥५०॥
राजराज महाराज, विविध अपूरव कौतुकी ।।
सुनि प्रभु सुयश दराज, आये उत्तरदेशते ॥५१॥
जो तिन होय रजाय, तौ इत सकल सुआवहीं ।।
राज दरश वर पाय, निज इच्छित फल सोलहैं ६२॥
द्वारपालके बैन, सुनि भूपति आज्ञा दई ॥
आवें सब गुणऐन, दरशा निज निज कला॥५३॥
द्वारपाल हरपाय, शीश नाय तहँ जाय तिन ॥
दीनी मुदित रजाय, आये भूपति निकट सब ॥५४॥
घनाक्षरी कवित्त ।
कोऊ बालरूप वर विमल अनूप अति कोऊ बहु वृद्ध सिद्ध तेज
तनु छायेहैं ॥ कोऊ हैं किशोर कोऊ तरुण सजोर कोऊ वसनविहीन
कोऊ भूपण सजायेहैं ॥ कोऊ झुकि झूमैं कोऊ गिरि गिरि भूमै उठे
कोऊ व्यंग्य वोलें कोऊ नृत्य गीत लायेहैं ॥ रसिकविहारी हेरि
कौतुकी अनोखे चोखे सहित समाज राज मंद मुसक्यायेहैं ॥ ५५॥
दोहा-लखि भूपहि मुद जैति कहि, सो कौतुकी सुजान ॥
करन लगे लीला रुचिर, तनु धरि विविध विधान ॥५६॥
अथ कौतुक-शंभु । घनाक्षरी कवित्त ।
आयो एक अंबरके मारग दिगंबर है गावत सुटंग रंग छाबत
गत ॥ कबहुं दिखाँव पंच आननः दुरावै कयौं तीय बनिजावे
पंगा नटानते ॥ रसिकविहारी क्यों खडग त्रिशूल धारी बीर
भुजा फेरत पटानते ॥ कवी प्रगटा भाल ज्वाल दरशांव
व्याल का वारिधारा शुभ छोड़तजटानतें ॥२७॥

रामरसायन। (३७) वीरभद्र। वीर वनिआयो एक कौतुकी नरेश दिग कयौ महाराज राज भवन पधारिये॥ रसिकविहारी सुखकारी साज साजे गेह रावरेहीहेत कीनी सकल तयारिये।अिशन धतूर आदि।भूर भांति भांतिनके सरशअभंग भंग नीर मद करिये ।। वृश्चिक विपारे कारे नाग फन बोर बहु देहों यह 'भेटे मेरे संग जो सिधारिये ॥ १८ ॥ बझा। ताहि छिन दूजो द्विज रूप धरि बोलो वेगि आयो दूरी तेही सुनि सुयश प्रतापको ।। वृद्धहों घनेरो पीत केश ममहेरो भूप रसिकविहारी नित्य कारी वेद जापको ।। देखौं आठ नैनते सुनौं में आठ श्रीननतें ताहू पे न पायो भेद बूझौं तब आपको ॥ औरनके एक मुख मेरे क्यों बनाये चार दीजिये वताय का विगारो विधि बापको ॥२९॥ यमधर्मराज। एक वर कौतुकी सुकीनी है अनूपकला उछलि महोत नभ मंडल समायगो॥ लकै संग अमित अनेक जीव जंगमको वेगहि तड़ाक पुनि ताहि ठाम आयगो ॥ देखत सभाके ते सु देव भये जंतु सब आप कराल रूप बहुरि दुरायगो॥ रसिकविहारी फेरि धरिक सु देश वेश वनिकै नरेश अवधेशहि रिझायगो ॥६॥ सनकादिफ-सर्वया । आय अनाचक बीच सभा वर बालक चार सुनाचन लागे । नाचतही तिय रूप भये चहुँ चंचल चारु सु जोवन पागे । फेरि पिलोकतहीं शिशुह मचले पुनि हसबने उड़ि भागे ।। देखतही रामकेश नरेश महाअनुराग आनंदमें पागे ॥ ६ ॥ गणेश-पित। एक आय बोलो मेरे गेदके चरित्र भूप मुत्य मुनि पै दाना कद्दत डरातहीं॥ वापद भिखारी मम माता मतवारी पनि भ्राता कोषकारी तिद्वं शोचमें रहातहों ॥ रसिकरिहारी मदागन बात भाग और (३८) रामरसायन। रावरे समीप सोऊ भापत लजातहीं। माई सेर भाईहु उसेर पितु पांच सेर आपहीमें थोरो नित्य मन भर सातहीं॥ १२॥ पद पदन। स्वाँगी एक आय घबरायकै पुकारोधाय धर्मराज तोऊ ऐसो कलह सचोरई ॥ धात्र मात वाहन रिसाय तात वाहन पै त्यादी मात वाहन 4 तातहू खचोर है ।। वाहन हमारो झहराय पितु भूपण भूपण पिताको बंधु वाह पैत चोरहै ॥ रसिकाविहारी नृप कीजिये निसाफ आप मेरे घर नित्य यह झगरो मचोरहे ॥ १३॥ नारदा एक कछु बोल ढोल देके भूप भीन बीच ओट करि बेगे कल्पाका रचि दानाह। रंचक दुरायचिंतामणिको बनायो मेरु रसिकपिलारी गुणी परम प्रवीनाद ।। हरित तुरंग ओ मतंग गटारो सेत फेरो निनरूप फेरि परत न नीना । निरखि अनोले खेल नोपरितो- पे नृप नीको इंद्र जाली इंद्रजाल जाल कीनाद॥ ६॥ बोलो येक आय वात मुनिये अमघराय अनुनित आय पानी ही मुनि नागनी ।। जोई नव नागे तुम तातकी गुनाग ताल नातही नागनास तात तात नागमा । फेरि तुम नागा पुराती गुनागे पुः पुरी मुनानी न पुन पुत्र नारीसो॥ सिहमाग गुमा पाशिनागमागायुग कोटि नमशान पनाग माइनिन । गरीका Hinामानि या नमाम य॥ दारा दीनी ग्लाय मानाय॥ ६॥ vिil HERE नि रामरसायन। (३९) सुनि सकल कौतुकी हर्प पाय। बोले सुजैति जै · अवधराय ॥ तुव पुत्र चारि प्रगटे अनूप । हम सबहिं चहें तिन दरश भूप।।७०॥ नृप रूप प्रेम कौतुकिन केर । लखि कह्यो गुरुहि करजोरि हेर॥ इन यथायोग लै सवहिं साथ । दीजे दिखाय चहुँ सुवन नाथ ॥७॥ सुनिकै वसिष्ट ले सबहिं संग । वर उचित रीति संयुत सुढंग ॥ छविधाम चारहु सुत ललाम । दरशाय दये हिय भरि सुठाम ॥७२॥ सो सकल कौतुकिन हेरिवाल । किलक चलाय कर चरण लाल ॥ स्वाँगीसुदेखिशोभित स्वरूप । हिय लई धारि वह छविअनूप।।७३|| आनंद मगन बैंकै अपार । कीनी सु देव वाणी उचार ॥ कहि जति जैति कौतुकिय बंद । गवने सु गेह जित तित मुछंद ॥७४॥ इमि राम जन्म उत्सव अभंग । चहुँ होत अवधपुर राग रंग ॥ नट भाट नर्तकी गणअपार । वर विविध कौतुकी झुंडझार ॥ ७ ॥ द्विज वृंद और याचक अनेक । गुण मंत्र एकते अधिक एक ॥ नित आय आय अवधेश द्वार । निज निज कलान ठाने प्रचार||७|| ते सवहि यथोचित दान मान । लहि होत हीय आनँद महान ॥ लखि नृपति दान प्रतिदिनसुरेश । सकुचात डरत संयुत धनेश।।७७॥ दोहा-अवध नृपतिके दानको, कछू न पारावार ।। शेपहु भापि सकैन जो, वरण युगन हजार ॥ ७८॥ ५० करित। दीने अवधेश ते गयंदनके भार भूमि बार वार झूमै शीशशेप- के छिलतहें ।। रसिकविहारी दान सुनिकै त्रिकूट कूट कंचन रजत मेरु शंकते हिलतहें ।। संकलप नीर भई सरिता गंभीर बहु जिनके प्रवाहना पयोधि पै झिलत, ।। खोजेहु अखंड नवखंड महि मंडल में एकहु न पुंगीफल तंदुल मिलतहैं ॥ ७९ ॥ अंबरते अंबर दिगंवर वरवरभो भूपणकी भूपण रहाहै भूपणनको ॥ मानको नमान मानको नमान मान देखि सूखनते रूखन मिटो- है रुखननको ॥ रसिकविहारी भये रसिकाविहारी सर्व दृपन विपन भयो दूपननको ॥ दशरथ दानके निदानको निदान यही पनते पूपन जनात पूपननको ।। ८०॥

(४०) रामरसायन। । " दोहा-याहीविधि नितहोत बहु, दान विधान अपार ॥ लोक वेद कुलरीति मय, सकल मंगलाचार ॥ ८१ ॥ राम दरश हित आवहीं, सुर नर नाग अपार ।। अवध निवासी रूप धरि, सेवत विविध प्रकार ॥ ८२ ।। पुर परिजन सेवक सखा, सुर नर सब रतधर्म ॥ कुशल हेतु चहुँ बंधुकी, संतत करत सुकर्म ॥ ८३॥ यौंही अति आनंदमें, पगे सकल पुर लोग ।। कहत मुदित अब सफलभो, नेम धर्म जप योग ॥ ८४ ॥ मुदित अयुध्यानगरके, वासी परम सुजान ।। वर्णत चारह बंधुके, गुणगण रुचि अनुमान ॥ ८५ ॥ घनाक्षरी कवित्त । अगम सनेह सिंधु उमगो विलोकि जाहि सजन चकोरनके हीय सुख है गयो।रानी अनुमेदिनी कुमोदिनी विकासी मंजुभूपउरभूमिमें प्रकाशतिहीं छयो ।। रसिकविहारी पाप तापतमटारी लोक शोक हर शीतकर शीत करते दयो।पूरण कलाको शुद्ध प्राची दिशि कौशिलाते स्वच्छ रामचंद्र चारु चंद्रमा उदै भयो । ८६॥ मंजुल मृणाली मृदु कोशलादि रानी शुभ्र जिनते प्रगटि रूप अनुपम भासेहैं ।लोचन विशाल पत्र कोस हिय मध्य भूरि पूरित पराग कृपा विमल विलासे- है। रंसिकविहारी भूप धर्म रवि तेज फूले फैली जस गांधि भक्त भ्र- मर हुलासेंहैं। अवध तडाग भरो सलिल सनेहतामें राजपुत्र चारु चारिकमल विकासेहैं।। ८७॥ दोहा-इहि विधि पुरवासी सकल, नाम रूप गुण गान॥ फरत चारहूं बंधुके, धन्य जन्म निज जान ॥ ८८॥ अवध वामिनी सफल तिय, नित प्रति हिय हुलसाय ॥ बार वार नहुँ बंधुको, लखें जाय दुलराय ॥ ८९॥ पनासंग पश्चि। आग्नी उनार को गई नोनवार कोऊनीर फोरिडॉर कोऊमंत्र- नते शाह कोड दुलगा मलग हलगों को चुटकी बनाव की. .

रामरसायन। (४१) ऊ देति करतौर हैं ॥ रसिकविहारी भरी परमप्रमोद नारी सहित वि- नोद गोद लैकै चुचुकारेहैं ।। आय आय आनंद उमाय चित: चाय चाय धाय धाय जाय चहुँ वालक निहारेहैं ॥ ९ ॥ दोहा-सकल मातु अवधेश युत, पुर परिजन समुदाय ॥ निरखत चारह वंधुकी, वालकेलि सुख पाय ॥९१॥ घनाक्षरी-कवित्त । छोटे पद पाणि लाल छोटी आंगुरीहु लाल छोटे नख लाल छो- टी रेपा लाल लालहैं । कलित कपोल लाल लोचन ललित लाल अधर अनूप लाल लाल मुख लालहैं।।लाल लाल भूपण बसन तन लाल लाल रसिक विहारी सव साज भौन लालहैं । लाल पालनामें लाल फूलनकी सेज लाल खेलैं नृपलाल लै खिलौना लाल लाल हैं ।। ९२ ।। झुलै माण मोतिनके झुमका विशाल तिनैं हेरै टकलाय हँस फेरि हेरि फूलहैं ।। फूलें हैं विलोकि बाल चहुँ दिशि जो पुनि हो अंधीर रोवें सब सुधि भलेहैं।। भूलेंहैं रुदन जब मातु पय प्यावे तब बहुरि आनंद द्वै कलोलनमें तूलैहैं । तुलह न या सुखपे कोटि ब्रह्मलोक सुख रसिकविहारी लाल पालने सुझुलहैं ॥ ९३ ॥ कौशिला मु कैकयी सुमित्रा आदि रानी सबै एकनते बालन लै एकन झिलावती ॥ कोऊ ले उछंग दुलरावती उमंग रंग कोऊ चूमि चूमि मुख मुखसों मिलावती ॥ रसिकविहारी मन मुदित हँसावती हैं अंगुरी ते कलित कपोलन हिलावती ॥ भूपन वसन धन बारिकै लुटावर्ती हैं हिय हुलसावती यो सुतन खिलावती॥९॥ रसिकविहारी प्यार कार करि राम मात वार बार झंगुली नवीन पहिराव है। कबहुं गुलावी आवी धानी आसमानी का कहूं गुलाली ओ जंगाली सरसावहै ।। कवहूं सुरंग श्वेत नारंगी बदामी श्याम कबहुं हरित पीत नील छवि छावहै ।। मानो ऋतु पावसमें सजल पयोद श्याम संध्या समै अमित सुरूप दरशाह ।। ९५ ।। चित्रित कपोल कल कजल विलोकि हठि कौशिला दरपि दीय मुत मुख धोयोहे ॥ता टिनको शोभा मंजु वरणी नजाय माप गमिक- (४२) रामरसायन। बिहारी जो अनूप रूप जोयो है ।। श्याम जल खूर्दै पीत रंगके झंगापै परी तापे लसो वधना विचित्र गुन पोयो है । मानों नीलगिरिपै विधायकै वघंबर सो अंबर विहाय वालचंद आय सोयो है।।९६॥ कवौं अति रोवें कवौं निपट अधीर हो कवौं नहीं सोवें टकलायकै निहारैहैं ।। कयौं नाहि छीनै मातु अंचल नपी पय अंकमें रहैं ना पानि पद झझकार हैं। सुतहि विलोकि जिय जननी विहाल है बांधैं जंत्र तंत्र करि राई नोन वारहैं ॥ रंसिकविहारी होय मुदित घनेरे जब आयकै वसिष्ट राममंत्र पढ़िझारै ॥ ९७॥चीकै चौकि चौंकि अति रोवै नाहिं सो रंच होवैहैं अधीर क्षीर पीवतहीं भूलैरी॥ किलक न नेकौ काहू हरि हिलकै नहेली निरखि रमैया मोहियेमें दुखहूलैरी।। रसिकविहारी मातु कौशिला सहेलिनसों कहैं कोउ लावो झारि लावै गात धूलैरी ॥ कलनापरहै एक पल ना भयो धौं काह ललना हमारो आज पलना न झुलैरी ॥ ९८॥ दोहा-इहि विधि बीते मासपट, शुभदिन समय निहार ॥ अन्नप्राश नीको विशद, उत्सव भयो अपार ॥ ९९ ।। भोजन दान विधानको, वरणौं इतो नज्ञान ॥ अकथनीय आनंद सों, बनत कियेही ध्यान ॥१०॥ प्रतिदिन दशरथ भवन जो, उत्सवहोंय सदस्य । सो शतशेष गणेशपै, रंचहु कहे नजाँय ॥ १०१॥ नित नित होत अनंद अति, दूनो हृदय हुलास ॥ दूनो नृपसुत तेज बल, संतत करै प्रकास ॥१०२॥ घनाक्षरी कवित्त । दिन दिन दूनो प्रगटात रूप राघवको दिन दिन दुनो तनु तेज बरसातहै ॥ दिन दिन दूनो औध मंगल जनात चहुँ दिन दिन दूनो लंक दुख दरशातहै ॥ दिन दिन दूनोही सनेह उमगात उर दिन दिन दुनो नित्त चित्त हरसातहै ॥ रसिकविहारी दिन दूनो अधिकात वित्त दिन दिन दूनो सबै सुख सरसातहै ॥१०॥शोभित सुवन चारौ कौशिला महल मध्य विचरत जानु पानि इत उत घेरि रामरसायन। (४३) घरि ॥ गिरत सु भूमि उठि रोवे पुनि जो चहुँ आप चुप हो एक एंकनको गेरि गरि।। धूसरित धूरि भूरि पूरित वसन अंग खेलत उमंगते अमंग रंग फेरि फेरि ।। अति सुख छावें मात आनंद अघा भावे रसिकविहारी हुलसा हिय हेरि हेरि ॥ १०४॥धावत बकैंया हचिरैया गहिवेको कयौं देखि परछया कबौं रोवत डरायकै ।। कवौं मचलाय भूमि लोटत रिसाय कयौं चारौ भाय खेलें एक एकन.गिरायकै॥ कवों प्रतिबिंव मणि खंभन विलोके हँसै रसिक विहारी क्यों रहत चुपायकै ॥ जननी निहारि मुख हरपि उठावें अंक तब हुलसाय रहैं अंक लपटायकै ॥१०॥ विथुरी लटूरी मुख सोहैं धुंधुरारी कारी रुचिर दंतूली दोय लागत पियारीहैं। धूसरित धूरि अंग पूरित उमंग भरे रसिकविहारी चहुँ बंधु सुखकारीहैं ॥ करत उमाह गहि भीत उठिवेकी फेरि गिरत बहोरि जोर भरत हुँकारी- हैं ।। सब जननांके जननीके मन मोद हेरि अवधविहारी खेलें अजिर विहारीह ॥ १०६॥ सवैया-कवित्त । वात कह तुतरात हँसात लसै जलजातसो आनन नीको। आँगु- री हात गहात चलात डरात चलें निरखात महीको ॥ पाय डगात रुकात लखात सुमात उठातहैं जीवन जीको ।। ज्योरसिकेश हिये लपटात त्या नेहबढ़ात धनों जननीको ॥१०७॥. दोहा-कबहूँ हठि अचगरि करें, छिन मचलें उमगाय ।। मात भुरावे जवहि तब, मौन रहैं हरपाय ।। १०८॥ घनाक्षरी-फवित्त। लाऊँ में मिठया औ मलैया सो खवाऊं तुमै आउँले चकैया झं. झनेया सो सुनाऊँ । नाऊँ में झपया दरुपैया जोमँगा गया द्वारे है ववैया जोर्डरया सो भगाऊँमै । गाऊँ मैं सुहया गीत रसिक- विहारी सुनी दया जो पपया रंगरैया सो वजाऊँ में ॥ जाऊँ में वलै- या कहे मैया जो स्नैया तुम सोवो नेक भैया तो उन्हयाको बुला- ऊँमै ।। १०९॥

(४४) रामरसायन। बहु॥ दोहा-इहिविधि वालविनोद बहु, करत लखत पितृ मात ॥ प्रतिदिन तन बल रूप गुना अधिक.अधिक अधिकात११० पनाक्षरी-फपित्त । ठुमक चलेह मातु संग गहि आँगुरी को ठहरे ठुनकि फेरि मछ- लि रहैं जवै ॥ कौशला प्रमोद भरि गोदमें उठाय चूमि अति दुलरावे सुख पावें विहीं तवै ॥ रसिकविहारी नर नारी लखि लालन पैतन मन प्रान धन वारत रहे सवै ॥ नितहि मनावे मैया दैया ले धनयां कर संगतिहुँ भैया मो रमैया खेलिहैं कवे ।। १११॥ सो०-योही नित प्रति माय, देव मनावै हुलसि हिय ।। बड़े भये रघुराय, खेलत बंधु सखान मिलि ॥ ११२॥ नारदादि ऋपिराज, ब्रह्मादिक सुरद राम. दरशके काज, गुप्त रूप नित आवहीं ॥ ११३॥ निरखत हिय भरि नित्त, सकल सुलक्षण रामके॥ पुलकित प्रमुदित चित्त, करत परसपर गुण कथन ११४॥ चारहु बंधु ललाम, सखन संग शोभित भले ।। वर विनोद अभिराम, करत लखत सव मुदित मन ।। ११५ ।। घनाक्षरी-कवित। हृदय हुलास भरि देवता दरश आश आवें बनिभिक्षुक बजावे द्वार तुन्तुनू । त्योंही सुरवामा होय 'मानुपी अनूपरूप भूप भौन भीतर सुआय न. थुन्थन ॥ रसिकविहारी रघुरैया तिहुँ भैया संग खेलें धाय नपुर बजाय पाय छुछुन ॥ सब नरनारी हेरि शोभा मनलोभा थक व्या अंग अंग अनुराग भई झुंझुनू ॥ ११६॥ छोटे छोटे बाल संग लीने करवाल छोटी छोटी ढाल छोटे तून वान औ कमान हैं॥ छोटीशीश चौतनी सुरंग अंग छोटे झंगा कटि पट पीत छोटे छोटे पद वान हैं ॥ छोटे कण्ठ कठुला जलजहार छोटे छोटे छोटी छोटी पैजनी विराजै छबिमान है।रसिकविहारी चहुँ वन्धु चारु छोटे छोटे धाय धाय खेल सबै सुपमा निधान हैं ११७ अंगन फटिक भूमि विमल विशाल तहां चारौ बाल करत कलोल रामरसायन। - कल केलें हैं ।लीने धनुबान त्यौं प्रफुल्लित प्रकाश मान जग सुख- दान करकंदुक सुझेलें हैं ॥ रसिकविहारी लपटाय रघुराय अंक तीनौ भाय धाय धाय गल भुज मेलैं हैं ।। मानौं रतिनाथ ऋतुनाथ रातिनाथ तिहूँ शुभ्र सरिपाथर सनाथ साथ खेलें हैं ॥ ११८॥ दो०-यहि विधि कौशलराजके, चारहु पुत्र अनूप ।। विहरत भूपति भवन में, मुदित मनोहर रूप ॥ ११९॥ समै समै सब सविधि वर, सहित वेद कुल रीति ।। भये अमित उत्साह चहुँ, मुण्डनादि उपवीत ॥१२०॥ पढी सकल विद्या निपुन, भये परम गुणमान ॥ चारहु सुत अवधेशके, हैं सब कला निधान ।। १२१ ॥ धर्म कर्म धारी चतुर, दानी परम दयाल ।। नीति प्रीति ज्ञाता वली, चारहु दशरथ लाल १२२।। यदपि चारह बन्धुवर, रूपवन्त मतिवंत ॥ तदपि सवहिते रामको, बल गुण तेज अनंत ॥१२३ ॥ राम अनन्त अनन्त गुण, सुयश चरित्र अनन्त ।। नाम एक त्रिभुवन विदित, या वरण सब सन्त॥२४॥ सो कौशलपति पुत्रके, विशद चरित नवनित्त ।। जनक जननि पुर लोग सब निरखत प्रमुदित चित्त॥२२॥ सर्वया-कवित्त । काहूँ गहि वान कमान सजै कबहूँ रथ वाजि गयन्द च ॥ कर हूँ मृगया वन खेलत हैं लखि मात पिता मन मोद व ॥ कबहूँ पुर हेरनको निकसे चतुरंग अनी चहुँ संगकटें | रसिकेम लह पुर लोग अनन्द भली विरदावलि बंदि पटें ।। १२६॥ पनासरी-परित्त। घर घर फम्पत है शेपके मदर शशि दिग्गज अधीर टाई ना भर आंग अछ। नाटक बगद डाटगेपत रुपन बाट हस्त मुनेक पल भलन पयोधि मच्च ॥ दशरथ नंद महाराजा रामचन्द्र की

(१८)
रामरसायन।
ससा मातु नृप सुत जननि, यो जानं सतभाव ॥
है मेरेदी सुवन सब, रंचन कल दुराव ।। १४ ॥
चारहु राजकुमारके, मुख्य सखा तिन नाम ॥
वर्णतही इनते अपर, अमित सफल अभिराम ।। ११५ ॥
सायद।
सुंदर १ सेपर २ बीरसेन ३ मणिभद्र निहारी ॥ तेज रूपर-
सिकेश६कलाधर ७ हृदय विचारा ।। वाणरूप ८ रसरास मनो-
दर १० और-गुणाकर ॥ ११॥ मानद १२ पुनि पत्रीस १३ बहुरि
वनपाल १४ गदाधर १५॥ रमनेश १६ पद्मकर १७ शीलनिधि
१८ रसिकाविहारी जानिये ॥ रघुवीर सखा ये अष्टदश अंतरंग पहि-
चानिये ॥ ११६॥
दोहा-रसिक रसाल १ सुभद्र २अरु, कमलाकर३शृतिजात॥
कुशल ५ जटाधरक्ष्वीरमणि७,भरतसखा ये सात१४७
वशाल १ समत्तरपुनि, वातप ३ मंडन ४ मानि ॥
बहुरि बिहारी लपनके, पंच सखा ये जानि ॥ १४८ ॥
चार शत्रुहनके सखा, संतानक १ सुखदान॥
दमन २ राजरंजन ३ लखी, चामीकर ४ वलवान।।१४९॥
मुख्य सखा ये जानिये, पुनि इनके स्वाधीन ॥
अष्टोत्तर शत प्रति सखा, यूथप सखा प्रवीन ।। १५०॥
प्रति यूथप आधीनहैं, सखा पंचशत जानि॥
पुनि सेवक सव सखनके, इनते न्यारे मानि ॥१५१॥
अरुं चारह वर बंधुके, सेवक दास अपार ।।
अंतरंग शुचि सुभगतनु, बली प्रवीन उदार ॥१५२॥
सखादास संयुत सकल, तीनहु बंधु ललाम ॥
प्रीति सहित रघुचंदको, सेवतहैं वसु याम ।। १५३॥
बंधु सखा सेवक सबहि, रघुवर युत सनमान ।
गया उचित राखत सदा, प्राणहुते प्रिय जान ॥ १५४॥

रामरसायन। (४९) अथ श्रीरामचंद्रजीके सखानका निर्णय चक्र। समानकी सखानके सखाप्रति यूधपप्रति सर्वयूथपन प्रतिमुख्य यूथप स्वाधीन संख्या. नाम सखा के सखा । मुंदर १०८ ५०० ५४०००५४१०८ शेपर ५४०००५४१०८ ३ वीरसेन ५४०००/५४१०८ मणिभद्र १०८ ५४०००५४१०८ तेजरूप १०८ ५४०००५४१०८ ६ रसिकेश १८८ कलाधर १०८ ५४०००५४१०८ ८ वाणरूप ५४०००५४१०८ ९ रसरास ५४०००/५४१८८ मनोहर १०८ । ५०० ५४०००५४१०८ ११ गुणाकर ५४०००५४१०८ १२ मानद ५४०००/५४१०८ १३ पत्रीस ५४०००५४१०८ १४ वनपाल १०८ ५४००० ५४२०८ गदाधर १०८ ५४०००५४१०८ रमनेश ५४०००५४१०८ १७ पद्मकर १०८ ५४०००|५४१०८ १८ शालनिधि १०८ ५४०००५४२०८ सव २५४४ ९००० १९७२०००५७३५४४ (४६) रामरसायना चमू चतुरङ्ग देखि दङ्ग होत देवरच्छ ॥ रसिकविहारी जवै कढत सवारी तवै आहि करि कसक कराहि रहि जात कच्छ । १२७॥ सवैया-कवित्त । खोर दिये शिर चंदनकी धनु वान लिये औ कसे कटि भाथै ।। मत्त गयन्दसी चाल चलें छविसों निरखें सरयू सरि पाथै ।। बाल सखा शुचि सेवक वृन्द सुबन्धु लसै रसिकेशहुसाथै ॥ औध निवासी सबै धनि जो इहि भांति लबै नितहीं रघुनाथै ।। १२८॥ दोहा-चारहु सुत अवधेशके, संग सखाअभिराम ॥ विचरै सरयू तीरसो, लई मुदित मन वाम ।। १२९ ॥ सवैया-कवित्त । ढोटाहैं ये अवधेशक मानों सुवाल मगलके जोटाहैं आछ। लाल अँगा शिर चौतनी चारु लसैं कटिमें पट पीत मुकाछे ।। हैंरसिकेश म एकहि वैसके संग सखा चहुँ ओरते गाँछे । देखु सखी सुखधाम छटा तिहुँ बंधु ललाम, रामके पाछे ।। १३० ॥ दोहा-विशद विनोदी रामत्यों, तीनहु बंधु अनूप ।। सरयू तट युत सखनके, खेलें रचि रचि रूप ॥१३॥ जैसे वल गुण रूप निधि, चारौ दशरथ लाल ॥ संग सखा तैसें सकल, रघुवंशिनके वाल॥ १३२॥ घनाक्षरी-कवित्त। कोऊ धनु बान धारी कोऊ तो कृपान धारी कोऊ शक्ति धारी शूल धारी गदा धारीहैं ॥ कोऊ कुंत धारी वत्र धारी चक्र धारी कोऊ कोऊ खड्ग धारी औ उदंड दंड धारीहैं । यूथप सखान पारी बंधुनकी न्यारी न्यारी ठानें कला भारी एक येकन प्रचारीहैं । सरयूके तीर खेलें सहित उमंग रंग रसिकविहारी संग अवध विहारीहैं।। १३३॥कोऊ लै तुरंग स्याह सवजा सुरंग नील नुकरा कुमैत लाखी अबलख साजेहैं। चालत सुचाल सहगाम और हालै कोउ धावा कोउ कावा दैलंगूरी कोउ छाजे हैं। कोउ मल्ल युद्ध ठानिरुदह उदंड दंड मुद्गर प्रचंड फेरि कोऊ ताल वाजेहैं ।। रसिक- विहारीकोउ वाना फेकि पट्टनते कोऊ भल्ल बानाके निशाना घालि (४७) रामरसायन। गाजे हैं ।।१३४॥ चीता श्वान जुर्रा कुही वाज वहिरीलै. कोउ चलत अहेरी वर वीरता वखानके॥चंद्र कुज भागै विधि सेनप सुभारती औ दुर्गा पत्र हेरिछोड़ें पौरुप पपानके ॥ निराखि कृपान वान वाहन सुरेश सती दुरत विहाय बल दशन नखानके ॥ रसिकविहारी अवधे- शके कुमार चारु खेलत अहेर वन संयुत सखानके ॥ १३९ ।। दोहा-कबहुँ चारहू नृप सुवन, संग सखा समुदाय ॥ रचत अनूप सुखेल वर, सरयू तट हुलसाय॥ १३६॥ घनाक्षरी-कवित्त । वनत रमेश रामं भरत महेश होत लछमन शेप औ सुरेश शत्रु शालहैं ॥ सखन बनावें हैं धनेश औ गणेश काहू रचत दिनेश काहू करें निशिपालहैं । काहु रूप साजें कपि रीछ औ निपाद काहू निश्चर वनावे काहू काहू मुनि बालहैं । रसिकविहारी इमि ठानिकै अनोखो ख्याल सरयूके तीर खेलें दशरथ लालहैं ॥ १३७॥ काहूके वनाय मच्छ कच्छ जल वोरतहैं काहूको वराह रूप रचत करालहैं। काहूको बनावै मृगराज दीह देह धारी काहू लघु रूप कला करत विशाल हैं।। काहूको वनावें गौर काहूको वनावें श्याम काहूको कलंकी करर्दै करवाल, ॥ ऐसे स्वाँग अमित सखानके वनाय हँसे रसिकविहार खेल खेल रधुलालहें ॥ १३८॥ दोहा-इहि विधिनित कौशल नगर, विहरत राज कुमार ॥ खेलत खेल अनूप अति, निज इच्छा अनुसार ।। १३९ निराखि राम गुण रूप वल, मुदित सकल पुर लोग। चारु चार मत संग बहु, सखा यथा जिहियोग ॥ १४० सुर किन्नर आदिक विविध, नरतनु धरि हुलसाय ॥ सखा भये चहुँ बंधुके, अवध आय प्रगटाय ॥ १४ ॥ ते प्रमुदित रघुकुल विपे, प्रगटे चारु कुमार ॥ सकल सखा नप सुत चहूँ, वय बल वपु इकसार ॥१०२ शिशुताते इक संगही, सब सुख भोग विनोद ।। उचित निरंतर परस्पर, रहत सनेद प्रमोद ।। ११३॥ १ (४८) रामरसायन। N सखा मातु नृप सुत जननि, यौं जानैं सतभाव ॥ हैं मेरेही सुवन सब, रंच न कछू दुराव ॥ १४४॥ चारहु राजकुमारके, मुख्य सखा तिन नाम ॥ वर्णतहौं इनते अपर, अमित सकल अभिराम ॥ १४५॥ छप्पय छंद । सुंदर १ सेपर २ वीरसेन ३ मणिभद्र ४ निहारौ ॥ तेज रूपयर- सिकेश ६ कलाधर ७ हृदय विचारी ॥ वाणरूप ८ रसरास९मनो- हर १० और-गुणांकर ॥ ११॥ मानद १२ पुनि पत्रीस १३ बहुरि वनपाल १४ गदाधर १५॥ रमनेश १६ पद्मकर १७शीलनिधि १८ रसिकविहारी जानिये ॥ रघुवीर सखा ये अष्टदश अंतरंग पहि- चानिये ॥ १४६॥ दोहा-रसिक रसाल १ सुभद्र २ अरु, कमलाकर३श्रुतिजात४॥ कुशल ५ जटाधरक्ष्वीरमणि७,भरतसखा ये सात१४७ वज्रशाल १ रसमत्त २पुनि, वातप३ मंडन ४ मानि ।। बहुरि विहारी लपनके, पंच सखा ये जानि ॥ १४८॥ चार शत्रुहनके सखा, संतानक १ सुखदान॥ दमन २ राजरंजन ३ लखौ, चामीकर ४ बलवान।।१४९॥ मुख्य सखा ये जानिये, पुनि इनके स्वाधीन ॥ अष्टोत्तर शत प्रति सखा, यूथप सखा प्रवीन ॥ १५० ॥ प्रति यूथप आधीनहैं, सखा पंचशत जानि ।। पुनि सेवक सव सखनके, इनते न्यारे मानि ॥ १५॥ अरुं चारहु वर बंधुके, सेवक दास अपार ॥ अंतरंग शुचि सुभगतनु, वली प्रवीन उदार ॥१५२॥ सखादास संयुत सकल, तीनहु बंधु ललाम ॥ प्रीति सहित रघुचंदको, सेवतहैं वसु याम ।। १५३।। बंधु सखा सेवक सबहि, रघुवर युत सनमान ॥ यथा उचित राखत सदा, प्राणहुने प्रिय जान ।। १५४॥

रामरसायन। (४९) अथ श्रीरामचंद्रजीके सखानका निर्णय चक्र। समानकी सखानके सखाप्रति यूधपप्रति सर्वयूथपन प्रतिमुख्य यूथप संख्या. नाम सखा के सखा स्वाधीन १ ३ सुंदर शेपर वीरसेन मणिभद्र तेजरूप रसिकश ६ कलाधर ८ वाणरूप ९ १०८ ५४०००५४१०८ ५४०००५४१०८ ५४०००५४१०८ ५०० ५४०००५४१०८ १०८ ५४०००|५४१०८ ५४०००/५४१०८ १०८ ५४०८०५४१०८ ५४०००५४१०८ ५४०००५४१०८ १०८ ५४०००१५४१०८ १०८ ५४०००५४१०८ १०८ ५४०००५४१०८ १०८ ५४०००५४१०८ ५४०००५४१०८ ५४०००५४२०८ ५४०००५४१०८ १०८ ५४०००५११०८ १०८ ५४०००५४१०८ १९४४ ।९००० ५७२००९:३९४४ रसरास मनोहर गुणाकर मानद पत्रीस १२ १२ वनपाल गदाधर रमनेश पद्मकर शीटनिधि १८ १८ सर्व (५०) रामरसायन। श्रीभरतजीके सखानका निर्णय चक्र। सखानकी संख्या ३ ४ ६ ७ सब सखानके नाम रसिक रसाल सुभद्र कमला श्रुतिजात कुशल जटाधर वीरमणि . ७ फर सखाप्रति यूथप १०८ १०८ १०८ १०८ यूथपप्रति ५०० ३५०० सखा चूधपनके (५४०२०,५४०००५४०००५४०००/५४०२०/५४०००/५४०००३७८००० सखा प्रतिमुख्य सखाके स्वाधी-५४१८८५४१०८५४१०८५४१०८५४१०८/५४१०८५४१०८/३७८७५६ नसखा ४१०८४५४१२८१४१०८/०४१०८ श्रीलक्ष्मणजीके सखानका निर्णय चक्र । १ सब २ ५ रसमत्त वातप सखानकीसंख्या संखानफनाम वनसाल मंडन विहारी सखाप्रतियूधप १०८ १०८ यूथपप्रतिसखा २५०० यूधपनसरा ५४०००५४०.०४.०० ५४०००/५४०००२७०००० भनिगुत्यससा | ५४१०८/५४१०८/१०८५४१०८/५४१०८२७०५४० स्वाधीनमा श्रीशचनजीके सखानका निर्णय चक । मसानकामया १ ३ दमन राजरंजन धामीकर १०८ ४३२ माननाम मनानक मगनियर पानिमा मनमा ५.० NE ५.८५४१८/५४१८५४१०८२११४३० दोहा-नीति प्रीति मर्याद मय, रामधर्म धुर जान ॥ यथा योग चहुँ बंधुवर, करत काज सुखदान ॥ १५५॥ इहि विधि चारहु नृप सुवन, भये समर्थ सुरूप ॥ पितु ढिग सकुचे रहत अति, सोलखि प्रमुदितभूप ॥१५६॥ निरखि चतुर्दश वर्षके, सुत चारहू अनूप ॥ सकल साज मय भवन वर, चहुँन दये तब भूप ।। १५७ ॥ रंग भवन रघुचंदको, खचित रचित मणि जाल । रूप भवन शुचि भरतको, सुंदर विमल विशाल ॥१५८॥ क्रांति भवन वर लखनको, विशद प्रकाशित धाम ।। चित्र भवन रिपुदमनको, अमल अधिक अभिराम ॥१५९॥ निज निज भवन मखान युत, रीति सहित नृप नंद ।। हास विलास निशंक उर, करत सदा सानंद ॥ १६०॥ पगे परमपर प्रेममें, यदपि चारहूँ भाय ।। राम लपण रिपुहन भरत, तदपि मिले अधिकाय ॥ १६॥ तिहूँ बंधू निज मुखन मिलि, संयुत प्रीति प्रतीति ॥ लेवहिं श्रीरघुवीरको, सहित धर्म नृप नीति ॥ १६२ ॥ इहि विधि दशरथ राजके, बारहु कुँबर सुजान ॥ सवहि देत आनंद अति दानज्ञान ननमान ॥ १६३ ॥ मात पिना पुर लोग अरु, सकल लोक नरनारि ॥ मुदित होत चहुँ बंधुको, बल गुण रूपनिहारि ॥ १६ ॥ कति कोविद नट नर्तकी, जे जग गुणी अपार ॥ राम निकट नत्र आवहीं, पावहिं बहु मतकार ॥ १६५ ॥ द्विज मुनि संत गुणीनकी, सभा करत नित राम ॥ इहि विधि कौशल नगरमें, रहत मोद वम याम ॥ १६६ ।। सुर ब्रह्मादि प्रशंसही, अवध जननको भाग। धन्य धन्य जे गमके, पो पान अनुगग ॥ १६॥ भी गनर०विवि० श्रीगजन्न वर्णनो नाम चतुषि० ॥ ४ ॥ - तिहिं भोजन कार तृप्त, मुदित भये अति भूप ।। 12113 जन-कल्यनन्दन। मलाला युसनको । उनि लिदस्ता कारभार न्य पात्र में जल कार निमुना। ननद यात मटकी सन्नी रोगा सह पाल बहुते॥ तनहुँ नपनी ॥2॥ नमी न बन जयाल्लंग ॥९॥ नकुल योग सुनाया। झोक सुई उडु मन मन लाई॥६॥ नये न समायोजन नहु राजा ॥ नि लेक र जलनिय नारी ॥७॥ हा एक सय सुज्ञ वन, विवत सत अहेर ।। गलमन नल, अनजानन ना ॥८॥ गोपन वल्लु पुनि नच दिन शक्ति वृत्ति अति भूप ॥ वहाँ नहाँ जल जल कहूँ, त्रिवल भये विरूप ॥ ९॥ ताछिन औचकहीं तहां, आयो यक वनपाल ।। तिहि विलोकिडिग वेरिफ, निज गति कहीनृपाल ॥१०॥ सो सुनि वेगा विपिनते, लायो कंद अनूप ॥ रघु प्रसन्न बोले वनप, माँगु जु तो रुचि होय ।। मौन रहो मुसक्याय सो, भूपति मुख दिशिजाय ।। १२॥ पुनि वोले नृप माँग जो, अबहि देउँ तुहि सोय।। मोरिमाय भापी महा, दुस्तर देवो दोय ॥१३॥ न मागे जो हम चहें, काह तिहारे पाहे ॥ सीप तर नप कही, मांग जु तो मन माई ।। 18॥

रामरसायन। सों अनखाय रिसायकै, बोलो महा उदार ॥. याही छिन इहि ठौर मुहि, स्वर्ण देहु शतभार ॥१५॥ चकित भये नृप सुनतही, कीनो हृदय विचार ॥ अब याही छिन विन दिये, धर्म सुयश होछार।। १६॥ करि विचार भूपति तुरत, लै अनामिका रक्त । तृणते पत्र सुपत्रपै, लिखो हाल कछु व्यक्त ॥ १७॥ वाण वाँधि तिहि धनुप धरि, छोडो वेगि नृपाल । सोशर जाय कुबेर हिग, पहुँचो अतिहि उताल ||१८|| लखि धनेश वह पत्र द्रुत, लै सुवर्ण बहु भार ॥ नभ मंडलद्वै भूप ढिग, वरसो आय अपार ॥१९॥ चार दंड नभते भई, वरपा हेम अखंड ॥ बनप गिरो नृप चरण पै, देखि प्रताप उदंड ॥२०॥ समाधान करि भूप अति, सकल कनक तिहि दीन ।। चढ़ि तुरंग मग बृझिकै, बेगि पयान मु कीन ।। २१ ॥ एने रघु गुण अमितह, एक एक अधिकाय ॥ पुनि प्रताप कछु औरहू, कहीं सुनौ रघुराय ॥ २२ ॥ चौ०-एक समय लंकापति रावन धरि द्विज रूप अनूप सुहावन।। आय अवध लखि अति हरपायो पुनि रघुके रनिवास सिधायो२३ रघुरानी बहु तियन समेता ॐ सुखयुत बैठौं मुदित निकेता ।। तह लंकेश विन तनु धारी गयो विलोकि उठीं सब नारी२४ द्विज वर जानि सकल शिर नायो हेम सिंहासन बेगि धरायो। सो प्रतापमय रघु नृप केरा जटित अमोल रत्ननहुँ फेग२५ तेजमंत सिंहासन भागतापर दियो द्विजहि बटारी॥ बेटतही मुव छल प्रगटाने * दशशिरबीस भुजा दरशाने२६ सो देखत भागी सब वाला धाय धनी गृह अतिहि विदाला सोडरि उठि द्विज तन पुनिकीनोडरावण नलोफोऊनहिं चीनो२७ इत सब तीय हीय भय पैटी दे कपाट शफिन चुप चटी। उत दशमुख का डरपि लजायोएनिधरि धीरपाटिंगआयो२८

(५४)
रामरसायन।
ताछिन सरयू तट रघुराजा करत हुते संध्या शुचि साजा ॥
द्विज लखिकै सादर बैठारो * करनलगे पुनि कृत्य सुखारो ॥२९॥
औचक संध्या करत नृपाला* कियो आचमन अतिहिं उताला ॥
पुनि करलै जलदर्भ सक्रोधाक दक्षिण दिशि घालोनृप योधा ॥३०॥
पुनि आचमन कीन रघुराई * करन लगे संध्या चित लाई ॥
सो न भेद रावण कछुजानो चकित चित्त अति जिय अकुलोनो३१
करै कल्पना अमित सुरारी बैठो चकित मौन मनमारी ॥
जब नृपसुचित भये करिनेमा तब बूझी विप्रहि सब क्षेमा ॥३२॥
अशीशकहि कुशल बहोरी* दशमुख बोलो नृपहि निहोरी ॥
महाराज़ जो दर्भ चलायो * सो गुण श्रवण हेतु हुलसायो ३३॥
तव नृप कही बात कछु नाही लंका ढिग इक धेनु चराहीं ॥
तिहि भक्षण धायो वनराई * सो सुरभी मो दई दुहाई ॥ ३४ ॥
हतो केहरी गाय बचाई * या हित कुश घालो अतुराई ॥
मुनि विस्मितद्वै शोक दुरायो पुनि अशीशदै भवन सिधायो॥३५॥
वेगि जाय सोई गति पेखी मृतक सिंह सुरभी मुद देखी॥
है सशंक अति आतुर धाई सकल कथा निज तियहि सुनाई३६
मंदोदरी सुनत अकुलानी कही कत सब लंक नशानी ॥
रघु प्रताप तुम रंच न जानो तिहि गृह माहि जाय छल ठानो३७
तब दुशकंट कही विलखाई
प्रिया कहा अब करौं उपाई॥
जाते बचे प्राण परिवारास नृपति चक्रवल प्रवल अपारा ॥३८॥
तव मयमुता उपाय विचारी पतिहि संगलै भवन सिधारी ॥
तहाँ जाय इक पीठ धरायो ताहि हेट रावणहिं दुरायो॥३९॥
निपट नगह बसन विहाई वठी ताहि पाठपर आई ।।
करन लगी मंजन मिमधारी ॐ अतिहि सभीत दुहूँ पति नारी॥४०॥
इत रख भुपदि महल बुलाई तियन दशा निज सकल सुनाई।
जानो दशमुख छल महिपाला भये क्रोधवशलोचन लाला४१॥
नुरत भूप शुचि नीर मंगायोले मंत्रित करि भूमि गिरायो ।
तह महिते इक शर तनुधारी प्रगट भयो नृप आज्ञाकारी ॥१२॥

रामरसायन। (५५) अति सकोप नृप दई रजाई * लंकहि जाय वेग वल छाई ।। वीसहुकर . दशकंधर केरे 2 वाँधिअवहिं आनौ मम नेरे।।४।। पायरजाय वाण करि कोहा * गयो लंक रावण चहुँ जोहा।। तिया भवन पत्री दृढ़ जानो नम नारिलाख हिय सकुचानो४४॥ रोको द्वार शोर करि भारी कह्यो आव इत दुष्ट सुरारी ।। लखि कराल शर कंपहि लंका 8 भये निशाचर सकल सशंका४५ करत विचार वाण अकुलाई नग्न नारि देखौं किमिजाई ॥ पट धारे तिय जवहिं अन्हाई तब हौं गहौं रावणहिं धाई॥४६॥ इहि विधि गुणत भई बहु वारा उठत नहीं रजनीचर दारा ॥ इत विलंब लखि भूप रिसाये * तीन वाण पुनिकोप पठाये४७॥ तेऊ जाय नग्न लखि नारी रुके द्वार चहुँ क्रोधित भारी॥ तिनहुँ गये अति भयो विलंबा तब रघु कीनो कोप कदंबा ४८॥ सप्त वाण पुनि बोलि नृपाला दीनी तिनहिं रजाय कराला ॥ वाण सहित रावण गहि आवो कैलंकहि उखारिइत लावो ४९|| सुनि रजाय सो वाण कराला ॐ गये लंक सब अतिहिं उताला॥ पुर पहुँचत त्रिकूट चहुँ फेरा उठीवाल अति भयो उजेरा ५० भयो सिंधुखलभल महि कंपी धूरि पूरि लंका सब झंपी ।। तव मयसुता हीय दृढ़ जानी ॐ अव सब भांतिप्राणकी हानी यह विचारि आतुर पटधारी आय द्वार कहि त्राहि पुकारी ॥ तृण दवाय द्विज दुहुँ कर जोरी , विहवल बोली वचन निहोरी१२ हो रघुराज शरण युत ईशा ॐ वधी मोहिं आगे यह शीशा॥ मुनत फैन सब शर अनुमानी है अवध्य अवलाद जानी२३॥ पुनि रघुराज शरण कहि टेरी अब कीजे कह जतन निवेरी ॥ यो विचारि शर एक उताला नृप दिगआय कहो सब हाला५९ मुनि शरमुख तिय वैन मुदीना पुनिअवध्य अबला दृढ़ कीना ।। ताहू पे सो शरण पुकारी सकल वात इमिहीय विचारी२५ तब बोले रघुराज कृपाला धर्मशरण रक्षण दम पाला॥ याते नूक क्षमा सर कानी अवलाजानि अभयतिहि दीनी९६ (५६) रामरसायन। , जाहु सकल शरनिज निज ठामाइपुसुनि पुनिआयोतिहिंधामा। कहो मानि रघु वचन प्रमाना * लंका त्यागि गये सब वाना५७ जब सब वाण गये तजि लंका तब रजनीचर भये निशंका ॥ तुव कुल ऐसे बली नृपाला * प्रगटेविपुल सुनौरधुलाला५८|| सो रावण अव सबहिं सतावै * हिये भीतिरंचहु नहिं लावै ।। महि निछन यो दशमुख जानै * मनमानै अधर्म सो ठानै ५९ ॥ महाबीर लंकापति रावण * अस्त्र शस्त्र विद अमर सतावन ।। यहिविधिअमितव्यंग्यमुनि भापी नारद गिराराम उर रापी ॥६॥ इति श्रीरामर ज०वि०रघुचरित्रवर्णनो नाम पंचमोविभागः ॥ ५ ॥ दोहा-पुनि बोले मुनिराजसुत, रावण यदपि प्रचंड ॥ तदपि भानुवंशी अधिक, ताहूते वरखंड ॥ १ ॥ जिहि दशमुखको तेज बल, विदित लोक तिहुँ माहिं ॥ अति उदंड रघुराज सो, तृणहुँ गिनों तिहि नाहिं ॥२॥ चौ०-सुनि मुनिमुखलंकेशप्रशंसा हँसिनोले रविकुलअवंतसा ॥ कयि कछू रावण कर गाथा *तब भाखी नारद ऋपिनाथा३ दोहा-सुनौ राम रावण प्रगटि, प्रथम महातप कीन ॥ बै प्रसन्न करतार तिहि, परम प्रबल वर दीन ॥ ४॥ नर वानर तजि सहिते, भयो अवध्य सुरारि ॥ परम प्रचंड उदंड चहुँ, कीनी विजय प्रचारि ॥५॥ लंका वंक कुबेर ते, वरवस लई छुड़ाय ॥ सैन कुटुंब समेत तहँ, दशमुख रहै सदाय ॥ ६॥ अति उतंकहै लंक वर बंक निशंक अखंड। यातुधानरक्षित सदा, चंड मंड परिवंड ॥७॥ घनाक्षरी कवित्त । खाई सिंधु वितत त्रिकूट शतयोजनको तापै मणि हेममई नगर बस निशंक ॥ वीस दश योजनको आयत वितार जाके चार दृढ द्वार सबै रक्षित मुवीरवंक ॥ अयुत सुलक्ष दशलक्ष कोटि कोटि रामरसायन। (५७) शत पूरवादि मध्य जोधा पाहरू विचारौ अंक ॥ रसिकविहारी साज अपर अपार भूरि चमू चतुरंगहे अभंग यौ उतक लंक।। ८ ।। दोहा-पुनि दशमुखके त्रासते, बहु सुर मुनि गंधर्व ।। जाय जाय लंका सदा, सेवतहैं तिहि सर्व ।। ९॥ घनाक्षरी-कवित्त । वेद धुनि छौ विधि ग्रहन बतावें गुरु शारदा बजावें वीनगंधरव गावही सदन समीर झारै वरुन सुनीर ढारें चंद्र छत्र धारै भानु चँवर चलावह ॥ अनल मुपाककारी द्वारपाल दंडधारी देव त्रिपुरारी आय प्रातहि पुजावै ॥ रसिकविहारी तेज भारी यौ दशाननको अमरसं शकयातें लंक नित जावेह ॥१०॥ दोहा-परम प्रतापी अति वली, ऐसो निश्चरराय ।। जाय जाय तिहुँ लोक चहुँ, विजय करी हरपाय ॥ ११ ॥ चौ०-अति वखिंड उदंड मुरारी सुर नरनाग सबहिं दुखकारी। धाय धाय तिहुँलोक मँझारी हरी अमित वरवस वर नारी१२ पुनि कुबेरको धर्पित कीनो पुप्पकवर विमान हरि लीनो॥ मेघनाद तिहि सुत बलवाना सोसुरपतिहि जीतिहरपाना१३ दोहा-याही विधि दशकंठ बहु, कर सदा उतपात ।। पै तिहि बलं गुण तेजते,सुर नर नाग डरात ॥ १४ ॥ एक समय कानन विपे, होत रहो वर जाग। सकल अमर वठे तहां, लीने निज निज भाग ।। १५॥ ताही छिन तहँ लंकपति, आयो अति बलवंत ॥ दूरहिते तिहि देखि सुर, जहँ तहँ भगे तुरंत ॥ १६॥ निज निज तनु सुर गुप्त करि, धरे औरही रूप ॥ देव चरित सो रंचहू, लखो न निश्वर भूप ॥ १७॥ धरो सुरेश मयूर वपु, धर्मराजभे काग ।। सरठ कुबेर मुहंस, वरुन दुरे इमि भाग ॥ १८॥ चौ०-इहि विधिसंवं रावण भयभारी दुरे रहे मुरनिपट दुखारी ।। जब दशकंठ गयो ध्रुव जाने से सकल देव नव अनि हरपाने ११ (५८) रामरसायन। टै निशंक निज निज तनु धारे * परम प्रसन्न सुबैन उचारे ॥ जो सुर जाहि सुरूप दुराना ताहि दियो सो वरवरदाना॥२०॥ मोरहि कही इंद्र हुलसाई रहौ व्याल ते अभय सदाई ॥ सहस नैन जिमि मो तनु माही * तिमि तुव पक्ष चिह्न दरशाही २१॥ नील वर्ण तनु प्रथम तुमारा * पै अब वर प्रभाव विस्तारा ॥ चित्रित पंख वर्ष प्रति पावो * सुंदर रूप अनूप लखावो॥२२॥ दोहा-धर्मराज तब वायसहि, वर दीनो हुलसाय ॥ विन वध मृत्यु न होय तुव, रहौ निरोग संदाय ॥२३॥ पुनि जो तुमहिं करायहैं, भोजन विशद बनाय ॥ तिनके सकल कुटुंबि जन, मम पुर तृप्त रहाय ॥२४॥ सो०-तब कुबेर वर दीन, हर्प सहित कृकलासको ॥ द्रव्य सहित शिर पीन, रहै अंग कंचन सरिस ॥२५॥ परीछंद । वर वरुण दीन हंसहि अनृप । तुव श्याम श्वेत मिश्रित सुरूप ॥ तनु सकल आजते शुभ्र होय । अतिक्रांतिमंत वर विमल सोय२६ ची-सुर वरदै निज निजथल आयेदुखी रहत दशमुख भय छाये। इमि लंकेश तेज बल भारी मुनि पुनि मुनिहि कही धनुधारी२७ कहिय मुनीश आजलग रावण कीने कर्म अनेक अपावन ॥ कहा हेत कितहूँ नहिं हारो वीर विहीन लोक भो सारो२८॥ तब नारद मुनि कही सुवानी मुनी राम धनुसायकपानी ॥ बहुते ठौर पराजय पाई ॐ कहूं बँधो कहुँ गयो पराई॥२९॥ एक बार सो निश्चर राई लिया जाय कैलास उठाई ॥ तब शिव लखि दशमुख कर दापा पद अंगुष्ट वाम गिरि चापा३०॥ दवे वशिहु भुज भूधरतर रोय कीन बहु वर्ष विनय वर ॥ तर दयालुह छोड़ि दये कर रावण नाम धरोताको हर॥३३॥ किया समर पुनि हरिमे जाई तहते दशमुख गयो पराई ॥ सदमबाहुने सर विधि हारो वाली कपि तिहिको मद गारो३२॥ पुनि इन अवध माहि बहु वागभिरो आय दशकघर हारा ।। -

रामरसायन।
इहि विधि अमित वार रघुराई सो वहु ठौर पराजय पाई ॥३३॥
पै वह निज भुजबल अधिकाई करत अनीति देव दुखदाई ॥
धर्म कर्म शुभ सकल निवारे द्विज सुर मुनि गोवृंद सँहारे३४॥
दोहा-सुनि नारदमुनिके वचन; गर्भित अर्थ प्रमान ॥
वोले दुहुँ कर जोरिकै, दशरथसुत मतिमान॥ ३५ ॥
चौ०-इमिअपराध रजनिचर कीनाशापहु कोउ कबहुँ तिहि दीना।
सुनि बोले नारद हुलसाई ॐ भई शाप सो कहीं बुझाई ॥३६॥
एक समे अभिमान वढाई से मुनिन दई लंकेश रजाई ।।
हौं भूपति ऋपि प्रजा अपारा दंड भरै सब वित अनुसारा॥३७॥
सुनि मुनि सकल कही हम पांहीं कुश वल्कल मृगचर्म रहांहीं ॥
कंद मूल दल फल नित खांहीं यह तजि और पदारथ नाहीं॥३८॥
सुनि लंकापति कोपि सुनाई दंड न भरै दंड सो पाई।
तब सब ऋपिन क्रोध उर छायो एक कुंभ अति वेगि मँगायो ३९||
तामहँनिजनिज रुधिरनिकारो शोणित भरो सबनि घट सारो॥
घोर शाप करि शोर सुनाई यहि घटतें रावण विनशाई ॥४०॥
यो कहि घट भेजो तिहि पासा हम मुनि करें विपिनमें वासा ।।
है नहि कळू भरे कह दंडानुप आज्ञा अति भई उदंडा॥४१॥
यातें भरो दंड हम येहू है मुनि गणको शोणित लेह ।।
यो मुनि शाप डरपि लंकेशा वेगहि दीनो जनन निदेशा ।।१२।।
यह घटल अति दूर सिधाको तिरहुत देश माह तुम जावो ।।
तहां भूमि खनि खात मुभारी ताधिच घरी कुंभ दृढ़कारी ।।४।।
जातें फेरि न घट प्रगटवि बहुरि काह यह विन जना ।।
मुनिजन जाययुक्तितिमिकीनी जिमि लंकेश रजायन दीनी॥2॥
दोहा-एक शाप यह भनिनकी, सो जानी रघुनाथ ॥
पुनि दुजी गंधर्षकी भई कहीं नो गाय ॥ १५ ॥
एक समय मग जातहो, रावण मयुत मन ।।
चीन लखो अनि मनिर गिरि, आयो तिहि नन ॥३॥

(६०) रामरसायन ताभूधर पर लंकपति, कियो मुदित विश्राम ॥ तिहि मगढ़ एक तिय कढी, सजे अंग अभिराम ॥४७॥ नारिहि लखि लंकेश तव, भापे मंजुल बैन । को सुंदरी अकेलि तुम, कहां चली अधरैन ॥४८॥ तिय बोली हौं अप्सरा, इत गंधर्व रहात ॥ नल कूवर जिहि नामहै, तिन ढिग मैं नित जात ।। ४९॥ सुनि वोलो है कामिनी, हौं लंकेश निहार ।। काह लहौ गंधर्व दिग, मो मिलि करौ विहार ॥५०॥ सो सुनि तिय सब भांति ते, समुझायो लंकेश ।। सो नहिं मानो रंचहू, ता हिय भयो कलेश ॥५१ ।। ताछिन मदन विहालकै, गही तिया भुजबीस ॥ वरबस कियो विहार तह, अति निशंक दशशीश ॥५२॥ सो अप्सरा विहाल बहु, नल कूबर ढिग जाय ॥ रुदन कियो कहि निज दशा, गिरी चरण पर धायः॥ ५३॥ तब गंधर्व सु ध्यान धरि, देखो सत्य सुहाल ॥ जैसो निपट अधर्म हठि, सकल कियो दशभाल ॥ ५४॥ द्वै क्रोधित गंधर्व तब, दई रावणहिं शाप । जाते फेरि न भूलि इमि, करै निशाचर पाप ।। ५५ ।। आजहिते परतीय गहि, जो हठि कर विलास ॥ तो मम शप प्रभावते, होय लंकपति नास ॥ ५५॥ रावण सुनि यह शाप दृढ़, तबहीतें भय मान॥ गह नारि पै शंकते, रहै ताहि रुचि जान ॥ २७॥ द्वितिय शाप गवणहिं यह, घोर दई गंधर्व ।। वेदवतीकी बात पुनि, कहीं सुनी वह सर्व ।। ५८ ॥ चौक-एक समय मनि पुष्प विमानावटि कियोलंकेशपयाना ।। पन्या विमल विपिन इकदेखीवर सुंदरि तपरूप विशेखी ॥१९॥ निभापनि आयो तिहि पाना कहे वन भरि होय हुलासा पयों मुंदनी विपिन दिन डाली कोही कदा नाम तुम बोली।

रामरसायन (६५) शुद्ध हृदय निश्शंक सुवाला * बोली विमल सुबैन विशाला॥ कुशध्वजनाम ब्रह्मऋपिख्याता सो मम पिता वेद वर ज्ञाता६॥ वेद पढतहै मम पितु ज्ञानी तवहीं तिहि मुखतें प्रगटानी ॥ वेदवती याते. मो नामा * अर्थ सहित राखो अभिरामा६२॥ सो मम तात सत्य प्रण धारा विष्णु संग मो व्याह विचारा ।। यहसुनिशंभु दैत्यपति कोप्यो खल मलीन सवधर्महि लोप्यो६३ अर्ध नि सो शंभु सिधारो सोबत मम पिताहि हति डारो॥ तब मो मात पतिहि लै अंका * जरीअनलअतिदुखित निशंका६४ तबते मैं नित हरि आराधौं पितु प्रण सत्य हेतु तप साधौं । सुनि दशकंठ मुदितद्वै भाखी यह अभिलाप वृथा हिय राखीद५ मम भामिनी होहु अव वाला ॐ त्यागौ तपहि कलेश कगला ॥ हौं कलेश तिहूँ पुर स्वामी * मो सन्मुखकहँखगपति गामी ६६ सुनि बोली रे अधम सुरारी कह अधर्म यह बात उचारी ।। मोहग ओट वेग खल होई पातक लगो बदन तुवजोई।।६७॥ सो सुनिरावण अधिक रिसाई खल तिहि केश गहे वरियाई ।। ताछिन वेदवती कर हाथा ६ भयो कृपान सरिस रघुनाथा६८|| सोकन्या निज कर निजकेशालिन किये हृत पाय कलेशा॥ पुनिरावण प्रति बहु तपधारी बोलत भई क्रोध करि भारी ६९।। रेखल हती तोहि छिन माहीं पै यह बात उचित मुहिं नाहीं ।। करौं शाप दे जो अब छारा ती नशाय मम तप फल सारा ७० दोहा-याते ही पुनि जन्मल, करी बेगि नुवनास ॥ यौं कहि वेदवती तव, फियो अग्निमें वास ।। ७१ ।। वेदवती जवहीं ऋषित, अनल दाह तनु कीन । तवहिं भये दशवदनके, दशहू बदन मलीन ।। ७२॥ येही विधि लंकेशको, भई अनेकन शाप ।। तऊ रजनिचर मंदमति, कर अमित नित पाप ।। ७३॥ पै अब रावण शीशप, फिर काल मडरात ।। जानि पर ध्रुव वेग सो, सहित कुटुंब नशात ।। ७ ।। , " - रामरसायन। याही विधि बहु वार लग, नारद मुनि बहु गाथ ।। कहे अनेक प्रसंगके, मुदित सुने रघुनाथ ॥ ७ ॥ राम मुदित कर जोरि दुहुँ, ऋषि पद शीश नवाय ॥ बोले बंधु सखान युत, धन्य धन्य मुनि राय ॥७६॥ अहो भाग्य मम आज प्रभु, दरश कृपा करि दीन । भयो कृतास्थ अतिहि मैं, नाथ सुपावन कीन ॥ ७७ ॥ तव प्रसन्न मुनि कही, राम सकल गुण धाम ॥ जानत हौ सब हीयकी, ही परिपूरण काम ॥७८॥ सुनि नारदके बचन वर, गर्भित अर्थ सहेत ॥ विहँसि राम मुनि पद गहे, बंधु सखान समेत ॥ ७९ ॥ जैति राम कहि मुनि गये, प्रमुदित सवहि सुनाय ॥ रघुवर ऋपिहि प्रशंसही, कहि कहि अमित प्रभाय ।। ८० ॥ येही विधि रघुवंश मणि, नित सजन सतसंग ॥ करत रहत विचरत अवध, लखि सब हिये उमंग ॥ ८१॥ इति श्रीरामर० ज०वि० रावणवृत्तांत वर्णनोनाम पष्ठोविभागः ॥ ६ ॥ दोहा-अवध निवासी नारि नर, संयुत नृप रनिवास ।। चरित चारह बंधुके; लखि हिय होत हुलास ॥१॥ व्याह योग नृप सुत चहूँ, लखि सब करत विचार ।। वधुन सहित कब देखिये, सुंदर राज कुमार ॥२॥ सो इत अवध नरेशके, जब जनमे सुत चार॥ तिहि पाछे मिथिलेश गृह, कन्या भई सुढार ॥३॥ सीरध्वज मिथिलेशकी, कन्या युगल अनूप ॥ अरु कुशध्वज नृप बंधुकी, दोय सुता सुख रूप ।।४।। भूमिसुता मिथिलेश गृह, प्रगट भई जिहि भांति ॥ जन्म कथा तिनकी कहीं, सहित रूप गुण पांति ॥५॥ ना-मिथिला नाम मुमंडल भारी विदितजनकपुर आनँद कारी। विशद विशाल नगर शुचिमा निहिं पिलोकि मुरलोक विमाहवा , रामरसायन। (६३) तह महीप सीरध्वज नामा के तिनके कुशध्वज वंधु ललामा ॥ सो नृप परम धर्म नयनागर जिहिको यश तिहुँ लोक उजागर॥७॥ ज्ञानीवर विरक्त भूपाला * परमसंत गुणवंत विशाला ॥ सत्य विदेह देह धर राजा विमल विवेकी सकल समाजा॥८॥ सीरध्वज अरु जनक विदेहू 3 एकहि रूप नाम तिहु येहू ।। पटरानी नृपकी मति ऐना धर्म रूप जिहि कहत सुनैना॥९॥ दोहा-जनक राजके पुत्र वर, वीर विशद गुण रूप ॥ लक्ष्मीनिधि यह नाम जिहि, यश विख्यात अनूप।।१०॥ प्रोहित नृप मिथिलेशके, शतानंद मतिमान । वेद नीति ज्ञाता कुशल, त्रिकालज्ञ शुभदान ॥ ११॥ सुतं संपति तिय धर्म सुख, सजन सहित समाज ॥ जनक नगरमें जनक नृप, करत अकंटक राज ॥ १२॥ चौ०-एक समय मिथिलामधि भारी परो अवर्पणकाल दुखारी।। कालहु पर दुकाल पुनि देखी चहुँदिशि पीडित प्रजा विशेपी १३ सो कलेश लखिकै नर नाहा ॐ हृदय भयो अतिदारुण दाहा ॥ पूजन दान अनेक प्रकारा किये अमित मिथिलेश उदारा १४॥ तदपि न कहूँ रंच जल वरपे प्रति दिन प्रजा नीरहित तरसै॥ तब भूपति सब मुनि द्विज ज्ञानी गुणी बुलायसभावर ठानी३२॥ यथा योग सनमानि नृपाला सविनय वोले वचन रसाला ।। सवही सुजन कृपा करि हाला कहिए जतन मिटे जिहि काला १६ वरप वेगि वारिधर वारी ॐ होय सकल मम प्रजा मुखारी।। नृपति वचन सुनि सकल दृढाई यज्ञ भयेविन काल नजाई॥१७॥ यह सुनि दई रजायमु राजा वेगहि सजी यज्ञ कर साजा ॥ होय शीघ्र मख सहित विधाना यथावेद ऋतु कर्म वखाना १८॥ वेद विहित सब साज सजाई नृप कर महि शोधन विधि आई।। फंचन हल पर विशदवनावास्यथा उचित द्विज मनिन बनाया ? सतानंद आयसु लै राजा चले मुदित महिशोधन काजा॥ भूपति चलत सगुण पर भारी भये निरखि सवनये मुखाग२०॥

रामरसायन द्विजन सहित तहँ जाय नरेशासविधि कृत्य करि सकल सुदेशा पुनि हल गहिकर जनक मुजाना महिशोधन अरंभ वर ठाना२१ सप्तावृत्त होत हलरेपा * महिगत कुशभो अचल विशेपा सो हल रंच न चलै चलावारुको सीत नृपलखि दुख पावा२२ दोहा-औचकहीं तहँ भूमिमें, भयो प्रकाश . अपार ॥ लखि चौंके चित चकितढे, सकल लोग इकवार ॥२३॥ पुनि नृप हेरे . सीत ढिग, हल रेखा विस्तार ।। भूमि विवर मगढ़ कढी, प्रबल अनल सम झार ॥२४॥ . चौ०-बहुरिसीत संयुत इक कन्या * भूदलते प्रगटी अति धन्या। नृप विलोकि तिहि धाय उठाई दीपति दिव्य देह बहुछाई २५ । अमित वेज तनु भयो प्रकासा छायो भ्रम दशहू दिग आसा। सोविलोकि ज़हँ तहँ तिहुँलोका दौरे विपुलसु होय विशोका२६। घनाक्षरी कवित्त । पद् नख पानि अरु अधर कपोल नैन भ्रुकुटी सुकंठ नाम एडी औ चरण रेख ॥ कंज भानु पल्लव सुबिंब औ मुकर बाण चार कंबु कुंड फल सरिता अनूप लेख ॥ भौंर कोक कोकिल सुकी कमला अनंग इंद्र हरि देव वृंद कीस शफरी विशेष ॥ रसिक विहारी सिया प्रगटतयेते सबभ्रमवश धाये भये चकित सुरूप देप२५ चौकन्या अमल अनूपनिहारी भयेजनक हिय अतिहि सुखारी। आवतही नृप अंक मझारी र रुदन करन लागी सुकुमारी॥२८॥ रुदन शब्द सुनि सब जन धाये * भूपति निकट वेगि ते आये॥ जे मुनि त्रिकालज्ञ वर ज्ञानी तेउर माहिं सकल गति जानी२९॥ कन्या निरखि भूप कर माही द्विज मुनि सब वोले नृप पाहीं ॥ महाराज यह सुता अनूपा प्रगटी रमा मनों धरि रूपा॥३०॥ आप भूमिपति भू तुव नारी महाराज यह सुतातिहारी ॥ सीत द्वार महिते प्रगटानी सीता नाम सुमंगल दानी ३॥ सुनि वर वचन मुदितह राजा वंदेसर द्विज संत समाजा॥ नभते सुमन विबुध गन वरपेचहुँदिशिसकलचराचर हरपे ३२॥

रामरसायन ।
त्रिविध समीर चलो सुखकारी * गिरे मेघ मंडल- चहुँ भारी॥
गगन हेरि सबही हुलसाये * शतानंद तब नृपहि सुनाये३३॥
दोहा-जनकराज तुव सिद्धि भो, सकल काज अब आज ॥
आय गये सुरराज बहु, लीने मेघ समाज ॥३४॥
वेगहिभवन पधारिये, साज समाज समेत ॥
भूपसुता पग धारिये, आतुर राज निकेत ॥३५॥
सुनिवर वचनमहीप मणि, बहु माणि गण धन वारि।।
सुता गोदैलै हरप युत, आये भवन पधारि ॥३५॥
सुभग सुनैना सदनमें, गये भूप हुलसाय ॥
सुतादईतिय गोद मधि, परम प्रमोदअघाय ॥३७॥
महरानी मन मुदितह, मुतालई जब गोद ॥
तब तनुते पय सावित भो, वाढोपरम प्रमोद ॥ ३८॥
ताही छिन चहुँ ओरते, माचि उठे घन घोर ।।
राचि उठे सब रंगमें, नाचि उठे वन मोर ॥ ३९ ॥
वरसन लागे मेघ ज़ल, महि मंडल चहुँ छाय।।
धारा धर धारा अमित, धारन धरनि समाय ॥४०॥
भई पंचदश जामलों, वरपा अमित अखंड ॥
नीर भूरते पूर महि, चहूँ ओर नवखंड ॥४१॥
मिथिला मंडल सकलमें, छायो परमानंद ॥
दुख टूटो सबही भये, जड चेतननिर्द्वन्द्व ॥ ४२ ॥
प्रमुदित प्रजा विलोकि बहु, सुखपायो मिथिलेश॥
शोर होत चहुँ ओरते, जै जै जनक नरेश ॥४३॥
मिथिलापुरवासी सफल, सहित भूप रनिवास ।।
सिया जन्म उत्साह हित, छिन छिन क्यिो हुलास ॥४॥
पे अपार जल वृष्टिते, उत्सव नीकी भाँति ।।
होत घनो वर तदपिहू, जिय उमंग रहिजात ॥ १५॥
इहि विधि पीते पंच दिन, भूमि स्वच्छ नभ देखि ॥
उमड़ो आनंद जनकपुर, सुर नर मुद चहुँ पेपि॥ २६॥

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रामरसायन। (६७) . घनाक्षरी कवित्त । आनंद अथाह सिया जनम उछाह माह गति नरनाहकी न परत पिछानीहै । औरै दान और मान और ज्ञान और ध्यान और प्रीति नीति रीति और प्रगटानी है ॥ रसिकविहारी न्यारी उमँग विलोकि भारी सब नर नारी सत्य येही उर ठानी है ॥ तो अधिकानी या विदेहकी विदेहताई आजकै विदेहकी विदेहता भुलानी है ॥५३॥ सोरटा-इत नृप जनक उदार, ज्यों उमँगे आनंदमें ।। त्यो सिय मातु अपार, दान निछावरि करहिं बहु॥५४॥ येही विधि दिन रेन, जनकनगर उत्साह नित ।। लखि पावे सब चैन छाके, परम प्रमोदमं ॥५५॥ अमित देव मुनि वृंद, सुरी किनरी आदि बहु ।। दरश हेत सानंद, जनक द्वार नित आवहीं ॥५६॥ घनाक्षरी फवित्त । शतानंद हो विधि कौशिक महेश वने जनक स्वरूप त्यों सुरेश निज ठान है ।। अंग ज्यों कुशध्वजको धारत कुवेर त्याही वरुण सुगालयको गात निरमान है । रमिकविहारी नर नारी देव देवी और वपु विरह बहु जैसे मन मानहें ॥ मिस करि आवे सब सीयके दरशहेत भीरमें न कोऊ भेद जाने ना पिछाने हैं ।। ५७ ।। थाय है सुधाची धाय धाय पय प्यावे लदा पद्मा प्रोहितानी है सुनेग निरवारती । किन्नरी नरी है पुरवासिनी सुगीत गांव शारदा सुवा- सिनी व आरती उतारती ।। रसिकविहारी रूप रचिकै रिझावं रती जननी सुखी है शची मीतहि शृंगारती ।। अंग उपटायें नागक- न्या नव नायन है गिरिजा गुसायन है आय नित झारती ॥२८॥ दोहा-अनफललीके शिशु चरित, रूप अनृप ललाम ।। पुर परिजन पितु मातु सक, मुदित लखत वसुयाम ॥९१|| घनाक्षरी कषित। इँगुली सुपीत जाताग ने जटिन मंजुरंगरंग मणिन मट्टामा अंग खूलंह ।। काग चिकनारी शीत लटुर्ग लखान लोनीमानित डिटीना भाल सुखमा अतृलें । निविदाग मग्नान पुग्नान (६८) रामरसायन। सब लेति बलिहारी हेर तेरे हिय फूलहै ॥ कहति अलीसों अली जनक ललीको देख कमल कलीसी भली पालने सुझूलेहै ॥ ६ ॥ दोहा-निरखि सुता मुख मात नित, करै निछावर दान ॥ पुनि पसार अंचल मुदित, माँगै रुचि वरदान ॥६॥ घनाक्षरी कवित्त । शंभु अभिषेक शुचि सविधि करहौं सदा गिरिजा पुजैहौं बाल मुदित मुखी रहै। मोदक चढेहौं गणराजको घनेरे नित्य रसिकविहारी कबौं रंचन दुखी रहै ।। द्विजन जिमैंहौं दान देहौं व्रत लेहौं बहु देवी देव ग्रहन मनैहौं सो पुखीरहै । अंचल पसार प्रात ठिकै निहोरे मात मेरी प्राण प्यारी सिया संतत सुखी रहै ॥ १२॥ चौ-यही भाँति पितु मातु अपारा करत सुकर्म अनेक प्रकारा ॥ बीते कछुक दिवस तब सीता खेलें सखिगण संग पुनीता॥६३|| घनाक्षरी-कवित्त । छोटे छोटे पायनमें पैजनी सु छोटी छोटी नूपुर जु छोटे छोटे रुनझुन बाजैहैं ॥ छोटे छोटे कंकन चुरीहु कर छोटी छोटी छोटे श्रीन छोटे झुमकाहु छबि छाजैहैं ॥ रसिकविहारी छोटी छोटीही सहेली संग छोटे छोटे भूपन बसनसव साजे हैं। धाय जाय आय माय अंक लपटाय सीय खेल हुलसाय मिथिलेश भौन भ्राजैहें ॥ ६४ ॥ मंजन कराय माय सकल सजाय अंग भालपै डिठौना दियो रुचिर सुधारिकै । जनकदुलारी किलकारी दे सखीन संग खेलें धाय धाय मन मुदित निहारिक श्रम जल पाय श्याम बिंदुसो वितारभयो हिय हुलसायो मंजु उपमा विचारिक ॥ रसिकविहारी चंद्र मंडल में एक ओर बैठो अलिछोना मनो पंखन पसारिक॥६॥ दोहा-इहिविधि वाल विनोद बहु, करत सीय मुखदानि ॥ सो विलोकि मुर परस्पर, वचन कहत अनुमानि ॥६६ ।। पनासरी-फक्ति। फूलो हिय कंज मंजुरानी कौशिलाको उत महिपी सुननाइत नलि- सिकविहारी धर्मकोकभो विशोक उत इतहि चकोरी अमित दुलासा ।। असुर अनीत शीत भौति उत दूर भई

रामरसायन।
(६९)
सकल त्रिताप दाप ताप इत नासीहै ।। अवध चहूँघा उत छायोहै
दिनेश तेज इत मिथिलामें चंद्र चंद्रिका प्रकाशीहै ॥ ६७॥
दोहा-यहि विधि सब सुर मुदित मन, वर्णत सिय गुण रूप ॥
जवते प्रगटी भूमिजा, तबते सुगति अनूप ॥ ६८ ॥
घनाक्षरी कवित्त ।
हरप विपाद सुख शोक औ उमंग ब्रीडा कंप तेज जड़ता सुधीर
परसावैहै ।। देवासुर जनक पिनाक राम सिंधु लंक कीश औ हरीश
संत क्रम सरसावै । रसिकविहारी या अनूप गति सारी हेरि छिन
छिन भारी मोद उर वरसावह ॥ जनकदुलारी प्रगटीहैं तबही ते
नित्य शुभाशुभ दोऊ दिन दूने दरशाते हैं ॥ ६९ ॥
दोहा-इहिप्रकार सिय जन्मते, चहुँदिशि होत चरित्र ॥
मनहीं मनते मुदित जे, ज्ञानी परमपवित्र ॥७० ॥
जवतेप्रगटी, सिया, जनकनगरमें आय ।।
तवते सुर मुनि गुप्तह, नित दरशन करिजाय ।। ७१ ।।
एक दिवस नारद प्रगट, आये जनक समीप ॥
ऋपिहि नाय शिर उचित विधि, पूजे मुदित महीप ॥ ७२॥
पुनि वोले नृप जोरि कर,भवन पधारिय नाथ॥
कृपासुता पर कीजिये, हाथ धरिय तिहि माथ ।। ७३॥
मुनि प्रमुदित मुनि वर तुरत, मिथिलाधिपके संग ।।
आये अंतःपुर हिये, वाढ़ी परमउमंग ।। ७४।।
निरखि सुनैना ऋपिहि उठि, सविधि पूजि शिरनाय ।।
लै सीतहि निज अंकते, मुनि पग धरी सुभाय ॥ ७५॥
तव नारद अतिहर्प युत, सियहि लई निज अंक ॥
ताछिन मुनिमन मोद ज्यों, पारस पायो रंक ॥ ७६॥
लखि मुनिवरहि प्रसन्न चित, सविनय कही नरेश।
नाथ मुताके चिह्न लखि, दीजे मोहिं निदेश ।। ७७ ।।
सुनत वचन मुनि मुदित है, नखशिख सियहि निहारि ।।
बोले नृपति विदेह सों, ज्ञानी विमल विचारि ॥७८॥

(७०) रामरसायन। भूप सुताके अमित गुण, कहौं कहा मति मोरि॥ शेपहु भापि सकें न जो, वरण वर्ष करोरि ॥७९॥ तुव पुत्रीके चिह्न जो, परे चरण कर भूप॥ अवधनाथ सुतके सकल, येही लखे अनूप ॥८॥ सुनि त्रिकाल ज्ञाता नृपति, मुनिहि कहो कर जोरि॥ श्रवण करनको चिह्न सो, चाहति मति मोरि ॥८॥ तव मुनि बोले रामके, लक्षण सकल अपार ॥ पैपद करके कछु कहौं, निजमतिके अनुसार ॥ ८२॥ घनाक्षरी कवित्त । स्वस्तिक त्रिकोण २ बाण ३कल्पतरु ४ कंज ५ चक्र ६ बज्र ७ छत्र ८ चौर ९ रथ १० अष्टदल ११ अर्द्धरेप १२ ॥ सिंहासन १३. अंकुश १४ मुकुट १५ हल १६ मूशल १७ श्री १८ वमु १९ अहि २० दंड २१ ध्वजा २२ नर २३ जनमाला २४ लेप॥ रसिकविहारी रेप उरके वाम सोहैं, एक बीस २१ताके दिशि दक्षिणसुदै २ विशेपायहें वीस चारि चिह्न दक्षिणचरण चारु राजै रामचंद्रके मैं मुदित भयो हौं दोप॥८॥गोपदापताकारशंख३ भू४ घट ५ त्रिकोण ६ गदा ७ जंबू ८ जीव ९ सरयू१०छकोन ११ तिल १२ चंद १३ जान ॥ शक्ति १४ वीन १५ त्रिवली १६ पियू- पसर १७ मीन १८ हंस १९ तूण २० धनु २१ वंसी २२ नैनविंव २३ शशिविव २८ मान ॥ द्वादश १२ अनूप सरयूके दिशि दक्षिणहै एकादश १ ताके वाम ओर वर कीनो थान ॥ रसिकविहारी चिह्न चौविस विशाल येई रामपद वाम मैं विलोके मनमोद मान ॥८४॥ चिंतामणि १ कामधेनु २ अरव ३ तुरंग ४ गजकुंभ ६ पटकोण ७ लता ८ चक्र ९ ध्वज १० भाजे हैं। वत्र ११ पंचकोण १२ कंज १३ मंदिर १४ त्रिकोण १५ बान १६ पड़ग १७ त्रिशूल १८ मीन १९ चंद्र २० रवि२१राजहें ॥ अष्टकोणरकुंडलरसमून२४ तिल २५ रंभा २६ कोट २७ माल २८ फल २९ चंद्रिका३०गिरी- श३१ ग्राम ३२ साजैहैं। रलिकविहारी रघुचंदकर दाहिनमें विशद रामरसायन। (७१) वीस वर चिह्न छवि छाजैहें ।। ८५॥ कंकण १ कदंब २ चाप३ अंकुश ४ मलिंद ५ तुला ६ योनि ७ नरमुंड ८ रथ ९ कुंभ १० मणिमाल ११ है। मास १२शक्ति १३ तोमर १४ पयोध १५ म- हि १६कीर १७ केतु १८ नलिनी १९ सरोज २० शंख २१ भानु विव २२ लालहै । पारिजात २३ मंजरी २४ अशोक २५ मृग २६ मीन २७ सिंह २८ तारा २९ सरिता३० पियूपकुंड ३१ शशिवा- ल ३२ है ॥ रसिकविहारी ये वतीस वर चिह्ननते रामको सुवामकर चिह्नित विशाल है ।। ८६॥ दोहा-दोऊ पद कर दुहुँनके, येकहि चिह्न ललाम | दक्षिण वाम जु वाम सो, दक्षिण सीताराम ॥ ८७॥ पुनि मुनि बोले नृपति मणि, सुनौ कहौं दृढ़ बैन ।। राम भामिनी तुव मुता, हहै संशय हैन ।। ८८॥ इनकी प्रभुता जगत्में, Qहै वर विख्यात ।। रूप तेज वल गुण सहित, चिरुजीवै कुशलात ॥८९॥ पनाक्षरी कवित्त । सुंदरी सुरी औ नरी किन्नरी अनूप सदा इनकी सुतीय सबै रहैं अनुगामिनी ।। देव द्विज वृंद संत सुखसर सहैं भक्ति भुक्ति मुक्ति पहें गुण गहें दिन यामिनी ॥ रसिकविहारी हीय मोद उमगहें यश प्रभुता बढेहैं औ कहहैं राम भामिनी ॥धर्म निरौहें पतिव्रतहि दिई- हैं सत्य कंत प्रिय हैहं तिहुँ लोकनकी स्वामिनी ।। ९० ।। दोहा-सुनि भूपति नारद वचन, बोले हिय हुलसाय ।। सुखीरहे संतत मुता, मुनि तव कृपा प्रभाय ॥९॥ इहि विधि मुनिवर दरशल, सियहि दई नप गोद ।। कहि जज कीनो गमन, पुलकित परम प्रमोद ॥ ९२॥ मुनिहि चलत नृपतियसुता, संयुत उठि शिरनाय ।। कही दरश फिरि दीजिये, गेह रावरो आय ॥ ९३॥ द अशीश नारद गये, इत रानी नरनाथ ।। फहत परस्पर मुनि कृपा, भो यह गेह ननाथ ।। ९ ।।

(७२) रामरसायन। AR- , पुनि बोले नृप मुनि जिती, कही सत्य सव सोय ॥ विधि हरि हर नारद वचन, कबहुँ मृपा नहिं होय ।। ९५॥ बैन सुनत पितु मातके, सिय हिय भयो प्रमोद ।। सो दुराय लागी करन, इत उत वालविनोद ॥ ९६॥ सिय लघु भगिनी तीन जे, बहु गुण रूप ललाम ।। कहत मांडवी उर्मिला, श्रुतिकीरति ये नाम ॥ ९७ ॥ ते मिलि सखिगण संगमें, खेल खेल अनूप ॥ चहुँ नृपकन्या सकल अलि, परममनोहर रूप॥९८ ॥ यद्यपि चारहु नृपसुता, हैं गुण रूप प्रधान ॥ तदपि सहिमें जानकी, सुभग शिरोमणि मान ॥ ९९ ॥ मात पिता पुर नारि नर, लखि सिय वालविनोद ।। छिन छिन पुलकित होत हिय, पावत परम प्रमोद ॥१०॥ जबते सिय प्रगटीं अवनि, तबते नृप मतिमान ।। सहस धेनु तिहि हाथते, नितहि करावत दान ।। १०१ ।। अपर दान उत्सव अमित, समय समय अनुसार ॥ सकल यथाविधि होत नित, जिनको कथन अपार॥१०२॥ सिया जन्म दिनते जनक, करत सदा जो दान ।। ता प्रभावते रंक बहु, भये कुबेर समान ॥ १०३॥ धर्म तेज पितु मातको, भाग्यवंत पुनि आप ॥ याते नित प्रति सीयको, छिन छिन बढ़े प्रताप ॥ १०४॥ थोरी वय स्यानी लखत, वल गुण रूप अपार ॥ सकल कला विद्या निपुण, संतत विशद विचार ।। १०६॥ शिशुताई ते सीय हिय, रुचै अधिक वसु ८ रीत ।। दान दयारशुचिश्धर्मध्वल५,प्रीतिरनीतिसंगीत८१०६ इहि विधि जन्म अनूप भो, जनकसुताको जान ॥ शुकृपक्ष नवमी लखौ, माधव मास प्रमान ।। १०७॥ नपत उत्तरा फाल्गुनि, मध्य दिवस गुरुवार । सिंह लग्नमें अवनि ते, सिय प्रगटीं मुखसार ।। १०८॥

रामरसायन। (७३) म० महासुंदरीतंत्र-शोक। नवम्यां शुक्लवैशाखे ह्युत्पन्ना सावनीसुता ॥ सीतामुखात्सा संजाता पालिता जनकेन च ।। १ ।। रामपत्नी महाभागा सीता नामेति विश्रुता ॥ तस्मिन्दिने रामभक्ताः श्रद्धाभक्तिसमन्विताः ॥ ॥ २॥ महोत्सवपराः सर्वे वित्तशाठयविवर्जिताः ॥ गीतवादिन नृत्यायैः रामभक्तिपरायणाः ॥ ३ ॥ नवम्यां सितवैशाखे पुराण- पठनं तथा लक्ष्मीसूक्तं पठस्तत्र याति रामं सनातनम् ॥४॥ सौभाग्यं धनधान्यं च पुत्रसंततिविस्तृतम् ॥ रामप्रसादाल्लभते मुच्यते सर्वपातकात् ॥ इत्यादि । इति श्रीरामरसायन श्रीसीताजन्मवर्णनो नाम सनमो विभागः ॥ ७ ॥ सोरठा-सिय गुण रूप निधान, सखी वृंद संयुत सदा ॥ सकलहीय मुखदान, जनक भवन मधि राजहीं ॥१॥ चौ०-एकसमैसियसखिन समेता विचरतही आराम निकता ॥ वाग विलोकि चहूँ रुचिराई जहाँ सदा ऋतुराज रहाई ॥२॥ अलिन सहित तिहि बाग मॅझारी प्रमुदित फिरत विदेह दुलारी॥ इक रसाल तरु लखि हरपानी कछुक वार तिहि तर विलमानी३ ताछिन इक शुक शुकी अनूपा आये तहँ विचरत वर रूपा ॥ चिठे सो रसालपर. दोऊपरम प्रसन्न शंक नहिं को॥४॥ करत परस्पर केलि कलोल प्रमुदित दुहूँ मनोहर वोलें ।। रुच जोइ सोई घरवानी कह सुन निज निज मनमानी॥ कबहुँ शुद्ध सुर गिरा उचार 0 कयहुँक नखाणी विस्तार ।। कवहूँ शुक भाषा निज बॉल दुहूँ परस्पर जियगति खोला। मधुर शुद्ध बर सुनि शुक वानी मखिन सहित सिय हिय हुलमानी सीता कह्यो जतन सो कीजे सुंदर शुकजोरी गहिलीजाणा वचन सुनत आली इक जाई फंद डारि गहिवेको पाई। शुक उड़ि गयो हाथ नहिं आयो शुकी गहीतनु फॉन फॅनायो।।८।।

रामरसायन। तिहि गहि कनक पिंजरा बरी शुली देखि सिय भई सुखारी ॥ भूषण वसन अमोल नवीने प्रमुदित है सोआलिहि दीने९॥ परि पिंजरा शुकी अकुलानी रोवन लगी दीन कहि बानी॥ हा सुखदान हाय शुरु प्यारे - हा मम जीवन प्राण अधारे१०॥ यौं कहि तलपत पिंजर नाही छिन छिन ताहिकल्प समजाही सिय विलोकितिहिन्याकुल भारील पिंजरचुचुकारि दुलारी॥११॥ फल मेवा पकवान अनेकता मी सरस एकते एका ॥ कना क्योरिन सकल सजाये नीरसहित तिहि निकट धराये१२ शीश धुनै सो पंख पलारी रोजे शुरु विहीन शुक नारी ॥ करू न साप पियै नहिं नौ विलाप सुनिपट अधीरा१३ बोली शुझी दोनई बनी हे लोता तुम परम सयानी ॥ हम पक्षी फस पर हाये हैवल तनावनचारी॥१४॥ ना मै उनि ही सहमती सगर्भ अतिहि बेहाला ॥ गते मोरी दी है दिली जाय शुक्र परमसनेही१५ हाले जनाको हतो कोजातिहि तुम मोहिं सुहानी।। पाले तर परेडगनतेझनिन्यारी१६॥ मई को होने वालेजलिया तजैना ॥ योगमा जानकारी पुनिरोजन लागी३७॥ इन और नर्स गलती चुपाई ॥ भोजर कुलो जिय देविड बुडलेती ८ हैं नाहीं।। सबसन्त रे दुर शाहजनजानता खान र जनामा पानिकाने तुमननारी ॥ साजन माल रेनिमितिलार आई हर पता होस दुलला ।। रिमानी भाबक सदन रत॥ होते जनरूकिसोरी जनजले तो रामरसायन। (७२) बचो फंदते तू उडि भागो ॐ अव बहु वात बनावन लागो। सुनि बोलो शुक सियहि बहोरी तुव हिय होय प्रतीति नमोरी२३ सुनौ सिया शुक मोहिन जानी हौं गंधर्व सत्य करि मानौ । पशी देह हेतु जिहि पाई सकल कहौं वह कथा बुझाई२४॥ परीछंद। गंधर्वलोक मेरो सुधाम । हौं नृत्य गानकारी ललाम || गंधविनी सु यह तीय मोरि। संगीत कला यामें करोरि ॥२९॥ तिय सहित सदा सुरलोक जाउँ। सुरराज सभा सब निशि रहाउँ । तह नित्य होत वर नृत्य गान । गंधर्व अप्सरा जुरहिं आन ॥२६॥ सुरपति रजाय.जब जाहि होय। तब नृत्य गान तह करहि सोय ॥ इहि हेतु सबै हाज़िर रहात । अमरेश सभा नित सकल जात ॥२७॥ इक दिवस तीय संयुत तहाँय। हम गयेनित्य जिहि समय जाय॥ तिहि दिन सभा न आये सुरेशीमो जिय विचार आयो सुदेश २८॥ है अमरराजको अति विलंब । पुनि नृत्यगानकारी कदंब ॥ चलि लखिय आज अमरावतीहि । वर विशद वाटिका भावतीहि२९|| तिहि मध्य विना वासव रजाय। सुर किन्नरादि कोऊ न जाय ॥ याते दुराय गंधर्व देह । शुक रूप धारि हम दुहुँ सनेह ॥३०॥ नभ पंथ होय तहँ जाय दोय । मन मुदित भये आराम जोय ॥ तरुवेलि फूल फल अतिअनूप। मणि हेम धाम शुचि विविध रूप३१ तिहि देखि अमित आनंद फूलि । दुहुँ गये सभाकी सुरति भूलि ॥ लहि विमल धाम पुनि तीय संग । विचरे अपार वाढी उमंग ॥३२॥ उत सभा आय राजे सुरेश। दीनी रजाय मोहित सुदेश ।। दरवार माहिं पायो न मोहिं । थाके समस्त जन जोहि जोहि ।। ३३ ।। तब कियो अमित सुरराज कोप । तिहि समय हीय राखो सुगोप ॥ किन्नर सु किनरी अमित और । ते नृत्य गान ठाने मुटोर ॥ ३४ ॥ इत अर्धनि लग कर विहार । तिय सहित फेर निज देहधार ॥ ही सभा मध्य गवनो सशंका लखि भई इन्द्र ध्रुफुटी वंक॥३५॥ तिहि देखि भयो में अति विहाल । जान्या सतीय आयो जुकाल ||

१७६)
रामरलायन।
-
कहि नाहि त्राहि अकुलाय धाय । शिर धरो जाय सुरराज पाय॥३६।।
सहरोप कही तब इन्द्र मोहि । गुण पाय बढ़ो अभिमान तोहि ।
रेदुष्ट भंगकी नीरजाय। तिय सहित मूढ वध योग आय ॥३७॥
कहु सत्य रहो किहि ठौर आज । क्यों करि विलंब आयो समाज ॥
मिथ्या न बोल तो वचिहि प्रान । नत वध्य होय या छिन निदान ३८
सुनत लई दृढ़ हीय ठान । अब दुहूँ भाँति है प्राणहान ॥
याते असत्य भापी नरंच । सो होय होय जो पूर्व संच ॥ ३९ ॥
यौं ठानि कहो सब सत्य हाल । सुनि भये इन्द्र दुहुँ नैन लाल ॥
बोले सुरेश पुनि अतिसरोप । दुरि कियो दुष्ट तू अमित दोष ॥४०
आज्ञा सुभंग द्वै कीन मोरि । तिय सहित मृत्यु आई सु तोरि ॥
कह करी चरण गहि लीन धाय । अव हती तोहितौ धर्मजाय ॥४१॥
इहि हेतु देउँ तुहि शापदंड। या समय सेप मो अति प्रचण्ड ।।
होखल उलूक तिय सहित जाय । नरलोक विपिन निर्जन बसाय४२॥
सुनि घोर शाप तिय विकल होय । द्रुत गिरी धाय तिन चरणरोय ॥
हौं शरण पाहिबोली पुकार । यह दुसह शाप कीजे उधार ॥४३॥
अवला विलोकि अतिहीं विहाल । पुनि कृपाकीन बहु द्वै दयाल ॥
देवेश तबै बोले सुबैन । मो शाप अन्यथा होय हैन ॥४४॥
पैकहौं लाय दाया सु हीय । हो उलूक ध्रुव पुरुप तीय ॥
सत वर्ष रहौ सो देह दोउ । तिहि अंत फेरि शुकरूप होउ ॥४॥
इमि जन्म मरण भोगौ अपार । शुकयोनि वर्ष पैहौ हजार ॥
पुनि रजक भवन दुहुँप्रगट होयादश सहसवर्प सुख अवध जोय४६॥
सो देह त्यागि नर नारि दोउ । पुनि स्वर्ग लोक तुव वास होउ ॥
इमि इन्द्र शापवश द्वै सदाय । शुकशुकी पुरुप तिय जगरहाय।।४७॥
मुहि पूर्वजन्मको सकल ज्ञान । तुझ निकट सत्य कीनो बखान ॥
याते प्रतीति मन मानि मोरि । सिय देहु वेगि मम शुकिहि छोरि४८॥
दोहा-सुनत कही सिय सखिन ते, शुक अति मोहिं सुहाय ।।
याहूको गहिलेहु तो, दोउरहें यक ठाय ॥ ४९॥

रामरसायन।
सुनि सीता वाणी शुकी, सब विधि होय हिरोस ।
पति वियोग दृढ़ जानिक, तजी प्राणकी आसं ॥५०॥
शिर धुनि धुनि पिंजर विपे, दोऊ पंख पसारि ।।
प्राण त्यागि दीनों शुकी, सवही रही निहारि ॥५१॥
शुक विलोकि निज तिय मरन, रोयो विकल पुकारि ।।
निपट दीनदै रोपयुत, बोलो सियहि प्रचारि ॥५२॥
जनकलली कीनी भली, लये दुहुँनके प्रान ॥
याको फल भल पायहो, कहाँ कहा अब आन ॥५३॥
अवध लेहुँगो जन्ममैं, जाय रजकके भौन ॥
तव याको फल देहुँगो, जाविधि वनिहै जौन ॥ ५४॥
यों कहिकै शुक विकलढे, गिरो धरणिपै आय ॥
हाय हाय प्यारी शुकी, मोहिं गई तजि हाय ।। १५ ।।
बहु विलापकरि छिनकमें, शुकहु तजो निज प्रान ।।
सोलखिकै सिय सखिन युत,कीनी अमित गलान ५६॥
सोच विवश पछिताय चित, भई जानकी मोन।
तिहि कमला पर वाँहदै, चली मंद निजभौन ॥२७॥
पुनि गजल भरिकै सिया, सखिन कही विलखाय॥
सत्यप्रीति की रीति वर, लखी अली यह आय ॥२८॥
सवैया कपित्त ।
चित चाहको चाहक पाय सदा धिग है तिहि फेरि जु चाह विय।।
करि नीके अमीरस पान घनो धिगहै पुनि जो कटुवारि पिये।
जिय चाहै चलो विन प्रीतमके धिग वाहि जुधीर पराव हिये ।।
रसिकेशीकहायक नहीं तव धिगताहि जु मीत विछोह निय९९||
दोहा-यों कहि सिय बोली बहुरि सखि ही अति पछिताउँ ।
माप वनी न वात कछु, आपहि आप लजाउँ ॥६॥
सुनि बोली आली सर्व, स्वामिनि ही मतिमंन ।
होनी होय सु नहिं टर, यों भाप मुब संत ॥६॥

(७६) रामरसायन। कहि त्राहि त्राहि अकुलाय धाय । शिर धरो जाय सुरराज पाय॥३६॥ सहरोप कही तब इन्द्र मोहि । गुण पाय बढ़ो अभिमान तोहि ॥ रेदुष्ट भंगकी नीरजाय। तिय सहित मूढ़ वध योग आय ॥३७॥ कहु सत्य रहो किहि ठौर आज । क्यों करि विलंब आयो समाज ॥ मिथ्या न बोल तौ वचिहि प्रान । नत वध्य होय या छिन निदान ३८ हौ सुनत लई दृढ़ हीय ठान । अब दुहूँ भाँति है प्राणहान ॥ याते असत्य भाषौं नरंच । सो होय होय जो पूर्व संच ॥ ३९ ॥ यौं ठानि कहो सब सत्य हाल । सुनि भये इन्द्र दुहुँ नैन लाल ॥ बोले सुरेश पुनि अतिसरोप । दुरि कियो दुए तू अमित दोप ॥४०॥ आज्ञा सुभंग द्वै कीन मोरि । तिय सहित मृत्यु आई सु तोरि ॥ कह करौं चरण गहि लीन धाय । अव हतौं तोहिं तौ धर्मजाय ॥४१॥ इहि हेतु देउँ तुहि शापदंड । या समय सेप मो अति प्रचण्ड ॥ होखल उलूक तिय सहित जाय । नरलोक विपिन निर्जन बसाय४२॥ सुनि घोर शाप तिय विकल होय । द्रुत गिरी धाय तिन चरणरोय ॥ हौशरण पाहिबोली पुकार । यह दुसह शाप कीजे उधार ॥४३॥ अवला विलोकि अतिहीं विहाल । पुनि कृपाकीन बहुवै दयाल ॥ देवेश तबै बोले सुवैन । मो शाप अन्यथा होय हैन ॥४४॥ पैकहीं लाय दाया महीय । हो उलूक ध्रुव पुरुप तीय ॥ सत वर्ष रही सो देह दोउ । तिहि अंत फेरि शुकरूप होउ ॥४५॥ इमि जन्म मरण भोगी अपार । शुकयोनि वर्ष पही हजार ॥ पुनि रजक भवन दुहुँप्रगट होयादश सहसवर्प सुख अवध जोय४६॥ सो देह त्यागि नर नारि दोउ । पुनि स्वर्ग लोक तुव वास होउ ॥ इमि इन्द्र शापवश है सदाय । शुकशुसी पुरुप तिय जगरहाय।।३७ मुहि पूर्वजन्मको सकल ज्ञान । तुझ निकट सत्य कीनो बखान याते प्रतीति मन मानि मोरि । लिय देहु वेगि मम शुकिहिछोरि दोहा-सुनत कही मिय मसिन ते, शुक अति मोहिं सुहा याइको गहिलेहु तो, दोउग्ह या ठाय ॥ , रामरसायन। (८१) दोहा-श्रीसीतापति पद कमल, वंदों मन वच काय ।। जाकी कृपाकटाक्षते, सकल चरित दरशाय ।।३।। जवते प्रगटी जनकजा, जनकनगरमें आय ॥ तबते अति आनंद चहुँ, अधिक अधिक अधिकाय ॥२॥ सिय गुणरूप अनूप लखि, कहत यहै सब लोग ॥ अब सुख तब जब सुभग वर, मिलै जानकी योग ॥३॥ जनकसुता गुणरूप वल, प्रतिदिन बढ़त अपार ॥ सो विलोकि पितु मात उर, आवें व्याह विचार ॥४॥ पै नारदके वचन उर, घरेसिया पितु मात ।। याते धीरज राखि अति, उर प्रति दिन उमगात ॥५॥ होम दान पूजन विविध, सिय मंगल हित नित्त॥ करत रहत नृपरानि दुहुँ, श्रद्धा सहित सुचित्त ॥६॥ येही विधि निशि दिवस सब, प्रेम मगन नर नारि ॥ सिय विवाह अभिलाप हिय, रहे सकल जन धारि ।। ७॥ चौ एक दिवस नृपरानिसमेता के प्रमुदित बैठे रहसि निकेता ॥ ताछिन सिया मात सुखदानी बोली पतिहि जोरि युगपानी॥८॥ कंत मोहि यह परम उमाहा हग भरि कलखों सिय व्याहा॥ याते जतन कीजिये सोई से सम सम्बंध वेगि जिहि होई ॥९॥ रानी वचन सुनत मिथिलेशा हर्पित बोले वचन सुदेशा॥ प्रिया धीर धारी मन माहीं ॐ ईश कृपा कछु दुर्लभ नाहीं ॥१०॥ यों कहि भूपसभा मधि आयेको मान सहित जन सकल बुलाये ॥ पुनि बोले. नृप सवहि सुनाई धर्म नीति मय गिरासुहाई ॥११॥ है सीता अयोनिजा कन्या * प्रगट भई अवनीतल धन्या।। ताको गुण वल तेज अपारा के सबहि विदित काकरी उचारा॥१२॥ सो गुरु सुहृद सचिव पुरवासी * सब मतिवंत ज्ञान गुण रासी। सजन सकल सुमतिअनुसारा सीय व्याह कर करो विचारा १३॥ जनक वचन सुनिसब हरपाने के धन्य धन्य कहि नृपहि वखाने । ता छिन शतानंद वरज्ञानी बोले नीत धर्ममय वानी ।।१।।

(८०)
रामरसायन।
चौ०-यौं कहि धाय विदेहदुलारी मंजूपा सह
जबलग मातु गहै सिय जाई * तबलगधनु
निरखि मातमन विस्मय भारी चकित भई र
रानी तुरतहि नृपहिं बुलाई कही सकलगति
भूपति भूमिसुता वल देखी ॐ प्रगटो उर
ईश चरित्र विचित्र विचारी नृपरानी!
पुनि पुत्रिहि गहि जनक सुनैना करचूमें
करी सिया यह कह लारकाई * मुरकी हो
यौं कहि वार बार नरनाथा कै लखत
हरपितढे बोले अवनीशा की
है यह वात अमित भी ताकी का
यौं कहि भूपति विप्र बुलाई १ र
मणि भूपण पट वित्त अपारा*
आये जनक नगर नर नारी*
जो जो सुनै सुविस्मित होवें है
इहि विधि युगलयाम दिन आयो
तबं सिय मात सियहि लै संगा
कार मंजन शृंगार शुचि सार्ज
इष्टदेव कुलदेव सप्रीती
गीत वाद्य भोजन युत द
इहि विधि कुलपति पूजन
प्रमुदित हृदय सकल नर
दोहा-यौही नृपति
होत रहता
इति श्री
इति श्रीमद्रमि

रामरसायन। (८३) . दोहा-दै पत्री इहि भाँति चहुँ, भेजे दूत अपार ॥ सिय गुण रूप विदेह प्रण, विदितभयो संसार ॥२८॥ सुनि मानी महिपाल वहु, विपुल बली हुलसाय ॥ आये मिथिला नगरमें, निज निज साजसजाय ॥२९॥ सन्माने सवही जनक, यथा उचित शुचिं भाय ।। पुनि दरशायो चाप नृप, निज प्रण सकल सुनाय॥३०॥ लखि कोदंड अखंड अति, परम प्रचंड उदंड ॥ भूप महावर बंडते, हृदय भये शत खंड ॥३१॥ कोऊ नृप लखि दूरही, रहे न लायो हाथ ।। कोऊ भूपति हेरिकै, चापहि नायो माथ ॥३२॥ कोऊ अतिमानी सुते, गहि बल फियो अपार ॥ रंचहु डगो न शंभु धनु, रहे मानि हिय हार ॥३३॥ कोऊ धनु गरुतासुनत, गवने नहीं सुठाम।। कोऊ आवत बीचते, लौट गये निजधाम ॥ ३४॥ कोऊ हठि सिय लेन हित, ठानो कुटिल विचार ॥ युद्धकियो मिथिलेश ते, तऊ न पायो पार ॥ ३५ तन मन धन जन मान गुन, ज्ञान सान घनकान । खोय गये निज निज संव, रावणसे बलवान ॥३६॥ याही विधि आ सदा, जनकनगर बहु भूप ।। चाप डगत नहिं काइते. खोय जात सब रूप ॥३७॥ जनक नगर नित रनि दिन, भारी भीर रहात ।। चहूँ ओरके भूप वर, इक आवत इक जात ॥३८॥ पुनि भेजे नृप पत्र वर, नफल मुनिनके धाम ।। आये कौतुक लखनको, धनप यन अभिराम ॥३९॥ येही विधि बहु दिवसलों, आये बली अपार ॥ डगो चाप नहिं जनक तय, दुखित भये हिय हार ।।2।। निशि दिन नृपगनी नकल, पुरजन देव मनाय ।। कद लियाको व्याह पर, निरखं ईश महाय ॥१॥ दति भीगमरनापन का०वि० अनुपपतारन ना नाम मोरिनाम: 15 -

८२)
रामरसायन।
दोहा-धेनु सुता तिहुँलोक में, हैं दोऊ अति दीन ।
इनको दुख सुख रहतहै, संत स्वामि आधीन ॥ १६ ॥
कन्या धेनु दुहूँनको, देय सुठौर कुठौर ॥
याते अधिक न है कहूँ, पुण्य पाप का और ॥१६॥
पुनि वर कन्या रूप बल, कुल गुण तेज निहारि॥
यथायोग जहँ होय तह, कोजे व्याह विचारि ।। १७ ।।
शतानंदके वचन सुनि, बोले जनक नरेश ॥
परम कृपाकरि आप यह, दीनो वर उपदेश ।। १८ ॥
सो शिर धरि उपदेश यह, कहीं यथा रुचि मोरि ।।
सुनि मुनि उचित विचारि हिय, करिय रजाय वहोरि ।। १९॥
सहज उठायो सीय जो, चाप विदित सो बात ॥
याते मेरे हीयमें, यह विचार ठहरात ॥२०॥
सुर नर वर कोऊ जु यह, चाप चढ़ावै आय ॥
सो सुयशी सुकृती मुदित, सियहि व्याहि लैजाय ॥२१॥
चौ०-जनकराजकी सुनि वर वानी सभा वृंद बोले शुभजानी।।
भूप बात यह भली बिचारी धर्म नीति दुहुँ रीति सुधारी॥२२॥
सुनि पुनि वचन जनक हरपाई बोलि सचिवगण कही बुझाई ॥
सिया व्याह हित हम प्रण ठाना आजहि ते यह सत्य प्रमाना२३॥
जो बरबीर पिनाक उठावै १* *जै २ तौलै ३ तनै ४ चढावै ॥
पंचकर्म मधि एकहु करई 8 मुदित देहुँ सीता सो वरई ॥२४॥
यह प्रण सत्य सकल संसारा वैगि यथोचित करौ प्रचारा ॥
अरु सब धनुप यज्ञ कर साजा*साजहु अमित करो महराजा २६॥
नृप रजाय सुनि सचिव प्रवीना * बहुजन बोलि निदेश सुदीना ।।
सजो वेगि सव साज सचेता * लिखे पत्र पुनि रीति समेता२६॥
घनाक्षरी-कवित्त ।
प्रगट भईहै एक कन्या अवनीते चारुसोई मिथिलाधिराज पुत्री
प्रिय प्रानको ॥ गुण बल तेज रूप अमित अनूप यात भूपति
दिढाई बात परम प्रमानकी ॥ रसिकविहारी शंभु चाप अति भारी
ताहि तोलन सम) होय काहू बलवानकी ।। आय वरवीर तो चढाव
धनु छात्र यश मोद उपजाये व्याहि जवि दे जानकी ॥ २७ ॥

रामरसायन।
(८३)
दोहा-दै पत्री इहि भाँति चहुँ, भेजे दूत अपार ।।
सिय गुण रूप विदेह प्रण, विदित भयो संसार ॥२८॥
सुनि मानी महिपाल बहु, विपुल बली हुलसाय ॥
आये मिथिलानगरमें, निज निज साजसजाय ।। २९ ॥
सन्माने सवही जनक, यथा उचित शुचि भाय।
पुनि दरशायो चाप नृप, निज प्रण सकल सुनाय॥३०॥
लखि कोदंड अखंड अति, परम प्रचंड उदंड ।।
भूप महावर वंडते, हृदय भये शत खंड ॥३१॥
कोऊ नृप लखि दूरही, रहे न लायो हाथ ।।
कोऊ भूपति हेरिक, चापहि नायो माथ ॥३२॥
कोऊ अतिमानी सुते, गहि बल कियो अपार ॥
रंचहु डगो न शंभु धनु, रहे मानि हिय हार ॥३३॥
कोऊ धनु गरुता सुनत, गवने नहीं सुठाम ।।
कोऊ आवत वीचते, लौट गये निजधाम ॥३४॥
कोऊ हठि सिय लेन हित, ठानो कुटिल विचार ॥
युद्धकियो मिथिलेश ते, तऊ न पायो पार ॥३५
तन मन धन जन मान गुन, ज्ञान सान बनान।
खोय गये निज निज संव, रावणसे बलवान ॥३६॥
याही विधि आ सदा, जनकनगर बहु भूप॥
चाप डगत नहिं काहुते. खोय जात सब रूप ॥३७॥
जनक नगर नित रनि दिन, भारी भीर रहात ॥
चहूँ ओरके भूप वर, इक आवत इक जात ॥ ३८॥
पुनि भेजे नृप पत्र वर, सकल मुनिनके धाम ॥
आये कौतुक लखनको, धनुप यज्ञ अभिगम ॥३२॥
येही विधि बहु दिवमलों, आये बली अपार ॥
डगो चाप नहिं जनक तय, दुखित भये हिय हार ॥2॥
निशिदिन नृपगनी नकल, पुरजन देव मनाय।।
पद मियाको व्या वर, नि ईश महाय ॥४॥
दगी भीगमरनापन मा०वि० नुसरतान
गनी नाम पनाविभागः ॥ 5 ॥

(८४)
रामरसायन।
चौ०-दिशि दिशिते बहु ऋपिगण आये मिथिला चहूँओरसब छाये
विश्वामित्र : महामुनि ज्ञानी * धनुषयज्ञ दरशनमतिठानी ॥
पै मुनि मन अति खेद रहावै * पूरण होम होन. नहिं पावै ॥
अनल धूम लखि निश्वर भारी * करैं विघ्न ऋषि रहैं दुखारी ॥२॥
कौशिक मुनि मन सोच अपारा 2 किमि पूरण मख होय हमारा ॥
पुनि ऋपिराज सुहीय विचारी * जाते बनै यज्ञ रखवारी ॥३॥
व प्रसन्न मुनि अवध सिधाये * दशरथ राजद्वार पहँ आये ।
मुनि नरेश उठि आगे आने * करि प्रणाम पूजे सनमाने ४ ।
सिंहासन पर मुनि पधराये * वेगि चारहू कुवँर बुलाये।
ऋपि चरणन मेले तिन भूपा ॐ कौशिक भये मगनलखिरूपा
सो०-पुनि करजोरि बहोरि, भूप सभाशिर नायकै ॥
कियो प्रणाम निहोरि, मुनि अशीश सबहीदयो॥६॥
पुनि वसिष्ट द्विजवृंद, मिले यथोचित कौशिकहि ॥
बूझि कुशल सानंद, निज निज थल बैठे सकल ॥७॥
तव कर जोरि वहोरि, भूप कही ऋपि राजसों॥
कीनी कृपा करोरि, नाथ मोहिं दरशन दियो ॥८॥
जो कुछ होय रजाय, सो शिर धरि वेगै करौं ॥ .
सुनि कौशिक हुलसाय, वोले दशरथ रायसों ॥९॥
यज्ञ न पूरण होत, याते हम अति दुखित हैं ।
सदा निशाचर गोत, विघ्न करत हैं आय बहु ॥१० ॥
याते तुब सुत राम, लपण देहु खल दलन हित ॥
हो परिपूरणकाम, सुयशरहै तिहुँ लोकमें ॥ ११ ॥
सुनि मुनि वचन नृपाल, विकल भये बहु शोचवश ॥
पुनि धरि धीर उताल, कझो कौशिकहि जोरिकर ॥ १३
नाथ वाल रघुनाथ, युद्ध कहा जाने अवै॥
सजि अनीक प्रभु साथ, ही चलि मख रक्षा करीं ॥ १३
मुनि बोले मुनि चन, हम कानन वामी तपी॥
मंगलेय नदि मैन, गम लपण याचत तुमैं ॥ १४ ॥

रामरसायन. (८५) मुनि चुपरहे नरेश, तब वसिष्ठ बहु भाँतिते॥ नृपहि दियो उपदेश, ज्ञान धर्म वर नीति कहि ॥ १५॥ तब द्वै मुदित भुवाल, कहो कौशिकहि जोरि कर। दुहूँ रावरे वाल, लै निज संग सिधारिये ॥१६॥ पैजो होहि रजाय, राम सखा सँग रहहिं तो॥ सुनि बोले मुनिराय, नृपशंका निरवारिकै ।। १७ ॥ चौ सुनिय अवध पति वचन हमारे तुव सुत सकल प्राणते प्यारे ॥ याते राम लपण हम याचे निरखे सवै प्रेम पन साँचे १८॥ लपण रहें रघुवरके संगा * संयुत प्रीति प्रतीति उमंगा। और समाज साज नहिं कोऊ ॐ केवल चहियभूपसुत दोऊ१९॥ रंचहु कछु कलेश नहिं पहें ॐ गृहते सरस सुखी नित रे हैं। ज्यों सुत हैं तुव प्राण अधारे तिहितेअधिक मोहिंदुहुँ प्यारे२० सुनि भूपति दुहुँ सुतन बुलाई धर्मनीति रणरीति शिखाई ॥ कह्यौ जाहु सँग दोऊ भाई निज पितुगुरुजानी ऋपिराई२१ सुनि प्रमुदित पितु पद शिरनाई ले धनु वाण सुअंग सजाई ।। चरण वंदि सब मातन केरे * दई धीर कहि वचन घनरे २२॥ बंधु सखन मिलि मिलि बहुवारा ॐ नृपहि कियो पुनि आय जुहारा।। पुनि प्रोहित द्विज वृंद समेता वंदन किये सुबुद्धि निकेता २३॥ तब भूपति दुहुँ सुत उर लाये गद्गद कंठ नैन जल छाये॥ बोले मुनिहि दीन फरजोरी सुनिय नाथ यह विनती मोरी२४ सो उपाय कीजे मुनिनाथा निरखी वेगि लपण रघुनाथा॥ यो कहि दुहुँ सुत कर गहिराई मापे मुनिहिं प्रतीत दिवाई२५॥ सहित समाज ऋपिहिनृप वंदे पुनि मिलि द्विज गुरु मकल अनंदे दे अशीश भूपदि मुनिनाधा चले राम लछमनले माधा२६ तामाउंद। ले राम लछमन. नंग ॥ पनि चले पुलस्नि अंग ॥ मग जातदों अपीच ॥ लखि नाड़का तिय नीच ॥ २७ ॥ आई सुप्रेरितकाल | थाई नकोर गल॥

(८६) रामरसायन । तान॥ बंधु प्रवीन ॥ लखि कही कौशिक राम ॥ इहि हतौ यह खल वाम ॥२८॥ रघुवीर आयसु मान ॥ मारो जु इक शर तनु भयो प्राणविहीन ॥ लखि दीन तिहि गतिदीन ॥ २९॥ तिहि वध विलोकि मुनीश ॥ रघुवरहि दीन अशीश ॥ दुहुँ वंधु हिय हुलसाय ॥ लीने सुहृदय लगाय ॥ ३० ॥ पुनि दुहुँनको ऋपि भूप ॥ दीने सु अन्न अनूप ॥ विद्या सु और अनेक ॥ इकते विशद वर एक ॥३१॥ मुनि राम लपणहि दीन ॥ भे दुहूँ बंधु तनु तेज बल सरसान ॥ उर अमित सुख दरशान॥३२॥ पुनि आश्रमहिं निज आय ॥ मुनि कही अब रघुराय ॥ हम कहिं यज्ञरचाय ॥ दुहुँ बंधु रहहु सहाय ॥ ३३ ॥ है सजग नृपति किशोर ॥ दुहुँ वीर वर वर जोर ॥ मखपाल भये उतंक ।। मुनि कियो यज्ञ निशंक ।। ३४॥ दिन पंच मख मुनि कीन ॥ जब पूर्ण आहुति दीन ॥ तर उठो धूम अपार ॥ भो गगन लों विस्तार ॥ ३५॥ अपलोकि नभ मख धृम ॥ धाये असुर करि धूम ॥ मार्गन दल गुत नीच ॥ आयो सुबाहु समीच ॥३६ ।। कीन अमित उतपात ॥ तम च्यो कछु न दिखात ॥ वाप उपल मल धुरि ॥ दशहँदिशा भार परि ॥ ३७॥ नम भूमिमें नहुँ ओर ॥ बहु घोर छायत शोर ॥ किन न मोर जनात ॥ दुई गंधु अति अकुलात ॥ ३८॥ मा मग्न शर ीर ॥ छोड़ो नकोप नमय नम नाग ॥ भो दशदिशादि प्रकाश ॥ ३९॥ नाग निर बार ॥ नागन लागमनाय ॥ RE: पग जलनिधि पा॥1॥ भायंदना दिगि गोप ॥ सुधीर ॥

रामरसायन। (८७) - लगि अनलशर कर दाहु ॥ भो भस्म वीरं सुबाहु ॥ पुनि अपर दलहि सँहार ॥ कीनो सु पलक मझार ॥४३ इंहि भाँति मारि सुरारि ॥ दुहुँ बंधु अंग सम्हारि ।। आनंद हिय हुलसाय ॥ आये गहे गुरु पाय ॥ ४४ ॥ हिय लाय मुदित मुनीश ।। दुहुँ दीन अमित अशीरा ॥ आकाश अवनि मझार ॥ चहुँ भयो जैजैकार ॥ १५॥ इहि भाँति ऋपि मखपाल ।। बोले दुहूँ रघुलाल ॥ अब और काह रजाय ॥ सो भापिये मुनिराय ॥४६॥ दोहा-सुनि बोले कौशिक हरपि, सुवल तिहारे राम ॥ निरखि यज्ञपूरण भये, हम परिपूरण काम ॥४७॥ सुनि दुहुँ बंधु सुजोरि कर, कही सकुचि शिरनाय ।। बन बाल ते काह यह, सब रावरो प्रभाय ॥४८॥ तब दोऊ नृप सुतनसों, बोले पुनि सरबज्ञ ॥ चली जनकपुर देखिये, रचो जनक धनुयज्ञ॥१२॥ सुनि आज्ञा मन मुदित ह, गुरु पद नायो माथ ।। चले जनकपुर बंधु दुहुँ, कौशिक मुनिके साथ ॥५०॥ चले गाधिसुत मुदित मग, वर्णत बहु इतिहास ॥ रामलपणमुनिजन सकल,सुनि हिय होत हुलास५१ इहि विधि आये विपिन इक, लखी उपलमय बाम ।। पूछो भेद सु मुनिहिसे, चकित चित्त राम ॥५२॥ विश्वामित्र प्रसन्न है, कही मुनी रघुनाथ ॥ यह तिय पादन जिमि भई, वर्णत ही सब गाथ ॥ ५३॥ नी-गीतम ऋपि सर्वज्ञसुजाना जिनकी कीरनिविदिन जहाना। है तिनही मुनिकी यह वामा अति सुंदरी अदल्या नामा। या मिलि फियो अमरपति पापा.. उपल भई निज पतिक भापा ।। ताको फल सुरेश भल पायोजो मदनभा नामकहापार। ऐफ मम मगज निधायेगौतम भवन दिन आये।। लखिमुनिनारिनिपटमन लाने मननिज विवापिन अतिधोनर (८८). रामरसायन। . तहते गये विकल निज धामा ॐ सुरपति हिये वसी मुनि वामा । पुनि वासव दृढ़ युक्ति विचारी *.जाते मिले अहल्यानारी॥१७॥ ऋषि आश्रम आये सुरराया * अधनि कीनी यह माया ।। कछु उजासभो प्रात समाना बोलन लगे पक्षिगण नाना५८॥ मंजन समय जानि मुनिराई गये वेगि तिय सदन विहाई ॥ ताही दिन ऋतुते मुनि नारी * भई पुनीत रीतयुत सारी॥५९॥ सून भवन जब सुरपति देखा तव आये करि गौतम भेपा॥ सोमुनि तिया इन्द्र पहिचानो 8 पै चुपरही मदन उमगानो६०॥ लखि बोली हँसि बचन सुहाये * आज वेगि मंजन करि आये ॥ सुनि मुनि कपट वेप सुरराई * कहे बचन बहु प्रीति बढाई६१॥ तव दोऊ अनंग उमगाई * कियो विहार वेगि भय छाई ॥ तहते बहुरि रूप सोधारे *सुरपतिशंकित चलन विचारे६२ तव तिय कही सुनिय सुरराई * निज मम रक्षा करहु सदाई॥ जो मुनि भेद रंचहू पैहैं हम तुम दुहुँके प्राण नशै हैं६३ तब सुरेश वोले तिहि पाही रहौ निशंक शंक कछु नाहीं॥ या कहि इन्द्र तियहि उरलाई ॐ कढ़े वेगि गृहते सचुपाई ॥६॥ इत यह इन्द्र कियो छल भूरी उत ऋपिगये जवहिं कछु दूरी।। तव नभ दिशि हेरे मुनि ज्ञानी हैवहु निशा अवहिं यह जानी ६५ दैि विस्मित धरि ध्यान मुनीशा देखो सो जु कियो सुरईशा ॥ क्रुधित वेगि निज भवन सिधारे वासव कढत लखो वपु धारे६६|| तब मुनीश कटु वचन उचारी इन्द्रहि दई शाप अति भारी॥ रेखल वृपण नष्ट होजाई भग सहस्र तो तनु प्रगटाई६७।। तुरताह वृपण गिरे तर ताके सुरप विकल भो विवश विथाके।। नत्तण भग सहव मब अंगा प्रगटे खावित रुधिर अभंगा६८ दुखित होय मुरपति गृह गयउ गौतम तियादि शाप तब दयऊ।। दा अपमा तुर उपल शरीरावन बसि मंद पवन तप नीरा६९ दादा-मुनत शाप निय विफल ह, गिरी चरण प धाय॥ गेई दीन अधीन गड, पिनय फग मनभाय || ७० ॥

रामरसायन। (८९) तब दयालु है मुनि कही, होय न मिथ्या शाप । पुनि कछु दुख भोगे बिना, मिटै नहीं तुव पाप ॥७१ ॥ याते पाहन रूप है, वन कछु काल रहाय ॥ पुनि राघव पद परसते, होय शुद्ध हरपाय ॥ ७२ ॥ इत तिय मुनिवर शापते, भई सुपाहन रूप ॥ वृपणहीन तनु भगनते, उते विकल सुरभूप ॥ ७३ ॥ लजा विवश न धामते, कवहूँ कढ़त सुरेश ।। भग सहस्र तनुमें भये, लागत निपट भदेश ।। ७४॥ वासव व्याकुल देखिके, सकल देव समुदाय ॥ करि विचार ले मेपके, दीने वृपण लगाय ॥७२॥ पुनि सव सुर गंधर्व मुनि, देवराज लैसाथ ॥ आये गौतम निकट बहु, विनय करी सुरनाथ ॥ ७६ ॥ तव मुनि बोले इन्द्रसों, घोर पाप तुव आय ॥ या कारणते चिह्नतो, रहें अंग सदाय ॥७७॥ सहखभगते सकल, दृग होवें अभिराम॥ रह एक भग अंगमें, तीन होय तुव नाम ॥ ७८॥ मेप वृपण इक दूसरो, हो सहस्त्र भग जान ॥ सहसनैन पुनि तीसरोसुरपति नाम प्रमान ॥ ७९ ॥ वर प्रभाव भग दृगभये, सुरहे पूरण काम ॥ मुनिहिवंदि वासव सहित, सकल गये निज धाम ॥ ८॥ मो सुरेश शुचि सुखी, अब यह पाहननारि ॥ तुव पद रजके परशकी, रही आश उरचारि ।। ८१॥ याते अब रघुवीर इहि, वेगि सुपद परशाय ।। कंग अदल्या शुद्धता, पुनि पनि सेंब जाय ।। ८२॥ गुरु आज्ञा सुनि सकुचिक, राम सकल गुणधान ॥ निज पद परमायो तुरत, भई शुद्ध वर वान ।। ८३॥ मुनिगण जैजैकार किय, तिय दिय अति दम्पानि ।। फरी अदल्या विनय बटु, दीन जारि दुगपानि ।। ८१ ॥ - - गनरलायन। अन्तुति करि शिनाय उत, गई वाम पति धाम ॥ जनकनगर नमने इत, मुनि सँग लछमरनाम ॥ ८५॥ सुरसरि आदिक बहु कथा, कही सुनी हरपाय ॥ मुनि दुहुँ नृपनुत जनकपुर, पहुँचे मुख सरसाय ।। ८६॥ लखि सब भाँति सुपास थल, शुवि रसाल आराम ॥ दुहुँ बंधु मुनि नहित मुनि, फियो तहाँ विधाम ॥ ८७।। इति श्री. रा. २० वि०वि० विश्वामित्र आगमनवर्णनो- नान द्वितीयोविभागः ॥२॥ दोहा-कौशिक आगम सुनि जनक, शतानंदलै संग ॥ संयुत सकल समाज शुधि, आये भर उमंग ॥ १॥ मुनिहिं ययोचित बंदि पुनि, तब सब कियो प्रणाम ॥ कुशल प्रश्न कार परस्पर बैठे निज निज ठाम ॥२॥ मुनिहिं प्रशंसि महीपमणि, पुनि निज विनय नाय ॥ निरखि रामदिशि नेह युत, बझा हिय हुलसाय ॥ ३ ॥ पनासरी-ऋविन। तरस सलोने लोने रूप अनहोने दोर मनु मृग छोने ने कोने जग जो है ये । निर्गख अनंगदंग हो। यो मुटंग अंग आनंद अभ गते उमंग संग नहिये । वरने उमेह मह नेहको अभेद देखि देव पर कोद पविदेश मन मोहं ये । रमिकविनारी मुलकारी धन वान धाग पित्तनानि गुगल किशोर या कोई ये॥॥ मो-मुनि मनद पुतन, मंडलीमनिला नागो।। पनि नायिका मनि नि, गोल दिप लागनार ॥५॥ मन-किन। को मानी रिसीमामी भाग रामरसायन। दोहा-यौंकहि पुनि कौशिक सकल, कथा सहित विस्तार ॥ वरणी जनक नरेशसों, प्रमुदित वारंवार ॥७॥ चौ०-सुनिमुनिवचन भूपहुलसाये उठि दुहुँ बंधु सु अंक लगाये अवधनाथकी सव कुशलाई ॐ पूछी राम सु सकल सुनाई॥८॥ शतानंद सुनि मात उधारा पायो उर आनंद अपारा॥ उमॅगि होय दुहुँ नृपसुत भेटे दुसह शोक संभव दुख मेटे ॥९॥ पुनि मुनि मुनिहि प्रशंसन लागे * सरस सनेह परस्पर पागे । शतानंद अति हिय हुलसाई * सवाहि गाधिसुत कथा सुनाई१० प्रथम रहे कौशिक वर भूपा शोभित राज समाज अनूपा॥ सबल सेन चतुरंग अपारा सकल साज वरण को पारा११॥ एक समय वर विपिन मँझारी * करि अहेर अति भये सुखारी॥ कछुक दूर चलि लखि शुचि ठामा दल समेत कीनो विधामा१२ सो आश्रम वशिष्ट ऋपि रहहीं जो विधिपुत्र विदित जग अहहीं।। सुनि महीप प्रमुदित तहँ जाई दरशलये सादर शिरनाई॥१३॥ नृपहि यथोचित ऋपि सनमाने भप बहोरि पाहुने जाने । याहित वर विचार मुनि कीना राजहि सदल निमंत्रणदीना १४ मुनि आज्ञा शिर धरि नृप आये ॐ मनही मन विस्मित सचुपाये। इत वशिष्ट ढिग ऋधि सिधिधामा कामधेनु सबला जिहि नामा १५ सो वशिष्टकी आयसु पाई ॐ सौंज यथोचित बहु प्रगटाई । असन वसन भूपण धन धामा दासी दास अमित अभिरामा१६ सुर दुर्लभते सकल पदारथ 3 अगणित उचित अनुपयथारथ इहिविधि सवला साज सजाई करी सदल कौशिक पहुनाई १७ नृत्य गान भोजन बहु भोगाइ सबनिशि पगे भुप सब लोगा। प्रातहोत सो फछुन दिखाना र विश्वामित्र आचरजमाना||१८| निरखी भूप अमित प्रभुताई मनहीं मन विस्मय अधिकाई। वगि वशिष्ट निकट तब जाई करि प्रणाम बैठेसचुपाई ॥१२॥ चपल चित्त चहुँ इत उत देखी संपति वस्तु न कछ कहुँ पेन।।। परन कुटी वल्कल इक गाई में दंड कमंडलु यही लम्बाई २०

(९६)
रामरसायन।
अमित अन्न कौशिक प्रगटाये * नवल लोक नव धाम वसाये ॥
दूजो स्वर्ग विरचि नृपकाजा राखोतहँ त्रिशंकु ऋपि राजा७७
दोहा-एकवार कौशिक सु यह, महा आचरज कीन ।
जाते गाधिकुमार को, भो सब तप बल छीन ॥ ७८॥
चौ०-पुनि ऋपि पुष्कर तीरथ जाई महा घोर तप प्रवल दिढ़ाई।।
तब हूँ एक विघ्न यह आयो * अंबरीप नृप अवध सुहायो७९॥
करनलगे वर यज्ञ सुदेशा * तिनको मख पशु हरो सुरेशा ॥
सो नृप पशु हेरत चहुँ घाई ॐ भृगु आश्रम पहुंचे अकुलाई८०
तहँ ऋचीक मुनि युत सुत दारा करत रहे तप प्रबल उदारा ॥
तिनके तीन पुत्र लखि राजा ॐ माँगो एक यज्ञ वलि काजा८॥
लघु पुनहि माता नहिं दीनो जेठहि निज ऋचीक कार लीनो।
रहो मध्य शुनशेफ जु नामा सोजानौं हौं एक निकामा८२॥
तब शुनशेफ दीन है भापो से मोहिं लेहु नृप कोउ न रापो।।
सुनि महीप गोलक्ष सुदीनी * गहि शुनशेफहि मारग लीनी८३
भूपति पुष्कर किय विश्रामा सुनि ऋचीक सुत कौशिक नामा।।
ऋपि दिगजाय कहो सब हालाॐ गाधिसुवनलैअतिहि दयाला८४॥
तप बलदै द्वे मंत्र सिखाये * कियो अभै शिर कर परशाये ॥
सो नशुशेफ हीय हुलसायो * अंबरीप सँग अवध सिधायो॥८॥
दोहा-लै शुनशेफहि सविधि जब, बाँधो जुपहि आन ।
तब मुनि सुत सो मंत्र दुहुँ, पढ़े समय अनुमान ॥ ८६ ॥
मंत्र पढ़त सब देवगण, तुष्ट भये सुख पाय ॥
यज्ञ समापत मुनि तनय, बचो सदेह सुहाय ॥ ८७ ॥
दूजो विन जु कौशिकहि, भयो तबै ऋषिराज ॥
पुनि तप ठान्यो प्रबल अति, त्यागि सकल जगकाज ८८॥
एक समै वर अप्सरा, लखि लोभे ऋपिनाथ ॥
बहुत वर्ष तप त्यागिकै, रमन कियो तिहि साथ ॥ ८९ ॥
पट्टी विधि बहु वार ऋपि, कियो अमित तप जाय॥
महि दसह दख, भये विन वह आय ॥१०॥

रामरसायना - चौ०-तप महँ भये विघ्न बहु बारा जाते रहो निफल श्रमसारा।। तऊ न कौशिक तपहि विहाई करीअमित विधि चहुँ दिशिजाई९१ पुनि बहु तप कीना ऋपि कानन तब अतिमुदित भये चतुरानन ॥ आय दियो जिय रुचि वरदाना कहे ब्रह्म ऋपि युत सनमाना९२ तब कौशिक बोले करजोरी ॐ जक्तपिता इक विनती मोरी आय वशिष्ट ब्रह्म ऋपि भा सो कीजे हम यह अभिला ९३ व दयालु विधि वेगहि जाई * कही वशिष्ठहि बहु समुझाई ।। पितु आज्ञावश मुनि तहँ आये बोलि ब्रह्मऋपि भवन सिधाये९४ दोहा-जब कौशिकहि वशिष्ट मुनि, कहे ब्रह्मऋपि आय ॥ तवते गाधिकुमार द्विज, भये सु तपबल पाय ॥ ९५ ॥ यदपि ब्रह्मऋपि वै गयो, तपबलते महिपाल । तदपि सुमिरि पूरवदशा, होय कवौं उरशाल ॥ ९६॥ पुनि बसिष्ट तप तेज लखि, कौशिक कीन विचार ।। जौ लग रहैं वशिष्ठ जग, तौलग मोर नसार॥१७॥ यो हद ठानि विचार हिय, महि विचरत इक बार ॥ मुनि बशिष्ट आश्रम गये, आधीरैनि मँझारि ॥ ९८॥ कुटी निकट तरु ओट गहि, ठाढे करत विचार ।। जो वशिष्ठ बाहर क., तो अब डारौं मार ॥ ९९॥ सो निशि पूरण शरद शशि, छायो विशद प्रकाश ।। लखि वशिष्ट सो शिप्य प्रति, बोले सहित हुलास ॥१०॥ आज शरद शशि चंद्रिका, यों अनूप दरशाय॥ ज्यों कौशिक तप तेज जग, रहो विमल यश छाय॥१०॥ चौ०-मुनिवशिष्टकेवचन सुहाये के काशिकमुनिअति हिय पछिताये विधिसुतकी विलोकि सरलाई गहे पाय पद पंकज जाई १०२ लखि कौशिक वसिष्ट हियलाये मिले परस्पर दुहुँ हुलसाये ।। मुनि मुनि कियो परम दृढ प्रेमा हृदय शुद्ध दोऊ युत क्षेमा१०३ तबते दुहुँ . मुनीशनमाही काहविधि कछु अंतरनाहीं ।। इहिविधि गाधिपुत्र अवनीशा तपबल भये सुब्रह्मऋपीशा१०४ - (९२) रामरसायन। विश्वामित्र : देखि दृढठानी है यह कामधेनु सुखदानी ॥ याहीके प्रभाव मुनिराई १ अनुपम कीनी मम पहुनाई२१॥ यह विचारि नृप अधिक लुभाने को बैन बहु स्वारथ साने । दास जानि मुनि कृपा करीजे से एक वस्तु मुहि माँगेदाज॥२२॥ भूपन,वसन धेनु धन धामा ॐ मणि मुक्ता गज वाजि सुग्रामा। जो भाव सो सब कछु लेहू % मुनि यह कामधेनु मुहि देहू२३ सुनि वशिष्ठ बोले वर बैना कळू वस्तु हम रंच चहना ॥ है सबला यह धेनु अनूपा ॐ सोनदेहिं गवनो गृहभूपा॥२४॥ दोहा-सुनि बहोरि बोले नृपति, सकल राज्य मम लेहु ॥ पै मुनिवर करिकै कृपा, यह सुरभी मुहिं देहु ॥ २५ ॥ तब पुनि कही वशिष्ठ हम, देहि न सबला काहु ।। तुम नृप उचित न याचिवो, यह विचारि घरजाहु ॥२६॥ सुनि कौशिक करि कोप तब, दीनी तुरत रजाय ।। वरवस धेनु छुराय लै, चले हिये हरपाय ॥ २७॥ सोरठा-जब नृप सदल वलिष्ठ, कामधेनु वरखस लई ॥ व्याकुल भये वशिष्ठ, तब निज धर्म विचारिकै ॥२८॥ उत सवला अकुलाय, दृढ बंधन तिहि भंजिकै ॥ धाय परी मुनि पाय, वोली दीन विलाप करि ॥२९॥ अनुचित कीनो काह, जाते त्यागी नाथ मुहि ॥ मुनि बोले मुनिनाह, लिये जात हठकै नृपति ॥ ३० ॥ कहो तबहिं वरगाय, जो प्रभु आज्ञा होय तौ ॥ अमित बीर प्रगटाय, कौशिक दल नाशों सबै ॥३३॥ मुनि सवलाके बैन, प्रमुदित मुनि आज्ञा दई ।। भयो धेनु चित चैन, प्रगटे वीर सुअंगते ॥ ३२॥ यमन अनेक प्रकार, पह्नवादि हुंकारते ।। प्रगटे वीर अपार, विदित जक्त वर्वर सकल ।।३३।। बहुरि शृंगते वीर, विविध किये. उत्पन्न पुनि ।। रोम कूपते भीर, कढी मलेक्षनकी अमित ।।३४॥

रामरसायन। (९३) योनि अंगते भूरि, यवन भये वलवान बहु ॥ रहे विविध भट पूरि, सबला तनु प्रगटायकै ॥३॥ दोहा-पहव सक वर्वर यवन, अरु कंबोज अपार ॥ पुनि हारीत किरात ये, म्लेक्ष सकल 'निरधार ॥ ३६॥ ची०-धेनु अंगते वीर अपारा प्रगटि सकल नृप दल संहारा ॥ नीति जानि भूपतिहि बचायो *सवलाआय मुनिहि शिरनायो३७ पुनि कौशिकके शत सुत धाये सवल शस्त्र गहि मुनि पहँ आये। निराखि वसिष्ट कियो हुंकारा 8 ते सव भये तुरत जरि छारा ३८ लखि कौशिक 8 अमित दुखारीकी गे हिमि निकट सुदुर्ग मॅझारी ।। तहाँ भूप तप कीन अपारा * भये प्रसन्न महेश उदारा ॥३९॥ आय कौशिकहि अस्त्र सिखाये अमित उदंड प्रत्यक्ष दिखाये ॥ लहि बहु अस्त्र भूप हरपाये सहित प्रहार निवारण पाये ४० अग्नि अस्त्र ब्रह्मास्त्र२ प्रचंडा ॐ विष्णुचक्र गन्धर्व ४ उदंडा। कालपाशझ्दै शक्ति६-७सुघोरा वज्र अस्त्र८कापाल९सजोरा४१॥ वरुणअन्न १०असि११शूल १२विलापन १३प्रधापन१४मादन१५संतापन १६ गदा१७शक्ति १८असि१९वाण२०वज२१वरइनहिआदिबहुअवदियेहर४- पाय अत्र वल बहु दल साजा आये पुनि वशिष्ट ढिग राजा। त्रिकालज्ञ मुनिवर विज्ञानी दये अस्त्र शंकर यह जानी४३। तंव वशिष्ट कार कोप प्रचंडा लेकर ब्रह्मदंड वरिखंडा। वेद मात सुमिरन युत गाढे वाहर कुटीद्वार भे ठाढे ॥ ४४ विश्वामित्र मंत्र बलभारी पुनि बहु संग अनीकजुझारी आये मुनि सन्मुख अति ऋद्धा कियो अपार अस्त्रमय युद्धा४५ दोहा-जिते अस्त्र शिवदत्तते, सब घाले नृपचंड ॥ ब्रह्मदंडते मुनि सकल, विन श्रम कीने खंड ॥४६॥ अग्नि अस्त्र ब्रह्मास्त्रजे, घाले नृपति कराल ||. ब्रह्मदंडमें सब मिले, बढ़ी अनल सम ज्वाल॥१७॥ ताप भई तिहुँ लोकमें, सुर मुनि सब अकुलाय ।। मुनि सन्निध द्रुत आय वहु, विनय करी समुझाय ॥ १८

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रामरसायन। (९५) चौ०-करि त्रिशंकु इहि भाँति विचारा के विश्वामित्र निकट पगधारा॥ आतुर जाय गहे ऋपि चरना कहि प्रभु पाहि दीन दुख हरना६३॥ नृपहि सकल बूझी ऋपिराई सो निजगति वरणी अकुलाई॥ भूप बैन सुनि कौशिक वोले वृथा चहूँ इत उत बहु डोले ॥६॥ अब उर धीर धरौ भूपाला ॐ जैहौ स्वर्ग सदेह उताला ॥ यौं कहि यज्ञ साज सजवाये चहुँदिशिते मुनि सकल बुलाये६५॥ ऋपि रजाय सुनि सव मुनि धाये *शत सुत युत वासिष्ट नहिंआये। सोलखिक्रोधकौशिकहिछावा जानत हिये मुनीश प्रभावा॥६६॥ याते नहिं वसिष्ठ हित भापे ॐ दीनी मुतन शाप मन मापे ॥ शतसुत मुनिकेअवहिं नशा सप्तजन्म लघुयोनि सुपावें ॥६७॥ कौशिक शाप देत तंतकाला जरे वसिष्ठ पुत्र शत ज्वाला॥ सोई सब निपाद कुल जाई जनमें नीच कर्म नित पाई ॥ ६८॥ तिन महँ जेष्टपुत्र अभिरामा ॐ रहो अनूप महोदयनामा ॥ सोई राम सखा गुह भयऊ * जन्म निपादभवन जब लयऊ६९॥ पुनि कौशिक इत यज्ञ मुठानाकीने सकल प्रमान विधाना ॥ पे कोऊ मुर तहाँ न आये तव कौशिक बहु क्रोध समाये७०॥ लै जल दर्भ संकलप कीना निज तप फल बहु भूपहि दीना ॥ सो प्रभावते नृपति मदेहा चले अमित प्रमुदित मुर गेहा७॥ देवन लखो मनुज तनुधारी नरपति आवत स्वर्ग मँझारी॥ तव मुरगण बोले अकुलाई भूमि पतन हो वेगि पगई ।। ७२ ॥ दोहा-दुत सुर वचन प्रभावते, पद उ.रध अधशीश ।। स्वर्ग पंधते पलटिक, गिरन चही अवनीश ॥ ७३ ॥ तब विशंकु अति दीन, ऋपिदि कही कर शोर ।। त्राहि त्राहि काशिक जवहि, सुन्यो महा ख घोर।। ७४ ।। निरखि नृपहि आयत अवनि, बोले पीवलिष्ट । गच्छ गच्छ भो भूपवर, निष्ट तिष्ठ ननतिष्ट ॥ २ ॥ ची-पोफदिमनि अमर्प करि भाग रचना करी अनुपम न्यागः। भूपहेतु नगनि चलाईनिज प्रभाव दोनो दाई । ६॥ -

(९४)
रामरसायन।
UNMUKASS
तव वशिष्ठ द्विज दंडको, तेज शांत सब कीन ।।
ब्रह्मदंडवल हेरिक, नृप मुख भयो मलीन ।। ४९॥
चौ ब्रह्मदंडकर देखि प्रतापा भूपति कही सहित संतापा।
धिगधिग धिग क्षत्रिय बल तोही राजसाज धिग धिग धिगमोही९०
यौं गलानि उर आनि नृपाला गये बहुरि तपहेतु . उताला ।।
तप बल हूजे ब्रह्म ऋपीशा यह दृढ़ प्रण कोनोअवनीशा ५१
यौं विचारि बहु काल न रेशा तप कीनोसहि अमित कलेशा॥
तब विरंचि नृप संनिध आई भये राजऋपिकहीवुझाई५२ ॥
भूपति मन अमिलाप न पूरी बहुरि करन लागे तप भूरी ।।
होउँ ब्रह्मऋपि मन हठ एही सह अपार कष्ट निज देही५३॥
तव यह भयो विघ्न इक भारी जाते निफल गई तप सारी ॥
रविकुल नृपति नाम पथिपाला तिनके सुत विशंकु भूपाला९४
सो विशंकु नरपति मतिमाना 8 भावीवश विचार यह ठाना ॥
काहू विधि इमि बात बनाई बसौं सदेह देवपुर जाई ॥५५॥
तब वसिष्ठ ढिग भूपति जाई * करि विनती अभिलाप सुनाई ॥
सुनि मुनि कही सुनी हढ़ राजा हम न करें यह अनुचित काजा५६
दोहा-तहते भूपति बेगि उठि, करि क्रोधित हगलाल ।
जहँ वसिष्ट शत सुत करत, तप तहँ आये हाल ॥१७॥
तिन प्रति निज इच्छा कही, अरु वसिष्ट संवाद ।।
कहि बोले नृप करहुसो, हो जिहि हिय अहलाद५८॥
सुनि वसिष्ठ शत सुत कही, पितुन कियो जो काम।।
सो अनुचित हम क्यों करें, जाहु भूप निजधाम ।।२९॥
सुनि विशंकु बोले रहौ, पिता पुत्र निज और ॥
तव करनी जानी अबै, हम करिहैं गुरु और ॥ ६० ॥
अनुचित इच्छा भूपकी, पुनि कृत पितु अपमान ॥
सुनि मुनि सुत नृपको दई,शाप क्रोध उर आन६१॥
शापित 8 चंडाल भो, नृप तव कियो विचार ।।
कौशिक ढिग जो जाउँ तो, यह दुख मिटै अपार॥३२॥

रामरसायन चौ०-करि त्रिशंकु इहि भाँति विचारा विश्वामित्र निकट पगधारा ।। आतुर जाय गहे ऋपि चरना कहि प्रभु पाहि दीन दुख हरना६३।। नृपहि सकल बूझी ऋपिराई सो निजगति वरणी अकुलाई ॥ भूप बैन सुनि कौशिक बोले वृथा चहूँ इत उत बहु डोले ॥६॥ अब उर धीर धरौ भूपाला * जैहौ स्वर्ग सदेह उताला ॥ यौं कहि यज्ञ साज सजवाये चहुँदिशिते मुनि सकल बुलाये। ऋषि रजाय सुनि सब मुनि धाये *शत सुत युत वामिष्ट नहिंआय।। सोलखिक्रोधकौशिकहिछावा जानत हिये मुनीश प्रभावा ॥६६॥ याते नाहं वसिष्ठ हित भापे ॐ दीनी मुतन शाप मन मापे ॥ शतसुत मुनिकेअवहिं नशावें सप्तजन्म लघुयोनि सुपावें ॥ ६७॥ कौशिक शाप देत तंतकाला जरे बसिष्ठ पुत्र शत वाला ।। सोई सब निपाद कुल जाई जनमें नीच कर्म नित पाई ॥ ६८॥ तिन महँ जेष्टपुत्र अभिरामा ॐ रहो अनूप महोदयनामा ॥ सोई राम सखा गुह भयऊ ॐ जन्म निपाद भवन जवलयऊ६९॥ पुनि कोशिक इत यज्ञ मुठाना कीने सकल प्रमान विधाना ।। पे कोऊ सुर तहाँ न आये तब कौशिक बहु क्रोध ममाये७०॥ लै जल दर्भ संकलप कोना ॐ निज तप फल बहु भूपहि दीना ।। सो प्रभावते नृपति सदेहा चले अमित प्रमुदित सुर गेहा७१॥ देवन लखो मनुज तनुधारी नरपति आवत स्वर्ग मँझारी॥ तव सुरगण बोले अफुलाई भूमि पतन हो वेगि पगई ।। ७२॥ दोदा-दुत सुर वचन प्रभावते, पद उरच अयशीश।। स्वर्ग पंधते पलटिक, गिरन नहीं अवनीश ॥ ७३॥ तव विशंकु अति दीनई, सपिहि कही कर शोर ।। त्राहि त्राहि काशिफ जवहि, सुन्यो महाख घोर॥ १॥ निरखि नृपहि आवत अपनि, बोले ऋपीवलिए। गच्छ गच्छ भो भूपार, निष्ट तिष्ठ नननिष्ट ॥ ७ ॥ चीन-पादि मनि अमर्प कार नागरचना को अनुपम न्या भूपदेनु नागति चलाई निज मनात दोनो द६॥

(९६)
रामरसायन।
.
अमित अन्न कौशिक प्रगटाये * नवल लोक नव धाम वसाये ॥
दूजो, स्वर्ग विरचि नृपकाजा * राखोतहँ त्रिशंकु ऋषि राजा७७
दोहा-एकबार कौशिक सु यह, महा आचरज कीन।
जाते गाधिकुमार को, भो सब तप बल छीन ॥७८॥
चौ०-पुनि ऋपि पुष्कर तीरथ जाई* महा घोर तप प्रबल दिढ़ाई।
तब हूँ एक विघ्न यह आयो * अंबरीपनृप अवध सुहायो७९॥
करनलगे वर यज्ञ सुदेशा * तिनको मख पशु हरोः सुरेशा ॥
सो नृप पशु हेरत चहुँ घाई 8 भृगु आश्रम पहुंचे अकुलाई८०
तहँ ऋचीक मुनि युत सुत दारा * करत रहे तप प्रबल उदारा ॥
तिनके तीन पुत्र लखि राजा * माँगो एक यज्ञ बलि काजा८३॥
लघु पुत्रहि माता नहिं दीनो * जेठहि निजऋचीक करि लीनो।
रहो मध्य शुनशेफ जु नामा ॐ सोजानौं हौं एक निकामा८२॥
तब शुनशेफ दीन है भापो मोहि लेहु नृप कोउ न रापो॥
सुनि महीप गोलक्ष सुदीनी *गहि शुनशेफहि मारग लीनी८३
भूपति पुष्कर किय विश्रामा *सुनिऋचीक सुत कौशिक नामा।
ऋपि दिगजाय कहो सब हाला*गाधिसुवनलैअतिहि दयाला८४॥
तप बलदै दै मंत्र सिखाये * कियो अभै शिर कर परशाये ॥
सो नशुशेफ हीय हुलसायो 8 अंबरीप सँग अवध सिधायो।।८५॥
दोहा-लै शुनशेफहि सविधि जव, बाँधोजुपहि आन ॥
तब मुनि सुत सो मंत्र दुहुँ, पढ़े समय अनुमान ॥८६॥
मंत्र पढ़त सब देवगण, तुष्ट भये सुख पाय ॥
यज्ञ समापत मुनि तनय, वचो सदेह सुहाय ।। ८७ ॥
दूजो विघ्न जु कौशिकहि, भयो तवै ऋपिराज ॥
पुनि तप ठान्यो प्रवल अति, त्यागि सकल जगकाज ८८॥
एक सम वर अप्सरा, लखि लोभे ऋपिनाथ ॥
बहुत वर्प तप त्यागिक, रमन कियो तिहि साथ ॥ ८९ ॥
एही विधि बहु वार ऋपि, कियो अमित तप जाय ॥
चहूँ ओर सहि दुसह दुख, भये विन बहु आय ॥९० ॥

रामरसायन। ९७) चौ०-तप महँ भये विघ्न बहु बारा जाते रहो निफल श्रमसारा॥ तऊ न कौशिक तपहि विहाई करीअमित विधि चहुँ दिशिजाई९१ पुनि बहु तप कीना ऋपि कानन तब अतिमुदित भये चतुरानन ॥ आय दियो जिय रुचि वरदाना कहे ब्रह्म ऋपि युत सनमाना९२ तब कौशिक बोले करजोरी 9 जक्तपिता इक विनती मोरी आय वशिष्ट ब्रह्म ऋपि भासो कीजे हम यह अभिला५९३ है दयालु विधि वेगहि जाई कही वशिष्ठहि बहु समुझाई ॥ पितु आज्ञावश मुनि तहँ आये *वोलि ब्रह्मऋपि भवन सिधाये९४ दोहा-जय कौशिकहि वशिष्ट मुनि, कहे ब्रह्मऋपि आय ॥ तवते गाधिकुमार द्विज, भये सु तपवल पाय ॥ ९५ ॥ यदपि ब्रह्मऋपि है गयो, तपवलते महिपाल ॥ तदपि सुमिरि पूरबदशा, होय कवौं उरशाल ॥ ९६॥ पुनि वसिष्ठ तप तेज लखि, कौशिक कीन विचार ।। जौ लग रहें वशिष्ट जग, तौलग मोर नसार॥ ९७॥ या दृढ़ ठानि विचार हिय, महि विचरत इक वार । मुनि वशिष्ट आश्रम गये, आधीरैनि मॅझारि॥ ९८॥ कुटी निकट तरु ओट गहि, ठाढे करत विचार ।। जो वशिष्ट बाहर करें, तो अब डारौं मार ॥ ९९ ।। सो निशि पूरण शरद शशि, छायो विशद प्रकाश ।। लखि वशिष्ट सो शिप्य प्रति, वोले सहित दुलास ॥१०॥ आज शरद शाशि चंद्रिका, यों अनूप दरशाय॥ ज्यों कौशिक तप तेज जग, रहो विमल यश छाय॥१०१॥ चौ०-मुनिवशिष्टकेवचन सुहाये कोशिकमुनिअति हिय परिताये विधिसुतकी विलोकि सरलाई से गहे धाय पद पंकज जाई १०२ लखि कौशिक वसिष्ट हियलाये में मिले परस्पर दुहुँ हुलमाये ॥ मुनि मुनि कियो परम दृढ प्रेमा का हृदय शुद्ध दोऊ युत क्षेमा१०३ तवते दुहुँ मुनीशनमाही काहविधि कछु अंतरनाही ।। इहिषिधि गाधिपुत्र अवनीशा तपबल भये सुब्रह्मस्पीशा१०१

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रामरसायन। (१०१) दोहा-इमि शोभा लखि वागकी, मुदित भये दुहुँ भाय ॥ लखत फिरत चहुँ ओर पुर, सानंद इत उत जाय२५ ॥ निरखत निरखत नगर विच, आये राजकुमार ।। धाये पुर नर नारि बहु, शोभा लखत अपार ॥ २६॥ जव ते लखि आये नृपति, तब ही ते बहु शोर ।। रूप तेज बल गुण सुयश, फैलि रहो चहुँ ओर ॥२७॥ वाल युवा अरु वृद्ध सक, पुरवासी नर नारि ।। राम लपणके लखनकी, रहे आश उर धारि ॥२८॥ आये पुर अवलोकिवे, सुनि सवही हुलसाय ॥ धाम पंथ इत उत चहूँ, चितवत हैं चित लाय ॥२९॥ पनाक्षरी-कवित्त । कोऊ धायहरेकोऊ काहकहँ टेरै कोऊ जाय लख ने कोऊ दृरिते सिधार हैं । कोऊ काहु बूझ कोऊ काहुते अरुझ कोऊ काहू हठि झुझं कोऊ काहू को निवार ह।।कोउद्धार कोऊ हैं दिवार कोऊछजनपकोऊ तो अटारी नर नारी यों निहारे हरिसिकाविहारी सुखकारी धनु धागे दोउ पुर अवलोक मंद मंदही पधारे हैं ॥ ३० ॥ नृपति किशोर श्याम गौर हे अनुपरूप पुर अविलोकिको आये हैं बजाग्में ॥ द्यायोशोर भारी चहुँ ओर नर नारी भीर सुरति नकाह देह गेहकी मम्हाग्में ॥ गमिकाविहारी वरखामजे सुधाम मवें आई धाय आँगन अग कोउद्धारम। फिर फिरकीसी भीन धिरकी रहना नेक कोऊ खिरकामं कोउ हिरकी फिबॉरमें ॥३१॥ कोऊ मिलकी सों कछू भाप दिलकी ना नेक हिलकी जुलैले हिय गखें हियको हिलोकोऊ. ममर्क हैले उसाँस मसकै हैं उर रमर्क करेजे कम हैं मेनकी मगर ॥ कोउ, मुख अंचल छिपायक दगय दीठ करि करि हाय गह जायं नेहकी झफोर ॥ रसिकविदारी सखि रसिकाविहाग रूप माग है दुखारी नारी विरह व्यथा जोर ॥ ३२ ॥ युनि झुमि हमें कोड हुनि हमि दूम कोउ. दृनि दृमि पन कोड पनि निरन् मह ।। ति पारे हरे कोउदेरि देरि हरे कोड, टेरि टेनिकोड शेग्गिदि (१००) रामरसायन। जो वरण शोभा अस कवि को भा लघुमति छोभा रहत थकी ।। सर सरस विभागा अनुपम बागा अगम सुलागा बुद्धिजकी ॥ द्रुम वेलि अतूला नव फल फूला सब सुख मूला छविछाजै ।। बहु वरण विहंगा अगणित रंगा निज निजसंगा मिलिराजै॥१३॥ भुजंगप्रयातछंद। कहूं, कदंबा कहूंहैं रसाला ।। कहूं दाडिमो शिशुपाऔ तमाला ॥ कहूं पीपरो पाकरी, अशोकालवंगी लतासो कहूं लेति झोका।।१४॥ कहूँ चिंचिनी श्रीफलौ हैं बदामा ॥ कहूँ नागवल्ली सुएला ललामा || कहूँ वृक्ष फूले कहूँसो फरे हैं। कहूँ पत्र पारे झरे औ हरे हैं ।। १५ ।। कहूँ तो गुलाबी चमेली जुसोहै ।। निवारी जुही सेवती चित्त मोहै ।। कहूँ मालती और बेला विराजै । कहूँ केवरो केतकी गंध छाजै १६|| कहूँ कुंद केससुगन्धै झकारें । कहूँ सांवनी और गेंदा हिलोरें ॥ सुवृंदारका वृंद सोहैं अनूपा । जुदौना कहूँ पानडी है सुरूपा ॥ १७ ॥ कहूँ भूमि चंपा जु गुल्चाँदनी हैं। कहूँ इश्कपेचा कि वेलें धनी हैं। कहूँ विष्णुक्रांती छटा दे रहीहैं । सुचंपा सुगंधै कहूँ छैरही हैं १८॥ गुलव्यास गुल्दाउदीहै जुखासी । कहूँ रौसपै राजहीनातरासी ॥ - कहूँ फूल फूले कहूँ तो कली हैं ॥ छहूँ वृक्ष बेली दुवीचे गली हैं १९॥ कहूँ तो भली भाँति छूटें फुहारे ॥ भरेनीर राज कहूँ हौज भारे । कहूँ दुवसे है हरी भूमि नीकी । छटा वागकी मोहनी है सुजीकी२०॥ कहूँ कोकिला कूकदेकै पुकारें । पपीहा कहूँ शब्द ऊंचे उचारें । कहूँ शारिकाबैन मीठे सुनावें । कहूँ कोरनीकी गिरा चित्तभावै २१ ॥ कहूँ मोर नाचे महामोद माने । कहूँ भौंर गुजे धने प्रीति सानै ॥ कहूँ तीतरो लाल सोहें कपोती।कहूँ खुल्युलों की बनी जुट्ट होती२२॥ हूँ नीलकंठा सुश्यामा सुहावें ॥ कहूँ तो हरे वालवा चित्त भावें ॥ कहूँ हंसराजा वटेर बनेरी । कहूँ बाज जुर्रा कुही देत फेरी ॥ २३ ॥ कहूँ तो परेवा सु चंद्दल सोहैं । कहूँ तो चकोरी कहूँ खंजनो हैं । भरे मोद पक्षी सब मत्त डोलें । कलोल करें भारते येन वोलें।

रामरसायन। (१०१) दोहा-इमि शोभा लखि वागकी, मुदित भये दुहुँ भाय॥ लखत फिरत चहुँ ओर पुर, सानंद इत उत जाय२५ ।। निरखत निरखत नगर विच, आये राजकुमार ॥ घाये पुर नर नारि बहु, शोभा लखत अपार ॥ २६॥ जव ते लखि आये नृपति, तब ही ते बहु शोर ॥ रूप तेज बल गुण सुयश, फैलि रहो चहुँ ओर ॥२७॥ वाल युवा अरु वृद्ध सब, पुरवासी नर नारि ।। राम लपणके लखनकी, रहे आश उर धारि॥ २८॥ आये पुर अवलोकिवे, सुनि सवही हुलसाय ॥ धाम पंथ इत उत चहूँ, चितवत हैं चित लाय ॥२९॥ घनाक्षरी-कवित्त । कोऊ धायहरैकोऊ काहूकहँ टैरै कोऊ जाय लखें नरें कोऊ दुरिते सिधारें हैं । कोऊ काहु वूझै कोऊकाहुते अरुझै कोऊ काहू हठि झु कोऊ काहू को निवारें हैं।कोऊद्धार कोऊ हैं दिवार कोऊ छजनपैकोऊ तौ अटारी नर नारी यों निहारे हरसिकविहारी सुखकारी धनु धारी दोउ पुर अवलोके मंद मंदही पधारे हैं ॥ ३० ॥ नृपति किशोर श्याम गौर द्वै अनूपरूप पुर अविलोकिको आये हैं बजारमें ॥ छायो शोर भारी चहुँ ओर नर नारी भीर सुरति नकाहू देह गेहकी सम्हारमें । गसिकविहारी वरवामजे सुधाम सवें आई धाय आँगन अटारी कोउद्धारम।। फिरें फिरकीसी मौन थिरकी रहना नेक कोऊ खिरकीमें कोउ हिरकी किवॉरमें ॥३१॥ कोऊ मिलकी सों कछू भाप दिलकी ना नेक हिलकी जुलल हिय राखें हियकी हिलोसाकोऊ ससकै हले उसाँस मसके हैं उर रसके फरेजे कसक है मेनकी मरीर ।। कोऊ मुख अंचल छिपायक दुराय दीठ करि करि हाय हि जाये नेहकी झकोर ॥ रसिकाविहारी लखि रसिकाविहाग रूप मारी हैं दुखारी भारी विरह व्यथाके जोर ।। ३२ ॥ यमि झुमि हमें कोऊ हूमि हृमि में कोऊ. दृमि दृमि पमें कोक मि निरभू महैं ।। फेरि फोर हर कोऊ हेरि हरि टेरे कोऊ रेरि टरि वर कोळ घेरि गर्दि 국 स हैं।

