Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
Prasnoattar Tatvabodh 1
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( ख ) नम्बर विषय दोहा सं० पृष्ठ ५६ ६२ २६ ४३ १६ ८. २० ४२ १०१ १३ । देश चमर सुधर्मागत अधिकार १४ । इशार वली कम्मा अधिकार असहेजाधिकार १६ | चारमूं यात्रा अधिकार १७ | तेरह इक्कीस हजार वर्ष तीर्थ रहसी ते अधिकार १८ | चौद{ आगमा अधिकार पनरम मुख पत्रिका अधिकार सोलह स्याद्वाद अधिकार २१ | सतरमूं विषंवाद अधिकार २२ | अठार नियुक्ति अधिकार उगनीसमू नन्दी थिरावली अधिकार वीस नदी अधिकार २५ इक्कीसमू दानाधिकार २६ बावीस श्रावकने दियाँ स्यूं थाप म० २७ । तेवीसमू अनुकम्पा अधिकार २८ चोवीसमं सुभद्राधिकार पच्चीसम गोशालाधिकार ३० छब्बीस प्रतिमा वैराग्य हेतु कहै तेह उत्तर सत्तावीसम् लिपि अधिकार १०४ ૨ ६९ २४ २६ १४० १४५ २६ २८६-२-४ १६२ २६ २०० ३ २०१
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२] प्रश्श पत्रिका ॥ प्रश्न पत्रिका ॥ श्री जिनाय नमः॥ A m ॥दोहा॥ चरण-कमल निनराजे को, जामें मुंज मन लौन मधुकर लिहा गुञ्जत रहे, ज्ञानामृत रस पौन ॥१॥ नाभेयादिक ' जिनेश्वरा, तीर्थकर चोबोस'.. गणधर पाठक साधु पद, ध्यावत विश्वावीस ॥२॥ जिनवर भाषित शुद्ध नय, भागम-उदधिः अपार । चमतं पूर्ण कलि काल में, जिन प्रतिमा आधार ॥३॥ खर्ग. निवासी देवगण, वलि पावाल कुमार, साखत मिन प्रतिमा भणी, नित प्रति करत नुहार॥ ४ ॥ एहवी प्रतिमा जिनः तणी, प्रणामी वहना पाय...- पत्र लिखू अति प्रेम सुं, मुनिवर ना गुंण गाय ॥५॥ क्रोध लोम.मद, मोह सबे, त्यागी. विषय विकार। जीतमल महाराज कू, नमत सकल , नर नार ॥ ६ ॥ दोष बयालीसौं टालते, लेते 'शुद्ध आहार । भविजन कुं प्रतिबोधता, विचरै धरा मजार-॥७॥ - , प्रश्न पत्रिका .[३ ॥ सोरठा ।। - तौन: करण थिर धार, जोवे बावीस परिसह । जपते दिल नवकार, शुद्ध करि सञ्जम निरवहै ॥८॥ ॥ दोहा॥ 1. सतावीस गुणे करौ, पालो निज आचार । 'पञ्च - महाव्रत ‘पालता, एहवा तुम अणगार ॥ निरजित मदं उनमाद पणों, वर्जित विषय विकार । 'तति कर्मादिकं अशुभ, गणित नाण उदार ॥१०॥ शहर लाडन अति भलो, विचरो तिहां धर नेह । प्रेति वन्ध बिहार करी, बैठा सम्बर गेह ॥२॥ तुम गुण गण मकरन्द से, भविजनभ्रमर लोभाय । देश विदेश मानवी, कर जोड़ी गुण गाय ॥१२॥ मैं मिण गुण श्रवणे सुगी, भेटण की मनं चाय । ते.दिन सफल गौणिस ई, वन्दी..तुमरा पायं ॥१॥ कर्म : ईधन कू नालवा, प्रत्यक्ष अग्नि समान । इन्द्रिय प्रांचु वश करी, एहवा तपको खान ॥१४॥ गुण सगला तुम अङ्ग से, दौखत है प्रत्यन । आगम अर्थ विचार के, किम ताणो इंक-पक्ष ॥१५॥ ܙ ..
प्रश्न पत्रिका --- -wn . पक्ष पक्ष काडू मत करो, ज्ञान दृष्टि मनलाय । जिनवर प्रतिमा देखता, दुःख दोहग टल जाय ॥१६॥ च्चार निक्षेपा जिन कहा, भाव स्थापना नाम । सत नब करी देखल्यो, बरगन ठामों ठाम ॥१०॥ अम्बड श्रेणिक राय तिम, रावण प्रमुख अनेक । विवध परै भक्ति करी, पाम्या धर्म विवेक ॥१८॥ मञ्चम अगे.भाषियो, प्रगट पणे अधिकार । सूर्याभे जिन बन्दिया, राय प्रवेणी. मनार ॥१६॥ विनय देवताये करी, जिन पूजा लिनराज । मक्षपात कू छोड़के, सारी भातम काज ॥२०॥ छठे. ज्ञाता अङ्ग में, द्रौपदी पाण्डव नार। मन वच काया वश करी, पूज्या जिन दूकतार ॥२१॥ नङ्गा , विद्या चारणा, मुनिवर गुणको खान । ते पिण प्रतिमा वन्दता, पबम अङ्ग बखान ॥२२॥ जिन प्रतिमा निन सारखी, भाखौ श्री महावीर । कोई शङ्का मत प्राणज्यो, निम पामो भव तौर ॥२॥ जिनवर मत स्थाबाद है, मत जाणो करी एक। 'दया. दान मन धारल्यो, नद पावै विवक ना२४॥ जीव दया पाल्यां. धका, निश्च होय उपगार। 'दया धर्म को मूल है, एहवो आगम सार ॥२५॥ 1 . .
. - *प्रश्न पत्रिका [५ घातः करता जौव को, छोडावै कोई नाय । अभय दान तेहने कह्यो, आगम में निनराय ॥२६॥ ज्यो न छुडावो नौव कू', तो अनुकम्पा नाय । अनुकम्पा बिन नौवको, समकित पुष्टि न थाय ॥२७॥ गोशाली जलता थकां, जिननी दियो विचार । सौतल लेश्याये करी, तेजु लश्या वार ॥२८॥ ज्याने कहता चूकिया, ते तो मिथ्या वति । कल्पातीत खभाव है, तीन लोक के नाथ ॥२६॥ नेम कुंवर तोरण चब्यां, देखौ नौव विनाश । अनुकम्पा मन लायक, छोड़ाई प्रभु पास ॥३०॥ आप बड़े अणगार हो, पिण ये मोटी.खोट । ज्यो नवि नौव दया करो, बंधै पापं शिरं पोट ॥३१॥ पञ्च अधिकं चालौस तो, कद्या सूत्र जिनराय । हार्तिस तुम मानता, कुण हेतु के न्याय ॥३२॥ भाख्या नहि सूत्र मे सहु, आगम के नाम । ते बत्तीसा बौच है, देखो चित करौ ठाम ॥३॥ सांचा बत्तीस मानता, और न मानो सांच । के कोई प्रगट्यो ज्ञान तुझा, अथवा-मनको खांच॥३४॥ सत्य · परुपणा ज्यो करो, तो मानो महाराज। गहन अर्थ आगम तणा, भाष्या श्री जिनरान ॥३॥ .
६] प्रश्न पत्रिका मुखपती मुखं बांधता, कौन सूत्र अनुसार । मन को धमतां मिटो नहि, ऐ२ विषम प्रकार ॥३६॥ श्लेस्मा के संजोग सुं, उपजत जीव असख्य । जीव सप्यूछि इन्द्रियन, यामे नहिं को. बंक ॥३०॥ गणधर गौतम खाम , मिया देवी कह्यो एम। मुख बांधी वस्त्रे करौ, गब न आवै ओम ॥३८॥ ज्यो :पहलां बंधी हुन्ती, बलि बंधन किम होय । एह त्यतिकर तुम जाणजी, सूत्र विपाक जोय ॥३६॥ जम्मा छिंका कारणे, मुख ढांक :मुनिराय,। .... दशवकालिक सूत्र में, देखो मन चितलाय-॥४०॥ सूत्र ; सबै तुम देखल्यो,-बंधण-का-नहिं पाठ। भगवती ज्ञाता आदि में, साख सूत्र को आठ ॥४॥ इत्यादिक . सूत्रां. तणा, मानो नहौं वचन। प्राप.मते नहीं मानता; करल्यो लाख जतन्नः॥४२॥ लिख्या अनमौगंज,शहर मुं, मन अधिक उच्छरङ्ग खमतखामणा मानज्यों, करितीन करण दूक, संग।४३॥ मुनि शुग अति मुन अल्प थी, कैसे लिखू बणाय । जैसे जाल सब उदधि को, घट बिच नहिं समाय ॥४४॥ कुशल "खेम वरतै तिही, धर्म थकी बयकार।. यो पिण सुगुरु पयास थो, आणन्द हरष अपार ॥४५॥ - *प्रश्न पत्रिका [0 भक्ति पत्र भावे लिख्यो, धरज्यो चित अधिकाय । अधिको ओछो ज्यो हुवे, ते खमज्यो मुनिराय ॥४६॥' लिखज्यो उत्तर एहनो, मत धनज्यो मन रोस । मुन मति सार में लिख्यो, धरज्यो मन सुजगोश ॥४०॥ एहवि परुपणा ज्यो करो; तो होय लाभ अपार । मुग्ध जौव संसार का, उतरै पैले पार ॥४ा देखो बूटे रायजौ: तिम वलि आतमराम । त्यागौ मन भम आमणो. साखा भविजन काम ॥४ा थावोज्यो तुम एहवा, आगम अर्थ विचार। मारवाड़ ढूंढाड में, बहु जनं पामै पार ॥५॥ सकल सङ्क श्रावक सहु, वांची ज्यो धर प्रौत। उत्तर पाहो अपावज्यों, ए पण्डित जन रौत ॥५१॥ मुनिवर ना गुण गांवतां, होता चित धाराम । मन तन कपट तजौ करो, वन्दत कालूराम ॥५२॥ ॥ कलशः॥ . ७म.करी रचनाःअति ही सुन्दर, 'वांचता.मन. उबसे देवाधि देवतिलोय खामौ अन्तर नामी-मन वसे संबत उगणीस साल-वेतीस मास आश्विन सुद पखे । मुनि विनयचन्द पसायकरी ने, गोपीचन्द इम.उपदिशै॥
NAAR- ८] * प्रस्तावना पूर्वोक्त प्रश्न पत्रिका अजीमगज से लाडनूं आई सो वहाँ के श्रावकों ने महाराज से मालूम करी तब स्वामी ने हित शिक्षावली प्रश्नोत्तर तत्ववोध बनाया जिस को श्रावकों ने कण्ठान धार के लिखाकर अजीम- गज धावू कालूरामजी के पास भेजा था। यह प्रश्नोत्तर तत्ववोध सूत्रों के प्रमाणों सहित जिन प्रणीत वचनों को यथा तथ्य बताने वाला और आत्मार्थी भव्यों को लाभदायक है इस को वाँचने से निष्पक्षी हलु कर्मी जीव जिन मारग को सहज में अच्छी तरह जान कर यथाशक्ति व्रत पञ्चखाण अङ्गीकार करके अपनी आत्मा का कल्याण कर सकते हैं जो राग द्वेष रहित वीतराग कथित मार्ग है जिस आत्मार्थी को पुद्गलोक सुखों से अरुचि है उन्हीं के लिये यह प्रन्थ मानो अमृत समान मिट है । इसमें से कितनेक दोहा आगे श्री० खेतसी जीवराज ने मुम्बई में एक पुस्तक में छपाए थे परन्तु स- पूर्ण ग्रन्थ यह आजतक छपा नहीं अब शहर जयपुर में निम्न लिखित श्रावको ने धावा जिन्हों के नाम । गणेशीलालजी सींधड़, जोरावरमलजी वाठिया, गुलाबचन्द लूणियाँ, सुजानमलजी खारेड, चन्दनमलजी दूगड, नाथूलालजी संरावगी, उपरोक्त पाँचों धावकों के पास से पत्र लेकर मैंने संग्रह करके लिखा और सर्वसाधारण को लाभ पहुंचाने के निमित्त मेरी लघु बुद्धि प्रमाण शुद्ध करके छपाया है, यदि कोई अक्षर या लधु दीर्धादि मात्रा की गलती रही होय उसका मुझे बारम्बार मिच्छामि दुक्कड है पण्डित और गुणी जमों से मेरी यही प्रार्थना है कि कोई अशुद्धि यही हो उन के लिए क्षमा चाहता हूं। आप कां हितेच्छ और गुणवानो का दास, श्रा• जौहरी० गुलाबचन्द जूणियां जयपुरं । ।
प्रश्नोत्तर तत्वबोध . ॥ दोहा॥ नमं देव अरिहन्त नित, जिनाधिपति जिनराय । द्वादश गुणें सहित जे, बन्टू मन बच काय ॥ १ ॥ नमूं सिद्ध गुण अष्ट युत, आचार्य मुनिराज । गुण घटतीस संयुक्त जे, प्रणमुं-भव दधि पान ॥ २ ॥ प्रणमं फुन उवज्झाय प्रति, गुण पणवौस उदार । नमं सर्व साधु निमल, सप्तबीस गुण सार ॥ ३ ॥ द्वादश भठ षटतीस फुन, वलि मणवीस प्रगट्ट । सप्तबोस ये. सर्व हौ, मुणवर कशय घट्ट ॥ ४ ॥ नवकरवाली नां निके, मिमियां जगति मभार । एक एक जे गुण तणो, दूक दूक मिमियो सार ॥ ५ ॥ दूकसी अठगुण सहित ए, परमेष्टौ पद मंच । ते तो भाव निक्षेप हैं, हूँ प्रणमु तज खंच ॥ ६ ॥ ए सहु ने प्रथमी करी, सखर समय रस सार । तत्व बोध अविरोध तर, भाग्→ अधिक उदार ॥ ७॥ ॥ इति मङ्गलाचर्णम् ॥
*
१०]
* विजयसुर्याभाधिकार
॥अथ प्रथम विजयसुर्याभाधिकार॥
॥दोहा॥
कोई कहै विजय सुर, वलि सुर्याभ विचार।
प्रतिमा नौ पूजा करी, हिव तमु उत्तर सार ॥ १ ॥
प्रतिमा पूजो विजय सुर, जीव अनन्तौ वार ।
विवय पणे सह ऊपना, पाम्यां नहिं भव पार । २॥
शक्र सामानिक संगमो, देवलोक स्थित है।
पूजे दिन प्रतिमादि ले, रान बैसतां वेथ ॥३॥
तिमहिन सुर्याभादि सुर, गज बैसता तेह ।
प्रतिमा पूतलियादि प्रति, बहु वाना पूजेह ॥ ४ ॥
सुर्यामे सुरलोक नौ, स्थिति ना वश थी जाण ।
पूजा जिन प्रतिमा तणो, कौधी कहौ पिशाण ॥ ५ ॥
इत्ति भोघ नियुक्ति नौ, वह विषै ए ख्यात ।
पाचार्य गन्ध हस्त कृत, छै तिहां बहु अवदात ॥ ६ ॥
मिथ्याती वा समकिती, विमान अधिपति देव ।
देवलोक नौ स्थित हुन्ती, प्रतिमादि पूजेव ॥७॥
समदृष्टि पूलै तिमन, मिथ्याती पूर्जत ।
देवलोक नौ स्थित वशात, पिण धर्म कार्य नहिं हुन्त ॥८॥
सुर्याम बिन बन्दियां, प्रभु षट वच पाख्यात ।
यह पुराण भाचार तुझ, जौत आचार सुजात ॥६॥
* द्रोपदी अधिकार यह तुम्हारी कार्य है, वलि तुझ करवा योग । ए तुमने चाचरण छै. है मुझ पाग पारोग ॥१०॥ नाटक नौ पूछा करी, तिहां आदर न दियो खाम। मन में भलो न जाणियो, प्रगट पाठ मे ताम ॥११॥ वलि मौन राखौ प्रभू, देखो पाठ प्रसिद्ध । मे भाव निनेपै पागलै, नाटक पाण न दोध ॥१२॥ बलि मन मे भलोन जाणियो, ए पिण पाठमभार। पाज्ञा विन नहिं धर्म पुण्य, देखो आंख उघार ॥१३॥ तो तास स्थापन पागले, आज्ञा किम दै वीर। एह न्याय के पाधरो, धारो धर चित धौर ॥१४॥ ॥ इति ॥ ॥अथ द्वितीय द्रोपदी अधिकार ॥ ॥दोहा॥ कोई कहे समकित छता, द्रुपद सुता अवलोय । प्रतिमा नौ पूजा करी, तमु उत्तर हिव जोय ॥ १ १॥ वृत्ति मोघ नियुक्ति नौ, गंधहस्थ कृत मांय । जे एक पुत्र थयां पछे, द्रोपदी समकित पाय ॥२॥ पूर्व कृत निदान करी, प्रेरौ ती मु आय । पांच पाण्डव त्यां द्रोपदी, कयो सुजाता माय ॥३. - .
- १४] * द्रोपदी अधिकार * आशातनात्सम्यक्तभाव अतः पप द्रौपदी न सम्यक्त्व धारणी संभाव्यते पुनः ओघ नियुकि चिरंतन टीकायां गंधहस्त्याचार्येण उक्त द्रौपद्या नृप पुत्रिका निदान कृति भार पंचस्यछेता निदान भोजितवान जातक पुत्रः पुनः पाश्चात्साधू सकाशमाप्य प्रवरं सम्यक्त्व मार्गो धरते ॥ इति ।। ॥ एहनु अथ वार्गिका करी कहै छै॥ इहाँ फह्यो द्रव्य लिङ्गी परिगृहीत चैत्यप्रति प्रतिमा ते स्यूं सम्यक् इष्टि संभावित नही ते किण कारण थकी इसो कोई प्रश्न पूछ तेहन उत्तर द्रव्य लिङ्गी मिथ्या दृष्टि छ ते कारण थकी जो इम छै तो दिगम्बर सम्बन्धी चैत्य प्रतिमा स्यूं सम्यक् द्रष्टि संभावित नहीं ए सत्य जो ए सत्य तो वर्गलोक ने विष साखता चैत्य सुर्यामादि देवता समदृष्टि पूजे ते माटै ये पूर्वा पर विरुद्ध मही हुवै कोई पहवी तर्क की छतें हिव पहनु उत्तर कहै छ, सूर्यामादि देव खर्गलोक ने विष साखता चैत्य पूजे ते कल्प देवलोक नी लित वस अनुरोध थकी इण कारज थकीज विरुद्ध नहीं हुवै जो इम छै तो द्रौपदी समकित धारी चैत्य ने नमस्कार कियो ते स्यूं द्रव्य लिङ्गी परिगृहीत न हुई काई पहवी तर्क कीधै छत हिवे पहनु उत्तर कहै छै। द्रौपदी समकित धारणी न हुई इम कहे छतै बलि पूच्यो द्रौपदी समकित धारणी किम नहीं, तेहनु उत्तर।ओध नियुकि ने विप इम को लीजन ने स्पर्श साधू ने त्रिविध २ वरंजवो साधू ने अकल्पनीय कर्म आचरखा थको समकितनुं अभाव हुवै ते कारण थकी साधू ने ली जन नुं स्पर्श त्रिविध २ वरजवू द्रौपदी आगम ने विर्ष सांगली ये छ "लोमहत्यं परामूसई' लोमहस्त करिके फरसै पूंज इत्यर्थ, ते पूंजवै करी जिम नूं स्पर्श हुवे जिन में स्त्री अन स्पर्शवे करी अशावना हुवै आशातना करिबे करी समकितनं अभाव इण कारण थकी द्रौपदी, समकित धारणी न संभाविये, वलि ओघ नियुक्ति नी चिरंतन दीका ने -विपै गन्धहस्त आचार्य को द्रौपदी नृप पुत्री निहाणानी करण हारी - * द्रोपदी अधिकार [१३ AAA- M ॥ ते माटै ये द्रोपदी, निदान विन पूरह । प्रतिमा पूजी तिण समै, समकित किम पामेह ॥१४॥ जाता वृत्ति विषै कह्य, एक वाचना मांहि । द्रोपदी जिन प्रतिमा तणी, अरचा कौधौ ताहि ॥१५॥ दौसै येतोहिज इम कयो, तेह · वृत्तिरै मांहि । नमुत्युणं नु पाठ त्यां, आख्यो दौस नांहि ॥१६॥ ॥ वात्तिका कोई कह द्रोपदी समकित धारणी प्रतिमा क्यूं पूजी तह तुं उत्तर ओघ नियुक्ति प्रत्य ने अभिप्राय द्रौपदी प्रतिमा पूजी तिण वेल्या सम्यक धारणी नहीं ते देखाई के, "वं मि जिणहरा' इति व्याख्या ओघ नियुक्ति रव्याख्येयं ॥ द्रन्यलिङ्गी परिणहितानि चैत्यानि किं सम्यगदृष्टिर्न संभाविनानि इनि कस्मात् द्रव्यलिङ्गी मिथ्यावृष्टित्वात् । यद्येवं तर्हि दिगम्बर संबंधीनि चैत्यानि किं सम्यकही न संभाविनानि एतत्सत्यं यो तत्सत्यं नहि स्वर्गलोकेषु साखतानि चैत्यानि सूर्या भाद्यादेवाः सम्यक्दष्टय. प्रपूज्यते तश्चत्यानि संगमवत् अभव्य देवा: मढीय मिति बहुमानात् प्रपूज्यं ति पूर्वी पर विरुद्धं न स्यात् ननुसूर्या भाद्यादेवाः नरकल्पस्थिति वसानुरोधान् अत. एव विरुद्धं न सभवति यद्येवं तर्हि द्रोपद्या सम्यक्त धारण्यायानि चैत्यानि नमस्कतानि किं व्यलिङ्गी परि- ग्रहीतानि न भचंतीत्याह द्रोपदी न सम्यकाव धारणो म्यात् ॥ ओघ नियुकथा इत्युक्तं ॥ इत्थी जण सघट्ट तिविहं तिबहेणं बज ए साहु इति वचनात् ॥ श्री जनस्पी त्रिविध विविधेन साधूनां वर्जनीयः साधोश्व अकल्पनीयः कर्माचारत. सम्यक्तभावान् द्रौपढी आगमेषु श्रूयते लोमहत्येयं परामुसई । लोमहस्ते न परामृशति परामायतीत्यर्थः तत् परमार्जने न जिनस्पर्शी जांत जिनस्य स्त्री जनस्पर्श न आशातनास्यात् .AAAAAA---VPAN . १६] *निक्षेपा अधिकार विनय विषै न्यो वर्तता, वंदै इक जिनराय । सो पिण जे चोवीसत्यो, किण विध कहिये ताय ॥८॥ विदेह क्षेत्र ना मुनि कर, द्वितीय भावश्यक जेह । विचला जिन बावीस ना, मुनि पिण तिमहिन करहा। वैटकने तमु नियम नहौ, पिण ज्यो किणहिकवार। मडिक्कमणा में स्युं करे, दितीव आवश्यक सार ॥१०॥ जाता अध्ययन पञ्चमें, शेलक ऋषि ना माय । पथक पडिकमणो करत, वांद्या आख्या ताय ॥११॥ वे मार्ट जे 'जिन हुवै. तह तणो ले नाम । धितीय भावश्यक नुं तदा, नाम उक्विता ताम ॥१२॥ जिन चौबीस ती जिहां, नियम नहीं है ताम। तिण सुं चोवीस्था तणे, स्थान उत्कीर्तन नाम ॥१३॥ अनुयोग द्वार विषै अमल,, वश्यक षट मांय। अर्थ तणां अधिकार षट, आख्या श्री जिनराय ॥१४॥ हितीय पावश्यक नै विषे, उत्कीर्तन पाख्यात । कधू अर्थ अधिकार ये. जिन गुन नाम विख्यात ॥१५॥ विदेह हंध मे मुनि तणे, द्वितीय पावश्यक जान । ख ख जिन गुन नाम ते, उत्कीर्तन अभिधान ॥१६॥ वह विजय नहीं जिन तदा, हितोय आवश्यक माहि। पूर्व जिन गुन नाम दे, इसो सभवै ताहि ॥१७॥ आवश्य . .
*निक्षेपा अधिकार
[१५
तिणे भर्तार पंच ने घरी निहाणो भोगवी एक पुत्र थयाँ पर्छ साधू
समोपै समकित पामी पहवो ओघ नियुकि नो टीका नै विषे गन्धहस्त
आचार्य को ते मित्थ्यात्वना घश थकी पुण्यादिक करी प्रतिमा
पूजी।
॥अथ तृतीय निक्षेपा अधिकार॥
॥ दोहा॥
कोई कहै बावीस मिन, ससु मुनि प्रतिक्रमणेह ।
किस्यु कर चोबोस्थो, द्वितीय आवश्यक जेह ॥१॥
तसु कहिये महाविदेहना, मुनि प्रतिक्रमण विषह।
द्वितीय भावश्यक स्यूं करे, न्याय विचारी लेह ॥२॥
नहीं तिहां भवसर्पिणी, उत्सर्पिणी पिण नाहि ।
ते माटै नहि षट परा, सम पड़ा कहि वाहि ।।३।।
तिहां अनन्ता शिव गया, बासे मुक्ति पनन्त ।
मेल नहीं चोवीस मुं, देखोजी बुद्धिवन्त ॥ ४॥
दूक दूक विजय विषै वली, एक एक जिनगन।
वर्तमान काले हुवे, उत्कृष्ट पणे समान ॥ ५ ॥
हिव वे क्षेत्र विदेह ना, निन थया सिद्ध अनन्त ।
तसु वांद्यां चौबौस नौ, संख्या नथी रहन्त ॥ ६ ॥
थास. सिद्ध मनन्त विन, तमु बंदै जे कोय ।
तो पिण्ण जिन चोबीम नी, संख्या न रहै सोय ॥७॥
१८]
*निक्षेपा अधिकार
विदेहक्षेत्र मे बौस जिन, तमु मुनि ख जिन नाम।
अर्थ तणा अधिकार करि, ते उत्कौर्तन ताम ॥२॥
सूत्र उववाई ने विषे. तप ना हादश भेद ।
तृतीय भेद भिक्षाचरी. वाळं नाम सर्वद ॥२६॥
समवायंग विषे कया. वारै भेद अभिराम ।
भिक्षाचरी ने स्थान जे. वृत्ति संक्षेप सु नाम ॥३०॥
भिनाचगै ना नाम वे, द्वितीय पावश्यक तेम।
उत्कीर्तन चोवीस्थो, उभय नाम तमु एम ॥३१॥
नवमा जिन ना नाम वे, सुविध अने पुफदन्त ।
आख्या लोगस में प्रगट, देखोनी बुद्धिवन्त ॥३२॥
पुष्प सरिसा दन्त तसु, पथ्य दन्त अभिराम ।
दूम अर्थ तणा अधिकार करि, उत्कीर्तन पिण नाम ॥३३॥
कृष्ण अने वलभद्र नो, केशव राम आख्यात ।
उत्तराध्ययन बावीसमें,तिम द्वितीय आवश्यक ख्यात।३४॥
किहांच्यार महाव्रतकह्या, तास कह्या चिहुं याम।
उत्तराध्ययन तेवौस में, केशी मुनि गुण धाम ॥३५॥
द्वितीय आवश्यक ना तिमज, उभय नाम अवलोय।
उत्कीर्तन चोवोस्थो, सहु भावे जिन जोय ॥३६॥
चौवौसम जिन ना मुनि, करै चोवीस्थो ताम ।
विदेह तेवीस तणा मुनि, उत्कीर्तन जिन नाम ॥३७॥
*निक्षेपा अधिकार
[१७
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विचला जिन बावीस ना, मुनि ने खजिन नाम ।
उत्कौतन अभिधानतसु. द्वितीय आवश्यकताम॥१८॥
धुर जिन ना मुनि लै तिमज. खजिन गुन फुन नाम।
द्वितीय आवश्यक संभवै, उत्कौन अभिराम ||१||
वा धुर जिनना मुनि तणे, चोवोस्थो ज्यो होय ।
तो गत चौबीसौ हुई. नाणे केवलौ सोय ॥२०॥
थया नही चोवीस निन, तमु बारै अवलोय ।
द्वितीय आवश्यक ने विषे, चोवीस्थी किम होय ॥२१॥
चोवीसमा शासण धणी, वह तणो अपेक्षाय ।
पाख्युं है चोवोस्थो, हितोय आवश्यक मांय ॥२२॥
द्वितीय आवश्यक ना कह्या, उभय नाम अवलोय।
उक्वौत्तन चोबोस्थो. तसु हेतु हिव जोय ॥२३॥
पञ्चम अंगे धुर का, इन्द्रभूति सुप्रसिद्ध ।
वृत्ति विषै कयो नाम ये, मात पिता ने दोध ॥२४॥
गौतम गौत्र करि तसु, गौतम ‘नाम कहाय ।
उत्तराध्ययन तेवीस मे, गाथा छट्ठी मांय ॥२५॥
तिम जिनवर चोवीसमा, तसु वारै अवलोय ।
गुणै नाम चोवीस जिन, ते चोवीस्थो होय ॥२६॥
ते चोवीस्था नै विषे, उत्कीर्तन अभिराम ।
अर्थतणा अधिकार है, पिग मुख्य चोवीस्थो नाम ॥२०॥
२०]
* निक्षेपा अधिकार
*
-
१
तिम जे कोई इक मुनि हुस्ये, पिण हिवडांग्रहस्थ पोह।
कहिये द्रव्य साधू तसु, आवश्यकवत् एह ॥४८॥
नो वन्दो द्रव्य निक्षेप ने, तो तिण द्रव्य मुनि ग पाय।
तुमे बन्दता क्युं नघौ, तुम श्रद्धा न्याय ॥४॥
चोवीसौ वर्तमान ने, बन्दै बहु ठामेय ।
अनागत वांद्या नथौ, देखो तुर्य ग्रंगय ॥५०॥
तृतीय निनेपो द्रव्य तसु, गणधर बंद्यो नांहि ।
तो द्वितीय निक्षेपो स्थापना, किम बंदी जे ताहि ॥५१॥
द्रव्य तीर्थंकर कृष्ण था, दोधा नेम बताय ।
नेम तणा साधु साध्वयां, त्यांक्यु नहौं बंद्या पाय ॥५२॥
उलटो कृष्ण भणी तिगां, दोधो पगां लगाय।
तो चौबीस्थो करतां छतां, किम वदै मुनिराय ॥५॥
द्रव्य जिन श्रेणिक नृप हुँतो, दोधो वौर वताय ।
वीर तणां साधु साध्वियां, त्यां क्युं नही बंद्या पाय ॥५४॥
तीर्थंकर बन्दन तणं, तमु राण्यां रे चाहि ।
तो कृष्ण अने श्रेणिक तथा, त्यां क्यूं नही बद्या पाहि ॥५५॥
उलटौ करौ विडम्बना, जाणी ने भरतार ।
तो चौवीस्थो करता छता, किम वर्दै अभागार ॥५६॥
जिन बन्दै तिहुं काल ना, नमोत्थुणं रै अन्त ।
किणी सूत्र में ते नहीं, देखोजी बुद्धिवन्त ॥५॥
Knowww An.
