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आलोयना

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श्री स्थानकवासी जैन प्राधमाला पुप्प न० २ (युज्य श्री श्री १००८ श्री श्रीलालजी महाराज की स्मृति-स्वरूप) - आलोयणा (विस्तार सहित) प ग्रकाशक- श्री श्वेताम्बर साधुमार्गी जैन हितकारिणी संस्था घीकानेर (राजपूताना) धीर सर २४५४ विक्रम स०१९८५ न्योछावर प्रथमावृति २००० Kesx MEX Sxi JKAM

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श्री धीतरागाय नमः आलोयणा। (विस्तारसहित) जिनवरपद-पंकज विमल , प्रणी मन उल्लास । करूँ पाप आलोयणा, कटत विकट भव पास ॥१॥ प्रमतीत काले प्रहारा पापस्थानक सेविषा होय सेवाथा होय सेक्तां प्रते अगुमोद्या होय इस भवे पर भवे उसकी आलोयणा इस तरह है । प्रथम तो नवकार मंत्र कहना । नव- कार मन्त्र इस प्रकार

मालो०
॥२॥
,
" नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उवज्झायाणं नमो
लोए सव्वसाहूणं , एसो पंचनमुक्कारो सव्वपावप्पणासणो मंगलाणं च सवर्सि
पढमं हवइ मंगलं ॥"
यह नवकार मंत्र कैसा है उसके गुण लिखते हैं - चौदह पूर्वको सार मंत्र नवकार , सर-
णा को आधार , तर तारगा जिहाज , महामंगलीक , महाजसवंत , महासुभट , महा-
पवित्र , अक्षय अजर पद को दातार , निर्भय ठिकागा को दातार , सामता सुखां को दातार,
मनचिंच्या मनोरथ को दातार, चिन्ता को हरणहार, विन को मेटणहार , हर्प अानंद को उप-
जावगाहार, जिनशासन को मूल ज्ञान दर्शन चारित्र बोज को दातार, विन को विनासनहार,
फलेस को हरणहार , पाप को टालणहार , दुर्गति को नमारनहार , विलास को उपजावा-
हार , जंत्र में मोटो जंत्र , मंत्र में मोटो मंत्र , नंत्र में मोटो तंत्र , टोटका में मोटो टोटको,
औषधि में मोटी औषधी , ऋद्धि में मोटी ऋद्धि, मिद्धि मेंमोटी सिद्धि, रतन में मोटोरतन,
जतन में मोटो जतन , वृक्ष में मोटो कल्पवृक्ष, रिखन में मोटो रिख , निधान में मोटो निधान,
,
,
॥२॥

लालो०
,
॥३॥
ध्यान में मोटो ध्यान, ज्ञान में मोटो ज्ञान, दर्शन में मोटो दर्शन, दान में मोटो दान , तीर्थ में
मोटो तीर्थ , प्राण में मोटो प्राण , सिद्धान्त में मोटो सिद्धान्त , रसायन में मोटी रसायन,
रसकुंपिका में मोटी रसकुंपिका , नागदमनी में मोटी नागदमनी, पारस में मोटो पारस ,
प्रसिद्ध में मोटो प्रसिद्ध , प्रगट में मोटो प्रगट , प्रतीतकारी में मोटो प्रतीत कारी , सेवा में
मोटी सेवा , सुमरन में मोटो सुमरन , जस में मोटो जस , विचार में मोटो विचार , हित में
मोटो हित, पारगामी में मोटो पारगामी, करनी में मोटी करनी , अर्थ में मोटो अर्थ , भक्ति
में मोटी भक्ति, क्षमा में मोटो क्षमा, निराधारां को आधार ,मुक्ति मार्ग को पोंचाड़णहार।
इत्यादिक उपमा की नवकार मंत्र महाकल्याणिक है । यह नवकार मंत्र कह कर पीछे इरि-
यावहीं पडिकमीने पीछे तस्मुत्तरी कह कर पीछे अर्थसहित इरियारही का काउसग करे ,
पीछे नवकार कहकर लोगस्स उजोयगरे प्रगट कहे, पीछे बैठकर पूर्व तथा उत्तर दिसि मुख कर
के जीम गो गोहोनीवो राख कर वामो गोड़ो ऊंचो रख के कँवल का डोडा की परे दो हाथ जोड़
कर नमोत्युगं को पाठ भण कर पीछे जघन्य २० तीर्थंकर उत्कृष्टा १६० तथा १७० तीर्थ-
कर उन में वर्तमान काल जो महाविदेह क्षेत्र के विषे विचरते हैं उन को वंदना नमस्कार कर
-
॥३॥

॥४॥
८
८
सालो. 13 के पीछे अनंत सिद्ध भगवान को वंदना नमस्कार करे पीछे अरिहंतों की साक्षी मानता सिद्ध
भगवंत की साक्षी , केवली की साक्षी ऐसी पालोयगा लें उसकी विधि कहत्त्वे हैं- पहले तो
समकिन शुद्ध करे उप्त में देव तो अरिहंत , गुरु श्रीनिन्ध , धर्म श्रीवली भगवंत भाषित
दयामय श्रद्वे, पदार्थ की सहगा परूपणा उत्तराध्ययन के विष अट्ठाईसवें अध्ययन में नीचे
लिखी गाथामा (१४, १५, २८, ३१) से जानना । नव तत्व
जीवाजीवा य बंधो य , पुण्णं पावासको तहा।
संवरो णिजरा मोक्खो , संतेए तहिया णव ॥ १४ ॥
तहियाणं तु भावाणं , सम्भावे उवएसणं ।
भावेण सद्दहंतस्स, सम्मत्तं तं वियाहियं ॥ १५ ॥
परमत्थसंथवो वा सुदिपरमत्थसेवणा वावि ।
वावनकुसगजगा य सम्मत्तसद्दहणा ।। २८ ।।
॥४॥

मालो० निस्सकिय निकंखिय , निबितिगिच्छे अमूढदिट्ठी य। उववूहथिरीकरणे वच्छल्लपभावणा अट्ट ॥ ३१ ॥ नव पदार्थ जैसा भगवम्त भाष्या वैमा श्रद्धया न हो तस्स मिच्छामि दुकडं । अरिहंत सिद्ध केवली भगवन्त के सन्मुख भगवन्तभापित नव पदार्थ की श्रद्धा करना। अघ सूत्र आचाराग के चौथे समकित अध्ययन में समकित का अधिकार लिखा है उसका उच्चारण सन्त्रपाठ से करते हैं सेवमिजे अतीताजे पडुप्पन्नाजे य आगमिस्ला अरिहंता भगवंतो ते सव्वेवि एवमाइ क्खंति एवं भासंति एवं पण्णवंति एवं परूवेति-सव्वे पाणा सव्वे भूया सव्वे जीवा सवे सत्ता णहंतव्वा णअज्जावेयवाणपरिघेतव्या णपरितावेयव्वाणकिलामेयव्वा णद- वेयव्वा । एस धम्मे सुद्धे णितिए सासए लमेच लोयं खेयन्नहिं पवेइए तंजहा-उहि- एसु वा अणुहिपसु वा उवरयदंडेसु वा अणुवरयदंडेसु वा सोवहिपसु वा अणोव- हिपसु वा संजोगेसु वा असंजोगेसु वा तचं चेयं तहा चेयं आस्स चेयं पवुच्चइ ॥ 14 भालं. ६॥ वेगृहस्थी जती सारभी निरारंभी सपरिग्रही निष्परिग्रही को यही उपदेश देना-सवे पाणा सचे भूया सव्वे जीवा सच्चे सत्ताहणना नहीं, ऐसे अनन्ता तीर्थंकर भगवान ने कहा है, अभी वत्तमान तीर्थंकर भगवंत ऐसे ही कहते हैं , आगामी काले अनंता तीर्थंकर ऐसे ही कहेंगे । यह धर्म ध्रुव नित्य शाश्वत है। सर्व जीवों के खेद के जाणणहार केवली भगवंतने कहा और इसीतरह समकित शुद्ध जानना । यह समकित अनंतकालें अभी भी न श्रद्धी हो तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ चार सरणा लिखते हैं- पहला सरणा श्रीअरिहंत भगवंत का, उत्पन्न विमल केवल ज्ञान से सूर्य की तरह प्रकाश के करणहार , मिथ्यात्वरूप तिमिर अंधकार के हरणहार , समफित व्रत शुद्ध धर्म के देनहार, तीयाटुप्पन्नमणागयजाणए सव्वन्नूण सम्वदंसी मापडिहपवरनाणदसणधरे तिलोकनिरि- खए तिलोकचंदिए तिलोकपृहए अण्णासवे असयले अफम्मसे संसुद्धनागदसणधरे अरिहा जिणे केवली अप्पडिही , पारह गुणों सहित अनन्त ज्ञान अनन्त दर्शन अनन्त चारित्र अन- न्त वीर्य अनन्त लोचन अनन्त गुणों करी विराजमान भामण्डल श्वेतचामर देवदुन्दुभी स्फटिक सिंहासन प्रशोक वृक्ष तीन छवधर्मचक्र धर्मध्वजा, जघन्यतो सात हाथ उत्कृष्टा पांचसौ धनुष ,