(१००) रामरसायन। जो वरणे शोभा अस कवि को भा लघुमति छोभा रहत थकी ।। सर सरस विभागा अनुपम वागा अगम सुलागा बुद्धिजकी ॥ द्रुम वेलिं अतूला नव फल फूला सब सुख मूला छविछाजै ।। बहु वरण विहंगा अगणित रंगा निज निजसंगा मिलिराजै॥१३॥ भुजंगप्रयातछंद। कहूं, कदंबा कहू, रसाला ॥ कहूं दाडिमो शिशुपाऔ तमाला ॥ कहूं पीपरो पाकरी, अशोकालवंगीलतासो कहूं लेति झोका॥१४॥ कहूँ चिंचिनी श्रीफलौ हैं बदामा ॥ कहूँ नागवल्ली सुएला ललामा । * कहूँ वृक्ष फूले कहूँसो फरे हैं। कहूँ पत्र पारे झरे औ हरे हैं ॥ १५ ॥ कहूँ तो गुलाबी चमेली जुसोहै ।। निवारी जुही सेवती चित्त मोहै । कहूँ मालती और बेला विराजै । कहूँ केवरो केतकी गंध छाजै १६॥ कहूँ कुंद केससुगन्धै झकोरै । कहूँ सांवनी और गेंदा हिलोरें ।। सुवृंदारका वृंद सोहैं अनूपा । जुदौना कहूँ पानडी है सुरूपा ॥ १७ ॥ कहूँ भूमि चंपा जु गुल्चाँदनी हैं। कहूँ इश्कपेचा कि बेलै धनी हैं । कहूँ विष्णुकांती छटा दे रहीहैं । सुचंपा सुगंधै कहूँ छैरही हैं १८ गुलब्यास गुल्दाउदीहै जुखासी । कहूँ रौसपै राजहीनातरा कहूँ फूल फूले कहूँ तो कली हैं ।। छहूँ वृक्ष वेली दुवीचे गली कहूँ तो भली भाँति छूटें फुहारे । भरेनीर राजै कहूँ । कहूँ दुवसे है हरी भूमि नीकी ॥ छटा वागकी मोहनी है कहूँ कोकिला कूककै पुकारें । पपीहा कहूँ श कहूँ शारिकावन मोठे सुनावै । कहूँ कीरनीकी गि कहूँ मोर नाचे महामोद मानें। क कहूँ तीतरो लाल सोहे कपोती कहूँ कहूँ नीलकंटा सुश्यामा सुहावै ॥३ रामरसायन। .(१०३) चहुँ डोलें हैं।कोऊ इतराय अनखाँय औ रिसायँ कोऊ कोऊ वतराय कोऊ करत कलोलें हैं। रसिकविहारी नेहवश रघुलाल तिनं करत निहाल प्रीति नीति अनमोल हैं ।। कोऊ देत गारी कोऊ देत- करतारी कोऊ करें मनुहारी कोऊ वालहसि वोलें हैं ॥ ३९ ॥ कोऊ कहें श्याम तुव ग्राम है कहां सो कहो कोहै पितु मात औ वतावो कित धामहे ॥ कोऊ कहें लाल किहि देशते पधारे फेरि केही किहि देश इस आये कौन कामहै । कोऊ कहैं मीत हम आज यों सुनीहै मुनि दोय वाल लाये एक गौर एक श्यामहै ॥ रसिकविहारी पुर वालक अनंद छके बार बार यूझै रावरोई नामरामहै ॥४०॥ कोऊ बाल वालसों कहैं हैं हम ऐसी सुनी वीरता बढाय चाप तोरिबे सिधाये हैं। कोऊ कहैं कौतुक विलोकिवे पधारे दोउ कोऊ कहें कौशिक भुराय इन लाये हैं। कोऊ कहैं हेरत बटोही पुर कोऊ कहैं रसिकविहारी आज भूपति बुलाये हैं। कोऊ कहैं जानैं हम सत्य सो बखानै सुनौ जनकललीके व्याहिवेको इत आये हैं।॥४१॥ कोऊबाल वोले लाल अब ना तर्जेंगे तुम्हें कोऊ कहें यार संग तेतीनाहिंदारोगे।। कोऊ कहैं मीत प्रीत करि मिलि रहैं सदा कोऊ कहै श्याम कवी रोप तो न धारोंग ॥ रसिकविहारी कहैं कोऊ तो बनेगी बात जो पै कई काहू कुछ दोप ना निहारोगे । कोऊ कहैं प्यारे हम सकल सुखारे संग चलिहँ तिहारे जब सदन सिधारोगे ॥४२॥ कोऊ वाल बोले धनु- शालको उताल चलौ | है अतिकाल तो नृपाल बहु माखेंगे ॥ कोऊ कह श्याम इत आवहु हमारे धाम देहे मातु मेवा औ मिठाई मिलि चाखेंगे। कोऊ कह रसिकविहारी हितकारी बात सुनहु हमारी तो तिहारे कान भांपेंगे। कोऊ कहें कितहूं न जाहु अव ह्याई रही जनकदुलारीकी सवारी संग राखंगे॥४३॥ कोऊ जे प्रवीण प्रौढ सरस सनेही शुद्ध ते लखि अनूपरूप अधिक लुभाने हैं ।। तिनकी सुप्रीति श्याम सुंदर विलोकि साँची रसिकविहारी अतिहीय हुलसाने है। कहिरस वन चन दीनोह कमलनयन लाय निज ऐनते अपार सनमाने हैं । सुख सरसाने मनमाने पहिचाने जाने सत्य प्रण ठान (१०२) रामरसायना लूमैं हैं ।। रसिकविहारी मिथिला की नौल नारी सारी रूप मदछाकी मतवारी करें धूमैं हैं ॥ धाय धाय आवै आय आय रहि जावें जाय जाय गुण गावै गाय गाय झुकि झुमैं हैं ॥ ३३॥ कोऊ कहै कारो मणिवारो है बिसारो भारो कोऊ कहें फंदी फंदवारो वटपारोरी ॥ कोऊ कहैं निपट धुतारो ठगहारो महा कोऊ कहैं सुधौ है विचारो संगवारोरी ॥ को कहैं गोरोहै न भोरो विसवोरो सोउ जानो जनि थोरो ताहि नीकेहौं निहारोरी ॥ रसिकविहारी कहैं कोऊ नौल नारी अली कैसहु तुमैं है पै हमैं है प्राणप्यारोरी ॥ ३४ ॥ कोई कहैं दोई ननदोई तुव आली देखे कोई कहैं दोई बहनोई तो सिधारे हैं। कोई कह दोई जेठ तेरे तून हेरे भटू कोई कहैं गोरे तोरे देवर निहारे हैं ॥ रसिकविहारी पुरनारी संगवारी सबै मोदते विनोद बैन विविध उचारे हैं ॥ तौलौं एक बोली कंत साँवरे हमारे सब बोली यों हमारे हैं हमारे हैं हमारे हैं॥३॥कोऊ दूरहीते हग जोरती निहोरती हैं कोऊ चित्त चोरती बहोरि मुखमोरती ॥ कोऊ मुसक्यावती सुनावती हैं व्यंग्य कोऊ सैनन बुलावती हैं नैनन मरोरती ॥ कोऊ नीरवारती उतारती हैं आरती लै आनन निहारती हैं कोऊ तृण तोरती । रसिकविहारी गुण वारी रूपवारी नारी अवधविहारीको सनेह सिंधु बोरती ॥ ३६॥ कुंतल कृपाणनते काटत करेजोआन भृकुटी कमान तान तानकै चढ़ाये हैं। तापै नैनबाणको संधान हठिले प्राण जनकपुरी में घमसानयों मचाये हैं ॥ रसिकविहारी एक नारी धाय वावरी सी घावरी है द्वार द्वार वचन सुनाये हैं । कोऊ मृगर्नेनी वाम धामते जुकाहू काम कितहूँ नजैयो दो सिकारी आज आये हैं ॥ ३७॥ धाये पुर वालक विलोकि जुरि बूंद बूंद आये ढिम सकल विनोद मोद भीने हैं ॥ जानै नहिं सब रंक निपट निशंक बंक चंचल उतंक चपलाई चित्त दीने हैं कोऊ पदपानि पट पीत धनु वाण कोऊ कोऊलंक कोऊ जंब जानु गहि लीने हैं।रसिक- विहारी | अनंद रघुनंद तिन कहि मृदयन मन भाये तोपं कीने ॥३८॥ अंग अंग परौं सुदंग रंगरंगर, सहित उमंग संग संग

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रामरसायना .(१०३) चहुँ डोलें हैं।कोऊ इतराय अनखाँय औ रिसॉय कोऊ को बतराँय कोऊ करत कलोलें हैं। रसिकविहारी नेहवश रघुलाल तिन करत निहाल प्रीति नीति अनमोलैं हैं । कोऊ देत गारी कोऊ देत- करतारी कोऊ करें मनुहारी कोऊ बालहाँस बोलें हैं ॥ ३९॥ कोऊ कहैं श्याम तुब ग्राम है कहां सो कहो कोहै पितु मात औ बतावो कित धामहै । कोऊ कहैं लाल किहि देशते पधारे फेरि जैही किहि देश इस आये कौन कामहै ।। कोऊ कहैं मीत हम आज यों सुनीहै मुनि दोय वाल लाये एक गौर एक श्यामहै ॥ रसिकविहारी पुर बालक अनंद छके वार वार बूझै रावरोई नामरामहै ॥४०॥ कोऊ बाल बालसों कहैं हैं हम ऐसी सुनी वीरता बढाय चाप तोरिबे सिधाये हैं। कोऊ कहैं कौतुक विलोकिवे पधारे दोउ कोऊ कहें कौशिक भुराय इन लाये हैं। कोऊ कहैं हेरत बटोही पुर कोऊ कहैं रसिकविहारी आज भूपति बुलाये हैं। कोऊ कहैं जानें हम सत्य सो बखानै सुनी जनकललीके व्याहियेको इत आये है।।४१॥ कोऊचाल बोले लाल अब ना तजेंगे तुम्हें कोऊ क यार संग तेतौनास्टिारोगे।। कोऊ कहै मीत प्रीत करि मिलि रहैं सदा कोऊ कहें श्याम का रोप तो न धारोग ॥ रसिकविहारी कहें कोऊ तो बनेगी बात जो पै कई काहू कुछ दोप ना निहारोगे । कोउ कहें प्यारे हम सकल सुखारे संग चलिहैं तिहारे जब सदन सिधारोगे ।। ४२ ॥ कोऊवाल बोले धनु- शालको उताल चलौ हृ है अतिकाल तो नृपाल बहु माखेंगे ॥ कोऊ कहें श्याम इत आवहु हमारे धाम देहे मातु मेवा औ मिटाई मिलि चावंगे। कोऊ कहें रसिकविहारी हितकारी बात सुनहु हमारी ती तिहारे कान भागे । कोऊ कहें कितहूं न जाहु अब छाई रही जनकदुलारीको सवारी संग राखंगे ॥ १३ ॥ कोऊ. जे प्रवीण प्रीद सरस सनेही शुद्धते लखि अनृपरूप अधिक लुभाने हैं । तिनको सुप्रीति श्याम सुंदर विलोकि साँची रसिकविहारी अतिदीय दुलमान है ।। कहिरस वन चन दीनोहे कमलनयन लाय निज पनते अपार सनमाने हैं। सुख सरसाने मनमान पहिचाने जाने सत्य प्रण टान

(१०२)
रामरसायन।
लूमैं हैं ॥ रसिकविहारी मिथिला की नौल नारी सारी रूप मदह
मतवारी करें धूमैं हैं ॥धाय धाय आवे आय आय रहि जावे
जाय गुण गा, गाय गाय झुकि झुमैं हैं ॥३३॥ कोड करें
मणिवारो है बिसारो भारो कोऊ कहें फंदी फंदवारो वटप
कोऊ कहैं निपट धुतारो ठगहारो महा कोऊ कहैं सूधौ है
संगवारोरी ॥ को कहैं गोरोहै न भोरो बिसवोरो सोउ ज
थोरो ताहि नीकेहौं निहारोरी ॥ रसिकविहारी कहैं
नारी अली कैसहु तुमैं है पै हमैं है प्राणप्यारोरी ॥ ३४
दोई ननदोई तुब आली देखे कोई कहें दोई बहनोई ।
कोई कहैं दोई जेठ तेरे तून हेरे भटू कोई कहैं गोरे
हैं ॥ रसिकविहारी पुरनारी संगवारी सबै मोदते ।
उचारे हैं ॥ तौलौं एक बोली कंत साँवरे ।
हमारे हैं हमारे हैं हमारे हैं॥३५॥कोऊ दूरहीते
हैं कोऊ चित्त चोरती बहोरि मुखमोरती
सुनावती हैं व्यंग्य कोऊ सैनन बुलावती
नीरवारती उतारती हैं आरती लै आर
तोरती ॥ रसिकविहारी गुण वारी रु
सनेह सिंधु वोरती ॥ ३६॥ कुंतल
भृकुटी कमान तान तानकैच

दोहा-ताही औसर जनकजा, जननी आयसु पाय ।।
आई गिरिजा दरशहित, संग सखी समुदाय ॥५॥
करि मनन शृंगार सजि, सकल अलीन समेत॥
पूजन सौंज अपार युत, गवनी गौरि निकेत ॥६॥
राजसुता अरु सखिनकी, शोभा अमित अनूप ॥
ध्यान किये सुख होय हिय, किमि वरणों वह रूप॥७॥
तोमरछंद।
पदकंज अधिक ललाम । सुखसीम वर छविधाम ॥
जिनकी परत महि ज्योति। सो लाल मणिमय होति ॥८॥
पुनि चरणअंगुलि मंज । मानहु मृदुल दल कंज ॥
उपमा सु और लखाय । जनु चंप कलिक सहाय ॥९॥
नख गणनकी नव क्रांति । लखि कोटि शशि द्युति भ्रांति ॥
जनु रसिक जन मुख हेत । चिंता सुमणि छबिदेत ।। १०॥
बिछिया ललित मुखधाम । नृपुर अधिक अभिराम ।।
रव मधुर सरस मुहात । मुनि राजहंस लजात ॥११॥
युग जानु सुंदर गोल । लखि मन विकत विनमोल ।।
जनु उभय कंचन खंभ। मिटिजात मनसिज दंभ ॥ १२॥
जंघा युगल अभिराम । जनु कदलि खंभ ललाम ॥
अतिसुभग उभय नितंब । मति कहत गहत विलंब ॥१३॥
कटि अधिक सक्षम जान | उपमा न जगमहँ आन ।
देखी न सुनियत लंक । ज्यों ब्रह्म निर्गुण शंक ॥ १॥
लहँगा ललित लहरात । बहुघेर छवि छहगत ॥
जरतार जटित जराय । निज कर मनोज बनाय ॥१५॥
जगमगत मणि गणजोत । द्युतिमंद रवि शशि होत ।।
सोहत अनृपम कोर । जनु दामिनी चहुँ ओर ॥१६॥
बूटे मुललित ललाम । फैली प्रभा अभिगम ॥
सुंदर सरस सरखधाम । लखि लजत शत रतिकाम || 1७॥
मृदु रदर अधिक सुहात । जनु लस सुरतरूपात ॥
ज्यों सिंधु सब गुणकेर । है कृपासदन निवेर ॥ १८ ॥

(१०४)
गमरसायन।
नेहजाल उरझानेंहें ॥ ४ ॥ लूटीद लुनाई लोनी मिथिला निवासि-
नने रसिकविहारी दुहुँ भाई प्रीति जुटींह ॥ जुटी चहूँघाई छाई नेहकी
सचाई तब छेल रघुराई निठुराई सब छूटी है। छूटी धीग्ताई वीरताई
ओ गंभीरताई अंग अतुराई चतुराई चित्तास्टी है । सूटी नूर भूरके
गरूर की गरूरताई नेहमें निकाई प्रभुताई गई लूटीद ॥ ४५ ॥ सुंदर
अनूप रूप साँवरो किशोर लोनो देखि देखि मिथिलानिवासी हुलसा
वहीं ॥ सब नर नारी एक एकते कह हैं रुचि तारे धनु येही तो
अपार सुख छावहीं । जनककिशोरी मिलि जोरी श्याम गोरी भली
विधिहि निहोरी करजोरी या मनावहीं ॥ रसिकविहारी हितकारी बात
होवै वेगि सकल विचारी सत्य येही यश पावहीं ।। ४६॥
चौ०-इहिविधिजनक नगर नर नारीराम लपण लखि भये सुखारी
प्रमुदित पुर विलोकि दुहुँ भाई गुरुढिग चले हीय हुलसाई४७॥
संध्या समय आय दुहुँ भ्राता गहे मुदित मुनि पद जलजाता।
करि संध्यावंदन शुचि रीती, अमित सराहत पुरजन प्रीती ४८
पुनिमुनि मुनि लछमन अरुरामा करि भोजन रजनी इक यामा।।
कहत सुनत पुरछवि अभिरामा १ अर्ध रैनि कीनो विश्रामा॥४९॥
इति श्री० रा० र० वि० वि० पुर दर्शन वर्णनो
नाम चतुर्थोविभागः ॥ ४ ॥
चौ०-प्रात समै दुहुँ राजकुमारा * नित्यकृत्य कीनो शुचि सारा ॥
वेगि आय गुरुपद शिरनाई * मुदित भये शुभ आशिप पाई॥
गुरु पूजनको समय निहारी के चले प्रसून लेन फुलवारी ।।
दुहूँ बंधु नख शिख वर अंगा करधनुशर कटि कसे निखंगा२॥
करि प्रणाम गुरु आयसु पाई * गये दुहूँ नृप सुत हरपाई ॥
गिरिजा बाग विचित्र अनूपा ॐ रहत जहाँ पटऋतु धरिरूपा॥
जाय दुहूँ नृपसुत तिहिद्वारे * द्वारपाल रुचि लखि पगधारे ॥
लेत प्रसून फिरत चहुँ ओरा ॐ प्रमुदित हेरत राज किशोरा ॥४॥

रामरसायन ।
(१०५)
दोहा-ताही औसर जनकजा, जननी आयसु पाय॥
आई गिरिजा दरशहित, संग सखी समुदाय ॥५॥
करि मनन शृंगार सजि, सकल अलीन समेत॥
पूजन सौंज अपार युत, गवनी गौरि निकेत ॥६॥.
राजसुता अरु सखिनकी, शोभा अमित अनूप ॥
ध्यान किये सुख होय हिय, किमि वरणौं वह रूप ॥७॥
तोमरछंद।
पदकंज अधिक ललाम। सुखसीम वर छविधाम ॥
जिनकी परत महि ज्योति। सो लाल मणिमय होति ॥ ८॥
पुनि चरणअंगलि मंज । मानहु मृदुल दल कंज ॥
उपमा सु और लखाय । जनु चंप कलिक सहाय॥९॥
नख गणनकी नव क्रांति । लखि कोटि शशि द्युति भ्रांति ॥
जनु रसिक जन मुख हेत। चिंता सुमणि छबिदेत ॥ १०॥
विछिया ललित मुखधाम । नूपुर अधिक अभिराम ।।
ख मधुर सरस मुहात । सुनि राजहंस लजात ॥११॥
युग जानु सुंदर गोल । लखि मन विकत विनमोल ॥
जनु उभय कंचन खंभा मिटिजात मनसिज दंभ ॥ १२ ॥
जंघा युगल अभिराम । जनु कदलि खंभ ललाम ।।
अतिसुभग उभय नितंब । मति कहत गहत विलंब ॥१३॥
कटि अधिक मूक्षम जान । उपमान जगमहँ आन ॥
देखी न सुनियत लंक । ज्यों ब्रह्म निर्गुण शंक ॥ १४ ॥
लहँगा ललित लहरात । बहुघेर छवि छहगत ॥
जरतार जटित जराय। निज कर मनोज बनाय ॥१५॥
जगमगत मणि गणजोत । द्युतिमंद रवि शशि होत॥
सोहत अनृपम कोर । जनु दामिनी चहुँ ओर ॥१६॥
बृटे मुललित ललाम । फली प्रभा अभिगम ॥
सुंदर सरस सखधाम । लखि लजत शत रतिकाम ।। ७॥
मृदु टदर अधिक सुहात । जनु लस सुरतम्पान ।।
ज्यों सिंधु सब गुणकेर । है कृपामदन निवेर ॥ १८ ॥

(२०६)
रामरसायन।
नाभी सुललित गंभीर । जनुसिंधु भँवर सुधीर॥
है सुभगता कर खानि । उपमा जु यह पुनि जानि ॥ १९ ॥
माण जटित पदिक सुहाय। नवग्रह रहे जनु आय ||
कंठी सुकंठ विराज । भूपण अधिक छबिछाज ॥२०॥
भुज मूल बाहु विशाल । मनु मृदुल पंकजनाल॥
युग सुभग वर भुजबंद । मणि जटित क्रांति अमंद ॥२१॥
कर युगल कोमल मंजु । मानौ मृदुल दलकंज ॥
कंकन सुदेश अनूप । मिलि अंग एकहि रूप ॥२२॥
नव बलय की झनकार । मृदुमंद अति सुखसार ॥
मुंदरी हरित नग क्रांति । नृग साव कहि कर भ्रांति ॥२३॥
पुनि कलित कंठ सहाय । जहँ पान पीक लखाय ॥
लखि लजत कंबु कपोत । भूपण सरस छविहोत ॥२४॥
सोहै चिबुक छबिधाम । तिहि मध्य तिल अभिराम ॥
जनु हेम संपुट माहि । मणि नील जटित सुहाहि ॥२६ ॥
युग अधर सुंदर लाल । जनु लसत बिंब प्रवाल ॥
दंतावली छबिधाम । जनु कुंदकली ललाम ॥२६॥
नासा अनूप सुढार । शुक तुंड सम सुखसार ॥
नथझुमका लहरात । मुक्ता बुलाक सुहात ॥ २७ ॥
हैं सुभग युगल कपोल । आदर्श मनहुँ अमोल ॥
आसन किधी अभिराम । रसराजको सुखधाम ॥ २८॥
युग श्रवण हैं अभिराम । अति मृदुल अमल ललाम ॥
कुंडल मुझमक झल । भूपण विराज अतूल ॥ २९ ॥
लोचन युगल अभिराम । जनु कंज मीन ललाम ।।
खंजन मृगी सम जान । शरमैनके अनुमान ॥ ३० ॥
भृकुटी कुटिल सुखरूप । युग धनुप मनहु अनूप ॥
ठी तिहिवींच कुंकुम बिंदु । इकठोर शनि कुज इंदु ॥३१॥

रामरसायना (१०७) नवगौर सरस सुरूप । सुंदर ललाट अनूप ॥ वंदा विशाल विराज । जनु नवग्रहन समाज ॥ ३२ ॥ वेंदी लसै कमनीय । मणिजटित द्युति रमनीय ॥ मुक्ता अमोल सुहाय । सुंदर अधिक छविछाय ॥ ३३ ॥ शिरचंद्रिका लहराति । झुकि झुमि छवि छहराति ॥ मणि जटित क्रांति विराजाकोटिन प्रभा कर लाज ३४॥ चिकन कुटिल मृदुकेश । वेणीगुही वर वेश ।। छूटत सुगंध झकोर । द्वै मत्त डोलत भौर ॥ ३५ ॥ सारी सुनील सुहाय । जनु मेघमंडल छाय ॥ जरतार की नवकोर । सौदामिनी चहुँ ओर ।। ३६ ॥ वरसै सुछवि मय नीर । सोपरत सीय शरीर ॥ दरशात आनंद रूप । शोभा अभंग अनूप ॥३७॥ नख शिख सबै सुठि सीय । शृंगार पुनि रमणीय ॥ गजगामिनी मृटुगात । गिरिजाहि पूजन जात ॥ ३८॥ जैसी सिया आभिराम । तैसी सखी छवि धाम ।। शिख नख स्वरूप सुदंग । शृंगार शोभित अंग ॥ ३९ ॥ तिनके अमित गुणरूप । तनु तेज अमल अनूप ॥ सिय सहचरी जु अनेक । हैं सरस एकहि एक ॥४०॥ दोवई-उंद। रूपरंगीली गुणगरवीली सुपर सलोनी बाला ॥ नवल नागरी अति उजागरी छाफी प्रेमपियाला ॥ नखशिख भूपण अमल अदूपण ज्यों शशि पूखन सोहैं ।। वसन सुरंगा शोभित अंगा निरखि शची रतिमाह ॥११॥ पंकजनैनी हैं पिकवनी गजगामिनी ललामा ॥ वैसकिशोरी श्यामल गोरी मनहरनी सुखधामा ॥ उरज उतंगा नवल अनंगा परम प्रवीन पियारी ॥ रंगरंगीली नेद पगीली सुंदररूप उज्यारी ॥ १२ ॥ गानकलाम छंद छलामें परम ललाम गजें ॥

(1०८)
गमानायना
बहु मुलदानी अधिक नयानी अंग अनुपम माने ।
मिकाविहारी मति अति नारी करत पारको पनि ॥
निनको दाया मा चल आया तिहि भरोसफा गाये ४३
साहकी अंगी फलन मों
गुही विराजतनीती ॥
काहाकी गंधी मोतिनों मास मोनी जी ॥
कार बीस पीठ पे छूटे केश सुगौं ।
माना नाग नागिरी कारी मदमातीलदों॥ १३ ॥
अन्ग मामगिर मुहार मानिन माग भग ।
याम पी गोगिनसनी मुमानी अभी भगे है ॥
गाली पोशार पनी गंदर रंग मुरंगी ॥
कामायनी बनी अंगनांगी ॥ १५ ॥

रामरसायन। (१०९) दै प्रदक्षिणा पदपंकजगहि बहुविधि विनती कीनी । मन भायो माँगो वर सुंदर परम प्रेम रस भीनी ॥ ताही समय अली इकलोनी गईविलोकनवागा। डोलत फिरत लखत दुम वेली हिय उमॅगेअनुरागा॥५०॥ ताहि छिन गुरु आयमु लैकै राजकुँवर दुहुँ आये। निरखत वाग उतारत फूल न दोना करन सुहाये ॥ औचक दृष्टि परे सो ताके लखत विहाल भईहै । भूपण वसन अपान चातुरी भोरी सबै गई है ॥५१॥ इकटकरही निहारि चकितकै नैन निमेप नलावै । रघुनंदन छवि छकी छबीली मनमें मोद नमावै॥ लोक लाज कुलकानित्यागि कै दौरि मिलनको चाहै । है सकोच मनमारि रहै जिय अंतर मनसि जहा है।॥५२॥ हिय विचारि कुलकानि जानितिय धर्मधीर कछु धारी। चलीबैक डग परै न पग मग भई नेह मतवारी ।। तहँ ते चले फेरि फिरि लोटे इहि विधि करि बरि आई। झूमत झुकत चकित सी चितवतअली अलिन विचआई ५३॥ वरवा छंद। तिहि विलोकि सिय सखियां वृझति बैन । कहा भयो तुहि हेली तू मतिऐन ॥५४॥ सोहे रति नहिं काहुहि उत्तर देत ॥ लै उसास युग अँखियां भरि भरि लेत ॥५५॥ पुनि कर गहि सिय बूझति बैन रसाल | निजगति कहति न काहे नवला बाल ॥५६॥ सुमिरि श्याम उर अंतर हिय धरिधीर । सियसों वोली सुंदरि बैन गँभीर ॥५७॥ अवधनपति दशरथ के सुत अभिराम ।। कौशिक सँग सो आये सुखमाधाम ॥ ५८ ॥ राम लपण दुहुँ भैया श्यामल गौर | सुंदर ताके सोहं जो शिरमीर ॥ ५९ ॥ धनुपयन सुनि आये हैं अतिवीर ॥ इनहि ताडकामारी एकहि तीर ॥ ६ ॥ हति मुबाहु मारीचहि विनफलबान ।। सिंधुपार तिहि पठ्यो राखे प्रान ॥ ६१ ॥ गये जनकपुर देखन (११२) रामरसायन। रौ॥ सरसमाधुरी पियौ भली विधि पलक न टारौ ।। अलीआज सु- खसाज सबै निज निज हिय खोली। निरखिलेहु भरिनैन बैन यौं सिय जू बोली ॥ १०२॥ दोहा-औचकराज किशोरकी, परी दृष्टि इत आय ॥ जनकनंदिनी रूपलखि, प्यारे रहे लुभाय ॥ १०३॥ सिय मुख पंकज रसरसिक, रघुनंदन मनभौंर ।। रम्यो सुछबि मकरंदमें, कछू सुहात न और ॥ १०४॥ राजकुँवर वर बंधुसे, बोले वचनरसाल ॥ धनुप यज्ञ इन हेतु ये, जनकलली नवबाल ॥ १०५॥ सिय सुंदरता नेहमय, कहत लपण रघुचंद ॥ भये लतनकी ओटमें, ज्यों घनबिच युगचंद ॥१०६॥ अकुलानी सिय सखिन युत, लखे न श्यामसुजान ॥ बढी अगिन तनु विरहकी, भूलो सबहि अपान ॥ १०७॥ भई सबै अतिवावरी, बोलति अटपटबैन । राजकुँवर बिछुरे अबै, रंचहु परै नचैन ॥ १०८॥ घनाक्षरी कवित्त । क्यौं न जर जायरी पतंग आय दीपकमें क्यों न मणिहीन जो जग प्राणत्यागैरी ।। रजनीमलीन बिन चंद क्यों नहोय भटू स्वातिबिन चातक अधार क्यों न वागैरी ॥ रसिकविहारी बिन सुघर सनेही मि- ले कोटिहू उपायते न हीय अनुरागैरी ॥ विठुरे सुनीर क्यों न मीन मरिजाय हेली जानै सो वियोग पीर जाके जिय लागैरी ॥१०९॥ विरही वियोगिनीन देखिकै अधीन दीन अधिक सतावे भटू मिलिक अनेकसे ॥ कसकत छाती मुनिकारीकोकिलाकी कूक गरजतकारे घ- नमान तन नेकसे ॥ रसिकविहारी कारी जुलफंचुभी, हिय विरह मनोज अंग दाह अविवेकस।कारे कजरारे नैन कीनी कतलाम धनी हेली हम जानी कारे कारे सब एकसे॥११०॥द्रुम वेली संबै विकल सहेलीपनी रसिक रमाल रघुलालको बतायोजकिलित कदंव कैसो बहत विलंब ऐसो नबल अशोक तुम शोक ती नशायो । तरुन -- रामरसायन। (११३) तमाल इतलाल अविलोके कहूँ रसिकबिहारी मोहिं वेगि दरशावोज।। एहो मृग छोना जाय करहु सहाय येती पीर यह मेरी दौरि श्यामको सुनावोजू ॥ १११॥ कोऊ नवपल्लव गहति कर जानि कोऊ जानि पद पंकजको कंज शीश नावहीं । कलित कपोल जानि चूमत गुलाब फूल कोऊ गहिकै तमाल बिरह सुनावहीं ।। रसिकनिहारी कोउ हेरती चरण चिह्न पावें कहुँ ताकी रेणु हगन लगावहीं॥ नेह रसमाती सिया आली विलखाती सबै पातीदै पतौवनकी पशिन पठावहीं॥ ११२॥ नृपति कुमार सुनि लीजिये पुकार येजू हमतौ तिहारे श्याम रूप रस प्यासीह ।। प्यावो छवि नीर तनु तपनि सिरावो लाल विरह विहाल हाल करि मति नासीहे ॥ येहो रघुराय अबै जानोना वियोग पीर रसिकविहारी तुमैं लागत जुहाँसीहै ॥ नैननकी सैन दरशाय दुरे कुंजनमें हाय वह भई सो हमारे गर फाँसी है ॥ ११३॥ कोऊ कहें आली इमि होतीही अधीर काहे येई धनुतोरि तिहुँ लोक यश छायाँ जोरी नीर श्यामकी संयोग रचि राखो विधि कंठ इनहींके जयमाला सरसायह ॥ रसिकविहारी मन भाई सब हह भट्ट राम वनश्याम सिया दामिनी सुहाय हैं ।। उमॅगि चलैगो उर आनंद घनेरो सखी नागरी सहेली सबै मंगल जुगायह॥ ११॥ कोऊ सखी बोली राजकुँवर सलोने मृदु शंभु चाप निपट कठोर क्यों चढविंगे ॥कोऊ कई बैम अति थोरी पै अपार वल तोरि धनु पंकजकी नाल ज्यों वहाँवंगे । रसिकाविहारी मुनि सकल सुखारी भई हम सबधन्य ऐसो नन फल पविंगे। परशि सलोनो गात मुख जलजात देखि कोमल रसीलेवन विहसि सुनावगे ।। ११५ मन अकुलानी मिया नमिरि पिताको प्रण अति सुकुमार घनश्याम राम जाने हैं ॥ निपट कठोर शंभु नाप लखि भारी घनो केते भूप थाके वीर परम सयाने हैं ।। अधियः अधीर भई होयना धरद धीर दरशन हेत युगर्नेन अकुलाने हैं। रसियविदारी दृग चंचल अचंचलभ मानी जालवीच नवीन । उन्शान हैं ।। ११६॥ येरे विधि परम नयानो तृ बनायो जग मेरे दिन देन ऐनो भयो मतिहीनो क्यों ।। जो पं श्यामसुंदर सो मिल 111४) रामरसायन। . बिछोह भयो तोपै मुखमाँगो मोहिं मरनन दीनो क्यों ।। रसिक रघुनंदन अनूपरूप तिनके हियेते मोह सब हरि लीनों जबै मिथिलामें धनुयज्ञ सुनि आये तबै शंभुको : सुकोमल न कीनों क्यों ॥ ११७ ॥ येहो शंभु परम हौं निहोरों तुम मांगों मनभायो वरदान यह पा दोजे प्रसन्न अति दाता फल चारके हो गौरि संयुत तिहारो गुण गाउंमें ॥ कैती तात प्रण कैती मृदु हो चाप तबै साँवरेको जयमाला | राउंमैं ॥ रसिकविहारी व्याहि आनंद उमंग रंग घनश्याम संग अवध सिधाऊंमैं ॥ ११८॥ कीजिये उपार न कोटिन कछूना चलै सोई अब है है जो विधाताः लिखि भाल ॥शंभुचाप तात प्रणरेखा या ललाटकीसो टारेनाटरै तीनों ये अचल चाल ॥रसिकविहारी सुखदानी मनमानी यही ये न काहूंसो कछूक निजहीको हाल ॥ जोपै रघुराय सों हमा साँचो लगो तोपै हम जानी हमैं साँचहू मिलेंगे लाल ॥ १: हरिगीतिका छन्द । इहि भाँति सिय जू सखिन युत रस नेहके छाकी घनी प्रगटे लतनकी ओटते ताही समैं रघुकुल मनी आनंद हिय उमँगो रही जकि चित्रसी सब जहँ तही मानो शरद निशि चन्द्रको यकटक चकोरी लखिरही १२ कोऊ क. सखि दौरि मिलिये त्यागिये जग लाजको इनते विहीनो जो भयो सुरराज तौ किहि काजको कोऊ कहें हम धन्य सजनी लखे श्याम मुजानको ते मूढ़ कैसे श्याम राम विहाय ध्यावें आनको ॥१२१ जरि जाय सो जप योग ज्ञान सनेहसो जरि जायरी जरि जाय जननी जनक मत हित जिनहिं येन महायरी जरि जाय सो गुरु बंधु तन मन प्राण धन जरि जायरी जो भजत रघुकुल चन्दको नहिं करत अधिक सहायरी१२

रामरसायन।
(११६)
यह प्रीत साने वेन आली जनकनंदिनि युतकहैं ।।
सब श्याम छवि छाकी सखी कोऊ न गृह जैवोचहैं ।
मन मानिकै भय मातकी तब 'सीय हिय धीरज धरी ॥
उर गखिकै रघुराय गमनी गेहको आनँद भरी ॥ १२३ ॥
लखि जात जनककुमारिको नृप नंद अति व्याकुल भये ॥
हा भामिनी गजगामिनी मृदु बैन या बोलत नये ॥
हा लाडिली नवला किशोरी प्राणप्यारी नागरी ॥
हा जानकी सुखदायिनी गुण रूप शील उजागरी ॥१२४॥
क्यों नैन वान चलाय प्यारी करिचली घायल हियो ।
मुसक्यान मंद कृपानसी लागी मुतन व्याकुलकियो ।
हे सुंदरी नवला सलोनी फेरि रूप दिखाइयो । १२५॥
हगनीर तुब छवि नीर बिन तलफत तिनै रसप्याइयो।
तुव रूप टर अंतर लिखो पिलगाय क्यों पल एकहू ।।
मन तो तिहारे संग गमनो धात धीर न नेकहू ।।
इहि भांति कहि मृदुवेन राजिवनैन गुरु दिगको चले ॥
इत लाल उतप्यारी चितव फिरिर चितव आनंद भले १२६
इत आय दोऊ भाय गुरु पद पूजि अति आनंदलहै ।।
नृपवागके संपाद सरल मुभाय मुनित सब कहे ।।
द्वै अधिक हृदय प्रसन्न कौशिक मुभग शुभ आशिप दये ॥
चिरजियहु मन अभिलाप पूरे राम मुनि प्रमुदित भये १२७
उत गई मखिगण संग सिय ज गौरिसदन वहारिक ॥
पदकंजगहि मृदुवैनते विनती करी करजोरिके ॥
जति जशिव प्राणप्यारी जैति अभिमत दायनी ।।
जे दीनगन भय भंजनी जैभन जनमन भायनी ।। १२८॥
जे शंभु तन अरधंग वामिनि जैति सुग्गन मंडनी।।
उत्पत्ति थितिलयकारिणी जे जति खल दल उनी ।।
जगजननि ज गिरिजा भवानी जैति इच्छानागिणी।
जे जति जे गजबदन अंबा जति मंगलकारिणी॥ १२ ॥

पामरसायन।
सकल अंतर्यामिनी।
विश्वास करि अति प्रीतिसे पदकमल जो तुम ध्यावहीं।
तिनको अगम सब सुगम होत अभीष्ट फल सो पावहीं ॥
किहि भौति में विनती करो तुम
मन भावतो वर दीजिये अब मोहि शंकर भामिनी ॥१३०॥
बहु दिवस बीते तुमहि सेवत सफल सेवा कीजिये ।
जा भाँति रघुवर वर मिलें कार कृपा आशिप दीजिये ॥
धनु होय कोमल के तजे प्रण तात रामहि देखिके ।
जिहि विधि मिले मुहि साँवरो सोजतन वन हि विशेपिक।।१३१॥
सुनि सीयकी वर विनय गिरिजा परमआनंद पायकै ।
दीनी सुखद आशीश सीतहि सकल सखिन सुनायकै ॥
मन भावतो वर पाय हौ संशय तो सब जानकी ।
दिन कछू बीते होहु दुलही रामरूप निधानकी १३२॥
सुनि गौरि वचन प्रमोद वाढो सीय हिय न समायसो।।
आनंद जो सखियानके किहि भाँतिते कहि जायसो।।
गिरिजाहि शीश नवाय आलिन संग सिय मंदिरगई ॥
रघुचंद दशरथ नंदमें उर प्रीति बाढी अतिनई ॥ १३३॥
दोहा-है सिय जिय रघुवीर बिच, सिय विच रघुबर जीय ॥
प्रीति सनातन परस्पर, दुहूँ बसैं दुहुँ हीय ।। १३४॥
वर्णत शोभा छिनहि छिन, उत सिय इत रघुलाल
दोऊ दुहूँ निहारिकै, फँसे प्रेमके जाल ॥ १३५॥
इति श्री० स० २०वि०वि० वाटिका प्रसंग वर्णनो
नाम पंचमोविभागः ॥ ५॥
॥
-
दोहा-रामसिया सियरामको, सुमिरत निज निज ठाम ॥
मनसंकल्प विकल्प मधि, बीती सकल निजाम ॥१॥
उठे प्रात लखि बंधु दुहुँ, नित्य कृत्य सब कीन ।
गुरुपद पूजे मुदित ढ, मुनि अशीश वर दीन ॥२॥

रामरसायन।
(११७)
"
ताही छिन भेजे जनक, शतानंद मतिधाम ।।
सादर चले लिवाय मुनि, सहित लपण अरु गम ॥ ३॥
मुंदर विशद विशाल वर, बनी धनुप मखशाल ।
मध्य चाप चहुँ ओर बहु, बैठे बली नृपाल ॥४॥
शतानंद कौशिक सहित, दोऊराजकुमार ॥
गये तहां लखि सव उठे, कियो जनक सतकार ॥५॥
परम उच्च आसन मुभग, तहँ करगहि नृप आय ॥
रामलपण संयुत मुनिहि, बैठोरे हुलमाय ॥६॥
राज कुँवर कौशिक सहित, आये धनु मवशाल ॥
मुनि धाये सब दरशहित, तरुण वृद्ध अरु बाल ॥७॥
रुचिर यज्ञशाला निकट, रचित बने बहु धाम ।।
यथायोग मर्याद जह, बैठि लखें सब बाम ।। ८ ।।
ताछिन रघुवर रूप सब, निरखो निज निज भाव ॥
परम विचित्र चरित्र सो, नेक न परो लखाव ॥९॥
तब बंदीजन आयकै, कहो जनक प्रण देरि ॥
सो मनिकै भूपति बली, उठे धनुप दिशि हेरि ॥ १०॥
जाय जाय सब लाय बल, थाके चाप उठाय ।।
रंच डगो नहि करहुते, बैठे भूप लजाय ॥११॥
तब कौशिक लखि रामदिशि, बोले हिय हुलसाय ॥
तात विलोकी धनुप तो, लीजे जनक रजाय ॥ १२ ॥
मुनि रघुवर कर जोरिकै, कहीजु आयसु होय ॥
तो देखों धनु जाय में, नृपरुचि लीजे जोय ॥ १३॥
चीन तब मुनीश औसर अनुमानी जनकहि कही मनोहर वानी॥
राजराम धनु देखन चाहे वड़ीवारते हृदय उमाह ॥१४॥
मुनि कर जोरि कही अवनीशा की परम उचित यह बात मुनीशा।
तर आज्ञा दीनी मुनिनाथा उठे गम गुरुपद परिमाथा१५॥
नख शिख सुभगश्याम मृद्गाता वय किशोरलोचन सुखदाता॥
रखवर रूप निरखि नरनारी भये नेहवश गिगरचारी॥१६॥

1१८)
रामरसायन।
सवैया-कवित्त ।
कोउ कहैं हित हूँ इहि औसर भूपहि कोउ नहीं समुझावै ।।
काह करें नरनाह वृथा जिहिते सबके उर दाहं वढावै ॥
हैं कर कोमल राघवके यह शंकर चाप कठोर लखावै ।।
क्यों रसिकेश गहैं मिथिलेशके हीय दयाहु को लेश न आवै ॥१७
कोउ कहैं इत होत अनीत लखौ न अवै चलिये निज गेहू ॥
कोउ कहैं नृप वावरोहै तब तो सब भापत नाम विदेह ॥
कोउ कहैं सब कोउ कठोर सुराज समाज दया नहि केहू ॥
कोउ कहैं रसिकेश अवौं नृप लालहि बाल चलो गहिलेहू ॥१८
दोहा-कोउ कहैं आली सुनौ, मोहिय इमि दरशात ॥
तृण समान धनु तोरिहैं, दृढ मानौ मम बात ॥ १९॥
इहि विधि पुर नर नारि सब, कहत परस्पर बैन ।
हेरि हेरि रघुचन्द मुख, रंचहु धीर धरै न ।। २० ।।
विकल सुनैना अति भई, क. सखिनसों वात ॥
कैसे धनुप उठाय हैं, राम श्याम मृदु गात ॥२१॥
करति सोच सिय मनहिमन, शंकर गौरि मनाय ॥
कहति सखिन धीरे सकुचि, अलि अब ईश सहाय ॥२२॥
सुमिरि राम बल जनक नृप, छिनक हिये उमगात ॥
पुनि पिनाक गुरुता समुझि, मनहीमन अकुलात ॥२३॥
सो गति सब हियकी लखी, रघुवर उर उमगाय ॥
आये वेगि पिनाक ढिग हेरे सहज सुभाय ।। २४ ॥
घनाक्षरी-फपित्त।
आयो चाप भंग सम सहि जनायो ढंग मानी नृप हिय तंत्र
परकि धरकि उठे। रमिकविहागनेहवाग पुर नारिनके कंचुकी सुबंद
आप ताकि ताकि उठे । उर उमगे हैं भूप कौशिक लपण आदि राम
दोउ थकि थकि उठे। जनककिशोरी के मखिन समेत
सनमफल चाफ फर्गक फकि उठे।॥२५॥

रामरसायन। (११९) दंडक छन्द । राम धनु निरखि वर नृपन बल धरपि बहु परखि सब हीय गति हरपिरुख पायकै ॥धर्मधुर धीर रघुवीर रणधीर तिहि सहज करधारि गुरु शिवहि शिर नायकै ॥ सपदि संधानि ध्रुव भंग अनुमानि कसि- कान लगतानि निरखो न कोऊ वियोवेगि वरिबंड जसमंड भुज- दंड ते चंडको दंड दैखंड खंडित कियो ॥२६॥ घोर धनु भंगको शोरचहुँ ओरभो सुनत तिहुँ लोक चर अचर औचक चके । विष्णु विधि शंभु सुरपाल दिगपाल अहिपाल महिपाल तिहिकाल झझके- जके ॥ होत धराधर धरा कुधर थर हलत सिंधु खलभलत उछलत रविशशि थके । चिक्करत मत्तगज सिंह मृग आदि बहु फिकरत विकल मणि विपिन कंदरतके ॥ २७ ॥ दोहा-धनुप भंग इहि विधि भयो, औचक काहु न देख ।। गिरोखंड है भूमि तब, चकित रहे सब पेख ।। २८ ।। जै रघुवर जे राम जै, जैजै अवध किशोर ।। जै रघुवीर सुधीर जै, चहूँ मचो यह शोर ।। २९ ।। निरखि शंभु धनु भंग सब, जनक नगर नर नारि ॥ करहिं निछावर आरती, बहु मणिगण धनवारि ।। ३० ।। जनक सुनैना सीय हिय, जो कछु भयो अनंद ।। भापिसके नहिं शेप सो, मैं वरणों कहमंद ॥ ३१ ॥ सोरठ-कौशिक लपण अपार, मुदित भये धनु भंग लखि । मानी नृपति निहार, सकुचाने श्रीहत सफल ॥ ३२।। समय निरखि सानंद, शतानंद आज्ञादई ।। जयमाला निरद्वंद, सियमैले रघुचन्द उर ॥ ३३ ॥ तव नृप दई रजाय, सुनि सिय मन आनंद भो ।। मखिन संग हुलमाय, चली विशद जमाल ल ।।३।।

(१२०)
रामरसायन।
घनाक्षरी कवित्त ।
आई रघुचन्द ढिग जनक किशोरी गोरी देखो खंड खंड तहँ शंभु
धनु बंकको।रसिकाविहारी ऐसोआनंद सियाकेचित्तजैसे वरवित्त पाय
होवै सुख रंकको ॥ दोऊ कर उमॅगि उठाये जयमाल लीने कवि
हुलसाये हेरि उपमा उतंकको क्षीरसिंधु गहिकै सनाल युग कंजनते
मुक्तमाल देत मानो पूरन मयंकको ॥३५॥सोहैं सिय सहित उमंग
सखिसाजे अंग भूपण सुरंग रंग वसन विशाल सों ॥ करि कर ऊँचे
दोउ ठाढ़ी हैं विदेहसुता कैसे कंठ डा माल छोटी रघुलालसों ॥
रसिकविहारी तिहि औसर निहारी छबि उपमा विचारी सो उचारी
है उतालसों । कनक लताकी नववल्ली द्वै अनूप कढि उरथ उठी है
मनो मिलन तमाल सों॥३६॥
सोरठा-एक सखी मुसकाय, तब वोली रघुचन्दसों ॥
सादर शीश नवाय, जयमाला उर धारिये ॥ ३७॥
सुनि रघुवर सकुचाय, शीश नवायो सियहि लखि ॥
जनकसुता हुलसाय, पहिराई जयमालउर ॥३८॥
घनाक्षरी कवित्त ।
अतिहि उताल कै निहाल रघुलाल कंठ मेली जयमाल भयो
आनंद अपारो है ॥ रसिकविहारी श्याम गोरी नवजोरी हेरी सब
| नरनारि निज प्राण धनवारो है ॥ माल पहिराई दुहुँछाई सो अपार
शोभा ताछिन अनूप रूप रुचिर निहारो है। धरि तिय भेप मंजु
मुदित वसंत मानौ आज ऋतुराज पै प्रसून जाल डारो है ॥ ३९ ॥
सोरठा-सखिन सिखाई सीय, गहे राम पद कंज तव ॥
आई प्रमुदित हीय, मातु निकट बैठी सकुचि॥४०॥
उत रघुवर हुलसाय, कौशिक पद शिरनायकै ॥
बैठे आशिख पाय, सहित लपण शोभित भये ॥४१॥
पुखासी नर नार, निरखि शंभु धनुभंगको।
निज निज मति अनुसार, कहत परसपर मुदितमन ॥१२॥
दोहा-कोर क. सब भाँति विधि, आज सुधारी बात ॥
दशरथ राजकुमारको, सुयशरहो कुशलात ॥१३॥

रामरसायन। (१२१) घनाक्षरी कवित्त । ताडका जु मारी करी यज्ञरखवारी फेरि तारी सुनिनारी येतो वल जस खूट तो ॥ पुनि सुरनारी नरनारी औ सुरारिनारी हँसती जुन्यारी वीर नाम वह छूटतो॥ रसिकविहारी ईश सहि सुधारी यह कीरति अपारी धौ नजानौं कौन लूटतो॥ जनकदुलारी होती निपट दुरखारी भारी अवधविहारी ते न जो पै धनु टूटतो॥४४॥ दोहा-कोऊ कहति दिढायजिय, सबहि अधिक समुझाय ।। बाप आपही भंग भो, बात सत्य यह आय ॥४५॥ घनाक्षरी कवित। सुनिकै उदंड बल प्रथमैकोदंड दुरि जाय कै लजाय सो मॅजूपा माहिं सोगयो । रसिकविहारी तऊ अवधविहारी ताहि हठकै उठायो मान ताको सबखोगयो । शंभु धन हीय हो गरूर गरुताको भूर चूर धर कै सो सूरताको नूर धोगयो । सोई हूक लूक की भभूक फूक फाटो हीय याही ते पिनाक आप एक टूक होगयो॥४६॥ दोहा-कोऊ कहति विचारिजिय, भयो जु भंगपिनाक ॥ सो कारण हम लखिलयो, सुनौ करें दै हाँक ॥१७॥ घनाक्षरी फपित्त । राम करकोमल कठोर शंभुचाप हेरी मिथिलानिवासिनके सोच हिय भरिगो । निपट हिरासले उसाँस सबु भापी यह रसिकविहारी कौन भूप मान धरिगो ॥ जीरन भयो पै तऊ आज लो कराल भाग येते यास माहीं धनु गरिगोन सरिगो॥ एकै वार ऐसी परीआय सबहीकी चाय लाय लगी हायकी पिनाक याते जरिगो ॥४८॥ दोहा-कोर कहें हम एकह, नहिं माने ये बात ।। निज भुजबलते रामधनु, भंजो प्रगट जनात ॥ १९॥ मो सुनि बोली कोर तिय, आली मेरी जान ॥ जिहि प्रभाव दृटो धनुप, मो में कगं वलान ॥२०॥ पनाक्षरी पपित्त । परि परि पाय जाय गिरिजा निहोरी नित्य शंकर मनायपूजे गण- पति भारसे ॥ दीने दान विविध विधान जपकीने बहु नेम धन लाने ,

(१२२)
रामरसायन।
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RELATiness
सिय सहित उछावसे ॥ रसिकविहारी मिथिलेशकी दुलारी दृढ प्री-
ति उरधारी अवधेश मुत चावसे ॥ जनक किशोरीके प्रतापते पिना-
क टूटो टूटो है न जानी राम बलके प्रभावसे ।। ५३॥
दोहा-इहि विधि उत पुर नारि नर, कहें परस्पर वन ॥
मनभाई सबकी भई, उर आयो अर्तिचन ॥ १२ ॥
इत सिय मातप्रमोद युत, कही नीरभरि नैन ।
भंजी राजकुमार धनु, क्यों भापी यह बैन ॥५३॥
घनाक्षरी फचित।
कहति सखीसों सियमाय हुलसाय हीय हेली हौं भई हो अति
चकित निहारिकै ॥ रसिकविहारी भूरि भारी हो पिनाक जाहि निर-
खि अपार वीर बैठे बलहारिकै॥भंजो ताहिवाल रघुलालहौं नमानी
यह वात इक आई उर भापोंसो विचारिक । मेरीजान काम राम रू-
प धरि आयो आज शंभु धनु तोरो वैर पाछिलो सम्हारिकै ॥ ५४॥
दोहा-यौं कहि रानी बहुरि लखि, सीतहि दई रजाय ॥
सखिनसंगलैसाजसजि, गिरिजहि पूजी जाय ॥१५॥
मात वचन सुनि मैथिली, सकल सीज लै साथ ॥
जाय अलिन युत पूजिकै, गिरिजहि नायो माथ ॥५६॥
ताछिन इक आली कही, सुन हेली मम बैन ।
गौरि सरिस कितहूँ कहूँ, कोऊ सुर तिय हैन ॥५७॥
जाके पदपूजत सदा, पूजत सब अभिलाख ॥
सकल सुरासुर नारि नर, पूजत हिय दृढ राख ॥५८॥
सुनि बोलीं सबही सखी, आली कही प्रणाम ॥
पै फल मिथिला वासको, है यह मेरी जान ।।५९॥
घनाक्षरी कवित्त।
शंभुगिरि वासी विंध्यवासी या गिरीशवासी रहती उमा क्यों तहाँ
जानकी सिधावती ॥ काशीकी सुवासी तथा कांचीपुर वासी तऊ
तितहूँ न जाय सीता सुमन चढ़ावती ॥ रसिकविहारी पूजी जनकटु-
परीयातें नारी त्रिपुरारीकी त्रिलोकमें पुजावती ॥ मिथिला निवा-
गीन होती फेरि कैसे यह ऐसीगरुताई गौरि पावती॥६०॥

रामरसायन।
(१२३)
-
दोहा-इहि विधि सवही परस्पर, कहत सुनत हुलसाय ॥
सिया सहित आई भवन, वेगहिं गौरि पुजाय ॥६॥
छायो अति आनंद चहुँ, करें नारि कलगान ।।
बजत बाजने विविध विधि, होत निछावर दान ॥६२ ।।
राम लपण मुनि जनक सिय, हिय बहु बढ़ी उमंग।
पुर नर नारि अनंद युत, कहत भयो धनुभंग ॥६३ ।।
इति श्री० रा० र० वि० वि० धनुपभंग वर्णनो
नाम पठोविभागः ॥६॥
दोहा-धनुपभंग लखि जनक नृप, अति अनंद उमगाय ।।
करत दान बकसीस बहु, भूपण वसन लुटाय ॥ १॥
ताही छिन चहुँ ओरते, भयो कुलाहल सोर ॥
औचक आये परशुधर, कंध कुठार कठोर ॥२॥
जटाजूट शिर भस्म तनु, भाल त्रिपुंड विशाल ॥
करधनु शरवर तेज बहु, चपल चाल हग लाल ॥३॥
परशुरामको सकल नृप, उठि उठि कियो प्रणाम ॥
शतानंद कौशिक तिनै, उचित मिले लखि वाम ॥४॥
मुनिहि मिलत लखि बंधु दुहुँ, सादर नायो शीश ॥
निरखि परशुधर रूपसव, विकल भये अवनीश ॥५॥
ताछिन औचक धनुपदिशि, हेरि कुठार उठाय ॥
अतिसकोप बोले तमकि, मिथिलापतिहि बुलाय॥६॥
बोल मूढ़ नृपवेगि यह, किन भंजो भव चाप ॥
देव असुर नर कौन जो, भयो कालवश आप ।।७।।
सुनि कराल भृगुपति वचन, नृप चुप रहे सशंक ॥
तब रघुवीर सुवेगहीं, वोले निपट निशंक ॥८॥
परशु नाम ते डरपि के, कहै न कोऊ नाम ।।
धनुभंजन हेतु सब, लेत राबरो नाम ॥ ९॥
सुनि भृगुनाथ रिमाय अति, परशु उठायो हाथ ।।
कही अवहिं सब खलनके, गात करों विन माय ॥१०॥

(१२२)
गमम्मायना
मधि मंडल मय छिनकम, अपही होत निक्षत्र ।।
माला क्षचिन शिरनकी कोटिन बने एकत्र ॥ ११ ॥
परशुगम बनन मुनि, लपण काही अनलाय ।।
अपनी गरे निक्षम अन, कोटन हम लवाय॥ १२॥
लपण और तर पशुधर, लम्प पिलोकनियंकः ।।
गम बंधु पुनि गेप गुत, चोले बनन निशंक ॥ १३॥
पनासरीपगिता
अनुचित भापी तुम जमी यह माखी मय गखी मनही हम निज
रिस मारिक । एको ना दिखाय ऐलोवी सामुहे जो आय फेरि घर
जाय रघुवंशिन प्रनारि के ॥ युद्ध जानि छोरी कर जोगी निहोरों
गि भवन मिधारो गेप मफल निवारिक ॥ रसिकाविहारी छत्र धारी
युद्ध कारी कोउ सकना निहारी या कुठार्गको निहारिक ॥ १४ ॥
पटरीउंद।
सुनि लपण लाल वाणी निशंकादिजनन लाल कार भौहवंक ॥
बोले रिसाय रे मंदवाल । क्यों होत कालवश अतिउताल ॥१५॥
तू अवहिरंच जान न मोहि । चुप जाय वट का कहहुँ तोहि ॥
सुनि फेरि कही लछमन हँसाय । भापो चरित्र निज मुखहि गाय१६
देखो विचारि यह जक्त रीति । जाने विना न हो प्रीति भीति ॥
याते जु हाल पूछ प्रशस्त । सो सत्य सत्य भापी समस्त ॥ १७॥
तुव रूप देखि मम हीय माहिं । एको प्रतीति कछु होत नाहिं ।।
सुर हौ तथापि हौ नाग कोउ । नरही सुभापहू जोइ होउ ॥ १८ ॥
घनाक्षरी कवित्त ।
विप्र कहिये क्यों कर लीने हो हथ्यार याते क्षत्री कहिये क्यों
वीरताई ना जनात है। संत कहिये क्यों क्रोध मंत हो अनंत अरु
भूप कहिये क्यों रूप तौर ना लखात है ॥ रसिकबिहारीहै तिहारी
न्यारी कछू सव दरशात शुद्ध एकौ ना मिलात है ॥ आपनों
। नाम ठाम तब जानै हम भापौ को गुरू है कौन तात
भ्रात है ॥ १९॥

रामरसायन।
(१२५)
पदरी छंद।
सुनि कही कुपित रे बाल वाम । मो नाम ख्यात जग परशुराम ॥
बहु बार भूमि कीनी निक्षत्र । वैठे महीप बहु बूझ अत्र ।। २० ॥
दोहा-सुनि लछमन हसिक कही, धन्य भाग्य मम आज ।।
दीन जानि कीनी दया, दरश दियो द्विजराज ॥२१॥
घनाक्षरी कवित्त ।
पाऊं अनुशासन तो आसन बिछाऊं वेगि वासन भराऊ वेगि
धीर उर राखिये ॥ द्विज गुणमान ज्ञान त्यों विचार मान कीजे
छोहकोहतें इतो न मनमाहँ माखिये ॥ देखि धनु वान क्षत्री जान
पुनि वीर मान कीनो हम रोपसो कृपाते दोप नाखिये ।। रसिकवि-
हारी सदा पूज्य ही हमारे याते मीठो दधि मोदक मँगाऊं
विठि चाखिये ॥२२॥
पड़ीछंद।
तब कही कोपि भृगुवर जुछिप ॥ जनि जान मोहिं केवल सुविधा।
मोसम नऔर जग कोउ वीसाबहु शूर मोहि लखततजत धीर ॥२३॥
सामिव कही तब विहँसि धीर ॥ नव सुनी आज हम विप्र वीर ॥
पैजिय प्रतीति नहिरंच होय॥ द्विजराज सत्य गुण सुनहु सोय॥२४॥
पनासरी कवित।
वेद पदि जाने जप यज्ञ बढ़ि जाने पाप पुण्य मदि जाने बहु
बात गढि जान ॥ शापवेमें जान वर थाप में जानें दोप
दापवेमें जाने तप तापवेमें जान है ॥ खाय जानें सृा औ
अजूवजा चिलाय जान रसिकाविहारी बालह पढ़ाय जान है ।।
येती पुनि औरह अनेक गति जान एक. युद्धवर वीरताई विप्र
नहिं जान हैं ॥२५॥
पदरीट।
भृगुनाथ फेरि बोले भत्रोध । अज्ञान ताहि चहु न बोध ।।
परवीर माटिमणि गुर पानिामोशंभुदासले मोहिं जानि२६
दादा-टपण को गुरु शिष्यको पल अग मुयश अपार ।।
को अम जो जान नहीं, विदित मरद मंगा ॥२७॥

(१२६) रामरसायन। घनाक्षरी कवित्त । मदन निहारो सो प्रसून वान वारो मारो दुर्वल विचारो यह शंभुवल भूरता ॥ अबला अपारी वृद्धनारी महतारी ताहि तमाक संहारी या तिहारी तेज पूरता ॥ रसिकविहारी दुहुँकाज दुराचारी तिन भारी करि भा या कवीनकी हे करता ॥ हम तो धनयांहीं विलोकि अनुमानी जानी सकल पिछानी स्वामी सेवककी शूरता २८ दोहा-यौं कहि वोले लपण पुनि, मोहिं रुची इक बात ॥ स्वामी सेवक दुहुँनके, गुण समान दरशात ॥२९॥ घनाक्षरी कवित्त । उन द्विज मारो तुम क्षत्रिन संहारो उन लाज सब छोरी मरजाद तुम तोरीहै ॥ मुंड उनधारे तुम अक्षि गलधारे उन खप्पर लयो है हाथ लीनी तुम झोरीहै । उनै विप वारे तमैं क्रोध तनुजारै उनै भाई मति भोरी तुम वाद बुद्धि चोरी है ॥ रसिकविहारी त्रिपुरारी औ तिहारी भली एकसी अनूप स्वामी सेवककी जोरीहै ॥३०॥ पदरी छंद। सुनि बैन लपणके परशुराम। बोले रिसाय रे बालवाम ॥ अब वेगि भाग ह्यात दुराय। तन छनक माह जम लोक जाय॥३॥ सुनि स्वामि निंद जे चुप रहायँ । ते अधम सूढ़ वेगे नशाय ॥ हो रहाँ दोप लखिरोप मार । भो आज काह कुंठित कुठार ॥३२॥ दोहा-सुनि बोले हँसि कै लपण, करौ न सोच अपार ॥ लाय देहुँइक उपल तिहि, लेहु सुधारि कुठार ॥३३॥ कुंठित भयों कुठार जिहि, सो कारण यह आय ॥ लखि लीजे निज हीयते, मैं सब कहीं बुझाय॥ ३४ ॥ घनाक्षरी कवित्त । कैतो कर कंपत गिरो है कहुँ पाहन पै परशु तिहारो तबहीते छीन धार भो । कैती कहुँ कानन कठोर तरु कीने छिंद जाते वाढ मंद है हथ्यार विन कार भो ॥कैतो लोहकाचेको बनायोहै अजान कोऊ 'कैतो यह आजलों न काहू पै प्रहार भो॥ रसिकविहारी सत्य

रामरसायना
येही दरशात याते कंध पै धरेही धरे कुंठित कुठार भो ॥३५॥
चौ०-सुनि भृगुनाथलपण की वानी जनकहि कही महारिस सानी॥
रे नृप गहो मौन नहिं बोले लखौं काल दुव शिरपर डोल।।३६॥
वेगि बताव चाप किन तोरो, लखो ताहि कैसो रिपुमोरो॥
महावीर जेते जगलोगा कोउ न धनुप भंजिवे योगा॥३७॥
भारी भूरि कठिन कोदंडा की परम उदंड प्रचंड अखंडा॥
मम गुरु कर पिनाक जिन भंगाकरौं खंड तिहिको द्रुत अंगा३८॥
सुनि भृगुपतिके वचन कठोरा * कहो वहुरि लछमन बरजोरा।।
बारबार बूझा भृगुनाथा ॐ धनुपभंग भो परशत हाथा ॥ ३९ ॥
सहज राम चापहि कर परसो तुरत टूटि अवनी पर दरसो ।
धनु गरुता कछुनाहिं दिखानी भई बात सो सकल पिछानी४०॥
घनाक्षरी कवित्त ।
तेज ते न भारी गुणरूप तेन भारी शंभु संयुत तिहारे दोहदोपनते
भारी भो । सुनो भृगुनाथ रखनाथ हाथ लागतहीं चापके सुपापन-
को भार जरि छारी भो ॥ रसिकविहारी राव दुरित दुरानो तवधनुप
पुरानो वृद्ध विशद विचारी भो । फेरि अनुमानो तुव आगम पिनाक
याते पातकडरन तन त्यागिक सुखारी भो ॥४१॥
दोहा-या कहि बोले लपण पुनि, नेक न आवे लाज ॥
धनुही को बहु वार तुम, कहौ धनुप विनकाज ॥१२॥
घनाक्षरी कषित।
छोटे छोटे छोहरा छवीले रघुवंशिनके करत कलोल यूथ निज
निज जोरि जोरि ॥ बेहो भृगुनाथ चली अवध हमारे साथ
देखी तहँ कसे चहुँ खेलत हैं कोरि कोरि॥ रसिकविहारी ऐसी
अमित अमान सदा आने गदि तनि एक एकनते छोरि २॥ कोऊ
झकनारे कोक पकार मरोरें योंही खोरि खोरि नितहि वहाँ
बाल तोरि तोरि ॥४३॥
दोहा-रही तिनहुँ ते अति हरू निपट निजोर निकाम ।।
यह धनुहीं कैसी हुँती, मोहिं बतावो राम ॥ १४ ॥

(१२८)
रामरसायन।
घनाक्षरी कवित्त ।
तूलकी रही कै काहू फूलकी रही कै मृदु मूलकी रही कै
धूलसान कै सजाईती ॥ सांटीकी रही कै कहौं साँची स्वच्छ
माटी लाय काँची काहू कुशल कुलाल ते कराईती ॥ रसिकबिहारी
भृगुनाथ भापिये तो नेक शंकर समीप या कहाँ ते किमि आईती॥
हौतौ यह जानौ अनुमान ते जु कोऊ बाल ख्यालहेतु धनुही
मृणालकी बनाईती ॥४५॥
चौ०–यों कहि लपण बहुरि मुसकाई बोले रोप तजौ भृगुराई ।
भूले इक धनुहीं जो टूटी और अमित जगमें कह खूटी॥४६॥
घनाक्षरी-फवित्त ।
ऐसीही कमान बालकेलिकी रुचै तौ बहु होगी विदेह गेह
अवहिं कढ़ाऊँमै ॥ रसिकबिहारी जो तिहारी प्रीति याही माहिं
तोपै दुहुँ खंड बैंचि वेगही बढ़ाऊँमैं॥ नीकी जिय भावै भृगुनाथ तो
निदेश दीजे हेमकी रचाय मणि माणिक मढाऊँमै ॥ जोपै तुमैं चाहिये
कहौ तौ द्विजराज अवै याहू ते अनोखी चोखी अमित गढाउँमै४७॥
दोहा-लपण वचन सुनि परशुधर, परशु उठायो घोर ॥
कहो हतहुँ इहि वालकहि, मोहिं न दीजो खोर ॥४८॥
करवादी निंदक कुटिल, याहि वधे नहिं दोप ॥
करौं क्षमा हठिकै तऊ, मोहिं बढ़ावै रोप ॥४९॥
सुनि भृगुपतिके वचन तब, रघुवर मृदु मुसकाय।।
जोरि दुहूँ कर सामुहे, विनय करी शिरनाय ॥५०॥
महावीर वर धीर प्रभु, क्षमिये शिशु अपराध ॥
कृपा करत हैं वाल पे, सबही साध असाध ॥२१॥
लपण छुमो नदि चापको, सत्य कहीं भृगुनाथ ॥
ही अपगधी गवगे, यह तुब कर मम माथ ॥५२॥
मुनि रखवर वागी माल, विशद विनय गंभीर॥
भामिन भयो र कोप कछु, भृगपति भागधार ॥२३॥

रामरसायन।
(१२९)
ची-पुनिभृगुवर विचार उरकीना निजकर धनुरघुनाथहि दीना।।
नृप सुत छुअत सगुन भो चापाकलखो राम तब राम प्रतापा२४॥
तब भृगुनाथ प्रेम उर भारी वारवार रघुवरहि निहारी ॥
नख शिखरूपअनूपअपारा चकित चित्त हिय करत विचारा२५॥
घनाक्षरी-कवित्त ।
कैधों जटा जूट कधी कंचन मुकुट सोहे चंदनकी खोरि के
चंद अभिरामहै ।। कैचों मुण्डमाल कंधौं नाग मुक्ताकी माल
कैधौं अंगराग के विभूति छवि धामहै । कैयौं है त्रिशूल कैधा
शर मुख मूलकर कधी पटपीत के वचंवर ललामहै रसिकविहारी
छवि न्यारी या अनूप भारी राम रूपशंभु कधौं शंभु रूप रामहै५६॥
चौ०-यौं विचारि पुनिदृढ़ अनुमाने सकल ईश धनुधर पहिचाने।।
तब जानो रघुवीर प्रभावा परमानन्द ज्ञान उर आवा॥५७ ॥
परशुराम हिय अति सकुचाई दुहुँ बंधुन वर विनय सुनाई।
निज अनुचित सब क्षमा कराई प्रमुदित गयेवेगिर.२॥२८॥
दोहा-अतिसशंक जिय विकलह, परे रहे दुखकूप ॥
लखि पयान भृगुनाथको, सुखीभये सब भूप ॥ ५९॥
पुनि मानी महिपाल सब, करि करि विविध विचार॥
गमन कियो निज निज भवन,अमित मानि मनहार॥६०॥
चौ जनकनगर चहुँ आनँद भारी कहत परस्पर पुर नर नारी॥
अव दुख शोक सकलविनशाये रखल मलीन सब भवन सिधाये६१
जनकराज उठि अधिक अनंदे * सादर मुनि कौशिक पद वैदे ।।
पुनि कर जोरि कही मृदुवानी * अब सनाथ सीता मैं जानी ६२॥
मुनिवर करिय रजायसु सोई उचित होय इहि औसर जोई॥
सुनि कौशिक बोले हुलसाई * लोकरीति अब चहिय सुहाई ६३
सजि वरात दशरथ नृप आराम व्याह लखि हिय हुलसाव।।
यह दृढ़ करि मुनि लछमनरामा की परमानंद गये निज ठामा॥६॥
इति श्री. रामरसायनवि० वि० परशुरामसंवाद
वर्णनोनाम सतमोविभागः ॥ ७ ॥

(१३०) रामरसायन। दोहा-आये जे महिपाल ते, किते गये निज़ गेह ॥ किते सुजन मिथिला रहे, राखे नृपति विदेह ॥१॥ पुनि मिथिलाधिप पत्र चहुँ, भेजे उचित लिखाय ॥ सकल ठौर मग साजते, निज दिशि दिये सजाय ॥२॥ चौ०-पुनिप्रवीन वर दूत वुलाये * दै पत्री तिन अवध पठाये ॥ शुचि सेवकन कही महिपाला * व्याह साज सब सजौ उताला३ समै जानि नर तनु धरि देवा करत काजसियकी लखि सेवा।। मंडप सजो अनूप विशाला रचित खचित कंचनमणिजाला असन वसन भूपन बहु नाना विविध वास वाहन वर जाना ॥ जनक भवन अरु नगर मँझारा * सुर निर्मित सब साज अपारा॥५ उत वर दूत अवध पुर जाई * युत मर्याद नृपहि शिर नाई ।। करि बहु विनय पत्रिका दीनी * प्रमुदित सुमंत करलीनी ॥६॥ जनक पत्रिका बाँचि सुनाई * पुनि मुनि पत्र पढो हरपाई ॥ नृप सुनि समाचार हुलसाने * सकल लोगआनंद अघाने॥७॥ वृझी कथा दूत वर वरनी * राम लपण नृप कौशिक करनी॥ कहो वहोरि मु व्याह विचारा साजसमाज सहित विस्तारा८॥ मुनि सब चरित भूप हुलसाये भूपन वसन अनूप मँगाये ।। प्रमुदित देनलगे चकशीशा ले मुदूत बोले धरि शीशा ॥९॥ कोशलपाल कृपा करि दीनी # हम सानंद शीश धरि लीनी॥ धर्मपाल महराजहि जानी विनती करै जोरि दुहुँपानी१०॥ जिमि ममईश विदेह नृपाला तिमि स्वामी अवधेश कृपाला। पे हम हैं मिथिलापुरवासी जनकमुताके रहत उपासी११॥ मो जानकी ग़ममों व्यावह नातो जिहि भाँति निवाई ॥ याते धर्मनीति जिमि होई भूपति करियरजायसु सोई १२॥ इतबनन मनि सकल मराहे कड़े वचन नरपनि जिय चाहे ॥ नृप रस लावि मोशीश चटाई पुनि यकशीशयरी तिहिठाई १३ बार जोगिकर विनती कोनी गजराज आना मुदि दीनी ।। । साल कौशरपुर जाई आयोगदि नादि लियाई ३२|| an रामरसायन। (१३१) याते राज रजायसु दीजे वेगि जनकपुर पाचन कीजे ॥ सुनि सुमंत दिशि भूप निहारी के आज्ञा दुई यथोचित सारी १९॥ सुनि सुमंत दूतन सँग लाये $ सहित सुपास निवास दिवाये ॥ पुनि बहु सेवक सुमति बुलाई * साज सजन हित दई रजाई १६|| पुनि बह निवत पत्र लिखवायेदै सुदूत चहुँ ओर पठाये ।। इहि विधि गुरु मंत्री मतिमाना कियेकाज सब सहित प्रमाना१७ जवते गम व्याह मुधि पाई सकल मातृ तवते हुलसाई ॥ गानतान कशीश सुदाना छिनछिन करें अनेक विधाना१८ भरत शत्रुहन अति हुलमाये * सकल सखा सेवक हरपाये निज निज साजसजें सब भारी कर जनकपुर चलन तयारी १९॥ पुरवासी अनंदमें फूले देह गेह सुधि बुधि सब भूले ॥ करें सकल मंगल मय काजा साजेंवर वरात कर साजा २०॥ साजे सकल सदन बहु भाँती * जटित हेम मुक्तामणि पाँती ॥ कंचन कलश सुवंदनबारे ध्वज वितान नवरंग अपारे २३॥ सोरठा वीथी भवन बजार, राजमहल बहु साज सजि ॥ छाई छटा अपार, राम व्याह मंगल अवध ॥ २२ ॥ मातु सकल हुलसाय, लोक वेद कुल रीति युत । अति आनंद अघाय, नेग योग कीने विविध ॥ २३॥ पुरवनिता वर बंद, मंगल साज सिंगार सजि ॥ गावत भरी उमंग, आवत राज अगारमें ॥ २४॥ इहि विधि सहित उमंग, भये सकल मंगल सुखद ॥ सजी बरात सुढंग, जुरो लोग चहुँ ओरते ॥ २५ ॥ समय विलोकि वसिष्ठ, बोले दशरथ राजसों। है यह योग बलिप्ट, वेगि बगत पयानको ॥२६॥ सुनि गुरु वचन नरेश, दोऊ राजकुमार युत ॥ पूजे गौरि गणेश, कियो पयान मुहूर्त शुभ ॥२७॥ दोहा-गज तुरंग रथ पालकी, सकल अनृप अपार ॥ पदचर संग समाज बहु, चले महीप उतार ॥२८॥ .

(१३२)
रामरसायन।
गुरु नृप स्यंदन पैरुचिर, कुँवर तुरंगन पाहिं ।।
यथा उचित वाहन अपर, सजे जनकपुर जाहिं ॥ २९ ॥
बजत बाजने विविध विधि, गान तानको शोर ।।
जै जैजै अवधेश नृप, शब्द होत चहुंओर ॥ ३० ॥
जनक नगर ते अवध लग, जनक सजे सव साज ॥
मग सुपास गृहतें अधिक, लखि मन मुदित समाज ॥ ३१ ॥
अति उताल यौं जनकपुर, आये अवधनरेश ॥
इक योजन अगवान तिन, लाये सजि मिथिलेश ॥३२॥
दियो विशद जनवास नृप, करि बहु सकल सुपास ।।
दोऊ दिशिअतिप्रीति भरि, छिन छिन बढत हुलास॥३३॥
भयोशोर चहुँ जनकपुर, धाये सब नर नारि ॥
मुदित भये अवधेशको, साज समाज निहारि॥३४॥
भरत शत्रुहन रूप लखि, चकित चितव सब कोउ ॥
कहत परस्पर कुँवर ये, राम लपण सम दोउ ॥ ३५ ॥
ताही छिन नृप सुतन युत, कौशिक हिय हुलसाय ॥
आय मिले अवधेशसों, परमानंद बढ़ाय ॥३६॥
राम लपण सौंपे नृपहि, प्रमुदित सकल निहारि ॥
देत अशीश उमंग सव, चिरुजीवो सुतचारि॥३७॥
पुर परिजन सेवक सखा, चारहु सुतन समेत् ॥
जनकनगरमें अवधपति, राजे सहित जनेत ॥ ३८॥
पुनि कौशिक मिथिलेशसों, कहि ठाने चहुँ व्याह ॥
हरपाने दुहुँ ओर सब, बाढो अमित उछाह ॥ ३९ ॥
लोक वेद कुल रीति बहु, यथा उचित सतकार !
दान मान दुहुँ ओरते, नित प्रति होत अपार ॥ ४० ॥
तितहि भरत मातुल मुदित, नाम जुधाजित सोय ॥
आये सादर अवध है, लखि प्रसन्न सव कोय ॥४१॥
लाख मिथिलावासी मुदित, कौशल नाथ समाज ।
सुखी अवधवासी निरखि, जनकराज वर साज ॥ ४२ ॥

रामरसायन। (१३३) , इहि विधि बीते कछु दिवस, भई सकल जगरीत ॥ आयो समय विवाहको, शुभ दिन परम पुनीत ॥४३॥ अगहनकी सित पंचमी, वृपभलग्न भृगुवार ।। सुखद समय गोधूलिका, रामविवाह विचार ॥४४॥ प्रमाण उत्सवसिंधौ-श्लोक । विधिः-पंचम्यां मार्गशीर्पतु शुक्लपक्षे शुभे दिने । संध्याकाले च गमस्य विवाहो भवति ध्रुवम् ॥१॥ दोहा-सजिवरात जनवासतें, चले जनकके धाम ।। चहूँ बंधु दूलह बने, शोमित रूपललाम ॥ १५ ॥ घनाक्षरी कविता बागो पीत फेटा पीत पटका पिछौरा पीत सोहे खार पीत मन मोहै मौर पीत है। अंगराग पीत वर भूपण अमाल पीत तून धनु वान ओ कृपान म्यान पीत है । सजित तुरंग पीत सँग निज संगी पीत विपुल वराती पीत साज मब पीत है ।। रसिकविहारी चारु दूलह विलोकि चारी श्याम श्वेत हरित सुरंग भयो पीत है ॥ ४६॥ दोहा-ताछिन छटा अनृप लरिख, जनक नगर नर नारि ॥ कह परस्पर वचन वर, परम प्रेम उर धारि॥४७॥ घनाक्षरी कविन। कंधों मणि मार कधी रुचिर रसाल मौर कधी फूल जाल कधी मेरो दगज है ।। कधी मुख मंज कैची विक्रमो विशाल कंज कुंतल किधी है किधी मधुप समाज है । कधी हे तुरंग कधी मारुत चल ई मंद कधी कल गान कधी कोकिल अवाज है । कैथीं रखगज सा- ज दूलह सुहाव आज रसिकविहारी किधी वि ऋतुगज ॥४८॥ निरखि गत हुलमात बतरात वाम देखो रघुवंशी सबै सुखमानिया- नई ।। मोदत अदा तें नेक जोहन ही मोदन हैं गमिक विहारी वीर धारे धनुवान हैं। सकल मुजीले आ चीले उमगीले अंग माम पनीले त्यागीले स्पमान ॥ याने यी जनात वात कौशल पुरीमें वीनागे ओरील गट रनको वान हैं ॥१९॥ चार्गबंधु मु- -- रामरसायन। खमानिधान सुखसिंधु हेली रसिकविहारी नेक नैन भर हेरिले ॥ हि- यरो डराय हाय डीठना लगाय कहूं याते तू लजायना छबीली टुक रिले॥ हाहा खाय विनय सुनाय तुव पाय परौं धाय चहूं वदन दुरा- य पट गेरिले ॥ वनरा विशाल वर वानिकवने हैं वीर वेगि ढिग जाय लाय राई नोन फेरिले ॥२०॥ दोहा-यौं प्रमुदित सव रूप लखि, कहैं परस्पर बैन । सजि वरात चहुँ बंधु मुठि, जात जनकके ऐन ॥५१॥ नृत्य गान बहु वाद्यको, छयो शोर चहुँ ओर ॥ सुर नर नभमहि कहत सब, जैज अवधकिशोर ॥५२॥ चौ०-इहि विधि चारी कुँवर सुहाये सहित समाज राज हुलसाये ॥ आये जनकद्धार भये ठाढे 3 सवही मन प्रमोद बहु बाढे ॥ ५३॥ सियामात सब सखिगणसंगा परिछन कीनो सहित उमंगा॥ लखि शोभा हरपी महरानी सकल नारि आनंद अघानी॥५४॥ मोद भरी मंजुल मृगननी करें गान कल कोकिल बैनी॥ राज कुँवर मंडपतर आये ६ लखि दुहुँ राज हिये हुलमाये२५ ॥ भई अमितलौकिक कुल रीतीः पूजन दान नेग युत प्रीती॥ प्रादित समय बिलोकि बुलाई. सीतहि साजिमखीले आई ॥२६॥ पनातर्ग-पापित। कंचन नमान गात महज मुहात फरि दीपति दिखात दुनी मंजन निपप मिकाविहारी मंज सकल सिंगार नाम शामा अपामविदक विमा प॥ मनमणि मांग लस जनकमिशांगि शीशगत गुहाई आई उपमा निपरप ॥ मानी रमराज गगन मनजाति पानी पिजय पताल, गुमक शिरार ॥२७ aiनंग गंद की चाट नगरी पिटांग या || HD शामिता गंगालाल गंगा 27T गिटार मार ॥जी गग पानी की याद ॥२८॥ - चौ०-जनकलली रघुलाल निहारी भये अनंदसकल नर नारी ॥ तब सब उचित विधान अपारा* किये दुहूँ नृप रानि उदारा ॥ ५९॥ ते पुनि पद सरोज नृपधोये जे नित निजमानस मधि गोये ।। पुनि विदेह गुरु आयसुपाई * कन्यादान कियो हुलेसाई॥६० ॥ दोहा-जनकराज सिय कर हरपि, राम पाणिमह दीन । छई छटा तब राजसुत, प्राणिग्रहन जबकीन ॥६॥ घनाक्षरी-कवित्त । जनक किशोरी अरु अवध किशोर दोऊ होत पाणिग्रहण अनंद रसभीने हैं ।। राम कर मध्य मंजु शोभित भयो है कर शोभा सो अपारमें सुजान चित्त दीने हैं।अति छविवारी सिय आँगरी अनूप हेरि वात निरधारी मति धारीजे प्रवीन हैं।।रसिकविहारी विश्व विजय विचारी आज यातें पंचवान पंचवान संग लीने हैं ॥१२॥ चौ०-सीता पानि गहोरघुनाथा पुनिकरि सुविधि होम मुनिनाथा।। सिया राम पट गाँठ सुजोरी * होन लगी भाँवर सुठिजोरी॥६॥ घनाक्षरी कवित्त । साजे व्याह साज ज्यों अनूप अवधेश लाल कीने, सिंगार त्यों विदेहनृपकी लली॥दोऊ होत भाँवरी अपार ता समैकी छवि रसिकविहारी सो अभूत उरमें रली ॥ ग्रंथित सुरंग चूनरीसोपटपति संग निराख सुढंग यो उमंग उमगी भली ॥ वृंदबंद जुरिकै अनंद भरि इंद्र बधू कर गहि मानों दामिनीको घर ले चली ।। ६४ ॥ देखि वनरी की छवि राति सकुचाति होय हेरि वनराको त्यों मनोज होत झावरो ॥ सिय रघुचंदकी छटा निहारि व्याह समै रसिक बिहारी सब लोग भयो बावरो॥ चूनरी ग्रथित पटपीत मणि मार माथे लखि जन भा मिथिलेश पुण्य रावरो॥ नवलकिशोरी गोरी दुलहिनि जसी बनी तसोनव दूलह किशोर वर साँवरो॥६५॥ जनक किशोरी गोरी राम अभिराम श्याम जोरी या करोरी रति काम सुपमा भली ।। रसिकविहारी व्याह औसर अनूप रूप शोभित अपार शोभा हेरि हरपी अली ।। सिय छवि छाक पीय पीय छवि

(१३४)
रामरलायन।
खमानिधान सुखसिंधु हेली रसिकविहारी नेक नैन भर हेरिले ॥ हि-
यरो डराय हाय डीठना लगाय कहूं याते तू लजायना छबीली टुक
घेरिले। हाहा खाय विनय सुनाय तुव पाय परौं धाय चहूं वदन दुरा-
य पट गेरिले ॥ वनरा विशाल वर वानिकवने हैं वीर वेगि ढिग जाय
लाय राई नोन फेरिले ॥५०॥
दोहा-यौं प्रमुदित सब रूप लखि, कहैं परस्पर बैन ॥
सजि वरात चहुँ बंधु सुठि, जात जनकके ऐन ॥५१॥
नृत्य गान बहु वाधको, छयो शोर चहुँ ओर ॥
सुर नर नभ महि कहत सब, जैजै अवधकिशोर ॥ ५२ ॥
चौ०-इहि विधि चारौ कुँवर सुहाये * सहित समाज राज हुलसाये ॥
आये जनकद्वार भये ठाढे * सबही मन प्रमोद बहु बाढे ॥ ५३॥
सियामात सब सखिगणसंगा परिछन कीनो सहित उमंगा ॥
लखि शोभा हरपी महरानी * सकल नारि आनंद अघानी॥१४॥
मोद भरी मंजुल मृगनैनी करें गान कल कोकिल बैनी॥
राज कुँवर मंडपतरं आये 8 लखि दुहुँ राज हिये हुलसाये५५ ॥
भई अमित लौकिक कुलरीती * पूजन दान नेग युत प्रीती ।।
प्रोहित समय विलोकि बुलाई * सीतहि साजि सखीलै आई ॥५६॥
घनाक्षरी-कवित्त ।
कंचन समान गात सहज सुहात फेरि दीपति दिखात दूनी
मंजन निपर पै ॥ रसिकविहारी सजे सकल सिंगार चारु शाभा
है अपार हमविदुक विखर पै ॥ मंजुमणि मौरी लस जनक किशोरी
शीश लगत सुहाई आई उपमा तिपरपै ॥ मानौ रसराज रघुराज
मन जीति बांधो विजय पताक ले सुमेरुके शिखर पै॥५७ ॥
घांघरा बनरो लाल बंद कंचुकी ह लाल चूनरी पिछोरी लाल
मारी मंजुलाल हैं। भूपण अनृप लाल शोभित शृंगार लाल रसिक-
विहारी नरनारी बहु लाल हैं। मंडफ विचित्र लाल महल विशाल
लाल चांदनी चॅदावा लाल साज सब लाल हैं। उलही उमंग हिय
लाल पीत पीत लाल है ॥२८॥

रामरसायन। चौ०-जनकलली रघुलाल निहारी भये अनंदसकल नर नारी॥ तब सब उचित विधान अपारा किये दुहुँ नृप रानि उदारा ।।१९।। ते पुनि पद सरोज नृपधोये जे नित निजमानस मधि गोये ॥ पुनि विदेह गुरु आयसुपाई कन्यादान कियो हुलसाई॥६० ॥ दोहा-जनकराज सिय कर हरपि, राम पाणिमह दीन । छई छटा तब राजसुत, प्राणिग्रहन जब कीन ।। ६३ ।। घनाक्षरी-कवित्त। जनक किशोरी अरु अवध किशोर दोऊ होत पाणिग्रहण अनंद रसभीने हैं ।। राम कर मध्य मंजु शोभित भयो है कर शोभा सो अपारमें सुजान चित्त दीने हैं।।आति छविवारी सिय आँगुरी अनूप हेरि बात निरधारी मति धारीजे प्रवीन हैं।रिसिकविहारी विश्व विजय विचारी आज यातें पंचवान पंचवान संग लीने हैं ।। ६२॥ चौ०-सीता पानि गहोरघुनाथा पुनिकरिसुविधि होम मुनिनाथा।। सिया राम पट गाँठ सुजोरी होन लगी भाँवर सुठिजोरी॥६॥ घनाक्षरी कवित्त । साजे व्याह साज ज्यों अनूप अवधेश लाल कीनेहें सिंगार त्यों विदेहनृपकी लली॥दोऊ होत भाँवरी अपार ता समकी छवि रसिकविहारी सो अभूत उरमें रली ॥ ग्रंथित सुरंग चूनरीसोपटपीत संग निराखि सुढेग यो उमंग उमगी भली ॥ वृंदवृंद जरिक अनंद भरि इंद्र बधू कर गहि मानों दामिनीको घर ले चली ॥ ६ ॥ देखि बनरी की छवि रति सकुचाति होय हेरि वनराको त्यो मनोज होत झावरो ॥ सिय रघुचंदकी छटा निहारि व्याह सम रसिक विदाग सब लोग भयो वावरी॥ चूनरी ग्रथित पटपीत मणि मीर मार्थ लखि जन भा मिथिलेश पुण्य गवरो ।। नवलकिशोरी गोरी दुलहिनि जसी बनी तसोनव दूलह किशोर वर साँवरी ॥६५॥ जनक किशोरी गोरी गम अभिराम श्याम जोग या कगेरी गति काम सुपमा भली ॥ सिकविदारी व्याद आसर अनृप रूप शोभित अपार शोभा हेरि हरपी अली ।। मिय छवि छाके. पीय पीय रवि (१३६) रामरसायन। छाकी सीय जीकी गति दोऊ निजहीकी हियमें रली ॥ कंज हग देखे उत श्याम भुंग लोभे इत हेरि मुखचंद फूली वालन- लिनी कली ॥ ६६॥ चौ०-बजहिं बाजने विविध विधानाकरहिं नारिमंगल कलगाना।। भाँवर फेरि नेगबहु कीने धनमणि गण अगनित नृप दीने॥६७॥ ताछिन जनकनगरकी शोभा वरणिसकै अस कवि जग को भा॥ वरसै चहुँ अनंदकी धारा * सुखी सकल नर नारि अपारा६८॥ घनाक्षरी कवित्त । जलद घिरे हैं जन उमडो विदेह मेह वरसै अनंद नीर धारन अनंतसें ॥ दुंदुभी अवाजें घन गाजें जोरशोर छाजै दुति दरशावे तिय दामिनी दुरंतसें ॥ भूरि पूरि दान मान सरिता अपार बाढि पवन झकोर प्रीति पूरव दिगंतसे ॥ रसिकविहारी सिय व्याहके उछाह माह भूलि कै भई है मनो पावस हिमंतसें ॥ ६९ ॥ बैठौं जे जठेरी निमिवंशकी घनेरी तिननेगरीति उचित निवेरीसब भूरीहै। फेरि फेरि दम्पती विराजे मंजु शोभा वह रसिकविहारी प्राणजीवनकी मूरी है।राम अभिराम श्याम करते सिंदूर जब दिनो सिय माँग सो अभूत छबिरूरी है । महत मतंग मत्त मुदित निशंक मानो झुंडमें गुलाल लै कलिंदी धार पूरी है ॥७० ॥ चौ-पुनि मुनि सकल नेग निरवारे * दंपति एक ठौर बैठारे॥ बहुरि वशिष्ट रजायसु पाई * सिय भगिनी तिहुँ जनक बुलाई७१॥ दोहा-सुता औरसी जनककी, एक उर्मिला नाम । द्वैकुशध्वजकी मांडवी, श्रुतिकीरति अभिराम ॥ ७२ ॥ ची०-सुंदरि सुता मांडवी नामा सो भरतहि व्याही सुखधामा । पुनि कन्या उर्मिला अनूपा र व्याहि दई लछमनहि सुभूपा ७३॥ जो श्रुतिकीर्तिनाम वर कन्या र सो व्याही रिपुडनकहँ धन्या । व्याहे गम सरिस तिहुँ भाई की मुदित जनक दशरथ दुहुँगई।७४॥

रामरसायन। (१३७) सो०-इहि विधि भयोविवाह, राम सहित तिहुँ बंधुको ॥ वाढो परम उछाह, महासुखी चर अचर सब ॥७॥ तव नृप जनक उदार, हृदय हुलास सकोच युत ।। दायज दियो अपार, सकल अलौकिक वस्तुते ॥६॥ घनाक्षरी कवित्त । वच्छ युत धेनु कामधेनु सम पंचलच्छ दंती श्याम श्वेत दश लच्छ मद भीने हैं ।।हरित सुरंग रंग रंगके तुरंग कोटि स्यंदन सपाद कोटि हेमके नवीने हैं । शिविका अमोल रत्नजड़ित सुसप्त कोटि दासी दास अमित अनूप जे प्रवीने हैं ॥ वासन वसन भरि भूपण अपार साज रसिकविहारी ये विदेह नृप दीने हैं ॥७७ ॥ सो -जिते जनक नृप दीन, तिते सकल पुनि और बहु ॥ दासी दास विहीन, किये दान अवधेश बहु ।। ७८ ॥ जितीकरी वकसीस, अवध नृपति हुलमायके ।। ताहूते गुण बांस, माज मकल पूरित भयो ।॥ ७९ ॥ याही विधि दुहुँ राज, पागे परम प्रमोदमें ।। अमितबार बहु साज, देत सकल पूरित तर.॥ ८॥ दुहूँ भूप कर दान, देखि सकल सुर नर चकित ।। भेद न कोऊ जान, सिय प्रभाव प्रगटो कहा ।। ८१॥ छायौ अमित अनंद, मीताराम विवाह को ।। मुदित नारि नर वृंद, जैजज मब करत हैं ।। ८२ ।। पुनिसुवामिनी नारि, दलह दुलहिनि चारह ।। सुंदर समय निहारि, कर गहि कुहवर लेगई ॥ ८३॥ ले निवासमझार, कियो नेग लहकीरिको ।। गाँवंगीत सुदार, गनि मिग्वा दंपनिहि ।। ८ ।। पनाक्षी धिन। कलिन कटोग स्वच्छ हीरक अमोल गोल नामें भी औदन मु. धारोमुखदेतही होत लरकारिनेग आनंद अपा छायोलगत मुद्दायो -

(१३८)
रामरसायन।
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अति सकल निकेतहै ॥ राम सिय शोभा अविलोकितिहि औसरकी
भापिवेको हरपि हिलोर हिय लेतहै ॥ रसिकविहारी जनु चंदते पियूप
लैलै रतिसुख मैनरति मैन मुख देतहैं ।। ८५ ॥
सो०-इमि बहु सहित उमंग, व्याहरीति सबही भई ॥
जनक सदन रसरंग, छायो नेह अपार लखि ॥८६॥
पुनि चारहु वर बंधु, पितु ढिग आये सकुच युत ॥
दशरथ नृप सुखसिंधु, निरखि हीय प्रमुदित भये ॥ ८७॥
बहुरि भई जिवनार, पटरस व्यंजन चतुरं विधि ॥
वरणि लहै को पार, सो सब अमित अनूप सुख ॥ ८८॥
गारी विविध प्रकार, गावे तिय आनंद भरी ।।
हास विलास अपार, भये भई जिवनारवर ॥ ८९ ॥
करि भोजन सानंद, एक सरिस सब छोट बड़ ॥
संयुत सुत सुखकंद, आये नृप जनवासमें ॥९॥
नृत्य गान चहुँ ओर, होत कुतूहल विविध बहु ॥
मचो नगरमें शोर, घर घर होत अनंद अति ॥ ९१ ॥
इहि विधि राम विवाह, भयो भये प्रमुदित सबै ॥
प्रतिदिन होत उछाह, दोऊ दिशि आनंदमय ॥ ९२ ॥
भोजन दान विनोद, गीतवाद्य कौतुक विविध ॥
हास विलास प्रमोद, होत रहत नित रैनि दिन ॥ ९३॥
दोहा-कौसल पुरवासी सबै, भूलिगये निजधाम ॥
मिथिला अवध लखात यक, मुदित रहैं वसुयाम ॥ ९४ ॥
होत जनकदिशिते सदा, नित नूतन सतकार ।।
रामविवाह अपार सुख, वरणिलहै को पार ।। ९५ ॥
इति श्री. रा०र० वि०वि०विवाह वर्णनो नाम
अष्टमोविभागः ॥८॥
सोरठा-प्रातसम सियमात, बोलि पठावत बंधु चहुँ ।
सखन सहित नित जात, करत कलेऊ मुदित मन ॥१॥

रामरसायना (१३९) - लक्ष्मीनिधि अभिराम, जनक राजके मुत विदित ।। तिनकी तिय मति धाम, सिद्धानाम ललाम अति ॥२॥ दोहा-सो चारहु नृपनंद को, सिद्धा सहित सनेह ।। संग सखिन युत लैंगई, कर गहिकै निजगह ॥३॥ वर आसन सनमान करि, वैठारे नृपलाल ॥ हास विलास विनोद बहु, करन लगी सब वाल ॥४॥ घनाक्षरी करित्त । बोली एक वाम श्यामनाम राव रोहे राम याको अर्थ सकल समर्थ इमिलायो है ।। सबमें रमै जो वही रसिकविहारी राम सो सुनि हमारे हिय अति भ्रम छायो है ॥ सकुच न राखौ नेक सत्य बात भापों वेगि आपने सबै हैं इतै कोऊ ना परायो है । सबमें रमौ त्यौ रमा भगिनी सुमातनमें नाम गुण है कै वंशहीमें होत आयो है ॥५॥बोले रघुलाल निमि कुलकी निहारौ चाल जानें हम हाल सब जैसे मिथिलाक हैं ॥ रसिकविहारी रीति भारी है तिहारी यह एक नामहोते काम राखत सदाके हैं ॥ अंबके जनक वेई जनक कुटुंबहुके जनकपुरीके वेई जनक सभाके हैं । जातके जनक वेई भ्रातके जनक बेई तातके जनक वेई जनकसुताके हैं ॥६॥ कहत वधूटी एक हम यौं सुनी है लाल मुनि प्रगटाये चार मुत अवधेशके ।। दूजी हँसि बोली भानुवंशी वल हीन होत आली इनके तो यही ढंग हैं हमेशके ॥ वाले मुनि श्याम तुम याही भ्रमते सुधाम देखो बल नृपति चुलाय देश देश के॥ रसिकाविहारी नारि मिथिलाप्रवीन सारी जसी सुनी तैसी भोन देखी मिथिलेशके ॥ ७॥ बाल हँसि भरत सुनी जू सिद्धिप्यारी नेक वात हम वृझै सो वतावो बहरावोना॥ नारीको विवाह नारी संग या तिहारी रीति कौन सुख भारी वगि भापो सो सकायोना।। लक्ष्मीनिधि सिद्धि तिय नाम है प्रसिद्ध यह सिद्धिकाज सिद्धि विधि हमते दुरावोना ॥ रसिकविहारी गुण मंत संत पुत्र वधू इत है इकंत तंत कहत लजावोना ॥ ८ ॥ सिद्धि पुनि बोली बन (१४०) गमरसायन। सुनिये कमल नैन सारखे रघुवंशी गुण सकल प्रवीन ते ॥ सबसे अनोखी चोखी चातुरी चलावं यह भगिनी सुता दें काम लेत है ऋपीन ते ॥ रसिकविहारी कही लखन न कोऊ काज साधक उदंड निमि वंशके वलीन तें ॥वल बनना कल छलते बनना तय हलते सलोनी सुता काढत जमीन तें ॥ ९॥ कोऊ सखी बोली अली सुंदर सबै हैं तऊ कौशला दुलारे क्यों सुरूप सरमाये हैं। कही तव कौऊ कीन जानै महरानी भीन कीनो रतिनाथ गोन सोई छवि छाये हैं ॥ रसिकविहारी बाल कोऊ हुलसाय भापी मधुर सुबैन कैसे बोलत सुहाये हैं। कोऊ हँसि बोली याते बोल अति मीठे भये इनकी सुमाय इनें खीर खाय जाये हैं ॥ १० ॥ संवैया-फवित्त । बोले तबै रिपुसूदन यों जिय भाये तुमैं यह क्यों पहिचान ।। संग चलो सवही जुरिकै हम सत्य सनेह तबै तुव जाने । जो न चलौ तौकछू घरही सतकार करौ अतिही मन मानें । हैं अनव्याहे किशोर घनेरसिकेशसखावे कहोइत आन।।३।। वेगहि सिद्धि कही हँसिके निमिवंशीकहा गुण रावरे गावै ॥ सो रसिकेशकरौ जिहिते मिथिला पुर वासी सबै समुझावै ॥ चारन नंद अनंद समेत दई हमतौ तिहिते हुलसावें ॥ होंय तिहारी जिती भगिनी तिन देहु विवाहि इहाँ सुख छा३१२॥ राम कही सिधिसों मुसक्यायकैनारि घनी रघुवंशिहिचाहैं । हौं निमिवंशी महा तपसी तिय एकहीको वरियाँई निवाहैं । याते न राखौ विचार कछू रसिकेश बुलावहु बेगि कहाँहैं । होयँ जिती मिथिलेशसुता हम चारह बंधु तिती सबब्याह १३॥ सिद्धि कही तब श्याम सुनोबहु तीत्र भये जिय चैन लहैना।। याते जुहो रसिकेश भली इक तौ पुनि दूजिहि पाणि गहना। नारि धनी जिहिके तिहिके मन और कछू वर चाह चहैना ।। ताहू पैसोरस भंग महा सब माहिं समान सनेह रहैना॥१४॥ सो सुनिकै रघुराय कही है सही यह पै सब एकसेना ॥

रामरसायन। (१४१) कोउ लखें सुख स्वारथको अरु कोउ वनो शुचि प्रेमहिथाहैं। सुंदरि सिद्धि सुवैन सुनौ कछु नीकोबुरो जियरंच न चाहै ।। ऐसो सुभाव परो है सदा हमतौ हिय सत्य सनेह निबाह १५ ॥ राजकुमारके वैन सनेह भरे सुनिक सबही उमगानी ।। प्रेम प्रवाह बढ़ो हियमें तब सिद्धि कही गहिके मृदुपानी ॥ लाल निहोरति हो तुमको मम चूक क्षमौ अति नारि अयानी।। मोहिनभूलियोश्याम सुजान कौरसिकेशसदानिजजानी १६ तिय एक हिये उमगाय सुधायक आय दुहूं पदकंजगहे || सकुचाय कछू अकुलाय सकाय सुनेह बढाय सुबेन कहे ॥ हम रावरे संग चलें अवौ जु वियोग कलेश न जै है सहे।। रासिकेशजुपै तजिही ललाछिनमें सुनिहौ नहिं प्राण रहे १७॥ करजोर निहोरकही इक लाल विहाल करी सिगरी तियको। मृदुबैन सुनाय छटा दरशाय सनेह लगाय हरो हियको ।। रसिकेश कियो जिमि छोह वनो तिमि मोह सदा रखियो जियको। न सुहाय विहाय तुम रघुराय धरावहि धीरकहौ वियको॥१८॥ दोहा-सुनि सिद्धा बोली विलाख, जिय सनेह सरसाय ॥ हेली इनके हीयमें, निठुराई दरशाय।। १९ ।। कुण्डलियाउंद। जाके नामहिं लेतहीं, मोह सकल मिटि जात ॥ सुत वित गृह तिय मीतसे, फेरि न प्रीति रहात ।। फरि न प्रीति रहात दुखसुख सम दुहुँ मा ।। लोक और परलोक, चाह आशा सब खोवें ॥ रसिकविहारी गम जपत, ममता नहिं ताके॥ नेह ताहि क्यों होय, नाममें यह गुण जाके॥२०॥ लांग जाके हीयम, प्रिय वियोगको तीर ।। आप सरिस माई त , लख पगई पार ।। लवं पराई पीर हिय दाया फछु लाई ।। येथे पार सुबीन जिये, शंका कद आवे ।। . ,

(१४२)
रामरसायन।
रसिकविहारी सहज चाप भंजो-अनुरागें ॥
इनै विरहको भार कहो, भारी किमि लागै ॥२१॥
दोहा-यों कहि सिधि पुनिश्याम दिशि, हेरिनीर भरि नैन॥
लै उसाँस बहु नेह युत, बोली मंजुल बेन ॥ २२ ॥
घनाक्षरी-कवित्त ।
सरससनेहसने मधुर सुधासे बैन मंद मुसक्याय फेरि कवधौं
सुनावोगे॥ रसिकबिहारी बलिहारी या तिहारी छवि मंजुमनहारी
फेरि कब दरशावोगे ।। रूपकी उपासी हमैं दासी जानि खासी लाल
यौंही फेरि कवधौं अनंद उर छावोगे । येहो श्याम सुंदर सुजान
प्राणप्यारे छैल साँचि कहो फेरि मिथिलामें कब आवोगे ॥ २३॥
दोहा-ताछिन बोली एक तिय, सुनी छबीले लाल.॥
यह अधार है प्राणकी, प्रिया जानकी बाल ॥२४॥
सवैया कवित्त ।
है सबको अति नेह सिया महँ सो रसिकेश विलंब न लैयो ।।
वारहिं बार बुलावहिंगे इहिते मिथिलेश ललीही पठेयो ॥
फोर हिये हुलसाय लला मिथिला पुरवासिनको सुख दैयो
राजकिशोर सदा तुमहीं इत सीतहि आपलिवावन ऐयो२६॥
सत्य सनेह सने सुनि बैन कहै अनुराग भरी वर नारी ॥
देखि दशा तिनकी रघुनंद पगे दुहुँनैन भरे सुख वारी ॥
धीरज दै तिन श्याम कही रसिकेशरहो सब भाँति सुखारी ॥
ज्या तुम मोहिं धरो उरमें तिमि हौं सबही अपने हिय धारी२६॥
आवहिंगे हम वार घनी मिथिला रसिकेश लहैं सुख भारी॥
ऐसो सनेह को ठौर न और कहूँ जगमाहँ रुचै जहँगारी ।।
सत्य विचार करौ अपने अपने उर जानतिही गति सारी।।
होय कोऊ नरनारी सदा तिहि लागत है ससुरारपियारी ॥२७॥
दोहा-इहि विधि सुख सरसाय बहु, कहे परस्पर बैन ।
डीट बचाय सखीन दिशि, सिद्धि करी दृगसेन ॥२८॥

रामरसायन।
(१४३)
पाय सिद्धि रुख तीयगन, गहे बंधु चहुँधाय.॥
बहु विनोद भारि मोद सब, करन लगी हुलसाय ॥२९॥
घनाक्षरी-कवित्त ।
कोऊ नारि सहित उमंग रंग डोरे अंग कोऊ भाल बेंदी दै तियाके
माज साजै हैं । कोऊ गुलचायक कपोल मुख चूमै धाय कोऊ
आय औचक गुलाल मलि भाजै हैं ।। कोऊ गाय गारी करतारीदे
विलोके रूप कोऊ दूरहोतें फूल घाल फेरि लाजै हैं । रसिकविहारी
कोउ दुलही बखानि भेट करहिं अनंद रघुनंद सुखकाजै हैं ॥ ३०॥
सिद्धि हुलसाय आय बीरी मुखदीनी फेरि अतर लगायो अंग
वसन सुरंगमें । गजरा प्रसूननके चारू पहिराये लखि लाल हरपाये
वोल आनंद उमंग में ॥ तुम अलबेली चारहूके जयमाल मेली
काह यह कीनो छकिनेह रसरंगमें । रसिकविहारी सुकुमारी अब
साँची कही चारौ वीचरैही कै रहोगी एकसंगमें ।। ३१ ।। सुनि
सकुचाय सिद्धि वोली हँसिये हो लाल चारौ नृप लाल बहु
ख्यालनमें तीखेहो। नीके श्याम गोरे हौन कोरे रस बोरे छल कोऊ
नाहि थोरे भेप भोरे शुद्ध दीखे हो ॥ रसिकविहारी औध नारी
हैं प्रवीन मारी तिन ढिगजाय जाय सब रस चीखे हौ। नैननके
मेननके बैननके चैननके पूरे रघुचंद छलछंद बंद सीखे हो३२॥
श्याम हँसि बोले हम सीखे वह सीखे जो न सीखे तिन सीखवेकी
चाह उरलाये हरसिकविहारी गुणकीरति तिहारी सुनि सीखियेको
चारी बंधु आज इत आये है ॥ जो पै कृपा करिक सिखायो
अधिकावो मोद जग यश छावो बहु दृरि ते सिधाये है। कहो
हियराखें कही भापं अभिलासव पूजंरावरेसे गुणमंतमंत पायेहँ३३॥
दोहा-इहि विधि हास विलासमें, मध्य दिवसभो आय ॥
समय निरखि पितृ निकटको, हरपिउठेरघुराय ॥ ३४॥
पुनि सिद्धा रुखपायक, सब धाई सखि द ।।
द्वार आय वर सखनकों, गहि लीने सानंद ॥३५॥
भरि भार रंग गुलाल सों, करि करि नारि सिंगार ।।
अनर पानंद मान युत, पदिराये टर हार ॥ ३६॥

(१४) गमरसायन। " अमित अली चहुँ बंधुको, मखन सहित ले संग॥ यथा रूप जनवासमें, लाई सहित उमंग ॥ ३७॥ अपर सखन को टेरि के, सीप राजकुमार। कही लेहु वर बीर ये, सकुचे सफल निहार ।। ३८॥ इत सबही मंजन कियो, सजे अनृपम अंग ॥ सिद्धि निकट सर उत गई, आली भरी उमंग ॥३९॥ सब रघुवर गुण रूप मद, छकी तीय हुलसाय ।। कहति पुरस्पर रुचिसरिस उर अभिलाप दृढाय ।। ४० कोउ कहैं सखि होउँ जो, अवध महलकी धूरि ॥ तो परसों नित श्यामके, चरण सजीवन मृरि ॥४१॥ कोउ कहैं सखि होउँ जो, अवधनगर तरु पात ॥ तो परसौं तन लालको, कुंजन आवत जात ॥४२॥ कोउ कहैं सखि होउँ जी, अवधनगर मधि मोर ॥ उड़ि महलन पै वैठितो, निरखौं नवल किशोर ॥ ४३ कोउ कहैं सखि होउँ जो, अवधवाग विच फूल । तौ सुमाल मिलि लाल हिय, लगौं मिटै सब शूल ॥ ४४ कोउ क अलि होउँ जो, अवध मध्य मृग रूप ॥ तौ खेलौं सँग लाडिले, शोभा लखौं अनूप ॥ ४॥ कोउ कहैं अलि होउँ जो, श्रीसरयूमधि मीन ॥ तौ मजत परसों लखौं, रघुवर अंग नवीन ॥४६॥ सिद्धि कही तब सखि सुनौ, मैं यह चहौं सदाहि ॥ बसै श्याम मो हीय नित, छिनहु नहीं बिलगाहि ॥४७॥ इक सखि बोली प्रेम भरि, बडभागिनि है सीय ॥ जाहि अनूपम वर मिलो, रधुवर सों कमनीय ॥ ४८॥ येही विधि सब सिद्धि युत, छकी नेहरसरंग ॥. निशिदिन रघुवर रूप गुण, ध्यावै सहित उमंग॥ १९॥ जनक भवन यौँ नि दिन, नित प्रति होत उछाह ।। सब हरपे जबते भयो, सिया रामको व्याह ॥५०॥ इति श्री. रा. २० वि० वि० हासविलासवर्णनो- नाम नवमोविभागः ॥ ९ ॥ , - रामरसायन। (१४५) तोटक छंद। इहि भाँति वने दिन बीत गये ।। सबही जन प्रीति अधीन भये। नहिं काहु कछू सुधि धामहुकी । तनकी धनकी सुत वामहुकी ।।१।। बहुवार कही अवधेश जऊ ॥ न विदेह बिदा तिन कीन तऊ॥ तब कौशिक भूपहि आय कही ॥ अव राज विदा हढ लेन चही ॥२॥ सुनिके मिथिलेश कहो वर है । मिथिला अवधेशहिको घर है। पुनि जो कछु राज रजाय करी ॥ सबही विधिसो हम शीशधरी॥२॥ कहि यो पुनि साज सजाय सवै॥ पठये चहुँ बंधु बुलाय ते ॥ यह बात सुनी पुर लोग जहीं। अकुलाय उठे अतिहीं सुतहीं॥४॥ नर नारि सबै यह जीय चहैं ॥ रघुचंद इहाँ अब नित्य रहैं ।। पुरवाम परस्पर बोलति हैं ॥ अभिलाप हिये वह खोलति ।।५।। घनाक्षरी कवित्त । को कहैं हेली निज दोङमें श्रवण कुंड वचन सुधाते हौं भरौंगी- जोरि बूंद बूंदकोऊक हों तो सखी गुण गण साँवरेको उरबिच धा- रों कंठ माल मधि गूद गूद ॥ कोऊक, रसिकविहारीछवि नीलमणि धरि ही हिये सो दृगतारनमें फूंद फूंदकोऊ कहें वेतौ अली अवध सिधा यात हम गहिराई मन मंदिरमें मूंद मूंद ॥६॥ तो० छंद । इहि भांति सबै तिय वैन कहें ।। रघुनंदनको न वियोग चहें । जुरिकै वनिता रनिवास चली।लखिये छवि और आज अली|| इहि भाँति चहूं वहु शोरविछ्यो॥अब आज विदाकर साज भयो । सब नेनन नीर विमोचत हैं ॥ किहि भांति रहे इमि सोचत हैं |८|| कह बालक वृद्ध कहा तरुणा ।। मिथिला सब छाय गई कमणा। पशु पक्षिहुते अतिही विल ॥ मनही मन सोच भरे कल्पै ॥ ९॥ सिय मातु इतै सिय गोद लई । करि हाय विलोकि उमाम लई ॥ बहु नेनन ते जलधार चली। तिहि औसर धीर अपार चली||१०|| तब रानिहि धीर धराय अली ।। बहु बात कही समुझाय भली ।। सिय मात महा मनमोह मली। उरलाय लई करिछोद लली ११॥

(१४४) रामरसायन। -- अमित अली चहुँ बंधुकों, सखन सहित ले संग ।। यथा रूप जनवासमें, लाई सहित उमंग ॥ ३७॥ अपर सखन को टेरि के, सोपे राजकुमार ॥ कही लेहु वर वीर ये, सकुचे सकल निहार ॥ ३८॥ इत सबही मंजन कियो, सजेअनूपम अंग॥ सिद्धि निकट सब उत गई, आली भरी उमंग ॥३९॥ सब रघुवर गुण रूप मद, छकी तीय हुलसाय ॥ कहति पुरस्पर रुचिसरिस,उर अभिलाप दृढाय ॥१०॥ कोउ कहैं सखि होउँ जो, अवध महलकी धूरि ॥ तो परसों नित श्यामके, चरण सजीवन मूरि ॥४१॥ कोउ कहैं सखि होउँ जो, अवधनगर तरु पात ।। तो परसौं तन लालको, कुंजन आवत जात ॥४२॥ . कोउ कहैं सखि होउँ जौ, अवधनगर मधि मोर ॥ उड़ि महलन पै वैठितो, निरखौं नवल किशोर ॥ ४३ कोउ कहैं सखि होउँ जो, अवधबाग विच फूल ॥ तौ सुमाल मिलि लाल हिय, लगौं मिटै सब शूल ॥ ४४ कोउ कहैं अलि होउँ जो, अवध मध्य मृग रूप ॥ तौ खेलौं सँग लाडिले, शोभा लखौं अनूप ॥ ४५ ॥ कोउ कहैं अलि होउँ जो, श्रीसरयूमधि मीन ॥ तौ मज्जत परसों लखौं, रघुवर अंग नवीन ॥४६॥ सिद्धि कही तब सखि सुनौ, मैं यह चहौं सदाहि ॥ बसै श्याम मो हीय नित, छिनहु नहीं बिलगाहि ॥४७॥ इक सखि बोली प्रेम भरि, बडभागिनि है सीय ॥ जाहि अनूपम वर मिलो, रघुवर सों कमनीय ॥४८॥ येही विधि सब सिद्धि युत, छकी नेहरसरंग। निशिदिन रघुवर रूप गुण, ध्या सहित उमंग॥ ४९॥ जनक भवन या नि दिन, नित प्रति होत उछाह ।। सब हरपे जवते भयो, सिया रामको व्याह ॥५०॥ इति श्री० रा. र० वि० वि० हासविलासवर्णनो- नाम नबमोविभागः ॥ ९ ॥ - रामरतावना तोटक छंद। इहि भाँति वने दिन बीत गये ॥ सबही जन प्रीति अधीन भये॥ नहिं काहु कछू सुधि धामहुकी ॥ तनकी धनकी सुत वामहुकी ॥३॥ बहुवार कही अवधेश जऊ ॥न विदेह विदा तिन कीन तऊ॥ तब कौशिक भूपहि आय कही ॥ अव राज बिदा दृढ लेन चही ॥२॥ सुनिके मिथिलेश कहो वर है ॥ मिथिला अवधेशहिको घर है। पुनि जो कछु राज रजाय करी ॥ सवही विधिसो हम शीशधरी॥३॥ कहि यौं पुनि साज सजाय सवै।। पठये चहुँ बंधु बुलाय तौ ।। यह वात सुनी पुर लोग जहीं॥ अकुलाय उठे अतिहीं सुतहीं॥४॥ नर नारि सबै यह जीय चहैं ॥ रघुचंद इहाँ अव नित्य हैं । पुरवाम परस्पर बोलति हैं ॥ अभिलाप हिये वह खोलतिह।।५।। घनाक्षरी कवित्त । कोऊ कहैं हेली निज दोउमें श्रवण कुंड वचन सुधाते हों भरींगी- जोरि बूंद बूंदकोऊकहें हों तो सखी गुण गण साँवरेको उरविच धा- रौ कंठ माल मधि गूद गूद ॥ कोउ.कहें रसिकविहारीछवि नीलमणि धरि ही हिये सोहगतारनमें फूंद फंदाकोऊ कहें वेती अली अवध सिधा याते हम गहिराखें मन मंदिर में मुंद मूंद ॥६॥ तो० रुंद । इहि भांति सबै तिय वैन कहें ॥ रघुनंदनको न वियोग च ॥ जरिक वनिता रनिवास चली। लखिये छवि और आज अली|| इहि भाँति चहूं बहु शोरविथ्यो।अब आज विदाकर साज भयो । सब नेनन नीर विमोचत हैं । किहि भांति र इमि सोचत हैं ।।८।। कद वालक वृद्ध कहा तरुणा। मिथिला सब छाय गई करणा॥ पशु पक्षिटुते अतिही विल ॥ मनही मन सोच भरे कलंपें ॥ ९॥ सिय मातु ईत मिय गोद लई । करि हाय विलोकि टमाम लई ।। पटु नैनन ते जलधार चली । तिहि ऑसर धीर अपारची||5|| तब रानिदि धीर धराय अली । यह बात कही ममुदाय भली ।। निय मात महा मनमोह मली। अल्पवयी .

२४६) गमरसायन। नि हीय लखी जगरीति यही॥ इमि सोचि कछू जिय धीर रही। ननी मुख चूमि कपोल गहे ॥तियधर्म सिखायसुबैन कहे ॥१२॥ हि औसर आय विदेह तहाँ । लखि सीतहि कीन विलाप महाँ । नही छिन अंक लगावत हैं । बहु नैनन नीर वहावत हैं ॥ १३॥ पनीति सुरीति सिखावत ॥ उमगावत हैं अकुलावत हैं । विदेह विदेह विदेह चहै । तब कौन विदेह विदेह कहै॥ १४ ॥ हि औसर तीन हुँ बालतहाँ । द्रुत आय मिलीं करि शोर महाँ॥ नेवास जुरी तिय बूंद घनी।। दृग नीर हरै सब शोक सनी॥१९॥ हुँ राजसुता सब नारिनके ॥ उर लागिरहैं सुकुमारिनके । छन धाय मिलैं गहि मातनको ॥ विलपाय मिलैंछिनभ्रातनको१६॥ हुँ बंधु नरेश समाज सबै ॥ लखि सो गति होय अधीर तबै ॥ नि लाय हिये समुझाय घनी ॥अपने अपने उर धीर ठनी ॥१७॥ पद्धरी छंद। हि समय चहूँ नृप सुत ललाम । आये अनंद युत जनक धाम ॥ मथिलेशरानि सन्मान कीन । भोजन कराय बहु साज दीन।। १८॥ हु भाँति कीन विनती अपार । सौंपी सुतान करिअमित प्यार। मलि चहूंबंधु सबसों सप्रीति । परितोप यथोचितरीति नीति॥१९॥ नाये रताल जनवास माह । भेजो दहेज पुनि जनकनाह ॥ हु साज वित्तदासी सुदास ।दीने अपार नृप युत हुलास ॥२०॥ रिनारि नगरवासी अनेक । जिन उचित सरस इकतें इकेक ॥ तेन अमित वस्तु सिय रामहेत । दीनी सप्रेम लीनी सहेत ॥२१॥ नाये समाज युत अवधनाथ ।। मिथिलेश मिले गुण वरणिगाथ ।। हुदान मान दुहुँ दिशि अपार । कीने नरेश दोऊ उदार ॥ २२॥ तासी सुदा सधन अमित साज । दीने बहोरि मिथिलाधिराज ।। गुभ समय जानि पुगिन बुलाय ॥ दीनी चढाय रथ अंक लाय२३॥ विभाँति विदा कीनी नरेश । पर यमन विभूपन शुनि सुदेश ॥ प मफल जान कर उचित दीन। युत प्राति महि परितोपान२४॥ नि अपयनाय गमने मुधाम । युत पुरवा चहुँ मुत ललाम ॥ दुगार तिमिथिलानशा यह कदन अवय पति गुण मुदेश २६॥

रामरसायन । (१४७) कार राम सीय सुधि बार वार ॥ सब होय .नेह उमगै अपार ।। पुनि जनक राज सुत दान माना।तोपे समस्त याचक महान॥२६॥ पुनि विदा किये सब लोग भूप ॥ वर उचित रीति संयुत अनूप ॥ चहुँ सुयश शोर भो देश देश । जैजैति जैति मिथिला नरेशा॥२७॥ इति श्री. रा०र० वि०वि० श्रीजनकनंदिनी- बिदावर्णनो नाम दशमोविभागः ॥१०॥ चौ अवधनाथ उत अवध पधारे कहत जनक गुण मुदित अपारे। पहुँचे आयअयोध्यामाही रचना भई अमित चहुँघाहीं ॥१॥ मंगल साज साजि वर वामा करत गान आई नृप धामा । वजत वाजने परम सुहायेर सुत सुतवधुन सहित नृप आये ॥२॥ मोद भरी सब मात सिधारों से परिछन करि चहुँ बधू उतारों ॥ डारि पावड़े मंदिर लाई 8 जुरौं नारि बहु हिय उमगाई ॥३॥ देहि अमोलनेग वर नारी मुख देखें पट घूघट टारी ॥ चारह बधू निरखि सब रानी * हिय अपार आनँद हुलसानी॥४॥ नेग देन हित हिय सकुचाही * तिहलोक संपत्ति कछु नाहीं । हिय लजाय औसर अनुसारा भूपण दिये अमोल अपारा ॥५॥ दोहा-पुनि रानी चहुँ सुत वधुन, प्रीति अनंद समेत । सुंदर मुख दिखरावनी, दीने सुभगनिकेत ॥ ६॥ पुत्रवधू जहँ चारहू, प्रमुदित सहित उमंग। विलसे रहसि निकेत सो, निज निज प्रीतमसंग ॥७॥ कनक भवन वर कैकयी, सियहि दियो हुलसाय । दियो सुमित्रा मांडविहि, मुकर भवन उमगाय ॥ ८॥ हरपि उर्मिलहि कौशला, फटिक भवन सुचिदीन । चंद्र भवन श्रुतिकीतिको, दियो मुदित मुख भीन ॥ २॥ चौ०-पुनि कार निवछावर बहुवारा दई मासु वामीम अपारा ।। लोक वेद फुलरीति अनेका कीनी सरम एकते एका ॥१०॥ निशि जागरन करें सब नारी, दोत गान कातृहल भारी ॥ पूजन दान मान जिवनाग करें अनेक रचित व्याहाग||13|| २४८) रामरसायन । . - इहि विधि सब अनंद महँ फूले 8 रैनि दिवस कब होय सुभूले । राज भवन अरु नगर मझारा ॐ चहुँ बहु होत मंगलाचारा१२॥ शुभ ग्रह योग वार दिन जानी थी तब कंकन छोरन विधिठानी ॥ सकल हास सन बंधिनि नारी * कहैं वचन परिहास सुखारी ॥१३॥ घनाक्षरी-कवित्त । बोली एक नारी सुनौ अवधविहारी यह शंभु धनु है न जाहि वेगै गहि तोरीगे ॥ रसिकविहारी हौं तिहारी चतुराई तब जानौंगी सुकंकनकी गांठ जब छोरौंगे ॥ ताछिन छबीली एक दूजी हँसि बोली श्याम आज धीरताई वीरताई सब भौरोगे ॥ तुम पै न तौ लों कषौं छूटि है छवीलेछैल जौलोनाहिं जनकसु ताकों कर जोरौगे ॥ १४॥ फेरि इक बोली हम जानी मिथिलामें जाय नीकी नौलनारिनके चित्त चोरि लायेही ॥ याते बारम्बार कर कुंपत तिहारो लाल करत ढिठाई पैहियेमें भय छाये हौ ॥ कछु जनि मानौं नेक भीति जो भई सो भई हेरौ टुकप्यारे क्यों लजाय शिर नाये हौ।।मति मुखमोरौ वेगि कंकनको छोरो संक छोरौ सब कौशलपुरीमें अब आये हो ॥ १५॥ पुनि इक वाम यौं कहीहो अभिराम श्याम कौशिक कृपाते यश भारी बहु लूटो है । नृपति कुमार हौ सदा ते सुकुमार फेरि खानों तिय जुठो तब और वल खुटो है ॥ हम अबला पैरावरे ते सबैलातऊ जानो पुरुषारथ तिहारो सब झूठो है ॥ रसिकविहारी शंभुचाप किमि टूटो कहौ तुम पै अबैलों नेक कंकन न छूटो है ।। १६॥ दोहा-इहि विधि हास विलास बहु, करें मुदित मन वाम ॥ सुनि सकुचाय सुवेगहीं, कंकन छोरो राम ॥ १७॥ योही प्रति दिन होत बहु, आनँद आमित उछाह ॥ भोजन दान विनोद नित, निशिदिन रहत उमाह ॥ १८॥ पुनि दशरथ महिपाल मणि, यथा उचित सानंद ॥ सकल अयाची करिदये, जिते सुयाचक बूंद ।। १९॥ अरु जे जन चहुँ देशके आये राम विवाह ॥ बहु दिनते प्रिय पाहुने, हटिगखे नरनाह ॥ २० ॥ .

रामरसायन। (१४९) - पुनि सब रुचि लखि अवधपति, संयुत प्रीति सुनीति ॥ किये बिदा सन्मान करि, बहु विधान नृपरीति ॥२१॥ कौशिक मुनिहि निहोरि पुनि, राखे राम नृपाल । प्रीति प्रतीति अपार वश, रहे अवध कछु काल ॥२२॥ पुनि मुनि मुनिन समाज युत, नृप रामहि समुझाय ।। भये विदा सानंद अति, यथा उचित सतभाय ॥२३॥ नूपरानी सुत सुत वधू, सकल परे मुनि पाँय ।। दई अशीशप्रमोद भरि, ऋपिन सहित ऋपि राय ।। २४ ॥ पुनि वशिष्ठ आदिक सकल, मुनिहि मिले युत प्रेम ।। अपर समाज प्रणाम करि, आशिप लहो सुक्षेम ॥२५॥ पुनि वशिष्ठ सुत सचिव नृप, कछुक दूर मुनि संग। गये फिरे पहुँचाय गृह, आये सहित उमंग ॥२६॥ रहत सदा सानंद सव, पुर परिजन समुदाय ॥ सुत सुत वधू निहारि नित, नृप रानी हुलसाय ॥२७॥ जे तिय मिथिला वासिनी, नृप सुतानके संग ।। आई ते सखि गणरहै, प्रमुदित भरी उमंग ॥२८॥ जनक लली प्रगटी जब, जनक नगरमें आय॥ जनम लियो मिथिला तवै, सकल सखी समुदाय ॥२९॥ यथा योग निमिकुल सदन, लखि निजरुचि अनुसार ॥ सुरी किन्नरी आदि बडु, भई नरी सुविचार ||३०॥ तेमिय संग विनोदिनी, वय गुण रूप समान।। बाल सखी हैं आठ वर, प्यारी परम प्रधान ॥ ३१॥ दोषईवंद। चंद्रकला १ उर्वशी २ सहोद्रा ३ कमला १ विमला ५ मानी ।। चंद्रमुखी ६ मेनका ७ सुरंभा ८ आठ मुख्य ये जानी ॥ प्यारी सखी विदेहसुताकी वाल मंगिनी मोहं।। इनाई आदि सहचरी घनी जिहि देखि शची रति मोहें ॥ ३२॥ दोहा-सप्त सप्त यूथेश्वरी, इक इक सखि स्वाधीन ।। हैं सदव युधेश्वरी, प्रति अनुचरी प्रवीन ।। ३३ ।।

(१९०) रामरसायन। - सानुचरी यूथेश्वरी, संयुत सखी सुढंग ॥ दीनी जनक दहेजते, आई सियके संग ॥३४॥ पुनि इत कौशल्या सियहि, दई सखी दश और ।। ते मिाल अष्टादश भई, सब सखीन शिर मौर ॥ ३५ ॥ दोवई छंद। प्रथम-चारुसीला १ पुनि-राधा २ अरु-सुभगा ३ लप-क्षेमा ४॥ मृगलोचना ५ मालिनी६हरिणी कहि-सुलोचना ८ प्रेमा ९॥ सुधामुखी १० ये विशद सखी दश दई कौशला रानी ॥ सरिस रूप वय गुण सप्रीति सब जनकसुता सुखदानी।। ३६ ॥ दोहा-दशहू प्रति यूथेश्वरी, आठ आठ हैं और ॥ तिन सबही प्रति किंकरी, द्वैव सहस सुतौर ॥३७॥ सो-सखी अष्टदश सोय, सहस यूथ यूथेश्वरी ॥ सवें मुदित मन होय, बढ़ी परस्पर प्रीति बहु ॥ ३८॥ मिथिला वासिनिजोय, अरु कौशल पुर वासिनी ॥ एक प्राण तनु दोय, यौं सम सबहि सनेह भो ॥ ३९ ॥ दोहा-सखी अष्टदश सीयकी, प्यारी परम सुजान ॥ पुनि पोडश ये और हू, सिय पियकी सुखदान ॥ ४० ॥ य पोडश वे अष्टदश, सकल सखी सुखदाम ।। दंपति सेवाकिनी सदा, अंतरंगिनी जान ॥ ११॥ कनक भवन वर विशद है, जासम सदन न आन । सीता राम विहार थल, परमानन्द प्रधान ।। १२ ।। महल रहस्य रहस्य सखि, अंतरंगिनी जोय ॥ समय रहस्य रहस्यमें, रहें तहाँ अलि सोय ॥४३॥ यदापि सकल दंपति सखी, तदपि विनोद प्रकार ॥ पिय पांडशमिय अष्टदशकार राखी निधार ॥ ११ ॥ पास कविता हमा १ पगंधा यागदा ३ नंद्रभागा ? चार-गंद्रातीर मिनी मनोमा नायि ॥ चंद्रावली ८ अलमा ९ मु-पमा मोहनी नियमानी १२ मुभदा १३ गुणवलग १४ निहाय नीना मंग: १६ मोदवानी १६ गमकपिटारी मंत्र

रामरसायन।
(१५१)
पोडश अनूप अंतरंगिनी विचारिय।।दंपति रहस्य अधिकारी सुखकारी
सदा कौशल किशोरकी सखी ये निरधारिये ॥१५॥
दोहा-पुनि पोडश पोडश लखौ, यूथेश्वरी प्रवीन ।
एक एक सखिके निकट, रहैं सदा स्वाधीन ॥४६॥
सोहैं प्रति यूथेश्वरी, वर अनुचरी अनूप ।
पंच पंच शत रहत हैं, परम प्रवीन सुरूप ॥४७॥
यूथेश्वरी सुकिंकरी, सहित सखी सुखदानि ।
सवै दंपति रुचि निरखि, समै समै अनुमानि ॥४८॥
अपर तिहूँ भगिनीनकी, सखी अनेक प्रवीन ।।
आई मिथिलाते बहुरि, इतहुँ रानि अलिदीन ॥ १९ ॥
चौ०
•-भामारुक्मवतीरशुभकारी सुमतीबहुरिचन्द्रिकानारी॥
ये चारों सुंदर गुणखानी सखी मांडवीकी प्रियजानी ॥५०॥
चंपावती १ नंदिनी २ वामा मुदिता ३ कुण्डली ४ सुगुण धामा।।
चारों चारु अंग शुचिनारी * सखी उर्मिलाकी अतिप्यारी ॥५१॥
सुभग संयमीउत्तम श्यामाक्षेरबहुरिमादिनीश्छविमय कामा।|४||
चारहु प्रीय विशद गुणरूपा श्रुतिकीरतिकी सखी अनूपा ५२॥
द्वै दै शत किंकरी मुनारी प्रति सखीनकी सेवाकारी ।
या विधि द्वादश सखी सदाई कसिय तिहुँ भगिनी पास रहाई ॥५॥
दोहा-ये सब जनक दहेजमें, दीनी पुत्रिन संग ।।
आई अवध समाज युत, प्रमुदित भरी उमंग ॥ ६४ ।।
निज निज पुत्र बधून पुनि, दुहुँ सासु हुलसाय ॥
चार चार औरहु सखी, तिनहुँ दई सुखदाय ॥ ५५॥
सूर सुंदरी १ सारिका, २ नेह मंजरी ३ जानि ।।
वाला ४ ये चारहु सखी, दई मांडविहिमानि ॥५६॥
सखी गोकुला १ जोवना, २ दीपावली ३ अनूप ॥
वृन्दा ४ दीनी मिलहि, ये चारह मुरूप ।। ५७ ।।
साखा १ ला २ गर्विता ३ विशद कदंबा ४ देखि ।।
ये चारी तिकीर्तिको, दई सखी शुभ लेखि ॥२८॥

(१५२) रामरसायन। RA- NAMAL ये द्वादश सखियान प्रति, रुचिर अनुचरी और ॥ पंच पंच शत सकल हैं, विशद रूप गुण तौर ।। ५९ ॥ अवधवासिनी और सब, मिथिला वासिनि तीय ॥ रहैं परस्पर प्रेमयुत, परम प्रमोदित होय ॥६॥ चारहुनृपति सुतानकी, मुख्यसखी ये जान ।। दासी दासी दासिका, ते न्यारी बहुमान ।। ६१ ॥ आई मिथिलाते तिया, ते सव सहितकुटुंब ॥ सो न्यारे पुनि इतर हैं, दासी दास कदंब ॥ ६२॥ निज निज स्वामिनिको सवै, सेवे सहित सुरीति ॥ रहैं सकल सानंद नित, भीति प्रीति युत नीति ॥ ६३ ॥ चहूँवधू निज निज भवन, संयुत सखी समाज ॥ विलसैं परमानंदहिय, सुर दुर्लभ सुखसाज ॥ ६४॥ तिहुँ भगिनी निज सखिनयुत,सादर प्रीति बढाय ॥ रीतिनीति मय सीय की, सेवा करें सदाय ॥६५॥ राबै सिय भगिनीन पै, सादर सत्य सनेह ॥ रहै परस्पर प्रेम जनु, एक प्राण द्वैदेह ॥ ६६॥ वेदवाण अरु-चंद रस६, भूमिनन अनुमान ॥ जनकसुताकी सहचरी, येती मुख्य प्रमान ॥ ६७॥ वेदवान५गरनागभुज२,गणपतिरदन १विचार ॥ अंतरंग रघुचंदकी,मुख्य सखी निरधार ॥ ६८॥ वसु८आकाश अहिटनैनरकहि, भापी परम प्रमान ॥ तिहूँ सीय भगिनीन प्रति,मुख्य अली ये जान ॥ ६९ ॥ नभ०सरवसुहगरपंचगुण३,ये सब सखी प्रधान ॥ अपर सुदासी वेदरसदमुनिग्रह शशिगवान५।७० पुनि जे सखि दासीनके, सकल कुटुंबी और ।। तेऊ सेवक सिवकिनी, वर्णनको नहिं तौर ॥ ७१॥ - रामरसायन। (१५३) श्रीजानकीजीकी सखीनका निर्णय चक्र । जुदीजुदी सर्शनके नाम सग्बीनकी यूधेश्वरी यूधेश्वरीनकी मचीप्रति चूयेश्वरीन- सब अनुचरी की अनुचरी सब सखी गिनती चंद्रकला १ २ उर्वशी ००० ३ महोद्रा ७ ३ कमला ८ विमला ७ SCCU ५ ६ ur पंद्रमुरी ७ ००० S मनका ७ ८ ये सब मिथिलासे आई सो सखी हैं ५६०६४ । १ घागरा ५ राधा ८ सुभगा ८ ६.८ मा ८ ነ፣ ८ ६ ८ गालोचना गादिनी | हरित | ओपना राधागुपी पेनब अवधकी मखी है, जो मामने दीनदि १६०.१०॥ श्रीजानकीजीसी मब मुखी मिथिला अवधी २०६१५२॥ मिलापरे. इननी हैं।

(१५४) रामरसायन। श्रीरघुनंदनजीकी सखीनका निर्णय चक्र । सखीनकी ससीनकी गिनती सखीनके नाम यूपेश्वरीनकी यूयेश्वरी सखोप्रति यूथेश्वरीनकी सब अनुचरी अनुचरी १ हेमा १६ ८००० २ २ पद्मगंधा ८००० ३ वरारोहा १६ ८००० द चंद्रभागा चंद्रवती ८००० -- ६ हमिनी ८.०० मनोरमा १६ ८ नंदावली २६ अलसा १६ पमा १६ ८२१० माधी १६ १७ गुमटा ५.० श्रीनाथनीकी मय मानी इतनी १२८२५१ ॥

रामरसायन ५५. श्रीमांडवीज़ीकी सखीनका निर्णय चक्र। श्रीउर्मिलाजीकी सखीनका निर्णय चका एकत्र जुदी जुदी गिनती सखीनके सखीनकी एकत्र गिनती नाम अनुचरी सब जुदी जुदी सखीनके सस्पीनकी गिनती गिनती अनुचरी नाम सत्र १ भामा १ १ चंपावती २ रुक्मवनी २ २ नंदीनी २ ३ मुमनी ३ मुदिता ३ ३ ४ ४ चद्रिका ४ कुंडली २०० ४ ये सब ससी मिथि- ये सब सनी ८०४ मिथिला की हैं . लाको ८२४ १ मुरमुंदरी ५ १ गोकुला ३ सारिका ६ जोवना ६ ३ नहमंजरी ३ दीपावली ४ बाला ८ वृदा ये सब अवधी सानी है जो मामुने दानी है २००४ ये सब अवधी सनी है जो सामुने दानी : भीमांधीजीदी सप सी दोनो जगपाइननी है २८.८ श्रीरमिजीवी मर मारी होनी जगसीरी -- (१५६) रामरसायन। गिनती १ संयमी २ ध्यामा ३ ४ कामा ४ ० ० Tur दोहा-इहि विधि चारहु नृप मुता,नि- श्रीश्रुतकीर्तिजीकी सखीनका ज निज महलन माहि ॥ सखिन निर्णय चक्र। सहित सादर सदा, परमानन्द रहाहि।। ॥७२॥राज कुँवर वर चारहूँ, समय समय युत रीत ॥ सकल काज नित- जुदी जुदी सखीनके नाम सखीनकी गिनती करत हैं, सहित प्रीत नृप नीत ॥७३॥ अनुचरी सब बहु दिन वीते अवधमें,रहत अनंद स- १ मेत ॥ बहुरि भरत मातुल करी, नृप- २ हि विनय लखि हेत ॥ ७॥ तात मादिनी ३ बुलायो भरत को,जो दीजिये रजाय॥ तो हम संग सिधावहीं, सहित शत्र- हनभाय ॥ ७९ ॥ सुनत युधाजितके ये सब मी वचन, दशरथ नृप हुलसाय ॥ भरत मिथिलाकी है |शत्रुहन बंधु दुहुँ, पठये साज सजाय ॥ ७६॥ दुहुँ बंधु मातुल सहित, पहुँचे केकय पास ॥ मिले रहे सादर ६ तहाँ, सहित सुपास हुलास ॥ ७७ ॥ ७ राम लपण इत अवध, रहत सदा हरपाय ॥ भरत शत्रुहनकी सुगति, नितहि करत दुद्भाय।।७८॥ रंगभवन चंद दिग, जुरत सखा हित बंधु।। करत विनोद पिलाम नित, उमगि मानना है ०४ उमगि दिय सिंधु ।। ७९॥ राज काज मरयादमय, पितु अनुशामन पाय॥ Pim मा गमी गम टपण दुहुँ करत हैं, यथा योग हुलमाय ॥ ८॥गम म्प गुण धर्म वलदान मान या सानामीतिगति निर" कियही ध्यान८ मापा ૨ माला ३ गर्षिता पदंया ८ पंप भरपरी गाना -----manumaanti meas- रामरसायन। (१५७) - राम रीति अवलोकिकै, मुदित सवै नर नारि ॥ सकल कहैं अवधेशके, चिरजीवो सुत चारि ।। ८२ ।। सुरपुर नरपुर नागपुर, नर नारिनके बंद ।। राम सुयश सब गावहीं, नित प्रति परमानंद ॥ ८३॥ राम दरश हित नित्य प्रति, आवत सुर नर नाग। निरखि रूप गुण अतुल अति, करें धन्य नृपभाग ॥ ८ ॥ मातु पिता तिय बंधु हित, पुर परिजन समुदाय॥ रहें सदा सानंद सब, छिन छिन सुख अधिकाय ।। ८५॥ इति श्रीरामरसायन वि० वि० विवाहांत वर्णनो नाम एकादशोविभागः ॥ ११ ॥ इति श्रीमदसिकविहारीविरचिते श्रीमद्रामरसायन ग्रन्थे विवाहचारत्र वर्णनो नाम तृतीयोविधानः ॥ ३ ॥ . १ दोहा-कौशल पति दशरथ तनय, राम सकल गुणधाम ॥ जाको यश तिहुँलोकमें, छायरहो अभिराम ॥ १ ॥ करत राज मर्यादयुत, रघुवर परम समर्थ ॥ समें समै साधत सवै, धर्म काम अरु अर्थ ॥२॥ नीति रीति लखि रामकी, भूपति कियो विचार ।। अब रघुवीरहि कीजिये, राजतिलक सुखसार ॥३॥ तव महीप गुरुसचिव हित, पुर परिजन बहु लोग ।। जोरि सभा निज रुचि कही, कही सबै अति योग ॥४॥ मुदित नृपति आज्ञा दुई, येगि सजी सब साज ॥ अपिलोकों निजन भरि, राम होय युवराज ॥५॥ ची भूप वचन सुनिसब हुलमायेक वेगि सचिव शुभ माज मजाये।। रचना भई विचित्र अपारा कौशलपुर नृपसदन मझागदा सुनि रघुवर कर तिलक प्रसंगा सकल मातु हिय बढी उमंगा।। कौसल्या कैकयी सुमित्रा कहिँदान गुद विविध विचित्रा अपर मातु बहु वित्त लुटावें राम निलक सखि हुदमावे ।।

(१५८) रामरसायन। पुर नर नारि अमित हिय हरपे धो देव वृंद मनहीं मन करपे॥८॥ रघुवीरहि नृप निकट वुलाई कहि रुचि राजनीति समुझाई। पुनि गुरु कनकभवन मधि आये सियरामहि संयंम करवाये ९॥ मुदित सकल साजें सव साजा - प्रात होय रघुवर युवराजा ।। सीता लपण हीय सुख भारी परमानंद सबै नरनारी ॥१०॥ कोउ न कळू देव गति जानीक सव निज निजस्वारथ मति ठानी।। है यक भरत मातकी दासी नाम मंथरातिहि मतिनासी११॥ सो कैकेयीकी बुधि भोरी * कपट कथा कहि करी ठगोरी ॥ दासी वचन मानि के रानी *कियो मानवहु कुमतिसुठानी१२ लखि तिय मान भूप अकुलाये भावी पश विचार नहिं लाये ॥ राम शपथ करि कही नृपाला कहौ प्रिया सो करौं उताला १३॥ राम शपथ संयुत नृप वानी सुनि कैकयी अधिक हरपानी॥ जानी अब न तजै प्रण राजाभयोसमस्त सिद्ध निज काजा१४ वोली मो अभिलाप जु कीजे * द्वै वर देन कहे सो दीजे ॥ सुनि नृप कही वेगि किन भापौ १ इती बात हित इमि मन मापौ १५ तब तिय कही एक यह दीजे भरतहि राजतिलक वर कीजे ॥ द्वितिय राम मुनि वेष बनाई 8 चौदह वर्ष वसैं वन जाई॥१६॥ रानी वचन सुनत महिपाला गिरे भूमिबै निपट विहाला ।। लखि नृपदशा नारि झहरानी १ कही बहोरि विविध कटुवानी१७ सुनि महीप धीरज उर लाई तियहि अनेक भाँतिसमुझाई ॥ नहिं मानी तब नृप दृढ़ जानी * अबमम मृत्युआयनगिचानी १८ पुनि मूर्छित है दशरथ भूपा धरणी परे सु विहवल रूपा ॥ प्राण कंठगत कंठगत कौशलराई * बिलपतहीसबरैनि विताई१९॥ इत सब पुर परिजन नरनारी रामतिलक हित करहिं तयारी ॥ सो न भेद कछु काहु जनायो कहैं सकल अब औसर आयो२० ताछिन कीनो सचिव विचारा जगे न भूप भई बहु वारा ॥ तवै सुमंत द्वारपर जाई * दासी टेरि विनय करवाई ॥२१॥ सुनि कैकयी सुमंत बुलाई बोली इत आनहु रघुराई ।।

रामरसायन। (१५९) चकित सचिव नृपदशा निहारी भो अनर्थ कछु हीय विचारी२२ पाय राय रुख वेगि सिधाये क रथ चढ़ाय रामहि लै आये ॥ लखि पितुगति रघुवर अकुलाने ॥धाय भूप चरणन लपटाने २३॥ नृपहि सकल तन मन सुधि भूली पुत्र वियोग शूल हिय हूली। सो विलोकि मातहि अकुलाई * पितु दुखहित बूझो रघुराई २४॥ निठुर हृदय कैकयी कराला कही कथा सब अमित उताला॥ पुनि बोली नृप दई रजाई * भयवश कहि न सकत रघुराई२५ ॥ सो-मात वचन सुनि राम, हिय हरपे परपे सकल ॥ कहे वैन सुखधाम, पितु आज्ञा में शिरधरी ॥२६॥ यो कहि गहि पितु पाय, कहो तात दुख त्यागिये ॥ भरतहि वेगि बुलाय, राजतिलक तिन कीजिये ॥२७॥ तात इती लघुवात, हेत शोक इहि विधि कियो । हौं अवहीं वन जात, आशिप दीजे मुदित मन ।। २८ ।। परी वचन धुनि कान, पहिचानी वाणी कछू ॥ नृपति चेत उर आन, निरखे नैन उघारि तव ॥२९॥ : उठि महीप युत प्यार, अंक लगाये रामको ॥ चली गन जलधार, मुखते कढ़े न बैन कछु ॥ ३०॥ दोहा-राम निरखि पितु मोहवश, बहु विधि धीरज दीन । मातहि मिलि आऊं अब, यो कहि गमन सुकीन ॥३१॥ राम गमन लखि अवधपति, विलपत भये अचेत ॥ परे मौन महि छिनहि छिन, दीह उसास न लेत ॥ ३२॥ देखिं सुमंत नृपाल गति, भरे नैन दुहुँ नीर ।। कैकेयी प्रति जोरिकर, बोले वैन सुधीर ।। ३३ ।। महरानी हठ त्यागि अव, यतन कीजिये सोय । राम भरत नृप रावरो, जिहि विधि सब भल होय ॥३॥ मुनि वोली दृढ कैकयी, हो जु कही दुहुँ वात ।। भली बुरी कछु होय पे, सोई मोहिं सुहात ॥ ३५ ॥ , (१६२) रामरसायन। पुनि कौशला वधू गति जानी वोली सुतहि मनोहर बानी।। तात तिहारे संग जानकी दृढधारी निज हीय जानकी जो अब उचित होय रघुलाला *सोसिप देहुँ सियहि इहिकाला सोरठा-सुनि बोले रघुचंद, कानन अमित कलेशैहे ।। याते इत सानंद, तुव पद सेंवें जनकजा ॥ ६१॥ चौ०-सुनि सुत वचन वधुहि उरलाई भवन रहन हित बहु समुझ. तबसिय हीय अधिक अकुलाई वोली विकल सकोच विहाई ६२ दोहा-धर्मचारिनी तियनकी, गति है पति सुत ज्ञात ।। तीन विहीन चतुर्थ नहि, अवलंबन यह ख्यात ॥१३॥ याते हौं प्रण सत्य करि, कहौं शपथ मय बैन । नाथ मोहि तजि जाहिं जो, तौ मम प्राण रहैं न॥६४॥ सत्य प्रेम गुणि सीयको, सकुचि कही रघुनाथ ॥ जननी कहौ विदेहजा, चलें विपिन मम साथ ॥६५॥ सुनि पति आयसु जानकी, परमानंद अघाय ।। गहे चरण पति मातके, सो लीनी उर लाय ।। ६६ ।। चौ०-ताही छिनसुनि लछमनधाये अतिहिय शोकराम ढिगआये। नाय माथ बूझो वन कारन रघुवर कीनो सकल उचारना॥३७॥ सुनतहि भयो क्रोध अति भारी बोले लपण वीर धनुधारी॥ नाथ सत्य जानी यह बाता करीअनीति दोउ पितु माता ६८ घनाक्षरी कवित्त । आजलों न ऐसी कोऊ कोनी जो नृपाल करें रीति रघुवंशिन की सकल मिटावें हैं ॥ बुद्धि सब नाशी अति जरठ भये हैं अब काम वश हैकै तियसीख उरलावै हैं ॥ रसिकविहारी किमि सत्य व्रतधारी भूप राजदेन भापो और वनहिं पठावै हैं । याते. रघुराज राजगादी गहि बैठौ फेरि देखें तात मात भ्रात कैसे तो उठविहें ॥१९॥ सो०--सुनि सुबंधुके वैन, कही धीर रघुवीर तव ।। लपण धर्म यह है न, पितु आज्ञा किमि त्यागिये ||७०॥ , रामरसायना घनाक्षरी कवित्त । गुरु पितु मात वृद्ध स्वामीनृप आयसु जो होय सो अनंद मानि माथे धरि लीजिये ॥ कामक्रोध लोभ मोह काहू शभा बैन तोऊ तिन दोपनमें चित्त नहि दीजिये ।। रसिकविहारी सुनौ सीख या हमारी बंधु निज दुख भारी देखि नेकहः न : खीजिये ॥ परम सुधर्म सत कर्म वत सत्य येही आपतें बडेनकी न आज्ञा भंग कीजिये ॥ ७१॥ दोहा-गम वचन सुनिकै लपण, कही क्रोधवश बात ।। ज्ञान राबरो या समै, मोहिं न रंच सुहात ॥७२॥ घनाक्षरी-कवित। बैठो राजगादी नाथ लीजे धनुवान हाथ दास हौ तिहारे साथ देखिये लरतको ॥ तात बाँधि डारौं मात गहिकै निकारों सेन सकल सँहारों लखीं सामुहे अरतको ॥ रसिकविहारी धनुधारी या विचारी काह ऐसो वीरं भारी वनचारी यौं करतको आवे यमराज देवराज तो न पा राज हेरौ फेरि होवे को सहायक भरतको ।। ७३ ॥ धरम यही है सत करम यही हे ज्ञानपरम यही है मुख शत्रुनको मोड़िये॥ तात मात भ्रात जात पात हित मीत कोऊ करहि अनीत लाज ताकी अब तोडिये ॥ रसिकाविहारी छल वलको न दोप कळू साधिये सुकाज औ कलेश अंग ओडिये । वनिता वसुंधरा वडाई वित्त बोरताई वीर रघुवीर येते कमहू न छोडिये ॥ ७४ ॥ लवो राज लाजको दियो न्याय काजको सुंदवो दान येही मदा आपनो करम है ॥ वरिनको पालियो औ पालियो सुदीननको युद्धमें निरुद्र मत्य संतत परम है ।। नसिकाविहारी गजगादी हरि वीर यामें गवीर फहा काहूकी शरमद।। त्यागि धनुवाण औ कृपाण तपस्वी है जाय डोले वन पेसो नादि क्षत्रीको घरम है ।। ७५ ॥ धनते मुधर्म हावे धनते सुकर्म हो धनते मुयश लोक धन ही को कान है। नात मान भात दित पुत्र आकलन लग्यो मिऋविहान भई धनको .

(१६४) रामरसायन। समाज है ॥ होवै रूपमान गुणमान कुलमान तोउ धन बिन .. ताकी राखत न लाज है। कैस हु निकाम धनमान सो प्रधान है। धन है समस्त मूल धन मूल राज हैं ॥७६॥ दोहा-सो लघु राज न कोउ तजै, यह तौ कौशल राज ॥ हौं नहिं त्यागन देगो, तुमैं राज रघुराज ॥ ७७॥ घनाक्षरी कवित्त । मारि मारि बाणन कृपाणन ते झारि झारि मान बलवाननके प्रा- णन नशावेंगे। भूरि भानुवंशी चंद्रवंशी वर वीरनके झुंड झुंड भारी रुंड मुंड महि छाबैंगे ॥ क्षत्री छत्रधारी क्षोणिपालनके शोणितसे कुंडभरि सकल दिशान क्षिति छावैगे ॥ रसिकविहारी रघुराज सब साधौ काज जियत हमारे राज भरत न पावेंगे ॥७८ बाणन विदारि सैन सकल संहारौं अवै गहिकै कृपाण तात मात दुहुँ मारौं मैं।भरत समेत शत्रुशाल दलिडारौं वेगि केकय नरेशको सुदेश निकारौं मl. सुर नर नाग करें कोऊशत्रु पक्ष तिनैं करिकै विपक्ष तिहुँ लोक ते उजारों मैं। रसिकविहारी होय आयसु तिहारी नेक फेरि वर वीरनकी वीरता निहारौं मैं ॥७९॥ दोहा-पुनि बोले रघुवर लपण, उर आनौ अब तोप ॥ रोप विवश अनुचित किये, होत अयश अरु दोप ॥ कही लपण सुनि नाथ हौं, सत्य कहौं यह बात ॥८०॥ राज लीजिये कैसहू, कळू न दोप लगात ॥८॥ घनाक्षरी कवित्त । छलमें नदोप कलवलमें न दोप मंत्रतंत्रमें न दोप विप यंत्रमेंनदोपहै। तातके न मारे दोप मातके न मारे दोप भ्रातके न मारे दोप दोपमें न दोपहै। मित्र पुत्र कुटुम कलत्रके न मारे दोप धर्मकर्म सकलं निवारे हून दोप है ॥ रसिकविहारी काज साधौ रघुराज राज राज राज लेवे हेत काहूमैं न दोप है ॥ ८२॥ एक नृप घालें तौ अनेक नृप पालें एक भ्रातहि नशा बहु भ्रातन वसविंगे ॥ एक मात मार तो अनेक मात ज्यांचे एक अयश रठा तो अनेक यश पविंगे । - N A F रामरसायन। (१६९) रसिकविहारी नेक न्यायते विचारो नाथ रीति राबरेको हम काह स- मुझावैगे। धरम जिते हैं तिते पातक न यामें जो न दोऊ तो समा- न पाप पुण्य होय जावेंगे ।। ८३॥ दोहा-यौं कहि वोले लपण पुनि, राम चरण शिरनाय ।। नाथ दोप जनि कीजिये, दोजेमोहिं रजाय ।। ८४ ॥ घनाक्षरी कवित्त । धर्म नहिं जानों औ अधर्म नहिं जानौरंच सत्य नहिं जानौं औ असत्य नहिं जानी हौं। तातको न जानी मात भातको न जानौं गु रुजातिको न जानी जात पाँतको न जानौ हौं। देवको न जानौं औ अदेवको न जानी लेव देवको न जानों सेव भेवको न जानौं हौं । गसिकविहारी करौशपथं तिहारी नाथ हौं ती एक रावरी रजाय दृढ़ जानी हों ।। ८५॥ दोहा-यौहीं अमित प्रकार बहु, कही लपण रिसठान ।। वाल्मीकि आदिक विविध, ग्रंथन माहिं प्रमान ।। ८६ ॥ प्रमाण वाल्मीकीये अयोध्याफोडे ॥ सर्ग ॥ २१॥ शाक। यावदेव न जानाति कश्चिदर्थमिमं नरः ।। तावदेव मया सार्द्धमा- स्मस्थं कुरु शासनम् ॥ १॥ मया पार्श्वे सधनुपा तव गुप्तस्य राघव।। का समर्थाऽधिकं कत्तै कृतांतस्येव तिष्टतः ॥ २ ॥ निर्मनुप्यामिमां सर्वामयोध्यां मनुजपम ।। करिप्यामि शेरेस्तीक्ष्णैर्यदि स्थास्यति विप्रिये ॥३॥ भरतस्याथ पक्ष्योवायो वास्य हितमिच्छति ॥ सर्वास्तां- श्व बधिप्यामि मृदुर्हि परिभृयते ॥४॥प्रोत्साहितोयं कैकेय्या संतु- हो यदि नः पिता ।। अमित्रभूतो निःसंगं वध्यतां वध्यतामपि ॥ ५॥ गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।। उत्पथं प्रतिपत्रस्य कार्य भवति शासनम् ॥६॥ इनिप्ये पितरं वृद्धं कैकेय्यासक्त मानसम् ।। कृपणं च स्थितं वाल्ये वृद्धभावेन गर्हितम् ॥७॥ पुनः । तत्रैव ।। मर्ग।॥ २३ ॥ धर्म दोपप्रसंगेन लोकस्यानतिशंकया ॥ कथं ह्येतदसंभ्रांतस्व- द्वियोवन महति ॥ ८ ॥ यथा ।वमीडीरं शोडीर क्षत्रियपन ॥ F (१६६) रामरसायन। किं नाम कृपणं देवमशक्तमभिशंससि ॥ ९॥ पापयोस्ते नाम तयोःशंका न विद्यते ॥ संति धर्मोपधासक्ता धर्मात्मन् कि बुध्यसे ॥ १० ॥ कथं त्वं कर्मणाशक्तः कैकेयीवशवर्तिन करिप्यति पितुर्वाक्यमर्मिष्ठं विगर्हितम् ॥ ११ ॥ द्रक्ष्यति त्व वस्य पौरुपं पुरुपस्य च ॥ दैवमानुपयोरचव्यक्ताव्यक्तिर्भविष्यति ॥३२॥ अद्य मे पौरुप हतं देवं द्रक्ष्यति वै जनाः ॥ यैर्देवादाहतं दृष्टं राज्याभिपेचनम्।। १३ ।। लोकपालाः समस्तास्ते नाव रा भिपचनम् ॥ न च कृष्णास्त्रयो लोकाविहन्युः किं पुनः पिता ॥१ मद्लेन विरुद्धाय न स्यादेववलं तथा॥ प्रभविष्यति दुःखाय या पौरुपं मम।।१॥न शोभार्था विमौ वाहू न धनुर्भूपणाय मे॥न मि बंधनार्थाय न शराः स्तंभहेतवः ॥ १६ ॥ अमित्रमथनाथ सर्वमेतच्चतुष्टयम् ॥ न चाहं कामयेत्यर्थ यः स्याच्छतुर्मतो मम ॥१७॥ बहुभिश्चैकमत्यस्य नैकेन च बहून् जनान् ॥ विनियो म्यहं वाणान्नृवाजिगजमर्मसु ॥ १८॥ अद्य मेस्त्रप्रभाव प्रभावः प्रभविष्यति ॥ राजश्चाप्रभुतां कर्त्त प्रभुत्वं च तव प्रभो॥ अद्य चंदनसारस्य केयूरामोक्षणस्य च ।। वसूनां च विमोक्षस्य सुद पालनस्य च ॥ २० ॥ अनुरूपाविमौ वाहू राम कर्म करिप्यतः आभिपेचनविनस्य कर्तृणां ते निवारणे ॥ २१ ॥ इत्यादि दोहा-लपण वचन सुनिक कही, धर्मधुरंधर राम ॥ पातक लाग बंधु जिहि, करिय नहीं सो काम ॥ ८७ ॥ निज कीनी कछु होत नहि, देव करी सब होय ॥ याते सोई सत्यंह, प्रवल देव रुचि जोय ॥ ८८॥ सुनन गम यागी भये, लपण नन दुहुँ लाल || भौंह, पंक फरक अवर, बोले बन रताल ॥ ८॥ पातक देव दु:नकी, बड़ी नाथको भीति ।। गावाः मोर करत, यह न वीरकी गति ॥ १० ॥ .

रामरसायन। (१६७) बहुरि देव को है कहाँ, कीजे वेगि बखान ।। ९१ ॥ कै इत दुहुन बुलाइये, कै वताइये धाम ।। हो तिनते धनुवाणले, करौं जाय संग्राम ॥ ९२ ॥ वली देव है अवल पै, करै रुचै तिहि सोय ॥ सवल सामुहे दैवको, जात सकल वल खोय ।। ९३॥ रामदासकी दासता, दैव देवता जोय ॥ अधिक न्यून सम होय सो, आज लखैसव कोय ॥१४॥ हो निज बलते नाथको, करौं राज अभिपेक॥ फोर लखौं बलवान है, आ दैव अनेक ॥ ९५ ॥ धनु शर शोभा वाहुवल सफल करौं मैं आज ॥ देव भरत नृपके अछत, नाथ होय युवराज ॥ ९६॥ तात भ्रात कह देव कह, कहा धर्म कह पाप ॥ तृण सनान जानो इनें, इक रावरे प्रताप ॥ ९७॥ यौं कहि धनु शर माजिकै, माथ रामपद टेक ॥ कही हाथ गहि चलिय हो, करों राज अभिपेक ॥९८॥ राम मात सिय हियरुचे, लपण वचन तिहि काल । धर्मधुरंधर राम तव, बोले अतिहि उताल ॥ ९९ ।। लपण कही तुम प्रथम हम, जानें नाथ रजाय ।। तो मम आयसु है यही, रोप तजौ सब भाय ।। १०० ।। लछमन राम रजाय सुनि, मौन रहे शिरनाय ॥ बवित वारि दुहुँ ननते, पुनि वोले अकुलाय ।। १०१।। लाभ हानि मुख दुख ममय, कोजे हृदय विचार ।। बहुरि रजायसु दीजिये, लखि सब सारासार ।। १०२॥ ची-पंधु विनय सुनि पुनि रघुनाथावरणे विविध धर्म यशगाथा । काही लपण करगदि वरवानी ॥तनी गेप मम आयसु मानी१०३ सुनि योले लछमन करजोरी भलदि नाथ पुनि विनती मोरी!! होहूं वन चलि हों तुर माथा इन तर प्राण तनिहीं रघुनाथा१०? तर रघुबर बटु विधि समुझाये है. लपण रदय कछुवचन न आये।। .

