Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Manas Makrand

Sharma,pt,pandhya Ramavatar · 2011/01

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मानस-मकरन्द गोरखामी जी की जीवनी, आलोचना, कठिन शब्दों के अर्थ और अन्तर्कथाओं से युक्त 'मानस' के सुन्दर सार- गर्मित पद्यों का संग्रह। . सकर नकर्ता और सम्पादक श्री पाण्डेय रामावतार शर्मा, एम ए , विशारद (भारतवर्ष का इतिहास, सस्कृत-ज्ञानोदय, नारी शिस्तार, प्रशिक्षा, प्रबन्ध पुष्पाञ्जलि, गीतावली भादि के लेखक और सम्पादक) प्रकाशक शर्मा-साहित्य-सदन सौंधी, पो. भगनाथपुर, जिला पलाम्। प्रथम सरकरण] सन् १९२८० [ मुल्यमा

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श्रीयुत कुमार गङ्गानन्द सिंह जी
SLNFTES Gerare

यह
"मानस मकरन्द”
श्रीनगर-नरेश साहित्य सरोज कविकुल-चन्द्र
श्री कमलानन्द सिंह जी के कुल-दिवाकर
हिन्दी के सुरेखक, देश सेवा के उपासक,
शुद्धोनत जीवन के नेमी,
निहार हिन्दू-सभा के सभापति
श्रीयुत कुमार गङ्गानन्द सिंह जी
एम ए एम एल ए, एम. आर.ए एस, एफ आर ए एस.
,
क
करकमलों म
साहित्य सेवा के उत्साह दान के भेंट स्वरूप
सादर समर्पित है।
.
विनीत
पाण्डेय यमातार शर्मा

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विषय-सूची कृतज्ञता प्रकाश दो विनीत बातें गोस्वामी तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन वृत्त ग्रन्थ, भाषा सम्बन्धी और मालोचनामक दूसरी बाते १ वंदना प्रथम सोगन, बाल काण्ड मे २ पुष्पवाटिका में जनकनन्दिनी और राजकुमार ७-११ " " " ३ मन्धरा कीमत्रणा द्वितीय सोपान, अयोध्या कापड से १२-१८ ४ राम का कैकेयी से सम्भापण . माता कौशल्या से राम का विदा मोगना और सीता को समझाना २५-३३ ६ माता सुमिनासे लक्ष्मग काविदा माँगना, ३४-३६ ७ चिट की भक्ति ८ भरत की व्याकुरता ९ भरत-स्वभाव-चित्रण १० सीता को अनुसूया का उपदेश-नृतीय सोपान, आरएष काएद्ध से ६०-६२ ११ पपासर की शोभा ६३-६७ १२ वर्षा-रद-वर्णन-चतुर्थ सोपान विविधा काण्ड से ६८-७० १३ सीता-रावण सम्वाद-पचम सोपान, सुदर एड से ७१-७३ १४ लक्ष्मण शक्ति और कुम्भकर्ण-वध-पष्ठ सोपान, सका पद से ४-८१ १५ राम-राज-वर्णन -सप्तम मोरान, उत्तर कायह से ८२-८८ " . कठिन शन्दों के अर्थ आन्तकंथाएँ ९७-१०६

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कृतज्ञता-प्रकाश . प्रस्तुत 'मानस-मकरन्द' के सम्पादक द्वारा लिखित और सम्पादित कुछ पुस्तकें अब तक मिा भिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित हुई है, यद्यपि साहित्य-सेवा-व्यसनी सम्पादक ने अपने इच्छानुसार तथा अपनी देखरेस में सुन्दर पाठ्य पुस्तकों के प्रकाशन तथा मातृभाषा सेवा-मुलभता के निमित्त 'शर्मा-साहित्य-सदन' नामक एक अपनी सस्था स्थापित की है। अभी तक उचित व्यवस्था न हो सक्ने के कारण उक्त सस्था इस 'मानस- मकरन्द' से भी प्रकाशन-कार्य का श्रीगणेश नहीं करने पाती यदि बिहार के एक परम प्रसिद्ध विद्याविभूपित तथा श्रीसम्पन प्रतिभाशाली राजकुलोद्भव पूज्य पुरप की कृपा इस पर नहीं होती और आप अपनी महत्ता और साहित्यप्रियता का परिचय देते हुए मकरन्द-सम्पादक के एक तुच्छ समपण को स्वीकार करने की दया नहीं दिखाते । आप सर्वगुणार कृत राजकुमार का जिनकी कीर्ति भारत की प्रत्येक दिशा में व्याप रही है नाम हे कुमार गगानन्द सिंह जी बहादुर M A M L A,M RAS, FRASI 31948 R quiet जिलान्तर्गत श्रीनगर के राजकुल में १८९८ ई० के २४ सितम्बर को हुआ था। यह लिपी बात नहीं है कि राजा दुरारसिंह जी द्वारा सस्थापित नसीराकुल में एक से एक विद्याव्यसनी, साहित्य प्रेमी काव्यमर्मज्ञ, साहित्यसेवी और साहित्यसेवी सहायक हो गए है। राजा दुलारसिंह जी के ही छोटे पुन राजा रद्रानन्द सिंह जी के, जो बनैली छोटे तरफ (पीछे श्रीनगर के नाम से प्रसिद्ध) के अधिपति थे, वश में श्रीकुमार साहर राना रद्राान्द सिह जी के पुत्र राजा . - ૨ मानस मकरन्द राजा श्रीनन्दनसिंह जी थे, जिन्होंने श्रीनगर ग्राम बसाया था। आपके तीन पुन हुए---राना नित्यानन्द सिंह जी, राजा कमलानन्द सिंह जी, और कालिकानन्द सिंह जी । राजा नित्यानन्द सिह जी पृथक् हो गए और राजा कमलानन्द सिंह जी २४ वर्ष की अवस्था में १९१०ई० में गोलोकवासी हुए । राजा कमानन्द सिंह जी के ही सुपुन कुमार गगानन्द सिंह जी हैं। राजा कमलानन्द सिंह जी को हिन्दी से उत्कट प्रेम था । भाप ये 'साहित्य सरोज कवि कुल चन्द' । आपने 'भानन्द मठ' का अनुवाद किया और अन्य छोटे छोटे ग्रन्थ तथा स्फुट कविताएँ बनाई । आपके जीवन-काल में आपके पास कवियों और विद्वानों की भीड़ लगी रहती थी और उनका सदा सम्यक् सम्मान होता रहता था । आपके भ्राता रामा कालिकानन्द सिंह जी भी कम विद्या प्रेमी नहीं हैं । आपका जैसा सरल स्वभाव है, चेसी ही भाप मे सहदयता और विद्याप्रियता भी है। मापसी सहायता से अनेक दीन विद्यार्थी उच्च शिक्षा पा चुके हैं और पा रहे है । आपकी विद्यानुरागिता इससे भी प्रकट होती है कि आपकी देख रेख में ही कुमार साहब का पठन- पाठन हुआ और आपका ऐसी उच्च शिक्षा और कीर्ति प्राप्त हुई। ऐसे गौरवशाली कुल के योग्य ही कुमार गगानन्द सिंह जी में सद्गुण हैं। भापके सिद्धान्त परिपृत और उच्च तथा कार्य उसत और जनता प्रिय हैं। आपका सक्षिप्त परिचय, या प्राप्त विद्या का उल्लेप कहा जाय, 'टाइम्स आफ इण्डिया' के 'इण्डियन इयर चुक' में प्रकाशित हुआ है। भापकी शिक्षा मुझेर जिला स्कूल, पूर्णिया जिला स्कूल, कलकत्ता-प्रेसिडेन्सी कालेज, कर कत्ता सस्कृत कालेज, और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पोष्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट में पूरी हुई और १९२१ ई० में आपने एम की उपाधि प्राप्त की । तब से आप सर्वदा तत्परता और कर्तव्यपरायणता से सभी सार्वजनिक, राजनीतिक, धार्मिक और विद्या सम्बन्धिनी समी RRITमरिमलित इभा करते हैं। ए कृतज्ञता प्रकाश ३ १९२५ ई० में एसेन्टरी में स्वराज्य पार्टी से मिलकर भापने अपनी देश सेवा के भाव का परिचय दिया। सन् १९२५-२८ में आप पूर्णिया जिरे की कांग्रेस कमिटी और वि०मा० हिन्दू सभा के सभापति हुए । १९२६ ई० में वि० प्रा० कवि सम्मेलन के सभापति-पद पर भी भाप सुशोभित हुए । भापक गम्भीर और खोजपूर्ण लेख अग्रेजी पत्रों में भी छपा करते है। आपके रेख दो बार (द्वितीय और तृतीय) मदरास ओरिएन्टल कान्फाम में भी पटे गए है । आपके रिसे कई ग्रन्थ है, निनके प्रकाशन का प्रबन्ध हो रहा है। ऐसे विख्यात, विद्वान् , सिद्धहस्त लेसक, कान्यक्लामर्मज्ञ, उत्साही, मातृभापा सेवी और रक्ष्मी के कृपापात्र पुरप की कृपा से वर पावर ही 'शमा साहित्य-सदन' बिहार के प्रतिभावान् रेखक श्री पाण्टेय रामावतार शर्मा विशारद, एम की लिखी पुस्तकों के प्रकाशन कार्य में अग्रसर हुआ है, जिस बल और आय के लिए उन सस्था कुमार साहब की कृतज्ञ है और रहेगी। साथ ही वह पूरी भाशा रखती है कि इसी प्रकार के नाश्रय से हिन्दी भाषा की सेगा समुचित रूप से करती रहेगी। मिनीत पारप्टेय मुनीश्वर शर्मा, -शा-साहित्य सदन। --- व्यवस्थापक्- -

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दो विनीत वातें यन्मायावशवर्ति विश्वमखिल ब्रह्मादिदेवासुरा- यत्सत्त्यादमृपेव भाति सकल रजौ यथाऽहेभ्रंम । यत्पादप्सवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीपांवतां- वन्देऽह तमशेषकारणपर रामारयमीश हरिम् ॥ शिक्षा विभाग के हिन्दी-हितैपियों और विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत 'मानस मकरन्द' समुपस्थित करते हुए मुझे उसके सम्बन्ध में दो बातें निवेदन करनी है। पहरी बात यह है कि यह पुस्तक महाकवि तुलसी दासजी के सर्वप्रसिद्ध महाकाव्य 'रामचरितमानम' का 'मकरन्द' है। दूसरी चात यह कि इस सग्रह मे यह ध्यान रखा गया है कि अप अध्ययन से ही पाठकों को गोस्वामी जी के सिद्धान्त रविता और भापा का बहुत कुछ परिचय प्राप्त हो जाय और उनके हृदय में साहि य रसास्वादन की रारसा परपती हो। गोस्वामीनी की कीर्ति और विशेषत साहित्य सेवा के सम्बन्ध म कुछ कहना 'चर्षित-चर्पण' वाली यात होगी, क्योंकि इस सम्बन्ध में बहुतों ने बहुत कुछ लिया है। सभी लोग आप से पूर्णत परिचित है और आप की पीयूपवर्पिणी कविता से अपूर्व आनन्द उठाया करते है । गोस्वामीजी कृत एक से एक अमोल रन है, परन्तु मानस सरश्रेष्ठ है और उसी के मात्र .

२ मानस मकरन्द्र अन्य अन्यों में भी पाए जाते है। मानस द्वारा गोस्वामीजी ने साहित्य सेगा अतिरिक्त समाज और धर्म की भी भारी सेवा की है। इस कारण भापा का थोडा ज्ञान होते ही विद्यार्थियों का तुलसीजी से परिचय कराना प्रत्येक प्रान्त के शिक्षा विभाग के विचारशील नागरी नागरों का कर्तव्य है किन्तु इस सम्बन्ध में यह भी ध्यान देने की बात है कि मानस के किसी एक काण्ड को किसी सास के लिये पाठ्य पुस्तक बनाने में कुछ न कुछ कठिनाई बराबर बनी रहने की सम्भावना है । कहीं कहीं पाठ्य पुस्तक- निर्वाचिनी समिति के कुछ अनुभवी हिन्दी प्रेमी सदस्यों ने यह स्वीकार भी किया है कि किसी एक काण्ड को पाठ्य पुस्तक यनाने से कभी तो उससे उम कक्षा की समता और आवश्यकता की पूर्ति नहीं होती, कभी स्वीकृत काण्ड मे गोस्वामीजी के सिद्धान्त विद्यार्थियों पर प्रकट नहीं होते, कभी एक के रसने से पृष्ठ अधिक हो जाते हैं और उसे हटाकर दूसरा रसने पर कम । जैसे 'अयोध्याकाण्ड' को प्रवेशिका परीक्षा (Matriculation Examination) की पाठ्य पुस्तक बनाने से पुस्तक बढी हो जाती है और पाठ भी कठिन हो जाते हैं। नियत समय में सहज ही वह समाप्त भी नहीं होता । इन कठिनाइयों को दूर करने के लिये सुन्दरकाण्ड या किष्किन्धा- काण्ड को उसके स्थान में रखने पर पाठ सरल हो जाता है और काव्य का अच्छा अश भी विद्यार्थियों को नहीं मिलता। ऐसी दशा की कठिनाई ओर सरलता की समस्या तभी सुलझ सकती है जब उस परीक्षा के परीक्षार्थियों के उपयुक्त कोई सुन्दर सग्रह पाठ्य पुस्तक के रूप में पाठकों के समक्ष रक्सा जाय । इस भाव से प्रेरित होकर कुछ प्रकाशकों ने 'सक्षिप्त रामायण' के सस्करण और तुलसीजी के ग्रन्थों से सग्रह भी प्रकाशित किये हैं। पर उन्हें भी पाठ्य पुस्तक बनाते समय विद्वानों को कक्षा और समय पर ध्यान देना होगा। साथ ही उद्धृत विषयों को गम्भीरता, भावचित्रण कान्यसरसता, आदि आवश्यक बातों पर ध्यान देना आवश्यक है।

दो मिनीत यातें कुछ वर्षों से स्मृलों में कार्य करने और प्रवेशिका के परीक्षार्थियों की योग्यता तथा प्रवृति से परिचय पाने के अनन्तर मैने उनके व्यवहार के योग्य यह 'मानस मरकन्द' सम्पादित किया है । मानस के प्रथम सोपान की चना और वाटिका के वर्णन मे जैसा सौदर्य हे, वैसा ही मावमय माधुर्य और कारण्य द्वितीय सोपान के मथरा की मग्रणा, राम के वनगमन ओर भरत की व्याकुलता में है। तृतीय सोपान मे सीता को पातिप्रत पर भनुसूया उपदेश और पपासर की शोभा सुन्दर भऔर प्रधान स्थान है। चतुर्थ सोपान में वर्षा और शरद के वर्णन के अतिरिक्त सग्रह योग्य और क्या है? पचम सोपान का सर्वस्व सीता और रावण का कथोपकथा है। पष्ट सोपान में लक्ष्मण की शक्ति का स्थर अत्यन्त सुन्दर है और उससे सम्बद्ध उम्भकर्ण वध मे युद्ध-वर्णन भी भरी भाँति पिया गया है । सप्तम सोपान में ज्ञान-दीपक और रामराज्य वर्णन सुन्दर अश है, निनमे ज्ञान दीपक यहुत लम्या चौदा और गम्भीर है, पर रामराज्य का वर्णन यहुत सुन्दर, सरल और सहज ग्राह्य है। इनके सग्रह से 'मानस-मकरन्द' मैं मानस के मभी सोपानों के सार भी आ जाते ह और पुस्तक भी न बद्धी होती है, न छोटी। इस सकल में भिन्न भिन्न स्कूलों के अनुभवी शिक्षकों को सम्मति से छानों की रुचि और आवश्यक्ता भी मालम कर ली गई है। इनमें में अपने मित्र पण्डित लक्ष्मीश्वर जी पाण्डेय वी० ए० पी०टी० पाण्डेय यदु नदन प्रसाद जी एम० ए० वी० ई० डी०, श्रीवरगीरारजी यी० ए. और श्रीनित्यानद जी त्रिवेदी का नाम नहीं भूल सकता। साथ हो इस तुच्छ भेंट को स्वीकार कर श्री सरस्वती-सुपुत्र कुमार साहब ने मुझ पर जो असीम कृपा की है, उसके लिए मैं भापका कम कृतन नहीं हूँ। पद्य पाठ काशी-नागरी प्रचारिणी सभा और बैलवेडियर प्रेस, प्रयाग के मानस मस्रण के अनुकूर सम्मा गया है। छात्रों की जानकारी के लिए मकरन्द के आरम्भ में तुरसीदास जी की सक्षिप्त जीवनी तथा अन्य । बी०पर,

मानसन्मकरन्द
आलोचनात्मक बातें और अन्त में कठिन शन्दों के अर्थ तथा अन्तर्कथाएँ
भी दे दी गई है।
हिन्दी प्रेमियों की कृपा से इन विशेषताभो से युक्त इस 'मानस
मकरन्द' के छात्रोपयोगी सिद्ध होने से मैं अपना परिश्रम सफल समझेंगा।
शर्मासाहित्य-सदन खरौंधी,
पो० भवनाथपुर,
जिला पलामू।
विजयादशमी, वि० स० १९८५
नागरी-नागरों का कृपाकाक्षी
पाण्डेय रामावतार शर्मा।

श्री गोस्वामी तुलसीदास जी का संक्षिप्त जीवन वृत्त स्यात् ही ऐसा कोई थोडा भी पढ़ा लिखा पुरप होगा, निसने गोस्वामी जी की रामायण न देखी हो ओर जो प्रेम तथा श्रद्धासे उसकी चौपाइयों के पढने गाने की राल्सा न रखता हो। इससे रामचरितमानस ख्याति की सर्वप्रियता और उसके रचयिता महाकवि तुलसीरास जी की विस्तृत रयाति प्रकट होती है । विद्या प्रेमी-समाज में भी गोस्वामीजी का स्थान अत्युच्च है और आपनी मन्जुर मनोहारिणी कविता के रसास्वादन से सभी विद्वान् अपने को कृतकृय मानते है । रेखकों की लेखनी भी गोस्वामी जी की राम भक्ति, काम्यग्रन्य-गुण-गरिमा और रचना सौंदर्य पर अनेको लेख सूझ-समन्वित विचार और टिप्पणियाँ प्रकाशित कर पवित्र हो चुकी हैं। आश्वय्य है, तब भी मानसकार महाकवि की जीवनी की कई बातें अभी तक अनिश्चित और अज्ञात है। कवि कुल-कुमुद-बलाधर गोस्वामी जी के जन्म का ठीक समय और स्थान किसी प्रथ में लिखा नहीं मिलता। अतण्य जन्म-काल ओर जन्मस्थान के निणय में इस सम्बन्ध के विचारों, भिन्न रेखा और कपनाभा का आश्रय लेना पड़ता है। इन्हीं साधनों के आधार पर गोम्बामीनी के जन्म के कार और स्थान के सम्य ध में कई सिद्धान्त खडे किए गए हैं, परतु अधिफ लोग गोस्वामी जी का जन्मकार सत् १५८९ और जन्मस्थान योग जिले का जाम-काल और जम स्थान मानस मकरन्द राजापुर नामक माम मानते हैं । राजापुर में प्रमाण स्वरूप कुटी, मन्दिर मादि विश्वासपदायिनी वस्तुएँ भी लभ्य है। यह निश्चित है कि सुलसीदास जी का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था, यद्यपि वह कौन ग्राह्मग थे, इसके निर्णय में भाजतक मतभेद है । कोई उन्हें कान्यकुब्ज और कोई सरयूपारीण ब्राह्मण कहता है। किन्तु उनका सरयूपारीण होना ही अधिक लोगों को मान्य और प्रमाणसिद्ध भी है। काल और स्थान के समान गोस्वामी जी के माता पिता के नाम भी कही लिसे नही मिरते । पर रोक प्रसिद्ध बात यह है कि उनकी माता का नाम हुलसी था और पिता का आत्माराम दूबै । कहा जाता है कि पचपन में ही गोस्वामी जी को माता पिता के वियोग बचपन की विपत्ति का कष्ट सहना पड़ा । यह क्धन सर्वथा निर्मूल नहीं कहा जा सकता, जब इसकी पुष्टि के निम्नलिखित प्रमाण मिलते है-- "मातु पिता जग जाइ तज्यो निधिह न लिख्यो कछु भार भलाई" --ऋषितावली। "तनु तज्यो कुटिल कीट ज्यों तज्यो मात पिताह ।" "जनक जननि तज्यो जननि करम ग्नुि विधि सिरज्यो तम्यो मात पिताहू" -विनयपत्रिका। इस वियोग के कई कारण कहे जाते हैं । कोई मूल में पढ़ने के कारण माँ पाप से त्यक होना कहता है, कोई जन्मोपरान्त फेंक देना मानता है, ओर कोई कहता है कि इनके जन्म के थोटे काल पीछे इनके माता पिता की मृत्यु हो गई। पर इन क्पनाओं के लिए पके प्रमाण नहीं मिलते। तब इन्हें न मान कर ऐसी क्रपना क्यों न की जाय कि किसी अज्ञात कारणवश या विद्याध्ययन के लिए गोस्वामी जी के माता पिता ने उन्हें घर से दूर कर दिया और पीछे उन्हें माता पिता के साथ रहने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ १ तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन-वृत्त विनयपत्रिका के "च्याहन बरेपी जाति पाँति न चहत हो" की पक्ति के यर पर कुछ रोग गोस्वामीजी का अनिवाहित रहना बताते हैं, किन्तु पति से ऐसी बात कदापि सिद्ध न होने के कारण विवाद, वश और वैराग्य यह विचार प्रानिमूलक कहा जा सकता है । इसके विन्द रोगों में प्रसिद्ध है कि गोस्वामीनी का विवाह दीनमधु पाठक की पुत्री रत्नावली' में हुआ था और उसमे 'तारक' नामक एक पुन भी हुआ था, जो यचपन में ही मृत्युप्रस्त हो गया। पीछे वह चिरक्त हो गए थे और उन्होंने सन्यास धारण कर लिया था। कुछ उढेवा से जीवन के आरम्भिक काल में गोस्वामीजी का विषयी होना प्रमाणित होता है। यह भी मिलता है किगोस्वामीजी के तीन विवाह उप । तीसरा विवाह कचनपुर ग्राम के लक्ष्मण उपाध्याय की कन्या बुद्धि मती से हुआ, जिसके पीछे समुराल जा पहुंचने पर गोस्वामीजी को अपनी धर्मपत्नी से कही भर्त्सना सुननी पड़ी और उसी से उनके हृदय में विराग उत्पा हो गया। विराग होने पर यह ससार-सुखों से विरक्त हो गए और तीयों में पय्यटन करने निक्रे । तपसे कभी उन्हें स्त्री मोह नहीं हुआ। विरक्त होने पर गोस्वामीजी ने कई स्थानों में भ्रमण किया। पता घरता है कि वह भृगु आश्रम, हसनगर, ब्रह्मपुर, गायघाट, (बलिया जिलान्तर्गत), बला-पतीत, अयोध्या, कुरक्षेत्र, मथुरा, वैराग्य और विचरण कोत, वृन्दाग, प्रयाग, सोरों, जगन्नाथजी, चित्र यूट आदि स्थानों में पर्यटन किया करते थे। उनका अधिका निवास अयोध्या, चित्रकूट और काशी था। काशी में उनका सर से अधिक रहना हुआ और अत तक वह वहीं रहे । काशी के हनुमानफाटक, गोपालमन्दिर, प्रसाद याट और भस्सी नामक चार स्थान गोस्वामीजी के सम्माध से प्रसिद्ध हैं। कहीं कहीं गोस्वामीजी ने ऐसा उल्लेख किया है जिससे उनके किसी गुर से शिक्षा पाने का आभास मिरता है, परन्तु किसी प्रथ में क्सिी .

मास मररन्द गुर का नाम नहीं मिलता। 'बदउँ गुरपद क्ज, कृपासिंधु नर रूप हरि' में 'नर रूप हरि' पद है, जिससे लोग अर्थ निकालते है कि गोस्वामीजी के गुरु का नाम 'नरहरिदास' था। परन्तु तुलसी चरित में गोस्वामीजी के गुरु का नाम रामदास जी लिखा है। तुलसी चरित का कथन ही अधिक मान्य मालम होता है, क्योंकि जैसी शिक्षा का विवरण उसमें पाया जाता है, वैसी ही विद्वत्ता गोस्वामीजी के प्रथों से प्रकट होती है । गोस्वामीजी की निधन तिथि जन्म-कार से अधिक प्रसिद्ध है। वह तिथि इस दाहे से प्रकट होती है- "सवत् सोरह से असी, असी गग के तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर ॥" अर्थात् ,श्रावण शुक्ला ७, स० १६८० को काशी में गगा के अस्सी घाट पर गोस्वामीजी ने शरीर त्याग किया। यह मास सवत ठीक माना जाता है। कई प्रमाणों से यह बात सिद्ध होती है कि गोस्वामीजी की मृत्यु शेग से हुई । कुछ लोग इसे नहीं मानते । स्यात् महामारी को युरा रोग समझकर उसके भक्त ऐसे महामा की मृत्यु महामारी से बताना अच्छा न समझते हों। ऐसा विचार कोई विचार नहीं । मृत्यु किसी रोग को विशेषता नहीं देती, भार किसी रोग की भयकर दशा मृत्यु के लिए पर्याप्त है। गोस्गमी जी का पाण्डिस्य अगाध था। आप महाकवि थे, पण्डित शिरोमणि थे, सतराज थे, और समानोन्नति पर सदा ध्यान रखनेवाले धर्मात्मा थे; तथापि आपका हृदय अत्यन्त सरर और नन्न प्रकृनि था। भाप में महत्ता के अमिमा का नाम भी नहीं या। आपकी आतरिक सरलता और नम्रता के फल स्वरूप ही आपके श्रीमुख से निकला था -"कवि होउँ नहिं चतुर कहावई । मति -अनुरूप राम-गुन गावउँ।" रामचरितमानस के आरम्भ में अपनी नम्रता का तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन-वृत्त परिचय देते हुए गोस्वामी जी ने सभी लोगों की वदना की है। उसमें जहाँ आप "व्यास आदि कवि पुगर नाना" की वदना करते है, वहीं निश्छल भाव से और नम्रता पूर्ण शन्दों में "करि के कविन्ह कर. परनामा" भी भक्ति करते है। इतना ही नही, "भये अहहि जे होडहिं आगे प्रनवउँ सहि कपट सब त्यागे।" निवेदन करने पर ही आपको शाति मिलती है। आप भक्तिरस में शराबोर रहते थे भोर भक्ति आपके जीवन का रक्ष्य था, पर आपकी भक्ति सदा सदाचार के मार्ग पर चरते रहने की एक शक्ति थी। उस शक्ति से समन्वित होने पर रपटता और विरासिता का भणुमान भाव भी मनुप्य के पास फटकने नहा पाता। यही कारण है कि गोस्वामीजी का जीवन एक आदर्श और विमर जीवन था। भक्ति के आश्रय से “वचक भगत कहाइ राम के" जीना आपको प्रिय नहीं था, न आपको धम्माइम्बर से प्रेम था। आपने कहा भी हे-"धिक धरमध्वज पंधरकधोरी।" आप निश्चय, गभीर, नन और शात थे, परन्तु सलों को बढ़ावा देना भाप समाज के लिए बुरा मानते थे, क्योंकि दुर्जनों के दमन से ही मानव समाज में शाति रह सकती है, और ऐमा न करने से उनके उरे विचारों को और भी बर मिरता है। यही भाव व्यक्त करते हुए मापने हिसा- 'यायस पालिय अति अनुरागा । होहि निरामिप करहुँ कि कागा।" गोस्वामी जी के हृदय में समाजोगति और भारत हित की लहरें उमडती रहती थीं। अतएव अन्याय, अभिमान, द्वेष दुर्भिक्ष प्रकोप, गोपद्रव आदि से समाज और देश को दुसी देख आपका हृदय द्रपित हो उठता था। आपके हदय में किसी की धुराई का कभी ध्यान नहीं आया, न आप सदाचार और कर्तव्य के माग से विचलित हुए, तथापि काशी के कुछ भभिमानी, भज्ञानी और स्वार्थी पुरप आपसे द्वेप माव रखते थे। पर भाप से निष्काम मत को उस भकारण द्वेप से क्या चिन्ता हो . " मानस मकरन्द मकती थी ? आप तो सदा सोचा करते थे कि किसी की बुराई मुझसे न हो जाय, क्योंकि भापका अन्त करण निर्मल था, आपको किसी से द्वेष नहीं था, दुप्फर्म से भापका कोई सम्बन्ध नहीं था और न आप ईर्ष्यावश किसी की कुछ हानि करने का विचार रसते थे। भाजकल तुलसीजी भक्ति रस के एक प्रधान वैष्णा माने जाते हैं। साथ ही कुछ लोग आपको शेव भी कह बैठते ह। परन्तु वास्तविक्ता धार्मिक सिद्धान इन मनमानी बातों से कहीं दूर है। न तो आप आज की सी भक्ति के कट्टर भक्त थे, न शिवोपासना के वाह्य लक्षणों केदास थे। भापके ग्रन्थों के विचार आपको किसी सीमानद्ध सम्प्रदाय का सिद्ध नहीं करते । आप की धार्मिक उदारता, समाजप्रियता, विचारशृङ्खला और प्राचीन अन्धों के प्रति श्रद्धा न तो आज के वैष्णन कहलानेवारों में मिलती है, न शेवों में। भाप भक्तिमार्ग के पथिक थे, पर आपकी भक्ति और उपासना मिराली थी। आप अपने इष्टदेव में सर्वदा तल्लीन रहते थे। आप के इष्टदेव राम थे, और साधारण लोग दशरथारमग मर्यादा-पुरपोत्तम श्रीरामचन्द्र- जी को उनका इष्टदेव मानते हैं और देवादेखी बहुत लोग राम-नाम जाप को मुक्तिदाता और स्वार्थापहर्ता समझते हैं। परन्तु सूक्ष्म विचार इस स्थूर भाव को स्वीकार नहीं करता। क्योंकि गोस्वामीजी के 'राम' महाराज दशरथ के पुत्र होते हुए भी 'सत्र में रमण करणवाले' के सत्यार्थ के परि- चायक थे । यह कोई लिष्ट करपा नहीं है। आपने वदना में स्पष्टतया काह दिया है-"वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामारयमीण हरिम् ।" पुनश्च- सारद सेप महेष विधि, आगम निगम पुरान । नेति नेति कहि जासु गुन, करहिं निरतर गान ॥ परब्रह्म सर्वव्यापक है, वह सभी मनुष्यों के हदय में निवास करता है और सभी वस्तुओं में वर्तमान है। उसी प्रकार राम-सत्ता भी ससार

तुरसीदास जी का सक्षिप्त जीवन वृत्त
७
की सभी वस्तुओं में वर्तमान है। विचार से सब जग को 'राम नाम-मय'
यतलाया और "रोग को पोच, सो न सोच, न सँकोच मेरे, व्याइ न
बरेखी, जनि पोति न चहत हो" कहकर जाति-पाति के विरोध को व्यर्थ
वता 'हरि को मजै सो हरि का होई' का उपदेश दिया।
गोस्वामीजी को पि रचित सद्ग्रन्थों के सिद्धान्त ही प्रिय थे और
उन्ही के यता धर्ममार्ग पर चलने से वह समान का कन्याण मानते थे।
धाम्मिक क्षेत्र में आप समना का साम्राज्य देसते थे। आपने इसमें जाति
पाँति के विचार से घृणा और तिरस्कार को स्थान नहीं दिया। प्राचीन
वैदिक मार्ग त्याग और समाज की गिरती दशा से आपको भारी कट होता
था। नाना पथ, भित्र भित्र मत, प्रेत पाखण्ड मिथ्यावाद आदि शास्त्रावरोधी
बातों से आपका हत्य सिस रहता था और वह खिताजापने समय
समय पर प्रकट भी की है। यथा-
"अशुभ भेष भूपन धर, भछाभच्छ जे खाहिं।
ते जोगी ते सिद्ध नर, पूज्य ते फलियुग मॉहि ॥
साखी सादी दोहरा, कहि कहनी उपखान ।
भगति निकपहिं भगत कलि, निंदर्हि वेद पुरान ॥
श्रुति-सम्मत हरि भक्तिपथ, सयुत विरति-विवेक ।
तेहि परिहरहिं बिमोहवस, फल्पाहि पथ अनेक ॥
तुलसी पारस के समय, धरी कोकिलन मोन ।
अब तो दादुर बोलिह, हमहि पूछिहे कोन ॥"
-दोहावली।
तुलसीदामजी की जितनी रयाति हे उसी के योग्य मापका पाण्डित्य
भी था, जिस पाण्डिस्य के प्रमाण में अपनी ओर से कुछ भी कहने की
.