* निक्षेपा अधिकार
[१६
मुझ ने झ्यास एहवा, वारू न्याय विचार ।
वलि कवली जे वदै. तेहिन सत्य उदार ॥३८॥
भाव निक्षेपै भरत नौ, चौबीसौ वर्तमान ।
पाठ बद बहु ठाम है, लोगस मांहि सुजान ॥३६॥
भाव निक्षेपै ऐरवत, चौबीसौ वर्तमान ।
पाठ बंद बहु ठाम है, समवायंगे जान ॥४॥
चौवीसौ भरत ऐरवत, अनागत जिन नाम।
द्रव्य निक्षेपी तुर्य अङ्ग, बंदे पाठ न ताम ॥४१॥
अष्ट अने चालौस ना, वर्तमान जिन नाम ।
भाव निक्षेपो ते भणी, पाठ बंदे बहु ठाम ॥४२॥
अष्ट अने चालीस ना, अनागत जिन नाम ।
द्रव्य निक्षेपो ते भणी, बदे टाल्यो खाम ॥४॥
द्रव्य निक्षेपै एह जिन, गणधर बंद्या नांहि ।
तो चौवीस्थो करतां छता, द्रव्य जिन किम वंदाहि॥४४॥
तीर्थंकर घर में छतां द्रव्य निक्षेपै जेह ।
तहने मुनि बदै नही, तुझ लेखे पिण तेह ॥४५॥
तो होनहार जिनवर भणी. चौवीस्था विषेह ।
मुनिवर किम बंदै तमु, न्याय विचारी लेह ॥४६॥
वलि कयो अनुयोग द्वार में, जे आवश्यक ने जान।
होस्वैपिणन योहनी.ते द्रव्य आवश्यक पिछाण ॥४७॥
२२] निक्षेपा अधिकार कोई कहै आचार्य ना, उपाध्याय ना ताहि । उपयण नौ आशातना. कहि ठालवी काहि ॥८॥ जान दर्शन चारित तणां, वह उपधिरै माहि । कहवा गुण छै ते भणी, उपधि संघटनांहि ॥६॥ नवमें दशवकालिके. द्वितीय उद्देशे ख्यात । इम कहै उत्तर तेहनु, सांभलजो अवदात ॥२०॥ सूत्र विषै तो इम कह्यो, गुरू कायाई करह। तिमहिन गुरु नां उपधि करि, सघटे थये छतेह ॥७॥ मुझ अपराध खमो तुम्हे, वलि न हूँ कवं कोय । दूम भाषे सुविनीत शिष्य, तास न्याय हिव जोय ॥७२॥ आचार्य नां उपधि ए, तास प्रयोगे पाय । जिम गुरु कै सहवतों तनुतेम उपधि पिण ताय ॥७॥ भाव निक्षेप गणपति, तास उपधि तनु जेम । तासु सघट्टथयां खामवं, आख्यू सूबे एम ॥७४।। थयु वलि अपराध मुझ, खमं तुम्हे अवलोय । ए बच प्रत्यक्ष गुरु तणे, न्याय विचागै जोय ।।७।। जो खमायवो हुवे उपधि ने. तो देखो चित देह । बन्दना करो खमायवे. उपग्रण स्यु नाणेह ||७६॥ ये तो उपधि सहित जे, आचारन नौ जोय । कही अशातना टालवी, नयी अन्यथा कोय ||७||
*निक्षेपा अधिकार *
[२१
-
जे कोई नौव अनौव ने नाम आवश्यक देह ।
ते आवश्यक नों प्रभु, नाम निक्षेप कह ॥५॥
अनुयोग द्वार विषै दूसो, प्रगट पाठ पहिछाण ।
तिमहिज तीर्थंकर तणं, नाम निक्षेपो जाण ॥५६॥
जिम कोई जीव अनौव नें, ऋषभ नाम है ह ।
ऋषभ देव भगवान नो, नाम निक्षेपो वह ॥६॥
जो बांदो नाम निक्षेपने, तो तिण ऋषभारा पाय।
क्यं नहिं वांदो छो तुम्हे, तुझ श्रद्धा रै न्याय ॥६॥
किण रो नाम दियो वली, परिहन्त ने भगवान ।
नाम अरिहन्त बन्दो तुम्हे, तो क्युं नहिं बन्दो जान।६।
सिद्ध निरञ्जन नाम पिण, दौसै वहु जग मांहि ।
नाम सिद्ध बन्दो तुम्हे . तो क्यु नहिबन्दो पाहि ।।६।।
फेडूका मनुषां रा कारटा, वेपिण बाजे आचार्य ताय।
बन्दो नाम आचार्यतुम्हे, तो क्यु नहिं बंदो पाय ॥६४॥
कईक ब्राह्मण लोक मे, बाने के उपाध्याय ।
नाम उपाध्याय बदो तुम्हे, तोक्यु नहिं बदी पाय ॥६५॥
नोगौ सन्यासौ प्रमुख, साधू नाम कहाय ।
नाम साधु वांदो तुम्हे, तोक्यु नहिं वन्दो पाय ॥६६॥
ज्ञान दर्शन चारित्र ना, गुन्म नही छै ने मांय ।
तेह बंदवा योग किम, निमल विचारो न्याय ॥६॥
२४] निपा अधिकार । ज्ञान दर्शन चारित तणा, तिणमें गुण नहिं कोय । तिणसुदहन क्रिया कियां, अशातना नहिं होय ॥८॥ करी स्थापना तेहने. वांद्या कहो छो धर्म। तो ए सागे तनु वालियां, लागै आशातना कम ॥॥ आवश्यक नो जाग थो, काल कियो तिहबार । द्रव्य आवश्यक तनु कयो, देखो अनुयोग द्वार 18.1 तिम मुनि काल कियां छतां, नौव रहित ने देह । द्रव्य साधु कहिये तसु. न्याय विचारौ लेह ॥शा वन्दनीक द्रव्य मुनि कहो, तो तुम लेखें ताय । द्रव्य साधु वाल्यां छतां, अशातना मिण थाय ||२|| जम्बूद्वीप पन्नती में कह्यो, जिन जनम्यां सुर राय । जन्म भुवन जिनवर तणा, तसु प्रदक्षिणा दे पाय ।। जिन ने वा जिन मात प्रति, प्रदक्षिणा बण वार । देई कर जोड़ी करो, क्दै शक्र अवधार ||६|| हेधरण हारी रतन कूधिनी, थावो तुम नमस्कार। दूह विध सुरपति ऊचरै, ए पिण जौत आचार ॥५॥ दूण लेख मरु देवी प्रति, इन्द्र कियो नमस्कार। पिण सकित किण पै लही, वारुं न्याय विचार ॥६॥ ग्रहस्थ पणे जिन जनक ना, पद प्रणमै अवलोय । लौकिक हेते जाणवू, धर्म हेतु नहिं काय IIEI
* निक्षेपा अधिकार
२३]
सयनाशन गणपति तणां, तास संघट्टवं नाहि ।
तेहिन प्राचार्य विहार करि, गया हुवै जो ताहि ॥७८॥
सयगाशण तेहिज तव. शिष्य सवै के नांहि ।
भोगवियां आशातना. लागै के नहि ताहि ॥७॥
जे पृथिवी शिल ऊपरै, बैठा श्री भगवान ।
कालान्तर गोयम सुधर्म, बैठे के नहीं जान ॥८॥
छायागणी ना तनु तणो, शिष्य अक्रमी तास ।
चाले के चालै नहौं, जोवो हिये विमास ॥८॥
तुझ लेखै छाया भणी, आक्रमवू पिण नाहि ।
संघटो पिण कर नहीं, गुरू छाया नु ताहि ॥२॥
ते माटै ए स्थापना, वन्दन , योग न होय ।
ज्ञान दशन चारित्र तणा, तिणमें गुण नहिं कोय॥८॥
अथवा आचार्य तणा, पगला तणौ पिछाण ।
तुम्हे करो छो स्थापना, तेहने बन्दो जाण ॥८॥
तो चाले गुरू कोड शिष्य, गमन करता जोय ।
धरतौ ऊपर गुरू तणा, पगला मडै सोय ॥८५||
शिष्य ना पग ते अपरै, पडियां दण्ड स्यु आय ।
बन्दनोक पगला कहो, ते लेखे दण्ड माय ॥६॥
चारित सहित ने गुरू भणी, बदै तौरथ च्यार ।
काल कियां तसु कायने, भस्म करै तिह वार ॥८॥
* अम्बडाधिकार
तीर्थकर जनम्यां पछे, ते पिण द्रव्य जिनराय ।
भाव निक्षेपै तेहने, ग्रहस्थौ कहिये ताय ॥१०॥
तीर्थकर दीक्षा लियां, तसु द्रव्य निन कहिवाय ।
भावे ते मोठा मुनी, बन्दनौक तसु पाय ॥१६॥
चौतीस अतिशय श्रोपता, बाणी गुण पैंतीस ।
केवल जान थयां मछ, भावे जिन जगदीश ॥११॥
वन्दनीक भावे मुनी, वलि भावे जिनराय ।
भोलख ने जपियां थकां, पातिक दूर पुलाय ॥१११॥
॥ इति निक्षेपाधिकार ॥
॥ अथ चतुर्थम् अम्बडाधिकार ॥
॥दोहा॥
कोई कहै अम्बड का, अरिहन्त विन अवलोय ।
वलि अरिहन्त ना चैत्य विन, नथौ बंदवा मोय ॥ १॥
प्रथम उपाङ्ग विषै दूसो, आख्यो श्रौ जिनराय ।
ते अरिहन्त ना चैत्व कुण, तमु उत्तर कहिवाय ॥२॥
परिहन्त तो धुरपद विषै, प्रतिमा चैत्य कहाय ।
तो मुनिवर नही बन्दवा, अन्य वा तिस न्याय ॥३॥
मुनि पद तो है पञ्चमो, ते धुरपद में नहीं आय ।
तिण कारण अरिहन्त ना, चैत्य मुनि कहिवाय ॥ ४॥
*निक्षेपा अधिकार
[२५
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ज्ञाता अध्ययन आठमे. मल्लिनाथ भगवान ।
लागी पगां पिता तणे, लोकिक हेते जान ||१८||
मल्लिनाथ थया कवली, तठा पछै मा तात ।
बाणी सुणी श्रावक धया, पाठ विषे अवदात Item
दूण लेखै मल्लि नो पिता, पहिला श्रावक नांहि ।
तास पाय प्रणम्यां मल्ली, धर्म नहीं तिण माहि ॥१०॥
तिम हिन द्रव्य जिनवरभणी, इन्द्र करै नमस्कार
ए तसु जौत आचार छ, श्रौजिन पाजा बार ॥१०॥
जीव रहित जिन देहं ते, द्रव्य जिन तास कह।
ते वंदनीक किण विध हुदै, न्याय विचारी लेह ॥१२॥
जो बन्टनौक ते द्रव्य हुवै, तो तुझ लेख कहेह ।
तनु प्रते दग्ध कियां छतां, आशातन लागेह ॥१३॥
ज्यो द्रव्य निक्षेप बन्दो तुम्हे, तो जमाली आदि।
द्रव्य साधु कहिये तसु, बन्दो क्यूँ न संवाद ॥१०४॥
भावै जे साधू हुन्तो, सेव्यो तिण अण्णाचार ।
भाव निक्षेपो तसुगयो, कै गयो द्रव्य जिवार ॥१०॥
मुनि वैसे सेव्यो तिणे, अशाचार अवधार ।
ते द्रव्य मुनि बन्दो कै नहिं, धर्म हेत धर प्यार १०६॥
कृष्णादिक नरक पद्या, द्रव्य जिनवर कहिवाहि ।
भावै कहिये नेरिया, बन्दनौक ते नांहि ॥१०॥
॥
२८]
* आनन्दाधिकार
कोई कहे तसु देव ने, किम बोलावे ताय ।
वलि अशनादिक किम दिये, निमल सुणो तमुन्याय ॥७॥
पुत्र सुजेष्टा न करो, महादेव तसु देव ।
नवमे ठाणे अर्थ मे, ते वीर थका खय मेवं ॥ ८ ॥
चैडा राजा नौ सुता, तेह सुजेष्टा जाण ।
तिण कारण तमु देव ते. विद्यमान पहिछाण ॥६॥
तहने बोलावै नहौं, वलि नहीं आप आहार ।
वलि चैत्य मुनि अरिहन्त ना, भ्रष्ट थया तिणवार ॥१०॥
ते अन्य तौर्थिक में नई मिल्या, अन्य तौर्थिक पिण तास।
ग्रहण किया निजमत विषै, अन्य तौर्थिक रहित विमास ॥
नहीं बोलावं तेहने, बलि नहीं पा थाहार ।
अभियह ए आनन्द लियो, वारूं न्याय विचार ॥१२॥
॥ इति आनन्दाधिकार ॥
अथषष्टम्जंघा विद्याचारणाधिकार।
॥दोहा॥
कोई कहै मुनि लब्धि धर, बडा विद्याचार ।
जावै । रुचक नन्दौखरें, वन्दै चैत्य तिवार ॥ १ ॥
बौसम शतक भगवती, नवम उद्देश विषह ।
प्रभू पाख्या ते चैत्य कुण, उत्तर तास कहेह ॥२॥
* आनन्दाधिकार
[२७
जिन प्रतिमा जिन सारसौ, तुम्हे कहो तिण न्याय ।
प्रतिमा तो धुरपद हुई, मुनि धुरपद नहीं आय ॥ ५ ॥
अरिहन्त तो ए देव हैं. अरिहन्त चैत्य सु सन्त ।
तेह गुरु ए देव गुरु, बिना न अन्य बंदन्त ॥ ६ ॥
॥ इति अम्बडाधिकार।
॥अथ पंचम् आनन्दाधिकार ।।
॥दोहा॥
कोई कहै आनन्द कयो, अनतौर्थिक संग्रहीत ।
परिहन्त ना ले चैत्य प्रते, बन्दू नहौं प्रतीत ॥ १ ॥
एह सातमा अङ्ग मे, दाख्यो गणधर देव ।
ते अरिहन्त ना चैत्य कुण, उत्तर तासु कहेव ॥२॥
आनन्द का अण तीर्थ ने, अणतीर्थिक ना देव ।
अन्यतौर्थिक परिग्रहीत ने, अरिहन्त चैत्य कहेव ॥ ३ ॥
ए तीन ने बन्दना, करवी कल्यै नाहि ।
नमस्कार करिवं नहौं, ए तीन ने ताहि ॥ ४ ॥
पहिला बोलाव्यां बिना, बोलू नहौं दूक वार।
बार घार बोलू नहौं, नही आपूँ तमु आहार ॥ ५ ॥
चैत्य दूहां प्रतिमा हुवै, तो बोलावै कम।
वलि भाप अशणादि किम, न्याय विचारो एम ॥ ६ ॥
३०]
*जंघाविद्याचारणाधिकार
तया चैत्य ते जिन वह, तह तणा गुण गाय ।
धन्य प्रभू दूम कहै तमु, सत्य वचन सुखदाय ॥१३॥
कोई कहे प्रभूजी भणी, चैत्य किहां आख्यात ।
उत्तर तेहने आखिए, सुगज्यो सुगण सुजात ॥१४॥
सूर्याभे मन चिन्तव्यु, कल्याण कारौ खाम ।
दूरितोपशम कारौ यकी, मगलोक अभिराम ॥१५॥
तीन लोकना अधिपति, तिणसुदेवत नाथ ।
हेतु सुप्रसन्न मनतणा, तिणमु चैत्य पाख्यात ॥१६॥
राय प्रशेणी वृत्तिमें, चैत्य अर्थ जिन, ख्यात ।
तेमाट बड़ा संभवे, बहु जिन गुण अवदात ॥१७॥
बहु जिनेन्द्र वा जिनकहै, रुचक नन्दीश्वर मांय।
भाव कन्या तिमहिज सहु, देखि हिये हुलसाय ॥१८॥
धन्य जिनेन्द्र धन्य केवलौ, गिरि कुंटादिक जेह ।
जेम कहा तिमहिन ए, इम तमु स्तुति करेह ॥१६॥
ते माटै दू चैत्य ते, बहु जिन कहिए सोय ।
बन्दई तमु स्तुति कर, एह अर्थ पिण होय ॥२०॥
विन आलोयां ते.मुनी, काल कर जो कोय ।
तास विराधक प्रभु, कयो, पाठ विष अवलोय ॥२॥
जव को तर्क करै दूसौ, दिसा गौचरी जोय
माछा बी पडिकमै, ईर्या वही मुनिराय ॥२२॥
*जंघाविद्याचारणाधिकार [२६ जङ्घा विद्या चारणा, रुचक नन्दीश्वर जाय। तिहां 'बन्दै पाठ है, पिण नमसई नाहि ॥३॥ मानुषोत्तर गिरी विषै, कूट च्यार पाख्यात । नथौ का सिद्धायतन, तूर्य ठाण अवदात ॥ ४ ॥ बत्ति विर्ष बादश कद्या, तिशं देवता वास । पाख्या पिण सिहायतन, फॅट कधो नहौं तास ॥ ५ ॥ तिहां चैत्य बन्दै किसा, तिण सं चैत्य सुज्ञान । करै तास गुणयाम पति, देखो से स्थान ॥६॥ धन भगवन्त नो ज्ञान ए, धन्य भगवन्त रो ज्ञान । ओम का तिमहिन सह, इम करै स्तुति जान ॥ ७ ॥ नमसई तिहां पाठ नहीं, बन्दई पाठन एक । तहनु है स्तुति अर्थ, देखो धर सु विवेक ॥८॥ प्रश्न हजारां पूछिया, गोयम पञ्चम अङ्ग । तिहां बंदई नमसई है, विई पाठ सुचन ॥६ एतो के अति अजव गति, रुचक होप लग जाय । तिहां नमसई पाठ नहीं, नमोत्थूणं पिण नाय ॥१०॥ श्रावक तुङ्गियां ना प्रवर, भाया स्थिवरां पास । तिहां वन्द्रई . नमसई, उभय पाठ गुण रास ॥११॥ नो प्रतिमा बन्दन गया, तो करता नमस्कार। नमोत्थूणं गुणता वलि, देखो हृदय विचार ॥१२॥ - ३२] जंघाविद्याचारणाधिकार * वही पहिकमियों बिना काल कर तो उपरी श्रद्वारे लेखे ओ पिण विराधक हुवै, धर्म कारणे जाता धर्म कारणे आवतां ईर्यावही.पडि- कमिया विना काल कर तो उणरै लेखे ओ पिण विराधक हुवे, जद तो तीर्थकर ने बांदवा जात आवता ईर्यावही पडिकमियां बिना काल करें तो उपर लेखे ओ पिण विराधक, अरिहन्त गणधर आचार्य उपाध्याय महामोटा पुरुषों ने वलि साधू साध्वियों ने बांदण जाता ने आवा ईर्यावही पडिकमियां बिना काल कर तो उणरै लेख ओ पिण विराधक, इम इत्यादिक अनेक कार्य कियाँ ईर्यावही पडिकमवी छ, जद ते पिण कार्य करता ईर्यावही पडिकमियाँ बिना काल करें तो उणरै लेखे ओ पिण विराधक, इमर्यावही पडिकमियां बिना विराधक हुवै छै तो साधू ने पहिलाहीज ईर्यावही पडिकमवा वालो कार्य करणो हिज नही, तथा पडिलेहणा कियाँ पछै अथवा विवे ईर्यावही पडिकमियाँ बिना काल कर तो उणरै लेख ओ पिण विराधक हुवे, इम विहार करता विचै ईर्यावही पडिकमियाँ बिना मरै तो उणरै लेखे ओ पिण विराधक हुवै, जो इम विराधक हुवै जद तो तीर्थकर ने धन्दवा जाता ने आवता विचै ईर्यावही पडिक्कमियां बिना काल करे तो उगरै लेखे ओ पिण विराधक हुवै, अरिहन्त गणधर आचार्य उपाध्याय महा मोटा पुरुषों ने वलि साधू साध्वियों ने बन्दवा जातीने आवता विच काल करै तो उणर लेखै ओ पिण विराधक छै, इम ईर्यावही पडिकमियाँ विना विराधक हुवै तो सार्धान पहिला हिज ईर्यावही पडिकमवाये कार्य करणो हीज नहीं, इण श्रद्धारै लेखे तो साधू ने हालवो चालवो इत्यादि क्युंही कार्य करणो नहीं, अरिहन्त ने भगवन्त ने तीर्थकर ने गणधर ने माचार्य ने उपाध्याय ने महा मोटा पुरुषों ने साधों ने साध्वियों ने किण ही ने बन्दवा जाणो नही कदा विच ही काल कर तो विराधक पणो थाय छै आउखा रो भरोसो छे नही.विणसं, उणरी श्रद्धारै लेखे तो धर्म ये कार्य करण ने कहाँ जाणो नहीं जाता ने आवता ईर्ष्यावही पडिकमियां बिना मरे * जंघाविद्याचारणाधिकार ३१] तिम ए पिण पावौ करो, ईयर्या वहौ गुणेय। तासु उत्तर कहौजिये, सांभलन्चो चित देय ॥२३॥ दिसा गौचरी मुनि जई, आवंतां कियो काल । तेह विराधक नहीं हुवे, नोवो नयण निहाल ॥२४॥ जंघा विद्याचारणा, काल कियां अन्तराल । तास विराधक प्रभु कद्या, नथी भाराधक नहाल २५॥ तिणसुईयां वही तणू, नथी मिले ए न्याय । लब्धि फोड़वौ तहनो, दंड कयो जिनराय ॥२६॥ वार्तिका ॥ । कोई कहै जंघाविद्याचारण लब्धि फोडो ने नन्दीश्वर द्वीपे जाय ते आलोयां बिना मरे तो विराधक को ते आलोयणा ईर्यावहो नी कही 3 दिसा गौवरी जाव तेहनी पिण ईर्यावही 'गुणे विम ए पिण लाब्धि फोडने नन्दोश्वर द्वीप गया तेहनी पिण इर्यावही जाणवी इस कहै तेहने कहिणो हम ईर्या वही गुण्या विना विराधक हुवै तो गौचरी पिण जाणो नहीं कदा ठिकाणे आयाँ विना पहिला मरि जाय तो विराधक हुचे, वलि गाम याहिर दिसा जाणो नही। बिहार फरणो नहीं। पढिलेहणा करणी नहीं। क्षण भंगूर काया है सो ईर्यावही गुणियाँ विना पहिला हो मर गाय तो विराधक होवणो पड़े ते माटे साधू गौवरी गयो पाछो भावतों बीच में काल कर ईर्यावही पडिकमियाँ बिना जव तो ओ पिण विराधक हुवे, इम विहार करता विचर्यावही पडिकायां बिना काल करें तो उणरी श्रद्धार लेने भो पिण विराधक हुवै, इम तो पडिलेहणा किया पर्छ अथवा विचे ईर्या .- . ३४] * धर्मार्थ हिन्सा न गिणे तेहना उत्तर में अधिकार यावा अर्थे लब्धि जे, फोडवियां दण्ड पाय । तो पुष्पादिक कार्य में, धर्म पुण्य किम थाय ॥२६॥ ॥ इति ॥ ॥अथ सातमोधर्मार्थ हिन्सा न गिणे तेहना उत्तर नुं अधिकार॥ ॥दोहा॥ कोई कह धर्म कारणे, नौव हो जो कोय । पाप न लागै तेहने, हिव तसु उत्तर नोय ॥१॥ देवल प्रतिमा कारगणे, हणे जु पृथिवी काय । मन्द बुद्धि वेहने कया, दशमा अझ रै मांय ॥ २ ॥ अर्थ धर्म ने हेते हो, मन्द बुद्धि कधा तास । ए पिण दशमा अङ्ग मे, प्रथम अध्ययन विमास ॥३॥ मणे सूकायवा. हणे जे पृथिवी काय । कह्या अहेत अवोध तसु. प्रथम अङ्ग रै माय ॥ ४ ॥ धर्म हेतु जन्तु हणे, दोष दूहां नही कोय । ए अनार्य नं वचन, आचार) जोय ॥ ५॥ जिनाला सावद्य सहु. वचन माव पिणा सोय । मुक ने पावरवा नहौं, प्ररूपवा नहीं कोय ॥ ६ ॥ महानिशीथ रे पंच मे, कमल प्रभाः इम ख्यात । सावध पाप सहित में, धर्म पुण्य किम थात ॥ ७ ॥ जन्म.
* संघाविद्याचारणाधिकार* [3 तो विराधक पणो थाय छै, इण श्रडार लेखे तो शासन सर्व ऊठ जाने या तो महा विपरीत श्रद्धा छ, अरिहन्त भगवन्त तो यूं कह्यो छे साधू चारित्रयाने कर्मयोगे अनेक भारी कार्य कीधा के मोटा मोटा टोप सेन्या छैपर्छ गुरु कने अनेक कौसा लगे आलोवण चाल्यो छै कटा गुरु पास नहीं पूगो विचै हो आलोयाँ विना काल करै तो तिण ने भगवन्त अराधक को छै, तो जंघा चारण ने विद्या चारण नी ईर्यावही पडिक्कम- वारी सरधा नहीं थी काई ? ये विराधक किसे लेख हुवै तो ऐसा ये कॉई भोला छा अने वलि यार ईर्यावही पडिकमवारी सरधा न हुचे, तो गौवरी दिसा बिहार प्रमुख नो मांगे तो आज्ञा पिण देणी नही विच मे मरि जाय तो विधिक हुच, घलि नन्दी उतरवारी पिण आज्ञा मांगे तो आना देणी नही बिचै मरि जाय तो विराधक हुवै ते वारै नीकलियाँ पहिला ही ईर्यावही तो न गुणी डम जो विराधक हुये। तो नन्दो उतरता मोक्ष किम जाय, सागारी संथारो पवखी नावामे वैसे पहचुं आचाराङ्ग अध्येयने तीसरे को छ, जो ईर्यावही गुणियाँ बिना विराधक हुवै नावा में सागारी संथारो पचखी किम वैसे, वलि नन्दी उतरवा री साधओं ने भगवान आज्ञा दीधी अने गौचरी प्रमुख नी पिण आशा दीधी छै तिण सूं नन्दी नावा उतरता गौचरी प्रमुख पूर्वे कार्य कहा ने करता मरै तो अथवा गौचरो प्रमुख कार्य करी ठिकाणे आयाँ ईर्यावही गुण्या पहिला मरैनो आराधक पिण विराधक नही । कने आशा धर्म हेतु ॥ दोहा ।। हिन्मा कियां. तुम्हे दोष कहो पुष्पादक आरस मे, धर्म कहो छो तो यावा करवा भणी, लब्धि फोड़वी धर्म हेतु ए कार्य नो, किम प्रभू दण्ड कहेह ॥२८॥ नांहि । ताहि ॥२७॥ जेह।
३६]
* सुर्याभाधिकार
निग्वद्य के तो मुनि करी, गृहौ सामायक मांय ।
ते पिण द्रव्य पूजा करे, तुझ ‘श्रवा रै न्याय ॥१५॥
नो सावद्य द्रव्य पूना हुवै, तिण तूं मुनि न करेह।
तो सावध मांही धर्म पुन्य, केम कहोजे तेह ॥१६॥
आरम्भ जे छकाय पूँ, पचण पचावण नास ।
निज वा पर अर्थे किया, निन्द्रं मरई तास ॥१७॥
इम कय बन्देतू विषै, सप्तम गाथा जोय।
तो साहम्मौ वच्छल विर्षे, धर्म पुन्य किम होय ॥१८॥
॥ इति॥
॥ अन्न बन्देतु नौं गाथा ॥ छक्वाय समारम्भे, पयग्ण
पयावण जे दोसा ॥ अत्तट्ठा परट्ठा ए, उभयट्ठा चैव
तं निन्द॥
॥ इति धर्मार्थ हिन्साधिकार ॥
॥ अथ अाठमो सुर्याभाधिकार ॥
॥दोहा॥
कोई कहै सुर्याभसुर, प्रतिमा पूजी ताम।
तिहां हित मुचम पाठ है, निसेमा ए अनुगाम ॥ १ ॥
ते निसमा नूं अर्थ तो, मोक्ष अमर पद होय ।
ते माटै शिव हेतु ए, तसु उत्तर हिव जोय ॥२॥
-~-~~~-
1
* धर्मार्थ हिन्सान गिणे तेहना उत्तर , अधिकार * [ [३५
ग्रन्थ संघ पट्टक कियो, जिन बल्लभ मुरेगा ।
जिन प्रतिमा यावा भणी, किस्— कह्यो के तंगण ॥ ८॥
लोहना कांटा ऊपरै, मांस डली प्रति ताहि ।
मूंकी पकड़े मौन ने, धौवर नर जग मांहि ॥६॥
तिम जिन विम्म जिन नाम करि, मुग्ध लोक जे मौन।
जिन यावादि उपाय करि, कुगुरू ठगत मत होन ॥१०॥
॥ काव्य॥
अत्र जिन वल्लभ सूरि कृत संघ पट्टानी कान्य।
आकृष्टुं मुग्धमीनान् बडिशपिशितवन्दित्रमादर्य जैन। तमामा
रम्यरूपान पवर कमठान् स्वेष्ट सिद्ध्यै विधाप्य ॥ यात्रा नामोद्युपाय
नमसितक निशा जागराधे श्छलैश्च । श्रद्धालु मजन श्छलित इव गठ
ईच्यतेहाजनोऽयम् ॥२१॥
॥दोहा॥
भस्म ग्रह करिके वलि, दशम् अछर करह ।
मिथ्या मत का संघपट्टे, जिन वल्लभ सूरह ॥११॥
इन्द्र विम्म प्रति वाल विन, ग्रहिवं कुण बंछेह ।
तृतीय काव्य भक्तामरे, न्याय विचागै लेह ॥१२॥
तिम हिनजे जिन विम्म प्रति, जिन जागी ने जेह।
बाल अजाण विना संवगा,
अङ्गीकृत करेह ॥१३॥
द्रव्य पूजा सावद्य है, के निरवद्य आख्यात ।
उत्तर हिये विचारिये, छोडौ ने पक्षपात ॥१४॥
३८]
* सुर्याभाधिकार*
--------
मातम
सामानिक परिषध प्रमुख. सुर सुर्याभ प्रतह ।
अष्ट सहस्र ने चौसठ फुन, जल भरिया कलशेह ॥१३॥
इन्द्राविषेक करौ कहै, सुरगण में जिम इन्द्र ।
तारागण में चन्द्र जिम, असुर विषै चमरिन्द्र ॥१४॥
नाग विषै प्रणिन्द्र जिम, भग्त चक्री मनु मांहि ।
वहु पल्योपम लग तुम्हे, बहु सागरोपम ताहि ॥१५॥
च्यार सहस्र सामानिका, यावत सोल हजार।
रक्षक देवता, तेह तणो अवधार ॥१६॥
अधिपती
फुन
खामी पगो, करतां थकां न सोय ।
पालन्ता विचरो तुम्हे, इम कहै सुर अवलोय ॥१७॥
अलंकार सभा तिहां, भावी करै अलंकार ।
भावी व्यवसाए सभा, पुस्तक बांच तिवार ॥१८॥
पछ आय सिद्धायतन, प्रतिमादिक पूजेह ।
सूवे. विस्तार के बहु, इहां का संक्षेपेह ॥१६॥
दूम प्रतिमा दाढां पनग, पूतलियांदिक पेख ।
बहु वाना पूजा तिणे, खर्ग स्थित थी देख ॥२०॥
ऊपजियो सुर्याभ तब, चिन्तवियो मन जय ।
पूर्व पछ करिवं किस्बू, सुभ पूर्व पछै स्युं श्रेय ॥२१॥
जेह कार्य कौधे छते, पूर्व पछै स्यु मोय ।
हित सुख प्रमुख भणी हुइ', इम चिन्तवियो सोय ॥२२॥
~-
* सुर्याभाधिकार
[३७
गय प्रशेणौ मे का, ले सुर्याम सु देव ।
उपजियो तब चिन्तव्यूं . मन मांहि खयमेव ॥ ३ ॥
स्युं मुझ ने करिवो हिवै, पहिला पछै ज कान ।
मुझ पहिला श्रेय जे, श्रेय फुन पछै समाज ॥ ४ ॥
स्युं मुझं महिला ने पर्छ, हित सुख्खम निस्ससाहि ।
अनुगामी के. हुई', इम चिन्तव्यो मन मांहि॥५॥
सामानिक परिषध सुरे, नाग्यौ ए अध्यवसाय ।
कर जोड़ी सुर्याम प्रति, बोल्या एम बधाय ॥ ६ ॥
जिन प्रतिमा दाढां प्रते, आप भणी अवलोय ।
अन्य बहु वैमानिक सुरा, सुरी प्रते फुन जोय ॥ ७ ॥
भरचण जोगन जाव फुन, सेवा जोगज जेह ।
ते माटै पहिला पछ, तुम ने करिवं एह ॥ ८ ॥
पहिला पछैन ए श्रेय, पूर्व पच्छा मिण जोय ।
हित सुखम निस्समाए हैं, अनुगामिक अवलोय ॥ ४ ॥
दूम सांभल सुर्याभसुर, हृष्ट तुष्ट सलहौज ।
यावत् विकस्यो हृदय फुन, जम्यो सेझ थकीज ॥१०॥
पवर सभा उपपात थी, निकली द्रह विषेह ।
भावी ने ते 'द्रह प्रवे, तथा प्रदन्निण देह ॥११॥
गृह मैं ऊतर स्नान करे, निहा सभा अभिषेक ।
तिहां आवौ सिधाशणे, बैठो पूर्व सम्मेख ॥१२॥
४०] * सुर्याभाधिकार* ------ -~- उत्तराध्ययन बावोस में. द्रव्य मंगल संवाद। तोरण नातां नम कृत. दधौ अक्षत द्रोवादि ॥३३।। तिमहिन सुर्याम करी, संसारिक मंगलौक । पूना जिन प्रतिमादि नौ, खर्ग स्थिति तह तौक ॥३४॥ प्रभू बन्दन अवसर का , पेचा हित सुख आदि। पच्चा ते पर भव विष, देखो तज असमाधि ॥३५॥ प्रतिमा त्यां पूव्वौ पच्छा, फुन वन्दन जिन राय । पेच्चा पाठ कयो तिहां, राय प्रवेणी माय ॥३६॥ पचमा अङ्ग दूजे शतक, प्रथम उद्देशक पेख । खन्धक दीक्षा अवसरे, इह विध का विशेष ॥३॥ धन काटे ग्रहौ लाय थी, पच्छा पूरा ए ताय । बक्ति काल थको पछ, फुन पहिला कहवाय ॥३८॥ ते ग्रही जाणे मुभ हुसे, ए धन हित सुख कान! बम समरथ निस्ससायजे, फुन अनुगामिक साज ॥३६॥ तिम जरा मरण गैलाय थी, खात्म काव्यां ताय। परलोके हित सुख भणी, वलि मुज क्षम निस्ससाय॥४॥ मेघ का धन लाय थी, काव्यां पूर्व पश्चात् । हितसुखक्षम निस्ससाय फुन, पिणपेचा पाठ न ख्यात।४१ तिम जरा मर्ण रौ लाय थी, खात्म काव्यां सोय । हुसे विछेद ससार.नू, ज्ञाता प्रथम सु नोय ॥४२॥ -
* सुर्याभाधिकार*
[३६
धर्म कार्य तो जाणतो, समदृष्टि थो नेह ।
तेह तण' स्यु चिन्तवे, किम तमु अमर वदेह ॥२३॥
पिण राज वैसतां कृत्य जे, करिवू पूर्व पछेह ।
तेह कार्य ससार ना. मङ्गल हेतु कहेह ॥२४॥
वह रौत नवी जाणतो, नवो अपनो एह ।
तिण स्यू' चित्यो मुझ किस्यु', करिवो पूर्व पछेह ॥२५॥
एह भाव सुर्याभ नां, सामानिक सुर धार ।
वलि परिषधनां देवता, नाण लिया तिण वार ॥२६॥
ए जूना था ते भणी, राज बैसता ताय ।
कारज करवो तेहनां, नाण हुन्ता अधिकाय ॥२७॥
ते माटै सुर स्थिति हुन्ती, ते दौधौ तिणे बताय ।
जिन प्रतिमा दाढां भणी, कह्यो पूज' ताय ॥२८॥
खर्ग रीत नाणी का, सुर सुर्याभ प्रतेह ।
पूजा हित सुख प्रमुख पिण प्रभुन कह्या वच एह ॥२६॥
पुब्बौ पच्छा पाठ त्यां, पहिला पछै सुनोय ।
हित सुख प्रादि कहोसुरे, पिण पचा पाठ न कोय ॥३०॥
पूर्व पछा ते दूह भवे, द्रव्य मङ्गल कहिवाय ।
विनोपशम अर्थे किया, राज बेसतां ताय ॥३॥
श्रावक तुङ्गिया ना स्थविर, बन्दन जातां कौध ।
सरिशव द्रोवाक्षत दही, द्रव्य मङ्गलोक प्रसिद्ध ॥३२॥
. -------- ------- ४२] * सुर्याभाधिकार तिम प्रतिमा पूजे तिहां, निस्ससाय पाख्यात । विघ्न तणौ ए मोक्ष है, विघ्न मूंकाय खात ॥५३॥ ए द्रव्य मंगल राज वैसता, जे जग मांहि गिरोह । विघ्न पड़े नहीं रानमें, दधी अक्षत जिम नेह ॥५४॥ कोई कहै प्रतिमा तणी, पूजा थी कहिवाय । अनुगामिया ए का, फल तसु कड़े आय,॥५५॥ तसु कहिये धन लाय धौ, का? तसु पिण सोय । अणुगामिया ए दूसो, पाठ सरोसो जोय ॥५६॥ ने धन काढे लाय थी, दृह भव पूर्व पश्चात । तसुफल धन काढण तणू, निहां जाय तिहां आता विमान अधिपती अभव्यथा, खर्गतणी स्थिति मंत। सहु सुर्याभ तणी परै, प्रतिमांदिक पूजन्त ॥५८॥ तिम पना प्रतिमा तणी, ए भव पूर्व पश्चात । तसु फल द्रव्य मंगल तणू, जिहां जाय तिहां आता। शुभ सूचक संसार में, दधों अक्षत द्रोवादि। तिम पिण ए सुरलोक में, शुभ सूचक सवाद ॥६॥ भाषा श्री जिन रायनो, गावै विवाह विषेह । तिम पूजा प्रतिमा तो, वलि णमोत्थूणं गुणेह ॥६१॥ राज बैसतां . कार्य जे, सहु ससारिक हेत। खर्ग स्थिति माटै किया, धर्म पुण्य नहीं तेथ ॥६२॥ ।
* सुर्यामाधिकार [४१ प्रतिमा नौ पूजा विहां, लाय थको धन बार । काटे तिहां पच्छा प्रथम, ते दूह भव में धार ॥४३॥ निन वन्दन मेञ्चा कच्छ, चारित ग्रयां परलोग । ते परभव हित सुख प्रमुख, देखो दे उपयोग ॥४४॥ कोई कह प्रतिमा तणी, पूजा है निग्दोष । हित सुखक्षम निस्ससाएका, निस्ससाय ते मोख॥४५॥ तसु कहिये धन लाय थी, काढे तसु पिण सोय । हित सुखक्षम निस्ससाए का, हां मोक्ष स्यूं होय ।४६। धन काटे जे लाय थी, इह भव पूर्व पश्चात । दारिद्र थी कायवो, ते मोक्ष दारिद्र नौ ख्यात ॥४॥ तिम पूजा मंगलिक अरथ, दूह भव पूर्व पश्चात । विघ्न थको स्कायवो. ते मोक्ष विघ्न नौ ख्यात ॥४८॥ शतक पनरमें भगवती, आणंद थिवर प्रतेह । गौशाले जे वलिक नूं, पाख्यु दृष्टान्त देह ॥Ben चौथो वल्गू फोडतां, पुरुष तिहवार । फोडक हाला पुरुष नूं, हित सुख वंछणहार ॥५०॥ पथ्य आनन्द कारण तणू, बंछणहारो तेह । अनुकम्पा कारक तिको, निश्चय यश बन्छेह ॥५२॥ निस्साए अर्थ जे, आख्यो वृत्ति विषेह । व मोक्षज वियतनी, विपत मूंकाय जेह ॥५२॥ ६
N
४४]
* सुर्याभाधिकार
जन नायौँ महल थकी, हित सुख प्रमुख जे पाय ।
पण नहीं जाणे पूर्व बंध, पुण्य थको ए थाय ॥७३॥
पुत्रादिक परणायवे, पारा मोसर आदि।
सुयश हुवै ते पूर्व बन्ध, पुण्य करौ सम्बाद ॥४॥
ब्रह्मा विष्णु महेश फुन, देवी पूजा आदि।
कौधां सुख सम्पति मिले, ते पूर्व पुण्य प्रसाद ॥७॥
महा आरम्भ महा परग्रही, करै पंचेन्द्री घात ।
मांस भक्षण ए चिहुं थकी, नरकायु वधात ॥६॥
नरके पंचेन्द्रिय पणी, पुण्य प्रकृति के जेह ।
वे तो छै पूर्व बध्यो, बर शुभ जोग करेह ॥७७॥.
पण महाआरम्भ आदि ने, चिहुं कारण करि जोय।
पंचेन्द्री पर्यों नहीं बंधे, न्याय हिये अवलोय ॥७८॥
तिम प्रतिमा पूज्या छता, हित सुख प्रमुख न थाय।
पूर्व बंधे पुण्ये हुवै, हित सुखक्षम निस्ससाय ॥६॥
वर सुर्याभ विमान नो, अधिपती देव किंवार।
मित्थ्या. दृष्टि पिण हुवै, भव्याभव्य विचार ॥८॥
जे सुर्यामे सांचवी, ते हिज रौत तिवार।
राज बैसतां सांचवे, विमान अतिपती धार ॥
प्रतिमादिक पूजे तिक, वलि नमोत्थूग्णं गुणेह ।
तिण सूए स्थिति वर्ग नौ, मङ्गलोक हेतेह ॥२॥
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-
* सुर्यामाधिकार *
[४३
कोई कहै पूजा कियां, ए भव विघ्न मिटेह ।
पुण्य वध किम नवि कहो, हिव तसु उत्तर लेह ॥६॥
चढ्यो सूर संग्राम में, कर बहु जन संहार ।
पाव्य जीत फते करौ, सुयश करै नर नार ॥६४॥
सावध युद्ध तिणे करो, अशुभ कर्म बंधाय ।
ते अशुभ कर्मे करौ, सुयश हुवै किम ताय ॥६५॥
नाम , कर्म नौ प्रकृति, यशो कीर्ति पुन्य नह।
ते तो पाछल भव बधौ, वर शुभ योग करेह ॥६६॥
ते यशो कौतिं पुण्य प्रकृति, युद्ध समय सुविचार ।
उदय भावी तिग कारणे.
सुयश
करै नर नार ॥६॥
जन बहु जाणे युद्ध थौ, सुजश थयो जग मांहि ।
पमा नहीं जाणे पूर्व वध, पुण्य थको नश पाय ॥६८॥
तुङ्गिया ना श्रावक किया, विघ्न हरण रै काज।
दधौ अक्षत द्रोवादि ने, दूम हिज नेम समान ॥६॥
दधौ अक्षत द्रोवादि करो, अशुभ कर्म बंधाय ।
विध मिटै किम तेहथौ, किम सुख सम्पति माय 1७०
विघ्न मिटै अरि जन इटे, सुख सम्पति पामेह ।
ते पुण्य प्रकृति पूर्व भवे, बंधौ
शुभ
ते पुण्य प्रकृति कदा, मङ्गल कियां पछेह ।
उदय पायां सुख सम्पज, बलि बहु विघ्न मिटेह ।७२।
जोगह ॥७॥
. -~~-ARAN ४६] * नवमू चौटी निज्मराठी शब्दार्थ अधिकार * तथा परभवे एहवू पाठ पिण पच्छा महौं ॥ ४ ॥ चम्या तथा बन वृन्द जिन वन्दन समय ए विध कही। प्रभु बन्दतां फल पेचा भव वा दूह भव हित सुख प्रमुख हो। फुन तुङ्गिया ना श्रावक पिण स्थविर वन्दन समय हो। फल वन्दना वह भवे वा परभवे होसे सही ॥५॥ शिवराज ऋषि फुन ऋषभ दत्ते कह्य प्रभू वन्दन तणूं। फल दूह भवे वा पर भवे हित सुख प्रमुख हुसे घणं । इम जिन मुनि प्रते वन्दवे फल पेच्चा वा परभव वहौ। पिण पाठ पच्छा शब्द किहां हो सूत्र में दाख्यो नहौं । ॥ इति सुर्यामाधिकार ॥ ॥अथ नवमूं चैइट्ठी निज्मराठी शब्दार्थ अधिकार ॥प्रारभ्यते॥ ॥दोहा॥ कोई कहै प्रतिमा तणी, व्यावच करवी सार। पाखौ दशमा अङ्ग में, तीने संबर हार ॥१॥ उत्तर. तसुः निसुणो हिवे, तिण ठाणे दूमवाय । पाराधै ए वतीय ब्रत, ते कहवू मुनिराय ॥ २ ॥ ।
. ॥ * सुर्याभाधिकार * [४५ बहु सागर सुर सुरौ तणं, अधिपती पणो करह। ए पिण बच है देव , देखो प्राठ विषह ॥३॥ आयू जे सुभ न, च्यार पल्योमम ख्यात । बहु सागर लग किम रहे, पेखो तन पखपात ॥८॥ ॥ गीतक छन्द ॥ प्रतिमा तणौ पूजा तिहां सुर्याम ने सुर आखियो। पुव्वी अने पच्छा हियाए आदि पाठ सुभाखियो। पुवी पच्छा वे इह भवे संसार ना मंगलीक हो। तुङ्गियादि ना जिम विन हरवा। द्रोव सरसव तिम वही सुर्याभ जिन वन्दन तणौ मन मांहि धारी छै तिहां । पच्चा हियाए पाठ आदन प्रगट अन्तर ए जिहां। पेचा तिको परभव विषै हित सुख प्रमुख पहिछाणवू । पच्छा पने पच्चा उभय नुं अर्थ दिल में पाणिवं ॥२॥ खंधक कधो धन लाय थौ काढे तिको चिन्ते सही। पच्छा पूराए हिया सुहाए आदि पाठ सु प्रगट हो। तिम जरा मरणन लाय यौ निज आत्म प्रति काव्यां थके। मुभ हुसे परलोक हियाए। प्रमुख पाठ कच्चा तिकै ॥ ३ ॥ प्रतिमा तणौ पूजा भने धन लाय थो काहे वहौ। पच्छा हियाए पाठ के पिण पच्चा वा परभव नहीं। सुर्याभ जिन बन्दन अने जे खन्धक दीक्षा ग्रही। पञ्चा ।
४८] * नवमं चैट्ठी निझराठी शब्दार्थ अधिकार * प्रतिमा अन्न खाती नथी, पौती नथौ ज पाण। वस्त्र भोढती पिण नघौ, नधो पहरती जाण ॥१३॥ ते माटै दूमः । सम्भवै, चैत्य ज्ञान अर्थह । निरजरा नूं अर्थी छतो, करै व्यावच जेह ॥१४॥ चैत्य ज्ञान अर्थे करे, एक अर्थ ए होय । द्वितीय अर्थ कहिए हिवै, सांभलजो अवलोय ॥१५॥ आराधै ए तोय ब्रत, ते कह मुनिराय । दूम शिष्य प्रश्न किये छतें, हिव गुरू भाषे वाय ॥१६॥ उपधि भात पाणी जिको, प्रतीत घर थी प्राण ।' संग्रह.करिखा में कुशल, कुशल दान में जांण ॥१॥ वे कहने पामै तिको, अत्यन्त गाढो बाल । टुवैल रोगी वृद्ध फुन, खमग प्रवर्तक न्हाल ॥१५॥ आचारन उवमोय शिष्य, साधर्मीक पिछाण । तपसी कुल गंण संघ ए, चैत्य तिको जिन जाण ॥१६॥ पूर्व कद्या ते सर्व नूं, अर्थ प्रयोजन नह। निरजरा, अर्थों छतो, करै व्यावच वेह ॥२०॥ पूना साधा रहित चित, दश विध प्राचार्यादि। बहुविध भत्त पाणादि करि कर अनेक प्रकार सम्वाद २१ चित्त प्रहलादक ते भणी, चैत्य केवली जाण । भात पाणी तसु आणि दे, वलि उपधादिक दे आण ।।
* नवमू चाटो निज्मराठी शब्दार्य अधिकार * [४७
उपधि भात पाणी जिको, प्रतीत घर थौ प्राण ।
संग्रह करिवू कुशल वलि, कुशल दान में जाण ॥ ३॥
ते कहने आपै तिको, अत्यन्त गाढीवाल।
दुरबल ते बल रहित ने, वलि ग्लान मुनि न्हाल ॥४॥
वृद्ध तिको कहिये स्थिविर, खमग मास खमवादि ।
प्रवर्ताव ने योग्य तिम, प्रवर्तक ने सम्वाद ॥ ५ ॥
आचारज उवभाय फुन, नव शिष्य साधर्मीक ।
तपसौ कुल गण संघ ए, तमु व्यावच तहतोक ॥ ६ ॥
कुलते गच्छ समुदाय है, चन्द्रादिक कहिवाय ।
गण ते कुल समुदाय छ, संघते गण समुदाय ॥ ७॥
दूतलानी व्यावच करे, चैत्य ज्ञान अर्थह ।
निरजरान परथी छतो, कर्म क्षयां थौ तेह॥८॥
पूजा झापा रहित चित्त, दश विध बहु विध नह।
कर व्योवच तृतीय वरत, पाराधै मुनि तेह ॥६॥
अप्रतीत कारी घर विष, प्रवेश न करै जान ।
अप्रतीत कारौ घर तणं, नहीं लेवे अन्न पाण ॥१०॥
वहां कच्छ जे उपधि करि, वलि भत्त पाण करेह ।
अत्यन्त वाल प्रमुख तथौ, करै व्यावच वेह ॥११॥
कोई कहै प्रतिमा तणी, व्यावच करवौ ख्यात ।
तो प्रतिमा रे ये विह'. वस्तु काम न भात ॥१२॥
1.
