Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Kabir Ke Dharmik Vishvas

Maini,dharampal · 2010/12

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कबीर के धार्मिक विश्वास
डा० धर्मपाल मैनी,
एम ए, पी-एम् ,
प्राप्यापक, हिन्दी विमाग, पंजाब विश्वविद्यालय,
परसोगद ।
वितरह
भारतेन्दु भवन,
सैक्टर-१५ ए, पपीगर

डॉ० धर्मपास मनी
६१ ५२, सैक्टर १४,
पण्डीगा३
मूल्य ३७४
पर्यि प्रिटिन प्रस
निकमसन रोग मम्मामा साथमी।

समर्पण
'मेरो बहुरिया
कमला ना रे।'
का
--धमपास

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दो शब्द पायुष्मान् ग० धर्मपाम मैनो को पुस्तक ५वीर के पार्मिक विश्वास' कबीर साहित्य के प्रध्ययम का एक नवीन प्रयास है। ग. ममी मे कबीर के धार्मिक विश्वासों को बहुत कुशलता साप स्पष्ट किया है और सहानुभूति के साप मूल्मांकन किया है। कबीर भारतीय पम सापना के क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण स्पान के अधिकारी हैं। ये उन मार्गद्रष्टामों में है जिनके बारे में बार बार मिला पायेगा, फिर भो मिसमे को कुछ रह ही पायेगा। मुझे पसन्नवा है कि डा० ममी मे नये सिरे से उनके पार्मिक विश्वासों का मूल्यांकन किया है । प्राधा है धम-सामना रिमामु इस पुस्तक का स्वागत करेंगे परमात्मा से प्रार्थना है किये ग० ममी को दीर्ष प्राय पोर पूर्ण स्वास्प्प दें, ताकि ये इस क्षेत्र में अधिकाधिक काय करते रहें पौर नमे प्रप देते रहे। पगोगा ११-६४ हवारी प्रसाद रिवेदी

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स्या नहीं उपसम्म ? बौखिक पल्पना से अनुभूति का भी
मनुमान मगामे का प्रयल किया है। यहां उसकी प्रमुभूति
मही, तमसी भी प्रमिप्यक्ति में उपनम्ब-निम्म सापन
स्वस्प पार्मिक विश्मासों को समझने के प्रयत्म में विश्वास के
माध्यम से बौविक-सम्बवता के अतिरिक्त लेखक का अपमा
कुछ भी नहीं पौर उसमें भी यौखिक पाठक का बहुस-सी
मसंगतियों से परिचय होगा, पिपवास-परायण की दृष्टि उम
पर नहीं भी पड़ सकती।
विश्व-सरकार के इस युग में एक ही 'मामर-मर्म' की
मी भावसकता है। कमीर के माध्यम से इम सम्तों की
मान्यतामों में-मगता है. इस 'मानव-पम' के तत्व ही
संगृहीत हुए हैं। पौर सच पूधा माये तो 'पसुपर मुहम्म
कम्' (सारा विश्व ही एक परिवार है) का सदपोप करने
पासो भारतीय संस्कृति की प्रारमा का सच्चा प्रतिनिपिस्व
करने वाले ये सम्त ही हैं जिन्होमे धम, अप, कम पोर जाति
के किसी भी वर्ग को स्वीकार किए बिना कियात्मक जीवन
के माध्यम से पपना सम्वेव प्रसारित किया है। पान विषयको
ऐसे ही प्रापरण प्रमाम, उदार, मिश्मत पौर निष्कमुप
पाक्तियों की मावस्यकता है। शायद इनके पार्मिक विश्वास
ऐसे म्पक्षियों के उद्भूत होने के लिए उपयुक्त नावावरण
की सृष्टि करने में कुछ सहायक हो सके।
भारतीय साहित्य में प्रधान स से और हिन्दी साहित्य
में मपम पौर प्रमुस स्म से पनीर के प्रमुमति परक व्यक्तित्व
से सहर प्रारमीयता भनुमव करने वाले गुरुसर प्राचार्य
हमारीप्रसाद द्विवेदी का कदीर मार भी मृर्षम है और एक

छ
युग सक बना रहेगा। प्रत्यक्ष गुरु पोर उनकी कृति को
प्रेरणा के वावजूद भी लेखक की प्रशस्त अभिम्मति उसकी
सीमित सामय पोर पारितही परिपापिका है। फिर भी
इस कृति की पावश्यकता क्यों मायद इसलिए कि मह इस
प्रचार के महान साहित्य तक पहुँरने पोर उसे समझकर
भपनामे के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण कर सा और
सापन भी मन सक। साहित्यिक मगत में संसद का मह एक
पन्य विश्वास-परामण पग-मित है।
...पारा प्रस अम्बामा क महयोग समा भाषा-दिमाग
पजार के प्रमुवान को भी मन साभार स्वीकार करता है।

प
स्या नहीं उपसम्प? बौद्धिक कल्पमा से अनुमूप्ति का भी
मनुमान लगाने का प्रयत्न किया है। यहां उसकी प्रमुभूति
महीं, उसको भी प्रमिम्पक्ति में उपमम्भ निम्न सापन
स्वरूप धार्मिक विश्वासों को समझने के प्रयत्न में विस्वास के
माध्यम से पौविक-सम्बवता के प्रतिरिक्त फेसफ का प्रपना
कुछ भी नहीं और उसमें मी पौविक पाठक का बहुत-ती
मसंगतियों से परिचय होगा, विश्वास-परायण को दृष्टि उम
पर महीं मी पा सकती।
विश्व-सरकार के इस युग में एक ही 'मानम-धर्म' को
मी पावश्यकता है। कमीर के माध्यम से इन सन्तों की
माम्यतामों म-मगता है, इस 'मामब-यम' के तत्व ही
संगृहीत हुए हैं। पौर सम पूछा गाये, तो बसुभम कुटुम्म
कम् (सारा विश्व ही एक परिवार है) का उदभोप करने
पासी भारतीय संस्कृति की प्रारमा का सम्मा प्रतिनिधित्व
करने वासे ये सम्स ही है जिन्होंने पम, पप, कम मोर पाति
के किसी भी वर्ग को स्वीकार किए बिमा नियात्मक पीवम
के माध्यम से अपना सन्देश प्रसारित किया है। माम विषय को
ऐसे ही प्रावरण प्रधाम उदार, निश्चम मौर निफमुप
व्यक्तियों की प्रावश्यकता है। शायद इनके धार्मिक विश्वास
ऐसे पक्तियों के उद्भव होने के लिए उपयुक्त वातावरण
की सृष्टि करने में कुछ सहायक हो सके।
भारतीय साहित्य में प्रपान स्म से पौर हिन्दी साहित्य
में प्रपम प्रौर प्रमुख रूप से कबीर के अनुभूति-परफ म्पपिसस्त्र
से सहर पात्मीयता मनुमप करने वाले गुरुवर प्राचार्य
हवारीप्रसाद द्विवेदी का कबीर पाप भी मृर्षम्य है और एक

छ
युग का बना रहेगा। प्रत्यक्ष गुरु और उनकी कृति के
प्रेरणा के बावजूद भी लेखक की प्रशस्त अभिम्पक्ति उसकी
सोमित सामर्प और शक्ति की परिचायिका है। फिर भी
इसति को पावश्यकता क्यों ? शायद इसलिए यह इस
प्रकार के महान साहित्य सा पहुँमने पौर उसे समझकर
अपमाने र सिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण कर सरे मोर
साधन भी बन सके। साहिस्पिक जगत में सेसक का यह एक
पन्म विश्वास-परायण पग मिह है।
माग प्रस अम्बाला + महयोग सया मापा विमाग,
पमान
अनुदान को भी लेना सामार स्वीकार करता है।
-सेसक

सन्तों के धार्मिक विश्वास
माग १
कवीर के धार्मिक विश्वास
१ कबीर
व्यक्तित्व, ऐतिहासिक परिचय मन्म-मृत्यु का समय
व स्पान, भाति गुरु, परिवार, व्यवसाय, जीवन सपर्प,
गुरु माई शिष्य परम्परा।
२ धर्म:
मावश्यक वस्व, सक्षण, परिमापी, वो पक्ष) (सिक्षात य
माचार), मानव धर्म, युग की पुकार, कवीर का बम
सामान्य विशेपवाएं।
३ -मातरम्प-माविमाव :
गुष-मति प्रजमा अनादि प्रगम, ममम्म, पाहा
अनन्त मनश्वर (प्रक्षर), परेस, अस्म, मसोम,
प्रमनुमेय असम, प्रमुपम, मस्याग्य, प्रमेय, भगोप्य
प्रमूल्य प्रपट (मधरीरी), प्रारम (भगोपर), भवष्य,
मपठप प्रमम्प, प्रस्थाप, ममिस्म, मतः प्रतीन्द्रिम,
प्रकल्प्य, पचिरम प्रबोम्य, मझम, प्रसाम्प, रेवस
अनुभूविगम्य।

मगुण-निराकार, मिरकार, निरंजन, निरक्षानो
निर्विकार, मिर्मम मिर्दोप, निरम्पर (सदास्पायी) ।
मवार--सर्वातर्यामी, सस्वामी, सपदानी सवरूप
सवार्वा सदा स्थायी, सदा एक स्म (समरूप) प्रत'
प्रेष्ठ, एकमात्र सस्य ।
भौखिक गुप-कृपामू रक्षक,
भवतार
ज्योनि
प्रकाराफ, मारय परन्तु अनुभूति गम्य ।
Pी स्पिति-एक देशीय म होकर सपम्यापक केमम
प्रचार में प्राप्य।
Ka n सापटीभिर, गुप्पापीठ भस निगु ण,
मिराकार।
सम्पप--मात्मा से, अंध होते हुए भो ऐक्य,
बीम से, फवीर से, गुरु से सत एवं मत से, माया से
मुष्टि से।
४ सृष्टि
निर्माम, रचना प्रक्रिया, अस्थिर, मदार।
बीमामा-तत्पत्ति, ब्रह्मा मंग, स्पूम से सूक्ष्म का
विकास, परपस जीव, सगिक देह जीवन सांसारिक
समन्म, योनि धमष, गुरु सन्त भय ।
५ कपीर का प्राध्य
माया स रक्षा, रम से रसा, भव-बन्पम का मारा-मन
पार मायागमन रहित होना (मोक्ष प्राप्ति, मगपत्
प्राप्ति-ब्रह्ममाम प्रझरसपामाह्मानुभूति, साम्य का

भी साम्य, सल्मीनता एवं पूम ऐक्य (बा से)
महाकविता-नाम की सार्थकता, मगवरूपा
सरगुरु, नाम अप सिमरम भक्ति, प्रमभ्य पमवरत व
तीव-यूम पात्म समर्पम।
निमम पर बावन-मान, योग, पविममन, सत्संगति,
हरि सेवा।
६६-१०३
६ अवरोधक शक्तिमा
भारम्भ-मापाचन कामिनी, विषय, इन्द्रिया, मम
महकार, दुगुण, दुष्कर्म, दुसगति ।
पामार-प्रारम्म, पूषा स्नान दीप, प्रत, उपवास,
घार माझा विक्षक पारीरिक साधना वेदपाठ,
पुस्तकी विधा बप पाए भेप, पन मियास विसावटी
पवित्रता, मुस्ता, मस्विर, बांग पशु, नमान, वसनीह
इबादत रोगा, हर।
मामालिक एका-मायूत का विरोध, पात-पात का
प्रमेव मानन की एक ही जाति ।
२०४१२७
७ सन्सों की सामान्य मान्यताएं:
१२-१४१

-
व्यक्तित्व
परम्परीण मान्यतामों में क्रान्ति उत्पन्न करने वाला
प्पक्तिस्व महान् होता है और कबीर ने भी अपने युग में यही
किया था। उसका पक्तित्व मान, मक्ति और कर्म को सामग्री
के उस अनुपात से तैयार हुमा पा, पिसे उस बार सम्भवत
अझ भी भूम गया। उमका मान पढ़ाई का महीं, गुगाई का
मान पा पन्त माम पा सत उद्भूत प्राम था। चन्द्र की
भांति मूप कोमो ग्यावित हाने के लिए ज्योति की भावपयकता
नहीं, यह स्वतः पग्मि पिण्ड जो है । कबीर को भक्ति अनन्य
पौर मनमरत पो, जिसका पाधार थी उनकी अनुभूति । अनु
भूति भी पास ये रहस्यवादी कवियों सी काल्पनिक मही,
अपितु अनुभूत अनुभूति । उनका पम पा निमारमा । निपाम
कमप्य भीवन ननमा पाप नहीं उमका दनिक म्पावहारिक
गोवन बा। यह पहना भूम है कि कबीर म उपदेश दिया था
उसने सो अवम सन्देश दिया था, अपनी प्रास्मा का-मनुभूति
को प्रमिम्पत्ति के माध्यम से । बह ऐसा जुमाहा पा सा म
हुपा है म होगा। उसने वो वस्त्र तैयार किया वह भी उमके
पक्तित्व की तरह प्रनवर है उसी पापियों मे मूठों से
हना हमा यह मामव-यम मस्प निरय प स्याणकारी बह
पाकर पम्प है रिसे युग युग तर मामब मात्र पाइता रहे,
पर सम्भबस अपना म सरे । चोर बम्बों को प्रोड पर
अपमान पामे भी उमी पी तरह अमर हा गम है पोर होते

हेंगे। मारतोय मनीपाके क्षितिम पर योम गाम्बो मौर
परमिंद ऐसी ही तीम विभूतिया ममी विमुप्त हुई है। जो हो
म हिन्दू न मुसममान गात से मनुष्य मोगा न भोगी-कम
से कोरी,म राणा मधासक-समाज के नियम्ता ममानी म
मस्त-वस सम्त मौर संसार के मिए जो म मम्मे न मरे
(क्योगि किम्मरम्ती के अनुसार सम्म के बदमे उहे लहरतारा
शामाब के पास पाया गया वा सपा मृत्यु के समय पावर के
के मीषे पूस ही मिले पे, बिन्दै हिन्दू पौर मुसममामों मे
पापा पापा माट निया पा)। ऐतिहासिक भौतिर दृष्टि से
तो यह सत्य ही है कि वोय पारमाएं युग की प्रायम्यता
मुसार प्रातरित होती है और समय की पुकार का समुचित
पत्तर देकर तिरोहित हो जाती हैं । अपम रूपों व हतियों के
माप्यम से ये प्रमर होती हैं। माहे का कपड़ा भी नवमा
ही मजबूत है, जितमा विश्व के पुमाहे ! उसमे भो भूम
पौर पन्द्र की गलियों में विस्यवस्म का निर्माण किया था।
कोरी ही कोरी की पाम सकता है। कबीर की वामी इसका
बसन्त प्रमाण है।
हिन्दू संभार और मुस्मिम प्रमान में पोषित बमममीवो
पध में कबीर उत्पन्न हुए यह प्राय सभी विद्वानों को
मान्य है । यह वाव पर है, कि कुछ उम्हें हिन्दू परिमार की
देन पौर मुस्लिम नुमाड़ा परिवार में पोपित समझते हैं, सपा
दूसरे पूर्णत: मुस्लिम परिवार का ही रस्म
मामले है।
पुरम।

इसी प्रकार उनके सम्म और मृत्यु के विषय में कई मठ है मौर
उपयुक्त प्रमाों के प्रभाव में विद्वान किसी एक निफर पर
नही पा सके हैं।
सम्बत् १४५ कोर की माक-प्रमिद पन्म तिपि है। कुछ
विद्वानों में रामामन की मृत्यु विपि का अनुमान पन्नहीं
प्सताम्दी के प्रारम्भ में लिया है मौर उसका शिष्य होने के
कारण क्योर की मम तिथि को भी यहाँ तक से जाने का
प्रयत्न किया, सकिन किसा प्रबल प्रमाण के अभाव में उनकी यह
भारणा नदो विटामा में ही मान्यता प्राप्त कर सकी पौर म
ही साधारण पाठक को पौचित्य-पूण प्रतीत हुई। इस लिये
कबीर की परम्परागत काम सिपि सम्बत् १४५५ ही प्रषिक
उनकी मृत्यु तिषि के विषय में इससे भी अधिक
मत-भेद है, जिसका प्राधार पम्याम्य अनुमान है। भवामु पय
अनुमाम्पिों के अनुसार उन्होंने १० पप की पायु पाईमी
पोर उनकी मृम्प सम्बत् १५४५ में ममहर में हुई पा। इस
विपास के मापार-निम्न दोहे की प्रामाभिकता के विपय
में पमा अनुसन्धान विप पावश्यकता है-
मदत पन्द्रह सो पवतग किया मगहर को गौन।
माप मुदो एकादमा, पो पोन में पौन।'
नवाव रिसों सोमपीर का स्मारक सम्मत ५.५
में बम मा बाम मनोमानम बालों ने उनका मिमम
काम पही स्वीकार किया है। पौर संवत् १५५३ में गुरु
मानक मे नमकी मेंट को प्रामाणिक मानकर कृष विद्वानों

कह कर भगवद्भक्त नामक एक मई गति का निर्माण
कर मिया मा जिसके पवार उज्ज्वमनम एन । किन
हिन्दू और मुसममान दोरो तथा गुमाहा जातियों के पार
में पड़ने पाले मानिक युग के पोरिकों ने उन्हें सई बिनक
पाकर में पार रिभेग वाति मन में धने
का प्रयत्न किया है।
ए बाहान मै पासो का उमाहा पूझा मोर गिपामा ।
इसी प्रकार नई बार उन्हनि पपन गुमाहा कहन
में ही गौरग मनुभव किया , मौर कहीं हो सम्हाने अपने
मोहोरी' भी कहा है। मत वोना ही वमन-गीरी है पास
के बौविक मनुसंघिस्सुभों ने यह भेद करने में देर नो
सपाई, कि ये माहे मुसममान थे और कोरी हिन्दू । फिर
भी कबीर दोनों में ये पिस 4 में हुए यह मगरा बना ही
पा। स्वामी रामानन्द के पामीर्वाद से विपदा बाह्यपी
की कोमसे सम्म मेना तमा मुस्लिम मीर उपाहा दम्पति
द्वारा उसका पोपित होना-दोनों ही प्रसिद किरम्तिा है।
प्राचार्य हमारी प्रसार दिरेरी ने कहा है-नीरवास जिस
पुमाहा पाति में पामित इए ये बह एमाग पुश्त पहले की
मोगी जैसी किसी प्राथम प्रप्ट जाति से मुसलाम हुई थी या
मनी होने की राह में पी। यह कह कर उम्हामि योगी या
जुगो गादि को कोरी या जुनाहा से अधिक महत्व प्रदान
किया है। मुमत पो बात उन्होंने कही है वह यह है कि
हिंदू संस्कार भाप पन्षियों के माध्यम से इम मोगियों में
चीर प्रसा, पप"
.

प्रये ये पौर तम संस्कारों के स्थान पर पिन योमियों में
माप पन्थियों के विश्वास ही प्रबल हो गये थे या हो रह
पे व योगी हो पीरे धीरे मुम्मिम धम माण कर रहे ये
एस ही बस में जमीर का पालन पोषण हुपा ।
कृल मिमाम हम इस निष्कप पर पहुँपते है कि कबीर
म एपा पा जिसमें बहुतायत स हिन्दू सम्भार बीमित
५ हेकिन उनक प्राचारों पर भमिक प्रभाव मुसलमानों का
पा। उनका मिपारमक जीवम वमनीवियो पापा बिस
पर हम दोनों स मी अधिक माथ-पषी योगियो की छाप
किंठ प्रतीत होती है। वस्तुत कबीर न अपने को हिन्दू
मोर मुसलमाम दोमों से पमग मीकार किया है पसी मिए
उनकी एम म सबमाम गावि वी-मामय और उनका
यापप और उदार पम था-मानवता वन्धन होन मारम्बर
एवंभवरणहान ।
इसके बावजूद भी कि कबीर न पुरु को गोमिर समी
उपर-पद प्रदाम छिपा है कुछ विद्वानों म म माने यह कसे
स्वीकार कर लिया कि कबीर मिगुरे पै। यह बहुत उपयुक्त
नहीं प्रतीत हावा । निम्न जाति का होम केसरण पब
कबीर सोपेन्स रामामन्द का शिप्यत्व म पा सकता सीदिया
पर मेट र स्नान + लिए प्राव हा मामी रामानन्दक
पाण-परा में भी उन्होंने गममामरी राणा से सी। इस
पिदम्ती में कुछ पम्प हो पा महामपिन राम से मनु
प्राणित चोर के धापन से इसमें से इस सत्य को गष प्रवस्य
मावा है कि उन्होंने राम-माम को दीक्षा अवश्य मी होगी
मार महत सम्मर है कि नमके दीक्षा-गुरु रामानन्द हो रहे

विशेष महत्व
(८ U
हों। यपि कुछ विद्वाों ने घेख तको को भी उनका गुरु
मामने का प्रयल किया है लेकिन यह कल्पमा विस्त भी
संगत महीं प्रतीत होती सम्भवत इसी लिए प्राय समी
विद्वानों ने इस मव को प्रणाम पोपित किया भौर रामानन्द
को ही उनका गुरु स्वीकार किया है। यह ठीक है कि
सत्संग का उन्होंने कपनी भौर करमी
स्वीकार किया है और जीवन भर इसके माध्यम से विचारों का
पावाम प्रदान करते रहे, लेकिन उमः समग्र जीयम पोर देन
का मूल्यांकन करते हुये हमें यह मामने में संसरोष नहीं होमा
पाहिए कि उनके दीक्षा-गुरु गमानन्द हो हो सकते हैं अभ्य
कोई नहीं।
'युग बंस कबोर का, उपम्या पूत कमाम ।
हरि का सुमरिम चारि के, पर से पाया माम ।।
यदि यह पर प्रामागिक है तो कपीर के पुत्र अवश्य पा
पौर यदि पुष पा तो पस्नी भी अवश्पवयी-पह पौर बात
है, कि एक ही पी या दो। मो एक के मरम के बाद भा गई
होगी। मस्तुत से कबीर का जीवन सरल और स्पष्ट नहीं
वा,उसी प्रकार उनके पोवन-सम्बन्धी प्रतिवत्त भी प्रस्पष्ट
कुछ विद्वानों का कहना है कि कोई उनी शिप्या
मात्र पी। दूसरों का कहना है कि यह उनकी पत्नी थी।
सीसरों ने दोनों में बहुत प्रन्या समझौता करवा दिया यह कह
कर कि पहले या बाद में पिप्या भी यही हायो पर परली
अवस्य पी। कहते है दूर से पाने बासे साघु प्रतिषि की
सूपना पाकर बहसीर से विशेष प्रभावित हुई पी वमी से

उसके साथ रहने सगो। इस लिम्वदम्तो का कुछ सत्प मी चमक इस सम्बन्ध में दिखाई देता है। एक जगह उन्होंने कहा है- पहिमी करुपी कुजाति दुससनी। पर को मरूपी मुजाति मुमलनी ।। इसस पनकी दो स्मियां होने पर मनुमान मगाया गया है, जिनके स्प, गुम का मी पणन मिमता है। एक सभ्य उसरण क पाधार पर कुछ विद्वाना म एक का माम मोई पौर दूसरी का पनिपा पा राम बनिया बताया है। उन्होंने भी कहा है-मरी बहुरिया मा पमिया मार. यह भगभग निदिषत प्रतात होता है कि उनको एक पत्नी ता पी हो पोर कमास नामक वनमा एक पुत्र भी हो। पीर की मो उससे बहुत मागर रहती पो क्योंकि यह भोतिक-समृद्धि की प्राप्ति के लिय वा मधिक उधम नहीं करवा पा-सपपि बह पीएम- मर ताना-बाना बुनता रहा, सेकिन अधिक सम्भावना यही है रिबह गुजारे भर के लिये कमाता होगा पार संग्रह की उसे कोई विम्ता म होगी, इसी स उसकी मां को बराबर यह पिता बनी ही, किस ताना बाना कपू म सूम' पौर यह 'हरि हरि रस सपरिमो। मां ने उस पार समझाया मो 'हमारे कुम राम रामु कहिमा', लेकिन यह कहो मानने वाला पा तर उसमे सोम करगहा- 'परि मामा मई निपूढे वर वे मुघु म भापो।' भक्त का मौकिन परिवार मुनी रह भी कसे सकता पा । एक दो स्थानों पर उसने अपने पिता का उस्सेस भी किया है, पर उससे उनके किसी विषय परहार मार गुपों पर .

-
प्रकाश्च महीं परसा । एक मगह उसने मिसा है-वापि दिसासा
मेरो कीन्हा ।' सम्मयत यह समी का उस्सेस हो, जब मौके
कोभित होने पर कपीर ठ गया हो । सक्षेपस कहा जा सकता
है, कि कबीर मो घामाम्प लौकिक गृहस्प पा। मां की
मिकिया, बाप का दिलासा पत्नी के उमाहने, पोर नुपूत
कमास सभी उमके बीवन के वरदान पे ! इस सामाम्प गृहस्प
की महिमा इसी में है, कि इसमे इस बन्धन में बंप कर भी
निर्मित पप्टि से अपना माग बनाए रसा -पौर निसि-परफ
प्रवृत्ति का मध्य-मार्ग पुनकर जन-जीवन को उम्मत पारिवारिक
पीपन का भियात्मक संदेश दिया।
'हम पर सूत तमहि नित तामा ।'
सूठ के ताने-वामे में ही में मोबन के ताने-बान का सत्य
हुपते रहे । मागीविका पमित करने के मिये उन्होंने बयन-जीवी
बने रहमा ही उपयुक्त समझा। उमको वागियों में प्रयुक्त
तामे-याने केसों को ध्यान से देखने से पता पमता है, कि
उन्हें अपने म्पवसाय का मग मूक्ष्म मान पा। विश्व-सप्टा को
कोरी कहकर उसने उससे प्रदभुत तापारम्प स्थापित किया है।
इसी में उनके मोकिक और पारलौकिक गोवन का भवितीय
समन्वय और संतुमन देखने को मिमता है।
ससंग को ही ये सर्वोत्तम दोष-यात्रा समझते थे।
इसीमिये उस युग के घुमक्का संसों पी तरह उपदेश देने या
अपने विचारों का प्रचार करने बहुत पर-उधर नहीं भूमे,
क्योंकि ऐसा करने में उमपने प्यपसाय से हाथ धोना
पण, यो उन्हें उपयुक्त म प्रतीत हमा । इसीलिये उन्होंने बहुत

कम यात्राए की । उनको समापिर्यो तपा अन्य अनुमानों के माधार पर मुछ विद्वानों का मत है, कि वे रतनपुर भगम्माप पुरी तपा गुगरांत भी गये थे। पर यह बहुत सम्मव नहीं प्रतीत होता हो ! मगहर के प्रपश्य गये थे और 'गोमती-सोर' प्रादि कुछ पास-पास के स्थानों पर भी भी गये होंगे इसमें सन्देह नहीं। उनका जीवन परे संपर्कों में व्यतीत हुमा पा। मालपन से हो द्विविधाों ने उनका साप दिया पा। जैसा कि किंवदन्ती नेपाषार पर प्रचलित है कि विधवा के पर जम पोर जमते हो क मामा, पुन मोरु जुमाहे के पास पासन-पोपण-यह सय सामाम्य जीवन का प्रवाह नही है। इसी प्रकार बरे होकर मो की झिकिया सपा प्रौर पर होकर पत्नो के उलाहने यह सब भी उना लिये सरस-जीवन का गौरव नहीं बन सका। म केवप पर में ही यह हालत पी, बाहर तो पौर मी सुरी या पी। परि पौर परिव स तो उसमते ही रहते थे, कामी पौर मुस्मा स भी पैर सेन में उन्होंने कभी महीं मगाई। यस एप अपनी ही धुन के पक्के पे। उन्हें गो गसत लगता था उसे मुझे मैदान में भी पहने में कमी म पूरे थे, पाहे फिर भी दुश्मन क्यों न हो पाने और उसका कुछ भी दुप्परिणाम उन्हें पर्यो म भुगतना पड़े। इस सौदे में ये गानी-प्रशानी, घोट या रागा रफ किसी से मी म हरे प-इसीलिये उन्हें रामा ने कोपित हापी रे सामने 'मुजा दांप मिसाकरि गरियो सेफिन उस भगवद्-विश्वासी भक्त को मनाने भगवान् मे कैसे बमा मिया । पुन गंगा में छुपाने के लिये मिस जगीर से गाय कर फछा गया पा, गंगा मे भी पवीर को छुपाने के स्थान पर

उस जंगीर को ही तोर कर दुमा दिया और उसे तो उबार
दिया~प्रदभुत है विधि का विधान प्रौर मरत का विश्वास ।
इस परभुत विश्वास के सहारे ही युग २ से भगवद्भक्त श्रीमन
बमिवान भी करते पाये हैं। सम्भवत इन विरोगो, पीयों
पौर यातनामों के कारण हो वे प्रषिक र मौर प्रवण हा
गये पे। महो भगवाम् और उनके सच्चे भक्तों के प्रति उनमें
मया पौर ममता पी यहां पारमरवादियों के प्रति उनमें
माक्रोश था। प्रभुत पा उमका जीवन पौर म्यक्तित्व, जिसमें
विरोपी कार्यो मोर गुणों का विशिष्ट समाहार उपसम्म है।
सेन, पीपा, रैदास और पन्ना इनके गुरु-माई प्रसिद्ध
है। विधानों मे इस दृष्टि से इन सब का समय निर्धारण वपा
परस्पर सम्मन्य स्थापित करने का प्रयत्न किया है। मीर को
हो या म मेकिन इमकी बागियों पर पप्पयम करने से इनकी
विचारधारा में अद्भुत साम्म ममय मिलता है। मे सर
समकामीन रहे हों या न, हाँ ये एक परम्परा में प्रपत्म पे पार
विचारपारा की दृष्टि से यह परम्परा रामामम्द की परम्परा
ही कहना सकती है। कबीर का म्पस्तित्व इन सम से प्रवर
पा पर रामानन्द के बाद युग-प्रवक्तक बम बैठ।
कबीर ने परे मापक पन-समुदाय को प्रभारित किया
था । उसमें बग, पवसाय जाति, अवस्था मादि का विचार
त्याग कर सभी कोटि के प्यक्ति थे। इतमा होने पर भी
मियभित मिप्य-परम्परा पनाने की पुष्टि से उन्होंने पित्री
विशेष शिष्य को ऐसे अधिकार में दिये पे। उन्दनि अपनी
हतियों में किसी शिष्य का उस्मेप मो महीं किया । परन्तु

-
मात-परम्परा के माधार पर उनका गेगा वमगने वाले विद्यमी
मा कबीर पंप की अपीसमा की शाखा क प्रवस क धमदास
तपा नमकी पंप-परम्पराको का) में दमाने वाले मुरतगापाम
का नाम उनको विप्य-परम्परा में सादर लिया जाता है। यह
पौर बात है कि जिस भूति-पूजा भौर माघारमा विराष
परख २ नन्होंने बीबन विता दिया, उनक गिप्पा द्वारा प्रमित
पषों की घासामों में उनी की मूक्ति की पूजा होत लगा पौर
सब पाबार्गे का सप भी निर्धारित कर दिया। विधक समी
पौर उमापों रिपय में यह सम प्रवीत होता है कि
ज्यों किसी पम की जीत शस्ति क्षाम होतो गाठी है
स्या यह भी पापार प्रपाम हो र समुदाय र ल में
म्यापक तासे जाता है, परन्तु पान्तरिक दृष्टि स प्रभाव पोर
माव होम भी होता गाता है । कबीर नही, उसम प्रमुयायियों
द्वारा प्रतितकवीर-पप भी इसका अपवाद नहीं ।
सस्य के प्रति प्रापहपौर असत्य पर प्रायात मन्त्र से
पास्मीयहा पोर मापानी से प्रनगाव, कपनी में शक्ति पौर
रामा में विश्वास, निवृत्ति परक होते हुए भी प्रतिपरक
गीवन, मठ होते हुए भी पुम गृहस्वा सषपमय मामन बिताते
हुये भी, स्वत सरस उपमा देने वाले हाकर मा पठ
पारणमीम सामान्य होकर भी असामान्य एप पद्वितीय
स्वभावातिल एक पतित रमने पासे युग-द्रप्टा वीर
पुप-नायक मो ५ । उनक इस मस्तित्व का महान् बनान गाते
पार्मिक रिसासों का ही पप्ययन प्रयमे पृष्ठों में किया
1