मालो
॥७॥
.
,
देहमान, वज्र ऋषभ नाराच संघषण, समचउरंससंठाण , एक हजारने आठ लक्षण सहित,
अनुपम वन्न रस गंध फरस से शोभायमान, चौतीस अतिशय पैंतीस वाणी कर विराजमान,
चौसठ इंद्रों के पूजनीक , अनन्त जीवों के रिक्षपाल , जगतगुरु , जगतलोचन, जगतजीवन
भव्य जीवों के आह्लाद हर्ष आनन्द संतोष के उपजावणहार , मोक्षमार्ग के दिखावणहार ,
अभयदान के देनहार , शरणों के देनहार , संयम जीवितव्य के देनहार , पोधियोज समकित
के देनहार, रागद्वेष के जीपणहार, बारह गुणों सहित, अठारह दोष रहित , (मिथ्यात्व नहीं १
अज्ञान नहीं २मद नहीं 3 क्रोधनहीं ४ माया नहीं ५ लोभ नहीं ६ रति नहीं ७ अरति नहीं८
निद्रा नहीं ९ शोक नहीं १० अलीक( मृषा) नहीं ११ अदत्त (चौरी) नहीं १२ मत्सरभावर-
हित १३ भय नहीं १४ प्राणिवध करे नहीं १५प्रेम (राग) नहीं १६ क्रीडा नहीं १७ हास्य
नहीं-१८) एवं अठारह दोष रहिन, संमार समुद्र के तारणहार, चार घातिया कर्मक्षय किया,
मुक्तिजाने के कामी, ऐसे श्री अरिहंत भगवन्त अतीत काले अनन्ता अरिहन्त भगवन्त हुए
अभी वर्तमान काले संख्याता अरिहंत भावन्त पांच महाविदेह क्षेत्र के विषे उद्योन के करण-
हार गामे गामे एकराप नगरे नगरे पंचराय प्रतिषध रहित परमात्मा परम पूज्य परमदयालु परम
॥७॥

मालो
॥८॥
,
,
कृपालु, भव्यजीवों के आधार घणे जीवों को तारते हुए विचरते हैं। ऐसा पहला सरणा श्री
अरिहंत भगवंत केवली का पडिव® हूं ॥ इति प्रथम सरणा संपूर्ण ॥
दुजो सरणो श्री सिद्ध भगवंतजी को वे सिद्ध भगवंतजी कैसे हैं ? इकतीस गुण सहित,
वे ३१ गुण ये हैं-पांच ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय करणहार , नवप्रकार दर्शनावरणीय कर्म के
क्षय करणहार , दोय भेदे वेदनीय कर्म के क्षप करगहार , दोय भेदे मोहनीय कर्म के क्षय
करणहार, चार भेदे माउप्प कर्म के क्षय करणहार, दोय भेदे नाम कर्म के क्षय करण हार, दोय
भेदे गोत्रकर्म के क्षय करणहार , पांच भेदे अन्तराय कर्म के क्षय करणहार । और इकतीस
अतिशय कर विराजमान । वे अतिशय इस प्रकार
न दीहे न हस्से न वहे न तंसे न चोरंसे न परिमंडले न किण्हे न नीले
न लोहए न हालिद्दे न सुकिले न सुराभगंधे न दुरभिगंधे न तित्ते न कडुए न
कसाए न अंबिले न महुरे न करखडे न मउए न गरुए न लहुएन सीए न उण्हे
न निद्धे न लुक्खे न काऊ न रहे न संगेन इत्थीन पुरिसेन अन्नहा (नपुंसए) " ॥
॥८॥

सालो
॥९॥
चौदह भेदे तथा पन्द्रह प्रकारे सिद्ध हुए हैं । वे सिद्ध भगवन्त कैसे हैं-न रोगी न सोगी
नजागी न भोगी नकाई नमाई अनन्तजानी अनन्तदर्शनी अनन्तचारित्री अनन्त क्षायिक
सनकित के धणी अनन्तवीर्य अनन्त सुख आत्मिक आनन्द प्राप्ति सिद्ध बुद्ध पारंगत परम्प-
रागत अजर अमर अक्षय अव्वाबाह अकलङ्की निरंजण निराकार असरणसरण जीवसरूपी एक
१- सिद्धों के चौदह भेट --तीर्थ प्रवते उस वक्त एकसौ आठ सिद्ध होवे १ । तीर्य का विच्छेद हुए दश सिद्ध
होवे २ । तीर्थकर वीस सिद्ध होवे ३ । सामान्य केवली एकसौ आठ सिद्ध होवे ४ । स्वयबुद्ध १०८ सिद्ध होवे ५।
प्रत्येकबुद्ध ६ सिद्ध होवे ६ । बुद्धबोधित १०८ सिद्ध होवे ७ । स्वलिङ्ग १०८ सिद्ध होवे ८ । अन्यलिङ्ग १० सिद्ध
होवे । । गृहस्थलिङ्ग ४ सिद्ध होवे १० । स्त्रीलिङ्ग २० सिद्ध होवे ११ । पुरुषलिङ्ग १०८ सिद्ध होवे १२ । नपुं-
सकलिङ्ग १० सिद्ध होवे १३ । सर्व भेले उत्कृष्ट एक समय में १०८ सिद्ध होवे ॥ पूर्वोक्त सब वोल एक समय
आसरी ( को ले कर ) जाणना, एक समय में उत्कृष्ट इतने सिद्ध होते है।
२ सिद्धों के पन्द्रह प्रकार तीर्थ सिदा १ , अतीर्य सिद्धा २ , तीर्थकर सिद्धा ३ , अतीयकर, सिद्धा ४ ,
स्वयबुद्ध सिद्वा ५, प्रत्येकबुद सिद्धा ६, बुद्धबोधित सिद्धा ७, स्त्रीलिङ्ग सिहा ८, पुरुषलिङ्ग सिद्धा ६, नपुसकलिङ्ग
सिदा १.०, स्वलिङ्ग सिद्धा ११, भन्यलिङ्ग सिद्धा १२, गृहिलिङ्ग सिद्वा १३, एक सिद्धा, १४, अनेक सिद्धा १५ ।
.
॥९॥

