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Ath Ishwer Deepikasateek
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.Un- ॐ श्रीपरमात्मने नमा अथ ईश्वरदीपिका सटीक । ॐ शन्नोदेवीरभीष्टयमापोभवन्तुपीतये शयोरभिस्रवन्तुनः॥१॥ अर्थः-सबका प्रचारित करनेवाला और सबको सुख देनेवाला और सर्वव्यापक पूर्णब्रह्म आनन्द की प्राप्तिके लिये हमारे ऊपर दया करें और वही परमात्मा हमारे ऊपर सुखकी वृष्टि करें ॥ १॥ ॐ उदयंतमसस्परिस्वःपश्यन्तउत्तरंदेवं देवत्रासूर्यमगन्मज्योतिरुत्तमम् ॥२॥ : अर्थः-हे परमेश्वर ! आप प्रकाशस्वरूप हैं और ह- मेशा वर्तमान हैं और सब मनोंके मन हैं और आप सब के आत्मा हैं और ज्ञानस्वरूप हैं आपके स्वरूप में प्राप्त होकर प्रार्थना करते हैं कि, आप हमारी रक्षाकरें ॥ २ ॥ नमःशम्भवायच मयोभवायच नमः शङ्करायच मयस्करायच नमः शिवायच शिवतरायच ॥३॥ अर्थः-जो आनन्दस्वरूप. संसारका . .
ईश्वरदीपिकास और प्रकाश करता.अपने भक्तों का रक्षक जो परमात्मा उसको मंगलरूप से मैं वारंवार नमस्कार करताहूं ॥३॥ सदैववासनात्यागः शमोयमितिशब्दि तः ॥ निग्रहो बाह्यरत्तीनां दमइत्यभिधी यते ॥४॥ अर्थः-अब प्रथम शम और दम को कहते हैं। सें- सारकी वासनाओं का त्याग करना शभ कहावे है और बाह्य इन्द्रियों का रोकना अर्थात् नासिका कर्ण आदि इन्द्रियोंको गंधशब्दादि विषयोंसे हटाकर अपने अधीन कर लेना दम कहावे है. ॥ ४॥ - .. -विषयेभ्यःपरावृत्तिः परमोपरतिहिंसा ।। सहनं सर्वदुःखानां तितिना सा शुभा में ता॥५॥ अर्थः-अब उपरति और तितिक्षा को कहते हैं । वि. पयों से अत्यन्त चित्तको अलग करदेने का नाम उपर- ति है और सम्पूर्ण प्रकारके दुःखों को सहन करना सो तितिक्षा कहावे है ॥ ५॥ निगमाचार्यवाकयेषुः भक्ति श्रद्धोतिः वि ५ ईश्वरदीपिका स०। श्रुता.। चित्तैकाग्रयन्तु सल्लक्ष्यसमाधानमि तिस्मृतम् ॥६॥... अर्थः-अच श्रद्धा और समाधान कहतेहैं। वेदशा- स्वादि और गुरुके वाक्योंमें जो भक्ति करना है सो श्रद्धा कहावे. है और शब्दादि विषयों से चित्तको रोककर मो- क्षके करनेवाले श्रवण मनन निदिध्यासन द्वारा एकान्त -में बैठकर नित्य अनित्य के विचार को समाधान कह: बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि साक्षान्मोक्षक साधनम् ॥ पाकस्यवह्निवज्ज्ञानं विनामो चोनसियति ॥७॥ अर्थः-यज्ञ व्रत उपासना आदि जो अनेक साधन हैं उनमें केवल एक आत्मज्ञानही मोक्षकी प्राप्ति का मुख्य उपाय है जिस प्रकार अन्नःआदि का भोजन बनाने में . -पात्र काजल:आदि अनेक वस्तुओं की आवश्यकता । होयहै परंतुःप्रधानकारणं अग्निही होय है क्योंकि यदि सोसम्पूर्ण सामग्रीहों और एक अग्निही नहीं होय नौ भो- जन नहीं बनसकै है इसी प्रकार मन्त्र जप आदि अन्य साधनों के होनेपर भी आत्मज्ञान हुए विना मोक्षकी 1 '६ - ईश्वरदीपिका सं०। प्राप्ति कदापि नहीं होसकै हैं सोई श्रुतियोंमेंभी कहाँहै कि ऋतेज्ञानान्न मुक्तिः ॥ ज्ञान के विना पुरुषकी मुक्ति नहीं होयहै और।ज्ञानादेवतु कैवल्यम्॥ ज्ञानसेही कैवल्यपद की प्राप्ति होती है। तथा ज्ञात्वा दैवं सर्वपाशापहानिः॥ आत्मदैव को जानकरही सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्ति हो- ती है ।। ७॥ अविरोधितयाकर्मनाविद्यांविनिवर्तये त् ॥ विद्याऽविद्यांनिहन्त्येवतेजस्तिमिरस अवत् ॥८॥ अर्थ:-कर्म अविरोधी होनेके कारण अविद्याके दूर करने में समर्थ नहीं है अर्थात् कर्म और अविद्या (अ- ज्ञान) इन दोनोंका परस्पर कोई विरोध नहीं है क्योंकि यह दोनों नड़ हैं इस कारण कर्म कदापि अविद्या को दूर नहीं करसकै है परन्तु जिस प्रकार तेज और अन्ध- कारका विरोध होयहै और तेज अन्धकार को नष्ट करदे ताहै उसी प्रकार विद्या कहिये मैं नित्यं शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वरूपहूं इस प्रकार ब्रह्म और जीवात्माकी एकताके ज्ञान और अविद्या कहिये मैं मनुष्यहूं दुःखीहूं सुखीहूं इत्याका- एक अज्ञान विरोध है इस कारण विद्या. जो ज्ञान सो
७
ईश्वरदीपिका स०
अविद्या कहिये अज्ञान को नष्ट करदेती है।.८॥
नानाशास्त्रपठेतप्राणी नानादेवप्रपूजन
म् ॥ आत्मज्ञानं विनापार्थसर्वकर्मनिरर्थ
कम् ॥६॥
अर्थः-श्रीकृष्णं महाराज अर्जुन से कहते हैं कि हे
अर्जुन ! नाना (बहुत) रकमके मनुष्य शास्त्र पढ़ता है
और नानांतरह के देवों की पूजा करते हैं परन्तु आत्म-
ज्ञानके विना सब निरर्थक हैं अर्थात् आत्मज्ञानही मुख्य
साधन है ॥ ६॥
- आचारः क्रियते ;कोटिर्दानं काञ्चनभू
षणम् ॥ आत्मानंनवजानाति मुक्तिोंसद्
तिविना ॥१०॥
वहुत तरहका आचार अर्थात् कोटिन प्रकार के आ
चार याने क्रिया और काञ्चनों के दान अर्थात् सोना
चाँदीजवाहिरातों के दान करनेसेभी आनन्द नहीं होता
जहांतक आत्माको नहीं पहचानेगा और सत्कर्म नहीं
करेगा याने सतशास्त्र और सत्संग करके विचार नहीं
करेगा और ब्रह्मानन्द को नहीं पहँचानेगा तहांतक
मुक्ति नहीं होवेगी ॥१०॥
ईश्वरदीपिका स : कोटियज्ञःकृतो येन कोटिदान जप च यः ॥ गवांदानञ्चासकृतस्यान्मुक्तिर्ना स्तिनसंशयः ॥११॥ अर्थः-कोटिन तरहके जो यज्ञ करता है और कोटिन तरहके दान और जप जो करता है और गौवोंके दानभी करता है परंतु हे अर्जुन ! इन सबके करने से मुक्ति नहीं होगी अर्थात् ब्रह्म की प्राप्ति नहीं होगी इस में कोई भी संशय नहीं है ॥११॥ जित्वासर्वकृतंकर्म ज्ञात्वाविष्णुगुरुत था ॥ कल्पविकल्पमात्यज्य पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १२॥ अर्थः-सर्वकर्मोंको जीतकरके याने काम क्रोधादि- कनको जीतकरके और इन्द्रियादिकन के पदार्थों के वि- पयों को जीतकरके और श्रीगुरुके उपदेश को धारण करके चैतन्यस्वरूप जो ब्रह्म है उसमें मवको लगाना और कल्प विकल्प का त्याग करना अर्थात् नित्य अ- नित्यका विचार करना इससे फिर संसाररूपी जन्म मरण से रहित होजाता है ।।१२।। यद्वाचानाभ्युद्यते येनवागभ्युद्यते तदे .
8 ईश्वरदीपिका स। वब्रह्मत्वं विद्धिनेदंयदीदमुपास्यते. ॥ य चक्षुषानपश्यन्ति येनचथूषि पश्यतितदेव ब्रह्मत्वं विद्धिनेदंयदीदमुपास्यते ॥ यच्छो त्रेण न शृणोति येनश्रोत्रेणइदंश्रुतं तदेवब्रह्म त्वं विडिनेदं यदीदमुपास्यते ॥ यन्मनसा नमनुते येनाहुर्मनोमतं तदेवब्रह्मत्वं विद्धि नेदंयदीदमुपास्यते ॥ यत्प्राणेननप्रणीयते येनप्राणःप्रणीयते तदेवब्रह्मत्वं विद्धिनेदंय दीदमुपास्यते ॥ १३ ॥ अर्थः-वो वाचाके साथ नहीं बोलता है उसकी स- हायता से वाचा वोलती है उसी को तू ब्रह्म जान जिसः की उपासना करता है वो ब्रह्म नहीं है अर्थात् मूर्ति आ- दियों पर व्रह्मभाव करता है वो ब्रह्मनहीं है । जो चक्षुके द्वारा नहीं देखता है जिसके द्वारा चक्षु अपने कार्य को करते हैं उसीको तू ब्रह्मजान जिसकी उपासना करता । है वो ब्रह्म नहीं है ।। वो कानके द्वारा नहीं सुनता जिस के द्वारा कानसे सुना जाता है. उसीको तुम ब्रह्म जानो जिस की उपासना करताहै वो ब्रह्म नहीं है । वो मनके १० ईश्वरदीपिका सा दारा भ्रमण नहीं करता जिसके द्वारा मन भ्रमण करता है उसीको ब्रह्मजान जिसकी उपासना करता है वो बहनहींहै । वो प्राणके द्वारा श्वास नहीं लेता जि- सकेबारामाण अपनेकार्योको सम्पादन करते हैं उसीको मजान जिसकी उपासना करताहै वो ब्रह्मनहीं है. १३॥ दिग्देशकालाधनपेक्षि सर्वगं शीतादिह नित्यमुखं निरञ्जनम्॥ यःस्वात्मतीर्थमज तेविनिष्क्रियः ससर्ववित्सर्वगतोऽमृतो म वेत् ॥ १४॥ अर्थः-जो सर्वप्रकारकी क्रियाओं करके रहित ज्ञानी पुरुष एकाग्रचित्त होकर पूर्वादिदिशा और चैकुंठ कैला- सादिदेश तथा भूत भविष्यत् वर्तमानकाल की अपे- क्षारहित सर्वव्यापक और शीतादिकं हरणकरने वाले अर्थात् शीतोष्णादि छन्दों के नाशक नित्य सुखरूक और निरञ्जन कहिये माया के कार्य जंगतरूप मल से रहित आत्मतत्त्वरूप तीर्थ को सेवन करता है अर्थात् विचार सेवन मनन आदि करता है अर्थात् जो पुरुषस: म्पूर्ण काँको त्यागकर आत्मतत्वरूप तत्त्वे का विचार करता है वह सर्वज्ञ और सर्वव्यापक तथा अमृत कहिये ईश्वरदीपिका स०। मुक्त होकर ब्रह्मरूप होजाताहै इसकारण मुमुक्षु पुरुषों को आत्मतत्त्वरूपी तीर्थका सेवन करना अत्यन्त आवश्यक है सोई महाभारत के विषे कहा है कि ॥ अत्मानद्रीसं- यमतोयपूर्णा सत्यावर्ता शीलतटादयोर्मिः ॥ तत्राभि- षेकं कुरु पांडपुत्र नवारिणा शुद्धयति चान्तरात्मा ॥ अ- र्थात हे युधिष्ठिर ! संयम है जल जिसमें और सत्य है भवर जिसमें और शीलहै तट जिसका और दयाहै ऊ- मि (तरंग) जिसमें ऐसआत्मरूपीनदी (तीर्थ )में स्नान करों जल से अन्तर आत्मा शुद्ध नहीं होता है ॥ १४॥ उपासनाश्रितोधम्मोजातेब्रह्मणिवर्तते । प्रागुत्पत्तेरजंसवतेनासौकृपणःस्कृतः १५॥ .: अर्थः-धर्म उत्पन्न हुये ब्रह्म विषे वर्तताहै उत्पत्ति से पूर्व सर्व अजन्माथा-उपासना के आश्रित हुआ तिससे यह कृपण चिन्तन किया है अर्थात् देहके धारण से धर्म जो जीव सो आकाशादि भूतों के समुदायके आकारसे उत्पन्न हुये ब्रह्म विषे तिसका अभिमानी होके वर्तताहै सो उत्पत्ति से पूर्व सर्व अजन्माथा इसप्रकार काल करके परिच्छिन्न वस्तुको मानताहै सो जीव पुनः उपासनाको पुरुषार्थ का साधन जानके तदाश्रित हुआ.देहपात हुये ईश्वरदीपिका सः। पश्चात् तिसही ब्रह्म को प्राप्त होवेगा इसप्रकार जिसका- रणसे मिथ्या ज्ञानवान होयके स्थित होवे है तिसकारण से यह व्रह्मवेत्ता पुरुषोंने कृपण (अल्प)चिन्तन किया है इसका यह अभिप्राय है कि उपासनाके आश्रितहुआ। अर्थात् उपासना को अपनेमोक्षका साधनमानके प्राप्त हुआ। उपासकोऽहं.ममोपास्यब्रह्मतदुपासनं कृत्वां जा- ते ब्रह्मणि इदानीं वर्तमानोऽजं ब्रह्मशरीरपातादूचं प्रति- पत्स्येप्रागुत्पत्तेश्वा जामदं सर्वमहंच ।। मैं उपासकहूं मेरा उपास्य ब्रह्म है तिस उपासना करके अव भूतों के संघात के आकार से उत्पन्न हुये ब्रह्म विषे वर्तमानहूं, और श- रीरके पतन हुये पश्चात् अजन्मा व्रह्मको प्राप्त होऊंगा और उत्पत्ति से पूर्व अवस्था विपे यह सर्व अजन्मा था और में भी तैसाही अजन्माथा इसप्रकार जिसकरके उ- पासक मानताहै एतदर्थ पूर्व अवस्थावाले ब्रह्मको विषय करनेवाली अजन्मापने की श्रुतिवने है ।। इंदानी जातो जाते ब्रह्मणि च वर्तमानउपासनया पुनस्तदेव प्रति- पत्स्य इत्येव उपासनाश्रितोधर्मः। उत्पत्ति अवस्था विपे मैं जन्मको पायाहूं और इस स्थित अवस्थाविषे उत्पन्न हुये ब्रह्म विपे अर्थात् भूतों के संघातरूप शरीराकार से उत्पन्नहुये ब्रह्मविपे वर्तमानहीं और उत्पत्ति से पूर्व जिस ईश्वरदीपिका स० रूप वालाहुआ स्थितथा तिसंहीको पुनः प्रलय अवस्था विषे उपासनासे प्राप्त होऊंगा इस रीतिसे उपासाना के आश्रित हुआ साधक जीवसे ज़िसहेतुसे इसप्रकारकरके अल्प ब्रह्मकावेत्ताहै तिसही हेतुसे यह नित्य अंजन्मा ब्रह्मके दर्शी अनुभवी महात्मा पुरुषोंने उक्त प्रकार के उ- पासकको कृपण दीन अल्पकरकेचिन्तन कियाहै॥१५॥ "दम्भोदोभिमानश्च क्रोधःपारुष्यमेवच। अज्ञानं चामिजातस्य पार्थसम्पदमासुरि म्॥१६॥ अर्थः-पाखण्ड अहंकार मान क्रोध पारुप्यता अज्ञान हे अर्जुन-ये संपदा आसुरी है असुरों के कामहै ॥१६॥ आत्मन्येवाखिलं. दृश्यं प्रविलाप्यधि यासुधीः ॥ भावयेदेकमात्मानं निर्मलाका शवत्सदा ॥ १७॥ अर्थः-सुधी कहिये शुद्ध, अन्तःकरणवाला अधि- कारी पुरुष विवेकिनी बुद्धि करके सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च आत्मा के विषेही लीन करके अर्थात् आत्माके विषे वि. कार कथनमात्रही है उसको दूरकरके अर्थात् पृथ्वी को जलके बिपे लीन करै जलको तेज (अग्नी) के विषे .
