Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Solahe Bhavna Or Dus Dharam

Jain Suresh Kumar · 2011/03

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भोनिनायनम सोलह भावना तथा दश धर्म अ दर्शनविशुद्धि नाम प्रथम अगकी भावना वर्णन करिये है। हे मन्यजीव हो जो! या मनुष्यजन्म पाय यात सुफल किया चाहो हो तो सम्यग्दर्शनकी विशुद्धता करहू । या मम्यग्दर्शन समस्त धर्मका मूल है सम्पन्न मिना श्रापक- धर्म ह नाही होय नधर्म हूँ मुनिाहा हाय सम्पग्द- शनविना ज्ञान है सा कुत्रान चारित्र कुचारित है तप है सो कुतप है। सम्यग्दर्शन रिना यो जीय अनतकाल परिभ्रमण किया है अब जो चतुर्गति समारपरिभ्रमणसू भयान हा अर जन्मजरामरणते छुटया चाहो हो अर अनत अविनोशी सुसमय आत्माक् सच्छो हो तो अन्य समस्त परद्रव्यानिमैं अमिलापा छोडि सम्यग्दर्शनही की उजलता करहु । केसीक है दर्शनविशुद्धता निर्वाणके सुसको कारण है दुर्गतिका निराक- रण करनेवाली है। विनय सपन्नादिक पद्रहकारणनिका मूल कारण हे दर्शन विशुद्धता नाही होय वा अन्य पन्द्रह भावना नाही होय है यात ससारका दु सरूप अन्धकारके नाश करने सूर्यसमान है भयानक परम शरण है ऐसी दर्शनविशुद्धता नाम भावना भावहू । जैसे स्वपरद्रव्यका मेद विज्ञान उज्वल हाय तैसे यत्न करहु । यो जोर अनादिकालका मिथ्यात्वनाम कर्मके वशि होय आपका स्वरूपकी अर परकी पहिचान ही नाही करी जमैं पर्यायकर्मके उदयत पर्याय पाय तैसी पर्याय ही अपना स्वरूप जानता अपना सत्यार्थरूपका ज्ञान में अन्य हाय आपके स्वरूपत भ्रष्ट हुआ चतुर्गतिमें भ्रमण कर है देवकू जाने नाही धमा जाने नाही सुगुरु कुगुरुकू जाने नाहीं । बहुरि पुण्यका, पापका, इसलेोकका, परल.कका त्यागनेयोग्य, ग्रहणकरने योग्य, भत्य अभक्ष्यका, सत्सगका कुसगका, शास्त्रका शास्त्र का विचार रहित कर्मका उदयके रनमे एकरूप भया अपना हित अहित नाही पहिचानता परद्रयनिम लालसास्प होय सदाकाल क्लेशित होय रहा है कोऊ अकस्मात काललब्धिके प्रभाषिते उत्तमकुंलादिकम जिनन्द्रधर्म पाया है याते धीतरागे- सर्यझका अनेकातस्प परमागमके प्रसादत प्रमाणनयनिक्षेपनित निर्णयकरि परीक्षाका प्रधानी हाय पीतरागी सम्पज्ञानी गुरुनि के प्रसादत ऐसा निश्चय भया जो एक जाननेवाला ज्ञायक अग्निाशी असण्ड चेतना लक्षण देहादिक समस्तपरद्रव्यनित भिन्न मैं आत्मा हू देह जाति कुल रूप नाम इत्यादिक मात अत्यन्त भिन्न है अर राग, द्धं प, काम, काध, मद, लाभादिक करके उढयते उपजे मेरे शायकस्वभावमें निकार में स्फटिक मणि तो आप स्वच्छ श्वेतस्वमार है तिसमै डागका मसर्गत काला पीला, इरालाल, अनेक रगरूपकं दीखे है तम मैं आत्माका स्वच्छ शायकमार हू निर्विकार टकोत्कीर्ण ह मोहकमजनित राग द्वपादिक यामैं झलर है वे मेरे रूप नाही पर हैं ऐसे तो अपने स्वरूपका निश्चय हुआ। बहुरि सर्पज्ञ पीतराग परम हितोपदेशक अर सुधा, तृप्याा, जन्म, मरण, रोग, शोक, भय, विश्मय, रागढप, निन्द्रा, मद, मोह, चिन्ता, स्वेट, अति इन अप्टादशदापनिका अत्यन्त अभाव जाके भया और अन- राज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तवीर्य, अनन्तसुस इत्यादिक अनत आत्मीक अविनाशोगुण मा प्रकट भये से ही आम हमारे इन्दन स्तनन पूजन करने योग्य है। अन्य कामी काधो लोभी मोही स्त्रीनिमें आशक्त शस्त्रादिक ‘ग्रहण किये कर्मके आधोन इन्द्रज्ञानके धारक मज्ञतारहित हैं से मेरे चन्दन, स्तवन पूजन योग्य नाही । जा चारनिमें शिरोमणि : अर जारनिमैं शिरोमणि है सो कसें आराधना योग्य होय । , ,

बहुरि मजवीवरागका उपदेश्या अर प्रत्यक्ष अनुमानादिकरि
जामे सर्वथा बाधा नाही आरे अर समस्त छइकायके जानि
की हिंमारहित धर्मका उपदेशक आन्मारा उद्धार के अनेक
कावरूप वस्तुकू साक्षात प्रगट करनेवाला ही आगम' है
से पडने पढगाने श्ररण करने श्रद्धान करने बन्दने योग्य
है। अर ज रागी व पोनिकरि प्ररूपण किये अर विषयानुराग
अर पायके यधारनेवाले जिनमें हिंसाफ करने उपदेश
है ऐसे प्रयक्ष अनुमान करि बाधित एकावरूप शास्त्र अवण
पढनेयोग्य नाही नन्नायोग्य नाही है। नहुरि 'बायनि
की पाछाका अर कपायका अर आरम्भ परिग्रहका या
अत्यन्त अमात्र भया, काल आत्माको उज्जलता करने में
उद्यमी, ध्यान सध्यायमै अत्यन्त लीन, साधीन कर्मध
जनित दुख सुसमै साम्पमायके धारक, जीवन मरण लाम
अलाभ स्तवननिंदनेमैं रागद शरहित उपमर्गपरोपहनिकै सहने
मैं अकम धर्यक धारक परमनिरग्रन्थ दिगम्बर गुरु ही
चन्दन स्तवन करने योग्य है अन्य आरम्मी पायी
विषयानुरागी कुगुरु कदाचित् स्तवन चन्दन करने योग्य
नाही हैं । बहुरि जीवदया हो धर्म है हिंसा कदाचित
नाही जो कदाचितू सूर्यका

हो जाय अर अग्नि शीतल ही जाय अर मर्पका मुखमे अमृत हो जाय अर मेरू चलि जाय अर पुथ्वी उलट पलट हा जाय तो ह हिंसामे तो धर्म कदाचित नाहों होय। ऐमा ढश्रद्वान सम्यप्टिके होय हैजाकै अपने आत्माके चनुभनमें अर सर्वन वीतरागम्प आप्तके स्वरूप में अर निरग्रन्थ विषयकपाय रहित गुरुमै अर अनेकात स्वरूप आगममे अर दयारूप धममें गकाका अमान सा निशक्ति अग है सम्यग्दृष्टि यामें कदाचित् शका नाही करै है। महरि सम्यग्दृष्टि है सो धर्मसेवनकरि पियनि पाछा नाही करै है । जाते सम्यग्दृष्टिक इन्द्र अहमिन्द्र- लोको पिप । महान वेदनारूप चिनागीक पापका बीज देखे हैं अर धर्मका फल अनन्य अविनाशी स्वाधीन मुसकरियुक्त माक्ष दीस है तात में बहुमूल्यरल छोटि काचसण्डकू जोहरी नाही ग्रहण कर ह तम जाक साचा आत्मीक अविनाशी बाधारहित सुरा दीख्या सो झूठा पाधामहित रिपयनिका सुपमै कम याछा कर लाते सम्यग्दृष्टि पोछारहित हो होय है । अर जी अवती सम्पादृष्टिक चर्तमानकालमें आजीविकादिकनिम तथा स्थानादिकपरिग्रहमे वेदनाके अभावमं जो चाडा होय है सो पर्वमानकालकी

अर जिनक
वेदना सहनेकी आसमयत घेदनाका इलाजमार चाहे है।
जैम रागी कडयो औषधित अतिविरक्त होय तो वेदना
का दुप नाही सह्या जाय तात कडयो, औषधि धमम
विरेचनादिका कारण हु ग्रहग की है दुगंध तेलादिक
६ लगा है अन्तर गर्ने औषधित अनुराग नाही है तैसे
सम्पादृष्टि निरा छक है तो ह वर्तमानके दुख मेटने
योग्य न्यायके पियर्यानको बाछा करै है ।
प्रत्याख्यानातरण कपातका अमार भया ते अपना मी सड
हा ता हु विषयगछा नाही कर है यात सम्बन्टि
अशुभकर्मके उदय प्राप्त भई अशुभ मामग्री तिनम 'लानि
नाही करें परिणाम नाहीं बिगाडे है मैं पूर्व जमा धर्म
बाध्या तैम। भोजन स्त्री पुन दरिद्र सम्पदा आपदार
प्राप्त भया हूँ तथा अन्य किसी रोगी दरिद्रीहीन नाच
मोन देसि परिणाम नाही निगाडे है आपकी सामग्री
जाना कलुपता नाही की है तथा मलमूत्र कर्दमादिकदव्या
दपि आ भयकर स्मशान बनादि दसि
दुपदायो कालक दसि दुष्टपना कडयापना इत्यादिक
वस्नुका समापा देखि अपना परिणाममैं क्लेशित नाही
हाना सो निर्विचिकित्सित अग सम्यग्दृष्टिके होप ही
भयरूप

है। बहुरि सोटे शास्वनित तथा व्यतरादिकटेननिकृत निक्रियात तथा मणि । मन्त्र औपधादिकनिके प्रभारत अनेक वस्तुनिके विपरीत स्वभार देसि सत्यार्थवर्मत चलायमान नाही होना सा सम्यग्दर्शनका अमूढदृष्टि गुण सो सम्य दृष्टि के हाय हो है। बहुरि सम्यग्दृष्ट अन्य जीवनिके अज्ञान ते अशक्ततात लगे हुये दोष देसि आच्छादन करे है जो मसारीजीर ज्ञानावरण दर्शनावरण मोहनीय कर्मके वशि होय अपना भूल रहे हैं कर्मके आधीन असत्य परधन- हरण कुशीलादि पापनिपं अमृत्ति कर है जे पापनिते दरि प्रगत है ते धन्य हैं। बहुरि कोऊ धर्मात्मापुरुष ( मामीपुरुष ) पापके उदयतें चूकि जाय ताकू देसि ऐसा "विचार जो यो दोप प्रगट हासी तो अन्य धर्मात्मा अर जिनधर्मकी वडी निन्दा होमी या जानि टोप अच्छादन कर अर अपना गुण हाय ताकी प्रशंमाका इच्छुक नाहीं हाय है सो यो उपगृहनगुण सम्यक्त्वको है इनगुणनित पवित्र उज्वल दर्शन विशुद्धता नाम भावना होय है। नहुरि जो धर्ममहित पुरुषका परिणाम कदाचित् रोगको वेदनाकरि धर्मत चलिजाय तथा दाग्द्रिकरि चलि जाय तथा उपमर्ग "परीपहनिकरि चलिजाय तथा अमहायता करि तथा अहार-

(८)
पानका निरोधसरि परिणाम धर्म शिथिल होजाय तार
उपदाकरि धर्म स्तम्भन कर । भो शानी मा धर्म
क धारप तम मचंत हा स कायरता धारण करि
धर्मम शिथिल भय हो रोगरी पेदनासे धर्मत चिगो है।
भानो होय में भूने। हा यो अमातावेदनीकर्म अपना
अपमर पाय उदयम आय गया है अब जो कायर होय
दीनताकरि रुटनविलापाटि करते भोगोगे तो कर्म नाही
छाडेगा कर्मके दया नाही हाय है और धीरपनातें
मांगोगे तो म नाही छाडेगा काऊ देय दब दानव
मन्त्र तन्त्र ओपधादिक तथा सी पुत्र मित्र याधर सेरक
सुभटादि उदयर्म आयुकर्म हरनेक समर्थ है नाही यो
तुम अच्छी तरह समझो है। अब इम वेदनाम कायर
होय अपना धर्म और यश और परलोक उनक कम
विगाड़ी ही अर इनक निगाडि स्वछन्द चेष्टा पिलापादि
करनेते वेदना नाही घट है ज्या ज्या कापर हावागे
त्यो त्यो वेदना दुम बढेगा। तात मा साहस धारण
करि परम धर्मका शरण ग्रहण करा । समारत नरकके
विर्यचनिके क्षुधा सुपा रोग सताय ताडन मारण
'शीत उणादिक धोर दुख असरयात कालपर्यन्त अनेक

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(६)
पार अनन्तमव धारणकरि भोगे ये तुन्हारे कहा दुःख
है अल्पकालमैं निर्जरगा अर रोग वेदना देहरू मारेगा
तुम्हारा केतनस्वरूप आत्माक नाही मारेगा। अर देह
का मारना अवश्य हायगा जो देह धारण किया ताऊं
अवश्यम्भात्री मरण है सो अर सर्चत हाहू यो र्पका
जीतवाको अवसर है अर भगान पचपरमेष्ठोका शरण
गहण करि अपना अजर अमर असण्ट जाता दृष्टा
स्वरूपका ग्रहण करो ऐसा अपमर फेरि मिल्ना दुर्लभ
है इत्यादिक धर्मका उपदेश देय धर्ममें दृढ करना अर
अनित्यय असरणादि भावना ग्रहण शीघ्र करावना त्याग
तादिक छाडि दिये होय तो फिर ग्रहण करापना तथा
शरीरका मकनादिक दुस दूर करना अर काउ टहल
करनेवाला नाही होय तो आप टहल करना अन्य साधीनका
मेल मिलादना आहार पान औपधादि करि स्थितिकरण करना
तथा मलमृत्रकफादिक हाय तो धोवना पूछना इत्यादिक
करि स्थिर करना तथा दारिद्र करि चलायमान होप
तिनका भोजनपानादिक करि आजीविकादिक लगाय देनेकरि
उपसर्ग परीपहादिक दर करने करि मत्यार्थधर्ममें स्थापना
करना सो स्थितिकरण अङ्ग सम्यदृष्टिक होय है। पहरि

यात्मल्यनामगुण सम्पादृष्टिके हाय है ममारी जीरनिकी प्राति तो अपने स्त्री पुनादिरनिमैं तथा इन्द्रयनिके पिपय भोगनिम धनकै उपानिमे बहुत रहै है जाके स्त्री पुन धन परिग्रह पिपयादिकनिक ससार परिभूमणके कारण जानि अन्तरङ्गम वीतरागता धारणकरि जाकी धर्मात्मामैं रनायके 'धारक मुनि अजिंका श्राफ श्राषिरामै वा धर्म आयत- ननिम अत्यन्त प्रीति होय ताक सम्यग्दर्शनका वात्सल्य अग होय है। बहुरि जो अपने मनकरि वचनकरि कापारि धनकरि दानकरि तकरि तप भक्तिकरि सनरका प्रभार 'प्रगट कर से मार्ग प्रमारना अग है याका निशप प्रभारना अगकी भावना वणन करियेगा । ऐम सम्यग्दर्शन अष्ट अग धारण करने इनगुणनिका प्रतिपक्षो शकाकाक्षादिक दोपनिका अभावकरि दशन रिशुद्धता हाय है । महुरि लोक्महता देवमूहता गुरुमूढताका परिणाम निक छोडि श्रद्धाना उज्जल करना । अन लोक मूढताका "स्वरूप ऐसा है जो मृतकनिका हाड नसादिक गगामें पहुंचाने में सुगति भई मानें हैं तथा गगाजला उत्तम मानना तथा गगास्नानमें अन्य नदीके स्लान नदीकी लहर लेनेम धर्म मानना तथा मृतक भताके साथ जोगती

स्त्री तथा दासी अनिमें दग्ध हो जाय जाकृ सती मानि
पूजना मरयाक पितरमानि पूजना, पितरनिक पातडीमें
स्थापना करि पहरना तथा सुर्य चन्दमा मगलादिक
सेहनिक सुवर्णरुपाका वनाय गलेमे पहरना तथा ग्रहनिका
दोष दूर करनेकू दानदेना सक्रान्ति व्यतिपात सोमोतो
'अमावसी मानि , दान करना सूर्यचन्दमाका ग्रहणका
निमित्तत स्नान करना डामक शुद्ध माननो हस्तीके दतनिक
शुद्ध मानना का पूजनो सूर्यचन्द्रमाक अर्ध देना. देहली
पूजना, भूशलक् पूजना, छींकक पजनो, विनायक
नामकरि गणेश पूजना तथा दीपकको जोतिक पूजना
तथा देवताकी योलारी चौलना अडूला चोटो रसना देवताको
भेटके करारतें अपना पतानादिकका जीरन मानना
सताना देवताका दिया मोनना तया अपने लाम वास्ते
तथा कार्य सिद्धि पास्ते ऐमी चीनती करे जो मेरे एतो
लाभ हो जाय तया सतानोंका या रोग मिटि जाय तथो
सतान हो जाय या वैरीका नाश हो जाय तो मैं आपके
छन चढाऊ मकान बनाऊं इतना धद मैंट करु ऐमा
करार करे है देवताकू सौक (हिरसरत), देय कार्यकी
सिद्धिके वास्ते बांछे है। तथा रात जगा 'करना कुलदेव

(४)
अत्यत अमाव होय है तार्क दर्शन पिशुद्धता होय है
सम्पष्टिके मांचा विचार ऐसा है ह आत्मन् या उच्च जाति
है सो तुम्हारा समार नाही यह तो कर्मको परिणमनि,
पाकृत विनाशीक, कर्मनिकै आधीन है। समारम अनेकधार
अनेकनाति पाई, माताको पक्षक जाति कहिये और जीप
अनेकवार चाडालोके तथा भीलनो के तथा मोक्षणोके,
चमारीके, धोपडिके, नायणिके, ड्रमणीके, नटनीके, वेश्यक
दासीके कलालीके, धीररो इत्यादि मनुष्यनिके गर्भम उपज्या
तथा सुकरी,, कारी, गईमो, स्यारणो, कागलो, इल्पादिकी
तिर्यचनिके गर्भमें अनतवार उपजि मरया ।
नोचनाति पाचे तव एका उच्चजाति पा फिर अनतधार
नीच जानिपा तर एकबार उचजाति पान ऐसे उचजाति
भो अनतवार पाई तो हूँ मसारपरिभ्रमण ही क्यिा, अर
ऐसे ही पिताको पक्षमा कुल हू उचा नीचा अनतबार
प्राप्त भया ससारम जातिका कुलमा मद से करिये।
म्वर्गका नहद्धिकदय हरिकरि एकेन्द्री आय उपर्ने तथा
स्मानादिक निन्य तिर्यचनिमैं उपन तथा उत्तमकुलको धारक
हाय सो चाडालमै जाय उपज वात जातिएर में अहकार
करना मिथ्यादशन है। हे आत्मम् ! तुम्हारा जाविकुल
अन्वयार

या सिद्धनिके ममान तुम आपामूलि माताका रुचिर पिताको
वीर्यते उपजे जातिकुलमे मिथ्या - आपा धरि कर हु अनतकाल
दिगोदनाम मति करी। वोतरागका उपदेश ग्रहण कया
तो इस देहको जाति हू सयम शील दया सत्यरचनाटिकरि
सफल करी जो मैं उत्तम जातिकुल पाय नोच कर्मीनिकेसे
हिंसा असत्य परधन हरण कुशोलसेपन अभक्ष्य भक्षणादि
अयाय पाचरण से करु नाही करु ऐमा अहकार करना
योन्य है सम्याष्टिके सर्मकृत पुदगलपर्यायमे कदाचित
आत्मबुद्धि नाीं होय है। बहुरि ऐश्वर्य पाय ताफा गद
कैसे करिये या ऐपर्य तो ओपा भुलाय बहु आरम्म राग
पादिकमै प्रवृत्ति कराय चतुर्गतिमें परिभमणका कारण
है और निर्गथपना तीनलाम्मे ध्यापने यागि है पूज्य है
अर यो ऐश्चर्य क्षणभगुर है बडे बडे इन्द्र अहमिन्द्रानिका
पतनसहित है बलभद्र नारायणनिका ऐश्वर्य क्षणमामे
नष्ट हो गया अन्यजीवनिका ऐश्वर्य केतक है एमें
जानि ऐश्वर्य दाय दिन पाया है तो दुसित जीवनिया
उपकार करो मिनयवान होय दान देहु परमात्मस्वरूप अपना
ऐशय जानि इस कर्मकृत ऐश्वर्य में रिक्त होना योग्य है।
बहुरि रूपमा मद मति करो यो विनाशीक पुद्गलको रूप
-

नाही पिनाशीक है क्षणक्षणमे नष्ट होय है इसरूपकू रोग
वियोग दरिद्र महायुरूप करेगा ऐमा हाडचोमको रूपमैं
रोगी होय मद करना पडा अनर्थ है इम आत्साकारूप तो
केरल ज्ञान है जिसमे लोग अलाके सर्व प्रतिविम्बित हाय
हैं ताते चमडाका रूपमैं अपा छाडि अपना अधिनाशी ज्ञान
स्वरूपमै नापाधारहू बहुरिं श्रुतिका गए छाडहू आत्मज्ञान
रहितका श्रुति निष्फल है जाते एकादशअगनका ज्ञान सहित
डोय करम्ह अभव्य ससारहीमें परिभ्रमण कर है सम्पदशन
बिना अनेक व्याकरण छन्द अलङ्कार काव्य कोपादिक
पटना पिपरोत धर्मम अभिमान लोभम प्रवर्तन कराय संपार
रूप अन्यरमे डुवायने अर्थि जानह और इस दरिद्रजनित
ज्ञानका कहा गई है एकक्षणमे बातचीच कफादिक्के घटने
अधनेत जान चलायमान होय जाय है अर इन्द्रियजनित
ज्ञान तो इन्द्रायनिका पिनाशोक माथ ही बिन्दोगा अर
मिथ्याज्ञान तो ज्यो यचंगा त्यो साटे काव्य खोटी टोका-
दिकनिकी रचनामें प्रवर्तन कराय अनेक जपनि दुराचारमैं
प्रवर्तन कराय डुवायदेगा ताटं श्रुतका मद छोड़ा ज्ञान पाय
आत्मविशुद्धता करई ज्ञान पाय आझानो कैसे आचरणकार
ससारमें भ्रमण करना योग्य नाही । बहुरि समकवाव बिना

प्रिशसा- मिथ्याप्टिका तप निष्फल है तपको मद करो हो जो मैं नडा तपस्सी है सौ मदके प्रमानत बुद्धि नष्ट करिक यो तप दुर्गतिमै परिभ्रमण करावंगा- तात तपका गर्व करना महा अनर्थ जानि भव्यनिक तपमा गर्वना योग्य नाही है । बहुरि जिस चलकरि कर्मरूप रोकू जीतिये तथा काम क्रोध लोभत जोतिये सो बल तो योग्य है अर देहका नल यौननका ऐश्वर्यका चल पाय अन्य निर्मल अनाथ जीनिक् मारि लेना धन सोसिलेना जमी जीविका खोसिलेना कुशील सेवन करना दुराचारमै पार्तन करना से पल तो नर्क के घोर दु.स असरयात- काल भोगाय तियचगतिमैं मारणता डनलादन करि तथा दुर्वचन तथा क्षुधा तपादिकनिके दुःख अनेक पर्यायनिमें भुगताय एकेन्द्रियनिमैं समस्त बलरहित असमर्थ काँगा । ताते चलका मद छाडि क्षमा ग्रहण करि उत्तमतपमैंग्न वर्तन करना योग्य है। बहुरि जे विज्ञान कहिये अनेक हस्तकला अनेक वचनाला अनेक मनके विकल्प जिनकरि-यो आत्मा चतुर्ग- तिरूप ससारमे परिभ्रमण करि दुःख भोग है ते समस्त कुज्ञान हैं। इस ससारमे-सोटीकला चतुरताका बडा गर्व

(१८)
है जो हमारा सामर्थ्य ऐसा है कहो तो सांयक झूठेकू
सावा फरिदेवं कलक रहितक् कलकमहित करिदेव
अदण्डनिक दढ देने योग्य करि देखें पहुत दिननिका
सचय किया हुआ द्रन्यक कढ़ा लें. क्या धर्म छुटाय
अन्यथा श्रद्धान कराय देवं क्या प्राणीनिके वशीकरण
तथा अनेक जीवनिका मारण तथा अनेक जलमें गमन
करनेके, स्थलमें गमन करनेके, आकाशमै गमन करनेके,
अनेक यन्त्र बनायदेव इत्यादिक कलाचातुर्य है ते मय
कुशान है याका गर्न नरकके घोर दापका कारण है
कलाचातुर्य सम्यक् तो सो है नावं अपना आत्माक्
विषयपायके उलझाडत सुलझावना तथा लोकनिक हिंसा-
रहित सत्यमार्गमैं प्रपर्वावना है, ऐसे सत्यार्थ वस्तुका
स्वरूप समझि जाति, कुल धन, ऐश्वर्यरूप, विज्ञानादिकल,
कर्मके अधीन जानि इनका मद छाडि दर्शनविसुद्धता
करो। ऐसें तीन मृढता और आठ शंकादिक शेष
अर पट्अनायतन अर अष्टमद
ऐसें पचीस देोपका
परिहार करि सम्यग्दशनकी उन्नलवा होय है ऐमें जानि
दर्शनविशुर भावनाही निरन्तर चिन्तवनकरि अर याही
ध्यान गोचरकरि स्तुति सहित उज्जलता होय है ऐसे

(१८) जानि दर्शन विशुद्ध भावनाही निरन्तर चिन्तपनकारि अर याहीकू ध्यानगोचर करि स्तुति महित उज्जल अर्ध उतारण कर सो मुक्तिस्त्रीय सम्बन्ध कर है। ऐसे दर्शन पिशुद्धता नाम प्रथम भावना वर्णन करी ॥१॥ अब आग विनयसम्पन्नता नाम दजी भावना कहिये हैं सा-विनय पचप्रकार कया है दर्शनविनय, ज्ञान विनय, चरित्र विनय, उपचारविषय । तहा जो अपने श्रद्धानके शकादिकदोष नाहीं लगाना तथा सम्यग्दर्शन की रिशुद्धताकरि ही अपना जन्म सफल मानना सम्यग्दर्शन के धारकनिमें प्रीति धारना आत्मा अर परका मेद विज्ञानका अनुभव करना सो दर्शनविनय है। बहुरि सम्यग्ज्ञान के आरोधनमैं उद्यम करना, सम्पज्ञानकी कंपनी मे आदर करना तथा सम्पज्ञानके कारण अनेकांत रूप जिनसून तिनके श्रवण पठनमैं बहुत उत्माहरूप होना तथा चन्दना स्तवनपूर्वक बहुत आदरतै पढना सो ज्ञानविनय है तथा ज्ञानके आराधक ज्ञानीजनाका तथा जिनागमके पुस्तकनिका सयोगका पडा लाम मानना सत्कार स्तवन यादरादिक करना सेो ज्ञानविनय है। बहुरि अपनी भक्ति प्रमाण चारित्र धारणमैं हर्ष करना दिन दिन पारित्रकी

(२०)
उज्नलाता अर्थि विषयकपायनिक घटापना तथा चारित्र
के धारकमिले गुणनिमें अनुराग स्तपन जादर करना से
चारितग्निय है । यहुरि इच्छाा रोकि मिले हुए पियनिमें
मतोप धारणकरि ध्यानस्वाध्यायमें उद्यमी होय कामके
जीतने अर इन्द्रियनिके पिपयनिमें प्रवृत्ति रोकने
जनशनादिक्तपमें उद्यम करना सेो तपविनय है। घरि
इन च्यारि अराधना का उपदेशकरि मोक्ष मार्ग प्रार्वन
कराननेनाले हैं तथा निनके स्मरण करने परिणामनिका
मल दूर होय पिशुद्धता प्रगट हो जाय ऐसे पचपरमेटी
के नामकी स्थापनाका विषय बन्दना स्तान करना सो
उपचार पिनय है। अन्य हू उपचार विनय का बहुत
भेद है अभिमानक छाडि अष्टमदका अत्यन्त
जाके हाय कठोरता छुटि कोमलता जाके प्रगट हाय ताके
नम्रपना प्रगट होय है ताके मत्यार्थ ऐमा विचार है यो
धन योवन जीउन क्षणभगुर है कर्मके आधीन है काऊ
जीव हमतें क्लेशित मति हाहु सफल सम्पन्ध नियोग
महित है इहा केते काल रहगा समय समय काल
सन्मुस असण्ड गमन करू हु केऊ वस्तुका सम्बन्ध थिर
है यहा पिनय धर्म ही भगवान मनुष्य जन्मका
अभार
-

सार कझा है यो विनय ससाररूप वृक्षके टग्धा करनेक आग्न हैं यो विनय है सो गैलोक्यपर्ती जीवनिके मन की उज्जलता है आ विनय है सो समस्त जिन शासनको मूल है विनमरहितके जिनेन्द्रकी शिक्षा ग्रहण नाही, होय है विनय- रहित जीन समस्त देोपनिका पान है विनय है सो मिथ्याश्रद्धा- दानके छेदनेकू सूल है विनय पिना मनुष्यरूप चामडाको वृक्ष मानरूप अग्निकरि भम्म हाय हे अर मानकायकरिके यहा ही घोर दुख सहै है अर परलोकमै निन्द्यचाति कुलरूप बुद्धिहीन चलहीन उपजे है जे अभिमानी यहा किंचित यचनमान ह नाही मह है ते तिर्यचगतिमे नासिकामे मूजका जेरडाका बधन लादन मारण लात ठोकराका घात चामडाका मरमस्थानमे घात पराधीन हुआ भोगे है तथा चाडालनिके मलीन घर में बन्धनते बन्ध रहे हैं जिन ऊपर मलादि निन्धरस्तु लादिये है और इस लोकम ह अभिमानीके समस्त लोक वैरी हो जाय हैं अभिमानीकू समस्त निन्द हैं महा अपयश प्रगट होय है समस्त लोक अभिमानों का पतन चाहै है मानरुपायत क्रोध प्रगट होय कपट विस्तर अतिलोम 'कर दुर्वचननिमे प्रवर्तन कर कलोमे जेती अनीति है तितनी मानकपाय हाय है। परधन 1 हरणादिक हू अपने अभिमान पुष्ट करने कर है यात इस जीमका बडा बैरी मानपाय है यात विनय गुणमें महान आदरकरि अपना दोऊ लोक उज्जल करो सो विनय देवको शास्त्रको, गुरुनिको मन, पचन, कायतें प्रत्यक्ष करो अर परोक्ष हू करो तहा देव जो भगनान अरहन्त समवशरण निभूति सहित गन्धकुटीके मध्य सिंहासन उसरि अन्तरीक्ष विराजमोन चौसठ चमनिकरि चीज्यमान छत्रयादिक पाविहार्यनिकरि निभूपित कोटिसूर्य समान उद्यात का धारकपरमीदारिकदेहमे निष्ठता द्वादशसभाकरि सेरित दिव्य धनिकरि अनेकजीवनिका उपकार करनेवाले अरहन्तको चिन्तन करि ध्यान करना सो मनकरि पराक्षविनय है। याका विनय- पूर्वक स्तान करना सेो वचनकरि पराक्ष विनय है। अजुनिजोडि मम्तक चढाय नमस्कार करना से कामकरि पराक्षरिनय है । बहुरि जो जिने द्रको प्रतिविम्बकी परम मुद्रार प्रत्यक्ष नेत्रनित अवलोकन करि महा आनन्दत मनमे ध्यानकरि अ पक कृतकृत्य मानना सेो मन करि प्रत्यक्षनिनय है जिनेन्द्रका प्रतिबिम्बके सन्मुस होय स्तवन करना से प्रत्यक्ष वचननिनय है। अजलि मस्तक चढाय बन्दना करना तथा भूनिमें अंजुलिसहित मस्तक गोडानिका स्पर्शनकरि नमस्कार (२३) करना सो कायकरि प्रत्यक्ष विनय है। तथा सर्वज्ञ वीतराग परमात्मा जिनेन्द्रका नामका स्मग्ण ध्यान चन्दना स्तवन करना सो समस्त परोक्षपिनय है। ऐसे देवका विनय समस्त अशुभकर्मनिका नाश करनेवाला कया है। बहुरि जो निग्रन्थ चीतरागी मुनीश्वरनिक् प्रत्यक्ष देखि सडा होना आनद- सहित सन्मुस जानास्तवन करना वन्दना करना गुरुनिकू आगंकरि पाछ चलना कदाचित् वरावर चालाना होय तो गुरुनिके नामतरफ चालना गुरुनिक अपने दक्षिण भागमे करके चालना बैठना, गुरूनिक विद्यमान होते आप उपदेश नाही करना कोऊ प्रश्न करे तो गुरुनिके होते आप उत्तर नाही देना अर गुरुनिकी इच्छाके अनूकुल उत्तर देना गुरुनिके होते उच्च आमन नाही चैठना अर गुरु व्याख्यान उपदेशादिक कर ताकू अजुलि जोडि बहात आदरतै ग्रहण करना गुरुनिका गुणनिम अनुराग करि आनाके अनुकूल प्रवर्तन करना अर गुरु द्रक्षेत्रमै होय तो पाकी जो आना होय तैम प्रवर्तन करना दूरदीत गुरुनि काध्यान स्तवन नमस्कारादि विनय करना सो गुरुका विनय है। सहुरि शास्त्रका विनय करना बडा आदरत पठन श्रमण करना द्रव्य क्षेत्र काल माक्कू व्याख्यानाद करना शास्त्रका कया व्रत सयमादिक आपत नाही पनि सके तो आज्ञा

(२४)
का लोप नाही करना इनकी आज्ञा होय तिस प्रमाण ही कहना
तथा जो सूत्रकी आज्ञा होय ताडू एकाग्रचित्तत श्रवण करना
अंग करते अन्य कथा नाहीं करना आदरपूर्वक मौनत श्रवण
करना जर जो मशय होय तो सशय दूर करनेक विनयपूर्वक
अल्प अक्षरनिकरि जैसे सभा के अर लोकनिकै अर वक्ताकै क्षोभ
नाही उपजे तैम नियमपूर्वक प्रश्न करना उत्तर आदरतें
अङ्गीकार करना सो शास्त्रका विनय है तथा शास्त्रकू उच्च
आमनपर धरि नीचा नैठना प्रशसा स्तवन करना इत्यादिक
शास्त्रका पिनद करना ऐमें देव गुरु शास्त्रका विनय है सो धर्म
का मूल है। बहुरि जो रागद्व पकरि आन्माला घात जैसे
नाहीं होय तेस प्रवर्तन करना सो आत्माका विनय है जात
ऐसा विचार है अब यो मेरो जीव चतुर्गतिम मवि परिभ्रमण
करो अब मेरा आत्मा मिथ्यात्व पाय अविनयादिक करि
ससार परिभ्रमणके दुस मति प्राप्त होहू ऐसे चिन्तयन करना
मिथ्यात्व कपाय अविनयादिक करि जात्माका झानादिक गुण
थात नाही करना से आत्माका पिनय है यादीकू निश्चय ययन
कहिये है यह तो परमार्थ विनय कह्या अब यहा ऐसा विशेष
जानना आके मान कपाय घटि जाय ताहीके व्यवहार विनय है
कोऊ जीवका मोत अपमान मति हाहू जो अन्यका सन्मान

