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Sahaj Sukh Shadhan
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(२) - - श्रध्यात्ममय निश्चय धर्म के ग्रन्थ निर्माताओं मे श्री कुन्दकुन्दाचार्य का नाम अति प्रसिद्ध है। उनके निर्मापित पचास्तिकाय. प्रवचनसार, अष्ट पाहुड़ आदि श्री समयसार एक अपूर्व ग्रन्थ है, जो श्रात्मा को आत्मारूप पर से भिन्न दिखाने को दर्पण के समान है । मी कुन्दकुन्दाचार्य के तीनों प्रभातों के टीकाकार श्री अमृतचन्द्र श्राचार्य बड़े ही आत्मज्ञानी व न्यायपूर्ण सुन्दर लेखक होगए हैं । श्री समयमार के अर्थ को खोलनेवाले जयपुर निवामी पं. जयचन्दजी होगये हैं । उनकी श्रात्म ख्याति नाम टीका आत्म तत्व झल- काने को अपूर्व उपकार करती है । कारजा (बरार) निवामी श्रीमेनगण के विद्वान भट्टारक श्री वीरसेनस्वामी समयसार के व्याख्यान करने को एक अद्वितीय महात्मा है । उनके पास एक वर्षाकाल बिताकर मैंने समय- सार आत्मख्याति का यांचन किया था। श्री वीरसेन स्वामी के अर्थ प्रकाश में मुझ अल्प बुद्धि को विशेष लाभ पहुंचा था। उसी के आश्चय से और भी जैन साहित्य के मनन करने से तथा श्रीमद् रामचन्द्रजी के मुख्य शिष्य श्री० लघुगजजी महाराज की पुनः प्रेरणा से इस ग्रन्थ के लेखन में इस बात का उच्चम किया गया है कि श्री तीर्थकर प्रणीत जिनधर्म का कुछ बोध दर्शाया जावे व अनेक प्राचार्यों के वाक्यों का संग्रह कर दिया जावे जिमसे पाठकगण स्वाधीनता की कुजी को पाकर अपने ही अज्ञान के कपाटो को बोलकर अपने ही भीतर परमात्म देव का दर्शन कर सकें। जो भव्य जीव इस को आदि से अन्त तक पढ़कर फिर उन ग्रन्थो का पठन करेगे जिनके वाक्यों का इसमें सग्रह है तो पाठकों को विशेप श्रात्म लाभ होगा। इसमे यथा सभव जिनवाणी का रहस्य समझकर ही लिखा गया है । तो भी कहीं अज्ञान व प्रमाद से कोई भूल हो तो विद्वज्जन मुझे अल्पश्रुत जानकर क्षमा करें व भूल को ठीक करलें । मेरी भावना है कि यह ग्रन्थ सर्वजन पढकर आत्मज्ञान को पाकर सुखी हो। - अमरावती । आश्विन सुदी ८ वीर स. २४६० ता.१६-१०-१९३४ जनवर्मप्रेमी- ब्रह्मचारो सीतलप्रसाद - - विषय-सूची विषय पृष्ठ । विपय पृष्ठ प्रथम अध्याय-- पिंडस्थ ध्यान धारणाए उपयोगी श्लोक व गाथाए उपयोगी कवित्त १४८ १४९ 'ससार स्वरूप २ रौद्र ध्यान سع ७ क्षुद्भव'६६३३६ का विवरण प्रात ध्यान । ससार सम्बन्धी श्लोक व गाथायें बनारसीदास, द्यानतराय, भगवतीदासजी के कवित्त सातवां अध्याय- ११ | सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य जीव अजीव तत्व २६ द्रव्यों के सामान्य विशेष गुण पांच अस्तिकाय जीव द्रव्यो के नौ विशेषण ३० । सात समुदघात ३६ चौदह जीव समास चौदह मार्गणायें दूसरा अध्याय- शरीर स्वरुप उपयोगी श्लोक व गाथायें कवित्त उक्त तीन कवि चौदह गुणस्थान र तीसरा अध्याय- आश्रव व वध तत्व मवर और निर्जरा तत्व १९३ १९५ १९७ १९७ १९८ २०३ २०४ २०४ २०६ २१० २१४ २१५ २१७ २१७ २१९ २२० २२२ २२३ २२४ २६५ भोगों का स्वरूप ५१ मोक्ष तत्व उपयोगी श्लोक व गाथायें कवित्त ४० चौथा अध्याय- द पहज या अतीन्द्रिय सुख उपयोगी श्लोक व गाथाये वित्त सात प्रकार जप णमोकार मंत्र सात प्रकार भय सम्यक्त के आठ अंग के आठ लक्षण १४८ कर्म प्रकृतिया चौदह गुणस्थानों मे कर्म बध उपयोगी श्लोक व गाथायें उपयोगी कवित्त ९६ गांचवा अध्याय- व का एकत्र पयोगी श्लोक व गाथायें वित्त १०१ | आठवां अध्याय- ११० १३४ | मम्मग्जान और उसका महात्मय चार अनुयोग निश्चय व्यवहार नय १४० नैगम नयादि सात नय १४६ / स्याद्वाद स्वरूप प्रठा अध्याय- २७१ २७६ २८० ૨૮૨ २८३ हजसुख साधन पान का उपाय (२) -- अध्यात्ममय निश्चय धर्म के अन्य निर्माताओं में श्री कुन्दकुन्दाचार्य का नाम अति प्रसिद्ध है। उनके निर्मापित पचास्तिकाय. प्रवचनसार, अg पाहुड़ आदि श्री समयसार एक अपूर्व ग्रन्थ है, जो श्रात्मा को आत्मारूप पर से मिन्न दिखाने को दर्पण के समान है। श्री कुन्दकुन्दाचार्य के तीनों प्रभातों के टीकाकार श्री अमृतचन्द्र श्राचार्य बड़े ही आत्मज्ञानी व न्यायपूर्ण सुन्दर लेखक होगा है । श्री ममयमार के अर्थ को खोलनेवा ते जयपुर निवासी पं. जयचन्दजी होगये हैं। उनकी श्रात्म ख्याति नाम टीका आत्म तत्व झल. काने को अपूर्व उपकार करती है । कारजा (वरार) निवामी श्रीनगण के विद्वान् भट्टारक श्री वीरसेनस्वामी समयसार के व्याख्यान करने को एक अद्वितीय महात्मा है। उनके पास एक वर्षाकाल बिताकर मैने समय सार प्रात्मख्याति का पाचन किया था । श्री वीरसेन स्वामी के अर्थ प्रकाश स मुझ अल्प बुद्धि को विशेष लाभ पहुंचा था। उसी के आश्य से और भी जैन साहित्य के मनन करने से तथा श्रीमद् रामचन्द्रजी के मुख्य शिष्य श्री० लघुराजजी महाराज की पुनः प्रेरणा से इस ग्रन्थ के लेखन में इस बात का उद्यम किया गया है कि श्री तीर्थकर प्रणीत जिनधर्म का कुछ बोध दर्शाया जावे व अनेक प्राचार्यों के वाक्यों का संग्रह कर दिया जावे जिससे पाठकगण स्वाधीनता की कुजी को पाकर अपने ही अज्ञान के कपाटो को खोलकर अपने ही भीतर परमात्म देव का दर्शन कर सकें। जो भव्य जीव इस को आदि से अन्त तक पढ़कर फिर उन ग्रन्थों का पटन करेंगे जिनके आक्यो का इसमें सग्रह है तो पाठकों को विशेष श्रात्म लाभ होगा। इसमें यथा सभव जिनवाणी का रहस्य समझकर ही - लिखा गया है । तो भी कहीं अज्ञान व प्रमाद से कोई भूल हो तो विद्वज्जन मुझे अल्पश्रुत जानकर क्षमा करें भूल को ठीक करलें । मेरी भावना है कि यह ग्रन्थ सर्वजन पढकर श्रात्मज्ञान को पाकर सुखी हो। A अमरावती। आश्विन सुदी ८ चीर स. २४६० ता.१६-१०-१९३४ जैनधर्म प्रेमी- ब्रह्मचारो सीतलप्रसाद T विषय-सूची विपय पृष्ठ विपय पृष्ठ प्रथम अध्याय-- १४८ पिंडस्थ ध्यान धारणाएं उपयोगी श्लोक व गाथाएं उपयोगी कवित्त ससार स्वरूप रौद्र ध्यान २ ३ १४९ १८७ क्षुद्रभव ६६३३६ का विवरण - आर्त ध्यान द ससार सम्बन्धी श्लोक व गाथायें बनारसीदास, द्यानतराय, भगवतीदासजी के कवित्त सातवां अध्याय- ११ / सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य जीव अजीव तत्व २६ द्रव्यों के सामान्य विशेष गुण पाच अस्तिकाय जीव द्रव्यो के नौ विशेषण ३० सात समुदघात चौदह जीव समास चौदह मार्गणायें ४८ १९३ १९५ १९७ १९७ १९८ २०३ २०४ दूसरा अध्याय - शरीर स्वरूप उपयोगी श्लोक व गाथायें कवित्त उक्त तीन कवि चौदह गुणस्थान तीसरा अध्याय- आश्रव व वध तस्त्र मवर और निर्जरा तत्व भोगों का स्वरूप २०६ २१० २१४ २१५ २१७ 3 ต मोक्ष तत्व उपयोगी श्लोक व गाथायें कवित्त चौथा अध्याय- 3 पहज या अतीन्द्रिय सुख उपयोगी श्लोक त्र गाथाये वित्त सात प्रकार जप णमोकार-मत्र सात प्रकार भय सम्यक्त के आठ अंग के आठ लक्षण १४८ कर्म प्रकृतिया चौदह गुणस्थानों में कर्म बध उपयोगी श्लोक व गाथायें उपयोगी कवित्त २१९ २२० २२२ २२३ २२४ २६५ ९६ गांचवा अध्याय- - शव का एकत्र पयोगी श्लोक व गाथायें वित्त १०१ पाठवा अध्याय- ११० १३४ | मम्मग्नान और उसका महात्मय चार अनुयोग निश्चय व्यवहार नय १४० नैगम नयादि मात नय १४६ स्याद्वाद स्वरूप प्रठा अध्याय- २७६ २८० हजसुख साधन पानका उपाय २८३ (२) र -- अध्यात्ममय निश्चय धर्म के ग्रन्थ निर्माताओं में श्री कुन्दकुन्दाचार्य का नाम अति प्रसिद्ध है। उनके निर्मापित पचास्तिकाय, प्रवचनसार, अपाहुड़ आदि श्री ममयसार एक अपूर्व ग्रन्थ है, जो आत्मा को आत्मारूप पर से भिन्न दिखाने को दर्पण के समान है। श्री कुन्दकुन्दाचार्य के तीनों प्रभातों के टीकाकार' श्री अमृतचन्द्र श्राचार्य बड़े ही आत्मज्ञानी व न्यायपूर्ण सुन्दर लेखक होगए हैं । श्री समयमार के अर्थ को खोलनेवा ने जयपुर निवासी पं. जयचन्दजी होगये है । उनकी श्रात्म ख्याति नाम टीका आत्म तत्व झल-- काने को अपूर्व उपकार करती है। कारजा (बरार) निवामी श्रीमेनगण के विद्वान् भट्टारक श्री वीरसेनस्वामी समयसार के व्याख्यान करने को एक अद्वितीय महात्मा है। उनके पास एक वर्षाकाल बिताकर मैने समयः सार प्रात्मख्याति का वाचन किया था। श्री वीरसेन स्वामी के अर्थ प्रकाश से मुझ अल्प बुद्धि को विशेष लाभ पहुंचा था। उसी के आनय से और भी जैन साहित्य के मनन करने से तथा श्रीमद् रामचन्द्रजी के मुख्य शिष्य श्री० लघुराजजी महाराज की पुनः प्रेरणा से इस ग्रन्थ के लेखन में इस बात का उद्यम किया गया है कि श्री तीर्थंकर प्रणीत जिनधर्म का कुछ बोध दर्शाया जावे व अनेक प्राचार्यों के वाक्यों का संग्रह कर दिया जावे जिससे पाठकगण स्वाधीनता की कुंजी को पाकर अपने ही अज्ञान के कपाटों को खोलकर अपने ही भीतर परमात्म देव का दर्शन कर सकें। जो भव्य जीव इस को श्रादि से अन्त तक पढ़कर फिर उन ग्रन्थों का पठन करेगे जिनके वाक्यों का इसमें संग्रह है तो पाठकों को विशेष प्रात्म लाभ होगा। इसमें यथा सभव जिनवाणी का रहस्य समझकर ही लिखा गया है । तो भी कहीं अज्ञान व प्रमाद से कोई भूल हो तो विद्वज्जन मुझे अल्पश्रुत जानकर क्षमा कर भूल को ठीक करलें । मेरी भावना है कि यह ग्रन्थ सर्वजन पढकर आत्मज्ञान को पाकर सुखी हो । R . व अमरावती । आश्विन सुदी ८ वीर स. २४६० ता.