(६६) समरसायना कि नाम कृपणं देवमशतमभिशंसति ॥ ९ ॥ पापयोते की नाम तयोः शंन न विद्यते ।। संति योपचासत यनान कर बुध्यते ॥ १० ॥ कथं वं कर्मगाशक कन्याशान्तिः।। करिष्यति पिनुवांस्यमयमिष्टं विगहितम् ॥ ॥जयति त्वयः वस्य पोल्प पुत्पन्य च ॥ देवनानुपयोयन्यजातिभविष्यति । ||२|| अब मे पाल्प हतं देवं यात वे जनाः ॥ वशंवाहत नत्र दृष्टं गज्याभिपेचनन्।। ३।। लोजपालामनन्ताले नाब गन्ना भिपवनम् ॥ न कृष्णावयो लोचाहिन्युः पुनःपिता li l नहन विद्यायन त्यावर त्या॥ प्रभावियतिसार या पोम्पं नन।शान शोभायां विमौ वाहून धनुनपगाय मान शिव बंधनार्थाय न शगः तंभहेतवः ॥६॥ अनित्रनयनायर्याय सवमतचतुष्टयम् ॥ नवाई कानयेत्ययं यः त्यानतो नन । 11100 बहुभिश्चैकमत्यत्य नेन च बहन जनान ॥ विनियोध्या म्यहं वागान्नवाजिगजमर्मसु ॥ ८॥ अघ नेवप्रभारन्य प्रभाषः प्रभविष्यति ॥ गजन्याप्रभुतां कई प्रभुलं मनो। अब चंदनसारत्व केयानोगत्य ।मृनां दिनोजत्वज्ञ पालनत्व ३॥ २० ॥ अनुरूपापिनी शाह न करितः॥ आभिपेचनविनत्य कञ्गां ते निवारणे ॥ २३॥ इत्यादि। बोहा लपण वन सुनिर कवी, वनांचा रान् ॥ पातक लागवं निहि चाय नहीं तो जान ॥ ८ ॥ निज चीनी ऋज्ञात नहि देव की बहोत ।। याते लोई लत्यह, माल देवतविजोय ॥ ८८।। सुनत गन वानी नये लपन लाल !! भौंह बंद करके अपर बोले वन ताल।। ८२॥ याता मनकी बड़ी नायचो भौति ।। वारवारलाई कम्त. यह नवीरकी गति ।।१।। mmon marathe लहान बोले लछमन करजोरी भलहि नाथ पुनि विनती मोग।। रामरसायन। बहुरि देव को है कहाँ, कीजे वेगि बखान ॥ ९१॥ कै इत दुहुँन बुलाइये, कै बताइये धाम ॥ हौं तिनते धनुवाणले, करौं जाय संग्राम ॥ ९२॥ बली दैव है अवल पै, करै रुचै तिहि सोय ॥ सवल सामुहे दैवको, जात सकल बल खोय ॥ ९३॥ रामदासकी दासता, दैव दैवता जोय ॥ अधिक न्यून सम होय सो, आज लखैसव कोय ॥९४ ।। हो निज बलते नाथको, करौं राज अभिषेक ॥ फेरि लखौं बलवान है, आ देव अनेक ।। ९५ ।। धनु शर शोभा वाहुवल सफल करौं मैं आज ॥ दैव भरत नृपके अछत, नाथ होय युवराज ॥ ९६॥ तात भात कह देव कह, कहा धर्म कह पाप ।। तृण सनान जानो इने, इक रावरे प्रताप ॥९७॥ यौं कहि धनु शर साजिकै, माथ रामपद टेक ॥ कही हाथ गहि चलिय ही, करों राज अभिपेक ॥९८ ।। राम मात सिय हियरुचे, लपण वचन तिहि काल ॥ धर्मधुरंधर राम तब, बोले अतिहि उताल ॥ ९९ ॥ लपण कही तुम प्रथम हम, जाने नाथ रजाय ।। तो मम आयसु है यही, रोप तजौ सब भाय ॥१०॥ लछमन राम रजाय सुनि, मौन रहे शिरनाय ॥ सवित वारि दुहुँ ननते, पुनि वोले अकुलाय ॥ १०१॥ लाभ हानि मुख दुख समय, कीजे हृदय विचार ।। बहुरि रजायसु दीजिये, लखि सब सारासार ।। १०२।। ची-पंधु विनय सुनि पुनि रघुनाथावरणे विविध धर्म यश गाथा।। कही लपण करगहि वरवानी ॥ तनी गेप मम आयसु मानी१०३ ती 141 TRI स 71 है लाला हो, वन चलि ही तुब साथा इन तरु प्राण तजिहाँ तब रघुवर बटु विधि मसुझाये ति।। रलमान (१६८) रामरसायन। रामबंधु जियकी गति जानी कही चलौधनुशर गहि पानी१०५ सुनि सौमित्र अधिक हुलसाये * मोदभरे जननी ढिग आये ।। माँगी बिदा चरण शिरनाईहरपि सुमित्रा दई रजाई ॥१०६॥ अंक लगाय कही बलि ताता * राम सीय तुव दुहुँ पितु माता ॥ जाहु संग सेवौ सतभाये सुनि शिर नाय लपण उठि धाये१०७ | देवरचित धनुशर असि धारे * तूण वान वर विशद अपारे । विपिन गमन हित हिय हुलसायोआय रामपद शीश नवायो१०८ ताछिन भयो कुलाहल भारी नृपतिय आय जुरी तहँ सारी ॥ तब रघुवीर मात पग लागी विपिन गमन हित आयसु माँगी१०९ धर्म धुरीण सुतहि जिय जानी # वोली विकल कौशला रानी ॥ जाहु तात मुहिं भूलि नजैयो वेगि आय फिर बदन दिखयो११०॥ यौं कहि मात गोद सुत लीने * पढि रक्षा अभिमंत्रित कीने ।। करि अमानशीश अकुलाई * आयसुदई सुअंक लगाई ॥ ११॥ येही विधि सिय लपणहि रानी करि अभिमंत्रित रक्षा ठानी ॥ उर लगाय बहु कियो विलापा दई रजाय सहित संतापा११२॥ दोहा-सिय सासुनके पग परी, दीनी सबहि अशीश ।। सुखसुत वित अहिवातयुत, जीवो विपुल वरीश ॥ ११३॥ चौ सकल सियहि निज अंक लगाई विलपी नैन नीर अन्हवाई।। सीतहि मिली सखी पुरनारी रोवें सब तिय निपट दुखारी११४ दोहा-इहि विधि सिय रघुवर लपण,सहित सकल रनिवास ॥ करुणा प्रेम वियोग वश, निज निज होय हिरास ॥ ११५॥ मातु सुमित्रा कौशला, विकल भई जिहि भांति ॥ ताछिन जो गति दुहुँनकी, सो कछु कही न जाति॥११६॥ तब रघुवीर सुधीर धरि, लछमन सीय समेत ।। सकल मातु पग नाय शिर, आयेद्वार निकेत॥ ११७॥ चहुँ दिशि कीशल नगरमें, मगो रुदनको शोर। दुखी भये सिय सहित सुनि, दोऊ राज किशोर ॥ ११८॥ सखा वृन्द ताही मम, विपिन गमनको हाल ॥ मनि विलपत धाये मय, आये अतिहि उनाल ॥ ११९ ॥ - रामरसायन। तिनहिं निरखि दुहुँ बंधुवर, भरि आये जलनैन । सो सवही लपटाय उर, कहे नेहमय वैन ॥ १२०॥ भोजन वसन विनोद मुद, संग भये सब काज॥ जात अकेले विपिनको, यह न उचित रघुराज ॥ १२१॥ चलै संग सब रावरे, अवधरहैं किहि काम ।। तुम विन प्राण न मानि हैं, याते तजौ न श्याम ॥ १२२॥ सुनि सखानके बैन वर, कार सनेह रघुवीर ॥ नीति रीति बहु भाँति कहि, तिनहि देत बहु धीर ।। १२३॥ ते सब विरह विहाल द्वै, कहन लगे रघुराय ॥ भये निठुर इमि मीत किमि, गमनतहाय विहाय ॥ १२४ ॥ घनाक्षरी फवित्त। का करें समाधि साधि का करें विराग याग का करें अनेक योग भोगहू करें सुकाह ॥ का करें समस्त वेद शास्त्र औ पुराण देख कोटि जन्मला पढ़े मिले तऊ कळू न थाह । राज्यले कहा करें सुरेश औ नरेश है न चाहिये कडू सुदुःख होत लोक लाज माह ।। सात द्वीप खंड नौ तिलोक संपदा अपार ले कहा सुकीजिये मिली जु आप सीयनाह ॥ १२५ ॥ हम सब तुव मुख लखि मुदित रहत निशि दिन छिन तजि नहिं पलक परत ॥ चिन दरशन तन मन थिर न रहत छवि निरखत हठि हग अरनि अरत ॥ कबहुँक जब ललन तनक बिलगत तव यक परि बहु युग सरिस भरत ॥ नित हिलत मिलत धरि दुहुँ गल भुज तिहि मनमुख सब जग सुख निदरत ॥ १२६॥ लागी उर विपम वियोगकी जु आगी अति जागी ताहि नीर ते सयोगके सिराइयो॥ हीय ना धरैगो धीर बाडी है अपार पीर लाल रघुवीर नक दाया चित लाइयो ॥ रसिक विहारी दीन छीन रावरे विहीन सुरति करी जो श्याम विमरिन जाइयो । ये होरघुनंदन सुजान पाणप्यारे मीत वेगही दमागे जियजनि बुझाइयो । १२७॥ माह करि भा कोर प्राण नदि गावेजोप साटिले सलोने यार तुम विसगयी। कोर, ना सवाय या

(१७०)
रामरसायन।
,
कलेशको हरैया लाल सकल सखान एक जीवन उपायहाँ ॥
तनमन प्राणनकी ताप तब दूर हैहै जब निज आनन
मयंक दरशाय हौ ॥ ये हो रघुनंदन पियारे मति सांची
कहौ कब या हमारी जियजरनि बुझायहौ ॥ १२८ ॥
दोहा-सखा वृन्द इहि विधि विकल, विलपत विरह विहाल॥
कर जोरत पग परत कहि, तजौ नहीं रघुलाल ॥ १२९॥
बालसखनकी प्रीतवश, विवश भये रघुवीर ॥
घाय धाय सब अंक गहि, मिलत चलत हग नी।।१३०॥
लखि सखानकी विकलता, रघुवर भये अधीर ।।
पुनि कुसमय अनुमानिक, उर धारी कछुधीर ।। १३१॥
उर लगाय समुझाय बहु, सवही धीर धराय ॥
पुनि पितु ढिग सिय लपण युत, वेगि चले रघुराय।।१३२॥
पिता निकट सिय लपण युत, जात पयादे राम ॥
सो विलोकि विलखात सब, कहैं आज विधि वाम१३३॥
पुरवासी नर नारि सव, वृद्ध युवा अरु बाल ॥
रुदन करत धाये विकल, आये अतिहि विहाल १३४॥
भई भीर भारी तब, राजसदन चहुँ ओर ॥
हाय राम सिय लपण यह, रुदनशोर अति घोर ॥ १३५ ॥
ताछिन सीता लपण युत, राम गये पितु पास ॥
करि प्रणाम पितु चरण गहि, बोले सहित हुलास ॥१३६।।
तात मोहिं अब गमनकी, दीजे वेगि रजाय ॥
वन मनु वर्ष वितायकै, लखौं चरण पुनि आय ॥ १३७ ॥
सुनत गमके वचन नृप, उठे अतिहि अकुलाय ॥
पुत्र बध युन पुत्र दुहुँ, लिये गोद बैठाय ॥ १३८ ॥
लपण मीय पुर रहन हित, कड़े भूप बहु बन ॥
मग लखि नानी गम विन, ये दुई भान गन ॥ १३१॥
मो गगि दशग्य ने, वश, पिकल गिरे मुरझाय ।।
हाय गम मियलपगण दमि, फ. पिपुट पिलपाय ॥१०॥

रामरसायना (१७१) बरवा छंद। सो गति निरखि कृपालु की, भये सुमंत विहाल। कैकेयी प्रति बचन पुनि, कहै कुधित हग लाल ||१४१ ।। केकयसुता विचारी अवहूँ वात । न तरु छनकमह सबको सबै नशात ।। १४२ ।। कछू न उत्तर दीनो सो सुनि रानि । सचिव कही तब भूपहि हित मय वानि ॥ १४३ ॥ महाराज यह रानी अति मतिहीन । तिहि भूले वर दीने नाथ प्रवीन ।। १४४॥ याते पुनि प्रभु कीजे हृदय विचार । दूजे वर इहि दीजे राज उदार ॥ ।। १४५॥ साम दाम अरु भेद सुदंड उपाय । उचित नृपहि ये चारी नीति कहाय ॥ १४६॥ पड़री छंद। यौं कहि सुमंत दुहुँ हाथ जोरि बोले सहेत वाणी बहोरि ।। तिहुँ लोक नीति ज्ञाताप्रधानाकोऊन और है प्रभु समान १४७॥ तजिकै कलेश उर धारि धीराकीजे सुयन जिहि मिटहि पीरा। कीनी न रानि यह नवल वातालक्षण परंपरा नहि मिटात।।११८॥ लक्षण जुहोत हैं तात गात । सो प्रगट पुत्र तनु में जनात ।। त्यों मात चिह्न पुत्रिहु मझाराहो सुऔर बहु किय विचार१४९ उत रानिमात ज्यों कीन वातात्योंही प्रत्यक्ष इत सब जनात ।। वह कहीं सकल सुनिये सुदेशाजो भयो हाल केकय नरेश१५० केकय महीप अति मति प्रवीनामुनि तिन एक वरदान दीन।। जैतेसुजीव जगलघु विशालाभापासबकी समझें नृपाल १५१ इक समयभूपरानी समेत। निशिमध्य मुदित शोभित निकेत। तहँ द्वपिपीलिका निरखि गत ।। कीनी प्रसन्न है कछुक बात १५२॥ सो समुझि भूप हे अति अनंद । विहमे कटक बहु मंद मंद ॥ लखि नृपहि हँसत बोलो मुरानि ॥ क्यों हमे वेगि दोन यखानि१५३ सुनि कहो भूप यह अक्थ भेद ।। जो कहीं होय तनु हानि खेद ॥ वाली सुरानि तव कुपित होय ।। हो अवहिं देति निनप्राणवाया? हारे मदीप बटु विधि बुझाय ।। मान न नादि का उपाय ।। पुनि कही भूपयामें न तंत । भापत मुहोय मम प्राग अंत।। १२५॥

'(१७२) रामरसायन। सुनि बैन रानि वोली रिसाय ।। तुव प्राण जायँ अथवा रहाय ।। इहि समै मोहि कछु नहिं सुहात ॥ दीजे वताय वेगे सुवात॥१५६|| तब विवश भूप वै अति अधीर ॥ वोले घरीकडे धरहु धीर ॥ अवहीं सुधार लगजाय आय ॥ पुनि भेद देहुँ वह सब बताय१५७|| यौं कहि नरेश द्रुत द्वार आय ॥ गवने तुरंग वेगहि सजाय । मुनि पास जायव्याकुल नृपाल॥पद वंदिकहो निज सकल हाल १५८ मुनि सुनि समस्त बोले सुबेन ॥ विन दिये दंड तिय जिय तजैन ॥ याते महीप गृह वेगि जाय ।। ताडो डराय आपहि चुपाय ॥१५९ ॥ मुनि वचन मानिकै मनुजनाथ ॥ आये सुभौन लैकसहि हाथ ।। वोले तियाहि सुनि लेहु भेद ॥ आई उताल तजि सकल खेद १६०|| पुनि कसा हेरि कर भीति मानि ॥बहु विनै कीन तिय जोरि पानि ॥ तब भूप मष्ट करि प्रातकाल ।। दीनी पाय पितु गृह उताल॥१६॥ पुनि तिहि न भूप स्वीकार कीन । केकयनरेश तिय त्यागि दीन ।। यौं कहि सुमंत रानिहि बहोरि॥ बोले सुसीख यह सुनहु मोरि१६२॥ हठ सकल छोड़ि वर और लेहु ।। सब हीय अमित आनंद देहु ॥ नातर कछूक जो करहु आन ॥ तौ सुगति होयजननी समान१६३॥ दोहा-सुनि सुमंत के वचन बहु, मनही मन रिस छाय॥ उत्तर दियो न रंच कछु, हेरी नैन चढाय ॥ १६४॥ पुनि सुमंत महिपाल सों, बोले बैन गंभीर ॥ नाथ तिया जानै नहीं, नेक पराई पीर ॥ १६५ ॥ जिहि विधि केकय भूपसों, हठकीनी वह नारि ॥ भरत मात सोई करी, लीजे हीय विचारि ॥ १६६॥ सुनि वर वचन सुमंतके, नृपहिय रुचे सुदेश ।। . हाय राम कहि चुपरहे, धर्मपाल अवधेश ।। १६७॥ तब रघुवर कर जोरि पुनि, बोले हिय हुलसाय ।। हौं उताल बन जाउँ अब, दीजे तात रजाय ॥ १६८ ॥ गम वचन सुनि अवध पति, मौन रहे अकुलाय ॥ सिया सहित दुहुँ बंधुको, लीने हृदय लगाय ।। १६९ ॥ " ,

रामरसायन।
(१७३)
निरखि भूप गति कैकयी, उठो कुपित झहराय ॥
वेगि लाय मुनि साज सब, धरो राम ढिग आय ॥ १७०॥
चौल-तवरघुवीर साज मुनि सारे तूण कृपाण वाण धनुधारे ।।
गहि पितु मातु चरण रघुनाथा चले मुदित सिय लछमनसाथा॥
द्वार पधारि सुयज्ञ बुलाये दिये दान बहु द्विजन सुहाये ।।
पुनि बोले करगहि रघुवीरा गुरु वशिष्टसुत तुम मतिधीरा ।।
ये मम सखा प्राण ते प्यारे हों इन किये अधीन तिहारे ॥
सुनि सुयज्ञ बोले दृढ़ जानौं मैं नितलपण सरिस सब मानौं
सुनि सुयज्ञ वाणी . रघुराई * लिये प्रेम भरि अंक लगाई ।।
ताछिन भयो शोर चहुँ भारी राम चले सब कहैं पुकारी१७४
राम गमन लखि नृप अकुलाई सचिवहि कहे वचन बिलपाई।।
स्पंदन साजि तिहूँ बैठारौ ॐ राम संग तुम वेगि सिधारी१७५
सुनि नृप वचन सुमंत सिधाये रथ सजि वेगि राम ढिग लाये ।।
तब तिहुँ गुरु द्विजपद शिर नाई स्पंदन चढ़े रजायसुपाई १७६
चले राम सँग पुर नर नारी आरत रुदन शोर चहुँ भारी॥
ताधिन अवध नगर कर शोकासोजनजान जिन अवलोका १७७
घनाक्षरी कवित्त ।
पाय पितु आयसु वनाय वेप तापसको बंधु सिय संग राम वन-
दि सिधारे हैं। ताछिन भो विरह विलापको कलाप महा जेते जड
चेतन ते जातना निहार हैं। भये हैं विदाल सिय रामके वियोग म
व सरसिज वृन्द मुख मानो हिममार हैं ।निकविहारी नप काशला
सुमित्रा आदि बोलत विकल हाय प्योरे हाय प्यार हैं ।। १७८॥
दोहा-मात सुमित्रा काशला, सहित सकल गनवान ।।
विग्ह विकल विलपत विपुल, नमुझि गम वनवास। ७९||
गद गद गर जलनन भनि, कहनि मुभित्रावन !!
अति कटोन मेग दियो, ऐसह दुःख पटन ॥ १८ ॥

(१७४) . रामरसायन। . चित्र लिखे कपि देखिकै, जो सिय भौंन डराति ॥ पुत्र वधू प्यारी सु क्यों, वन वसिहैं दिन राति ॥ १८१ ॥ पलँग गोद तजि पालना, डगहू अनत न जात ॥ . ते मेरे बारे मुक्यों, सहिहैं आतप वातु ॥ १८२॥ कहति सुमित्रा नैन भरि, विकल वचन है दीन ॥ हाय कुटिल मति कैकयी, अवध अनाथ जुकीन ॥१८॥ रे विधि लेत न प्राण क्यौं, कहा कहौं अब तोहि ॥ राम लपण वन जात सखि, जियत रही धृग मोहि।।१८४॥ खग मृग गो गज वाजि सब, विलपत राम विहीन ॥ जे जड चेतन ते भये, विरह विवश बहुछीन ॥२८॥ कुनक पिंजरनमें कहैं, शुक सारिका बिहाल ॥ करै राम सिय लपंण बिन, को हमरो प्रतिपाल ॥ १८६॥ सो०-इहि विधि इत सव मात, दासी दास अनेक युत ॥ राम विरह बिलपात, अरु नृप दुख को कहि सकै ॥१८७ उत रघुवर रथ साथ, चले जात नर नारि बहु॥ भो अव अवध अनाथ, कहत रुदत इमि विकल सब ८८ तब पुरवासिन राम, समुझाये बहु धीर दै । काहु सुहाय न धाम, रह संग सब दृढ़ ठनी ॥ १८९॥ तमसातट विश्राम, प्रथम दिवस रघुवर कियो॥ निरखि रौनि युग याम, गे रथ खोज दुराय तव ॥१९॥ प्रात उठे नर नारि, रथ न लखो विल विकल ॥ आरत वचन पुकारि, आये सकल सशोक पुर ॥१९॥ गंगातीर सुटाम, शृंगवेर पुर विमल थल ॥ सचिव लपण सिय राम, द्वितिय वास कीनो तहाँ।।१९२॥ कुल निपाद गृहनाम, राम सखा आयो निरखि ॥ अंकलाय घनश्याम, मिलें ताहि सादर मुदित ॥ १९३॥ नपण सचिव सहुलास, उठि निपादपतिसों मिले ॥ सो सब कियो मुपास, सकल रहे मोरनि तह ॥१९॥ प्रात कही गय, तात जाइ रथल अवध ।। मुनि सुमंत पिलपाय, बोले वचन मिनीत अति ॥१९॥ . , रामरसायन। चौ-मुहि इमि नृप सिख दीनघनेरीवन दिखाय तिहुँलावहु फेरी॥ सोपितु वचनमानि रघुनाथा अवध चलौ सियलछमन साथा १९६ सचिव वचन सुनिकै रघुराई धर्मरीति बहु नीति बुझाई ॥ तब सुमंत वै निपट निरासा वोले यहुरि दीह लै श्वासा १९७॥ भूपति यह कही बहुवारी * जो न राम आँ प्रणधारी ।। तो इत आनौ जनकदुलारीन तरुतजीतनु निपट दुखारी१९८॥ सुनि सुमंत मुख तात रजाई 4 राम जानकिहि बहु समुझाई ॥ तब सिय कह मम दृढ़ प्रण येही चलौं साथ कै तजी मुदेही १९९ ताछिन लपण पितहि कटुवानी कही अमित रिसपुनि उर आनी।। बंधहि वरजि सचिव सन बाताकहीराम कहियो जिन ताता२०० फिरहि न कोउ सचिव दृढ़ जानी भयो विहाल कट्टै नहिं वानी॥ मिलि तिहुँ कहि मृदु वचन घनेरे धीरज दैसुमंत पुर फेरे२०१॥ तब निपाद रघुवर रुखपांई तिहुँ पद धोय नाव बेठाई ।। अति अनंद युत पार उतारी पुनि गमनोनिजभवन मुखारी२०२ दोहा-इत रघुवर सिय लपण तिहुँ, सुरसरि मुदित अन्हाय ॥ नित्यकृत्य कोने सकल, समय सरिस विधि भाय॥२०३॥ तब गंगहि कर जोरिकै, करी विन बहु सीय ॥ कही कुशल युत दीजियो, वेगि दरश रमणीय ॥२०॥ गंग देवि ही पृजिहीं, सविध विपिन ते आय ॥ मद आमिप पय अन्न फल, संयुत सुमन चढाय ॥२०५॥ याही सिय सुरसरि विनय, कीनी सहित उमंग ।। गमन कियो शिरनाय तिहुँ, राम लपण सिय संग२०६॥ प्र० पाल्मीकीय अयोध्याफोडे सर्ग॥ ५५ ॥ श्लोक। सुरावट सहस्रेण मांसभूतीदनेन च ॥ यक्ष्ये त्वां प्रीयतां देवि पुरी पुनरुपागताम् ।।२२।। दोहा-इहि प्रकार मिय लपण युत, रघुनंदन सुखभौन ।। तापसर्वप बनायके, कानन कीनो गान ॥२०७॥ इति श्री. रा०२० वि० वि० श्रीरामवनगमन वर्णनो नाम प्रथमोविभागः ॥ १ ॥ .

(१७६)
रामरसायन।
,
दोहा-रघुनंदन सिय बंधु युत, कीने तापसवेश ॥
चले मुदित गहि विपिन मग, रंच न हृदै कलेश ॥ १॥
मंगवासी रामहिं मिलें, ते लखि होहिं अधीर ॥
कहैं कहाँके कौन ये, श्याम गौर दुहुँ वीर ॥२॥
सुनें जबै वन गमन तव, अधिक हिये विल खाय ॥
कहें चलें हम रावरे, संग जु होय रजाय ॥३॥
कोऊ रघुवर संगही, होत प्रेम वश धाय ॥
फेरे फिरें न कहत हैं, हम मग देहिं वताय ॥४॥
कोल भील सिय राम. हित, लावत भेट अपार ।।
कंद मूल फल फूल अरु, खग मृग मीन सिकार ॥५॥
तिन सराहि सनमानहीं, कहि रघुवरवर बैन ।
सो सुनि सब सुख पावहीं, छवि निरसैं भरिनैन॥६॥
कछुक दूर सँग जात हैं, कानन पंथ वताय ॥
फिरत नहीं रघुवंश मणि, तिन फेरत वरियाय ॥७॥
याही विधि रघुवंश मणि, सीता लपण समेत॥
प्रमुदित कानन जातहैं, मगवासिन सुख देत ॥८॥
राजकुंवर फिर फिर.चितव, प्रिया वदनकी ओर ॥
है अधीन मृदुवचन कहि, विनवे सबहि निहोर ॥९॥
घनाक्षरी कवित्त ।
ये हो भूमि तजिकै कठोरता मृदुल होउ ये हो भानु सीत सबै
तपन विहाय हो।।डोली हो त्रिविध पौन लघुतां गहो हो मग कानन
गिरीशजाहु वाटते पराय हो ॥ मो सँग सिधारी वन जनकदुलारी
प्यारी रसिकविहारी हो सुखारी सो उपाय हो ॥ होवै ना दुखारी
सुकुमारी ये विदेह वारी इन हितकारी तुम सकल सहायहो ॥१०॥
दोहा-रघुनंदन सिय लंपणको, मुख निरखत फिर फेर ।
सीय लपण इत श्यामके, रहें वदन दिशि हेर॥११॥
सेवत हैं सिय रामको, लपण सनेह समेत ॥
दंपति प्राणनते अधिक, करत लपणपर हेत ॥ १२ ॥

रामरसायन। (१७७) इहि विधि सिय रघुवर लपण, कियो विपिन विश्राम ।। प्रात होत पुनि उठि चले, दिवस चढो द्वैयाम ।। १३ ।। दोबई छन्द । सिय तन चितै श्यामसुंदर वर श्रमित जानि सुकुमारी ॥ रघुनंदन मृदु वचन लपण सों कहे समय अनुसारी ।। तात लखो तरुछांह मनोहर तहँ विश्राम करीजे ।। थकित भई अति जनककिशोरी अब न पंथ चित दीजे ।। १४ ॥ लपणलाल इत उत निहारिके इक वट विटप सुहायो । सीतल सघन छाँह सुंदर शुचि ठाम अधिक मनभायो । तातर जाय मृदुल पवनकी रचि साथरी विछाई ॥ कियो तहां विश्राम मुदित मन सिया सहित रघुराई ॥१५॥ कंद मूल फल आनि लपण पुनि शीतल जल भरि लाये ।। बंधु सिया संयुत रघुनंदन अतिरुचि भोग लगाये ॥ तामगह निकसी पुर वनिता श्याम गौर लखि जोरी ॥ प्रमुदितभई चकितसी चित, कहो कहाँके कोरी ॥ १६॥ ते सब जाय सहेलिनमें निज यह चरचा जु चलाई ।। पथिक दोय आये अति सुंदर मैं अवहीं लखि आई ।। वठे सखी सुभगवट छहिया जवते मैं अविलोके ॥ तर ते जिय अकुलात अलीरीनन रुकत नहिं रोके ॥ १७ ॥ कोधी सुखी कहां ते आये तापस वेप बनाये। जाकी छवि अवलोकि सहेली कोटि अनंग लजाये ।। कानन सुनी न नैनन देखी रूप छटा अलि ऐनी॥ पुनि सजनी तिन संग मनोहर नवल नारि यक तसी ॥ १८॥ तिनके वचन सुनत वनितनके र अनंद अधिकायो। दशलालसा लगी घनेरी तन मन मर दुलमायो ।। गुरुजन डीठ बचाय मंगकी जरि मिलक नव वामा । देखन चला श्यामसुंदरकी छा अनुप लयामा ।।१९।। आई जहाँ रहे, मनमोहन निगम्य प्रीति अति वाटी।

(१७८).
रामरसायन।
चकित चित्त द्वै रही नबेली मनो चित्र लिखि काढी॥
इकटक रहीं निहारि ठगीसी भई निमिप नहिं देहीं ।
लै उसाँस उर ससकि छवीली नैनन जल भरिलेहीं॥२०॥
कोऊ रही चिबुक गहि अँगुरिन भई थकीसी कोऊ ॥
कोऊ कर कपोल धरि ठगढी रहीं जकीसी कोऊ ।।
कोउ दबाय देतन ते रसना लखें कनौखिन देकै ॥
कोऊ शीश हाथ दे नवला सोचें कुँवर चितकै ॥ २१ ॥
काहूके जिय राजकुँवरकी चितवन पैठ गईहैं ।
भूली सकल चातुरी सुधि बुधि विह्वल दशा भईहैं ।
काहूके उर लगी लालके नैन वाणकी गाँसी॥
काहूके गर परी कठिन यह श्याम प्रीतिकी फाँसी ॥ २२ ॥
काहूके वेणी बँद छूटे भूली सो न सुधारै ॥
काहूके सारी शिर सरकी सोऊ कछु न सम्हारै ।।
काहूकी ऑखिनते अतिहीं आंसुन धार बही है ।
काहूकी गति भई बावरी धीर न रंच रही है ।। २३ ॥
कोऊ लाज त्यागि रघुवरको रूप निहारि रहीहै ।
कोऊ कछु सकुचाय प्रगट पै हिय विच जात दही है ॥
कोऊ सुरति सम्हारि हेरि छवि पुनि अधीर है जाहीं ॥
कहि न सके कछु डर सकोच ते मनहीं मन विलखाहीं ॥२४॥
कोऊ कहें सखी ये को हैं आये इतै कहाँ ते ।।
जैहें कित किधी अवरै हैं ऐहैं फेरि यहाँते ॥
कोऊ कहें चली ढिग चलिये भेद सबै मिलि जैहैं ।।
कोऊ कहें अलीरी हम तो नेननको फल लह ॥ २५ ॥
ताछिन राजकुँवर सिय दिग ते सहजहिं उठे प्रवीने ॥
निकटहि कछुक दृरि चलि विरहन लगे विपिन चित दीने ॥
म्हो फटक दिवस चहुँचाई लांग सम सुहायो ।
लपणलाल घर ले धनु शर कर वन अदर जिय लायो ॥२६॥

गमरसायन।
(१७९)
लखि अकेलि सकुचति ठुठकति तिय जुरि सब सिय ढिग जाई।।
परि परि पाँय आय मिलि बैठी बोलि न सके सकाई ॥
दुहुँ करजोरि धीर धरि इक तिय कहत भई मृदुवानी॥
हे स्वामिनि कछु पूछन चाहै हम हैं नारि अयानी ॥२७॥
बनवासिनी गमारि नारि हम नीति अनीति न जाने ।
चूक क्षमा कीजो अजानको कोऊ विलग न माने ।।
मधुर वचन बोली सिय तिनसों तुम मम प्राणपियारी।।
बुझौ कहा कहति हौ नागरि का अभिलाप तिहारी ॥२८॥
बोली ग्रामवधू प्रमुदित है दै तापस ये को हैं ।।
जिनकी छटा निहारि अनूपम कोटिकाम रनिमोहैं ।।
जैहैं कहाँ कहाँते आये यह कौन तिहारे ।।
कहा नाम कह ग्राम धाम कहूँ हैं किहिके दुहुँ बारे ॥ २९ ॥
कहा तिहारो नाम छवीली कौन देत बन आई।
हमहि अयानी जानि सयानी कहिये सकल बुझाई ॥
ग्रामवधुनके वचन सुनतहीं जनकसुता मुसकानी ।
कार सकोच शिरनाय तियनते वोली मधुर सुवानी ।। ३० ।।
नाम अयोध्यानगर तहाँके दशरथ नृपति सुने हैं।
श्याम गौर व राजकुँवर वर सखि तिनके सुत हैं ।
इनकी मातु कौशला रानी मो हैं सासु हमारी ।।
अरु ये बंधु जु देवर गोरे लछमन नाम पियारी ॥३१॥
सीता नाम हमारो सजनी पिता जनक नृप स्याता॥
जिनकी पटगनी जु सुनना मोइह मम माता ॥
मकर कथा वरणी बंदड़ी ग्रामवधुन समुझाई ।।
त्यागिसकल कुल गज काज बटु जिहि कारण बन आई ।। ३२॥
सुनि चरवा सब ग्राम वधुनके लोचन जल भरि आये।
गदगद कंठ परस्पर लयिक कहें बचन विलखाये।
कही न जाय कळू नुन नजनी रिधि गति वाम बने।
अनुचित उचित नहिं जान कम्त भने टनेगे ॥ ३३॥

(१८०)
रामरसायना
॥
॥
एकै कहें
पुनि सजनी उन मात पिताको निपट कठोर हियो
जिन दोउ सुकुमार सुवनको हठि बनवास दियो है॥ .
राजकुमारि मनोहर ऐसी पुत्र वधू वर पाई ॥
कानन ताहि पठावत जियमें रंच दया नहिं आई ॥३४॥
एकै कहैं सखी नृप भोरे तिय चरित्र नहिं जाने ॥
बचन बद्ध ढ गये प्रथम कह होत बहुरि पछिताने ॥
एकै कहैं कुटिल कैकेयी अति मतिमंद अभागी॥
राम लपण लिय बनहि पठाये चेरि सिखापन लागी ॥३५॥
सुनौंरी
आली
भाग आपने जागे॥
ठई बुद्धि नृप रानिहि ऐसी हम सबके हित लागे ।
कितै राम सिय कितै अयोध्या कित हम बिपिन निवासी॥
विधि संयोग पुण्य पूरवले भई चरणकी दासी ॥ ३६॥
एकै कहैं अवधवासी सखि एकौ जियत न है हैं।
एकै कहैं अली जड चेतन सब इन बिन जिय ख्यैहैं।
एकै कहैं भटू जो इनको विधि काननै पठाये।
तौ सजनी वे सदन मनोहर जगमें वृथा बनाये ॥३७॥
एकै कहैं सखीरी जो ये कंद मूल फल खाहीं ॥
तौ पटरस व्यंजन बहु आली जगमें रचे वृथाहीं॥
एकै कहैं सहेली ये मगचलैं पयादे जोपै ।
शिबिकादिक गज वाजि यान बहु वादि बनाये तोपै ॥३८॥
एकै कहैं सखी जो इनको विधि बन अटन दियोरी ।
मृदुल प्रसून बिछाय सकल मग कोमल कसन कियोरी॥
एकै कहें उसासन लै के जो आपनो बसाहीं।
दुहुँवर बंधु सिया संयुत तो राखिय आँखन माहीं ॥ ३९॥
एकै कहें सुनी सिय स्वामिनि वचन कहत हम डरहीं॥
निरखिरावरी कृपाघनेरी तवहि ढिठाई करहीं।
राजसुता यह ग्रामवधुनकी विनती सुनि चित दीजे ।
जानि गँवारि न विलग मानिये चूक क्षमा सब कीजे ॥४०॥

गमरतायता
(१८१)
कानन कठिन कलेश छबीली तुमतौ अति सुकुमारी॥
सकल महादुख कैसे सहिही लैही निपट दुखारी ।।
कोल भील गज सिंह रीछ कपि विकट सदा बनचारी॥
डरिही तिनहि निहारि सुंदरी ते लागत भयकारी ॥ ११ ॥
ताते इतहिं रही वैदेही सवही विधि सुख पैही ।
करिहे सकल रावरी सेवा जो कछु आयसुदहौ ।।
हम निज करते नव पत्रन की रचिहें कुटी सुहाई ।
सखी सदा तुम संयुत बसिहँ राम लपण दुहुँभाई ।। ४२ ॥
अवधि विताय अवध पुनि चलियो हम सब संग सिधैं हैं।
जौलौं इत रहिहो तौली नित लखि निज नैन सिरें हैं ।
जवते सुनो श्रवण ते स्वामिनि हम वन गमन तिहारो।
तबहीते उर कल न परत है कसकत हृदय हमारो॥१३॥
ग्रामवधुनके वचन सुनत सिय कही मनोहर बानी॥
जानति हो तिय धर्म सखीरी तुम सब परम सयानी ॥
राजकुँवर वर श्याम सलोने धर्म धुरंधर आली ।।
चौदह वर्प प्रमाण राजतजि पितु आयसु जिन पाली ॥४४॥
तिनकी रुचि जो होय सखीरी सोई मोहिं महाही ।
पतिसेवा मन वचनकर्म तिय धर्म परम यह आही ।।
सब दुखदानि मुखद उनके सँग रंच भीति कछु नाहीं॥
निरखि श्याम मुखचंद्र सहेली हम दिन रैन अवाही ॥४५॥
इत बतरात रहीं तिय सियसों उत मन रघुवर पाँहीं।
दरशत कबहुँ दुरत कबहूँ चलि वन तरु लतिकन माहीं।।
विचरत फिरत विपिनमें लालन निरखि नवेली वामा ।
सकुचति सी चित तिहि ओरे जित डोलत धनश्यामा ॥१६॥
मिलते उठि सिय विगते सब तिय राजकुँबर ढिग आई।
निरखि लालकी छटा अनूपम ननन जल भरिलाई॥
लतन ओट ठाढे रघुनंदन लखि वोली इक वामा।
हम राबरे दरशहित आई हे सुंदर घनश्यामा ॥४७॥

(१८२)
रामरसायन।
तुम हौ राजकुमार छबीले हम हैं नारि गमारी।
कहा करै लखि रूप तिहारो लागी प्रीति हमारी ॥
निरखि रावरी छटा लाडिले हम कुलकानि विसारी॥
रुकत नहीं तन प्राण राखिये अब कह लौ मन मारी ॥४८॥
हम सब तिय तुव पास छवीले विनय करन कछु आई।
सो सुनि मानिलेउ हे प्यारे करियो जनि वरियाई ॥
सुनो लाल बन गमन तिहारो तवते अति विलपाती।
तुमहिं विलोकि विपिन दुख सुमिरत फटत हमारी छाती ॥४९॥
येती विनय सुनी हो प्यारे सब है दीन निहोरें ।
प्राण अधार मानलीजो यह शीशनाय कर जोरै॥
सिया बंधु संयुत मनमोहन इतही अवधि वितावो।
सवऋतु इहाँ सुखारी रैहो कितहूँ अनत न जावो ॥५०॥
कै पुनि संग लेहु हम सबहीं चलि हैं साथ तिहारे ।
तुमहिं विहाय सुहाय और नहिं घर पुर मकल बिसारे ॥
करिहैं सदा रावरी सेवा विनादामकी दासी ।
और कळून चहैं हे प्यारे हम सवरूप उपासी ॥५१॥
और न कौंऊ सुहात साँवरे तुम कछु टोना कीनो।
नेक छटा दरशाय छवीली तन मन सब हरिलीनो॥
के अब इतही रही लाडिले के सवही सँग लेह ।
अवला अबल जानि है प्रीतम जनि विठुरन दुख देह ॥५२॥
साँची प्रीत हमारी प्यारे हम छलछंद न जाने ।
तुम दियो तन प्राण आपनो करी सु जो मन मान ।।
हैं सब ग्राम निवासिनि भारी लखि तुव रूप लुभानी।
तिन पर कृपा कग हे रघुवर दान हीन मति जानी ।। ५३॥
तिनकी प्रीतिरीति साँची लखि रघुनंदन हरपाने ।
बोले बचन धीर द सर मी नीति नेहरम साने ॥
यी अधीन जनि हो बोली तुमही परम मयानी ।
लोक लान कुल धर्म पिनांग मी म अयानी ॥२१॥

रामरसायन।
(१८३)
.
पितु आयसु तजि राज साज हम है तापस इत आये।
चौदह वर्ष न जाहिं ग्राम बन रहैं परण गृह छाये ।।
एक जटिल दूजे परदेशी तुम हौ नारि ललामा ।
हमरो तुमरो संग सयानी वनै नहीं अभिरामा ॥५५॥
सवही वसौ सदा मेरे हिय सुधि राखियो हमारी।
फिरि हैं अवधि विताय फोरि हम मिलिहैं वोगि पियारी ।।
तुमरो धर्म यही है सुंदरि पति सुतमें चित दीजो ॥
हृदय हमारो ध्यान राखियो नीतिकाज सब कीजो ॥५६॥
राजकुँवरके वचन सुनत सव वाम विकल बिललानी।
द्वै अधीर मोहनसों वोली विरह प्रीति नय बानी ।।
तुम ही नृपति किशोर लाडिले नीति धर्म सव जानौ ।
लोक लाज मयाद वेदकी सकल रोति पहिचानी ॥ ५७॥
हम हैं नारि गँवारे साँवरे धर्म कर्म नहिं जानैं।
मन लग जाय छैल जाही सों ताहीके हित साने ॥
राखें साँची प्रीत लाडिले येही धर्म हमारे ।
प्यार एक रस सदा निवार्ह सुन ले वचन पियारे ।। ५८॥
सुनी वैन हे यार वटोही अवला अवल सदाहीं।
ताह पै पुनि ग्राम निवासिनि कळू चातुरी नाही।
छलबल एका रंच न जाने केवल प्रीत पियासी।
सांचोनेह लग जाही सों ताहीकी हम दासी ॥ ५९॥
जयते रूप तिहारो हेरो तबते सकल लुभानी ।
पति सुत धाम त्यागि प्यारे हम तुव हाथ विकानी ।
जिय भाव सोकरी लाडिले मारी चहा जिवावो ।
प यह विनय मान मनमोहन अब नरंच बिलगावो ॥६॥
परम प्रेममय वचन तियन मुनि बोले रघुगई।
तुम जु कही वाणी रससानी सब मेरे मन भाई ।।
मानो सीख हमारी एती सकल वाम गृह जाह।
कबहुँ न कोउ.मोहिं विसरियो में भूली नाहं काह ॥ ६॥

८४) रामरसायन। लगे श्यामके बैन बाणसे बोली सब विलखाई ॥ हाय हमारी पार साँवरे रंचहु तोहिं न आई ॥ प्याय सुधा फिर विपदै मारे ऐसे गुण नहिं जाने ।। कारे कपटी होत सांचहू अब नौके पहिचानें ॥ १२ ॥ कोऊ बोलि उठीं सुन सजनी और उपाय नकीजै । सब विरहिनी वाम जुरि मिलिके प्राण इनहिं ढिग दीजे कोऊ कहैं अरी आली यह जतन करौ सब कोऊ। अंगविभूति रमाय त्यागि घर सकल फकीरिन होऊ॥ कोऊ कहैं हाय हे छैला मैं तुमरी बलि जाऊँ । अब जनि मोहिं सताव पियारे पद गहि हाहा खाऊं। कोऊ कहैं साँवरे तुम तौ राजकुमार कहाचा ।। ऐसी निठुराई नहिं बहिये हिये दया कछु लावो ॥६४ । 'कोऊ कहैं हाय हे प्रीतम डार प्रीतकी फाँसी। करी मोहिं अधमरी छोडि जनि जाओ मीत विशासी।। कोऊ कहैं श्याम यह तुमरी नेक चितौन तिरीछी रोम रोम विधि गई हमारे छुवत बड़ी जनु बीछी ॥६ कोऊ कहैं सखी रघुवंशी इनाहि दया नहिं आवै ।। करत अहेर हेर मृगछौनन रंचहु कसक न लावै । कोऊ क सखी ये तापस प्रीत रीत कह जानें। कोऊ कहें भटू निरमोही मोह न रंचहु मानें ।। ६६ ॥ कोऊ कहैं सखी कहुँ इनको विरह पीर नहिं व्यापी । कोऊ कहें भटू सव कारे लखियत पर संतापी ।। कोऊ कहें अलोरी इनको निपट कटोर हियो है। कोऊ. कह ऐसही गुणतें पितु वनवास दियो है ।। ६७॥ कोऊ कहें श्याम निरमोही अब तू जनि दुख देरे । के इतहीं रह प्राणपियारे के सवहीं सँग लेरे ।। कोड, कहें अरे निर्दिया इतनी कृपा किये जा ।

रामरसायन। (१८५) कोऊ कहैं लाल तुम लाखनके जिय लीने लै हौ।। कोऊ कहैं प्राण अवहीं कह कोटिनहूंके लै हो। कोऊ कहें अली इनके हिय रूप गुमान घनेरो ।। कोऊ कहैं लरकपन आली छुटो नहीं बहु तेरो ॥ ६९ ॥ कोउ कहें भटू मनमोहन पाई नारि सयानी। याते हीय नरंचहु भाव हम सब निपट अयानी ॥ कोऊ कहैं चरण गहि रहिये कैसे फेर तजेंगे। कोऊ कह निरदई छली ये नेक न लाजलजेंगे ॥७०॥ कोउ कहें बरजोरी राखें हमतौ जान नदै हैं। कोड कहें जित चहें जाँय तित अव तौ संग सिधै हैं । कोर कहें सबही चलि हजे योगिनि इनके पाछे। लाज कहा तस नाच नाचिये वीर काठ जस काछे॥७१॥ कोऊ कहें सखीरी इन विन धृगजीवन सबहीको ॥ सुत पति हित धन धाम भोग सुख एको लगत न नीको ॥ कोऊ कहै भली अति कीनी श्याम जु इत ह आये ॥ कोऊ कहें हमहिं मारनके कारन बनहिं सिधाये॥ ७२ ॥ कोऊ कहें लाल कहु साँची कितनी नवला मारी॥ कीनी कहां धायल केती किती तर्जी अधमारी॥ कोऊ कहें सखीरी इनके जहां जहां पग परि हैं। तहां तहां मयही वनितनकी ऐसीही गति करिहैं ॥७३॥ फोऊ कहें जहां ये मजनी हह रहत सदाई । ता पुर में क्यों बसत होइँगे हेली लोग लुगाई ॥ कोउ कहें मुनोरी सजनी राजकुमार नहीं है। ये ति काम देह वै धरिक आये वन मही है ॥ ७ ॥ कोड करें. कहा अब कर्ज अमित जनन करि हाग। रंचटु कमक न आयत इनको अधिक कठोर दिया। को कह हम और हाय बलि नेक निहार छोले । जीव दया कछु लार लाडिले हो न निदर गरीले ।। ७२ ।।

रामरसायन। कोऊ कहैं सुनो हो प्यारे जो हमको कलपैहो । सब विरहिनि की हाय परैगी तो कबहुँ न कल पैहो । कोऊ कहैं पाय छबि नीकी प्यारे गरब न कीजे । धन जोबन नहिं रहत सदाही यश जगमें करि लीजे ॥७६॥ कोऊ कहैं अरे साँवलिया क्यों इतरात घनेरो। कछू बोल तो रहो मौन क्यों हर कलेश यह मेरो॥ कोऊ कहैं सखी या ढिगते चलिय गेह मन मारी। देखि देखि याकी छवि औरौ पीर उठत उर भारी ॥ ७७॥ कोऊ कहैं भटू विधि इहिकी जो ऐसी छवि कोनी। तो सजनी याके उर काहे नेक दया नहिं दीनी ।। कोऊ कहैं सखी काहू को काहे दोप लगये । जो कछ होनी होय होय सो कर्म लिखे फल पैये ॥ ७८॥ कोऊ धाय जाय रघुवरके चरण परी अकुलाई । 'कोज हाय हाय करि रोवन लगी सामुहे आई ।। विरह नेह वश विकल सबै तिय तन मन कीन सम्हारा। विह्वल बचन कहैं नैननते चली जात जलधारा॥ ७९ ॥ तिनकी प्रीति निरखि नृप लालन नैन नीर भरि आयो। गदगद कंउ हृदय उमगानो सकल अंग पुलकायो॥ उर धरि धीर ही सबहीनों रघुनंदन मृदुवानी। हे सुंदरी भी सर तुमरी मेरे हीय समानी ॥ ८०॥ जसरी मम पाणपिपारी में हों तब आधीनो। मानी जा सहि मारे रुनै न प्रति विहीनो। Hiसमिपातसी ताहि पुर्जहाँ । Eins मोमानी मनमानो सुख दहीं ॥८॥ मगर सर उर धीर धराई। सध्या मम मानि शिप. निज निज गेट पठाई ।। अपने अपने भान गई तिय जिरानंदन माहीं। जशी गरीमी रहीं यटिक मनहीं मन पिरमाहीं।। ८२।।

रामरसायन। (१८७) उत रघुनंदनमें मन अटको इतै लाज गुरु जनकी । दशा दुराय रहीं सवही तिय राखि मनहि में मनकी ।। होय प्रात कब चलिय लाल ढिग नींद न रंचहु आवै । छिन छिन लब चंद निशि तारे युग समान पलजावै ।। ८३॥ इति श्री० रा०र० व० वि० ग्राम वधू समागम वर्णनो नाम द्वितीयोविभागः॥२॥ . इत रैनि वसिकै रघुनंदन प्रातहि विपिन सिधारे । ग्राम वधुनकी प्रीति सराहत चले जात मग प्यारे ।। दोऊ सिय रधुचंद परस्पर तिनही की सुधि करहीं। साँची नेह वखानि तियनको अतिआनंद उर.भरहीं ॥१॥ निशा विगत लखि उठी संब तिय करि गृहकाज उताली। गुरु लोगनकी डीठ दुरै के चली तहाँ मिलि आली ॥ आई जहाँ रहे नृपलालन तहाँ न श्याम निहारे । हिय धकधकी उठी सवहीके लखें चहुँ कित प्यारे ॥२॥ जाय निहारत भई सुबट तर सृनि साथरी पाई। हेरतही सब वाम हाय कार गिरी धराणि मुरझाई ॥ घोर शोर करि रोक्न लागी कहें गये कित प्यार। आँसुनधार वही नननते तन मन प्राण विसारे ॥३॥ कोउ भूमि परी रज लोट कोर फिरें विललाती। कोऊ.शीश धुनै व्याकुल है कोऊ पीटति छाती ॥ कोऊ हाय श्याम ! कहि टेरें कोऊ मान रही हैं। कोड. लेति उसाँस आह भरि कोऊ. विरह दही हैं॥४॥ काहकी सारी तनु ते गिरि लतिकनमें उरझानी। काहूकी कंचुकी फटी सब मुधि वृधि सफल नशानी ॥ काहूके अंगन ते केते भूपण टूट पाहें । काहके आनन प दुदिशि कुंतल टूट पन्हें ॥५॥ काहके तनुमें तरु वेलिनते जु खगट पाहे ।

रामरसायन। काहूके पायनमें कंटक लागे अमित खरेहैं । काहूके अतिविरह ज्वालतें मुखसे फेन बहोहै । काहूके सब अंगन माहीं स्वेद जु छाय रहाहै ॥६॥ राज कुँवरके विछुरत सवहीं भई बावरी वाला। जो जिय आवै कह करें सो बढी विरहकी ज्वाला ॥ कोऊ कर कर शोर रोयकै हँसत निशंक बहोरी। कोऊ हाय मार रहि जावें पुनि बैठे मुख मोरी ॥ ७ ॥ कोऊ मनहीं ते बतरा अरु अनखाय रिसावें। कोऊ विरह कवित्त छंद कहि फिरि चुप है शिरना । कोऊ भानु भूमि नभ पशिन तरु गिरि निकट बुलावै । कोऊ कहैं लाल वे ठाढे चलौ चलौरी धा३ ।। ८॥ कोऊ दौरि च तरु गिरि पै इत उत चहुँ दिशि हेरें । आव आव हो श्याम बटोही फिरौ फिरौ कहि टेरें ।। कोऊ धाय गहे तरुपल्लव कहैं दौरियो आली । हम कर गहि राखे मनमोहन दुरे हुते इत ख्याली ॥९॥ कोऊ निज परछाँही लखिकै ताहि गहनको धावें । कहैं वेगि आवोरी पकरौलाल भगे ये जावे ।। कोऊ लखि प्रतिबिंब वार विच वोले अति बिलखाई। धाव धावरी आव वेगही ये ठाढे रघुराई ॥१०॥ कोऊ झुकि झुकि भूमि पंथमें चरण चिह्न चहुँ हेरें । कोऊ खग मृग तरु लतिकन को जाय जाय मिलि धेरै ।। कोऊ कहें सखी हम सबको आवत देखि दुराने । कोऊ कहें अलीरी कालिहि वे निशि मांझ पराने ।। ११॥ कोऊ कहैं सुनौरी सजनी हैं दुहुँ बंधु अहेरी। खेलनगये भट्ट काननमें आवत हे येरी॥ कोऊ कहें अली टुक टेरी हैं किहि ओर चलीजे। कोक कहें संखी चुप साधी इतही आवन दीजे ॥ १२ ॥ कोळ विरह अधीर विकल के टेरन लगी सुवामा ।

रामरसायन । (१८९) हाय प्राणप्यारे अब आवो कितै गये घनश्यामा॥ कोऊ कहैं लेत कह प्रीतम हमरी प्रेम परीक्षा । हैं सब विकल वियोग तिहारे आय करौ कछु शिक्षा ॥ १३ ॥ हे लाडिले सुजान छबीले अब टुक मुख दरशाजा । विरह ज्वाल ते जरत सबै तन नेह सुधा बरसाजा ॥ तो बिन हे दिलदार पियारे निकसैं प्राण हमारे । हिये दया कछु लाय जिवाले हे प्रीतम इत आरे॥ १४ ॥ कहाँ दुरेही जाय विपिनमें बोलौ मीत बटोही । कल्प समान पलक बीतत हैं श्याम मोहिं विनतोही। पहिले मारि नैन वाणन ते सव घायल करि डारी । प्रीत लगाय हाय अब प्यारे काहे सुरति विसारी ॥ १५ ॥ राजकुमार मुजान जानि कैहम तुमसे हित कीनो। ऐसे निपट अजानकढे मोहिं अधिक दुख दीनो । या विधि विकल वाम सब विरहिनि विरह भरी विललाही। धाय धाय इत उत जिततिनसों वृझत हैं सब पाहीं ॥१६॥ तरु गिरि महि सरिता खग मृगको जड चेतन नहिं सूझें। निज प्रीतमकी खबर दीन वैधाय सबहिंसों बूझै ।। कहैं अधीन बचन करजोरेंअब जनि कोउ दुरावो॥ प्यारे प्राणअधार सांवरे हैं कित मोहिं बतावो ॥ १७॥ कलित उद । हे अशोक तुम शोक हरी सबहीके । क्यों न मिलावो मोहन जीवन जीके ॥ हे कदंब बलि अब विलंब जनि लावो ।। राजकुँवर रघुबरको हमर्हि बतावो ॥ १८॥ हे रसाल कहुलाल कहूँ इत हे रे । पहुँचालो ज वेगि हमें उन नेरे ॥ हे पापर तुमही पर दया जुलावो ।। मुंदरश्याम सजनको रूप दिखावो ॥ १९ ॥ हे पाकर अब इती कृपा कर देही । कहाँ बतादे मोकहँ श्याम सनेही ॥ हे तमाल रघुलाल कहूं तुम पाये । कही फित मुहि तजिकै रहे दुराये ॥ २० ॥ हे वट तुम तजि कपट वचन ठक बोला। भये गमरसायन । चल यों काहे रंच न डोलौ ॥ तुमहूसे कहि गये कछू मम प्यारे। पनि दिन तो ढिग मीत हमारे ॥ २१ ॥ हे अनार कचनार र निरमोही । कहां बतादे छैल निहारौं. तोही ॥ हे पलाश तुम श पुजावो मोरी । कहां दिखावो लाल कहों कर जोरी ॥२२॥ चंदन रघुनंदन रूप दिखावो । विरह ताप मो उरकी सकल रावो । हे कदली कस बदली बुद्धि तुमारी॥ कहां वतावो श्याम ति बलिहारी ॥२३॥ हे अवनी दुख दवनी हौ सवही की। कह। गल कित हरौ व्यथा मोजीकी॥ हे मग तुम पग चिह्नवतावो ही । गये कहां है सुंदर छैल बटोही ॥२४॥ हे समीर बलि वीर र हरमेरी । कितै गये रघुवीर धीर मुहिं देरी ॥ धाय लाल द्विग यि मोहिं सुधि लादे । उन हूं को या विरहिनि दशा सुनादे॥२६॥ सरिता तपहरिता तुमहु कहावो।जरत हृदय यह मेरोक्यों नसिरायो। सरोजप्रीतमको खोज बतायो।कहा दुरे मनमोहन वेगिदिखावो२६ हो मीन जलहीन दशा तुव जैसी ॥ श्याम सुघर बिन तलफतहैं म तैसी ॥ हाय न कोउ सहाय आय हो जावै ॥ विरह अगिन हियकी विपम वुझावै ॥२७॥ अहो भौंर बहु ठौर सदा तुम लौ । लखे होय कहुँलाल वेगि तो बोलो। वेऊ कपटी छैल तुम- से कारे। प्रीतलाय हरि लैंगै प्राण हमारे ॥ २८॥ हे खंजन मन जन नैन तिहारे । हम जानी कहुँ निरखे हैं तुम प्यारे ॥ हे मैना! बैना क्यों न सुनावो । गये पथिक किहि ओर जु मोहिं बतावो॥ २९ ॥ हे शुक तुम टुक बोलौ मधुरी वानी । कहूं निहारे रघुवर प गुमानी ।। अरे काग बलिभाग तोहिं बलि देहीं। मोकहँ सगुन तार श्याम कब पैहीं ॥३०॥हे हरिनी मन हरिनी आंख तिहारी। प लालनको तुम कहुँ छटा निहाग। हेदिशि किहि दिशि गये साँवरे पारे । कहो लाल बिन तलफल प्राण हमारे ॥३॥ हे गिरिह। रति ऊंचे फिरि चहुँ हेंगे। लखा लाल कित जात वेगि किन टे। रहो मोर अति उंचे शोर मचावो । विरहकलपना मेरी सफल नायो ॥ ३२ ॥ अरे पपीहा तृप्रीतम किंग जारे। दीन वचन कति गमरसायमा (१९१) पीर पीर रट लारे ॥ हक ईठ मुनि कूक कोकिला तेरी । नेक मान गहु हाय न मुहि दुख देरी ।। ३३ ।। अरे चंद मतिमंद अंग क्यों जार। पंचवाण उर वाण हाय क्यों मारे। अरी रैनि दुखदैनि सिरात न काहे । अरे विरह मो सकल अंग कसदाहे ॥३४॥ अलबल बोले विकल विरहिनी वामा । तिनहि कळू न सुहाय विना घन- श्यामा ।। सुधि बुधि भूलगई हैं सब तन मनकी । घर पुरकी नहि सुरति भई बन वनकी ॥ ३५॥ कोऊ कहूँ विहाल बैठ पछताती । कोऊ करि करि हाय धुनें शिर छाती ॥ भई वावरी कोऊ इत उत दौर। कोंऊ विहवल गिरी परी शिति छोर ॥३६ ॥ कोऊ तिया तियाको भुज गहि लेही । कह चले कित तजिकै श्याम सनेही ॥ बोलें कोऊ गहि तमाल अकुलाई । आउ आउरी हम पाये रघुराई ।। ॥३७॥काहूके शिरकेश खुले न सम्हारे । काहू तनते वसन गिरे नहिं थारै ।। काइके पट फटे कंटकन माहीं । काहू परे छगैंट कछू सुधि नाहीं ॥३८॥ हाय हाय कहि कोउ उसासन लेहीं । कोऊ काहि कछू न उत्तर देहीं । भई वावरी रघुवर विरह वधूटी । लोक लाज कुलरीति नीति सब छूटी।। ३९॥ कोउ कह सखि हाय कहौ कित जैये । कोरं कहें यह काको विरह सुनैयै ॥ कोड कहैं सखी उन विन धृग जीनो। कोक कहें विधाता यह दुख दीनो ॥४०॥ कोऊ कहे सखी मो निठुर महाहै । कोऊ कहें अली उहि दोप कहाहै ॥ कोऊ कहें मुहि हाय संग नहिं राखी । कोऊ कहें कछु चलतहुँ मीत न भाखी ॥४१॥ कोऊ क ह योगिनि भस्म रमैये सब मिलि श्यामहि हेरन जित तित जये। कोऊ कहें सखीरी हम तन देह । मनमोहनके ढिगहीं प्राण पर्टहैं ।। १२ ।। कोऊ कहें अली हम अब लखि पावें । ती छिन भरि नैननते न दुरावै ॥ कोर कहें सखि होनीहुती भईसो कोऊ कहैं करी जमि दई दई सो ॥ ४३ ॥ कोऊ कई अलि कारो कठिन महाह । कोऊ कहें तापसकी प्रीत कहाह ।। कोऊ कहें कपटी जस मुहिं दुख दोनो । सोऊ तस फाल पहे अपनोकीनो || कोड कह सखी सांवलिया मोरो॥

(१२) रामरसायन। P4 ताके संग महा छलिया है गोरोकोड कहें अली सो नारि सयानी । हम सबको लखि लै निज पियहि पगनी ॥ ४५ ॥ कहैं वचन सब जाके जिय जो आवै । रघुनंदनके विरह विकल विललावें । ताही मग है एक पथिक तहँ आयो । तिहि विलोकि सब वनितन अति सुखपायो ॥ ४६ ॥ घेरि लयो तिहि धाय जाय सब नारी । चकित भयो सो तिनकी दशा निहारी ॥ कहे पथिक तुम को हौ कौन कहांकी । कळू न बोले वाम श्याम मद छाकी ॥४७॥ वैठि गयो इक तरु तर आय बटोही । घेरि रही चहुँ फेर वाम सब वोही । वृझतिहैं मिलि खवर मीतकी तासों । कहन चहैं कछु कछू कलै रसनासे ॥४८॥ कही पथिक तुम साँचे बैन सुखारे ॥ कहूं निहारे हमरे प्राण पियारे । श्याम गौर द्वै बंधु सुभग धनुधारी । है तिनके सँग एक मनोहरनारी॥४९॥कीने तापस भेप तिहूँ वनचारी ॥ कहौ बटोही तुम कहुँ छटा निहारी। लछमन नाम सु गौर राम हैं श्यामा। सीता नाम ललाम वाम गुणधामा ॥ ५० ॥ अविलोके तुम होय कहूं तौ बोलौ । रंच न राखौ हृदय गांठ बलि खौलौ ॥ पथिक तिहारे ' पाय परै करजोरी ।। कहा श्याम सुधि निरखि दीनता मोरी ॥५१ ॥ भई बावरी सिगरी विरहिनि बाला। कहें पथिक कित मिले तुमैं रघुलाला।।कहो कछू हम संबसों श्याम सँदेशो । पाई खबर न मोजिय अधिक अंदेशो ॥ २२ ॥ कही कहा कहि भेजो वह निरमोही । कैपाती लिखि दई बतावो मोही ॥ के हम सबको भेद लेन तुम आये । राजकुवँर छल करिकै सिखै पठाये ॥५३॥ वारवार तुव पाय पथिक हम परहीं। हाथ जोरि शिरनाय विनय बहु करहीं ॥ वा निरमोहीकी कछु खबर सुनावो ॥ तिहि बिन तलफत प्राण सुहाय बचावो ॥५४॥ येकै तिया वटो- हासों कर जोर । एकै तिहि निज शीश नवाय निहोरें ॥ एकै कर अझकोरि कहें कछुतेही । वृझे इक गुलचाय कहीं फित नहीं॥५५॥ 4

रामरसायन।
(१९३)
एकै बूझें वात वलया लकै । एकै दिन ताहि चिबुक कर
देक ।। एकै कहैं अली यह बौरो नर है । याको निज तन मनकी
कछु न खबर है ॥ ५६॥ एकै कहें भटू इन श्याम निहारे ।
डोलत वन वन तन मन सुधि सकलीवसारे ॥ जो इन छविन
लखी होती लालनकी । सुर तिन जाती तौ याके तनमनकी ।।१७॥
एक कहैं अली यह उनढिग जैहैं । विरह दशा या सबकी सकल
सुने हैं। एक कहैं कछू तो वोल कसाई । तोहि हमें कछु रंचहु
दया न आई॥५८॥ एकै कहें पथिक प्रीतम ढिग जैयो ।
हम दिशिते पग परि परि विनय सुनैयो | कहियो तुम
विन तलफत हैं सब वामा । तिनहि जाय सुखदेड वेगि
वनश्यामा ॥ ५९ ॥ एक बेर फिरि आय वदन दर
शावें । कहियो फिरि जित भावै जिय तित जावें ॥
कहियो जव ते नैन वान तुम मारे। तबते निशिदिन तलफत प्राण
विचारे ।। ६० ।। कहियो लालन जो न वेगि तुम जैहो । तो मार हैं
सब विरहिनि जियतन पेही ।। कहियो आय सु प्राणदान दे जावे।
नाही ती निज करते जिय ले जा ॥ ६१ ॥ कहत वचन
विरहिनी नेहमदछाकी । सही जात नहिं पीर वियोग व्यथाको ।
अहो पथिक उन पास जाय फिरि आवो। कहा कहो मनमोहन
मोहि सुनायो ।। ६२ ।। कोऊ लेकर कंकन पथिकहि देहीं । कोऊ
निज मुद्रिका देति हैं तेहीं । कोऊ तिय भुजवंद देय अतिनीको ।
देनलगी हैं चंद्रहार वरहीको ॥६३॥ कोऊ वेसर कोउ. कुंडल
देही शीशफूल मंजरि देय रठिकहीं। करनफूल नथ झुमक कोड
उतारें । चंपकली वर माल कोउकर धाग।६।पथिकनहीं कछु लेय
देय पर जोरी । पाय पर तिय विनय करें फर जोग ।। कह पथिक
तुम बेगि श्याम सुधिलायो। एक बेर रघुबर सोहमहि मिलावो६५॥
तिनकी प्रीति निहारि पथिक हरपानो। वंदि चरण निज जन्म
सफल करिमानो।धन्य वाम ये जिन प्रीति अनिसानी । लाज
त्यागि रघुगज रंगमें गची ॥ ६६ ॥ तिनहिं धीग्द पधिक की

रामरसायन। मृदुवानी । धीर धरौ निज हियमें परंम सयानी ॥ यौँ जनिहोहु अधीर विरहिनी वामा । तुमहिं मिलेंगे वेगि राम अभिरामा ॥६॥ धर्म धुरंधर राम विपयरसरूखे । रहत भक्त आधीन प्रीतिके भूखे।। तुम उनते नहिं दूर नवे तुमसे हैं । दुहूँ निकटं ही दोऊ दुहूँ हिये हैं ॥ ६८ ॥रैनि दिवस ज्यों तुम सब उनहिं रटौहौ । तिय सिगरी त्यों तिनकेहिये बसौहौ ॥ वेसवहीके जीकी जाननवारे । दूर करेंगे सकल कलेश तिहारे ॥ ६९ ॥ पथिक धीरदै सबही विधि समुझाई। विरह आगिनि कछु कहि रस वैन सिराई ॥ कहैं वियोगिनि बाल बटोही प्यारे । और श्यामकी चरचा फेरि चलारे ॥ ७० ॥ फेरि विरहिनी विकल भई अकुलानी । हाय लाल कहि टेरन लगी सुवानी ॥ विरह विवश तिन सुधि बुधि पुनि विसराई। उठो वटोही ताछिन औसर पाई ॥ ७१॥ तिन चरणनकी रज निज नैन लगाई। चलत भयो कछु मिसतै डीठ बचाई ॥चलो जात मग पथिक नैन भरिलाये । करि करि तिनकी सुरति हिये हुलसावै ॥ ७२ ॥ इते विरहिनी वाम अधिक अकुलानी । हाय बटोही गयो कहें विलखानी ॥ धाय धाय चहुँ ओर जाय तिहि हेरें । कोऊ कहुँ न दिखाय वेसही टेरें ॥ ७३ ॥ कहें पथिक कित गयो नेक इत आरे । मेरो कछु संदेशो तो लेजारे ॥ इहि विधि करति विलाप विकल सब नारी । बड़ी पीर उत लागी विरह कटारी ॥ ७ ॥ ताही छिन चहुँ ओर घेर धन आये । वरसन लागो नीर अधिक क्षिति छाये ।। झोका देत समीर दामिनी कोंधे । जाकी चमक निहारि नैन चकचों ॥ ७॥ नटत मोर वन पक्षिन शोर मनायो । सुनि विरहिनि हिय दुनो विरह बढ़ायो । नीर बुंद जो पर नियनके तनमें । रंक हूँ न लखाय सुछन छिनमें ।। ।। ७६ ॥ देखतही घनश्याम विहिनी बाला । गंय उठी अति मं पिग्ह येदाला ॥ काह कया भट्ट जमे चनहार । नेमही मनमोहन अपने प्यारे ॥ ७ ॥ मोविहिनि कहें, मंत्र इन मारे । तोलागिमीतल दोन मुनन हमारे ॥ येई घनश्याम रामरसायन । (१९५॥ तुमौं घनश्यामा । दोउनको है एक रूप गुण नामा ॥ ७८ ॥ कोउ करें धन इतै नहीं तुम छावो । जित होय मनमोहन तितै सिधायो । उनही के ढिग जाय घेरि झरि लैयो । यह दुख हमरो श्यामहि सकल मुनयो ॥ ७९ ॥ नेह विरह वश ग्राम वधूं कर- जोरै । शीश नाय है दीन ज सबहि निहोरै ॥ कानन योग नहैं सुकुमार पियारे । ते वन वन या डोले पाय उघारे ॥ ८० ॥ तुम सवही मिलि प्रीतमको सुख दीजो ॥ जड चेतन निज जन्म सफल कर लीजो ॥ अहो मेघ तहँ कीजो छाँह सदाहीं । सुंदर श्याम सलोने जहँ जहँ जाहीं ।। ८१॥ अहो पवन नित त्रिविध लाल हित दरियो । होन न पावे सकल स्वेद श्रम हरियो॥ अहो चंद रघुचंद अनंद करीजो । अहो रैन प्रीतमहिं चैन बहु दीजो ॥ ८२॥ अहो भूमि तुम तहाँ मृदुल अति होऊ । जहां जाहिं सिय सहित बंधु वर दोऊ ॥ अहो पंथ लघु सुगम स्वच्छ शुचि रहियो । राजकुँवरको मोद सहित निरवहियो ॥८३॥ रघुवरके हित हेतु अहो तरु वेली । फूली फली सबै ऋतु समय सकेली ।। अहो भानु तुम उनके कुलपति हौजू । राजकुँबर सुख हेतहि सीत गहौनू ८४|| सब पसारि निज अंचल विधिहि मनावें ॥ जहां रहे रसिकेश तहाँ सुखपावें ॥ देव पुजयो वेगहि आश हमारी । बहुरि विलोक नयनन भार धनुभारी ।। ८५ ॥ इति श्री० रा०र० ३० वि॰ग्रामयचविलाप वर्णनो नाम तृतीयो विभागः॥३॥ दोषई छंद । सब रघुवर छवि छकी छबीली तन मनकी सुधि भृली । राजकुंवर घनश्याम सुघर बिन विरह शूल हिय हली॥ सकल दिवस निशि बन विलपतहीं रहीं नवेली वाला। घर पुरजन अकुलात सोच वश खोजत फिरत विहाला ॥१॥ दूजे दिवस विपिनमें पाई तिनकी दशा निहारी॥ भये विकल गुरजन पुर परिजन बढ़ो सोच उरभारी ।।

।
चलत भयो कछु मिसतै डीठ बचाई | चलो जात मग पथिक,
आरे । मेरो कछु संदेशो तो लेजारे ॥ इहि विधि करति विलय
रामरसायन।
मृदुवानी । धीर धरौ निज हियमें परम सयानी ॥ यो जनिहो
अधीर विरहिनी वामा । तुमहिं मिलेंगे वेगि राम अभिरामा ।। ६७.
धर्म धुरंधर राम विपयरसरूखे । रहत भक्त आधीन प्रीतिके भूखे
तुम उनते नहिं दूर नवे तुमसे हैं। दुहूँ निकट ही दोऊ दुहूँ हि
हैं। ६८ ॥रैनि दिवस ज्यों तुम सब उनहि रटौही। तिय सिगर्न
त्यों तिनकेहिये बसौहौ ॥ वेसबहीके जीकी जाननवारे । दूर करें
सकल कलेश तिहारे ॥ ६९॥ पथिक धीरदै सबही विधि समुझा
विरह अगिनि कछु कहि रस वैन सिराई । कहैं वियोगिनि वाद
बटोही प्यारे । और श्यामकी चरचा फेरि चलारे ॥ ७० ॥फे
विरहिनी विकल भई अकुलानी । हाय लाल कहि टेरन ल
सुवानी ॥ विरह विवश तिन सुधि वुधि पुनि विसराई । उठो वो
ताछिन औसर पाई ॥७१॥ तिन चरणनकी रज निज नैन लगाई
भरिलावै । करि करि तिनकी सुरति हिये हुलसावै ।। ७२॥
विरहिनी वाम अधिक अकुलानी । हाय बटोही गयो ।
बिलखानी॥धाय धाय चहुँ ओर जाय तिहि हेरें । कोऊ क
दिखाय वैसही % ॥ ७३ ॥ करें पथिक कित गयो नेक
विकल सब नारी । बढ़ी पीर उत लागी विरह कटारी ॥७४
ताही छिन चहुँ ओर घेरधन आये । वरसन लागो नीर अधि
क्षिति छाये ॥ झोका देत समीर दामिनी कोंधै । जाकी च
निहारि नैन चकचोंधै ॥७॥ नटत मोर वन पक्षिन २
मचायो । सुनि विरहिनि हिय दूनो विरह बढ़ायो । नीर वृंद
परें तियनके तनमें । रंचक हुन लखाय सुछनकै छिनमें
॥ ७६ ॥ देखतही घनश्याम विरहिनी वाला । रोग -
अति भई विरह वेहाला ॥ काह
तेसेही मनमोहन अपने प्यारे ।
इत आरे । तो लखि सीतल

रामरसायन।
(१९७)
रहिये करि करि हाय ।। ११ । वह मधुरी रस वोलनि कसकत
होय ॥ वा तिरछी रस हेरनि पैठी जीय ॥ १२॥ कबहूँ फिरि
अव ऐहे इहि मग लाल । हमहिं बहुरि दरशैहे वदन विसाल ॥१३॥
सो दिन धौं कब होइहि अति अभिराम ।। जादिन प्रीतम हेरौं फिरि
सब वाम ॥ १४॥ दई देवता कित धीं गये पराय ॥ सवै मनाये
कोउ न होत सहाय ॥ १५ ॥ श्याम मिलनकी धरि धरि जियमें
आस।। करत सदा हम सजनी जप उपवास ॥ १६॥ हम उन लागि
| परनवां अरपन कीन । सो अस निठुर पियवा सुधिहुन लोन १७॥
लिखि न पठाई पतियो एकौ मीत ॥ का राखिहि निरदैया साँची
प्रीत ॥ १८॥ सजनी नेह निवाहव सहज न होय ॥ प्रीत रहै वरु
जियरा जावै खोय ॥ १९ ॥ सखी इकंगी नेहवा दुख बहु आय ॥
दिवला माहि पतंगवाकर जिय जाय ॥२०॥कार करि श्याम सुर-
तिया हम दिन रैन ।। रोय रोय मन मारै छिनहुँ न चैन ।॥२१॥
कोऊ खवरि सुनाइहि असि फिरि हाय ॥ आये मीत पियरवा देखहु
जाया॥२२॥सजनी कस सुधि होइहि उनहि हमासिराजकुँवर वे हमह
नारि गँवारि ॥२३॥ कोऊ कहे सखीरी मुहि दिन रैन ॥ झझक
उठे हिय धरकत परेन चैन ।। २४ ।। रहे जहाँ मोहन तहँ जाय न
जाय ॥ सजनी सो वट छहिया धरि धरि खाय ॥२५॥ लंगत
मशान भवनवाँ परिजन भूत ॥ रिपु समान दरशा पितु पति पूत ।।
॥२६॥ जबसे श्याम सजनवाँ विछुरे हाय ।। तबसे आपनि देहिया
मुहि न सुहाय ।। २७ ।। विछुरत प्रीतम छतिया फाटिन मोरि ॥
अव छिन छिनहि करेजवा रठत मरोरि ॥२८॥ वृद्धि मरे वरु हेली
समुद मझार । विरह कलेश न डार कहुँ करतार ॥ २९॥ लाय
भसम वरु देहिया वसे पहार ॥ प्रीतम के विछुरनिया होय न पार ।।
॥३०॥ दुख चाहे सो विधिनादे भरपूर ॥पे अँखियन ते मितवहि
करे न दूर ॥ ३३ ॥ प्रीतम माथ सहेली बनहुँ मुद्दाय ॥
रन चिन मून सदनवां विपिन लखाय ॥ ३२ ॥ बोली एक
मुनारी सपना मोर ॥ रखे आज जनु आये राजकिशोर ॥३३॥

(१९८) रामरसायन। वोली इक कुवना पर बैठो काग ॥ कहु साँची यह दैहौं तुहि बलि- भाग ॥ ३४ ॥ काग कनकके पिंजरा राखौं तोहि ॥ जुपै सगुन यह साँचो तेरो होहि ॥३५॥ जस हमारहैं जियरा उन महँ लाग ॥ तस मित उकर वैहै कहुरे काग ॥३६॥ कोऊ कहैं सखि बृझिय गणक बुलाय॥ किते दिवस महँ ऐहैं अब रघुराय॥३७॥ वामनन द्वै- दिनसे फरकत मोर ॥ आय काग शुभ वोलिया बोलत भोर ॥३८॥ सखिरी नीक सगुनवाँ अव नित होहि ॥ जानि परै अस प्रतिम मि लिह मोहि ॥ ३९ ॥ इहि विधि निशि दिन सब तिय सुमिरहिं श्या- म॥ अवधि आश मग निरखें सिगरी वाम ॥४०॥ प्र०॥ तुलसीकृत रामायणे अयोध्याकांडे । चौ०-सीता लपण सहित रघुराई ग्रामनिकट जब निसरहजाई।। सुनि सब वाल वृद्ध नर नारी चलहिं तुरत गृह काज विसारी ॥ नारि सनेह विकल सब होही चकई सांझ समै जनु छोही॥ १॥ इत्यादि । इति श्री० रा० र० वि० वि० ग्रामवधूनेहकथन- वर्णनो नाम चतुर्थोविभागः ॥ ४ ॥ दोहा-उत इहि विधि मगवासिनी, हिय सुमिरे नित श्याम ।। छिन छिन तिनको प्रीति इत, सदा सराहत राम ॥ १ ॥ लिया लपण रघुवर मुदित, पहुँचे जाय प्रयाग। मजन करि बहु मुनिनतें, मिले सहित अनुराग ॥२॥ भरद्वाज ऋपि दशलहि, भये परम आनंद ।। तहैं । चलि न्दाये तिह, कालिंदी मुखकंद ॥३॥ दोउ. पंधु पुनीत मृग, लाये खोलि अहेर ।। विधि कृत्य युत अशन करि, नाले मुदित तिपेर ॥ ४ ॥ पान्माप पापामग॥ ५५ ॥र। मोगमा ततो गवामान गमलक्ष्मणा ।। नहन्मध्यान्मगान्दवा ननुयंमनापन ।। । । -गरमीकि आश्रमानिनि, लंदी परम आनंद ।। आपभोगनासो भनिदिमिया सपानंद ॥८॥ - वाल्मीकि लखि मुदित है, तिहुँ शुभ आशिप दीन । यथा उचित सत्कार बहु, प्रीत सहित मुनि कीन॥६॥ पुनि कर जोरि निहारिकै, मुनिसन बुझी राम ॥ नाथ रजायसु दीजिये, वास करौं किहि ठाम ॥७॥ वाल्मीकि मुनि मुदित है, बोले मंजुल बैन । राम तिहारे वासु हित, अमित अनुपम ऐन ॥८॥ घनाक्षरी कवित्त । मनमें मुनीनके कवीनके सुबैननमें नेहिनके नैननमें प्रानमें पुरा रीके । अवधनिवासिनके मिथिलाविलासिनके परम उपासिनके स- त्यव्रत धारीके।।ज्ञानी गुणवंतनके सज्जन अनंतनके साँचे शुचि संत नके परउपकारीके । राम अभिराम सीता लपण समेत सदा हृदय निवास करौ रसिकविहारीके ॥ ९॥ सकल सुपास पास वास मुनि मंडलीको लायक विलास थलदायक हुलासको । कंद मूल सरस अतूल फल फूल मृग सरिता विशाल गिरि विपिन विकासको ।। रसिकविहारी सो निहारी छवि भारी ताहि भावना अनूप रूप अमर निवासको । चित्रकूट विशद विचित्र है पवित्र तहां ठाम अभिराम राम रावरे निवासको ॥१०॥ चौ सुनि वरवैन मुनिहि शिरनाईक चले बंधु सिय युत रघुराई ।। आये चित्रकूट छवि हेरी मुदित फिरे गिरिवर चहुँ फेरी 19 पुनिदै परणकुटी वर भारी * लपण लाल निज हाथ सवारी॥ सो लखि राम कही हुलसाई 8 शाल प्रतिष्ठा उचित सदाई १२ सो सुनि लपण कृष्ण मृगलाई क विधि युत पल साकल्य बनाई। तब रघुवर जपि मंत्र प्रमाना कीनो हवन समेत विधाना १३ प्र. वा० ज० फां• स० ५६ ॥ श्लोक। ऐणयमांसमाहृत्य शालां यक्ष्यामहे वयम् । कर्तव्यं वास्तुशमनं सौमित्रे चिरजीविभिः॥२॥भ्रातुर्वचनमाज्ञायलक्ष्मणः परवीरहा । चकार च यथोक्तं हि तं रामः पुनरत्रवीत् ॥ ३॥ अयं सर्वसमस्तांगः श्रितः कृष्णमृगो मया। देवता देवसंकाश यजस्व कुशलो ह्यसि ।। ॥ ४ ॥ बभूव च मनोहादो रामस्यामिततेजसः । वैश्वदेववलि कृत्वा गैद्रं वैष्णवमेव च ॥५॥ इत्यादि।

(२००) रामरसायन। ची० इमि विधियुत करिशालप्रतिष्ठा दशरथसुत रघुवर धरमिष्टा ।। येक कुटी मधि सिय रघुवीरा इकमह रहे लपणरणधीरा १४॥ राम आगमन सुनि सब धाये ॐ मुनि मुनितिय लखि हिय हुलसाये इहिविधि चित्रकूट मधिरामा कियो वास लखि थल अभिरामा १५ सेवा करें लपण चित लाई सुखी परस्पर प्रीति सदाई।। वसे राम लछमन वन जवते * निर्भयभये देव मुनितवते १६॥ दोहा-चित्रकूटवासी सकल, जेते जड चैतन्य । तिन सराहि सुर कहत हैं, धन्य धन्य ये धन्य ॥१७॥ इति श्री० रा० र०व० वि० चित्रकूटनिवास वर्णनो नाम पंचमोविभागः॥५॥ दो०-चित्रकूट उत राम सिय, लखि सब भये निहाल । इत कौशलपुर शोक वश, विलपत सकल विहाल॥ १॥ अवधनिवासी नारि नर, निशिदिन करत विलाप । राम लपण सियके विरह, सबके उर संताप ॥२॥ कहत परस्पर वैन सब, विरह विवश बहु दीन । . हाय लपण सिय राम हम, काहे संग न लीन ॥३॥ घनाक्षरी कवित्त । सोचत हिये में सबै रसिकविहारी यहै काननमें येते दिन कैसे वे विताय हैं। संग सुकुमारी तिय देखि मृगराजको अतिही सशंक है कै जिय विलखाय हैं। कंटक समेत बाट चलि हैं उघारे पाय ताहू पै विरस कंद मूल फल खायहैं । जो सुमन सेज पैरहत दिन निहुते तेई सिय राम अब साथरी विछायहैं ॥४॥ दोहा-इहि विधि कोशल नगरमें, छायो चहुँ संताप ।। जड चैतन सब करत अति, राम विहीन विलाप ॥५॥ अवधनगर चहुँ ओर महि, लगत भयावन घोर ।। जित तित विलपत नारि नर, हाय राम करिशोर ॥६॥ लाजशोक वश सचिव पुर, आये नि निहारि ।। धाये चहुँ दिशि ते विकल, स्थ विलोकि नर नारि ॥ ७ ॥ , .

रामरसायन। (२०१) लखि स्यंदन सूनो सबै, गिर धरणि करि हाय ॥ सचिव वेगि नृप सदनमें, जाय गहे प्रभु पाँय ॥ ८॥ दशरथ निरखि सुमंतको अतिही उठे उताल । बृझे गदगद कंठ कित, सिया लपण रघुलाल ।।९।। सुनि सुमंत बहु विकल है, कहे वैन बिलपाय ॥ लपण सीय संयुत वनहि, गये राय रघुराय ॥१०॥ निज विनती उत्तर तिहूँ, गुह मिलि उतरन गंग ॥ सकल यथारथ समय सम, वरणो सचिव प्रसंग ॥११॥ राम लपण सिय वन गमन, जब दृढ सुनो नरेश ।। गिरे भूमि मूर्छित विकल, वाढो विपुल कलेश ।। १२ ।। चौ०-हाय राम सिय लपण पुकारी रुदन करत नृप आरत भारी ।। सुनि कौशलां आदि बहु रानी धाय आय पति पद लपटानी१३ ताछिन प्रेम विवश महि पाला १ कहे कौशलहि वचन विहाला॥ दीनी तापस अंध जु शापा सोफल मोहिं सत्य अव व्यापा१४॥ ही अहेरहित गैनि मझारी सरयू तीर हुतो पदचारी ॥ ताछिन इक तापस सुत आयो, कुंभ नीर पूरण चित लायो१५॥ जल पूरत घट शब्द सुनो में करि केहरि ध्रुव हीय गुनो मैं॥ शब्द वेध करि शर तिहि मारा गिरोधरणि सो विकल पुकारा१६॥ मानुप गिरा सुनत' ही धायो जाय निकट गहि वेगि उठायो। लखि तापस मुत वचन उचारा की विन अपराधमोहि किमिमारा१७ मो पितु मातु दुहूँ दृगहीना * बसत सदा कानन तप लीना॥ तिन हित नीर भरन में आयो की वृथा नृपति मो प्राण नशायो१८॥ तब ही कहे वचन अति दीना विन जाने यह पातक कीना।। यौं कहि तिहि तनुतेशर काढो तिजो प्राण सो दुख लहि गाड़ो१९ ही तिहि निरखि महादुख छायोले पूरित घट वेगि सिधायो। जाय नीर धार सब गति वरनी मुनतहिं गिरे रुदित दुहुँ धरनी२० दोवई छंद। पुनि दुहुँ विलपत कही मोहिं द्रुत लेचल सुतके पासा । हो तिन कंघ राखि तह लायो अतिहीं दुखित हिराशा।

(२०२) रामरसायन। ENLI -- । दुहुँ पितुमातु पुत्र कर परसो वरदे शुभ गति कीनी । पुनि रचि चिता वैठि तिहि उपर घोर शाप मुहि दीनी॥२१॥ कही दुहूँ ज्यों हम तनु त्याग पुत्र दुखित इहि काला। त्योंही मुत वियोग वश तेरो मरन होय महिपाला ॥ दै इमि शाप दुह तनु जारो देवलोक सो पायो। भई सिद्धि सो शाप राम बिन मृत्युसमैं अब आयो ॥२२॥ प्र०॥ वा० ॥ अ० का०स०॥ १४॥ श्लोक। पुत्रव्यसनजं दुःखं यदेतन्मम साम्प्रतम् ॥ एवं त्वं पुत्रशोकेन राजन्कालं करिप्यसि ॥ १ ॥ इत्यादि ॥ चौ०-यौं कहि भूपति अति अकुलाई वोले दीन नेह उरछाई ॥ राम मात मम उर कर धारो लखि न परत मुहि वदन निहारो२३|| अंतसमै अब मो मुख देखो * हाय न मैं टुक तुव मुख पेखो ॥ रघुवर दरश हेतु सब रानी तनु रखियो मम आयसुमानी२४॥ यौं कहि नृपति विकल है भारी हाय राम सिय लपण पुकारी॥ रुदन करत आरत रखघोरा आये धाय सकल सुनि शोरा२५ ॥ गुरु द्विज सचिव विविध पुरवासी सेवक सखा दासअरु दासी । . सब निजमति अनुसार वुझाई 8 कहि सुगाथ बहुधीर धराई ॥२६॥ अवध नाथ कछु उतर न देहीं * हाय राम कहि हिलकिन लेहीं । लखि नरेशगति विलपति रानी *यौंही निशि द्वैयाम विहानी॥२७॥ ताछिन दशरथ नृप अकुलाई * उठे विकल चितवत चहुँधाई ।। नैननते रंचहु कछु सूझै विहवल बिलपि विलपिवहु बुझे॥२८॥ कहाँ राम लछमन वैदेही % हाय कहाँ सुत परम सनेही ।। यौं कहि धरणी गिरे विहाला प्राण कंठगत भये नृपाला॥२९॥ दोहा-हाय प्राणप्यारे सुवन, हा मम प्राण अधार ॥. पुत्र वधू हालाडिली, हाय लपण सुकुमार ॥३०॥ कहाँलपण सीता. कहाँ, कहाँ राम रघुचंद ॥ यौं कहि दशरथ तन तजो, लहो परम आनंद ॥३॥ -- रामरसायन। (२०३) चौ०-भूपतिमरन देखि सवरानी घोर शोर करि आति बिलपानी।। गारी सकल कैकयिहि देही कहें लियो जिय पापिनी येही ३२ सकल नारि नर करत पुकारा रुदन छयो चहुँ नगर मँझारा॥ यौं विलपत सवरैनि सिरानी समुझायो बहु गुरु वरज्ञानी ॥३३॥ नृप तनु हेत जतनकार भारी सो धार राखो तेल मँझारी ।। पुनि वसिष्ट वर दूत वुलाये जाहु भरत ढिग वेगि सिखाये ३४॥ जनि भरतहि कछु हालसुनयो मम आज्ञा कहि वेगहि लैयो। यौं सिख दें हृत दूत पठाये अति उताल सो चरवर धाये३५ उतै निमधि होत सवारो स्वप्न अशुभ अति भरत निहारो ॥ उठिनृपसुवन सोच बहु कीनोभूरि दान विधि संयुत दीनो॥३६॥ ताछिन दूत भरत ढिंग आये दै पत्री गुरु बचन सुनाये ।। सुनि दुहुँबंधु अधिक अकुलाई चले वेगि मिलि बिदाकराई ३७॥ आये अवध लगो भयकारी निरखि बंधु दुहुँ भये दुखारी॥ वेगि जाय जननी पग लागे चूझे राम पितहि अनुरागे ॥ ३८॥ कैकेयी सुत अंक लगाई निज करणी सब मुदित सुनाई। मुनत भरत रिपुहन दुहुँ भाई गिरे भूमि मूर्छित विलपाई ॥३९॥ दोहा-हा कुमात हा मात वर, हाय भ्रात हा तात ॥ बहु विलाप करि बंधु दुहुँ, सोक विकल विललात ।। 2 ।। चा-याविलपत दुहुँ राजकुमारा कहि कुमात कटु वचनअपारा॥ ताही छिन सो परी दिखाई किये शृंगार चित्त हरपाई॥११॥ पनाक्षरी-यवित्त। दासी कैकयी की मति नामी मंथरा जो ताहि शत्रुहन देखी भई रंचह नवरी। धाय वर जोरी केश धरि झकझोरी गहि रसना भरोरी कहि दीनी सीख सूररी ॥ फारे त्यों कपोल दंतझारे दलिडार अंग भाप रोप धारे मात मंत्री तु अन्वरी । कृवर सुटो शीश फूटापन प्राण छूटो ऐसी मारिलातन लथोरी डाग कृषी।। १२॥ दोहा-करत हाय पिटलाय मो, प्राण कंटगत आय ।। तिय अवध्य लखि भरत तिहि, दीनी बेगिहडाय ॥ 2३|| (२०४) गमरसायना तह ते दिलपत बंधु दुहुँ, गम मात ढिग जाय ।। धाय गहे पद कौशला, निरखि लिये उर लाय ॥ १४ ॥ जननी सुत दुहुँ परस्पर, प्रेम शोक वश होय ॥ करत विलाप विहाल बहु, धीरज धरे न कोय ।। १५ ॥ सकल मातु तव सुतनको, समुझाये हिय लाय ।। कछुक धीर धरि के भरत, कही सत्य सकुचाय ।। ४६॥ घनाक्षरी-कवित्त। गाय द्विजमारे तिय वालक सँहारे गुरु स्वामी अपचारे झूठ वचन उचारेते । माता सुता भगिनी कुदृष्टिते निहारे मित्र दोह उर धारेशर- णागत निकारते ॥ सत्य प्रण टारे निज धरम निवारे निंदा पिशुन प्रचारे परनारी धन हारेते । होवै पाप भारे मोहि लांग मातु सारेराम बनहि सिधारे जोप संमत हमारे ते ॥४७॥ चौ-सुनत शपथ जननी हिय लाये कहि मृदुवचन भरत समुझाये पुनि करि सौंह कौशलाबोली. मुहि प्रतीति तुवमति नहिंडोली४८ भरत आगमन सुनि सब धाये है गुरु मंत्री पुर परिजन आये ॥ दुहुँ बंधुन बहु विधि समुझाये भूप क्रिया हित साज सजाये४९ पुर पूरव सरयू तट जाई मृत्युक्रिया सब करी तहाँई ॥ सब कृत हित प्राचीन मुठामा जहँ शिवधाम बिल्व हरि नामा५० उचित कर्म पुनि सहित विधानाकीने भरत अमित विधि नाना।। भये पुनीत वेद कुल माने तब ज्ञातीन सकल सनमाने९१॥ दोहा-लोक वेद कुल रीतिमय, जिमि गुरु आयसुदीन ॥ भरत उदार सप्रीति तिमि, तात कर्म सब कीन ॥५२॥ इति श्री. रा०र०व० वि० राजादशरथदेहत्याग- वर्णनो नाम पष्ठोविभागः ॥ ६ ॥ दोहा-नृपति कर्म ते सुचित लखि, सब मिलि कियो विचार ॥ राजतिलक अब.भरतको, कीजे समय निहार ॥ १ ॥ चौ गुणि गुरु सचिव सुजन बहु आये सभामाहि दुहुँ बंधु बुलाये॥ सबकथासकल अभिलापी राजतिलक हित भरतहि भापी२ रामरसायन। (२०५) मा सुनि वर वचन भरत शिर नाई गुरुहि जोरि कर विनय सुनाई। 'मो रुचि यह प्रभु सहित समाजा चलीराम दरशनके काजा ॥३॥ पद परि निज अपराध क्षमाई सिया सहित आनौं दुहुँ भाई ॥ पुनि रघुवरहि तिलक प्रभु कीजे वेगिनाथ यह आयसुदीजे॥४॥ पुनि इक औरह मो रुचि नाथा ६ तिलक साज लीजे सब साथा॥ है अभिपेक उतहिं पुनि आ सहित राज श्री बहु छवि छा३॥ भरत वचन सुनि सब हुलसाने धन्य धन्य करि अमितवखाने॥ प्रमुदित है गुरु आयसुदीनी तिलकसौजसारी संग लीनी॥६॥ दोहा-देश कोश गृह धर्मको, उचित प्रबंध सुठान ।। वहुरि चित्रकूट हि भरत, कीनो वेगि पयान ।। ७ ।। पुर परिजन सेवक सखा, गुरु मंत्री सव मात ॥ भरत संग गवने सकल, चित्रकूट कह जात ॥८॥ ची -नृपसुत सदल गंगतद आये सुनि गुहसैन साजि उठिधाये॥ जानो भरत राजमदछाये समर करन हित वेगि सिधाय९॥ आय निपाद भरत गति देखी हृदय भयो आनंद विशखी ॥ करि सतकार उतारे पारा चलो संगले सुभट अपारा१०॥ पहुँचे भरत प्रयाग नहाये पुनि मुनि भरद्वाज ढिग आये|| उचित प्रणाम ऋपिहि सब कीने मिले परस्पर आदर दीने ॥११ पुनि मुनि करी सकल पहुनाई सो अनूप अति वरणि न जाई।। एक भरत विन मब नरनारी ऋपिसतकार लहो सुख भारी १२ प्रात होत मुनिपद शिरनाई चले भरत रिपुहन दुहुँ भाई ॥ अवध विहाय रठे जव होते ? नृप सुत राम रटत तवहीते १३ मारग दिन पदवान सिधव ही मोलखि गुरु जननी समुझाव।। तिन रजाय यश बैटे स्पंदन चलि कद पुनि उतर नृपनंदन१४ फवहूँ राम विरह संतापा क. वटि पंथ बहु करत पिलापा ॥ कबहुँ भूमि परि करहि प्रणामा टेग्त कबहुँ हाय लियामा १२ कंद मूल पल पहिं अहान, भात त्यागि दीनो मुवनाग । मलिन वसन तनु चीन दुखारीक लोटविविकल मकर नानानद

रामरसायन ।
भरत प्रीति निरखी सुरराई वोले गुरुहि हृदय अकुलाई ॥
जो रघुवर फिरि अवध सिधारे वनेकाज पुनि बिगरै सारे॥१७॥
मुनि गुरु कही सोच जनि करहू 8 राम प्रतीत प्रीति उर धरह ॥
जो रघुवर भरोस दृढ राखें र तिनकी सब पूर्जे अभिला १८॥
सुनि गुरु बचन अमर हरपाने * देवराज आनंद अघाने ॥
इत आतुर अति भरत सिधाये वेगहि चित्रकूट नियराये १९॥
ताही निशि सिय स्वप्ननिहारो आयो अवधनगर जनु सारो॥
दुहुँ नृपतनय सकल महरानी देखी मलिन शोक दुखसानी२०
उठि अकुलाय कहो सब रामैं 8 मुनि दुहुँ बंधु भये करुणामैं ॥
पुनि रघुवर उताल नितकर्मा किय सिय बंधु सहित निजधर्मा२१
ताछिन गगन धूरि बहु छाई 8 लखि बंधुहिं बोले रघुराई ॥
तरु चढि लछमन वेगि निहारौ कहा हेतु सो समुझि उचारी२२
देखी लपण शाल चढि जानी पहिचानी सब अवध निसानी॥
धाये भरत लग्न अनुमाने आय लपण द्रुत गहिधनुवाने २३
रामहि कही रोप हिय लाई 8 आवत भरत साथ कटकाई ।
सुनि रघुनाथ बंधु समुझाये भरत शील गुण सकल सुनाये२४
तौ लग बहु वनचर नर आये रामहि भरत चरित्र सुनाये ॥
बंधु आगमन सुनी रघुबीरा हर्प शोकवश धरै न धीरा॥२५॥
उत लखि चित्रकूट अभिरामा भरत भूमि परि कियो प्रणामा।
परण कुटी दूरहि ते देखी छाई हृदय गलानि विशेखी२६
समय निहारि धीर उरधारी चले बेगि दुहुँ बंधु दुखारी ॥
आये परण कुटी ढिग धायक निरखि रामपद परि बिलपाये२७
उठि रघुवीर बंधु दुहुँ भेटेर कहि वर वचन सोच बहु मेटे
पुनिनृपसुतकियसियहि प्रणामा मिले लपण धनु शरकर वामा२८
ता लग सकल लोग तहँ आये ॐ निरखि राम लोचन जलछाये।
दुहूँ बंधु गुरु सिय पद परसे सचिवसखा सेवक हित सरसे२९
दोहा-यथा रचित सन्मानि सब, राम लपण अरु सीय ।।
सफल महारानानके, चरण गहे लगि होय ॥३०॥

रामरसायन । मातु सुमित्रा कौशला, विलपति करि करि प्यार ॥ राम लपण सियको हृदय, लाय लाय बहु बार ॥३१॥ यौं सिय रघुवर लपण मिलि, हरपो सकल समाज ॥ पिता कुशल बूझी गुरुहि, द्रुत सप्रेम रघुराज ॥३२॥ सुनि वसिष्ट जल नैन भरि, बोले हिय बिलपाय ॥ तुव वियोग तजि अवध नृप, बसे देवपुर जाय॥३३॥ राम लपण सिय गुरु बचन, मुनत गिरे मुरझाय ।। हाय तात हा नाथ कहि, रुदन करत अकुलाय ॥३४॥ सचिव सखा गुरु मात तिहुँ, समुझाये कहि वैन । आये तट मंदाकिनी, न्हाय भरे जल नैन ॥ ३५ ॥ चौ०-अपर क्रिया विधिवत सब कीनी मौनरहे रघुवर दिन तीनी।। चौथे दिवस जुरे सब आई वोले गुरुहि राम सकुचाई ।। ३६॥ कृपासिंधु बन सकल दुखारी जिते अवधवासी नर नारी॥ याते भरत सहित ले साथा * कौशलपुर पधारिये नाथा ॥३०॥ मुनि गुरु कही अमित सब लोगा ॐ पुनि व्याकुल तुव दुसह वियोगा याते कछ दिन रहि रघुराई फिरि सुहोय जो देव रजाई॥३८॥ इहि विधि चित्रकूट सब रहही रामहि लखि आनंद अति लहहीं। सर सरिता गिरि बन चहुँ फेरें राम चरण अंकित थल हेर३९ चित्रकूट मिथिलाधिप आये मिले परस्पर बहु सुख छाये ।। सियलखि हरपशोक अधिकाई कपित जननी गहि हृदय लगाईट. मिथिला अवध प्रजा नर नारी, जुरे भई चहुँ भीर मुभारी ।। चित्रकूट महँ बहु दिन बीते , रहत मकल सानंद सप्रीते ॥४॥ सचिव मखा गुरु सकल समाजाः पुरपरिजन मिथिला महगजा। युत मर्याद दुहूँ रनिवासा वैठी सभा विशद चहुँ पामा॥२२॥ तब वसिष्ट बोले मृदुवानी में नीति सुधर्म मम अनुमानी॥ सरनर व आना अभिलापीराम पदिय सबकी रुचि गरवीर।। तुम पितृ वचन मानि वन आये अब नृप भरत लिबान आये। याते करद मुकाज विचारी जिंदि मुर नर सब होहिं मुम्बा 22 (२०८) रामरसायन। " सुनि वर बचन राम कर जोरे * गुरु पद पंकज वंदि निहोरे॥ रहै मोर जिमि धर्म दयाला * सोई सबहिं उचित इहिकाला४५ दोहा-सुनि रघुवर वाणी कही, भरत जोरि दुहुँ हाथ ॥ अधर्म मम माथ सब, अवध सिधारिय नाथ ॥४६॥ पुनि कर जोरि निहोरि कै, कहौं विनै यह मोरि ॥ प्रभु दिशि ते वन जाउँ मैं, चलिये अवध बहोरि ॥४७॥ येही विनती विविधविधि, करी भरत दुहुँ भाय ।। सचिव सखा नृप मातु सब, अमित कही समुझाय ॥ १८॥ राम सकोची धर्म धर, सोच विवश तिहिकाल । दियो न उत्तर काहु कछु, तब गुरु कही कृपाल ॥४९॥ सुनहु राम नृप भरत सब, रहे जाहि विधि धर्म ॥ निज हठ स्वास्थ लाज तजि, याछिन उचित सुक॥५०॥ मुनि कौशिककै बचन वर, बोले रघुकुल चंद ॥ कहौं शपथ करिकै वचन, सुनौ सकल सानंद ॥५१॥ धर्म नीति ज्ञाता इतै, मिथिला अवध समाज ॥ चित्रकूट शुचि पुण्यथल, जुरी सभासद आज ॥५२॥ गरु द्विज मंत्री मातु नृप, भरत एक मत होय ।।. जो कछु भा सकल मिलि, सत्य क मैं सोय ॥५३॥ राम शपथ सुनि देव सर्व, अकुलाने बहु हीय ॥ सवहि मनाये मनहिमन, प्रेरि शारदा जीय।। ५४॥ . रहे मौन द्वै सकल तव, करि हिय धर्म विचार । बोले भरत प्रवीन पुनि, वचन समै अनुसार ॥ ५५॥ अवधराज मुहि पित दियो, मैं निज दिशिते देत ।। यामें कडू अधर्म नहि, सोऊ नाथ न लेत ॥५६॥ अब हो किमि धीरज धरौं, तुव वियोग रघुराय ॥ होवे जिमि अवलंब मुहि, सो प्रभु देहु रजाय ॥२७॥ तब प्रमुदित है राम निज, चरणपादुका दीन । करि प्रणाम मोप्रीति युत, भरत शीश धरि लीन ।। ५८॥

रामरसायन।
सबहि उचित मिलि प्रेम युत, सिया लपण रघुवीर ॥
विदा किये समुझाय पुनि, हिय धराय बहु धीर ॥१९॥
भरत कही जो अवधिते, येकहु दिन अधिकान ।।
प्रण करि भापौं शपथ युत, तौ न राखि हौं प्रान॥६॥
मधु सित दशमी पुण्य गुरु, दिन अभिजित मध्यान ।।
सिया लपण युत अवधते, कीनो नाथ पयान ॥६॥
प्र० वा. अ. का० स० ३ श्लोक।
चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुप्पितकाननः॥
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम् ॥ १॥
तत्रय पुनः स. ॥ ४ ॥
श्वएव पुप्यो भविता सोभिपेच्यस्तु मे सुतः॥
रामो राजीवपवाक्षो युवराज इति प्रभुः॥२॥
पुनः मुन्दरामायणे अयोध्याकांडे ।
मधुशुकदशम्यां च मध्याह्ने गुरुवासरे ।।
मेपांशी द्वीनते भानी रामो गच्छति काननम् ॥३॥ इत्यादि.
दोहा-तादिन बीते अंश जे, मेप भानुके जान ।
ही गनिलहों वर्ष मनु, ध्रुव संक्रांति प्रमान ॥ १२ ॥
गम कहो तव जिहि दिवस, चौदह वर्ष करार ।।
पूज तिहिदिन देखियो, ध्रुव मुहि अवध मझार ॥६३ ॥
भ्रात वचन हह सुनि भरत, चले अवध शिरनाय ।।
दुहुँ समाज संयुत मकल, पुर परिजन समुदाय ॥ ६ ॥
चित्रकूट महिमा अमित, भरत मगहत जात ॥
रघुवर पद अंकित सुथल, ध्यावत दिय दुलमात ॥ ॥ ६॥
हर्प शोक वश नापिनर, छिन मुख छिन दुख पाय ॥
जनक भरत संयुन सकट, पहुँच अवधहि आय ॥६६॥
कक दृनि पुन वाहिन, नंदिग्राम अभिगमः ।।
वरविचार का भात तह रहे निन्ति शुचिटाम ॥ ६॥
गमपादुका शुन समय. निदान पयगय ।।
भरत फियो मनिभेपनिजाममुखमाज विहाय ॥१८॥

...) गमायना " द्वादश दिन तितही रहो, मिथिला अवध समाज || पुनि बहु गुरुहि अभार दे, गये जनक महराज ।। ६९॥ जी लग रहे विदेह नृप, गनी सहित प्रवीन । ती लग कमलानीर तजि, अशन पान नहिं कीन ॥७॥ पुर परिजन इत अवधर्म, लियो सत्यव्रत ठान ॥ राम दरश विन भोग सुख, सकल तजे दुखमान ॥७१ ॥ भरत महल रनिवास सब, भेजो रिपुहन संग ॥ गुरु सचिवहि सौंपे उचित, काज बखानि प्रसंग ॥७२॥ यथायोग इहिविधि भरत, कीनी सकल सम्हार ॥ राम पाँवरी निकट सब, राजसाज अधिकार ॥ ७३॥ पूजत भरत सुपादुका, करत निवेदित काम। फल अहार मुनि बेपनित, निशिदिन सुमिरत राम ॥ ७॥ देश कोश सेवक प्रजा, न्याय धर्म सव काज । सुनत गुनत निरखत सदा, भरत सुपालत राज ॥ ७ ॥ महि मंडल चहुँ ओर सब, प्रमुदित प्रजा सुकाल || नीत धर्म लखि कहत जन, जै जै अवध भुवाल ॥ ७६ ॥ घनाक्षरी कवित्त। दूजो गुरु ज्ञाताना वसिष्ट वामदेव ऐसो सचिव सुमंत सम स्वामि सुखदाताना ॥ दशरथ राज सो न ताता हढ प्रीति वारो रामसो सुपुत्र है जहान धर्म त्राताना ॥ कौशलामुमित्रासी न माता है विवेकी पुनि सीतासी सुतीय कहूँ पति अनुराताना ।। रसिकविहारी नेहकारी नीतिधारी सत्य काहू और भरत समान और भ्राताना ॥ ७७॥ इति श्री०रा०र०व० वि० राम भरत संवाद- वर्णनो नाम सतमोविभागः ॥ ७ ॥ दोहा-राम राम नित रटत उत, भरत वरणि गुणग्राम ॥ भरत भरत सुमिरत भरत, छिन छिन हग इत राम ॥१॥ - रामरतायत। (२११) चौ-चित्रकूट सिय लपण समेतार्क वसैं राम मुद परण निकेता ।। गिरि कानन नर सरित निहारी विहरत सिय युत अवध विहारीर कबहूँ सुमन लाय रघुराई भूपण वसन विचित्र बनाई। निज करते प्यारिहि पहिरा छबिनिहारि आनंद बढावें ॥३॥ कवहूं फटिक शिलाएर गजें अंगराग करि सियतन साजै ॥ विविधरंग मृदुरज शुचि आनी ॐ सारें तिलक प्रिया रुचि जानी॥४॥ कवहूँ सिय पंकज मृदु लाई * सेज रचें वर विशद सुहाई ॥ तापर प्राण पतिहि बैठारे * निज अंचलते पवन सुढारें ॥५॥ कबहुँक्रीट कुंडल धनुवाना * विरचें सिय प्रसूनमय नाना॥ निज करतेप्रीतमहि सुधा * करि करि प्यार लेहिं बलिहारी ॥६॥ कबहुँलपण कलिका मृदुला * नूपुर अनुपम रुचिर बनावें ।। सोस्वामिनि चरणन पहिरा निरखि राम आनंद अधांवें ॥७॥ कबहुँ सुमनदललछमन लाला र पादुका विमल विशाला || खुवर पदसनेह युत धारें कबहुँ प्रसून विजन सजि ढोरें॥ ८॥ लपणहिदंपतियुत अहलादा देहि सुभूपण वसन प्रसादा॥ इहि विधि तिहुँअपार सुख लहहीं प्रीति परस्पर प्रमुदित रहहीं।॥९॥ कबहुँ गम दिगमुनिगण आ* कबहुँ सुतिनके निकट सिधा ।। काई ऋपितियचरिसियपाही पति रुचिलखिनिजसंग लैजाही१० कबहुँक वनवासी नर नारी के ले फल. मधु मग सौंज सुधारी ॥ आ गम नीय पग परहों देसुभेट विनती वर करहीं ॥ ११॥ इहि विधिलपणनीय रघुवंदाचित्रकूट वसि करत अनंदा।। जिमि रअवधिवपचलिजाही क तिमिर देवअधिक अकुलाही॥१२॥ एक नभ सुम्पति सुत आयो के नाम जयंत कागतनु लायो । मियररहति निजतुंड परानो रघुवर कपट भेष पहिचानो||१३|| लिय हियरुधिर देखि रघुवीरा तापर तजो कुपित तृणतीरा ॥ भाग तिहुँपुर सुगयो सब पासाक न बचोतव होय निरामा १२॥ गम चरण परि शरण पुकारो में तब दयालु निदि प्राण निवारो। एकहग विन करि वायन त्यागो भागोपिन गृह विकल अभागो३५ (२१२) रामरसायन। गये सुधामा एक समै विधि इंद्र विचारी श्री रावण वध सुधि राम बिसारी ।। याते चलि कछु युक्ति रचाई बेगहि चाहिय सुरति कराई१६ यों बिचारि दुहुँ शिव ढिग जाईनिज उरकी अभिलाप सुनाई ॥ सुनि बोले शंकर वर ज्ञानी वृथा दोउ भ्रम वश यह ठानी।। १७॥ राम वेगि दशमुख वध करिहैं * भूमि भार सुर दुख सब हरिहें । कछु न शंक मानौ मन माहीं छल करि जाउ न रघुवर पाही१८ सो सुरपति विधि मन नहिं भाई 8 चले दुहूँ मुनि वेप बनाई। वेगहि चित्रकूट ढिग आये * तहके चरित विलोकि सकाये१९ देखे अमित भालु कपि ठाढे * गहे युद्ध हित गिरि तरु गाढे ॥ पुनि हेरे तहँ विपुल दशानन परे भूमि वेधे तनु पानन ॥ २० ॥ सो विलोकि दुहुँ लंक सिधारे * देखो दशमुख बैठ अखारे ॥ तहँ ते चकित चित्त पुनि आये *चित्रकूट सो चरित लखाये२१॥ तब सशंक बहु विधि इंद्र लखे तिहि ठामा ॥ दोऊ भवनजान नहिं पाये * पुनि है विकल शंभु ढिग आये२२ कही सकल गति अति अकुलाई सुनि पुरारितिन धीर धराई॥ पुनि तिहुँ राघव निकट सिधारे * सो चरित्र नहिं कछू निहारे२३ आये देव देखि रघुनाथा * उठे मिले प्रमुदित गहि हाथा॥ बैंठारे करि बहु सतकारा 8 तब कीनी सुर विनय अपारा ॥२४॥ सुनि बोले रघुवर हरपाई * जाहु भवन निर्भय हुलसाई ।। वेगि करों अब निश्वर नासा राखो सत्य मोर विश्वासा ।। २६॥ राम वचन सुनि सुर हरपाये को मिले उचित तिहुँ सदन सिधाये॥ विधि वासव लखि चरित अपारा पायो भेद न अमित विचारा२६ इहि विधि द्वादश वर्ष विताये चित्रकूट नित नव सुख छाये ॥ पुनि रघुवर वर इच्छाचारी तह ते गमन हेतु चितधारी२७ ॥ प्र० ॥ अनिवघ्यरामापणे ॥ शोक । गमः पंचदशे वर्षे पझ्वामपि मैथिलीम् ।। उपयमे त्वयोध्याय द्वादशादानवानमः ॥१॥सप्तविंशतिमे वर्ष वनवासमकल्पयन अष्टादश न पाणि नीतायान्तु तदा भवन् ॥२॥ विराजमुदया रामरसायन। (२१३) हारश्चतुथेति फलाशनः ॥ पंचमे चित्रकूटे तु रामो वासमकारयत ॥३॥ अथ त्रयोदशे वर्षे पंचवट्यां महामना । रामो विरूपयामास घोरां शूर्पणखां वने ॥ ४॥ इत्यादि । चौ० राम चलत सुनिमुनि गण आये मिलें यथोचित प्रेम वढाये। ऋपिपनी सियनिकट सिधारी सादर शीशनाय वैठारी ॥२८॥ मुनि तिय कही सियहि हुलसाई धन्य जानकी पिय सुखदाई ।। धन्य पतिव्रत धर्म सदाही जिदि विधि हार हर सकल डराही२९॥ अनसुइयापतिव्रतवलपाई * कह त्रिदेव गति प्रगट दिखाई ॥ सिय वृझो सो बात लजाई ऋपि तिय कही कळू मुसक्याई३० दोबई उंद । एक समै मिलि उमा रमा अरु धात्री तीनहुँ नारी। लखि रहस्य सुर गंगतीर थल भूपण वसन उतारी ॥ मजन करत हुती तहँ प्रमुदित ताछिन नारद आये। तिनहि विलोकि लजाय अधिक तिहुँ तिय निज अंग छिपाये३३॥ मो विलोकि मुनि रिस करि बोले क्यों तुम मोहि न जानी।। भई चहतिही जनु अनसुइया सम पतिव्रता जानी॥ यो कहि गमन कियो ऋपि तहँ ते पुनि यो तिहुँ टहराई। पतित्रत भंग अधि तियको जिमि होय सुरचिय उपाई ॥३२॥ करि विचार निज निज गृह गवनी तिहूँ मान बहु ठानो। विधि हरिहरहि रोप तियको लखि मकल अनंद भुलानो ।। अमित वार वृझी तब बोली और कष्ट नहिं भा। अनसुइयाको पतिव्रत खंड तो हम निज तनु राखें ॥३३॥ तिहूँ नारि निज निज पति मो इमि वचन कहे बिलखाई । ग्मा उमा ब्रह्मानी बहु विधि हरि हर विधि समुझाई ।। नहिं मानी तब देव मोच यश इक इक पान सिधारे । काह गति कोउ. ना जाने चले जतन निरधारे ।।३।। भई भट तिहुँ बीच पंधमें तिहुँ मशोक तिहुँ देखे । गक्ति कष्ट कहिं नक, न काही बदन पन्या परे ।

'(२१४) रामरसायन। पुनि धरि धीर तिहूँ तिहुँ बूझी तिहूँ, तिहूँ प्रति वरनी॥ तिहूँ हीय भो दुखी और सुनि तिहूँ ठौर इक करनी ॥ ३५ ॥ तिहूँ देव है विवश मंत्र करि यही बात ठहराई। पतित्रत भंग कीजिये तियको कछु छलछंद बनाई। यौं विचारि निज निज गृह वेग जाय सुधीर धराई। चले उताल बहुरि तिहि मारग मिले बीच पुनि आई ॥ ३६॥ तहां विष्णु विधि शंभु मनुजद्वै अतिथि भेप तिहुँ धारे ॥ सिकताकन लैलये कमंडलु गये अत्रिके द्वारे ॥ ताछिन मुनि नहि रहे भवनमें अनसुइया लखि आई। करि प्रणाम लैजाय सबन फल धरे सामुहें लाई ॥३७ ।। सो लखि सकल अतिथि यों. बोले और न अशन कराहीं॥ ये हम सिक्ताकन लै आये पक्व होय तो खांहीं ॥ पैजिहि विधि भा ताही विधि करौ सुभोजन करिहैं ।। नतरु क्षुधित तिहुँ अत्रि भवनतें निज निज मारग धरि हैं ॥ ३८॥ अत्रितिया सुनि वचन मुनिनके भई सोचवश भारी ।। पक्क होय किहि विधि सिक्ताकन इन नहिं बात बिचारी॥ अतिथि क्षुधित जो जॉय द्वारते तो गृहधर्म नशावै । इहि विधि करहिं अनेक जल्पना हिय न कळू ठहरावै ॥ ३९ ॥ पुनि पतिव्रता नारि विचारी जुपै धर्म हौं साँची। तौपै पक होइगी सिकता रंचरहैं नहिं काची। है प्रमुदित बोली अनसुइया अतिथि कहा कन दीजे । जिहि विधि कही पक्क करि आनो रुचिमय भोजन कीजे ॥ ४० ॥ सुनि तिहुँ कही अनल जलबिन कन करमें पक्क बनायो । बहुरि नम ह निलज हाथ निज भोजन हमें करावो । तब बोली सो अतिथि न भापौ महा असंभववानी । तव सुकर्म मम धर्म रहे जिमि देहु रजायसुज्ञानी ॥27॥ पुनि सो तजि तिन और न भापी तव निज हीच विचारी। अतिथि नहीं ये छली कोर हैं. यो गुनिक मुनि नारी।

रामरसायन।
(२१५)
पति पद सुमिरि ध्यान शुचि कीनो सकल चरित दरशाये।
जानी विधि हरि शंभु पतिव्रत भंगकरन मम आये ॥४२॥
तब सुधर्मचारी वर नारी सकल शीश कर फेरे ।
भये अयान वालवपु तीनी लै सुपालने गरे ।
पुनि लै नग्न लिये कन अंजलि अनसुइया यों बोली ॥
पक्क होय तो यह सिक्ता जो हो पतिधर्म नडोली ।। ४३॥
कहतहि भये पक सिक्ताकन मृदु शुचि शुभ्र सुहाये।
सो निज करते तिहूँ शिशुन मुख दै भोजन करवाये ॥
पुनि पट धारि झुलावन लागी ताछिन मुनि गृह आये।
लखि बूझी बालक ये किहिके तिय सब चरित सुनाये ॥४४॥
मगन भये ऋपि देवचरित लखि मनहीं मन मुसक्याने ।।
योही शंभु विरंचि विष्णुको वासर सात सिराने ।
उमा विधात्री रमा उतै तिहुँ सोच विवश अकुलानी।
पुनि नारद कैलास पधारे त्रिकालज्ञ वर ज्ञानी ॥४५॥
बोले हँसि मुनीश गिरिजासें लखौ देवतिहुँ जाई ।
पतिव्रता अनसुइया निजगृह राखे बाल वनाई।।
सुनि है विकल शिवा उठिधाई धात्रिहि सुगति सुनाई ।।
दोऊ तिय अकुलाय कही सब सिंधुसुता ढिग आई ॥४६॥
सोच सकोच विवस तिहुँ वनिता है जिय निपट हिरासा॥
भूर गरूर दूरधरि गमनी अत्रितियाके पासा ॥
आय लजाय धाय ऋपितियके पाँय परी अकुलाई ॥
अनमुइया करि प्यार वधू सम गहि निज हृदय लगाई ॥१७॥
पुनि तिहुँ बालन शीश धरोकर लहे शद्ध निजरूपा ।।
न्दिाक्रिये सवही तिय संयुत कहि वर वचन अनूपा ।।
निज निज धाम गये हरि हर विवि कहे परस्पर माही ।।
कोऊ.अनसुइयासम तिहुँ पुर घर पतिव्रता नाहीं ॥१८॥
दोहा-इहिविधि अनसुइया कथा, ऋपितिय सियहि सुनाय।
मिली परस्पर प्रेमभरि गई गह सुखपाय ॥ १९॥

रामरसायन। सुनि.अनसुइया दरश की, सियहि भई अति चाह ॥ प्रातपयान विचारि उर, छिन छिन होत उछाह ॥ २०॥ इति श्री० रा० २० व० वि० चित्रकूट चरित्र वर्णनो नाम द्वितीयोविभागः ॥२॥ दोहा-प्रात होत सिय लपण युत, चित्रकूटते राम ॥ आये परमानंद चलि, अत्रिमुनीके धाम ॥१॥ धाय गहे तिहुँ मुनि चरण, ऋपि उठि अंक लगाय ।। यथा उचित सतकार युत, विनयकरी सतभाय ॥२॥ बहुरि राम सिय लपण तिहुँ, धरि ऋपितिय पद माथ। कही मात तुव दरशलहि, अब हम भये सनाथ ।।३।। अनसुइया उठि तिहुन को, उर लगाययुत प्रेम ॥ आशिपदीनी विशद शुभ, संततरहै सुक्षेम ॥४॥ चौ०-पुनिबहुप्रीति सहित ऋपि नारी लैजानकिहि गोद बैठारी॥ पट भूपण अमोल शुचि दीने * निजकर सियतन भूपित कीने ॥ बहुरि प्यार करि नीति सिखाई * पतिव्रत रीति सकल समुझाई ॥ सोसिख सीय ह्रदै धरिलीनी * ऋपितिय मुदित सुआशिपदीनी६॥ पुनि तिहुँ अशन अनूप कराई * विदाकरी निज हृदय लगाई ।। मुनि मुनि तियहि मुदित शिरनाई * चले सीय संयुत रघुराई॥७॥ अपर मुनिनके आश्रम आये * सबलहि राम दरश सुखपाये ॥ ऋपिगणअमित भांति सनमाने * विनती कार निज निजथलं आने८ तहँ वसि बहुरि गमन तिहुँ कीनो* मिलो विराध पंथ मदभीनो। सो खल धाय सियहि लै अंका चलोशोर करि घोर निशंका९॥ तिहि लखि राम लपण अकुलाने धाय जाय धनु शर संघाने ॥ पाणन मारि विकल करि डारो तव विराध किय कोपअपारो१० लेकर शूल राम पर धावा * दुहूँ बंधु तिहि मारिगिरावा ॥ सोतनु त्यागि शुद्ध वपु पाई ७ गयो देवपुर विनय सुनाई ११॥ नब दुहुँ बंधु भूमिखनिभारी. गर्ति राखि तिहि देह सुधारी ।। सिजगलपण सिय साथाई चले विपिन निरखत रघुनाथा१२ ।

रामरसायन। (२३७) १ मुनि शरभंग ज्ञान गुण छाये रघुवर तिहि आश्रम नगिचाय।। दूरहिते नमपंथ मझारे * स्यंदन हरित तुरंग निहारे १३॥ गुणी राम मुनि दरशनकाजा * मुदित आज आये सुरराजा॥ इमि विचारि कछु विलमत रामा * गये गये जब इन्द्र सुधामा१४॥ राम लपण अरु मुनि शरभंगा मिले परस्पर सहित उमंगा। ऋपि तिहुँ उचित सवहि सनमाने करि बहु विनय अनंद अघाने १९ दोहा-मुनि वोले सियनाथ मैं, जातहुतो सुरधाम ।। तुव आगम सुनि पुनि रहो, अब पूजे सब काम ॥ १६॥ यो कहि ऋपिवर विरचि सर, ताविच वैठि विशोक ! योगानल तनु दाहकरि, गये विष्णुके लोक ॥१७॥ चौ लखि मुनि अपर विनय बहुकीनी । रामभक्ति निजसब कहँदीनी तहते चले हरपि रघुनाथा ऋषिगण लगमुदित मन साथा१८ कछुक दरि चलि रघुवर हेरी ॐ लागी चहूँ अस्थिकी ढेरी॥ करुणाकर बूझी तिन पाही किनके सकल अस्थिये आहीं१९ सुनि मुनि सवहि नेन भारे नीरा # वोले विह्वल बचन अधीरा ॥ ये सब अस्थि ऋपिनके नाथा 3 दले निशाचर जानिअनाथा२० सुनि रघुबर नैनन जल छायोकरि प्रण सत्य मुनीन सुनायो। अभय होहु धरि मम विश्वासाकार ही सकल खलन कर नासा२१ राम सत्य प्रण सुनि मुनि हरपे ताछिन सुमन देवगण बरपे॥ पिगण निज निज आश्रम आये विपिन राम सियलपण सिधाये राम आगमन सुनत सुतीक्षण चले धाय आनंद मगनमन । तनु पुलकत हुलकत हिय भूरी गावत हँसत नवत सुखपूरी२३ दहि विधि आय गहे पदधाई , राम लिये तिन अंक लगाई। पुनि बहु विनय सुतीक्षण ठानी तिहुँ जे निज आश्रम आनी२४ राम अनन्य उपासक चीना : भक्तित्व निज मुनि कह दीना। परमानंद सुतीक्षण सुतीलण पाई बहुरि विनय कर जोरि मुनाई२५ मम गुरु पर कुंभज मुनि नाथा ६ ही निन दरश करी चलि माथा। सुनिले. राम मुनीक्षण मंगा ले चहूँ मन मुदिन अभंगा२६ (२१८) रामरसायन। वेगि अगस्त्य आश्रमहिं आये * चारहु मुनि पद शीश नवाये । ऋपि विलोकि रघुवर उर लाये * आसन दे सप्रेम बैठाये ॥२७॥ तिहुँ आदर करि सहित विधाना पुनिबहु गुणगण किये बखाना।। रामदरशहित बहुमुनिआये लखि निजं सकल सुकृत फल पाये२८ दोहा-पुनि अगस्त्य मुनिसे कही, राम दुहूँ कर जोरि ।। नाथहि विदित समस्त सो, जो कछु.रुचि हैं मोरि ॥२९॥ नाथ रजायसुहोय जहँ, वास करौं तिहि ठाम ॥ जाते सुर मुनि सुखलहैं, सिद्धि होय सब काम ॥ ३० ॥ सुनि कुंभज मुनि विहँसि कै, बोले सहित विचार । ऋषि शापित दंडकविपिन, ताकर करौ उधार ॥३१॥ विमल सरित गोदावरी, पंचवटी शुभठाम ॥ लपण सीय संयुत तहां, वास कीजिये राम ॥३२॥ यौं कहि मुनि रघुवीर को, दियो विशद सारंग ॥ खग अनूपम द्वै रुचिर, पत्री सहित निखंग ॥३३॥ लहि रघुवर प्रमुदित भये, पुनि मुनि पद शिरनाय ॥ . चले बंधु सिय सहित वन, मगमें मिले जटाय ॥३४॥ तिनहि पिता सम पूजि तिहुँ, गोदावरि तट जाय॥ पंचवटी विच परण गृह, विरचिरहे रघुराय॥३५॥ इति श्रीरा० र०व० वि० मुनिसमागमवर्णनो नाम नवमोविभागः ॥९॥ दोहा-सुभग सरित गोदावरी, विमल नीर गंभीर ।। परम सुहावन सुखद नित, अतिपावन दुहुँ तीर ॥ १॥ मंजु कंज विकसित विविध, गिरि कानन अभिराम ॥ प्रफुलित हुमवल्ली अमित, सुथल सदा सुखधाम ॥२॥ तनु परसतं हरंसत हियो, सरंसत त्रिविध समीर ॥ सुख.बरसत दरशत छटा, जहँ.निवसत. रघुवीर ।।३॥.. मृग विहंग बहु रंगके, कानन करत कलोल ॥ कोकिल कीर मयूर चहुँ, वोलतं मधुरे बोल ॥४॥ पहुँ कदली कहुँ सुमन कहुँ, वृदा कहुँ तरु वेलि ॥ - -- रामरसायन। (२१९) लाय रची वर वाटिका, सिय निज कर युत कलि ॥५॥ पंचवटी थल विमल वर, विहरत सीता राम ॥ परम प्रीति संयुत लपण, सेवत हैं वसुयाम ।। ६॥ देव सदाशिव हेत नित, राम करत अभिषेक ॥ सविधि हवन प्रतिदिन सदा, साधत सहित विवेक ॥७॥ म०-वाल्मीकीये आरण्यकांडे ॥सर्ग ॥ १६॥ श्लोक ॥ कृताभिपेकः सर राजरामः सीताद्वितीयः सह लक्ष्मणेन । कृत्वाभिपेकस्त्वगराजपुन्या रुद्रः सनंदिर्भगवानिवेशः।इत्यादि. दोहा-लखि पुनीत मृग बंधु दुहुँ, प्रमुदित करत अहेर ।। दै आमिप बलि पितर सुर, लेत प्रसाद सुफेर ॥ ८॥ कंद मूल फल सरस मधु, मधु मैरेयक शुद्ध ।। अशन पान सिय लपण युत, रघुबर करत प्रबुद्ध ॥२॥ पंचवटी कृत वास इमि, सिय सबंधु रघुनंद ॥ वन विहरत निर्भय सकल, संतत परमानंद ॥ १०॥ दांवईछंद । एक समय रावणकी भगिनी शुर्पणखा तहँ आई। देखि राम वनश्याम रूपकी शोभा सो ललचाई ॥ रघुवर सों बुझी तुम को ही इहां कहां ते आये ।। मुनि सियनाथ सरल चित अपने सबही चरित सुनाये ॥११॥ तब वोली यह तिया तिहारी क्या गी निपट कुरूपा ॥ मो सँग करो विहार विपिन नित ही तुम योग सुरूपा॥ राम कही सुंदर वर गोरो है मम बंधु कुँवारो ।। सो विनतीय दुखारी तिहि मिलि रहो सुजाय निहारो ॥ १२॥ तब आई लछमन छवि देखी है प्रमुदित यों भारखी। रमी छल भलि हम तुम जोरी प्रथमहि विधि रचिराखी॥ लपण कही सुनि सुनौ कामिनी नुम उनहीं दिग जावो । दास पास दासी इत बनिहीं रानी तहाँ कहायो।। १३॥ तते सो रघुवर दिगगमनी तिन तित फेरपटाई। पटुरि लपण भेजी मोरिसकरि धरि कगल वY आई ॥

(२२०) रामरसायन। PRADUAAmosasu बोली अधम तिहारी तियको अवहिं लेति ही खाई। तिहि विलोकि डरि जीय सीय अति लगी पीयहिय पाई ॥१४॥ तब रघुवीर क्रोध भरि अनुजहि नैन सैन कछु कीनी। लखि कृपाण लै लपण तासु दुहुँ श्रुति अरु नासा छीनी ॥ कटत नासिका श्रवण निश्चरी भभरि भगी विललाती। गिरी आय खर निकट विकल बहु रोय धुनै शिरछाती ॥ १५॥ हीरक छंद । ताकी गति हेरि सकल निश्चर अकुलायकै । बूझो सब कारण सो भाषौ विलपायकै ॥ बोलो खर यातुधान वेगे तहँ जावहू । दोउ नर नारी मम सन्निध गहि लावहू ॥ १६॥ धाये दश चारि सुभट शूर्पण- खा संगमें। आये रघुवीर निकटछाके रणरंगदेखे तिन अच्छन लै तच्छन धनुवानको । ठाढे युतलच्छन सजिरच्छन तनुबानको॥१७॥ दूरहिते निश्चरी दिखाये दुहुँवीरको धाये करिकोपसकल त्यागि तन पीरको। धारे बहु शस्त्र ते प्रहारे इकबारहीं राघव तिन मारे महिडारे ततकारहीं ॥ १८॥ शूर्पणखा हेरि मरन निश्चर बलवानको । लागी भय भूरि भभरि भागी जनथानको बोली खर पास जाय भेजे भट ते मरे । लोटे सब पंचवटी हेरौ चलि भूपरे॥१९॥शूर्पणखा वैन सुनत क्रोधित खरयौं कही।साजी सव साजसमर देखौं चलिहों सही। दूपण त्रिशिरादि सहस चौदह वर वीर ते । लीने कर शस्त्र अमित भारी रणधीरते ॥२०॥ शूर्पणखा अग्रहै अमंगल मुख सर्वते । पाछे खर दूपणादि धाये भट गर्वते । पूरीनमधूरि भूरि हेरी रघुवीर सो। बोले तवलपण लखौ आई खल भीरसो॥२१॥सीतहि लै साथ बंधु धनु शरकर सजहू । वैठौ दुरि कंदराहि याछिन थल तज्जहाबोले सुनि लपण नाथ ऐसी जनि भाखियेह है बहु युद्ध अवहिं मोकह ढिग राखियो।२२॥ बोले पुनि राम लपण शंका जनि मानहू मारी द्वै दंड माहिं खलदल दृढ़ जानहू ॥ आज्ञावश अनुज सिय संगमें । वैठे दुरि कंदराहि छायोबल अंगमें ॥२॥ ताही छिन यातुधान आये अति जोरते। धाये दशह दिशान छाये रखघोरते। रा ॥

रामरसायन।
(२२१)
म रूप देखतही सन चकित होगई । निश्चर मन मोहि युद्ध बुद्धि स-
कल खोगई ॥ २४॥ भेजे खर दूत दोय आये ढिग रामके। बोले
खल बैन सो सिखाये शठ वामके ॥ तापस तिय सौपि खरहि बनते
द्रुत भागहू । वीरनके हाथन ते काहे तनु त्यागहू ॥ २५ ॥ भापी
सुनि बैन तबहिं रघुवर मुसक्यायकै। सेवें खर शूर्पणखहि नीकी विधि
भायकै ॥ वृद्ध औ कुरूप फेरि होनी श्रुति नासिका।
भूलिहू नकोऊ 'तिहि राखै गृहदासिका ॥ २६॥ राघवके वैन
सकल दूतन जवहीं कहे । सो मुनि खर दूपणादि क्रोधानलते
देहे ॥ वोलो खर वीर न अब दाया कछु धारहू । वेगहि. भट
जाय पकार तापसहति डारहू २७ ॥ धाये सुनि सुभट
शक्ति पट्टिश कर चंड लै । भिडिपाल तोमर असि मुद्गर वर खंड
ले । शुल औ त्रिशूल परिघ धारे दृढ भल्ल हैं। दंडही उदंड मंड
मंडित बहु मल्लहें ॥ २८ ॥
अविली छंद।
या सकल निश्वरन संग खर वायकै । शत्रवा करी रामपर
आवक ॥ देखि रघुवीर बहु वीर वर वंडको । कीन टंकोर ख
घोर धनु चंडको ॥ २९ ॥ कान लग तान बहु वान वपन लगे।
विपुल बलवानके प्राण कर्पन लगे ॥ कटत भुज शीश भट
अटत अकुलायके । पटत नहिं नटत पद हटत भय पायक ॥३०॥
झुंड गजतुंड सह शुंड धरणी परे । रुंड खलमुंड बहु कुंड शोणित
भरे । सुदल बल विचल अविलोकि दृत धायक। शक्तिशर
समर खर प्रखर किय आयकै ॥ ३१ ॥ गम लखि मुभट वर
चाप मंडित लियो । बान संधान खर घान खंडित कियो ।।
परत खर बान महि त्रिशिर शर जालते । शाल रघुलाल
तिदि काल नख भाटते ॥ ३२ ॥ निरखि रघुवीर वरवीर
र थीन्ते । कीन सुविदीर बद्र विशि तनु तीन्ते ॥ हमि
दूपण विशिर शक्ति कर चंडल । युद्ध किय क्रुद्ध भट उद पुनि
खंडले. ॥३३॥

(२२०) रामरसायना amrapremiM. बोली अधम तिहारी तियको अवहिं लेति ही खाई । तिहि विलोकि डरि जीय सीय अति लगी पीयहिय बाई ॥१४॥ तब रघुवीर क्रोध भरि अनुजहि नैन सैन कछु कीनी। लखि कृपाण लै लपण तासु दुहुँ श्रुति अरु नासा छीनी ॥ कटत नासिका श्रवण निश्वरी भभरि भगी विललाती। गिरी आय खर निकट विकल बहु रोय धुनै शिरछाती ॥ १५ ॥ हीरक छंद। ताकी गति हेरि सकल निश्चर अकुलायकै ॥ वृझो सब कारण सो भापौ विलपायकै ॥बोलो खर यातुधान वेगे तहँ जावहू । दोउ नर नारी मम सन्निध गहि लावहू ॥ १६॥ धाये दश चारि सुभट शूर्पण- खा संगमें । आये रघुवीर निकटछाके रणरंगदेखे तिन अच्छन लै तच्छन धनुवानको । ठाढे युतलच्छन सजिरच्छन तनुबानको॥१७॥ दूरहित निश्चरी दिखाये दुहुँवीरको ! धाये करि कोप सकल त्यागि तन पीरको। धारे बहु शस्त्र ते प्रहारे इकबारहीं राधव तिन मारे महिडारे ततकारहीं ॥ १८॥ शूर्पणखा हेरि मरन निश्चर बलवानको । लागी भय भूरि भभरि भागीजनथानको बोली खर पास जाय भेजे भट ते मरे । लोटे सब पंचवटी हेरौ चलि भूपरे॥१९॥शूर्पणखा बैन सुनत क्रोधित खरयौं कही।साजो सव साजसमर देखौं चलिहों सही। दूपण त्रिशिरादि सहस चौदह वर वीर ते । लीने कर शस्त्र अमित भारी रणधीरते ॥२०॥ शूर्पणखा अग्रहै अमंगल मुख सर्वते । पाछे खर दूपणादिं धाये भट गर्वते ॥ पूरीनभधूरि भूरि हेरी रघुवीर सो। वोले तबलपण लखौ आई खल भीरसो॥२॥सीतहिलै माथ बंधु धनु शरकर सजहू । बैठौ दुरि कंदराहि याछिन थल तजहावाले सुनि लपण नाथ ऐसी जनि भाखिये है बहु युद्ध अवहिं मोकहँ ढिग राखिय॥२२॥ बोले पुनि राम लपण शंका जनि मानहू मारों द्वै दंड माहिं खलदल दृढ़ जानह । आज्ञावश अनुज लेके सिय संगमें । वैठे दुरि कंदराहि छायोवल अंगमें ॥२॥ ताही छिन यातुधान आये अति जोरते । धाये दशहू दिशान छाये रखघोरते। रा

रामरसायन।
(२२१)
म रूप देखतही सन चकित होगई । निश्वर मन मोहि युद्ध बुद्धि स-
कल खोगई ॥ २४ ॥ भेजे खर दूत दोय आये ढिग रामके। बोले
खल बैन सो सिखाये शठ वामके । तापस तिय सौंपि खरहि वनते
द्रुत भागहू । वीरनके हाथन ते काहे तनु त्यागहू ॥ २५ ॥ भापी
सुनि बैन तबहिं रघुवर मुसक्यायकै । सेवेखर शूर्पणखहि नीकी विधि
भायकै ॥ वृद्ध औ कुरूप फेरि होनी श्रुति नासिका ।
भूलिहू न कोऊ 'तिहि राखे गृहदासिका ।। २६॥ राघवके वैन
सकल दूतन जवहीं कहे । सो मुनि खर दूपणादि क्रोधानलते
दहे ॥ वोलो खर वीर न अब दाया कछु धारहू । वेगहि. भट
जाय पकार तापसहाते डारह ॥ २७ ॥ धाये मुनि सुभट
शक्ति पट्टिश कर चंड लै । भिंडिपाल तोमर आसि मुद्गर वर खंड
लै ॥ शुल औ त्रिशूल परिघ धारे दृढ भल्ल हैं । दंडही उदंड मंड
मंडित बहु मल्लहैं ॥ २८ ॥
अविली छंद।
या सकल निश्चरन संग खर धायक । शत्रवर्पा करी रामपर
आयकै ॥ देखि रघुवीर बहु वीर वर बंडको । कीन टंकोर ख
घोर धनु चंडको ।। २९ ॥ कान लग तान बहु वान वपन लगे॥
विपुल बलवानके प्राण कर्पन लगे ॥ कटत भुज शीश भट
अटत अकुलायके । पटत नहिं नरत पद हटत भय पायर्क ।। ३०॥
झुंड गजतुंड सह झुंड धरणी परे । रुंड खलमुंड बहु कुंड शोणित
भरे । सुदल बल विचल अविलोकि दृत धायक। शक्तिशर
समर खर प्रखर किय आवर्क ॥ ३१ ॥ गम लखि मुभट वर
चाप मंडित लियो । बान संधान खर वान खंडित कियो।
परत खर वान मदि शिशिर शर जालते । शाल रघुलाल
तिदि काल नड भालते ॥ ३२ ॥ निरखि रघुवीर वरवीर
र धीरते । कीन मुविदीर यह विशिर तनु तीन्ते ॥ हरि
दूपण शिशिर शक्ति कर मंडल । युद्ध किय ऋद्ध भट बड पुनि
।
खंडल ॥३॥

२२२) गमरसायना पदरी छंद। इमि यातुधान अति कोप कीन । पुनि घरि शोर करि घरिलीन ॥ गदि उपल वृक्ष डारत प्रचार । वपंत अपार मल अस्थिधार३॥ परिवंड चंड निश्वर अनेक । निरहंद वीर रघुनंद एक । खल दल अखंड करि खंड खंड डारत सुभमि इतिचंड चंड॥३६॥ खर दूपणादि निश्चर समस्त । वाणन विदारि कोने परस्त ॥ भोकटंक खिन्न बहु छिन्न छिन । कर चरण शीशतनु भिन्न भिन३६॥ बहु भिरत आय बहु गिरत झुमि । बहु धूमि प्राण तजि परत भूमि ॥ बहु क्रुद्ध युद्ध किय धाय धाय । बहुखल पगंय करि हाय हाय३७॥ रघुवीर चंड कोदंड धारि । वाणन विदारि खल झारि मारि॥ खर दूपणादि विशिरादि सर्व ।भो यातुधान दल निहत गी३८|| निश्वर सहस्र पट दंड मध्य । रघुवीर एक कीने सुवध्य ॥ खर यातुधान संहार हेर । कोप्यौअपार किय समर फेर३९॥ निश्चर सहस्र वसु एक वार । वर अस्त्र शस्त्र कीने प्रहार ॥ तिन सकल खंडि रघुवीर वीर । हिय भरोक्रोध बहु समर धीर४०॥ कोदंड चंड शर मंड मंड । वर बंड वीर किय खंड खंड ॥ स्पंदन गयंद बेसर तुरंग । वाहन सुढंग सव कीन भंग ४१॥ पुनि विशिखबाण गहि गहि अपार । काटे समस्त निश्चर हथ्यार ॥ कर चरण शीश कटि कटि अनेक । द्रुत परत एक पर एक एक ॥४२॥ पिकरत वीर धावत रिसाय । चिक्करत हाय करि करि पराय ।। रघुनाथ हाथ लाघव अभूत । तनु तेजधीर भुजबल अकूता॥४३॥ कर लहत गहत अरु बहत बान । धनु सजत तजत कोऊ न जान ॥ दिशि विदिशिदीन शरजाल छाय नमभूमि काहु कछु नहि लखाय४४ भरि नैन श्रीन मुख विशिख तीर । निश्वर अधीर कीने सुवीर ॥ करि हाय हाय भट यातुधान छोड़त सुप्राण लगि वनवान।।४६॥ बल झुंड एंड अरु मुंड भूरि । छाये कराल चहुँ धरणि परि ॥

रामरसायन । (२२३) बहु श्वान गृध्र वायस शृगालातिनलखत भखत अति जिय निहाल४६ कर चरण शीश लैलै परांय । मड़राय धाय गहि जॉय खाँय ॥ पलभरखी जीव आमिप अहार।लहि करें पानशोणित अपार॥४७॥ बहु समर घोर करि यातुधान । लगि रामबाण सब तजत प्रान ॥ चौदह सहस्र निश्चर समस्त । शरग्रस्त त्रस्त भेध्वस्त अस्ता॥१८॥ इहि भाँति प्रवल खलदल उदंड । खर दूपणादि विशिरा प्रचंड ॥ वर वीर सकल दशशत पडए । ते यातुधान भेसमर नए ॥१९॥ निश्चर विनाश लखि देवबंद । वोले सु जैति जैरामचंद ॥ चहुँ सुमन वृष्टि कोनी अपार । नभ छई विपुल दुंदुभिधुकारा॥५०॥ लखि विजय मुदित बैलपणलाल । सियसहित धाय आये उताल ॥ करि नेह गम उरलाय लीन । कहि विशद बैन आनंद दीन॥५१॥ सिय देखि राम तनु धान खंड । अकुलाय नीर लोचन उमंग ।। विलपाय धाय रघुराय अंकोलीनेलगाय जियअतिसशंकर२॥ तिन लखि अधीर रघुवर प्रवीन । तनु वान वेगि अति दूर कीन । सियलपणराम नख शिख निहार । पायो सुहीय आनँद अपारा।९।। दोहा-इमि रघुवीर सुधीर वर, वीर समेत हुलास ॥ जनस्थानवासी सकल, निश्चर किये विनास ॥५४॥ खर दूपण त्रिशिरादिये, चौदह महस सुधीर ।। दशमुख आज्ञाते रहे, जनस्थान वरवीर ॥५५॥ सुनि दुखकारी सकल शठ, रहे भये सो नाश ॥ ऋपिगण अति आनँद लहो, सब छूटी खल त्रास ॥५६॥ सुर मुनि मब रघुवीरकी, अस्तुति करत अपार ।। दंडकवन पावन भयो, होत सु जैजैकार ॥२७॥ सिया लपण संयुत सुदा, रहत सजग रघुवीर ।। छिनहुँ न छोड़त बंधु दुहुँ, धनु शर आसि तूणीर ॥५८॥ पंचवटी इदि विधि रहें, सिया लपण रघुचंद ।। -

(२२४)
रामरसायन ।
धीर वीर विहरत विपिन, प्रतिदिन परमानंद ॥१९॥
कियो राम सिय मंत्र कछु, लपण सुजानों नाहिं ।।
यथारूप गुणनेहं युत, संतत तिहूँ रहाहिं ।। ६०॥
पंचवटी गोदावरी, सुभग तपोवन ठाम ।।
परम मनोहर सिद्धि थल, जहँ विहरत सिय राम॥६१ ॥
इति श्री. रा०र०व०वि० पंचवटीवास वर्णनो
नाम दशमोऽविभागः ॥ १० ॥
इति श्रीरसिकविहारीकत श्रीरामरसायनान्थे वनचरित्रवर्णनो
नाम चतुर्थोविधानः ॥ ४ ॥
लीला छंद।
इहि विधि सब यातुधान ॥ नाशे हति राम बान ॥
कानन चहुँ झुंड झुंड ॥ छाये बहु रुंड मुंड ॥ १ ॥
शूर्पणखा देखि हाल ॥ अतिही जिय हे विहाल ॥
भागी तहते सशंक ॥धाई बहु वेग लंक ॥२॥
आई दशशीशपास ॥ विलपी वहु लै निरास ॥
ताको सब हेरिहाल ॥ वृझी अतिही उताल ॥३॥
कोधित करिअरुण नैन । बोली बहु निदरि वैन ।
बूझे कह निलज वात ।। मोगति तुहि नहि लखात ॥ ४॥
डूबो मति अंधकूप ॥ तोसम कहुँ होत भूप ॥
देख कछु देश कोश ॥ तोको नहिं रंच होस ॥५॥
घनाक्षरी कविता
भाव-मति वंक मद छात्र हैं उतंक तिय अंकले निशंक पर्यक
माहिं सविहं ॥ अथवत भान का होत है विहान सो न जान
मुरापान माईि रोनिदिन खोव हैं। रमिकविहारी राज काज आ
समाज साज कैसो का अकाज काज चट्ट न जोय है। तो मी
जोनरेश मोकलेशबहु पार देश जाव पछितावाविनाश बेगि होबेहद
दोदा-शुपंणखा इमि नावणहि कहि अनेक कटुवात ॥
परि कथा सब वगणक, बार बार विलयात ॥ ७ ॥

,
सो?-सुनि खरवध-दशमाथ, विकल भयो बहु:सोचवश ।
पुनि रिस करि निज हाथ, मलत:उसासन लेत बहु ८॥
निरखि शोक वश भ्रात, पुनि बोली कुलनाशिनी ।।
सुन दशमुख मम वात, जिहि कीने तुव होय भल ।।९।।
राम तिया छबिसिंधु, कैसहु सो हरिलावहू ।
तौ तिहि दुख दुहुँ बंधु, करि विलाप निज तनु त ॥१०॥
शूर्पणखाके बैन, मन भाये · दशमुख सुनें ।
हिय आयो कछु चैन, चलो वेगि रथसाजि सो॥११॥
आयो जहँ मारीच, कियो अमित सतकारसो॥
बहुरि दशानन नीच, ताहि सुनाई सकल गति ॥ १२ ॥
चौ०-पुनि वोलो तुम मृगवनि जाबो छल करिदुहुँ बंधुन भरमावो।
तब इकंतलखि मैं तहँ आऊँलै सीतहि निज लंक सिधाऊँ१३॥
तब मारीच ताहि समुझायो ॐ राम तेज वल अमित सुनायो ।।
सुनि वोलो दशवदन रिसाई मुहि लखि परै मृत्यु तुव आई १४॥
तर मारीच चलो गुणि साथा मरन भलो रघुवरके हाथा॥
निशिचरपति तहँ आय लुकायोसोअनूप मृगतनु धरि आयो१५॥
पंचवटी विच इत उत जाई * बार बार दुरि दई दिखाई ।।
औचक लखोसीयतिहि रूपा ॐ अकथ अभूत कुरंग अनूपा १३॥
पनाक्षरी-फपित्त ।
नीलमणि नैन औ प्रवालके विशाल शृंग जटित अनेक रन
कंचनको अंग है । दशन सुहीरनके रजतमई हैं सुर रसिकविहारी
रूप सुभग सुदंग है ॥ ताहि अविलोक्तहीं सीय रघुनंदनको टेरे
हुलसाय छाई अमित उमंग है । धावो देगि घावो लाल आवोइत
आवो श्याम देखों याहि देखा कमो रुचिर कुरंग है ॥ १७ ॥
दोहा-ले धनु शर मिय वचन सुनि, दुहूं बंधु रठि धाय ।
जनकसुता टिग आयर्क, चहुँ पितये अकुलाय ॥ १८॥
वेगि सिया पिय हाथ गहि. दरशायो मृग मोय ।
लखि अनृप दुहुँ गनसुत, चकितर छवि जोय ॥ १९॥

ताही छिन विन अनल यह, भस्म करों निज अंग ।।२९।। (२२६) रामरसायन। जनकसुता पुनि श्याम सों, वोली सहित उमंग । करि अहेर वा जियत गहि, लीजे लाल कुरंग ॥२०॥ सुनत प्रियाके प्रिय वचन, धनुशर सजि रघुराय । चले वेगि मृग हेतु सो, बहु लपणहिं समुझाय ॥ २१ ॥ रामहि निरखि कुरंगसो, कहुँ दुरि कहुँ दरशाय । यौं छल करिबन अगम विच, लैगो दूरि भुराय ॥२२॥ चौ०-जब मृग छल रघुवीर विचारा तबतकि ताहि चंडशर मारा। गिरो कहत हा लछमन सीता सुनत भई रघुवरहियभीता२३ सो तजि कपट मरो कहि रामा के दिव्य देह धरिगो सुरधामा । पुनिरघुनाथ रुचिर त्वच लीना वेगि फिरे सिय ढिग चित दीना२४ जव मारीच शोर करि भारी हाय लपण सिय गिरा उचारी ॥ सो सुनि जनकसुता अकुलानी * कही वीर धावो धनुपानी २५॥ भो कलेश तुव भ्रातहि भारी तब इमि आरत गिरा उचारी ॥ लपण कही तजि तुमहि न जाहीं ॐ तिनहिं देइ दुख को जग माही२६ वचन सुनत सियरिस कारभारी * कहीलपण दुरनीति विचारी ॥ | जानत हौ जिय भ्रातहि मारी हम लीजे मिथिलेशकुमारी २७ कै तुम भरत मंत्र दुहुँ कीनो स्वारथहेत संग बन दीनो । सो रुचि नहिँ पूजिहै तिहारी * मोहिं न गुनौ और सम नारी२८ दोहा-जाछिन प्यारेको सुनौं, हौं दृढ़ अशुभ प्रसंग। यौं कहि पुनि बोली सिया, लपण जात कै नाहि । जौ न जाहु तो अवहिं मैं, प्राण तजौं छिन माहिं ॥३०॥ चौ०-अनुचित सुनतरोप उर धारे लछमनहू कटु वचन उचारे ।। वेगि कृपाण धनुप तूणीरा सजिके चलतभये वर वीरा ३१॥ प्र० ॥ वाल्मीकीये आरण्यकांडे ॥ सर्ग ॥ ४५ ॥ शोक। आर्तस्वरं तु तं भर्तुर्विज्ञाय सदृशं वने ॥ उवाच लक्ष्मणं सीता गच्छ जानीहि राववम् ॥ १ ॥ रक्षसां वशमापन्नं सिंहानामिव गोवृपम् ॥न जगाम तथोक्तस्तु भ्रातुराज्ञाय शासनम् ॥२॥ तमुवाच ततस्तत्र रामरसायन। (२२७) क्षुभिता जनकात्मजा ।। सौमित्र मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि शत्रुवत् ॥३॥ सुदुष्टस्त्वं वने राममेकमेकोऽनुगच्छसि। मम हेतोः प्रतिच्छ- वः प्रयुक्तो भरतेन वा ॥ ४ ॥ अबवील्लक्ष्मणः सीतां प्रांजलिः स जितेन्द्रियः ।। उत्तरं नोत्सहे वक्तुं दैवतं भवती मम ॥ ५॥ स्त्रीत्वादु- एस्वभावेन गुरुवाक्ये व्यवस्थितम् । गच्छामि यत्र काकुत्स्थः स्वस्ति तेऽस्तु वरानने ॥६॥ इत्यादि । चौ०-गमनत पर्णशाल चहुँ फेरा * करि महि धनुपरेख कर घेरा॥ कही इती विनती चित दीजो रेख उलंधि काज जनिकीजो ३२ योंकहि लपण बेगि पगधारे 8 रोप सोचवश विकल अपारे । सूनो थल दशमुख जब पायो * तब सो तापस वेप वनायो ३३॥ रथदुराय शाला ढिग आई , आतथि भिक्षु सम गिरा सुनाई। लखि सिय देन लगी फल जाई तब वोले इमि निश्चरराई ॥३४॥ हों न लेहुँ बंधनमय भिक्षा ॐ है इहि भांति मोहिं गुरु शिक्षा। याते रेख वाहिरे आई * जो कछुदेहु लेउँहुलसाई ३५॥ भावीवश सिय कछु नविचारी धनुरेखा उलंधि पग धारी॥ देन लगी भिक्षा तिहिजाई है तब दशमुख स्वदेह प्रगटाई ३६॥ अंतर भक्ति सहित शिरनाई * प्रगट निश्चरी मति दरशाई ॥ नाहिलीनी सीतहि वरियाई बेगि ले चली रथ बैठाई ॥३७॥ गवण गहत विदेहकुमारी ताहि अमित कटुवाणि उचारी ॥ घोर शोर करिगेवन लागी ॐ ताछिन दुसह शोक दुख पागी३८॥ आरत दीन पुकारत सीता * वचन उचारत विकल सभीता ॥ हाय नाथ हा अवध विहारी हाय वीर यों विलपत भारी ॥३९॥ पनाक्षरी फचित्त। जनकसुताको हरिलींनी दशशीश जय रथ पै चढाय लैचलो है निज भोनको विकल अधीर विललाति कुररीकी भाँति दीन है पुकारति है भूमि नभ पौनको ।। रमिकविहारी हाय प्रीतम धनुपधारी आपनी दशाया में सुनाउँ. सर्व कोनको। अवतो परी है बालमृगी या वधिक हाथ वेगही छुड़ावो धावो दुष्ट दल दौनको 12० ॥ हाय चौ० करत:विलाप अमित इमिसीता लिये जात दशवदन सभीता। सुनिसिय रुदन जटायू धावा गहि रथनभते भूमि गिरावा ४६॥ तब रावण कर गहि असिघायो गृद्ध पंखं दुहुँ काटि गिरायो। (२२८) रामरसायन। रघुचंद हाय दशरथनंद प्यारे हाय रघुवीर धीर पीरके हरैया हाय । हाय प्राणवल्लभ दयालु रघुलाल हाय संकट हरैया उर आनंद भैरैया हाय ॥ हाय सुखकारी हाय रसिकविहारी धाय कीजिये सहाय आय धनुप धरैया आय । हाय प्राणप्रीतम सुजान बलवान. एसी सुरति विसारी क्यों हमारी रघुरैया हाय ॥४१॥ हाय मतिमान धीर लपण सुजान तव कीनो अपमान सो निदान भई घांत है । हाय बलवान धाय वेगही छुड़ावो आन निकसत प्राण छिन कलप विहात है ॥ रसिकविहारी धनुधारी हौ तिहारी वीर मेरो दुखहारी और कोऊ ना दिखात है। हाय रघुनाथ मोहि निरखि अनाथ देशमाथ गहि हाथ निज साथ लीने जात है ॥ ४२ ॥ मेरी महि माय हाय 'सोऊ ना छुटाव मोहिं ठाड़े कुज भ्रात भूरि तेऊ नगिचायना ॥ तातके समान भानु देखै ना बचाव आन भगिनी लता ये लखें तेऊ गहैं धाय ना। संगिनी कुरंगिनी सुहे पे नटेरे काहू ऐसे समयहित और कितहूँ जनायना ॥ रसिकविहारी दुःखहारी धनुधारीविन विपत । परै पै कोऊ करत सहायना ॥४३॥ दोहा-इहि बिधि अमित विलाप युत, जनकसुता कर जोरि ।। जड़ चेतन वन वसहिं तिन, विनवें अधिक निहोरि ॥४४॥ घनाक्षरी कवित्त । कदली कदंब अंब शिशुपाअशोक वट निपट अधीन दीन देखि दया कीजियो ॥ सरित समीर दिशि कानन सुपंथ गिरि प्यारे तेवताय वेगि ये तो यश लीजियो ॥ रसिकविहारी कीर सारिका चकोर मोरे भृग पिक कोकिल नमौनही रहीजियो । केहरी कुरंग व्याल आते रघुलाल तिनै मेरो हाल सकल उताल कहि दीजियो ॥ ४६ ।। रावणकर धनु शर. रथ भंजाकियो युद्ध खल बल मद गंजा चोंचन नखन सुअंग विदारी के छीनलई हठि जनकदुलारी १%

गमरसायन।
(२२९)
.
।
झटित जाय दूजो रथलायो सिय जटायुसो भेद न पायो४८॥
पुनि सीतहिलै निश्चर गई नभमारग . चलो पराई ।
वहु विधि करति विलाप जानकी तजीआश तिहि समै प्राणकी४९
दोहा-तभमारगढ़ सीय को, लिये जात दशशीश ।।
ताछिन देखे जनकजा, गिरिपर बैठे कीश ॥५०॥
कछु निज भूपण अंगते, सिय दीने तहँ डारि ॥
आय परे विच कपि सकल, चकृतरहे निहारि ॥५१॥
कोर न जानो भेद कछ, किहिके भूपण आँय ॥
सहजहिं वनचर तिनाह ले, धरे कंदरामाय ।। ५२ ॥
दशकंठहु जानो न सो, जो कछु कीनो सीय ।।
वेगि लैगयो लंकमधि, शोक हर्प वश हीय ॥५३ ।।
चौल-सियहि लंकपति लंकहि लाई माधि अशोकवाटिका दुराई।।
विकट निश्चरी विविध त्रुलाई से सब शस्त्रलिये कर आई५४
साम दाम भयभेद सिन्वाई तिनहिं दशानन दई रजाई ।।
मजगरहौ निशि दिवस सदाई करहु सिया रखवारी जाई॥५५
लंकनाथ आज्ञा शिर धारी सीता निकट सुवेगि सिधारी ॥
तिनहि निरखि मैथिली सकानी मौन रही मुख कढीन वानी२६
इहिविधि सिय निश्चरिन मॅझारी निशिदिन विलपत रहे दुखारी
ते सब बहु प्रकार समुझावें साम दाम भय प्रीति जना३२७
लिय रावण गृह दृढ व्रतकीना निद्रा अशन पान तजिदीना ।।
सो गति लखि सब देव दुखारी करि सुमंत्र दृढ़ युक्ति विचारी९८
पंचम निशि सुरपति दुरि आये , निद्रा घोर संग निज लाये।
पायस शुचि अनृप करधारेश भक्ति महित सिय निकट पधारे५९
सब निश्चरी नींद वश मोई सोन भेद जानो का कोई ॥
मियदि बुझाय सुअशन कराई कीदै बहु धीर गये सुरराई ॥१०॥
दोदा-शुद्ध सिद्धि चरु देवकृत, गुणद पियूप नमान ।
कबहुँ न सुधा पिपानहो, पुनि न तेज बलहान ॥ ६ ॥
पदापि देवपति अमित विधि मियाद गये ममुझाय ।।
तदपि निपट व्याकुल कर हाय हाय विलपाय ॥१२॥

(२३०)
रामरसायन।
चौ०-जवसिय खबर विभीपणपाई *तब है दुखित हिये अकुलाई।
कला नाम निज सुता बुलाई के भक्तियुक्ति शुभरीति सिखाई६३
कहीसहज नित सिय ढिगजावो सखिनसहित तिन धीर धरायो॥
पैन भेद कोऊ यह जान *रावण न तरु क्रोध उर आन६४॥
सो सुनि कलासंग सखि चारी लखि औसर सियपास सिधारी
जाय पाँय परि विनती कीनी अपितु प्रणाम कहि धीरज दीनी ६५
इहि विधि कला नित्य सियपाही सखिन सहित लखि औसरजाही
पुनि जो सिय ढिग निश्चरि रहही तिनमहँ द्वतिय शुभ मति अहहीं
त्रिजटा अरु शरमाशुभ संगिनि* ये दुहुँ गुप्त रहैं सिय अंगिनि ॥
सप्तनारि ये जनकदुलारी बाढी प्रीति परसपरभारी ॥६७॥ ॥
इहि विधि सिया लंकमाधिरहही निशिदिन पिय वियोग दुखद
राम नाम मुख हग पति ध्यानाकरि राखें सीता निजप्राना॥६
दोहा-इहि विधि दशमुख सीय लै, राखी लंक दुराय ॥
नगरद्वार चहुँ विपिन मग, परम प्रबंध दिढाय ॥ ६९॥
माघमास तिथि अष्टमी, शुक्ल दिवस मध्यान ॥
दशकंधर सीता हरी, ग्रन्थन माहिं प्रमान ॥ ७० ॥
प्र० अमिवेश्यरामायणे।
ततो माघे सिताष्टम्यां मुहूर्ते वृंदसंज्ञके ।।
राववाभ्यां विना सीता जहार दशकंधरः ॥७॥
पुनः हनुमन्नाटके।
अर्द्धरावे दिनस्याः अईचंद्रेर्द्धभास्करे ॥
रावणेन हता सीता शुक्लपक्षे सिताप्टमी ॥ ८ ॥ इत्यादि
दति भी ० रा०र० वि०वि० सीताहरण
वर्णनो नाम प्रथमोविभागः ॥ १ ॥
दोहा-इहि पिधि भये जु मासदश, दुखित रहे सियलंक ।।
निअरपति अनिश्ची, दशावत बहुशंकः ॥ १॥
मिया कलादिकमखिपतिन, प्रति दिन करहिं विलाप ।
प्रिय पियोग दुखते मदा, यटत विरहतनु ताप ॥२॥

रामरसायन। २३०) घनाक्षरी कवित्त। विरह विहाल शीशनाय सियसोचत हैं मोचत हगनवारि ऊंची श्वास भरिकै ॥ रसिक विहारीको मिलावै धनुधारी अव भूमिहू न मेरे हेत फाटत दरीरकै ॥ श्याम रघुराई कहा चूक वनि आई मौतें ताही सों दुराई चुप है रहे विसरिकै। हाय प्राणप्योरको दरश मोहिं दुर्लभ भो विमुख मरौंगी यावियोग ज्वाल जरिकै ॥३॥ निपट निलज्ज सदा सहत वियोग परि रटत हमेस हाय रहत सतापीतू ॥ येरे मति- हीन दीन दुखित घनेरो वृथा विलपत निदिन भयो है विलापीतू ॥ रसिकविहारी प्राणप्यारे ढिग जारे अव विरह सुनारे कस होत मृखा- लापीतू ॥ ऐसह कलेश धृग जीवन है तेरो हाय निकसत नाहीं क्यों कठोर प्राण पापीतू ॥ ४ ॥ जाके हिय लागी लखै सोई या वियोग पीर निपट कराल है कृपाण कठिनाईते ॥ दोऊ तन दाहै हेली दुसह व्यथा है अति रचहू न चाहे सुख सुजन मिताईते ॥ प्रानको पयान दुख एकको नशात सवै समुझ सयानी भट्ट निज निपुनाईते ॥ रसिकविहारी सुखकारी यों विचारी वेगि मरन भलो है यह विरह कसाईते ॥५॥ सुनत सदाही मैं दयालु दैव मानों किमि प्रगट जनात निठुराईको निकेत है । रसिकविहारी दीन रक्षक बताव ताहि मिथ्या सो अजान सुधि काहूकी न लेत है ॥ अमित उदार यों ही करत वखान वाको मेरी जान कृपन महान इहि हेतहे । हीं तो वह जाँचो कछु दाम कोन काम जामें मोऊ नेक मीच मोहि माँगेहून देतह ॥ ६॥ मोसी मंदभागिनी न कोऊ है जहान हेली ते हैं वड़ भागिनी जु श्याम सुख पागेंगी । आनंद अभंग नवने- हकी उमँग माहीं छाकि रस रंग संग सब निशि जागगी ॥ जन्म धिग मेरो हाय प्रीतम वियोग भयो धन्य मोतिया जो अति दीय अनुरागेंगा। रासिकविहारी रघुचंद हैं निशंक अब आमत मयंकमुखी आय अंकलंगगी ॥७॥ संईया करित। जानतिहीं रासिकेश सुभावरहें दृप्रीतिको गतिमें मारे । नेहि- नके वश वेगहि होत अभंगनदारनगमें गप्रेिम लगाय लुभाय LANG पति वियोग वश दुखित जिय, नेक न धीर धराय ॥१२॥ ( २३२) रामरसायन। न लेय कोऊ हौं तजौं इहि सोचकी आँचे । और नहीं: इमि है कितहूँ जिमि हैं साख श्याम सनेहके साँचे ।। ८॥.. घनाक्षरी कवित्त । इत रत जाय बार बार फिरि. आय. आय रसिक- विहारी ढिग मेरेही अरत है । गोदावरि तीर धाय जोलो नीर लाऊँ"वीर तौलों हेर हेर प्यारी प्यारी ही ररतहै. शैनहूं में नैन खोलि खोलि अविलोकत ते मोहिं बिन देखे छिन धीर न धरत है ॥ भूलै है न सोई सुख हूलै है हिये में हाय मेरे प्राण प्यारे वह प्यार जो करत है ॥ ९॥ चौदह सहस्र यातुधान बलवान भूरि जिनते संहारेते अमोघवान खोगये। दीन दुख टारतते दुष्टनको मारतते एकैवार अमित समस्त गुण गोगये । निराखि पराई पीर नीर हग ढारतते धारतते विविध धर्म धोगये । रसिक विहारी लाल परमदयालु सोई मेरे हेत, निपट कठोर अव होगये ॥१०॥ सपैया फवित्त। है जु पतिव्रत धर्म महा तिहि में दृढं के अपने उर ठानों। प्रीतम के पदपंकजते बढि और कडू तिहुँ लोक नमानों । सो फल हीन कियो सिंगरो अब काह कहीं पिय नेक न जानों । मोहिय दाहत शोक यही उनसत्य सनेह नहीं पहिचानों॥ ११॥ दोहा-जनकनन्दिनी विकल नित, इहि विधि अति बिलपाय ॥ सुकर्म १ लिया . कला विजयादिते, समझायें मतभाय ।। स्वामिनि धीरज धारिये, मुधिले हैं रघुराय ॥ १३ ॥ मुनि तिनके वर पवन बहु, सिय चार छिन धीर ।। पुनि बॉल अकुल्यायः टर, उंठ विग्हकी पीर ।। १ ।। मोपा गपिन मुन अ. कामों कदी पुनि मानिये कोर न मानत व्यापी नहीं या पियांग व्यथा मुकदा दपको पदिनाना है । पर मिली जामिट विडी गति मो र आनन ।

रामरसायन। (२३३) . नर नारि सयोगी वियोंगी कहा मिलिकै विछरो सोई जानतहै||१२|| कोउ कहै दुख त्यागी सबै हिय धीर धरौ. मिलि है रस.भीनोंः।। पै मन मेरो न मानत है विछुरे तन छोडियोई प्रण लीनों। मोहि जुपै समुझावति हो रसिकेश तुपै अतिही: भल कीनों। हों करतारसे पूछों इतो विरहीके ललाट कहूं सुख दीनों ।।१६।। चित चाहिय जाको सँयोग सदा वह ताहिको वेगि वियोग करावे.॥ देखि दशा विरहीनकी वाके हिये कछु रंच दया नहिं आवै ॥ योरसिकेश संदेसो अबैं करतारको कोऊ न जाय सुनावे ॥ छीन सुधा सबके करते फिर नाहक क्यों जु हलाहलप्यावे ।। १७ ॥ सो०-पुनि सिय बोली वीर, तन मन ते न वसाय कछु।। विन सुन्दर रघुवीर, नेक धीर कोउ न धरै ॥ १८॥ संक्या कवित्त । प्राण समीरते बोलत है पिय तू परसै किधौं हों परसौं ॥रसना पपिहाते कहै रट पीर की तूं सरसै किधी ही सरसों ॥ तनकी अरु जीवकी होड़ लगी अति तू तरसै किधी हो तरसौं । रासकेश बदी हग मेवनसों वनो तू परसै किधी ही बरसौं ॥ १९॥ दोहा-यौं कहि सिय बोली वहुरि, अली धरौं किमि धीर ॥ राजकुंवर विन रौनि दिन, देत सकल ऋतु पार ॥२०॥ घनाक्षरी-कवित्त । शिशिर समीर तीर वालियो न चूको नेक शीत भीत देवेमाह कसर लगाईना ।। रैनहूँ अर्चन अधिकवेमें न राखो चेन पाला त्यों कसाला मध्य कीनी लघुताईना. रसिक विहारी फेर नीरहू न धारी धीर निराखि दुखारी मोहि काह दया आईना ॥ येते बलवान मिलि प्राणहठि लेते हाय जो पै एक होतो विरहानल सहाईना ॥ २१ ॥ फूल नकी शुलनते शुल शूल शालो हीय कोकिलाकी कूकन ल लूकसी लगाइरी। विविध समोर तीर ताकि तनुबंधो वीर विरह कृपान तान विशिप चलाईरी ॥ रसिकविहारी धीर धारोवरियारी वीर हाय यावि- चारी तब कीनी मोसहाईरी ।। निठुर कमाई सो वसंत दुखदाई घात पाई प्राण लेवे माह कसर न लाईरी॥२२॥ आतप अपार फेर विरह

(२३४)
रामरसायन।
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कृशानु झार लगि तन होतो छार कैसहू न जीतीमैं । लूह की लपेट
ताती श्वासकी सपेट जैसीभई जिय जानौं का बखानौं गति बीतीम।।
रसिकविहारी धनुधारीकीकृपाते बचि जैहै प्राण ऐसी सत्य हीय धरि
लीतीमैं ॥ ग्रीपम वियोग दोऊ दाहतें मरीती हाय जोपै श्याम नाम
सुधा छिनहुँ न पीतीमैं ॥२३॥ मेघन घिराय झरि लाय दामिनी
दिपाय घोर घहराय तमछाय डर पायोरी ॥ पौन जोर तोर तरु चा-
तक सुमोर शोर करकै करोर कला दुख दरशायोरी॥अबला अधीन
दुखी विरहिनि दीन देखि रसिकबिहारी दया रंचहू न लायोरी ॥
पावस प्रपंची निशि दिवस सताई मोहिं फेरि वह पापीके सुहाथ कह
आयोरी ॥२४॥
दोहा-हौं पाहन निज हीय करि, इती सही सब शंक ॥
निपट दुसह दुख देतहै, अब यह शरद मयंक ॥२५॥
यौंकहि सिय शशि ओर लखि, बोली वचन रिसाय ॥
सुखी न रही चंद तुम, मो अबलाहि सताय ॥२६॥
संवैया कवित ।
टुक जीय विचारौ अहो द्विजराज अजौं दुख दीनको देखि लचौ॥
रसिकेश सु शीतलता तजिक मुहिं हेत वृथा जनि तापतची॥
यह वात भली जु न मानहु तौ पछितैही घने बहु नाच नची।
प्रथम हिय कारो भयो पै अब मुखकारो भये विन नाहिं बची २७॥
दोहा-येही विधि सिय तियन प्रति, करति विलाप अपार ॥
दुखित हीय दुहुँ दृगनते, चली जात जलधार ॥२८॥
गदगद कंठ सनेह मय, बहुरि कहे सिय बैन ।
सखी सुमिरि पिय हीय गति, ही सोची दिन रैन ॥ २९॥
पनातरी फायित्त ।
दुसह कलेश नित विरह व्यथाको सही पन प्राणप्यारे हिग प्राणदि
पठाउं. मैं ॥ रसिकपिहारीयो कठोर दिय मेरो त करि करि हायरनि
दिवस विताउं में ॥ प्रीतमको दीय अंग कोमल महाह सखी कसे दुख
झेले याने मी जिय चाउं.मंजीलाह वियोग तालों श्यामको सनेद
मोमें अधिक न हॉर यदी शिते मनाउं.में ॥३०॥

रामरसायन। (२३५) दोहा-दशरथ राज किशोर नित, सब विधि मुदित रहायँ ॥ तो तिनके सुखते सखी, हौं अति सुखी सदायें ॥३१॥ याते हौं शिरनायक, विनय करौं कर जोरि ॥ गिरिजापति पूजैं सदा, यह अभिलापा मोरि ॥ ३२॥ घनाक्षरी कवित्त । दोऊ बंधु रूप गुणसिंधु दीनबंध हेली परम सुधर्म सतकर्ममें सने रहें खल दल घालनको भक्त प्रतिपालनको सत्य प्रणयेई सदा हीयमें ठने रहै । अंचल पसार वारवार वर माँगी येही तन मन प्राणप्यारे मुदित बने रहैं ।। वसुधावड़ाई वित्त वीरता समेत जैसी रसिकबिहारी सुखी संतत बने रहें ।। ३३॥ दोहा-यौं कहि सिय पुनि नेह भरि, बिलाख कहे मृदुबैन । हाय श्यामसुंदर वदन, कब देखौ भरिनैन ॥३४॥ सुनि कलादि नारी सबै, सियहि दई बहु धीर । राज सुता अव वेगही, मिलन चहत रघुवीर ॥ ३५॥ सुनि वरवानि कलहि सिया, हिये लई लपटाय॥ पुनि सवही आदर दियो, बहु विधिप्रीत बढ़ाय ॥ ३६॥ येही विधि नित जानको, करि करि विविध विचार || कहत रुचत सो विरह वश, नेक न रहत सम्हार ॥३७॥ सिय बिलाप इमि अमितह, कह लग करीबखान । वाल्मीकि नाटक विविध, ग्रन्य न माहि प्रमान ॥ ३८॥ पाल्माफीप सुंदर पाहे । सर्ग २८॥ लोक । हा राम हा लक्ष्मण हा सुमित्र हा राममातः सह मे जनन्यः ।। एपा विपद्याम्यहमल्पभागा महार्णवे नीखि मृद्दबाता ॥ हा राम सत्यवत दीर्घवाहो हा पूर्णचन्द्रप्रतिमानवक्त्र ।। हा जीवलोकस्य हितः प्रियश्च वध्यां नमवित्मि हि गक्षमानाम् ।।२।। अनन्यदेवत्वमियं क्षमा च भूमी व शय्या नियमच धर्मे ।। पतिव्रतात्वं विफलं ममदं कृतं कृतवित्र मानुपागान् ।।३।। -- - (२३६) रामरसायनः। mers मोघं हि धर्मश्चरितो :ममायं , तथैकंपनीत्वमिदं निरर्थकम् ॥ या त्वां न पश्यामि कृशा विवर्णा हीनात्वया संगमने निराशा ॥४॥ पितुर्निदेश नियमेन कृत्वान वनानिवृत्तश्चरितव्रतश्च ॥ स्त्रीभिस्तु मन्ये विपुलेक्षणाभिः संरस्यसे वीतभयः कृतार्थः॥५॥ इति श्री. रा०र०वि०वि० जनकनंदिनीविलाप वर्णनो नाम द्वितीयोविभागःः॥ २ ॥ दोही-सीता प्रेम वियोगको, कीनो कछू बखान ॥ नेह विरह रघुचंदको, वरणों सहित प्रमान ॥१॥ इत मारीचहि मारिक, वेगि फिरे रघुलाल ॥. धनु शर साजे लपण उत, आये अतिहि उताल ॥२॥ निरखि बंधुको चकित है, बोले अति अकुलाय ॥ । कहौ कुशल हैं जानकी, किमि आये इत धाय ॥३॥ हाय लपण यह काकियों, सियहि अकेलि विहाय । इत आये बिनकाजहीं, असि धनुवाण सजाय ॥ ४॥ जानत हौ निशिचरनते, भई शत्रुता भूरि ।। लखि सूनी हरि लेहिंगे, मेरी जीवनमूरि ॥५॥ पुनि कर गहि वर बंधुते, बूझी है अतिदीन ।। सत्य कहौ प्यारी कुशलं, क्यों तुव वदन मलीन ॥६॥ मम आज्ञा करि भंग तुम, इत आये किहि हेत ॥ राम वचन सुनि लपण ते, वनै न उत्तर देत ॥७॥ पुनि धरि धीरज जोरिकर, बोले दुखित.निहोरि ॥ १.-, नाथ कही सो सत्य पै, मोरि कछु नहिं खोरि ॥ ८॥ कहि अनेक अनुचित वचन, हिए रोप बहु लाय ।।.. वरियाई मुहि जानकी, इत भेजो रंघुराय ॥ ९ ॥ यो कहि पुनि वृत्तांत सब, रामहि लपण सुनाय ।।- वोले दुहुँ करजोरिकै, कहा दोप मम आय ॥ १० ॥ सुनि बोले रघुवंश मणि, तुम लछमन मतिमान ।

रामरसायन। (२३७) - . तिय वाणी मानी हिये, ऐसे भये अयान ॥ ११ ॥ मृट मत्त शिशु तिय दुखी, पांचहु एक समान ॥ इनके वचन सरोप सुनि रोप'न करें सुजान ॥ १२॥ सो-यौं कहि पुनि रघुराय , लै उसास है सोचवेश ।। वोले अति अकुलाय, हाय लपण यह काकियो ॥१३॥ मुहि इमि परत जनाय, पंचवटी सीता नहीं। लीनीनिश्चर खाय, कै हरिके हरि लै गयो॥ १४ ॥ यौं करि अमित विलाप, सोचत जल मोचत हगन ॥ हृदय चढत संताप, छिन छिन चले उताल अति ॥ १५॥ बंधुसहित रघुवीर, आये आश्रम रिते ॥ सूनी निरखि कुटीर, भये अधीर सुवीर दुहुँ ॥ १६॥ तहते आतुर धाय, आय परणशाला लखी ।। विकल भये रघुराय, इत रत अविलोकत चहूँ ॥ १७॥ वोले निपट अधीर, हाय लपण प्यारी कहाँ।। कहूँ धनुप कहुँ तीर, गिरो गात कंपित भयो ।॥ १८॥ पुनि अतिही अकुलाय, गिरे भूमि विलपन लगे ।। . हाय प्रिया स्टलाय, टेरत अरु हेरत चहूँ ।। १९ ।। बहार रठे रघुराय, धाय धाय हेरत विकल ॥ टेरत है चहुँ जाय, आवो प्यारी कित गई ॥२०॥ लपण अमित दुखछाय, धाय धाय हेरें चहूँ ॥ कितहुँन पर लखाय, तब पुनि खोजें टेरि के ॥२१॥ येही विधि दुहुँ भाय, सर सरिता गिरि विपिन चहुँ । धाय धाय अकुलाय, हेरी मियहि न कहुँ लखी ॥२२॥ तब अति भये अधीर, रघुवर तन मन सुधि गई ।। वड़ी विह दुख पीर, धाय धाय वृद्धत महि ॥ २३॥ ताछिन कछु न जनाय, को हम फिहित का कहत ।। जड़ चेतन इक भाय, सबहीते बुझत विकल ॥ २४ ॥ दोहा-पंकज नम का पद मृदुल, पंकजने हा लाल । हेरांकज कहु तुम लखी, पंकज बदनी बाल ।।२९।।

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मतंग मृगराज मृग मोदिशि निहारौ तो वियोगी दीन वागोंहों ।
गोदावरि पंचवटी विटप विहंग वेलि मेरो दुख हरहु तिहारे पाय
लागहों ।। शत्री जाति यदपि न. याचिवो उचित मोको रसिक
विहारी या विरह भीति भागोंहों । हो तो रघुराज पै विहाय सब
लाज आज देहु मोहिं कोऊ मैं प्रियाको दान माँगौं हौं ।। ३५ ।।
चौ०-यौं बहु सवहि निहोरतधाई * कतहुँ न कछू प्रिया सुधिपाई।।
बैठे इक
तरुतर अकुलाई तब वोलेलछमनहि रिसाई३६
घनाक्षरी कवित्त ।
विकल वियोगी दीन अबल विलोकि मोतें जेते जड़ चेतन ते
सबै मुख फेरो है ।। रोय द्वै अधीन कर जोर मैं सुनाई विनय दया
करियेको नेक मोतन न हेरोहै।। छिनमें विदारौं इन पापी अभिमानि-
नकों जानत नरोप रघुवंशको करेरो है ॥ रसिकविहारी प्राणप्यारी
ना वतावे कोर आन तो लपन धनुवान कित मेरो है ॥ ३७ ॥
लोक तिहुँ जारों सातो सागर सुखाय डारों गिरिन ढहाय डारों
भूमि उलटाऊमें ॥ रंचमें विदारि डारों दशो दिग पालनको खगन
समेत शशि सूरहि गिराउंमै ।। नभते पताल लेके कितहूँ कहूँ जो
नेक रसिकबिहारी प्राणप्यारी सुधि पाऊँ में || जानकी न लाऊं तो
पि क्षत्रीना कहाऊँ राम नाम पलटाऊँ धनुवाणना उठाऊँ में ॥ ३८॥
सो०-घुवर रोप निहारि, लपण कह्यौ कर जोरि के।
मिलि हैं जनक कुमारि, नाथ धीर उर धारिये ।।३९ ।।
मिलिहें यह सुनि श्याम, विकल उठे अकुलायक ।।
कह भामिनी ललाम, इत उत फिरिखोजन लगे ॥४०॥
पनाक्षरी फक्ति ।
हेरत चहूँघा हाय सीते कहि टेरत, रसिक विहारी प्यारी मिलि
क्यों दुरानी है ।। विरह व्यथाते है विहाल रघुराय जसे काहू भांति
तसी गति जाय ना वखानीह ॥ रडि मगधूरि भरि पूरि रही श्याम
गात अधिक सुहात मो सुरीत दरशानी है । हरि निज नाथ तिय
विरह दुखारी मनों भूमि अकुलाय धाय उर लपयनहि ॥ ११ ॥
दोहा-राजकुँवर इमि दुखित अति, खोजत सिय चहूँ और ॥
कहुँ बूझत हेरत कहूं, कहुँ टेग्न करि शोर ॥ १२॥

(२४०) रामरसायन। धांय-परणशाला लखत, धाय लखत वन जाय॥ प्रिया विरह व्याकुल निपट, विलपत करि करिहाय ॥४३|| तो कहुँ न मिली प्यारी तबै, परणशाल ढिग धाय ॥ आय गिरे मूर्छित विकल, कहती वचन विलपाय॥४॥ घनाक्षरी कवित!:: चलत अपार जल धार दुहुँ नैननते नेक हू सम्हार सार हैन तन प्रानकी। झांवरो भयो है मुख वावरो भयो है चित्त धावरो. भयो है जीय सुधि न अपानकी ॥ रसिकविहारी धनुधारी सिय प्यारी बिन जैसे हैं दुखारी गति तैसी ना बखान की | लाय लाय सुरति प्रियाके गुण गाय गाय बोले विलपाय हाय हाय हाय जानकी ॥ ४५ ॥ हाय मृगनैनी हाय प्यारी सुखंदैनी हार्य प्रिया वर वैनी विनतोहिं कित जाउंमैं ॥, हाय हाय जानकी सुहाय प्राण प्राणकी जुहाय गति प्राण' की या किहिको सुनाऊमैं ॥ रसिकबिहारी हाय सुरति विसारी प्यारी छिन छिन भारी कैसे दिवस बिताऊं मैं । हाय प्राणवल्लभा किशोरी क्यों दुराय रही नेक मिल आय धाय अंकसो लगाऊं मैं ॥४६॥ लाय जा सु अंक नेक बचन सुनाय जारी नाय जा हिये में रस मरत. बचायजा ॥ चाय जा दयातें प्रीति रीति में हिताय जारी ताय जा वियोग प्रिया प्रेमको निभायजा ॥ भायजा घनेरी मनमोद उमगाय जारी गाय जा सुगीत की तनीतहि विछायजा ॥ छायजा छबीली सुख रसिकवि- हारी प्यारी हाय फेर आय एक बार तो मिलायजा ॥४७॥ जीय अकुलावे तब कौन जो धरावै धीर हाय टक लाय चाय काको रूप हेरौं मैं । कोहै उमगाय धाय उर लगिजाय आय हिय हुलसाय काके गल भुज गेरौं मैं ॥ नेह सरसाय को मनाय गहिलेवे अंक को इमि जातें.इतराय मुख फेरौं मैं ॥ प्यार करि मोकों अब प्यारेको पुकार हाय रसिकविहारी काहि प्यारी कहि टेरॉमैं ॥४८॥ दोहा-विरह वीर बाढ़ी अधिक, तन मनकी सुधि हैन । भयो चित्त भ्रम मत्त सम, वोलत अलबल बैन ॥४९॥ - रामरसायन। (२४१) सर्वया कविता दूरहिते मुहि देखतहीं तहँ जाय दुरी छलतें रस भीनी ॥ आज प्रमोद मई रसिकेश विनोद की रीति नई चित दीनी ॥ बैठि रहीं पटपूँघट घाल सुमेरी विहाल दशा यह कीनी ॥ क्यों तरु ओट गही नवला अब आवो भला ही कला लखिलोनी ।। फेरि भुजा गहि आपने आपहि बोलत नेह भरे रघुराई ॥ हाय छबीली रहीं अबलों कित क्यौं यह आज लई निठुराई ।। यो कहि.चौकि चहूं चित कहँ प्यारी गई विल अकुलाई ।। टेरै बहोरि प्रिया इत आवोज़ आवो तुमैं रसिकेश दुहाई ॥५१॥ पुनि वेलिन धाय गहें भरि अंक निशंक हिये हुलसावत हैं ।। यह वाटिका प्यारी रची करते कहि यौं अति नेह बढ़ावत हैं। इत प्राणप्रिया नित डोलत ती रजलै रसिकेश लगावत हैं। हरपावत हैं उमँगावत हैं अकुलावत हैं बिलपावत हैं।॥५२॥ दोहा-यौं विलपत दिन वीति गो, अथवन लागो भान ।। साँझ समे लखि राजमुत, प्राण अधिक अकुलान ॥५३॥ घनाक्षरी-कवित्त । विरह विहाल रघुराई को लखाई परी औचक ललाई मंजु अथवत भानकी । रसिकविहारी उमगाय उठिधाये वेगि बंधुहि बुलाय बोले भूली मुधि प्रानकी ॥ आवो वेगि धावो समुझावो औ मनावो गहि लावो तुम जावो आन मान हैं न आनकी ॥ आयकै परानी जात बहुरि हिरानी जात देखो देखो लपण दुरानी जात जानकी ।। ५४ ॥ दोहा-निरखि दशा रघुलालकी, विकल सुमित्रा लाल ॥ गदगद हिय दृग जल बहत, बोले वचन विशाल ॥२५॥ देखि रावरी विकलता, मोजिय अति अकुलात ।। जनक सुता मिलि हैं वहुरि, धीर धरौ उर तात ॥५६॥ सुनि सुवंधुके वचन वर, राम कही विलपाय। पंचवटी प्यारी विना, मोपे लखी न जाय ॥१७॥ यो कहिलै धनुवान असि, कटि कसि वेगिनिपंग। चले राम व्याकुल अतिहि, गमने लछमन संग ॥ ५८॥ .