५.] * नवमूं चैइट्ठी निज्मराठी शब्दार्थ अधिकार :
भव द्रव्य देव भवान्त, देव हुसे ते ताय ।
चक्री ते नर देव है, धर्म देव मुनिराय ॥३३॥
देवाधि देव तीर्थकरा, तिणसू दैवत वौर ।
तीन लोक ना अधिपति, युग केवल गुण हौर ॥३४॥
भाव देव चिहुं जाति ना, भवनपत्यादिक नेह।
वाग्म शतके भगवती, नवम उद्देश विषेह ॥३५॥
ते माटे ए चैत्य जिन, तास वेयावच ताम ।
निग्नरा - अर्थी छतो, करै मुनि गुण धाम ॥२६॥
कोई कहै ए चैत्य न, अर्थ वहां जिन होय ।
तो छेहड़े ए किम का, तसु उत्तर हिव जोय ॥३७॥
चैत्य तुम्हे प्रतिमा कहो, तो बेहड़े किम ख्यात ।
तुम लेखै तो धुर कहो, पछै अन्य मुनि आत ॥३८॥
जिन प्रतिमा जिन सारषी, तुम्हे कहो छो सोय ।
ते माटै ए आदि मे, कहि चैत्य सु जोय ॥३९॥
दूहां वाल अत्यन्त धुर, दुर्वल, म्लान पश्चात ।
स्थिवर प्रवर्तक धुर को, पछै आचारन ख्यात ॥४॥
आचार्य पद तो प्रथम, कहिय् धुर अहल्लाद ।
ठाम ठाम व्यावच विषै, आचारज पद आदि ।॥४॥
दूहां प्रथम वालादि कहो, पछे, आचारज नोय ।
तेहनु कारण को नही, देखा दिल अवलोय ॥४२॥
* नवमू चट्ठी निझराही शब्दार्थ अधिकार* [४६ सूत्र भगवती में कह्यो, सीहो मुनि सुजाण । पाक बौजोरा बौर प्रति, बहरौ पाप्या आण ॥२३॥ अन्य केवलौ तेहने, उपधादिक दे आण । आराधै इम दृतीय ब्रत, महा मुनि गुण खान ॥२४॥ राय प्रशेणी में कह्या, वीर तणा चिहुँ नाम । कल्याणं मंगल वलि, दैवत चैत्य सु ताम ॥२५॥ मलियागिरि कृत हत्ति में, अर्थ दूसो आख्यात । कल्याणकारी ते भणी, कल्याणिक जगनाथ ॥२६॥ दुरित विधन तेहना, उपशम कारौ खाम । ते माटै जगनाथ ने, कयो मंगलं ताम ॥२७॥ तीन लोकना अधिपति, तिणसू दैवत ख्यात । हेतु सु प्रश्न मन तणा, तिणसू चैत्व संजात ॥२८॥ चैत्य शब्द न अर्थ दूम, श्राख्यो छै तिण स्थान । ते माटै ए चैत्य निन, तास वैयावच नान ॥२६॥ मुनि ना ए पिण नाम चिहुं, आख्या है बहु ठाम । कल्याणकारी ते भणौ, मुनि कल्याणिक नाम ॥३०॥ दुरितोशम कारौ पणे, मंगल मुनि कहिवाय । च्यार मंगल में देखल्यो, तौजो मंगल ताय ॥३१॥ दैवत कहतां देव ए, पब देवमें धर्म देव मुनि ने कया, सूत्र भगवती मांहि ॥३२॥ ताहि ।
- wn M- ५२] * नवम् चैइटी निज्मराठी शब्दार्थ अधिकार तिणहिजअध्ययन किया, रुचि दर्शन जान चरित्त। इहां दर्शन धुर आखियो, तसु कारण न कथित ॥५३॥ अभिणि वोधिक धुर कही, पछै कयो श्रुत ज्ञान। भगवती आदि विषै प्रभू, प्रगट पाठ पहिछान ॥५॥ उत्तराध्ययन अट्ठबौस में, कह्यो प्रथम श्रुत ज्ञान । अभिणि बोध कह्यो पछ, तमु दोषण नहीं जान ॥५५॥ पूर्वानु पूर्वी किहां, किहां द्वितीया अवलोय । अनानु पूर्वी कही किहां, तमु दोषण नहिं कोय ॥५६॥ पञ्च ज्ञान में देख लो, छेहड़े केवल ज्ञान। छेहड़े दर्शन च्यार मे, केवल दर्शन जान ॥५७॥ च्चार ध्यान मांही वलि, हेहड़े शुक्ल ध्यान । छेहड़े गुण्ठाणा मझे, अनोगौ गुण स्थान ॥५॥ छेहड़े चिहुविध देव मे, बैमानिक सुर ख्यात । चारित्र में छेहड़े का, यथाक्षात. जगनाथ ॥५६॥ बलि षट नियट्ठा ने विषै, छेहड़े स्नातक जान इत्यादिक बहु सूत्र में, भाष्या श्री भगवान ॥६॥ अनानु पूर्वी करो, दूहां चैत्य जिन अन्त । उपधिभात पाणी करो, तसु व्यावच मुनी करन्त ॥६१॥ आराधै दूम ढतीय ब्रत, महा मोटा मुनिराय । द्वितीय अर्थ ए आखियो, निमल विचारो' न्याय ॥२॥ १ -n. भाषा माछा लेह ॥४६॥ * नव चैट्ठो निन्झराठी शब्दार्थ अधिकार * [५१ तिमहिन अते चैत्य जिन, इहां आख्यु छै सोय । तेह पिण कारण नहीं, हिये बिचारी जोय ॥४३॥ मुनि सहचारौ पणा थकी, प्रथम कद्या अणगार। पछ चैत्य ते जिन कया, तसु नही दोष लिगार ॥४४॥ गिणू अनुपूर्वी तुम्हे पद, तसु दूकशय बोस । पच्छानु पूर्वी विषै, पहला मुनि नगौश ॥४५॥ उवमाया आचार्य सिद्ध, अरिहन्त अन्त कहेह। अनानु पूर्वी विषै, अनुयोग हारे आखियो. पूर्वात पूर्वी जान । पच्छानु पूर्ती वलि, अनानु पूर्षों पान ॥४॥ पूर्वानु पूर्वी तिहां, ऋषभ जाव वईमान । महावीर यावत् ऋषभ, पश्चानु पूर्वी जान (४८॥ आधा पाछा नाम ले, अनानु पूर्वी तेह । ए बिहु अनु पूर्वी कही, देखोजो चित देह ॥४६॥ सामाचारौ दश विध कहो, अनुयोग हार विषेह । इच्छा मिच्छा धुर अखौ, पूर्वानु पूर्वी एह ॥५०॥ उत्तराध्ययन छब्वौस मे, भावस्थिया धुर नोय । अनानु पूर्वी एह छ, तमु दोषण नही कोय ॥५१॥ ज्ञान दर्शन चारिब तप, शिव मग ए चिहुँ' सार। उत्तराध्ययन अटुबौस से, प्रथम ज्ञान सुविचार १५२॥
५४]
* चमर सुधर्मागत अधिकार *
दूमांचव अवधे करो, प्रभु कहै मुज प्रति देख।
शीघ्र गमन कर संग्रयो, बच्च प्रते सुविसेख ॥ ७ ॥
दूहां तिहुं शरणा में प्रथम, अरिहन्त केवल धार।
अरिहन्त चैत्य छमस्थ जिन, चिहुं ज्ञानी सुविचार ।।
भावितात्म भणगार फुन, यह तिहुं शरणे मन्त ।
वृहां चौत्य ते ज्ञानवन्त, चि? जानौ भगवन्त ॥ ६ ॥
बलि मन शक्र विचारियो, अरिहन्त नौ अवलोय ।
भगवन्त ने अणगार नौ, अति आशातन होय ॥१०॥
चौत्य स्थान भग शब्दकयो, भग न अर्थ सुजान।
चिहुँ जानो परिहन्त ए, मिण प्रतिमा नहि जान ॥११॥
कोई शरण तो पण कहै, पाशातन कहै दोय ।
अरिहन्त ने प्रतिमा तणी, एक कहै छै सोय ॥१२॥
शरण विषै तो पाठ वय, पाशातन में जोय ।।
दोय पाठ दाखा हुंता, तो भाशातन बे होय ॥१॥
घरण विषै तो पाठ बण, आशातन में, जोय ।
तौन माठ ते भणी, पाशातमा वण होय ॥१४॥
प्रत्यक्ष सूत्रे शरणा तिह, कही पाशातना तीन ।
अरिहन्त ने भगवन्त नौ, वलि मुनि तणो कथौन ॥१५॥
तौन पाशातन ने विषै, चत्य शब्द नहीं खाात ।
त्य ठिकाणे भग का, देखो तज पखपात ॥१६॥
* धमर सुधर्मागत अधिकार * [५३
चैत्य ज्ञान धुर अर्थ का, दितीय अर्थ जिन जोय ।
बलि कवल ज्ञानी वदै, देहिज सत्य सुहोय ॥६॥
॥ इति इट्टी निझाराही शब्दा अर्थ ॥
॥ अथ दशमूं चमर सुधर्मागत
अधिकार ॥
॥ दोहा॥
कोई कहै असुरेन्द्र ने, खर्ग सुधर्मे' नाय ।
त्या प्रतिमा नें शरण कय, तसु उत्तर कहिवाय ॥ १ ॥
सूत्र भगवती द्वतीय शत, हितोय उद्देशा मांय ।
चमर वौर नं शरण ले, खर्ग सुधर्मे जाय ॥ २ ॥
नई सुधर्मे शक प्रति, बोल्यो विरूई वान ।
शक कोम कर मंकियो, वञ्च सु वाञ्चलमान ॥ ३ ॥
पछ बून्द्र विचारियो, विन नेवाय सुजोय ।
पावै चमर सुधर्म ए, इसौ शक्ति नहिं होय ॥ ४ ॥
परिहन्त अरिहन्त चैत्य फुन, भावितात्म अणगार ।
भावै ए तिहुं शरण ले, चमा सुधर्मे धार ॥ ५ ॥
ते माटै महा दुःख ए, अरिहन्त नौं अवलोय ।
भगवन्त ने अणगार नौ, अति आशातन होय ॥ ६ ॥
५६]
*वली 'कम्मा अधिकार
ते माटै अरिहन्त नी, प्रतिमा नौ अवलोय ।
शरण कहै छ ते दहां, नथौ संभवै सोय ॥२०॥
॥ इति चमर सुधर्मागत अधिकार ।
॥अथ इज्ञारमूंवलीकम्मा अधिकार
॥दोहा॥
कोई कहै वली कम्म शब्द, सूत्र विषै बहु स्थान ।
तेह तणु स्युअर्थ है, हिव तसु उत्तर जान ॥ १ ॥
पञ्चमुश द्वितीय शत, तुङ्गिया तणा विचार ।
श्रावक स्थिविर सु वांदवा, त्यार थया तिह वार॥२॥
स्नान कगै वली कम मत, तास अर्थ वृत्तौकार ।
कौधो , गृहदेवता, देखी हिये विचार ॥ ३ ॥
दूमही उववाई में कह्यो, प्रवृत्ति वाटुक कौष ।
वलि कम ख गृहदेवता, हत्ती विषे सुप्रसिद्ध ॥ ४ ॥
केदक वहां गृहदेवता, जिन प्रतिमा कहै हेव ।
पिण दूतलो नाणे नहीं, ए किन, धरना देव ॥ ५ ॥
तीर्थंकर तो है सही, तीन लोक ना देव ।
ते किम जिन प्रतिमा भणी, धरना देव कहेव ॥ ६ ॥
जिन प्रतिमा जिन सारषौ, म पिण कहता जाय ।
वलि स्थापै घर देवता,ए किण विध मिलसे न्याय ॥ ७ ॥
* चमर सुधर्मागत अधिकार * [५५ अरिहन्त ने प्रतिमा तणो, मुनिनो शरण जु थाय । तो छद्म निन नुशरण ग्रांत किण शरणा माय ।१७॥ अरिहन्त तो केवल धरा, तेह विष सुविचार । जिन छद्मस्थ तणो शरण, आवै किण विध सार ॥१८॥ जिन प्रतिमा नं शरण कहै, तिण मे पिण नहीं आय । बतीय शरण जिन विन मुनि, किम तिण विषे कहाय॥१॥ विण सुंछद्म जिन तणू, द्वितीय शरण ए होय । जो प्रतिमा नुशरण हुवे, तो किम आवै मनु लोय ॥२०॥ सभा सुधौं थौ निकट, सिद्ध आयतन जाय । जिन प्रतिमा नुशरण तो, यहा करतो ताय ॥२१॥ ते माटै दूहां चैत्य नु, अर्थ ज्ञान अवलोय । अन्य ठाम पिण चैत्य नु, अर्थ ज्ञान कछु चौबीस तीर्थकर तणा, चैत्य सूख चौबीस समवाबज विषै कथा, ए ज्ञान संख सु जगौस ॥२३॥ चैत्य ज्ञान केवल लयं, जिण तरु तल जिनराय । चैत्य वृक्ष ए जाणवा, ए ज्ञान वृक्ष कहिवाय ॥२४॥ तिमहिन अरिहन्त चैत्य प्रति, चिहुंजामो अरिहन्त । द्वितीय शरण ए जाणवी, देखोजी मतिवन्त ॥२५॥ द्वितीय पाशातन ने विषै, चैत्य स्थान भगवन्त । दूहां अर्थ जे भग तणो, कहिए ज्ञान सुतन्त ॥२६॥ सोय ॥२२॥ -- *वली कम्मा अधिकार* -~~-~- . ॥ सोरठा ॥ मल्ली पिता ने पास रे, भावन्ता म्हाया कधा। जाव शब्द में तास रे, वली कम्मा ए पाठ छै॥२८ वलि मनी षट राजान रे, समभावा भावी. तदा । जाव शब्द में जान रे, वलौ कम्मा ए पाठ के ॥१॥ देखो मली भगवान रे, प्रतिमा पूजो कोहनी । अध्ययन पष्टम् बान रे, पाख्यो ज्ञाता ने विषै ॥२०॥ वलौकम्मा न जाग रे, अर्थ कहै पूजा तणो। ए जिन प्रतिमा नौ माण रे, के पूजा कुल देव नौ ॥२१॥ नो स्थापे जिन विम्ब रे. तो मल्लौ तीर्थकर छतां।। पूजेतेह अचम्म रे, वलि प्रतिमा किण जिन तणौ ॥२२॥ निन प्रतिमा नौ ताय रे, मल्ली नाथ पूजा करौ। तो भाव मुनि पाय रे, देखी प्रणमै के नहौं ॥२॥ वलि बढाहीप रे म्हाय रे, भावे निन उत्कृष्ट थी। इक सौ सित्तर थाय रे, जघन्य वौस थौ नवि घटै ॥२४॥ त्यां द्रव्ये जिन घरमाय रे, भाव जिन दैनौं। वलि तमु वाण सुहाय रे, तसु लेखै किम नहिं सुजै ॥२५॥ मलिनाथ घर मांहि रे, जिन प्रतिमा पूजो कहै। तो द्रव्ये जिन पिण ताहिरे, भावे जिन वन्दै न किम।२६ * वली कम्मा अधिकार * [५७ कदापि कुल देवी प्रते, कहिये घर ना देव । लोकोक हेते पूजता, श्रावक पिण खमेव ॥ ८॥ नेह देवता शब्द नित, स्त्री लिङ्ग वाची होय । का अमर में वे भणी, न्याय हिये अवलोय ॥६॥ नवम उद्देशै सप्तशत, वर्ण कौध वलौ कर्म । अर्थ देवता न कियो, वृत्ति विषै ए मर्म ॥१०॥ वली कर्म नु अर्थ धर्मसी, स्नान तणो न विशेष । कौधो वलि कर्म शब्द करी, आया कारन शेष ॥१२॥ ज्ञाताध्ययने दूसरै, सुत बंच्छा ने हेत । नाग भूत यक्ष पूनवा, गई सुभद्रा तेथ ॥१२॥ पुष्करणी में स्नान कर, कौधा वली कर्म जोय ए बाव मधे किण देवनी, प्रतिमा पूजी सोय ॥१२॥ भीनी साडी घोडणे, एहवी छतीन तेह । कमल वहु ग्रही नौकली, पुष्करणी थी लेह ॥१४॥ बहु पुष्प गन्ध धूपणो, माल्य प्रमुख अवलोय । काठे जे मूक्या प्रथम, तेह ग्रही ने सोय ॥१५॥ पछै नाग घर आय ने, प्रतिमा पूजी पाम । नाव वे श्रमण नौ वलि, पूजी आखी ताम ॥१६॥ वलौ कर्म पुष्करणी विषै, कौधो धुर आख्यात । ते पुष्करणी ने विषै, किसा देवनौ नात ॥१७॥ ८ ६.] *वली कम्मा अधिकार* पहला तो न्हावो कह्यो, पछै कावलि कर्म । पछ वस्त्र पहया- कह्या, हिव जोवो ए मर्म ॥३६॥ स्त्री जाति सुभाव नग्न, घई न्हावा बैठी जेह । त्यां न्हावा ना घर विषै, कहवो पूज्यो देव ॥३०॥ वली कर्म कर जिन घर विषै, प्रतिमा पूजी आय । तो वली कर्म मंजन घरे, वे कहनी प्रतिमा थाय ॥३८॥ ॥ सोरठा ॥ अपात चिलाती न्हायरे, कय वलि कम्मा माठ त्या । जम्बुद्वीप पन्नती मांय रे, किसो देव त्यां पूजियो ॥३६॥ ॥दोहा॥ कोणिक जिन बन्दन गयो, कह्यो स्नान विस्तार । वली कम्म शब्द न मूलगो, नधौ तिहां अवधार ॥४०॥ ॥अथ कोणिक जिन बंदवा गयो त्यां न्हावा नूं पाठ उववाई सूत्र में कह्यो ते लिखिये छ। जेणेव मज्मण घरे तेणेष उवागच्छ गच्छइत्ता मज्झन धरं अणुप्य- विसइस्ता समुत्ताजाला उलामिरामे विचित्त मणिरायण कुष्मितले.रम. णिजे ण्हाण मंडवं सिणाणामणिरयण भत्ति चित्त सि एहाण पीटसि सुहणिसणे सुद्धौदगेहि गंधोदगेहिं पुष्फोदगेहि सुमोदगेहिं पुणोरकाला- णग पवस्मज्मण विहिए मझिएतत्थकोउयसपहि वहुविहिं कल्लोणग- 'पवर मज्मणावसाणे पम्हल सुकुमालगंध कासाइय लूहियंगे सरस सुरहि
*धली कम्मा अधिकार
[५६
जो स्थापै कुल देव रे, महिनाघ पूजा करौ।
सुर सहाय खयमेव रे, किम न करैश्रावक ममकिती॥२०॥
स्नान तणुं ज विशेष रे, अर्थ कह वली कर्म नं।
तोटलियो केश अशेष रे, सह ठाम विशेष स्नान न ॥२८॥
॥दोहा॥
भगवतौ नवमां शतक मे, तेतीस में उद्देश ।
जमाली मंजन धरै, स्नान वली कर्म शेष ॥२६॥
अलकार कर नौकल्यो, मंजन घर थौ हेर ।
इण न्हावा ना घर विषै, केहवो पूज्चो देव ॥३०॥
देवा नन्दा ब्राह्मणी, वलौ कर्म मजन गैह ।
तिण न्हावा ने घर किसी, पूज्यो देव कहेव ॥३१॥
द्वितीय उपात्र प्रदेशौ नृप, देव पूजवा जाय ।
पहिला न्हावा घर विषै, वलौ कर्म कौधो ताय ॥३२॥
इश न्हावा ना घर विषै, किसो पूजियो देव ।
देव पूजवा तो हिवै, जावै
स्वयमेव ॥३॥
जाताध्ययने सोल मे, द्रौपदी मंजन गेह ।
स्नान वलौ कर्म कौतुकः, पवर वस्त्र पहरेह ॥३४॥
मंजन घर सुं नौकलो, भावी जिन घर माय ।
इतरा सूधौ पाठ है, देख विचागे न्याय ॥३५॥
NAMA
६२]
* असहेजाधिकार
प्रतिकार कसोय रे, वलौ कर्म ते गृह देवता।
तमु पूजा पवलीय है, यहां कुल देवौ सम्भवै ॥४६॥
स्नान विशेषण होय रे, वा पूजी ग्रह देवता।
उभय पथ पवलोय रे, सत्य सर्वन वदै तिको ॥४७॥
॥ अथ असहेजाधिकार ॥
॥दोहा॥
वलि कहै श्रावक समकिती, च्चार जाति ना देव ।
तास साम बछे नहीं, सूत्र विषै ए भेव ॥४८॥
ते माटै वली कर्म. ते, जिन प्रतिमा पूजन्त ।
पिण कुल देवी अर्थ नहि, हिव तसु उत्तर मन्त ॥४॥
। सोरठा॥
पसहेका पोठ । जाण रे, पथं दोय है हत्ति में।
पामद पधे सुजाण रे, साझ न बंछ देव नूं ॥५०॥
पोते कौधा पाप रे, ते पोतेहिन भोगवै।
पदौन मनोहत्ति स्थापरे, एक अर्थ तो इम कियो ॥५१॥
वलि पाखंडी पायरे, चलावै समकित पादि थी।
तो नहीं बच सहाय , समर्थ खयमेव इटायवा ॥५२
वलि जिनशासन मांय रे, अत्यन्त भावित पासता।
से माटै असहाय रे, अर्थ दूजो हम इति में ॥५॥
* वली कम्मा अधिकार *
[६१
-RAHA
1
गोसीस चंदणोणु लित्तगते अहय सु महग्ध मरयण सु संवए सुइ
माला चण्णग विलेषण आविद्ध मणि सुवणे कप्पिय हारहार तिसरय
पालंब पलंघमाणे कडिसुत्त सुक्य सोहे पिणद्धगे विम अङ्गुलिने कल
लियंगयं ललियं कया भरणे वरकडंग तुहिय थमियभूय भहिय
रुवसस्सिरीया मुष्टिया पिगलंगुलिय कुंडल उजोषियाणणे, मउद्ध
दित्त सरण हारोत्थए सूकयर इयव पत्ये पालंय पलंबमाण पडसुकय
उत्तरिझणाणामणि कणगरयण विमलमहरि हणितणा वियमि सम-
संति चिरइय सु सिलिल विसिह लट्ठ आविद्ध वीर वलये किं बहुणा
कप्परुखए व अलंकिय विभूसिए परवई सकोरंट मल्लदामेणं छत्तेणं
धरिज्म माणणं चउ चामर वालवीजयंगे मंगल जय सह कयालोए
मझण घराउ पडिणिक मइमझ२चा। इति ॥
॥ सोरठा॥
वली कर्म शब्दे जेह रे, पूजा जिन प्रतिमा तणौ ।
तो कौणिक अधिकारह रे, निन वंदन समय ए न किम॥
जम्बूदौम पन्नती एम रे, भर्तेश्वर ना स्नान नं ।
विस्तार कौणिक जेम रे, त्यां वलौ कमा पाठ नहीं ॥४२॥
स्नान तणो जिन स्थान , विस्तार पणे नवि वरणव्यूँ ।
त्यां वली कम्मा नानी, पाठ देख निरणय करो ॥४॥
जलाञ्जलि प्रमुख रे, स्नान करंतो ने करै।
कुरलादिक प्रत्यक्ष रे, स्नान विशेषण एह छै ॥४४॥
ते माटै अवलोय रे, वली कम्मा ने पाठ ।
स्नान विशेषण सोय रे, अर्थ धर्मसी दूम कियो ॥४५॥
६४]
* असहजाधिकार
तास अर्थ हत्ति माय रे, एक ईन कौधो अछ।
भापद सुर असहाय रे, एह अर्थ कौधो, नथौ ॥६॥
कुतौर्थिक प्रेरित रे, समकित से अविचल पणो।
पर सहाय नवि चित्त रे, उववाई वृत्ति में कह्यो ॥६५॥
राय 'प्रशेपे वृत्ति रे, पसहेज्मा नें अर्थ
कोधी अधिक पवित्त रे, चित्त लगाई सांभलो ॥६॥
कुतौधिक प्रेरित रे, समकित से अविचल पणो।
पर सहाय नवि चित्त रे, यह अर्थ दूक हिज विहां ॥७॥
पापद सुर असहाय रे, यह अर्थ कौधो नथौ।
कुतौर्थिक थी ताहिरे, न चले एहिज अर्थ त्यां ॥८॥
आनन्दादिक साररे, पसहेज्मा पाठ कह्यो तिहां।
छः छण्डी. आगार रे, 'देवाभिउगे माठ में | ॥६॥
अन्य तौथौं ने धार रे, तथा देव जे तेहनां ।
श्रद्धा भ्रष्ट अणगार रे, अन्य तौथौँ ग्रह्या तेहने ॥७॥
न कर वन्दना ताहि रे, नमस्कार पिण नहिं कर।
पहला बोलूं नाहि रे, अशणादिक देवू नहौं ॥७१॥
अभियह एह विशेष रे, छः छण्डी आगार त्यां।
राजा ने आदेश रे, तथा कुटख आदेश थौ ॥७२॥
बलवन्त तणे प्रयोग रे, देव तणे परवश पणै।
कुटम्ब बडा ने योग रे, अटवी विषैज कारी ॥७३॥
३
* असहजाधिकार
[६३
तुनिया ने अधिकार रे, उभय पर्थ ये पाखियो।
तास न्याय सुविचार रे, चित्त लगाई सांभलो ॥५४॥
दूनो अर्थ पहिछाप रे, समकित ब्रत सैंठा पणो ।
प्रवर सूल गुण जाण रे, एह अवश्य गुरु चाहिने॥५५॥
ए गुण खण्डित थायरे, तो हुवै विराधक पांति में।
शुद्ध हुवा सुताय रे, भाराधक पद पाखियो ॥५६॥
जो पाखण्डौ ने जहरे, नाव देवा समरथ नहीं।
पर सहाय बिन तेहरे, तासु चलायो नवि चलै १५७॥
तो पिण मूल गुण तास रे, तेहन गयु सर्वथा।
समकित ब्रत,नी राय रे, अखण्ड पणे राखी तिथे ॥५॥
पापद पडियां पाय रे, सुर सहाय बछे नहीं।
ए धुर अर्थ काय रे, उत्तर गुण ते जाणवू ॥५६॥
मुनि धुरपहिर सझायरे, द्वितीय पहिर में ध्यान वर।
तृतीय गोचरी नाय रे, चौधे पहिर सभाय फुन ॥६॥
उत्तर गुण ए च्यार ने, कह्या विचक्षण मुनि तणे।
ज्यो न करै अगार रे, तो संयम में भङ्ग नहीं ॥१॥
तिम श्रावक रै एह रे, उत्तर गुण असहायता।
सुर सहाय बछेहरे, तो समकित में भा नहीं ॥२॥
सूत्र उववाई मांहि रे, अम्बड ने अधिकार पिण।
बाव शब्द में ताहि रे पसहेका ए पाह है ॥६॥
* असहजाधिकार* Mov ~~ कृष्ण पिण सुविशेष रे, लघु बधव रे कारण। देव आराध्यो देख रे, अन्तगड मांही कह्यो।४॥ चक्री भरत सु सोय रे, देवी देव भणौ तिणे । जम्बूद्वीप पन्नत्ती जोय रे, अट्टम करि आराधियो ॥५॥ वलि मूक्या छ: बाण रे, नमस्कार सुर ने लिख्यो। ए प्रत्यक्ष ही पहिछाण रे, बन्यो सहाय देवने ॥६॥ वलि चक्री भरतेश रे, चक्र तणौ पूजा करौ। इमहिन सुर सम्मेख रे, पूजे खार्थ कारणे ॥८॥ शान्ति कुंथु अरि जाण रे, चक्र रतन पूज्यो के नां । खट खण्ड साधत पाण रे, अट्ठम तेर किया कै नांच्या लवण मुट्ठियो देव रे, कृष्ण पिण आराधियो । जाता सोलम भेव रे, सुर सहाय बंछो तिणे टा पूर्वोक्त पहिछाण २, देव सहायन बान्छवै । सम्यक् दृष्टि जाण रे, सावध लोकिक कृत करै ॥३०॥ समकित तासन जायरे, नहौं जाय श्रावक पणो । जो सुर पूजे नाहि रे, तो गुण अधिकरी अछे ॥६॥ नारद करा पाय रे, द्रुपद सुता प्रणम्या नथी। ए गुण है अधिकाय रे, मिला पांडू प्रणमत करी ॥२॥ जाव शब्द रे मांहि रे, कृष्ण पिण नारद भणौ। प्रथमत की धौ ताहि रे, पिण तसुसमकित नवि गई।
। मेहनां ॥७॥ १ असहनाधिकार * [६५ एखट तणे प्रकाररे, अन्य तीर्थादिक बिहुँ भणी। बन्द करि नमस्कार रे, अशणादिक दे वहने ॥७॥ आपद उपजे पाय रे, अथवा वेहना भय थकी। बांछ देव सहाय रे, जाणे सावद्य तेहने ॥७॥ तसुसमकित किम जाय रे, समकित तो श्रद्धा अछ। हिये विचारो न्याय रे, श्रद्धा कार्य जुवा जुवा ॥७६॥ छः छण्डी विन त्याग रे, एपिण गुण अधिकाय है। अधिकरो बैराग रे, ब्रत सांकडा इक बस ना पञ्चखाण रे, कौधां से श्रावक हुवे। शतक सतरमें जाण रे, द्वितीय उद्देशै भगवती ॥७॥ अनर्थ दण्ड परिहार रे, ए आठमू ब्रत है। अर्थ तणो आगार रे, न्याय हिवे तेनु मुणो ॥७॥ अर्थ दण्ड में एह रे, पाठ आगारन आखिया। द्वितीय सुयगडांगेह रे, द्वितीय उद्देशै देखल्यो ॥८॥ आत्म ज्ञात घर तेथ रे,परिवार ने मित्र कारणे नाग भूत यक्ष हेत रे, हिन्सादिक आरम्भ करै ॥८॥ अर्थ दण्ड रै माहि रे, ए आढू हो आखिया। नाग भूत यक्ष ताय रे, श्रावक रै आगार छै ॥२॥ धारणौ नो तिहवार रे, अकाल घन डोहला अर्थ देखी अभय कुमार रे, जाता सुर आराधियो n८३॥ ३ ६८] *यात्रा अधिकार ॥ अथ १२ मूं यात्रा अधिकार ॥ ॥दोहा॥ यावा शेर्बुनादि, नौं, करवी केक ख्यात । पिण ए यावा सूत्र में, कही नथी जगनाथ ॥ १ ॥ शतक अठारमें भगवती, दशमें उद्देशै सार । सोमल पूछया वौर प्रते, प्रश्न यानादि प्रकार ॥ २ ॥ हे भगवन्त ! स्यूँ थाहिरै, यात्रा अधिक उदार । दूम सोमल पूछयां थकै, उत्तर दे जगतार ॥३॥ जिन भाषै सुण सोमिला, छै मांहरै सुखकार । तप अणशणादिक नियम, तेह अभिग्रह सार ॥ ४ ॥ संयम वलि सभाय ते, धर्म कथादिक जाण । ध्यान आवश्यक आदिवर, जोग विमल पहिछाण॥ ५ ॥ ए पूर्व कह्या वेहने विषै, जयणा प्रते राखै जेह । ते मांहरै यात्रा अथे, कह्या पवर बच एह ॥ ६ ॥ पिण शत्रुनयदिक तणी, जिन यात्रा कही नांहि। देखोजी देखो तुम्हे, देखो हिवडा मांहि ॥ ७ ॥ सोरठा वृत्ती विषै दूम वाय रे, यद्यपि प्रभू केवल पणे। आवश्यकादि ताय रे, बोल केडूक नहीं है तमु ॥८॥ ॥ ॥
* असहेजाधिकार [६७ प्रत्यक्ष ही पहिछाण रे, समदृष्टि श्रावक तिक शौथ नमाव जाण रे, म्नेछ ना राजा प्रते ॥४॥ तिमहिन डरता ताय रे, अथवा स्वार्थ कारणे । प्रणमै सुर ना पाय रे, ते मार्ग लोकीक है ॥१५॥ ते माटै पहिछाण रे, पाखण्डौ थौ नवि चले। दृढ़ आसता जाण रे, मूल अर्थ असहेक नूं ॥६॥ वलि जे कहै दूम बाणि रे, सुर सहाय नही बच्छणो। तो चौवोस जिनना नाण रे, चौवीस यक्ष यक्षणी कहै। शासण देव सहाय रे, तसु थुई पडिक्कमणे पढ़े। वलि शेव॑ले ताय रे, पूजे केम चक्खरौ ॥८॥ तथा यतो थकां प्रत्यक्ष रे, काला गौरा भैरव । माणभद्र दिक यक्षरे, आसधै रक्षा भणी || ए लेखै तो जोय रे, सहाय देवनो बञ्छवै । निज श्रद्धा अवलोय रे, तुम गुरू पिण नहीं समकिती। पूजे भैरव आदि रे, श्रावक परणीजे तदा । शौतलादिक अहल्लाद रे, तुझ लेखै नही श्रावक पणो।। तिणसू देव सहाय रे, लौकिक खाते वञ्छता । सम्यक्त तास न जाय रे, नहीं जावै श्रावक पो ।१०२॥ ॥ इति असहेज्झाधिकार
७.]
* यात्रा अधिकार*
M
शेतुंभ पव्वए सिद्धे, सूत्र में इम गिरि ख्यात ।
पिण शेवुन तीर्थ सिध, बूम'न कंधो गणि नाथ ॥१८॥
जागां भलाहदी जाणि ने, कौधा तिहां संथार ।
बन्दनौका तो गुण पछे, जीवो हिये विचार ॥१॥
जीव रहित तनु तेहर्नु, ते पिण नहिं बन्दनीक ।
तो जानां बन्दनीक किम, न्याय विचारो ठीक ॥२०॥
नाज खला थी .ले करी, घाल्यो जे कोठार ।
सूना खला लारै रया,, चाटै वह गिमार ॥२१॥
हुण्डौ बे लाखां तणी, सिकारता ने स्थान ।
काल तलै शेठजी, छोड़ी तेह दुकान ॥२२॥
हिव हुण्डी सिकरै नहीं, तेह दुकाने जोय ।
तिम शेवुञादिक विषै, जिन मुनि सिद्धा सोय ॥२३॥
हिव ते पर्वत ने विषै, हुण्डी तयूँ न सोय ।
सिकारण वाली नहीं रह्यो, बन्दनीक, किम होय ॥२४॥
बन्दनीक जो गिर हुवै, तो तिण ऊपर, ताय ।
मग दोधां पाशातना, हुवै तुझा श्रद्धा न्याय ॥२५॥
हीप पढाई , विषै, दोय समुद्र विषेछ ।
सह ठामे सिद्धा मुनी, पनवणा सोलम एह ॥२६॥
निहां एक सिधा ति, सिधा मुनि अनन्त ।
सूत्र , उववाई ने विषे, भाख्यो श्री भगवन्त ॥२०॥
* यात्रा अधिकार
[६६
RANA---
तथामि तप नियमादिरे, तसु फल नासदभाव थी।
तप नियमादि संवाहि रे, 'कहिये फल ते आसरी॥६॥
॥दोहा॥
इमहिन पुफिया उपाङ्ग में, ढतीय अध्ययन मझार।
पार्श्वनाथ भगवन्त प्रते, सोमल विप्र जिंवार ॥१०॥
प्रथ यात्रादिक पूछिया, तप नियमादि प्रबत्ति ।
पार्श्व प्रभू यावा कही, पिण गिरि नौ न कथित ॥११॥
जाताध्ययने पंचमें, मुनि स्थावरचा पूत ।
तेह प्रते शुक पूछिया, प्रश्न यावादि प्रभूत ॥१२॥
हे भदन्त ! यात्रा किसौ, शुक पूछे ए सार ।
कमु थावरचा पुत्र इम, ने मुझ ज्ञान उदार ॥१३॥
दर्शन चारित्र तप वलि, संयम आदि विचार।
योगे यत्नौ जीवनी, ए मुझ यात्रा धार ॥१४॥
इहां पिण यात्रा एह हो, ज्ञानादिक नौ जोय।
पिण शेवुजा आदि नौ, यात्रा न कही कोय ॥१५॥
उत्तराध्ययन सु वारमें, हरिकेशी प्रति सार।
विप्र पूछियो थाहिरे, कुंण द्रह तीर्थ उदार ॥१६॥
धर्म रूप मुनि द्रह कयो, ब्रह्मचर्य अवलोय।
तीर्थ शान्तिकारी कयो, पिण गिरने न कयो कोय ॥१०॥
॥ ॥ ७२] * इक्कीस हजार वर्ष तीर्थ रहसी ते भधिकार* सोरठा तीर्थ आगम धारं रे, अमर कोष में आखियो। तीजा काण्ड मझार रे, थांतत वर्गे जाणवो ॥ ६ ॥ निपान आगम जेहरे, ऋषि सेव्योजल गुरु विषै ए चिहुं अर्थ विषेश रे, तीर्थ शब्द कह्यो तिहां ॥ ७ ॥ ॥ श्लोक ॥ निपानाांगमयो तीर्थ मृषि जुष्ट नले गुरौ ॥ इत्यमर तृतीय काण्डे थांतत वर्गे ॥ ॥ सोरठा ॥ तीर्थ शास्त्र अवधार रे, हेम अनेकार्थे अख्यं । द्वादश नाम मझार रे, प्रथम नाम ए आखियो॥८॥ ॥ श्लोक ॥ तीर्थे शास्त्रे १ गुरोर यजे ३ पुण्य क्षेवा ४ वतार यो ५ ऋषि जुष्टे ६ जले मंविण्यु ७ माये ८ स्वी रजस्यपि ॥ योनी १० पात्रे ११ दर्शनेषु १२ ॥ ॥ इति हेम अनेकार्थे । सोरठा ॥ विश्व कोष माहि रे, तीर्थ नाम कथुशास्त्र । 'नव नामा में ताहि रे, प्रथम नाम ए पेखिये ॥४॥ . r ,
-------
* इक्कीस हजार वर्ष तीर्थ रहसी ते अधिकार
[७१
दूण लेखे तुझ बन्दवा, अढौहीप अवधार ।
फुन बे दधि प्रति वन्दवा, त्यां सिधा अणगार ॥२८॥
ते माटै बन्दनौक छै, जिन मुनि महा गुणधार।
पिण स्थानक बन्दनौक नहीं, वारुं न्याय विचार ॥२॥
॥ इति यात्रा अधिकार ।
॥ अथ १३ मूं इक्कीस हजार वर्ष
तीर्थ रहसी ते अधिकार ॥
॥ दोहा॥
सूब भगवती में कयो, बौसम् शतक विषह ।
अष्टमुद्देशक वौर प्रति, गोयम प्रश्न करेह ॥ १ ॥
जम्बूदीप ना भरत में, ए अवशर्पिणी माहि ।
काल केतलं आपरो, तीर्थ रहिस्यै ताहि ॥२॥
जिन कहै जम्बू भरत में, एह अवशर्पिणी मन्त ।
वर्ष सहस्र दूकवीस मुझ, तीर्थ रहिस्य तन्त ॥३॥
तीर्थ कहिन कहने, दूम को प्रश्न करेह ।
तसु उत्तर तीर्थ तौको, पागम सूत्र कहेह ॥ ४ ॥
वर्ष सहस्र दूकबीस लग, रहिस्ये सूत्र उदार ।
बहु ठामे जे तौर्य नु, सूब अर्थ सुविचार ॥ ५ ॥
'" Ge * इंळीस हजार वर्ष तीर्य रहसी ते अधिकार सौर्थ प्रवचन सार रे, तेहना, अव्यतिरेक थी। -संघ तीर्थ सुविचार रे, तमु कर्ता तीर्घ करा ॥१॥ ॥ अन टीका ॥ तति तेन संसार सागरमिति तीर्य प्रबचन तान्यतिरे काह संघताय तत करण शीलत्वा तीर्थकर ॥ एहनु अर्थ वार्तिका करिइं कहै छ। विर तिणकरी संसार सागर इति तीर्थ ते तीर्थ ने करिवा नो शील पणा यकी तीर्थकर कहिये, इम भगवती नी वृत्ति में नमोत्यूणं में तित्थगनो अर्थ फियो, इमहिन समवायंग नी वृत्ति ने विष जाणवो, हो तो नाम प्रश्न खून न कर, ते पाठ अर्थ रूप सूत्र साधू साध्वी माधार रखा है अने अर्थ रूप सूत्र श्रावक श्राविका ने आधार रहो ते सूत्र वीर्य तो आधेय छै अने चतुर्विध संघ माघारते अधेयने माघार ना किण ही प्रकारे करी अभेदोपवार यकी संघ ने तीर्थ का तेहने करिखा, शील ते मारै तीर्घकर कहिये । इहा मुख अर्थ प्रवचन ने वीर्य का ते प्रवचन रूप तीर्य बहुल पणे संघ ने विष रख के निण सूं संघ ने तोर्य का ते प्रवन रूपी तीर्थ थो संघ सुदो नयी ते माद। ॥ सोरठा ॥ सौर्य प्रबचन सार, तत् करण शील तीर्थ कग। ममोत्थूर्ण में धार रे, राय प्रशेणो वृत्ति मे ॥१४॥ .॥ अत्र टीका ॥ तीचे ते संसार समुद्रोऽनेनेति वीर्थ प्रवचनं तत् करण शीलास्तीर्थ करातेम्यः इति .