ईश्वरदीपिका स०। लीनकर और तेजको वायुके विषे लीनकरै वायुको आ- काश के विपेलीनकर और आकाशको मूलप्रकृति (मा- या) के विषे लीनकर और मूलप्रकृति को शुद्ध ब्रह्म के बिपे.लीनकरके तदनन्तर शुद्ध व्यापक ब्रह्म मैंहीहूंऐसा चिन्तवन कर जैसे शरत्काल के विषे आकाश धूलीमेघ आदि उपाधी करके रहित स्वच्छ होताहै तिसी प्रकार आत्माको स्वच्छ एकरस चिन्तवन करना ।। १७ ।। इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषुगुणैरपिगुणणेषुच॥ ह्यगु विप्यहं कुर्यानविद्वान्यस्त्वविक्रियः१८॥ . . अर्थः इन्द्रियों के पदार्थ विपे इन्द्रिय करिकै जे भये सत् असत् कर्म गुणों करिकै गुणों विपे तिसकर्मों का फल ग्रहणकरा अज्ञानी अपने को मानताहै कि हम कर्मकिया जिनने आत्मा को जान लिया कि आत्मा अकर्ता है विकार से हीन सो ज्ञानीअपने को नहीं मा- नता॥१८॥ विश्वोहिस्थूलमुनित्यं तेजसः प्रविविक्त मुक। आनन्दमुक्तथाप्राज्ञनिधाभोगनियो धत।। १६॥ विश्व नित्यही स्थूलमुक है तेजस प्रविविक्तभुक् 14 ईश्वरदीपिका सः। है अर्थात् जापवस्थाका अभिमानी विख नित्यही स्थूल भोगोंका भोक्ताहै और स्वप्नावस्था का अभिमानी तैजस नित्यही वासनामय सूक्ष्म भोगोंका भोक्ता है और आनन्दमुक्तथा प्राज्ञस्त्रिंधा भोगं निबोधत । तैसे प्राज्ञ आनन्दभुक् है तीन प्रकार के भोगों को जानो अर्थात् जैसे जाग्रदवस्था का. अभिमानी विश्व. स्थूल भोगों का.और स्वप्नाभिमानी तैजस वासनामय सूक्ष्म भोगों का भोक्ता है तैसेही सुषुप्ति अवस्थाका अभिमानी प्राज्ञ आनन्दका भोक्ताहै इस माफिक तीन भोगजानना१६॥ स्थूलतर्पयतेविश्वप्रविविक्तन्तुतैजसम् ।। आनन्दश्चतथाप्राज्ञविधातृप्तिनिबोधत २० स्थूल भोग विश्व को तृप्त करै हैं.सूक्ष्म तैजसको तृप्त करै हैं अर्थात् शब्द आदि विषय स्थूलभोग जाग्रंद- भिमानी विश्वको तृप्तकरताहै और जाग्रतकी वासना- मय सूक्ष्म भोग स्वाभिमानी तैजस को तृप्त करता है तैसेही॥आनन्दश्च तथा प्राज्ञ त्रिधा तृप्ति निबोधत तैसे आनन्द प्राज्ञ को तृप्तकरैहै तीन प्रकार. की तृप्तिको जानो ॥२०॥ अनुभूतोप्ययं लोकोव्यवहारतमोऽपि ईश्वरदीपिका सः। सन्। असदूपोयथास्वप्नउतरक्षणबाधत:२१ स्वप्नो जागरणेऽजीकः स्वप्नोपिजागरोन हि । इयमेवलयेनास्तिलयोपियुभयोर्न च॥२२॥ अर्थः-जिस प्रकार स्वप्नावस्था में स्वप्नमें देखाहुआ पदार्थ सम्पूर्ण सत्स्वरूप मालूम पड़े है .स्वप्न से दूसरेक्षण में जागतेही सव असत्स्वरूप होजाय है इसप्रकार इस संसार का व्यवहार संत्य मालूम होयहै और असत्यं स्वरूप होयहै जाग्रदवस्था में स्वप्न मिथ्या मालूम हो- यहै और स्वप्नावस्था में जाग्रत् मिथ्या मालूम होय है और सुषुप्ति अवस्था में स्वमजाग्रत् दोनों मिथ्या होयहैं इसी प्रकार स्वप्न और जाग्रत् अवस्था में सुपुप्ति मिथ्या प्रतीत होयहै ॥ २१ ॥ २२॥ त्रयमेवंभवेन्मिथ्या गुगत्रयविनिर्मित म् । अस्यद्रष्टांगुणातीतोनित्योोकश्चिदा. त्मकः ॥ २३ ॥ अर्थ:-सतोगुण रजोगुण तमोगुण से बनहुये जाग्रत स्वम सुषुप्ति तीनों ऊपर कहेहुये प्रकारसे मिथ्या होय हैं ..
ईश्वरदीपिका स०। इन तीनों अवस्थाओंका साक्षी गुणातीत अर्थात गुण- रहित चिन्मय चैतन्यस्वरूप सत्यहै ।। २३ ।। यहन्मृदिघटभ्रांतिशक्तीवारजतस्थिति म् । यहब्रह्मणिजीवत्वंवीक्ष्यमाणेनपश्य ति॥२४॥ अर्थः-यदि आत्मामें तीनों गुण मिथ्या, तो जीव ही सत्यहो तहां कहते हैं जिसप्रकार मृत्तिका में घटकी भ्रांति है परन्तु घटनष्ट होनेपर मृत्तिकाही दृष्टिगोचरहोय है और जैसे शुक्ति में चांदी की भ्रांति होयहै और जब समीप जाके देखेहैं तो सीपी होय है इसी प्रकार जब तक आत्माका ज्ञान नहीं होयहै तवतवजीवहै ऐसीपती- तिहोयहै परन्तु ब्रह्मका साक्षात्कार होनेसे जीवको नहीं देखेहै ॥ २४॥ यथास्वप्नमयोजीवोजायतेम्रियतेऽपिच । तथाजीवाश्रमीसर्वभवन्तिनभवन्तिच२५ ॥ जैसे स्वप्न के जीव जन्मता है और मरताभी है तैसे ही यह सर्व जीव होतेभी हैं और नहीं भी होते हैं अर्थात् "स्वम विषे अनहुयेही जन्मते हैं अरु मरते हैं तैसे जगत् के जीवभी न हुये जन्मते हैं और मरते हैं ॥ २५ ॥ ..
- ईश्वरदीपिका स०॥ संसारस्वप्नतुल्योहिरागद्वेषादिसंकुलः।। स्वकालेसत्यवद्धातिप्रबोधेसत्यसवेत्२६॥ राग द्वेप आदि करके व्याप्त यह संसार स्वपके तुल्य मिथ्याहै. क्योंकि स्वप्नकाल की घटना केवल स्वभावस्था में ही सत्यसी प्रतीति होतीहै और प्रबोध (जाप्रत्) अ- वस्थाहोने पर उसकी असत्यता प्रतीत होज़ायहै उसी प्रकार अज्ञान अवस्था में यह संसार सत्यसा प्रतीतहो- ता है और जब तत्त्वज्ञान होजाताहै तव संसार स्वयं मिथ्या प्रतीत होने लगेहै इस कारण इस अमकल्पित संसार को आत्माकी अद्धितीयतामें कोई हानि नहीं होयह ॥ २६॥ यथासायामयोजीवोजायतेत्रियतेपिच। तथाजीवाश्रमीसर्वेभवन्तिनमवन्तिचा२७॥ जैसे मायामय जीव उपजताहै और मरंताभी है तैसे यहसर्व जीवहोतेभीहैं और नहींभी होते हैं अर्थात् जैसे इन्द्रजालिक मायावियोंकी मायासे मायामयजीव जन्म- ता है और मरताभीहै तैसेही प्रज्ञप्तिमात्र चैतन्यकी मा. या से जो कि वास्तव में है नहीं यह अण्डज आदि सर्व जीव उत्पत्त्यादि होतेभीहै और नहीं भी होते हैं२७॥
१६ ईश्वरदीपिका स०॥ अजमनिद्रामस्वप्नंप्रभातम्भवतिस्वय म् ॥ सकृतिमातोशेवैषधरोधातुस्वभाव तः॥२८॥ अर्थः-नाम अज है निदासे रहित है स्वारहित और आपही प्रकाशरूपं होताहै और सर्वदा प्रकाशरूप ही है यह धर्म स्वभावसे धातु है अर्थात् सर्वदा प्रकाश- रूपही यह इस लक्षणवाला आत्मा नामक धर्म स्वभाव से ही धातु कहिये धारण करने वाला है ॥ २८ ॥ पलब्धावरणाःसर्वे धर्मा प्रतिनिर्म लाः॥ आदौबुद्धास्तथामुक्ता बुद्धधान्तइति नायकाः॥२९॥ ::. अर्थः-अर्थात् सर्व धर्म कहिये आत्मा बुझ्यादिरूप उपाधि को लेके है घटाकाशवत् ऐसा जानना और नि- रुपाधि रूप अत्मा.तो एकही है महदाकाशरत् अंबि- धादिक बंधनरूपं आवरण को अप्राप्त कहिये बन्धन रहित है और स्वभाव से निर्मल कहिये सदाशुद्ध जैसे धर्माख्य आत्मा आवरणरहित शुद्ध है तैसे आदिविपे कहिये बौद्धस्वरूपहै और तैसे ही नित्यमुझहै ॥ २६ ॥ भनण्वस्थूलमहस्वमंदीर्घमंजमव्यय .
२० ईश्वरदीपिका स० म् ॥ अरूपगुणवर्णाख्यं तद्ब्रह्मेत्यवधार येत् ॥३०॥ अर्थः-आत्मा अणुरूप (सूक्ष्मरूप) नहींहै और ॥ अ- णोरणीयान् महतो महीयात् ।। इस.श्रुति में जो आत्मा को अणुरूप वर्णन किया है सो उसका तात्पर्य यह है कि आत्मा का स्वरूप दुर्विज्ञेय अर्थात् अति कठिनतासे जानने योग्य है किन्तु श्रुतिका तात्पर्य यह नहीं है कि आत्मा अपुमात्र है और आत्मा. स्थूल है अर्थात् स्थू- ल (महान नहीं है और उपरोक्त श्रुतिके विषे जो आत्मा को महानरूप वर्णन किया है उसका तात्पर्य यहहै कि आत्मा सम्पूर्ण का अधिष्ठानरूप होने से सर्वश्रेष्ठ है यह महान् पदका परिमाण अर्थ नहीं है और आत्मा ह्रस्व दीर्घ परिणाम से रहित है अज अव्यय अर्थात् जन्ममरणारहित है और अरूप कहिये शुक्ल पित्तादि अथवा सत्त्वादिके परिणामरहित और निर्गुण तथा वर्ण- हीन अर्थात् ब्राह्मणादि वर्णरहित जो ब्रह्म है उसकोही मुमुक्षुपुरुष निश्चय करता है।॥ ३०॥ लकश्चिज्जायतेजीवः सम्भवोऽस्यनविद्या ताएतत्तदुत्तमंसत्यंयत्रकिञ्चिन्नजायते३१॥
ईश्वरदीपिका स०। इसजगत्का कारण नहीं तिसही करके कोईभी जीव जन्मता उपजता नहीं और ॥ एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र कि- श्चिन्नजायते ॥ जिस विषे कुछ भी जन्मता नहीं यह तिनके मध्य उत्तम सत्य है अर्थात् जिस सत्यरूप एक अद्वितीयब्रह्म विषे उपायपने करके उक्तसत्यों के मध्य उत्तम सत्यहै इसका खुलासा यहहै कि व्यवहारविषे सत्य विषयका और जीवोंका जन्म मरणादिक स्वमादिकोंके जीवोंवत् है अर्थात जैसे स्वप्नविषे जीवादिक अनेक प- दार्थ उपजते विनशते हैं तैसेही यह जाग्रत् जीवादिकों को कल्पनामात्रही जानना कदापि कोई भी जीव ज: न्मता नहीं यह परमार्थ से जो सत्यहै इसीलिये मिथ्या भ्रममात्रहै ॥ ३१ ॥ नोत्पद्यतेविनाज्ञानं विचारणान्यसाध नैः ॥ यथापदार्थभानंहि प्रकाशनविनाक चित् ॥३२॥ विना ज्ञानके और साधनोंकरके नित्य अनित्य वस्तु का विचार नहीं होयहै जैसे सूर्यादिकं प्रकाश के विना कहींभी कोई घटपटादि पदार्थोंका भान नहींहोयहै ३२॥ कोहं कथमिदंजातं कोवैकर्त्तास्यविद्य ईश्वरदीपिका स० ते ॥ उपादानंकिमस्तीह विचार सोयमी दृशः ।। ३३॥ में कौनहूं यहसंसार किसप्रकार उत्पन्नहुआ कौन इस जगत्का का है और संसार का उपादानकारण कौन है इसप्रकार नानातरह का जो विचार करना है सो वि. चारहै ॥ ३३ ॥. निर्विकारोनिराकारो निरवद्योऽहसव्य यः ॥ नाहंदेहोघसद्रूपो ज्ञानभित्युच्यते बुधैः ॥ ३४॥ अर्थ:-मैं निर्विकारहूं अर्थात् सदा एकल्पहूं और नि. राकार अर्थात् मेरा कोई आकार नहीं है में निखचहूं अ त् अध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिक इन ती तापों करके रहितहूं और अविनाशीहूं नाशवान देव नहीं हूं इसरकार ज्ञानको पण्डितगण तत्त्वज्ञान कहे हैं ॥३४! निरामयोनिरामासो निर्विकल्पोऽहमा ततः । नाइंदेहोह्यसद्रूपो ज्ञानमित्युच्यते बुधैः ॥ ३५॥ अर्थ:-मैं रोगहीनहूं अर्थात् मुझे राजयक्ष्मादि रोग ईश्वरदीपिका स०। २३ नहीं होयहै मुझे फलंकी अभिलापा नहीं है मैं कल्पना नहीं करूंहूं और सर्वव्यापीहूं मैं नाशवान्देह नहींहूं इस प्रकारके ज्ञानको पण्डितगण तत्त्वज्ञानकहते हैं ॥३५॥ निर्गुणोनिष्क्रियोनित्यो नित्यमुक्तोऽह मच्युतः । नाहंदेहो सासूषो ज्ञानमित्युच्य तेदुधैः ।। ३६॥ अर्थः-मैं रजोगुण सतोगुण तमोगुणरूप तीनोगुणों करके रहितहूं क्रियाकरके रहितहूं नित्यहूं नित्यमुक्तहूं अ- र्थातु सर्वदाही बन्धनशून्यहूं अच्युतहूं अर्थात् सदा ज्ञा- नमयहूं मैं नाशवान् देहनहींहूं इसप्रकार ज्ञानको पण्डित- जन तत्त्वज्ञान कहते हैं ।। ३६ ॥ आदिशान्तावानुत्पन्नाः प्रकृत्यैवसुनिर्व ताः ॥ सर्वेधाःसमामिन्ना अजंसाम्य विशारदम् ॥३७॥ अर्थः-अर्थात् जिसकरके सर्वधर्म कहिये आत्मा आदि विषे कहिये नित्यही शान्तहै और अनुत्पन्नकहिये अजन्मा है और समान है और अभिन्न है इस प्रकार जिसकरके जन्मरहितहै ॥ ३७ ॥ ब्रह्मैवसर्वनामानि रूपाणिविविधानि २४ ईश्वरदीपिका स० च ॥ कर्माण्यपिसमग्राणि बिभौतिश्रुति जगौ॥ ३८॥ अर्थः-ब्रह्मही सर्वप्रकार के नाम और नानाप्रकार के रूप धारणकरता है और नानाप्रकार के कर्म धारणकरता है ऐसा साक्षात श्रुति कहती है ।। ३८ ॥ सुवर्णाज्जायमानस्य सुवर्णत्वंचशाश्व तम् ॥ब्रह्मणोजायमानस्य ब्रह्मत्वचतथाभ वेत् ॥ ३६॥ अर्थः-जिसप्रकार सुवर्ण के कटक कुण्डलादिक नाये जाते हैं जबतक कुण्डलादि आकार रहा तक्लोरहा फिर गलानेसे सुवर्ण का सुवर्णही होजाताहै इसीप्रकार यह ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ संसार जवलों किसी आकार में रहताहै तवलों रहता है अन्त में आकार दूर होनेपर भी ब्रह्मही होता है ॥ ३६॥ स्वल्पमप्यन्तरंकृत्वा जीवात्मपरमात्म नोः ॥ यःसन्तिष्ठतिमूढात्मा भयंतस्यामि भाषितम् ॥ ४॥ जो पुरुष जीवात्मा और परमात्मा में कुछभी भेदकरै है और माने हैं वह अज्ञानी पुरुप भयको प्राप्त होयहै अ- - २५ ईश्वरदीपिका स० र्थात् उनके चित्तको कदापि-शान्ति नहीं होयहै ॥४०॥ प्रकाशोऽर्कस्यतोयस्य शैत्यमग्नेर्यथो ष्णता ॥ स्वभाव सच्चिदानन्द नित्यनिर्मल तात्मनः॥४१॥ अर्थः-जिसप्रकार सूर्यका प्रकाश स्वभावहै अर्थात् स्वरूपहै और जिसप्रकार जलका शीतलता स्वभाव है तथा जिसमकरा आग्निका उष्णता स्वभावहै तिसीप्रकार आत्माका सत् चित् आनन्द नित्य और निर्मल स्वभाव है।॥४१॥ आत्मनःसच्चिदंशश्च बुडेत्तिरितिहय- म्॥ संयोज्यचाविवेकेन जानामीतिप्रवर्त ते॥४२॥ . अर्थः-प्रत्यगात्माका सत् चित् अंश अर्थात् बुद्धिकी वृत्ति में पड़नेवाला आत्माका आभास. (छाया) और अज्ञानस्वरूप आनन्द का अंश जो बुद्धिकी वृत्ति इन दोनों को एक में मिलाकर अज्ञान से मैं जानताहूं मैं सुखी हूं मैं दुःखी हूं इत्यादि अनुभव परागात्मा (जीवा- स्मा) करता है वास्तव में सर्वप्रकार के सम्बन्धरहित आत्मा के विषे ज्ञान सुख दुःखादि बुद्धिका वृत्तिरूप २६ ईश्वरदीपिका स०। परिणामहै इसकारण ज्ञान सुख दुःखादिका आश्रय बुद्धि है आत्मा नहीं है और आत्मा के विपे जो ज्ञान सुख दुःखादि की प्रतीति होती है सो आत्मा तो स्वभावतः निर्विकार सच्चिदानन्दस्वरूपही है ॥ ४२ ॥ नवत्रसूर्योभातिनचन्द्रतारक नेमावि- द्युतोभांतिकुतोयमग्निःतमेवभान्तमनुमा तिसर्वतस्यमासासर्वमिदविभाति ॥ ४३ ॥ : अर्थः-न वहां पर सूर्य प्रकाशं करसकता है न वहां चंद्र प्रकाश करसकता है न वहां तारांगण प्रकाश कर- सक्ताहै न वहांपर विद्युतादि नाम विजुलीआदि प्रकाश करसक्ती है यह अग्नि. उसी के प्रज्वलित करने से प्रकाशित होती है अर्थात् ब्रह्म अपने प्रकाशस्वरूप . प्राप्यसर्वज्ञतांकृत्स्ना ब्रह्मण्यंपदमहय म् ॥ अनापन्नादिमध्यान्तं किमतः परमी हते॥४४॥ अर्थः-सम्पूर्ण सर्वज्ञताको पायके अद्वैत और आदिः मध्य अन्त को अप्राप्तहुये और ब्रह्मभावरूप पदको पाय के इसके पश्चात् क्या चेष्टा करता है ।। ४४॥
२७ ईश्वरदीपिका स०। प्रकृत्याकाशवज्ञयाः संर्वधर्माअनाद यन् ॥ विद्यतेनहिनानात्वं तेषांकचनकिञ्च न॥४५॥ सर्वधर्म स्वभावसे आकाशवंतहै और अनादिहै और जानने योग्यहै तिनका नानात्व कहीं भी कुछ विद्यमान नहीं अर्थात् परमार्थ से तो सर्वधर्म कहिये आत्मा स्वभाव से सूक्ष्म निरंजन और सर्वगतपने विपे आकाशवतहै ।। आकाशवत् सर्वगतःसनित्यः ॥ और अनादि कहिये व्यवधान से रहित नित्यहै. इसप्रकार मुमुक्षुओं करके जा- नने योग्य है और तिनका नानात्व कहीं भी अर्थात् अ- घुमात्र भी विद्यमान नहीं अर्थात् एक अद्वैत परिपूर्ण आत्माविपे एक अणुमात्र भी नानात्व नहीं ॥ ४५ ॥ आदिबुद्धा प्रकृत्यैव सर्वेध स्मुनि श्चिताः ॥ यस्यैवंभवतिशांतिःसोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ४६॥ अर्थः-सर्वधर्म कहिये आत्मा स्वभावसेही आदिविषे नित्यहै अर्थात् जैसे नित्य प्रकाशस्वरूपहै तैसेही नित्य बोधस्वरूप है जिसके ऐसे शान्ति होती है सो अमृतभाव के अर्थ समर्थ होताहै ॥ ४६॥ -- ईश्वरदीपिका स! नसन्हशेतिष्ठतिरूपमस्यनचक्षुषापश्य तिकश्चनैनम् ।। हृदामनीपामनसापिकल्पते यएतहिदुरमृतास्तेभवन्ति ॥४७॥ :: अर्थः-न उसका कोई रूप देखसलाहै न उसको कोई नेत्रों के द्वारा देखसक्ताहै हृदय और मनकेसाथं जिसआ- दमीने विचारकरलियाहै वह अमृत होगयाहै अर्थात् स- तशास्त्र और सत्संगकरके जिसने ब्रह्मकाविचारकियाहै वह अमृत होगया अर्थात् जन्ममरण से छुटजाताहै ४७|| अशब्दस्पर्शरूपमव्ययंतथारसंनित्यंग न्धवच्चयत् ॥ अनाद्यनन्तंसहतंपरध्रुवनचा प्ययमृत्युमुखात्प्रमुच्यते ।।.४८ ॥ अर्थः-वह ब्रह्म शब्द स्पर्शवाला रूपवाला नहींहै अ- व्ययं अर्थात् मरता-जन्मता नहीं और रसवाला भी नहीं और नित्यहैं और गन्धवालाभी नहीं याने उसको गन्ध भी स्पर्श नहीं करसहा वह अनादि है और अनन्तहै याने सर्वव्यापक हैं और सब में श्रेष्ठहै और परघुवं अ- र्थात् उसका कोई पार नहीं है इस माफिक जिसने उसका विचार किया है वोमृत्युके सुखसे वचंजाताहै अर्थात् जन्म मरणमे रहित होजानाहै ! ४८ ॥
ईश्वरदीपिका सा २६ निषिध्यनिखिलोपाधीनेतिनेतीतिवाक्य तः ॥ विद्यादैक्यंमहावाक्यैर्जीवात्मपरमा त्मनोः॥४९॥ अर्थः अपरोक्षरूपसे जो आत्माके चैतन्यस्वरूपकाज्ञान है वह सामान्यज्ञानहोनेसे मुक्तिका साधन नहीं है किन्तु महावाक्योंसे उत्पन्न जो जीव और ब्रह्मकी एकता विशेष ज्ञानहै वहही मुक्ति का साधनहै अर्थात् नेतिनेति- इसवा- क्यसे सम्पूर्ण उपाधियों का निषेध (त्याग) करके और तत्त्वमसि आदि महावाक्यों के द्वारा जीवात्मा और पर- मात्मा की एकता का निश्चयकरै अर्थात् ।। सरासंआदे शोनेतिनेतीत्यतन्निरसनम् ॥ वह यह उपदेशहै इसप्रकार की श्रुतियोंके वचनों से अतत् कहिये आत्मासे भिन्नका निरसन (त्याग) करै अर्थात् आत्मासें भिन्नको जड़ और अनित्यं समझे इस व्याससूत्रके अनुसार सम्पूर्ण समष्टि व्यष्टिरूप उपाधिस्थूल सूक्ष्मरूप वा कार्यकारणरूंप नाम रूपात्मक जगत् अनात्म अर्थात् अनित्य और जड़ जान 'करनिषेध (अनात्मजपदार्थों का त्याग) करे और तिनं सम्बन्धों सहित “तत्त्वमसि, अयमात्माब्रह्म, प्रज्ञानंब्रह्म अहंव्रह्मास्मि” इनवेदोंकेमहावाक्योंकरके जीवात्मा और ईश्वरदीपिका स० परमात्मा की एकरूपता को निश्चयपूर्वक जाने तिस जानने के ज्ञानकोही मुक्तिका साधन और तत्त्वज्ञान कहते हैं।॥ ४६॥ आत्मनोविक्रियानास्तिवुद्धोधोनजा विति ॥ जीवःसमल ज्ञात्वा कर्नाद्रष्टेतिमु छति ।। ५० ॥ अर्थः-आत्मा सर्वप्रकारके विकारोंसेहित (निर्विकार) है सोई श्रुति में भी कहा है कि । निर्गुणनिष्क्रियशान्त निरवानिरंजनम् ॥ निर्गुण कियारहित शान्तस्वरूप. निष्पाप और निरंजन अर्थात् निर्मलहै और गीताकेरिपे भी कहाहै कि ।। अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमु च्यते। यह आत्मा अव्यक्त और अचिन्त्यं तथा निर्वि- कारहै और बुद्धिके विषे कदाचित् ज्ञानहोताही नहीं क्योंकि बुद्धिजड़स्वरूपमायाका कार्यहोनेसेजड़है परन्तु अन्तःकारणावच्छिन्ना अर्थात् अन्तःकरणोपाधिक चैतन की चेतनता करके देह इन्द्रिय अन्तःकरण आदि सम्पूर्ण जड़ पदार्थ चैतन्यात्मक प्रतीत होनेलगते हैं सो बुद्धि के कर्तृत्व भोक्तृत्व आदि.धाँकोजीवात्माअन्तःकरण और आत्मा की एकता के भ्रमसे आत्माके धर्म गानलेताहै ईश्वरदीपिका स०। सो मिथ्याप्रमहै आत्मा तो सर्वदा निर्विकार और सच्चि- दानन्दस्वरूपहै ।। ५०॥ अजेष्वजमसंक्रान्तं धर्मेषुज्ञानमिष्यते। यतोनक्रमतेज्ञानमसङ्गंतेनकीर्तितम्. ५१ ॥ अर्थः-अजन्मा धर्मों विषे अजन्मा ज्ञान है न जानने वाला अंगीकार करते हैं जाते ज्ञान गमन करता नहीं ताते असंग कहा है अर्थात् जिप्स करके सूर्य विषेऊष्मता और प्रकाशवत् अजन्मा कहिये अचलधर्म कहिये आत्मा विषे अजन्मा कहिये अचल ज्ञान अंगीकार क- रते हैं क्योंकि आत्मा ज्ञानस्वरूपहै ।। ५९ ॥ यथाभवतिबालानां गगनंमलिनंमले। तथा भवत्यबुद्धीनामात्माऽपि मलिनोम लैः ॥५२॥ अर्थ:-जैसे बालकों को आकाश मलकरके मलिन होता है.अर्थात् जैसे लोकविपे विचार शून्य अविवेकी बालकों को परमशुद्ध जो आकाशहै सो मेघ रजधूमा- दिमल करके मलिन ( मैलवाला) भासता है परन्तु आकाश के स्वरूप स्वभाव के जानने वाले जो विवेकी पुरुषहैं तिनको आकाशमलवाला प्रतीत होता नहीं . ३२ ईश्वरदीपिका म॥ अर्थात् जिन पुरुपोंको आकाशके यथार्थ स्वरूप स्वभाव का ज्ञान है तिनको आकाशमें धूम धूलि आदिक मलके होते संतेभी आकाश मलिन प्रतीतहोके जैसाहै तैसाही प्रतीत होताहै तैसे आत्मा भी अबुद्धियों को मलकरके मलिन होताहै ॥ ५२ ॥ क्रमतेनहिबुद्धस्यज्ञानधर्मेषुतापिनः सर्वे धर्मास्तथाज्ञाननैतबुडेनमाषितम् ॥५३॥ अर्थ:-अर्थात् जिस करके सन्ताप वाले कहिये सूर्य के तापवाले आकाश के तुल्य भेदसे रहित वा पूजांकरने योग्य बुद्धिमान् परमार्थदर्शी पण्डित का ज्ञान अन्य विपयरूप धर्मों बिपे जाता नहीं किन्तु जैसे सूर्य विपे प्रकाश अभिन्नरूपसे स्थितहै तैसे आत्मरूप धर्मविपेही स्थितहै इस प्रकार अंगीकार करते हैं ताते आत्मा चिपे मुख्यपनाहोने के योग्यहै ॥ ५३॥ . अधिदैवमध्यात्मञ्चतेजोमयोऽमृतम यः पुरुषः पृथिव्याद्यतर्गतोयोविज्ञातापर एवात्माब्रह्मसर्वमिति ॥५४॥ अर्थः-अधिदैव और अध्यात्म तेजोमय अमृतमय marate ईश्वरदीपिका सः। पृथिवी आदिकों के अन्तर्गतजो विज्ञाता पुरुषहै सो पर- मात्माहीहै सर्व ब्रह्महै ॥ ५४ हयोईयोर्मधुज्ञानपरम्ब्रह्मप्रकाशितमाट थिव्यामुदरेचवयथाऽकाशप्रकाशितः५५॥ अर्थः-दयद्रय विषे परब्रह्म प्रकाश कियाहै मधुज्ञान विषे अर्थात् उक्त प्रकार दोनोंदोनों स्थानों.विषे द्वैतके क्षय होने पर्यन्त परब्रह्मप्रकाशित किया है अर्थात जिस विषे ब्रह्मविद्या नामक मधु अमृततत्त्व को मोदन होनेसे अ. थत ब्रह्मविद्या को अमृतत्त्व मोक्ष परमानन्द की प्राप्तिका हेतु होने से मधु वा अमृत कहतेहैं और यही मुख्य अमृत है क्योंकि इसही करके जन्म मरणादि लक्षणवा जीव सकारण मरणं से रहित अमर अभय भावको प्राप्तहोता है ( पृथिव्यासुदरे चैव यथाऽऽकाश प्रकाशितः) नाम 'जैसे पृथ्वीवि और उदरविषे आकाश प्रकाशित किया है जैसे लोक विषे. पृथ्वीविपे और उदरविषे एकही आ- काश :अनुमानप्रमाण से प्रकाशित किया है तैसे मधु ब्राह्मण मैं पृथ्वी आदिको विषे अधिदैव और शरीरादि को विर्षे अध्यात्मरूप से परब्रह्मही प्रकाशित किया है।
ईश्वरदीपिका सन नाकाशस्यघटाकाशो विकारोवयवौयं था ॥ नैवात्मनःसंदाजीवों विकारावयवौत था।॥५६॥ अर्थः-जैसे आकाश का घरकाश विकार और अ-- वयव नहीं अर्थात् जैसे कुण्डलादिक सुवर्णके और कु. बुदादि जलके विकार औरशाखादि वृक्षके अवयव हैं तैसे घटाकाशादि महदाकाशं के विकार अवयव नहीं और तैसे आत्माका जीव सर्वदा विकार और अवयव नहीं तैसेही परमार्थ से सत्यरूप महाकाशस्थानीय एक अखण्ड अद्वैत निराकार परब्रह्मसें अभिन्न आत्माका यह घुटाकाशस्थानीय जीव सर्वदा उक्त दृष्टान्तवत् विकार नहीं और अवयंवभी नहीं एतदर्थ अत्माकें भेदका किया व्यवहार मिध्याही है.॥५६॥ तिर्यगूर्वमधःपूर्णसच्चिदानन्दमयम् ॥ अनन्तंनित्यमकंयत्तब्रह्मेत्यवधारयेत् ५७॥ अर्थः-जो तिर्यक् कहिये पूर्व आदि-चारों दिशाओं के विपे और ऊपर तथा नीचे सर्वत्र पूर्ण है जो अनन्त कहिये देशकाल. वस्तुकृत परिच्छेदसे रहितहै नित्य क. हिये सत्यहै और एक कहिये सजातीय विजातीयह स्व.