करेगा सो आपह मन्मानक प्राप्त होयगा जो अन्यको अपमान करेगा से आपहू अपमानकू प्राप्त होय है नो समस्त मिष्ट बचन बोलेना सो विनय है किसी जीपक तिरस्कारनाहीं करना सोहनिय ही है। अपने घर आया ताका यथायोग्य सत्कार करना किमोफू सन्मुस जाय ल्यापना किसीकू उठि सडा होना एक हस्तक माथे माथै चढामना किमोकू आइये ३ इत्यादिक तीन वार कहि अगोकार करना कोऊकू ओदरकरि नजीक बैठापना फिमीर आमनदान देना किमीक आनो, बैठो, किसीक शरीरको कुशल पूछना तथा हम आपके हैं हम आज्ञा करिये भोजनपान करिये यह आपहीका गृह है ये गृह - आपके आग्नेत उच्च भया है नापकी कृपा हमारे पर सनातन है ऐसे हू व्यवहार विनय है तथा कोऊकू हस्त उठाय माथे चढापना एता ही निनय है यह समस्त व्यवहारविनय है और हु दान मन्मान कुशल एछना रोगी दुसीका चयावृत्य करना से भी विनयपानहीके होय है दु.सित मनुष्य तिर्यचननिक पिसास देना दुःखित होय आपका दु स कहने आया होय ताफा दुःस श्रवण करना अपना सामथ्य प्रमाण उपकार करना नाहीं बननेका होय तो धीरता मतोपादिकका उपदेश देना ऐसे व्यवहार बिनय है से परमार्थ विनयका कारण है यशक उप-

जाव है धर्मकी प्रभारना कर है मिथ्याप्टिका हु अपमान नाही
करना मिष्टबचन बोलना यथायोग्य आदर सत्कार करना याही
विनय है महापापी द्रोही दुराचारीक हू कुनचन नाहीं करना
एकेन्द्रिय निकलेन्द्रियादिक तथा सानिक दुष्टजीव तिनकी
विराधना नाही करना याकी रक्षाफरि प्रवर्तना सो हो इनका
विनय है अन्यधर्मीनिका मन्दिरप्रतिमादिकनै वेर फरि निन्दा
नाही करना ऐमा परमार्थ व्यवहार दोऊ प्रकार विनयको
धारणकरि गृहस्थक्क पूर्वन करना योग्य है। येसो सकलमग
परित्यागो वीतरागी मुनिश्वरहूकू कोऊ मिथ्यादृष्टि बन्दना
कर ताफू आशीवाद न्यै चाडाल भील धीवरादिक अधर्म जाति
हू वन्दना कर तालू पापक्षयास्तु इत्यादिक आशीर्वाद देह वात
विनयअग धारण करो हो तो चाल आनान धर्मरहितका तथा
नीच अधर्म जाति होय ताका हूँ गिनय नाही करो तो हु
तिरस्कार निन्दा कदाचित करना उचित नाही है डम मनुष्य
जन्मका मण्डन विनय ही है रिनय बिनो मनुष्यजन्मकी एक
घडी भी हमारे मति जावो ऐसे भगवान गणधर देव कहें है
ऐसा विनयगुणकी महिमा जानि याका महान अर्थ उतारण
करो। हे विनपसपन्नता अग इमारे हृदयमें तू ही निर तर
वाम करि तेरे प्रमादतें अब मेरा आत्मा कदाचित अष्ट

(२) मदनिकरि अभिमान मति पाप्ति होहु ऐसे नियसपन्नता नाम अंगकी दूजी भावना वर्णन करी ॥२॥ अब तीसरी शीलवतेवनतीचार भानना कहे हैं:-शील- मतेप्यनतीचारका ऐसो अर्थ बार्तिकमें कया है अहिंसोदिक पचनत अर इन चूतनिका पालनके अर्थ क्रोधादिकपायका वर्ज- नादिकरूप शोलविषय जो मननचन कायको निदोप प्रवृत्ति सो शीलनततेपनतिचार भानना है शील नाम आत्म स्वर्भावका है आत्मस्वभावका नाश करनेवाला हिंसादिक पांच पाप हैं वित मैं कामसेवन नाम एक ही पाप हिमादिक ममस्त पापनिक पुष्ट कर है अर कोधादिकपायनिको तीपता कर है तात यहाँ जयमालाम ब्रह्मचर्यकी ही प्रधानताकरि वर्णन करिये है यो शील दुर्गतिक दुसका हरनेवाला है स्वर्गादिक शुयगतिका कारण हे तप व्रत मयमका जोपन है शील गिना तप करना तधरना मयम पालना मृतकका अग समान देखने मान है कार्यकारी नाही तसे शोलरहितका तप प्रत मयम धर्मकी निन्दा करानेवाला है ऐसा जानि शील नोम धर्मका अंगकू पालना करहु अर चचल मनरूप पक्षोक ठमो अविचार रहित शुद्धशीलतू पुष्ट करो धर्मरूपरनके विघम करनेवाला मनरूप मदोन्मत्त हस्तीकू रोको चलायमान हुआ मनरूपहस्ती महान (२८) अनर्थ कर हैं हस्ती मदवान होय तदि ठाणमैत निकाल भाग है अर मनरूपदस्ती कामकरि उन्मत्त हात तर समभोप- रूपी टाणत निकलिभाग है तथा कुलकी मयादा मतोपादि छाडि निकस है मदोन्मत्तहस्ती तो माकल तुडाय जाय है अर मनरूपहस्ती सुबुद्धिस्प साफल तोडि पिचर है हस्ती तो मार्ग मैं चलापनेवाला महाबतक नारी है अर कामीका मन सम्य- धर्मके मार्गम प्रवतावनेवाला मानकू छोड है हस्सी तो अकु- शक नाही माने है और हनरूपहस्ती गुरुनिक शिक्षाकारो वरना नाहों माने है हस्ती तो महाफल अर छायाका देने- वाला वृक्षर उसाडि पटक है अर कामकरि व्याप्त मन है सो स्वर्गमोक्षरूप फल का देनेाला अर यशरूप मुगन्धा विस्ता- रता सकलविपयाकी आत.पर हरनेवाला ब्रह्मचर्यस्प वृक्षक उसाडि डाल है हस्ती तो मल कर्दमादिक दूर करनेवाला सरो- वरम स्नानकरि मस्तक ऊपरि लि नासता धुलिरजम् ब्रोडा कर हे और कामरि व्याप्त मन सिद्धावा, करि अनेक नरूप मलक गोय कोडा र है हस्ती तो अर कामसयुक्त मन धारण कर है हस्ती तो byy

(२८)
कुबुद्धिरूप हस्तिनी में रचै है हस्ती हु स्वछन्द डोले मनहू
स्वच्छन्द डोले हस्ती तो मदकरिके मत्त है कामी का मन रूपा-
दिक अष्टमदकरि मत्त है हली के नजीक तो कोऊ पथिक
नोहीं आ दूर भागिनाय अर कामकरि उन्मत्तके नजीक कोऊ
एकह गुण नाही रहे है यात इस काम उन्मत्त मनरूपी
हस्तीक धरायरूप स्थभर यायो यो सुल्यो हुरो महा अनर्थ
करगा यो काम अनग है याक अङ्ग नाहीं है यो तो मनजिस
है मनही मैं याझा जन्म है ज्ञानकू मथन करनेवाला है याहीत
याक् मनमथ कहिये है।
सारको अरि कहिये बरी है यात सारारि कहिये है काम
ते खोटा दर्प जो गई सो उपज है यात या कन्दर्प कहिये
है या करि अनेक मनुष्य तिर्यच परस्पर विरोधकरि मरि जाय
हैं याते या मार कहिये है याहीत मनुष्यनिमें अन्य इन्द्रियन
के भोग तो प्रगट हैं अर कामके अगह ढके हुये है कानके अग
का नाम ह उत्तमपुरुष है ते नाही उच्चारण कर है यो समान
अन्य पाप नाही है धर्मः भ्रष्ट करनेवाला कान है यो काम
हरिहरवलादिकिक भ्रष्टकरि आपके आधीन किये है याही है
समस्त जगता जीतनेवाला एक काम है याका विजय - करने-
शाला मोहक सहज ही जीते है याहोते कामके परिहारके अधि-
AN

(३०)
मनुप्यनी तथा देवांगना तथा तिर्यचनी इनका समर्ग संगति
कामविकारके उपजापनेवाली दर हीत परिहार करो स्त्रीनिमैं मन
वचनकापरि रागका त्याग करो आप कुशीलक मागर्म नाही
चलना अन्यकू कुशीलके मार्गका उपदेश मति करो अन्य कोऊ
कुशील के मार्ग प्रवर्तन कर तिनकी अनुमोदना भव्यजीव
नाही र है पालकास्त्रीक देखि पुनोगत् निर्विकार वृद्धि करो
अर मौवनरूप करीन्द्रऊपरि चढी लावण्य जो सौन्दर्यरूप जाका
सप अग डूमि रखा ऐसो रूपवतीस्त्रीमैं यहिणवत निर्विकार बुद्धि
फरहू अर वाक् सनमान दान मति करो। पचनकरि आलाप
मति करो शीलवान हैं दिनकी दृष्टि स्त्रीनिमें प्राप्ति होत ही
मुद्रित हो जाय हे घीनिमैं वचनालाप कर गा स्त्रीके सगनिका
अवलोकन फरगा तार्क शीलका भग अवश्य होयगा तातें जो
गृहस्य है वा तो एक अपनी स्त्रीविना अन्यधीनिकी सगति
तथा अवलोकन पचनालापकार परिहार अर अन्य सीनिकी
कथाका स्वप्नहमै पिचार नाही रह है अर एकान्तमैं माता
बहन पुत्रीकी सगति हू नाहीं करे है अर मुनीश्नर तो समस्त
नीमात्रका ही सम्बध नाही करे है लोनिमें उपदेश नाही
करें है जात नीका नाम ही प्रगट दोपनिक कह है।
स्त्रीसमोन इस जीवक नष्ट करनेवाला अन्य कोऊ अर कहिये

पैरी नाही वात उत्तम पुरुष याक नारी कई है दोष नक प्रत्यक्ष देसते देखते आच्छादन करे ताते याका नाम खी याका देखनेकरिपुरुष को पतन हो जाय तात याका नाम पत्नी है कुमरण करने का कारण है वात याको नाम कुमारी है याकी सगतकरि पौरुपवुद्धियलादिक नष्ट हो जाय योत याका नाम अबला है। ससार वधका कारण है यात याका नाम वधू है कुटिलतामायाचारका स्वभाव धारे हैं यात याका नाम चामा है याका नेत्रनिमें कुटिलता वस है यातै पाका नाम नामलोचना है शीलवतक इन्द्र नमस्कार ही है शीलनान पुरुष रत्ननयरूप धन लेय कामादिक लुटेरानिका भयरहित निर्मय निर्माण पुरी प्रीत गमन करे हैं शीलकरि भूपित रूप- रहित होय तथा मलोन होय रोगादिककरि च्याप्त हो जाय तो हू अपना ससर्गकरि समस्त समानियाभावना वर्णण करि ॥३॥ अब अभीक्ष्णज्ञानोपयोग नाम चौथो भाग्नाका वर्णन करें हैं। माआत्मन् ! यो मनुष्यजन्म पाय निरन्तर ज्ञानाम्यास ही करो ज्ञानको अभ्यासचिना एक क्षण ही व्यतीत मति करो शानके अभ्यास पिना मनुष्य पशु समान है यात योग्यकालमै जिन आगमका पाठ करो अर समभाव होय यदि ध्यान करो अर शास्त्रनिके आर्थका चिन्तवन करो अर बहुत ज्ञानी गुरुजन तिनमैं नम्रता बन्दना पिनयादिक करो अर धर्म श्रण करने के इच्छुक तिना धर्मका उपदेश करो याहीक अभीक्षणज्ञानोप- योग कहै हैं इस अमीगनानोपयोग नामगुणा अष्टद्र पनि ते पूजन करके याका अर्घ उतार करो अर पुष्पनिमी अजुली अप्र- भाग निक्षेपण करो इहा ज्ञानोपयोग हे से चैतन्यकी परिणति है याहीत क्षणक्षणमैं निरन्तर चैतन्यकी भावना करना। मेरे अनादिकालत काम क्रोध अभिमान लामादिक सग लागि रहे हैं इनका सस्कार अनादितै मेरे चैवन्पर्म धुलि रहे हैं अब ऐमो भावना होहू जो भगवानके परमागमका सेग्नका प्रभारत मेरा आत्मा रागद्वपादिक्त भिन्न अपना शायकस्वमार रूपहीमैं ठहरि जाय अर रागादिकनिकै वशीभूत नाहीं होय से ही मेरी वात्माका हित है अथवा नगीनशिप्पनिके आगे अवका अर्थको ऐमा प्रकाशकरना जो सशयादिक रहित शिष्यनिको हृदयमैं यथावत सपर पदार्थका स्वरूप प्रगट स्त्रीनिकू माहित कर है मुखित करै है! अर शोलरहित व्यभिचारी रूपकरि कामदेव समान है तो ह लोकनिमे अंधकार करिये है जात याका नाम ही कुशोल है शील नाम समावका है कामी मनुष्य का शील जो आत्माका स्वमार से सोटा हो जाय यात याकू चुशील कहिये है। यहरि कामी मनुष्य धर्मते आत्माका

स्वमारत व्यवहारका शुद्धतात चरि जय है यत यात
व्यभिचारी रहिये या समान उगमे अन्य कुकर्म नाही तात
कामक पुग्म रहिये है यात मनुष्य पशुबै समान हो जाय
यात याक पशुम रहिये ब्रह्मली जाण ताका शानदर्शनादि
म्यभार त.का धात यात होय है तात या अब्रह्म कहिले है
जात कुशीलाका सगनिन कुशीली हाय जाप है जो गोली
रक्षा करी से ही शाति तप नत मयग समस्त पालया। गरी
जो अपना स्वभापत नाही चलायमान होना ताक मुनायर
गील कह है शोर नामका गुण ममन्न गुणनिर्म वटा ई मील
कारि सहित पुर पश तो धाडा जव तप प्रचुर फलक फल है
अर शीलनिना बहुत ह तप नत है सा निष्फल है। इस प्रकार
जानि अपने आत्माम शीलको शुद्धता के अधि की कर नित्य
पूजन यो शीरमत मनुष्य जन्महामे है अन्यगतिमे नारी है
वात जन्म सफल किया चाहे तो शंकी ही उजरता का
ऐसे शील्पतेवनतीचार नाम उमरी हा जाय पाप पुण्यसाम्पत्प
लोफअलोकका स्वरूप मुनियानसा धर्म म्वरुप सत्याय
निर्णय हो जाय तस ज्ञानाम्याप करना तथा अपने चित्त
ससार देहभोगत विरक्तता चिन्तयन करना। ममारदह भोगनि

(४)
का यथार्थ स्यम्पमा चिन्तन करने गग टप माह माना
रिपरीत नाही सरिसर हैं। ममा व्यनिम ए নিশা
हुश्रा हूँ जात्माको मिन्न अनुभव गाय से ही मनोग
है नानाम्याग करके पियनिसरी घाटा नष्ट हाय है क्या
निका अमार होय है माया मिथ्या निदान तीन शासनान
के अभ्याम करिही नेट हाय है नानर न्यामही ते मन
स्थिर होय है नानके अभ्याम करपहा जनक प्रारम
रिल्प नष्ट हाय है ज्ञानाभ्याम फरक धर्म ध्यानम गुरल
ध्यानम अचल होय तिष्ठ है नानाभ्यामत हीनन र यमत
चलायमान नाही होय है मानाभ्याम परमहा मनेन्द्रमा
शामन ( आना) प्रत है अशुभ गर्मश नागट झानाभ्याय
करही हाय प्रभागना ह जिनधर्मी नानक जन्याम करक
ही हाय झानका जम्यामत लारनिका हृदयमैत पूर्व सचय
क्यिा ऐमो पापरूप प्रण नष्ट हाय जाय है जनानी धारतप
करि कोटि पूर्वम पिस कर्मक पिपान तिम वर्मा नानी
अन्तमुहर्तम सिपा है निनधर्म स्थभ ज्ञानस जन्यामही है
ज्ञानहोके प्रभागते ममस्त पियनिकी पांछा रहित होग
सीप धारण करिय है नानहींत उत्तमक्षमादि गुण प्रगट होय

है जाना-मामात ही अमयअभक्ष्य योग्यअयोग्य ग्रहण करने योग्यका विचार हाय है जान विना परमार्थ अर व्यवहार दोऊ नष्ट हो जार है ज्ञानरहित रानपुत्रहका निरादर होय है बान मम न को धन नाहीं है ज्ञानमा दान समान काऊ दान नाही है दुसित जीवक सुम्बितक सदा ज्ञानही शरणमे झानही म्रदेश - में जन्यपशम जादर करापनेसाला परम धन है जानवनसेकिमी किसी करि चा नार नाही किमीश दिये घटे नाही ज्ञान ही मम्पग्दर्शन उपनावे है न नहोते मेक्षि होय है मम्यग्यान आत्मा का मिनाशा स्वाधीन धन ह ज न निना मपार समुद्रमे डूबतेक हस्तार न देय मौन रक्षा करे ? विद्या समान आभूपण माही विधा दिना आभूषणमावत ही सत्पुरुषनिके आदरने योग्य होय नहीं है निधनके परमनिधान प्राप्त करनेवाला इक समन्यानही है य त हे भन्यजीवश ! भगवान रुमानिधान वीतराग गुरु तुमक्र या शिक्षा कर है अपनी आत्माक मण्यन्यानके अभ्यामही में लगायो अर मियादृष्टिनिकारि प्ररूप्या मिथ्या गानका दूरिही ते परिहार करो मम्यामिथ्यागी परीक्षा करि ग्रहण करा अपना मतानक पढायो अन्य नननिक् विद्या करावा जे धन होय अपने वनेक सफल त्या चाहोहाता पहन पहारनेनाले कू आजीविका- दिक यारि धिरता उगो पुगक सिर देवा चिया पहनमालक दवा पुगकाना शुद्ध मग कगो पठन पठन के अधि स्थान देनो निरन्तर पउन आगाहा भनु जन्मक काल व्यतीत करा या अपनर व्यतान हा ता चल्य जाय है जेते आयु शाम इन्द्रय उद्धि पनि रही है लेते मनुः जन्मको एक घडा हु मम्म जान बिना मति खारा बानरूपयर पालारुम टू लार जायणाडप अभाक्ष्णज्ञान पयागकी महिम सटि निहानि करि ह वर्गन नहीं करि कार है याहातं ज्ञाना पयागको परमशरण अथि गृहम्म धनसहित हाय मो भावन भाय और अर्घ उतारण कर गृक त्यागा हाय ते निरन्त भारना भानो जमा मनानापयाग नामा चायी भावना वर्ण रा॥४॥ अब पचमी मग भावनाका वणन है-नो समार दे भोगनित विरक्तपना सा मवग तथा धर्म पर वर्मका फल अनुराग मो मरग है जयमा ममार दह भोगनितें रिक्त हो परि धर्मम अनुराग करना मा मरग है । इहा समारम जि पुत्रमू र ग करिय है मा पुत्र नन्म लेत ही ता स्त्रीका यौन सौन्दयादिक निगाट है जाजम से पाछ बडी जाल

पडा काटकरि धनका सरचकरि पुगत धाइये है जर रोगा-
दिकनिका बडा जानता अर क्षणक्षणमें नडो सावधानीत महा-
माहो महारागी ग्लानिरहित हाय पडा कष्ट महिकरि वडा
करियह महा होय तदि जाला भोजन अच्छा स्त्र आछा आमरण
आठा म्यानाक हठतं ग्रहण करै है अरजो मूर्ख होर व्यसनी होय
तीनपायी होत्य ता रात्रिदिन क्लेश होनेका परिमाण नाही
कहनेमे आ है पुरके मोहतें परिग्रहम बडी मूळ न है अर
समर्थ हो जाय अर अपनी आज्ञाम मन्द होय तो महा आर्तरूप
हुआ मरणर्पत क्लेप नाही ठार्ड ओर जा पिताकू जपना
मार्य करनाला ममझे जैत प्रीति करें है असमर्थ होजाय ताम्
रानाही करें धनरहितका निरादर का है यात पुनका स्वरूपक
ममझि रागत्यागि परमधर्मसू राग करा पुरके अधि अन्यायतें
धनादिपरिग्रहके ग्रहणका परित्याग करो। बहुरि स्त्री हु मोह
नाम ठगिकी महापाशी है ममता उपजारनेवाली है तृष्णा
धावनेवाली है स्त्रीम तीवराग है सो वममे प्रवृद्धिका नाश कर
है लोमकू अत्यन्त प्रधान है परिग्रहमैं मूर्छा धावें है ध्यानम्या-
ध्यायमित्र कर पियनिमैं अन्ध करनेवाली है कोषा
दिक च्यारो कपारनिको तीनदा करनेवाली है संयमका घात

(३८) मरण निगा- करनेवला है लगता है दुध्यनका म्यान पाटो है इत्या दिसायनिक मलकारण जानि स्वीक सगम रागभान छाडि बार गाम् अपना मान्य करा। बहुरि फरिमालक मिा: यनि उनमापन हार है समस्न यम- ननिम महारी हैं धनवान दसे है तिनत अनेक प्रकार प्रकार पिनमा पर हैं निधन कार समापण नाही है तातें भा नानानन हा जो ममारपतनका भय है वा अन्यममसात मित्रता छाडि परसपने अनुराग र अर सार निरन्तर जन्म मरगप है पर अमानत हा मरणक मन्मुख निरन्तर प्रमाण २ है आतानन्तकाल जन्ममरण करते भया तात व परिपतनरूप नसाव पिरागता भाषा अर ये पव इन्द्रियनिक रिपय ह न जात्माका स्वरूपा भुलारनेवाले है तनाक ववारनेवाल है ZATI बग्नेवाल है नियनिकीमी आशाप तैलास्यन जन्य नाहा है पिपर है त नरकादिमागति क कारण हैं यमौ पराङ्ग मुत्र ३२ है पायनिक यधावनेवाले है अपना कल्याण चाह तिनक इन्हीत त्यागने योग्य है। जाना सिरात करनेवाले है जिसके समान मारनेवाले है रिस अर अभिममान दाहक उपनानेमार ह तातविश्यनिर्व रागछाडना ही परम ल्याई र शगर है सा रोगनिका म्यान ह महा- मलान दुर्गच मनातुमेव ह मलबादिकसरि भरा ह बातपित्त- कफमय है परनामावन्ति हलन चलनाटक कर है मामता सुवापागे बदनः उपना है ममस्व अशुचितरा पुन है दिन दिन जीर्ण होता चला जाय है कोटिनि उपाय र ह रक्षा रिणाहुना मरण प्राप्त हेत्य है ऐमा दहा गिगवा ही ए है ऐसे पुर मिन कल्न नमार भोग शरीर का दस कानेवाला मारूप जानि गिगमान्य प्राप्त होना सा मोग नग मान बार निरन्तर निचयन करना का श्रेष्ठ ह या मेर हत्य निरन्तर मवेग भारना शिग ऐमा चिन्तन करते समार देव मागमित रित्ता हार दि परमधर्ममें अनुराग हाय है। वर्मशब्द का अर्थ ऐमा जानना जो पम् का स्वभार है तो वर्म है तथा उत्तमसमाटि दशलक्षणस्प धर्म तथा रत्नत्रयम्बन्ध चर्म है तथा जीपनिका दयाम्प धर्म है से पर्यापधुद्धि शिपनि के समझायने अथि धर्मशब्द च्यारिप्रसारकारि वर्णन गि है तोह वस्तु जो आत्मा ताराम्बभार ही दशरक्षण है समादि टश प्रसार आन्मा हो म्यमान है अर मम्यग्दर्शन म्यानचग्नि है आत्मात भिन्न नाहीं है और दया है से आत्माही का स्वभाव ह सा ऐमा जिनेन्द्ररि जया मात्माका म्यभारस्प टम स्थ- रवणधर्मम जो जनुराग से मांग है अर वपटरहित कर धर्मम अनुराग करना सा सवंग धर्म है तथा मुनीवनमा पारफका धर्मम अनुराग से सग है तथा जीवनीमा माग्न स्प जोरनिका दयाम परिणाम हाना से भामान नाग रहा अथरा वस्तुजी जात्मा ताफा स्वभाव कालमान सरदर्शन : तिस स्वमाम लीन होना से प्रशमा कपन योग्य मांग है। चर्मम अनुराग परिणाम से मवेग है तथा धर्मका फार न्तमिप्ट जानना सोमवग है ये तीर्थरपना चस्पती हाना नारायण प्रतिनारायण पलभद्रादिक उपजना से धर्महार तथा वाधारहित रेली हाना तश स्वादिरनिम महान ऋद्धिका धारक देव होना तथा इन्द्र होना तथा जनरादिक विमानम अहमिन्द्र होना सा ममम्त पूर्वजन्ममैं आराधन रिया धर्म का ही फल है बहुरि जार जा भागभूमिमादिर उप जना राजमम्मदा पापना अखण्ड ऐश्वर्य पाना अनेक देशनिम आनाधन प्रवर्तना प्रचुर सम्पदा पापना रूपकी अधिस्ता पारना लकी अधिकता चतुरता महान पडितपना सलामें मान्यता निर्मलयशकी पिरयातता वृदिशी उज्वलता आनाकारी धमात्मा मुटुम्मका सयोग होना सत्पुस्पनिकी सगति मिल्ना रोग . (४१) रहित होना दीर्घ आयु-इन्द्रियनिको उज्वलता न्यायमार्गमैं प्रा- तैना वचनकी मिष्टता इत्यादिक उत्तममामग्रीका ,पारना है- साह काऊ धर्ममैं प्राति करी है तथा धर्मात्मानिका सेग्न किया है धर्मका तथा धर्मात्मानिको प्रशमा की है ताका फल है । कल्पन चिन्तामणि ममस्त, धर्मात्माके द्वारे ,सडे ,जानहू । धर्म फलकी महिमा काऊ कोटि जिह्वानिकरि कहनेक समर्थ नाहा हाइये है। ऐसे धर्मके फलक लाक्यमें उत्कृष्ट जान है ताक मवेग भावना होय है। .. बहुरि धर्मसहित, साधर्मीनिक देसि जानन्द उपजना तथा धर्मकी कथनीमै आनन्दमय होना और भागनित विरक्त हाना पा मग नामा एचमअङ्ग है या आत्माका हित समझि याका निरन्तर भावना भानों अर भावना के मानन्द करि सहित होय याकी प्राप्तिक अर्थियाका महाअर्थ उतारण करो । ऐस सवेगनाम पचम भावना वर्णन करी ॥५॥ र शक्तिप्रमाणत्याग भावना पणन फरिये है। त्यागनाम भारना प्रशसायाग मनुष्य जन्मका मण्डन है। अपने हृदयमें त्यागभान रचने के अर्थि अनेक उत्सनरूप, वादिवनिक बजाय याका महान अर्थ उतारण करा। पाय अभ्यतर टोय प्रकार का परित्रहने ममता छाउनेकरि त्यागधर्म होय है । अन्तरङ्ग परिगह नोटह प्रकार है सो ऐसे-जानना } - जाण्याविना,-ग्रहण न्याग स्था है। "मिथ्यात्व, अर स्त्रीवेट, पुरुपवेद, नपुसक वेदस्प परिणाम सा वेदपरिग्रह है। होम्य, रति, अरति, ४२) शोक भय जगुप्पसा, राग. ढेप, क्रोध, मान, माया, लोभ ऐसे चौदह प्रकार अन्तरग परिग्रह जनाया। तहा जो शरीरादिक परद्रव्यनिम आत्मबुद्धि करना सो मिथ्यात्व न म परिग्रह है। यद्यपि जो वस्तु है से अपना द्रव्य अपना गुन अपना पर्याय है से ही अपना स्वरूप है। जैसे सुवर्णनाम द्रव्य है मुपर्णके पीतादिक गुण हैं कुण्डलाढि पयाय हैं से ममस्त सुपर्ण हो हैं यात सुवर्ण अन्यपस्तुका नाही अन्यबस्तु सुत्रणका नाही सुवर्ण है सो सुपर्णहामा है जन्य वस्तुका काऊ हुआ नाही हा है नाही होयमा नाही अपना स्वरूप है सो ही आपका है ऐसे आत्मा है सो आत्माहो का है आत्माका अन्य काऊ ही द्रव्य नाहों है। अब जो देहा आपा माने है जा मैं गोरा, मैं सारला, म राजा, मक, मैं मामो, म सेनऊ, मैं ब्राह्मण, मैं क्षत्रिय, मैं वैश्य, मैं शुद्र, मैं युद्ध, मैत्रोल, म यलमान, मैं निनल,मै मनुष्यमै तिर्यच इत्यादिक कमकृत निनाशोक परद्रव्यकृत पर्यायम आन्मशुद्धि करना सो मिध्वात्वनाम परिग्रह है। मिध्यादर्शनते ही मेरा गृह, मेरा पुन्न, मेरा रान मै ऊ च, मैं नीच इत्यादिक मानि समस्त पर पदार्थनिम आ मनुद्धिकर है पुद्गलका नाशकू अपना नाश माने है याके यधनेत अपना पधना घटनेत घटना मानि पर्यायम आत्मबुद्धिकरि अनादिकालत आपा भूलि रहा है या समस्त परिग्रहम आत्मद्धिका मूल मिध्वात्वनामपरिग्रह है जाके मिथ्याग्यान नाही से। परद्रव्यनिमें 'हमारा'.एसै कहता हुवा हू.

(०४३ ), परद्रयनिमें कदाचित् आपा/नाहीं माने है। बहुरि वेद- उदय तं स्त्री पुरुपनिमें जो कामसेवनके परिणाम हाय हैं तिम कामम तन्मय होय कामके भावकू आत्मभार मानना सो वेदपरिग्रह है। बहुरि धन, ऐश्वर्य, पुर, स्त्री, आभरणादि परद्रव्यादिकमे आसक्तता सो रागपरिग्रह है अन्यका विभव परिसार एश्चय पाहित्यादिक देखि पैरभाव करनासो वैपपरिग्रह है हास्यमे आसक्त होनासो हास्य, परिग्रह है अपना मरण होनेत मित्रनिका परिग्रहादिकनिकार रियोग होनेते निरन्तर भयमान रहनासो भय' परिग्रह है पचइन्द्रियनिरियाछित मोगउपयोगके भोगनिमे लीन हो जाना सो रतिपरिमह है। अनिष्टास्तुका मयोगम परिणामनिका सक्लेशरूप होना सा अरति परिग्रह है अपना इप्ट स्त्रोपुनमिरधनजीविकादिकका नियोग होते तिनका सयोगकी। पाछा करके सक्लेशरूप होना सा शोक परिग्रह है । बहुरि घृणा- पान पुढलनिक देखनेत श्रवणत चिन्तनत परिणाममें ग्लानि उपजना सो जुगुप्सा नाम परिग्रह है।" अथवा अन्यका उदय देसि परिणाममे क्लेशित होना सुहावे नाही से जुगुप्मा परिग्रह. है। गरि परिणाम रोपरि तप्त होनासो क्रोध परिग्रह है बहुरि उच्च कुल, जाति, धन ऐश्वर्य, रूप पल, ' ज्ञान बुद्धि इनकार आपक अधिक जानि मद करना तथा परकृ. पाटि जानि निरा- दर करना कठोर परिणाम रखनासो मानपरिग्रह है अनेक कपट- । छलादिककरि पक्रपरिणाम रसनासो मायापरिग्रह है । परद्रयनि। A .

के ग्रहणमे तृष्णा मे लोम परिगह है। ऐम ममार परिम्रमण के काग्ग आत्मा नादिर गुणनिक पातर चौह प्रसार अन्त ग्ग परिगह हैं अर इनहीत मुद्रा के कारण धनधान्यसेनसुवर्णा- दिक प्रोपुत्रादिक चेतन अंतन नाय परिगट हैं गम अन्तर ग वहिर गदाय प्रकार परिम्हक त्यागनत त्याग धर्म हाय है। ग्यपि वाघपरिदगरहित तो दरिद्रो मनुष्य ममाहीत हाप' परन्तु अभ्यन्तर परिंगहका त्याग बहत दुर्लभ है। यात दोय प्रकारका परिग्रह एक दशत्याग तो थापरके हेत्य है अर माल- त्याग मुनीरनिके हाय है यहुरि पायनिका त्यागते त्याग धर्म हाय है नहुरि इन्द्रियनिक विषयनित रोकने करि त्याग होय है। बारि रमनिका त्यागकरित्यागधर्म हाय है। जान रसना इन्द्रियको लोलुपता जीतनेत ममस्त पापनिका त्याग सहज हाय है ।। वहरि मिनेन्द्रका परमागमका अध्यपनश अन्य अन्ययन कगना शासनिकू लिगार देना शोधना गुधापना सो परम उपसार ग्नेवाला स्पागधम हाय है। बहुरि मनक दुष्टविकल्पनिया अभाव परना दुष्परिकल्पनि कारण छाडि चारि अनुयागरी चरचामें चिन लगाउना सा । त्यागधर्म है। बहुरि माहका नाश करनेवाला धर्मका उपदेश श्रापकांना देना सा महापुण्यका उपजापनकाना त्यागधर्म है। भीतरागका उपदेशत अनेकमाणोनिका परिणाम पपत-मयमोद होप है धर्मके प्रभारर अनेक प्राणी प्रास होय हैं। नारि उत्तर- - मध्यम जपन्याऐम तं न 'प्रकोरके पानिक ' भक्तिरि युक्त हाय आहारदान हेना' प्रासुक: ओपपि देना ज्ञानके उपरण “मिद्धातके पदनेयाग्य पुस्तकका दान देना मुनिके योग्य तथा श्रापकक योग्य चम्मिका दान देना गुणनिके धारकनिक तपकी वृद्धि करनेवाला माध्यायमें लोन करनेवाला ध्यानको वृद्धिका कारण आहारादिक चारि प्रकारका दानं परम भक्तित विकसित चित्त हुआ अपना जन्मई कृतार्थ, मानता गृहचाराक सफल मानता नडा आदरतै पात्रदान करों। पायदान हाना महाभाग्यत जिनका मना हाना है, तिनके होय है पानका लाभ होना ही दुर्लभ है और भक्तिमहित पात्रदान हाय जाय ताकी महिमा करने कौन समर्थ है यहुरि क्षुधातृपितकार जो पीडित हाय तथा रोगो होय दरिद्रो होय वृद्ध होय दीन होय तिनक अनु पारि दान देना मा समस्त त्यागधर्म है। त्यागहीते मनुष्य जन्म • सफल है। त्यागहीत धनधान्यार्दिक पापना सफल त्यारपिना गृहस्थका गृह है सो ममान समान है अर गृहस्थका स्वामी पुरुष मृतक ममान है और स्त्री पुत्रादिक गृद्वपक्षी समान हैं से याका धनरूप मास चरि चुटि पाय है म त्यागीरना वर्णन री ॥ ६॥ अशक्तिप्रमाणतपभारना अङ्गीकार करना कमोतियो शरीर सको गरण है।। अनेक दुःखायो गरीर उपजाय है।और,यां शरीर अनित्यमे अस्थि अशुचि हरन- वत् ही कोटया उपकार करता है जैसे कृतम अपना नाही हाय - १ ?