आलो०
॥१०॥
सिद्ध वहां अनन्त सिद्ध लोक के अग्रभाग सिद्ध क्षेत्र के विषे जाकर तिष्ठया (रह्या) है वे
जवन्य अवगाहना एक हाय आठ अगुंल, मझिम चार हाथने सोलह आंगल, उत्कृष्टी तीनसौ
तेतीस धनुष ने बत्तीस आंगल क्षेत्र अवगाह कर रहे हैं आठ कर्म रहित आठ गुणां सहित,
वे ८ गुण ये हैं -ज्ञानावरणीय कर्म क्षय करने से अनन्त केवल ज्ञान गुण प्रकट हुमा १ दर्श-
नावरणीय कर्म क्षय करने से अनन्त केवल दर्शन गुण प्रगट हुआ २ वेदनीय कर्म क्षय करने से
निराघाध सुख गुण प्रगट हुआ ३ मोहनीय कर्म क्षय करने से अनन्त चारित्र गुण प्रगट हुआ
४ आयुष्य कर्म क्षय करने से अटल अवगाहना गुण प्रगट हुआ ५ नाम कर्म क्षय करने से अमूर्त
गुण प्रगट हुआ दे गोत्र कर्म क्षय करने से अगुरुलघु गुण प्रगट हुमा ७ अन्तराय कर्म क्षय करने
से अनन्त आत्मिक शक्ति गुण प्रगट हुमा ८। जो सिद्ध भगवन्त जन्म मरण के फेरे टाल के
मुक्ति स्थानक जाकर विराजे हैं । अतीत काले अनन्त सिद्ध भगवन्त मोक्ष पहुँचे वर्तमान काले
संख्याता सिद्ध भगवान मोक्ष जाते हैं सामता सुखां में लयलीन हैं उन सिद्ध भगवान का सरणा
पडिवजूं हूँ॥ इति दुसरा सरणा संपूर्ण ।
तीसरा शरणा श्रीसाधुजी भगवंत का वे साधु भगवान कैसे हैं ? जघन्य तोदोय करोड़
॥२०॥

मालो
॥१२॥
केवली उत्कृष्टा नव कोडि केवली भगवन्तजी वे कैसे हैं ? अनन्त जान अनन्त दर्शन अनन्त
चारित्र अनन्त वीर्य अनन्त गुण कर सहित अनन्त क्षाधिक समकती ययाख्यातचारित्र के
धरणहार जघन्य दोय हजार कोडी साधु उत्कृष्टा नव हजार कोडी साधु । वे साधु महापुरुष
गणवर आचार्य उपाध्याय बहुश्रुती द्वादशांग के भणण हार चौदहपूर्व के पाठी ऋजुमति विपु-
लमति मतिज्ञानी श्रुतज्ञानी अवधिज्ञानी परमावधिज्ञानी मनापर्यवज्ञानी इरियासमिया
भासासमिया एसणासमिया आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिया उच्चारपासवणखेलजल्ल
सिंवाणपरिहापणियासमिया मनसमिया वयसमिया कायसनिया मणगुत्तिया पयगुत्तिया
कायगुजिया गुत्ता गुत्तिदिया गुत्तभयारी अकोहा अमाणा अमाया अलोभा संता पसंता
उपसंतपरिनिव्वुडा अण्णासवा छिन्नगंधा छिन्नमोया जाइसंपन्ने कुलसंपन्ने विणयसंपन्ने नाणसंपन्ने
दसणसंपन्ने चारित्तसंपन्ने लज्जासंपन्ने लाघवसंपन्ने ओसंयी तेयंसी वच्चसी जसंसी जियकोहे
जियमाणे जियमाया जियलोभा जियनिहा जिपइंदिया जियपरिसहा जीवियासमरणभयवि-
प्पमुक्का अममा अकिंचणा वचप्पहाणे गुणप्पहाणे खंती मुत्ती गुत्ती करणप्पहाणे चरणप्पहाणे
अजवप्पहाणे मद्दवप्पहाणे लाघवप्पहाणे सञ्चप्पहाणे संजमप्पहाणे तवप्पहाणे सोयप्पहाणे यंभ-
॥११॥

आलो०
॥१२॥
पहाणे नयपहाणे नियमप्पहाणे नागबलिया दसणबलिया चारित्तवलिया मणबलिया वयव-
लिया काययलिया आमोसहिंपत्ता खेलोसहिपत्ता जल्लोसहिपत्ता विप्पोसहिपत्ता सम्बोसहिपत्ता
कोहयुद्धी बीजवुद्वी पाणुमारी संभिन्नोसहिपत्ता खीरासवा महुयास्वा सप्पियासवा अक्खी-
णमहानिसिया जंघाचारणी विजाचारणी आगासगामी वैक्रियल ब्धि के धरणहार आहारक
लब्धि के धरणहार तेजोलेश्या की लब्धि शीतलेल्या की लब्धि पुलाक की लब्धि इत्यादि
लब्धि के धरणहार तपसी मोटा महानुभाव एकावलीत के करणहार मुक्तावली तप के करण
हार रत्नावली तप के करणहार कगागावली तप के करण हार खुड्गसिहनिकीलियतप के
१ आमोसहि १ वियोमहि , २ खेलोसहि ३ जल्लोसही ५ चेव । सयोसहि ५ मभिन्न ६ , मोहि ७
रिउ ८ विउलमइलद्री ६ ॥ १५०६ ॥ चारण १० आसीविम ११ के - वलिय १२ गगहारिणो १३ य पुवधग
१४ । अग्हत १५ चवटी १६ , बलदेवा १७ वासुदेवा १८ य ॥ १५०७ ॥ ग्वीरमहुसप्पि आसव १९
कोट्टय बुद्धी २० पयाणुमारी २१ य । तह बीयबुद्धि २२ तेयग २३ , आहाग्ग २४ सीयलेसा २५ य ॥ १५०८॥
वेउब्धि देहलद्धी २६ , अग्वीणमहाण्मी २७ पुलाया २८ य । पमिणामतपरसेगा , एमाई हुति लद्धीओ ॥ १५०६ ।।
(प्रवचनसारोद्धार २७० द्वार ) ।
.
॥१२॥

आलो, ॥१३॥ - करणहार महासिहनिकोलिय तप के करणहार जवमझचंदपडिमा के वहणहार वज्रचन्द्र पडिमा के वहणहार भद्रपडिमा के वह्णहार महाभद्रपडिमा के वहणहार सच्चोभद्दपडिमा के करमहार आयंबिलबईमान तप के करणार भिक्खु की पडिमा के करणहार इत्यादिक विविध प्रकार के तप के करणहार चउत्यभत्तिया छट्टभत्तिया अट्टमभत्तिया दसमभत्तिया दुवालसभत्तिया चोहसभंत्तिया सोलसभत्तिया अडमासिश एक्कमासिया दुमासिया तिमासिया चउम्मासिया पंचमासिया छम्मासिया उक्खित्तचरिया निक्खित्तचरिया उविस्त्र- तनिक्खित्तचरिया निक्खित्तउक्खित्तचरिया अंतचरिया पंतचरिया लूहचरिया समुदाणियचरिया संसट्टचरिया असंसहचरिया दिठ्ठलाभिया अदिट्ठलाभिया भिक्खलाभिया अभिक्खलाभिया अंतआहारी पंतआहारी लूहआहारी तुच्छआहारी अरसआहारी विरसाहारी अंतजीवी पतंजीवी लूहजीवी तुच्छजीवी अरसजीवी ***** मालो ॥१४॥ 'विरसजीवी उपसंतजीवी पसंतजीवी आयबिलिया पुरिमड्ढीया एकासणिया निवि- गइया अमजमसासणिया नपगामरसोई। इत्यादि गुण महित वीर भामण के करण हार सूर्य की प्रातापना के लेणहार वस्त्ररहित शीत के सहण हार अड्डया सव्वगायअपडिकम्मा इहलोकपरलोकपडियंधरहित संसारपार- गामी कम्मनिग्गहणट्टयाए अभुटिया। ऐसे श्रीसाधु महापुरुष मोक्ष मार्ग के साधनहार छ काय के रक्षपाल छकाग के दयालु आप तरे दूजा भवजीवाने तारे सतरा भेदे संयम बारह भेदे तप कर पातमा को भावना विचरे । ऐमा तीसरा सरणा श्रीसाधु भगवंत का परिवजु हूँ। तीसरा सरणा संपूर्ण ।। चोथासरगाश्रीकेवलिभाषित दयामय धर्म का । वह धर्म कैसा है बस थावर सूक्ष्म यादर पर्याप्ता अपर्याप्ता पृथिवीकाय अकाय तेउकाय वाउकाय वनस्पतिकाय बेइन्द्रिय तेइन्द्रिय चोरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय सर्वलोक के विषे सर्व जीवों की रक्षा करना किसी जीव को विराधना नहीं ऐसा श्रीकेवलिभाषित दयामय धर्म जानना । वह धर्म कैसा है-? कर्मरूप शल्य का कापणहार, सर्वदुःख के टालणहार, मोक्षमार्ग के पहोंचाउणहार , अवितथ सद्या संदेहरहित और संसार