[ * इक्कोंस हजार वर्ष तीर्थ रहसी ते अधिकार * ॥ श्लोक ॥ तौर्य शास्त्रा १ ध्वर २ क्षेत्रो ३ पायो ४ पाध्याय ५ मंविषु ६ अवता ऋषि ७ जुष्टांमः ८ स्तौ रनः ६ सु च वि श्रुतं। ॥ इति विश्व थाँतत वर्ग। सोरठा ॥ . तीर्थ शास्त्र म लेख रे. कयो मेदनी कोष में। दश नामा में देख रे. प्रथम नाम ए परबरो ॥१०॥ ॥ इलोक ॥ तीर्थे शास्त्रा१ ध्वर २ क्षेत्रो३ पाय ४ नागैरजः १. सु च ।' अवता ऋषि ६ [ष्टांव ७ पात्रो ८ पाध्याय ६ मैत्रिषु १०। ॥ इति मेदनी थांतत वर्ग। ॥ सोरठा । गुणतौसम उत्तगध्ययन रे, वोल गुनौमम वृत्ति में। तीर्थ शब्द वयण रे. गणधर वा प्रवचन श्रुतः ॥११॥ भगवई वृत्ति मभार रे. लित्य गराणं नो अर्थ । तीर्थ प्रवचन सार, इमहिज समवाय पत्ती १२|| W . . . 2 * तीस हजार वर्ष तीर्थ, रहली. ते.अधिकार * सिद्धः इदा पिण परम गुरू ते तीर्थकर तहना वचन-ते आग्रम तेहने तीर्थ कयो, ते भागा आधार पिना न हुवै तें आधार माटै संघ ने तथा प्रथम गणधर ने तीर्थ कायो। ॥ सोरठा धावश्यक नियुक्ति रे, तास अर्थ में भाव यौ। तीर्थ प्रवचन उक्त रे, समर्थ क्रोधादि नौपवा ॥१८॥ n अत्र टीका ॥ इह भाव तीर्थ क्रोधादि निग्रहं समर्थ प्रवचन मेव गृहने । । एहनु अर्थ॥ इहाँ भाव तीर्थ क्रोधादि निग्रह समथ प्रवचन सूत्र होन ग्रहण करिये, हाँ पिण प्रवचन सूत्र ने तो कहो।। ॥सोरठां॥ मूत्यादिक बहु ठाम रे, तीर्थ सून भणी क्रा।' तितीर्थ प्रबचन नामरे, रहित्येप्रकबीस सहसवर्ष ॥१॥ प्रवचन तीर्घ सोय रे. सघ आधारे हुवै कंदा । किणहिक वेला जोय र, द्रव्य लिङ्गो आधार हुवै ॥२०॥ जद को.प्रश्न करत रे, मुनिना गुण,विन हनुंग; अमयं सूत्र.किम हुन्त से.तसु उत्तर-हित सांभलोसारखा धुरं उद्देशवहार रे, बहु श्रुत्त बहुभांगेम भण्यु 'द्रव्य लिहौजे धाररे, मुनि प्रायश्चित ले तिण क्रीं ॥२२॥.
*कीस हजार वर्ष वीर्य इसी ते अधिकार [१ एहनु अर्थ वार्तिका करीई कहै छ । तीरीये संसार समुद्र इणे करी इति तीर्य प्रबचन सुन ते सूत्र तीर्थ करिखा ना शील थकी तीर्थकर कहिये, इहाँ राय प्रशेणी नी वृति में प्रवचन ते आगम ने तीर्थ का ते आगम रूपी तीर्थ ना कर्ता वीर्यकर छैने माटे तीत्ययरे नो अर्थ तीर्य कर कियो । ॥ सोरठा ॥ पनववा इत्तिमभार रे, पनर मेद में तित्व सिक्षा। प्रथम मदे अवधार रे, दाख्यो है वे सांभलो ॥१५॥ सत्य प्ररुपक सोय रे, परम गुरु है वहना। बचन विमल.पवलोय रे, तौथं कहिये तेहने ॥१६॥ तनिराधार नहिं होयरे, तसु भाधारज संघ प्रति। तौर्य कहिये जोय रे, वा धुर गणधर विहां कडं ॥१७॥ ॥ अत्र टीका ॥ वीर्य संसारसागये अनेनेति तीर्थ यथा भवलित सकल जीना. जीवादि पदार्थ पकपकं परमगुरु प्रणीव ववनं तब निराधार भवति इति सदा धार संघः प्रथम गणघरोघा वस्मिन् उत्पनाये सिवाहस्ते वीर्य सिखा। ॥ पहनु अर्थ वार्तिका करीई कहै छ। तिरीय संसार सागर इणे करी इति तीर्थ यथावस्थित सकस जीव मजीवादिक पदार्यमा प्ररूपक परम गुरू ना कहा बवा देने तीर्य कहिये अने ते परम गुरुना पवन रूप तीर्थ ते आधार बिनामा संधने आधार छैते भणी संघ ने तीर्थ कहो, अथवा प्रथम गणधर ने वीर्य कहिये ते संघकप तीर्थ ने विषै अपना जे सिद्ध थया ते तीर्थ ७८] * इक्कीस हजार वर्ष तीर्थ रहसी ते अधिकार संघ पाधारे जेहरे, सूत्र रूप जे तीर्थ है। निरन्तर नहौं दौसह रे. वर्ष सहस बकवास लग ॥३०॥ कदही संघ आधार रे, कादही अन्य प्राधार हुवे। सूत्र तीर्थ सुखकार रे, वर्ष दूकबीस हवार लग ॥३१॥ कोई कहै चिहुविध मजरे,वह भणी तीर्थ कश्य। तसु आधार सु चङ्ग रे. प्रवच तीर्थ ते भयौ ॥३२॥ पिण प्रबधन सु प्रशंस रे, द्रव्य लिङ्गो आधार तम् । तीर्थ तणोज अंथ रे, किम कहिये ? उत्तर तसू ॥३३॥ पण्डित मर्ण विख्यात रे, शत दूने उद्देश धुर । पाउवगमन सुनात ने, भत्त पञ्चखाण व दूसरी ॥३४॥ मुख बचने करि हाल रे. मरण पण्डित बेभाखिया। मुनि अपशण बिन कालरे; करै तिको पण्डित मृत्यु ३५ बाल मर्ण फुन बार रे, मुख्य बचन करि ने कया। बार मरण बिन धार रे. असंयती नो बाल मृत्क ॥३६॥ पूरण तापश ताहिरे, वलि जमालो तामली। बार मरण में नाहिरे, पिण बाल मरण ते जाणवी ॥३७॥ मुख्य बचन करिबार रे, बाल मरण पाख्या.प्रभू । तिम तीर्थ संघच्चाररे, मुख्य बचन करि जावा. पण्डितमरण पिण दोयरे, मुख बचने करिने कया। तिम चिहुं तौथं जोवरी, मुख्य बचन करि बाणवा ।३।।
* इक्कीस हजार वर्ष.तीर्थ रहसी ते अधिकार *
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वहां द्रव्य ग्लिो बाधार .सूवागल श्री जिन कया।
तसु बाबा श्राचार रे, विरुद्ध हुवै ने तो जुदो ॥२३॥
॥ वार्तिका ॥
पवहार उद्देशै पहले कहो साधू ना रूप सहित भेषधारी बहुश्रुत बहु
आगग नूं जाण ते कनै साधू आलोवणा कर पहका ए भेषधारी ने
आधार बहु श्रुत बहु आगम को छै ते माटे-तेहढं जेतलं जेलं शास्त्र
ना अर्थ -शुद्ध नाण पणो ते श्रुत आगम रूप तीर्थनूं अंश संभवै ते माटै
किण हिक काले चतुर्विध संघ न हुवै तो लिलावारी ने आधारे प्रवचन
रूप तीर्थ नो अंश झुवै एहवं संभाचियै छै।
॥सोरठा ।
वलि ववहार कथित रे, बहु श्रुत आगम भण्य।
श्रावक पश्चारमात्य रे, मुनि आलोवै तिण कनै ॥२४॥
वहां ग्रहस्थ आधार रे. बहुश्रुत आगम जिन कयो।
तसु सावध व्यापार रे. ए तो एह थौ छै जुदो ॥२५॥
अर्थ रूप अवलोव रे, जाण प्र" छै जेह न ।
ते निर्वद्य ॐ सोय रे, सूत तीर्थ छैने भणौ ॥२६॥
मिथ्या दृष्टि देह , देश अंण दश पूर्व धर ।
उत्कृष्टो गम्पेख रे, नन्दौ मांहि निहालज्यो शर७॥
मिरथ्या आधार है, हां प्रभू पूर्व अखिया ।
श्रद्धा तास असार, ते तो धुर . आसव अछै शरा
महिज पञ्चम् चार २, किण बेत्यांमुनि.नहिंघया।
द्रव्य लिंग्याद्या धार रे, सृत रूप तीर्थ हुई ॥२६॥
26 आगमा अधिकार ~~ ते माटै अवधार रे, तीर्थ प्रबचन सूत है। कदहि संघ आधार रे. द्रव्य लिङ्गी आधार कदि ॥४२॥ ॥दोहा॥ सूत्र भगवती नौ पंवर, मम कृत नोड विषेह । वलि कर्म तीर्थ न्याय का, ते वहां ग्रहण करेह ॥४ ॥ इति इक्कीस हजार वर्ष तीर्थ रहसी ते अधिकार । ॥ अथ चौदमू आगमा अधिकार ।। ॥ दोहा॥ पल अने चालीस में, जे चिहुं शरण विचार१ । नीम भक्त परिज्ञारं वलि, फुन पईब्रो सन्थार३ ॥१॥ जीत कल्प४ पिंड नियुक्ति५, पञ्चखाण काल्प अवलोय । ए खट नौ नन्दौ विषै, साख नहीं है कोय ॥ महा निशीथ विषै कच्चं , दितीय अध्ययन मझारं । कुं लिखत दोष देवो नहीं, तसु कारण अवधार ॥ ३॥ एहिज महा निशीथ में, कि एक अई शोलोग। किहां श्लोक किहां अक्षर नौं. पंहित ओली प्रयोग ॥ ४॥ किहां एक पानी अई हो, किहां पन बे तीन । 'गल्यो ग्रन्थ इम पादि बहु, यह विध कसुचौन । ५॥ वलि कच्छ हतीय अध्ययन में,ए पुस्तक र मांहि। चट्ठी बूक पाना थकी, बोजो पानो ताहि-६॥ . . --- * इक्कीस हजार वर्ष तीर्थ रहसी ते अधिकार * [७६ ॥ एहिज अर्थ वातिका करीई कहै छै । जिम भगवती शतक दूसरे उद्देशै पालै मुख वचने करी बाल मरण बारा प्रकार नो को अने असंयती अविरती वारा प्रकार विना चालतो ही मर जाय ते पिण चाल मरण हिज छ, तथा तामली जमाली प्रमुख नो बाल मरण हीज छै पिण ते बारा में नथी कह्यो ते माटै ये वार प्रकार बाल मरण मुख्य पचने करी जाणवो, या वलि पण्डित मरण वे प्रकार कह्या एक तो पादोपगमन चूजो भत्तपचखाण ए पिण मुख बचने करी कहा, जे साधू संथारा बिना आराधक पद पायो तेह पिण पण्डित मरण हिज के जिम श्रावानुभूति तथा सु नक्षत्र मुनि नो संथारो वाल्यो मयी ते भणी भत्त प्रत्याख्यान पादोपगमन तो नथी पिण पण्डित मरण हिज छ भने पांदोपगमन भस पचखाण ए वे भेदे पण्डित मरण कह्या ते मुख्य बचने करी जाणवा, तथा अराधना ज्ञान दर्शन चारित्र ए तीन प्रकार नी भगवती शतक आठमें उद्देशै दशमे कही ते पिण मुख्य बचने करी जाणवी, अने वलि तिणहिज उद्देशै श्रुत ते समकित रहित अने शोल किया सहित ने देश आराधक को तिहाँ वृत्तीकार कहो ए बाल उपखी थोडो अंश मुक्ति मार्ग नो पाराधै एहवो अर्थ कियो छै जिम भान रहित शील सहित वाल तपखी मोक्ष मार्ग नो अंश आराधै ते देश आराधक छै पिण तीन आराधना में नथी तिम द्रव्य लिङ्गी ने आधार मवचन सत्र ते तीर्थ नो अंश संभवै पिण ते च्यार तीर्थ मे नथी। ॥ सोरठा॥ वर्ष इनौस हजार रे, तीर्थ रहिस्यै न्याय तसु । एम संभवै सार रे, फुन बहुश्रुत कहै वह सत्य ॥४०॥ वर्ष एकवीस हजार रे, तीर्थ रहिस्ये दुम कह्यो। पिच चिहुं तीर्थ सार रे, रहिस्ये इम आल्यो नथौ।४।
-ANKA ८२] * मुसवत्रिका अधिकार हरिभद्र सूरे करी, दशवैकालिक वृत्ति । भाष्य अने. वलि चूर्णि पिण, पूर्वाचार्य कृत्त ॥१७॥ तिम ए षट नौ नवि करी, पूर्वाचार्य जोय । तिम सं तिणे न मानिया, एहवं दौस सोय ॥१८॥ शेष रमा बतीस जे, मानव योग आरोग्य । पायौ मिलता पन्य पिथ, है मुझ माना योग्य ॥१९॥ ॥ इति आगमा अधिकार ॥ अथ पनरम मुख वस्त्रिका अधिकार! ॥दोहा॥ इन्द्रभूति ने आखियो, मृगा राणी ताहिं। मुंहपोत्तिया ई' करी, मुख बांधो मुनिगय ॥ १ ॥ ते मुख कहिये कहने, उत्तर तमु अवलोय । माकं तयो ए नाम मुख, न्याय विचारौ जोय ॥२॥ दुर्गन्ध पावै नाक ने, ते माटै सुविचार । भाव बांधवा नी कहो, राणी मृगा जिवार ॥३॥ जाता अध्ययन पाठमें, दुर्गन्ध व्याप्यो ताहि । घट राना मुख ढाकिया, ते दुर्गन्ध नाके पाय ॥ ४ ॥ जाता नवम अध्ययन में, दुर्गन्ध व्याप्यां न्हाल मुख ढाक्या पाख्या तिक, जिन इषि ने जिन माल 10 । * आगमा अधिकार [८१ ते माटै ए सून ना, आलावा न पामेह । तिहाभणणहारसूत्रांतणा, त्यां अशुद्ध लिख्यु हुवै जह। दोष न देवो तेहनो, खंड खंड थई एह। पत्र सद्या खाधा बलि, जीव उद्देहि जेह॥८॥ हरिभद्र निज मति करी, सांधी लिख्य न ताम। इम का महा निशीथ में, वलि अन्य आचार्य नाम।। तिण तूं महा निशीथ पिण, डोहलाणो छै एह । सर्व मूलगो नहि रह्यो, निपुण बिचारी लेह ॥१०॥ शेष रह्या षट तेह में, काइक काबूक बाय । अङ्ग सुंन मिलै तेह वच, किम मानौने ताहि ॥११॥ टोका चूरणि दीपिका, भाष्य नियुक्ति नाण ।. किणही करौ दौसै नथी, तिण सं एह अप्रमाण ॥१२॥ एकादश ने अङ्ग थी, मिलता - बचन सुजाण । सर्व मानवा योग्य मुभ, पन्ना प्रमुख पिछाण ॥१३॥ धुर बे अङ्ग नौ वृत्ति ने, शौलाचार्ये किछ । अभय देव सूरे • करो, नव अङ्ग वृत्ति प्रसिद्ध ॥१४॥ फुन अभय देव सूरे रची, प्रथम उपांग प्रबन्ध । चन्द्र सूरि विरचित वृत्ति, निरावलिया श्रुतस्कन्ध ॥१५॥ शेष उपांग अरु छेदनौ, मलयामिरि कृत जोय । हेमाचार्य वृत्ति करी, अनुयोग द्वार जो सोच ॥१६॥ - - .
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पुस्तक
पूठा तो,
* मुखखिका भधिकार
तथा तपंक्षी प्रमुख वे, डोरी बांधे तास ।
ते किण सूवे पाखियो ? बोवो हिये विमास ॥३६॥
कम्बर विहाणा नी करे, तसु डोरी बांधय ।
ते पिण किण सूत्रे कचं? न्याय विचारी लेह ॥३७॥
बलि सौराणा बांधता, डोगै थकीज बोय ।
ते पिण किण सूबे का, उत्तर पापो मोय ॥३८॥
बलि चिरमली सूत्र में, बास्यो श्री भगवान ।
तमु डोरी बांधे तिका, विसा सूत्र में जान ? ॥३॥
पडला पहिछाव।
डोरी बांध है तिका, विसा सूत्र में बाब ? ॥४॥
पलि लेखमा राखवा, कलमदान कहिवाय ।
डोरी बांधै वेह ने, किसा सूव रे म्हांय ? ॥४१॥
लिखवारी पाटी तरी, डोरी प्रति बधिक।
किसा सूत्र में से कछु, देखो ससु लेखेह ॥४२॥
तथा लोक पाना तो, डोरी श्री पाडेह ।
फांच्या नो पाटी करै, किसा सूत्र में बह १ ॥४॥
कारण में मग प्रमुख रे, भाटो बांधे देख ।
डोरी बांध देह ने, किसा सूत्र में लेख ? ॥४४॥
गोछारै -डोश्यां धकी, पाबा बांधै विह।
किसा सूब मांझी कायो ? उत्तर पापो एह ॥४५॥
* मुखवत्रिका अधिकार * [८३ जाता अध्ययन बारमें, जे जितशबू राय । मुख ढांके इम आखिया, दुर्गन्ध व्याये ताय ॥ ६ ॥ मुखनो अवयव नाक छ, ते नाक भयौ मुख ख्यात । वारू न्याय विचार ने, समझो सुगुण सुजात ।। ७ ॥ होट घडवटी नाक फुन, बचु गाल निलार। मुखना अवयव ते भणी, मुख कहिये सुविचार ॥८॥ धुर पङ्ग प्रथम अध्ययन में, द्वितीय उद्देश उइंत। पृथिवी बेदन ऊपरे, पन्ध पुरुष दृष्टन्त ॥ ६ ॥ पग लेई पिर लगे, तनु हाविंशत् स्थान । भाला तूं भेदै वलि, खडगे छेदै जान ॥१०॥ विहां होट हडवटी नाक फुन, पांख नोभ ने दन्त । गाल निलार पर कर्ण फुन, जू जूआ नाम क्रथन्त ॥११॥ एमुखना अवयव कच्चा, पिण मुख नो न कहो नाम वे माटै ए सहु भयौ, मुख ऋहियै छ ताम॥१२॥ बादश आंगुल मुख कह्यो, नव मुख नो सहु देह । अनुयोग हारे पाखियो, देखो पाठ विषेह ॥१२॥ ललाट यो लेई करो, हादश प्रांगुल जाण । नाक होट ने इडवठी, ए मुख तां प्रमाण ॥१४॥ गर्गाचार्य ना कुशिष्य, मुख ने विषे विकार। भुकटौ करै कया प्रभू, उत्तसध्ययन -मझार ॥१५॥ - . १०] *स्याढाद अधिकार* कहिये कियौ प्रकार करि, ते स्याबाद कहिवाय । न्याय कछुवैहनी, सांभलजो चितल्याय ।। ३ ॥ सब भगवती ने विषै, शतक सातमें सोय । द्वितीय उद्देशै भाखियो, जीव प्रश्न अवलोय ॥ ४ ॥ किणी प्रकार करि प्रभू , जौव साश्वता ख्याती किणं ही प्रकार अंसाश्वता, पाख्या श्री जगनाथ ॥ ५॥ द्रव्य थको तो साश्वता, भाव घंको सु विचार। पसावता प्रभूजी कद्या, ए स्याहाद मत सार । ई सूत्र भगवती ने विषै, शतक चौदमें सार। तूर्य उद्देशै भाखियो, ‘परमाण अधिकार ॥ ७ ॥ कह्यो परमाणू साखतो, किणी प्रकार करेह ।। किणी प्रकार असाश्वतो, हिव तमु न्याय कहह ॥८॥ द्रव्य थकी तो साश्वतो, परिमाणू प्रति ख्यात । . न मिटै परम अणू पणो, किण हो काल विख्यात ॥६॥ वर्णादिक ने पज्भाव करि, पसाखतो' अवलोय . स्याहाद बच एह है, न्याय दृष्टि करि जोय ॥१०॥ बहत्कल्प मांहि का, पञ्चमुद्देश प्रथम पोहर पशणादि प्रति, वहिरो ने पणगार ॥११॥ तूर्य पहिर राखौ करो, ते अशणादि प्रतेह । भोगवणो · कल्यै नहीं, 'सुखे समाधे एह ॥१२॥ मभार।
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*-मुखवस्त्रिका अधिकार *
[८५
पशणादिक प्रति बहिरता, पांती करतां सोय ।
अन्य साधु प्रति धामतां,. चरचा करतां जोय ॥२६॥
मुनि ने कार्य भलावतां, इत्यादिकं सु प्रयोग।
मुख बांध्यां विन किम रहै, अति तीखा उपयोग ॥२०॥
तिण सं यतना कारणे, डोरो घाली सोय ।
मुख
बांधे
मुख वस्त्रिका, और कारण नहिं कोय ॥२८॥
नदि कहैडोरो किहां कह्यो? तमु कहिये दूम बाय।
कान विषे घालै तिका, किसा सूच रै मांहि ? ॥२६॥
मुख बधैि डोरै करौ, तसु करै निन्दा तात ।
कान बधावै प्रगट एं, आ किसा सूत्र नौ वात ॥३०॥
तक करै डोरा तणौ. कहै किण सूबे ख्यात ।
कान बधावै वेहनौ, क्यूं नहिं पूछे वात ॥३१॥
मोर पृच्छना देश प्रति, घाली कर्ण मार।
उंदक थको छांटयां थकां, फूले तेह तिवार ॥३२॥
इम नित प्रति बहु खप कैरी, कर्ण वधाय विशेष ।
धम घालै मुख बस्त्रिका, किसा सूत्र में लेख ? ॥३३॥
कहै बचन शुद्ध यतना अर्थ, घाला कर्ण मझार।
तो डोरो पिण यतना अर्थ, न्याय सरिषो धार ॥३४॥
उदक तणा घट ने विषै, डोरी बांधे तेह ।
किसा सूत्र में ते कडं, देखाजो चित देह ॥३५॥
१] * स्याद्वाद अधिकार दशवकालिक देखल्यो. तूर्य अध्ययन ममार। सचित उदक नहिं सारी, ए जिन भाज्ञा सार ॥ हत्कल्प तौजे का विधार कारण थी. बोय। नदी उतरणी प्रभू कही, ए स्थाहाद बच होय ॥२॥ मरणान्त कष्ट मुनि भगी, सचितोदक अवलोयः। भोगवाणू, प्रभू. एहफू स्यावाद नहिं होय ॥२५॥ उत्तराध्ययन कथा विषै, परोषाह द्वितीय प्रसिद्ध मार्वान्त कष्टे खुलक शिष्य, सचितोदक नहिंपिका ॥२६॥ शत पटादश भगवती, दशम उदेश, देख। पूथ्यो सोमिल प्रभू प्रति, नेस्यु छो- तुम्ह एक ॥२॥ तथा तुम्ह.स्यू दोय छो, वा अक्षय तुम्ह होय। फुन,स्यू.पव्यय छो तुमही शवस्थित तुम्हजोया॥ तुम्ह भनेक भूव फुन, भाव भविक अवधार। वीरभदौ षट, प्रन्त्र प, सोमल, पूझा सारः॥२॥ उत्तिकार कश्यो:तब, प्रभू, स्याबाद प्रति, तायः। सर्वदोष गोचर रहित, अविनम्बी कविाय ॥३०॥ दूक मिच,हरू सोमिला, यावत बलि अनेक,। भूत भाव.भावौ अपि, ईश्र्रम का पेड ॥३१॥ किण अर्ये प्रमु बम का, नाव भविक हूं सोय। प्रभु,कहै द्रव्याथ करी, दूक. मिण- अवलोय ॥३सा .
* मुखवत्रिका अधिकार
डोरा तूं मुंह पोतिया, बांधै जयसा काज ।
तर्क करें तसु पूछिये, इतला बोल समान ॥४६॥
कहै अष्ट महिर वांध्यां रहै. वे किण सूने ख्यात ?
तो एक पहिर बांधे तिका. किण सूबे अवदात ॥४on
बखान में एक पहिर लग, कर्ण घाल बाधन्त ।
वेपिय किणी सिद्धान्त में, भाष्यो नहिं भगवन्त ॥४८॥
पष्ट पहोर बांध्यां थकां, दोष घणो जो होय ।
तो एक पहोर बांध्यां थकां, दूषण थोड़ी जोय ॥४॥
जो एक पहोर बांध्यां थकां, दोष नहिं छै कोय ।
तोपाठ पहर बांधे तसु, दोषण किण विध होय ॥५॥
डोरो घाले कर्ण में, वहनो दोषण होय ।
तो कर्ण विषे मुख वस्विका, पाल्यां दोषण बोय ॥५१॥
जो कर्ण विषे मुख वस्त्रिका, पाल्यां दोष न कोय ।
तो डोरो घालै कर्ण में, तो पिण दोष न होय ॥५२॥
कोई कहै मुख वस्त्रिका, अष्ट पहिर लग एह ।।
बांध्यां कफ में अपने, जीव - पसहित बह ॥
तो मुनि पमा तनु विषे, थयो गुम्बडो कोय ।
राषि रुधिर जपरे, पाटो बांधे सोब ॥५
जीव समुच्छिम ते विषै, उपजे तिर रै लेख।
पाटा है लागा रहै, रुधिर राधि सम्येख ॥५५॥
६४] * विषवाद अधिकार ----AAPW ॥अथ १७ मूं विषंवाद अधिकार ॥ ॥ दोहा॥ काई कहै विषंवाद मत, प्रभू ना समय विषेह । किण सूवे वच जे का, किहां पन्यथा वह ॥ १॥ किण सूत्रे वच जे का, तेवच अन्य सूत्रह। विकट ते विषंवाद कहै, उत्तर तास सुणेह ॥ २ ॥ सखर सप्त भी कही, जिन वाणी सुखदाय। सप्त नये करि सत्य वच, तमु विषवाद नकहाय ॥३॥ किण हो सूव विषे प्रभू, पाख्या वयण विख्यात ! -- विगटै जे पन्य सूव थौ,-ते विषंवाद बच थात ॥ ४॥ विषंवाद वच एह तो, प्रभू नो नहिं , काय । वच वल ज्ञानी तयो, व्यभचारिक नहिं - होय ॥५॥ विषवाद वोगे करो, अशुभ नाम कर्म बंध। पष्ठम शतक भगवती, नवमे---उद्देश- सन्ध.॥ ६ ॥ विष वाद ए अशुभ है, तिण थी पशुभन बंध । तो किम हुवै प्रभूजी तणो, विषंवाद वच मंद । ७-॥ प विष बाद योगे करी, नाम कर्म शुभ बंध। - अष्टम शतक भगवती, नवम उद्देशै - संघ ॥८॥ दशमा अङ्ग में देखला, सप्तमध्ययने माहि। सत्यवादी तेह तुं, विषंवाद वच नाहि ॥ ६ ॥ ।
*स्याद्वाद अधिकार * [८e सूत्र मगवती ने विधे, सौलम शतक मंभार हितोय उद्देशै भाखियो, कहिये ते अधिकार ॥६६॥ शक्र उघाड़े मुख लवै. भाषां सावधं सोय । हस्त वस्त्र मुख दे वदै, निरवद्य भाषां होय || वृत्तिकार दूम आखियो, जौव सरक्षण सोय । निरवद्य भाषा वागवी, अन्या सावध होय ॥६८ विकेन्द्री ना पज्झत्तग्गा, देहना स्थानक जेड। वे सुरलोक विषे नथौ, पनवणा द्वितीय पदेश ॥६॥ धर्म सम्बन्धी वार्ता, करै शक्र नेवार। बोले तदा, ते निरवद्य बच सार ॥७॥ संसारिक ने वार्ता, करै शक नहवार । बदै उघाड़े मुख तदा, ते सावद्य बच धार ॥७॥ तिच कारण वायु तणौ, दया पर्थ मुनिरान । मुख बांधे मुंह पोत्तिया, पिण अवर नहि छै काज ॥७२॥ ॥अथ सोलहy स्यावाद अधिकार। तो दोहीं॥ कोई कहै भगवन्त नौं, स्याहार्द मतंजोय । एकान्तिक कहिवू नहीं, तसं उत्तर अवलोय ॥ १ ॥ स्थाद कथंचित जाणे, किण ही प्रकार करें। बदबू कहिवूवादवें; स्याहाद , एह २ मुख ढांकी १२
विवन्द अधिकार
कल्प बने पुर में चपन बाल विई शार।
एक सरोषा पाखिया, शिव माहरण विचार
गर्भ साइरस विदो तिहाकल्प सूत्र में ल्यात!
संझरियां पहिला पहै. उारयु नौ जपनाय TRE
संदरता. वेला प्रभू. वर्तमान काले।
बाखु नहिं एहर्बु कई कल्प सूद वचं एक
पाचार मन्नरमें कहो. साारस प्रयन पशाता
वलि साक्षरता बार पिछ. बाएं से बगनाय कर
चदन काल तो सनव इन कदनस्य नो उपयोप।
पसंख्य समय न त भदौ, चवद नवाश्य बोग
सुर कार्य साइरह दे. मनर संल्ड सुबाह।
तिर स्माइरंत प्रभू, वाल पधि प्रमार
साहरवा बाखु नही, कल्प सूद में ल्वात ।
साहरता जावं क्र्छ, पुर बड़े उपनाया
करन व धुरं रई में, ए पिडु दशल्या ।
स्वसांची भूठौं कित्तो, देखो दन यसपति निया
और प्रसूते एक है. बास्य बुर बङ्क ल्वात।
नदिवा कल्यै झुरि साधा किमयातहट
उसव माहिदों एक तो मित्या वचन विशव ।
देखोत्री देखो तुम्हे. देखो तब मत ठेका
* स्यावाद अधिकार गाढा गाढ आतङ्ग- करि. तूर्य पहिर में देह । भोगवणो कल्पै तसु, स्याहाद बच एह ॥१३॥ प्रथम पहिर बहिरौ करो, कारण पडियां ताहि । रावि वि ने भोगवै, ए स्याहाद बच नांहि ॥१४॥ तूर्य पहिर आज्ञा कही, निश नौ पाज्ञा नांहि । तिण मुनिश नहिं भोगवे, कारण पडियां ताहि ॥१५॥ द्वितीय उद्देशै ने विषे, वृहत्कल्प रै मांहि । जल वा मद ना घट तिहां, रहिवू कल्यै नांहि ॥१६॥ पन्य स्थान न मिलै कदा, तो दूक वे निशि जाख । रहिवू कल्पै प्रभू कयो, ए स्याहाद पहिछाण ॥१०॥ तिणहिन उद्देशै भाखियो, पाखी निशि मांहि । दीपक वा पनि बले, विहां नहि रहित ताहि ॥१८॥ जो पन्य बागां नहिं मिले, वो दूक वे निशि ति स्थान रहिवू.कल्प प्रभू कह्यो, ए स्याहाद बच जान ॥१९॥ मुनि ने सट्टो स्खौ तणो, करिवो बरज्य खाम । सोलमा उत्तराध्ययन में, वलि बहु सूवे ताम ॥२०॥ बहत्कल्प छटै कछु', नदी प्रमुख थी वार । पभा प्रति कादे मुनी, ए स्याहाद मत सार ॥२१॥ ग्रहस्थ पुरुष वा स्त्री भणै, नदी प्रमुख यौ जोय । कार्ट मुनि वच एहवं, स्याहाद नहि कोय ॥२२॥ .
-~~~ Re] * विवाद अधिकार पाख्यो चर्णि में तिहां, शिष्य अपण्डित सोय । रोग मिटावा निमित्ते, वैद्य. कथन थी जोय ॥४०॥ अथवा मारग चालतां, उयोदरी छै वह। पणसरत ने. भोगवे, विरुद्ध कहिजे जेह ॥४॥ सूबे वरज्यो सचित अम्ब, चूर्णिकार फुन तेह । कारण पडियां चूंसवू, का विरुद्ध वच एह ॥४२॥ सचित सूख मुनि जो चंटे, तो चौमासिक दण्ड । निशीथ उद्देशै बाग्में, श्री जिन वयण सुमण्ड ॥४॥ सूत्र निशीथ तणो जिका, चूर्णि विष दूम वाय । खान प्रमुख ना भय हरण, दण्ड यह मुनिराय ॥४४॥ प्रथम पचित दांडो ग्रहै, पर मिश्र. परितण। प्रथम मरित यावत पर, अनन्त काय नु नेण ॥४५ सूख जपर मुनि नवि चढे, ए जिन पाजा शुद्ध । पूर्णिकार का सचित दण्ड, ग्रहै ते वयण विरुद्ध ॥४६॥ ऋषभ भरत फुन बाहुबलि, ब्राह्मी सुन्दरी बेह। लग्नु चौरासी पूर्व नू, पायु तूर्य बनेह ॥४७॥ ष मण्डल मांहि कह्य; ऋषभ देव भगवान । भात विना बलि ऋषभ ना, पूत्र निन्नाणु जान ॥४८॥ भरत तथा वलि अष्ट सुत, अष्टोतर सौ एह । एक समय.सौमा तिकी, विरुद्ध वचन है बेहा .
. स्याद्वाद अधिकार [ ज्ञान दर्शन कर दोय है, प्रदेशाध करि ताय । अक्षय ई पव्यय अपि, अवस्थित पिण थाय ॥शा अनेक भूत भावी प्रमि, ई उपयोग करेह । न्याय सहित उत्तर छव, स्याहाद क्च पाई मज थावरचा सुक प्रते, ज्ञाता पञ्चम् लेहः । दूमन पावं सोमिल प्रते, पुफिया विर्षे कहह ॥३५॥ सहु दोषण करि रहित है, स्याहाद बच एह । पिण दोषन कर सहित बच, स्वादाद न कहह ॥२६॥ पूर्वापर पविरुद्ध वच, स्यादाद मति मांहि । ' पिण पूर्वापर विरुद्ध वच, स्याहाद बच नाहिं ॥३७॥ इत्यादिक प्रभू आखिया, किणाही प्रकार करे। नित्य अनित्यादिक जिक, स्याहाद वच तेहं ॥३॥ मिथ ज्योकिण हो प्रकार करि, कुशौल में नहिधर्म। वलि नहिं किण ही प्रकार करि, शोल विचध कर्म ३ पज हिन्सादिक में नहीं; किण ही प्रकार धर्म किण ही प्रकार बंधे नहीं, सम्बर थी.पच कम ॥४॥ किण-ही प्रकार हुवे नहीं, सावा माही धर्म। किण ही प्रकार बंधे नहीं; निरवद्य धौ पःकर्म ॥४॥ किण ही प्रकार हुवे नहीं, जिन पाजा विन धर्म। किण ही प्रकार नही बंध, पाजा थी पध कर्म ॥४स ॥ इति स्यावाद भधिकार ॥ । ।
* विषवाई अधिकार गुरु वन्दै शिध्य वीवली, सूर्व विधै दूम स्यात। ती प्रभू बन्दी इम कयां, आशांतन किम यात ६ ॥ सचितभाहार मुनि ने अभक्ष, पश्चम अा प्रवन्ध । माता अध्ययन मन में, निरावलिया श्रुत स्वायश हितौब भावारा लागता, बाधा करमी आहार । प्राशुक पिश इत्ति में, भोगव] का धार ।६२॥ कबो अफासु अमल जिन, पति वियै सुन तेह। कांच भोगदको कारणे, विरुद्ध वचन के एह दशा शत पणवीसमें भगवती, छट्ठा उद्देशा माहि। बकुश उत्तर गुण तणो, पडि सेवी कायु ताहि ॥६॥ तिणज उद्देश हत्ति में. बकुश प्रति दूम ख्यांत । सूस उत्तर पडि सेविये, तेह विरुद्ध समाते॥६५॥ ठाणा प्रात्यै चतुर्थ, प्रधम उद्देशै पेख । सनत कुमार तणी नाही. अन्त क्रिया सुविशेष ॥६६॥ पावश्यका नियुक्ति में, उत्तराध्ययन हत्ति माहि । तौले खर्ग गयु कयो, मिलै नहि ए वाय ६७॥ पष्टम शतक भगवती. द्वितीय उद्देशा नांहि । एकन्द्री निश्चय करी. कह्या अज्ञानौ ताहिदा कर्म ग्रन्थ मे देखल्यो, एकन्द्री २ माहि। द गुणठाणा पाखिया, तेह विरुद्ध कहाहि RELI
* विवाद अधिकार
[६५
सत्यवादी संसार का, तमु विषवाद वच नांहि ।
तो प्रभूजी ना वयण ते, विषंवाद किम थाय ॥१०॥
पर्वापर अविरुद्ध वच, प्रभू ना समवायङ्ग ।
वच अतिशय पैंतीस में, अतिशय नवम सुचत ॥११॥
उत्सर्ग में प्राज्ञा किहां, किहां आज्ञा अपवाद ।
दूकसू दूक विगटै न ते, पिण नहिं है विषवाद ॥१२॥
उत्सर्गे आज्ञा नयौ, ते कार्य नौ- नान ।
अपवाद आज्ञा कही, ते विष वाद मत मान ॥१३॥
विषवाद रै ऊपरै, कहिये हेतु सार।
निपुण न्याय वच सांभली, हेष हिये मत धार ॥१४॥
बार मास है वर्ष ना, तेह विधै सुविधान ।
अधिक धर्म करिखा तणू, मास भाद्रवी जान ॥१५॥
वह विषे पण प्रगट है, अधिक धर्म ना दौह ।
पर्व मधूषण प्रसिद्ध हो, पासह प्रमुख सु लौह ॥१६॥
ते पर्दूषण ने विषै, कल्प सूत्र व्याख्यान ।
तेह विर्ष वतका कहो, सुणज्यो सुगण सुजान ॥१०॥
प्रभू दशमा सुर लोक थी, भव स्थित भोगव वहन
चवियां पहलां ने पर, नाण्यु अवधि करेह ॥१८॥
चवन समय नवि जाणियो, सूचम काल विशेष ।
महिन पनरमध्ययन में, द्वितीय पाचारालेख ॥१६॥
१०२]
* विवाद अधिकार
--------
कुल चाण्डाले अपनो, हरकेगी मुनिराया
उत्तराध्ययन विष कडु, वारमा अध्ययने माय-८०
कर्म ग्रन्य मांडी · को, छठे गुणठाणेई ।
नीच गोत नो उदय नहीं, न्याय मिले किम देह मा
परम शतक भगवती, दशम उद्देश इष्ट । ::
वधन्य ज्ञान पाराधमा, सत अठ भत्र उत्कृछाया
हतिकार कयुएह विध, चरित सहित ले जाना
तहमो जवन्य आराधना, ससु भव ए पहिशनाशा
बीजा सम दृष्टि तथा, देश व्रती ना बेह।
भव उत्कृष्ट पसंख्य है, न्याय वचन है एकान्छा
चन्दा विजय अन्य में, आराधक ना सोय।
पाखा भव उत्कृष्ट वण, एह मिलै नहिं कोय ॥
पष्टम अझे नेम प्रमू , कृष्ण भगी पाख्यात ।
तुं तौजी पृथिवी विषै, नास्य स्थित दधि सात हा
तीवी यौ अन्तर रहित, निकली सय वारह।
पमम नाम बादशम् जिन, घास्ये महा गुन देह प्रणा
यहां पाखो अन्तररहित, तृतीय नरक थी ताहि ।
निकली तोयंबर हुस्य, तिच सुं विच भव नाहिया
प्रवाल रतन संचय विषै, पाख्यो रुख मुरार।
बालू प्रभा थी नौकली, नर भव लही उदार ॥८॥
* विवाद अधिकार [0 जाण्यां धुर बड़े कधा, बैंड सत्य वचं बोल। सवि जाण्य - कल्पे कहा, ते वयर अग्रमा ३०॥ हत्कल्प रै पञ्चमें, तनु कारख यौ ताय । सूर्य जगी जाणि ने, पाहार लियो मुनिराय ॥३६॥ भोगवत शङ्का पड़ी, रवि जगो के नाहिं। अथवा सूर्य पांघन्यो, तथा आंथम्यो नाहिं ॥३२॥ शक्ष सहित दूम भोगव्यां, रावि भोजन मिण्ड । मोगवतो. पामै तिको, गुरु चौमासौं दंण्ड ॥३॥ दूमहिज कारण विन रवि, ऊगी जागौ ताय । पाहार यो पिण शक सहित, भोगवियां दण्डं पाय ३४ दशम उद्देश निशौथं में, राति भोजन ताय । कारण सूपिण भोगव्यां, दण्ड चौमामो माये ॥ निशीथ उद्देशै वारमें, चुणि विषै अवलोय । निशि भोजन कारण थकी, भोगवणो कयो सोय ॥२६॥ दूमहिज वृहत्कल्प तणी, चुर्णि वृत्ति विह। रोगादिक कारण मुनी, निशि भोजन बीमह ॥३७॥ सूत्रे निशि भोजन प्रते, वयौँ ते तो शुद्ध । चूर्णि विषै ए स्थापियो, तेह प्रत्यक्ष विरुद्धं ॥३८॥ निशीथ उद्देशै पन्नरमें, पाखी श्री मिन वाल। सचित अम्ब से मुनि, दण्ड चौमासी ना Rea १०४] * नियुकि अधिकार तिण जे विशेष सूत्र नो, पर्थ उत्सर्ग पोछ। मेम अ तिमहिन मिले, इम कारबा विषेश १.. टबाकार पिण इम कयो. सूब थको विगटेह । अर्थ प्रमाण तिको नहीं, तो मुझ दूषण किम देह॥१.१॥ ॥ इति विवाद अधिकार, ॥अथ अठारमू भगवती में नियुक्ति कही तथा पन्नवणा सामाचार्य कृत कहै तसुत्तर अधिकार ॥ ॥दोहा॥ कोई कहै नियुक्ति कही, शत पण बौसमा साहिं। सतीष उदेशै भगवती, तुम्हे न मानूं काहिं ॥ १ ॥ तसु पूछौजे नियुक्ति, कहनी कौधौं जेह। भद्रबाहु कता तब कहै, चौद पूर्व धर वह ॥ २ ॥ तसु कहिये जे तुम्ह कही, भद्रबाहु कृत एह । तो भगवती सूत्र विषे तिका, केम कहाँ छ तेह ॥ ३ ॥ वीर छता ए भगवती, तेह विष अवधार किम कहि भद्रबाहु कृता, देखो न्याय विचार ॥ ४ ॥ भद्रवाहु मोड़ा हुआ, पञ्चम् अर्क सुजात । चौथ परकी भगवती, वह विषै किम थात * विवाद अधिकार [ER सषम बाहुबलि भाउषो, पूर्व चौरासी लक्ष । किमतसु शिव गति एक समय, पखो तज मतपच ॥५॥ शत चौदगमें भगवती, सप्तम उद्देश विषह । हत्ति विषै पाख्यो तिकी, सांभलजो चित देह ॥५१॥ पन्दरसौ प्रति बोधिया, तापस गौतम वाम । प्रमू पै पावत मामिया. केवल युग अभिराम ॥५२॥ भी साधी ! वन्दो तुम्हे , श्री जिन प्रति शिरनाम । इम गीतम याख'छते, जिन भाषे गुण धाम ॥५३॥ ए केवल ज्ञानौ तणी, हे गौतम ! मुनिराय । लागै तुझ आशातना, वृत्ति विषै ए वाय ॥५४॥ दशवैकालिक सूत्र में, नवमें ध्ययन विषेह । प्रथम उद्देशै ज्ञारमौ, गाथा में दूम लेह ॥५५॥ विप्र पग्निहोती तिकी, अग्नि प्रते शिरनाम । पाहुती पद मन्त्र पढ़, घृतादि सौंचे ताम ॥२६॥ पाचार्य प्रते दूह विध, वारूं शिष्य विनौत। वर मनन्त जानौ छता, पाराधे दूर रौत ॥५०॥ हरौभद्र सूरे करो. वृत्ति विषै दूम उक्ति । शिष्य केवल जानी छता, करै गुरुनौ भक्ति ॥५८॥ का वृत्ति में जिन प्रवे, वन्दा गौतम ख्यात । तसु प्रभू कही आयातना, कम मिलै ए बात REEn
.