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रामरसायन। (२४५) सबैया कवित। विरही समुझायहु धीर हिए नधरै न धेरै न धरै न धरै ॥ जगलो गहि सो रसिकेश कछू न डरे न डरै न डरै न डरै ।। निज प्रीतमके विन एक घरी न भरै न भैरै न भैरै न भरै ।। विधि काहुहि प्रीय विछोह कवौं न करै न करै न करै न करे ।।८१ ।। फलदै तिहि के शत कर्मनको जिाहिके जिय माहिं सदा कल है ।। कल है नहिं जाहि कलेशनते न लगै कहुँ ताहि कछू भल है ।। भल है रसिकेश सदा अति सो हठिकै दृढ़ प्रेमहि जो न लहै ।। नल है निज मीत वियोग कवों जगजीवनको सुयही फल है ॥८२॥ दोहा-इहि विधि वर्णत लपणते, प्रीत विरह दुख भीति॥ जनकसुतहि खोजत चहूँ, गई निसवबीति ॥ ८३॥ कहूँ न पाई प्रियहि पुनि, भये विकल ग्घुराय ।। बंधु कंध धरिकै भुजा, बोले अति विलपाय ।। ८४ ।। घनाक्षरी कवित्त । अंक द्युति चंपा अरु संपाचपलाई लई कंज कोमलाई मंजुगजगति लीनी है । लोचन कुरंग दंतदाडिम अधरविच पल्लव सुपानिहरें ग्री या कंबु छीनी है।श्रीफल उरोज केशपत्रग कुमार लीने रसिकविहारी । यह प्यारी गति कीनी है । लंकहारकानन कलंक औ मयंक मुख तारक मब लेक एक शंक मोहिं दीनी है ।। ८५ ।। दोहा-यों कहि करगाह लपणको, मग डगमग पग चाल । कहत सियाको रूप गुण, वृझत चले विहाल ॥८६॥ घनाक्षर्ग-कषित। सुजन विहीन सुख हीन तनछीन दीन विकल अधीन मोकली- न दुख वोरीसी । रसिकविहारी वरखेनी है विथोरी शीश विपम वि- योगमें लथगि वसथोरीसी ॥ विरह बिलोरी नेह सिंधुम हिलोरी वा- ल निपट न जोरी औलजोरी अति भोगसी । वृझो करजोरी प्रिया मोरि गई चोरी कोट देखी कहूँ नवलकिशोरी एक गोगमी ॥८७॥ दूजी नादि नारी जग जाकी अनुहारी और तेज गुण भारी त्यों अ- नृप रविन्यागे हा पीत रंगसारी हेम भूपण विचित्र धारी चंपायुनि मा THRS मे. नि प्यार विन यार मूना प्यारी विन लाल तसे लाल धिन प्यारीह।।८० जैसे दीप बिन भौन जैसे वीर विन रारी है ॥ रसिकविहारी जैसे (द) रामरसानना रसिकविहारी चर अचर अचर विलोकौ पैनप्रीत करि कोऊ | सुखपायो काहूँ आज लों॥७३॥ सर्वया कवित्त। . होत नहीं चित रंचहु चैन करै कतलाम वियोग.छुरी है ॥ छूटत है कुलकानि औ लाज फिरै मन ज्यौं चहुँ तेजतुरी है जाहर होत जहानमें सो नरहैं कहुँ एकहु भांति दुरी है। हायहहा अब कीजे कहा रसिकेश या. इश्क बलाय बुरी हैं ।। ७४॥ घनाक्षरी कवित्त । छूटि जात खान पान भूपन वसन भौन छुटि जात वित्त देश प्रेमकी पगनमें ॥ तात मात दारा पति पुत्र सखा बंधु छूटै तन मन प्रान छूटै नैनकी खगनमें ॥ रसिकबिहारी नेम धर्म परलोक लोक छूटि जात मोद बहु चित्तकी ठगनमें । येते सब छूटि जात रंचहु न लागै बार विरह न छूटै नेक नेहकी लगनमें ।। ७५ ॥ दोहा-नेह सिंधु यह अगमहै, कोऊ लहै न अंत । सत्य नेह तजि जगतमें, और नहीं कछु तंत ॥ ७६ ॥ हौ तौ सांचे नेहके, रहत सदा आधीन ॥ नेह अपूरव वस्तु तिहि, अबलों लपण न चीन ॥७७॥ हाय लपण यह प्रीतकी, रीत प्रिया मम जान ॥ सो न निकट ही नेहको, कासों करौं बखान ॥ ७८ लखो लपण प्यारी विना, हौं किमि भयो मलीन ॥ ऐसिहि लैहे सीयकी, गतिमों संग विहीन ॥ ७९ ॥ घनाक्षरी-कवित्त । देह विन प्रान जैसे दिन विन भान जैसे चूना विन पान जैसे कूप विन वारी है।नि विन चंद जैसे तालविन कंज जैसे कुल धिन पुत्र जैसे फूल बिन क्यारीहै । भूपविन भूमि जैसे पत्र विन वृक्ष .

रामरसायन। (२४५) सवैया कवित्त । विरही समुझायहु धीर हिए नधरै न धेरै न धरै न धरै ।। जगलो गहि सो रसिकेश कछू न डरै न डरै न डरै न डरै॥ निज प्रीतमके विन एक घरी न भैरै न भैरे न भैरै न भरै ।। विधि काहुहि प्रीय विछोह कवौं न करे न करे न करै न करे ।।८१ ॥ फलहै तिहि के शत कर्मनको जिहिक जिय माहिं सदा कल है। कल ह नहिं जाहि कलेशनते न लगै कहुँ ताहि कछू भल है । भल है रसिकेश सदा अति सो हठिकै दृढ़ प्रेमहि जो न लहै ।। नल है निज मीत वियोग कवौं जगजीवनको सुयही फल है ॥८२॥ दोहा-इहि विधि वर्णत लपणतें, प्रीत विरह दुख भीति॥ जनकनुतहि खोजत चहूँ, गई रैनिसक्वीति ।। ८३॥ कहूँ न पाई प्रियहि पुनि, भये विकल रघुराय ।। बंधु कंध धरिक भुजा, वोले अति विलपाय ॥ ८॥ घनाक्षरी कषित। अंक द्युति चंपा अरु संपा चपलाई लई कंज कोमलाई मंजु गजगति लीनी है । लोचन कुरंग दंतदाडिम अधरविव पल्लव सुपानिहरें ग्री या कंबु छीनी है।श्रीफल उरोज केशपन्नग कुमार लीने रसिकविहारी यह प्यारी गति कीनी है । लंकहारिकानन कलंक औ मयंक मुख रंक सब लेक एक शंक मोहिं दीनी है ॥ ८ ॥ दोहा-यों कहि करगाह लपणको, मग डगमग पग चाल ।। कहत सियाको रूप गुण, वृझत चले विहाल ॥८६॥ घनाक्षरी-पषित। सुजन विहीन सुख हीन तनछीन दोन विकल अधीन मोकली. न दुख वोरीसी ॥ रसिकविहारी वरखेनी ह विथोरी शीश विषम वि- योगमें लथोगि वसथोरीमी ।। विरह बिलोरी नेह सिंधुमें हिलोरी वा-. ल निपट न जोरी आ लजोरी अति भोगेसी । वृझो करजोरी प्रिया मोरि गई चोरी कोट देखी कहूँ नवलकिशोरी एक गोगीसी ॥८७॥ दूजी नाहिं नारी जग जाकी अनुहारी और तेज गुण भारी त्यों अ- नूप छवि न्यारी है। पीत रंगमारी हेम भूपण विनिव धारी - । - (२४६) रामरसायन। हारी मंजुकेसरकी क्यारी है ॥ रसिकविहारी सुखकारी सो अपारीनव अति सुकुमारी चारु आनन उज्यारी है। कोऊ, वनचारीने निहारी तो बतावो वेगि ऐसी रूपवारी सो हमारी प्राणप्यारीहै ॥ ८८ ॥ अ- मल कपोलवारी मंजु मुख गोलवारी कोमल सुबोलवारी लोलहगवा री है । पानिप अमोलवारी सुमति अडोलवारी कानन कलोलवार हीय सुखकारीहै।सुचित अलोलवारी सरस सुडोलवारी रसिकविहा री त्यौं अतोल चाह धारी है। कोज वनचारीने निहारी तो बताये बेगि ऐसी रूपवारी प्राणप्यारी सो हमारीहै ॥ ८९ ॥ दीपति अभंग वारी हृदय उमंगवारी छोटे अंग वारी रंग वारी ढंग वारीहै । झीने जीलवारी अति खीनेडीलवारी चारु वेनी लटवारी सुख- देनी सीलवारी है ॥ रसिकविहारी सटकारे कारे केशवारी बेस भेस वारी मिथिलेश देशवारी है । कोऊ वनचारीने निहारी तो वतावो वेगि प्यारी सो हमारी है जु ऐसी रूपवारीहै ॥ ९० ॥ भुकुटी कमानवारी तीखे नैन बानवारी हँसनि कृपानवारीभारी.सानवारीहै । वदन विशालवारी अधर प्रवाल वारी पानी पदलालं वारी मत्तचाल वारीह।। रसिकविहारी नेहवारी दिव्य देहवारी संतत अछेहवारी सत्य नेहवारी है ॥ कोऊ वनचारीने निहारी तौ बतावो वेगि प्यारी सो हमारी है जु ऐसी रूपवारी है ॥ ९१॥ तोटक छंद। इमि दीन सुवैन जु बोलत हैं ॥ वनिता विरही वन डोलत है । जवहीं नव फूलनको निरखें ॥ तवहीं करि हाय हिए करखें ॥१२॥ अविलोकि रसाल न मौरन को ॥ पुनि हेरि लता तरु ओरन को ।। घुलाल विहाल जु होय रहे । अकुलाय मनोजहि बैन कहे ॥१३॥ घनाक्षरी कवित्त । यरे मैन नृपति अनीतिन न ऐसी कर ताहि निरमोही नक दाया ना शरम है ।। तान वाणमाप कहा मैती हों वियोगी दीन जारो मम अंग विरहागिनी परम है । गसिकबिहारी टुक मो दिशि निहारी धीर धरि दे धनुप यह निंदित करम है । येसही मगही प्राणप्यारीके विछोह होती मृतकहि मारखो नवीको धरमह ।। ९ ।।

रामरसायन दोहा-यौं कहि के कछु दृरि चलि, पुनि बोले रघुनाथ ।। अरे मदन शर पाँचहू, छोड़ि हिये यकसाथ ॥ ९ ॥ घनाक्षरी-कवित्त । येरे पंचवाण पांचौ वाण भले मारे मोहिं वीर तुव रोप यह अति उपकारी भो ।। सब दुख छूटो विरहानलकी ज्वालन ते तो शर समेत मम अंग जर छारी भो ॥ अव विन तीरके न हैहै बरियाई तो पै मन तू निरायुधानिपट दुखकारी भो ॥ कोऊ भीति मानिहै कहूँ ना रंच तेरी सदा रसिकविहारी लोक सकल सुखारी भो ॥ ९६॥ सो०-या विधि विरह विहाल, विलपत हेरत फिरत हैं। तिय विद्युरनकी ज्वाल, बढी न नेक सिरात है ॥ ९७ ॥ हेरत हेरत श्याम, बैठ गये मग वीचही ॥ निज मनहीं मन राम, सोचत चित चकितह ॥ ९८ ॥ घनाक्षरी कदित्त । आजलों सुनीना कहूँ ऐसी रघुवंश माहि रसिकबिहारी भई जैसी यह वातहै । ऐसो को जु हेरे रघुवंशिनकी वाम ओर गति भवितव्यते न काहको वसाह । इत मदि सासुके मैंकोच सकुचात अति कुलपति भान रंत तिनहिं लजात ।। नीची अरु उंची मुख करत न गम याते माहें दृग दीने बेटे मन अकुलातहैं ।। ९९ ॥ मो०-चेन राजकुमार, लपण कहो अकुलायर्क । आतप तपनि अपार, इतते उठितस्तर चलिय।। १०० ॥ भुजंगप्रपात उन्द । मुनी धुकी वाणि गजीवनना । तव दीन है लाल बोले सुचना ।। जय ने लिया प्राणप्याग विछोही। तव ते मंत्र देत, ताप मोदी शशीभीतह मो धनो अंग जॉर। विधापान मोडहिये वत्र माद।। पगेट नं. धानना धीर धागे । कटहन मोकोभई निभाग०२॥ सम्माननमें दालमे फूल लाग । करशोर पकी व दाग दाग। या प.मह चना चित्त पागे । छबीली विना मानद भार लाग०३ प.गजाकामा यही का नामहा मोरको मधु को नर्गमें। नकोड या मोहिं. ऐमो लदा भाव हिधी प्यानमिला? - (२४८) रामरसायन। चौ-सुनि अधीर राधवकी वानी समुझाये लछमन गहि पानी ॥ तब कछु धीर धारि रघुराई * वोले बहु गलानि उर छाई १०५ ॥ घनाक्षरी कवित्त । कनक कुरंग कहुँ आज लो न देखो सुनो ताके हेत विनहिं विचार ठिधायो मैं । नारिमत आयो खल छलको न ज्ञान लायो निपट दुरायो चेत सकल भुलायो मैं ॥ मोसम न कोऊ बुद्धि- हीन है त्रिलोक माहिं रसिकविहारी यह दृढ ठहरायो मैं । ऐसी मति मेरी तो नशावतो समस्तकाज याते भई नीकी राजत्यागि वन आयो मैं ॥ १०६॥ दोहा-यों रघुवर वरबंधुसे, कहत अनेकन बात ।। सोच विवश विलपत विकल, सिय खोजत चहुँ जात १०७ मैं इत रघुवर विरहको, कीनो कछू बखान ॥ रामायण नाटक अधिक, देखो सकल सुजान ॥ १०८॥ प्र०वाल्मीकीये ॥ आरण्यकांडे ॥सर्ग५९ ६० ६१ ६२ ६३ ॥ श्लोक ॥ राक्षसं मृगरूपेण चरतं कामरूपिणम् ॥ निहत्य रामो मारीचं तूर्ण पथि न्यवर्तत ॥१॥ त्वरमाणो जगामाथ सीतादर्शनलालसः ॥ शून्यमावसथं दृष्ट्वा बभूवोद्विग्नमानसः ॥२॥ यत्नान्मृगयमाणस्तु नाससाद वने प्रियाम् ॥ शोकरक्तेक्षणः श्रीमानुन्मत्तइव लक्ष्यते॥३॥ वृक्षाद् वृक्षं प्रधावन्स गिरीश्चापि नदी नदम् ॥ बभ्राम विलपत्रामः शोकपंकार्णवप्ठतः॥४॥ककुभः करभोर तां व्यक्तं जानाति मैथिली म् ॥ लतापल्लवपुप्पान्यो भाति ह्येप वनस्पतिः ॥६॥ यदि ताल ल या दृष्टा पक्कतालोपमस्तनी ॥ कथयस्व वरारोहां कारुण्यं यदि ते मयि ॥६॥ किं धावसि प्रिये नूनं दृष्टासि कमले क्षणे ॥ वृक्षरा- च्छाध वात्मानं किं मां न प्रतिभापसे ।। ७ ॥ पीतकौशेयकेनासि मृचिता वरवणिनि ॥धावत्यपि मया दृष्टा तिष्ट यद्यस्ति सोहदम्।।८।। इत्येवं विलपत्रामः परिधावन्वनादनम् ॥ क्वचिदुद्धमते वेगात्वनि विनमते बलात् ॥ ९॥ अदृष्ट्वा तत्र वदेही संनिरीक्ष्य च सर्वशः ।। वान गमः प्राकृश्य प्रगृह्य रुचिरी भुजी ॥१०॥मीतया रहितोद रामरसायन । वै न हि जीवामि लक्ष्मण ॥ वृतं शोकेन महता सीताहरणजेन माम् ॥ ११ ॥ तन्मामुत्सृज्य हि वने गच्छायोध्यापुरी शुभाम् ॥नत्वहं तां विना सीतां जीवेयं हि कथंच न ॥ १२॥ नमद्वियो दुप्कृतकर्म- कारी मन्ये द्वितीयोस्ति वसुंधरायाम् ।। शोकानुशोको हि परंपराया मामेव भिन्दन् हृदयं मनश्च ॥ १३॥ पूर्व मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि ॥ तत्रायमद्यापतितो विपाको दुःखेन दुःसं य दहं वसामि ॥ ४ ॥ पुनः ॥ हनुमवाटके॥शोक। आलिांगताऽवसरसीरुहकोरकाशी पीताधरेति मधुरो विधुमंडलस्य॥ रंगावतारमकरंदविमर्दितानि पुप्पाण्यमूनि दयिते कगतेत्यरोदीत् ।। ॥ १५॥ हा जानकि प्रचलितोत्पलपद्मनेने हा मे मनः कमलकान- नराजहंसि ।। एप प्रिये तव वियोगजवहिदग्धो दानं प्रयामि भवती प्रविलोकयामि ॥ १६ ॥ इत्यादि। इति श्री० रा०र० २० वि० रघुनंदनपिलाप घणनो नाम नृतीयोविभागः ॥३॥ दोहा-कहत परस्पर वचन बहु, सोच विवश अकुलात ॥ सिय खोजत दुहुँ बंधु चहुँ, विपिन चले मग जात ॥१॥ कछुकदूर चलिंक लखे, कानन पंथ मझार ।। रधिर विंदु जहँ तहँ परे, अरु विनशित द्रुमडार ॥२॥ तिहि आगे भूतल परी, रथ खंडित धनुवान ॥ अग निश्वर पद चिह्न महि, देखत हिय अकुलान ॥३॥ निदि पिलांकि बिलपायक, कही लपण नों गम ॥ निश्वर मिय हेतु जनु, कियो इटां मंग्राम ॥2॥ या मोचत कछु और चलि. लसोट नगवीच ॥ तिहि विलोकि रघुबर कही निय लीनी यहि नीच ॥५॥ है निधा यह मिय भनी गृद्ध रंप धालीन।। जाप मोच यशानभन ।६.

रामरसायन । MAM mero E-IN- - ची-निकट जाय अविलोकोताही तब जानो जटायु यह आही ।। चाय राम तिहिं अंक लगायो भये विकल कछुवचननआयो ७॥ पुनि वृझी रघुवर तिहि बाता सो कछु कही विकल विलपाता ॥ सकल कथा वर्णन नहिं पायो तोलगप्राण कंठमाधि आयो८ ॥ तिहि रघुवीर अंक गहि राखो सो खग राम राम इमि भापो॥ हेरिवदन दिशि हग भरि आँसू * गृहराज त्याजो तनु आमू ९॥ गीधमरन लखि सानुज रामा कियो विलाप अतिहि तिहि ठामा। पुनि निजकरते समय समाना रामकृत्य किय सहित विधाना १० तहते चले बहुरि दुहुँ भाई हग भरि करत जटायु वड़ाई ॥ खोजत फिरत सियहि चहुँ ओरा *इकनिश्चरी मिलीवन घोरा १३॥ उदर दीह कुच जंघन छाये * दंत कराल केशविखराये ॥ कलुप अंग लीने मृगव्याला भक्षण करत निशंक निहाला१२ सो निशाचरी लपणहि देखी * भई हृदय आनंद विशेषी॥ घाय आय कर गहि लपटानी * बोली मदन विवश वैवानी १३।। है अजामुखी नाम अनूपा ॐ मोसम तिय न कहूँ सुठिरूपा॥ चलो इतै घन विपिन अपारा तहँ हम तुम मिलि करहि विहारा१४ सुनत बचन लछमन तिहि डाटी* दुहुँकुच श्रवण नासिका काटी॥ सो कुरूप है अतिहि डरानी घोर शोर करि विकल परानी१६ चले बंधु दुहुँ पुनि निरभीता * विपिन चहूँ दिशिखोजत सीता।। लखो फेरि इक निश्वर भारी निपट कराल रूप भयकारी१६|| शीश विहीन ग्रीव तनु कारो आनन उदर थूल वपु भारो॥ विशिख दंत शोणित लपटाना * दुहुँभुज इक योजन परमाना१० सो कवंध निज भुजा पसारी गहि लीने दोऊ धनुधारी॥ भये विवश परि निश्चर हाथा दुख बहुलहोलपण रघुनाथा१८ पुनि औसर लखि राजकुमारा वेगि कृपानतान खर धारा ॥ दक्षिण मुंजा राम तिहि काटी वाम बाहु लछमन द्रुत छाटी१९॥ भयो विकल जब तब अकुलाई बूझी सुनि जाने खुराई ॥ पुनि नृपसुत पूछो तिहि हाला कहो कबंध समस्त उताला २०॥

रामरसायन।
(२२१)
निश्चर हो मैं सुभग अनृपा मुनिन सताऊं धारि कुरूपा ॥
तव अस्थूलशिरा ऋपि कोही दीनी घोरशाप यह मोही॥२१॥
खल तुब यह वपु रहै सदाई सुनि हों गिरौ चरण पर धाई ।।
तब मुनि कही राम वन ऐहैं दुहुँ भुज काटिदाह तुहि देहें२२॥
शुद्ध रूप ताही छिन हैहै रघुवर कृपा परम सुख पहै ।।
सुनि मुनि वचन हीय हरपाना पुनि मैं विपिन महातप ठाना२३
सो लखि विधि प्रसन्न अति भयऊदीर्घ आयु हो यह वर दयऊ ।
तब निशंक ही सुरपति धामा 3 कीनो जाय भूरि संग्रामा २४ ॥
कियो इंद्र तब वज्र प्रहारा 8 गयो शीश मो उदर मझारा॥
सो गति लखिहीं भये दुखारी बहु सुरेश प्रति विनय उचारी २५||
दोहा-नाथ मोहिं अब आजते, जिहि विधि मिलै अहार ॥
कृपा लाय हिय देवपति, कीजे सो उपचार ॥२६॥
तव सुरेश करिके दया, दियो मोहिं वरदान ।।
लंबित हो तुव भुज दुहुँ, योजन येक प्रमाण ॥ २७ ॥
पुनि तुव दुहुँ भुज काटि हैं, राम लपण वन माहि ॥
दिव्य देह धरि अमरपुर, प्रमुदित सुखी रहाहि ॥ २८॥
भयो सिद्धिचर इंद्रको, तबते विपिन रहाउँ ।।
करि केहरि मृग मनुप ही, नित प्रति धरि धरि खाउँ ॥२९॥
सुनि कवंधवच बंधु दुहुँ, सिय सुधि पूछी ताहि ।।
सो भापी मुहि शाप वश, अवह ज्ञान कछु नाहिं ॥३०॥
सररचि मो तनु दाहिये, तर सुदिव्य तनु पाय ॥
यथा शक्ति वर्णन करी, सीता मिलन उपाय ।।३।।
सुनत बंधु दुहुँ सर रचो, तामधि तिहि बैठार ।।
दाह किया प्रगटो सु तक, सुभग शुद्ध वपु धार ॥३२॥
कही सु तब हे राजसुत, कपि सुकंठ दिग जाय ।।
करी मिताई मो तुम, देह सीय मिलाय ॥३३॥
पुनि मतंग वन वसति इक., नारी शवरी नाम ।।
शुद्ध भक्त तुव वृद्ध तिहि, दया दीजियो गम ॥ ३४ ॥

(२५२) रामरसायन। - नाम ठाम गिरि विपिन मग, रामहि सकल बताय॥ गयो कबंध सुदेवपुर, दुहुँ बंधुन शिरनाय ॥३५॥ हरिगीतिका छंद । इमि सुगतिकरि सुकबंधकी दुहुँ बंधु पुनि तहँते चले ॥ बूझत विलोकत सियहि खोजत कर सजे धनु शर भले ॥ इत राम शवरी मिलन आतुर जात हिय उमगात है ॥ अनुरागिनी रघुचंद दरशनहेत उत हरपात है ॥ ३६॥ जब ते सुनी सबरी कि रघुवर चित्रकूटहि छाय हैं। तहँ वास करि सानंद पुनि युत बंधु इहि दिशि आय हैं । तबते सदा उठि प्रातही बहु दूर लौं मग झारही ॥ पुनि धाय छिन छिन जाय उर उमगाय पंथ निहारही ३७॥ कवहूं सुनिर्तत मगन मन सिय राम गुणगण गायकै ॥ कबहूं दुई हग ऍदि बैठत श्याम ध्यान लगाय के ॥ कबहूं अनेक विचार करि करि होय होत हिरास है। कवहूं मुदित मन हँसत शबरी लगी दरशन आश है ॥ ३८॥ कबहूँ विचारत राम मेरे भवन किहि विधि आय जो आय हैं तो भीलनी गुणि मुहिन पद परसाय हैं। काहूं कहत मनमाहिं यों रघुवीर परम दयाल है। लाख दीन दैहैं दरश मो कहँ सत्य जन प्रणपाल हैं।॥३९॥ कबहूं विपिनविच जाय वीनत वेर हिय हुलसायकै ॥ तिन चीखि मीठे जानि रघुवर हेत धरत सुखायके । कवहूं निहोरी मुनीन भापत नाथ नहिं विसराइयो । तुवधाम आ राम तो मुहि दूरतें दरशाइयो ॥४० ॥ इहि भांति शवरी रहति निशिदिन रामपद अनुरागिनी ।। तिहि धन्य भक्ति अनन्य पूरन शुद्धतिय बडभागिनी ।। निय जानि प्रीति प्रतीति मांची रामहिय हुलसायकै । सामित्र संयुत दाशदानो नादि वेगदि आयकं ॥29॥ निगखि गमदि घाय उर उमगायकै चरणनपरी ।। ॥ ".

रामरसायन।
(२५३)
आनंद जल भरिनैन गदगद वैन वर विनती करी।।
सिय नाथ शबरी हाथ गहि वेगै उठाई धीरते ॥
सोगहे लछमन पाँय धोये नेह युत हग नीरते ॥ ४२ ॥
पुनि लाय शुचितृणसाथरी सुविछाय बहु सनमानिके ।।
हुलसाय वेगहि धाय जाय सुबेर दीने आनिकै ।
रघुराय नेह बढाय ले सुख पाय सो फल खात है।
तिहि बार बार सराहि वहु विधि मुदित हिय बतरात हैं ।। ४३॥
घनाक्षरी कवित्त ।
विविध विधानके अनेक पकवान जेते होतहैं जहान मेरी जानसब
सीटहैं ।। रसिकविहारी फल सरस रसाल आदि तेऊ यह स्वाद पाय
सकल वीठे हैं। कंद मूल अधिक अतुल रुचिकारी सोऊ एकहून
इनकी समान मोहिं दोहरंचहून सीठे ना उबीठेयोनदीठेकहूं लपण
कहीतो सत्य कसेवर मीठे हैं॥४॥ब्रह्मके उपासी तपराशी बनवासी
वर विपुल मुनीशनके आश्रम सिधायो में। कीने सनमान तिन
सहित विधान तऊ काहू ठौर कबहुँ न पेट भरि खायो में ॥ अमृत
समान शवरीके इन बेरनमें रसिकविहारी मन भायो म्वाद पायो
में ।। अवध विहाय वन आयो जब ते हो बंधु तवते विचाग सत्य
आजही अपायो में ।। ४५॥
दोहा-शवरी सुनि रघुवर वचन, हिय फूली न समाय ।।
धाय धायकै छिनहि छिन, देत मधुर फल लाय ॥१६॥
घनाक्षरी कवित्त ।
बेर वेर वेरल मगह बेर बेर बहु मिकाविहारी देत वयु कहँ फे.
फेर ।। चाखि चाग्वि भापं यह वाहु ते महान मोटो लेटु नौ लपण या
बखानत दग्दर ॥ र बेर देव वेर शव मु बेर बेर तोउग्घुवीर येर
बेर तिदि टेरटेर बेरजान लावा बेर बेर जनि लामो र जनि
लावो बेर लाको कहें या बेर ॥१७॥
मोग-ददि विधि रघुकुल चंद, अशन कियो पर बंधु युन ।।
शरीप्रति मानंद, बोलेनत्य मद भार॥ १८ ॥

रामरसायन । AAMANA घनाक्षरी करित्त । सदन सिधाऊँ पाऊँ व्यंजन अनेक तऊ याके सम एकहू पदारथ न तूलैगो॥ करि करि प्यार मातु अशन करें, जब मेरे हीय तवहिं सनेह यह शूलैगो॥ आजको अपार सुख कहँलो वखानी सब छिन छिन नित प्रति चित्त अति फूलेगो॥शवरी तिहारे इन बेरनको स्व द मोहिं रसिकविहारी कहूं कबहुं न भूलैगो॥४९॥ दोहा-यौहीं परम प्रमोद भार, वचन कहे बहु राम ॥ सुनि शबरी मन मुदित है, विनय करी अभिराम ॥५०॥ चौ०-ताही छिन सब मुनि सुधिदिलपण सहित आये रघुराई।। शवरीके आश्रम पग धोरे यह सुनि लजित भये ऋपि सारे॥ भक्तिअधीन राम कह जानी आये तहँ मुनिवर विज्ञानी ॥ मिले यथोचित लछमन रामा 83 बैंठे सब शबरीके धामा॥१२॥ राम लपण अरु मुनि समुदाई * करत परस्पर विनय बडाई॥ पुनि ऋपिवर वोले धनुधारी हम इत जल बिन रहत दुखारी है सर सुभग भरो गंभीरा 8 पै नहिं ग्रहण योग तिहि नीरा।। रुधिर वरन वन कीट अपारा * बहु कुगंध नहिं जाय निहारा५४ सो रघुवर तुव पद परसावै * तो वह नीर शुद्ध है जावे ॥ मुनि बूझी सियनाथ प्रवीना किहि कारण जल भयो मलीना॥ तब मुनि कही हेतु यह आई शवरी न्हातरही निशिजाई औचक एक समै लखि लीनी ॐ ताही दिवस बरजि यहि दीनी९६ पै सुनीर इन बहु दिन परसो याते मलिन भयो सर सरसो॥ अब तुव चरण लागि शुचि होवै हम सबको अपार दुख खोवे ५७ सुनि रघुनाथ कही मृदुवानी र होसमस्त मुनिवर विज्ञानी ॥ परम शुद्ध शबरी कह जानी याते कछु दुरभाव नमानी ५८॥ शबरी अवहिं मंग तुब जाव के सर नीरहि निज पद परसावै ॥ व तडाग शुद्ध इहिकाला मकल अमल जल लेहु उताला५९ कहि पुनि बोले घुबीग सुनहु सकल मुनिगण मतिधीरा।। । चहु छल छिद्र न राखी * जोसहि रुच नत्यसोभाखीद ० ----- रामरसायन। (२५५) दोहा-योग याग जप त्याग तप, नेम धर्म व्रत दान ।। इन सबहीते अधिक मुहि, सत्यसनेह सुहान ॥६॥ ऊँच नीच कोऊ करें, सत्य प्रीति मो माहि ।। होय अधमते अधमपै, तिहि वश रहौं सदाहिं ॥३२॥ सुख दुख संपति विपतिमें; जिहि हड़ ममविश्वास ॥. हौ ताकी दुहुँ लोक मधि, पूजी सिगरी आस ।। ६३ ।। जो मेरो जनहोइक, करें और की आस ॥ ताको नाम सुनतही, मोजिय होत उदास ।। ६४ ।। मोठा इमि अनेक वरवैन, रघुवरके सुनि मुनि सकल ॥ भरे प्रेम जल नैन, भयो महा आनंद उर ॥ ६५ ।। ऋपि समस्त मतिमान, विविध भाँति अस्तुतिकरी ।। जै जै कृपानिधान, अधम उधारन धर्म धर ॥६६॥ चौ०-पुनि मुनि राम रजायसुपाई कैशवरिहि सरतट गये लिवाई ॥ तह बोले समस्त ऋपि ज्ञानी परसावो पद सुनि सकुचानी६७ पुनि शबरी रामहि शिर नायो सरजल माँहि स्वपद परसायो। भयो शुद्ध पगलगत सुनीरा निरखत रहे चकित मुनिधीरा६८ सर ऋपि धन्यवाद तिहि दीना आये रघुवर निकट प्रवीना ।। तिनहियथोचित मिलि दुहुँभाई विदाकिये आनंद बढ़ाई ॥६॥ पुनि शवरिहि झी रखुराई के तुम कछु जनकसुता सुधि पाई। सुनि बोली सुकंठ दिगजावो ऐतिहिसहायते सीतहि पावो७०॥ तब रघुनाथ कहीतिहि पाहें * तब गुरु थल हम देखन चाहैं। मुनि शबरी दुहुँ नृप मुत संगा चलि दरशायोसहित उमंगा७१ विपिन विचित्र लता हम नाना परमरम्य नहि जाय वखाना ।। विमल प्रकाश नि दिन रहई विविध समीर मुखद नित बहई७२ सत्यसिंधु जलमय सरमोहे : जिद्दि लखि मान मरोबर मोह। दल फल फूलसकलमत्र काला रह एक हिग केहरि व्याया७३|| लखि मतंगवन केर प्रभावाः रामलपण हिय यमब पावा।। पुनि शरिहि बोले गई है जादु थामअब हिय हुलमाई?

रामरसायन । तब शबरी रघुवर पगलागी * करि बहु विनयभक्ति दृढ माँगी। शुद्ध प्रीति लखि कृपानिधाना * दियो यथारुचितिहि वरदाना७५ पुनि शबरी सर विरचि उताला * दही देह योगानलज्वाला ॥ दिव्यरूप लहि बैठि विमाना * मुदित कियो सुरधाम पयाना ७६ दोहा-उत शबरी धरि दिव्य तन, मुदित गई सुरधाम । इत सुग्रीवहि मिलनहित, चले बंधु युत राम ॥ ७७ ॥ सीतहि खोजत बंधु दुहुँ, चहुँ गिरि बिपिन मझार ॥ आये पंपासर निकट, हेरी छटा अपार ॥ ७८॥ इतिश्री० रा०र० वि० वि० वनअटन वर्णनो नाम चतुर्थोविभागः ॥४॥ दोहा-पंपासर शोभित विशद, विमल नीर गंभीर।. सुभग विपिन दरशत चहूँ, सरसत विविध समीर ॥१॥ द्रुम वल्ली दल फूल फल, विविध अनूपम रंग। छाय रहो ऋतुराज चहुँ, कूजत विपुल विहंग ॥ २॥ लखि वसंतऋतु राम अति, विलपत प्रिया विहीन । है अधीर गहि बंधु कर, कहत वचन अति दीन ॥३॥ जनकसुतहि खोजत लपण, वीति गये द्वैमास । कछु न मिली सुधि अजहुँलों, अब जिय होत निराश ॥४॥ हाय प्राणप्यारी विना, अब किमि धारौं धीर। मिलि ऋतुपति रतिपति हिये, मारत तकि तकि तीर ॥५॥ अविलोको किहि भाँति चहुँ, छाय रहो ऋतुराज । फिरें मत्त मधुपान करि, प्रमुदित मधप समाज ॥६॥ घनाक्षरी कवित। झमहें चहुंचा गजराजसे रसाल भूमें घूमहें समीर तेज तरल तुरंगज्या किंशुक गुलाब कचनार औ अनारनके प्यादे भांति भांति लम महित उमंग त्यां। छाई नव वल्ली छटा छहर रही है धनी तई सय गजें मार भ्रमत अभंग क्या । रसिकाविहान साज माज ऋतुराज आयो छायो यन बाग मेनालीने चतुरंग यौं ॥ ७ ॥ कहूं भीर गुड मंद सम्म मुहाये गुर कोकिला अलाप कद मधुर उनार हैं। रहे पाटय मदुल छवि छांव कई महक प्रमननकी कई मुखमा है। .

रामरसायन। (२५७) कहूं चटकाहट गुलावनकी लोनी प्रात कहूं शर मैन नर नारिनको मार हैं । रसिकबिहारी साज नागरी सिंगारे कहूँ अजब अनोखी ये वसंतकी बहारें हैं ।। ८ विलिन वसंत ज्यौ नवेलिन वसंत वन बागन वसंत रंग रागन वसंत है। कुंजन वसंत दिज पुंजन वसंत अलि गुंजन वसंत चहुँ ओरन वसंत है ।। छैलन वसंत अरु फैलन वसंत संग सेलन वसंत बहु गैलन वसंत है ॥रसिकविहारी नैन सैननमें वैननमें जितै अविलोकौ तितै वरसै बसंत है॥९॥निर्तत मयूर महा मुदित मयूरी मिलि मत्त अलि डोल लिये अलिनीलसंत सो। रसिकविहारी कीर सारिका सुकोकिलादि करत कलोल कलि कूजत हसंतसो । निज निज नारी संग अपर विहारी चहूँ खेद जड चेतनंको सकल न संत सो। संत सम सुखद वसंत सबहीको यह प्यारी बिन मोको भयो दुखद असंतसो ॥१०॥ प्र०॥ वाल्मीकीये ॥ किष्किन्धाकांडे ।। सर्ग ॥ १ ॥ श्लोक । अयं वसंतः सौमिवे नानाविहगनादितः ।। सीतया विप्रहीनस्थ शोकसंदीपनो मम ।। १ ।। संतापयति सौमित्र क्रूरश्चैत्रबनानिलः ।। अमी मयूराः शोभते प्रनृत्यंतस्ततस्ततः ॥२॥ इत्यादि । दोहा इहिविधि बहु वर्णन करत, लखि वसंत चहुँ ओर ॥ प्राणप्रिया विन विकल अति, विलपत राजकिशोर ।। ११ ।। इत उत हेरत लपण युत, ऋष्यमूक गिरि पास ॥ आये फिरत मतंग वन, सिय विन निपट हिरास ॥ १२॥ तहँ गिरिपर कपि पंचये, हनुमान सुग्रीव ॥ तार नील नल रहत नित, परम भीम बलसीव ॥ १३॥ ची-जब मुग्रीव लखे दुहुँ वीराक तब हनुमंतहि कही अधीरा ।। भेद लेहु वेगै तुम जाई ? को किहि देत फिरें इहि ठाई ॥१४॥ तद हनुमान विप्र तनु धारी आय जति वर गिरा उचारी ।। पुनि कर जोरि विनय युतरीतीक वृझी कपि सब कथामग्रीती।। १५|| सुनिलछमन गुणज्ञान निधाना निज चरित्र सब कियो वखाना ।। तब हनुमंत स्वामि पहिचाने पुलकि सप्रेम चरणलपटाने ॥ १६॥ पुनि लछमन वृझो कपि हालाई कहो पवनसुत मकल उताला॥ राम बंधु मुनि अति हरपाने को बोले वहरि सत्यहित माने ॥१७॥ १७ २५८) रामरसायन। घनाक्षरी फायत। जाकी इंद्र वरुण कुबेर कृपा चाहं सदाजाके नारदादि ऋपि सेवर चरणहें । परम प्रचंड खल खडिवे उदंड जाके दोऊ भुजदंड दिन दुखके हरणहैं।।चक्क नरेश अवधेशके किशोर वीर संतत त्रिलोकहूवे पालन करणहैं ॥ धीर धनुधारी तिय विरह दुरखारी गम रसिकनि हारी सो सुकंठके शरण हैं ॥ १८ ॥ म०॥ किष्किन्धाकांडे ।। सर्ग:४॥श्लोक ॥ यस्य प्रसादे सततं प्रसीदेयुरिमाः प्रजाः ॥ स गमो वानरेंद्रस्य प्रसादमभिकांक्षते ॥३॥ सर्वलोकस्य धर्मात्मा शरण्यः शरणपुरा।। गुरुमें राघवः सोयं सुग्रीवं शरणं गतः॥ ४॥ इत्यादि ॥ चौ०-सुनि अंजनिसुत विनती कीनी कहिसुकंठ गति धीरज दीनी पुनि कपि रूप धारि हनुमाना* लै निज कंध दोउ वलवाना ॥१९॥ ऋष्यमूक गिरि पर द्रुत आये 8 प्रमुदित हाल समस्त जनाये ॥ सुनि सुग्रीव धाय ढिग जाई परे चरण आनंद अघाई॥२०॥ तव रघुवर उठि अंक लगाये * नीति प्रीति मय वचन सुनाये ॥ सुनि सुग्रीव परम सुखमाना * निज निज गतिदुहुँ कीन बखाना२१ दोहा-पुनि रघुवर सुग्रीव दुहुँ, शिपि साखी विच दीन । प्रीति निरंतर परस्पर, शुद्ध सत्य दृढ कीन ॥ २२ ॥ राम कही हति वालि हो, तुमैं करौं कपिराय ।। मुदित कही सुग्रीव मैं, हौं सियहि मिलाय ॥२३॥ पुनि बैठे इक ठौर मिलि, गहे परस्पर हाथ ।। वर्णत निज निज शोक गति, दुहुँ सुकंठ रघुनाथ ॥ २४ ॥ चौ०-ताछिन सुग्रीवहि सुधि आई * बोले अति आतुर उमगाई ॥ शीत काल आतप सुखपाई हौं कपि युत बैठी रघुराई ॥२५॥ ताही छिन नभते इहि ठाई भूपण गिरे अचानक आई ॥ को जानै किहिके सो आहाँ लै धरि दये कंदरा माहीं ॥२६॥ वर भूपण अमोल सुठि रूपा कंचन मय माण जटित अनूपा ॥ पै अव ही सुसत्य अनुमानी के हैं ध्रुव जनकसुताके जानी।॥२७॥ - रामरसायना , सुनि सुग्रीव बचन रघुराई बोले सपदि प्रेम उमगाई॥ हाय सखा कित वेगहि लावो सो प्रिय भूपण मोहिं दिखावो२८॥ सुनि सुकंठ अति आतुर जाई रामहिं दिये सुभूपण लाई ॥ उठि रघुवीर हुलसि हिय लीन है निज प्राणप्रियाके चीने ॥२९॥ घनाक्षरी-कवित्त। भूपण सु लेतही पिछाने निज लोडिलीके हिय हुलसायो अति रसिकविहारीको।।कार करि प्यार फेरि फेरि तिहि हेरौं श्याम कलित केयूर मंजु रूप उजियारीको ॥ चूमि चूमि कुंडल निहारें नेह ऊमि ऊमि बार वार धार कर जानि सुकुमारीको ॥ भरि भरि नैन वैन वोलें उर लाय लाय हाय यह नृपुर हमारी प्राणप्यारीको ।। ३० ॥ दोहा-यों सिय भूपण हेरि के, प्रेम विवश रघुवीर॥ करत विलाप विहाल आति, तन मन भयो अधीर ॥३१॥ पुनि बोले वर बंधुसे, राघव अति विल पाय ॥ भूपण प्राण अधारके, लखौ लपण ये आय ॥३२॥ रामानुज कर ले निरखि, भरे नीर दुहुँ नैन ।। गदगद कंठ सनेह मय, कहे सत्य वर वैन ।। ३३ ।। घनाक्षरी कवित्त। अमल अमोल गोल कुंडल प्रकाशमान ऐसो दरशात कोऊ राजभामिनीको हैं ।। तैसही अमंद भुजवंद चंद ते दुचंद दीपति सु दिव्य दुतिहारी दामिनीको है । परम पुनीत पद भृपण अनृप चारु पूजनीय संतत त्रिलोक नामिनीको है ॥ रसिकविहारी और नाहि पहिचानें एक जान यह नृपुर हमारी स्वामिनीको है ॥३४ ।। ची-सुनि सुबंधुवाणी रघुराई ले उसाँस योले विलपाई॥॥ हैं तिहुँ भूपण प्राणप्रियाके पाये आज अधार जियाके॥ ३५।। यो कहि पुनि सुकंठ प्रति भाखे सो भूपण लगाय उर गवे ।। कहो सखाको हरी जानकी फितलगयो अधार प्राणकी ॥३६॥ सुनि सुग्रीव कही मृदुवानी को कहको कितगो पदिय धीर धर्ग घुगई होलही मिय

(२६०)
रामरसायन।
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यौं कहि पुनि बहु धीर धराई श्री राम सुकंठ लये हि
बोले वचन नेह दुख साने विरही हम तुम दोउ मिला
बहुरि कही रघुवर सो भापो किदि कारण वाली
सुनि सुकंठ बोले कर जोरी राजकुंवर कछु मोरिन खो
सो०-मायावी जिहि नाम, असुर जु आयो इक र
वालि कियो संग्राम, भ्रात संग होहू रहो ।। १०
पुनि सो असुर पराय, जाय धसो महि विवर :
वालि क्रोधवश धाय, तिहि पाछे प्रविशो तहाँ
मोहि राखि बिल द्वार, भ्रात कही यक पक्षलों
नहिं आऊं तिहिमार, तौलखिया हौं हत भयो ।
मैं तिहि आयसुधार, तितहि रहो यक मास ला
शोणित तबै अपार, बहो नदी सम विवरतें ॥ ४६
भ्रात वचन हौं पाय, जानो बाली हत भयो ।।
शिला विवर मुख लाय, आयो भय दुख शोक वर
तब पुर लखि पतिहीन, सब मंत्री हित बंधु मिति
राज तिलक मुहिं कीन, करन लगो नृपकाज सब
कछु दिन गये कपीश, ताहि मारि आयो सदन ।।
करी मोहिं लखि रीस, कहि कटु वच ताडन कियं
हरिलीनी ममनारि, एक बसनदै मोहिंसो ।
गृहते दियो निकारि, प्राणघात लाई तऊ ।। ४७।
तिहि भयते चहुँ ओर, विकल फिरो बहु वर्पलों।
इहां शाप अति घोर, याते रहौं निशंक इत ।। ४८
सुनि सुकंठके बैन, दुखित भये जल नैन भरि ।।
वाले करुणाऐन, वेगि वालि हौं मारिहौं ।। ४९॥
चौ०-राम वचन सुनिकै सुग्रीवा कही नाथ वाली बल
अकथनीय ताको पुरुपारथ सुनो सकल मैं कहाँ यथार
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रामरसायन। 4 दिनकर उदै होन नहिं पा चहूं सिंधु संध्या करि वें ॥५॥ कवहूँ कीश कोलि जियलावै तव गहि गिरि नभ ओर चलावै ॥ पुनि कंदुक सम सो कर झेले*इहि विधि अमितःबार वन खेलै५२ दोहा-अपर वालि बल सुनिय प्रभु, दैत्य दुंदुभी नाम ॥ जिहि सहस्रगजमत्त बल, गिरि समान वपु राम ॥५३॥ असुर मत्त सो युद्ध हित, गयो सिंधुके पास ॥ ताहि विलोकि नदीशके, उर छाई बहु त्रास ॥ ५४॥ तब पयोधि सविनय कही, हम तुव लायक नाहि ।। बली हिमंचल करहिंगे, युद्ध जाहु तिन पाहि ॥ ५५ ॥ सुनि दुंदुभि हिमगिरि निकट, आयो अतिहि रताल ॥ गौरि पिता तिहि देखिकै, भये निपट वेहाल ॥५६॥ तब कर जोरि अधीन है, बोले वचन गिरीश ।। तुमते भिरै सु एकहै, वाली वली कपीश ॥२७॥ सुनत दुंदुभी महिप वपु, गिरि समान विकराल ॥ किष्किघामधि घोररव, कीनो आय रताल ॥५८॥ सो सुनि वाली क्रोध युत, धाय कीन बहु युद्ध ।। अमित काल लग परस्पर रहे दुहूँ रण रुद्ध ॥५९ ॥ पुनि कपीश तिहि वध कियो, गहि महि पटक पछार ॥ दुंदुभिमुख ग श्रवणते, चली रुधिरकी धार ।। ६०॥ पुनि वाली कर तालि तिहि, वपु फेको रिस ठान ।। सो मतंग आश्रम परो, योजन एक प्रमान ॥६॥ रुधिर विंदु बहु मुनि निकट, परे भयो अति शोर ।। धाये चीकि मतंगवन, लखो महिप मृत घोर ॥ १२ ॥ गिरि समान तनु गिरतहीं, भो बहु विपिन विनाश । कियो क्रोध मो देखिकै, मुनि मतंग तपराश ॥ ६३॥ त्रिकालज्ञ ऋषि ध्यान धरि, लखो वालिकृत हाल ॥: तब कपीशहित क्रोधवश, दीनो शाप कगल ।। ६२ ।। मम आश्रम वाली कबहुँ, आव योजन माहि ॥ - (२६२) रामरसायन। सहस खंड तिहि शीशके, तौतत्क्षण है जाहिं ॥ ६५ ॥ ताते वालि न आवही, इत इक योजन माहिं ।। याते हौं इहि ठौर अति, निर्भय रहो सदाहि ॥६६॥ चौ०-यौं सुकंठ वाली वलगाथा* कहत सुनत लछमन रघुनाथा। सहजहि डोलत विपिन मझारा पंचकीश दुहुँ राजकुमारा ॥ ६॥ सो दुंदुभी अस्थि अति भारी गिरिसम निरखि लपण धनुधारी ॥ बामचरण ते सहज उठायो द्वैशत धनुप प्रमाण बहायो॥६८॥ पुनि सुग्रीव कही रघुवीरा * कपिपति महाबली रणधीरा ॥ याते मुहि अपनी कदराई तिहि वध सहज न परत जनाई६९!! दोहा-धनुप प्रमाण कहावही, अर्ध अधिक त्रैहस्त ॥ सो दै शत धनु अस्थि यह, फेंको लपण समस्त ॥ ७० ॥ पैविलोकि ये राजसुत, वाली बल है भूरि ॥ द्वैशत धनते होत है, यक योजन बहु दूरि ॥७१ ॥ चौ०-सुनि सुग्रीव वचन रघुराई * कहि बहु वीर रीति समुझाई ॥ बहुरि सुहिय विचार ठहराई तिन प्रतीत हित सहज सिधाई७२ सो दुंदुभि वपु अतुलित भारी रघुवर पद अंगुष्ट निज धारी ॥ सहज पँवारि दियो बलवाना परोसुदशयोजन परमाना७३|| दोहा-सो लखि कही सुकंठ पुनि, बल न कळू विलगान॥ तव वाली दुहुँ मध्यको, अधिक सु न्यून समान ।। ७४॥ सहित रुधिर त्वच मांस गरु, वाली फेको ताहि ॥ शुप्कभयो बहु दिवस हरु, अब मेलो प्रभु याहि ।। ७६ ॥ चौ०-सुनि रघुनाथ कही मुसक्याई तुव उर जिमि प्रतीति ठहराई । वरणो वेगि सु हम दरशा जिहिलखि सब निश्चय उरला३७६|| तव सुग्रीव कही रघुलाला शाल सात ये विटप विशाला॥ गहि वाली झकझोरत जवहीं - पत्र हीन हो तरुतवहीं ॥७॥ सो प्रभु यक शरते तरु एका पत्र हीन कीजे धरि टेका। तव तव वल वाली समजानी कतिहि वधकी प्रतीत उरआनी७८ मुनि सुग्रीव वचन बलवाना कः सातहु तर वेधे इक वाना॥ पत्री पत्र हीन करि पत्री २ः प्रविशो तूण प्रवेशिधरत्री।।७९॥

रामरसायन । (२६३) सो प्रभाव लखिक मुग्रीवा की जानी दृढ रघुवर बलसीवा ॥ गहि पद कीनी विनय सप्रीतीनाथ मोहिं अवभैपरतीती ८०॥ दोहा-इहि विधि करि बहु चरित पुनि, आप कियो विश्राम !! सह मुकंठ रघुवर लपण, अपर कीश वलधाम ।। ८१ ॥ इति श्री० रा० र० वि० वि० श्रीरामसुग्रीवमिलन वर्णनो नाम पंचमोविभागः ॥५॥ दोहा-पंपासरते सरस शुचि, लाये लपण प्रवीन । कंद मूल फल फूल मधु, स्वादित खग मृग मीन ॥१॥ करि कबंधवाणी सुरति, अशन कियो हरपाय ॥ खग मीनन को स्वाद बहु, वर्णत हैं रघुराय ॥२॥ प्र० ॥वाल्मीकोये। आरण्यकांडे ॥ सर्ग७२॥श्लोक। घृतपिंडोपमान स्थूलान्तान्दिजान् भक्षयिप्यथ ॥ रोहितांश्चक्र- तुंडांच नलमीनांश्च राधव ॥ १ ॥ पंपायामिपुभिर्मत्स्यास्तत्र राम वरान्हतान् ॥ निस्त्वपक्षानयस्तप्तानकृशाऽनेककंटकान् ॥ २॥ तव भत्तयासमायुक्तो लक्ष्मणः संप्रदास्यति ॥ भृशं तान्खादतो मत्स्यान्पंपायाः पुप्पसंचये ॥३॥ इत्यादि। दोषई उन्द । यो प्रमुदित कछु दिवस रहे पुनि कही सवहि श्रीरामा ।। करिहीं वेगि वालिबंध गमनी सजिकिष्किघाग्रामा। दे आजा गदि बाण शरासन चलेसबंधु रताला॥ संग मुकंट आदि कपि पाँचहुँ हर्पित बलीविशाला।। जाय नगरमन्निध सब वनमधि गहि तम ओट विराजे ॥३॥ पाय रजाय मुकंट आय तुर पुगेद्वार बहु गाजे ॥ मुनि वाली क्रोधित है धायो भिरे सबल मुग्रीवा ।। दोउ.भात उद्धयुद्ध अति दुहुँ अमित बलमीश ॥2॥ इत रत रखत मुकंठ सुयुद्धत तर काक्रोध होगा। हने अमित तरमुष्टि कसम वैधुदि घरि भुज शीशा ।। है पिहाल मुमीच पाने ऋप्पभूक वनलीना ।।

(२६४) रामरसायन। वालि न गयो शापभय तहँते भवन गवन द्रुत कीना ॥५॥ जाय सुकंठ विकल रघुवर सो कही नाथभल कीना ॥ दै:विश्वास पठाय भिरायो फेर फेर मुख लीना ॥ मुनि श्रीराम अंक भरि भापी हौ दोऊ इकसारा॥ हौं ताही भ्रम भीति विवश है वाण न कियो प्रहारा ॥६॥ यौं कहि राम सुकंठ कंठमधि गज पुप्पी पहिराई ॥ भापी जाहु चिह्न अब लखिकै ध्रुव मारौं कपिराई ॥ प्रभुरजाय वश चले सुगल पुनि फिरि फिरि हेरत पाछे ॥ दृढ़ कर हीय आय पुर द्वारे गर्जत भये सु आछे ॥७॥ सुनि वाली पुनि उठो क्रोध वश तब तारा सब भापी ॥ राम सुकंठ मित्रता प्रथमहि जो सुतमुख मुनिरापी । सो तिय शीश हरीश नमानी भिरो आय बलवानां ॥ दोऊ भ्रात विरुद्ध क्रुद्ध भरि उद्ध युद्ध बहु ठाना ॥ ८॥ भये थकित सुग्रीव विकल पुनि हेरत बारहिवारा ।। तब रघुवर तरु ओट दूरते बाण वालि उर मारा॥ गिरो कपीश भूमि विह्वल है सजि शर राघव धाये ।। दुहूँ बंधु चहुँ कपि संयुत द्रुत तामु निकट चलि आये ॥९॥ तिनहि निहारि वालि इमि भापी यह न वीरको धर्मा ।। क्षत्री 8 भूपति दुरि मारो कीनो राम अकर्मा ॥ तब रघुवीर कही सुन हरिपति अनुज वधू तू लीनी ॥ याते तोहिं दंड वध दीनो नहिं अनीति कछु कीनी ॥ १०॥ इहि विधि दुहुँ कटु मृदुल बैन बहु कहे वालि अरु रामा । तजो प्राण कपि भयो शोर चहुँ सब धाये तजि धामा । तारा अरु अंगद बहु पिलपत आरतगिरा पुकारी॥ कीश ऋच्छ किप्किवावासी रुदन करत नर नारी ॥११॥ तब रघुवीर धीर दै सवहीं सुग्रीवहि समुझाई ॥ मृतक किया वर सविधि यथोचित सकल सपदि करवाई। पुनि आजाद अनुजहि प्रमदित हृत भेजो रघुनाथा ॥ जाय लपण पुर साजि सुकंठहि कियो तिलक कपिनाथा ।।१२|| रामरतापन। इहि विधि वालिहिमारि राम अरु कार सुग्रीवहि राजा।। हनुमंतहि मंत्री दृढ़ थापो अंगदको युवराजा ॥ तारा भ्रात नारि निज नारी रुमासहित कपिनाथा॥ रहत सदा सानंद राज लहि विलसत भये सनार्था॥ १३॥ वरपा काल निरखि श्रीरघुवर सानुज गिरि पर छाये ॥ परमरम्य कंदरा शिलावर द्रुम फल फूल मुहाये ॥ पावसऋतु लखि राम विरह वश प्यारी विन अकुलाहीं॥ नैन नीर भरि दीन वैन बहु वोलत अति विलपाहीं ॥१४॥ दोहा-वरपा हिय करपा करत, रंच दया हिय नाहिं ॥ विरहीको जिय लेन को, मदन पठायो माहि ॥ १५॥ घनाक्षरी कवित्त । कीधौं विरहीके प्राण दाहे धूम धुंधर ये कोधौं सपक्ष गिरि उ- डत उतंग हैं। कीपी ऋतु पावसके विविध वितान तने कीधौं नभ मंडलमै तरल तुरंग हैं। रसिकविहारी कीचों बालक निशाके श्याम कौधौं वरपाके दूत डोलत सुढंग हैं ॥ कीधों युगमासके विलासके अवास मोहें छूटे किधों मदन महीपके मतंग हैं ॥ १६॥ आवत चहूंघा वन घेरि नभ मंडलमें करत अँध्यारी भारी गरजत जोरसे ।। दुरि दुरि दौरि विनु छटा छहरात ज्याही त्याही तरु तोरें पौन प्रवल झकोरसे ॥रसिकविहारी मोर मुदित पुकारत जित तित झिल्ली झनकारत हैं जोरसे ॥ वरसत नीर धारा धरणी धरै न धीर होत हैं अधीर सब मदन मरोरसे ॥ १७॥ घुमडि घनेरे घहरात घन घेर घेर झुम झुम घूम घूम मंडित घमंड है ॥नि अँधियारी कारी कारी भयकारी भारी जोरते झकॉर पीन प्रबल प्रचंडही।दादुर दिमाक दरशा दिशि चाराभले झिल्ली झनकारें सुरदीरव अखंड है।रसिकविदारी दुति दामिनी दमक देखि अवला सशंक यह पावस रदंड है ।। १८ ॥ पात्र हैं वलाक झुंड झुंड नभमंडलमें नीके कोकिलानके मुग्म मुर मात्र हैं। गुंजत मधुप ज पुंजनमें कुंजनमें बोलत पपीहा पीर पीर रंग राचें हैं।। रसिकबिहारी टर आनंद अपार होन पावमके

।२६६)
रामरसायन।
June
-
साज सबै सांचे सुख सांचे हैं। लरज उठे हैं सुनि मेवकी गरज
देखो बागनमें मुदित मयूरगण नाचे हें ॥ १९ ॥
सपैया पयित ।
झुमिरहीं दुमडोरै चहूँ दिशि भूमि हरी लखि होत हरो हिय॥
लोनी लता लपी तरु अंगन मानो नवेली रहीं मिलिक पिय ।।
इन्द्र वधू छवि छावें चहूँ रसिकेशविलोकतही हुलसे हिय ।
श्याम मनाये न मानतीं जो सोई आपुहिते तजिमान मिले तिय २०॥
वरसै बहु नीर फुहारनतें अविलोकि बनो विरहासरसै ॥
सरसै दुख देखत कुंजनको रसिकेश मनोज जहां दरसै ||
दरसै चहुँ प्राविट रूप अनूप वियोगिनी हाय हिये तरसै ॥
तरसै घनश्याम विना घनश्याम लखे छिन बीतत है वरसै ॥२१॥
घनाक्षरी कविता
घन गरजैहै किधौं दुंदुभीरसेशकी है छाये मेघ कीधौं तने पावस
वितान हैं। संपाकी दमक कीधौं चमक कृपाणनकी कीधों नीर बुर्दै
कीधौं मदनके वान हैं ॥ पवन प्रचंड कौंधौं दूती या विरहकी है
रसिकविहारी ऋतु कीधौं भूपसानहै ।। उडत बलाक कीधौँ आनंद
वियोगिनके जरत जवासे किधौं विरहीके प्रान हैं ॥२२॥ हीय
मुद्दानी रतिरानीके प्रगट भयो पावस सपूत पूत सब सुखदाई है ।।
सुनि हरपायकै सिधाई चारु इन्द्रवधू मधवा अनंद है अमीकी
झरि लाई है। निर्तत कलानि कल कोकिल करैहैं गान दल फल
फूल सौंज दिशन सजाईहै ॥ रसिकविहारी घन गरज मची है आज
मदन नरेश द्वार बाजत बधाई है ॥ २३ ॥
दोहा-यौं बहु विधि वर्णत विलखि, लखि पावस भरि नैन ।
विरह विवश अति दीन पुनि, रघुवर बोलेबैन ॥२४॥
सवैया कवित।
अति शीतल मंद सुगंध समीर सदा तिहि को तनु जापरसौ ॥
कल कोकिल चातक मोर मलिंद उतैरव मंजु महा सरसौं ।
वर इंद्र वधू वक दामिनि हो नवभामिनिके दिग जा दरसौ ॥
रसिकेश जहाँ मम प्राणप्रिया घन घेरि घनें तहँजा वरसौ ॥२५॥

रामरसायना (२६७) दोहा-इमि कहि पुनि वर बंधुसे, वोले निरखि अधीर ।। सुनो सुनौ हेरौ लपण, प्यारी गति मति धीर ॥२६॥ घनाक्षरी कवित्त । धाय धाय वैठत कदंब जंबु अंबनकै चाय टकलायलाय मेरीओर हरैहैं ।। आय आय बोलै वार वार छाय छाय शोर भाय भाय डोल डार डार चहुँ फेरै है ॥ जाय जाय दुरत घरीक प्रीति पाय पाय रसिकविहारी रहै इत उत नरहै ॥ जीव तरसाव पीउ पीउ रटलावै हाय होयकै पपीहा प्राण प्यारी मोहि टेरै है ॥२७॥ दोहा-इमि पावस लखि राजसुत, विलपत होत अधीर ।। अमित भांति समुझायक, लपण धरावै धीर ॥२८॥ प्र०॥ वाल्मीकीये किफियाकांडे | सर्ग ॥२८॥श्लोक। अयं स कालः संप्राप्तः समयोऽयजलागमः ।। संपश्यत्वं नमो मेघैः संवृतं गिरिसन्निभैः ॥ ४ ॥ कचिदाप्पाभिसंरुद्धान्वपीगमसमुत्सु- कान् ।। कुटजान्पश्य सौमित्रे पुप्पितान्गिरिसानुपु ) मम शोका- भिभूतस्य कामसंदीपनान्स्थितान् ॥५॥ इत्यादि । इति श्री०रा०र०वि०वि०वालिवथवर्णनो नाम पष्टोविभागः ॥६॥ सो०-इहि विधि राजकिशोर, पावस विलपि वितीत किय ।। शरद निरखि चहुँ ओर, काजसमै गुणि मुदित भे ॥१॥ उत प्रथम हनुमान, सुरति दिवाय सुकंठको। भेजे बहु वलवान, सुभट बुलावन हेतु चहुँ ॥२॥ ची०-इत रखवीर लपण प्रति भापीकलखो सुकंठ तुरति नहिं राखी॥ राजतीय लाहि के सुखसारो भये मत्त ममकाज विसारो॥३॥ इहि विधि राम कोषकारभारी कही लपण जावो धनुधारी || कहो वेगि वनवरहि बुझाई ? अब विलंब तुव नाहिं भलाई ॥४॥ सुनि लछमन धनु शर कर धारी आये कोधित नगर मझारी ।। राजदार मधि खबर जनाई क अंतर गये रजाय मैंगाई॥५॥ गृह पटत फिय धनुप टॅकोराई पूरित भयो शोर चहुँ ओग ॥ लपणकोषलखिअंगद धाई कपिनाथहि गति सकल सुनाई। लपणकोपसुनिक हरिपाला भेजी तारहि लिख उताला॥

(२६८)
रामरसायन।
सो सुंदरी आय शिरनाई * करि,बहु विनय सुधीर धराई ॥७॥
तारा अरु अंगद हनुमाना करि बहु विनय सहित सनमाना॥
सादर लै सँग महल पधारे जाय लपण कपिपतिहि निहारे ८॥
सदन विचित्र अनूपम साजे * कंचनमय आसन वर भ्राजे ॥
रुमारूप मय गल भुज धारी अपर अनेक लसैं नवनारी ॥९॥
प्र० ॥ वाल्मीकीये । किष्किन्धाकांडे सर्ग ॥ ३२ ॥श्लोक ।
दिव्याभरणमालाभिः प्रमदाभिः समंततः ॥ संरब्धतररक्ताशो-
वभूवांतकसन्निभः ॥ १॥ रुमां तु वीरः परिरभ्य गाढं वरासनस्थो
वरहेमवर्णः ॥ ददर्श सौमित्रमदनिसत्त्वं विशालनेत्रः स विशाल
नेत्रम् ॥२॥ इत्यादि।
चौ०-लपण हि देखि उठे कपिपाला *रामबंधु कह वचन कराला
तब तारा पुनि बहु समुझाये कही सुभट हरिनाथ बुलाये ॥१०॥
सो सुनिलपणधीर उर धारी तब सुकंठ वर गिरा उचारी ॥
तन धन प्राण राज परिवारा हौं अर्पण किय प्रभु हित सारा॥
यौं कहि पुनि उताल शिष दीनी पवनपुत्र प्रति आयसु कीनी ॥
महि मंडल जेते कपि ऋच्छा आवें वेगि सकल ममशिच्छा१२॥
सुनि कपि पुनि भेजे भट धाये नभ मग वेगि विपुल चहुँ जाये।
मिलि सुकंठ लछमन दुहुँअंका* बैठे मुदित एक परयंका ।। १३॥
पुनि सुग्रीव तियन शिप दीना निज निज ठाम गमन सब कीना॥
वेगहि शिविका सुभगमँगाई बैठे लपण सहित कपिराई ।।१४।।
छन चमर व्यजनादिक साजा लिये यथोचित कीश समाजा॥
मुभट शस्त्रधारी बहु संगा * आये प्रभु ढिग सहित उमंगा॥ १५॥
दूरहि उतरि यानते कीशा * लजित प्रभुपद नायो शीशा ॥
राम सखहि उठि अंक लगावा सादर गहि समीप बैठावा।। १६॥
तब सुकंठ बहु विनती कीनी रामनाति मय वर शिप दीनी ॥
ताही छिन कपि ऋच्छ अपारा आये विविध वीर परियारा १७
दोहा-महि मंडल जेते सकल, हैं कपि ऋच्छ विशाल ।
ते हरीश आज़ा सुनत, आये मुदित उताल ॥ १८॥

रामरसायन। (२६९) . कीशपतिहि रामहि सबै, सादर नायो शीश ।। भये मुदित प्रभु हेरिकै, अगणित ऋच्छ शुकीश ॥ १९ ॥ तब सुग्रीव बुलाय ढिग, मुख्य मुख्य कपि ऋच्छ॥ करी सबहि भय प्रीत युत,सिया शोध हित शिच्छ ॥२०॥ कही वेगि तिहुँ लोकमें, हेरो सीतहि जाय ।। दिवस पंचदश मध्यदुत, आवो शोध लगाय ॥२१॥ विनत नाम कपियूथपति, तिनाह मुकंठ बुलाय ।। कही सुभट तुम सीयको, शोधहु पूरख जाय ।। २२ ।। हनुमत ऋच्छप वालिसुत, नीलादिकन नृपाल ॥ भापी दक्षिण दिशि सबै, सीतहि लखौ उताल ॥२३ ।। पश्चिम दिशा मुपेणको, सादर कह कपिराय ॥ पुनि शतवलीसुकीशको, उत्तर दई रजाय ॥ २४ ।। इमि चहुँ दिशि अरु विदिारी पुनि, सातहु स्वर्ग पताल ॥ बहु भूगोल खगोल युत, सब भापे हरि पाल ॥२५॥ सो०-सुनि वृझी रघुवीर, सखा सकल ये किमि लखे॥ कही सुकंठ सुधीर, भ्रात भीति भागे तबै ॥ २६ ॥ तब रघुवर मुसक्याय, बोले गई सुभीति अब ।। सुनि सुकंठ शिरनाय, कही सु मम पोरुप कहा ॥२७॥ प्रभु तव कृपा प्रभाय, कन अनु होय सुमेरु सम ॥ नेकरोप है जाय, सुरगिरिहो लघुरजहुते ॥२८ ॥ दोहा-यों कहि पुनि हनुमानको, भापी निकट बुलाय ।। राम काज सिधि होय जिमि, सो कीजो मनलाय ॥२९॥ ची-तब लाखे राम हिये हुलसाई , पवनपुत्र कह टिग वटाई। दई मुद्रिका अति अभिरामा जामधि वर अंकित निजनामा॥३०॥ दे मुद्रिका कही पुनि रामा , ही कपि वीर बुद्धि गुण धामा।। नीतिप्रीति जस बल गुणलोजो कहॉव सिद्धि काज वह कीजो॥३१॥ मुनि हनमंत आदि सब वीरा नाय शीश कहि जे रघुवीग ।। गमन कियो तिमिल भटमाथा जिमि रजाय दीनो कपिनाथा३२ - (२७०) रामरसायन। , चलत समय भाषी कपिराई जो ऐह सिय शोध लगाई ॥ सो अति ही आनंद अप है 8 नाम धाम धन ग्राम सुपह॥३३॥ सुनि गमने सब हिय हुलसाई खोजत फिरत सियहि चहुँ पाई।। तिहूँ लोक कपिऋच्छ सिधा कितहूँ कहूँ सोधनहिं पावे ॥३४॥ इमि पश्चिम उत्तर अरु प्राची खोजी सब दिशिरंचन वाची।। नभ पाताल हेरि चहुँ आये विवशवचन कपिपतिहि सुनाये३५ दक्षिण हनुमंतादिक वीरा 8 खोजत सीतहि भये अधीरा ॥ निर्जल निर्जन वन गिरि भूरी हेरे नगर देशबहु दूरी ।। ३६ ॥ इमि खोजत इक दिवस सुवीरा भये तृपातुर निपट अधीरा ॥ तिहि थल मध्य नीर कहुँ नाहीं ॐ धाय धाय हेरै चहुँघाहीं ॥ ३७॥ तहाँ भूमि इक विवर लखाना १ ताढिग आये सब बलवाना। आरद पक्ष हेरि खगनाना हैइत जल यह दृढ़ अनुमाना३८ तब सबही यह कीन विचारा 9 अविलोकिय चलि विवर मझारा निरखो विल द्वारा चहुँ ओरा * अगम पंथ छायो तम घोरा३९॥ भयवश जाय सकत नहिं कोई * तब हनुमंत अग्र हठि होई ॥ एक एक कर गहि सब गौने ॐ पैठे विवर सभै धरि मौने ॥४०॥ गये सुयोजन एक प्रमाणा 8 तब तहँ अति प्रकाश दरशाना।। भवन बाग सर परम अनूपा ॐ लसै एक तिय वृद्ध स्वरूपा४१॥ तिहि विलोकि सबकीन प्रणामा * पुनि बूझी किहिको यह धामा ॥ कही सु मयदानव कर ठामा 8 है कपि स्वयंप्रभामम नामा४२।। सुनि रजाय लै फल दल खाये * करि जलपान अनंद अघाये ॥ तासु निकट पुनि सव मिलि आये सो बूझी को तुम कहँ आय४३।। तब कपि कही सकल तिहि बाता सुनि बोली सो तिय हे ताता।। पैहौ सीतहि संशय नाही वीर धीर धारौ मन माहीं ॥४॥ पुनि कपि कही ताहि कर जोरी कर सहाय माता अब मोरी ॥ महाअंध मग सूझत नाही किमि हम विवर द्वार फिरि जाही४५॥ तब तिहि कही कृपालु सुहोई है ह्यांते निसरिसकै नहिं कोई ॥ 'पै तुम रामदास हो याते मुंदहु नैन जाहु इहि ठाँते ॥४६|| रामरसायन। (२७१) - सुनि सब निज निज कर ग ढांके मूंदे पलक रंच नहिं झांके | स्वयंप्रभा तपबल तिन काढेलखें वीरसागरतट ठाढे ॥४७॥ दोहा-सवही चित चकृत लखें, कहत बचे अव प्राण ॥ गये हुते किहि हेतु तहँ, भयो आनको आन ।। ४८॥ सिंधुतीर गिरि पैसकल, बैठे सोच कराहिं ।। किमि जैये कपिराज ढिग, काज भयो कछु नाहि ॥४१॥ भापी अवधि हरीश सो, वीति गये दिन और ॥ गये हते नृप याहिते, मरण भलो इहि ठौर ॥५०॥ राम काज हित तनु लगै, दोऊ लोक बनाय ॥ लखौ जटायू गीध किमि, सुखी भयो गति पाय ॥२१॥ चौ०-इमिलिय जब जटायु कर नामा। तासुभ्रात सो सुनि तिहि ठामा प्रगटो मंद मंद वपु भारी पंख विहीन भूरि भयकारी५२॥ ताहि देखि सब भीत जु मानी सो भापी सुधीर मृदुवानी ॥ कहाँ अभय प्रथमाहि कह वरनी है कित किमि जयायुकी करनी५३ तव अंगद सब कथा कहाई मुनि सुगीध भापी बिलपाई। मोहिं ले चलहू सागर तीरा देहुँ जटायु बंधु कहँ नीरा ॥९॥ तब सब ताहि सिंधु तट आनो र सो वंधुहि जल दै दुःखमानो ।। बोलत भयो कपिन समुहाई ॐ रही जटायु मोर लघुभाई ५५॥ एक समय हम दुहुँ अभिमानी उडिरविनिकट चले हटानी ।। जवहीं गये प्रकाश मझारी तव नहिं सही गई तप भागमा दोउ.प्राण कंट मधि आयो पंख झांपि ही बंधु बचायो । ताछिन भानु तेज मम पना जरे गिरोमह निरपना ॥ ५७॥ पगे आप इत निपट विहाला इहाँ निशाकर मुनी दयाला॥ फन्त रहे तप मो मुहि हेरी कियोसचेतशीश कर गर॥ पुनि मनि कही अयोध्याधामा दशरथ मुत ह , श्रीगमा । तासु तीय निश्वर हरि लहतिहि विशोष कपिनायलंग १ गरें और बटु, मुभट निधाय बोजन कोश भालु रन आई ।। मिया शोश नमतिनरि. हो नाही ममय पत पुनिपटा ६०॥

(२७२)
रामरसायन।
J
,
दोहा-यौं कहि भापी गीध पुनि,संपाती मम नाम ।।
सब वृद्धनको भूप हौं, पे अव भयो निकाम ॥ ६ ॥
जरठ पक्ष बिन हीनवल, बने इतो अब काम ॥
पुनि गिरि पै मुहि लै चलो, कहाँ सिया जिहि ठाम ॥ ६२॥
सुनि प्रसन्न है सपदि सब, संपातिहि कर धारि ॥
लाय उच्च गिरि शिखर पै, सादर दिय बैठारि ॥६३ ॥
संपाती तब देखि कै, दक्षिणशीश उठाय ॥
कही इहाँ ते मोहिं सब, सम्मुख परत लखाय ॥ ६॥
निरखत कोश सहस्रलों, गीध दृष्टि इमि होय ॥
दूर विलोकन हेत कहुँ, समता करै न कोय ॥६६ ।।
सो लखि सत्य बखान हूँ, करौ प्रतीति निशंक ॥
शत योजन इहि ठामते, सिंधुपार पुरलंक ।। ६६॥
तहाँ निशाचर अमितहैं, भूपति रावण नाम ॥
सो सीतहि हरि लै गयो, वैठी दुखी सुठाम ॥६७॥
यौं वर्णत संपातिके, प्रगट भये वर पक्ष ।।
सब आयो विश्वास दृढ़, निरख प्रभाव प्रतक्ष ॥ ६८॥
चौ संपाती लहि पंख अनूपा * प्रमुदित भयो विशद वर रूपा॥
सबहि धीर दै सियहि बताई गमनोखग नभ पंथ उड़ाई ६९॥
सुनि कपि भालु परम सुख पागे * किलकि कूदिबहु नाचन लागे।
ऊर्द्ध रोम 8 पुच्छ उठाई * सिंहनाद कीने हरपाई ॥ ७० ॥
सो निशिसुख महँ जात नजानी मात सिंधुलखि मतिअकुलानी।
वैठि करत सब विविध विचारा 8 किमिकोलंचै जलधि अपारा ७१
दोबई छंद।।
ताछिन गज गवाक्ष दोऊ अरु शरभ ऋपभ वरवीरा ॥
कीशगंधमादन मयंद मिलि द्विविद सुपेण सुधीरा ॥
जाम्बवंत ये कमते दश दश योजन कहे बढ़ाई ।।
निज निज गमन शक्ति इमि सबही सत्य वखानि सुनाई ॥७२॥

रामरसायन। (२७३) तब अंगद् भापी हम इतते कूदि उतै ध्रुवजावे ॥ फिर उतते इत आगमके हित निश्चय नाहि कहावें।। सुनि ऋच्छेश कही तुम नृपसुत दुहुँ दिशि गमन समर्था । पैहौ अधिप वनै किमि पठवत प्रभुबिन होत अनर्था ॥७३॥ यौं कहि ऋच्छराज हनुमानहि लखि बोले हे वीरा ॥ पवनपुत्र बैठे सुमौन क्यौं धरी कहा इमि धीरा ॥ गुणिसमर्थ प्रभु दई मुद्रिका निजवल रूप विचारौ ॥ गोपद सरिस सिंधु यह तुमको है द्रुत सजग सिधारी ॥ ७४ ॥ जाम्बवंतके वचन सुनतही कपितन बल उमँगायो । ऊरधरोम प्रफुल्ल पुच्छ वपु तेज तरणि सम छायो । यौं हनुमंत वीर उद्धत है कियो मेघ सम नादा।। पुनि अंगद अरु मच्छराज प्रति वोले युत अहलादा ॥ ७९ ॥ घनाक्षरी कवित्त। मेरो ना प्रभाव सीतारामकी कृपाते यह रसिकविहारी सत्य प्र- ण ठहराऊँ मैं ॥ उछलि उतंक तिहुँ लोकहि उलंक आऊँ सिंधुवापु- रेकी काह गिनती गनाऊँ में ॥ जोपै रघुराज कपिराज युवराज और मच्छराज काहू को रजाय नेक पाऊँ मैं ।। एकही फलंकामें निशंका उत जाऊँ फेरि हंकादै मुलंकाको उखार इत लाऊँ मैं ॥ ७६॥ दोहा-मुनि मुबैन हनुमानके, ऋच्छराज युवराज ॥ बोले कपिहि सराहिक, सादुर सहित समाज ।। ७७ ।। ही समर्थ पुनि या समै, उचित इतोही काम ॥ जनक सुतहि अविलोकिक, द्रुत आवो इहि ठाम ॥ ७८॥ पुनि सब चलि निजनाथको, प्रमुदित सकल सुनाय ।। करि ह सोई काज जो, देह ईश रजाय ।।७९।। मुनि शिप शीशनवायक, सवही धीर धराय ।। द्रुत महेंद्र गिरि शिखर प, उछलि गये हुलसाय ॥ ८॥ जाम्बवंत अंगद अपर, कीश भालु भट वृन्द ।। रसिकविहारी काज सय, सिद्धि जानि आनंद ॥ ८१ ॥ इति श्री. रा०र० वि० वि० जनकनंदिनो गोध वर्णनो नाम मनमोविभागः ॥७॥ , (२७४) रामरसायन । - . दोहा-अंजनि सुत हनुमंत कपि, रामचरण हिय ध्याय ।। तिहि सुवेल गिरि शिखर पै, बेठे गात वढाय ॥१॥ टेकि कुधरपर दोउ कर, पीट पुच्छ कार गुच्छ । श्रवण चपरि रोमांच युत, वढो तेज तनुसुच्छ ॥२॥ दक्षिण दिशि लखिक कियो, प्रलय मेघ सम गाज । भापी सवहि सुनाय हौं, जाहुँ रामके काज ॥३॥ रामवाण सम वेगते, जाय निहारौं लंक ॥ जौ न मिली तह तो लखौ, मुरपुर धाय निशंक ॥४. तित न पाई सियहि तौ, गहिलैहों लंकेश ॥ अथवा लंक उपाटिक, धरौं आय इहि देश ॥५॥ यौं कहि उछले वीर वर, तहँ तै सबल उताल ॥ चपि भूधर धरणी धसो, महा वेग भो हाल ॥६॥ पितु सम वेग प्रचंड अति, बहु तरु भये उपाट । हनुमत सिंधु उलंधि वे, उछलि चले नभ वाट ॥७॥ आयत योजन तीस अरु, दशयोजन विस्तार ॥ तनु छाया हनुमान की, ताछिन परम सुढार ॥८॥ प्र०॥ वाल्मीकीये सुंदरकांड सर्ग॥१॥ श्लोक ॥ दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशयोजनमायता॥ छाया वानरसिंहस्य जवेचारुतराभवत् ॥ ३॥ दोहा-गर्जत उर आनंद भरि, जात व्योम पथवीर ।। ताछिनको वल तेज वपु, वरणिसकै को धीर ॥९॥ घनाक्षरी कवित्त । देव दहलाने औ अदेव हहलाने सिंधु जीव खहलाने जल नदीशकोभानुतेजमंद पथ बंद व्योमगामिनको आसन : डगो शंभु सुरईशको ॥ रसिकविहारी राम दूत हनुमंत वीर । गौन मर्दन प्रताप भुजवीसको जजैकार करत अपार तिहुँ झार विक्रम पराक्रम निहार वर कीशको ॥ १० ॥ हेम है मपक्ष नभ कीनी गौन कैयौं स्थत्यागि प्रात , रामरसायन। (२७५) -- सिधायो है ॥रसिकविहारी परमेश्वर प्रत्यक्षकैयौं व्योममें विराट रूप प्रकटि दिखायो है । कैयौं खगराज हरिकाज हेत चालो आज कैधौं रामचंद्र बाण विशिख चलायो है । कैयौं हनुमान वीर परमउदंड चंड सागर उलंघि वेप मंडलते पायोहै ॥११॥ चौ०-या हनुमंत अकाशमझाराजात निरखि किय सिंधु विचारा॥ हौं कपिहित कछु कौँ महाई सो श्रम खोय बहुरि द्रुतं जाई १२॥ तब गुणि कह मैनाकहि सागर ही गिरि तुम सपक्ष गुण आगर ।। वपु बढ़ाय इतते नभजावोनिज दिशि करि आदर विलमायो १३॥ सुनि भूधर मैनाक उताला हेम शिखर युत वाढि विशाला ॥ मिष्ट वारि तरु सफल समेता गगन उच्चगो हनुमतहेता ॥१४॥ नम मारग रुद्धित कपि देखा कछू विघ्न प्रगटो दृढ़ लेखा। तिहि उरते खंडित किय वीरा चलत भये सुमिरत रघुवीरा १५ ।। तव शैल मानुप तनुधारी प्रगटि शिखर. वर गिरा उचारी। धन्य पवनसुत विनय सुनीज बहुरि तात हो चिसो कीजै १६॥ वृद्ध राम कुल जात न दीशा तव सहाय भेजो मुहिं कीशा ॥ पुनि मो सँगबहु पवन मिताई रहीं अभय जिहि कृपा सदाई १७॥ सो तुम कपि मो पुत्र समाना नाही पीति करी मनमाना॥ है मैनाक सुनाम हमारा बसें सदा अवसिंधु मझारा ॥१८॥ प्रथमसकल गिरिरहे पन पर निज इच्छित उडि पर भूमि पर ।। तिनते नगर ग्राम बहु नामै ॐ कुधर सदा सवही इमि त्रास १९ ॥ लोलखि कोधित सुग्नाचा उग्र वत्र गहिक निज हाथा ॥ पक्ष गिरिनके काटि नशाये ? मोदिशि देवराजजव थाये।।२०।। तव तव पिता पवन हितकीना गुहि उडाय निज वेगहि दीना॥ मैं इत जलनिधि पगे दुगई तस्ते जलमधिग्दी नदाई ॥२॥ सतयुग मध्य भई यह वातानो तुव पिनुहित मानहुँनाता ।। याते मग श्रम विलमिनिवारी पुनि प्रभुकारज देत मिधाग२२।। करी अशन स्वादित फल बीग पीने विमल मिष्टवर नीग ।। सो सुनिनादर कह हनुमाना तव ननकानफट में माना।

की है सपन नभ कीनी गीन कैची स्थत्यागि प्रात मुजा । नदीशको || भानुतेजमंद पथ बंद व्योमगामिनको आसन मुचंद्र डगो शंभु सुरईशको ॥ रसिकविहारी राम दूत हनुमंत वीर कीनो/ झार विक्रम पराक्रम निहार वर कीशको ॥ ॥ हेम गिरि, (२७४) रामरसायन । दोहा-अंजनि सुत हनुमंत कपि, रामचरण हिय ध्याय ॥ तिहि सुवेल गिरि शिखर पै, वेठे गात वढाय ॥3॥ टेकि कुधरपर दोउ कर, पीठ पुच्छ करि गुच्छ ।। श्रवण चपरि रोमांच युत, बढो तेज तनुसुच्छ ॥२॥ दक्षिण दिशि लखिक कियो, प्रलय मेघ सम गाज ॥ भापी सबहि सुनाय हौं, जाहुँ रामके काज ॥३॥ रामबाण सम वेगते, जाय निहारौं लंक ॥ जो न मिली तहँ तो लखौं, सुरपुर धाय निशंक ॥४॥ तित न पाई सियहि तौ, गहिलैहौं लंकेश ॥ अथवा लंक उपाटिक, धरौं आय इहि देश ॥६॥ यौं कहि उछले वीर वर, तहँ तै सबल उताल ।। चपि भूधर धरणी घसो, महा वेग भो हाल ॥६॥ पितु सम वेग प्रचंड अति, बहु तरु भये उपाट ॥ हनुमत सिंधु उलंधि वे, उछलि चले नभ वाट ॥७॥ आयत योजन तीस अरु, दशयोजन विस्तार ॥ तनु छाया हनुमान की, ताछिन परम सुढार ॥ ८॥ प्र० ॥ वाल्मीकीये सुंदरकांड सर्ग ॥ १॥श्लोक ॥ दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशयोजनमायता॥ छाया वानरसिंहस्य जवेचारुतराभवत् ॥ १॥ दोहा-गर्जत उर आनंद भरि, जात व्योम पथवीर ॥ ताछिनको वल तेज वपु, वरणिसकै को धीर ॥ ९॥ बनाक्षरी कवित्त । देव दहलाने औ अदेव हहलाने सिंधु जीव खहलाने जल उछल गौन मर्दन प्रताप भुजवीसको ॥ जजैकार करत अपार तिहुँ लो रामरसायन। (२७५) सिधायो है ॥रनिकविहारी परमेश्वर प्रत्यक्षकों व्योममें विराट रूप प्रकटि दिखायो है ॥ कधी खगराज हरिकाज देत चालो आज कैचों रामचंद्र वाण विशिख चलायो है ।। कंधों हनुमान वीर परमउदंड वंड सागर उलंधि वेप मंडलते पायोहै ॥११॥ चौ०-यो हनुमंत अकाशमझाराजात निरखि किय सिंधु विचारा॥ हों कपिहित कछु करें महाई सो श्रम खोय बहुरि द्रुतं जाई १२॥ तब गुणि कह मैनाकाहि सागर ही गिरि तुम सपक्ष गुण आगर । वयु बढ़ाय इतते नभजावोनिज दिशि करि आदर विलमायो १३।। सुनि भूधर मैनाक स्ताला हेम शिखर युत वाढि विशाला॥ मिष्ट वारि तरु सफल समेता गगन उच्चगो हनुमतहेता ॥ १४ ॥ नभ मारग रुदित कपि देखा कछू विन प्रगटो दृढ़ लेखा। तिहि उरते खंडित किय वीरा चलत भये सुमिरत रघुवीरा१५॥ तव शैल मानप तनुधारी प्रगटि शिखर, वर गिरा उचारी।। धन्य पवनसुत विनय सुनीजै ॐ बहुरि तात हो चिसो कीजै १६॥ वृद्ध राम कुल जात न दोशा तब सहाय भेजो मुहि कीशा ।। पुनि मो सँगबहु पवन मिताई ॐ रहीं अभय जिहि कृपा सदाई १७॥ सो तुम कपि मो पुत्र समाना ताही प्रीति करौं मनमाना ॥ है मैनाक सुनाम हमारा बसें सदा अवसिंधु मझारा ॥१८॥ प्रथमसकल गिरिरहे पन पर निज इच्छित उडि परें भूमि पर। तिनते नगर ग्राम बहु नार्स कुपर सदा सवही इमि वासं १९ ॥ सोलखि ह क्रोधित सुग्नाथा उग्र बन गहिर्क निज हाथा ।। पक्ष गिरिनके काटि नशाये: मोदिशि देवराज जब धाये॥२०॥ तब तव पिता पवन द्वितकीना मुहि उटाय निज वेगहि दीना। मैं इत जलनिधि पो दुगई तबते जलमविरहीं लदाई ॥२१॥ मतयुग मध्य भई यह वातानो तुब पितुहित मानहुँ ताता ॥ याते मग श्रम विलमिनिवाग : करी अशन स्वादित फर सोशनि सादर (२७६) रामरसायन । विलमौं बीच न यह प्रण धारा बेगि जात ही सागर पारा॥ यौंकहि गिरिहि परसि कर वीरा चलत भयोकरि नाद घ्भीरा २४॥ हनुमत कर आदर गिरिठाना सोलखि इंद्र परम सुखमाना ॥ मैनाकहि प्रमुदित सुरपाला ॐ दीन अभै वरदान कृपाला २५ ॥ पुनि कौतुकी सकल सुरवाता* कही नाग मातहि यह वाता लखो चहैं हम कपि बल सबही *करै सुकहतुव सनमुख अबही२६ सो सुरसा करि कृपा सिधावो के हनुमंतहि बहु भीति दिखावो ॥ कै भय मानि पारनहिं जावै ॐ कै सुठानि बल बुद्धि सिधावै २७ तब सो आय भई मग ठाढी * बिरचि कराल रूप बहु बाढी ॥ कही कपिहि करि घोर पुकारा आव कीशमम मुखहि मझारा२८ यों कहिकै कराल मुख फारा * तब बोले तिहि पवनकुमारा ॥ सिय लखि प्रभु सुनाय संदेशा * करौं आय पुनि मुखहि प्रवेशा२९ सुरसा नहिं मानी तब वीरा कह विस्तृत मम सकल शरीरा ॥ किमि तुव मुख प्रवेश बपु होई *तब सो विहँसि कीशदिशि जोई ३० दोहा-दशयोजन विस्तार मुख, कियो सुलखि हनुमान ॥ भये वीस योजन तुरत, निरखि तीस सो ठान ॥३१॥ तब कपि योजन तीस भो, तिय मुख किय चालीस ॥ इमि दश दश दुहुँ बढ़त गे, नाग मात अरुकीस ॥३२॥ जब कपि सुरसा मुख लखौ, शतयोजन परमान ॥ तब अंगुष्ट समान वपु, किय प्रवीन हनुमान ॥३३॥ प्रविसि तासु मुख निकसि पुनि, कही व्योममाध जाय ॥ गो आनन त नहिं भखो, मम कछु दोप न आय॥ ३४ ॥ लखि सुरमा कपि बुद्धि बल, करि बहु भाँति बखान ॥ गई देवपुर उत इत, हरपलहो बलवान ॥३५॥ सकल देव सो चरित लखि, चकित रहे सकुचाय॥ कहत तिहूँपुर वीर सम, और समर्थ न आय॥ ३६॥ पूरवसन विस्तार वपु, कार गमने हनुमान ।। जान नगन है छाँह तनु, पर सिंधु जल आन ॥३७॥ N सो-सो छाया जल बीच, अवलोकी खल निश्वरी ॥ नाम सिंहिका नीच, गहि लीनी वरदान गुण ॥३८॥ गहतछाहँ हनुमंत, तनु कंपो गति रुद्धह्व ॥ अकुलाने बलवंत, दशहू दिशि हरे चकित ॥ ३९॥ चौल-तब देखी कपि सिंधु मझारा* ठाढी एक नारि विकरारा ॥ तीक्षण दशन विकट मुखफारे छाया गहि ऐचै वलधारे ॥४०॥ हनूमान तब गात बढ़ाई *किय बहु गिरि सम तनु गरुआई॥ आय परेतिहिमुखहि मझारा तासुअंग नख दशन विदारा॥४॥ मृतक भई सिंहिका कराला पुनि कपि उछलि गये नभ हाला॥ सो विलोकि खेचर सबहरपे जै जै भापि सुमन सुर वरपे॥४२॥ तब हनुमत करि पूरवरूपा उछले दुत बल धारि अनूपा ॥ ताछिन वेग अपार बढ़ाई * चले सिंहिकाहति हुलसाई॥४३॥ घनाक्षरी कवित्त । परम प्रकाशमान प्रभुता प्रधान स्वच्छ खल दल शाल जनपाल सुखदान है ॥ रसिकविहारी उर अधिक अनंदकारी विपति विदारी दिव्य दीपति महान है ॥ शुद्ध पक्षधारी भीतिहारी नभचारी वर सुवन विहारी वेग भारी बलवान है। काज आज कैयौं खगराज द्विज राज धायो कैयौं रामवाण कैयौं वीर हनुमान है ॥४४॥ चौ०-इमि उताल केशरी किशोरा में पहुँचे जाय वीर वरजोरा ॥ निरखि सुभूधर सागर तीरा परे पार कै तहँ कपिधीरा ॥४५॥ चंपो कुधर सुधरणि समाना पुनि लघु वपु कीनो हनुमाना। तहते लखो लंकपुर कीसा* चहूँ ओर कंचनमयदीसा।। ४६॥ दोहा-परिखासिंधु गंभीर चहुँ, योज़न एक प्रमान ॥ उचहेम प्राकारपुर, नारिद्वार दृढठान ॥१७॥ निरखिलंक कपि हीयमें, सोचत करत विचार ॥ कहा करें कपिऋच्छ इत, दुहुँ अरु राजकुमार ॥१८॥ जय पावे इत युद्धमें, काहू की न समर्थ ।। सामादिक चहुँ जतन बल, सकल होय द्यां व्यर्थ ।।१९।। ,

(२७८)
रामरसायन।
-
यो गुणि परम प्रबंध चहुँ, निरखि चकित हनुमान ॥
रनि समै पुर पैठियो, उचित कियो अनुमान ॥ ५० ॥
निफल न हो मम आगमन, सोई वात महान ।
उक्ति युक्ति सोचत गुनत, यौहीं अथयो भान ॥५१॥
निशि लखि कपि कति रूपही, करि मंजार प्रमान ॥
राम सुमिरि लंका निकट, दुरि आयो बलवान ॥५२॥
प्र०-वाल्मीकीये मुंदरकांडे । सर्ग ॥ २ ॥ श्लोक ॥
सूर्ये चास्तं गते रात्री देहं संक्षिप्य मारुतिः॥
वृपदंशकमात्राथ बभूवाद्भुतदर्शनः ॥२॥
दोहा-तहँ लंका निज रूपते, रक्षहि पुरी सदाय ॥
नाम लंकिनी जाहि दुरि, कोऊ जान न पाय ॥५३॥
सोरठा-कपिहि देखि सो धाय, कही सकोय करालवपु॥
अरे कीश कहँ जाय, दुरिमोते वै चोर सम ॥५४॥
ताहि निरखि हनुमंत, वृझी दुष्टा कौन तू ॥
सो भापी बलवंत, हौं लंका रक्षों सदा ॥५५॥
तब बोले कपिताहि, हौं युर अवलोकन चहौं ।
कही सुद्भुत फिरि जाहि,न तर हरौं तुव प्राण अब ॥५६॥
सुनि कपि वै विकराल, तिय लखि तलताड़ो सहज ॥
गिरी भूमि बेहाल, महानाद करि निश्वरी ॥ १७ ॥
पुनि लंका लहि चेत, उठि बोली कर जोरिकै॥
कपि आये जिहि हेत, करौकाज सो सिद्धि तुव ॥२८॥
मोहि कही विधिवात, तोहि कर कपि त्रास जब ॥
तब निश्वर कुल घात, लखिये भई सुसत्य अब ।। ५९॥
सुनि कपि लघु वपुधार, पुर प्राकार उलंधित ॥
पैठे लंक मझार, प्रथमवामपद अग्रकरि ॥ ६०॥
प्र० ॥ वाल्मीकीय सुंदरकांडे । सर्गः ॥ लोकः ।
प्रविश्य नगरी लंकां कपिराजो हितंकरः।।
केथ पादं सन्यं च शत्रूणां स तु मूर्धनि ॥३॥

पुनः ॥ अन्यत्रापि। प्रयाणकाले स्वगृहप्रवेशे विवाहकालेऽपि च दक्षिणांघ्रिम् ।। कृत्वाग्रतः शनपुरप्रवेशेवामं निदध्याचरणं नृपालये ॥४॥ इत्यादि। दोवई छंद। देखो लंकनगर वर शोभित कंचनमय सब धामा ॥ विविधवेप निश्वर निशाचरी सकल साज अभिरामा ।। बाल युवा अरु जरठ पुरुप तिय विपुल सुरूप कुरूपा॥ धर्म अधर्म सुकर्म कुकर्महि निरत अनेक अनूपा ॥६१॥ शस्त्र शैल तरुधरे खरे भट और ठगेर रखवारे ॥ कहुँ सहस्रदश कहूँ लक्ष कहुँ कोटिन कहूँ अपारे॥ हाट वाट गृह नगर मध्य चहुँ अध उरध सबठावा। वाहर अरु अंतर लंकापति परम प्रबंध दृढावा ॥१२॥ वाग वाटिका कुंज पुंज वरवीथी पंथ बजारा ॥ वापी कूप तड़ाग सरित गृह वन गृह गुहा अपारा॥ जाय जाय सब ठौर वीर कपि दुरिहर चहुँ घाई ।। रामभामिनी जनकनंदिनी कतहुँ न परी लखाई ॥६३॥ दशमुख भवन माहिं तब पैठ तह सब ठीर निहारा॥ अशन पान स्नान हवनथल अविलोको कपिसारा ।। शन भवन मधिगयो वीरवर निरखि चकितभो कीशा ।। जा सम सुभग साज शोभा सुख अपर त्रिलोक नदीसा॥६॥ सुर किन्नर गंधर्व यक्ष नर नाग नारि अभिरामा ।। सजे सुभग श्रृंगार मनोहर वरनिश्चरी ललामा। सकल वारुणी पान मदन मदमत्त अंगसुधि नाहीं॥ जहँ तहँ निद्रावश अचेत है सोयरही चहुँ चाहीं॥६५॥ काहू शिर पर पद काहूको काहूपग किहुँ माथा ।। काहु उदर उर भुजा शीश कटि काह किहु मुख हाधा ।। कोऊ शस्त्र वस्त्र भूपण युत इमि अचेत सब सोई ।। सुभग सुंदरी स्वरमाधिराची प्राण लुकाय विगाई ।। ६६ ।। कोऊ वसन विहीन वामवर कोऊ.सुभग शृंगारी ।। कोऊ पिलुलित साज सकल तनु कोऊ.अर्थमवारी ॥

२८०, रामरसायन। . कोऊ सुरतिहीन रति संयुत कोउ विलग कोउ संगा॥ कोऊ अशन पान भाजन लैं शैन किये इहिढंगा॥६७॥ तिनके मध्य रूपवर रावण सोवत मुदित निशंका ।। मंदोदरी गौर सुठि नारी आलिंगित निज अंका॥ लखि मयसुता रूप शोभा दृढ हीय कीश अनुमाना॥ यही जनकनंदिनी इमि छवि तिन बिन तिया न आना ॥ ६८॥ प्र०॥ वा० ॥ सुं० को० ॥ स० ॥ १० ॥ श्लो०॥ गौरी कनकवर्णाभामिष्टामन्तःपुरेश्वरीम् ॥ कपिमैदोदरी तत्र शयानां चारुरूपिणीम् ॥५॥ स तां दृष्ट्वा महाबाहुर्भूषितां मारुतात्मजः॥ तर्कयामास सीतेति रूपयौवनसंपदा ॥ हर्पण महता युक्तो ननंद हरियूथपः ॥६॥ इत्यादि । दोवई छंद। हेरि हिये हनुमंत हर्ष भरि रोम प्रफुल्लित कीना ॥ लै ऊरध लंगूर चुंबिक कीश केलिचित दीना ॥ आयो बहुरि विचार वीर उर मो कस बुद्धि नशानी ॥ शैन किये दशमाथ जो तिया तिहि सीता मैं जानी ॥ ६९॥ रामभामिनी दृढ पतिव्रता सत्यधर्म धुरधारी ॥ परपति संग ताहि अनुमानी कियो जु पातक भारी ।। पुनि कपि सोच पाप यह दूजो एक और हौं कीना ।। पर नारी नरशन संग ही नग्न अंग लखि लीना ॥ ७० ॥ यो गुणिकै पनि हदै धारदै दृढ विचार यह थापा ॥ मोमन निर्विकार ती निरखे भयो नहीं कछु पापा ॥ इहि विधि सोचि वीर तहँ ते चलि फिरि चहुँ हेरन लागे । जब कहुँ लखी नहीं सीता तब महा शोकमें पागे ॥ ७१ ॥ कर विचार कपि सिया न जीव के गवण तिन मारी ॥ के लावतहि व्योम मंडल तें गिरी पयोधि मझारी । हाय कहाँ अब मिलें जानकी विन पाये नहिं जाऊं। है यह भली प्राण निज त्यागी काहु न मुख दरशाऊं ।। ७२ ॥

रामरता हरिगीतिका छंद। इमि गुणत कपि बहु सोच वश पुनि किय विचार सुहीयमैं ॥ उत जो लखाय अशोक वन हेरो न वह रमणीय मैं । देखी तहांचलि सीय जो दरशाय तौ भलिवातहै । हढ़ मिलहि स्वामिनि तितहिं या छिन जीय मम उमगात है७३॥ यौं ठान दृढ हनुमानकीन पयान अतिहि उताल जो॥ दरशान इक स्थान शोभामान परम विशालसो।। जिहि धाम द्वार ललाम अंकित राम नाम सुवर्णते ॥ वृंदा सुमन वर बूंद बूंद विराज तरु बहु वर्णते ॥ ७४ ॥ लखि हीय गुण हनुमंत कोऊ संतको यह धामहै ।। अति आचरज इत लंकमें हरि भक्त को आभिराम है। तो लग सुनिद्रागत विभीपण नाम लीनो रामको ।। सुनि कीशद्विजतनु धारि कीनो गान प्रभु गुण ग्रामको ॥ ७॥ सो सुनि विभीपण द्वार आये दोउ दुहुँदिशि हेरिकै ॥ वृझी दुहूँ दुहुँ कही निज गति मिले गल भुज गरि के। नृपवधु तब हनुमंत सों भापी सबै समुझाय के ॥ वर वाटिकामधि मैथिली कह लखहु जाय दुगयकै ॥ ७६॥ ची-सुनिसिय कथा हीयहरपानाचले वेगि तिन मिलि हनुमाना। वर अशोकवाटिका निहारी * परमरम्य शोभा मनहारी ॥ ७७॥ कंचन महि माणि जटित अनूपा वापी कुप तडाग सुरूपा॥ वेलि विटप लघु दीरवनाना फल प्रमून वर विविध विधाना७८ खग मृग विपुल जीव बहु जाती हेमरजत तरु अगणित भाती ।। चहुँमुक्ता प्रवाल मय सिक्ता महि दरशाय न तिहि अतिरिक्ता७९ धवल धाम वर उच्च अनेका सुंदर सुखद पकने एका ॥ रसत विविध भूरि भट भारे निज निज काजशन सब धारे ८० इमि अशोकवाटिका सुहाही जिहि पटना अमगंवति नाहीं।। तहँ कंचन मय सुभान निगलाई एक शिशपा वृक्ष विशाला ॥८॥ तिहि तरुतर वेदिका मनोहर दाटक गचित विचित मणिगणवरा।

(२८२)
रामरसायना
तहँ सशोक श्रीजनकदुलारी बैठी राम ध्यान उर धारी ॥ ८२||
चहूं ओर निश्चरी कराला रक्षहिं लीने शस्त्र विशाला॥
सियहि दृरते लखि हनुमाना मम स्वामिनि ये दृढ़ अनुमाना८३||
करि प्रणाम दूरहिते सादर 8 हर्प शोक दोऊ सुहीय भर ॥
सिया रामकी दशा विचारी * हनूमान कह मनहि मझारी ॥८३॥
सबैया कवित्त।
उत का कहिहीं सियकी गति हौं वरणों इत काह कथा पियकी ।।
नहिं भाषे बनै निरखेही बनै अति दुःख सनेह दशा वियकी ।
इहिते रसिकेस भली है यही गहि मौन धरौं हिय मैं हियकी ॥
ममस्वामिनि स्वामि परस्पर दोऊ सुजानत हैं दुहुँके जियकी ॥८॥
चौ०-पुनि कपि गुणी भयो दुख दूरी * सियाराम मिलि हैं सुख पूरी॥
प्रभु सँदेश सुनिकै हरपाही पै मुहिं प्रगट मिलय भल नाही८६
यौं गुण कोश निलखिथोरी दुमचढ़ि दुरो निरखि चहुँ ओरी॥
ताछिन तहँदशवदन सिधारा संग नारि बहु किये शृंगारा ॥८॥
आय सियहि सो बहु समुझाई कटु वचकह सीता विलपाई॥
तब दशमुखलै कठिन कृपाना # जनकसुता दिशि हेरि रिसाना८८
तब गहि मंदोदरी सुनीता समुझायो कहि वचन विनीता ॥
पुनि रावण निश्चरिन सिखाई करौ नारि मम सियहि बुझाई,८९॥
दोहा-यों कहि भापी सीय दिशि, और तजो द्वै मास ।।
इहि ऊपर तुब मरन कै, हठिराखौं रनिवास ॥ ९०॥
प्र०॥ वा० ॥सु० ॥ कां० ॥ स० ॥ २२ ॥ सो० ॥
द्रौ मासौ रक्षितव्यौ मे योऽवधिस्ते मया कृतः॥ततः शयनमारोह
मम त्वं वरवणिनि ॥ ७॥ द्वाभ्यामूर्ध्व तु मासाभ्यां भत्तारं मामनि-
च्छतीम् ॥ मम त्वां प्रातराशार्थे सूदाश्छेत्स्यति खंडशः॥८॥इत्यादि।
चौ०-ताछिन धान्य मालिनी नामावर निशाचरी परम ललामा।
दै गल भुज दशमुखहि.सप्रेमा शैन सदन लै गई सुक्षेमा ॥९॥
इत निश्चरी कुरूप कराला लेकर मुशल शूल असि भाला ॥
हुविधि सीतहि वास दिखा साम दाम भय भेद दिढावै॥१२॥

दोवई छंद ।
इकनैनी कोऊ इक कर्णी कोऊ बहु गवारी॥
काऊ गजकर्णी खरकी कोउ नाग दैतारी ॥
कोऊ व्याल मुखी लंबोदरि लंबकुची कुचहीना ।।
कोऊ हस्त चरण इक एकै कोउ. अगणित कीना ॥ ९३॥
कोऊ शीश विहीन बहुत शिर कोऊ. अगणित नासा ॥
कोऊ अर्ध कोऊ अनासिका कोऊ बहु मुख भासा ।।
कोऊ शकर श्वान सिंह मुख कोऊ गिरि वपुधारा ॥
कोऊ अति लघु इमि निशाचरी विविध कराल अपारा ॥ ९४ ॥
कोऊ बाँधि मुष्टिका धावै सियहि प्रहारण काजा ।।
कोऊ दशन काढ़ि मुख फारें भक्षणहित करि गाजा ।।
कोऊ लै कृपाण कर दौरे कोऊ शूल भमा ॥
यौंही बिकट निश्चरी सीतहि बहु विधि त्रास दिखावें ॥९५ ।।
कह सकल हे जनकनंदिनी जो निज जीवन चावो ।।
ती सिख मानि वेगही हटतजि दशमुख महल सिधावा ।।
सुनि सिय बोली भले सवहि मिलि मुहिं भक्षण करि लेह ॥
निज पतिविन नहिं लखी आन दिशि मोर सत्य प्रण येह ९६॥
यौंकहि सिया हाय श्वासा भरि करति अपार विलापा॥
सो गति लखि हनुमंत हीय बहु बढो क्रोध संतापा।।
कुसमय जानि मौन दुरि हेरे कपि निश्चरी कटोरा ।।
जनकनंदिनिहि भीति दिखावें वोलि वचन अतियोग ।। ९७॥
दोहा-ताछिन त्रिजटा निश्चरी, बोली सबहि रिसाय ।।
सियहि न खायो आप तनु, आपहिलेवो खाय ॥९८॥
स्वप्न लखो ही अवशिहा, तिहि फल यह विश्वास ॥
राम विजय पावें सपदि, अरु निश्वर कुलनास ।। ९९ ॥
सुनि सशंक सब निश्वरी, विजयहि कह अकुलाय ।।
कहा लखो भापो नत्र, नो बोली समझाय ॥१०॥

(२८४)
गमरसायन।
६० गी० छंद।
गजदंत शिविका सहस हरि युत अंतरिच्छ सुहावहीं।
तिहि मध्य रामसबंधु राजे शुभ्र साज सु आवहीं ।
पुनि लखी श्वेत शृंगार धारे सिंधुई आवृत किये।
सीता विराजी धवलगिरिपै पीय पद निज हग दिये ॥१०॥
हेरो सुदंती चारदत ,गार युत भूधर चढो।
तिहि पै लसे सिय बंधु संयुत राम अति आनंद महो।
पुनि लखी सीता चंद्र भानुहि छिनहि छिन कर परसही।
स्थ खेत वृपभ सुयुक्तता मधि तिहूँ बहु छवि सरसही ॥ १०२॥
दोहा-पुनि हेरे सीता सहित, राम लपण दुहुँ भ्रात ॥
शोभित पुप्पविमान मधि, उत्तर दिशि नभ जात ॥ १०३||
दांवई छंद ।
पुनि देखो दशमाथहि मुंडित लाल वसन तन धारे ॥
कंठमाल करवीर पानमद अरुण साजहैं सारे ॥
सो पुष्पकविमानते गिरिकै परो महीतल आई ॥
श्याम शृंगार श्यामतिय मुंडित तिहि बँचै गहि धाई ॥१०॥
खर युत रथ बैठो पुनि हेरो हँसै नचै अरु गावै ॥
करै तैल को पान सुव्याकुल दक्षिण दिशा सिधावै ॥
बहुरि लखो गर्दभ मय रावण बिन शिर गिरो जु भूमै ।।
फिर उठि मत्त नग्न लै विलपत दुर्वच बोलत घूमै ॥ १०५॥
पंक घोर मलकुंड प्रविशिके दशमुख दक्षिण जाही॥.
रतवासिनी श्याम तिया गल बाँधि सुर्खेचैताही ॥
यौंही कुंभकरणको देखो अरु रावण सुत सिगरे।
मुंडित तैल लिप्त अविलोके त्यौं निश्चर सब बिगरे ॥१०६॥
शूकर खान ऊंट खर जल कपि चढे नग्न हैं कोऊ ॥
कोऊ महिप मनुप निश्चर पै गमने दक्षिण सोऊ॥
एक विभीपण लखो शुद्ध वर श्वेत छत्र शुभकारी ॥
अविलोके अति अशुभ रीतिसें अपर सकल नर नारी ॥१०॥

रामरसायन । , खंडित सदन सकल अविलोके भस्म निहारी लंका॥ सब निश्वरी रुदन करभारी विह्वल भई सशंका ।। पुरचर अचर सिंधु माधि डूबे अरु जे वीर वडेरे ॥ ते समस्त गोमय हद प्रविशे इमि कुस्वप्न मैं हरे ॥१०८॥ दोहा-सुनि बिजटा मुख स्वप्न गति, भई सकल अति दीन ॥ परी निश्वरी सीय पग, विनय जोरि कर कीन ॥ १०९॥ इमि यामिनि द्वै दंड ही, रही निरखि सब बाम ॥ कछू सचेत अचेत द्वै, सोई इत उत ठाम ॥ १० ॥ ताछिन राघवभामिनी, कोनो महा विलाप ॥ सो विलोकि हनुमंत हिय, भयो अधिक संताप ॥ १११॥ ताही समय सुऔचकै, शकुन भये सिय अंग ।। वामवाहु उर नैन ध्रुव, फरकन लगे सुढंग ।। ११२॥ तब कपि सुरवाणी विपे, प्रभु गुण कीन बखान ।। सुनि चितई सिय चकित चहुँ, सोच हर्प अधिकान ११३॥ हु माया कछु आसुरी, यो करिसीय विचार ॥ है सशंक शिरनायक, रही मान दुखधार ॥ ११ ॥ हनुमान तब आयक, निकट नवायो शीश ॥ कही दुहुँ कर जोरिक, राम दृत ही कीश ॥ ११९॥ तऊन सिय सन्मुख लखी, बोली महि दिशि जोय ॥ नाथ दृतह सत्य कपि, मुहि प्रतीत किमि होय ॥ ११६॥ तय कपि रघुवर अंगके, नखशिख चिह्न समस्त ॥ कहे यथारथ मीय प्रति, बंधु ममेत प्रशस्त ॥ १७॥ अपर कथा वरणी बहुरि, आसर जानि रताल।। मुखते काटि सुमुद्रिका, दीनी अंजनिलाल ।। ८॥ लई सिया आत दुलसि, पिय मुंदगी पहिचानि ॥ ताछिन उमडो नह सुख, नो किमि जाय ययानि ॥१२॥ पनाक्षरी परिन। हगन छुवधि गदि शीशप चटा नाहि हदय लगाव बारम्बार दुलगबहो। फेरि फेरि हरि हरि के कपालभाभी की - (२८८) रामरसायन। ॥ पुनि हनुमान कही कर जोरी खाउँ सरसफल हैरुचि मोरी१३६ सुनि बोली सिय हे. हनुमंता* इत से वर सुभटं अनंता ।। यह अशोकवाटिका विशाला * गुण प्राणप्रिय निश्चर पाला१३७ याते जाय दुराय उताला * खाय सरसफल गमनौ हाला ।। पुनि हौतेज बुद्धि बल धामा औसर लखि कीजो सर्व कामा१३८ यौं कहि दीनो बहुरि अशीशा * शीशनाय गमनो मुदकोशा सियदिशि बार बार सो हेरै 8 सीताकपिहि लखें फिर फेरें१३९ इमि जानकिहि निरखि हनुमाना 8 चले हृदय आनंद अधिकाना॥ अंग प्रफुल्ल रोम बलवंता * उमगो गुण बलतेज अनंता१४० इति श्री रा०र०वि०वि० जनकनंदिनीदर्शन- वर्णनो नाम अष्टमोविभागः ॥ ८॥ दोहा-श्रीहनुमत वरवीर कपि, सिय ढिगते चलि आय कियो विचार सुहीय अब, गमनों बल दरशाय ॥१॥ यौं दृढ ठानि सुवीर वपु, कीनो मेरु समान ॥ प्रगटो वेग प्रचंड अति, पवनतनय बलवान ॥२॥ पुनि अशोकवन मध्य चहुँ, धाय धाय फलखात ॥ भंजत दुमवल्ली सदन, करत महा उतपात ॥३॥ भयो शोर चहुँ ओर अति, खग मृग भगे विहाल ॥ उठी भभरि सव निश्चरी, बूझी सीय उताल ॥४॥ कोहै कपि तुमते कहा, कही निकट यह आय ॥ सुनि दीनो उत्तर सिया, हौंहू भेद न पाय॥५॥ चौ०-सबहि निश्वरी जाय उताला रावण प्रति वरणो कपिहाला ॥ तव दशवदन क्रोध किय भारी सुनिअशोकवाटिका उजारी | प्रात समै सेवा हित ठाढे असीसहस किंकर बलगाढे ॥ सबहि दई आज्ञा दशभाला मारी कीशहि जाय उताला॥७ ते सवही सकोप द्रुत धाये विपुलशस्त्र कपि पर बरसाये॥ तय हनुमत ले परिष विशाला करि पुनि रूप भीम विकराला८ -

धाय धाय किंकर सब मारे ॐ परे मृतक ते धरणि मझार ।।
पुनि कपि गर्जि कियो व भारी बैठ जायगृह शिखर मझारी ९॥
जैति राम लछमन वरवीरा जै कपीश सुग्रीव सुधीरा ॥
राम दास हौं हनुमतकीशा ॐ मदो बहु सहस्र दशशीशा॥१०॥
यों पुकारि पुनि धाम सुभंजा सकल साज खंडित करिगंजा।।
सो विलोकि शतरक्षक धाये १ लै ले शस्त्र क्रोध भरि आये११॥
खंभ उपाटि वीर गहि धावा ताहि भमाय अपार तपावा ॥
सबकी सहि बहु शस्त्र प्रहारे हनुमत ते समम्त हति डारे१२॥
पद्धरी छंद।
हनुमान वीर रसकन मारि । पुनि अति प्रचंड हिय रोप धारि ॥
द्रुम लता धाम सर ह्रद सुकूप । मर्दै अनेक ध्रुव लखि अनूप१३
दशमाथ जंबु मालीहिटरि। दीनी रजाय तिहि ओर हेरि ।।
सोभट प्रहस्त सुत धनुप धाराधायो उताल गर्जत अपार॥१४॥
लखि ताहि वार किय अट्टहास । लंगर लंब चंबो हुलास ॥
सोआय विशिखवाणन प्रहार। मुखशीशवाहु कपि तनु विदार १५
तव कोपि वीर हनुमत उतालागरु शिला धारि तिहि शीश चाल।
भट यातुधान वाणन विदारिकार खंड ताहि दिय भूमिडारि१६॥
तब भीम शाल तरु गहि उपाटोकपि हनो सोउ सोशरन काट।
पुनि पंच बाहु उर मध्य एकादश वक्ष घाल अरु तनु अनेक १७
इमि वाण जंबुमाली स्ताल। हनुमंत अंग मधि दीन शाल ॥
तब कीश धाय सो परिवधारि। डारो जु भूमि निश्चरहि मारि१८॥
पुनि गर्जि वीर चढि उच्च धाम। बैठो निशंक कह जति राम॥
वध जंबुमालि सुनि लंकराय । द्रुत सचिव सुतन दीनीरजाय१९
ते सप्त वीर ल सुभट संग । धाये रताल सजि शस्त्र अंग।
चहुँ ओर घेरिकै सकल कोपिावाण न प्रहारि दिय कपिहिनोपि२०
हनुमान वीर तब क्रोध लाय । निज गात चंड गिरि ममबढ़ाया।
जैजेति राम कहि मोरछाय । कृदेउताल दल मध्य आय ॥२१॥

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गिरे उछलि तिहि शीश निश्चरहि रथ हार युत दलि डारा ॥२६॥
पामरसायना
दावई छंद।
काहू शीश मुष्ट हनि फोरा काहू दंतन काटा ॥
काहू जानु चापि हत काह चरण भुजा उत पाटा ।
काहू पुच्छ लपेटि पछारा काहू नखन विदारा ।।
काहू घालि चपेट प्राण लिय भयो सु हाहाकारा ॥२२॥
यौं हनुमंत सातहू मंत्री सुतन मारि महिडारे ॥
विलोकिकै भभरि पराने अपर निशाचर सारे॥
वीर धीर सानंद धाय पुनि गर्जत निपट निशंका ॥
करि विध्वंस बहोरि धाम बन बैठो शिखर उतका ॥२३॥
सुनि मंत्री सुत निधन दशानन चकित दुखित यौं वरनी ।।
है कोऊ बलवंत सुरासुर यह न कीशकी करनी ॥
इमि कहिलंकनाथ क्रोधित है आज्ञा दई उताला॥
सेना अग्रगमन अधिकारी जाय गहौ कपि हाला ॥२४॥
'विरूपाक्ष यूपाक्ष प्रघस अरु भास करण वर वीरा ॥
रश्मिमालि ये पंच निशाचर दल नायक रणधीरा ॥
संग सैन चतुरंग अंग सजि घोरं शोर कर धाये।
कपि उदंड भुजदंड चंड दुहुँ ठोकि हिए हुलसाये ॥ २५॥
. यातुधान हनुमान अंगपर अगणित शस्त्र प्रहारे ॥
रश्मिमालि तकि पंचवाण वर विशिख वीर तनु मारे ।
तब केसरी किशोर गात निज करि भूधर सम भारा ॥
विरूपाक्ष यूपाक्ष वीर दुहुँ तासु निधन लखि धाये ॥
कोश वाहु उर कोपि निशाचर मुद्गर अमित चलाये ॥
तब हनुमंत शाल द्रुम लैंकै दोऊ भट हति डारे ॥
भासकर्ण अरु प्रघस हेरि सो क्रोधित आय प्रचारे ॥२७॥
पटिश प्रवस बाल हनुमंतहि भासकरण हन शुला ।
अपर अनेक शस्त्रधर निश्चर निकर कीशवपु हूला ॥
तवहि प्रभंजनपुत्र प्रवल भट गहि गिरि शृंग विशाला।।
घालो यातुधान मो दोउ मृतक भये ततकाला ॥२८॥

रामरसायन। (२९१) पुनि रथ रथनि तुरंग तुरंगनि दंती दंनिन मारे ॥ वीरन वीर विपुल गिरि वृक्षन दंतन नखन विदारे । या संहारि सैन पुनि हनुमत जै कपीश कहि धाई ॥ बैठे धाय उताल शिखरपर रोमावली फुलाई॥ २९॥ न दोहा-पंचसैन नायक मग्न, सुनि दशवदन रिमाय ।। निज सुत अच्छकुमारका, दीनी वेगिरजाय ।।३० ।। सो०-रावण सुत बलवंत, अच्छसाज वर स्वच्छ मजि ॥ लै भट भीर तुरंत, धायो रत आरूढ़ है ॥३१॥ हरिगीतिका छंद । लखि अच्छ वपु छवितेज हनुमत बीर चित चकृत भये ॥ वा सो सपदि चापहि तान बान संधान त्रैकपि शिरहए । जोलग तवंगम उठन चाहो तो लगे शर जालते ॥ दिय झपि अंग रताल दीनों शाल नख लग भालते॥३२॥ कपि तकत इत उत जकत पुनि अवकाश रंच न पावही ।। इमि अच्छवीर निहार वान अपार विशिख चलावही ।। हनुमान किय अनुमान निश्चर वाल पेबल भूगह ।। कह कीजिये इहि काल मोतनु शालनग्ख शिख पूर है ॥३३॥ यौंकरि विचार सुवीर उछले व्योमदिशि मोऊ तहाँ ।। चलि बाण वेधे लच्छ करि करिअच्छ कपि व्याकुल महाँ॥ हुनुमंत तब अतिरोप करि निज गात विपुल बढायक ॥ तल मारि स्यंदन बाजि युत तिहि दीन भूमि गिरायकैः ॥ ३ ॥ पुनि उछाल निश्चर अंतरिच्छहि भिगे दुहुँ दोउन हने । तितह प्रहारे शस्त्र अंग निनवीर मे व्याकुल बने । तय कोष भरि हनुमंत अग्छदि बेगि पद गदि धायक ।। आकाशने धरि धणि मागे सबल भूरि भमायक ॥३३॥ दश कंठसुत शिर कंट भुज काटि जंब पद टिन " दुई अच्छ बच्च. ܐ al मन (२९२) रामरसायन। . . लखि तासु वध निश्वर पराने कोश आय उतालही। तिहि उच्च शिखर विराजकी नगराज दै भुज तालही ॥३६॥ दोहा-सुनौ दशानन अच्छ वध, भयो शोक दुख भूरि ॥ तब भापी घननादसों, महाकोष उर पूरि ॥३७॥ जाहु पुत्र वर वीर तुम, गहि लावौ इतकीश ॥ को आयो कपि वै लखौ, के यम कै सुरईश ॥ ३८॥ सुनत इंद्रजित साज सजि, आयो अतिहि उताल ॥ . लखि हनुमत घननादको, किय घननाद कराल ॥ ३९ ॥ करो युद्ध बहु बीर दुहुँ, काहुहि कोउ न जीत ॥ उत नृपसुत इत पवनसुत, दोऊ सबल अभीत ॥४०॥ इंद्रजीत हिय हारिक, किय ब्रह्मास्त्र प्रहार ॥ निज इच्छातें कपि गिरो, तासु प्रभाव विचार ॥४१॥ भूमि परतही वीरको, यातुधान बहु धाय ॥ सन द्रुम बल्कल रज्जुते, बंधन कीन दिढाय ॥४२॥ रज्जु निबंधन होतही, अस्त्र बंधभो मोच ।। सोगुणिकै घननादके, हदै भयो अतिसोच ॥ ४३॥ अस्त्र बंध जो होय तिहि, बंधन अपर न योग । दृजो बंधन होतही, रहै न मंबनियोग ॥४४॥ इंद्रजीत इमि मनहि मन, सोचत करत विचार ॥ ताडत खेचत कपिहि भट, लाये सभामझार ।। ४५॥ १० वा ॥ मुं' का ॥ स. १८॥श्लोक ॥ ततः स्वायंभुवमत्रब्रह्मानं चाभिमंत्रितम् ॥ हनुमाश्चिंतयामास वरदानं पितामहात् ॥ १॥ नमेम्य बंधस्य च शक्तिस्ति विमोक्षणे लोकगुगः प्रभावान इत्येवमेवं विहितोत्रबंधो मयात्मयानानुवर्तितव्यः ॥२॥ नवीयमन्त्रम्य कपिपिचार्य पितामहानुग्रहमात्मना ।। पिमोसशक्तिः परिचितयित्वा पितामहानामनुवर्ततेस्म ॥३॥ .

गमरसायन। (२९३) अस्त्रेणापि हि बद्धस्य भयं मम न जायते ॥ पितामहमहेंद्राभ्यां रक्षितस्यानिलेन च ॥४॥ ग्रहणे चापि रक्षोभिर्महन्मे गुणदर्शनम् ॥ राक्षसेन्द्रेण संवादस्तस्मागृहंतु मां परे ।।५।। सनिश्चितार्थः परवीरहता समीक्ष्यकारी विनिवृत्तचेटः ।। परैः प्रसह्याभिगतर्निगृह्य ननाद तेस्तैः परिभय॑मानः ॥६॥ ततस्ते राक्षसा दृष्ट्वा विनिश्चेष्टमरिंदमम् ॥ वबंधुः शणवल्कश्च तुमचीरश्च संहतैः ॥ ७ ॥ म बद्धस्तेन वल्केन विमुक्तोत्रेण वीर्यवान् ।। अस्त्रबंधः सचान्यं हि न बंधमनुवर्तते ।। ८॥ अथेंद्रजित्तं द्रुमवीरवद्धं विचार्य वीरः कपिसत्तमं तम् ॥ विमुक्तमस्त्रेण जगाम चिंतामन्येन बद्धोप्यनुवर्ततेस्त्रम् ॥ ९॥ अहो महाकर्म कृतं निरर्थ न राक्षसमैत्रगतिर्विमृष्टा ।। पुनश्च नास्त्रे विहितेस्त्रमन्यत्प्रवर्तते संशयिताःस्म सर्वे ॥१०॥ अत्रेण हनुमान्मुक्तो नात्मानमवबुध्यते ॥ कृप्यमाणस्तु रक्षोभिस्तश्च बंधेर्निपीडितः ॥ ११ ॥ इन्यमानस्ततः क्रूर राक्षसैः कालमुरिभिः ।। समीपं गक्षमेंद्रस्य प्राकृप्यत स वानरः ॥ १२ ॥ अथेंद्रजित्तं प्रसमीक्ष्य मुक्तमस्त्रेण वद्धं दुमची-मूत्रः ॥ व्यदर्शयत्तत्र महावलं तं हरिं प्रवीरं मगणाय ग १३॥इत्यादि दोहा-गवणममा विलोकिक, चकित चित्त हनुमंत ।। करजोरे टाटे उचित, सुर अरु असुर अनंत ॥ १६॥ प्र०॥ हनुमनाटक ।। शोक। ब्रह्मन्नध्ययनस्य नप समयस्तृप्णी बहिः स्थीयतां स्वल्पं जल्प बृहस्पते जमते नपा सभा वत्रिणः । वीणां वारय नारद श्रुति- कथालापरलं तुम्बुगेमीनागरिकभल्लभग्नहदयः स्वस्थो न लंकेश्वरः।। 1118| इंद्रं माल्यका महवकिरणं द्वारप्रतीहारकं चंद्र छत्रधरं समी- वाणी समाजयंती गृहान ।। पारक्ये परिनिष्टितं हुतबदं किं नाम नेहेलमग्मोमध्यमनुष्यमात्रयपंग स्लीपि किम।।।५।। इन्यादि चौ०-शिबिका मध्य सियहि बैठारी दासी भाव सकल तुवनारी जिनहिं सदा मम निश्चर खाही तिनके शरण वीर हजाही २८॥ (२९४) गमरसायन। दोहा-दशमुख साज समाज वर, तेज प्रताप मरूप ॥ निरखि सग़हत मनहिं कपि, गुणत समस्त अनृप ॥१७॥ लंकनाथ हनुमानको, वल वपु तेज निहारि ।। सोचत विधि हरि शंभुको, आयो कपितनु धारि॥ १८ ॥ यौं गुणि रावण छिनहि छिन, हेरत कार हगवंक ॥ त्यो उतंक तिहि लखत कपि, लोचन लाल निशंक ॥४९॥ तब ग्रहस्त प्रति दशवदन, कही सुवृझी याहि ॥ वन भंजन किहि काज किय, क्यों आयो को आहि ॥५०॥ चौ०-सुनि प्रहस्त बृझी सब कोश कह हनुमंत सुमिरि निजईश ।। कपि हौं पवनपुत्र हनुमाना रामदास लघुकरत वखाना५॥ राज दरश हित विपिन उजारा * निज तनु रक्षाहित दलमारा ॥ जनकसुताहि लखन हित आयो पुनि कपीशशिख देन पठायो५२ यौं प्रहस्त प्रति कहि कपि वका पुनि बोले रावणहि निशंका है। निश्चरनाथ परमहित मानी * अंगीकार करिय ममवानी ५३॥ सर्वया कवित्त । लुकि कीजत है कहुँ नेकी बदी वह देखत है सबही गति साफै ॥ यह भूलि न जानियो जीमें कवौं जुकरैं हम काम सु कोउ न भाफै ।। रसिकेश इहाँ कछु जैसी करी तिहिमें तिलहू न घटै न इजाफे ॥ उत वैसिहि हेत तिहारे तयारहै ह्वां हरिके घर होत निसाफै ॥ ५४॥ दोहा-हौ निश्चरपति वेद विद, सकल ज्ञान गुणधाम ।। तव हौं अति हितमानिकै, कहौं भी श्रीराम ॥ ५५॥ पुत्र बंधु युत निश्वरनाथा रामशरण गमनीमम साथा२६॥ याहीमें सब भाँति भलाईन तरु वृथा तुव सकल नशाई ॥ । सुनि हनुमंत बचन दशशीशा कही सम्हरि बोलत नहिं कीशा२७ राम लपण है मनुज दुखारे ॐ त्यौं दुर्वल कपि भालु बिचारे ॥ ।

गमरसायन। तब हनुमंत कही करि क्रोधा *तू वेदज्ञ रंच नहिं बोधा॥ हौं जानी आयो तुव काला ॐ सुनि रिसाय बोलोदशभाला५९ दोहा-है कटुवादी कीश अति, वेगि करौ वध याहि ।। सुनि आज्ञा निश्चर उठे, लै लै शस्त्र उछाहि ॥६॥ तवहि विभीपण जोरि कर, भ्रातहि कही बुझाय॥ नाथ नीति जान सकल, दूत अवध्य सदाय ।। ६३ ।। वध कारागृह ट्रेन अरु, इते दूत हित दंड ॥ अंग विरूप सुताइना, मुंडनादि सब चंड ।। ६२ ।। प्र.॥ वा० ॥ मुं० का० स०५२॥ लोक । वरुप्य मंगेत कशाभिघातो मौड्यं तथा लक्षण सन्निपातः ॥ एताहि दृते प्रवदंति दंडान्वधस्तु दूतस्य न नः श्रुतोस्ति ॥१६॥ चौ सुनि रावणतब नीतिप्रमाना कही बोलि निश्चर बलवाना॥ कीशहि पुच्छ परम प्रिय होई याते भस्म करौ दूत सोई ६।। सुनत अनेक निशाचर धाये ॐ जीरन वसन तैल बहु लाये ।। कपि विचार युत पुच्छ वढाई यातुधान सोलखि रिसलाई ६४ पुच्छ लपेटे वसन घनेरे * सिंचि तैल बहु घट चहुँ फेरे ।। तामधि पावक दई लगाई चले कपिहिलै ढोल बजाई ६५॥ नगर माहिं फेरो चहुँ ओरा * कौतुक लखें सकल कार शोरा।। ताछिन इक तिय सिय ढिगधाई हनुमत दशा समस्त सुनाई ६६॥ मो सुनि सीता भई दुखारी अति उताल उठिलै करवारी ॥ अनल दिपाय प्रदक्षिण दीना कहि वर वैन सत्य प्रण कीना६७ दोहा-मेगे मन वच कर्मते, सत्य पतित्रत जोय ॥ तो हनुमंतहि वेगही, अनल तोय सम होय ॥ ६८ ॥ यौंकहि मुख कपि ओर करि, सींचो अनल सुवारि ॥ शीत पुच्छ तच्छनलगो, वीर सुलयो विचारि ॥ ६९ ।। चा-तब हनुमंत हीय ठहराई की इमि औसर का फेरि मिलाई । सो गुणि लघुतनु करि बलवंता बंधन तेकढि निमुकि तुरंता ७० प्रवल मेव सम गर्जि कराला ॐ भये पर्वताकार विशाला।। --

(२९६)
गमरसायन।
-
बंध मांच लखि निश्चर भागे हनुमान अति आनंद पागे ७१॥
उछलि उनाल, उच्च गृह जाई प्रबल अनल चहुँ ओर लगाई।
तह ते पाय अपर थल जाग कृदि सुधाम और पुनि वाग ७२||
एक विभीपण मदन बचाई लंका अपर समस्त जराई ।
ताछिनु प्रवल पवन किय जोग माचो नगर शोर अति घोरा७३
धाय धाय चहुँ पवनकुमाग पैटि पंथ गढ सदन बजारा ॥
लाई अनल उठी बहु बाला छायो हाहाकार कराला॥७४ ॥
दोहा-अमित निशाचर निश्चरी, जान माज आगार ॥
अग्नि उतंक सुलंक नहुँ, लगी होत जरिछार ।। ७५ ॥
गवण अति व्याकुल भयो, जन धावत चहुँ ओर ।।
जगत मरत भागत परत, करत सुआरत शोर ॥ ७६॥
एक विभीपण भौन अझ, मिया रहें जिहि ठोर ।।
बचे दुहूँथल गम बल, लंक जरी सब ओर ॥ ७७॥
इमि हनुमंत सुवीर वर, लंक नगर सब जार।
अनल सिराई पुच्छकी, कूदि पयोधिमझार ॥७८ ॥
मंजन किय तनु स्वेदजो, परो सिंधु महँ भूरि ।
मोसफरी भपिक जनो, मकरध्वज बल पूरि ॥७९॥
करत समंजन कीश उर, वाढो सोच अपार ॥
भो अनर्थ जारोसकल, राखो कछु न विचार ॥ ८०॥
नगर वाटिका बाग वन, गढ़ गृह पुर प्राकार।
सब जारी हौं क्रोध वश, कियो सकल कार ॥८१ ।।
सुरति न राखी सीयकी, हाय कहामैं कीन ॥
भयो अयश पातक मरन, अरु त्रिलोकपतिहीन ॥ ८२॥
दोवई छंद।
सीय मरन सुनि राम न जीवें तिन बिन लपण न है ॥
सोलखिकै सुकंठ तनु त्याग तब सब कपि जियदे हैं।
सुनि उत भरत सर्वधु मातगण युत समाज मृत होवें ॥
कोशवंश रघुवंश दुहूँ ये मो करणी वश खोवें ॥ ८३ ॥

नमरसायन। (२९७) दोहा-धिग मम जीवन जन्म घुधि, थिग धिग बल धिग क्रोध॥ धिग विद्या गुण रूप धिग, जो नहिं गखो बोध ।। ८४॥ मोहि उचित सब भाँति अब, प्राण त्याग इहि काल ॥ यौं मोचत विलपत अतिहि, व्याकुल अंजानिलाल ॥८५॥ तो लग सुने सुबैन कपि, इत रत होत पुकार ॥ जरी वाटिका मिय बची, यह आचरज अपार ॥ ८६॥ उत सीता सब विधि कुशल, इने विभीषण भौन ॥ बचे सुदै थल अरु सकल,जगे सु कारण कौन ॥ ८७॥ सो०-सुनी गिरा हनुमंत, यों तब कछु उर धीर धरि ।। आये.धाय तुरंत, निराख मियहि प्रफुलित भये ॥ ८८॥ स्वामिनि पद धरि शीश, करी विनय बहु धारदै । तव सिय सहित अशीश, कहे वचन अति प्रीति युत८९॥ सुनि हनुमत शिरनाय, पाय रजाय अनंद युत । रामचरण हिय ध्याय, चलि आये पुनि सिंधुतट ॥ ९०॥ इति श्री० रा० २० वि० वि० लंकादहन . वर्णनो नाम नबमोविभागः ॥ ९॥ दोहा-सागर तट हनुमंत कपि, गिरि अरूढ़ ह वीर ॥ पार गमन हित हर्प युत, कीनो भीम शरीर ॥ १॥ अंग फुल्ल रोमांच भो, पुच्छ गुच्छ शिरधार ॥ कुधर चापि उछले सबल, गमने व्योम मझार ॥२॥ सिंहनाद करि वीर कपि, नभ मंडल जात ॥ सिद्धि भयो प्रभुकाज गुनि, छिन छिन हिय हरपात ॥३॥ सुर किन्नर गंधर्व मुनि, खड़े व्योम चहुँ ओर ।। ताछिन कपिहि सुनाय के, विनय करत कर जोर ॥१॥ घनाक्षरी कवित्त । ऐसोओज सुयश विराजे महि मंडल में परम प्रचण्ड तनु तेज भूरि भानको ॥ जाकी केलकीरति बवान गम आप मुख शेप हून गाय सके ताके गुण गानको ।। गमिकाविहारी मुखदायक मदाही बंध ॥ वंध बुद्धि दुष्टनकी वाक्य बंध गति बंध दल खल झुंडनके । दृष्ट तेरी है ॥९॥ तृतो वीर सुखद सदाही दीन दासनको दोप परकृत यंत्र मंत्र तंत्र बंध भानु भीम मंद आदि कुग्रह सुबंध (२९८) रामरसायन। दूजो जनपाल दानी करुणा निधानको। दीननको त्राता मोद मंगल विधाता बहू ऋद्धिं सिद्धि दाता वंदों नाम हनुमानको॥५॥संकट हरन दुष्ट दानव दरन छल छिद्रके छरन शोक सिंधुके तरन हैं।अंधुज वरन बहु वित्तके भग्न वेगि औढर ढरन दीन पालन करन हैं। अशरन शरन सुभक्त उद्धरन जोम जंगके लरन पूरी पैजके परन हैं । रसिकविहारी हेतु सुफल फरन सदा ऐसे कपि केशरीकिशोर के चरनहैं ॥६॥दाताहैं अतुल जन त्राता वरवंड बहु दुष्टनके पाता है प्रचंड सो वनेरे हैं।। रसिकविहारीके कलेशके निपाता सदा भक्त भय हाता चहुँ येही निरवरे हैं ॥ केशरी किशोर रणरोर वर जोर वीर पकर पछारें विघ्न जेते सब नेरे हैं । वैरीबल भंजा उद्धखल दल गंजा धीर दीन मन रंजा ऐसे पंजा युग तेरे हैं ॥७॥गिरि सों गंभीर प्राण हरत सुवीरनके वैरिन विदीरनको बत्र सों करेरोहै ॥ पव्वै सो परे है खल झुंडनके मुंडनपै परमः प्रचंडित उदंड सो घनेरे है ॥ उद्धत अपार जाके बलको न वारापार रसिकविहारी दीन रक्षक निवेरोहै ॥ केशरीकुमार निज वीरता विचार वीर दुष्ट हर जुष्ट रुष्ट पुष्ट मुष्ट तेरोहै ॥ ८॥ भंजत अरिष्ट कोटि अति उतकृष्ट रहै दुष्टन तलिटन पै कुद्धित करेरी है ॥ दीनके अभिष्टनको पूरत वरिष्ट वेगि अमित गरिष्ट इष्टवान हित हेरी है ॥ दृष्टको अदृष्ट औ अदृष्टहूकों दृष्ट करै उतपति पालक सँहार सृष्टिके रोहै । अधिक कुदृष्ट सदा रहत मलिटनपै रसिकविहारी पै सुदृष्ट रसिकविहारी हेत संपतिकी संकरे।मुटनसे मारिकै विदारत अतुष्टनकों जोमजुष्ट रुष्ट पुष्ट दुष्टनकी काचर्वचर्व डारत अखर्व गर्व गर्विनको विघ्नकै कृतघ्ननको मारि विनत करे ॥ येरे हनुमान बलमान गुणके निधान बेगि हो सहाय मेरी तूही नित्य जैकरी॥१०॥बंध जीभनिंदक प्रमादी औ चवाइनकी बंधढीठ मूट भूत प्रेत रोग बंध बंध ॥ बंध रामरसायन। कर पद बंध बंध ॥ वंध विप डाढ नख शृंग शस्त्र अस्त्र सबै वेगि बजरंग कुरु चराचर वंध बंध ॥ ११ ॥ बन्ध बंध अनल अकाश जल थल बंध योगिनी मशान यक्ष गन्धरव वन्ध बंध ।। बंध बंध शाकिनी औ डाकिनी पिशाचिनीको बंध वीरदानव सु ब्रह्मदेव बंध बंध ॥ बंध बंध काल औ कराल वैरी बंध बंध दीह दुख दारिद जु दुर्दिनको बंध वंध ॥ वंध बंध सकल समर्थ खल झुंडनकी वेगि हनुमंत कुरु दुष्ट बल बंध बंध ॥ १२ मणिप्रवालरीति । देहि वरदानं वीर सम्प्रति यथेच्छितं हि कुरु चानुकंपां तव चरणी भजाम्यहम् ॥ दुर्जनान् भंजय विभंजय सुदुर्दिनानि शृणु चांजनेय दीनवचसा वदाम्यहम्।।झटिति गृहाण हे निलात्मज तवाशनाय कलुप दरिद्रारातियूथं प्रददाम्यहम्॥ पूरय सुवित्तं रसिकेशस्यानुमोद दातुं पवनात्मजो मां पातु शिरसा नमाम्यहम् ॥ १३॥ माकुरु विलंबं वीर संकटादुद्धारयाशु दासोहं तवास्मीत्यभियाचमानो दीनोहम् ॥ दिक्षु वितनोतु कीर्ति विपुलां तनोतु लक्ष्मी देहि रसिकेशस्याभिलापं त्वदधीनोहम् ॥ निर्भयो हि भूमी विचरामि भक्दाश्रयेग सकलसुकर्ममनोवचनान्मलिनोहम् ॥ करणाकटाक्षेणावलोकया शु मां भो कपे नान्यम् ॥ भावयामि पवनात्मजा विहानोहम् ।। १४॥ दोहा-इमि अपार अस्तुति विविध, होत व्योम चहुँ ओर । सिय सुधिले आनंद युत, जात वीर वर जोरं ॥ १२॥ प्रवल पवन सम बंगबहु, मेघ सरिस कर नाद । सिद्धि काज भो राजको, या टेरत अहलाद ।। १६॥ ची-जाम्बवंत अंगद बहुवीराज मय मागर उत्तर तीरा ॥ ते लखि वेग गर्जनों भारी, उठि उठि दक्षिण दिशा निहाग१७॥ कीनो सकल सत्य अनुमाना नहि घन पान मुहै हनुमाना । काजसिद्धि करिक कपिआयोः यह आनंद शोर नग्मायो ॥१८॥ इमिभापत तो लग हनुमंता आये व्योम निकट १९. - ३००) रामरसायन। हिते कह कीश पुकारी * ही देखी श्रीजनकदुलारी ॥१९॥ नौं भापत नभ ते गुणमाना * गिरि पर कूदि परे हनुमाना। हरि अंगदादिक सब धाये * यथायोग मिलि हिय हुलसाये२०॥ हनूमान तब लघु वपु कीना * कहि समस्त सवही सुख दीना ॥ वीर पराक्रम सुनि हरपाही * पुनि पुनि मिलन पवन सुतकाहीं२१ सिद्धि काज गुणि कपिगण नाना * किलक नवे करै बहु गाना ॥ वाय धाय सुंदर फल लावै हनुमंतहि करि प्रेम खवावै ॥२२॥ छिन छिन सब हनुमतहि सराहैं * हेरि हेरि मुख हीय उमाहैं । जाम्बवंत प्रमुदित यो भापे सकल प्राण तुमहीं कपि राखे२३॥ दोहा-कीश भालु गावत नचत, कहत सुनत वर वैन । यौं ही अति आनंदमें, तहँ बीती सब रैन ॥२४॥ प्रात होत सब भालु कपि, जुरि बैठेइक ठाम ॥ करन लगे वर मंत्र तब, कह अंगद बलधाम ॥ ॥२५॥ जिते भालु कपि हैं इतै, ते सबही बलवंत ॥ पै रावण वध हेत बहु, के हम कै हनुमंत ॥२६॥ सो हम लंकहि जाय द्रुत, सदल रावणहि मारि । जनकसुतहि लै आवहीं, इते पृष्ट निज धारि ॥२७॥ पुनि चलि सब सानंद अति, रामहिं सौंपें सीय । कपिपति रघुपति काज लखि, सिद्धि मुदित हो होय ॥२८॥ चौ०-ऋच्छराज सुनि अंगद वानी * कही सुरीत नीत हित सानी।। कीशपाल रघुलाल सुदोऊ दीनी यह रजाय नहिं कोऊ ॥२९॥ सिय दरशन आज्ञा जो दीनी सो प्रतिपाल पवनसुत कीनी ॥ याते मम संमत यह आई चलि दीजे सब प्रभुहि सुनाई॥३०॥ पुनि जिमि ईशरजायसु होई शिर धरि मुदित करें सब कोई ॥ जाम्बवंत मत सकल सराहा र उठे वीर भरि हृदय उछाहा ॥३१॥ हुत महेन्द्र गिरिते सब बीग उछले व्योम पंथ रणधीग | किकिया टिग वेगहि आये ? नकल भालु कपि आनँद छाये३२|| N

रामरसायन।
(३०१)
जो मधुवन कपिपति प्रियकारी जिहि दधिमुख वानर बलभारी ।।
कीशपाल मातुल सो धीरा रस सदा सहित भट भीरा ॥३३॥
दोहा-आये मधुवन मध्य सब, लखे सरसफल भूर ।
विविध पत्र मधु वेलि तरु, विमल नीर सुखपूर ॥ ३४ ॥
हनुमानादिक वीर सव, लै युवराज रजाय ।
पठे मधुवन मध्य दुत, कहि जैजै कपिराय ॥३५॥
दोवई छंद।
धाय धाय चहुँ ओर सुवानर जाति महा उतपाती ।
अशन करै अरु तोरि बहाशाख फूल फल पाती।
भंजै तर गजै बर वेलिन मधु पी३ किलकारें।
भरै द्रोण कर धरै मत्तह्न ढोरि महीतल डारें ॥३६॥
कोउ चदि द्रुम धरि झकझोर कोउ शाखगहि झमैं ।
कोऊ इक तरुते दूजेपर उछलि वैठि तिहि दूमैं ॥
काऊ पुच्छ उठाय सुनाचै कोऊ मुखहि बजावें।
कोऊछंद प्रबंध उचारे कोऊ हँस जुगावें ॥३७॥
कोऊ मल्लयुद्ध हठि ठान बैठे कोउ चुपाई ।
कोऊ. रुदनकरें शिरकर घर सो कोउ जाई ।।
गज कोउ शोरतें कोट, पौ मृतक समाना॥
इहिविधि कपि उनमत्त मोद युत विरचे कौतुक नाना ॥ ३८॥
घोर शोर मधुवन मधि छायो सो सुनि दधिमुख धाये ।।
लखि विनस दंडगहि क्रोधित कीशनमारि भगाये ॥
पुनि अंगद रुखपाय प्लवंगम हनुमदादि बलवाना ॥
सन्मुख है सुकंट मातुलके भये युद्ध अगवाना ।।३९॥
रहे जित वनपाल कीश तिन हनुमदादि वरवीग ।।
दंतन नखन तलन पद मुटन हनि हनि किये अधीरा ॥
कहे विविध दुर्वचन सकल पुनि देव मार्ग दरशाये ।
अति अपमान जान सो दधिमुख रक्षक सकल बुलाये ॥१०॥

रामरसायन। सुनि सुग्रीव सहानुज रामा ॐ मुदित भये गुणि पूरण कामा । गदगद कंठ अंग पुलकाने * प्रिया प्रीति रघुबर उमगाने ५८ रही न धीर वीर दिशि हेरी निज समीप अतिआतुर टेरी ॥ सादर अंकलाय बैठारे राजकुँवर मृदु वचन उचारे५९ दोहा-कहाँ प्राण प्यारी सिया, भापौ पवनकुमार ।। हौं धाऊं अति बेगि तहँ, जहँ जीवन आधार ॥६० ॥ घनाक्षरी कवित। मेरी प्राणप्यारी तुम निज हग देखी सत्य भाषी वेगि नकहून शंक हिय राखौ वीर। कितहैं कहाँहैं किहि देश किहि भेष माहिं ग्रा- म नाम ठाम धाम वरणि धरावो धीरसिकविहारी कहीजनकदुला- री काह जीवै किमि वाला कैसे सहत वियोग पीर । मेरो दिन रात विरहानल जरावै गात सपदि सिरावो वरसायकै सुबैन नीर ॥६१॥ दोहा-तब हनुमान मुवीर वर, बोले दुहुँ कर जोर ॥ सिंधु पार लंका नगर, अनुपम दक्षिणओर ॥ ६२॥ तहाँ अमित निश्चर प्रबल, भूपति रावण नाम ।। लै राखी सो जानकिहि, वन अशोक वर धाम ॥ ६३॥ परम प्रबंध अपार चहुँ, दशमुख राखत आप ॥ बिकट निश्चरिनमध्य सिय, बैठी करहिं विलाप ।। ६४ ॥ सत्य पतिव्रत धर्म युत, प्रभुपद सुमिरहिं सीय ।। दुरश आश करि छिनहि छिन, वरवस राखहिं जीय॥६६॥ भोहिं रावरो दास दृढ, जानि महा सुखपाय ।। मम स्वामिनि प्रभु हेत यह, विनय करी शिरनाय ॥६६॥ हो दासी प्रभु चरणकी, दीन आपनी जानि ।। मोहिं दश दीजे सपदि, हो सुभक्त सुखदानि ॥ ६७॥ भयो होय भारी जुप, माते का अपराध ॥ तो सवही कीजे अमा, प्रभु उर दया अगाध ॥ ६८॥ मेरे मन वच कर्म नित, प्रभु बिन और न कोय ॥ पराधीन अबला दुखी दखि कृपा द्रुत होय ॥ ६॥ - ~ , .