-
आलो०
॥१५॥
समुद्र में त्रुडित जीव के द्वीप समान है । वह संसार समुद्र कैसा है ? संसार समुद्र में जन्म
जरामरण रूप प्रभूतिधन पाणी है संयोगवियोगचिंतारूपी विचित्र प्रकार के विस्तीण मोटे कल्लो.
ल हैं, वहां तृष्णारूपीमोटीबेल है,अभिमानरूपी फेन है, चारकषायरूपी मोटे पातालकलसे हैं,
काम भोग रूपी कादा है, आठ कर्म रूपी पाठ मोटे वेलंघर पर्वत हैं, एकसौ अडतालीस प्रकृ-
तिरूपी पत्थर हैं, मोहरूपी मच्छ हैं,निल जीवको सबलजीव रूपी मगर मिलते हैं, पांच प्रमा-
दरूप तथा माठमदरूप दुष्ट शराम(हिंसक) जीव हैं, मरणरूप भय है, अज्ञानरूप अन्धकार है
चार गति गमन करने रूप विस्तीर्ण भँवर है, ऐसा संसारसमुद्र तिरना दुष्कर है, उस संसार
समुद्रको तिरने के लिए केवलिप्ररूपित धर्म जहाजसमान है तारणसरण है, गतिपतिष्ठित जीव के.
प्राधारभूत है, जीवादिक नव पदार्थ प्रकाशने में सूर्य समान है, महाकल्याणिक है, महामंग-
लीक है। धर्म किस को कहते हैं ? दुर्गति पडते जीव को धारण करे उस को धर्म कहते हैं। ऐसा
धर्म अतीतकाले अनंते अरिहंत भगवंतने कहा वर्तमान काले संख्याता अरिहंत भगवंत कहते
हैं, यही धर्म आगामी काले अनन्ता अरिहन्त भगवन्त कहेंगे। इसी धर्म को विराध कर अतीत काले
अनन्ता जीव संसार-समुद्र में बुड़े हैं इसी धर्म की-विरघकर वर्तमान काले संख्याता जीव
?
॥१५॥

मालो
॥१६॥
संतार समुद्र में बुडते हैं इसी धर्म को विराधकर आगामी काले अनन्त जीव संसार समुद्र में
बुडेंगे। इसी धर्म को आराधकर अतीत काले अनंता जीव संसार समुद्र तिरे हैं इसी धर्म को
माराधकर वर्तमान काले संख्याता जीव संसार समुद्र तिरते हैं इसी धर्म को आराधकर अागामी
काले अनंता जीव संसार समुद्र तिरेंगे। ऐसा चौथा सरणा केवलिभापित दयामय धर्म का
पडिवचं हूँ, आदरूं हूँ, लेउ हूँ, अहो भगवान ये चारों सरणा अंतकाल लग मुझ को होज्यो।
इति चार सरणा संपूशण ।।
इन सरणों को गुणने के बाद अपने किये हुए पापों की अरिहंत भगवंत की साखसे आलो.
यणा करे - सात लाख पृथ्वी काय सात लाख अप काय सात लाख तेउ काय सात लाख
वा उकाय दस लाख प्रत्येक वनस्पति काय चौदह लाख साधारण वनस्पति काय बे लाख इन्द्रिय
बे लाख तेइंद्रिय बे लाख चउरिन्द्रिय चारलाख नारकी चारलाख तिर्यंच पंचेन्द्रिय चार लाख
देवता चौदह लाख मनुष्य की जाति, ये चौरासी लाख जीवजोनी जानना। तथा पृथ्वीकाय की
पारह (१२) लाख कुलकोही , अपकाय की सात (७) लाख कुलकोड़ी, तेउकाय की तीन
(३ ) लाख कुत्तकोड़ी , वाउकाय की सात (७) लाख कुलकोड़ी, वनस्पति काय की अटा-
.
॥१६॥

मालो
-
॥१७॥
,
ईस (२८) लाख कुलकोड़ी, बेइन्द्रिय की सात (७) लाख कुलकोड़ी , तेइन्द्रिय की पाठ-
(८) लाख फुलकोड़ी, चउरिन्द्रिय की नौ (९)लाख कुलकोड़ी , जलचर की घारह (१२)
लाख कुलकोड़ी, थलचर की दश (१०) लाख कुलकोड़ी, खेचर की साढ़ा पारह (१२॥)
लाख कुलकोड़ी, उरपर की दश (१०) लाख कुलकोड़ी , भुजपर की नौ (९) लाख कुल-
कोड़ी , मनुष्य की बारह (१२) लाख कुलकोड़ी, नारकी की पच्चीस (२५) लाख कुलकोड़ी,
देवना की छाईस ( २६)लाख कुलकोड़ी, एवं एक करोड़ साढ़ासत्यानवे लाख (१६७५००००)
सर्व संसारिक जीवों की कुलकोड़ी। एवं सर्व कुलकोड़ी के जीव चांपीया होय चूरीया होय
असलीया होघ मसलीया कूटीया होय पिसीया सेकीया भुंजीयाहोय पीलिया होय तलिया
होय गालिया होप पालिया होय हण्या होय हणाया होय हणते को भला जाण्या होय मन वचन
काया करी विराध्या होय अतीतकाले वर्तमान काले अर्थ अनर्थ धर्म अर्थ काम सिइण भवे
परभवे मनेरे अनंते भव ते अरिहंत सिद्ध केवली भगवंत की साख से त्रिविकर मन वचन
काया कर के तस्स मिच्छामिदुकडं ॥ गाथा
॥१७॥