१०६]
* थिरावली अधिकार
तमु कृत पागर्म किम हुवे, न्याय नेव करि जोय ।
सूत्र बृहत् नी लघु करे, तसु कारख नहिं कोय ॥१६॥
इमहिन सूत्र निशीथ प्रति, गयौ विसाह विचार ।
मोटा यूँ ‘छोटो कथ, एहबु दौसे सार ॥१७॥
वलि कहै दशवकालिक पिण, कय सौवभव एहैं।
तास नाम नन्दी विष, किम पाखयो गुरु गेह॥१८॥
गवधर कृत के भगवती, तास विष सु विचार ।
नाम नन्दी ने पिच कयो, हिव तसु उत्तर सार ॥१६॥
नेम पनववा तिमन ए, छहत् थकी लधू कोध ।
पिन मूल थकी कौधौ नवी, नयौ सम्भवै सौध ॥२०॥
चौदश पूर्व माहि थी, पर्थ पनोपम सार।
दशवकालिक वृहत् पिण, पूर्वे रचित उदार ॥२१॥
वे मोटा. - ए लघू, मनक पुत्र अर्थे ।
सूब सौजभव पिच कम, न्याय सम्भवै एह ॥२२॥
॥ इति नियुकि अधिकार ॥
अथ १६ नंदी थिरावली अधिकार
॥दोहा॥
कोई कर नन्दी तबी, थिरावली है वह।
गरधर कृत की पन्य कृत, हिव तसु उत्तर देह ॥१॥
* विषपाद अधिकार
शतक सात में भगवती, छ? उद्देश सम्बद ।
छ? पार वैताध विन, सह गिर हुस्यै विछेद ॥७॥
प्रकरण में शत्रुघ्न गिरि, सप्त हस्त परिमाण ।
रहिस्ये भाख्यो तेह वच, प्रत्यक्ष विरुद्ध पिछाण ॥१॥
अष्टम शतने भगवती, नवम उदेश विषेह ।
माया गूढ माया करे, वचन अलोक वदेह ॥७२॥
कूड़ा तोला ने बलि, कूड़ा माम करे।
ए गरुई प्रकार करि, तौरि श्रायु पन्हा
ए चिहुं कारण अशुभ थी, तीर्यच वायु बन्ध ।
तिण कारण तिर्यच नूं. आयु पाप कथिन्ध ॥७४॥
कार्य ग्रन्थं मांही कयो, तिथंच भायु पुन्य ।
ते माटे. ए “सूत्र थौ, बचन विरुद्ध नबुन्य ॥७॥
पच्च स्थावर विलन्द्रिया, ए पिण तौर्यच जाण ।
तास धाउषो पुन्य कहै, प्रत्यक्ष विरुद्ध पिछाण ॥७॥
जघन्य आउषा दुधौ, तौर्यञ्च मरि ने तेह।
नो तौर्यच मे जपजै. कोड़ि पूर्व स्थित कह ॥७॥
जघन्य आयु पल तिरि तया, माठा अध्यवसाय ।
कह्या भगवती ने विष, शतक चौवीसमा मांहि ॥७॥
प्रमसत्य अध्यवसाय सं, कोड़ि पूर्व तिरि होय ।
तिण सूं ए तिरि पाउषो, माप कृत अवलोय ॥७॥
NP
१०८]
* थिरावली अधिकार
दृष्टिवाद तणो धणी, बचन खलायां ताहि ।
अन्य मुनी ने इसवो नहीं, दसवैकालिक माहि ॥२॥
पञ्चम अंश- तृतीय शत, प्रथम उद्देशै ताय ।
बैक्रिय शक्ति सुर तणे, अग्नि 'भूति कहिवाय ॥१शा
वाय भूति ही नहीं, प्रतीत नागौ तेह ।
प्रभू ने पूछ खमाविया, हादशाङ्ग धर एह ॥१४॥
ठाणा अङ्ग ठाणे सात में, हिन्सा झूठ प्रदत्त ।
शब्द रूम गन्ध फर्श रस, आखादी हुवै रक्त ॥१५॥
बलि पूना सत्कार प्रति, मामी ने हर्षाय ।
सावद्य ते वह विध कहो, तास सेव' थाय ॥१६॥
जेम प्ररूपै ते विषे, नथौ पालवू होय ।
सप्त प्रकारे जाणवं, छमस्थ प्रति अवलोय ॥१७॥
चौद पूर्व धर पिण करै, पडिक्कमयो विहु काल ।
खलता खामी, नुं तिको, देखो न्याय निहाल ॥११॥
तिण मु चौदश पूर्व धर, बलि दश पूरव धार ।
जिन साखे आगम रचे, इसो सम्भवै सार ॥१६॥
महिन प्रत्येक बुद्धि पिण, जिन साखै सुविचार ।
मागम रचबु सम्भवै, अमल न्याय अवधार ॥२०॥
इम मुज झयासै तिम का, अर्थ अनूप उदार।
फुन केवल ज्ञानी कहै, हिज छै तन्त सार ॥२१॥
*विषवाद अधिकार है [१०३ ब्रह्म कल्प में सुर घई, हुस्ये तीर्थकर देव । दूम पाख्या तसु पञ्च भव, कम मिले ए भेव 18.1 इत्यादिक ने सूच थौ, वृत्ति प्रमुख रै मांहि । विरुद्ध बचन छै ते प्रते, किम मानिजे ताहि ॥१॥ द्वितीय पाचाराङ्ग ने विषै. दशम उद्देशै माय । मंस मच्छ कयो पाठ में, तास अर्थ कहिवाय ॥१२॥ टवो पाखंचन्द्र सूरि कत, तेह विषै दूम ख्यात । वृत्तिकार ए मांस मच्छ, लोक प्रसिद्ध आख्यात ४३॥ विरुद्ध सूत्र सुं वे भणी, न संभाविये ए अर्थ । वलि गौतार्थ ने वहै. प्रमाण है न तदर्थ ॥४॥ अस्थी शब्द सूत्र में, कुलिया है वह स्थान । ए गढ़िया हरड़े कह्य, सूब पनवणा बान HE५ कच्या दाडिम प्रते वहुट्टिया. एहवा शब्द प्रभृत । अस्थि शब्द कुलिया कन्या, तो मंस शब्द गिर हुन्त ॥६६॥ एहवो सभाविये अछे. ते माटै अवलोय । बनस्पतिज विशेष है, मस मछ ए जोय ॥६॥ भाव उघाड़े मंस मच्छ, धारिखया ने नेह। कारण थी पिण पाहारवो, योग्य नघौ दोसह मा बलौ सूत्र में साधु ने, उत्सर्ग भाव पाख्यात । वत्ति विषै अपवाद ए, भाव तो अवदात REL
११.]
*थिरावली अधिकार
भद्रवाह
खामो
पर, बहु वर्षे अवधार।
वच खामौ मोड़ा हुवा, देखो न्याय विचार ॥३२॥
निर्मिवियो कन्या धने, एम वहां पाख्यात.
पिक निमन्सौ दम नयी कयो, देखो सुगल सुजात ॥३॥
महिमा कोधी देवता, इम इहां पाल्यो सोय ।
सुर करस्य महिमा इसो, वचन को नहीं कोय ॥३४॥
तिथ कारब ए नियुति, भद्रबाहु कृत नाहि ।
बलि ए नियुकि विवे, बचन बहु विरुद्ध दिखाहि:३५॥
उववाई में पाखियो, उत्कृष्टी अवगाह।
धनुष पंचसय नौ तिको, सौम ,ए विन वाय ॥२६॥
पावश्यक नियुक्ति में, मोरादेवी माय ।
सवा पांचसौ धनुष तनु, ए बच कम मिलाय ॥३०॥
ठाबा सूर्य ठाबा विषे, प्रथम उद्देशा माहि।
समत कुमार चक्री तबी, पन्त क्रिया कही ताहिया
पावश्यक नियुक्ति में, चक्रौ सनत् कुमार।
सौनै सुरलोकी गयो, ए वच विरह विचार ॥३॥
ऋषम बाहुवल पाउयो, पूर्व चौरासी लद।
समवाया में पाखियो, पाठ मांहि प्रत्यक्ष ४०॥
पावश्यक नियुक्ति में, ऋषम बाहुबल राय ।
एक समय शिवगत लही, कम मिलै ए वाय॥४॥
- * नियुक्ति अधिकार * [१०५ यामो नास्ति सौम कुतः, भद्रबाहु अणगार । नथौ हुन्ता तो तसु कृता. केम नियुक्ति तिवार ॥ ६ ॥ : सूत्र भगवती ने विष, कही नियुक्ति ह। तेह मानवा योग अम्हे, पिण हिवडा नहिं वह ॥ ७॥ तब कहै पटं तेबीस में, सामाचार्य ताहि । सूत्र पनवणा'तिण कस्', कह्यो पौंठका मांहि । ८॥ गणधर कृत ते भगवती, तेह विष सु विचार । नाम पन्नवणा नी कह्यो,'ते किण विध अवधार ॥४॥ तसु कहिये ते पनवणा, सामाचार्य 'जोय । मोटा नौ छोटी करौ, एहवु दौसै सोय ॥१०॥ पिण मूल थकी कौधौ नवी, दूसो सम्भवै नाहिं। दश पूर्वधर ते नहीं, तसु कौधौ किम थाय ॥१श सम्पूर्ण दश पूर्व धर, चौदश पूर्व धार । तास रचित 'पागम हुवै, वार न्याय विचार ॥१२॥ हेमि नाम माला विष, धुर काण्डे अवदात । सुहस्ताद्या बचान्ता, दश पूर्व धर आयात ॥१३॥ सुहस्त से लेई 'करी, वञ्च खामी लग जोय । दश पूर्व धर दाखिया,' अधिक पूर्व नहिं होय ॥१४॥ खामी वर्च घयां पछे, बहु सामाचार्य्य तो थया, दश पूर्व नहिं नास ॥१५॥ वर्षे मुविमास ।, १४ * थिचलो अधिकार आवश्यक नियुक्ति मुनि, कृत पञ्चक में काल पञ्च डाम ना पूतला, करबा कह्या जु न्हाल ॥५२ भावश्यक नियुति में, वतिका विमह अनेक। चतुर हुचे से बोलखो, शंडे मत रौ टेक ॥५॥ तिण सुं. चौदश पूर्व धर, भट्रवाहु अणगार । तेहनौ कौधौ किम हुवे, ए नियुति विचार ॥५४॥ पावश्यक नियुक्ति में, कारण यो अणगार। पहल करै षट काय ने, कहिये ते अधिकार-१५॥ शादिक डसियां छता, पृथ्वीकाय प्रतह । प्रथम अचित्त मांगौ लिये. ग्रहस्थ समीप जेहा५६।। जो मांगौ लाधै नहौं, तो पोते आरोह । . कदा प्रचित लाधै नहीं, तो मित्र पृथ्वी मांगेह ॥५०॥ मिथ पृथ्वी लाधै नहौं, तो पोतेहिल वाय अटव्यादिक यी मित्र प्रति, ले आवै मुनिराय-५पा मिश्र कदा बाधै नहीं, मांगै बई ग्रहस्यौ-मास । सचित पृथ्वौकाय प्रति, मांगी ल्याचे तास-॥५॥ जो मांगी सचित मिले नहीं, तो थोतेहिज जाय । खान प्रमुख भागर थकी, ले आवै सुनिसक-॥६०॥ वह काम पासी तिको कार्य करीने ताय । पृथ्वौकाय ने जबरै, तेह परिटुवै जाय Hशा
*थिरावली अधिकार *
[१००
नन्दी पौठकाने विषै, . सुधर्म अम्ब खाम।
प्रभव सौवभव पादि त्यां, माठ वन्दे बहु ठाम ॥२॥
चनागत जिन तूर्य पा, वन्दे माठ न स्यात।
तेह पनागत मुनि भयो, किम वंदै गणीनाथ ॥ ३ ॥
तिण एह थिरावली, देव वाचक , कहिवाय ।
पिच गलधर कृत ए नहौं, निर्मल विचारो न्याय ॥ ४ ॥
थिरावली ने पन्त कडंपन्य पिच सहु भगवन्त ।
प्रथमो ज्ञान प्ररुपला, कहस्यु तास उदन्त ॥ ५॥
नन्दौ सूब नौ इत्ति में, पाख्यो एम पवदात ।
दुष्य गरी नो शिष्य ने, देव वाचक इम ख्यात,॥ ६ ॥
दूख लेखे नन्दी सूत्र, दुष्य गरी शिष्य देव ।
मोठा ने छोटो कयं. ते जाणे जिन मेव ॥ ७॥
कथा तशी गाथा निक, नन्दी सूब रे माहि ।
देव वाचक कौधौ हुवै, एहवू दौसे न्याय ॥८॥
दश चौदन पूर्व धरा, पागम रचे उदार ।
वे पिख जिननी साख थी, विमल न्याय सुविचार |
पिण विन नौ जे साख विन, पागम सूब अमोल ।
छनस्थ कृत किव विध हुवै, बावु न्याय तूं तोल ॥१०॥
चौ नाची मोयम गयी, चौदश पूर्व धार ।
ते पिण वचन खलाविया, सप्तम पड़ मभार ॥११॥
११४]
* नदी अधिकार
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॥अथ बीसमू नदी अधिकार॥
॥दोहा॥
कोई कहै नदी उतरे, मुनि ईर्ष्या समितेह
तिहां जिन आना ते भणी, हिंसक तमु न कहह ॥ १॥
तिम म्हे पिण प्रतिमा भणी, पुष्प चढ़ावां तेह ।
म्हाने पिण जिन आण है, हिंसा तसु न कहह ॥२॥
तसु कहिये माधू नदी, उतरै तिहां निन आण।
जो पूजा में लिन आण है, तो मुनि किम न करै बाण ।
वन्दना नौ पूछा थकां, मुनि आज्ञा दे देह ।
पुष्प चढ़ावू दुम कयां, मुनि आना नहिं देह ॥ ४ ॥
नदी ऊतरै जे मुनि, द्रव्य पूजा कहै वम ।
हेतु तिण अपर कई, चतुर सुणो घर पेम ॥ ५ ॥
विहार विषै जल सहित चूक, नदी देख मुनिराय ।
से टालण रै कारणे, अंवलाई पिण खाय ॥ ६ ॥
इक कोशादिक अन्तरै, सूको नदी निहाल ।
तह प्रने मुनि अंतरै, उदक सहित दे टाल ॥ ७ ॥
तिम दश दिननां पुष्य जे, सूका दे अवलोय ।
एकण पाडौ पुष्प फुन, वतृक्षण चंच्या होय ॥८॥
किसा चढावो पुष्प तुम, तुझ लेखे इम हाल ।
सूका फूल चढावणा, इरिया देशा टाल ॥६॥
* थिराषली अधिकार * [१०३ mme Www 4 । जद कहै चौदश पूर्व धर, भद्रबाहु गुन गेह । नियुक्ति तेहनौ करो, किम मानूं ननि तेह ।२२॥ हिव तेहनो उत्तर सुणो, तेह नियुक्ति मांहि । ई बाटूवच खामी प्रते, एम काछै 'ताहि ॥२३॥ जो भद्रबाहु कृत ए हुवै, तो वञ्च खामी प्रति ह । नमस्कार किण,विध करै, देखोजी चित देह ॥२४॥ वलि नियुक्ति में कयो, वाल्य अवस्था मांहि । मेह वर्षतां देवता, आहार निमन्चो ताहि ॥२५॥ मिण ते पाहार वञ्छशो नहौं,सौखयो विमय पाचार।:- एहवा वच खामौ प्रते, नमस्कार करू सार ॥२६॥ नगर उन्नणी ने विषै, जम्बक नामे देव । करी परीक्षा ने पछे, स्तव्यो तास खयमेव ॥२७॥ लब्धि पक्षौण माहणसी, तेह तणो धरणहार। सौह गिरौ प्रशंसियो, 'बन्दू ते अगगार• ॥२५॥ पदासारणी लब्धि जसु, दश पुर नगर मभार । महिमा कोधी देवता, कर तासु नमस्कार ॥रया नेह कुसुमपुर ने विषे, धन्नो शेठ जिंवार । धन फुन कन्याई करी, निमिन्दियो धर. प्यार ॥३॥ नव जोबन वय ने विषै, वच ऋषि गणधार । नमस्कार वहने कर, इम कह्यो नियुक्ति मझार ॥३१॥ - १९६] * नदी अधिकार जेह कार्य अनुमोदियां, मुनि ने लागै पाप । तो करखवालो तो धुर करण, तिण में धर्म नथाप ॥२०॥ सावध कार्य सर्व हो, मुनि त्यागै विष जाण । आज्ञा वहनौ किम दियै; वार करो विनाय ॥२१॥ द्रव्य पूजा सावध है, के निर्वद्य कहिवाय। सावध है तो वेह में, धर्म पुण्य किम धाय ॥२२॥ जो पूजा निवद्य है, तो मुनि न करै काय । वलि सामायिक पोषह मझी, तुम्हें करो क्यूं नाव ॥२३॥ सामायिक पोषा मझ, पचख्या सावध जोग । निर्वद्य तो त्याग्या नहीं, देखो दे उपयोग ॥२४॥ द्रव्य पूजा आना मझे, के जिन आज्ञा वार । जो पाना वारै कहो, तो धर्म पुण्य मत धार ॥२५॥ जो ए है पाना मझौ, तो मुनि न करै काहि । सामायिक पोषा मझ, तुम्हे करो क्यु नाहि ॥२६॥ द्रव्य पूजा के विरत में. के अविरत रे माहि । जो अविरत माहौँ कहो, तो धर्म पुण्य किम थाहि ॥२७॥ द्रव्य पूजा के विरत में, तो मुनि क्यं न करेह । सामायिक पोषा ममी, क्यों न करो तुम्हे तेह ॥रा जो पूरी समझ पड़े नहीं, तो राखो प्रभू प्रतीत । बिन याना वाहर धर्म कहो, न करणी एह अनौत ॥२६॥ ॥ इति नदी अधिकार।
* थिरावली अधिकार M [२१९ जाताध्ययने पाठमें, महीनाथ जिनराय। पोह सुध पूगारस दिने, चारिख केवल माय ॥४२॥ आवश्यक नियुक्ति में, चारिख पीवल नाम। मगधिर सुध एकादशी, विरुद्ध बचन ए जान ॥४॥ नेक गाधर पवित ना, समवाया विषेह । पावश्यक नियुक्ति में, कया पचावं ह ॥४४॥ तूर्य पा जिन मुविध ना, असी पर षट गबधार । पावश्यक नियुक्ति में, पठ्यासी अधिकार ॥४॥ तूर्य भङ्ग शीतल तणा, तीन पसी सुविचार । पावश्यक नियुक्ति में, एक पसौ गबधार ॥४६॥ तूर्य अङ्ग बासट कथा, बास पूज्य गधार। पावश्यक नियुक्ति में, छास? कच्चा तिवार ॥४॥ गणधर पनन्त प्रभू तवा, सूबे चौपन वास । पावश्यक नियुक्ति में, पाख्या है पचास ॥४८॥ गषधर धर्म प्रभू तथा, सूवे अड़तालीस । पावश्यक नियुक्ति में, तयांलीस कुन दौस RBEn मेज गरधर शान्ति मा, तूयं पा सुवगीस। पावश्यक नियुक्ति में, पाख्या के षट तीस ॥५॥ पाल प्रभू ना तूर्य अंग, गवघर पर उदार । पावश्यक नियुक्ति में, पाख्या दश गराधार २१ m ११८] * दानाधिकार छः छण्डौ धागार ते, राख्यो सावध जाण । सामायिक पोषह मो, तेहना पिण पञ्चखाण ॥१०॥ दोधां अन्य तौर्थिक भणी, धर्म पुण्य जो होय । तो आणन्द किम तज्यो, हिये विमासौ जोय ॥११॥ उत्तराध्ययने चौदमें, गाथा वारमौ मांय । भग्गु प्रते पुचां कह्यो, सांभलज्यो चित्त ल्याय ॥१२॥ वेद भण्या सुत जन्धियां, बाय शरण नहिं होय । दियां जिमायां तमतमा, नावै इम कयो सोय ॥१३॥ वृतिकार वृह विध कयो, नरक गेरवा देय । तो तेहने पोष्यां छतां, किण विध धर्म कहेह ॥१४॥ कोई कहै ए गृही हुन्ता, तसु उत्तर अवलोय । देहनी धुर गाथा विषै, तूर्य पदे कड्यु सोय ॥१५॥ वदै, दूम कह्यो गणधर देव.। ते माटै तसु सत्य वच, पिण नहीं झूठ कहेव ॥१६॥ वेद भण्यां सुत जन्मियां, बाण शरण नहिं होय । ए पिण भग्गु प्रते कयुं, बेहुं पुनां अवलोय ॥१७॥ ए बच सांचा तेहनां, तुम्हे जाणो मन माय । तो दियां निमायां तमतमा, ए पिण सांचौ वाय ॥१८॥ द्वितीय सूयगडांगे सखर, छट्ठाध्ययन रे मांहि । निज श्रद्धा विप्रे कही, आद्र मुनि ने ताहि ॥१॥ कुमर आलोची * थिरावली अधिकार [११३ इम कारण थी धुर अचित, मिश्र सचित भपकाय । मुनि दातार कने नई, मांगी ल्याव ताय ॥२॥ जो मांग्यो जल ना मिले, तो पोतहिन जाय । नदी तलावादिक थको, आप आगे मुनिराय ॥६॥ शूलादिक कारण पद्यां, वूमहिन तेऊकाय । अचित मिश्र फुन सचित प्रते, मांगे ग्रही पै जाय ॥६४॥ जो मांगी अग्नि मिलै नहीं, तो पोतैहिज जाय । कुम्भ कारादिक स्थान थी, लेडू आवै मुनिराय ॥६५॥ शूलादिक कारण पड्यां, इमहिन बाऊकाय । पचित मिश्र फुन सचित प्रति, ग्रहण करैऋषि ताय॥६६॥ दूमहिन बनस्पति अचित, मिन फुन सचित मुनिराय । गाढा गाढ कारण पद्यां, ग्रहै मूलादिक ताय ॥६॥ बस बेन्द्रियादिक प्रते, तनु फोडादिक होय । तास मिटावा मुनि ग्रहै, जलोक आदि सुजोय ॥८॥ पावश्यक नियुक्ति में, परिढावणिया समितेह । पाखी है ए वारता, किम मानौजे एह ॥६॥ ॥ इति थिरावली अधिकार।
१२०] * दानाधिकार -----~~ तिम सावद्य दान प्रशंसियां, कर्म तणो बंध थाय। तोदान दिये ते धुर करण, तसु अघबंध अधिकाय॥३०॥ दान निषेद्यां वृत्ती नौ, छैद करै इम ख्यात । कयो अर्थ में काल ए, वर्तमान में थात ॥३१॥ मिलतो अर्थ ए सूत्र थौ, देखो न्याय विचार । ठाम ठाम सूत्रे कयो, सावद्य दान असार ॥३२॥ असंजती ने दान दे, पाप एकन्त आख्यात । सूब भगवती ने विषे, देखो तज पखपात ॥३३॥ ते माटे वर्तमान ने, काल विषे जे मून । मून कहे बिहुं काल में, श्रद्धा तास जबून ॥३४॥ विधे, पञ्चमध्ययने पेख। देतो , तो एहयो, वर्तमान में देख ॥३॥ पुण्य माप नहिं कहै तिहां, एह बच अवलोय । ते माटै वर्तमान हिन, काले सून सुजोय ॥३६॥ कयो उपाशक घन में, सुत सकडाल उदार । गौशालक ने भामिया, फलग सेन्झा संधार ॥३७॥ कयो प्रभू ना गुण कया, तिण स्यु भा सोय । पिण निश्चय नहिं धर्म तप, इम कह दौधा जोय ॥३॥ दोघां गौशालक भयो, नही धर्म तप सद्य । तिमन अनेरा ने दियां, कम दुवै पुण्य बन्ध ॥३॥ द्वितीय सूयगडांगे
* नदी अधिकार *
[११५
.
जो चाढो तत्काल ना, शुष्क पुष्प न चढाय ।
जद तो पुष्प नदी तणो, मिल्यो न सरिषो न्याय ॥१०॥
उदक सहित टालै नदी, मुनि अंवलाई खाय ।
तिण कारण हणवा तणु, ते कामौ नहिं ताय ॥११॥
हरित पुष्प चादी तुम्हे, शुष्क पुष्प न चढ़ाय ।
दूण कारण हणवा तणो, तुम्हे कामी इणन्याय ॥१२॥
तिण मुंपुष्प नदी तणो, नयी सरिषो न्याय ।
द्रव्य पूजा नौ त्राण नहौं, नदी जिन आज्ञामाय ॥१३॥
निन आज्ञा देवै निको, निर्वद्य कारज जान।
जिन आज्ञा देवे नही, ते सावध कायं मान ॥१४॥
सुर सुर्याम भणौ प्रभु. वन्दन आज्ञा खयात ।
नाटक नौ पूशां थकां, आण न दौधौ नाथ ॥१५॥
मन में भलो न नागियो, मौन रद्या अवलोय ।
तिण सुंए नाटक कियो, ते सावध कार्य होय ॥१६॥
प्रभूनी ने नाटक तणो, आज्ञा दोधी नाय ।
तो किम द्रव्य पूजा तणो, आज्ञा दे जिनराय ॥१७॥
मुनि दीक्षा लेतां किया, सावद्यरा पञ्चखान।
न करै द्रव्य पूना तिको, सावद्य कार्य मान ॥१८॥
सावध कार्य प्रते मुनि, करै करावै नाय ।
अनुमोदै पिण नहिं तिको, निमल विचागे न्याय ॥१॥
१२२]
*दानाधिकार
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नित्य हजारां मण तदा, धान रांधता जाण।
हुवै हजारां मण तिहां, अग्नि पांणो धमसाण ॥५०॥
उदक विषै फुवागदि फुन, वलि वनस्पती जल माय ।
सूण मां बन्ध लागतो, अनेक सूवा तसकाय ॥५१॥
वायु जीव विराधना, वे पिण तिहां विशेष ।
मोटो आरम ए सही, दानशाला में देख ॥५२
दिन दिन प्रति षटकाय हगा, अनन्त जीवारी धात।
न गिणे पाप हिंसा तणो, तमु घट माहि मिथ्यात ॥५॥
असंयती बहु पोषियां, करै षटकाय बिणाथ ।
धर्म पुण्य किम वेह में, जोवो हिये विमास ॥५४॥
धर्म हेतु प्रति नौव ने, हणियां दोष न कोय ।
कधु अनार्य बचन ए, आचारङ्गे जोय ॥५५॥
कह्यो धर्म रै कारणे,
जौव न हणवू कोय।
ए पार्य नो बचन है, धुर अङ्गे अवलोय ॥५६॥
तिण सू प्रदेशी तणी, दानशाला पहिछाण।
श्री जिन आज्ञा बार है, समझो चतुर सुजाण ॥५७॥
ज्ञाता अध्ययने तेरमें, जे नन्दन मणिहार।
नन्दा पुष्करणी तणो, आख्यो बहु विस्तार ॥८॥
चिहुं दिश च्या बाग फुन, चिडुबाग चिहुशाल ।
पूर्व बाग विषे प्रवर, चित्रशाला सुविशाल ॥५६॥
* दानाधिकार *
[११७
॥ अथ इक्कीसमू दानाधिकार ॥
॥दोहा॥
असंयती ने जाण ने, वा श्रावक ने कोय ।
दान दियां स्यु फल हुवे, तसु उत्तर अवलोय ॥१॥
अष्टम शतक भगवती, छ? उद्देशै जोय ।
गौतम पूछयो गैर प्रति, हे प्रभू! श्रावका कोय ॥२
तथा रूप ने असंजति. तसुसचित्त अचित अशणादि।
अशेषणौ फुन एषणोक, प्रति लाम्ये स्युं सम्वाद ॥ ३ ॥
तहने स्यु फल सम्पजे, तब भाषै जिनराय ।
एकान्त पाप हुवे तसु, निरजरा किञ्चित नाय ॥ ४॥
एकान्त माप कयो प्रभू, प्रगट पाठ मे जोय ।
तो वे दान दियां कृतां, धर्म पुख्ख किम होय ॥ ५ ॥
वलि सातमां अजमें, प्रथम अध्ययन मभार ।
बौर भणी आणन्द कटो, अन्य तीर्थों प्रति धार ॥ ६ ॥
अन्य तौर्थिक ना देव प्रति, फुन जिन ना मुनिराय ।
अन्य तौर्थिक में नई मिल्या, तिणे संग्रह्या ताय ॥ ७॥
ए विहुं प्रति वन्दू नहीं, वलि न कर नमस्कार ।
पहली बोलाऊ नहीं, एक बार बहु वार ॥८॥
अशणादिक नहिं धुं तसु, वलि देवावू नाहिं ।
एहवुअभिग्रह प्रादग्रो, देखो आगम मांहि ॥६॥
*दानाधिकार
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मधिरै खरयो वस्त्र ओ, जलादि करि शुद्ध होय ।
तिम हिसादिक अघतज्या, जीव निमल हुवै सोय ॥२०॥
सचित अचित सह ने दिया पुण्य कहै छै जेह।
कड़ायत चोखी तणा, न्याय विचारी लेह ॥७॥
दशमें ठाणे देखल्यो, प्रभू कथा दश दान ।
संक्षेमै कहिये तिक, सुणजो चतुर सुजाण ॥७२॥
सचित अचित जल अन्न लवण, अग्नि जमौकन्द जान।
अनुकम्पा आणी देवे, ते अनुकम्पा दान ॥७३॥
हितीय दान संग्रह कयो, पोषै बन्दीवान ।
तथा छुड़ावै दाम दे, चोर प्रमुख ने जान ॥४॥
ग्रह करड़ा जाणौ करी, थावरिया ने जान ।
देव भय आणी करो, ते तीनो भय दान ॥७॥
खर्च कर मृत कडवा, नौवत बारियो जान ।
शाध छमासी प्रमुख दे, तूर्य कालूणी दान ॥६॥
बहु नौ लज्जावू करी, सचित अचित धन धान ।
दिये असंजती ने निको, पञ्चम् लज्जा दान ॥७७॥
मुकलावो पैरावणी, जण अहङ्कार जान।
दिये रावलिया प्रमुख ने, छटो गावं दान ॥७८॥
कुशील नो अर्थों जिको, गणिकादिक ने जान ।
दिये द्रव्य तेह ने कह्यु, सप्तम अधर्म, दान ॥६॥
# दानाधिकार # [११६ जीमावै दिन सहस्र बे, तसु पुण्य खन्ध बंधाय । तेह पुण्य थी सुर हुवे, वेद विष ए बाय ॥२०॥ भाद्र मुनि कह्यो सहस्र बै, दोहा नौमावै नह । तेह नरक में अपने अति अभिताप विषेह ॥२१॥ प्रगट पाठ में बात ए, आद्र मुनि बच जोय । तो असंयती रा दान में, धर्म पुण्य किम होय ॥२२॥ कोई कहै छमस्थ था, आद मुनि विहवार । कवू ताण में देह बच, किम कहिये तसु सार ॥२३॥ तमु कहिये आदर मुनि, चरचा करी विशाल । बौद्ध मती गौशाल सू, साग मती न्हाल ॥२४॥ एक इण्डिया प्रमुख ने. उत्तर दिया विचार। तेह सत्य जाणो तुम्हे, तो ए पिण सत्य उदार ॥२५॥ नाव अन्य प्रति सत्य है, ब्राह्मण प्रति अवदात । उत्तर असत्य कहो तुम्हे, आ किसा लेखा रौ वाता२६॥ सूत्र सूयगडांग जारमें, दान प्रशंसै सन्त । वध बंछे षट काय नो, म भाष्यो भगवन्त ॥२७॥ वृतीय करण प्रशंसियां, हिन्सक कहिये ताहि । तो दान देव ते धुर करण, वे हिंसक किम नाहिं गरमा करै प्रशंसा कुशौल रो, तासु कर्म बन्ध होय । तो सवै ते तो धुर करण, स्युं कहिये तसु सोय ॥२६॥ U w * दानाधिकार * १२६ ] वेश्या ने देवै तिको, प्रत्यक्ष अधर्म पेख । दौसै लोक विषै तमु, अधर्म नाम सम्मेख ॥६॥ धर्म दान विन शेष अठ, ते पिण अधर्म जान। गुण निष्पन् ए नाम तसु, भाष्या श्री भगवान ॥१॥ श्री निनवर ने दान रो, आज्ञा नही दे कोय । धर्म पुण्य नहिं तेह में, हिये विमासी जीय ॥२॥ दशमें ठाणे धर्म दश, पाषण्ड धर्म आख्यात । पिणते नहिं आना विषै, तिमहिन दान अवदात ।। सूत्र चारिन ने धर्म बे, श्री निन आज्ञा माहि । तिमहिन जिन आज्ञा विषे, धर्म दान कहिवाय ॥४॥ निन आजा ने धर्म नौ, ते निर्वद्य पहिछाण । आज्ञा नहिं निण धर्म रौ, ते तो सावध जाण ॥६५॥ जिन पाज्ञा जे दान नौ, ते निर्वद्य अवलोय । आज्ञा नहि जे दानरो, ते सावध है सोय ॥६६॥ दशमें ठाणे स्थिवर दश, भाष्या श्री भगवान । सावद्य निर्वा पोलखो, जिन आज्ञा करि जान ॥६॥ तिमहिन निन आज्ञा करी, सावद्य निर्वद्य दान । पोलख ने निर्णय करे, ते कहिये बुद्धिवान ८॥ नवमें ठाणे पुण्य बन्ध, नव विध समुच्छ ख्यात । अन्नपुण्य फुन पाणपुण्य, लैणपुण्य विख्यात ॥en * दानाधिकार [१२१ दुःख विपाक मांही कयो, मृगालोढो देख । गौतम पूछो वौर प्रति, पूर्व भवे दूण पेख ॥४०॥ स्य दोषो स्यूं भोगव्यो, इम पूछो गणिराय । तिण सुदान कुपान ना, फल अति कटुक कहाय ॥४१॥ प्रदेशी केशौ भणी, बोल्यो एहवौ वाय।. च्चार भाग ए राज रा, ई करस्यु सुनिराय ॥४२॥ एक भाग राख्यां निमित्त, दूजो भाग खजान । तीजो हय गय अर्थ हो, चौथो देवा दान ॥४॥ च्या सावध जाण ने, मौन रह्या मुनिराय । तौन भाग जिम तूर्य पिण, जाणौ साक्द्य ताय ॥४४॥ पिण न कयो बण भाग तो, हेतु अघ नौ राश। तूर्य भाग तो पुण्य वन्ध, इम न कह्यो गुण तास ॥४५॥ च्यार भाग वोलाय ने. प्रेदेशी राजान। निज लफरो मेटी थयो, धर्म करण सावधान ॥४६॥ तूर्य भाग दान तालक, नित प्रते धान रधाय । वणी मग रांक जिमायिवै, तिहां जीव हिंसा अधिकाय ४७ सप्त महस्र ने ग्राम नां, च्चार भाग तसु कौध । दान तालके घापियो, चौथो भाग प्रसिद्ध ॥४च्या दान तालके ग्राम था, साढ सतरै सो जेह । तमु हांसल धान रंधाय ने, दानशाला मांडेह ॥४॥ १६ . .
av- WAAAAAMANA १२८] * दानाधिकार बलि सूझता उदक प्रति, पायां तसु पुण्य होय । अथवा उदक असूझतो, मायां पुण्य अवलोय ॥११॥ मान्ने दोधां पुण्य है, तथा कुपान विषेह । मुनि प्रति दोघां पुण्य है, तथा असाधु प्रतेह ॥१११॥ चोर कसाई ने दियां, वलि गणिका प्रति जोय । तुम लेखै सहु ने दियां. पुण्ण बन्ध अवलोय ॥११२॥ लयणपुण्य समुच्चय कयो, ते जागां नवौ कराय। छक्काय हणो दे तासु पुण्य, के सौधौ दोघां थाय ॥११३॥ पान ने दौघां पुणा है, तथा कुपात्र विषेह।, मुनि प्रते दौधा पुणा है, तथा असाधु प्रवेह ॥११४॥ गणिका चोर कसाई प्रते, दोधां पुण्ण बंधाय । समुच्चय लयम्पुण कयो, उत्तर देवो ताय ॥११॥ सयणपुणा समुच्चय कयो, सुख कटाय कटाय । पाट बाजोट कराय ने, दोधां पुण बंधाय ॥११६॥ के सौधा,दोधां पुण है, पान कुमान भणोज । साधु असाधु ने दियां, ते किण से पुण्ण कहौज ॥११७॥ गणिका चोर कसाई प्रते, दोधां पुग्ण अवलोय। '. समुच्चय सयणपुण्ये कच्यो, उत्तर देवो सोय ॥११॥ वखपुण समुच्चय कयो, कमड़ा नवा बनाय । धोवाय दोषां पुण्य है, के मौधा दौर्धा ताय ॥११॥ -
दानाधिकार *
[ १२३
AN
विविध रूप चिया तिहां, नयना ने सुखदाय ।
नाटक ना धुवार बहु, जन मन हुलसत थाय ॥६॥
दानशाला दक्षिण बने, दिये दान दगचाल ।
जौमाये वणी मग रांक बहु, भोजन विविध रसाल ६१॥
तौगच्छ शाला पश्चिम बने, राख्या वैद्य सुताम।
औषध करी रोगी भणी, करै अधिक आराम ॥६२।।
शुभ अलङ्कार उत्तर वने, नाई प्रमुख बैसाय ।
रोगी प्रमुख भणी तिहां, खिजमत स्नान कगय ॥६॥
दूम बहु असंयती भयो, सुख साता उपजाय ।
उपना छेहड़े सोल गद, नन्दन रै तनु माय ॥६॥
काल करी मोडक हुवो, निन पुष्करणी मांय ।
सावध कार्य ना कटुक फल. निमल विचारो न्याय ।६५।
ज्ञाताध्ययने आठमें, देखो चतुर सुमर्म ।
चोखी सन्यासण का, दान धर्म शुचि धर्म ॥६६॥
दोन धर्म शुचि धर्म कर, निरविन खर्गे जाय ।
मल्लि भणौ चोखी कही, ए निन अड्डा ताय ॥६॥
तब मल्लि कह्यो चोखी भणी, रुधिरे खरयो जेह ।
वस्त्र लोही सू धावियां, शुद्ध हुवै किम तेह ॥६५॥
तिम अष्टादश माप प्रति, सेवै जे कोई नन्त ।
वह निमल किण विध हुवे, दौधा एह दृष्टान्त ॥६॥
. १३०] * दानाधिकार * नमस्कार समुच्चय कह्यो, सिद्ध साधु प्रति जोय । नमस्कार कियां पुण्य है, कै अन्य प्रते कौधा होय ॥१३॥ कुत्ता भाई राम गम, कागा भाई राम । इम चाण्डाल भयो नम्या, पुण है कै नहिं ताम ॥१३॥ विनय करै सधला तणो, विनय वादी अवलोव । तसु पाषण्डी प्रभु कयो, सूत्रे ए वच जोय ॥१३२॥ जो नमस्कार सहु ने कियां, पुण्य कहै मति मन्द। ते कडायत जाणवा, विनय वादी रा अन्ध ॥१३॥ अन्नपुण्य समुच्चय कह्यो, ते माटै अवलोय । सहु ने अन्न दोधां थकां, पुण्य कहै जे कोय ॥१३४॥ तसु लेखै समुच्चय कया, मनपुण्य वचपुण्य काय । ए पिण अशुद्ध तीनो थकी, पुण्य तणो बन्ध थाय ॥१३॥ जो सावध मन वच काय थी, पुण्य बंध नहिं थाय । भन्न मिण दियां कुपात्र ने, पुण्य बंध किणन्याय ॥१३६॥ नमस्कार पुन्ये अपि, समुच्चय कहिये पेख । सहु ने नमण कियां थका, पुण्ण बन्ध तमु लेख ॥१३७॥ गणिका चोर कसाई प्रति, कर जोड़ी नमस्कार । कौधां पिण पुणा बन्ध हुवै, जसु लेखै अवधार ॥१३८॥ सर्व भणी जी अन्न दियां, वलि सहु ने नमस्कार । कौधां पुण तो देखलो, सप्तम अङ्ग मझार ॥१३॥ .