Ente
र तैसे देहके नाना उपकार सेरा करता हु अपना नाही होय है
“यात यथेष्ट पिधिकरि नार पुष्ट करना योग्य नाही करा करने
योग्य है ता हु यो गुणकरलायके मचयका कारण है शरीर
पिना रनायधर्म नाही होय है सेवकको ज्या याग्य भोजन देर
यथाशक्ति जिनेन्द्रका मार्गत रोिघरहित कापरेशादि तर
काना योग्य है। तप मिना इन्द्रियनिकी विषयनिमें लोलुपता
घटे नाही तर रिना लोक्यका जोतनेगाला कामा नष्ट करने
कू समर्थता होय नाही तप बिना आत्मार अयंत करने ली
निद्रा जीतो जाय नाही अर तपगिना शरीरका मुखिया सभार
मिट नाही जो तपके प्रभाव शरीरकू माघि राम्या हाय ता
या तपा शीत उणादिक परापद आरे कायरता उपजे नाही
मयमधर्मत चलायमान होय नाहीं तप है मा कमका निगरा
कारण है। तात तप ही करना श्रष्ठ है । अपना वार्मर नाही
डिपाय करि जैम निनेन्द्रक मागत निराघरहित हाय तैसें तप
करो तपनाम मुमटका सहाय विना ये अपना श्रद्धान मानाच.
ग्गरूप धनकू काम क्रोध प्रमादादिर लुटर एकनगमे लूट
लेगे तदि रत्नत्रयमपदाकरि रहित चतुतिस्प समारम दीय
काल भ्रमण करोगे याहीत असे वात पिच कफ ये निदोष रिप
गेत हाय रोगादिक नाहीं उपना तैम तप करना उचित है
ममस्तमे प्रधान तपवो दिगम्बरपणा है कैमा हे दिगम्वरपणा
जो घरकी ममतापपासीर छेदि देहशा समस्त मुपियापणा

छाडि अपना शोर शीत उष्ण तावडा वर्षा पवन डाम मच्छर मक्षिकादिकनिकी बाधाके जीतने सन्मुस होय कोपीनादिक समस्त वस्त्रादिकका त्यागफरि दशदिशारूपहो जाम वस्त्र हैं ऐमा दिगम्बरपणा धारण करना से। अतिशयरूप तप जानना जाका स्वरूपक लेखते अषण करते बडे बडे शूरवीर कम्पायमान है। जाय हैं तात मे शक्ति प्रगट करनेवाले होजो ससारके बन्धन से छुटया चाहो तो जिनेश्वर सम्पन्धो दोक्षा धारण करो जात अगका सुखियापणा नष्ट होय उपसर्गपरोपह सहनेमैं कायरताका अभाव होय सो तप है। जात स्वर्गलोककी रमा अर तिलो. तमा हू अपने हावभावरिलामरिभ्रमादिककरि मनफू कामका विकारमहित नाही कर सकै ऐमा कामकू नष्ट को सो तप है। जो देय प्रकारके परिग्रहम इच्छाका अमार हो जाय से तप है जो इन्द्रियनिक विपनि प्रर्तनको अभाव हा जाग् सो:-तप तप वही है जो निर्जनवन अर परततका भङ्कर गुफा जहां भूतराक्षसादिकनिके अनेकविकार प्रत अर सिंहच्याघ्रादिकनिक भयङ्कर प्रचार होय रहे अर कोव्या वृक्षनिकरि अन्धकार हाय रह्या अर जहा सर्प, अजगर, रीछ चीता इत्यादिक "भयकर दुष्टतिर्यचनिका संचार हाय रह्या ऐसे महा पिमस्थान- निम भयरहित हुआ ध्यानस्वाध्यायमैं निराकुल हवा तिष्ठे सो , तप है। जो आहारका लाम अलाममें समभारके धारक मीठा खाटा, फिडमा, कपायला, ठण्डा ताता मरमा नीरस, भोजन है । t (१८) जलादिको लालमारहित मतापम्प अमृतरा पान करते आनन्द म तिप्ठ सा तप है। जो दुष्टे देव दुष्ट मनुष्य दुष्टतियननि रिकिय पार उपमर्गनि आपते कायरता छाडि रम्पायमान नाही हानासी तप है। जात चिरमालका मचय क्यिा कर्म निर्जी से तप है। महरि जो पुरचन रहनेगले नियटाप लगाननेराले, ताडन, मारन अग्निम ज्वलनादि उपद्रर करनेवारे, द्व पशुद्धिकरि क्लुपित परिणाम नाही करना पर स्तुतिपूजनादि करनेगले मैं राग भानका नाही उपजना से। तप है । बहुरि पर- महानतनिका अर पचसमितिका पालन अरपंच इन्द्रिनिका निमय सना पर छह आरग्यफ समयका समय करना अपने मम्नक के डाढी म छके कशनिक अपने हस्ततै उपरामका दिन मैं उपाडना देाय महीना पूर्ण पप उत्कृष्ट लोच है मध्यम तान महोने गये लांच करे जघन्य चार महीने गए लोच कर है 'मा लेच करना हु तप है अन्य भेनिकी ज्यो रानीना श नाहीं उपार्ड है शीतकाल, ग्रीष्मशाल, पाकालम नग्न रहना अर स्नान करनाही करना अर भूमिसयनररि अल्पकाल निन्द्रा लेना “दवनिक अगुलिकारि ह नाही धावना अर एक्गर भाजन राडा भोजन रसनीरसस्वादर छाडिक भोजन करे ऐसे अट्ठाइस मूरगुण अखण्ड पालना से बडा तप है इन मूलगुणनिके प्रभारत घातिया धर्मनिका नाशकरि केवलज्ञान प्राप्त हयि मुक्त हो जाय है। यति म ज्ञानीजन ही धर्मका अगायो तप हे याकी निविंश -

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{(8)
'प्राप्ति अर्थि याहोका " स्तवन पूजनादिकरियाका महाअर्थ
उतारण कग। यात रि अर अत्यन्तपरोसाहू मोक्ष 'तुम्हारे
अतिनिकटता प्राप्त तय है म शक्तिसत्यागनामा सप्तमी
'भाग्नाका वर्णन किया ॥७॥ मायुममाधि नामा. अष्टमी
भावनाकू कहै है। जैसे भण्डारम लागी हुई अग्निा , गृहस्थ
“है से अपना उपकारक वस्तुका नाश जानि अग्नि झाइये। है
क्योकि अनेक वस्तुको रक्षा होना बहुत उपकारक है तसं अनेक
व्रतशोलादि अनेक गुनिकरि महित जो प्रती सयमी तिनके
कोका कारणते निम प्रगट होत निना द्रिकरि नत शीलकी
रक्षा करना से ममाधि है । अथवा गृहस्थ अपने परिणाम
विगाडनेवाला मरण आ जाय उपसर्ग आ जाय रोग आ जाय
• इष्टपियोग हो जाय अनिष्टमयोग आ जाय तदि भरा नाही
प्राप्त होना सो मोधु समाधि है । “समग्यानी ऐमा पिचार की
“हे आत्मन् ! तुम अखण्ड अग्निाशी जानदर्शन - स्वभार हो
तुन्हारा मरण नाही "जा उपन्या है से रिनशेगा पयायका
'ग्निाश है'चैतन्य द्रव्यमा विनाश नाही. है। वाच “इन्द्रिय , अर
मनवल, कायरल, वचननल, आयुगल अर उस्मास ये दशप्राण है
'इनिका नाशकू मरण कहिये है । तुम्हारा ज्ञानदर्शन सुसमत्ता
इत्यादिक भाषमाण हैं तिनका कदाचित् नाश नाहीं हैं तात देह
"की नाशक अपना नाश मानना सो मिथ्याज्ञान | भो
*ज्ञानिने ? हजारा कर्मनिकरि भया हाडमासमय दुर्गन्ध विना-
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शोरु देहका नाहीत तुम्हार कहा मप है तुम तो अमिनाशी
शानमप है। यो मृत्यु है सो रहा उपकारा मित्र है जो गल्या
सध्या देहमत कादि तुमय देवादिकनिका उत्तमदेह धारण गर्ने
है मरण मित्र नाही होता तो हम हमें फेनेककाल यसता अर
रोगका अर दुपनिका मत्या देहत कौन निकासता अर ममाधि
भरणादिकारि आमाग उभार कम होता अर प्रतनपस्यमा
उत्तमफर मृत्युनाम मित्रका उपसाररिना रम पारता र पारत
कौन भयभीत होता अर मृत्युरूप कल्पयनपिना पारिभाराधना
का शरण ग्रहण कराय ममारूस कपन मौन काढता तात
ससारमे जिनका चित आमत है अर देहर आना रूप जाने हैं
तिनके मरयाका भय है मष्टि दह अपना घर मिन्न
जानि भप प्राप्त नाहा हाय है तिनक साधनमाधि होय है
अर जो मरणके अवसरम पदाचित रोगद सादिर आन से
हू सम्पष्टिक देहर ममत्व छुडापने के अर्थी हैं अर माग
सपमादिक सन्मुख परनेर अपि हैं प्रमादक (डाय मम्याद
-र्शनादिक चारिआराधनामैं हरता अथि है अर जानो विचार
जो जन्म घय से अपश्य मागा नो कारर होगा तो मरण
नाही छाडेगा र घार हाय रहूँगा ते। मरण नादी छोडगा
"तात दुर्गतिका कारण जो मापातात मरणतार धिक्कार
हा बरसेगा साहमत मर जा दह मरि नाय अर, 'मेरा
ज्ञानदर्शनस्वरूपमा मरण नाही हाय ऐसे मरण करना उचित है

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ममस्त किया पुश्पका यन्ध करनेवालो है सम्पादन महितात' दि ससारका छेद कर सा हो अमानुशासनम रया है- सम्बोधवृत्ततपसा पापारश्यक गौरव पुस । पूज्य महामणे रिव तदेय सम्यमत्यमयुक्फ ॥१॥ अर्थ-पुस्पके समभाव अर मान अर चारित्र अर तर इनका महानपणा पापाणरा महानपणाके तुल्य है अर ये हो जे मममाघ चरित्र और ताजा मम्पय महित होय तोमहामणिकी तरह राज्य हा जाय। भावार्थ--जगतिम मणि है सो हू पाषाण है आ अन्य झाझडा पथर है स ह पापाण है परन्तु पाषाण तो मण दाय मण हूं पाधि ले जाय वेचे ता हु एक पोसो उपने तात म दिन हू पेट नाही भरै अर मणि केई रती हूँ ले जाय येथे तो हमारा स्पया उपज समस्त जमका दारिद्र नष्ट हो जाय तैम समभार अर शास्त्रनिका नान अर चारित्रधारण अर घार तपश्चरण य मम्यक्त्वधिना यनुतकाल धारण करे तो राज्यमम्पदा पान तथा मन्दक्पायके प्रभारत दवलोम जाय उपजे फिर एक इन्द्रियादिक पयायनिमे परिभ्रमण कर अर जो सम्यवस्व सहिन ।प, तो समार परिम्रमणको नाशकार मुक्त हो जाप-तात सम्पायरिना मध्याटि है हैं जिनम् पूजा या गुरु बन्दना करो ममरमरणाम जावा श्रुतका अभ्यास को तप करो ना हू अनन्तकाल , समार 7 ज - - घाम हो कर गा इस तीन भवमे सुस दुसको समस्त सामगो। यो जोर अनन्ताचार पाई काऊह दुलभ नाही एक साधुममाधि जो रनायका लब्धिक निर्विघ्न परलोकताई ल जाना है सो रज- त्रय सहित हुआ दहक छाडे है तिनके साधुसमाधि होय ताका पानना ही दुर्लभ है साधु समाधि है से चतुर्गतिनिमे परिभ्रमण के दु सका अमानकरि निश्चल घाधान अनन्तसुखक प्राप्त कर है जो पुरुष साधममाधि भावना निर्विघ्न प्राप्त होने अर्थि इस भावनाकू भारता याका महान अर्थ उतारण कर सो ही शीघ्र ससार समुद्रकू विr अष्टगुणनिका धारक मिद्धि हाय है ऐम गधसमाधिनामा अष्टमीभावना वर्णन करो ॥ ८॥ अन यावृत्तिनामा नवमी भावनाका वर्णन करिये है। कोठा अर उदरकी व्यथा जो आमयात सग्रहणी कठोदर सफोदर नेत्रशूल 'कर्णशल शिर शूल दन्तशूल तथा ज्वर काम चाम जरा इत्यादिक रागनिकरि पोडित जे मुनि तथा श्राफ तिनक निदप आहार औषधि वस्तिकादिक करि सेवा करना तिनकरि शुश्रूषा करना पिनय करना आदर करना दुःस दरि करनेमें यल करना से ममस्त वैयावृत्य है जे तपकरि तप्त होय अर रोगरि युक्त निनका शरीर होय तिनके वेदना देखकर तिनके अर्थि प्रासुक औषधि तथा पध्यादिकारि रोगका उपशम करना सो नपमा वैयाघृत्य मुनीश्वरनिके दशभेद करि दश प्रकार है। आचार्य, उपाध्याय, तपधी, शैक्ष्य, प्लान, गण, बल, सघ, साधु, मनाज्ञ अध्ययन इनदग प्रसारक मुनापतिक परस्पर योग्य हाय है कार्यको चेष्टा या जन्पदव्या दुम बदनागिरदा सरनेम यापार करिये प्रातन करिये सायाय है। इन दस प्रकारक मुनिन का मामा जाननागिनत गमासक सुपर जोन न प्रत तिनने अरसहित गदग करिम भ पजार आननिक अर्थि आचारण किए त मम्घग्नानादिगुगनिक धार आनार्य है। भाषाय-गिनत मालक गक माघर प्रत आचरण करिये ते आचाय है जिनका ममापा प्राप्त हाय आगमन करिये त उन मालपतक आधार एसे उपाध्याय है महार अन शनादि तपम निष्ठ त ताम्मी हैं जे तक शिलगम तमनिर न्तर प्रतनिका भाग्नाम तत्पर ते शैल्य है रागादिस्कार जाका शरीर कोशित होय मा ग्लान है वृद्धमुनिनिका, परिपाटीका होय मा गण है आपकटाक्षा देनेगाला आचार्य शिष्य हाय सा पुल है। चारप्रकार के मुनिका ममूह मा मय : चिरकाल का दीक्षित हाय मा माग है जा पण्डितपणेफर कापणे ऊघे कुलकरि लेफिनिमें मान्य होय धर्म का गुरु मूलका गारवपणा का उपिय कानेगाला हाय से मना है अयश अमयतसम्प- दृष्टि हु ममारका अभार रूपरणव मनोन है। इनदशा प्रकार- कैमर्क रोग आ जाय परिपहनिकरि रोदित होय तथा श्रद्धानादि विगडि नियात्रादिक प्राप्त हत्य"जाय तो प्रामुक औषधि मे रान योग्य स्थान आसन काष्ठफलक तृष्णादिकनिका . 4 सम्तरादिकनिकारि अर पुन्ता पोछिकादिक प्रमोपकरणहरि जो प्रतिकार उरफार करिये तथा मम्यक्तपिमैं रेशी म्यापन गरिने इत्यादि उपकार से ज्यादा है। अर जो पान्य मानन पान जोपधादिक नाही मम्मरते होंय तो कायकरके कफ तथा नाशि कामल मनादि दूर करनेकरि तया उन अनुकुल आचरणा करनेकर क्यान्य हत्य है इस सालमे सयमका स्थापन ग्लानिको अभार जर प्राचनम चात्मल्यपणो अर मनाथपगा इन्यादि अनेक गुण प्रगट हाय है गाहपहो परम वर्म है या वृत्य नाही होय तो मोक्षमार्ग निगडि जाय जात्रायादिक करें वे शिष्य मुनि तथा रोगी इत्यादिकका पैयाहत्व करने वात विशुद्धता उच्चताक प्राप्त हाय है ऐमे हो सादिक मुनि वयावृत्य कर तथा श्रावक श्राविकाका रै अपवदानकरि नया मृत्य अर भक्तिक युक्तिकरि देद्रका मापार आहारदानकारि यावृत्य कर अर कर्मके उदयत देोप लगि गया हाय ताका हास्ना तया श्रद्धानमू चलायमान भरा य ताक सम्यग्दर्शन ग्रहण करावना यया जिनेन्द्र मार्गमू चलि गया होय ताक मार्गमे स्थापन काना इत्यादिक उभारकरि पाहत्व है। जहरि जा आचार्यादि गुरु शिया अराका अग पटा तमा नत मय- मादिककी शुद्धिका उपदेश कर सा शिष्यका वाहत्व है। जर शिष्य गुरुनिकी आना प्रमाण प्रतता गुनिशा चाणनिका सेवन करें सो आचर्यका यात्व है परे अपना वन्य उप आन्मार रागह पादिक दापनि लिप्त नहीं होने देना मो (५८) जपने जात्माका क्यामृत्य है तथा अपने जान्मार भगमगार परमागमम लगाय टना राया दशललगस्प यममे लोन हाना मे पत्नयावृत्य है। तथा सान काध लाभादिक अर्थ अर इन्द्रियनिक किनावान नाहा हाना से अपना आत्माका पाता है। यारि हाजार ह विशेष जानना जा रागा मुनि तथा गुरु नका पात काल अर जवणने शयन आगन मण्डल पाया पुस्ता नेत्रनि दचि मयुरपाच्छितकात शाधना वा जमक्तरागा मुनिका माहार जोपवादि करि मयमके योग्य उप- कार करना तया शुद्ध ग्रन्यनिक वाचनेरि धर्मका उपदेशसरि परिणामा वर्मम लान करना तथा उठारना ठापना मरमून करावना कलाट लिपाना इत्यादिकारि वयावृत्त कर तथा काऊ मावु मार्गकरि सेदित हाय तथा भील म्लेक्ष दुष्टराना दुष्टतिय- चनिकरि उपद्रवरूप हमा हाय दुर्भिक्ष मारि व्याधि इत्यादिक उपद्रामरि पाउा हानेत परिणाम पायर भया हाय तापू म्यान न्य कुशल पूछि करि आदरकरि मिन्ता शिक्षाकरि स्पिनि करण करना मा वैयारत है। बहुरि जा ममर्थ हाय कररह अपना वलकार्य छिपाय यावत्य नाही कर है सो धर्मरहित है। तीयकरनिका जागाभग करी श्रुतिकरि उपाश्या धर्मकी राधनाकरि आचार निगडया प्रभागना नष्ट करा वर्मामाकी पदान कार नाहा किया तदि वर्मतै परामुर भया अत ती आशा लापनेत परमागमत परामुस भया जा जाके एमा परिणाम होगी जहा मेह अग्निकार दप हाता जगतमे एक - यापक () सिमर मुनि जानरूप अल-रि माटम्प अनि जुझाय जात्मक- है वन्य है, जे काम मारि रागढ पका परिहार इन्द्रियनिए जीत आत्माके हितमैं उयमो भए है वे लोकात्ता गुणनिक व रस है मेरे ऐसे गुगान्तनिका चरणनिका ही शरण हाट एसे गुगनिम परिगाम यारत्यत ही हाय है पर जमे २ गुगनिमे पारणाम राच हे तैम २ अद्वान व है श्रद्धान र तट धर्मम प्रोति न तदि धर्मकै नायक रहन्तादिक पच परसेटाके गुणनिमे जनुरागरूप भक्ति वध है सीक भक्ति हाय है जो मानाचार हिन मिथ्यान रहित भागनिकी बाडा रहित पर बेकाया निम्मम्प अचल एपी जिन क्ति जा हाय ताक समारके परिनमणका भर नाहा रहे है । भक्ति मात्माकी चंगायत हाय है। महरि । महानानारि युक्त अर क्णय गरि रहित नगद पता जीपमा अनुबानका खनिमा निधान ऐसा पात्रका लाम सत्य सागरे हाय है जो ग्लनधारी का यात्व किया मा रत्नप्रयम् उपना जोर दि आप जर जन्यक मेलिमागम मा है। यानि माय अन्तर पति- रग दाट तपनि प्रान कर्मको निगमगान कारण है जो आचार्य बागाय कीया से ममग्न मपदा मना कर्मकाया वृनय कोपा भगराना आता पारी अ' पर आ परम् मयम की रला शुभध्याका र अर रन्टिानि । निग्रा स्यिा । रनारको रसा अरजतिशाप दान मानिनिनिस्किागुणर प्रगट दिसाया जिनन्दवर्मका गभावना जग पारसनदना सुल्भ

है रोगीको टहलारना दुर्लभ है राणाशाह कानादुर्लभ अन्त
का औगुण हाकना गुण प्रगट करना चाहिम गुणनि प्रमान
तार्यकर नाम प्रातिका वध कर है या वयात्य जगतमैं उनम
यो मिनेन्द्रमा गिरा है जा काऊ पाकामा
यात्य
से है से मोटर नि पार है पदुरि ना अपना साम
प्रमाण छ या जानिरी रक्षाने मारधान म वारे समस्त
पाणानिरा बयान हाय है एम बयाहत्य नाम नवमा मारना
पणन करी
अर जहन मति नाम दामो मारमा वर्णन है। जो
मनाचनकाय करि निन से दाय अक्षर साकार स्मरण करें
६ सो जरहन्त भक्ति है।
भाई-बहन्तम गुणनिम अनुराग की रहन्त भक्ति है
जो पूर्वनन्ममे पाडशारण भाग्ना भाई है ता तीर्थकर होय
अरहन्त हाय है नाके ता परिशरण नाम भावनात उपनाया
अदभुनपुण्य ताक प्रभान गर्भम जारनेक छह महीने पहली इन्द्र
को ज ज्ञान और है सा चारह बोनन लम्बो नयोजन चौड़ी रन
मय नगरी रच है तिसके मध्य रानाके रहनेका महलनिका
पणन अर नगराको रचना अर रड द्वार अर काट साई पहकाटि
'त्यादिक रतनमद ना दुबैर रच है तारी मीमा ताकाऊ हजार
निहनियरि वणन करनेक समर्थनाही है तथा तीर्थकरने माता
को गर्भका सायना जर स्वादीपादिकम निगम करनेगाली

उप्पन कुमारिका देवी माताको नाना प्रकारकी सेवा करनेमे माधान होय है अर गर्भके आपने छह महीना पहली प्रभात मध्याह्न अर अपराग एक एक कालमैं आकाशते रतननिकी वर्षा कुवर कर है जर गर्मम आरंतही इन्द्रादिक चारि निकायके देशनिका आसन कपायमान हानते च्यारि प्रकारके देन आय नगरकी प्रदक्षिणा देय मातापिताको पूजा मत्कारादिकरि अपने स्थान जाय है अर भगवान तीर्थकर स्फाटिक मणिका पिटारा समान मलादिरहित माताका गर्भमै तिष्ठं है पर कमलवासिनी छह दबी अर छप्पन रुचिकद्वीपमै उसनेगाली अर और अनेक देवो माताकी सेवा कर है अर नरमहीना पूर्ण हात उचित जयमरमें जन्म होतेहो च्यारा निकायके दानिका आसन कम्पाय- मान होना अर वादिननिका अकस्मात बाजनेते जिनेन्द्रका जन्म जानि वडा हर्पत सोधर्म नामा इन्द्र लस योजन प्रमाण ऐरामत हस्ती उपरि चढि अपना सौधर्म स्वर्गका इकतीसमा पटलमै अठारसा अणोपद्ध नाम निमानते असरदातर अपने परिकरनि फरि सहित साहा नाराकादि जातिका मादिन निझी मिष्टानि अर अमर यात देवनिना जयजयकार शब्द जर अनेक रजा अर उत्सवमामग्री अर कोट्या अप्सरादिका नृप्यादिक उला अर कोन्या गधदेवनिका गारनेफरि साहत अमग्यात योजन ऊचा हाते इन्द्रका रहनेका पटल और अमम्मात योनन तिर्यक् दक्षि- णादिशामै है तहाते जम्बूद्वीप पर्यन्त योजन उत्मा करते आय नगरकी प्रदक्षिणा देय इन्द्राणी गसूतिगृहमें जाय मातार. माया-

निद्राके वशिरि सिगर समय अपनात्यात
बालक और चि तार्या भगिनत्याय इन्द्र
है तिमालमें दसता इन्द्र ठाकूना प्राप्त होता हनार ।
रचिारि दसै है फिर तराशनादक मगन र मन
चाणी यतर ज्यातिनिक इन्द्राय अमाय नठा अपना अपना
सेना बाहर परिसार सहित र है तहा मार्ग जाति
हस्तो ऊपरि चटा भगवाना गाढम रेय चहा ईशानन्द्र
छर धारण करें अर मनतामार मान्न चमर डारते अन्य
अमर यातदन अपने अपन ।नयागम मापन यात्म
मेरगिरिका पाडकमनम पाटुक शिलाजपा जात्रिम अहिमन है
शिमङपरि जिनेन्टर पवराय जर याटुपत तार समुद्र पर्या
दाऊ तरफ दयाका पति बना जाय है सा बार ममुद्र में
भृतित पांचराड दशलाम मानगुणचाम हनार यानन पर है
तिम अपमरम मेहमी नविन दा तगर मुर कुन्टल पर
क कणादि जदभुत रसनिक आभरण पद. दर्शनका पति र
की चूलिकात बोरसमुद्र परत णी बन्य है अरहा,
ग्लश सौप है तहा दाउ तरफ इन्द्रक पडे रहकर
दाय छोटे सिंहासन अरि दशान इन्द कलश ल्य जमिपक पर
हनार आठ क्ल्शनिकरि क ह तिन निशानका मुग्न एर
योननका उदर छरिमानन चौडा पाठ यानन ऊ चा तिा
फ्लशनि निमि धारा भगवानक वनमय शरीर ऊपरि पुष्पनि
तरी या समान नावा नाहा कर पर पाठ इन्दाणी कोमल

रचनं पूछ अपना जन्मा हतार्य मारती सर्गत साये रानमन ममम्न आभरण बरस पहरा द तहा जनेक देर अनेक उत्तर विस्तर तिनक लिसनेक कोऊ ममर्थ नाही फिर मैरु गिरित पूर्ववत् उत्मा करते निन्द्रा ल्याय ममर्पण करि इन्द्र पहा ताडननन्यादिक जा उत्मर कर है तिन ममम्न उत्सननिरी काऊ अमायातकाल पर्यन्त काटि जितानिारि वर्णन करनेक ममय नाड़ा जिनन्द जन्मते हा तीर्थकर प्रतिके उग्यके प्रभारत दश अतिशय जन्मत लिय ही उपज है पगारहित शगर है।य, मलमूत्र कादिक रहितपना, अर मरारमे दुसवर्ण सविर समचतुरगतम्थान, उपभनारायम- जानु अप्रमाणरूप, महामुगप शरार अग्रमाणपल एक हजार आट लक्षण, प्रियहितमपुरमचन ये मनस्त पूर्वजन्ममे पोडश कारण भानना भाई ताका पभावम नारि इन्द अगुठमे स्थाप्या अमृत ताक पान करता माताका स्तनत उपज्या दुग्धपाद नाहा कर है फिर अपनी अम्माम समान बने देनकुमारनिमें काडा करते वृद्धि प्राप्त हाय है अर स्वर्गलागत आभरण वस्त्र भोजनादिक मनमा उत देय लीये पामता गरिदिन हाजिर रहे है पृथ्वीलोफ का भानन माभरण स्वादिक नाही अजीकार कर है तिं आये ही भागे है। महरि कुमारकाल व्यतीत करि इन्द्रादिकनिकरि कीरे अद्भुत उत्माइ करि भक्तिपूर्वक पिताकरि समर्पण कीया राज्य भागि जामर पाय ममार देह भोगनित पिरागता उपजे नदि अनित्योदिक नारह भाना भावने

होते लोकातिकदेव पाय नन्दना स्तनरूप मसाधनादिक करे है
अर जिनेन्द्रका चिराग भाग हातेही चारिनिकायके इन्द्रादित्य
अपने आमन कम्पायमान होनेत मिनेन्द्र के तपका अमर अबधि
ज्ञानत जानि बडे उत्सत जाय अभिपम्करि दरलारक त्रा
भरणते भक्तिते भूपितकरि रवमयी पालकी रचि जिनेन्द्रका
चढाय अप्रमाण उत्सर अर जय जयकार शब्दनहित तपके योग्य
जनम जाय उतार तहा वस्त्र आमरण ममल त्याग देव अधर
शेलि मस्तक चहार अर पचमुष्टा लोच मिद्धनिक नमस्कार करें
कर तदि शनि महत्तम जानि इन्द्र रत्ननिक पात्रम
धारणकरि क्षीरसमुद्रमै नडो मत्तित क्षेप है निनेन्द्र कनेक कारम
तपके प्रभावत गुस्ल यानके प्रभारत सरक अणाम पातिगा
कर्मनिका नाशकरि विरज्ञानक उत्पनर हैं तदि जरहन्न नन्न
प्रगट होय है तदि केवलज्ञानरूप नेन रि
भूत
भरिपतै वर्षमा
निशालवी ममग्न व्यनिको अनन्तात परणतिमहित अनु
मते एक समयम युगपत ममस्ता जान है दस है। तदि
च्यारिशिकायके देश ज्ञानकल्याण की पूजा स्तरन गरि भगानमा
उपदेश में नापि ममरमरण अनेक रत्नमर रच हैं तिस मममरण
की निभूतिका वणन कोनार सके ? मोते पांच हनार धनुर
उचाना नीम हजोर पी तापरि इन्द्र नोलमणिमय गोल
भूमि यारह योनन प्रमाण निमऊपरि अप्रमाण महिमामहित सम
मरण रचता है जग समयमरण रचना हाय है जर भगवानका
निहार होय है वहाँ जाधेनिक टोरानेलगी जाय बहरे श्रमण

करने लगि जाय लूले चालने लगि जाय है गूगे वोलने लगि
नाय है वीतरागको अदभूत महिमा है जाके धूलिशालादिक
रत्नमय कोट मानस्तभ अर जलकी सातिका अर पुष्पमाडी फिर
रत्नमय कोट दरवाजे नाट्यशाला उपवन वेदी भूमि फिर काट
फिर कल्पवृक्षनिका बन रहलमयस्तूप फिर महलनिको भूमि फिर
स्फटिकका काटमैं देवच्छद नाम एक योननका मण्डप सब तरफ
द्वादश ममा तिनकरि सेवित रत्नमय तीन कटनी गवकुटीमैं
सिंहासन ऊपरि च्यारि अगुल अन्तरीम विराजमान भगान
अरहन्त है जिनकी अनन्तबान अनन्तदर्शन अनन्तमोर्य अनत
मुखमयी अन्तरङ्ग विभूतिको महिमा कहनेह च्यारिजानके
धारक गणवर समर्थ नाहीं अन्य कौन कहि सक अर समवसरण
की निभूतिही बचनके अगोचर है अर गवकुटी तीमरा कटणी
ऊपरि है तहा चउसठि चमर बत्तीस युगलदेव निके मुकुट कुण्डल
हार कडा भुजाधादिक ममस्त आभरण पहिरे ढालि रहे है तीन
छर अद्भुत कातिके धारक जिनकी कातित सूर्य चन्द्रमा मन्द
ज्यातिमाम है अर जिनकी देहका प्रभामण्डलको चयन्ध रह्या
जाफरि समवसरणमैं रात्रिदिनको भेद नाहीं रहे सढा दिवस ही
प्ररंत है अर महामुगध लेाक्यमें ऐसा मुगध और नोही ऐमी
गधटिक ऊपरि देवनिकरि रन्या अशोकक्षक देसतेही समस्त
लोकनिका शोकनष्ट होय जाय है अर कल्पवृक्षनिके पुष्पनिकी
वया आकशत होय है अर आकाशमैं साढागर कोटि जातिके
चादिरनिकी ऐसी मधुर पनि होय है जिनके अणमारत क्षुधा

होते लोकातिरदेव आय वन्दना तानम्प मोधनादिक पर है
अर जिनेन्द्रका निराग भाग हातेही चारिनिसायक इन्द्रादिकर
अपने आसन कम्पायमान होनेत मिनेन्द्र के तपमा अमर अधि
मानत जानि बर्ड उत्सत नाय अभिपरभरि देसक त्रा
भरणत भक्तित भूपितकरि रामयी पालकी रचि जिनेन्द्रा
चढाय अप्रमाग उत्मर पर जय जयकार शइनहित तपके योग्य
चनम जाय उतार तहा वसा भामरण समस्त त्याग देव अधर
अलि मस्तक चहार अर पचमुष्टा रोच मिनिस् नमस्कारकरे
फर तदि केशनि महा म जानि इन्द्र रननिके पारमे
धारणकरि क्षीरसमुद्रमै बसी मतित प है निनेन्द्र कोर फारम
तपकै प्रभात शुक्लभ्यानके प्रभावत सपक अंणाम पातिया
कर्मनिका नाशफरि फेवरज्ञानक उत्तार हैं तदि अरहन नन
प्राट होय है तदि केरलतानरूप नेन रिभृत मविपत वर्षमान
निकाली समस्त व्यनिकी निन्तात परणतिमाहित अनु
मतें एक समयमें युगपत समस्ता जान है दस है। तदि
च्यारिनिहायके देव जानरल्याणकी पूजा स्तन गरि भगवानका
उपरयो जाथि समरमरण अनेक रत्नमा रच हैं सिम ममस्मरण
की निभूतिका वर्णन शैनार मकै? पीते पांच हनार धनु
ऊचा पोत हजार पैरी तापरि इन्द्र नालमणिमर गोल
भूमि बारह यातन प्रमाण निसउपरि अप्रमाण महिमामहित सम
पसरण रपता है जहा मममसरण स्थना हाय है अर भगवानका
विहार होय है तहां आधेनिह दोसनेलगी जार पहरे श्रवण

होय है। आईमागेवो भाषा समस्त जनसमूहम मैत्रीमान, समस्त ऋतुके फूल फल पत्रादिक सहित वृक्ष होय है पृथ्यो टपन ममान रत्नमयो तृण कटक रज रहित होय है, गोतल मन्द सुगन्ध पान चले है, समस्त जनाकै आनन्द प्रगट हाय है, अनुकूल पवन सुगन्ध जलकी गृष्टिकरि भूमि रव रहित होय ह चरण पर तहा सात अगै सात पाछे एक बीच एस पन्दगार दोयम पच्चीस कमल देव रचे हैं, आकाश निर्मल- दिशा निर्गलि च्यानिकायके देवनिकरि जयजय गन्द एक हजार आगकरिमहित विरणनिका धारक अपना उद्योकरि मूर्यमटला तिरस्कार करता वर्मन्चक आगे चाले अष्ट मङ्गलद्रव्य ये चौदह देवकृत अतिशय प्रगट होय है । क्षुधा तुपा जन्म जरा मरण रोग शाक मय विस्मय राग तुप माह अरति चिन्ता स्वेद खेद मद निद्रा इन अष्टादशदापनिकरि रहित अरहत तिनका बदना स्तान धान कग। या अहवभक्ति ममार ममुद्रका ताग्नेमाला निरतर चिन्तन करा । सुसका करनेवाला अहंत ताका स्तान करो याका गुनके आश्रय तो जनत नाम है। जर भक्तिका भस्या इन्द्र भगानका एक हजार जाठ नाम- करि स्तान किया है जर ने अल्पसामर्थ्यके यारक है तेह अपनी शक्तिप्रमाण पूजन स्तरन नमस्कार ध्यान करा जरहत- भक्ति समार समुद्रका तारनेवाली है सम्पादर्शनमै अरहतभक्ति मैं नामभेद है अर अर्थभेद नाहीं है। अरहतमस्ति नरकादिग- तिक हरनेनाली है या मस्तिका पूजन स्तरनकरि अर्थ उतार