जालो०
॥१८॥
॥१॥
खामेमि सेवजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मझ न केणइ ॥
इस तरह सब जीवों को खमा के अब अठारह पापस्थानक आलोउँ हूँ । वहा पहले तो
प्रागातिरान याने जीवहिमा छप्रकार उसमें पहले तो पृथ्वीकाय उसके भेद दो एक लक्ष्म दूसरा
यादर । समन के भेदो पर्याप्ता अपर्याप्ता, सक्षम धादर इन दो में से सूक्ष्म तो सर्वलोकव्यापी
रह्या है और बादर लोक के एकदेश भाग में है। उसके अनेक भेद हैं
काची माटी मुरड़
कांकरा खड़ी गे हींगलू हरिनाल हिरमिच वानी लूगा भोडल पापागा लोह तांबो तरयो रूपो
सोनो जसद पारो सुरमो मगसिल वज्र हीरा कर्केननरत्न वैडूर्यरत्न लोहितासरत्न मसारगल्लरत्न
हंसाभरत्न पुलाकरल मौगन्धिकरत्न अंजनरत्न अंजनपुलाकरत्न रजतरत्न जातिरूपरत्न
रत्न स्फटिकरत्न रिष्ठरत्न चन्द्रकान्तमणि वैडूर्यमणि , इत्यादि पृथ्वीकाय के भेद घणा उन
कीहिसा इस भवे पर भवे अनेरे अनंते भवे करी होय कर्पणी का कर्म करी कूवा बावड़ी
तालाच सरोवर द्रह कुंद गढ कोट खाई प्रामाद घर हाट भवन महल महलायत पाटण देहरा
उपासरा महजीत मुरुम्बा प्रमुख अर्थ अनर्थे धर्म जाणि कामवालि हिसा पृथ्वीकाय की कीनी
॥१८॥

आलो
॥१९॥
होय कराह होय करत्ताने अणुमोदी होय तो अरिहंत सिद्ध केवली भगवानकी साख से मन
वचन काया कर के तस्स मिच्छामिदुकाई ॥
दूसरी अपकाय उस के भेद २ सूक्ष्म और पादर , उसके भेद २ पर्याप्ता और अपर्याप्ता ।
मृक्ष तो सर्वलोकव्यापी है बादर लोक के एकदेशभाग में है उस के अनेक भेद हैं वे ये हैं-
सुद्धोदक ओस हेम गड़ा धूवरि हरितणु शीतल पाणी उष्णपाणी खारो पाणी वारुणी समुद्र
का पागी आसोदक पाणी खीरोदक पागी क्योदक पाणी इक्खोदक पाणी रसोदक पाणी इत्या-
दिक पाणी का धणा भेद है उन पागी की हिंमा की होय न्हाने के लिए धोने के लिए पीने के
लिए तथा तीर्थ के पागी की विराधना की होय पीपल में पाणी नाल्याहोय तलाव की पाल फोड़ी
होय , सरोवर को पाल फोडी होय सरवर सुकाया होय, कूवा बावडी उलीच्या होय आंगण
चौक डागला में पाणी का छिड़काव दिया होध , इत्यादिक आरंभ समारंभ करके हिसा की
होय कराह होय करते प्रति अनुमोदी होय इस भन परभव अनेरे अनन्त भवे अर्थ अनर्थ
धर्म अर्थ कामवश तो अरिहंत सिद्ध केवली भगवन्त की साखते मन बचन काया करके तस्स
मिच्छामि दुकडं ॥
,
॥१०॥

मालो ॥२०॥ अव तेउकाय उस के भेद २ नक्षम और बादर उस के भेद २ पर्यासा और अपर्याप्ता, सूक्ष्म तो सर्वलोक में व्याप्त है शादर लोक के एकदेश विषे है उस के अनेक भेद हैं - अंगारा मुम्मुरा अवीजाला उल्कापात योजली प्रमुख अग्नि कर के रूपा का मागर सोना का आगर लोहा का आगर तांबा का मागर जसद का ागर पचाया होय कोलु का अहाव ईट का यहाव खार कांजी चूना की भट्टी कोपले पाने के लिए, दीवा चराक मसाल पलीते के लिए तथा देवता की मूर्ति को धूप देने के लिए तथा रांधने सेकने के लिए भुंजने के लिए दव देने के लिए और अनेरा मारंभ समारंभ करने के लिए , इत्यादिक अग्निकाय की हिंसा की होय कराई होप करता प्रते अगुमोदी होय इसभवे परभवे अनेरे अनन्त भवे अर्थे अनर्थे धर्म अर्थे काम अर्थ हिंसा की होय तो अरिहंत मिद्ध केली भगवन की साखसे मनवचनकाया कर के तास मिच्छामि दुकडं ॥ चौथी पाउकाप उस के भेद २ नुक्ष्म और पादर , उस के भी दो भेद - पर्याप्ता और अपर्याप्ता। सूक्ष्म तो सर्वलोक में व्याप्त है और पादर लोक के एकदेश भाग में है उसका भेद घणा है-उक्कलिया वाय मंडलिया पायं धनवायतनवाय गुंजा वाघ संवर्तगवाय सुद्धवाय, इत्या- . ||२०|

मालो
॥२१॥
.
-
दिक वाउकाय को वीजणे से वन से पत्र से हाथ से मुख से ( उघाडे मुखयोलकर ) मोरपीछी
से चामर से , इत्यादि से वाउकाय को हिंसा की होप कराइ होय करता प्रतें अणुमोदी होय
इसभवे परभवे अनेरे अनंतभवे अर्थे अनर्थे धर्म अर्थ काम अर्थ तो अरिहंत सिद्ध केवली भग-
वंत की साख से मनवचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।।
अव पाचवा वनस्पति काय उस के भेद २ सूक्ष्म और बादर उस के भेद २ पर्याप्त और
अपर्याप्त । सूक्ष्म तो सर्वलोक व्यापी रह्या है वादर लोक के एकदेश भाग में है उसके अनेक भेद हैं
तथा दोय भेद हैं- प्रत्येक वनस्पति और साधारण वनस्पति। उस के अनेक भेद हैं- मक्खा
गुच्छा गुम्मा लता वेली पञ्चगा तृणा वेली हरिए औषध अनाज जलरुह कुहणा इत्यादिक के
मूल कंद खंध साखा पडिशाखा पान फल फूल वीज प्रमुख और नीलण फूलण की जाति
अनन्तकाय । अनन्तकाय और साधारण काय इस भवे पर भवे अनेरे अनन्त भवेअर्थ अनर्थ
धर्म अर्थे काम अर्थ हिसा की होय कराई होय करता ने अणुमोदी होय तोअनन्ता अरिहंत सिद्ध
केवली भगवन्त की साख से मनवचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुकडं ।।
॥२१॥

प्रालो
wdeormirma
॥२२॥
अब छठी प्रप्तकाय उस के भेद ४- बेइन्द्रिय तेहन्द्रिय चउरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय । बेइन्द्रिय
का भेद घणा है-लट गिंडोला सीप साखुलाअलसिया जोक कोड़ा गजाइ कृमि चरम्यावालो
पडेरा प्रमुख । अघ तेइंद्रिय इम का घणा भेद है- चांचड मांकण जें लीख कीड़ी कुंथुवा
मंकोड़ा सुत्तमुली कानखजूग उद्देही प्रमुख । अब चरिन्द्रिय उस का घणा भेद है-माखी
माछर भमरा भीगाड़ी डांस कोड़ा तीड पतंगिया कणसारी विच्छ प्रमुख । अब पंचेन्द्रिय उस
का भेद घणा है-नारकी तिथंच जलचर थलचर खेचर उरपर भुजपर सन्नी असन्नी तथा मनुष्य
पांच देवकुफ गंच उतरकरु पांच रम्यक वास ५हरिवास ५हेमवय ५एरणगय छप्पन अन्तर
टीप पांव भरत पांच एरवत पांच महाविदेह क्षेत्र के सन्नी प्रसन्नी तथा देवता भवणपति वाण-
मन्तर ज्योतिषी वेमाणिक, इत्यादिक अनेक प्रकार के त्रस थावर संख्याता अपव्याताअनन्ता
जीव चांया होय चूरया होय असल्या होय मसल्या होय कूटया होय पोस्या होय सेक्या होय
मुंज्या होय , इत्यादिक प्रकारे परितापना उपजाई होय दुहव्या होय दुहाव्या होय दुहता ने
भला जाण्या हाय हगया होय हगाया होय हणता ने अणुमोद्या होय, इसप्रकार प्राणातिपात
सेव्या होय सेवाया होय सेवता प्रने अणुमोद्या होय अथै अनर्थे धर्म अर्थ काम अर्थ इस
॥२२॥