1
"
यतोभ्युदयनि.श्रेयससिद्धि. स धर्म
एहिम एम पारमोहिम सुख शान्ति एक समृद्धि की पोर
ले गामे वामा साधन पम है। मुष्टि के विकास क्रम के साप
साप पौरिक मानव मृत्यु के माध्यम से यम के सहारक प्रहार
को म सह सका । सदा ममे रहने की धमबती इभ्या म उसमें
एप प्रशात पापित प्रति भय उत्पन्न कर दिया। उस मय स
ही मानव में उस पक्ति में प्रति विश्वास यदा भौर मेम
उत्पन्न हुमा। यह भगवत्प्रम ही धीर धीरे पृष परमों क
साप मानव पम में परिणत इमा।
पो तो धारणायमस्याह धारण करने से हो थम
वम बाता है। इसीलिए पग्नि का पम दाहकता है। गो हो
धम के इन मूल तत्वों से जब मामब सम्परा होता है, तब से ही
मामम-पम का रूप ग्रहम कर सेते हैं। इस प्रकार मानव-मम
क मो दो उदय है। बसा कि ऊपर बताया जा चुका है-
एहिक एष पारसौकिक सुख, शांति व समृद्धि पाना। मूलत
एहिम समृधि अपने भाप में साध्य मही, वह ता केवम सापन
प मसीकार्य हा सकती है। प्रम से एहिम सुखों को ही
मानव साध्य समझ बैठता है, वस्तुत पारमीकिक उम्नति
एव प्रविष प्रामम्द में तम्मीनता ही मामय-जीरम का साम्य
है। और जो मानव जीवन का साप्य है यहो मानग-धम का
1 गपकन
2 मारामारत पर 11

उदय हो सकता है । सम्भवत इसी कारण धम + दो पम है, सिदाम्स पक्ष पौर व्यवहार (पाचार। पक्ष । स्मृति कार न प्रापारप्रमवो धर्म कह कर प्राचार का महत्व स्थापित घ्यिा पा। बयोपि उन सब सिद्धान्ता का शाम म्पथ है जिन्हें जीवन में त्रिमारमा प नहीं दिया जा सकता। यपि युधिष्ठिर को 'सत्यवद' का पाठ एक मास भर न याद हो सका था तपापि भमराम को उपाधि मे उन्हीं को विभूपित किया था। इसमा होप्त हुए भी सस्य के ज्ञान क बिना उस पापरण में उतारमा यदि प्रसम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। पत सिदान्त पसमाजाम होना भी उतना ही मावश्यक है, जितना कि उसके व्यवहार (माचार) पक्ष का दिम्य पास्मामों की अनुभूति पर प्रधारित सिटाम्तों को पाधार वना कर सम्पक व्यवहार (पाचार) से बोवन म्यतीत करना ही वह पामिर गीवन है, या निर्मिप्त मामय को ऐहिक सुखों माध्यम से पारमौषि सुन्न पौर पति को प्रोर लाता है मानव-मम महान् है। उसे किमी तक की नहीं, अनुभूति को मावस्याता होती है। उसके पापार में रिसो वा बंधन पा नहीं, एपमान समार पौर निक्षिप्तता का हो राम्प होता है। मेफिन मानव पारिवारिस एवं सामूहिक प्राणी है, प्रता उसन मानव-यम को भी सामायिका रेक्टपरे में बन्द परना प्रारम्भ कर दिया। सामाजिकता संकीम परे पम पमप नहीं सकता, प्रत उपयुक्त दान प्रभाव में उसमें भी विकार मान पक्रयम्भावी है। इन विकारों के ही परि पाम स्पर घीण को पहना पापा- 3 मनुस्मृति ,१। मानव-

"यदा यदा हि पमस्य ग्मामिभवति भारत ।
पम्युरपानमधमस्य तदारमान समाम्यहम् ।।
धम के नाम मोर प्रपम की वृधि होने पर ही दिम्प
पारमामों का संसार में प्रवतरित होना परता है। ये विम्य
प्रारमाए पर कुछ मही वे ही मौफिक महापुरुप हैं गिम्हनि
पन्तकरण में स्थित ब्रह्म को उभासित पर मिया है। परि
स्पितियों का एसा करने में प्रत्यन्त महत्त्वपूण संयोग एवं
सहयोग होता है। मम्भवप्त मीमिये यकले मे तो यहां तक
कहा है कि विश्व की महान विभूधियाँ काम प्रसूस होती है।
को महत सत्य है। रावण को विपत प्रतिमा से उत्पन्न
दुरापारों में प्रवामी पारपत्र को राम वमा दिया था।
कम के पत्याचारों उपा दुर्योधन के मूष्यन नेव दास्यामि
(सुई की मोर के बराबर मी भूमि न गा) पामे ठ ने
अब को गोपियों के कन्हैया' को भगवान् श्री गप्प बनने
पर विवश कर दिया था। माननवदुर्विदग्ध' बाह्मणों के
माक्षिक प्रमापारा मे बुट की प्रमुप्त सइद प्रतिभा का उदगुट
कर उस भगवान बुद्ध मना दिया था। इसी परम्परा में
भारतीय मनीपा के क्षितिज पर प्रभारतीय मानव मानव नहीं
दामों की राजनैतिक एप सामाषिक ही नहीं अपितु धार्मिक
धान की नसता तपा भारतीय पम नहीं, उसके प्राचार के
प्रारमर ने कबीर को कबीर (महान्) वमन के लिए पुकारा
पा। इसी सिये दिपवी जी को मिसमा पड़ा-'कबीर भाषि
भूत हुए थे। ये माविमू त हुये हों या म ! ऐकिम यह
पीपा मारा.-
राभाचपातीमार 10

नितांत सत्य है कि उन्होंने प्रा को अवश्य ही अपने मन्त'
करण में 'पापित कर लिया था। इसी सिमे सत्य का वध
पहन पर, पटु सत्यों का प्रहार करते हुए उन्होंने समाग के
सब प्रधार्मिक कारों को मारकर, फटकार कर पौर
समझाकर पन्त में सहसाया मी, ताकि वे पिट धम मार्ग
पर प्रप्रसर हो सके।
कमीर अपनी मामा के सच्चे पुपारी थे पोर ये पानसे
पे कि सस्प दो मही हो सकते । इसीलिए उन्होंने पिसी सस्प
का कमी विरोध नहीं किया पौर यो सत्य नहीं वह धर्म भी
महीं हो सकता, प्रत उम्हामि किसी धर्म भी विरोध मही
किया, उन्होंम तो करम सत्य तमा पर्म के पावरण २ मीचे
जमी हुई मंस को बाहर निकाल फकने का प्रसस्त किया, मठ
और के धम की सबसे पहती मोर सबसे बड़ी विशेषता यही
कि उन्होंने मामक पारम्पर पूर्व कमीर-पंच' का मजन म
काय सबनीस चिरंतन मामय-पर्म की स्थापना की पी।
प्ररमा म सन्चे सेवक हाम के कारण फबीर मन्नद्रप्टा
अपियों से भिन्न हार पर मथे पार दिम पात्मामों की
अनुमूर्तियां प्राय एष-मी होती हैं, क्योंकि अनुभूति मिश्राम
पौर पवित्र भव करण को पनि होती है। वीर का काम्य
सपा ज्वलन्स प्रमाण है।
कबीर का 'कवीररर इसी में है, कि उसने देवम
'पममो साप'कोही अभिम्पक्ति दी। इसलिए चमरे मन में
सस्या बम, वामोमा पोन, मापा की मरसता और सादगी,
बिम्बमीनी मम्पाई, वासायिक प्रापार को इप रेगा, एक्य

का पीग्न, माव का सचमन, शाम का प्रकास, वौविकता का पिकास मामव-मन का स्वमाव समाज का कल्याण है पौर नमसे भी यह कर है बीवन का प्रमर सन्देश-एकमात्र सत्य से तादात्म्य । मिसने उसे पहिचामा यह प्रमर हो गया जिसमे उसे माना, वह शानी हो गया बिसने उसके रहस्य को समझा वह समझदार हो गया जिसने उसे पढ़ा, यह पणित हो गया निसने उसे सुना बह निर्मम हो गया, पौर जिसने उसे अपनाया, वह दो सय कपीर (महाम्) ही हो गया। कवीर चन्म पाति पौर कर्म से सामान्य मामव ये इसी लिये उनरे माध्यम से मानव भम का प्रसार हुमा । वे दाधनिक म थे, लेकिन उन्होंने सम्पूर्ण पक्षों के तत्वाने दशम कर सिये पे, वे ताफिक मी म पे परन्तु पे उनके प्रत्मेक सक से परिमित पे वेद पाठी भी न पे, पर वेदों का सार संसार को पढ़ाने की क्षमता रखते पे वे पुस्तकी विया के जाता न पे, पर भयाह माम के मारपे ये सामाजिक दृष्टि से वाह्य प्रापारवान म पे, पर उममा म्यक्ति प्राधार- निष्ठ पा, प्रत पे सामान्य होकर भी असामान्य 4 पौर किसी के कुछ मी म होकर सभी के सर कुछ पे । , उनके 'कर्म पौर पम में एकता पी कपनी पौर रमी में साम्य पा फहनी पौर रहनी में समरपता पी। उनका धर्म 'मकर मम' पा, जिसका उपार रनको मान्य नहीं, गिसे सीमित रखना तम्हें सह्य नहीं और जिसका उपदेश उन्हें प्राध महीं, क्योंकि रेमो करम सन्देश देन की सापना मेकर पाये ये -वाह मी कपनी महों, करमी के माध्यम

( १ )
से। इमोमिए कबीर का घम योग में भटका महीं, वहाँ से
सहर बन पर मिकम प्राया, मान में उलझा नहीं, वहाँ से
विवे' वन कर पमा माया और भक्ति में रमा महीं,
वहां से अनुभूति बन कर यह नियमा। प्रत वह विभिन्न
मतों से विवाद के मी स्वतः पिसी चाद' के पस्कर में
नहीं फेसे अन्याय सम्प्रदायों से मगरकर भी पिसी झगरे
में नहीं उमम इसी मिए किसी विधिप्ट समुदाय रे धर्म
प्रणता म वम मामय धम के निर्माता बने।
पवीर वाशनिक न पे, प्रत उन्हें किसी दशन विधेप के
बंधन में गोपना उनसे माप पोर अपने माप प्रयाय होगा।
क्योंकि पमुभूति तक की सोमामों से परे की वस्तु है पौर
दान का प्राधार ही तक है। इसी कारण प्रतिवाद की
मोर रुझाम रखन वाले बौदिरों ने उनकी अनुभूतियों को
अपने विचारों के अनम गमकर उन्हें विशिष्ट सम्प्रदाय के
समपर बताया है। म केवम उमको अनुभूति, अपितु उन्हीं
की भिव्यक्ति को विषयानुकूम सम्बत कर सरल व स्पष्ट
गप में प्रस्तुत परने का हमारा प्रपल है। यहाँ उनक पार्मिक
विश्वासोपा अम्पयन ब्रह्म, सृष्टि जीव उममा साम्प
तपा प्रवरोपक शक्तियों क माध्यम से हमा है।

-३-
ब्रह्म माहात्म्य
कवीर साठ समु पहि मसु करत,
कमम
करत
नरा.
हरि मसु
पसुपा काग
नितु म बाद
पए का माहात्म्य वो इतने से ही स्पष्ट है कि उसका
मुांकित करने के लिए अनपढ़ कबीर को मो 'पमुषा,
कागद, तपासात समुपहि ममुकी सामग्री भत्यल्प ही प्रवीत
हुई, फिर यह हरिगुण कैसे मिल सकता पा। मीर तो
सीप ही पा समम सनन्दन' मादि भी उसका गुमगाम करते
है लेकिन रेत के ममन्द माहात्म्य का मस्त कहाँ । म
केबस सुरपति, मरपति उसकी महिमा को कहने में असमय
है अपितु "बार देर मौर घिमित पुराना इसके महत्व का
मसाम करने में मयक्त है। नारद मीर पारवा उसकी सेवा
में उपस्पिस हे पोर ब्रह्मपत्नी कमला तो वासो ही मनी
बैठी है। लेकिन उसका गौरव मारो की सोमामों से भी
परे है। "ठाठा ब्रह्मा निगम योचार" लेकिन "मलनु न मसिमा
8 'प्रयोग
7 एमपर..
8. E३

मार।" पौरों की सो बात ही दूर रही सेकिन स्वयं ब्रह्मा
भी ब्रह्म को न जान सका।" प्रगपित चन्द्र सपा सूर्य यहाँ
दीपक का काय करते हुए प्रकाश करते है, प्रसरम भर्मराम
बिसके प्रहरी है और देवतापों की तो रात ही क्या-ननके
भी रागा इनकोटि पाके सेवा करहि'10 ऐसे ब्रह्मो
माहाम्प का क्या कमी दशाम हो सकता है -मानव कल्पना
से भी दूर की बात है।
ममेवम पम्प उसके रूम की स्पमा ही महान है
पपितु उसको कप त्व-विक्ष का नाम भी मानव-मन को
सोमामा में प्राबर महीं हो सकता । वह जब पाहे इससे को
एमा देता है भौर गेठे को ईसा देता है । 'अस हे पस कर
पौर पस से भूप वया पुन मेरु परत तक बना गमता है।
भण भर में मिखारी को राना भोर राजा हे मिखारी
बना देता है। पप में मामम मन की ममी प्रकल्प्य कम्प
मानों को भी यह क्षण भर में साकार व सामफ कर देता है।
पाणी को पदम्य ममिम्यक्ति से भी बप में समतुष्ट न हो सके,
वव उसे 'गूगे का गुष' कह कर उन्होंने सन्तोप किमा। गुरु
मानक ने “मैं मूरत काणु न बाई'महकर अपनी विनम्रता
का परिचय दिया है। भक्त शिरोमणि तुमसी दास न गुण
मान करते हुए पक कर कहा-'अनव हरि की कपाएं भी
भमत है। और यह कहकर 2 वोट सुत में सीन हा
91 १२,५
10. A

(२०)
गये। इतमा होते हुए भी लेयक का यह मधु प्रयत्न तिसीप
दुस्वर माहादुरुपनाम्मि साररम' (पोत से मो दुस्तर महान
सागर को तैरने का) दुम्साहसमात्र समझा जा सकता है
निसका बाप रेखा को नही महाम् अनुभूतियों को पमि
व्यक्ति के प्रम्पयन और उससे प्राप्त प्रदम्प प्रेग्णा तपा पम
परत पस्माइपो ही दिया जा सकता है।
भाषिर्माय
कबीर का रस निविवाद स्म से समम्मा, प्रमादि तपा
प्रमोनि है लेकिन मत की भक्ति में तिमी पक्ति है कि
अपनी अनुभूति से बह उसे अन्तर में उमामित कर लेता है।
इसी सिय कहा है, 'पूति पिता ५ माश्या" पुत्र (पारमा)
पिता (परमारमा) को प्राषिभूत कर मेनी है और दिन महि
साई परगटे।
प्रम के गुण
पास्कृति के प्रारमा क्या है ? यह पूछने पर भार पो
मारमा ने दो बार मूक रह कर उसे अपना मन्देश दे
विया पा-छेकिन उसमें न मममले पर तोमरी बार मार को
कहमा ही पड़ा था कि 'प्रारमा मौम है" मम्मत इसी
लिए 'भारमान दिदि (मपमे माप को बानो) का मारसीम
दान में मानप जीवन के साक्ष्य के स्प में महत्वपूम स्थान
ममा हुपा है। पास्मा तो पास है मेकिन परमात्मा गया है ?
12 पू०१५॥
13श्माक 150
14 पास गुप्त-हिमा भार हरिवन प्रासये, भाप ।

( २३ )
'स एप नेति वह यह भी नहीं वह भी नहीं' इत्यादि
'मन्त्र द्रष्टार ऋपियों ने इस नेति पति से ही उसके स्व
रूप को समझन का प्रयत्न किया है। कवीर को अनुभूति मो
उनसे बहुत मिन नहीं है। प्रत उसी पति का पाप्रय
लेकर हम कवीर ब्रह्म को समझने का प्रयत्न करगे। कबीर
का ब्रह्म अनादि है और प्रनादि होने के साम साय बह
भगम्मा मी है क्योकि प्राव म गाई मरे म जीव' । पौर
गो विश्व में महीं प्रामा बह प्रयोनि भी है, इसीमिय यह
मनायास ही अमर भी है। 'भगम प्रगोचर रहै निरन्तरिया
पह म केवम प्रगम' भीर भगोषर है अपितु प्रवंध्य व भतर
भी है, उस सांप कर पागे वड़ने की बात तो दूर रहो उस
तर पहुंचना भी असम्भव नहीं, तो प्रति कठिन अवश्य
हैं। मन्ताहित होन के कारण रसका पार भी महीं पाया जा
समता, 'ना मन्तु न पार " और जिसमा पन्त महीं उसकी
गहराई का भी क्या मान 'मया भपाह पाह महीं पावा"
जीव तो क्या शिष मुकदेव भी उस ब्रह्म पी पाहम पा सके।
सके गुणों को पाह पाने में प्रयत्नशीम कवीर उसे अनन्त कह
पर सन्तोप रते हैं। क्योंकि वेद परि परि ब्रह्म जनमु
गवाया लेकिन अनन्त का प्रम्त रहाँ ? अनन्त हो जा
अनन्त हाने के कारण ही वह अनश्वर, प्रविनाशी, अक्षर
15षपरिषर-1, ४, २२।
16 १०१११,.
17 १०१,
19." १
20.01.

गये । इतमा होते हुए भी लेग्नक का यह मषु प्रयत्न तिमीषु
दुस्तर मोहादुरुपेनास्मि सारम्' (पोस से भी दुस्तर महान्
सागर को तैरने का) दुस्साहममात्र समझा जा सकता है
चिसका दोष मेखक को महीं महान् पन भूतिया को प्रमि
म्यक्ति के प्रध्ययन और उससे प्राप्त प्रवम्म प्रेरणा तथा प्रन
वरत उत्साह को ही दिया मा सकता है।
प्राविवि
कबीर का जन्म मिविवाद स्प से अजन्मा, प्रनादि तथा
प्रयोनि है लेकिन भार की भक्ति में इतनी पाक्ति है कि
अपनी अनुभूति से वह उसे प्रस्तर में नामित कर देता है।
इसी मिये कहा है, 'पूति पिता इकु माइमा'" पुत्र (पारमा)
पिता (परमात्मा) को प्राषिभूत कर सेनी है और विम महि
साई परगटै"।
प्रम के गुए
पासमि क मारमा क्या है ? यह पूछने पर भाव को
पारमा ने दो वार मूक रह कर उसे अपना सन्देश दे
दिया पा-पिम उसक म समझने पर तीसरी बार माप को
कहना ही पड़ा था कि 'पारमा मौन है। सम्भवत इसी
लिए 'पारमान पिदि (पपमे माप को बानो) का भारतीय
दमन में मामय जीवन के साम्य के स्म में महत्वपूर्ण स्थान
बना हुमा है। मारमा तो शान्त है सेकिन परमारमा क्या है?
12 पू०१९५५
13 साल
14 राम गुप्त-हिसको भाइविषय सामगे, मग प..।

( २३ )
'स एप मेति । 'वह यह भी महीं यह भी नहीं' इत्यादि।
'मन्त्र द्रष्टार ऋपियों ने इम नेति पति से ही उसके स्म
म्प को समझन का प्रयत्न किया है । कवार को अनुभूति मो
उनसे बहुत मिन्न नहीं है। मत उसी पति का भायय
लेकर हम क्योर ब्रह्म का समझने का प्रयत्न परेंगे। कबीर
का ब्रह्म पनाति है पौर अनादि होने के साप साप यह
प्रमन्मा भी है क्योकि प्राव न जाई मरै न गोव'।। पौर
गो विश्व में नही मामा वह प्रयोनि मी है, इसीमिये वह
मनायास ही अमर भी है। 'भगम प्रगोचर रई निरन्तरिय
वह न केवल प्रगम पौर प्रगोघर है अपितु प्रसप्प य प्रवर
नो है, उस सोप कर प्राग वड़ने की बात तो दूर रही टम
तक पहुँचमा भी प्रमभ्भय नहीं तो प्रति कटिम प्रवम्प
है। अन्तहित होन क कारण उसका पार भी नहीं पाया ग
ममता, 'ना मन्तु म पार " पौर जिसमा पन्त नही ग्री
महराई का भी क्या ज्ञान 'यया प्रपाह पाह महीं पाया
गोव तो क्या गिव गुकाव भी उम ब्रा पी पाह न पा मः।
उसके गुणों को पाह पान में प्रयत्नगीप पवार दम घन्टमा
कर मन्तोप करत है। क्योंकि 'यद परि परि का र
गाइया' सचिन प्रमन्त का अन्त वहाँ
१
प्रनम्त हाम कारण ही वह मन पर,
15 रनर-1४१९
1621
10 . ११५५.
201.., ..
17 11,E
191"

एवं 'अमर' है। काम को पाप गति से कोई नहीं वप
सका लेकिन एक मान बहा 'सरा भिर' है। 'दुई पार न
सिसहि" सम्पूण पग्यमाना पा विलेपण कर कीर में
मनुभप किया कि रा भौर 'म' दो ही प्रकर एसे है तो
पस्तुत 'पक्षर हे प्रत मस्त बोबन की सापकता सम्ही में
तस्मोन होन में है। ममम्म कह पर भी कीरपैय में ही
चमकी अपनी महत्ता छिपी है। उसकी पतृप्ति एवं प्रसस्तोप
में ही नस प्रनम्प मक्ति क धाम होते है । मह्म को प्रमन्त
कहने के पक्षपात बह र कृप्त न रहे एसी यात मही अपनी
सामम्य को सोमित पान फर यह प्रयत्नसाम न रहें एसी वास
मी मही उसे मगन है मनमरस र मनन्म, पानी पमन्त की।
परेख मोर प्रस्म असीम सपा प्रहम कह कर भी बह उस
छोड़ने को तैयार नहीं उसके प्रमौकिक रुप मोर गुणों को
मोरकर मौकिकवा के माध्यम म वह हमें अनुमेय का पन
मान कराना माहता है प्रनय गजाम कराना चाहता है
पोर पाहता है प्रमूल्य का मूल्य अतसामा । कोहरि समामि
नहीं राना। ससार + रामाभो मे तो ब्रह्म का मेवर ही
प्रहा है। मतः वह तो 'प्रसम' और अनुपम है। जोकिन
मम्मतिरी तरह से दिया म वार और एक बार प्राप्त
मरने से छोड़ा भी नहीं जा सकता । इस प्रकार प्रदेस' और
मत्याग्यमा प्रनेच मनोध भी है। उसकी तो बात ही
दूर की है। इसके माप-मानना भी पग्नि म द" और म
हो यम्पूण मोगिक सम्पत्ति देकर उसे सरोदा हो मा सपना
22 .
24 ३३५, ५६
23 .

( २५ )
है इसलिए यह 'मक्रय भी है। लेकिम सन्तों ने पमूल्म
बह्म को मनु दे राम मीया है मोमि । इस प्रकार भौतिक
स्यूल गुणों से परे के ब्रह्म को मावात्मक सूक्ष्म गुणों से भी
दूर बताया है। कबीर का ब्रह्म पर घट निवासी होकर भी
समय अमट मशरीरो। ही है भोर प्रषट होने के कारण ही
एकमात्र वह ममन है। क्योंकि मपा ब्रह्मा, मैसा इन्दु
विश्व में सभी कुछ दो मैला है । 'प्रापत दोसै सात न मानो।
अदृश्य वह इन्द्रियातीत भी है, उसे तो पम पम घलों के
स्थान पर पन्त पामों का ही विषय बनाया जा सकता है।
विश्व क सम्पूर्ण वाम्मय का उपयोग करने पर भी वह प्रवण
मीय ही जमा रहता है। "पड़े किया हो। वेदों के पढ़ने
व प्रवण से भी वह गम नहीं, जो वामी उसका कपन महीं कर
कवीर उसे 'गूग का गुह पर ही सन्तोष पर
"al | स्प रहित अस्पृश्य ब्रह्म इन्द्रियातीत होकर केवल
अनुभूति-गम्य है, पर्योकि पंपानमन की उम्मतम कल्पनाये
भी उस तर नहीं पहुँप पाती। ज्ञान को साधिका दुटि भी
इसे अपनी सीमा में महीं पाष पाती।
कबीर कवि नही जो मन से ब्रह्म की कल्पना कर पाता,
यह मामी भी मही, गो पुटि स उसका चिंतन कर पाता, वह
योगी वो पा ही नही, जो योग य सिटि द्वारा उस प्राप्त कर
पाता। यह तो प्रनय भक्त है, जिसने मनपरत सगम के
कारण उसकी अनुभूति की है।
25...
27 1 २७ २
28 प५ ।
29
30ो.
26. ३०,1
..101

प्रवतार
( २६ )
क्वीर का ब्रह्म निर्गम है अर्माद् सभी गुणों से रहित
क्योंकि गुणों का प्रारोप करते ही वह सगुण हो पाता है। अब
गुमों के पाषार-स्प को यह धारण करता है तो साकार बन
पाता है। कबीर को ब्रह्म का यह स मान्य मी, इसीलिये
उसमे स्पष्ट हो कहा है कि अपनी इन्द्रियों को पम्तमु सीकर
के कोई बिरसा ही उसके मिर्गुण स्वस्प को बाम पाता
है। जिसे अभिम्यक्ति देने में वह असमय है। न केवल
को सर्म-म्पापफ कहा है अपितु ससके
स्प का सपन करते हुए कहा है कि परि भक्त-वदारक भी
कृष्ण नन्द का पुत्र पा सो नन्द किसका पुत्र पा? कितना
सरम पौर मपुर होते हुए मी सशक्त सके है। निरंजन
ध्यापकह कर उसमे निर्गुण के ही निरंजन स्प का भी
महस्व स्थापित किया है तपा मन्त में उसी को निरंकार पोर
निरबानी का कर उसकी प्रारती उतारी है। एक मात्र
मह निमम होने के साथ साप विकार-रहित होने के कारण
निर्षिकार भो है, मोर मिसमें कोई विकार ही मही, उममें पोप
की सम्भावना कैसी ? प्रत यह निर्दोप भी है। तह उतपति
परमठ माही नहीं नस्पचि पोर प्रमप हो नहीं, बहो उसका
नित्य स्पाईस्प स्पष्ट हो पाता है। वह म बम बम पोर
परप से परे है अपितु सभी मोदिक गुणों से भी प्रतीत है।
'सम पट देहत पीर प्रत्येक प्राणी में उसके दर्शन
होते है, मत बह सदन्तिर्यामी है। पौर बीउ एक परु
31 1 ३३३,..
32 १. ३३८, ...
331.१५,१८॥
34 प १२५०,५।
25 1 ११५४ ८। 38.२३३,137 1

( २५ ।
सकम सरोरा प्रा यह सम्मापक भी है। सव व्यापक
यह एक सप या सम स्प है, क्योंकि षट फूटने पर भी उसको
स्थिति में कोई पम्पर नहीं पाता । भौर यह तो 'त्रिभुपन महि
रहिमो समाई "विश्व क पपु-परमाणु में म्माप्त होने के कारण
वह सपा विधमान है । वांग देते हुए मुल्ला को पिस्कारते हुए
उसने कहा है कि सवस्यापक वह सवम मी है। प्रादुराचार
करने स पूर्व मानव से उसके इस गुण का ध्यान रखमा पाहिए
तर यह पनायास हो पापकर्मो स प सकेगा।
यह वर्ष-स्थापक, सर्वम ब्रह्म ही सृष्टि का एक सब
खप्टा है। सृष्टि ग्पना क्रम पर प्रकाश हामते हुए उसने
बताया है कि सब प्रयम प्रकाश पुम प्राति एवं
सपापात् प्राणी व मनुष्य की उत्सप्ति हुई है। 'माटी एम
पनक माति करि साबी साजन हार ।
बिस माटी से अन्याय पटों का निर्माण किया है उनमें
परिवत्तम भा सकता है, ऐकिन उपादान माटी तो नहीं
रहेगी। सम असु प्रानि तमाइमा तामा गुमाहा कीर
ब्रह्म को गुमाहा मनाकर उससे विश्व का ताना-बाना म
बुनपाता तो उसपी भात्मीयता का परिचय हो स मिसता ।
सेकिन इस रहस्य को उसके सिवाय पौरमोई नहीं जानता ।
इस पारमा का विकास भी उम् ब्रह्म से हो हुपा है और इसे
पापार प्रदान करन के लिए उसने ही तो 'परि सफेमिक
पुरीमा गोपि देह योड़ी मी पून को पुरिया रोप पर देह
3811५०,
39 १ ३.१.१७॥
101
4111३१. "
427,
43
11

भवतार
( २६ )
कबीर का ब्रह्म निर्गुण है प्रति भी गुणों से रहित
योनि गुणों का मारोप करते ही वह सगुण हो जाता है। म
गुणों के प्राचार-स्प को यह पारण करता है तो साकार बम
पाता है। कबीर को पाका मह रूप माम्प नहीं, इसोसिये
उसने स्पष्ट हो कहा है कि अपनी इन्द्रियों को प्रम्तमु ती कर
के कोई बिरला ही उसके निगुण स्वरुप को मान पाता
है। बिसे अभिव्यक्ति ऐसे में वह भममप है। म फेमस
बाप को सर्व-प्यापक कहा है मपितु उसके
स्प का सपन करते हुए कहा है, कि पदि भक्त-उदारक श्री
उष्ण नम्द का पुष या पो मन्द किसका पुष पा ?" कितमा
सरस मोर मपुर होते हुए भी सशक्त तर्क है। मिरमन
म्यानहम कह कर उसम निर्गुण के हो मिरगम स्म का भी
महत स्थापित किया है सपा पन्त में उसी को निरंकार पोर
निरगामी का कर उसकी मारती उतारी है। एक माप
यह निर्मम होने के साप साप सिकार-रहित होने के कारण
निर्मिकार भी है, पौर पिसमें कोई विकार ही नहीं उसमें दोप
की सम्भावमा फसी ? प्रत यह निर्दोप मी है। 'उह उतपति
परमत नाही" यहाँ उत्पचि पोर प्रमय ही नहीं, यहाँ उसका
निस्य स्पाईप स्पष्ट हो जाता है। यह न केवल पाम भार
मरण से परे है अपितु सभी नौनि गुणों से भी प्रतीत है।
'सम पट देकर पीन। प्रत्येक प्राणी में उसके दर्शन
होते हैं, अतः वह सम्तिर्यामी है। मोर 'जीत एक प्ररु
31 1 ,...
32 ५० ३३८,.
33 प्र.३२७,१८।
34 १५०५
25.1 ११५४,51 36 १ ३३२, ४ | 37 Times

( २५ ।
सम्म सरारापा यह सव-व्यापक भी है। सर्व व्यापक
वह एक रूप या सम स्प है क्योंकि पट फूटने पर भी उसकी
स्थिति में कोई पन्तर महीं पाता । और यह सो निमुवन महि
रहिमा समाई, विश्व के प्रमु-परमाणु में व्याप्त होने क कारण
यह सवत्र विद्यमान है। बांग देते हुए मुल्पा को पिकारते हुए
उसने कहा है कि मुरम्यापक यह सवाल भी है। पता दुराचार
करने से पूर्व मानप को उसक इस गुण का ध्यान रखमा पाहिए,
तर यह पनायास हो पापकर्मो से गप सकगा।
यह सर-म्यापक समान ब्रह्म ही सृष्टि का एव सर्व
साष्टा है। सृष्टि रचना-कम पर प्रकाश हासत हए उसने
बताया है कि मई प्रयम प्राध पुन प्राति एवं
तलावात् प्रापी व मनुष्य की उत्ससि हुई है। माटी एक
पनक भांति परि सानी साजन हारे।
निस माटी से प्रयाम्य पों का निर्माण मिपा है-जनमें
परिवत्त न पा मकता है, मेशिन उपादान माटी को नहीं
रहेगी। 'समुपयु पानि तमामा तपा'
पुमाहा मोर
ब्रह्म को गुमाहा बनारर उसमे रिपथ का ताना-बाना म
सुनपासा, दो उसपी प्रारमीयता का परिचय कहां स मिमता ।
मेकिन इम पस्प को उमर सिबाय पौर मोई नहीं जानता।
इस प्रारमा का विकाम भी नम ह्म से हो हुपा है पौर से
पापार प्रदान रान रे मिए उसमे ही वा परि सकेनिके
पुरीमा गामि देह" पोड़ो मी पुन की पुष्पिा गाम कर देह
381.३.३।
1001
42,२॥
39.३१,
41...
43uNEL

( २८ )
सरा कर दिया-पान का बौशिक-मानव अपने वास्तविक
मस्तित्व को समझे तो अनायास ही उसके 'मह का विमटम
हो बावे मौर भावनापों का उदात्तीकरण हो वह सच्चे प्रयों
में मामब-सत्व के मिकट पा सकेगा। काष्ठ ! सृष्किा के
इस सेम को कोई नहीं मानता ।" यह सब प्रष्टा ही सगकर्ता
एवं सर्व-मियम्ता भी है, क्योंकि यही तो सहारक महेश साधन
यम का भी प्रष्टा है। इसलिए पीव से कहताहै कि के 'सुमरो
कहिमो न होई' क्योंकि विमाता ने तुम्हारे कर्मों के प्रणु
स्प नो पिपान कर दिया है, उसे मेटि न साकोर
पौर फरम बष तुम बीयफिर सीव की पतत्र सत्ता
ही क्या? इस प्रकार कवीर पूर्ण विश्वास दिमवा देता है
कि वो सब को बसाता है, पम पो पम और मम को पसमय
कर देता है, एक मात्र वही पूष्टिर्सा के सम्पूर्ण कार्यों का
का है 'न हम की प्रान परहिगे मा करि सकै सरी ।" पत
जीर को उसकी कवृत्व शक्ति में पूर्ण विश्वास रखना चाहिए।
एकमाम कर्ता ही सर्व-शक्तिमाम् 4 सब-समम है।
सीनों मोकों को उसी मे सहया-यह किया है मत एस
महान् स्वामी हरि तगि कत काहू के माहीं।" यह सर्व
समर्ष ग्रह ही तो सर्व-नियंता भी है क्योकि 'माप
वह रिस भाप बसाय पोर उसके नियत्रण के बिना
कोई कार्य सम्मान भी मही हो सकता । विषय के बरे से बढ़
44 मेड.41
46 E.०,३।
481.३..,
65 प्रेक
47 सोश
49 १.१३,२॥

दाना उस सम्मम पापा बनार गिरमिगते है ऐस मस्तियों भाग गयोर क्यापर हाय पसारे, वह तावर ही ऐसे दामी को पोर में है जो सब कुछ दन की समठा रथमा हो 'तुम समग्मदाते पारि पदारय देश म मार जीवन में एक माप प्राप्य वम अप, काम और मोक्ष ममी म देने में मह क्षण मर का समय भी नहीं सगावा इमसे स्पष्ट है जिस नियता ही एक मात्र सब-दानी है। मम्पूण तोकिम और प्रमोदिक सम्पत्ति का एक मात्र दातार पुगई। हा। सर्व-दामी सप-म्पापर वह सदा स्थिर होने के कारण मय-समयो भी है म कोई स्पम और न ही कोई एसा समय पही उसका प्रभाव हो। जीव के विपास मोर अनुभव को बात है कि उसमा माक्षात्कार कर मकै । यह सदा एस्प या समस्प बना गया है नसमें भी कोई परिवतन महीं, क्योंकि विभादि देवतामों की तरह बह दो काल-कपमित होता नहीं। इसलिए एकमात्र वही सत्य-चिरतम सत्य है पत. मरमान तपी में पूरा भारम-समपन करता पाहिए, क्योंकि उपप्पमित्र जीव का जिसने पहूँ म पापा टऔर एक माम सहायक र पायपदाता ब्रह्म हो है सोर की अनुभूति को प्रमिक्ति मिती-तिस पिन दूसर को नहीं विना सरस मावारमा सस्प है। ज्योति सरपी त० भनूप । अनुपम यह क्योति स्रम्प पोर उसको ज्योति को पनुनब लिए 50 प.. 51..... 52 ... 53 मार ॥३॥ 54...।

मावस्या है, कि पोष पहले इस बात को समझ से, कि वह
"एक मनेक होई रहिमो सगम महि । वम मपने प्रस्तर में
भी ससफो सता व म्योति का प्रकाश मनुभव हो सकता है।
अन्तर में उसको म्योति का अनुमूसि होते ही 'यूट भरम मिसे
गोबिदु पार 'दहविस हार पानदु । इस पानद के लिए ही
तो योग माम मर पाकर काटता रहता है । यह हावा तम है,
पापा को पीव पर कृपा हो । इस कृपा के परिणाम-स्वरूप
हो माया का यरत तोड़ कर यह गीर के हदय की कुटिन
गाठियम बोले देव" उसका उतार होता है । मन्याम्य
विश्व के सो महों के द्वार के बाहरण प्रस्तुत कर कवीर
ने उसके कामु प्रोर उसारक म्यस्म पर प्रकाश गमा है।
पब तक उसके महारम्प का दशन पौकिक गुगों के माध्यम
से करवाया घा, सेपिन वे गुण तो मानव पुठि को मारपर्यान्वित
पमिक करदे है वैयक्तिक गोवन को प्रभावित कम । मौकिक
परातल पर उसको सत्ता की महत्ता तो लौकिक गुणों के माध्यम
से हो स्थापित का गा सकती है। इसीलिये तो माह प्रम के
पावरण प्रपा पातरिक प्रशान का दूर कर पतर को अपनो
ज्योति से पोतित करने वाला उसे बताया है। उसका कृपा
पान मा पनायास ही पुकार उठता है राम समान मदेसर
पान । सोमिर मा उसको महत्ता को स्वीकार करते हुए
मात कहता है किगीवन भर 'हरि सेवा करत तुमारी।।
कृपामु वह हो तो मक्त का एक मात्र रक्षक है सत
551.., ।
56 12.1१।
57 151001
58 १३,
69t३. ।
60 प...