तप्यादिक ममस्त रोग वेटना नष्ट होय नाय है अर रत्नजडित
मिहामन सूर्यको कातिक जिते है। गरि निनेन्ट की दिव्य
घनिकी अद्भुत महिमा लोक्यरती जीवनिक परम उपकार
करनेगाली माह अन्धकारका नाश र आर समस्तजीव अपनी
अपना भाषामें शद अर्थ ग्रहण का है और समस्त जीवनिक
मशय नाही रहै है स्वर मोक्षका मार्ग प्रगट कर है दिव्यधनि
महिमा यचनद्वारा गणधर इदादिक रहने? ममर्थ नाही है
जिनके ममरमरणम जातिरिराधा जीन गैर रोिप नाही रहे
है समयमरणम सिंह और गन, व्यान अर गौमनारी अर हन
इत्यादिक जातिनिराधा जीर बरबुद्धि छाडि परस्पर मिातार
प्राप्त हाय हैं। योतरागताको अदभुत महिमा है जिनके
असण्यात देव जय जयकार शन्द का है जिनके निस्टार पाय
परिक दयनिकरि रचे क्लश झाटा,
ठोणा
चमर, यीनना य जयेतन द य र लाझमें मगल्तार प्राप्त हाय
अर काल ज्ञान उत्पन्न भये पाठ दश अतिशय प्रगट
हाय है चारा तरफ मो मो योजन सुभिन्नता अर, आकाग
गमन भूमिका स्पर्श नाही कर, अर काऊ प्राणाका अध
नाही हाय और भौजनका अभार अर उपसर्गका जभार,
चतुर्मुस दोसे, अर समस्त विद्याका ईश्वरपना, छाया रहितपना
अर ने टिमकार नाही, अर केस नप अर्ध नाही ये दश
अतिशय घातिया कर्मश नाशते स्त्रय प्रगट हाय है। और
तीर्थकर प्रकृतिम प्रभापते चौदह अतिशय दवनिकरि किये
दर्यग धना,

होय है। आईमागेवो भाषा समस्त जनसमूहमै मैत्रीभान, समस्त तुके फूल फल पत्रादिक सहित नुक्ष होय है पृथ्यो दर्पन समान रत्नमयो तृण स्टक रज रहित होय है, शीतल मन्द सुगन्ध पवन चल है, समस्त जनाके आनन्द प्रगट हाय है, अनुकूल पचन सुगन्ध जलकी वृष्टिकरि भृमि रथ रहित होय । चरण वर तहा मात अगै मात पाछे एक वीच एस पन्दगरि दोयमै पञ्चीस कमल देव रचे हे, आकाग निर्मल- दिशा निर्गलि च्यारनिकायके देवनिकरि जयजय शब्द एक हजार जाराकरिसहित किरणनिका धारक अपना उद्योकरि मूर्यमडलर तिरस्कार करता धर्मचक्र आगे चाले अष्ट मङ्गलद्रव्य ये चोदह देवकृत अतिशय प्रगट होय है । क्षुधा तृपः जन्म जरा मरण रोग शाक भय निस्मय राग तुप माह अरति चिन्ता स्वेद खेद मद निद्रा इन अष्टादशोपनिकरि रहित अरहत तिनका नदना स्तम्न ध्यान कगे। या नहतभक्ति मसार ममुद्रका ताग्नेगालो निरता चिन्तयन करा । सुसफा करनेवाला अहंत ताफा स्तनन करो याका गुगनिके जाश्रय ते। जनत नाम है। जर भक्तिका भस्वा इन्द्र भगवानका एक हजार आठ नाम- करि स्तवन किया है अर जे अल्पसामर्थ्यके धारक है हु अपनी शक्तिप्रमाण पूजन स्तपन नमस्कार ध्यान करो अरहत. भक्ति ममार समुद्रका तारनेवाली है सम्यग्दर्शनमै अरहतभक्ति मैं नामभेद है अर अर्थभेद नाही है। अरहतभक्ति नरकादिग- तिक हरनेपाली है या भक्तिका पूजन स्तननकरि अर्घ रनार को है सो देवोंका मुस फिर मनुष्यका मुस भोगि अपिनाशों मुसका धारक अक्षय अविनाशी मुसक प्रोप्त होय है, एम अहंतमस्ति नाम दशमो मोनना वर्णन करी ॥१०॥ आचाय भक्ति नाम ग्यारमा भावना वर्णन कर है। सो हा गुरु भक्ति है धन्यभाग जिनका हाय तिनके वीतराग गुरनिके गुणनिमे अनुराग होय है धन्य पुरुषनिके मस्तक अपरि गुरुनि को आना प्रगत है आचार्य है से अनेक गुणनिको सानि हैं श्रेष्ठताका धारक हैं यात इनका गुण मनवि धारणफरि पूजिए अर्घ उतारण करिये पुष्पानलि अग्रभागम क्षेपिये जो मेर ऐसे गुरुनिका चरगनिका शरण ही होह कैसेफ है आचार्य जिनके अनगनादिक बारह प्रकारका उज्ज्वल तपनिमें निस्तर उद्यमह अर यह आवश्यकक्रियाम सामधान है अर पचाचारके धारक है अर दशलक्षणधमरूप है परणित जिनकी और मनवचनकायका गुप्तकरि सहित हैं ऐसे छत्तीमगुणनिकरि युक्त आचार्य होय है अर मम्यग्दर्शनाचारक निर्दाप धार हैं और सम्यग्ज्ञानको शुद्धता परि युक्त है अर नयादशप्रकार चारित्रकी शुद्धताके धारक अर तपश्चरणमे उमाहयुक्ति अर अपने वीर्य नाही छिपाते याईम- परिपहनिके जीतनेमे समर्थ ऐसे निर तर पच आचारके धारक हैं अन्तर ग बहिरङ्ग प्रकरि रहित निग्र थ मार्गके गमन करनेम तत्पर है अर उपनाम वेला तेला पचोपनाम पक्षापवाम मासाप- वाम करनेमे वपिर हैं अर निर्जनानमे अर पातनिके दराडे अर फानिकै स्थानम निश्चल शुभध्यानम निरन्तर मनक धारे हैं (६) धर शिष्यनिकी योग्यताकु आछी रीतिमू जानि दीक्षा देनेमें अर शोक्षा करनेमे तिपुण हैं अर युक्तित ना प्रकार नयके जाननेवाले हैं अर अपने कायमू ममत्व छाडि रात्रिदिन तिष्ठे हैं समाररूपमें पतन हो जानेकै भयवान हैं मनरचनकायको शुद्ध- तायुक्त नामिफाफे अग्र में स्थापित करिये है नेत्रयुगल जिन्हुँने ऐसे जाचार्यनिरु समस्त जगनिक नमाय पृथ्वीमै मन्तकधरि चन्दना करिने है तिन आचार्यनिका चरणनिकरि स्पर्शन भई परि- वरजक अष्टद्रव्यनिफरि पूजिये से। ममार परिभ्रमणका क्लेग पोडार नष्ट करनेपाली आचाय भक्ति है अब यहा ऐमा विशेष जानना जो आचार्य है से समस्त वर्मके नायक है आचा- यनिके आधार समस्त धर्मके नायक है आचार्यनिके आधार समम्म वर्म है यात एते गुणनि धारक हो आचार्य होय वडा राजानिका वा रानाके मन्त्रोनिका ना महानार्थ प्ठोनिका कुलमे उपज्या होय जर जाके स्वरूपकू देखते हो शातपरिणाम हो जाय ऐमा मनोहररूपका धारक होय जिनका उच्चआचार जगतम प्रसिद्ध हाय में गृहचारामे भा कटे हाणआचार निन्यन्याहार नाही किया होग अर वर्तमान भागसम्पदा छाडि पिरक्ततार प्राप्त भया होय अर लौफिक व्यवहार पर परमार्थके ज्ञाता हाय अर बुद्धि को प्रालता अर तपको प्रालताका धारक होय अर मर के अन्य मुनीश्वरानेत ऐसा तप नाहीं बनि सके तैमा तपका धारक होय यहुत कालका दीक्षित होय बहुत काल गुरुनिया चरण सेग्न किया होय पचनका अतिशयसहित होय जिनम (७०) चरन अरण करत ही चर्मम दृढता अर मापा अभार पर मार देह मार्गनित पिरागता जार्क निश्चल हाय सिद्धान्तमाके पर्थका परगामो इन्द्रनिका दमनकरि इसरोक परलोरममन्धी भेनिलामरहित दहादिकम निर्ममपि हाय महापीर होय उप- जगपगप निसरा पदाचित् जाका चित्त चलायमान नहीं हाय आ चाचा ही चलि जाय तो सफल्मघ प्रष्ट हो जाय पर्मका लोप सजाय स्वमत परमतका जाता होय अनेकांवविद्याम क्रीडा भग्नाला हाय अन्यके प्रश्नादिस्त शायरतारहिन तत्काल तर दनेवाला हाय एकांतपक्षा सोनार सत्यार्थधर्मर मापन करने का जाका मानर्य होय वर्मका प्रभावना करनेम उत्रमा हाय गुरुनिके निस्ट प्रयश्चित्ता दरमत्र पहि छत्तास गुणनिका धारक होर है मो समस्त सपनी नाभिमू गुतीकरि दिया जाचार्य पद प्राप्त होय मते गुगनिका धारस हाय तिमही. जाचार्यपना होय है ऐम गुणनि विना आर्य हाय ता धर्म कार्यका लोप हा जाय जमार्गकी प्रवृत्ति हो जाय ममम्नमय बन्छाचारी हा जाय सूररी परिपाटो जर आधारको परिपाटी - जाय। बहुरि आचार्यपनाक अन्य अष्ट गुण हैं निनका पारक हाय ! आचार्यान, आधारमान “पहारमान, प्रकर्ता यापायविदशी, अपीडक, अपरागी, निर्यापक ए आठ गुग है। निनम पच प्रकारका आचार धारण कर तारु आचार- चान रहिये है जीगादिस्तन्य भगरान मर्मज्ञ वीतराग दिव्य निरागरणज्ञानकरि प्रत्यक्ष देसि कथा तिनम श्रद्धानरूप परणति - (७१) सो दर्शनाचार है सपरतवनिक निर्माध आगम अर आत्मानुमा करि जाननारूप प्रवृत्ति सो नानाचार है हिंमादिक पच पापनिका अभावरूप प्रवृत्ति सो चारित्रिचार है अन्तरग ताम प्रवृत्ति से तमाचार है परीपहादिक आए अपनी शक्तिक नाही छिाय धोरताप प्रवृत्ति सो नोर्याचार है यथा और दश प्रकार स्थित कल्लादिक नाचारम तथा समितिगुप्त्यादिकनिका कथन करिने तो ननुत कयन गधि जाय । पचप्रकार आचार आप निरोप आचर अर अन्य शिष्यादिकनिक आचरण करापनेमें उद्यमी हाय सो आचार्य है आप हीणाचारी होय से शिप्यनिक शुदनाचरण नाही गय मक होणाचारी होय से आहार विहार उपरण चम्तिमा अशुद्ध ग्रहण कराय दे अर आपन आचरहीण होय सो शुभ उपदेश नाही मरि मके तात आचार्य आचारवान ही हाय ॥ १ ॥ हरि जाके जिनेन्द्र का प्ररूप्याच्यार अनुयोगका आपार हाय स्याद्वादरियाका पारगामी होय शब्दे विद्या न्याय- विद्या मिदातविद्याका पारगामी हाय प्रमाणनय निक्षेपणिकारि स्थानुभर करि भले प्रकार तत्वनिका निर्णय किया होय से आधारपान है जाके घेतका आधार नाही से जन्य शियनका मार तथा एकातरूप हठ तथा मिथ्याचरणकू निराकरण नाही करियर। नारि जनन्तानन्तकाल में परिभ्रमण करता ज के गतिदभ मनु यनन्मा. पापना तामे ह उतम दश नाति कुल इन्द्रियपूणता दानायु मत्मगति अद्धनि ज्ञान आचरण ए उत्तरो- चर दुर्लभ मयोग पाय तो जल्पनानो गुरुके निकट यमनेवाला

(७२)
शिष्य से सत्यार्थ उपदेश नाहो पारने यथार्थ आपका स्वरूप
नाही पाय मशयरूप हा जाय तथा मोक्षमार्गक अतिदूर अति
कठिन जानि रनरयमार्गमू जलि जाय तथा सत्यार्थ उपदश
बिना पियरूपायनिमै उरझा मनकू निकामनेमै समर्थ नाही
होय तथा रोगकृत वेदनाम तथा घोर उपमर्गपरीपहनित चल्य
हुआ परिणामक श्रुतका अतिशयरूप उपदेशरिना थामनेकू समर्थ
नाही हाय है। बहुरि मरण आजाय तदि सन्यासका असरमै
आहारपानका त्यागको यथा अवसर देशकाल सहाय सामर्थ्यका
कम समझ चिना शिष्यका परिणाम चलि जाय वा आत ध्यान
हो जाय तो मुगति बिगाडि जाय धर्मका अपवाद हो जाय
अन्य मुनि धर्ममे शिथिल हो जाय तो बडा अनथ है तथा जो
मनुष्य आहारमय है आहारत जो है जाहारहीका निरन्तर पाछा
कर है अर जब रोगकै बशर्त तथा त्याग करनेत आहार छुटि
जाय वढि दु सकरि बानचरित्रम शिथिल होय धर्मध्यान रहित
हा जाय तो बहुश्रत गुरु ऐसा उपदेश करै जारि सुधातृपाकी
वेदनारहित हाय उपदेशरूप तमृतकरि सीची हुआ समस्त क्लेश
रहित भया धर्मध्यानमें लीन हो जाय है सुधातृपारोगादिक्की
वेदना सहित शिष्या धर्मका उपदशरूप अमृतका पान अर
शिक्षारूप भोजनकरि ज्ञानसहित गुरुही वेदनारहित कर पहश्रुति
का आधारदिना धर्म रहै नाही तात आधारवान आचार्य होय
ताहीका शरण ग्रहण करना योग्य है बहुरि जो शिष्य वेदनाकरि
दुखित होय ताके हस्त पाद मस्तकको दाना स्पर्शनादि करना

मिष्टाचन कहना इत्यादिककरि दुःख दूर करें तथा पूर्व जे अनेक साधु घोरपरीपह सहकरि आत्मकल्याण किया तिनकी कथाके कहनेकरि तथा देहत भिन्न आत्माका अनुभव करारनेकरि बैठना रहित कर तथा मो मुने ! अब दुःसमे धैर्य धारण करो ससार में कौन कौन दुस नाही भोग अर योतरोगताका शरण ग्रहण करोगे तो दु सिनिका नाशकार कल्याणक प्राप्त होवोगे इत्यादिक बहुत प्रकार कहि मार्ग नाही चलने दे तातै आधारमान गुरु- निहीका शरण योग्य है ॥ २॥ यहुरि जो व्यवहार प्रायश्चित्त- सूत्रनिका ज्ञाता होय जातै प्रायश्चित्तम आचार्य होने योग्य हाय तिसहोकू पहा है और निकै पढने योग्य नाही जिन- आगमका ज्ञाता अर महावैर्यवान प्रनलघुद्धिका चारक होय सो प्रायश्चित दे अर द्वन्य क्षेत्र काल भार किया भार परिणाम उत्साह सहनन पर्याय जो दीक्षाका काल अर शास्त्रज्ञान पुरुषा- दिक आछरीति जाणि रागद्वप रहित होय प्रायश्चित भावार्थ-जाम ऐमी प्रवीणता होय जो याक ऐसा प्राय- श्चित दिये योका परिणाम उज्वल होगया अर दोपका अभार होयगा व्रतनिमें दृढता होयगी ऐमा ज्ञाता होय जाके आहारकी योग्यतामा जानहोय तथा यता क्षेत्रमैं एमी प्रायश्चितका निरीह होयगा पा या क्षेत्रमै निर्माह नाही होयगा तथा इस क्षेत्रमं नात पित्त, कफ शीत उष्णताकी अधिकता है कि हीनता है कि मम-

कर्डवगुण मुग्य है ममग्न मपस याहय यरनेस जारा
सामर्थ होय हे कोड होगापारी ताा शु: आवरण प्रहण कगर
काऊ सन्दनानी हाय तिना समझाय नारिप्रभ रगार कानि
प्रारित दय शुद्ध र काऊर धमापदरा दय दता कर।
धन्य है आपाप निनके शरगा प्राप्त हो गया सिनर भाभ
मागमे लगाया उद्धार कर यात आगरा प्रस्ता नामा
गुण प्रधान है ॥४॥ परि आपायापापरिणी नामा परिमा
गुण है पाऊ माधु क्षुधा ठपा रोग वेदनाररि पीडित मा
क्लेशित परिणामम्प हो जाय तया तीन रागढ़ पम्प हो जाय
तथा लग्नारि भयकरि यथारत आगरना नादों करे नरा
रत्नत्रयम उन्माह रहित हा जाय धर्म शिथिल हो जाय तार
अपाय मानि जनयका माश अर उपाय रत्नमपी रखानित
प्रगट गुण दाएमा रियार जो नया नाग होते मन्या-
यमान हा जाय अर रजनयरा नाति अग्ना नाश अर नरवादि
पुगतिम पतन मसात दिपार अर र नायको रक्षान ममारत
उद्वार गोय अनत मुग्यको प्राप्ति उपदेगरि माशात दिसाय
देय ऐमा उपदेशभरि मातात दिसाय दय मा उपदेशरा
सामर्थ जाम हाय सो अपयोपायविदर्गी नाम गुणा धारक
आचार्य हाय है हा उपदेश रिपाय क्थन यत हो ज्ञाप
जात नाही लिरया ॥५॥ अब अपीडर नाम छटा गुण कहिये
हे काऊ मुनि स्नाय धारण करके ह लग्नासरि भयकरि अभि-
मान गौरवादिकरि अपना आलोकना ययारत शुद्ध नाही फर तो

आचार्य ताक् स्नेहकी भरी कर्गनिक मिष्ट अर हृदयमे प्रवेश शिक्षा करे जो है मुने ! बहुत दुर्लभ रत्ननयका लाम ताकू माया चार करि नष्ट मत करो माता पिता समान गुरुनिके निकट अपने दोप प्रगट करनेमे कहा लज्जा है जर पात्मल्यके वारक गुरु है अपने शिष्यके दोप प्रगट करि शिष्यका अर धर्मका अर- याद नाहीं कराते हैं ताते शल्य रिकरि आलोचना करो जैसे स्नायकी शुद्धता जर तपश्चरणका निहि होयगा तम द्रव्य क्षेत्र काल भात अनुसार प्रायश्चित तुम दिया जायगा तात भय त्यागि आलोचना निदोप करह ऐसे स्नेहरूप वेचन करिकेहू जा माया शल्य नाहीं त्यागे तो तेजका धारक आचार्य शिष्यको शल्य जपरीत निकामै जिमफाल आचार्य शिष्यक देखते ही + स्याल साया हुआ मामा तत्काल उगल है तथा म महा प्रचण्डतेजस्वी राजा अपराधक पूछे तदि तत्काल सत्य कहताही वर्ण तैमैं शिष्यह माया शल्यक निकास है अर मायाचार नाहीं छाडे तो गुरु तिरस्कारके वचन कहे है हे मुने ! हमारे सघत निकमजाहु हमरि तुम्हारे कहा प्रयोजन है जो अपना शरीरा- दिकका मैल धोया चाहेगा सो निर्मल जल भरे मरोररक प्राप्त होयगा जो अपना महान रोगक दूरि किया नाहगा सो पूीण चैद्यक प्राप्त होयगा तसे जो रत्नत्रयरूप परमधर्मका अतिचार किरि उज्वलता किया चाहेगा से गुरुणिका आश्रय करेगा तुम्हारे रत्नत्रयकी मुदिता करनेम आदर नाही तात ये सुनिपणा चत धारण भग्न होय सुवादि परीपह महनेको पिटरनाकरि कहा

साध्य है मार गिरा तो रसायनिक जीतनेत है माया स्पाय
कदी त्याग नाही किया वदि नत सयम मौन धारण हमा
नामता अर परिषहमहनता मायाचारोका वृया है तिगच द परिग्रह
हित रम रहै ही है यात तुम दुरभव्य हो हमार बटाने योग्य
नाही हो ना तुम्हार परिणाम एमे है जो हमारा दोष पगट
होय ना हम निद्य होय जान हमारा उन्यपणा घटिजात्र मा
मानना का कारण है परण तो म्नुति निंदाम ममानपरिणामी
होप है ऐस गुरु कठोर सन यहि करके मायाचारदिरा
अभार नगर कसा होय जपपीड जाचाग जो परवान हाय
उपमर्ग परिपय आये कायर ताही होय प्रतापपान ह य जाफा
वचन कोऊ उल्लघन करने ममर्थ नाही होय र प्रभारना होय
जाप दसतपमाण दोपरा यार माध कापने लगि जाय नाम
बडे बडे विवाफ धारक नत्रीभूत होय पन्दना र नामा
उज्वलकीति निर यात होप जारी काति सुनताही जार गुण
हद गद्धाहो जाय जाका व ग्न जगतम दर या पिनाही दूरदेशनिर्म
प्रमाण कर सिंहरा ज्या निर्भय हाय ऐमो अपीडन गुमा
धारक गुरु हाय सो जमे शिष्यका हित हाय तस उपकार कर है
जैम पालम्रा हितने चिन्तयन करतो माता रुदन ररताह
वालकर दारि मुस फाडि जनहोतं घृत दुग्धादि पान करा
। ऐसे शिष्यका हिता चिन्तरन करता आचार्य हु माया-
शत्यमहित क्षपरका बलात्कारकरि दोप रि करे है अथवा कटुक
औषधि ज्या पश्चात् हित कर है जो जिहाफरिके मिष्ट बोले अर

(१) गिय टेपते ही छुडा सा गुरु भला नाही जर जो आचरण करि ताडनाहूकरि दापनित सिन्न करे हं सो गुरु पूजने येग्य है पात अपपीउगुणका धारक हा जाचार्ग हाय है ॥ ६ ॥ जर अपरानीगुणफू कह है जो शिष्य गुरनिक, दाप आला- चना कर सो दाप जन्यक गुरु प्रकाश नाहों को जम तताय- मान लाहकार पीया जल सो वाह्य प्रगट नाही हाय तमं निष्प- करिअयग किया दाप आचार किमीक नाही जणानं हं मे. ही अपरामा नाम गुण है शिष्य तो गुस्का दिमामकर यह अर गुरजा शिष्यका दीप प्रगट कर अन्यक जना तो ना गुरु नाही अधर्म है विनाममाती है काउ शिप्य अपना दोपकी पगरता जानि दुखित हार जात्मघात कर है ना क्रोधी हाय ग्लनयका त्याग कर है तथा गुरुको दुष्टता जानि अन्नमयमै नाय तथा जन हमाग अपना कगे तमं तुमारी हु अपना करेगा ऐम समस्त मम पापणा प्रगट होय समस्तमय जाचागनिका पतोतिरहित हा जाय आचार्ग मरके त्याज्य हो जाय इत्यादिक बहुत कट कथनी नपि जाय तातं अपरागी गुणका आचार्य पोग्य है।॥७॥ अब आचार्य निर्यापक हाय जर्स नावर सेटिया समस्त उपद्रमनिक टालि नायक पार उतारि ले जाय तसे आचार्य शिष्या अनेक पिमम् बचाय समार समुद्रक पार कर सो निर्यापक है ।। ८ ॥ ऐमे आचारसान ॥ १॥ आधारनान ॥ २॥ व्यवहारमान ॥ ३ ॥ [फर्ता ॥ ४ ॥ अपायो- पायावदशों ॥५॥ अवपीटक ॥६॥ अपरानी ॥ ७॥ - वारक ही (८०) निर्यापक ॥ ८॥ यह आचार्गनिकै अष्टगुगक धारक करतेनिके गुगनिमें अनुरागसा आपण भक्ति है ऐमैं आचर्गनिकै गुगनिक, स्मरण करके आचागनिका स्तपन बन्दना करता जो पुरुष अर्थ उतारण कर है से पापरुप ममारका परिपाटीक नष्टकार अक्षय सुरसा प्राप्त होय है ऐम पीतराग गुरु कहै है। ऐसे आचाग भक्ति वर्णन करा ॥ ११॥ अन बहुश्रु तभक्ति नाम चाग्मी भावनाक कहै हैं । जो अगपूपादिकका ज्ञाता तथा न्यार अनुयोगनिका पारगामी जो निरन्तर आप परमागमा पढ अन्य शिष्यनिक, पढा बहुभती है तथा निनके श्रुततान हो दिव्य- नेत्र है अर अपना अर परका हित करनेमें पूर्त ते और अपने जिनसिद्धान्त अर अन्य एकातीनिके मिद्वान्तनिका विस्तारत जाननेनाले स्याद्वादरूप परमविद्याक धारक तिनको जो भक्ति से बहुश्रुतीकी महिमा कौन कहनेह समर्थ दे जे निरन्तर श्रुतज्ञान का दान कर हैं ऐसे उपाध्याय तिनकी भक्ति नियारि सहित कर है ते चारित्ररूप ममुद्रका पारगामी हाय हैं जे अङ्गर्सक पूफीणक जिनेद्र वणन किये तिन समस्त जिनागमा निरन्तर पढ़ पढा ते बहुतश्रु तो हैं इहा पूथम आचाराग तामैं अठारह हजार पदनिमें मुनिधर्मका वणन है ॥ १ ॥ सूत्रकृतागका छत्तोस हजार पद हैं जिनमे मिनेन्द्रके नतके आधारन करनेके मिनय बियाका वर्णन है ॥२॥ स्थानांगकाव्यालिम हजार पद तिनमें पद्रव्यनिका एकादि अनेक स्थानका वणन है ॥३॥ ममना- याग एक लास चौसठि हजार पदनिर्म है तिनम जावादिक पदार्थनिका द्रव्यक्षेत्र काल मानके आश्रित : समानता,वर्णन है। ११.४ ।। व्याख्याज्ञप्ति अङ्गके दोयलक्ष अट्ठाईस हजार पदेनिमैं । जोपका अस्तिनास्ति इत्यादिक गणधरनिकरि कोये साठि हना 'पदनिका वर्णन है ॥ ज्ञावधर्मकथागके पांचलक्ष छप्पन हजार पदनिमें गणपरनि,करि कीये प्रश्ननिके अनुसार जीरादि- कनिका स्वभावका वर्णन है ।।.1 उपासकाध्ययन, नाम अङ्गक ग्यारहलस पत्तर,हजार पदनिमे आपकके, ब्रत शील , आचार क्रियाका तथा याका मन्विनिका उपदेशका, वर्णन है ॥७॥ अन्तकृतदशांग तेईसलक्ष अट्ठाईस हजार पदनिमे एक एक तीर्थकरके तीर्थमे दश दश मुनाश्वर, उपमग महित निर्माण प्राप्त भये विनका कथन है,८॥ अनुत्तरोपपादकदशागके . वाण लक्ष चौगालोम-हजार पदनिमें एक एक तीर्थकरके तीर्थम, दश दश मुनीस महासयकर घोर उपमर्ग सहित देवनित - पूजापाय- विजयादिक अनुत्तर विमानमें । उपजे तिनका वर्णन है । अश्नव्याकरण नाम.अगके वानलक्ष पाडस सहस्त्र पदनिमें नष्ट मुष्टि लाभ अलाम सुखदु स जीवित मरणादिकके प्रश्नका वर्णन है।१०॥ विपाकसूत्रांगके,एककोटि, चौरामीलक्ष, पदनिमे- कर्मनिका उदय उदाणां सत्तामा वर्णन है।।११ || अर दृष्टिबाद- नाम बारम अगका पाच, भेद-है परिकम, यस प्रयमानुयोग, पूर्व- चुलिका तिनमैं परिफर्मकाह पाच भेद है--विनमे चन्द्रप्रनप्तिके छह लक्ष पांच हजार पानिम चन्द्रमामा आयु गति अर कलाको हानिवृद्धि अर,देवीनिमय, परिवारादिकका वर्णण है ॥१॥ अर M N M (८२) सूर्यप्राप्तिके पावलक्ष तीन हजार पदनिम सूर्यका आयुगति' विभादिकका वर्णन है ||२|| जम्वृद्धीपप्रज्ञप्तिके तीनालक्ष, पञ्चीस हजार पदनिमे जम्बुद्वीप सम्बन्धी क्षेन कुलाचल द्रह नदी इत्यादिकनिका निरूपण है ॥३॥ द्वीपमागरमेशप्ति के बारन" लक्ष छत्तीस हजार पदनिमे असख्यावद्वीप'ममुद्रनिका और मध्य- लोकके जिनमनमुनिका र भग्नपासो व्यन्तर ज्यातिष्फ देवनि" के निगमनिका वर्णन है ॥ ४॥ व्याख्याप्रज्ञप्तिके चौरामो लक्ष छपन हजार पदनिमैं जीप पुद्गलादि। द्रव्यका निरूपण है ॥५॥ ऐसे पच प्रकार परिक्रम कह्या अमेटियांदा अगादूजा भेद सूरकेअिट्ठामोलक्ष पदनिमें जीव अस्विरूप ही है नास्तिरूप ही हे कर्ता ही है भोक्ता ही है इत्यादिका एकान्तमादिकरि कल्पित जीवका स्वरूपका वर्णन है ॥२॥ बहुरि प्रथमानुयोग के पाच हजार पदनिमें सठि महापुरुपनिकै चरिनका वर्णन है। ॥ ३ ॥ अमटर दजगमा 'चतुर्थभेदमे चौदहपूर्व है तिनमें। उत्पादक एक फोटि पदनिमें जीपादिक द्रव्यनिका उत्पादादि स्वामारका निरूपण है ॥ १ ॥ अग्रायणीपूर्वके छिनकोटि पदनिमें द्वादशागका सारभूत सप्ततव नवपदार्थ पद्रव्य सातमें सुनय दुर्न यादिकका सरूपका वर्णन हो । घोपानुपादक सप्तलम पदनिमें आत्मीय परवोर्य कामगीर्य कालपीर्य भारभार्य- तपोीर्यादि समस्त द्रव्यगुण पर्यायनिवार्य निरूपण है। ॥ ३॥ अस्तिनास्तिपूराद नाम के साठिलक्ष पदनिम जीना- दिद्रव्यनिका स्वद्न्यादिचतुष्टयकी अपेक्षा अम्नि और 'परद्रन्यादि चतुष्टयकी अपेक्षा नास्ति इत्यादिक सप्तभगादिक तथा नित्य-' अनित्य एक अनेकादिकनिका गिरोधरहितं घणन है ।।४॥" ज्ञानपूाद पूरके एक योटि कोटि पंदनिमें मति श्रुत अवधि मन. पर्यय केवल ये पाच'ज्ञान अर कुमनि कुश्रुति विभग ये तीन अज्ञान इनका स्वरूप सख्या पियफलनिके आश्रय प्रमाणपना' अपमाणपनाका वर्णन है ॥ ५ । सत्यपादपूर्वके छह अधिक एककोटि पढ निमैं वचनगुप्ति अर वचन 6 सस्कारका कारण जर द्वादश भाषा अर वक्तानिके भेद अर बहुत अर पुकार 'असत्य अर दशकारक सत्यका वर्णन है ॥६॥ आत्मपुपादपूर्णके छमीम कोटि पदनिमें अम्मा जीप है का है भोक्ता है प्राणी है पद्गल है' चेद है रिष्णु है स्वयम्भू है शरीरो मान पक्ता शक्त जतु मानो मायी नियोगी अमकुट क्षेत्रझ इत्यादिक स्वरूपका वर्णन है ॥ ७॥ कमीपूशनपूर्णके एक कोटि अस्सी लास पदनिर्म कर्मनिका वधउदय उदीर्ण सब उक्तर्षण उपशमन मक्रमणविधि निकाचितादि अस्था अर ईर्यापथ तपस्या अधः- कर्मादिकनिका वर्णन है ॥ ८॥ पूयारयानपूर्वके चौरासीलक्ष नाम स्थापना द्रव्य क्षेत्रकाल भावनिकू आश्रय करि पुरुपनिको महनन अर पलाजिकनिके अनुमार प्रमाणोक काल वा अपमाणीक काल लिये त्याग अर पापसहित वस्तुतं निराला होना अर उप-' चामको विधि अर उपरासको मारना अर पचसमिति अर तीन गुप्तिका वर्णन है ॥६॥ विद्यानुवादके एक कोटि दशलक्ष पद- निमैं अगुष्टपूसेनादिल मातमै अल्पविद्या अर रोहिणी आदि पाँच - 1 - । (5) स महाविधानिका सरूप मामा अर इनका, साधन मन्त्र तन्त्र, पूना विधान। अर सिद्धभई तिनका फरका अर अनन्तरिक्ष मोम अग स्वर स्वप्न, लक्षण गजन छिन्न ये जप्रकार तिमिनज्ञानका, वर्णन है । १० । फस्पाणानुवादपूर्ण छनोसकोधि पदनिम तार्थकर चक्रधर बलदन प्रातिगासु दयादिकनिका गर्भकल्याणा दि महाउत्सानिका अब इन पदनिका कारण पाडश भावना का तपशिप आचरणादिकका जर चन्द्रमा - सूर्य ग्रह , नक्षत्रनिका गमन तया ग्रहण शकुनादिक्के फरका वर्णन है,॥ ११॥ प्राण- प्राद पाक तरह काटि पदनिम कायका चिरित्मामा- अष्टाग आयुर्वेद,जा मैदाविद्या तामा भूतकर्मका अर जागलिका, अर इला पिंगलादिक स्वासोच्छ्वासमा पर गति के अनुसार, दशप्रा । णनिरे उपकारक अनुपरारक द्रयनिका पणन है ।। १२॥, क्रियाविशाल के नयकाटिं पदनिम सगीत शार, छन्द, अलकार , वहतरि कला जर स्वाक चौसटिगुण अर शिल्पादिज्ञान अर- चौरासो गभाधानानि प्रिया अर एकमी- आठ मम्पग्दर्शनादि । क्रिया अर पञ्चोस दरपदनादिक निल्यो मित्तिक क्रिया रणन है, ॥ १३ ॥ जलापहिसार के सदापाराकोटि पदनिम लैला- क्यका स्वरूप छपाम परिस्म अष्ट त्याहारि मारि-योज माक्ष, का रूप मागमनका कारग क्रिया और मोक्षसुसका वर्णन है ॥ १४ ॥ में पिल्याणचे दादिप चामलाप पांच पद निमें,. चौदह पूर्ण वर्णन किया। अम दृष्टयादागको पाचमा मेदि, चलिका-पाच प्रकार है. एक एक चूलिकाके दाय कोटि नरलक्ष 14 (८५) HT निशानी हजार दोय मै पर्द है तिनम जलगतालिकामे जलका स्तंभन जलमें गमन अग्निका स्तमन भक्षण अग्निऊपरि आमन अगिम प्रशनादिकका कारण मन्त्र तन्त्र तपश्चरणका वर्णन है ॥१॥ अर म्यर तालिकाम मेरु दुरांचलादिकनिमें भूमिम प्रवेश करनेक अशोरगमनके कारण मन्त्र तन्न पधरणका वर्णन है || २|| अर पायागताचूलिकामें मायारूप इन्द्रजालाटि प्रिक्रियाका मन्त्र तन्त्र तपश्चरणादिका वर्णन है ॥ ३ ॥ आकागगतलिफ में पाराशगमनका कारण मन्त्र तन्त्र तपश्चर- गणादि का न है॥ ४ ॥ रूपगतालिका सिंह, हम्ती, तरग, मनुन, वृक्ष, हरिण, गगा, लिपि, व्यात्रादिकके रूप पल्टने के कारण मन्त्र तन्त्र तपश्चरणका वर्णन है तथा चित्राम माटी पापाग काटाटिक इनकासोदना तथा धागाद, रमवाद, सान्य- चादातिकको निनाके अर्थ है ॥५॥ पचचूलिका दशकाटि गुगचासलाम छयालीस हजार पढ़ हैं इहा ऐमा जानना यमस्त द्वादशाक एक घाटि एक ही प्रमाण अतर है । १८४४६७४४ ०७३७०६५५१६१५ एते 'अनुपमरुक्त अक्षर है एक शर आग अक्षर मरा नाहों आ उनमे मठि मोगा ताई अक्षर है अर आगमम कया एमा मद्यपटका प्रमाण 'सोलोम बांतीम साडि तोयामील मात हजार आठसे अठासी १६३४८३०७८८८ अपुनरक्त असर है इन अमरनिको प्रमाणका भाग दीए एकमी चाराकोटि तोयागेला अठारन हजारे "पाचंपदे आए तिनमें ममस्त द्राजशाग है और अपशप अक्षर आठकोटि एक स्म PAN आठ हजार एकापचेतरिक रहे ८०१०८१७५ इनिअक्षरनिका एक पर होय नाही तात इनरु अगवाह कया नित अक्षरनिका मामायिकादि चौदह प्रकोणक है सामायिक नाम प्रकीर्णको मियात्य कपायाठिकक क्शका अमानरूप नाम स्थापना न्य क्षेत्रकाल भारके भेदत छ। मेदरुप सामायिकका वर्णन है ॥ १॥ कहरि चौतीम अतिशय अष्टप्राविहार्य परमौदारिक दिव्य देह मामशरण ममा धमोपदेशादिक तीर्थकरनिका मयात्म्यको प्रका- रास्प स्तान नाम प्रमोर्णक है ॥ २ ॥ एफ तीर्थकरके आल- मन रूप त्यालय प्रतिमाका स्तवनरूप प्रार्णक है ॥३॥ यहुरि पूर्वकृत प्रमादजनित दोपका निराकारण क अथिं दामिक रात्रिक चतुमामिक, सारत्मरिक, ऐयापथिक, उत्तमार्थ ऐसे मप्त प्रकार प्रतिक्रमका जामैं वर्णन ऐसा प्रतिक्रमण नाम प्रकीर्णक है ॥ ४॥ परि सम्पग्दर्शन ज्ञान चरित्र तप उपचार स्वरूप पचप्रकार पिनयका वर्णनरूप विनय नाम प्रकीर्णक है ।। ५ ॥ बहुरि नन- दरतानिकी बन्दनाक अथि तीन प्रदक्षिणा नु शिरागनी तीन गुरता द्वादश आरत व्यादिक नित्यनैमित्तिकत्रियाका जामें वर्णन ऐमा कतकर्म पूकोर्णक है ।। ६ ॥ यहरि जाम माधुका सावरक गाचर आहारका शुद्धताका वर्णनरूप दशकालिका पुकार्णक है ॥७॥ बहुरि च्यारपुकार उपमर्ग तथा वाईसपरोप हमिक सइनके निधान अर इनके फलमा वर्णनरूप उत्तराध्ययन प्रकीर्णन है ॥ ८॥ बहुरि साधक योग्य आचारणका विधान अय पसे धनका प्याश्चित्तका वर्णनरूप न्याहार नाम पूर्ण क । है,॥ ६॥,बहुरि द्रव्य क्षेत्र काल भागकै आश्रय साधक ये योग्य है ये अयोग्य है ऐमा विभागका वर्णनरूप कल्पाकल्प नाम, पूकी- क है ॥१०॥ यहुरि उत्कृष्ट सहननादिसयुक्त द्रव्य क्षेत्रकाल भाष पभानत उत्कृष्टफिरि वर्तते ऐसे जिनकल्पो साधुनिके योग्य निकालयोगादि। आचरणका अर स्थविर कल्पनिका दीक्षा शिक्षा गण पोपणा आत्मपम्फार सल्लेसना अर उत्कृष्टस्थानगत उत्कृष्ट आराधनाका वर्णनरूप महाकल्प नाम पूकीर्ण है ॥ ११ ॥ जाम भान व्यन्तर ज्योतिष्फ तथा कल्पनासोनिके रिमाननिमें उत्पत्तिका कारण दान पूजा तपश्चरण अफामनिर्जरा सम्यस्त 'सयमादिकका विधान तिनके उसजानेका स्थान वैभवका वर्णरूप पुडरिक नाम पफीर्णक है ।। १२ ।। बहुरि महर्दिक देवनिमे इन पतीन्द्रादिकनिमे उत्पत्तिका कारण तपोविशंपादिक आचरणका कहनेपाला महापुडरीक प्रकीर्णक है ॥ १३ ॥ नामे पूमादस् उपन्या देोपनिक त्यागतरूप निषिद्धका पकीर्णक है ॥ १४ ॥ जैसे द्वादशांगरूप सूत्रका ज्ञान है सो तरका पूभापत उपजे है सो आप पढे हैं अन्यको शिक्षा चुद्धिपमाण शिष्यनिक पढाना है तिन बहुश्नुतनिका, भक्ति है साहू बहुश्रतभक्ति है जो, गुणनिमे अनुराग करना ताकू भक्ति कहिये है जा शास्त्रनिमै अनुरागकरि पहूँ तया-शास्त्र के अर्थक - अन्य फहै-जो धनक लगाय शास्त्र निका लिपा तथा हस्तुरुरि,शास्त्र लिखे तथा हीन अधि कअपरक : मोनाकार शोधन कर तथा पहनेपालेनिक शास्त्र लिपाय देव तथा- पाख्या क-- पढायने बचाने वालेनिकी (८८) "आगाविकांकी स्थिरताकरि शास्त्रनिक ज्ञानाम्यामरी पूवर्तन कॅगचा पाय करनेक अपि निगल स्थान दवे सो नानापरण कर्मक नाश करनेवाली पहुश्रुनिभक्ति है । बहुरि बहुमूल्य वस्त्र पूठा लगाय पट्टमह डोरि करि शायनिकू पाधै जो दिसने श्रण पैठन करनेगानिका मनर जायमान कर सो ममस्त रह अतिमक्ति है । बरि सरर्ण करिमनोहर घड भये अर पचपूकार नारि जटित मकडा पुष्पनिकरियलको मारभूत पूजा कर मा श्रुतिमक्ति सशयादिक हित सम्यज्ञान उपजाय अनुप्रमत विलज्ञान उपना है जोपुरुए अपने मनय इन्द्रयनिक विषयनित कि अर पारम्बारे श्रुतदेवताका गुण स्मरण करके भलीविधी नाया पवित्र धर्म थ तन्यताका उतारे है से समस्त अतका पारगामी होय के वर ज्ञान उपजाय निर्माणक, पाप्त होय है ऐसे बहुश्रुतिभस्ति नाम चारमी भावना वर्णन करी सो निरन्तर 'भारो ॥ ४२ ॥ अब पूचनभक्ति नाम तेरमी भावना वर्णन 'कर हैं। प्रवचन नाम जिनेन्द्र सरन्न वीतरागार प्ररूपण रिया 'आगमका है। जिसमें पटद्रव्यनिका पचस्तिकायका सप्ततपनिका 'नवपदार्थनिका वणन है आ कर्मनिको प्रकृतीनिका नाश ! करने का वर्णन सो आगम है जाका प्रदेश बहुत होय ताशी अस्ति- काय सका है। और गुणपर्यायनिकू निरन्तर प्राप्त होये तात 'द्रव्यमना है वस्तुपनारि निश्चय करिये । तात पदार्थ सना है स्वभावरूपपनात तत्वशा है सो इनकी विशेष कथनी आगे प्रकरण पार्य कहसी । जैसे अन्धकारसंयुक्त महलमें दीपक हस्तम - -- 44 है - लेगरि ममतपदार्थ'देखिये है तम लाक्यरूप मन्दिरमें पूचन- रूप दीपकरि सूक्ष्मः स्थूल मूर्तीक अमूर्तीक पदार्थ देखिये है। 'प्रवचनरूप ही नेत्रनिकरि' मुनीचर चेतनादि गुणनिके धारक समस्तदन्यनिका अवलोकन कर जिनेन्द्र के परमागनक योग्यकाल "मैं बहुत विनय पडिये मो प्रावनभक्ति है कैमाफ है अपचनजामे 'पद्रव्य सप्तत्व नरपदार्थनिका भेदं समस्तकुणपर्यायनिका वर्णनहे 'जामैं भूतकाल अनन्त भया और भविष्यत' अनन्त होयगा अर 'पर्तमान तिनको स्वरूप वर्ण है । जामें अधोलोककी सप्तश्योअर 'नारकोनिका नसनेका उत्पत्ति होनेका स्थ ननिकू अर आयु'कीय वेदना इत्यादिक ममस्तका अर भग्नवासी देवनिका सातकरोड यहत्तरलास' भवनिका अर तिनका आयु काय विभन" निक्रिया मोगादिनिका अधोलाकमे वर्णन किया है । जाम मध्यलोक 'समन्धी असरयात दोप समुद्रनिका अर तिनम मेरु चुलाचल नदी द्रहादिकनिका और कर्म भूमिकै निदेहादिक संत्रनिका अर भोग- भूमिका र छिनौ अन्तदीप मम्पन्धी मनुष्यनिका अर क्म भुमिक मागभूमिके मनुष्यनिका कतेश्यका और ऑयु कोय सुस दु सादिकनिको अरै तिर्यचनिका व्यन्तरनिकै नियाम निमा पार- चार आयु'काय सामर्थ्य रिक्रियाको वर्णन है । तथा मध्यलोकम 'ज्योतिष्फंदेह तिनके विमान निभय परिपार आयु "कायादिक का तथा सूर्य चन्द्रमा ग्रह नक्षानिका च्यारक्षेत्रगत सोगादिको वर्णन है - AT बहुरि उचलीको स उपटलनिका स्वके शहमिन्द्रकोटल