N - ram * दानाधिकार . [१२५ धर्म दानवर आठसू, तीन भेद है तास । सून सुमार दान पुन, अभय दान गुण राश ८० पागम अर्थ बताय ने, तसु मित्थ्यात्व मिटाय । शुद्ध समकित पमाविये. सून दान कहिवाय ॥८॥ वर महाब्रत धारौ मुनि, दिये सूजतो तास । दान सुपात्र तसु कह्यो, द्वितीय भेद सुविमास ॥२॥ भय नहिं दे जंतू भगी, हगवारा पच्चखाण । ते अभय ए भेद वण, धर्म दान रा नाण ॥३॥ सचितादिक जे द्रव्य बहु, दिये उधारा जेम। ध्यान पालो लवा तणो, नवम काएन्ती एम ॥८॥ लैणायत ने जिम दिये, हातौ नैता. देय । दियां पछै माशे लिये, दशम कएन्तौ तेय ॥८॥ धुर वोहरा निम उभय ए, दियां प्रथम दे तेह । ते नवनू फुन दशम ने, दियां पाछो दे जेह ॥६॥ धर्म दान अष्टम तिको, श्री जिन आज्ञा मांहि । 'शेष दान नव 7 जिका, जिन आजा में नाहि ॥८॥ असंजती ने दान दे, तसु कयो अध एकन्त । नव हौ दान वेहने विषै, देखोजी बुद्धिवन्त ॥८॥ ए दश दान कह्या तिके, गुण निप्पन्न तमु नाम । पिण जिन आजा बाहिरो, व सावध अघ धाम ॥
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१३२]]
* दानाधिकार
जागां पाट बाजोठादि नो, पडै साधुरै काम ।
कपड़ो पिण साधू तणे, अवश्य चाहिजे ताम ॥१५॥
इम कल्यै साधू भयो, पाख्या तेहिन बोल ।
देखोनी
देखो तुम्हे, आंख हौया रौ खोल ॥१५१॥
साधू बिन जो अन्य प्रवे, दोधां पुण जो होय ।
तो गाय मुण्य किम नवि कयो,भैस पुण पिण जोय।१५२
सुवरण पुण्य रूमो पुग्ण, होरो पुणा उदार।
मोती ने माणिक पुणा, खेती पुग्ध विचार ॥१५३॥
इत्यादिक मुनिवर भणी, नहिं कल्प ते बोल।
सुत्र विषे ते नवि कहा, देखोजी दिल खोल ॥१५॥
मुनि प्रति नहिं कल्यै तिको, एक ही बोल कहन्त ।
तो तुम्हें कहता अन्य प्रति, दोधै मिण पुणा हुन्त ॥१५५॥
अब को कहै कयो अर्थ मे, पाने अन्न दौघह।
तौधकार नामादि ने, पुण्ण प्रकृति बंधह ॥१५६॥
मात्र थकी जो अन्य प्रति, दियां अनेरौ ताहि ।
पुण्य प्रक्रति बन्धै दूसो, कयो अर्थ रै माहि ॥१५७॥
तसु कहिजे जे मान ने, हौधै छतां जु तेह ।
तौबार नामादि ने, पुण प्रकृति बंधेह ॥१५॥
आदि शब्द में तो जिक, पुण्ण प्रकृति सहु आय ।
इक ही बाकी नवि रही, निमल विचारोन्याय ॥१५॥
* दानाधिकार *
[१२७
----
सयणपुण्य फुन वस्त्रपुण, मनपुणा वचपुण काय ।
नमस्कारपुणे नवम, समुच्चे हो कहिवाय ॥१०॥
कोई कहै अनपुण दूम, समुच्चय आख्यो खाम ।
ते माटै सहु ने दिया, पुण बध छै ताम ॥१०१॥
इम कहै वहने पूछिये, अन्नपुणा पाख्यो सोय ।
के कोरी दौघां पुण्ण हुदै, के काचो दौधा होय ॥१२॥
के अन्नपुण रांध्यो दियां, सचित दियां पुण्य थाय ।
तथा अचित्त दोधां थकां, पुराय बन्ध कहिदाय ॥१०॥
दियां सूझतो पुण्य है, वा असूझतो दियेह ।
पान प्रति दौधा पुण्य है, तथा कुपान विषेह ॥१४॥
मुनि प्रति दोधां पुण्य है, तथा असाधू प्रवेह ।
चोर कसाई ने दियां, वलि गणिका प्रवेज देह ॥१०॥
समुच्चय आख्यो अन्नपुण्य, ते माटै अवलोय ।
सहु ने दोधां पुण्य नो, तुझ लेखै बन्ध होय ॥१०६॥
दूम तसकर गणिकादि ने, सहु ने दोधां पुण्य ।
तिणसुसघला पात्र है, नहिं कुपात्र जबुन्य ॥१०॥
पाणपुण्य समुच्चय कह्यो, ते अचित्त पायां पुण्य होय
की सचित्त उदक पायांधकां, पुण्य बंध तसु जोय १०८
नो सचित्त पायां यौ पुण्य हुदै, तो छाण्यो पावह ।
अथवा अछाण्या उदक प्रति, पायां पुण्य कहेह ॥१०॥
१३४] * दानाधिकार वृत्ती माने तसु लेख पिण, पुण्य पावे न दियेह। अर्थ न मानै एह तिण, वृत्ति न मानो वह ॥१७०॥ सूत्र भगवती सुयगडांग, उत्तराध्ययन उनास । असंजतौ प्रति दान दे, कहा अशुभ फल तास ॥१७१॥ इम जाणौ उत्तमा नरां, राखो सूत्र प्रतीत। श्रौजिन आण उथाम ने, मती को करो अनौत ॥१७२॥ ठाणा अङ्ग ठाणे तूर्य वर, तूर्य उद्देशा मांय । च्यार मेह प्रभू आखिया, सांभलग्यो चित्तल्याय ॥१७॥ दूक वर्षे जे खेव से, अखेत वर्षे नाहि । अखत वर्षे एक पिण, खेव न वर्षे ताहिं ॥१७॥ दूक क्षेत्रे पिण वर्षतो, अखेने मिण वर्षाय । एक क्षेत्र नहिं. वर्षतो, अखेत वर्षे नांहि ॥१७॥ दूण दृष्टान्त पुरुष नौ, च्यार जाति कहिवाय । देव मात्र विषे जु बुक, दिये कुपावे नाहि ॥१६॥ दृह विध कया कुमान ने, कुक्षेत्र सु वर न्याय । बायो जिहां जगै नहीं, ते कुक्षेत्र कहिवाय ॥१७॥ ते माटै जु कुपाव ने, दोधां शुभ अङ्गुर। जगै नहिं तिण कारण, काया कुक्षेच भूर ॥ १७॥ ॥ इति दानाधिकार।
*दानाधिकार * [१२६ पावेज दौधा पुण्ण है, तथा कुपात्र विषेह । साधु असाधु ने दियां, किण मे पुग्ध कह ॥१२०॥ गणिका चोर कसाई प्रते, दोधां पुण बंधाय । समुच्चय वत्यपुरा कहो, उत्तर देवो न्याय ॥१२॥ मनपुण्ये ससुचय कह्यो. सावद्य अशुद्ध जवुन्य । मन प्रवत्र्तायां पुणा छै, के निवंद्य मन थौ पुग्णा ॥१२२॥ पञ्ज आसव सेवण तणा, मन थी पुणा बंधाय । पज पासव छोडण तणा, मन थौ पुणवंध थाय ॥१२॥ समुख्य मनपुण्ये कह्यो, सावध मन प्रवर्ताय । ते थौ पुण्य बंधे के नहिं, उत्तर देवो ताय ॥१२४॥ वचपुण्ये समुच्चय कयो, सावध अशुद्ध जन्य । वच वोल्वां थी पुण्य है, कै निवंद्य वच थी पुण्य॥१२५॥ समुच्चय वचपुण्ये कयो, मुख से वोले गाल । एक गुगणे नवकार शुद्ध, किण यो पुण्ण वंध न्हाल ॥१२॥ कायपुणे समुच्चय कयो, सावद्य तन प्रवर्ताय । तेह थकी पुण्ण बध हुवै, कै निर्वद्य तनु थी घाय ॥१२॥ मौत तप्प तनु धौ खमै, वे यो पुण्ण वधाय । गेहूँ पौसै छेदै हरौ. वेषी पुण बन्ध धाय ॥१२॥ हिन्सा झूठ अदत्त फुन, चौथो आसव ताहि । समुच्चय कायपुण्ये काह्यो, दूण धो पुण्य के नाहि ॥१२६॥ १७
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१३६] * श्रावक ने दिया स्यूं थाय अधिकार *
ग्रहस्थ ने देवो तन्यो, स्यूं जाणो मुनिराय ।
ते ससार भ्रमण तणो, हेतु जाणौ ताय ॥६॥
सुयगडांग नवमें कयो, गाहा तेवौसम् ताहि ।
तिण सूं श्रावक आवियो, प्रत्यक्ष ग्रहस्थ माहि ॥१०॥
पनरमोद्देश निशीथ में, मुनि अन्य तीर्थों प्रवेह ।
अथवा ग्रहस्थ प्रते बलौ, अशणादिक पापिह॥११॥
वस्त्र पान फुन कम्बली, रजोहरण सुविचार ।
ए आठ बोल देव तसु दण्ड चौमासौ धार ॥१२॥
देतां प्रति अनुमदियां, दण्ड चौमासी आय ।
ते माटै ग्रहस्थ विषै, श्रावक मिण वहां आय ॥१३॥
तसु मुनि पोते दै नहीं, बलि जसु देवै कोय ।
अनुमोदै नहि तेहने, ऋषि पाचार सु जोय ॥१४॥
द्वतीय करण अनुमोदियां, दण्ड चौमासी आय ।
तो प्रथम करण देवै तसु, धर्म
पुण्य
किम थाय ॥१५॥
पडिमाधारौ पिण दूहां, आयो ग्रहस्थ विधेह ।
तसु अशनादिक नहि दिये, महा मुनि गुण गेह ॥१६॥
ते पड़िमाधारौ प्रवे, ग्रहस्थ दिये को आहार।
तो मुनि अनुमोदै नहो, देखो न्याय विचार ॥१७॥
देता प्रति अनुमोदियां, मुनिवर ने दण्ड आय ।
तो देशवालाने धर्म किम, तसु खायो घबत माहि॥१८॥
* दानाधिकार * [१३१ अन्य तीर्थों ने नहिं करूं, बन्दना ने नमस्कार । पशणादिक पिण द्यं नहौं, पानन्द कञ्चु उदार ॥१४॥ मुनि बिन अन्य प्रति अन्न दियां, बलि कियां नमस्कार। पुण्य हुवै तो किम लियो, आनन्द अभिग्रह सार ११४१॥ जसु अन्न दौधा पुग्ध हुवे, तेह ने पिण शिरनाम् । नमस्कार कौघां छता; पुग्या हुवै छै ताम ॥१४२॥ ते नव ही निर्वद्य है, साधू ने नमस्कार। कौघां पुण्य छै तो तसु, अन्न दोषां पुख्य सार ॥१४॥ जल पिण निरदोषण तसु. दोघां पुण्य सु देख । नागां पिण तमु सूझती, पाप्यां पुण्य सु पेख ॥१४४॥ सयण पाट प्रमुख तसु, दोधां पुण्य सो नोय । वत्व पिण निरदोषण तसु, दोधां थी पुण्य होय ॥१४॥ मन वच काया पिण वलि, निरवद्य थौ पुण्य बन्ध । नमस्कार पद पञ्च प्रति, कौघां पुग्ण सु सन्ध ॥१४६॥ निरवद्य रै लेखे नवू, वोल सरोषा शुद्ध । नवू शरीषा नवि कहै, श्रद्धा तास विरुद्ध ॥१४७॥ ने कल्यै विक, तेहिन द्रव्य पाख्यात । द्रव्य अनेरा नवि कहा, देखो तन पखपात ११४८ अन्न साधु रै बोइये, जल मिण मुनि रै ताय । चाहिने तिण कारणे, पांणपुण्ण कहिवाय ॥१४॥ साधू १३८] * श्रावक ने दियाँ स्यूं थाय अधिकार * व्यावच ग्रहस्थ तणौ कहो, दशवकालिक माहि। . अणाचार अट्ठबीसमो, टतोय अध्ययने ताहिर गृही व्यावच मुनि नहीं करें, नथी करावै जाण । करता अनुमोदै नहीं, विविध २ पच्चखाण ॥३०॥ ग्रहस्थ प्रति पूछ मुनि, सुख साता के तीय। अणाचार ते सोलमों, दशवकालिक जोय ॥३१॥ सुख पूछयां बव्ही तिणे, साता तसु अणाचार । तो यही ने साता कियां, किम हुवै धर्म उदार ॥३२॥ दशाश्वतस्कंधै चारमी, पडिमा में सम्मेख। पन्न वंधण तूठो नहौं, ज्ञात तणो सुविशेष ॥३॥ ते माटै कल्यै तसु, ज्ञात तो ने आहार। इम पेज वंधण खाते कही, भिक्षाचरी तसुधार ॥३४॥ पेज वंधण ना अशुभ फल, ते माटै अवलोय । तसु खाते भिक्षाचरी, ते पिण सावध नोय ॥२५॥ भगवती अष्टम शत विषै, पञ्चमुद्देशक नान । गौतम पूछो यही करी, सामायिक मुनि स्थान ॥३६॥ तसु भण्ड तस्कर अपहरयां, सामायक चौतार। भण्ड नौ करै गवेषणा, श्रावक वह तिवार ॥३॥ हे प्रभु! वे निज भण्ड तो, करै गवेषणा सोयः। के पर भंड नी ते करे, गवेषणा अवलोय ॥३८॥ ,
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* दानाधिकार
[१३३
ऋषभादिक कहिवै दूहां.जिन चउवीस सु आय ।
गौतमादिक गुणवै करी, चउद सहन मुनिराय ॥१६॥
तिम तीर्थकर नामादि दूम, आदि शब्दरै मांहि ।
पुण्णा प्रकृति भावी सड, वाकी रही न काय ॥१६१॥
पाव थकी जो अन्य प्रति, दियां बनेगै जाण ।
पुणा प्रकृति बंधै तिको, अर्थ विरुद्ध पहिछाण ॥१६२॥
आदि शब्द में तो जिक, पुण प्रकृति सहु आय ।
वलि अनेगै पुग्ण नौ, प्रकृति किसी कहिवाय ॥१६॥
किणहिक ठाणा अजमें, के ए अर्थ जदुन्य ।
सह ठाणा अङ्ग में नहीं, पाठ विना अर्थ शून्य ॥१६४॥
अन्य प्रति दोधां अन्न जे, पुण्य प्रकृति बधेछ ।
त्ति विषै ए नवि कधी, अभयदेव सूरेह ॥१६॥
पाने अन्न देवा थकी, ने तीर्थकर नामादि ।
पुणा प्रकृति नो बंध ते, अन्नपुणा संवाद ॥१६६॥
वृत्ती विषे इतरोन है, पिण अन्य प्रति दौघांसोय ।
बंध अनेरी पुण्ण प्रकृति, एहवू कयो न कोय ॥१६॥
पाठ विषै पिण ए नही, हत्ती विषै पिण नांहि ।
सूत्र घको पिख नहिमिले, ए विरुद्ध अर्थ यन्याय ॥१६८ः
अन्नपुण को अर्थ शुद्ध, वृत्तौ विषै कयु सोय ।
पाढे दौॉ पुण्य कडं, प्रत्यक्ष हो अबलोय ॥१६॥
१४०] * श्रावक ने दियाँ स्यूं थाय अधिकार *
ममत्व तजी नहीं ले भणी, धन तेहनो न काहाय।
तिण सुसामायक मझो, मुनि प्रति.द्रव्य वहिराय ४६
द्रव्य अनेरा नो हुवे, ते मुनि प्रति नो देह ।
तो वहनी आता थकी, वहिगवै गुन गैह ॥५०॥
पिण ममत्व भाव पच्चयो नहीं, तिमासु तसु द्रव्य जोय
बहिरायां आज्ञा तणो, कारण नहिं के कोय ॥५१॥
तिग न उद्देशै पूछियो, सही सामायक मांहि ।
कोई पुरुष सवै तदा, तसु आर्या प्रति आय ॥५२॥
है प्रभु ते श्रावक 'तणी, भायां प्रति सैवह ।।
तथा अभार्या प्रति. तदा, सवै बम धूछह ॥५॥
जिन कहै ते श्रावक तणी, भार्या प्रति सेवन्त ।
अभार्या प्रति सेवै नहीं, बलि गौतम पूछन्त ॥५४॥
हे प्रभु सामायक विषै, भार्या अभार्या होय ।
जिन कहै हन्ता गोयमा, भार्या अभायां जोय ॥५५॥
किण अर्थे प्रभु इम कंजु, मार्या प्रति सेवन्त ।
अभार्या प्रति सवै नहौं, तब भाषे भगवन्त ॥५६॥
जिन कहै सामायक विषै, इसी भावना भाय ।
माता नहिं छै मांहरी, पिता न म्हारो ताहि ॥५०॥
माता ते म्हांगे नहीं, भगिनी मांहगै नांहि ।
भार्या महिनी को नहीं, सुत म्हांगे नहिं ताहि ॥५॥
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* श्रावक ने दियाँ स्यूं थाय अधिकार * [१३५
॥ अथ बावीसमूं श्रावक ने दियां
स्यूं थाय अधिकार ॥
॥ दोहा ॥
कोई कहै श्रावक भणी, अशणादिक आपह ।
तहने स्यूं फल सपणे, हिव तसु उत्तर लेह ॥ १ ॥
द्वितीय सुयगडांगे कह्यो, द्वितीय अध्ययन विषह ।
अथवा प्रथम उपस मे, प्रश्न बीम मे लेह ॥ २ ॥
खाणो ने फुन पौवणो, श्रावक तणो सु जोय ।
अबत मांहे आखियो, बलि गहणो अवलोय ॥३॥
त्याग त्याग सहु ब्रत है, राख्यो ने आगार।
तहने अब्रत आखिये, बारूं न्याय विचार ॥ ४ ॥
टूनो वासव दाखियो, अब्रत ने जिनराय ।
ठाणांगठाणे पांचमें, वलि समवायाङ्ग मांहि ॥ ५ ॥
भाव शस्त्र अब्रत भणी, भाष्यो श्री जगभाण ।
शङ्का हुवै तो देखल्यो, ठाणांग दशमें ठाण ॥ ६ ॥
तिण तूं हियै विचारिय, श्रावक ने अवलोय ।
अब्रत सेवायां छतां, धर्म पुग्ण किम होय ॥ ७॥
श्रावक ते विरते करी, देव वैमानिक थाय ।
कद्यं भगवती प्रथम शत, अष्टमोद्देशक मांहि ॥८॥
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१४२] * श्रावक ने दियाँ स्यूं थाय अधिकार *
शस्त्र के षट्काय नो, अधिकरण कहिवाय ।
तसु तौखो कौधा छता, धर्म पुण्य किम थाय ॥६॥
महिज मड़िमा ने विषै, श्रावक बातम जाण ।
अधिकरण न्याये करी, वार करो विनाम ॥७० ॥
सामायक में आत्मा, तसु अधिकरण आख्यात ।
तो जे सामायक विना, तेह तणौ सौ वात |
षट् पोसा दूक मास में, अष्ट पोहरिया करेह ।
घया बोहित्तर वर्ष में, संवत्सरि दूक लेह 10॥
एह तिहोत्तर दिन तणो, व्याज तसु घर आय ।
वलि तोटादि नफा तगो, वैहिज धौ कहाय ॥७॥
घर पुवादिक जन्मियां, हर्ष हिये तमु आव।
चित्त उदास हुवै मूंचा, पेज बंधन दूम धाय ॥४॥
तोटो सुण पिलखो हुवे, नको सुगौ विकसाय ।
सामायक पोषह मज्भे, ममल भाव इणन्याय ॥७॥
इमहिन पडिमा रै विषै, हर्ष सोग चित्त प्राय ।
पेज बंधन आख्यो प्रभु, न्यातीलर सू ताव ॥६॥
एक . लखपती शेठ नसु, मात मिता परिवार ।
स्त्री पुबादिक को नहीं, एकलड़ो अवधार ॥७॥
लाख रुपया रोकड़ा, मिन भणी ज भलाय ।
श्रावक नो पडिमा बहै, एकादश लग नाहि ॥७॥
-- AAMAA . * श्रावक ने दियाँ स्यूं थाय अधिकार * [१३७ गौतम प्रतिसथार मे, धानन्द आख्यो एम। हे भदन्त ! हूं गृहस्थ छु, रहि मभ ज वेम ॥१॥ ते रहो मम वसताभणी, इतरो अवधि उम्पन्न । पूर्व दिशि लवणो दधी, नोयण पञ्च सयजन्न ॥२०॥ देखू ते हूं क्षेत्र प्रति, दक्षिण पश्चिम एम। वलि उत्तर दिशि नै विषे, चूल हेमवन्त तेम ॥२१॥ ऊंचो सौधर्म कल्प लग अधो नरक धुर तास । सहस्र चौरासौ वर्ष स्थिति, लोलुच नरकावास ॥२२॥ गौतम वोल्या ए वडो, मोटो अवधि उदार । ग्रहस्य भयो नहीं उपजे, हे आनन्द विचार ॥२॥ ते माटै तूं एहनौ, लै आलोवण सार- नाव प्रायश्चित एहनो, पडिवजिये धर प्यार ॥२४॥ तब आनन्द पूछो भदन्त, जे वर सत्य वदेह । आवै छै दण्ड देह ने, श्री जिन क्यण विषेह ॥२५॥ गौतम कहै नहिं दण्ड तसु, वलि भानन्द कहै वाय । सत्य प्रवर वच कहै तमु, प्रायश्चित जो नाय ॥२६॥ तो तुम्ह हिज पालोवणा, नाव प्रायश्चित लेह । दूत्यादिक दूधकार छै, देखोजी चित्त देह ॥रणा दूम सक्षम अझे , कहो, अणशण से ,मुविशेष । । आनन्द माख्यं ग्रहस्थ ई,तो पडिमा नोस्यूं पेख परदा .
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१४४] * धात्रक ने दियाँ स्यूं थाय अधिकार *
पडिमा में पिण पञ्चमू, देश ब्रत गुणठाण ।
जे जे वसु आगार है, वे ते अब्रत नाण ॥८॥
खाणो पौणी वेहनो, अविरत मांही बोय ।
तसु अब्रत सेवावियां, धर्म पूण्य किम होय ॥१०॥
मडिमाधारी आहार ले, वेहने तो कहै पाप ।
तो देवै तमु धर्म किम, देखो घिर चित्त थाप ॥६॥
जो लेग वाला ने पाप छ, माप लगायो जास।
धर्म पुण्य किण विध हुवै, जोवो हिय विमास ॥२॥
लेण वाला ने ले . हुदै, देश वाला ने देह ।
जिन जा नहिं विहुंभणी, विडं ने अध बधेह ॥३॥
जे पड़िमाधारी 'बिना, अन्य तणो पिण देख ।
खाणो' पौणो पहिरणो, अविरत में सम्पख ॥४॥
ते माटे मुनि 'दैन तसु, दोधां यावै दण्ड ।
अनुमोद्यां पिण दण्ड है, सूत्र निशीथ सुमंड ॥६५॥
श्रावक जिमावण तणो, जिन बोना दे नाहि ।
पाजा बिन नहिं धर्म पुण्य, देखोजी दिल मांहि ॥६॥
समदृष्टि श्रधै समो, जिन आज्ञा में धर्म।
याज्ञा बारै धर्म नहौं, ए जिन शासन मर्म ॥१७॥
कहि कहि र वितरो काई, धर्म न आना बार।
पाना,मांहों पाप नहीं, श्रध्यां सम्यक्त्व सार ॥६॥
* श्रावक ने दियाँ स्यूं थाय अधिकार प्रभु कहै करे गवेषणा, निन भंड तगीन तेह। पिण जे मस ना धन तणी, गवेषणा न करेह ॥३॥ वलि गौतम पूछो प्रभु, सामायिक रैमाहि । ते भड ने वोसिरावियां, भंड अभंड कहाहि ॥४०॥ जिन कहै हन्ता गोयमा, भंड अभंड कहाय । वलि गौतम पूछयो प्रभु, तसु भंड कहो किणान्याय ॥४१॥ प्रभु कहै सामायक विषै, ते इसी भावना भाय । हिरण्य नहौं ए माहरो, बलि मुझ सुवर्ण नाहि ॥४२॥ कांसी नहीं ए मांहरी, नही वस्त्र मुझ एह । नहिं माहरो विस्तीर्ण धन, कनक रत्न मणि जे ह ॥४॥ मोती ने वलि शङ्क शिल, प्रवाल मूंग कहाय । पन रन आदिक छतां, सार द्रव्य मुझ नांहि ॥४४॥ एहवी चिन्तवना प्रवर, सामायक में जान । पिण ममत्वभाव ने धन थकी,न कियो तिण पञ्चखाण।४५॥ तिण अर्थे दूम आखियो, निज भंड तणोन जेह । गवेषणा पिण पर तणा, भंड नौ नौ करह ॥४६॥ प्रगट पाठ में दूम कयो, ते माटै अवलोय । सामायक में धन थकौ, ममत्व भाव तसु जोय ॥४॥ ममत्व भाव पचाख्यो नथी, यही सामायक मांहि । तो पडिमा में धन तमी, ममत्व तनी किम ताहि ४८ १४६] * अनुकम्पा अधिकार * -~ -- . सावध पाप सहित जे, सावध कहिये वास । अन्तर भांख उघाड़ने, वारूं न्याय विमास ॥८॥ निशीथ उद्देशै बारमें, मुनि अनुकम्पा प्राण । वृणादिक पाथे करो, जो बांधे बस प्राण ॥६॥ अथवां बांधतां प्रते, जो. अनुमोदै ताय ।' चौमासौ तसु प्रायश्चित, प्रगट पाठ में वाय ॥१०॥ महिन बन्ध्या बीव ने, छोडे तो दण्ड पाय । : छोड़ता प्रति ने वली, अनुमोद्यां दण्ड पाय ॥११॥ ए प्रत्यक्ष पाठ विषै कयो, अनुकम्पा ए जान । सावध छै तिण कारणे, दंड को भगवान ॥१२॥ छोडै तसु अनुमोदियां, दृतीय करण दंड ख्यात । तो छोडे ते, धुर करण, तास धर्म किम थात ॥१३॥ पसंजतो रो जीवणो, बंछ नहिं मुनिराय । मरणो पिण नहिं बञ्छणो, ए राग द्वेष कहिवाय ॥१४॥ असंजती रो नौवणो, बच्छयां धर्म जु होय । तो ए. पनुकम्पा तणो, प्रायश्चित किम जोय ॥१५॥ सावध ए अनुकम्प छै, तिण सुदंड छै तास । निर्वद्य नो दंड हुवै नहीं, नोवी हिय विमास ॥१६॥ अनुकम्पा में अर्थ हो, कृष्णो ईंट उपाड़। मूको वृद्ध तरी' घरै, भन्तगडे अधिकार ॥१७॥ .
AAS . * धायक ने दियाँ स्यूं थाय अधिकार * [१४१ नहिं छै म्हारी पुत्रिका, सुत नौ बह विमास । ते पिण मांहरौ को नहौं, करैम चिन्तवमा लास ॥५६॥ प्रेम रूप पन्धन बलि, सु विछिन्न न हुन्त । तिण अर्थे करि तहनी, भार्या प्रति सेवन्त ॥६॥ दुह विध प्रभुजो पाखियो, सामायक रै मांहि । प्रेम वखन छेद्यो नथी, मात प्रमुख नं ताहि ॥६१॥ इमहिन पड़िसा ने विषे, मात प्रमुख नूं सोय । 'प्रेम बंधन तूटो नथौ, न्याय विचारी नोय ॥२॥ इग्याग्मी पडिमा मझौ, न्यातीला नो धार । प्रेम बंधन छूटो नधौ, तिण सुलै तसु आहार ॥६३ कद्यं दशाश्रुतस्वन्ध बम, ते माटे अवलोय । पन्न वन खाते तसु, आहार लेवू पिया होय ॥६४॥ पूछयां जिन आज्ञा न दे, लेण वाला ने जोय । देण वाला ने पिण नही, जिन आज्ञा अवलोय ॥६॥ जिन आजा बारे नहौं, धर्म पुण्य ,रो अंश । धर्म कहै आज्ञा बिना, तसु कहिये मति भंश ॥६६॥ सूव भगवती ने विषै, सप्तम सतकै भेव । प्रथम उद्देशा ने विषै, दाख्यो श्री जिनदेव ॥६७ सामायक मांह कही, श्रावक नौ सपख । अाम वे अधिकरण इम, प्रगट पाठ में लेख ॥६८ :
१४८]
*अनुकम्पा अधिकार
छेद्र करी जल यावतो, देखौ ग्रहस्थ प्रतेह ।
बतावणो नहिं जिन कयो, प्रत्यक्ष पाठ विषेह ॥२॥
उदक भराती नाव ए देवू तुरत बताय ।
एहवु पिण नवि चिन्तवै, मन माहीं मुनिराय ॥२६॥
आप अने बहु अन्य जन, डूवै उदक करेह ।
सम भावे बैठो रहे,. राग हेष टालेह ॥३०॥
हितोय अङ्ग में शाखियो, श्रुतखंध दितीय विषेश ।
पञ्चम अध्ययने प्रगट, तौसमौ गाथा जेह ॥३॥
नौव सिंह व्याघ्रादि फुन, हिन्सक देखी सन्त ।
यह मारवा जोग है, वूम न कहै गुणवन्त ॥३२॥
अथवा हिंसक देख ने, यह हणवा जोग जनाहिं।
एहमिण कहिवुनहौं, निपुण विचारो न्याय ॥शा
वृत्तिकार पहq कयुं, वद्यवा जोग न माहिं।
इम कहता तसु कर्म नौ, अनुमोदना जु आय ॥३४॥
कद्या मिह बाघ्रादि ने, आदि शब्द रै मांहि ।
घातक जे षट्काय मा, ते सह थाव्या ताहि ॥३५॥
हरी कासाई अन भयो, तमु तारण अणगार ।
ज्याम, करावै बध तया, दे उपदेश उदार ॥३६॥
पिच बकरा नु जीवग्यो, बछै महिं मन मांहि ।
पसंजम जौवत बंकणो, बज्यो
जिनराय ॥३०॥
. * श्रावक ने दिया स्यूं थया अधिकार * [१४३ मित्र तणे ब्रत पञ्चमे, निन पोता ना जाण । सहस दाम उपरन्त सूं, राखण रा पञ्चखाण IIGER पडिमाधारौ ना निक, लाख दाम राखन्त । तह तणी अबत तणो, अघ किण में लागन्त ।। तथा रुपया लाखे , किण रा परियह मांहि। पोते रखवाली करे, पिण तसु पग्ग्रिह नांहि शा पडिमाधारौ ना प्रगट, परिग्रह माहि पिछाण । अविरत नो लागे तसु, पाप निरन्तर जाण ॥२॥ ममत्व भावं पञ्चख्यो नथी, पडिमा मे इणन्याय । सामायक जिम तेहर्नु, तनु अधिकरण कहाय ॥८॥ तथा लखपती शेठ दूक, पुत्रादिक नहिं कोय । गुमास्ता वह वेहने, विणज करै अवलोय ॥८॥ दुकान वागोत्तर भगी, शेठ भलावी मोय । श्रावक नौ पडिमा बहै, एकादश लग जोय ॥८॥ व्याज आवै रुपया तणो, ते किण रा घर मांहि । वलि तोटारु नफा तणो, कंवण धणी कहिवाय ॥६॥ पडिमाधारौ ना प्रगट, घर मे पावै व्यान । नफा बने तोटा तणो, एहिज धणी समाज ॥८॥ लाख तणा बे लाख थया, परिग्रह दूण रो हौज। सहस्र पचास रह्या छता, तोटो तास कहोना
२५०]
* अनुकम्पा अधिकार
Ima-
मात बचावा अठियो, भागो पोषह ताहि ।
तो साधु वचावै तेहनु चारित्र भागै किम नाहि ॥४८॥
ने कार्य कौधे छते, पोषह चारित्र भागेह।
ते कार्य में धर्म किम, न्याय विचारौ लेह ॥४॥
द्वितीय सुयगडाङ्गे पवर, छट्ठा अध्ययन रे माहि ।
अठारमी गाथा अमल, आद्र मुनि कहिवाय ॥५०॥
निज कर्म प्रते खपायवा, वा अन्य तारण वाहि ।
धर्म देशना प्रभु दिय, निमल विचागे न्याय ॥५१॥
असंजती ने जीव है, तास बचावा हेत।
वौर
प्रभू उपदेश दे, इम नवि पाख्यो तेथ ॥५२॥
द्वितीय पाचाराने विषे, द्वितीय अध्ययन ताहि ।
प्रथम उद्देशै प्रभु कयो, ग्रहस्त लड़े माहोमांहि ॥५३॥
देखो नवौ चिन्तै मुनि, मारो - एह प्रवेह ।
अथवा दूर ने मत हणो, राग द्वेष वर्जेह ॥५४॥
द्वितीय आचारङ्ग ने विषै, हितोय अध्ययन विषह।
प्रथम उद्देशै ग्रहस्थ वे, वेज आरम्भ करेह ॥५५॥
देखो मन चिन्तै न मुनि, अग्नि उजालो एह। .