मानस मकरन्द आवश्यकता नहीं जान पदती, जय कि भापके गम्भीर ग्रन्थ ही इसके लिए पर्याप्त है। शास्त्रों का जितना ज्ञान गोस्वामी जी को था, पारिदत्य उससे कम न आप में काव्यकुशलता थी, न विचार और न विवेक । आपने पर्यटन और सत्सग से मानव बरिन का अध्ययन भी पूरा किया था। विद्वानों का सग भी ज्ञान प्राप्ति का एक साधन है और इस साधन से अनेक गुण प्राप्त होते हे। गोस्वामी जी ने सत्सग की महिमा विशद और सरस रूप मे गाई हे । उससे प्रकट होता है कि विरक्त होने के बाद आपने देश पर्यटन और सत्सग से बहुत लाभ उठाया । बालकाड के आरम्भ में चंदना करते हुए गोस्वामी जी ने अपनी काव्य मर्मज्ञता ओर तल्लीनता का परिचय देते हुए काव्य-कुशल कारी देवताओं की ही वदा की है। यथा- वर्णानामर्थसहाना रसाना छदसामपि । मङ्गलाना च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥ अर्थात्-वर्णों के, अर्थ-समूहो के, रसों के, छदों के और मगरों के करनेवाली वाणी (सरस्वती) और विनायक (गणेश) की वदना करता हूँ। आगे अपने विविध विषयों के अध्ययन और मनन पर भी गोस्वामी जी ने "नानापुराणनिगमागमसम्मत यद्, रामायणे निगदित क्वचिदन्य- तोऽपि ।" कहकर कुछ प्रकाश डाला है। गोस्वामी जी सस्कृत के अगाध विद्वान थे, परन्तु आपकी पण्डिताई विवेक विहीन कोरी पण्डिताई ही नहीं थी। आपको अपने समाज की दशा का ज्ञान था, देश में प्रेम था और समाजोलति का ध्यान था । आप ने "भलि भारत भूमि" और "यह भारत पड समीप सुरसरि, थल भरो, सगति भली।" कहकर देश प्रेम का परिचय दिया, और उस काल मे पण्डित वृन्द के देवनागरी से घृणा करते रहने पर भी देवनागरी प्रेम दिखलाते तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन-वृत्त ९ हुए आपने देवनागरी की सेवा में अपना अपमान नहीं समझा यदिक आक्षेप करनेवालों को शिक्षापूर्ण उत्तर दिया- "का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहियतु साँच । काम जो आप कामरी, का ले करे कुमाच ॥" मनुष्य अपने मान्य महापुरषों के जीवन में ऐसी बात हँढता है, जो साधारण पुरष के नित्य के कार्य में नहीं मिलती और न मनुज-शक्ति के लिए सम्भव जान पड़ती है । फलत प्रसिद्ध महापुरपो गोस्वामी जी के जीवन के भक्तों की प्रवृत्ति उाकी जीवीयों में चमत्कृत मन की चमत्कार माया गदन्त कथाएँ मिलाने की और होती है, भोर जैसे जैसे समय बीतता जाता है, वैसे वैसे उनके जीवन की घटनाओं में अौकिक बातों का समावेश होता जाता है। तो भी जन साधारण को ये बातें सची प्रतीत होती हैं और उनके उल्लेख से साधारण पुरपों के बल और महापुरषों की महत्ता में अन्तर बताया जाता है । ऐमी ही अध भक्ति के पल स्वरूप कुछ रोग किसी महापुरप के अनुयायी यन उसके मत को धर्म का रूप दे डालते हैं। ऐसे मतों की प्रधानता से ही भारत में वैदिक धर्म का अपमान और साम्प्रदायिक यातों का पूरा प्रचार हुआ है। जिस प्रकार महात्मा बुद्ध, शर, कबीर आदि प्रसिद्ध समाज सुधार- को और मत प्रवर्तकों की जीवनियों के साथ भौकिक क्याओं का सयोग उनके अनुयायियों ने किया है, उसी प्रकार गोस्वामी जी के भक्तों ने भी उनके जीवन के साथ कई प्रसिद्ध चकितकारी चमत्कारों का सयोग किया है। हनुमान जी की आज्ञा से चिमूट के वन में एक हरिण के पीछे एक श्याम और पक गौर धनुपधारी दो सुन्दर राजमारों के दर्शन, सती होनेवाली ग्राह्मणी के मृत पति को ती दिनों की भगवान्-स्तुति से जिलाना, फरामात न दिसाने के कारण मुगर बादशाह जहाँगीर के यहाँ फैद किए २ १० मानस-मकरन्द . तुमसीजी के जाने पर यंदरों की सेना की सहायता से मुक्त होना, तुलसी जी की जिला पर बैठकर हनुमान जी का भाषा-रामायण कहना, कृष्ण मूर्ति का राममूर्ति हो जाना, चोरों का घेले वनाना भादि कई चमत्कारपूर्ण कथाएँ गोस्वामी जी के जीवन के साथ मिलाई गई हैं और अब भी मिलती जा रही है। इन गुप्त मिश्रणों के सिमा क्षेपककार प्रकटत मानस के दोहे चौपाइयों के भीतर अलौकिक कथाओं को मिलाने की चेष्टा करते रहे है । अब सुसयोग से क्षेपकों को दूर कर देने की ओर साहित्यिकों का ध्यान गया है। ऐसा होना भी भावश्यक है, क्योंकि असम्भव कथाएँ समाज और कर्तव्य के लिए हानिकारक हैं और उन्हें दूर करना ही न्याय सगत है। गोस्वामी जी के अन्यों की सख्या में भी यडा मतभेद है। मिश्र बन्धुओं ने २५, शिव सिंह सेंगर ने २२ भऔर तुलसी जीवनी के लेखक ने ३१ अन्य गिनाये हैं । अन्य कई विद्वानों ने भी भिन्न भिज सण्याएं निर्धारित की है। रामचरितमानस को क्षेपक- जाल से निकालने के प्रथम प्रयासी मिर्जापुर निवासी स्व० ५० रामगुलाम द्विवेदी ने गोस्वामी जी के १२ अन्य गिनाये हैं। उन्हीं बारह अन्यों को काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने भी प्रसिद्ध और ठीक माना है। विचारने से यही सरया ठीक भी जान पडती है, क्योंकि तुलसी नामक एक कायस्थ और दुसरे एक सनार ब्राह्मण कवि हुए है। उनके अन्य और गोस्वामी जी के हो मुख्य बढे अन्यों के कुछ अश रेकर रोगों ने कई अन्यों के नाम गिन लिये है। वास्तव में गास्वामी जी के ६ बडे अन्य ही मुख्य हैं और सब में मर्यादा पुरपौत्तम श्रीराम चन्द्र जी की ही कथा किसी न किसी रूप में वर्णित है। गोस्वामी जी के १२ ग्रन्थों के नाम ये है- घडे ग्रन्थ रामचरित मानस कवितावली रामायण विनय पत्रिका दोहावली गीतावली रामायण रामाज्ञा तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन वृत्त मानम --प्रथम छोटे ग्रन्थ पार्वती-मगर परवै रामायण जानकी-मगर वैराग्य-सदीपनी रामलसानहरा कृष्ण गीतारली गोम्धामी जा के प्रन्यों में मुख्य और परम प्रसिद्ध अन्य रामचरित मानस है । इसको कथा जितनी सरस और हृदय पर प्रभाव डालनेवारी है, उतना ही इसकी कविता भी मनोहारिगी है । इसमें स्थान स्थान पर अनेक रिपयों का उल्लेख है, यद्यपि उसकी मुरय कथा श्रीरामचन्द्र की जीवनी है। मानस में सप्त सोपान है- सोपान पालकांड, द्वितीय सोपान-अयोध्या कांड, तृतीय सोपन-आरण्य पाण्ड, चतुर्थ सोपान-किकिया काण्ड, पचम सोपान-सुन्दर कापट, पष्ट सोपान-रका काण्ड और सप्तम सोपान-उत्तर काण्ड । किसी किसी सस्करण में प्रकाशकों ने 'लवकुश काण्ड नामक' एक अष्टम सोपान भी मिला दिया है। इसी प्रकार क्षेपककारों ने भी मनमानी हीरा की है । यह काम सर्वथा निन्दनीय है ओर ऐसे सस्करणों को कभी प्रधानता नहीं दनी चाहिए । कुछ टीकाकारों ने भी मनमाने परि बर्तन कर जथ में अनर्थ पिया है। सौभाग्य ही से भर कुछ सुन्दर और शुद्ध सस्करण प्रकाशित हुए है । उनमें काशी नागरी प्रचारिणी सभा और बेलवेडियर प्रेस प्रयाग के सस्करण अच्छे हैं। कनिह चूडामणि गोस्गमी जी के प्रन्यों में रामचरित मानस का जितना आधिपत्य आल्य घशजों और नागरी भापियों के हृदय पर हे, उतना आधिपत्य भन्य किसी देश के किसी अन्य का नहीं है। कविता उसकी करिता तो मनाहारिणी हे ही, अन्य ग्रन्थों की कविता भी कम सरस नहीं । आपकी पीयूष वपिणी कविता के विचार से हिन्दी के सुप्रसिद्ध करियों में आपका पद बहुत ऊँचा है। वर्ण-ज्ञान रग्पनेवाली सेलेकर परम विद्वान तक निज सामर्थ्य के अनुसार गोस्वामीजी की कविता मानस-मकरन्द . का रसस्वादन करते हैं । 'सर सूर तुलसी शशी' की प्रसिद्ध उक्ति के प्रचलित होते हुए भी, मेरे विचार में कई विषयों में गोस्वामी जी श्रेष्ठ जंचते हैं और 'सुरसी सूरज सूर विधु' की उक्ति टीक जान पड़ती है, यदि सूर और शशि का प्रयोग बढे-छोटे के भेद विचार से किया गया हो। गोस्वामी जी की कविता स्वाभाविक, ओजपूर्ण, सरस, सरल, अगाध, हृदयहारिणी, सुविचारपूर्ण और काव्यगुणालकृत है। आपकी कवित्र शक्ति की स्थापना में किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं, ग्याति और सर्वप्रियता आप ही आपकी कविता-कला की प्रासा करती फिरती है। भापकी कविता-करा में सगीत मर्मज्ञता भी मिश्रित हो गई है, जो पत्रिका और गीतावली से प्रस्फुटित होती है। गोस्वामी जी की भाषा अवधी और बैसवाडी थी। तुर्की, भरनी, फारसी, सस्कृत और ठेठ भापा के भी शब्द इनकी रचना में पाये जाते है। ऐसे ही विदेशी शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो उम समय बोलचाल में आ गये थे। ग्राम्य शब्दों के भी प्रयोग भरे रूप में नहीं हुए हैं, उनसे भाषा की रोचकता ही बढी है । आपकी भापा बाह्याडम्पर से रहित थी। आपने न भनुप्रास का अधिक आदर किया, न जम के बाहुल्य से पाण्डित्य प्रदर्शित करने का भाव दिखलाया। तुलसी जी भाषा में 'श्री' में तालव्य 'श' का प्रयोग अवश्य करते थे और अन्य स्थान में अधिकतर 'स' ही व्यवहार में लाते थे । म,पक्ष और ज्ञ के स्थान में क्रमश प, ब, ख (छ) और ग्य लिपते थे। य का ज, कान प्रयोग अधिक पाया जाता है और अकारान्त शब्दों के अन्त में प्राय '3' का योग उनके प्रन्या में पाया जाता है। 'स्तुति' और 'स्थान' के पहले 'स' का योग भी किया गया है। कर्म, सम्प्रदान कारक में "हि, हि' का प्रयोग मिलता है । यथा-- रामहि, रामहिं, मुनिहि, 'गुरुहि पूछ, करि कुलविधि काजा' । बहुवचन में 'न, न्ह, न्हि' का प्रयोग है यथा-नारिन, मुनि ह, मुरन्हि भादि। भापा ।

तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन-वृत्त सम्बन्ध कारक में 'के, को' के अतिरिक्त 'केर, केरा, केरे, केरि' का, क, के, विभक्तियों भाई हैं । यथा -मिटेन जीवन केर कलेसा । प्रभु कह गरर यधु सिसि केरा। परहित हानि लाभ जिन्ह केरे। सीता केरि कर रखवारी। प्रथम भक्ति सतन कर सगा। नीको तुलसी क । उमा सत के इहइ बडाई । सर्वनाम में 'जिहि, जेहि, तिहि, तेहि, जाकर, जाकरि, जास मे सम्यन्ध जताया गया है। यथा-जहि सुमिरत, जाकरि ते दासी, यह सवाद जास मन आया, आदि । 'कोन' के लिए 'कान, कचनु कवनि, और 'क्या' के लिए 'काह, काहा, कि' आये है। यथा-मिरे क्वन विधि बाला, परनि करन विधि जाइ, येप अगणित को गणे, होहि निरा मिप करहुँ कि कागा, आदि । मिया के प्रयोग में भी कुछ विशेपता पाई जाती है। सम्मति या आज्ञा देने में क्रिया के अन्त में हु, उ, प, पि, ह, य, य पाये जाते हैं। यथा-नजहु सोच, करउ सो पेगि जो तुम्हांहें सोहाई, सो जानय सतसग प्रभाऊ, कररि पाय परि बिनय, मनोरथ पुरइय मोरा, विनय करिय सागर सन जाई, आदि । भून काल म होना, ठानना, जाना, करना, रेना, देना आदि के कई रूप पाये जाते है । याधा-भा भयउ, भयउँ, ठयउ, ठयो, गयउ, गे, गा, गत, गये, किय, कीन्ह कीन, कृत, लिय, तीन्ह, रीनौ, दियो, दीन्ह, दीन । र भी जोडा गया है। यथा-कोपि गगन पर धायल। प्रेरणार्थक में आव या मा जोडा गया है। यथा-अन्दवावा, यनावा भादि । सयुक्त क्रिया का प्रयोग भी खूब हुआ है। बनाना आदि । सयुक्त मिया का प्रयोग भी सूर्य हुआ है । यथा अहवावा जाई, रेत धुराई घलि भावा, चाही कीन्हा, सोजन रागा, चाहहु सुने, पर लगे, लाग कहह, परनय लागा आदि । मानव समाज के सुप, शान्ति और उन्नति का इच्छुक कवि अपनी कविता को वैसी कल्पना के भावरण से भूपित नहीं करता, जो वास्तव . यथा-सजि १४ मानस मकरन्द जगत् में नहीं पाई जाती, जिसका स्थित्व मानव. समाज प्रादर्श जीवन के प्रति दिवस की घटनाओं में नहीं होता और और जिसके आदि भन्त कवि कल्पना में ही हो जाते है। मानव-चरित्र चित्रण गौम्वामीजी की कविता भी मानव समाज के करयाण के विचार से ही हुई है। अतण्व समाज के सामने उसके सुप शान्ति और पूर्णोन्नति के लिए एक आदर्श सडा करते हुए तुलसीदास ने अपने प्रधान पान के चरित्र का चित्रण इस उत्तमता से किया है कि मनुष्य मान का मस्तक उनकी भाप्तता के आगे झुक जाता है और वे उन्हें अपना आदर्श मानने लग जाते है। अन्य पानी के चरित्र का चित्रण भी उस समाज कल्याण चिन्तक महाकवि ने वेसी ही कुशलता से किया है। उस कुशलता का थोदा परिचय नीचे प्रधान पानों के सक्षिप्त चरित्र चित्रण से मिल सकता है- दशरथ-राजा दशरथ धर्मात्मा, न्यायी और प्रतापी थे। अन्य विद्याओं में निपुण होने के अतिरिक्त वह भख विद्या और धनुर्वेद में सिद्धहस्त थे, जो ब्राह्मणों के भक्त थे। राज्य में सुशासन से शान्ति थी, धनों में तपस्वी शान्ति से तपश्चर्या करते थे। तो भी हमें कुछ कम जोरियाँ थीं, जो पद के अनुसार ठीक नहीं थीं। राजा में धीरता और दूरदर्शिता का अभान था। अपार सम्पत्ति के स्वामी होते भो वह पुत्र- चिन्ता से व्याकुल रहते थे। चौथेपन में पुत्र हुए भी तो "किसी को बैगन पथ्य किसी को पित्त" चारी बात चरितार्थ हुई। दूरदर्शी न होने के कारण कैकेयी से प्रसन्न हो उसे प्रसन्न रखने के लिए साधारण पुरप की नाई दो वर देने की प्रतिज्ञा उन्होंने कर दी। उन वरों के कवेयी से माँगे जाने पर राम के वनवास की बात उन्हें असह्य हो गई और वह अबोध कायर की भाँति व्याकुल हो बलरलाने लगे, रोने लगे और बेसपर हो गये । कैकेयी की निर्दयता पर तब मानों उन्हें बोध हुआ- तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन-वृत्त करने अरसर का भयउ, गयउँ नारि विश्वास । जोग सिद्धि-फल समय जिमि, जतिहि अविद्या नास ॥ 'उत्कट पुन-स्नेह और सत्यमियता' के सिवा पिलास वासना की माना भी दशरथ में पूरी थी। वृद्धावस्था तक विवाह करते जाने का यही कारण था । इस अनुचित काम का फर भी उन्हें वेसा ही मिला। अपमान हुआ और असामयिक मृत्यु के शिकार हए। शिकार में निर्दोष जीवों की हत्या करने का भी देवी फल उन्हें भोगना पड़ा और निर्दोप अन्ध-मुत की हत्या का पाप लगा । रामाभिषेक के समय भरत के न बुलाने में भी कपट का भार वर्तमान पाया जाता है। जनक-राजा जनक राज्य शासा और प्रजा पालन करते हुए भी पारलौकिक आनन्द के लिये धर्मकार्य में रत रहते थे। गृहस्थाश्रम में भी वह ज्ञानी थे, योगी थे। उनका ज्ञान साधारण नहीं था, बडे बडे योगी उनके यहाँ ज्ञान प्राप्ति के लिए जाते थे। उनका हृदय, आचार और विचार विमर था। 'भरत कथा भव-अध विमोचनि' कह कर भरत का चरित्र जनक ने निउर भाव से स्वीकार कर अपने सूक्ष्म ज्ञान का परिचय दिया है। "भरत चरित फीरति करतृती, धरमशील गुन विमल यिभूति । समुझत सुनतसुसद सनकाह, सुचि सुरसरिरुचि निदरसुधाहा" विग्वामित्र-इनका चरित्र सामाजिक नियमों में से एक इस यडे नयम का उदाहरण है कि रिसी कुल का उत्पन्न अपनी विद्या, बुद्धि, यट, तेज और ज्ञान से उच्च कुर वारों की पक्ति में येठ सकता है। विश्वा मित्र ने अपनी प्रतिभा और तप-यल से क्षत्रिय होरर राजपि और नापि का पद प्राप्त किया। यह साधुता से काम नहीं चरने के स्थान में कोपानर से भी काम रिया करते थे। रामचन्द्र-मर्यादा पुरपोचम श्रीराम न्द्रजी का चरिन सय प्रकार मानस-मकरन्द -- से आदर्श है। रामायण की रचना ही उनके सद्गुणों के दर्शन कराने के निमित की गई है। रामायण के अध्ययन से राम धर्म के अवतार जान पडते है और पापावतार रावण से उन्हे युद्ध करना पडा। वह सत्यनिष्ठ, धर्मज्ञ और सर्वप्रिय थे। उनकी मञ्जुल मूर्ति में मनमोहिनी शक्ति थी, अतएव जो उनके शान्त ज्योतिष्मान मुग्वमण्डल को देग्यता, वही उनपर श्रद्धा करने लगता। विश्वामित्र उन्हें देखकर मुग्ध रहते थे, परशुराम का हृदय शातल हो गया था, जनक अपने को कृतार्थ समझते थे। जनकपुर के निवासी उनके दर्शन से अपना सौभाग्य मानते थे, वन गमन के समय मार्ग के नारी नर चकित हो जाते थे और जगरी प्रान्तों के निवासी भी उन्टे देवता मानते थे । वह निरभिमान थे, स्वभाव सरल था और गुरु जनों की आज्ञा के पालन में सर्वदा कटिबद्ध रहते थे। आप वीर थे, धीर थे, गभीर थे । बाह्मणों के प्रति आपके हृदय में अपार भक्ति थी, तभी परशु- राम के क्रोध और दुर्गाक्य वर्षा पर भी हंसते हुए कहते रहे---"जेहि रिस जाइ करिय सोइ स्वामी, मोहि जानिय भापन अनुगामी" आपके चरित्र में पितृ भक्ति, मातृ भक्ति और गुर भक्ति के अनेक उदाहरण हैं । भ्रातृ भक्ति के भी उनसे कम उदाहरण नहीं है। अपने भाइयों को वह प्राणों से अधिक चाहते थे। भरत के वन में पहुँचने पर रामचन्द्र प्रेम से इतना गद्गद हो उठे थे कि-"कहुँ धनु, कहुँ निसग, कहुँ तीरा।" एका म रक्ष्मण को शक्ति रगने पर विलाप करते हुए आपने हृदय का भाव व्यक्त किया- जथापहरिनु खगअति दीना,मणि घिनु फनि करियर कर हीना। अस मम जिवन बन्यु रिनु तोही, जो जड देव जियावह मोही॥ जैहउँ अवध कवन मुँह लाई, नारि हेतु प्रिय भाइ गॅनाई । यस अपजस सहतेउँ जग माही, नारि हानि विशेष छति नाही ॥ आप भन-वत्सल मी वैसे ही थे। आप में शील, सकोच भौर दया .

तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन वृत्त की भी पूरी माना थी। आप कृतज्ञता से दवे रहते। इसी से हनुमा से कहा था-"प्रति उपकार करउँ का तोरा, सनमुग्व है न सकत मुख मोरा।" शरणागत की रक्षा में आप कुछ उठा नहीं रसते थे। आपने सुग्रीव की भी पूरी सहायता की और रिभीपण की भी । आपकी प्रतिमा भी थी- "कोटि विप्र अघ लागइ जेही, आए सरन न त्यागउँ तेही।" अनुचित कामों के समथन की ओर आपका ध्यान भूल कर भी नहीं जाता था, बल्कि आप क्रुद्ध हो उठते थे । अनुचित, अधर्म और अन्याय करनेवालों को समुचित दण्ड देना आपका सिद्धान्त था। इसी से यालि का नाश किया और अधा रात्रण तथा उसके सहयोगियों का । राजा होने पर सुग्रीव कुछ कार के लिए उन्हें भूल गया था । यहाँ मापको क्रोध हो आया और कहा- "सुग्रीवहु सुधि मोरि विसारी, पाना राज, कोष, पुर, नारी। जेहि सायफ मै मारा वाली, तेहि सर हतउँ मृढ कहें काली ॥" भरत-भरत का चरित्र रामायण में अति उन्नत है और उनके परिन पर प्रकाश डालनेवारी बातें बाहुल्य में वर्चमान है। गोस्वामीजी ने स्पष्ट शादी में भरत का चरित्र चित्रित किया है। इसी चित्रण से भयोध्या काण्ड का उगराई भरा पड़ा है । रामचन्द्र और भरत में अलौकिक प्रेम था, साय ही भरत में अपर्स और अनुपम आत्मत्याग भी था । ऐसा आत्म-त्याग पृथ्वी के किसी देश के साहित्य में नहीं मिलता है जिस राज्य के लिए ससार के इतिहास में पढे यड़े वीमन्स और घृणित काण्ड हो गये हैं, उस राज्य को पाकर भी भरत ने तृगयत् समझा और राम तथा भरत दो भाइयों ने गेंद बनाकर पीच मे ठुकराया। भरत के निश्छल घ्याहार, स्वार्थ-रयाग, निरभि मान भ्रातृभक्ति आदि गुणों की प्रशसा सय ने की है । यल भी भरन में असीम था। हनुमान के भू-पतित होने पर शीघ्रता से भेजने के निमित्त 1

मानस-मकरन्ट
भरत ने कहा था- "चटु मम सायक मेल समेना।" राजा दशरथ ने
कैकेयी को बुरा भला कहते समय कहा था--
[-"घहत न भरत भूप-पद
मोरे ।" सरस्वती ने इन्द्र को समझाते हुए कहा था-
मोसन कहत भरत-मति फेरू, लोचन सहस न सूझ मुमेरू ।
भरत के चित्रकूट आगमन के अवसर पर लक्ष्मण को कुछ सदेह हो
आया और भरत के प्रति क्रोध उत्पन्न हुआ। लक्ष्मन ने कर जोड़ कर
प्रार्थना की- भरतहिं समर सिसावन देऊँ।" इस पर रामचन्द्र ने उन्हें
शान्त किया और उनका सदेह दूर करते हुए समझाया-
"भरतहि होइन राजमदु, निधि हरि हर पद पाइ ।
कबहुँ कि कॉजी सीकरनि, छीर सिन्धु विनसाइ ॥"
इतना ही नहीं, और भी जोरदार शब्दों में वह भरत का स्वभाव
प्रदर्शित करते है और रक्ष्मण को विश्वास दिलाते हैं-
"मसक फॅक मकु मेरु उडाई, होहि न नृपमद भरतहिं भाई।
लपन तुम्हारसपथ पितु आना,सुचिसुध नहिं भरत समाना॥"
राजा जनक ने भी भरत के स्वभाव की प्रशसा करते हुए ऐसी ही
बहाई की है। यथा-
"भरत अमित महिमा सुनु रानी,
जानहिं रामु न सकहिं बखानी ॥"
और करि का क्या कहना है । गोस्वामीजा ने तो यहाँ तक कह दिया हे
"गगन सनेह भरत रघुवर को,
जहें न जात मन विधि हरि हर को ।।
लक्ष्मण-लक्ष्मण का जीवन एक भादर्श वीर का जीवन हे, जिसमें
न विलास है, न भय, न चिन्ता, न अविचार । आप में राम की भसीम
भक्ति थी। जिस समय रामचन्द्र के वन जाने की बात उनके कानों में

सुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन वृत्त
पहुँचती है, वह अधीर हो उठते भोर व्याकुर वदन अपने पूज्य भाई के
पास दौडे जाते है। तब की उनकी दशा कही नहीं जाती। गोस्वामी
जी ने लिखा है-
"कहि न सकत कछु चितवत ठाढे ।
दीन मीन जनु जल ते काढे ॥
सोच हृदय विधि का होनिहारा।
सय सुप सुकृत सिरा न हमारा ॥
आप फर्मवीर थे। व्यर्थ प्रलाप से आपको घृणा थी। न आप
अपने याहुम्ल की उपेक्षा कर दूसरों का मुंह ताकना पसन् करते थे।
समुद्र पार करने के समय विभीषण के सागर से विनय करने पर जब
राम ने कहा -"करिय दइव जौं होय सहाई" लक्ष्मण का मुखमण्डल
तमतमा आया, क्योंकि यह भाग्य घाद की कायरता को कभी स्वीकार नहीं
करते थे । लक्ष्मण ने सुरन्त वीरत्वपूर्ण सम्मति दी-
"नाथ देर कर कौन भरोसा।
सोखिय सिन्धु करिअ मन रोसा ॥
कादर मन कह एक अधारा।
देव दैन
आलसी पुकारा॥
सुमत के सम्मुस भी रक्ष्मण को एक बार महाराज दशरथ के भविचार
पर शोध आ गया और मुख से निकल पडा--
“कहें लगि सहिय रहिय मन मारे,
नाथ साथ धनु हाथ हमारे ।'
इमी प्रकार चीर शिरोमणि परशुराम के समक्ष भी इनकी वीरता
कुछ भी नहीं दवी, वरन् ओर भी चमक उठी । परशुराम से बद कर ही

मानम मारन्द -- दमण ने बातें कहीं। इसी प्रकार भरत, सुग्रीव और मेघनाद के प्रतिकूल मी एक्ष्मण ने वीरवपूर्ण पचन कहे है। कौशल्या कौशल्या में जितना ही पुत्र प्रेम था, उतनी ही पतिभक्ति। उसने दोनों का भाजीवन निर्वाह किया । यद्यपि कौशल्या के प्रति दशरथ का प्रेम कम हो गया था और दशरथ कैफेयी के प्रेम के दास बने थे, तथापि कोयो द्वारा राम को वनवास मिलने पर वह राम को शिक्षा देती है- "जो पितु मातु कहै धन जाना, तो कानन सत अवध समाना।" इस उपदेश से उसके हृदय की धीरता और गम्भीरता स्पष्टत' प्रकट होती है। माता का हृदय पुन प्रेम से कैसे विह्वल हो उठता है और पतिभक्ति की मर्यादा उसे किस दत्ता से निगाहनी पडती है, इसे यह राम पर सधे हृदय से व्यक्त करती है । कहती है- "राखि न सकइन कहि सक जाह,दुहुँ भॉति उर दारुण दाह । धरम सनेह उभय मति धेरी, भइ गति सॉप छुछुदर केरी ॥ राषउँ गुतहि करउँ अनुरोधू, धरम जाइ अरु वधु विरोधू । कहउँ जान वन तो घडि हानी, भरत से कोई द्वेष या धुरा भाव कौशिल्या के हृदय में नहीं था। वह राम और भरत को सम जानती थी। उन्होंने भरत को राज्य स्वीकार के लिए भी बहुत तरह से कहा था और राम वियोग से दुखित भरत की चिन्ता उन्हें बहुत थी। कहा भी था-"मोहिं भरत कर सोच।" सुमित्रा-सौत के पुत्र के प्रति जिस प्रेम से साधारण घरो में 'स्वर्गीय प्रेम का साम्राज्य स्थापित हो सकता है, वह प्रेम सुमित्रा के हृदय में पाया जाता है। राम के प्रति सुमित्रा का जो भाव था, यह सर्वथा सराहनीय है। राज्य का झगड़ा कौशल्या और कैकेयी के पुत्रों के बीच था और वनवास की आजा राम को मिली थी। उस भवस्थान - तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन-वृत्त का दुख सुमिना किस प्रबल वीरता से सहन करती है, पह रामायण के पदनेवाले जानते है । उसका मुख तक म्लान नहीं होता । लक्ष्मण के राम के साथ बन जाने की आज्ञा मांगने पर वह शिडकियाँ देती हुई आना देती हे "तात तुम्हारि मातु वैदेही, पिता रामु सर भॉति सनेही। अवध तहाँ जहँ राम निवासू , तहइ दिवस जहँ भानु प्रकासू । जों पे सीय रामु बन जाही, अवध तुम्हार काजु कछु नाही ॥" कैकेयी-सौत भावजनित द्वेप से कितने घर वन हो गए । उसी भार को प्रतिमा कैकेयी है। उसकी बुद्धि ओछी थी और हृदय सकीर्ण था । उच्च कुर में होने के कारण मन्थरा से राम के राज्याभिषेक का समा चार सुन वह आनन्दित हुई और योल उठी- "राम तिलकु जो साँचेटु काली, देउँ मॉगु मन मावत आली ।" यहाँ तक कह गह-"प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरे।" कौशिल्या तथा सीता की भी कम प्रशसा नहीं की। परन्तु यह प्रशसा याह्य प्रशसा मान थी, क्योंकि उसके हृत्य को एक सदह लगा था कि इस हर्प काल में मथरा के विवाद में क्या कोई रहस्य है। उमसे यह आग्रह करके पूरती भी है और मायरा को मप्रणा के अनुसार तुरत कार्य कर दिखाती है । पहले की प्रामा का कारण भी उसी के मुख से मालूम होता है । यह कारण, वह रानी होने के कारण जानती थी- "जेठ स्वामि, सेरक लघु भाई, पहु दिन फर-युल रीति सुहाई।" कैकयी वो कोई ऐसी बात पहले नहीं मूभी थी जिसमे कुन्न रीति के पिस्तु राज्य भरत को मिरता। जय मन्यरा ने पताया 'राजहि दुग्द पर प्रेम पिसेसी', अतएव श्यी। , २२ मानस मकरन्द दुइ बरदान भूप सन थाती, मॉगहु आजु जुडाबहु छाती, सुतहिं राजु रामहि वनवामू , देहु लेहु सब सवति हुलास । भूपति राम सपथ जब करई, तव मॉगेहुँ जेहि वचनुन टरई, होइ अकाजु आजु निसि वीते, वचनु मोर प्रिय मानहु जीतें। कैकेयी को सुधि हुई और वह कपट नाटक के सेलने के लिए तय्यार हो गई । अब उसे और कुछ नहीं रचता । उसे एक लारसा हे, एक हठ है और एक लक्ष्य है । वह हे भरत के लिए अयोध्या का राज्य । इसी धुन में वह मम्त हे, तल्लीन है, मतवाली है और अधी है । पीछे का उसे कोई ध्यान नहीं रहा। उसने दशरथ से अपने वरदान माँगे और उसी के फल स्वरूप दारथ की मृत्यु हुई और राम को वनवास । सीता-सती साधी सीता के चरित्र में आदर्श पातिव्रत के भाव वर्तमान है। सीता अपने पति देव सेपिरग रहने में असमर्थ थी । राम ने निविध प्रकार से सीता को जगल के कष्ट बसराये किन्तु सीता को उनपर ध्यान देने का अवसर कहाँ था ? अवसर था भी तो प्रयोजन क्या था? राजसुखों के प्रलोभन दिखाने पर सीता ने अपने हृदय का भान और स्त्री पति के क्षेम का सार राम के समक्ष रखते हुए निवेदन किया- "जिय पिनु देह नदी रिनु वारी, तैसिअ नाथ पुरुप बिनु नारो। नाथ सकल सुख साथ तुम्हारे, सरद-विमल विधु वदनु निहारे । सीता के इस निवेदन ने-"हसगमनि तुम्ह नहि धन जोगू , सुनि अपजसु मोहिं देहि रोगृ" की समस्या रखनेवाले राम को भी साथ रे चलने पर धाध्य कर दिया। इस अवसर के सवाद में जैसा भाव गोस्वामी जी ने चित्रित किया है, वेसा किसी अन्य कवि की कविता में स्यात् ही मिल सकता हो। रावण-नाम का प्रधान शह रावण अधर्म का रूप था, तो भी वीर तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन वृत्त २३ - और नीतिज्ञ था। किसी से दधना, शङ्का से विचरित होना, दूसरे का दर्प सह रेना, कार्यारम्भ करके पीछे पैर देना और प्राण सकटापन्न पार शव को मनाना या शीश झुकाना उसके स्वभाव के प्रतिकूल था । इसा स्वभाव के कारण वह मरते दम तक कहता रहा-"कहाँ राम रन हती प्रचारी ।" आपत्ति की सूचना मिरने पर भी वह घबराता नहीं था और धीर बना रहता था। भगद के आगमन पर सभा में उसका मुकुट गिर पड़ने पर उसकी सभा के सदस्य कुछ घबरा गए, पर वह धीरता और चतुरता से वोल उठा- "सिरह गिरे संतत शुभ जाही, मुकुट गिरे कस असगुन ताही?" रावण की शूरता और धीरता परले सिरे की थी। न उसे राम से भय था, न राम की सेना से । युद्ध काल में भी, जब निस्य उसकी सेना का सहार होता जाता था और एक से एक वीर मारे माते थे, वह भानन्द ही मनाता रहा । सब वीरों के मारे जाने पर भी उसने अशक और अचर भाव से कहा- "निज भुज-यल मे र बढ़ावा, देहो उतर जो रिपु चढि आवा।" इतने पर भी यह अधम्म के कारण अपमान और धृणा का भागी रहा। उसे धमाधर्म का विचार न था, अन्याय से घयगना वह नहीं जानता था, दूसरों पर द्रवित हाना उसकी प्रकृति के प्रतिकूल था, अतुल सम्पत्ति का स्वामी होते भालूट से पराये का धन हरना उसे प्रिय था, और विश्वासघात करना उसक लिए पहुत सहज था। दुराचारी, स्वार्थी, कपटी, व्यभिचारो और अत्याचारी राजा के राज्य म प्रजा की जो दुर्दशा होती है, यही अवस्था रावण की प्रजा की थी। रावण को प्रजा के दुखों का ध्यान नहीं था। वह आप ऐश में मस्त रहता था। गा विनों यो असामा य कष्ट था भौर या के तपस्वी मुनियों पर भी असझ कर था । काम के यश में रावण अपनी मर्यादा भूल जाता था, और भरलाओं 4 २४ मानस मकरन्द . पर अत्याचार करते हुए उसे अपनी नश्वरता का ध्यान नहीं रहता था। उच फुलोत्पन पर भभिमानी और अत्याचारी रावण को पीछे अपने दुष्कर्मों का ऐसा उरा फल भोगना पढा कि उसके फुल में कोई नाम• रेया पानी देवा भी नहीं बचा। हनुमान-महावीर हनुमान की इतनी अचर भक्ति राम पर थी कि राम ही उनके स्वामी, पिता, ईश्वर, सर्वस्व थे। उधर महावीर को राम भी लक्ष्मण से किसी प्रकार कम ही मानते थे। स्वामी के हित में कठिन से कठिन काम भी महावीर ने अपने हाथों में लिया और बात की वात में समाप्त किया। 'जो होवे उत्तम प्रकृति, का करि सकै कुसग' के कथन का प्रमाण मजरगवली की जीवनी है। वह कपीश्वर के सेनापति थे, सचिव थे । आप भी बानर जाति के थे । कामी और स्वार्थी सुग्रीव से उनका घरायर साथ रहा, किन्तु उनके चरित्र में कोई अन्तर नहीं आया। पानर नामक जगली जाति के होते हुए भी वह निर्भीक बली, ज्ञानी और नीतिज्ञ थे। उनका चरित्र स्पष्टत बतलाता है कि छोटे कुलों में जन्म लेकर भी निश्चय ही पुरप नीच नहीं होते, न वे धृणा के पान हे विभीषण-रावण से विगढकर विभीषण ने राम का आश्रय लिया और निशाचरों के नाश में पूरा योग दिया। रावण से बिगडकर श्रीराम- चन्द्रजी के पास जाने और भेदों के बताने के कारण आलोचक विभीषण को मतरपी और भातृद्रोही मानते हैं। पर मेरे विचार में विभीपण का चरित्र ऐसा नीच नहीं था, न यही कहा जा सकता है कि विभीपग ने राम का आश्रय लका के राज्य के लिए लिया था। पीछे लक्षा का राज्य उन्हें भले ही प्राप्त हुआ। विभीपण के व्यवहार में मनुष्य हृदय का एक अकृतिम भाव पाया जाता है। जिसकी जैसी प्रकृति होती है, उसको वैसा ही सग अच्छा लगता है । विभीषण को रावण के दुष्फर्म अच्छे नहीं लगते थे। उनकी दृष्टि में रावण पापी था। पाप से विरक्त हो अच्छे काम की सम्मति पर रावण को क्रोध होता था। विभीषण ने रावण को भली । - तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन वृत सम्मति दी। उसपर रावण ने उसका अपमान किया और रात मारकर निकाल याहर किया। य धुकृत अपमान के सहनेवाले नररत्न ही होते हैं, साधारण पुरप का हृदय सदा अपमान का सहन धैर्यपूर्वक नहीं कर सकता। यही दशा पिभीपण की भी थी। विभीषण को सत्य और धर्म प्रिय था। वह धर्म के उपासक थे । रावण पापात्मा था, पाप का अवतार था। धर्मोपासक निभीपण ने अन्त में पापात्मा का सग छोदना उत्तम समझा । तर धर्मावतार राम से मिलने का सयोग मा उपस्थित हुआ। असत्य का त्याग और सत्य का गृहण क्सेि प्रिय नहीं होता। फुम्भकर्ण -गरण का भाई कुम्भकर्ण राक्षसों के ही वीच रहता था। उसने बराबर रावण का साथ दिया, तो भी वह हम्पट, मायावी और कपटी नहीं था। वह वीर था, उसे वीरता प्रिय थी और वीरता से शत्रुओं का सामना करना उसका सिद्धान्त रहा । छल से युद्ध करना वह कायरता और नीचता समझता था। उसकी वीरता राम से उसकी निशक रडाई से प्रकट होती है। विभीषण से कुम्भकर्ण में अतर यही था कि कुम्भकर्ण अपनी भवस्था को उन्नत बनाने की इच्छा नहीं रखता था भौर बली होते भी राक्षसी कर्म में निश्चिन्त रहता था। किन्तु रावण से उसका चरित्र उसत था। युद्ध के पहले उसने रावण के बुरे कर्म पर भी उसे भला बुरा सुनाया और साफ कह दिया-"जगदना हरि मानि जब सटु चाहतु कल्यान ।" अत्यन्त आलसी और निद्रालु होने के कारण उसके हृदय से उत्साह और शुभ कर्मों को भाकाक्षा का वेग मद पद गया था। किन्तु वह कामी नहीं था और विपय भोग से यचा रहा। सभा-चतुर होते भी 'मांस और मदिरा' में लिप्त अपना काल्यापन किया करता था। इतने पर भी उसके हृदय में कुछ अच्छे भार थे। बन्धुत्व और सजन सेना का महत्व वह भली भाँति जानता था। तभी रावण को समझाया- "अज? तात त्यागि अभिमाना, भजहु राम होइहि करयाना। अहह रधु ते कीन्हि सोदाई, प्रथमहिं मोहि न सुनायहि आई ॥