'प्रहलाद की पर गिनि राम्रो पोर एसा करने के लिए सी ने ता 'हरमानमु नख विदरिमा ।। भगवान् + इस मास- रक्षा व सारसन होमीण पह महम पर विषय कर दिया था- 'यदा २ हि पमस्त ग्यानिमठि भारत। मम्पुत्पानममस्म तदारमान साम्यहम ।। या व्यासपोर रक्षक हो तो एकमात्र तरन तारन सोई योजना स्वयही मत क पार नहीं पा सस्ता, यह मौरों को क्या पार पडेबावेगा। एमा तदारक हो जीप के माटों को दूर करता है और उसक मय का माशकर एक मान सफल परमदाना मिउ होता है। इस प्रकार मौषिक विपदामों सीपको रखापर-मोरिय सम्पदामों में माम्मम म मौकिक पानाबाने गामा प्रा ही रत का एक मात्र पामय स्पम है तब मायेन मरत को सो मप्रति म पारम-समपम कर देना चाहिए। इन प्रकार कवार का पनारि एवं ममता यो म केवल मान्द्रिय पोर ममय ही है, अपितु वह तो पनमुमैय मो है, किस प्रकार उमको कोई झमक विश्व को दो साती है। बीर का एशियास ना की महता मेरम महान् मही, तमा अनुमय है, दिमत को नम्म मनपात र मरत मविस नायास ही रहना भी पसन पासान प्रारत करता है हरि पदु 61 10. 62ी ज्य,.॥ 611..1 64 १९५३॥

। ( ३२ ) करि रहिए" एसा करने से पीरे • सीव का 'मिटे मोह तनु ताप पोर पुन उसे हरस सोग दाझे नहीं पौर मष योग को मुसम विपमित न कर सकेंगे, पर प्रगम ही वह मह तत्व को अनुभव करना प्रारम्भ करेगा अपवा हरि पापदि माप । " कौम जामता है कि वह अपने ही भगवत् प्रेश को उमार कर मभेद दृष्टि से उसी की महत्ता को प्रमुभव करने खग नावे । इस प्रकार प्रननुमेय केवल अनुभूति गम्य है। नाम में तम्मोग होकर जिसने उसमें वित्त मगाया है 'कह कबीर तो मनमठ पाइया । " इस मनुभव में ही उसे सच्चे पामन्द की प्राप्ति होती है, इसी लिए तो 'पर मेरा मनु कतहूँ न माहि । " क्योंकि मामन्द का बही तो एम मात्र प्रागार है। मौकिक दृष्टि से समा प्रकार से प्रगम्य प्रवृश्य प्रमेय व पप्राप्य ब्रह्म भी भक्त की पहुँप से दूर मही- पहुँप तक पहुँच पाने में हो तो कबीर की पौर मक्स की महिमा है, जिसका एकमात्र साधम है पनभूति । बहाण में ब्रह्म की स्पिति कहाँ है? यह भी कम कौतूहनोत्पादक विषय मही? यो सो सर्वम्यापक होते हए मी यह एकदेशीय नहीं। उसके गुणो में यह बिरामाभास ही जीव को प्रापयाम्मित कर देता है। उसकी मिरारी पाप कपा' को कबीर कहने का प्रयत्न करता है कि वह तो पहाँ ह गहाँ 'पावस सिघु धूप नही दहीपा वह उतपति परमठ नाही" सिन्धु, बर्षा पूप हि की तो गाव ही प्रनग यहां 65 1 ३५४,१। 68 का 67.३१८९ 68 ११०३ ,। 69 पू३३२.५८ । -इस

( ३ )
जो उसति पौर और प्रमय भी नहीं है। इतना ही नहीं
पहाँ जीवम मिरतु म दुस सुस विमापै । ऐसा स्माम
तो ब्रह्माण भर मदनिकालना कठिन होगा। इससे भी
पर कर 'रासि दिवस तह माहि ।' इसकी भी सम्भावना हो
सकती है, सेकिन उसने तो प्रकृति क मूल मूठ पोर्यो वस्नों
की स्थिति को भी स्वीकार नहीं किया-यमु नहीं पवनु
पावर फुनि माहीं। ऐसे स्माम पर ही तो अनुपम पोर
ममम्प को स्पिति हो सकती है। 'उहा सूरज नहीं पन्द
क्योंकि उसे तो पिसी प्रम्य ज्योति ज्योवित होने की
मावश्यकता नहीं। सम्पूण वाग्मय का साधन को वापन
मार है, पन्हीं में तीनों मोर एवं सम्पूर्ण सृष्टि मा गाती है,
सेफिन 'भोर प्रसर
इन महि नाही क्योकि 'ए पनर सिरि
जाहिगे। पर ब्रह्म को स्पिति तो सम्पूण वाममय में
भी नहीं पा पाती, क्योंकि यह सीमित पौर मबर है।
मेकिन वह इन गुणों की सीमामों की परिमि से बाहर
है कि उसकी स्थिति रहीं भी नहीं, लेकिन हम यह भी
भून मही सकते कि मर्य प्यापक एवं सन्तिरर्यामी होते
कारण वह 'सगण पट भीतर निवास करता है 'इस पर
वह न केवम इस पट स्पो भर में है अपितु उसको
इससे मो सूक्ष्म स्थिति है, पम्पपा घट के मप्ट हो पाने पर
उसकी ससा कहाँ ? सकिम एसा महीं होता। हिरदै
कमम महि हरि का बास। इस स्पून देह में मी उसका
70 1 ११६२.१६॥
71 १३४.1
7IA.४०२.०१।
72 पृ० ११६२.४॥
73.३४५,४।

( ४ )
निवास स्पाम हवय है प्रत' दिम महि छोमि' क्योंकि कबीर
को पूर्ण विश्वास है कि 'एहो ठतर मुकामा ।" भक्त
मनन्य भक्ति से उसे हवय में अनुभव कर सकता है, क्योंकि
कबीर ने स्वत ऐसा किया है। योगियों के मिए उसने 'प्रगम
द्रगम रधिमा पौर यह दुग है पहलवम कमस का। पहा
मिरन्तर प्रकाश रहता है, तपा वही ममहर माद होता है
मिसके पानम्द को वहां पहुंचने वामा जीप ही अनुभव कर
कर पाता है, लेकिन उसके रहस्म को शेपमाग तक नहीं
समझ सकता। अन्यत्र स्पिति को और स्पष्ट हुए कहा है
कि सहस्रदन कमप्त में ब्रह्मरघ है उसी में प्रारसामृत का
'सरवर भरा है जिसका पाम करने में हो मानव-जीवन की
सफलता है । मौकिकों को मो कबीर मे पुकार • कर कहा
है कि 'तन महि हरि" प्रत उसे बाहर दमे का सब
प्रयत्ल व्यय है अम्तमुनी बनो, उसे प्रतर में अनुभव कर
उससे ऐश्य स्थापित कर जीवन को सार्मक करो। चनु करि
मटुकी मम माहि विक्षोई देह की मटकी में मम को विलोमे
पर ही गुरु की कृपा से जीप 'पापै प्रमूठ धारा । पद्दिाम
प्रलह मुकामा" मान कर वोग देने वाले मुल्मा को भी
उसने ललकारा है साई म वहा होई 'या पारन तू वाग
देहि क्योंकि वह तो विमहि भीतर होई ब्रह्मानुभूति
कर मग उससे ऐक्य ही स्थापित हो गया, तर पुन' कवोर
74 प.१३४१॥
761 ११६२ १९।
76 ११६५४॥
77 1500,
78 १४७, १०
79 १३४६,२।
80 मेक १८।

को जब पी स्थिति के विषय में नम हो गया मह ममने
पापसे हो पूछता है कि 'पोउ महि मीउ बसै अषका जीउ महि
वकिपीउ किठनो मषुर सरन मोर माझादक अवस्था
है भन तो ब्रह्म स्थिति के मान की भावत्यकला ही नहीं
रहती क्योंकि ब्रह्म-स्पिति का दोष गिस साध्य का साधन
पा उसकी प्राप्ति के बाद सापन का महत्व हो क्या ?
जिस सर्व-व्यापार की स्थिति का मुष पाभास मिसा
है, उस मरुप के रूप की कल्पना भी कुछ कम मपुर मौर
अनुपयुकत म होगी। उसक विराट रूप का इष मनुमाम तो
दमी से सग सकता है कि 'रोमावमि कोटि पठारह भार ।
प्रसार करोड़ पा समाए तो उसकी रोमावसि माम
है और कोटि बग के दरवार ।' म उसके इस विराट
रुप के अनुरूप हो र रो बाके सेवा करहि' मनन्त
प्रहा उसने गुण गान में 'वेद उचरे' सेकिन इतना होते हुए
भी बह एसा है मारे रेल , रूप कितना प्रभुत
रोधाभास है मौर है सस्प ! पनि मिगुण बह सो
सगुण भी नहीं बनता फिर सापार को तो बात ही कहाँ ?
मग-व्यापक होता हुपा मोबह तो पून्म मास है। स-सप्टा
श्री सम्पूर्ण प्रमाण में रमा हुपा है, लेकिन फेरम सिप्राम
मूरति माहि। "43 'माटी एक मेस धरि नाना उससे
स्पोमतो किसी सोमा में पाया मा माया है और न
81 मा २६॥
82. 1. १६२, २०॥
332 १०
65 र, १७।
84. ७२,११

किसी पाफार में ही रस्सा गा सकता है या देखा था सस्ता है। सम्पूण प्रकृति में उसी के दाम होते है, लेकिन किसी एक स्पन पर उसके दर्शन नहीं होते। इतना ही नहीं 'विनु पप बने सुनै बिमु काना।' मौकिक रूप से रहित होत हए भी सर्व-गुम सम्पन्न है पौर विना पिसी अमुविधा के समी काय कर लेता है । कुम मिला कर यह स्प, रग पौर प्राकार से प्रतीत है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार निगुम मोर सगुन से परे वह गुणातीत है।" इससे कबीर के ब्रह्म का स्म स्पष्ट है लेकिन उवरण स्वस्म प्रवतार राम या कप्म की झपक भी बहुत स्पानों पर मिलती है, इससे हम उसे पवतार में विश्वासी मही कह सकते। यह साहित्यिक परम्पराएं और सामाजिक जीवन के लिए उदाहरण स्पस्प प्रस्तुत स्पल है, प्रत उनके पापार पर कदीर में 'सागार ग्रह के दमन करना भूम होगी। इसमा ही नहीं, बहुत से स्पनों पर तो नहोंने 'वी/ल पीताम्बर' 'गम प्रादि शवों का प्रयोग भी मिराकार के लिये ही किया है। अपने राम' को 'दायरपि म कह कर उन्होंने इस भ्रम का निवारण भी कर दिया है। उसके रूम के वन और प्रास्पाम में अपने पापको पसमम पाकर प्रम्स में उसने कहा है कि म तो उसकी उपमा दी जा सकती है और न ही किसी से तुमना की पा सकती है। धर्म चर्मों से उसे देखा नहीं पा सकता, पम्प इगियों से उसका पमुमाम नहीं मगाया जा सकता पीर पुद्धि 8610२,११ 87 1 १९९२, १५ 88 १९५५३.१४८१३, १४,५

से मी उसे मामा नहीं जा सकता। एसा त मनूप को है
मह वो फेमस 'मोति सहपी' है।" प्रव उसकी सत्ता की
तरह उसके स्प को भी केवल अनुमन ही किया जा
समता है।
प्रम का भारमा ससम्बन्ध
मह राम का प्रसु यह मारमा ब्रह्म का प्रय है पोर
इसकी उत्पत्ति भी उसी में मे हुई है। लेकिन विश्व में प्रा जाने
बाद उसकी म्पिति उसी प्रकार को हो जाती है उस कागद
पर मिट मेसु ।' इससे स्पष्ट है कि इसमा भपमा मस्तित्व धन
जाता है। मोष में मिकटमा उतष्ट सम्बन्ध दाम्पत्य ही
है पत कबीर पारमा को सम्बोधित करक रहता है, जिग
गोषम प्रान पधारा' ब्रह्म को घेरी तू राम न करसि
भवाग।"पारमा को भी यह अनुभव करने में देर मही
भगदी। मारमा म कोर की सीमा रोखीकार किया पौर
नागपू की मांति 'पू भट कादि गई।पने पति के समीप
पपि हृदय व पति की महत्ता को पूर्णतया अनुमबर मिया
है, फिर भी उसे सन्देह बमा हुमा है कि म जामव रिमा
करसी पीर पर्योकि जीवन का मौषत तो उसे पहिषामन
में ही म्पतीत हो गया जो कि वास्तविर सयोग मा समप
पा, लेकिन उसे अपने पति पर विश्वास है कि मह उस पूण
तपा प्रपना मेगा प्रपन विश्वास का मस्म पाकर वह पाहाय
80,५४४, ११।
90 १८७१
911 १४.
9225,३४।
93.१.१२.२॥

( ३८ )
'पुकार उठती है 'हरि मेरो पिर हर हरि को बहुरिया।"
पत्नी पति से धीरे धीरे पनिष्ठता बढ़ाप्ती पमती है सब सक
उनमें पूर्ण ऐक्य नहीं हो जाता। एक्स एसा जिसमें दोनों का
ममग मस्तित्प किसी भी प्रकार पवशिष्ट म रह जाये।
हरदी पीपरी चूना ऊपम दामों मिलकर प्ररुम हो जाते हैं,
दोनों के रंग ही मही, रूप पौर गुण में मी परिवत्त म मा माता
है और इस प्रकार को अपनी प्रसग सत्ता समाप्त कर मबीम
स्म प्रहण कर लेते हैं। ऐमा ही प्र म पन्य है भिसमें त्याग
हो-म्यक्तित्व का अस्तित्व का। बहुरिया प्रारमा की महत्ता
इसी में है, कि इस प्रकार वह अपना अस्तित्व पति में ही
बिसीन कर दे। इह पर मोह व मिनै तब मिमम न माने
मोह। इस मिमन को न कोई जाम हो सकता है क्योकि
'एक बोसि एका मिसि'" यह तो एक ज्योति का दूसरी ज्योति
में मीन होना है और उसका तेर तेगु ममाना तेच महावेग
में समाहित हो गया। इस प्रकार बम से उद्भूत होकर सोक
में विपरमपरने वाली प्रारमा-उसकी पत्नी बनकर उससे
ऐसा ऐपय विधान करती है जो प्रनायास ही उसके
मस्तित्व तक को उसी में विस्तीन कर देता है और वह सवा
के लिए अपने उद्गम स्रोत में वा मिनती है।
यह पारमा हो वेहपारी हाने पर चीन का स्प ग्रहण
करती है। इस प्रकार गीर के दो पंश है-पारमा पौर देह ।
।
95 सो ४६५७।
97 प्र. ३३५ ५।
901 ३४२ ३८।
93 HE५०, ११

पनी हमने ऊपर देखा है, कि मारमा का उदभव-स्यमा
है पौर उसन 'भूरि सकेति पुरीमा यापी देह पोड़ी-सी
धूम सगृहीत कर उसको मो पुरिया दाधी-उसी से मामय
देह का निर्माण हमा, जिसमें प्राम-मस्या का समार होने पर
यह पोव कहलाया। सर्वम्यापर पसे भीष के भी 'पट घट
निवासी है, उसी से उसका महत्व वमा हमा है एकमात्र
उत्पादक प्रा ही तो गीय का म्मामी है भोर जब तर गोष
उसे पहिबान न थे, तब तक उसका इस संसार से घुटकारा
मम्मत नहीं है क्योंकि-
'God known is no God and God realised
15 no more God
'तुम दाते हम सदा भिवारी' मौक्ति जीव को
पर अपनी सीमित सामप्प और भापत्तियों का ध्यान
भाता है सपा अपने प्रभावी की पूर्ति क मिम उसे किसी
सहायक दीपावश्यकता अनुभव होती है, तब अनायास
हो अपन सवनामय, सब-दावा पिता + सम्मुप झाली
फैमा देता है । दुसगति के कारण काम
शेष सोम
मद, माह मत्सर प्रादि दुगुणों का शिकार पोर अपनी
हीनता का अनुमब कर रहना है, 'मोविन्द हम एसे
पपरापी जिसमे मन्म दने वाली की 'भार भगति नही
साथी' पौर विश्व के सब दुगुप प्ररित कर लिए है
मतः हे भगवम । कष्ट में पर हुए पर अपने इस जन
को 'रासह पोर अपरामी पह विश्वास रिसमाता है
1001३४४ ॥
99 सार
101 1.३४०,८

( ४० )
कि प्रम 'सेवा करत तुम्हारी। भगवान् का पह अपराधी
है और वह इसका रक्षक एवं भाश्रय-स्यत । पवमा ही
मही परिणाम स्वरुप पह भगवान का सेवक भी बन पाता है
उस समीप रहने बामा सेपक ही धीरे धीरे उसके
महारम्म को अनुभव करता हमा- ममत बम पैठता है' मह
मस्त उससे घनिष्ठ हाता जाता है पौर पस्य सम्पन्म स्वापिस
करने में प्रयत्न भीम रहता है। ज्यो २ पाती सूची पौर
'सेतु निमूटा' स्यों २ पेह का पत समीप पा गया और धीरे
पीरे २ 'टूटी तन्तु न पर रवाम् । तब वेह का पक्षी ताकर
प्रपन प्रादि स्पान को घमा नाता है। उससे सम्बन्ध गोड़से
ही जीव को इस जगत में और कोई दृष्टिगोचर हो मही
होता, वह कहता है हमारा को मही हम किसह के नाहि ।
इमी मिए पाती बार मिमि ह रमु रपारमा तिस हो
माहि समाहि । 'मदी तरंग को सरह एक्य होगा पौर महा
गृन्य में पूम्य विलीन हो जायेगा, जिसका कुछ पता मी म
लग सकगा।' मोर पुनः मी पुनरागमन भी म होगा। कबीर
को इसमे मात्र से मन्तोप नहीं, वह तो बीब की सत्ता को
पौर मी महत्ता प्रदान करते हुए कहता है कि मनहर भरण
करने के बाद एक 'प्रचरजु माझ्या और वह प्रायचर्य क्या पा
कि श्रीमते पीर बीम तो स्वयमेव शिष में परिणत हो
गया।' इस ऐक्य के परिभाम-सस्प अनुभूति में भी परिमर्वन
21१७१,८॥
4 ४७८११।
6.११.३, ४।
3 ११५१,४२॥
6 मेक २१४॥
7 १.३४१, १३

( २ )
पा गया। 'सव पाही प्राह ए म होई ।'कि प्रब बीव की
मता हो म रही पौर सपन सर्व-म्याएक ही धा गया।
मनुभूति का यह परम ही तो मानव-जीवन का साध्य है, यही
जीर के देहधारी होने की साता है।
अप-कपीर सम्पन्न
कबीर देहधारी जीव भबम्म पे, मेक्ति मपनी मनुभूति
के पाधार पर ब्रह्म से उन्होंने गो सम्बन्ध स्थापिठ पर लिमा
पा, यह प्रस्पेग जीव कामही हो सकता। पात्मीयता मे उनकी
अनुभूति को समाप्त प्रभिष्यक्ति दफर भी हृदयमाही बना दिया
है। 'मुई मेरी माई मौषिक मा के प्रभाव में उसने सम्पूण
स्नेह उस परम पिता से पापा पा-इसीनिय पहा है-'हर
पूतु तेग वापू मेरा।' उसावर पिता ही पासनहार, रक्षक
र सरमुर के माध्यम से माग-दरा रहा है। इसोमिय मि सकोग
उससे अपरार्षों की क्षमा मांगने पमा पाता है 'रामईमा हर
बाम वेग।" कहते हुए अपनी वीनता प्रगटाता है। 'तुम
समसरि माही समाम माहि समरि पापो" उसके पश्चा
ताप से विगमित हृदय को कमण पनि म उसकी विनविता
का भी परिषय मिलता है। इतना ही नहीं, पापी में अपना
पूग परिपय दिया या काठागुरु तुहो सारिममर मोहि
8.१.३४३,३३
1011
91४.६,३॥

( ४२ । फबीरा नाच रे ।। लेकिन भगवाम नहीं पसीमे, उनके द्वार पर तो सदा ही म जाने कितने पापिर्यों की भीर पो लगी रहती है। कबीर ने उसने नाम को प्रापार गमाया मा मत उसे पिता महीं पोर उसने स्पष्ट ही कहा है 'कहि कबीर गुमामु घर का बीमाई मात्रै मारि। हर है प्रारम-समपण की पौर मगनविश्वास की। सम्भवत' इसी लिए जिस हापी के सम्मुम उसे कुममने के लिए घोगा पा उसी मे प्राकर उसे नमस्कार किया था। मौर बिस जगीर से बांध कर उसे गंगा में बमे के लिए पका पा उस अंगीर को ही मगा ने ठोस कर यहा दिया था।" इन परनामों में भौतिक सत्य हो या न? छेकिन इनके प्रतहित प्राणवान् सत्य महान है । मस्त के विश्वास में प्रतितीय शक्ति है। कृचे की भांति समता प्रगटाते हुए उसमे कहा हे 'मुतिमा मेरा ना' पौर 'गमे हमारे बरी पाई सीप तह पास सेबक को सवतोभावेन स्वामी की सेवा करमी पाहिए -ऐसे उत्कृष्ट सेवक के ही गुण हमें कबीर में मितठे है। इतना ही महीं, उसने अपने भापको पूगत स्वामो पर निर्भर बना दिया है-'तू बममिमि हर अम का मीतु" पोर इस स्म में वह सबा बम में रहता है क्योंकि बमहि विनु मीनु । उसके पिंजरे का यह तोता है उस पम पर रहमे पासा वह पक्षी है ऐसी अवस्था में यम- 121 ३२८६६। 13.३३८६४। 14 H८७०,४॥ 15 1 ११६२, १८ 16 मेड। 17 1 ३२२,२॥

( ४३ )
राम उसका विगारही क्या सकता है। ऐकिन मगवान से
यह सब सम्म स्थापित करके भी उसे सम्ताप नहीं हावा-
इसलिए प्यार को पारमा पुकार उस्तो है गाउ मातरी
दुमहनी मगमापार।' यह मंयमाचार गाने को पावश्यकता
पर्यो है ? क्योंकि 'राम OF सिर भावरि सहर पोर भवरे
लेकर 'पातम सिंह रंग राती।' व अपने प्रापको म तया
उसके रग में रंग विया, तब उसने अनुभम किया, कि 'मेरे
गह पाये राजा राम मठारा। उसके इस रूप को देखने के सिय
प्रसम्म 'सुरि मर मुनि बम प्रामे मोर उमरे मामन ही कबीर
कहते हैं, कि 'मोहि विप्राहि परे है पुरख एक भगवाना।
हरि मोर पि' पार कबीर हरि की पहरिपा' बन पुका
है। 'राम पो मैना महरोमा हकर उसने अपन माप
पो उनस पोड़ा सा छोटा स्वीकार किया है। सपपि 'एक
सगि' उनका बसेरा है, फिर भी परलो-रवीर मनुमय करते
है, कि उसका मिलनु दुहेरा" मिसन कठिन है पनि नाराज
पा हो गये हैं। उन पूछती है-'परबटु दे मारट काह कर
भारे' पो इस प्रकार मुह मोर कर तुम मम मारते हो?
अपन पातिवप का पूरा विश्वास दिमवाव हुए रहती है-'मनु
तम् पीरहि पंगु म मोरर पौर मुम पर रिनी हो विपत्ति
पर्यो न पा ता भी तुमसे 'भोति म तारठ। भगवान् की
प्रियवमा पनने में मिस मनन्पता को प्रावस्यरता है उसी क
कारण ता उसने सोईसा पति बमना मात्वाकार करते हर उस
म माता तोर दिया है और भगवान रा विश्वास दिसवापा
18 TV८२,२४॥
19 ५.४८३,३०॥

'हम तुम गीचु मइयो महीं कोई। इसलिए 'सुमहि सुब्ध मारि
इम मोई। पत्नी एसके इसमा निकट मा गयी है कि वह
तो सदा उसी के 'गि राठी' मौर उसी के पामम्द में
तस्लीम हो मासी है। पीरे २ उसने अपना महत्व पौर
मस्तित्व ही समाप्त करने का प्रयत्म किया है-पूर्ण पात्म
समपण के माध्यम से 'तेरा तुझ कर सरपसे किमा लाग
मेरा।' उससे प्रारमीयता स्थापित करने में इससे कम
प्रमन्यता पापा भी तो नहीं हो सकती। सिपोरा (सती होते
समय पति से सवा मिमे रहने का चिह्न) प्रो हाथ में से
मिया है तब उसे संसार की चिन्ता ही क्या ?" क्योकि उसने
जो 'हरि भेटत मापु मिटाइया । इसो लिए पा बिस
मरने से पगु गरे' उसी मृत्यु में कबीर को मानन्द मिलता
है क्योंकि देह मुक्त होकर हो तो वह पूर्ण-ऐक्य का प्रामन्दोप
मोग कर सकता है । 'मरने ही से पाइए पूरन परमामम्दु ।
इस प्रकार उसने अपने प्राग-तन्तुर्मों से एसा मिमा दिया कि
दोनों में किसी भेद का पता ही नहीं मगठा । 'पोरा गरि
पानी भइमा पोर पानी में पा मिमा तो उसकी सत्ता का
कोई पिक्ष मी प्रवधिप्ट नहीं रहता, इसीमिये 'राम कवीरा
एक भये है कोउ न सके पसानी'५ उमके इस ऐक्य का किसी
को बोध भी नहीं हो सकता। किसी हो तो क्या-यह ऐक्य
90 ४८४, २५ ।
21 सक २०३॥
23 पू ६५५,६॥
25 रोक १७७॥
20A 2,।
22.मोक ७१।
24 बोर २२
26 ११६,३॥

इसना पनोसूत होजाता है कि स्वत्त उन्हें भी इसका माम
महीं हो पाता, इसी लिये तो ये कहठे ह~ पोम महि जोर
यसं जीप महि वसं कि पौन। वस्मीनता में विमा सो गये
कि यही नहीं दोष होता कि मह वृदय है या भगवालस्मीन
है अपवा भामान ही हृदय में मा बम है इतना ही
मही, इसका परम हो महाँ माता है यहाँ से कहते है कि
'घट महि जो कि पो" हद हे प्रमुमूति को धौर प्रारमीयता
की। पौर एसा हो मी क्यों न~-क्योंकि यह बहा पद
उसके लिये कोई बाहर का तत्व महीं है-बस्तुत वह सो 'सू
तू रता हुमा' अपन भोर परामे के भेद पो उसने इतना
प्रषिक मिटा दिया है, कि अपना अस्तित्व हो मुणकरके
वह स्वतः ही 'बह बन गया है और मम उमे रहो त
राष्टिगोचर होता है। इसी का वर्ग में तत्वममि' कहा
मपा है यो सम्वों में साहम के रूप में अधिक प्रपमित
हुपा पा और पाम तक भारत के बहुत से सम्त-सम्प्रदायों
में उसका यह स्प 'गुरुमात्र के रूप में स्वीकार किया है।
वामिक सफर के वाधारित प्रदेशमी हो सन्त कबीर ने
अनुभूतिपरक प्यास्या प्रस्तुत को जो भपिक हृदयग्राही ग
प्रमापोत्पादर सिब हुई।
यपि मन्त, सन्त और गुरु भी जीव मोरि के ही
है मकिन अपने सदाचार तथा प्रान्तरिक गुणो , विकास
से नम्होने पपने को उत्कृष्ट मानप बना लिया है और वह
7 मोहन
281

( ४६ )
से उनका प्रषिक सम्बन्ध पनिष्ठ ग मारमीयता पूग हा
जाता है। सर्पिगी माया से गप कर बीब जग ब्रह्मोम्मुन
होता है और मगम द्वारा उससे मारमोयता का सम्बन्म
स्पापित करता है तब यह मक्त कोटि में पा गाता है।
भौर कष्ट में परे हुए ऐसे भक्त का रक्षक व उवारक ग्रह्म
है प्रसाद मावि प्रग्याम्म मक्तों की रक्षा के मिये प?पमे
वामे भगवान का वर्णन अनेक बसों पर मिमता है।"
सवमाही यम समह-मै गाहा सेकिन भक्त पर उसका
कोई पस नहीं चलता। मत ब्रह्मानुभूति कर जब भक्त
मोक-कल्याण की भावमा से माग प्रदान का कार्य भी करने
लगता है सब वह सम्त मवस्था को प्राप्त करता है। वीर को
भव-पार से माने में एसे सन्त का विशेष महत्व है क्योंकि
उमकी संगति से ही नीव माया के प्रावरण से बप सकता
है। पत फवार ने सवा क दो ही अभिमारो पताए है-
“एक सन्तु इक राम् । मोर इनम मो प्रधिक उपादेम सम्स है,
क्योकि राम गुदाता मुमति का सन्तु वपापे नाम ।
मध्यकामोन सन्त को माफ को मावस्यकता मही, उस वा
नाम' में तम्सीन होमा है, जो भपन माप में मोक्ष से भी
कही अधिक सुखदायी मिति है। ऐसे सम्त को निन्दा नहीं
फरमी पाहिए क्यों कि सन्त राम है एक और गुरु-
उसके पिता भगवत्प्राप्ति की तो वाव ही दूर रही-भगवत्
दशम भी सम्भव नही क्योकि योग प्रौर 'सतिगुर' + मप्प
2. L. १२५३,३।
30.११६४,४।
31 १५,१॥
3.साक १६४।
33.७९२,५।