(६०)
निका इन्द्रादिक देशनिका विभव परिवार आयु काय शक्ति गति
सुसादिकका वर्णन है। ऐसे मजारि प्रत्यक्ष देसा निलो करती
समस्त द्रव्यनि के उत्पाद व्यय प्रौव्याना ममम्त प्राचनमैं वर्णन
आगममैं ह बहुरि कर्मतिको प्रतिनिका धन्य होनेस उदयका
स.का मक्रमण दिनिका ममता वर्गन , आगमनमै है । बहुरि
“ममारत उद्धार करनेवाला रत्नत्रयका सार प्राप्त होने का उपाय
परमागमहाम बहुरि गृम्यपणाम श्राफ धर्मका जम्न्य मध्यम
उत्कृष्ट चर्चाकार तथा प्रारनिके नत मयमादिक उपहार
परमार्थरुप पूनिका वण न पूर बननहा जनिये है यहरि - गृहमा
स्पागी मुनानिक महानतादि अईम मूलगुग और चोरापोलाए
- उत्तरगुण अर स्वाध्याय पान आहार विहार - माम पिकादि चा
चारित चयाका धर्मध्यान गुस्सपानादिका मल्लेपना मरणका
ममस्तचयाका गण न प्राचनम है। बहुरि चौदह गुणस्यानिका
सरूप तया चौदह जोपममामनिका आ चौदह-मार्गणानिका
चर्णन प्राचत जानिये है तथा जापनिये एर सौ माडानिन्धान
-लभ पुरकाड अर चौरमा लास- जाविका यो नस्थान
प्रय नहात जोनिये है वयापार अनुयोग च्यार शिलानत
तोनगुणवत आगगहो जानिये है । तथा च्यार गतिनिका भेद
अर मम्यग्दर्शन सम्पायान मम्पक चारित्रका सस्प भगवानका
अरू या आगम हित जानिये है ।, यहुरि द्वादश भावना- अर
द्वादश तप अरद्वादश अङ्ग अर चौदह प्रकोण कनिका, सहा
प्रश्चनहात जानिये ह । बहुरि उत्सरिणी अपमर्पिणी - कालकी

(-६१) - फिरणी अर यांमैं छह छह भेदरूप कालमैं पदार्थको परिणतिका भेदनिका स्वरूप आगमत जानिये है । बहुरि कुलकर तीर्थकर चाधर बलदेव वायुद्देन प्रतिवासुदेव इत्यादिकनिकी उत्पत्ति 'पृत्ति धर्म तीर्थका वर्तन चक्रीका साम्राज्य , व देवादिकनिके विभा , परिवार ऐश्वर्यादिक आगमहीत- जानिये है। , बहुरि जीनादिक द्रव्य नका प्रभार आगमहीत जानियेहै जात “आगम भक्तिपूर्वक सेग्नमिना कनुष्यजन्ममैं हू पशू ममान है भगवान सर्गज बोतराग समस्त लोक जलाफक अनन्तान्त भूत भविष्यत वर्तमान कलवर्ती पर्यायनिकरि सयुक्त एक समयमें युगपन् क्रम रहित हस्तकी रेसारत् प त्यक्ष जान्या देख्या ताकरि परूपण किया पम्पक मप्तऋद्धि च्यार ज्ञानवारी गणवरदेव द्वादशागरूप रचना पूगट करी इहा ऐमा विशेष जानना जो देवाधिदेव परम पूज्य धमतीर्थक प वर्तन करनेगले अनन्तज्ञान अनन्तदर्शन अनत चार्य अनन्तसुखरूप जनन्तगश्मी अर समस्मरणादि बहिरङ्गल- मोररि मडित अर इन्द्राटिक अमख्यात देवफिके समूहकरि चन्दनीक चौतीम अतिशय अष्टपतिहर्यादि अनुपमा ऋद्धिकारि "सहित अर क्षुधा तृपादि अटादश दोपरहित समस्त जीवनिका 'परोपकारक पर लोक अलोकके अनन्तगुण पर्यायनिर्का क्रम- रहित युगपत ग्यानका धारक अर अनन्तशक्तिका धारक ससारमें डूबते पाणीक हस्तारलन्चन देनेगाला समस्त जीवनिका दयाल परमारमा परमेश्वर परमनह्म परमेष्ठी सयम शिव अजर अमर अरहन्तादि नाम कपि पिरयात अशरण , पणोनिक परमशरण अनन्तका परमौदारिक देह में तिष्ठता गणधरादिक मुनीश्वरनित करि वन्दनीक म चरण जिनका अर कट तारयो ओष्ठ जिह्वा दिका चलनहलनरहित इछापिना अनेक' पूणोनिका प्रपके ५ भापत उपज्या अर थार्य अनार्य ममस्त दशके पाणीनिका ग्रहणमे आरता समस्त पापका घातक दिव्यधानिकरि भव्य जीपनिका मोह अधकारकू नष्ट करता चमरनिकरि चीज्यमान छायादि प्रातिहार्य के धारक रत्नमय मिहामन अर च्यार अंगुल जतरीक्ष पिरानमान भगवान सकलपूज्य समभट्टारक- श्रीवर्ध- मानदेवाधिदेव मोक्षमार्गक प्रकाशन के अथि मतपदार्थ निका स्वरूप सातिशय दियघनिकरि प्रगट पिया तिम अनसम्म निफ्टवीं निन्ध ऋपियरनिवरि बदनीक मप्सपि समृद्धि च्याम्यिानके धारक श्रागतिमानाम गणधर रसुद्धि आदिक “ऋद्धिके प्रभारत भगवान मागित अथक नाही निम्मरण होता. भगवानभापित अर्थक धारणारिद्वादशांगला रचना की जा “चतुथरालका तीनवर्ष साह आठ महीना बाकी रयो तदि श्रीव मानस्वामी निगण गये पीछे गौतम स्वामी; सुघमाचाग, जम्बूधामी र तीन केरलो सामठयप पान्त वल ज्ञान रि ममस्त रूपणा करी। पाठ वल ग्यानी अभाव भया ता पाछै अनुनमारि विष्णु, निदिमा अपराजित गोवर्धन, भद्र- "बाहु ये पाच मुनि हादशागा धारकाथ तब वली भए तिनका एक सौ वर्षका अपमर नमत भया तिनके अपमरमें भगवान वमनीतुल्य पदार्थ निमा ग्यान अपहरणा रही यहरि विशाल ।

ऍमें भगवान साचार्य, झाष्ठिलाचार्य, क्षत्रिय, जयसेन, नागसेन, सिद्धार्थ पृतिपेण, विजय बुद्धिमान गगदेन, धमसेन ये दश पूर्वके धारक एकादश परम निग्रंथ मुनीश्नर जनुक्रमते एक सौ तियामी वर्णः में, भये तेहू यथानत पूरपणा करो बहुरि नक्षत्र, जयपाल, पाडु नाम, ध्रु सेन; कसाचार्य ये पाच महामुनी एकादर्शाग विद्या- 'का- पारगामो अनुकमत, दोयः सौ बीस - चर्पमे , भये- तेह ययावत करणा करी ।' बहुर। सुभद्रा यशोभद्रा भाह, महायश, लाहाचाय ये पच महामुनि एका प्रथम अगका , पारगामी एकसौ अठारा वपमै अनुक्रमतै भये । घोटनिनेन्द्र निर्माण गये पार्छ छ। सौ तिरासी वर्ष पर्यंत अग: का ज्ञान रया पाछ ऐम कालके निमित्त बुद्धिवीर्यादिककी. ‘मन्दता होते श्री कुन्दकुन्दादि अनुक मुनि निथ धीतरागी अपके वस्तुनिका जानी हीते भये तथा उमादामी भये ऐसे पापत भयभीत कानपिन नमम्मन्न परममजमगुणमण्डित गुरुनिकी- परिपाटीत श्रतका अव्युटिल अर्थक धारक वीतरागीनिका पर- सरा चलो जाई जिनम श्रीकुन्दकुन्दस्वामो समयमर प्राचनसार पचास्तिकाय, अटपाहुडकू , आदि-लेय-अनेक ग्रन्थ रचते अधार प्रत्यम वाचने पटने मैं आप, हैं। इन ग्रन्थिनिकाला विनयपूर्पक- आराधन सा अपचन भक्ति है । बहुरि दशअध्यायमा ततार्थस्त्र श्रीउमा पामो रच्या तिमको तत्वार्थसिद्धि नाम टोका: पूज्यपाद- स्वामी,रची है। अर तत्वार्थसत्र उसरि,हो राजवातिक सोलहर हजार-लोहनिम ,श्रोअकरकर स्पा र श्लोम्बातिद बोम . 15 -- 1 (६६), विद्या है सो परमदेवता है जो माता पिता ग्यानाभ्यास कराने है। ते कोट्या धन दिया। जे सम्यग्ज्ञानके , दाता गुरु है तिनका- उपकार समान मात्र लोक्यम कोऊ उपकारक नाही अर ज्ञानके देनेवाला गुरुका उपकारक लोपै है तिस ममान कृतनी नाही पापो, नाही । पानका अम्पाम विना व्यवहार परमार्थ. दोउनि - मे मूढ है. यात प्रवचन भक्ति ही, परमकल्याण है। पूचनका सेग्न निना मनुष्य पशु समान है। या पूबचन भक्ति , हजारों, दोपनिका नाश करनेवाली है याका , भक्तिपूर्वक अर्थ । उतारण करो याही त सम्यग्दर्शनको उज्ज्यता होय है । ऐसे पूवचन; भक्ति नामा तेरखी भावना वणन करी ॥ १३ ॥ आग आवश्यकापरिहाणि नाम,चौदमी) मारना, वणन करें- है। अवश्य करनेयोग्य होय ताकू आपट्यक कहिये है। आप- ३यकनिको जो हानि नाही करनेका , चिन्तन सो, आवश्यरका परिहाणोनाम भावना है। अश्रया इन्दियनिके, वश नाही से. अश्य कहिये अश्य जे मुनि-तिनको जो क्रिया से आवश्यक है,। आवश्यककी हानि नहा करना आवश्यकापरिहाणि कहिये ते आवश्यक छह,पकार हैं। सामायिक रतन, वन्दना. पूतिक्रमण साध्याय, कायोत्सर्ग ये छह आवश्यक है सो कहिये हैं, जे देह त भिन्न पानमयही जारी देह ऐसा : परमात्मस्वरूप, कर्मरहित चैतन्पमात्र शुद्धजीवर एकागार ध्याता मुनि है -सो, सर्वोत्कृष्ट, निर्माण प्राप्त होय है और जा विकल्परहित शुद्धआत्माके गुण निमे आपका मन, नाही तिष्ठ, तो- तपधीमुनि पट : आरश्यक ५ M -

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. - - दया है मा परमदेवता है जो माता पिता त्यानास्पाम की हैं, ते कोट्या धन दिया। जे सम्पज्ञानके दाता गुरु हैं। दिनका उपकार समान मात्र मैलोक्यमे कोऊ उपकारक नाही, अर जानके देनेवाला गुरुका उपकारकू लोप है विस समान कृतनी नाही पापो नाही । पानका अभ्याम विना व्यवहार परमार्थ दोनि- -मे मूढ है यातै प्रवचन भक्ति ही,, परमकल्याण हैं। पूचनका सेनन मिना मनुष्य पशु ममान है ।। या पूपचन भक्ति., हजारों दोपनिका नाश करनेवाली है याका - भक्तिपूर्वक अर्थ , उतारण करो याही ते सम्यग्दर्शनको उज्यता होय है। ऐसे पूपचन.. भक्ति नामा तेरवी मारना वणन करी ॥ १३ ॥ '- आप आवश्यकापरिहाणि नाम चौदमो भावना पणन करें हैं।, अपश्य करनेयोग्य होय ताक आवश्यक कहिये है।। आव- श्यकनिको जेा हानि नाही करनेका चिन्तयनासो आवश्यकका परिहाणीनाम भावना है। अश्रया, इन्द्रियनिके, वश - नाही से अपश्य कहिये अश्य, जे मुनि, तिनको जो क्रिया से आवश्यक है । आवश्यरको हानि नाही करना आवश्यकापरिहाणि कहिये ते आवश्यक छह प्रकार हैं। मामायिक स्तर, बन्दना. पूतिक्रमण साध्याय, कायोत्सर्ग ये छह आवश्यक है सो कहिये हैं। जे देह त भिन्न पानमपही जाके दह ऐसा परमात्मस्वरूप, कर्मरहित चैतन्यमान शुद्धजीना एकागूफार घ्यारता मुनि है सा-सोकृष्ट माणक प्राप्त होप है अर जा विकल्परहित शुआमाके गुण: निमे आपका मन नाही तिष्ठ, तो तपस्वीमुनि पट, आवश्यक ,

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1
हातात
हा श जोपरम
जी 'धर्मताकरि
पाहातात आप वृषभ हा अरणगतक सफल प्राणीनिम गुण

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क्रिया है तिनको पुष्ट करो अङ्गीकार करो अर आपते अशुभाने के आसन निराकरण करो 'टालो' पृथम तो सुन्दर असुन्दर वस्तुम तथा शुभ अशुभ कर्मके उदयमे रागद्वप मति करो तथा आहार वस्तिकादिकनिका लाभमे गा अलाभम समभार करीजाते स्तुतिम; निन्दामे, आदरमे, अनादरमे, पापाणम, रत्नम, जीवनम मरणमें, रीमें, मित्रमे, सुसम, दुसमै, स्मशानमै, 'रागढ प रहित परिणाम, होना मो समभार है। जातें साम्यभारक धारक हे ते वाह्य पुद्गलनिक अवेतन अर आपते भिन्न अर अपने जा मस्स- भामै हानि वृद्धिक अति जानि रागद्वप छाड हे अर आपक शुद्ध ज्ञातादृष्टारूप अनुन करता रागदेपादिविकार रहित तिष्ठ है ताके साम्यभार होय है मोही मामायिफ है बहुरि भगवान जिनेन्द्रक अनेक नामनिकरि स्तरन करना सो स्तवन नाम आर. इयक है जो कमरूप रोक आप जीते ताते जिन हो आ अपने स्वरूपम आपकरि तिष्ठी हो तात स्वयभु हो अर केवलज्ञान रूप नेत्रकरि निकालती पदार्थनिक जाना हो तात विलोचनहीं अर आप मोहरूप जन्धासुरक माया तात अन्धकान्तक हो आप पातियाकर्म रूप अधौरीनिका नाश करके ही अदित ईसर पना पायो तातं अधनारीश्वर ही आप शिवपद् जो निर्माणपद तामै बसे तात जाप शिन हो पाप घरोका सहारं करो होतात याप हर हो लेफिम मुसका कर्ता तात आप शकर हो शं जोपरम आन-दरूप' सुख तामें उपजें तात संभन हो वृप 'जो धर्मनाकरि दिपा हो सम ही अर जगतक'सकले प्राणीनिमें विद्या है सा परमदेवता है, जो माता, पिता यानाम्पास कराने हैं; ते,कोट्या धन दिया। जै- सम्यग्ज्ञानके, दावा गुरु हैं -तिनका समोसा '() निया तिनको पुष्ट करो जङ्गीकार करो अर जागते अशुभकमे के आसन निराकरण करो टालो पृथम तो मुन्दरं असुन्दर चस्तु तथा शुभ अशुभं कर्मके उदयमे रागढ़ प मति करा तथा आहार पस्तिकादिकनिका लाभमें ना अलाममे ममभार करोजात स्तुतिम, निन्दामें, आदरमे, अनादरमें, पापाणमे, रत्नम, जाननम मरणम, बैरीम, मित्रमे, सुसमे, दुःसमै, म्मशानम, रागद्ध प रहित परिणाम होना मो समभान है। जात साम्यभारके वारक हे ते बाह्य पुद्गलनिक अतन अर जापतं भिन्न अर अपने नामस्म- भारमै हानि रद्धिक अकर्ता जानि रागढ पे छार्ड है और जापत शुद्ध जातादृष्टारूप अनुभव करता रागदेपादिविकार रहित निष्ठ हे नाफे माम्यभार 'होय है सोही मामायिक है नहुरि भगवान जिनेन्द्रक जनेक नामनिकरि स्तरन करना सो स्तवन नाम आर- श्यक है जो कमरूप रोक आप जीत तातै जिन हो अर अपने स्वरुपमै आपकरि तिष्ठी हो तात स्वयभु हो अर केलजान रूप नेत्रकरि निकालातो पदार्थनिक जाना हो तात रिलोचनहो अरं आप मोहरूप अन्धासुरक माया तात अन्धकान्तक हो जाप घातियाफर्म रूप अवारीनिका नाश करके ही अदित य ईश्वर- पना पायाँ तीत अनारीयर हा जाप शिमपद जा निर्माणपद ताम से तात आप शिन हो पापरूप पैरोका महार करो होतात आप हर हो लेकमे सुसका कर्ता तात आप शकर होश जोपरम आनन्दरूप सुख तमि उपजे तात सभा हो वृष 'जो धर्मताकार 'टिपा हो तात आप वृषभ हो जर जगतके सकल प्राणीनिमे गुण (१८) निकरि बडं तात जगज्येष्ठ हो क जो सुसताकरि समस्त जीवन की पालना करी वात आप कपाली हो केरल ज्ञानकरि ममस्त लोक अलोको व्याप्त हो रहे ताते आप विशु हो अर जन्मजरा मरणरूप निपुरक माचा वात आप निपुसतक हो ऐम एकहजार ओठ नामरि आपका स्तरन इन्द्र किया है। अर गुणनिकी अपेक्षा आपका अन्त नाम है। ऐमै भावनिम गुणचिन्तनकरि जा चोगाम तर्थकरनेका स्तमन कर है मा स्तान नाम आवश्यक ह।। २ ।। बहुरि चनुविशति तीर्थकरने मे त एक्तीर्थकरनेका वा अरहत मिद आचार्य उपाध्याय सर्वसाधुनम त एफक मुरुष- करि स्तुति करना सो बन्दना आवश्यक है ॥ ३ ॥ नरि जो समस्त दिनमे प्रमादके वश होया तथा कपायनिक वश हाय या विपान मे रागद पी होय होऊ एकन्द्रियादिक जीवनिका घाव किया तथा जनर्थक प्रपतन किया वा सदेोपभाजन क्यिा वा किसी जीवका प्राणपीडित किया तथा कर्कश कठोर मिथ्या यचन क्या चा किसीको निन्दा अपवाद किया अपनो 'प्रशमा फरीवा स्त्रो कथा मानन कथा देश कथा राज्य कथा करी तया अदत्तधन ग्रहण किया या परका वनमै लालमा करी तथा परको स्त्रीमे राग किया यथा धन परि गृहादिकमें लालसा करा ते समस्त पाप सोटे किये बन्धनके कारण किये, अब ऐसा पापरूप परिणामनिक भगवान पच परम गुरू हमारी रक्षा करह अब ऐ परिणाम मिथ्या होह पचपरमेष्ठी के प्रमादतें हमारे पापरूप परिगाम मति होहू ऐसे मारनिको है (८) शुद्धता पास्ते कायोत्सर्गकरि पच नमस्कारके ना जाप्य कर ऐसे समस्त दिनकी प्रवृत्ति सध्याकाल चिन्तनकरि पापपरिणाम निक निन्दना सो देवसिक प्रतिक्रमण है। अर रात्रि सम्बन्धी पापका दरि करनेके अर्थ प्रमात प्रतिक्रमण करना से रात्रिक अतिक्रमण है। बहुरि मार्गमे चालनेमे दोप लाग्या ताका शुद्धिका जा प्रतिक्रमणसो ऐपिथिक प्रतिक्रमण है। एक पक्षके दोष निराकारण करने के अर्थ पाक्षिम्य प्रतिक्रम है च्यार महीनेक दोष निराकरणके अर्थ प्रतिक्रमण करना चार्तु मासिक प्रतिकमण है एक वर्षके दोप निराकरणके अर्थ मानत्सरिक प्रतिक्रमणहे समस्त पर्याय कालका दोप निराकरण के अर्थ अन्त्य सन्याममरणको आदिमें प्रतिक्रमण है सो उत्तमार्थ पूतिक्रमण है ऐसे मात प्रकार पुतिक्रमण है तिनमे गृहस्थर सध्या अर पुमावतो अपना नफा टोटा अवश्य देखना योग्य है । इहा जो सौ पचास रुपयाका व्यवहार करनेवाला हू आथगनै ठिगाई देस हैतो इस मनुष्य जन्मको एक एक घडो कोटिधनमे दुर्लभ गया पाऊँ नहीं मिल हे याका विचार हू अवश्य करना जो आज मेरे परमेष्ठोका पूजनम स्तरनमें केता काल गया अर स्वाध्यायमें पचपरमगुणके शास्त्र श्रवणमें तत्वार्थकी चरचाम धर्मात्माकी यावृत्तिम केता कल गया अर घरके आरममें पायमै ज्या किया करनेमै पिसादमैं भोजनादिक, वा अन्य इन्द्रियनिक विपयनिमें प्रमोदमै निद्रामै शरीरके सरकार में हिमादिक पच पापनिम केवा काल गया है ऐसा चिन्तनकरि पापमैं

घटुत प्रवृत्ति भई होय'तो आप विकर देय पाप बन्धक
कारणनिक घटाय धर्म कायमै जामाकू युक्त करना योग्य है
पचकालम प्रतिक्रमण ही परमागमम धर्म कया है। आत्माका
हित अहितका विचारम निरन्तर उद्यमी रहना योग्य है। या पति
क्रमण जामाकी घडी मात्र माना गोपाला है अर पूर्वले किये
पापकी निर्जरा कर है॥ । परि आगामी कालम आपके
असारके रास्ने अर्थ पापनि का त्याग करना जो आगे मे ऐमा
पाप का मन वचन पायम्या नाहों करुगा से प्रत्यारयान नाम
आवश्यक सुगतिका कारण है ।।५।। बहुरि च्यार अगुलके अन्त
राल दाऊ पग परोपरि सटा रहे दाउहस्तनिक लन्यायमानकरि
दहमा ममता छाडि नामिकाका अगमैं दृष्टि पारि देहतै भिन्न
शुद्ध आनाको भावना रना सा कायो-पर्ग है। मा निश्चय
पद्मासनत टू हाय अर पडा दहकरि हू होय दोऊनिमैं
शुद्धध्यानका अपलम्पनत सफलहै ।६। ए छह' आवश्यर
परमधर्मरूप हैं इनक पूजि पुष्पाजलि क्षेप अर्थ उतारण
योग्य है। । यहुरि ए छह आवश्यक परमागमम छह
छह प्रसार क्या है। नाम, स्थापना, द्रव्य, संन, काल, भार
करि पट प्रकार जानना। गुम अशुभ नामक श्ररणारि राग
द्वप नोही करना सो सामयिक है। कोऊ स्थापना प्रमाणादिक
करि सुन्दर है कोऊ प्रमाणादिक करि होनाधिक करि सुन्दर है
तिनके पि राग द्वेषका अभार सो स्थापना सामायिक है।
अषण रूपा रत्न मोती इत्यानिक' अर मृचिका काष्ठ पापाण

(१९०१)
कण्टक छार भम्म धूल इत्यादिकनिमें रागढ़ प रहित सम देखना
सेो द्रव्य सामायिक है। महल उपननादि रमणीक स्मशाना-
दिक अरमणीक क्षेत्रमैं रागदप छाडना सो क्षेत्र सामयिक है
हिम शिशिर थमन्त ग्रीष्म शरत ये मतु अर रानि दिनस
अर शुक्लपक्ष कृष्णपक्ष इत्यादिक काल पि रागढ़ पको वर्जन
सो काल सामयिक है अर ममस्त जीरनिके दुस मति गहू
ऐसा मनीभारफार अशुभ परिणामनिका अभार करना सेो भार
सामयिक है ऐम छह प्रकार मामायिक क्या। अन छह प्रकार
स्तपन कहे है चतुर्विशति तीर्थकरनिका अर्थ महित एक हजार
आठ नामकरि स्तवन करना सेो नाम स्तपन है अर कृत्रिम
अकृतिम अपरिमाण तीर्थकर अरहन्तनिके प्रतिविम्मनिका स्तवन
सो स्थापना स्तमन है अर समरमरणस्थित काल देह प्रभा प्राति-
हायर्यादिकनि करिस्तान से द्रव्य स्तरन है अर क्लाश ममेदाचल
ऊर्यन्त ( गिरनार ) पापापुर चम्पापुरादि निर्माण क्षेत्रनिका तथा
समवसरणमैं वर्मोपदेशक क्षेत्रका स्तन सो क्षेत्र स्तरन है। अर
स्वर्गारतरण जन्म तप ज्ञान निर्माण कल्याणके कालका स्तबनसो
काल स्तन है अर केल ज्ञानादिअनन्तचतुष्टय भावका स्तन
साभार स्तवन है ऐम छह प्रकार स्तपन कस्या। ए तीर्थकर
चा सिद्ध तथा' आचाय उपाध्याय साधु इनमें एकका नाममा
उच्चारण करना से नाम बन्दना है। अर अरहत सिद्ध आचा-
र्याटिकनिमै एकमा प्रतिनिम्बादिककी पटना सो स्थापन बदना
है।तिनके शरीरकी यदना है। तिनके शरीरकी बदना सो