मानस मकरन्द पर अत्याचार करते हुए उसे अपनी नश्वरता का ध्यान नहीं रहता था। उच्च कुलोत्पन्न पर अभिमानी और अत्याचारी रावण को पीछे अपने दुपफर्मों का ऐसा बुरा फल भोगना पड़ा कि उसके कुल में कोई नाम- हेवा पानी देवा भी नहीं बचा। हनुमान-महावीर हनुमान की इतनी अचल भक्ति राम पर थी कि राम ही उनके स्वामी, पिता, ईश्वर, सनस्व थे। उधर महावीर को राम भी लक्ष्मण से किसी प्रकार कम नहीं मानते थे। स्मी के हित में कठिन से कठिन काम भी महावीर ने अपने हाथों में लिया और बात की बात में समाप्त किया। 'जो होवे उत्तम प्रकृति, का करि सके कुसग के कथन का प्रमाण यजरगबली की जीवनी हे। वह कपीश्वर के सेनापति थे, सचिन थे । आप भी धानर जाति के थे । कामी और स्वार्थी सुग्रीव से उनका घरावर साथ रहा, किन्तु उनके चरित्र में कोई अन्तर नहीं आया। यानर नामक जंगली जाति के होते हुए भी वह निर्भीक पली, ज्ञानी और नीतिज्ञ थे। उनका चरित स्पष्टत. बतलाता है कि छोटे फुलों में जन्म लेकर भी निश्चय ही पुरप नीच नहीं होते, न वे घृणा के पात्र हैं। विभीपण-रावण से विगढकर विभीषण ने राम का आश्रय लिया और निशाचरों के नाश म पूरा योग दिया। रावण से निगडकर श्रीराम- चन्द्रजी के पास जाने और भेदों के बताने के कारण भारोचक विभीषण को मतरपी भोर भातृद्रोही मानते हैं। पर मेरे विचार मे विभीषण का चरित्र ऐसा नीच नहीं था, न यही कहा जा सकता है कि विभीपग ने राम का आश्रय रका के राज्य के लिए लिया था। पीछे लङ्का का राज्य उन्हें भले ही प्राप्त हुआ। विभीषण के व्यवहार में मनुष्य हृदय का एक अकृतिम भाव पाया जाता है। जिसकी जैसी प्रकृति होती है, उसको वैसा ही सग भन्छा लगता है। विभीषण को रावण के दुष्कर्म अच्छे नहीं रगते थे। उनकी दृष्टि मे रावण पापी था। पाप से विरक्त हो अले काम फी सम्मति पर रावण को झोप होता था। विभीषण ने रावण को भली - तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन-नृत २५ सम्मति दी । उसपर रावण ने उसका अपमान किया और लात मारकर निकाल याहर किया। मधुकृत अपमान के सहनेवाले नररत्न ही होते हैं, साधारण पुरप का हृदय सदा अपमान का सहन धैर्यपूर्वक नहीं कर सकता । यही दशा विभीपण की भी थी। विभीषण को सत्य और धर्म प्रिय था। वह धर्म के उपासक थे। रावण पापामा था, पाप का अवतार था। धर्मोपासक विभीषण ने अन्त में पापात्मा का सग छोडना उत्तम समझा । तब धर्मावतार राम से मिलने का सयोग मा उपस्थित हुआ । असत्य का त्याग और सत्य का ग्रहण किसे प्रिय नहीं होता। कुम्भकर्ण रावण का भाई कुम्भकर्ण राक्षसों के ही यीच रहता था। उसने यराबर रावण का साथ दिया, तो भी वह एम्पट, मायावी और कपटी नहीं था। वह वीर था, उसे वीरता प्रिय थी और वीरता से शत्रुओं का सामना करना उसका सिद्धान्त रहा । छल से युद्ध करना वह कायरता और नीचता समझता था। उसकी वीरता राम से उसकी निशक रढाई से प्रकट होती है। विभीषण से कुम्भकर्ण में भतर यही था कि कुम्भकर्ण अपनी भवस्या को उन्नत बनाने की इच्छा नहीं रखता था और बली होते भी राक्षसी कर्म में निश्चिन्त रहता था। किन्तु रावण से उसका चरित्र उन्नत था। युद्ध के पहले उसने रावण के बुरे कर्म पर भी उसे भला उरा सुनाया और साफ कह दिया-"जगदवा हरि आनि जब सा चाहतु कल्यान ।" अत्यन्त आलसी और निद्रालु होने के कारण उसके हृदय से उत्साह और शुभ कर्मों की आकाक्षा का वेग मद पद गया था। किन्तु वह कामी नहीं था और विषय भोग से रचा रहा। सभा-चतुर होते भी 'मास और मदिरा' में लिप्स अपना कारयापन किया करता था। इतने पर भी उसके हृदय में उछ अच्छे भाव थे। बन्धुरव और सजन सेवा का महत्व वह भली भांति जानता था। तभी रावण को समझाया- "अजहूँ तात त्यागि अभिमाना भजहु राम होइहि करयाना । अहह पधु त कोन्हि पोटाई, प्रथहि मोहि न सुनायेहि आई ॥

२४ मानस मकरन्द पर अत्याचार करते हुए उसे अपनी नश्वरता का ध्यान नहीं रहता था। उच्च कुरोत्पन्न पर अभिमानी और अत्याचारी रावण को पीछे अपने दुष्कर्मों का ऐसा चुरा फल भोगना पहा कि उसके कुल में कोई नाम- रेवा पानी देशा भी नहीं बचा। हनुमान महावीर हनुमान की इतनी अचल भक्ति राम पर थी कि राम ही उनके स्वामी, पिता, ईश्वर, सर्वस्व थे। उधर महावीर को राम भी लक्ष्मण से किसी प्रकार कम नहीं मानते थे। स्वामी के हित में कठिन से कठिन काम भी महापौर ने अपने हाथों म लिया और बात की यात में समाप्त किया। 'जो होवे उत्तम प्रकृति, का करि सके कुसग' के कथन का प्रमाण पजरंग-परी की जीवनी है। यह कपीश्वर के सेनापति थे, सचिव थे । आप भी यानर जाति के थे । कामी और स्वार्थी सुग्रीव से उनका घराबर साथ रहा, रितु के चरित्र में कोई अन्तर नहीं भाया । यानर नामक जगली जाति के होते हुए भी वह निर्भीक घली, ज्ञानी और नीतिश थे। उनका चरित्र स्पष्टत यतलाता है कि छोटे कुलों में जन्म लेकर भी निश्चय ही पुरप नीच नहीं होते, न वे घृणा के पास हैं। विभीषण-रावण से बिगडकर विभीपण ने राम का आश्रय लिया भौर निशाचरों के नाश में पूरा योग दिया। रावण से बिगडकर श्रीराम- चन्द्रजी के पास जाओ और भेदों के पताने के कारण भालोचक विभीषण को मतलबी और भातमोही मानते हैं। पर मेरे विचार में विभीषण का चरित्र ऐसा नीच नहीं था, न यही कहा जा सकता है कि विभीषण ने राम का आश्रय लका के राज्य के लिए लिया था। पीछे लसा का राज्य उन्हें भले ही प्राप्त हुआ। विभीपण के व्यवहार में मनुष्य रदय का एक अकृतिम भाव पाया जाता है। जिसकी जेसी प्रकृति होती है, उसको वैसा ही सग अच्छा लगता है। विभीषण को रावण के दुष्कर्म अच्छे नहीं एगते थे। उनकी दृष्टि में रावण पापी था। पाप से विरक्त हो अच्छे काम की सम्मति पर रावण को मोष होता था। विभीषण ने रावण को भली - तुलसीदास जी का सक्षिप्त जीवन वृत ૨૫ । सम्मति दी । उसपर रावण ने उसका अपमान किया और लात मारकर निकाल याहर किया। पधुकृत भपमान के सहनेवाले नररत्न ही होते है, साधारण पुरुष का हृदय सदा अपमान का सहन धैर्यपूर्वक नहीं कर सकता । यही दशा विभीषण की भी थी। विभीषण को सत्य और धर्म प्रिय था । वह धर्म के उपासक थे। रावण पापामा था, पाप का अवतार था। धर्मोपासक विभीषण ने अन्त में पापात्मा का सग छोडना उत्तम समझा । तर धर्मावतार राम से मिलने का सयोग आ उपस्थित हुआ भसत्य का त्याग और सत्य का गहण किसे प्रिय नहीं होता। कुम्भकर्ण-रावण का भाई कुम्भकर्ण राक्षसों के ही बीच रहता था। उसने बराबर रावण का साथ दिया, तो भी वह हम्पट, मायावी और कपटी नहीं था। वह वीर था, उसे वीरता प्रिय थी और वीरना से शत्रुओं का सामना करना उसका सिद्धान्त रहा । छल से युद्ध करना वह कायरता और नीचता समझता था। उसकी वीरता राम से उसकी निशक रडाई से प्रकट होती है। विभीषण से कुम्भकर्ण में भतर यही था कि कुम्भकर्ग अपनी अवस्या को उन्नत बनाने की इच्छा नहीं रखता था और बली होते भी राक्षसी कर्म में निश्चिन्त रहता था। किन्तु रावण से उसका चरिन उन्नत था। युद्ध के पहले उसने रापण के बुरे कर्म पर भी उसे भला बुरा मुनाया और साफ कह दिया-"जगढमा हरि आनि जर सटु चाहतु कल्यान ।" अत्यन्त भालसी और निद्रालु होने के कारण उसके हृदय से शुभ कर्मों की आकाक्षा का घेग मद पट गया था। किन्तु वह कामी नहीं था और विषय भोग से बचा रहा। सभा चतुर होते भी 'मांस और मदिरा' में लिप्त अपना काल्यापन किया करता था। इतने पर भी उसके हृदय में कुछ अच्छे भाव थे। बन्धुत्व और सजन सेवा का महत्व यह भली भाँति जानता था। तभी रावण "अजहूँ तात त्यागि अभिमाना भजहु राम होइहि करयाना। अहह बधु ते फीन्हि खोटाई, प्रधहि मोहि न सुनायेहि आई ॥ उरसाह और समझाया- मानस मकरन्द दो०-सुनि समुमहिं जन मुदितमन, मजहिं अति अनुराग । लहहिं चारि फल अछत तनु, साधुसमाज प्रयाग ॥१॥ मजन फल पेखिय ततकाला । काक होहिं पिक वकउ मराला। सुनि आचरज कर जनि कोई । सत-संगति-महिमा नहिं गोई । वालमीकि, नारद, घटजोनी ।निज निजमुखनि कही निज होनी। जलचर, थलचर,नभचर नाना । जे जड चेतन जीव जहाना। मति कीरति गति भूति मलाई । जब जेहि जतन जहॉजेहि पाई। सो जानव सत-सग-प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन उपाऊ। विनु सतसग विवेकु न होई । रामकृपा विनु सुलभ न सोई । सतसगति मुद-मगल-मूला ।सोइ फल सिधिसव साधन फूला। सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधातु सोहाई । विधिवस सुजन कुसगति परहीं फनि मनि सम निज गुनअनुसरहीं विधि-हरि-हर-कवि-कोविद-वानी। कहतसाधुमहिमासकुचानी । सो मोसन कहि जात न कैसें । साकवनिक मनि-गन गुन जैसे। दो-दो सत समानचित, हित अनहित नहिं कोउ । अंजुलिगत सुमसुमन जिमि, सम सुगध कर दोउ ॥२॥ संत सरलचित जगतहित, जानि सुभाउ सनेहु । चालविनय सुनि करि कृपा, राम-चरन-रति देहु ॥३॥ बहुरि वदि खलगन सतिभायें । जे विनु काज दाहिनेहुँ चायें । परहित-हानि लाभ जिन्ह फेरे । उजरे हरप विपाद धमेरे । हरि हर-जस राकेस राहु से। पर अकाज भटसहसवाहुसे। जे परदोप लपाहिं सहसापी । परहित घृत जिन्हके मन मापी।

बदना - । तेज कृसानु रोष महिपेसा । अघ-अवगुन-जन धनीधनेसा। उदय केतुसम हित सरही के । कुभकरन सम सोरत नीके। पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं।जिमि मि उपल कृपीदलिगरही। बदा सल जस सेप सरोपा । सहसरदन परनइ परदोपा । पुनि प्रनवो पृथुराज समाना । परअघ सुनइ सहसदस काना। बहुरि सक सम विनयी तेही । सतत सुरानीफ हित जेही । वचन बन्न जेहि सदा पिआरा । सहसनयन परदोष निहारा। दो०-उदासीन अरि-मीत हित, सुनत जरहिं पलरीति । जानि पानिजुगजोरिजन, गिनती करह सप्रीति ॥ ४॥ मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा । तिन्ह निज ओरन लाउवभोरा। चायस पलिअहि अति अनुरागा ।होहिं निरामिप करहुँ कि कागा। नदी सत असतन चरना । दुखप्रद उभयचीच कछु परना। विल्लुरत एक प्रान हरि लेई । मिलन एक दुप दारन देई । उपजहिं पक सग जग माही जलजजोंक जिमिगुन पिनगाही। सुधा सुरा सम माधु असाधू । जनक एक जगजलधि अगाधू। भल अनभल निज निज करतृती। लहत सुजस अपलोक विभूनी। सुधा सुधाकर सुरसरि साधू ।गरल अनल कलि मल-सरिया गुन अवगुन जानत सर कोई । जो जेहि भावनीक तेहि सोई। दो०-भलो भलाइहि पे लहर, लहइ निचाइहि नीचु । सुधा सराहिअ अमरता, गरल सराहिम मोचु ॥ ५॥ राल अघ अगुन साधुगुन-गाहा । उभय अपार उदधिअरगाहा । नेहि ते कछु गुन दोष यपाने । सग्रह त्याग नरितु पहिचाने ।

४
मानस-मकरन्द
भलेड पोच सय विधि उपजाए । गनि गुन दोष वेद विलगाए ।
कहहिं वेद, इतिहास, पुराना । विधिप्रपवुगुन-अवगुन-साना।
दुस सुख पापपुन्य दिन राती । साधु असाधुसुजाति कुजाती।
दानव देव ऊँच अरु नीचू । अमिअ सजीचनु,माहुरुमीचू।
माया ब्रह्म जीव जगदीसा । लच्छि अलच्छिरंकअवनीसा।
कासी मग सुरसरि मनासा । मरु मारव महिदेव गवासा ।
सरग नरक अनुराग विरागा । निगम अगम गुन-दोप विभागा।
दो०-जड़-चेतन गुन-दोपमय, विस्त कीन्ह करतार ।
संत हस गुन गहहि पय, परिहरि चारिविकार ॥६॥

पुष्प-वाटिका में जनकनन्दिनी और राजकुमार दो०-उठे लपनु निसिगित सुनि, अरन-सिखा-धुनि कान । ते पहिलेहि जगतपति, जागे रामु मुजान ॥१॥ सफल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निगहि मुनिहि सिरनाय । समय जानि गुर आयसु पाई । लेन प्रसून चले दोउ भाई । भूप घागु बर देखेउ जाई । जहें बसतरितु रही लोभाई। लागे टिप मनोहर नाना । वरन यरन घर चेलिचिताना । नव पल्लव फल सुमन सुहाए । निज सपति सुररूख लजाए। चातक कोकिल कीर चकोग। कृजत बिहॅग नटत कल मोरा । मध्य भाग सह सोह सुहावा । मनिसोपान विचित्र बनाया। बिमल सलिल सरसिज यहुरगा। जलखग कृजत गुजत भृगा। दो०-यागु तडागुरिलोकि प्रभु, हरपे चधु समेत । परम रम्य आगमु पह, जो रामहिं सुख देता॥ चहें दिसि चितइपूछि मालोगन । लगे लेन दल फूल मुदित मन । तेहि अनसर सीता न आई । गिरिजापूजन जननि पठाई । सग ससौ सय सुभग सयानी । गावहिं गीत मनोहर बानी। मर समीप गिरिजागृह सोहा । बगनि न जाइटेखि मन मोहा। मजनु करिसरसखिन्ह समेता । गई मुदित मन गौरिनिकेता। पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप मुभगयर मॉगा।

मानस मकरन्द - एक सखी सिय संगु बिहाई । गई रही देखन फुलवाई। तेइ दोउ वधु विलोके जाई । प्रेमविवस सीता पहें आई। दो०-तासु दसा देखी ससिन्ह, पुलक गात जलु नयन । कहु कारन निज हरप कर, पूर्हि सर मृदु वयन॥३॥ देखन वागु कुँवर दोउ आए । यय किसोर सवभाति सुहाए। स्याम गौर किमि कहो बखानी । गिरा अनयन नयन विनु बानी । सुनि हरपी सव सखी सयानी। सियहिय अति उतकठा जानी । एक कहइ नृपसुत तेइ आली । सुने जे मुनि सँग आए काली । जिन्ह निज रूप मोहनी डारी । कीन्हे स्ववस नगर नर-नारी। वरनत छवि जहें तहँ सर लोगू । अवसि देखिअहि देखन जोग। तासुचचन अति सियहि सुहाने । दरस लागि लोचन अकुलाने। चली अन करि प्रिय सपिसोई । प्रीति पुरातनि लखै न कोई । दो०-सुमरि सीय नारदयचन, उपजी प्रीति पुनीत । चकित बिलोकति सकल दिसि, जनुसिसु मृगी सभीत॥४॥ ककन-किंकिनि-नूपुर धुनि सुनि। कहत लपनसन रामहृदय गुनि । मानहुँ मदन दुदुभी दीन्ही । मनसा विस्वविजय कहॅकीन्ही। अस कहिफिरिचितएतेहि ओरा। सिय मुप-ससिभएनयनचकोर: भए बिलोचन चारु अच चल । मनहुँ सकुचिनिमितजेगचले। देखि सीयमोभा सुख पाना । हृदय सराहत यवनु न आवा। जनु चिरचि सपनिज निपुनाई । मिरचि विस्त फ] प्रगटिदेवाई। सुंदरता कह मुदर करई । छविगृह दीपसिखा जनु परई। सब उपमा कति रहे जुहारी। केहि परतरो विदेहकुमारी।

पुष्प वाटिका में जनकनन्दिनी और राजकुमार
७
दो-सियसोभा हिय परनि प्रभु, आपनि दसा विचारि।
चोले सुचि मन अनुज सन, वचन समय अनुहारि ॥५॥
तात जनक तनया यह सोई । वनुपजग्य जेहि कारन होई।
पूजन गौरि सखी ले आई । करत प्रकास फिरइ फुलवाई ।
जासुरिलोकिअलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मन छोभा ।
सो सा कारन जान विधाता । फरकहिं सुभग अगसुनु भ्राता।
रघुवसिन्ह कर सहज सुभाऊ । मनु कुपथ पगु धरे न काऊ ।
मोहि अतिसय प्रतीत मन केरी । जेहि सपनेहु परनारि न हेरी।
जिन्ह के लहहिंन रिपु रनपोठी । नहिं लावहिं परतिय मनु डीठी ।
मगन लहहिं न जिन्ह कैनाहीं । ते नरवर योरे जग माहीं ।
दो-करत बतकही अनुज सन, मन सियरूप लुभान ।
मुख-सरोज-मकरद-छवि, करे मधुप इव पान ॥६॥
चितयति चकित चहें दिसि सीता। कहॅगएनृपकिसोरमनुचिता।
जहँ पिलोक मृग-सापक नयनी । जनु तह परिसकमल सित श्रेनी।
लता ओट तव सखिन लगाए । स्यामल गौर किसोर सुहाए ।
देसि रूप लोचन ललचाने । हरपे जनु निज निधि पहिचाने ।
थके नयन रघु पति छरि देखे । पलकन्हिह परिहरी निमेसे।
अधिक सनेह देह भै भोरी । सरद-ससिहिजनुचितपचकोरी।
लोचनमग रामहिं उर आनी । दीन्हे पलककपाट सयानी ।
जासिय सचिन्ह प्रेमवस जानी। कहिनसकहिंफछुमनसकुचानी ।
दो०-लताभवन ते प्रगट भे, तेहि अवसर दोउ भाइ।
निकसे जनु जुगनिमल विधु, जलदपटल रिलगाइ॥७॥

मानस मकरन्द सोभासी सुभग दोउ चीरा । नोल-पीत-जलजात-सरीरा । मोरपख सिर सोहत नीके। गुच्छबीच विच कुसुमकली के। भाल तिलक श्रमविंदु सुहाए । श्रवन सुभग भूपन छवि छाए। विकट भृकुटि फच घरवारे । नवसरोज लोचन रतनारे। चारु चिचुक नासिका कपोला । हालविलास लेत मनु मोला। मुपछवि कहि न जाइमोहि पाहीं। जो विलोकि बहु काम लजाही। उर मनिमाल कबुकल ग्रीवॉ । काम-कलम-फरभुज बलसीवाँ। सुमनसमेत थाम कर दोना । सॉवर कुँअरसखी मुठि लोना। दो०-केहरिकटि पट पीत धर, सुखमा-सील निधान । देखि भानु-कूल-भूपनहि, विसरा सबै अपान ॥ ८ ॥ वरि धीरजु एक आलि सयानी । सीता सन बोली गहि पानी। बहुरि गौरि कर ध्यान करेह । भूपकिसोर देखि किन लेह । सकुचि सीय तव नयन उघारे । सनमुख दोउरघुसिंह निहारे । नससिख देखि राम के सौभा ।सुमिरिपितापन मनअतिछोभा। परवस सखिन्ह लखीजवसीता । भए गहरु सय कहहिं सभीता। पुनि आउव एहि वेरियॉ काली । अस कहि मन विहॅसी एफआली गूढ गिरा सुनि सिय सकुचानी । भयेउ विलंय मातुभय मानी। धरि यडि धीर राम उर आनी । फिरि आपनपी पितुवस जानी। दो०-देखन मिस मृग विहग तरु, फिरै वहोरि वहोरि । निरपि निरपि रघुबीरपि, वाढे प्रीति न थोरि ॥६॥ जानि कठिन सिपचाप विसुरति । चलीराखि उरस्थामल मूरति । प्रभु जव जात जानकी जानी । सुख-सनेह-सोभा गुन पानी । 1 पुप्प-वाटिका में जनकनन्दिनी और राजकुमार . परम प्रेम-मय मृदुमसि फोन्ही । चार चित्त भीती लिपि लीन्हीं। गई भवानी-भवन बहोरी । चदि चरन चोली कर जोरी। जय जय गिर घर-राज किसोरी । जय महेस-मुख चद चकोरी । जय गज-बदन पडानन माता जगतजननि दामिनि दुति-गाता। नहिं तर आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभार येद नहिं जाना । भव भव विभव पराभर कारिनिारिस्व रिमोहनिस्त-वसरिहारिनि दो०-पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम तर रेख । महिमा अमित न सकहिं कहि, सहससारदासेस ॥१०॥ सेवत तोहि सुलभ फल चारी । बरदायिनि त्रिपुरारि पिआरी। देवि पूजि पदकमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे। मोर मनोरथ जानहु नीके । यसहु सदा उरपुर मनही के । कोन्हउँ प्रगट न कारन तेही । अस कहि चरन गहे पैदेही। बिनय प्रेम-यस भई भगानी । ससी माल मूरति मुसुकानी । सादर सिय प्रसाद सिर परेऊ । वोली गौरि हरपु उर भरेऊ । सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहि मनममना तुम्हारी । नारदरचन सदा सुचि साँचा ।सोयर मिलिहि जाहिमनगॅचा। न्छन्द-मन जाहि रॉचेउ मिलिहि सो वर सहज मुदर सॉररो। करनानिधान सुजान सीलसनेह जानत गरो॥ पहिभॉति गोरि असीस मुनिसियसहित हित हरपित अली तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मदिर चली । सो०-जानि गोरि अनुकूल, सिय हिय हरप न जान यहि । मजल मगल-मूल, याम लगे ॥१॥ फरकन ६० मानस मकरन्द हिमकर नाहीं। । हृदय सगहन सीय लोनाई । गुरु समीप गपने दोउ भाई। राम कहा सर कौमिक पाही । सरल सुभान छुआ छल नाहीं। सुमन पाद मुनि पूजा कीन्हीं। पुनि असीस दुह भाइन् दीन्हीं। सुफल मनोग्य होटु तुम्हारे । राम लपन मुनि भए सुखारे । करि भोजन मुनिवर बिग्यानी । लगे कहन कछु कथा पुरानी। विगतदिवम गुर आयसु पाई । सव्या करन चले दोउ भाई। प्राची दि सिससि उगेउ सुहानगासिय-मुख-सरिस देखि सुखपान बहुरि विचार कीन्ह मन माहीं। सोय वदन दो०-जनक सिंधु पुनि यधु चिप, दिन मलीन सकलकु । सिय मुख समना पाव किमि, चद वापुरो रकु ॥१२॥ घटै बढे पिरहिनि दुप दाई । यसै राहु निज सधिहि पाई। कोक-सोक-प्रद पकजद्रोही । अवगुन बहुत चद्रमा तोही । चैदेही मुस पटतर दोन्हे । होइ दोप वड अनुचित कीन्हे । सिय मुख-ठपि विधुव्याज खानो। गुरपहँ चले निसायटि जानी। करि मुनि-चरन सरोज प्रनामा । आयसु पाइ कीन्ह विश्रामा । विगतनिसा रघुनायक जागे । वधु विलोकि कहन अस लागे । उयेउ अरुन अवलोकहु ताता । पकज-लोक-कोक-सुख दाता। बोले लपन जोरि जुग पानी । प्रभु-प्रमाउ-सूचक मृदु वानी । दो -अरन उदय सकुचे कुमुद, उडुगन-जोति मलीन । तिमि तुम्हार आगमन सुनि, भए नृपति बलहीन ॥१३॥ नृपसर नखत करहिं उँजियारी । टारिन सकहिं चापतम भारी। कमल कोकमधुकर राग नाना । हरये सकल निसा-अवसाना।

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पुष्प-याटिका में जनकनन्दिनी और राजकुमार
सेहि प्रभु सब भगत तुम्हारे । होइहि टूटे धनुप सुखारे।
उयेउभानु रिनुश्रमतम नाचा । दुरे नपत जग तेज प्रकासा ।
रनि निज-उदय-ब्याज रघुगया। प्रभुप्रताप सरनृपन्ह दिसाया ।
जर भुज बल महिमा उद्घाटी । प्रगटी धनु रिघटन परिपाटी।
चधुरचन सुनि प्रभु मुसुकाने । होइ सुचि सहजपुनीत नहाने ।
नित्यक्रिया करिगुरपहिं आए । चरनसरोज सुभग सिर नाए ।
सताना तर जनक बोलाए । कोसिक मुनि पहि तुरत पठाए ।
जनकरिनय तिन्ह आनि सुनाई । हरपे गोलि लिये दोउ भाई।

मन्थरा की मन्त्रणा दो०-तेहि अवसर आप लपन, मगन प्रेम आनद । सनमाने प्रिय वचन कहि, रघु-कुल कैरव चद ॥ ॥ थाजहिं याजन विविध निधाना । पुरप्रमोदु नहिं जाइ यखाना। भरतआगमनु सफल मनावहिं । आवहि येगिनयनफल पावहिं हाट बाट घर गली अथाई । कहहिं परस्पर लोग लोगाई कालि लगन मलि केतिक वारा । पूजिहि विधि अभिलापुहमारा कनकसिंघासन सोय समेता । बैठहिं रामु होइ चित-चेता सकल कहहिं कब होइहि काली। विधन वनावहिं देव कुचाली तिन्हहिं सुहाइनअवध वधावा । चोरहि चंदिनिराति न भाषा सारद बोलि विनय सुर करहीं । वारहिं पार पॉय लै परही दो०-रिपति हमारि विलोकि वडि, मातु करिअ सोइ आजु । रामु जाहिं वन राजु तजि, होइ सकल सुरकाजु ॥ सुनि सुरविनय ठाढि पछिताती । भाउँ सरोजविपिन हिमराती देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी विसमय हरप-रहित रघुराऊ । तुम जानहु सर राम प्रभाऊ जीव करमयससुख-दुख-भागी । जाइअ अवध देवहित लागी चार चार गहि चरन सँकोची ।चली विचारि विविधमतिमोर ऊँच निवासु नीचि करतूती । देखि न सकहिं पगइ विभूती मन्थरा की मन्त्रणा , आगिल काजु पिचारि बहोरी । करिहहिं चाह कुसल कवि मोरी। हरपि हृदय दसरथपुर आई । जनु ग्रहढसा दुसह दुखदाई । दो-नामु मथरा मदमति, चेरी कैफेड करि । अजस पेटारी ताहि करि, गई गिरा मति फेरि ॥३॥ दीख मथरा नगरुन्चनावा । मजल मगल वाज वधावा। पूढेसि लोगन्ह काह उछाह । रामतिलकु सुनि भा उरदाह । करे विचार कुवुद्ध कुजाती । होइ अकाजुकरनिनिधि राती। देसि लागिमधु कुटिल किराती। जिमि गॅव तकैलेउँ केहिभाती। भरतमातु पहि गइ विलखानी ।काअनमनि हसि,कहहँसिरानी। ऊतर देइ न, लेइ उसासू । नारि चरित करि ढारइ ऑसू। हॅसि कह रानि गालु यड तोरें। दीन्हि लयन सिप, असमन मोरें। तपहुँन चोल चेरियडि पापिनि । छॉडै स्वास कारिजनु सॉपिनि दो०-सभय गनि कह फहसि किन, कुसल रामु महिपालु । लपनु भरत रिपुदमनु सुनि, भा कुवरी उर सालु ॥४॥ कत सिख देइ हमाहिं कोउ माई।गालु करय केहि कर यलु पाई। रामहि छॉडि कुसल केहि आजू । जेहि जनेसु देइ जुयराजू । भयेउ कोसिलहि विधि अति दाहिनादेखत गरररहत उर नाहिंन । देखा कस न जाइ सर सोभा । जो अपलोकि मोर मनु छोभा। । पूतु रिटेस, न सोचु तुम्हारे । जानति हहु यस नाटु हमार। नीद बहुत, प्रिय सेज तुराई । लखहु न भूप कपट-चतुराई । सुनि प्रिय रचनमलिनमनुजानी। मुकी रानि अररहु अरगानी। पुनिअस फयहुँफहसि घरफोरी। तय धरि जीभ क्ढामा तोरी। । E- F

मानस-मकरन्द
दो०-फाने खोरे कवरे, कुटिल कुचाली जानि |
तिय विसेपि पुनि चेरि कहि,भरतमातु मुसुकानि ॥५॥
प्रिययादिनि सिप दीन्हिउँ तोही।सपनेहु तो पर कोपु न मोही।
सुदिन सु मगल-दायकु सोई । तोर कहा फुर जेहि दिन होई।
जेठ स्वामि सेवक लघु भाई । पहुदिन कर-कुल रीति सुहाई
रामतिलकु जो सॉचेहु काली । देउ मॉगु मन भावत जाली
कौसत्या सम सब महतारी। गमहि सहज सुभाय पिआरी
मो पर करहिं सनेहु रिसेखी । में करि प्रीति-परीछा देखी
जो विधि जनमु देइ करि छोह । होहु रामसिय पृत पतोह
प्रान ते अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्हके तिलक छोभु कस तोरें
दो०-भरतसपथ तोहि सत्य कह परिहरि कपट दुराउ ।
हरप समय विसमउ करसि कारनु मोहि सुनाउ ॥ ६॥
एकहि चार आस सर पूजी । अव कछु कहब जीम करि दूजी।
फोरे जोगु कपार अभागा। भलेउ कहत दुख रोरेहि लागा।
कहहि झुठि फुरि यात वनाई । ते प्रिय तुम्हहिं करह में माई ।
हमहु कहव अव उकुरसोहाती । नाहि त मौन रहर दिन राती ।
करि कुरूप विधि परवस कीन्हा । ववासोलुनिअ,लहिअजो दीन्हा
कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छॉडि अव होय किरानी।
जारे जोगु सुभाउ हमारा । अनभल देखि न जाह तुम्हारा।
ताते कछुक यात अनुसारी । छमिअदेवि, वडि चूक हमारी ।
दो०-गृढ़ कपट प्रिय-वचन सुनि, तीय अधरवुधिरानि ।
सुरमाया यस वैरिनिहि, मुहदय जानि पतिआनि ॥७॥

मन्धरा को सत्रणा
सादर पुनि पुनि पूछति ओही। सवरीगान मृगी जनु मोही।
तसिमति फिरीअहै जसिभावी । रहँसी चेरि घात जनु फापी ।
तुम्ह पूछ
मैं कहत डेराऊँ। घरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।
सजिप्रतीतिरहु विधिगढि छोली। अवध साढसाती तब बोली।
प्रिय सियरामु कहा तुम्ह रानी । रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरिवानी।
रहा प्रथम, अब ते दिन धोते । समय फिर रिपु मोहि पिरोते।
भानु कमल कुल पोपनि हारा। पिनु जर जारिकरसोइ छारा।
जरि तुम्हार चह सरति उधारी । मॅधह करि उपाउ घर वारी।
दो-तुम्हहिं न सोचु सोहाग क्ल, निज घस जानहु राउ ।
मन मलीन मुहुँ मीठ नृपु, राउर सरल सुभाउ ॥८
चतुर गंभीर राम-महतारी । वीचु पाइनिज बात सॅचारी।
पटप, भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु-मत जानर रउरें।
सेवहिंसकलसवति मोहिनीक। गरवित भरतमातु बल पी के।
सालु तुम्हार कोसिलहि माई । कपट चतुर नहिं होइ जनाई ।
राजहि तुम्ह पर प्रेम पिसेसी । सपति-सुभाउसफइ नहिं देसी।
रचि प्रपचु भूपहि अपनाई । राम तिलक हित लगन धराई ।
यह कुल उचित राम कहें टोका। सहि सुहाइ मोहि मुठिनीका।
आगिलि यात समुझिडरमोही। देउ टैउ फिरि सो फलु ओही।
दो०-रचि पचि कोटिक कुटिलपन, कीन्हेंसि कपटप्रगोधु ।
कहिसि कथा सत सरति के, जेहि विधि पाढ़ विरोधुEl
भारी यस प्रतीति उर आई । पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई ।
का पूँछटु तुम्ह अजहूँ न जाना । निज हित अनहित पमुपहिचाना