गुरु गोबिन
(४. )
'सस्गुरु' हो तो एक मात्र सेतु 4 साधन है और यह भी
भी भगवकपा , बिना प्राप्य मही। उसके मिमने पर
"गुरपरसादी हरि पनु पापा 25 इसलिये वह न केवल मझ
के समपद का ही अधिकारी है।* अपितु सम्तों का प्रमुभूति
गत वानिकों के सर से कहीं से प्रधिष सशक्त हृदय
माही पौर प्रमावोत्पादक है-
दोनों बरे, काके लागू पनि।
तिहारी तिन गुरु की, विम गोविद दिमो दिखाय ।
सो यह है गुरु और गोविन्द का महत्व १ परस्पर
सम्बर । सम्पूर्ण सम्त माहिम में ही भलौकिक साध्य से
मौकिक सामम का पधिक महत्व है क्योंकि यह लम्म है
पौर स्मिात्मक दृष्टि से अनुकरणोम भी।
प्रय भौर माया का समन्य
बह ही माया का उत्पादक है, स्थिति में गते ही
मापा म केबम सम्पूर्ण ब्रह्माग को भरमाना प्रारम्भ कर
रेती है।" अपितु यह तो ब्रह्म को ही अपना स्वामी मी मना
सेना पाहती है 'नो ससमु है मामा । पूति वापुसेमापा ।
सेपित पा उसकी मेस का पात्र महीं बनता और वह
सपमा माया निरपरा स्प पारण किए रसता है इतना ही
महीं उसका उत्पादक होकर भी उसमें ब्रह्म का अंश नहीं-
इस प्रकार माया मा यम-निरपेटा है। दोनों ही एक
25 १ ८७१, ६.
37 श्मोर १०॥
39 १३९४,५२
31 ०२,७॥
36.1 ४५,"
387 १९९४.३॥

( ४८ )
दूसरे से पूर्णतया निसिप्स रहत है, वस्तुत सो से दोनों को
म्पिति है क्योंकि माया-मरमित होकर ब्रह्म ब्रह्म नहीं
रहता और ब्रह्ममय होकर माया माया नही रहती।
प्रा-सष्ठि का सम्बन्ध
मागे विये गये सष्टि के विराट स्म का स्रष्टा ब्रह्म
ही है। उसने प्रमाण मा प्रमार किया इस प्रकाश में से ही
सम्पूर्ण वा पोर चेतन जगत् का विकास इमा। पौर इस
प्रष्टी ही झपक उसके अणु-परमाणु में मिमती है।"
इस प्रकार दोनों प्रयोम्यापम मिष्ट सम्बग्य
होता है क्योकि एक क विना दूसरे की स्पिसि मही पौर
दूसरे के विना प्रपम की शक्ति के विकास का क्या परिपप ।
इतना होते हुए भी सृष्टि ब्रह्म की तरह प्रमश्वर पौर अनंत
महीं अपितु परिवर्तमधीम वा नश्वर पौर सात है। लेकिन
पार्शमिम कर के विचार मी तरह उसकी कोई सत्ता ही
म हो एसी वास नही, बह यपाप है, केनम प्रममात्र नहीं ।
स्पष्ट
40 1 १३४६,३।
41 1 २४०,७

A
सृष्टि
मोइनुदोसहि मंगरि पारे ।
किमि पोर पोते पीतन हारे।
तारों से भरे पाकाम को देख कर कबीर की जिज्ञासा
साकार हुई, कि इमका पिवेरा कौन है ? पन्तकरण को
रटोमा तो पता चला कि सारी सिरजनहार की गाने माही
पोइ।" समस्या उमझ गई, मुसमाने के प्रयत्न में जीव को
प्रामास मिमा-'उपा का मरमु मोही पर गान।" मत मोर
निकर पहुंचा तो उसे सगा कि जाने मापन पनी अथवा
* दासु दीवानी होइ। भक्त का प्रारम विश्वास बड़ा पौर
उसने पनुमय करमा भारम्भ किया-'सम महि पसरिया ब्रह्म
पसारा।" यह सृष्टि तो पौर कुछ महों, उसी का प्रसार
माम है। यह प्रसार कैसे हुमा, इसके ऋमिक विकास की
भी अपनी एकहानी है-'अवनि प्रलह दूर उपाइमा सप
प्रयम गण में प्रकाश को प्रसारित किया पौर उस 'एक मूर
+2.1 ३१६,
44 1 ३३४,५२॥
43 साल १.६॥
45 ८३२६, २६.
-

दे समुपयु परिमा। उसमें मो सूम भौर गांद के उदय
होने के सापही साप 'उ मई सभ देह ।' विश्व में प्राग
तत्त्व चार हपापोर वनस्पति, प्रामो तपा जीव में इसका
क्रमण विकास हुपा। प्राय सम्पूण सन्त-साहित्य में सृष्टि-
रचना क्रम को यही रिकाम देखने को मिलता है।
'खामिकु सप्तक समक महिसासह पूरि हिमो सब ठाई।
सम्पूर्ण वर्षात उसी का प्रसार है, मत सम्पूण बार
में उसकी स्थिति है। रपना के लिये उसे किसी वाह उपा
दान की पावसाता नहीं और 'एक मागे पनेक मांति करि
सायी साचनहारे एक ही मिट्टी को विभिन्न स्स प्रदान कर
उसने प्रस्चिम विश्व का निर्माण टिया है और एक मात्र सस्प
मही सब में है सपा उसी के नियन्त्रण में सृष्टि संसरण कर
रही है, क्योंकि विसुर कीमा समु कनुहोई। फिन कर्ता
की का स्व-पाक्ति का परिचय किसी को महीं मिम पाता।
'चावन प्रघर मोक समुफमुनही माहि' सम्पूर्ण सृष्टि तो
इन पावन प्रसरों में ही सीमित है 'ए पतर सिरि पाहिमे'
यह प्रसार प्रौर इनसे निर्मित सृष्टि नष्ट हो जावेगी लेकिन
इनका निर्माता मही परमि प्रकास को करमह रमाई
तपा सूम बद्र की परकियों के सहारे कोरी मे ब्रह्मोर स्पी
पस्त्र का पिताम तना है रिस रहस्य को कोई नहीं मानता
बन गोमाहे वह अपना चीम्हा' पौर विश्व पुमाहे के मूत्र में
उसने अपना सूर मिसाकर उससे पूण ऐक्य स्पापित कर
46 1 १३४।
47 रोका
481 १३४१३.
49. ३५.१.

मिया है।" पिटेरे ने जिस महान् पित्र को पक्षित किया के
वह पित्र मधित ई भरभरा तो उसमाने पासा चिम है,
प्रयः रमे घोर पिवेरे में विध स्पामो पौर सिमाने
बासी र सृष्टि स्विर भी तो नहीं-क्योकि नमन देखत
हुगम माई " प्रस. सामारिक सम्पत्ति मे मोह करने
पासी सोई को सपमाया है-'वह उपयै रिमस वहि पैसे
पुरविन पाट | मश्वर भगत् में कुछ सम्म भी वो मझें
ब्रह्मा, इन्द्र, शिव पादि के साथ ही साप 'मैमा मम्ता पर
संसारमपवित्र यह जगत कामम की कोठरि है, मौर
‘मधे परे तिस माहिम फिर निकसमे का माय हो कहाँ
सम्भव है ? उसने पष्ट हो जोर को मतक किया है, कि
गम माम बिनु मा गु मामा घ" इस पीहर में
नसे रहमा भी सो केबस पार दिन है प्रस' भपक्रमवन में
ही बीपम का सदुपयोग ना पाहिए "
भासिर यह समार है क्या? 'पप तत बिसपार
पत मौगिक सम्पत्ति के काम्प अपने पापको गौरवपीम न
मममना पाहिए, क्योंकि पर सूरजु आतपत रसोई और
संतम पाके कपरे घोई प्राय तह गबन पर दीया न
-
50 1481,381
59.१३.५, ११॥
SIL१५८ ॥
561 ३३८, 1
58.४२, ६॥
51.३४०, १०
53 1२५१.1
5.
371 ३३५,२०॥

वाती।" इतना ही नहीं, मिसके पास रक्षा के लिए मेका
सा कोट समुप सी नाई भी मम के पाने की तो 'तिह
रामन पर परि म पाई। पता न केवल सांसारिक
सम्पत्ति का प्रपितु मम सोवन का गरवु म की क्योंकि
यह सब तो 'कागर पीर गनि बाहिगा।" ऐसी अवस्था में
दुष्कर्मों द्वारा प्रति पन को संचित करमे का क्या साम?
पर्योकि 'नांगे पापमु माये गाना इस लिए शामिक जीवन पौर
नयर संसार में मौकिक सम्पत्ति का मोह और संचय त्याग
कर 'राम माम धनु करि संचम्मी सो धनु कतही म माये।"
'नाम' पर प्रषित करो भो कि वास्तविक सम्पत्ति है।
बीवारमा
'यह कबीर छ राम का पसु ।
भारमा परमात्मा का मंस है पौर देहपारी होने पर
यही बोव का रूप ग्रहण कर मेती है। 'उपमो पेटते"
परमात्म-बम से उत्पन्न होकर यह प्राणी-जगत् में विचरण
करती है मौर फिर 'परमेसुर परम हंस मे सिषामा । तो
जीव मे माश्चर्यान्वित होकर पूछा बनावम हारो कहा गइमो।
देह के अंग मोर इन्द्रियों के सामन तो वैसे ही प्रतीत होते
है किम पर 'मुबह न निकसे माता। इसी का उत्तर
दिया है कि-
591४८१२१।
60 1 ११.१,११।
61८११५५
62.१.२२६,५८1
63.८६१,५।
64 खो१२३॥
65 प.४८०, १८।
।

हत यसतु युपास की जब मात्र के सि ।।
यह तो उसो की सम्पत्ति है, व पाहे से आमे। 'मा
मन्दिर महि कोन पसाई मातिर इस वेह-मन्दिर में बनने
वामा मह कौन है ? दारानिकों के प्रा का नेति' स्सस्स
प्रसिय है। प्रारमा के विषय में कबीर ने उसी दौसी का
मनुसरण करते हुए लिखा है- ना मानसु मा इह देउ म
राजा, म मिसारी,न प्राहाण, म सनिय तपा मा इसु माईन
राह पूठा।' मॉकि 'ना इहु सोये न मरता देखा।
इस प्रकार वा का पान कोऊ पाई।" मेक्नि गुर प्रसादि
मे गरो पाइमा' पहलगर यही है कि यह राम का प्रसु' है।
और इसकी स्पिति व ससा बेसी है बस कामद पर मिटै म
मसु । पटनेम करने वाले मोपो में 'वसतु पनूपु बोप पाई
इस अनुपम वस्तु के परे गाने पर न देह रहा मौर म देहमारी
सपा सम्मवत इसी लिए निमासु बीच मे प्रान किया-
करनु कागि मगु पर्व जिनसे कहहु मोहि समुदमा ।"
बोरिक तक की बसोटी पर इसका उत्तर जो मान, मेकिम
पनीर की पनुभूति इस प्रकार हुई.
'पिर प्रतिमिनु रिम्ब कर मिमी हैं उरक कुम्मुगिरामा।
महकमोर ऐसा गुण प्रमु मागा पर मनु सुमि समाना ।
देह के मष्ट होने पर अमरत् नस में अपवा अन्य में
ममा मामा ही मानव जीवन का समय सम्मरत इसीमिये
म होउ सिमरहि देव ।। इससे देह का महत्व स्पष्ट
67 2.८७१,21
6
681.1
71 ११५६

(४)
है। इस देह में मिवास करने वाला 'श्रीव एक पर सगन
सरीरा" बीव पो एक हो है लेकिन इसे धारण करने वासे
वेह मनन्त है । और मानव स्म में प्राने से पूर सृष्टि की
रपना प्रक्रिया में बीब ने 'प्रसपावर बमम कीट पतया ।
पनिक मनम किए बह रमा। प्रम्याम्म रूप धारण किये थे।
मानव-जीवन के विकाम क्रम में वह है मी स्वाभाविक । पह
ससार इसी मूम से सूक्ष्म के विकास के इतिहास की
कहानी है।
देवानुपापियों ने ब्रह्म को मानने का प्रपम सोपान
मतामा पापात्मानं विदि।' उनकी मापा प्रमिक रासनिक
पी पौर कबोर की उक्तियां हैं अनुमूस्याबारिख ।
उन्होंने भी मगमप यही कहो है-भापु पचाने त एक जान ।।
उसके बामने का साधम प्रपमे पाप को पहिचानना है । बिसने
पपने को पहिचान लिया, उसे 'रोमु न विमाप सीने ताप !"
त्रिविम भय के मारा होने पर मीच अन्तकरण में हो उसे
मनुमव करने मम गाता है। तम मांसारिक मम्मति पौर
सम्पषियों को स्पाग कर संसार से उदास होकर जीव का
'हसु केमा बाई । पोंकि ससार से सव सम्पन्न दो
भूठे हैं। यह गुमी बीव तो कम करने में मी स्वताप मही
मोकि उसके पित्त की बात नहीं होती, होता वही है जो हरि
करें। प्रत से सतर्म करने में प्रयत्मसोस रहना चाहिए
पीर पपमे कार्य को कप्त पर म छोर कर 'काति करता प्रगति
पाव
721 ३२०, ३६।
57412,२॥
76.१.११२४, ६॥
731 ३२५, १२
75 ५.३२६,१०॥
77 सोक२१६।

कर पा करता सु इतास। पापीघ्र करते हुए जीवन में
मागे यदे रहना चाहिए । 'माटी के हम पूठरे मुसामू पर
हैं प्रा सभिक जीवन का सदुपयोग करने में ही हमारी
मलाई है। क्योंकि पीर तो संसार-समुद्र की गहमानी है,
मो उससे उत्पन्न होकर-मामामिण होने के कारण संसार में
रमण करते हुए पुन मुस्पा से माया-निलिप्त हो उसी में
गा मिलती है. माहि के संग ते वीपुरा ताहि के सम मागु"
यह है जीव की स्थिति।
जीव स्वस्म निस्पम के बाद प्रात्मा के प्रावरण
देहरा पर विमार रना भी पाया है। जिस प्रकार
प्रामसरप के बिना देह व्यर्ष है, उसी प्रकार देह का महत्व
तो इतने मात्र से सप्ट है कि उसकी प्राप्ति के मिये
'भूमिरहि मुनि नन सेव' गोंकि उसके बिना मोक्ष प्राप्ति
नहीं। यह देह क्या है ? 'पानी मैसा माटी पोरी इस
माटो को पुतरी गोरिया काप मपवान ने किया है।
उसने मरे से पोटी सी मिट्टी उटाई और विश्व के साथ
साप मानव-देह का भी निर्माण कर दिया ही इछे
परि समिर पुरिमा बाँधी कहा है, कहीं पस मरी
मागरी रवाया है। यह सर " पात्रों की तरह मष्ट
79 m६४
81 हो१२६।
83 1३६, ६०1
85uci
87 होग५॥
-
78 पोर १५८)
30 .. १८६॥
81 सा२२७॥

-
हो पायेगा क्योंकि 'सो तमु बर्म काठ के सगा। पौर यह
ऐसे पसेगा-हार परे पिर भाकरी फेस सरे मित्र मास ।'
प्रात कामीन तारों तथा सांप की केमुली के समान इमे
लपिक व नश्वर बताया है। इस देह पर गप करने वालों को
समझाया है कि 'मसति परम विसटा के मू पुरगप ही के
यह तो दुर्पध-पूष पस्पिों का समय पावरण है । प्रता
इस पर गर्व किए बिना ही इसका मदुपयोग करो क्योंकि
'मानसु बनम दुमभु हपौर यह बार बार महीं मिलता।
बीवन
"इस वेहो कर सिमरहि देव देह के माध्यम से मामय भीवन
के मिप्सु मनुष्य ही नही देवता भी है । इतने में हो जीबम का
महत्व स्पष्ट है और इसको प्राप्ति प्रासान भी तो नही, सेपिन
उसका सापन है पुर सेवा से भगति कमाई, तब यह मानस
देही पाई। पप प्रदशक गुरु की सेवा कर भक्ति के माध्यम
से जिस मामय जीवन को पापा है, उसे स्पर्ष पवा देना
पुद्धिमत्ता नही। नग-जीवन का स्वप्न पैसा बताते हुए उसने
कहा 'जोग्नु मुपन समान" स्वप्न-सुस्प इसलिए कहा है कि
मानव कनक कामिनि मागि' से मप्ट न कर दे और उसके
महत्व को समझे, बर्गेकि ग जीवन एसा दुतीय नहीं
कोई। पह मनुपम है लेकिन अनुपम, होते हुए भी मणिक ही
881 ३५, ११.
89 मोक३६।
90 सो..
911.१२४,४
92 ३०।
93 १.२१५६५,

है मा जीवन भर भटकना उचित नहीं, इसी से पसका
उद्देश्य भी स्पष्ट कर दिया है-
'मगह गोविन्द भूली मत बाह।
मामस मनम का एही माहु ।'
जीवन को दस दिन और बार दम का भी न बता
कर बम रात भर का कहा है, क्योंकि प्रात वो यमरान
प्रतीक्षा कर रहा है। बिस पीप को रैन गई (युवावस्था
म्पप बीत गई) से कहा है कि प्पाम रस्मा 'मत दिन भी
बार नहीं तो वागस्था में नामों के पक नाम पर बीवन से
बेड़ा से पार होपा ? प्रत समय पोर बीवन को कार म
गगामी, हीरे की मांति 'प्रमोसु बनम है इसे कड़ी बदसे
हारिमारे पनीर कल्पना की ऊपी उड़ाने सेने बारे
सनिकम थे, अपितु जीवन के मपासप्य अनुमयों को प्रस्तुत
करमा रम्होंने अपना प्येय रस्सा या।
सीमिए भगवान् से भी उन्होंने कह दिया-भूवे भगति
म सोई। यह मामा प्रपमी मी॥ उसे हो माम्मास्मिक
सीबम को भौतिक सीवन का ही सहर विकास पनामा पा-
दोनों में ऐक्य स्थापित करना मा। उसका पम केवस सम्म
पीय म्पनियों के लिए प्रपमा मौखिक चिन्तकों के लिए म
पा, अपितु मानवीय परात पर यह सम-सामान्य के लिए
पारासोसिए देह को समाए रसने के लिए भगवान् से यह
96.१,२।
98...३३५,५६॥
93 ११५६६॥
81...

2100 सद मांगते हुये भी झिम्के महो- 'दुइ सेर मागउ भूना पान पोर सागि सूना। इस प्रकार सांसारिक जीवन की म्बामाविकमावत्यक- ताओं का समाव उन्हें भी प्रसरता पा मेकिन उसके प्रति मासक्ति मबी। ये 'पद्मपत्रमिवाम्मस पामी में प्रमिप्त कमम पर की तरह) बीवन को महत्व देते थे। सांसारिक सम्बन्ध हसु फेमा गाा पौर 'संगि न मयु मै ना।। बीव को जीवन गत सत्य से परिचित करवा दिया, कि यह हंस (पारमा) तो अकेला ही गावेगा। और इस संसार में- क्वनु को पूतु पिता को का को। कौन मरे को दो सम्तापो॥ तथा 'कतम को पुरनु कउन की मारी। इमा तत सेह मरीर विचारी।" पिता पुत्र की तो बात ही क्या ? सांसारिक पनिष्ठसम सम्बम्प नारी के विषय में भी कुछ नहीं कहा या सकसा । यह समाप तो केवल कहने मात्र के है, इससे कुछ पाशा मरमा म्पर्म है, पोनि मा मन जोगन अरु मुस वाग' मगसर पामे पर मह सब साप देने वाले नहीं मा मोष को इन सब के पासन-पोपग में ही गोषन महीं विता येमा पाहिए' 100 १६५६, ११॥ 1 १.११२४,। 2११३१, 3 १३३६ ५ 41 MP, १४॥

-
(
पौर म ही इनके मोह में फमे रहना चाहिए।' कनिम
फामनो महासरि' यह समझ कर रिसने 'रामु विसारिमो है
प्रमिमानि ।' सुन्दर स्त्री के पमप में राम को भुलाने वाले
फो उसने मसाया है, यह मय तो सांप को तरह के भयकर
मापी है, प्रत इनकी चिन्ता नहीं करनी पाहिए। मिस रावण
एक मामु पूर्व सदा मम मातो' थे', पबसर पटने पर एक
का भी पता नही मगा। जीव को यदि इतने पर भी विसास
मही तो देख ले कि देहरी मउ परी संग' तपा मरघट सउ
मम मोपू कुटुम्प भइमो माग हनु घरमा ।' तमा ही मही
पर फूट पोऊ बात न पूर्वक वह माह होई ।। मा बेचारी
दहीम पर गेती रह गई पौर भाई से उठा र मे गए।
उपमे सभी सम्बम्पा और मम्बन्धियों को देख लिया है कोई
किमीमा नहीं - कोई काहू को नहीं मम दयो ठोर बनाई।"
पौर पिर लौकिकों के मोह में फंसने वाले से दो भपनाम् मी
मम महीं करते, प्रता म सम्बन्धियों में फसे रहना कहो तक
नषित है? प्रत मामारिक कतय्यो का पालन करते हुए
धेवन यठ एक मात्र सत्य भयरमेम को मही भूममा चाहिए।
यानि भ्रमण
सांसारिक सम्बन्धों के मोह में फसा रहने कारण
पोप इस मावायमन के पार से नहीं फूट पाता । एन
जीवन में भगवानामा म म करले कारण होम
6 1 ११४,
7१,५
8 १ मा

योनि में पाना पड़ा। माया के बस में पड़ा हमा
इस योनि भ्रमण से नहीं निकल पाता। गुरु कृपा से प्राप्त
माम' के सहारे ही मह इस योमि के पस्कर से निकल कर
निरगम की तरह प्रयोमि' हो सकता है, क्योकि जीव भी तो
'अपमा किमा पा सोई।।
भीमात्मा को परमात्मा की उत्कृष्टतम देन है सत्गुरु ।
मह पुरु तो उस तक पहुंचाने में सहायक है। गुण भोर काय
की रष्टि से कवीर ही नहीं अपितु सम्पूम मध्यकालीन
सम्हों का गुरु सगुण भक्तों के प्रसारों से कम महत्वपूर्ण
नहीं। इतना होते हुए भी यह है जीव ही, केवम एक सतप्ट
कोटि का बीय। मतः उसके सहप, गुण एवं कार्य पर विचार
करमा अनुपयुक्त म होगा।
कह कबीर में पो मुरु पाहमा । बाका माउ विवेक।।"
कबीर ने तो विवेक को ही गुरु पवाया है। वास्तव में
विवेक पीस बह व्यक्ति हो मुर है, जिसने पानों इनियों तपा
मन को बस में कर मिया है तथा ब्रह्म को पहिचान लिया
है। पहिपान महीं लिया, अपितु 'तासु मद मात्रा हो गया
है।" एक मात्र सच्चे गुरु के अतिरिक्त पौर कोई उसे
पहिमाम मी तो नहीं सकता। पौर 'विनु सतिमुर बाट न
10३६,५६।
18. १ २३८७..
13 ११११.१५॥
142,
15.८७२,१०॥
18.1 १६६ २.

पाई। उसे प्राप्त करना मावश्यक है पोर उसका सापन भी एक ही है भगवान् जब हुए किपाल मिसे गुरुदेठ ॥ भगवान् का कपाल बनाने के लिए प्रावश्यक है, कि मनुष्य सत्कम करे।" तम्ही सस्को से वह भगवरूपा का पात्र बन सकता है, और उसी से 'पद देने वासे सरगुरु मिल सकेंगे 20 मिससे संसार के प्रति पैराग्य उत्पन्न होगा। इस प्रकार गुरु को दाक्षा से शिष्य जागता है, और भाग कर 'गुर परसादी हरि धन पाया। इस हरि-पम- द्वारा ही गुरु गोव का उतार करता है। उदार करन का भी एक कम विक्षेप है। सब से पहले गुरु सांसारिक भ्रम का माश करता है जिसका साधन है जीप की वासनामों का माघ । गुर शन्द' देवा है जिस क्षम्य की सहायता से गोष इमियों को वश में करता है पर इन इन्द्रियों के साथ ही साप ममका मी बस में कर शेता है, क्योंकि विकत मन हो वो देहगढ़ का रागा है।" उसे बस में करने से ही ता 'गुर प्रसादी देव मामा । भगति + प्रमि इनही है जामा इम मस्तों ने भी भक्ति के महत्व को समा। पह मति गौ हाय में गुरु का पद स्पिर करने से उत्पन्न हुई पी। यम से रक्षा करते हुए ऐसे भाउ को गुरु भव-पार पहुंचा देता है। और 'गुरु सेगा ते 18 4.१७॥ 20.१०४,51 2:10१, १०॥ 211 १११,१७॥ 171 ११९४,३ 19.११.३,४. ALL. १५ 23.११११, १४॥ ७.३९.

मगति कमाई। इसीलिए ता सम्पूर्ण सन्त साहित्य में गुरु-
सेवा का विशेष महत्व है। एक मात्र सत्य-मार्ग का दर्शन
कराने वाले गुरु की शरण में जाना चाहिए।" और वह भी
ऐसा हो, कि 'सो गुरु कर मि बहुरि न करना । । एसे गुरु
की सपा से ही तो 'प्रमोन दास करि मीनो प्रपमा ।" उसने
जब अपना दास ही बना लिया तब उसमें मौका लगे रहना
स्वाभाविक ही है। गुरु शम के माध्यम से ही यह सौ
मगठी है, गिससे स्गत गुरु में ही हरि के रहस्म को नामा
है। इसके लिए मामनि गुरु मबदु गुरु कीन रे। पौर
उससे त्रिसना नामु मद मस्सर फाटि पाटि कसु दीनु रे । "
समी दुर्गगों का नाश किया। इस प्रकार दुर्गुणों का नाम
कर मन को वश में कर उससे अमृत की पार नही जिससे
अमर होई सोह
ब्रह्म-म्नेही बनत ही गुरु मे मव निगमामों को प्राचार्यो
में बदल दिया क्योंकि जीन एक बार मत्गुरु से दीक्षित
होकर मोकिम तो क्या पारमौकिक दुमों से भी बच कर
अमर हो जाता है। मोर फिर माया ऐसे जीव का क्या
विगार सकती है, क्योंकि वह तो मयं ही मुरु पी मार मे
परें । स्योंकि असर पाते ही गुग ने तो तीनि मोक की
16 पू १९३६६।
177३५६५६ ।
18 पू३२७ १८।
19 पू१४०
20 पृ.,१॥
21 प ६४४,१॥
22 पू ६८ ।
23 १३५,२01
24 १७२,१॥
25 १८७१,७॥

पिपारो' के नाक काटि कानहु काटि पानि कूटि के गरी।
इस प्रकार म केवल त्रिभुवन रासिमि' से रक्षा की अपितु
यम से युट करने की सामप्य मी प्रदान की।
गुरु मे ही केवल सरगुरु से पहिचान रवा दी पपितु
उम ज्योतिको अन्तर ज्योतिस मी परवा दिया। इस अन्तः
ज्योति को उभासित को ही गुरु ने मन्तगति हरिमेटिय'
इम मिये 'प्रय मेरा मन कह न जाइ इसलिये गुरु की
पा से भगवान की प्राप्ति हो गई। 'गुरुमिमत' और उसने
एसी महारसु प्रम प्रेम भक्ति दी जिसन ससार सागर से
निसारियो २० जिसस पावागमन का पत्र सदा क लिए
मिट गया। पत सतगुरु को घरम में अवश्य माना पाहिए
पर्योकि पूल की यह पुरिया गुरु क मिस बिना 'पमटि गई
मव खेह पोर पोर ने भो तो गुरु बनाए थे रामानन्द,
मन्तों की वाणी में अपनी और करनी की एकता का यह ज्वलन्त
प्रमाण है।
संत
"सत राम है एको" गुरु गोविन्द पाहोन कारण
गोर मोटि में गुरु का स्थान तो है ही कर लेकिन सन्तों
ने तो भगवान् से ममेद स्पापित पर लिया। प्रम उसका
26.1.५७६,४॥
27 1 ११२६, ११॥
8.८१३१॥
29 1 ११०३,२॥
31 बार ०६
33 ० ११११,४०५॥
*0 1 २१५, ५६ ॥
32.७५

।
क्षीर का साध्य
जीवन का मर्मनकवीर प्रदतवादी कर की मांति
मान का पह उपदेश देना नहीं चाहता गिसे सामाग्य म्परित
म समझ सके भोर म प्रपना ही सके। इसी लिये यद्यपि शकर
का पठत बौखिकों के मस्तिष्क के लिये पर्याप्त चिन्तम की
सामग्री प्रस्तुत कर सम्र विहामों में सम्मानित भी हुमा लेकिन
जनता का धर्म कमी म बन सका । उसके विरूस कबीर के
सिवात पनुभूति प्रापारित होने के कारण तपा कियात्मक
रूप से अपना प्राद भाव पामे के कारण , जीवन के माध्यम से
अपना विकास पाने के कारण, सामान्य बन-मन को प्रमाणित
करने वाले सिस हुए । इसी का प्रमाण है कि क्वीर पप के
सकुचित सम्प्रदाय के बाहर भी सभी सम्मत उन्हीं सिखाम्तों
क पापार पर विकसित एवं प्रसारित हुए है । मूमत यही
बह पुरातम मानव धर्म , बिस का स्याम प्रसार सभी
पर्मों में प्रमुष्ण बमा हुमा है । दृष्टि मेद सिद्धान्त परिशाम में
परिवर्तन मही ताता, इसी मिमे गत हबार बो में कीर
मसा नम होते हए मी प्रिय म्पस्तित्व भारतीय क्षितिज पर
पर देखने को नहीं मिलता । उनका साम्म पकर के मई
.