३५ 'ईश्वरदीपिका.स गत भेदशून्य है वही ब्रह्म है ऐसा निश्चय करना इस प्रकार परमात्मा की परिपूर्ण नित्यानन्द स्वरूपता क- रके परम पुरुषार्थता सिद्ध होती है ॥५७ ॥ मरणेसम्भवेचैव गत्यागमनयोरपि । स्थितौसर्वशरीरेषुआकाशेनाविलक्षणः५८ अर्थ:-सर्व शरीरों विषे जन्म मरण गमन आगमन और स्थिति के हुये भी आकाशं से अविलक्षण है अर्थात् घटाकाश के जन्म मरण गमन आगमन अरु स्थितिवत् सर्व शरीरों विषे आत्माको जन्म मरणं गमन आगमन और स्थिति के हुये भी आत्मा आकाश से अपिलक्षण आकाशके तुल्य) प्रतीत करने को योग्यहै अर्थात् घटांकाशजोहै सो घटंकी उत्पत्ति होने से उत्पन्न हुयेवत् घटके ध्वंसहुये वंसहुयेवत् और घटके गये गयेवत् और घटके आये आयेवत् और घटके स्थितहुये स्थित हुयेवत् इत्यादिप्रकार घटाकाशविषेजो उत्पत्तिआदि प्रतीत होवे है सो घटरूप उपाधिके सम्बन्धसे होवेहै परन्तु घटसे पृथक दृष्टिकरके केवल आकाशकोही अनुभव दृष्टिंसे देखिये तोघटके वर्तमान कालमें भी आकाश उत्पत्ति विनाशा- दिकों से रहित: अपने स्वरूप करके ज्योंका त्यों एकरस्म- ३६ . ईश्वरदीपिकास ही है।तैसेही आकशि से भी महासूक्ष्म परिपूर्ण एंकरस आत्मा-विषे जो जन्म मरण सुख दुःख और परलोकमें गमन पुनःआग्रमान इत्यादि प्रतीत होता है सो शरीरादि संघातरूप उपाधि के सम्बन्धसे होताहै.1.५८॥ तयुक्तमखिलवस्तुव्यवहारस्तदन्वितः तस्मात्सर्वगतंब्रह्मक्षीरसपिरिवाखिले १४ ।। अर्थः-जिस प्रकार घृत सम्पूर्ण दुग्ध विषे अभेद- रूप करके व्याप्त रहताहै तिसी प्रकार घंटपटादि सम्पूर्ण वस्तु ये सचिदानन्द ब्रह्मकी सत्ता करके युक्त होकर अस्ति भाति प्रियरूप करके प्रकाशमान होती हैं औरतिसब्रह्म • की सत्ताकरकेही वचन दान गमन विसर्ग आनन्दकियाँ आदि सम्पूर्ण व्यवहार सिद्ध होते हैं सो भगवान ने भी कहा है कि (सर्वेन्द्रियगुणाभास सर्वेन्द्रियविवर्जितम् अर्थात् सम्पूर्ण इन्द्रियों के गुणों का प्रकाशक और सम्पू- र्ण इन्द्रियों करके रहित वह ब्रह्मही हे तिस कारण सम्पूर्ण वस्तुओं के विषै ब्रह्म अभेदरूप करके व्याप्त है ब्रह्मकी स्थिति का कोई देश काले नियतरूप से नहीं है किन्तु ब्रह्म सर्वव्यापकहै ।। ५६ ॥ हृदाकाशोदितोह्यात्मावोधभानुस्तमोऽ पनु ईश्वरदीपिकासी तः सर्वव्यापीसर्वधारोमातिसर्वप्रकाश ते॥६॥ - अर्थः- इसप्रकार जीवात्मा और परमात्मा की एकता के ज्ञान से शुद्ध हुआ हृदयरूपी आकश में उदित हुवा निर्मल बोधस्वरूप सूर्य अज्ञानरूपी अन्धकार को नष्ट करता है तहाँ शङ्का होती है कि हृदयाकाश के परि- च्छिन्न होनेसें तहाँ उदय को प्राप्त होनेवाली आत्मा भी परिच्छिन्न र नाशवान होजायंगी तहाँ कहते हैं कि आत्मा तौ सर्वव्यापी है और सर्वाधार अर्थात् अज्ञान का कार्य जो जगत् तिसका अधिष्ठानरूपहै अर्थात् भ्र- मसे प्रतीयमान हृदयाकाश सर्वव्यापक आत्माकाहा- निकारक नहीं होसकता क्योंकि आत्मा. सबका प्रका- शक नित्यस्वरूपं है ॥ ६० अनिश्चितायथारज्जुरन्धकारविकल्पि ता...: सर्पधारादिभिर्भावस्तदात्माविक ल्पितः ॥ ६१॥ अर्थ:-जैसे अन्धकार विषे अनिश्चितहुई रज्जु सर्प -और-जलधारा आदिक, भावंकरके विकल्प को प्राप्त होता है अर्थात जैसे लोकविषे मंद अन्धकार विषेरही ईश्वरदीपिकास वस्तु अहं अमुकवस्तुहीहै. इसप्रकार अपने स्वरूपसे अ- निश्चय को प्राप्त हुई सो क्या सर्प है वा जलधाराहै वां वक्रदंड है वा भूमि की दरार है इत्यादि प्रकारसे सर्प धा- रा आदिक भाव करके अनेकप्रकार से विकल्प को प्राप्त होवे है अर्थात् रज्जुविषे सर्प और थाणु (डूंछ) वि.] जो पुरुष की भ्रान्ति होती है सो मन्द अन्धकार के स- मय होती है घन अन्धकार में और स्पष्टप्रकाश में नहीं क्योंकि जिस काल में रज्जु के सामान्य अंश:सर्पवत् चक्राकार की.प्रतीति और विशेष अंशः त्रिवली ऐठन की अप्रीति होतीहै तिसकाल में सपदि भ्रान्ति हो- ती है:॥ ६१ ॥ निश्चितायांयथारज्ज्वीविकल्पोविनिव तते ॥: रज्जुरेवेतिचाद्वैतंतहदात्मविनि श्चयः ।।६२॥ अर्थ:-जैसे ये रज्जुही हैं ऐसे रज्जु के निश्चयहुये विकल्प सर्वथा निवृत्त होता है अर्थात् यह रज्जुहीहै इ. सप्रकार रज्जुके निश्चय होनेसें तिसके अज्ञान की नि; त्ति उत्पन्न हुवा जो सर्पादि रूप विकल्प सो सर्वथा नि. वृत्त होता है और रज्जुमात्र अवशेपरहती है (तददा ईश्वरदीपिका स० त्मविनिश्चयः) तैसे आत्माविषे निश्चय प्राप्त होता है अर्थात् जैसेही जब आत्मा-विषे: श्रुति वाक्यानुसार नि: श्चय प्राप्त होता है तब आत्माकी, अविद्या करके क ल्पित जे जीवादिक विकल्प तिनकी अशेष निवृत्ति से एक अद्वैत आत्मतत्तही परिअवशेष रहता है। भावार्थ कहते हैं जैसे रज्जुरेवेति रज्जुहीहै इस प्रकार निश्चयके होने से सर्व विकल्पों की निवृत्ति के होने से. रज्जुही अद्वैत है इसप्रकार नेति नेति ॥ नइति नइति ॥ सूक्ष्म भी नहीं स्थूल भी नहीं कार्य भी नहीं. कारण भी नहीं मूर्त भी नहीं अमूर्त भी नहीं इत्यादि इस सर्व संसार के धर्म से रहित वस्तु के प्रतिपादक शास्त्र से ज़नित ज्ञानरूप, आकाशका किया जो यह आत्मा का निश्चय है सोई॥ आत्मैवेदं सर्वमपूर्वमनन्तरमबाह्य संबाह्याभ्य- न्तरोह्यजी अजरोऽमरोऽमृतोऽभयएवादय इति। आत्मा ही यह सर्व है = अपूर्व है = अनपरहै अन्तर है अबाह्य है बाह्याभ्यन्तरके सहितहै और जन्मरहितअजहै अर्जरहै अमरहै अमृत (रोगरहित) है अर्थात् जन्मादि पड्भाव विकार रहित. है अभय है इसप्रकार अपने आप आत्माका दृढ़ निश्चय है सोई अद्वितीय परिशेष रहता है पुनः दैत'सर्वही निवृत्त होता है.।। ६३ ॥ .
HA H... ईश्वरदीपिका सा जाणादिमिरनन्तैश्च , भाचरेतैर्विकल्पि तासायषातस्यदेवस्यययासम्मोहितः स्वयम्।। ६३॥ अर्थः-प्राणादि अनन्त भावों. करके विकल्पको प्रास हुआहै यह उस देवकी मायाही है अर्थात् जब निश्चय करके सर्व संसार धर्मरहित-आत्मा एकहींहै तब इन सं: साररूप प्राणादि, अनन्तभाव से कैसे विकल्पको प्रांत होता है जहां इस प्रकार संशय है तहां कहते हैं यह उस आत्मरूप दैवकी मायाहै जैसे मांयांवी पुरुष करके प्रेर- णाको प्राप्तहुई जो उसकी माया सो अतिशयः निर्मल आकाशा तिसको पुष्पपत्र सहित वृक्षों करके पूर्ण हुये: वत् पूर्ण करे है तैसे यह आत्मदैवकी माया भी हैं और जैसे इन्द्रजाली की मायासे लौकिक द्रष्टाजन उस माया कृत मोहसे उस मायाकेही नशहुये देखते हैं तैसे अपनी मायासेही यह आत्मा अपने चिदाभासरूप से आप भी मौहको प्राप्त होताहै एतदर्थ मोहरूप कार्यद्धारा आत्मा विषेही माया का ज्ञान होता हैं अर्थात मूलाज्ञान की. शक्ति जो शुद्धमाया तद्विशिष्ट जात्माको मायाके कार्य मोह करके अपने विपे माया का ज्ञान होताहै और सर्व
ईश्वरदीपिका स०॥
शब्दके अर्थकी साम्यता जो माया तिसका ज्ञाता होनेसे
उसको सर्वज्ञ कहतेहैं और वो माया से रहित औरमाया
का आश्रय शुद्ध अविशिष्ट अपने सत्यस्वरूप तिसंको
स्वरूपसेही जानता है ताते ईश्वरहै और अज्ञान की
द्वितीय शक्ति मलिन अविद्या अदिशिष्ट जीव अविद्या
के कार्य मोहरूप निमित्तसे उसको अविद्या का ज्ञानहो.
ताहै कि मुझ विषे अविद्या वा मायाहै.और तिससे पृ.
थक् अपने अशुद्ध स्वरूपको विना आचार्य के उपदेशके
जानता नहीं ताते जीवहै और एतदर्थही श्रुति कहती
है कि । आचार्यवार पुरुषो-वेद ॥ और माया और अ-
विद्यारूपं उपाधि के अभावसे उभयविशिष्ट चैतन्य आ-
स्माकी अविशिष्ट ज्ञप्तिमात्र तत्त्वविषे एकताहै परन्तु आ.
चार्यके उपदेश द्वारा सम्यक प्रकारके आत्मज्ञान विना
मायाऔर अविद्याकीनिवृत्तिहोवेनहीं ॥ तथाचमममाया
दुरत्यया। मेरी माया दुःखसे.तरने योग्यहै. इस गीतोक्ति
से भगवान ने भी मांयाको मोहकी हेतुता कहीहै ।। ६.३॥
कार्यकारणता नित्यमास्तें घटदोर्य
था ॥ तथैवश्रुतियुक्तियां प्रपञ्चब्रह्मणो
रिह.॥६४॥
ईश्वरदीपिका स०। अर्थ:-जैसे सदा घट और मृत्तिका का कार्य कारण भाव देखने में आवै है तिसी प्रकार श्रुतियों से और युः लियों से प्रपंच. अर्थात् जगत् और ब्रह्मका कार्य कारण भाव जानाजाय है ।। ६.४ ॥ गृह्यमाणेघटे यहन्मृत्तिकायाति वै बला त्॥ वीचमाणे प्रपञ्चेपि ब्रह्मैवाभातिमासु रम् ॥६५॥ अर्थ:-जैसे घटके विषय में विचार करते करते अन्तमें मृत्तिकाही निश्चय होयहै इसी प्रकार इस संसारके विषय में विचार करते करते विना प्रमाणों के प्रकाशवान ब्रह्म- ही प्रतीत होयहै ।। ६५ ।। सर्पत्वेन यथारज्जूरजतत्वेनशुक्तिका ॥ विनिता विमुढेनदेहत्वेनतथात्मता ६६॥ अर्थ:-जिस प्रकार अज्ञानी पुरुष रज्जुको सर्पमान- लेयहै और सीपीको.चांदी मानलेय है इसी प्रकार आ- स्मा को देह अज्ञानीकी कल्पनारूप निर्णयकरहै ६६ ॥ घटत्वेन यथापृथ्वी पटत्वेनैवतन्तवः ॥ विनिता विमूढेनदेहत्वेन तथात्मता ६७॥ अर्थ:-जैसे अज्ञानी पुरुष मृत्तिका को घटमानै है
ईश्वरदीपिका स०।
४३.
और तन्तुओं को पटमान है तिसी प्रकार अत्माको देह-
रूप निर्णय करै है ॥ ६७॥
. पीतत्वंहियथाशुभ्रदोषावतिकस्यचि
त् ॥ तहदात्मनिदेहत्वं पश्यत्यज्ञानयोग
तः॥६८॥
अर्थ:-जिस प्रकार किसी पुरुषको पित्तदोषसे क-
मल वायु होजाय है और श्वेत वस्तु भी पीली मालूम
होने लगैहै तिसी प्रकार अज्ञान वशसे इस आत्मामें देहः
का ज्ञान है ।। ६८॥
चक्षुभ्याश्रमशीलाभ्यां सर्वभाति प्रमा
त्मकम् ॥ तहदात्मनिदेहत्वं पश्यत्यज्ञानयो
गतः।। ६६ ॥
अर्थ:-जिस प्रकार किसी पुरुषके नेत्रों में श्रम होयहै
अर्थात् घूमने की बीमारी होयहै उस पुरुषको सम्पूर्ण प-
दार्थ घूमतेहुये मालूम होयहैं तिसी प्रकार अज्ञानवश से
इस आत्मामें देहका ज्ञान है ।।.६६ ॥
अङ्गानांसमतांविद्यात्समेब्रह्मणिलीयते।।
नोचेन्नवसमानत्वमृजुत्वंशुष्कतवत्॥७०॥
..
ईश्वरदीपिका. स.
अर्थः-सब प्राणियों में समष्टि करके जो समान
ब्रह्म में लीन होय है सो देह साम्य कहावैहै सूखेहुये
काष्ठकी तरह समान वस्तुको समता नहीं कहेहैं॥७॥
अश्यंभावरूपंच सर्वमेवचिदात्मकम्।।
सावधानतयानित्यं
स्वात्मानंभावयेबु
घः॥७१॥
अर्थ:-ज्ञानी-पुरुष सदाही सावधान होकर अदृश्य
दृश्य सम्पूर्ण संसारको चिन्मय ब्रह्म चिन्तनाकरे ॥७॥
दृश्यह्यदृश्यतांनीबानमाकारणचिन्त
येत् ॥ विद्वान्नित्यशुलैतिष्ठेडियाचिद्रसपू-
र्णया ।। ७२॥.