१४ मानस मकरन्द दो०-फाने खोरे कृयरे, कुटिल कुचाली जानि। तिय विसेपि पुनि चेरि कहि, भरतमातु मुसुकानि ॥५॥ प्रियवादिनि सिप दीन्हिउँ तोही। सपनेहु तो पर कोपु न मोही। सुदिन सु मगल-दायकु सोई । तोर कहा फुर जेहि दिन होई। जेठ स्मामि सेवक लघु भाई । पहुदिन कर-कुल-रीति सुहाई। रामतिलकु जी सॉचेहु काली । देड मॉगु मन भारत आली । कौसल्या सम सर महतारी । रामहि सहज सुभाय पिआरी। मो पर करहिं सनेह बिसेषी । मै फरि प्रीति-परीछा देसी। जो विधि जनमु देइ करि छोह । होहु रामसिय पूत पतोह । प्रान ते अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्हके तिलक छोभु कस तोरें। ढो०-भरतसपथ तोहि सत्य कह परिहरि कपट दुराउ । हरप समय विसमा करसि कारनु मोहि सुनाउ ॥६॥ एकहि वार आस सब पूजी । अव कछु कहब जीभ करि दूजी। फोरै जोगु कपारु अभागा । भलेउ कहत दुसरौरेहि लागा। कहहि ऋठि फुरि यात बनाई । ते प्रिय तुम्हहिं करर में माई । हमह कहव अव ठकुरसोहाती । नाहिं त मौन रहय दिन राती । करि कुरूप विधि परवस कीन्हा । यवासोलुनिअ,लहिअजोदीन्हा कोउ नृप होउ हमहि का हानी ! चेरि छॉडि अव होय किरानी जारै जोगु सुभाउ हमारा । अनमल देखि न जाइ तुम्हारा कछुक वात अनुसारी । छमिअ देवि, बडि चूक हमारी दो०-गृढ कपट-प्रिय-वचन सुनि, तीय अधरखुधिरानि । सुरमाया वस वैरिनिहि, सुहृदय जानि पतिआनि ॥७॥ 4 मन्थरा की मात्रणा ११ सादर पुनि पुनि पूछति ओहो। सबरीगान मृगी जनु मोही। तसिमति फिरीअहै जसिभायी। रहँसी चेरि घात जनु फावी । तुम्ह पूछह मैं कहत डेराऊँ । धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ। सजिप्रतीतिवहु विधिगढि छोली। अवध साढसाती तर वाली । प्रिय सियरामु कहा तुम्ह रानी । रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरियानी। रहा प्रथम, अर ते दिन बीते । समय फिरे रिपु मोहिं पिरीते। भानु कमल कुल पोपनि-हारा । विनु जर जारि करे सोइ छारा। जरि तुम्हार चह सरति उखारी । रूँधह करि उपाउ घर गरी। दो०-तुम्हहिं न सोचु सोहाग वल, निज बस जानहु राउ । मन मलीन मुहुँ मीठ नृपु, राउर सरल सुभाउ ॥८॥ चतुर गंभीर गम-महतारी । योचु पाइ निज वात सँवारी । पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानर रउरें। सेवहिं सकल सवति मोहि नीक। गरवित भरतमातु बल पी के । सालु तुम्हार कौसिलहि माई । कपट चतुर नहिं होइ जनाई । राहि तुम्ह पर प्रेम रिसेखी । सपति-सुभाउसका नहिं देखी। रचि प्रपचु भूपहि अपनाई । राम तिलक हित लगन धगई । यह कुल उचित गम कह टीका । सबहिसुहाइ मोहि मुठिनीका। आगिलि बात समुझिडर मोही। देउ देउ फिरि सो फलु ओही । दो०-रचि पचि फोटिक युटिलपन, कीन्हसि कपटप्रयोधु । कहिसि कथा सत सवति के, जेहि विधि पाढ विरोधु॥६॥ भानी घस प्रतीति उर आई । पूँछ रानि पुनि सपथ देयाई । का पूँछह तुम्ह अजरें न जाना ।निज हित अनहित पसु पहिचाना मास-मकरन्द भयेउ पाप दिनु सजत समाजू । नुम पाई सुधि मोहि सन आजू साइअ पहिरिअ राज तुम्हारे । सत्य कहें नहिं दोपु हमारे। जो असत्य कछु कहर बनाई । तौ विधि देइहि हमहिं सजाई। रामहि तिलकु कालि जो भयेऊ ।तुम्ह कहें विपति वीजु विधिवयेऊ रेख खेचाइ कही चलु मापी । भामिनि भइहु दृध के माखी । जो सुन सहित करहु सेवकाई । तो घर रहतु, न आन उपाई। दो०-कटू विनतहि दोन्ह दुखु, तुम्हहिं फौसिला देव । भरतु यदि-गृह सेइहहि, लपनु राम के नेय ॥१०॥ कैकयसुना सुनत कटु यानो । कहि न सके कछुसहमि सुपानी तन पसेउ, कदली जिमि कॉपी । कुवरी दसन जीभ तब चॉपी। कहि कहि कोटिक कपटकहानी । धीरज धरहु प्रबोधिसि रानी। कोन्हिसि कठिन पढाइ कुपाठ जिमिननवड फिरि उकठि कुकाट फिरा करमु प्रिय लागिकुचाली । बकिहि सराहै मानि मराली । सुनु मंथरा वात फुरि तोरी । दहिनि ऑखि नित फरकै मोगे। दिन प्रति देखो राति कुसपने । कही न तोहि मोहवस अपने । काह करो ससि सूब सुभाऊ । दाहिन चाम न जानो काऊ । दो०-अपने चलत न आजु लगि, अनमल काहु क कीन्ह । केहि अघ एकहिचारमोहि, दैव दुसह दुख दीन्ह ॥११॥ नहर जनमु भरव बरु जाई । जियतन करविसति सेवकाई। अरिबस देउ जियारत जाही । मरतुनीकतेहि जीवन चाही। दोन वचन कह यहु विधि रानी । सुनि कुबरी तिय माया ठानी। अस कस कहहु मान मन ऊना । सुखुसोहागु तुम्ह कह दिन दूना मन्थरा की मनणा । जेहि राउर अतिअनभल ताका । सोइपाइहि पटु फनु परिपाका । जय तें कुमत मुना मै स्वामिनि । भूपन यासर नींदन जामिनि ! पॅछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह पाँची । भरत भुआल होहिं एहु साँची। भामिनि करहु त कहो उपाऊ । हे तुम्हरी सेवारस राऊ। दो०-परउँ कूप तुअ वचन पर सकउँ पूत पति त्यागि। कहसि मोर दुखुदेखि वड, कस न करय हित लागि ॥१२॥ कुयरी करि फवुली• केकेई । कपटछुरो उर पाहन टेई । लखे न रानि निकट दुखु कैसे । चरे हरित तृन वलिपसु जैसे। युनत यात मृदु अत कठोरी । देति मनहुँ मधु माहुर घोरी। कहे चेरि मुधि अहै कि नाही । स्वामिनि कहिहु कथामोहिपाही दुइ वरदान भूप सन थाती । मॉगहु आजु, जुडाबहु छाती। सुतहि राज रामहि पनगरासू । देहु, लेहु सर सवतिहुलासू । भूपति रामसपथ जर करई । तब माँगेहु जेहि वचनु न टरई। होइ अकाजु आजु निसि पीते । वचनु मोर प्रिय मानहु जीते। दो०-बड कुधातु फरि पातकिनि, कहेसि कोपगृह जाहु । काजु सँवारेहु सजग सतु, सहसा जनि पतिआहु ॥१३॥ कुवरिहि रानि प्रानप्रिय जानी । बार बार यडि बुद्धि यखानी। तोहि सम हितुन मोर ससारा । बहे जात का भइसि अधारा। जो विधि पुरर मनोरथ काली । करो तोहि चपपूतरि आली। यह निधि चेरिहि आदर देई । कोपभवन गवनी कैकेई। ॐ काली- यलिपशु जो किसी देवता पर चढ़ाने के लिए पहले से कबूला या माना जाय । ૨

मानस-मररन्द
क
विपति बीच, घरपारितु चेरी । भुइँ मै कुमति कैकई देरी।
पाइ कपटजलु अंकुर जामा । घर दोउ दल, दुसफल परिनामा
कोप समाजु साजि स सोई । राजु फरत निज कुमति विगोई
राउर-नगर फोलाहलु होई । यह फुचालि कलुजान नको ।

राम का कैकेयी से सम्भाषण -दो०-जाइ देखि रघु-यस मनि, नरपति निपट कुसाजु । - सहमि परेउ लपि सिंधिनिहि, मनहु वृद्ध गजराजु ॥ १ ॥ सूहिं अधर जरे सतु अगू । मनहुँ दीन मनिहीन भुअगू । सरख समीप देस कैकेई । मानहुँ मीच घरी गनि लेई । करनामय मृदु राम-सुभाऊ प्रथम दीप दुखुसुना न काऊ । तदपि धीर धरि समउ रिचारी । पूँडी मधुर वचन महतारी । मोहि कहु मातु तात-दुख-कारन ।करिअ जतन जेहि होइ निरन। सुनहु गम सर कारन पट्ट । राजहिं तुम्ह पर यहुत सनेह । देन कहेन्दि मोहि दुइ वरदाना । मॉगेउँ जो कछु मोहिं सुहाना । सो सुनि भयेउ भूपउर सोचू ।छोडिनसकहिं तुम्हार सँकोचू। दो०-सुन-सनेहु इत बचनु उत, सकट परेउ नरेसु । सकहु त आयसु बरहु सिर, मेटहु कठिन कलेसु ॥२॥ निधरक चैठि कहे कटु वानी । सुनत कठिनता अति अकुलानी। जीभ कमान, वचन सर नाना ।मनमहिप मृदु लच्छ समाना। जनु कठोरपनु धरै सरीरू । सिरमै धनुपविद्या पर वीरू । सवु प्रसग रघुपतिहि सुनाई । बेठि मनहुँ तनु धरि निठुराई । मन मुसकाइ भानु कुल-भानू । रामु सहज आनद-निधानू। चोले बचन विगत सब दूपन । मृदु मजुल जनु यागविभूपन । सुनु जननी सोइ सुत बड भागी। जोपितु-मातु-वचन-अनुरागी। ननय मातु पितु-तोपनि हारा । दुर्लभ जननि सकल ससारा ।

मानस-मकरन्द - दो०-मुनिगन मिलनु विसेपि वन, सबहि भॉति हित मोर । तेहि मह पितुआयसु बरि, संमत जननी तोर ॥३॥ भरतु प्रानप्रिय पावहि राजू। विधिसब विधिमोहि सनमुपआज जो न जाउँ वन ऐसेहु काजा प्रथमगनिअमोहि मूढसमाजा। सेवहिं अरेंडु कलपतर त्यागी । परिहरि अमृत लेहि विपुमाँगी। तेउ न पाड अस समउ चुकाहीं। देखु विचारिमातु मन माही अव एकु दुखु मोहिं विसेपी । निपट निकल नरनायकु देखी। थोरिहि वात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति नमोहि महतारी। राउ वीर गुन उदधि-अगाधू । भा मोहि ते कछु घड अपराध। जाते मोहि न कहत कछु राऊ मोरिसपथ तोहिकह सतिभाऊ दो०-सहज सरल रघुवर वचन, कुमति कुटिल करि जान । चलइ जोक जिमि चक्रगति, जद्यपि सलिल समान ॥ ४॥ रहसी रानि रामरख पाई। बोली कपटसनेह जनाई। सपथ तुम्हार, भरत कै आना । हेतु न दूसर मैं कछु तुम्ह अपराधु जोगु नहिं ताता। जननी-जनक-यधु सुस-दाता राम सत्य सब जो कछु कहह । तुम्ह पितु मातु वचन-रत अहह पितहि बुझाइ कहहु, बलि, सोई। चौथेपन जेहि अजसु न होई। तुम्ह समसुअनसुकत जेहिं दीन्हे। उचित न तासुनिरादर फोन्हे। लाहि कुमुख यचन सुभ कैसे । मगह गयादिक तीरथ जैसे रामहि मातुवचन सा भाए । जिमिसुरसरिगतसलिलसुहाए। दो०-गइ मुरुछा, रामहि सुमिरि, नृप फिरि करवट लीन्ट । सचिव राम आगमन कहि, विनय समयसम कीन्ह ॥ ५॥ जाना।

राम का कैकेयी से सम्माषण २१ अवनिप अकनि रामु पगु गरे । धरि धीरजु तव नयन उघारे। सचिव सँभारि राउ पैठारे । चरनु परत नृप रामु निहारे । लिये सनेहविकल उर लाई । गैमनिमनहुँ फनिक फिरि पाई। रामहि चिते रहेड नरनाह । चला रिलोचन पारिप्रवाह । सोकविवस फछु फहे न पारा । हृदय लगारत यारहिं पारा । विधिहि मनार गउ मन माहीं । जेहिं रघुनाथ न कानन जाही। सुमिरि महेसहि कहै निहोरी । विनती सुनहु सदा सिरमोरी। आसुतोष तुम्ह अबढर दानी । जारति हाह दीन जनु जानी। दो-तुम्ह प्रेरक सब के हृदय, सो मति रामहिं देहु । बचनु मोर तजि रहहिं घर, परिहरि सीलु सनेहु ॥६॥ अजसु होउ, जग सुजसु नसाऊ । नरक परी बर सुरपुर जाऊँ। सर दुस दुसह सहारउ मोही। लोचन ओट रामु जनि होहीं। अस मन गुनै, राउ नहिं योला । पीपर पात सरिस मनु टोला। रघुपति पितहि प्रेम यस जानी । पुनि कछु कहिहि मातुअनुमानी देस काल अवसर अनुसारी । गोले वचन चिनीत विचारी। तात कही फछु करों दिठाई । अनुचित छमर जानि लरिकाई । अति लघु बात लागि दुख पाना। काहु नमोहिं कहि प्रथम जनावा देखि गोसॉइहि पूछेउँ माता । सुनि प्रसगु भए सीतल गाता । दो०-मगलसमय सनेहरस, सोच परिहरिज तात । आयमु देइअ हरपि हिय, कहि पुलो प्रभुगात ॥ ७ ॥ 'अन्य जनमु जगतीतल तासू । पितहि प्रमोटुचरितमुनि जास्। चारि पदारथ करतल ताक । प्रिय पितुमातु प्रानसम जाकें। -

२२
मानस मकरन्द
-
आयसु पालि जनमफलु पाई। पहो वेगिहि होउ रजाई।
विदा मातु सन आवो मॉगी। चलिहो वनहिं बहुरि पग लागी।
अस कहि रामुगवनु तब कीन्हा। भूप सोकवस उतरु न दीन्हा ।
नगर व्यापि गइ यात सुतीछी । छुअत चढी जनु सवतन वीडी।
सुनि भए विकल सकल नरनारी । वेलि पिटप जिमिदेखि दवारी।
जो जहें सुनह धुनइ सिर सोई । बड विपादु नहिं धोरजु होई।
दो०-मुस सुखाहि लोचन स्त्रवर्हि, सोकु न हृदय समाइ ।
मनहुँ करुन-रस-कटकई, उतरी अवध वजाइ |
मिलेहिं मॉझ विधि यात विगारी। जहॅ तह देहि कैकाहिं गारी ।
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ । छाइ भवन पर पाकु धरेऊ ।
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा । डारिसुधा विपुचाहति चीखा।
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी । भइ रघु-वस-चेनु बन आगी।
पालय चैठि पेडु एहि काटा । सुख मह सोक ठाठ धरि ठाटा ।
सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन करन कुटिलपनु ठाना ।
सत्य कहहिं कवि नारिसुभाऊ । सव विधि अगम अगाध दुराऊ
निज प्रतिवियु वरक गहि जाई । जानि न जाइ नारिगति भाई ।
दो०-काह न पावकु जारि सक, का न समुद्र समाइ ।
का न करे अपला प्रवल, केहि जग कालु न साइ ॥६
का सुनाइ निधि काह सुनावा । का देखाइ चह काह देसारा।
एक कहहिं मल भूप न कोन्हा ।रु रिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा
जो हठिभयेउ सकल दुस भाजनाअवलाविवसग्यानुगुनु गाजनु।
एक यरमपरमिति पहिचाने । नृपहि दोसु नहिं देहि सयाने।
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राम का कैकेयी मे सम्भापण २३ सिवि-दधीचि हरिचद-कहानी । एक एक सन कहहिं बसानी । एक भग्त कर समत करहीं। एक उदास भाय सुनि रही। कान पूँदि कर, रद गहि जीहा । एक कहहि यह बात अलीहा । सुरत जाहिं अस कहत तुम्हारे । राम भरत कहें प्रान पियारे । दो०-चदु चरा वर अनलकन, सुधा होइ विप तृल। सपनेहुँ करहुँ न करहिं किछु, भरतु रामप्रतिकृल ॥१०॥ एक विधातहि दूपनु देही । सुधा देखाइ दीन्ह विपु जेही । खरभर नगर, सोचु सर का । दुसह दाहु, उर मिटा उछाह । विप्रधू कुलमान्य जठेगी । जे प्रिय परम केकई फेरी। लगी टेन सिख सीलु सराही । यचन चान सम लागहि ताही। भरतु न मोहि प्रिय रामसमाना । सदा कहहु यहु सजगु जाना। करहु राम पर सहज सनेह । केहि अपराध आजु पनु देह । कव: न कियेहु सरनि आरेस । प्रीति प्रतीति जान सत्रु देसू । कोसल्या जर काह यिगारा । तुम्ह जेहि लागि राज पुर पारा । दो०-सीय कि पिय सँगु परिहरिहि, लपनु किरहिहर्हि धाम । राजु कि भूजव भरत पुर, नृपुकि जिइहि विनु राम॥११॥ अस विचारि उर छॉडह कोह । सोक कल कोठि जनि हो । भरतहि अवसि देह जुबराजू। कानन काह राम कर काजू। नाहिंन रामु गज के भूसे । परमधुरीन विपयरस रूखे । गुरगृह यसहु गमु तजि गेह । नृप सन अस बर दूसर लेह । जो नहिं लगिहहु कहें हमारें। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारें। जौ परिहास कीन्हि क्छु होई । तौ कहि प्रगट जनारहु सोई ।

मानस-मकरन्द रामसरिस सुत कानन जोग।फाह कहहि सुनि तुम्ह कह लोग उठ बेगि सोर करहु उपाई । जेहि विधि सोकु कलकु नसाई। छंद-जेहि भॉति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही। हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही। जिमि भानु रिनु दिनु,प्रान यिनुतनु चदुविनु जिमि जामिनी। तिमि अवध तुलसीदासप्रभु विनुसमुझिधौ जिय भामिनी। सो०-सपिन्ह सिखावनुदीन्ह, सुनतमधुर परिनाम हित ।। । ते कछु फान न कीन्ह, कुटिल प्रयोधी कुवरी ॥१२॥ उतरु न दे दुसह रिस रुखी । मृगिन्हचितवजनुयाधिनिभूखी च्याधिअसाधिजानितिन्ह त्यागी। चली कहत मतिमद अभागी। राजु करत येह देव बिगोई । कीन्हेसि असजस कर न कोई। पहिबिधिक्लिपहिं पुर-नर-नारी। देहि कुचालिहि कोटिक गारी । जरहिं विषमजर,लेहि उसासा । कवनिराम विनु जीवन आसा। बिपुल थियोग प्रजा अकुलानी । जनु जल-चर-गुन सूखत पानी । अति विषाद सब लोग लोगाई । गए मातु पहिं रामु गोसाई । मुखु प्रसन्न चित चौगुन चाऊ । मिटा सोचु जनि राखइ राऊ। दो०-नवगयदु रघुवीरमनु, राजु अलान समान । त्रुट जानि चनगवनुसुनि, उरअनदु अधिकान ॥१३॥ . ।

- माता कौशल्या से राम का विदा मॉगना और सीता को समझाना रघु कुल तिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायेउ माथा । दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे । भूपनवसन निछावरि कीन्हे । बार चार मुख चुनति माता । नयन नेहजलु पुलकित गाता । गोद राखि पुनि हदय लगाए । स्रवत प्रेमरस पयद मुहाए । प्रेमप्रमोदु न कछु कहि जाई । रक धनदपदत्री जनु पाई। सादर सुदर यदनु निहारी । बोली मधुर वचन महतारी । कहहु तात जननी बलिहारी । काहिं लगन मुद-मगल कारी । सुकृत सील सुख सीव सुहाई । जनमलाभ के अनधि अघाई। दो०-जेहि चाहत नरनारि सव, अति आरत एहि भॉति । जिमि चातक चातकि तृषित, वृष्टि सरद रितु म्वाति ॥१॥ तात जाउँ पलि रेगि नहा । जो मन भारमधुर फाछु खाह । पितुसमीप तर जायेहु भया । यडि यार जाइ गलि मेया । मातुरचन मुनि अति अनुकूला । जनु सनेह-सुर-तर के फुला। सुखमकरद भरे नियमूला । निरखि राम मनु-भवरन भूला। धरमधुरीन धरमगति जानी । कहेउ मातुसनअति मृद-पानी। पिना दोन्ह मोहि काननराजू । जहँ सरभॉति मोर वट काजू। आयसु देहि मुदितमन माता । जेहि मुदमगल कानन जाता। जनि सनेहवस उरपसि भोरें। आनॅदु अर अनुग्रह तोरें।

२६
मानस मकरन्द
,
दो०-घरप चारि दस विपिन यसि, करि पितु-वचन प्रमान ।
आइ पाय पुनि देखिहउँ, मनजनिकरसिमलान ॥२॥
वचन चिनीत मधुर रघुपर के । सरसम लगे मातु-उर करके।
सहमि सूपि सुनि सीतल वानी । जिमि जवास परे पावस पानी।
कहि न जाइ कटु हदय विपादू । मनहुँ मृगी सुनि केहरिनादू ।
नयन सजल तन यरथर कॉपी । मॉजहि खाइ मीन जनु मॉपी।
धरि धीरजु सुतवदनु निहारी । गदगद-चचन कहति महतारी ।
तात पितहि तुम्ह प्रानपियारे ।देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।
राजु देन क] सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहि अपराधा।
तात सुनावह मोहि निदानू । को दिन-कर-कुल भयेउ झसान।
दो०-निरखि रामरुप सचिवसुत, कारनु कहेउ घुझाइ ।
सुनि प्रसगु रहि मूक जिमि, दसा बरनि नहिं जाइ ॥३॥
रासिन सकइन कहि सक जाह । दुहे भॉति उर दारुन दाह
लिपत सुधाकर गालिपि राह । विधिगति याम सदासय काह।
धरम सनेह उभय मति घेरी । भइ गति सॉप छुछुदरि केरी ।
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधृ । धरम जाइ अरु वधुविरोध ।
कहउँ जान बन तो यडि हानी । सकट-सोच-विवस भै रानी ।
बहुरि समुझितियधरमु सयानी। रामुभरतुदोउ सुत सम जानी।
सरल सुभाउ राममहतारी । बोली वचन धीर परि भारी।
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका । पितुआयसुसय घरमक टीका।
दो०-राजु टेन कहि दीन्ह पनु, मोहि न सो दुरा लेसु ।
तुम्ह विन भरतहि भूपतिहि, मजहि प्रचड कलेसु ॥४॥

। माता कौशल्या से राम का बिदा माँगना जा केवल पितु-आयसु ताता ! तो जनिजाहु जानि वडि माता। जो पितुमातु कहेउ न जाना । तो फानन सत-अवध-समाना । पितु पनदेन मातु वनदेवी । खग मृग चरनसरोरह-सेवी । अतहु उचित नृपहि यनवासू । पय ग्लिोकि हिय होद हराम । वडभागी वनु, अवध अभागी । जोरघु रस तिफल तुम्ह त्यागी। जा सुत कहा सग मोहि लेह । तुम्हरे हृदय होद सदेह । पूत परमप्रिय तुम्ह सरही के । प्रान प्रान के, जीवन जी के। ते तुम्ह कहह मातु यन जाऊँ । में सुनि वचन वैठि पछिताऊँ। दो०-यह पिचारि नहिं करउँ हठ, झूठ सनेह यढाइ । मानि मातु कर नात रलि, मुरति विसरि जनि जाइ ॥५॥ देव पितर सर तुम्हहिं गोसाई । रासह पालक नयन की नाई। अरधि अवु प्रियपरिजन मीना । तुम्ह करनाकर धरमधुरीना । अस विचारि सोड करह उपाई । सरहिं जिअत जेहि भेंटहु आई। जाहु सुसेन यहि धलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन-गाऊँ। सरकर आजुसुकृतफल पीता । भयेउ करालुकालु विपरीता। बहु विधि निलपिचरन लपटानी। परमअभागिनि आपुहि जानी। दारन दुसह दाह उर न्यापा । वरनि न जाइ चिलापकलापा। राम उठाद मातु उर लाई । कहि मृदुवचन बहुरि समुझाई। दो०-समाचार तेहि समय मुनि, सीय उठी अकुलाइ । जाइ सासु पठ-कमल जुग, नदि वेठि सिर नाइ ॥६॥ दोन्हि असीस मासु मृदुगानी । अतिसुकुमारि देखि अकुलानी ।। वैठि नमित मुरा सोचति सोता ! पराशि । पति प्रेम पुनीता।

मानस-मकरन्द
दो०-यरपचारिदस विपिन यसि, फरि पितु-बचन प्रमान ।
आइ पाय पुनि देखिहउँ, मनजनिकरसिमलान ॥२॥
वचन विनीत मधुर रघुबर के । सरसम लगे मातु-उर करके।
सहमि सूति सुनि सीतल यानी । जिमिजवास पर पावस पानी
कहि न जाइ कछु हृदय विपादू । मनहुँ मृगी सुनि केहरिनादू ।
नयन सजल तन थरथर कॉपी । मॉजहि साइमीन जनु माँपी।
धरि धीरजु सुतवदनु निहारी । गदगद-वचन कहति महतारी ।
तात पितहि तुम्ह प्रानपियारे ।देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।
राजु देन कह सुभ दिन साधा। कहेउ जानधन केहि अपराधा।
तात सुनाव मोहि निदानू । को दिन-कर-कुल भयेउ साना
दो०-निरखि रामरुस सचिवसुत, कारनु कहेउ धुझाइ ।
सुनि प्रसगु रहि मूक जिमि, दसा घरनि नहिं जा ॥३॥
राखिनसकइन कहि सक जाह । दुहुँ भॉति उर दारुन दाह ।
लिपत सुधाकर गालिपि राह। विधिगति वाम सदासय काह।
धरम सनेह उभय मति घेरी । भइ गति सॉप छुछुदरि केरी।
रापउँ सुतहि करउँ अनुरोधृ । धरम जाइ अरु वधुविरोधू ।
कहउँ जान बन तौ वडि हानी । सकद-सोच-विवस भै रानी।
वहरिसमुभितियधग्मुमयानी। रामुभरतुदोउ सुत सम जानी।
सरल सुभाष राममहतारी । योली वचन धीर धरि भारी।
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका । पितुआयसुसव धग्मक टीका।
दो०-राजु देन कहि दीन्ह यनु, मोहि न सो दुख लेसु ।
तुम्ह विन भरतहि भूपतिहि, प्रजहि प्रचड कलेसु ॥४॥

माता कौशल्या से राम का विदा माँगना . जा केरल पितु-आयमु ताता । तो जनिजाहु जानियडिमाता । जो पितुमातु कहेउ बन जाना । तो कानन सत-अवध-समाना । पितु उनदेव मातु यनदेवी । खग मृग चरनसरोरुह-सेवी । अतह उचित नृपहि यनवासू । यय विलोकि हिय होइ हरास् । घडभागो धनु, अवध अभागी। जोरघु बस तिकल तुम्ह त्यागी। जो सुत कहो सग मोहि लेह । तुम्हरे हृदय होइ सदेह। पूत परमप्रिय तुम्ह सरही के । प्रान प्रान के, जीवन जी के। ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ । मे सुनि पचन वैठि पछिताऊँ। दो०-यह रिचारि नहिं करउँ हठ, झूठ सनेह बढाइ । मानि मातु कर नात पलि,मुगति निसरि जनि जाइ ॥५॥ देव पितर सब तुम्हहिं गोसाईं । राखहु पालक नयन की नाई। अवधि अमियपरिजन मीना । तुम्ह करनाकर धरमधुरीना । अस विचारि सोइ करहु उपाई । सरहिं जिअत जेहि भेंटहु आई। जाहु सुसेन बनहिं वलि जाऊँ । करि अनाथ जन-परिजन-गाऊँ। सब कर आजुसुकतफल वीता । भयेउ करालुकालु विपरीता। बहु विधिपिलपिचरन लपटानी । परमअभागिनि आपुहि जानी। दारन दुसह दाहु उर व्यापा । वरनि न जाइ पिलापकलापा। राम उठाइ मातु उर लाई । कहि मृदुवचन बहुरि समुभाई। दो०-समाचार तेहि समय सुनि, सीय उठी अकुलाइ । जाइ सासु पद कमल-जुग, यदि वैठि सिह नाइ ॥६॥ दीन्हि अमोस सासु मृदुवानी । अतिसुकुमारिदेखि अकुलानी । चठि नमित्त मुस सोचति सीता ! रूपराशि पति प्रेम पुनीता २८ मानस-मकरन्द --- चलन चहत बन जीवननायू । केहि सुकृती सन होइहि साथ् । की तनु मान कि केवल प्राना । विधि करतब कछुजाइ न जाना चारु चरननख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कविवरनी। मनहुँ प्रेमवस विनती करहीं। हमहिं सीयपद जनि परिहरहीं।' मजुविलोचन मोचति वारी। चोली देखि राम-महतारा। नात सुनहु सिय अतिसुकुमारी । सासु-ससुर-परिजनहिं पियारी। दो०-पिता जनक भूपालमनि, ससुर भानु-कुल भानु । पति रवि-कुल कैरव-विपिन विधु, गुन-रुप निधान ॥७॥ मै पुनि पुत्रवधू प्रिय पाई । रूपरासि गुन सालु सुहाई। नयनपुतरि करि प्रीति बढाई । राखेॐ प्रान जानकिहिं लाई। कलपटेलिजिमिबहुविधिलाली । सींचि सनेहसलिल प्रतिपाली। फूलत फलत भयेउ विवि यामा । जानि न जाइ काह परिनामा । पलगपीठ तजि गोद हिंडोरा । सियनदीन्ह पगु अवनि कठोरा। जिअनमूरिजिमि जोगवत रहऊँ। दीपवाति नहिं टारन कहऊँ। सोइसियचलनचहतियन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा। चद-किरन रस रसिक चकोरो। रविरुख नयनसकै किमिजोरी। दो०-करि, केहरि, निसिचर चरहि, दुष्ट जतु वन भूरि ।' विश्वाटिका कि सोह सुत, सुभग सजीवनि मूरि ॥८॥ बनहित कोल किरात किसोरी। रची विरचि विषय सुख भोरी। पाहन कृमिजिमिकठिनसुभाऊ । तिन्हहिं कलेसुन कानन काऊ। के तापसतिय काननजोगू । जिन्ह तप हेतु तजा सा भोग। सिय ग्न पसिहि तातकेहिभाती। चित्रलिपित कपिदेखिडेराती।

माता कौशल्या से राम का विदा मांगा मुर सर सुभगवनज-वन चारी! डायर-जोग कि हंसकुमारी। अस पिचारि जस आयसु होई । मे सिप देउँ जानकिहि सोई। जो सिय भवन रहे कह अवा । मोहि कहँ होइ बहुत अचलवा। सुनि रघुवीर मातु-प्रिय-यानी। सील सनेह सुधा जनु सानी। दो०-कहि प्रिययचन विवेकमय, कीन्ह मातु-परितोष । लगे प्रबोधन जानकिहि, प्रगटि विपिन-गुन दोप ॥६॥ मातु समीप कहत सकुचाही । योले समउ समुझि मनमाहीं। राजकुमारि सिखारन सुनह । आन भॉति जिय जनिकदुगुनह । आपन मोर नीक जो वहा । वचनु हमार मानि गृह रहा । आयसु मोरि सासु-सेवकाई । सरयिधिभामिनिभरनमलाई। ३ ते अधिक धरमु नहिंदूजा । सादर सासु-ससुर पद पूजा । (जरमातु फरिहि सुधिमोरी। होइहि प्रेमविफल मतिमोरी।

मानस-मकरन्द चलन चहत बन जीवननाथू । केहि सुकृती सन होइहि साथ । की तनु प्रान कि केवल प्राना । विधि करतय कछुजाइन जाना। चार चरननख लेखति धरनी । नूपुर मुखर मधुर कविवरनी। मनहुँ प्रेमवस विनती करहीं। हमहिं सीयपद जनि परिहरहीं। मजुबिलोचन मोचति वारी । चोली देखि राम-महतारी। नात सुनहु सिय अतिसुकुमारी । सासु ससुर-परिजनहिं पियारी। दो०-पिता जनक भूपालमनि, ससुर भानु कुल मानु । पति रवि-कुल कैरव-विपिन विधु, गुन-रूप निधातु ॥७॥ में पुनि पुत्रवधू प्रिय पाई । रूपरासि गुन सालु सुहाई। नयनपुतरि करि प्रीति यढ़ाई । राखेऊँ प्रान जानकिहिं लाई। कलपलिजिमियहुविधिलाली । सीवि सनेहसलिल प्रतिपाली। फलत फलत भयेउ विधि यामा । जानि न जाइ काह परिनामा। पलगपीठ तजि गोद हिंडोरा । सिय नदीन्ह पगु अवनि कठोग। जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीपवाति नहि टारन कहऊँ। सोइसियचलनचहतियन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा। चद किरन रस रसिक चकोरी । रविरख नयनसकै किमिजोरी दो०-करि, केहरि, निसिचर चरहि, दुष्ट जतु वन भूरि । विपवाटिका कि सोह सुत. मुभग सजीपनि मूरि ॥८॥ पनहित कोल किरात किसोगे। रची विरंचि रिपय मुख भोर पारन मिजिमिकठिनसुभाऊ । तिन्हहि कलेसुन कानन के तापमतिय फाननजोगू । जिन्ह तप हेतु तजा सिययन यसिहि तातकेहिभातीचित्रलिखित कपि, माता कौशल्या से राम का निदा माँगना ~ Vvvvv सुर-सर सुभगवनज-धन चारी। डागर-जोग कि हंसकुमारी। अस विचारि जस आयसु होई । मे सिख देउँ जानकिहि सोई। जो सिय भवन रहै कह अवा । मोहि कह होइ बहुत अवलया। सुनि रघुवीर मातु-प्रिय-यानी । सील सनेह सुधा जनु सानी । दो०-कहि प्रियरचन विवेकमय, कोन्ह मातु-परितोप । लगे प्रमोधन जानकिहि, प्रगटि विपिन-गुन दोप ॥ ६॥ मातु समीप कहत सकुचाहीं । बोले समउ समुझि मनमाही । राजकुमारि सिसावन सुनह । आन भॉति जियजनिकछुगुनह ।। आपन मोर नीक जो चहह । यचनु हमार मानि गृह रहह । आयसु मोरि सासु-सेवकाई । सब निधिभामिनिभरनभलाई। एहि ते अधिक वरमु नहिं दूजा । सादर सासु ससुर पद पूजा । जनजय मातु करिहि सुधिमोरी। होइहि प्रेमनिकल मतिमोरी। तर तर तुम्ह कहि कथा पुगनी । सुदरि समुझायहु मृदु वानी। कहो सुभाय सपथ सत मोही । सुमुखि मातुहित राखो तोही। दो०-गुर-ति-समत धरमफ्लु, पाइअ रिनहिं फलेस । हठयस सब सकट सहे, गालन, नहुप नरेस ॥१०॥ मैं पुनि करि प्रमान पितुवानी । वेगि फिरपसुनुसुमुखि सयानी। दिवस जात नहिं लागिहियारा । सुदरि सिपवनुसुनहु हमारा। जा हट करह प्रेमयस यामा तो तुम्हदुतुपाउयपरिनामा । फाननु कठिन भयफर भारी । घोरयामु,हिम, यारि, पयारी। कुस कटक मग फॉकर नाना। चलत पयादेहिरिनु पदनाना । चरनकमल मृदु मजु तुम्हारे । मारग अगम भूमिधर मारे ।

३० मानस मकरन्द । कदर खोह नदी नद नारे । अगम अगाधन जाहिं निहारे। भालु वाघ वृक केहरि नागा। करहिं नादसुनि वीरजु भागा। दो-भूमिसयन पलकलवसन, असनु कद-फल-मूल । ते कि सदासय दिन मिलहिं, सवह समय अनुकूल ॥१६॥ नर अहार रजनीचर चरही। कपटवेप विधिकोटिककरहीं। लागै अति पहार कर पानी । विपिन विपति नहिं जाइ वखानी। 'व्याल कराल विहंग वन घोरा । निसिचर-निकर नारि-नर-चोरा। डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ । मृगलोचनि तुम्ह भीर सुभाएँ। हंसगवनि तुम्ह नहि धनजोग । सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू। मानस सलिल सुधा प्रतिपाली! जिअइकि लवनपयोधिमराली। नव-रसाल-बन बिहरनसीला । सोहकि कोकिल विपिन करीला । रहहु भवन अस हृदय विचारी । चदवदनि दुखु कानन भारी। दो०-सहज सुहृद-गुरु-स्वामि सिस, जो न करे सिर मानि । सो पछिनाई अघाइ उर, अवसि होइ हितहानि ||१२|| सुनि मृदुवचन मनोहर पिअके। लोचन ललित भरे जल सियके । सीतल सिख दाहक भै कैस । चकइहि सरदचद निसि जैसे । उतरुन आव विकल वैदेही । तजनचहत सुचिस्वामिसनेही। परवस रोकि विलोचनगरी। धरिधीरजु उरअरनिकुमारी। लागि सासुपग कह कर जोरी । छमरिदेविचडि अविनय मोरी। दीन्हि प्रानपति मोहि सिपसोई। जेहि विधिमोर परमदिन होई । मैं पुनि समुझि दोष मनमाही पित (1

माता कौशल्या से राम का यिदा माँगना
दोo-माननाथ करुनायतन, सुदर सुखद सुजान ।
तुम्ह यिनु रघु-कुल-कुमुद विधु, सुरपुर नरकसमान ॥१३॥
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई । प्रिय परिवार मुहृद समुदाई।
सासु ससुर गुरु सजन सहाई । सुत सुदर मुसील सुखदाई।
जहें लगि नाथ नेह अरु नाते । पियरिनुतियहि तरनिहते ताते।
तनु धनु धामु धरनि सुरराजू । पतिविहीन सयु सोकसमाजू ।
भोग रोगसम, भूपन भाम । जम-जातना-सरिस ससारू
प्राननाथ तुम्ह विनु जगमाहीं । मो कह सुखद कनहुँ कछुनाही ।
जिअग्नुि देह नदी विनु वारी । नेसिअ नाथ पुरप विनु नारी।
नाथ सकल सुख साथ तुम्हारे । सरद-विमल विधु-बदनु निहारे
दो०-खग मृग परिजन नगर वनु, पलकल रिमल दुफल ।
नाथ साथ सुर-सदन सम, परनसाल सुखमूल ॥२४॥
यनदेवी धनदेव
उदारा । करिहहिं सासु-ससुर-समसारा
कुस किसलय-साथरी सुहाई । प्रभु सँग मजु मनोज तुराई ।
कद मूल फल अमिअ अहारू । अवध साध-सत-सरिस पहारू।
छिन डिनमभु पदकमलविलोकी। रहिहामुदितदिवसजिमिकोकी।
बनदुप नाथ कहे बहुतेरे । भय विपाद परिताप घनेरे।
प्रमु-नियोग-लव-लेस समाना ।सर मिलि होहिं नकृपानिधाना ।
असजियजानिसुजान सिरोमनि। लेइअसग मोहि छाँडिअजनि ।
विनती यहुत करो का स्वामी । करुनामय उर-अतर-जामी ।
दो-राखिअअपधजोअवध लगि, रहत जानिअहि प्रान ।
दोनयधु सुदर सुखद, सील-सनेह-निधान ॥१५॥