प्रा से प्रारम्म म होकर भी बीब के बह से एसय मही
ममाप्त अवश्य होता है। उस ऐक्य साम्प तक पहुँचने के
सहुत से सारन भी अपने प्राप में साम्प प्रतीत होते है यही
करम है कि उमका साभाविप विकास कम हमें अपनी पोर
मापित ही महीं करता अपितु विशेष रूप से प्रमाणित भी
करता है। जिन्हों ने चीर को पापी में-निमारमाए में
समानता स्थापित करने का प्रयल महीं किया पौर परवा
पद पारि शिपों से सुशोभित किया उन्हें यदि उसके
सामग्रार सापनो में सम्पयता म विशाई दे तो हम प्रकोप
स्वीर को दोपो नहीं ठहरा साठे। उस के साम्म साधन
मम को सम्पप देने का हो यह एक प्रयत्न है।
-
उम का कपन है कि सर्व प्रपम सीव को अपने जीवन
पा रम्य एमाम मामा से रक्षा ही सममना माहिये मिस
मग्याम्य सारनों का निर्देश पायन हम साधनों का भाषय
मे गीर भव माया से रक्षित हो जाता है तो यह पम से रक्षित
हाला पाहता है। पस्तुत यम से रखा ही भवबम्मन कामाप
कर मषनागर से पार पहुँमाती है और इस प्रकार मावायमन
के से बरकर जीव मोग पर का प्राप्त करता है। मोष
पाणि हो ब्रह्म प्राप्ति होती है । वह प्राप्तिका लम्प उसने
ब्रह्म वाम पुन गा रस पाम पर इयानुभूति व्हर स्पष्ट
दिया है महानुभूति तो मामय जीवन का एक मात्र साम्य
है इसी को विपता यही है कि इसके साथन का प्रत्यक
स्तर मी पपने पाप में साम्य है और यह सापन दमिक बीपन
रे पापरण है को मानस भाषनामों दो उदास मना

( ६ )
कर उन में प्रतहित महायस्व को उमासित करने में
सहायक होता है।
माया स रक्षा के नवीर ने सीम माषन बसाये है
सर्व प्रयम गीय स्पट प्रयत्न करता है मा मामय प्रपन विकारों
को मुमा कर इन्द्रियों पर विनय पामे के लिये प्रयत्नशीम
रहता है वही माया से पप सकता है ।
इन्द्रियों पर विनय पाने रे लिये अभ्यासको पावश्यकता
है और यह प्रयास ही वैराग्य को सस्पान करता है। जय
तम मौकिक वस्तुमों के प्रति विगग म दो, पब का माया
से रक्षा सम्भप नहीं क्योंकि, पिनु वैराग मनसि माइमा"
पारीरिक प्रयरन एवं सापमों का महत्व बताने के बाद यह
पन्तमु ली प्रवृत्ति का विशप महत सममता है। सिमरि
सिमरि हरि हरि मनि गाइए' समी सव मापत्तियां नष्ट होंगी
मोर एसे स्मरण से हा मापा दूर भागेगी। लेकिन यह स्मरण
'भविगुरु से पाइए तमी स्मरण का महत्व हो सकता है। क्योंकि
'गुरु बिना गत नहीं इस प्रकार उसने यह स्पष्ट कर दिया कि
गुम ही नाम से जीपमा समन्य बार सक्ता है। और उसी से
माया भाग सकती है। पापारम्परीपैरागी को भी उसने सतर्क
किया है कि माया से रक्षित हाने के लिये गाय मही पान्तरिक
पैराग्य की प्रायपयकता है जिसके लिये सतगुरु की सरण में
पाना होगा वह माया मिस ने संसार के सम्पूर्ण विदामो
को वा में कर रणा है कबीर के गुरु को दासी यम गई
रोग
2. 10,२४।
८१९०४,८1

( ६ )
है। पौर जिनहि परी तिमु परी' संत के भी पीछे पस्न
रासी यह माया कार गुरु परसादि भारहि ग्रै' पौर सतगुरु
का सामने देख यह भाग खड़ी होठी ई ता पासु गुरुदेव से
मिमते हो उस से रक्षा होती है। मारको सयम को समाप्त
पर रेन व ली इस माया से कबीर को रक्षा सत्तगुरु ने ही की
पो' इस प्रकार सारे संसार को भरमाने मासी मामा से जब
हम भीष की रमा न हो वन तर वह जीवन में कुछ नहीं
कर सकता । सतगुरु के प्रमरन सं पोम पप माया से पप
निकलता है तब से भयानक मम के वचन होते हैं किम
पीन हो उसे इस बात का भान हो जाता है कि 'सपनी बीती
कहा पर जमरा" इस से स्पष्ट है कि माया विजेता स्वत
हो मम से रक्षित हा पाता है। योगिर्यो को करीर में बताया
है कि जब उम्मन मुद्रा में रह कर पिगुट होकर प्राणायाम पर
मापिपरय कर मिया तव वह प्रमभ्यास हीबवावस्मा एवं जीवन
पौर मृत्यु से मी रहित हो सकता है।"
भूटम मोइ जु मन कउ यूट,
मन पूरी तउ बम ते ट।' 10
मन को पा में परने वाला क्या रिहया से रामामूर
पान करने वाला व्यरित अनायास हो पमर हो जाता है।
एस म्पत्ति का बहा कर बममा । न सब प्रपरनों से भी
६.८७१,
82.४०,१६॥
10.....
१.१ १०
11.४४६,५॥

1
( ७० )
चव तक गोव को पूर्ण विश्वास महों होता कि यम से उसकी
रक्षा हो सकेगो तब यह ब्रह्म से यही प्रापना करता है कि
मुझे यम की यासमा से पचामो। उस के मिये प्राधय मिमता
है उसे गुरु का । क्योंकि गुरु 'उपदेसि काल सिर पुरै वह
कास से भी युद्ध कर सकता है संक्षेप में मूल मात इतनी ही है कि
पर 4 राम राम रति नाहीं।
वे समि परम राइक माहीं ॥
प्रमु का वाप करने वाले क्वीर मे मनुभष किया कि
'यम भी मेरा म कर तिराकार' क्योकि 'गिनि-नह समूपा
सिरमिमी' " उस प्रभु का कवीर मे पाप मो कर मिया ।
माया से मना हुमा गोद यम से भी रक्षित होरर मप मापामों
को नाम करने में तस्लीन हो मास्मिक उन्नति के पप पर
पग्रसर हो सकेगा।
भव-बम्बम को नाश र भव-सागर से पार जाने के
मिये सर्व प्रपम प्रावश्यक है कि मानसिक विकारों को दूर
किया पाये पूसरे सयों में इन्द्रियों के क्रियाकमापों में सतुनन
एवं निग्रह की भावस्पकता है । 'पंच पोर को पाने रीति'"
इन ाम्ब्रिम रूपी पोरों को पस में करमे काग बो बाम
पायेगा वही तो भप-पार पहुंचेगा। पाप के मार से दबे हुए
इस देह स्पी बपर मेरे को संसार से पार सहारना तब
सक सम्भन महीं है बव तक इसे पुष्पों और सत्कर्मों से हस्का
12.15.६,1
13 प ११५५११।
14,३४,1
15 बोर १४.।
18.५ ३४८, ३

मकर मिया माये। इस प्रकार सत्कर्मो वाय मन को
सम्मार्गी बनाना और उस पर विजय पामा ही भव-पार पहुँचन
का एकमात्र साधन है। इवीर के मनु बीसे नगु जीविप्रा"
कोही गुरु मानक न 'मनि जी पगु मोतु ॥के रूप में स्वीकार
किया है। माया से रक्षा हो पाने पर भी यदि मन को पर
में न किया तो भी मब-पार नहीं पहुँमा जा सकता, क्योंकि
पप के पमिमाम और पहकार के कारण कृषि-मुमि तक न
पचमके। कबीर मामा जीत किमा मामा गत मामु
सबिमा नही जाई' इस प्रकार भप पार पहुँचने के लिये ग्रह का
स्याग निवास पावरयकर्मण्य बीवन फा सवेध देने वासे
कयोर में मानव को समेत किया है कि भव पार पहुँचने के
तिमे सोते रहने से कुछ न बनेगा, अपितु उसके सिपे प्रयत्म
पोम पहना होया रही मक्ति भवपार करेगा या मध्य
जीयम म्पतीत रेया । भौतिक एबम के साधन गुटासे
हुये तयापारीरिक उपभोग को सामग्री एकत्रितरते हुये विस
नब्रह्म ज्ञान नहीं प्राप्त किया वह मो भव-पार नहीं पहुँच
समता।" पनु पारीग्रि तुष्टि में ही सिप्त न रह कर पूर
को बान कर उसमें अपने मन को स्पिर पर जो म्पस्टि उस
पा ममम परता है यह मस्त मनापास ही भव-पार पहेम
जाता है। इस प्रकार सांसारिक सम्बग्यों को त्यागी
17 , १९ ॥
18 ६४०१,२८॥
19 साथ १५॥
21 प १,४॥
पृ ३, ४६.
40

हरि पिप्रावै वह 'मीवन्त बम्पम पोरै गोप के नाम
प्रपस्नों के बाद भव-सागर पार करने के लिय पावश्यक सामन
के स्म में नाम पौर अप का विशप महत्त्व यताया गया है।
'रिसने हरि मामा वितु माई' उसने ससा नहीं
प्रन्ति परम गति पार॥ वस्तुन गाको हदय से
मगाये विमा सांसारिक भ्रम एवं भय दूर ही नहीं
होवे। मोर माम में मी मापारम्बर की अपेक्षा नहीं,
ना भी मही नाम मी एकाकी पोर एक हो राम का
पाहिये, सरद तिमागो पपु यम रामु पौर पर हरय
में राम हो निवास करने मग गये, नर बह पाहे जाति का
गुलाहा हो यों न हो, उस के भी 'कहि सरव मान
विस ने देह की मटकी मम का विमोग्न कर पारद सनाता
जोड मिया है बहो उसरे तोरा वस्तुस वहम + महत्व को
म समझने वाले जितु मटि मामु म उम टि मरै गनु सोइ।
क्योंकि 'राम नाम मिनु समै बिगते' क्योंकि उसके नाम
के विना समी ठगे पो गये। यह सम मानने पर ही कमी.
भगवान् से प्राय मा करता है कि मेरे अवगुणों का नाम पर
मुझे सम्मति दीमिये पोर मेरा मम अपने में मगाइये । पौर
जब एक बार उसने इस रस का पाम कर मिया तो फिर
'राम अपठ तमु परि की म माइ । राम माम गितु रहिमा
23 १४८०, १८।
24 प.३३१,४
2 पृ० ३२४, ३॥
26.01
97 १४१ ।
28. प ५१५, १५
291
"

समाईकिसी मो धर्व पर यह नाम को छोड़ने को तैयार
मही, पथपि माम का रास्प बामे बिना उसका कोई मूल्य
नहीं क्योंकि जिसमे राम नाम को गति नहीं मानी से
उतरसि पारा। उसके सिए दो विना पर्य बामे वेदों पुरामों
का पठम भी 'बर बदम इस मारा' से अधिक कोई मूस्य महो
रखता, यह वाक्षिक एवं बौदिक कबीर का मत है लेकिन
मक्त कबीर ने तो माम के महल को समझाते हुए कहा है
कि स्वप्न में पतेि हुए भी किसी के मुख से राम निकम
गया वो मह भी पवमा पवित्र हो ममा कि तापम की पानही
मेरे दन को पाम इसी विचार-मारा की पुष्टि में उन्हेंनि
बताया है कि प्रमामिप्त, गम ठपा गमिका प्रादि भी निकृष्ट
कम करने वाले 'राम माम सीने पार उतर गये। इस सम
से स्पष्ट है कि मिय सापक मुमि मादि भी सब प्रयत्न करके
हार बाते है लेकिन एक माम माम कापता ही सम्हें भव पार
पहेपाटाईमौर कवीर को इस बात की प्रमग्नता है कि
उन्होंने ऐसे माम को पहिमान मिया है। जिसको माया
खपति बुभिमा पंगिमार, मनि संवोधु भाषा प्रामार
बनाने पर कवीर के सभी कष्ट दूर हो गए है। नाम का
महत्व म बम कबीर में ही देखने को मिलता है अपितु
सम्म सम्त मत इस दृष्टि से उस महान् सन्त का प्राणी
१ रिसने हमार पप तक मत समाज को मामामु का
पान कराकर पमर कर दिया। ऐसे नाम का जप मोव को
30. ३२५, २६॥
31 प ११०९६१
33.१ ६,५१
म.॥४॥

-
मनुभव कराने में सहायक सिख-होता है। माम का तस्मीन
होकर पनवरत स्मरण ही यम-है- पौरासी माब योनियों के
चक्र से बचाने के लिए जीव को इसी बप का सहारा लेना
पड़ता है इसीलिए लपिक देह द्वारा प्राप्त प्रमूख्य समय का
प्रपम्पय म कर, वीर ने सभ्वेस दिया है कि मजा गोविन्द
भूमि मत गाडू कोंकि पृवावस्था में अब पाणी पौर बेह
के प्रम्य प्रम कार्य न करेंगे तम-अप करने की सामप्प ही
कहो बाकी रह जायेगी। इसका उपयुक्त सामन कपन गुरु
की शरण लेना ही है, 'धम भरी' गायरी यह देह वो
मणिक ही है मन बर तक सतगुरु म मिसेगा, तब तक
मुक्ति का द्वार म हुम सकेगा, क्योंकि वही तो माम के महाप
को पता कर माम दे सकता है और यह नाम भी उसकी
पा के बिमा प्राप्त मही हो सकता। उसकी पा प्राप्त
करने के लिए मानव को सत्कर्मों का पाभय लेना होगा ।
सत्कर्म की प्रेरणा सत्संमति से मिम सकती है मौर सत्सगति
मी तो पये भारए के विमा सम्भर मही, इस प्रकार यह
गुरु ही 'गोति महि मनि भसपिरु करै-विससे इस भवसागर
से प्राणी तरंग भव-सम्बन का माश कर सोष भवपार पहेच
माता है मेकिन भवपार पहुँच के भी उसे भमबत् प्राप्ति
करनी है जिसके मिये भावागमन के पक से सदा के लिए
पपमा पारस्यक है । इसी लिय मामब मोक्ष प्राप्ति का प्युफ
बना रहता है-'सोम मोह सरव विसि बाई' पम मनो-
पत्तियों को बम्पम में रप मनोविकारों को भूमामे पासा
35 1 ११४॥
36 मोड ३
97 , १६२,२०।

(५ ।
जीव ही मो मोक्ष प्राप्त करता हुमा युग २ तक अमर फल
चावर गुरु की पा से जब पासनामों की भनसु बुझाइमा
समी तो यह बीषण मुक्त हो सकता है। वस्तुतः इन्द्रियों को
मारना अपवा उमें शिक्षित करमा ही इस मोक्ष प्राप्ति फा
एकमात्र साषम है । इन्द्रियों को वास में करने के साथ ही साथ
सांसारिफ रस का त्याग पर माया मे अपना पड़ता है-
योगिक वियामों से गो मनहर किगुरी वामो ° उसे सुन कर
माग माग बड़ी हुई और मन,मानाद से परिपूर्ण हो गया
नमी जीप पावागमन ने अपन को घोर प्रमय पद को प्राप्त
र समसा है। अपने प्रारम्भिक जीवन में कबीर मे युग का
निरोप महत्व स्वीकार किया पोगो के लिये नर ारों को
रोक कर दाम-बार ब्रह्मरम्ध्र को पोस मेने में ही उमके
जीवन की माथरता है। क्योंकि वहाँ से ही प्रमत पार
सुभाष पौर उस अमृत रस पाम में ही यह प्रभय-पदको
पनुमब'फरता है। स्वत किये गए प्रपरनों में हरि सेवा
का भी विशेप महत्व है, अन्याम्य देवी देवतामों की पूजा को
निस्सार बताते हुए या तोपम्मान प्रादि बाहारमर्रा से
पर्प का बयास पोपित करते हुए बी' में कहा है कि
मोम्पति राम की मेवा करता है वही 'श्रीपत पाबह मोम
दुपार पर यह हरि सेवक हा है लिममा काम भी पृष
विगार महो सकता। मन मोग प्राप्ति के लिये हरि मया
में हो स्मीम हो जाना चाहिए।
39 ११४,५-1
401 ३४, १३॥
397.८७१११॥
41.११२३,१
H

महाबसी गवग को भी देशों से सीप पर
समरान ने अपना प्रतिषि बना सिया पा, क्योंकि उसने माम
के महत्व को नहीं समझा वा मस्पिर संसार में रावण की
इस दुर्दशा को देखते हुए क्वीर कहता है कि नाम को अपना
देना चाहिए क्योंकि 'राम नाम विनु मुफसि न होई' यदि
कहीं 'गोविन्द मिब मागी ता बनम मरम का भरम गामा"
मीव का प्राबागमम मगबाम् के प्राबध से ही होता है। प्रत
उससे बचने के लिए मो उसी की सहायता प्राप्त करना पाप
श्यक है "मौर उसके लिए भगवाम की सेवा। क्योंकि सेवा
से भगवान की कृपा प्राप्त हो समसी है। और इस प्रकार
वन कर किरपा करत है गोबिन्दु वे सतसंगी मिलात' .
पौर भगवान की कृपा भी किसी सीमाग्यशामी को ही प्राप्त
होती है जिसे यह कृपा प्राप्त हो गई, वह पनामास ही
मावागमम के चार से निकल जाता है। इस पावागमम
के चक्र से पचने पर ही जीव को ब्रह्म की प्राप्ति
होती है प्रतसंसार में उसी का मारा करना चाहिए
"बिह मुए सुनु होइ' मही पानन्द ब्रह्म की प्राप्ति है।
तामसिक पृत्तिसांसारिक भ्रम तपा प्रान्तरिक मलिनता को
दूर कर यदि बसों हारों एवं पापों इन्द्रियों से भगवत
स्मरण किया जायेगा हमी उसकी प्राप्ति हो सकेगी।
इसकी प्राप्ति के लिए प्रसार एवं मम्पिर जगत में
पुत्र,
स्त्री,
42.५.३४३७६॥
43 प ११०४ ६.
441 १९६२.१६॥
45.११.३,४।
46. १२५२,०॥
47 सोडा
48. ११५८,४॥

तिया मायाक वास्तविक रुपको जानकर इनका त्याग करना
हापा। और इस प्रकार संसार के प्रति मृतक होने के बाद
भी मन्तर में 'मामा मानन्दु' ब्रह्म मिसम के मानद की
मनुभूति होगी।" योपिक च्यिामों का महत्व प्रतिपादित
परत हुए कहा है निरन्तर अपमक दृष्टि से ब्रह्म मी पोर
देव - नेत्र माम हो जाते है और इसी प्रयास से ब्रह्म को
प्राप्ति होती है तब धीरे धीरे दृश्य प वर्गक एकाकार हो पाये
है प्रथवा घरीर की मटकी का मन द्वारा मापन करमा
चाहिए तप अन्तर में ब्रह्मानन्द की मनुभूति हो सकेगी।
पहर में अमित मनहर मार की जो पीणा बरेगी, उसका
सर कमी म टूटेगा और इस पर का मुनमे पाले का मन
मन्द से परिपूर्ण हो जायेगा, यस्तुत यही ब्रह्म प्राप्ति की
मरस्पा है।
बह्म प्राप्ति के लिये यस्तिर यागसाधना से अधिक
महत्व बम सेवा का है युवावस्था में समस्त देह से गो स्यक्ति
सन सेवा करता है वही पाए निरजन देव चोर को मरिस
पर पंग करती हुई मोई कहती है कि 'मूर पसोसि पमर पनि
पोपी सामुमों को तो चोर सर य देते है लेकिन हमें दो
पाना भी नहीं भर पेट मिसता पनीर उत्सर देते है-
'पुनि अपसी सोई ये पौर, इम्हि मुगमन मार सर्पम कोर।'
प्रत उनकी सेवा करने में तुम्हें इसी मही हाना
501४.
52.१११११
49 पोरा
G४,५२

--
(E
दे परिचित ये यही कारण है कि मयबत् प्राप्ति के बिमा ही
अन्तर्जगत को अभ्यास द्वारा सर करने पर भी ये नहीं ब्रह्म
रस का पान कर सकते थे। भौर सब एक बार उनकी मौवा
से भग गई, तय वो रात दिम उसी में मीम हो गये। प्रपतक
दृष्टि से उन्हें इरि के बिना कुछ दिसता ही नहीं, क्योंकि उनके
मेत्र उसी के अनुराग से सास है"।
भाभी मेरे माम की मित देखो वित मास
प्लानी देसन में गई मैं भी हो गई तात।
योगी तो माम्तरिक पटकों में सगे को देखना है
पौर उसी में ब्रह्म के दर्शन हो माते जिस से यह मांसारिक
प्रम में नहीं पड़ता, ऐसी अवस्था में बाहर की दसों दिशाओं में
दौडने की मावश्यकता नहीं है क्योंकि उसके हो '
वारी,भीतरी
मइसा प्रकासू'"
गुरु द्वारा मनुभूत माम का प्रकाश ही भक्तों तक फैमा
है मोर दासु मदमाता जिसकी मस्ती उतरती ही नहीं ऐसे
ग्रह रस का पाम करने वाले कोही यह सौभाग्य-धाती सममता
है मोगों के प्रम को दूर करता हुमा पपा नाम के महत्व
को बताता हुमा कोर कहता है कि इस गुमाहे के सामाग्य
कार्य में कौन अपना अमूल्य जीवन लाये । इसी सिये हापों से
माहे का कार्य करते हुये भी उस के 'हिरदै राम मुसि
राम होई मान्तरिक दृष्टि से पूषत उसमे अपने पाप को
86 ६४,४।
07 ५३९,
69 ११६६,२॥
69 ५५ALI

170
.
राम में सस्तोम कर रखा है इसो मिए कह प्रेम-रस पान कर
पासा मौर बिस राम के रहस्प को सनर सनन्दन' महा
पौर शेप मी म जान सके वह सन्त सगति रामु रिदै बसार'
मह सब गुरु की कृपा से हाता है लेकिन गुरु की रुपा मी पहा
इब नहीं कर सकसी उ रामुन कर महाइ स्योंकि उसरी
सहायता के विना 'निए बिहामी पा घाट सोइ मुरि मुरि
ग" वस्तुतः वही सोमारयवासी है मिस रसु मिनि
पाइया' पौर मह सब भगवत्कृपा से ही सम्भव है। करके
साम्य की पतिम सोती है भगवान् में तस्सोनवा पौर
उसमे पूण एज्य यह पभिमन्य हो चोर की सत्ता को समान
कर परत स्यापित करता है। संसार में मोने बारे सोष को
कहा है हिमाय उठो और शाके सग के वीधरा ताहिके संग
सागुमोले की तरह धुन कर बस स्पीपा में मिमना
होगा। सांसारिक बासमानों से उदासीन हा मम को जोत
परमानासम प्राप्त समे पासा हो, पन्तरगवि हरि मेटिया।
पही उससे एप है ऐसा ऐक्य रहो पियोग का प्रश्न ही मी
वटवा । निरन्तर प्रभु का रिपार करते हुए पट महो जब
भोग प्रमु से जोड़ा करने सगता है हर यम तो उससे दूर
भाग चावा है मौर यह मादि पुरम में ही रई मुमाइ" और
चीरतूदू करखा हा मुझ महि रहा है।
70.६१११
131
74.11.1,२६
71001
73 मोड
75 1.३४३,

(८२)
सब माया परमा मिटि गइमा, पत वेबर सततू"
इस प्रकार गोव अपमी सत्ता को सोकर केबस उसी
पी सत्ता को अनुभव करमे मग पाता है।
सक्षेपत कवीर के भीवनोदेश्य की सामन साम्य प्रक्रिया
का विकास हमने देखा । सांसारिक मय से मातुर सांसारिकता
का मान पाते ही सर्व प्रथम माया से अपनी रक्षा की इच्छा
करता हुमा जीव उस विधा में प्रयत्नशील होता है। अपने स्यूस
शाम क पल पहिले यह शारीरिक पुन' सामनात्मक तत्पश्चात्
मामसिक एव पारिमक प्रयत्न करता है लेकिम शीघ्र ही इस
शाम हो पाता है कि पप प्रपशक गुरु के विमा सब सामन
म्यप है। पौर वह गुरु का पामय सेता है, परंतु यह अनुभव
करने में भी देर नहीं भगती, कि भगवत् कपा बिमा इतना
सौभाग्यशाली महीं बना पा सकता कि बिलोत वशफारिणी
माया से रक्षा हो सके । माया से रक्षित पीब सांसारिक
प्रलोभनों से प्रवपय पन निकलता है। लेझिम प्रपन क्षेत्र के
एकाधिपति यम का भय उसे निरन्तर घिम्सित किये रसता
है। इस प्रकार उसे यम से रक्षा का प्रयत्न करना पड़ता
है। यम से रसित हो वह मब-यन्धनों का माध कर उस पार
पहेचने का प्रयत्न करता है और यही प्रयत्न उसे मोक्ष एवं
प्रमय पर का इच्छुक वमा देता है। मोक्ष प्राप्त के बार
मावागमम के से पप कर जीय भगवत प्राप्ति करना
चाहता है, महा-दर्शन पर उस का माम प्राप्त करता है और
धीरे २ उस की अनुभूति में अपने
पौत्रीकर उस से
76.शोक०४

।
पेसा ऐश्य सम्पप स्पापिप्त करता है यहाँ दोनों क रूप में
कोई भेद नहीं रहता। संकर के पास को भी यही पुकार है।
सहायक शक्तियाँ
मामव जीवन का साम्य प्रहा
पूर्ण वय है। जीव का
अपने साम्म म परिचय हो जाने पर उस विद्या में प्रगतिशीम
हो जाना स्वाभाविक ही है। यपि गत प्रकरण में साधनों पर
बहन सा प्रकाश इस चुका है लेकिन कुछ स्पम पस्पष्ट भी
ए गये है गोंकि वहां साम्य प्रमान पा मोर साधना चम
कपनकम । प्रत साधनों का स्वतन्त्र मस्तिस्य य महस्व न स्पष्ट
हो सका । महो सायमों का अपना ही विकास क्रम है। वस्तुस
सापन से पपिक उन्हें सहायक सस्ति कहमा पधिक उपयुक्त
होगा। भगवत् प्राप्ति के दुर्गम माग पर भागे बदन के लिये
पम्पान्य पारितों का मापस लेना पड़ता है, यह पारितया
कमी प्रयत्न साम्य होती है और कमी पनायास ही उपसम्ध ।
उन को प्रनायास उपसम्षि भो सम्भवत पूष म पमित
संस्कारों कारण ही होती है। सरकम, सत्संग तपा सतगुर
का प्रादि नबाम कितने चौराहों से होकर जीरो भगवत
पा प्राप्त गरने सिमे प्रयत्नशील हाना परता है सपिन
भनम्प मात को तो मनापास ही पपनी सल्लीनता में ही
भगवद हा को अनुभूति हा जाती है। प्रत इन सर परिठयों
यो पसमाप्ति से शाम में सहायफ पक्सि का नाम देना
मधिक युषित सपत प्रतीत होता है ।
मगवत् सपा
पर भगवा प्राप्ति राएर मात्र साधन है नगरत्

कपा। मानब के सव सरकम, मोग प तप, मान पोर सम्पूर्ण
भगित मी पवि मीव को मपवरफपा का अधिकारी महीं पना
समती तो सर पथ है भगवत् कपा के लिये पावश्यक है कि
कि जोन में ब्रह्मन प्रति मिनासा हो ऐसी मिासा जो
मृत्यु
के मनम्सर मी सव भावेम उसी को अपना अधिपति स्वीकार
करे, मवा उसकी प्रनम्स सरित के प्रति मयोत्पम्म हो । प्रत्यक्ष
स्म से भय ही उस प्रनम्तशक्ति के प्रति प्रथा उत्पन्न करता
है। पटा का प्रामार है विश्वास अपने पर जिस व्यक्ति को
मरोसा हो और उस को अनन्त शक्ति पर मिस विश्वास हो
उसी में उपयुक्त रूप से भया उत्पन्न हो सकती है। सच्ची
यया एक बार भनन्त पारित पर पूर्ण विश्वात पूषक की जानी
पाहिये फिर तो मीच स्वत हो पुकार उठता है प्रब का
राम भरोसा सेगबीव को उस पर भरोसा हो गया पौर यह
डान भी हो गया, कि वही सब के कार्य करता है।
'साहिव होत इमाम, कपा करे पुना कारनु संवार ।"
भगवाम दयामु हुमा पौर भक्त का काम बन गया क्योंकि
उसी मे तो कपा करपे ध्रुब पौर प्रहलाद का मी सवार किया
पा, लेकिन यह कृपा तमो हो पाटो है जब भगवत् विश्वास
से भपपत् प्रेम उत्पम्म हो पौर प्रेम की यह तड़पन घनीभूत
होकर ममायास ही ममवाम को कपा कर देने पर माचार
कर देती है जिस पर यह पा हुई, उस का तीनों मोकों में
प्रादर होता है, यस्तुत हरि कपा से ही वह सत्संगति प्राप्त
11 ३८, ९२ ।
22. २२३,५०॥

होती है जिस से मन मस्ति में स्पिर होता है। इसी से
भन्यत घोति मिलती है । सत्सगति हो गया नीच का कोई भी
कार्य मगरकपा बिना सम्पन्न नहीं होता। और जब हुए
पिात मिल पुरदेठ, और यह गुरुदेव ही तो भगवान से मिमाने
वाह है। इस रनि में साधन साध्य म भी उपयोगी प्रवीत
होता है। इस प्रकार पीव का वास्तविक साम्य भौर सापन
मपबकपा की प्राप्ति ही है । इस लिये सब स समस्त सहायक
पारित भी भगवत् कपा को ही माना जा सकता है।
सतगुरु
सम के स्वरूप, गुण एप कार्यों का विवरण मन्यत्र दिया
गगुका है। यहा स्वल इतना ही कहना है कि गुरु पारम्परी
न होना चाहिये गुर पपमाने से पहिरे पछी तरह पहिचान
कर रेनी पाहिले, कि यह सरगुरु ही हो। ऐसा ससार मिसने
स्वता बह्म मनुभूत कर सिपा है, पोर इस प्रकार माया
निमिष्ठ यह दूसरो का एप प्रदर्शन गरे । गुरु के गुण उस्कृष्ट
वम मामय के मुम कहे जा सकते है। मोर उस के कार्य की
महत्ता को पनुभव काके ही कोर मै उसे गोविन्द से भी पहिले
प्रपाम लिया था।
'मुर गोबिन्द दोनों सर, कामे मागों
बलिहारी गुरु प्रापमे, मिन गोविन्द दीपो दिसाए ।
बस्नुत विश्व में गोबिन्द का प्रतिनिपि मरगुरुको ही मामा
पाय।
31१२५११

( ८६ ) पा सकता है इतना होते हुये भी यह पीप का निरन्तर पप- प्रश्धन करठा रहता है तथा वैयक्तिक साममा के रूप में माम देता है। राम पदारयु पाइक कबीरा गांठि न सोल्ट । मही पहणु नहीं पारमू महीं गाहक नहीं मोलु ।' वह नाम इतमी प्रमूस्य बस्तु है कि संसार के वागार में ससे पहिषामने वाले बहुत पोरे हो प्राहक है पर सम्मान कर रसमा चाहिये । कि उनकी हरि के माम विनु किनि गति पार' एक मात्र यह माम ही तो मामा पौर यम से जीन पी रक्षा करता है। इसी में उम्मीन होकर पीर परमात्मा का सहबास प्राप्त करता है। क्योंकि निम्होंने 'हरि का नाम म तिमा उन्होंने तो म्पप ही मोरन गवाया पौर , मरकाहि परहि क्योंकि 'राम माम विनु मुकसि न होई निसने राम नाम का रस नहीं पोया, उसकी मिखा येकार है। जिसने उसका नाम नहीं सुना उसके कान अब क्यों म गये । वस्सुव ससार की सम्पूण सम्पत्ति से मो कहीं अधिक मूल्यवान है, 'बहु धनु मेरे हरि के माउ ।। इसलिये संसार में मिर्घनमी परिमापा इस प्रकार है- 5२३। 8.६५४ १। पू४८२,२५॥ 8 I 9 4६५४ १॥ 10 सोल। 11 ११४०,१

प्रव
'कही कधीर निधन है सोई।
माके हिरद माम न होई 1121
इस माम के स्पस्प का नाम हाना भी
कठिन है क्योंकि यदि राम नाम की गति मही कसे उतरसि
पार । और यह गति क्या है ? 'राम कहन महि भेड़ है
ताहि एकह विधार।" ताते रदस्त का तोक्योर ने विरोम
ही किया है क्योकि यह मामासम्बर मात्र ही है- माम
सेने का रहस्य यही है कि भगवान् के उन गुणों में जीर को
मपने हृदय को तस्सीन कर देना चाहिये । ऐसा राम माम जिन
दामभरों से बना है 'ए दुर प्रसर म सिसहि। इस मबर
मसार में यह दो पारद हो पमपर है। इसका महात्म्य दोसमा
है कि म वम नाम लेने वाला मुझ ही धन्य होता है अपितु
दिहि किमकी वापुरो पवित्रु होइगो प्रामु यह कुस भी सापक
हो जाता है जिसमें भगवान का नाम भने वासाहरिदासु
त्पन्न हुमा है। नाम स्पी हीरे का म्यापारी ही वा सम्मा
म्यापारी है। उसी मनुष्य की देह सा सुग्दर है विपन नाम को
माधार पनामाचक नाम गिना जैसे पुरज दुरूप " पोर
ऐमो देह पिर भी तो नहीं ह सकती क्योकि 'रितु पटि राम
म पर फूटि मरे मनु मोह। इसी सिये उसने भी दो प्रसाद
हर पादुदराया था।"
13 १ ११०२.१॥
15 रोज १७१।
17 4.1
14 गो१५०१
18 101
18 १५५३,५५

( 5 )
'मोकल कहा पढ़ापसि पाक्ष माल,
मेरी पटीमा मिसि देउ मिगोपाल,
महीं छोड़ से बाबा राम नाम ।
मेरो पर पड़न सिउ नहीं कामु ।।"
ससार की सब पढ़ाई पोर सब काम नाम मेने ही में
तो निहित है क्योंकि उसके विमा गीय का जीवन ही बकार है।
यह है नाम का महत्व मौर स्वरूप । भगवत् प्राप्ति में साषम
के रूप में माम माम का प्रनवरत प्याम ही बप कहलाता है।
'कबीर सूता मिपा परहि, उठि कि म अपहि मुरारि सोते
हये गीर को सर्तक किया है कि मय पर अप करने का समय
है तर सोमे की क्या प्रावश्यकता ? क्योंकि इस क्षणिम नीवन में
पोरी देर बाद ही सो 'ताम्मे गोर पसारि' सो थामा है।
सासारिक मोह माया में उमझा बीप प्रभी सुप्लम मी म पाया
पा कि कवीर मे पुन मसकारा।
'हरि का मामु म गपसि गंवारा।
किमा सोचहि बारम्बारा।।
पौर यह अप मामा फेरना मात्र महीं है अपितु हरि गपि हिरदै
माहि कहकर उसने भगत के वास्तविक रूप से परिचित
करवा दिया । ममम्त जीवमो तक उसके उप में सीन रहने का
संदेश दिया है। मग माम के माम्सरिस उम्पारण की भी
पावस्यकता न एकर केवम स्मरण की भावमा रह गाती है
तब माम सिमरण में परिवर्तित हो जाता है 'कांगप मिठ मनि
19 १११६४,४।
20 सोक १८
22.सोडा
21 १६५२,७॥
1