(१०२)" द्रव्य यदना है। अरहत मिद्ध आचार्यादिकनि करि व्याप्त जो क्षेनताको बदना से क्षेत्र बदना है। तिन ही पचारमगुरुनिमें कोऊ एस्करि व्याप्त काल तारी वदना से माल पटना है। एक तीर्थस्सा या सिद्धका या आचार्यका वा उपाध्यायका या साथ के आत्मगुणनिक पदना करना से भार पदना। ऐसे छह प्रकार वदना कही। जब छह प्रकार प्रतिक्रमण कई है। अयोग्य नामके उच्चा- रणमैं कृतकारित अनुमोदनास्प मनवचन कायत उपन्या देोपका निराकरणके अयि प्रतिक्रमण करना सो नाम प्रतिरमण है। कोऊ शुभ अशभस्थापनाका निमित्तत मन वचन शायत उपग दोपत अमान निवृत्त करना से स्थापना प्रतिमा है। अर द्रव्य जो आहार पुस्तक औपधादिककै निमितते पाचनकायत उपना देोपका निराकरण के अर्थ द्रव्यप्रतिरमण हे ५म गमन- स्थानादिको निमित्ततै उपग्या अशुभ परिणाम जनित देोपनिका निराकरण के अर्थ क्षत्र प्रतिरमण है। अर दिम रात्रि, पर्स, मतु, शीत, उष्ण, वपासाल इनके निमित्त उपग्या अतोचारको दूर करनेक प्रतिक्रमण करना सा काल पतिक्रमण है। अर राग द्वपादि भापनित उपन्या दापके दूर करने भार पूतिक्रमण है। बहुरि अयाग्य पापके कारण जे नाम उच्चारण करनेका त्याग से नाम प्रत्यागन है अर अधाग्य मिथ्यात्यादिक पूर्वा- बनेपाली स्थापना करने का ल्यान सो पत्यार थान है। पापपन्धन कारण सदोपद्रव्य वा तपके निमित्त निर्दीप द्रव्यका हू मनपचन

(१०३)
काय करि त्याग सो दन्यपूत्यारयान है बहुरि असजमका कारण
क्षेत्रका त्याग सो क्षेत्र प्रत्यारयान है मिथ्यात्व असजम कपा-
दिकनिका त्याग सो भार प्रत्याख्यान है ऐसे छह पूकार प्रत्या-
ख्यान वर्णन किया। अब छह पूकार कायोत्पर्गतं कहै है।
पापके कारण कठार पटक नामादिकर्ते उपज्या दोष दूर करने
अर्थ कायोत्सर्ग करना सो नाम कार्योत्मर्ग है। पापरूप स्थापना
का द्वारकरि आया अतीचार दूरकरनेक कार्योत्सर्ग करना से
स्थापना सो कार्यो पर्ग है। सदापदच्यक सेननते तथा
सटोपत्रकालके सेननंत सयोगत उपज्या दोष दूर करनेकू
कायोत्सर्ग करना सो द्रव्यक्षेत्रकाल कायोत्सर्ग है। मिथ्याप
असजमादिक भावनिकरि
कीया दोष दूर करने
कायोत्म करना से "भार कायोत्सर्ग है।
प्रकार छह ओवश्यक वर्णन किये। अब गृहस्थके और ह
छह प्रकारके जाश्यक है। भगवान जिनेन्द्र नित्य पूजन
करना, निर्ग्रन्थगुरुनिका सेवन स्तन चिन्तयन नित्य करना अर
जिनेन्द्र के प्ररूपे आगमका नित्य साध्याय करना इन्द्रियनिक
विषयनिते रोकना छह काय जीवनकी दया पालना सो सयम
है, शक्ति प्रमाण नित्य तप करना, शक्ति प्रमाण नित्य दान
देनो ये पटप्रकार ( आवश्यक गृहस्थको नित्य नियमत जङ्गीकार
करना योग्य है। ऐसे समस्त पापका नाश करनेवाली मावनिम्,
उबले करनेवाली आवश्यकनिकी हानिका अमानरूप चौदमी
भावनी वर्ण करी ॥
ऐसे छह

(१००)
अब सन्माग प्रभारना नाम पदमी भावना वर्णन कर हैं।
उहाँ समाना मेक्षिका सत्यार्थ मार्ग ताका प्रभाव, प्रगट करना
सो मार्ग प्रभारना है। सो मन्मार्ग रताय आरमा म्यभार है
पक मिथ्य पराग, प, काम, कोय, मान, माया,
लोभ,ये
पिपरीत करि नादिन मलीन पिपरीतकार सरया है अर
परमागमका शरण पाय मेक मियात्वादिक दोपनिक
रिकरि रलाय समान उवलकरना यो मनुष्यजन्म
पर इन्द्रियपूर्णता जर ज्ञानशक्ति अर परमागम का शरण
अर माधमिनिका ममागम जर रोगादिकरहितपना अर
जतिश रहित जीविका इन्याटिक पुण्यात सामगा पायकरके
ह जा आत्माकू मिथ्यात्वापाय पियारिक ते नाही छुडायातो
अनन्तानन्त दु सनिका भचा समार समुद्र त मेरा निकपना
अनन्तकालहम नाही हायगा जो सामगो आर मिली है सो
जनन्तकालमेंहू दुर्लभ है अर अन्तरग बहिरग सम्ल सामग्री
पायकरके हू जो जात्माका प्रभार नाही पूगट करगा तो अचानक
काल जाय ममत मयोग नष्ट, कर देगा नात अचमै रागदेख
माह दरकरि जैसे मेग शुद्ध पातराग स्वरूप अनुभगोचर होय
तैम ज्यान स्वघ्यायमैं तत्पर होना । बहुरि बाह्य-प्रवृत्तिभी मेरी,
उमर करि अन्तर्गत धर्मका प्रभार प्रगट करि माग पूभावना
साना,जाक दपि अनेक जोरनिकै हृदयमै, धर्मकी महिमा प्रवेश
करि जाय । जिनेन्द्रका उत्सन ऐसा करना जाक देसि हजारा
लाानिस मार जिनेन्द्रकै जन्म कल्याण, समय जैसे, इन्द्रादिक

(११०५) देर अभिषेक करि अपना उन्म मफल किया तैम जयजयकारशब्द' करि हमारा, सरका उचारण करि लोक आपक कृतार्थ मान तन मन प्रमित हो जाय तैस अभिपंक करि प्रमानना करना तथा जिनेन्द्रका पाठ भक्ति अर वडी बिनय अर निश्चल ध्यान करि मे पूनन करो जात करते ढसते अर शुद्ध भक्ति के पाठ पढते तथा अमण करते हर्पके अकरे प्रगट होय आनन्द हृदयमे नाही ममारता वाघ उछलने लगजाय जिनक देसि मिथ्याप्टिका ऐमा परिणाम हो जाय अहो जैनीनिकी भक्ति आश्चर्यरूप है जामे ये निर्दोश उत्तम उज्ज्वल प्रमाणीक मामग्री अर ये उज्जल सुवर्णके रूपाके तथा काशी पीलमय मनोहर पूजन के पात्र अर ये भक्ति के रसकरि भरे अर्थ महित कर्णनिक अमृतरूप मीचते शुद्ध अक्षरनिका उच्चारण अर एकाग्ररूप विनय सहित शब्दनि के अनुकूल उज्वल द्रव्यमा चढापना अर ये परमशातमुद्रारूप वातरागकै प्रतिषिम्म प्रतिहार्यनिफरि भूपितका पूजना स्तवन करना नमस्कार करता धन्य पुरुपनिकरि होय है। धन्य इनकी भक्ति बन्य इनका जन्म कर धन्य इनका मनाचनकाय अर धन्य इसका धन नो निर्वाछक होय ऐसे सन्मार्गमै लगाव है। ऐमा प्रभार व्याप्त हो जाय। अर देसनेत अर श्रवण वस्नेत निकट भन्यतिके आनन्दके अश्रुपात झरने लगिजाय । भक्ति हो ससार समुदत ड्यवेक - हस्तावसम्मान देनेवालो हमारे भरमसमें जिनेन्द्रको भक्ति ही। शरण होह ऐसा जिनेन्द्रका नित्य पूजना करना तयाँ अष्टाटिक पर्व तयापोडशकारण दशलक्षम रेननंग (1०६" पर्वमें समस्त पापफे आरम्भ डि जिनपूजन करना आनन्द सहित नित्य करना रणनिक प्रिय ऐसे चारित्र बनाना तथा स्वर वाल मूर्खानाति सहित निनेन्द्रके गुण गारने समस्त सन्मार्ग प्रभावना है। मो जिनके हृदयमैं सत्यार्थ धर्म वस है तिनके प्रभावना होय है । बहुरि जिनेन्द्रके प्रस्में च्यार अनुयोगनिके सिद्धातनिका ऐसा ब्योरयान करना जात अपण करनेते एरात हृदयत रवि जाय पापनित कापने लगिजाय व्यमन छूट जाय दयारूप धर्ममें प्रवर्तन हो जाय अमक्ष्य भक्षणका त्याग हो जाय ऐसा व्यार पान करना जाके श्रवण करनेत हजारा मनुष्यनि कुदेव केगुरु कुधर्मके अराधनका त्याग हो मन वीतराग देव दयारूपधर्म आरम्भ परिग्रह रहित गुरुनिक आराधनमैं दृढ श्रद्धान हो जाय तथा ऐसा व्यार पान करना जो अरणकरि बहुत मनुष्य राति मोजन अयोध्य भोजन अन्यायका विषय परधनमै राग डि नतनिमे शीलम सयमभरवम सतोपभावम लीन हेाये जाय तथा ऐमा उपदेश करना जारि दहादिक परद्रव्यनित भिन्न अपने आत्माका अनुभव होना पयायमें आपा छटनो जीव अजी चादिक द्रव्यनिका प्रमाणनयनिक्षेपनिकत्तिनिणय होय मशयरहित द्रव्यगुण पयायका सत्यार्थ स्वरूप प्रगट जाना मिथ्या अन्ध कार दुस्र होना ऐमा आगमका व्यात्यानत तपफरि भावना होय है। क्योंकि विषयानुराग छादि निर्चा छक होनेकरि नाहीं धारण किया जाय ऐम तपकरि प्रभारना होय है । क्योकि विपयानुराग छाडि निर्मा छक होनेकरि आत्माका प्रभावभी प्रगट होय है अर (१८७) धर्मका मार्ग भी - सपहीतै दीप है। यो तप ही दुर्गतिका मागको नष्ट करनेवाला है। तप बिना कामादिक विपय झाना चारित्रक नष्टकार देहे तपके प्रभावतें कामका क्षय होय रसना इन्द्रियको चपलता नष्ट होय लालमाका अमान होय है यात रन प्रयकी प्रभावना तपहीतं दृढ होय है । बहुरि जिनेन्द्रका प्रति- निम्बकी प्रतीष्ठा करना जिनेन्द्रका मन्दिर करानना यात रत्न- सन्मार्गको प्रभावना है जाते प्रतीष्ठा कराग्नेकरि जहा ताई जिन निम्ब रहेगा तहा ताई दर्शन स्तरन पूजनादिकरि अनेक भव्य पुण्य उपार्जन करेंगे अर जिनमन्दिर करागे तिन गृहस्थनिका ही धनपापना सफल होयगा। पूजन रा 7 जागरण शास्त्रनिका व्याख्यान श्रमण पठन जिनेन्द्रका स्तवन सामायिक प्रतिक्रमण अशनादिक तप नृत्यगान भजन उत्मा जिनमन्दिर होय तदि ही होय जिनमन्दिर गिना धर्मका समस्त समागम होय हो नाही यात बहुत कहा लिखिये अपना अर परका परम उपकार का मूल प्रतिष्ठा करना अर मादर करावनाहे उत्कृष्टधर्मका मार्गतो समस्त परिग्रह छाडि वीतरागका अङ्गीकार करना है परन्तु जाके प्रत्या- ख्यान वा अप्रत्याख्यान नाम कपायका उपशम भया नायी तात गृहसपढा छाडि जाय नाहीं अर धनसपदा बहुत होय तो पृथम तो जिनका आप अन्योयम् धन लिया होय ताके निकट जाय क्षमा ग्रहण कराय उनका धन लोटा देना बहुरि धन बहुत होय तदि नवीनधन उपार्जनका त्याग करना बहुरि तीनमार्गके बधा- बघावनेवाले इन्द्रियनिके विषयनिकी, लालमा छाडि त्याग कर (११०) चात्सल्य है तथा व्रतनिके धारक अर पापम् भयमोत न्यायमार्गी धर्ममैं अनुरागके धारक भन्दकपायो सतोपो ऐसे पानक तथा श्राविका तिनको गुणनिमैं तिनको सगतिमैं अनुराग धारण करना सा वात्सल्य ह तथा जे नोपर्यायमे तनिकी हद्द प्राप्त भये और समस्त गृहादिक परिग्रह छडि कुटुम्बका ममत्व तनि देहम निर्मम समाधार पच इन्दियनिक विषय त्यागि एकरस्नमार परि- ग्रहक अग्लम्बनकरि भू मशयन सुधा कृपा शोतउष्णादि परिग्रह- निकरि सहनेकार मयममहित ध्यान पाध्याय सामायिकादिक आ वश्यकनिकरि युक्त निकाको दोक्षा ग्रहणकरि सयम सहित काल व्यतीत कर है निनको गुणनिमें अनुराग सो वात्सल्यभाव है तथा मुनीभरनिको ज्यों उनमें निवास करते बाईस परिग्रह सहते उत्तम क्षमादि धमक धारक देहम निर्ममता आपकेनिमित्तकिया औषधि अन्न पानादि नाही ग्रहण करते एक वस्त्र कोपोनपिना समस्त परिग्रहके बागी उत्तम श्रापकनिक गुणनिम अनुराग सो वात्म. ल्य है तथा देव गुरु धर्मका सत्याचा सपा जानि दृढश्रद्धानो धर्ममें रुचिक धारक अवतसम्यग्दृष्टिमें यात्सल्पता काह। इस समारमें अपने स्त्री पुत्र कुटुम्बादिकनमे तथा देहमे इन्द्रियनिक पिपयनिमे विषयनिक साधकनिमे अनादित अति अनुरागी होय याहो अथ कटें हैं मरे हैं अन्पकू माहें ऐसा कोऊ को ऊका अद्भुत माहात्म्य है। ते धन्य पुस्प हैं जे सम्यज्ञानते मोहफू नष्टकरि आमा गुणनिमें वात्सल्यता कर है ससारो वोधनकी लालमाकरि अवि आमूल भए धर्ममें वात्सल्यवा त्यांगे हैं अर संसारीनिक धन वध है। समा धर्मका मार्ग भूल जाय धर्मा- मानिम दूरहोते नात्मल्यता त्यागे है रात्रिदिन धन सम्पदा चधानमा ऐमा अनुराग वध ह लासनिका धन हो जाय तो फोनम वाडा करता आरम्भ परिग्रहक धानता पापनिमें पूर्माणता बापता वर्ममै बलत्य नियमन छाडै । जहा दाना द्विकनिम परोपकारमै धन लगारता ढोस नहा दूरहीत टलि सकल है अर बहु आरममा बहु परिग्रह अतितृष्णात समीप जाया नरकका पाम ता नाहों देस है नाम चमकाल धनाया तो पूर्व मिथ्याधम कुपात्रदान कुदाननिमै रचि ऐसा कर्म नाम आया है से नरक तिर्यचगतिकी परिपाटी अमरयातकाल अनतकाल पर्यन्त नाही छुटे उनका तन मन चयन धन वर्मकार्यम नाहो लाग है । रात्रि दिन तृष्णा अर आरम्भ करि क्लेशित रहे विनके धर्मात्मामै अर धर्मके धारणाम कदाचित् वात्मन्यता नाही होय है अर धर्मरहित थर्मामा दू हाय ताक् नी वा मान है तातें आत्महितके वाचक ही धनमपदा महामदकी उपजारनेवालो जान अर दहकू अस्थिर दुःसदायी जानि कुटुम्प महा बन्धन मानि इनसू प्राति छाडि अपने प्रात्माम् वात्सल्य करा धर्मात्मामें व्रतीनिमें साध्यायमैं जिनपूजनमैं वात्मल्यता करो। जसम्याचारित्ररूप आभरणकरि भूपित माधुजन हैं तिनको स्तरन कर है गौरव करे है तिनके यात्मल्यनाम गुण है सो उगतिक प्राप्त की है वात्स- ल्यगुणके प्रभार करके ही समस्त द्वादशाग विद्या सिद्ध होय है (११२) जात मिद्धान्तनम अर सिद्धान्ता उपदेश करनेवाला उपाध्याय म माचा भक्तिक पभारत श्रुतज्ञानावरणमंशा रम गरिमाया है तदि सकल विद्या सिद्ध होय है। वामगुणके धारका दर नमस्कार पर है और वात्मन्य करके ही पठारह द्वि प्राद्धि दाय पार चारणमाद्धि अनेरपार अर अष्टपकार विनिया द्धि तीन पुकार मलमद्धि मप्तपूकार तपद्धि उह प्रकार रसद्धि उह पार औषयमद्धि दाय पूमार क्षेनदि इत्यादिक अनेक शक्ति पूगट होय है । इहा ऋद्धिनिका सस्य कहिये तो पानि पधि जाय नात नाही लिया है तहात जाननग। वात्सल्य परक ही मदबुद्विनिकै हूँ मतितान अतमान मित्तार्ण होय है चालल्या प्रभारने पापका पूरा नाही होय है या मन्य परफे भूपित हाय है तपम उत्साह विना तप निरर्थक है । यो निनेन्द्र का माग वामल्य करि ही गोगार प्राप्त होय है। चामन्य करिहा गुम ध्यान द्धिक पाप्त हाय यात्मत्यत ही गम्यग्द- र्शन निर्माप होय है। चा मल्य करके ह। दान दिया कृतार्थ होर है। पान है ति पिना तथा दनम पीति विना दान निंदा का कारण है निनाणीम वास यं जाके हायगा ताहीक पशमा योग्य माचा अर्थ उद्यातरूप होयगा जार निनाणी या माय नाही प्रिनय नाही ताई यथाति र्य नाही देसंगा पिपरीत ग्रहण करेगा हम मनुष्य जन्ममा मडा बोलत्यही है वात्सल्य रहित यात ममात्र कारण यन्त्र आरण वस्त्र धारग सरना है पद "परम निन्या हाय है। अरेस लोकरा कार्य जोयाको ( १९३) उपार्जन धर्मको उपार्जन धनको उपार्जन सो बहामन्य ही होय है। अर परलोक जो स्वर्गलोकमे महद्धिक वेदना साहू वात्सल्य हीत होय है वामल्य गिना इस लोकका समस्त काये नष्ट हो जाय अर लोकमे देवादिगति नाही पा है। बहुरि अहतदेव निम्र न्यगुरू स्याद्वादरूप मरमागमढया रूपधर्ममे वात्सल्य है सो ससार परिभ्रमणका नाशकरि निर्माणकू प्राप्त कर है तथा वात्स- - 'ल्यतही जिनमन्दिरका वैयावृत्य जिनसिद्धान्तका सेवन साधर्मीनि का सेवन साधर्मीनिका यावृत्य तथा धर्ममे अनुराग दान देनेम मोति ये समस्तगुण वत्सल्यत हो होय है ज पटकायके जीवनिर्म वात्सल्य किया हैाते ही लाक्पमे अतिशय रूप तीर्थकर प्रकृति का उपार्जन कर है यात जे कल्याणके इक्षक हैं ते भगनान जिनेन्द्रका उपदेश्या वत्सल्यगुणको महिमा जानि पोडशमा अङ्ग जो वात्सल्य ताका स्तवनकरि पूजनिकरि याका महान अर्थ उतारण करे सो दर्शनको विशुद्धता पाय बहुरि तप उच्चारणकरि अहमिन्द्रादि देवलोक प्राप्त होय फिरि- जगतका , उद्धारक तीर्थकर होय निर्माण प्राप्त होय है। पोडश. कारण धमका महिमा अचिन्त्य है,जात लास्यमे आश्चर्यकारी अनुपम निभव के धारक तीर्थकर होय हैं, ऐसे पार्डश भाग्नाका वर्णन किया है ॥१६॥ r अब धर्मका स्वरूप दश लक्षण है. इन दश -चिन्हनिफरि अन्तर्गतधर्म जानिये है । उत्तमक्षमा, उत्तममार्दव, उत्तमआर्जय उत्तमसत्प, उत्तमशीच, उत्तमसयम, उत्तमत्याग.. उत्तम -

(११४)
घन्य, उत्तमामार्य चे दशर्मक सण है। जति धर्म तो
वस्तुका स्यमाहा कहिये है लोकमें नेत पदार्थ है तिने
अपने स्वभाषा कदापित नाही छाई 1 जोकमारका
नाश हा जाय तो या अमान हाय नाही अमानाश बस्नुका
स्वमार क्षमारिस्प है अर प्राधारिफ पर्नननित उपाधि है
आचरण है मोघ नाम धर्मका अमार होय तदिधमा नाम
आत्माका भार समर रहें है एमही मानस अमारत शोरगुण
इत्यादिक आत्माके गुण है त कर्मक अभात चमेन प्रगट हाप
है तात ये उनमक्षमादिक प्रात्ममा म्बमार है मोहनीय कनेक
भारत स्वयमेर प्रगट हाय है वात ये उत्तमयमादिन, आत्मा
का समार है मोहनीय सक मेट नाधादिक कपायनिकरि
अनादिका अच्छादिता हाप रह है पायके मारत धमादिर
स्वामानिक अरमान गुण उघडे है।
अब उत्तमक्षमागुणा वर्णन पर है माघीका जीतना
हो उत्तमक्षमा है कम है कार घेरी इस बार निगम करने
का स्थान जे मर्यमभार निराकुलताभार ला दग्ध करने
अनि समान मम्घग्दर्शनादिनलका भण्डारपूदग्ध करें है
यशा नष्ट कर' है अयशस्पालिमार बघार हे धमे अरमका
विचार नष्ट होय जाय है माधी अपना मन सन काय आपके
यश नाहों रहे हैं । पात काल को प्रोतिर क्षणमात्र, निगाडि
महार र उत्पनर है प्रोपप राससके पर्श हाय सा । असत्य
वचन लानिन्ध मोल चांडालादिनिके पालने योग्य पचन
7

बोले . है। - क्रोधो समस्त धर्म लोप है लोधी हाय ता पिताने मार नास मातांक-पुत्र सांकू बालक मित्रकू मारि प्राण रहित कर है ! अर-तोर काधा-आपका हू.विपर्प शस्त्रते मरण कर है ऊचे मकान तया पर्वतादिकत पतन कर है कृपमैप है काधीकी को प्रकार प्रतोत, नाहों"जाननी । क्रोधी है सौ यमराज तुल्य है.क्रोधी, हाय सा.प्रथम तो अपना नानदर्शन क्षमादिक गुणनिक पाते पीछे कर्मके वशतै अन्यका घात होय क्रोधके प्रभावत महातपम्पी दिगम्बरमुनि धर्मत भ्रष्ट होय नरक गये हैं। यो क्रोध है सो दाऊं शोफकानाश कर है महा पापन्ध कराप नरक पहुंचा है बुद्धि भ्रष्ट कर है निर्दयी करदे है अन्य कृत, उपकारकू भुलाय कृतन कर है ताते क्रोधमपान पाप नाहीं इमलाकर्म कार्धादिकपाय ममान अपना घात करनेवाला अन्य नाही है जा लाकमें पुन्यमान है महाभाग्य है जिनका दोऊ लोक सुधरना है तिनहीके क्षमा नाम गुण प्रकट होय है क्षमा जो पृथ्यो 'ताको ज्या महनेको स्वभाव हाय सो क्षमा है आसम्यक् स्वपर- कृ समझकर जा असमर्थ नकार किया हु उपद्रनिक् आप समर्थ हाय करके रागढे प रहित हानेक कया है। उत्तम क्षमा त्रैलोक्यमें मार है उंचम संमा ममार समुद्रत तारनेगली है उत्तम क्षमा है मो रनयनं धारण करनेवाली है उत्तम क्षमा दुर्गतिके दुःसनिके हरनेगालो है जाके क्षमा हीये ताके नरक अर, तियेत्र दोज गतिनमैं गमन नाही होय है उत्तम क्षमाझा.. लार अनेक गुणनिक हाय हैं मुनीश्वरनित वा प्रति 1 - (११) उत्तम क्षमा है उचम क्षमाका लाभक ज्ञानोजन चिन्तामणिरत माने है अर उत्तम क्षमाकी मनको उज्वलता कर'हे क्षमा गुण- 'बिना मनकी उज्ज्वलता और स्थिरता कदाचितही नाही होप है याचित सिद्ध करनेवाली एक क्षमा ही है । इहाँ क्रोधके जीतने 'की भानना ऐसी जाननी- काऊ आपकू दुर्वचनादि करि दुखित कर गाली दे चोर कहै अन्यायी पापो दुराचारी दंष्ट नीच या दोगलो चाडाले पापी कृतघ्नी ऐसे अनेक दुर्वचन कदै ता ज्ञानो ऐमी भापना कर जो याका में अपराध किया है कि नाही किया जी मैं याका अपराव किया तथा रागदप मोहका वशते कई बात करि दुखाया है तदि वो मैं अपराधी हू मोक् 'गाली 'देना धिकार देना नीच चार कपटी अघी कहना न्याय है। 'भाकू इम मिनाय भी दण्ड देना सा भी ठीक है मैं अपराध किया है मौत गाली सुनि रोप नाही करना हो उचित हैं। अपराधी सू नरकम दण्ड भोगना पडे है तात मेरा निमित्त याके दुःख भयाँ तदि क्लेशित होय दुर्वचन कह है ऐमा पिचार कार' क्ले- शित नाही हाय क्षमाही कदे है अर जो दुर्वचन कहनेवाला मद- कपायी होय तो आप जान समा ग्रहण करायने यह भी कपाल 'म अज्ञानी प्रमादक वशमा कपायनके वेश होय तो आपका 'चित्तक 'दुसार्या सो अब में अपराध माफ कराऊ हू.. आगाने ऐसा कार्य चूककरि नाही करू गा एकवार चतिजाय ताको चुकंक महतपुरुष काफ़ करे हैं और जो आगला न्याय रहित तीब 'कपापी होय तोपोर अपराध माफ कराग्नेका जाय नाही कोला- T (११७ ) तरमें क्रोध उपशांत हुवा पाछे माफ करावं अर जो आप आपराध. नही किया अर ईमारतें केवल दुष्टतात आपक दुर्वचन कह - तथा अनेक देोप लगोचे तो ज्ञानी किचित्मक्लेश नाही करे ऐसा. विचारे जो मै याका धन हन्ध हो तथा जमी, जायगा सोमी होय त्या , याको जीविका निगाडी-होय चुगली, साई होय. तथा याका दोष कहणादि करके वो में अपराध किया होय तो. मे पश्चात्ताप करना उचित है अर जो में अपराध नहीं किया:- सदि माकु कुछ फिकर नाहीं करना यो दुर्वचन कहै है सो नाम को है सो नाम मेरा स्वरूप नाहो मैं तो जायक हू जाकू - कदै : सा में नाही.-।- मैं है ताक वचन पहुंचे नाही ता मौक क्षमा- ग्रहण करना ही श्रेष्ठ है । बहुरि जा ये दुर्वचन कहे है मो मुख- यामा, अभिप्राय याका जिया दत ओष्ठ याका अर शब्द, अर. पुद्गल याका परिणामनिकरि शब्द उपझ्या ताफा श्रवणकरि मैं- जो विकारको, प्राप्त होऊ ताया मेरी यही आज्ञानता है वटुरि जो ईरान दुष्ट पुरुष मेरले गाली देहे सो स्वभार करि देखिए तो. गाली कुछ वस्तु ही नहीं है मेरे कहीं हू गाली लग नाहों : दी है, अवस्तुमें देने लेने का व्यवहार ज्ञानी होय सो कैसे माल्प करें । बहुरि जो मेक चोर कई अन्यायी कपटी-अधर्मी , इत्यादिक कह. तहाँ.ऐमा चिन्तनन करे । हे आत्मन !- तू अनेक बार चौर-हुओं अनेक जन्ममें व्यभिचारी, ज्वारी, अमध्य. भक्षी भील चाडाल, चमार, गोला, पदा, यूकर,शूकर, गाधा। त्यादिक तिर्य च तथा अधमी, पापी, कृतानी । होय - आया .

(११८) TA अर समारम भ्रमण करता अनेक वार होऊगा अन तो कर शुर चोर चाडाल कहै तोफू अाण करि ताशित होना पड़ा अनर्थ है अथवा 'ये दुप्टन दुर्वजन कहे है सो याका अपराध नाही हमारा बांध्या पूर्व जन्मकृत कर्मका 'उदय है सो यकि दुर्वचन कहने के द्वारकरि हमारे कर्मको निर्जरा होय है हमारे पड़ा लाभ है इनका यह हू उपकार है जा दुर्वचन कहनेवाले अपना पूर्णका समूहका तो दोप कहने करि नाश करे हैं ' अर मेरे किये पापा दरि कर है ऐसे उपकारीत जो मैं रोप करू तो मी समान कोउ अधम नाही है। यहुरि या ता मोक् 'दुर्वचन ही कया है मास्या वा नाही रोपकर मारने लगि जाय हे क्रोधी' यो अपने पुत्र पुत्री स्त्री यालादिककू मार है सी मो माया नाहीं गयो भी लाभ है अर जो दुष्ट आ. मारे तो ऐसा विचार जो मोक् माया ही प्रमाण रहित ता नाही किया दुष्ट तो अपका मरण नाही गिन करकै भी अन्य मारे है यो भी मेरे काम है। अरजो प्राण रहित कर तो ऐसा रिचार एकवार मरणा हो छो कर्मका ऋण चुक्यो । हम इहा ही कर्मके ऋण" रहित भये हमारी धर्ममें तो नाही नष्ट भया। प्राणधारण तो धर्म होत सफल है ये द्रव्यप्राण तो पुद्गलमय हैं मेरा ज्ञान दर्शन समादि धर्म ये भाप्राण हैं इनका पात क्रोधकार नही भयो इम समान मेरे लाम नाही है।' यहुरि जो कल्याणरूप कार्य है विनमें अने विध्न आ ही है जो मेरे विघ्न आया सो ठीक ही है। मैं तो अ ममाप आश्रय करू अर जो उपद्रर आपते है an

(१११६
क्षमाछोडि विकरारकू प्राप्त हुगा तो मेकू देखि अन्य, मदनाना
तथा फायर त्यागी,तपस्सी धर्म तै शिथिल हो जायगे तो मेरा
जन्म केरल अन्यके क्रेशके अर्थि हो भया तथा. मैं, वीतरागधर्म
धारण करफोह कोपी-निकारा - दुर्वचनी होऊ तो मामू-देसि
कोथम प्रवर्तने लगिजाय, तडि धर्मफ़ी मर्यादा भगवरि पापकी
परिपाटी चलानेवाला,मैं हो प्रधान भया तातैः क्षमागुणा प्राण
जातेह धन अभिमान नष्ट होनेह, मेक छोडना उचित नही
पहरि पूर्वमे ही अशुभ कर्म उपजाया ताका फल मैं ही, भोगूगा
अन्य जे जन है तेती निमित्तमान है इनके निमित्त-त; पाप उदय
नाही आता तो अन्यके निमित आता । - उदयमें आया-कर्म
तो फल दिये निना टलता नाही नहुरि ये लौकिक अानो मेरे
विप क्रोधित होय दुर्गचनादिकं करि उपद्रव करें- हैं - अर जा मैं
भी यात दुचनादि करि उस्तर, करू तो मैं तत्वज्ञानी अर ये
अज्ञानी दाऊ ममान भया हमारा तत्वज्ञानीपना -निरर्थक -भया
न्यायमार्गत उदयमे आया मेरा पापम तार सन्मुस होते कौन
विकी अपना आत्मा काधादिकनिके वश कर । भो-आत्मन्
पू गांध्या जो अमाताकर्म ताफा अब उदय आया तार, इलाज
रहित अराकनानि कर समभापनित - सहो,जो क्लेशित होय
मगोगे तो आमाता तो, भोगोहागे अर नगीन बहुत असाताका
घा और करोगे तात होनहार दुसरी निशिकित होय समभाना
होमहो ये दुष्टजन बहुत है अपना सामर्थ: करके मेरे रोपरूप
अग्निक
करि मेरा समभावरूप सम्पादक.