मानस मकरन्द कंदर खोह नदी नद नारे । अगम अगाधन जाहिं निहारे। भालु वाघ वृक केहरि नागा। करहिं नादसुनि वीरजु भागा। दो०-भूमिसयन बलकलवसन, असनु कद-फल मूल । ने कि सदासय दिन मिलाह, सबइ समय अनुकूल ॥१९॥ नर अहार रजनीचर चरहीं। कपटवेष विधि कोटिक करहीं लागै अति पहार कर पानी । विपिन विपति नहिं जाइ वखानी- ब्याल कराल विहंग वन घोरा । निसिचर-निकर नारि-नर चोग। डरपहिं धीर गहन सुधिआएँ । मृगलोचनि तुम्ह भीर मुभाएं। हसगवनि तुम्ह नहिं वनजोगू । सुनि अपजसुमोहिं टेइहि लोग। मानस सलिल सुधा प्रतिपाली। जिअइकिलवनपयोधि मराली। नव-रसाल-चन विहरनसीला । सोहकि कोकिल बिपिन करीला। रहहु भवन अस हृदय विचारी । चदवदनि दुखु कानन भारी। दो०-सहज मुहद-गुर-स्वामि-सिख, जो न करे सिर मानि । सो पछिताई अघाइ उर, अवसि होइ हितहानि ॥१२॥ सुनि मृदुवचन मनोहर पिअके । लोचन ललित भरेजल सियके । सीतल सिप दाहक भै कैसें । चकइहि सरदचद निसि जैसे । उतरु न आर विकल घेदेही । तजन चहत सुचिस्वामिसनेही चरवस रोफि विलोचनगरी । धरिधीरजु उरअवनिकुमारी । लागि सासुपग कह कर जोरी । छमविदेविचडि अग्निय मोरी दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि विधिमोर परमहित होई । मैं पुनि समुभि दोष मनमाही पिय वियोग-सम टुगुजग नाही

माता से राम का बिदा मांगना
तब जानकी सासु पग लागी । सुनिय माय में परम अभागी।
सेवा समय देव यन दीन्हा । मोर मनोरथ सुफल न कीन्हा ।
तजर छोभुजनि छॉडिअछोह । करम कटिन कछु दोसुन मोह ।
सुनिसियरचन सासुअकुलानी । टसा कवनि विधिकहा यखानी ।
वारहि चार लाइ उर लीन्ही । धरिधीरज सिप आसिप दीन्ही।
अचल होउ अहियातु तुम्हारा । जलगिगग-जमुन-जल धारा।
दो०-सीतहि सासु असीस सिख, दीन्हि अनेक प्रकार।
चली नाइ पदपदुम सिरु, अति हित वारहिं बार ॥१८॥

मानस मकरन्द मोहि मगचलत न होइहि हारी । छिनु छिनुचरनसरोज निहारी। सहि भॉति पिय-सेवा करिहो। मारगजनितसकलनमहरिहो। पाय पसारि बैठ नरुलाही । करिहों वाउ मुदित मन माहीं। स्त्रम-कन-सहितस्याम तनु देखें । कह दुस समउ प्रानपति पेखें। सम महि तृन तरु-पजब डासी । पाय पलोरिहिसव निसिदासी। बार वार मृदु मूरति जोही । लागिहि ताति ययारि न मोही। कोप्रभुसँग मोहि चितवनिहारा सिंहबधुहिजिमिससक सिमारा में सुकुमारि, नाथ वनजोगू । तुम्हहिंउचिततप,मोकहें भोगू। दो०-ऐसेउ वचन कठोर मुनि, जो न हृदय विलगान । तोप्रभु विषम-वियोग-दुखु, सहिहहिं पॉवर प्रान ॥१६॥ अस कहि सीय विकलभैभारी । बचनबियोग न सकी सॅभारी। देखि दशा रघुपति-जिय जाना । हठि राखे नहिं राखिहि प्राना। कहेउ कृपाल भानु-कुल-नाथा । परिहरिसोचु चलवन साथा । नहिं विपाद कर अवसर आजू । चेगि करहु वन-गवन समाज कहि प्रियवचन प्रिया समुझाई । लगे मातुपद आसिप पाई गि प्रजादुस मेट्य आई। जननी निर विसरिजनि जाई फिरिहिदसाविधियटुरिक्रिमोरी। देखिही नयन मनोहर जोरी। मुदिन सुघरी तात का होइहि । जननी जिअत बदनविधुजोइहि दो०-बहुरियच्छकहि लानु कहि, रघुपति रघुवर तात। कवहिं बोलाइ लगाइ हिय, हरपि निरपिहो गात ॥१७॥ लजि सनेट कातरि महतारो। यचनु न आव यिकल मै भारी राम प्रयोध कीन्ह विधि नाना । समउ सनेह न जा बखाना ३५ सुमित्रा से लक्ष्मण का विदा मांगना मीन्हि मोहि सिख नोकि गोसाई। लागि अगम अपनी कढराई। रियर धीर धरम-धुर-धारी । निगम नीति कह ते अधिकारी। सिसु प्रभु-सनेह-प्रतिपाला । मदर मेर कि लेहि मराला । तुम पितु मातु न जाना काह । कहा सुभाउ नाथ पतिआह । नौ लगि जगत सनेह सगाई । प्रीतिप्रतीति निगम निलु गाई । और सरह एक तुम्ह स्वामी । दीनवयु उर - अन्तग्जामी परम नीति उपदेसि ताही । कोरति भूति सुगनि प्रिय जाही। नि-काम-वचन-चरनरत होई । कृपासिधु परिहरिअकि सोई ? to-फरनासिंधु सुयधु के, सुनि मृटु वचन विनीत । समुझाए उर लाइ प्रभु, जानि सनेह सभीत ॥३॥ गहु विटा मातु सन जाई । आवह वेगि चलहु वन भाई । दित भये सुनि रघुवर यानी । भयेउ लाभ रड, गइचडि हानी। रपिन दृदय मातु पहिं आए । मनहूँ अध फिर तोचन पाए । इ जननि-पग नायेउ माया । मनु रघुनदन-जानकि-साथा। के मातु मलिन मन देखी। लपन कही सरकथायिसेगी। ई सहमि सुनि वचन कठोरा । मृगीदेखि दवजनु चहुँ ओरा। पिन लपेउ भा अनरध आजू । एहि सनेह उस फरव अकाज। गत विदा सभय सकुचाहीं । जाइ मग,विधि,कहहिकिनाही । 10-समुझि नुमित्रा राम-सिय-रुपु-लुसीलु-मुभाउ । नृपसनेह लपि धुनेउ सिर, पापिनि दीन्ह कुदाउ ॥ ८ ॥ रज धरेउ अवसर जानी । सहज सुदृद चोली मृदुयानी। नि तुम्हारि मातु येदेही । पिता गमु सब मॉति सनहीं ।

माता सुमित्रा से लक्ष्मण का विदा मांगना समाचार जर लछिमन पाए । व्याकुल चिलखबदन उठि धाए । कप पुलक तन नयन सनौरा । गहे चरन अतिप्रेम अधीरा। कहिनसकत कछु चितवत ठाढ़े । मोनु दीनु जनु जल ते काढ़े। सोचु हृदय विधि का होनिहारा । सरसुखुसुकतु सिरान हमारा। मो कहें काह कहव रघुनाथा । रसिहहिंभवनकिलेहहिं साथा। राम विलोकि बंधु कर जोरें । देह गेह सब सन तुन तोर वोले वचनु राम नयनागर ! सील-सनेह-सरल सुख सागर। तात प्रेमवस जनि कदराह । समुझि हृदय परिनाम उछाह । दो०-मातु-पिता-गुर-स्वामि सिस, सिरधरिकरिहिसुभाय । लहेउ लाभ तिन्ह जनम कर, न तरु जनमुजग जाय ॥१॥ असजिय जानिसुनहु सिख भाई । करहु मातु पितु-पद-सेवकाई । भवन भरत रिपुसूदनु नाहीं । राउ वृद्ध, मम दुप मन माहीं। मै बन जाउँ तुम्हहिं लेइ साथा । होइसयहिंविधिअवध अनाथा। गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू । सव कह परै दुसह-दुख भारू । रहहु करहु सव कर परितोपू । नतर तात होइहि वड दोष।' जासु राज प्रिय प्रजा दुसारी। सोनपुअवसि नरकअधिकारी। रहहु तात अस नीति विचारी । सुनत लपनु भए व्याकुलभारी । सिअरे बचन सूपि गए केसे । परसत तुहिन तामरस जैसे। दो०-उतर न आवत प्रेमयस, गहे चरन अकुलाइ । नाथ दासु मै स्वामि तुम्ह, तजहु त कहा बसाइ ॥२॥ . 4 केवट की भक्ति हो०-रथ हॉकेउ, हय रामतन, हेरि हेरि हिहिनाहि । देखि निपाट विषादरस, धुनहिं सीस पडिताहिं ॥ १ ॥ जासु वियोग विकल पसु ऐसे । प्रजा मातु पितु जीहहिं कसे । परपस राम सुमनु पठाए । सुरसरितीर आय तर आए । मॉगी नाव न केवट आना । कहे तुम्हार मरमु म जाना । चरन कमत-रज कहॅसबु कहई । मानुपकरनि मूरि कछु अहह । छुअत सिला भइ नारि सुहाई । पाहन ते न काठ कठिनाई । तरनिउँ मुनिघग्नी होइ जाई । याट पर मोरि नार उडाई । एहि प्रतिपाला सयु परिवारू । नहिं जानो क्छु और क्यारू । जो प्रभु पार अपसि गा चहह । मोहि पदपदुम पपारन कहह । उद-पदकमल धोइ चढाइ नार न नाथ उतराई चहो । मोहि राम राउरि आनि दसरथ सपथ सर सॉची कहा ॥ रु तीर मारह लपनु पेजर लगि न पाय पसारिहो। तर लगि न तुलसीदास नाथ कृपालु पारु उतारिहा ॥ सो०-सुनि केवट के चयन, प्रेम लपेटे अटपटे । रिसे करना-अयन, चिते जानकी लपन-तन ॥ ॥ चोले मुसुझाई । सोदकर जेहि तर नारन जाई। गि आनु जल पाय पखारू । होत विल्य, उतारहि पारू । जासु नाम सुमिरत एक बारा । उतरहिं नर भासिधु अपारा । - कृपासिंधु

मानस मकरन्द
नाही
अवध तहाँ जहँ राम-निवासू । तहइँ दियसु जहँ भानुप्रसम्!
जो पं सीय-गमु वन छाहीं । अग्ध तुम्हार काजु कछु नाहीं ।
गुर पितु मातु बधु सुर साई । सेडअहि सफल प्रान की नाई
राम प्रान प्रिय जीवन जी के । सारथरहित सखा सवही थे।
पूजनीय प्रिय परम जहाँ ते । सर मानिअहि राम के नाते
अस जिय जानि सग वन जाह । लेहु तात जग जीवन लाह
दो०-भूरि भागमाजन भयहु, मोहि समेत चलि जाउँ ।
जो तुम्हरे मन छॉडि छलु, कीन्ह रामपद ठाउँ ॥५
पुत्रवती जुरती जग जोई । रघु-पति-भगतु जासु सुतहों
नतर यॉझभलि, वादि रिआनी । रामविमुख सुत ते हित-हानी
तुम्हरेहि भाग राम वन जाही। दूसर हेतु तात कछु
सकल सुकृत कर वड फल एह । राम-सीय-पद सहज सनेह
रागु रोषु इरिपा मदु मोह । जनि सपनेहु इन्हके बस हो
सफल प्रकार विकार रिहाई । मन क्रम वचन करेहु सेवका
तुम्ह कहुँ वन सरभाँतिसुपासू। संगपितु मातु राम-सियजा
जेहि न रामु वन लहहिं कलेम् । सुत सोइ करेहु इहै उपदे
छट-उपदेसु एहु जेहि जात तुम्हरे रामसिय सुख पावई
पितु-मातु-प्रिय-परिवार,पुर-सुप,सुरति वन यिसरावही
तुलसी सुतहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिप द
रति होउ अविरल अमल सिय-रघु-बोर-पद नित नित
सो०-मातुचरन सिर नाइ, चले तुरत सकित हृदय ।
वागुर विषम तोराइ, मनहुँ भाग मृगु भागबस ॥

भरत की व्याकुलता दो०-पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु, गॅयहिं जोहारहिं जाहि । भरत कुसल पूछि न सकहिं, भय विवाद मन माहिं ॥२॥ हाट याट नहि जाहिं निहारी । जनुपुर दहॅ दिसि लागिदारी। आरत सुन मुनि कैकयनदिनि । हरपी रवि-कुल जलरह चदिनि सजि आरती मुदित उठि बाई । द्वारहिं मटि भवन लेइ आई। भरत दुखित परिवार निहारा । मान? तुहिन बनजरनु मारा। के हरपित पहि भाँती । मनहुँ मुदित दव लाइ किराती। सुनहि ससोच देपि मनु मारें। पूछति नैहर कुसल हमारें । सकल कुसल कहि भरत सुनाई । पूछी निज कुल-कुसल भलाई । कहु कहें तात कहाँ सय माता । कहॅ सियरामुलपन प्रियभ्राता। दो०-सुनि सुन वचन सनेहमय, कपटनीर भरि नयन । भरत अरन मन सूल सम, पापिनि बोली अयन ॥२॥ नान यात मै सकल सॅचारी । भइ मथरा महाय रिचारी। कछुक काज विधि नीच विगारेउ । भूपति सुर पति पुर पगुधारउ। सुनत भग्न भयविवस विवादा । जनु सहमेउ करि केहरिनादा। तात नात हा तात पुकारी। परे भूमितल व्याकुल भारी। चलन न देखन पाये तोही । तात न रामहि सोपेहु मोही। बहुरि धीर धरि उठे सँभारी । कहु पितु-मरन हतु महतारी । मुनि मुनरचन कहति कैई । मरमु पॉछि जनु माहुर हेई । आदिहु ते मर आपनि करनी । कुटिल कठोर मुदितमन यानी।

३८ मानस मकरन्द N । सोर रुपालु केवटहि निहोरा जेहिजगु किपतिहुँ पगहुँ तथा पदनप निरपि देवसरि हरपी । सुनि प्रभुश्चन मोह मति करपी। केट रामरजायसु पावा । पानि कठवताभरिलेइ आग। अति आनद उमगि अनुरागा । चरनसरोज पसारन लागा। रपिसमन सुरसफल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुज कोउ नाहीं। दो०-पद पपारि जनु पान करि, आपु सहित परिवार । पितर पार करि प्रभुहिं पुनि, मुदित गयेउलेपार ॥ ३॥ उतरि ठाढ़ भए सुरसरिरेता । सीय रामु गुर लपन समेवा केवट उतरि दडवत कीन्हा । प्रभुहिसकुच एहिनहि फलुदीन पियहिय की सिय काननिहारी। मनिमुंदरी मन-मुदित उतारी कहेड कृपाल लेहि उतराई । केवट चरन गहे अकुलाई नाथ आजु में काह न पाना । मिटे दोप-दुस-दारिद दावा बहुत काल में कीन्हि मजूरी ।आजुदीन्हि विधि धनिभलिभूर अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह फिरती बार मोहि जोइ देवा । सो प्रसादुम सिर धरि ले। दो०-बहुत कीन्ह प्रभु लपन सिय, नहि कछु केचट लेइ। विदा कीन्ह करुणायतन, भगति विमल वरु देव ॥ तो - ।

भरत की व्याकुरता VW सुनि सत्रुमन मातुकुटिलाई । जरहिं गात रिस, कछुन घसाई। तेहि अवसर कुवरी तहँ आई । वसन विभूषन विचित्र बनाई। -लखि रिस भरेउ लपन लघु-भाई । वरत अनल घृतआहुति पाई । हुमगि लात तकि कृरर मारा । परि मुँह भरिमहि करत पुकाग। कूर टूदेउ, फट कपारू । दलित दसन मुख धिरप्रचारू। आह दइअ मे काह नसावा । करत नीक फलु अनइस पाना । सुनिरिपुहन लपिनस सिखपोटी।लगेघसीटन धरि धरि झोटी। भरत दयानिधि दोन्ह छुडाई । कौसल्या पहिगे दोउ भाई। दो० मलिन बसन विवरन विकल, कृस सरीर दुपभारु ! कनक-फलप-वर-लि-चन, मानहें हनी तुपार ॥१॥ भरतहि देखि मातु उठि धाई । मुरडित अपनि परी झंड आई देखत भरतु चिकल भए भारी । परे चरन तनदसा विमारी। मातु तात कह देहि देपाई। कहें सिय रामुलपनु दोउ भाई । इका कत जनमी जग माझा । जो जनमितमइकाहे न पॉझा। कुलकलकु जेहि जनमेउ मोही । अपजसभाजन प्रिय जन द्रोही। कोत्रिभुवनमोहिसरिसअभागी। गतिअसितोरिमातु जहिलागी। पितु सुरपुर, बन रघु-घर केतृ । में केवल सर अनग्थहेत । धिगमोहि भयेउँनु बन आगी। टुसह-दाह-दुप दृपन भागी। दो०-मातु भरत के वचन मृदु मुनि पुनि उठी सँभारि । लिये उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति पारि ॥७॥ सरल सुभाय माय हिय लाए । अतिहित मनहें गम फिरिआरा भेंटउ बटुरि लपन लघु भाई । सोकु सनेहु न दृट्य समाई।

मानस-मकरन्द जय ते कुमति कुमत जिअ ठयेऊ। खड पड़ होइ हृदय नगयेऊ।। भूप प्रतीति तोर किमि कीन्ही । मरन काल विधिमति हरिलीन्हीं। विधिहुन नारिहृदयगतिजानी। सफल कपट-अघ-अवगुण खानी दो-भरतहि विसरेउ पितुमरन, सुनत राम-उन-गौनु । । हेतु अपनपउ जानि जिअ, थकित रहे धरि मौनु ॥३॥ चिकलविलोकिसुतहिसमुझावति । मनहुँ जरे पर लोनुलगायति । तात राउ नहिं सोचइ जोगू। विदा सुकृत जसु कीन्हेउ भोग। जीवत सकल जनम-फल पाए । अंत अमर पति सदन सिधाए अस अनुमानि सोचु परिहर । सहित समाज राज पुर कर सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू । पाके छतु जनु लाग अॅगार धीरजु धरिमरिलेहिं उसासा । पापिनिसबहिं भॉति कुल नासा जो पै कुरचि रही अस तोही । जनमत काहे न मारेसि मोही पेड काटि तै पालउ सीचा । मीनजिअन निति वारि उलोचा। दो०-हसरसु दशरथु जनकु, राम लपन से भाइ। जननी त जननी भई, निधि सन कछु न बसाइ ॥४॥ घर मॉगत मन भइ नहिं पीरा । गरिन जीह, मुँह परेउ न कीरा! सरल सुसील धमरत राऊ । सो किमि जानै तीयसुभाऊ! अस को जीव जंतु जग माहीं । जेहि रधुनाथ प्रान प्रिय नाहीं । भे अति अहित राम तेउ तोही । को तूं अहसि सत्य कटु मोही जोहसिसो हसि मुंह मसिलाई । आँति ओट उठि घेठहि जाई। दो०- o-गम विरोधी हृदय ते, प्रगद कीन्ह विधि मोहि । मो समान को पातकी, वाटि कहाँ कछु तोहि ॥ ५॥ . . - भरत की व्याकुलता जे अब मातु पिता-सुत मारे । गाइगोठ महि सुर-पुर जारें। जे अघतिय-चालक यध कीन्हे । मीत महीपति माहुर दीन्हे । जे पातक उपपातक अहही । करम वचन मन भर करिकहहीं ते पानक मोहि होह विधाता । जो एह होइ मोर मत माता। दो०-जे परिहरि हरि-हर चरन, भजहिं भूतगन घोर । तेहि के गति मोहि देउ रिधि, जो जननी मत मोर॥१०॥ वेचहिं वेदु धरम दुहि लेही । पिसुन पराय पाप कहि देहीं। कपटी कुटिल कलहप्रिय कोधी । वेदविदूषक स्त्रिविरोधी। लोभी लपट लोलुपचारा । जे ताकर्हि परधनु परदारा । पारो मे तिन्ह के गति घोरा । जा जननी एटु समत मोरा। जे नहिं साधुसग अनुरागे । परमारथपथ निमुख अभागे। जैन भजहि हरि नरतनु पाई । जिन्हहिं न हरि हर सुजस सुहाई तजि श्रुतिपथ यामपथ चलहीं । वचक विरचि चेषु जगु छलही। तेन्ह कै गति मोहि सकर देऊ । जननी जो एड जानो भेऊ दोo-मातु भरत के वचन सुनि, सॉचे सरल सुभाय । कहति रामप्रिय तात तुम्ह, सदा वचन मन काय ॥ ११ ॥ राम प्रान ते प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहिं प्रान ते प्यारे । रिधुरिष चवे नवै हिमु आगी। होइ वारिचर वारिविरागी। भर ज्ञान पर मिटे न मोह । तुम्ह रामहिं प्रतिकूल न होस् । मत तुम्हार एह जो जग कहहीं । सोसपने सुखसुगति न लहहीं अस कहि मातु भग्तु हिय लाए । यन पय स्रनहिं नयनजल छाए। परत रिलाप यहुन एहि माती । येठेहि बोति गई सर राती । N ।

३२ मानस-मकरन्द an देखि सुभाउ कहब सर कोई । राममातु अस कहे न हाई। माता भरतु गोद बैठारे । ऑसु पोछि मृदुवचन उचारे। अजहुँ यच्छु, बलि, धीरज धरह। कुसमउसमुझिसोक परिहरह। जनि मानहु हिय हानि गलानी । काल करम-गति अघटित जानी। काहुहि दोस देहु जनि ताता । भामोहि सब विधि वाम विधाता जो एकेहु दुप मोहि जिआवा । अजहुँ को जाने का तेहि भावा । दो०-पितुआयसु भूपन बसन, तात तजे रघुनीर । पिसमउ हरप न हृदय कछु, पहिरे बलकल चीर ॥८॥ . सुखप्रसन्न मन रग न रोपू । सव करसव यिधिकरि परितोष चले रिपिन सुनिसिय सॅगलागी । रहै न राम-चरन-अनुरागी। सुनतहि लपनु चले उठि साथा । रहहिं न जतन किए रघुनाथा । तब रघुपति सवही सिरु नाई । चले सग सियअर लघु भाई। रामु लपनु सिय वनहिं सिधाए । गाउँ न सग न प्रान पठाए । एहु सबुभा इन्ह ऑसिन्ह आगे । तउ न तजा तनु जीव अभागे। मोहि न लाज निज नेह निहारी । रामसरिस सुत मे महनारी । जिअइ मरइ भल भूपति जाना । मोर हृदय सत-कुलिस समाना दो०-कौसरया के वचन सुनि, भरतसहित रनिवासु । व्याकुल विलपत राजगृह, मानहुँ सोकनिवासु ॥६॥ बिलहि विकल भरत दोउभाई । कौसल्या लिए हृदय लगाई। भॉति अनेक भरतु समुझाए। कहि विकमय वचन सुनाए । भरतहु मातु सफल समुझाई । कहि पुरान श्रुति कथा सुहाई। छलविहीन सुचि सरल सुवानी । योले भरत जोरि जुग पानी। - ।

भरत की व्यापुरता ४३ है अर मातु पिता-सुत मारें। गाडगोठ महि-सुर-पुर जाएँ। में अघतिय-चालक रध कीन्हे । मीत महीपति माहुर दीन्हे । ने पातक उपपातक अहही । करम पचन मन भव करिकहहीं ले पानक मोहि होहु विधाता ! जा एह होइ मोर मत माता । दो०- परिहरि हरि हर चरन, भजहिं भूतगन घोर । तेहि के गति मोहि देउ निधि, जो जननी मत मोर॥२०॥ वेचहिं वेदु परम दुहि लेही । पिसुन पराय पाप कहि देहीं । कपटी कुटिल कलहप्रिय कोधी । वेदविदूषक विसतिरोधी। लोभी लपट लोलुपचारा । जे ताकर्हि परधनु परदारा। पावो म तिन्ह के गति गोरा । जा जननी एहु समत मोरा। 'जे नहिं साधुसग अनुरागे। परमारथपय चिमुप अभागे। जे न भजहि हरि नरतनु पाई । जिन्हहिं न हरि हर-सुजस सुहाई तजि श्रुतिपथ वामपथ चलहीं । वचक विरचि येषु जगु छलही। तिन्ह के गति मोहि सकर देऊ । जननी जो एहु जानो भेऊ। दौo-मातु भरत के बचन सुनि, साँचे सरल सुभाय । कहति रामप्रिय तात तुम्ह, सदा पचन मन काय ॥ १२ ॥ राम प्रान ते प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिथि प्रान ते प्यारे । वितुनिष चवै नवे हिमु आगी। होइ बारिचर चारिनिरागी । भए मान घर मिटे न मोह । तुम्ह रामहि प्रतिकूल न हो । मत तुम्हार एह जो जग कहहीं । सोसपनेहुँ सुपसुगति न लहही अस कहि मातु भरतु हिय लाए । थन पय सरहिं नयनजल छाए। करत रिलाप बहुत एहि भाँती । वैठेहि घीति गई सर राती ।

मानस मकरन्द 4.1%Anna । वामदेउ वसिष्ठ तय आए । सचिवमहाजन सकल योलाए। मुनि बहु भॉति भरत उपदेसे । कहि परमारथ बचन सुदेसे । दो०-तात हृदय धीरजु धरहु, करहु जो अवसर आजु । उठे भरत गुरवचन सुनि, करन कहेउ सव साजु ॥ १२ ॥ नृपतनु वेद विहित अन्हवाचा । परम विचित्र विमान नावा गहि पग भरत मातु सब राखी । रहीं राम दरसन अभिलाखी । चंदन अगर-भार वहु आए । अमित अनेक सुगध सुहाए। सरजुतीर रचि चिता बनाई । जनु सुर-पुर-सोपान सुहाई। पहि विधि दाहक्रिया सब कीन्ही। विविवतन्हाइ तिलाजुलि दीन्ही सोधि सुमृति सच वेद पुराना । कीन्ह भरत दसगात विधाना। जहॅ जस मुनिवर आयमुदीन्हा । तहतस सहसभॉति साकीन्हा भप विसुद्ध दिये सब दाना । येनु वाजि गज वाहन नाना । दो०-सिंघासन भूपन वसन, अन्न धरनि धन धाम । दिये भरत लहि भूमिसुर, मे परिपूरन काम ॥ १३ ॥ पितुहित भरत कीन्ह जसि करनी।सोमुख लाख जाइ नहिं चरनी । सुदिनु सोधिमुनिपरतब आए । सचिव महाजन सकल बोलाये। बैठ राजसभा सर जाई । पठप वोलि भरन दोउ भाई । भरतु वसिष्ट निकट पैठारे । नीति नरम-मय वचन उचारे। प्रथम कथा सय मुनिवर परनी । काकइ कुटिल कोन्ह जमिकरनी भूप धरमवतु सत्य सराहा । जेहितनु परिहरिप्रेम नियाहा । कहत राम गुन सीलु सुभाऊ । सजल नयन पुलकेउ मुनिरा! चहुरिलपन सिय प्रीति यसानी । सोक सनेह मगन मुनिग्यानी।

भरत की व्याकुरता दो०- -सुनह भरत भावी प्ररल, बिलप कहेउ मुनि नाथ । हानि लाभु जीवन मरनु, जसु अपजसु विधि हाय ॥ १४ ॥ अस विचारि केहि देइअ दोपू । व्यरथ काहि पर कीजिअ रोष। तात विचार करहु मन माहीं । सोचुजोगु दसरथु नपु नाही। सोचिअ चिन जो येद विहीना । तजिनिज धम्मु विषय लपलीना सोचिअ नृपति जोनीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रानसमाना सोचिअ वयसु कृपन धनवान् । जो नअतिथि सिगभगति मुजानू सोचिअ सद विप्र-अवमानी । मुसरु मानप्रिय ग्यानगुनमानी। सोचिअ पुनि पतिश्चक नारी । कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी। सोचिस वटु निज बतुपरिहरई । जो नहिं गुर आयसु अनुसरई। दो० सोचिअ गृह जो मोहास, कर करमपथ त्याग। सोचिअ जती प्रपचरत, विगत विक चिराग ॥ १५ ॥ पानस मोइ सौचन जोगू । नपु विहाइ जेहि भावै भोग । सोचिय पिसुन अकारन क्रोधी । जननि-जनक-गुरु-वधु निरोधी। सरविधि सोचिअपर अपकारी। निज तनुपोषक निरदय भारी। सोचनीय सवही निधि सोई । जो न डॉडि छलु हरिजन होई ॥ सोचनीय नहिं कोसलराऊ । भुवन चाग्दिस प्रगट प्रभाऊ। भयेड, न अहै, न अर होनिहारा ! भूप भरत जस पिता तुम्हारा। विधिहरिहर सुरपति दिसिनाथा।रग्नहिं सब दसरथ गुन गाथा। दो०-कहहु तात केहि भॉति कोउ, करहि वडाई तासु । राम लपन तुम सहन, सरिस सुअन सुचि जासु॥१६॥ सर प्रकार भूपति पदभागी । यादि विषादुकरिअतेही लागी ४६ मानस मकरन्द । एटु सुनि समुझि सोचुपरिहरह । सिर धरि राजग्जायसु करह। राय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा । पिताश्चनु फुरचाहिम कीन्हा। तजे रामु जेहि पचनहि लागी । तनु परिहरेउ रामविरहागी। नृपहि यचन प्रिय,नहि प्रिय प्राना । करहु तात पितुवचन प्रचाना। फरह सीस धरि भूपरजाई । है तुम्ह कह सरभॉति भलाई। परसुराम पितुअग्याँ राखी । मारी मातु, लोग सय सासी! तनय जजातिहि जीवनु दयऊ । पितुअग्या अघअजसु नभयऊ। दो०-अनुचित उचित विचार तजि, जे पालिहिं पितु क्यन । ते भाजन मुख सुजस के, घसहिं अमरपति-अयन ॥१७॥ अपसि नरेस वचन फुर करह । पालहु प्रजा, सोक परिहरह। सुरपुर नुपु पाइहि परितोपू । तुम्हकहसुकृतुसुजसु, नहिंढोधू वेदविदित समत सबही का । जेहि पितु देइ सो पावै टीका। करहु राजु परिहरहु गलानी । मानहु मोर वचन हित जानो। सुनि सुखु लहव रामदेही । अनुचित फहन न पडित कही। कौसरयादि सकल महतारी । तेउ प्रजासुख होहिं सुखारी। मरम तुम्हार राम फर जानिहि । सोसवरिधितुम्हसनभलमानिहि सापेटु राजु राम के आएँ । सेवा करेहु सनेह सुहाएँ। दो०-कीजिअ गुरु आयसुअवसि, कहहिं सचिव कर जोरि । रघुपति आएँ उचित जस, तस तय करव बहोरि ॥१८॥ कौसिल्या धरि धीरजु कहई । पूत पथ्य गुरु आयसु अहई । सो आदरिअ करिअहित मानी । तजिअ विपादु कालगति जानी। बन रघुपति, सुरपुर नरनाहू । तुम्ह एहि भॉति तात कदराह। . । - . दो०-पितु सुरपुर सियराम वन, करन कहहु मोहि राजु। भरत की प्याकुरता परिजन प्रजा सचिव मय अगा। तुम्हही सुत सरकअरलगा। लपि विधि धाम कालुकठिनाई । धीरजु धरह मातु बलि जाई। सिर धरिगुरआयसु अनुसरह । प्रजा पालि परि-जन दुख हरह। गुर के पचनसचिव अभिनदनु । सुने भरत हिय हित जनुचदनु सुनी रहोरि मातु मृदुवानी । सील सनेह सरल रस सानी। -छद-सानी सरल रस मातुवानी सुनि भग्तु प्याकुल भए । लोचनसरोवह श्रवत सींचत चिरह उर अकुर नए ॥ सोदसा देखत समय तेहि रिसरी सहि मुधि देह की। तुलसी सराहत सफल सादर सीव सहज सनेह की ॥ रो०-भरत कमलकर जोरि, धीर-धुर-धर धीर धरि । वचनु अमिअ जनु योरि, देत उचित उत्तर सहि ॥१६॥ गेहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका । प्रजा सचिव समत सयही का। गतु उचित परि आयसुदीन्हा । अपसिसीसरि चाहो कोन्हा पुग पितु-मातु-स्वामि हित-यानी।सुनिमनमुदितकरिअभलिजानी उचित कि अनुचितकिए विचारू। धरमु जाइ मिर पातक भारू । तुम्ह तो देउ सरल सिख सोई । जो आचरत मोर भल होई । जद्यपि यह समुझत हो नीके । तदपि होत परितोषु न जी के। अब तुम्ह विनय मोरि सुनि लेह। मोहि अनुहरत सिवाननु देह । उत्तर • देउँ छमय अपराधू । दुखित-दोप-गुन गनहि न साधू। - एहि ते जानहु मोर हित, के आपन बड काजु ॥२०॥ हित हमार सिय पति सेवकाई । सो हरि लीन्हि मातु-कुटिलाई।

द मानस मकरन्द M . मै अनुमानि दीस मन माहीं । आन उपाय मोर हित नाही सोकसमाजु राजु केहि लेखे । लपन-राम-सिय-पद पिनु देखें बादि यसन दिनु भूपन-भारू । वादि विरति विनु ब्रह्मविचारू । सरुज सरीर बादि बहु भोगा । विनुहरिभगति जाय जप जोगा। जायं जीव विनु देह सुहाई । बाटि मोर सत्रु विनु रघुराई। जाउ गम पहि आयसु देह । एकहि ऑफ मोर हित एह। मोहिनूपुकरिभल आपन चहह । सोउ सनेह जडतापस कहह । दो-कैकेइसुअन कुटिल मति, रामविमुप गतलाज । तुम्ह चाहत सुखु मोहवस, मोहि से अधमु के राज ॥२१॥ कहोसॉच सय मुनि पतियाह । चाहिअ धरमसील नरनाहा मोहि गजु हठि देइहह जनहीं । रसा रसातल जाइहि तवहीं । मोहि समान को पापनिवास । जेहि लगि सीयराम वनवास्तू । राय राम कहुँ कानन टीन्हा । पिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा। मै सठ सर अनरय करि हेतृ । बैठ बात सय सुनो सचेतू। विनु रघुवीर विलोकिय वासू । रहे प्रान सहि जग उपहास । गम पुनीत विषयरस रूखे । लोलुप भूमिभोग के भूखे । कहें लगि कहो हृदय-कठिनाई। निदरि कुलिमुजेहि लही बडाई। दो०-कारन ते कारजु कटिन, होइ दोसु नहिं मोर । कुलिस अस्थि ते उपल ते, लोह कराल कठोरः ॥२२॥ कैईभव अनुरागे । पारन पान अघाड अभागे। जो प्रियविरह प्रान प्रिय लागे। देखच सुनव यद्भुत अन आगे। लपन गम सिय कहुँ धनु दीन्हा। पढ़ अमरपुर पतिहित कीन्हा।

भरत की व्याकुलता - . लीन्ह विधवपन अपजसु आपू । दीन्हेउ प्रजहिं सोकु सतापू । मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराज। कीन्ह कैकई सव कर काजू । रहि ते मोर फाह अब नीका । तेहि पर देन कहत तुम्ह टीका। कैकईजठर जनमि जग माहीं । एकमोहिकहँकछुअनुचितनाहीं नोरि गत सर विधिहि बनाई । प्रजा पॉच कत करहु सहाई। ०-ग्रहग्रहीत पुनि वातास, तेहि पुनि गछी मार । तेहि पिआइअ वारनी, कहहु कवन उपचार ॥ २३ ॥ कका सुअन-जोग जग जोई । चतुर विरचिदीन्ह मोहि सोई। दशरथतनय राम लघु-भाई ।दोन्हि मोहि विधि वादि बडाई। तुम्ह सबु कहहु कढावन टीका। रायरजायसु सर कह नीका । इतर देउँ केहि विधि केहि केही । कहहु सुसेन जथारुचि जेही । मोहि कुमातु समेत निहाई । कहहु हिहि के कीन्हि भलाई । नो बिनु को सचराचर माहीं । जेहि सियरामु प्रानप्रिय नाहीं। नरम हानि सा फह बड लाह । अदिन मोर नहिं दूपन का । सय सील प्रेमवस अहह । सनु उचितमजोफतु फहट । दा०-राममातु सुठि सरलचित, मो पर प्रेमु सिसि । कहे सुभाय सनेहवस, मोरि दीनता देखि ॥ २४ ॥ गुरिक सागर जग जाना जिन्हहि विस्य कर-यदर समाना नो कहुँ तिलकसाज सज सोऊ। भएयिधि विमुपरिमुपसयकोजा मरिहरि रामुसीय जग माहीं । कोउ न कहिहि मोरमत नाहीं। मा मै सुनव सहब सुप मानी । अता फाँच तहाँ जहं पानी । दान माहि जग कहिहिकिपोचू। परलोकहु कर नाहिंत सोचू । ४ मानस-मकरन्द एक उर वस दुसह दयारी ।मोहि लगिभे सियराम दुखारी। जीवनलाहु लपन भल पावा । सबु तजि रामचरनु मनलाग । मोर जनम रघुवरवन लागी । झूठ फाह पछिनाउँ अभागी । दो०-आपन दारुन दीनता, कहाँ साहिं सिर नाइ । देसे विनु रघुनाथ पद, जिय के जरनि न जाइ ॥ २५ ॥ आन उपाउ मोहि नहिं सूमा । को जिय कैरघुवर यिनु वूमा। एकहि ऑफ इहै मन माहीं। प्रातकाल चलिहो प्रभु पाही। जद्यपि में अनमल अपराधी । भइ मोहिकारन सकल उपाधी। तदपि सरन सनमुपमोहिदेगी। छमिसवकरिहहिकृपाधिसेखो। सीलुसकुचिमुठिसरल सुभाऊ। कृपा - सनेह - सदन रघुराऊ । अरिहु क अनभल फोन्ह नरामा। मैं सिसु सेवकु जद्यपि वामा ।। तुम्ह पै पाँच मोर भल मानो । आयसु आसिप देहु सुवानी ।। जेहि सुनिचिनयमोहिजनुजानी। आनहिं बहुरि गम रजधानी । दो०-जद्यपि जनमु कुमातु ते, मे सठ सदा सदोस । आपन जानिन त्यागिहर्हि, मोहि रघुवीरभरोस ॥ २६॥ .