।
पाऊँगा और यम प्रामक रोगों से सौंप से पायेगा इस
मिये सम्पूष सांसारिक सुखों को छोड़ उन सवसे अप्ठ 'हरि
सिमरन दिन बाई' नहीं तो 'नाम सिमरु पयसाहिगा मन "
मांसारिक विष को घोरकर मामाठ का प्रास्वादन करने की
प्रेरणा देते हा कवीर ने कहा है-
'राम मिमरि राम मिमरि गम सिमरि माई
राम नाम सिमरे विन, बूढ़ते प्रपिवाई
इसके बिना मधिक मोग तो भवसागर में बसे हो जायेंगे।
यह सिमरम हो तो ऐसा विना नपा दीया है, गो काम,
कोष
पारि विकारों के सम्पूण अन्धकार को पा से उखाड़ फरता
गिह सिमरनि सेरी गति हो ।
सो सिमग्न रस्तु ठ पिरोह ॥
इममिये 'जह मिमान तेग बाउ बमार हे जीव 'सो सिमरन
प्रमदिम दिउ ""म सिमरन को प्राप्त करने का स्याम भी
बता दिया है । इह सिमरनु सतिगुरु ते पाइये' पौर रात दिन
उटरो बैठो प्रत्येक समय म्यक्ति जो सिमरन परता है वही
हरि मिमरनु पाइये संजोग' मामय जीवन का उद्दश्य ही भगवत
मिसन है और प्रमबत सिमरम उसका साधन । सिमरम का
भा परमावस्या तक पहुंप पर आप को 'अन्तरि लिग
मापे में यह भगवान में एसी वस्सीनता है जिसमें पाक्त
सिमरण वो क्या प्रपमे पाप को मो मुसा देता है। और भी
यह सम ही मुस पावपयोंरि उसा सम्पूण पोक तो मिट
-.:7 ७१,
29.३४० ४॥

(१०)
पुके होते हैं। प्रतः कवीर अपने अनुमर से गोर को विश्वास
दिलाता है कि मेरी २ छोड़ कर फेवस 'राम रहह मिब
मात इस प्रकार माम उसका सप एवं सिमरन तमा उसमें
मौ मगाने का महत्व बताया है। बरसुत यह मो (उस्मीमता)
ही भगवत् भक्ति है मत उसका स्पस्म देखना मो पावश्यक है।
मक्ति
कह कबीर भगति करि पाइमा ।
भोले भार मिसै रघुरामा ||"
मोमेपम से मरीई भक्ति से ही भगवाम मिल सकते
इसी मिये 'बरम कमल माके रिदै बसहि यह मनुप्प कमी
नहीं गेलता, अपितु सर्वच मुनु पार्वम् इतना ही नहीं, मक्ति
इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विमु हरि मक्ति म मुक्ति न
होई-पोर मह मक्ति ही है जो मूम में कस्तुरी बत् पीव
में मन्वहित बह्म को उद्भासित करती है। इसी कारण तो
उस नगर से वह निर्जन स्थान ही भमा है "गम मगठि गिह
ठा क्योंकि भक्ठि रहित स्पान दो यम का मगर है यही
कारण है कि कबीर को उसे कोसमा पग।
'मिह मर राम ममति नहीं साधी।
पनमत करा म मुमो अपराधी॥
भक्ति न करने वाला पपरापी गम पाते ही मर क्यों
म गया ? भक्ति के विमा प्रत्येक पर बेकार है, पत उस घर
30.११६०, १४।
31 १.३२४,६॥
821८२७१२ ।
33 हो।
34 श्योक १५१।
35 1 ३२८, २५ ।

( १ )
को पाग लग जानी चाहिये हि नाही हरि माउ" पर का
ही मया कहना ? मस्ति करिना तो मानम का गीषम हो प्यय
है। इसी सिये वीर म पढ़ने से योग को भसा समझा पा
सेफिन मस्ति पाकर मह उठा, कि वह उसे छोड़ने को तैयार
महीं 'भाव दि सोगुम पक्ष भक्ति की युति माननी
पापस्या है क्योंकि उसके रिना मुषित नहीं, और जीव
मांसारिक मोह-माया हो में ही फेशा रह जाता है । उसने
पारम्परी साधु मानविय पति को भव-सारक नहीं माना,
अपितु कोई मोव मन-पार नहीं हो सकता जब हम-'भगति
भारती रिद न भार" चोर की नारदी भक्ति शास्त्रीय म
होकर मनुमय है तमहीने इसका विधिवत् शिक्षण में पाया पा
पपित नहीं यह मुमा होगा कि भारदी भक्ति ही ममतारक
है मम्मपन समिमे उसका उस्स भी कर दिया। सेमिन
पनीर को अनुभूत मति के सभी तत्व शास्त्रीय भक्ति मे
अभिन्न महीं । 'मन परे विमु भक्ति म होइ" इमसिमे बिरसे
प्पति हो कि अधिकारी होते है। उमकी प्राप्त का स्पान
है 'सतगुरु और सर लिए पावश्यक है उसकी कृपा । यरव
पौर नामय इसके प्रमाण है।
गुर प्रसादी व मामा ।
मपति कशमि नहि है जाना।
सा मस्ति में यह भी पायायक है कि मास 'प्रमपिर
1001
381 4.४,३॥
40.
37 साल४५॥
39 ३६,०८॥

। ( २ ) रहे म कतई पार" उसकी कग्न सर्वच भगवान में भयो होनी पाहिये, उसका पापम भी उसने बताया-वाइमा मदर मनमा पम' बना मेना पाहिए " मी यह स्थिरता पा सकेगी। भक्ति की सबसे पहमी पौर की शर्त है पम यता की 'सरव विमागी मनु केवत राम' फ्योंकि पिस प्रकार कामी सरसों से न तुम निकमता है और न सम ही उसी प्रकार अन्य देवी देवताभी का पाभय छेमा म्पप है। प्रत एक मात्र पानी ब्रह्म को ही भगना चाहिए। घर वापर फेवस राम, पान देव सिउ नाही काम समिए एक हो ब्रह्म से अपनी मम्न लगा मेनी चाहिए, तपा, 'दूसरे मनहि म माना ना ।" सर्व पक्ति माम भगवान का मक्त प्रम्य देवी देवतामों के पर बाता हमा शोभा नहीं देखा, ऐसे दूसरे में मन लगाने वाले मस्त को भिकारसे हए कबीर कहते हैं- रेणीम नितम माग तुहि नाही। हरि तगि कत काहू के बाही। माको ठाकुर होई, सो गनु पर पर बात म सोही ।। क्योंकि वह 'भमि ममम ताहि को मन । अनन्यता के बाद चाहिये पूर्ण पारम-समर्पण और उसमें भी 'सीसु काटि फरि गोई॥" यह समर्पण उस पिसी हुई महती 41 .,२१ । 12.१ ३४४, १। 49... ३२४, ३1 44.१ ११९२, २०। 461 ७४। 481 २३०,५८। 47 श्रेष२५४ ।

(६३ )
नसा हाना पाहिमे यो पैर में मगने पर उस रमता दे, सचिन
पर में उसक घाट स कण भी पुम पर उसको उपस्थिति को
सूचना नद सार सांसारिक बन्धनो को त्याग कर नेत्र,
काम बामी तपा हृदय सनो इन्द्रियों से जोव को अपने मापको
रसो में ममा दना पाहिए क्योंकि-
'हम तुम ईमामा नहीं कोई।
तुमाह सुक्त मारो हम साई॥
पौर वह तुमहि घोरियामत नही दूजी" भगवान की
परलो बनसे हुए यह भई का पति भी हो रहा।" उसी पूप
पारम समपण का हा परिणाम है कबीर इतना मी महीं शाम
पाते कि 'पीप महिनीर बसे नीम महि बसे कि पीउभा ।"
लेकिन इस प्रारम समपण माप : मेह के लिये पात्रिक जित
नमा रहै एसो तापन की मी पावश्यकता है। इस तरपन
हो मगवान में पनवरत प्यान मगा रहना पाहिए मोर मक्त
चमी में 'पसपिठ रहे म कहु गाई" इसलिए तो कबीर
पहवा है कि राम म छोड़ीए, तमु भनु जाइत बाउ ।" यह
इस नाम को गो उसी मति का प्रापार है किसी भी धर्व
पर छोड़ने को तैयार नही। इसी लिये उसने हर एक को सदेश
या है कि पाठशाम पोमठ परी तु प्रनिरतात दपी।
48.
10.1 ११५५,२॥
521
4.४८१, २१॥
समा५४1
491४२,२२॥
51 1०८२३॥
63 १२४।
55 १०२।

(१४ )
ससार के सभी प्राणियों के माध्यम से भक्त भगवान को ही
तो देसता है इस प्रकार कबीर की भक्ति के प्रावष्यक तत्व है,
पन्यता, पूर्ण प्रात्म-समर्पस, अनवरत तापम और उसमें ही
एकाग्रता । एसी प्रेम भक्ति के सहारे ही मौकिक महारों में
सिप्त म होने पामा जीव भवपार पहुँच सकत है। धूप,
प्रसाद, जयदेव माम देख सभी मे तो उसका प्रायय लिया
पा।" इसी सिए तो पूर्व पम के संस्कारों के कारण समार की
निन्दा के भय को त्याग कर एकता पूर्वक स्वयं को उसको भका
में समा सिया 'राम स्वोरा रमि रह भवर पजे सब काम"
मही है कबीर को प्रमुभूत भक्ति और उसकी स्म रेसा ।
निकाम कमयप पीवन
'विह महमाग गसिप्रो मनि गाके कस्य प्रधान मपामामा ।"
मन में कम की प्रथामता पर विचार करने वाला व्यक्ति
हो सोमाम्प यामी है-पयोंकि करि करता उतरसि पार'"
काम करने वामा म्पक्सि ही भवसागर से पार स्तर
सकेमा, इसलिए कमक्षेत्र से परार मुख मही होमा पाहिए ।
प्रग २ कटवा कर मर जाना ममा है पर कई न घाई
सेत"। मीवम सपर्ष है। सत पसायन के विरोपी पे
पता उन्होंने दुस्ता पूर्वक सांसारिक समस्यामों का मुकावमा
करने का कियारमक सदेश अपने जीवन के माध्यम से दिया है
उनका पस्तिस्व पोर बीवन इस बात का बमम्त प्रमाण है।
57 १३३० २६।
58. श्योक २३६।
691५४ ।
60 L७१,१०॥
61 ११०५, 1
।

-
.
संसार समर से म मागने ले को ही उन्होंने 'सूरत पार
माम" सूर मठाया है। मोर, नामदेव पौर विमोमन की
तपीत को प्रस्तुत करते हुए इसी माप को पुष्ट करते हैं।
विमोचन के यह कहने पर कि इस 'छोपह बारे में ही माम
देवस्यों जीवन गा रहा है? नामदेव ने उसर दिया था-
'मामा कहै त्रिभोधन मुख से गमु समाति,
हाप पाठ करि कामु समु पीतु निरजमामि ।'
पिस को भगवान में मगाते हुए भी उसमे हायों से
काय महीं रोका था कवीर में भी कहा है हम परि मूत
तनहिं निस' मेन 'गोबिन्दु रिदै हमारे । इस प्रार
निष्कमप्यता का उन्होंने नियात्मक हिरोष र उसे
भगवत् प्राप्ति में महापा बताया है। पत गोप को कम
हो महीं सरम करने पाहिए मही तो कर्मभोग का ध्यान ही
बड़वा बायेगा, 'मुस्तुमरि करि सो रे मम" सस्कों की
पहिराम का सापन मा कबीरा मे मता दिया है कि, 'सत की
मन म घोहिये। गौर मे तो देवम उस माग पर पमना है
म्सी मिए तो हि मारगि परित गए पाथे परीवहीर,"
चनो माग पर ही तो समाज की मीर पम परी, मत मीर
को सत्कम करते हुए बावन उपप में यूमा रहना चाहिए।
सम्मों के साय २ सदयूमों का भी महत्व बताया है।
यहां हम पोर दूगु म पपरोपक शक्ति के रूप में बोव को
bsोर २१२१
05.८२,२६३
061 १६। 87 साल १३० । 08 को १६५
62८३४२,३४॥
१५.

उसके उद्देश्य तक पहुंचने में रुकावट गमते हैं वहां सस्फर्म
पौर सद्गुण मामन को ब्रहो मुन करने सहायक सिर
होते हैं । फसवान वृक्षों की तरह परोपकारी व बानी होना
यहाँ जीव को मम्र पौर उदार वमाता है वहा उन्नत भी कर
देता है। यहाँ जान में वर्म है पह्म मूठ में पाप विमा 'महाँ
मोमु वह कामु है यहाँ बिमा वह प्रापि । क्षमापारी को सो
भगवतुम्प ही बताया है । इस प्रकार मक्ति के साय २ मत् मुण
मौर सस्कम पफ निष्काम कमभ्य जीवम भी जीव को उसके
साम तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध होता है।
मान
मान के प्राडम्परों में पो हुए पणे पविजों नाम्हन
बामनों तमा मुस्पा मोमपियों का कबीर ने विरोष प्रबश्य
किया है फेकिन इसका बह मतमर महीं कि अपर कबीर ने
जान के महत्व को सीकार न किया हो उमने स्पष्ट हो कहा
है यह ज्ञानु वह परम् ॥ बस्तुत विवेक एवं निपार के
बिना पुस्तकी ज्ञान का उन्होंने विरोध किया। मेकिन रिमेक
का तो नहोंमे इतना महरम स्वीकार किया है कि उसे अपमा
गुरु तक कहने में नहीं पू" । वास्तविक नाम तो वही है मो
प्रत करप में ब्रह्म को उब मासित कर उसकी पहिपाम करवा
दे। मक्ति मार्गी कबीर का यचपि विशिष्ठ सामन नाम है
69 सो२२० ।
70 साफ १५५ ।
71 खो-१५५ ।
72.7 ७६२,५०
73.३४०,८॥

, लेकिन इस बात को भुमा नहीं सके कि बिना विचार किये नाम का भी कोई महत्व नहीं, मम्पपा वह घर पवम भारा' ही बना रह जायेगा ।" पन्तर मान ही यह प्रमूस्य पन है जिसे पार नीरवास्तव में धनी बनता है क्योंकि उसका 'सिना मामामा भमुपूका । इस प्रकार- 'बीमठ चितु मिरवन लामा । कहावीर सौ मममन पाइया || पस्तुत कीर का माम पुस्तकी शाम म होकर स्वत उद्भव मात करम का शाम या। मान के पाश्रम के बिना कोर की मस्ति सशस्त मी प्रबलित, मारम्बर पूष भक्ति को प्रतिश्यिा में यह उसने अनुभव किया पा। इसी लिये वही उसने अपनी भक्ति को निष्काम कर्मम जीवन से प्रह मानसंपरमधील दैनिक जीवन का मग बवाया पा। वही स्थापी भी किया। उसे मान के सम्बल से सशक्त एवं भक्ति की प्रभानता होते हुए भी उसमे मान, भक्ति और पर्म वीनों का समुपित समन्वय र मह त्रिवेणी प्रवाहित की यो युग-युगान्तर तक मेडन का परम मोत बहाये हुए है। प्रत वीर के साम्य प्राप्ति में सहापर काम का महत्व सुमाया महो पा सकता, क्योंकि शाम हो ता यह भूप है जो भक्ति के पपको प्रायोपित करता है। योग 'परवर एक प्रसन्न र पासा पृहा पत्र रस भरीमा । रह पमित की बारी है रे तिनि हरि पूर करोमा। 131 (६,३। 78.१०२.१॥ 771 ३२६ २७॥

( )
बानी मामी रे
राम की कहामी,
अन्तरियोति राम पग्गामा गुर मुहि विरी मानी।"
मम्मवत' कबीर अपने प्रारम्भिक भीवन में योगी रहे
थे। प्रपदा उनका योगियों से सना घनिष्ठ सम्बन्ध पा
कि मे न केवम यौगिा क्षम्दावमी पपितु मौगिक कियाों से
भी बहुतायत मे परिचित पे। उनकी वाणो इस बात का प्रमाण
है । 'युग' (गोड़ना) से योग शम्द का प्रर्प हो मोडना , मारमा
को परमात्मा से । इस पम्याम्य साधन है शारीरिक श्मिामों
द्वारा बमात् इनिर्मों एवं मन को वश में करना ही हठ योग का
गप्प होता है क्योकि 'मनु गोते मगु मोतिमा । "इतना ही
नहीं उस पवित्र मन के पीछे तो स्वता भगराम भी घूमन लगते
है। और ऐसे ही पवित्र मन पामा भीष ते सीन पीर से
शिम में परिणत हो पाता है। वृक्ष घरोर को उसने समझ
लिया है तमी उसे "रामा राम की कहानी," का पता लग
गया और यह मो मात हो गया कि यह परीर ऐसा है या
महिम्मोति करे परगार" सब नाटक से उसमे संसार का काम
प्राप्त कर लिया ब्रह्मरन में कुमिनी की पावी द्वारा उसमे
प्रदर्शन करने का प्रयत्न किया है। नप दारों की गलियों
को रोकने से ही यह मम्भव है। कोई विरमा ही ऐसा ईपो
वयम द्वार वक पहुँच सके पौर प्रमहर माद को भवण कर
781 ७५६.
79 १.११०३,२।
80 पोका
811 ५४४,१५॥
8 ११०,६१
881 ११५ १९
841३४१, २४॥

(t)
राम रसामृत पान करता हुमा उसी के मानद में तल्लीन हो
गाये।" परपक्र में अनुभूत ब्रह्मा के कारण हो उसकी द्विविधा
का नाप हो पाता है इस प्रकार पर उगवै सूर' सपा मगातार
महिनिसि गाय मनहर दूर' तब जीव ने 'देसिमा सिह मोक
का पी- मिस योग का मारमर समाज को वियमित
कर सकता पा उसका कबीर ने रविराप किया। लेकिन
वास्तविक योग देह भी पुष्टि पोर मन की एकाग्रता के माध्यम
से ब्रह्म प्राप्ति में सहायक मिय हो सकता है। इस बात को
उसने स्वीकार किया है। इन्द्रियो पोर मन को नियन्त्रित
किये बिना पनम्य पोर प्रमवरतभक्ति हो भी कैसे सकती है।
पता साप्य प्राप्ति में कबीर को योग का विशेष सहयाग
स्वीकार है। हो यह स्मरण रहे कि उसन इष्टदायिनी दुरुह
पारीरिक मापनापो का गिरोप कर महब-योग का महत्व
स्पापित किया है। सहर' मु तात्पय हा उस योग का है
गो पपने पाप में हा दुसाध्य साध्य म मन कर इनिक जीवन
मा क्रियात्मक प्रग बन सा जिसके लिये मिवृत्ति मार्गी एक
निममय जोबन म्यतोस करना प्रापदपक महीं अपितु
प्रवृत्ति मार्गी होते हुए भी जो सहम ही मोव को इस साम्प
सोपोर ममसर परे इस सहज में सीन हान पर हो जोव का
प्रम नष्ट होता है सपा कापपूग होता है ." दस सहमसारण
ही मरन जीपम को सपा मासी परिणाम स्वरूप पोरी.
85 1१४, २३॥
86.३४,१३॥
१२, १५
86 1 ३४१, १३॥
87 १ १९६४,६॥

{ १००) उसका 'मनुमा सहषि समाना । इस प्रकार सहन योग साप्य प्राप्ति का उपयुक्त साधन है। पवित्र मन मन बीते मगु बीतिमा" मन का महत्व तो इसी से स्पष्ट है। मत साध्य तक पहुँचमे में पवित्र मम का विशेष सहयोग है। मन को पवित्र करने के लिए उसे नियन्त्रण में ज्ञाना मावश्यक है मत "कूटम सोइ यो मन को पूर्ट। मम स्टे व बम से छूट।। पवित्र मन न बम पम से रक्षा करवाता है पपितु भगवद- प्राप्ति भी करवाता है। और अब 'मनु मिममु माया, तो पाचे मागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर ॥ पवित्र मन के पोधे तो भगवान स्वत पकर काटता फिरता है पोंकि पविण मन तो समत. ही भगवरस्म को प्राप्त हो बाता है। सस्समति मन को पवित्र रसने के लिए सहमति मावश्यक है, 'सत संगति रामु रिच मसाई म केवम पठना, उसी से तो 'मुकति पदारपु पाइए और वीर का भावागमन के बफ से पुटकारा होता है यह सत्संगति ही पहिले माया से रक्षा करती 80 प्र. ११५८,41 90.५.११०२, २ 911.०२.१.। 92.पोक। 94६६११॥ 4.यो २१ (१०१) पुन- 'सति सगति मिली विवेक बुद्धि होई, पारसु परसि मोहा कंपनु सोई। उसके बिना तो यह ससार बमती हुई मट्टी है जिसमें मुपसता हुपा गोर म कमी धान्ति हो पा सकता है मौर न ही मवपार पहुँच सकता है। मिस प्रकार कोई भी मदी मंगा में मिल कर गगा ही बन जाती है उसी प्रकार- 'सम्तन पगि कबीरा विगरइमो, सो कवीर रामै होड निवररामो।" सन्त समागम से कबीर तो राम ही हो गया था। मरिहरि ने भी तो रहा है "सत्संगति कयम किं करोति पुसाम्' जीव का कौन सा कार्य है जो सत्संगति से सिद्ध महीं होता। प्रसः सत्संगति के महत्व को समझते हुए कबीर ने 'कबीर एक पड़ी, भाषी पगे, पापी हूँ ते माम, भगवन सेती गोसटे जो कोने मोसामा" पाण मर की मत्संगति भी पीवम को सफल बना देती है। इसी सेतो ब्रह्ममय वातावरण बनता है सत्गुरु की प्राप्ति होती है- -नाम का प्राधार मिसता है सलम तपा सद् गुस्मों के माध्यम से चौवन का समुपित विकास होता है मोर पोष ब्रह्म की पोर महता रहता है। 95.४८०, २०॥ 96.१११०१०॥ 97..११५८,२॥ 98ोड २१२ 29...२०७ हरि सवा । 'मृटनु हरि की सेव' । मव यम्धर्मो से छूटने का उतष्ट साधन है हरि को सेवा । क्योंकि पो सुमु प्रमु गोविन्द की सबा, सो सुनु रानि म महिए'। सम्भवत इसा मिए- 'स देहि कर सिमरेश देव। सो देहि भगुहरि की सेव ॥1॥ देवता भी दोहरि की सेवा करमे लिये ही सस वेह को प्राकक्षिा करते है । वस्तुत 'मानस बनम का एहि माहुल मामन बीमम का यही तो उद्देश्य है। इस प्रकार मामय देह यह भोमन हरि की सेवा के माध्यम से भगवस्त्राप्ति में विशेष सहायक है। बोग का प्रारम विश्वास अपने पति करण में ब्रह्मानुभूति तथा उसक मनफून प्रापरम ऐसी प्रबम माम्तरिक शक्ति है वो पनायास ही बीव को प्रमोग्मुस बना देती है। अपनी मास्मा की पूकार का मनुकरण और कुछ महीं, केवम प्रमा की मात्रा करवा का ही पालन मात्र है। क्योंकि पारमा की पुकार के विषय कुष मो करमा भगवान से दूर मामा है परिपाम सम्म प्रपनी पात्मा की पुकार का जीवन में निमारमक मनुकरप भगवद् प्राप्ति में मामय का सहायक बनता है। इस पद के लिए भगवसपा की मानायकता है, क्योंकि भगवत्याप्ति के सम्पूण साबों में यह महत्वपूर्ण प्रमम तपा अन्तिम सापन है भयवरुपाक्षेप सब सापन तो पोपपारिक 100 ३११४८ 101 प ५१५५

मात्र है, यदि ये भगवत्कृपा प्राप्त करने में सायामही हो
सकने, हो इनका कोई मृत्य महीं। सामों से प्रापरत्व का
सधार करने वाली यह भगवतपा है सेकिन यह किसी सौमाग्य
भाभी को प्राप्त होती है सो सिए मम्याग्य प्रमों पर
"सारिंग पर सो भिमे मो र मागो रे ।
पौर जिस पर मपपरकपा होती है वही सो सौभाग्य पामी है।
संक्षेपस. पूर्व जन्म के प्रति पुष्पों
पार गीत
एस सस्कारों को प्राप्त करता है जिससे वह सम भोर
सदगुण परक वातावरण में पनपना प्रारम्भ होता है। ऐसे ही
ममम सत्सगति से उसे कहीं सरगुरु मिम वाता है जो माम देकर
गोप को प्रनम्मर मनवरत भक्ति में मगा देता है। बीरम
पर उसका पप प्रापन करता हुमा से निफाम कमप्य भोगन
उपा सलाम करन को प्रेरणा देता रहवासी से पसका
पन्तमम पवित्र हा पारमा की पुकार का अनुसरम करता
रहता है। एसा भोग हो कमी सौमाग्य से ममता को
प्राप्त करता है। मोर भगवसपा होते ही जीव का मस्तित्व
परमानन्द में तिल हा गाता है। यह है भात के जीवन
मग शिरिष्ठ पम पिया
*
12.८६

अवरोधक शक्तियाँ
मानब बीवम सपर्प है और सम्पूम ब्रह्माण ब्रह्म का
मीसम्मेष। साध्य का मान होन पर साधक साधनों की
सहायता मे पम पड़ता है लेकिन पटकाकीम मार के दुर्मप्य
प्रयों को भूम कर, मर सागर की पत्ताम सरगों के पेड़ों
का मनुमान न कर। सम्भवत इसी मिए कि मानव सुम,
प्रसन्नवा पौर उन्नति पाहता है, पर उसकी कल्पनाएं सुमर
पाखामों के सुन्दर प्रासादों का ही निर्माण कर पाती है,
प्रसय पुगम बम-बगों की महीं । समुद्राभिमुखी प्रत्येक पहानी
झरने को न पामे कितनी पट्टानों को यहा देना पता है म
भाने कितमी पर्वत पपमापों से टकर देनी पड़ती है तब
मी प्रसंस्स झरनों को रेगिस्तान प्रारमसात् कर मेवा है पौर
उपयुक्त सम्बन पाने वाले कुछ पोड़ से ही समुद्र तक पहुँप
पाते है-यही मामय की कहानी है। ठीक एसा ही उसके
जीवन का मी मग है। भगवाम् मे सीमा रचाई है, उसमे
सेखना को है। इसीलिये प्रपमे पौर पीच में एक माई र
दो है गिसे भरने में भी गीच प्रयत्नशीम रहता है। लेकिन
बह ऐसा होने देमा नहीं पाहवा, पर्योकि इस से सेम समाप्त
हो पायेमा, इसीलिये उसने संसार की प्रवसवम शक्ति 'माया'
को मेगा उस माया मे मीव और प्राणो मात्र कीटो पिसात
ही क्या-

(१०)
'जोर बसम है वाइमा
भौर 'प्रति पापु सिसाइपा।
उसने म केषप्त 'ब्रह्मा विसनु महोदेव सिया' अपितु
देवतामों पर भी अपना
प्रमार यमाया, देवताओं की
वो बात ही क्या उनके भी प्रषिपति नको गौतम परली
पहिल्या पर मोहित होते हुए देसो पोर इस से भी बा
कर स्वत ब्रह्मा को भी अपनी पुत्री के पोछे मापते देखा,
मामाराससार तो उसी की व्य विद्या का प्रसार माम है
मौर रह सपनी' ऐसी है कि 'मसमु मरे तर म रोग क्योंकि
'इस रसबारा पररो हो रहदो ऐसी सहायमी बयत पिमारी
है वो 'समले निम बन्त की मारी है। सम्पूप बहारको
पोहित करने वाली यह 'गमनी मुपटा गहिमो,' समर की उस
मामिनी की तरह पापप गिसक रोष में तो सह पर
वास सौन्दर्य से उसमे सोते को मोहित र सिमा है। सपिभो,
परिमी, पोरटी पादिन याने उसके तिने हिप्प
मुखिमानों मे रेते, मुझे और अनुभव किए हेकिन फिर भी
उसके बंगाल से म प सा 'मामा , देसन को
'रम महि मीन, दीपक पतंग, काम पर पसी मृग, पौर
पीप बति समी को देखिये, इतमा ही महीं 'सागर इन्द्र
परवेर' मी तो माइमा रे येरे ही शो 'योमियों के यहाँ माया
जीरो सास बन गई है। शानो, भ्यानियों को परमे प्रमाम
।१ ११४,३॥
3rt,६॥
A६३३५,७॥
१४८२,२५॥
. १९६० १६॥

. के प्रकार में ऐसा सपेटा है कि नहें सत्य का कमीशम ही महीं होने दिया । भोर यह इन्द्रिय सुम को ही वास्तविक मुन्न समझ मैठे हैं। माके नैन सबम मूनि पाके पानी सुन्दरि कादमा मेकिन 'एक म पानि माइमा।' इपिये जीव को मत किया है कि, उसमें लिप्त रह कर 'कों पिापा जम्म गलाइमा पह माया ही, मो नीव को माम रहिम करो। 'कनिक कामिमि मागि' बना देगे है। सा चम मौर कामिनी ही तो संसार के सम्पूर्ण, भाकपप, मवगुण सपा दुष्कर्मो के उत्पादक है । इम्ही से काम क्रोज पोर मोम उत्पन्न होता है। जिनके भ्रम में फंस कर मान प्रपना अमूल्य जीवम गंवा बैठा है। कौमसा एसा प्रवगुण या दुष्कर्म है गो माया नहीं करव। वेती ? कौनसा ऐसा प्रानी व स्पन है शो इससे प्रभावित मही, प्राणी मात्र के गमे में उममे तोक' पौर पगें में ऐसी पेड़ी गम रक्लो है कि वह योनि प्रमण के पक से भी मिकम् ही मही पात) । पौर मगत पिमारी के पक में पड़े हए को मगवत्प्रेम- को सुप ही कहाँ। इसीमिये मायापी कमी मुक्ती, मही ६ मग पार पहुँचने के लिये इस माया से पटना मावश्यक है, मदिम 'विनु बैरागुन पूर्सि माया'" पय प्रर्दश गुरु की कृपा से गोग उसके बाम से बच सकता है, प्रनहद सुमने वाम योगियों के सर स बह दूर भागने मगी, संतो न माया मटी को मय कर उसका सार ही निकाम रामपोर स्वत 7 १६९,१1 8 १३४1- B.४२,२७॥ 10 1११०६,११ 11.३५,८। 12.१२२८, ३४। 18 १३३४, ५३॥ 14 क१८॥ - 11 पाता T ܐ -

1
,
(( १०७१)
माम्बनु खपमा तथा समार पाय धादि पीएस प्रकार
भारे ससार को पुगने वाली पारी मामा से एकए
मुस" जिसन माइमा' प्रम को ही समाप्त कर दिया है,
बल्कि गुरुकर मार पारी माया न रबीर को हो प्रणाम
रिपा
माया के प्रमुख पात्र हैन पौर कामि! । कपन
पका पोष कर देन मामी यह पनै नगि है विमरे मोम में
गीय ससार का प्रत्येक कुकर्म करने की तयार रहता है।
उससे उत्पन्न मेहकार मानव को दान बमामे में पोड़ा भी
विसमा मही करता लेकिन यह म भूमना चाहिए कि रावण
की मुरण षका को उसने मतिनो देर मगो या" यही नहीं
ससार की सम्पूर्ण मुम्पास कितनी प्रेस्पिर" मन मश्वर है
और गाते समय बासी हाय 'हम इलेषा पाद" पोर मूरणु
रावनु किपा के गामा कयोंकि यह तो प्राणी मात्र मे ही गि
भानु मांगे माता' है।" मांसारिक मम्मनों को सत्यता में
कामिनो मोह को वर्गम किया गया है, वीर तो क्या ब्रह्मा तक
को विपतित कर देने पालो यह स्त्री का कामिमी पहा है।
गिस मतों में और विशेष कोर में भर पेट गामा
पोंकि यही सब दुगुणों की मान है। पोर में भी वादा
से नही पिा मा ममता मिनी प्रमोमवस्त्र भो मही
--
मा...
16.2.३२१४ ।
-
.
171.४८१
1

१०) हो सकता क्योंकि भगवान को तो मनम्म भक्त की भावश्यकता 'नारि मसावै टोन गुन, यो मर पासे होए। मपिठ, मुक्सि निबध्यान में, पैठ सके महीं कोए । भौर मानर बीवन में क्षेप रह ही क्या जाता है। माया, कंचन पौर कामिनी के प्रार्पग से मन को विस्त कर देती है। विकत मन इमियों पर नियन्त्रण म रस पन्हें निपम गामी ममाता है इसका प्रधान पाषार विपय और पासना ही है। मत उनका विरतपण ही इस विषय पर समुचित प्रकार नाम सकेगा। विषय- 'निखिमा 'माह सुरति सुस मासा । बीग सांसारिक प्राणी है और उसे सांसारिक विपयों में ही सुन की माया है हो से होर है राजा राम निवास' सर्वक बीच भी पनामास हो वासनाओं का शिकार हो प्राता पासनाये मन को ऐसा पापो बनावी पाती है किसह- "हरि का सिमरनु पाटि महोई रासे मारि. तो भामहि होर मौतर भार सह मनपारि "तिना ही मही पब सय रसुतर मग नहीं मेहनिपप रस के हेति गहए अपरत्ने म संसा। इसी सिये तो कबीर ने मामा और भक्ति दोनों पत्नियों को एक साप पर में रसने का दुस्साहस न किया पाऔर भक्ति को अपनाने से पहिले 20 १३०, ३६। 21.शेक । १०८ 222. पृ १२८, २५॥

(१५) भाया की विसावमिदीपीकाम निरपेक्ष वीर का पनुमत मस्प कितमा महान है हमें यह म मूम गामा पाहिये । धीर गोवा बासनाकारमागरदे 'मो-गने सम्द्रको रंक: प्रमत्यु से घरमे पास बीपको कबीर ने भौर सकिया- प्रहरु योर पोरि बिसिमा रस इतु-मंगसि निहवन-मरमा इन्द्रिया- पिपयों के उपभोग का मापम है, इन्द्रियो । जयराम इम पर नियन्त्रणम हो, तब तक बीय सत्कम में नहीं सम सस्ता- पंच महापादर महि राहत तिम्ह का महीपति पारा। जनका पिनास हो भी से रवासमा-सित दे सम प्रापय स्यप है. माये पोप इन्दियो धर के पहरेदार नहोकर पाया पापों का कार्य करती है। मुमवत् परम पे हो रेहकी सपानिका पवित मतं इन्हें पा में परमा भारम्पक है, मन्यया विपक्त्-यहन्देह- मम कर-स काही मापकर देगी। नपरसोरको समकर न नाम सपनगा दिया जायेगा तमी तो मुक्ति की प्राप्ति हो पोपो। पपा बीपमनसे प्रमावित म होगा. मी 24 श्रे) 26३३८६३ 7१२२११४.। 28. 29* 192, 1. Rara Krishna 'Passiods cau't bt exndiested, there can be sublimated pr educated.' ' 23.४२,३१1 ( १९०) उसका माध्यात्मिक गायरन होगा पौर तिम्रो नाहि परम परे। 6 ग F TH मन TU । 7 'मन प्रोसे बगु मीतिमा ।' सम्यकामीम सम्सों में से क्रान्तिा को मे ऐसा पनुभूत सून जन-समाज को दिया, जिसे सम्मयत समती तो म प्रपमा सकी मेकिन मिस किसी भी गिरमे मे अपनाया, मही महान से मया। पावसाह के सोद्रीपाने में मादा सोलने गाने 'ममि पीते जगु मीतिगाम्प में इसे अपनाया पौर बह मुरु नानक बन गया । कितना महान है यह सस्प । पडू मम रे सा ? 'उस मन र म म मेलिया, गाई और स्म रेषा हो भी से. सकती है, जब कि, इस मन कर मही भावम भामा। इसीमिए तो समझ, समन्दन भी इसे म परि मह मम प्रति पचप है। इसो विधामों में उड़ने वामा पनी भाया पौर बिरस गरेरो नापसी को भर मग पाहे यहां मा माये। इसोभिए ता हापी की सरह मुख मन का सकरा मकति दुम रा' में प्रवेदा कैसे हो यह पेह की मांति सशक्त एवं संबम भी है । सक्त' होते हुए भी यह" चोरी करता है और वह गई को मूट में माता यह -मन ही गब ससार में लिप्त रहता है 3। १३, 33 1 ३३,३६ 361 ३३४ ६४ 37.११६२, ८। कासपके। -- ६४०१,२६। ४ 36.रसोर५८ ।

N ( ११ वो कह दिन पर नहीं पद एसे व्यक्ति के द्वार पर 'अमदीमा दमामा माईम इसलिए मन की पता को दूर कर उममें पिरती मानो परगी। पोर एक 'मन को मारने से हो सब दुप पर्ने पाप मप्ट हो पायेंगे ।'मा एक सलिमा पने' पते पारनरी सधूपों को सनक किया है कि सिर को न मूल पोपित मन को मूहों (पर्यित्र रो) पौर' योगियों को भी कहा है और मसार 3 मन पेट फूट ' क्योकि गारीरिक सपनों में मही गपितुं मन को नियन्त्रम में कर उसमें विकार पूरने से हो गोद यम और निपर्यो स पचने पर ही al'राम माम विष मागी' पर 'मन मारे विमु भगति म। हाइपौर मति विना मुस्तिका निमाप पड़ने वाले को। मही मन से मरने वाले मोही प्रसमी मुल्पा बताया है और इन प्रकार मन से मर कर जिममे 'मन साप सिदिहा पति बिसने मन को निमप्रित पर मिया सी मे सब सिद्धियां प्राप्त कर मी है और यह मिम मम ही तो हमन कति मनु मास गिन पोर मक्ति के समान सतra है और जिमन एसे मन को प्राप्त कर मिया पर तीमि माका कोबात कह ७ यह देख कर हो रवीर मे इस सब का निपो मानो वाणो में प्रमट मा या मनु योवनगु गीतिमा '" 38 391४१, २१॥ 40१E.० १०॥ 41 1 ३३२४६. 12.2.1 Pc 43 1 ११२६, ११ 14१३४० ०" 45. १ ३४२, ३५. 46.१ ११.३। - H .