१६-१०-१९३४ जैनवर्म प्रेमी- ब्रह्मचारो सीतलप्रसाद T विषय-सूची विपय पृष्ठ विषय पृष्ठ प्रथम अध्याय- - पिंडस्थ ध्यान धारणाए उपयोगी श्लोक व गाथाए उपयोगी कवित्त १४८ १४९ १८७ ससार स्वरूप रौद्र ध्यान س س و ا ه झुद्रभव ६६३३६ का विवरण सातवां अध्याय- बात ध्यान ससार सम्बन्धी श्लोक व गाथायें बनारसीदास, द्यानतराय, भगवतीदासजी के कवित्त ३ ११ सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य जीव अजीव तत्व २६ | द्रव्यों के सामान्य विशेष गुण पाच अस्तिकाय जीव द्रव्यो के नौ विशेषण ३० सात समुदघात ३६ चौदह जीव समास चौदह मार्गणायें दूसरा अध्याय शरीर स्वरूप उपयोगी श्लोक व गाथायें कवित्त उक्त तीन कवि चौदह गुणस्थान तीसरा अध्याय- - आश्रव व वध तत्त्र मवर और निर्जरा तत्व १९३ १९५ १९७ १९७ १९८ २०३ २०४ २०४ २०६ २१० २१४ २१५ २१७ २१७ २१९ २२० २२२ २२३ २२४ २६५ भोगों का स्वरूप ५१ मोक्ष तत्व उपयोगी श्लोक व गाथायें कवित्त सात प्रकार जप ७० णमोकार मत्र चौथा अध्याय- पहज या अतीन्द्रिय सुख उपयोगी श्लोक व गाथायें कवित्त ७७ सात प्रकार भय सम्यक्त के आठ अंग के आठ लक्षण १४८ कर्म प्रकृतियां चौदह गुणस्थानों में कर्म बध उपयोगी श्लोक व गाथायें उपयोगी वित्त रांचवा अध्याय- व का एकत्र पयोगी श्लोक व गाथायें वित्त १०१ आठवां अध्याय- ११० १३४ | सम्भग्नान और उसका महात्मय चार अनुयोग निश्चय व्यवहार नय १४० | नैगम नयादि ग्नात नय १४६ स्याहार स्वरूप छठा अध्याय- . २७१ २७६ २८० ૨૮૨ २८३ हजसुख साधन पान का उपाय (२) विषय विषय पृष्ठ ५ उपयोगी श्लोक व गाथायें कवित्त नौवां अध्याय- सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य सकल्पी व आरम्भी हिंसा साधु का १३ प्रकार का चारित्र पांच व्रतों की २५ भावनायें दशधर्म २८६ / २२ परीपहजय ३१३ | चारित्र ५ प्रकार बारह तप ३१७ श्रावक के बारहव्रत ३२२ ] श्रावक का समाधिमरण ३२३ | श्रावक की ग्यारह प्रतिमायें ३२४ / उपयोगी श्लोक व गाथायें ३२४ | कवित्त ३२४ | प्रशस्ति ३२५ ३२५ ३२६ ३३० - ३३० ३३३-३६३ ३६८ ३७२ बारह मावनायें - RALNITNNER शुद्धा-शुद्धि पत्र. अशुद्ध शुद्ध पत्र पक्ति স্পঃ पंक्ति वय १२ मे ३ वायु वार कर चेतन नहीं होता इस ५ ११ १३ २९ ३२ ३२ ३३ ३४ ३७ १४ १८ २३ २६ ४ १९ वायु कायादि वहुत उत्तम ६ ६ स ३९ or बर कर ही चेत नहीं स वायुवादि बहुत रोग रुधिर रुधिर पुराना रहते खन भुख मदिरा कनकफल कषाप नह सख सा वीर्य } ४९ ५६ ५६ ६८ २९ वराणो १६ | गे ११ शरार १८ सरसदो १४ | दसणणापु २४ | पेछन्ता १ | उसके ३० मढ कष्ट शत्रुन मरम सो में नहीं हूँ भेद वत्स्वल ३१ विवर्जित २३ अपने ही २८ ८ मढ़ रसखगंधा चरम विनश्चत्य ३२ कमभवाः समस्त्रिस्यते १९ बधस्तस्य न यत्रित आत्मा जुदा से ११ पश पुरानी कहते खून सुख मदिरा से कतकफल कषाय वह सुख सांप्र वएणो १११ ११३ शरीर ११३ सास्सदो ११३ दसणणाणु ११३ पेच्छता ११४ उनके १२५ मूढ ११५ कष्ट, ११६ शत्र ११७ मम या भ्रम ११८ में नहीं हूँ, १५८ भेदवत्स्वडल ११८ विवर्जितः ११९ अपने में ही १२० मूढ १२१ रस रूव गंधा १२१ परम विनिश्चित्य १२३ कर्मभवाः १२३ सनीस्त्रस्यते १२४ बधस्तस्यन यत्रित १२४ आत्मा से जुदा १२४ पशु १२५ ध्यात्मनो १२५ धनिक १२६ अज्ञानि व दास १२६ निमेल: १२८ वर्जित १२९ मुख का दृश्य १२९ २२ २४ २६ २८ प २५ १२२ ३ ७५ ४५ रखना न रखना ६० २ १ १२ १८ ५ २४ १३ १४ १०८ ३४ | ध्यात्मनो १५ / घनिक १०९ शद्ध ज्ञा अपनी स्वतत्र निराल हरएक भोगता है एक्का कर्मो ४ शुद्ध अपनी स्वतंत्र निराला ० नहीं चाहिये एवको कमी २७ / अज्ञानदास १०९ ३१ / निर्गलः २१ वैर्णित ६ १ ११० २५ मुख दृश्य ३२ .
पक्ति पंक्ति पत्र पत्र अशुद्ध २९ | अनभव २२ স্পত্তি शुद्धि तस्मित् हपे तस्मिन हर्प १२९ शुद्वात्मा अनुभव से ही-सोशुद्ध अनुभूति से ही अनुमय करने w योग्य हूँ ४ २६ २५ १८ १९ मोक्ष ५ बहिई 'ट्वा १५ - श्रनुभव १६३ आत्मनतत्वं आत्मनस्तत्व १६. पलयकासन पर्याशासन १६५ मनमायमा समावण १६५ जिम १२ भांजन १६५ निरस्यसम्यन्यत्रस्य १७० रस्यमम्यम्म्य १९ वत्तस्माद यत्तस्माद १७० २६ चरत्यपि चम्त्यपि १७० रम्तभेति रम्तमति ४ २६ | वियोयातिनिक्षेपचक-विद्मोयातिनिक्षेपचक्र ९ / अस्त होजाते है के आगे-निनेर चक्र कहा गायब होजाता है नहीं जाना जाता है अधिक ६ श्रपतति अपतति १० | पुद्दलादि पदलाद्भिन्न १७२ ११ शक्त्या शक्त्या १७२ १४ पृथलक्षणा पृथग्लअणा २४ चैतन्यमान २५ भनया शुद्धनया विकार १७३ १३ श्रात्मन आत्मन १७५ १५ | पथान पथानं १७५ १९ विपश्चित विपश्चितः १७६ २४ / द्वेपरागाभ्या द्वेपरागाभ्यां १७९ २४ | नातिस्थिरी नातस्थिरी १८० कीय १८० २६ | धीरे रेवगाहः १९ | ध्यान के योग्य वामन है-ध्यान के योग्य ये श्रासन है. १८१ सफल सफल १८७ १४ ज्ञानवन ज्ञान वन १८७ उछेद १८८ २६ / ज्यान है १८९ १५ श्रामाल अमल १९० १७३ १७३ चंतन्यमाका स्वकर्मान स्वकर्मनि १३० अकेला ही अकेले ही को कृपाणः कृपाणः १३० वघ्नाति बध्नाति : १३० मुक्त १३१ घरमातरम परमादरम् १३१ वहिष्टवा १३३ उबरयोजु उबरभोजु १३५ नमै न में १३६ वेदिन विदित १४१ पालताहे पालेता है उपयोगको क्रोधाधि क्रोधादि सच्च सच्चे १४४ तव १४५ अत्यन्त प्रातःकाल प्रातःकाल १४५ १४६ सोयो सोचे १४७ श्रागेयी आग्नेयी १४७ एका एक १४७ विचारो विचारे १४७ १४७ । समयोसरण ममवशरण १४८ १४८ सुख फूल १४९ परमप यपान परमपयंपावर १५५ समयक्त मम्यक्त स्वरूपाचरण रूपी स्वरूपाचरणरूपी १५६ हादि होदि धौके धौके १५६ भात्र भव १६० १२ १४ १५ ध्यान जपे ध्यान जमे २९ / विकाये १३ 1. १३ प । १६ २० २१ २० कर्माध । धीररवगाह १८० २५ मन लगे मन न लगे १९ ११ १४. २६ ९ १६ अछेद हान है (३) - पक्ति अशुद्ध पत्र शुद्ध पत्र अशुद्ध पंक्ति शुद्ध ५ ९ इन्द्री मनके आत्मा में ६ आत्मा के पुद्गलों के ३२ सहित हा ११ | हु.खों ९ १३ १५ १४ ९ २३ २४ २३ २३ १४ १९ १० | दसण श्रोत्र ९ २४ | ऐसा जाता w ३० . २४ | वियो। or मिष्ट भिष्ट १९१ गनीभनके १९२ प्रात्मा १९३ प्रात्मा १९४ पुद्गलों में १९४ उपयोगी उपयोगी है। १९७ सुबण सुवर्ण १९५ देखने देखन में १९५ श्राकाश अवकाश १९७ चौंद्रिय चौहन्द्रिय १९८ कम कर्म २०१ श्रोत २०४ यो। योग २०५ कार्माणयग कार्माणयोग २०५ शुभतरशुभ है शुभतर पद्म है २०५ जिनकी जिनको २०५ सम्यक्तमोहिनी सम्यक्प्रकृतिमि. २०६ अतमुहूर्तअधिक अतमुहूर्त में अधिक २०७ सयम समय २०८ ऋ ऋ २०९ वणभय वर्णमय २०९ ससारी ससारी २१० अरति अविरत २१२ कमस्थिति कमस्थिति में २१३ तोनिमित्त तोनिमित्तन २१३ ४ दिन १० घटे-४ दिन १० घटे ४० मि २१४ अनुभव बढ़ता अनुभाग घटता २१४ इस सात इन सात धर्म धर्म २२० लिम्बा लखा २२१ निद्रा निन्द्रा निद्रा निद्रा निद्रा निद्रा २२२ प्रमाण निर्माण २२२ वादर, पर्याप्त २२२ निद्रानिद्रा २२३ २६ | तिर्यंचांग तिर्यचगति २२३ ३२ | का बध होता है का बंध नहीं होता है, १९ कम्मविमुखण कम्मविमुक्खणं २३१ २४ | गणिवेददि णावि णविवेददिणाणी २३१ २९ | जीवादि जीवादि जीवाजीवादि २३३ सहित हो २३२ दुखों २३६ २२ | अभियान अभिमान २३७ गाउव गाऊण २३७ दसण २३८ २० प्रसिद्वश्तुविधः प्रसिद्धश्चतुर्विधः २४७ ३० आकर आकार २४८ प्रतीभास प्रतिभास २४९ कतव्यं कर्तव्य २४९ ऐसा कहा जाता २५१ २५ त २५१ वियोग २५३ हा ही २५४ २९ | तुलो तुषों २५४ सुखी २५६ ३२ गते हि गते काले हि २५६ १२ | वजिता वर्जिता २५८ १५ इया ईया २५९ ९ / परिकीतितम् परिकीर्तितम् २६० १९ | जिन जिम २६४ १६ की को २६५ ३१ अग अग २६५ २ | जागि जागी तैसे २६६ ५ लपि लखि २६९ ५ शुद्ध शुद्ध २७१ १३ । चौपट चौपड २७१ २३ | गटता प्रगटता २७२ ५) ज्ञानज्याति ज्ञानज्योति १० १८ १८ १० सुखा १५ १७ २५ २१ / से ૨૨ २८ २१ १२ २१ ३१ १६ २९ -~ i वादर पर्याप्त . निद्रा, निद्रा, 9 J (४) थशुद्व शुद्ध पत्र पक्ति अशुद्ध शुद्ध पत्र पंक्ति पापाक २८ गोचार अपन्न वीरागपना ली दुईज श्रा पडेगे समझाना मतिज्ञानवरण शस्त्र केवल न सयोग निवृतः गोचर अप्रशन्न वीतरागपना केवली दोज अंग पढेगे समझना मतिनानावरण शास्त्र केवलज्ञान सयोग २७४ २७५ २७५ २७६ ૨૭૬ २९ १५ मातमुहर्ततः २४ २७ नेष हे है ८ जिन्दः १५ १८ व्यापारी मूल बातों १६ असद्भत सामान सफेद पीला व्यापारीपना मूल बातों मृल असद्मृत समान सफेद काला भाव रुप स्यात् पजाया वैराग्य २७८ २७९ २७९ २८० २८० २८१ २८१ २८२ २८१ २८३ २८४ २८४ २८४ २८४ २८६ २८८ २८८ २८८ २९० २९ / विरियह दिगदा विरियाट्रिगदा २ पोपक २६ । सवेजिनी मवेगिनी २९७ मानरूपी मनस्पी २९९ २५] निवृत २९९ २५ की ३०० ३०. मातमुहर्ततः २३ अनुभव-अनुभव श्रुतजान का अनुभव ३०० २१ स्तार्थान स्वार्थान ३०१ जेय ३०१ म ३०३ २५ धर्मदर्शना धर्म देशना जिनेन्द्रो मनन ३०३ ८ यानभव अनुमव ११ स्वरुपल स्यस्पफुज ३०७ चिता चिन्ता ३०९ जयोति ज्योति ३१० १२ यन्नतानद अन्नतानन्त धों গ্রী ३१४ १६ पम पर्म २९ सस्यज्ञान मम्यचारित्र ३१८ बिलकुत बिलकुल ३१५ वैसे वसे १६ ३१९ गभित गर्भित ३२१ १९ प्राण प्रण २९ २२ बात वस्तु ३२३ कपायों को ३२४ १३ मानन मानना ३२४ १ | ११) चोधिदुर्लभ ३२४ २५ | सहनी सहना ३२४ २४ | दसगे दूसरों ३२८ उल्लघर उल्लघकर ३२८ आदरभाव श्रादरभाव न ३२९ १९ २० २१ ९ माव रुप ऊपर ९ कम्माई १६ १६ ३ १२ स्माद पज्वाया वैराम्य कम्मई कुम्मुदय भहुएहि अन्तमुहूर्त मुलगुणो परमात्व रक्त स्वगोस्यचरे नवान अज्ञानी २५ , पायो कम्मुदय बहुपहि अन्तमुहूर्त मूलगुणों परमात्म रिक्त स्वगोचरे नवीन अज्ञानी को २९१ २९३ २९४ २९५ २९७ २९७ २१ ९ + -- (५) पक्ति पत्र अशुद्ध গুড় पन्न पक्ति गगादिक १९ / पक्णो ur रोगादिक गर्म लौकिक ३३० ३३१ ६ २३ भिक्षार्थ १२ १८ or सो विहार लोट जीवादि ३३२ ३३३ ३३४ ३३४ ३३४ ३३५ ३३६ मे १८ १७ ७ ऐश्चर्यो १५ [ दुजयान . मन काय १२ | मुनिश्चल महस्मि सयम २० माव १०| शरा १ | कुर्यायसनानि रस्पि १३ | वीणता सव १४ | वशेखिये १६ | विधन १३ गुनको ४ | अमीत १७ - कमें १७ रोध णिच्छय अनित्यादि सयोग समा णिन्भय ३ १ सैव . लौकित भिक्षाथ सा विहा लोटू जोवादि भे णिच्धय अतित्यादि सयोग सभा किन्भय क्षा रग्गथ पासत्ते थिस्त णयस्य विनते धेय वेराग्यः आर्यिकानों (म्भोस्य रचत्रितुर्भेद पूर्वक क २९ पक्खो ३४६ ऐश्वर्यो ३४६ दुर्जयान ३४८ मन बचन काय ३४८ सुनिश्चल महोस्मि सयम ३५३ भाव (भाव) ३५४ शूरा ३५५ कुर्यान्यसनानि ३५७ रस्मि ३५९ वीर्णताम् ३६० ३६२ विशेखिये ३६४ विधून ३६४ ३६४ अभीत कर्म ३६५ धरौ ३६५ वृक्ष ३६६ कर दुर्जन को ब्रह्म ३६९ निर्धन आपी रहिये उमगाय ७ दिक्षा ११ मुनि को ४ २३ ३३६ ३३७ ३३७ ३३७ ३३८ ३३९ ३३९ ३४० ३४१ ३४१ ३४२ ३४३ ३४४ ३४५ ३४५ णिग्गथ पासकते स्थित यस्स बनते धैर्य वैराग्य आर्यिकाओं रम्भोरस्य पंचनि चतुर्भेद १३ | बच्छ ३६९ २ २१ २२ | कर दुजनको १५ | ब्रह्म ३] निधन ११ आप ४] ररिये ९ उमगाम 9 1 3 पूर्व के लोक ३४५ ८
।। श्री॥
ग्रन्थ प्रकाशन के ध्रौव्य फंड में प्राप्त हुई सहायता
ग्रन्थमाला के संरक्षकों की नामावली
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१५००) श्री स्व. सेठ गुलाबसा मोहनसा मलकापुर के पारमार्थिक फड मे
७००) श्री न. दुलीचन्दजी उदासीनाश्रम इन्दौर
५००) भी सेठ छगनलालजी सुसारी
१००) अखिल भारतवर्षीय केन्द्रीय श्री दि जैन महासभा देहली
१००) श्री सेठ नत्थुसा वालचन्दसा सराफ मलकापुर
१००) श्री सेठ कचरूमा रामुसा मलकापुर
१००) श्री तोतुसा किसनमा चवरे मलकापुर
१००) श्री लाडकाबाईजी धर्मपत्नी स्व. सेठ बंसीसा मलकापुर
१००) भी चम्पालालजी शिवलालजी टाया उदयपुर
१००) श्री शंकरलालजी लच्छीरामजी नरसिंहपुरा इन्दौर
१००) श्री सेठ नन्दरामजी नाथुलालजी सराफ इन्दौर
१००) श्री सेठ मोहनभाई काजीधीया राजकोट
१००) श्री सेठानी अनूपबाई सा. माणक भवन इन्दौर
१००) श्री तेजकुमारीबाई सा. विनोद मिल्स उज्जैन
१००) श्री दानशीला चन्द्रावतीवाई सा. खंडवा
१००) श्री भागाबाईजी चोलीवाले हाल खंडवा
१००) श्री मांगीबाईजी धर्मपत्नी सेठ मूलचन्दजी पाटनी इन्दौर
१००) श्री सेठानी मूरीबाईजी धर्मपत्नी सेठ जवरचन्दजी महू
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. ॐ सहज-सुख-साधन। दोहा। सहजानंद स्वभाव को, सुमरण कर बहु धार । भाव द्रव्यसे नमन कर, लहूं सुबुद्धि उदार ॥ १ ॥ श्री जिनेन्द्र ऋषमेश से, वीर धीर पर्यन्त । वर्तमान चौवीस जिन, नमहुँ परम गुणवन्त ॥ २॥ सिद्ध शुद्ध श्रातम विमल, परमानंद विकाश । नमहुँ भाव निज शुद्ध कर, होय आत्म हुल्लाश ॥ ३ ॥ श्री गुरु अाचरज गुणी, साधु संघ प्रतिपाल । निजाराम के रमण से, पायो ज्ञान विशाल ।। ४ ।। उपाध्याय श्रुतके धनी, ज्ञान दान कर्तार । अध्यातम सत ज्ञान से, किये भव्य उद्धार ॥ ५॥ साधु साधते आपको, निज अनुभव पथ लीन । कर्म कलंक मिटायके, रहें सदा स्वाधीन ॥ ६ ॥ तीनों पद धर गुरुनिको, वार वार सिर नाय । जिनवाणी पावन नमू, आत्म तत्व दरशाय ॥ ७ ॥ प्रात्मधर्म जग सार है, यही कर्म क्षयकार । यही सहज सुखकार है, यही भर्म हरतार ॥ ८ ॥ यही धर्म उत्तम महा, यही शरण • धरतार । नमन करु इस धर्मको, सुख शांती दातार ॥ ९ ॥ सहजानन्द सुधा महा, जे चाखन उत्साह । तिन हित साधन सार यह, लिखू तत्व अवगाह ॥१०॥ , २] ससार स्वरूप। - प्रथम अध्याय . संसार स्वरूप। "संसरणं संसारः परिवर्तनम्" संसार उसको कहते हैं जहां जीव संमरण या भ्रमण करता रहता है, एक अवस्थामे दूसरी अवस्थाको धारता है, उमको छोडकर फिर अन्य अवस्थाको धारता है । समारमे थिरता नही, ध्रुवता नहीं, निराकुलता नहीं, मसार दुखों का समुद्र है । शरीर सम्बन्धी दुःख है-जन्मना, मरना, वृद्ध होना रोगी होना, अशक्त होना, भूख प्यायस पीडित होना, गर्मी सर्दी से कट पाना, डास मच्छरादिसे पीड़ित होना, बलवानों द्वारा शस्त्र घात सहना, आदि । मन सम्बन्धी दुख है-इष्ट वियोग व अनिए मयोग तथा रोग पीडासे गोफिन व खेदित होना, परकी सपत्ति अधिक देखकर ईर्पा भावसे सतापित रहना, बेहत धनादि परिग्रह की प्राप्तिको तृष्णासे आकु- लित रहना, अपनी हानि करनेवाले पर द्वेप व क्रोधभावसे कष्ट पाना, अपमानकर्ताको हानि करनेके भावसे पोहित रहना, सताप व कप दातारों से भयभीत रहना, इन्छानुकूल वस्तु न पाकर क्षोभित रहना, आदि । शारीरिक तथा मानसिक दुःखों से भरा हुआ यह समाररूपी खारा ममुद्र है । जैस खारे समुद्रसे प्याम बुझती नहीं वैसे ससार के नाशवन्त पदार्थो के भोगसे तृष्णाकी दाह शमन होती नहीं । बड़े २ सम्राट भी ससारके प्रपचजालसे कए पाते हुए अतमे निराश हो मरजाया करते हैं। इस संसारके चार गति रूपी विभाग हैं - नरकगति, तिथंचगति, देवगति, मनुप्यगति । इनमें से तिर्यचगति व मनुष्यगतिके दु ग्व तो प्रत्यक्ष प्रगट है । नरकति व देवगरिक दुःख यद्यपि प्रगट नहीं तथापि आगम के द्वारा श्रीगुरु वचन प्रतीतिसे जानने योग्य है। (१) नरकगतिके दुःख-नरकगतिमें नारकी जीव दीर्घकाल तक वाम करते हुए कभी भी सुख शांति पाते नहीं। निरतर परस्पर एक दूसरेसे क्रोध करते हुए वचन प्रहार, शस्त्र प्रहार, काय प्रहार आदिसे कट देवे व सहते रहते हैं, उनकी भूख प्यास की दाह मिटती नहीं, यद्यपि वे मिट्टी खाते है, वेतरणी नदी काखारा जल पोते हैं परन्तु इससे न क्षुधा शांत होती है न प्यास बुझती है। शरीर बैंक्रियिक होता है जो छिदने भिदने पर भी पारे के ममान मिल जाता है । वे सदा मरण चाहते हैं परन्तु वे पूरी श्रायु भोगे बिना नरक पर्याय छोड नहीं सकते । जैसे यहा किसी जेलखानेमें दुष्ट बुद्धिधारी चालीस पचाम कैदी एक ही बड़े कमरे में धर दिये जाने तो वे एक दूसरेको सनाएगे, परस्पर कुवचन बोलेंगे, लड़े गे, मारें पोटेंगे और सब हो दुखी होंगे व घोर कट पाने पर रूदन करेंगे; चिल्लायेगे तो भी कोई कैदी उनपर दया नहीं करेगा । उलटे वाकप्रहार के बाणोंसे उनके मनको छेदित किया जायगा। यही दशा नरक धरामें नारकी जीवोंकी है। वे पचेन्द्रिय सैनी नपु सक होते हैं। पांचों इन्द्रियोंके भोगों की तृष्णा रखते है। परन्तु उनके शमन का कोई साधन न पाकर निरतर क्षोभित व सतापिस रहते हैं । नारकियोंके परिणाम बहुत खोटे रहते हैं । उनके अशुभतर कृष्ण, नील व कामोत तीन लेश्याए होती हैं। ये लेश्याए चुरे भावों के दृष्टांत हैं। सबसे बुरे कृष्ण लेश्याके, मध्यम बुरे नील लेश्याके, जघन्य खोटे कापोत लेश्याके भाव होते हैं । नारकियों में पुद्गलों का स्पर्श, रस, गध, वर्ण सर्व वहुत अशुभ वेदनाकारी रहता है । भुमि कर्कश दुर्गन्धमई होती है । हवा छेदक व असह्य F । सहज-सुग्व-साधन [३ चलती है । शरीर उनका बहुत ही कुरूप भयावना होता है, जिसके देखनेसे ग्लानि आजावे । अधिक शीत व अधिक उष्णताफी घोर वेदना सहनी पड़ती है । इस तरह नरकगतिमें प्राणी बहु काल तक तीव्र पापके फलसे घोर वेदना सहते हैं । जो रौद्रध्यानी है वे अधिकतर नर्कगतिमे जाते है । दुष्ट परघातक स्वार्थ माधक हिसक परिणामोंकी प्रणालीको रौद्रध्यान कहते हैं। यह चार प्रकार का है- १-हिसानन्दी- दूसरे प्राणियोंको कष्ट देकर, कष्ट दिलाकर व कष्ट देते हुए जानकर जिसके मनमे बडी प्रसन्नता रहती है वह हिसानन्दी रौद्रध्यानी है। वह मानवोंको रोगी, शोकी, दुःखित, भूखे प्यासे देखकर भी दया नहीं लाता है, किंतु उनसे यदि कुछ अपना मतलब निकलता हुआ जानता है तो उनकी हिसा कर के उनसे धनादि ग्रहण कर लेता है । किसी देश के मानव कारीगरी के द्वारा मिहनत मजूरी करके अपना पेट भरते हैं, हिंसानन्दी ऐसा उद्योग करता है कि वैसी कारीगरीकी वस्तु स्वय बनाकर व-बनवाकर उस देश सस्ते दाममें विक्रय करता है और उस देशको कारीगरीका सत्यानाश करके व आप धनी होकर अपने को बडा चतुर मानता है व बड़ा ही प्रसन्न होता है। हिंसानन्दी वैद्य दिनरात यही चाहता है कि प्रजामें रोगों की वृद्धि हो जिससे मेरा व्यापार चले । वह रोगीको जो शीघ्र अच्छा होसकता है देरतक बीमार रखके अपना स्वार्थ साधता है । हिंसानन्दी नाजका व्यापारी यह चाहता है कि अन्न न पैदा हो, दुर्भिक्ष पडे , लोगों को अन्नका कष्ट हो. जिससे मेरा अन्न अच्छे दामोमे बिके और मैं धनवान हो जाऊ । हिंसानन्दी चकोल यह चाहता है कि भाई भाईमे, माता पुत्रमे, परस्पर झगडा हो, मुकदमा चले, मैं खूब धन कमाऊ व जगतके प्राणी परम्पर मारपीट करे, फौजदारी केस चले, मुझे खूब धन मिले । हिंसानन्दी वैश्या यह चाहती है कि धनिक पुत्र अपनी स्त्रीसे स्नेह न करके मुझसे स्नेह करें । और मुझे अपना सब धन देडाले । यह धर्म कर्म से शून्य होजावें । हिंस नदी चोर मानवोंको गोल से व खड्गसे मारकर धन लूट लेते हैं। हिसानदी देवी देवताओंके नामपर व परमेश्वर के नामपर पशुओंकी निर्दयतासे बलि करता हुआ व शिकार मे पशुओंका घात करता हुआ व मासाहारके लिये पशुओंका वध करता हुआ बडा ही प्रसन्न होता है। हिमानदी व्यापारी पशुओंके ऊपर भारी बोझा लाडकर उनको मार मारकर चलाता है । भूखे प्यासे होनेपर भी अन्नादि नहीं देता है । दुःखी करके अपना काम लेता है। हिमानदी ग्राममें, वनमे आग लगाकर प्रसन्न होता है । थोडीमी बातमे क्रोधित हो मानवोंको मार डालता है । जगतमे हिसा होती हुई सुनकर प्रसन्न होना, हिंसानदीका भाव रहता है । हिंसानदी व्यर्थ बहुत पानी फेककर, भूमि खोदकर, अग्नि जलाकर, वायुको आकुलित कर, वृक्षोंको काटकर प्रसन्न होता है । हिंसानदीके बडे कर परिणाम रहते है । यदि कोई दोप अपना टोप स्वीकार करके आधीनतामे आता है तोभी उसपर क्षमा नहीं करता है और उसे जड़मूल से नाश करके ही प्रसन्नता.