भरत-स्वभाव चित्रण जगु भयमगन गगन भइ वानी । लषन वाहु वलुपिपुल वखानी । तात प्रतापप्रभाउ तुम्हारा । को कहि सके, को जाननिहारा। -अनुचित उचित काज किछु होऊ। समुझि करिअ भल कहसव कोऊ। सहसा करि पाछे पछिताही । कहहिं वेद बुध ते सुध नाही। सुनि सुरवचन लपन सकुचाने । राम सीय सादर सनमाने । कही तात तुम्ह नीति सुहाई । सब ते कदिन राजमदु भाई । जो अचवत मॉतहिं नृप तेई । नाहिंन साधु सभा जेहि सेई । सुनहु लपन भल भरतसरीसा। विधिप्रपच महें सुना नदीसा। दो०-भरतहि होइ न राजमदु, विधि हरि हर पद पाउ । फयहुँ सि कॉजीसीकरनि, छोरसिंधु विनसाइ ॥६॥ गुरुअनुरागु भरत पर देखी । रामहृदय आनदु बिसेखी। भरतहिं धरम धुरधर जानी। निज सेवक नन मानस पानी । गुरु आयसुअनुकृला। वचन मजुदु मगलमूला । नाथ सपथ पितु चरन दोहाई । भयेउ न भुवन भरतसम भाई। गुर पट अगुज अनुरागी । ते लोकहुँ वेदहें घडभागी । राउर जा पर अस अनुरागू । को कहि सके भरत कर भागू। लघुग्धु गुद्धि सकुचाई । करत बदन पर भरतवडाई । भरतु कहहि सोइ कि लाई । अस कहि राम रहे अरगाई। दो०-तर मुनि बोले भरत सन, सर सँकोचु नजि नात । . लखि मानस मकरन्द दो०-ससि गुर तिय गामी नहुपु, चढ़े उ भूमि सुर जान । - लोकवेद ते चिमुस भा, अपम न घेनसमान ॥३॥ सहसवाहु मुरनाथ त्रिसकू। केहि न राजमद दीन्ह क्लक। भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ । रिपुरिन रच न राखब काऊ । पक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे गम जानि असहाई । समुझि परिहि सोउआजुरिसेखी। समर सरोप राममुख पेखी पतना कहत नीतिग्स भूला । रन रस विटपपुलक मिसफूला- प्रभुपद यदि सीसरज रासी । बोले सत्य सहज घलु भाषी अनुचित नाथ न मानर मोरा । भरत हमहि उपचरा न थोरा। कह लगिसहिअ रहिअ मन मारे । नाथसाथ धनु हाथ हमारे दो०-उविजाति रघु-कुल जनमु, रामअनुग जगु जान । लातहुँ मारें चदति सिर, नीच को धृरिसमान ॥४॥ उठि कर जोरि ग्जायसु माँगा । मनहें वीररस सोवत जागा याँधि जटा सिर कसि कटि माया । साजि सरासनु सायकु हाथी आजु रामसेवक जसु लेऊँ ।भरतहि समर सिखापन देऊ रामनिरादर कर फलु पाई । सोवहु समरसेज दोउ भा आइ यना भल सकल समाजू । प्रगट करो रिस पाधिलि आ जिमि करिनिकर दलै मृगराजू। लेइ लपेटि लगा जिमि घार तैसेहि भरतहि सेनसमेता । सानुज निदिरि निपातऊँ खेळ जो सहाय कर संकर आई। तउ मारो रन रामदोह दो०-अतिसरोप मापे लपनु, लग्नि सुनि सपथप्रवान । सभय लोक सब लोकपति, चाहत भभरि भगान ॥ १ , भरत-स्वभाव चित्रण N । गु भयमगन गगन भइ यानी । लपन माह बलुचिपुल वसानी । नि प्रतापप्रभाउ तुम्हारा । को कहि सके, को जाननिहारा। नुचित उचित काज किछु होऊ। समुझि करिअभल कहसव कोजा हसा करि पाछे पछिताही । कहहिं वेट बुध ते बुध नाही। उनि सुरवचन लपन सकुचाने । राम सीय सादर सनमाने । नही तात तुम्ह नीति सुहाई । सर ते कठिन राजमदु भाई । से अचवत मॉतहिं नृप तेई । नाहिंन साधु सभा जेहि सेई । उनहु लपन भल भरतसरीसा । विधिप्रपच महें सुना नदीसा। to-भरतहि होड न राजमदु, विधि हरि हर पद पाइ । करहें कि कॉजीसीकरनि, छीरसिंधु विनसाइ ॥६॥ अनुरागु भरत पर देखी । रामहृदय आनदु रिसेसी। रतहि धरम धुर धर जानी। निज सेवक तन मानस वानी । गुरु आयसुअनकला। वचन मजु मृदु मगलमूला। नाथ सपथ पितु चरन दोहाई । भयेउ न भुवन भरतसम भाई। जे गुर पद अयुज अनुरागी । ते लोकहें वेदहुँ वडभागी। राउर जा पर अस अनुरागू । को कहि सके भरत कर भागू। लखि लघुग्धु बुद्धि सकुचाई । करत बदन पर भरतण्डाई । भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई । अस कहि राम रहे अरगाई । दो-तय मुनि वोले भरत सन, सब सँकोचु तजि तात । कृपासिंधु प्रियरधु सन, कहहु हृदय कइ गत ॥७॥ मुनि मुनि वचन रामरखे पाई । गुरु साहिब अनुकूल अधाई । लखि अपने सिर सयु छरभारू । कहिन सकहिंकझुकरहियिचारू गोले मानस-मकरन्द नेहजल वाढे। पुलकि सरीर सभा भए ठाढे। नीरजनयन कहब मोर मुनिनाथ निबाहा । एहि ते अधिक कहउँ मे काहा। में जानउँ निज नाथ सुभाऊ । अपराधिहु पर कोह न काऊ मो पर कृपा सनेहु विसेसी । सेलत पुनिस न कहें देखी। सिसुपन तें परिहरेउँ न सगू । कबहूँ न कीन्ह मोर मन भगू । मैं प्रभु कृपारीति जिय जोही । हारेहु खेल जितावहि मोही। दो०-महूँ सनेह-सॅकोच बस, सनमुख कहे न चयन । दरसन तृपित न आजु लगि, प्रेम पियासे नयन ॥८॥ विधिन सकेउ सहि मोर दुलारा । नीच बीचु जननी मिस पारा । यह कहत मोहि आजुन सोमा। अपनी समुझि साधुसुधि कोमा मातु मद में साधु सुचाली । उर असआनत कोटिकुचाली। फरै कि कोदव गलि सुसाली । मुकता प्रसव कि सबुक ताली। सपनेहु दोस कलेसु न काह । मोर अभाग उदधिअवगाह । विनुसमझ निज अघ-परिपाक । जारिजाय जननिकाह काकू हृदय हेरि हारेउ सब ओरा । एकहि भॉति भलेहि भल मोरा। गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू। दो०-साधु सभा गुर प्रभु निकट, कहो सुथल सतिभाउ । प्रेम प्रपचु कि झूठ फुर, जानहिं मुनि रघुराउ ॥६॥ भूपतिमरन प्रेम पनु राखी । जननी कुमति जगत सव साखी देखि न जाहि विकल महतारी । जहि दुसह जर पुर-नर-नारी। महीं सकल अनरथ कर मूला । सोसुनिसमुझिसहिउँ सरसूला सुनि वनगवनु कोन्ह रघुनाथा । करिमुनिवेष लपन-सियसाथा भरत स्वभाव विग्रण + V दिन पानहिन्ह पयादेहि पाएँ । सकर सापि रहेउँ एहि घाएँ। बहुरि निहारि निपादसनेह । कुलिस कठिन उर भयेउन हा अब सबु ऑपिन्ह देखेंउँ आई । जिअत जीव जड सबह सहाई। जिन्हहिनिरसिमगसॉपिनिपीडी। तजहिं विषमनिषतामसतीछी। दो-तेइ रधुनदनु-लपनु मिय, अनहित लागे जाहि । तासु तनय तजि दुसह दुख, देव सहावे काहि ॥२०॥ सुनि अति विकल भरत-घर-यानी । आरति प्रीति रिनय नय सानी। सोकमगन सर सभा सभा । मनहुँ कमलपन परेउ तुपारू । कहि अनेक विधि कथा पुरानी । भरतप्रयोधु कीन्ह मुनि ग्यानी । बोले उचित बचन रघुन । दिन कर-कुल-कैरप-यन-चदू । तान जायँ जिअ फरहु गलानी । ईसअधीन जीवगति जानी । तोनि काल तिभुवन मत मोरे । पुन्यसिलोफ तात तर तोरें। उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई । जाइ लोक परलोड नसाई । दोषु देहिं जननिहि जडतेई । जिन्दगुर-साधुसभानहिं सेई । दोo-मिरिहहिं पाप प्रपच सर, अखिल अमगल भार। लोक-सुजमु पग्लोक सुयु, सुमिरत नामु तुम्हार ॥१९॥ कहो सुभाउ सत्य सिर साखी । भरत भूमि रह राउरि राखी। तात कुतरक करहु जनि जाए। वैर प्रेम नहिं दुरे दुराएँ। मुनिगन निकट विहंगमृग जाहीं । वाधकवधिक विलोकिपराही। हिन अनहित पसु पछिउ जाना । मानुषतनु गुनग्यान निधाना। तात तुम्हहि में जानो नीके । करों काह असमजस जीके । राय सत्य मोहि त्यागी । तनु परिहरेउ प्रेमपन लागी। । रावे मागम मकरन्द NAA तामु वचन मेटन मन सोचू । तेहि ते अधिक तुम्हारसँकोचू। ता पर गुरमोहि आयसुदीन्हा । अवसिजोकहहुचहो सोहकीन्हा दो०-मन प्रसन्न करि सकुव नजि, कहहु फरउ सोह आजु । सत्य-सधरघुवर वचन, सुनि मा सुखी समाजु ॥१२॥ सुर-गन-सहित सभय सुरराजू । सोहि चाहत होन जकाजू। चनत उपाउ करत कछु नाहीं । रामसरन सर गे मन माहीं। बहरि विचारि परसपर काही । रघुपतिभगत-भगति-यसअहहीं सुधि करि अपरोप, दुरवासा । भे सुर, सुरपति निपट निरासा सहे सुरम्ह बहु काल बिगदा । नरहरि किए प्रगट प्रहलादा। लगिलगिकान कहहिंधुनिमाया। अब सुर-काज भरत के हाथा। आन उपाउ न देखिय देवा । मानत रामु सु-सेवक-सेना। हियसप्रेमसुमिरहुसवभरतहि । निज गुन सोलरामरस करतहि दो०-सुनि सुरमत सुरगुरु कहेउ, भल तुम्हार यडभागु । सकल सु-मगल मूल जग, भरत चरन अनुरागु ॥१३॥ सीतापति-सेवक-सेवकाई । कामधेनु-सय-सरिस सुहाई। भरतभगति तुम्हरे मन आई । तजहु सोचु विधि यात बनाई। देखु देवपति भरतप्रभाऊ । सहज-सुभाय- विस रघुराज। मन थिर करहु देव डर नाही । भरतहिं जानि रामपरिछाहीं। सुनि सुरगुरु-सुरसमत सोचू । अतरजामी प्रभुहि सँकोचू। निज सिरभार भरतुजियजाना। करत कोटिनिधि उर अनुमाना। करि पिचार मन दोन्ही ठोका । रामरजायतु आपन नीका। निजपन तजि राखेउ पनु मोरा । छोहु सनेह कीन्ह नहिं थोरा । । .

लकसमानुसाजिसबुआना करिअसुफलमभुजोमनमाना।
भरत-स्वभाच चित्रण
दो०-कीन्ह अनुग्रह अमित अति, सर विधि सीतानाथ ।
करि
प्रनामु योले भरतु, जोरि जलज-जुग हाथ ॥१४॥
कहें. कहाना का अब स्वामी । कृपा-अबु निधि अतरजामी ।
-गुर प्रसन्न माहिव अनुकृला । मिटी मलिन मनकलपित सूला ।
अपडर डरे न सोच समूले । रविहि न दोपु देव दिसि भूले ।
मोर अभागु मातु कुदिलाई । विधि गति विषमकालकठिनाइ ।
पाउँरोपिमामिलिमोहिघाला। प्रनतपाल पन आपन पाला ।
यह नइ रीति न राउरि होई । लोकहु वेदविदित नहिं गोई ।
-जगु अनभल मल एकु गोसाई । कहिअ होइ भल कासु भलाई ।
देउ देव-तम-सरिस सुभाऊसनमुप विमुखन साहुहि काऊ ।
दो०-जाइ निकट पहिचानि तरु, छाँह समति सर सोच ।
मॉगत अभिमत पाय जग, गड रक भल पोच ॥१५॥
निसरविधि-गुर-स्वामि-सनेह। मिटेउ छोभ नहिं मन मोह !
अब कस्नाकर फीजिअ सोई । जन हित प्रभुचितछोभन होई।
जो सेवकु साहिहिं संकोची । निज हित चहतासुमति पोची।
संपक हित साहिब सेवकाई । करे सकल सुख लोभ रिहाई ।
गरथु नाथ फिरें सरही का । किएँ रजाइ कोटि विधिनीका ।
यह स्वारय-परमारथ-सारू । सकल-सुकृत-फलसुगति सिंगारू
दर एक विनती सुनि मोरी ! उचित होइ तस कर रहोरी ।
दो
सानुज पठइअ मोहिं यन, कीजिअ सहि सनाथ ।
ननरु फेरिअहि यु दोउ, नाथ चलउँ में साथ ॥१६॥

. सो मति मोरि भरत महिमाही । कहे काह, छलि छुअतिनछाहीं। भरत अमित महिमासन गनी। जानहि रामुन सकहिं बसानी मानस-मकरन्द ननरु जाहिं वन तीनिउँ भाई । बहुरिअ सीयसहित रघुराई। जेहि विधि प्रभुप्रसन्न मन होई । करनासागर कीजिअ सोई। देव दीन्ह सर मोहि अभाला मोर नीति न धरम विचारू। कहउँ बचन सर स्वारथ हेत् । रहत न आरत के चित चेत् । उतरु देइ सुनि म्यामिरजाई । सो सेवकु लखि लाज लजाई ।' अस में अवगुन-उदधि-अगाधू । स्वामि-सनेह सराहत साधू अव कृपाल मोहि सोमत भावा । सकुच स्वामिमन जाइन पाना। पु-पद-सपथ कहोसतिभाऊ। जग-मगल-हित एक उपाऊ! दो०-प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि, जो जेहि आयसु देव ।। सोसिरधरि धरि करिहि सबु, मिटहि अनट अवरेव ॥१७॥ सुनि भूपाल भगत व्यवहारू । सोन सुगध सुधा ससिसाका मुंदे सजल नयन पुलके तन । सुजसु सराहन लगे मुदितमन सावधान सुन समुखिसुलोचनि। भरतकथा भव-वध विमोचनि ब्रह्मरिचारू । इहाँ जथामति मोर प्रचारू । विधिगनपतिअहिपतिसिवनारद। कवि कोविद बुधबुद्धिबिसारदा भरत चरित कीरति करतूती । धरम सील गुन विमलबिभृती। समुझत सुनत सुखद सब काह। सुचिसुरसरिरुचिनिदरसुधा दो०-निरवधि गुन निरुपम पुरपु, भरतु भरतसम जानि । कहिअ समेर कि सेर सम, कवि-कुल-मति सकुचानि॥१८॥ अगम सबहिं वरतन वरसग्नी । जिमि जलहीन मीन गमु धरनी। धरम राजनय

भरत स्वभाव चित्रण
५९
परनि सप्रेम भरत अनुभाऊ । तियजिय की रचिलखिकह राजा
बहुरहिं लपन, भरतु यन जाहीं। सर कर भल सरके मन माही।
देवि । परतु भरत रघुवर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।
भग्तु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि राम सीव समता की।
परमारथ स्वारथ सुप सारे । भरत न सपने मनहुँ निहारे ।
साधन सिद्धि रामपग नेह । मोहि लचि परतभरतमत एह ।
दो०-भोरहुँ भरत न पेलिहहिं, मनस: रामरजाइ।
करिअ न सोच सनेहरस, कहेउ भूप पिलपाइ ॥१६॥

सीता को अनुसूया का उपदेश अनसूया के पद गहि सीता । मिली यहोरि सुसोल विनीता ।। जो सिय सफल लोक मुखदाता। अपिल लोक ब्रह्माड कि माता। तेउ पाइ मुनिवर मुनिमामिनि । सुखीभई कुमुदिनि जिमि जामिनि रिपि पतिनी मन सुग्व अधिकाई । आसिप देइ निकट ठाई। दिव्य वसन भूपन पहिराए । जे नित नूतन अमल सुहाए। जाहि निरपि दुख दूरि पराही । गरड जानि जिमि पन्नग जाहीं। दो०-ऐसे वसन विचित्र सुठि, दिए सीय फहँ आनि । सनमानी प्रियवचन कहि, प्रीति न जाइ बपानि ॥१॥ कह रिपियधू सरस मृदु वानी । नारिधरम कछु व्याज बखानी । मातु, पिता, भ्राता हितकारी । मितप्रट सब सुनु राजकुमारी। अमितदानि भर्ता वैदेही । अधम सोनारिजोसेवन तेही । वीरजु वरम मित्र अरु नारी । आपदकाल परखियहि चारी। वृद्ध रोगवस जड धनहीना । अध बधिर क्रोधी अति दीना ऐसेह पति कर किए अपमाना। नारि पाच जमपुर दुख नाना एका धरम एक व्रत नेमा। काय बचन मन पतिपद-प्रेमा जग पतिव्रता चागि विधि अहहीं। बेद पुरान सत सर कहहीं दोह०-उत्तम मध्यम नीच लघु, सकल कहौ समुझाइ । आगे सुनहि ते भर तरहिं, सुनहु सीय चितु लाइ ॥२॥ उत्तम के अस बस मन माहीं । सपनेहुँ आन पुरुप जग नाहीं An/ अन्न कहिमभु विलोकिमुनिधी। लोचन जल यह पुलक सरीरा। सीता को अनुसूया का उपदेश नयम परपति देने केसे । भ्राता पिता पुन निज जैसे परम पिचारिसमुमि कुल रहई । सो निकृष्ट तिय श्रुति अस कहई। विनु अवसर भय ते रह जोई । जाने अधम नारि जग सोई । पतिश्चक पर पति-रनि करई। गैरव नरक कलप सत परई। छन मुख लागि जनम सत कोटी। दुख नसमुझ तेहिसम कोसोटी दिनु श्रम नारिपरम गति लाई । पति त्रत धरम छॉडि छल गहई । पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई । विधवा होइ पाइ तरनाई । सो०-सहज अपारनि नारि, पति सेवत सुभ गति लहे। जसु गारत श्रुति चारि,अजहें तुलसिका हरिहि प्रिय ॥३॥ सुनु सोता तर नाम,सुमिरि नारि पतिव्रत करहिं । तोहि प्रानप्रिय राम, कहेउँ कथा ससारहित ॥४॥ मुनि जानकी परम सुख पारा । सादर तासु चरन सिर नावा । सन कह कृपानिधाना । आयसु होड जाउँ धन आना। सतत मो पर कृपा करहु । सेवक जानि तजेहु जनि नेह । धरम पुरधर प्रभु के यानी । सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी । नाम रुपा अज सिरसनकादी। चहत सकल परमाग्थवादी। ने तुम्ह राम अकाम-पिआरे । दोनवधु मृदु वचन उचारे। जर जानी में श्रीचतुराई । भजिअ तुम्हहिं सरदेव विहाई । नहि समान अतिसयनहि कोई । ता कर सील कस न अस होई । कहि विधि कहोजाइ अवसामी। कहहु नाथ तुम्ह अतरजामी। । तर मुनि ६२ मानस-मकरन्द . " छद-तन पुलकनिर्भर प्रेमपूरन नयन मुख-पकज दिए । मन ग्यान गुन-गोतीत प्रभु में दीख जप तप का किए ॥ जप जोग वरम समूह ते नर भगति अनुपम पाई । रघुवीर चरित पुनीत निसि दिनु दास तुलसी गाई ॥ दो०-कलि मल-समनू दमनु दुख, रामसुजसु सुसुमूल । सादर मुनहिं जे तिन्हहिं पर, राम रहहिं अनुकूल ॥५॥ सो०-कठिन काल मल-कोस, धरम न ग्यान न जाग जप । परिहरि सकल भरोस, रामहि भजहिं ते चतुर नर ॥६॥ I -

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मानस-मकरन्द । - छद-नन पुलकनिर्भर प्रेमपूरन नयन मुख-पकज दिए । मन ग्यान गुन-गोतीत प्रभु में दीख जप तप का किए ॥ जप जोग धरम समूह ते नर भगति अनुपम पाई। रघुवीर चरित पुनीत निसि दिनु दास तुलसी गाई । दा०-कलि मल-समनू दमनु टुख, रामसुजसु सुखुमूल । सादर सुनहि जे तिन्हहिं पर, राम रहहिं अनुकूल पE सो०-कठिन काल मल-कोस, धरम न ग्यान न जाग जप । परोस, रामहि भजहि ते चतुर नर ॥६॥ । 1 परिहरि सकल पाप उलूकनिकर सुखकारी । नारि निबिड रजनी अँधियारी । पपासर की शोभा राम जयहिं प्रेरेटु निज माया । मोहेहु मोहि सुनह रघुराया। तत्र विगह में चाहो कीन्हा । प्रभु केहि कारन करे न दीन्हा । सुनु मुनिनोहि कहांसह रोसा। भजहिंजे मोहि तजिसकल भरोसा करो सदा तिन्ह के रसवारी। जिमि वालकहिं रास महतारी। गह सिसुवच्छ अनलअहिधाई। तह रासै जननी अर गाई। मोद भये तेहि सुत पर माता ! प्रीति करे नहिं पाछिलि याता। मोरे प्रोढ-तनय-सम ग्यानो । बालक सुत सम दास अमानी। जनहि मोर बल निज वल ताही । दुहुँ कहें काम क्रोध रिपुआही । यह विचारिपडित मोहिभजहीं। पाएटु ग्यान भगति नहिं तजहीं। To-काम-क्रोध-लोभादि-मद, प्रयल मोह के धारि । तिन्ह महें अति दारुन दुखद, माया रूपी नारि ॥७॥ निमुनिकह पुरान श्रुति सता। मोह विपिन कहुँ नारि बसता। अप तप नेम जलासय भारी । होइ ग्रीयम सोसे सब नारी। म कोष मद मत्सर भेका । इनहिं हरपप्रद घरपा एका । कुमुदसमुदाई । तिन्ह कहें सदासरद सपदाई । परम सफल सरसीरह-वृदा । होइहिम तिन्हहि देति दुखददा। मुनि ममता जवासाहुताई । पलुहे नारि सिसिररितु पाई । बुधि पल सील सत्य समीना बनसी समात्रिय कहहिं प्रीना। दा०-अपगुनमूल सूलप्रद, प्रमदा सर दुसवानि । तो तें कीन्ह निवारन, मुनि में यह जिय जानि ॥ ८ ॥ सनि रघुपति के वचन सुहाए । मुनि तनपुलक नयनभरि आए। . दुर्वासना मानस-मकरन्द vvv बिरहवत भगवतहिं देखी । नारदमन भा सोच विसेखी । मोर श्राप करि अगीकारा । सहत राम नाना दुख भारा। ऐसे प्रभुहिं विलोको जाई । पुनि नवनिहि अस अवसर आई यह विचारि नारद करवीना । गए जहाँ प्रभु सुखआसीना । गावत राम-चरित मृदुवानी । प्रेमसहित बहु भॉति वखानी । करत दडवत लिए उठाई । रासे वहुत वार उर लाई । स्वागत पूछि निकट पैठारे । लछिमन सादर चरन पखारे । दो०- नाना विधि बिनती करि, प्रभु प्रसन्न जिय जानि । नारद बोले वचन तव, जोरि. सरोरुहपानि ॥ ४ ॥ सुनहु उदार परम रघुनायक । सुन्दर अगम सुगम बरदायका देह एक वरु मॉगी स्वामी । जद्यपि जानत अन्तरजामी । जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ । जन सन कबहुँ कि करो दुराऊ। क्वनि वस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिवरनिसकहु तुम्ह मॉग जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोर। अस विस्वास तजहु जनि भोरें। नाग्द बोले हरपाई । अस वर मांगो करो ढिठाई जद्यपि प्रभु के नाम अनेका । श्रुति कह अधिक एक ते एका राम सकल नामन्ह ते अधिका । होउ नाथ अघ खग-गन यधिक दोग-राका-रजनी भगति तव, रामनाम सोइ सोम। अपर नाम उडुगन विमल, वसहु भगत उर व्योम ॥५ पवमस्तु मुनि सन कहेउ, कृपासिंधु तव नारद मन हरप अति, प्रभुपद नायेउ माथ ॥ ६ अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद वाले मृदुवानो तव रघुनाथ

पपासर की शोभा
"
दो०-रावनारिजस पारन, गाहि सुनहिं जे लोग।
रामभगति दृढ पाचही, रिनु विराग जप जोग ॥ १० ॥
दीप सिया समजुपतिजन,मन जनि होसि पतग।
भजहि राम तजि काम मद, करहि सटा सनसग ॥११॥

६६ मानस मकरन्द्र 4hArm. छद-कहि सक न सारद सप नारद मुनत पद-पकज गहे। कहहु कवन प्रभु के असरीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती। जे नभजहिं अस प्रभुभ्रमत्यागी। ग्यानरक नर मंद अभागी। पुनि सादर बोले मुनि नारद । सुनहु गम विग्यान विशारद । सतन्ह के लच्छन रघुबीरा । कहहु नाथ भजन भवभीरा । सनु मुनि सतन्ह के गुन कहऊ । जिन्ह ते में उन्ह के बस रहऊँ। पट विकार जित अनघ अकामा । अचल अकिंचन सुचि सुखधामा अमित चोध अनीह मितभोगी । सत्यसार करि कोविद जोगी। सावधान मानद मदहीना । धीर भगतिपथ परम प्रवीना। दो०-गुनागार ससार-दुख, रहित विगत सदेह । । तजि मम चरनसरोज प्रिय, जिन्ह कहुँ देह न गेह ॥६॥ निज गुनिश्रवन सुनत सकुचाही। परगुनसुनत अधिक हरषाहीं । सम सीतल नहि त्याहिं नीती । सरलसुभाउसयहिंसन प्रीती! जप तप व्रत दम सजम नेमा । गुर-गोविंद-विप्र-पद प्रेमा । श्रद्धा छमा मइत्री दाया । मुदिता मम पदप्रीति अमाया। चिरति विवेक विनय विग्याना। वोध जथारथ चेदपुराना। दभ मान मद करहिं न काऊ । भूलि न देहि कुमारग पाऊ। गावहिं सुनहिं सदा मम लीला । हेतु-रहित पर-हित-रत सीला। सुनु मुनि साधुन के गुन जेते । कहिन सकहिं सारदश्रुति तेते। अस दीनाधु कृपालु अपने भगतगुन निज मुख कहे । सिर नाइ वारहिं वार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारल। ते धन्य तुलसीदास आस विहार जे हरि रेंग रए ।

६९ - r दो०-चले हरपि तजि नगर नृप, तापस वनिक भिखारि। वर्षा शरम-वर्णन कृषी निरावहिं चतुर किसाना । जिमि सुध तर्हि मोहमदमाना। देखिअत चक्रवाक सग नाहीं । कलिहि पाइ जिमि धर्म पराही। सर वरप तृन नहिं जामा । जिमिहरिजन हियउपजनझामा। विरिष जतुसकुल महि नाजा । प्रजा वाढ जिमिपाइ सुराजा । जहें तह रहे पथिकथकि नाना। जिमि इद्रियगन उपजे ग्याना। दो०-करहुँ प्रयल चल मारत, जहें तहँ मेघ विलाहिं । जिमि कपूत के उपज, कुल सद्धर्म नसाहिं ॥ ३ ॥ कवढे दिवस महुँ निविड तम, करहुँक प्रगट पतग। विनसे उपजै ग्यान जिमि, पाइ कुसग सुसग ॥४॥ परपाविगत सरद रितु आई । लछिमन देवहु परम सुहाई । पले कास सकल महि छाई । जनु यरपाकृत प्रगट वुढ़ाई । उदित अगस्त पथजल सोसा। जिमि लोभहि सोये सतोपा। सरितासर निर्मल जल सोहा । सतहदय जस गत-मद-मोहा । रस रस सूख सरित सर पानी। ममनात्याग करहिं जिमिग्यानी। जानि सग्द रितु संजन आए । पाइ समय जिमि सरत सुहाए। पक न रेनु सोह असि वरनी । नीति-निपुन-नृपकै जसि करनी। जलसकोच निकल भे मोना । अवुध कुटुरी जिमि ग्रनहीना । पिन घन निर्मल सोह अफासा । हरिजन इच परिहरिसरआसा। करें वहुँ रष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जासि मोरी जिमि हरिभगति पाइ श्रम, तजहिं आत्रमी चारि ॥५॥ सखी मीन जे नीर अगाधा । जिमि हरिसरन न पकौ याधा।

वर्षा-शरद-वर्णन दो०-लछिमन देसह मोरगन, नाचत वारिद पेसि । गृही विरतिरत हरप जस, विष्णुभगत कहुँ देपि ॥१॥ घन घमड नभ गरजत घोरा । प्रिया-हीन डरपत मन मोरा । दामिनि दमकि रहन घन माहीं। पल के प्रीति जथाथिर नाही। वरपहिं जलद भृमि नियराए। जथा नहि बुध विद्या पाएं। बुद अघात सहहिं गिरि कैसें । पल के वचन सत सह जैसे क्षुद्र नदी भरि चली तोराई । जस थोरेहु धन खल इतराई । भूमि परत मा ढावर पानी । जिमि जीवहि माया लपटानी। सिमिटिसिमिटिजलभरहितलावा। जिमिसदगुनसजनपहिआवा सरिताजल जलनिधि महुँ जाई । होहि अचल जिमि जिय हरि पाई दो०-हरित भूमि तृनसकुल, समुझि परहिं नहिं पथ । जिमि पापड-विवाद ते, गुप्त होहिं सदनथ ॥२॥ दादुर धुनि चहुँ दिसा सुहाई । वेद पढहिं जनु बटुसमुदाई। नव पल्लव भए विटप अनेका । साधक मन जल मिले विका। आक जवास पात बिनु भयऊ । जस सुराज खल उद्यम गयऊ। सोजत कतहुँ मिलै नहिं धरी । करै क्रोध जिमि धर्महि दूरी। सससपन्न सोह महि कैसी । उपकारी के सपति जैसी। निसि तम घन खद्योत विराजा । जनु दमिन कर मिला समाजा। महावृष्टि चलि फुटि किआरी । जिमि सुतत्र भए बिगरहिनारी। । .

सामुजकठकितवअसिघोरा।सनसठ अस प्रमान पन मोरा। सीता-रावण सम्बाद दा०-निज पद नयन दिए मन, रामचरन महं लीन । परम दुपी भा परनमुन, देखि जानकी दोन ॥ १ ॥ तरपालर मर रहा लुकाई । फरे विचार करा का भाई । तहि भरसर रावनु तर आरा । सग नारि यह किए बनावा । बहुविधि खलसीतहिं समुझाना। साम दाम भय भेट देपाना । वह गरनु सुन सुमुखि सयानो। मदोदरी आदि सर रानो। तर अनुचरी फरी पन मोरा । एक यार विलोकु मम ओरा । शन घरि ओर कहति वैदेही ।सुमिरि अवधपति परम सनेही। सुन दममुख खद्योत प्रमासा । करहुँ कि नलिनी करे विकासा। अस मन समुमु कहति जानकी । पल सुधि नहिरघुवीर वानकी। सब सून हरि आनेहि मोही । अधम निलज लाज नहिं तोही। दो०-आपुहि सुनि खद्योतसम, रामहि भानुसमान । परुष बचन सुनि कादि असि, योलाअति पिसियान ॥२॥ सीता तै मम कृत अपमाना । कटिहाँ तव सिर कठिन कृपाना। नाहि त सपदिमानु मम वानी । सुमुखि होत न त जीवनहानी । -दाम-समसुदर प्रभुभुज करि कर-सम, दसकंधर चद्रहास हर सम परिताप रघुपति-विरह-अनल-सजात । म्याम-सरोज- ܕ

मानस-मकरन्द
फुले कमल' सौह सर कैसे । निर्गुन ब्रह्म सगुन भए जैसे।
गुजत मधुकर मुखर अनूपा । सुंदर सगरव नाना रूपा।
चक्रवाक-मन दुख निसि पेखो । जिमि दुरजन परसंपति देगी।
चातक रटत तृपा अति ओही । जिमि सुप लहै न लकरद्रोही।
सरदातप निसि ससि अपहरई । सतदरस जिमि 'पातक टरई ।
देखि इदु चकोरसमुदाई । जितवहि जिमि हरिजन हरिपाई।
मसकदंस वीते हिमनासा । जिमि द्विज द्रोह किये कुलनासा।
दो-भूमि जीव-संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।
सदगुरु मिलें जाहि जिमि ससय भ्रम-समुदाइ
1
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सीता-रावण सम्बाद दो०-निज पद नयन दिए मन, रामचरन महें लीन । परम दुसोभा पवनसुन, देखि जानकी दोन ॥ १ ॥ तरपहर मह रहा लुकाई । करे विचार करा का भाई । तेहि अरसर रानु तह आरा । सग नारि बर किए वनावा । यह विधि खल सीतहि समुझाना। साम दाम भय भेद देखावा । कर रारनु सुन सुमुखि सयानी। मदोदरी आदि सर रानी । तर अनुचरी करौं पन मोरा । एक बार विलो मम ओरा । तृन धरि ओट फहति चैदेही ।सुमिरि अग्धपति परम सनेही। सुन दसमुख पद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी कर रिकासा। अस मन समुझ कहतिजानकी । पल मुधि नहिंरघुवीर यानको। सठ सने हरि आनेहि मोही। अधमनिलज लाज नहि तोही। दो०-आपुहि सुनि खद्योतसम, रामहिं भानुसमान । परप वचन सुनि काढि असि, वोलाअति खिसियान ॥२॥ सीता त मम कृत अपमाना । कटिहीतर सिर कठिन कृपाना। नाहि त सपदि मानु मम यानी । सुमुपि होत न त जीवनहानी। स्याम-सरोज-दाम-समसुदर प्रभुभुज करि कर-सम, दसकधर सो भुजकठ कितय असि घोरा । सुनु सठ अस प्रमान पन मोरा। चद्रहास हर मम परिताप रघुपति-विरह- -अनल-सजात।

मानस मकरन्द सीतल निसि तव असिवरधारा। कह सोता हरु मम दुखभारा। सुनत वचन पुनि मारन धावा । मयतनया कहि नीति वुझावा कहेसिसकल निसिचरिन्हवोलाई। सीतहि बहु विधि प्रासहु जाई। मास दिवस महुँ कहा न माना । तौ में मारव काढि कृपाना । दो०-भवन गयेउ दसकधर, इहाँ पिसाचिनिवृद । सीतहिं त्रास देखावहिं, धरहिं रूप बहु मद ॥ ३॥ त्रिजटा नाम राच्छसी एका । राम चरन रति निपुन विवेका । सबन्हो बोलि सुनायेसिसपना । सीतहि सेइ करह हित अपना। सपने बानर लका जारी । जातुधानसेना सब मारी । खरआरूढ़ नगर दससीसा । मुडित सिर खडित-भुज वीसा पहि विधि सो दच्छिन दिसि जाई । लका मनहुँ विभीषन पाई । नगर फिरी रघुवीर दोहाई । तब प्रभु सीता बोलि पठाई । यह सपना मैं कहाँ पुकारी । होइहि सत्य गए दिन चारी। तासु वचन सुनते सब डरीं । जनकसुता के चरनन्हि परी। दो०-जह तह गई सकल तव, सीता कर मन सोच । मास दिवस बीते मोहि, मारिहि निसिचर पोच ॥४॥ त्रिजटा सन चोली कर जोरी । मातु विपतिसगिनि ते मोरी । तजौं देह कर वेगि उपाई । दुसह विरह अब नाहिं सहि जाई आनि काठ रचु चिता बनाई । मातु अनल पुनि देहि लगाई। सत्य करहि मम प्रीति सयानी । सुनै को श्रवन सूलसम वानी । सुनत वचन पद गहि समुझायेसि। प्रभु प्रताप-चल-सुजससुनायेसि निसिनअनलमिलु मुनुमुकुमारी । अस कहि सोनिज भवन सिधारी