महकार
'मी मेरी करते मनमु मामा प्रहकार की कहानी
न इसनो ही है मेकिन इतने में भी कुछ बाकी महीं रह
ता पौर सारा बीबम समाप्त हो जाता है। जिसे 'कुम की.
पानि' का पमप है उसे धीघ्र ही यमराम मसामि से
वा है।" मिसे सुन्दर देह का प्रभिमान है उसे कभीर में
म मपेटे हाईकर कर.सतक किया है। पीर कमक
मिनी महासुन्दरी पेसि पनि सदु मानि' उस प्रकार दो
इंकार का शिकार हुपा है उसे सुबई मका के मासिक
पग की वसा से परिचित करवाया है पह महकार ही
विकसित प्रतिभा को भी विकास प्रतिमा में परिणत कर
हा है और पीप ही मामयं को बिनायके गर्त में पहुंचा देता
- पस्तुत इस पहंकार की उत्सारिका मापा ही है जिसमे
इधम स्पाम कर दिया है। पौर स प्रम के कारण
, मानब गर्व करणा है 'रावन ते अधिक परपति बिन में
गये विमात ।" इसीमिए कबीर ने कहा है का मर
बसि पोरी बात। इस मह से ही 'मामय, मूठा विकार
हामद' पापि सम्मम इम्पों के साप साप पिक एवं मान
मष्ट हो पाता है क्योकि यह मुधि भम बारिणो इस
या के प्रम में बिसका मेरी मेरी करते पग्म गामो बह
7
9ो।
11tI
48.६१६६।
60११०४५
52.५ १०५१, १.

(१३)
प्रशानो महकारी पोर मिनमहि विमसि बार" अभिमानी
को उपब स बांस की वरद बताया, मो पाश्ववर्ती
पन्दन की सुगम्भ को पहन महीं करता। इसके लिये उपयुक्त
साधन भी बताया है। काम करत वर्ष महमे" और म
केबस पनि मनका मिान' पप ऐसे रो बनो, यो पपिक
को बुमे, अपितु इतने मम भी बमो 'जिट परनि महि
मेह, पौर मारम समपंग के लिए तो इस पह का मितान्त
विसन मावत्यक है क्योकि-
में माहि कम पाहि न मोरा,
वनु पमु समु रसु माविद तेरा"
इस मह के नष्ट होने पर हो भगवत् का होगी पोर
वमी भीव 'समु पयामि' सकेगा पौर उसो मिसमे का
प्रयत्न रेगा।
दुर्गव
'भोले भार मिसै रसुराश्या'
इसलिये-
परहन मोम पह सोका पाए ।
पर कामु, पोपु पई पार
बस मन इन गुपों के माध्यम से ही तो जीरो
मरमावा है पर उन्हें ब्रह्ममान से दूर जान में फंसाये रम्पता
54 1 ३३१०॥
55ोर१२॥
० १ ३१,६।
57.४७॥
58,१३६, ..
59 1४८ ॥

( १९४ )
है। काम कोष, सोम, मोह मादि विकार ही तो मानव को
पप भ्रष्ट कर देते है। और इसलिये शोघ्र ही उन्हें काल का
प्रास बनना पड़ता है। पाप करता मरि गामा' पौर सत्कर्मों
के विना दुप्फर्मों से मोबन का भार बता पाता है और यह
पुतन्या इतना मारी हो जाता है कि मानन भवसागर के पार
नहीं पहुंच पाता। इस प्रकार दुष्कर्म एवं दुगुण ही मामय
के जीवन के लिये प्राह के समान है।
दुस्सगति
'मूरस सिर बोसे मसभारि।
क्योंकि धोसत बोसत बढ़ विकारा'
इसलिए भताई इसी में है, कि- मिस प्रसस्तु मटि
करि रहिए विद्वानों ने सम्मवत इसीलिए कहा है कि मूनों
अपवा दुष्ट मनों से म मित्रता रखे और म पर ही। क्योंकि
दोनों ही प्रवस्पामों में पनिष्ट की सम्भावमा है। 'वासनु
कारो परसिए तन का लागै दागु पोर इतना ही नहीं
उसके पास एकर के तो जीप की मबस्था बेर के पास रहने
वाले केसे जैसी होगी, 'उह भूमै उह पीरिए ठीक उसी
प्रकार दुस्संगति को भाहने वाले सत्संगति से ऐसे ही दूर भागते
से 'मासि बदन पर हरै, पह विगम्य तह पाई। उस
प्रकार दुस्संगति पह सवातावरण ही नहीं बनने देती मिसमें
रह कर पीव प्रझोन्मुप्त हो सके।
60 शोक २२१ ।
61 1 ८७०,१।
02.सो ११।
63 खोरमा
04 सोडा

3
पापासादर
"मापे विमा हपि माता बाना ।
सोगम रामु सिमीमा बाना ।।
कबीरम तत्कालीन समाग के पामिक सोर्गों में पोयो
पारि पणे, पुराण पाठी परित, मासा पहिन बामन सिमक
पारी ब्राह्मान, पेरपाठी विद्याम, घूस रामाये जोगी गेए पहिने
सम्पासी ममे सापु, पोखेगाव तनिक, स्पटी पुजारी, गोग
रेठे मुस्मा, कुरान की माय परते मौलवी, मुर्गी मारते काजी
तपा हज से भी लौट र पाप करत हाजी का दक्षा पा । उसी
परीप्त पन्त पामों मे समाग के रूप को ठीक से पहिचाना
पा, स्त्री पारण निरर होकर क नम्होंने पारमा को पुकार को
सरप की एसो कसोटी बनाया, जिस पर समाज के इन सब
धम उकयारों को परखा जा सके। उसन हाप माष्टर
सा वह मदतर मिया मिससे वह देह के गले मा भागमो कारण
गया मोर सर्य हो महरम पट्टी भी रखा गया, तारि समाग
की देह नष्ट महोपर स्वस्प व इष्ट पुष्ट हा गाये। इसी सिये
उसने रिस पणे को भटकारा उसे अपनो मोर प्रमुरक्त भी
रिसा, जिस परित को फटकारा उसे मया पाठ भी पढ़ाया
विस बाहान दुर दुरापा उसे निर्मस भी कर दिया जिसमे
पाठी को सराहा उसे पर भी चठामा, जिस पुगारीरो
पिसारा तमे पम्प भी र दिपा मिस यागी को दुवकारा
उस पुरणारा मा, जिस तोप यात्री का पुषकारा न दुमराया
भी, शिस मुस्मा का टा उस मपा मूर भी दिखाया, निस
6.८११८८ ॥

मीसवी को स्पटा उसे नया सबक भी सिमाया, जिस कानी
को पुगका उसकी माम दुरस्त कर दी, जिस हानी को भित्रका
उसको सीचा रास्ता दिखाया इस प्रकार पथ प्रप्ट जन-साधारण
को सुपप पर पसाया पौर समाग द्वारा ठुकराये हरिमों को
पके भगाया। इन कार्यों से ही कबीरा कबीर (महान) हो गया
मत उसके व्यक्तित्व के निर्माण में यहाँ इन बाझाचारों के
शिरोम का विशेष महत्व है वहाँ देश की तत्कालीन, पार्मिक,
सामानिक एवं रावनतिक विषमता से टक्कर मेकर मदम्य
पत्साह एवं साहस से उसका विरोध करते हुए नहीन समाज
के निर्माण का कामी उसी को प्राप्त है। उसमे रहती हवा
के सम्मुस सीना करके न केवल उसके देम को ही सहा या
पपितु उस दिशा में मागे भी बड़ा पा। महापुरुप का यही
बक्षम है कि वह स्वता परिस्थितियों के अनुस म रस कर
परिस्थितिमों को अपने पनुम समता पसे, प्रौर कबीर ने
मही किया। मीपे मिसी पस्तियों में इसी का विवरण मिलेगा।
पूमा
'यो पापर को कहते देव ।
ताकि बिरपा होवे सेव ॥
इसीलिए उसमे पत्पर पूजा का विरोध किया है क्योकि
उससे सरकामीन समान पिस्त हो रहा था मंषविस्वास ही
ऐसा । मत उसने कहा है-
'तोरत म पाती पूरठ म देवा।"
12.१९६०.१२।
2.१ ११५८

योकि उसने स्मत भी तो सीम बरस कयुरेव न पूजा
मोर पूवता मो क्यों ? पासान गरि २ मूरठि कोन्ही दे
घाती पाठ फिर भी उसके प्रति थया कैसे बाकी ह
पाती, मौर यदि ये एह मूरति साबी है तो पनहारो भाउ"
मोर उस ने कहा पा 'न पाया शेर्षे नमु देह इसलिये
उसको पूया वकार है। पूजा के लिये भूनो मामनी' पचे
तोरठी है, उसे महा है कि पm तो तन पोप के प्रेम है पर
विसकी पूमा के सिये तुम इन्हें तोड़ रही हो सो पाहन
निरजीत "बह प्रा रिसकी पूजा के लिये यह सर मारमर
है सर्वत्र हो विद्यमान पौर प रग रेस' रहिट है। मेकिन
मसार न तो पाहन परममुर कीमा' पौर उसी को पूर्व समु
ससार ।" यदि पग्मे पर ही म मिले तो पुमारियों के लिये
उसे प्राप्त करना भी पहा मासान मोर धनवानों के यहां
तो भगवानों के ही र ग मारे, श्योकि यह वो ठागुरु
प्रहि मोसि में, कितना सस्ता है भगवान् । हेकिन कबीर
काममान तो इनसे भी सस्ता है। उसके लिये तो-
'गा.पाती बिसनु गरी फूस सकर देत।
घोमि देर प्रतमि तोरहि कहि किसकी से।"
हे गोव ससार के सभी देव वा सर्वत्र विमान है मात्र
उनको पहिसानने के लिये प्रमापा मपेक्षित है। इस प्रकार
3.४०९११॥
७.१९९०, १२॥
B. १२६
10 ० १४
4,5.१४७६,१४॥
Trut
खोफ १२५

( १९८) -पत्पर पूना, तथा मूर्ति पूजा के साप २ महदेवोपासमा का भी पिरोष करते हुए बीब को ससक किया है कि 'यो म्पप ही 'वी देवा पूनहि रोमहि । मेक्नि प्रमग धोम बीर का 'मन वचरा रे', मो, 'पूरम पर यह देव अग्याम्म तीर्थ स्थानो में उसे माये सिमे पाता है। यह कबीर पर कोई विश्वास महीं करता तव मह पूबने पानों को कह देता है 'वत पूनि पूणि हिम्य मूए, लेकिन उसके हाप ध म मगा। इसमिये, उसमे वो एक मात्र, 'निरकार निरपानी पा की उपासना का संदेशा दिया। क्योंकि- मोहरि सा होरा धादि के, करहि पाम को पास । ठे मर दोगक पाहिगे सति मासे रविवास ॥ स्मान संधिमा प्रात इस्नान कराही। निउ भए दादर पानी माहीं।। सामाम्प म्मान की तो बात ही घो? यदि 'पतरि मैमु' है तब तो मेक के समाम, चाहे 'तीरप नाचे तिसुकुष्ठ न माना मयत बह तीरप प्रमना है अपितु को 'हठ वीरव पाहि" तपा मगा ती नो परु करहि और 'पीवहि निर्मनु मीर', यह सब सामाधार भी कुछ मही 11 १३१२,४ा 12 ११३५01 13 ५ .. 14.१५५०,21 15ोक २४२ 16...३२४, 171४९४,३७॥ 18.1४०६,५। 19 झोप१५॥ 20 श्यो।

पा सकते। तीर्थ यात्रा, तीच निवास, तोर्य स्नान पौर
वीर्य मरण यदि वकार न होते, तो काशी मिवासी
पपितों का विरोध करने के लिये कबीर पाशा घोड़कर
मगहर क्यों मारे। उन्होंने यह सम्देश ही नहीं दिया अपितु
'सगत जनम शिवपुरी' गाने पामा जुमाहा सबमुच हो
मरती बार 'मगहरि उठि मारमा पागा मदि भव भी रवीर के
पर्म को माद धर्म न कहा जाये तो क्या कहा गाये उन्होंने
स्वर कहा है-
पहत बरस तपु कोमा कासी।
मरन माया ममहर वासी।
कासी मगहर सम बीपारी।
मोमी भगति कसे उत्तरसि पारी।
यह काशी मोर मगहर नहीं है जो मनुष्य को स्वग
प्रपा पदम योनि देते हैं यह तो भक्ति हो है। यदि मति
माछी होगी, तो वह भर-पार महीं पहुंचा सकती।
ग्रत
मांग, मदली पामे बाले यदि वह रस कर वैकुण्ठ आमा
भो हो वह कुम म पारर 'रसावन बाहि क्योंकि ससम
बिये बिमा रिमारटी अप, वप क साय 'किपा परतु किपा
पलानु'मा भी कोई अन्य नहीं। बाह्मणों न पीस
उपरास पार गियों महीने भर के रोरा या उन्हें मा
पार पहेपा साठे है ? कभी भी नहीं उन्होंने म कयम पठ,
।
22.1.३२६ १५॥
231
21 ११५,२

राप
कराहि।
(१२० )
उपवास प रोने का विरोम किया है अपितु मृतक मिण पौर
बाद की तो सविस्तार दुगति रणति हुए कहा है--
धीवत पितर न माने को,
मूए
पवा कुछ भोरम पिसे उनके लिए प्रसग से साम देते है
उसे करपा फूकर हाही इसना ही नहीं अपने मिट्टी के
देवी देवता के सम्मुख बोर देगी बीयों की भी यदि बरा देते
हैं। इस प्रकार उन्होंने पापों में पत, उपवास रोगा,
भाय, मृतक पि पा पसि पाने का निरोप किया है पोर
मामर को मान्तरिक दृष्टि से सरापारी होने का सन्देश
दिया है।
अपनी काठ को पिपा विसावहि मोई' म बस काठ
की मामा का पपितु माप विसामी नन्हनि विरोध
किया क्योंकि-
'रमा, मुदरा सिपा मापारी।
भ्रम के मार मर्व भेष धारी।
घूम रमाये हुए साभुगों के पापा, तिलक विपूण, काठमामा,
रण मुद्रा, मृगी सभी बाह्य मेों का उन्होंने विरोप
किया है। क्योंकि यह तगि बम समा गाए ऐसे पापी
सामों मे भगा विभर म पोड़ा, क्योंकि उनका 'मनु मरा
है। इसी तिये तो पाहे उन्होंने पटा भस्म सेपन स्मिा
251१२,४४
26 प २३२,४१॥
शोर
2912
3021

1 १२१ )
पौर 'गुफा महि वासु लिया लेकिन यह सब बेकार है।
पारम्बरी होने के कारण उन्होंने अपना नाम 'मम के पट
मिखाइमा | क्योंकि भर तक 'भगति मारठी रिदम माई
तम तक यह सब पहरावा पोर माहापरप्प व्यय है। कबीर
विममिमा देने से व्यग बब मोकिर जीवन स ग्रहण किये
गये है तब बहुत प्रभावोत्पादक सिद हुए हैं।
मूर मुगा यो मिदि पार।
मुकति भेर म गइमा कार"
पौर मगे रहने से ही यदि मोक्ष मिलता है तो सभी
पघु उसने मवाय अपिणारी है।
मारीरिकरप्ट साम्म साधनापों में प्रपया तन्त्र मन्त्र से
मन को वश में करने वालों का भी उन्हेंनि विराम किया है।
सिमरन महत्व बताते हुए उन्होंने कहा 'विस पागे
तन्तु म मातु" इस प्रकार मिर मुसकर प्रबका जटा रस
कर, नगे रह कर या पिक रम्प पहन पर, भस्म मगार
या पूनि रमाकर, छापा छाप कर या तिलक धारण र,
मामा पहिम कर या मामा फर कर, पप-तप सारीर को
मना कर या कठोर कर, कम्ब-मूल पर अपवा उपवास पर
पिम्दु ग्मा कर, या प्रावट कर, गुफा को पर मना कर या
पाश्य स्पम ममम कर भगपरों को सायी नान कर अपना
पगुमात्र ममम र पतोही पारास समाफर या मापना
स्पत ममम र शिन सामों और योपियों ने मोग प्रान्ति
327 ...
34 पूE
311 ११०३ ॥
331 ३४,४१

( १२२)
का प्रयत्न किया था। उन्हें कोर ने सतक किया 'मारे माये
केस कर, भावे पररि मुगा। इतना ही नहीं
कवीर मनु मूरिया नहीं, केस मुगए काई ।
जा किमु किपा पो मन किया, मग मुटु प्रमाय ।
और ऐसे ही बाझारम्बरिया के क्रिया कलापों को देख कर
कबीर की प्रारमा को मो ठस पहुंची पी । उमी का सम्बन इस
पद में देखने को मिलता है,
बासम मामि बराबहि कारि काठि धोइ अनारहि ।"
इतनी पवित्रता में भोजन बनान' बासे सारे मानस
सावहि मनुष्य को हो पा जात है। यह देख कर हो कबीर
ने उन्हें 'हरि के पन्त न कह कर 'पनारसी के ठग रहा है।
इसके अतिरिक्त उसने बनारस में 'मूर पमोमि कमर पनि
पोपी" ऐसे नापण भी देने पे। संक्षेपता उसने प्रारम्बर का
ऐसा विरोप किया पानिमसे कोई पारम्परी म प सका,
महा 'युत पूनि पूधि हिन्दू मूए' बहो 'सुरफ मुए सिर माई
'मटा पारि पारि गोगो मूए तवा व पढ़े पनि पगित मूए'
सेक्नि 'सरी गति इमहि म पाई। मूम बात यही है कि सब
तक 'विसिपा से होर दास, बीच में अपना मन मिमम
नहीं कर मिया तब तक इन माचारों और पारम्परों का
कोई मुस्प नहीं, उसमे अपने पुग के पचमकार सेवी पाठ
को भी सतक किया था क्योंकि भक्ति के विमा 'साफत मारी
35 बोड२५।
37 1.0
391011
30 शोक १.१।
38 4.४५,२॥
40 १६५४,१

कामरी पोए होइ न संतु" कवीर मे केवम हिन्दुओं के माह
म्बगे काही विरोध किया हो एसी बात नहीं निर्मीक उसने
मुसममामों को पाठ हापों लिया मा। क्योंकि उनका सन्देश
किमो मत सम्प्रदाय, धर्म या जाति सीमामों में परम पा।
बह तो मानवमात्र के लिए दिग्प सम्वेध पा।
कबीर मुमा मुनारे किग्रा धहि साई न बहरा होइ।
गा कारमि तू बांग देहि दिम ही भीतरि माइ
बांग देने वारे मुस्मा को पेवाया नि उसका सुदा न
तो बहग है पोर म दूर ही है। नमार पढ़ते मासे हुए
गिमा उनु पार पीपा मुह षोडमा योग को मुन पर 'ब'
(ममार से पहिले हाम मुह मादि षोना) पर तुम अपने को
पविम समझो हो मेकिन अब त दिम महि पटु निवान
गुगार "तब तक यहिस्त नहीं पहुँच सात इस बात को म भूमो।
तसबीह (मामा) तपा बादत प्रापना) ने पकर में पर
हुए मौसमी को भी धिक्कारा है पर्योंकि यहां तो पवित्र मात्र
माओं काही महरब १ पौर फिर पानी महरम नामावह
कर रमान महीन में रामा रमन का भी निरोप किया
है क्योकि यह 'रोगा पर मनाचे प्रमह मुपादति जोर
मेपारे" क्योंकि उमरे 'दिम महि कपटु है"। इसी सिये ता
रोगा रमने पामा वह स्वाद न मिए जीव का संहार कर
रोड १८४
Irars.01
43 1 १३५०,४॥
45 १२३४,२॥
474.१४०,४॥
46.८२

F
( १२४ )
ता है। मुदा को सब पापक समझने पाले मुरूपा से कर
नै यह भी पूछा है, 'किन मुरगी मार मेकिन इम 'इलामु का
उसके पास मोई उत्तर महीं। पछिमि प्रमह मुकामा समझ
भरहप पर पाने वाले कामी को भी उसने बताया है कि,
"विम महिमोजि-एहि ठतर मुपामा "पौर इम मिए उसने
पोपणा की है-
मनु परि मका क्विमा करि देहि।
पोमन
परम ऐही ।।
मुल्ला बांग मिवाम।
एक मसीवि बसे
दरबार ।
मन को मक्का पना कर देह को पश्चिम दिया
पनामो मार तब देह स्पी मस्जिद के दसों द्वारों से पांग
रेफर ममाम पड़ो। तरकही उसे रिल में पा सकोगे। उमन
करान पढ़ने को मी तब तक वेकार बताया है पता उसकी,
"दिल महि सवरि म होह, । इस प्रकार महाँ कबीर ने
ममार परवाने वाले मुस्सा को योग बनु ममान तपा
मस्पिद की सच्चाई से परिचित करवाया यहाँ पापित
पार्मिक मौली को कुरान की पापों पर विचार करमे
के लिए प्रेरित भी किया। इतना ही नही पर्माधिकारी
ख को तसवीह प्रौर वापत का महत्व समझाते हुए हर के
प्रससी एप के दशम भो करवाये । रामे पाप कुरवामो से पेट
भरने वाले मुर्गी मार न्यायाधिकारी कात्री को न्याय का सबक
48 १३४६,..
49 १११४९,४।
10.४८३

(१५)
सिमाया तथा अन्त में हर से सौटत हुए मिग हानी को
सम्धी हा का सच्ची हब का राह दिखाया। इस प्रकार हिन्दु
पौर मुसलमान का भेद भाव मिटाते हुए दोनों के खोखले
मायापारों प्रारम्बरों से उन्हें परिचत करवाया। सामाजिक
मेत्र में उन्होंने मधात का विरोध कर मामतीय धरातल पर
एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया था। पम नाठि, सिंग
पौर देश के पाषार पर मानवीय विभाजन को अनुमित वसाया
पापयामि
गरभवाम महि मुल नहीं जाती।
बाह्य बिन्दु से समु उसपाती
म मामने बारे मुम्सा को फमारते हुए उसने पूचा था कि
यदि मुदा मे तुझे तुक बनाया है ता तू क्यों वमपूजक मुन्नस
परता । मह माय भी यह स्वतः ही करेगा मुल्मा को मुशी
हुई गदन देख कर कबीर न पुरको मो-
मुमति मी तुरकुने होगा
प्रतरत का निभा परी ए।
परप सरीरो मारि मदोरे,
ताते
रहीए ।
मुन्मा यो बारा पामा हिन्दु बन गया लेकिन इतन में ग्राम
'गानसर दुदिप हो गया। कबीर न भारत हमे उस
भी नमनारा- तुम का ब्रह्मम हम कव मूद ।
पोर मे पमोप प्रहार किया--
52.१४.०८.
पह मौन प
51 ३२४,..
63 १.४०,८।

( १२६ )
जो तू प्राहमण
ब्रहमणी माझ्या
तो मान बाट काई मही प्रमा।"
मीर का तर्क शाम का तर्क महीं था। यह तो
प्रमुभूप्ति का सत्य था। दोगों के पास उसका कोई उत्तर
म पा | प्रप्त दोनों को ही कोर मे समझाया कि 'मप्त हरि
पूछ करन है मेरे गाति न माउ " मगवान ने मत की जति
सो क्या माम तक मी कभी नहीं पूछा। इसीमिए तो पह
-
कहता है कि
-
हमरा भगरा रहा म कोट।
पमित मुल्मा हे दोउ ॥"
इस प्रकार सामाजिक विषमता को दूर करने के लिए
मूत-छात पात-पात उपा कम म्यवसाय के ममी भेदों का
दूर कर भगवान के दरवार में प्रत्येक मानव की एक ही प्राप्ति
का सन्देश दिया। एक ही धर्म मानव प्रम का प्रसार किया
एप ही ब्रह्म एक मात्र पूग सत्य ब्रह्म का बोध गया।
एक ही माग प्रनवरत प्रनम्य तस्मीनता का भक्ति मार्ग
सुभाया । कौन जानता है गुरु नामक न कितने तस्व यही से
संग्रहीत किये पे? कौन पामता है प्रकार का दीम इलाही
इसी का प्रस्पष्ट प्रतिबिम्म मात्र मा ? कौम मामता है रबीन्द्र
के प्रयाह रहस्मयाद को पाह प्रदोष कमीर के शब्दों में ही
चिसो हुई पी? कौन पामता है गांधी के हिन्दू मुस्मिम के
ऐक्य की भावना का प्रावि स्रोत कबीर के ही कुछ पद है।
54 पू३०४,.
56 क ६०।

( १७ }
पौर कौम मानता है परविन्द के मानन्दमय मिफाम मध्य
जीवन के मूम माम्यात्मिक तन्तु गुमाहे के प्रत से ही एकत्र
दिये गये हैं इसी मिये कधीर धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र
में प्रमर हो गये है।
चीर की मरमना में जितनी प्रपणता है उसको भेट
में मितनो पात्रता है उसके म्पग में जितनी मुस्कराहट है,
नसा वणन में जितनी सजीवता है, उमके कयन में जितनी
सादगी है, उसक सन्देश में मितनो गहराई है, उसके घर में
जितनी मम स्पशिता है, उस पाम्प में जितना
है उतनी ही उसकी भभिम्पक्ति में अनुभूति है। यही कारण
है कि प्रारमर मरे सम्पूण जगन से विरोधी कोर का निरोप
करा भी कुछ न कर सरे । राग्य घामक उसे मार पर भी मार
म मके, समार उमका यहिपार करने भी उसे छोड म सका,
गमाम उसे ठोकर मगा का भी ठुक्रा न सके, सेगिम
दुप की बात यह है कि हिजपा मुसप्तमान उसे अपना
महकर भी पपना म सम । सम्भवत प्ररये दिपारमा का
ऐमा ही मन्त्र हाता है और कपीर भी उसरे पपवाद न ।
रस
JEE

संतों की सामान्य मान्यताएँ
मौगिक एव पारमोकिम जीवम में प्रदमुत सतुलन मोर
समन्वय स्पापित कर गौरव मय वयक्तिक पोरन पतात
करने पामे सम्ों ने समय समय पर समाज का पप प्रपशन कर
युग-नेसा का रूप ग्रहण किया है। वस्तुत सन्त कोई व्यक्ति
'विशेष म होकर भावना विशेष है, जिसका प्रसार अन्याम्य
मुर्गों में विभिन्न व्यक्तियों के माध्यम से हुमा है। यदि मूक्ष्म
दृष्टि से देखा जाये तो पता चमता है, कि इस भावना
मिशेप के मूम सत्यो में प्राय परिवर्तन महीं होता। युगमा
मावस्यकता पौर म्पक्ति की मपि तपा सामप्य में मनुरुप इम
वस्त्रों के अनुपात मौर क्रियात्मक प्रसार मे पाड़ा बहुत मम्सर
माता रहता है पर इससे मूम भावमा में कोई विदोप मम्तर
महीं पाता । भारतीय मध्य-युग के इतिहास को सापक मनान
के सिए ही मानों इस भावना का यहाँ विकास हपा-मोक्कार
जैसा ससक्त म्पक्तित्व पाकर मपने प्रौढ़ रूप में प्रतिफलित हुई।
पतृक सम्पदा में प्राप्त मार्मिक दरिद्रता पोर नतिक
समृमि सतों के जीवन का सबसे बड़ा पाभूपण रहा है। उनमें
जीवन की कर्मप्यता इस प्रार्षिक पग्रिता का ही बरदान है
पौर पान्तरिक गुणों के विकास के कारण प्रसर परिसस्प
इस मतिक समृद्धि की ही देम है। समाज के तपा-पित