रामरसायन। (३०५) दरश आश ? मास लग, औरहु राखौं प्राण ॥ अवधि गये तनु त्यागिहीं, दुसह कलेश निदान ॥ ७० ॥ यौं कहिकै हनुमंत पुनि, बोले हग जल ढार ।। जनकसुता दुख कहत प्रभु, मो हिय होत दरार ॥७॥ सो सुनि रघुवर श्वास लै, हिलकि उससि अकुलाय ॥ कही हाय ममवल्लभा, अब किहि भाँति मिलाय ॥७२॥ यौं कहिकै कपि ओर लखि, हग भरि है मुख दीन ।। विरह प्रेम दुख सुख उमॅगि, बोले निपट अधीन ।। ७३॥ मम हित निज भूपण वसन, प्रिया न दीनो वीर ॥ विनपाये तिहि चिह्न कछु, मो उर धरै न धीर ।।७४ ॥ तब हनुमंत उताल अति, सिय भूपण सो दीन ।। हेरतही उमँगाय कै, राजकुँवर करलीन ॥ ७ ॥ निज प्यारीके शीशको, भूपण दृढ पहिचान ।। लीनो हृदय लगाय तिहि, अति अनंद उमगान ।। ७६।। व प्रसन्न बहु कपिहि पुनि,लायो अंक मझार ॥ बहु वखान हनुमानको, कोनो राजकुमार ।। ७७ ।। चौ-पुनि रघुवीर धीर उर धारी ॐ जीवत सिय दृढ हृदय विचारी। तब वृझी कोशहि रघुवीरा * लंक कथा वरणो सब वीरा७८॥ सुनि हनुमंत प्रभुहि शिरनाई कर सकल कथा विस्तृत निज गाई॥ सुनि बोले कर जोरि सुकीशा यह तव कृपासकल जगदीशा७९ सुनि हनुमंत कर्म रघुवीरा ॐ अपर भालु कपि सब वरवीरा ।। बुद्धि नीति बल भूरि सराहे सिद्धिकाज गुणि हृदय उछाहे८० इति श्री रा०र०वि०वि०सीतासंदेशमानिवर्णनो नाम दशमोविभागः॥१०॥ दोषच्छंद। सुनि हनुमत मुखलंक कथा सब रघुनंदन धनुधारी ॥ सिया ध्यान करिक सुकंठ सों मंजल गिरा उचारी ।। हे कपिराज आज अगहनकी असित अएमीनीकी। पुनि नक्षत्र उत्तरा फालगुनि आश पुजा जोकी ॥१॥ ॥ २० ॥

तदुपरि हस्त समस्त योगवर है प्रशस्त शुभदाई ॥ पुनि मुहूर्त अभिजित यहि औसर अरु बहु सगुन जना ऐसे समय पयान अनी युत होय विजय चलिकीजे ॥ याते सखा वेगि कपि ऋच्छन गमन रजायसु दीजे ॥२ प्र० ॥ वाल्मी० ॥ सुद्धांडे । सर्ग ४ ॥ श्लोक । आस्मिन्मुहुर्ते सुग्रीवः प्रयाणमभिरोचते ॥ युक्तो मुहूर्ते प्राप्तो मध्यं दिवाकरः।।।।उत्तराफाल्गुनीह्यद्य वस्तु हस्तेन यो अभिप्रायाम सुग्रीवः सर्वानीकैः समावृतः ॥२॥ उपरिष्टाहि स्फुरमाणमिमं मम ॥ विजयं स मनुप्राप्तं शंसतीव मनोरथम् इत्यादि। दोवई छंद। मुनि सुग्रीव बुलाय वेगि भट यथा योग समुझाई ।। दई रजाय चले प्रमुदित सब कीश भालु समुदाई ॥ पवनसुवनके कंध राम लछमन अंगदके कांधे ।। शोभित भये भ्रात दुहुँ गमने वरणि खंग कटिवांधे ॥३॥ पंथ सुधारत जात नील कपि भालु लक्षलै आगे ॥ कुमुद सदल शोधत मग चहुँ दिशि चलें सजग सँग लागे तिन पाछे गज गवय गवाक्षहु गवनै अनी समेता ॥ ऋपभ वाहिनी सहित दाहिनी ओर सिधार सचेता॥ ४॥ गंध हस्ति दुर्धर्पतरस्वी गंधमादनहि आदी ॥ चलें वामदिशि बहु वीरन युत गर्जे कीश प्रमादी ।। बली सुपेण वेगदरशी अरु जाम्बवंत भट आछे ।। विकट भालु कपि विपुल सहित वे गमन करत हैं पाछे ।। लै शतवली कोटि दश वानर अनी चहूँ दिशि चाले । कपि शतकोटि पनस केसरि ले ते तिनहुं प्रतिपालै ।। हे विधि विकट कटकचहुँ गमन यथा उचित सह चेता। यसबंधु राम तहँ कपिपति कीश अपार समेता॥ ६ रामरसायन। (३०७) कीशभालुदल अमित भूमि नभ मारगं मुदित सिधा ।। नगर ग्राम आराम कृपी बहु गमनत सकल बचावै॥ होत शकुन शुभ निरखि राम युत हर्प सबै मनमाहीं। गर्जाहं कपि तरु गिरि गहि पावै करि कलोल किलकाही ।। ७॥ कंद मूल फल फूल पत्र मधु अशन करै हरपाई। सब तरु वेलि सफल छाये चहुँ निज निज समय विहाई॥ इहि विधि अमित भालु कपि संयुत राम सप्तदिन माहीं। पहुँचे आय उताल सिंधु ढिग दल छायो चहुँ घाई ॥ ८ ॥ बढि महेंद्र गिरिपर रघुनंदन लखि सबंधु वारीशा ।। सादर दुहुँ कर जोर विनय युत ताहि नवायो शीशा।। पुनि तहते वेगहि तट आये सब कह दई रजाई ।। कियो वास कपि भालु त्रिमंडल उचित मुआयसुपाई ॥९॥ द्विविद मयंद नील नल आदिकले कपि भालु अपारा । लखत फिरत महि व्योम सजग बहु चहूं सुभट रखवारा॥ अपर अनेक प्रबंध यथोचित दृढ कीने सुग्रीवा ।। नीति रीति भय प्रीति सहित सत्र रहे वीर बलसीवा ॥10॥ योथपि सेन विदिन सागर तट रघुवर कियो निवासा॥ वठे लपण सुकंठ पवनसुत आदि गमके पासा ।। ताछिन गजकुँवर दक्षिण दिशि निरखि नन भरि नीरा॥ ले उमाँस कहि हाय लाडिली वोले निपट अधीरा ॥११॥ दोहा-अहो बंधु याही दिशा, हैं मिय प्राण अधार !! मिलन होय किमि बीच यह, पगेनदीश अपार ॥१२॥ दाय धरी किमि धीर टर, काह करी कित जा। हो किहि सी चिनलाडिली, यह निज दुख पतरा॥१३॥ पनासग यषित। नेनजलगानि या हेगन अधीन ताकी बोलनि मुदीन नासी नेक नहिं भूल है. ॥ प्यारे सहि नि मनेभुन भे. गनि मो नाल, चोलीको भुराई दियहन, है ॥ हि हि (३०८) रामरसायन। पर - बार बार छिन छिन धाय धाय आय आय विरहा सुरतिशूल शूलै ॥ रसिकविहारी सुखकारी प्राणप्यारी सदा नि दिन मेरे दृग दोउनमें झुलै है ॥ १४॥ दो०-पुनि मोहिय नित रौनि दिन, यह कलेश अधिकाय ॥ प्यारी वैस विलासकी, किमि वियोग सहिजाय ॥१५॥ घनाक्षरी-कवित्त । नवल छबीलीबाल गुण सरसीली मंजु मोद उमगीली और गीली रूप वारी है। रसिकविहारी तरुणाई अंग अंग छाई वैस वर आई चारुशोभा मनहारी है ॥ प्यारीको विधाता सुख औसर दियौहै दुख किहि विधि हैं प्राण अति सुकुमारी है। यदपि अनेक सोच सोचों पै सदाही एक सबतें कलेश यह मेरे उर भारीहै ॥१६॥ प्र०॥ वा० ॥ यु० का० क० ॥ स० पू श्लो० ॥ न मे दुःखं प्रिया दूरे न मे दुःखं हृतेति च ॥ एतदेवानुशोचामि वयोस्या ह्यतिवर्तते ॥४॥ दोहा-यौं कहि निराख सुकंठ दिशि, बोले जलभरिनैन । प्यारीबिन मोको सबै, भये रहत दुखदैन ॥ १७॥ घनाक्षरी-कवित्त। विरह भभूकै तनुलकैसी लगी हैं अति मनसिजहूकै अंग अंगनछई रहैं।नीर औं समीर छाहँ चन्द्रनिशि चंद्रिकादि शीतल सकल वस्तु तपनि तईरह।।रसिकविहारी कितजाऊँ हाय कासों कहीं दशा दिशि देखों तिते अनल मईन्होपावस शरद हिम शिशिर वसंत मोहि प्यारी विन सर्व ऋतु ग्रीपम भई रहें ॥ १८ ॥ उरकी उमाह सबजानतदि मेरीप्रिया नीकी भाँति जानी हो जुप्यारीके जिये रही ॥ रासिक विहारी उत्था जो विचागवाल सोउ मचिकारी बात चित्तमें दिये ॥ द्वाय का उपाय कीजे अब नवसाय कट भयो यह काद अ. .५ का कियेही । करी या प्रेमी कहिन कुचाल जात निज

रामरसायन।
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निज चाह दोउ हियको हिये रही ॥१९॥ लाज मरयाद पितु मातके
सकोच वश जौलों रहों सदन न तौलोंचित्त दीनोंमें। बहुरि सिधारो
वन तबते दुरखारी अति सहित सुबंधु वेप तापसको लीनोंमें ।
रसिकविहारी सुख समय निरायो जब तब प्रथम ते भयो लाडिली
विहीनोंमें ।। शुलैगी सदाही यह शूल उर मेरे हाय प्यारीको न प्यार
का जिय भार किनमें ।। २० ।।
दो०-इमि बिलखतहीं औचके, लखौ द्वितीया चंद ॥
तिहि वन्दन कार उमॅगि उर, पुनि बोले रघुनंद ॥२३॥
घनाक्षरी फक्ति।
निपट निशंक आज द्वितिया मयंक वंक उदित उतंक सुखहेत नर
नारिके ।। संध्यासमै शोभित सुछंद जगवंदनीय रहत अमंद यौहीं
भाल त्रिपुरारिके । निरखति है उतै जनककिशोरी इतै हौंहूं अवै
दरश करोही नभ चारिक ॥ रसिकाविहारी इहि औसर भयेहै आय
दोऊ इकठोर हग मेरे अरु प्यारीके ॥२२॥
दोहा-या रघुवर अति सायकी, विरह कलपना कीन ।
सो लखि लपण सुकंठ दुहुँ, बहु विधि धीरजदीन ।॥ २३ ॥
परम विवेकी बुद्धि निधि, गधव हृदय विचारि ॥
युद्ध समे लखि शोक तजि, रहे धीर उर धारि ।। २४ ॥
इति श्री० रा०र०वि०वि० टंकमयाण-
पर्णनो नाम एकादशीविभागः ॥१३॥
रवि भीरनिकविहागर श्रीरामरमायन ग्रंप वियोग
चरित्रवर्णनो नाम पंचविधानः ॥५॥
मो०-दत इदि विधि रघुवीर, सदल प्रवल बार्गशतद॥
कियो निवास मुधीर, महसुकंड हनुमत लपण ॥१॥
उन दशमुख बलवंत, महिन मुभट निशा विविध ।।
को मुमंत्र अनंत, मुमिनि मुमिरि हनुमंत वर ॥२॥

(३१०) रामरसायन। FIRm चौ०-सभा मध्य बैठो दशभाला युत सुत सेवक बंधु विशाला।। ताछिन धाय चारि- चर आई * शीशनाय बोले अकुलाई ॥३॥ नाथ राम वारिधि तट आये * संग भालु कपि दल युत छाये ॥ सुनि हँसि कहीमूढ़ अभिमानी * कहा करें तापस धनुपानी ॥४॥ यौं कहि बहुरि निशाचर राजा * बोलो करहु मंत्र दृढ़ आजा ॥ सुनि वच यातुधान बहु यूथा भाषि उठे भट मुख्य वरूथा॥२॥ महाराज तव अमित प्रतापा * तिहूँ लोक भुजबल यश व्यापा॥ देव नाग कोउ सकै न हेरी * कहा भीति नर वानर केरी ॥६॥ सुनि प्रहस्त दुर्मुख बलवाना * कुंभ निकुंभ आदि भट नाना॥ लै कर शस्त्र अनेक कराला * उठि बोले रावणहिं उताला॥७॥ अबहिं जाय हम आवहिं मारी * सह नृप सुवन भालु कपि झारी।। सुनि तिन दिशि लखि भौंहचढ़ाई कहे विभीषण वचन रिसाई८॥ बैठहु मूढ़ जाहु कित धाये बिन निज ईश रजायसुपाये ॥ यौं कहि पुनि भातहि कर जोरी बोले वचन विनीत निहोरी॥९॥ दोहा-नाथ सकल ये मंदमति, हैं अयान वश पान ॥ इनके वचन न मानिये, प्रभु बल बुद्धि निधान ॥ १० ॥ मो. संमत उर आनिये, जिहि ते बहु हित होय ।। रहै राज तनु कुटुम यश, नीक कहै सबकोय ॥ ११॥ सो गुनि गुण गनि दीजिये, सिय रामहि हरपाय । समर किये कह जानिये, धोंकिहिविजय मिलाय ॥ १२ ॥. बंधु वचन सुनि दशवदन, कटन उत्तर दीन । सबहि शीप दे आप उठि, भवन गवन द्रुत कीन ॥ १३॥ तहाँ सदन एकांत मधि, बहुरि विभीपण जाय ।। समझायो भ्रातहि विविध प्रीत भीत दरशाय ॥ १४ ॥ कही जोरि करतात इत, जवते आनी सीय ॥ नयते अशकुन होत बहु. सकलं विचारिय जीय ॥ १९॥ -

रामरसायन।
(३११)
हवन अमि नहि दिपति पुनि, उटत धूम बहु श्याम ।।
झरै अनल कन अरु शिखा, आहुति मंत्र निकाम ॥१६॥
हवन पठन पूजन थलहि, दरशत व्याल कराल ।
अशन पान साकल्य चहुँ, हो पिपीलिका लाल ॥३७॥
सुरभी पयमद गजनको, सूखि गयो सब ठौर ॥
पुनि वसुदीन पुकारही, अश्वादिक बहु तौर ॥ १८॥
खच्चर ऊंट तुरंग नित, उरध रोम रहात ॥
पुनि रोवत दिन रौनिये, अतिहि विकल दरशात ।। १९ ।।
बोलत काक उलूक बहु, रैनि दिवस खघोर ॥
गृद्ध देत मंडल सदा, पुर ऊपर चहुँ ओर ।।२०।।
पुनि दुहुँ संध्या समय नित, बोलत अशुभ शृगाल।
नगर द्वार सो क्रूर स्वर, करत आप मृग माल ।। २१ ॥
ये लक्षण सूचक अशुभ, होत लंकके माहिं ।।
याते सीतहि दीजिये, गम सदल फिरि जाहिं ॥२२॥
सुनि सुरारि कोधित कही, रामहि देउँन सीय ।।
कहा करें नर कीश मिलि, कछु न भीति मम हीय ॥२३॥
यौं कह बहुरि विभीपणे, विदा कियो दशभाल ॥
प्रात होत आयो सभा, चढि रथ अतिहि उताल ।। २४ ।।
बंधु सजिव सेवक सखा, सुत हित अपर अपार ॥
दशमुख आज्ञा पाय सब, आये सभा मझार ।।२५।।
बेटे सब सादर उचित, तव गवण वरिवंड ।।
सभहि सुनाय पहस्त प्रति, भाप वचन उदंड ॥२६॥
सीता दिये विहीन जिमि, वेगि विजय निज होय ।।
इमि मलिवंत विचारि दृढ़, मंत्र कंग सब कोय ॥२७॥
सुनि निश्चरपतिक वचन, कुंभकरण रिल लाय।।
बोलत भयो उताल अति, दुहुँ ग माह बदाय ॥२८॥

(३१२) रामरसायन। तोमर छंद। जब हरी सीय स्वतंत्र । किहिते कियो तव मंत्र ।। अव काल शीश चढाय । बूझौ उपाय बुलाय ॥२९॥ सुन भ्रात हो कछु कार। जो करत विनहिं विचार ॥ सो अंत अति पछितात ॥ दुहुँ लोक तासु नशात ॥३०॥ पै जो भई अब बात । सो भई क्यों अकुलात॥ हिय धीर धारहु नाथ । हौं मारिहौं रघुनाथ ॥ ३१ ॥ तब महापार्श्व उदंड । बोलो वचन खल चंड ॥ हे नाथ निश्चर राज । क्यों करिय दुख बिनकाज ॥ ३२॥ प्रभु जाय कै निशंक । वरवस सियहि गहि अंक ॥ सजि राखिये रनिवास । रहिये मुदित सविलास ॥३३॥ तब कही दशमुखताहि । मुहि घोर शाप जुआहि ॥ परतिय रमौ बलठान । हो नाश द्रुत तनु प्राण ॥३४॥ सुनि अपर निश्चर भूर । बोले यथारुचि क्रूर ॥ ताछिन समै लखि ऐन । भापे विभीषण बैन ॥३५॥ विनवौं दुहूँ कर जोरि । हित वात मानिय मोरि॥ प्रभु वेगि सीतहि देउ । निज हाथ मीच न लेड ॥३६॥ सो सुनि प्रहस्त उमाहि । भापी विभीपण पाहि ।। नर भालु कपि कह वात । हम सुरन नाहि डरात ॥३७॥ तब रोप करि हिय माहि । भापी विभीपण ताहि ॥ क्यों करहु सब मिलि नास । नहिं शुभ चहौ रहि पास ॥ ३८॥ घनाक्षरी कवित्त । तव कछु वीरता न काहू ते बनेगी नेक जब कपि भालु वीर धाय आय जुटेंगे ॥ ताछिन वचैना कोउ भागेहू त्रिलोक माहिं जाही छिन राम बाण पन्नगसे छूटेंगे ॥ राधव विरोधी यातुधानके रहें ना 'पण सहित समाज राजसाज सब सूटेंगे ॥ रसिकविहारी सिय होभली है बात नत बहु मुंड दधि कुंड मम फुटेंगे ।। ३९॥ । - तोमर छंद। यौंकहि दशानन बंधु ॥ भापी बहुरि मतिसिंधु ॥ मंत्री जु तवसम होय ।। तौ रहै भूप न कोय ॥४०॥ दोहा-अज्ञानी लोभी निठुर, निकट न राखै कोय ॥ जो नृप सेवक होय इमि, तो जावे सब खोय ॥११॥ सवैया कवित्त । भिक्षुक मान चहै तो वृथा औ वृथा गति उत्तम चाहे जुकामी ॥ जो यश लोभी चहै तो वृथा सुख चाहे वृथाहि कुमारगगामी ॥ यौं रसिकेश विचारौ हिये है वृथा जुपै मुक्ति चहै नरवामी ॥ त्यो तिहिके सब काज वृथा जिहिके ढिग सेवक होय हरामी॥४२॥ दोहा-सेवक होवे दुष्ट पुनि, भूप मिलै मतिहीन ॥ तहाँ लाभ सुखराजकी, आशा तजें प्रवीन ॥४३॥ पैऐसेही कुमति बहु, कूर मंडली माहि ॥ बुद्धिमंत ज्ञानी गुणी, बडे सुवीर कहाहिं ॥१४॥ प्रथम वखानत फूलि जे, बड़ी बड़ी बहु वात ॥ ऐसे ते औसर परे, दरशत हैं कदरात ॥ १६ ॥ इमि प्रहस्त प्रति वचन बहु, भापे सबहि सुनाय॥ बहुरि विभीपण वंक लखि, बोले रोप बढ़ाय ॥१६॥ राम दूत कपि एकही, आयोहो हनुमान ॥ वीर मारि पुर जारिक, गयो सर्व बलभान-॥१७॥ कछु न बनी तब काहुते, अब बोलत बहु फूल ।। गम कोपकी अग्निमें, वृथा होत क्यों तूल ॥४८॥ एक वेर जो कसह, जाते लह कलेश। फेरि काज सोशंक युत, कर विचार हमेश ॥ १९॥ मंवया करित। फेरि नहीं वह काम कर जिदिने इक बेर कलेश लहे ।। भौति दिये अति पटि गई पुनि भूलि न लागाद काह कद्दे ।। ~~ (३१४) गुमरसायन। होरसिकेश सुदेश बनो तऊ चौंके हैं चित चेत गहे ।। छाँछहु फूंकिकै पीवहिं ज्यों डरिकै बहु जे जन दूध दहे ॥५०॥ दोहा-पै सबही सिख सुमतिको, दीजे तो भल होय ॥ क्रूर व्यर्थ मानी हठी, तापर वश नहिं कोय ॥५१॥ यौं कहि रावण बंधु पुनि, बोले सवहिं सुनायः॥ हौं जानौ सब शीश पै, कालचक्र मडराय ॥५२॥ मम भापित कटु वैनये, अंतर हैं अति मिष्ट ॥ सबहि व्याधि मद ग्रसित हैं, याते लगें अनिष्ट ॥५३॥ पै भापौं मैं हाँकदै, सभा बीच प्रणठान ॥ राम विजय निश्चर अजै, है है यह ध्रुव जान ॥५४॥ याते अजहूँ है भली, सकल मंत्र करि आज ॥ चलि रामहि सिय दीजिये, रहै प्राण कुल राज ।। ५५॥ इहि विधि बहु कटु बैन वर, अंतरप्रीति समेत ॥ कहे विभीषण सचिव प्रति, भ्रात बुझावन हेत ॥५६॥ चौ सुनत विभीषणवचन कठोरा* चितवत दशमुख हग कार घोरा।। तवहिं इन्द्रजित क्रोधित भापी *तातभ्रात लघुलघुमति राखी ५७ कही विभीपण तब करि क्रोधा मूढ अयान तोहि कह बोधा॥ जो तुहि मंत्र मध्य इत लायो *सोखलवधलायक ठहरायो ५८ दोहा-मत्त बाल तिय मंदमति, हठी पिशुन खलवाम ।। येते सभा अयोग पुनि, मंत्र मध्य कह काम ॥ ५९॥ तृ खल पितु युत कालवश, हित अनहित नाहं जान ॥ यातुधान ये मंदमति, करें अन्यथा मान ॥६॥ चारांछंद। सुनिक विभीपण वैन निश्चरपतिहि छायो कोप ॥ भापी अरे मतिमंद तू कुलधर्म कीनो लोप ।। पुनि शत्रु पक्ष बढाय निंदहि मोहिं तोहिं न शंक ॥ लखि बंधु शमहुँ अनीति नत वध योगह खलरंक ॥ ६१ ॥ -- रामरसायन । (३९) दश कंठ कहि कटु वैन बहु किय बंधुको अपमान ॥ तवहीं विभीपण उठे निश्वर चार सँग बलवान ॥ लीने गदा कर उछलि बोले कुपित नभ पथ जाय ॥ हित वचन मानत अहित घेरो काल निश्चर राय ॥ ६२॥ कछु दिवस बीते होय गति सो देखिही दशमाथ ।। तजिकै सकल खल दलहिहीं अब जात ढिग रघुनाथ ।। यौं कहि विभीपण चहँ निश्चर सहित कीन पयान ॥ सिय राम पद पंकजहि ध्याये हीय सुख उमगान ॥ ६३।। दोहा-इत रावण दरवार ते, उठो गयो निज धाम ।। उतै विभीपण राम ढिग, चले सुमिरि गुणग्राम ॥६४ ॥ इति श्रीरसिकविहारीकत रामरसायन ग्रंथ युद्धविधाने रावणसभामंत्रवर्णनो नाम प्रथमोविभागः ॥१॥ दोहा-राम चरण उर ध्यायकै, ठानि सुदृढ विश्वास ।। चले विभीपण प्रभु शरण, छिन छिन होत हुलास ॥१॥ मन प्रसन्न तनु पुलक अति, प्रीति न हृदय समात ॥ नैन नीर पग डगमगत, करत मनोरथ जात ॥२॥ घनाक्षरी कवित्त । 'मुंदर ललाम सुखधाम अभिराम अति सेय वसुयाम उर आनंद वगारि हो । उरध कमल वज्र अंकुशादि चिह्न सबै परसि प्रमोद पा यशोक श्रमटारिहीं ॥ रसिकविहारी रजनैनन लगाय नित लोचन सिराय निज जनम मुधारि हो । नाथहैं अनाथनके ऐसे रघुनाथ ज़ के दृग भरि आज पदपंकज निहारि हो ॥ ३ ॥मेटत सकल दुखद भ्रमपंद बने रहत अमंद सुखकंद छवि पेखि हो । जाहि लखि कोटि चंद होतह दुचंद मंद ताहि में विलोकी धन्य सुकृति विशेपि ही। दरशत भूलै छलछंदके प्रबंद सर्व रसिकविहारी युग पल सम लेखिहीं ॥ दशरथ नंद है अनंदके अनंददानि आन रघुचंदको मुख चंद देखिहीं ॥ ॥ आय हैं लपण कपिराय हैं मुभाय भले पायक रजाय धाय वेगही घुलाय है ॥ देखि गाय (३१६) रामरसायन। मुसकायकै बढाय प्रीति सुख सरसाय मीठे बचन सुनाय हैं ॥ रसि कविहारी कृपा लाय हैं दिवाय अभै मोद उमगाय तनु तपन सिराय हैं। मुख दरशाय करकंज परसाय शीश कौशलकिशोर आजमोहिं अपना- य हैं ॥५॥ पाऊँगो हमेश अंग वसन उतारे सबै दीन जानि अधिक कृपालु मन भाऊँगोभाऊँगो अहेर संग धाऊँगो बताऊँ पंथ दुर्लभ पुनीत नित्य जूठनको खाऊँगो ॥ खाऊँगो प्रसाद दास रामको कहाँ ॐ भलो रसिकविहारी तजि अनत न जाऊँगोजाऊँगो अवध निज जनम गमाऊँ तहाँ गाऊँगो सु कीरति परमपद पाऊँगो॥६॥धरम न जानौं सतकरम न जानों कळू मरम न जानौं क्यों सुढार मोपै ढरिहैं।। रावणको भैया हौं कुपंथको चलैया पुनि लंकको वसैया चित्त औगुण जुधार हैं। जाति हौं निशाचर अरातिनकी पाँतिको हौं रसिकविहा री कौन भाँति मोद भरि हैं । लोक विधि वेद विधि एकह न जानौ राम किहि विधि मोको विधि अंगीकार करिहैं ॥७॥ जनम गमायो राम नामको न गायो कछू कीनो ना उपाय भवसिंधुके तरनको ॥ शरन मैं जैहौं कौन बदन दिखें हों हाय औगुण भरो हौं गुण एकोना शरनको ॥ रसिकविहारी है न आपनो भरोसो रंच को सहाय शोक नद पारके करनको ॥ परौ मझधारवीच हौं तौ निराधार अब एकही अधार रघुरायके चरनको ॥ ८॥ एकही भरोसो दृढ़ आवत खरोसो यह उपल निपाद गीध अधम विचारे हैं। शवरी औ शाखामृग रीछ कौन वेदपाठी जाते इन ओर कृपा कोरतें निहारे हैं ॥ दीन हैं पियारे दीनबंधुको सुभाव मृदु रसिकविहारी सोई रक्षक हमारे हैं ॥ काहते न घाट पातकी हों क्यों तजैगे मोहिं वेगि अपनहें जो पे इतने र धारे हैं ॥९॥ मो०-इहि विधि करत विचार, तनु पुलकत हुलसत हियो । बाढी प्रीति अपार, मियपनि पदपंकज सुमिरि ॥ १० ॥ पहुँचे आतुर आय, दृतनमे मृदु यों कहो । अन्ज मुनायो जाय, कौशलगज किशोरको ।। ११॥

रामरसायन। (३१७). तुरतहिं चरवर जाय, रामानुज कपिराज ढिग । सादर शीशनवाय, वियन सुनाई तिनहिं सब ॥ १२॥ सुनत लपण कपिराज, चकित चित्त सोचत हिये ॥ कहा विभीपण काज, आयो है छल बल कछू ॥ १३ ॥ समाधान करि हीय, जात भये रघुराज दिग। करि प्रणाम कमनीय, रुख विलोकि बोल वचन ॥ १४ ॥ नाथ दशानन बंधु, नाम विभीपण ताहिको। आयो करुणासिंधु, शरणागत सो रावरे ।। १५ ।। विहसि कही रघुवीर, यह विचार को कहा। तुमही निपुण गंभीर, कहो उचित मत होय जो॥१६॥ वोले दुहुँ कर जोरि, प्रभु सन्मुख कहिवो न भल । पुनि मम मति अतिथोरि, तदपि कहत बुधि बल यथा१७ एक निशाचर रूप, दूजे रिपुको बंधु है। सुनिये कौशल भूप, माया मय सब काज है ॥ १८॥ तिहि राखियो न योग, बहुरि रजायसु रावरी। कहत सयाने लोग, रिपु प्रतीति नहिं कीजिये ॥१९॥ हँसि बोले श्रीराम, नीति उचित सो तुम कही । दीनबंधु मम नाम, कहत घन्ति सो होय क्यों ॥२०॥ सबैया कवित्त । एकहु वेर पुकारत आरत दीनगिरा जनकी मुनि पाऊं ॥ तो तिहि ऊंच न नीच लखों गहिक भुज कंठाहे वेगि लगाऊं ॥ देउँ अभपद लोक तिहुं विच ताहि कवों छिन हूंन भुलाऊं। सो रंसिकेश सुकंठ कहाँ शरणागतको किहि भाँति भगाऊ.२१॥ गो द्विज वातक होय जुप तजिक छल जो शरणागत आवे ।। छोडि सबै जग प्रीति प्रतीति सु एकही मेरो भरोस दिढाव ॥ ज्यों धन रंकहि भावत है तिहिते अधिको मुहि सो हिय भाव।। जो गति याचतह मुनि बुंद प्रयास विना रसिकेश सुपवि ॥२२॥ वेद पुराणनमें सबही शरणागतको खट रीति वखान ।।

मेोहि एक भरोसो जिन तिनके वश में फिर काह कहींगो॥२८॥ द, ये पदी मुरही कार्दिक पुनि आरको और न भाषा। (३१८) रामरसायन। नेम सदा अनुकूलहि को अरु वर्जन त्यों प्रतिकूल को ठानें । राखै प्रतीत जु रक्षणकी अरु भाषै सुगुप्तकथाहि विधान ॥ त्यौं रसिकेश जु अपहि प्राण सुदीन वनोरसहै यह जान ॥२३॥ जो इतनी शरणागतमें विधि एकहु होय सुहै मुहि प्यारो ।। सो विछरै छिनहूं न कवौं तिहिते पलहू भार मैं नहिं न्यारो॥ है पटरीति विभीपणमें अब सादर वेगि बुलाउ सवारो॥ आवतही रसिकेश अभै करि लंकपती कहि ताहि पुकारो॥२४॥ हे कपिराय सुनो मन लाय सुवाणि सदाकी कहों निज होकी ॥ जीव चराचर होय कोऊ दृढ़ प्रीति घनी मुहि लागत नीकी ॥ रावरोहौं इक वेर कहै तिहिकी न मलीनता देखहुँ जीकी ॥ नीति अनीति न मानौ कछू रसिकेश करौसम नाकपतीकी२५॥ जो विचरै छलछंदनमें नर भूलिहु सो मम भक्ति न पावे ॥ जो कुटिलाई विभीपणमैं शरणागत क्यों ताजकै सब आये ॥ यद्यपि हैं रिपु बंधु सही रसिकेश बनो मुहि सो हियभावै ॥ कौगुण औगुणको निरखै हित जानि हिये जिहि जो अपनाये ॥ त्याग कर शरणागतको तिहिकी सम पातक और नहीं है । गैरवनर्क परै भरि जन्म चहूँ युग चारहु वेद कही है ॥ आफ्नी होय कछू हितहानि घनो प्रतिपालन ताको सही है। आव विभीपण वेगि मिलौं प्रण मेरो मुएकहि आँक यहींहै।॥२७॥ दीन पुकारहिगो जवही मुनि कानन क्यों हिय धीर धरींगो ॥ देखि दुखी शरणागतको तब आतुर धायके वाँहगहींगो ॥ मेटी कलेश सर्व तिहिको निरसंक है आपनी हानि सहोंगे। योगी जपी द्विज दानी तपी नर नाग चगचर होय जु कोऊ॥ साँची मुप्रीति प्रतीति विना मुहिचहु हीय न भापत मोउ ।। पावन है जग दुःख बने भ्रम भूल परे सुख नेक न होऊ ॥ । मिशा अनन्य भन मुहिमोशरणागत है प्रिय दोउ।।२९॥ नो कृपा निदि पतिपिअपराध निहार ननद मात्र ।।

गमरसायन । (21) जाहि लियो गहिकै अपनाय तिनै रासिकेशन भूलिहुनापौ।। लावो कपीश विभीपणको कार दे अभैशरणागत राखौं॥३०॥ कोतिहिते अधिको प्रिय है तजिकै सब जो शरणागत आयो॥ राजकुटुंब घने हित बंधु तिनै तृणकी सम देखि भुलायो ।। मेरोहि एक लयो अवलंब कहौ किहि भाँति सो जात भुलायो। लंकको राज सु आजहि धौं रसिकेशजहों अवधेशको जायो२१ दोहा-दीनबंधुके वचन सुनि, मंजुल मृदुल अनूपः।। चले विभीपण पासको, रामानुज कपि भए ॥३२॥ रामानुज कपिराज सों, बोले वचन उताल ॥ कहो कहा करिये अब, भई रजायसु हाल ॥ ३३॥ नगस्वरूपिणी छंद। सुकंठ शुद्ध यों कही । सही जुनाथ है कही। विचार काह कीजिये ।बुलाय ताहि लीजिये ।। ३४ ॥ कही सुराम बंधुयों। विभीपणे वुलाउँ क्यों। अराति भ्रात आयहे । कटू भली न लायहे ॥ ३५॥ कठोर वोरहे महा। नजानिये हिये कहा ॥ करे अकाज काजसो । डरे न रंच लाजसो।।३६॥ कछू न फंद लावतो। इतै न भूलि आवतो ॥ सुवंधु वीसबाहुको । हितू न जान काहुको ।। ३७॥ तोफ छंद। हँसिक कपिराय सुवात । प्रभुमी अपनो कछु जोरनहीं ।। शरणागतको न तजें कबहूं । अपराध अनेक करे जबहूं ॥३८॥ पुनि या सु उपाय भली करिये । सुनिये गुनिताहि हिये धरिये ॥ अव एक विभीपण आवत । रघुराज तिन अपनावत ॥ ३९॥ अब नेक विलंब नहीं करन। हम ओ तुम दोऊ चलें शरनें ॥ गदिक पदपंकज मोद भरी कहिक प्रभु पाहि प्रणाम कर 120) शरणागत गावहिंगे जवहीं । करजारि करें विनती तबही ।। यह मंध दिये दृढ़ टान भले । बहुरे रघुनायक पाम चले।।23।।

(३२०) रामरसायन। रघुराज प्रसन्न विराजतहैं । लखि कोटि दिवाकर लाजतहैं । चहुँ पंथ विभीपणको परपैं । लखिप्रीति प्रतीति हिये हर ४२ तोमर छंद। तहँ जाय लपण कपीश । कहि पाहि प्रभु जगदीश ।। आये शरण हम नाथ । अपनाइये गहि हाथ ॥४३॥ सुनि वचन रघुकुलचंद । हँसि कही प्रभु सुखकंद । आवो शरण निरशंक | लाये सुकर गहि अंक ॥४४॥ कपिराज लपण बहोरि । बोले दुहूं कर जोरि ॥ महराज सब गुणसिंधु । जनपाल आरत बंधु ॥२५॥ आवत विभीपण एक । तिहि नाथ राखत टेक ॥ आये सु द्वै हम शर्ण ।। अवलंबलै प्रभुचर्ण ॥ ४६॥ अब एकको कहकाज । सुनि हँसि कहो रघुराज !! वह शरण प्रथमहि आय । सोकहो क्यों तजि जाय ॥४७॥ तुम औ विभीषण दोउ । मेरे सरिस प्रिय होउ ॥ लावो बुलाय तुरंत । इमि कही श्रीसियकंत ॥४८॥ तव चले लपण कपीश । कहि जैति कौशलधीश ॥ आये विभीपण पास । मिलि भेटि हृदय हुलास ॥४९॥ गहि लपणके पदकंज । अति सुखद कोमलमंजु ।। दुहुँ कर विभीषण जोरि । कीनो प्रणाम बहोरि ॥५०॥ दीनो जु सुभगअशीश । हियहर्प लपण कपीश ॥ रिपुबंधुको अनुराग । लखि कहत दुहुँ बड़भागः॥५१॥ सादर सुलै तिन संग । बहुप्रीति उमँगत अंग ॥ आतुर चले कुलदीप । कौशल किशोर समीप ॥५२॥ पहुँचे तहां सुखकंद । राजत जहां रघुचंद ॥ आनंद विभीपण धारि ।। कीनो प्रणाम पुकारि ॥५३॥ घनाक्षरी कवित्त । गजनके राजा महाराजा कौशिला किशोर रावरोप्रताप है सदाहीं दिन पंद्रमा॥होती हों अभागीभोशरण आय बहभागी नजरनकी .

रामरसायन जिये कृपालु मम रंद्रमा ॥ रसिकविहारी अवलंब पद पंकजको लोक परलोककी न चाह जिय अंद्रमा ॥ कीजिये सनाथ हौं अनाथ रघुनाथ मोहिं पाहि पाहि पाहि रघुवंश वंश चंद्रमा॥५४॥ अधम अभागी अनुरागी हौं कुसंगतको जाति हौं निशाचर कुवंधु दशशीशको ।। नाम है विभीपण विहाय सुत दारा गेह आयो हौशरण अवलंब एक ईशको ।। रसिकविहारी दीनबंधु अपनाय मोहिं कीजे खास दास अव लपण कपीशको ॥ नाथ गुण गैहौं निज लोचन सिरहौं भेद देहौं सब मरम वहौं भुजबीशको ॥५५ श्रवण सुनी है गिरा दीन यों विभीपणकी भरे जल नैन अंग पुलक जनायो है ॥ धीरज रहीना अति आतुर उठे कृपालु कृपा करि शीश करकंज परसायो है । रसिकविहारी मृदु वचन सुनाय भले जरत विभीषणको हृदय सिरायो है । ताप अच् कोने दूरि आनंद दियो है भूरि राम धनश्याम गहि अंकसे लगायो है ॥१६॥ दोहा-यों लगाय सादर हिये, बैठारे निज पास ॥ वृझो सब वृत्तांत सो, वरणो सहित हुलास ॥२७॥ सुनि ताही छिन सिंधु जल,अति उताल मँगवाय॥ करि अभिषेक विभीपणे, थपो लंकको राय ॥५८॥ सोलखि भूमि अकाश चहुँ, छायो जैजैकार ॥ कहत संबं को राम सों, वीर दयालु उदार ॥२९॥ ची-ताछिन अति प्रमुदित कर जोरी बूझी कपिपति प्रभुहि निहोरी लंकप किये विभीपण नाथा आविजुपेशरण दशमाथा ६०॥ ती प्रभु काहि लंकमधि राखें ? अरुलंकापति किहि को भापं ॥ सुनि बोले रघुवीर कृपाला सत्य उदारधर्म प्रणपाला ६१॥ निश्चरपति विभीपर्ण कीना के सकल राज्य लंका करदीना ॥ अब जो शरण दशानन आव दीजे अवध राज सो पाव ३२॥ तब हरीश बोले पुनि नाथा नृप भरत कहा प्रभु हाथा ।। सुनि रघुवीर कही सतवाता पे सुधर्मरत हैं मम भ्राता।।दशा भरत प्रतीत मोदि दृढ़ जोई भापी बंधु कर दृट सोई॥ सुनि प्रभु वचन सबहि सुख माना कह जजज कृपानिधाना६॥ इति भी०रा० २० वि० यु० विभीषण शरणागत वर्णनो नाम दिवायोविभागः ॥ २॥ --- R तव सुग्रीव कही कह बाता ॐ काह कहाँ दशमुख दुखदाता ।। तव शुकदीनी राम दुहाई सुनि कृपालु तिहि दयोछुड़ाई।। (३२२) रामरसायन। चारीछंद। इमि करि विभीपणको तुरत अभिषेक श्रीरघुवीर ।। पुनि कही उतरिय सिंधु किमि सो करहु मंत्र सुधीर ।। तब ठनो सत्य विचार कीजे विनय सागर पाहि ॥ सोई विचार बतावहीं जिमि सहज सव उतराहि ॥ १॥ दृढ ठानि यह सरिनाथ तट रघुवीर दर्भ डसाय ।। शिरनाय विनय सुनाय प्रण ठहराय बैठे आय ॥ सो लपण हिय न सुहाय पै कछु कहत भय वशनाहिं ॥ जिय चहत प्रभु रुचिपाय सोखों सिंधु छिन इक माहिं ॥२॥ चौ०-झाम सर्वज्ञ राम बलवाना * सिंधु नीर वैठे प्रण ठाना ॥ ताछिन यातुधानपति दूता शारदूल लखि चमूअकूता ॥३॥ जाय विकल रावणहि सुनायो * प्रभुकपिकटक सिंधु तट छायो॥ दशयोजन प्रमाण चहुँ फेरा ॐ परो राम दल करि बहु घेरा॥४॥ साम दान भेदादि उपाई करियवेगि वर दूत पठाई ॥ न तरु समरहोइहि दृढ भारी प्रथम जतनयाते सुखकारी॥५॥ सुनि रावण शुक दूत बुलायो 8 सिखै सुकंठ पास पठवायो॥ कीशपाल मम बंधु समाना * सो किमि वृथा समरप्रण ठाना६ हम हरि लई राजसुत दारा * पै कछु नाहिं तुमार विगारा॥ याते जिय विचारि कपिनाथा * जाहु भवनलै निज दलं साथा सोनम मग कपिपति ढिगगयऊ अंतरिक्ष रहि बोलत भयऊ ।। हे कपीश ही तुव ढिग आयो ? लंकनाथ मोकहँ पठवायो ॥८॥ सुनि शुक सकल सँदेश सुनायो जोरावण तिहि सिखै पठायो॥९॥ सुनि तिहि वचनअपर कपिधाये लपकार नभते महिलाये। ताडन करन लगे रिस धारी हनि तल मुष्टि सुपंख उखारी: "भय वगि पुनि नभ पथ जाई बुझी कही प्रभुहि कह जाई११॥ मुकंठ तिहि उत्तर दीना * कहो जाय खल बुद्धि मलीना ।

रामरसायन। (३२३) राम विरोध कुशल तव नाही * लंकनशाय फेर हम जाहीं॥१२॥ ताछिन वालितनय तिहि हेरी बोले वेगि गहो खल फेरी ।। यह संदेश मिपते इत आयो * भेद लेन दशकंठ पठायो॥१३॥ सुनतहि कोश कूदि गहि लाये पुनि तिहि ताडि पंखविनशाय।। तव शुक आरत विकल पुकारो । सुनि मुख [दि बहुरितिहि मारो१४ पुनि जिमि तिमि चर वचन उचाराप्रभुहि सुनाय सुकीन पुकारा ।। है निश्वर अघ औगुणखानी * सदाअनीतिरीति बहु ठानी१५॥ जनम मरन मधि पाप जुमेरे * भये होंय ते सकल घनेरे।। कृत राम आप द्रुत पावो 8 जुपै वगि नहि मोहिं बचायो॥१६॥ नि प्रभुवेगि कपिनको वरजो दूत अवध्य होत जनितरजो॥ य रजायन ताड़न कीना पैतिहिलंक जान नहिं दीना ॥१७॥ हरिगीतिका छंद । इहि भांति श्रीरघुवीर सागर तीर दृढ़ प्रणधारिके। दिन विताये अशन पान विहीन धर्म विचारिक । जड़ सिंधु कछ नाहि दीन उत्तर राम तब क्रोधित भये ।। मोखों समुद्रहि अवाह योंकहि वेगि कर धनु शर लये ॥१८॥ सजिवाण चापहि तान करि संधान जब घालन चयो॥ भय पाय माणगण लाय जलनिधि आय तव चरणन नयो । कीनी विनय सुनि राम बोले कहाँ इपु कित डारहूँ ।। तब हेत धारो है अमोघ सुअव न याहि उतारहूँ ॥ १९ ॥ मुनि सिंधु भापी नाथ मोजल अमितह मरु देशमें तहके निवासी पातकी सुर्हि छुवत लहत कलेशमें। याते अतुल यह वाणते वह नीर शोखन कीजिये ।। प्रभुको रहै यश मोर दूरित नशाय मो चित दीजिये ॥२०॥ तब तोर मो रघुवीर ताज मह नीर सागर शोपिक ।। तिदि देश हित करणानिधान जु दयो वर परितोपिक। पशु अल्परोग विशल होवे शीर ग्म बहु छावही ॥ फल कद मूल अट आपधिगंध अति उपजावटी ॥२१॥ D

(३२४)
रामरसायन।
प्र० ॥ वा०॥ यु०॥ का०॥ स०२२ ॥ श्लोक ॥
उग्रदर्शनकर्माणो वहवस्तस्य दस्यवः। आभीर प्रमुखःपापाः पिवति
सलिलं मम॥१॥ तैर्न तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पापकर्मभिः ॥ अमो-
घः क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः ॥२॥ इत्यादि ।
हरिगीतिका छंद
तब सिंधु प्रभुतापेपि बोलो नाथ करहुँ सहायहौं ।
नल कीश विरचहि सेतु ईश प्रताप उपल तरायहौं ।
इमि भापि सविनय जलधि गमनो राम अति आनंद लहो ।
अब वेग वारिधि बाँधि चलहु बुलाय नल नीलहि कहो ॥ २२॥
सुनि ईश आयसु वेगहीं कपि भालु चहुँदिशि धायकै ॥
बहु उपल तरु गिरि जाय भारी देन लागे लायकै ।
सो लेहिं नल कर वाम डारत नीर दक्षिणते सज।।
सुत बुद्धि बल अरु चातुरी लखि विश्वकर्मा हिय लजै ॥२३॥
दिन प्रथम योजन चार दश पुनि द्वितिय वीस सुधारिकै ॥
साजो वितिय इकवीस चौथे दोय विंश सँवारिकै ॥
पंचम रचो त्रयविंश सोदश वितत आयत सतवनो।
लखि सेतु अनुपम शोर भो तिहुँ लोक जैजैजै घनो ॥२४॥
चौ०-सेतबंधु पूरणको शोरा * जैजैकार मचो चहुँ ओरा ॥
सुनि कपि ऋच्छ जुतरु गिरिधारे की जहाँ तहाँ अधवीचहि डारे २५
त्यों इक गिरि हनुमंतहु डारा मधु दानवके देश मँझारा॥
तिहि तजि चलन लगे बलवाना तवसोशल निपट दुखमाना२६
कपिहि कही भूधर कर जोरी सब गिरि तें करणी लघु मारी
श्रीरघुवर पद रजनहिं परशों ऐसे समे फेर छब दरशी॥२७॥
यातें वीर कृपा उर लाई मोहिं देहु प्रभु निकट पठाई ।।
तब हनुमंत धीर तिहि दीनी वेगिआय गतिविदित सुकीनी२८
सुनियर गिरि विनय सप्रेमा बोले होय तासु सब शेमा ।।
... उर धारे की कुधर मनोरथ पूजहिं सारे ॥ २९॥

रामरसायन।
(३२५)
"
दोहा-द्वापर युग यदुवंश मधि, हो अष्टम अवतार ।।
नब अभिलापा पूजिहै, तब सो गिरि करधार ॥३०॥
सुनि प्रभु आज्ञा पवनमुत, बेगि शैल ढिग जाय ॥
कही लहो मुख सौ बहुरि, कपि आये हुलसाय ॥३१॥
नयो शोर चहुँ ओर अति, सागर बाँधो राम ॥
मुनि अविलोकन मुर असुर, धाये तजि ताज धाम ॥३२॥
हरिगीतिका छंद ।
सुनि उदधि बंधन कीशकृत दशशीश चित चकृत भयो ।
तबहूँ न खल कछु भीति लायो रंबहू नहिं शिरनयो॥
लखि सेतु रघुकुल केतु आनंद पाय वर वाणी कही।
इक रचहु सदन विशाल इत ही सविधिशिव थापौं सही ॥३३॥
सुनि राम आयसु कपिन वेगि विशाल शिव आलय करो।
पूजन प्रतिष्ठा हित यथोचित साज' सजि सवही धरो॥
पुनि ज्ञान गुणनिधि मुनिन राघव बोलि यों सविनय कही।
को वेद वर ज्ञाता प्रतिष्टा सविधि सो ठानै सही ॥३४॥
पड़ी छंद।
सुनि कही ऋपिन हे जक्तईश हैं अखिल निगम ज्ञाता मुनीश।
पतिहूँलोक रावण समान । वर बुद्धि वेदविद है न आन ॥ ३५ ॥
तब कही गम निर्भय उताल । दशवदन पास चर जाय हाल ।।
मोहै निशंक इत मुदित आय । वरसविधि शंभुथापन कराय ३६॥
सुनि राम बैन कह कपिप्रधान । नहिं उचित तासु आगम सुजान ।।
माया निधान खल यातुधान । पुनि भूप वीर अरु रिपु महान३७॥
जो काहि आय मिलि नीच वात । ती फेरि नाहि कछु बनहि वात।।
पुनि एक और कीजे विचार । सो मूढ मत्त मानी अपार ॥ ३८ ॥
प्रभु दृत गये आवे न जोय । ता वृथहि मान निज हानि होय ॥
याते प्रवीन ये ऋपय वृंद ॥ शिव थपहि सविधि प्रभु युत अनंद ३९
सुनि विहसि कहे रघुवीर वैन । सब कही नीति पै शंक हैन ।
हो कोउ मत्य वेदन जीना विश्वासवात सो कर कवीन ॥१०॥

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रामरसायन। (३२७) ~ सुनि प्रभु आयसु मुदित है, गवनो कटक अपार ॥ दिवस तीनमें सकल दल,भयो सिंधुके पार ॥२॥ छाये चहुँ दिशि भालु कपि, गहि तरु कुधर सचेत । रहे व्यूह रचि राम मधि, वंधु सुकंठ समेत ॥३॥ कहि तब रघुपति कपिपतिहि, दीनो शुकहि छुटाय । अति उताल सो रावणहि, वरणी सब गति जाय ॥४॥ पुनि शुकभापी जोरिकर, समर किये भल नाहिं ।। सियहि दीजिये बंधु दुहुँ, सकल धाम फिरि जाहिं ॥५॥ सुनि शुकवच दशमुख कुपित, कह तुहि कपि दुख दीन । तिहि भय तव मति विकल अति, रिपुवल बहुगनिलीन ६|| ताहि निदार इमि दशवदन, पुनि शुक सारन ओर ॥ तिनहि बोलि आज्ञा दई, जाहु वेगि तिहि ठौर ॥ ७ ॥ बल विचार आचरन युधि, अपर प्रबंध अनंत।। सकल भेद रिपुसैन दुरि, आवो निरखि तुरंत ॥ ८॥ ची सुनिशिरनाय चले शुकसारन दोऊ किये कोशवपु धारन । आय राम दल मधि मिलि डोले लखें सकल मिलि काहु नबोले९ तिनहि विभीपण लखिपहिचान गहि रघुवीर पास दुहुँ आने ॥ सो सशंक नमि वचन सुनाये लंकनाथ प्रेरित हम आये१०॥ किमि दल बल किहि विधिको कोशाई लखहु रजाय दई दशशीशा ।। सुनि रघवर लंकेशहि भापी लायो सब दिखाय मैंग राखी११॥ तव दुहुँ साथ विभीषण जाई लाये दल समस्त दरशाई ॥ पुनि तिनके कर लपण प्रवीना गवण हेत पत्र लिखिदीना १२|| छोडिदये चर समय सिधारे . आय बेगि गवणदि जुहारे । कहि निज गति पत्री हुत दीनी वाम हाथलंकापति लीनी १३।। सो पत्री मंत्री कर दीनी , वेगि सुनाव आयमु कीनी ।। सचिव प्रवीन रजायसुपाई ६ वॉननलागो प्रभुहि मुनाई || पनाग कारित। स्वस्ति श्रीन दशबदन मुगार योग पहुँचे लपण लेन जयी कोशरेशकी ॥त है कुशार टन मंगल. ची नी आय . रामरसायन । नात कुटुंब राजनाश तुव होत वात जात है हमेशकी॥ १९॥ दोहा-सो सुनि रावण हंसि तुरत, लेखक निपुण बुलाय ॥ पत्र लिखावत लपण. हित, उत्तर सुमति दिढाय ॥ १६॥। स्वस्ति तरज श्रीयुक्त तापस लपण योग लिपिकृत लंकनाथ जै श्रीत्रिपुरारीकी ।। मंगल सदाहै इत कुशल उतै है यही सदन सिधारो। निज आशा त्यागि नारीकी ।। ताडका सुवाहु शंभुचाप औ जयंत | /तरुवाली है न जानियो समान सिंधु वारीकी ॥ रसिकनिहारी साम दानको न काम कछू हिम्मत जुहो तो लखौ शूरता सुरारीकी ॥१७॥ दोहा-लिखि उत्तर चरकर दयो, दयो सुलपणहि जाय ॥ कार देहु सुता मिथिलेशकी ॥ रसिकविहारी अपराध सब न देखि दीनी सीख पत्री या सुदेशकी ॥ न तरु कदंब- घनाक्षरी कवित्त। पुनि आयो दशवदन ढिग, गमनो शीश नवाय ॥१८॥ . पुनि शुकसारन जोरिकर, कही नाथ कपिभृरि ॥ महावली छिन एकमें, लंक मिलावै धूरि ।। १९॥ याते प्रभु दीजे सियहि, राम सदल गृह जाहि ॥ यातुधान कुल रहनकी, और उपाय जु नाहि ॥२०॥ सुनि रिसाय दशमुख तिनै, कहे विविध कटुबैन । पुनि दुहुँलै प्रासाद मधि, गयो उच्च अति ऐन ॥२१॥ तहँ ते लखि कपि भालु दल, शुकसारनहि बहोरि ॥ कही बतावो वेगि अव, सत्य शंक सब छोरि ॥२२॥ तब उठाय सारन भुजा, करि अंगुलि निरदेश ।। सकल बताये रावणहि, कहि बुधि बल दल वेस ॥२३॥ ताही विधि कपि भालुको, कुल थल बल गुण रूप ।। कहो यथारथ शुक सकल, सुनो निशाचर भूप ॥२४॥ पुनि शुक भापी नाथहीं, कह लग करौं बखान ।। अमित गम दल मुख्य पै, कछु संख्या इमि जान ॥ २५॥ .

रामरसायन। (३२९) " शत सहस्रके शतकको, कोटि कहै सबकोय ।। कोटि सहसके शतकको, शंकुनाम है सोय ॥२६॥ सहस शंकुके शतकको, महाशंकुहै जान ।। महाशंकुके सहसको, शतक वृंद पहिचान ।। २७ ।। इंद सहसके शतकको, महावृंद काहजात ।। महायुदके सहसको, शतक पद्म ठहरात ।। २८॥ पद्मसहसके शतकको, महापद्म कह ज्ञात ॥ महापद्मके सहसको, शतक खर्व है ख्यात ॥ २९ ॥ सहस खर्वके शतकको, कह समुद्र मतिधाम ।। शतक समुद्र महस्रजो, है महोघ तिहि नाम ॥३०॥ इमि संख्या मय भालु कपि, रहें यूथपन पाहिं ।। ते यूथप दल मध्य वर, पद्मअष्टदशआहि ॥३१॥ ते सब वली समर्थ इमि, एकहि जीत लंक ।। इनते अपर अपार नो, समर उतंक निशंकः ।। ३२॥ चौ सुनत क्रोधरि दशमुख भापी। दुखल नेक शंक नहि गखी॥ मो सन्मुख किय शत्रुबडाई होहगओटबदन ममिलाई ३३॥ सुनत दुई गवने शिरनाई भापी बहुरि निशाचर गई। वेगि महोदर भेजदुदृना रिपुदल बल करि आवहिं कता३४ अशन मन किमि की कगंही गम निकटको मुभट म्हांहीं । दें दलमधि विहिके सुत नाती पुनिकह होतमंत्र दिनगती ३५ ।। सुनत महोदर दृत बुलाये भारल आदिक इन आये ।। पथ्ये तिन दशवदन सुझाई चले वेगि मोरूप दगई ॥३६॥ दलमधि आय भेद नव लीना ताटिन निनहि विभीपा जीना।। गहिताडे सो रहु रिटपाये मुनि रघुनायक वेगि छुडाय। ३७ ते पर इन रावण दिगआई गति ममन्न निज नभय मनाई। शारदल पुनि कट कर जोगनाय गम मेना नदि योनी ॥३८॥ गरडव्यद वि भट ममदाई दे सखेलथर टिग उई। चीपारिशान्ट मति माना है द कथित नमन दलाना ३२||

(३३०)
रामरसायन।
पुनिदशमुखहिदूत नभिभाषी सियदै लीजिय लंकहि राखं
रावण सुनत क्रोध बहुकीना * शारदूल लखि मारगलाना॥४
तबदशमुख कछुकरिदुचिताई कियो मंत्र मंत्रीन बुलाई
उनिविचार पुनिभवन सिधायो *विज्जु जीभ निश्चर तहँ आयो
दोहा-ताहि कही दशमुख झटित, सीतहि भीति दिखाव ॥
मायामय रघुनाथको शिर धनु शर रचिलाव ॥४२॥
वेगि यथारथ विरचि सो, लायो लखि दशशीश ॥
भयो मुदित भूपण विशद, ताहि दियो बकसीस ।। ४३
बहुरि दशानन जायकै, मृपा सियहि भय दीन ।
कही प्रहस्त सुराम को, रैनसैन वध कीन ॥४४॥
यौं दशमुख कहि वेगही, विद्युजीभ बुलवाय ।।
धनु शर शिर माया रचित, सिय ढिग दियो धराय ॥४
सो लखि सीता विकल है, भूमि गिरी मुरझाय ।।
रुदन करन लागी महा, लै शिर करि करि हाय ।। ४६
तब बोलो दशमाथ अब, वृथा करौ जनि सोच ॥
होहुनारि मम जानकी, मुदित रही दुख मोच ॥ ४७॥
यौं सीतहि दिखराय भय, भवन गयो भुजवीस ।।
भयो गुप्त ताही समै, सो धनु शर अरु शीश ॥ १८॥
चकित भई सिय सुगति लखि, हिय नहिं धीर धरात ।।
सरमा कही बुझाय बहु, यह खल माया बात ।। १९ ॥
यो कहि सरमा गुप्त है, लंकहि जाय उताल ।
लखि आई पुनि सीय प्रति, मुदित कही सब हाल ॥५०
सुनि हिय हरपा मैथिली, सखिहि मिली भरि अंक ।।
मदल कुशल दुहुँ गजमुत, जानि भई निशंक ।। ५१॥
इति श्री० ग० २०वि० यु० गवणन
अपनो नाम चतुषिभागः ॥ ४ ॥

समरसायन। (३३१) दोहा-सीतहि भय दिखराय जब, दशमुख आयो धाम ।। सुनो शोर चहुँ ओर तब, कहत कीश जै राम ॥१॥ गुणि रिपु दल बल प्रबलता, सवही वेगि बुलाय ॥ सभासदन जोरी सभा, कही कहौ ठहराय ॥२॥ काम्पछंद । माल्यवान वर वैन तबै रावणाहं सुनाये अशकुन तबते होत नाथ जवते सिय लाये ।। खर बोलत बहु क्रूर मेघ शोणित वरसावै । वाहन दृग जल ढरत व्योम मंडल रज छावै ॥३॥ मांस अहारी जीव मृत्यु दुखकारि घनेरे । जुरि घर पुर वन बाग घोर बोलें चहुँ फेरे ॥ श्याम रूप तिय हँसहिं स्वप्न मधि करहिं अहारा । पुनि दरशा भोति कहै कटु वचन अपारा ॥४॥ परसत नहिं बलिभाग कागतिहि श्वान भखावें । मृग पक्षी नित रोय अशुभ रख घोर मचावें ।। भवनन माहि कपोत लवा सारिखा जुधावें॥ पुनि ये बहु तृण लाय तहाँ निज सदन बनावें ॥५॥ तेइ परस्पर ग्रथित होय महि गिरे सयुद्धत । दिन उलूक निशि काग विपम वोलें ख उद्धत ॥ रुदन करें मंजार खान दिन नि सदाहीं।। स्वप्रमाहिं नर नारिहँसै अरु नृत्य कराहीं ॥६॥ मैथुन कर खर धेनु नकुल सँग मूपक ठाने । शान साथ मंजार श्वान शूकर रति आने ॥ किनर निश्चर संग फेरि नर नरन विहार ।। नर नारि न इमि जीव विपम संभोगहि कारें ॥ ७॥ सदन सदन प्रति साँझ समै इक पुरुप कराला॥ मंडित श्याम कुरूप लखै सबही नित हाला॥ इते अपर बहु अशुभ चिह्न लंकामधि भाग ।। याते सीतहि देहु नतरु निश्चर सब नासें ।। ८॥

(३३२) रामरसायना . सुनि रावण करि क्रोध निदरि तिहि कछु कटु भापी॥ तब मंत्री कहि जैति गयो निज गृह मन मापी । सभहि विदादै वेगि मुख्य सचिवन लै राजा॥ दीनी रहसि रजाय जाय चहुँ सुभट समाजा ॥ ९ ॥ दोहा-करि विचार तव लंकपति, सचिवहि कही बुझाय ॥ यथा योग इमि द्वार मधि, चमू युद्ध हित जाय ।। १० ॥ महापार्श्व बहु सैन लै, सहित महोदरवीर ॥ गहैं सुदक्षिण द्वार दृढ़, युद्ध करें रणधीर ॥ ११॥ पश्चिम द्वार अनीकलै, मेघनाद बलवान ।। होय समर अवरुद्ध सो, साजि शस्त्र तनु वान ।। १२॥ सेनापती प्रहस्तवर, पूरब द्वारहि जाय ।। युत अभंग चतुरंग दल, करै युद्ध हरपाय ॥ १३॥ शुक सारन वलवंत वर, संयुत सुभट अपार ॥ ठा. दृढ़ संग्राम द्रुत, जाय सु उत्तर द्वार ॥ १४॥ वही द्वार उत्तर गहैं, अपर सुभट समुदाय ।। होतितहीं रघुवीर सों, संयुग करिहों जाय ॥ १५ ॥ विरूपाक्ष बहु बीर युत, मध्यरहै मति श्रेय ॥ द्वार द्वार प्रति सुरति लै, सबहि सहाय सुदेय ।। १६॥ इहि विधि लंकापति उतै, थपे वीर चहुँ द्वार । इतै विभीपण राम सों, बोले वचन विचार ॥ १७॥ नाथ आज मम सचिव बहु, लाये लंक हवाल । चहूँ द्वार मधि सुभट दल, थपो विकट दशभाल ॥ १८॥ सुनि रघुवीर सुमंत्र करि, दई रजाय सुहाल ॥ युथा योग कपि ऋच्छ चहुँ, घेरौ लंक उताल ॥ १९॥ रहैं चमूपति नील नल, सदुल सु पूरब द्वार ।। दक्षिण द्वार अनीक युत, रुदै वालिकुमार ॥२०॥ हनुमान कपि सैन ले, धेरै पच्छिम द्वार । ऋच्छराज बहु मुभट युत, रहें मध्य रखवार ॥२१॥ {...

रामरसायन।
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हम सबंधु सुग्रीव अरु, लंकापति बलधाम ॥
उत्तर द्वार अनीकलै, कार हैं दृढ़ संग्राम ॥ २२ ॥
इहि विधि दोऊ दल रुपे, यथा कथित चहुँ ओर ॥
जै रावण जैराम ख, छाय रहो बहु शोर ॥२३॥
सुनि दशमुख निकश्शं अति, उच्च धाम चढि जाय ।।
लखो राम दल अमित पै, कछू न तिहिके भाय ॥ २४॥
तह बैठो दरबार करि, नृत्यगान बहु होय ।।
रावण युत मंदोदरी, मुदित पानवश जोय।। २५॥
इत सुवेल गिरि राम चढि, लखो लंक अभिराम ।।
चहूं दिवाकरसे दिपत, कंचन मय बहु धाम ॥२६॥
पुनि बिलोकि दक्षिण दिशा, धन दामिनि अभिराम ।।
चकित विभीषण प्रति कहे, मधुर वचन श्रीराम ॥२७॥
इत हेरो लंकेश किमि, दामिनि दमकत आज ।।
उटे अनूपम जलद अरु, गरजत मधुर गराज ॥२८॥
सुनत विभीपण जोरि कर, बोले वचन विशाल ॥
मेव न चपला नाथ वह, तिय युत है दशभाल ॥ २९ ॥
छत्र मेघ सम लखि पर, दामिनि तिय ताटक ।।
गरज मृदंग अवाज सो, रावण सभा उतंक ।। ३०॥
सुनि रघुवीर सँधानि शर, डाँडो सहज सुभाय ।।
भूपण छत्र किरीट सो, इपुडारे महि जाय ॥३१॥
भूपणादिके भंगको, भेद न जानो कोइ ।।
सकल सभा रावण सतिय, चकित रहे चहुँ जोइ ॥३२॥
सोचत सब अशकुन भयो, ताहि निदरि दशमाथ ।।
गयो सेन मंदिर विहँसिल मंदोदरिसाथ ३३॥
रहसिपाय मंदोदनी, समुझायो बहु भाँति ।।
कही सपदि सिय देहु पिय, नातर लंक नशाति ॥ ३ ॥
सुनि दशमुख वर नारिको, निजवल तेजसुनाय ।।
कही प्रिया जनि भीति करु, नर वानर कह आय ॥३२॥
इमि तुझाय बटु मुदित मन, हो सकल निशिधाम ।।
अशन पान मुख मन कार, लहो मनियविश्राम ३६॥
इति भी० ० २० वि० १० दरपानानी नामांकनोदिनानः ॥ १॥

(३३)
रामरसायन।
दोहा-पुनि प्रभात नितकृत्य करि, दशमुख वेठोजाय ।
विशद उच्च प्रासाद वर, जुरे सभासद आय ॥ १॥
इत सुवेलगिरिते लखो, कपिपति निश्चरराय ॥
है सकोप तहते उछलि, परे सभाविच आय ॥२॥
गिरि समान सुग्रीव वपु, औचक लखि सब कोय ।।
यातुधान रावण झझकि, उठे चकित चितहोय ॥ ३॥
पुनि विलोकि कपि जानिक, वेठे सबै सशंक ।।
है सकोप दशवदन तव, बोले निपट निशंक ॥४॥
तोमर छंद।
रेकीश तू कहु कौन । कीनो इहाँ किमि गौन ।।
ठाढो कहा चुप होय । कहु विनय वेगि जुहोय ॥५॥
सुनिकै सकोप सुकंठ । भापी सपदि सुनशंठ ।।
तूअजहुँ मोहिं न जान । कस जानि होत अजान ॥६॥
लीनो सखा प्रभुमान । हौंदास निज दिशि जान ॥
सुग्रीव नाम कपीश । तुवकालमै भुजवीस ॥ ७॥
श्रीराम त्रिभुवन ईश । तिन सामुहे दशशीश ॥
बैठो सिंहासन आनि । राखी न तू कछुकानि ॥ ८ ॥
यौं कहि सुकंठ उताल । कार कीशकोलसुहाल ॥
दशवदन मुकुट उतारि । दीने महीतलडारि ॥९॥
पुनि उछलि वेगि कपीश । गहि दशह दशमुख शीश ॥
करकेश धरि झकझोरि । द्रुतकूदि खडे बहोरि ॥१०॥
दश वदन लखि रिसलाय । कपिपतिहि परिभ्रमाय ॥
पटको महीतलमाहिं । तिनभयो कछु श्रम नाहि ॥११॥
भूपरतही बलवान । कपि उछलि कंदुक मान ।
भरि वेगि दशमुख अंग । महिडारि दीन निशंक ॥ १२ ॥
पुनि उठि भिरो दशशीश। भरि क्रोध निश्वर कीश ॥
भे मल्लयुद्ध निरुद्ध । दोऊ सरिसबल उद्ध ॥१३॥
दुहुँ करत दाँव अनेक । जीतन चहत इक एक ॥
कोऊ न मानत हार । बहु लरत भिरत प्रचार ॥ १४ ॥

रामरसायन । GOGGC भिरह भुज भुज मेलि । दुहुँलेत दुहुँन सकेलि ।। दपटि रपटत धाय । दुहुँ छपटि पुनि छुटकाय ।। १५ ।। दुहुँ देत झपक सुझांकि । खाली करत दुहुँताकि ।। बगलदै कढिजात । दुहुँ भिरत पुनि विलगात ।। १६॥ दुहुँ कढत दक्षिण बाउँ। पुनि करत निज निज दाउँ ।। तल चरण मुष्टि प्रहार । दुहुँ करत दुहुँन प्रचार ॥ १७॥ दुहुँ जानु बीच दवाय । मर्दत सुजान रिसाय ॥ महि लगत काहु न पीठ । दुहुँ मल्ल शिक्षित ढीठ ॥ १८ ॥ दुहुँ गिरत उठत बहोरे । गहि भिरत अंगन मोरि ॥ चलत वक्र सुचाल । पुनि देत झपट उताल ॥ १९ ॥ दुहुँ भरत मंडल मंडि । इक एक पद्गति बाँडे । धरि चक्र सरिस भ्रमात । रंचहु न कोउ श्रमात ॥२०॥ गहि एक एकहि रेलि । शिर शिरहि भेरत पेलि ॥ कटि गहत धरत सुकंद । भुजकंठ करत निबंध ॥ २१ ।। दुहुँचरण दुहुँ उरझाय । चाहत सुदेहुँ गिराय ॥ पुनि बचत काटत दाव ! लखिघात देत भुलाव ॥ २२ ॥ इक एक डारत भूमि । चढि पीठ मर्दहिहूमि ॥ पुनि उछलि बलकरि यमि । दै चक्र ठेलत धूमि ॥२३॥ नभ ओर उछलत कीशा गहि पद पटक दशशीश॥ लंगूर माहि लपेटि । कपि तिहि पछार समेटि ।।२४।। जे मल्ल युद्ध बखान । वत्तीस दाँव प्रमान । गत प्रत्यगत वह सर्व । दुहुँ वीर करत सगर्व ।। २५॥ दुहुँ अंग स्वेद प्रवाह । तनु धूसरित रज माह ॥ दुहुँ गात रुधिर यदात । नहि सास उदर समात ॥२६॥ पथकत जकत न कोय । सब चकित दुहुँ बल जोय ॥ कपिराज निश्वरराज । दुहुँ तेज गुण मम माज ॥२७॥ दुभिरे जात अकाश । महि परत पुनि दुहुँ आम ॥ दुगिन्त परिखदि माहि । तितहूँ नकोप लगहि ॥ २८ ॥ पुनि दोर उछलन आय । गोपुर मुराद कगय ।।

(३३६)
रामरसायन ।
इमि दंड द्वै दुहुँ वीर । किय मल्ल युद्ध सुधीर ॥ २९॥
कीने अनेकन दाव । जे चारि करन कहाव ॥
पै कोउ नाहिँ हरात । छिन छिन दुहूँ अधिकात ॥ ३०॥
प्र० ॥ वा० ॥ यु०॥ कां० ॥ स ४० ॥ श्लो।
मंडलानि विचित्राणि स्थानानि विविधानि च ॥ गोमूत्रिकाणि
| चित्राणि गतप्रत्यागतानि च ॥ १॥ तिरश्चीनगतान्येव तथा वक्र-
गतानि च ॥ परिमोक्ष प्रहाराणां वर्जनं परिधावनम् ॥२॥ अभिद्रवण
मालावमवस्थानं सविग्रहम्।।परावृत्तमपावृत्तमपद्रुतमवप्लुतम् ॥ ३॥
उपन्यस्तमपन्यस्तं युद्धमार्गविशारदौ ॥ तौ प्रचेरतुरन्योन्यं वान-
रेन्द्रश्च रावणः ॥४॥
पुनः॥ अन्यत्रापि ॥ भरतोक्तानि ॥
एकपादप्रचारेण चारिसंशं तु मंडलम् ॥ द्विपादक्रमणं यत्र करणा-
ख्यं तु मंडलम्॥६॥ करणानां समायोगात्खंडमंडलमीरितम् ॥ खडे
स्त्रिभिश्चतुभिर्वा महामंडलमीरितम् ॥ ६॥ वैष्णवं समपादं च
वैशाख मंडलं तथा ॥ प्रत्यालीढ़मनालीढं स्थानान्येतानि पण
नृणाम् ॥ ७॥ इत्यादि ॥
तोमर छंद।
दश वदन तब हिय ठान । माया करन अनुमान ।
जानी सुगनि सुग्रीव । गो उछलिं नभ वलसीव ॥३१॥
रघुवीर ढिग द्रुत आय । भेटे अनंद अघाय ॥
वरणो समस्त सुहाल ।सुनि चकितभे कपि भाल॥३२॥
दोहा-हिये लगाय सुकंठसो, कहीं नेहयुत राम ॥
यौं अकेल कोऊ सखा, जात शत्रुके धाम ॥ ३३॥
सुनि सुकंठ बोले कृपा, तुव जिहि पै दृढ होय ॥
ताको तीनहुँ लोकमें, करि न सकै कछु कोय ॥३४॥
सुनि सवही जैजै कही, छायो परमानंद ।।
उत दशमुख सुग्रीव वल, वर्णत मुदित सुछंद ॥ ३ ॥
इति श्री० स० २०वि० यु० रावण सुग्रीव
मयुद्धवर्णनो नाम पटोविभागः ॥६॥

रामरसायना
(३३७)
सो०-लखि कपीश वल भूरि, सकल सराहत अमित विधि ॥
सब हिय आनंद पूरि, रामविजय सूचित भई ॥१॥
चौ० ताछिन कहीलपणप्रति रामा होइहि बंधु बिकट संग्रामा।।
विग्रह लक्षण बहु दरशा 3 इनके फल अति शीघ्र जनाव२॥
घोर पवन चलि रज चहुँ छावै सहजहिं नग तरु महि थहरावें॥
गिरि घहरात लाखिय दिन तारा विन घन गर्जन होत अपारा ॥शा
धूसर मेव घोप कर भारी * चंद्र चंद्रिका बहु तपकारी ॥
सांझप्रभात अधिक अरुणाई नभ संध्या दारुण दरशाई ॥४॥
रविते अनल झरे दुहुँ वेरा श्याम रक्त शशि मंडल घेरा ॥
उदै होत नित केतु अनेका 8 कूर विशाल एक ते एका ॥५॥
चहूँ याम दिन दुर्दिन होई निशि मलीन शशि उड़गण सोई ॥
रवि परिवेप लखिय लघुलाला पुनि तिहि मंडल श्याम कराला॥६॥
तप्त नीर वरपा कछु होई 8 शोणितर्बुद सहित पुनि सोई ॥
भरे अयोगप्रसव बहु ठामा अपर अकर्म अमित वसु यामा॥७॥
वज्रपात वी विन होई काक गृद्ध युद्धत महि दोई ।।
इते अपर बहु अशुभ जनावै रुंड मुंड धरणी चहुँ छा३ ॥ ८॥
दोहा यौकहि उतरि सुवेल ते, दल युत रघुकुलदीप ।।
गिरि गहि उत्तर द्वारको, छाये लंक समीप ॥ ९॥
यूथप छत्तिस कोटि युत, पूरव कथित प्रमाण ।
वेरी लंक सुभालु कपि, अपर अमित बलवान ॥१०॥
काह तनु दशनागवल, काहू शत गज मान॥
काह सहस मतंग सम, काहू लक्ष प्रमाण ॥११॥
हनुमत कपिपति वालिसुत, नीलादिक रिछराय॥
अपर मुख्य बहु भालु कपि, तिनवल अतुल सदाय ॥१२॥
यथा वली कपि भालु तिमि, यातुधान बलवान ॥
अगणित भट दुहुँ कटक मधि, कोकरिसकै बखान ॥ १३॥
दुहुँ ओर भट दल रुपे, घोर शोर चहुँ होय ।।
निज निज प्रभु आज्ञा चहता धीर वीर सब कोय ॥१४॥

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लखाव है। रसिकविहारी ताहि भापौ महाराज वृथा सकल निलन
| कुल विभव सुविद्या धिग सुयश दराज धिग राज धिग साजको ।
(३३८)
गमरसायन ।
तब रघुवर दृढ मंत्र करि, अंगदको समुझाय ।।
पठयो रावण पास द्रुत, राजनीति ठहराय ॥ १५ ॥
अंगद प्रभुपद नाय शिर, आये लंक मझार ।।
प्रविशतही भेटो तिने, इक दशवदुन कुमार ॥ १६॥
दुहुँ वृझी दुहुँ बंक दुहुँ, बोले दुहूँ उतंक ॥
तिहि अंगद पद गहि पटकि, वध कीनो निशंक ॥ १७॥
वालितनय रावण निकट, पहुँच जाय उताल ।
निर्भय निपट विलोकि हसि, यूझत भो दशभाल ॥ १८॥
घनाक्षरी फवित्त ।
कोहै कपि दूत काको रामको सुराम कौन सोई तव भगिनीकी
नासिका जु काटीहै ।। आयो कहाँ तेरेपास काहे शिपदेन काह होस
कर क्यों तू दुरखुद्धि उदघाटीहै ॥कीनोका सियाको हरी होका नाश
कोकरें जुचौदहसहस्र चमूछिंद छिंद छाटीहै।।रसिकविहारी यौं निशंक
वैन अंगदके सुनि यातुधान मति सकल उचाटी है ॥१९॥ सभासद
बोले सुनि बोलैना विचारि कपि आयो किहि काज ह्यां फिरैया
मंदरनको।तू है पशुकोश कहा जानै नृप नीति रीति तापै वनवासी
औ निवासी कंदरनको ॥ रसिकविहारी यश जाहर त्रिलोक जाको
जाकी भीति भागैं देव भौन अंदरनको ॥निश्चराधिराज महाराजको
समाज देख यह दरवार है न ऋच्छ बंदरनको ॥२०॥ सुनिकै उतके
वैन अंगद निशंक बोले सब मति बंक रंक मोहिं दरशावै है।लोलुप
लबार चोर निपट कठोर घोर कायर कलंकी सदा कुयशी कहावै है।
बीस वीस पाये औन नैन पै वधिर अंध ऐसो महापातकी जो प्रगट
काहू लाज नहिं आवै है॥२१॥ धिग वह वीरता बड़ाई चतुराई धिग।
धिग प्रभुताई जहँलेश है न लाजको।रसिकविहारी जोन भाँपै सत्य
ताको धिग होत है अनीति तहां धिग सब काजकोधिग बल रूप
धिग
परतिय चोरी सदा करहि ठगोरी जोरी धिगहै समाज
ऐसे महाराजको ॥ २२॥

रामरसायन। (३३९) दोहा-सुनि अंगदके वचन तब, दशमुख बहु,रिस आन ॥ कही प्लवंगम मूढ़ तु, मो प्रताप नहिं जान ॥२३॥ मो सन्मुख रवि तेजहू, होत सदा आतिमंद ।। चंद्रहास असि भीति वश, स्रवत सुधा नित चंदे ॥ २४ ॥ लोकपाल दिगपाल अरु, देवपाल नरपाल ।। नाम सुनत दशभालको, सवही होत विहाल ॥ २५ ॥ यातुधान पतिके वचन, भरे भरि अभिमान ।। सुनि बोले तिहि निदरिक, वालितनय बलवान ॥२६॥ घनाक्षरी-कवित्त । जौलौं दशशीश भुजवीश ना नशॉय तौलौं चार दिन औरहू अनंद उर धरिले । येरे मतिमंद निज वीरता बढ़ाय झुठी सकल वृथाही अभिमान हीय धरिले ॥ रसिकविहारी तोहिं जानत जहान जैसो होवै जो लवारी तिनै फेरिहू उचरिले। और तो न कोऊ तोकों नेकहू सराहै याते आपनी बड़ाई तू धनेरी आप करिले ॥२७॥बोले पुनि अंगद अरे मलीन मंदमति भयो मतवारो तोहि रंचहू न चतह।। कायर कलंकी निशिचारी अनाचरी चोर देव दुखकारी दुष्ट पातक निकेत है ।। सीख या हमारी तू सुरारी शुभकारी मान रसिकविहारी होय भारी तुव हेतहै ॥ त्यागि अभिमान सिय लैकै अगवान गहु रामपदवान क्यों वृथाही प्राण देत है ।। २८ ।। मो०-सुनि अंगदके बैन, कही दशानन क्रोध युत ॥ रे खल मीनरहन, मोहिं सिखावत मंदमति ॥ २९ ॥ राज काज बहु युद्ध, किये करों पुनि करहुँगो ॥ बुधि विद्या बल उद्ध, मोसमान को और कहु ॥३०॥ तव युवराज प्रवीन, हसि भापी निशंक तिहि ॥ रेनिश्चर मतिहीन, तोते हो शुभकाज कह ॥ ३१॥ संक्या फस्ति। टीका कियो सब वेदपतृ ही सुनी जुन ववात अलीका ॥ लीका नहीं धिमंतनमें तुव द्रोही भयो तिहुँ लोकपनी ॥

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गमरसायन। ~ नोटकछंद। सुनिकै दशकंधर क्रोध कियो । कपि वैन सिखी करि दग्ध हियो । हृत अंगद-सों झहराय कही। शठ तू निज प्राण चहै कि नहीं॥४१॥ कहु कोश कहा तुव नामकहै । किहिको सुत तू किहि ठौर रहै ॥ बतगत निशंक रतंक यहाँ । खल रंक भयो मतिबंक महाँ।। १२॥ वि बालितनयहसि वैन कहे ।। तुव वीसहु लोचन जातरहे ।। हे रंचकह नाहि मृझहिरे ।। तिहि ते सुन मोहिं जु बूझहिरे ॥४॥ घनाक्षरी कवित्त । अंगद है नाम मेरो धाम किपक्षिामाही नीकी भांति जाने पातुधान त कपीशको ॥ वाली बलसीम भीम ताहीको सुवन जान आयो हो मथन तेरे बल भुजबीसको । तोहि विनशैया तुव सेनको नशैया इहि लंक उजरेया उखेरया दशशीशको ॥ देव दुखहारी दुष्ट दलके मँहारी वीर रसिकविहारी ही सुदास जगदीशको ।। ४४॥ मो०-सुनि भापी दशशीश, रे कपि तुहि जानो अवै ॥ तू अजान शिशु कीश, मुहि जानत हो तब पिता ॥१५॥ घनाक्षरी-फवित्त । देव औ अदेव शीश मेरीही रजाय एक देखि भुजवीश यमराजहू जकत है । वापुरो सुकंठ कपि रीछले लग्न आयो देखी कालि बन्दर नो कंदर तकत है । येरे कोश कोई और मोविन त्रिलोक ईश जाको तेज निखि सुरेशह सकत है ॥ रसिकविहारी कहा मानुप विचारे दोन मीनही लबार बार बार क्यों बकत है ॥ १६॥ लो-इमि कहि पनि दशशीश, कह कपीश सुन तोहि धिग ।। अव न बोल कछुकीश, गति जानी नुव ईशयुत ॥ १७॥ घनाभरी फविन । येरे कपि मृद क्यों खानत बडाई बहु जाहिर जहान माँहि जे नो हाल नागे है । मिकाविहारी तृ वही है जो पिताको नेक बदलो न लोनो औं सुकंठ माध धारोह ॥ई सुकंट मो जो वालि डग्ने भगो देवालि मोई जादि गम एक बाणही ते मागे है। मोई गम जाको देखि निपट निकाम बंधु वामके समेत बाप थामते निकागे १८॥

(३४०) रामरसायन । तीकारहै मद पी नित लोलुप है यह धर्म न वीर गुनीका ॥ नीका करै कह काम निलज्ज तू भ्रात कहावत है नकटीका ॥३२ तोटक छंद । सुनिकै दशकंठ रिसाय कही। शठ हौं बहुती कटु बात सही ॥ खल तो शिरपै ध्रुव बीच नचै । भगुकीश न तो अब प्राण बचै३३॥ इत बैठ घनी बकवादकरी । रजनीचर कोउ न हीय धरी ।। यह तो रसना जुउतंक चलै । गहिभंजहि आय निशंकमलै॥३४॥ सुनिकै तब अंगद रोपदहे । भृकुटी करि बंक निशंककहे ॥ चुपहो बहु बात बकै खलयों । तन हो प्रगटै सुनहीं बल क्यों ॥३५॥ जुभिरै मुहिते प्रण सत्य धरौं । द्रुतही दशकंठ विकंठ करौं । तव पुत्र कलत्र जुभ्रातसबै । सहसैन लखात सहात अबै ॥ ३६॥ इमि वालितनय कहि रावनसों। वरणी पुनि बात सिखाइनसों ॥ सुन निश्चरनाथ कहौं हितसों । ध्रुवमान हिये गुनिकै चितसों ॥३७|| घनाक्षरी कवित। बुद्धि ते विचार निरधार दोऊ सारासार स्वबल निहार कै सम्हार फेर रार करु ॥ येरे दशशीश बेगि जोरकर वीश लै सियाको संग शीशनाय ईशहीके पाय परु ॥ रसिकविहारी प्रभुदूत हौं सिखाऊँ तोहि एकौ तू न जानै राम बाणको प्रभाव गरु | चौदह सहस्र भाल। भेदे ताल छेदहाल सोई तीर सिंधु शोखि नीर बिन कीनो मरु ॥३८ द्रोही क्यों भयो है मतिमंद रामचंद जूको येरे भुजबीश शीश नाहक लयो है अघु ॥ अजहूँ भली है सियसौंप हठ छोड़ वेग राम राम वालमें न सहित कुटबै दः।। इन्द्र विधि वरुण कुबेर यम सूर चंद जाके डर डरत बिलोक तू कहाहै लघु ॥ रसिकविहारी वंश प्रभुता प्रसिद्ध जाने द्वे गये प्रतापी कैसे चव नरेश रघु ॥ ३९ ॥ नूर ना रहेरे यो गरूर ना रहेरे लंक धूर्ना रहरे खल जोपै तुव ऐसी चालु धीर ना रहेर एको वीर नारहरे तीर है है पलमाहि तोहि देखन सुयेही हालु । यो दशकन्ध वीस लोचन तऊ भो अंध हटते वृथाही जान सकल कुटुंब बालु ॥ रसिकविहारी हितकारी धनुधारी आन। आय संग सबल अभंग दल कीश भालु ॥ १० ॥ ।

गमरसायन। ताटकळंद। सनिकै दशकंधर क्रोध कियो । कपि बैन सिखी करि दग्ध हियो । हृत अंगद सों झहराय कही। शठ तू निज प्राण चहै कि नहीं॥४१॥ कहु कोश कहा तुब नामकहै । किहिको सुत तू किहि ठौर रहै ।। वतरात निशंक उतंक यहाँ । खल रंक भयो मतिबंक महाँ॥४२॥ तव वालितनयहँसि वैन कहे ।। तुब वीसहु लोचन जातरहे । तहि रंचकह नाई मृझहिरे । तिहि ते सुन मोहिं जु बूझहिरे ॥४॥ घनाक्षरी कवित्त । अंगद है नाम मेरो धाम किपंकिंधामाहाँ नीकी भांति जानै यातुधान तु कपीशको ॥ वाली बलसीम भीम ताहीको सुवन जान आयो हो मथन तेरे वल भुजबीसको ॥ तोहि विनशैया तुव सैनको नशैया इहि लंक उजरैया उखेरया दशशीशको ॥ देव दुखहारी दुष्ट दलके मुँहारी वीर रसिकविहारी ही सुदास जगदीशको॥४४॥ मो०-सुनि भापी दशशीश, रे कपि तुहि जानो अवै ।। तू अजान शिशु कीश, मुहि जानत हो तब पिता ॥४२॥ घनाक्षरी-फवित्त । देव आ अदेव शीश मेरीही रजाय एक देखि भुजवीश यमराजहू जकत है । वापुरो सुकंठ कपि रीठले लरन आयो देवी कालि बन्दर मो कंदर तकत है ।। येरे कोश कोहे और मोविन त्रिलोक ईश जाको तेज निरखि सुरेशहू मकत है ॥ रसिकविहारी कहा मानुप विचारे दीन मीनदो लबार बार बार क्यों वकत है ॥ ४६॥ सोल-इमि कहि पनि दशशीश, कह कपीश सुन तोहि थिग ॥ अब न बोल कछुकीश, गति जानी तुब ईशयुत ॥१७॥ घनाभरी फविन । येरे कपि मृट क्यों बखानत बडाई बहु जाहिर जहान माँहि जे तो हाल नागे है। सिकाविहारी तृ वही है जो पिताको नेक बदलो न लोनो औं सुकंठ माप धारोह ॥द सुकंट मोजो बालि डरते भगो हे वालि माई जादि गम एक वाणही ते मागे । मोई गम जाको देखि निपट निकाम बंधु वामकेनमेत चाप धामने निकागे १८॥

(३४२) रामरसायन। , दोहा-स्वामिनिंद सुनि क्रोध करि, वालितनय बलरास चार मुकुट दशवदनके, गहि फेंके प्रभु पास ॥४ तब निश्चर लखि अंगदहि, ताडन धाये कोपि ॥ कपि निशंक रघुवर सुमिरि, ठाढ भये पदरोपि ॥ वीर निशाचर भूरि बहु, बलकरि बैठे हार। रामदूतको चरणते, कोऊ सकै न टारि ॥५१॥ तब सकोप कपि कूदि गहि, शिखर धाम प्रासाद वेगि विभंजिबहाय चहुँ, कियो सिंहसम नाद ॥ पुनिअंगद जैराम कहि, तहते उछालि अकाश ।। रिपुबल मंथन करि तुरत, आये प्रभुके पास ॥ शीशनाय कहि सकल गति, पुनि बोले युवराज दशमुख हठ त्यागै न प्रभु, तिहि शिरकाल विराज् इति श्री. रा० २० वि० यु० अंगदरावण वर्णनो नाम सप्तमोविभागः ॥७॥ वोपैयाछंद। अंगदकी वानी सुनि धनुपानी बोलि कपीशहि भापी। जो किय दशशीशा सो वह रीसा हौं बहु दिन हिय राख अब देहु रजाई बहु भट धाई करें समर निश्शंका ।। कपि भालु उतंका हितिखलरंका वेगि नशा लंका॥" तबहीं सुग्रीवा बहुबलसीवाँ आयसु करीउताला ॥ सुनतहि भटभारी तरुगिारधारी धाये कुपित कराला ॥ जजे जगंदीशा जति कपीशा कहि कपि भाल अपारा। चहुँ दिशिते जाई करि वरियाई कीनो पंथ सुढारा ।।२ तरु गिरिते भूरी परिखा पूरी पुर प्राकार ढहायो॥ सो सुनि दशभाला करि हग लाला मारो कपि न कहा तब निश्चर यूथा विविध वरूथा नहुँ हथ्यार लै धाये। दुहुँ दिशि वर योधा मिरे सकोचा रण उमंग उरछाये रामरसायन। नख दशन विशाला इत विकराला गहि गिरि तरु गिरिखंडा॥ निश्चर कपि ऋच्छन करि करि शिच्छन हनत भूमिहति पारें । तेखल दल झुंडन रुंड सु मुंडन मंदि गर्द करि डारै ।। ४ ।। का कपि दाँतन हनि तल लातन मुंड मुटिकन फोरें । बहु उपल चलावें प्राण नशा, पकरि गात झकझोरें । रजनीचर लक्षन करें सु भवन शस्त्रन मारि गिरावै ॥ इहि भाँति परस्पर दुहुँ दल वल भर लरत न मनहिं फिरावै॥५॥ चारी छन्द । इमि यातुधान सुभालु कपिको होत समर मझार ॥ ताही समै पुनि औरहू धाई निशाचर धार । तिन भिरतहीभो आय औचक द्वंद्व युद्ध अपार ।। दुहूँ ओर सम बल वीर एकहि एक लरत प्रचार ॥६॥ वननाद अंगद जंबुमाली पवनसुत वलसींव ।। पुनि वज्रमुष्टि मयंद युद्धत प्रघस अरु सुग्रीव ।। भट विज्जुमाली सँग सुखेन प्रजंघते संपाति ।। प्रतपनहि नलसनि प्रभहि द्विविद निकुंभ नील भिरात ॥७॥ वरवीर लछमन संग युद्धत विरूपाक्ष प्रचंड ।। रघुनाथ साथहि अमिकेतु सु रश्मिकेतु उदंड ।। अरु यज्ञकोप कराल पुनि मित्रन ये भट चारि ।। इक एक है बहु समर कीनो हते तिनहि खरारि ॥ ८॥ अरु तपन गजसो भिरि विभीषण शहन बलवान ॥ इमि अपर निश्वर भालु कपि मिलि द्वंद्व युद्धहि ठान ।। घननाद कर गहि गदा अंगद अंगकीन प्रहार ॥ सोछीन ले कपि सारथी रथ वाजि दीन विदार ॥ ९॥ हनुमंत टरमधि जंबुमाली हनी शक्ति प्रचंड ॥ तब कोपि कपि तिहि तल प्रहारो कीन शिर शतखंड। भट वमरिहि मुष्टिकाते हनो वणि मयंद ।। मदि मारथी रथ वाजि संयुत गिरोखल मतिमंद ।। 1. ॥

(३४४)
गमरसायन।
चाणन विदारो गात कपिपति को प्रवस करि खीस ।।
पत्री उखारि विशाल सो तिहि हनो वेगि हरीश ॥
तजिवान विद्युनमालि वीर सुखेन विहवल कीन ।
गिरि शृंगलै कपि तिहि प्रहारो भो विकल रथहीन ॥ ११ ॥
संपाति अंग प्रजंव हनिशर तीन कीन विहाल ।।
तरुलै प्रवंगम यातुधानहि दलो अतिहि कराल ॥
प्रतपन कियो बल धाय नलपहँ त्यौं सुकपि बल ऐन ।
हनि मुष्टि लातन बेगि नखन विदारि डारे नेन ॥ १२॥
पत्रीनते तनुछिदि द्विविदहि विकल सनिप्रभकीन ।
तिहि कीश तरु हनि सारथी रथ वाजि युत हति दीन ।
नीलहि विदारो शरनते जु निकुंभ तब कपिधाय ।
रथचक तिहिलै सारथी तिहि शीश दीन नशाय ॥१३॥
करि कोप निश्चर जवहि पायो लपण पै धनुतान ।
तबहीं विरूपाक्षहि हतो तिन वेगि एकहिबान ।।
तल गजहि ताडो तपन कपि तिहि नखन डारो फार |
लंकेश लेकर खड्ग रिपुहन अंग दीन विदारि ।। १४ ॥
इमि द्वंद्वयुद्ध अपार एकहि एक करत प्रहार ।
कपि भालु निश्वर हनतते तिन दलत विविध प्रकार ॥
बहु समर होतहि दिवस बीतो जबाह अथयोभान ।
तव पाय निशि खल धाय भालु कपीन लागे खान ॥ १५ ॥
तमछाय कछु न जनाय निज पर नेक परहि न दीस ।
कपि वृझहीं तू रैनिचर बूझै सुतूहै कीस ॥
कपि कपिन निश्चर निश्चरन अरु ऋच्छ ऋच्छन मार।
हत यातुधानन भालु कपिते तिनहि कराह प्रहार ।। १६॥
इत भालु कपि उत रौनिचरके रुंड मुंड अपार ।
छाये महीतल बाजि गज रथ शस्त्र समर मझार ।।
कटकदहि मर्कट ऋच्छ गर्जाहं यातुधान कराल )
दुहुँ और छायो शोर जै रघुलाल जै दशभाल ॥ १७॥

रामरसायन।
(३४५)
बहु शंख झांझ मृदंग दुंदुभि तूर ढोल जुझाव ।
वाजत चहूँ बर वाजने सुनि बढ़त वीरन चाव।।
भदलरत आछे पगन पाछे धरत भरत उमंग।
महि गिरत पुनि उठि भिरत दुहुँ दल समर होत अभंग ॥१८॥
चहुँ ओर शोणित धार धरणी धीर नाहिं धरात।
वरवीर निश्वर भालु कपि तजि प्राण आश लगत ॥
भट इंद्रजीत उदंड लै सँग यातुधान अपार ।
शर शक्ति शूल कृपाणते कर भालु कपि संहार ।। १९ ॥
शुक और सारन वज्रदंष्ट्र जु यज्ञशत्रु सुधीर ।
उद्धत महोदर महापार्श प्रचंड ये पटवीर ॥
रघुवीर सन्मुख युद्धहीं भरि क्रुद्ध हिय भरि मान ।
तिन सवहिं शरन विदारि नृप सुत कंठगत कियप्राण ॥२०॥
पुनि अपर निश्चर वीर बहु मारे समर रघुवीर ।
रणधीर लछमन यातुधानन हते मजि धनु तीर ।।
तिहि समय खल दल प्रवल रण थल विचल खलभल हेरि ।
कपि भालु भिरे प्रचार प्रमुदित एक एकन टेरि ॥२१॥
बननाद लखि निज मन गति नभ मध्य जाय दुराय ।
छाँडन लगो शर विशिखते है व्याल लपदाह आय ।।
रवीर लपण समेत नखशिख नाग फाँसमझार ।
इतबाँधिडारे भूमि तल पुनि तजे तीर अपार ॥ २२॥
नल नील दिविद मयंदको शर तीन तीन चलाय ।।
रिछराज अरु हनुमंत प्रति दश दश हने रिसलाय ॥
पुनि शरभ और गवान आदि कपीन इंद्र वान ।।
सुग्रीव अंगद अंग अगणित शरहने वलवान ॥२३॥
अरु अपर बटु कपि भालु भट तिन यथा योग निहार ।।
परवान नारे इंद्रजीत सुगिरे भूमि मझार॥
इमि नागपॉम प्रनंड मबदि निबंध करि दम्पाय ।।
निमन मंयुन जाय कदि गनि गटे पिके पाय ॥२१॥

।
सीता अकुलाही छिनछिन तिनहि कल्पसम जाही३५ ।
(३४६)
गमरसायन।
सुनि मुदित दशमुख विजय निज लाख मुतहि लिया हिय लाया
चहुँ शोर छायो लंकमें जजति निश्चरराय ।।
आनंद युत लंकेश वेगहि प्रात मियढिग जाय ।।
भापो सदल सह पंधु मारे इंद्रजित राय ॥२५॥
चीयों कहि पुनि निश्चरिन बुझाई ॐ पुप्पक्यान मध्य बठाई ॥
नम मग है सीतहि लैजाईक लायो द्रुत दिखाइ दुहुँ भाई ॥२६॥
यांकहि गयी भवन दशभाला विजय लाय विमान उताला ॥
तामधि सियहि बेगि बैठाई दरशाये रामहि नभजाई ॥२७॥
पतिगति देखि रुदन कर सीता विजयहि बोलीवचन विनीता
हाय सखी अब मैं का करहूँ मरों गिरों के पावक जरहूं २८॥
अलि विधिना मोही पर स्टे भये शास्त्र द्विज वचनहु झूठे ।।
तिय वैधव्य चिह्नजे आंही ते मम अंग एकहू नाहीं ॥२९॥
केशन भूरे कुटिल कठोरा मुख न रोमवाणी नहिं घोरा ॥
जुरी भौंह नाहि बिरल न दंता अशुभ चिह्न ये तिय पतिहंता३०
जंधन रोम नैन लघु नाहीं कर पद गुल्फ न विपम लखाही
नखनदीह सितश्याम जनावै कुबनहिं विरल न शुष्कदिखा।
पदतलसंधि न परत दिखाई र कर पद अंगुलि विषमन आई।
सब सौभाग्यचिह्न मम गाता ते निष्फलकिमि किये विधाता३२
यौंकहि जनकसुता बिलपानी तब विजया बोली मृदुवानी ॥
राजकुमारि सोच जनि करहू भवपति जियत धीर उर धरहू३३
सुख न मलीन तेज नहिं हीना पुनि कपिभालु न देखिय दीना।
गाते धीर धरौ वैदेही से जियत बंधुत तवपतिनही ३४।।
पुष्पक भूमि उतारी लै सिय पूरख थल बैठारी ।।
-इत सिय सोचति विकल अति, करि दुहुँ नृप सुत शोच ।।
उत दशकंठ समेत सक, मुदित निशाचर पोष ॥३६॥

रामरसायन । (३४७) छायों लंक अनंद अति, दुखित भालु कपि वृंद ।। इंद्रजीत शरबंध परि, विकल भये रघुचंद ॥३७॥ अपर भालु कपि विवशबहु, ता छिन चहुँ दिशि धाय ।। कियो विभीपण वेग ही, उचित प्रबंध दिढाय ॥३८॥ पुनि लंकेश कपीश ढिग, आय लखो वेहाल। लै जल मंत्रित करि तुरत, सींचे नैन उताल ॥३९॥ परसत नीर सुकंठके, नैन सुले भो चेत। लिय लंकेशहि लाय उर, कहे वचन वर हेत ॥४०॥ पुनि रामहि सुग्रीव लखि, कियो विलाप अपार । धीर दई लंकेश तिन, कहिकार विविध विचार ॥४१॥ यों कहि पुनि लंकेश चहुँ, जाय सबहि दै धीर ॥ थापे सैन प्रबंध हित, कीश भालु बहुवीर ॥४२॥ तो लग दिनकर उदय भो, मिटो सकल तम घोर । लखिनिज दल गतिभालु कपि, विलपि कियो बहुशोर४३।। ताछिन कछु मुरछा मिटी, रघुवर खोले नैन । करि विलाप लखि बंधु गति, कहे सुकंठहि बैन ।॥४४॥ हाय सखा हौं बंधु विन, नहिं राखौं निज प्राण । भयो न है नहि होइ गो, भ्राता लपण समान |॥ १५॥ यौं कहि भापी राम मुहिं, सोच आपनो हैन । सोच विभीपणको जहाँ, कहो राज्य वरदैन ॥ १६॥ पै कह कीजे हे सखा, भावीते न वसाय । जाहु सदन अव संगल कीशभालु समुदाय ।। ४७॥ यौं कहि विलपत विकल द्वे, रघुवर दृग जल ढार । ताछिन आये लंकपति, करि चहुँ सन सम्हार ॥१८॥ निरखि रामको विकल अति, ऋच्छ कोश विलपात ॥ धरी धीर कपिपति कही, युद्धसम अकुलात ॥१९॥ ताछिन बोले वालिसुत, मोहि न कट लखाय । हग न लगेशर तात कह, लपण सहित रघुराय ॥५०॥ . 1

सुनिसुकंठ कह वीर सुत, धरी धीर हिय माहि ॥
लखिलंकापति राम दिशि, चोले कपिपति पाहि॥ १॥
हाय कहा अब कीजिये, दुहुँ नृप सुवन विहाल ॥
हम सब भये अनाथ अरु, प्रमुदित भो दशभाल ॥१२॥
अंक लगाय विभीपणे, तब बोले कपिराज ।
धीर धरी हिय लंकपति, ही करि ही सब काज ॥५३॥
हति दशकंटहि कुलसदल, तब अभिषेक कराय।
सियहि अवधलै जाहुँगो, राम लपण दुहुँ भाय ॥५४॥
तो लग कछ मुरछा जगी, लहो सुचेत सुखेन ।।
लखि कपीश तब ससुर प्रति, कहे वचन भरिनैन ॥१५॥
व्यथित भालु कपि ते संबै, अरु दुहुँ राजकुमार ॥
किष्किंधा लै जाहु तहँ, कीजो सकल सम्हार ॥५६॥
हौं इत रावण सदल हति, दै विभीपणे राज ।।
जनक सुतहि लै वेगहीं, ऐही सहित समाज ॥२७॥
सुनि सुखेन कह बात भल, पै औपधि इक जोय ॥
आवै तौ दुहुँ बंधु युत, विरुज सकल दल होय ॥२८॥
क्षीरासिंधु तट द्रोणगिरि, तामधि औषधि आय ॥
मथन भयो सागर तबै, प्रगटी अमित प्रभाय ॥२९॥
स्वर्ण करी संजीवनी, अरु विशल्य कर जान ।।
ते औपधि द्रुत लावहीं, पवनतनय बलवान ॥६॥
इमि सुखेन जामात प्रति, कही सुतौलग भूर।
पवन वेग छायो चहूँ, उड़ी धूर नभ पूर ॥ ६१ ॥
ता छिन चितये चौंकि सब, आय गये खगराज ॥
परसत पौन सुपंखकी, दुरे व्याल सब भाज ॥१२॥
आय गरुड दुहुँ बंधु तन, परसो भये अनंद ।
लखि सव दल रुंजहीन कह, जै जै जै रघुचंद ॥ ६३॥
मिलि सप्रेम दुहुँ बंधुको, कहि बहु बैन सुदेश ।
सबहि विरुज करि वेगही, जात भये विहंगेश॥ ६४॥

रामरसायन । रसिकबिहारी विरुज , राम लपण सब वीर । ले धनु शर तरु गिरि समर, उद्धत भये सुधीर ॥ ६ ॥ रसिकविहारी मुदित है, वानर भालु अपार । किलक कूदि कलोल करि, कह जैराम पुकार ॥६६॥ इति श्रीरा० २० वि० यु० नागफाँसबंधमोचन वर्णनो नाम अष्टमोविभागः ॥८॥ भीम छंद। दशबदन सुनि कपि भालु कृत बहु शोर । भेजे तमीचर भेद हित चहुँ ओर ॥ तिन कही तिहि अकुलाय वेगहि आय । अहिफाँसते छूटे सदल दुहुँ भाय ॥ १॥ चित चकित भो युत इंद्रजित दशभाल । वाढो सुनिश्चर निश्चरी उरशाल । सरमा उताल सिधाय वरणो हाल । सुनि मिली सीय सखीहि भई निहाल ॥२॥ लंकेश वीर सुधीर धरि करि हंक ॥ धूम्राक्ष प्रति भापे सुबैन निशंक । द्वतजाहु लै बहु सुभट सुभट प्रवीन । नृप सुतन मारौ सहित भालु कपीन ॥३॥ धूम्राक्ष ले भट विपुल साज सजाय । रथ बैठि गमने भये अशकुन आय ।। सो वीर कपि दल मध्य जाय तुरंत । मर्दन लगो बहु भालु कीश अनंत ॥४॥ तिहि देखि लै गिरि शृंग पवनकुमार । पालो मुताजिस्थ आय भूमि मँझार ।। गहिगदा निश्वर कपिहि कौन प्रहार । पुनि वीर बहु गिरि तरुन धरि धरि मार॥२॥ अरु अपर निश्वर कोश ऋच्छ अपार । भिरि लरत मारत मरत करत पुकार ।। हनुमंत तब करिक्रोध गहि गिरि खंड । वलयुत हनो तिहि शीश भो शत खंड ॥६॥ पुनि वीर तिहिहति ताल तरु गहि धाय । मारे निशाचर गये लंक पराय ॥ तिन कहो मुनि धूम्राक्ष वध दशमाथ । कार क्रोध लेत उसीस माँजत हाथ ॥७॥ तव वज्रदंतहि बोलि कह दशशीशा भटसनल द्रुत जाय मारहु कीश ॥ सो पाय आयसुबोग कटक सजाय । रथ वठि संयुग करन लागो आय ॥ ८॥ कपि वृंद युद्धत धाय गहि गिरि वृच्छ । तिमि यातुधानन दलत करि वल ऋच्छ ।। गहि भिन्दिपाल कृपाण अमित हथ्यार ॥ निश्वर (३५०) रामरसाना करें भरिकोप कपिन सँहार ॥ ९ ॥ वाणन विदारत वज्रदंत कपीन । लखिधाय अंगद शाल तरु इकलीन ॥ सो वीर भूरभमाय मारो ताहि । भो विकल निश्चर भीजि शोणित माहि ॥ १० ॥ पुनि वज्रदंत सुवीर सुरति सम्हार । हनि शरन विहवल कीन वालिकुमार॥ अंगदहनो तिहिधाय तरु गहि चंड ॥ लाघव सुकीनो इघुनते बहु खंड ॥ ११ ॥ पुनि वालिसुत लै कुधर भारी भूर ॥ मारो सुरथ युत सारथी भो चूर॥ पुनि और गहि गिरि खंड कीन प्रहार ॥ लगि वही निश्चर शीश शोणित धार ॥ १२॥ तब लै गदा करचंड कपि उर मार ॥ पुनि भिरे दुहुँ दुहुँ मुष्टिकीन प्रहार ॥ तब कोपि ले करवाल वालिकुमार ॥ करि शीश खंडित दीन भूतलडार ॥ १३॥ लखि तासुवध भागे निशाचर झार ॥ किय वज्रदंतहि घात वालिकुमार ॥ यौं विकल दशमुख पाहिं भापी जाय ॥ सुनि क्रोध शोक कलेश कार अकुलाय ॥ १४ ॥ वोलो अकंपन पाहिं रावण वैन । नृप सुतन मारहु वेगि संयुत सैन।सोसाजि दल रथ वैठि आतुर जाय ॥ कपि भालु मर्दन लाग चहुँ दिशि धाय ॥ १५॥शाखामृगहु बहु कुधर तरु पापान ॥ गहि हनत लागत ताहि सुमन समान ॥ सो शक्ति शूल कृपाण वाणन मार ॥ करि कोप भालु कपीन करत सँहार १६ पुनि अपर निश्चर वीर युद्धत भूरि ॥ छाये धरामधि रुंड मुंड सपरि ।। दल घात निरखि मयंद गहि तरुधाय ॥ हनि यातुधानन दीन भूमि गिराय ।। १७ ॥ सोलखि अकंपन वेगि वाणन मार ॥ कीने विदाल मयंद सह कपि धारि ॥ अविलोकि निज दल विचल हनुमत धाय॥ मारो खलहि इक करहि कुधर भमाय ॥ १८॥ सोगिरि अकंपन या णने दिय काटि ॥ लखि कोश पुनि गहि वृक्ष धायो डाटि ॥ किय यातुधानदि विकल कटकमदारि ॥ भागे निशाचर यूथ हाय पुकागि ॥ ११॥ त्याही अकंपन वालि धनु शर चार ॥ कोनो विदीरण अंग परनामा ॥ न कोय भरि हनुमंत गदि तर धाय ॥ निदि शशि हानि टनि दीन भूमि गिगय ॥२०॥ पुनि अपर पल दल मा रामरसायन। कीश सँहार ॥ निश्वरपराने विकल लंक मझार । भापो अकंपन बात सुनि दशशीश || कछु दीन मुख भो कीन फिरि बहु रीस॥२१॥ करि हीय विविध विचार दृढ़ ठहराय ॥ वर सेनपति प्रति कही निश्चररायाभट भूरि भारी यातुधान प्रवीना ते कपिनमारेकाहु विजय न कीन ।। २२॥ हौ कुंभकरण बलिष्ठ तुम घननाद ।। अथवा नि- कुंभसुवीर कर अहलाद ॥ याते अवै सजि साहनी लैजाय ॥ मारी सदल दुहुँ भाय विजय बढ़ाय ॥ २३ ॥ सुनिकै प्रहस्त उताल निज गृह जाय ।। करि हवन दीने दान विप्र बुलाय ॥ पुनि साजि तन स्थ वैठि कीन पयान ।। भे अमित अशकुन पैन निश्वर मान ॥२४॥ प्र०॥ वा०॥ यु.का०॥स०५७॥ श्लोक। लंका राक्षसवीरेस्तैगरिव समाकुला । हुताशनं तर्पयतां ब्रा- ह्मणांश्चनमस्यताम् ॥ १॥ आज्यगंधप्रतिवहः सुरभिर्मारुतो क्वौ ॥ खजश्च विविधाकारा जगृहुस्त्वभिमंत्रिताः॥२॥ भीमछंद। वर मुख्य तीन प्रहस्त संग प्रधान ॥ उद्धत नरांतककुंभ हनु बलवान ।। पुनि महानाद प्रचंड अपर अपार || भट यातुधान उदंड समर मॅझार ॥२५॥ बहु भीर भारी विकट भट बलवान ।। तिहि मध्य सेनापति प्रहस्त प्रधान ॥ किय घोर शोर सकोप निश्वर वीर ।। मुद्गर मुशल असि चक्र गहि धनु तीर ॥२६|| लखि निचर विकराल वनचर यूह धाये उपल तरु कुधर लै कर हह ।। दुहुँ ओग्ने भट भिरे भरि भरि रोप ॥ जै राम रावण छयो बहु घोप ॥२७॥ करि क्रोध निश्वर कपिन धरि धरि खात ॥ कपि यातुधानन करत मदि निपात ।। इमि ऋच्छ कोश अपार निश्वर झुण्ड ॥ छाये पहँ रण भूमि रुण्डहि मुंड ॥२८॥ सहभट प्रहस्त प्रचंडकोप बढा- य॥ इति शरन दीनो राम दल विचलाय ॥ निज मन विहयल देखि द्विविद उताल ।। मारो नरांतक शीश कुवर कगल ॥२९॥ भोविकल पवल भरि उठो करि खीस । त्यो बहार पत्री हानि हो । तिदि कोश ।। ऋच्छेप गदि गिरि खंड भारी भूगार मदानादहिमा रिकोनो तर ३० ॥ इकमाल वृक्ष विशालगदि कपि नार ॥ हुत (३५०) रामरसायन। करै भरि कोप कपिन सँहार ॥ ९ ॥ वाणन विदारत वज्रदंत कपीन । लखिधाय अंगद शाल तरु इकलीन ॥ सो वीर भूरभमाय । मारो ताहि । भो विकल निश्चर भीजि शोणित माहि ॥ १० ॥ पुनि, वज्रदंत सुवीर सुरति सम्हार । हनि शरन विहवल कीन वालिकुमार। अंगदहनो तिहिधाय तरु गहि चंड ॥ लाघव सुकीनो इषुनते दह खंड ॥ ११ ॥ पुनि वालिसुत लै कुधर भारी भूर ।। मारो सुरथ युत सारथी भो चूर॥ पुनि और गहि गिरि खंड कीन प्रहार ।। लगि बढ़ निश्चर शीश शोणित धार |॥ १२॥ तब लै गदा करचंड कपि मार ।। पुनि भिरे दुहुँ दुहुँ मुष्टिकीन प्रहार ॥ तब कोपि ले कर वालिकुमार ॥ करि शीश खंडित दीन भूतलडार ॥ १३॥ तासुवध भागे निशाचर झार ॥ किय, वज्रदंतहि घात वालि यौं विकल दशमुख पाहिं भापी जाय ॥ सुनि क्रोध शोक को अकुलाय ॥ १४ ॥ बोलो अकंपन पाहिं रावण वैन । मारह वेगि संयुत सैनासोसाजि दल रथ बैठि आतुर : भालु मर्दन लाग चहुँ दिशि धाय ॥ १५ ॥ शाखामृग तरु पाषान ॥ गहि हनत लागत ताहि सुमन समार शुल कृपाण बाणन मार ॥ करि कोप भालु कण- पुनि अपर निश्चर वीर युद्धत भूरि ॥छाये धराम दल घात निरखि मयंद गहि तरुधाय ॥ हनिर गिराय ॥ १७॥ सोलखि अकंपन वेगि बाणन मयंद सह कपि धारि॥ अविलोकि निज दल मारो खलहि इक करहि कुधर भमाय ।। १८ णते दिय काटि । लखि कीश पुनि गहि यातुधानहि विकल कटकसँहारि ॥ भागे ॥ १९॥ त्यौही अकंपन घालि धनु श पवनकुमार ॥ तव क्रोध भरि हनुमंत हनि इति दीन भूमि गिराय ॥२० रामरसायन। बिकट वीर अपार ॥ दृढ़ कवच धारे अंग विविध हथ्यार ॥ गज वाजि रथ पैदर चमू चतुरंग ।। साजी सबै लंकाधिराज अभंग॥३॥ त्रिभंगी छंद । नखशिखतनु साजे निश्वर भ्राजे बाजन वाजे छवि छाजे ।। दीने चहुँ डंका शोर उतंका करि करि हेका भट गाजे ।। फहरात निशाना रंग सुनाना दल अगवाना बहु चालें ।। घहरै घर नाले अरु करनालैं पुनि हथनालें जंजालें ॥४॥ तोपै गरुमंती रिपुदल हन्ती चल परदन्तीशत लागे । जिन अतुलित गोला साज अतोला हो भुवडोला तिन दागे ।। तैसे अति रूरे सब विधि पूरे भूरि जमूरे बहु भाँती ॥ इमि अपर अपारा प्रवल हथ्यारा समर जुझारा मिलि पाँती॥५॥ पनि पहिश बाना अरु धनवाना शक्ति कृपाना खरसाना॥ दृढ़ मुद्गर शुला खड्न त्रिशूला फरस अतूला गहि नाना ॥ लै परिघ प्रचंडा चक्र उदंडा गदा अखंडा वरभारे ॥ लंबित बहु भाला सुलघु विशाला शस्त्र कराला करधारे ॥६॥ इमि निश्वर यूथा विविध वरूथा निज निज गूथा लख भूपा ॥ कोऊ विकरारा कोट कुढारा कोउ सुढारा वररूपा ॥ शुकर मुख कोऊ गजमुख कोऊ खरमुख कोऊ मुखश्वाना ॥ केहरिमुख कोऊ मृगमुख कोऊ विन मुख कोउ. मुखनाना ||७|| यौं अगणित भाँती देव अराती निज निज पाती मिलि साजे । बैठे सुठि वाहन ऐंटि सुवाहन भरे उछाहन बहु गाजे ।। तवहीं दशभाला रटो उताला वर मखशाला गमन कियो। लखिकै चहुँ चाही कह मन माहीं मोसम नाही कोर वियो॥८॥ दोहा-जाय देवगृह सविधि शुचि, हवन कियो दशभाल ॥ द्विजन शीश नमि दान दे, कीने तुष्ट निहाल ॥९॥ यंत्र मंत्र करि विविध पर, अभिमंत्रित फल फूल ।। अपर वस्तु बहु सिद्धि लिय, पब औपची मूल ॥१०॥ पुनितनु कवन दध्यारसजि, निज इयदि शिग्नाय ।।

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गमरसायन।
(३५७)
सुनि एक मुष्टि तुरंत । कपि उर हनी बलवंत ॥
सो होत अतुल प्रहार । भो विकल पवनकुमार ।। ४३॥
तिन विकल लखि दशभाल । तहते सिधारि उताल ॥
दिग आय चापहि तान । नीलहि हनेबहु बान ॥१४॥
तब कीश गहि तुर धाय । चालो जुशैल उठाय ।।
तिहि सप्तशरन विदारि । दशमुख दियो महिडार ॥ ४५ ॥
ताछिन हनूमत वीर । गत मूरछा उटि धीर ।
देखो चमूपति साथ । वर युद्ध कर दशमाथ ॥४६॥
तब वीरं वर हनुमान । हृढ कीन उर अनुमान ॥
सह और युद्ध कराय । अव हनी उचित न आय ॥४७॥
इहि भांति हीय विचारि। पुनि शैल तरु कर धारि ॥
जे अपर निश्वर भूर । तिन मर्दहीं कर चूर ॥४८॥
उत नील निश्वर गय । दुहुँ क्रुद्ध युद्ध कराय।
हम शेल जो कपि मार । मोरिदिभूतलडार ॥१९॥
तब कीश लबु वपुधार । चढि तासु ध्वजहि विदार ॥
तहँ ते उछलि पुनि आय । दिय दशह क्रीट गिराय ॥५०॥
पुनि धनुप गहि झकझोर । भजि कूदि शिरनन छोर ॥
इमि बार बार उताल। तिहि दरत भरत उछाल ॥ ५॥
छिन दशह शीशन आय । गहि सबल देत हलाय ।।
छिन एक ते इक पाहि । सब शिग्न मध्य फिराहि ॥५२॥
छिन श्रवण दंतन काट । नासा नखन.छिन छाट ॥
छिन बाजि मारथि शोश । गहि दलत लघु वपु कोश ॥ ५३॥
बहु घात करदशमाथ । पै लगत कपि नहि हाथ ।।
सो निरन्दि रघुकुल केत । हँस सकल मन समेत ।। ५४ ॥
दक्षमालि तब रिस लाय विर आग्नि अस्वचलाय ॥
नीलहि दयो महिडार । लखि पुत्र अनल न जार ॥ ५५॥
जब वाण लग दलपाल । भो प्राण निपट विहाल ॥
तब अपर वीरनवाल । हानि शक्तिशर दशभाल ॥५६॥

(३५८) रामरसायन । . सो निरखि लछमन वीर । बोले वचन सजि तीर॥ हे हे निशाचर ईश । मारत कहा लघु कीश ॥ २७॥ मुहि देख हों तुव काल । इत आव धाय उताल ॥ सुनि लंकपति रथ लाय। ढिगआय कह रिसछाय॥ २८ ॥ रिपुबंधु है मति वंक । किमि कथित बैन निशंक ॥ हौं अबहिं वानर मारि । द्रुत देत भूतलडारि ॥ ५९ ॥ तब कहे लपण सुवैन । जे वीर ते गरजैन । वल अस्त्र शस्त्र जुहोय । दरशाव अब सब सोय ॥६० ॥ सुनि वचन निश्चरपाल । शर सप्त घाल उताल । द्रुत राम बंधु सुवीर । खंडित किये सब तीर ॥ ६ ॥ पुनि क्रोध करि बलवान । छाँडे विशिख बहु बान । तेऊ लपण सव खंड । फिरि तजे निज शरचंड ॥६२॥ ते वाण वाणन भिंद । रावण किये सब छिंद । पुनि विशिख शर दशभाल । वेधे सुलपणहि भाल ॥ ६३॥ ते लगत शर विकराल । कछु विकल भे नृपलाल ॥ पुनि घालि वाण प्रचंड । कीनो सु रिपुधनु खंड ॥६४॥ अरु तीन शेर विकराल ।मारे निशाचर भाल ॥ इिहि घात वंश दश कंठ । गुंठित भयो कछु कंठ ॥ ६॥ पुनि सजग है बहु तीर । छोडे निशाचर वीर ॥ वर लपण धनुतान । वाले अनेकन वान ॥६६॥ दुहुँ गात सायक छिंद । तनुवान भे दुद भिंद ।। दुहुँ अंग शोणित धार । नख शीश चलत अपार ।। ६७॥ तर कोष करि दशभाल । विधिदत्त शक्ति कगल ।। नोलपणके बलवान । मार्ग जुटर मधि तान ॥ ६८ ॥ तिहि लगत भूमि मैंदार । दृत गिरे गजकुमार ॥ निन पाय निमग्नाद । भुज भार उठावन नाद. ॥ ६९ ॥ निटि कोटिमेसनमान भानगी ननु जान ।।

रामरसायना बहु बल कियो भुजवीश । नहि चले रंच फनीश ॥ ७० ॥ सो शक्ति उरहि विभेदि । पुनि धसी भूतल छेदि ॥ गरु भूरि भार अनंत । बल करि थको बलवंत ॥ ७१॥ लखिधाय पवनकुमार । उर मुष्टि कान प्रहार ॥ तिहि लगत निश्वरपाल । भो विकल निपट विहाल ॥७२॥ दुहुँ जानु देकि सुकंपि । आतुर गिरो महि झंपि । मुख श्रवण नन मझार। वहि चली शोणित धार ॥ ७३ ।। तब वायुसुत बलवंत । लपणहि उठाय तुरंत ॥ रघुवीर ढिग तिन धार । लोनी सु शक्ति निकार ॥ ७४॥ पुनि धाय पवनकुमार। आये जु समर मँझार । लागेकरन बहु युद्ध । हनि निश्चरन करि क्रुद्ध ॥ ७९ ॥ लखि बंधुको रघुवीर । लाये हिये धरि धीर ।। प्रभु अंग परसतवार । भे तुरत विरुज शरीर ।। ७६।। उत चेत आय सुरारि । रथ घेठि धनु शर धारि ।। बहु दलत ऋच्छ कपीन । इति सेन विह्वल कीन ॥ ७॥ लखि सन विचल विहाल । उठि राम अतिहि उताल ॥ धाये सुधनुशर धार । सँग कोश भालु अपार ।। ७८ ।। आय सुप्तमर मझार । अवलोकि पवनकुमाः॥ लीने सुकंध चढाय । दशवदन मन्मुख जाय ॥ ७९ ॥ वाले सपदि रघुनाथ । हे लंकपति दशमाथ ।। कह करत कोश प्रहार । इत आव मोहि निहार ॥ ८०॥ सुनि राम वचन सुगरि । धायो महारिम धारि॥ धनु तान अगणित वान । छांड प्रचंड मैंधान ॥ ८॥ नाराव रघुवर अंग । वधे कवच कार भंग। तब राम अतिहि रताल । शरहने विपम कगल ।। ८२॥ हति सारधी अरु पत्र । वर कीट नवज छत्र ।। एत कवन भूपण वरख । बहु नाजमय नव वधु ।। ८३।। दादनको पदमाज । संडिन किया गयुगा ।

- हेबारे निश्वरराज । तव वध करो नहिं आज ॥८६॥ ममभ्य हो असमर्थ । तिहि वधत नाहि समर्थ ॥ हि हेत है निरसंक ।। अव वेगि गमनहु लंक ।। ८७॥ सनि राम वैन उताल । कीनों गमन दशभाल॥ सुत्रसेन लंकहि जाय। बठा सुधामलजाय ।।८८॥ रावण महा परिखंड । सो सुमिरि ते शर चंड ॥ बहु सोच हीय मझार । गुणि करत भार विचार ।। ८९॥ भारी भूधरशतें दिनेशहते तापकारी शेपतें विपारी वेग 4 / फाँसते निदानह । वंड जम दंड ते उदंड ब्रह्मदंडहूते वव्रते कः / महानहैं ॥ रसिकविहारी तेजधारी जे हुताशनते प्राणतनहारी घोर जोर व प्रमान है। अमित हथ्यार नव खंडमें अखंड पे ऐसे कई जसे वरिखंड गम वान हैं॥९०॥ विधि वर थाप जाना यहु निज शाप जाना खुको प्रताप जान मोन वित दीनो में । वेदके विधान जानी शास्त्र आ पुरान जानी शान ध्यान जानी मो विचार नाहि लीनों में ॥ रसिकाविहारी भली रामरसायन। सुनिल सुज मूल । दीने शरनतें शूल ॥ ८४॥ ललित नाग अखंड । भो विकल निश्वर चंड। जिनल शिथिल सब गात् । नहि नैन पलहु चलात ८५ ॥ निरखि निपट अधीर । बोले विहँसि रघुवीर ॥ घनाक्षरी-कवित्त । दोहा सुमिर सुमिर यो राम शर, चाँकि चितव चहुँ ओर । हिय पछिताय सुलंकपति, करत विचार बहोर ॥९१॥ पनाक्षरी-पवित्त । प्रति मियगम जानी जानके ममम्न फेर भयो मनिहीनो में । रंग हायो बोध निपट अबोध रहा कोयते निगेध है विरोष हरि नी में ॥ ९२॥ रोदा-या चिाम्पिरिताय पुनि, दशमुख गुनी सुटीय । नाहनी मो भई. अब नाई त्यागी मीय ॥१३॥ - रामरसायन। (३६१) घनाक्षरी कवित्त। कैतौ ना लगावै नेह कोऊ नर नारी साथ जोपे प्रीति जोरै तौ को फोर तोरैना। रसिकविहारीकाहू वचन न हारै कयौं जोपै वैन तो बहोरि हग चोरैना ॥ कै तौ प्रन कैसहू न ठानै रंच बात- जोपै धारिलवै वानि पुनि हठ छोरैना। सोई है त्रिशुद्ध औ हरण रुद्ध उद्ध रिपुते विरुद्ध क्रुद्ध युद्ध मुख मोरेना ॥ ९४॥ दोहा-यातुधानपति यों अमित, गुणत विचारत बात। जात भयो रनिवास मधि, यों बीती सवरात ॥ ९५॥ इति श्रीरा०र० वि० यु० रावणयुद्ध वर्णनो नाम दशमोविभागः ॥१०॥ दोवई छंद। रावण कीन विचार हीय दृढ़ कुंभकरण बलभारी । भक्षण करै भालु कपि सिगरे सो सह लपण खरारी। यौं गुनि बहारि सभा मधि आये आयसु दुई उताला॥ काहू विधि मम वंधुहि निश्वर जाय जगावे हाला ॥१॥ सुनि राक्षस बहु साजि सिधारे आये वेगि तहाई । कुंभकरण जहँ मास अनेकन सोबत रहत सदाई ।। सदन विशाल शैलकंदर मधि इक योजन चहुँ ओरा। निपट अचेत शैन कीने सो चलत श्वास अतिधोरा ॥२॥ प्र०वा. म. का .स ६०॥ी ॥ नवसप्तदशाष्टौ च मासान्स्वपिति राक्षसः। मंत्रं कृत्वा प्रमुप्तो मृतस्तु नवमेहनि॥२॥तां प्रविश्य महाद्वारा सर्वतो योजनायताम् । भकर्णगुहां रम्या पुप्पगंधप्रवाहिनीम् ।।२॥ इत्यादि । दोपई छंद। प्रविशिन सकत श्वासलगि निश्वर तब कर गहि बरियाग। बहुबल करि मिलि धाय एक मँग बैठे सदन मॅझाग ।। जाय प्रथम तिहि पास चहूँ दिशि अशन पान बहुयाग ।। आमिप अन्न गशि भूधर मम शोणित कलश हजाग ॥३॥ अरु सब घट सुरा अमिन पल पुनि मजीव पशु भृगे। .

(३६२)
रामरसायन।
विविध सुगंध वसन भूपण वर अपर वस्तु प्रति करी॥
यों सज पंचसहन निशाचर गरजे मेघ समाना ॥
पुनि सब शंख मृदंग आदि बहु बाध शोर किय नाना ॥ ४॥
नहिं जागा तब मुद्गर मूशल गदा उपल तरु धार ।।
उर शिर बाहु चरण कटि जवन वीरन अमित प्रहारे ।।
तऊन ताहि बोध तब निश्वर दशसहन मिलि गाजे॥
कियो घोर व तूरदुंदुभी आदि बजे बहु बाजे ॥५॥
जगो न तब तिहि तनपर गज रथ ऊंट तुरंग चढाये ॥
ते बहु दलत मलत धावत वपु कडू न तिहि के भाये ॥
पुनि निश्चर सकोप श्रुति नासा केशलंच मिलि कीने ॥
अरु शत कुंभ नीर ते दोऊ श्रवण तासु भरिदीने ॥ ६॥
कैसहु नहिं जागौ तब देशत तोप जंजीरन बाँधो ।।
भरि छोडी बहु बार जगो वह जब सुयतन यह साधो ।
जुंभित द्वै तनु इत उत फेरो गिरे सकल चहुँ ओरा ॥
नैन उवारि लखो सवहीं दिशि कुंभकरण अति घोरा ।। ७॥
सैनहि अशन पान सहजै सब करि बूझी तिन पाहीं ॥
कही मोहि किहि काज जगायो भ्रात कुशल कै नाहीं॥
नृप मंत्री यूपाक्ष जोरि कर कहो सकल तब हाला॥
सो सुनि कुंभकरण बहु रिस भरि बोलो वचन उताला ॥ ८॥
त भीति सब यातुधानपति हौं अबहीं द्रुत जाई॥
सदल राम लछमणहि नाश करि भ्रातहि मिलौं सु आई ॥
तब कर 'जोरि महोदर भापी नाथ प्रथम मिलि लीजे॥
पुनि दृढ मंत्र ठानि दल संयुत संयुग विजय करीजे ॥ ९॥
तासु वचन सुनिकै उठि बैठौ तब वह निश्चर धाई ॥
आय कही शिरनाय भूपसे नाथ जगो तव भाई॥
गुणि नृप दई रजाय प्रथम तिहि मजन अशन करावो ।
होय तृप्त पुनि वसन विभूपण साजि सभा मधि लावो ॥१०॥

रामरसायन । सो सुनि सकल सौंज लै निश्वर कुंभकरण ढिग जाई ।। मजन अशन पान करवायो प्रमुदित भयो अघाई ॥ सजितन उठो भ्रात दरशन हित ताछिन पुनि मन माना ॥ द्वै सहस्र घट सुरापान करि सहजहि कियो पयाना॥ ११ ॥ पशत धनुष उच्चतनु जाको है शत धनु विस्तारा॥ दृग मंडल दुहुँशकट चक्र सम अंगशैल इव भारा ।। कूप सरिस नासापुट दोऊ सुख गिरि कंदर माना। बहु विशाल विकराल काल सो कुंभकरण बलवाना ।। १२॥ प्र०॥ वा• ॥ यु० को० ॥ स० ६५ ॥ श्लो० ॥ धनुःशत परीणाहः सपट्शत समुच्छ्रितः॥ रौद्रः शकटचक्राक्षो महापर्वत सन्निभः ।। दोवई छंद। वली भीम वपु परम प्रतापी कुंभकरण मतिवाना ॥ जा सम यातुधान लंकांमधि प्रवल कोउ नहिं आना ।। चलत भयो रावण ढिग तब वह दूरहि परो दिखाई। तिहि विलोकि है विकल भगे चहुँ भालु कीश समुदाई ॥ १३॥ कोऊ चढे दुमन भजि कोऊ गिरि कंदरन छिपाने । कोऊ रघुवर निकट पराने कोर फिर विललाने ॥ सोगति हरि राम धनु शर सजि ठाढे भये रताला। सबहि धीर दै लखि लंकेशहि कही कौन विकराला ।। १४॥ तव करजोर विभीपण भापी कुंभकर्ण यह नाथा ॥ आज दशानन ताहि जगायो युद्ध करन तव नाथा॥ सुनि रघुवीर नील प्रति वोले सब ही धीर धराई ।। भालु कीशमय व्यूह रची वर मिलि बहु भट समुदाई ॥१५॥ तब सेनापति जाय वेगही राम कथित मव कोने ।। सजग भये हनमंत आदि भट दम गिरि आयुध लीने ।। कुंभकर्ण टत आय भ्रात दिग सादर शीश नवायो॥ उटि दशवदन अंक भरि यहि वरआमन बायो । १६॥ --

- .
तिन सन्मुख रणहेत अकेले गमनत विनहि विचारे ॥२२॥
(३६४)
रामरसायन।
कुंभकर्ण बूझी तब भ्रातहि क्यों मुहि वेगि जगायो ।
सुनि भापी दशकंठ कुपित है अजहुँ न परत जनायो ।
सदा बंधु नव सप्त सु दशवसु पट मासन ली सोवे ।।
कबहुँ वर्ष बहु सेन करै यों तोहू नींद न खोवे ।। १७ ॥
याहू छिन निद्रा हग छाई परत न कछु दरशाई ॥
यातुधान नाशो बहु संयुग नर वानर दल आई॥
कुंभकर्ण सुनि कही क्रोध भरि निज करणी फल पाये ॥
कहा जानि जगमातु सियाको जाय लंक हरि लाये ॥ १८॥
साम दान अरु दंड भेद ये चार चहिय नृप माहीं॥
अर्थ धर्म पुनि काम मोक्ष कृत समय समय भल आहीं।
बल गुण रूप प्रताप भाग्य धनकुल निज पर लखि लीजे ॥
देश काल निरवेर शुभाशुभ प्रीति वैर तब कीजे ॥ १९ ॥
सुनि दशवदन क्रोध करि भापी गुरु.सम मोहि सिखावै ।।
होनी हुती भई सो अब तो चहिय सुजिहि जय आवै ।
कुंभकर्ण तब कही जोरि कर रोप करिय जनि ताता ।।
जाम्बवंत सुग्रीव सदलहति हौं मारौं दुहुँ भ्राता॥२०॥
दृढ़ प्रतीत मुहि निज बलकी पै चिह्न अशुभ दुरशावै ॥
याते जानि परै इमिमोकों निश्वर सकल नशावें ॥
यौंकहि कही फेरि हे भूपति नर वानर कह भीता ॥
जाय एक हौं करों विजय निज तव वश कै है सीता ॥२१॥
कुंभकर्णके वचन सुनतही वेगि महोदर भापी ॥
भो नृप बंधु प्रौढ ढ अजहूं रंचहु बुद्धि न राखी ॥
जो रघुवीर सहस चौदह भट आय एक हति डारे ।
वटकरनहिं यों भापि महोदर कह पुनि रावण पाहीं॥
हमद्विजीभ आदिक सुपंच भट नाथ बंधु मिलि जाहीं ॥
सदल सबंधु अबहि रघुनाथै मारि लंक मधि आवें ।।
तब अनाथ सीता दुख भीता प्रभु तव वश है जावें ॥२३॥

रामरसायन।
(३६५)
सुनि कह कुंभकर्ण मुहि रोची यह जु महोदर वरनी ।।
करौं विनाश आज तव रिपुको लखौं नाथ मम करनी ।।
तब रावण तिहि विशद विभूषण साजि रजायसु दीनी ।।
चलो मत्तगज सरिस शुललै संग सैन मदभीनी ॥२४॥
पुर प्राकार उलंधि कढ़ा तिहि निरखि भालु कपि भागे ॥
तब नल नील तिनै धीरज दै धाये सँग ले आगे ॥
दूरहि ते लखि ताहि विभीपण गहे भ्रात पद जाई ।
कही मोहिं दशमदन तजो हौं राम शरण भो आई ॥२५॥
कुंभकर्ण बहु बंधु सराहो सो पुनि दल मधि आये ॥
चले निशंक निशाचर लखिकै कोश भालु चहुँधाये ॥
बहु गरु शैल शस्त्र द्रुम अगणित हने वीर वलवाना ॥
खंडित भये सकल ते तिहि तन लगे न सुमन समाना ॥२६॥
कुंभकर्ण करि क्रोध शूल गहि धायो कपिदल माहीं ।
अमित ऋच्छ वनचरन विदारे भागे नाहिं बचाहीं।।
लाखन चूर भये दविलातन लाखन धरि धरि खाये ।।
लाखन हने चपेटन मुटन लाखन काटि बहाये ॥२७॥
लाखन कीश भालु गहि फेंके लाखन धक्कन मारे ।।
लाखन भीति विवशभजि डूवे आपहि सिंधु मझारे ।।
कुंभकर्णगहि जे कपि ऋच्छन भच्छन करे अपारा ।।
तिन महँ बहु सजीव कढ़ि भागे श्रवण नासिका द्वारा ॥२८॥
तिहि भय भगे ऋच्छ कपि पुनि तिन अंगद हांकि प्रचारे ॥
तब संघ प्राण आश तजि धाये तरु गिरि विविध प्रहारे ।।
कुंभकर्ण लगदा विभंजे बहु वनचरन विदारे ।
द्विविदकीशगहिशेल निश्चरन बाहन युत दलि डारे॥२९॥
यातुधान गण हने ऋच्छ कपि ते तिन अगणित नासे ॥
मारत मरत मुरत नाहिं कोऊ दोऊ दिशि भट खासे ।।
हनूमान नभपथ ह बहु गिरि कुंभकर्ण पर बरसे ।।
ते सब वीर शूलते काटे एकहु नाहं तनु परसे ॥३०॥

चलोलंक मदत कपि ऋन्छन अतिआनंद अवाई ॥३७॥ (३६६) रामरसायन। तब केसरी किशोर जोर करि घोर शैल तिहि मारो। विकल भयो शोणितसे भीजो कुंभकर्ण तनु सारो॥ पुनि गहि शूल तमीचर कपिके उर अंतर हनिहूलो ॥ कियो शोर हनुमंत व्यथित है बरि एकलों रण भूलो ॥३॥ गति लखि लैनपाल गहिभूधर तिहि प्रहार द्रुत कीनो ॥ कुंभकर्ण सो शैल मुष्टिते हति चूरण करि दीनो ॥ सो अविलोकि पंच मिलि तासों भिरे आय भरि क्रोधा ॥ नील गंधमादन गवाक्ष अरु शरभऋपभ वर योधा ॥३२॥ कुंभकर्ण तव नीलहि जंघन दाबि व्यथित बहु कीनो ॥ बहुरि गवाक्षहि तल प्रहार तें प्राण कंठ करि दीनो ॥ शरभहि हनि मुष्टिका गिरायो ऋषभहि भुजा दबाये ॥ सकल वीर ते परे धरणिमें नख शिख रुधिर अन्हाये ॥३३॥ तिन प्रहारि यौं पुनि कपि ऋच्छन राक्षस भंजन लागा॥ बहु बिलपाय हाय करि व्याकुल बहुरि सकल दल भागा॥ ताछिन वालिपुत्र तिहि ऊपर पर्वत धाय पवारा ॥ निश्चर शूल प्रहारो अंगद सो करि दाव निवारा ॥ ३४॥ पुनि युवराज तासु उर वैगै तलताड़न किय घोरा ॥ कुंभकर्ण कछुपीड़ित लैकै सजग भयो वरजोरा ॥ बल करि मुष्टि हनी सो कपि हिय गिरोअचेत सुकीशा ॥ तब निश्चर तिन त्यागि शूललै मारो जाय हरीशा ॥ ३५॥ कै कछु विकल सुकंठ सम्हरि पुनि गिरि तिहि कीन प्रहारा। निश्चर कियो नाद तनु कंपो फिरि भरि क्रोध अपारा । भार सहब शुल कपिपति पैवध हित वेगि चलायो॥ लखि हनुमान धाय के बीचहि सो गहि तोरिबहायो॥३६॥ कुंभकर्ण निज शुल व्यर्थ लखि पुनि गहि गिरि तकिघाला। सोशिः परत विकलह अमित गिरे भूमि हरिपाला!! निरखि अचेत धाय गदि निश्वर तिनले कांख दवाई ।।

रामरसायन। (३६७) कुंभकर्ण करगत सुग्रीवहि लखि कपि करत विलापा॥ हनूमान वलगुणि सुकंठको दै धीरज दलथापा । उत नृप बंधु लिये हरि राजहि प्रविशो लंक मँझारी ॥ चंदन सुमन वारि तिहि ऊपर वर मुद नर नारी ॥ ३८ ॥ सो शीतलता लहि सुकंठकी भई मूरछा दूरी॥ निरखिलंक पथ आप विवश गुणि कियो दाँव बलपूरी॥ पगन कुक्षि कर नखन श्रीन दंतन नासिका विदारी ।। चौंकि रोप करि कुंभकर्ण तिन डारो अवनि पछारी॥ ३९ ॥ भूतल परत गेंद सम हरिपति उछलि गगन पथजाई ।। आये राम निकट तिन लखिकै सकल सैन हुलसाई ॥ नासा श्रवणहीन ढ अतिही कुंभकर्ण सकुचायो । फिरो बहोरि क्रोध भरि धायो सवतनु शोणित छायो॥४०॥ आय गदागहि भालु कीश पुनि अमितहने अरु खाये॥ भयो विकल दल लखि रामानुज तासु अंग शर छाये ।। कुंभकर्ण वाणन ते व्याकुल पैन गिने तनु पीरा ॥ रामहि देखि क्रोध करि धायो लिये सु आयुध वीरा ॥११॥ तब रघुवीर तीर निश्वर उर रौद्र अस्त्र मयमारे ॥ गिरो गदा भो विकल वानते वेधि गये तनुसारे ।। यातुधान पुनि शैल शृंग लै हनो राम तिहि काटो। कुंभकर्ण मुद्गर फर गहि के बहुरि राघवहि डाटो॥४२॥ ही न विराध कबंध त्रिशिर खर कपि मारीच न गमा॥ सुर नर नाग विदित तिहुँ पुरविच कंभकर्ण मम नामा ॥ करी प्रहार काही प्रथम तुम निज वल दरशावो ॥ पुनि यह मुद्दार हनी शीश तब तनु तजि यमपुरजाशे ॥४३॥ सुनि रघुनाथ कोष कार तिहि तनु तेशर अगणित मारे ।। जेविगध खर ताल वालिप परम प्रचंड प्रहारे ।। कुंभकर्ण तिन का मदरने भंजे कछुवपुलांग ।। मो नदि गिने वीर वर आयुष युन धायों प्रभु आग ।। 22॥

२५८) समरसायना तब उताल वायव्य अस्त्रयुत राम बाणतिहि मारा ॥ दक्षिण बाहु सहित मुद्गर सो खंडि महीतल डारा ॥ वाम हाथसे तरु उपाटिकै कुंभकर्ण पुनि धायो । ऐंद्र अस्त्र शरते हमसह भुज सोऊ काटि गिरायो॥ ४५ ॥ कटत बाहु बहु रिसकरि धायो भक्षण हित मुख फारे ॥ अर्धचंद्र शरते रघुवर तब पग खंडित करिडारे ॥ पुनि वाणन आनन भरि दीनो भयो विकल वरजोरा ॥ रहो रुंड युत मुंड क्रोध वश कियो शोर अतिघोरा ॥४६॥ तब रघुवीर उदंड चंड शर सजि कोदण्ड प्रहारा ॥ खंडित भयो शीश सो मरतहु मारौं राम पुकारा ॥ कुम्भकर्णको रुण्ड मुंड महि गिरो मेरु सम भारा॥ पुर प्राकार द्वार कपि निश्चर चूरन भये अपारा॥४७॥ तासु मरन लखि मदित भये सुर आय सुमन बरसाये ॥ किलक कृदि भालु कपि चहुँ दिशि जै जै शोर मचाये ॥ यातुधान बलवान अपर ते लल प्राण पराने ॥ रसिकविहारी रामचंद्रकी विजय देव सुखसाने ॥४८॥ इति श्रीग० र० वि० यु० कुम्भकर्ण युद्ध यथ यगनो नाम एकादशोषिभागः॥११॥ दोहा-आतुन जाय मुलंक मधि, यातुधान विलपाय॥ गण प्रति यग्णो मर्य, बंधु मग्न अकुलाय ॥१॥ मुभरणको निधन सुनि, पिकल भयो दशमाय ।। मदन माग्न गुगर्ग, दलन भूमितल हाय ॥२॥ निगान निभग कम्मलि शीशधुनात ।। करनगर गगन पुनि, गेय मिल गिलपान ॥३॥ दममा भाती शिन, विगजीन मुगगन ॥ मागो, हो नतिमा काम ।। ॥ नपिनमा पुनसयोटभीर भगप ।।

रामरसायन। , यौं भापी त्रिशिरा सुभट, अरु देवांतक वीर ।। प्रबल नरांतक रजनिचर, वर अतिकाय सुधीर ॥६॥ सो सुनि रावण धीर धरि, तिन बहु साज सजाय ।। संग सैन चतुरंग करि, दीनी युद्ध रजाय ॥ ७॥ बहुरि महोदर वीर अरु, महापार्श सजि अंग ॥ निश्चरपति निज भ्रात ये, किय पुत्रनके संग ॥ ८॥ रण दुर्मद पट सुभट ये, निश्चर अपर अपार ॥ चले यथोचित साज साजि, वाहन कवच हथ्यार ॥९॥ जै रावण कहि वेगही, भिरे सुनिश्चर आय ॥ जै रघुवर कपि भालु कार, गहि गिरि पादप धाय ।। १० हनें तमीचर ऋच्छ कपि, ते तिनकर संहार ॥ कटत अटत नहिं भट हटत, एकहि एक प्रचार ॥११॥ दांतन लातन मुष्टिकन, तलन नखन बहु वीर ॥ असन शस्त्रन गिरि तमन, हनत गनत नहिं पीर ॥ १२॥ तेज तुरंग फिराय चहुँ, पास शक्ति कर धार ॥ हने नरांतक सप्तशत, कपि छिन एक मझार ॥ १३॥ याँही हते अपार भट, दिय कपि दल विचलाय ॥ घाये अंगद वेगहीं, पाय सुकंठ रजाय ॥ १४ ॥ देखि नरांतक कीश उर, कीनो पाश प्रहार ॥ चूर चूर हे शस्त्र सो, विखरो भूमि मझार ।। १५ ।। वालिपुत्र तव कोध करि, तलहनि हत्यौ तुरंग ।। यातुधान सो कीश शिर, मारो मुष्ट अभंग ॥१६॥ पुनि सकोप अंगद सँभार, मुष्ट हनो तिहि माल । विकल नरांतक महि परो, निकसो प्राण उताल ॥ १७॥ चौ देखिनरांतकवधनिशिचारी थाये कुपित शस्त्र करधारी ॥ आय वेगि देवांतक योधा की परिघ हनोअंगदहि सक्रोधा१८ तब कपि गहि पादप तिहि मारा सो विशिरा खंडित करिडारा ।। पुनि बहु तरु गिरि कीश चलाये , तेसवानिश्चर भजि गिय १९॥ - 11 ॥ २४ = - । नील बहरि इकं शले चलायो * सो लागत त्रिशरा जमुहायो- । देवांतक शिर चूरन भयऊ * दखलमृतकभूमिगिरि गया, कियो सकल बहु कोप कराल अपर मत्तगज ह असवारा धाय महोदर कपिहि प्रचारार त्रिशिर महोदर दुहुँ इक साथा * भिरे बहुरि कपि दलपति साधा अमितबाण नीलहि तिन मारे * सोऊ बहु तरु कुधर प्रहारे३०/- तव करिकोप महोदर वीरा मैं कपिहि कियो विह्वल हनितीश है मूर्छित पुनि कोश सम्हारा सह तरु शैल सुवेगि उखारा तौल ताकि सो गिरि बरियारा * सपदि महोदर शीश प्रहारा॥ तिहि लागत गजसहित निशाचर गिरो मृतक है वेगिःभूमिपर३२ तिविधलखित्रिशिराभरिक्रोधार्क हने वाण हनुमानहि योधा। घालोशल शिखर कपि तामशरन चूर किय निश्वर आम (२८०) सामरसायन। पुनि त्रिशिरा अंगद तनु सारा वेधो शरण अमित खरा वालितनय तरु कुधर प्रहारे तिनहि महोदर परिव विदार तब कपि धाय उपल इकमारा करिभाग्यो करिवोर चिका- निज गज व्यथित महोदर देखा तिहि ताडोभरिकोप विशेष देवांतक पुनि आय उताला हनो कीश शिर परिव करा तर अंगद तलकीन प्रहारा क्षमत्त महोदर गज हति डारा: पुनि तिहि दन्त उखारि सुकीशा किय प्रहार देवांतक शीश भयो विकल फिरि सम्हार उतालाअंगद शिरहि परिव सोपाल तिहि प्रहार वश कछु अकुलायोजानु टेकि कपि महि लगा पुनि उताल उठि तनु सुधिलायोती लग त्रिशिरावाण चलायो तीन तीर निशिरा वरयोधा कपि ललाट मारे करि को सो लखि नील पवनसुत धाये ॐबहु गिरि पादप उपल चलायर पुनि गिरि खंड नील गहि भारा 8 वेगि त्रिशिर शिर पर सो मार लखि वीचहि निश्वर बल पूरा बाणन काटि उपल कियवरार देवांतक लै परिध कराला धाय पवनसुतके शिरघालार तब कार कोप वीर हनुमंता मुष्ट वज्र सम हनो तुरंता

नमरसायन।
(३७१)
पुनि हनुमत बहु द्रुम बरसाये * सोहनि शरन त्रिशिर बिनशाये॥
वीर थाय तब तासु टुरंगानखन विदारि कीन तनु भंगा३४
लखि निश्चर चर शक्ति प्रहारीसो गहि कीश भंजि महि डारी॥
तब त्रिशिरा लै खड्ग विशालावल भरि हनुमान उर घाला३५
तासु हृदय पुनि कपि तलं मारा सो फिरि कीशहि मुष्ट प्रहारा॥
गहि कृपाण हनुमान सु डाटे * विशिर शीश आतुर तिहुँ काटे३६
पद्धरीछंद।
लखि त्रिशिर वात निश्चर समस्ता भे अति विहाल बहु शोकग्रस्त ॥
कपि भालु पाय आनंद सर्व । चहुँ ओर वीर गर्जे सगर्व ॥ ३७॥
तव यातुधान करि कोप चंड । धाये हथ्यार गहि गहि उदंड ॥
शर शक्ति शूल भल्लन सुघाल चहुँ भालु कीश बहु किय विहाल ३८
भट महापार्श्व वर शस्त्रधार । वारनारोह बहु कपिनमार ॥
लखि पभकीश धाये उताल । कह आय हेरु खल तोरकाल ३९
तब गदा कीन निश्चर प्रहार। कपि हृदय सवित बहु रुधिर धार ॥
पुनि ऋपम क्रोधकर मुष्ट तान। मारो सुकुक्षि भो विकल प्रान॥४०॥
। मूर्छित सुरारे धरणीमझार । गिरि गदाधार पुनि उठि सम्हार ।।
कियघात कोशके शीश चंड । तिहि हनो फेरि वानर उदंड ॥११॥
पुनि यातुधान बहुवात कीन । तब गदा ऋपभ तिहि छीन लीन ॥
मो तासु शीशहनि वीर चाय । करिपान हीन दीनो गिराय १२॥
भटमहापाखंवर समरधीर । तिहि निधन कीन द्रुत ऋपभवीर ॥
लखि मरन तासु अतिकाय धायास्पंदन अरूट कियसमर आय२३
अतिकाय काय लाख कहत कीशाह कुंभकर्ण दृजो मुद्रीम् ।।
वाजी सहव जिहि रथ मझार । साजे अनेक रद्धत हथ्यार॥22॥
दुहुँ ओर लंक दे खट्न चंड । जिन मुष्टि पुष्टि अनुपम उदंड ॥
विस्तार जासु है हन्तबार । दशहस्त लंब हट भूरि भार ॥2॥
म०॥ पा ॥ युफा० ॥ ७॥ो।
दाच खहोय पार्यस्थी प्रदीनी पाशशोभिता ।।
चतुर्हस्तत्सरचिनी व्यनदस्तदशायनी ॥१॥

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रामरसायन। (३७३) पुनि राम अनुज क्रोधित सालोवर अनि अस्त्र बालो कराल ॥ सो रौद्र अस्त्र छांडो प्रचंड । भिरि गिरे दोउ शर होय खंड ॥१९॥ खलकोपि अत्र ऐपीकमार | तिहि ऐंद्र अखते लपण डार॥ पुनि याम्य अस्त्र निश्वर प्रहार । लक्ष्मण सुकीन वायव्यछार ६०॥ पनि अमित अस्त्रमय वाण चंड । कीने प्रहार लच्छन उदंड ॥ अतिकाय अंग एकी न भेद । सो करहि युद्ध निर्भय अखेद ॥६॥ तर पवन देव लच्छनाहि आय । भापी विरंचि वर याहि आय ॥ याको अवध्य तनुवान अंग । विन ब्रह्मअस्त्र होवे न भंग ॥१२॥ दश सुनि वायुबन लछमन उताल । शरब्रह्म अस्त्र योजित विशाल ॥ बलवान भरि बल धनुप तान । संधान ठान मारो सुबान ।। ६३ ॥ सायक प्रहार होतहि उदंड । अतिकाय शीशभो तुरत खंड ॥ विन मुंडकंडसो भूरि भार । महि गिगे चापि के दल अपार६४॥ तिहि निधन हेरि कपि ऋच्छ धीर । किय मुदित शोर जे लपण वीर ॥ सौमित्र आय आनंद पाय । शिर नायगहे ग्राय पाय ।। ६५॥ उठि गम बंधु उमलाय लीन । बहुविधि बखान सनमान कीन । सुग्रीव अच्छपति आदि वीर । आनंद अपाय धारी सुधीर ॥६६॥ अनिकाय अंत लग्वि यातुधान । दल नकल विकल वर्क परान ।। उत करत ग्जनिचर रुदन घोर । इत होत जति जति शोर ॥६॥ इति श्रीग० २० वि० यु० नगंतक अतिकाया- दियुदयधवर्णनो नाम द्वादशाविभागः ॥ १२॥ मो-निश्वर जाय विहाल, अतिउताल दशभालमों ।। विलपि कहोरण हाल, पुत्र बंधु दलमकल वय ॥१॥ सुनि रावण पर घात, भयो विफल बटु मोवश। कमीजन पछितान, चकिन चित्त ननु धकित भो ॥२॥ दशमन्व निपट अधीन, ले रमामयोलो विलानि ।। इमि-कांड. नहिं वीन, हत मदली जो॥३॥ ܕ܀ - (:३७४) रामरसायन। । दोहा-पितहि महादुख देखिकै, इंद्रजीत कर जोर। . कही तात धीरज धरिय, लखिय पराक्रम मोर ॥ ४॥ जाम्बवंत हनुमंत अरु, सह तव अनुज सुकंठ ।। अपर सदल दुहुँ बंधु को, वेगे करौं विकंठ ॥५॥ यौं बहु धीर धरायकै, मेघनाद वर जोर ॥ जाय सुभट थापे तुरत, किय प्रबंध चहुँ ओर ॥६॥ पुनि पुनीत कै वेगही, धारि वसन शुचिलाल ॥ जाय यज्ञशाला सविधि, ठानो यज्ञ उताल ॥७॥ समिध विभीतक कुंडरचि, पावक प्रबल बढ़ाय । यथा योग बर मंत्र पढ़ि, हवन कियो हुलसाय ॥ ८॥ श्याम अजा सहजीवलै, करि अभिमंत्रित ताहि ।। सविधि समर्पण कीन हुनि, अग्नि कुंडके माहि ॥ ९॥ ताही छिन मख कुंडते, स्पंदन कढो विशाल । तामधि कवच हथ्यार वर, घरे अनेक कराल ॥१०॥ सो लखि निश्चर मुदित है, करि प्रणाम सब लीन ॥ साजि अंग रथ बैठि कै, गमन युद्ध हित कीन ॥ ११॥ संग सैन चतुरंग वर, धीर सुवीर विशाल ॥ नाद करें घननाद सम, सह घननाद कराल ॥१२॥ अंतरिक्ष है इंद्रजित, आयो कपिदल माहि ॥ अपर निशाचर भूमि मग, धाय भिरे चहुँ वाहि ॥१॥ कीश भालु तरु उपल गिरि, गहि धाये बलवान ॥ घोर शोर चहुँओर है, रणछायो घमसान ॥ १४ ॥ रौनि अँध्यारी तम छयो, निज पर सूझत नाहि ॥ कपि कपि निश्चर निश्चरन, ऋच्छनच्छ हनाहि ॥१५ ऋच्छ कपिन ऋच्छन कपी, निश्चर ऋच्छ कपीन ॥ ऋच्छ कपी हन निश्चरन, कोऊ काहुन चीन ॥ १६॥ मेघनाद वर अत्रमय, वाण प्रहार अपार ॥ कोश भालु संहार कार, डारे अवनि मैंझार ॥ १७ ॥ - .