मानता है। २-मृपानंदी-जो अंसत्य बोल करके, असत्य बुलवा करके, असत्य बोला हुआ जानकर व सुन करके प्रसन्न होता है वह मृपानदी रौद्रध्यानी है । मृपानदी धन कमानेके लिये भारी असत्य बोलता है, उसको ढया नहीं आती है कि यदि इसे मेरी'मायाचारी विदित होगी तो कण. पाएगा। मृषानदी टिकट मास्टर मूर्ख गरीब ग्रामीण स्त्रीको असत्य कहकर अधिक दाम लेकर कम दामका टिकट देदेता है। मृपानदी झूठा मुकदमा चलाकर, झूठा कागज बनाकर, झूठी गवाही देकर दूसरोंको ठगकर वडा प्रसन्न होता है । मृषानंदी हिसाव किताबमें भोले ग्राहकसे अधिक दाम लेकर अमत्य कहकर विश्वास दिलाकर ठग लेता है । मपानदी गरीब विधवाके गहनोंका - - - . 1 -tum AO --- - । 7 A । ३ .
. ससार स्वरूप। ४] डिब्बा रखकर पीछे मुकर जाता है और उसे धोखा देकर बड़ा ही अपनेको चतुर मानता है। मषानंदी मिथ्या धर्मकी कल्पनाओंको इसलिये जगतमें फैलाता है कि भोले लोग विश्वास करके खूब धन चढाऐ गे जो मुझे मिल जायगा । उसे धर्म के बहाने ठगते हुए कुछ भी दया नहीं आती है। ३-चौर्यानन्दी-चोरी करके, चोरी कराके व चोरी हुई जानकर जो प्रसन्न होता है वह चौर्यानंदी रौद्रध्यानी है । चौर्यानंदी अनेक प्रकार के जालोंसे चाहे जिसका धन बिना विचारे ठग लेता है, छिपके चुरा लेता है, डाका डालकर ले लेता है, प्राण वध करके ले लेता है, छोटे-छोटे बच्चों को फुसलाकर जगल में ले जाता है, उनका गहना उतारकर उन्हें मारकर फेक देता है। चौर्यानदी चोरोंसे मित्रता करके चोरीका माल सस्ते दाममें खरीदकर धनिक होकर अपना बड़ा गौरव मानता है, झूठा सिक्का चलाकर झूठे नोट बनाकर प्रजा को ठगता है। घी मे चरबी, तेल व चाहे जो कुछ मिलाकर ठीक घी कहकर बेचता है और धन कमाता है । वह कम तौलकर व कम नाप कर धोखा देकर धन एकत्र करने में बड़ा ही राजी रहता है। चौर्यानदी चोरी करने की शिक्षा देकर अनेकों को चोरी के व्यसन में फसा देता है। ४ परिग्रहानन्दी-जो तृष्णावान होकर अन्याय से दूसरों को कष्ट देकर भी धनादि परिग्रह को एकत्र करने की तीव्र लालसा रखता है वह परिग्रहानदी रौद्र ध्यानी है। परिग्रहानदी स्त्रियों के उचित हकों को मारकर व भाइयों के हकों को मारकर लक्ष्मी अपनाना चाहता है । वह दूसरों का अपने से अधिक परिग्रह देखकर निरंतर यह भावना करता है कि या तो मेरा धन बढ जावे या इन दूसरों का धन नष्ट हो जावे । परिग्रहानन्दी धर्म सेवन के लिये समय नहीं निकालता है। धर्म के समय में धन के सचय के प्रारम्भ में लगा रहता है। परिग्रह के लिये भारी से भारी पाप करने में उसको ग्लानि नहीं आती है । अत्यन्त तृष्णावान होकर जगत के मानवों को व पशुओं को कए दायक व्यापार का प्रारम्भ करता है । वृद्ध होनेपर भी धनाशा त्यागता नहीं। परिग्रह के मोह में अन्धा बना रहता है। परिग्रहानंदी को जब कभी धन की व कुटुम्ब की हानि होजाती है.. तव घोर विलाप करता है । प्राण निकलने के समान उसको कष्ट होता है। इन चारों ही प्रकार के रौद्रध्यान करनेवाले प्राणियों के भाव अशुभ रहते हैं। उनके कृष्ण नील कापोत लेश्या सम्बन्धी भाव पाये जाते हैं जिससे वे नर्क आयु बांधकर नर्क चले जाते हैं । जहां भी ये ही तीन लेश्याएं होती है । अन्याय पूर्वक प्रारम्भ करने का व तीव्र धनादि का मोह नर्क में प्राणी को पटक देता है। तियंच-गति का दुःख-तियंच-गति में छः प्रकार के प्राणी पाये जाते हैं। . 4 (१) एकेन्द्रिय स्थावर-जैसे पृथ्वी कायिक, जल कायिक, वायु कायिक, अग्नि कायिक, तथा वनस्पति- काविक । ये सब सचित्त दशा में हवा के द्वारा जीते हैं व यढते हैं, हवा न मिलने से मर जाते हैं । खान की व खेत की मिट्टी जीव सहित है । सूखी व जली हुई मिट्टी जीव रहित है। कूप बावड़ी, नदी का पानी सचित्त है। गर्म किया हुआ, रौंदा हुआ, टकराया हुआ पानी जीव रहित है। लाल ज्योतिमय स्फुलिगों के साथ जलती हुई अग्नि सचित्त है । गर्म कोयलों में अचित्त आग है। समुद्र, नदी, सरोवर व उपवन की गीली हवा सचित्त है । गर्म व. सूखी धुएवाली हवा अचित्त है । फल फूल पत्ता शाखा हरी भरी सचित्त वनस्पति है । सूखा घ पका फल, गर्म व पकाया हुआ सागादि व यत्र से छिन्न भिन्न किया हुआ साग फलादि व लवणादि से स्पर्श रस गंधादि बदलाया हुश्रा साग फलादि जीव रहित अचित्त वनस्पति है। 4 1 सहज-सुख-साधन [५ जीव सहित सचित्त एकेन्द्रिय जीवों को एक स्पर्शन इद्रिय से छूकर ज्ञान होता है । इसे मतिज्ञान कहते है । स्पर्श के पीछे सुख व दुःख का ज्ञान होता है इसे श्रतज्ञान कहते हैं। दो ज्ञान के धारी होते हैं। इनके चार प्राण पाये जाते हैं-स्पर्शनेद्रिय, शरीर का बल, श्वासोछवास आयु, कर्म । (२) द्वन्द्रिय प्राणी-जैसे सीप, शंख, कौडी, केचुआ, लट आदि । इनके दो इंद्रियाँ होती हैं । स्पर्शन और रसना । इनसे ये जानते हैं । इनके प्राण छः होते हैं, एकेन्द्रिय से दो प्राण अधिक होते हैं। रसना इद्रिय और वचन बल । एकेन्द्रिय की तरह इनके भी दो ज्ञान होते हैं। (३) तेंद्रिय जीव-जैसे कुन्थु, चींटी, कुम्भी, बिच्छु, घुन, खटमल, जू । इनके घ्राणेंद्रिय अधिक होती छूकर, स्वाद लेकर व मू घकर जानते हैं । ज्ञान दो होते हैं-मति, श्रुत । प्राण एक अधिक होता है। घ्राण को लेकर सात प्राण होते हैं। (४) चौन्द्रिय-जैसे मक्खी, डास, मच्छर, भिड, भ्रमर, पतंगा आदि । इनके आंख अधिक होती है। इससे आठ प्राण व दो ज्ञान मति - श्रुत होते हैं। (५) पंचेन्द्रिय मन रहित असैनी-जैसे कोई जाति के पानी में पैदा होनेवाले सर्प । इनके कान भी होते हैं । इससे नौ प्राण व ज्ञान मति व श्रुत होते हैं। (६) पंचेन्द्रिय मन सहित सैनी-जैसे चार पगवाले मृग, गाय, भैस, कुत्ता, बिल्ली, बकरा, घोड़ा, हाथी, ऊट आदि । दो पगवाले पक्षी जैसे मोर, कबूतर, तोतर, बटेर, काक, चील, हस, मैना, तोता आदि। उरसे चलनेवाले नागादि व जल में पैदा होनेवाले मछली, मगरमच्छ, कछुए आदि । इनके मन बल को लेकर दश प्राण होते हैं । साधारण दो ज्ञान मति श्रुत होते है । मन एक सूक्ष्म हृदय स्थान में कमल के आकार अंग होता है, जिसकी सहायता से सैनी प्राणी सकेत समझ सकता है, शिक्षा ग्रहण कर सकता है, कारण कार्य का विचार कर सकता है, तर्क वितर्क कर सकता है घ अनेक उपाय सोच सकता है। छः प्रकार के तिर्यंचों को क्या २ दुःख हैं वे सब जगत को प्रगट हैं। एकेन्द्रिय जीवों के अकथनीय कए हैं । मिट्टी को खोदते हैं, रौंदते हैं, जलाते हैं, कूटते हैं, उनपर अग्नि जलाते हैं। धूप की ताप से मिट्टी के प्राणी. मर जाते हैं । मिट्टी के शरीरधारी का देह एक अगुल का असख्यातवां भाग वहुत ही छोटा होता है। एक चने के दाने बराबर चित्त मिट्टी में अनगिनती पृथ्वी कायिक जीव हैं। जैसे हमें कोई कूटे, छीले, कुल्हाडी से छेदे तो स्पर्श का कष्ट होता है वैसे पृथ्वी के जीवों को हल चलाने आदि से घोर कष्ट होता हैं पराधीपने वे सहते है, कुछ बचने का उपाय नहीं कर सकते, भागने को असमर्थ है। सचित्त जल को गर्म करने, मसलने, रौंदने आदि से महान कष्ट उसी तरह होता है जैसे पृथ्वी के जीवों को । इनका शरीर भी बहुत छोटा होता है । एक पानी की बून्द में अनगिनती जल कायिक जीव होते हैं । पवन कायिक जीव भीतादि की टक्करों से, गर्मी के झोकों से, जल की तीव्र वृष्टि से, पखों से हमारे दौडने कूदने से टकराकर वडे कष्ट से मरते है । इसका शरीर भी बहुत छोटा होता है । एक हवा के छोटे झोके में अनगिनती व यु कायिक प्राणी होते हैं। अग्नि जल रही है, जब उसको पानी से बुझाते हैं, मिट्टी डालकर बुझाते हैं व लोहे से निकलते हुए ; स्फुलिगों को घन की चोटों से पीटते हैं तब उन अग्नि कायिक प्राणियों को स्पर्श का बहुत दुख होता है। इनका शरीर भी