सीता-रावण सम्वाद
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कह सीता विधि भा प्रतिकूला । मिलहि न पाचकमिटहि नसूला।
देखिअत प्रगट गगन अगारा । अवनि न आरत एको तारा।
पावकमय ससिश्रत न आगी । मानहें मोहि जानि हतभागी।
नुनहि विनय मम पिटप असोका । सत्य नाम कर हर मम सोफा ।
नूतन किसलय अनलसमाना । देहि अगिनि,जहि करहि निदाना
देखि परम चिरहाकुल सीता । सो छन कपिहि कलपसम बीता।
सो०-कपि करि हृदय विचार, दोन्हि मुद्रिका डारि तव ।
जनु असोफ अंगार, दीन्ह हरपि उठि कर गहेड ॥५॥

. लक्ष्मण शक्ति और कुम्भकर्ण-वध दो०-देखा भरत विलाल अति, निसिचर मन अनुमान । विनु फर सर तकि मारेउ, चाप श्रवन लगि तान ॥१॥ परेउ मुरछिमहि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक। सुनि प्रिय वचन भरतु उठि धाए । कपि समीप अति आतुर आए। रिकल बिलोकि कीस उर लावा । जागत नहिं बहु भॉति जगावा । मुस मलीन मन भए दुपारी । कहत वचन लोचन भरि बारी। जेहि बिधिरामविमुप मोहिकीन्हा।तेहि पुनियह दारुन दुखुदीन्हा जो मोरे मन वच अर काया। प्रीति राम-पद-कमल अमाया। तो कपि होउ विगत-श्रम-सूला । जो मो पर रघुपति अनुकूला। सुनत वचन उठि घेठ कपीसा । कहि जय जयति कोसलाधीसा। सो०-लीन्ह कपिर्हि उर लाइ, पुलकित तन लोचन सजल । प्रीति न हृदय समाइ, सुमिरि राम रघु-कुल तिलक ॥२॥ तात कुसल कहु सुख निधान फो।सहित अनुज अरुमातु जानकी। कपि सर चरित सनुप बसाने । भए दुखी मन महुँ पछिनाने । अहह दैव में कत जग जायेउँ । प्रभु के एकहु काज न आयेउँ । जानि कुअवसर मन परिधीरा । पुनि कापि सन बोले वल वीरा। तात गहर होइहि तोहि जाता । काजु नसाइहि होत प्रभाता। चदु मम सायक मैल समेता । पठवो तोहि जहें कृपानिक्ता। सनि कपिमनउपजाअभिमाना । मोरे भार चलिहि किमिवाना।

लक्ष्मण शक्ति और कुम्भर्ण वध रामप्रभाव पिचारि रहोरी । यदि चरन कपि कह कर जोरी। तव प्रताप उर राखि गोसाई । जेहो रामयान की नाई। भरत हरपि तर आयस दयेऊ । पद सिरनाइचलत कपि भयेऊ। दो०-भरन वाह-बल सील-गुन, प्रभु-पद प्रीति अपार । जात सराहत मनहिं मन, पुनि पुनि पवन कुमार ॥३॥ उहाँ राम लछिमनहिं निहारी । बोले पचन मनुज अनुहारी। अर्धरानि गह कपि नहिं आगा । राम उठाइ अनुज उर लाग। सकन दुपित देखि मोहिं काऊ। यधु सदा तब मृदुल सुभाऊ । ममहित लागिता पितुमाता । सहेउ विपिन हिम आतप बाता। सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहुन सनिमम यचबिकलाई । जो जनत्यो पन यधुग्छिोह । पितायचन मनत्यो नहिं ओह । सत रित नारि भन्न परिवारा । होहि जाहिं जग वारहि बारा । अस रिचारि जिय जागहु ताता। मिले न जगत सहोदर भ्राता । जथा पर यिनुसग अति दीना । मनि दिनु फनि करियर करहीना अमममजिवन यधु रिनु तोही जो जड देव जियावे मोही। जैहो अबध कान मुंह लाई । नारिहेतु प्रिय भाइ गॉई। वह अपज़मुसहत्यों जग माही । नारिहानि पिसेप छति नाही । अब अपलोकु सोकु सुन तोरा । सहिहि निठुर कठोर उर मोरा। निज जननी के पक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रान अधारा । सोपेसि मोहि तुम्हहिंगहि पानी। सर विधिसुखद परमहित जानी उतर काह देहउ तेहि जाई । उठि किन मोहि सिखानहु भाई। विधि सोचत सोचविमोचन | नमत सलिल राजिव दल लोचन मानस मकरन्द 10 उमा एक अपड रघुराई । नरगति भगतकृपालु देखाई। सो०-प्रभुविलाप मुनि कान, विकल भए वानरनिकर । आइ गयेउ हनुमान, जिमि करना महुँ वीर रस ॥ ४ ॥ हरपि राम मटेउ हनुमाना । अति कृतग्यप्रभु परम सुजाना। तुरत वेद तव कीन्हि उपाई । उठि चैठे लछिमनु हरपाई । हृदय लाइ भेटेउ प्रभु भ्राता । हरपे सकल भालु कपि-त्राता। पुनि कपि वैद तहाँ पहुँचाया । जेहि विधितवहिताहिलेइआर यह वृत्तांत दसानन सुनेऊ। अतिविपाद पुनि पुनि सिरधुनेऊ। व्याकुल कुभकरन पहिं गयेऊ । करि बहु जतन जगावत भयेऊ। जागा निसिचर देखिअ केसा । मानहुँ कालु देह धरि वैसा । कुभकरन बूझा सुनु भाई । काहे नव मुख रहे मुखाई। कथा कही सब तेहि अभिमानी । जेहि प्रकार सीता हरि आनी । तान कपिन्ह सव निसिचर मारे । महा-महा-जोधा सधारे। दुर्मुख सुररिपु मनुजअहारी । भट अनिकाय अकंपन भारी । अपर महोदर आदिक वीरा । परे समरमहि सब रनधीरा । दो-सनि दस-कधर-वचन तव, कुमकरनु विलखान । जगदवा हरि आनि अब, सट चाहत कल्यान ॥ ५॥ भल न कीन्ह ते निसि-चर-नाहा । अव मोहि आइ जगायेहि काहा अजहें तात त्यागि अभिमाना । भजहु राम होइहि कल्याना है दससीस मनुज रघुनायक ! जा के हनुमान से पायक अहह वधु ते कीन्हि खोटाई । प्रथम हि मोहि नसुनायेहि आई कीन्हेहु प्रभुधिरोध तेहि देवक । सिर चिरचि सर जाके सेवक समाना। कोटिकोटिगिरि-सिखर प्रहारा!करहिंभालु कपिएकएकवारा। लक्ष्मण शक्ति और कुम्भकर्ण-वध नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहते तोहि समय निरसहा । अव भरि अक भेटु मोहि भाई । लोचन सुफल करों में जाई । स्यामगात सरसी-सह-लोचन । देया जाइ ताप-त्रय मोचन । दो०-राम रूप-गुन सुमिर मन, मगन भयेउ छन एक । रावन मॉगेउ कोटि घट, मट अर महिप अनेक ॥६॥ महिप साइ करि मदिगपाना । गर्जा वज्राघात कुभकरन दुर्मद रनरगा । चला दुर्ग तजि सेन न सगा। देषि विभीषनु आगे आयेउ । परेउ चरन निज नाम सुनायेउ। अनुज उठाइ हृदय तेहि लागा। रघु-पति भगत जानि मन भावा । तात लात गवन मोहि मारा । कहत परमहित मनविचारा। तेहि गलानिरघुपतिपहिं आयेउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायेउँ । सुनुसुत भयेउ काल यसरापनु। सोकिमान अप परम सिखावनु। धन्य धन्य ते धन्य चिभीपन भयेउतात निसि चर-कुल भूपन । उधु स ते कीन्ह उजागर । भजेहुराम सोभा सुख सागर । दो०-यचन कर्म मन कपटु तजि, भजेहु राम रनधीर । जाहु न निज पर सूझ मोहि, भयेउँ कालरस वीर ॥ ७ ॥ यधुपचन सुनि फिरा विभीषन । आयेउ जहँ त्रैलोक विभूषन । भूधग-कार-सरीरा । कुमकरन आरत रनधीरा । एतना कपिन्ह सुना जव काना। किलकिलाइ धाए बलवाना। लिए उपारि पिटप अर भूबर । कटकटाइ डारहिं ता ऊपर । नाथ मुरैन मन तन नारा लिमिगज अर्कफलन्हि कर मारा ७८ मानस-मकरन्द तर मारतसुत मुठिका हनेऊ। परेउ वरनिव्याकुल सिर धुने। पुनि उठि तेहि मारेउ हनुमता । घुमित भूतल परेउ तुरता। पुनिनल नीलहि अवनि पछारेसि। जहॅ तह पटकि पटकि भट डारेसि चली बली-मुस-सेन पराई । अनि भय त्रसितन कोउसमुदाई दो०-अगदादि कपि मुर्छित, करि समेत सुग्रीवें । कॉस दावि कपिराज कहुँ, चला अमित नल-सीव ॥ ८॥ उमा करत रघुपति नरलीला । सेलगरुड जिमिअहिगन मीला। भृकुटि भग कालहि जो खाई । ताहि कि सोहै ऐसि लराई । जगपावनि कीरति विस्तरिहहिं । गाइ गाइभवनिधिनरतरिहहि। मुरछा गइ मारतसुत जागा । सुग्रीवहिं तय खोजन लागा। सुग्रीव के मुरुछा चीती । निवुकि गयेउ तेहि मृतक प्रतीती काटेसि दसन नासिका काना । गरजिअकास चलातेहि जाना गहेड चरन धरि धरनि पछारा । अति लाघव उठि पुनि तेहिमारा पुनि आयेउ प्रभुपहिं बलवाना । जयति जयति जय कृपानिधाना। नाक कान काटे सोइ जानी। फिराकोध करिभइमनग्लानी। सहज भीम पुनि पिनु श्रुति नासा। देखत कपिदल उपजी त्रासा। दो-जय जय जय रघु वस-मनि, धाए कपि देह हह । एकहि वार जो तासु पर, छाडेन्दि गिरि तर जूह REM कुमकरन रनरग विरद्धा । सनमुस चला काल जनु कुद्धा। फोटि कोटि कपि परि धरि खाई। जनु टीडी गिरिगुहा समाई। कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा । कोटिन्ह मीजि मिलन महिगर्दा मुख नासा श्रनिन्हि की गाटा । निसरि पराहिभालु कपि वाटा।

७२ . लक्ष्मण शनि और कुम्भकर्ण-चर रना मद मत्त निसाचर दर्पा । विस्त्र प्रसिहि जनुएहिविधिअर्पा मुरे सुभट रल फिटिं न फेरे । सम न नयन सुनहिं नहिं टेरे। कुभकरन कपिफौज बिडारी । सुनि धाई रजनी-चर-धारी। देखी राम विकल फटकाई । रिपुअनीक नाना विधि आई । दोसुनु सोमिन कपीस तुम, सकल मॅभारे सैन । मे देखउँ पल-दल-बलहि, बोले राजिनन ॥१०॥ पर सारग साजि कटि भाया । अरि दज-दलनिचले रघुनाथा । प्रथम कीन्ह प्रभु धनुषटकोरा । रिपुदल बधिर भयेउसुनि सोरा। सयस छॉडे सर लच्छा। कालमर्प जन चले सपच्छा। जह तहँ चले विपुल नाराचा । लगे फटन भट विकट पिसाचा। क्दहि चरन उरसिरभुजदडा । बहुतक वीर होहि सत पडा। पुमि घुर्मि घायल महि परहीं । उठि मॅमारि सुभट पुनि लरही । लागनगन जलद जिमि गाजहि । बहुतकदेखि कठिन सरमाजहि । रड पचड मुट विनु यावहि । धरधर मारमारधुनि गावहिं। दो०-उन मह प्रभु के सायकन्हि, काटे विकट पिसाच । पुनि रघुयोर निपंग महँ, प्रविसे सब नाराच ॥११॥ कुमकरन मन दीस विचारी। हतीनिमिरमहॅ निसिचर धारी। भयेउ क्रुद्ध दारुन प्रल बीरा । करि मृग नायक नाद गंभीरा । कोपि महीधर लेइ उपाग। डार जडें मर्कटभट भारी। आपन देखि सैल प्रभु भारे । सरन्हि काटि रजसम फरिडारे। पुनि धनु तानि कोपिरधुनायक । छॉडे अति कराल बहु सायक । तनमहं प्रविसिनिसरि सरजाही जनुदामिनिघन मॉझसमाहीं।

मानस मकरन्द सोनित स्रवत सोह तन कारे । जनु कजलगिरि गेरुपनारे । विकल पिलोकिभालु कपिधाए । विहंसा जयहिं निकटभट आए। दो०-गर्जत धायेउ वेग अति, कोटि कोटि गहि कीस। महि पटक गजराज इव, सपथ करे दससीस ॥१२॥ भागे भालु-चलीमुस-जूथा । वृक विलोकि जिमि मेपवरूथा। चले भागि कपि भालु भवानी । विकल पुकारत आरतयानी । यहनिसिचरदु-काल समअहई । कपिकुल-देस परन अब चहई । कृपा-यारि-घर राम खरारी । पाहि पाहि प्रनतारतिहारी। स-करन-वचन सुनत भगवाना । चले सुधारि सरासन बाना। राम सेन निज पाछे घाली । चले सकोप महा-चल-साली। पेचि धनुप सर सत सधाने । छूटे तीर सरीर समाने । लागत सर बावा रिसभरा । कुधर डगमगत डोलति धरा। लोन्ह एक तेहि मैल उपाटी । रघु-कुल-तिलकभुजासोईकाटी। धावा चामवाहु गिरि धारी । प्रभुसोउभुजा काटि महि पारी। काटे भुजा सोह खल कैसा । पच्छहीन मदरगिरि जेसा । उग्र विलोकनि प्रभुहि विलोका ! ग्रसन चहत मानहुँ त्रैलोका । दो०-करि चिकार घोर अति, धावा बदन पसारि । गगन सिद्ध सुर भासित, हा हा होत पुकारि ॥ १३ ॥ सभय देव करनानिधि जानेउ । स्रवन प्रजत सरासन तानेउ । विसिखनिकर निसि-चर-मुसभरेऊ तदपि महायल भूमि न परेऊ सरन्हि भरामुख सनमुख धावा । कालत्रोन सजीव जनु आवा। तप प्रभु कोपि तीनसर लीन्हा । घर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा । - - लक्ष्मण शक्ति और कुम्भकर्ण वध सो सिर परेड दसानन आगेनिकल भयेउजिमि फनिमनित्यागे धरनि धसे धर धान प्रचटा!तर प्रभु काटि कीन्ह दुइ खडा। तासु तेज प्रभुग्दन समाना । सुर मुनि सहि अचभो माना। नभ दुदुभी जारहिं हरहि । जयजयकरिप्रसून सुर बरपहि । फरि गिनती सुरसकल सिधा । तेही समय देवरिपि आए । गगनोपरि हरि-गुन गन गाए । मचिर वीररस प्रभुमन भा। गि हतहु ग्वल कहि मुनि गण ! राम समर महि सोहत भए । छद-सग्रामभृमि निराज रघुपति अतुलपल कोसलधनी । श्रमन्दुि मुख राजीवलोचन रचिर तन सोनितकनी ॥ भुजजुगल फेरतसरसगसन भालुफपिचहुँ दिसि बने। रहदास तुलसी कहिनसक छरिसेपजेहि आनन घने ॥ दोग-निसिचरअधममलायतन, ताहि दीन्ह निजधाम । गिरिजा ते नर मदमति, जे न भजहिं श्रीराम ॥ १४ ॥ - । राम-राज्य-वर्णन राम राज बैटे त्रैलाका | हरपित भए गए सब सोका । बयर न कर काह सन कोई । रामप्रताप विपमता खोई। दो-चरनास्रम निज निज घरम, निरन वेदपथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुख, नहिं भय शोक न रोग ॥ १॥ दैहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज नहिं काहुहि व्यापा। सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्मनिरतश्रुतिरीती। चारिहु चरन धरम जग माहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाही। राम-भगति-रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी अल्प मृत्यु नहिं कवनिउँ पीरा । सब सुदर सव विरुज सरीरा। नहिं दरिद्र कोउ दुखीन दीता । नहिं कोउअबुधन लच्छनहीगा। सब निर्दभ धर्मरत नी । नर अरु नारिचतुर सब गुनी। सब गुनग्य पडित सब ग्यानी । सव कृतग्य नहिं कपट सयानी। दो०-रामराज नभगेस सुनु, सचराचर जग माहि । काल कर्म सुभाव गुन, कृत दुख काहुहि नाहिं ॥२॥ भूमि सप्त - सागर-मेखला । एक भूप रघुपति कोसला भुवन अनेक रोम प्रति जासू । यह प्रभुता कछु बहुत न तास । सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह घरनत हीनता पनेरी । सो महिमा खगेस जिन्ह जानी । फिरि येहिचरिततिन्हहुँरतिमानी सोउ जाने कर फल यह लीला । कहहिं महामुनिपर दमसोला। ।

राम-राज्य वर्णन रामराज कर सुख सपदा । वरनि न सके फनीस सारदा । सच उदार सब परउपकारी। विप्र-चरन-सेवक नरनारी। एक-नारि-व्रत-रन सब भारी नेमन ययक्रम पति हित कारी। टो-दड जतिन्ह कर भेद जह, नर्तक नृत्यसमाज । जितहु मनहिं अस सुनिअ जग, रामचर के राज ॥ ३ ॥ फूलहिं फरहि सदा तर कानन । रहहि पक सँग गज पचानन । पग मृग सहज ययर बिसराई । सरन्हि परस्पर प्रीति बनाई। कृजहि खग मृग नाना वृदा । अभय चरहिं वन करहिं अनदा। सीतल सुरभि पवन वह मदा । गुजत अलि लइ चलिमरदा। लना रिटप मागे मधु चवहीं । मनभावतो धेनु पय ववहीं। सससंपन्न सदा रह धरनो । नेता भइ कृतजग ६ करनी । प्रगटी गिरिन्ह विवध मनिखानी । जगदातमा भूप जग जागी। मरिता सकल यहहिं वर यारी । सीतल अमल स्मादु मुपकागे। सागर निज मरजादा रहहीं। डारहिं रतन तटन्दि नर लहही। -सकुल सकल तडागा अिति प्रसन्नदस दिसा विभागा। दो-विधु महि पूर मयूपन्हि रवि तप, जेतनेहि काज । मॉगे वारिद देहिं जल, रामचद्र के राज ॥ ४॥ गरिन्ह गाजिमेध प्रभु कीन् । दान अनेक द्विजन्ह कह दीन्हे ! धूनि पथ-पालक धरम-र-धर । गुनातीत अरु भोपुग्दर। अनुकल सदा रह सीता। सोभापानि मुसील निीता। ज्ञानति कृपा-सिंधु-प्रभुताई । सेवति चरनकमल मनु लाई । यपि गृह सेवक सेवयिनी । पिपुल सकल सेवाविधि-गुनी । मरसिज- पति मानस मकरन्द - जिन कर गृहपरिचरजा कई । राम-चद्र-आयसु अनुसरई। जेहि विधिकृपासिंधुसुस मानहासोइ कर श्री सेवारिधि जानइ । नौसत्यादि सास गृह माही। सेवइ सवन्हि मान मद नाही । उमा-रमा-ब्रह्मादि-वदिता | जगदया संततनिदिता। दो०-जामु कृपाकटाच्छ मुग, चाहत चितवन सोइ । गम-पदायिंद-रति, करति सुभावहिं खोइ ॥ ५॥ सहि सानुकूल सब भाई । राम-चरन-रति अति अधिकाई। प्रभु मुख कमल विलोकत रहही। करहुँ कृपाल हमहिं कछु कहहीं रामु कहि मातन्ह पर प्रीती | नाना भॉति सिखावहिं नीती। हरपित रहहिं नगर के लोगा । करहिं सकल मुरदुर्लभ मोगा। अहनिसि विधिहि मनायत रहही।श्री-रघु पीर-चरन रति चाही। दुइ सुन सुन्दर सीता जाए । लव कुश वेद पुरानन्हि गाए । दोउ विजई निई गुनमदिर । हरि-प्रति-निमनहें अतिसुदर। दुइ दुइ सुत सर भ्रातन्ह फेरे । भए रूप गुन सील घनेरे दो०-यान-गिरा गो-तीति अज, माया मन गुन पार। मो' सच्चिदानदघन, कर नरचरित उदार ॥ ६॥ प्रातकाल सरज़ करि मज्जन । चैठहिं सभासग द्विज सज्जन वेद पुरान वसिष्ट वखानहिं । सुनहिं रामु जद्यपिसवजानहिं अनुजन्ह सजुत भोजन करही । देसि सकल जननी सुखभरही भरत सत्रुहन दुनउ भाई । सहित पवनसुत उपवन जाई महि चैठि राम गुन गाहा । कह हनुमान सुमति अरगाहा सुनत विमल गुन अति सुसपाहियहुरि बहुरिकरि विनय कहाक राम राज्य वर्णन सर के गृह होहिं घेट पुराना । रामचरित पायन निधि नाना । नरअर नारिरामगुनगारहि । करहिं दिवस निसि जातनजानहि दो- -अग्ध पुरी वासिन्ह कर, सुख सपदा समाज । सहस सेपनहिं कहि सकहिं,जहें नृपरामनिराज ॥ ७ ॥ नारदादि सनकादि मुनीसा । दरसन लागि कोसलाधीसा । दिनप्रति सम्ल अजोध्या आपहिं । देसिनगर चिराग सिराह जातरूपमनि रचित अटारी । नाना रग सचिर गचढारी। पुर चढ़े पास कोटि अति सुदर । रचे कॅगरा रग रग पर । ननग्रह निकर अनीक ननाई। जनु घेरी अमरारति जाइ । नहि नहुरगरचितगच काँचा । जो पिलोकिमुनिवर मन नाचा। वरल धाम ऊपर नभ चुरत । क्लस मनहुँरविससि दुति निंदत बहु मनिरचित भागेपानाजहिं । गृह गृह प्रति मनि दीप गिर्हि । छह-मनिदीप राहि भवन भ्राजहिं देहरी रिद्रुम रची। मनियम भीति निरचिचिरची कनकमनिमरक्त खची ॥ मुन्दर मनोहर मदिरायत अजिर रचिर फटिक रचे । प्रनिद्वार द्वार कपार पुरट बनाइ रह बज्रन्हि खचे । दो-चार चित्रसाला रचर, प्रति गृह लिसे बनाई। गमचरित ने निग्य मुनि, ने मन लेहिं चोराइ ॥ ८ ॥ सुमनगटिया साह लगाई । विविधिभौतिकरिजतन बनाई। लता ललित रह जानि सुहाई । फलहि सदा मत कि नाई।

मानस मकरन्द गुजन मधुकर मुसर मनोहर । मारुत त्रिविधि सदा रह सुदर। नाना खग यालकन्हि जिआए । बोलत मधुर उडात सुहाए । मोर हस सारस पारावत । भवनन्हिपर सोभाअति पावत। जहँ तहें देखहिं निज परछाही । बहु विधि कृजहिं नृत्य कराही । मुक सारिका पदावहिं वालक । कहहु राम रघुपति जनपालक । राजदुआर सकल विधि चारू । वीथी चौहट रुचिर बजारू । छद-बाजार चार न चनै वरनत वस्तु विनु गथ पाइए । जह भूप रमानिवास तहे की सपदा किमि गाइए ॥ बैठे यजाज सराफ वनिक अनेक मनहुँ कुर ते । सब सुखी सब सच्चरित सुदर नारिनर सिसु जरठ जे ॥ दो०-उत्तर दिसि सरजू वहइ, निर्मलजल गभीर । गाँधे बाट मनोहर, स्वल्प पक नहि तीर ॥६॥ दूरि फराक रुचिर सो घाटा । जहँ जलपिअहि बाजि गज ठाटा पनिघट परम मनोहर नाना । तहाँ न पुरुष करहिं अस्राना । राजघाट सर विधि मुदर वर । मजहिं तहाँ वग्न चारिउ नर । तौर तीर देवन्ह के मदिर । चहुँ दिसि जिन्हकेउपवनसुदर कहुँ कहुँ सरितातीर उदासी । वसहि ग्यानरत मुनि सन्यासी। तोर तीर तुलसिका सुहाई । वृद वृद बहु मुनिन्ह लगाई। पुरसोभा कछु बरनि न जाई । बाहिर नगर परम रचिगई। देखत पुरी अपिल अघ भागा। वन उपवन नापिका तडागा।

राम राज्य-वर्णन छद चापी तडाग अनूप कूप मनोहरायत सोहही । सोपान सुदर नीर निर्मल देखि सुर मुनिमोहही ।। रह रग कज अनेक खग कृजहिं मधुप गुजारहीं। जाराम रम्य पिफादि-पग-रमजनु पथिक हकारही। दो०-रमानाथ जहॅ राजा, सो पुरः बरनि कि जाइ । अनिमादिक-सुख सपदा, रहो अवत्र सर छाइ ॥१०॥ जहॅतहॅनर रघुपति-गुन गारहि। बैठि परम्पर इहै सिखापहि । मजह प्रनत प्रति पालक रामहि । सोभा सील रूप गुन धामहि । जलज रिलोचन स्यामलगातहि । पलक नयन इस सेवकनातहिं । मृत सर रचिर चाप-तुनीरहिं । सत कज बन रवि रन धीरहि। काल कगल व्याल खगराजहि । नमत राम अकाम ममताहि । लोभ मोह मृग-जूथ किरानहिं । मनसिज करि हरिजनसुख दातहिं ससय सोर निविड तम भानुहि । दनुज गहन घन-दहन कसानुर्हि जनक-सुता-समेत रघुपीरहिं । कसन भजहभजन भवभीरहिं । रह-वासना मसक हिम रासिहि सदाएकरसअज अग्निासिहि मुनिरजन भजन महिभारहिं । तुलसीदास के प्रभुहिं उदारहिं । दो०-पहि-विधि नगर-नारि-नर-करहिं राम-गुन-गान । सानुकूल सर पर रहर्हि सतत कृपानिधान ॥११॥ जर ते रामप्रताप सगेसा । उदित भयेउअति प्रवल दिनेसा। पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका बहुतेन्ह सुस बहुतेन्ह मन सोका। जिन्हहिं सोक ने कहा खानी । प्रथम अविद्यानिसा नसानी । अघ उलुक जहें तहाँ लुकाने ! काम-क्रोध-कैरव सकुचाने ।

मानस मकरन्द
विविध-कर्म-गुन-काल-सुभाऊ । ए चकोर सुप लहर्हि न काऊ ।
मत्सर मान मोह मद चोरा । इन्हकर हुनर न कवनि ओरा ।
वरम तडाग ग्यान निग्याना । ए पकज विकसे विधि नाना।
सुप सतोप विराग विवेका । विगत सोक ए कोक अनेका।
दो०-यह प्रतापरवि जा के उर जय करै प्रकास ।
पछिले वाढहिं प्रथम जे कहे ते पावहि नास ॥१२॥

कठिन शब्दों के अर्थ १-२ गुरुत्पद - वदना दोउ । नयन भमिय = नयनामृत। गुनमय दोरैवारा मवृत्तिक । जगम = चरता पिरता। नीरथ राजू = तीधरान प्रयाग ! सरसः = सरस्वती । रविनदिनि = यमुना। परनी = वणन । वनी त्रिवेगी। घटु : भक्षय बट। धम्म, अर्थ, काम और मोक्ष । पिक = कोय। होनी = उत्पत्ति । नूति = ऐश्वर्य । सिधि = सिद्धि । कोविन : पण्डित । यामी-सरस्वती । -सा पचनेवाला, कुँजटा। समान चित = समान चित्तगरे । अनुरिगत = अनलि साग निक में प्राप्त । सत वारि विकार सतिभाये = सच्चे भाव से । चमेरे = पमन पर । हरि राटु मे विष्णु और शिव के यश रूप पूर्ण चन्द्र के लिए राहु क समान है । सहसयाहु = सहस्रार्जुन । सहसाखी = हजार नेत्रों से। महि पेमा - महिपासुर । केतु = पुच्छल तारा । सहम बदन = हतार से। सुरानीक - देवता-झुण्ड (सुर + अनीक) सुरा ( मनिरा) नीक (प्रिय)। जन - तुलसीदाम । निरामिप = मास न खानेवाला । जग- जगत में। अपलोक = अपयश । व्याध - दुष्टात्मा। परि सर - पाप की नदी, कर्मनाशा।

मानसन्मकरन्द ' पोच - धुरा । लच्छि अरच्छि - लक्ष्मीवान् और पिना लक्ष्मी का । मर-मर देश, मारवाट । मारव -मालय ! गवासा%D गाय सानेवाला। पुष्पवाटिका में जनकनन्दिनी और राजकुमार। १-३ उटे रपनु लवे न कोई । भरन शिसा - मुर्गा । नित्य = नित्य कर्म । नटत - नाचते हैं। भाराम बगीचा । चितह = देखकर। निकेता-मन्दिर । गिरा जिह्वा । (इसमें काव्यलिङ्ग अरकार हे1) काली = करह । ५-६ मुमरि सकुचानी। सिसुमृगी - बाल हरिणी । माहुँ दृगचल = मानो लजित हो निमि ने पलकों का निवास ही त्याग दिया। 'छनि में भयुक्ति भरमार है। ७-११ तामचन सींच - सीमा । कल = सुन्दर । भापनपो = अपनापन । आपा। भर कारिनी = आप ससार को उत्पन्न, पारन और प्रलय करने वाली है। १२-१३ हदय भाई। प्राची - पूरब । रथ = दरिद्र । (दोहा न० १२ मे व्यतिरेक अलकार है ।) व्याज = बहाने । कोक - चकरा पक्षी। नखत - नक्षन, नारे । विघटन = तोडने की। मन्थरा की मन्त्रणा पतियानि। भथाई = आस्थाई, बेठक । चैता = आनन्द । खोरी अप. राध । पोची-नीच । किन क्यों। सालु = पीडा। तुराई - तोशा तकिया। शकी- सिडक कर । भरगानी - चुप । फुर = सत्य । लगे। । तेहि अवसर -

कठिन शब्दों के अर्थ
सादर हित लागी।
सरी मीलनी । रहँसी प्रसन्न हुई । फावी = अच्छी
लगी। बीच- अवसर । नेर - नायन, सहायक । पसेउ = पसीना
निकल आया। उकठि बुकार - सूखा हुभा बुरा काठ । भरय %D
पिताऊँगी । गुनिन्ह - ज्योतिपियों से ।
१३- कुरी न कोई।
कबुली - देवता पर चढाने के लिए माना हुआ बरिपशु ।
राम का कैकेयी से संभाषण
जाई
जाइ।
सम्म = क्रुद्ध । बरमोर = श्रेष्ट बली । मुक्त - पुण्य से ।
अकी मुगा । फनिप = साँप । आसुतोष = शीघ्र ही सन्तुष्ट
होनेवाले । अवटर दानी = विना विचारे दया द्रवित हो कर देनेवाले।
रजाई = आना । दवारी द्वापानल ।
९-१२ मिलेहि माझ
अधिकान ।
परिमिति मय्यादा।रद = दाँत । मलीहा = अमिट । चवह %
वपा करे । खरभर सलबली । जठरी - बडी बूढी । आरेसू - डाह ।
मुंजव = भोगेंगे । कोटि = वखारी, गज । गयदु = हाथी । मलान =
साँकल, जजीर ।
माता कौशल्या से राम का विदा मॉगना और
सीता को समझाना
नहि गाइ।
भारत - दुखी यार = टेर। मकरद - पुप्परस । त्रियमला
श्री रूपी वृक्ष की जड। धरम पुरीन-धर्म पुरन्धर | जगास%3
D
जपासाची एक प्रकार का काँटेदार छोटा पेट होता है। यह वर्षा के
जर से सूर जाता है और गर्मी में खूब हरा भरा रहता है। इसी कारण

मानसमकरन्द r AIN. ग्रीम में उढक के लिए कहीं कहीं इसकी टही भी लगाई जाती है। माजहि = बरसात के प्रारम्भ के जल में उत्पन हुए झाग को । -९ राखि गुन दोष । धरि = बरपान । मजु विलोचन = सुन्दर नेत्रो से । रनि वियु - रवि के कुर (पष्ठी त०) रूपी केरवों (रूपर कर्मधारय) के विपिन (प० त०) के लिए विधु (पञ्चमी त. .)। करि = बनाकर। लाली= लालन पालन किया । जिवनम्मूरि - सजीवनी जडी । भृरि = अनेक । सुर सर = मान सरोघर । चारी = विचरनेवारी। डापर - गडाही। कुदाउ। १०-१३ मातु सुसमूल । पदनाना = जता । दृक = भेडिया । मस्निय = घटता । तियहि तरनिहुँते - स्त्री को सूर्य से भी बढ कर । १५-१८ नवी वारहि बार। सौंध = राजमहर । जोही - देस र । छोभ - दुख । माता सुमित्रा से लक्ष्मण का निदा मॉगना समाचार सिराा चुक गया । नय नागर = नीतिगपुण। सिरे शीतर । तुहिन = पाला । तामरस-कमल । सगाई = सगा पन, सम्बन्ध । कुदाउँ - चुरा घात । ५-६ धीरजु भागवस। बन्नु, ससा आदि का भेद्र इस प्रकार कहा गया है- अत्यागसहनो बन्यु सदेवानुमत सुहृत् । एवरिय मवेन्मित्र समप्राण ससामत । भागमाजन = भाग्यशाली। नतर = नही नो। बागुर = ग्वेनु को घेर कर गाडे हुए काँटे, फाटा।

कठिन शब्दों के भय ९३ 1-८ जन त केवट की भक्ति १-५ ग्य हॉकेट यर देह । मानुष करनि मनुष्य बना देनेवाली । बाट परम्डाका पड जायगा, अर्थात् मेरी नाव हाथ से निकल जायगी। अटपटे- निसका कुछ उत्तर देते न यो। निहारोमार्थना । पितर-पूर्वज । भरत की व्याकुलता ३-४ पुरजन उसाह। गॅरहि जाहि-गॅव से प्रणाम कर चरे जाते है। दव गह - भाग स्गार । सहमेड करि हाथी डर गया हो। मरम पौडि घाव को चीर कर । पाकै छतु-पके फोढे में । निति=निमित्त । चीर। हुमगिः - उटर पर । सई आइ व आ गया। अघ टिन =अमिर । ८-१४ मुम्नप्रसन्न विधि हाथ ) गाइगोठ-गोशालाभव - उत्पन । बामपयघाममार्ग जो एक शास्त्र भाति चेद विरुद्ध मत है, जिसमे मदिरापान, परस्त्रीगमन आदि टुराचार मोष के साधन माने जाते है । धरम दुहि-'गाय' या पुनी को देचना' धर्म दुहना है । पिसुन = कपटी ! यारिचर जलचर । बहोरि। या- वेश्य। कृपन = कंजूस। मुसरू- यकवादी गित रहित । सानस - तपस्वी। मुअन = पुन । रघुवीर भरोस। वादि व्यर्थ । चिरति = वैराग्य ।सरुज - रोगी । रसा राज ! कुलिस वत्र । उपल-पयर । जठर - उदर से। बात-बस बात ध्याधि के अधीन । अदिन : दुर्दिन । यर-अदर समाना = हाय १९-०६ कौसिल्या ९२ मानस मकरन्द गुन दोप। ग्रीष्म में ठढक के लिए कहीं कहीं इसकी टट्टी भी लगाई जाती है । मांजहि परमात के प्रारम्भ के जल में उत्पन्न हुए शाग को । ४-९ रासि बलि = वर पान । मजु शिलोचन - मुन्दर नेत्रो से । रवि विधु = रवि के कुल (पठी त०) रूपी केरयों (रूपक कर्मधारय) के विपिन (प० त०) के लिए विधु (पञ्चमी त.)। करि = बना। लाली = लालन पालन किया । जिवनम्मूरि = सजीवनी जड़ी । भरि = अनेक । सुर सर = मान सरोयर । चारी = विचरनेगी। दार-गडही। समाचार १०-१४ मातु सुखमूल । पद राना - अता । वृक - भेडिया | अयिनयरष्टता । तियहि तरनिहुँते = स्त्री को सूर्य से भी बढ कर । १५-१८ जनादेवी बारहि बार। सौंध = राजमहल । जोही - देस कर । छोभ - दुख । माता सुमित्रा से लक्ष्मण का पिदा मॉगना कुदाई। सिरान = चुक गया । नय नागर - नीति निपुण । सिरे शीतर । तुहिन = पाला । तामरस = कमल । सगाई = सगा पन, सम्बन्ध । कुदाई - उरा घात । ५-६ धीरजु भागबस । बन्तु, सपा भादि का भेद इस प्रकार कहा गया है- अत्यागसहनो बन्यु सदेवानुमत सुहृत् । एवनिय भनेन्मिन समप्राण सखामत । भागमाजन = भाग्यशारी। तर = नहीं तो। धागुर = वेव को घेर कर गाडे हुए काँटे, पदा।