अर्थः-दृश्य वस्तुको अदृश्य की तरह करके ज्ञानी
पुरुष ब्रह्मस्वरूपकी चिन्तनाकरै तिसचिन्मयज्ञानके होने
से विज्ञान पुरुष चिन्मयरससे भरी हुई. बुद्धिसें नित्यसुख
से अस्थान करै ।। ७२
भयंद्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशादपे
तस्य विपर्ययोस्मृतिः ॥ तन्माययातोबुध
आमजेत्तंभक्तयेकयेशगुरुदेवतात्मा॥७३॥
ईश्वरदीपिका स०। अर्थः-दैतभाव अपना और विराना जानने से सर्व स्थानमें भय होता है क्योंकि आत्मा सवमें एकै है दूसरी बुद्धि होजाती है आत्मा को दूसरा मानने से कि हम और हैं यह और है तब यह मत अज्ञानियों का है याते भक्ति करके एक परमात्मा सव से श्रेष्ठ आत्मदैवस्वरूप जगत् में ठहरा देह के भीतर बाहेर घट पटते महान महान आकाशकी नाईं। तमीश्वरं भजेत् ॥ विचारो अर्थात् एक आत्मा सब में देखौ तौ अभय को प्रास होवो ॥ ७३ ॥ आत्मानमन्यंचसवेद विहानपिप्पला दोनतुपिप्पलादः ॥ योऽविद्ययायुक्सतुनि त्यबद्धोविद्यामयोयःसतुनित्यमुक्तः ।।७४ ॥ : अर्थः-जीवात्मा परमात्मा दोनों में पीपरबृक्षरूपी देहमें फलरूपी कर्मको फलंनहीं मांगे सोंज्ञानी अपनेको और ईश्वरको जानताहै सो ज्ञानयुक्त मुक्त हैं जो कर्मफल चाहताहै सो अपने को और ईश्वरको नहीं जानता अ ज्ञान से युक्त नित्यबद्धहै ।।७४॥ .. खवायुमग्निंसलिलं महींच ज्योतींषिस त्त्वानिदिशोहमादीन् । सरित्समुद्राश्चहरे ४६ ईश्वरदीपिका स०। शरीरंयत्किचभूतंप्रणमेदनन्यः ॥७५ ।। अर्थः-किसरीति से एक आत्मा देखै सुनै आकाश वायु अग्नि जल भूमि नक्षत्रदिशा वृक्ष नदी समुद्र इत्या-- दि रूप सब ईश्वर काशरीरहै ऐसा जानकर सब से नम्र रहै किसी को दुःख न देवे आत्मरूपी ईश्वर को प्रणाम करै ।।७५॥ यदृष्ट्वानपरंदृश्ययभूत्वानपुनर्भवः ॥ यज्ज्ञात्वानपरंज्ञानंतद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ७६ अर्थः-जिस परब्रह्मके देखनेसे (साक्षात्कारहोने) पर और कुछ देखना नहीं है क्योंकि अधिष्ठानरूप ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर सम्पूर्ण कल्पित जगत्का साक्षात्कार होजाताहै और जिस ब्रह्मका स्वरूप होकर अर्थात् जिस ब्रह्मकेसाथ अभेदको प्राप्तहोकर फिर संसार में जन्म नहीं होताहै सोई श्रीकृष्ण महाराजने गीतामें अर्जुन के प्रति कहाहै कि ॥ यद्गत्वाननिवर्त्तन्तेतद्धामपरममम ॥ अर्थात् हे अर्जुन ! जिसंधामको प्राप्तहोकर पुरुषफिर नहीं लौटता है.वही मेरा परमधामहै और सम्पूर्णके उपादान कारण- रूप जिस ब्रह्मको जानकर अन्य किसी पदार्थ के जानने ईश्वरदीपिका स०। की इच्छा नहीं रहती है क्योंकि कारणकी सत्ता से कार्य की सत्ता भिन्न नहींहोती है सो कारणरूप ब्रह्मके जानने से सम्पूर्ण कार्य जानाहुआ होजाताहै इसप्रकार वर्णन करेहुये कोही परब्रह्म रूप जाननाहै ॥ ७६ ॥ दैवाधीनशरीरेस्मिन्गुणाभावेन कर्म णा ॥ वर्तमानोऽबुधस्तत्रकर्तास्मीतिनिब ध्यते ॥७७॥ अर्थ:-क्योंकि प्रारब्धके आधीन शरीरहै जैसा कर्म पूर्व में किया है तैसा सुख दुःख इन्द्रियां भोग करती हैं देह में टिककै गुणोंके अनुसारतिन कर्मों में वर्तमान राग से युक्त अज्ञानी अपना मानता कि यह कर्म हमने किया सो वंधजाता है ।। ७७ ॥ दैवीसंपतिमोक्षाय निबन्धायासुरीम ता॥माशुचःसंपदं दैवीमभिजातस्य पाण्ड व ॥ ७८॥ अर्थः-जिसके हृदय मनमें देवका वास रहताहै सो मोक्षार्थ कर्म यज्ञादि करताहै जिसके आसुरी संपदा वसी है सो जन्म मरणको प्रासहोताहैदुःख भोगताहै ७८ ॥
४८ ईश्वरदीपिका स०.! समाधौक्रियमाणेतु विनान्यायान्तिवै बलात् ॥ अनुसन्धानराहित्यमालस्यं भोग लालसम् ॥ ७९ ॥ लयस्तमश्वविक्षेपोरसा स्वादश्चान्यता ॥ एवंयविघ्नबाहुल्यंत्या ज्यं ब्रह्मविदाशनैः॥८॥ अर्थः-समाधि साधनकाल में अनेक प्रकारके विघ्न आनके बलसे निरोधकरैं हैं कि वह विघ्न यहहैं कि अनुसं- धान राहित्य अर्थात किसी प्रकार अनुसन्धान नहींरहना आलस भोग लालसा. लय अर्थात् निद्रातम अर्थात् कार्याकार्य का अविवेक विक्षेप (विषयानुराग) रसा- स्वाद अर्थात् मैं वड़ा धन्यहूं इस प्रकार आनन्दका अनु- भवकरना शून्यता अर्थात् रागद्वेषादिक से चित्तकी वि: कलता इसप्रकार विनों के समूह को ब्रह्मवेत्ताओंको शनैः शनैः त्याग करना योग्यहै ।। ७६ | ८० ॥ भाववृत्त्याहिभावत्वं शून्यत्त्याहिशू न्यता॥ ब्रह्मत्त्याहिपूर्णत्वंतथापूर्णत्वमभ्य सत्॥८१॥ अर्थः-जिसके चित्तकी वृत्ति घटादिभाव पदार्थ में ईश्वरदीपिका स०। जायहै उसको घटादि पदार्थों का प्रकाश होयहै जिसके चित्तकी वृत्ति शून्यताको आश्रयकरहै उसका चित्तं शू. न्यमय होयहै इसीप्रकार जिसके चित्तकी वृत्ति चैतन्य- स्वरूप ब्रह्ममें जायहै उसको पूर्णब्रह्मका लाभ होयहै इस से पुरुपको जिसप्रकार पूर्णब्रह्मत्वका लाम होय उसतरह का अभ्यास करके लाभ उठाना योग्यहै ।। ८१ ॥ इनिश्चरदीपिका समाप्तिमंगात् ।।
ईश्वरदीपिका स! शिक्षा॥ साधन बादश कहिये मोक्षके जो बारे साधन तिन करके सम्पन्न अर्थात् युक्त जो अधिकारी पुरुष तिनके मोक्षका साधन भूत कहिये मोक्षका कारण जोतत्व वि. वेक अर्थात् पृथिवी-जल-तेज-वायु-आकाश रूप पञ्च महाभूत उनके साथ एकता कहिये पञ्चमहाभूतों के विपे अभिन्नरूपसे प्रतीत होनेवाला जो सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है वही तत्त्वोंकी एकता से जीव भावको प्राप्त होजाता है उस पञ्च.म- हासूत का पृथक् ज्ञान जिस रीति के द्वारा होजाता है उस रीति का इस ईश्वरदीपिका ग्रंथके विपेवर्णन किया है और कुछ करेंगे। इनबारह साधनोंमेंसे चारकावयान नीचे कियाजाताहैः- दो० चिन्तनीय दै वस्तुहैं सदा जगत के बीच । ईश्वरके पदपनयुग और आपनी मीचं ।। -
५
ईश्वरदीपिका स०
करे बुराई आपसों कैसीह कोउ लोग।
आपकरे भल और सँग दोहू भूलनयोग||
अर्थः-इनचारमें से दो बातें याद रखने के लायक
हैं और दो बातें भूल जानेके लायक हैं याने एकतोपूर्ण
ब्रह्म आत्मस्वरूप को याद रखना चाहिये । और दूसरे
अपनी मृत्युको याद रखना चाहिये क्योंकि मृत्युकोयाद
रखने से बुरे काम न होंगे इसलिये इन दो बातोंकोयाद
रखना जरूरी है और तीसरे यहहै कि अगर कोई अपने
साथ बुराई करै तो उसको भूलजाना चाहिये और चौथी
बात यहहै कि तुम अगर किसीके साथ भलाई करो तो
उसको भी भूलजाओ।
107
बयान साधनका॥
और फिर चारचातें साधनकरनेकीहैं । पहलासाधन
यहहै कि नित्यअनित्यका विचार याने नित्य पदार्थ क्या
है और अनित्य पदार्थ क्याहै नित्य पदार्थ उसको कहते
हैं कि जो चीज़ हमेशा कायम रहै याने भूत भविष्यत
वर्तमान तीनों कालों में एक समान रहै अनित्य याने
जगत् और जीव जो आजहै और कल नहीं है ।।
५२ ईश्वरदीपिका सं०॥
दूसरा साधनं वैराग्य हैं याने यह लोक और परलोक
इन दोनों लोकोंके फलों से विरत रहना ।।
तीसरा साधन शम दम उपरतितितिक्षा श्रद्धा समा-
धान इनके मुताविक चलना ॥ देखो दीका श्लोक ऊपर
नं० ४।६ तक॥
चौथा सुमुक्षुत्व याने इच्छा रखनी मोक्षकी इसके सिं-
वाय और इच्छा नहीं रखनी चाहिये
इसके बाद चार बातें जो करने की हैं
उनका बयान नीचे कहा जाताहै ।।
: शम ::
शमसन्तोप-विचार-सत्संग उसको कहते हैं कि
संसार के इष्ट अनिष्ट में चलायमान न होवे न किसीका
रंज करे और न किसीसे कुछ सवाल करै उपाधिसे रहित
परम शान्तरूप अमृतकरके पूर्णरहै वो पुरुष नानाप्रकार
की चेष्टा करता हुआ दिखलाई देता है लेकिन हकीकत
में कुछ नहीं करता है जहां उसके मनकी वृत्ति जाती है
वहां आत्मसत्ता भासंती हैं जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा
अमृत करके पूर्ण रहताहै उसी तरह समदृष्टिंबाला पुरुप
ईश्वरदीपिका स० ज्ञान करके पूर्ण रहता है याने भूत भविष्यत् वर्तमान तीनोंकालमें एक समान रहताहै। सन्तोष ।। अप्राप्त वस्तु की इच्छा न करे और प्रासईई इष्ट अ निष्टमें रागद्वेष न करै जिसकी त्रिलोकी के राज्य मिलने से इच्छा पूर्ण नहीं हुई वह दरिद्री है और जो निर्धन है और संतोषवालाहै वह सवका ईश्वरहै इसके ऊपर एक दृष्टान्तहै कि एक गुरु और एक चेला थे वे लोग हमे- शह जंगलही में रहाकरते थे चेलने कभी वस्तीका मुंह तक नहीं देखा था यहांतक कि उसको स्त्री पुरुष का भी ज्ञान न था कि स्त्री किसको कहते हैं और पुरुष किसको कहते हैं एक रोज गुरुने चेलेसे कहा कि वेटा वस्ती में जाकर आज भिक्षा मांगलेआओ चेला-गुरुकी आज्ञा पातेही वस्तीमें गया और एक गृहस्थके दरवाजेपरं जा- कर भिक्षाके लिये सवाल किया उस घरमें सिर्फ.मा और बेटी रहती थीं माने बेटीसे कहा कि साधुको भिक्षा.देआ- वो बेटी भिक्षा देने के वास्ते गई उसवक्त इत्तिफाकसे उस लड़कीके छाती का कपड़ा खुलाथा साधुने उसके दोनों स्तनों को देखकर रोना शुरू किया और भिक्षा भी नहीं ५४ ईश्वरदीपिका स०॥ लिया लड़की यह सब हाल देखकर अपनी मातासे जा बोली कि साधु रोरहा है और भिक्षा नहीं लेता तव माताने आकर साधुसे पूछा कि महाराज आप क्यों रोते हो साधुने जवाब दिया कि ऐ माता!इस लड़की की छातीपर जो दो फोड़े हुयेहैं उनको देखकर मैं रोता हूं क्योंकि एकवक्त मेरे पावों में भी इसीतरह का एक फोड़ा निकला था उससे मुझको बड़ी तकलीफ हुईथी सो. मैं देखताहूं कि मेरे एकही फोड़े से इस कदर तकलीफ थी किं जिसका वयान नहीं होसक्ता तो जब इसके दो फ़ोड़े हैं तो किस कदर दरद होता होगा माने तब साधु के आंशू पोंछे और बोली कि महाराज!यह फोड़े नहींहैं यह तो लड़काओं के दूध पीने के प्यालेहैं तव साधुने अच- म्भेमें आकर पूछा क्या इसके वालक हुआहै माने कहा कि अभी नहीं परन्तु आगे पैदा होगा तब इन्हीं प्यालियाओं से दूध पीवेगा साधु बोला कि लड़के के पैदा नहीं होने के पहिले दूध के प्याले तय्यार होगये मैं तो पैदा होचुकाहूं क्या मेरे वास्ते खाना नहींहै इस पर वहांसे एकाएक गुरुके पास चलागया और उनको सब हाल सुनाकर कहने लगा कि लड़के के पैदा न होनेके पहलेही दुग्धकी प्यालियां तय्यारहोगई तो क्या आपको ...
ईश्वरदीपिका स०।
इतना संतोष. नहीं है जो मुझे भिक्षा मांगने के वास्ते
बस्तीमें भेजा था गुरुंने कहा कि बेटा भिक्षा मांगने के
वास्ते मैंने तुमको नहीं भेजा था बल्कि तुम्हारे संतोप
की परीक्षा करनेको भेजाथा संतोप ऐसी चीज है कि इस
से परमानन्दता प्राप्त होती है ।।
विचार ॥
: उसको कहते हैं कि नित्यं अनित्यको देखना बल
बुद्धि और तेज और चौथे यहहै कि जो वल और बुद्धि
के जरिया से प्राप्त हुआ पांचवें यह कि जो प्राप्ति होती
हैं सो विचारके द्वारा होती है इसका मतलब यहहै कि
इन्द्रियोंकाजीतना और बुद्धिसेआत्माव्यापनी औरतेज
पदार्थ का आना यह विचारसे होताहै जिसको जोकुछ
सिद्धताहोतीहै सो विचार करके होती है इसके ऊपर एक
दृष्टान्तहै एक फकीर किसी वादशाहके वामें गया और
अपना मोली तोबा बांदशाही तख्त पर रखकर बैठगया
सामके वक्तजब बादशाहं बगीचेमें सैरकरनेको आयां तो
फ़क़ीरकोदेखकर बड़ाक्रोधितहुआ और बोलाकि अरे अ
हमक! तूं नहीं जानता कियह मेरा बादशाही तख्तहै फ़-
कीर बोला बाबा इतना गुस्सा क्यों करताहै मैं तो इसको
ईश्वरदीपिका स० सराय समझकर कैठाहूं यह सुनकर बादशाहको वेसी- गुस्साहुआ तब फकीरने कहाकि सुनो वाचा यहतो बत- लाओ कियह वारा किसकाहै बादशाहने जवाबंदियां कि हमारा है फ़कीर बोला कि वावा तेरे पहिले यहां कौन रहताथा बादशाह ने कहाकि मेरा वाप रहता था फकीर वोला कि तेरे वापके पहिले यहां कौन रहता था वाद- शाहने कहा मेरा दादा रहता था इसी मांफिक बाद- शाह अपनी सात आठ पीढ़ीतक का नाम लेगये तब फकीर बोला कि बावा जिस घरमें मुसाफिरोंकी माफिक इतने आदमी रहरहकर चलेगये तो सराय नहीं तो फिर- और क्या है फकीरके इस जवाव पर बादशाहको विचार होगया कि हकीकतमें फकीर ठीक कहताहै आखिरिसमें बादशाह अपनीवादशाही छोड़कर फकीरहोगया यानी जगत् और जीवका विचार करनेलगा विचार करते करते परमपदवीको पहुंचगया इसीके ऊपर एक कवि कहते हैं ।। सराय दुनिया है कूचकी जा हरेक को खौफ दम वे दम है। रहा सिकन्दर रहा न दारा रहा फरीदों रहा.न जम है । मुसाफिराना टिकेहो उठो मुकाम फिर दोसहै इरम है। नसीमें जागो कमरको बांधो उठाओ विस्तर कि रात कम है।
. ईश्वरदीपिका स० ' इसीतरह विचार करने को विचार कहते हैं। सत्सङ्ग। जितने जो कुछ दान व तीर्थ वगैरा साधन हैं उनसे आत्मपदकी प्राप्ति नहीं होती याने सत्संगरूपी एक वृक्ष है और उसका फूल विचार है सो आत्मज्ञानरूपी 'फलको पाता है जो पुरुष आत्मानन्द से रहित है सो सत्संग से आत्मानन्द से पूर्ण होता है और अज्ञानक- रके जो मृत्यु को पाता है सो सत्संग के संगसे ज्ञान पा- कर अमर होता है और जो आपदाकरके दुःखी है सो सत्संग करके सम्पदा को पाता है इसी के ऊपर एक दृष्टान्त है कि एक भंवरा एक गोवरके कीड़े को उठाक- रके लेआया (क्योंकि भंवराओं के वचा नहीं पैदाहोता है उसीको अपना स्वरूप बनालेते हैं और उसको लै- कर एक कमलके फूलके ऊपर रस लेनेकों बैठेगया और उस फूलके ऊपर कीड़ेको छोड़कर दूसरे फूलके ऊपर रस लेने को गया इतने में शाम होगई फूलका मुंह बन्द हो: गया तो कीड़ा उसके भीतररहगया भंवरेने विचार किया कि कल जल्दी सुवहको आकर कीड़े को उठा लेजा- ऊंगा लेकिन सूर्य निकलने के पहिलेही उस फूलको माली तोड़ लेगया और मालीके यहांसे ब्राह्मणने लेजा-
ईश्वरदीपिका स०॥
कर शिक्के ऊपर चढ़ादिया और दूसरापूजा करने वाला
आया उसने फूलको उठाकर गंगाजी में फेंक दिया
जब दिन चढ़ा तो भंवराको कीड़े का ख्याल हुआ तो
उस फूलके ऊपर खोजने लगा जब फूलको नहीं पाया
तो विचार किया कि माली लेगया होगा जब मालीके
घरमें भी उस फूलको नहीं पाया तो ब्राह्मणके घर गया
जब वहांभी नहीं पाया तो शिवमन्दिरमें जाकर देखा
लेकिन वहां पर भी कीड़े को नहीं पाया तो विचार
किया कि गंगाजी में फेंक दिया होगा गंगाजी में जा-
कर देखा तो फूलके ऊपर कीड़ा बैठा हुआ वहता चला
जाता था भवरेने कीड़ेको उठाना चाहा तो उसने कहा
कि हे मित्र ! अब मुझे कहां लेजाताहै मैंने तो संगतिका
फल पा लिया कि मैं गोवरमें रहने वाला कीड़ा जिस
को लोग छूते तक नहीं तेरी सोहबत की बदौलत में
शिवके शिरतक चढ़ा और अब साक्षात् गंगाजी में
गिरा जिसके सिर्फ दर्शनही से पापोंके नाश होते हैं सो
मैं तो साक्षात् देह सहित गिरा अब इससे बढ़कर और
मुझे क्या चाहिये सत्संग का फल ऐसाही होता है।
श्लोक ॥
संतोषःपरमोलासःसत्संगः परमंधनम् ॥
.