बहुत छोटा होता है । एक उठती हुई अग्नि की लौ में अनगिनती अग्नि कायिक जीव है । - -- ६] ससार स्वरूप । वनस्पति दो प्रकार की होती है-एक साधारण, दूसरी प्रत्येक । जिस वनस्पति का शरीर एक हो व उसके स्वामी बहुत से जीव हो, जो साथ २ जन्मे व साथ २ मरे उनको साधारण वनस्पति कहते हैं। जिसका स्वामी एक ही जीव हो उसको प्रत्येक कहते है । प्रत्येक के आश्रय जव साधारण काय रहते हैं तब उस प्रत्येक को सप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते है । जब साधारण काय उनके आश्रय नहीं होते हैं तव उनको अप्रति- ष्ठित प्रत्येक कहते है । जिन पत्तों मे, फलादि में, जो रेखाए बन्धन प्रादि निकलते है वे जबतक न निकले तब तक उनको सप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते है, जब वे निकल आते हैं तब उनको अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते है। तुच्छ फल सप्रतिष्ठित प्रत्येक के दृांत है। साधारण वनस्पति को ही एकेन्द्रिय निगोद कहते हैं । बहुधा आल, घुईया, मूली, गाजर भूमि में 'फलनेवाली तरकारियां साधारण या सप्रतिष्ठित प्रत्येक होती हैं। अपनी मर्यादा को प्राप्त पकी ककड़ी, नारंगी, व पका श्राम, अनार, सेव, अमरुद आदि प्रत्येक वनस्पति हैं। इन वनस्पति कायिक प्राणियों को बड़ा कत्र होता है । कोई वृक्षो को काटता है, छीलता है, पत्तों को नोंचता है, तोड़ता है, फलों को काटता है, साग को छोंकता है, पकाता है, घास को छीलता है। पशुओं के द्वारा व मानवों के द्वारा इन वनस्पति जीवों को बड़ी निर्दयता से कष्ट दिया जाता है । वे बेचारे पराधीन होकर स्पर्श द्वारा घोर वेदना सहते हैं व बड़े कष्ट से मरते हैं । इस तरह एकेन्द्रिय प्राणियो के करों को विचारते हुए रोए खड़े हो जाते हैं जैसे- कोई किसी मानव की आंख बन्द करदे, जबान पर कपड़ा लगादे,हाथ पैर बाधदे और मुद्गरों से मारे, छीले, पकावे, कुल्हाड़ी से टुकडे करे तो वह मानव महाकए वेदन करेगा, पर कह नहीं सिकता, चल्ला नहीं सकता, भाग नहीं सकता, इसी तरह ये एकेन्द्रिय प्राणी अपने मतिज्ञान, श्रुतज्ञान के अनुसार जानकर घोर दुःख सहन करते है । वे सब उनके ही बाधे हुए असाता वेदनीय आदि पाप कर्म के फल है । दो इद्रिय प्राणियो से चौद्री प्राणियों को विकलत्रय कहते है। ये कीड़े, मकोड़े, पतगे, चींटी चीटे आदि पशुओ व मानवों से व हवा, पानी, आग आदि मे भी घोर कर पाकर मरते हैं, बड़े सवल जतु छोटों को पकडकर खाजाते हैं। बहुत से भूख प्यास से, पानी की वर्षा मे, आग जलने से, दीपक की लौ से, नहाने व धोने के पानी से, बुहारने से, फटकारने से, कपडों से, शस्त्रो से तडफ तड़फ कर मरते हैं । पैरो के नीचे, गाड़ियों के नीचे, भार के नीचे, चौकी, पलग, कुर्सी सरकाने से, बिछोना बिछाने से दबकर, टुकड़े होकर, कुचलकर प्राण देते है। निर्दयी मानव जान बूझकर इनको मारते है । मक्खियों के छत्तों में आग लगा देते हैं, मच्छरों को हाथों से मुरछलों से मारते हैं । रात्रि को भोजन बनाने व खाने से बहुत से भूखे प्यासे जन्तु अग्नि मेव भोजन मे पढकर प्राण गमाते हैं। सड़ी बूसी चीजो मे ये पैदा हो जाते हैं, अनाज में पैदा हो जाते हैं। इनको धूप मे गली में डाल दिया जाता है, गर्म कढाओं मे पटक दिया जाता है, आटे, मैदे व शस्कर की बोरी मे बहुत से चलते फिरते दीख पड़ते है तो भी हलवाई लोग दया न करके उनको खोलते हुए पानी में डाल देते हैं । रेशम के कीड़ो को औटते पानी मे डालकर मार डालते है। इन विकलत्रयों के दुःख अपार पचेन्द्रियो के दुःखों को विचारा जावे तो विदित होगा कि जिन पशु पक्षियों का कोई पालक नहीं है, उनको रात दिन भोजन ढ ढते हुए बीतता है, पेटभर खाने को नहीं मिलता है, वे बिचारे भूख प्यास से, अधिक गर्मी सर्दी से, अधिक वर्षा से तड़फ तड़फ कर मरते हैं। शिकारी निर्दयता से गोली व तीर मारकर मार डालते हैं । मासाहारी पकड़कर कसाईखानों मे तलवार से सिर अलग करते हैं। पशुबलि करने वाले - ४ -- + वे से सहज-सुख-साधन [७ धर्म के नाम से बडी ही कठोरता से पकडकर मारते हैं। जिनको पाला जाता है। उनसे बहुत अधिक काम लिया जाता है, ज्यादा बोमा लादा जाता है । जितना चाहिये उतना घास दाना नहीं दिया जाता हैं। थके मादे होनेपर भी कोड़ों की मार से चलाया जाता है, वे काम व जखमी होनेपर यों ही जगल मे व रास्ते में कहीं पटक दिया जाता है । वे भूखे प्यासे व रोग की वेदना से तडफ तड़क कर मरते है । पिंजरों मे बन्द किया जाता है, स्वतन्त्रता उड़ नहीं सकते। मछलियों को पकड़कर जमीन पर छोड़ दिया जाता है, वे तड़फ तडफ कर मरती है, जाल मे फसकर प्राण गमाती हैं । हाथियों के दात के लिये मार डाला जाता है । बैल, गाय, भैंसों को हड्डी के लिये, चमडे के लिये मारा जाता है। जीते हुए पशुओं को उबालकर चरवी निकाली जाती है । उनको कोड़ों से मारकर चमड़ा खींचा जाता है । सबल पशु पक्षी निर्बलों को मारकर खाते है । हिंसक मानव पशुओं को घोर कर देते हैं, अपना स्वार्थ साधते हैं, उनके अगों को छेद डालते हैं, उनकी पूछ काट डालते है, उनको घोर मानसिक व शारीरिक कष्ट देते हैं। इस तरह पंचेन्द्रिय तिर्यचों को असहनीय दुःख सहना पड़ता है । तिथंचगति मे व मनुष्य गति से कितने प्राणी तीव्र पाप के उदय से लब्ध पर्याप्त पैदा होते हैं। जो गर्मी सर्दी पसीना मलादि से सम्मूर्छन जन्म पाते हैं, वे एक श्वास मे अठारह बार जन्मते मरते हैं । उनकी आयु कद श्वास होती है । स्वास्थ्य युक्त पुरुप की नाडी फड़कन की एक श्वास होती है, ४८ मिनट या एक मुहूर्त मे ऐसे ३७७३ श्वास होते हैं । ऐसे जीव एक अतर्मुहूर्त मे ६६३ ३६ नीचे प्रमाण क्षुद्र भव धरकर जन्म मरण का कप पाते हैं। १ साधारण वनस्पति वादर के लगातार ६०१२ जन्म ६०१२ १३ पृथ्वीकायिक ६०१२ ६०१२ ५ जलकायिक वाटर के लगातार ६०१२ ६०१२ ७ वायुकायिक ६०१२ ६०१२ ९ अग्निकायिक ६०१२ ६०१२ ११ प्रत्येक वनस्पति के ६०१२ २ " , सूक्ष्म के वादर के " सूक्ष्म के " ६ . " " ८ सूक्ष्म के बादर के सूक्ष्म के बादर के सूक्ष्म के " " " " 1 " कुल एकेन्द्रियों के द्वेन्द्रियों के तद्रियों के चौन्द्रियों के पचेन्द्रियों के ६६१३२ जन्म लगातार ६० " २४ ६६३३६ + . - ८] संसार स्वरुप पचेन्द्रियो के २४ मे से ८ असैनी तियेच, ८, सनी तियंच, ८ मनुष्य के गर्मित है । तिर्यंचगति के महान दुःखों में पढने लायक पाप अधिकतर प्रातध्यान से बंध होता है। बार्तध्यान-दुःखित व शौकित भावो की प्रणाली को प्रार्तध्यान कहते हैं। इसके चार भेट हैं- (१) इप्ट त्रियोगज श्रार्तध्यान-प्रिय पुत्र, माता, पिता, भाई बहिन के मरने पर व किमी बन्धु व मित्र के परदेश जाने पर व धनादि की हानि होनेपर जो शोक भाव करके भाषों को दुग्वित रखना सो इष्ट वियोगन वार्तध्यान है। (२) अनिष्ट संयोजक प्राध्यान-अपने मन को न रुचनेवाले चाकर, भाई पुत्र, न मचनेवाली स्त्री आदि के होनेपर व मन को न रुचनेवाले स्थान, वन, भोग व उपभोग के पदार्थ होनेपर उनका सम्बन्ध कैसे छूटे इस बात की चिन्ता करना अनिष्ट सयोजक श्रातभ्यान है। (३) पीडा चिन्तवन मार्तध्यान-शरीर में रोग होनेपर उसकी पीड़ा से क्लेशित भाव बिना पीड़ा चिन्तवन आर्तध्यान है। (४) निदान आर्तध्यान-अागामी भोग मिले इस चिन्ता से यालित भाव रचना निदान यार्तध्यान है। आर्तध्यानी रात दिन इष्ट वस्तु के न पानेपर व अनिष्ट के मयोग होनेपर व पीड़ा होने से व नागामी भोग की तृष्णा से क्लेशित भाव रखता है । कभी रुदन किया करता है, कभी उदाम हो पड़ जाता है, कभी रुचि से भोजन पान नहीं करता है । शोक से धर्म, कर्म छोड़ बैठना है। कभी छाती पीटता है, कभी चिल्लाता है, कभी श्राघात तक कर लेता है। रोगी होनेपर रात दिन हाय हाय करता है। भोगों की प्राप्ति के लिये भीतर से तडफडाता है । अनिए सम्बन्ध दूर करने के लिये चिन्तित रहता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पुरपार्थोके माधन मे मन नहीं लगता है । से भी तिर्यंच श्रायु का बंध होता है । जो कोई कपट से दृसगे को ठगते हैं, विश्वासपात करते है, कपट से अपनी प्रतिष्ठा कराते है वे तिर्यच प्रायु का वध करते है। एक मुनि ने एक नगर के बाहर चार मास का वा योग धारण किया था। योग समाप्त होने पर वह दूसरे दिन वहा से विहार कर गये। दूसरे एक मुनि निकटवर्ती ग्राम से श्राकर वहीं ठहर गए । तव नगर के नरनारी पाकर मुनि वन्दना पूजा करते हुए ऐसा कहने लगे कि आपने हमारे नगर के बाहर दर्शालय मे योग साधन किया हमारा स्थान पवित्र हुआ आदि २ । उस समय उन मुनि को कहना चाहिये था कि मैं वह मुनि नहीं हूँ, परन्तु वह अपनी पूजा देखकर चुप रहे । कपट से अपना परिचय नहीं दिया। इस मायाके भावसे मुनिने पशुगति बांध ली और मरकर हाथीकी पर्याय पाई। एकेन्द्रियसे चोन्द्रिय तकको कृष्ण, नील, कापोत तीन लेश्याए होती हैं । पचेन्द्रिय अनीके पीत रहित चार व सैनी पचेन्द्रियों के पीत, पद्म शुक्ल सहित छहों होसकती हैं। अधिकतर खोटी लेश्या रूप भावोंसे तिर्यंचायु