अथवा अग्नि उजाल मति, इम पिण नवि चिन्तह ६॥
तथा बुभावो पनि ए, अथवा मत बुमाव ।
पहमिस नवि चिन्तवै, राखै सुबि सम भाव ॥५॥
मनुकम्पा अधिकार *
[१४५
इम सांभल उत्तम नरां, राखो निन सु प्रतीत ।
आज्ञा बारे धर्म कही, करवी नही अनौत neen
॥ इति श्रावक ने दियाँ स्यूं अधिकार ॥
॥अथ तेवीसमूअनुकम्पा अधिकार॥
॥दोहा ।।
कोई कहै असंजती भयो, जैह बचाव जाण ।
स्यु फल तास समुपजे, तसु उत्तर पहिछाण ॥ १ ॥
जीव छोडावै दाम दे, जिन मुनि नहिं दे आण ।
अनुमोदै पिण नहिं तिक, सावद्यरा पञ्चखाण ॥ २ ॥
मुनि दीक्षा लोधी तदा, सर्व सावद्य पञ्चखेय ।
जौव छोडावे नहिं तिक, निज वस्वादिक देय ॥३॥
यहस्थ छोडावै दाम दे, जो मुनि अनुमोदेह ।
तृतीय करण भागै तमु, माप कर्म बंधह ॥ ४ ॥
द्वतीय करण अनुमोद, लागै पाप अबून ।
तो दाम दिये ते धुर करण, कम छुवै तमु पुण्य ॥ ५॥
सामायक पोषह विषै, सावद्य प्रति पचखेह ।
जीव छोडावै नहिं तिकी, निन वस्खादिक देह । ६॥
खोटो सावध जाण के, जे स्वागो मुनिराय ।
ग्रहस्थ ते सावध कियां, धर्म पुण्य किम वाय ॥७॥
* अनुकम्पा अधिकार
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निशीथ उद्देशै ग्यारमें, पर ने भय उपनाय ।
डरावता प्रति अनुमोदै, दण्ड चौमासी आय ॥६॥
ग्रहस्थ नौ रक्षा करे, रक्षा करि प्रतह ।
अनुमोद्यां पिण दण्ड कह्यो, निशीथ तेरमें लेह ॥६॥
दशवकालिक तौसर, ग्रहस्थ तणो मुनिराय ।
साता पूशां सोलमो, अणाचार को ताय ॥७॥
ग्रहस्थ नौ व्यावच कियां, आठ बौसमं न्हाल ।
पणाचार मुनिवर भणी, दाख्यो परम कृपाल ॥७१॥
करै करावे ने नयौ, करता प्रवे अवलोय ।
मुनि अनुमोदै पिण नहौं, तो धर्म कहै किम सोय ॥७२॥
पशणादिक ग्रहस्थी भणी, दियां मुनि ने दण्ड ।
अनुमोद्यां पिण दण्ड कछु, निशीथ पनरमें मंड ॥७३॥
शस्त्र है घटकाय न, ग्रहस्थ तणो जे शरीर ।
तसु तीखो करवा वणी, किम आज्ञा दे वीर ॥४॥
घातिक ने षट काय ना, तास बचावै कोय ।
तसु प्रते आज्ञा किम दिये, न्याय विचारौ जोय ॥५॥
॥ हिव साधूरी आज्ञा बाहर रो ग्रहस्थ व्यावच
करैतसु उत्तर ॥
कोई कहै साधू तणी, व्यावच ग्रहस्थ करह।
तेह विषै स्यूं फल दुवै, तसु उत्तर हिव लेह ॥१६॥
* अनुकम्पा
अधिकार*
[१४७
गणीः धारणौ गर्भ नी, अनुकम्पा ने अर्थ ।
पथ्य अनादिक भोगव्या, ज्ञाता मांहि तदर्थ ॥१
सुलसांनी अनुकम्प करि, देवकी ना सुत आणि ।
सूक्या हरण गवेषौ सुर, अन्तगड में जाण ॥१८॥
अभय कुमार तणी वली, अनुकम्मा चित्तपाणि ।
दोहलो पूग्यो मित्र सुर, ज्ञाता मे जिन वाणि ॥२०॥
रत्तन होप देवी तणी, निन ऋषि करुणा- कौध ।
जाता.नवम अध्ये न कध, सावध यह प्रसिद्ध ॥२१॥
इत्यादिक अनुकम्प नौ, जिन पाजा दे नाहिं।
ते-माटै सावध तिक, देखोजी दिल मांहि ॥२२॥
जीव हणे मुज कारणे, चिन्तव नेम कुमार ।
तोरण थी पाछा फिस्या, ए अनुकम्पा सार ॥२
जीव हणन्ता नेम ना, विवाह निमत्त पिछाण।
ते टाल्यो पाप पीता तण, जिन प्राज्ञा तिहां जा २४॥
गन सव सुशलो नवि हरायो, कष्ट भोगव्यो पाप।
निवंद्य ए अनुकम्प है, गज टाल्यो निन पाम ॥२५॥
उत्तराध्ययन एकवीस में, चीर देख समुद्रपाल ।
छोड़ायो पाख्यु नयौ, चरण लियो सुविथाल ॥२६॥
टूजी श्रुतस्कन्ध अङ्ग धुर, ढतीय अध्ययन विचार।
प्रथम उद्देश कह्यो मुनि, वेठो नाव मभार ॥२७॥
१५४] * अनुकम्पा अधिकार A- --- - पटूची अति दुःख रे, दूठौ भूतौ सम कही। गृही मसले कर सुक्खर, तेहने पिण तसु लेख पुण्याच्या भटवी विषै अचेत रे, हय खर सगट वैसाण ने। आणे गृहौ पुर तेथ रे, तेहने पिण पुण्य तसु मते ।। मुनि थाकोमग मांहि रे. बोस घणो पोथ्यां तो। पगभर खिस्योन नाय रे, ते वोम उठायां पिण धर्मा८७) अरण्य बलि पुरमाहिरे, सन्त षातुर चेत नहौं । सचित उदक गृही पाय रे,तेह ने लेखै धर्म तसू या इत्यादिक अवलोय रे, रही मुनि ना कार्य करें। हरस छेद्यां धर्म होय रे, तसु लेखै सहु में धर्माच्या मुनि नौ हरस छेदन्त रे, तहने अनुमोदै मुनि । दण्ड चौमासो हुन्त रे, टतीय उद्देश निशीथ में १६०॥ अनुमोद्यां हो पाप रे, तोगृही छेद्यां पुण्य किम । जिन पाजा चित्त स्थापरे, आज्ञा विन नहीं धर्म पुण्य सामायक पश्चखाण रे, निवंद्य कार्य अन्य वलि । ग्रहस्थ करै को जाल रे. तो मुनि अनुमोदैतसु ॥२॥ निर्वद्य कार्य ताहि रे, गृहौ कौधे धर्म पुण्य तमु । अनुमोदै मुनिराय रे, वेहने पिण धर्म पुण्य है ॥६ विणज पने व्यापार रे, सावध कार्य अन्य बलि। ग्रहस्थ करै तिवार २, धर्म पुण्य देह ने नथी ।६४॥
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* अनुकम्पा अधिकार
[१४९
दशमें अध्ययन द्वितीय अङ्गा, च्यार बौसमी गाह।
मौवित भरण न बंछणो, असंजम जीवित ताह ॥३॥
तेरमें ध्ययने हितोय अङ्ग, तीन बौसमी गाह।
जीवन मरण न बंछणो, असंनम जीवित ताई ॥३६॥
'पनरम अध्ययने द्वितीय पङ्ग, दशमी गाथा मांहि।
यसंजम जीवित प्रते, मुनि पादर न दिये ताहि ॥४०॥
तृतीय अध्ययने द्वितीय अङ्ग, तूर्य उद्देश विषेह।,
जीवित मरण न बंछणो, असंनम जीवित तेह ॥४१॥
इत्यादिक बहु स्थान के, असंजम नौवत ताय ।
बाल मरण नहिं बंछयो, भाष्यो श्री जिनराय ॥४२॥
आप तणो नहिं बन्छनो, असंबम जीवित सोय ।
तो पर न बंच्या थकां, धर्म पुण्य किम होय ॥४॥
वाल मरण पिण आपरो, बंछ नहिं मुनिराय।
पर न मिण बछे नहीं, बच्छयां धर्म न थाय 188h
पण्डित मरण ज आप रो, वच्छ महा मुनिराय ।
पर न पिण ब तिको, विमल विचारो न्याय ॥४५॥
कयो सातमा अङ्ग में, पोषह विषै पिछाण ।
मात बचावण जठियो, चूलणीपिया जाय ॥४६॥
अमा तसु बूम आखियो, भागो पोषह सोय ।
वलि ब्रत भागो कच्छो, भागो नियम मु जोय ॥४॥
१५६ ]
* अनुकम्पा अधिकार
NAGARAN
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किण ही ग्रहस्थ पञ्चखाण रे, हरस छेदावा ना किया।
जबरौ सू पहिछाण रे, वैद्य इरस छेदै तमु ॥१०॥
नेम भगतसु नाहिं रे, पिण त्याग भङ्ग करवा तणो।
कामौ वैद्य कहिवाय रे, तिण सुधर्म न तेहने ॥१०॥
तिम सुनिरै पञ्चखाण रे, हरस छेदावा गृहौ कनै ।
जबरी सू' पहिछाप रे, वैद्य हरस छेदै तसु ॥१०७R
नियम भङ्ग तमु नाहिरे, पिण त्याग भङ्ग करवा तणो।
कामी वैद्य कहाय रे, तिण सुनहिंतसुधर्म पुण्य ॥१०८
वैद्य हरस छेदेह रे, अनुमोदै नहिं जे मुनि ।
किम तमु धर्म कहह रे, न्याय विचारौ देखल्यो ॥१०॥
अनुमोद्यां हो पाप रे. तो छदै तसु पुण्य किम ।
तृतीय करण अघ स्थाप रे, प्रथम करण तो अधिक अध
पाप हुवै धुर करण रे, ते अपनी अनुमोदना ।
तौले करण उच्चरण रे, तिण लेखै तमु पाप है ॥१११॥
प्रथम करण पुण्य होयरे, ते पुण्य नौ करणी प्रते।
अनुमोदै ने कोय रे, तास पाप किण विध हुवै ॥११२॥
करण वाला ने पुण्य रे, ते अनुमोद्यां पाप कहै।
प्रत्यक्ष बचन नबुन्य रे, न्याय दृष्टि करि देखिये ॥११॥
छेदै तिब ने पुण्य रे, ते पुण्य रौ करणौ प्रति ।
अनुमोद्यां जो पुण्य रे, तास पाप किण विध हुवे ॥११४॥
. * अनुकम्पा अधिकार [१५१ नवम: उत्तराध्ययने का, मिथिला बलती देख। साहD नवि जोयो नमो, टाल्यो राग विशेष ५८॥ दशवकालिक सातवें, पच्चासमो सातवें, पच्चासमौ में गाह । माहोमांही सुर भिडे, म मनु माहोमांहि ॥५६॥ तियंच माहोमांहि लड़े, एहमी थावो नौत। पूणरौ जय थावो मती, मुनि न कहै ए रौत ॥६॥ दशवकालिक सातवें, दबावनमौ वर्षा ने फुन बायरो, सौत उष्ण अधिकार ॥६१॥ रान विरोध रहित फुन, थावो देश सुगाल । उपद्रव रहित हुवो वली, दूम न कहै मुनि माल ॥६॥ ए सातों होबो तथा, ए सातों मत होय । ए विध पिणन कहै कदा, अमल न्याय अवलोय ॥६॥ दिशा मुढ जे ग्रहस्थ ने, मार्ग बतायां दण्ड । निशौध उद्देशै तेरमे, चौमासिक प्रचण्ड ॥६॥ ठाणा अंङ्ग ठाणे तीसरे, ढतीय उद्देशक माय । पात्म रक्षक तीन जे, पाख्या श्री जिनराय ॥६५॥ हिन्मादिक देखौ करो, दियै धर्म उपदेश।.. अथवा मौन रहै मुनि, समभावै सुविशेष ॥६६॥ अथवा अठी त्यां थकी, एकन्त जागां जाय । आत्म रक्षक ए कद्या, पिण छोडावयो कयो नांय 1६॥
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१५८]
# अनुकम्पा अधिकार
धर्म पुण्य नहिं होय रे, ते सघला बोलां मझे।
तो माप गृही ने जोय रे, जिन आज्ञा नहिं ते भणी १२५
तिम ते हरस छेदन्त रे, अशुभ क्रिया ते वैद्य ने।
मुनि नहि अनुमोदन्त रे, धर्म पुण्य किण विध हुवै १२६
हरस छेद्यां शुभ कर्म रे, तो आचारंग में कया।
त्यां सघला में धर्म रे, कहवो तिण रै लेख ए ॥१२॥
धर्म नहिं अन्य मांहि रे, ती छदै ब्रणादि गृहो।
तिण में मिण पुण्य नाहि रे, ए सावध आजा नथी १२८
हरस छेद्यां धर्म हुन्त रे, तो मुनि शिर सेती गृहौ।
वा पिण काडतरे, तिण में पिण तसु लेख पुण्य ॥१२॥
वलि मुनिवर नौ सोय रे, पग चम्यौ मईन करे।
कर जो औषध कोय रे, तसु लेखै पुण्य सहु मझे ॥१३॥
बत्ति विष दूम बाय रे, धर्म बुद्धि छेद्यां थकां ।
लिया हुवै शुभ तायरे, अशुभ क्रिया लोभादि करि १३१॥
विरुद्ध अर्थ छ एह रे. सूत्र थको मिलतो नथी
मुनि नहीं अनुमोदेहरे, तास क्रिया शुभ किम हुवै॥१३२॥
इम शुभ क्रिया जो होयरे, तो औषध तेलादि करि।
मुनि तनु मई कोय रे, तास क्रियापिण शुभ हुवै॥१३॥
बलि मुनि पग थौ ताय रे, खौलो कांटो काडियां।
तसु लेखै कहिवाय रे, तेहने मिण हुवै शुभ क्रिया ॥१३॥
* अनुकम्पा अधिकार * [१५३ मे व्यावच मुनि नौ करे, तसु आज्ञा प्रभु देह । निरदोषण अशणादि कर, तेह विषै धर्म लेह ॥७॥ बे व्यावच मुनि नौ करे, प्रभु आज्ञा नहिं देह । तेह विषै नहिं धर्म पुण्य. न्याय विचारौ लेह ॥७॥ ॥ साधूरी हरस छेयां पुण्य शुभ किया कहै तेहनु उत्तर ।। सोलम शतकै भगवती, तृतीय उद्देश विमास । हरस छेदै ने मुनि तौ, क्रिया कही प्रभु तास ॥७॥ हरस छेदूं तुम तणी, दूम पूछयां अपगार। आजा न दियै यही भणी, तिण मुंआज्ञा बार ॥०॥ कार्य करावै नहि मुनी, ग्रंहस्थ कनै जे अंश । जबरौ सू जो को करे, तो न करै तास प्रशंस ॥८॥ ॥ सोरठा ॥ ग्रहस्थ मुनि नौ पेख रे, हरस छेदबै धर्म पुण्य । तो मुनि ना कार्य अनेक रे, तमु लेखै कौधां धर्म ॥८RH मुनि पग कांटो नाण रे, वलि फांटो चलू थकी। गृही काडै विण आण रे, तसु लेखै धर्म ग्रही भणौ । दूखे पेट अपार रे, मुनि चित व्याकुल दुःख घो। गृहौ मसलै कर सार , वेहने पिण पुण्य लेख तमु ।८४ १६.] * सुभद्राधिकार दुखै पेट मुनी तणो, मौत घात अवलोय । बाई मसले उदरतो, तसु लेखै धर्म होय ॥ ३ ॥ वलि किण ही साधू तणी, टलौ पटूची ताम। बहु दुःख फेरोपी घणो, अन्न नहिं भावै आम ॥ ४ ॥ ते पेटूची मुनि तणे, बाई मसले कोय । तो उणरै लेखें तदा, तिण में पिण धर्म होय ॥ ५ ॥ किण हो मुनि रो गोलो चढ्यो, बहु दुःख बाई देख । गोलो मसले तेहनूं, धर्म हुई तसु लेख ॥ ६ ॥ अग्नि विष पड़ता प्रते, बाई बांह मकड़ेह । बारै काडे तेहने, तो धर्म तसु लेखह ॥७॥ जंचा थी पड़तो मुनि, बाई झेले तास । तिण मांही पिण धर्म है, वहने लेख विमास ॥८॥ भाखड़ पडतां मुनि भयो, बाई झाल राखेह । पड़ता ने बैठो करै, हुवै धर्म तसु लेखेह ॥६॥ माथो दूखै मुनि तणो, बाई शिर दाबह । मलम लगावै दुखणे, तसु पिण धर्म कहेह ॥१०॥ पाटो बांधे दुखणे, मुच्छौ फुन मुसलेह। इत्यादिक बहु मुनि तणा, बाई कार्य करेह ॥१॥ दुःखो देख साधू भणी, ,मरतो देखी ताय । पौडाणो देखी करी, साता करे सवाय ॥१२॥ .
* अनुकम्पा अधिकार * [१५५ सावध कार्य ताहि रे, गृहौ कौधे पिण पाप है। अनुमोदै मुनिराय रे, प्रायश्चित आवै तसु ॥५॥ हरस छैटगरी ताहिरे, आज्ञा जिन मुनि न दिये। अनुमोदै पिण नाहि रे, तिण सुते सावद्य पछै ॥६६॥ ग्रहस्थ पास जाण रे, कार्य करावा मुनि तणें। नावन्नोव पच्चखागा रे, मान्त पिण नियम ए ॥६॥ हरस गुम्वडा आदि रे, गृहौ पै छेदावण तणा। मुनि ने त्याग संवाद रे, गृहौ हेदै नबरी थकी ॥८॥ मुनि अनुमोदै नाहि. तो तसु त्याग भागे नहीं। पिग कामी कहिवाय रे, त्याग भगावानो गृही ॥६६॥ तिण सुंसावा एहरे, वलि अनुमोदै पिण नहौं । आज्ञा पिण नहिं देय रे, ते माटै नहिं धर्म पुण्य ॥१०॥ ने कामी यही थाय रे. त्याग भगावा मुनि तणो। धर्म नहिं तिण मांहि रे. न्याय हष्टि अवलोकिये ॥१०॥ किण गृही अट्ठम कौध रे, आहार च्यार त्यागन किया। व्याकुल वृषा प्रसिद्ध रे, थयां अचेतन मन्य रही ॥१२॥ उसनोदक तसु पाय रे, कियो सचेतन अधिक सुख । नेमभङ्ग तमु नांय रे. पिण कामी त्याग भांगण तणो।१०॥ तेम दूहां अवलोय रे. नेम भङ्ग मुनि नो नथौ । पिण्ण कामौ गृहौ होय रे, त्याग भगावा मुनि तणो ।१०४॥
१६२]
*गोशालाधिकार
जो यां सहु बोलां मी, जिन आज्ञा दे नांहि ।
तो धर्म पुण्यं पिण को नहीं, धर्म जिन आज्ञा मांहि ॥२॥
ने मुनिवर ने त्याग है, ते कार्य अवलोय ।
ग्रहस्थ करै को मुनि तणा, तास धर्म नहीं होय ॥२४॥
निण रौते जिणवर कयो, तिण रौते अवलोय ।
अज्मा ने मुनिवर भणी, बचावियां धर्म होय ॥२५॥
ने प्रभु सौखावै नहौं, न करै तास प्रशस ।
भान्जा मिण देव नहौं, तिहां धर्म तणो नहि अश ॥२६॥
॥ इतिःसुमद्राधिकार ॥
॥ अथ पञ्चीस गोशालाधिकार ॥
॥दोहा॥
कोई कहै छद्मस्थ प्रभु, चौनाणी था जेह ।
किम चूका कहो वौर ने, तसु उत्तर हिव लेह ॥ १ ॥
वलि तुम्ह कहो गोशाल ने, दीक्षा दौधौ खाम ।
ते किण सूब विषै कयुं, तसु उत्तर मिण ताम ॥ २ ॥
वलि अनुकम्पा करि प्रभु, राख्यो जे गोशाल ।
वह विषै पिण स्यु थयु, तमु उत्तर पिण न्हाल ॥ ३ ॥
शतक पनरमें भगवती, पाया सावत्यौ खाम ।
उत्पत्ति गोशाला तणी, गौतम पूछो ताम ॥ ४ ॥
* अनुकम्पा अधिकार
ने विषै
[१५७
धर्म बिना पुण्य नाहिं रे, शुभ नोगां यो निरजरा।
पुण्य बन्ध पिण थाय रे, ज्यूं गडुलारै खाखलो।११५॥
द्वितीय भाचारङ्ग माय रे. तेरम अध्ययन
पाठ कह्या जिनराय रे, ग्रहस्थ करै साधु तणा ॥११॥
मुनि तनु ब्रज थाय रे, गृही छदै शस्त्र करी।
मुनि मन कर बाछै नाय रे, न करावै बचकाय करि ११७
ब्रण छेदो ने ताहि रे, रुधिर राधि काहे गृहौ।
मुनि मनकरि बञ्छनांहि रे, न करावै बचकाय करि ११८
गृही मुनि पगवलि काय रे, तेल चोपड़े मईने ।
मुनि मन कर बञ्छ नाय रे, न करावै बच काय करि११६
गृहौ मुनि पग थी ताहि रे, खौलो कांटो काडियां ।
मन करि बन्छ नाहि रे, न करावै बचकाय करि १२०
मुनि मस्तक थी ताहि रे, गृहौ काटे जू लोख प्रते।
मन करि बच्छ नाहिरे, न करावैवच काय करि १२१
बोल इत्यादिक ताहि रे, ग्रहस्थ करै साधू तणा।
बच्छै नहिं मुनिराय रे, हितोय आचारंग तेरमे १२२
मुनि अनुमोदै नाहि रे, तो ग्रहस्थ करैए ऋषि तणा।
धर्म पुण्य तिष माहिरे, किण ही बोल विषै नथौ १२३
मुनि तनु ब्रण छेदन्त रे, धर्म कहै दूक बोल में ।
तो तसु लेखै हुन्त रे, धर्म सर्व बोलां मझे ॥१२४॥
१६४] गोशालाधिकार M mmmmwwwmv तन्तुवाय शाला विषे, गोशालो तिहवार । मुझ प्रति तिण देख्यो नहीं. जोयोमयन्तर बार ॥१५॥ मुझ अण देख्य निन उपधि, ब्राह्मण ने दे ताय । मूंडी दाड़ी मूंछ प्रति, मिल्यो न मुमा सूं भायं ॥१६॥ तौन प्रदक्षिण दे करो, नाव नमी कहै मुज्मा । थे धर्माचार्य माहरा, हूं धर्म अन्तवासी तुभा ॥१७॥ तब मैं गोशालक तयां, एह अर्थ प्रति सोय। पनौकार कौधो तदा, पाठ विषै दूम जोय ॥१८॥ वृत्तिकार कधु एहवा, मनोग मे मिण नेह । अङ्गीकार कौधो प्रभु, ते अक्षौण राग पणेह ॥१६॥ बलि तेहना परिचय थकी, ईषत् थोड़ी जाय । नेह गर्भ अनुकम्पना, सद्भावे पहिछाण ॥२०॥ प्रभु छनस्थ पणे करि, जेह अनागत काल । तह 'विषै बे दोष ना, अजाणवा धौ न्हाल ॥२१॥ अवश्य होणहार भाव थी, कियो प्रभु अङ्गीकार । अभय देव सूरे कह्यो, वृत्ति विषै ए सार ॥२२॥ ॥ते टीका कहै छै॥ अभ्युप गच्छामि यतस्य भयोगस्याप्य युगमन भगवत स्तदक्षीण रागतया परिवये नेषत्स्नेह गर्मानुकम्पासभावात् छद्मस्थ तयाऽना- गत दोषानवगमादऽवश्य भावीत्वाच्च तस्यार्थेति भावनीय ।
* सुभद्राधिकार
[१५६
वलि मुनि शिर थी सोय रे, जूवा लौखां काडिया।
तमु लेखै अवलोय रे, तेहने पिय हुवे शुभ क्रिया ॥१३॥
मुनि अति षा अचेत रे, सचित अचित जल पाय कर।
कौधो ग्रहस्थ सचेत रे, तसु लेखै हुवै शुभ क्रिया ॥१३॥
थाको मुनि उजाड़, गाडै हय खर चाढ़ करि।
आणे ग्राम मझार रे, तसु लेखै हुवै शुभ क्रिया ॥१३७॥
इत्यादिका अवलोय रे, मुनि ने जे कल्यै नहीं।
ते करै कार्य गृहौ कोय रे, तसु लेखे पिण शुभ क्रिया।१३८
जो या बोलां रैमाहिरे, न हुवै गृही ने शुभ क्रिया।
तोहरस छेद्यां पिण ताहि रे, किम शुभ क्रिया कहिनिए ।
हरस छेदण रौताम रे, जिन मुनि आज्ञा नहिं दिये।
जिन आना विन काम रे, कौधा नहिं छै धर्म पुण्य ॥१४॥
॥ इति अनुकम्पा अधिकार ॥
-
॥अथ चौवीस सुभदाधिकार ॥
॥ दोहा ॥
फांटो काद्यो आंख थी, सती सुभद्रा ह ।
किणौ सूत्र में ए नहीं, कथा विषै छै एह ॥ १ ॥
जो सुभद्रा ने धर्म है, तो मुनि ना अवलोय ।
अन्य कार्य वाई कियां, तसु लेखै धर्म होय ॥२॥
१६६]
*गोशालाधिकार
माटी सूल सहीत तिण, तुरत उपाड़ी नेह ।
एकन्त न्हाख्यो तदा, ते तिल थम्म प्रतेह ॥३२॥
तरिक्षण थोडी दृष्टि करि, थंब्यो तिल थम स्थान ।
थया सप्त तिल फूल चवि, एक फलौ में आप ॥३३॥
गोशाला साथै तदा, ई आयो कुर्म ग्राम।
तेहि नगर रै बाहिरै, बाल तपखी ताम ॥३४॥
नाम वैसियायिण तिको, तम छ? छ? करह ।
रवि सन्मुख आतापना, तिहां लेतो विचरेह ॥३५॥
तसु थिर थौ रवि ताप करि, यूँका भूमि पडन्त ।
तास दया अर्थे तिको, बलि.२ शिरै धरन्त ॥३६॥
तब गोशालो मुझ पास थी, बाल तपखौ पाहि।
धौरे धीरै आय
ने, बोल्यो एहवी वाय ॥३०॥
स्य मुनि तपखौ अछ, तथा तत्व जाण ।
यत्तौ तथा तू कदा ग्रही, के जू सिज्यातर माण ॥३८॥
गोशाला ना वचन ने, तिण आदर नहिं दौध ।
मन में भन्नो न बाणियो, साधौ मौन प्रसिद्ध ॥३६॥
बेवण वार गोशाल तब, बोल्यो तिमहिन बाण ।
स्यूं तूं मुनि तपखी अहै, जाव आं रो स्थान ॥४०॥
बाल तपखौ शीघ्र तब, कोप बढ्यो पसराल ।
जे पातापन भूमि थी, पाशे बलियो हाल ॥४॥
~~~~ * सुभदाधिकार* [१६१ फांटो काद्यो सुभद्रा, धर्म हुसी ज्यो तास । तो यांने पिया धर्म है, तिण रै लेख विमास ॥१॥ साधू 'रा कारज करै, वाई जे निण रौत। तिम कारज भाई करे, श्रमणौ ना धर प्रौत ॥१४॥ जो सुभद्रा ने धर्म है, तो श्रमणो नो नोय । भाई फांटो आंख थी, काडयां पिण धर्म होय ॥१५॥ वलि कांटो पग मांहि थी, श्रमणौ तणोज सोय। भाई काटे वेह में, तसु लेखे धर्म होय ॥१६॥ वलि गोलो श्रमणौ तणो, पेट पेटूची जोय । भायो मसलै तेह में, तसु लेखै धर्म होय ॥१॥ शिर दावै श्रमणौ तणू, भायो तमु दुःख देख । दूम मुच्छौ मसलै तसु, धर्म होसी तसु लेख ॥१॥ मलम बगावै दुखणे, वलि अज्झा पड़तौ जोय । भायो भेले वेहने, तमु लेखै धर्म होय ॥१६॥ पड़ती ने बैठौ करे, इत्यादिक अवलोय। श्रमणो ना भायो करे, तमु लेखै धर्म होय ॥२०॥ साधू रा बाई करे, तास धर्म के सोय। तोश्रमणौनाभायो कियां, तिण में पध किम होय ॥२१॥ सुभद्रा फांटो काडियो, जो तिल मे धर्म होय । तो सारां में धर्म है, न्याय सरिषो नोय ॥२॥ २१ १६८] *गोशालाधिकार MARA ॥दोहा॥ उष्ण ते प्रति संहरी, मुझ प्रति बोल्यो बाय । जाण्या भगवन् आपने, नाण्या २ ताहि ॥५॥ पाप तणा ज प्रसाद थी, दग्ध हुभो नहि एह । संघम धौ गत शब्द ने, बार २ उचरेह ॥५१॥ ॥गीतक छन्द ॥ कधुं हत्ति में गोशाल नो भगवन्त संरक्षण कियो। सराग भावे करि प्रभु इक दया रस थी राखियो । जे उभय मुनि नवि राखस्ये ते बौतराग पणे हत्तौ। फुन लब्धि पण फोडण थकी बलि अवश्य भावी भाव थी। ॥ अत्र टीका ॥ इह च यद्गोशालकस्य संरक्षणं भगवताः कृतं तत्सरागत्वेन वये. फरसत्वाद्गवतः यच्च सुनक्षत्रसर्वाणुभूति मुनिपुंगवयोर्न फरिष्यति तद्वीतरागत्वेन लधिनुपजीवकत्वात् अवश्य भावित्वा त्यवसेयं इति॥ ॥ दोहा ॥ गोशालो तिण अवसरे, सुभ प्रति बोल्यो वाय । जसिय्यातरियो किसू, तुझ प्रति भाषै ताहि ॥५३॥ जाण्या मगवन्त तो भणी, जाण्या जाण्या सोय । तब ई गोशाला प्रवे, इम बोल्यो अवलोय १५४॥
* गोशालाधिकार
[१६३
वौर कहै सुण गोयमा, गौ नौ शाला माय ।
ए बन्यो तिज कारण, नाम गोशाल कहाय ॥ ५ ॥
हूं तीस वर्ष घर में रहौ, ग्रह्यं चरण मुख राशि।
प्रथम वर्ष पख पख सुतप, अष्टौ ग्राम चौमास ॥ ६ ॥
तप मास मास दूजे वर्ष, नगर राजग्रह वार ।
नालंदा पाडा मो, चौमासो सुविचार ॥ ७ ॥
तन्तुवाय शाला विषै, हूं तप करत विशेष ।
आय रयो गोशाल पिण, वे शाला दूक देश ॥८॥
प्रथम मास , पारखो, विजय तणे घर कौध ।
प्रगट हुवा ने पञ्च द्रव्य, महिमा देख प्रसिद्ध है।
गोशालो कह्यो मुझ भयो, थे धर्माचार्य सोय ।
धर्मान्तवासी प्रभू, हूं तुम्हनो अवलोय ॥१०॥
तब मैं तेहना वचन ने, आदर न दियो कोय ।
मन मे भलो न बागियो, धारी मौन सु जोय ॥११॥
द्वितीय मास नो मारचो, अनन्द ने घर कौध ।
तिमहिन गौशाले कयो, मैं आदर नही दौध ॥१२॥
बतीय मास ने पारणो, कियो सुदर्शन गेह।
तिमहिन गौशाले कहो. मैं आदर नही देह ॥१३॥
तूर्य मास ने पारणो, कोल्लाक संनिवेश ।
ब्राह्मण बहुल तणे घरे, करि चाल्यो सुविशेष ॥१४॥
१७.]
*गोशालाधिकार
-~-
॥ दोहा॥
-
विण अवसर गोशाल ते, सांभल बच मुझ पास ।
विहनो यावत् पामियो, अत हो भय मन वास ॥६॥
मुझ प्रति वन्दी नमण करि, चूम बोल्यो अवलोय ।
संक्षिप्त विस्तीर्ण प्रभु, तेज लेश किम होय ॥६४॥
तिण अवसर हूं गोयमा, गोशाला प्रति ताहि ।
तेह मंखलौ पुत्र प्रति, वोल्यो दूह विध बाय ॥६५॥
दूक मुठी उडदै करी, फुन जे उष्ण जलेह ।
दूक पुशली तप छट छटै, अन्तर रहित करेह ॥६६॥
अंची बांह आतापना, सूर्य संनमुख लेह ।
तमु छेहरे षट् मास रै, वेज लेश है वह ॥६॥
गोशालक तिण अवसरै, ए मुझ पर्थ प्रतेह ।
सम्यक् प्रकारे विनय करि, अंगीकृत करेह ॥६८॥
तिण अवसर हू गोयमा, गोशालक संघात ।
अन्य दिवस कुर्म ग्राम ने, नगर थको विख्यात ॥६॥
सिद्धार्थ फुन ग्राम ने, नगरे आवत ताम ।
तिल थम मुझ पूछियो, भट आव्यो वे ठाम 1001
तब गोशालो मुझ प्रते, बोल्यो एहवी बाय ।
मुझने प्रभु तुम्ह जद कडं, तिल निपजसी ताहि ॥७॥
गोशालाधिकार [१६५ ॥दोहा॥ तदन्तर ई गोयमा, गोशाला रे साथ। भोगविया षट् वर्ष लग, लाभ अलाम सञ्चात ॥२३॥ सुख दुःख ने सत्कार फुन, असत्कार फुन सोय । अनित्य नागरणा जागतो, ई विचयो अवलोय ॥२४॥ मृगशिर मासे एकदा, ई गोशाला साथ । ने सिद्धार्थ ग्राम थो, कुर्म ग्राम प्रति जात ॥२५॥ तिल बूटो बूक देख ने, मुझ प्रति तब गोशाल । ए तिल नौपनसक नहीं, दूम पूछयो विह काल ॥२६॥ सप्त नीव तिल पुष्प ना, मरौ २ ने किहां उपनसे हे प्रभु! तब ई वोल्यो वाय ॥२७॥ नौपजसै तिल थम्भ ए, फूल नौव ने सात । मरी मरी ए एह ने, तिल थम्म विषै विख्यात ॥२॥ एक फलौ जे तिल तणी, वह विषै अवलोय । ए तिल सप्त हुरये सही, दूम मैं भाष्यो सोय ॥२६॥ तब गोशालै मुभ बचन, श्रद्दयो नहिं मन मांहि । प्रतीतियो पिण नहीं तिणे, रोचवियो पिण नांहिं ॥३०॥ मुझ ने झूठो घालवा, धौरै धौरै तास । पाछो वल ने आवियो, ते तिल बूटा पास ॥३१॥ ताय।
॥
।
१७२]
*गोशालाधिकार
दूम निश्चय गोशालका, बनस्पति रै मांहि ।
पउह परिहार कर तिके, मरोमरि तमु तन आया।
॥ टीका ॥
पारिखत्य मृत्वा २ यस्तस्यैव वनस्पति शरीरस्य परिहार परि-
भोग स्तनै वोत्यादो सौ परिवृत्य परिहारस्त ।
वार्षिका
बनस्पति कहतां वनस्पनि ना जीव जे पारिवृत्य २ क मरीमरी ने
एहिज बनस्पति ना शरीर नो परिहार क० परिमोग ते तिहाडज टपनg
ते पारिवृत्य परिहार कहिईते प्रति पहिरति कहतां करे
॥ दोहा ॥
तिण अवसर गोशाल ते, मुभा दूम को छतेह ।
एह अर्थ श्रद्ध नहीं, नहीं प्रतीत न रुचह ॥८॥
एह अर्थ अथ श्रद्धती, निहां तिल खन्भ त्यां आय ।
ते तिल घम्भ थौ तिल तणो, सङ्गखो तोड़े ताहि ॥८॥
ते तिल संगली तोड़ने, करतल विषै न सोय ।
सप्त तिलं पाई तदा, प्रगट पणे सु नोय ॥५॥
तिण अवसरं गोशाल ने, गिणतां ते तिल सात ।
एहबु मन में चिन्तव्यु, जाव समुत्पन्न नात ॥६॥
म निश्चय सहु जीव पिण, पउट परिहार करह।
है गोतम गोशाल नूं , पउट वाद कह्यु एह ॥८॥
*गोशालाधिकार
[१६७
समुदघात तेजस प्रवे, करै करी अवलोय ।
सात आठ पग ते तदा, पाछो उसरी सोय ॥४२॥
मड्डलि पुत्र गोशाल ने, हणवा काजे जाण ।
काढे तेन शरीर थी, ए तेजू उष्ण पिछाण ॥४॥
तिण अवसर ईगोयमा, गोशालक नौ नह।
वह मङ्कली पुत्र नौ, अनुकम्पा अर्थह ॥४४॥
वेमियायण नामे तिको, वाल तपखी नेह ।
वह तणी ने तेज प्रति, दूर हरण अर्थेह ॥४५॥
तापस ने गोशाल रै, दूहां विचाले न्हाल ।
शीतल तेजू लेश्य प्रति, मैं कौ तिण काल ॥४६॥
॥चौपाई॥
जा मुभ शीतल तेशूलेशं, तिण लेश्या करि ने सु-
विशेष । बेसियायण तापस नौ नाणी, उन्ही तेजु लेश
हणाणी ॥४on बेसियायण तपखौ तिह अवसर, मुझ
शीतल तेजु लेश्या करि। पोता नी ने उष्ण पिछाणी,
तेजु लेश्य हणाणी जाणौ ॥४॥ गोशाला ना तनु ने
तायो, बाण्यो किञ्चित पौड़ न पायो । देख्युं छवि छेद
अण करतो, ते उष्ण तेजु लेश्य महरतो॥ ४६॥
१७४]
*गोशालाधिकार*
रे काशव तूं इम कहै, मखलौ सुत गोशाल ।
धर्मान्तवासी माहरो, पिण हूं नहौं ते न्हाल ॥६॥
मंखलौ सुत गोशाल ते, धर्मान्तवासी तीय।
ते तो काल करी गयो, सुरलोक अवलोय.॥१७॥
महाकल्प चौरासी लक्ष, सप्त देव भव सार।
सप्त संयूथा सन्नि गर्भ, सप्त पउट परिहार ॥८॥
इत्यादिक निन शास्त्र नी, वत्तिका कही बणाय ।
जीव उदाई नाम हूं, पिण गोशालो नाय ॥een
गोशाला रै तनु विषै, अम्हे कोधू' प्रवेश ।
सप्तम् पौट परिहार ए, दूत्यादिक ने घशेष ॥१
चोर तणो दृष्टान्त प्रभु, गोशाला ने दोध ।
तब गोशालो बोलियो, अगल डगल बहु विध ॥१०॥
श्रवानु भूत्ति मुनि तदा, गोशाला पै आय।
भगवन्त ने अनुराग करि, बोल्यो एहवी बाय ॥१०२॥
समण; माहण पै एक पिण, आर्य बच धारह ।
तो पिण तसु बन्दै नमै, यावत सेव करेह ॥१०॥
तोस्यु कहियो गोशाल तुझ. भगवन्त प्रवर्या दोध!
निश्चय भगवन्त मूडियो, शिष्य पणे सुप्रसिद्ध ॥१०४॥
वृत्ति , पणै करिने बलौ, सेव्यो भगवन्त तोय ।
सौखावी भगवन्त तुझ, तेजु लेश अवलोय ॥१०॥
* गोशालाधिकार [१६९ हे गोशाला तू दूहां, बेसियायण नामेह । बाल तमखो प्रति तदा, देखी नेव करेह ॥ ५५ ॥ धौरै २ असरौ, मुम पासा थी ताहि । निहां वैसियायण तिहां, नई बोल्यो इम बाय १५६॥ ॥चौपाई॥ स्यं तूं मुनि तपखौ छै कोई, तथा तत्व नो बाण सु होई। स्यूं तूं यती कदायही कहियो, के तूं जुनूं सिय्यातरौयो ५० बेसियायण तपखौ तिवार, तुक बच आदर न दिये लिगारं। मन में पिण भलो न जाणे, रह्यो सून धरौ तिह टाणे ॥५८॥ अहो गोशाला तूं तब हेर, तिण बाल तपखौ प्रवेज फेर। तुं मुनि के जाव — सैया तरियो, इम बै वण वार उच्चरियो ॥५६॥ तब बाल तमखौ शीघ्र कोप्यो, नाव पाठो असर चित्त रोप्यो । तुभ हणवा वजू केह, तब हूं तुझ अनुकम्पा अर्थेह ॥ ६ ॥ तिणरो उष्ण वेजू हणवा न्हाल, को शौतल तेज अन्तराल। तब बाल तपखी चित्त ठाणी, उष्ण तेजू हणाणी जाणौ ॥ ६१ ॥ पौड तुझ तनु नवि देखेह। उष्ण तेजु लेश्या सहरेह। तब मुझ प्रति बोल्यो वाय, जाण्या २ हे भगवन् ताहि ॥ ६२॥ २२
* गोशालाधिकार
....
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छद्मस्थ थको छः मास मे, काशव काल करेह ।
प्रभु कहैई वर्ष सोल लग, गन्ध गन जिम विचरह।११६॥
ते मूंको तेजू तिका, पैठौ तुम तनु न्हाल।
वह थौ सप्तम निशिम:,तूं करसी छदमस्थ काल ॥११॥
पुर में जन कहै उभय निन, लवै माो मांहि वाय ।
कुण सांचो झूठो कंवण, आश्चर्य ए अधिकाय ॥ ११८ ॥
गोपालो निन स्थान नई, सप्तम निशि सुविचार ।
सम्यता पामी पात्म निन्द, काल कियो तिहवार ॥११॥
प्रभु वेदन षट् मास सही, पछै विजोरा पाक।
लौधै तनु प्राक्रम बध्यो, प्रभुजी होगया चाक ॥१२०॥
गीयम तब वे मुनि तणी, पूछौ फुन पूछेह ।
अन्तवासी आपरो, कुशिष्य गोशालक नेह ॥ १२१ ॥
काल करी ने किहां गयो, प्रभु भाष्यो सुविशाल ।
अन्तवासी मांहरो, कुशिष्य गोशालक न्हाल ॥१२२॥
श्रमण घातक छट्मस्थ थको, काल करौ सुजगोस ।
अच्युत् कल्पै अपनो, स्थिति सागर बावीस ॥ १२३ ॥
भगवती पनर में शतक में, छै बहुलो विस्तार ।
यहां संक्षेप थकी कयो, गोशालक अधिकार ॥ १२४ ॥
कही सूत्र में तिमज कड्यु, हिव तसु कहिये न्याय ।
प्रभु शिष्य कियो गोशाल ने, बलि बचायो ताय ॥१२॥
-~
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* गोशालाधिकार
[१७१
तिमन सप्त पुष्प जीव चवि, एक संगली माय।
हुस्ये सप्त विल वह बच, मित्थ्या प्रत्यक्ष दिखाये ॥२॥
ते तिल स्थम्भ न नौपनो; सप्त पुष्प ना नौव ।
चवी सप्त तिल नवि धया, दूक सुंगणी में अतीव ॥७३॥
तिण अवसर हूँ गोयमा, गोशालक प्रति बाय ।
बोल्यो तैं मुझ जद वचन, श्रयो नहिं मन माय ॥७४॥
प्रतीतियो नहिं रोचव्यो, एह अर्थ अवलोयं ।
मनमें अश्रइतो छतो, झूठी घालण मोय ॥७॥
ए मिथ्यावादी हवो, इम मन करौ विचार । .
मुझ थौ पायो ऊसरी. धीरे धीरे धार ॥१६॥
निहां तिल थम तिहां पायने, यावत एकान्त ठाम ।
न्हांख्यो ते उपाड़ ने, हे गोशालक ताम ॥७॥
तत्खिण वादल अभ् दिस्य. प्रगट थयो तिहवार ।
अम बदल ते शीघ्र हौ, तिमहिन यावत धार ॥७॥
तेह तिलनां स्थंभ नौ. एक संगली माहि।
तदा अपना सप्त तिल, गेम कायु तिम ताहि ne
हे गोशाला तेह ए, तिल नूं स्थंभ निष्पन्न ।
नथौ तेह अण नौप, निश्चय करौ सुजन्न ॥८॥
तेह सप्त पुष्प जीव चवि, एतिल स्थम्भ नौ जाण ।
एक संगलो ने विषै, थया सप्त तिल आण ॥८१॥
१७८]
*गोशालाधिकार
~~
१
॥दोहा॥
अक्षौण राग पणे करौ, अङ्गीकार प्रति ख्यात।
ते राग भाव में धर्म किम,समको सुगण सुजात ।१३।।
वलि परिचय करी ने कह्यो, ईषत् स्नेह अनुकम्प ।
एह कार्य प्राको हुवै, तो इह विध कम पर्यम्प ॥१३५॥
पक्षीण राग पणा विषे, परिचा विषय सुजोय ।
स्नेह अनुकम्या ने विषै, भलो कार्य किम होय ॥१३६॥
बलि अनागत दोष ना, अजाणवा थी जोय ।
अङ्गीकार कौधो कह्यो, ते दोष किसो अवलोय ॥१३७॥
ए तिल नोपजसे कह्यो, तिण दौधो तुरत उपाड़।
हिन्सा जौवारी हुई, ए अवगुण अवधार ॥ १३८ ॥
बलि लब्धि फोड गोशाल नो, रक्षण कौधो ताय"
तिण बहु मिथ्यात बधावियो, एपिण अवगुण थाय ।१३।।
बलि तेनु लेश्या प्रते, सौखावी भगवान ।
तिण लेश्याई मुनि हण्या, ए पिण अवगुण जान ॥१४॥
बलि प्रताप ना प्रभु ने करी, तेजू लेश्य करेह ।
वेदन पति षट् मास सही, प्रत्यक्ष अवगुण एह ॥१४१॥
बलि तिल बूटो नौपनो, एम कयो .भगवान।
तरिक्षण तिणे उपाडियो, ए पिण अवगुण जान ॥१४२॥
NAM
~~
॥
॥
गोशालाधिकार
[१७३
है गोतम गोशाल नूं, मुझ मासा थी जेह ।
आत्मबूं करि के तमु, पडिबु जुदो कह गया
वार्तिका
आयाए पाठ नो अर्थ, वृत्तीकार मायाए पाठ नावे अर्थ किया:-
भगवन्त कई म्हारा पासा थी मायाए कहता आत्मई करी अपक्रम ते
जुदो पडयो निसलो अथवा आयाए कहता आदाय तेजू लेश्या नूं
उपदेश ग्रहण करी ने जुदो पड़यो।
॥ इति आयाए पाठ नूं अर्थ ॥
तिण अवसर गोशाल ते, एक मुठि उडदेह ।
एक पुसली उष्णोदको, छट् यावत् विहरेह ॥८॥
तिण अवसर गोशान वे, षट् मास अवलोय ।
संक्षिप्त विस्तीर्ण तिका, तेजु लेश्यवन्त होय ॥६॥
विण अवसर गोशाल पै, पाय नाथ ना जोय ।
घट् साधू भागल हुन्ता, आवौ
मिलिया सोय ॥
गोशाला ने गुरू पणे, पडिवम रहिता जेह ।
ते साथै तिमहिन सहु, पूर्व कह्या तिम लेह ॥१२॥
यावत् ए अजिन छतो, पिण जिन शब्द उच्चार ।
प्रकाशमान छतो न ए, बिचरे के दूहवार ॥६॥
मोटौ प्रषध ने विषै, वौर. कही ए बात।
गोशालो सुख कोपियो, निज संघ प्रति ले साथ ॥E४॥
वीर समीमै प्राय ने, बोल्यो एहवौ बाय।
भलो कहै रे काशवा, आयो कहे रे ताहि ॥२५॥
१८०]
*गोशालाधिकार*
प्रभु कयो अन्तवासौ मुझ, कुशिष्य गोशान्न जगौस ।
अच्युत्कल्यै अपनो, स्थित सागर बावीस ॥१५॥
नवमें शतके भगवती, तेतीसम
तेतीसम उद्देश।
गौतम पूछयो वौर प्रति, सांभल जो मुविशेष ॥१५४॥
अन्तवासी कुशिष्य तुझ, जमाली अणगार।
काल करौ किहां ऊपनो, प्रभु भाषे तिवार ॥१५५॥
अन्तवासी कुशिष्य मुभा, जमालौ अणगार।
लन्तक कल्प अपनो, किल्विष पणे विचार ॥१५॥
जमालो ने कुशिष्य कथु, तिमहिन कुशिष्य गोशाल ।
ते माटै बिहु शिष्य हुन्ता, देखो नयस निहाल १५७॥
अन्तवासी बिहुँ भणी, पाख्या श्री जगनाथ ।
बलि कुशिष्य विहुँने काया, देखो तब पखपात ॥१५
कुपूत कहिवै पूत धुर, तिमहिन रौत पिछाण ।
कुशिष्य कहिवै शिष्य धुर, समभो चतुर सुजाण ॥१५॥
अङ्गीकृत पाख्यो प्रथम, श्रवानुभूति ख्यात ।
कह्यो सुनक्षत्र मुनि बलि, फुन प्रभु कयो विख्यात।१६॥
तास कुशिष्य कयो बलि, ए पञ्च ठाम पहिछान ।
दीक्षा गोशाला तो, देखोजी बुद्धिवान ॥१६॥
नवमें ठाणे. इत्ति में, जिन छद्मस्थ सुजोय ।
दीक्षा न दियै बूम कयो, शिष्य वर्ग ने सोय ॥१६२॥
-
*गोशालाधिकार
[१७५
वलिभगवन्त बहुश्रुतकियो, भगवन्त थकौन सोय।
भाव अनार्य पडिमियो, ते माटै अवलोय ॥१०॥
मति दूम है गोशाल तुम, करण योग्य नहि एह। ..