ईश्वरदीपिका स०। ५६ विचार परमज्ञानं शमश्च परमं सुखम् ।। अर्थः-संतोष की वरावर कोई ऐसा दूसरा लाभ नहीं है और सत्संगकी बराबर दूसरा धन नहीं है विचार की बराबर दूसरा कोई ज्ञान नहीं है और शमकी वराबर दूसरा कोई मुख नहीं है इसी लिये प्रथम मुमुक्षु पुरुषों को यह बारह साधन करना चाहिये ।। इसके बाद यह बिचार करना चाहिये कि मैं कौनहूं और किसतरह पैदा हुआ इसीके ऊपर एक दृष्टान्तहै कि एक दिन एक साधुका चेला जो किसी दूसरी जगह से आयाथा और रात्रि का वक्तथा चेलेने गुरुजी के सामने आकर प्रणाम किया गुरुने पूछा कि तू कौन है चेला बोला कि मैंहूं गुरुने कहा तू कौन है-चेला-मैं शरीरधारी हूं: गुरु-तीन किस्मके शरीर होते हैं कि स्थूल सूक्ष्म और कारण पस इन तीनोंमें से तू कौनहै चेला-मैं स्थूल शरीरहूं गुरु-स्थूल शरीरकी पैदायशपांचतत्त्व औरपंची. करणसे है (पृथ्वी-जल-तेज-वायु-आकाश) इनको पश्च- तत्त्व कहते हैं इन्हीं पांच तत्वों के दो दो हिस्सा करना और फिर आधेरहिस्साको अलगरखदेनाऔर आधाजो बाकी बचा उसका चारचार हिस्साकरना फिर आधा जो अलग रक्खाथा उनमें चारचार हिस्सा एकदूसरेमें मिला ६०. ईश्वरदीपिका स० देना इसीको पंची करणकहतेहैं । और स्थूल शरीर.ज: न्मताहै वढ़ता है और नाश होताहै और इसकी असली पैदायश जिसको तू घृणा करताहै एक पेसाबकी बूंदसे है.पस इनमें-तू कौन है चेला-मैं स्थूल नहींहूं, मैं सूक्ष्म शरीरहूं गुरु:-सूक्ष्मकी पैदायश. सत्तरह.चीजोंसे है याने पांच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रिय और पांचप्राण और एक मन और एक बुद्धि इनमेंले तू कौन है चेला-ये प- दार्थ भी विकारवान हैं इनमेंभी मैं नहींहूं मैं कारणशरीर हूं गुरु कारण उसको कहतेहैं जो न सत्यहै और न अस- त्यहै सत्य तो इसलिये कहाजाताहै कि जब निद्राअवस्था में रहताहै तव कहताहै कि मैं खूब सोया. ऐसासोया कि सुझे कुछ मालूम नहींथा इसमुंवाफिक करके तो.सत्य है. और झूठा इसतरहसे है कि जब सोकरके उठता है तो शरीर, ज्योंकात्यों मौजूद रहता है पस इनमें तू कौन है चेला-मैं इनमें भी नहींहूं मैं वोहूंजोन जन्मताहै और न मरताहै न घटताहै न बढ़ताहै याने सच्चिदानन्द स्वरूपहूं-सत् उसें. कहते हैं कि जो हमेशातीनोंकालमें एकसमानरहे चित जो चीज़ देखने और कहने में आती है उससे अलाहिदा हूं आनन्द याने सर्वप्रकारके दुःखोंसे रहित अप्रपंचरूप, जो आत्माहै. सो में है. इसीतरह जाननेकोज्ञान कहते हैं । -- ईश्वरदीपिका स० ईश्वर और माया ॥ शरीर और माया देखनेभरही सत्यहै असल में यह कोई वस्तु नहीं है मायाकरके यह भास रहा है और इनके कामोंको अज्ञानी पुरुष मानते हैं इसीकरके आवागमन का दुःख पातेहैं-इप्सीके ऊपर एकहधान्त है-किसी सा- हूकार ने एक बगीचा लगाया उसमें दो नौकर निगह- वानीकेलिये रक्खे उनमेंसे एकतो अन्धाथा दूसरा पंगुला उस बगीचे में बहुत फल लगेथे एकदिन पंगुलाने अंधा से कहा कि भाई फलतो बहुतलगे हैं लेकिन तुमतो अंधाः और मैं पंगुला, किसतरह हमलोग फल खासक्ते हैं अंधेने. पंगुलेसे कहा कि तू मेरे कंधेपर सवार होले और तू फल तोड़ना सो हम भी खांयगे और तुम भी खाना पस ऐ- सांही उन लोगोंने किया दोचार रोज़ के वाद मालिक वारा देखने को आया और देखाकि वारा में फल बहुत कमरहगयेहैं तब उनदोनों नौकरोंसे पूंछा कि बाराके फल कौन शख्स तोड़ लेजाया करता है उन्होंने जवाव दिया कि आप विचार करलीजिये कि येतो:अंधा और मैं पं- गुलाहूं न इसकी ताकत है और न मेरी मालिक भी वा- जिंव जवाब पाकर चुपहोरहा इसीतरह कई मरतबे देख चुका परन्तु किसीसे कुछ नहीं कहसकता था एक दिन - - ईश्वरदीपिका स०॥ बागका मालिक बगीचा के किसीतरफ छिपकर बैठगया और उनदोनों ने साविकदस्तूर फलतोड़ना और खाना शुरूकिया तब तो मालिक ने उन्हें गिरफदार करलिया और खूब मारा जहांतक मारागया जब हारगया तब फिर उन्हें जेलमें भेजदिया अब इसपर विचार करना चाहिये कि संसाररूपी बाराहै और इन्द्रियरूपी अंधाहै और मन: रूपी पंगुला और वासनारूपी फल और धन कुटुम्बरूपी वृक्ष इनमें मनुष्य फसजाताहै तब आत्मारूपी मालिक उसको दण्ड देताह विचार करनाचाहिये कि मनकाऔर इन्द्रियों का संयोग होताहै तब बासना उत्पन्न होती है इसलिये मनंको रोककरके इंन्द्रियों के विषयों की तरफ जाने नहीं देना चाहिये और अपने मालिक आत्मतत्त्व को पहिचाने कि जिससे जन्म मरण से रहित होजावें जिसतरह लड़का प्रथम क-ख-सीखता है उसीतरह प्रथम कर्मोपासना में मनको लगावें याने कर्मोपासनाओं के मतलवको समझे ये नहीं कि ठगकुरजीके मंदिरमें जाता है और शान्ताकारंभुजगशयनं' मन्त्रपढ़ताहैउसमन्त्रके पढ़ने में विशेषता नहीं है परन्तु उसके मतलव को सम- झनेमें विशेषताहै फिर उसको देखनेके लिये कोशिशकरें कि शान्तरूप और शेषनागके ऊपर शयन करनेवाला .
ईश्वरदीपिका स०॥ ६३ कैसाहै जब उसको देखा फिर उसके मुवाफिक होने की कोशिश करनाचाहिये इसीके ऊपर एकदृष्टान्तहै एकस्त्री के यहां कोई महमानआया वह विचारी गरीब दुखिया थी और उसके घरमें धान छोड़के और कोई दूसराअनाज नहीं था कि महमानके वास्ते बनाकर खिलावे तब उस ने धान कूटना शुरूकिया धान कूटते वक्त उसकीचुड़ियों की आवाज होने लगी स्त्रीने विचार किया कि मह- मान के आवाज सुनने से अच्छी नहीं लगेगी तब वो अपनी एक एक चूड़ी फोड़ने लगी प्रथम एक चूड़ी फोड़कर देखा कि आवाज होतीहै या नहीं लेकिन फिर चुड़ियों की आवाज के होने से फिर एक चूड़ी तोड़ी इसी तरह तोड़ते तोड़ते उसके हाथ में एकही चूड़ी रह- गई तब उसने विचार किया कि यही ठीक है अब इसी पर विचार करना चाहिये कि कर्म उपासना वगैरा कर्मों को करतारहै परंतु यह नहीं कि उसी में फसारहै मगर आगे का रास्ता तै करनेका फिकर करतारहै जब आख- रिसमें एकही चीज रहजावे याने आप आत्मस्वरूप तो उसीको ब्रह्म कहते हैं वह नित्य है अनादि है अनन्त है और जन्म मरणसे रहित है और दूसरी कल्पना का त्याग करतारहै जिसको ख्याल कहते हैं कल्पना याने ईश्वरदीपिका सा ख्याल कोई चीज नहीं है क्योंकि जितने पदार्थ हैं सब ख्यालही हैं और जिस ख्यालको ख्याल मानते हैं वोभी एक ख्याल है जिस तरह-आकाश में अनेक त- रह के चित्र देखने में आते हैं लेकिन देखते देखते सब नास होजातहैं और शुद्धस्वरूप आकाशही भासमान रहजाता है इसीतरह ख्याली पदार्थ जहांतक ख्याल है वहीतक हैं फिर आखिरित में हमहीं हम रहेजाते हैं इस तरह हमेशह विचार करते रहना चाहिये ये सव वातै म- नुष्य के लिये हैं। अध्यास अब कुछ अभ्यास के बारे में लिखाजाताहै अभ्यास के करनेवाले को प्रथम निदिध्यासन करना चाहिये नि- दिध्यासनके विना सच्चिदानन्द की प्राप्ति नहीं होती है इसलिये ब्रह्मज्ञानकी इच्छा करने वालों को बहुत का- लतक मंगल के लिये निदिध्यासन करना चाहिये नि- दिध्यासनके पंदरा अंगों को कहताहूं. इन्हीं अंगों के साथ निदिध्यासन करना चाहिये ।। : .. यम-नियम त्याग-सौन-देश-काल-आसन-मूलवन्ध- देहसाम्य हस्थिति-प्राणसंयम-प्रत्याहार-धारणा आत्म- ध्यान-समाधि-
ईश्वरदीपिका स०
यम ।।
तमाम जगतको व्रह्मरूप जानना इस तरह निश्चय
करके फिर इन्द्रियों को वशमें करना यम कहाता है ।।
नियम।
मैं बह्महूं और ब्रह्मसे परे सम्पूर्ण संसार मिथ्या है ।।
त्याय ॥
चैतन्यस्वरूप को अवलोकन करके जो प्रपंच का
याने घटपट आदि नाम से व्यवहारके पंदा का त्याग
करना त्याग कहलाता है ।।
मौन ।
जिसके जवान नहीं हो उसका तो क्या कहना है
और जिसकी आवाज और मनकी भी फुरना न होवे
याने मनसे वचन से और कर्म से इन तीनों से फुरना
नहीं होने का नाम मौन है मौन धारण करके फूलों से
या और किसी चीजसे लिखने का नाम मौन नहीं है ।।
देश॥
जहां आदि अन्तं मध्य में कहीं भी मनुष्य नहीं होवें
जिस वक्त संसारियों का शब्द भी सुनाई नहीं देव और
निर्जन स्थान हो उसीको देश कहते हैं
जिंस के कुरनमात्र में ही ब्रह्मा वगैरा सब सृष्टि
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ईश्वरदीपिका स० स्थिति प्रलय होती है इस कारण अखंड आनन्द स्वरूप अबैत ब्रह्म को काल कहते हैं। आसन। जिसमें हमेशह अच्छी तरह सुखके साथ ब्रह्म का विचार होवे याने पद्मासनके आसनको आसन कहते हैं। मूलबंध ॥ आकाश वगैराओंका आदिकारण और चित्त एका- प्रका मूलहै उसीको मूलबन्ध कहतेहैं ।। देहसास्य॥ सब प्राणियों में सम दृष्टिं करके जो समान ब्रह्म में लीन होजाताहै उसको देहसाम्यकहते हैं। दृस्थिति। दृष्टि को ज्ञानमय करके उस दृष्टिके द्वारा ब्रह्ममय जो जगत् को देखना है उसको हकस्थिति कहतेहैं ।। प्राणायाम ॥ चित्त आदिको लेकर सब प्रकार के पदार्थों में ब्रह्म- भावना करके और सब प्रकार की इन्द्रियों की वृत्तियों का रोकना है उसको प्राणायाम कहते हैं । प्राणायाम तीन तरह का है याने रेचक,पूरक,कुंभक- रेचक याने प्रपंच का त्याग और मिथ्यात्व को रोकना
ईश्वरदीपिका सः।
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पूरक सब एक ब्रह्मही है इसीतरह वृत्तियों का रखना
कुंभक अनन्तर निश्चलता से एक ब्रह्म निश्चय होताहै
उस को कुंभक कहते हैं।
प्रत्याहार॥
सर्वजगत् को ब्रह्ममय देखकर और चैतन्यस्वरूप
आत्मा में चित्तको लगाना उसको प्रत्याहार कहते हैं ।
धारणा॥
जहां जहां मनजाके वहांवहां ब्रह्मस्वरूप दर्शनपूर्वक
मनको निश्चल करने को धारणा कहते हैं।
आत्मध्यान।।
सम्पूर्ण विकारोंकोदूरकरके और देहके कर्मीको त्याग
करके तमाम ब्रह्महै इसप्रकार ज्ञानकरके सम्पूर्णब्रह्म है इस
प्रकार ज्ञानकरके जो ब्रह्मस्वरूप अवलम्बनकर स्थिति
करनाहै उसीको आत्मध्यान कहते हैं ।
समाधि।
निर्विकार चित्त होकरके अपनेको ब्रह्मस्वरूप ज्ञान
करके सम्पूर्ण प्रकारके प्रपंचभाव को परित्याग करना
समाधि कहलाताहै ॥
जबतक आनन्दमय ब्रह्मके वश में नहीं होवे तंवतक
ईश्वरदीपिका सः।
निदिध्यासन अच्छीतरहसे अभ्यास करना चाहिये ले-
किन जिसवक्त निदिध्यासन के द्वारा अपने आप ब्रह्म
स्वरूप होजाय उस वक्त निदिध्यासन विगैरः का कुछ
प्रयोजन नहीं है।
. अब कुछ पातंजलिऋषिके मत से लिखते हैं धन्यहै
वह सज्जन जिसका आदर सत्कार करते हैं परन्तु यह
ब्रह्मज्ञान योगियोंको सजहीमें नहीं मिलता बरन विद्धान
योगी महात्मा और धीर पुरुष योग विभाग से नाड़ियों
के द्वारा अपनी आत्मामें धारण करते हैं अर्थात् बड़ेबड़े
साधनोंसे वह अनमूल्य रत्न मिलताहै जिनकी व्याख्या
पातंजलि महर्षिनेकी है जिसका हम आगे संक्षेपले वर्णन
करते हैं इसलिये संज्जन पुरुषों को आलस्य त्याग पति-
दिन आठोंअंगों का सेवन युक्तिपूर्वक करना चाहिये
क्योंकि यह यज्ञ सब यज्ञोंसे श्रेष्ठहै इस बात को श्रीकृष्ण
महाराजने भी गीता में बारह प्रकारके यज्ञोंमें प्राणायाम
याने प्राण को निरोध करना सबसे श्रेष्ठ कहाहै.।।
अष्टाङ्गयोगके पाठोंङ्गों का वर्णन ॥
यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा--
ध्यान-और समाधि यह योग के आठ अंगहें