बाधकर एकेन्द्री आदि आकर जन्मते है । तियंगति के कष्ट प्रत्यक्ष प्रगट हैं । वे प्रत्यक्ष पापके फल बता रहे हैं। अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। - मायाचार - - सहज-सुख-साधन [९ (३) देवगति के दुःख-देवगति में यद्यपि शारीरिक कष्ट नहीं है परन्तु मानसिक कए बहुत भारी हैं। देवों मे छोटी बडी पदवियां होती हैं, विभूति सम्पदा कम व अधिक होती है, उन में दश दरजे हैं (१) राजा के समान इन्द्र, (२) पिता, भाई के समान सामानिक, (३) मंत्री के समान त्रायस्त्रिश, (४) सभा निवासी सभासद पारिपद, (५) इन्द्रके पीछे खड़े होने वाले आत्मरक्ष, (६) कोतवाल के समान लोकपाल, (७) सेना बनने वाले अनीक, (८) प्रजा के समान प्रकीर्णक, (९) दास के समान वाहन बननेवाले आभियोग्य, (१०) कातिहीन क्षुद्रदेव किल्विषक । इन दश जातियों में भी अनेक भेद होते है । नीची पदवीवाले ऊ चों को देखकर मनमें बड़ा ईर्षाभाव रखते हैं, जला ही करते है। भोग सामग्री अनेक होती है । एक समय एक ही इन्द्रिय द्वारा भोग हो सकता है । इच्छा यह होती है कि पाचों इन्द्रियों के भोग एक साथ भोगू, सो भोगने की शक्ति न होने पर आकुलता होती है। जैसे किसी के सामने ५० प्रकार की मिठाई परोसी जावे तो वह बार-बार घबडाता है, कि किसे खाऊ किसे न खाऊ चाहता यह है कि मैं सबको एक साथ भोगू । शक्ति न होने पर वह दुखी होता है। इसी तरह देव मन में क्षोभित हो कत्र पाते हैं । जब किसी देवी का मरण होता है तब इष्ट वियोग का दुःख होता है । जब अपना मरण काल आता है तब वियोग का बड़ा दुख होता है। सबसे अधिक का मानसिक तृष्णा का होता है। अधिक भोग करते हुए भो उनकी तृष्णा बह जाती हैं। यद्यपि कुछ दान पूजा परोपकार आदि शुभ मावों से पुण्य बांधकर देव होते हैं परन्तु मिथ्यादर्शन के होने से वे मानसिक कण ही में जीवन बिताते हैं। शरीर को ही आपा जानना, इन्द्रिय सुख को ही सुख समझना, आत्मा पर व अतीन्द्रिय सुख पर विश्वास न होना मिथ्यादर्शन है। सच है मिथ्याश्री हर जगह दुःखी रहता है । क्यों कि उसे तृष्णा की दाह सदा सताती है। (४) मनुष्यगति- इस गति के दुःख प्रगट ही हैं । जब गर्भ में नौ माम रहना पड़ता है तब उल्टा टगकर दुर्गंध स्थान में रहकर नर्क सम महान दुःख होता है । गर्भ से निकलते हुए घोर कष्ट होता है। शिशु अवस्था में असमर्थ होने के कारण खाने पीने को न पाकर बारबार रोना पडता है, गिरकर पडकर दुःख सहना पड़ता है, अज्ञान से जरासा भी दु ख बहुत वेदित होता है । किसी के छोटी वय में माता पिता मर जाते हैं तब बड़े दुःख से जीवन बितना पडता है। कितने ही रोग से पीड़ित रहते हैं। कितने अल्प आयु में मर जाते हैं, कितने ही दलिद्र से दुखी रहते हैं, कितने ही इए मित्र ब इष्ट वधु के वियोग से, कितने अनिष्ट भाई व मालिक व सेवक के सयोग से दुःखी रहते हैं। मानव गति में बडा दुःख तृष्णा का है । पाचों इद्रियों के भोगों की घोर तृष्णा होती है । इच्छित पदार्थ नहीं मिलते हैं तब दुःख होता है । यदि मनोज्ञ पदार्थ चेतन या अचेतन छूट जाते हैं तब उनके वियोग से घोर कष्ट होता है । किसी की स्त्री दु.खदाई होती है, किसी के पुत्र कुपुत्र होते हैं, किसी के भाई कपदायक होते हैं। चाह की दाह में बडे २ चक्रवर्ती राजा भी जला करते हैं । मानवगति में घोर शारीरिक व मानसिक कष्ट हैं। जिन किन्हीं मानव, पशु व देवों को कुछ सुख देखने में आता है वह ऐसा विनाशीक व अतृनिकारी है कि उससे अाशा तृष्णा बढ़ जाती है। वह सुख अपने फल में कष्टदायक ही होता है। जैसे मृग को पानी रहित जगल में मृग तृष्णा रूप चमकती घास या वालु से प्यास नहीं बुझती, मृग पानी समझकर जाता है - - - १०] ससार स्वरूप। परन्तु पानी न पाकर अधिक तृपातुर हो जाता है, वैसे ही ससारी प्राणी सुख पाने की आशा से पांचों इन्द्रियों के भोगों में बारबार जाते हैं, भोग करते हैं परन्तु विपय सुख की तृपा को मिटाने की अपेक्षा बढा लेते हैं, जिससे उनका सताप भवभव में कभी भी मिटता नहीं। असल बात यह है कि यह ससार केले के खभे के समान अपार व दुखों का समुद्र है। इसमे जो आसक्त है, इसमे जो मगन है ऐसे मूढ मिथ्यादृष्टी बहिरात्मा को चारों ही गति में कहीं भी सुख नहीं मिलता है । वह कहीं शारीरिक व कहीं मानसिक दुखों को ही भोगता है । तृष्णा की आताप से अनंतवार जन्म मरण करता हुआ चारों गतियों में भ्रमण करता हुआ फिरता है। यह ससार अथाह है, अनादि व अनत है । इस समारी जीव ने पांच प्रकार के परिवर्तन अनतवार किये हैं । वे परिवर्तन हैं-द्रव्य परिवर्तन, क्षेत्र परिवर्तन, काल परिवर्तन, भव परिवर्तन, भाव परिवर्तन । इनका अति सक्षेप से स्वरूप यह है- द्रव्य परिवर्तन-पुद्गल द्रव्य के सर्व ही परमाणु व स्कयों को इस जीव ने क्रम क्रम से ग्रहण करके व भोग करके छोड़ा है। एक ऐसे द्रव्य परिवर्तन मे अनतकाल बिताया है। क्षेत्र परिवर्तन लोककाश का कोई प्रदेश शेप नहीं रहा, जहां यह क्रम २ से उत्पन्न न हुआ हो। इस एक क्षेत्रपरिवर्तन में द्रव्य परिवर्तन से भी अधिक अन्नत काल वीता है। काल परिवर्तन-उत्सर्पिणी-जहां आयु काय सुख वढते जाते हैं । अवसपिणी जहां ये घटते जाने हैं। इन दोनों युगो के सूक्ष्म समयो में कोई ऐसा शेप नहीं रहा जिममे इस जीव ने क्रम क्रम से जन्म व मरण न किया हो । इस एक काल परिवर्तन में क्षेत्र परिवर्तन से भी अधिक अनतकाल वीता है। (४) भव परिवर्तन-चारो ही गतियो मे नौ ग्रैवेयिक तक कोई भव शेष नहीं रहा जो इस जीव ने धारण न किया हो । इस एक भव परिवर्तन में काल परिवर्तन से भी अधिक अनन्त काल वीता है। (५) भाव परिवर्तन-इस जीव ने आठ कर्मों के बंधने योग भावों को प्राप्त किया है । इस एक भाव परिवर्तन मे भव परिवर्तन से भी अधिक अनतकाल वीता है। इस तरह के पांचो प्रकार के परिवर्तन इस ससारी जीव ने अनन्त वार किये हैं। इस सब ससार के भ्रमण का मूल कारण मिथ्यादर्शन है। मिथ्यादर्शन के साथ अविरति, प्रमाद, कपाय तथा योग भी हैं । मिथ्यापी ससार के भोगों की तृष्णा से हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, तथा परिग्रह के अतीचार रूपी पांच अविरति भावो में फसा रहता है। वही मिथ्याही आत्महित में प्रमादी रहता है । तीव्र क्रोध, मान, माया, लोभ, कपाय करता है तथा मन वचन कायों को अति क्षोभित रखता है। इस असार ससार में अज्ञानी मिथ्याही ही कण पाता है, उसी के लिये ही ससार का भ्रमण है। नो आत्मज्ञानी सम्यग्दृष्टी होता है वह ससार से उदास व वैराग्यवान हो जाता है व अतन्द्रिय आत्मीक सच्चे सुख को पहचान लेता है, वह मोक्ष प्राप्ति का प्रेमी हो जाता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है यदि कर्मों के उदय से कुछ काल किसी गति में रहना भी पडता है तो वह संसार में लिप्त न होने से संसार में 1 1 - - t 3 सहज-सुख-साधन [११ - - , १ . प्राप्त शारीरिक मानसिक कष्टों को कर्मोदय विचार कर समताभाव से भोग लेता है। वह हर एक अवस्था मे आत्मीक सुख को जो सच्चा सुख है स्वतन्त्रता से भोगता रहता है, यह बात सच है। मिथ्यादृष्टी सदा दुःखी-सम्यग्दृष्टी सदा सुखी । जैनाचार्यों ने संसार का स्वरूप क्या बताया है सो पाठकोंको उनके नीचे लिखे अनुभव पूर्ण वाक्यों से प्रगट होगा। श्री कुन्दकुन्दाचार्य द्वादशानुप्रेक्षा में कहते हैं:- पंचविहे संसारे जाइजरामरणरोगभयपउरे । जिणमग्गमपेच्छंतो जीवो परिभमदि चिरकालं ॥२४॥ भावार्थ इस व्यक्षेत्रादि पांच तरह के ससार भ्रमण मे जहा यह जीव जन्म, मरण, रोग, भय के महान कष्ट पाता है, श्री जिनेन्द्र के धर्म को न जानता हुआ दीर्घकाल तक भ्रमण किया करता है। सव्वेपि पोग्गला खलु एगे मुत्तु झिया हु जीवेण । असयं अणंतखुत्तो पुग्गलपरियट्टसंसारे ॥२५॥ भावार्थ-प्रथम पुदगल द्रव्य परिवर्तन में इस एक जीव ने सर्व ही पुद्गलों को बार-बार अनन्त दफे ग्रहण कर और भोगकर छोडा है। सव्वम्हि लोयखेत्ते कमसो तगणस्थि जगण उप्पण्णं । उग्गाहणेण बहुमो परिभमिदो खेत्तसंसारे ॥२६॥ भावार्थ- -दूसरे क्षेत्र परिवर्तन में यह जीव बार-वर सर्व ही लोकाकाशके प्रदेशों में क्रम-क्रम से 'जन्मा है । कोई स्थान ऐसा नहीं है जहा वहुबार पैदा न हुआ हो और अनेक प्रकार के छोटे व बड़े शरीर धारे हैं। अवमप्पिणिउस्सप्पिणिसमयावलियासु णिस्वसेसासु । जादो मुदो य बहुसो परिभमिदो कालसंसारे ॥२७॥ भावार्थ-तीसरे काल परिवर्तन में इस जीवने उत्सर्पिणी तथा अवमर्पिणी के सर्व ही समयों में बहुतवार जन्म-मरण किया है। कोई समय बचा नहीं जिसमें यह अनतवार जन्मा या मरा न हो। णिरयाउजहण्णादिसु जाव दु उपरिल्लवा दुर्गवेज्जा । मिच्छत्तसंसिदेण दु बहुसो वि भवद्विदीभमिदा ॥२८॥ भावार्थ-चौथे भव परिवर्तन मे नरक को जघन्य आयु से लेकर ऊई लोकको ग्रैवेयिक की उत्कृष्ट आयु तक सर्व ही जन्मों को इस जीव ने बहुबार मिथ्यादर्शन के कारण धारण करके भ्रमण किया है । सव्वे पयडिटिदियो अणुभागप्पदेसवधठाणाणि । जीवो मिच्छतवसा भमिदो पुण भावसंसारे ॥२६॥ T -- .