वहिन छाया. ताहरौ, नहीं पनेरौ नेह ॥१०॥
सुण गोशालो कोपियो, तेनु लेश करि ताम ।
श्रवातु भूति मुनि प्रते, भस्म कियो तिण ठाम ॥१०८
हितीयवार गोशाल फुन, कठिन वचन अधिकाय ।
नष्ट वियष्टादिक कह्या, तब सुनक्षव मुनिराय ॥१०॥
निम श्रवानुभूति कहो, तिमहिन कह्यो विचार।
गोशालो तब तेल करि, परितापै तिहवार ॥११॥
प्रभु पै आवौ बन्दि नम, महाबत प्रति भारोप।
सन्त सत्यां ने खाम ने, कौधो काल प्रकोप ॥११॥
ढतीय वार गोशाल फुन, प्रभु प्रति निठुर वदेछ ।
तब प्रभु गोशाला प्रते, मुनि कहो तिमन कहह ॥११॥
हे गोशाला तो भणी, मैं प्रवा दौष ।
यावत मैं बहुश्रुतिकियो, म्लेच्छ भाव ते कोध ॥११॥
गोशालो सुण कोपियो, न्नु थी काढे तेन ।
प्रभु ननु परितापै तदा, पिण तनु नहिं पैसेन ॥११॥
गोशाला रा तनु विषै. पाी पैठी आय ।
लागी दाह शरीर में, बोल्यो प्रभु प्रति वाय ॥११॥
*गोशालाधिकार *
भावै स्नेह अनुकम्प कहो, भावै मोह अनुकम्प ।
श्री जिन आज्ञा वार है, सावद्य तेह प्रपञ्च ॥१७॥
मोह कर्म ना उदय थी, स्नेह राग ए होय ।
तिण सुस्नेह अनुकम्प ते,मोह अनुकम्मा जोय ।१७११
स्नेह किण सुं करिवी नहिं, भाष्यो श्री जिनराय ।
उत्तगध्ययने आठमें, दूनी गाथा मांय ॥१७२॥
ईषत् स्नेह कनुकम्प कही, ते अनुकम्या सोय ।
सावध पाप सहित्य है, अथवा निर्वद्य जोय ॥१७॥
जो निर्वद्य अनुकम्प ए, तो ईषत् क्यु ख्यात ।
पूरण कृपा करि प्रभु, म कहता अवदात ॥१७॥
ईषत् स्नेह अनुकम्प ए, जो सावध है सोय ।
तो सावद्य में धर्म नहीं, हिये विमासौ नोय ॥१७॥
ईषत् लोभ भलो नहौं, ईषत् भलो न मान ।
ईषत् माया नहीं भली. तिम ईषत् स्नेह नान ॥१७६॥
ईषत् झूठ भलो नहौं, ईषत् भलो न क्रुद्ध ।
ईषत् प्रदत्त भलो नहौं, तिम ईषत् स्नेह अशुद्ध ॥१७॥
गौतम ने जिन स्नेह थी, अटक्यो केवल ज्ञान ।
तो गोशाला रा स्नेह थी, धर्म पुण्य किम जान ॥१७॥
काल अनागत दोष पिण, इत्तिकार पाख्यात ।
तो प्रशंसवा योग्य ए, कार्य्य फेम कहात ॥१७॥
गोशालाधिकार* [१७७ गोशाला नौ वारता, प्रभुजी धुर सूख्यात । मास २ तय द्वितीय वर्ष, म्हे कौधो सुविख्यात ॥१२६॥ प्रथम मास ने पारणे, विनय तणे घर कौद्ध। गोशालो कयो पाप गुरु,ई तुम शिष्य प्रसिद्ध ॥१२७॥ तसु अनौकार मैं नवि कियो, द्वितीय मास ने बाण । पारण गोशालै कथु, तिथहिज रौत पिछाण ॥१२॥ अङ्गीकार न कियो तदा, वतीय मास रै जेह । पारण फुन गोशाल कथु पिण मैं अङ्गीकृत न करेह।१२६। जो शिष्य करवानौ गैत हुवै, तो प्रथम बार हो पख। अङ्गीकार करता प्रभु, न्याय विचारौ देख ॥१३०॥ तूर्य मास ने पारणे, तिमन कयूं गोशाल । मुझ धर्माचार्य तुम्हे, ई धर्म अन्तवासी न्हाल ॥१३॥ मैं अङ्गीकार कौधो तसु. इम कयो सूत्र विषेह । 'वत्तिकार एहवो कऱ्या, सांभलनो चित्त देह ॥१३२॥ ॥ गीतक छन्द ॥ अनौण राग पणा थेको, परिचय करी ने नानियं। ईषत् स्नेह अनुकम्पना, सद्भाव थौ पहिछानिय ॥ अवा: अनागत. दोष ना, अजाणवा थौ आद्रत। फुन अवश्य भावी भावधौल, पजोग प्रति अङ्गीकृतं ॥ ..
~~
१८४]
*गोशालाधिकार
इहां सराग पणे कयो, ते सराग पणारे मांय ।
धर्म पुण्य किण विध हुवे, देख विचारो न्याय ॥१६॥
सराग पणो - कहि ने पर, दया एक रस ख्यात ।
जिसो सराग पणो हुवे, तिसौ दया ए थात ॥१६॥
सराग भाव निवद्य नहौं, तिम दया न निर्वद्य एह ।
दोन सावध जाणवा, न्याय विचारी लेह ॥१२॥
बै साधु नवि राखिया, वे वीतराग भावह ।
यावन्त पिण जद हुन्ता, पिण सावद्य दया न तेह॥१८॥
वीतराग थयां · पछै, भाव सगग न होय ।
तिम वीतराग घयां पछे, सावंद्य दया न कोय ॥१६४॥
कोई कहै सावद्य दया, किहां कही है ताम।
न्याय कहूं छु तेहनो, सुण राखो चित्त ठाम ॥१५॥
हमि नाम माला 'विषै, पाठ' दया रा नाम।
दया शूक कारुण्य फुन, करुणा वृणा जु ताम ॥१६॥
कृपा अने अनुकम्प फुन, वलि अनुक्रोश कहाय ।
नाम 'एकार्थ आठ ए, 'तीय काण्ड रै माय ॥१७॥
॥ अथ हेमिनाम माला में आठ दया रा
नाम कह्यो ते लिखिये कै॥
सूरतीय दयाशुकः कारुण्यं करुणा घृणा कृपानु कम्पानु कोशो इति॥
निन ऋष रहोमो जीवियो, रत्तन होप नी जेण ।
देवी नौ करुणा करी, ज्ञाता नवम् अध्ययन ॥१८॥
'. *गोशालाधिकार* [१०६ एम अनागत दोष ना, अजाणवा थी हाल । प्रभु छमस्थ पणे कियो, अङ्गीकृत गोशाल ॥ १४३ ॥ जो ए अवगुण नासता, तो कम करै अङ्गीकार । मिण उपयोग दियो नहीं, वा न्याय विचार ॥१४४॥ जो अपर अनागत दोष हुवै, तो कहिये तसु नाम। प्रगट बत्ति में आखियो, दोष अनागत ताम ॥ १४५ ॥ कोई कहे गाशाल ने, अगीकार कृत ख्यात । पिग दौमा दौधौ दूसो, किहां पाट अवदात ॥१४॥ श्रवातु भूत्ति मुनि कह्यो, है गोशाला तोय । प्रवा दौधौ प्रभु, वलि प्रभु द्यो सोय ॥१४॥ वृत्ति पणे सव्यो प्रभु, सौखायो भगवान । बलि वहु श्रुति प्रभु कियो, प्रगट पाठपहिछान ॥१४॥ बुमन सुनक्षत्र मुनि कयो, इम प्रभु कयो प्रसिद्ध । है गोशाला तो भयो, म्हे न प्रवा दोध ॥१४॥ यावत् मैं बहु श्रुत कियो, मुझ सेती इहवार । भाव अनार्य पडिवज्यो, इम पाख्यो जगतार ॥१५॥ तव गोशाले जिन अपरै, सूको तेजू लेश। प्रभु षट् मास लगे सहौ, वैदन अधिक विशेष ॥१५॥ ने षट् मास थयां पढ़, प्रभु तनु थयो निराम। गौतम पूछो कुशिष्य तुझ, मर उपनो किण ठाम ।१५२।
५८६] *गोशालाधिकार -~~-~ तिण । तेज लब्धि प्रति, फोड़ी ने भगवान । गोशाला ने राखियो, छमस्थ थकां पिछाण ॥२०॥ केवल जान थयां पछे, लब्धि फोडवणी नाहिं। बहु ठामे वर्नी प्रभु, 'देखो सूत्रे मांहि ॥२१॥ पद छत्तौसम पन्नवणा, वैक्रिय लब्धिन ताय । फोद्यां किया जघन्य त्रण, उत्कृष्ट पञ्च ही पाय ॥२११॥ इमहिज पाहारिक लब्धि प्रति, फोद्यां थी पहिछान। जघन्य तौन क्रिया कहो, उत्कृष्ट पञ्च सुनान ॥२१२॥ महिंज तेन लब्धि प्रति, फो. तेह ने जोय । जघन्य तीन क्रिया कहो, उत्कृष्ट पञ्च ज होय ॥११३॥ तेजु लब्धि जे 'फोडवी, प्रभु छमस्थ पणेह । केवल लयां क्रिया कहौ, वैक्रिय नौ परै एह ॥२१४॥ सरागभाव करि कार्य कृत, तास स्थाप स्यु होय। केवल लयां पछ कयो, ताम स्थाप के सोय ॥२१॥ कोई कहै अनुकम्प करि, प्रभु राख्यो गोशाल । ते माटै दूहां धर्म है, उत्तर तास निहाल ॥२१६॥ बुद्ध तणी अनुकम्म करि, कृष्णे ईट उपाड़। तास घरे मेलौ कही, अन्तगडे अधिकार ॥२१णा सुलसांनी अनुकम्प करि, पुत्र देवको नां जः। {क्या हरण गवेषि सुर, सूव पन्तगड साज ॥२१॥ .
गोशालाधिकार [१८१ ॥ अथ ठाणांग नवमें ठाणे टीका में कह्यो छै तीर्थकर छद्मस्थ थका दीक्षा न दिये ते गाथा लिखिए छै॥ न परोवए सिया नय, छउमत्या परोवए। संपि दिविनय सौस वग्गो, दिरकन्ति जिणा जहासचे ॥ केवल उपजिया बिना, दीक्षा दौधौ आम । अक्षौण राग पणे करी, परिचय स्नेह प्रताय ॥१६॥ वलि अजाण पणा थको, मह अनागत दोष। वत्तिकार पिण दूम कयो, तो मुझ थी क्यूं अपसोस ॥ अयोग ने अलौकार कृत, एम कर्दा उत्तिकार। जे दौक्षा देवा योग्य नहीं, वह प्रयोग विचार ॥१६५॥ अक्षौण राग पणे कयो, ते राग भाव रै मांहि । आणां कीवली नौ अछ, अथवा आजा नाहिं ॥१६॥ वलि परिचय करि ने कहो, ते परिचय पहिचान । आछो छ अथवा बुरो, न्याय विचार सुजान ॥१६णा •षत् स्नेह गर्भानुकम्प, सभाव थौ अवलोय । अङ्गीकृत कॉ हत्ति में, तास न्याय हिव नोय ॥१६॥ में अनुकम्पा ने विषे, स्नेह रह्यो है ताय । स्नेह गर्भ अनुकम्प ते, मोह अनुवाम्य कहाय ॥१६६ १८८] गोशालाधिकार भगवती गौतम गुण मम तेजु लेश्या प्रति ताहि । संकाचे वे गुण कयो, फोड्यां गुण कयो नाहिं ॥२२॥ इत्यादिक बहु सूत्र में, तेजू वैक्रिय आदि। मुनि ने लब्धि न फोडणी, देखो धर प्रहलाद ॥२३०॥ जो लब्धि फोड गोशाल ने, राख्यां धर्मन होय । तो वे मुनि प्रतिराख्या न क्यूं.न्याय विचारीजोय ॥२३१॥ जब कहै बै मुनिवर तणो, मृत्यु जाण भगवान । तिण कारण राख्या नहीं, हिव तमु उत्तर जाण ॥२३२॥ त्तिकार तो हम कयो, वीतराग भाविह। लन्धि अण फोद्यांथको, वलि अवश्य भावी है एहार३३॥ शीतल वेन लब्धि प्रति, अण फोड़वा थी ख्यात । तिण मुंशीतल तेजु पिण, किम फोडै जगनाथ ॥२३॥ ज्यो प्रभु बै मुनिवर तणो, नाण्यो मृत्यु जिंवार । तो मुनि गौतम आदि त्यां,क्यं नहिं कीधी सार ॥२३५॥ गौतम आदि विषै हुन्ती, शीतल तेजू लेश । त्यां लब्धि फोड राखा नक्यु, बेमुनि प्रति सुविशेष । जब कहै गौतम आदि प्रते, वा प्रभुजी ताय । तिण सुमुनि राखया न बे, निसुणोतहनो न्याय ॥२३॥ प्रभु तो आनन्द ने कहो, तू मुनि प्रते कहह । धर्म प्रति चोयण मत करो, गोशालक थौ नेह ॥रश्ता
* गोशालाधिकार
[१८३
होणहार निश्चय तिको. टाल्यो नहीं टलन्त ।
तिण कारण गोशाल ने, दौना दो भगवन्त ॥१८॥
बत्तिकार पिण दूम कयो, तुम ने पिण तिण रौत।
कहिवु तेहिन उचित छ, वारुं बचन बदीत ॥१८॥
कोई कहै ए बत्ति ने, तुम्हे न मानो कोय ।
तो बात इत्ति नौ किम कहो, हिव उत्तर अवलोय ॥१८२।
भगवती शतक अठारमें, प्रभुजी भणी प्रत्यक्ष ।
सोमिल प्रश्नन पूछिया, शरसव भक्ष अभक्ष ॥१८॥
जिन कयोजे ब्राह्मण तणा, शास्त्र विषै आख्यात ।
शरसव ना बे भेद है, इत्यादिक अवदात ॥१८४॥
तो ब्राह्मण · ना शस्त्र प्रते, स्यु मान्यु जगनाथ ।
पिण तेहने समझायवा, तसु मतनी कही बात ॥१८॥
तिम मिलती ए वार्ता, उत्ति तणो पाख्यात ।
ने बत्ति माने तेहने, समझावा कही बात ॥१८६॥
बलि प्रभु गोशाला तणी, अनुकम्पा चित्त ल्याय ।
शीतल तेजू फोड़वी, रक्षण कौधी ताय ॥१८॥
वत्तिकार दूम आखियो, वह सराग पणेह ।
एक दया ने रस थकी, रक्षण कौधो एह ॥१८॥
वे मुनि ने न बचावसौ, तब वीतराग भावह ।
लब्धि अण फोड़वा थकी, अवश्य भावी एह ॥१८॥
WWWM . १९०] *गोशालाधिकार छेदै हरश मुनि तणी, क्रिया वैद्य ने खात। शतक सोलमें भगवती, हतीय उद्देश सजात ॥२४॥ आजा श्री जिनवर तणौ, नेह कार्य में नाय । वह कार्य कौधा छता, धर्म पुण्य किम थाय ॥२५० ॥ तिमन लब्धि फोड़ण तणी, श्री निन आण न देह। धर्म पुण्य किम तेह में, न्याय विचारो एह ॥२५१॥ कोई कहै छमस्थ प्रभु, फोडौ लब्धि जिंवार । दण्ड लियो स्यु वेहनो, हिव तमु उत्तर सार ॥२५२॥ राजमती ने बोलियो, विषय बचन रहनेम । प्रायश्चित्त चाल्योनतसु, पिण लियो हुस्ये धर पेम ॥२५॥ जल विच पाती नाव जिम, पाद्रमुते ऋषि कौध। प्रायश्चित्त चाल्यो न तसु, पिण लौधो हुस्ये प्रसिद्ध ॥२५॥ मोह बशे सौहो मुनी, रोयो मोटै साद। प्रायश्चित्त चाल्यो न तमु, पिण लोधो हुस्ये संवाद ॥२५५॥ धर्म घोष ना सन्त ने, आवी चोहटा मांहि । नाग श्री हेलो निन्दी, तसु दण्ड चाल्यो नांहि ॥२५६॥ हणसे हय नृप सारथी, नाम सुमङ्गल सन्त । प्रायश्चित्त चाल्यो न तमु, शतक पनरम् उद्दन्त ॥२५॥ कोई कहै आलोयथा, पडिक्कमणा कही तास। तिण सुंए दण्ड वेहनु, हिव उत्तर सुविमास ॥२५वी *गोशालाधिकार [१८५ करुणा नाम दया तणो, वे माटै सुविचार । एह दया सावध है, श्री जिन आज्ञा बार ॥१६॥ उत्तराध्ययन बावीस में, नमनाथ भगवान । जीव देख अनुक्रोश मन, पाठ विषै पहिछान ॥२०॥ अनुक्रोश ते करुणा कही, अविचूरि में अर्थ । वे माटै करुणा दया, निर्वद्य एह तदर्थ ॥२०१॥ तिण सं भाव सराग नौ, दया व सावध सोय । अष्टादश में देखलो, दशमं राग सुजोय ॥२०२।। लब्धि अणफोड़ववा थको, वीतराग भावह । बे साधु नवि राखस्ये, ए पिण हत्ति विषह ॥२०३॥ तिण सराग भाव करि, शीतल तेन लेश । लब्धि फोड़वौ राखियो, गोशालक सुविशेष ।।२०४॥ गोशालक हणवा भणी, बाल तपखी बेह। उष्ण तेजु लेश्या प्रवे, मूंको पाठ विषेह ॥२०५॥ भगवन्त अनुकम्या करो, लेश्या शीतल वेह । मूंको गोशालक भणी, रक्षण करण कहह ॥२०॥ उष्णा तेन लेश्या कहो, शीतल तेज ही लेश । तेजु लेश ए बिहुँ कही, पाठ विषै सुविशेष ॥२०७॥ उष्ण वैन लेश्या प्रते, तापस मंकी सोय । लेश्या शीतल वेज प्रति, प्रभू मूंको अवलोय ॥२०॥ , २४
*गोशालाधिकार
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छट्ठा गुण्ठाणा विषै, पाखी च्यार कषाय ।
षट् लेश्यां संना चिह', अशुभ जोग पिण पाय ॥२६॥
परिचय स्नेह अनुकम्य करि, अक्षौण राग पणेह ।
सराग भाव फुन खब्धि नं. फोडवयु पिण लेह ॥२७०॥
प्रथम छट्ठा गुण्ठाय ना, प्रगट भाव ए पेख ।
निर्वद्य किम कहिये तसु, न्याय विचारौ देख ॥२०१॥
जह कार्य नौ कवली, आज्ञा न दिये कोय।
धर्म पुण्य नहिं तेह में, हिये विमासौ नोय ॥२०॥
जेह कार्य नौ क्षेवली, आन्ना देवै पाप ।
धर्म पुख्य है वह में, तिहां नहिं किञ्चित पाप ॥२०॥
कई निन भाजा में पाप कहै, धर्म जिन आजा बार।
बिहुविध अशुद्ध प्ररूपवे, किम मामै भव पार ॥२४॥
जिन धर्म निन आज्ञा दिये, जिन धर्म सिखावै पाप।
जे धर्म कहै आज्ञा बिना, कंवा प्ररूप्यो थाप ॥२७॥
आज्ञा बारे धर्मरो, कंवण धणी अवलोय ।
हाथ जोडि पूल्यां थकां, कुण पाञा दे सोय ॥२७॥
देव गुरू तो मौन रहै, नहिं अनुमोदै अंश मात ।
नो पाना बाहिर धर्म से, उत्पतिरो कुण नाथ ॥२७॥
संबर ने बलि निरजरा, दोय प्रकारे धर्म ।
बिन पाना में ए बिहु, ते थौ शिवसुख पर्म ॥२७॥
*गोशालाधिकार
[१८०
पथ्य : धारणौ भोगव्यो, गर्भ अनुकम्पा आण | :: :
अभय अनुकम्पा सुर करो, होहलों पूस्खो जाण ॥२१॥
हरकेशौ मुनिवर तणी, अनुकम्पा करि यक्ष ।
रूधिर वमन्ता छान कृत, उत्तराध्ययन प्रत्वेन ॥२०॥
वलि मुनि नौ व्यावच अर्थ, शनां ने दुःख देह ।
ए पिण सावध जाणवी, तिम अनुकम्प कहेह ॥२२१॥
अनुकम्पा बस जीवनी, आणी ने मुनिराय।',
बांधे बांधतां प्रति, अनुमोद्यां दण्ड आय ॥२२॥
महिन छोडे शेडतां प्रति, मुनि जे अनुमोदेह ।
निशीथ उद्देशै वारमें, दण्ड चौमासी कहह ॥२२॥
अनुकम्पा ए सहु कही, पाठ 'विष पहिछाण ।
निन आज्ञा नहिं तेइ मे, तिण मुंः सावध जार्ण ।२२४॥
तिम प्रभु गाशाला तयौ, अनुकम्पा चित पाण ।
तेजू लब्धिन फोडवी, तिण सु सावध जाण ॥२२॥
आहारिक लब्धि फोडवै, अधिकरण को तास ।
शतक साल में भगवती, प्रथम उद्देश विमास ॥२२॥
वैक्रिय लब्धि फोडवे, कहो, विराधक ताहि ।
भगवती तौजे शतक में, तूर्य उद्देशा मांहि ॥२२॥
नडा, विद्या चारणा, लब्धि फोडवी जाय।
वे थानक विन पडिकम्यां, कह्या विराधक ताय ॥२२॥
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१६४]
*गोशालाधिकार*
गुणवन्त गै निन्दा कियां, कम तणं बन्ध होय ।
तेह कर्म थौ दुःख लहै, नरक निगोदै सोय ॥२८॥
तिण सुहित शिक्षा भलौ, धारै सुगण सुजाण ।
राग द्वेष छांडो करी, आराधै जिन पाण ॥२८॥
॥ कलश॥
॥चाल गीतक छन्द॥
निन बयण गुगण मणौ रयण सार उदार देखी
संग्रह्या, अवि तथ्य पथ्य सु अर्थ ने मुझ झ्यामना में
जिम कडा। अति श्रेष्ट मिष्ट गरिष्ट प्रवर विशिष्ट जिन
बच श्राद्यतं ॥ बच विरुद्ध को आयो हुवै मुझ तास
मिथ्या दुःकृतं ॥१॥ उगणौसै तेतीस वर्ष विद हादशी
फागुण वही, वर शहर बीदासर विषै हद श्रमण एका-
वन सही। फुन अन का दूकशय तिहां' गणी पाण
सम्प्रति शोभती। वर समय सार उदार निर्णय कौध
जय नश गणपती ॥ २ ॥
॥ दोहा॥
मित भारीमाल फुन, तीय माट, ऋषिराय ।।
तास पसाए सुगण, हद्धि, जय जश हर्ष सवाय ॥१॥
गोशालाधिकार
[१८६
पिण मुनि प्रते न वचावणा, दूम तो पाख्यो नांय ।
तिणसुगौतम आदिजे, मुनि नहीं राखा काया२३॥
पिण जे लब्धि फोडण तणी, श्रीजिन आज्ञा नाय ।
तिण सुशोतल तेजु प्रति, किम फोडै मुनिराय ॥२४॥
लब्धि फोड़ गोशाल ने, राखयो श्री भगवान ।
जद छट्मस्थ पणे हुन्ता, मोह स्नेह बश जान ॥२४१
जल थौ नाव भरौ नती, देखो ने मुनिराय ।
गृहौ प्रत वतावणो नहौं, द्वितीय श्राचारङ्गमाय ॥२४२॥
डुवै आप अने वलौ, जे डूबै वहु नौव ।
तसु अनुकम्प करै नहीं, रहै समभाव अतीव ॥२४॥
मात बचावा जठियो, चूलणि पिया पिछाण ।
तसु पोषह भागो कयो. सप्तम अङ्गे जाण ॥२४४॥
मिथिला वलती देख नमि, सहामों नोयो नाहिं।
देखो उत्तराध्ययन मे, नवमें अध्ययने ताहि ॥२४॥
दशवैकालिक सातमें, देव मनुष तिर्यंच।
विग्रह लडता परस्पर, देखी ने मुनि सञ्च ॥२४॥
एहनी होवे जौत फुन, एहनी होवै हार।
एहईन कहै महा मुनी, हिव तसुन्याय विचार ॥२४॥
हार नौत नवि वञ्छवी, तो तास विचै पड़ सन्त ।
किम करावे हार नय, देखोजी मति मन्त ॥२४८॥
*प्रतिमा वैराग्य नो हेतु कहे तेहर्नु उत्तर * . उत्तराध्ययन इकबीस में, समुद्रपाल सम्बंग। पायो तस्कर देखने, देखो तन उद्देग ॥५॥ सम्बेग पाठ तणो अर्थ, अविचूरि में ख्यात । सम्बंग ना हेतु भणी, सम्बंग .चोर कहात ॥६॥ ॥ सूत्र गाथा ॥ तं पसि अणं सम्बर्ग, समुद्दपालो इण मन्ची, अहो असुहाण कम्माण, निझाणं पावगं इमं ॥ उत्तराध्ययन २१३ गाथा हमीं ॥ ॥ अत्र अविचूरी ॥ तमिति तथा विध द्रव्यं दृष्टा संवेग संसार वैमुख्यतो मुक्त्य मिलापस्ततुत्वात्सोपि संवेगस्तं समुद्रपाल इदं वक्षमाणं अत्रवीत् यथा आशुभानों पापकानां कर्मणा मनुष्टानानां निर्यानं अवसान पापक अशुभं इदं प्रत्यक्ष असौवयको पद्धार्थ मित्यनीय ते इति भावः । ॥ वार्तिका॥ इहाँ कहो तं कहता है, तथा विध द्रव्य देखी ने सम्वेग ते संसार विमुखपणो मुकिनी अभिलाषा ते सम्बंग ना हेतु पणा थकी, सोपि कहता तिको चोर पिण सम्बंग, जिम पापकारो कर्म ते अनुष्टान ना छेहड़ अशुम ए प्रत्यक्ष रांक वघ ने अर्थे इह विध लेजाय छ, पठले सम्बंग नो हेतु चोर ते देखी ने समुद्रपाल घोल्यो अशुभ कर्म ना फल एभोगवै छै ॥दोहा॥ सम्बेग नो हेतु कयो, तसकर ने अवलोय । पिय गुण नहि छै ते भणी, वन्दन योग न कोय ॥ ७
*गोशालाधिकार*
[१६१
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चम समय पाठ ए, खन्धक धन्नो आदि ।
बहुमुनि नो समुच्चय कहो, तिम ए पिण संवाद ॥२५॥
जंघा विद्या चारणा, तम ठाणम सोय ।
पालोदय पडिमिय, एहवो पाठ सुजोय ॥२६॥
लब्धि फोड़ी ते स्थान प्रति, आलोवी गुणवन्त ।
बलि पडिक्कमे ते मुनौ, पद आराधक हुन्त ॥२६॥
मुनी सुमङ्गल स्थान के, तस ठाणमा नांहि ।
तिण सुखब्धि फोड़ण तणो, दण्ड कयो नहिं ताहि॥२६२॥
पिण नृप हय अरु सारथौ, हणसे दण्डन तास ।
तेह मुनी लस्यै सही, कर्वा सव्वठ सिद्ध वास ॥२६॥
इत्यादिक बहु ठाम हो, प्रायश्चित्त चाल्या नांहि ।
पिण लिया हुस्ये महा मुनी,गुणो देखोजी दिल मांहि २६४
तेनु लब्धि ने फोड़वै, तास क्रिया वण पञ्च ।
कवल लयां कह्यो प्रभु, तिण सुंदण्ड सुसञ्च ॥२६५॥
कल्पातौत हुन्ता प्रभू, छै ए सांचौ वाण ।
पिण किण गुणठाणे तिक, कहिये चतुर मुजाण ॥२६६॥
प्रभुजी चरित्त लियां पछी, श्रेणी चढ्या पहलांज ।
सप्तम गुण छ? वली, वे गुणठाण समाज ॥२६॥
सप्तम गुणठाणा तणो, उत्कृष्टौ अवलोय ।
अन्तर महुरत स्थिति छ, छ? वहु स्थितजोय ॥२६॥
१९८]
*लिपि अधिकार
R
हष तणा हेतु प्रभु, पिण ते गुणा सहीत ।
तिण सं ते निन्दनौक नहिं, देखोजी धर पौत ॥१८॥
वस्तु जे गुण सहित प्रति, देखौ हेष लहह।,
द्वेष तणो हेतु तिका, मिण निन्दनौक नहि जेह ॥१६॥
ने गुण होण प्रति, देखि सबैग - लहेह।
संबेग नो हेतु तिका, पिण वन्दनीक नहि देह ॥२॥
॥अथ सत्ताबीसम् ब्राह्मी लिपि
वस्तु
.
अधिकार॥
1
-
॥ दोहा ॥
कोई 'कहै अङ्ग पञ्चमें, ब्राह्मी नी लिमि सार
नमस्कार तेहने कयं, हिव तसु उत्तर धार ॥ १॥
नमो • वेभीए लिवी ए, लिपि कर्ता नामेय ।
चरण सहित जिन धुलिपिक, अर्थ धर्मसी एह ॥ २ ॥
पाथा ना कर्ता भणी, पाथो कहिए ताहि ।
एवं भूत नयने मते, अनुयोग द्वार रै मांहि ॥३॥
अथवा लिपि जे भाव लिपि, जे.मुनि ने आधार ।
नमस्कार छै । तेहने, एहबु दौसै सार ॥ ४ ॥
तीर्थ नाम जिम सूत्र नं, ते संघ ने आधार ।
तिण मुंसने तीर्थ का, तिमभावे लिमि सार॥ ५ ॥
गोशालाधिकार [१९३ होय प्रकार धर्म बलि, श्रुत फुन चरित पिछाण। जिन आजा एविडेविषै, समझो सुगण सुजाण ॥२७॥ पञ्च महाबत साधुरा, श्रावक ना ब्रत बार। जिन आज्ञा में ए बिहुँ, आज्ञा बार असार ॥२८॥ विण सुबिन आज्ञा तणौ, राखो सुगण प्रतीत धर्म जिन आज्ञाधारियो, वे गया जमारो जीत ॥२८१॥ ॥ अथ हित शिक्षा दुःख बहु नरक निगोद ना, सद्या अनन्ती वार। धर्म जिन आज्ञा शिर धरै, हुवै तास निस्तार ॥२८॥ मनुष जन्म दोहिलो लम्बो, लहौ सामग्री सार। पञ्च महानत पादरी, आराध्या भव पार ॥२८॥ जो चरित धर्म ग्रही नहिं सके, तो श्रावक ना ब्रत बार। निर अतिचारे पालियां, पामै भव दधि पार ॥२८॥ जो बार ब्रत ग्रहो न सके, तो समदृष्ट उदार । देव गुरु धर्म ओलखयां, सुख पामै श्रीकार २८५॥ जो पूरी समझ पड़े नहौं, तो गुणवन्त रा गुण गाय । कोडक रसायण आवियां, पातिक दूर पुलाय ॥२८॥ पोते 'ब्रत पालै नहौं, पाले ज्यासू द्वेष । दोय मूर्ख तिव ने कयो, प्रथम आचारङ्ग देख ॥२८॥ BELI MAAAA- २००] लिपि अधिकार बैदक विकथा वारता, मन्त्र जन्त्र फुन तन्त्र । कोक सामुद्रिक शास्त्र ए, लिमि में सह पावन्त ॥१६॥ पाप शास्त्र गुनतीस फुन, वर्ण- स्थापना पेख ।। ए अठारै लिमि विषै, वन्दनौक तुम लेख ॥१७॥ वीतराग तो तेहने, पाम शास्त्र आख्यात । द्रव्य लिमि कहिए वेहने, वन्दनीक किम थात ॥१८॥ जो वन्दनौक द्रव्य लिमि हुवे, द्रव्य लिपि कहौ अठार । वह विषै सह आविया, किम वन्दै अणगार ॥१६॥ ते माटे ते भाव लिपि, वा करता नामेय ।। भाषम वर्ण गुणयुक्त ने, नमस्कार- मुगुणेह.॥२०॥ ॥ वार्तिका ॥ ॥ कोई कहै भगवती रे आदि में णमोवंभीए लिविए। ए शब्द कही पंछ कहो णमो सुयस्त,ते लिपि ने नमस्कार करी सूत्र ने नमस्कार कसं ते भाव श्श्रुत ने नमस्कार को छते ते भाव सूत्र ने विष भावलिपी पिण आय गई वो पूर्व भाव लिपी ने नमस्कार किधो तेहर्नु स्युं कारण नमोभीए लिविए अनें नमो सुयस्स ए वे पद किम कहा तेहलु उत्तर ॥ दशवकालिक अध्ययन आठमें. गाथा ४१ मी में कह्यो कुम्मुवं अलिण पलिण गुत्तो, काछवा नी परै अलीण ते इषत् गुप्त पलिण ते प्रकृष्ट लीन घणो गुप्त यहां वे पद कह्या तथा दशवकालिक अध्ययन चौथे कयो पृथिविकाय ऊपर न लिहेमा कहितां थोड़ोसो अथवा एक बार लिखे नही, न विलिहेज्मा कहता बहुवार लिखे नही इहाँ पिण बे पद कहा, तथा उत्तराध्ययन पहले आलवते लवते वान सिपक कयाइवि गुई, आलवते कहता एकवार बोलाच्यो वा ते अथवा लवते
* प्रतिमा वैराग्य नो हेतु कहे तेहर्नु उत्तर
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तिण काले भिक्षू गणे, मुनिवर सित्तर दोय ।
इक सह वाणु अर्जका, गणौ आणा अवलोय ॥२॥
उत्तर तुम्हे मंगाविया, हमे लिखाव्या नाय ।
ते माटे. ए प्रश्न ना, उत्तर दोहा बणाय ॥३॥
दोहा ग्रहस्थ कंठे करी, निज मति थको लिखइ ।
तिकै खोट ज्यो को लिखी, तो मुझदोषण मत देह॥ ४ ॥
॥ इति गोशालाधिकार
"
॥अथ छब्बीस प्रतिमा वैराग्य नो
हेतु कहे तेहर्नु उत्तर ॥
॥ दोहा॥
कोई कहै वैराग्य नो, हेतु प्रतिमा एह ।
जिनं प्रतिमा देखौ करो, वर वैराग्य लहह ॥१॥
ते माट वन्दनौक है, निज प्रतिमा जग माय ।
हिव तेहनु उत्तर कहूं, सांभल जो चित्तल्याय ॥२॥
वृषभ देख प्रति बूझियो, कर • कंडू नरराय ।
दु मुह इन्द्रध्वज स्थम्ब प्रति, देख सम्वेग सुपाय ॥३॥
चूडि सूप्रति बूझियो, नमि नृपति तिह काल ।
अम्ब देख प्रति बूझियो, नगई नाम भूपाल ॥ ४॥
. -* प्रतिमा वैराग्य नो हेतु कहे तेहनु उत्तर * [१९७ वृषभादिक देखो करो, कर कडू आदेह । बूझया पिण कृषभादि ते, वन्दनीक न कहेह॥1॥ मुनि वैषे ने पासथो, तसु देखी ने सोय । बैगग मावै पिण तिको, वन्दन योग न कोय ॥४॥ तिम जिन प्रतिमा देख ने, पावै ने वैराग। पिण ते वन्दन योग नहीं, देखो मत-पक्ष, त्याग ॥१॥ ज्ञान दर्शन चारित तणा, गुण नहिं छै जे माय । ते सम्बंग नो हेतु हुवे, पिण वन्दनौक नहि थाय ॥११॥ मुनिवर प्रति देखी कगै, वेष धरै मन कोय । द्वेष तणो हेतु मुनी, पिण निन्दनौक नहिं होय ।१२। अवानु भूत्ति मुनि तणा, वचन सुगौ गोशाल । कोप्यो शौन उवावलो, सस्म कियो तेह काल ॥१३॥ कोप तणो हेतु सुनौ, मिण -गुण सहित सुसन्त । दे माटै निन्दनौक नही, देखोजौ बुद्धिवन्त ॥१४॥ सुनक्षत्र ना वचन सुणि, धन्यु गोशाले देष। देष तणो हेतु तिको, पिण निन्दनौक नहिं पेख ॥१५॥ वौर प्रभूना वचन सुणि, कोप्यो शौघ गोशाल । कोम तणा हेतु प्रसू, पिण निन्दनीक मत न्हाल ॥१६॥ छम वौर अति देखि ने, जन बहु वेष धरह। दुःख दीधा अति आकरा, आख्यो धुर अङ्गेह ॥१७॥ . .
*लिपि अधिकार [१६९ वृत्तिकार द्रव्य लिपि कहो, वह लिपि गुण सून्य । नमस्कार वेहने करई, ते तो बात जबुन्य ॥६॥ द्रव्य निक्षेपो गुण रहित, वन्दन जोग्य न ताम । समवायने देखल्यो, द्रव्य भाव जिन नाम ॥ ७॥ भरत एरवत खेव ना, अनागते जिन नाम । समचे चौवीस नाम जिन, वन्दे पाठ न ताम ॥८॥ वले एरवत खेत्र नौ, चउबीसौ वर्तमान । ठाम ठाम वन्दे कयु, ए गुन सहित सुजान ॥६॥ वर्तमान चउबौस ए, भरत खेव नौ ताहि । ठाम ठाम वन्दे कायो, जोवो लोग मांहि ॥१०॥ ते लेखै द्रव्य लिपि भणी, द्रव्य सूत्र ने सोय । नमस्कार किम कौनिये, 'हिये विमासी जोय ॥११॥ बत्तिकार द्रव्य लिपि भणी, थाप्यो छै नमस्कार । सूत्र थको मिलतो नथी, एह अर्थ अवधार ॥१२॥ तथा पत्र में जे लिख्या, अक्षर ना पाकार । वन्दनौक -जो .ते हुवै, तो लिपि अष्टादश धार ॥१३॥ अष्टादश लिपि ने विषै, वेद पुराण संमेख । कुरान जोतिष पिण हुवे, वन्दनौक तुझ लेख ॥१४॥ अष्टादश लिपि ने विषे, वर्ण संज्ञा सपख । सह पुस्तक में ने लिख्या, वन्दनौक तुझ लेख ॥१५॥ .
*लिपि अधिकार [२०१ कहता बार वार बोलाव्यो नं० शिष्य वैठो रहै नही कदाचित पिण इहाँ पिण वे पद कह्या, तथा उत्तराध्ययन इग्यारमे नासीले कहितां सर्वथा चारित्र नो विराधना नथी विसीले कहता थकी चारित्र भी विराधना नथी इहाँ पिण देश अने सर्व ए वे पद कहा, तथा वृहत्कल्पउद्देशै तीसरे अन्तर घरने विषै साधू ने न कल्पै निहा इत्तएवा कहिता थोड़ी नींद लेवी पयला इत्तएवा कहिता विशेष ऊंघवो इहाँ पिण वे पद कह्या, इत्याविक भनेक ठामें वे पद कह्या तिम इहाँ पिण वे पद जाणवा लिपि शब्दे भाव लिपि ते देश थकी श्रुत शान अने नमो सुयस्स ते सर्व श्रुत ज्ञान कहो तथा लिपिना करता ऋषभदेव ने लिपिक कहिए ते चारित्र युक्त प्रथम जिनने नमस्कार। ॥ अत्र टीका ॥ अयं च प्राग् वाख्याता नमस्कारादिकाग्रन्थ वृति कृत्वा न व्याख्यातो कुतोप कारणा दिति, ए भगवती नी वृत्ति में अभय देव सूरे कहो। ॥सोरठा॥ नमस्कारादिक ताहि रे. रचना पूर्व कही जिका । सूल इत्ति रै माहि रे, न कहो किण कारण तिका।। इम कह्यो वृत्तिकार रे, ते माटै हिव वेहनु । प्रवर न्याय ने सार रे, बुद्धिवन्त हिये. विचारज्यो ॥२॥ ॥ इति ॥ श्रीमद् जयाचार्यकृत हित शिक्षावली प्रश्नोत्तर तत्ववोध ॥ ॥ .