(१२०) चाहें हैं अब यहां जो आमाधान होय क्षमायू छाडो घोगातो अश्य हो माम्पभाव नष्ट कर धर्म अर अपयशका नाश करने पॉला हाय 'जाऊगा तात दुष्टनिका मसर्गमे मारधान रहना उचित है। ज्ञानी मनुष्य तो नाही सह्या जाय ऐमा क्लेशक, उपन्न होने ह पूर्वकर्मका नाश होना नानि हर्पित ही होय है जो वचन केंटकनिगरि बेध्या जी मैं क्षमा छोडगा तो प्रोपो अरहमैं समान भया अर जो घेरी नाना प्रकारका दुर्वचन मारण पीडन करके मरा इलाज नहीं करै तो मैं सचय किये अशुभकर्म तिन कैसे छूटता तातै पैरी ह हमारा उपकार ही किया है अथवा ताते विकी होय जो जिन आगमके प्रमादत अभ्यास किया। ताको परीक्षा लेनफू ये बैरीरूप परीक्षा स्थान प्रगट भया है सो मेरे भावनिकी परीक्षा करनेके ही कर्म उदय भये हैं जो समभावकी मर्यादाक भेद करि जो मैं वैरिनिमें रोष करू । तो ज्ञाननेत्रको भारक मैं ममभाव नाही प्राप्त होय 'क्रोवरूप अग्मेि भिम होर जाऊ । मैं वीतरागके मार्गमे प्रवर्तन करनेवाला मसारकी स्थिति छेदनेमैं उद्यमी अर मेरा ही चित्त जो द्रो प्राप्त हो जाय तो ससारके मगमें प्रगतते मिथ्यादृष्टोनिक समान मूहू मयो अरे जो दुष्टानिक न्याय धर्मरूप मार्ग समझाया अर क्षमा ग्रहण करोया जोनाही समझे 'अर क्षमा प्रहण नायर तो ज्ञानी- जन वान रोप नाही कर । जैसे चिप किरने अनेर औपधादि देय दिप रि कस्या चाहे अर नाका जहर रि नाहीं होय तोवैद्य 'जहर नाही साम है जोयाका दिप दूर नाही भया तो में । - ( १२१), हविष मक्षणकरि करू ऐमा न्याय नाहों है तसनीजनहु दुष्ट चन की पहली दुष्टताकी जाति पिछानै जो यो दुष्टता छाँड गा. चा अधिक दुष्टता घरंगा ऐमा विचार जा विपरित परमाणता देखि तातो उपदेश ही नाही देना अर कुछ समझने लायक योग्यता दीसे तो न्याय वचन हितमितरूप कहना अर दुष्टता' नाही छाई तो आप क्रोधी नाही होना जो या मोफू दुर्वचनादि. उपद्रवकरि नाहीं कपायमान करें तो मे उपशम भावकरि धर्मका, शरणा के मैं ग्रहण करता तात माकू पीडा करनेवाला हु पापत मयमीतकार धर्म सम्बन्ध कराया है तातै पीटा करनेवाला है। मेग प्रमादीमना छुडाय यडा उपकार क्यिा है । बहुरि जगतमें केतक उरकारी तो ऐसे है जो अन्यजनके इस होनेके निमित्त अपना शरीर छार्ड है : अर धना छार्ड है तो मरे दर्पयन न्यनादिक सहनेमै कहा जायगा माडू दुर्वचन कहे ही अन्यके मुखे हो जाय तो मेरे क्या हानि है । परि जो अपनेकू पीटा करनेवाले रोश करू तो बैरीके पुण्यका नाश होय है अर मेरेः अनाके हितको मिद्धि होर है पर पीडा करनेवालेत रोप करू -, चो, मेरा आत्मोका हितका नाम होय दुर्गति होय यात प्राणनिका नाश होते हू दुष्टनिप्रति क्षमा करना ही एक हित मन्पुस्प कह हैं। चात आत्मकल्याणकी सिद्धिके अधिक्षमा ही ग्रहण करूं, अथवा दुष्पनिकरि दुर्वर्यनादिक पीडा करने मेरे, जो क्षण पूगट मईदै: जो मैं इतना कालत वीतरामा धर्म धारण किया सो अब क्रोन चादिकके निमित्तत "साम्यभार रहा ऐसी परीक्षा करा! बहुरि + -

(10)
सेई साम्पमान प्रसमा योग्य है पर सोही कल्याणका कारण
है जो मग्ने इच्छा नियोनिमरि मलीन नाही किया गया।
यदुरि चिरकालत अभ्यास किया शास्त्र करके र स्वमार करके
पहा साध्य है जो प्रयानन पध्या व्यर्थ हो जाय है धर्म को ही
प्रशमा योग्य है जो दुप्रनिके रचनादि हाने नाही ऐटै दृद्ध रहे
वपद्गर आये गिना तो समस्तनन सेत्य शौच क्षमा धारक बन
रहे है जैमै चन्दन वृक्ष हाडा काट ती हकदाडेरा मुप
सुगध ही करे तैम जाकी प्रवृत्ति होय मोही सिद्धि माध्य
है।" बटुरि अन्यररि किया उपमर्ग तिनारि जाका पित्त'
बलुपित नाही होय सो अपिनाशो सम्पदार प्राप्त होय है।
अनानी हैं ने अपने भानिफरि पूर्व क्यिा पापकर्म तार अथि
तो नाही राप कर अर जो कर्मक फल देने वाधनिमित काध
पर है जिस कर्मका नाशते मेरा समारा साप नष्ट हो जाय
सो कर्म स्वमेव होयगा तो मेरे वाछित सिद्ध मया। बहुरि या
समारस्प बन अन त सम्लेशनि करि मला है इसमे यसनेशला
के नाना प्रकारके दुस नाही महने योग्य पहा.! “मसारमैं
या सही है शो इस ममारमं सत्यम्यान स्विकारि रहित अर
जिन सिद्धान्तत द्वीप करनेगले अर महानिर्दयी अर परलोक्का
हितके अर्थि जिनके उद्धिनाही अमोधरुप अग्निकरि प्रज्वलिता
अर दुष्टताकरि सहित पियनिकरि लोलुपताकार अन्ध हठयाही
महा अभिमानी कृत नी ऐसे बहुत दुष्टजन नाहीं होते तो उज्वल
+ धारक सत्पुस्प तातप तपश्चरणकोर मोक्ष के अर्थि
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-

-
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(१९३)
ट्यम कम करते? ऐसे लोधी दुर्वचन बोल्नेहारे हव्याही
अन्यायनांगीनिको जधिकता देखि करकही सत्पुत्स वीतरागी
भये हैं अर जा मैं वर्ड' पुण्यके प्रभारतं परमात्मा स्वरूपका
माता मोअर मयकरि उपदेश्या पदार्थनिक है जो क्रोधक
वादगा तो मेरा मान चारित्र समस्त निम्फल होयगा अर धर्म
का अपयश करावनमारा होय दुर्गतिका पात्र हूँगा। बहुरि और
'हपानदमुनि कह्या है जो मूर्सजनकरि बाधा पीडा अर क्रोधक
वचन और हास्या अर अपमानादिक होते हु वो उत्तम पुस्पनि
का मन निकारक प्राप्त होय ताकू उत्तम झमा कहिये है। सो
क्षमा मोक्षमार्गमैं प्रतते पुस्पके परम सहायता प्राप्त होय ।
विवेकी चिंतन कर है हम तो रागद्पादि मलरहित उज्वल
मनकरि विष्ठा अन्यलोक हम खोटा कहो तथा भला कहाँ
इमकू कहाँ प्रोजन है। वीतरागधर्मके धारकनिकू तो अपने
आत्माको शुद्धपना माधने योग्य है जो हमारा परिणाम दोष
महित है अर काऊ हितू हमके भली कवी तो भला नाहीं हो
जारेंगे पर हमारा परिणाम देोपरहित है अग काऊ हम पैरबुद्धि
तेसोटा कया तो हम खोटा नाहों हो जापगे फल तो अपनी
जैसी चेष्टा आचरण होयगा तता प्राप्त होयगा जैसे कोऊ
काचक रत्ल कह दिया अर रत्नकू कांच कह दिया तोह मोल
तो रत्नेकाहो पावेगी काचखण्डको बहुत धन कोन देव । बहुरि
दुष्टजन है ताका तो स्वभाव परके दोष कहाँ ह नाही होय तो
परके दोष कन्या पिना सुखा प्रप्त नाहों हाय तात :
H

(१२) निर्दयी ही होय है,मार्दवगुण समस्तकेहित करनेवाला है। जिनके मार्दवधर्मके प्रसादत चिगरूप भूमिमैं करुणारूप वेल नगीन फैले हे मार्दवकरके हो -जिनेन्द्रमगनमें तो शासनिमें भक्तिका प्रकाश होह है मद -सहितके जिनेन्द्रके गुणनिम अनुराग नाहीं होय हे मार्दवगुणकरि कुमतिनान के पूमारका नाश होय है कुमति नाहीं फैले है अभिमानीके अनक कुबुद्धि उपजे है । माद- यगुणकरि वडा मिनम पूरत है मार्दव करके बहुत कालका वैरो ह पैर छाडै है मान घट तदि परिणामनिकी उज्वलताहोय कोयल परिणाम करके ही दाऊ लोस्को सिद्धि होय कागलपरिगामी इस लोकमैं सुयमहोय है परलोकमें दरलोकको पाप्ति होय है कोमल परिणाम करिके हो अन्तरङ्ग पहिरग तपभूपित होय है अभिमानोका तप हूनि दवे योग्य है कामलपरिणमोते तीनजगत लोकनिका मन रजायमान होय है मार्दच करके ही जिनेन्द्रका शासन जानिये है मादव करके अपना परका-स्वरूपका अनुमान करिये है कठोर परिणामीके आपा परका विवेक नाही होय है मादव करके ही -ममम्त दापनिका नाश होय दे मार्दवपरिणाम ममारसमुद्रत , पार कर है । यात मार्दवपरिणाम सम्यग्दर्शन अगजानि निर्मल मार्दवर्मका स्तवन करो । समारी जोरनित अनादिकालका-- मिथ्या र्शनका- उदय राहा है ताका उदयकरि पयाययुद्धि हुओं जाति, कुलक, पियार, पलक तपर, धना, अपना स्वरूप मानि 1 बार ये ज्ञान नाहों है जो

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। (८१२८)) समस्त निन्दोफिर हैअमिमानीका समस्त लोक-परन होना चाहे स्वामी ह अभिमानी सेक्का त्यागे हैं अभिमानीका गुरुजन विद्यादने उत्साह रहित होय है अपना सेवक परागमुख हो. जाय मित्र, भाई, हितू पडोमी, यामा पतनही चाहह पिता गुरु उपायायतो पुनक पिनयान्त देस करिही आनन्दित होय | अग्नियी अभिमानी पुत्र बोशिष्य बडे पुस्पानके कनहरू सतातित कर है जाते पुत्रका तया शिष्यका तथा सेनकका तो ये ही धर्म है जो नवीम कार्य करना होय से पिता गुरु स्वा- मोक जनायकरि करै आहा मागि कर तथा आताको असर नाहीं मिले तो असर देखि शीघूही, जनावे याही विनय हैं याही भक्ति हैन जाको मस्तकउपरि. गुरू विराजते धन्यभाग हैं विनयनन्त रहित पुरुष है ते समस्त कार्य गुरुनिको जनाप दे हैं जे इस कलिकाल में मदरहित कोमल परिणाम करि समस्तलोकम प्रत्रते हैं। उत्तम पुरूष है तो पालकमेनिर्धनम रोगीनिमे युद्धिरहित मूररनिमे तथा जाति कुलादिहिनम हू, यथा योन्य प्रियवचन आदर सरकार स्थानदान कदाचित नाही चर्व हैं प्रियपचन ही कहेंउतम पुरा उद्धतताका वस्त्र आभरण नाहीं पहरे ऊद्धतपणाका परके अपमानका कारण देनलेन दिमाहादि व्यवहारकार्य नाहीं करे हैं उद्धत होय अमिमानीपनामा चालना गैठना, झाफना, दही छाडो तालोम पुन्य मार्दवगुण हैं । धमपारना, रूपपारना, शनिपापनाविद्यागालचतुराईपावना; वलपापना, जातकुलादिउतम गुण जगत्मान्यता पारना। जिनका सफल हैं जो ऊतिता रहित ( १२६) अभिमानरहित नम्रतासहित विनय सहित प्रगत है आने मनमें आपक सक्त लघु मानता कर्मके परसश जाने हैं से कैमे नाही करे हैं। • भव्यजन हो सम्पग्दर्शनका अग इस मार्दर अगर जानि चित्तके नि ध्यान करो। ऐम मार्दवधर्मका वणन कियो ॥२॥ न अब आर्जनधर्मक वर्णन कर हैं-धर्मका अंट लक्षण आर्जन नाम सरलताका है मन वचगायकी कुटिलता मान सो आर्जर है। आर्जन धर्म है सो पापका खण्डन कानेवाला है और सुख उपजारनेवाला है। तात कुटिलता छाडि कर्मका भय करनेवाला आर्जनधर्म धारण करो। कुटिलता है सो अशुभ कर्मका पन्ध करनेवाली है जगतमैं अतिनिंद्य है यात आत्मका हितका इच्छनिकू आर्जवधर्मका आलम्बन करना उचित है। जैसा आपका चित्तमै चिन्तन करिये तैसा ही अन्यक कहना अर तसा ही वायकायकरि प्रवर्तन करिये सो सुखका सचय करने वाला आर्जवधर्म कहिये है। मायाचाारूप शल्य मनते निकाला उज्वल पवित्र आजवधर्मका विचार करो मायाचारीका व्रत तप सयम ममस्त निरर्थक है आम्चधर्म निर्माणके मागका सहाई है जहा कुटिलपचन नाहीं वाले नहा आर्जवधर्म प्राप्त होय है । यो आज वधम है सो दर्शनज्ञानचारित्रको असण्ड स्वरूप है अतीन्द्रिय सुसका पिटारा है आननधर्मका अमानफरि अतीन्द्रिय अविनाशी सुखक प्राप्त होप है मसाररूप समुद्रके तरनेकू जहाजरूप आर्जर

(१३०)
मायाचार जान्या जाय तदि प्रीतिका भंग होय है।
जसे काजीत दुग्ध फटि जाय है अर मायाचारी अपना कपटकू
बहुत
छिपानते ६ प्रगट हुये पिना नाही रहे है। पापोजीनि
की चुगली करे वा दाप प्रकाश ते आपही प्रगट हो जार्य है
मायाचार करना है सो अपनी प्रतीतका रिगाडना है धन विगा-
ड़ना है मायाचारीका समस्त हितरिना कियेरो होय है नतोहाय
त्यागी तपस्यो होय अर जाकाम्पट एकनार किया प्रगटहा जाप
नाक ममस्तलाफ अधीमानि कोऊ प्रतीत नाही करे है कपटी
की माता ह प्रतीत नाही कर है कपटी है। विद्रोही सामीद्राही
मद्रोही कृतमी है अर या जिनेन्द्रको धर्म तो पटरहित छल
रहित है ज से बारा म्यानमै सूधा पडगं प्रवेश नाही करे तैसे
कपटकरि चक्रपरिणामीका हृदयम निनेन्द्रका आनन कहिये मरल
धर्म प्रवेश नाही कर मके है। स्पटीश दाऊगर नष्ट हा
जाय है याते जो यश चाहोहो धर्म चाहोहो प्रतीत चाहो हो तो
मायाचारका त्यागकरि आर्जवधर्म धारण रो पटरहितकी पैरों
ह प्रशमा करे है कपटरहित सरलचित्त जो अपराध भी किया
होय तो दन्ड दने योग्य नाही होय है आर धर्मका धारक तो
परमात्माका अनुभवनमै माल्प कर है पाय"जीतनेका सतोप
धारनेका सकप कर है जगतके छलनिका दरहीत परिहार करें
आमा अमहाय चैतन्यमार जागे है जो धनसम्पदा पुटुम्मा-
दिका जपनार से' ही कपट छलकार ठिगाई करे तात जो
मात्माकू समारं परिभ्रमणतं छुटाय परद्रव्यनित आपत भिन्न

। IM s T M (१३१) यसहाय जाने से धनजीवितव्यके अर्थि कपट कदाचित् नाही करै वाते जो आत्मान समार परिभ्रमणत। छुडाय चाहो तो माया चारका परिहारकरि अधिर्म धारण करे। ऐसे म्आर्जवधर्मका वर्णन किया ॥३॥ अब सत्यधर्मका वर्णन करे हैं जो सत्यवचन है से ही धर्म है यो स.पवचन दयाधर्मी अब मूल कारण है अनेक दोपनिका निराकरण करनेवाला है इस भवमैं तथा परभवमैं सुख करनेगला समस्तके विश्वास करनेका कारण हैं समस्तधर्मके मध्य सत्यपचन प्रधान है सत्य है जो ससार समुद्रके पारउतरने जहाज है समस्त विधाननिमें सत्य है सेो वडा विधान है समस्त सुखका कारण सत्य ही है सत्यत ही मनुष्यजन्मभूपित होय है सत्य करके ममस्त पुण्यकम उज्वल होय है जे पुण्यके ऊँचे कार्य करिये हैं विनको उन्नलता सत्य निना नाही होय है सत्य करि समस्त गुणनिका समूह महिमात्र प्राप्त होय ह स.पका प्रभावकरि देव हैं ते सेवा करे हैं सत्यफरके हो अणुनत महानत होय हे सध्यविना व्रत सयम नष्ट हो जाय है सत्यकरि समस्त आपटाका नाश होय है यातें जो बचन बॉली से अपना परका हितरूप कहो प्रमाणोक कहा काऊके दु ख उपजे ऐमारचन मति कहो गईरहित कहा, परमात्मा के अस्तित्व कहनेवाला वचन कहो नास्तिकनिके बचन पापपुण्यंका स्वर्गनरकका , अभार कहनेमाला मति कहा यहा ऐमा परमागम का उपदेश जानना जो जोर - - (१३२) अनन्तानन्तकाल तो निगोदमैं ही रह्या तहा पचनरूप कर्मवर्गणा महण नाही की क्योकि पृथ्वीकाय अपकाय तेजकाय यापुकाय वनस्पतिकाय इनके मध्य अनन्तकाल असरयातकाल असरयात काल रह्यो तहां तो जिह्वा इन्द्रियही नाही पाई बोलनेकी शक्ति ही नाही पाई अर जो विकल चतुष्यमैं उपज्या तथा पंद्रिय तिर्यचनमै उपज्या तहा जिह्वा इन्द्रिय पाई तो 'अक्षरस्वरूप गद उच्चारण करनेको सामर्थ्य नाही भया एक मनुष्यपनामैं पचन बोलनेकी शक्ति प्रगट होय है। ऐमा दुर्लभवचनक अमत्य वालि गिगाडि देना से बडा अनर्थ है मनुष्यजन्मकी महिमा तो एक वचनहीते है नेत्र वर्ण जिह्वा नासिका तो ढोर तिर्यचके ह हाय है सारना पापना भोगादिक पुण्य पापके अनु- ढानि हू प्राप्त होय है आभरण वस्त्रादिक कृकरा सिंह वानरा, गधा, घोडा, ऊट, पलध इत्यादिकनिको मिल है परन्तु पचन कहनेका शक्ति श्रवन करनेकी शक्ति तथा उत्तर दनेकी शक्ति तथा पढने पढापनेका कारण पचन तो मनुष्यजन्ममैं ही है और मनुष्यनन्म पाय जो बचन सिंगाडि दिया से समस्तजन्म विगाड दिया । बहुरि मनुष्यजन्ममैं जो लेना देना कहना सुनना 'धीज प्रतात धर्मकर्म प्रीतवर इत्यादिक जे प्रवृत्तिरूप और निहत्तरूप कार्य है ते पचनके आधीन है अर यचनकू हो पित कर दिया । तदि समस्त मनुष्य जन्मका व्यवहार विगाडि दूपित कर दिया। तात प्राण जाते हू अपना पचनकू पित मत करो। बहुरि परमागममैं कहा जो च्यारप्रकारका अमत्तपचन ताका त्याग - करो जो विद्यमान अर्थका निषेध करना से प्रथम अमत्य मे जसे' कर्मभूमिका मनुष्य तिर्यचका अकाल मृत्यु नाही हाय ऐसा चचन अमत्य है जात देनारको तथा भोगभूमिका मनुष्य तिर्यचका तो मायुकी स्थिति पूर्ण भया हो मरण है बीच आयु नाही दिय है जितनी स्थिति बाधी तितनो भोग करके ही मरण कर है अर कर्मभूमिका मनुष्यतिर्यचगनिका आयु है विपय भक्षणकारि तथा ताडन मारण छेदन बधनादिक वेदनाकरि तथा रोग की तोत्र वेदनकरि देहत रुधिका नाश हानेकरि तथा दुष्ट मनुष्य दुष्टतियच भयर दवकरि उपज्या भयफरि तथा चन्नपाताादकका स्पचक्र परचक्रादिक के भयकरि तथा शस्त्रका घातकरि तथा पक्तादिकत पतन- करि तथा अग्नि पवन जल कलह विसवादादिकतै उपज्या क्लेश करि तथा माम उस्वासका धमादिकतै, रुकनेकरि तथाआहारपाना दिका निराव करि आयुका नाश होय है आयुकी दार्पस्थिति ह निपभक्षण रक्तक्षय भय शस्त्रधात सक्लेश सासोस्वाम निरोधकरि अण्नपानका अभावकरि तत्काल नाश प्राप्त होय ही है। केते लोक कहे हैं आयु पूरो हुआ विना मरण नाही होय ताका उत्तर कर है जो बाह्य निमित्त - आयु नाहों छिदे तो निपभक्षणत कौन परांमुख होता,अर पिप सानेगालेत- उकाली काहेकू देते अर, शास्त्रवाता करनेवालेत काहेक भयकरि मागते अर सर्प सिह च्यान हस्ती तथा दुप्ट मनुष्य तिर्यचदिकनिकू-द्रहीत काहेकू छाड़ते मुद्र, कूप, पापडीमैं तथा अग्निको 1 हैं + पडते कौन भयाकरता अर रोगका इलाज काहे करते तात बहुत पहनेकरि हो जो गायुपात हानेका वादग्ग कारण मिल जाय तो आयुका घात हो जाय यह निश्चय है। परि आयु. कमाको ज्यो अन्य हू कम रहिरग कारण मिले उदय आरे ही हैं समस्न जोयनिकै पापकर्म पुण्यकर्म सत्तामैं विद्यमान गाय द्रव्य क्षेत्रकाल "भाषादि परिः परिपूर्ण सामग्री मिले कर्म अपना रस देवही है बाह्य निमित्त' नाहीं मिले तो उदयमै नाही आने तथा स्य दिया रिनाही यिजरे है बहुरि जो असद्भुत प्रगट करना सो दूजा अमत्य है जैसे देवनि के अकालमृत्यु कहना देवनिक भोजन ग्रमादिरूप करना कहे या देवागना मनुष्यमा कामसेग्न इत्यादिक कहना दूंना असत्य है। बहुरि वस्तुका स्वरूप अन्य विपरीत स्वरूप कहना सौ तीमरा अमत्य है। बहुरि गति पचन बहना सो चौथा असत्य पचन है । गहित वचन का तीन भेद हैं गर्हित, सारंध, अप्रिय । तिनमै पेशन्य, हास्य, कर्कस अममनस, प्रलपित इत्यादिक अन्य हस्तविरुद्ध वचन है तिनमें जो परके विद्यमान तथों अविद्यमान दापनिर पीठ पार्छ कहना तथा परका धनका ग्निाश जीविकाका विनाश प्राणनिका नाश जिस वचनत हो जाय तथा जगतम निन्ध हो जाय अपाप हो जरप ऐसा पन रहनों से गर्हित नाक असत्य वचन है । बहुरि हास्य लीयाँ भंडवन तथा श्रवण करनेालेनिकै पशुमराग उपजानेवाले पचनसे हास्यनामा गस्ति बचन है । पहुरि अन्य कहे तू टांडा है तू' मूस है अज्ञानी है इत्यादिक कश वचन है ।

बहरि प्रयोजन रहित धीठपनात याद करनासे प्रलपित रचन है। बहुरि जिप्स पचनारि प्राणानिका घाव हो जाय दशा उप- द्रव हो जाय देश लुटि आय तथा देशके, स्वामीनिक महार होजाय तथा ग्राममें अग्निलगि जाय घरनल जाय वनमैअनि लगि जाय तथा कलह निसाद युद्ध प्रगट हो जाय तथा विपाद करि मरिजाय तथा मारिजाय तथा और उन्ध जाय तथा छहकायके जीवनिके पातका प्रारम्भ हो जाय महाहिंसामै प्रवृत्ति हो जाय से सापद्य पचस है तथा पर चार कहना व्यभिचारी कहना से ममस्त सापय वचन दुर्गतिक कारण त्यागने योग्य है अप अपिय वचन त्यागने योग्य पाण जाते हू नाही कहना अपीय वचनकै भेद ऐसे जानने का सा, कटुका,पुरुषी, निपुरा परकोपनी, मध्यकपा,अभिमानो,अनयररी, छेदकरी, भूतपधकरी ये महापापके करनेवाली महानिन्य दश भाशा मत्यवादी त्याग कर हैं। तू मूर्स है चलद है दारहै रे मूर्म तू कहा समझे इत्यादिद कसो मापा है बहुरि तू कुजाति है नोच जाति है अधर्मी महा पापी है तू स्पर्शन करने योग्य नाहीं तेरा मुस देरया बड़ा अनथ इत्यादिक मर्म उद्वेग करनेवाला कटुका मापा ह तू आचारबष्ट है प्रष्टाचारी है महा दुष्ट है यादिक मर्म छेदनेनाली परुषा- भाषा है ताडू 1 मारनाखस्य थारै डाह लगास्छ थारो मसक काटिस्यू तने साय जस्यू यादिक,निष्ठुरा भाषा हैं। रे नि अवर्णशकर तेरो जातिकुल आचारका नाही तेरो कहा तपठ कुशील है हमने योग्य है महानिन्ध है अमक्ष्य भक्षण करनेवाला .

(१३) है तरा नाम लिया कुल लज्जित हाय हैं इंपादिक परकापोनो मारा है । बहुरि निमापन के मुनते ही हाइनिकी शक्ति नष्ट हा चाय से मध्य कृपा भाषा है । यहरि लागानि में आना अपना अनागुग प्रकट काना परके दाप करना आना कुन जाति रूप पर दिनानादिक मदनिये जायरन वालना से अभिमानामरस है। बहुरि शोलपण्डन कानेपाली पर पिद्धप करनेगालो अनय करि भाषा है । येरि जा वीर्य शोल गुगादिनिके निमल करने वाली अमत्यदोष प्रगट करनेराली जगत में हटा कलक प्रगट करनेवाला छरसरि भाषा है । जिम रचनारि अशुम येनाप्रगट ती जाय या प्राणनिका नाश करनेपाली भूतश्यकरि मापा है। ए र प्रकार नि ध पचन त्यागने योग्य है। परि स्त्रोनि के होर गाव स्लिाम विभ्रमरूप कोटा व्यभिचारादिसनिरी कया कामके जगाने वाली वाचार्यका नाश करनेवाली स्त्रोनिको कया तथा भातनपानम राग करानेवाली भनिनको कथा तथा रोद्रकर्म करनालो राजकथा तथा मिध्यादृष्टी बुलिंगोनिका कया तथा धन उपाजन करनेको क्या तथा वेरोदृष्टनिक तिरस्कार करनेको कया तथा हिमात्र पुष्ट करनेवाली येद स्मृत पुराणादिक कुशा- स्त्रनिको कयों करने योग्य नाही याग करने योग्यरापमानामा का कारण अप्रिय मापा त्यागने योर है। मे। ज्ञानोहा येवार प्रकारकी निन्यभापा हास्यकरि जोधरि लोमकरि मदकार भए. परिव परि कदाचित मति कही अपना परका हिंवरूपहोवचन चाले इस जीरके जैसा सुरा हितरूप अर्थ सयुक्त मिष्ट्र बैंचन करे

.
(१३७ )
है निराकुल कर है आताप हरे तैमा सुखकारी आताप हरनेवाली
चन्द्रका तिमणि जल चन्दन मुक्तामालादिक कोऊ पदाथ नाही है
अर जहा अपने वोलनेत धर्मको रक्षा होती होय प्राणोनिका उप
कार होता होय तहा विना पूछ,ह बोलना अर जही आपका अन्य
को हित नाही होय तहा मौन सहित ही रहनाउचित है। बहुरि
सत्य नवनते सकलविद्या सिद्ध होय है जहा विद्या देनेवाला सत्य
चादो हाय और सीपनेनाला हु सत्यवादी होय ताके सकल विद्या
सिद्ध होय कर्मकी निर्जरा होय सत्यका प्रभारसे अग्निजल, विप
सिह, सर्प दुष्ट देव मनुष्यादिक बाधा नाहा कर सके है। सत्य
का प्रमानत देना चशीभूत होम है प्रोति प्रतोत दृढ होय है
सत्यवती माताममान विश्वास करने योग्य होय हैं गुरुका यो
पूज्य होय हैं मित्रज्यों प्रिय होय है चाल यश प्राप्त होय है
तपमयमादि समस्त सत्पाचनत साह हैं। जैसे विष मिलनेकरि
मिष्ट भोजनका नाश होय अन्यायकरि धर्मका यशका नाश होय
तसे असत्यरचनत अहि सादि सकलगुणनिका नाश होय है तथा,
अमत्य, अवनत अनतोति अकोति अपपाद, अपने या अन्यके
सम्लेश, अरति कलह घर, शेक, वध, वन्धन, मरण, जिहाछंद,
सर्वस्वहरण, बदी गृहमे प्रवेश, दुर्ध्यान, अपच, व्रत, तप, शील
मयममा नाश, नरकादि दुर्गतिम-गमन, भगवानकी आज्ञाको भग
परमागमत, परागमुखतो घोरपापका आखर इदि हजारां देख
प्रगट हाय है । यात मोजानीजन हो लोक प्रिय हित मधुर पचन
बहुत भस्था है मुन्दर शब्दनिको कमी नाही फिर निन्धरचन
,
-

(१४०)
को अतिलम्पटता ही परिणामक मलीन करनेगली है. इनको
चाछाते रहित होय अपने आत्माकू समारपतनत रक्षा करो।
मामाको मछीनता तो जीवहिंमात अर परधन परस्त्रीको
चाचात है जे परम्त्री परधनका इच्छुक अर जीवघातके करनेवाले
हैं ने कोटितीर्थनिमैं स्नान करो समस्त तीर्थनिकी समस्त पदना
करो तथा कोटि दान करो कोटिपर्प तप करा समस्त
शास्त्रनिका पठन करे तो हू उनके शुद्धता कदाचित
नाही होय। अमक्षय भक्षण करनेवालेनिका अर अन्याय
विपय तथा धनके भोगनालेनिका परिणाम एमे मलीन होय है
जो कोटिवार धनका उपदश अर समस्त सिद्धान्तनिकी शिक्षा
बहुत वर्ष अषण करते हैं कदाचित हृदयमें प्रवेश नाहीं करे है
सो देखिये है जिना पचास शास्त्र श्रवण करते भये है तो हूं
धम का स्वरूपका ज्ञान जिन नाहीं है से समस्त अन्याय धन
अर जमक्ष्य भक्षणका फल है बात जो अपने आत्माका शौच
चाहा हो तो अन्यायका धन मति ग्रहण करो अर अभक्ष्य भक्षण
मति करो परकी स्त्रीको अभिलापा-मति करो।। बहुरि परमा-
स्माके 'ध्यानतें शौच हे अहि सा सत्य अचौर्य प्रापर्य और
परिग्रहत्यागते शौचधर्म है। जे पचपापनिमें प्रपतनेवाले हैं ते
सदाकाल मलीन हैं जे परके उपकारक लोपे हैं ते कृतमी सदा
मलीन हैं ज, गुन्द्रोही धर्मद्रोही मिनद्रोहो उपकारकू लोपनेवाले
-

(१४१ तिनके पापका सताने अमस्यांत मानिमैं कोटि तीर्थनिमें स्नान करि दानकरि दूर नाही होय है विश्वासघाती सदीमरीन है. यात भगवान के परमागमको आज्ञा प्रमाण शुद्ध सम्यग्दर्शनज्ञानचारि- प्रकरि आमाः शुचि फेरो क्रोधादि कपायका निग्रहकरि उत्तम धम दिगुण धारणकरि उज्वल करो समस्त व्यवहार कपटरहित उज्वल करो परका विभन ऐश्वर्य उज्यलयश उत्तमविद्यादिक पभार देखि अदेखसका भानरूप मलानता छाडि शौचधर्म अङ्गीकार करो परका पुण्यका उदय देसि पिपादो मति होहूँ डम मनुष्यप- यिकू तथा इन्द्रिय ज्ञान बल' आयु सपदाटिकना अनित्य क्षणभंगुर जानि एकाग्र चित्तारि अपने सम्पमें दृष्टि धारि अशुभ भावनिको अभावकरि आत्माकू शुचि करो। शौचः ही मोक्षका मार्ग है शौच ही मोक्षका दाता है । ऐमं शौच नाम पघधर्मको शर्णन कियो ॥ ५ ॥ अब सयम ना। धर्मका स्वरूप कहिये है--सयमका ऐमा लक्षण जानना जो अहिंसा कहिये हिंसाको त्याग दयारूप रहेगा हितमित पध्य प्रिय सन्यवचन बोलना परके यनमे याछा का अभार करना कुशीलका छाडना गरिग्रह त्यागनाए पाच प्रत हैं तिनम पंच 'पापनिका एक देश त्याग सो अणुनत है सफलत्याग' 'सेो महानत है इन पचनतनिक T दृढ

-
(१४२)
धारण करना आपच समितिका पालना -तिनम गमनको
शुद्धता ईश्र्यासमिति है-पवनको शुद्धता, से मापासमिति
निदोष शुद्ध भाजन काना से ऐपगाममिति है , शरीरके
उपकरणादिक नेत्रनित सोधि उठारना धरना से
आदाननिक्षेपण समिति है मनमूत्रककादिक मलनिक अन्य
जीपनके ग्लानि दुसयाधादिक नाहा उपनें ऐसे क्षेत्रम क्षेपण
सो पविष्ठापना समिति है इन पचम समितिनिका पालना अर
माध, मान, माया, लाम, इन च्यार कपायनिका निग्रह करना
अर मनपचनापको अशुभपति ए दण्ड हैं इनतीन दण्डनिका
व्याग अर विपयनिम दौडती पचइन्द्रियनिक पश, करना जीतना
से सयम है।
भावार्थ-पचनतनिका कारण । समितिका पालन -
कपायनिका निग्रह दण्डनिका बाग इन्द्रियनिका विजयकू
जिन्द्रके परमागममें सयम कया है । सो सयम बहुत दुर्लभ
है जिनके पूर्व के वाधे अशुपकर्मनिका अतिमन्दपना होते मनुष्य
जन्म उत्तमदेश, उवमकुल, तमनाति, इन्द्रियपरिपूर्णता नीरोगता
कपानिको मन्दता होप अर उत्तमसगति अर जिनेन्द्रका
आगमत अतिविरक्तता धारण मनुष्य के ,अपत्याख्यानापरणको
क्षयापशमत तो दशमयम होय अर जाक अप्रत्याख्यान अर प्रत्या-
है।
.