(१२)
निम्न-बग से उद्भूत इन संतों को मार ने राम का
दुस्माहम एकत्रित किया, लेश्मि कोम बानता पा, कि यह
दुस्माइस सर्वो को ही यह प्रदम्य पक्ति प्रदान करेगा, किसे
इप मारमरपूण समाज को ही ठुकरा कर प्रपन पीछे भगा
सेगें। समार के इस दुम्साहस में पन्हें तन कर परे होने की
पति प्रदान की। उहें प्रपनी परित मामध्य प्रौर माभ्यतामों
पर को विश्वास पा, बह पौर मी दाहो गया। इस प्रारमनिष्ठा
पौर पारम विश्वास के बस पर बम बस स्वय हो खरे हुए,
प्रपितु समाव के कुछ म्यक्तियों को भी उन्होंने अपने साप
पर पाया । यह उनकी सफलता का पहमा विष्ट पा। धीरे-
पमान उनकी पुकार मुमम पर विषय हो गया
फसर मस्ती
मदी गईमार्यो मे समार को मनापास ही प्रभावित
फरमा पारम्म किया क्योंकि नमके यपाप-पत्रण में सत्य का
बम पा, पिसको बह देर तक नपेक्षा नहीं की जा सकती।
इस प्रकार व भाषमा, गोपवता म्यक्ति के माध्यम से ही
पमिस्या होती पो, भर परिधिन धाग के प में साम रिक
परम्परा ही बन गई । मध्य-युगीन भारतीय समाज को इन
संवों की यह सबसे बड़ी देन है। यह पविछिन्न मामागिर
परम्परा ही सतों की मामाम्य माम्मवामों को साधन-मूमि है।
एक परम्परा में मी मान पासीमाम्यतामों में कोई परिपत्रम
महपाप समो पास नहीं दिम म परिबवम पा समाप
उनके मूम-गरम से न होकर उनी पमिप्यक्ति मा उनक
बाप पापरण-मात्र से ही पपिक ई इस प्रकार कीर मे दुष
परते मे हो मंत विषारापारा जो तब विसित हो
इथे, न फेरस खीर में पूपम्पा सिमित पोर मगर

( १३०)
होकर प्रकट हुए, अपितु देर तक समान को प्रभावित करने
पापी सशस रिचारपारा के रूप में तब स उसकी प्रबिकिन
परम्परा भी प्रवाहित हो चमी को मार ठक इस देश में उसी
तरह मोदित पोर माग है । सब पूछा जावे सा र मकृष्ण
परमहस, विवेकानन्द महात्मा गांभी, भी परमिन्द तपा बिनोवा
भावे तसा परम्परा के प्राथमिकतम फस है।
सों का समष्टिगत स्यक्तिस्व इन सामान्य माम्पताओं
की पापार-भूमि है। मौकिक कृपा पारमोकिक जीरम की
सामना उन्होंने एक ही म्पपितल के माध्यम से की है।
सांसारिक विपमदापो से घबराकर वे जंगम में भाग कर ब्रह्म
की साधना करने नहीं बसे गए बस्कि कमष्य बोरम विता
कर उनसे गुम पर इस प्रकार मौरिक उममनों को म्यिात्मक
जीवन के माप्पम से समाने का प्रयत्न किया। और इस
मियात्मक कमण्य मौवन के माध्यम से मनायास ही पनकी
परमोक की साममा भी होती रही। ये न कमी मदिर गए, न
मूर्ति-पूना की । वन, सीप, स्नाम उपवास पोर मामा फरमे से
पी ने कोसों दूर रहे फिर भी इस प्रकार के प्राचार-प्रधान
बापों से वे कहीं अपिक मामिक बने रहे। इस प्राह्मणों ने
पारिष पोर पारमौकिक अगत में समान के लिए जो पाई
पाट रसको पो, वैयक्तिक रिचार भोर मापार से इन्होंने न
केवम पसे भर दिमा, प्रपितु धन-मामस के लिये प्रयस्त राग
पप का भी निर्माम कर दिया। इस प्रकार वैयक्तिक सस्प
प्रापरमगा जोपम इनको सामान्य माम्पडामा का सबसे ससा
मापार है।

( १३१ )
समाज को धार्मिक सामाजिक, राजनतिक, प्रापिफ व
मासतिक समी प्रकार की समस्याओं का उन्होंने वैयक्तिक
गोवन के माध्यम से समापान प्रस्तुत करने का प्रयत्ल किया।
उचित सामन पौर सत्य साम्प पर विश्वास मे उन्हें जो
प्रम्तरिक शक्ति प्रदान को पी, उसी + बस पर ये इम
ममस्यामों से घबराए नहीं । यह ठीक है, कि वयक्तिक सामर्य
को सीमामों + कारण वे इस में से बहुत कम समस्यामों का
समापान प्राप्त कर सके, लेकिम अधिक महत्व-पूण यह है,
कि ये विपमताएं उनके म्यमितत्व को विश ललित म कर सकी
पौर वे सदा इमसे चूमते हो रहे - मागे कभी नहीं प्रौर इसी
मिर हारे भी भी नहीं। पार्मिक प्रारम्बर्गे पोर पावरों का
उन्होंने नुमकर विरोध किया। मामाजिक कुरीतियों को
उन्होंने सभी स्वीकार नहीं किया पौर यपा-सम्भव उन पर
मी
पुठारापास रिया। राजनैतिर प्रत्याचारों से जूझते .
उन्होंने सिर तक पटा दिया पर उसे मुक्ने महीं दिया-
यह पया कम है। पौर प्रापिप दरिद्रता से प्रपन को मारन
के लिये कोई बीवन मर सपा बुनता रहा तो कोई मूतियां
ही माटता रहा- यह उनके जीवन की महानता नहीं तो पौर
गया है। तुम मिमार ममाग मी रिसी भी स्ति, प्रहार
मे उन्होंने प्रपमे प्पग्तिरणको विपटित नहीं होने दिया यही
उनको मपमता का रहस्य है। इसीमिए व सत-म्पस्तित्व की
पाम्पग में मंत भाषमा मा ग्याति को गोवित पोर जागृत
रा सके।जीवन की ममा समस्यामों के प्रति उनकी यह
मित प्टि उनको मुरक्षित परितस्य की परम्पग का बनाए
.
पसरी

होकर प्रकट हुए अपितु देर तक समार को प्रमाबिस करने
वामी सशक्त विधारमारा के रूप में तब स उसको परिधिम्न
परम्परा भो प्रवाहित हो चमी यो पाम तक इस देश में उसी
तरह बीवित और जागत है । सब पूछा बावे तो र माष्म
परमहस, विवेकानन्द महात्मा गांमी, मी भरविन्द तमा विनोग
भावे उसी परम्परा के माधुमिकत्वम फाप्त है।
सतोमा समष्टिगत पस्तित्व इन सामान्य मान्यतामों
की प्रापार भूमि है। मौकिक सपा पारलौकिक जीवन की
सामना उन्होंने एक ही पस्तित्व के माध्यम से की है।
सांसारिक विपमताप्रो से घबराकर वे मंगम में भाग कर ब्रह्म
की सामना करने नहीं घस गए बल्कि कमष्य जीवन विता
पर उमसे पूझ पा इस प्रकार मौकिक उसमों को क्रियात्मक
पीयन माध्यम से सुमझाने का प्रयत्न किया । और इस
किपात्मक कमभ्य जीवन के माम्पम से अनायास ही उनकी
परसोक की साधना भी होती रही। वे न कमी मदिर गए, न
मूर्ति-पूजा को । व्रत, तोप, स्माम उपनास प्रौर मासा फरमे से
मी में कोसों दूर रहे फिर भी इस प्रकार के प्रापार प्रमाम
बामपों से ये कहीं अधिक पार्मिक यमे रहे। इन ग्रामगों ने
पापिय पोर पारमौकिक जपत में समाज के लिए गोसाई
पाट सतो पी वैयक्तिक विचार मौर भापार से इन्होंने म
केबस रस भर दिया, अपितु जन-मानस के लिये प्रशस्त राम
पप का भी निर्माण कर दिया। इस प्रकार वैयक्तिक स्वस्प
पापरगगत बोवन नहो सामान्य माम्पत्रामों का सबसे असा
मापार है।

.
( १३१ )
समाग की धार्मिक सामाजिक, राजनैतिक भाषिक
मास्कृतिक सभी प्रकार की समस्यामों का उन्होंने वैयक्तिक
गोवन के माध्यम से समाधाम प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया ।
उषित सापन पोर सत्य साध्य पर विस्वास ने उन्हें गो
मन्तरिक शक्ति प्रदाम की पी, उसी क वस पर इन
समस्याओं से एवराए मही । मह ठीक है, कि वयक्तिक सामर्थ्य
की सीमामों के कारम ने इस में से बहुत कम समस्यामों का
समापाम प्रस्तुत पर सके, किम अधिक महत्वपूर्ण यह है,
कि ये विषमताएं उमक व्यक्तित्व को विय समित म कर सकी
पौर ये सदा इमसे सूमदे हो रहे -मागे कभी नहीं प्रौर इसी
मिग हारे भी कमी नहीं । धार्मिक पारम्पर्गे मोर पापरोपा
उन्होंने खुमकर विरोध किया। सामाजिक कुरीतियों का
उन्होनि कमी स्वीकार नहीं किया पोर पया-मम्मय वम पर
भोलाराघात किया । राजनैतिन प्रत्मापारों से जूमन र
उन्होंने सिर तक कटा रिया पर उसे मृाने महीं गिया-
पहपया कम है। मोर पापिर दरिद्रता से प्रपन को समाग्न
के रिये कोई जीवन भर कपड़ा चूमता रहा तो कोई दिया
होगाटता रहा- यह उनके जीवन की महामता नही तो और
क्या है । तुम मिमार ममारको किमी भी ram
मे उन्होंने अपने परिसर को विपरित नहीं हान दि*
उनको मफमठा का रहस्म है। इमीमिए । मनमागिर
पामरा में संत भावनाको ज्योति को नीति और पर
एक सफजीवन की सभी समस्पानों म
मनुमित दृष्टि उना मुरक्षित व्यक्तित्व की पामगर म
रेप की।

इसी म्याक्तित्व के कारण उमड़ी बीवन प्रौर जगत् ॥
प्रति विशेष दृष्टि विकसित हुई। विश्व की पतुर्दिक समृद्धि
पौर उसकी सामग्री उनके पीपम-यापन में सामन से पधिक
कोई स्पान न ग्रहण कर सकी। उनका मक्ष्य सदा ही इससे
भिन्न रहा । इसीलिए उममें कमी ईर्ष्या म हुई और उस साध्य
की पोर बहते हुए भी दे मग इकट्ठे ही रहे। पनौकिक साध्य
को स्वीकार करने के कारण उनके पावन-यमन में एकरूपता
के साप २ स्पामित्व भी बना रहा। वस्तुत गावन-दशन में
इस समता में ही संत मावना को नींव को वृक्षता पौर स्थिरता
प्रवान की।
वैयमितक जीवन में सभी संतों ने अनुभूति का महत्व
स्वीकार किया है। पोर इसी माघार पर उहामे क्रियात्मक
जीवन बिताया है। यह अनुभूति ही उनके पर्म की भाभार
भूमि पी। इसीलिए सामायिक परम्परा में मान्यता प्राप्त
प्राचारों को भी उन्होंने वहीं तक प्रभय दिया, यहाँ तक में
उमकी मनुभूवि की कसौटी पर सरे उतरे थे। उन सामाजिक
या पार्मिक भाषारों और विश्वासों का उनके जीवन में
कोई स्पान म पा, पो उनको अनुभूति की कसौटी पर पूरे
म उतरे ५। इस प्रकार उनका पोवन यक्तिक पहले पा,
सामाजिक बार में।
इनकी जीवन-दृष्टि मूमत मानवतावादी मोदी
लिए धींगा, दर्जी, माई, मुमाहा, पमार पौर रागा सभी एक
भक्ति के सूत्र में पिरोपे माकर 'संत-मामा के सममपाते
'मामि बन गये। गत सात पवाम्पियों में मारग में

-
( १३३ )
चारों सत समुदायों ने बम लिया, लेकिम इन मानवतावादी
प्टि से कोई भी दूर म रह सका। धम प्रप, कम बजाति
पाधार पर मानव-समाजका विभाबम मिमीन भी स्वीकार
हो किया । इतना ही महो, नत्तराधिकारी , पुनाव में भी
नमें से किसी प्राधार या पुत्र-परम्परा का मो स्वीकार न
किया गया, भपितु जिस शिष्य में मामबोय तत्व सर्वाधिक
कसित हो मके हैं, उसे ही मही का अधिकारी बनाया
7पा वैयक्तिक स्वापों के कारण सदा हो इसके विरुद्ध विद्रोह
हमा है, लेकिन मानवतावादी दृष्टि इस विदोहरे सम्मुम
मी भुको महीं-इसी से इसका महत्व स्पष्ट है।
सों मे राम्य-निर्माण का बीमा कमी नहीं उठाया पर
पार न ही कास्य-गत विधेपणापों से उनका कोई परिचय ही
पा।कमी यक्तिक मालाए में गाम पर विवा हो गये
पास भाम्तरिक विवशता में अनुभूति को पा भिम्पति
प्रपमा जन-सामान्य का जिस वाणी में उन्होंने अपना
सन्देश दिया, उसे हम उनका काम्प समझ मंठे । मूलत काम्पत्य
तारनके संदेश का बहुत गोग तत्व पा, इसीलिए साहिरिया
दृष्टि से इसका भूस्पोकन करने वाले इनके साप म्याय म कर
सम् । उमा समूण काम्प का परमा योत वैयक्तिर पालन
सपा सामाधिक संदेश रहा है, पता मूल्यांकन करखे हुए हम
से मुनानहीं सकते।
संत-मारला की यह सामान्य पृष्ठभूमि पी, जिस पर
विपापारा रिशेप का प्रासार निमितहमा। पापामी पतिर्यो

( १३४ ।
में इसका विशेषताओं का उल्लेख करने का प्रयत्न किया
गया है।
संतो का प्रा प्रनिश्पनीय है । दानिक दृष्टि से उसे
विशिष्टात मादि कोटिर्यो मे नही रसा जा सकता।
वस्तुत मतों ने उसे दौविक या ताकि पति का माधार नही
प्रदान किया, मत इस दृष्टि से उसकी उपित म्मास्या भी
नहीं हो सकती। वीर से ब्रह्म पर विचार करते हुए हम देस
पाए है कि यह न वम पद्रियातीत है, अपितु यह तो निगुण
सगुणातीत मी है। बह नो केबस अनुभूति का विषय है।
सीलिए उसके स्वरूप पोर गुणों की प्रग्याम्प म्यास्यामों के
पाव भी कमी फोई संत मतुष्ट महीं पा कि यह समान के
मिये ग्रह के सपना स्पप्टीकरण कर सका है।
उसका गुण-गाम परते . 'मुर नर मुनि जम' का तो
महमा ही पया स्वत झा तक पक गए, लेकिन अनन्तमा
पोई प्रत म पा सके। उपनिपयों की तरह बह्म की 'नेति'
परम प्यास्या भी यहां मिलती है, चसे सर्व सर्व म्यापक
सन्सिामी सर्वकर्मा पर्व मियंता मादि स्वीकार किया गया
है। ममत्त निगु म बह पनिर्वाचनीय है मेनि गुणों के माध्यम
मे पर नमोसरप की म्याश्या करने का प्रयत्न किया जाता
है, तो यह सगुण निराकार हप प्रहण कर सेता है। किन मतों
का सगुण निराकार स्वस्म भी तुमसी जैसा सगुण महों क्योंकि
बह का कोपिग गुणों स प्रतीत ही है, इसलिय मूमत हम उसे
मिगुग ही मोकार करत है।
समूण ब्रह्माा उसी का प्रसार है मेबिन यह स्पत
।

१३५ )
पति और निसिप्त रहता है। सृष्टि का एक माप यही
उपादान भोर निमित्त कारण है। सतो की दृष्टि में सृष्टि
करम मिप्या नहीं, वह सत्य है, क्योकि सत्य ब्रह्म का हा
प्रसार है । मुष्टिमा प्रत्येक प्राणी जोग भी उसी तरह सत्य
है। मस्तु प्रारमा और और परमास्मा में उठाने प्राधि
धम्मपको स्वीकार किया है। मग्नि-स्फुमिगवत जोग में ब्रह्मरे
सब गुण है उन्हें यह विकसित कर प्रय से वादाम्म पोर ऐस्य
म्पापित कर अपने व्यक्तित्व का उमी में सिगेहप का समता
है। मह जोर के जीवन का मश्य या साम्य है जा प्राप्त करमा
दुष्कर है, लेकिन संजों मामा को सदा इस प्रति सतर्क
किया है, और इसे प्राप्त करने की प्रेरणा भी दी और माग
मी बताया है। इस मेव के प्रामास का कारण म्हाने सपिनी
माया को बताया है । वस्तुत माया ही गोव को भरमा पर
इस ससारक प्रमोमों में फसा देती है पर उम माप मै
पप प्रप्ट कर देती है। इम्द्रिमों के गम में होने के कारण गोष
ममता पम मोर कामिनी का विकार हो जाता है। मौणि
समृद्धि को पाह उस सरप्रसार के दुष्कर्मों की प्रेरणा देती है
पौरामिमो-मारी मामलोपासनामों को उमारर उमपे
वित्त को ममिन पर देती है। सतों न इसका विरोध नही रिया,
अपितु इनका परिहार किया है। भरमान पामो माया से बीर
सो सवा करते हुए उन्होंने पनावरपा पन-संग्रह को दी
दुरापतापा है, पहा पूमत कामिनी में सिप्त हानेको भो
परपेर निन्दा करो। मेरिम पन और स्त्री का न पून रसे
सापुपो में भी पेन पे। मरनी प्रायोपिका पति परम ,
मिए उन्होंने मच गृहस्प जोगन विवापा, सरिन में ही मर

( १३६ )
कुष नहीं समझ बैठ । उन्होंने मौकिक और पारमोकिक मारम
प्रभुत सतुमन स्थापित किया हुमा पौ। सोमिए कबीर
को अपनी मां के उमाइनों का शिकार बमना पड़ा पा लेकिन
भावात्मक मावेश में उसमे अपनी विचारधारा का त्याग नहीं
किया पा, यही उमके व्यक्तित्व की महानता पी। बस्तुत
यहाँ एक पोर इन मतों मे माया-निप्त हो पन-संग्रह का विरोध
पिया पा वहाँ पर्मण्य-गीवन का भी उतमी ही शक्ति-पूरक
विरोध किया था। इसी प्रकार गृहस्प में मिप्त गहम्बियों और
पमायमगावी मापुमो-दोनों का ही उन्होंने विगेम किया था।
सप पूछा गाये तो इमो से उनके 'सहम-पय का निर्माण हमा
है। प्रकृति के म्यामारिक नियमों को उन्होंने महा स्प में
अपनाया और क्रियात्मक मीरम के माध्यम से पन-समाग को
प्रपनामे का मदेश भी दिया।
बह पुग प्रतविरोषों का युग पा । मानियों के पुष्क-शान
मे तनये मइंकार को अवश्य गापत किया पा पर उनका
गौरिकतोप मकर सका था। मों में मामापारित सत्यों
को यहाँ तम अपमाया यहां तक ये नीबम बोभित म
बनाने वाले सिसहए। माम को अपनाए बिमा उसकी बात
करने पामों को उन्होने विषकारा है। इसीलिए वेदों इत्यादि
पुस्तकी विधा को मिना नहीं की, अपितु उसे समझे बिमा
अपनाने का राग मसापने दामों को मार हापों मिया है।
उनकी कृतियों में कहीं नहीं पुस्तकी विद्या का निरोप भी
प्रतीत होता है उससे भी मूम भार उसके नाम को म मपमामे
बामों का ही विरोष है। अनुमूल्याधारित शाम को इन्होम
सर्वच प्रथय दिया है।

जनसमाज में विभिन्न सम्प्रदायों क माध्यम से प्रमरित
हाने वाली भमि में उन्होंन भाव का ममाय पाया। इसी
मिग मनिरपाल पावरण अपने परम उत्कप पर पप
गए, परन्तु रमकी पान्तरिक-शक्ति क्षीण होती गई ।मम्तों
म माव-हीन प्राबरणों और प्रारम्परों का की भरकर विरोष
किया। मूति-यूमा करन बानों का प्रस्तर में पटी मूर्ति से परि
चय पराया मम्दिर गाने पामों का मन-मन्दिर को याद दिलाई
'घर का मनपा फेरम पालों को 'मना मनका मा पकाया
सीपों में प्रमण मग्न वासों का सरगुरु पी सीप के दान
करवामे, गया-म्मान करम दामों का प्रल स्नान र पाठ
पड़ाया, प्रारपर्म वामों का बास्तविक प्रत का महत्व बताया,
दन प्रापरणा के माध्यम मे नक्ति प्रपनाम में प्रयत्नधोता
पो भतिक मूम-तस्य भाव प 'माम 7 बगदान दिया।
इम पर मस्तिका मो इन्होंने विरोध नहीं किया अपितु रने
परिपतप प्रदान कर महर पोर म्यामाविर मा दिया
मादि दन-मामाम्प मार पून हद्दर मदिना किमा प्रारम्बर
नी उसपना मरे।
योगियों की अग्मि दहिर पियानों में सर याम
में भी निपट म्प पारण कर किया पा। मतों न इस टिमता
विग्रप र म मा बनामा । नमो नम माम्य नया
पा मालाप उरहोंने मास म्पम्प दरा निर्मित रग्न
पा मग दिया है सरिम गित मापमापा माध्यम म गम
पनापपरमेष-महिप्पु पनाना मुकारिगपरिया
६। रस हा कट फर मौगिर रिपापा मम
म ब्रह्म प्राप्ति या ब्रह्मा-राम राम मति माटो।

( १३८ )
इस प्रकार स्वस्मय वीर्ष भीवन व्यतीत करने की दृष्टि से
उन्होंने देह का महत्व स्वीकार किया है सेकिम सहन माग का
त्याग करके महीं।
सप पूषा बाये, तो सम्होंने एक बार फिर शान, मवित
पौर कम की एकांगिता का विरोध कर-वीमों का उचित
समाहार कर-समन्वित गीवन-दृष्टि प्रस्तुत करने का प्रयत्न
किया है। इस प्रकार तीनों के विकारों से तंग पाकर मम
पराम्मुम होती हुई मनता को एक बार फिर धर्मोग्मुस किया।
इस कार्य के मिए उनका सब से पग सहायक प्रा सत्गुरु ।
सम्तों में इस बात को समझ मिया पा कि प्रनानी गुरुपों म
ही मोमी माली जनता को पप प्रप्ट किया हुआ है इसीमिए
उन्होंने सस्पुर की नदी कठिन कसौटी रख दी लेकिन इसके
साप साथ उसका महत्व भी प्रत्यमिक पड़ा दिया । सतगुरु यही
हो सकता है मिसने मुद मार्ग पा निमा है और जो संसार
से सर उठ चुका है, पर बिसे केबस मोक-कल्याग की
ममन है। इसलिए उसका महत्व साभ्य से भी पधिक हो
गया, क्योंकि इस साधन के बिमा साम्य को प्राप्ति सम्भव
नहीं। सरमुरु मे समाज को सस्कर्म का महत्व बताया। बिना
सत्कर्मों के मानब का यह घरातम ही नहीं बन पाता, यहाँ वह
पारसौफिक जीवन की बात सोच सके। सलमों के माध्यम से
मानव शमा भौषिल्प-परक बन जाता है, कि 'नाम' प्राप्त
करने का अधिकारी बन पाये। सत्गुरु का सबसे बड़ा परवान
नाम है। सासारिफणीव इस नाम के सहारे हो उस दिम
और पौकिक सपा से अपना सम्पग्म पोड़ता है, क्योंकि
मूर्ति भावि उपके प्रठीक सस्म मौर कोई सापन पीर के पास

हैं
.
( १६)
नहीं है। इस 'नाम' में प्रन यता, एकामता पौर मनपरत
तम्मानमा मात्र को सफलता प्रदान करन बामे विधिप्ट तस्व
। सम्ता न नाम का खाना महत्व दिया इसी से इमरे माम
समायों ने माम-माग तक की समा प्रदान कर दी है। नाम
काई भी हो समका रखना महत्व नहीं जितना उसमें मनाहिस
भाप का। पोर नाम तो उस माव को ही मागत रमने का
माम मात्र है सप पृषा गावे दो सरगुरु पौर नाम
पो अमित नहीं किया जा सकता यह तो भगवतपा
से ही प्राप्त हो सकता है और यह मगरकपा कय हो, यह
काई महीं जान सकता । पक्ति भाव परायण होकर सलम
पता पस, पदि उसके विश्वास में बल होगा निश्चम में
दावा हागो मरित में प्रन यता हातो, तो मगवसपा मी कमी
नममी हा ही जावेगी। और जब भगवत्कृपा हा गई ता कोई
ममस्या घेप नहीं रह जाती। समतों न एक स्वर म नगवासपा
पोहो सरप्रभान सान स्वीपार रिया है। सरकम ससंगति
सरगुरु पानि मा सिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण कर
सम्व है, इससे अधिक पुछ महीं।
मपनी अनुभूति को पमिम्मति देने मिए उन्होंने
पासंपरिक पमबाग्मयी वाणी या प्राथय नहीं मिया, प्रपितु
भाषा की मरमा म्पप्टठा पर गतिमसा मे ही उनकी सी
सो माहिस्विरवा प्रदान की है। म उमरे मन में, न उनकी
निधारपारा में मिमी प्रकार का दुरार दिपार पा, पौर म हो
पमिति में कोई पता। हा उनके सोप-मादे परन्तु सशस्त
संमों में माम्मरणारियों को सिममिता देने की अद्भुत
सापप पो, पहो उनरी पमिपति को पति है। इसका

(१४० ।
।
यह मतमा नहीं कि उनकी वाणी में ममता महो । नगवान
के सम्मुस उनकी बिनयिता की हद हाती है उनका अपना
तो पस्विस्व ही नहीं पता। वम्सुत वनपी अभिम्परित
को उनकी विचारधारा नहीं भाववाग डामतो रही है, इसी
से वह सहब सामाविक और प्रभावोस्पादक वम सकी है।
पीपा चन-मन में इवय को प्रमावित करती है, इससे बढ़कर
उसकी निश्छलता का प्रमाण हो मी पया सकता है।
सन्त भावना किसी सम्प्रवास विक्षेप मे पायद नही हुई
इसीमिए मन्याम्प मम्प्रदायों के माध्यम से बस एक ही मावमा
का विकास होता रहा पौर हो रहा है। यह मानवीय परातल
पर विकसित हुई। किसी भी प्रम, कर्म, अप पोर नाति के
बग का व्यक्ति इसे प्रनायास हो अपमा समता पा पौर पद पाहे
इसका त्याग भी कर सकता था । यहाँ किसी प्रकार का पत्पम म
पा, पाति या वर्ग वहिपत करने की पावश्यकता न पी।
सन्तों की मान्यतामों का घरासम बड़ा म्यापकपा । वस्तुत
उनकी माम्मतामों की मापार-भूमि एक ही पी, पत उन पर
बिस नियारमक जीवन या जीवन-पान का विकास हुमा उमये
मूस-तत्त्वों में कोई मन्तर न पाया। इस मापना के स्थायित्व
का कारण इसको सहज स्वाभाविकता है। भिम किया
कसापों को इसमें स्थान न देकर सन्तों ने इसे विधिप्ट नहीं
होमे दिया। वाह भावरणा, भारम्परों या कर्मकाणों ।
प्रभाव मे इसे मात्र प्रयान बना एम में सहायता दी । इस
प्रभार मकोणता के माधार-स्तम्भों के प्रमाण में इसे कम
पिरोप सहना पड़ा और यह सामान्य भरातम पर विकसित
होती गई। बपक्तिक पारित्रिक दाता ने इसे मोर भी

{ १४१)
शक्ति प्रदान की। समाव के किसी भी वग से माने पाऐ
परिवान व्यक्ति में इसे इस पर पपनाया, यदि नही
भी अपमामा तो कम से कम इसका विरोध नहीं किया। इस
प्रकार प्रत्येक युग के सभी वर्गों के परिप्रवान् म्पपिसों का
पायय पाकर यह सशक्त हत्ती गई।
मानिक प्रगति भोर राजनैतिक प्रशोधिक इस युग में
पाय प्रस्नोसिमों ने विश्व-सरकार' की पावत्यकता अनुभप
की है। यह समस्या का बहुत परी समाधान है। यदि और
गहराई में बाफर मानव-मामय को निकट माने का प्रपरन
किया भावे, ता मह 'मानव धम' पोर कुछ नहीं, इन मन्तों की
सामान्य माम्यतापों का हो विसित एवं परिफत रूप है।
सन्तों की मान्यतामों का महत्व इसी से स्पष्ट है। परा प्राम
का स्टार करने वाले, मानव-मानव को एसा का सन्देश
देने वाले गोषम में मसौकिक रस का मजार करने वाले,
लिएर म गान्ति का प्रसार करने पास सन्तों और उनकी
मान्यतामों का मह सक्षिप्त-सा लेसायोसा है।

यह मतमय नहीं कि उनकी वाणी में नम्रता न हो । नगवान
के सम्मुस उमकी पिनपिसा की हद हाती है -नमका अपना
तो मस्तिस्म ही नहीं रहता । वस्तुस' उनकी पमिम्पत्ति
को उनकी विधारमारा नहीं माववाग हामती रही है, इसी
से वह सहज स्वाभाविक पौर प्रभावोत्पादक बन सको है।
सीमा बम-मन के हदय को प्रमावित करती है, इससे गदकर
उसकी निश्छमता का प्रमाण हो मी क्या सकता है।
सन्त-भावना किसी सम्प्रवाय-विक्षेप में पावर ही हर्ष
इसोलिए मन्यान्य सम्प्रदार्यों के माध्यम से इस एप ही भावना
का विकास होता रहा भौर हो रहा है। यह मानवीय घरासस
पर विकसित हुई है। पिसी भी धर्म, कर्म, पब और गाति के
वग का पक्ति इसे अनायास हो अपना समता पा पौर पर चाह
इसका त्याग भी कर सकता था। यहां किसी प्रकार का यत्पम म
पा, पाति या पंग महिपत करमे की भावश्यकता न पी।
सम्तों की मान्यताों का परातस बग म्पापक पा । वस्तुत
उमकी माम्पतामों की प्राधार भूमि एक ही पा, पत उन पर
निस प्रियात्मक पीवम या जीवन-वर्धन का विकास हुमा उसके
मूम-तत्वों में कोई मम्तर न पाया। इस भावना के स्थापिरम
का कारण इसको सहल स्माभाविकता है। कृत्रिम किया
कमाों को इसमें स्पाम म देकर सन्ठों ने इसे विशिष्ट मही
होने दिया। बाह्म पापरणों, प्राइमरों या कर्मकाण्डों ।
प्रमार मे इसे भाव प्रमान बना हमे में सहायता दी। इस
प्रकार महीणता क माषार-स्तम्मों के प्रभाव में इसे कम
विरोध सहना पड़ा और यह सामान्य घरातम पर।
होठो गई। वैयक्तिक चारित्रिक दाता ने इसे प्रोर भी

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( १४० ।
यह मतमा नहीं कि उनकी वाणी में नम्रता न हो। भगवान
के सम्मुस उनकी विमपिता की हद हाती है। -उनफा अपना
तो पस्तित्व ही नहीं रहता। अस्तुत उनकी पभिम्परित
को उमकी विचारधारा नहीं भावयाग वामती रही है, इसी
से वह सहर्ष स्वाभाविक पौर प्रभावोत्पादक दम सी है।
सीपा पन-मन के हृदय को प्रभावित करती है, इससे पाकर
उसकी मिछमता का प्रमाम हो भी गया सना है।
सन्त मापना किसी सम्प्रदाय विशेप में माघ मही हर्ष
इसोसिए प्रम्यान्य सम्भदायों के माध्यम से इस एक ही भावना
का विकास होता रहा पोर हा रहा है। यह मानवीय परातम
पर विकसित हुई है। किसी भी भम, कर्म, प्रप पौर माति के
पग का व्यक्ति इसे भमामास हो प्रपना एकता था और पव बाई
इसका त्याग भी कर सकता था। यहां किसी प्रकार का बन्धन म
पा, जाति या वग यहिपत करने की मावश्यकता न भी।
सम्तों की मान्यतामों का पगतम गरा व्यापर पा । वस्तुत
उनकी माम्पतामों की प्रापार भूमि एप ही घी, प्रस चन पा
निस क्रियात्मक जीवन मा पीयम-दमन का विकास हमा उसके
मूम-सत्त्वों में कोई मन्तर न पाया। इस भावना के स्थायित्व
का कारण इसकी सहा सामापिकवा है। पत्रिम किया
कमार्यों को इसमें स्थान म देकर सन्तों ने इसे विधिप्ट नहीं
होमे दिया। वाह पावरमो, भारम्बरों मा कमेकागों में
प्रमाय मे से भाग प्रधान बना रहने में सहायता दी। इस
प्रकार संकीणता के मापार-स्वम्मों के प्रभाव में से कम
निरोप सहना पड़ा और यह सामान्य भरातल पर विकसित
होती गई। अयक्तिक पारिविक पढ़ठा ने इसे पौर भी

Kabir Ke Dharmik Vishvas

Author
Maini,dharampal
Title
Kabir Ke Dharmik Vishvas
File name
Kabir Ke Dharmik Vishvas
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2010/12
Publisher
Chandigad,bharatendu Bhawan
Language
Sanskrit
Pages
159
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514925
Barcode
4990010022594.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
sQcMtHyguo3
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Kabir Ke Dharmik Vishvas