ससार स्वरूप । १२]] भावार्थ-पाचवे भाव परिवर्तन में यह जीव मिथ्यादर्शन के कारण पाठों का के सर्व ही प्रकृति स्थिति, अनुभाग व प्रदेश इन चार प्रकार बन्ध स्थानों को धारता हु। बार-बार भ्रमा है। पुत्तकलत्तणिमित्त अत्थं अज्जयदि पावबुद्धीए । परिहरदि दयादाणं सो जीवो भमदि संसारे ॥३०॥ भावार्थ-जो जीव पुत्र व स्त्री के लिये पाप की बुद्धि से धन कमाता है, दया धर्म व दान छोड़ देता है, वह जीव ससार मे भ्रमण करता है। मम पुत्त मम भज्जा मम धणधएणोत्ति तिव्वकंखाए । चइऊण धम्मवुद्धि पच्छा परिपडदि दीहसंसारे ॥३१॥ भावार्थ-मेरा पुत्र, मेरी स्त्री, मेरा धन धान्यादि इत्यादि तीव्र तृष्णा के वश यह जीव धर्म की बुद्धि को त्यागकर इस दीर्घ ससार में भ्रमता रहता है। मिच्छोदयेण जीवो जिंदतो जेएणभासियं धम्म । कुधम्मकुलिंगकुतित्यं मण्णंतो भमदि संसारे ॥ ३२ ॥ मिथ्यादर्शन के उदय से यह जीव श्री जिनेन्द्र कथित धर्म की निदा करता है और मिध्या- धर्म, मिथ्या गुरू व मिथ्या तीर्थ को पूजता है इसलिये ससार में भ्रमता है । हंतूण जीवरासि महुमंसं सेविऊण सुरपाणं परदव्यपरकलत्त गहिऊण य भमदि संसारे ॥३३॥ भावार्थ-यह जीव अनेक जन्तु-समूह को मारता है, मांस मदिरा मधु खाता है, परद्रव्य व परस्त्री को ग्रहण कर लेता है, इसलिये संसार में भ्रमता है। जत्तण कुणइ पावं विसयणिमित्त च अहणिसं जीयो । मोहंधयारसहियो तेण दु परिपड दि संसारे ॥ ३४ ॥ भावार्थ- यह जीव मोह के अंधेरे मे अंधा होकर रात दिन उद्योग करके विषय भोगों के लिये पाप किया करता है इसीलिये इस ससार में भ्रमता है। संजोगविप्पजोग लाहालाहं सुहं च दुक्खं च । संसारे भूदाणं होदि हु माणं तहावमाणं च ॥३५॥ भावार्थ-इस संसार मे जीवों को संयोग वियोग, लाभ हानि, सुख दुःख, मान अपमान, हुआ करता है। कम्मणिमित्त जीवो हिंड दि संसार घोर कांतारे । जीवस्सण संसारो णिच्चयणकम्मणिम्मुक्को ॥३७॥ . - ।
सहज-सुख-साधन [१३ ३ 11 भावाथ-~कर्मों के वश होकर यह जीव इस भयानक ससार बन में भ्रमता फिरता है। निश्चय नय से विचार किया जावे तो इस जीव के ससार नहीं है । यह तो कर्मों से भिन्न ही है। संसारमदिकन्तो जीवोवादेयमिदि विचिंतिज्जो। संमारदुहकन्तो जीवो मो हेयमिदि विचिंतिज्जो ॥३८॥ भावार्थ-जो जीव ससार से पार हो गया है, उसकी सी अवस्था ग्रहण करने योग्य है ऐसा विचार करना चाहिये। तथा जो जीव ससार के दुःखों में फंसा है यह ससार दशा त्यागने योग्य है ऐसा मनन करना चाहिये । श्री कुन्दकुन्दाचार्य भाव पाहुड में कहते हैं. भीमणणरयगईए तिरियगईए कुदेवमणुगइए । पत्तोसि तिव्वदुक्खं भावहि जिणभावणा जीव ।।८।। भावार्थ-हे जीव । तूने भयानक नरकगति मे, पशुगति में, कुदेवगति में व मनुष्यगति में तीव्र कष्ट पाए है । अब तो तू शुद्ध आत्मतत्वकी भावना कर ही । वही जिन या कषायों को जीतनेवाला परमात्मारूप है। सत्तसुणरयावासे दारुणभीसाई असहणीयाई । भुत्ताई सुइरकालं दुःक्खाई पिरंतरं सहिय ।।६।। भावार्थ "सात नरकों के आवासों में तीव्र, भयानक, असहनीय दुक्खों को दीर्घकाल तक निरन्तर भोगकर तूने कष्ट सहा है। खणणुत्तावणवालणवेयणविच्छेयणाणिरोहं च । पत्तोसि भानरहिओ तिरयगईए चिरं कालं ॥१०॥ भावार्थ-हे जीव ! तूने पशुगति में शुद्ध भाव को न पाकर चिरकाल तक खोदे जाने के, गर्म किये जाने के, जलाने के, धक्के खाने के छेदे, जाने के, रोके जाने के दुःख पृथ्वीकायादि में क्रम से पाए है। आगंतुक माणसियं सहज सारीरियं च चत्तारि । दुःक्खाइ मणुयजम्मे पत्तोसि अणतय काल ॥११॥ भावार्थ-हे जीव ! तूने मनुष्यगति मे पुन. पुनः जन्म लेकर अनतकाल अकस्मात् वज्रपात गिरने आदि के, शोकादि मानसिक कर्म के द्वाग महज उत्पन्न रागद्वेषादि के, तथा रोगादि शारीरिक ऐसे चार तरह के कष्ट पाए हैं। सुरणिलएसु सुरच्छरविओयकाले य माणसं तिब्बं । संपत्तोमि महाजस दुःखं सुहभात्रणा हिरो ॥१२॥ भावार्थ- -हे महायशस्वी जीव ! तूने देवों के स्थानों में प्रिय देव या देवी के वियोग के काल में तथा ईर्पा सबधी मानसिक दुःख शुद्ध आत्मा की भावना से शून्य होकर उठाया है। - 1 .
ससार स्त्ररूर।
१४]
पीयोसि थणच्छीरं अणंतजम्मतराई जणणीणं ।
भएणाराणाण महाजस सायरसलिलाहु अहिययरं ॥१८॥
भावार्थ-हे महायशवी जीव ! तूने अनंत मानव जन्म धारण करके भिन्न भिन्न माता के स्तनों का दूध
पिया है, जो एकत्र करने पर समुद्र के जलसे भी अधिक होजायगा।
तुह मरणे दुःखेण अण्णगणाणं अणेयजणणीणं ।
रुगणाण णयणणीरं सायरस लिलाहु अहिययरं ॥१६॥
भावार्थ-
-तूने माता के गर्भ से निकल कर फिर मरण किया तब भिन्न भिन्न जन्मों की अनेक माताओं
ने रुदन किया। उनके आंखों के आंसुओं को एकत्र किया जावे तो समुद्र के जल से अधिक ही होजायगा।
तिहुयण सलिलं सयलं पीयं तिहाइ पीडिएण तुमे ।
तो वि ण तहाछेओ जाओ चिन्ह भवमहणं ॥२३॥
भावार्थ- हे जीव ! तूने तीन लोक का सर्व पानी प्यास की पीडा से पीड़ित होकर पिया है । तोभी तेरी
तृषा या तृष्णा न मिटी । अब तू इस संसार के नाश का विचार कर ।
छत्तं सं तिरिण सया छावद्विसहस्सवारमरणाणि ।
अन्तोमुहुरामज्झे पत्तोसि
निगोयवासम्मि ॥२८॥
भावार्थ-हे जीव ! तूने एक श्वास के अठारहवें भाग आयु को धारकर निगोद की लव्ध्यपर्याप्तक
अवस्था में एक अतर्मुहूर्त के भीतर ६६३३६ जन्म मरण किये हैं । इनका हिसाब पीछे लिख चुके हैं।
रयणचए अलद्ध एव भमियोसि दीहसंसारे ।
इय जिणवरेहिं भणियं तं रयणचं समायरह ॥३०॥
भावार्थ-रत्नत्रयमई जिनधर्म को न पाकर तूने ऊपर प्रमाण इस दीर्यससार में भ्रमण किया है ऐसा
जिनेन्द्रों ने कहा है । अब तू रत्नत्रय को पाल । श्री कुन्दकुन्दाचार्य पंचास्तिकाय में कहते हैं:-
जो खलु संसारत्थो जीवो तचोद होदि परिणामो।
परिणामादो कम्म फम्मादो होदि गदिसु गदी ॥१२८॥
गदिमधिगदस्स देहो देहादों इंदियाणि जायंते ।
तेहिं दु विसयग्गहणं ततो रागो व दोसो वा ।।१२६।।
जायदि जीवरसेवं भावो संसारचक्कवालम्मि ।
इदि जिणवरेहि भणिदो भणादिणिधणो सणिधणो व ॥१३०॥
1 सहज-सुख-साधन' [१५ . , भावार्थ-इस संसारी जीव के रागादि भाव होते हैं उनके निमित्त से आठ कमी का बन्ध होता है, कर्मो के उदय से एक गति से दूसरी गति में जाता है। जिस गति में जाता है वहां स्थूल शरीर होता है उस देह में इन्द्रियें होती हैं। उन इन्द्रियों से भोग्य पदार्थों को भोगता है तब फिर राग व द्वेप होता है, इस तरह इस संसार रूपी चक्र में इस जीव का भ्रमण हुआ करता है। किसी के यह ससार अनादि अनंत चला करता है, किसी के अनादि होनेपर भी अत हो जाता है। श्री वट्टकेरस्वामी मूलाचार द्वादशानुप्रेक्षा में कहते है:- मिच्छत्तणो छएणो मग्गं जिणदेसिदं अपेक्खंतो। भमिहदी भीमकुडिल्ले जीवो संसार कंतारे ॥१३॥ भावार्थ यह जीव मिथ्यादर्शन से ढका हुआ व जिनेन्द्र कथित मार्गपर श्रद्धान न लाता हुआ इस ससार रूपी अति भयानक व कुटिल वन में भ्रमण किया करता है। तत्थ नरामरण भयं दुःखं पियविष्पोग बीहणयं । अप्पियसंजोगं विषय रोग महावेदणाश्रो य ॥१६॥ भावार्थ- इस ससार मे बूढापना, मरण, भय, क्लेश, भयानक इष्ट वियोग, अनिष्ट सयोग रोग आदि की महान वेदनाओं को यह जीव सहा करता है। जायंतो या मरंतो जलथलखयरेसु तिरियणिरएसु । माणुस्से देवत्त दुःक्खसहस्साणि पप्पोदि ॥१७॥ भावार्थ -यह जीव पशु गति, नरक गति, मनुष्य गति व देव गति में तथा जलचर, थलचर, नभचर प्राणियों मे जन्मता व मरता हुआ सहस्रों कष्टों को भोगता है। संजोगविप्पोगा लाहालाहं सुहं च दु:खं च । संसारे अणुभूदा माणं च तहावमार्ण च ॥१६॥ एवं बहुप्पयारं संसारं विविहदुःक्ख थिरमारं। णाऊण विचिंतिज्जो तहेव लहुमेव णिस्तार ॥२०॥ भावार्थ इस ससार में इस जीव ने सयोग, वियोग, लाभ-हानि, सांसारिक सुख, दुःख मान व अप- मान का अनुभव किया है। इस तरह इस संसार के नाना प्रकार के सदा ही मिलनेवाले दुःखों को जानकर यह असार ससार जिस उपाय से कम हो वह उपाय विचारना चाहिये। श्री समतभद्राचार्य स्वयभू स्तोत्र में कहते है- अनित्यमत्राणमहंक्रियाभिः प्रसक्तमिथ्याध्यवसायदोपम् । इदंजगज्जन्मजरान्तका निरंजनां शांतिमजीगमस्त्वम् ।।