लो०
॥२३॥
भवे परभवे अनेरे अनन्त भवे तो अरिहन्त सिद्ध केवली भगवन्त की साख से मन वचन काया
कर के तस्स मिच्छामि दुकंड ।
अय दूमरापाप मृषावाद आलोउ क्रोधकारी लोभकारी भयकारी हास्यकारी कुतूहलकारी
रागकारी द्वेषकारी झूठ बोल्या होय बोलाया होय बोलताने अणुमोद्या होय। तथा कर्कशकारी
कठोरकारी पीडाकारी निश्वयकारी छेदकारी भेदकारी सावद्यकारी मुखरी मिश्रभाषा, इत्यादिक
भाषा बोल्या होय बुलाया होय बोलताने अणुमोद्या होय अर्थे अनर्थे धर्म अर्थ काम अर्थ इस
भवे परभवे अनेरे अनन्त भवे तो अरिहन्त सिद्ध केवली भगवन्तकी साखसे तस्स मिच्छामिनुक्कडं।
तीजा पाप अदत्तादान आलोउं- खान खण के गांठ छोड के ताला पडकुची कर के पड़ी
वस्तु धणी की जाण कर तथा सगासंबंधी व्यापार संबंधी ली होय तथा चौर की ठग की वस्तु
ली होय कूडा तोला कूडा मापा किया होय कूडा लेख लिख्याहोय सरसी वस्तु में निरसी भेली
होय सरसी दिखा कर निरसी दी होय इत्यादिक अदत्त लिया होय लेवाया होय लेता ने भला
जाण्या होय अर्थे अनर्थे धर्म अर्थे काम अर्थ इस भवे परभवे अनेरे अनंत भवेतो अरिहंत सिद्ध
केवली भगवंत की साखसे मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥
॥२॥

मालो० ॥२४॥ चौधा पापस्थान मैथुन ते पालो,देव मनुष्य नियंचसंपन्यो मैथुन सेव्याहोइ पर का विवाह नात्रा जोडापा होय अर्ध अनर्थे धर्म अर्थे काम अर्थ इस भवे परभवे अनेरे अनंत भवे तो अरिहन्त सिद्ध केवली भगवंत की साख से मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुकाई । पांचवा पापस्थान परिग्रह आलोउ-खेत्त वत्थु हिरण सुवष्ण धन धान्य दोपदचोपदकुविय- धातु इत्यादि नव प्रकार का परिग्रह संग्रह किया होय.राख्या होय रखाया होय राखता ने भलो जाण्यो होय अर्थ अनर्थे धर्म अर्थ काम अर्थ इस भचे परभवे अनेरे अनन्त भवे तो अरिहन्त सिद्ध केवली भगवंत की साखसे मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।। ऐसे क्रोधमान ७ माया ८ लोभ १ राग १० वष ११ कलह १२ अभ्याख्यान, १३ पिशुन १४ परपरिवाद १५ रतिअरति १६ मायामोसो १७ इत्यादिक पापेस्थानक सेया होय सेवाया होय मेवताने भला जाण्या होय अर्थे अन धर्म अर्थे काम अर्थे इस भवे परभवे अनेरे अनन्त भये तो अरिहन्त सिद्ध केवली भगवन्त की साख से मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुफडं। अठारहवा पापस्थान मिथ्यासगशल्य - खोटा देव ग्योटा गुरु खोटा धर्म पर श्रद्धा ॥२४॥ EEN मालो ॥२५॥ रक्खी होय तथा जिनवचन से अणो सरध्यो होय परूप्यो होय तथा धर्म ने अधर्म सरध्यो होय अधर्म ने धर्म सरध्यो होय जीव ने अजीव सरध्यो होय अजीव ने जीव सरध्यो होय असाधु ने साधु सरध्यो होय साधु ने असाधु सरध्यो होय संसार का मार्ग से मोक्ष को मार्ग सरध्यो होय मोक्ष का मार्ग ने मंसार को मार्ग सरध्यो होय कर्मों से अणमुकाणा ने मुकाणा सरध्या होय कर्मों से मुकाणा ने अणमुकाणा सरध्या होय । इत्यादिक मिथ्यादसणशल्य अठारहवा पाप- स्थानक सेव्या होय सेवाया होया सेवता ने अणुमोद्या होय अर्थे अनर्थ धर्म अर्धे काम अर्थ इस भवे परभवे अनेरे अनन्त भवे तो अरिहन्त सिद्ध केवली भगवन्त की गख से मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ ईसर महेसर महादेव देवी दिहाडी शीतला चौथ बजासणे मांडी चंडिका भैरव क्षेत्रपाल जक्ष राक्षस भूत काठ का पीतल का सोना का रूपा का तांया का चित्राम का पाषाण का गारिका कर के फल फूल पाणी अग्नि धूप दीप केसर चंदन तेल फुलेल सुगन्ध करी अर्ध्या पूज्या होय पूजता प्रते अणुमोदणा की होय अर्थ अनर्थे धर्म अर्धे काम अर्धे इस भवे परभवे

पालो०
॥२६॥
अनेरे अनन्त भवे तो अरिहन्त सिद्ध केली भगवन्त की साख से मन वचन काया कर के
तस्स मिच्छामि दुकडं ॥
तथा जोगी जंगम सेवडा भेषधारी नागा सन्यासी बामण भगतगंगागुरु गयागुरु इत्यादिक
को गुरुवुद्धि से बंद्या होय पूज्या होय पूजाया होय पूजता प्रते अणुमोद्या होय अर्थ अनर्थे
धम अर्ये काम अर्थ इस भव परभव अनेरे मनन्त भव ते अरिहन्त सिद्ध केवली भगवन्त की
साख से मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।।
कूवा बावड़ी सा दह तलाव निवाण देहरा उपासरा महजीत मुकरपातीर्थ धाम पादुका छत्री
जात्रा मेड़ी इत्यादिक ठाम ठेकाणा किया होय कराया होय करता प्रते अणुमोद्या होय अर्थे
अनर्थ धर्म अथ काम अर्थे इस भये परभवे भनेरे अनन्त भवे तो अरिहन्त सिद्ध केवली भग-
वन्त की साख से मन वचन काया कर के विविधे २ तस्स मिच्छामि दुझंडं ॥
तथा सचित्त फल फूल पाणी लूगा दोपद चौपद अचित्त सोनो रूपो लोह कांसी पीतल
जसद तरवो सीसो धन धान्य पाहाण हल फाल लाकडा पासण वासण पाणी अग्नि शस्त्र तेल
फुलेल अगर चन्दन केसर इत्यादिक हिंमाकारी दिया होय दिवाया होय देता प्रते अणुमोद्या
॥२६॥

मालो ॥२७॥ होय अथै अनर्थे धर्म अर्थ काम अर्थ इम भवे परभवे अनेरे अनन्न भवे तो अरिहन्त सिद्ध केवली भगवन्त की साख से वित्रि २ मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुक्कडं। तथा तीर्थयात्रा मेला खेला नदी नाल खाल सर तालाब कुवा घावड़ी इत्यादिक ठाम ठिकाणा कातीमाहात्म्य माहमाहात्म्य सदाकाल न्हायण धोवण करवा होय कराया होय करता प्रते अणुमोद्या होय अर्थ अनय धर्म अयै काम भर्ये इम भव परभर अनेरे अनन्त भवे मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ जज्ञ होम अग्यारी मसाल चराक दीवा पलीता इत्यादिक आरंभ करया होय कराया होय करता प्रते भलो जाण्यो होय इस भवे परभवे अनेरे अनन्त अवे तो अरिहन्त सिद्ध केवली भगवन्त की साख से मन वचन काया कर के नस्स मिच्छामि दृकडं । देश विदेश तीर्थयात्रा गमन किया होय कराया होय करता ने अणुमोद्या होय मल वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुफर्ड ।। कुदेव कुशास्त्र क्रुधर्म सेवियां होय सेवाया होय सेवता ने अणुमोद्या होय अर्थे अनर्थे धर्म अर्थे काम अर्थे इस भवे परभवे अनेरे अनन्त भवे तो मरिहन्त सिद्ध केवली भगवन्त की साख से त्रिविध २ मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुकड । ||२७॥