ईश्वरदीपिका सः। यमकावर्णन॥ (१)अहिंसा (२) सत्य (३) अस्तेय (४) ब्रह्मचर्य (५) अपरिग्रह || अहिंसा॥ किसी से वैरभाव मनसे नकरना अर्थात् सुख संभोग युक्त प्राणियों में मैत्री और दुःखियोंपर दया पुण्यात्माओं में मुदिता और पापियों में उपेक्षा करना चाहिये ।। सत्य-जैसा अपनी आत्मामें हो वैसा कहै और मा- ने जो मनुष्य ऐसा करते हैं उनकी वाणीसे जो निकल- ताहै वैसाही होताहै॥ अस्तेय-किसी प्रकारकी चोरी न करना जो इसकी यथावत् सेवन करता है उसको सब पदार्थ मिलजाते हैं। ब्रह्मचर्य-इसको कहते हैं कि कोई तरहसे वीर्य को स्खलित न होने देना अर्थात् जो वीर्यकी पूर्णरक्षा करता है वह पूर्णज्ञानी और महात्मा होनेके योग्य है ।। अपरिग्रह-जब मनुष्य यथावत् इन्द्रियों को अपने वशमें करलेता है तव उसके मनमें यह विचार आता है कि मैं कौनहूं और कहां से आयाहूं और क्या करताहूं ईश्वरदीपिका सक। मुझको क्या करना चाहिये और मेरी किस बातमें भला- ई है इत्यादि ऐसी बातोंके विचारका नाम अपरिग्रह है। नियम॥ शौच-संतोप-तप-स्वाध्याय-ईश्वरप्रणिधान यह पांच प्रकारका नियम है ।।.. शौच-यह दो प्रकार का है एक शारीरक दूसरा आ- त्मिक शारीरक शुद्धि जल और खानपान आदिसे हो- ती है और आत्मिक वेदादि विद्या पढ़ने और धर्म पर चलने और सत्संगसे होती है। सन्तोष-उसको कहते हैं जो सदा धर्मानुकूल कार्यों को करता हुआ नाना प्रकारके क्लेश होनेपर भी धीरज को नहीं छोड़ता आलस्य का नाम संतोप नहीं है ।। तप-जैसे सोना चांदी आदिको अग्निमें तपाने से स्वच्छ होजाते हैं वैसेही आत्मा और मनको धर्माचरण- रूपी शुभगुणोंमें तपाकर निर्मल करने का नाम तप है स्वाध्याय के तीन भेदहैं मनसा वाचा कर्मणा इन तीनोंको धर्माचरणमें लगानाही तप कहाताहै अग्निमें 'जला कर वीचमें बैठने का नाम तप नहीं है। ईश्वरप्रणिधान-सब सामर्थ्य सर्वगुण प्राण आत्मा ईश्वरदीपिका सं० और मनके प्रेमभावसे आत्मादि सत्यद्रव्यों का ईश्वरके लिये समर्पण करने को कहते हैं । आसन । आसन-उसको कहते हैं कि जिसमें शरीर और आ- त्मा सुखपूर्वक स्थिरहो इसलिये जैसीरुचिहो वैसाआसन करे जब आसन हद होजाता है तब उपासना करने में परिश्रम नहींजान पड़ता और शरदी गरमी आदि नहीं व्यापती यह उपासनाका तीसरा अंग अर्थात् सीढ़ीहै ।। प्राणायाम।। आसन स्थिर होनेसे जो प्राणों की गतिका अवरोध होताहै उसे प्राणायाम कहते हैं आसन सिद्धिहोंने पर जो बाहरसे वायु भीतर को जाताहै उसको श्वासं कहते हैं और जो भीतरसे बाहर जाताहै उसे प्रश्वास कहते हैं और इन दोनों की गति के अवरोधको प्राणायाम कहते हैं वह चारमकारकाहै बाह्य आभ्यंतर, वृत्तिस्तम्भ,बाह्या- भ्यन्तराक्षेपी,बाह्य वह है कि जब भीतर से वायु वाहर को निकले उसको बाहरही रोकदे ।। आभ्यंतर उसे कहते हैं कि जब बाहरकी वायु भीतर जावे तब जिंतनां होसके भीतरही रोके । - ईश्वरदीपिका स०। स्तम्भवृत्ति उसको कहते हैं न प्राणको बाहर नि: काले न बाहर से भीतर ले. बरन जितनी देर होसके सुखपूर्वक जहां का तहां रोकदे || बाह्याभ्यंतराक्षेपी जब श्वास भीतर से बाहरको आवै तब बाहरही थोड़ा थोड़ा रोकता रहै और जब वाहर से भीतर को जावे तब उसको भीतरही थोड़ा थोड़ा रोके ॥ प्राणायाम करने की विधि । जिस प्रकारके होती है जिसको लौटा वा वमन कंह- ते हैं जिसके होने से भीतर पेटके अन्न और जल वाहर निकल आते हैं उसी प्रकार माणको बलसे बाहर फेंकके बाहरही यथाशक्ति रोकदेवै और जब बाहर निकालना चाहे तो मूलेन्द्रियको ऊपर खींच रक्खे जबतक प्राणं वाहर निकलें और जब घबराहट हो धीरे धीरे भीतर लेजाय और जितना होसके रोके इसीप्रकार जितनी सामर्थ्यहो धीरे धीरे बढ़ावे ।। प्रत्याहार ॥ प्रत्याहार उसको कहते हैं जब मनुष्य अपने मनको जीतलेताहै तव सब इन्द्रियां अपने आधीन करलेता है क्योंकि मनही इन्द्रियों का चलानेवालाहै सचमुच मन ही इन्द्रियों का चलाने वालाहै इन्द्रियां कभी काम नहीं .. ईश्वरदीपिका सक करती जबतक कि मन इन्हें प्रेरणा नहीं करता निश्चय जालों कि जितने विकार और दुष्टभाव इन्द्रियों के द्वारा प्रकट होते हैं सत्र मनकेही उत्पन्न कियेहुये होते हैं में- हात्माओं ने मनुष्य के शरीरंकी बनावट को एक रथ के समान माना है बुद्धिरूपी स्थवान मनकी रस्सियों से इ- न्द्रियों के घोड़ों को अपने आधीन रख सकताहै पस जिस प्रकार रासों के घुमोन से जिधर को चाहो घोड़ों को फेर सकतेहो उसी प्रकार मन जिधर चाहता है उधर इन्द्रियों को घुमाताहै इस कारण कर्म ठीक करने के अर्थ मनको निर्दोष कियाजावै यहमन बड़ी बड़ी दूरजाताहै जो देश और कालकी रुकावट में भी नहीं आता इससे अधिक प्रवल चालवाला कोई नहीं सो, यह मन जी- वात्माके आधीन है परन्तु जीवात्मा उसको अपने आ. धीन न रखकर किन्तु उसके आधीन होकर नाना प्रकार के दुःखोंको फेलता है इसलिये परमेश्वरसे प्रार्थना की गई है कि इस मनको हमारे आधीन सदाबनाये रहै न कि हमको उसके सोमनकी चंचलता प्राणायामसाधनं से जाती रहती है इसलिये शांति ढूंढनेवालों इस क्रिया को कर.मनको आधीन कर आनन्दको भोगों ॥
ईश्वरदीपिका स०. धारणा-उसको कहते हैं किमनको चंचलतासे छुड़ा: कर जिस स्थान परजिस विषयमें चित्तको लगावें वहीं चित्त ठहरजावे अर्थात् जिस विषय में चित्तको लगानाहो उसको छोड़कर कहीं न जावे ॥ ध्यान ॥ ध्यान-धारणा के पीछे उसी देशमें ध्यान करे आ- श्रय देने के योग्य जो अन्तर्यामी व्यापक ब्रह्म उसी के प्रकाश आनन्दमें अत्यन्त विचार और प्रेमभक्तिके साथ इस प्रकार प्रवेश करना जैसे समुद्रके वीचमें नदी प्रवेश करती है उस समयमें ब्रह्मको छोड़ किसी अन्य पदार्थ का स्मरण नहीं करना उसी ब्रह्मक ज्ञानमें मग्न होनेको ध्यान कहते हैं। समाधि। समाधि-जैसे अग्निके बीच में लोहा भी अग्नि हो- जाता है उसी प्रकार ब्रह्मके साथमें प्रकाशमय होके अ- पने शरीरको भूलेहुये के समान जानके मनको ब्रह्मके प्रकाशस्वरूप आनन्द और ज्ञानसे परिपूर्ण करने को समाधि कहते हैं ध्यान और समाधि में इतना अन्तरहै :- कि ध्यान में तोध्यान करने वाला और मन और जिस का ध्यान करताहै ये तीनों विद्यमान रहते हैं परन्तु ईश्वरदीपिका सा ७५ समाधि में केवल ब्रह्मही के आनन्दस्वरूप ज्ञानमें मग्न होजाता है वहां तीनोंको भेदभाव नहीं रहता जैसे मनु- ष्य जलमें डुबकी.मारके थोड़ा-समय भीतरही रुका रह- ता है वैसेही मनः परमेश्वरके बीच में मग्न होकर फिर बाहर को आजाताहै और जिस देशमें धारणा कीजावे उसमें ध्यान और उसीमें: समाधि याने ध्यान करने के योग्य ब्रह्ममें मग्न होजाने को संयम कहते हैं जो एक- ही कालमें तीनों का मेल होताहै याने धारणाके संयुक्त ध्यान और ध्यानसे संयुक्त समाधि होती है उसमें बहुत सूक्ष्म काल का भेद रहताहै परन्तु जब समाधि होती है तब आनन्द.के बीचमें तीनों का फल एकही होजाताहै उस वक्तके आनन्दकी महिमा कहने योग्य नहीं है ऐसा ही अन्य शास्त्रकारोंने भी कहाहै कि समाधिरूप नदीमें गोता लगाने से मल धोयागया ऐसा चित्त जब आत्मा में लगाया जाताहै तब जो सुखः होताहै उस का वर्णन वाणी से नहीं होसक्का किन्तु उसका मुख अपने आप जानताहै इस प्रकार अष्टाङ्गयोग को जानो।। ".. ॐकार और ब्रह्मका क्या अभेद है ?।।.. जैसे:सर्वस्वरूप अकार है तैसे सर्वस्वरूप ब्रह्महै इस ईश्वरदीपिका स० से कार ब्रह्मरूप है याने कार ब्रह्मका चाचकहै ब्रह्म वाच्यहै ।। वाच्य का और वाचक का अभेद होवे है इस से ॐकार ब्रह्मरूप है और विचारदृष्टिसे तो जो अक्षरब्रह्म चिषे अध्यस्त है ब्रह्म तिसका अधिष्ठान है अध्यस्त का स्वरूप अधिष्ठान से न्यारा होवे नहीं इससे भी ॐकार ब्रह्मस्वरूपहै इससे ॐकारको ब्रह्मरूप करके चिंतनकरै।। चार पादन के कथनपूर्वक आत्मा का ब्रह्म से और विश्व का विराट् से अभेद विराट् विश्वके सप्तअंग और उन्नीस सुख । ब्रह्मरूपकारका आत्मासे भी अभेदःचिंतन करे क्योंकि आत्मा का ब्री से मुख्यः अभेद है और ब्रह्मके चारं पादहैं तैसें आत्मा के भी चार पादे हैं-(पाद नाम भाग का है और उस को अंश भी कहते हैं.) विराट- हिरण्यगर्भ-ईश्वर-और तत्पद का लक्ष्य ईश्वर साक्षी ये चार पादं ब्रह्मके हैं विश्व तैजस प्राज्ञ और वंपद का लक्ष्यजीव साक्षी ये चार पाद आत्माके हैं (जीवसाक्षी को ही) तुरीय कहते हैं।।::: .......... समष्टिस्थूल प्रपंचसहित चैतन्य विराट्।।व्यष्टिस्थूल अभिमानी.विश्वहै विराटकी और विश्व की उपाधिस्थूल है इसमें विरादरूपही विश्वहै विराट् से जुदा नहीं विराट .
७७ A ईश्वरदीपिका स० रूप विश्वके सात अंगहै = स्वर्गलोक मूर्धहै-सूर्य नेत्र हैं-वायु.प्राणहैं-आकाश धड़है-समुद्जल सूत्रस्थान है-पृथ्वीपादहै-जिस आग्निमें होमकरै सो अग्नि मुख है-ये सात अंग विश्वकेहैं माण्डुक्यमें स्वर्गलोक वगैरह विश्वके अंग बने नहीं तथापि विराट के अंगहैं उसविराद् से विश्वका अभेदहै-इससे विश्वके.अंग कहेहैं ।।. तैसे विराट् विश्वके उन्नीस मुखहैं-पंचप्राण-पंचक- मिइन्द्रिय-पंचज्ञानेन्द्रिय-चारअन्तःकरण ये उन्नीस मुख कीनाई भोगके.साधन हैं इससेमुख कहागयाहै-इनउन्नी- ससेस्थूलशब्दादिकनंकों बाह्यवृत्तिकरकेज़ाग्रत् अवस्था विषे भोगेहे-याते विरारूप विश्व स्थूलका भोगताहै- और बाह्यवृत्ति कहिये है और जाग्रत् अवस्थावालाहै। चतुर्दशत्रिपुटी: प्राणादिक उन्नीस जो भोगके साधन हैं:-तिनविषे श्रोत्रादिक इन्द्रिय और अन्तःकरण चार-ये चतुर्दश अ. पने अपने विपंय और अपनेअपने देवताकी सहाय चा- हते हैं देवता विषयकी सहाय विना केवल इनसे भोग होवें नहीं इससें.पंचप्राण और चतुर्दशत्रिपुटी विराट रूप 'विश्वके मुखहैं तिनंके समुदाय का नाम त्रिपुटीहैं =सो त्रिपुटी इसतरह से कही है = श्रोत्रइन्द्रिय अध्यात्म है ईश्वरदीपिका.स और उसका विषय शब्द अधिभूतहै दिशाका अभिमा- नी देवता अधिदैवहै त्वचा इन्द्रिय अध्यात्महै इसका वि- षय स्पर्श अधिभूतहै और वायु अधिदेवहै नेत्र इन्द्रिय अध्यात्महै रूप अधिभूतहै सूर्य अधिदैवहै नेत्र इन्द्रिय अध्यात्महै रस अधिभूत वरुण अधिदैवहै रसना इन्द्रिय अध्यात्म गंध अधिभूतहै.अश्विनी कुमारअधिदैवहै हस्त इन्द्रिय अध्यात्म पदार्थीका उठाना अधिभूत इन्द्रिय अ- धिदैवहै पाद इन्द्रिय अध्यात्म गमन अधिभूतहै विष्णु अधिदैवहै गुदा इन्द्रिय अध्यात्म मलका त्याग करना भोग अधिभूत-प्रजापति अधिदैवहै मनअध्यात्म इसका विषय फुरना अधिभूत चन्द्रमा अधिदैवहै बुद्धिः अध्यात्म और वोधका होना अधिभूत ब्रह्मा अधिदैव है अहंकार अध्यात्म और अहंभाव अधिभूत शिव अधिदैवहैं ये च तुर्दश त्रिपुटी पंचप्राण उन्नीसविरादरूप विश्वके मुखह।। विश्व विराट और कार में क्याफर्कहै ...जैसे विरादः विश्वमें कोई फर्क नहीं है इसीतरह कार के प्रथम मात्रा अकार और विरारूप विश्वमें कोई फर्क नहीं है क्योंकि ब्रह्मके चार पादों में प्रथमपाद-वि- संद हैं और आत्माके चार पादोंमें प्रथमपाद विश्वहै इसी ७६ ईश्वरदीपिको स० तरह ओंकारके चार मात्रारूप पादों में प्रथम पाद अकार: है इसलिये प्रथम का तीनों में समान धर्म होनेसे विश्व विराद आकार में फर्क नहींहै जो सात अंग उन्नीसमुख विश्व के हैं वही सात अंग और उन्नीस मुख तैजस के भी, लेकिन सिर्फ इसकदर फर्कहै कि विश्वके जो अंग और मुखहै वो ईश्वर रचितहै और तेजसके जो इन्द्रिय देवता विषयरूप.त्रिपुटी और मूर्दादिक अंग सो.मनी- मयह और तैजसका भोग सूक्ष्महै भोग नाम सुख या दुःखके ज्ञानका है उसके विषे स्थूलता और सूक्ष्मता क- हना बने नहीं तथापि बाहरके जो शब्द वगैरः विषयह उसके सम्बन्ध से जो भोग होताहै वही सूक्ष्म है इसलिये विश्व-तो स्थूल का भोक्ता श्रुति विषे कहा है और तेजस को सूक्ष्मका भोगनेवाला कहाहै क्योंकि तैजसके भोग शब्द वगैरह हैं वह तो मानसिकहैं याने मनोमय, इस लिये सूक्ष्महै और तिनकी अपेक्षा करके विश्व जो भोग बाह्य शब्दादिकहैं सो स्थूलहै इसलिये विश्व बाहिरप्रज्ञहै है औरतैजस अन्तरप्रज्ञहै क्योंकि विश्वकी अन्तःकरण की वृत्ति बाहर जाते है और तैजसकी नहीं जावेहै ॥ तैजसहिरण्यगर्भ और-उकारका अभेद ॥ जैसे विश्व और विराट्काअभेदहै उसीतरह तैजसको ईश्वरदीपिका सन भी हिरण्यगर्भ जानना चाहिये क्योंकि सूक्ष्म उपाधि तैजसकीहै और सूक्ष्मही हिरण्यगर्भकीहै इसलिये दोनों की एकताजाने तैजस और हिरण्यगर्भकी एकताजान करके औरफिरओंकारकी दूसरीमात्रा उकारसेइनका अ- भेद विचारकरैं क्योंकि आत्माके चार पादोंमें दूसरापाद तेजसहै और ब्रह्मकपादोंमें हिरण्यगर्भ दूसरा पाद है और ओंकारकी मात्राओं में दूसरीमात्रा उकारहै द्वितीयता तीनों में समानहै इन तीनों को एकरूप विचारकरें । : प्राज्ञ ईश्वर और मकारका अभेद ।। प्राज्ञको ईश्वररूप जानै क्योंकि प्राज्ञ की कारण उ- पाधि है और ईश्वरकी भी कारण उपाधि हैं ईश्वर और प्राज्ञपादन में तृतीय है ओंकार की तृतीय मात्रा मकार है-तीसरा पनातीनों में समानपना है-इससे तीनों की एकता जानै-और यह प्राज्ञ प्रज्ञानधन है क्योंकि जा. ग्रत् और स्वप्न के जितने ज्ञान हैं सों सुषुप्ति विपे धन याने एक अविद्यारूप होजावे हैं जैसे आटा जल से पिंडके वांधे हुये एकरूप होय है और वीके अनन्त विदु तालाब में एकरूप होवे हैं इसीतरह जागत् स्वप्न के ज्ञान सुषुप्तिबि एक अविद्यारूपही वेहैं इससे प्रज्ञानधन ईश्वरदीपिका स०। है और आनन्दमुक्त भी यह प्राज्ञ श्रुतियों में कहा है क्योंकि अविद्यासे पैदाहुआ जो आनन्द है उसको यह प्राज्ञ भोगे है इससे आनन्दमुक्त कहते हैं जैसे तैजस और विश्व का भोग त्रिपुटी से होवे है इसीतरह प्राज्ञके भोग भी त्रिपुटी हैं-चेतनके प्रतिबिंब सहित जो अविद्याकी वृत्ति है सो अध्यात्म है और अज्ञान से पैदाहुआ जो स्वरूप आनन्द सो अधिभूत है और ईश्वर अधिदैव है इसलिये विश्व बहिरमज्ञ है और तैजस अन्तरप्रज्ञ है और प्राज्ञ प्रज्ञानधन है इसी तरह जो तीनोंका भेदहै सो उपाधि करके है विश्वकी स्थूल सूक्ष्म अज्ञान तीनों उ- पाधि हैं और तैजसकी सूक्ष्म अज्ञान ही उपाधिहै और प्राज्ञ की अज्ञान एक उपाधिहै इसलिये उपाधि की न्यू. नता और अधिकता से तीनों का. भेद है और असली विचार से जो देखाजावे तो स्वरूप से भेद नहीं है विश्व तैजस प्राज्ञ इन तीनों विषे अवगत जो चैतन्य है सो परमार्थ याने असलियत से तीनों उपाधियों के सम्बन्ध से रहितहै और तीनों उपाधिका अधिष्ठान तुरीयहै सो बहिरप्रज्ञ नहीं और अन्तरप्रज्ञ नहीं और प्रज्ञानधन भी नहीं कर्मइन्द्रिय और ज्ञानइन्द्रिय का विषय नहीं और बुद्धिका विषय नहीं ऐसा जो तुरीय है उसको परमात्मा १. .