रामरसायन। (३७९) " श्रवण नैन मुख नासिका, हृदय चरण कर शीश ।। वाण न वेधे इंद्रजित, भागे बचेन कोश ।। १८॥ वालिसुतहि शर अष्टदश, नौ किय नलहि प्रहार ।। सात मयंदहि पंच गज, ऋच्छपतिहि दशमार ॥ १९॥ नीलहि तीस गवाक्ष पट, गंधमादनाह चार ।। अपर अमित कपि रीछ तिन, बाणन दिये बिदार ॥२०॥ राम लपण सुग्रीव अरु, लंकापति हनुमान ॥ इनहिं जु मारे विशिख शर, तिनको कछु न प्रमान ॥२१॥ भयो सकल कपिदल विकल, आरत करत पुकार ।। प्राण कंठगत है परे, बहुरण भूमि मझार ॥ २२॥ रघुनंदन तव लपण प्रति, बोले निपट अधीर ॥ नागफांस बंधन कियो, जनु आयो सो वीर ॥२३॥ इमि रघुवर लक्ष्मण अपर, कीश भालु समुदाय ॥ विकल व्यथित शर घातते, बोलत अतिअकुलाय॥ २४ ॥ कीश ऋच्छ दल को कियो, मेवनाद संहार । रुंड मुंड छाये चहूँ, शोणित बहत अपार ॥२५॥ सरसठकोटि सुवीर वर, वानर भालु उदंड ॥ पर वटिका मधि इंद्रजित, वाणन हते प्रचंड ॥२६॥ प्र. वा. ॥ यु. कां० ॥ स०७४॥ सप्तपष्टिहताः कोटयो वानराणां तरस्विनाम् ॥ अह्नः पंचमशेपेण वल्लभेन स्वयं भुवः ॥१॥ दोहा-अपर व्यथित कीने अमित, ते बहु मृतक समान ॥ परे भूमि तल विकल अति, भये कंटगत प्रान ।।२७॥ यो विदारि वाणन नबाहि, इंद्रजीत बलवान ।। निरखि विजय निज मुदितहे, कीनोलंक पयान ।। २८ ॥ वेगि आय पितुचरण गहि, कहो मुरल रणदाल ।। जयकारी पुत्रादि मुदित, उर लायो दशभाल ॥२९ सफल निशाचर निश्वरी, प्रमुदित कहन निशेर।।

नुम निन्खे निजननते, किमि है कित बलवान ॥29॥
(३७६)
नामरसायन।
इंद्रजीत कीनी विजय, अचल भई अब लंक ॥३०॥
उत लंका मधि मोद अति, इत कपि सैन मझार ॥
वायल वीर विहाल बहु, आरत करत पुकार ॥ ३१ ॥
ताही छिन कछु सजग है, लंकापति वर जोर ॥.
जाय सम्हारो सकल दल, धाय धाय चहुँओर ॥३२॥
तौं लग पवनकुमारहू, लहो चेत कछु वीर ।
बहुरि विभीपण आयकै, दई कपिहि बहु धीर ॥ ३३॥
तब हनुमत लंकेश प्रति, बोले अतिहि उताल ।
चलो सबहि अवलोकिये, को किहि भांति विहाल ॥ ३४॥
यौं कहि दोऊ सजग है, लेकर लूक उजेर ॥
लंकापति हनुमत लखो, दल समस्त चहुँ फेर ।। ३९ ।।
रुंड मुंड कोटिन परे, कोटिन कहरत वीर ।
कोटिन प्राण सुकंठगत, कोटिन मृतक शरीर ॥ ३६॥
योंही हेरत जात दुहुँ, हनुमत निश्चरराय॥
जे सजीव तिन देत हैं, धीर सुवैन सुनाय ॥ ३७॥
चलि हेरे दुहुँ ऋच्छ पति, धरणी परे अचेत ।
नख शिख वेधित शरनते, विकल उसाँस न लेत ॥ ३८॥
कही विभीपण जाय दिग, तात जियत के नाहि ।
सुनि सुवेन रिछराजके, चेत भयो हिय माहिं ॥ ३९॥
जाम्बवंत तब मंद स्वर, बोले अतिअकुलाय ।
वाणी जानीलंकपति, पगते न लखार ॥१०॥
कहो विभीपण वेगही हैं सजीव हनुमान ॥
मुनि बोले लंकेश हत, कहा बात यह नात ॥
नहिं प्रभुकी हनुमंतकी, तुम बृझी कुशलात ॥१२॥
जाम्बवान भापो नये, जीन जिय हनुमान ।
नो जीवन जेते पंचनेनर मृतक ममान॥१३॥

समरसायन । (३७७) अरु जी हनुमंत तो, बल प्रभाव बलवान ॥ मृतक भये कपि ऋच्छते, ज्या सबहि सुजान ॥४४॥ सुनि सुवैन गहि वेगही, जाम्बवंतके पाय ॥ कही पवनसुत कुशल हो, प्रभु तव कृपा प्रभाय ॥१५॥ कपिहि लाय हिय ऋच्छपति, बोले वचन उताल ॥ तिहूँलोक तुम सम बली, और न अंजनिलाल ॥ ४६॥ याते वीर सुवीरता, कीजै अतिहि उताल । जाय औपधी लाय के, विरुज करौ कपि भाल ॥४७॥ हिम गिरि अरु कैलासके, मध्य ऋपभ गिरि नाम ॥ तापरहै वर औपधी, सो लावो बलधाम ॥१८॥ सुनि सुबैन हनुमंत द्रुत, करि निज रूप विशाल ।। उछलि चले नभ पंथ है, धाये अतिहि उताल ॥४९॥ उपल रजत अरु हेममय, लखे शैल अभिराम ॥ अवलोके हनुमंत पुनि, अपर अमित सुर ठाम ॥५०॥ इहि विधि जाय उताल अति, पहुँचे पवनकुमार ॥ ऋपभ कूट हेरो चहूँ, शत योजन विस्तार ।। ५१॥ कपिहि निरखि सो औषधी, गुप्त भई चहुँ ओर ।। हनुमान तव क्रोध युत, गिरिहि कही करि शोर ॥५२॥ रे खल रघुवरकाजहित, ओपधि लई दुराय ॥ लखु भूधर मम बाहुबल, धरी तोहिं युत जाय ॥५३॥ यौं कहि तिहि गहि धारिकर, उछलि व्योम पथ जाय ॥ आय धरो कपि सेन मधि, युत औपधि गिरिलाय ॥२४॥ लावतहीं गिरि पवन लगि, भे सब विरुज शरीर॥ अपर जिय कपि भालु ते, भये मृतक जे वीः ॥ ५५ ॥ होत मृतक निश्वर जिते, ते मब सागर माहि ॥ दशमुख आज्ञाते परत, याते जिये सुनाहि ॥५६॥ या शु कां ॥ म. ७३ ॥ धोय. । यदाप्रभृति लंकायां युद्धयने हाररातमाः ॥ नदाप्रति मानार्थमाजया गवणस्य च ॥३॥ ।

. धाम वाजि गज रथ अपार । शिशु तरुण वृद्ध वरि होत छार।। हाय हाय सव करि पुकार । भे विकल कोउ काहु न सम्हार ।। ये हन्यते रणे तत्र राक्षसाः कपिकुंजरैः ।। हता हतास्तु क्षिप्यन्त सर्वएव तु सागर ॥२॥ हा-रैनि समै बहु भालु कपि, मृतक भये कपि जोय ॥ है सजीव ते दिवस मधि, उठे उठे जनु सोय ॥२७॥ भये विरुज दुहुँ बंधु युत, वानर भालु अपार ॥ अति आनंद उमँगाय सब, जैरघुवीर पुकार ॥ ५८॥ हनूमान पुनि शैल सो, रहो जहाँ तहँ धार ॥ नभमारग द्वै वेगि पुनि, आये सैन मझार ।। ५९ ॥ राम लषण सुग्रीव अरु, अपर अमित बलवान ॥ बार बार हनुमानको, बल यश करत बखान ॥६० ॥ इति श्रीरामरसा० र० वि० यु० इंद्रजितअंतरिक्षयुद्ध वर्णनो नाम त्रयोदशोविभागः ॥ १३ ॥ पद्धरी छंद। यौं विरुज भई कपि भालु सैन । तब कहे सपदि सुग्रीत बैन । वीतो समस्त दिन भो न युद्ध । हनुमत करौ बल वेगि युद्ध॥३॥ तब हनूमान बहु भट बुलाय । कर लिये लूक पावक दिपाय॥ पाये अपार सँग भालु कीश । कहि जैति राम जै जै हरीश ॥२॥ दिन अस्त होत लखि समय सांझ । कूदे सवीर चहुँ लंक मांझ। दोनो लगाय पावक उताल । निश्चरन धाम वर लघु विशाल||३|| प्र० ॥ वा० ॥ यु० कोडे । सर्ग ७४ ॥ श्लोक । अदहत्पावकस्तत्र जज्वाल च पुनः पुनः ॥ सावंति महाणि गंभीरगुणवंति च ॥ १॥ पदरी छंद। इ.समै कीन बहु पौन जोर । वादी उदंड ज्वाला सुघोर ॥ यातुधान करि कोप चंड। वाये हथ्यार ले ले उदंड ॥५॥ [ भालु वीर गहि गहि सुलूक । भिरि जाय दीन निश्चरन फूक ॥ तुधान पुनि पुनि प्रहार । भट ऋच्छ कीश फिर तिनहिं मार६॥

रामरसायना (३७९) पापक प्रचंड चहुँ लाय दीन । पुनि भालु कीश विध्वंस कीन॥ मदत सु भोन अरु लरत जात । बहु धाय धाय दल दरत जाता॥ ७॥ पठे सु जाय दशकंठ धाम । कीनो विहाल कहि जैति राम ।। चहुँ जन्त लंक अरु होत युद्ध । कर बहु विनाश कपि भालु उद्ध ८॥ घनाक्षरी-कवित्त । थंभडारे देहरो उखारे औ कपाट फारि सदन उजारि जारि डारें रंचहन में ।। केसरी किशोर वीर बंकादै उतंका हंका लंकामें फलंका वालि कूदत चहुँ अभै ।। रसिकविहारी जै कपीश ईश गाजे कीश सुनि दशशीश कर वीस रीस है चभै ।। चंगुल चपेटि औ लंगूरमें लपेटि मर्दि मर्दत खखेटि रजनीचर भगे सभे ॥९॥ ठेलें ठेलि पेलें पेलि रेलैंलि झेले फेरि झेलिकै ढकेले यौहीं भौन डार मीथि मीथि भारी तेजधारी जे प्रवृद्ध युद्धकारी तेउ वीरन निहारी मानहारी भगैं वीथि बीथि ।। रंसिकविहारी विजकारी कपि रीछ झारी डारी औ विडारी शव सेन मारी झीथि झाथि ॥ गुंठित हथ्यार कीने लुंठित करहें कर कुंटित किये हैं दशकंट कंट चाथि चीथि ॥१०॥ पद्धरीछंद। उत करहिं यो सुविध्वंसलंक । इत राम साजि धनु शर उतंक ।। छोडे अपार सायक उदंड । तिन किये आय गृह खंड खंड ॥ ११॥ इमि भालु कीश करि लंक नाश । ले सकरुद्ध पुर आस पास ॥ देखें पगत कोऊ जु ताहि । देव वहाय गहि अनल माहि ॥ १२॥ दशमालि देखि गति है विहाल । दीनी रजाय अतिही उताल ।। वर कुंभकर्ण सुत दोर वीर । उद्धत निकुंभ अरु कुंभ धीर ॥१३॥ वर शोणिताक्ष यूपाक्ष चंड। कंपन प्रजंघ पट भट उदंट ॥ पुनि अपर निचर शस्त्रधार । तिन संग कुपित धाये अपार ।। १।। भट भाल कीश अरु यातुधान । भिरि परे दोर दल ऋद टान ।। द्रुम शैल शक्ति शर खड्ग चंड । लगि गिरे वीर ह खंड खंड ॥१५॥ गहि गदा धाय कंपन उताल। अंगददि बाल भी कपि विदाल ॥ पुनि सँभरिकीशफिय गिरि प्रहार । मोगिरी मृतकह रण मझार१६ लखि शोणिता पायो उताल।किय कपिहिमारियागन विहाल।

सगरमा । तब बालि पुत्र धनु तून छीन । कार खंड खंड महि डारि दीन।।१७॥ पुनि शोणितात असि चर्मधार । वायो सुछीन लिय कपिकुमार ॥ सो हनी ताहि करबाल तासु । आये प्रजंघ यूपाक्ष आमु ॥ १८ ॥ यातुधान! अंगद अकेल । लखि निविद मैंद पाये सकेल ॥ इत भये प्लवंगम तीन चंड । तिहुँ उतह वीर निश्चर उदंड ॥ १९ ॥ तिहुँ कीश कीन बहु तरु प्रहार । ते सब प्रजंघ असिते विदार॥ पुनि अपर शैल तुम घाल चंड। यूपाक्ष डारतिन शरनखंड ॥२०॥ निश्वर प्रजंघ गहि खड्गतान । अंगदहि वात किय क्रुद्ध ठान ॥ तब कीश रोपभरि सुष्ट मारि । तिहिशीश मंजि महिदीन डारि२१॥ लखिकै प्रजंघ वध रोप आन । यूपाक्ष वीरवर लै कृपान ॥ सो द्विविदहीय घाली उताल। तव गहो कीशनिश्चरहि हाल ॥२२॥ लखिशोणिताक्ष किय कपिहि वातागहि गदा कीशतिहि शिर निपाता। ताछिन मयंद द्रुत धाय आय । यूपाक्ष वीरको दिय गिराय॥२३॥ सुजन मर्दि लिय प्राण तासु । त्यौं शोणिताक्षको द्विविद आसु॥ गहि दशन कोटि तनु नखन फारािडारो सु भूमि लै प्राण मारि२४॥ इमि दुहूँ कीश दुहुँ भट संहारि । धाये सुकुंभप्रति कुधर धारि ॥ सो यातुधान हन अमित तीरं । कीने विहाल कपि विविद वीर२६॥ लखि व्यथित भ्रात धाये मयंद । गरु शिला घाल कुम्भहि मुछंद।। निश्चर सुपंच शर खंड कीन । पुनि कपिहि सायकन भेदि दीन२६॥ पीडित विलोकि मातुलन वीर । द्रुत वालिपुत्र धाये सुधीर । तिन कुम्भ कीन बहुशर प्रहार। कपि अमित ताहि द्रुम शैल मार२७॥ पुनि कुम्भवीर शर सप्त माराि करि विकल कपिहि दिय भूमि डासि॥ अंगद विहाल गति कीश धाय । भापी उताल रघुवरहि जाय ॥२८॥ सुनि जाम्बवंत आदिकन गम । दीनी रजाय करि हग ललाम ॥ थाये सु ऋच्छपति अरु सुखेन। कपि वेगदर्श तिहुँ सुवल ऐन२९॥ १ चेतलहि चहुँ सुवीरं । तरु उपल धारि धाये सुधीर ॥ मत्राहि कुंभ शर विपुल शाल व समस्त वपु किय विद्याल३०॥

रामरसायना
(३८१)
पाये सुकंठ सो गति निहार । बहु कुधर कीन कुम्भहि प्रहार॥
ते सकल शैल भट यातुधानावाणन विदारि किय रज प्रमान॥३०॥
पुनि शरन बेधि डारो सुअंग । तब किय कपीश तिहि चापभंग ।।
धनु भजि कीशपति कर बखान । तुव तेज रूप वल पितु समान३२
मुनि कुम्भ कुपित भरि लीन वाथ । तब कीन भूरि बल कीशनाथ ॥
दुहुँ वीर धीर वर समर उद्ध । अवरुद्ध क्रुद्ध कर मल्लयुद्ध ।। ३३ ।।
कुम्भहि सुकंठ बहु कोपधार । फको उठाय सागर मँझार ॥
सो बहारे आय तुर बांधि पुष्ट । पालो कपीश उर वत्र मुष्ट ॥३४॥
पीड़ित हरीश पुनि है प्रचंड । तिहि वज्र मुष्ट मारो उदंड ।।
सो लगत वच्छ तच्छनहिं फाट । गिरि गयोभूमि निश्वर उलाट३५॥
भो मृतक मुष्ट लगि कुम्भ वीर । लखि यातुधान तजि दीन धीर॥
निरखो निकुंभ निज भ्रातहाल । थायोसकोप अतिही उताल॥३६॥
सन्मुख सु आय हनुमंत वीर । कीनो निरुद्ध तिहि समर धीर ।
लोकपिहि परिव मारो प्रचंड । लगि हृदय शस्त्र भो खंड खंड॥३७॥
तब कीश कोपि तिहि उर मझार । द्रुत पुष्ट मुष्ट कीनो प्रहार ॥
विहल निकुम्भ हे सजगहाल । गहि लयो धाय कपिको उताल३८
पुनि पवनपुत्र हनि मुष्ट ताहि । भी विलग वीर इक छिनक माहि ।।
फिरि तासु परिघ लै कपि उदंड । तिहि दलोधाय कार कोपचंड॥३९॥
हनुमंत फेरि तिहि महि पछार । दूत लीन वीर गहि शिर उपार ॥
तब भो निकुम्भ तनु प्राणहीनालखि भालु कीश जैशोर कीनार॥
दोहा-सकल निशाचर जायक, भाजि लंकपति पास ॥
कही नाथ पट भट सदल, रण मधि भये विनास ।। 25॥
कुम्भ निरंभादिक भग्न, मुनि दशमख विलपाय ॥
पुनि भापी मकरानमा हिय बहुगेप वढाय ॥ १२॥
जाहु पुत्र द्रुत मन लें, हती नदल रघुवीर।
अब शव वर युद्ध, हो तुम निपुण मुधीर ॥ १३ ॥
तुर पिनुको रहवर हनी, दंडकवन रग माहि ।।
मोसा बदला लेंदु अब.नमय विलंच मुना ॥ २४ ॥

नृपसुत शर निश्चर बहु छाटे भतासु वाण प्रभु अगणित काटे२६॥ सपल भ्रमाय सुरात्र उताला नाकि तालि खबरपर घाला चौ०-सुनि खर सुत मकराक्ष सुभट्टा * लिये संग वीरनके ठट्टा । शस्त्र कराल कवच तनुसज्जे *यातुधान दुर्मद बहु गजे ॥ ४५ ॥ धीर वीर मकराक्ष प्रधाना * स्यंदन वैठि सुकीन पयाना॥ चलतभूरि अपशकुन जनाये तिनहिं निदरि निश्चर सब धाये४६॥ भयो शोर चहुँ ओर अपारा * सुनत राम धनु बान सँभारा ॥ कीश भालु तरु गिरि गहि दौरे निश्चर भिरे पानवशबौरे ॥ १७ ॥ शक्ति परिघ आसि शरन प्रहारी यातुधान कपि सैन विदारी ॥ तरु गिरि उपल कीश वहुवर धीर वीर सो नेक न करपें ॥४८॥ भट मकराक्ष बाहु बल पाई सवल प्रबल निश्वर समुदाई ॥ खरसुत अमित चंडशर मारे 8 यातुधान वहु शस्त्र प्रहारे ॥४९॥ करहिं भालुकपि रण वारियारा भये सकल तनु व्यथित अपारा॥ सोलखि राम भूरिशर चंडा* मारि कीन निश्वर दल खंडा ॥२०॥ खरसुत निज दल विचल निहारा धाय आय रघुवरहि प्रचारा॥ कहा ठाढ होमम पितृवाती आज निपाति सिराऊँ छाती॥५१॥ अस्त्र शस्त्र तनु बल जिहि नाही अति अभ्यास होय तुम काहीं॥ द्वंद्व युद्ध मो संग सु करहू * बहुरि वेगि मम शर लगि मरहू२२॥ सुनि रघुवीर सु उत्तर दीना 8 हौं तुहि मूढ़ भली विधि चीना ॥ जनि मिथ्या वकवाद बढ़ावै निज पुरुपारथ करि दरशावै॥५३॥ सुनि मकराक्ष सकोप उताला की छाय दीन रामहि शरजाला ॥ प्रभु ते सकल खंडि महि डर अरु प्रचंड निज शर बहु मारे५४॥ ते निश्वर भंजे सब तीरा इहि विधि हने दुहूँ दुहुँ वीरा॥ तव रघुवीर कोप उर धाग तासु चाप खंडित करि डाग। बहुरि अष्ट शरते रघुनंदन में किय विनाश सारथि हरिस्यदन ५६ विस्थ होय मकराक्ष मुयोधा ॐ महि धायो गहि शूल सक्रीया।। नो.प्रचंड गुलदि धीग भजो बेगि चार हनि नाग।

रामरसायन। (३८३) लाखि मकराक्ष शूल निज खंडा धायो मुष्टिक बाँधि उदंडारा तव रघुनाथ अनल शर मारा गिरो भूमि करि घोर चिकारा॥ भो मकराक्ष मृतक वर वीरा भागे निश्चरनिरखि अधीरा५९॥ सो-भो मकराक्ष निपात, निरखि भालु कपि मुदित व ॥ बहु कूदत किलकात, कहैं रामजै रामजै ॥६०॥ इति श्री रा० २०वि० यु० लंकदहन मकराक्षादि युद्धवधवर्णनो नाम चतुर्दशोविभागः ॥ १४ ॥ चामरछंद। उतालयातुधान हाल रावणै सबै कहो ॥ नृपाल 8 विहाल त्यौं कराल कोप ते दहो । तबै विचार गनिकै सुइंद्रजीत सों कही। सुवीर तो समान वीर आन लंकमें नहीं ॥ १॥ कहा विचारि पुत्र तू न आजलों बिजै करी ॥ मनुष्य भालु कोश कूर आय लंक क्षे करीभिई भई सुपे अंबे विलंब है न कामको ॥ उताल हाल जायकै संहार डार रामको ॥२॥ तव सुमेधनाद या धराय धीर तातको ॥ कही न सोच कीजिये कटक श पातको । सबंधु राम भालु कीश आज ही नशाय हौं । परायहूं कहूं क्, न व्योमते खसायहीं ॥३॥ वखानि इंद्रजीत या सुयज्ञ कीन जायकै ॥ भयो प्रसन्न सो समस्त सिद्ध साज पायक । उताल अंतरिक्ष है अलक्ष गो अकेलही। कियो विचार आज ही विजें करीं सकेलही ॥१॥विशाल चाप तान के संधान वान वालही || उताल कीश भालु शीश भालगात शालही ।। लखे न कोउ ताहि सो समस्तसैन हेरही ।। प्रहारि तीर मारि वीर भूमि मध्य गेरही ।।५।। उखार शैल वृक्ष धार कीश ऋच्छ धावहीं ॥ लखाय ना कहूं सु व्योम ओरको चलावहीं । सुरारि पुत्र गुप्त कै अपार वाण मारिक । दई गिराय भालु कीश सनको विदारिकै ॥६॥ परे विहाल ह अधीर वीर तीर पीर ते ॥ करें सुदाय हाय शोर न्हाय नन नीर ते ॥ सम्हार सार काहुकी न काहु को कट रही। अपार धार रक्तकी समस्त अंगते वही ॥७॥ सबंधु गम अंगमध्य गेम गेम छेदिगे ।। सुबीर इंद्रजीतके प्रहार तीर (३८४) रामरसायन। - भेदिगे ।। भये विहाल दोउ राजपुत्र बाणपात त । चली अपार रस धार बेसुमार गात ते ॥ ८॥ तवै अनंत कोपिक कही उताल भ्रा सों॥ कहा कलेश होय गो बहोरि प्राण घातसों । सुही अब प्रचं ब्रह्म अस्त्र बाण मारहूं ॥ जित त्रिलोक यातुधान ते सबै सँहारहूं।।१ सकोप देखि बंधुको कृपालु राम यों कही ।। अराति घात हेत ता बात योगहें यही ॥ परंतु व नरेश पुत्र ना अनीति धारिये ॥ सुए: दुष्टलागि क्यों अनेक प्राण मारिये ॥ १०॥ दोहा-भगो दुरो लीने शरन, नहिं आयो रण मध्य ॥ करजोरे उनमत्त हो, ये पट सदा अवध्य ॥ ११ ॥ याते उर धीरज धरो, हौं मारौं अब याहि ।। मायामय बरिखंड खल, जोपै भागि न जाहि ॥ १२ ॥ यौं तिहि दृढ वध ठानिक, नभ दिशि लखें निशंक ॥ रघुवर हियकी गति समुझि, गयो इंद्रजित लंक ॥१३॥ पुनि धननाद विचार किय, माया रचौं अपार ।। ठानि हिये बहुरो तुरत, लै सँग सुभट जुझार ॥ १४ ॥ आयो पश्चिम द्वारसो, मायामय सिय रूप ॥ रवि बैठारे संग निज, रथ बिच परम अनृप ।। १५॥ यातुधान दल देखिकै, वानर भालु अपार ।। क्रोधभये चहुँ ओरते, धाये तरु गिरिधार।। १६॥ आवतही कपि वृंदको, दशमुख सुत दरशाय ।। . माया:सियको वध कियो, गहि कच खड्ड़ चलाय ।। १७ सो लखि हनुमत आदि सब, हाय हाय किय शोर ।। आरत विकल पुकारही, करो कर्म खल घोर ।। १८॥ रुदन करत धननाद पर, धाये पवनकुमार ॥ कहत क्रोधमय दुर्वचन, मूढ तोहिं विकार ॥ १९॥ है अवध्य अबला सदा, पुनि अति दुखी अधीर । बहुरि विवश तिहि वध कियो, दुष्ट कहावत वीर ॥ २० ॥ " रामरसायन। (३८५) यौं भापत धाये सदल, किय तरु कुधर प्रहार ॥ तिनहि छिदि मारत कपिन, इंद्रजीत परियार ॥२१॥ समर करत हनुमान प्रति, कहे इंद्रजित बैन ॥ . रेकपि मुहि तिय घातको, रंचहु पातक है न ॥२२॥ नर नारी कोऊ कहूँ, पीडाकारक जोय ॥ ताहि वधेते कैसहू, काहू पाप न होय ॥२३॥ सुनि हनुमत कपि भालु युत, धाये करि बहु क्रुद्ध । तरु गिरि पाहन भरि हनि, करनलगे रणयुद्ध ॥ २४ ॥ कोधित काल करालसम, भये वीर विकराल॥ पौनपुत्र गहि गरु शिला, घाली अतिहि उताल॥२५॥ ताछिन रथ लै सारथी, भागो निरखि शिलाहि ॥ गिरी आय सो ठौर तिहि, धसी धरणिके माहि ।। २६ ॥ वहुरि हनूमत सदल अरु, युत अनीक घननाद ।। करत युद्ध रख उद्ध भो, मनी. प्रवल घननाद ॥२७॥ हनूमान सोचत हिये, सियहि हती खलवाम ॥ प्रभु रजाय पाये विना, है अब युद्ध निकाम ॥२८॥ :: यह विचार दृढ़ ठानिक, युक्तिहि युक्ति सुधीर ॥ भिरत फिरत निकटत दुरत, गये समर तजि वीर ॥२९॥ इंद्रजीत अवकाश लहि, गयो सदल द्रुत लंक ॥ हनुमत बल दुर्पित सकल, निश्वर निपट सशंक ॥३०॥ लंक सिद्धि देवी सु जिहि है निकुंभिला नाम ।। करन लगो मख इंद्रजित, करि प्रबंध तिहि ठाम ॥ ३ ॥ पवनसुवन इत विकल अति, विलपत जाय उताल ।। कहो सिया वध सुनतही, भूमि गिरे रघुलाल ॥३२॥ करत विलाप अधीर आति, तन मनकी न मॅभार। बदो फेन मुख स्वेद तनु, चली गन जल धाः ॥३३॥ पनाक्षरी वाषित। हाय हाय करि रघुराय बिलपाय धाये बोले हाय प्यारी कहाँ वेगही बतायदे ॥ जनकदुलारी किनमार्ग फितडारी दाय आय - | मेरी ओर रसिकविहारीगई न्यारी चित चाय चाय । होवै हितकारी) ऐसे समै कोऊ आय हनहि कृपान तान त्यागौं प्रान मुदित प्रियारे । हनुमत लपण सुकंठ नल, आदिक सबहि सुनाय॥३९॥ सेवक सुबंधु सखा तन मन वित्त चित्त रसिकविहारी सदानंदमें। रहीजियो ॥ हों तो अब करत पयान प्राणप्यारी ढिग सकल सुजान। सीख येती सुनि लीजियो।लायकै सुदारु भार भरि विरचाय ३ | एकै ठौर धारकै दुहूँको दाह दीजियो । मेरो दृढ नेह औ पतिवन। (२८६) रामरसायन। हनुमंत फोरि सकल सुनायदाहीहूं प्राण त्यागौं तहां चलिकै छबीली, जहां संगले उताल तिहिं ठौर पहुँचायदे । होनी ही भई सो आज लाज को न काज हाय कैसह प्रियाको मोहिं वदन दिखायदे ॥३४॥ दोहा-इमि अधीर रघुवीर को, लपण गहे उठि धाय । बैठारे कहि मृदु वचन, समै सरिस समुझाय ॥ ३९ ॥ धीर धरत नहि रंचहू, बढी विरहकी पीर ।। बहु विलपत अकुलायकै, कहत वचन रघुवीर ॥ ३६॥ घनाक्षरी कवित्त । रसिकविहारी किमि लगनहुती सो कूर जा छिन छबीलीको उछाहि व्याहि लायोंमें ॥ कौन कुघरीही वह जाघरी प्रियाको संग लैकै त्यागि देशको विदेशहि सिधायोमैं । कैसो दिन अशुभ कराल सो कलेशकारी जादिन समस्त दल साजि इत आयोमैं ॥ जब ते विछोही तबही ते हाय लाडिलीको सकवेर फेर मुख देखनन पायोंमें ॥३७॥ प्यारी सुरधामको सिधारी सो सुखारी भई होती. तिहि विरह दुखारी करौं हाय हाय । सुरति बिसारी ना निहारी ने जो सहाय सो हमारीकरै लागीअंग अंग रूपवारी विन लाय लाया। गुण गाय गाय ॥३८॥ दोहा-यौं बहु विलपतही विकल, पुनि बोले रघुराय॥ घनाक्षरी कवित्त। प्रियाको सत्य ताको निरवाह सबै अंतलग कीजियो॥४०॥ दोहा-सुनि लछमन रघुचंदको, गहि निज अंक मझार । कही तात धीरज धरिय, कीजे समय विचार ।। ४१!!!

गमरसायन। (३८७) यौं कहि पुनि रघुवीर सों, बोले कछु झहराय । राज तजो प्रभु धर्म हित, ताको फल यह आय ॥४२॥ घनाक्षरी-कवित्त । घरमधुरीण नाथ पायो सो कलेश ऐसो यातुधान रावण सुमोद तूठे हैं।परम सुकर्मी प्रभु वन वन डोले दुखी रावण अधर्मी ताहि साज पूठे हैं । रसिकविहारी ही विचारी निरधारी सत्य सकल शुभ त्रिलोकही ते उठे हैं॥ धनको प्रभाव एक सत्य है सदाहीं धर्म कर्म ज्ञान पाप पुण्य सब झूठे हैं॥४३॥ प्र० ॥ वा०॥ यु०॥ का०॥ स० ८३ ॥ श्लोक ॥ रे युद्धयमानानामस्माकं प्रेक्षतां च सः॥जघान रुदतीसीतामिंद्र- रावणात्मजः॥१॥ तस्यतचनं श्रुत्वा राघवः शोकमूछितः ॥ पात तदा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥२॥ तं लक्ष्मणोऽथ वाहुभ्यां प्वज्य सुदुःखितः॥ उवाच राममस्वस्थं वाक्यं हेत्वर्थ संयुतम्३ वमति तिटतं त्वामार्य विजितेंद्रियम् ॥ अनर्थेभ्यो न शकोति तुं धर्मो निरर्थकःशाभूतानां स्थावराणां च जंगमानां च दर्शनम्।। स्ति न तथा धर्मस्तेन नास्तीति मे मतिः॥५॥ यद्यधों तोरावणो नरकंत्रजेत्।भवांश्वधर्मसंयुक्तौनव व्यसनमाप्नुयात य च व्यसनामावाट्यसनं चागतं त्वयि ॥ धर्मों भवत्यधर्मश्च स्परविरोधिनौ ॥ ७॥ यस्माद विवर्धते येप्वधर्मः प्रतिष्टितः॥ श्यन्ते धर्मशीलाश्च तस्मादेतौ निरर्थकी॥ ८॥ मम चेदं मतं त धोयमिति रावव॥ धर्ममूलं त्वया छिन्नं राज्य मुत्सृजता तदा।। ९॥ हपः कामश्च दर्पश्च धर्मः क्रोधः शमो दमः ॥ अर्थादेतानि वाणि प्रवर्तते नराधिप ॥१०॥ इत्यादि। दोहा-यौंही लखन अनेक विधि, कहे वचन समुझाय ॥ सुनि गुनि समय स्वरूप कछु, धीर धरी रघुराय ॥22॥ ० ताही छिनसब सैन सँभारी आय विभीपण दशानिहारी।। लपत सकल भाल कपिवीरा लेत रमाँस विकल रघुवीरा२२||

ऐसे समै कोऊ आय हनहि कृपान तान त्यागौं प्रान मुदित प्रियारे ।
सेवक सुबंधु सखा तन मन वित्त चित्त रसिकविहारी सदानंदम् ।
रहीजियो ॥ हो तो अब करत पयान प्राणप्यारी ढिग सकल सुजान।
सीख येती सुनि लीजियो ।लायकै सुदारु भार भूरि विरचायश/
। एकै ठौर धारकै दुहूँको दाह दीजियो । मेरो दृढ नेह औ पतित्रा)
(३८५)
रामरताना
हनुमंत फेरि सकल सुनायदेहीहूं प्राण त्यागौं तहां चलिक छबीली
जहां संगलै उताल तिहिं ठौर पहुँचायदे । होनी ही भई सो आग
लाज को न काज हाय कैसह प्रियाको मोहिं वदन दिखायदे ॥३१॥
दोहा-इमि अधीर रघुवीर को, लपण गहे उठि धाय ॥
बैठारे कहि मृदु वचन, समै सरिस समुझाय ॥ ३५ ॥
धीर धरत नहिं रंचहू, बढी विरहकी पीर ॥
बहु विलपत अकुलायकै, कहत वचन रघुवीर ।। ३६॥
घनाक्षरी कवित्त ।
रसिकविहारी किमि लगनहुती सो कूर जा छिन छबीलीको
उछाहि व्याहि लायोंमें ॥ कौन कुघरीही वह जाघरी प्रियाको संग
लैकै त्यागि देशको विदेशहि सिधायोमैं ।। कैसो दिन अशुभकराल
सो कलेशकारी जादिन समस्त दल साजि इत आयोमैं ॥ जब ते
विछोही तबही ते हाय लाडिलीको सकवेर फेर मुख देखनन
पायोंमें ॥ ३७॥ प्यारी सुरधामको सिधारी सो सुखारी भई होती
तिहि विरह दुखारी करौं हाय हाय । सुरति बिसारी ना निहारी ने
मेरी ओर रसिकविहारी गई न्यारी चित चाय चाय । होवै हितकारी
जो सहाय सो हमारीकरै लागी अंग अंगरूप वारी विन लाय लाया
गुण गाय गाय ॥ ३८॥
दोहा-यौं बहु विलपतही विकल, पुनि बोले रघुराय॥
' हनुमत लपण सुकंठ नल, आदिक सबहि सुनाय ॥३९॥
घनाक्षरी कवित्त।
प्रियाको सत्य ताको निरवाह सबै अंतलग कीजियो॥४०॥
दोहा-सुनि लछमन खुचंदको, गहि निज अंक मझार ।
कही तात धीरज धरिय, कीजे समय विचार ॥११॥

गमरसायन। (३८७) यों कहि पुनि रघुवीर सों, बोले कछु झहराय । राज तजो प्रभु धर्म हित, ताको फल यह आय ॥४२॥ घनाक्षरी-कवित्त । घरमधुरीण नाथ पायो सो कलेश ऐसो यातुधान रावण सुमोद मध्य तृठे हैं।परम सुकर्मी प्रभु वन वन डोले दुखी रावण अधर्मी ताहि राज साज पूठे हैं। रसिकविहारी हैं। विचारी निरधारी सत्य सकल शुभाशुभ त्रिलोकही ते उठे हैं॥ धनको प्रभाव एक सत्य है सदाहीं और धर्म कर्म ज्ञान पाप पुण्य सव झूठे हैं ॥ ४३॥ प्र०॥ वा०॥ यु०॥ का०॥ स० ८३ ॥ इलोक० ॥ समरे युद्धयमानानामस्माकं प्रेक्षतां च सः॥जघान रुदती सीतामिंद्र- जिद्रावणात्मजः ॥ १॥ तस्य तद्रचनं श्रुत्वा राघवः शोकमूछितः ॥ निपपात तदा भूमौ छिन्नमूल इबद्रुमः ॥२॥ तं लक्ष्मणोऽथ वाहुभ्यां परिप्वज्य सुदुःखितः। उवाच राममस्वस्थं वाक्यं हेत्वर्थ संयुतम्३ शमे वमति तिष्टतं त्वामार्य विजितेंद्रियम् ॥ अनर्थेभ्यो न शक्नोति त्रातुं धर्मों निरर्थकायाभूतानां स्थावराणां च जंगमानां च दर्शनम्।। यथास्ति न तथा धर्मस्तेन नास्तीति मे मतिः॥ ५॥ यद्यधमों भवेद्भूतोरावणो नरकंबजेताभवांश्चधर्मसंयुक्तोनवव्यसनमाप्नुयात्६ तस्य च व्यसनाभावाद्व्यसनं चागतं त्वयि ॥धर्मों भवत्यधर्मश्च परस्परविरोधिनौ ॥ ७॥ यस्मादा विवर्धते येवधर्मः प्रतिष्टितः ।। किश्यन्ते धर्मशीलाश्च तस्मादेतौ निरर्थकी।॥ ८॥ मम चेदं मतं तात धोयमिति रावव॥ धर्ममूलं त्वया छिन्नं राज्य मुत्सृजता तदा।। ।। ९ । हपः कामश्च दर्पश्च धर्मः क्रोधः शमो दमः ॥ अर्थादेतानि सवाणि प्रवर्तते नराधिप ॥ १०॥ इत्यादि। दोहा-याही लखन अनेक विधि, कहे वचन समुझाय ॥ सुनि गुनि समय स्वरूप कछु, धीर धरी रघुराय ॥22॥ चोल-ताही छिन सब सैन सँभारी आय विभीपण दशानिहारी॥ विलपत सफल भालु कपिवीरा कलेत रमाँस विकला . IRL 81 बहु धीर धराई॥ सो प्रथमहि वल करितरु लीजे बहुरि निशंक समर हद कीजे। || सो सुनि लक्ष्मण दई रजाई * धाये कीश भालु समुदाई ॥ ५५॥ कपिन हने वल कार सब तेते ।। भिरे अपर निश्वर अरु कीशा होत समरदुहुँ दिशिकरिखीसार भयो चहूँ कोलाहल भारी उठो न मखते तबहुँ सुरारी। लखि कपिभाल धसे वरियाई ? यज्ञसाज सब दीन नशाई ॥२८॥ (३८८) रामरसायन। बूझी लखि लंकेश उताला * विलखि कहो लछमन सब हाला सुनि भापी तबसों झहराई नृप सुत बैठौं क्यों न चुपाई ४६॥ पुनि हनुमतहि लंकपति बोले के बुधिमंत विचारि न बोले। सो मायावी दुष्ट मलीना मायामय सीतावध कीना ४७ ॥ यो कहि बहुरि निशाचरराई * रघुवीरहि राम विभीपण वचन प्रमाना मायामय सीता बध जाना ॥१८॥ पुनि बोले लंकेश उताला ॐ करै इंद्रजित यज्ञ कराला॥ याछिन लछमन सदल सिधा * मख विध्वंस होय तिहि मारै४९॥ सुनि रघुनाथ रजायसु दीनी * सुभट सैन लछमन बहु लीनी॥ कवच अंग बहु शस्त्र सुधारे * जैति जैति जैराम उचारे ॥२०॥ हनुमानादि सुबीर प्रधाना* जाम्बवन्त आदिक भट नाना॥ धनु शर गदा विभीषण साजे यातुधान चहुँ विकट सुराजे ५१|| रामहि लपण प्रदक्षिण दीना * पदशिर धरि प्रणाम पुनि कीना॥ बहुरि कही प्रण ठानिअनंता है ऐहौं हनि निश्चर बलवंता ॥२॥ यौं कहि लछमन सदल सिधाये * द्रुत निकुंभिला धामहि आये॥ तब बोले लंकेश उताला लखौ वीर यह वृक्ष विशाला ५३॥ इहि वट तर सु इंद्रजित आई * होत अलक्ष व्योममधि जाई । याते कार प्रबंध तरु धेरे * निश्चर खडे विकट चहुँ फेरे।।५४॥ मारत मरत लरत बरियाई *गहो सु वट रिपुदलहि नशाई ५६ तिहि तरु तर वै सजग सुधीरा खड़े लपण युत कोटिन बीरा ॥

रामरसायन। (३८९) दंतन नखन इंद्रजित गाता फारि केश गहि मारहिं लाता।। भो विध्वंस यज्ञ करि कोधा उठोशूल लै निश्चर योधा ॥१९॥ सो बहु वीरन मारि गिराये * अपर भाजि लछमन ढिग आये ॥ यज्ञ भंग सुनि सब हरपाने ॐ भयो अवै खलबधाहढ़ जाने ६०॥ मेघनाद करि कोष कराला धायो स्यंदन साजि उताला ॥ देखो पवनपुत्रकी ओराहनत निश्चरन कपि वरजोरा ६॥ तोमरउंद। लखि मेघनाद सुहाल । कपि निकट आय उताल ॥ किय अमित शस्त्र प्रहार । गहि कीशते दाल डार ।। ६२ ।। लखि पौनसुतहि लरात । धायो दशानन भात ॥ ढिग जाय करि हग बंक । कह इंद्रजितहि निशंक ॥ ६३ ॥ रे दुष्ट तू अति उद्ध । करु आज मोसम युद्ध । सुनि मेघनाद रिसाय । बोलो सुभौंह चढ़ाय ॥ ६४ ॥ भो तात बंधु कनिष्ट । हो मौन कुमति अनिष्ट । महराज बंधु कहाय । भो भिक्षु सेवक जाय ।। ६५ ।। दोहा-जो निज सुजन विहाय के, करें पराई आश ।। ताको इत उत दोउ दिशि, हो सब काज विनाश ॥६६॥ इंद्रजीतके वचन सुनि, कहे विभीपण वैन । तू खल पितु युत काल वश, अरु सब निश्वर सैन ॥६॥ कूर कुशील कुंकर्म रत, कटुवादी मतिहीन । लुब्ध अधर्मी कुटुम जो, ताको तजे प्रवीन॥६८॥ यो कहि कह लंकेश पुनि, रे खल कुमति कराल ॥ वटतर जान न पायहै, आज होत तब काल ॥ ६९॥ सजग दुहूँ इमि परस्पर, कहत हुते कटु वैन । ताछिन हनुमत कंध चढ़ि, धाय लपण युत मैन ।। ७०॥ कहीं आय वननाद सों, रेकायर खल चोर ।। दुरन न पहे आज तू, देख पराक्रम मोर ॥ ७ ॥ सुनि भाषी घननाद तब, भलि गई वह पीर ।। - ..

। - दुहुँ शस्त्र भंजत दोउ । इमि भिरत फिरत न कोउ ॥ ८ ॥ त्यों लपण अरु घनगाद । किय समर हिय न विपाद ॥ ८४॥ (३९०) रामरसायन। नागफाँस कपिर्सेन युत, महि डारे दुहुँ वीर ।। ७२ ॥ कही लपण तब हे कुटिल, करी दुराय सु वात ।। आज प्रगट दरशाव बल, जितो होय तुव गात ।। ७३ ॥ तोमर छंद। सुनि इंद्रजित रिस धारि । निज अस्त्र शस्त्र संभारि ॥ बोलो बहोरि सुछंद । हो सजग दशरथ नंद ॥ ७ ॥ यौं भापि अतिहि उताल । सायक तजे विकराल ॥ सो लागि लक्ष्मण गात । बहु रुधिर धार वहात ॥ ७५ ॥ तब लपण वाणन मारि । तिहि कवच दीन विदारि॥ सोऊ महारिस ठान । भंजन कियो तनु वान ॥ ७६ ॥ पुनि राम अनुज उदंड.। द्रुत पंच शर वर चंड ॥ चाले सबल धनु तान । तिहि उर विधे विच आन ॥ ७७ ॥ घननाद युद्ध प्रवीन । लै विपम सायक तीन। मारे सपदि करि लच्छ । वेधे सुलच्छनवच्छ ॥ ७८॥ यौं विविध उद्धत बान । दुहुँ हनत दुहुँ बलवान ।। पुनि अपर शस्त्र अपार । दुहुँ करत दोऊ प्रहार ॥ ७९ ॥ इक एक करत अधीर । पुनि सँभरि युद्धत वीर । दुहुँ शस्त्र तकि तकि बाल । दुहुँ अंग विधत कराल || इमि लपण अरु घननाद । कर समर युत अबाद ॥ ८१॥ . बहु यातुधान कराल । कपि ऋच्छ वीर विशाल । वर शस्त्र तरु गिरि धार । कर धाय धाय प्रहार ।। ८२॥ कपि भालु निश्वर झार । भो दोउ दलहि सँहार ॥ महि वही शोणित धार । भेरुंड मुंड पहार ॥ ८३॥ कपि भालु निश्चर सैन । इमि करत युद्ध हटैन । - तब राम बंधु उदंड । उर गुनो भट वरिखंड। यौं करि विचार उताल । पुनि हने वाण कराल ।। ८५॥

रामरसायन।
(३९१)
सो लगत भो मुख दीन । लखि लंकनाथ प्रवीन ॥
बोले लपण प्रति ठान । अव मरिहि खल दृढ़ जान॥८६॥
तव इंद्रजीत रिसान । लछमनहिं सप्त सुवान ।।
मारे बहुरि दशतीर । हनुमतहि वेध सुवीर ।। ८७॥
तब कोपि लक्ष्मण चंड । छोडे सुअस्त्र उदंड ।।
तिमि इंद्रजीत अपार । किये विविध अस्त्र प्रहार ।। ८८॥
इमि अस्त्र शस्त्र अनेक । घाले जु एकहि एक ॥
भे दोउ विह्वल वीर । पै तजत नहिं रणधीर ।। ८९ ।।
लंकेश लपणहि हेरि ।धाये धनुप सजि फेरि ॥
द्रुत इन्द्रजीतहि आय । शर हने कोप बढाय ।। ९० ॥
पुनि अपर निश्चर भूर । दिय तिनहिं वाणन पूर ॥
सँग यातुधान जु चार । ते करहिं समर प्रचार ॥ ९१॥
लंकेश समर मझार । कह भालु कपिन प्रचार ।
यहि खलहि मारहु बैंक । फिरि और वीर न लंक || ९२॥
सो सुनि भये भट क्रुद्ध । किय प्रवल औरहु युद्ध ।।
लपणहिं लिये निज पीठ । कर समर हनुमत ढीठ ।। ९३॥
लै भालु दलहि रिछेश । करशव यूथनिशेश ।।
भो घोर शोर अपार । दुहुँ ओर भट वरियार ॥ ९४॥
तब इन्द्रजीत सुबाय । स्थते उतरि महि आय ।।
रिछपतिहि शक्ति प्रहार । लगि वही शोणित धार ॥ ९५॥
तब जाम्बवंतहु धाय । पद पकरि भरि भ्रमाय ॥
फेंको रिसाय निशंक । गो इन्द्रजित गिरिलंक ।। ९६॥
लजित सुह घननाद । पुनि आय करि वननाद ।।
स्थ बैठि कान सु युद्ध । ख बार दुहुँ दल रद्द ॥ ९७॥
सुनि शोर पुनि दुहुँ वीर । धाये भिरे रणधीर ॥
घननाद लछमन उद्ध । ठानो समर भरि ऋद्ध ।। ९८॥
तव लपण हनि शर चार । रथ वाजि तास विदार॥
पुनि मृतह हंति दीन । सारथ्य सो निज कीन ॥ ९९ ॥

(३९२)
रामरसायन।
तब धाय कपि वरियार । डारो तुरंग चहुँ मार ॥
सो धाय ले रथ आन। आयो जु कोउ न जान ।। १०० ॥
तिहि लाववी लखि सोय । भे चकित चित सब कोय ॥
पुनि इन्द्रजित धनुधार । किय कपिन वाण प्रहार ॥ १० ॥
भागे प्लवंगम धीर । कहि पाहि छक्ष्मण वीर ॥
तब रामबंधु प्रचंड । किय इन्द्रजित धनुखंड ॥ १०२॥
निश्वर शरासन आन । ले हने अगणित चान ॥
लखि राम अनुज सुवीर । भंजे सकल तिहि तीर ॥ १०३॥
घननाद तब सहरोप । द्रुत धाय करि बहु घोप ॥
पितु वन्धु हीय मझार । शर तीन कीन प्रहार ॥ १०४॥
तवहीं विभीपण धाय । गहि गदा चंड भ्रमाय ॥
सह सारथी रथ वाजि । विध्वंस कीन सु गाजि ॥ १०५॥
है इन्द्रजित रथ हीन । गरुचंड शक्ति शुलीन ॥
घाली तिनहिं बहु डाटि । दुत दीन लपण सु काटि ॥ १०६॥
पुनि मेघनाद रिसाय । दिय लपण कवच गिराय ।।
तब राम अनुज उदंड । तनु वान तिहि किय खंड ।। १०७॥
पुनि दोउ वीर प्रवीन । बहु शस्त्र संयुग कीन ॥
फिरि अस्त्र करत प्रहार । दुहुँ दलत दुहुँ वरियार ॥ १०८॥
तब ऐंद्र अस्त्र उडंद । संयुत लपण शरचंड ॥
संधानि तानि सुचाप । भापी बढाय प्रताप ॥ १०९।।
जो राम दशरथ नंद । सत धर्म सत्य सुछंद ।।
है तौ लगत यह बान । हो इन्द्रजित विन प्रान ।। ११० ॥
यौं सुमिरि दृढ़ प्रण ठान । सो अस्त्र संयुत वान ॥
किय इंद्रजितहि प्रहार। अति उठी पावकझार ॥ १११॥
सो जायके शरचंड । किय तासु शिरभुज खंड ।।
हारामं कहि घननाद । तनु तजो करि घननाद ॥ ११२॥
तिहि रुंड भो महि पात । निश्चर भगे विललात ॥
खै कोश भालु अनंद । कह जैति दशरथ नंद ॥ ११३॥

रामरसायना (३९३) , . सब देववेद उताल । नभ आय युत सुरपाल । वरपे प्रसून अनंद । कहि जति रघुकुल चंद ॥ ११४ ॥ बहु भांति विनय सुनाय । सुरगये निज निज ठाय ॥ प्रमुदित कही सुरराज । निर्भय भये हम आज ।। ११५॥ दोहा-मेघनाद वध करि लपण, लहो अनंद अपार ।। चले सदल रण भूमिते, कहि जैराम उदार॥११६॥ हनुमान लंकेशके, कन्ध लपण धरि हाथ ।। सिथिल गात शोणित सनो, चले सुमिरि रघुनाथ ॥११७॥ राम बन्धु विजयी मुदित, इंद्रजीत कहँ जीति ।। सकल सन युत आयके, प्रभुपद गहे सप्रीति॥ ११८॥ रडि रघुवर हिय लायकै, बैठारे निज गोद ॥ बहु सराहि सनमानिकै, कहे चैन भरि मोद ॥ ११९ ॥ महावीर हो इन्द्र जित, युद्ध प्रवीन निशंक । ताको वध कीनो अनुज, जीति लई अब लंक ।। १२०॥ तीन नि दिनलों लपण, ठानो समर अभंग। दुष्कर कृत कीनो अनुज, भयो सकल दुख भंग ।।१२१॥ यौं रघुवर आनंद भरि, लिये बन्धुको अंक ॥ लपण वीरता सवाहि प्रति, वर्णन करत निशंक ॥ १२२॥ ताही छिन श्रीराम ढिग, मेवनादको शीश ॥ लाये भट अवलोकिक, मुदित अच्छ अरु कीश।। १२३॥ सो विशाल शिर तेजमय, निरखतही रघुनाथ ।। कही धरी मर्याद युत, हे सुवीरको माथ ॥ १२ ॥ यो कहि पुनि लखि अनुजको, शोणित व्यथित शरीर ।। श्रीरघुवर कोमल हृदय, भरि आये दृग नीर ॥ १२५।। ताही छिन वर औपधी, वेगहि लाय सुखेन ॥ किये विरुज लपणहि सदल, तुरत लहो सब चैन ।। १२६॥ अनुज मन युत विरुज लखि, रायब भये अनंद कोश भाल किय शोरबहुँ, जै जै जै रघुचंद ।। १२७ ।। इति श्रीरा २० वि० यु० मेघनादयुद्धपध वर्णनो नाम पंचदशोविभागः ॥ १५॥ - भुज निज गति लिखी सकल महि लखि पियवध दृढ जानी।।। नभ मग आय परी तिहि सन्मुख विशद विभूपण धारी॥८॥ तब स्वामी बल गुणि सुलोचना हिय कछु धीरज लाई ॥९॥ हवाहु तो लिखा भूमि जो हो निज धर्म न डोली ॥१०॥ (३९४) रामरसायन। दोहा-सुनत दशानन पुत्र वध, धरणि गिरा मुरझाय ॥ हाय इंद्रजित वीर वर, कहि रोवत अकुलाय॥१॥ सकल निशाचर निश्चरी, करत विलाप अपार ॥ छयो शोर चहुँ लंकमें, आरत होत पुकार ॥२॥ पुत्र मरन दुख दुसह लहि, छायो क्रोध अखंड ॥ लै कृपाण धायो सपदि, सिय वध हित खल चंड ॥३॥ बरजत धाये सचिव सँग, पहुँचो सियढिग जाय ॥ तिहि विलोकिकै मैथिली, भई सभय विलपाय ॥४॥ बहु मंत्री गण रावणहि, सविनय नीति वुझाय ॥ लाये सदन बहोरिकै, बैठारो समुझाय ॥५॥ इत दशमुख दुख रोष भरि, मंत्रिन मिलि विलपात ॥ उत सबतिय रोवै विकल, बहु उर शीश धुनात ॥६॥ इत रण मध्य सु इंद्रजित, जबहि भयो महिपात ॥ तासु तीय तब महल उत, लखी अनोखी बात ॥७॥ दावई छंद । नागसुता तिय इंद्रजीतकी है सुलोचना नामा ॥ परमरम्य सो दृढ़ पतिव्रता वैठी हुती सुधामा ॥ औचकही ता छिन शर छिदित मेघनाद भुजभारी॥ उझकि उठी अकुलाय हेरितिय धाय वेगि ढिग आई। निज पति भुज अनुमानि हाय करि गिरी धरणि मुरझाई ॥ घोर शोर करि रोवन लागी सखिन ताहि समुझाई ॥ छिन भुज पेपि विकलहो छिन पति गुणहि सुमिरि रहि जावे ॥ रियो विचार नारि दृढ़ जाते सब संदेह मिटा कर जोरि ध्यान धरि पतिपद वचन विनय युत बोली।

रामरसायन। करि विलाप बहु निरखि कु औसर पुनि धीरज उर आनी ।। सत्य प्रेम पति धर्मधारिनी उठि धन वित्त लुटाई ॥ सहित बाहुतनु सजि शिविका चढि सखिन समेत सिधाई१॥ दशमुख पासं जाय बहु विलपत भापे वचन कठोरा ॥ कहि वल पुत्रवधुहि समुझाई रावण सहित निहोरा ।। ताहि निदरि सो जाय सासु ढिग पगपरि कियो विलापा | मंदोदरी गोदलै रोवै वढो हृदय संतापा ॥ १२ ॥ पुनि मयसुता वधू जियकी गति नेह धर्म लखि लीनी ॥ जाय लेहु रघुवरते पति शिर यो कहि शुभ सिख दीनी ॥ मासु रजाय पाय सो सखि गण संगहि वेगि सिधारी ॥ आय राम ढिग माथ नायकै मंजुल गिरा उचारी ॥ १३ ॥ प्रभु समर्थ उर अंतर्यामी मो रुचि पूरण कीजे॥ हौं निज सत्य धर्म निरवाही याहित पति शिर दीजे ।। नेह धर्म दृढ़ लखि रघुनायक तिहि सो शीश दिवायो । उठि लै पियमस्तक सुलोचना हृदै सप्रेम लगायो ॥१४॥ ताछिन हँसि कपीशयों बोले निश्चर माया भारी ॥ छिदित मृतकबाहु लिखि देवे यह मिथ्या गति सारी ॥ जोपै सत्य भुजा लिपि कीनी तोपै अब यह शीशा ॥ याठिन हँस बात तब मान नत प्रपंच सब दीशा ॥१५॥ सुनि बोले रघुवर सुकंठ सौ सखा न मिथ्या मानौ ॥ लिखी भुजा सो सत्य बात अरु शिरह हँसै दृढ जानो ।। मोहिय ध्रुव प्रतीत याते यह है पतिव्रता नारी ॥ पतित्रत धर्म प्रभाव अमित सो इती बात कह भारी॥१६॥ सुनि हियं अमरप सोच सकुच युत धरि सन्मुख पति माथा ।। हँसो नाथ लना मम राखो कही जोरि युग हाथा ।। विनय करतही हँसो बेगि सो लखि सब अचरज आयो ।। दशमुख पुत्र व हरपीलजि कपिपति शीश नवायो ।। १७ ॥ पुनि सुगम लछमन लंकेशहि सविनय शीश नवाई॥3 जब राम सर्वधु रहन यहां । तवही कपि भालु वच सु कहां ॥५॥ हरि दोउ पताल सिधाबहुँगो । बलि देविहि जाय चढ़ावहुँगो॥६॥ (३९६) -गमरसायन । लैशिर धरि शिविका अरूढ है वेगि लंक मधि आई ॥ सुथल उताल रचाय सविधि सर लै भुज शीश सुवामा ॥ है निशंक तनु दहो सपति सो गमन कियो सुरधामा ॥ १८॥ दोहा-मेघनाद वल वीरता, अरु सुलोचना धर्म । देव अदेव सराहही, निरखि दुहूँ दृढ कर्म ।। १९॥ लंकापति निश्चर सकल, विकल अधिक अकुलाय॥ हाय हाय करि रोवहीं, इंद्रजीतगुण गाय ॥२०॥ कहत निशाचर निश्वरी, विलपि विलपि पछिताय । हाय दशानन का कियो, डारी लंकनशाय ॥२१॥ इहि विधि लंका मध्य सब, सोचें निश्वर वृंद ॥ इत रघुबर दल माहिं चहुँ, छायो परमानंद ॥ २२ ॥ इति श्रीरा० र० वि० यु० सुलोचना सत्य वर्णनो नाम पोडशोविभागः ॥ १६ ॥ तोटक छंद । दशकंठ सुमौन उसास भैरै । घननाद बिना बहु सोच करै । धार धीर बहोरि विचार कियो । इत मोबिन है नहिं और वियो १॥ वर वीर जिते बहु लंक रहे । सब राम शरानल ज्वाल दहे ॥ अब है महिरावण आवहि सो । छलते बलते जय पावहि सो ॥२॥ इमि ठानि शिवालय माहिं गयो । जपि मंत्र महाबलिदान दियो । तिहि सिद्धि प्रभाव उतालहिते । महिरावण आय पतालहिते ॥३॥ दशमाथहि वेगि मिलो सु तबै । तिहि ते वरणो तिन हाल सबै ॥ सुनिकै महिरावण रावणको । बहु धीर दई जै पावनको ॥ ४॥ पुनि यो अहिरावण बात कही । हरिलै हतिहीं दुहुँ भ्रात सहीं॥ इक याम सु औरह धीर धरौ । पुनि धाय विजयःनिरसंक करी ॥ जब भूरि प्रकाश दशौदिशिम । दिनको सम देखि परे निशिम ।। तब जानि लियो ध्रुव काज भयो । अहिगवण ले दुहुँ बंधु गयो ७॥

रामरसायन ।
इहि भांति बुझाय चलो खल सो । दशमाथ सहर्प गयो थल सो॥
महिरावण आय उताल तहां निरखी कपि सैन प्रबंध महा ॥८॥
हनुमंत सुपुच्छ बढ़ाय घनी । चहुँ कोट कियो विच मुख्य अनी॥
सुचमू मधि राम सुबंधु लसे। पुनि संनिध वीर सचेत गसे ॥९॥
कपि ऋच्छ सुयूथप सैन लिये । सहचेत फिरें चहुँ चक्र दिये॥
गति कीट पतंगहुकी न तहां । प्रभुके ढिग जाय सु और कहां १०॥
हनुमंत लँगूर सुकोट चहूं । नहिं काहु दिशा मधि पंथ कहूं ॥
इक पौन तनै ढिग ते मग है । तितहूँ कपि रोपि रहो पग है ।।११॥
महिरावण ठाम अगम्य लखो। तव रूप विभीषणको सुरखो।
द्रुत पौन तनै ढिग जाय कही । कपि राघव जागत हैं कि नहीं १२॥
दुरि भेद लगावन लंक गयो । तिहिते मुहिं आज विलंब भयो ।
प्रभु पास जु वेगहि जावहुँ मैं । सब हाल इकंत सुनावहुँ मैं ॥ १३॥
इमि भापि चलो सु अनंद लहो । निज जानि कळू नहिं कीश कहो।।
हनुमंत भुलायगये छलमें । निरशंकं सुजात भयो दलमें ।। १४ ॥
दोहा-जाय लखे सब दुरिते, राम लपण कपिराज ।।
गज गवाक्ष लंकेश अरु, अपर समस्त समाज ॥१५॥
सहित प्रबंध सचेत बहु, शोभित सब सरदार ॥
अपर पाहरू भालु कपि, निज निज ठौर हुस्यार ॥१६॥
सो लखि महिरावण तबै, काज समै अनुमान ॥
कीनो कामा देविको, मंत्र पठन युत ध्यान ॥१७॥
सो निश्वरमाया विवश, सबही भये अचेत ॥
छाई निद्रा घोर बहु, काहू कडू न चेत ॥ १८॥
तब महिरावण राम ढिग, गयो निशंक उताल |
जाय लखो दुहुँ बंधुको, तनुसुख तेज विशाल ॥ १९ ॥
गुनि कीनो दोउनको तंभन वगलामंत्र ॥
प्रभु मर्यादा पाल सो, सब विधि भये निजंत्र ॥२०॥
माया कार इहि भाँतिसो, अहिरावण हरपाय |
राम लपण हरिले गयो, नभ मग वेगि दुगय ॥ २१ ॥

(४००
रामरसायना
t
।
बहोरि बचे तहँ जे नर नारि । सुते बलवंत. समस्त संहारि॥ १९॥
लिये दुहुँ बंधु सुकंध चढाय । चले हनुमंत अनंद वढाय ॥
प्रमोद भरे अवधेशकुमार । सराहत कीशहि वारहि वार ॥५०॥
लखो पुनि द्वार प्रभंजन लाल । बँधो निज़ पुच्छहि सो कपिवाल॥
दियो तब छोरि दया हिय लाय । कही इत राज करौ तुम जाय५१॥
सुनी मकरध्वज तात रजाय । सहर्प सुराज कियो तहँ जाय ।
उतै दुहुँ बंधहि कंध सुधार । गयो कपि वेगहि सैन मझार ॥५२॥
सुजै रघुवीर कही करि शोर । सुनो कपि भालु उठे चहुँ ओर ॥
लखे हनुमंतहि राम समेत । सचेत भये सब हे जु अचेत ॥५३॥
सहर्ष मिले हनुमानहि धाय । गहे दुहुँ बंधुनके सब पाय ।।
भयो अति आनंद सैन मझार । छयो चहुँ जय जय.शोर अपार५४॥
सुनो दशकंधर हाल समस्त । कियो बहुशोक भयो दुखग्रस्त ॥
कही पुनि तीय धनी विधि ताहि । सिया कहँ देहु सुमानत नाहि ५५॥
इति श्रीरामरसायन र० वि० यु० महिरावण वध
वर्णनो नाम सप्तदशोविभागः ॥ १७ ॥
दोहा-महिरावण वध मुनि अतिहि, सोच विवश दशभाल ॥
खेद रोप युत प्रातही, आयो सभा उताल ॥ १ ॥
व्यग्रचित्त इत उत लखत, बैठो मौन उदास ॥
कर कपोल छिन शीश धरि, हग भरि लेत उसास ॥२॥
सो विलोकि बहु वीर वर, उठि बोले कर जोर ॥
होय रजाय सुजाय हम, समर करै अति घोर ॥३॥
राम लपण प्रभु अनुज युत, सह सुकंठ हनुमान ॥
सबकर करि संहार पुनि, वेगि लखें पदआन ॥४॥
सो मुनि हिय कछु धीर धरि, दशमुख आज्ञा दीन ।
मुख्य वीर ले भूरि दल, साजि गमन हृत कीन ॥५॥
तिनहि निरखि कपि भालु भट, धाये तरु गिरि धार ।।
भयो समर अति घोर चहुँ, हाहा होत पुकार ॥६॥

रामरसायन । (४०१) प्राणआश तजि रौनिचर, परे अनी विच धाय ।। मारि विडारे भालु कपि, लिये घने गहि खाय ॥७॥ विकल भयो कपि ऋच्छ दल, भभरि भगे तजि धीर ।। जाय पुकारे राम ढिग, पाहि पाहि रघुवीर ।। ८॥ तब रघुवर धनु साजि हुत, धाय हने बहु बान ।। राम नराचनते व्यथित, निश्चर दल विचलान ॥९॥ पुनि धरि धीर सु रजनिचर, धाये एकहिबार ।। तिनहिं राम ते रामपर, किय बहु शस्त्र प्रहार ॥ १०॥ राम गंधरव अस्त्र शर, छाँडो परम प्रचंड ।। जाते कोटिन रजनिचर, होन लगे शतखंड ॥११॥ पुनि रघुवर कौतुक कियो, प्रगटे रूप अपार ॥ इक राक्षस प्रति राम इक, वाणन करत प्रहार ।। १२ ।। प्र०वा ।।यु० का० ॥ स० ९४ ॥इलो० ॥ ते तु रामसहस्राणि रणे पश्यन्ति राक्षसाः ॥ पुनः पश्यन्ति काकुत्स्थमेकमेव महाहवे ॥१॥ दोहा-यातुधान सो चरित लखि, चकित विकल अकुलाय ॥ बहुरि छिनक मधि देखहीं, लरत एक रघुराय ॥ १३ ॥ यहि विधि श्रीरघुवीर वर, निश्चर सुभट जुझार ॥ युग पटिका पदहीन मधि, किये सफल संहार ॥१४॥ देलख पदचर अयुत स्थ, वसु दश सहस मतंग ॥ सहस चतुर्दश वाजि वर, इक इक यूथपसंग ॥ १५ ॥ इमि यूथप अति मुख्यवर, सहस कोटि वलधाम || तिनहिं सदल पूरख कथित, वध कीने श्रीराम ॥ १६॥ निरखि विजय जय शोर भो, लखि प्रभुवाण प्रभाव ॥ चकित चित्त हनुमंत सों, वृझी निश्चरराव ॥१७॥ कही वीर रघुवीर शर, कदत तृनते एक ॥ कद्दा हेत सो जायक, निश्वर हनत अनेक ।। १८॥

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रामरसायन। (४०३) निज सैन निहारी मुदित सुरारी कहत राम कह बाता।। दोऊ धनुधारी सह कपि झारी करिहौं आज निपाता ॥७॥ स्पंदन शंत लक्षा गज दश लक्षा पदचर अगणित घोरा ।। खर ऊंट तुरंगा सजे सुटुंगा तीसहि तीस करोरा ॥ इमि सेन मझारा रथ असवारा दशमुख कीन पयाना ।। ताछिन चहुँघाई परे लखाई अशकुन भये जु नाना ॥ ८॥ दोहा-इत रावण आगमन सुनि कीश भालु वरि बंड | चले सजग है समरहित, लै तरु कुधर प्रचंड ॥९॥ उत रावण इत राम दल, प्रवल अभंग अपार ॥ चले दुहूँ दिशिते दुहूँ, सहि न सके महिभार ॥ १०॥ घनाक्षरी-कवित्त । स्पंदन सवार है अपार रत यातुधान कवच मढे हैं अंग नख शिख झफि झंफिरिसिकविहारी इतभालु कपि भारीभीर चलत चमूके धूरि पूरि भानु छफि छफि॥ दोऊ दल भार भूमि डगमग होत चहूँ दिग्गज सु दव्ये पग्ग शुंडनते चंफि फिजिोरते सहस्र शीश जोरत फनीश तऊ वोझनते बार वार जात फन लंफि लंफि ॥ ११ ॥ चर्षिया छंद। आवत दशशीशा लखि भट कीशा धाये करि अतिरीमा । सो कोपि विदारा कपि दल मारा गहि धनु शर भुजवीसा ।। पुनि निश्वर नाना बहु बलवाना ऋच्छ पूवंगम खाये । निज प्रभुवल पाई चहु दिशि धाई शबन मारि गिराये ॥ १२॥ मो लखि कपिराजा बल कार गाजा गहि तम कुधर अपारा ।। निधरन प्रहारे हति महि डार मर्दन रिपुदल मारा ।। फरि क्रोध तमीचर कीशपतीपर वपशिघ्र बनेरे ॥ ते मयधरि भजे पुनि खल गंज बालिबंधु नहुँ फेरे ॥ १३॥ मो-निरखत निजदलशाल, विरूपान योषा प्रबल । परिय, कोप फगर, तजिन्य गज आस्ट भी ।। 5211 भज्जही ।। ४०॥शक्ति सो प्रचंड राम बंध हीय छेदिगी ।। पातभे ॥धीर धार औसरै विचार प्राण ऊबिकै ॥४१॥ वेगही/ शक्ति भंजिकै वहाय दी। भूरिभारचंड देवदत्तसों नशायदी। सुराम-शक्ति भंगकी नतौ लगे ॥ शालि दीन लंकनाथ (४०६) रामरसायन। स्पंदन ॥ मारहूँ समेत सेन आज राजनंदन ॥ यी चलाय . वीस हथ्य चाप वानले ॥ घाल घाल तीर वीर वीरडार देखि लंक ईश रीस कीश युद्ध तनिक ॥ त्राहि त्राहि बोलही पास भजिकाजानिक सुरारिचंड दोउ बंधु क्रुद्ध वै ॥चाप बाण सा- जिक सुरारि भे निरुद्ध ह॥३शविगते प्रचंड वाण दोउ वीर छंडहीं ॥ यातुधान ईशके समस्त शस्त्र खंडहीं ।। वीसवाहु बाहुलाघवी पर न नेकह ॥ कीन जे प्रहार ते बचे न तीर एकहू ॥ ३४ ॥ फेरि लंकपाल पे तजे प्रचंडवानजे ॥ सोउ खंडि खंडि कीन रेणुकी समानते॥यातुधान वीरके सु अंगतीर छोदिगोदोउ भ्रात गातमें प्रचं डमंडभेदिगे ॥३५॥ कौशलाधिराज निश्चराधिराज क्रुद्धमे।।दोउभेनि रुद्ध उद्ध युद्ध अस्त्र युद्धमें ॥ लंकनाथ राम अस्त्र शस्त्र भंजि डारहीं ॥ राजपुत्र तासु अस्त्र शस्त्रते सँहारहीं ॥ ३६ ॥ सर्व अत्र शस्त्रमें प्रवीन दोउ वीर हैं । युद्धमें प्रबुद्ध में सु दोउ वीर धीर हैं। काहु के न अस्त्र काहु काहु पै प्रचंड भी रहे समान जो अखंड खंड मंड भेढि रहे समान जो अखंड खंड मंडभे॥३७॥हरिकै अनंत बै सरोष बाण छंडिकै॥ सूत केतु चाप तासु डारि दीन खंडिकौतासमै विभी- पणौ गदा प्रहार धायकै ॥ रथ्थ वाजि मारि दीन भूमिमें गिरायकै । ॥३८॥ देखि सो सुरारि शक्ति बंधु पै प्रहारकीन ॥ ताहि भंजि वाणते जु राम बंधु डारदी ॥ कोपि लंकनाथ यों अनंत सों तबै कही ॥ क्यों बचै विभीपणे सु मृत्यु आपनी चही ॥ ३९॥ भापि यों सुरारि ब्रह्म दत्त शक्ति धारिक । कीन्ह सों प्रहार राम बंध पै प्रचारिकै ॥ तास भंग हेतु लै अनेक बाण तज्जही ॥ पै अभंग है उदंड शस्त्र नाहि विहाल दै सुभूमि मध्य भेदिगी ॥ देखि भ्रात घात राम शोकसि रामरसायन। (४०७) वाण अंगसों लगे ॥४२॥ फेरि राम बंधुको सुखेन बोलि सौंपिक। रावणै प्रहारकीन भूरि वाण कोपिकै । लंकपाल वीर तीर शक्ति शुल धालही ॥ होत है विहाल है सचेत शस्त्र शालही ॥४३॥ तासमै प्रचंड घोर शोर भो अपारही ) कोश भालु यातुधान मर्दिकै वेदारही । औधनाथ लंकनाथ दोउ क्रुद्ध छै गये।कै अराम के भरावणे यही लै लये ॥ ४४ ॥ राम कोपि कोपिकै प्रचंडवान जे हने । ते समस्त लंकनाथ गातमें विधे घने तासमै निशाचरेश हीयमें विचारही । हौं करौं जु युद्ध कोउ तीर ये निसारही ॥ ४५ ॥ ता समै जु रामचंद्र बंधुनेह लायकै ॥ कीन यों विचार भ्रात देखि आउँ धायकै ।। फेर हौं सुरारिको सुरारि ठान मारहूँ ॥वेगि भंजि याहि भूमिभारको उतारहूं ।। ४६ ।। यों विचार ठानि रामबंधु पास धायगे ।। देखिकै विहाल क्रुद्ध बुद्धिसों भुलायगे॥ तासमै सुलंकनाथ औसरै निहारिक ॥ है अलक्ष गो उताल धामको सिधारिक ।। ४७॥ दोहा-जाय लंकपति लंकमधि, बैठो रहसि निकेत। रामसायकन व्यथित सो, दाह उसाँस न लेत ॥१८॥ ताछिन तिहि मंदोदरी, समुझायो पुनि भूर ।। कही कंत अजहूं भली, करी सकल हट दूर ॥ १९॥ सियहि साथ लै नाथ द्रुत, मिलहु जाय रघुनाथ ॥ जाते ही आनंद मय, प्रभुयुत रहाँ सनाथ ।।५०॥ सुनि दशमुख मंदोदरिहि, गहि लाई निज अंक ।। बहु विधि धीर धरायक, कहे बैन निशंक ॥५१॥ ही जानी सब भामिनी, पहें अकथ सुभेद ।। युद्धकियेही मोर भल, हह करो न खेद ॥ २२॥ तब वोली तिय लखटु पिय, अव कद जयकी आश। कुंभकर्ण घननादसे, समरथ भये विनाश ॥५६॥ पंच पुत्रको नाम सुनि, दशमख भान जलनन । पुनि बहु कोप बटायर्क, भापे उड़त वन।।2।। हरी अपही द्रुन जापर्क, करि मख निमसार । १ . कालनेमि भो मृतक तुरंता * कियो गमन वेगै हनुमंता ।। ८९॥ हेरो कछु न व्योम अंधियारा तब ताक शब्दवेध शर मारा।। बिन फल सायक लगत तुरंता गिरे भूमि नगयुत हनुमंता॥१२॥ गिरत कीश कह हा सिय रामा सुनि धाये भूपति बलधामा कपिहि भरत बूझोलखि हालासा सूक्षम सब कहो उताला ॥२३॥ सुनि कैकयीसुवन पछिताने सुमिरि लपण सिय प्रभु दुखसान। कुसमय जानि धीर उरधारी गदगद कंठ सु गिरा उचारी॥९॥ राठि वठो ममवाण पर, भेजा अतिहि उताल ॥ ९५॥ लें परीक्षा किमि चल,शर गिार युत ममभार ॥ ९६ ॥ (४१०) रामरसायन । पुनितुम जात काज सो जानौं र सुनौ सत्य भवितव्य बुखानों मरै लंकपति प्रभु जै पैहैं * निश्वर नाथ विभीषण है हैं॥८३ सोसुनि कपि आनंद अघाना पुनि मुनि प्रति भापी हनुमाना। तृषा विवश मो चित्त अधीरा* आयसु होय पियौं शरनीरा।।८।। सो सुनि कही करौजलपाना आवो वेगि कहौं कछु आना। गति भविष्य युत विशद चरित्राकपि सुनि लैयो कथा विचित्राट सुनि सानंद वेगि सर आई * पैठि पियो जल सरस अचाई ॥ ताछिन तहँ मकरी इक धाई गहि लीनो कपिपद वरियाई॥८६॥ कपिअकुलाय दाबि तिहि दीनी भई मृतक सो परम मलीनी ।। पुनि वह दिव्य नारि वपुधारी गई गगनवर गिरा उचारी ॥८७॥ है कपि यह निश्चर मुनि नाही * बैठो छलन हेतु तुम काहीं॥ सो सुनि हनूमान रिसलाई * कै करालवपु पुच्छ बढ़ाई ॥ ८८ ताहि लंगूर लपेटि उठाई * करि बल पटको भूमि भमाई ॥ जाय देखि गिरिकीन विचारा* हेरत औषधि लागै वारा। यौं गुनि कुधर वामकर धारा धाये नभपथ वेग अपारा ॥ ९०|| मारगव्योम अवध ढिग आये प्रलै पौन सम वेग जु छाये॥ सो सुनि भरत उठे अकुलाई रैनि समय लखि नभ चहुँघाई९ दोहा-व्यथित भये इहि हेतुते, गिरि युत अंजनिलाल ।। सो सुनिक कपि चकित है, मनमहँ कीन विचार ।। - - - रामरसायन। (४११) . " यौ गुनि गिरि युत पवनसुत, बैठवाणपर आय ।। तबहिं भरत शर धनुप घर, चाहो देहुँ चलाय ।। ९७ ।। लखि अपार बल भरतसों, कही वेगि हनुमान ।। प्रभुन परिश्रम कीजिये, जैहौं वाण समान ॥ ९८ ॥ कपि हिय रुचि लखि भूप तव, दीनी वेगि रजाय ।। लैगिरि कर कूदे गगन, भरत चरण शिरनाय ॥१९॥ उत रघुवर लखि लपणको, विलपत करत विचार ॥ रैनि चली आयो न कपि, कहा लगाई वार ।। १००॥ नंदग्रामते तासमे, गिरियुत पवन कुमार ॥ नभमगाघटिका अर्ध मधि, आये सैन मझार ।। १०१॥ लखि हनुमंतहि गिरि सहित, मुदित भये रघुचंद ।। अपर भालु कपि सैन सब, लहो परम आनंद ।। १०२॥ तब सुवैद्य ले औषधी, लपणहि सविधि सुँघाय।। करतहि सो अमानके, उठे वीर हरपाय ।। १०३।। मिटे सकल व्रण तुरतही, दूर भई सब पीर ॥ विरुजहेरि वर वन्धु बहु, सुखपायो रघुवीर ॥ १०४॥ प्रेम सहित वर अनुजको, लीनो अंक लगाय॥ पुनि बोले हनुमंत सों, 8 अधीन रघुराय ॥ १०५॥ घनाक्षरी पवित। प्रथम सुकंट ते मिलायो सिंधु नांघो सीय शोधी दल ज्यायो निज नैनन निहारो में ॥ रसिकविहारी महिरावण ते लायो इमि भृरि सवही ते यह अधिक विचारो मैं || तुब उपकार, अनेक प्राण पंच एक प्रति उपकार हेत सो ती वारि डारो मैं ॥ येहो हनुमान बल वानहीं वखानी सत्य आज ते रहों गो सदा ऋणिया तिहारो में १०६ भ० ॥ हनुमन्नारंक ॥ शोकः ।। एककस्योपकाराणां प्राणान्दास्यामि ते कपे॥ प्रत्यक्ष क्रियमाणो वै शेषस्य ऋणिनो वयम् ॥ १॥ दोहा-सुनि प्रभु बैन समीरसुत, गहे राम पद धाय ।। फरी विनय बहु राजमुत, कपिहि लियो टर लाय १०७॥

(४१२) रामरसायन। पुनि रघुवीर सुखेन को, कीनो मान वखान ।। बहुरि हिये रुचि जानिक, दियो अभै वरदान ।। १० पुनि प्रभु रुख लखि पवनसुत, गिारे अरु सगृह सुपेन निज निज थल दुहुँ धरि तुरत, आय गये मधि सैन अपर भालु कपि जे रहे, पीड़ित मृतक शरीर ॥ शैल पवनके परशते, विरुज उठे सव वीर ।। ११० उठि बोले सव राम जै, जैति लपण वर जोर।। जै कपीश हनुमंत यों, करें भालु कपि शोर ॥ १११ रसिकबिहारी मुदित अति, रहे सकल सुख पूर॥ राम कृपा ते वै गये, तन मनके दुख दूर ॥ ११२॥ इति श्रीरा० २० वि० यु० रावणयुद्धकालनेमि वध वर्णनो नाम एकोनविंशोविभागः ॥११॥ दोहा-रैनिसमै उत दशवदन, कालनेमि पठवाय ।। करनलगो मख सविधि वर, वेगि यज्ञ थल जाय ॥ यज्ञ करतही कपिनको, सुनो सु जै.जै शोर ।। . जानि गयो ले औषधी, आयो कपि वरजोर ॥२॥ ताही छिन चर आय के, वर्णन कियो समस्त ॥ सुनि रजाय दीनी तबै, वर दल सजै प्रशस्त ॥३॥ मध्य दिवस अभिजित समै, संयुत सकल सुसाज ॥ मुख पूरण करि वेगही, चलि हति हौं रघुराज ॥ ४ ॥ यौं रजायदेके सविधि, करन लगो मख फेर । मद आमिप अज कृष्ण युत, मंत्रन आइति गेर ॥ ६॥ उत निश्वर साजन लगे, वाहन कवच हथ्यार। भयो शोर चहुँ ओर अति, लंका नगर मझार ॥६॥ निज निज दल सजि यूथपति, जुरन लगे सव आन । रंग रंग फहरात ध्वज, गर्जत धुमरि निशान ॥७॥ ताछिन भेद मँगाय के, बेगि विभीषण जाय ।। कही रामलों मख कर, याछिन निश्वरराय ॥८॥ 1 r रामरसायन। (४१३) सो प्रभु वेगि पठाइये, हनुमानादिक वीर ॥ करैं जाय विध्वंस मख, छूटै दशमुख धीर॥ ९ ॥ मध्य दिवस मधि धायहै, समर हेत मम भात ॥ याते मख विध्वंस भल, अवहीं समय प्रभात ॥१०॥ सुनि रघुवीर सुकंठ सों, कही वेगि भट जाय ।। करै लंकपति यज्ञ सो, डारै सकल नशाय ॥ ११॥ सो०-ताही छिन कपिराज, ऋच्छराजके संग करि॥ भट कपि भालु समाज, भेजे समर सुधीर बहु ।। १२ ।। चले सुभट कपि ऋच्छ, हनुमानादि प्रवीन अति ॥ सकल युद्ध गति शिच्छ, अस्त्र शस्त्र निर्भय निपुण ॥१३॥ समर वाजने घोर, वजत शोर चहुँ नगरमें ॥ भालु कीश वरजोर, है सकोप धाये सपदि ॥ १४ ॥ घनाक्षरी-कवित्त। डंकाकी धुकार मुनि लंकामें मुहका करि कूदे कपि भालु दे फलंका भिरे जूटि जूटि ॥ निरखि निशंका रजनीचर सशंका भये बंका वीर हाथते हथ्यार गिरे छूटि छूटि॥ रसिकविहारी कहै राम जै उतका सबै ढंका दै ढहाये भौन भका परे टूटि टूटि । शोणित की पंका पाय छंका काक कंका धाय धाय खाय रंका औ मलंका धरै टि लुटि ।। १५ ।। तामरछंद। इमि भालु कीश प्रचंड । करि प्रवल रिपु दल खंड ।। गे यज्ञशालहि धाय । देखो मुनिश्चरराय ॥ १६॥ चहुँ बहु प्रबंध समेत । मख करत चैट निकेत ॥ लखि भालु वानर धाय । भट भिरे निश्वर आय ॥ १७॥ शर शक्ति परिच कृपान । दुम उपल मब अरु जान ।। दुहुँ ओर होत प्रहार । भट गिरत भूमि मझार ॥ १८॥ अमृतध्वनिलंद। उद्धत मरकट विकट भट झपट तर पर छह ।। हिय हरपत धरपत सल न दाखत वापत माल।

हे कालवश दशभाल। तिन निदार जात उताल ॥२९॥ रुधिर सिक्त महि पतन भाग लखो निकट दशकंध ॥३०॥ (४१४) रामरसायन। मल्टन गंजत भल्लन भंजन हहन करि कार ॥ . लथ्थन रद्दत मथ्थन मद्दत हथ्थन धरि धरि ॥.. कट्टत दंतन फट्टत अंतन दट्टत. रुद्धत ॥ भज्जत रिपु बल छज्जत कपि दल गजत उद्धत ॥ १९॥ तोमरछंद। मि सकल दल बिनशाय । कपि भालु पुनि रिस लाय।। खशाल दीनढहाय । नहिं उठो निश्वरराय ॥२०॥ ढि मंत्र आहुति देत । सो अनत चित्त न देत ॥ ब पौननंदन कूदि । गहि लियो तिहि मुख मंदि।॥ २१ ॥ लि चरणते सव साज । कीनो सुघोर गराज ॥ शुनि अपर ऋच्छ सुकीश । धाये चहूँ करि खीस ॥२२॥ देय अनल कुंडहि फोरि । साकल्य सकल विथोरि ।। ल मूत्रःकरि करि भूर । सो यज्ञ थल चहुँ पूर ॥ २३ ॥ नि वीर वर हनुमान । तिहि हनो इकतल तान ॥ त धाय कुपित रिछेश । गहि लीन दशमुख केश ॥ २४ ॥ वण तबै अकुलान । गहि लीन दुहुँ बलवान ।। दि पकरि पटकन चाह । तब तिन मरोरं सुबाह ॥ २६ ॥ बुज मुरत तिन दिय छोरि । ते दंत नखत न.छोरिः। तहते उछलि प्रभुपास । आये सदल सहुलास ॥ २६॥ शिकंठ किय अनुमान । अब नहिं बचै मम प्रान ॥ गुनि धीर धरि बलवंत । लै विशिख शस्त्र अनंत ॥२७॥ नु वसन भूषण धार । स्यंदन भयो असवार ॥ चतुरंग सैन अपार । लै चलो उत्तर द्वार ॥२८॥ तेहि समय मधि चहुँ ओर । बहु होत अशकुन घोर ॥ होहा-गिरो गिद्ध ध्वज यान पर, अरु इकश्वेतकबंध ।। शोणित वरपो व्योम ते, भयो भूर भू कंप॥

रामरसायन।
(४१५)
घोर पवन रजते तरी, गई दशौ दिश झंप ॥३१॥
विजुपात भो मेघ विन, प्रगटी पावक ज्वाल ॥
मृग लोवा अरु श्वान खर, रोदन करत शृगाल || ३२।।
पंथ चलत महि अरुझिकै, गिरे यान भट भार ।
बहुरि आपही ते सहज, करते खसे हत्यार ॥ ३३ ॥
चलें न वाहन रुकत सब, पुनि भट मुख रति हीन ।।
दीन चित्त गदगद गिरा, भये अंग वल छीन ॥ ३४॥
विन घन झंपो भानु नभ, फरक वाम भुज नेन ।
पुनि पुनि बोलहिं लूक अरु, शिवा सृगाल डरै न ॥३५॥
पल आहारी द्विज फिर, ऊपर मंडल वाम ।।
पुनि दक्षिण मुख केतु पर, बैठो गिद्ध निकाम ॥ ३६॥
वोर गर्जना मेघ कर, पशुरथ त्यागि परात ॥
कसा सारथी हाथते, वाहत भो महिपात ॥ ३७॥
गिरो ध्वजा रथ शिखर महि, वाहन दृग जल जात ।।
गर्दभ दरशो कूर स्वर, मन्मुख शोर करात ॥ ३८॥
सन्मुख आयो रिक्त घट, शुष्क काप्टको भार ॥
तिय विधवा अरु नग्न गज, रुदन करत शिशु चार ॥३९॥
विप्र लखो इक नैन को तेलकार घटकार ॥
तीन मिले ब्राह्मन बहुरि, रोवत तिया अपार ।। १० ।।
बहु पक्षीगण पल भपी. शीशन पे मडरात ।।
चुंच हनत वैठत भजत, वाहन भभरि परात ॥११॥
इनहि आदि अशकुन विविध, लरखे सुरारि प्रबुद्ध ।
मो न गिर्न कछु मृत्युवश, भो अबुद्ध भार कृद्ध ॥ ४२ ॥
तोमर एं।
इमि यातुधान प्रचंड । करि कटे शोर रदंड ॥
सब करत जै दशमाय । जति निश्वरनाथ ॥१३॥
लखि दरित रिपुमन । पद गम गजित नन ।
इहि रंक नगर मझार । ईवीर को नादि पार ॥१२॥

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रामरसायन। (४१७) " सो सुनि कही रघुवीर । हे लंकपति छल वीर ॥ क्यों करहु मिथ्यहि गर्व । है विदित तव बल सर्व ॥ ५९॥ जब हरी सीतहि चोर । तब गयो वल किहि खोर ॥ अव करत बात बढ़ाय। निज सुयश निज मुख गाय ॥६०॥ हो आज दृढ प्रण ठान । नहिं बचहि अब तव प्राण ॥ हो सकल छलबल जौन । दुरशाव वेगहि तौन ॥ ६॥ दोहा-राम वचन सुनिकै तवै, हँसिभासी दशमाथ ।। हौं याही हित ठानिक, युद्ध करों तुव साथ ।। ६२ ।। हो साँचो रावण जु पै, हो साँचे तुव राम ॥ दुहुँ प्रभाव साँचो अवै, लखो परे इहि ठाम ।। ६३॥ कै हौं तुमहि सहारिकै, अवहीं होत विशोक ।। कै रणमें तनु त्यागि कै, वसों जाय सुरलोक ।। ६४ ।। सो०-तव सुनिकै रघुनाथ, भापी मृदु मुसक्यायकै ।। तुव छल निश्वरनाथ, हौं जानो सव हीय को ॥६५॥ याते तुव रुचि जोय, समर मरनकी है सु अब ।। वेगहि पूरित होय, जो न जाहु रणभूमि तजि ॥६६॥ तोमर छंद। मुनि राम बैन मुरारि । करि क्रोध बंक निहारि ।। करिवेगि धनु शर धारि।धायो प्रचंड प्रचारि॥६७॥ किय अमित वाण प्रहार । भंजे सु राजकुमार ॥ तिन खंडि अतिहि उताल । सायक तजे रघुलाल ।। ६८॥ लाघव दशानन वीर । खंडित किये सर तीर ।। इमि दोउ दुहुँ बलवान । हठि हनत अगणित वान ॥ ६९॥ तिहि समय युद्ध निहार । चहुँ होत जति पुकार ॥ सुरपाल यह चित दीन । हैं राजसुत रथहीन ।। ७०॥ तव मातलीहि बुलाय । दीनी उताल रजाय॥ तुम वेगि मम रथ माज । लै जाहु हिंग रघुराज ॥७१॥ मुनि सूत सहित उमंग । सजि स्थहि हरित तुरंग ॥ यदु शस्त्र विशद विशाल । भेजे प्रभुहि सुरपाल ।। ७२ ॥

(४१६) रामरसायन। पुनि भूरि अचरज और । देखो परै इहि ठौर ॥ जैसे नशे रण माहिं । तैसे बहुरि दरशाहिँ ॥ ४५ ॥ सुनि राम बैन उताल । भाषो बिभीषण हाल ॥ कह लंकपति पुनि ईश। है एक इक दशशीश ॥ ४६॥ अरु भूरि-निश्चर आन । बहु रूप नाम समान ॥ हैं एक सरिस अनेक । जिन माहि भेद न नेक ॥ १७ ॥ इमि लंकपति रघुराज । कह निरखि लंक समाज-॥ ताछिन भयो अतिशोर । धाये निशाचर घोरं ॥४८॥ सो सुनि उठे रघुनाथ । सजि वेगि धनु शर भाथ ॥ लछमनहु चाप निपंग । धारण लगे निज अंग ।। ४९ सो लखि कहीरघुराज । तुम युद्ध करहु न.आज॥ सुनि बंधु कह कर जोर । यह नाथ धर्म न मोर ॥ ५० बोले बहुरि रघुवीर । हौ बंधु अति रणधीर ॥ पै हौं करौं प्रण आज । ध्रुव हतौं निश्चरराज ॥५१॥ याते सु जाय अकेलं । हों करों युद्ध सकेल ॥ हैं भालु कपि बहुवीर । हनुमंत आदिक धीर ।। ५२ ।। उत सदल इक दशमाथ । इत सदल इक रघुनाथ ॥ जो लरिय मिलि दुहुँ भाय । तो आज उचित न आय॥ इमि राम दृढ़ प्रण ठान । किय गमन सजि धनुवाण ॥ भट कीशभालु अपार। धाये कुधर तरुधार ॥५४॥ रामहि निरखि दशभाल कर वीस लोचन लाल || सन्मुख मुआय उताल । वोलो सकोप कराल ॥५॥ हे गजमुत रणधीर । ही भानुवंश मुवीर ॥ पुनि अव शस्त्र प्रवीन । सब भाँति ही लखि लीन ।। ५६ प मोरगरण नाम । जानो भली विधि राम ॥ ही नुमहिं अब यमलोक । पठवाय होत विशोक ।। ५७ ॥ यांने प्रथम तुम भृर । कार लेहु निज बलपूर ॥ अभिन्याप तुम न रहाय । तब लखो मम यल आय ॥ ५५ रामरसायन। (११७) सो सुनि कही रघुवीर । हे लंकपति छल वीर ॥ क्यों करहु मिथ्यहि गर्व । है विदित तब बल सर्व ॥१९॥ जब हरी सीतहि चोर । तब गयो बल किहि खोर ।। अब करत बात बढ़ाय । निज सुयश निज मुख गाय ॥६॥ हौं आज दृढ प्रण ठान । नहिं बचाहि अब तव प्राण ॥ हो सकल छलबल जौन । दरशाव वेगहि तौन ॥६॥ दोहा-राम वचन सुनिकै तबै, हँसिभासी दशमाथ ॥ हौं याही हित ठानिक, युद्ध करों तुव साथ ॥ ६२॥ हों साँचो रावण जु पै, हो साँचे तुव राम ।। दुहुँ प्रभाव साँचो अवै, लखो परै इहि ठाम ॥ ६३ ॥ कै हौं तुमहि सँहारिकै, अवहीं होत विशोक ।। कै रणमें तनु त्यागि कै, वसों जाय सुरलोक ॥ ६॥ सो-तब सुनिकै रघुनाथ, भापी मृदु मुसक्यायकै ॥ तुव छल निश्वरनाथ, हाँ जानो सब हीय को ।। ६५ ।। याते तुब रुचि जोय, समर मरनकी है सु अव ।। वेगहि पूरित होय, जो न जाहु रणभूमि तजि ॥६६॥ तोमर छंद । मुनि राम वैन मुरारि । करि क्रोध बंक निहारि ।। करि वेगि धनु शर धारि । धायो प्रचंड प्रचारि ॥ ६७ ।। किय अमित वाण प्रहार । भंजे सु राजकुमार। तिन खंडि अतिहि उताल । सायक तजे रघुलाल ॥ ६८॥ लाघव दशानन वीर । खंडित किये सब तीर ॥ इमि दोउ दुहुँ चलवान । हठि हनत अगणित वान ॥ ६९ ॥ तिहि समय युद्ध निहार । चहुँ होत जति पुकार ॥ सुरपाल यह चित दीन । हंगजसुत रथहीन ।। ७० ॥ तब मातलीहि बुलाय । दीनी उताल रजाय॥ तुम वेगि मम रथ साजाले जादु दिग रघुराज ।। ७१ ।। सुनि मृत सहित उमंग । सजि स्थाहि हरित तुरंग ।। बहु शस्त्र विशद विशाल । भेजे प्रभुदि मुरपाल ॥ ७२॥ - २७ । तिहि समय दुहुँ दल युद्ध । अति होत अनुपम उद्ध ॥७९॥ टिकत न वीरनके प्राण रण भूमि मध्य ऋद्ध युद्ध रुद्ध उद्द युदत गये अघा ॥ इए वल पाय फेरी प्रवल वरिष्ट भिरे झुंड झुंड एंड मुंड -गिरत दुहूँ जघा । यातुधान कपिन कपिद गहि यातुधान भंजत में माय फारि फेकत अनीनघा॥ चारहू दिशान वान वरपत आनन दोउ दल उदयों कुद्ध अवरुद्ध ह करहि वहु युद्ध नहि शुद्ध प्रानकी ॥ दंत कट कटत भट भालु मर्कट विकट कटत फिरि अन (४१८) रामरसायन । सो सहित स्यंदन लाय । रघुवीरही शिरनाय ॥ करि विविध अस्तुति गूढ । कह होउ प्रभु आरूढ ॥७३॥ सुनिकै प्रदक्षिण लाय । पुनि स्थहि शीश नवाय ॥ बैठे सु दशरथ लाल । युत कवच शस्त्र विशाल ॥७४ ॥ तिहि समय व्योम मझार । सुर लखत समर अपार ॥ रामहि रथी अविलोक । भे सकल भक्त विशोक ॥ ७॥ दशवदन हेरि रिसान । शर छाय दशहु दिशान ।। दिय राम स्यंदन झंप । तिहि समय भो महि कंप ॥ ७६ ॥ तव आनिशर रघुवीर । तजि किये भस्म सुतीर ॥ कपि भालु चहुँ दिशि धाय । दिय अपर दल बिचलाय ॥ ७॥ पुनि यातुधान प्रचंड । गहि विविध शस्त्र उदंड ॥ कीशन सुऋच्छन मार । तरु कुधर तेउ प्रहार ॥ ७८॥ भिरि राम रावण वीर । वहिं अपार सु तीर ॥ घनाक्षरी-कवित्त । कि भुज दंड वीर प्रबल प्रचंड भिरे उद्धत विरुद्ध रुद्ध क्रुझदल दंडि दंडि । अमृत सुभट्ट औ दपट्टत उचट्ट चट्ट भट्टन के ठट्ट ५ कदृत हैं खंडि खंडि । हथ्थ लथ्थ हथ्थनते मथ्थ गथ्थ. " .. मथ्थत समथ्य पथ्थलेत रथ छडि छडि । रसिकविहारी राना जैति जै उदंड शोर छावै नवखंड नभमंडलमें मंडि मंडि ।। ८० रसिकविहारी झरि लाई हैं मनो मघा ॥ ८१ ॥ दंडक। क रामरसायन। (४१९) जै रटत बलवानकी ।। गजन गज मर्दक स्थन रथ गर्दकै वाजि वाजीन हनि शस्त्र शस्त्रन दलें ॥ रुंड रुंडन झटकि मुंड मुंडन पटकि झुंड झुंडन झटकि चापि कर पद मलैं॥ ८२ ॥रेनिचर चंड शर शक्ति कर खंडते कीश ऋच्छन सु उदंड खंडित करें । उच्छलत पुच्छ गुच्छाहि धरि धरणिमें पटकि तिन पट्ट शिर कट्ट प्राणन हरें।होत यों समर थर हरत घर घर धरा रुधिर धारा तबहिं धरणि नहिं मावहीं शीश कर चरणके ढेर चहुँ फेर ते बहुलरनभूमिमें मेरुसे छावहीं 1८शा खग्गगण मुदित नभ मग्ग द्वैधायके मुंड कर पग्गले सग्ग उडि भग्गहीं। योगिनी वृंद सानंद ना सुभारिखप्परन रुधिर करि पान अनुरगहीं। शोर चहुँ वोर छाई कबंधन धरा छिनहि छिन उठत फिरि गिरत लरि गजिकै ।। प्रबल निश्चरन दल दलत कपि ऋच्छ भट सवल अरु अबल भज्जत समर तजिकै ॥ ८४ ॥ यातुधानेश लखि सवल दल विचल निज भालु कपि छलन हित प्रबल माया ठनी ।। अमित हनुमंत सुग्रीव अंगद लपण प्रगटते आपनी आप पाल अनी ।। ऋच्छ वानर भये चकित तब रैनिचर निधन किय तिनहिं अवकाश लहि ता घरी ।। वीर रघुवीर सो हरि अति वेगही एकही तीर ते सकल माया हरी ।। ८५ ॥ फेरि वह कोपि के धाय रथ लाय दिग राम निज चंड कोदंड मंडित लियो ॥ सायकन घाल बलशाल दशभालको सहित धनुवाण तनत्राण खंडित कियो । क्रोध भरि चाप लै आन तिहि तान के लंकपति अमित शर आतुरी ते हने ।। सर्व रघुवीर ते तीर निज तीर ते भजि पुनि तासु तनु तीर वेधे घने ॥ ८६॥ हरिगीतिका लंद। तव क्रोध भरि दशभाल ठानो अस्त्र युद्ध अपार सो॥ रघुवीर ते सव भंजि डारे कीन अमित प्रहार जो॥ पुनि लंकपति शतवाण मारे भो विकल सुर सारथी ।। कर धार तिहि वेग उठायो रामचंद्र महारथी॥ ८७॥ जो लग उठायो राम सूतहि दशवदन तौलग घने । • शर घालि रथको केतु काटो वेगि चहुँ वाजी हने ॥

फिर लागि वरपै आगि सव भट भागि प्रभु शरणे गये ॥ ११॥ बहुँ ऋच्छ कीशन भक्षिवे हित धावहीं मुख फारिकै।। ९२॥ ते धारि तरु गिरि उपल रामहि धाय चहुँ दिशि ते हने || ९३१॥ तरु शैल हानि हनि निश्वरन पुनि भालु कपि गंजन लगे।। दंतन नखन तल मुष्टि लातन कोपकार भंजन लगे ॥ ९॥ (४२०) रामरसायन। लखिके तुरंगहु राजपुत्र सँभारि स्यन्दनमें सजे ॥ ताही समै भुजवीस राघव गात पै बहु शर तजे ॥ ८ ॥ रघुवीर कछु दुख पाय पुनि कै सजग वाणन बँडिक ॥ . रथ सारथी ध्वज वाजि तासु नशाय डारे खंडिकै ॥ द्रुत आन स्यन्दन बैठि घालो घोर शुलप्रचारि कै॥ रघुवीर सुरपति शक्ति छोडी भस्म दुहुँ दुहुँ जारिकै ।। ८९॥ पुनि क्रोध कर शरतीस वेधे वीस भुज दशशीशमें । तब भये अंतरधान निश्चर ईसभरि बहु रीसमें ॥ रहि गुप्त घाले बाणवर बहु व्योमतें आवन लगे। ते विविध रूप कराल भालु कपीन चहुँ खावन लगे ।।९० ॥ खै बाण शूकर सिंह श्वान शृगाल अहि गज धावहीं । मारत पछारत भखत मर्दत सकल सैन नशावहीं ।। पुनि वृष्टि कीन अपार सिक्ता उष्ण सब व्याकुल भये ॥ द्रुत वरुण अस्त्र चलाय राधव सकल छल किय दूरसो॥ पुनि वीर विद्या आसुरी प्रगटी दशानन भूर जो ॥ बहुभूत प्रेत पिशाच योगनि खड्न खप्पर धारिकै ।। तिन देखि वानर ऋच्छ इतर विहाल डरि डरि भाजहीं ।। हनुमंत आदिक वीर ते बहु मदि मार्द सु गाजहीं । पुनि अपर माया कीन दशमुख पवनसुत प्रगटे घने ॥ रणधीर श्रीरघुवीर पावक तीर सपदि चलायके ॥ माया हरी सब निरखि दारे सुभट हिय हरपायक ।। भट विकट मर्कट ऋच्छ युद्धत ऋद उद्धत महा ॥ अब करहु निश्वर हीन लंक निशंक यो सवही कहा ।।

रामरसायन। (४२१) EL . M -- तिय पुरुप वालक तरुण वृद्धसु यातुधान न छंडिये ॥ जे नगर अरु रण मध्य होवें वेगिते सब खंडिये ॥ ९५ ॥ ताछिन दशानन आय प्रगटो रूप कोटिन धारिकै॥ चहुँधाय लच्छन कीश ऋच्छन करतभच्छन मारकै ।। इक एक वानर भालुपे इक एक रावण धावही॥ धर मार फार पछारयों बहु घोर शोर मचावही ।। ९६।। तिहि समय राम सुकंठ हनुमत अंगदादिक वीरजे ॥ करि कोप बहु दशमुखनको भंजै निशंक सुधीरते ॥ सुरवृंद निरखि अनेक रावण विकल है वागन लगे। लै लै विमानन हाय कार कार व्योमते भागन लगे ॥ ९७ ॥ तब सुरन व्याकुल जानि राघव प्रवल अस्त्र प्रहारिकै ॥ इक वाणते दशकंठके सब रूप लोपे जारिकै ॥ सो हरि बहुरे देव प्रमुदित छाय नभ जै जै करी ।। अवलोकि धायो व्योम दिशि बहु कहत वाणी रिसभरी ॥९८॥ रे खलहु तुम कहँ एकही मैं कोटि मम आयो अवै ॥ पुनि करत हाहाकार नभते देवगण भागे सबै॥ तब कूदित कपि वीरं अंगद् ताहि पदगहि जोरते ॥ झकझोरि वेगहि भुमिडारो खाँच नभ ओरते ॥ ९९ ॥ पुनि उछलि अंगद वेगि रघुवर पास पहुँचे जायके । दशकंट रठि रथ पैटि पायो कुपित चाप चढायक। हनिवाण अगणित रामको तनु वान खंडित कीन सो॥ तब वीर रघुवर शरनते किय तासु दशशिर छीनसो ॥ १० ॥ शिर गिरत दशहू और नृतन फेरि प्रगटे तैसही। सोउ. विभंजे राम सबही वहरि उपजे सही।। इमि रामशर शतवार खंडे माथ दश दशमाथके। ते फटत होत नवीन लखि हिय आचरज रघुनाथके ।। १०१॥ १० पा० ॥ यु. पां. स. १०९ ॥ शोक ॥ रावणस्य शिरोविंदच्छीमचलितकुंडलम् ॥ तच्छिरः पतितं भूमी दृष्ट लोकत्रिभिस्तदा ॥ १३॥ तस्यैव सदृशं चान्यद्रावण- - - L - . लै गदा विभीषण कोप धार । तुरधाय भ्रात उर किय प्रहार॥१०॥ घालो प्रचंड गिरि धाय गाजि । डारे नशाय रथ सूत वाजि ॥१०॥ |धायो सुकीश परजंग जोम । हनुमान वेगि कूदे सु व्योम ॥१०॥ उच्छलत लंकपति पकरि पुच्छ । भापी सुखचि कह जाहि तुच्छ । | वरवीरकीश भुजवीश युक्त । गो गगन सो न लंगूर मुक्त ॥११॥ कार कोप एक एकहि प्रहार नाहि गिरत कोटत नबल अपार ११२।" (४२२) गमरलायन। स्योत्थितं शिरः॥ तत्क्षिप्रं क्षिप्रहस्तेन रामेण शिनकारिणा ॥२॥ द्वितीयं रावण शिरश्छिन्नं संयति सायकः ॥ छिनमानं च तच्छा। पुनरेव प्रहश्यते ॥३॥ तदप्यशनिसंकाशश्छिन्नं रामस्य सायकैः । एवमेवं शतं छिन्नं शिरसां तुल्यवर्चसाम् ॥ ४॥ इत्यादि। पद्धरीछंद । शिर कटत फेरि प्रगटात और । भो मुदित लंकपति निरखि डौर॥ हौं अमर सत्य दृढ ठान लीन । यों गुणि निशंक पुनि युद्ध कीन१०२ सुर कीश भालु लखि सकलवस्त । सुनि भई जानकी शोकप्रस्त॥ निश्चर समस्त आनंद छाय । रंण रुपे वोलि जे लंकराय ।। १०३।। रावण सकोप शर तान तान । रामहि प्रहार कर आन आन॥ । रघुवीर सर्व करि खंड खंड । घालत अपार इषु चंड चंड ॥१०४॥ प्रभु निकट विभीपण शस्त्र धार ॥ रथ संग धाय निश्चरन मार॥ लखि कुपित होय दशमुख उताला गरु भूर शक्तिं घाली कराल३० लखि वेगि राम 8 अग्र आप । झेलीस्वहीय सो शक्ति दाप । निज गुणि विभीपणे अभय कीनादृढ शरणपाल प्रण राखि लीन१०६ सो शक्ति हीय बेधी कराल । मुछित कछूक भे नृपति लाल ॥ दशकंठ व्यथित गिरि धरणि माहि।पुनि उठिपछारि तिहि पकरि वाहि। सो सँभरि फेरि भिरि कीन युद्ध । दुहुँ क्रुद्ध वृद्ध अवरुद्ध उद्ध भे कछुक विभीपण श्रमित अंग । हनुमंत वीर हेरो सु ढंग ॥ दशमुखहि कीन पुनि पद प्रहार । सो त्यागि बन्धु कहँ रोपधार । दुहुँ भिरे वरिनभ अंतारक्ष । हैं सबल सर्व रण रीति शिक्ष॥ १०८॥ - रामरसायन। (४२३) तब सुमिरि राम कपि कीन घात । भो विकल भूमि दशवदन पात ॥ तहँ आय कीश पुनि किय प्रहार ।सो सँभार फेरि हनुमतहि मार११३ बजरंग कोपि तिहि मुष्टघाल। भो लगत लंकपति कछु विहाल । तिहि समय कूदि कपि कुधरधार । चहुँधायधाय निश्वरनमार१११ दशमौलि सजग लै आनरथ्य । द्रुत लै अरूढ़ धनुवाण हथ्थ ।। धायो कपीन भंजत उताल । तिहि समय क्रोध भरिऋच्छपाल११९ तिहि लात घात कीनो प्रचंड । मुरझाय गिरो भो चापखंड ॥ दशमुखहि सारथी विकल हेरि। गहिभुज विठायस्थ मध्य फेरि११६ घटिका सु एकमधि चेत लाय । ह्वे सजग फेर लंकाधिराय ॥ करि घोर शोर भरि क्रोध वीर । छाँडे प्रचंड बहु विशिख तीर११७॥ रघुराज पत्र पत्रीन छाय । ध्वज वाजि रंचहू . नहिं लखाय ।। दशमथ्थ रथ्थहू वाणजाल ॥चहुँ झपि दीन दशरथ्य लाल||११८॥ इमि द्वंद्व युद्ध पुनि होत भूरि । दशहूँ दिशान गे वाण पूरि ।। तब रामचंद्र दश शर कराल । वेधे उताल दशभाल भाल ॥ ११९ ।। तिन लगत भयो विह्वल अपार । सारथि प्रवीन सो गतिनिहार ।। स्थ वाहि वेगि लै गो सु दूरि । रावण अचेत जल नैन पूरि।।१२०॥ द्वै दंड मध्य आयो जु होस । लखि सारथीहि भापो सरोस । रणविमुख कीनरे मूढ मोहिं । सेवक विचारि नहि वधहुँ तोहिं१२१॥ स्थवाह वेगि पुनि राम पास । ही करीं आज रिपुकर विनाश ॥ तब कही सारथी जोरि हाथ । अपराध क्षमिय प्रभु लंकनाथ १२२॥ है सूत कर्म यह धर्म तात ! महि समय लखे जय अजय घात ॥ लखि प्रभुहि विकल बहु समर माहिीलायो उताल स्यंदनहि वाहि१२३ सुनि मूत वैन दशमुख सराहि । दोनो जु हस्त भूपण उमाहि ॥ धारण सुकीन लेनाय मथ्थ। पुनि वाहि वेगि लायो सुस्थ्य १२|| दशकंध बेनि वर धनुपधार । रघुवरहि कोन बहु शर प्रहार ।। ते सकल राम तिहि दीन काटि वेधे अनेक निज वाण डाटि१२९॥ पुनि शक्ति मूल शर खड्न चंड गिहि गदा चक्र तोमर रदंड ॥ इमि अपर शव अमअस भरि । दशौलि गमपर दीन परि १२६॥

वरिवंड चंड सुरारि छिन छिन भालु कीशन त्रासि है ||१३ (४२४) रामरसायन। ते सकल रामभंजन करात । पुनि विशिप वाण तिहि हनत जात ॥ त्यों ही वहोरि लंकेश वीरें । तिन खंडि फेरि वेधत सु तीर ॥२७॥ तिहि समय राम रावण सु वीर ॥ छिन हो अधीर छिन धरत धार ॥ कीनो अभूत दुहुँ समर घोर। छायो अपार तिहिं लोक शोर १२८॥ ह. गी० छंद। इमि राम रावण युद्ध देव विलोकिकै सब चकित भे ॥ कपि भालु निश्चर निकर दुहुँ बल हेरिकै अति चकित भे॥ सुर कहत अबलग याहि राम समान नहि भेटो वियो । दशमुख बहत्तर चौयुगी भरि राज बहु संयुग कियो ॥ १२९ ॥ प्र० ॥ सुंदर रामायणे लंकाकांडे ॥ सर्ग५१ ॥ श्लोक । राज्यं चकार लंकेशो द्विसप्ततिचतुर्युगम् ॥ त्रिपुलोकेषु नप्राप्तस्तंरामसदृशो बली ॥५॥ ह० गी० छंद । तिहि समय वेगि अगस्त्यऋपि श्रीराम संनिधि आयकै ॥ आदित्यहृदय अनूप किय उपदेश अतिहि दुरायकै ॥ दै सविधि उत्तम कवच मंत्र उताल मुनि पुनि जात भे॥ रघुवीर लहि जय अस्त्र अतुल अमोघ अति हरपात भे ॥३०॥ ताछिन विभीपण राजसुत सों विलखि यौँ वाणी कहीं॥ दशकंठ नाभी मध्य एक पियूप कुंड विराजही ॥ जौलों न प्रभु तिहि सोपि हो तौलों न यह खल नाशि है ।। सुनिके विभीपण वेन शर इकतीस श्रीरघुवीर लै । आदित्यहृदय उचारि विधि युत लेक पतिहि सुधीर दे ।। ते कालदंड समान वाण प्रचंड धनुपर तानिक । कीने सपदि संधान प्रभु बलवान दृढ प्रण ठानकै ।। १३२॥ तिहि समय झंपी सकल दिशि कंपी अपार वसुंधरा ॥ चहुँ,रठी पावक दाह रावण गात हृबहुथरहरा ॥ श्रीगम छोडे चंड सायक चलत अमित प्रकाश भो । अनि बार शोर दंड महि पाताल मध्य अकाश भो ॥ १३३।।

रामरसायन। (४२५) ते प्रबल शर इकतीस चलि दशशीश के दशशीशमें। इक नाभि शर शोपो अपर लागे सपदि भुज वीसमें ॥ शिर वाहु लै नाराच गवने रुंड रावण कंपिकै ।। द्रुत गिरत भो रणभूमि मध्य सुभूरि दुहुँ दल चंपिकै ॥१३४॥ बिन मुंड रुंड बहोरि उठि बहु गार्ज धायो मंडिकै॥ रघुवीर तिहि युग खंड कार महि डारि दीनो खंडिकै ॥ भुव गिरतही अति शोर किय हा राम हाहा जानकी॥ यों कहत निकसो जीव पूजी आश सव वलवानकी ॥१३५ ॥ तिहि समय पावकझार रावण अंग ते अनुपम कढी॥ बहु तेज विशद प्रकाश अद्भुत तासु द्रुत ज्वाला बढी॥ सो आय अतिहि उताल कीन प्रवेश मुख श्रीरामके ।। सत्र निरखि चकृत कहत भेद अलक्ष प्रभु गुण ग्रामके ।।१३६॥ तिहि समय रावणवध विलोकि समस्त सुर आनंद लहे ।। जै राम जै रणधीर जै रघुवीर जै जै सब कहे ।। बहु भाँति अस्तुति करहिं प्रभुपर सुमन वर वरसावहीं। दुंदुभि बजाय बजाय श्रीरघुनाथको यश गावहीं॥ १३७ ॥ कपि भालु कूर्दै जैति जे करि शोर चहुँ विलकारहीं। पुनि धाय धाय अनंद भरि भरि राम वदन निहारहीं । तिहि समय लछमन दौरि भ्रातहि अंकभरि हुलसायक। नखशिख विलोके प्रेमयुत वर विजय मोद अपायकै ॥ १३८॥ सुग्रीव अंगद ऋच्छपति लंकेश हनुमतनील जे । इन आदि अपर अपार वानर भालु हैं बलशील ते ॥ सबको महाआनंद कविप कौन विधि कहिजाय जो । ज्यों होत प्रमुदित भापि सकहि न मूक मिष्टहि खायसो १३९॥ घनाक्षरी कपिन । सरसिज सुभट समूह बर फूल चारु पूरण प्रतापमोप्रकाश अति ही जयो । निशिचर मन रेन तम दशमाथ भारी बिनशि समस्त शोक लोक तिहुँ ते गयो । रमिकविहारी देवलोक वृंद अनंद दशह वेगि विभीपण राम ढिग, आय खरे सचुपाय ॥ १४९॥ शीश नाय स्यंदन सहित, गयो मृत हरपाय ॥ १५॥ (४२६) रामरसायन । दिगंतमें अनंत जैति जै छयो । कोशलाधिराज रघुराज उदयाचलते तेज पुंज विजय दिवाकर उदै भयो । १४० ॥ हरिगी० छंद। इत मोद इमि उत लंक निश्चर निश्चरी अकुलावहीं । दशमाथके गुण गाथ कहि धुनि माथ बहु विलपावहीं ॥ मंदोदरी आदिक अनेक सुतीय विह्वल धायकै । बेहाल आय उताल रोवत गिरी पतिपद धायकै ॥ १४१॥ दोहा-निरखि विभीपण भ्रात गति, कियो विलाप अपार ॥ तिनहि धीर दीनी विविध, दशरथ राजकुमार ॥ १४२॥ पुनि भापी लंकेश प्रति, रघुवर दीनदयाल ॥ मृतककर्म दशकंठ को, सविधि करौ ततकाल ॥ १४३॥ तबहि विभीपण जोरि कर, कही छुचौं नहिं याहि ॥ तव निंदक पुनि शत्रु मम, अरु अधर्म रत आहि १४४॥ सुनि बोले रघुवंश मणि, यह मम निंदक नाहि ॥ अरु अधमरतहू न है, हौं जानौं मनमाहिं ।। १४६॥ वैर जियतलों राखिये, मरण भये नहिं मान ॥ अंत समै रिपु मित्र सम, जान वही सुजान ।। १४६॥ याते सविधि निशंक सब, करौ भ्रात कृतजाय ।। जाते तव रावण सहित, दोनों लोक बनाय ॥ १४७॥ राम रजायसु शीश धरि, सकल तियन समु झाय।। मृतक कर्म दशकंठके, किये विभीपण जाय ॥ १४८॥ सविधि कृत्य करि तियनको, लंका मध्य पठाय ॥ तब रघुवर शर तून धनु, कवच कृपाण उतार ॥ स्थते आये भूमि पर, सप्तम दिवस मझार ॥ १५० ॥ चले देव निज निज भवन, राम रजायसु पाय ॥ हरपि राम सुग्रीवसे, कहे वैन भर अंक ।

रामरसायन ।
(१२७)
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तव सहाय बलते सखा, पाई विजय उतंक ॥ १५२ ॥
यों कहि पुनि अवधेश सुत, सकल भालु कपि मान ।।
यथाउचित सादरनिरखि, किय बहु विशद बखान ॥१५३॥
निरखि विभीपण ओर पुनि, लपणहि कही बुझाय ।।
लंकापति अभिषेक हुत, करो सदल तुम जाय ॥ १५॥
तव सुकंठ हनुमंत अरु, अपर भूरि बलवंत ॥
सहित विभीपण लंकमें, आये लपण तुरंत ।। १५५ ।।
वोलि सचिव द्विज ज्ञाति सब, सविधि साज सजवाय॥
किय अभिपेक विभीपणे, लंक निसान बजाय ॥ १५६॥
श्वेत छत्र चामर विजन, साज समाज समेत ॥
चले विभीपण लपण सँग, रामदरशके हेत ॥ १५७॥
आय वेगि प्रभुपद गहे, उठि रघुवर उर लाय॥
प्रीति रीति नृप नीति युत, दीन मान हुलसाय ।। १५८ ॥
दास भाव कर जोरि कै, ठाढे निश्चरनाह ॥
निरखि राम उठि फेरि तिन, वैठारे गहि बाँह ।। १५९ ॥
रीत प्रीत नृप नीति मय, कहे राम वहु बैन॥
सो सुनि निश्चर भालु कपि, सब हिय छायो चैन ।। १६०॥
पुनि तहते उठि सेन युत, आनंदित श्रीराम ॥
चलि सुवेल गिरि पै सुथल, आय कियो विश्राम ।। १६१॥
रसिकविहारी आजते, भयो परम आनंद ॥
सब सुर मुनि भा,मुदित, जैजै दशरथं नंद ।। १६२ ।।
इति श्रीरामरसायन २० वि० युद्ध रावणयुद्धवध
वर्णनो नाम विंशोविभागः ॥ २०॥
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ए.
वा
५
॥
दोहा-राम लपण लंकेश अरु, अपर समाज अपार ॥
शोभित शेल सुवेल पर, विजै मोद उर धार ॥१॥
तब हनुमत दिशि हेरिक, बोले रघुकुल चंद ॥
हे कपि रिपु दल जीति अब, भये सकल सानंद ॥२॥

दरश गिनाइक एक छिन, कोटि कल्प समजात ॥१३॥ मिय दिशि ते प्रभचरण गहिकहो सकल म दुलासा1201 (४२८) रामरसायन। महाराज लंकेश की, लै रजाय तुम जाय ॥ सियहि सुनावो जै कुशल, कहो तासु पुनि आय ॥३॥ प्रवा॥ युकां ॥स ० ११४॥ श्लो। ततः शैलोपमं वीरं प्रांजलिं प्रणतं स्थितम् । उवाचेदं वचो रामो हनुमंतं प्लवंगमम् ॥१॥ अनुज्ञाप्य महाराजमिमं सौम्य विभीषणम् ॥ प्रविश्य नगरी लंकां कौशलं ब्रूहि मैथिलीम् ॥२॥ दोहा-सुनि हनुमत लंकेश प्रति, बूझि गये द्रुत धाय ॥ शीश नाय सीतहि कही, विजै कुशल हुलसाय ॥४॥ जनकसुताके हिय भयो, ताछिन इमि अहलाद ॥ मुदित मयूरी होत जिमि, सुनि पावस धननाद ॥५॥ कही सीय संदेश सम, कछु न तिहूँ पुर माहि ॥ कहा देउँ कपि तोहिँ अब, कबहुँ उऋण मैं नाहिं ।। ६॥ कही कीश कर जोर तब, हौं पायो सब मात ॥ महाराज विजयी भये, आप लखी कुशलात ॥७॥ पै जननी इक मोहिं ये, रुचि सो कीजै पूरि ॥ हो रजाय तो निश्चरिन, हनौं कुटिल ये भूरि ॥ ८॥ सुनि सिय कोमल हिय कही, करौ पुत्र जनि रोप ॥ पराधीन सिगरी कहा, इन दीननको दोप ॥९॥ भये मौन हनुमंत पै, तिनै विलोकत वंक ॥. सिय पाछे बैठी सबै, मिलि इक ठौर सशंक ॥ १० ॥ कही तबै कर जोरि कपि, करिय मातु उपदेश । वेगि जाय भापी सकल, प्रभुसों तब संदेश ॥११॥ सुनि सिय बोली पवनसुत, अंतर्यामी नाथ ॥ सब जानत है हीय की, कहा कहीं बहु गाथ ॥ १२॥ मो दिशिते पद परसिक, विनय करी जो तात ॥ मुनि कपि गमनो नाय शिर, आयो रघुवर पास ॥

रामरसायन । (४२९) " , मुनिकै प्रिया सँदेश प्रिय, हिलकि हृदय भरि लाल ।। दीह श्वास हग जल उमड़ि, व सनेह बेहाल ।। १५ ।। महि विलोकि लंकेश सों, कहे सु मंजुल वैन । सिय अन्हवाय शृंगारि कै, द्रुत आनौ मति ऐन ।। १६॥ पाय रजाय सु रामकी, लंकापति मतिधाम ।। जाय सीय ढिग मातु गुनि, किय कर जोरि प्रणाम ॥१७॥ पुनि रघुवर आज्ञा सकल, वरणी शीश नवाय॥ सुनि लंकेशहि सिय कही, अतिअनंद उमगाय ।। १८॥ सुन मो उर अभिलाप यह, प्रभुपद प्रथम विलोक ॥ पुनि मंजन श्रृंगार हों, करों जु होय विशोक ॥ १९॥ सुनत विभीपण पुनि कही, जननी हो सर्वज्ञ ।। तव सन्मुख मैं कह कहीं, अति अयान अल्पज्ञ ॥२०॥ पैकछु विनवौं दीन है, क्षमियो मम अपराध ॥ जानतही हे स्वामिनी, है हिय कृपा अगाध ॥२१॥ नेम धर्म जप योग तप, ज्ञान ध्यान अरु दान ।। पति आज्ञा पालन सरिस, सुखद सुकृत नहि आन ॥२२॥ याते मो विनती यही, जो प्रभुकही पठाय ।। सोई करिवो उचितहै, पुनि जिमि होय रजाय ।।२३।। इमि कहि रुचि लखि निश्चरिन, दी लंकेश रजाय ।। विशद विभूपण वसन ते, लाई साज सजाय ॥२४॥ तव सिय पिय रुचि गुणि कियो, मंजन सकल शृंगार ॥ पुनि वैठी शिविका सुभग, पतिपद हियविच धार ॥ २५॥ विशद निश्चरी यूथ वहु, सहित साज भट भीर ।। राम दरश हित सिय चली, संग विभीपण धीर ।। २६ ।। सिय आगम सुनि दरश हित, वानर भालु अपार ।। अपर निशाचर निश्चरी, धाये ति उचार ॥२७॥ वेतपाणि रक्षक तिन, वारन करत दुराय॥ शिविका सह आवरण वर, प्रभु ढिग चले. । - .

, ऐसे समय शुभ रीति समेत लखै तिय काहुकि कोउ कहाहीं।। नारि विलोकनको रसिकेश कहीं दृढ रंचहु दूपण नाहीं ॥३६॥ न गृहाणि न वस्त्राणि न प्राकारास्तिरस्क्रियाः ॥. नेहशा राजस-1 (४३०) रामरसायन । ताछिन भो वहु शोर चहुँ, दूरहि ते लखि राम ॥ कह लंकेशहि बोलि द्रुत, करि हग दोउ ललाम ॥२९॥ कीश भालु मेरे सकल, प्राणहु ते प्रिय भूर ॥ पुनि हैं मम सुत वन्धु सम, तिनहिं निवारत दूर ॥ ३० ॥ कहा हेत आवर्णको, कह शिविकाको काज ॥ मम समीप आगमनमें, काह मैथिलिहि लाज ॥३१॥ यों कहि पुनि लंकेश प्रति, भापी राम सप्रीत ॥ समय पाय सोहै सवै, भीति रीति नृप नीत ॥ ३२ ॥ बहुरि होत याते कहो, जो नहिं निर्मल जीय ॥ शुभ अरु अशुभ समस्त कृत, निभत आपने हीय ॥३३॥ सवैया-कवित्त । हो न कछू बहु वस्त्र न शस्त्रसे धाम न कोटकी ओट लियेते ॥ मापनते कटु भापनते जन लापनते न कपाट दियेते ॥ हैं रसिकेश घने नृप साज सु और अनेक प्रबंध कियेते ॥ नाहिं रहै तियकी परदा जु न राखहि सो निज आपहियेते॥३४॥ दोहा-सो विचार यह हीयको, पै जगरीति जु होय ॥ यदपि उचित सब भांति है, तदपि समय लखि सोय॥३५॥ सवैया-कवित्त । भूरि विपत्ति परै जवहीं अरु पीड़ित होय महारुज माहीं।। औ मख व्याह स्वयंवर युद्ध गुरू नृप मातु पितापति पाहीं॥ दोहा-सो सीता या छिन दुखी, तिनहि लखे कह रोप ॥ पुनि मोढिग कोऊ कवों, दरश लहे निरदोप ॥ ३७॥ प्र०या०॥ यु० क्रां० ॥ स० श्लोक ११६ ॥ कारा वृत्तमावरण स्त्रियः ॥ ३ ॥ व्यसनेषु न कृच्छेषु न युद्धे न रामरसायन। (४३१) " स्वयंवरे ॥ न कतौ न विवाहेपु दर्शनं दूष्यते स्त्रियः ॥ ४॥ सैपा विपद्ता चैव कृच्छेण च समन्विता ।। दर्शनेनास्तिदोपोऽस्या मत्स- मीपे विशेपतः ॥५॥ दोहा-याते अवहीं सीयको, शिविकाते उतराय ।। वेगि पियादे लावहू, लबै सबै शुचि भाय ॥ ३८॥ सुनि लंकापति मौन है, सकुचिं प्रभुहिं शिरनाय ।। तिमि लाये सीतहि यथा, रघुवर दई रजाय ॥ ३९ ॥ आय सियापति चरण गहि, लजित वसन समेटि । बैठी हेरि सुवाम दिशि: आनंदित भुजभेटि॥४०॥ झीने पट बै लखति सिय, पियको बदन मयंक ॥ राजकिशोर विलोकहीं, सकुचि विलोकन बंक ॥४१॥ है प्रमुदित लखि सीय सों, वचन कहे रघुराज । राजसुता मम सफल भो, सकल परिश्रम आज ॥४२॥ यो कहि राम सुनीतिवर, अंतर नेह अपार ॥ प्रगट वचन कटु जानकिहि, कहे लोक अनुसार ॥४३॥ सुनहु मेथिली तुमहि लखि, मों हिय उपज कलेश ॥ कछु न काज मम निकट अब, जाहु रुचे जिहि देशा॥४४॥ दशमुख सवल महीप पुनि, युत ऐश्वर्य अकर्म ।। युवा सुन्दरी तिहि सदन, रहो न हे धर्म ॥ ४५ ॥ याते तुब दे वर तिहूं, पुनि सुकंठ लंकेश ॥ अथवा और जु रोचही, तिहि मिलि रहो हमेश ॥ ४६॥ प्र०॥ पा०॥ यु० कांडे । सर्ग ११७ ॥ श्लोक । तां तु पार्थस्थितां प्रहा रामः सम्प्रेक्ष्य मैथिलीम् ।। हृदयान्तर्गत भावं व्याहतुमुपचक्रमे ॥६॥ प्रातचारित्रसंदेहा मम प्रतिमुखे स्थिता दीपो नेचातुरस्येव प्रतिकूलासि मे दृढा ॥७॥ तद्गृच्छत्वनुजानद्य यथेच्छं जनकात्मजोएता दशदिशो भट्टे कार्यमस्ति न मे त्वया||८|| तदद्य व्याहतं भद्रे मयेतत्कृतयुद्धिना लक्ष्मणं वाथ भरते कुरु बुद्धि यथासुखम्।।९॥शने वाथ सुग्रीव रातमे वा विभीपणे ।। " | पितहि विलोकिवेगि उठिरामा सिया बंधुयुत कीन प्रणामा।।६७॥/ | सरते प्रगटिराम ढिग आई * कही उच्च स्वर सबहि सुनाई५४॥ | चौताछिन भूपति वैठि विमाना* आये देखि हृदय हुलसाना ।। (४३२) रामरसायन। सीते यथा वा सुखमात्मनः ॥१०॥ न हि त्वां रावणो दृष्ट्वा दिव्यरूपा मनोरमाम्।।मर्पयत्यचिरं सीते स्वगृहे पर्यवस्थिताम्॥११॥इत्यादि। दोहा-सुनि सीतापति वचन कटु, लागी करन विलाप ॥ लज्जित बोली मंद स्वर, बढो हृदय संताप ॥४७॥ घनाक्षरी-कपित्त । ये हो प्रभु इतर तियान सम जान मोहिं दोप अनुमान कडा बैन इमि बागौना ॥ रसिकविहारी तुव नारी पति धर्मचारी काहूके सिखाये धनुधारी नेक लागौना ॥ विवश परी हौं घरी युगसी भरी है लाल हृदय जुडानो आज फेरी दुख दागौना ॥ हाय श्यामसुंदर सुजान सरवज्ञनाथ करुणा अगाध अपराध विन त्यागौना॥४८॥ चौल्यौं कहिसिय पियरुख अनुमानी *बोली विलखिलपणसों वानी राजपुत्र द्रुत सर राचि देहू * अब नहिं मैं राखों यह देहू ४९ लछमन रामहि लखि रुख जानी * विरचो सर वेगै निज पानी॥ पावक ज्वलित देखिकै सीता * उठिपियपदगहिकहीअभीता ५० दोहा-जो अनन्य मन वच करम, हौं सेये श्रीराम ॥ तौ रक्षो मुहिं अनल तुम, व्यापक हो सब ठाम ॥५१॥ चौल्यौं कहि सर प्रवेश सिय कीना निजपति चरण चित्त दृढदीना ताछिन भयो शोर बहु घोरा हाहाकार करत चहुँ ओरा९२॥ सकल सुरासुर करत पुकारा ॐ है अदोष सीतावर दारा ताछिन शिव ब्रह्मादिक आई *रामहि बहु विधि विनय सुनाई ५३॥ तब पावक सुदिव्यतनु कीने * सीतहि मुदित अंक निजलीने ॥ परम शुद्ध यह सीता देवी, सदा राम पतिपद दृढ सेवी ॥ यौं कहि राधव ढिग बैठारी * सब हमें जै जैति उचारी ॥ ५५॥ .. दोहा-सीताराम चरित्र यह, भयो काहको जान ॥ दंडकवन उत लंक इत, गुप्त प्रगट गतिमान ॥५६॥ .

रामरसायन।
(४३३)
हाराज तिहुँ अंक लगाई विपम विरहकी ताप सिराई ।।
हरि परस्पर म अघाई गये धाम पर दशरथ राई ॥१८॥
छिन देवराज हुलसाई कही राम कह होत. रजाई ।।
। बोले रघुवर हुलसाई मृतक जियें मम भट समुदाई ५९
रु जहँ बसें ऋच्छ कपि भूरी रहै अशन जल तहँ नित पूरी।
है वर सुरनायक दाजे * सकल मनोरथ पूरण कीजे३०॥
नि कह एवमस्तु सुरराजा जिये सकल कपि भालु समाजा॥
ल फल फूल पत्र तरुछाये * निरखि राम आनंद अघाये६१
दोहा बहुरि जोरि कर विनय युत, सुरन बिदा किय राम ॥
ते सवही शिरनायकै, गमने निज निज धाम ॥ ६२॥
जनककिशोरी राजसुत, दोऊ दुहूँ निहार ॥
प्रगट सकुच जन मध्य पै, अंतर प्रेम अपार ॥ ६३॥
लपण कीशपति लंकपति, हनुमानादिकवीर ॥
रसिकविहारी मुदित सव, निरखि सिया रघुवीर ॥६॥
कहत सवे जे राम सिय, जैति लपण कपिराज॥
जै हनुमंत सुवीर वर, जै जै जै सुरराज ॥६५॥
इति श्रीरा० २० यु० विधाने श्रीसीताराम मिलन
वर्णनो नाम एकविंशोविभागः॥ २१ ॥
इति श्रीरसिकविहारीरुत श्रीरामरसायनयंथे युद्धचरित्र
वर्णनो नाम पष्ठोविधानः ॥६॥
दोहा-श्रीसीता रघुवर लपण, अपर समाज अपार ।।
शोभित शैल सुवेल पर, विजय मोद उरधार ॥१॥
इहि विधि वीते हे दिवस, रावणवध उपरंत ।।
राम लपण सीता निरखि, सवहि अनंद अनंत ॥२॥
तब लंकापति रामसों, कहे वैन कर जोरि ॥
तजिय सहानुज मुनि वसन, है प्रभु यह रुचि मोरि ॥३॥
अरु धन भूपण वसन गृह, देश ग्राम वर नाम ।।
कपि ऋच्छनको दीजिये, पूरित लंक ललाम ॥४॥

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।
आवत जात अवध मधि रहियो सहित वीर वर बंका ॥१२॥
(४३४)
रामरसायन।
सुनि बोले प्रभु हे सखा, तुमते विलग न नेक॥ .
भरत सहित तनु साजहूँ, सो राखो मम टेक ॥४॥
अरु ये प्यारे प्राण सम, हैं कपि ऋच्छ अपार ॥
सबहीको सब भाँति ते, करौ उचित सत्कार ॥ ६॥.
बहुरि चाहिये जतन वह, द्वत हम करहिं पयान ॥
नतरु अवधि बीते भरत, नहिं राबै निज प्रान ॥ ७ ॥
सुनि भाषी लंकेश तब, पुष्पकयान विशाल ॥
तामधि प्रभु पधराय हौं, चलिहौं अवध उताल ॥८॥
यौं कहिकै लंकेश द्रुत, जाय सु लंक मझार ॥
धारे पुष्पकयान मधि, भूषण वसन अपार ॥९॥
दोबई छंद।
लै पुप्पक वर नभ मंडल द्वै वेगि विभीषण आये ॥
अंतरिच्छ ते अमित अनूपम भूपण वसन लुटाये ॥
कीश ऋच्छ सब राम रजायसु पाय मनुज तनु धारे ।
सजि सजि अंग उमंग रंगते प्रभुहि जुहारत सारे ॥ १० ॥
पुनि पुष्पकविमान लंकापति वेगिराम ढिग लाये ॥
तामधि लपण सीय युत रघुवर बैठे लखि हुलसाये ॥
तब सवही सनमानि यथोचित बोले वच अभिरामा ॥
सकल भालु कपि प्राणपियारे जाहु सु निज निज ठामा ॥ ११॥
ऋच्छराज कपिराज लंकपति तिहूं सखा मम प्यारे ।
बसिहौ नि दिवस हिय अंतर हो छिनहु न न्यारे ।
अब सब निज निज धाम सिधारो करो राज निरशंका ।।
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सुनि प्रभु बैन ऋच्छ कपि सिगरे तिहुँ नृप युत हनुमंता॥
गदगद कंठ अवध दरशनहित कीनी विनय अनंता ।
तव रघुवीर धीर दै वनचर विपुल विदा करि दीने ॥
यूथपमुख्य शोपि तिहुँ भूपति सह सेवक सँग लीने ॥ १३॥

रामरसायन। (४३५) पुप्पकयान प्रभाव अनूपम जेते होयँ सवारा ।। यथायोग सबहेत सुखद वर तितो रहै विस्तारा ॥ तामाधि कोटिन कीश भालु युत सिया लपण रघुलाला॥ लंक ऋच्छ कपिपति केसरि सुत वैठे सदल उताला ॥१४॥ ताछिन पुप्पक इच्छा चारी उत्तर दिशहि सिधायो॥ सियहि राम सब ठाम दिखाये सागर दरश करायो ।। तब लखि सेतु लपण इमि भापी जो यह सदा रहाई ॥ तो पयोधि अरु लंक दुहूँ की है है अति लघुताई ।। १५ ॥ सुनि रघुवीर रजायसु दीनी अनुज वेगि सजि तीरा ॥ कीनो भंग सेतु तहँ जलमें परी भौर गंभीरा ॥ भो खंडित बहु ठोर जहां जहँ तहँ तहँ भँवर महाना॥ इक इक भँवर सिंधु जलमाही योजन योजन माना ॥ १६ ॥ तिन ऊपर नभ पंचकोशलग पशिहु नाहिं उडाई ।। महावेगते भंवर सिंधुमाधि अगम पंथ चहुँघाई ॥ इमि प्रबंध करिके पुनि तहँ ते पुप्पक वेगि चलायो॥ सेतु भंग मग अगम लंक गुणि लंकपाल सुख पायो ॥ १७॥ दोहा-सेतु शिवालय सीयको, दरशायो रघुनंद ॥ तिनकी महिमा अमितविधि, भापी अतिसानंद ॥ १८॥ म. ॥ पा० ॥ यु० ॥ कां• ॥ स० १२५ शोक । अत्र पूर्व महादेवः प्रसादमकरोद्विभुः॥ एतत्तुदृश्यते तीर्थ सागरस्य महात्मनः॥१॥ सेतुबंधे इति ख्यातं लोक्येन च पूजितम् ।। एतत्पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥२॥ दोबई उंद। सिंधुतीर रामेश्वर दरशन पूजन मवही कोना। बहुरि टताल चले श्रीरघुवर भरत नेम चित दीना ।। अतिहि सपदि किष्किन्धा आये नम मग है दम्शायो । जनकसुता रुचि पाय गजसुत तह विमान विलमायो । १९ , सुनि उठि सपदि कपिहि सो भेटे अति आनंद अपाये ।। २४॥ अस्य अपार अनंद मानु उर भचर अचर सुखारी ॥ २२॥ ! (४३६.) रामरसायन । तब सिय कही राम सों प्रभु मो हीय एक रुचि भारी ।। तारा रुमा चलैं मोसँग अरु अपर ऋच्छ कपिनारी ॥ सुनि रघुचंद सुकंठहि भापी वेगिसकल ते आवें ॥ जनकनंदिनी प्रीति मानिकै अवधहि साथ सिधावें ॥२०॥ सुनि सुग्रीव ऋच्छ कपि संयुत जाय वेगि सब आनी ॥ नारि रूपते सकल वानरी तिमि अनूप दुहुँरानी ॥ यथायोग सियमिलि बैठारी पुष्पकयान मँझारी॥ बहु आनंदसहित पुंनि अवधहि किय पयान धनुधारी ॥ २१ ॥ भरद्वाज आश्रम मधि आये तिथि पंचमी प्रमाना ।। ताही दिन मनुवर्ष सु पूजे भानु अंशते जाना ।। सहित समाज मुनिहि शिरनाई बूझी गृह कुशलाई ॥ अवध कथा तव सकल सुमंगल ऋपि रघुवरहि सुनाई ।। २२ ॥ सुनि सब कुशल मुदित मुनितें पुनि वर माँगो रघुराई । नाथ भालु कपिगण हित बहु तरु फूलै फलैं सदाई ॥ एवमस्तु कहि ऋपिवर तादिन प्रभुहि सु आश्रम राखे । तब हनुमंतहि अवध गमनके अर्थ राम द्रुत भापे ॥२३॥ प्र०॥ वा०॥ यु० कां० स० १२६ ॥ श्लोक ॥ पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पंचम्यां भरताग्रजः॥ भरद्वाजाश्रमं प्राप्य ववंदे नियतो मुनिम् ॥३॥ दोवई छंद। तव अंजनि सुत मुदित सिधाये धरि द्विज रूप अनूपा । प्रभु आगम कहि मिलि निपादसों जाय लखे तुरभूपा शीश नाय भरतहि इंमि भापी सिय सबंधु प्रभु आये । कथा वृझि सब कपिहि भरत अति वेगहि सचिव बुलाये। चहुँ ओर पुर मरित बाग मग अनुपम साज सजाये। राम लपण निय आगमं मुनिक महामोद भो भारी । ॥

रामरसायन। पुर परिजन नर नारि साज साज सकल दरश हित धाये ।। राम पादुका भरत शीश धरि वेगि चले हुलसाये । उत हनुमंत जाय सब भापी सुनि मुनि पद शिरनाई। गमने राम निपाद लखे मग आये अवध तुराई ॥२६॥ दोहा-लखि सुरसरिहि प्रणाम करि, मजन अरु जलपान । सिया सविधि पूजी सरित, पूरव कथित प्रमान ।। २७॥ दोवई छंद । चले वेग लखि अवध लपण सिय युत समाज श्रीरामा ॥ उठि करजोरि नवाय शीश सब कीनो पुरिहि प्रणामा ।। सरयू अवध महातम रघुवर वर्णत विविध अपारा। आये नंदिग्राम सन्निध तहँ पुप्पकयान उतारा ॥ २८॥ दोहा-लपण सिया प्रभु निरखिकै, धाये सब नर नारि ।। राम भरत हग रत दुहुँ, उमगे दुहूँ निहारि ॥२९॥ भरत धाय प्रभु पद परे, राम लिये उरलाय ॥ मिले परस्पर प्रेम युत, यथा उचित नहुँ भाय ।। ३०॥ भरत हरपि सो पादुका, रामचरण पधराय ! पनि सबंधु मियके गहे, पद पंकज हुलसाय ॥ ३१॥ राम लपण मीता सहित, गुरु द्विज पद धरिशीश ।। विनय करी करजोरि बहु, पाई सुखद अशीश ॥३२॥ गम लपण हुलमायक, जाय जाय उमगाय ॥ गहेमातु गणके चरण, सवहि लये उरलांय ॥३३॥ मात सुमित्रा कौशला, ताछिन जो आनंद ।। कदिन म सो कल्प शत, शेप शारदा वृंद ॥३॥ मखा यूथ प्रमुदित मिले, अपर अमित नर नारि॥ यथायोग मिय लपण प्रभु, भेटे मवादि निहारिः ॥ ३९ ॥ नाछिन चरित अनुप भो, जे जन मकलं अपार ॥ इक इक. प्रति छिनमें उचित, भेटे गजकुमाः ॥ ३६॥ भये मुदिन बा अनामब, अमित नाविना बंद ! .

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निरखि धनेश अनंद है, कियो तासु बहुमान ॥ ४६॥
नंदिग्राम बहु जुरो समाजाल वठे जन युत अगणित साना-
तब रठि भरत गम पहँ वाले धर्म सत्य मय वचन अमोरे
मातु पिताआता जा दीनामाप्रभु अरु में शिर धार कीना२८
निज दिशित हा दटु मलोन येती कृपा दोन लखि कोजार
(४३८)
रामरसायन।
सो न भेद कोऊ लखौ, कह जै जैनृप नंद ॥ ३७॥
सुग्रीवादि नृपाल तिहुँ, हनुमानादिक वीर।
भरतादिक सब सबहि सों, मिले यथोचित धीर ।।३८
सिय सासुनके पग परी, सब लोनी उर लाय ॥ ..
भगिनी पुरवासिनि सखी, मिली हीय हुलसाय ॥ ३९॥
तारादिक सब तीय वर, उचित रीत युत नीत.॥
मिली परस्पर नारि बहु, यथायोग सह प्रीत ॥४०॥
मिले परस्पर सबहि सब, यथा उचित हरपाय ॥
राम कही तब भरत सों, प्रमुदित सबहि सुनाय ।।४।।
सखा ऋच्छपति लंक पति, दृढ अंजनिसुत दास ॥
प्राणहुते प्रिय अपर सब, कीश भालु बलरास ॥४२॥
हम तुम लछमन शुलहन, तिमि सुकंठ कपिराज ॥
मिले पंच भ्राता अबै, सुखद समै शुभ आज ॥ ४३
इहि विधि अतिहि अनंद दै, पुष्पक सबहि बिठार ।।
आये श्रीरघुवंशमणि, नंदिग्राम मझार ॥ ४४ ॥
तहां आय उतरे तवै, कही पुप्पकहि राम ॥
जवःसुमिरै तब आइयो, जाहु सु पूरव धाम ॥ ४५ ॥
राम रजायसु शीश धार, गो कुबेर दिग यान ।
चौ०-इमि सबमिले परस्पर लोगा मिटेसकलदुखजनितत्रियोगा
अब मम विनय मानिये ताता राज दीन मो कह पितु माता
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• गा ॥ युगा॥ १३० । माटोमः।
अनाव नदा गर्म भन्नः मताजलिः ।।
पलते मफलं गन्यं न्यानं नियतितं मया ॥४॥

रामरसायन। (४३९) अमित विनय सुनि दीन दयाला भरतहि बोले बैन रसाला ॥ नेह धर्म तव अति वरियारा याते करौं सु अंगीकारा ॥५०॥ राम वचन सुनि सब नरनारी कह जै जै अति भये सुखारी ।। भरत हुलसि प्रभुपद शिरनायो रघुवर बंधुहि अंक लगायो५१॥ पुनि तिहुं बंधु जटा रघुनाथा * किये सप्रीति विलग निजहाथा।। प्रेम सहित सवही अन्हवाये विशद विभूपण वसन सजाये९२ पुनि तिहुँ बंधु सविधिसजिसाजा * मिलि बहु सेवक सखा समाजा।। राम जटा निरवारि सुधारे वर मंजन कराय तनु सारे ५३॥ भूपण वसन अमोल अनूपा नख शिख सज श्रृंगार सुरूपा॥ तन छिन चहुँ इमि लगत सुहाये चहूँ वेद जनु तनु धरिआये५४॥ दोहा-पुनि रिपुहन द्रुत साजलै, सेवक सखा प्रवीन ।। तिहुँ नृप कपिपति आदिको, सकल शृंगार सु कीन ॥५५॥ रामसखा सेवक अपर, यथायोग चहुँ जाय ॥ कोश ऋच्छ निश्वरनको, सजे अमल अन्हवाय ॥५६॥ स्त कौशल्यादिक सकल, सियहि मुदित अन्हवाय ।। नख शिख भूपण वसन सुठि, साजे प्रीति बढाय ॥ ७ ॥ तारादिक जे सकल तिन, पुत्र वधू सम जान ।। राम मातु मखिं गण रचित, सनी सहित सनमान ॥२८॥ सियभगिनी अरु आलिगण, पुनि सवही नर नामि। साजे वर शृंगार निज, उचित सुमाज मवॉरि ॥ ५९॥ ची-इमि सबही शृंगार सुधारे भोजन पान कीन गुचि मांग। पुनि किय अवध चलन तैयारी, अति आनंद सफल नग्नाग ६० मंगलमय सब साज मुधार र स्थग गज विश्यि मपाः तिन पर यथायोग असवारा भये भयो नहुँ जजकाग॥६॥ नर बदन पर कुंजर माजे निपर हर भालु कपिगजे॥ पारन अपर अनेरः अपाग यथायोग जन नमागदा

| रंग भवन लंकेश रहाये * वन प्रमोद ऋच्छेश टिकाये।1931
अपर धाम आराम मझारा यथा योग कपिऋच्छ अपारा७२)
'सरयू तट निपादकिय वासा अपर सकल चहुँ सहित सुपासा७३/
यथा योग वर दोन निवासा बहु प्रकार करि सकल सुपासा७४,
उमगो अति आनंद अवध, घर घर होत विलास ॥७॥
(४४०)
रामरसायन।
शिविका सुभग अनेक अनूपा बहु सिय युत तिय बैठि सुरूपा ॥
हरि सहस्र मय स्पंदन साजा तिहि सोहे सर्वधु रघुराजा ॥३॥
बजे बाजने अमित अनूपा नृत्यगान ठानो वर रूपा॥
बंदीजन बहु विरुद बखाने ध्वज फहरत घहरात निसाने ६४
तडपाहं तोप घोर बहु छायो दीपावली प्रकाश सुहायो ।
छत्र चमर व्यजनादि नवीने वंधु सखा सेवक चहुँलीने ६५॥
इहि विधि पुर प्रवेश किय रामा बैठी अटन अमित वर वामा ॥
रोचन लाज सुमन वरसा व मंगल गीत मनोहर गावै ॥६६॥
दरश देत सबहीको रामा * आये सन्ध्या समय सुधामा ।
धन भूपण वारे मन माही भ परे कोउ तिन बूझत नाहीं॥६७॥
माता करि आरती उतारे सहित समाज भवन पगधारे॥
पूजन दान मंगलाचारा नृप गृह नगर सु भये अपारा ॥ ६८॥
दोहा-तव सुरनायक भरतसों, कही समस्त बुझाय ॥
सबहि निवास सुपास युत, वेगि करावहु जाय । ६९॥
चौ.
o-राम बंधु तंब आतुर जाई संग सचिव सेवक समुदाई ॥
सबहि यथोचित दीन निवासा *सदन साज करि सकल सुपासा७०
वर अशोक वाटिका विशाला तहँ राखे सुकंठ हरिपाला ॥
अंगदराज बागके माहीं विशद कोट अंजनिसुत काहीं॥
अवधि विचारि अवधमधि आये देश देश के भूप सु छाये।
विविधऋच्छ कपि नारि अपारातिन सवही रनिवास मॅझारा॥
दोहा-इहि विधि सबहि निवास भो, सादर सहित सुपास ॥
,
तिहुँ नृप कपिपति आदि अरु, वानर भालु जु भूरि ।।
सबहीको यश अमल बहु, रहो अवधमें पूरि ॥ ७६ ॥

रामरसायन। (४४१) , लंक विजय करिते सबै, वानर भालु अपार ॥ धरे मनुजतनु सुभगवर, आये अवध मझार ।। ७७ ॥ त्यौही बहु निश्वरन युत, लंकापति नर रूप। तिलक भाल गलमाल वर,शोभित सुभग अनूप ।। ७८ ॥ तिमितारादि रुमादि सब, सुभग मानुपी रूप ॥ कोश ऋच्छ तिय सुंदरी, सजे शृंगार अनूप ॥ ७९ ॥ तिनके गुण गण सुनत सब, पुरवासी नर नारि ।। धाय लखत निज गति सरिस, चकृत होत निहारि ॥ ८॥ प्रात राम अभिपेक सुनि, सबाहिय भरी उमंग ॥ होत जागरन सदन प्रति, नृत्यगान सुखरंग॥८१॥ रसिकविहारी प्रातही, होय राज अभिपेक ॥ ताहित निज निज साज सब, साजत सुभग अनेक ||८२॥ इति श्रीग०र०वि० अ० श्रीरामचंद्र अवध आगमन वर्णनो नाम प्रथमोविधानः ॥ १ ॥ दोहा-आये श्रीरघुवर अवध, भयो परम आनंद ॥ घर घर होत वधावने, मुदित नारि नर वृंद ॥१॥ ताही निशि गुरु संचिव अरु, मेवक सखा अनंत ॥ सकल साज अभिपेकके, लीने साज तुरंत ॥२॥ हरिगीतिका छंद। गुरु भरत मंत्री अपर जन बहु प्रात माज समेतसो।। कीने सविधि मतकर्म जो अभिपेकके हित हेतमो॥ दिन मध्य औसर जानि आये देव मकल हुलासमें । श्रीगम गज उछाह वर अवलोकिवेकी आशमं ॥३॥ शुभ समय जानि बसिष्ट द्विज पर मविधि नीतागमको । अभिषेक कोनो विप्रगण यन मंत्र पट्टि पहि नामको ।। शृंगारि पुनि दोडविराजे ग्न सिंहामन जय ॥ पर बल निर्मित कीट रघुवर शीश गुरु धागे नत्र ।।2।। पुनि गंध असत तिलक कीन वनिष्ट गुम गय॥

नंत लीला विहारी।।जति दुप्पार पाथोध बंधान कृतकुद्ध युद्धावरुद्धोद भटभीम वपु दुष्ट दल दलन दृढ विजयकारी॥९॥जतिसद्धि पिया जन्म जन्मार्जितानक पापान ध्रुव भक्ति मुत्त्यादि स्वच्छायं दाता। (४४२) रामरसायन। सुर विप्रवृंद महीप दीनो भाल जग सुखदायके । तिहिसमय जै जै शोर भो नभदुंदुभी देवन हनी ॥ गुण गान करि उर प्रेम भरि वर सुमन झरि लाई घनी ॥५॥ अंतिमुदित निर्तहिं अप्सरा वरबाजने बहु बाजहीं ॥ सुर नाग नर गंधर्व निज निज कलाकरि छबि छाजहीं॥ सुखकौशला सिय हीयको कहि शेष पार न पावहीं॥ सब मातु पुर परिजन अनंदित अमित वित्त लुटावहीं ॥६॥ कंचनमई शत कंजमाला विशद वर अनुपम नई ॥ सो पवनदेव प्रसन्न है पहिराय श्रीरामहि दई । बहु रत्न युक्त विशाल सुक्ताजाल संयुत हारसो॥ सुरपाल गल रघुलालके धारो सुक्रांति अपार जो ॥७॥ तिहिसमय चारहु वेद निज निज रूप विशद सुधारिकै ॥ आये नवायो शीश रघुवर छटा अमित निहारिकै । ब्रह्मादि सुर मुनि नारदादिक एक ठौर समय है। अस्तुति करत हैं राम-सियकी चहूँ निगमन अग्रकै ॥ ८॥ मणिप्रवाल रोति ॥ कुमारदंडकछंद। जयति जय सजनानंद कर धर्म धुर चंड कोदंड धारी खरारी प्रभो पाहि पूर्णावतारी कृपाले ॥जैति लंकाधिपति शमन सीतारमग सर्व देवाधि राजेश अवधेश सुत भक्त अनुरक्त जैजक्तपाले ॥ जयति गर्वापकर्पण प्रहर्पण प्रणत कारुणीकात्म सौंदर्य रूपावधी स्वेच्छया विचक्षण विपुल अस्त्र शस्त्रादि संहार वारणनिपुणस्वक्षसर्वात्म विज्ञान सिंधो । उद्भव स्थिति प्रलय कर्म का प्रबल धर्य सौय्यांधिपाधी सिद्धीश वर कौशलाधीशदीनातंबंधो।काम क्रोधोद्भवा पार केशापार नंड कालानल ज्वाल दम्धा कुलित तत ताप तापातं पाहीतिक श्रीपते नामु भक्ता मुत्राता ॥ १०॥ मकल संगीत गीतन गरा रामरसायन। (४४३) महा सर्व श्रृंगार सारावधीच्छा जनित कोटि कंदर्प दपीपहताराम श्यामांगनीलोत्पलो फुल्ल द्युति दिव्य पीतांबरा भरण शर. चाप धृत राज राजेन्द्र त्रैलोक भर्ता ॥ सदय जन हृदय सर हंस नृप मौलि मणि भानु वंशावतंशाति क्रांतीशवर सत्य व्रत शुद्ध प्रेमानुगामी ॥ अखिल ब्रह्मांड व्यापक चराचर प्रभो जानकीनाथ सद्गाथ रक्षक प्रणत दीन दासोस्मि मां पातु स्वामी ॥ १६॥ जयति जनकात्मजा जक्तजननी प्रवल असुर संहार कारणि उधारणि धरा राम गजेन्द्र पद पद्मसेवी । नाग नर यक्ष गंधर्व किन्नर अमर कन्यकाभिस्त्वमपि वंदनीया सदा त्वचरण सर्व पूज्यादि देवी स्वक्ष सहीत ज्ञेया सिध्येया सित्वं रूप लावण्य स्वेच्छावपुपधारिणी धर्मधर प्रीतमाज्ञानुवर्ती ।। रामरामाभिरामारमाधीश्वरी शुभ्र सिंहासनारूढ सौभाग्यनीराघवे वामभागानुवर्ती ॥ १२॥ दोहा-कुरु कुशलं प्रणमोस्तुते, देहि भक्ति निष्काम ॥ बंधुभिश्च सहसीतया, वस हृदये श्रीराम ॥ १३॥ सो०-इमि सुर निगम अपार, करी विनय सिय राम प्रति ॥ होत सु जैजैकार, भयो राज अभिषेक लखि ॥ १४ ॥ हरिगीतिका छंद । तिहि समय रघुवर लक्ष धेनु सवत्स विधियुत साजिक ॥ दीनी सु विप्रन विनय पूरक राज गादी राजिकै ।। पुनि तीसकोटि मु हममुद्रा दान कीनो रीतिसे ।। गज वाजि स्यंदन वसन भूपण अमित दिये बहु प्रीतिने ||१|| पुनि पवनदत्त सु माल दीनी हर्पिक कपिराजकी। भुजवंद चन्दसमान दीनों वालिसुत युवगजको । वरहार जो वासव समर्पित दुलमि मोमीतहि दयो ।। जिदिको रजाम प्रकाश बहु आवासमें चहुँ दिशि व्यो ॥१६॥ फछु चार धार उतार पुनि मोहार सियरधान्किः॥ उिन लसहिं हनुमत ओर छिन नहि जाहि पियहि निहाकि ।। मोमगाई दियको ध्यान योले देह निदि जिय भावदा । राखि लीन हम तब अंततोगनि जाहिर उमगाशी --- दीनां कट नप, यथा दन्ति नृप माज मनि ॥२६॥ (४४४.) रामरसायन। तब सिय सकुचि हनुमंतको वह माल दानी प्रेमते॥ उठि कीश लै धरि शीश धारी कंठ निज दृढ नेमते ।। पुनि तासु मणि मुक्ता अमोल सु एक एक निहारही ॥ तिन दावि दंतन फेर हेर निरकै कर धारही ॥ १८ ॥ सो देखि सिय हिय कहतिहै कपिरत्नगुण कह जानही ॥ अनमोल माणि मुक्ता अनूपम तिनहि दंतन भानही । यौं गुणिं जु सीता मधुरबूझी वीर काह निहारहू ॥ क्यों विमलमाल विशाल दशननशाल सकल विदारहू ॥ १९॥ हनुमान तव कर जोर भापी मात और न पेखहूँ । या में खचितकै नाहिं है श्रीराम नाम सुदेखहूँ ॥ सुनि सीय मृदु मुसक्याय बूझी कहौ कपि तव. गातमें ॥ कह नाम लिपि है सो लखौं उर माथमें कै हाथमें ॥२०॥ हनुमंत तब निज नखनते उर बाहु चर्म विदारिकै ॥ कर जोरिकै सीतहि दिखायो चकित अंग निहारिकै । हेरो सिया कपिगात अंतर राम नामहि लिपि चहूँ ॥ तिल मानहू भुज हीयतिहि विन वपुप नहिं सूनो कहूँ ॥२१॥ हनुमंत भक्ति अनन्य सत्य विलोकि सिय हर्पित भई ।। चिरुजियहु ईश प्रसीदहीं सुत सपदि वर आशिप दई ॥ सो लखि समस्त समाज सुर नर कपिहि धन्य बखानहीं। ते धन्य जन जे पानसुतको ध्यान निज उर आनहीं ॥२२॥ सो०-इहि विधि सकल समाज, लखि कपिभक्ति अनन्य दृढ ।। कहत भक्त शिरताज, हैं हनुमान मुजान वर ॥ २३ ॥ होय राम जय शोर, तिहुँ लोक अति सुख छयो। दान मान चहुँ ओर, नीति प्रीति शुभ रीति मय ॥२१॥ पुनि प्रमुदित श्रीराम, वमन विभूपण विशद बहु ।। भूमि ग्राम धन धाम, कपि ऋन्छन दीने उचित ॥ २० ॥ लंकापतिहि अनृप, महिन निशाचर बूंद बहु ।।

रामरसायना (४४५) जाम्बवन्तको राम, मणिन जदित भूपण विविध ॥ वसन अनूप ललाम, दीने संयुत प्रीत बहु ।। २७॥ पुनि बहु याचक वृंद, किये अयाची सकल विधि ॥ इमि श्रीदशरथनंद, दान मान तोपै सवै ॥२८॥ चौ०-पुनि रघुवीर हिये हुलसाई * लपणहि कही सनेह बढाई ॥ करों बंधु तुम कहँ युवराजा * या छिन मध्य समस्त समाजा२९॥ सुनि लछमन बोले कर जोरी नाथ एक विनती है मोरी ॥ हो लघु भरत जेठ मम भ्रातातिनहि उचित पदवी यह ताता३० तव प्रमुदित भरतहि रघुराजा युत अभिषेक कीन युवराजा ।। लपणअधीन सकल दल राखा न्याय काज रिपुदमनहि भाखा२१ वृद्ध सुजन प्राचीन प्रवीने * ते तिहुँ बंधु निकट करि दीने। अपर अपार समस्त प्रधाना यथायोग राखे युत माना||३२॥ जे जन दशरथ नृप ढिग केरे ६ तिने राम राखे निज नेरे ॥ दान मान प्रथमहुते भूरी ॐ सबकी सब अभिलापसु पूरी३३ बाल सखा सेवक बहुतेरे * उचित मान कीने सब करे ।। इमि सुर नर अनंद मधि फूले । निज निजधाम काम सुख भूले३४ दोहा-सात दिवसको एक दिन, भयो न अथये भान ।। रामराज आनंदमें, कळू न कोऊ जान ॥ ३५ ॥ पुनि नट नर्तक कौतुकी, अपर अनेक समाज ॥ नर नारी तिन भूरि धन, दीनो कौशलराज ॥३६॥ ताछिन द्वैगंधर्व जे, चित्रसेन इक नाम । दूजो विश्वावसुगुणी, दोऊ वर मतिधाम ॥ ३७॥ ते रामहि कर जोरिक, रठि बोले हुलसाय ॥ महाराज रघुवंश मणि, मम विनती यह आय ॥ ३८॥ पंचवर्ष वय नाथकी, रही तब हम आन ।। महाराज अवधेश ढिग, कियो दुहूँ बहु गान ॥ ३९ ॥ ताछिन प्रभु तिहुँ बंधु युत, पितु ढिग रहे विराज ।। सुर गुरु मंत्री नृप सखा, सेवक सकल समाज ॥१०॥ १ --- गो दिन तिय शिशु आत्महन, अरु मिथ्या वतराहि ।।1/ (४४८) रामरसायन। तब अगस्त्य मुनि राम सों, बहु विधि करि निरधार ॥ सकल निश्चरनकी कथा, कही सहित विस्तार ॥६॥ पुनि बोले ऋपि रामसों, निश्चर प्रबल महान ।। तब ते.अति जवते दयो, पार्वती वरदान ॥६॥ जन्मतही निश्चर तुरत, माता वैस संमान ।। होत प्रौढ ताही समैं, समर योग बलवान ॥ ७॥ प्र० ॥ वा० ३० कां०॥ स०४॥श्लोक ॥ पुरमाकाशगं प्रादात्पावत्याः प्रियकाम्यया ॥ उमयापि वरो दत्तो राक्षसीनां नृपात्मज ॥ १॥ सद्योपलब्धिगर्भस्य प्रसूतिः सद्य एव च ॥ सद्य एव वयः प्राप्ति मातुरेव वयःसमम्॥२॥इत्यादि। दोहा-याते वाढत अमित नित, देत सबहि:संताप ॥. . . सो गति अजहूँ पै अवै, कार न सकें बहु पाप ॥८॥ गो द्विज हत्या रौन दिन, करत हुते खल भूरि॥ रही दुखित बहु भूमि सो, भयो सकल दुख दूरि ॥ ९॥ अब सुब्रह्महत्या सदा, रही चार अस्थान॥ प्रभुहि विदित कारण सकल, है बहु ठौर बखान ॥ १० ॥ चार मास पावस विपे, एक अंशते खास ॥ चंड ब्रह्महत्या करै, सरितन माहि निवास ॥ ११ ॥ बहुरि ब्रह्महत्या प्रबल, सो इक अंश सदाहि ।। रहै निरंतर रैनि दिन, ऊपर धरणी माहिं ।। १२॥ तिय रजवंतिनमें सदा, तीन दिवस लग जोय ॥ वास ब्रह्महत्या प्रवल, एक अंशते होय ॥१३॥ सदा ब्रह्महत्या रहै, एक अंश तिन माहि ॥ । . -

रामरसायन ।
(४४९)
प्र०वा०॥3.फा० ॥ स. ८६॥श्लो० ॥
देवानां भापितं श्रुत्वा ब्रह्महत्या महात्मनाम् ॥ संदधौ स्थान-
मन्यत्र वरयामास दुर्वसा ॥३॥ एकनांशेन वत्स्यामि पूर्णोदासु
नदीपु वै ॥ चत्वारो वार्पिकान्मासान्दर्पघ्नी कामचारिणी ॥४॥
भूम्यामहं सर्वकालमेकेनांशेन सर्वदा ॥ वसिष्यामि न संदेहः सत्ये-
नैतद्रवीमि वः ॥५॥ योयमंशस्तृतीयो मे स्त्रीषु यौवनशालिपु॥
बिराचं दर्पपूर्णासु वसिप्ये दर्पघातिनी॥६॥ हतारो ब्राह्मणान्ये तु
मृपा पूर्ववदूपकान् ॥ तांश्चतुर्थेन भागेन संश्रयिष्ये सुरपभाः ॥७॥
दोहा-इन विहाय अव और थल, रहो न पातक लेश ॥
राम कृपाते रावरी, सुखी भये सब देश ।। १५॥
चौ०-जोप्रभुलंकनाथको मारा 8 सोप्रसिद्ध तिहुँ लोक मझारा ॥
जासु तेज बल गुण प्रभुताई आपहिप्रथम समस्त सुनाई।।१६।।
जे कुकर्म वश जीव अपारा परे दुखित बहु नरक मझारा।।
तिन उद्धारक तिहुँ पुर माहीं * तुम बिन कोउ सुरासुर नाही१७॥
सो रावण यम जीतन काजा क गो यमपुर जव सहित समाजा॥
लखि नारकी विकल विललाये *दशमुखते सब जीव छुड़ाये १८||
म० वा० ॥३० फा०स० २१ ॥ोफ० ॥
रावणो मोचयामास विक्रमेण बलाली ।
प्राणिनों मोक्षितास्तेन दशग्रीवेण रक्षसा ॥ ८॥
सुखमापुर्मुहूर्त ते रातर्कितमचिंतितम् ।।
प्रेतेपु मुच्यमानेपु राक्षसेन महीयसा ॥९॥ इत्यादि।
चौ०-सो रावणहि सहित परिवारा संयुत सेन समर संहारा ॥
पुनि नृप तिलक विभीपण सारा को प्रभु सम बलवंत उदाग १९॥
दोहा-इहि विधि मुनिवर बहु कला, कहि पुनि अस्तुति कीन ।
भई साँझ तब सबहि.प्रभु, उचित वाम वर दीन ॥२०॥
रएवर सादर प्रीत युत, राखे मुनिवर बंद ।।
अपर कथा नित होत बद्दु, छायो परमानंद ॥२७॥

सहित ग्रीति नृप नीति रसाला भये बिदा मुद सकल भुपाला२८, प्रभु अनुजनलै संग नरेशा * गये पाय रघुवीर निदेशा॥ | इहि विधि होत अनंद सदाई रामराज वसुधा सुखछाई ॥३१॥ | प्रति दिन होम दान सुरपूजाकार पुनि करें काज निज दूजा | ऊंच नीच जे गुणि जन आ * तिन सबकी अभिलाप पुजावे३२/ | देश कोश कृत नैनन देखें न्याय माहिं निजपर नहिं लेते।। | पालैं प्रजहि पुत्र सम जाने * यथा योग सबही सनमानें॥३३॥ कृपा रोप वसुगुण उचित, चहिय भूप महँ शुद्धि ॥३४॥ .सकल चराचर लोक.तिहुँ, रहत सदा सानंद ॥३५॥ (४५०) रामरसायन। मिथिलाधिप केकयनृपति, काशि नृपादि अनूप ॥ जुरे अवध मुदित बहु, देश देशके भूप ॥ २२ ॥ द्विज मुनि कविकोविद निपुण, याचक गुणी अपार ॥ ज्ञातिवर्ग वर धनिक बहु, नर तिय वरन सुचार ॥ २३॥ अपर अमित जन अवध, छाये सब कहँ राम ॥ मान दान सादर सकल, करि राखे निज धाम ॥२१॥ बीते बहु दिन प्रीति वश, राम जान नहिं देत ॥ : ते अतिही आनंदमें, भूले सकल निकेत ॥ २५ ॥ चौ०-तव मुनिगण रामहि समुझाई *गये अनंदित विदा कराई ॥ विपुलमहीप राज धन धामा रामहि अर्पिलहो विश्रामा ॥२६॥ राम उदार धर्म धुर धारी * यथा उचित नृपनीति निहारी ॥ दीन बहोरि राज्य तिन काही * कोऊयह न कीन कोउ नाही२७॥ राम नीति युत सब रुचिराखी * तिन प्रति मधुर गिरावर भाषी। तिनहिं राज धन अर्पण कीना * उचित बहोरि ताहि सो दीना २, विपुल वस्तु धन राज समाजा* लाये अनुज निकट रघुराजा ॥ सो लखि तुरत राम सब दीने * यथा योगपरितोपित कीने३० ॥ याचक भये समस्त अयाची ऋधि सिधि फिरै अवधमें नाची। दोहा-साम दान अरु दंड पुनि, भेद पराक्रम बुद्धि ॥ ते सवयुत रघुवंश मणि, राज करत निरद्वंद ॥

गमरसायन। (४५१) चौ०-कबहुँ अहेर करें वनजाई संग सखा सेवक तिहुँ भाई ॥ कबहुँ सैन जोरै इकठाई ६ निरखें वीर शस्त्र निपुणाई॥३६॥ होहिं प्रसन्न देहिं बकशीशा करें अनेक जनन जन ईशा ॥ कबहुँ सकल गुणि गणनखुला गुनाहिं परस्पर प्रगट करीव ३७॥ कवहूँ सब पुरवासिन जोरै क करि बहु नीति निदेश निहोरें । कबहुँ सखा सेवकन बुलाई सिखवहिरीति प्रीति हुलसाई ३८ कबहुँ प्रात सरयू अस्नाना करहिं देहिं विप्रन बहु दाना ।। | गृह अंनुजनके कबहुँ सिधारें कबहुँ सखनके भवन पधारे ३९॥ दोहा-उचित प्रजा सेवक कबहुँ, विनय करें युत प्रीति ॥ राम जात ताहू सदन, भक्ति वश्य सह रीति ॥४०॥ चौ०-सब मातनके भवन सिधा डे चहूँ वन्धु समभाव बढावें ॥ जननी सखी जिती बहु वामा मातसरिस सब जानत रामा४१॥ त्यों सिय सव सासुन सम जान तिहुँ देवरन पुत्र इब मान । भगिनी नित्य आय शिर नाव जनकसुता बहु प्रीति बढ़ाव ४२॥ तिहूँ बंधु नित सिय पगपर, बाल सखाहू चरणन दरसैं ।। पुरवासिनि रनिवास सिधार दान मान सबही सतकारें ॥२३॥ सखा ज्ञाति गृह औसरमाही सासु संग आज्ञा ले जाहीं॥ पुत्रवधू चहुँ धर्म सयानी प्रमुदित रहे निरखि सब रानी तिहुँ भगिनी सियरीति निहारीक्षा करें उचित कृत तिहि अनुसारी।। सीता सहि सुनीति सिखवि सोलखि साल मास हुलसा दोहा-पुत्रवधू चहुँ पुत्र चहुँ, परम परम्पर प्रीत ।। धर्म.गति मर्याद कुल, संयुत सब नृपनीत ॥ १६॥ इहि विधि अति आनंद युत, रहत सर्व नर नारि॥ धन्य धन्य सुर मुनि नकल, वर्णत अवध निदारि ॥२७॥ प्रजा धर्मरत ज्ञान दुत, विज सुखी गुणवंत ।। संतति संपति सचिमय, आनंद दश दिगंत २८॥ जन इच्छित ने जलद, पाणी धान्य असार । रामगज प्रमुदित नर, टोत मुजेज शा॥१९ -- (४५२.) रामरसायनः। सीतारामहि सुमिरिकै, दृढ विश्वास कराय। रसिकविहारी हीयकी, सव अभिलाप पुजाय ॥५॥ ब्रह्मादिक सुर वृंद अरु, नारदादि ऋपिराज ॥ नित प्रति आवत अवधमें, राम दरशके काज ॥५॥ इति श्री० रा०र० अ० वि०.श्री. रामचंद्र राज्यरीति वर्णनो नाम तृतीयो विभागः ॥ ३॥ दोहा-इहि विधि दशरथ चकवै, नृप सुत वर श्रीराम ॥ सार्वभौम दृढ राज्य शुभ, करत धर्म युत काम ॥ १॥ मात बंधु सेवक सखा, अपर सकल नर नारि॥ धन्य राम सब कहत हैं, प्रीति सुनीति निहारि ॥२॥ समै समे प्रति होत हैं, सकल काज सब ठौर ॥ अवध भूप श्रीराम इक, तिहूँलोक शिरमौर ॥३॥ एक दिवस रघुवंशमणि, विचरत सरयूतीर ॥ संग वंधु संत्रक सखा, अपर विविध जन भीर ॥४॥ लखि सरयूतट रेणुवर, मृदुल विमल रघुराज ॥ राजे ताविच मुदित महि, संयुत सकल समाज ॥५॥ ताछिन बहु नर नारि तद, ऊंच नीच सब कोय ॥ यथायोग प्रभु दश लहि, अति आनंदित होय ॥६॥ विविध प्रजा चहुँ मरण अरु, मुनि तापस बर संत ॥ दाशयन्त आरत चलत, वेटन जात अनंत ॥ ७॥ पर गय मिलि विविध जन, इत उत निकटगुदर॥ पहियथोगित परम्पर, वनरायन मुख पूर॥८॥ आनंद ममीपदान परम आनंद ॥ परत सुन्न करनगमदिन मनन द ॥९॥ -मनमस्मिार्गदीन एक ॥ किरगीरी रामरसायन । (४५३) सवैया कवित्त ! उत वीत गई लरकाइँ सबै वा अजानतामें कछु जानो नहीं। तिमि जात जवानी कुसंगहिमें छिन एक सुसंग जु आनो नहीं। कर पाय सुधा तजि दीनो में हाय हलाहलखाय अघानो नहीं। रसिकेस वृथा यह जन्म भयो सिय रामको नाम कमानो नहीं११ दोहा-यौं कहि पुनि कर जोरिकै, भापि विनय युतबैन । अधम उधारन नाम सुनि, हौ आयो तुव ऐन ॥ १२॥ सोरठा-तासु विनय सुनि लीन, कछु विहँसे तिहि ओर लखि ॥ पै नहिं उत्तर दीन, तव चोले पुनि दीन वह ॥ १३॥ संवेया कवित्त। गीध गुयंदगनी गनिका सवरी कपि रीछहि आदि अनेकू ॥ तारे तबै रसिकेस तिनै हितकीन नलीन अलीन विवेकू ।। पातकी मोहिमहा लखि राम न त्यागो दयालु जु आपनि टेकू ।। पाँवरो वावरो डावरोधावरी रावरो है अवलंब जु एकू ॥१४॥ टेरत दीन है दीन जवे तवही तिहिकी सुधि लेतहो लायो । रावरि रीति सदाकी बंधी अब सो मरयादकी लीक न नायो। पातक पुंज भरो रसिकेस पै धाय परो तुव पाय पैरावो ॥ राखत आये की लाज सबै प्रभु सामुहे जायतीखायन वावो १५ दोहा-यों कहि पुनि बोलो निडर, मोहिं नहीं कछु लाज । कठिन ताहि जाको विरद, होय गरीबनिवाज ।।१६।। मवैया कवित्त। खेच कसी है कुकर्मनते कटि शीश अधर्मनको धरो गट्टा ।। मोहिं न जानि परे का भार करों नितकार यही हिय कट्टा ॥ योंही चहूं बहु डोलतहीं दुहुँ कंध टटायके लोभकेलट्टा। देखि दशा रसिकेस किया जग गम जगवरोहोत है ठट्टा ।।१७॥ दोहा-सुनि रघुवर समक्यायक, पुनि हेरे तिहि ओर ।। कटन उत्तर दीन तय, योले वचन कटोर ।। १८ ॥ पनाक्षरी-शस्ति । फरम सुटेलावरणाश्रम टुटेलामंजु धाम छंटला जानि पानिने टंट- ला है ॥ दीनको जुटेला और मलीनको लुटला सदा आन वान -- । संगी तू ॥ २०॥ ये दो अंजनीके पूत देत हौं रजाय यह रसिकविहारी मो अनन्य मो अवगुण जित देखियो, निज दिशि लखोसदाहिं ॥२॥ रामरसायन। कान:सान मान ते रुठेला है ।। मनको मुटैला पातकीनको पुटैल चित्त चाहको चुटैला झूठ यशको झुठैला है ।। रसिकविहारी तो नीकी भांति जानौं राम द्विजको कुटैला भीलनीको तू जुठेला है।९). शबरी अहल्या गणिकादि दुराचारी भारी ऐसी ऐसी घनी अधम कुनारिनको रंगी तू ।। वायस निपाद गीध राकस अपावन ये गज कपि रीछ भूर कूरनको अंगी तू ॥ काम क्रोध लोभ मोह विवश मलीन दीन दुःखित दरिद्री इमि रागिनको ढंगी तारसिकविहारी भली भाँति पहिचानो राम हौंतो तोहिं जानो है सदाते नीच सवैया-कवित्त । लूटि लयो तिहुँ लोकनमें यश भारी न काम कहूँ कछु कीधी॥ पाहन भील निशाचर कीश उधारे तिनै रहो काम सुसीधो॥ दीनदयाल कुहाय भले रसिकेस सुगीधेहो तारिकै गीधो । जानि परै तुमैं राम तबै जब मोसम पातकिसे हठि वाघो ।। २१॥ दोहा-सुनि हँसि विकल सु दनि गुणि, कृपा करी रघुवीर ॥ हनुमंतहि आज्ञा दई, तिहि धराय बहु धीर ॥ २२॥ घनाक्षरी कवित्त । भक्ति पावही ॥ काम क्रोध लोभ मोह दुरित दरिद्र दोष कोऊ दुर याके नेक निकट न आवहीं ॥ नाम रूप लीला धाम बहु गुण ग्राम सत्य सकुल चरित्र मो समस्त दरशावही ॥ सहित अनंद निर द्वंद यश गाव भूरि फेरि द्वे निशंक मम संनिध रहावही ॥२३॥ दोहा-सुनि प्रभु आयसु पवनसुत, कही धीर दे ताहि ॥ हम तुव रक्षक हैं सदा, दोऊ लोक वनाहि ॥ २४ ॥ सुनि मुदीन कर जोरिक, भापी हनुमत पाहिं ।। । - - घनाक्षरी-फपित्त । कछु नकल कर्म करिहीं करे में करीं तिनकी प्रतीतिहिर धारी हैं । रसिकाविहारी दृढ गखो है विधाम येही केसी रामरसायन। (४५५) केशोर मम रक्षक सु भारी है ॥ 8है लोक दोऊ सुख संपति सुयश दा सुधरै सुधारी सुधरैगी बात सारी है। मेरी प्रभुताई करौ प्रभुता तेहारी यह जो पै लघुताई करौ लघुता तिहारी है ।। २६ ॥जानत नीकी भांति मेरे मैं कुकर्मनको याते अकुलात उर आवत न परता ॥ ये हो रामदूत अब ऐसी कृपा कीजे जाते सकल अनंद होय धार चित्त धीरता ॥ नीके कर्म कीने सब नीको फल देत सोई कोनी तुम यामें का कहावै तुव मीरता ॥ रसिकविहारी कर्म खोटे हू किये पै मोहिं नीको फल दीजे तो तिहारी वीर-वीरता ॥२७॥ दोहा-सुनि हनुमत भापी तवै, त्याग सकल अब सोक ।। राम कृपा तुव सबहि विधि, शुद्ध भये दुहुँ लोक ॥२८॥ रसिकविहारी दीन तब, कहि जैजै रघुचन्द ।। करन लगो विनती विपुल, पुलकित परमानन्द ॥२९॥ तब रघुवीर कृपालु तेहि, सादर निकट बुलाय ।। अभय कियो कर शीश धर, गयो सुपद शिरनाय ॥३०॥ रसिकविहारी दीन द्रुत, तहँ ते मुदित सिधार ॥ आय पुकारो पाहि कहि, कनक भवनके द्वार ॥३१॥ दीन गिरा सुनिक सिया, भेजी अली उताल ॥ संपदि आय वृझो सुतव, बोलो सब निज हाल ॥३२॥ पनाक्षरी कवित्त। रहत अनीता रंचनीता ना पुनीता कर्म धर्म ते अतीता ज्ञान गुणत न गीताको ॥ जन्म सव वीता विपरीता आकुरीता बीच सहज अभीता ही सभीता नाहि भीता को ।। काल यो व्यतीता नेक मनको न जीता कवी कीनी ना सुरीता औ भरो ना हियरीताको । वेदना अधीता पुण्य पूरन न कीता मोहि रसिकविहारी हे भगेमो एक सीताको॥३३॥ जाकी ओर ताकी नेक,नजरकृपा की कोर ताकी करताकी लिपि दूर कर ताकी है। अमित गुण की ता क्षमा की यह काकी वाणि कीरति सुधाकी चंद्रमा की ममता की है ।। शारदा रमाकी मति छाकी क्यो ममासी होय गमिकाविहारी हिन देत किमि थाकी है ।। दीनमुखदासी खल मन दुख दासी शुभ दृष्टि पुन्यपारी मिधिरेशी सुताकी है ।।३।।

- कहनलगो दंपति गुण गाथा रसिकाविहारी अति मुखता (२६) दादा-मिकाविहान दीन डाम, कही नदि निरि बी आयो स्वामिनि शरण, कादयगि करना। अन्नी दयालु मुनाय द्रुत नियहि काही ना काल । मुनि शिशु जानि समीप तिहि, लियो बुलाया ननिविहारी दीन तव चार वाण गहि लीन । त्राहि त्रादि कहि जोरि कर, पुनि बहु विनती कीन । গলাম । कुटिल कुपंथी है कुकमा औ कुसंगी सबा कुमति कु कपटी कुकामको । कायर कलंकी कुद्ध कुयशी जना कुवसी कोर औ कुत्राली ही कुछामको। दुष्ट दुराचारी का दन्द्रिी द्रोही दाया हीन दंभी दोप भाजन अनामको da- मुखकारी अवलंब मोहिस्वामिनी तिहारे पदपंकज ललाम कीरति तिहारी तिहुँ लोक उजियारी भारी भाप । दीन जनकी । होती हधारी यही हृदय विवारी निज काय गति गवरे वग्नको ॥ रसिकाविहारी ओम्हेरी कृपा राखेही बनेगी लाज किंकर करनकी ॥ काहु की न आश से निराश भयो मोकों बडी आश सिया स्वामिनी शरनकी । जाय हीन और डिग दीनतासुनाय हौं न ध्यायहाँन और को न गायहाँ । खायहीं न औरको प्रसाद वित्तलाय ही न न और शीश और को न नायहीं ॥ रसिकविहारी में के रामजको भूलिहूकै कबहुं न औरको कहाय हो ।। गहे दृढ़ ती सकल अभीष्ट फल स्वामिनी तिहारे पद पंकज ते पाय चौ-दीन वचन सुनि जनकदुलारी कृपा दृष्टि करि ताहि रसिकविहारी शिर कर धारी किया अभै दुहुँ लोक मझ मखी चारुशीलाहि बुलाई सैट कर गहि सापो हिय - . शरण लहो मम सिकविहारी याहि सदा राखियो सुखान तब सो अति अनंद उमगाई , सविनय स्वामिनि पद शि --- रामरसायन। (४५७) दोहा-स्वामिनि हियकी मृदुलता, इत अलि करें वखान ॥ उतं रघुवर उर सरलता, लखि सबही सुखमान ॥४४॥ रसिकविहारी दीन द्वै, भापे वचन कठोर ॥ सो क्षमिकै पुनि अति कृपा, कीनी राजकिशोर ॥४५॥ शमा दया श्रीरामकी, लखि सब करें बखान ॥ धन्य धन्य रघुवीर सम, स्वामी कोउ न आन ॥ ४६॥ ताछिन बोले राम सों, कपिपति दुहुँ कर जोर॥ सब कहँ आदर देत प्रभु, निरखि चकित चित मोर॥४७॥ रंच दीन है आय फिरि, करें कोटि अपराध ॥ सो क्षमिक कीजे कृपा, प्रभु हिय दया अगाध ॥४८॥ तव रघुवर हँसिकै कही, सुनौ सखा दृढ़ वैन । बडो कहावो लोकमें, यह साधारण है न ॥१९॥ धन ते गुन ते रूपते, कुल ते वयते नाहि ॥ वडो कहावै जाहि ते, ते लक्षण ये आहि ॥५०॥ दीननके अवगुण क्षमै, मेटै दुखित कलेस । यथायोग सब आदरै, सोई बडो सुदेस ॥५१॥ मक्या-कवित्त । जू कहि बोलै यथोचितसों अरु तू कहि वोले न बोल कड़ो। आसन देत विठारत पास औ आवत जात जु होवे खडो॥ योग जितो जिहि आदर होत तितो तिहि हेत सदा उमड़ो॥ और की राख वड़ाई भली विधि सो जगमें रसिकस वड़ो॥५२॥ दोहा-पुनि जगमें छोटे बडे, सब प्रकारके लोय । पै ऐसे अति स्वरूप हैं, शुद्ध हृदय जिहि होय ॥५३॥ घनाक्षरी कवित्त । ढूँढ़े नर नारी बहु पालक जवान बूढे रूढ़े और गृढे तिन बुद्धि ते विचारे भाफ ।। देखे तो दुरंगी कोउ काहु के न अंगी होत स्वारथके संगी परकाज हेत आ जाफ || रसिकविहारी यही गति में निहारी चहूँ तब या उचारी बात साँची चूक कीजो माफ ।। दानी गुनी ज्ञानी मानी जगमें बनेरहि प होत है करोरनमें पैसा न हो तब और कहा सुमबंधिहु होत सुदारन गड ॥ पैसा रहे रसिकेस जु पास तो होय घने श्वशुरे अरु साट्ट 10/ मुखतहै अति वेगहि मो जल जो सरिता सर सीम वह नवि॥ (१५८) रामरसायन । कोऊ एक जीको साफ ॥५४॥ खूबी सुवत कोऊ डूवत्त डिमाक माहिं कोऊ गरकाव है गरूर भूरमें गडे । कोऊ मतवारो मतवारी पनि बैठत है कोऊ आन आन के कहे ते आन में अडै ॥ वित्त वसुधा औ वाम हेत तजि हेत सबै जिते अवलोकौ तितै एक एक ते लडै । रसिकविहारी कोउ सज्जन मिले है तबै ताको अविलोकि घनो चैन चित्तमें चडै ॥५५॥ दोहा-तब भापी कर जोरिकै, भरत सुमति प्रभु पाहिं ॥ काहूको कह दोप सव, माया विवस भुलाहिं ॥५६॥ काम क्रोध मद लोभ अरु, मोह प्रबल ये पांच ।। इनके होत अधीन तब,सबहि सुरासुरनाच ॥ १७॥ हैं पांचहु ये प्रवल पै, अधिक सबहि ते लोभ । दुहूँ लोक नाशक दुखद, करै सदा मन छोभ ॥ ५८॥ सवैया कवित। ज्यों मद मत्त मतंग बली निबली अति होत जुपंक रहै खुभि॥ ज्यों वर वीर सुधीरहु होय अधीर जबै हग तीर अडै चुभि ।। दारु विधीरसिकेसमलिंद ज्यों होत अधीन सुपंकजमें गुभिः॥ त्यों मतिमंत रु संत गुणी बहु वेवस होत जु लोभ परै लुभि६९॥ दोहा-सो सुनि बोले लपण ते, लोभ करैं भल काज !. विन धनके जगमें कछु, होय नहीं सुख साज ॥ ६० ॥ सवैया कवित्त । पैसहिते सुख होय सबै अरु पैसंहिते दुख छूटत गाढू ॥ पैसहिते जग काम चलै अरु पैसहित सतकार हो वाढू ॥ दोहा-सो सुनि बोले शवहन, सबकी है मर्याद ॥ मर्यादा युत काज भल, त्यागे ताहि विपाद ॥ ६२॥ सवैया कवित्त ।। ख्यात चहूँ यह ताहि कहूँ न मिलै सुख जो मर्याद चले नपि।

रामरसायन। (४५९) याते अनंद चहै रसिकेस तो लोक दुहूनकी लीक नहीं नधि ॥ देखहु कैसो कलेश लहो मिथिलेशसुता धनुरेख कढी नवि६॥ चौ०-तवहिं विभीपण वात उचारी जो मम भ्रात सरिसनरनारी कर सकल मर्याद विहाई ६ ताहि कहौ का चलै उपाई ॥६॥ सो०-सुनत वचन श्रीराम, मुसक्याने मुख वसन दै॥ जाम्बवंत मतिधाम, तब भापी लंकेशप्रति ॥ ६५ ॥ कोऊ हो नर नारि, कूर कृपण वर धर्मगत ॥ ताको संग न कारि, सबते उत्तम यत्न यह ॥६६॥ तव वोले रघुचंद, सत्य कही ऋछराजपै ।। जो मन होय प्रबंद, करै कोउ तिहिको कहा ।। ६७।। ताछिन पवनकुमार, विनय करी कर जोरिकै ।। कहा प्रबल उपचार, जाते मन वंधन रहै ॥ ६८॥ सुनि बोले श्रीराम, मन बंधन करिवो कठिन ॥ बहु सुर मुनि मतिधाम, विवसरहें याते सदा ॥६९॥ विविध उपाय उदंड, सो मन बन्धन हेत है। साँचो सदा अखंड, सवते उत्तम यत्न यह ॥ ७० ॥ मनबंधनके काज, प्रीति करे सजन विपे ।। त्यागि सकल जग काज, तो पुनि वेवस होय सो ॥७॥ सर्वया कवित। है मति कूर महावल भूर छुटै तब काहुके हाथ न लागा ॥ ज्ञान विराग जंजीरन ते जकरो तिन तोरि फिर चहुँ भागा। जो रसिकेसनिशंक चहूँ तर लाज ढहावत है मदपागा। सोमन मत्तमतंग अधीन है आप वध हटि प्रेमके धागा॥७२॥ दोहा-यौं कहि बोल फेरि प, कीजे प्रेम विचारि ।। हो अनंद दुहुँ ठौर जिहि, मो लोने निरधारि ॥७३॥ गया पश्ति। प्रीति निर्भन की तिहिमों जिहिके हिय मां हिम अंतरडायद ।। तासों मिले न का सुख काहुको जा मनमें फट मध्य बनाया। ॥

रामरसायन ।
गले लग रहिनों जिय जाको सदा सर और जनाय
जोनाही इहि भाँति ती नंदने आदि हमेश मिलाय=
दोन-उन नो कान न कीजिये, जाते लघुता होय ॥
नीति प्रतिवलीत युत कर काम भल सोय ॥ ७ ॥
बनारीकविता
लोकी वात तास जालोजी भार होवे वासों कहिये
जो कहत फिर हूँ। जैदेतिपात जो गयेको पास राखै म
जीन मान राखतौन जैमले होतहूं ॥रसिकविहारी होय नेही
सनेह कीजे नहीं बनते. त्यालि दीजे भूपहो जहूँ ॥ आनवा
मान सान कान निजाताही मन गर्ने घर बाहर रहँकहूँ
दोहा-तानि बोले लाम पुति दुसमें सुधि न रहाय ॥
तब भारतवाहिना है धीर सो आय ॥ ७७ ॥
नपा शक्ति।
ठूठहु नाई ईलाहोर न जब लागत है वन ठाढा ॥
शहर जो उजौ जिन शाल सुपत्र रहै तहँ ठाढा ॥
सो शिर होत होतिशासपहब फूलै फलै बहु वाढा।
त्यौ सुसजान न त्याने कबोकहुँ कैसहु आय परै दुख डाढा७८
दोहा-कोड सौचे जीयते शुभ प्रणगहै दिवाय ॥
ताहि प्रथमहो दुखहुतो, अंत सुखहु ध्रुव आय ॥ ७९।।
सबैपाकक्ति ।
मात करून कनौं तिहिको जिहिको जिय रंचहु होय न कानू॥
चाहै इकतर नितही अरु बैठहि.चाहै सदा मिलि पांचू ॥
सत्य सुसत्यहि सत्य भलो रसिकेश कहौं ध्रुवरेखहि खाँच ॥
देखो सिया महाद भिया इमि साँचहि आवै कवों नहिं आंन्ट'
बोला-राम वचन सुनिकै तबहि, कह सुकंठ कर जोर ।।
नाथ सिया प्रहलाद सम, है दृढ़ता थोरि ॥ ८ ॥
रबर भापी सखा, लोक अमित नरनारि ।।
। अवगुण मिश्रित सकल, हेरो बुद्धि विचारि ॥ ८२॥

रामरसायन। (४६१) पैहो दुर्गुण गुण कहूँ, गुण कहुँ दुर्गुण होय ।। प्रकृति समै अरु विवश वश, गुण अवगुण दुहुँजोय ॥८॥ याते जे. बुधिमंत ते, करत समस्त विचार ॥ सत्य शुभाशुभ शुद्धता; सब विधि लेत निहार ॥ ८ ॥ केते अंतर शुभ सकल, ऊपर. लगत कुभेप ॥ केते अंतर अशुभ पै, प्रगट परै शुभ देख ।। ८५ ।। सो अंतरगति लपणकी, बुद्धि सहज नहिं होय ॥ करै घनो सतसंग सो, ज्ञान चहै जो कोय ॥८६॥ विना ज्ञान गति अंतरी, नहीं परै पहिचान ॥ विन पहिचाने शुभ अशुभ, कर्म किये बहु हान ||८|| याते मो मत है यही, भापों सहित उमंग ॥ सकल कुसंगहि त्यागि के, सदा करै सतसंग ॥ ८८ ॥ सुनि रघुवरके बैनवर, मुदित भये सब कोय ॥ दृढ़ धारी सतसंगते, दुहुँ लोक सुख होय ॥ ८९ ।। इहि विधि वाक्य विलास बहु, होत अनेक प्रकार ॥ कहत सुनत सब जन उनित, सह चहुँ राजकुमार ।। ९० ॥ अपर अनेक विनोद वर, नृत्य गान रस रंग ।। हास विलास सुहोत बहु, सब उर भरी उमंग ।। ९१ ।। इति श्री रा० २० अ० वि० वाक्य बिलास वर्णनो नाम चतुर्थों विभागः ॥ ४ ॥ 1 दोहा-धीशलपति निकट रतहोत अपार अनंद ।। इत जहँ त बेठे विविध, कहन सुनत जन बंद ।।१।। संत विष मुनिमंडली, जग होत ननमंग ।। वर्णत मुमुख मुनीशव: प्रभु यश नदिन उमंग ॥२॥ ताछिन मुमुप मुनीशते बोले हापि मुयन ।। पाहिय उपासक नीतिया, मुनिया का नयंत ॥३॥ -- 1 "..