कठिन शब्दों के अर्थ
पपासर की शोभा
१-६ पुरइनि माथ ।
मर्म - पता । बकुल - मौरसिरी। पाटर - गुरार । पनस -
फटहल । पटली- झुण्ड । दुराऊ - छिपाव । राका रजनी - पूर्णिमा
की रात्रि सोम चन्द्रमा ।
७-१, अति प्रसन
सतसग।
भेका-मेढ़क । अविचन-धन हीन । अमित = अनन्त ।
योध% ज्ञान । अनीह - चेष्टा रहित । मितभोगी - अल्पभोगी ।
मानट = औरों को मान देनेवाले।
धर्षा शरद् वर्णन
१-६ रछिमन समुदाई।
दातर = मटमेरा । आक = मदार । अगस्त = भगस्य तारा ।
सीता-रावण-सम्वाद
1- निज पद पोच ।
साम भेद = विरोधी मनुष्य को वश म राने के रिश
राजनीति की धार चारें हैं साम-समता, दामपन से वश में
लाना, भय दण्ड देकर, भेट-अलगाव डालकर । सपदि-झट ।
दान% मारा। मय-तनया-मन्दोदरी।
लक्ष्मण शक्ति और कुम्भकर्ण-वध
१-१ देना भरत वीर रसा
पिता बचन • ओह - यहाँ लोग अनेक शकाएँ और विष्ट
कपना करते हैं। 'ओ'से रामचन्द्र ने प्रलाप करते हुए निरह
दशा म व्यक्ति किया है कि चौदह वर्ष के चावास की बात कौन
रहे कि पिता जी के 'रथ चदाइ दिखराइ बन, रितु गपे दिन
चारि' वाली बात भी जो सुमन्त मे कही थी, नहीं मानता।

मानस-मकरन्द १-६ सुनत D . बेर के फल के समान । बन रागी वनवास के लिए। तुम्ह प पाँच पर भाप पञ्च लोग । भरत-स्वभाव-चित्रण पिनसाइ । सिय रवन = सीतारमण । ग्यमार-चिता । कलपि-क्ल्पना करके । गजाली = हाथियों का झुण्ड । जाए = व्यर्थ । रच = थोडा भी । निदरे = अपमान किया। उपचरा - कुव्यवहार किया। निपा तॐ = गिरा दूंगा । अचवत = भाचमन लेते ही । मातही मतवारे होते हैं। सीकरनि-बूंदों ।तरन-मध्याह्न । तरनिहि = सूटप को। मकु - चाहे । गिलई = निगर जाय । मग न%= मार्ग नहीं। घटयोगी समुद्र को पी जानेवाले भगस्य मुनि । छोनी - पृथ्वी । सगुनुपीर - सद्गुणरूपी दृध । ७-१७ गुरु भवरेव। अरगाई - चुप । छरुभार = कुश । बुनिस - भमसन्नता । चेहू बिहर नहीं गया । पुन्य तोरें नीचे हैं। सय - सेकडों । गोई - छिपी । सुगति = मोक्ष । अनट अवरेव - उपद्रव की उलझन । १८-१९ सुनि बिलखाइ। राज-नय - राजनीति । निरवधि = सीमारहित । सेर सम - मेर (तौलने का बटखरा) के बराबर । घर बरनी = सुन्दर कशा । अनु. भाऊ = अनुभव । भोरे = भूल कर भी । पेलिहहिं = दालेंगे। सीता को अनुसूया का उपदेश चतुर नर। रिपि = अत्रि ऋषि । अमित दानि = असीम आनन्द देने बारा । सहज अपापनि = स्वभाव से ही अपवित्र । मल-कोस - पापो का भण्डार .. - पुण्यात्मा पुरप तुम्हारे 1-९ सूया अन्तर्कथाएँ "वालमीकि, नारद घटजोनी"- धात्मीकि-वात्मीकिजी ने रामचन्द्रजी से कहा था कि मैं पहले किरातों के सग में चोरी ठगहारी करता था। एक बार सप्तर्पियों का दर्शन हुभा और के इस उपदेश से कि “ससार में सव सुम्प और पुण्य के साथी होते है, दुप और पाप में कोई भाग रेना नहीं चाहता" मुझे ससार से पैराग्य हो गया। तब से मैं सासारिक प्रलोभनों से विरक्त हो आपका उरटा नाम "मरा, मरा" जपने लगा और अन्त में इस पद को पहुंचा कि घर बैठे आपका दर्शन हुआ नारद-एक यार देवर्षि नारद ने वेदव्यास जी से कहा था कि म पूर्व जन्म में वेदज्ञ सपियों की दासी का पुत्र था। मे निरन्तर ऋपियों की मेया में लगा रहता। उनके सत्सग के परम्वरूप मेरे हृदय के विकार नष्ट हो गये और काल पाकर उस शरीर का त्याग कर यह तन पाया । मा निरन्तर भगवद्भक्ति में मग्न रहता हूँ। अगस्त्य-एक बार अगस्य मुनि ने महादेवनी से कहा था कि मेरे पिता मिनावरण के उर्वशी पर मोह करने के फल-स्वरूप मेरा जन्म एक यदे से हुआ। किन्तु सत्सग के प्रभाव से मेरी बुद्धि सन्मार्ग में प्रवृत्त हुई और मैं मुनीश्वर पद को प्राप्त हुआ। "सुमिरि सोय नारद वचन"- एक समय पार्वती पूजन को जाती हुई सीता की मार्ग में नारद से भेंट हुई। आशीर्गद में नारद ने कहा- पहले पहल दर्शन होगा । वह राजकुमार श्यामवर्ण का होगा।" -"इसी याग में तुम्ह अपने पति का मानस-मकरन्द सहोदर = विह्वल दशा में असगत प्रयोग हुआ है। कुछ लोग एक हा यज्ञ से उत्पन्न होने के कारण सहोदर शब्द का प्रयोग होना बतलाते हैं। चारमीकि ने भी ऐसा ही लिखा हे-ततु देवा न पश्यामि यत्र भ्राता सहोदर" । निज कुमारा = इस में भी बहुत कल्पनाएँ की जाती है। यह पक्ति भी कई दूसरी पक्तियों की नाई स्पष्ट अर्थवाली नहीं है। निज का अप या तो राम के पक्ष में किया जा सकता है, या एकोन्ये प्रधाने इत्यमर' के अनुसार 'एक' का अर्थ 'प्रधान' करना ठीक है। ७~१२ हरपि जाता = समुदाय । मीरा-मिल कर। देइ दूह = हुल्लड मचाते हुप । अनोरु = पेना। भाथा-तरकस । नाराचा - बाण। बली- मुख -न्दर । मेप = भेड । श्रवन = कान । प्रयत: पयंत । परिपि - देवपि नारद । राम-राज्य-वर्णन उदार1 अनुध%3 मूर्न। घृशीयालु । कृतजुग के जगातमा = जगत के प्राण । याजिमेध = अश्वमेध । गुनातीत = गुणों म परे । भोग पुरटर - भोग विलास में इन्द्र । गो-इन्द्रियाँ । अतीत -शिलेप । पार=परे । सर छाई। निकर = समुदाय । अजिर = अंगनाई । फटिक = स्फटिक पधर । पुरट = सुवर्ण । पारामत = कबूतर । गथ = पृमी । दाम । पराम= भरग । अनिमादिक अणिमा आदिबाटो सिद्धियाँ। १-२ राम - सतयुग की। ७-१० प्रतिकार 5 दिया-"शरणागत की रक्षा करना मेरा धम्म है, अब म इसे छोड नहीं अन्तर्कथाएं युद्ध में गये । दशरथ के साथ में कैकेयी भी थी। युद्ध रात तक चरता रहा और अन्त में निशाचरों का बल बढ़ गया। घायल होकर राजा दश- रय मूछित हो गए और सारथी भी मार डाला गया। तब सारथी का काम केकेयी ने किया और रथ भगा ले जाकर दशरथ के प्राणों की रक्षा की । मूर्योपरान्त होश होने पर दशरथ कैरेयी पर बहुत प्रसन हुए और कोई दो वरदान माँगने को कहा। कैकेयी ने उन्हें उन्हीं के पास आव- श्यकता पर मांगने के लिए धरोहर रख दिए । इस सम्बन्ध में यह कथा भी मिलती है कि युद्ध में रथ की धुरी टूट जाने पर कैकेयी ने कीर की जगह अपने हाथ की उँगली रगा पहियों को गिरने से बचाया । विजय पाने पर यह हाल देख कर राजा को परम प्रसन्नता हुई और उन्होंने उसे दो वरदान मांगने को कहा। कैकेयी के सबध मेंकहा जाता है कि एक ऋपि ने उसे यह पर दिया था कि तू जर चाहेगी, तर तेरा हाथ रोहदण्ड का काम देगा। "सिरि द्धीचि-हरिचद कहानी"- -राजा शिवि के ९२ या कर चुकने पर इन्द्र को वडा भय हुआ और ९३ वे यज्ञ के आरम्भ में अपि को पृतर बना कर यम स्थान म भैना और स्वय याज बन कर झपटे । कतर राजा शिवि की गोद में ना येग । शरणागत जान शिवि ने उसे छिपा लिया और बात को उठाया। -"शान् । मै मारे भूख के मरा जा रहा हूँ और मेर मर जाने पर मेरे कुटुयो भी मर जायेंगे । उनको हत्या तुम्हें लगेगी। इसलिए मेरा माहार छीन कर भागी क्यों बनते हो?" राना ने उत्तर शिधि- इस पर पाज ने कहा- सकता। हाँ इसके बदले में और जो कुछ चाहो, मांगो।" अत में बस्तर के पावर राजा के शरीर के मास पर यान राजी हुआ, कि तु स्वशरीर मे मांस पाटकर यार यार चढ़ाने पर भी यह क्यूतर के बराबर नहीं होता था।

९८ मानस-मकरन्द - "मनहुँ सकुचि निमि तजे डगंचल"- निमि-निमि ने एक बार यज्ञ कराने के लिये वशिष्ठ जी को बुल- वाया । उन्हें पहले ही इन्द्र का निमन्त्रण मिल चुका था, इसलिए वहाँ से लौट कर यज्ञ कराने को कहा । शरीर की अनित्यता पर विचार कर निमि ने देर करना उचित नहीं समझा और दूसरे पुरोहित द्वारा यज्ञारम्भ किया। इन्द्रलोक से लौटने पर शिप्य के अपमान से वशिष्ठजी बहुत रुष्ट हुए और निमि को शरीर नष्ट होने का शाप दिया। अपने पुत्रों के प्रयत से तिमि को पुन शरीर प्राप्त हुआ और तर निमि ने यह घर माँगा कि मैं चिना शरीर सब की पलको पर निवास करूँ, क्योंकि शरीर से बन्धन का भय बना रहता है। तब से निमि पलकों में रहते है। पलकों के निमेष कहलाने का भी यही कारण है। "कटू विनतहि दीन्ह दुखु" दो १०- -कश्यप मुनि की कद्रू और विनता नाम की दो स्त्रियों थीं। कद्रू सपा को माता थी और विनता गरुड की । एक दिन कद ने विनता से पूछा--"सूर्य के घोड़े की पूंछ का रंग केसा है" उसने कह-श्वेत है। कढू ने इसे न माना और पूंछ का रंग काला कहा। अतएव दोनों में कहा- सुनी होने लगी। इस झगडे के निर्णय के लिए अन्त में निश्चय हुआ कि जिसकी यात शूटरी हो, वह दासी बन कर रहे । कद्दू की यात सञ्ची करने के लिये घोडे की पूंछ में सर्प जा लिपटे । तब कढू ने पूंछ का काला रग दिसा दिया। विनता रजित हो गई और कद्दू की दासी होकर रहने लगी। "दुइ वरदान भूप सन थाती।"- फैकेयी-यर-एक समय दक्षिण देश के दण्डकारण्य में जयन्त नगर में राजा निमिध्वन के शासन काल में शम्परासुर के साथ इन्द्र का युद्ध हुमा इन्द्र की सहायता के लिए राजाओं समेत राजा दशरथ भी उस - अन्तस्थाएं १०१ करनेवाले से दो सौ श्यामकर्ण घोढे रीजिये। गालय हर्यश्व, दिवोदास और उशीनर के पास माधवी के साथ गये और दो दो सौ श्यामकर्ण घोडे लेकर एक एक पुत्र उत्पन्न करने दिया । तब भी दो सौ घोडे नहीं मिले। अन्त म गालन छ सौ घोडे और माधवी के साथ अपने गुरु के पास गये। विश्वामित्र ने छ सो घोडे स्वीकार किए और माधवी से एक पुत्र उत्पन्न कर गारर को गुरु दक्षिणा से मुक्त किया। नहुप--एक समय इन्द्र ग्रह्महत्या के कारण छिप गये थे । इन्द्रासन का पद पारी था। राजा नहुप धडे जानी और सन्तोषी थे। इन्द्र पद उही को मिला । इन्द्र-पद पाने पर नहुप ने इद्राणी से विवाह करने की इच्छा प्रकट की । वृहस्पति की सम्मति से इद्राणी ने कहला भेजा कि यदि तुम अपनी पालकी ऋपियों से उठवा कर भाओ तो मैं तुम्हें स्वीकार करूंगी। कुछ आगा पीठा न सोच कर राजा ने सप्तपियों से पालकी उठवाई । जल्दी पहुँचने को इच्छा से नहुप ने मद गति से चलते हुए ऋपियों को शीघ्र चलने के लिए 'सर्प, सर्प' कहा। ऋपियों को यह बहुत बुरा लगा और तुरन्त पालकी छोट अगस्य जी ने शाप दिया-"तू सर्प हो जा।" सो राना नहुप इन्द्र पद से गिर कर साँप हो गये और भनेक कष्ट'उठाये। । - "छुअत सिला भइ नारि नुहाई"- अहित्या- --ब्रह्मा ने अहिल्या नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या उत्पल की और उसका विवाह गौतम मुनि से कर दिया । इन्द्र ने छल से एक यार गौतम का रूप बना कर अहिल्या का सतीत्व नष्ट किया । उसी समय अपि आ गये। भयभीत अहिल्या ने मुनि पर इन्द्र का दुराचार नहीं प्रक्ट किया। इस कपट से मुनि को अत्यन्त क्रोध हुभा और उन्होंने महिन्या को पत्थर हो जाने का और इन्द्र को सहस्र- मानस मकरन्द विष्णु भगवान् राजा के अपना मस्तक काटने पर उतारू होने पर इन्द और अग्नि प्रकट हो गये और भगवान् ने उन्हे अपने धाम को पहुँचाया । दधीचि-वृनासुर मे बहुत दुस पाने पर देवताओं के साथ इन्द्र पास गये और अपना कष्ट कह सुनाया। भगवान् ने कहा कि वह असुर दधीचि मुनि की हड्डी के अतिरिक्त और किसी भस्त्र से नहीं मर सकता । दधीचि नेमिपारण्य में तपस्या कर रहे थे । इन्द्र ने यहाँ जाकर उनकी हड्डी माँगी । दधीचि ने बड़ी प्रसरता से गौ से घटवा कर अपनी हड्डियाँ निकाल दे दी और अपने शरीर का त्याग किया । उन हड्डियों का वत्र यना फर इन्द्र ने देत्यों का सहार किया। हरिश्चन्द्र-अयोध्या के राजा हरिश्चन्द्र की कथा उनकी सत्यता के रिए बहुत प्रसिद्ध है। हरिश्चन्द्र बहुत धर्मात्मा थे। एक यार उन्होंने विश्वामित्र को अपना सारा राज्य सकल्प करके दे दिया। उनके दक्षिणा माँगने पर हरिश्चन्द्र ने काशी में पुत्र-स्त्री को बेच कर स्वय एक चाण्डाल का दासत्व स्वीकार कर दक्षिणा चुकाई । हरिश्चन्द्र श्मशान में मुर्ती का कर लेने का काम करते थे। अत में इन्हीं का पुन मर गया। उसे श्मशान मे जलाने के समय अपनी स्त्री से कर लिए बिना इन्होंने उसे नही जलाने दिया । जय स्त्री ने दुखी हो आधा वर फाडने को हाथ बढ़ाया, उसी समय भगवान् ने आकर उनका हाथ रोका और प्रसन्न होकर उनके पुत्र रोहिताश्व को जिला कर उन्हें पुन' अयोध्या के राज सिंहासन पर बैठाया। अन्त में सभी वैकुण्ठवासी हुए । "गालव, नहुष नरेस"- गालव-यह विश्वामित्र के शिष्य थे। विद्या समाप्त कर ऐने पर इन्होंने गुरु से गुरु-दक्षिणा मांगने का आग्रह किया। गुरु श्यामपर्ण घोडे मागे। तब वह राजा ययाति के पास माँगने गए। ययाति ने अपनी पुती माधवी की ओर देखकर कहा-इससे एक पुत्र उत्पा ने माठ सौ अन्तम्या फरनेवारे से दो सौ श्यामकर्ण घोडे लीगिये। गाय हर्यश्व, दिवोदास और उशीनर के पास माधवी के साथ गये और दो दो सौ श्यामकर्ण घोढे रकर एक एक पुन उत्पन्न करो दिया । तप भी दो सौ घोढे नहीं मिले। • अन्त में गाल्य छ मौ घोहे और माधची के साथ अपने गुर के पास गये । विश्वामित्र ने छ सौ घोड़े स्वीकार किए और माधवी से एक पुत्र उत्पन्न कर गालर को गुरु दक्षिणा से मुक्त किया। नहुप-एक समय इन्द्र ब्रह्महत्या के कारण छिप गये थे । इन्दासन का पद पाली था। राजा नहुप बडे ज्ञानी और सन्तोषी थे। इन्द्र-पद उन्हीं को मिला । इन्द्र-पद पाने पर नहुप ने इद्रागी से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। वृहस्पति की सम्मति से इद्राणी ने कहा भेजा कि यदि सुम अपनी पालकी ऋपियों से उठवा कर आओ तो मैं तुम्हें स्वीकार करूँगी। कुछ भागा पीछा न सोच पर राजा ने सप्तपियों से पालकी उठवाई । जल्दी पहुँचने की इच्छा से नहुप ने मद गति से चरते हुए पियों को शीघ्र चलने के लिए 'सर्प, सर्प' कहा। ऋपियों को यह बहुत धुरा लगा और तुरन्त पारकी छोट अगस्त्य जी ने शाप दिया-"तू सर्प हो जा।" सो राजा नहुष इन्द्र पद से गिर कर सौंप हो गये और अनेक कष्ट उठाये। "छुअत सिला भइ नारि सुहाई"- अहिल्या ब्रह्मा ने अहिल्या नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या उत्पन्न की और उसका विवाह गौतम मुनि से कर दिया। इन्द्र ने छल से एक यार गौतम का रूप पना कर अहिल्या का सतीत्व नष्ट किया। उसी समय ऋषि आ गये। भयभीत अहिल्या ने मुनि पर इन्द्र का दुराचार नही प्रकट किया। इस कपट से मुनि को अत्यन्त क्रोध हुआ और उन्होंने अहिल्या को पत्थर हो जाने का और इन को सहस्त्र. 1 मानस मकरन्द भग हो जाने का शाप दिया। इन्द्र के कार्य में चन्द्रमा ने सहायता पहुँ चाई थी, अतएव मुनि ने चन्द्रमा को शाप दिया कि तुम्हारा मुँह काला हो जाय । इसके उपरान्त मुनि अन्यत्र तपस्या करने चले गए। वह अहिल्या चहान होकर निर्जन स्थान में पड़ी थी। रामचन्द्र के चरण-स्पर्श से पहिल्या शिला से पुन पूर्व रूप को प्राप्त हुई । रामन्द्र को दूल्ह रूप में जनकपुर में देख कर इन्द्र भी सहस्र भासवाले हो गए। "जेहि जगु किय तिरे पगहुँ ते थोरा- चलि -राजा बलि के महायज्ञ से घबरा कर इन्द्र विष्णु के पास गये और अपने पद की रक्षा की प्रार्थना की। विष्णु वामन रूप धर कर बलि के पास गये और तीन पद पृथ्वी दान में माँगी। दान पाकर वामन ने दो पदों में नीचे पाताल से ऊपर सत्यलोक तक नाप लिया और तीसरे पद के लिए पृथ्वी माँगी। तत्र बलि ने अपनी पीठ नाप लेने को कहा। इस पर प्रसन्न होकर भगवान् ने उसे पाताल में जाकर राज्य करने की आज्ञा दी। इस पौराणिक कथा की कल्पना ग्वेद और यजुवेद की इन पत्तियों पर की गई हे-- “यस्य त्री पूर्ण मधुना पदान्यक्षीयमाणा स्वधया मदन्ति ।" "इद विष्णु विचक्रमे त्रेधानिदधे पदम् । समूहढरस्य पांसुरे॥" "परसुराम पितु अग्याँ राखी"- परशुराम-एक दिवस परशुराम की माता रेणुका जमुना-स्नान को गई। वहाँ गन्धवों की क्रीडा देखने से उसका मन धर्म पथ से विचलित हो गया। आश्रम को लौट आने पर सब वृत्तान्त जानकर जमदग्नि ने क्रुद्ध होकर अपने पुत्रों को माता का सिर काटने की भाज्ञा दी। तीन पुत्रों ने तो नहीं काटा, केवर परशुराम ने पिता की माज्ञा का पालन किया ।

१०३ अन्तर्वथाएँ "तनय जजातिहि जौयनु दय"-- ययाति [-राजा ययाति की देवयानी और शर्मिष्टा नामक दो रानियाँ थीं। देवयानी शुमाचार्य को कन्या थी और शर्मिष्टा पपर्वा की । विवाह के समय ही शुक्राचार्य ने शर्मिया से प्रेम न करने की प्रतिज्ञा ययाति से करा ली थी। परन्तु शामिछा के पुत्र उत्पा होने पर राजा के प्रतिज्ञा भग की यात बााकर शुमाचार्य को वठा क्रोध हुआ और ऋषि ने राजा को पुढे हो जाने का शाप दिया। राजा के बहुत प्रार्थना करने पर शुक्राचार्य ने युवा अवस्था यदल लेने का नियम निश्चित कर दिया । तर राजा ने थारी यारी से अपने सभी पुत्रों से जरावस्था से युवावस्था को बदलने की यात कही । पर कोई सहमत नहीं हुआ। अत में सबसे छोटे पुत्र पुर ने पिता की भाशा को अपनी युवावस्था के मुग भोग से कही महत्व की ममझ कर अपनी जवानी पिता को देकर उनका बुढ़ापा माप रे लिया । समान" दो०३- चन्द्रमा-निरोक को जीत चन्द्रमा ने राजसूय यज्ञ किया और अपने गुर वृहस्पति की पसी तारा का भी हरण कर उसके साथ सभोग क्यिा । इस पर देवताओं में घोर युद्ध आरम्म हुआ और उसके अन्त के लिए यीच में पड़ कर ब्रह्मा ने तारा वृहस्पति को दिल्या दी और उससे बुध नाम का जो पुनशुमा था, वह चन्द्रमा को मिला। नाप-पीछे ४ में पाट पृष्ट १०१ में इनका वर्णा दिया गया है। बेन-चैन जाम से ही वाचाल, दुष्ट प्रकृति और उपदयी था। पिता के दुखी होकर बन चले जाने पर वेन राका हुआ। राज्य मिलने पर वह और उत्पाती हो गया। उसने धर्म कार्य रोक दिए भौर ब्राह्मणों को अपनी पूजा करने पर याध्य किया। जब ऋषियों और ब्राह्मणों के बहुत समझाने पर भी उसने कुछ ध्यान नहीं दिया, तब उन्होंने बुद्ध हो उसे भस्म कर दिया। ईश्वर के अवतार राजा पृथु येन के ही पुत्र थे। "ससि गुर मानस मकरन्द भग हो जाने का शाप दिया । इन्द्र के कार्य में चन्द्रमा ने सहायता पहुँ चाई थी, अतएव मुनि ने चन्द्रमा को शाप दिया कि तुम्हारा मुँह काला हो जाय । इसके उपरान्त मुनि अन्यत्र तपस्या करने चले गए। वह अहिल्या चट्टान होकर निर्जन स्थान में पड़ी थी। रामचन्द्र के चरण-स्पर्श से अहित्या शिला से पुन पूर्व स्प को प्राप्त हुई । रामन्द्र को दूलह रूप में जनकपुर में देख कर इन्द्र भी सहस्र आँखवाले हो गए। "जेहि जगु किय तिहुँ पगहुँ ते थोरा- चलि राजा बलि के महायज्ञ से घबरा कर इन्द्र विष्णु के पास गये और अपने पद की रक्षा की प्रार्थना की। विष्णु वामन रूप धर कर यलि के पास गये और तीन पद पृथ्वी दान में माँगी। दान पाकर वामन ने दो पदों में नीचे पाताल से ऊपर सत्यलोक तक नाप लिया और तीसरे पद के लिए पृथ्वी माँगी। तन बलि ने अपनी पीठ नाप लेने को कहा। इस पर प्रसन्न होकर भगवान् ने उसे पाताल में जाकर राज्य करने की आज्ञा दी। इस पौराणिक कथा की कल्पना ऋग्वेद और यजुर्वेद की इन पक्तियों पर की गई हे- “यस्य त्री पूर्ण मधुना पदान्यक्षीयमाणा स्वधया मदन्ति ।" "इद विष्णु विचक्रमे त्रेधानिदधे पदम् । समूहढरस्य पांसुरे ॥" "परसुराम पितु अग्याँ राखी"- परशुराम-एक दिवस परशुराम की माता रेणुका जमुना-स्नान को गई । वहाँ गन्धवों की क्रीडा देखने से उसका मन धर्म पथ से विचलित हो गया। आश्रम को सैट आने पर सर वृत्तान्त जानकर नमदग्नि ने कुछ होकर अपने पुनों को माता का सिर काटने की भाज्ञा दी। तीन पुत्रों ने तो नहीं काटा, केरर परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन किया । - 1 अन्तर्कथाएँ १०३ T "तनय जजातिहि जौवनु दय"- ययाति-राना ययाति की देवयानी और शर्मिष्ठा नामक दो रानियाँ थीं। देवयानी शुक्राचार्य को कन्या थी और शर्मिष्ठा पपर्वा की । विवाह के समय ही शुक्राचार्य ने शर्मिष्टा से प्रेम न करने की प्रतिज्ञा ययाति से करा री थी। परन्तु शर्मिष्ठा के पुत्र उत्पन्न होने पर राजा के प्रतिज्ञा-भग की गात आर शुक्राचार्य को बढा प्रोध हुआ और ऋपि ने राजा को खुढे हो जान का शाप दिया। राजा के बहुत प्रार्थना करने पर शुक्राचार्य ने युवा अवस्था यदल रेने का नियम निश्चित कर दिया । तर राजा ने पारी बारी से अपने सभी पुत्रों से जरावस्था से युवावस्था को बदलने की बात कही। पर कोई सहमत नहीं हुआ। अन्त में सबसे छोटे पुन पुर ने पिता की मापा को अपनी युवावस्था के सुख भोग से कहीं महत्व की समझ कर अपनी जवानी पिता को देकर उनका बुढापा माप रे लिया। समान" दो०३- चन्द्रमा-निलोकको जीत चद्रमा ने राजसूय यज्ञ किया और अपने गुर हम्पनि की पनी तारा का भी हरण कर उसके साथ सभोग किया। इस पर देवताओं में घोर युद्ध आरम्भ हुमा और उसके अन्त के लिए यीय में पट कर ब्रह्मा ने तारा वृहस्पति को दिलवा दी और उससे पुष नाम का जो पुत्र हुभा था, यह पन्द्रमा को मिला। नहुप-पीछे ४ में पाठ पृष्ठ १०१ में इनका वर्णन दिया गया है। येन-न जम मे ही याचार, दुष्ट प्रकृति और उपळवी था। पिता मे दुखी होकर मन चले जाने पर येन राजा हुआ) राय मिलने पर वह और उत्पाती हो गया। उसने धाम-कार्य रोक दिए और मालगों को अपनी पूजा करने पर याध्य किया। जब ऋषियों और प्राह्मगों के समाने पर भी उसने पुर ध्यान नहीं लिया, नए उन्होंने खुद हो टसे भाम कर दिया। वर फे भपतार राजा पृथु येन के ही पुत्र । "ससि गुरु बहुत मानस मकरन्द "सहसराहु सुरनाथ त्रिसक सहस्रवाहु-एक बार आवेट करता हुआ राजा सहस्रयाहु जमदग्नि मुनि के आश्रम में जा निकला | मुनि के आदर-सत्कार पर राजा को आश्चर्य हुआ कि इतनी सम्पत्ति मुनि के पास कहाँ से आई । पूछने पर ज्ञात हुआ कि मुनि के पास कामधेनु हे और यह सारा वेभव उसी का हे । सहस्त्रबाहु उसे माँगने लगा। मुनि के न देने पर राजा का क्रोध बड गया और वह मुनि को मार कर गौ ले चला । गौ तो छूट कर इन्द्रलोक में भाग गई, इधर जमदग्नि पुत्र परशुराम ने युद्ध में सहस्रबाहु को मार कर पृथ्वी को २१ बार नि क्षत्रिय किया, और यज्ञ के प्रताप से जमदग्नि को भी जीवित कर रिया। सुरनाथ-एक बार सुरनाथ इन्द्र अपने सिंहासन पर बैठे थे कि- सुरगुर वृहस्पति जी वहाँ भाये । राजमदान्ध इन्द्र के यथोचित्त भादर न करने पर वह अप्रसन्न होकर स्वर्ग से चले गये। गुरुद्रोह के कारण इन्द्र पर भारी विपत्ति भाई । देत्यों ने चदाई कर देवताओं को स्वर्ग से मार भगाया। तब इन्द्र ने ब्रह्मा की सलाह से तपस्वी विश्वरूप को अपना पुरोहित बना कर भनेक प्रयलों द्वारा अपनी रक्षा की । त्रिशङ्कु-राजा त्रिशङ्ख सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा से उद्योग करने लगा। उसने वशिष्ठ और उनके पुत्रों से इस कार्य में सहायता माँगी, किन्तु नकारात्मक उत्तर पाकर विश्वामित्र के पास गया। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल से उसे स्वर्ग को भेज तो दिया, परन्तु स्वर्गवासियों ने उसे धक्का देकर नीचे गिरा दिया। विश्वामित्र के तप और सुर-बल से वह बीच में ही टगा रह गया। "सुधि करि अपरीय, दुरवासा" अवरोप -यह अयोध्या का एक सूर्यवशी राजा प्रशुश्नक का पुत्र था और इक्ष्वाकु से २८ वीं पीढ़ी में हुआ। इसके कारण विष्णु के चक्र ने दुर्वासा अपि का पीछा दिया था। - - । 12 इतनी देर की कि पारण का समय जाने रगा। राजा ने जर पीकर पारग कर रिया। आने पर यह वृत्तान्त जानते ही दुर्वासा के कोर की सीमा न रही और उन्होंने राजा के नाश की कृत्या प्रकट की। अपरीप परम हरिमन ब्रह्मा, शिव और विष्णु के पास गये पर कहीं रक्षा नहीं हुई। अन्त में राजा की ही शरण में आये और राजा ने स्तुति कर थक को शान किया। एक बार नारद को कामदेव पर विजय पाने का अमिमान हमा उसे दूर करने के लिए लक्ष्मीकान्त ने शीरनिधि नामक एक राजा को कन्या को देसने का अवसर दिया। उसे दबने नारद जी मोहित हो गये और स्वयंवर में जयमाल पाने की लालसा से पुन विष्णु भगवान् से अनुपम सदिय्य मांगने गए। विष्णु ने उनका लाई का विश्वास दिया। स्वयम्बर में नारद मुनि भी विजय की माता अमि. मान में जायेटे । परन्तु राजकुमारी ने उनकी भोर देखा मा नोंक्योंकि उनका मुख बन्दर के मुख के समान काला भरि दरावना। था। इस पर मुनि विरल हो उठ । धही भगवान मा का शरीर अन्तकथाएँ दुर्गासा -यह अति मुनि के पुत्र थे और अस्य त क्रोधी थे। इन्होंने और्व मुनि की कन्या कदरी से विवाह करते समय प्रतिज्ञा की थी कि उसके सौ अपराध तक क्षमा करेंगे। इससे अधिक अपराध होनेपर उन्होंने शाप देकर कदली को भस्म कर दिया। इस पर शोकातुर श्री मुनि ने । श्राप दिया–'तुम्हारा दर्प चूर्ण होगा।" इसके अनन्तर एक दिन दुर्वासा अतिथि स्वरूप राजा अवरीप के यहाँ ऐसे समय पहुँचे, जब वह एकादशी व्रत के सम कृय समाप्त कर पारण की तैयारी में थे। निम प्रण लेकर मुनि स्नान करने चले गए और वेपणा ये और सुदर्शन चक्र उनका शरीर रक्षक था। सुदर्शन ने अपने तेज से कृत्या को भम्म कर दिया और दुर्वासा पर एपका ! रक्षार्थ दुर्वास "मोर धाप करि अङ्गीकारा"- विश्वमोहनी - के रिचार पढ़ता मानस मकरन्द min धारण किए हुए उपस्थित थे । कुमारी ने उन्हें ही जयमाला पहना दी। इस पर नारद जी अत्यन्त व्याकुल हो उठे। वहाँ दो रुद्गण भी थे। वे मुस्करा कर बोले-"जरा अपना मुँह तो आइने में देखिए ।" जल में अपना मर्कट मुस देख नारद को वडा क्रोध हुभा और उन्हें राक्षस होने का शाप दिया भौर भगवान् के पास चले । राह ही में वह राजकुमारी के साथ मिल गये। नारद जी ने उन्हें बहुत भला बुरा कहा और शाप दिया "तुमने हमारा चेहरा बन्दर का कर दिया, जिससे मुझे राजकुमारी नहीं मिली। अतएव तुम्हे भी पती नियोग होगा, और तर बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे।"

- eminently fit for those for whom it is primarily intended "-Pt Batuknath Sharma M A padhyaya M RAS, MDM G , पाण्डेय रामावतार शर्मा एम ए विशारद की बनाई हुई कुछ अन्य पुस्तके भारतवर्ष का इतिहास-प्रवेशिका परीक्षार्थियों के पढने योग्य पुस्तक होने के कारण पटना विश्वविद्यालय द्वारा मेट्रिकुलेशन परीक्षार्थियों के लिए स्वीकृत पाठ्य पुस्तक है। स्मिथ, प्रोथेरो, ए सी मुखर्जी, आर सा दत्त आदि के अग्रेजी में लिसे इतिहासों के पढ़ने वालों को भी इसे अवश्य पड़ना चाहिए, क्योंकि विद्यार्थियों की कठिनाइयों और परीक्षा की आवश्यकताओं पर पूरा ध्यान रखकर इसकी रचना की गई है। इसका उर्दू-सस्करण भी तैयार हो गया है। मृत्य ) नीचे की कुछ सम्मतियाँ भी पढ़ें "The book is a delightful reading It is written in a scholarly style and gives plenty of facts The author deserves every encouragement "-Mr R P Khosala, M A, I ES. Vice-Principal, G B B_College, 'It is better than similar books published on the subject and is quite suitable for the Sanskrit and Hindi Students " --Sahityacharya Pt Ramavatar Sharma, MA Prof Patna Cgllege "The author has written this book with great care and judgment The book is undoubtedly and pre- Sahityo- Prof Hindu University Benares "The most important feature of the book is the easy and lucid fashion with which certain very hnotty Muzaffarpur

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problems of History have been explained
-B Shiva Chand Kapur, M A , M RAS, Prof
Queen's College, Benaies
प्रवन्ध-पुष्पाजली -इसमें बिहार के प्राय सभी प्रसिद्ध रेसका
के सुन्दर लेखों का सग्रह है। लेस भिन्न २ विषयों पर भिन्न २ दौली में
लिखे गए हैं और सरसता तथा शिक्षा से भरे है। मैट्रिकुरे शन तक के
हिन्दी पढनेवाले विद्यार्थियों को इसे अवश्य पढना चाहिए । मृत्य )
सस्कृत ज्ञानोदय-यह सस्कृत के व्याकरण अनुपाद के नियमों
को समझानेवाली एक अपूर्व पुस्तक है। विद्यार्थियों की आवश्यकता और
कठिनाइयों से पूर्ण परिचित रेसक ने व्याकरण और अनुवाद सम्बन्धी
नियमों को इस ढग से समझाया है कि विद्यार्थियों की इस विषय की
कुछ भी किष्टता नही रह जाती, न इसके पढने पढाने से किसी भय
व्याकरण या अनुवाद की पुस्तक की भावश्यकता जान पढती है। इसका
प्रकाशन पापिलास प्रेस, याँकीपुर ने किया है । मूल्य 1)
पता-शर्मा-साहित्य सदन, खरीधी,
पो0
भवनाथपुर,
जिला पराम
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Manas Makrand

Author
Sharma,pt,pandhya Ramavatar
Title
Manas Makrand
File name
Manas Makrand
Text
OCR done
Citation
1928
Published
2011/01
Publisher
Sharma Sahitya Sadan Palamu
Language
Sanskrit
Pages
166
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546515
Barcode
4990010024983.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
sfwXSHCuG69
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