ईश्वरदीपिका स० को चौथापाद ईश्वर साक्षी शुद्ध ब्रह्मरूप जानै: इस:- तरह से दो प्रकारका आत्माका स्वरूप काहाँ एकपरमार्थ रूपं दूसरा अपरमार्थरूप: उसमें तीनपाद तो अपरमार्थः रूपहैं याले विश्व तैजस प्राज्ञ और एक पादतुरीय परमार्थ रूप है जैसे आत्मा के दो स्वरूप हैं तैसे कार के भी दो स्वरूप हैं अंकार उकार और मकार-यह तीन मात्रा रूप जो कहा है सो परमार्थरूप है और तीनों मात्राविषे व्यापक जो अस्ति भाति प्रियरूप अधिष्ठान चैतन्य है सो परमार्थरूप है अकार परमार्थरूप है उसको श्रुतियोंमें श्रमात्र शब्द करके कहते हैं क्योंकि परमार्थस्वरूप विषे मात्राविभाग नहीं है इसबजे से अमात्र है इसीतरहसे दों रूपवाला जो कार है उसका दो स्वरूपवाले आत्मी सें फरक नहीं है इसलिये आकार के अमात्ररूप को और तुरीयको एकरूप जाने अब आत्मा के पद और कार की जो मात्रा हैं तिनको एकजानकर लय चिंतन करें। विश्वरूप जो अकार है सो तैजसरूप उकारसे जुदा नहीं है लेकिन उकारसप है इस सुवाफिक विचार करने कोही लय कहते हैं इसीतरह दूसरी मात्राओको भी सम- कलेना चाहिये और जिसतरह उकास्य आकर कालय. किया। उम्मी मम्ह तेजगरूप उकानको जानकापराकानि .
ईश्वरदीपिका स०
८३
लय करें और प्राज्ञ जो मकार तिसको तुरीयरूप ओंकार
का परमार्थरूप अमात्र है उसमें विषे लीनकरें क्योंकि
स्थूल की उत्पत्ति और लय सूक्ष्मविपे हुई है इससे वि-
श्वरूप जो अकार है उसका तैजसरूप उकार में लग्नं व.
नती है और सूक्ष्मकी उत्पत्ति औरलय कारणमें बनती है
इससे तैजसरूप जो उकार है उसका प्राज्ञरूप जो मकार
हैं उसके विषे लय बनतीहै इसजगह विश्व वगैरहके ग्रहण
से समष्टि जो विराट् वगैरह हैं उनका और अपनी अपनी
त्रिपुटी तिनं सर्वका ग्रहण जानना जिस प्राज्ञरूप मकार
विपे उकार का लय किया है उसी मकारको तुरीयरूपं
ॐकार का असली रूप अमात्र है उसके विपे लीनकरें
क्योंकि ॐकार के असलीरूप का तुरीयसे फरक नहीं
सो तुरीय ब्रह्मरूप है और शुद्धविपे ईश्वर प्राज्ञ दोनों
कल्पित याने ख्याली हैं जो जिसकेविषे कल्पितहोवेहे
सो उसका स्वरूप होये है क्योंकि असली चीज़के मि.
लने से उसमें से निकली जो जीज़ है वों कल्पित याने
सिर्फ ख्याली होती है और फिर वही कल्पित जीज
असली चीज में लीनहोकर. उसी का रूप होजाती है
इसलिये ईश्चरसहितं प्राज्ञरूप मकार का लय तुरीय में
वर्नती है इसीरीति से कार का असलीरूप अमात्र
८४
ईश्वस्दीपिका स०
विषे सबका लय किया है सो मैं हूं इसी मुवाफिक एकाग्र
चित्त होकरके बिचारकरै कि स्थावर जंगमरूप असंग,
अद्वैतं असंसारी नित्यमुक्त निर्भय ब्रह्मरूप जो ॐकारका
असली स्वरूप सो मैं हूं इसी मुवाफिक विचार करनेसे ज्ञा-
नका उदय होवे है इस ज्ञानके द्वारा मुक्तिरूप फलका देने
वाला यह ॐकार निर्गुण उपासनाहै सो सवमें उत्तमहै ।।
ॐकार को दूसरी तरहसे अभेद लिखते हैं ।
ॐकार की प्रथम मात्रा अकार ।।
अकार स्थूलरूपी जगत् जगत्का रूप विराट् उसका
अभिमानी विश्व उसका देवता ब्रह्मा जाग्रत् अवस्था
और राजस गुण ॥
कारकी दूसरी मात्रा उकारका वर्णनं ।।
सूक्ष्म-तैजस हिरण्यगर्भ विष्णुदेवता स्वप्न अवस्था
सतोगुण ॥
ॐकार की तीसरी मात्रा मकार ॥:
मंकारका कारण शरीर अव्याक्तरूप प्राज्ञ अभि-
मानी रुद्रदेवता सुपुप्ति अवस्था तमोगुणः।।
अकार मात्राको उकार मात्रामें मिला और स्थूल
शरीरको सूक्ष्ममें मिला क्योंकि स्थूलका लय सूक्ष्म-के
"
८५ ईश्वरदीपिका सका साथ होवे है जो पदार्थ देखने और बोलने में आवेहै. वो सूक्ष्ममें लीन होजाते हैं याने उसका ज्ञान सूक्ष्मसे होवे है इसीलिये स्थूल झूठा पदार्थ है क्योंकि जन्मताहै और मरताहै बढ़ता है और घटता है विराट्को हिरण्यगर्भ में मिला क्योंकि विराट की उत्पत्ति हिरण्यगर्भसेहै विश्व को तैजसके साथमें मिलावें ब्रह्माको विष्णु के. साथ मिलावें क्योंकि ब्रह्माकी उत्पत्ति विष्णुसे है जाग्रत को स्वमके साथ मिलावें क्योंकि जाग्रत् वस्तु स्वम में देखी जाती है और देखने मात्र सत्य है परन्तु वस्तु असत्यहै रजोगुणको सतोगुणमें मिलावें क्योंकि रजोगुणकी उ- त्पत्ति सतोगुणसे है । उकार मात्राको मारकर-मात्रामें मिलावें और सूक्ष्मा शरीर को कारण शरीरमें मिला क्योंकि सूक्ष्म शरीर मननमात्रहै और कारण न सत्यहै.न असत्यहै इसलिये सूक्ष्मकी उत्पत्ति कारणसेहै हिरण्यगर्भको अव्याकृत में, मिलावें और तैजसको प्राज्ञमें मिलावें प्राज्ञ आनन्द का भोगनेवालाहै औरतैजस अज्ञानहै अज्ञानपने में दोनों समानहैं इसलिये तैजसका प्राज्ञमें लयबने है और विष्णु को रुद्धमें मिलावें क्योंकि विष्णुकी उत्पत्ति रुद्रसे हैस्वप्न को सुषुप्ति में मिला क्योंकि स्वभ अवस्था झंडा-पदार्थ ईश्वरदीपिका सं०॥ है जहाँतक स्वप्न रहता है तहतिक सच्चाहै नींद खलजानें से झूठा प्रतीत होजाताहै इस मुंघाफिक सुपुशि अवस्था .. को भी जानो येभी जहांतक सोया रहता है तहतिक क- हताहैं कि खूब सोया ऐसा सोया कि मुझकों कुछ भी ख- बर नहीं रहा कि मैं कहांथा और दिन निकलने से शरीर मौजूदह में पने में दोनों समानहैं इसीमुवांफिक जगत् के पदार्थ को जानो जहांतक अविद्या तहातक संसार सत्य है जब उपदेशरूपी ज्ञानहोय तव सत्यपदार्थ को मा- नाथा उसको असत्यजानते हैं और जिसको असत्य माना था उसको सत्य जानते हैं इसलिये स्वमकालय सुपप्तिवने है सतोगुणको तमोगुणमें मिलावें सतोगुण शान्ति को कहते हैं और शान्ति स्वभाव को तमोगुण अपनेमें लीन करलेताहै जबतक तमोगुण रहताह तहातक सतोगुण रजोगुण को ठहरने नहीं देता इसीलिये सतोगुणकी उत्पत्ति तमोगुणसेहै और इनसवको अंकाररूप तुरीय में मिलावें कार कैसा है कि निर्विकल्प निराकार घनस्व- रूप सचिदानन्द परिपूर्ण परमेश्वर परमात्माजहि सो मह इसी मुंवाफिक समझना चाहिये और ये जो तीनों क- ल्पित पदार्थ हैं उनसें निर्लेपरहै और सर्व जगतको अपने स्वरूप में जाने याने दृष्ट्रारूप रहै मंसाररूपी इन्द्रजाली
ईश्वरदीपिका स०
७
तमाशाह उन तमाशाओंका कर्ता व तमाशारूप नबन्ने
सिर्फ तमाशा को देखतारहै. न. कि तमाशावाला,मदारी
व.तमाशाके साथ अपना भी नोंचनवाला वनवैठे ।।
::श्रीकृष्ण महाराजने अर्जुनके प्रति कहा है कि हे अर्जुन!
बड़ेश्वेदान्ती जिसको अक्षरब्रह्म कहते हैं संन्यासी संकलं
चासनाओंको त्यागकरके बड़े प्रयत्नसे जिसमें प्रवेशकरते
हैं और जिसका ज्ञान होनेके वास्ते कितनेक ब्रह्मचारीहो
गुरुकुल में वास करते हैं तिसीकी प्राप्ति के अर्थ तुमको
संक्षेप से उपाय कहताहूं।
श्लोकः॥
सर्वाहाराणि संयम्य मनोहदिनिरुध्यच।
मधयांधायात्मनः प्राणमास्थितोयोगधार
पाम् ॥ अमित्येकाचरंब्रह्म व्याहरन्माम
नुस्मरन् । यःप्रयातित्यजन्देहं सयातिपर
मांगतिम् ॥
अर्थ:--सों ऐसे कि सकलइन्द्रिय विषयों में से निवृत्त
करके संकल-दारों को रोक करके और मन हृदयमें नि-
रुद्ध करके और योगवंल से प्राणको मुस्तक में चढ़ाय
स्थापन करके योगधारणामें स्थित होकर ब्रह्मस्मरण पू.
.
ईश्वरदीपिका स। र्वक ॐ इस प्रणवाक्षरका उच्चारण करते करते जो योगी देह छोड़ताहै वह उत्तमगति को प्राप्त होताहै ।। इसलिये मनुष्य इस अकारको हमेशा अपने हृदय में धारण करै कारकी चार मात्राओं का फल ॐकार की प्रथम मात्रा अकारका जो ध्यान करता है वह ब्रह्माके लोकमें जाताहै और दूसरी मात्राउकारका जोस्मरण क- रताहै वह चन्द्रलोक को जाताहै अकारकी तीसरी मात्रा मकारका जो ध्यानकरताहै वह सूर्यलोक में वासकरता है और जो अंकार की चौथी मात्रा तुरीय का ध्यान करता है वो सचिदानन्द घनस्वरूप परिपूर्ण जो सवकार प्रकाश करताहै उसमें लीन होता है इसीतरह ॐकारके स्वरूप को जानना चाहिये और सत्संग और सतशा- स्वरूपी फलको लेकर के हमेशा विचार करना चाहिये याने अपनेको पहिचानना चाहिये फकत ॥ दो० करत सबनि सों बीनती हाथ जोड़ शिरनाय। - तत्त्व विवेकियों का दासहूं ज्ञाता करहु सहाय ॥ माझिनीन जानत न कछु लीजो चूक सुधारि । करत वैलि सम ढीठही यही जीयमें धारि 2. N. इति श्रीई यादीपिकाशिक्षासम्पूर्णतामगात् ।। सच्चिदानन्दार्पणमस्तु.॥ •. be
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इस्तहार ... जिस में इस प्रसार संसार से विरक्त . विरागी जनाको वैरान्य वर्णित है जिस को श्रीभर्तृहरि जीने संस्कृत श्लोकों में रचा था उसी को कविवर श्रीहरदयाल जीने दोहा, सोरठा, सर्वया व कवित्तादिकों से सुशोभित क्रिया-उसी को भाषानु- बाद पिशावरनिवासी श्रीस्वामी परमानन्दजी ने सर्वसाधारण मुसुक्षुजनों के चिचानन्दार्थ अतिश्रम से निर्माण किया अमेठी के राजा श्रीसाधवसिंह जी रचित-जिस में अ- त्युत्तम वैराग्य ज्ञान निर्माण और काम क्रोध लोभ मोह जगहिपचादि खण्डन सहित ईश्वर यश में अनुरागमण्डन । भगवती शिवा काशी विश्वनाथादि प्रशंसासहित मनोहरपद अ. ल्हैया, भैरवी, होरी और खेमटादि रोगों में वर्णित हैं ।। जिस में ईश्वर कृष्णाचार्य ने सत्तर कारिकाओं में साठ तत्वोंका कथन किया है टोक्न सरल मध्यदेशीय भाश में बाबू जालिमसिंह निवासी ग्राम अकवरपुर जिला फैजाबाद हेडपोस्ट मास्टर नैनीतालने गौड़पादाचार्य के भायानुलार रचनाक्रियाहै!! जिस में चार प्रसार के तिलक, अर्थात् ( शंकरभाष्य ह भानन्दगिरि २ ) { श्रीधरजी) (नवलमाष्य ४.) संयुच हैं और दो हिस्सों में विभाजित है इस में श्रीस्वामींशाचार जीके सदनभाश्यनामक संस्कृतीको से.नवलभाष्यनामक मा टीका श्रीमान सुशीनवलकिशोर जी के महान व्यय व आकांक्ष से पण्डिदाउमादत्तजी ने किया है जिससे गनदीना के लि. चढ़ गृह स्थलभी सापामात्र के जाननेवाले समयसकते हैं |