मालो
॥२८॥
तथा रात्रीभोजन - अस पाणं खाइमं साइमं सचित्त कन्द मूल फल फूल अने पाणी
मय मांस सहित इत्यादिक अभक्ष्य भोगव्या होय भोगाया होय भोगता ने अणुमोद्या होय
इस भवे परभवे अनेरे अनन्त भवे तो अरिहन्त सिद्ध केवली भगवन्त की साख से निविधे२
मन वचन काया कर के तस्स मिच्छामि दुकर्ड।
अब भवान्तर की आलोयणा कहते हैं - इस भव के पहले अनेरे भव अनन्त नारकी
के भव किये हों रत्नप्रभा के जाव तमतमा के भव किये। इस जीव ने अनन्ते तिर्यंच के भव
किए वे फिर एकेन्द्रिय के वेन्द्रिय के तेइन्द्रिय के चाउरिन्द्रिय के पंचेन्द्रिय के वे फिर जलचर के
थलचर के खेचर के उरपर केभुजपर के। अनन्ते भव देवताके वे फिर परमाधामी के भवणपतियों
के वारणमंतरों के जोतिषी के पहले सुधम देवलोक के ईशान देवलोक के जाप नक्वेयक तक
अनंत भव किये । मनुष्य के वे फिर कसयीयों के उन के नाम जुदे २ इस प्रकार-काजी का मुल्ला
का कीर का कसाई का वागरी का थोरी का भील का खटीक का हलालखोरकारी का बिलोची
का तेली का तंबोली का गंधी का माली का घांची का मोची का गांछाका छींपा कारंगरेज का
नीलगर का पनीगर का सीसागर का सिकलीगर का मच्छीगर का पासीगर का बादीगर का
॥२८॥

मालो
॥२९॥
साजीगर का तवगर का कचारा का मणीयारा का लूहार का सोनार का कुंभार का तुषार का
ठंठारा का बोड का सीलवर का चतेरा का खारोल का हाली का करसणी का बागवान का-
ड्योढीवान का दरवान का सारवान का पासवान का चीतीवान.का कुत्तीवान का ऊँटवाने का कोट
वाल का बीडवान का फोनदार का हुजदार का तपदार का खेतदार का किलेदार का गोलादार
का तोयदार का गूजर का धाकड़ का जाट का पिंजारा का वाज्यारा का माडंवी को कोडवी को
कासीद का हलकारा का आगड़ा का जोगडा का ड्रम का भांड का भाट का भोजग का चारण
का कापडी का कलाल का दलाल का फेरागर का कठारा का मजूर का घसीयारा का खोजा
का दाई का वेश्या का भगतण का रावलिया का नटवा का खोजर का सागी को रागी का
खाती का खराधी का खरसाणी का विरामण का पतड्या जोतसी का गरुड्या मिश्र का भट का
नागर का नंदवाणा का गुजराती का साह का सेठ का बजाज का पसारी का सराप,का कसेरा
का हटवाण्या का भडभुंज्या का तमाख्या का बोहोरा का भंडसाली का कोठारी का कोठीवाले
की राजा का जुवराजा का पातसाहू का, यजीर का अमीर का. मुगल का पठागा.का सैद का
रोहेला का सेख का भटियारा का मुठ्यारा का लखारा का इत्यादिक आर्य अनार्य भव किये
॥२०॥

बालो०, हों वहां उन भवों के विषे हिंसा की होप वे ठिकाणा तथा उपगरण के नाम जुदा जुदा
वे इसप्रकार-पासण पासणशस्त्र पसा नाम नगर खेड़ागढ़ कोट सोनारूपातांचा लोह मादिक
॥३०॥ के सागर सागर पुर पाटण सराय हाट हवेली खाई खास कूवा पापड़ी तालापपाग बगीचा
रूख वाली चौक योगान चोदा बाजार भेला नाव जिहाज घाणाघाणी नील का कोठा कोठी
जाल फंद खोडा बेड़ी भागमी बदोखाना कठींजरा पांजरा पागल भोगल सांकल तरवार
कटारी भाला परली तीर काण नाली बन्दूक पाण दारू गोलो गोली बगतर टोपडल्हाडी
फरसी छुरी कतरणी सुई कुमी कुदाली पावडा पावही ऊखली मूसल जोतणि चरखापरली
रहट रहट्या परवा कुंडी काइ कछुया जाजम सामयाना गाड़ा गाड़ी रप बहीली शिक्षिका
सुखपाल इत्यादिक सर्व हिंसाकारी भावकारी किया होय कराया होय करताने अणुमोचा-
होय अर्थे अन धर्म मय काम मर्थे इस भवे परभवे भनेरे अनन्त भवे तो मरिहन्त सिद्ध
केवली भगवन्त की साख से मन वचन काया कर के सेव्या होय ममता से इत्यादिक की
क्रिया प्रतीतकाले लागी होप-वर्तमानकाले लागती होय तो त्रिविधे २ मन वचन काया कर
के तस मिच्छामि दुकडं ॥
॥३०॥

बालो० ॥३॥ कर्मादान पन्द्रह - अंगारा का कम किया होय १, वणकटी का कसब २ , गाड़ा गाडी प्रमुख कराइने देखने का कसप ३., ऊँट घोड़ा आदि को भाडे देने मादि का कसब ४ , खानि मादिक फुड़ाने का कसय ५, गजदांत का कसब द लाख का बज ७, रस (मदिरामादि)को पणज८,विष का बजE, केसवाले जीवों का तथा दास दासी का पणज १०, तिल इक्खु का पीलाना ११, पलधादिक को बाधी करना १२, दवाग्नि का देना जंगल गाव घर आदि में भाग लगाना १३, मर तालाब मादि का सुकाना १४, असतीजणका पोषना ग्राजीविकानिमित्त इसरित्र लियोंका पोषण करना तथा कुत्ता बिल्ली नौला मादि हिंसक प्राणियों को पालना १५॥ ये पनरा कर्मादान सेव्या होय सेवाया होय सेवता प्रते अणुमोद्या होय अर्थे अनर्थे धर्म अर्षे काम भर्थे इस भवे परभवे मनेरे अनंत भवे तो अरिहन्त सिद्ध केली भगवन्त की साख से मन वचन काया कर के त्रिविधे २ तस्स मिच्छामि दुबई ॥ इस भव के पहले नारकी तिर्थच मनुष्य देवताका जितने भव किये हों उन भवों के विषे जो शरीर छोड़े पुंछ रोम नख नसाजाल इत्यादिक पुगल पडे हों वे हिंसाकारी ठाम ठिकाणा हों उन शरीरों के हाड चाम केश सींग भासण वासण शस्त्र वन बने हो स्वाभाविक पुद्गल पडे