वाल लखै दशरथ सुतहि, सो वात्सल्य कहाय ।। १६॥ सकल उपासक जन लह, जहाँ मोद विश्राम ॥ १७॥ (४६२) रामरसायन। चौ-सुनि मुनि सुमुख परम सुखमानातिन सराहि वोले मतिमाना हो वसिष्ट सुत परम प्रवीना तुमहि विदित सब हम लखि लीना पै कछु निज मतिके अनुसारा* कहिहीं यदपि सुभेद अपारा॥ है परन्तु यह गुप्त बखाना * याते वरणौं सभा प्रमाना ॥५॥ पुनि कबहूं येकांत मझारा * कहि हैं हम समेत... विस्तारा॥ यह उपासना रीति अनूपा 8 जानिलहै जन शुद्ध स्वरूपा ॥६॥ यों कहि पुनि बोले मुनिनाथा * सुनिय सुयज्ञ विशदवर गाथा॥ परम गुप्तसो गुप्तहि रापौर है प्रसिद्ध योगै सो भापौं ॥७॥ दोहा-सुर नर सव रघुचंदको, ध्यावै मन वच कर्म ॥ करें अनन्य उपासना, लहैं शुद्ध पद पर्म ॥८॥ सो उपासना पंचविधि, मुख्य प्रथम शृंगार ॥ सख्य दास्य वात्सल्य पुनि, है ऐश्वर्य विचार ॥९॥ जो अपने हित सत्य यह, राखे सदा विचार ॥, हम दंपति की हैं सखी, सो जानौं शृंगार ॥१०॥ अंतर दासिका, आदिक भाव अनेक ॥ .. मिथिला अवध प्रसंग युत, जानौ सहित विवेक ॥ ११ ॥ जो दृढ जान हीय दृढ, अपने हेत सदाय ।। राजकुँवरके हम सखा, सोई सख्य कहाय ।। १२॥ सुहृद नर्म सचिवादि बहु, भेद सकल इहि माहि ॥ जाति विजाति कुटुंब कुल, रीति धनी दरशाहि ॥ १३॥ जो ध्रुव दशरथनंदको, सेवहि स्वामी जानि ॥ सत्य दास हो आपतिहि, दास्य उपासन मानि ॥ १४॥ मात पिता गुणि आप कहँ, जो दृढ प्रीति कराय ।। जो श्रीराजकिशोरको, परब्रह्म दृढ मानि॥ ध्या सवचर अचरमें, सो ऐश्वर्य वखानि ॥ १६॥ ये वर पंच उपासना, तिनके निज निज ठाम ।। * रामरसायन। (४६३) - चौ० जिते उपासक हैं शृंगारी * तिहूँ लोक कोऊ नर नारी ॥ तिनको पूजनीय है जानौ कनकभवन वर मुख्य बखानौ २८ सख्य उपासक हेत प्रमाना रंगभवन है पूज्य प्रधाना॥ दास्य जनन लग रतन सिंहासन जो वरराज्य तिलककोआसन१९ वातसल्य जन हित सो ठामा २ जन्मसदन जहँ प्रगटे रामा॥ थल ऐश्वयिनको वह आई * वैठि जाहिं जहँ ध्यान लगाई२० दोहा-पंच उपासकहेत ये, मुख्य पंच अस्थान ॥ अपर सवहि सव पूज्य है, सरयू अवध प्रधान ॥२१॥ याही विधि सिय रामको, ध्यावत हैं सब कोय ॥ भुक्ति मुक्ति वर भक्ति रुचि, होय सुपूरित होय ॥ २२ ॥ जे प्रवीन ते भूलिहू, भक्ति मुक्ति नहिं चाय ॥ निज सुभक्ति सिय रामकी, चाहत कृपा सदाय ॥२३॥ अति उदार मृदु चित्त पुनि, समरथ सीताराम ॥ रसिकबिहारी हीयके, पूर्जे सवही काम ॥२४॥ अतिसमर्थ सिय राम सों, होहि भक्ति आधीन । भक्ति नाम आधीन है, नाम सुगुरु आधीन ॥२५॥ गुरु सतसंग अधीन है, संग सुभाग्य अधीन । भाग्यहीन बहु जन्मके, ले पति कर्म मलीन ।। २६ ।। सो कुभाग्यको जो है, हो सुभाग्य सुखधाम ॥ तो अनन्यं दृढ नेम ते, सुमिरै सीताराम ॥२७॥ सुनि सुयज्ञ आनंद है, कही सहित सनमान ॥ धन्य धन्य ऋपिराज वर, बहु गुणज्ञान निधान ॥२८॥ ताछिन अपर सुभक्त वर, बोले शीश नवाय ।। मुनिवर पुनि उपदेश कर, कांजे कृपा दिढाय ॥ २९॥ जाते दोऊ लोकको, होय शुद्ध निरवाह ॥ मोई शिख शुभ दीजिये, दाया युत मुनिनाद ।। ३०॥ तय मुनि बोले प्रेम युत, प्रश्न करी तुम जोय ।। - 1 , परवश निर्धन निर्गुणी, वचन सबै जन जोह ॥ ३८॥ तन मन धनते जो चहे, लखा सुजन सब कोय ॥३३॥ विविध प्रसंग मुग्रंथके, लखा मुजन अबदात ॥211 (४६४) रामरसायन। दुहूँ लोक अनुकूल हम, उत्तर देवै सोय ॥ ३१ ॥ सुनि प्रमुदित बै सुमति जन, खै इक मुख सब कोय॥ करत प्रश्न मुनि तासुको, उत्तर वर्णत जोय ॥ ३२॥ प्रश्न ॥ करैक्या? उत्तर-सिया राम भजिये सदा, करै दान सनमान ॥ सतसंगति दाया क्षमा, येही बात प्रधान ॥ ३३॥ प्रश्न ॥ संग किसका करै ?। उत्तर-संत सुजन पंडित चतुर, इनको कीजे संग॥ कै अपने दृढ़ मीतको, जानो वैन अभंग ॥३४॥ प्रश्न ॥ सज्जन कौनहै ?। उत्तर-दयावंत दानी गुनी, रामभक्त रतधर्म ॥ अविरोधी सज्जन भले, शुभ संतत सत कर्म ॥ ३५ ॥ प्रश्न ॥ दुर्जन कौनहै!। उत्तर -धर्म विरोधक पापरत, कपटी लोभी जान ॥ रामविमुख दुर्जन लखौं, वचन सबै दृढ़मान ॥ ३६॥ प्रश्न ॥ सुखकाहेमैंहै। उत्तर-राम भजन दानादि बहु, सुख है प्रीय मिलाप ॥ येकाकी सुनिरास पुनि, जानौ सजन आंप ॥३७॥ प्रभ ।। दुखकाम है ?। उत्तर-राम विमुख दाया रहित, दुखहै प्रीय विछोह ॥ प्रश्न ॥ मित्र कहि। उत्तर-विद्यामित्र वखानिये, पुनि चित भावें सोय ।। उत्तर-सधैं लोक परलोक दुहुँ, बढे हिये आनंद ॥ मोई पढियो चाहिये, होवे बुद्धि अमंद ॥४०॥ मन मुनिये गया। उत्तर-नाम कथा मुनिये सदा, चनुगईको यात ॥ - प्रश्न ॥ पट क्या?

रामरसायन। १ .प्रश्न ॥ रहिये किस रीती। उत्तर-सवसों नमि रहिये घने, मनमें दीन सदाय ॥ लोक वेद दोऊ लिये, समुझौ सुजन दिढाय ॥४२॥ प्रश्न ॥.जाना किस जगे?। उत्तर-जैयेकैती स्थनकै, राम कथा जहँ होय ॥ के दुहुँ लोक वनै तहाँ, यह समुझौ सब कोय ॥४३॥ प्रश्न।। कमावै क्या। उत्तर-नाम कमांव रामको, के यश लोक मझार ॥ कै सुख दोऊ ठौरको, लीजे वचन विचार ॥१४॥ प्रश्न ॥ विचारै क्या ? उत्तर-लोक और परलोकको, कीजे सदा विचार ॥ आपरूप पररूपको, वचन सुनौ यह सार ॥ ४५ ॥ प्रश्न त्यागये क्या? । उत्तर-कामादिक चारहु तजो, पुनि जो सियवर हीन ॥ अरु कुसंग अभिमानको, जानौ वचन प्रवीन ॥ ४६॥ प्रश्न। गहिये क्या? उत्तर-गहिये सकल सुधर्म निज, गुणधीरज मन नैन । नेह नेम अरु शत्रुकों, ये जानौ दृढ़ बैन ॥ ४७॥ प्रश्न ॥ शत्रु को है ?। उत्तर-तन धन हित घातक रिपू, अरु कामादिक जान ।। कुसमय सम शालक सदा, वचन लेहु दृढमान ॥१८॥ प्रश्न ॥ विश्वास फिसका फर। उत्तर-श्रीसीता अरु रामको, चहिये दृढ विश्वास ।। के पुनि साँचे मित्रको, माना वचन सुपास ॥१९॥ मन । गुरु को है। उत्तर-भव बन्धन छोरे सबै, ताको गुरू बखान ।। रक्षक अरु शिक्षक लखो, हेरो हरपि मुजान ॥५०॥ प्रश्न। मोक्षम होरहे। उत्तर-राम भक्ति हिंसा रहित, जानी मोन प्रमान । वचं सुपर संतापमे, गदियो वचन प्रथान ।। २१ ॥ , ॥ भाव कुभाव सुविधि अविधि, राम जपे सुख होय ॥१८॥ मैं वरणौं किहि भाँतिते, अति मतिमंद अजान ॥ ६॥ ताप दूर करबेको सीतकर सोहैसीत तमके नशायवेको भानुका | समान है । वुद्धिके बढायवेको शारदासे बुद्धिवंत वित्तपूरिखको. खलके संहार हेत शंभुसो प्रधान है। अभिमत देनवारो रामनाम (४६६) रामरसायन। प्रश्न निरपकाई सहायडे?।। उत्तर-पर पीडित निंदा निरत, हिंसक राम विरोध ।। गुरु द्विज शाप सुमित्रकी, नरक होय जिय शोध ।। ५२॥ प्रश्न ॥ अमर कौन है? उत्तर-सुकृती सुयशी रामरत, योगी योग प्रवीन । सदा अमर सो जानिये, वेद वचन रसलीन ॥ ५३॥ प्रश्न । मृतक कीन। उत्तर-राम विमुख अयशी सदा, मृतक समान सुजान नीच देव सेवक सबै, देखीं वचन प्रमान ॥५४॥ प्रश्न ॥ सार क्या है ? उत्तर-प्रीति राम द्विज संतमें, दया अधिक जिय माहि ॥ ज्यों चाहे त्योंही रहै, सार गहै शुभ ताहि ॥ ५५ ॥ इहि विधि प्रश्न अनेकके, मुनिवर उत्तर दीन ॥ पुनि सवही दिशि हेरिकै, बोले वचन प्रवीन ॥५६॥ लोक और परलोकमें, सुखद सत्य शुभसार ।। राम नाम सांचो सदा, अपर असत्य असार ॥२७॥ यातें कैसहु कीजिये, भजन वनै जिमि जोय ॥ . सियाराम की भक्ति दृढ, सियाराम गुणग्राम ॥ सियारामकी ध्यान नित, सियारामको नाम ॥ ५९॥ नाम प्रभाव अपार है, विधि हरि हरहुन जान ॥ घनाक्षरी कवित्त। जो कुबेर सो महान है ॥ पालिवेको विष्णु उपजैवको विरंचि )

रामरसायन।
(४६७).
कामतरु रसिकविहारी भला राम नाम गान है॥६॥काम क्रोध लोभ
मोह मारवेको मारन है विधि हरि हर आदि मोहिवेको यंत्र है।। महा
दुख दारिद्र त्रितापको उचाटन है आकरपवेको सुख संपतिको तंत्रहै ।।
कठिन कुचालरत इन्द्रिनके हेत असतंभन प्रबल भूरि परम सुतंत्र
है। रसिकविहारी राम नाममें प्रयोग पट रामवश्य करवेको वसीकर
मंत्रहै ॥ ६२॥ जगत अथाह सिंधु भरोहै कुमति नीर पावत न थाह
कोक सुर मुनि राज हैं ।। काम क्रोध लोभ मोह भंवरगंभीर परै तामें
जलजंतु भूर वासनादराज हैं।कोऊ बहे बूडे कोऊ वूड बच डूब पुनि
कोऊ, विकल चढे ज्ञानकी जहाज हैं।। तेईकै निशंक भये रसिकवि-
हारी पार रामनामसेतुपे चले जे तजिकाज हैं॥६३॥नामके भरोसे
सब भाँतिते निशंकर, लोक परलोकको उपाय ना करत हैं। नामके
भरोसे उपजा विधि पाल हरि हरहू संहारे नाम ओटले तरत ।|नामके
भरोसे भील सबरी सुगीध कीश भये बडभारी राम जाको सुमिरत
हैं। रसिकविहारी राम नाम अवलंब बडो जाते दिन रैनि यमराज हू
डरत हैं॥६॥
दोहा-ऐमो नाम अनृप जो, नहिं सुमिरै मन लाय ।।
कोऊ कलह होय तिहि, जन्म अकारथ जाय ।। ६५॥
घनाक्षरी करिन ।
योग जप सधि कोटि देव अवरोध कर संयम समाध निरूपाध
हो न पविना ॥ ज्ञान अरु ध्यान मान पूजा असनान दान निगम
पुरानके वखान सुख विना ।। तीरथ घनेरे नेम यज्ञ बहुतेरे प्रेम
रसिकविहारी रूप फेरते सुहावना ॥ येते हैं निकाम कोऊ.कामके न
काम कछु है हैं नहिं काम जोलों राम नाम ध्यावना ॥६६॥
पढो चारी वेद औ अठारह पुराण पट शान्न यंत्र मंत्र तंत्र आदिक
प्रवीनता ।। गान तान आदिक अनेक विद्यामं प्रवान बहु गुन ज्ञान
नधन माननमें पीनता ।। रूपमंतनीके मतिमंत औ कहाँव नंत फिम
दिगतनमें जैहना अधीनता। निविदाग नव भौति भलो चाही-
ताप जपागम नाम जाते मिटन मलीनता ॥६॥

| परलोक राम नाम सों हे रसिकविहारी सो विचार चितगनिये ॥ | राम नामको विहाय पावै जो पियूप सोहै हलाहल की समान भये सकल निप्पल जु पै, भजे न सीता राम ॥७३॥ जग लोग रिझाय बने रसिकेशरचोहन धाम कहा तो भयो।' नख केश बटाय विधायक चाम धरोवक ध्यान कहातो भयो। हढनेतनलायोसियावर मोनरजन्म लियेही कहातोभयो।।:/ (४६८) रामरसायना सवैया कवित्त । सी कहते सब सिद्धि मिलै अरु ता कहते तन आनंद आये ॥ रा कहते रस होत महा कहतेही मकार महत्व बढ़ावै ॥ जो रसिकेस प्रतीति समेत सुवर्ण भले ये चहूँ चित लावै ॥ होय उजागर लोक तिहूँ विचताहि हिये सियराम लगावै ॥६८॥ दोहा-कहत राम सीता मिलत, सीता कहतहि राम ॥ रीति अनोखी देखिये, सुमिरत सीता राम ॥ ६९॥ राम विना सीताभजै, सीता विन जो राम ।। होय ताहि फल है सकल, पूरो पुजैन काम ॥ ७० ॥ जेजन प्रीति प्रतीति युत, सुमिरै सीता राम ।। सुख पावै दुहुँ लोकते, लहैं सदा विश्राम ॥ ७ ॥ प्र०॥ गुणावली ग्रंथे ॥ श्लो। सीतया सहितं रामं सीता रामेण संयुताम् ।। न स्मरेत्स फलं. पूर्ण लभते न कदाचन ॥१॥ घनाक्षरी कवित्त । प्रीति राम नाम सों प्रतीति राम नाम सों सुरीति राम नाम सा सवहि भाँति भांतिये ॥ आशराम नामसों विलास राम नाम सो सुपास राम नाम सों अनेक विधि जानिये ॥ लोक राम नाम 'तामें धूर सानिये ।। ७२॥ दोहा-करे लोकपरलोकके, साधन वृथा निकाम ।। संवैया फवित्त । मूड़ मुंडाय सहाय के साधु लगाई विभूति कहा तो भयो । "

रामरसायन।
(४६९)
घनाक्षरी कविता
रूप गुण धनमें जु शंका अति होत आय त्याग औ विरागमें
अनेक विघ्न लेखिये ॥ रसिकविहारी यज्ञ योगमें उपाधि भारी
देहमें मरन नेहमें विछोह पेपिये ॥ भूत प्रेत पूजे गति अंतकी
नशात सबै जगमें वृथाही पचि दुःख अवरेखिये ॥ जामें अव-
लोको एक एक है कलंक तामें सीता राम नामैं निकलंक सदा
देखिये ॥ ७९ ॥
दोहा-सीता राम सुनाम यह, सकल सिद्धिको मूल ॥
ताहि त्यागि साधत अपर, साधन मति भ्रम भूल ॥७६॥
सो यह भ्रम सतसंग विन, कवौं न होवै दूर ।।
याते तजे कुसंग सब, जो चाहै सुख पूर ॥७७॥
संवैया-कवित्त ।
ग्राम नशै धन धाम नशै सुत वाम नशै सब काम कुटंगू ।।
राज नशै सुख साज नशै जग लाज नशै औ नशै वर अंगू॥
मान नशे तन प्राण नशै गुण ज्ञान नशै दुख होय अभंगृ॥
याते सुदूर रही रसिकेश जु भूलि कवों करियो न कुसंगू ॥७८॥
दोहा-पै कहुँ कहुँ संसारमें, धूतहु घरत सुभेप ॥
याते वुद्धि विचार युत, संग कीजिये देख ॥ ७९ ॥
संवैया-कवित।
डिंभ दिखावत लोगनको अति झूठे सुनावत ज्ञानके गाथे ॥
आरनको उपदेश विराग सु आप घने जगजालमें गाये।
पैलसे डोलत हैं नित गल करें बढु फैलहु लोभसे नाथे ।
ऐसन ते रसिकेसर्वचे हठि सोई नशे जो लग इन साथे ॥८॥
औरहि काह सुझावहि ते सुजन अपनहीं न औरण मुझे ॥
औरहि काह वुझावहि ते नर आपुहि जे सब भाँति अबुझे ।
ओहिते सुरझावहिका अति आपुहि जे जग जाल अल्झे ।।
भापतह मिकेस सुनी लखि भेप पतावनी दिनदृझे ॥ ८ ॥

नाम बिहायक और सुहाय न मंत्र न यंत्र न तंत्र न जादू १०६॥ (४७२) रामरसायन। अंकन भागे गुणे उनपे उन अंकन भगि गुणे न करे हठु ॥ जो गति गूढ विचारो चहै रसिकेश ती रामको नाम भले पठु१०० दोहा-ग्रह साँचे फल सत्य पे, राम नामको इष्ट । जाहि न सो जाने कहा, निजपर इष्ट अनिष्ट ॥१०॥ सो सुनिकै इक मंत्रविद, विन कही हुलसाय ॥ नाम मुख्य पै औरहू, मंत्रादिक सु उपाय ॥ १०२॥ ग्रन्थन माहिं अनेक हैं, देव सिद्ध समुदाय ।। जाते कारज सिद्धिं सब, गति त्रिकाल दरशाय ॥ १०३॥ तब तापस तिहि प्रति कही, कही सत्य तुम जोय ॥ जाने नामप्रभाव तिहि, और न भावे कोय ॥ १०४॥ संवैया कवित्त । टूटत है जग मोह जबै तब छूटत है सब दुःख विपादू॥ होत विराग विशेप हिये कछु फेरि नभावत वाद विवादू ॥ रामके नामहिमें दृढ प्रीति प्रतीति रहे रसिकेस अनादू ॥ दोहा-यों कहि भापी जटिल पुनि, सबहि सुनाय पुकार ॥ राम नाम विन और जो, जपै तासु मुख छार ।। १०६॥ तापस परम प्रवीन लखि, सुमुख सुयज्ञ तुरंत ॥ सादर कर गहिकै निकट, बैठारो गुणि संत ।। १०७ ॥ ताछिन एक सुभक्त वर, कह सुयज्ञ प्रति दीन । काह करौं जिहि नाशही, मोकृत कर्म मलीन ॥ १०८॥ सुनि सुयज्ञ बोले मधुर, हरि गुरु कृपा विहाय ॥ कोटि जतन कोऊ करै, तऊ न दुरित नशाय ।। १०९॥ जो कोऊ गुरु विमुख हो, अथवा गुरून कीन । कृपा आश प्रभुकी धरै, सोई है मतिहीन ।। ११०॥ सवैया कवित्त । ढेर सुमेर सो कंचन दान करै नित जायकै क्षेत्र कुरू धेनु अलंकृत कोटिन देतन अंशत नीरते रीते चुरू ॥ ॥ ।

रामरसायन।
(४७३)
मान प्रमान यही रसिकेश चहूँ युग भापत धर्म धुरू ॥
कैसहु राम न रीझत काहु पे तो लग जौलों वै न गुरूं॥११॥
दोहा-गुरुद्वारा प्रभु शरण है, सदा जपे शुभ नाम ॥
तो दुहुँ लोकं अनंद हो, कृपा करें सियराम ॥ ११२ ।।
राम नाम सुमिरै सदा, करै शक्तिसम दान ।
तो नित सुख संपति बढे, होय नहीं कछु हान ॥ ११३॥
सुन सुभक्त सविन कही, कहिय भजो नित सोय ॥
तव द्विज दै नामावली, कह याते भल होय ॥ ३१४॥
घनाक्षरी कवित्त ।
सीतानाथ १ सीतावर२सीताकंत ३ सीतापति ४ सुंदर सुजान६
सुखमानिधान ७ शोभासिंधु ८॥ रसिकविहारी ९ हपिकेश १०
रघुचंद ११ राम १२ बुद्धिवर १३ दाता १४ वेद ज्ञाता १५ बीर
१६ विद्यासिंधु १७ धाता १८ दीनवाता १९ दुष्टघाता २०
दुःखहाता २१ दोपदारिद्रनिपाता २२ देव २३ पाता २४ दाता२५
दयासिंधु २६ ॥ अवधभुवाल २७ भक्तपाल २८ रघुलाल २९
प्रात लेवे तीस नाम ये सप्रेम द्रु३-दीनबंधु ३०॥ ११५ ॥
दोहा-पुनि सुयज्ञ भापी तवै, सबही प्रति दृढ़ बात ॥
याते सबही नारि नर, हो भुव मंडल ख्यात ॥११६॥
घनाक्षरी वित्त ।
झंडा औ निसान के निसान ते न जाने कोऊ जाने है न कोऊ
द्वार दुंदुभी बजायते ॥ ऊंचे महिलानके उठानते न जान कोऊ
जाने है न कोउ. मत्त गजके बंधानते ।। मानते न जाने ओ गुमा-
नते न जाने धन धाम ते न जाने कोउ. कोटिहू विधानते ॥
रसिकविहारी चार वातते जहान जाने विद्या दारे ध्यान ते कृपान
ते सुदानते ॥ ११७॥
दोदा-मुनि सुभता आनंद है, हद धर दृढ़ वन ।।
अपर विविध जन मुदित भे, जे वृषि विद्या ऐन ॥ १८॥
दहि विधि सत्यतीर मधि, वाश्य बिलास उमंग ।।
गज नमाज समेत बहु, भयो विशद मन्मंग ॥ ११९॥

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रामरसायन । (४७५) धर्म नीति वरज्ञान कथा कहि सबहि सुधीर धराई ॥ पुनि चोले तुम सकल हमारे हिय विच वसो सदाई ।। सखा सुकंठ प्राण ते प्यारे तुमते उऋण सु नाहीं॥ तिमि लंकेश ऋच्छपति मेरे भरत लपण सम आहीं ॥ ६॥ हनूमान अंगद नीलादिक सकल प्राण सम प्यारे॥ मो जियहोत यही काहको छिन भरि करों न न्यारे॥ पै नृप धर्म प्रजापालनको सो न आप विन होवे। याते जाहु सदल तिहुँ भूपति सकल सुजन मुख जोवै ।। ७॥ सुनि सब विनय करी बहु प्रभु सों भरे नैन बिच नीरा ॥ पुनि वर नीत प्रीत मृदु कहिकै दई राम तिन धीरा ॥ यों कहि निकट बुलाय सुकंठहि दीन मु अंग प्रसादा ॥ निजकर सखहि विभूपितकीने भरे हृदय अहलादा ॥८॥ ऋच्छपाल लंकेशहि रघुवर सादर निज कर दीने ॥ भरत वेगि उठिकै दुहुँ भूपन प्रमुदित भूपित कीने ।। अपर यथोचित राज साज बहु सादर दिये कृपाला ॥ सनमाने सव भाँति नेह युत राम तिहूँ भूपाला ॥ ९॥ अंगद नील नलादि मुख्य तिन लछमन अरु रिपुशाला ॥ हित करि यथायोग पहिराये शिख नख साज विशाला॥ बहुरि विभूपन वसन अनूपम रघुवर भूर मँगाये ।। कोश भालु निश्चरन यथोचित सन्मुख सबहि दिवाये ॥१०॥ ताछिन हनुमान उठि वेग रामचरण धरि माथा ॥ पुलकित गात दीन ह विनती करी जोरि युगहाथा ॥ मो अभिलाप नाथ यह तव पद सेवौं निकटसदाई।। जवलग प्रभु चरित्र महि तवलग श्रवण करौं हुलसाई॥ ११॥ लखि हनुमंत प्रीति रघुनंदन उठि गहि अंक लगायो । एवमस्तु कहि विशद हार निजलै प्रमुदित पहिरायो । पुनि अंगदहि गोदले सुत सम कियो प्यार बहु रामा । तासु भार सुग्रीवहि दोनो भापि वन सुखधामा ॥ १२॥ आ यो। जाई। मई

मूलानि च फलानि च ॥ १॥ एवं तेषां निवसतां मासः साम्रो यम्,
(१७४)
रामरसायन ।
संध्या वंदन करि मुदित, सकल समाज समेत ॥
द्वै घटिका वीती निशा, गवने राम निकेत ।। १२० ॥
योंही नित प्रति होत है, अवध परम आनंद ।।
कहैं नारि नर वृंद सब, जै जै जै रघुचंद ।। १२१ ॥
इति श्री रा० २० अ० वि० सत्संगवर्णनो नाम पंचमो विभागः ॥ ५॥
दोहा-इमि नित सुखमधि वीति गो, मास अधिक इक वर्ष ।।
नृपति सुकंठादिक तिहूँ, दल युत रहैं सहर्प ॥ १॥
कोशऋच्छ निश्वर सकल, पल मद मधु पकवान ॥
अशन पान प्रमुदित करें, सहित प्रीत सनमान ॥२॥
प्र० वा० ॥ उ० कां० ॥ स०३९ ॥ श्लोक ॥
ते पिबति सुगंधीनिमधूनि मधुपिंगलाः ॥ मांसानि च सुमिष्टात
तदा । मुहूर्तमिव ते सर्वे रामभक्त्या व मेनिरे ॥२॥ रामोपिरे।
तैः साधै वानरैः कामरूपिभिः ॥ राक्षसैश्च महावीर्येत्रीय
महाबलैः ॥३॥ इत्यादि।
दोहा-ऋच्छ कीशतिय भरि तिन, नित रनिवासमझार ॥
सादर बहु नूतन विविध, होत सकल सतकार ॥ ३॥
दोवई छंद ।
लंकनाथ हरिपाल ऋच्छपति सदल सकुल यह चावै ॥
इतहि रहिय नित कबहुँ नाथ अब हमैं न गेह पठावै ।।
तिनको परमनेहु रघुवरमें राम प्रेम तिन माहीं॥
दोऊ हिये परस्पर चाह कोउ न छिन विलगाहीं ॥४॥
तब रघुवीर ज्ञाननिधि हियमें दृढ विचार ठहरायो।
राज साज धन धाम कुटुम इन मोहित सकलभुलायो।
पे अव निज निज गेह सिधार लखें काज जन जाई ।।
इमि गुणि सभा मध्य प्रभु बैठे लीजे सवहि बुलाई ॥५॥

रामरसायन।
(४७)
धर्म नीति वरज्ञान कथा कहि सवहि सुधीर धराई ।।
पुनि बोले तुम सकल हमारे हिय विच वसो सदाई ।।
सखा सुकंठ प्राण ते प्यारे तुमते उऋण सु नाहीं ।।
तिमि लंकेश ऋच्छपति मेरे भरत लपण सम आहीं ॥६॥
हनूमान अंगद नीलादिक सकल प्राण सम प्यारे॥
मो जियहोत यही काहूको छिन भरि करों न न्यारे ॥
पै नृप धर्म प्रजापालनको सो न आप विन होवे ।।
याते जाहु सदल तिहुँ भूपति सकल सुजन मुख जोवै ।। ७ ।।
सुनि सब विनय करी बहु प्रभु सों भरे नैन बिच नीरा ॥
पुनि वर नीत प्रीत मृदु कहिकै दई राम तिन धीरा ॥
यों कहि निकट बुलाय सुकंठहि दीन सु अंग प्रसादा।
निजकर सखहि विभूपितकीने भरे हृदय अहलादा ॥८॥
ऋच्छपाल लंकेशहि रघुवर सादर निज कर दीने ॥
भरत वैगि उठिकै दुहुँ भूपन प्रमुदित भूपित कोने॥
अपर यथोचित राज साज बहु सादर दिये कृपाला॥
सनमाने सव भाँति नेह युत राम तिहूँ भूपाला ॥ ९॥
अंगद नील नलादि मुख्य तिन लछमन अरु रिपुशाला।।
हित करि यथायोग पहिराये शिख नख साज विशाला ॥
बहुरि विभूपन वसन अनूपम रघुवर भूर मँगाये ॥
कोश भालु निश्वरन यथोचित सन्मुख सहि दिवाये ॥ १० ॥
ताछिन हनुमान उठि वेगै रामचरण धरि माथा ॥
पुलकित गात दोन 8 विनती करी जोरि युगहाथा ॥
मो अभिलाए नाथ यह तव पद सेवौं निकट सदाई ।।
जवलग प्रभु चरित्र महि तवलग श्रवण करी हुलसाई ॥ ११॥
लखि हनुमंत प्रीति रघुनंदन उठि गहि अंक लगायो।
एवमस्तु कहि विशद हार निजले प्रमुदित पहिरायो ।
पुनि अंगदहि गोदले सुत सम कियो प्यार बहु रामा ।
तासु भार सुग्रीवहि दीनो भापि वन सुखधामा ॥ १२॥

पितु आज्ञा सुनिअति अनंद सों साजि चले शिरनाई ।। १८॥ रामरसायन । उत तारा अरु रुमा आदि पुनिऋच्छतिया जेलरी॥ सादर सवहि अमोल साज वर दये सुरानिन भूरी ।। कौशल्यादि सियादि प्रीति युत अपर सखी पुरनारी ॥ सह सनमान उचित मिलि भेंटी भरे सकल हग वारी ॥ ३॥ इहि विधि इत रघुवीर निकट अरु उत रनिवास मझारा ।। अतुल साज धन धाम ग्राम दै भयो अमित सतकारा॥ ताछिन पुष्पकयान राम ढिग विचरत नभ मग आयो॥ समै प्रमाण तासु आगमलखि प्रभु उर आनंद छायो॥ १४॥ तव रघुवीर मुदित उठि तिहुँ नृप सादर अंक लगाये। अपर यथोचित कीश भालु मिलि पुष्पक मधि बैठाये॥ त्यौं कपि ऋच्छ तीय गण पद नमि भई अरूढ विमाना॥ यौं सब सबहि उचित मिलि गमने हृदय प्रेम उमगाना ॥ १६॥ निज निज धाम सबहि पहुँचाई पुष्पक बहुरि सिधारी ॥ राम धनद पद वैदि व्योम चहुँ विचरत इच्छाचारी ॥ हनूमान आनंद सहित नित रघुवर निकट रहाहीं ॥ राम चरित्र सनेम प्रेम युत सुनत अंग पुलकाहीं ॥ १६॥ तारा रुमा सहित उत हरिपति प्रमुदित करें विहारा ॥ दये ग्राम धन बहु कपि ऋच्छनते सब सुखी अपारा ॥ निज तिय अरु मंदोदरि युत त्यौं लंकनाथ विलसावें ॥ चहूँ मुख्य निश्वर समस्त पुनि परमानंद रहा ॥ १७ ॥ पुनि लंकेश विभीपण प्रमुदित निज लघु सुतहि बुलाई ॥ मत्तगयंद नाम तिहि सादर दीनी हुलसिरजाई ॥ जाहु पुत्र मम दिशि ते प्रभुकी सेवा करौ सदाई ॥ आये वेगि राम ढिग प्रमुदित शीश नाय कर जोरे ॥ कही विनय युत पूर्व जन्म कृत सुकृत उभे मोरे ॥ सादर तिहि बैगरि निकट प्रभु सुत सम प्यार वढाई ॥ बूझिं कुशल पुनि आज्ञा दीनी इतही रही सदाई ॥ १९॥ -- रामरसायन। (४७७) -- यौं कहि भूपण वसन अनूपम अपर यथोचित साजा ॥ मत्तगयंदहि अरु हनुमंतहि दियो सभा रघुराजा ॥ किय लंकेशसुतहि निजपुरको रक्षक अधिप महाना॥ गढ़पति पवनपुत्रको थापो सवही मध्य प्रधाना ।। २०॥ पुनि बहु सँखा सुसेवक पुरजन परिजन अपर अपारा॥ यथायोग बहु राज काज तिन सौंपे सहित विचारा॥ इहि विधि कौशलपाल कृपानिधि धर्म नीतिमय राजा ।। करहिं निदेश न्याय पालन वर संयुत सकल समाजा॥२१॥ इति श्री रा० २० वि० अ० मुग्रीवादि गमनवर्णनो नाम पठो विभागः ॥६॥ सो०-श्रीदशरथ सुत राम, करत राज मर्याद युत ॥ सबहीके मन काम, यथायोग पूर्जे सदा ॥१॥ सिंह पौरि कछु वार, वैठत हैं रघुराय नित ॥ करें विनय सब झार, तहँ निबंध नहिं काहुको ।। २॥ दोहा-सभामध्य राजें तबै, छिनहीं छिन सुधिलेत ।। विनय कार कोऊ विमुख, जाय न आय निकेत ॥३॥ एक दिवस इक श्वान तह, आय पुकारो द्वार । सुनतहि राम कृपालु तिहि, लिय बुलाय दरबार ॥४॥ वृझी तिहि कह विनय तुव, तब सोशीश नवाय ॥ कही नाथ ही पंथ विच, बैठो सहज सुभाय ॥५॥ अमुक ठाम वासी जु द्विज, मोको विन अपराध ॥ कियो प्रहार सुन्याय मम, कीजे बुद्धि अगाध ॥६॥ सुनि रघुवर तिहि विप्रको, बैंग सभा बुलाय ॥ वृझी श्वान प्रहारको, हेत कही मतभाय ॥७॥ तर द्विज बोलो श्वान यह, बैठो पंथमझार ॥ भयो शंक वश अतिदि में, याको रूप निहार ॥ ८॥ दूरहिते यदु वार ही, कही दूर हो दूर ।। रही तहाँई श्वान यह, दुरो नहीं मदपूर ।। ९॥ गा Ist कार file है।

(४७८)
गमरसायन।
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हुतो क्षुधित मैं तासमे, आयो क्रोध अपार ॥
तबहिं भजायो याहि में, करके दंड प्रहार ॥ १०॥
इनो जु इहि अपराध विन, मोतें भो अपराध ।।
क्षमादंड जो उचित सो, कीजे नीति अगाध ॥ ११ ॥
सो सुनि प्रभु वृझी द्विजन, उचित दंड इहि काह ।।
विप्र अवध्य अदंड सब, कह पुनि रुचि नरनाह ॥ १२॥
ताछिन बोलो श्वान पुनि, न्याय करिय प्रभु जोय ॥
तौ जो कछु हौं भापहूँ, याहि दण्ड सो होय ॥ १३ ॥
सुनि तिहि बूझी राम तब, कह कूकुर शिरनाय ॥
चित्रकूट ढिग शिव सदन, ग्राम कलिंजरमाय ।। १४ ॥
कीजे तहको अधिप इहि, सुनि रघुवीर तुरंत ॥
किय अभिषेक चढाय गज, भेजो थापि महंत ॥ १५॥
राज साज गज वाजि जन, पाय मुदित भो विप्र ॥
राम रजायसुते तहाँ, गयो अधिप क्षिप्र ।। १६॥
निरखि श्वान रुचि चकित सब, तब वूझी तिहि राम ॥
कही दिवायो दंड यह, भाप प्रगट मनकाम ॥ १७॥
कही श्वान तव सुनिय प्रभु, हौंहूं अधिप सुआउ॥
तिही पापते योनि यह, पाई चहूँ भ्रमाउ ॥ १८॥
शिव निर्मायल वस्तुको, ग्रहण करत जो कोय ।।
प्रगट पुराणनमें सकल, ताको पाप जु होय ।। १९ ॥
कहुँ घुनि मुखिया आपही, भपैसुवस्तु अकेल ।
संनिध जनहिं न देय सो, परै नरक महँ पेल ॥२०॥
सो द्विज तहको अधिपढे, करिहै येई पाप ॥
मोसम वै है श्वान ध्रुव, सदासहै संताप ॥२१॥
यौं कहि श्वान नवाय शिर, गयो तासु गति सोच ॥
कहत सबै पर भागको, खैबो है अति पोच ॥ २२॥

रामरसायन । (४७९) सुनि पुरजन यह न्याय गति, कहत मुदित वरवैन । धर्म नीति ज्ञाता नृपति, और राम सम है न ॥२३॥ -योंही सब चर अचर सुखारी रामगज नहिं कोउ दुखारी ॥ न मान अरु न्याय विचारा होय नीत संयुग कृत सारा२४॥ क दिवस कौशलपति रामा सहित समाज सकल मतिधामा सभा सदन मधि आय विराजे निज निज काजसाज सब साजे२५ छिन द्वै पक्षी तह आये भूरि परस्पर वाद बढाये ॥ क उलूक इक गृह कराला * झगरत दुहूँ सकोप विहाला२६ आय प्रभुहि दुहुँ शीश नवायो * निरखि राम तिन विस्मय छायो।। अतिहि उताल प्रथम हे दीना अस्तुति कीनी गिद्ध प्रवीना२७ पुनि बोलो प्रभु मोर अगारा ॐ यह उलूक लेवै वरियारा ॥ याको न्याय नाथ ध्रुव कीजे * सत्य विचारि रजायसु दीजे२८॥ मुनि तिहि वचन उलूकहि रामा क्ष वृझी भाप कौनको धामा। दुहूँ बखान सुनें हम जवहीं न्याय विचार करें पुनि तवहीं२९ सुनि उलूक बोलो हे नाथा दिवा अंध मुहि जानि अनाथा॥ सदन मोर यह गीध सुलेबै ॐ वृथा सकुल मोको दुख देवे३०॥ सुनि दुहुँ वचन गुणी महिपाला * जानो परे गीध वाचाला॥ प्रथमहिं अस्तुति मधुर वखानी के कही बहोरि विवाद कहानी ३१॥ दोहा-धृत होत ते काज निज, साधत चित्त लुभाय ।। छल बल गुण धन दीनता, मन वच कर्म दिखाय ॥३२॥ यौं गुनि पुनि दुहुँ ते कही, भापी सत्य प्रमाण ॥ है वह केते वर्षको, निर्मित तव अस्थान ॥३३॥ ची०-सुनि उताल पुनि गिद्ध बखानी जयते भूमि सृष्टि टपजानी ॥ तबही ते वह आलय मेगे इमि प्राचीन करियनिखरो३॥ सुनि उलूक मत वचन सुनायो प्रभु जयते वह ना प्रगटायो । तर ते तिहि उ.पर मम धामा गुणि कीजिये न्याय श्रीगमा३५ जल सर्व तीर्थ लायें मुनीश। फल फूल दीन प्रभु लीन शीश!! || बहु कुशल परस्पर बूझि दोउ ।बैठे प्रसन्न मन सबहि कोउ॥३॥ सुनि मुनि समस्त वोले उताला रघुलाल धन्य जन भक्तपाल 1/27 । दीनो उतार प्रभु भूमिभार । अब एक दुष्ट मधुपुर महार।। मुनि जनन देत सो दुख अपार। द्रुति चाहय नाथताको सहारा॥२॥ तासमय शहन जामदायीभापी रजाय मुहि होय नाथ ॥९॥ रामरसायन । सुनि रघुवीर सुहीय विचारा * जब ते प्रगट भयो संसारा॥ तबको द्रुम अवलग किमि रहई * मिथ्यावात गीधं यह कहई ३६॥ याते गृह उलूकंको आही * यौं गुणि राम दिवायो ताही॥ गीध हारि गमनो सकुचाई भोउलूक मुद आलय पाई॥३७॥ शीशनाय द्विज गयो सुधामा 8 इमि वर न्याय करत श्रीरामा॥ सकल चराचर परम सुखारी ॐ धर्मराज चहुँ आनँदकारी॥२८॥ इति श्री रा०र०वि० अ० न्याय वर्णनोनाम सप्तमो विभागः ॥ ७॥ पद्धरी छंद । इक समय राम प्रमुदित विराज । शोभित समस्त सजन समाज॥ ताछिन सुमंत तहँ वेगि आया किय विनय जोरि कर शीश नाय॥३॥ भार्गव मुनीशच्यवनादिनाथ । आये समस्त सुनि विशद गाय ॥ सुनतहि बुलाय लीने सुधाम । सत्कार उचित सब कीन राम ॥२॥ तब कही राम कहहै रजाय । दीजे सु लेहुँ निज शिर चढाय। सो०-है लवणासुरनाम, चंड शूलधारी सबल ॥ ताहि बधे विनराम, अजहुँ चराचर दुखित बहु ॥६॥ शूल रहै करमध्य, जवलों मधु मत लवणके ॥ तब लों निडर अवध्य, है इमि वर हरदत्त तिहि ॥७॥ गज मृग वाघ अपार, अपर जीव मानुप विपुल ॥ नित सो करत अहार, याते होत विनाश चहुँ ।। ८॥ पढरा छंद । मुनि तवहि कीन रघुवर विचार । कोकरदि जाय तिदि को महा। .

रसायन । , भु भरत लपण बहु कीन काम ! हो रहों आजलग अवध धाम ।। वा सु एक यह मैं कराउँ । वध हेत तासु अव द्रुतहि जाउँ ॥१०॥ नि बन्धु वैन आनंद समेत । दीनी रजाय तिहि वधन हेत ॥ तुरंग सेन कीनी जु संग । प्रिय वीर धीर वर युद्ध ढंग ॥११॥ नि दीन वाण इक प्रवल चंड । कह होय याहिते शूलखंड ॥ मि भापि सोधि दिन साजिसाज । किय विदा बन्धुकोअवधराज १२ दोहा-चलत कही प्रभु बन्धुसे, जिते सु सेवक संग । सादर सबको राखियो, सब विधि सुखी सुढंग ।। १३ ॥ धन गुन बल तिय बंधु हित, तिमि न देय आराम ॥ प्रीतिपाल सेवक सुजिमि, सदा करै रुचि काम ॥१४॥ पद्धरी छंद । मुनि भ्रात सीख वर गुण दमान । मिलि शीशनाय कीनो पयान ॥ नि वाल्मीकिते भेटि वीर । मधुपुरहि गये सह सुभट भीर॥ १५ ॥ सो लवण सदाही प्रातकाल । चहुँ जाय गहत बहु जीव घाल ॥ त्यौं नित समान लै शूल आन । उठिकै प्रभात कीनो पयान ॥१६॥ इत वीर शत्रुहन समय पाय । औचकहि आय मधुपुर तुराय ॥ धनुवाण साजिके नगर द्वार । ठाढे सचेत चहुँ दिशि निहार ॥१७॥ दिन युगेल याम भो तव सुरारि । आयो अपर मृत जीव धारि॥ लखि राजसुतहि सो क्रोधलाय । बूझी मनुष्य तू कौन आय॥१८॥ तब रामबन्धु निज नाम ठाम । भापो निशंक कुलग्राम धाम ॥ सुनि लवण रोप करिके उताल । वोलो प्रचारि वाणी कराल॥१९॥ तुव भ्रात रावणहि कीन घात । हौं सुनि तबही ते जरत गात ।। तिहि वन्धु आज मोनिकट आयाअव फेरि नाहिं गृह जियत जाय २० टुक धीर धार हे नृपति बाल । हौं गेहजाय आऊँ उताल॥ वर चंड शूल लाऊं तुरंत ॥ तव लखहुँ फेरि तुव वल अनंत॥२१॥ दोहा-सुनि भापी रिपुदमन तव, अरे असुर मतिमंदु ॥ अब गृह जैवो सहज नहि, परो वीरके फन्द ॥२२॥ स्ववश पायकै शत्रुको, जो नहिं साधत काज ॥ दुख पवि पछताय मो, पुनि हो अधिक अकाज ॥२३॥ . ३१ | साज साज इशआयसु प्रमाण. नामकीन बेगिमधुपुर पयान | बहु सैन सचिव सेवक प्रवीन । तहँ राखि आप पुनि गमन कीन।। आये उताल श्रीराम पास । कीनो प्रणाम संयुत हुलास॥३३॥ उठि राम बंधु लिय अंक लाय। सब मिले उचित आनंद अघाया रघुवीर अनुजको बहु सराह । वर मान दीन कीनो उछाह ॥३४॥ | इमि सप्त दिवस तिन भवन राखि । दीनी रजाय बहु नीति भावि मुनि प्रभु रजाय रिपुदमन वीर । कछु ह उदास पुनि धारि धरि । याते खल याही समै, यमपुर पठऊं तोहि ॥ शूल आश तजि अंगवल, जो दरशाव सु मोहि ॥ २४॥ पदरी छंद। शत्रुघ्न वैन सुनिकै सुरारि। वालो विशाल इक द्रुम उखारि ॥ तिहि राम बंधु बहु शर प्रहारि । करि खंड खंड दिय भूमि डारि२६॥ तरु घात देखि निष्फल सुभूरि । पुनि किय प्रहार सो वृक्ष पूरि ॥ ते सकल शत्रुहन कोन छिंद । वहुवाण मारि तन तासु भिंद ॥२६॥ तब लवण कोपि गहि विटपचंड । घालो भ्रमाय वल करि उदंड ॥ सो लगो आय ततकाल भाल। महिगिरे शत्रुसूदन विहाल ॥२॥ जानी सुरारि भो मृतक वीर । याते निसंक है धार धीर ॥ गवनो न धाम लायो न शूल । तिन भपण हेतु धायो सुभूल।। २८ । तत्क्षण सचेत कै शत्रुशाल । उठिगहो द्वार अतिही उताल ॥ साजो सुवाण जो राम दीन । तिहि समय त्रसित भे लोक तीन२९॥ सो चंडवाण तिहि उर मझार । किय शत्रुशाल क्रोधित प्रहार ॥ भ्रमि गिरो लवण भूमधि तुरंत । है हृदय चूर भो प्राण अंत ॥३॥ तेहि निधन देखि सुर मे निहाल । ख कियो जैति जै शत्रुशाल॥ वरपे प्रसून दुंदुभि वजाय । तिहुँलोक रहो आनँद छाय ॥३१॥ तिहि मारि शत्रुहन सहसमाज । मधुपुरी मध्य कीनो सु राज॥ : तहँ रहे वर्ष द्वादश प्रमाण । बहु प्रजापाल परबंध ठान ।। ३२॥ प्रभु कही जाहु मधुपुर उताल । विन भूप आनको नजहि: .

रामरसायन। (४८३) , तहँ जाय सबहि आनंद दीन । रिपुदमन राजधानी सुकीन । मधुपुरनिवास कर सह समाजातिय सचिव सखा सेवक विराज३७॥ लखि समय कबहुँ सोअवध आयारहि कछू दिवस पुनि तितहि जाय। इहि भाँति शत्रुहन युत समाज । सानंद करत मधुपुर सराज ३८॥ इत भरत लपण युत रामचंद । कर अवध राज अतिही अनंद ॥ निज समै समै सब होत काज । बहु दान मान नृपनीति भ्राज ३९॥ इति श्रीरामरसायन वि० अ० लवणासुरवधवर्णनो नाम अष्टमो विभागः ॥८॥ सो०-एक समै रघुवीर, सभामध्य शोभित सदन ॥ ताछिन निपट अधीर, वृद्ध विप्र आयो रुदत ॥१॥ तासु पुत्र वर एक, योवन क्य ज्ञानी गुणी ॥ संयुत परम विवेक, सो सुठि बालक मृतक भो ॥२॥ मात पिता मृत बाल, लाये भूपति द्वार पै॥ रोवत विकल विहाल, कहि नृपके पातक मरो॥३॥ भूपति करै अनीति, होय दुखी तिहि फल प्रजा॥ प्रजा करै अनरीति, नृपहि पाप सो लागही ॥४॥ यों कहि द्विज सो वाल, राजद्वार धरि दीन हठि॥ प्रभु ढिग आय उताल, भापी हत्या लेहु मम ॥५॥ के नृप के ते लोग, राज काज अधिकार जिन ॥ कारज करै अयोग, प्रजा दुखी हो पाप तिहि ॥६॥ सो तब पाप कदंब, जाते मम वालक मरो।। ही इत सहित कुटुंब, प्राण देहुँगो राज प॥७॥ मुनि विप्रहि कर जोर, समुझायो बहु राम मृदु । कही मोर जो खोर, होय सकल निर्णय अवहि ॥८॥ ची-यों कहि करुणाकर अकुलाये मंत्री दिन गुरु बेगि थुलाये। नारदहू विचरत तहँ आये सादर सहि गम बैगये ॥ ९ ॥ युझी गम द्विजन कर जोरी कहिये कह अनीति ई मोरी ॥ तर विकाल दरशी वर ज्ञाता नारद मुनि बोले वर " ---

कर्म कुकर्म करें कपटी जन ते कलिकाल कहावत साधू ॥१७॥
तप महत्व पद उचित तिहि, अनुचित करै जु अन्य ।।१८
द्विज कुल विन जे सत कथा, कहि सुनाय विधि युक्त ॥
सुनहु राम सतयुगके माही सदा तपस्या विन कराहीं॥
तब काहू नहि होय कलेसा ॐ रहे न रचहु पातक लेसा ॥ ११॥
नेता मध्य करै तप क्षत्री 8 तब इक पदधर पाप धरत्री॥
पुनि द्वापर तपवैश्य दिढावै महि पातक द्वै चरणजमाये ॥१२॥
कलिमें नीच शूद्रगण आदी करें तपस्या मृढ, विवादी ॥
तृतिय चतुर्थ चरण तब पापा 8 धरत भूमि वाढे. तिहुँ तापा॥१३॥
जब कलि करै शूद्र तप भूरी ॐ रहे पाप तब चहुँ पद पूरी ॥
अल्प मृत्यु दारिद्र दुख नाना की तिहि फलते सब लहत निदाना११
दोहा-सिद्ध साधुको भेप बहु, लेत नीच जन नष्ट ॥
निजते उच्च तिनै सुते, करत विविध विधि भ्रष्ट ।। १५ ॥
वेद पुराण प्रमाण जो, सो नहिं करै प्रमाण ॥
नूतनगाथा जोरकै, ठानैं महत बखान ॥ १६ ॥
सवैया-कवित्त ।
ज्ञान अखंड पखंड कथै रसिकेश भरो उर लोभ अगाधू ॥
जोरत दाम सँवारत धाम भये ममता मदमें अति आनू ॥
धूत महा अवधूत बने बहु देतहैं पूतन धैं जगनाधू ॥
दोहा-हो विरक्त अथवा गृही, चहिय विप्रकुल जन्य ।'
बिन द्विज कुल जे सुर सदन, पूजन पाक कराय ।।
करता कारयिता दुहुँ, ते ध्रुव नरकहिं जायँ ॥ १९॥
विना विप्र तिहुँ वरण जे, कोऊ गृही बिरक्त ॥
देत मंत्र गुरु शिष्यते, दुहूँ नरक अनुरक्त ॥२०॥
सो वक्ता श्रोता दुहूँ, हों न नर्कसे मुक्त ॥२१॥
ऐसे पातक भूरिते, होत सदा कलिमाहिं ।।
जाते जग नर नारि सब, संतत दुखी रहांहि ॥२२॥

रामरसायना ताही पातकते नृपति, होवै धन सुत हीन ॥ पुनि रुजपीड़ित रहत हैं, प्रजा नशै सुख छीन ।। २३ ॥ महा पाप यह जानिये, शूद्र वनै जो सिद्ध ॥ यह प्रबंध भूपहि रचित, होय न कर्म निपिद्ध ॥२४॥ सो जु शुद्र तप पाप है, द्वापर कलिहू घोर ।। वेताहीमें होय तौ, पातकको कह छोर ॥२५॥ प्रजा जासु अवनीशके, संतत पाप कराय ॥ राज्य नाश हो ताहि ते, पुनि नृप नरकहि जाय ॥२६॥ कृपी जनित धन धान्य अरु, पाप पुण्य ये चार ।। पष्टम भाग प्रजानते, लहै भूप अधिकार ॥२७॥ याते भूपहि उचित है, प्रजा करै जो पाप ॥ ताहि निवार जतनते, ती न होय संताप ॥२८॥ आप प्रजा सेवक सहित, रहे सधर्म नरेश ।। तो काहू कबहूँ कछु, होय नरंच कलेश ॥२९॥ प्रमाण ॥ पाल्मीकीये ।। उत्तरकांडे । सर्ग ७३॥ श्लोक ॥ रामस्य दुप्कृतं कर्म महदस्ति न संशयः॥ यथा हि विपयस्थानां वालानां मृत्युरागतः ॥ १॥ रामद्वारे मारप्यामि पत्न्या सामना- थवत् ॥ ब्रह्महत्यां ततो राम समुपेत्य सुखी भव॥२॥ राजदोपविपद्य- ते प्रजा ह्यविधिपालिताः। असदृत्तेहि नृपतावकाले म्रियते जनः॥३॥ यद्रा पुरेप्वयुक्तानि जना जनपदेषु च ॥ कुर्वते नव नास्ति तदा कालकृतं भयम् ॥४॥ पुनः । तत्रैष । स०७४॥ इलोक। श्रुत्वा कर्तव्यतां राजन्कुरुप्प रघुनंदन ।। पुरा कृतयुगे गजन्त्रा- मणा वे तपस्विनः ॥५॥ अब्राह्मणस्तदा राजन तपस्वी कथंचन ।। तस्मिन्युगे प्रचलिते ब्रह्मभूते त्वनावृते ॥ ६॥ अमृत्यवस्तदा म यतिरे दीर्घदर्शिनः ।। ततखेतायुगं नाम मानवानां वपुप्मनाम् ॥७॥ क्षत्रिया यत्र जायंते पूर्वेण तपमान्विताः ॥ बाग तपना तेऽधिकाः पूर्वजन्मनि ॥८॥ तस्मिन्यगेपनलिने धर्याने

स्य च भोक्तासौ रक्षते न प्रजाः कथम् ॥ सत्वं पुरुषशार्दूल मार्गर
चेदर्मवृद्धिश्च नृणां चायुर्विवर्धनम् ॥ भविष्यति नरश्रेष्ट बालस्यास्य
ये च भागवताः शुद्धास्ते नृनं मम मूर्तयः ॥तान्त्रिप्रान्ये न-
मस्यंति ते मामेव नमति वै॥ २० ॥ शुद्धा भागवताः पूज्या
द्रष्टव्याः सर्वदानृभिः॥विशेपेण कलौ ब्रह्मन्दिजरूपोह्यवस्थितः२१॥
(४८६)
रामरसायन।
अधर्मः पादमेकं तु पातयत्पृथिवीतले ॥ ९॥ ततः पादमधर्मस्या
तीयमवतारयत ॥ ततो द्वापरसंख्या सा युगस्य समजायत ।। १०
अस्मिन्दापरसंख्याने तपो वैश्यान्समाविशत्॥त्रिभ्यो युगेभ्यो त्रीन
णान् क्रमा? तप आविशत् ॥ ११ ॥ त्रिभ्यो युगेभ्यो बन्विर्णान-
मश्च परिनिष्टितः ॥ न शूद्रो लभते धर्म युगतस्तु नरर्षभ ॥ १३
हीनवर्णो नृपश्रेष्ट तप्यते सुमहत्तपः ।। भविष्यच्छूद्रयोन्यां हि तप-
यो कलौ युगे ॥ १३॥ अधर्मः परमो राजन्द्वापरे शूद्रजन्मनः
सवै विषयपर्यंते तव राजन्महातपाः ॥ १४॥ अद्य तप्यति दुर्बुद्धि
स्तेन बालवधो ह्ययम्॥योऽध धर्ममकायै वा विपये पार्थिवत्य तु १
करोति चाश्रीमूलं तत्पुरे वा दुर्मतिर्नरः ॥ क्षिप्रं च नरकं याति स
राजा न संशयः।।१६॥अधीतस्य च तप्तस्य कर्मणः सुकृत
च ।। पष्टं भजति भागं तु प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ १७ ॥ पडूभाग
विपयं स्वकम् ॥१८॥ दुष्कृतं यत्र पश्येथास्तत्र यत्नं समाचर 1,ए-
च जीवितम् ।। १९॥
पुनः॥अन्यत्रापि ॥बाझे ॥
विष्णुपुराणें ।
वर्णाश्रमाचारवता पुरुपेण परः पुमान् ।।
विष्णुराराध्यते पंथा नान्यत्तत्तोपकारकम् ॥ २२ ॥
पसिष्ठसंहितापाम् ।
ज्ञानिनोऽज्ञानिनो वापि यावद्देहस्य धारणम् ॥
तावद्वर्णाश्रमप्रोक्तं कर्तव्यं कर्म मुक्तये ॥२३॥
मनुस्मृती।
न तिष्टति तु यः पूर्वा नोपास्ते यस्तु पश्रिमाम् ॥
स गद्रवद्रादिकार्यः सर्वम्माधिजकर्मणः ॥ २ ॥

रामरसायन । ४८७.) लक्ष्मीतंत्रे। सर्वलक्षणसंयुक्तो ब्राह्मणो वेदपारगः॥ पट्कर्मनिरतः शांतः पंच- कालरतः शुचिः॥२५॥ न स्थूलो न कृशो ह्रस्वो न काणो नैव रोगवान् ।। नांधोन बधिरो मूढो न खल्वाटो न पंगुकः ॥२६॥न हीनांगोतिरिक्तांगो न श्वित्री न च दांभिकः॥ क्रोधनो नैव दुष्कर्मा लोभोपहतचेतनः ॥२७॥ अकुलीनं दुराचारं शठं जिलं च वर्ज- येत् ॥ दयादमशमोपेतं दृढभक्ति क्रियापरम् ॥ २८॥ कुर्याल्लक्षण- सम्पन्नमाचार्य चारुहासिनम्॥ एवं गुणगणाकीर्ण गुरुं विद्यात्तु वैष्ण- वम् ॥ २९ ॥ उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्दिजः॥ सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते ॥३०॥ पाराशरस्मृतौ ।। दुःशी- लोपि द्विजः पूज्यो नतु शूद्रो जितेंद्रियः ॥ कः परित्यज्य गां दुष्टां दुहेच्छीलवती खरीम् ॥३१॥ महाभारते ॥ श्वचर्मणि यथा क्षीरमपेयं ब्राह्मणादिभिः । तद्वच्छूद्रमुखाद्वाक्यं न श्रोतव्यं कथंचन ॥३२॥ पंडितस्यापि शूद्रस्य शास्त्रज्ञानरतस्य च ॥ वचनं तस्य न श्राव्यं शुनोच्छिष्टं हविर्यथा ॥३३॥ कींसंधौ ॥ भविप्यंति नरा मूढाः कलौ धर्मच्युतास्तथा ॥ अमर्यादां करिष्यंति प्रमादाद्विष्णुमंदिरे ॥ ॥ ३४ ॥ अज्ञानाद्वा प्रमादादा अमर्यादां करोति यः॥ इह लोके भवेद्धष्टः परलोके विनश्यति ॥ ३५ ॥ विष्णुस्थानेपु कुर्वति अमर्या- दां च ये नराः॥ नो बुधाः न च धर्मिष्टाः न भक्ता नाच वैष्णवाः॥ ॥३६॥ आचारहीना ये कार्या भवंति विष्णुमंदिरे ॥ तस्यापराधा- नश्यन्ति धर्माः स्थानाधिकारिणः ॥३७॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सर्वा- चारसमन्विताः ॥ सर्वे कार्याणि कुर्वति साचारविष्णुमंदिरे ।। ३८॥ पूर्वाचार्यकृतां शुद्धां मर्यादा यो समाचरेत् ॥ तस्य सर्वसुखं भूया- सदा विष्णुः प्रसीदति ॥ ३९ ॥ विष्णुस्थाननिर्णयः।। स्वयंव्यक्ति- स्तु या मृतिवेदमंत्रात्प्रतिष्टिता ॥ भवेद्यत्र हि तत्स्थानं विष्णुस्थानं निगद्यते ॥ ४० ॥ विष्णुस्थाने योग्यायोग्यनिर्णयः ॥ पाकपाकाधि- काराय पूजनाय महत्पदे॥ विष्णुस्थानेषु तिप्टेयुर्वप्णवा द्विजजातयः॥ ॥ ११ । द्विजवष्णवनिर्णयः॥ पंच द्राविडगौडाश्च ब्राह्मणा दश

| स्वयं व्यक्तां तथा मूर्ति वेदसंस्कारसंयुताम् ॥ नार्पयेदन्यकृत्पा
तदा कलेवृद्धिरनुमेया विचक्षणैः॥ ५३॥ वसिष्टस्मृतौ ॥ श्रुतिस्मृ}
त्युदितं धर्ममकृत्वा यश्चरेन्नरः॥ विकर्मस्थः स विज्ञेयः सर्वकमविग-
|हितः॥५४॥ यो वेदार्थ गर्हयति धर्माधर्म न विंदति ॥ न बुध्यतेपर,
प्रवर्तते ॥ पतितः स तु विज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः॥५६॥ महाभारत।।"
| श्रुतिः स्मृतिर्ममैवाज्ञा यस्तामुलंध्य वर्तते ॥ आज्ञाछेदी मम द्रोही
मद्भक्तोपि न वैष्णवः॥५७॥ श्रुतिस्मृती उभे नेत्रेब्राह्मणानां प्रकी
तिते । एकेन विकलः काणो द्वाभ्यामंधस्तथैव च ।। ५८॥ इत्यादि
(४८८)
रामरसायन।
ज्ञातयः ॥ तेषां मध्येपि भूयासुर्वणवा द्विजवैष्णवाः ॥ ४२ ॥वष्ण-
वपरत्वे कार्यनिर्णयः॥ अन्ये तु वैष्णवाः सर्वे सर्वकार्याधिकारिणः ॥
चत्वारि नहि कार्याणि योग्यानि विष्णुमंदिरे ॥४३॥ विष्णुस्थाना-
तिरिक्ता हि वैष्णवाः सर्वज्ञातयः । सर्वेप्वप्युचितं पाकं पूजनं विष्णु-
हेतवे ॥ ४४ ॥ पंचसंस्कारसंयुक्ता वैष्णवाः सर्वज्ञातयः ॥ पूजनी-
याश्च ते सर्वे स्थानमर्यादसंयुताः ॥ ४५ ॥ स्पर्शनिर्णयः ॥ स्पर्श
स्पर्श न चिंतेयुर्विष्ण्वायां हि ये नराः॥ ते च्युताः सर्वधर्मभ्यो
नरके यांति रोवे॥४६॥ वेदसंस्कारसंयुक्ता विष्णुमूर्तिः प्रतिष्टिता।
नैवान्यस्पर्शनीया सा विनापि द्विजवैष्णवम् ॥ ४७ ॥ श्रुत्तरे
ताम्रपाश्च पुरुपोत्तमपुरीप्वपि। स्पर्शनेपि च पाका स्पर्शदोपोन
विद्यते ॥ ४८ ॥ पाकनिर्णयः ॥ विष्णुस्थानेषु यो मूढो विनापि
द्विजवैष्णवम् ॥ कुर्यात्पाकानं विष्णुनों गृह्णाति कदाचन ॥ १९॥
विनापि द्विजवैष्णवम् ॥ ५० ॥ द्विजवैष्णवकृत्पाकमर्पितं हि हरेस
दा॥ पाका; तत्कृता नूनं विष्णुस्थाने सदोचिता ॥ ५१॥
विष्णु पुराणे।
सर्वे ब्रह्म वदिप्यंति संप्राप्ते तु कलौ युगे॥नानुतिष्टति मैत्रेय शिश्नो
। दरपरायणाः ॥५२॥ यदा यदा सतां हानिर्वेदमार्गानुवर्तिनाम् ॥ तदा
लोकं स नास्तिक उदाहृतः॥५५॥ उक्तधर्म परित्यज्य यो।
दोहा-यातें हौं जानौं अबै,करत सूद तप कोय ।
ताहिदंड दीने तुरत, द्विजसुत जीवित होय ॥३०॥

रामरसायन। (१८९) मो०-सुनि नारदहि राम शिरनाईक वेगि कही लछमनाहि बुझाई ॥ देज सुत मृतकहि जतनसमेता राखौ सवाहि भाँति सह चेता३॥ कहि पुनिकिय पुप्पक ध्याना * आयो अतिहि उताल विमाना।। तजि सव साज बैठि द्रुत रामा *कियो पयान लखे वहु ठामा ३२॥ पश्चिम उत्तर पूरव देखी $ दक्षिण दिशा जाय चहुँ पेखी। इक तडाग तहँ विशद निहारा *सैवल गिरि अरु विध्य मँझारा३॥ तहाँ अधोमुख इक नर झूलो * करहि तपस्याआनँद फूलो। ताहि जाय बूझो रघुराजा को तू तप साधे किहि काजा३४॥ सुनि सोकही शूद्र मम जाती 8 देव होन हित यह तपथाती ॥ है शंबूक नाम मम नाथा हौं नहिं भापों वचन अकाथा३५॥ सुनतहि रांम खङ्ग खरधारा * अति उताल तिहि कंठ प्रहारा ॥ तापस प्राण गयो प्रभु हाथा * दुरित दूर लै भयो सनाथा ३६॥ तांपस शूद्र भयौ वध जवहीं * वालक विन जियो सो तवहीं । सो लखि जन समस्त हुलसाये *मात पिताआनंद अघाये ३७॥ दत तिहि वध लखि सब सुर हरपे अस्तुति करत सुमन वर वरपे॥ ताछिन मुदित कही सुरराजा * निज रुचिवरयाँचौ रघुराजा३८॥. तब रघुवर वोले सुरराई * दीजे सो द्विज पुत्र जिवाई ।। इंद्र कही इहि मरतहि वीरा जियोसुवाल मिटी सद पीरा३९॥ सुनि हुलसाय सुरन शिरनाई * पुनि बैठे पुप्पक रघुराई ।। आय अगस्त्य मुनिहि श्रीरामा गहि सप्रेम पद कीनप्रणामा४० ऋपि रघुवर कर आदर कीना ॐ भूपण इक अमोल वर दीना। तव करजोरि मुनिहि शिरनाई * मधुर वचन बोले हुलसाई४॥ दोहा-शत्रिन काहू दानको, लैबो उचित न आय ॥ अरु द्विज धनतो कैसहू, ग्रहण अयोग कहाय ॥४२॥ सो हम क्षत्रिय बहुरि नृप, प्रभु मुनिवर द्विजराय ।। उचित कहा करतव्य है, दीजे नाथ रजाय ॥१३॥ तब अगस्त्य ऋपि रामको, बहु विधि कियो बखान !! नीति धर्म संयुत वहुरि, वोले सत्य प्रमाण ॥ १४ ॥ - किाम लघुवात जु वध कियों, महा प्रबल दशभाल || (४९०) रामरसायन। देव गुरु नृप पितर द्विज, साधु प्रजा सह तोप ॥ सादर देवे वस्तु कछु, लिये न काहू दोप ॥ १६॥ चौ०-मुनि आज्ञा सुनिक रघुराई ६ लिय कर भूपण शीश चढाई पुनि तिहि भूपण कथा विशाला ऋपिवर कही सुनी रघुलाला४६ तिहि निशि मुनि आश्रम वसिरामा ग्रात चले करिदंडप्रणाम। पुप्पक वैठि अयोध्या आई 8 उतरि विमानहि दई रजाई ॥१७) द्वारपालते खबर जनाई * आये भरत लपणदुहुँ भाई ॥ करि प्रणाम रामहि कर धारी ॐ गये भवन जन आनँद कारी४८ द्विज अशीश दै प्रमुदित भारी गयो सदन संयुत सुत नारी ॥ राम सुयश वर्णत सब कोई ॐ तिहुँ लोक नित आनंद होई ४९॥ दोहा-दान मान वर न्याय नित, करत राम नृप काज ॥ पालत प्रजहि सुधर्म युत, प्रमुदित सकल समाज ॥५०॥ राजसूय आदिक विविध, मख कीने श्रीराम ॥ अमित दान दीने सविधि, धेनु धाम धन ग्राम ॥१॥ प्र० ॥ वा० ॥ युद्धकांडे सर्ग १३० श्लोक ॥ पौंडरीकाश्वमेधाभ्यां वाजिमेधेन चासकृत् ।। अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैरयजत्पार्थिवात्मजः॥५९॥ इति श्री रा० र० अ० वि० द्विजपुत्रसंजीवन- वर्णनो नाम नवमो विभागः ॥ ९ ॥ दोहा-श्रीरघुवर गुण गण विमल, सुर मुनि करत बखान ॥ कहत सबै को राम सम, है त्रिलोक बलवान ॥१॥ जो दशमुख निज वाहुबल, जीति लये सब लोक ॥ ताहि मारि रघुवीर प्रभु, कीने सकल विसोक ॥२॥ सो अस्तुति सुनि राम सों, कही सिया मुसक्याय ॥ देखहु सब लघु बातको, वर्णत किती वढाय ॥३॥ तब रघुवर मन मापिके, बोले वैन उताल ॥ 1 - } रामरसायन। (४९१) चौ०-सो सुनि भापी जनकदुलारी कहाहुतो रावण बल भारी।। लघु निश्चर ताको प्रभु मारा के यामहँ कौन वीर गुण सारा ॥५॥ मिथिला माहि सुनी ही ख्याता गौतमऋपि वरणी वर ज्ञाता ॥ त्रैरावण इक लंक रहाही , दूजो सो पाताल बसाही ॥६॥ त्रितिय महारावण जिहिनामा जाके सहस शीश अभिरामा ॥ रहैसु पुष्कर द्वीप मझारा दशमुख सम तिहि दास अपारा॥ सुनतहि राम क्रोध उरलाई दई सपदि मंत्रीन रजाई ॥ सकल सैन चतुरंग सजावो अरु चहुँ दिशिके भूप वुलावो।।८॥ पुष्कर द्वीपहि वेगि सिधारे सुभट महा रावण तिहि मारें। सुनि मंत्री हुत पत्र पठाये सदल भप बहु अवधहि आय॥९॥ । दोहा-तब रघुवर ध्यायो सपदि, आयो पुष्पक यान ॥ वंधु सैन युत वैठि तिहि, कीनो सुदिन पयान ।। १० ॥ राम संग सुग्रीव अरु, जाम्बवंत लंकेश ।। अपर भूप निज निज विपुल, साजे सैन सुदश ॥ ११ ॥ अंगद हनुमत नील नल, आदिक वीर अपार ॥ यह दल ताइते अधिक, रहो जु लंक मझार ॥ १२ ॥ चौ०-पुष्करद्रीपहि जाय उताला परो घेरि चहुँ कटक विशाला।। रावण सुनी सदल रघुनाथा * आये युद्ध करन मम साथा।।१३।। सहज विहँसि सो वन उचारे करें समर कह राम विचारे ॥ हो तिनहित क्योंसन सजाऊँ एक बाण ते सबहि भजाऊँ ॥१४॥ यौं कहि सहज वाणधनु लीनो चलो महारावण मद भीनो ॥ आप एकदल सन्मुख आवा 3 तिहि लखिराम कटक कियधावा१५ तवं महारावण धनुताना छाँडो महज एक. वर याना ॥ तिदिशरजनित प्रचंड समीरालागि उडे सय प्रभु दल बीरा १६॥ उड़े सबंधु सदल श्रीरामा परे आय कौशलपुर धामा ॥ जाम्बवंत अंगद कपिराई गिरे सुभट किकिया जाई ॥१७॥ परे लंकपति लंक मझारी संयत मकल निशाचर धागे । मन समेत अपर नृप जेते. निज निज टाम गिरेमव तेने १८॥

दुहुँ अस्तुति करिकै मुदित, गये सकल सुरवृन्द ॥ ४॥
आये कौशलनगर मधि, कोनो विदा विमान ॥४७॥
सिय प्रभाव वर्णत सबै, मिटो सकल दुख शोक ॥६॥
सुर मुनि नर यश गावहीं होत सुजै जैकार ।।६१॥
दोचई छंद।
शोणित बिंदु परै भूतल मधि असुर अंगते जेते ॥
होय महारावण तिन कणते प्रगटते तत्क्षण तेते ॥
गति विलोकि यह महा कालिका निज रसना विस्तारी॥
झपित करी वेगि ताही ते सो रण धरणीसारी ॥४२॥
तब तिहि तनुते रक्तबिंदु जो गिरै सकल सो चाटें।
गहि कर खड्ग महारावणके शीश भूरि ते काटें ।
महा कालिका शक्तिन संयुत इमि ताको संहारा ॥
असुर मरन लखि सुर हरपाये किये सु जैजैकार ॥४३॥
वरपि सुमन दुंदुभी बजाई अस्तुति करी कदंवा ॥
सो सुनि क्रोध त्यागि शक्तिन युत गुप्त भई जगदंवा ॥
सिय वै प्रगट राम ढिग धाई लखे निपट बेहाला ॥
ताही छिन विधि शंभु इन्द्र तहँ आये अतिहि उताला॥४४॥
दोहा-तब विरंचि प्रभु अंगपर, प्रमुदित फेरो हाथ ।।
विनय करी बहु चेतलहि, हरपि उठे रघुनाथ ॥ ४५॥
सिय महिमा सुन राजसुत, लहो परम आनंद ।।
रघुवर सिय हनुमंत युत, बैठि सुपुष्पक यान ।
राम सिया आगमन सुनि, धाये तीनहु बन्धु ॥
आय परे पग प्रेम भरि, उमगाये सुखसिंधु ॥१८॥
पुर परिजन सिय राम लखि, भये परम आनंद ॥
घर घर भये वधावने, कहैं जैति रघुचंद ॥ १९॥
भयो महा रावण निधन, शोर छयो तिहुँ लोक ॥
सीताराम अनंद युत, राजत अवध मझार ।।
इति श्रीरा० र० अ० वि० महारावणवध
वर्णनो नाम दशमो विभागः॥ १०॥

सपास.. " दोहा-एक समै श्रीरामसों, हनुमत कह कर जोरि ।। भुव मंडल हेरौं चहूँ, है प्रभु यह रुचि मोरि ॥१॥ हो रजाय इक दिवसकी, आऊँ निरखि उताल ।। सुनि कपि रुचि आज्ञा दई, पुनि बोले रघुलाल ॥२॥ जैयो सवही देशपै, वंग देशके माय ।। है सुंदर इक रतन वन, तहँ न धारियो पाय॥३॥ सुनि प्रभु सिख शिर नायकै, उछले कपि वरजोर ॥ अवलोको द्वै याम मधि, भुव मंडल चहुँ ओर ॥४॥ आये प्राची दिशि तवै, लखि कौशिक अस्थान ॥ गये मुनिहि शिरनायकै, बोले कपि हनुमान ॥५॥ मुनिनायक मम स्वामि गुरु, मो हिय शंका भूर ॥ कृपा सहित उपदेश करि, कीजे सो भ्रम दूर ॥६॥ विधि विरचित यह सृष्टि मधि, सुख दुख रूप कुरूप ॥ किहि गुण औगुण होतहैं, सो वरणिय मुनि भूप ॥७॥ तव सादर कह गाधिसुत, सुनौ वीर हनुमान ।। जीव लहै संसार फल, पूरव कृत्य प्रमाण ॥८॥ प्रथम किये जप योग तप, दान जीव सो आय ।। धन गुण प्रभुता रूप वल, सुख युत जग विलसाय ।। ९ ।। जिन कुकर्म कीने तिनै, दुख हो दुहुँ ठौर ।। हों भापों संक्षेप इमि, गुणि लीजो बहु और ॥१०॥ परधन तिय सुत हरनते, होतामिश्र नर्क । गोद्विज पितृ वध द्रोहते, कालसूत्र संतर्क ॥११॥ दंडा दंडहि देत सो, शूकरमुख माधि जात ।। अंध पते परहिं जे, सुरस अकेले खात ॥ १२॥ गरलद अग्निद चौर ते, सारमेय मधि जाय ।। दंदसक पत्रि पिसुन, निंदक राव माय ॥ १३॥ ची-जे विश्वासघात कछु करदी, ते जन शुल नर्क म, परहों ।। मिथ्यावादी बीचिहि जाही गुरु श्रुति विमल सुनार रहाही12 -- " गोद्विज स्वामी घात ते, गलित कुष्ठ'तनु छीन ॥२५॥ गुदरोगी जल सुर सदन, जे विट मूत्र करात ॥२६॥ इमि अनेक जे पातक आदी तिहि कृत जीव नमवि जाही। भोगि पाप पुनि जग मह अविधा तिहि प्रमाण सब चिह्न जनवि१५ दोहा-श्याम दंत मद पीलखी, वादी खंडित अंग ॥ निंदक हो खल्वाट अरु, परहासक दृढ़ भंग ॥ १६ ॥ मातागामी लिंग विन, कन्यागामी कुए ॥ . भगिनीगामी के हुदै, होय महा व्रण पुष्ट ॥ १७॥ मित्रतियागामी जु-सो रहे भारजाहीनः।। स्वामिगम्य तिय गमन ते, गंडमाल दुख दीन ॥ १८॥ राखै तियन प्रतीतिपे, तिनते कर अधर्म ॥ तासु अंगमें दुखद बहु, रुज होवें गज चर्म ।। १९ ।' उच्च जात जो आप ते, तिहि तिय भोग कराय ।। ताके मस्तकमें सदा, महा रोग सरसाय ॥२०॥ आत्मघाती हस्त रुज, मिथ्यावादी मूक... परसुख अनदर्शी हिये, उठे सदाही हूक ॥२१॥ देवनिंद प्रिय बधिर हो, कुन्ज कुटिलता पाय॥ वट पारी पद रुज रहै; पिशुन श्वांस उपजाय ॥ २२॥ गर्भपात कारिहि सदा, क्षई जलोदर जान ।। छर्दि विपद धूतहि मृगी, मत्त कृतघ्नी मान ॥ २३॥ अग्निदाह कारीहि बहु, होय रक्त अंति सार ।। शतकृत बाधकके रहै, रुज नित उदर मझार ॥ २४॥ शिशुघाती सुतहीन अरु, तियघाती धनहीन ॥ . मृपा पक्षकारी सुतिहि, होवै पक्षाघात ॥ . . इहि विधि चिह्न अनेक ते, नर नारीके अंग ॥ पूरव कृत पातकनके, लखे पर सब ढंग ॥२७॥ , रामरसायन। (१९७) म० ॥ पद्म० श्लोक। परवित्तं परापत्यं कलत्रं हरते च यः॥ तस्य पातं तु तामिले फुर्वन्ति यमकिंकराः॥१॥ इत्यादि । तत्रव। " मातृगामी च पुरुपो जायते लिंगवर्जितः॥ स्वसुतागमने चैव रक्तकुष्ठं प्रजायते ॥२॥ इत्यादि। बौ-यौं कहि भापी गाधिकुमारा है नहिं पापं पुण्यको पारा॥ याते सहि उचित यह बाता हरिहि भजे दुहुँलोक सुत्राता २८॥ सुनि मुनि वचन वीर हुलसाने धन्य धन्य ऋपिवरहि वखाने ॥ शीशनाय गवने वजरंगा वश भवितव्य भई मतिभंगा ॥२९॥ दोहा-किय विचार कपि ईश मुहि, क्यों वरजो तहँ जान । चलि हेरौं तौ देश वह, किमि सुरत्न वन थान ॥ ३० ॥ यौं विचारि हनुमत सपदि, जाय लखो सो देश । पुनि अवलोको रतन वन, परम अनूप सुदेश ॥३१॥ रजत हेम विद्रुम विटप, मणि मुक्ताफल फूल । द्विज सजीव बहु रत्न मय, सरित तडाग अतूल ॥३२॥ तिहि वन चहुँ प्राकारवर, चारु चार दृढ द्वार । परम विचित्र विशाल बहु, तासु-मध्य आगार ॥३३॥ तहाँ द्वार रक्षक तिया, एक वृद्ध बलरास । तेज पुंज दुल अतिहि, बैठी सहित हुलास ॥ ३४॥ ताढिग हनुमत आयकै, कही लखों वनजाय । सो वरजी तव तिहि निदरि, चले वीर वरियाय ॥ ३५॥ तब वह तिय कपि पगंपकार, के भूरि भ्रमाय। राम निकट हनुमंत द्रुत, परे अवध आय ॥३६॥ लखि सकुचे कपि प्रभु हँसे, तर हनुमत करजोरि ।। विनय करी रघुवर क्षमी, आज्ञाभंग जुखोरि ॥३७॥ निज अपराध क्षमायक, रहे मुदित हनुमंत ।। राम स्वभाव कृपालुता, यश वर्णत सबसंत ॥३८॥ इति श्री० रा०र० अ० वि० हनुमत पर्यटन पर्ननो नाम एकादशो विभागः ॥ ११ ॥ .

- एक निश्वरी बाला ऋतु मंजन किय युवा रसाला॥ बहु सन्मान सहित बैठारे सकुचि विहंसि मृदु वचन उचारे। कीन आजही ऋतु अस्नाना * तुमहि निरखि मोचित्त लुभाना। (बहुरि कीश यह उर ठहराई उत्तर दीने नाहि भलाई॥१०॥ समर्थ नहिं देय तौ, तिहि सम दोप न आन ॥ ११॥ सो०-श्रीरघुवर गुणग्राम, कथा होत तिहुँलोक मधि ॥ सुर नर मुनि वसु याम, यूथ यूथ वर्णत सुनत ॥१॥ चौ०-मुनिअगस्त्य इक समै सुजाना करतहुते रघुवर यशगाना। ताछिन ऋपि बोले हुलसाईकरों कहाँलग रामबडाई ॥२॥ दोहा-लखों कीश नल लंकमें, किमि कीनो अपराध ॥ अपनायो तिहि करि क्षमा, ऐसे कृपा अगाध ॥३॥ सुनि चूझी सब चकित है, कहा कियो नलनाथ ॥ तब मुनिवर ऋपि गणनते, वर्णन लगे सुगाथ ॥ ४॥ चौ०-कीनी लंक विजै जब रामा ॐ तब वर भूपण वसन ललामा। तीजे दिवस सवहि बहु दीने * कीश भालु परितोपित कीने ५॥ तादिन पट भूपण सजि नाना नल कपि धरि नरतनु वलवाना॥ हाट वाट चहुँलंक मझारी निरखत पुरशोभा सुखकारी ॥ ताछिन मोहित भई नलहि सो हेरी कीशह दृष्टि नारि सों भेरी ॥७॥ धाय आय सो निश्चर वामा कपिहि बोलि लैगई स्वधामा। लावो हीय न और विचारा मोमिलि करौ निसंकविहारा ९॥ तासु वचन सुनि कपि हिय सोचा परतिय गमन कर्म अति पोचा। दोहा-तिय सपष्ट मुख आपने, जो माँग रतिदान ॥ यौं गुणि भापी कीश तिहि, सुनौ सुंदरी वाल ॥ तुम निश्चरी अनूप हौ, नव योवना रसाल ॥ १२॥ पै विशुकर्मा देवके, अंश जनित हम आहि ॥ सुर निश्वरी विहारमें, पातक दुहूँ लगाहिं ॥ १३॥ तव बोली वह निश्वरी, सुनो एक इतिहास ॥ सत्य प्रमाण वखानहूँ, मानौ दृढ़ विश्वास ॥१४॥ ।

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(४९८) रामरसायन। सो-श्रीरघुवर गुणग्राम, कथा होत तिहुँलोक मधि ॥ सुर नर मुनि वसु याम, यूथ यूथ वर्णत सुनत ॥१॥ चौ०-मुनिअगस्त्य इक समै सुजाना करतहुते रघुवर यशगाना।। ताछिन ऋपि बोले हुलसाई 8 करों कहाँलग रामवडाई ॥२॥ दोहा-लखौ कीश नल लंकमें, किमि कीनो अपराध ।। अपनायो तिहि करि क्षमा, ऐसे कृपा अगाध ॥३॥ सुनि बूझी सब चकित है, कहा कियो नलनाथ ।। तब मुनिवर ऋपि गणनते, वर्णन लगे सुनाथ ॥४॥ चौ०-कीनी लंक विजै जब रामा ॐ तब वर भूपण वसन ललामा।। तीजे दिवस सबहि बहु दीने 8 कीशभालु परितोपित कीने ६॥ तादिन पट भूपण सजि नाना नल कपि धरि नरतनु बलवाना। हाट वाट चहुँलंक मझारी * निरखत पुरशोभा सुखकारी ६॥ ताछिन एक निश्चरी बाला ऋतु मंजन किय युवा रसाला ॥ मोहित भई नलहि सो हेरी कीशहु दृष्टिनारि सों भेरी ॥७॥ धाय आय सो निश्चर वामा 8 कपिहि बोलि लैगई स्वधामा ।। बहु सन्मान सहित बैठारे सकुचि विहँसि मृदु वचन उचारे८॥ कीन आजहौं ऋतु अस्नाना तुमहि निरखि मोचित्त लुभाना॥ लावो हीय न और विचारा मोमिलि करौ निसंक विहारा ९॥ तासुवचन सुनि कपि हिय सोचा परतिय गमन कर्मअति पोचा।। बहुरि कीश यह उर ठहराई उत्तर दीने नाहिं भलाई ॥१०॥ दोहा-तिय सपष्ट मुख आपने, जो माँगै रतिदान ।। कै समर्थ नहिं देय तौ, तिहि सम दोप न आन ॥११॥ यौं गुणि भापीकीश तिहि सुनौ सुंदरी बाल ॥ तुम निश्चरी अनूप हौ, नव योवना रसाल ॥ १२॥ पै विशुकर्मा देवके, अंश जनित हम आहि ॥ सुर निश्वरी विहारमें, पातक दुहूँ लगाहिं ॥ १३॥ तब बोली वह निश्चरी, सुनौ एक इतिहास ॥ सत्य प्रमाण बखानहूँ, मानौ . 4

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रामरसायना पुनि अति अंतरंगिनीजोई गवनी निकट मंदगति सोई ।। दंपति पद सरोज मृदु चापे मधुर मधुर सुर गीतअलापे ६॥ दोहा-तत्र दंपति निद्रा विगत, उठि बैठे सानंद ।। बलिहारी सखि लेत सब, लखि दोऊ मुखचंद ॥ ७॥ पुनि दंपति रठि सेजते, सैन सिंगार उतारि ॥ अपर वसन धारे विशद, निज निज कुंज पधारि ॥ ८॥ चौ-यथायोग दंपतिहि अलीगन निज निज थल से प्रसन्न मन॥ सकलसीच करि कर पद धोये वदन प्रछालि नींद सब खोये॥९॥ पुनि स्रान कुंज मधि आये श्री सखिन सविधि मंजन करवाये। वर शुचि पीतांवर तनु धारे * कीने देव नित्य कृत सारे ॥१०॥ दोहा-होम ध्यान जप यजन वर, दान विधान अपार ॥ यथा उचित कीने सकल, दंपति सहित विचार ।। ११ ॥ स्वर्णदान गोदान अरु, अन्नदान महिदान ।। अपर दान बहु सविधि किय,सह श्रद्धा सन्मान ॥ १२॥ चौ०-पुनि शृंगार कुंजपग धारे भूपण वसन सु अंग सँवारे ॥ विविध सुगंध प्रसूनन माला साजि कियोशृंगार रसाला ॥१३॥ इहि विधि सखिन दुहूँ शृंगारे पुनि इक सिंहासन बैठारे ।। शुचि फल मेवा सरस सुहाये कछुक दंपतिहि अशन कराये१४॥ पुनि सरयू जलपान कराई कर प्रक्षालि वर विरी पवाई। सजिआरती अलिनदुहुँकीनी सविधि चतुर्दश आवृति दीनी१५ दोहा-चरणवेद ४ हग २ लंकमुख, शशि १ वासर७सब अंग। इमि चतुर्दशा१४ वृत्ति सो, सविधि आरती ढंग ॥१६॥ प्र० ॥ नामाजी कृत अष्टजामे । दोहा-चार आवरत चरण पुनि, कटि युग मुख पर एक ॥ सप्त अवरत सर्वअंग, विधि युत करि सविवेक ॥२॥इत्यादि चौ०-पुनि तहँ ते दंपति पग धारे * संग सखीगण यूथ अपारे ।। छन विजन चामर बहु साजा लिये यथोचित अली समाजा १७ विलग विलगसिविका मधिराजे निरखि छटारति मनसिज लाज। सखियन दुहुँ पालकी उठाई प्रमुदित निज निज ओर सिधाई१८ "

(५०२)
रामरसायन।
चौ०-एवमस्तु तब कही दिनेशा पुनि वो
कीनी कृपा यथा दिनराई * तिमि
दोहा-इमि वरदै ग्रहपति गये, सो आर
दिनईशहि नित ध्यावहीं, मुदित
चौ०-सप्तसहस्र वर्ष अब बीते * तिन
ते कलि मध्य करें महिराजा
न्याय नीति तत्पर मतिधामा ।
विसुकर्मा सुदेव शुभ अंशी
अपर अनेक अनूपम काजा
भूरि काल लग राज्य कराही
इहि विधि विपुल कथा मुनिगाई
सुनि सुर नर ऋपि संत अपारा
इति श्री० रा०
--
वर्णनो नाम
इति श्रीरसिकविह
चरित्र वर्णन
दोहा-यथा योग क
अष्ट याम मा
चौ०-चार दंड निशि
आय द्वार द्विज
बाजै .वर नौबत
कुंज कुंज अलि
दोहा-कै
पुनि

रामरसायन । त जे नृप सुत संगी सखा, सेवक बैठे द्वार ॥ सब दिशिकी वर वंदना, अलिगण करी उचार ॥३३॥ -ताछिन कौशल्या महरानी* आलिन प्रति भापी मृदुवानी।। धुर सरस मेवा पकवाना लावो साजिथाल वरनाना ३४॥ नि सखिगण अति आतुर जाई भरि भरि थार सौंज ले आई। व सब सुतन सखान समेता निज कर परसिमात भरिहेता३५॥ य पकवान सविधि फल मेवा * मात कराये सबहि कलेवा ॥ और प्याय वर विरी खवाई निज पट मुख पोठो हुलसाई३६॥ नि जे द्वार सखा सेवकगण अशन पान तिन पठे मुदित मन।। नज सुत सों सवहीको प्यारा 8 कियमहरानी परम उदारा ३७॥ कैकयी सुमित्रारानी अपर भूरि हिय अति सुख मानी।। पुत्र वधुन आलिन युत तेऊ * करवायो मनमुदित कलेऊ३८॥ दोहा-सखा बंधु युत राम पुनि, मातनशीश नवाय ॥ चले विपुल जन संग चहुँ, दिवस याम इक आय ॥३९॥ सभा धाम मधि आयकै, श्रीरघुराज विराज ॥ जुरे विप्र सुर संत मुनि, अपर अनेक समाज ॥४०॥ ची-तहां वेद वर शास्त्र पुराना * नीति धर्म इतिहास जु नाना॥ होत कथा सतसंग अनूपा ॐकहत सुनत कौशल पुर भूपा४१॥ इहि विधि दिन आयो ? यामा 0 दीनी सबहि रजायसु रामा॥ अपर सकल निज धाम सिधारे 83 रहे संग जे जेवन हारे ॥४२॥ जाछिन राजसदन ते आई * सेवक वृंद सुविनय मुनाई। सो सुनि गमने राजकुमारा संग सखा सेवक सरदारा ४३॥ आय सकल शृंगार उतारा * द्वे सब शुचि पीतांबर धारा ॥ बैठे हेम पीठ रघुराजा यथायोग सह बंधु समाजा१४॥ दोहा-कंचनमय मणि जटित वर, पात्र अनूप अपार ॥ अशन पान बहु वस्तु सब, परसी सुमति सुआर ॥ ४५ ॥ चौपंच ग्रास युत भोजन कीना * पुनि सब मुदित आचमन लीना। बहुरि सकल सेवक हरपाई कियो मुअशन प्रसाद अघाई४६॥

(५०४)
रामरसायन।
सिधारी॥
अंतर मग द्वै जनकदुलारी * रानी वंदन हेत
जाय सासु ढिग राजकुमारी ॐ पदगहि कीन प्रणाम सुखारी १९ ॥
उत सिय भगिनी विशद सुहाई रानी सदन सखिन सँग आई॥
ते तिहुँ सासु सियहि नमि सोही सबही मुदित चहूं मुख जोही२०॥
दोहा--राम मातके ढिग जुरी, रानी अपर अनेक ॥
तिन सबको सादर बधुन, किय प्रणाम सविवेक ॥ २१ ॥
चौर o-पुत्र वधुन सब दयो अशीशा बैठारी सुघ्राण करि शीशा ॥
इत रघुवीर कनक गृह द्वारे * अलिगण संग मुदित पग धारे२२॥
तहाँ सखा सेवक बहु राजे * निज निज साज समय सम साजे ।
आवतही उठि सकल प्रवीना प्रमुदित उचित सुवंदन कीनार३॥
यथायोग रघुवर सनमाने * सवही अति आनंद अघाने ॥
पुनि सिविकाते राज कुमारा * उतरि भये स्यंदन असवारा॥॥२४॥
तब अलिगण मिलि महल सिधारी सियके निकट गई ते सारी ॥
इत रघुवीर समेत समाजागमने गुरु पद वंदन काजा ॥ २५ ॥
दोहा-नित्य कर्म करि बंधु दुहुँ, अपर सखा सरदार ॥
जुरे आय जन वृंद बहु, रंगभवनके द्वार ।। २६ ॥
तहँ आये रघुवंश मणि, उचित वंदि सब कोय ॥
मिलि गमने गुरु गेहको, सहित भक्ति मुद होय ॥२७॥
चौ०-आय सबंधु गुरुहि शिरनाये* दिय आशिप वसिष्ठ हुलसाये॥
जुरे सुविपुल विप्रतिहि ठामा सबहि कीन रघुवीर प्रणामा॥२८॥
पुनि गुरुपत्निहि शीश नवाई * चले राम शुभ आशिप पाई ॥
आये मात भवन हुलसाई संग सकल सज्जन समुदाई२९॥
दोहा बाल सखा अरु बंधु वर, संग लिये रघुराय ॥
अपर द्वार थपि मातु ढिग, गवने विदित कराय ॥३०॥
जाय सकल जननीन पद, सादर नायो शीश॥
कंठ लाय शिर प्राण करि, सवही दयो अशीश ॥३१॥
बैठारे सादर सबै, राम मात हुलसाय ।।
कियो प्यार सुत लखनसों, अति उमंग उमगाय ॥३२॥

रामरसायना - जे नृप सुत संगी सखा, सेवक बैठे द्वार ।। सब दिशिकी वर वंदना, अलिगण करी उचार ॥३३॥ चौ०-ताछिन कौशल्या महरानी आलिन प्रति भापी मृदुवानी।। मधुर सरस मेवा पकवाना लावोसाजिथालवर नाना ३४॥ सुनि सखिगण अति आतुर जाई * भरि भरि थार सौंज ले आई। तव सव सुतन सखान समेता * निज कर परसिमातभरिहेता३॥ पय पकवान सविधि फल मेवा 8 मात कराये सवाहि कलेवा ।। नीर प्याय पर विरी खवाई ॐनिज पट मुख पोछो हुलसाई३६॥ पुनि जेद्वार सखा सेवकगण अशन पानतिन पठेमुदित मन।। निज सुत सों सबहीको प्यारा *किय महरानी परम उदारा ३७॥ उत कैकयी सुमित्रारानी अपर भूरि हिय अति सुख मानी।। पुत्र वधुन आलिन युत तेऊ * करवायो मन मुदित कलेऊ३८॥ दोहा-सखा बंधु युत राम पुनि, मातनशीश नवाय ॥ चले विपुल जन संग चहुँ, दिवस याम इक आय ॥३९॥ सभा धाम मधि आयकै, श्रीरघुराज विराज ॥ जुरे विप्र सुर संत मुनि, अपर अनेक समाज ।। १० ॥ चौ०-तहां वेद वर शास्त्र पुराना नीति धर्म इतिहास जु नाना ॥ होत कथा सतसंग अनूपा कहत सुनत कौशल पुर भूपा॥ इहि विधि दिन आयो ? यामा , दीनी सबहि रजायसु रामा। अपर सकल निज धाम सिधारे रहे संग जे जेवन हारे ॥४२॥ ताछिन राजसदन ते आई है सेवक वृंद सुविनय मुनाई ।। सो सुनि गमने राजकुमारा संग सखा सेवक सरदारा ४३॥ आय सकल शृंगार उतारा ह सब शचि पीतांवर धारा ॥ वैठे हेम पीठ रघुराजा यथायोग सहवंधु समाजा 22॥ दोहा-कंचनमय मणि जटित वर, पात्र अनूप अपार || अशन पान बहु वस्तु सब, परसो सुमति मुआर ॥१५॥ चौपंच ग्रास युत भोजन कीना पुनि सब मुदित आचमन लीना|| बहुरि नकल मेवक हरपाई कियो मुअशन प्रसाद अवाई।

(५०६)
रामरसायन ।
यौहाँ तिहुँ भगिनी युत हेता अपर नारि वर सखिन समेता॥
राम भामिनी भोजन कीना दासीजन प्रसाद सब लीना४७॥
पुनि सब सासुन शीशनवाई निज निज भवन वधू मुद आई।
उत रघुवीर रजायसुपाई गवने वंधु सखा समुदाई ॥१८॥
सैन कुंज मधि जाय सुरामा 8 कीनो दै घटिका विश्रामा॥
पुनि उठि सजि शृंगार अनूपा * आये सभा अवध पुर भूपा ४९॥
रत्न सिंहासन मध्य विराजे सेवक सखा सचिवजन भाजे ॥
राज काज अधिकारी जेते आये सभासमैलखितेते॥५०॥
मंत्र निदेश न्याय नृप काजा यथायोग किय सब नघुराजा।।
वासर रहो दंड युग जबहा उठे सभाते रघुवर तवहीं॥५१॥
प्रमुदित रंगभवन मधि आये 8 मुख प्रक्षालि शृंगार सजाये ॥
बंधु सखा सेवक हित, संगी तहाँ जुरे सब जन बहु रंगी॥५२॥
वाहन विविध वाजि गज स्यंदन शिविका अरु विमान वर वृंदन ॥
पदचर वीर शस्त्र धर भूरी बहु चतुरंग सैन अतिरूरी५३॥
छन चमर व्यजनादिक साजा लिये यथोचित सुजन समाजा॥
वाद्यकार गायननर्तक गन ६ वेतपाणि रक्षक बंदीजन ॥५॥
भूपण बसन वित्त बहु लीने कोशप मुख निरखे हगदीने ॥
इमि मय गज साज वर साथा सहसमाज गवने रघुनाथा॥२५॥
यथायोग वादन सब
गजे रखवर शहंजय पर भ्राजे ॥
मंद मंद विचन्न पुरमाही चले गम जन दरश कराही९६।।
नगरनियानी रचित जुहार मान सहित रघुवीर निहारे ।
का उद्याय मवही मनमाने नम तानि जिहि भमुर जान२७॥
यमन विभपन वित्त अपाग कोशप वपन गन अमवाग।
इपिपिरिमच्या लग ग्घुबीग ५. पुरनिग्गनगमग्य तीन-८॥
नोकरे मन मंपुन प्रेमामंध्या वंदन किया मनमा ॥
निनानिधिमाहित मनाना आये मातृसदन ग्गजा॥२०॥

, जननी पद गहि वंदन कीने ॐ सोलखि सुतहि अंक भरिलीने।। कंचन जस्ति पीठ बैठारी * करि आरती लई बलिहारी६०॥ पुनि कछु पय मेवा पकवाना अशन कराय दये मुख पाना ॥ सखा बंधु युत रामहि माता । कियोप्यार इमि प्रफुलित गाता६१ दोहा-पुनि जननिहि शिरनायकै, गवने सहित समाज || रंगभवन आये मुदित, कौशलपति रघुराज ॥ ६२॥ दई रजायसु अपर वड, गमने निज निज ठाम ।। सखा बंधु सेवक उचित, रहे निकट अभिराम ।। ६३ ।। मणिनजटित वरमंच मधि, सोभित श्रीरघुराय ॥ राजे सादर उचित वहु, वंधु सखा समुदाय ।। ६४ ।। नृत्य गान वर वाद्य बहु, कौतुक हास विलास ।। भयेरैनि इक याम लों, रंग सदन विचखास ॥ ६५ ॥ पुनि उठि बंधु सखान युत, वोलि संग सरदार ।। राजमहल आये मुदित, दशरथ राजकुमार ॥ ६६॥ मिलि बैठे संग अपर सव, भोजन कीन अघाय ॥ रंच रंचही ग्रास लिय, वंधु सहित रघुराय ॥ ६७॥ चौ-यौं सब मिलि तहँ भोजन कीना। सेवक वृंद प्रसाद सुलीना॥ दई रजाय तबहि श्रीरामा ।गये अपर जन निज निज धामा६८ बंधु सखा सेवक अति प्यारे तिन युत कनकभवन पगधारे ।। द्वार आय दिय सबहि रजाई निज निजसदनगये शिरनाई६९ साज सहित प्रथमहि सखि वृंदा खरी तहाँ लखि समय अनंदा।। तिन सँग अंतर महल पधारे * मुदित उठी सिय पीय निहारे७० कर गहि सिंहासन पधराये * राजकुँवर लखि आनंद छाये ।। सादर मधुर वचन कहि प्यारी ॐ वाम भाग निज ढिग बैठारी ७१ ताछिनसीज साजि सखिआई है करी आरती हिय हुलसाई ॥ पुनि दंपति शृंगार उतारे रौनि साज वर अपर सुधारे ७२॥ दुहुँ रुचिमय दुहुँ कियो शृंगाराम्साजि परस्पर करि करि प्यारा अंगराग शुचि वसन विभूपण के सुमन सुगंध धारि प्रमुदित मन७३ अपर गई निज निज यलहि लियोनि सुख ८३॥ स्ट इ बौहि भाजे। कानवाणि नजाई ७४ में अधि खाइ प्रमाना । मानो बहु थारा ७६॥ सन पान करावें॥ वनक्लिास रिझाये७६ ... तुलनलकन्नर बलानि स्वादवर । बन्द इ-ले सेन्ट किन एप्रति एका ७७॥ इन दिजनजानन लोन दुहुँ पाना ॥ साद सानंद प्रसादा ७८॥ दुई जन्म दिइ सह शैन भवन पगधारे । ननग नभवकिसतान सव साजे॥७९॥ पनवीन जल्लीकर पते करें अनूपा ॥ सरल वाय छु निकिकाई तिहि दिखावें॥८०॥ बदि विषिरंग नंग असर होने का आगार मझारा । पिच प्यारी आनंद पाई र सनिपाला दुहुँ कतरा३ ॥८११ युगल यान यानिनि इनि आईने डा आल्म छाई ।। लखि सखि द लई बलिहारोह निज निज निधारी८२ दोहा-परन अंतरंगी सती, रहौनिटादूर ॥ विी मसाले सुमन शुचि, मादक अशन सुनीर ।। अपर साजन मानिसति, रेसेजके तीर ॥ ८ ॥ दहि विधि नकल विलासयुत, आनंद भरे अछेद ।। शन क्रियो दंपति मुदित: पगे परस्पर नेह ॥ ८५ ।। पुल अलीगण शन्न वर, पुम्प वेप वर जोन ॥ Ora 7

मणि दीपक बहु भवन चहूँ, छायो परम प्रकाश ॥
तासु छटाहै अकथ जो, रहसि विलास अवास ।। ८७॥
अष्टयाम सिय राम इमि, करत रीति युत काज ॥
नीत प्रीत मर्याद लखि, प्रमुदित सकल समाज ॥ ८८॥
अष्टयाम प्रति रीति जिमि, करत काज श्रीराम ।।
तिहुँ बन्धुन तिमि निज उचित, रहत सदा मंतिधाम।।८९॥
इति श्री. रा. २० विहारविधाने अष्टयामरीति-
वर्णनो नाम प्रथमो विभागः ॥ १ ॥
दोहा-अवध नगर आनंद अति, नित नव होत उछाह।।
ब्रह्मादिक वर विविध बहु, आवत दरश उमाह ।।१।।
पवंगम उद
देश देशके भूप अवध पुर आवहीं । सब रघुवर नृपनीतिहेरि
हुलमाहीं । अखिल प्रजा गुणवंत आप चहुँ ओरके ॥ दरश करें
सानंदित राजकिशोरके ।।२।। यथायोग सनमान दान अधिकायकै
सबहि देत सुख राम सुआश पुजायकै । कोऊ वर महिपाल समय
लखि रामको । युत समाज लैजाहिं मुदित निज धामको ॥३॥
कबहूँ मिथिलानाथ सप्रेम बुलावहीं ।। लक्ष्मीनिधि चहुँ भगिनि
आय ले जावहीं । भरत लपण रिपुदमन जाय तिन लावहीं । कबहूँ
नेहवश रामहि आप सिधावहीं ॥ ४ ॥ मिथिला अवध समाज
जब इक टारहो । ताछिनको आनंद अकथ कछु औरहो । राम
सियाकी वर्ष ग्रंथि प्रति वर्षके। को वरण किमि सो जिमि होय
सहपके ॥ ५॥ जनक नगरते विविध वस्तु पर आवहीं ।। नृपगनी
जन विपुल सप्रेम पठानहीं । इहि विधि बहु व्यवहार लोक कुलगति
के ॥ मय राखत रघुवीर सहित नृप नीतिक ॥६॥ अगणित
उत्सव होत यथोचित मोदमें । हुलमा नर नारि समस्त विनोदमें ।।
सकल तिया मानंद सदा निराममें ॥ सी ग्लै निन रचित
उद्याद दुलासमें॥७॥

(५१०) रामरसायन। , दोई छंद। कबहूँ सखा बन्धु सेवक युत ऋतुबसंत.रघुराई॥ प्रमुदित जाय लखें वन वागन बहु वर साज सजाई॥ अशन पान अरु नित्य गान तह मृगया हास विलासा ।। होतरह मरयाद मोद मय सहित सखी रनिवासा ॥८॥ पीपम ऋतु कबहूँ जल विहरे ससन सहित रघुवीरा ॥ कपहूँ रहसि सन्यूमंघि सिय युत रमें सखिनकी भीरा ॥ कबहूँ सुमन कुंजमहें गजें कहुं उशीर गृहमाहीं ॥ दशन्ध सुत अरु जनकनंदिनी इमि सानंद विलसाहीं ॥९॥ दोहा-प्रति ऋतु अति अनुपम अवध, शोभा बढ़त अपार ॥ पपायस ऋतु में छठा, और बहु सुखसार ॥ १० ॥ परमम्म्य सुरसदन ये, जिनते सुखद न आन ॥ तिनने उत्तम अवधमें, लघु सेवक गृहजान ॥ ११॥ जदा मिया रघुवीर नित, रहत अवध पुर सोय ।। तिहि ममान निहुँ लोकमें, दनो थलमिमि होय ॥ १२॥ होगी। मुंदर पिग भूमि निता मणि जटिन छवि छापदी । तो गनमहल ललामकी नाभा अतुल मरमाही। नाओ कंगन गनिन गित अमोट बद माणिक लगे। नविन लीला गुमग निवाम नगंगनग्गे ॥ १३ ॥ बालभपिशाल गुभन नपाट मोभित अगि भरे ॥ मग नीर भगत अनुपग गंभ दायानहाटम ।। मंदानामा गुगामा शमा पनी ।। शिमग नीट मांग पीत कविमनमनी ।। ११ ॥ ५मोनिजकमया ॥ 1. भीमरमरण ।।

रामरसायन । (५११) पुनि तीनहुँ भैया मोद भरैया सुख युत करत कलोलें।। रघुवर रुचि लीने रहत प्रवीने संग सखनकी गोलैं ॥१५॥ रघुनंदन संगी सखा सुदगी निज निज महलन राजै ।। जिनकी प्रभुताई वरणि न जाई लखि धनेश मन लाजै !! सब भाँति सुपासा भोग विलासा करत दास अरु दासी॥ मिथिला पुरवासी अवधनिवासी सकल सुकृतकी रासी ॥ १६॥ भुजंगी छंद। छटा औधकी को सकै गायकै । सिया राम राज भले भायकै । सदाही प्रभामंत सो धाम है । पुरी सातमें मुख्य जो नामहै।॥ १७॥ कहूं गेह सो हैं घने रंगके । सुचित्राम राजे भले अंगके ॥ कहूं हाट बाटै सुगंधैं सिची। कहूँ चांदनी है चहूंघाखिची ॥१८॥ कहूँ फूल डाली धरी हैं धनी। सुधासी कहूँ वस्तुकेती बनी।। मिली झुंड गावें सुन नीकहू । कहूँ कौतुकी खेलठाने चहूँ ॥ १९ ॥ कहूं मल्ट जोरी मिरजंगसे । कहूं बाल खेलें घने रंगसे ॥ कहूं लेतताने सुरावर्त की ।। कहूं नृत्य ठानें भले नर्तकी ॥२०॥ कहूं विष उच्चारही वेदको । हरें वेगि कामादिक खेदको ॥ कई छल डोलें भरे मोदमें । कई बाललीने तिया गोदमें ॥२१॥ कहूं वाम सोहे पिया संगमें। हिंडोरे सुझले छकी रंगमें ।। भरे मोदमें औधवासीरहें । सिया लालके सो उपासी रहें ॥२२॥ घने जन्मलों शेप जो गावहीं । प्रभा धामको पार ना पावहीं ॥ कही कौनप जात सोभामहा । विहार स्थली लाडिलेकी जहां २३॥ दोहा-पुनि सवही ते रुचिर अति, शेन मदन तिहि ठाम ॥ शिव अगस्त्य आदिक अमित, कहो जामु गुणग्राम ॥२॥ पटरी छंद। श्रीकनक भवन आनंद रूप । शोमा अभंग अतुलित अनृप ।। तिहि मतावरन विचित्र मोह । जिहि देखि कोटि मायाम मोह २२।। नियन्घुनंदनका फेलि भान । तिहि की ममता कवि कहदि कीन !! नां महल मध्यनलिगणअनृप । ज प्रान होत नदि पुरुप रूप २६|| (५१२) रामरसायन। इकराज कुँवर प्यारे विहाय । तहँ सखी वृन्द सवही लखाय ॥ निज निज सेवाकी सौंज साज । सेवें नित दम्पति रसिकराज २७॥ सबै श्रीसियपतिको सदाय । ते धन्य सखी दम्पति सुहाय ॥ प्रति कुंज कुंज शोभा अपार । सुखधाम नित्य लीला विहार २८॥ कहुँ सुभग लसत अस्नान कुंज।सजिअमित वस्तु जहँ अलिन पुंज ॥ तहँ मंजन करत जु सीयलाल । बहु भांति परस्पर होत ख्याल २९॥ कहुँ सुखद सुभग शृंगार कुंज । जहँ लहि सुगंध बहु मधुप गुंज ॥ नव बसन विभूपण अंगराग । साजै अलि दम्पति करि विभाग ३०॥ कहुँ भोग कुंज सुंदर अनूप । जहँ अमित वस्तुवर अमृत रूप ॥ सखि वृन्द सबै निज सौंजसाज । सेवै नित दंपति रसिकराज ३१ ॥ कहुँ शैन कुंज शोभा अभंग । जिहि देखि ल6 शतरति अनंग ॥ जहँ लाल लाडिली सुख समेत । विहरत दोऊ आनंद लेत ॥३२॥ कहुँ रास कुंज अतिही ललाम । जहँ लहत मोद सुखधाम श्याम ॥ संगीत निपुण तहँ विविधि बाल । निज निज सेवातत्पर विसाल३३॥ कहँ शरद कुंज अति स्वक्ष चारु । जहँ करत सीय रघुवर विहारु ॥ तहँ सखी बंद नितॆ सुढंग । जिहि रूप देखि लजरति अनंग।। ३४॥ हेमंत कुंज मुखमा ललाम । जहँ करत विहार जुसीय श्याम ॥ वहु केलि साज साजे अभंग । सरसात मोद मुनि राग रंग ॥ ३५॥ कहुँ शिशिर कुंज शोभा लखात । बहु दीप माल दुति जगमगात ॥ नव वसन मसाले गृह सुहाय । निरखत ग्रीपम जिहि अति लजाय३६॥ कहुँ लसत अनूप वसंत कुंज । जहँ सरस सुहाई अलिन पुंज ॥ विलसत पिय प्यारी मुदित हीयारसऋतुरति सुरपति लजतजीय३७॥ कहुँ ग्रीपम कुंज विशाल सोह । लखि जाहि शिशिर हेमंत मोह ॥ जहँ सकल सुशीतल विविध साजाराजतपिय प्यारी युत समाज३८॥ कहुं पावस कुंज अनूपराज । जहँ मुदित पीय प्यारी विराज ॥ तहँ सदा लखिय प्राविट अभंग ।दुम वेलि फूल नभ सरस रंग३९॥ कहुँ फाग कुंज शोभा अपार । हिंडोल कुंज कहुँ अतिसुढार ॥ कहुँ सखी भवन सोहैं अनूप । मुद रसिकविहारी निरखि रूप४०॥

रामरसायन। (५१३) - सो०-इहि विधि कुंज अपार, कनक भवन मधि राजहीं ॥ एक कोश विस्तार, शैन धाम सिय रामको ॥४१॥ पुनि सरयू तट कुंज, वागवाटिका वन विविध ।। यूथ यूथ अलि पुंज, हैं यथोचित सकल थल ॥४२॥ श्री सरयू तट धाम, अपर अमित तिय नरनके ।। उचित घाट वर ठाम, परमरम्य शोभित सरित ॥४३॥ कुंडलिया। नोके घाट सुहावहीं, मणि गण जटित विचित्र ।। बहु सोपान अनूप अति, मोहत मनहिं पवित्र ॥ मोहत मनहिं पवित्र तीर सुर मंदिर राजैं। सुखद सुभग आराम सरस वन उपवन भाजें। रसिकविहारी मधुर शब्द शुक पिक अलि नीके। विप्र वृंद उच्चरत वेद धुनि मृदु व नीके ॥ ४४ ॥ राजै नर नारीनके विलग विलग शुचि घाट॥ पुनि न्यारे मज्जत जहाँ, विपुल वाजि गज ठाट । विपुल वाजि गज ठाट अमित गोवृंद पियत जल ॥ उत्तम मध्यम नीच गहत अपने अपने थल॥ विविध वृंद वृंदारकानके वहु छवि छाजै ॥ रसिकविहारी युगल ध्यान युत मुनि गण राज ॥१५॥ रामवाट अति सुभग जहँ, मजतहैं सब भाय । करत विविध विधिकेलि तहँ, सखन सहित सुखदाय ।। सखन सहित मुखदाय अधिक आनंद लह जति ॥ निरखि सकल पुरलोग हृदय पावत प्रमोद गति ।। रसिकविहारी मानरहत शारद नारद मति ॥ को वरण छवि अतुल स्वच्छ वर राम घाट अति ।।१६|| चौ०-सुभग जानकी वाट विशाला मनें अंतरंगिनीवाला ॥ तह प्रमोद पन परम सुहावन कोटिन अमरावती.

(५१४) रामरसायन। लतिका छंद। सुखद सुंदर वन प्रमोद विराजही । विमल सरयू तट अधिक छवि छाजही । जहाँ पावस प्रगट रूप दिखावही ।। सो सदा सिय श्यामके मन भावही ॥४८॥ कलित कदलि कदंव तरु राजत बने। बकुल विविध रसाल सरस सुहावने ॥ पनस पाकर पल्लवित सोहैं भले ॥ सुफल समय निहारि निज निज सो फले ॥४९॥ ललित लतिका तरुन तनु लपटावहीं ॥ मोर निर्तत सुखद शब्द सुनावहीं।। शोर करि पपिहा घनो पी पी स्टै।। जाहि सुनि बिरहीनकी छाती फटै ॥ ५० ॥ झुमि झुकि झुकि पवन झोका लेत हैं ॥ करत घन घनघोर अति सुख देत हैं ॥ दामिनी दमके चहूँदिशि धायके ॥ नीर वरसत भूमि मंडल छायकै ।। ५१ ॥ श्यामधन चहुँओर सुंदर घेरही ॥ अरुण नील सुपीत रँग बहु फेरही ॥ | इंद्र धनुप विशाल कबहूं दरशई। सुखद पावसकी छटा अतिसरसई५२ दोहा-इमि अति सुभग प्रमोद वन, बाढ़ी छटा अपार ।। पावसऋतु उत्सव समय, वर हिंडोल विहार ॥५३॥ श्रावण शुक्ल सु तीज तिथि, लखि औसर अलिबूंद ॥ वन प्रमोद हिंडोलनव, सजो सुभग सानंद ॥५४॥ लतिका । हेम खंभ विशाल मणि गण खचित है। बेल बूंटे रंगके बहु रचित है। मुकुर अगणित भाँतिके लागे घने । मनो मनसिजके सुभग करते वने ॥६५ ॥ रुचिर डाँडी राजहीं बहु रंगकी । जगमगत जिहि ज्योति सरस सुढंगकी॥ नगन जटित अमोल चारौं चारु है। मनौ सुखमाकी सुखद सुखसार है॥५६॥ लाल बेलन चा- खडी चित्रित घनी। ललित चमकत चहूँ दिशि मर्कत मनी ॥ झू- मका बहु स्वच्छ मोतिनके वने । बीच विच कहुँ लाल पन्नासों बने ५७ ।। सुभग पटुली अरुण विद्रुम मय लसै । मध्य चहुँ बहु मणिनकी अवली वसे ॥ झालरे नव रंग जरित जरावकी । अमल मोतिन युक्त नवल वनावकी॥२८॥ म्रदल रेसम टोर पांगी ।

रामरसायना (५१५) खरी। अधिक छवि सरसात मोतिनसों भरी ।। कहूँ गाथे नव सु- गंधित फूल हैं। जहाँ अलि कल रख करें अनुकूल हैं ॥२९॥ शि- खर सुंदर अरुण मणिमय राजहीं । निरखि सो छवि वालरवि द्युति लाजहीं। हरित नीलमणीनके बहु मोर हैं । नचत मनहुँ सजीव करत न शोर हैं ।। ६० ।। सखिन साजि हिंडोल सवही भांति सो। अति विचित्र अनूप निज गुण जाति सो ।। झुलि हैं सिय पीय दोऊ मोदसों । करति अलि अभिलाप सकल विनोदसें ।। ६१ ॥ समय लखि सखिगण चली शृंगार कै । वसन भूपण सरस अंग सुधारकै॥ जाय दंपति ढिग रहीं कर जोरकै ॥ वैन मृदु हँसि कहत दुहुँन निहो रकै ॥ १२॥ सुभग पावस चहूँ दिशि छवि छै रही । विविध सरस समीर अति सुख दै रही।। हरित भूमि विशाल उपवन राजही। मधुर शब्द सुहावने धन गाजही ।। ६३ ।। ललित लघु बुंदन फुही सुंदर परै।। निरखि सावन रूप मन मनसिज हरै। हुलसि प्यारी पीय मु- दित सिधारिये ।। झूलिये गल वाँह दे सुखकारिये ॥ ६४ ॥ सुनि सखिनके वैन मृदुल सुहावने । भये दंपति मुदित सुख सरसावने ॥ पीय मुख सिय सीय मुख पिय देखिकै । घरे दुहुँ गल बाँह आनंद पेखिकै ।। ६५॥ वन प्रमोदहि चले सखि गण संगमें । होत कीत- हल विविध रस रंगमें ॥ लिये अलि सुखपाल दंपति राजही। निर- खि छवि रति मैन कोटिन लाजहीं ॥६६॥ सरयुतीर प्रमोद वन शोभा महा । नित्य पिय प्यारी विहारस्थल जहाँ ॥ गये युगल कि- शोर हिय आनँद भरे ॥ झुलही सिय पीय भुज अंस न घरे ॥३७॥ भाँति इहि झुलत मदा दंपति भले । गीत वाद्य मैंगीनके नवरंग रले ॥ नचति गावति मखीगण प्रमुदित मंत्र । मम निज निज गगिनी सुंदर फंव ।। ६८॥ कोउ झोका देत अली झुलावहीं । कोट भर आनंद विजन दुलावहीं । कोर प्यारे हग गनमों जोन्ही ।। फोर बलिहारी करें तृण तोन्हीं ॥ १९॥ कबहुँ झोंका देत पारे रमकिक । टरपि उर लगि जान प्यारी झमकिकः ।। कयहुँ पिय गरि लेन सिपको अंकमें ।। करहुँ दैनिशागत दोर .

(५१६) रामरसायन । रंग भरे इहि भाँति झुलत सोहहीं ॥ निरखि छवि रति काम कोटिन- मोहहीं ॥ कहति प्यारी लाल धीरे झुलिये॥डरति हम सुकुमारि क्यों इमि भूलिये ॥ ७१ ॥ 'वीरके सुतवीर हो तुम श्यामन ॥ डरति अधिक अधीर, हम वामजू ॥ तुमहिं धनु तोरत न लागी वारहे । हमहिं निज शृंगारहीको भार है ॥ ७२ ॥ सुनि रसीले बैन प्यारीके नये ॥ प्राणप्यारे सुरसहिय प्रमुदित भये । चाह उर वाढी घनेरी लालके ॥ बहुरि झोका दियो मिसकार ख्यालके ॥ ७३ ॥ लखि निठुरता लालकी अति लाडिली ।। मानिकै मनमान उठि तहँ ते चली।लसत पावस कुंज बहु सोभाजहाँ ।मोरि मुख नख लिखत महि बैठी तहां ॥ ७४ ॥ देखि अलिगण मान चक्रित जहँ तहीं। कसियजूसंग कछु पिय ढिग रहीं । विकल वोलत वैन प्यारे दीन हैं ॥ धरत धीर न नीर विन जिमि मीन हैं ॥ ७९ ॥ घनाक्षरी कवित्त । कोऊजाय सुघर सहेली लाडिलीको यह विनय हमारी कर जोरकै सुनावो धाय ॥ हमतौ तिहारे रस रूपके अधीन घने तुम हौ प्रवीन निठुराई यौं धरी क्यों हाय ॥ रावरो निहारि रुख रहत सदाही मोद तन मन प्राण भये विकल वियोग पाय । रसिकविहारी प्यारी डारि गलबाही वेगि विरह कटारी लगी भारी सो सँभारो आय ।। ७६॥ चंद्रकला परम प्रवीन गुण आगरी हो जाय प्राणप्यारी ढिग कहो कर जोरिकै ॥सुभग सलोनी तुम सुंदर चतुर बाल प्रियाको मिलाको वेगि नेह रस बोरिकै ॥ रसिकविहारी हेमा क्षेमादिक प्यारी अली क्यौं न अब विरह सुनावो हाय दौरिकै ॥ विनै हम ओर ते जू कीजो चारुशीला चारू काहे चित्त चोरि आज बैठी मुखमोरिकौ७ि७॥जाय सखि वृंद पाय औसर विलोकि रुख जोरि कर मंद मृदुवचन उचारे हैं। स्वामिनी सुजान प्राणप्यारी सुनि लीजै विनै विकल विहाल लाल विरह तिहारे हैं ॥ खान पान भूपण वसन सुख सैन सबै रावरे वियोग वश निपट विसारे हैं। रसिकविहारी चलि कीजिये सुखारी बेगि मन वच कर्म प्यारे रसिंक तिहारे हैं ॥ ७८॥ पलक विछोह रामरसायन। (५१७) जासों आज लो भयो ना कहूँ तासों मुख मोरि मान गहि कै रहीजे क्यौं।हाय प्राणप्यारी जक लागी तबही ते यह दया हिय लाय तिनै आनंद न दीजे क्यौं ॥ रसिकविहारी बरसावन सुहायो चहूँ प्यारे संग झुलि सुख सुंदर न लीजे क्यौं । घरि घहरा धन घुमड़ प्रमोद वन गल्ल भुज डार प्यारी रमन न कीजे क्यौं ॥ ७९ ॥ सो-हे प्यारी सुखदान, जैसी तुम गुण आगरी ।। त्यों प्यारे रसखान, योग विरंचि भलो रचो।। ८०॥ कीजे तहँ न विछोह, तुम बिन प्यारे विकल अति ॥ दुहुन दुहूँ मिलि सोह, दुहुँ विन लखिय मलीन दुहुँ ८३॥ सवैया कवित्त । क्यों हठि मान कियो नवला तुम जीवनमूर ललाकि सदाई ॥ श्याम निरंतर रावरे हीय वसे छिनहूँ विलगाय न जाई ।। रीति नई विपरीति कहा यह रूठि रही पिय सों अनखाई। लाडिली रोप विहाय सबै रसिकेश मिलौ हिय सों हियलाई ८२ आज दशा लखि लालनकी सखियान सबै उर वाढत पीर है ।। रावरो मान विलोकतही तनु प्राण चनो विधि होत अधीर है। राजकुमारि विनै सुनिये रसिकेश मिलो सजि भूपण चीर है। हो मिथिलेशसुता इततो उत वे अवधेश तने रघुवीर है ।। ८३ ॥ शील दया अरु प्रीति सुरीति हिये विचरावरे सोह विशेखी ।। ज्यों वन दामिनि फूल सुवासहि कोऊ कहूं विलगात सुपेखी ॥ प्यारी बिना पिय प्यारी विनापिय रंच लहें सुख है किन लेखी ।। त्यों रसिकेश तिहारे विपे मुइती निठुराई न आज लो देखी ८४ चौ०-इहिविधिसखिप्यारिहिसमुझाव करिमृदुविनयसुमानछुटावें ॥ तौ लग राजकुमर अकुलाई बोले मधुर प्रिया लिंग आई।।८।। संवैया फपित्त । नेक निहारी प्रिया इत ती किहि देत इती निटुराई धरी ।। लाडिली क्यों न कहो हँसिक सु कहा हम ते बडि नूफ परी है। चंद्रकला विमलादि सखी विनती हम ओग्ते केती की है।

(५१८) रामरसायन। रंच दया नहिं आई हिये अजहँ हग सैन सुरोप भरी है ।। ८६ ॥ कहूँ घनसों तड़िता मिलि जात लता लपटी तरु मध्य चहूँ।। चहूँ दिशि प्राविट रूप अनूप भलो दरशै ऋतु माहिं छहूं । छहूं अरु चार अठारहमें प्रिय हीन प्रमोद लखो न तहूं ॥ तहूं पुनि हीय विचारौ प्रिया कोउ सावन मान करै न कहूं ८७॥ नव रूप उजागरि नागरि आगरि रोप तजौ किन भूतनया ॥ इन मोरनको निक सोर सुनौ कह बोलत हैं पपिहा छनया ॥ रसिकेश विचारहु प्यारी हिये यह योग भलो विधिने बनया ।। हम हूँ अवधेश किशोर प्रिया तुमहूँ मिथिलाधिपकी तनया८८॥ सुनि वैन सिया जू कहो हँसिकै हम जानति, तुम प्यारे छली ॥ पिय बोले जू जैसे हैं तैसे तिहारे प्रिया जू भला तुम तौ हौ भली। रसिकेस लखौ अलिके गुणकैसे तऊ रस देत प्रसून कली। कपटी सब कारे सुनौ घनश्याम मलिंद विचारेकी काह चली८९ स्वारथ के तुम मीत लला कछु रंच दया नहिं हीय तिहारे ॥ पीर पराई न जानत हौ छल छंदनमैं सुप्रवीन अपारे । जीय रुचै सु करौ न डरौ सिगरे हम रावरे फैल निहारे । आये मनावन बोलत मीठे सु बैन इतै जु भले पग धारे ॥९॥ कारे भले सब प्यारी सुनौ जगजीवन दायक हैं उनकारे । नैन रुचें कजरारे हिये रसिकेश सुकेश सुहात हैं कारे ॥ कोकिल कारे कितो सुख देत सिंगार मनोज सुभावत कारे॥ रावरी आयसु पालैं तिहूँ पुर सो कमलापतिहू अतिकारे । लाल सुनौ इककारे भुजंग डसैं जिहिको वह होत अचेत है। पावसनि जु कारी अंध्यारी घनो विरहीन हिये दुख देत है । कारो हि है विरहा कपटी जिन कोटिन प्राण लये विनहेत है ॥ कारे ठगी मिथिलापुरकी तिय ऊची उसाँस.सो आजलों लेत है९२ लाल कही हँसि प्यारी सुनौ हम तौ न कछू छलछंद न जानें ॥ नागरि होति प्रवीण बनी जिहिकी रति लोकहु वेद बखानैं ।।

रामरसायन।
(५१९)
रावरो आनन पंकज सो तिहिकी रस चाह मलिंद समानें ।
वा दिन दीजिय दोप प्रिया रसिकेश बनेगी दया उर आने ९३॥
झूलतहीं मिचकी निक देत धरो तुम रोप प्रिया जु विशेखो।
चूक निहारि किती विनती कर जोर करी सु कछू नहि लेखो।।
रावरो कोमल चित्त घनो सुन कानन रंचन नैनन पेखो ।
प्यारी पिया सों कहूँ रसिकेश इतो हम मानन आजलों देखो९॥
घनाक्षरी कवित्त ।
सरस रसीले व्यंग्य वचन दुहूँके होत ताही समै घोर धन घटा
घहरानी है। झोकि झोकि पवन प्रचंड तरु तोरै लगी धाराधर धारा
धरा मध्य सरसानी है। रसिकविहारी कारी रैनि अँधियारी अति
दामिनी दमंकि मेघ मंडल समानी है। नवल किसोरी देखि पावस
| ससंकित कै नृपति किशोर उर दौरि लपटानी है ।। ९५ ।।
दोहा-भयो मान मोचन दुहूँ, हृदय बढो आनंद ।।
करी आरती वेगही, मुदित सहचरी वृंद ॥ ९६ ॥
पुनि आनंदित नित्य प्रति, झुलत युगल किसोर ।।
परम परस्पर प्रीति लखि,सखि डारें तृण तोर ।। ९७॥
संवैया कविता
सुंदर दंपति की छवि देखनको पुरवासिनि आवे धनी ।।
सब चंद्र मुखी तिय साजे शृंगार स्वरूप अनुपम अंगवनी ।।
रसिकेस परस्परबैन कहैं बहु भाग्य सराहत मोदसनी॥
हम धन्यलखंभर नैनन जोसियस्वामिनि ओरघुवंशमनी ९८॥
कोऊ कहै सियज़ पटरानी मिली बडभागी नरेश लला॥
कोऊ कहै इनकी सम को कमला विमालादिक चंद्रकला ॥
कोक कह तिय प्यारिहि धन्य जु त्यागत पीय न एको पला ।।
कोक कहें हमसों जगको रसिकेस लखै छवि जो अमला ९९॥
कोक पसारकै अंचलको विधिसे कर जोर के येही मनावें ॥
आप निवासिनि होवे सर्व हम जोरी अनूप निहारि मुहावे ।।
हेरें कृपा करि लाल सिया रसिकेश सदा सुख सों अपना ।।
प्यारी पिया पदपंकजमें नित नेह वढ यह आशिल पाई॥१०॥

(५२०) रामरसायन। कोऊ कहैं इन राज किसोर की आँखनमें है सखी कछु टोना ।। जाके विधं उर अंतरमें तिहि फेर सुहाय नहीं सुख सोना ।। कोड कहें मुसक्यान कृपान कै लागत दुःख परे री सहो ना। कोउ कहैं रसिकेश सवै तनु सुंदरहै कछु जात.कहो ना ॥१०॥ कोउ कहै सखिरी निरसंक हे पीतमप्यारी निहारियो कीजे ॥ कोड कहैं तजिये कुलकान भटू इनसों मिलि के कह लीजे ॥ कोउ कहैं रसिकेश सुनौ अव एक उपाय भलो चित दीजे ।। योगिनि वै तनु लाय विभूति सुऔधकी वीथिन वीच रमीजे१०२ दोहा-इहिविधि नेह भरी सबै, वचन परस्पर भाप ।। प्रतिदिन सुख पावत रहैं, सिय सियवर हिय राख॥१०३ ॥ झूलत अष्टादश दिवस, यों सिय पिय मिलि दोउ ।। मणि पर्वत वन महल कहुँ, जबै जहाँ रुचि होड १०४॥ कोऊ सिय कृत मानको, भ्रम कछु हीय न मान । प्रथम लिखे जे ग्रंथ वर, तिन महँ लखौ सुजान ॥ १०५॥ बहुरि स्वकीया मानको, है बहु और प्रमान ॥ भेद लखौ साहित्यके, तहाँसकल विलगान ।। १०६॥ प्रकारसमंजरीग्रंथे । सूत्र । स्वामिन्येवानुरक्ता स्वकीया । स्वीया तु त्रिविधा । मुग्धा मध्या प्रगल्भा चेति । मध्याप्रगल्भे प्रत्येकं माना वस्थायां त्रिविधे ॥ धौरा अधीरा धीराधीरा चेति ॥ इत्यादि। इति श्रीरा०र० वि० वि० हिंडोल विहार वर्णनं नाम द्वितीयो विभागः ॥२॥ दोहा-इमि अगणित आनंद नित, पुनि पावसके अंत ॥ आई शरद अनूप ऋतु, सब हिय मोद अनंत ॥ १॥ संतत प्रति ऋतु शरदमें, करें सखी गण रास ॥ निरखें सिय रघुवर मुदित, बाढत हृदय हुलास ॥२॥ कबहूँ दंपति नेह युत, अति अनंद उमगाय ॥ सखिन मध्य एकांत थल, नटत मनोहर गाय ॥३॥ - रामरसायन। (५२१) याते सब आली सदा, सजे रहैं सव साज ॥ नृत्य गान बहु वाद्य नित, ठानें तीय समाज ॥ ४॥ हरिगी . छंद। कबहूँ सुभैरव १ मालकोश२ हिंडोल ३ दीपक ४ गावहीं ।। श्री ५ मेघ ६ये पट राग नारि समेत शुद्ध सुहावहीं॥ कबहू जु शंकर रागिनी बहु सरस सुरन उचारहीं। तिहुं ग्राम इकविस मूर्छना युत सकल भेद सचारहीं ॥५॥ दोबई छद। भैरव तिय भैरवी १ सिंघवी २ मधुमाधवी ३ रसाला ॥ बंगाली ४ वैराड़ी ५ सुंदर गान करें वरवाला ॥ मालकोसकी नारि गुणकली १ खंबावती २ अनूपा ।। ककुभा ३ अरु टोडी ४ सुठि गौरी ५ गावे सखी सुरूपा ॥६॥ पटमंजरी १ विलावल २ मुंदर रामकली ३ मनहारी॥ अरु देसाख ४ ललित ये मवि हैं हिंडोलकी नारी ॥ कामोदी १ देशी २ केदारा ३ नट ४ कान्हरा ५ मुढंगा ।। ये दीपक तिय गान करें तिय शुद्ध सुरनके संगा॥७॥ आसावरी १ मालश्री २ मालव ३ अरु धनाशिरी ४नीकी। मुभग वसंत ५ सरस मुरगावे सखी नागि ये श्रीकी ।। मेवतिया मुठि टंक १ मलारी २ देशकार ३ भूपाली ४ ॥ मखद गृजरी ५ शुद्धरीत मोंगान करें वर आली ॥ ८॥ दोदा-पंच पंच तिय महित जे, हे पट गगरमाल । गान कर आली मंत्र, शुद्ध समय सुरताल ॥९॥ पुनि जे शंकर गगिनी, गगिनि गग मिलाय ।। तिनहूँ मुखी नव गावहीं, शुद्ध सुग्नमग्नाय ॥ १० ॥ ईमन १ म २ हमीर ३ पोवी? मार-गाइदमदाना ७॥ दखाग८ कापी रसिंग महा११ निलय अहाना ||३|| चालशिरी श्वहन ९भहीन हसापदादागा।१९ (५२२) रामरसायन। पीलू२०वरवा२१माझ२२शंकरा२३लूम२४तिलंग२५वहारा २६ सिंधुभैरवी२७ ककुभ विलावाल२८चती२९जाजमलारा ३० ॥ मुलतानी३१वाटो३२प्रदीपको३३परज३४कमोद मलारा ३५ ॥ चौरा अष्टकरक्ष्मंगल अएक३७गीडकली ३८भठियारा ३९ ॥ लंकदहन सारंग ४०सावनी ४१पट४२हिंडोल बहारा॥१२॥ सोरट ४४रामपूरिया जंगला४६पंचमनट कल्याना४८॥ जैजेवंती १९ भीमपलासी ५० देवगिरी ५१ कल्याना ५२॥ नट नारायण ५३ चैती गौरी ५४ युगिया ५५ गोडमलारा ५६ श्याम५७शंकराभरन ५८ त्रिवेनी ५९ सारंग ६०देवगंधारा६॥१३ लंकदहन ६२ पूरवी ६३ झंझोटी ६४ खेमखरज ६५ सुधरैया६६॥ तिलक कमोद ६७ विहाग ६८ विहंगा ६९ कुंभावती ७० अढया७१ नटसारंग ७२ विभास ७३ पहाडी ७४ फरोदस्त ७५ सामंता७६॥ जैतशिरी७७पूरिया ७८ मनोहर७९जैत ८० बहारवसंता ८॥१४॥ दोहा-नट मलार ८२ बागेसरी ८३, अरु ईमनकल्यान ८४ ॥ देश मलार८५विहागडा८६,देश ८७ श्यामकल्यान८८॥१५ सरस्वती ८९ बंगालश्री ९० और लूम सारंग ९१ ॥ सिवरी ९२ कुंभारी ९३ तथा, अपर गौडसारंग ९४॥१६॥ गौरीकालँगडा ९५ रुचिर, अरु सोरठमल्लार ९६ ॥ पुनि सारंग बड़हंस ९७ सो, वर धूरिया मलार ९८ ॥ १७॥ बहुरि सु गौरी कान्हरा ९९, अपर झूम सारंग ॥ १०॥ अरु सोहनी१०१सुईमनी,१०२पुनि सामत सारंग१०३ १८॥ झुम१०४धूरिया१०५नारदी१०६,अरु कान्हरा मलार १०७ गिरिनारी सोरठ१०८तथा भगवंती१०९गिरि नार११०॥१९ दोबई छंद। श्रीबहार १११ भैरवी कलंगडा ११२ काहल ११३ नटकेदारा११४ काफी सिंधु ११५ सिंदूरा सोरठ ११६ अरु कान्हरा बहारा ११७॥ सूर मलारी ११८ राम मलारी११९ यमन मलारी १२० बाला१२१ रामरसायन। (५२३) इनहि आदि शंकर सुरागिनी गावे सखी रसाला ॥२०॥ खरज १ ऋपम २ गंधार ३ सु-मध्यम ४ पंचम ५ धैवत ६ होके ॥ अरु निपाद७ ये सप्त सुरनको लै स १रि२ ग३ म४ परधनी के औडब १ अरु पाडव २ संपूरण ३ अस्थाई १ आरोही २॥ अवरोही ३ संचारी ४ संयुत गान करें मनमोही ॥२१॥ इकताला १ अदा २ अरु रूपक ३ धीमा ४ जलद तिताला ५॥ सूल ६ झपकणत्यौरा ८ धमार९पुनि आडा १० शुध चौताला११।। असावरी १२ तिमि फरोदस्त १३ इन आदि ताल अभिरामा॥ ब्रह्म १४रुद्र १५लक्ष्मी १६गणेश१७वर विष्णु१८बजावै वामा२२॥ दोहा-इमि अपार संगीतके, भेद सकल नित ठान ॥ नृत्य गान बहु वाद्य युत, साजे रास विधान ।। २३॥ सो लखि दंपति मुदित है, दीनी हुलसि रजाय॥ शरद रैनि अब रास वर, ठानौ साज सजाय ॥२४॥ सरयू उत्तर तीर थल, परमरम्य सुखधाम ॥ योजन मंडल विशद, रचौ रास तिहि ठाम ।। २५ ।। कुंजवाटिका वाग वन, सरि सर सुभग मुढार ॥ तिहि थल रास विहारको, आनंद होय अपार ॥२६॥ लहि रजाय आल वृंद तह,सपदि सजे सब साज ।। गये मु दंपति मोद भरि, संयुत रहशि समाज ॥२७॥ शुभ्र वसन भूपण विविध,दंपति कियो शृंगार ।। सब ललनागण त्यों सजे, नख सिख अंग मुढार ॥२८॥ दोबई छंद। चंद्रकला १ उर्वशी २ मेनका ३ चंद्रमुखी ४ वरवाला ॥ मृगलोचना ५ चारुशीला ६ अरु क्षेमा ७ रूप रसाला ॥ त्यों राधा ८रंभा९ सुमालिनी १० सुठि सुलोचना ११ नारी॥ हरिणी १२येद्वादश आली है सियकी प्राणपियारी ।। २९ ।। हेमा १ वीणाधरी २ हंसिनी ३ गुणवहरी ललामा॥ चंद्रावली ५ सुभद्रा ६पदमा ७ मनोरमा ८ अभिगमा ।।

. नौल नारी सारी रुचि अनुसारी श्यामा श्यामको रिझाबें हैं३७! नवेली तांडवादि जे अनेक गति कर सद जानुभेद सकल कलानका रसिकविहारी सुरनारी अवलोकि सासी दंग है किये हैं मान भंग अप्सरानके ॥३६॥ अमित उमंग अभंग वर अंग भरी अंतरंग | -अरु बहिरंग ढंगछावै है ।। नैन सैन है बैन कर चैन औ अचैन दशा | शिख हाव भाव शुद्ध दरशावै है। दीप कुंभ कंदुक कृपान माल | कलावारी चित्रकारी ये मु नृत्या सरसावें हैं।रिसिकविहारीगुण- (५२४) रामरसायना मुखद चंद्रभागा ९ नुमोदनी १० पदमगंध ११ मतवाली ॥ सरस बरारोहा १२ द्वादश ये राजकुंधरकी आली ॥३०॥ दोहा-चतुर्विश ये मुख्य सखि, इनके यूथ अपार ।। मिलि मुरासमंडल रचो, सजि अनूप शृंगार ॥३१॥ अधिक चतुर्दश त्रिशत अरु चोविस सहस२४३१४मुवाल रचो रासमंडल रुचिर, लखत सिया रघुलाल ॥३२॥ चंद्र चंद्रिका चारुचहुँ, राका शरद प्रकाश ।। मणिदीपक भूपण प्रभा, मिलि भो अमित उजास ॥३३॥ घनाक्षरी कवित्त । श्यामा श्याम सुभग सिंहासन विराजे चारु आली सब साजे साज सहित उमंगक। वीणा औ मृदंग वेणु मधुर मंजीर मंजु बाजने बजावें वर विविध मुंढगके । ठानो गति कार झनकार धुंघुरून छाई रसिकविहारी पद न्यास बोल संगके ॥ थेईततथेईतातिर्थयार्थंग तत्ता थेई आदिक सचार भेद जैसे गीत अंगके ॥३॥ पद चपलाई कोमलाई मधुराई मंजु कर कमनीयताई अति छवि छाई है। लंककी लटकलोनी लोचन चटक चारु मटक उतंक बंक भृकुटी निकाई है ॥ ग्रीवकी डुलन शोभा खुलन मुअंगनकी हार नथ कुंडल की झूलन सुहाई है ॥ रसिकबिहारी रासमंडलके मंडल की कुंडली विलोकि बिज्जु कुंडली लजाई है॥३५॥ मंजु मृगनैनी पिकबैनी मुखदैनी बाल करें कलगान कोकिलानकी समानके। सम सुर ताल लै विराम रिक्त पूर भूर गीत पद छौंद बंद विविध विधानके । निर्तत १

रामरसायन ।
(५२५)
हरिगीतिका छंद।
इमि रास बहु सुखरास ठानो शरदरैनि प्रकाशमैं ।
गंधर्व किन्नर अमर तिय मिलि लखहि दुरि आकाशमें ।
तिहि समय सरयू सलिल खग मृग अपर जड़ चेतन जिते॥
सवही थकित है रहे जहँ तहँ भये अति मोहित तिते ॥ ३८॥
दोहा-शिव विरंचि सुर राज रवि, नारदादि ऋपिराय ॥
लखत रासमंडल सबै, दुरि नभ मंडल आय ॥ ३९॥
उडुगणपति उडुगण सहित, अचल भये लखि रास ।।
गति मति भूले मुदित अति, कीनो अमित प्रकाश ॥४०॥
एनाक्षरी कविता
दरनपैद्वारनपै कलिते किवारन पैद्रुमनप डारनपैलोनीलतिकानपै
हाटन पै वाटनपे नाके नव घाटनपैगेहनपै सेजन अमलअटानप।।
वागन पै वन पै निकुंजन पैपत्रन पे फूलन पैकूलनपै सर सरितान
पे ॥रसिकविहारी सुखदाई चहुँचाई भाई छाई यह शरद जुन्हाई
वनितान प॥११॥
दोहा-सो चंद्रिका विलोकिक, हुलस सिय रघुचंद ।।
नाह मायो मुख हीयमें, उमगो अधिक अनंद ।। १२॥
उटि दंपति अनुराग भार, नृत्य साज सव साज ॥
आय रास मंडल विपे, गढ़े मध्य समाज ॥ १३॥
निरखि व्योम दिशि अर्घ निशि, जानी राजकुमार॥
रही यामई यामिनी, हिय मधि कियो विचार ॥22॥
कहीं सियहि तब रनि अब, वीति गई है याम ॥
या छिन वाढत रामको, छिन छिन मुख अभिगम ॥१५॥
शरदनिशा यह आजकी, जुपैरह इस वर्ष ॥
ती प्यारी अभिलाप भारि, होय गमयुन हर्प ॥१६॥
सुनि बोली सिय लाडिले, होय यही भलि बात।
हेरो राम अनंद अव, छिन छिन प्रति अधिकात ।।2।।
तब रघुवर भापी प्रिया, ऐमिहि अब ध्रुव होय ।।
आज न एक वर्षकी, ह न जाने कोय ॥२८॥

(५२६) • 'रामरसायन। - इत इमि दंपति हिय रुची, उत सब देव समाज । यही चहें आनँदछके, प्रात होय नहिं आज ॥१९॥ भई तैसिही रैनि वह, एक वर्ष परमान ॥ सुर मायावश भेद सो, कोंऊ कळू न जान ॥५०॥ करहिं रासलीला मुदित, सहित सीय रघुचंद ॥ रीझत रिझवत परस्पर, अलिदंपति सानंद ॥५१॥ घनाक्षरी कवित्त । कौशलाधिराज सुत राम रमणीय जैसे तैसी मिथिलेश मुता सिय अभिराम हैं ॥ रसिकबिहारी सुखकारी छबि धारी दोउ नृत्य गान वाद्यमें प्रवीण गुणधाम हैं। पूरण मयंकराका शरदनिशामें रास करत उमंग संग रंग भरी वामहैं ॥ दम्पति सुरूप उपमाको है न रूप कहूं श्यामा श्याम रूपसे अनूप श्यामा श्याम हैं ॥ १२ ॥ दोहा-छाई सुंदर शरद ऋतु, सुखदाई चहुंओर ।। निरखि छटा आनंद भरि, निर्तत युगल किशोर ॥ ५३॥ घनाक्षरी-कवित्त । गुंजत मलिंद पुंज नव नव कुंजनमे छाके मत्तडोलै मकरंद पान करिकै ॥ शीतल सुधाकरहू मुदित मयूखन ते श्रवत पियूष सोचको रहेत धारकै ॥ रसिकबिहारी सुखकारी चंद्रिका अनूप हृदै हुलसात अनुरागराग भरिकै ॥ निर्तत सुढंग रस रंग श्याम श्यामा संग अंग अंग मोरत अनंग मान हरिकै ॥ ५४ ॥ ता छिन अपार सुख छायो रासमलडको जेते जड़ चेतन ते सकल लुभायगे।यूमि भूमि चूमें डार अंबन कदंबनकी पक्षीते निपक्षीसे अचेत महिआयगे। चित्र सम लैकै रहे परम विचित्र मृग मुळे सुर सुरताकी सुरति भुलायगे । रसिकबिहारी सो निहारी छबि भारी सबै तन मन प्राण हीय आनंद छकायगे॥५५॥ दोहा-जड चेतन मोहित भये, काहु कछू सुधि नाहिं ॥ अति मूर्छित है चंद्र तहँ, गिरो सुधरणी माहि ॥५६॥ ता छिन भयो प्रकाश अति, निरखि सीय रघुराज। उझकि चौंकि चितये चहूं, संयुत सकल समाज ॥१७॥ ,

रामरसायन।
(५२७)
S
,
लखो मयंकहि विकल तव, जनकसुता अकुलाय॥
करुणाकार धाई सपदि, परम कृपा उर लाय॥५८॥
वर सरयूतट रेणुमाधि, धावत अतिहि उताल ।
चणकत्वचाइक शुक अति, चरण चुभी तिहि काल ॥१९॥
सो लखि सिय दीनो तबै, घोर शाप रिसलाय ॥
कबहूँ इहि थल आज ते, चणक नहीं उपजाय ॥ ६ ॥
यौं कहि पुनि उमगायकै, धाय चंद्रढिग आय ।।
परसायो तिहि शीशकर, सुतसम गोद उठाय ।। ६॥
सियकर परसत चेत भो, लहो परम आनंद ।।
शीश नाय सकुचायकै, गयो व्योम मधि चंद ।। ६२ ।।
दोवई छंद।
सो लखि मुदित राम तव भापी चंद्रगिरो इहि ठामा ।।
सिय पालो याते या थलको चंद्रपालहै नामा ।।
यौं कहि गहि प्यारी कर सानंद गवने अतिहि उताला ।।
ता छिन भयो प्रभात पक्षिगण कीनो शोर रसाला ।। ६३॥
तब सब रास श्रृंगार उतारे ताछिन जनकदुलारी॥
कछु मुसक्याय मधुर पिय कर गहि मंजुल गिग उचारी ।।
वर्प प्रमाण होय रुचि कीनी भई रासनिशि सोई ।।
एकहि दिवस शेप यह तामधि दीनो चंद्र बिलोई ॥ ६॥
दोहा-कही तबै रघुवर प्रिया, कीजत रास सदाहि ॥
पै यह इक दिनशेपसो, है है द्वापर माँहि ॥६५॥
यौं कहि अति आनंद युत, ठानत हास विलास ।।
सिय समाज युत महल मधि,आये सहित हुलास.॥६६॥
इमि प्रति दिन प्रति शरद ऋतु, होय रास अभिगम ॥
अपर अमित उत्सव सदा, विहरत सीताराम ॥ ६७॥
इति श्रीरामरमापन र०वि०वि० रामविहारवर्णन
नाम तृतीयो विनागः ॥ ३॥