(११४३) ध्यान दोऊ कपायनिका क्षयोपशम होप ताके सकल सथम पावना महादुर्लभ है । नरगतिमै तिर्यच गतिमै देवगतिमै तो सयम होय नाही कोऊ तिर्यचके देशनत अपनो पर्यायमाफिक कदाचित होय है अरे मनुष्यपर्यायमै भी नीचकुलादिकमै अधर्मदेशनिमें इन्द्रियनिकल जज्ञानो रोगो दरिद्रो अन्यायमांगी रिपयानुरागी चाशकपायो निन्धकमी मिथ्यादृष्टीनिकै मयम कदाचित नाही हाय है तात अतिदुर्लभ सयमका पारना हैं ऐसे दुर्लभ सयमकू दुःपाय काऊ मूढद्धि विपयनिका लालपो होय छाडे है तो अनन्तकाल जन्म मरण करता मसारमै परिम्रमण करे है। सयम पाय छाटै सयमक विगडे है ताते अनन्तकाल नगोठमैं परिम- --मण बसस्थानरनिमें भमण करना होय सुगति नाही होर पर "पाय रिगाडने समान अन्व अनर्थ नाही है विपति झापजा सयमक निगाडे है से एक कौडीमे कि है तथा इन्धनके प्रधि कल्पवृक्षक छेदे है सिकिन्न मुख नाही सुपामास है क्षणभगुर हैं, नरकृति बोल्ड कारण है किंगफल नैम जिलाफा मनिट योर दुस महादाह मन्ताप देय मगर क्षिचिमान काल तुा, अज्ञानी दिन- फिर अनन्तकाल जनन्तमपनि (१४) की परमरक्षा करा पांच इन्द्रिय पियनिक सम्बन्ध रोकनेते सयम होय है पायनिका राण्डनकरि सयम होय ई दुद्धरतपका धारणकरि मयम होय हैं रसनिका त्यागकर सयम है मनके अमरके रोकनेकरि सयम होय है महान कायक्लेशनिके कहने करि सयम होय है प्रमस्थायर है । उपनासादिक अनशनतपकार सयम होय है मनम परिप्रहको लालमाका यागारि सयम होय है सस्यापर रक्षा करना से ही मयम है मनके निकल्पनिके राक्नेकार तथा प्रमादत पचनको प्रतिक रोकनेकरि, सयम होय है शरोरके अगउपासिका प्रवर्तन किमरि सयम होय है। बहुत गमनके रोकनेकरि सयम होय है । बहुरि दयारूप परिणाम कर सयम होय है परमार्थका विचार करके तया पर- मात्माका । ध्याम करके सयम होय है जहा परिग्रहमे मता मनष्ट होय पालारहित तिष्ठना कामना सण्डन करना सो बडा तप है। जहा नग्न दिगम्बर रूप धारि शीतकी पानका आतापका वांकी तथा डास मार मक्षिका मधुमक्षिका सप पिन्छ इत्यादिक उपजो घोर वेदना फ कोरे अगपरि सहनामो तप है अर जो निर्जनपतनिकी निर्जनगुफानिमे भयकर पर्वतनिकै दराडेनिम तथा मिहन्याघ्र रीछ भ्याली चीता हस्तीनिकरि व्याप्त धोरवनमैं निवास तथाप्रचड ( १४५ ) करना सो तप है । तथा दुष्ट बैरी म्लेक्ष चोर शिकारी मनुष्य और दुष्टव्यतरादिक देवनिकृतघोर उपसर्गनित कपायमान नाही हाना धीर वीर पनात कायरता छाडि गैरतिरोध छाडि सममानतें परमात्माका ध्यानमें लीन हुआ सहना सो तप है। बहुरि समस्त जीवनिक उलझानेवाले रागद पनिक जीतना नष्ट करना मो तप है। बहुरि यो यातनारहित मिक्षाके अव- सरमे श्रावकका घरमे ननधाभक्ति करि हस्तमे धा सारा आलूणा कडया खाटा लूसा चीकना रस नीरस विममें लोल- पता और सक्लेशरहित निर्दोप प्रासुक आहार एक बार भक्षण करना सो तप हैं। बहुरि जो पचसमितिका पालना अर मन वचनकायकू चलायमान नाहीं करना अपना रागद्व परहित मात्मानुभव करनामो तप है। जो स्वपर तत्वकी कथनीका निर्णय करना च्यार अनुयोगका अभ्यासकरि धर्म सहित काल न्यतोत करना सो तप है। बहुरि अभिमान छाडि विनयरूप प्रारीना कपट छाडि सरल परिणाम धारना क्रोध छाडि क्षमा ग्रहण करना लोमत्याग निवांछक होना सो तप है। जाकरि कर्मका समूहका नाशकरि आत्माका स्वाधीन हो जाय सो तप है। जो श्रुतका अर्थका प्रकाश करना न्याख्यान करना आप निरन्तर अभ्यास करै अन्यक अभ्यास करानै सो तप है। तपस्नीनिका देवनिका इन्द्र स्तवन कर भक्तिका प्रकाश करे तपकरि केवलज्ञान उत्पन्न होय है तपका अचिंत्य प्रभार है तपके माहि परिणाम होना अतिदुर्लभ है। नरक .

( १४६) मैं तपकी योग्यता ही दाही एक मनुष्यगतिमें होय मनुष्यों हु उत्तम कुल जाति बल बुद्धि इन्द्रियनिकी पूर्णता जाकै होय तथा रागादिकनिकी मन्दता जाकै हाय तथा पियनिकी लालमा जाकै नष्ट मई ताके होय है अर तप द्वादशप्रकार है जाकी जमी शक्ति हाय तिम प्रमाण धारण करी । पालक करो वृद्ध करो धनाड्य करो निधन करो पलपान करो निर्मल करो सहाय महितहोय सो करो सहायरहित होय सो करो भगान को प्ररूप्यो तप किसीके हू करनेक अशक्य नाहीं है। जैसे पायुपित्तकफादिकनिका प्रकाप नाहीं होय रोगकी पृद्धि नाही होय जैसे शरीर र प्रयका सहकारी पन्या रहे तसे अपना सहनन बल पार्य दखि तप करो। तथा देशकाल आहारकी योग्यता देखि तप करो। जैसे तपम उत्माह पधतो रहे परि- णामनिमें उज्वलता बघती जाय तैसें तप करो तथा जो इच्छा का निरोध करि विषयनिमें राग घटारना सो तप जीवका कल्याण है तप ही जीवका कल्याण है तपही कामकू निद्रा प्रमाद नष्ट करनेवाला है यात मदछाडि यारहप्रकार तपमें जैसा जैसा करनेक सामर्थ्य होय वैमा ही तप करौ सो धारह प्रकार तपा आगै न्यारो लिखेंगे। ऐसें तप धर्मक, चणन किया ॥ ७॥ अब त्याग धर्मका वर्णन करै है। त्याग ऐस जानना जो धन सपदादि परिग्रहक कर्मका उदयजनित पराधोन अर अवि- नाशीक अर अमिमानको उपजावनेवाली तृष्णाकू पधारनेवाला । तप ही (१४७ ) रागद्वेपकी तीव्रता करनेवाला आरम्भकी तीव्रता करनेवाला हिंसादिक पचपापनिका मूल जानि उत्तम पुरुष यकू अंगी- कार ही नाही किया ते धन्य हैं। कोई याक अङ्गीकार करि याक हलाहल विष समान जानि जीर्णतृणको ज्यों त्याग किया तिनकी अचिन्त्यमहिमा है। अर कोई जीवनिके तीन रागमात्र मन्द हुआ नाही यात सकल त्यागनेक समर्थदानमैं लगा है अर जे धर्मके सेवन करनेगाले निर्धनजन हैं तिनके अन्न वस्त्रादिक करि उपकार करनेमैं धन लगावै हैं तथा धर्म के आयतन जिनमन्दिरादिकमैं जिनसिद्धान्त लिखाय देने में तथा उपकरण पूजनादिक प्रभावमैं लगाये हैं तथा दुखित दरिद्री रोगिनीके उपकारमें तन मन धन करुणापान होय लगावै है ते धन जीतन्यक सफल कर हैं। दान है सो धर्मका अङ्ग यातें अपनी शक्ति प्रमाण भक्ति करि गुणनिके धारक उज्वल पात्रनिको दान देना है सो परलोकक जीवने महान सुख सामग्रीक लेजावै है सो निर्विन स्वर्गक तथा भोगभूमिक प्राप्त करनवाला जानो। दानकी महिमा तो अज्ञानी बालगो- पाल हू कहे हैं जो पूर्व दान दिया है सो नाना प्रकार मुस सामग्री पाई है अर देगा सो पागा ताते जो सुख सपदाका अर्थी होय सो दानहीमै । अनुराग करो। दान करनेमें उद्यमी हैं ते इहा हू तीन आर्तपरिणामतै मरि सर्पादिक दुष्ट तिर्यचगति पाय नरक निगोदक जाय प्राप्त होप हैं। धन कहा साथ जायगा धन पावना तो दानीही ते सफल दानus है

(१४८ )
रहितका धन घोर दु.सिनिकी परिपाटीका कारण है अर इहा
हू कृपण घोर निन्दाक पावै हैं कृपणका नाम मी लोक नाही
कहै हैं कृपण समका लोफ अमगल माने हैं जामै औगुण दोष
हू होय तो दानीका दोष दकि जाय है। दानीका दोष दरि
भागे है नानकरिही निर्मलकीर्ति जगतमे विख्यात होय है।
देनेकरि बैरी ह चरननिम नमै है दान देनेत वैरा पैर छाडे है
अपना हित करनेवाला मित्र हो जाय हैं जगतम दान वहा है
थोडामा दान है सत्यार्थ भक्तिकरि करनेवाला मोगभूमिका
तीनपल्यपर्यतभोगभोगिदेवलोकमेंजायाँदनाहीजगतमेंऊँचादैदान
देना विनयसयुक्तस्नेहुरा वचनकरिइसत गेय देना अर दानी
है ते ऐसा अभिमान नाही कर हैं जो हम इसका उपकार कर
हैं । दानीतो पात्रकू अपना महाउपकार करनेवाला मानै हैं जो
लोक रूप अन्धकूपम पडनेका उपकार पान विना कौन करें
पात्रमिना लोमोनिका लोभ नाहीं छूटता अर पात्रपिना ससार
के उद्धार करनेगाला दान कैंस रहता । यात धर्मात्मा जननिके
तो पात्रके शिलने समान अर दानके देने समान अन्य कोऊ
आनन्द नाही है चडापना धनाढ्यपना झानीपना पाया है तो
दानमें ही उद्यम करो। छ६ कायके जीवनिक अभयदान देह
अभक्ष्यका त्यागकरि पहआरम्भके घटाउनेकरि देखि सोधिके
लना धरना यत्नाचार विना निर्दयी होय नाती प्रवर्तनाकिमी
प्राणीमात्रक मनवचनकायत दुखित मतिकराादु सीनिकाकरणा

( १४६ ) ही करो यो ही गृहस्थक अभयदान है यात ससारमे जन्म मरण रोग शोक दारिद्र वियोगादिक सतपका पात्र नहीं होओगे।। २५ । यहुरि संमारके नधारनेवाले हिंसाकू पुष्ट करनेवाले तथा मिथ्याधर्मकी प्ररूपणा करनेवाले तथा शुशास्त्र भृङ्गारशास्त्र मायाचारके शास्त्र वैद्यकशास्त्र रस रमायण मत्ल जन्त्र मारण वशीकरणादिक शास्त्र महापापके प्ररूपक है इन अति दूरत ही त्यागि भगवान वीतराग सर्पज्ञका कह्या दया धर्मक प्ररू- पणा करनेवाला स्याद्वादरूप अनेकान्तका प्रकाश करनेवाले नय प्रमाणकरि तत्वार्थकी प्ररूपणा करनेवाले शास्तनिक अपने आत्माक पढने पहावने करिआत्माका उद्धारके अर्थि अपने अर्थि दान करा। अपनी सन्तानक ज्ञानदान करा तथा अन्य धर्म बुद्धि धर्मके रोचक इच्छा तिनकू शास्त्रदान करा ज्ञानके इन्छक है ते ज्ञान के अर्थि पाठशाला स्थापना कर हैं लाते धर्म का स्तम्भ ज्ञान ही है । जहा ज्ञान दान होयगा तहा धर्म रहेगा यात ज्ञानदानमे प्रातेन करो। ज्ञानदानके प्रमारत निर्मल केवलज्ञानकू पा है । । बहुरि रोगका नाश करनेवाला प्रसुक औषधिका दान करो औपधदान बड़ा उपकारक है अर रोगी कू सीधो तयार औपध मिलं है वाका बडा आनन्द है अर निरधन होप तथा जाकै टहल करनवाला नाही होय ताफू औषध जो करी हुई तग्यार मिल जाय तो निर्धनिका लाम ममान मान है ओपय लेय नीरोग होय है समस्त प्रत तप मयम पाल जानका अभ्यास करें है औपधदान है ताकै वात्सल्य गुणस्थितिकरणगुण निविचिकित्मा गुणे इत्या दिक अनेक गुण प्रगट हाय है औपधदानके प्रमागत रोगरहित देवनिका क्रयिक देह पार्य है। परि आहा- रदान समस्त दाननिमें प्रधान है प्राणो का जीवन शक्ति पल बुद्धि ये ममस्त गुण आहार रिना नष्ट होय जाप है आहार दिया सो प्राणीक जीवन बुद्धि शक्ति समस्त दीना । आहा रदानते ही मुनि श्रापका सकल धम प्रात है आहार विना मार्ग भ्रष्ट हो जाय आहार है मो गमस्त रोग का नाश फरनेवाला है जो आहारदान दे है मो मिध्यादृष्टि ह भोगभू मिम फलपक्षिका दशाग मागा अमरपातकाल भोग अर क्षुधातपादिकको नाधारहित हुआ आपला प्रमाण नीन दीनक आतरै भोजन करें। ममस्त दु पालश रद्दिन अमरुपात वण सुसभोगो देवलाफनिम जाय उपज है तात धनकू पाय च्यार प्रकारके दान टनम प्रपतन करा । अर जा निधन है सो हू अपना मोननमते जेता बने तेता दान करा आपा आधा भोजन मिलती मै तै हू ग्राम दोय ग्रास दु सित घ मुक्षित दोन दरिद्रीनिक अथ देवा । बहुरि मिथ्यचन बोलने का बडा दान है आदर सत्कार पिनय करना स्थान दना कुशल पूछना ये महा दान हैं। बहुरि दुपविक्लपनिका त्याग करो पापनिम प्रवृ. तिका त्याग करो चार पायनिसा त्याग करो विस्था कर- नेश त्याग करो परके दोप सत्य असत्य कदाचित् मति कहो । पहुरि अन्यायका धन ग्रहण करनेका दूरहित त्याग फरा भो ज्ञानीजन हो जो अपना हितके इच्छक हो तो दुखित जननिक तो दान करो अर सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञानादि गुणनिके धारक- निका महाविनय मन्मान करो ममस्त जीपनिमे करणा करो मिथ्यादर्शनका त्याग करो रागद्वप मोहके धारक कुदेव अर आरम्भ परिग्रह के धारक मेषधारी जर हिंसाके पोपक रागद्वपक पुष्ट करनेवाले मिध्यादृष्टिनिके शास्त्र इनक चन्दना स्तवन प्रशमा करने का त्याग करो काध मान माया लोभ इनके निग्रह करने में बडा उद्यम करो क्लेश करनेके कारण अप्रिय पचन गालीके वचन अपमानके पचन मदसहित वचन कदाचित मति कहो इत्यादिक जो परके दुःखके कारण तथा अपना यशकू नष्ट करनाला धर्म नष्ट करनेवाला मन चन कायकै प्रार्तनका त्याग करो ऐसे त्याग धर्मका सक्षेप वर्णन फिया ॥८॥ अब आकिंचन्य धर्मका स्वरूप कहिये है जो अपना ज्ञानदशनमय सरूपविना अन्य किंचित्मात्र ह हमारा नाहीं है में किसी अन्य द्रव्यका नाही हूँ मेरा कोऊ अन्य द्रव्य नाहीं है ऐसा अनुभव निकू आकिंचिन्य कहिये है। भो आत्मान् अपना आत्मा देहर्ते भिन्न अर ज्ञानानन्द मुखकरि पूर्ण परम अतीद्रिय भय रहित ऐसा अनुभव करो । मानार्थ--ये -देह है सो मैं नाही देह तो रम रुधिर हाड माम चामरमय जड अर्च- तन है । मैं इस देवता अत्यन्त भिन्न ह ये नाह्मण क्षत्रियादिक । . नातिाल है मेरे ये नाही है स्त्री पुरुष नपु मक जस रसनिमा गाहारी जडे हुय पचवर्ण रत्नानिके आभरण डारका रंगमरमाणिक्यका रगा अर नालक अर मोलक ( १५२ ) देहके हैं मेरे नाहीं यो गोरापना, मावलापन, राजापना, रकपना, सामीपना, सेवकपना, पण्डितपाना, मूर्स पना इत्यादि समस्त रचना कर्मका उदय जनित देहके हैं में तो जायक हूँ ये देहका सम्बन्धी मेरा म्वरूप नाही है मेरा स्वरूप अन्य द्रव्यका उप मारहित है ताता ठण्डा कठोर लूसा चीकना हलका भारी अष्ट प्रकार सर्ग है त हमारा रूप नाही पुद्गलके रूप हैं ये साटा मीठा रडया कमायला चिरपरा पच प्रकार रस अर सुगन्य दुर्गय दाय प्रकारका गध अर काला पीला हा स्वेन रक्त ये पचपर्ण मेरा स्वरूप नाही पुद्गलका है मेरा सभार तो सुप करि परिपूर्ण है परन्तु कर्मक आधीन दुसकरि व्याप्त होय रया ₹ मेग स्वरूप इन्द्रिय रहित अतान्द्रिय है इन्द्रिया पुद्गलमय धर्म रहित की हुई है मैं ममन्त भय रहित अविनाशा असण्ड आदि अतरहित शुद्ध नान स्वभाव है परन्तु अनादिकालते जैसे सुवर्ण अर पापाण मिल रहा है तैसे तथा क्षीरनीर 'ज्यो कर्मनि करि जनारि कारतें मिल गया है तिनमहू मिथ्यात्वनाम कर्मका उदयकरि अपना स्वरूपका ज्ञानरहित होय दहादिक । परद्रव्य निए आपका स्वस्प जानि अतकाल में परिभ्रमण करघा भर काऊ किंचित जापरणादिकके दर हाने श्रीगुरुनिका उपदश्या परणाम प्रमादत अपना रपया स्वरूपका ज्ञान भया है निम गुरुको पात अर निरन्तर अभ्यामन मिल्या हुवा है (१५३ ) 4 भिन्न भिन्न जाने है तैसे परमागमका निरन्तर अभ्यामते मेरा ज्ञान स्वभावमै मिल्या हुआ राग द्वेष माह कामादिक' मैलफू भिन्न जाण्या है अर मेरा ज्ञायक स्वभारफू भिन्न जाण्या तातें अब जैसे रागद्वेप मोहादिक भाव कर्मनिमे अर कर्मनिके उदयतें उपज विनाशीक शरार परवार धन सम्पदादि परिग्रह में ममता युति मेरे जेसे फिर अन्य जन्ममें हू नाही उपजे तैसे आकिचन्य भाऊ वा आकिचन्य भाग्ना अनादिकालत नाही उपजी समस्तपर्यायनिक अपना रूप मान्या यथा रागद्वेप- मोहक्रोधकामादिकमा कर्मकृत विकार थे तिनकू आपरूप अनुभवकरि विपरीत भावनिते घोरकर्मरत किया अप मैं आचिन्य भारनामे विनका नाश करनेवाला पच परमगुरुनिका शरणते आकिंचन्य ही निर्विघ्न चाहू हू और त्रैलोक्यमे कोऊ अन्य वस्तुकू नाही बाछू हू । यो अकिचन्यपणा ही ससार समुद्रतै तारणेक जहाज होहू जो परिग्रह महायध जानि छाडना सो आकिचन्य है आकिचन्यपणा जाके होय है ताके परिग्रहमे बांधा रह नाही है आत्मध्यानमे लोनता होय है देहादिकनिमै चासमेपमै आपो नाही रहे है अर अपना स्वरूप जो रतनय वामै प्ररवत्ति होय है इद्रियनिक विषयमै दौडता मन रुकि जाप है देहत स्नेह छुष्टि जाय है समारिकदेवनिका सुख इन्द्र अहमिन्द्र चक्रवर्तीनिका सुख ह दुस दीरा है। इनमे घाछा कैसे करें परिग्रह रत्न सुवर्ण राज्य ऐश्वर्य स्त्री पुत्रादिनिक जीर्णतवृर्णमें जैसे ममतारहित छोडनेमें विचार नाही वैसें परि-

( १५४ )
गह लाई है। आकिंचन्य वो परम गीतरागपणा है।
जिनके ममारको अन्त आगयो तिनके होय है जाके आकि
याणा होय ताम परमार्थ जा शुद्धआत्मा ताका विचारनेकी
शक्ति प्रगट होकही अर पचपरमेष्ठीम मक्ति होय ही पर
दुष्टयपिकल्पनिका नारा होय ही और इट अनिष्ट मोननमें
रागद्वेप नष्ट हा नाय है केरल उदररूप सादा भरना अन्य
रस नीरम भोजनमे विचार जाता रहे है मगस्त धर्मनिमें प्रधान
धर्म आस्मिन्य हा मोक्षस निस्ट समागम गोला है
अनादिकालते ते सिद्ध भये हैं त आम्चिन्यतं ही भये है
अर आगे जा जा तीर्थक्गदि सिद्ध धागे ते आकिंचन्यपणा
हीत होयेंगे । यद्यपि आचिन्यधर्म प्रधानकारि ,
साधुजननिके
ही हाय है क्यापि एक दश धर्मस धारक गृहस्थ उस धर्म
के ग्रहण करने की इच्छा को है अर गृहस्चारमै मदगगो
होय अतिविरक्त हाय है प्रमाणिकपरिग्रह धार है आगामी
पाछारहित है. अन्यायका धन परिग्रह कदाचित् ग्रहण नाहीं
कर है अल्पपरिग्रहमें अतिसतापी होप रह है परिग्रहक दुख
का देनेनाला और अत्यन्त अस्थिर मान है ताके ही आकिंचन्य
मावना होय है । ऐम आकिंचन्य धर्मका वर्णन किया है ॥६
अब उत्तमब्रह्मचर्यका स्वरूप कहिये है-समस्त विषयनिमें
अनुराग छोड करके ब्रह्म जा घापफस्यमाव-आत्मासा ता
मैं जो चया कहिये प्रति सो ब्रह्मचर्य है। मोशनीजन हो
यो ब्रह्मचर्य नाम मत बडो दुर्द्धर है हरेक यापहा विषयनि

व के बम हुआ : आत्मज्ञान रहित है ते या धारवक् समर्थ ना- ही हैं जे मनुष्पनिमें देनके समान है ते धारवेक समर्थ हैं अन्य रक विषयनिकी लालसाके धारक ब्रह्मचर्य धारनेक समर्थ नाही हैं। यो ब्रह्मचर्यव्रत महादुर्द्धर है जाके ब्रह्मचर्य होप ताके समस्त इन्द्रिय अर रुपायनिका जीतना सुलभ है। मो भव्य हो। स्त्रोनिका मुखमे रागी जो मन रूप मदोन्त - हम्ती ताकू वैराग्यभावनामै रोक करके अर विपयाका आशा का अभाव करके दुर्द्धर ब्रह्मचर्य धारण करो। यो काम सो चितरूपमूमिमै उपज है याकी पीडाफरि नाही करने योग्य ऐसे पाप कर है याते,यो काम मनक मथन करै है मनका ज्ञानक नष्ट कर है याहीत याकू मनमथ कहिये है ज्ञान नष्ट हो जाय खदि ही स्त्रीनिका महादुर्गध निन्द्यशरीरक रागा हुया से है 'अर कामकरि अघ हो जाय तदि महाअनीतिक प्राप्त "होय अपनी परकी नारिका विचार ही नाहीं करै है। जो इस अन्यायतम इहा ही मास्या जाऊ गा राजाका तीनदण्ड होयगा पश मलीन होयगा धर्म नष्ट हो जाऊगा सत्यार्थबुद्धि नष्ट हा जायगो । मरणकरि नरकनिके धारदुःस' असख्यातकाल पर्यंत भोगी फिर असरयात तियचनिके दुःखरूप अनेकभव पाय कुमानुपनिमें अधा लूला कूपडा दरिद्रो इ द्रियश्किल बहरा गूगा चण्डाल भील चमारनिके नीचकुलनिमें उपजी फिर स्थावरनिमै अनन्तकाल परिभ्रमण करूगा । ऐसा सत्य- विचार कामोके नाही उपज है. इस कामके नाम हो जगतके - जीनिक प्रगट करे है। क फहिये पोटा व अपात गई उपजा ताने कदर्प काहिय है। अति कामना को पांडा उप- जाप खिरा करे तात यार काम कहिये है। पाकरि अनेक तिर्यचनिक तथा मनुष्पनिक भवनिमें ललिटि गरिये तान मार कहिये है। सबको नैरी तात मवरारि फाहिये । प्रा जो तपसयम नात गुपित कहिये घलापमान पर सात ममम कहिये इत्यादिक अनेक दानिक नाम ही रहें है या जानि मनवचन कायत अनुरागकरि मनचय मन पालो । मानकर सहित ही ममारक पार जाग अन्नपचना मा तप समस्ट असार है जमचर्य पिना मफल फायालेश निपल है वान जी स्पर्शनइन्द्रियका सुख व पिरक होय अम्पन्तर परमत्मा- स्वरूप आरमा ताफी उज्वलता दयाहु जैसे अपना आत्मा काम के रागकरि मलीन नाहा होय ते पन करो। मनधर्यकरि ही दोउ लाक भूषित होय हैं। यहरि जा गीतको रक्षा बाहो हो अर उज्ज्वल यश चाहो हा अर धर्म चाहो हो और अपनी प्रतिष्ठा चाहा हो तो चित्तम परमागमको शिक्षा इस प्रकार धारण करा स्त्रीनिकी कथा मति श्रवण करो मति हो स्त्री निका रागरण कुतूहल चेष्टा मति देखो ये मेला देखना परि णाम विगार्ड है। व्यभिचारी पुरुषनिकी सगतिका करना भांग जरदा मादकरस्तु भक्षण नाही करना नाप ल तथा पुष्प माला अत्तर फुललादिक शील भगके कारण दूरत टालो गीत. नृत्यादि कामोहीपनके कारणनिका परिहार करो रानिमक्षण -

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. माताक् मित्रर स्वामीक सेवककू इक क्षणमात्रमें मारे है। माधी घोर नरकका पात्र है क्रोधी महाभयकर है ममस्त धर्म का नाश करनेवाला है। क्रोधीके सत्यरचन नाही होय है अर आपकू अर धर्मकू अर समभावा दग्ध करनेवाला कुन चनरूप अग्निकू उगले है मोधी होय मो धर्मात्मा सयमी शोलयान मुनि अर श्राफविक चोरी अन्याईके झूठे दोष फलक लगाय पित करे है। क्रोधके प्रभावत ज्ञान कुना होय है आचरण विपरीत हो जाय है श्रद्धान भूष्ट हो जाय है अन्यायमें प्रवृत्ति हो जाय है नीतिका नाश होय है अति हठी होय विपरीत मार्गका प्रवर्तक होय है।धर्म अधर्म उपकार उपसारका विचार रहित कृतनी होय है यात वीतरागधर्मके अर्थी हो तो क्रोधमानक कदाचित् प्राप्त मति होहु । यहुरि मार्दव जो कठोरतारहित कोमलपरिणामी जीनमें गुरुनिका बडा अनुराग वर्त है मार्दवपरिणामीक साधु माने है तात कठोरता रहित पुस्प ही ज्ञानका पात्र होय है। मानरहित कोमल- परिणामीक जैसा गुण ग्रहण कराया चाहे तथा जैसी कला मिखाया चाहे तैमी कला गुण प्राप्त हो जाय के मूल समस्त विद्यामा मल विनय है विनयपान समस्तके प्रिय होय है अन्यगुण जामें नाही होय सो पुरुष हू विनपर्ने मान्य होय है विनय परम आभूषण है कोमल परिणामीम ही दया यसे है मार्दवत सर्गलोककी अभ्युदय सम्पदा निर्वाणको अग्निाशिक सम्पदा प्राप्त होप है अर कठोरपरिणामीक दर- समस्त धर्म

सदाकाल कपटादि दोपरहित वागन्यता।
समस्त दोप ही दोप पास करे। सनी यहा अप.
यश पाय तिर्यच नरकादिक गतिनि। यान काल भ्रम
करे हे मायाचार रहित आज वधमेशा न ममस्तु गुप
है समस्त लोकनिक प्रीतका प्रीतीतिका कारण है परना
ही आत्माका हित है । बहुरि स करने ममस्तगुर"
होते त्याग्या चाहे है जैसे पापाणमैं जल नाही प्रवेश करे
तैसें सद्गुरुनिका उपदेश कठोर पुरुषका हृदयमें प्रवेश नाही
कर है जात जो पापाणकाष्टादिक हुनरमाई लिए होय ता
जो बालपालमात्र हू जहा घड्या चाहै छीन्या चाहै नहा,
वालमात्र ही उतरि आवे तदि जैसी सूरत मुरंत बनाया चाई
तैसे ही बने है अर कोमलरहित मै जहा टाची लगाई नहा
चिडक उतरि द्रि पडे शिल्पीका अभिप्रायमाफिक टन
नाही आवे तैसें कठोरपरिणामीक यथात् शिक्षा की
अभिमानी कोऊक प्निय नाही लागे अभिमानीकायलोक
विना किया गैरी होय है अर परलोकमें अतिनीच किन्नु-
यनिमे असख्यातकाल नाना तिरस्कारका पात्र बन्न चात
कठोरता त्यागि मार्दवभावना ही निरन्तर धान्य,
बहुरि कपट समस्त अनर्थनिका मूत्र में प्रीति अर
प्रीतीका नाश करनेवाला है कपटीमें अन्य ल निर्दयता
विश्यामपातादि: ममस्त दोष चसैं हैं का गुण"नाही
देवनिकरि पूज्य इन्द्र प्रतोन्द्रादिक हतो बात
सरल
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1 - है अर परलोकमे अनेक देव मनुष्यादिक जाकी आशा समस्त परि धार है अर.मत्यगढी इहा ही अपवाद निन्दा करने योग्यहाय है। समस्तक जमतीतिका कारण है पांधव मित्रादिक हु अवना करि छाड हैं गनानिकरि जिव्हाछेद सर्वस्वहरणा- दिक दण्ड पार है अर परलोकमैं विर्यचगति है - बचन रहित एकेन्द्रिय विकलनयादि अमख्यात पर्याय धार है यात सत्य धर्मका धारणा ही श्रेष्ठ है। बहुरि जाका शुचि आचरण होय मो ही जगतमै पूज्य है शुचि नाम पवित्रता उज्ज्वलताका है। जाफा,आहार विहारादिक ममस्त प्रवृत्ति हिंमारहितः हिंसाका मयते यत्नाचार सहित होय अर अन्यके घनमें, अन्यकी स्त्रीम कदाचित स्वप्नम वाडा नाही होप मो ही उज्ज्वल आचरण का धारक है तिमक ही जगत पूज्य माने है निर्लोभी का समस्त लोक विश्वास कर है सो ही लोकमे उत्तम है ऊपलो कका पात्र है लोम रहितका बडा उज्ज्वल यश प्रगट है लोमी महामलीन समस्त दोषनिका पात्र है निद्य कर्ममे। लोभीका प्रीति हाय है लोभीक ग्राह्य अग्रास खाय-असाध कृत्य अकृत्य का विचार,ही नाही होय है इहा हू लोकमें निन्दा धर्मत परामुखता निर्दयता प्रगट दक्षिय है लोभी धर्म अये काम नष्टकरि कुमरणकरि दुर्गति जाय है लोभीका हृदयमै गुण अव- काश नाही . पाचै है इमलोक परलोकमें लोभीक अचिन्त्य क्लेश दु ख प्राप्त हाय हे यात शौच धर्मका धारण ही श्रेष्ठ है यहुरि सयम हां आत्माका हित है इस लोकमे सयमका धारक -- ममस्त लोकनिके बदने योग्य होय है समस्त पापनिकरि नाही लिपै है याकी इम लोकमैं परलोकम अचिन्त्य महिमा है अर पमयमी है सो प्राणनिका घात अर विषयनिमें अनुगग करि जशुभ कर्मका यन्ध कर है यात सयम धर्म ही जीवका हित है । बहुरि तप है सो कर्मका सार निर्जरा करनेका प्रधान कारण है तप ही आत्माकू कर्ममल रहित कर तपका प्रभार यहा ही अनेक ऋद्धि प्रगट होय है तपमा अचिन्त्य प्रभावक तपविना कामकू निद्राक कौन मारे तपसिना वाछा कौन मार इ द्रियनिके पियनिको माग्नेम तप ही ममर्थ है आशा- रूप पिशाचणी तपहीते मारो जाय है कामका विजय तपहीत होय है तपका साधन करनेवाला परीपह उपमर्ग आपते हू रत्न- अप धर्मत नाहीं छट यात तपधर्म ही धारण करना उचित है तपचिना ससारत छटना नाही है जात चक्रीपनाका हु राज्य छाडि तप धार सो त्रैलोक्यमें बदने योग्य पूज्य होय है अर वपक छाडि राज्य ग्रहण करै सो अतिनिन्ध थुथुकार करने योग्यहोय तृणत ह लघु होय यात त्रैलोक्यमे तप समान महान् अन्य नाहीं। पहरि परिग्रह ममान भार नाही जेते दुःख दुर्ध्यान क्लेश पर वियोग शोक भय अपमान हैं ते समस्त परिग्रहके इच्छक जैसे परिग्रहत परिणाम निराला होय तेसै तैम सेद रहि होय है जैसे यदा भार करि दु.सित पुरुष मार रहित होय वदि सुसित होय तैमें परिग्रहकी वासना मिटे मुखित हाय है समस्त दुस अर समस्त पापनिका उपजाबनेका स्थान ये परिग्रह है जमैं नदीनिकरि समुद्र वत नाही होय अर ईधन करि अग्नि तृप्त नाही हाय है आशारूप बाडा बडा आगाथ है नाका नलस्पण नाही दिन दिन यामै भरो त्यो त्यो साडा वधना जाय जो आशारूप साडा निधिनित नाही भरै सो अन्य सपदात कैम भरे जर ज्या ज्यां पग्ग्रिहकी आशाका त्याग करो त्यां भरतो चल्या जाय जाने ममस्त दु स रिकग्ने कुत्याग ही समर्थ है त्यागहात जन्तरद्ग बन्धन रहित होय अनन्त मुसक धारक होहुगे परिग्रहके वधनमें बन्धे जीन परि ग्रह त्यागत ही छुटि मुक्त हाय तात त्याग धर्म धारण ही अप्ठ है बहुरि ह आत्मन् । यो दह अर स्त्री पुन , धन धान्य राज्य ऐश्चयादिकनिमे एक परमाणुमात्र हु तुम्हारा नाही है पुद्गल द्रव्य है जद है चिनाशीक हैं अचेतन है इन परगन्यनिमें 'अह' ऐमा सकल्प तीन दर्शन मोह कर्ममा उदग्निा कौन करानै इम परद्रव्यमै आत्म मारप मेरे कदाचित् मति होइ मैं अकिंचनहू । याआकिंच यमाग्ना प्रभारत कर्मफालेपरहित यहा ही समस्त पन्ध रहित हुआ तिष्ठे है साक्षात् निर्माणका कारण "आकिंचन्य धर्म ही धारण करो बहुरि कुशोल महापाप है ससार परिभ्रमणका चीज है ब्रह्मचर्यक पालनेपालेत हिमादिक पाप निका प्रचार दूर भागे है। समस्त गुणनिकी सपदा. यामैं बस है जिनन्द्रियता प्रगट हाय है ब्रह्मचर्यत मुलनात्यादि भूपित होय हैं परलाफमें अनेक ऋद्धिका धारक महादिक देव होय ।

(१६४ ) दुर्लभ है नाही वोझ उठावना नाही द्रदेश जावना नाही क्षुधा तृषा शोत उष्णताफी बेदनाका आफ्ना नाही किसीका विस- वाद झगडा है नाही अत्यन्त सुगम समस्त क्लेश दुख रहित स्वाधीन आत्माका ही सत्य परिणमन है। यात समस्त ससार परिभूमणः छुटि अनन्तज्ञान दर्शन मुख वीर्यमा धारक सिद्ध अवस्था याका फल है। ऐसे दशलक्षण धर्मका सक्षेप करि वर्णन कियो। * ममाप्त* * ------

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Solahe Bhavna Or Dus Dharam

Author
Jain Suresh Kumar
Title
Solahe Bhavna Or Dus Dharam
File name
Solahe Bhavna Or Dus Dharam
Text
OCR done
Citation
1946
Published
2011/03
Publisher
Culcatta Brajdulal Street Petric
Language
Sanskrit
Pages
159
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551854
Barcode
4990010032553.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
sPxhC3F0J9p
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