सालों
॥३२॥
हों वे सब मन वचन काया कर के त्रिविये २वोसिरामि.। जाति १ कुल २ यल ३ रूप ४ लाभ
५ तप ६ सूत्र ७ ईसर ८, ये आठ मद किये होतथा रिद्धि का गारव रस का गारव साता का
गारव , ये तीन गारव किये हों कराये हो करतां प्रते अणुमोद्या होय तस्स मिच्छामि बुक्कडं ॥
मायामल्ल नियाणसल्ल मिथ्योदसणमल्ल मनदण्ड वचनदण्ड कायदण्ड सेव्या होय सेवाया
होय सेवता प्रते अणुमोद्या होय तस्स मिच्छामि दुकाई ।।
आठ निमित्त - धातुबाद ज्योतिषशास्त्र वेदांगशास्त्र लक्षणशास्त्र स्वप्नशास्त्र तथा भारत
रामायण आदि मिथ्या शास्त्र उपदेश्या होय पापमूत्र की प्ररूपणा की होय कराई होय करता
अणुमोद्या होय तेतीस आशातना मांहिली पाशातना की होय तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
ज्ञान दर्शन चारित्र की विराधना की होय कराड होय करता ने अणुमोद्या होय तस्स मिच्छामि
दुकडं।
मूलगुण उत्तरगुग के विये अतिक्रमव्यतिक्रम अतिचार लागो होय तस्स मिच्छामि दुकडं।
संबर सामायिक पोसा में संधारा में तथा' मंवच्छरी के दिन ऐसी आलोयणाअणुमोदणा
करनी श्रीतीर्थंकर देव जीवद्यामय धर्म की प्ररूपणा कर के धर्म तीर्थ धाया मोक्षमार्ग प्रवत्ताया
ने
॥३२॥

मालो
संबरनिर्जरा वधाया द्वादशांग परूप्या अनन्त ज्ञान अनन्त दर्शन अनन्त चारित्र अनन्त सुखों
की खान ऐसी जणुमोदगा करनी । दूसरे पद सिद्ध भगवान चौदहभेदे पन्द्रह प्रकारे सिद्ध हुए
पाठकर्म रहित आठगुग्ग सहित अनन्त सिद्ध मोक्ष पहुंचे उन की निर्जरारूप अणुमोदणा
करनी । इस प्रकार गगधर आचार्य उपाध्याय सर्वसाधु इन के गुण जुदा २ दिपावै ऐसे अनेक
प्रकार उत्तम पुमपां का गुण दिपावे ऐसी अलोयगा मोक्षार्थी जीव हिरदे धारेगा॥ संपूर्ण ।।
अध श्रावक के तीन मनोरथ लिखते हैं । पहलो मनोरथ समणोपासक ऐसे चिंते फर मैं
आरंभ और परिग्रह घोडा और घणान्हाना और मोटा सचित्त अचित्त निदुःख का कारण
दुर्गति का अधिकारी महा अनर्थकारी पहापाप का मूल बुर्गति का साल वैर विरोध का करा-
वणहार काम क्रोध मान माया लोभ का स्वामी, कुलेश्था झंडा अध्यवसाय का परिणामी अन्नाणी
मच्छरी रागद्वेप का मूल, न्याय कृपा हित शील नंतोष का छुडावण हार कुमति कुबुद्धि दा.
लिद्र का देगा हार सुमति सुबुद्धि मोभाग का हरणहार तप संजम धन का लूटणहार लोभ
क्लेश का वधारण हार जन्म जरा मरण का देण हार माया नियाण मिथ्यात सल्य भरा अनन्त
१ नियों के भेद और प्रकार पृट ६ (टिप्पनी) में आये हैं।
॥३॥

मालो
॥३४॥
संसार का चधारण हार मोक्षमार्ग में विघ्न का करण हार कटुवा कर्म विपाक फल का देणहार
अधोगति वि बेलि का सींचगाहार महागर्भ चक्र कर्म बंध मन्द बुद्धि का मादरा हुआ सर्व
साधु निग्रन्थ का निदा हुआ पांच पाश्रव का सागर सर्वलोक में नहीं दूसरा मोहपास,
इहलोक परलोक मुखरहित अतिदारुण कर्कश अशांति से भरा हुआ सर्व कुवाज कुव्यापार
'का करावणहार अधुव- अनन्त असार अशरण ऐसा प्रारंभ और परिग्रह मैं भी छोडूंगा
भगवानजी ! इति प्रथम मनोरथ संपूर्ण ।।
दूसरा मनोरथ कप मैं दस प्रकार यति धर्मधारी नव वाड सुद्ध ब्रह्मचारी सर्व सावध
परिहारी सैतालीस दोष विशुद्ध आहारी चारह भेदे तप कारी सतरा भेदे संजम घारी पांच
महावत धारी पांच आचार पांच समिति तीन गुप्ति शुद्ध विहारी महा अभिग्रहधारी अन्त
आहारी पंत आहारी लूह आहारी तुच्छ माहारी अरस आहारी विरस आहारी अंतजीवी पंत
जीवी लूहजीवी तुच्छ जीवी सर्वरसपरित्यागी छकाय का रखपाल छकाय का प्रतिपाल निर्लोभी
निगन्धी निस्दी कुच्छिसपला पंखीतुल्ला वायु की तरह प्रतियन्धरहित सर्वसंगपरित्यागी
वीतराग की प्राज्ञासहित सुद्ध अणगार गुणधारी ऐसा शुद्ध साधु मैं भी पनूँगा भगवन्तजी॥
॥३४॥

मालो० ॥३५॥ इति दुसरा मनोरथ संपूण ॥ तीसरा मनोरथ समणोपासक ऐसे चिंते कप में सर्व जीव खमा के सर्वपाप अलोय कर पडिकम कर के निन्द कर निशल्य हो के निरतिचार होकर सर्व व्रत संभाल के अठारह पाप- स्थानक पचख कर के चार आहार छोड़ कर यह शरीर इष्टकारी कंतकारी प्रियकारी मनोगम- कारी रतनकरंडिया समान वह भी छेहले सास ऊसास वोसरा कर समाधि प्राप्ति करता हुआ तीन आराधना आराधता हुआ चार सरणा चार मंगलीक मुख से उचरता हुआ सर्व संसार का पीछा करता हुआ अरिहंत सिद्ध साधु केवलीपरूपित धर्म का ध्यान धरता हुआ शरीर की ममतारहित पादपोपगमन संथारांसहित अन्तकाले ऐसा पंडितमरणपांच अतिचार टालता हुआ काल अवांता हुआ अंत काल ऐसा पंडितमरण मुझ को होज्यो भगवानजी! ये तीन मनोरथ समगोपासक मन वचन काया कर के थिरता सहित चितारे तथा चिंतवे तोमहा निर्जरा महापञ्जवसाण,भवह, वे महा निर्जरा मोटा कर्म का क्षय संसार का अन्त करें। तीसरा मनोरथ संपूर्ण ॥ ॥ इति आलोयणा संपूर्ण ।। ॥ श्रीरस्तु॥ ३॥

मालो ॥३६॥ पुस्तक मिलने का पता-- अगरचन्द भैरोंदान सेठिया जैन शास्त्र भण्डार (लाइब्रेरी) बीकानेर (राजपूताना)

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पुस्तक मिलने का पता-
अगरचन्द भैरोंदान सेठिया
जैन शास्त्र भण्डार (लाइब्रेरी)
बीकानेर (राजपूताना)
सेटिगा जैन पिटिग प्रेम बीकानेर में मुद्रित
ता...१८-७-२८

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आलोयना

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Not Available
Title
??????
File name
आलोयना
Text
OCR done
Citation
1111
Published
1111/09
Publisher
श्री श्वेताम्बर साधु मार्गी जैन हितकारिणी संस्थान, बीकानेर
Language
Sanskrit
Pages
42
Library
Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
DLI number
322532
Barcode
99999990253081.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
sbARpKSZ2DY
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आलोयना