(५२८) रामरसायन। दोहा-श्रीसीतारघुवर सदा, विहरत अवध मझार ॥ समै समै उत्सव उचित, होत अनंद अपार ॥ १॥ एक समय मिथिलाधिपति, लक्ष्मीनिधिहि पठायः॥ परम प्रेम युत रामको, बुलवाये हुलसाय ॥२॥ लपण शत्रुसूदन अपर, सेवक सखा अपार ॥ लै सानंद रघुवर गये, मिथिलापुर ससुरार ॥३॥ जनक सुनैना आदि बहु, निमिवंशी नर-नारि ॥ पुरवासी सबही मुदित, रघुवर रूप निहारि ॥४॥ नई पहुनई प्रति दिवस, होय नगर रनिवास ।। सिद्धा आदिक नारि बहु, ठानें हास विलास ॥६॥ दोवई छंद। जनकनगर नर नारि अनंदित राघव छटा निहारी कह सकल मृदु बैन परस्पर छिन छिन लै बलिहारी॥. धनुपभंग कीनो जवही अति हुतो सुभग वर रूपा॥ पुनि आये तव और बढी छबि अब कछु और अनूपा ॥६॥ तब बोली इक तिया बुद्धि वर अति अचरज यह आही ॥ छबि अधिकात सदा पैवयवपु एकै सरिस जनाही ॥ ता छिन विशद नारि भापी यौं मुनि मुख सुनो प्रमाना । सियारामको रूप रहे नित पोडश वर्षसमाना ॥ ७॥ इहि विधि निरखि श्यामसुंदर छवि छाकी हैं बहु नारी तिनमें एक वाम इमि मोही दियो प्राण तन वारी ।। तासु दशा लखि संग सहेली जानि लई गति जीकी ।। हृदय सनेह भूरि उपर कटु कही वात हितहीकी ॥८॥ सर्वया कवित्त । न्यारी चल सब ते नितही अरु संग सखीन ते न्यारी रहे छट ॥ न्यारहि ठाट सुन्यारिहि वाट औ न्यारहि घाट रह सरिता तट। जानि पर गसिकेस न तो गति वात कहा तुव हीय गई जट॥

रामरसायन।
(५२९)
वोल भटू घटको अटको घट आय भरै तब आय भरै घट ॥९॥
दोहा-यौं कहि पुनि बोलो अली, वात लई हौं जान ।।
प्रथम दई सिख फेर हौं, कहों लेहु सो मान ॥ १० ॥
सवैया कवित्त।
डीठ बचायकै पीठ दै ईठहि ढीठ है ढीठ सों डीठहि जोडौ।
जो कहिये कछु प्रीत ते नीतकी रीत तबै सुनि भौंह मरोडौ ।।
मानौ कही रसिकेश यही हो बडे घरकी कुल कान न तोडौ ।
फेरभली पछतैहौलली नित या गलिको अली आयवो छोडौ११॥
टक दै तिहि देखनकी टक छोड भटू यह तोटक है न भली।
चहुँ चौचंद चोल चवाई करें पुनि चोज चले चरचाजु चली।
रसिकेश रसीली रहौ रसमें रसते रस राखहु रंग रली ।।
गुणलेहु कहोंगुणके गुण वातन औगुणको गुण मान अली१२॥
दोहा-पुनि हेली यह प्रीत सम, और न दुख जगमाहि ।।
जान परै जब जिय लगे, तवसब गुण दरशाहि ॥ १३॥
संवैया-कवित्त ।
लाज तजै निज साज तजै गृह काज तजै सुख दूर धेरै सो॥
मान तजै तन प्राण तजै कुलकान तजै दुख भूर भरै सो॥
लोक तजै परलोक तजे हिय शोक तजै सब धूर परै सो॥
योगओ भोग स्वलोग तजैतवही रसिकेश सुप्रीति कर सो१४॥
दोहा-पुनि हेली ये नन निज निपट प्रपंची जान ।
मिले रहे मिलि मारही, ऐसे धूत महान ॥ १५॥
घनाक्षरी कषिच ।
मिलत अगाऊ जाय नेकहूँ न मान शंक फेरे ना फिर, लोक
लाज सब डारे तोरि ॥ लावत मिलाय बेगि आपने सजातिनको
आसनद चित्तकी हिये सो नेह लावें जोरि । रसिकबिहाग भन
रसनाको रसनासो रसनाके रसहि पिवाय मति डारे भोगिरोसे
ठग नेननकी करना प्रतीत ये तो देत पर हाथ मन माणिक
थाही छोनि ॥ १६॥

(५३०)
रामरसायन।
दोहा-प्रीति वुरी वैसहि सखि, फेर विदेशी संग ॥
जिहि विठुरे मिलियो कठिन, विरह देहे नित अंग ॥ १७॥
सधैंया-कवित्त ।
गिरिसे गिरवो मरवो विपसे निज हाथसे काटवो नीको गरेको।
पावकमें जरखोहे भलो नहिं खेद हिमालैमैं जाय गरेको ।
त्यागोहै दुहुँ लोकको लोनो नहीं है कछू दुख नर्क परेको ॥
रसिकेशकलेश न जो इतनेमें सु होत विदेशीसे प्रीत करेको १८||
दोहा-सुनि बोली वह वाम तब, कहो सत्य सखि बैन ।।
कहा करों अब विवशहूँ, दरश विना नहिं चैन ।॥ १९॥
अली श्याम गुण रूपको, कह लग करौं बखान ।।
तुमहि विदित है सकल अरु, मो हियकी हिय जान ॥२०॥
सवैया कवित्त ।
आननकी उपमा अरविंदसी इंदु कलासी कोऊ अनुमानें ॥
नैन कुरंगसे कोऊ कहै अलिखंजन मीनसे कोऊ बखानैं ।।
शेप न भापिसकै छबिसोरसिकेश हिये शत शारदा आने ॥
साँवरेकी वा निकाई भटू अँखियानेंते मेरी लखें सोई जानै २१॥
धनाक्षरी कवित्त ।
आसन किधौं है रूपभूपतिके शोभा देत कीधौं यह पंचवानहींके
नौल घर है ॥ कीधौं पंथ आनंदके रसिकविहारी स्वच्छ कीधौं वास
हेत नैन मीननके सर है। प्रेम के विलोकिवेके कीधौं ? मुंकर राजें
कीधौं मन मोहिबेके यंत्र वसी कर हैं ॥ लालके कपोल कीधौं
कामने दिखाये युग सुमन गुलाबके बनाये आप कर हैं ॥ २२ ॥
खुलत चहूँघा खुशबोईके खजाने खूब वह महबूब जब आयकै चढे
अटा । अलकै अनूप अति अतर भरी सो चारु मुख पै परें हैं जनु
चंद पै धिरै घटा। रसिकविहारी रूप सरसरसीलो मंजु को है जो न
जो हैं मन मोहे छैलकी छटा । आनन बिलोकि अंग भान न रहैरी
वीर मार नैन वानन ते प्राणन करै कटा ॥२३॥
दोहा-सुनि धुझाय पुनि अलि कही, करौ भटू वह काज ॥
जाते सबही भाँति तुव, रहै लोक कुल लाज ॥२४॥

रामरसायन।
चौ-तब वह वाम नेह मद माती सत्य विशुद्ध राम रंगराती ॥
संग सहेलिन प्रति झहराई. * वचन कहे दृढ सहि सुनाई२५॥
सवैया कवित।
होत नहीं कछु काहुहिते जग लोग वृथा समुझाय के छूटें ।।
प्राण रहै किन जाय भले धन धाम सो काम नहीं कोउ लूटै ॥
भूमि चलै नभ मेरु हलै बरु ऊपर ते शशि सूरह टूटै ॥
होय सबै अनहोनी तऊ रसिकेशलगी यह प्रीति न छूट।२६॥
डौंडी बजाय के प्रीति करी तब कौन कोहौं अब लाज लजौं।
जो कछु होनी हुती सु भई पुनि औरहु होय सु होय अजौं ।
शंक न काहु की है रसिकेश रही पग रोपि कहा मैं भजौं ।
नेह न छोडो कवौं उन सों सजनी वरु गेह औ देह तजौ॥२७॥
टोको नहीं अब रोकौं नहीं हमसे सजनी न वृथाहिं अरूझौ।
लाज बड़ाई धनी कुलकान की रारमें जाय तुमैं सब जूझौ ॥
होती रंगी रँग साँवरेके कछु होत न कोउ किते कहुँ झझौ ।
होरंसिकेश कहूँ टुक काहू सनेही सों नेहकी रीति तो बूझो २८॥
दीवई छंद ।
तासु वचन सुनिक सब बोली लोक लाज जौं त्यागो।।
तौ तप करौ भस्म तनु लावो ब्रह्म ज्ञानमें पागो॥
तब वह वाम राम अनुरागिनि तिन दिशि देखि रिसानी ॥
भापी बहुरि संग आलिन सों परम तत्त्व मय बानी ॥ २९ ॥
घनाक्षरी कवित्त ।
टोवा ये वनावाजाय औरको मुनावो हम नेह कथा छोड़ बात दूसरी
सुनें नहीं । रमिकविहारी श्यामसुंदरको त्यागि और दृजी नान
ध्यान दीय काहूको गुनं नहीं। प्रेम वारि शीतलको मंजन विहाय
नित्य योग बाल मध्य निज देहको भुननहीं। नीको मनमोहन के
नहमें पगाहे हम ब्रह्मज्ञान मीख वृथा शीशको धुनें नहीं ॥ ३०॥
दोहा-या कदि पुनि बोलो तिया, मैं बहु सुने पुगन ॥
राम भक्ति ते अधिक कछु, कोर न कियो बखान ॥३३॥

(२३४)
रामरसायन।
-
आये विचरत बाग मधि, लखि पावस चहुँ ।
सवही प्रति हिय हुलासकै, बोले राजकिशोर ।
घनाक्षरी कवित्त ।
घिरन लगेहैं घन घूम घूम चारों ओर पावसक
फिरन लगे किधौं । दौरि दौरि दामिनी दमकन लन
विरहिनि कामिनी चमकन लगी किधौं। रसिकविहारी
लगेहैं मंजु रसिकविहारी रंगराचन लगे किधौं । चलन
शीतल समीर आज मनसिज वीर तीर घालन लगो वि
दोहा-इमि वर्णत विचरत बहुरि, आये धाम मझार
ताछिन लाये पत्रिका, अवध नगर ते चार ॥
अपर पत्र सवही सुने, सियकर लिपि कर धार
लखि सुख दुख छायो हिये, रघुवर करत विच
घनाक्षरी कवित्त।
भोगभरी योग भरी सकल संयोग भरी प्रेम भरी
ताकी रीतकी । साम भरी दान भरी दंड अरु भेद भर
परम अभेद भरी नीतकी ॥ रसिकविहारी बहु चाह में
क्षेम भरी क्षमा भरी भरी शुभ गीतकी। मोद भरी वि.
भरी आई आज पाती लाडिलीकी किधौं थाती यह प्रीत
दोहा-इमि मिथिला में रामको, बीतगयो इकवर्प ॥
जात न जाने रैनि दिन, नित नव आदर हर्प ।
सुंदर शेखर शीलनिधि, तेज रूप रशिकेश ।।
इनहि आदि बहु प्रियसखा, रघुवर संग सुदेश ॥
तिन सखानकी तीय अरु, सिया सखी समुदाय
निज निज पिय दरशन बिना, सकल हीय अकु
चौ०-वर अशोकतारिका
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नेगी

रामरसायन। घनाक्षरी कवित्त। घौर चौर दुमन लगे, फल ठौर ठौर शोभितहै और झौर पल्लव प्रसून पेखु ।। मौर मौर मंजुल मलिंद मडरात मत्त रसिकविहारी सुखकारी सवही को लेखु ॥ और और बोलै कीर कोकिल सु तौर तौर डौर डौर वल्ली लपटानी जो कहा विशेखु ।। धौर और मौर और तौर चहुँ और भये दौर दौर आली आज आयो ऋतुराज देख ॥ ॥५४॥ ौर और ठऔर ठौर झूमत रसाल मौर पी मकरंद लै मलिंद बूंद धापिधापि।। सबै जड चेतनके अंग उमँगो अनंग लपर्टी सुमालती तमालतरु ढापि दापि। रसिकविहारी हैं संयोगिनी सुखारी हीय कोकिला अलापें सुर पंचमको थापि थापि ।। सुनि सुनि कूकैं उर विरह भभूकै र निरखि वसंत हैं विरहिनि कापि कापि ॥५५॥ पेखिये पलाशन पै प्रबल हुताशन है पाय अनुशासन विरह सरसा- योहै।। कोकिलाकी कहिये हूकसी उठावतहै लूकसी लगावत समीर अधिकायो । रसिकविहारी मैन मनकों मरोरतहै भौरन को शोर जोर अधिक जनायो है ।। संतकै असंत प्राण लैहै विनकंत हेली आज विरहनपै वसंत चढि आयोहै ।। ५६।। दोहा-यौंकहि दीह उसाँसलै, पुनि बोली अकुलाय ॥ कहादोप ऋतुराजको, है वियोग दुखदाय ॥१७॥ घनाक्षरी-कवित्त। हेलीही विकल विललाता तवही तें वनी जवते विदेश गोन भयो प्राणप्यारेको ॥ रसिकविहारी तोहिं झों यह बात भटू कौन विधि देहुँ धीर हृदय विचारेको.। विरह सतावै दिन रैनि दुख कासों कहीं ऐसी को मिलावे हाय प्रीतम हमारेको । हेम लंकदाही कपि नीको मैन जारो शंभु कोउ नाव रायो या वियोगदई:मारेको ॥२८॥ दोहा-तोछिन दूनी वाल इक, पिय सुधि कार अकुलाय ।। सुधि वुधि भली विरहवश, बोली सखिहि रिमाय ।। ५९॥ पनाक्षरी फवित्त। भान दापि राखे ताको भानही न राखों चीर के है जो गणेश ताहि देश तें निकारोंगी। ज्योतिप पढ्गो मेरे ग्राम ते कढगा वह यान (५३६) रामरसायन। जो ववैगो ताकी सान मैं विगारौंगी। रसिकविहारी यह डौंडी फिरवाय देरी आज ते चहूँघा यही आज्ञा अनुसारौंगी । प्रथम भई सो भई अब तो समै पै सदा सासु औननँदकै प्रबंद बंद पारौंगी६० दोहा-इमि निज निज प्रीतमसुरति करि करि होय अधीर ॥ जनकनंदिनी प्रीति युत, तिनहिं धरा धीर ॥ ६॥ ग्रीपमऋतु आई तबै, वोली विरहिनिबाल ॥ अब किमिवचिहैं प्राण ये, एक अंग दै ज्वाल ॥ ६२॥ सवैया-कवित्त । यौं मुरझाय रहीं द्रुम बेलि हुताशनसी जंनु लागी पहारन । नीर ते छीन भये सरिता सर कौन सहै यह आतप झारन ॥ है रसिकेश अनंद पिया संग या ऋतु है विरहीनके कारन ॥ एक तो जारततो विरहा पुनि दूजहु ग्रीपम लागी है वारन॥६३॥ घनाक्षरी कवित। कीधौं शेप मुख झाल कीधौं वड़वाग्नि ज्वाल कीधौं भानु काला भानु भानु कीनो वास है। कीधौं हर तीजो नैन खोलो फेरि क्रोधित कीधौं शंभु कंठते कढो जो विष त्रास है। कीधौं महा प्रलयको आतप प्रचंड अति कीधौं महाकाली कोप प्रगट प्रकाश है।कीधौं यह ग्रीपमकी तपन समेत पौन रसिक विहारी कीधौं विरही उसीसह ६४॥ दोहा-यौं विलपत पिम गई, पावस आई घेरि ॥ जनकसुता सखियान सों, कही चहूँ दिशि हरि ॥६५॥ घनाक्षरी कवित्त । मोरनमें मगमें मनोजमें सु मीननमें मनमें महीमें गति औरहि छई है आज । तरुन तमालनमें तालनमें तरुनीमें तममें तमीमें यति औरहि ठई है आज । रसिकविहारीरस रंगनमें रागनमें रीति रमनीमें गति औरहि नई है आज । पवनमें पावसमें पत्रनमें पुप्पनमें प्रीतिमें सु पोमें मति औरहि भई है आज ॥६६॥ वेई मेघमंडल मढ़े हैं नभमंडलमें वेई मोर कोकिला कलाप करें नीकेरी।वेई वन वेई वाग सक्ननिकुंज वेई वेई रागरंग जो प्रमोद दानही केरी । वेई नवनागरी रामरसायन। (५३७) सहेली संग वेई रैनिकारी हित वेई कोंधा दामिनी केरी रसिकविहारी वेई पावस मनोज वेई साज सब पीके बिन दाहक, जीकेरी ॥६॥ आवन न दीने पिय चारों दिशि रोकि राखी चातक शिखंडी व्यंग्य वाणी सो उचारी है । विरह विलोकि मेरो दामिनी हँसतहेली रैनि दिन संधि पाय होत अरु नारी है । इंद्र धनु भ्रकुटी चढाई कारि कोप येरी पवन प्रचंड दूती सीखदै सिधारी है ॥ रसिक विहारी हम जानी री, सयानी सुनौ पावस नहीं है यह सवति हमारी है ।। ६८॥ दोहा-मुखछावन सावन छयो, तिय मनभावन संग॥ झुलै हुलसि हिंडोरने, हृदय वढाय उमंग ।। ६९ ।। घनाक्षरी कवित्त । वृन्दवृन्द रिकै अनंद भरी चंद्रमुखी झूलती हिंडोरे हिय हुलास वढाय चाव ।। रसिकविहारी सजे भूपन अनूप अंग वसन सुरंग रंग रंग रचिकै बनाव।। गाय गाय उमग अभंग उमँगाय उर भाय भाय सरस जनाय पिय प्रीत भाव || सावन अपार सुखछावन सु- हावन हैं प्यार ते बुलावे मनभावन पियारी आव ॥ ७० ॥ दोहा-इमि सबके पिय प्यार करि, झुले प्रिया समेत ॥ राजकुंवर विन या समै, हम उसाँस नित लेत ।। ७३ ।। इमि पावस सोचत गई, छायो शरद प्रकाश ॥ रास सुरति करि सिय कही, ले अति दीह उनास ।। ७२ ।। घनाक्षर्ग फक्ति । आतपसी चांदनी तपन तन दूनी देत लागत हिये में चंद्र कि- स्ने करदसी ।। आवत उमाँन उंची सुखद मुबाम लहि विविध स- मीर धीर शालत दग्दसी ॥ रमिकाविहारीद संयोगिनी अनंद संय विकल वियोगिनी न लागत शरदमी ।। आशी निगशई निगशहते आश पाय मरि मरि जीवत है नॉपर नरदमी ॥ ७३॥ दोहा-चों नवही अलायक, पं बिताई वाम ।। आई फेर वसंत प, नदि आये घनश्याम ।। ७2।।

(५३८) रामरसायन। अवध नगर ते सिय सहित, तिय अति विह्वल होय ।। निज निज पिय हित पत्रिका, पठवत हैं सबकोय ॥ ७९ ॥ दोवई छंद। उत रघुवर बहु जनक राजसों गमन रजाय सु चाहैं । पै विदेह राखत मिसही मिस नित नव नेह उमाहैं ।। जे मिथिलावासी निमिवंशी वर किशोर सुठि रूपा॥ तिन मिलि राम परस्पर अतिही बाढी प्रीति अनूपा ॥ ७६॥ ते सांचे रघुवीर मित्र सब छिनहु संग नहि त्यागें ॥ वनविहार मृगयादि खेल बहु केलि ठनैं अनुरागें ॥ जब जब अवध चलनकी चर्चा राजकिशोर चलावें ।। तब तब सकल मित्र कछु उत्सव र, तहाँ बिलमावै ॥ ७७॥ दोहा-यों बहु काल व्यतीत भो, तब भापी रघुचंद ॥ अहो मित्र अब हमहिं शिप, देहु सकल सानंद ॥ ७८॥ सुनि सब भापी रामसों, लखो जनकपुर माहि ॥ जिमि सुखहोत बसंत तिमि, कहुँ त्रिलोक मधि नाहिँ ७९॥ दोबई छंद। माघ मास शित पक्ष पंचमी शुभमुहूर्त सुखधामा । ऋतुपतिको प्रस्थान दिवस है अति पुनीत अभिरामा ॥ तादिन ते ऋतुराज दशौं दिशि छावत करत विहारा ॥ याते ख्यात वसंत पंचमी नाम त्रिलोक मॅझारा ॥ ८०॥ दोहा-सो आनंद अरु फाग लखि, चलें अवध सब फेरि ॥ लक्ष्मीनिधि सों राम तब, कही कंठ भुज गेरि ॥८॥ जनक नगरके नारि नर, सवही मंत्र प्रवीन । पढि भुरकी डारी कहा, हमै स्ववश करिलीन ॥ ८२॥ अनुज सखा सेवक जिते, तेऊ पगे सनेह ॥ अवध सुरति काह नहीं, भूल गये सब गेह ॥ ८३ ।। यौं कहि बोले राम पुनि, राजपुत्र तुव बैन ॥ कबहूँ काहू भाँति हम, रंच रलंधि सकेन ॥ ८४ ।।

रामरसायन। - ॥ याते तव रुचि राखि हम, और रहैं इक मास ।। फाल्गुन अर्ध वितै विदा, दीजो सहित हुलास ।। ८५ ॥ तब लक्ष्मीनिधि राम रुचि, पालि कही दृढ ठान ।। राज कुँवर |है यही, सत्य लीजिये मान ॥ ८६॥ यौं विचार उनि कै सवै, रहे परमआनंद ॥ भो वसंत उत्सव महा, जुरे नारि नर बूंद ।। ८७ ॥ लागो फाल्गुनमास तय, रंग रचे सब कोय।। अवधनिवासी छैल बहु, खेल प्रमुदित होय ॥ ८८॥ इक होरी ससुरार पुनि, कहा लाजको काज ॥ धम करें घर घर चहूँ, रंग गुलालहि साज ।। ८९ ।। डफ मृदंग वंशी बजै, जनक- नगर चहुँ ओर ॥ ५ रोनि दिवस छायो रहै, होरी होरी शोर ।। ९० वधियोरी बचियो कहैं, एकहि एक पुकार ।। अवधनिवासी लोगते, सबै वडे फगुहार ।। ९१॥ राम अनुज रिपुदमन ते, औरहु चपल प्रवीन ॥ संग सखन लै फिरत हैं, रंग गुलालहि भीन ॥ ९२॥ इहि विधि मिथिलावासिनी, कोउ कह सकुचाय ॥ कोऊहै सन्मुख रचें, फाग रंग वरसाय ।। ९३ ॥ कोउ तिय चरिकै रहसि, करें परस्पर बात ॥ सुखी न होरी होइ यह, वरजोरी दरशात ॥ ९॥ ताछिन बोली एक तिय, सुन गोरी मम वात ।। अबकी फागुन माह यह नये ढंग दाशात १९५॥ मपा-कवित्त । बैंधर लाल गुलालकी छाई चहूं दिशि केशरग हो नि ।। गावत है डफ ताल बजावन गारीद लंकलचावत हैं नचि ॥ होगे कहा वरजोरी भट्ट मिकेश भई नव गति नई मचि ।। लचल मोहीं कई मननी इहि लागकी पागने भाग दुगेपनि - १

(५४०)
रामरसायन ।
दोहा-ताछिन बोली अपर तिय, सखी एक खिलवार ।।
अवध निवासी कौन धौं, है वह बडो धुतार ॥ ९७ ॥
घनाक्षरी कवित्त।
छेकत गलीमें बैल नवल छवीलिनको छाती छै छिपात जो
छरीले तिहि धावै तौ ॥ गजब गरार गारी गावत गरूर भरो
गुण गर्न वाके गिनै पार नहिं पावैतौरसिकविहारी रूप चतुररसीलो
अति रिसहू करौ जो रस रीति तें रिझावै तौ ॥येरी यह गांव छोडि
अनत वसीजे अब कीजैकी उपाय जाते लाज रहि जावै तौ ॥९८॥
दोहा-तासु वचन सुनि एक तिय, बोली अतिहि उताल ॥
हौं भाषौं तोसों भटू, सुन होरीको हाल ॥ ९९ ॥
घनाक्षरी कवित्त ।
लीने पिचकारी कर झोरिन गुलाल भरे खेलत छवीले छैल होरी
मद छाकि छाकि ॥रंग बरसा अंग जोबन अभंग भीनै घालत हैं
कुंकमा कपोलन पै ताकि ताकि ॥ रसिकबिहारी सबै सुघर खिलारी
भारी देखि नौल नारी गाय गारी देत वाकि वाकि ॥ तूतो है भली
पै अली चरचा चली मैं सुनी जात या गली लै छली तेरो भौन
झांकि झांकि ॥ १०॥
दोहा-सो सुनि कही प्रवीन तिय, कहा आपनो जोर॥
छैहै प्रति दिन दिन घनो, फाग रंगको शोर ॥ १०१॥
याते हौ हित वात यह, भाषौं सवहि बुझाय ।।
होरी बरजोरी रचै, कहा दोप तिहि आय ॥ १०२॥
घनाक्षरी कवित्त ।
होरी में मचेगी धूम धुंधर चहुँ दिशान गानवान ताननमें
कानन पगैयो जनि ॥ रंग पिचकारिनकी धारनमें भीजि
भीजि आवेंगी सहेली सवै दोप त्यौं लगैयो जनि ॥ रसिकविहारी है
अनोखे खिलवार इहाँ नीकै नैन वैननकी सैन भूलि जैयो जनि ।
ही तो इहि फागुनमें फाग ना रचौंगी वीर कोऊ रंग डारै बरजोरी
कटकैयो जनि ॥ १०३॥

रामरसायन। (५४१) . दोहा-इमि बतरात हुती सबै, ताछिन तहँ इक बाल ।। आई भाजत रंग सनी, बोली निपट विहाल ॥ १०४॥ घनाक्षरी कवित्त। थोरी वैस कोरी मोसे करि बरजोरी गोरी डारिकै ठगोरी मेरे गरभुज मेलिगो ॥ वेनी लै विथोरी माल तोरी तनी छोरी भटू झोरी भरि रोरी कहि सोरी तनु झेलिगो॥ काह मैं कहोरि रस चोरी में खरोरी छैल रसिकविहारी अंग अंग रंग रेलिगो॥ होरी में भयोरी जो नयोरी स्वाँग देखो - वीर कोधौं खिलवार आज ऐसी फाग खेलिगो।।१०५॥ दोहा-इहि विधि मिथिलानगर मधि, मची फाग चहुँओर ॥ अरु सिद्धा रनिवास मधि, सकल सरिखनको जोर ॥१०६|| कोशलराज किशोरको, अनुज सखनके संग ।। रंग अवीर गुलाल भरि, रचें तियाके अंग ॥१०७॥ परमानंद समेत इमि, सब हिय भरि अनुराग ॥ फागुन द्वादश दिवस लग, खेली नित प्रति फाग ।।१०८॥ पुनि लक्ष्मीनिधिते कही, रघुवर नेह बढाय ।। अब नृपरांनिहि विनय करि, दीजे हमैं रजाय ॥ १०९ ।। तव लक्ष्मीनिधि वेगही, मातु पितहि समुझाय ॥ रामविदा को साज सब, साजो अमित सजाय ।। ११०॥ तव सव संगी मित्रते, रामहि कहैं सुबै न ।। हम चलि हैं सँग रावरे, क्षणहूँ विलग रह न ॥ १११॥ सुनि रघुवर तिन धीर दे, समुझाये हिय लाय ।। तब सो कोऊ दीन ह, बोले कोर रिझाय ॥ ११२॥ सर्वया कवित्त । माही न चाही पियारे हम दिन रनि सदा जिय रूसे बने रहो। बोली न बोलो हँसी न हँनों गर लागौ नलागो जुरोलजने रहो।। जो जिय भाव करी रसिकेश भले सुख माज में सार मने रहो ।। नननसे.लखि लीजे लला युगकोटिनलों तुम नीके बने रहो ११३ .

(५४२) रामरसायन। पहिले छलते मन मोहि लयो अब क्यों जियरा तरसावत हो। मृदु बैन सुनावत ऊपरसे हियमें न दया कछु लावत हो । निठुराई तजो रसिकेश सबै तुमतो दिलदार कहावत हो। हम जानि लई हो बड़े कपटी तब तो ममप्राण सतावत हो११४ भौर दयो जिय पंकज पै तनु दीपमें जारत धाय पतंगी। त्यौं हम मित्र जु साँचे भये अजहूँ तुम यार न त्यागि दुरंगी ॥ ठौर घनी अनरीति लखी जिहि दीजिये प्राण सु होय न संगी। नेह दुहूँ सु भले रसिकेश है हाय जरे यह प्रीत इकंगी ॥११॥ दोवई छंद। राम मित्र मिथिलावासी बहु इमि अति होय दुखारी ॥ कोऊ मृदु कटु कोउ नेह वश विह्वल गिरा उचारी ।। सुन उमंगाय लगाय अंकसो समुझाये रघुनाथा ॥ दै बहु धीर काहु तहँ राखे काहु लये निजसाथा ॥ ११६॥ उत सिय मात प्रेम भर प्रमुदित पुत्रिन निरखन हेता ॥ सिद्धाकी प्रिय सखी विचित्रा ताहि समाज समेता ।। दई रजाय जाव कौशलपुर सो आनंद अघानी ॥ तिहि सँग अपर भूरि पुरवासिन गई दरश रुचि ठानी ॥११७॥ तब मिथिलेश बिदा किय रामहि दै बहु साज समाजा ।। परम सनेह उमंग यथोचित मिले सबहि रघुराजा॥ दुघरी शोध पयान कियो द्रुत संग विपुल नर नारी ।। अति उताल पुर सन्निध आये सप्तम दिवस सुखारी ॥ ११८॥ दोहा-इत सिय ढिग बहु नारि मिलि, करहिं परस्पर बात ॥. भये घने दिन तबहिं ते, नित शुभ शकुन जनात ॥११९॥ घनाक्षरी कवित । डेरी भौंह डेरी आँख डेरोभुज डेरो कुच डेरे अंग मेरे सब फरक रहे है री। आजहूँ न आये कहँ छाये प्राणप्यारे लाल मेरी जान कोऊ वाल गाढे के गहे हैंरी। रसिकविहारी यह कारण कहा है वीर आँगीमें न मावै मो उरोज उमहे हैं ।होत हैं शकुन वेई पीके मिलिवेके नित्त तीके हेत नीके नीके नीके जे कहे हैं री ॥ १२०॥ दोहा-सो सुनि बोली एक तिय, सत्य कहीं मैं वाल । हों जानौ मो प्राणप्रिय, आवन चहत उताल ॥ १२ ॥ घनाक्षरी कचित्त। हिय हुलसात मन मोद सरसात भटू अंचल उडात वाम नैन बाहु फरकै । दाहिने कुरंग पाँत काग शुभ बोलि जात रसिकविहारी त्यौं उरोज युग थरके। गनक बुलायो प्रात सोउ कही नीकी वात शकुन दिखात लोन नीवी फंद सरकै । हेली हम जानी मिलो चाहत हमारे प्यारे वार वार आज कंचुकीके बंद तरके ॥ १२२॥ दोहा-ताछिन बोली मैथिली, स्वपन लखो हम आज ॥ कौशलराजकिशोर जनु, आये सहित समाज ॥ १२३॥ इमि वतरात हुती सबै, ताछिन इक अलि धाय ॥ आय कही सानंद अति आवत हैं रघुराय॥ १२४॥ तापु वचन सुनिकै मुदित, सिय निज निकट बुलाय॥ दीने भूपण वसन वर, परमप्रेम उमगाय ॥ १२५ ॥ भरत साज माज जायके, लाये नगर लिवाय॥ घर घर भये वधावने, मिले सव हुलसाय ॥ १२६॥ मिथिलाते आई अली, जासु विचित्रा नाम । ताहि सिया सादर निकट, राखी हरपि सु धाम ॥ १२७॥ फागुन मास अनंदको, आये सब निज गह ॥ मिले परस्पर नारि नर, हिय उमँगाय सनेह ॥ १२८ ॥ रचो रंग निज निज सदन, खेलत सबही फाग। बटु दिनके विछरे मिले, बाटो अति अनुगग ॥ १२९ ॥ इहि विधि ते ग्घुवंश मणि, अनुज मखान समेत॥ करि विहार मिथिला मुदित, आये अवध निकेत॥ १३०॥ इत मीता मखिगण नहित, नवन महित टन गम ॥ दुहुँ दिशि फाग उमंग भार, मने नाज मुखधाम ॥ १३॥ इति श्री रा०प०वि०वि०मिपिनादिहाबादी मान तुर्कोदिनाः ॥४॥ -

रामरसायन।
दोबई छंद।
आये कौशल नगर मुदित सब रची फाग सुखरासी ॥
जनकनगर वासी नर नारी मिले अवध पुरवासी ॥
जे तिय पुरुष भूरि मिथिला ते राघव संग सिधारे ।
ते अरु प्रथम हुते जे सिगरे जरे एक 8 सारे ॥१॥
जबते सिय आई कौशलपुर तबते बहु नर नारी ॥
जनकनगर वासी सानंदित निवसे अवध मझारी ।।
तिनके सदन अपार अनूपम विस्तृत भूरि सुवासा ।।
पुनि आवत तेऊ तहँ विलसत सब विधि सकल सुपासा ॥२॥
तिहि वर वास मध्य रघुवरके अनुज सखा प्रति वर्पा ॥
होरी धूम करें कबहूँ तहँ रामहुँ जात सहर्षा ।।
सो मिथिलावासी नर नारी भये अवधपुर वासी ॥
तदपि सकल सम्बंध यथोचित रचैं फाग सुखरासी ॥३॥
ते सब हीय उमंग भरी अति ठानी फाग सुहाई ॥
रघुवर अनुज सखा सानंदित करी धूम तहँ जाई॥
इत रघुवंशी छैल सुभग उत निमि वंशी नर वामा ॥
यूथ यूथ मिलि होरी खेलत सुख शोभा अभिरामा ॥४॥
दोहा-इमि माची नित घूम तब, एक तिया चहुँ धाय ॥
जे आई नव नारि तिन, सबही कही बुझाय ॥५॥
घनाक्षरी कवित्त।
छैल नित याही गैल आयके मचा फैल भौंह मटका औ
नचाँव नैन गारो दे॥ देखि नव गोरी वरजोरी करि धावै ताहि रंगमें
भिजावं ताकि तन पिचकारी दै ॥ रसिकविहारी हैं अनोखे फगुहार
फेर पकर बनावें नर भेप हँसें तारी दे॥याते प्राणप्यारी सीख
मानियो हमारी दुरि वैठियो अटारी चहुँ ओर ते किंवारी दे॥६॥
दोहा-यों कहि पुनि बोली भट्ट, जे रघुवंशी छैल ॥
तिहूँ लोकते अवधमें, तिनको न्यारी गैल ॥७॥

रामरसायन ।
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चैतमास आरंभकी, रंग पंचमी होय ॥
पुनि दिन लग अटमी, फाग गिनै सब कोय ॥८॥
इहि विधि मिथिलावासिनी, करें परस्पर बात ॥
छिन छिन प्रति दिन दिन चहूँ, होरी सुख सरसात ॥९॥
उत खेलत पुर माहिं सब, नरे नारी सानंद ।।
रची फाग इत महल सिय, सहित सखिनके वृंद ॥ १०॥
आई मिथिला ते सखी, तिहि सिय दई रजाय ॥
होहु सजग अलि यूथ मिलि, सुठि सिंगार सजाय ॥ ११॥
सुनि सिय आयसु हुलसिके, सुभग विचित्रा नारि ॥
सजे अंग भूपण वसन, वर शृंगार सुधारि॥ १२॥
घनाक्षरी कवित्त ।
जावक लगायो युग पाँयन सुरंग अति घेरदार घाँघरो नवीन
पहिरायकै ॥ नीलरंग चूनरी चटकदार चातुरी ते चुनि चुनि चारु
राखी सरस उढ़ायक।।रसिकविहारी भली तियहि सिंगारी अली माँग
रचि दीनी वर सेंदुर भरायकै । मानो रसराजको विदारि आयो
रौद्र रस लालमन जीतिको विजय वढाय कै॥ १३ ॥
दोहा-तासु छटा लखि परसपर, कहैं अवधकी तीय।।
याको शिख नख सुभग पे, पीठ कहा कमनीय ॥१४॥
घनाक्षरी कवित्त ।
कंचन पटी के अँगनाई मैन मंदिरकी जोवन महीपके
विराजिवेको कैयौं पीठ ।। कैयौं मान गढकी दिवाल हे विशाल अति
रूप परदाकै कोऊ ढीठको परैना डीठ ॥रसिकविहारी हरि हेरि मति
हारे धनी ऐसी है अनूप जाकी उपमा मिले है नीठ ॥ कंधों कदलीको
पत्र कोमल नवीन मंजु कैयौं यहशोभित नवेली नागरीकी पीठ१५॥
दोहा-निरखि विचित्राकी छटा, तिय बोली हुलसाय ॥
हो सुंदार तुव नाम यह, सत्य रूप मम आय ॥ १६॥

रामरसायन । संवैया कवित्त । धुर वृद्ध भयो करतार अबेथहरे.तनु औ कटि कंठ लपो॥ इहिते तिहिते वर रूप बने न चनावत पै उर अपिचपो॥ अति.तो छबि हेरि अनूप हिये रसिकेश यही दृढ हेत थपो॥ विरची विधि तोहि भटू जवहाँ तव रंच कहूँ कर नाहि कपों १७ भंग चहूँ भ्रमते मड़रात विलोकत, हग पंकज फूले ॥ आवत कीर हिये ललचात लब अधरारुण विम्ब अतूले ।। चंदके धोखे चकोर लखै मुख है रसिकेश. सदा अनुकूले । तो छबि हेरतही नवला निरपक्ष कहा पुनि पशिह भले ॥ १८॥ घनाक्षरी कवित्त । खंजन मलिन्द मीनहूत गुण चौगुणो है ऐसे हग दोऊ जिनै निरखि लजाय कंज ॥ मधुते सुधाते बसै छैगुणो मिठास जामें वाणी यौं अनूप सुनि सकल नशात रंज ॥ सिकविहारी रूप नौगुणो गुलाबहूते जिनको कपोल ये ललाम मदकाम भंज ॥शीतकरहूते अति शीतकर सौगुणो है येरी प्राणप्यारी तेरो वदन मयंक मंजु १९॥ दोहा-सुनत विचित्रा सकुचिकै, कहे भाव युत वैन । अवधवांसिनी धन्य तुव, पद रज सम हम हैं न ॥२०॥ इमि अति आनंदित सबै, सखिगण कियो शृंगार ॥ आई सिय ढिग मणिजटित, पिचकारी कर धार ॥ २१ ॥ सिय शृंगार तिहि समय को, वरणि सकै कवि कोय ॥ जिहि भाप बहु शारदा, तऊ थकित मति होय ॥२२॥ सो मिथिलाधिप नंदिनी, संयुत सखी समाज ।। शोभित महल उमंग भरि, फाग साज सब साज ॥२३॥ साजे होरी साज सब, सकल अनूप अनेक ॥ सो अवलोकत ही बने, वर्णत बनै न नेक ॥ २४ ॥ घनाक्षरी कवित्त । मृगमद चूर औ कपूर धूर भूर पूर कुंकुमा करोरनते सु लघु विशा- ल हैं ॥ मेरु सम चारों फेर अबिर गुलाल ढेर स्वच्छ गुच्छ विपुल रामरसायना (५४७) प्रसूननकी मालहैं | केशर कुसुंभ रंग पूरे कुंभ कुंड रूरे अतर तमोल येला अमित निरालहैं । रसिकविहारी इमि फागको तयारी संग जन- कदुलारीके उमंग भरी बाल हैं ॥२६॥अनुज सखान बंद युत रघुचंद सजे अतिही अनंदते प्रबंद करि होरीके ।। रसिकविहारी करधारी पि- चकारी मंजु सहित अबीर औ गुलाल भर झोरीके ॥ रंग रंग रंगके अपार घट लीने संग वाजत सुढंग ते मृदंग डफ जोरीके । मिथिला- निवासिनमें अति अनुराग भरि खेलि फाग आये भौन जनककिशो रोके ॥ २६॥ देखि रघुराईको विचित्रा उठि धाई वेगि सखिन समेत आय रंग झरिलाई सो॥ करि चपलाई लँगराई औ ढिठाई भरि मस- लि गुलाल मुख औचक दुराई सो॥ रसिकविहारी चारु परम प्रधान नारी सकल खिलारिनकी सुमति छकाई सो॥ सरस अनूप रूप हेरि मन मोहित है जानी सब येही मिथिला ते बाल आई सो॥२७॥ दोहा-निरखि विचित्राकी छटा, चकित भये रघुवंद ।। करत विचार सु हीयमें, पूरो परमानंद ॥२८॥ घनासरी कविता मेरो चित्त निश्चल छलैबे छल ठानि सीय गुण बलते धी प्रगटाई यह भामिनी ॥ कंधों किन्नरी है के नरी है के सुरी है कोर कधी वन त्यागिइत आई आज दामिनी । रसिकविहारी रूपवारी है अनुप नारी कहांते सिधारी प्यारी ढिग अभिरामिनी कधी भारती है के रतीह के मती है नीय शरदशशीकी जोन्ह केधी भई कामिनी॥२९॥किधी भूप जोवनके चपल तुरंग युग कधी दलपंकजके सरस सलोने याकिया मदगंजन निरंजन है खंजनके कैवी मृग मीन हेत भये अनहोने य।। कधी मन मोहिवके उभय अमृत दृत कधी सुखदेत लेत अमविप दोने ये ।। रासेकविहारी की हरन सुहीके पीके लोचन सुतीके अतिनीके रचे कोने ये ॥३०॥ कपी शशि अंकमें विग शनिवाल रूप कधी कंज कलिकाप सो है भंग नीको द॥ कवा देम संपुटमें जटिन मु नीलमणि कधी धगे आरमी प फूल

(५४८)
रामरसायन।
अरसीको है ॥ कंधों शुभ्र आसन पैवेठो है मनोज भूप कधी जंत्र
मोहन है मोहन सुजीको ह ॥ रसिकविहारी कधी डीट काहकी है
गडी कीधौं यह आनन पे गुदना सुतीको है ॥ ३३ ॥
दोहा-इमि विचार करि राजसुत, बहुरि लखे तिहि और ॥
ताछिन कमला धायक, दये रंगमें वोर ॥३२॥
लखि रिपुसूदन कुंकुमा, पालो तासु कपोल ॥
मुख गुलाल मलि मेनका, धाय मिली-निज टोल ॥३३॥
ताछिन आलीगण उमॅगि, रंग गुलालहि छायः।।
अनुज सखन युत श्यामको, नख शिख दये रचाय ॥३॥
तिहि औसर छवि फागकी, अकथ अभूत अनूप ॥
सो सुख जान नैन मन, जहँ छायो वह रूप ॥३५॥
घनाक्षरी-फविक्त।
बरसत रंग तिय दामिनी सी दौरें दुरि वन अँधियार है गुलाल
अवरोधमें ॥ गरजत मेवसे मृदंग मैन पौन झोके होत कलगान
कोकिलानके प्रबोधमें ।। फागुन पलट भयो सावन सुहावन सो
रसिकविहारी कहौ निज मति शोधौ । सरिता नवेली उमड़ी है नेह
नीर भार धायकै मिली, जाय प्रीतम पयोधमें ।। ३६॥
दोहा-इहि विधि इत होरी मची, कोऊ कछू ने जान ॥
राम विचित्रा डीठ लखि, सिय उत ठानो मान ॥३७॥
मिसकरि उठि तहँ ते सिया, विमलहि निकट बुलाय ॥
रहसि भवन मधिले गयी, भापी भौंह चढ़ाय ॥३८॥
सखीन हौं आयसु दई, पै सु विचित्रा नारि ॥
आवतहीं नृपनंद ढिग, धाई रूप निहारि ॥ ३९ ॥
पुनि श्यामहु की डीठ हैं, पहिचानी तिहि ओर ।।
चकित भये टक लाय दृग, मानो शशिहि चकोर ॥ ४०॥
याते हैंौं अब लाल दिग, जाय न खेलौं फाग ।
सुनि विमला समुझायकै, बोली युत अनुराग ॥ ११॥

रामरसायन। (६४९) एनाक्षरी कवित। नृपतिकिशोरी मोरी विनय सुनीजे इती कहति निहोरी करजोरी मान लीजिये । गोरीते सु जोरी डीठ होरी में न चोरी कछू खोरी तिन ओरी है न जीमें ठान लीजिये। जोरी श्याम गोरी विधि जोरी या करोरी युग अचल सदाही सत्य नेह जान लीजिये ॥राम एक नारी व्रतधारी मुनि झारी कह रसिकविहारी वात सारी छानि लीज ये॥४२॥ हम सब आली दिन रौनि नित दंपतिको सबैं हैं सदाही जीय गति हिचान हैं ॥ रहसिरसेंहैं दरशैहैं परसह अंग बोलह हँसे हैं औ विनोद मोद ठान हैं ।। सिकबिहारी धीर अवधविहारी सत्य धर्म धुरधारी सो सुनीति रीति जानें हैं।मन वच कर्मते सुभूलिहु कवौं न लाल रावरे विहीन काहु बाल उर आनें हैं ॥१३॥ दोहा-यौं कहि पुनि विमला सुमति, वोली परम सुजान ॥ धनि दंपति जोरी मिली, दोज दुहूँ समान ॥४४॥ घनाक्षरी कवित। प्यारे सों न कोऊ एक नारी प्रतधारी और प्यारीसी पतित्रता पुनीत कहुँ नारी ना ॥ अवधविहारी ऐसे कितहूँ न रूपमंत नृपति दुलारीसी सुतीय छविवारी ना || रसिकविहारी दुहुँ दोऊ अनुहारी इमि काहु ठौर दंपति सनेह सत्य कारी ना ।। एक मुख कैसे यह भाग्यकी वडाई करों गिरिजा रमाहु नम स्वामिनी तिहारी ना||४|| मया कवित्त । व्याह भयो जवहीते पिया तुत्र रूप लखें नितही हग दीने ॥ रंच न त्यागत हैं रसिकेश तिहारहि नेह सुधारस भीने ।। रावरे अंगको देखि प्रभा ललक पलक नहिं देत प्रवीने ॥ हो वड़ भागिनि राजसुता रघुनंदनको अपने वश कीने ॥ १६|| पना पवित। परमसुजान ज्ञान गुणको निधान मंजु अति मतिमान मदान प्राणप्यारेकी । मेरो विन मान मान त्यागी अनुराग प्रिया सिखई मखीको आज यह गति न्यारेकी । कीने फाग विजय सुटंग गदि

(५५०)
रामरसायन ।
लीजे धाय सुथरी भली है या गुलालके अँध्यारेकी ॥ रसिकविहारी
प्यारी रंग बरसावो चलि पिय दरशावो द्युति आनन उज्यारेकी४७॥
दोहा-यौं कहि विमला सीय मुख, लखि पुनि कर गहि लीन ॥
नैननाय मुसकाय फिर, बोली अली प्रवीन ॥ १८॥
घनाक्षरी कवित्त
झेलि झेलि झोरिन अवीर रंग रेलि रेलि मेलि मेलि कुंकुमा
गुलाल भरि मूठि मूठि ॥ खेलो फाग आई अनुराग भरी भाग्यनते
काहे इतरात बात बोलतीही तृठि तृठि ॥ रसिकविहारी कौन वानि
या तिहारी प्यारी प्यारेको वृथाही क्यों लगावो खोरि झुठि झुठि ॥
मानो सीख मोरी वैस थोरी पै न भोरी वीर होरीमें न गोरी बरजोरी
चलो रुठि रूठि॥४९॥
दोहा-सुनि आलोके वर वचन, हँसि लगाय तिहि हीय ॥
सीय कही विमला सखी, हौं अति मति कमनीय ॥५०॥
यौं कहिकै आनंद भरि, लै पिचकारी हाथ ॥
कोउ न जानो भेद सिय, मिली सखिनके साथ ॥५१॥
बरसत है दुहुँ ओरते, रंग गुलाल अपार ॥
कोऊ लखै न काहुको, छायो अति अँधियारं ॥५२॥
छिन छिन कहत उमंग भरि, सखी सखा दुहुँ ओर ॥
जै मिथिलाधिप नंदिनी, जै अवधेशकिशोर ॥ ५३॥
घनाक्षरी कवित्त।
बरसत दोउ ओर रंग पिचकारिनते मृगमद मिश्रित गुलाल
धुंधलाईहै ॥ रलित कपूर धूर पूरोहै अबीर चहूँ केशरकी कीच वीच
महल मचाई है।चलत अपार चारु कुंकुमा प्रसूनगुच्छ रसिकविहारी
गान धुनि सरसाईहै ॥ अवधकिशोर अरु जनककिशोरी गोरी खेलें
आज होरी औज होरी अधिकाई है ॥५४॥
दोहा-इमि खेलत होरी दुहुँ, आय भये इकठौर ॥
जनकनंदिनी राजसुत, रसिकनके शिरमौर ॥५५॥
ताछिन पिय कर गहि सिया, वोली मृदु मुसक्याय ॥
कितते विचरत रंग भरे, आये हो इहि ठाय ॥५६॥

रामरसायन।
(५५१)
सवैया कवित्त ।
फौज लिये फगुवारनकी सब सौंज सजे निज मौजमें सूवे ॥
लाल गुलाल ते लाल भये छवि छाक छके हग हैं मद ऊबे।।
हौ रसिकेश उमंग भरे रसरंगमें अंग सुरंगमें डूबे ॥
सांचि कहौ किहिके घर जाय लला वनिआये हो आज अजूबे९७॥
दोहा-सुनि हँसिकै बोले तबै, रघुवर प्रेम प्रवीन ।।
इन दिन मिथिलावासिनी, भई सबै रसलान ॥५८॥
तिनके सदन सखान युत, कियो जाय रसपान ॥
अंब इत आये तव सखी, सव करिहैं सनमान।। ५९ ॥ .
इमि वतरातहि औचकै, चंद्रकला अलि आय ॥
अंजन रेख,कपोल करि, बेंदी दई लगाय ॥ ६॥
सोल-ताछिन लपण प्रवीन, गहि बोरी तिहि रंगमें ।
भरत धाय धरि लीन, हेमा मुख रोरी मली।। ६१॥
दुरत विचित्रा नारि, आई कर कजल लिये ।।
रिपुहन ताहि निहारि, गहि सोई तिहि मुख मलो ॥ ६२॥
ताछिन ताहि निहारि, पहिचानी रघुवीर ध्रुव ।।
यह सु विचित्रा नारि, सिद्धाकी प्यारी सखी ।। ६३ ।।
अति उताल रघुलाल, मारी मूठ गुलाल तिहि ॥
सो प्रवीन वरवाल, भजी श्याम मुख चूमिकै ।। ६४ ॥
ताछिन अलिगण धाय, गहि लीने बहु सखनको ।
नारी वेप बनाय, पाय पराये सीयके ॥६५॥
लपण शत्रुहन धाय, गहि लाये सखियानको ॥
वर नर रूप सजाय, राम पाँय डारी मदित ॥६६॥ .
सो लखि सिय उमंगाय, गगुलाल अरु कुंकुमा ।
सहित मुखी समुदाय, पिय तन ताकि वामन लगी ६७]
अनुज मखन युत श्याम. होरी होरी शोर कार ॥
रंग गुलाल आभिगम, चहुँ दिशिते लाई झगे ॥ ३८॥

(६५२) रामरसायन । -- दोपई छंद । लपण विचित्रा अंग शत्रुहन चंद्रकला पर मेलें ॥ भरत चारुशीला मिलि रघुवर जनकनंदिनी खेलें ॥ सखा सखी अरु अपर अनेकन भरि भरि हृदय उमंगा॥ गेंद प्रसून गुलाल कुंकुमा घालत वरसत रंगा ।। ६९ ॥ वजत मृदंग झांझ डफ दुहुँ दिशि होत मनोहर गाना ।। अतर मलत सुख पान देत हठि अति अनंद उमगाना ॥ राजकुंवर मिथिलेशनंदिनी दोऊ सुघर खिलारी॥ खेलत दुहूँ परस्पर होरी भरे सनेह सुखारी ॥ ७० ॥ घनाक्षरी कवित्त । श्यामा श्याम सुघर खिलारी हुसियारी करि रसिकविहारी धाय धाय दोऊ रेले हैं।।केशरके रंगमें सुअंग सराबोर भीजे ताकि ताकि कुंकमाकपोलन पै मेलैं हैं। लाल मुख लाल सोहैं सहित गुलाल तापै अलमैं अबीर भरी झूमैं छवि झेलें हैं। पीत जरतारी अँगा पहिरे भुजंग छोना मानो बाल भानु संग धाय धाय खेलें हैं ॥ ७१॥ दोबई छंद। ताछिन धाय अली कमलादिक औचकही द्रुत जाई ॥ चारहु राजकिशोरन गहिकै निज सु गोल मधि लाई ॥ नैन जि वेदी लिलारदै फूल माल गल डारी॥ आय खरे कीने सिय सन्मुख हँसी सकल दैतारी ।। ७२ ॥ लखि मुसकाय कही सिय प्यारे अब कह सखा तिहारे ॥ मन भावै सो रचिय रूप चहुँ बोलि देहु किन हारे ॥ तब रधुचंद मंद हँसि भापी प्रिया सदा हम हारे । हैं अबला सबला सहाय जिहि मनसिज धनु शरधारे ।। ७३ ।। सुनि सिय नैन नवाय विहँसिकै पिय दुहुँ कर गहि लीने ॥ कही लाल मिलि अनुज सखन इत आय फैल बहु कीने ॥ फगुवा देहु छैल तव छूटी.नत ये मिथिला नारी ।। साजि तिया शृंगार नचे हैं चहूँवंधु धनुधारी ॥७४॥ .

रामरसायन। कही तबै रघुचंद मंद हँसि वर फगुवा हम देहीं ।। अनुज सखा ये जिते तिते सब सखी एक इक लेहीं । हमैं लेहु प्यारी तुम याते कह उत्तम सो दोजे ।। पुनि बहु सखा सखिनको भूपण बसन विभूपित कीजे ॥ ७९ ॥ दोहा-सुनि सिय पिय वाणी विहसि, बोली हम लखि लीन । सखा अनुज संयुत लला, ही सब कला प्रवीन ॥७६ ॥ यौं कहि सिंहासन विशद, बैठारे रघुचंद ॥ श्याम वाम दिशि लाडिली, शोभित परमानंद ॥ ७७॥ अशन पान मादक विविध, अतर तमोल सुमाल || वसन विभूपण विशद बहु, सकल रसाल विशाल ॥ ७८ ॥ यथायोग सादर सकल, देत लेत युत मोद ।। भरे परस्पर प्रेम सब, छाके फाग विनोद ।। ७९ ।। पुनि तहँ ते निज निज भवन, गवन कियो सब कोय ।। इहि विधि फाग अनंद अति, अवधनगरमें होय ॥ ८० ॥ बहुरि परस्पर करत सब, निज निज भवन उछाह ।। अनुज सखा सेवक सखी, सहित सनेह उमाह ।। ८१॥ सर सरिता गृह वाग वन, विहरत निज निज टोल ॥ भोग राज कौतुक करें, ठाने विविध कलोल ।। ८२॥ इहि विधि फाग अनंद अति, होय अवध पुर माहि ॥ जो सुख लखि सुरपालटू, निजसुख तुच्छ गिनाहि ॥ ८॥ परमानंद समाज युत, कौशलनगर मझार ॥ इहि विधि सीताराम नित, करें अनेक विहार ॥ ८ ॥ इति श्रीरा०र०वि०वि० फागविहार वर्णनो नाम पंचमो विभागः ॥ ५॥ - हन्गिीतिका छंद। इहि भांति श्रीरघुवीर सिय युत करत नित लीला नई ।। अवलोकि पुर परिजन यथोचित रहत मब आनंद मई॥

रामरसायन।
वर बंधु सेवक सखन संयुत मुदित शहर निवासके ।
वर विशद विधि मय सकल तीरथ किये सहित हुलासके ॥ १॥
दशसहस वर्प सहर्प बीते विविध विपुल विहारमें ।।
छाके रहैं नर नारि निशि दिन सब अनंद अपारमें ।
रघुवीर निश्चल राज काज सुरीति संयुत बहु करें ।।
नित नगर चरचा चरनते सुनि सुनि सुयशनिज सुख भैरै ॥२॥
इक समय सियके सदन रघुवर मध्य दिन मधि जायकै ॥
बैठे वरासन प्रियहि लखि भापी हृदय हुलसायकै ॥
हे मैथिली कछु दिन व्यतीते सुभग संतति पाय हौ ।
सुत गोदलै करि प्यार छिन छिन निरखि मुख सुख छाय हौ।॥३॥
प्रश्न । रामाश्वमेधे । अध्याय ॥ ५५ ॥ श्लोक० ।
रामो राज्यमयोध्यायां भ्रातृभिः सहितोऽकरोत् ॥
धर्मेण पालयन्सर्व क्षितिखंडं स्वया स्त्रिया ॥१॥
सती दधार तदीजं मासाः पंचाभवंस्तदा ।।
अत्यंत शुशुभे देवी त्रयीव पुरुषं धरा ॥२॥
हरिगीतिका छंद ।
सुनि सीय हिय सकुचाय शीश नवाय कछु मुसकायकै ॥
करि वदन अंचल ओट निरखें पीय मुख हुलसायकै।।
रचंद पुनि सानंद बूझी काह तव रुचि भामिनी॥
अभिलाप उर जो होय सो सब पूजही गज गामिनी ॥४॥
सुनि जानकी आनंद भरि मृदुबैन यौं पिय ते कहे ।।
तब कृपा कंत अनंत सब सुख विविध भाँतिन ते लहे ॥
है और कछु नहिं चाह इक अभिलाप यह उरमें रही।
बूझी दया ते नाथ जानौं सोउ अब पूजे सही ॥९॥
दोहा-सुनि बोले पुनि राजसुत, भापी प्रिया उताल ॥
जो तुव उर अभिलाप सो, सब पूजे इहि काल ॥६॥

रामरसायना दोबई छंद। तब सिय कही जोरि कर प्यारे यह रुचि मो मन माहीं। बहु मुनि नारि तपोवन वासिनि सुरसरि तीर रहाहीं॥ तिनके दरश करौं इक वासरप्रमुदित तितहि रहाऊँ ।। अशन वसन भूपण दै पूजौं पुनि प्रभु ढिग द्रुत आऊँ ॥७॥ सुनि सानंद कही रघुनंदन प्रिया पात द्रुत जावो ॥ सकल साज संयुत तिन पूजी प्रमुदित दरंश करावो । इमि रजाय दै प्रीति रीति युत तहँ ते राम सिधारे ।। राजे आय मध्य कच्छा बिच चरवर विविध जुहारे ॥ ८॥ उत लिय साज सजन लागी बहु उर अनंद उमंगाई ।। सखिन कहैं चलि सुनिनारिनके दरश लहैं सुख छाई ।। इत रघुवर ढिग विजय मत्त मधु भद्र आदि वर चारा ॥ वर्णत नगर कथा सानंदित हास विलास अपारा ॥९॥ तव कौशलपति सकल चरन बूझी सहज विलासी॥ हमाह सियहि बंधुहि पितु मातहि काह कहैं पुरखासी ॥ भद्र दूत भापी तव प्रणमित प्रभु सव सुयश अपारा ।। वर्णत सकल नारि नर प्रमुदित चहुँ दिशि नगर मँझारा ॥ १०॥ दोहा-सुनि बोले क्षितिपाल तब, यह जगरीति न आय ।। सब सवही शुभही कहै, कोउ न अशुभ कहाय ॥११॥ सो मम शपथ निशंक जिय, भाषो सत्य जु होय ॥ यही काज हित नियतहाँ, सदा सुचर सब कोय ।।१२।। ची-तव करजोरिभद्रचर भापो हो प्रभुते कछु गुप्त न राखो। इक यह वर सेवक गति होई के स्वामिनिंद सुनि कहै न कोई१३ पै मुहि अव निज शपथदिवाई याते भापी कौशलराई ।। सो अपराध क्षमा प्रभुकीजे कुमति वचन पर चित्तन दीजे१४ वसै रजक इक नगरमँझारी भो विपाद रूठी तिहि नारी।। सो सब दिन कहुँ अनत रहाई कसंध्या समय गेह मधिआई१५॥ रजक ताहि ताडन कार भापी हो नहिं राम लेउँ तुहि राखी । - (६५६) रामरसायन । पै ते वर भूप रुचै सो करही है हमती दुहुँ लोकते डरहीं॥१६॥ यौं सकोप है ताहि निकारी दीनी त्यागिरजक निज नारी ॥ इमि पुनि अपर कुमति जन वृंदा # करत परस्पर कछु प्रभु निंदा१७ कहत लोग सिय लंक मझारी रही ताहि पुनि रघुवर धारी ॥ भूपतिही जो ठान अनीती तो किमि करै प्रजा शुभरीती१८ दोहा-दूत वचन सुनि राम उर, भयो महादुख शोक ॥ गुणत मीय वर धर्म घर, दोप देत तिहि लोक ॥ १९ ॥ कछु हो वै शुभ अशुभ, लोक देश कुलरीति ॥ निपट त्यागि वो ताहुको, नीति प्रमाण अनीति ॥ २० ॥ कर्म शुभाशुभ कैसहू, जाते निंदा होय ।। सुजन प्रतिष्टित काज सो, भूलि करे नहिं कोय ॥२१॥ इमि विचारि हिय विविध विधि, लिय उसाँस रघुराय ॥ वेगि बुलाये अनुज तिहुँ, सेवक सुमति पठाय ॥२२॥ तिहि औसर शचनहरहे अवधपुर माय ॥ आये तीनहु बंधु द्रुत, राज रजायसु पाय ॥२३॥ चौ-तब सब दूत गये सिख पाई * रहे इकंत चारहू भाई ॥ बंधुन प्रति प्रभु कीन उचारन पुरचरचा निज हिय दुख कारन२४ तब तिहुँ अमित भाँति समुझाये पैरघुवर हिय तोप न लाये ॥ लै उसॉस अनुजन प्रति भापी आवो सियहि गंगतट राखी॥२५॥ सुनत वचन मे बंधु विहाला तब बहु शोक सहित रघुलाला ॥ कही अनुज तिहुँ धर्म धुरीनासो मम आयसु चित्त न दीना२६॥ सुनिलछमन बोले शिरनाई प्रात करौं जिमि होय रजाई ॥ तब नृपाल सब बंधुहि भापीमुनितिय दरशन रुचि सियराखी२७ ताही मिस सीतहि लै जावो का तहां राखि पुनि वेगहि आवो ॥ इमि कहि सबहि बिदा कियरामा की गये मौन तिहुँ दुखित सुधामा२८ प्रात होत लछमन रथलाई तामधि जनकसुताहि चढाई ॥ सूत सुमंत लपण सियसंगा गवने मुनि आश्रम तट गंगा।।२९॥ ,

रामरसायन ।
O
पूजन दान साज बहु भांती के लिये संग सिय हिय हुलसाती ।।
मुनितिय गण दरशन कर आऊनिज उरकीअभिलाप पुजाऊं३
वाल्मीकि आथम मधिजाई लपण सियहि भापी शिरनाई॥
दीनी नाथ रजायसु येही कछु दिन रहैं तहां वैदेही ।। ३१ ॥
पतिआज्ञा सुनि हिय अकुलानी पुनि तिय धर्म रीति अनुमानी।
वाल्मीकि आश्रम मध सीता सवहि पूजि वर वसी पुनीता॥३२॥
लपण सुमंत राम ढिग आई ॐ कही सकल सिय गति शिरनाई ।।
यह चरचासुनि पुर नर नारी भये सकल बहु हीय दुखारी ॥३३॥
अति वह रजकहीय पछताता कहत कढी कह मो मुख बाता ।।
तब तिहि पूर्वजन्म सुधि आई के जानी यह भवितव्य रहाई ॥३४॥
हम शुक रहे जनकपुर माही ॐ तिय युत तजे प्राण सिय पाहीं॥
ताते जन्म अवधमें पायो सो बदलो सीतासे आयो ॥३५॥
दोहा-अपर नारि नर अमित विधि, करत परस्पर बात ॥
सुमति कुमति बहु शुभ अशुभ, जो कछु जिहि उपजात ३६
प्र० स० ॥२०५॥श्लोक।
तत्र नीचजनाच्छुत्वा सीतायाअपमानताम् ॥
स्वां च निंदां रजकतस्तां तत्याज रघदहः ॥३॥
दोहा-उत मुनि आश्रम जानकिहि, वीते चार सु मास ।।
तव प्रगटे द्वै सुत विशद, पितु सम जासु प्रकाश ।। ३७ ।।
वाल्मीक मुनि दुहुँनकी, दृढ रक्षा वर कीन ।।
भयेसंग याते तिनै, को बड छोट न चीन ।।३८॥
चो०-तब मुनि नाथ समेत विचारा पूरव पर उतपति निरधारा ॥
जेठे सुतहि नाम कुश राखा पुनि कनिष्ट पुत्रहि लब भापा३९॥
सीता लखि दुहुँसुत अभिरामा पायो अति अनंद विश्रामा ।।
रहें निकट सखि मुनि जन नारी सेवें सियहि प्राणत प्यारी॥
इहिं निधि बडे भये दुहुँ भाई मुनिवर विद्या सकल पढ़ाई।।
अस्त्रशस्त्र मधि परम प्रवीना गीत वाद्य संगीत धुरीना॥23॥
विरचित वाल्मीकि मुनिनाधारः राम चरित पटकांड मु गाथा ॥
सो लव कुश सुरताल प्रमाना कंठ मनोहर कर सु गाना ॥ १२॥

रामरसायन । दोहा-सियातिय मुनि सुत अरु मुनिन, निकट सदा तिहि जान॥ इन विहाय कुश लव दुहूँ, नहिं काहू पहिचान ॥४३॥ चौ०-वाल्मीकि ऋपि गुरू हमारे * हैं क्षत्रिय दुहुँ बंधु करारे ॥ यौं गुनि मुनि सेवा दुहुँ करहीं कानन धनु शर धारि विचरहीं। राम पुत्र दुहुँ तेज निधाना * छवि गुण बल वपु पिता समाना।। तिनयुतरहातसियामुनिआश्रम करति सदापतिनामभजनश्रम ४५ इत रघुवीर अवधपुर माहीं राज काज सव सविधि कराहीं ॥ पै दिन नि प्रिया को ध्याना* राखत हृदय सहित वर ज्ञाना४६ वहुरि भये दैवै सुत नीके 8 भरत लपण रिपुसदनजीके ॥ सबही निज निज पितु अनुहारी* सुंदर बली गुणी शुभकारी४७॥ तक्ष और पुष्कल शुभनामा * ये दै भरत पुत्र अभिरामा ॥ अंगद चित्रकेतु दुहुँ वीरा ॐ हैं लछमनके सुवन सुधीरा॥४८॥ इक सुबाहु अरु शत्रुधाति वर * ये शत्रुघ्न पुत्र दुहुँ धनुधर ॥ चहूँ राजसुत सब गुणराशी रूपतेज बल धर्म प्रकाशी॥४९॥ प्रमुदित रहत सदा सब कोई * समय समयं वर कारज होई ।। लोक वेद कुलरीति प्रमाना 8 उत्सव करत सकलविधि नाना५० दोहा-तिहूँ लोक नर नारि अरु, अपर चराचर जोय ॥ श्रीरघुवरके राजमें, सुखी रहैं सबकोय ॥५१॥ इति श्रीरा०र० वि० वि० कुशलवादिजन्मवर्णनो नाम पष्ठोविभागः॥६॥ सो०-इमि रघुवर मतिधीर, करत राज वर नीति मय ॥ भरत लपण दुहुँ वीर, सेवत युत सेवक सखा ॥१॥ चौ०-एक समय रघुवंर करजोरी बोले गुरुहि सप्रीति निहोरी।। प्रभु बहु वार सकल मख कोने यथाशक्ति दानहु कछु दीने ॥२॥ पे कृपालु यह रुचिहै मोरी अश्वमेध मखहोय बहोरी ॥ सुनि वसिष्ट आदिक ऋपिराई भये प्रसन्न परम सुखपाई ॥३॥ बोले राज विलंब न कीज साजसजनहित आयसु दीजै ॥

गमरसायन। सुनि मंत्री सेवकन बुलाई है यथा योग सब दई रजाई । पुनि दशहूँ दिशि दूत पठाये यज्ञ निमंत्रन सवाहि दिवाये । कपिपति जाम्बवंत लंकेशा * आये सदल साजि वर वेशा॥५॥ अपर भूप सुर नर मुनि नागा जिनके हिय रघुवर अनुरागा ॥ ते सब सदल यज्ञ हित आये * राम सकल सतकार कराये॥६॥ कोऊ नृपति वीर अभिमानी कियो विलंब युक्ति कछु ठानी। कोऊ हय सँग गमन विचारार्थ ते गृह रहे साज सजि सारा७॥ इहि विधि भई अवध अतिभीरा जुरे भूरि जन सुमति सुधीरा ।। कोऊ अतिहि उताल सिधाये * कोऊ कछु विलंब ते आये ॥८॥ दोहा-कोऊ द्विज मुनि संतवर, कीनो हृदय विचार ॥ यज्ञ अंतलग जुरहिं जन, है है मोद अपार ॥९॥ याते जुरै समाज बहु, तब चलिये हुलसाय ॥ काहू कियो विलंब इमि, अरु छाये सब आय ॥१०॥ भूप प्रजा ज्ञानी गुनी, सब संयुत परिवार ।। साज समाज समेत बहु, आये यज्ञ मझार ।। ११ ।। सुथल नैमिपारण्य मधि, भयो सकल मखकाज ॥ अशन वसन धन धाम वर, अपर उचित बहुसाज ॥१२॥ कंचनमय तिय सविधि सुठि, रची सीय अनुहारि।। विधि विशुकर्माहूं चकित, जाकी बनक निहारि ॥ १३ ॥ सकल अनूपम साज सजि, सविधि प्रथम श्रीराम ।। बन्धु सखा मेवक अमित, पटै दये मखठाम ॥१४॥ तिन तहँ साजो साज सब, तिहि पाछे रनिवास ॥ अपर अमित जन यज्ञ थल, गवने सहित हुलास ॥ १५ ॥ चौ.पुनि शुभ समय मध्यरघुराजा नैमिप गये समेत समाजा।। लखिथल साज सकल हुलसाये राम यथोचित काज दिढाये १६॥ कीश ऋच्छ नर निश्वर नाना. करें काजजिमि जाहि घरखाना। अरु कपि भालु निचर नारी लागी उचित कृत्यमहँ सारी१७॥ यथायोग सवही रनिवासा सखा सखी दासी अरुदासा ।। पुर परिजन पाहुन नर नारी कर काज निज निज अनुहारी १८||

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दोहा-सव प्रबंध वर हेरि के, ह प्रमुदित रघुनाथ ॥
कियो अरंभ सु यज्ञको, विशद विप्र मुनि साथ ।। १९ ॥
श्यामकरण तनु गोरवर, पुच्छ पीत मुख लाल।।
तरुण सुलक्षण सर्व गति, वली तुरंग विशाल ॥२०॥
प्र. रा० अ०९ शोक।
गंगाजलसमानेन वर्णेन वपुपा शुभः ॥
कर्णे श्यामो मुखे रक्तः पीतः पुच्छे सुलक्षितः॥१॥
मनोवेगः सर्वगतिरुच्चैःश्रवस्समप्रभः॥
वाजिमेधे हयः प्रोक्तो शुभलक्षणलक्षितः ॥२॥
दोहा-हेम पट्टिका राम यश, लिखित बँधी तिहि माथ ॥
साजि सविधिवाजी तजो, सदल शत्रुहन साथ ॥२१॥
सदल वाजि तजि अवधपति, वैसनेम विधि उक्त ॥
निकट शृंग मृग हेम सिय, मखकर मुनि द्विज युक्त ॥२२॥
प्रतिदिन आवत विपुल जन, होत सकल सत्कार ॥
दान मान तिहि समयको, को कहि पावै पार ॥२३॥
उतरामानुज शत्रुहन, संग तुरंग प्रधान ॥
चले परम आनंद कहि, जैति राम बलवान ॥२४॥
दोवई छंद।'
भरत पुत्र पुष्कल सिय भ्राता लक्ष्मीनिधि बलवाना ॥
नील रत्न रिपुताप उग्रहय प्रतापाय नृप नाना॥
जाम्बवंत सुग्रीव सु हनुमत आदि ऋच्छ कपि वीरा ॥
सकल भूप युत सैन राम दल रिपुहन संग सुधीरा ॥ २५ ॥
संचिव सुमति वर सखा सु सेवक सदल विभीषण भूपा॥
इहि विधि अमित सैन तिहि पाछे अग्र तुरंग अनूपा ॥
जहाँ जहाँ निज रुचिते वाजी गवनत तहँ सब जावै ॥
नृपति अनेक आय रिपुशालहि शिर नमि संग सिधावै ॥२६॥

रामरसायन। (५६१) सुंदरपुरी नाम अहिछत्रा तहाँ सुमद नरनाथा ॥ आवतही सो राज्य समर्पण कियो नाय पद माथा ।। रिपुहन तासु पुत्र कहँ नृप करि सदल भूप लिय संगा ।। परमानंद चले पुनि तितहीं गमनो जितै तुरंगा ॥ २७ ॥ चौ०-यौं विचरत मख वाजि अनूपम आयो च्यवन मुनीके आश्रम।। रांम बंधु नमि अपिहि सप्रीती गवने पुनि सुनि कथा सुनीती२८ विचरत संग सैन चतुरंगा गयो नीलगिरि निकट तुरंगा ।। जहँ . चक्रांकापुरी अनूपा 8 तहाँ सुबाहु नाम वर भूपा २९|| तासु कुमार दमन जिहि नामा समर धीर वर गुणवल धामा ।। सो नृपसुत मृगयाहित आयो है मख तुरंग वन तिहि दरशायो ३० दोहा-नख शिख साज अमोल वर, साजो वाजि विशाल॥ यह रघुवर यश खचित सो, पत्र लसै तिहि भाल ॥३१॥ घनाक्षरी कवित्त । श्रीयुत सकल धर्मधारी चक्रवर्ती ख्यात क्षत्री भानुवंशी दशरथ अवधेशके । परम पवित्र पुत्र राजा रामचंद्र वीर ठानो अश्वमेध जो दलैया निश्चरेशके ॥ तिनको तुरंग याहि कोऊ हो वली सो गहै जीते शवशाल ताहि सदल मदेशके । नतरु नवाय माथ हाथ जोरि आव साथ रमिकविहारी है अधीन कौशलेशके ।। ३२॥ चौ०-इमि लिपिदेखि दमन करिक्रोधा। कहीरामविनऔर न योधा। यो हठि गयो धामले वाजीक चतुरंगिनी अनी द्रुत साजी२३।। लै दल दमन युद्ध हित आयो ? प्रतापाय लखि कटक चलायो!! भिरे दुहुँ दिशि वीर जुझारा भयो समर तिहि समय अपारा३४ प्रतापान नृप इत रणधीरा भूपति पुत्र दमन उत वीरा ॥ अस्त्र शस्त्र दुहुँ दुहुँन प्रहारे मुरैन कोउ दोउभट भारे ।।३।। तव नृपसुत वर घाण प्रहारा विधो सु भूपति हृदय मझारा॥ प्रतापाय अति भये विहाला तिन स्थलगो मूत उताला ३६॥ सुनि रण हाल शवहन धीरा पठ्यो भरत पुत्र वरवीरा ॥ पुष्कल सदल आय ततकाला दमन संग किय युद्ध कराला३७ (५६२) रामरसायन । भरत पुत्र शर अग्नि प्रहारा $ होन लगो तिहि दल जरिछारा ।। वरुण वाण तब दमन चलावा अनल वुझी बहुजल चहुँ छावा३८ शर वायव्य सु पुष्कल छोरा छाई पवन भजे घनघोरा ।। पर्वत अस्त्र. तजो सो उद्धा भो गिरि कोट वायु वलरुद्धा३९॥ भरत पुत्र तव हनो वज्र शर* गिरे कुधर हे चूर धणिपर ।। पुनि दमनहि इक वर इY शाला भयोराजसुत लगत विहालाट. दोहा-दमनहि निरखि विहाल अति, वर सारथी प्रवीन ॥ तिहि युत रथ लै नगरगो, नृपहि विदित सव कीन ॥११॥ सुनि सुबाहु निज सुत व्यथा, दुखित सकोप उताल ॥ साजि सैन चतुरंग लै, चलो महीप विशाल ॥४२॥ चौ०-नृपसुत इक चित्रांग ललामा दूजो है विचित्र जिहि नामा ॥ दोऊ दमन अनुज ये वीरा * भूपति बन्धु सुकेतु सुधीरा४३॥ ये तिहुँ अपर अनेकन योधा * लै गंमनो नृप सुभुज सक्रोधा। ताछिन दमनहु भयो सचेता * चलो सोउ वर सैन समेता४४॥ आय भिरे भट सकलं जुझारा दुहुँ दल एकहि एक प्रचारा ।। उत सुबाहु जय होत पुकारा ॐ इत शत्रुघ्नति उच्चारा॥४५॥ लक्ष्मीनिधि सुकेतु दुहुँ युद्धे * पुष्कल अरु चित्रांग निरुद्धे ॥ संयुग धीर सुभुज नरनाथा * ठानोसमर शत्रुहन साथा॥४६॥ दोहा-युद्ध करें रिपुतापते, उद्धत दमन सुधीर ॥ लरत विचित्र विचित्र गति, नील रतनते वीर ॥४७॥ अपर वीर बहु वीर सँग, नर निश्चर कपि ऋच्छ । अस्त्र शस्त्र वर मल्ल युध, करत सबै रण शिच्छ॥४८॥ रुंड मुंड कर पद रुधिर, समर भूमि मधि छाय ॥ भयोजु हाहाकार चहुँ, निज पर कछु न जनाय॥४९॥ तब पुष्कल चित्रांगको, वध कीनो हनिबान॥ सुभुज़ नृपति लखि सुत मरन, शोक दुःख अकुलान ॥५०॥ ::... पुनि धरि धीर सकोप अति, धाय सुबाहु नृपाल । अति उताल शत्रुघ्न पर, घाले बाण कराल ॥५१॥.

रामरसायन। चौ० ताछिन धाय पवनसुत वीरा 8 वीचहि गहि भंजे सब तीरा। मर्दन किय स्पंदन हय सूता मिरे भूप कपि सुबल अकूता ५२। तब हनुमंत क्रोध कार ताही * चरण प्रहार कीन उर माही। गिरोभूमि भूपाल विहाला ॐ मुर्छित है अचेत ततकाला ५३ ॥ तब तिहि तजि कपि अपर निरुधे सो लखि कुछ उद्ध भट युद्ध। बहु सेवक जन धाय उताले ॐ घेरि रहे है विकल नृपाले ॥५४॥ ताछिन भयो आचरज भारी* जो न होत रणभूमि मझारी। मुर्छित परो अचेत जु भूपा ॐ तबै लखो यह स्वप्न अनूपा ॥५५ । हरिगीतिका छंद । श्रीराम शोभाधाम प्रमुदित यज्ञशाल विराजहीं। ब्रह्मांड अगणित देव ब्रह्मादिक अमित तहँ भ्राजहाँ ।। ते सकल सुर मुनि नारदादि अपार अस्तुति ठानहीं ।। गंधर्व किन्नर अप्सरा बहु सुयश कर वर गानहीं ॥५६॥ प्र०॥रा०॥ अ०२८॥शोंक। तदा तु मूर्छितो राजा स्वप्नमेकं ददर्श है ।। रण मध्ये कपिवरप्रपदाचातताडितः॥३॥ रामचंद्र स्त्वयोध्यायां सरयूतीरमंडपे । ब्राह्मणैर्याज्ञिकश्रेष्टबहुभिः परिवारितः॥४॥ तत्र ब्रह्मादयो देवास्तत्र ब्रह्मांडकोटयः॥ कृतप्रांजलयस्तत्र स्तुति स्तुतिभिर्मुहुः ॥ ५ ॥ हरिगीतिका संद। यह लखत स्वप्न सुबाहु नृपहीं चेत भो मुग्छा गई। उर ज्ञान आयो तबाह श्रीरघुवीर प्रभुता हिय छई। उठिवेगि बरजे युद्धते सुत बंधु मेवक घायके ।। पुनि मकल युत शत्रुनके पद शीश नायो आयकं ॥ ५७॥ मो०-कीनी विनय अनंत, नृप सुबाहु कर जोरिक । राम अनुज मतित, तर भूपदि ग्लाय लिय ।।५८॥ रामबंधु बलवान, किय मन्मान बग्वान यहु ।।

(५६४)
रामरसायन।
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नृप गुण ज्ञान निधान, राज समो प्रभुहि निज ।। ५९ ।।
तब रिपुदमन उदार, दमनहिं करि अभिषेक पुनि ।।
संयुत सैन अपार, चले संग लै नृप हरिहि ॥ ६ ॥
इति श्रीरा० २० वि० वि० अश्वमेधयज्ञारंभ सुबाहु
युद्धवर्णनो नाम सप्तमोविभागः ॥ ७ ॥
दोहा-इहिविधि श्रीरघुवीरको, मख तुरंग चहुँ ओर ॥
निज इच्छित गमनत मुदित, संग सैन वरजोर ॥ १॥
दोवई छंद।
विचरत वाजी गयो तेजपुर तह वर भक्त भुवाला ॥
सत्यवान जिहि नाम हरपि सो आयो अतिहि उताला ॥
शीशनाय निज राज समर्पो तब रिपुदमन प्रवीना ॥
तासु पुत्र रुक्महिं अभिषेको चले नृपहि सँग लीना ॥२॥
तहते कछुक दूर गमने तब औचक भो अँधियारा ॥
धूरि पूरि नभ विज्जु चमंकी द्वै धन गर्ज अपारा ॥
वरपिरुधिर कच अस्थि उपल मल तम करि खल दल धायो ।
दशमुख मित्र सु विद्युन्माली नाम निशाचर आयो॥३॥
भयो विकल दल कछु नहिं सूझै ताछिन सो निशिचारी ॥
अंतरिक्ष कै हरि हरि लैगो दुष्ट सु मायाकारी ॥
पुनि ताही छिन मिटो सबै तम दशहू दिशि उजियारा ॥
यातुधान नभ मंडल छाये गहिं विकट अपारा ॥४॥
सो विलोकि सब दल अकुलायो तब शत्रुहन वीरा ॥
भापी अवहिं निश्चरन नाशै हौ भट सकल सुधीरा ॥
सुनि पुष्कल लक्ष्मीनिधि हनुमत आदि अमित बलवाना ।।
रामबंधु युत भये सुउद्धत समर हेत प्रण ठाना ॥५॥
समरधीर वर वीर दुहुँ दल भिरे क्रोध करि भारी ॥
पुष्कल संग सु विद्युन्माली ठनो युद्ध बलकारी ॥
तासु भात जो उपदंत सो ले धनु खड्गविशाला॥
मिथिलापति लक्ष्मीनिधि साथै संयुग कियो कराला ॥६॥

रामरसायन। अपर वीर बहु दुहुँ दिशि युद्धत उद्धत है करि शोरा ॥ हटत न यातुधान तब धायो कपि केशरी किशोरा ।। तरु गिरि उपल दंत नख मुष्टन चरण चपेटन मारे॥ आय जाय महि व्योम छिनहि छिन निश्वर निकर सँहारे ॥७॥ यातुधान है विकल थकित तब निज माया विस्तारी॥ मृतक पपाण रुधिर मल वरपो भयो चहूँ तम भारी ॥ भभरि भगे नर भालु कीश भट लखि रामानुज वीरा ॥ छिनमहँ दूर कियो सो खल छल मोहनास्त्र हनि तीरा ॥ ८॥ सो विलोकि निश्चर पुनि गनो अस्त्र शस्त्र वर युद्धा ॥ व्याकुल भये सदल रामानुज तव छायो बहु कुद्धा ॥ राम सुमिरि नाराच प्रहारे लगत दुहूँ बलवाना ॥ उपदंत अरु विद्युन्माली गिरे भूमि गत पाना ।। ९॥ तव अनाथ व विकल भीतिवश लै तुरंग द्रुत धाई ॥ यातुधान सब रामबंधुके परे चरण मधि आई ।। भये मुदित सव विजय वाजि लहि कियो सु जैजैकारा॥ तह ते चलि पुनि विचरन लागो मख हय दल युत सारा॥१०॥ इति श्रीरा० २० वि० वि० विद्युन्मालीयुद्ध वर्णनो नाम अष्टमोविभागः ॥ ८॥ चौ०-इमि विचरत बाजी वर वीराः पहुँचो रेखा सरित सु तीरा ।। तहँ आरण्यक मुनि वर ज्ञाता तिनहि मिले सादर प्रभु भ्राता तहते गमन कियो जन सारे तब हय सेवक आय पुकारे ।। सरिता तट तडाग वर भारी तामहँ पान करत हो वारी ॥२॥ जल पीवतही तुरंग न जाना भयो मध्य मर अंतरध्याना॥ सो गति सुनि रिपुहन अकुलाये सुमति मकल मिलि मंत्र ढाये३ तब रिपुहन पुष्कल हनुमंता सर प्रविशे जल मध्य तुरंता ॥ लखो गंभीर नौरतल धामा मणि कंचनमय पम्म ललामा शा तामहँ इक तिय तेज विशाला शोभित युत अनेक वर वाला ॥ तहांसु वाजि निबंधित देखा यदि भयो आज विशेखा

रिपुहन आदि सकलधरि धीग १ नायो शीश जाय
सो बूझी गति तब हनुमंता बरणी सत्य समस्त तु
सुनि योगिनी कही हम काही जीत कोर मुरासुर
पै तुरंग मम प्रभुकर याते किमि ही गहों जाहु ले
यौं कहि पुनि योगिनी प्रवीना एक अन रिपुदमनहि
भापी लरै वीरमणि राजा तहँ ऐह तुमरे यह काज
सुनि सवही आनंद अचाई 8 ले तुरंग गवन
सरजलते कढि दल मधि आये चले मुदित शोर मच
विचरत मख वाजी अभिरामा * आये नगर देवपुर -
तहँ गिरिवन सरि सुभग पुनीता। लखि तृण जल गोअक्षः
दोहा-नृपति देवपुरमें प्रवल, नाम वीरमणि जासु ॥
शंकर नित रक्षा करें, प्रगट सगणके तासु ॥ ११
हैं अनन्य शिवभक्त नृप, तासु पुत्र बलधाम ।।
परमरम्य गुणवंत वर, रुक्मांगद जिहि नाम ॥ १२
सो तिय गण संयुत मुदित, वनविहार करवीर
लखि तुरंग शिर पत्र पढि, गहि लायो रणधीर ॥
पितहि बखानो हाल सब, सुनि शिवसहित नृपाल
कही कियो अनुचित. महा, है है युद्ध कराल ।
पुनि पुरारि भापी नृपहि, लाभ महारण माहि ।।
हम तुम दोउनको इहाँ, रघुवर दरश मिलाहि ॥
प्र०रा० अ० ३९॥ श्लोक।
परमत्र महालाभो भविष्यति रणांगणे ॥
यद्रामचरणांभोजंद्रक्ष्यामः स्वीयसेवितम् ॥ १
दोहा-सुनि नृप उठि तिहि वाजिके, निज कर चरण अः
किय निबंध दै अशन जल, वर हय शाल विशाल
सचिव सैन पति बोलि पुनि, कही वीरमाण वार ।
सजौ सैनहौं देखिहौं, किमि रिपुहन रणधीर ।। १८
-
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रामरसायन।
(९६७)
तिहुँ पुरके सुर असुर जो, युद्ध करें मम साथ ॥
तौ नहिं पावें वाजि अब, बिन आये रघुनाथ ॥ १८॥
नृप रजाय सुनि वेगही, सजी सैन बलपूर ।।
जै महेश कहि वीरमाण, चलो संग भट भूर ॥ १९॥
नृपसुत रुक्मांगद प्रथम, द्वितिय शुभांगद नाम ॥
वीरसिंह भूपति अनुज, अपर आमित बलधाम ॥२०॥
इमि सुत बंधु अनीक युत, गमन कियो भूपाल ।
इत रिपुसूदन सजग द्वै, विरचो व्यूह विशाल ॥२१॥
चौ ताछिन आय भूप कटकाई कहि जै जति बाण झरिलाई ।।
कीश ऋच्छ निश्वर नर धाये इतते गिरितरु शस्त्र चलाये २२॥
भिरे सुभट दुहँ कटक विरुद्ध * उद्ध प्रबुद्ध सु युद्ध निरुद्ध ।।
अस्त्र शस्त्र बहु करत प्रहारा * लरत मरत भोहाहाकारा २३ ॥
ताछिन भूप कटक विचलाना * सो लखि रुक्मांगद धनुताना॥
धाय मिरो पुष्कलसे योधा * दोऊ हनत दुहूँ भरिक्रोधा २४॥
तब पुष्कल तिहि अस्त्र प्रहारा भ्रमो सरथ नभ मंडल सारा॥
भानु निकट जातहि हय स्पंदनः दिग्ध भयो व्याकुल नृपनंदन२५॥
तासु हस्त इक भो जरिछारा गिरो विकल वै धरणि मझारा।
रुक्मांगदहि विहाल निहारी भगेभीति भरिबहु भटभारी२६॥
लखिसुत गतिकारक्रोध कराला धायो गहि धनु वाण भुवाला।
मारि सायकन दल विचलावा निरखि हनूमत कोषबढावा२७॥
दोहा-धाय वीर कपि भिरि कियो, वीरसिंहते युद्ध ।।
पुष्कल अरु नृपवीर मणि, भये समर अवरुद्ध ।। २८॥
पुष्कल रथ हय कवच धनु, दियो वीरमणि कोटि ।।
भये विकल पुनि सजग है, हने वाण तिहि डाटि॥२९॥
भरत पुत्र शरघातते, गिरो भूमि भूपाल ।
नृपगति लखि दल विचलभो, भगे सुवीर विदाल ॥३०॥
वीरसिंह तब कोष भरि किय हनुमनाहि विहाल ।।
शालि मुष्टिका भूमि तिहि डागे अंजनिलाल ॥३०॥

रामरसायन।
चौ०-ताछिन कोपि शुभांगद वीरा कीनी.सैन विकल हनि तीरा।।
रुक्मांगदहु सजग है धायो दुहूँबंधु मिलि दल विचलायो३२॥
सो लखि हनुमानादिक वीरा * धाय कियो नृप कटक अधीरा ॥
नृपसुत वन्धु समेत अचेता * निरखि भजे सब वीर निकेता३३॥
ताछिन शंभु क्रोध उर धारा * भूत प्रेत गण संग अपारा॥
रथ अरूढ दै गहि धनु धाये लखि रिपुहन सजिबाण सिधाये३४
महादेव रिपुसूदन धीरा * पुष्कल वीरभद्र वर वीरा ॥
नंदी हनुमत संग निरुद्ध इमि बहु एक एक मिलि युद्धे३५॥
चार दिवस भो समर महाना १ पुष्कल वीरभद्र बलवाना ॥
अस्त्र शस्त्र दुहुँ दुहुँन प्रहारे एकहि इक मुच्छित करिडारे ३६॥
तब करि वीरभद्र रिसि चंडा हनि त्रिशूल पुष्कल शिरखंडा॥
भरत पुत्र वध लखि सब बीरा सहित शत्रुहन भये अधीरा ३७॥
पुनि धरि धीर वीर सब धाये युद्धे महा क्रुद्ध उर छाये ॥
शंभु शहन दुहुँ बलवंता ॐ अस्त्र शस्त्र रण, कियो अनंता३८॥
दोहां-इमि एकादश दिवस लग, युद्ध कियो दुहुँ वीर ॥
हनो अस्त्रशर प्रवल हर, द्वै हिय निपट अधीर ३९॥
सो पीडित शर शत्रुहन, मुर्छित धरणि मझार ॥
गिरे निरखि गति विकल दल, हाहा होत पुकार ॥४०॥
अपर शंभुगण क्रोध भरि, धाय धाय चहुँ ओर ॥
बहु मुर्छित बहु वध किये, कपि नर भट वर जोर ॥४१॥
यह गति लखि निज सैनकी, तब हनुमंत उताल ॥
पुष्कल तनुको बहुरि पुनि, किय प्रबंध रथ घाल ॥४२॥
आय शंभु सन्मुख सपदि, हनुमत कही सकोप ॥
परम संत गुणवंत है, कियो धर्म सव लोप ॥४३॥.
तब शिर भापी सत्य कपि, पै हौं भक्ति अधीन ।।
याते ही कछु कोष भरि, याछिन संयुग कीन ॥१४॥
प्र० स०॥ ०४॥शोक।
आगत्य सविध रुद्रं समरांगणमूर्धनि ।
जगाद हनुमान
सुराधिपम् ॥२॥

रामरसायन।
(५६९)
मया पुरा श्रुतं देव ऋपिभिर्वहुधोदितम् ।।
रघुनाथपदस्मारी नित्यं रुद्रः पिनाकधृक् ॥३॥
तत्सर्वं तु मृपा जातं शत्रुघ्नं प्रति युदयता ।।
पुष्कलो मे हतोः वीरः शत्रुघ्नोपि विमूर्छितः॥४॥
इत्युक्तवंतं प्लवगं प्रोवाच स महेश्वरः ।।
धन्योसि वीवर्य वं भवान्वति नो मृपा ॥९॥
मत्स्वामी रामचंद्रो वै सुरासुरनमस्कृतः॥
तदश्वमानयामास तद्रक्षार्थ मयागतम् ॥६॥
निवसामि पुर नित्यं तद्भक्त्यानुवशीकृतः ।।
यथा कथंचिद्भक्तोऽसौ रक्ष्यः स्वात्माइति स्थितः॥७॥
एवं वदति चंडीशे हनुमान्कुपितो भृशम् ।।
शिलामादाय कोपेन ताडयामास तद्रथम् ॥८॥ इत्यादि।।
चौ०-सुनि हनुमत करि कोष करालावालो गहि गिरि खंड विशाला।।
तिहि लागतहि मूत हय स्पंदन वचे शंभु तिहुँ भये निकंदन ४५
तब शंकर नंदी पर भ्राजे हनुमत बहुरि शैलहनि गाजे ॥
शंभु कपिहि वर शूल प्रहारासो गहि कीश भंजि महिडारा५६
पुनि हर कीशहि शक्ति प्रहारी तासु घात सो भयो दुखारी॥
इहिविधि शंकर अरु हनुमाना उद्ध युद्धकर दुहुँ बलवाना२७॥
जौलग कपि प्रहार कृत तरु गिरि भंजतशंभु कीशती लग भिति।
मदत शंकर दलहि करालाहरसन्मुख पुनि होत उताला ४८
करते लात शंभु ते वीरा दल पद पुच्छ दले रणधीरा ॥
इमि किय उद्ध युद्ध बहु कीशा से सगणभये विहल गौरीशाट९||
प्र०॥ रा०प०१४॥धोक।
अत्यंत विहलो जातो महेशानः प्रकोपनः ॥
सणेक्षणे प्रहारेण कुर्वत्तं विहलं भृशम् ॥ ९॥
दोदा लखि हनुमतकी बुद्धिवर, भये प्रसन्न महेश ।।
कही वीर कपि याचह, वर जो मचे सुदेश ॥ ५० ॥

रामरसायन। N तब कपि भापी और हौं, कछु न चहौं बरदान ॥ जो प्रसन्न तौ रशिये, मम दल सकल महान ॥५१॥ वायस गृद्ध शृगाल सुन, भूत प्रेत तब जोय ॥ मम दल घायल मृतक जे, तिनै भखै नहिं कोय ॥६२ ।। हौ द्रोणाचल जायकै, वेगहि भेपज लाय॥ करिहौं विरुज सजीव संब, रघुवर दल समुदाय ॥५३॥ चौ सुनि भाषी शिव जाहु उतालाकरिहौंसदल सकल प्रतिपाला। तब कपि उछलि व्योम पथ धाये की द्रोणशैल ढिगवेगहि आये५४॥ तहाँ इंद्रसेवक बलवाना * भेपज ग्रहण हेत रण ठाना॥ तिनहिं पराजय करि हनुमंता * लै औपधि पुनि आयतुरंता ५५ दोहा-पुष्कल शिर धर जोरिकै, हिय धरि जीवन मूर ।। राम ध्यान करिकै कही, सत्य प्रेम प्रण पूर॥५६॥ जौ हौं मन वच कर्म ते, ध्याऊं राम अनन्य ।। तौ ए होउ सजीव द्रुत, कर भेपज गुण धन्य ॥ ५७॥ यौं कहतहि पुष्कल उठे, द्वै सजीव धनुधारि ॥ वीरभद्र दुरिंगो कहाँ, भापत चहूँ निहारि ॥ ५८॥ पुनि रिपुहन ढिग जायकै, धरि औपधि तिन हीय ॥ सियाराम पद सुमिरि कपि, वोले वच रमणीय ॥ ५९॥ ब्रह्मचर्य व्रत सत्य मम, जो आजन्म अयंत ॥ जिय सचेत तो होयँगे, याही समय तुरंत ॥६॥ यो भापतही शवहन, उठि बैठे सर साजि ॥ इत उत हेरत कहत हैं, गये शंभु कहँ भाजि ॥ ६ ॥ पुनि हनुमत चहुँ धायक, भेपज कियो उताल । धाये विरुज सजीव सब, नर निश्वर कपि भाल ॥ ३२॥ पुनि शिव दल अरु रामदल, भिरी भयो बहु वोप ॥ अति उद्धत युद्धत सुभट, कटत अटत सह रोप ॥३३॥ .

रामरसायन । (९७१) चौ०-ताछिन है सचेत धनु साजा धायो सदल वीरमणि राजा। अस्त्र शस्त्र शिवनृप रिपु शाला * हर्नै परस्पर विशिख कराला६४ तव ब्रह्मास्त्र वीरमणि घाला * सो विलोकि शत्रुघ्न उताला॥ अस्त्र योगिनी दत्त विशाला *योजित करिशर हनोकराला६५ ब्रह्म अस्त्रको मार्द सु तीरा मूर्छित कियो सदल नृप वीरा ॥ ताछिन एक शंभु बिनु जेते गिरे भूत नरगण सवतेते ॥६६॥ तव लखि पुनि कोधित शिव धाये अस्त्रन मारि वीर बिचलाये ॥ रिपुहन भये कंठगत प्राणा विह्वल हनुमतादि बलवाना ६॥ दोहा ताछिन रिपुहन विकल है, बोले वचन अधीर ॥ हाय नाथ हा भ्रात मम, पाहि पाहि रघुवीर ॥ ६८॥ यौं भापतही वेगि अति, प्रगट भये श्रीराम ॥ यज्ञ साज साजे सकल, श्याम अंग छवि धाम ॥६९ ॥ दरशतही रघुचंदके, सबही भये अनंद ।। त्राहि त्राहि कहि पद गहे, धाय धाय जन बूंद ॥७०॥ शंभु धाय कीनी विन, कही क्षमिय अपराध ॥ मुनि रघुवर उर लायकै, बोले कृपा अगाध ॥ ७१ ॥ हौं प्रसन्न राखो भलो, भक्तपाल वर धर्म । रंच विलग मानौं नहीं, मम तव हितहै पर्म ॥ ७२ ॥ मम तव भक्त सु एक है, मम तव हित इक आय ॥ पावें नरक निवास जो, मम तव भेद कराय ॥ ७३॥ प्र० स० अ० ॥१६॥शांक ।। मया बह्वपकारा यत् कृतं कर्म तव स्फुटम् ॥ सम्यतां तत्कृपालो हि भवतोप्यभिधायकम् ॥ १० ॥ इति वाक्यं समाकर्ण्य महेशस्य रघूत्तमः॥ उवाच धीरया वाचा कृपया पूर्णलोचनः॥११॥ ममासि हृदये शर्व भवतो हृदये त्वहम् ।। आवयोरंतरं नास्ति मूढाः पश्यन्ति दुधियः ॥ १२ ॥ ये भेदं विदधात्यद्धा आवयोरकरूपयोः॥

(६७२) रामरसायन । कुंभीपाकेषु पच्यन्ते नराः कल्पसहस्रकम् ॥ १३॥ ये त्वद्भक्तास्त एवासन्मद्भता धर्मसंयुक्ताः॥ मद्भक्ता अपि भूयः स्युभक्ता स्तव नर्तिकराः॥१४॥इत्यादि। चौ॰इमि दुहुँ राम शंभुआनँदभर मिले समर महि मध्य परस्पर॥ पुनि रघुवीर उताल सिधाये सदल नृपहि निज कर परशाये७४ विरुज सजीव वरिमाण राजा उठो उताल समेत समाजा॥ सकुल भूप जोरे युग हाथा * विनय करीप्रभुपद धरि माथा७५ रिपुहन हनुमतादि में वीरा सबहि मिले नृपं सकुल सुधीरा।। पुनि नृपराज साज बहु साजी प्रभुहि समपों युत मख वाजी७६ ताछिन रघुवर अंतरध्याना * भये भेद कछु कोउ न जाना॥ जै जै राम सबै उच्चारा * दुहुँदिशि भयो अनंद अपारा ७७ सो०-सदल वीरमणि भूप, चले शत्रुहन संग सुद ॥ यज्ञ तुरंग अनुप, इमि विचरत इच्छितं चहूँ॥ ७८॥ इति श्रीरामरसायन र० वि० वि० वीरमणियुद्ध वर्णनो नाम नवमोविभागः ॥ ९ ॥ दोहा-इमि विचरत मख वांजिवर, इक अरण्य मधि आय ॥ पंथ चलत औचकरुपे, भूमि अश्व चहुँ पाय ॥१॥ अचल भयो हरि चलत नहिं, कीनेहुँ कसा प्रहार ॥ पुनि हनुमानादिक सुभट, गहि उठाय रह हार ॥२॥ तहाँ विजन वन माहिं चहुँ, जन धाये अकुलाय ॥ दूरि गहन कानन विपे, शौनक आश्रम पाय ॥३॥ जाय शत्रुहन शीशनामि, कही सुगति अति दीन । सादर मुनि प्रभु बंधु तें, कथा सुवर्णन कीन ॥ ४॥ पुनि बोले हे राजसुत, जहँ हय रुपो पवित्र ॥ तहाँ सविधि होवै कथन, सीताराम चरित्र ॥६॥ तौ हय पद मोचै तुरत, सुनि रिपुहन शिरनाय ॥ गये तहाँ हनुमत सविधि, कहो राम यश गाय ॥६॥ 1 रामरसायन। (६७३) छूटे पाय तुरंगके, हरपाने रिपुशाल ॥ गमन कियो मखवाजि ले, कहि जै जै रघुलाल ॥७॥ इहि विधि विचरत यज्ञ हय, संग सुभट समुदाय ।। सप्तमास डोलत भये, अवध नगर ते आय ॥८॥ पद्धरी छंद। इक नगर नाम कुंडल विशाल । जहँ सुरथ भूप वर धर्मपाल ॥ नृप प्रजा सर्व तहँ रामभक्त । कोऊ न अन्य देवानुरक्त ॥९॥ सुनि राम वाजि आगम नृपाल । सादर गहाय बाँधो उताल ॥ मिलि प्रजा भूप सेवक अपार । कीनो सहर्प यह दृढ विचार १०॥ मिस याहि सबै प्रभु दरश होय । विन राम वाजि पावै न कोय॥ इमिठानि भूप चतुरंग सैन ।साजी समस्त भट सुवल ऐन११॥ दोवई छंद। चंपक १ मोहक २ सुभट रिपुंजय ३अरु दुरि ४ प्रतापी ५॥ बल मोदक ६ हर्यक्ष ७ और सहदेव ८ शव संतापी । भूरिदेव ९ गुणमंत सुतापन १० ये दशवीर विशाला ॥ सुरथ वीरके पुत्र धनुर्धर रण कोविद रिपुशाला ॥ १२॥ पद्धरी छंद। नृपराज पुत्र अरु भट अपार । दृढ़ कवच शस्त्र वर विविध धार॥ इत राम बंधु करिकै विचार । भेजो सु दूत बालीकुमार ॥ १३॥ अंगद उताल नृप सुरथ पास । आये विलोकि छायो हुलास ॥ सब तिलक माल गल माल राजातुलसी सुपत्र शिर मध्य भ्राज१४॥ सादर विठाय वृझी नरेश । तब वालिपुत्र वोले सुदेश ॥ त्यागिय नृपाल वर मख तुरंग । सोहै न दासरण ईश संग ॥ १५॥ पुनि वृद्ध भूप कीजे न युद्ध । हैं तरुण वीर रिपुदमन उद्ध। तिमि पुष्कलादि भट अमित धीराजिन हेरि सैन तवहो अधीर १६॥ तव सुरथ भृप भापे सु वैन । श्रीराम रूपानधि कमल नन ॥ जौलौ सु आप इत आय हैं ना तौलौ सुकोउ ह्य पाय हैं न ॥१७॥ अरु ईश दासको रण अयोग । ताकी मुरीति कह वीर लोग।

(९७४)
रामरसायन।
प्रभु ते सु युद्ध किहु उचित नाहि। संयुग अदोप सेवकन माहि१८॥
पुनि वैस नेम नहिं वीर केर । कीनो विचार बहु ठौर हेर ॥
सो यवा वृद्ध दुहुँ बल प्रशस्त । रण मध्य हेरि लीजो समस्त॥१९॥
तव सैन माहँ भट जे सगर्व । है हैं निबंधते सपदि सर्व ॥
हौं राम भक्त जानौ न आन । द्रुत कहौ शत्रुहन ठनहिं ठान ॥२०॥
सुनि सुरथ बैन अंगद उताल । रिपुहनाहि आय भापो सुहाल ॥
तब रामबंधु बहु क्रोध छाय । ध्रुव होय युद्ध दीनी रजाय ॥२१॥
सुनिसकल वीर इत साजि साजि । शत्रुहन जैति कह गाजि गाजि ॥
उत राम जैति वर कीन शोर । धायो नृपाल दल प्रबल जोर ॥२२॥
भिरि गये दोउ दल परम चंड । दुहुँ ओर राम सेवक उदंड ॥
भोद्वंद्व युद्ध तिहि समय भूर । दशहूँ दिशान मध बाण पूर ॥२३॥
दोहा-चंपक अरु पुष्कल भिरे, मोहक मिथिलानाथ ॥
विमल रिपुंजय वीरमणि, भूरिदेवके साथ ॥ २४ ॥
है दुर्वार सुबाहुते, सत्यवान सहदेव ॥
प्रतापान नृप युद्ध कर, संग प्रतापी एव ॥२५॥
नीलरतन हर यक्ष अरु, अंगद सह बल मोद ॥
असुतापन उग्राश्व इमि, भिरे भरे रण मोद ॥२६॥
अपर वीर दुहुँ ओरके, इहि विधि लरत अपार ॥
अस्त्र शस्त्र वर्पत विपुल, छायो हाहाकार ॥ २७॥
पदरी छंद।
चंपकहि कीन पुष्कल विहाल । हनि अस्त्र शस्त्र अगणित कराल॥
तर राजपुत्र रामान घाल । लिय भरत सुवनको वाँधिहाल ॥२८॥
तब हनुमान चाये तुरंत । किय तासु संग संयुग अनंत ॥
नृप पुत्र पवनपुत्राहि उठाय । गहि पुच्छ भूमि डारों भमाय ॥ २९ ॥
पुनि सँभरि वीर पद पकरि तासु । फेको फिराय बहु दृरि आसु ॥
मूर्थित विदाल भो नृपति वाला हनुमंत पुष्कलहि छोर हाल ३० ॥
बिल बिलोकि मुत मुन्थ वीर । कोशहि प्रहार किय विपुल तीर ।
हनुमंत धाय नव नामु चाप । गदि कीन भंग भरि कोहदाप ॥३१॥

रामरसायन। (२७९) पुनि धनुप आन लै नृपति मंड । कोदंड सोर किय खंड खंड ॥ इमि असी चाप भंजे सुवीर । तब सुस्थवीर अति है.अधीर ॥३२॥ गरु चंड शक्ति कीनी प्रहार । हनुमंत ताहु धरि भजि डार ॥ पुनि कीश तासुस्पंदन उछाल । तव भूप कोपि दृढ़ परिघशाल३३॥ चौ ताछिन तासु सूतरथस्यंदन गहि पछारि महिकीन निकंदन।। पुनि रथ आन वैठि नृप धावा * सोऊ हनुमत वेगिनशावा३४॥ इहि विधि एकऊन पंचाशा * वीर सुरथ रथ करे विनाशा॥ अस्त्र पाशुपति तब नृप घाला 8 तासु घात कछु भये विहाला३५॥ है सचेत धाये परियारा तब नृप ब्रह्मअस्त्र पुनि मारा ॥ तऊ न नेक मुरे हनुमाना ॐ सुरथ महीप अतिहि अकुलाना३६ तव रामास्त्र कपिहि नृप घाला * गिरे भूमि हनुमंत उताला ॥ सुरथ कपिहि दृढ बंधन कीना गहिपुर गमन हेत चित दीना३७॥ दोहा-तव बोले हनुमंत कपि, अहो मुरथ नृप धीर ॥ अपर अस्त्रते बांधते, तव हे सत्य सुवीर ॥३८॥ ताछिन कपिहि निबंध लखि, धाये पुष्कल वीर ॥ हने परस्पर दोउ दुहुँ, विविध विपम वरतीर ॥ ३९ ॥ तोमर उंद। तब नृपति बहु अकुलाय । धनु चंड बाण चढाय ।। पुप्कल हिये महँ शाल । भे तामु वात विहाल ॥ १० ॥ भूमधि गिरे मुरझाय । रिपुदमन लखि दुख छाय॥ पुनि समय सम धरि धीर । करि कोप धाय सुवीर ॥११॥ भूपहि हने बहु बान । छिदे सु वीर महान ।। तब शत्रुहन रिस धार । बहु अस्त्र कीन प्रहार ।। १२॥ ते भये निर्फल सर्व । तब कही नृपति मगर्व ।। प्रभु दास सत्यजु आदि । तिन पैन मंत्र चलाहि ॥ १३॥ यो कहि सुरथ वलवान । रिपुदनदि इन इक वान ।। तिदि लगतही ग्ध माहिं । गिरि परे कर मुधि नादि ।। 22 ।। पुनि भूप वाणन मारि । दिय अपर भट मदि डादि ।।

रामरसायन। RE तिहि समय रिपुहन सैन । चहुँ भजत धीर धरै न ।।.४५ ॥ लखि कटक गति कपिराय। गरुशैल कर धरि धाय ॥ कीनो सकोप प्रहार । दीनों सुभूप विदार ॥ ४६॥ पुनि विपुल तरु गिरि वीर । घाले सु सब नृपधीर ॥ बाणन विभाजि बहाय । कपितन दिये शर छाय ।। ४७।। सुग्रीव धाय उताल । नख दशन तिहि तनु शाल ॥ तब सुरथ अस्त्र प्रहारि । कपिपतिहि दिय महि डारि ॥४८॥ तिहि समय प्रभु दल माहि । कोऊ सुभट इमि नाहि ॥ जिहि नृपन बंधन कीन । तव विजय दुन्दुभि दीन ॥४९॥ शत्रुघ्न आदिक वीर । मुञ्छित सबै रणधीर ।। कछु पवनपुत्रहि चेत । अरु समस्त अचेत ॥५०॥ सो विवश कपि रणधीर । वर अस्त्र वद्ध सु वीर ॥ नृप सबहि रथ मधि घाल । आयो सु धाम निहाल ॥५१॥ बैठो सभा हुलसाय । हनुमतहि लै तिहि ठाय ।। भापी तबै नृप धीर । अब सुमिरहू रघुवीर ।। ५२ ॥ श्रीराम आपहि आय । जौलौं न देइँ छुडाय ।। तौलौं न कोटिन वर्प । छूटै न अस्त्र प्रकर्प ॥५३॥ तब सबहि निरखि अधीन । हग नीर भरि अति दीन । श्रीरामपद हिय लाय । हनुमंत कह अकुलाय ॥५४॥ घनाक्षरी कवित्त । सीतानाथ सुभग दयाल भक्तपाल वीर दासहों तिहारो या प्रचंड फास तोरिये ॥ रसिकविहारी दीन दुखित घनेरो त्राहि वाहि त्राहि वेगि अव समय बहोरिये ॥ रावरोहि एक अवलंब है कदंब सत्य मेरे दोप देखिकै कबी ना मुख मोरिये। आपनी बडाई जानि कीजिये कृपालु कृपा पाहि पाहि पाहिमोहिं बंधनतेछोरिये५५ रामरसायन। (६७७ नीको हौं बुरो हौं सांचो झूठो हौं खरो हौं खोटो कैसा हौं तोऊ सब भा रामदास है ।। रसिकविहारी मन वच अरु कर्म गति नाथहि प्रसिद्ध सदा हृदय निवास है ॥ भेषज उपाय यंत्र मंत्र तंत्र देवी देव काहूको न मानौं एक रावरीही आश है ॥ मोको वेगि दुसह कलेशतें छुटावो राम यामें नत होत आपहीको उप- हास है ॥५६॥ दोहा-इमि ध्याये हनुमंत तब, ताही छिन श्रीराम ॥ अति उताल दीनो दरश, करुणानिधि छविधाम ॥२७॥ शोभित पुष्पकयान मधि,भरत लपण मुनि संग ॥ दूरहिते लखि कपि कही, भूपहि सहित उमंग ॥ ५८॥ सो०-देख नृपति मम नाथ, विनय सुनत आये सपदि ।। भक्तपाल जिहि गाथ, सो विलंब किमि लावहीं॥२९॥ चौल्यौं कहतहि कौशलपुर राजा से आये द्रुत लखि सहित समाजा॥ धाय सुरथ रघुवर पद परसे जल आनंद नैन दुहुँ वरसे॥६॥ राम कही बहु भाँति सराही * क्षत्री वीर धर्म यह आही ।। सुनि नृप विनय करी कर जोरी ॐ पूजी नाथ सकल रुचि मोरी६॥ तव रघुवर सब वीर छुटाये की दुहुँ दलके भट मृतक जिवाये। उठि रिपुहन भेटे मुद भ्राता गहे कीश प्रभु पद जलजाताद।। अपर समस्त प्रभुहि शिरनाये ६ प्रजा नारि नर दरश अघाये ॥ तीन दिवस तहँ श्रीरघुराजा रहे भक्तवश सहित समाजा६॥ दोहा-पुनि रघुवर मुनि वन्धु युत, वैठि सु पुप्पविमान ॥ गये मुदित नृप सुरथको, बहु विधि करि सनमान ॥६॥ कोट न जानत भेद कछु, कहा करत रघुवीर ॥ यज्ञ करत उत नित इत, हरत भक्तकी पीर ॥६५॥ रसिकाविहारी दुख सवे, मिटे भयो सुखभरि ॥ दुहूँ ओर आनंद है, चहुँ जै जै धुनि पूरि॥६६॥ सुरथ चंपकहि थापि पुर, भये सदल हय साथ ॥ नाम बन्धु गमने सुखी, कहि जै जै रघुनाथ ।। ६७॥ इति श्रीरा० २० वि०वि० नुस्ययुद्धवर्णनो नाम दशमो विभागः ॥ १०॥ .

(५७८)
गमरसायन।
दोहा-श्रीरघुवर मख वाजिवर, विचरत बहु दल साथ ॥
वाल्मीकि आश्रम तहाँ, आयो सुरसरिपाथ ।। १ ।।
परमरम्य वन हरिके, डोलत चहूँ निशंक ।।
अशन करत तृण पियत जल, हिंसत इंक उतंक ॥२॥
मुनि कुटीनते ठोर सो, योजन एक प्रमान ॥
तहँ मृगयाहित आवहीं, सिय सुत सजि धनु वान ॥३॥
तादिन लव आये तहां, कुश विन आप अकेल ॥
वन विचरत मुनि सुतन युत, करत मुदित बहु खेल॥४॥
सो लव वरखाजी निरखि, वांचि तासु शिर पत्र ।
गहि बांधो तरुते तहाँ, कही न भूमि निक्षत्र ॥ ५॥
प्रबल होत भवितव्य गति, कोउ न जानत भेद ॥
औचक प्रगटै बुद्धि जिहि, होवै खेद अखेद ॥ ६॥
वाल्मीकि पट कांड जो, सिय सुत करत सु गान ।।
सो तिन हिय भो भ्रम इतो, को हैं राम न जान ॥७॥
त्यौंही मति मुनि सुतनकी, ताछिन गई भुराय ॥
कही न कोऊ वाजि यह, तब पित मखको आय ॥ ८॥
ताछिन मुनि बालक लवहि, इमि भापी समुझाय ॥
वर्ष पंचदश ते अधिक, निज मधि कोउ न आय ॥९॥
तजौ वाजि हाँते चलौ, करिय बाल कहँ युद्ध ॥
है हैं संग तुरंगके, रक्षक जन भट उद्ध ॥ १०॥
पुनि मुनि शिष्यनको समर, उचित कहै नहिं कोय ।
ताहू पै नृप दल अमित, तुम इक ते कह होय ॥११॥
तब लय भापी हे सखा, तुम सब हो द्विजबाल ॥
भोजन भिक्षा पढन तजि, और न जानी हाल ॥ १२ ॥
क्षुधित तृपित है हौ अतिहि, जावो गेह पराय ॥
इत,अबहीं है है समर, लखि तुव चित्त भ्रमाय ॥ १३॥
कही मित्र तुम सत्य यह हैं अबहीं हम बाल ॥
पै क्षत्रीसुत शुद्ध सो, वीरनके उरशाल ॥१४॥
रामहि इमि अभिमान है,जानत भूमि निक्षत्र ॥
बाँधो वैन उतंक लिखि, मख तुरंग शिर पत्र ॥ १५॥

रामरसायन। (६७९) कितहूँ वीर सु आजलों, मिलो न छैहै कोय ॥ जानि परेगी सबहि अब, क्षत्रिय बल इमि होय।। १६॥ ताछिन हय सेवक तहां, आये वीर विशाल॥ तिनहिं दूरहीते निरखि,भाजि दुरे द्विजबाल ॥ १७ ॥ लव अकेल सजि वाण धनु, रहे वाजिके पास ॥ सोबंधित लखि बाल दिग, किय सेवक गण हास |॥ १८॥ ते सेवक लखिकै सपदि, छोरन लगे तुरंग ॥ लव बरजे माने न फिर, कीने नैन सुरंग ॥ १९॥ तब सीतासुत कोपिकै, सपदि धाय बहु डाट॥ तिन सब हय सेवकनके, भुज डारे महि काट ॥२०॥ भजे विकल तहते सकल, आये रिपुहन पास ॥ कही सबै गति बिलपिकै, है हिय निपट हिरास ॥२१॥ शशमन सुनि चकित है, कहे विचारि सु बैन । विष्णु होय कै शंभु ध्रुव, सो नर वालक हैन ॥२२॥ प्र०॥रा०॥ अ०६० ॥श्लोक। नायं बालो हरिनूनं भविष्यति हयं धरः॥ अथवा त्रिपुरारिः स्यानान्यथा मद्धयापहृत् ।। १ ।। दोहा-पै हरि हर हो कोडं सो, कहा विजय ले जाय॥ श्रीरघुवर ते काहुको, छल बल कछु न चलाय ॥२३॥ यो कहि पुनि रिपुदमन द्रुत, सेनापतिहि बुलाय॥ दई रजायसु युद्ध करि, लावो वाजि छुटाय ॥ २४ ॥ मो०-कालजीत जिहि नाम, सकल सेनपति वीर वर॥ लै बहु भट बलधाम, चलो साजि चतुरंग दल ॥२५॥ भुजंगप्रयात छंद । चमूनाथ लै मैन आयो तहाँई । अकेले सियापुत्र ठाढे जहाई ॥ कही सोतवे छोरिदेवाजि वालाकिरैक्योंवृथाआपनीमृत्यु झाला२६ सिया मनु भापी तब रे अयाना।जुहीकाल तेगे सुक्यों वाल जाना। काट वीरता होय बेगे दिखाव । न तो सैनले फेर पछि सिधावा२७॥ तवे फेर सेनापती यों वखानी । लखीं ग़म मोरूप, दाया मुगनी॥ भली है अजीछोडिदयन वाजीनितीवापिहानोदि ताहोयराजी२८ (५८०) रामरसायन। तोटक छंद। सुनिकै लव वेगहि बाण सजे। धनुतान सँधान सकोप तजे ॥ छिनमें बहु सैन विदारि दई । वर वीरनकी मति हार गई ॥२९ सजि सायक चाप अनीप घने । करि कोप महाबल अंग हने ।। नृपराज सबै शर भजि दिये । बहुरौ तिहि प्राण विहाल किये३० पुनि स्यंदन संडि चमूपतिकोकिय हाल विहाल कहै गतिको । तब सो द्रुत भीम गयंद चढ़ो । कर धारि गदा बहु कोप मढ़ो३१ तोमर छंद । सो गदा कीन प्रहार । लव भांज तिहि दिय डार ॥ मारो परिच पुनि चंड। किय सोउ नृप सुत खंड ॥३२॥ बहुरौ सुलै करवाल । गज शुंड काटि उताल ॥ तिहि दंभ पद धरि वीर । करि शीश चढि रणधीर ॥ ३३॥ कीनो सुकुट तिहि छिंदि। पुनि कवच वेगहि भिदि ॥ दलपतिहि कच कर धार । डारो सु भूमि मझार ।। ३४॥ तब कालजित अति पुष्ट । मारो लवहि दृढ मुष्ट ।। पुनि लै कृपाण कराल । तानो सुहस्त उताल ॥३६॥ सो सपदि हनि शर चंड । सह खड्न भुज किय खंड ॥ तब कोपिकै दलनाथ । लिय गदा वामहि हाथ ॥ ३६॥ सोऊ भुजा लव वीर । दिय छिंद हनि खर तीर ॥ तब कालजित वरियार । किय कोपि चरण प्रहार ॥ ३७॥ लव पगहु खंडित कीन । सो गिरत शिर हनि दीनः॥ तिहि वीरता लखि वीरं । जिय कहत वीर सुवीर ॥३८॥ पुनि लै कृपाण प्रचंड । लब तासु शिर किय खंड ॥ फिरि विशिपवाणन मारि । दिय सकल सैन विडारि ॥ ३९॥ दोहा-लव लाघवता अकथ यह, लरत चमूपति संग ।। आवत अमित हथ्यार ते, करत तिनहुँको भंग ॥१०॥ लखि यह गति सब थकित द्वै, पुनि दलपतिको पात ॥ विजय आश तजिक सुभट, भगे विकल विललात ॥१३॥ कही जाय रिपुदमन ते, रण गति सकल अधीर ॥ कालजीत दलपालको, वध कीनो शिशुवीर ॥१२॥ ~

रामरसायन।
(५८१.)
-
शत्रुशमन सुनि चकित है, कीनो शोक अपार ॥
पुनि धरि धीरज पुष्कलहि, कही समेत विचार ॥४३॥
वीर जाहु भट सैन लै, गहि लावो सो बाल ॥
भरतपुत्र सुनिकै सकल, साजो साज उताल ॥४४॥
ख० गगन नभ० महि१ ग्रह निगम४, स्यंदन इते सुढंग।
हय गज पद चर अपर बहु, दल चतुरंग अभंग ॥ ४५ ॥
इमि सजिकै धाये सकल, सिया सुतहि लखि वीर।
घेरि शस्त्र वर्पन लगे, शक्ति शूल असि तीर ॥ ४६॥
दोबई छंद ।
राज पुत्र तिन मध्य अकेले पद मंडल दै युद्धे ॥
खंड खंड करि चंड वीरते वाणन प्राण निरुद्ध ॥
गज तुरंग स्यंदन अरु पदचर लव निशंक बहु भजे ॥
भये अधीर मरत तजि भागे सकल सुभट मद गंजे ॥ १७॥
तौ लग पुप्कल आय वेगही सैन दशा अवलोकी ॥.
फिरौ फिरौ कहि टेर धीर दे भगत अनी सब रोकी ॥
बचे वीर ते अपर भूरियुत भरत पुत्र द्रुत धाये ॥
सकल सुभट मिलि राम पुत्र पै अमित शस्त्र वरसाये ॥ १८॥
लब ते सर्व हथ्यार शरनते छिदि भूमि मधि डारे॥
पुनि धनु तान वाण अगणित हनि विकल किये भट सारे॥
तव पुष्कल बहु विशिख तीरते राजपुत्र तनुशाला ॥
सो फिरि मूत वाजि स्पंदन दलि वीरहि कियो विहाला॥१९॥
गिरे भूमि पुष्कल तब हनुमत लवहि वृक्ष लै मारा ॥
सियसुत मपदि छिदि बाणन ते सो तरु भूमि पवारा ॥
प्रनि करि क्रोध शैल पाहन द्रुत कीश अनेकप्रहारे ।
सोऊ सकल वीर -तीरनतें भंजि महीतलडारे ॥५०॥
पुनि हनुमंत लपेटि पुच्छ मधि चाहो सपदि उछाला ॥
लव अकुलाय रताल मुष्ट हनि कपि लंगूहि शाला।।
तासु घात है विकल वीर तिन छोड दये ततकाला।
वेगि सीयसुत दलि वाणन ते कीशहि कियो विदाला॥२१॥

. 1 पुनि मुनि गण विन इहि विपिन,और न कोउ रहाहि।।७७॥ सो सब गये अवंतिका, मुनि गण कुशहू साथ। हाय करौ मैं काह अब, या छिन निपट अनाथ ॥ ७८॥ इमि अति विलपतही सिया, ताही छिन कुशवीर.॥ आये औचक मातु गति, निरखत भये अधीर ॥७९॥ त्रिकालज्ञ मुनि चरित सव, जानत परम सुजान ॥ भेद न प्रगटो रंचहू, मानों निपट अयान ॥८॥ मातहि शिर नमि जोरि कर, तब कुश बूझो हाल ॥ निज दुख भापो जानकी, विलपत सकल उताल ॥८॥ चौ०-सुनि कुश हीय भयो अतिक्रोधामातहि करि बहु भाँति प्रबोधा साजो द्रुत अभंग तनु त्राणा चर्म कृपाण शक्ति धनुबाणा८२॥ गवने मातु चरण धरि शीशा 8 सीय दुई जय सिद्धि अशीशा ॥ कुश धाये करि क्रोध अपारा * दूरहि ते लखि सबहि प्रचारा८३॥ रिपुहन आदि कुशहि जब देखा छायो हिय आश्चर्य विशेपा॥ कहत बाल यह मायाकारी * पुनि आयो दूजो तनुधारी ॥ ८॥ दोहा-इक तनुते इत विवश ढ, परो सबहि भरमाय ॥ दूजो वपु धरि औचके, आयो अंग सजाय ।। ८५ ॥ वय वपु शोभा साज सब, दोऊ एक समान ॥ ध्रुव यह सुरमाया कछू, भेद परत नहि जान ॥८६॥ कहत परस्पर चकित इमि, सजग भये सब कोय ॥ ताक्षण लव मुर्छा जगी, अति अलक्ष चहुँ जोय ॥ ८७ ॥ भ्रातहि आवत देखिकै, भयो महाआनंद ।। तौ लग कुश पहुंचे सपदि, कियो शोर जनवृंद ॥ ८८॥. ताक्षण तुर धनुवाण गहि, रथते उछलि उताल ॥ . परे भ्रात ढिग वीर लव, सजग भये तत्काल ॥ ८९ ॥ चारी छंद। अति मुदित दुहुँ बलवंत सिय सुत सपदि चाप चढ़ाय ॥ चहुँ धाय धाय कराल वाणन घाल दल दिय छाय ॥ तब सकल वीर सुधीर गहि गहि शस्त्र अगणित उद्ध। रिपुशाल आदि विशाल भट बहु करन लागे युद्ध॥ ९० ।।

रामरसायन। वर सुभट वनचर भालु मानुप यातुधान अपार ।। तरु कुधर पाहन शक्तिं शर असि परिध शुल प्रहार ॥ दुहुँ वीर ते बहु तीर हनि हनि करत सवहीं चूर ॥ पुनि मारिकै सु प्रचंड बाणन सकल गातहि पूर ॥ ९१ ॥ तब कोपि रिपुहन वीर तीरन छाय दिय दुहुँ वीर ।। रणधीर सियसुत तदपि भे तिहि समय कछुक अधीर ।। कुश अग्नि अस्त्र प्रहार सो लखि वरुणते किय खंड ॥ वायव्य छोडो ताहि पर्वत घालकै चहुँ मंड ॥ ९२॥ वर वज्र ते गिरि चूर किय तब कुशमहारिस लाय॥ नारायणास्त्र प्रहार सो रिपुहनहि कछु न जनाय ।। लखि सीयसुत अरिशाल ते भापी अहो नृप वीर ।। अब तुमहिं डारत भूमि ही सब भाँति होउ सधीर ।। ९३॥ यों कहि प्रहारे तीन शर सो लगतही रिपुशाल ॥ बहु व्यथित है अकुलाय मूर्छित गिरे भूमि विहाल ॥ तिहि समय हाहाकार भो धाये समस्त नृपाल ॥ तिन सबहि दोऊ बंधु वाणन वेधि डारे हाल ॥ ९४ ॥ सो गति विलोकि समीर सुत तरु कुधर अमित प्रहार ।। तीरन विदारे सकल ते दुहुँ वीर राजकुमार ।। पुनि कीश बहु हम शेल पाहन घाल चहुँ दिशि छाय॥ अकुलायकै सिय पुत्र कुश तब अतिहि कोप बढ़ाय ॥१५॥ संहार अस्त्र प्रहार कीनो तवहि पवनकुमार ॥ कहि राम राम अचेत मृर्छित गिरे धरणिमझार ॥ पुनि कोपिक लव कुश दुहूँ बहु चंड वाणन मारि ॥ दल सकल किय विध्वंस भागे सुभट हाय पुकारि ॥ ९६॥ सो हरिके कपिनाथ धाये शल तरु गिरि खंड ।। दुहुँ बंधु पर वरपाय छाये कीन क्रोध प्रचंड ।। ते सकल राजकुमार पाणन मंजि डारे भूमि ॥ सुग्रीव तब लंगर घालो भूरि बल युत दृमि ॥ ९७।। कुशवीर कपिपति अंगमें येथे अनेकन नीर॥ तोर सुसंटन न फिरत फिरिफिरि मिग्न भट गयी।

(५८८) रामरसायन । सादर सहित उमंग, रहे मुदित मख दरशहित ॥३॥ लव कुश दोऊ वीर, जिन ठानों बहु युद्धवर ॥ पट कपाय द्रुम चीर, ते धारण कीने सुभग ॥४॥ चौ० जाक्षण समर करो दुहुँवाला ताक्षण औरहि छटा विशाला ॥ अब सुवेप मुनि शिष्य प्रमाना * इनहिं कियोरण कोउन जाना वाल्मीकि हियकी हिय राखी क राम पुत्र ये काहु न भापी॥ सन्निधि ऋपि जेते गति ज्ञाता । लखिमुनि रुचि किय कोउ न ख्याता जब सीता मखवाजि छटायो * सुनत तबै सब कहि समुझायो॥ सो लव कुश जानैं यह बाता * रामअवधपति हैं मम ताता ७॥ पै दोऊ गुरु आज्ञाकारी याते निज मुख कछु न उचारी॥ सदा रहैं मुनि शीश प्रमाना *तिहि तजि काज करै नहिं आनाट सो कुश लव तापसके भेपा शोभित नखशिख अंग सुदेशा॥ गुरुकृत रामायण नित गावै परमरम्य वर वीण वजावें ॥९॥ राग रागिनी समय समाना शुद्धवर्ण स्वर ताल प्रमाना ॥ लय विश्राम सुभेद समेता गान करें सह वाद्य सचेता॥१०॥ तिन लखि सब जन अति हरपाबैं * मुनि द्विज नृपं निज निकट बुलावें बारहिं बार गवावे * रामायण सुनिअचरज ला₹ ११ सुनि रघुवर दुहुँ वेगि बुलाये 8 गुणी समाज जोरि बैठाये ॥ तिन बिच रामायण तिन गाई सुनत सकलं हिय विस्मय छाई १२ अति प्रसन्न कै राम प्रवीना की वसु दशसहस १८०० स्वर्ण तिन दीना तब भापी दुहुँ रघुवर पाहीं हम मुनि शिप्यलेत धन नाहीं॥ पुनि इमि भापी राम नृपाला* हम सुनिहैं सब ग्रंथ रसाला ॥ तव लै गुरु आज्ञा नित आई * बहु दिन लग रामायण गाई १४ इहि विधि नित अनंद अधिकाना * पूरण यज्ञ समै नगिचाना । तव रघुवर निज हीय विचारी अब इत सिय आगम शुभकारी१६ पुनि मुहिं वाल्मीकि मुनिराई के सिय अंगीकृत हित समुझाई ॥ याते जाय लपण लै आ 8 यज्ञ दरश सीताहू पावें ॥ १६ ॥ यो गुणि बंधुहि दई रजाई ऋपि आश्रम ते सीतहि लाई । राख्यो वाल्मीकि मुनि पासा सुनत लपण हिय भयो हुलासा१७ दोहा-वाल्मीकि मुनिके जु हैं, शिष्य महोदय नाम ॥

रामरसायन ।
(५८९)
तिन युत रथ लैकै लपण, वेगि गये तिहि ठाम ॥१८॥
प्रभु आज्ञा कहि शीश नमि, लाये अति समुझाय ॥
वाल्मीकि ढिग सीयको, राखी राज रजाय ॥ १९ ॥
प्र० स० ॥अ०६६ ॥ श्लोक ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणो रामं रथे स्थित्त्वा नृपाज्ञया ।
सुमित्रमुनिशिष्याभ्यां युतोगाद्भूमिजाश्रमम् ॥१॥ इत्यादि ।
दोहा-जादिन मख पूरण हुतो, तादिन आई सीय ॥
सुनि अतिही आनंद भयो, पुर परिजनके हीय ॥२०॥
सो मखपूरण दिवस प्रभु, गुरु मुनि आयसु पाय ॥
दिये दान बहु सहित विधि, श्रद्धा भक्ति दृढ़ाय ॥ २१ ॥
दोबई छंद।
पुनि जते नृप अरु नृपरानी नरपति पुत्र समाजा ॥
नृपति पुत्र नारी ये सबही सहित उचित रघुराजा ॥
द्वै पुनीत इकठौर भये तव गुरु वसिष्ट मुनि वृंदा ॥
लै शुचि जल समस्त अभिपके वाढो हृदय अनंदा ॥२२॥
पुनि अगस्त्य मुनि खड्न मंत्रि कै सविधि राम कर दीना ॥
सो ले वाजि पीठ प्रभुधारा दिव्यरूप तिहि लीना ॥
ताज पशुगात देव वपु है के वैठि विमान सिंधारा ॥
सुर नर मुनि अवलोकि तासु गति कियो म जैजैकारा ॥२३॥
म०॥रा०॥अ०६७॥शोकः ।
करवाले धृते पृष्टे रामेण स ह यः क्रतो॥
पशुत्वं तु विहायाशु दिव्यरूपमविंदत ।। २ ।।
विमानवरमारा अप्सरोभिः समंततः॥
चामरेवीज्यमानश्च वैजयंत्या विभूपितः॥३॥
गतोसी शाश्वतस्थानं रामपादप्रमादतः।।
पुनरावृत्तिरहितं शोकमोहविवर्जितम् ॥ १॥ इत्यादि ।
दोई उंद।
बटुरि देव सब नविधि तत कार पूरण आहुति दीनी ।
अपर किया मख अंत संचित मो सकल यथान्य कानी।।
अश्वमेव वर यज्ञ समापत भयो मुदित मुव कोई ॥
नृत्य गान सन्मान दान बहु चहुँ जज धनि होई ॥२३॥

(१९०) रामरसायन । दोहा-पुनि गुरु मंत्री राम मिलि, कियो विचार दृढाय ॥ सवहि बिदा अब दीजिये, भयो वर्ष इत आय ॥ २५॥ चौ०-तव रघुवरजन निकट बुलाये * सबहि यथोचित काज दृढाये ॥ भूपनके सतकारन हेता ॐ थपे अनुज तिहुँ परमसचेता ॥२६॥ द्विजगणआदर अर्थमहीशा दै शिख राखे निपुण कपीशा ॥ मुनिजन मानन काज कृपाला आरोपित किय लंकनृपाला॥२७॥ अपर जनन परतोपन हेता * राखे सेवक, सखा सचेता ॥ तियन विदा रनिवासमझारा * इमिप्रबंधरघुवर किय.सारा ॥२८॥ दोवई छंद। इहि विधि विदा प्रबंध ठानि पुनि राघव हृदय विचारी॥ ऋषि आश्रमते आये सीतहि बीत गये दिन चारी ॥ लपणहि पठै बोलि लोनी मैं पुनि मुनि पासहि राखी ॥ ऐसे समय शपथ होवे तो भली भूरिजन साखी ॥२९॥ दोहा-यों विचारि श्रीराम तव, सभामध्य द्रुत आय ॥ दूतन प्रति आज्ञा दई, ताक्षण सबहि सुनाय ।। ३०॥ वाल्मीकि मुनिनाथको, मम दिशिते शिरनाय ॥ विनय करो सिय प्रात निज, शपथ देय नित आय ॥३॥ तब चर मुनि ढिग जायक, कही कही जिमि राम ॥ भापी ऋपि आशीपदे, पुजै राज मन काम ॥३२॥ चौ०-भयो शोर चहुँ ओर सु भारी जुरे प्रभात अमित नरनारी।। नित्य नेम करि श्रीरघुराई क शोभित भये सभा मधि आई ३३॥ ताक्षण वाल्मीकि मुनिनाथा , आये ले सिय कुश लव साथा ॥ रठे राम नमि सहित समाजा आशिप दीन मुदित ऋपिराजा३४॥ नख शिख अंग सु वन्न दुराये * कर जोरे :लजित शिरनाये ॥ वाल्मीकि पाछे मिय टाठी शोक विरह वीड़ागिनि बाढी ॥३॥ दोऊ नृपसुत मुनि पट धारी र खरे मातु युत:ममा मझारी ।। त्यों मिय वमन कपाय निदाग भये मकल नर नारि दुखाग३६॥

गमरसायन। (५९१) तव मुनि कही सुनौ रघुनाथा * अति पुनीत सिययुत तवगाथा॥ सीय समान पतिव्रत नारी नहिं तिहुँ लोक धर्मधुरधारी ॥३७॥ हम बहु नेम धर्म व्रत लीना विपुल सहस्र वर्ष तप कीना ॥ ते मम सब निरफल कै जाही* जो कछु दोप होय सिय माही३८॥ ये कुश लव दुहुँ शिष्य हमारे ॐ हैं रघुवीर सुपुत्र तिहारे ॥ यौं कहि सतप्रतीति मुनि दीनीकै सुतन सहित सिय सन्मुख कीनी३९ तब करजोरि मुनिहिं शिरनाई ॐ सत्य वचन बोले रघुराई ॥ परम प्रमाण वाक्य तव नाथा प्रभु शिख हौं धरि लई सुमाथा. पुनि वोले प्रभु मुनिहि विनीता ॐ हीं जानो सिय परम पुनीता ॥ पैपुरजन कछु अनुचित भापीतब कछु दिन प्रभु आश्रम राखी४१॥ हैं मम पुत्र दुहूँ मैं जानो ॐ पूत मैथिली सत्य वखानो ।। ताक्षण सुर नर मुनि चहुँ ओरा कही शुद्ध सीता करि शोरा४२॥ तिहि औसर पिय हिय गति जानी र सियनिशंक द्वै त्याग गलानी।। हाथजोर पतिपद र आनी * महि टकलाय कही वरवानी ४३॥ दोहा-जो अनन्य मन कर्म वच, सदा भजे रघुराय ।। ती मोको याही समय, विवर देहि महि माय ॥१४॥ प्रश्न ।। वाल्मीकीय ॥ उत्तरकांड सर्ग।। ९७ ॥ सर्वास्तानागतान्दृष्ट्वा मीता कापायवासिनी ॥ अब्रवीत्प्रांजलिवास्यमधोदृष्टिरवामुखी ॥५॥ यथाई राघवादन्यं मनमापि न चिंतये ।। तथा मे माधवी देवी विवरं दानु मर्हति ॥ ६॥ इत्यादि ॥ दोहा-यों सिय मुख ते कढ़त ही, धरणी भई दगः ॥ एक सिंहासन विवरते. प्रगटो तेज अपार ॥१५॥ शीश धरे तिदि नाग बढु, तादी क्षण मदि आय ॥ मिदानन पे मीयको, कर गहि लई रिटाय ।।१६।। मोसिंहासन वेगटी, पुनि गो धणि मझार ॥ विवर भयो परित मपदि, गरीन A

(५९२)
'रामरसायन।
जै जै छायो शोर चहुँ, व्योम् पताल मझार ॥
सुरगण अति आनंद है, वरपे सुमन अपार ॥१८॥
अंतर्धान सियाहि लखि, सब नर नारि पुकार ॥
विह्वल बहु विलपात चहुँ, छायो हाहाकार ॥ १९ ॥
श्रीरघुवीर अधीर अति, कियो भूमिपै कोप ॥
लपण लाव धनु शरं अबै, करौं धरणिको लोप ॥५०॥
तब सुर मुनि कर जोरिकै, विनय करी समुझाय ॥
है तव अरधंगी सिया, प्रभु विहाय कहँ जाय ॥ ५ ॥
सियहि तजी बिन दोप प्रभु, यो तिहि मातु रिसाय ।।
लै गमनी निज धाम पुनि, देहै अवध पठाय ॥५२॥
अंतर मग प्रभुते प्रथम, गई सिया तव धाम ॥
सदा निरंतरसे इहै, लखि लीजो श्रीराम ॥५३॥
सुनि रघुवर प्रमुदित भये, देव गये निज धाम ॥
तादिन नैमिप मध्य सब, कीनो निशि विश्राम ॥ ५४॥
चौ०-प्रात समय पुनि जुरो समाजा भयो समस्त विदाको साजा ॥
ताक्षण वाल्मीकि मुनिनाथा * दैलव कुशही सप्तम गाथा९५॥
पुनि भापी यह यज्ञ प्रयंता * अबहीं कहैं सुनैं सब संता॥
अंत कथा वह गुप्तहि राखौ १ सहस वर्प पाछे पुनिभायो॥५६॥
तब तिन निज गुरु शीप प्रमाना * गायो सुनि सब अचरज माना।
ताक्षण शिव ब्रह्मासुर राजा 8 वोले सकल सु देव समाजा९७॥
दोहा-प्रभु तव आविर्भाव ते, वर्ष सहस चौवीश ।।
प्रथमहि विरचो ग्रंथ यह, वाल्मीकि मुनि ईश ॥२८॥
सो कुश लवको कांडपट, प्रथम दये ऋपिराज॥
दीनो सप्तमकांड यह, प्रभु तव सन्मुख आज ॥१९॥
वेदमात सर्वोपरी, गायत्री जगमूल॥
चतुर्विश वर वर्णमय, ब्रह्म अनादि अतूल ॥६॥
सो चौवीस सुवर्ण जे, वेदमातके आय ॥
• सहस सहस अश्लोक प्रति, ते इक इक इहि माय ॥६॥
यात उत्तम लोक तिहुँ, याते काव्य न आन ||
परम प्रमाणिक ग्रंथ यह है वर वेद समान ॥६२॥

रामरसायन। भानु चंद महि सिंधु ये, जवलग विदित रहाय ॥ वाल्मीकिकृत ग्रंथ यह, तौलग अचल सदाय ॥ ६३॥ सुनि सु कांडलै सातहू, श्रीरघुवर हुलसाय ॥ हिय लगाय दिय हनुमतहि, लियो सु शीश चढ़ाय ॥६॥ ताक्षण देव अदेव सब, अति आनंद उर आन । कहीधन्य जै जैति जै, वाल्मीकि भगवान ।। ६९॥ इमि अतिही आनंद युत, नैमिप भयो समाज ॥ पुनि सबही सादर उचित, विदा किये रघुराज ॥६६॥ इहि विधि पूरण यज्ञ भो, परमसुखी श्रीराम ॥ विदा होय मिलि उचित जन, गये सु निज निज धाम।।६७॥ चौ०-पुनिसमाजसंयुत श्रीरामा * आये अवध लहो विश्रामा । सहित कुटुम्ब मुदित रघुराजा। करत नीति मय नित सब काजा६८ | राम पुत्र कुश लवहि निहारी ॐ रहत सदा पुरलोग सुखारी ।। सब जननी राखें समप्यारा * एक सरिस दुहुँ राजकुमारा६९॥ वाल्मीकि वर ग्रन्थ अनूपा सादर सुनत प्रजा अरु भूपा॥ धन्य धन्य श्रीराम चरित्रा पंचम वेद सु परम पवित्रा ७०॥ प्र०॥ रामाश्वमेधे ।। अध्याय ॥६६॥ श्लोक। इत्युक्तौ तौ सुतौ रामचरित्रं बहुपुण्यदम् ॥ आगायतां महाभागौ सुवाक्यपदचित्रितम् ॥७॥ वीणाया रणितं श्रुत्वा तालमानेन शोभितम् ।। निखिला परिपत्तत्रशालभंजीव चित्रिता ॥८॥ हदिशूणि मुंचंतो रामाद्या भूमिपास्तथा ॥ तदानं पंचमो वेदो विहितश्चित्रितः पदैः ॥९॥ हीत श्रीरा०र०वि०वि० अश्वमेधयत्नांतपर्णनो नाम द्वादशा विभागः१२॥ ची०-इहि विधि पुनि बहु वर्प रितीते पूरित सकल मोद सबहीते ।। राम मातु वय वृद्ध सुखारी युत अनंद मुरलोक सिधारी ॥ पुनिक्रमक्रम सब दशरथ रानी गई देवपुर आनंदसानी ॥ ते सब जाय रहीं पति पासा है: मेवे प्रभहि समेत हुलासा ॥२॥ सबके सकल यथोचित कर्मा समय समय प्रति मयुत धर्मा ।।। कीने राम सप्रेम अपारा लोक वेद कुल

(५९४)
रामरसायन ।
-
तिहि पाछे बीते कछु वर्षा अंगिरादि ऋपि आप सहा ॥
भापी केकय भूप युधाजित पठये हमाहि नाथ ढिग या हित ॥
दोहा-कही निकट मम देशके, है नद सिंधु अनूप ॥
तिहि दुहुँ तटवर भूमि तह, हे गन्धर्व जु भूप ॥५॥
तीस कोटि वर वीर हैं, युद्ध उद्ध गन्धर्व ॥
तिनहिं जीति प्रभु लीजिये, तासु राज्य शुभ सर्व ॥६॥
चौ०-तव रघुवर द्रुत भरत बुलाई कही जाहु बहु ले कटकाई ॥
तिनहिं जीति दुहुँ सुत करि राजाआवो पुनि इत सहित समाजा॥
इमि कहि प्रभु दुहुँ सुतन बुलाये * पुष्कल तक्ष आय शिरनाये ॥
दोउनको अभिपेक सुकीना 8 प्रमुदित राज राजपद दीना ॥८॥
तब लै भरत अनीक अपारा ते मुनि गण दुहुँ राजकुमारा॥
वेगि गये मातुल मिलि साजे * भिरे जाय दोऊ दल गाजे ॥९॥
सप्तदिवस निशि युद्ध अपारा
भयो भरत तव अस्त्र प्रहारा।
सो संवर्त अस्त्र ते सारे * तीसकोटि गंधर्व सँहारे ॥ १०॥
भरत विजय करि नगर निहारे परम अनूप सुभग सुखकारे ॥
तक्ष शिलापुर तक्षहि दीना की पुष्कलावती पुष्कल कीना ॥११॥
भूरि भूमि वर राज अपारा श्री दुहुँ पुर साजविशद बहु सारा ॥
पंचवर्प तहँ भरत रहाये करि प्रबंध पुनि अवध सिधाये।॥१२॥
दोहा-मिलि सबही प्रमुदित रहे, इतै भरत हुलसाय ॥
तिय युत निज निजराज उत, करत सदा दुहुँ भाय ॥१३॥
इत रघुवर पुनि लपणके, दोऊ सुतन बुलाय ॥
करि अभिपेक सुबंधु सँग, दीने सदल पठाय ॥ १४ ॥
विशद कारुपथ देश जो, उत्तर भूमि मझार ॥
तहँ अंगद पुर राजसो, अंगदलहो अपार ॥ १५ ॥
मल्लभूमि मधि सुभग थल, चंद्रकांति पुर नाम ॥
चंद्रकेतु किय राज तहँ, सुभग देश सुखधाम ।। १६॥
इमि दुहुँ सुतन सुराज दै, करि कछु दिन तहँ वास ।।
भरत लपण पुनि मोदयुत, आये रघुवर पास ॥ १७ ॥
इहि विधि राम सुनीति युत, बंधु सुतन दै राज ॥
प्रमुदित कौशल नगर नित, रहत समेत समाज ॥ १८ ॥

रामरसायन । चौ-एक समय इक तापस आयो श्याम रूप तनु तेज सुछायो।। विदित कराय सु आयसु पाई जाय सु बैठो शीश नवाई ॥१९॥ आदर तासु राम बहु कीना, बोलो तापस. परम प्रवीना॥ कछु बिनवौं एकांत मझारी 0 सुनिय कृपा करि अवधविहारी२० तव द्रुत लपुणहि राम वुलाई * कही द्वार रक्षौ दृढ जाई ॥ जौ लॅग करें बात हम दोई तो लग इत आवै नहिं कोई ॥२१॥ याक्षण कोउ भूलि ढिग ऐहै सो ध्रुव दंड प्राण वध पैहै ।। सुनिलक्ष्मण धनु वाण सजाई ठाढे भये द्वारपर जाई ॥ २२॥ तब रघुवर अरु तापस दोऊ * रहे भवन तीजो नहिं कोऊ ।। ताक्षण तिहि बूझी रघुनाथा सुनि भापी सुजोरियुग हाथा२३ मो कहँ विधि प्रभु पास पठाई शीश नाय यह विनय कराई। सत्यसिंधु राघव प्रणपालक जनरक्षक दुर्जन दल पालक२४ एक समय प्रभु करी रजाई क हम सुर लोक लखहिंगे आई ॥ तव में बूझो समय प्रमाना ग्यारह सहसवर्ष प्रण ठाना॥२५ सो अव अवधि आय नियराई याते प्रभुको · सुरति दिवाई॥ पुनि जिमि नाथ हृदय रुचि होई कीजे राज रजायसु सोई ॥२६॥ सुनि बोले रघुवर तिहि पाही की हम मिथ्या प्रण नाहिं कहीं। पेविधि जानत मो हिय वातामुहितजिअवध न और सुहाता२७ याते सदा अवध पुर माहीं रहैं मुदित हम अनत न जाहीं॥ जुपै हेतु वश कितहु सिधा के तौ पुनि वेगि अयोध्या आव २८ पुनि चर अचर अवधपुर वासी हैं अनन्य मम परम उपासी। एकहु दिवस दरश नहिं पा तो सवही क्षण क्षण अकुलाव२९ ये मुहि सकल प्राणते प्यारे धर काहू करी न क्षण भर न्यारे॥ में इनको मेरे सब आही दोऊ हिय दुहुँ सदा वसाही ३० याते ही निज समय प्रमाना * करी सत्य सा जो प्रण ठाना ॥ लखि मुरलोक अवधानि ऐही पप्रियजन सबही सँगलेही ३१ इमि रघुवीर तापमहि भाषी चलन चहो मो मब उर गयी। तो लग दुर्वासा मुनि आये राम द्वार इत वचन मुनाय||३|| कहाँ राम हम तिन दिगजह वेगि कहीं नन शाप मुदई ।। तब करजोरि लपण शिग्नाई दीन गिरा करि विनय मुनाई नाथ नाथ कछु मंत्र काही नहीं गमन हित (५९८) रामरसायन । दुहुँ पुत्रन इमि राजदै, आये अवध उताल । मिले चरण गहि भ्रात लखि, मुदित भये रघुलाल ।। पुनि रघुपति निज सुतनको, कीनो वर अभिषेक ॥ सरयू दक्षिण राज कुश, उत्तर लव सविवेक ॥ ६२॥ करत राज कुश लव दुहूँ, पितु आज्ञा अनुसार ।। राम सरिस सब कृत्य वर, बल गुण धर्म विचार ॥६३ इति श्रीरा०र०वि० विराज्यविभागवर्णनोनाम त्रयोदशोविभागः ॥' हरिगीतिका छंद । श्रीराम दोऊ सुतन दै सब राजभार प्रमोदमें ॥ नित करत विविध विहार लीला सुजन सहित विनोदमें ।। कपि केसरीसुत सेवहीं सानंद प्रभु पद प्रीतिसे ॥ मुनि रचित रामचरित्र वर्णत सुनत सादर रीतिसे ॥१॥ जबसे लखो वर वाल्मीकि सु ग्रंथ हनुमत प्रेमते ॥ तबसे सहर्ष प्रकर्प आपहु रचत प्रभु यश नेमते॥ हनुमाननाटक नाम धरि शुभ ग्रंथ कीनो स्वक्ष जो ॥ मुनि कृतहुते अति रुचिर छंद प्रबंध सह पद लक्षसो ॥२॥ पापाण पत्रन पै लिखो नखते विशद्ध सुधारिकै ॥ राखो सुकंठ समस्त रामचरित्र विशद विचारिकै॥ करिक सु पूरण एक दिन औसर विलोकि अनंदको॥ कर जोरि निज कृत ग्रंथ नाटक विदित किय रघुचंदको ।। ३ कपिकाव्य उत्तम मुनिहुते सुनि राम अति प्रमुदित भये ॥ बहु बार वार सराहि कीशहि पुलकि अंक लगा लये ॥. ऋपि विप्र कवि कोविद सुरासुर श्रवण करि ज्ञाता सूबे ॥ भापी हनूमत सरिस तिहुँपुर कोउ नहिं बुधिवर अबै ॥ ४॥ श्रीराम तब हनुमंत सों बोले अतिहि सकुचायकै ॥ हे वीर हम कछु चाहहीं सो देहु हिय हुलसायकै ।। सुनि दीन कै कपि कही कौन पदार्थ इमि बहु श्रेय है ॥ तनु प्राण ही अर्पित कियो दृढ वहरि काह अदेय है।। ५॥ तवःमुदित ह रघुवीर कह तुव रचित ग्रंथ अपार जो।। नाटक उताल दराय आवो सिंध नीमगार मो॥

रामरसायन (९९९) . - इहि देखिकै वर वाल्मीकि प्रभाव लघु जन मानि हैं। सो गाथ है जग पृज्य तिहि लघुता किये बहु हानि हैं॥६॥ सुनि ईश आयसु वीर गवने पै कछू मुख दीन भो।। लखि राम दिय बरदान जाते मुदित कीश प्रवीन भो॥ कलिकाल मधि तुव ग्रंथ यह कछु कोउ नृप प्रगटाय है । हनुमाननाटक विदित रहै श्रम वृथा नहिं जाय है ॥ ७॥ सुनि वेगही कपि जाय प्रमुदित सिंधु वन गंभीर में ।। लिपि उपल डारे सब गिरे बहु मध्य कछु तट नीरमें ।। द्रुत आय पूनि प्रभु पास सहित हुलास विनय सुनायकै ।। सेवन लगे नित चरण सादर परम प्रेम बढाय कै ॥ ८॥ जहँ होत रामचरित्र तहँ हनमंत वेगि सिधावहीं ।। सादर सुनै कर जोर शिर धरि नैन भरि पुलकावहीं ।। याते सबै कार नेम आसन प्रथम कपि हित राखहीं ।। शुचि सविधि प्रेम समर्थ श्रद्धा सहित प्रभु यश भापहीं ॥ ९ ॥ प्रश्नः ॥ वाल्मीकिटीकायाम् ॥ श्लोक । यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृत मस्तकांजलिम्।। वाप्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुति नमत राक्षसान्तकम् ॥ १॥ हुरिंगीतिका छंद। कोऊ करै विधि भंग कहुँ अस्थान अरु अभिमानते ॥ अपराध अनुचितनेक सो सहिचाय नहिं हनुमान ते ।। तब कोश ठानी देहुँ शिक्षा सबहि यों हिय दृढ गुनी। करि हंक शोर उत्तक भापी शीख जो तिहुँपुर सुनी ।। १०॥ जो सुनहि वर्णहिं रामचरित सदाहि संयुत नेमसों ।। सब भाँति सो दुहुँ लोकमें सानंद रहें क्षेमसों ।। यह गाथ विशद त्रिलोक पूजित वेद पंचम जानिये ।। इक एक वर्ण अनंत पातक प्रबल चातक मानिये ॥ ११॥ शुचि नेम उत्सव यज्ञ दान सु मान साज सजायक। श्रद्धा सनेह प्रतीति नीति समेत हिय हुलमायके । वक्तासु पुस्तक पनि मविधि समस्त सुनदि सुनायई ।। यह राम चरित प्रभावते अभिलाप . प्रति दिवस वा प्रतिमान वा ।

६०४) रामरसायन। सव्येपिच महादेवी व्यवसायस्तथाग्रतः॥९॥ शरानानाविधाश्चापि धनुरायत्तमुत्तमम् ॥ तथायुधाश्वतेसर्वययुः पुरुपविग्रहाः ॥१०॥ वेदा ब्राह्मणरूपेण गायत्री सर्वरक्षिणी ॥ ॐकारोऽथवपट्कारः सर्वेराममनुव्रताः॥ ११॥ तथातामनुगच्छंति गुंतःपुरचराःस्त्रियः ॥ सवृद्धवालदासीकाः सवर्पवरकिंकराः॥ १२॥ सांतःपुरश्चभरतः शत्रुघ्नसहितो ययौ। रामं गतमुपागम्य साग्निहोत्रमनुव्रतः॥१३॥ तेच सर्वे महात्मानः सामिहोत्राः समागताः॥ सपुत्रदाराः काकुत्स्थमनुजग्मुर्महामतिम् ॥ १४॥ मंत्रिणो भृत्यवर्गाश्च सपुत्रपशुवांधवाः॥ राघवस्यानुगाः सर्वे हृष्टा विगतकल्मपाः॥१९॥ ऋक्षवानररक्षासि जनाश्च पुरवासिनः॥ आगच्छन्परया भत्तया पृष्टतस्तु समाहिताः ॥ १६॥ यानि भूतानि नगरेप्यंतर्धानं गतानि च ॥ राववं तान्यनुययुः स्वर्गाय समुपस्थितम् ॥ १७॥ यानि पश्यन्ति काकुत्स्थं स्थावराणि चराणिच ॥ सर्वाणि रामगमने अनुजग्मुर्हि तान्यपि ॥ १८॥ नोच्यसत्तु ह्ययोध्यायां सुसूक्ष्ममपि दृश्यते ॥ तियंग्योनिगताश्चैव सर्वे राममनुव्रताः॥१९॥ अध्ययोजनं गत्वा नदीम्पश्चान्मुखाश्रिताम् ॥ शरयूं पुण्यसलिलां ददर्श रघुनंदनः ॥२०॥ इत्यादि । चो-आये मुदित तहाँरघुवीरा संग अपार चराचर भीरा ।। तानण ब्रह्मादिक सब देवा है धाये मुदित करनहित सेवा४१॥ शतकोटिन विमान नभ छाये विशद् विशाल अनूप सुहाये ॥ अनुनि कहि देव मुनि वृन्दा नाहि अप्सरा परम अनंदा ४२ नवर मन्यू कार मनन कमजो/गार मुदित लखि सजन शनि प्रभु कड़ी गनर जोई हात स्नान करें सब कोई १३॥ गाय रिपिनिकट विमाना जामु तेज शत भानु ममाना । श्रीमंत श्रीगमा शोभित भये मध ललामा ४१ रामरसायन । (६ अपर चराचर सरयू न्हाई * सु दिव्य शृंगार सज वैठे सकल विमानन माहीं तिनहिं देखि सुरवृन्द सिहाह जै जै करें देव समुदाई * दुदुमि ह. सुमन वरस नभमंडल है सकल विमाना * कियोसजन सुरलोक पयान निरखतजन चहुँसुगति विचित्रा देवधाम बहु सुभग पवि सुरपुर भई भीर अति भारी।चकित होत लखि लखि नरनारी वैठे वर विमान पुरवासी * देव सरिस अति रूप प्रकाः पहुँचे वेगि सहित श्रीरामा यथायोग पाये सब धामा। जनकनंदिनीयुत रघुराई 8 संग अनुज तिहुँ आनँद छ कीनो वास उच्च वर धामा *देव मुदित लहि दरशललाम ब्रह्मादिक सुर विविध अपारा *युत अस्तुति किय बहु सतक इमि रघुवर निज वचन प्रमाना 8 लखो देवपुर सब सुखमाना दोहा-जिते चराचर राम सँग, आये सुरपुर माहि ॥ ते विधि हरि हर से सकल, जिन लखि देव सिहाहि सरयू अवध प्रभाव अरु, राम कृपा फल जानि॥ तिनहिं सराहत देव सब, सुकृत सुभाग्य वखानि ।। पैजेते चर अचर सब, अवध निवासी जोय ।। कहा अधिक आनंद इहाँ, यों भा सब कोय ॥५३॥ कुव चलिये पुनि अवध, सवही जिय रमगाय ॥ कौशलपुर सुख सामुह, मुरपुर काहु न भाय ॥५४॥ इमि बहु भापत प विवश, प्रभु आज्ञा आधीन ॥ वह सुख साज समेत पुनि, वास देवपुर कीन ॥५५॥ सीतारामहि नेह युत, नित सेवत मुरबूंद ॥५६॥ पुरजन परिजन चर अचर, विहरत सब सानंद ॥५६ देव भक्ति आधीन तहँ, रहे यदपि श्रीराम ।। पसमाज संयुत सदा, सुमिरत अवध सुधाम ॥ ५७ इमि रघुवर सुर प्रेममें, मन रहे बहु काल | दुष्ट दरन संकट हरन, करन भक्त प्रतिपाल ॥२८॥ पुनि सब देवन धीर दे, कहि मृदु वचन बुझाय ॥ देव लोकते मुदित है, गमन कियो रघुराय ॥५९ ॥ ऋतु वसंत लखि पीरमण, स. 'पार॥

(६०६) रामरसायन। पूरव सम सानंद द्रुत, आये अवध मझार ॥६॥ सिया बंधु तिहुँ मातु पितु, सेवक सखा समाज ॥ पुर परिजन चर अचर सब, युत आये रघुराज ॥६॥ तिहूं लोकं आनंद भो, छायो जैजै शोर । रसिकविहारी सुख भरे सब अपार चहुँ ओर ॥ ६२॥ नितप्रति लीला होत बहु, प्रमुदित सकल समाज ॥ सुख शोभा लखि अवध पुर,अति सिहात सुरराज ॥ ६३॥ सीताराम समाज युत, परमानंद अपार ॥ सदा निरंतर अवधमें, करत अनेक विहार ॥ ६४॥ नित्य राम सिय अवधनित, नित्य नाम गुण रूप ॥ नित्य चरित लीला सकल, नित्य समाज अनूप ॥६५॥ प्र० ॥ वा०॥ यु० का० ॥स० ॥१३०॥ श्लोक ॥ यावदावर्त्तते चक्र यावती च वसुंधरा ॥ तावत्त्वमिह लोकस्य स्वामित्वमनुवर्तय ॥ २१॥ पुनः पद्मपुराणे। रामस्य नाम रूपं च लीलाधाम परात्परम् ।। एतच्चतुष्टयं नित्यं सच्चिदानंदविग्रहम् ॥ २२॥. पुनः॥ महारामायणे॥ श्रीअयोध्यां परित्यज्य पदमेकं न गच्छति ॥ अशोकवाटिकायान्तु रमते सर्व देवहि ।।२३।। इत्यादि । दोहा-जे जन ज्ञाता विमल दृढ, राम भक्त मतिवंत ।। ते यहि भेदहि जानहीं, हरि गुरु कृपा अनंत ॥६६॥ कल्प कल्पके चरित बहु, कोऊ लहै न अंत ॥ निज निज मति अनुसार कछु, वर्णत सुर मुनि संत ॥ ६॥ पै निज निज कृत ग्रंथमें, धरत अनूपम युक्ति ॥ सो सुबुद्धिते लखिय तो, एक मिलै सत उक्ति ॥ ६८॥ पक्षवाद भ्रम तर्क तजि, अवलोकै सदग्रंथ ॥ अर्थ व्यंग्य ध्वनित मिले, सबको एकहि पंथ ।। ६९ ॥ हेरी पद्मपुराण में, अश्वमेधके अंत ।। परम प्रमाणिक उक्ति सत, किमि राखी मतिमंत ।। ७०॥ युत समाज श्रीरामको, वर सुरलोक विहारं ॥ पुनि आगम श्रीअवध में, कियो युक्ति निरधार ।। ७१ ॥ -- अपलोकत हुलसायह, जे शनि सुमति mal प्र० पागणांतर्गतगमा ! अध्याय १८॥ शो० ॥ गजट मीनया माकं गन्वंतं सरितं प्रति ।। विलापय गुदित लोकाश्चिरं दर्शनलालसाः ॥२: अनकराजकाटीभिः परितः परिवारिभिः ।। जगाम म मरिच्छेप्टो पक्षिदसमाकुलाम् ॥ २५ तत्र गत्वा स यदद्या गमः कमललोचनः ।। प्रवियेश जलं पुण्यं वसिष्ठादिभिरन्वितः ।। २६ अनु प्रविविशुः संघ गजानो जनता तथा ॥ वत्पादरजसा पुतं जसं लोककवंदितम् ॥ २७॥ परम्परं प्रसिचंतो जलं यचमनोगमः ।। सुशोणनयनाः सर्व हर्ष प्राधमनोधिकम् ॥२८ मरामः सीतया साई चिरं पुण्यजलपवे ॥ कीरित्या जलकाटालेनिरगार्मसंयुतः ॥ २९ ॥ दुलयासाः सफिरीदांडलः फेयूरशोभावरकंकणानि फादकोरिश्रियगुददन्नृपोराजा च सर्वरुपसंस्तुतो व दोदा पनि विधि अमित प्रमाण मय दे श्रीरामचरित्र ।। पल संदेवन कीजिये, गुणिये ग्रंथ पवित्र ॥ ७२ ।। जनमध्यापनरसियहरण, शोधपुछ अभिषेक राजदयलि९मख १० गुप्त१११, राम चरित्र अनेक ॥ ७॥ धन्य राम यश कददि अरु, श्रवण करते धन्य । धन्य धन्य सिय रामको जे दृढ़ भक अनन्य । राम रसायन गंथ या, प्रगट भयो सुखकर गिरा गुरू मिय राम कपि, यह यात प्रगटायोपरि में मतिमंद जग LI २) इस इस वफ यह छाय- यह छद प्रयगर-या, मय छन चारी घर-चार चरण सीम वर्णक में गव इतने हैं भाक मननी छानाम गिनने इतने व-हिमायमे - वर्ण महाग अनुमा-तन गफका हिमावसे नम . मालिनी उपजाति १ १३ गार्दूलपि श्रुति ०६ ७ इंद्रवमा ४४ यमंततिलका २ ३ उपद्रवना द ७ रथोद्धता ४४ १ ३५७ ४ अनुष्टुप ३२ कुमारदंडक १५२ घनाक्षरी १२४ दोहा चौपाई ४८ सोरठा २४५१ २७५७ १४४७ २१७० २६७ काव्य ८० हरिगीतिका सवैया १२७ ३१८ १३१ पद्धरी ३९३ २८९ ११२ १ ४० ३ २७९ ७०

Ramrasayan

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Not Available
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Ramrasayan
File name
Ramrasayan
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2011/07
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
623
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310942
Barcode
99999990314380.00
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