१२।। - मसार स्वरूप। - १६] भावार्थ- -यह संसार अनित्य है, अशरण है, अहंकार बुद्धि मे मंमारी प्राणियों में मिथ्याल भात्र प्रवेश हो रहा है । यहा संमारी जीव नित्य जन्म, जरा व मरण से दु.पी है, ऐमा जानकर आप हे संभवनाथ ! निर्मल शाति को भजते हुए। स्वजीविते कामसुखे च तृष्णया दिवा श्रमार्ता निशि शेरते प्रजाः । त्वमायं नक्तं दिवमप्रमतावानजागरेवात्मविशुद्धवर्त्मनि ॥४॥ भावार्थ-संसार के प्राणी अपने जीवन की तथा काम भोगों की तृष्णा से पीड़ित होकर दिन भर परिश्रम करके थक जाते हैं व रातको सोरहते हैं। इस तरह कभी तृष्णा को व संसारके कप्पो को नहीं मिटा सकने, ऐसा जानकर हे शीतलनाथ ! आपने पालस्य टालकर इम मंमार के नाश के लिये श्रात्मीक वीतराग मार्ग मे रात दिन सदा जागृत रहना ही स्वीकार किया। श्री शिवकोटि मुनि भगवती प्राराधना में कहते हैं- गिरयेसु वेयणाश्रो अणोवमानो असादवहुलाओ। कायणिमित्र पत्तो प्रणंतसो तं यह विधायो ॥१५६२॥ भावार्थ-हे गुने ! इम ससार मे काय के निमित्त असंयमी होकर मा कर्म बांधा जिमसे तू ने नर्क में जाकर बहुत प्रकार की उपमा रहित बहुत असाता सहित वेदना अनन्त यार भोगी। ताड़णतामणबन्धण,-वाहणलंछणविहेडणं दमणं । करणच्छेदणणासा,-वेदणणिन्लंकणं चेव ॥१५८२॥ छेदणभेदण्डहणं, णिच्छलणं गालणं छुहा तरहा भक्खण मद्दणमलणं, विकत्तणं सीदउण्हं च ॥१५८३॥ जं अत्ताणो णिप्पडियम्मो बहुवेदणदिओ पडियो । बहुएहि मदो दिवसेहि, चडयडंतो प्रणाहो तं ॥ १५८४॥ रोगा विविधा बाधाउ, तह य तिव्वं भयं च सव्वत्तो। तिव्वा उ वेदणाओ, धाडणपादाभिषादा य ॥ १५८५ ।। इच्चेवमादि दुःखं, अणंतखुत्तो तिरिक्खजोणीए । नं पत्तो सि अदीदे, काले चिंतेहि तं सत्रम् ।। १५८७ ।। भावार्थ-हे मुने ! तिथंच गति मे तू ने नाना प्रकार की लाठी घूसे व चाबुको की ताड़ना भोगी, शस्त्र- निकी त्रास सही, दृढ़ता से बांधा गया, नाक बींधी गई, हाथ पगादि वाघे गए, गला बांधा गया, पिंजरे में डाला हुआ तीव्र दुःख पाया, तथा कान छेदे गये, नाक छेदी गई, शस्त्रो से बोंधा गया, घसीटा गया आदि सहज-सुख-साधन [१७ दुःख भोगे, बहुत बोझे से हाड टूट गए, मार्ग में बोझ लादे बहुत दूर रात दिन चलना पड़ा, आग में बला, जल में डूबा, परस्पर खाया गया, भूख, प्यास, सर्दी गर्मी की घोर वेदना भोगी, पीठ गल गई, असमर्थ होकर कीचड में पड़ा रहा, घोर धूप मे पड़ा रहा। जो २ क्लेश पाये हैं उसका विचार करो, नाना प्रकार के रोग सहे, सर्व तरफ से डरता रहा तथा दुष्ट मनुष्य व पशुओं से घोर कष्ट पाया, वचन का तिरस्कार सहा, पगों की मार दीर्घ काल तक सही इत्यादि दुःख अनन्त वार तिर्यंच योनि में तू ने गत काल में भोगे हैं उन सबको अब विचार करो। देवामाणुसते जं ते जाएण सकयकम्मवसा । दुक्खाणि किले सा वि य, अणंतखुत्ता समणुभूदम् ॥१५८८॥ भावार्थ-हे मुने ! अपने किये हुए कमी के वश से देवगति में तथा मनुष्य गति में पैदा होकर अनतवार बहुत दु:ख क्लेश भोगे हैं। जं गम्भवासकुणिमं, कृणिमाहारं छुहादिदुःक्खं च । चिंतं तस्स य सुचियसुहिदस्स दुःक्खं चयणकाले ॥१६०१॥ भावार्थ-देवों को मरते हुए ऐसा चितवन होता है जो मेरा गमन अब तिर्यंच गति व मनुष्य गति के गर्भ मे होगा । दुर्गध गर्भ में रहना, दुर्गध आहार लेना, भूख प्यास सहना पड़ेगा, ऐसा विचारते बहुत कष्ट होता है। भावार्थ- -इस मनुष्य पर्याय में निर्धनता, सप्त धातुमय मलीन रोगों का भरा देहका धारना, कुदेश में वसना, स्वचक्र पर चक्र का दुःखसहना, बैरी समान बाधवो में रहना, कुपुत्र का सयोग होना, दुष्ट स्त्री की सगति होनी, नीरस आहार मिलना, अपमान सहना, चोर, दुष्ट, राजा व मत्री व कोतवाल द्वारा घोर त्रास सहना, दुष्काल मे कुटुम्ब का वियोग होना, पराधीन रहना, दुर्वचन सहना, भूख प्यास आदि सहना इत्यादि दुःखों का भरा मनुष्य जन्म है। तरहा अणंतखुत्तो, संसारे तारिसी तुम आसि | जं पसमेदु सव्वोदधीणमुदगं पि ण तीरेज्ज ॥१६०५॥ आसी अणंतखुत्तो, संसारे ते तुधा वि तारिसिया । नं पसमेदु मयो, पुग्गलकाश्रो ण तीरिज्ज ॥१६०६।। भावार्थ-हे मुने ! संसार में तुमने ऐसी प्यास की वेदना अनतवार भोगी जिसके शांत करने को सर्व समुद्रों का जल समर्थ नहीं व ऐसी क्षुधा वेदना अनतबार भोगी जिसके शान्त करने को सर्व पुद्गल काय समर्थ नहीं। जावं तु किंचि दुःखं, सारीर माणसं च संसारे । पत्तो प्रणंतखुत्त कायस्स ममत्तिदोसेण ॥१६६७॥ -- - समार स्वरूप। १८] भावार्थ-हे मुने ! इस ससार में जो कुछ शारीरिक व मानसिक दुःख अनतयार प्राप्त हुए है, सो मर्च इस शरीर में ममता के दोप से प्राप्त हुए हैं। पत्थि भयं मरणसमं, जम्मणसमयं ण विजदे दुःखं । जम्मणमरणादं के छिपणममति सरीरादो ॥१६६६।। भावार्थ-इस संसार मे मरण के समान भय नहीं है, जन्म के समान दुःख नहीं है। इसलिये जन्म मरण से व्याप्त इस शरीर से ममता छोड़। श्री पूज्यपादस्वामी सर्वार्थसिद्ध मे कहते हैं:- 'अत्र जीवा-अनादिसंसारेऽनन्तकाल नानायोनिपु दुःख भोग भोग पर्यटन्ति । न चान किंचिनियत- मस्ति । जलबुद्बुदोपम जीवित, विद्युन्मेवादिविकारचपलाभोगसम्मदइत्येवमादि जगवस्वभावचिंतनात् संसारात संवेगो भवति' ।।१२-७|| भावार्थ- -इस जगत में जीव अनादिकाल से अननकाल तक नाना योनियों में दुख भोगते हुए भ्रमण किया करते हैं । जलके बुल्ले के ममान जीवन क्षणिक है । बिजली की चमक, बादलों के विघटन के समान भोग सम्पदा अथिर है, ऐसा जगत का स्वभाव विचार ने से भय होता है। श्री पूज्यपादस्वामी समाधिशतक में कहते हैं:- मूलं संसारदु:खस्य देह एवात्मधीस्ततः । त्यक्त्वैनां प्रविशेदन्तर्वहिरव्यापतेन्द्रियः ॥१५॥ भावार्थ-इस ससार के दुःखों का मूल यह शरीर है, इसलिये श्रात्मज्ञानी को इसका ममत्व छोडकर व इन्द्रियों से विरक्त होकर अतरंग आत्मध्यान करना चाहिये। शुभं शरीरं दिव्याश्च विषयानभिवांछति । उत्पन्नात्ममतिदेहे तत्वज्ञानी ततश्च्युतिम् ।।४२॥ भावार्थ-शरीर को प्रात्मा मानकर अज्ञानी सुन्दर शरीर व मनोहर भोगों की सदा बांछा किया करता है परन्तु तत्वज्ञानी इस शरीर को ही नहीं चाहते हैं। जगद्दहात्मदृष्टीनां विश्वास्यं रम्यमेव च। स्वात्मन्येवात्मदृष्टीनांक विश्वासक वा-रतिः ॥४६॥ भावार्थ-जो शरीर में भात्मबुद्धि रखनेवाले हैं उनको यह ससार विश्वास योग्य तथा रमणीक भामता है, परन्तु आत्मा में आत्मबुद्धि धारकों को इस संसार में न विश्वास है न उनकी रति है। स्वबुद्धया यावद्गृहणीयात् कायवाक् चेतसां त्रयम् । संसारस्तावदेतेपां भेदाभ्यासे तु नितिः ॥६२।। के - श्री सहज-सुख-साधन [१९ भावार्थ-जब तक कोई शरीर वचन कायको आत्मारूप मानता रहेगा तब तक संसार का दुःख है । जब आत्मा को इनसे भिन्न विचारने का अभ्यास करेगा तब दुखों से छूट जायगा। श्री पूज्यपादस्वामी इष्टोपदेश में कहते हैं:- विपद्भवपदावर्ते पदिकेवातिवाद्यते। यावतविदर्भवत्यन्याः प्रचुरा विपदः पुरः ॥१२॥ भावार्थ- इस ससार की घटी यत्र में इतनी विपत्तियां हैं कि जब एक दूर होती है तब दूसरी अनेक आपदाए सामने आकर खडी हो जाती हैं। विपत्तिमात्मनो मूढः परेषामिव नेक्षते । दह्यमानमृगाकीर्णवनांतरतरुस्थवत् ॥१४॥ भावार्थ: जैसे कोई मानव वन के वृक्ष पर बैठा हुआ यह तमाशा देखे कि वन में आग लगी है, मृग भागे जाते हैं, परन्तु आप स्वय न भागे और वह यह न विचारे कि आग इस वृक्ष को भी जलानेवाली है, इसी तरह ससार मे मूर्ख प्राणी दूसरों की विपदाओं को देखा करता है परन्तु मेरे पर आपत्तियां आनेवाली हैं, मेरा मरण होनेवाला है, ऐसा नहीं देखता है। गुणभद्राचार्य आत्मानुशासन में कहते हैं- संसारे नरकादिषु स्मृतिपथेऽप्युद्वगकारीण्यलं । दुःखानि प्रतिसेवितानि भवता तान्येवमेवासताम् ।। तत्तावत्स्मरसि स्मरस्मितशितापाङ्गरनङ्गायुधै- र्वामानां हिमदग्धमुग्धतस्वद्यत्प्राप्तवान्निर्धनः ॥५३॥ भावार्थ-हे जीव ! तू ने इस ससार में नरक आदि योनियों में अत्यन्त दुःख भोगे हैं जिनके स्मरण करने से आकुलता पैदा होती है, उन दु.खों की बात से दूर ही रहो, इस नरभव में तू निर्धन हुआ है परन्तु नाना प्रकार भोगों का अभिलापी है । काम से पूर्ण स्त्रियों के मद हास्य और काम के बाण सामान तीक्ष्ण कटाक्षों से वेधा हुआ तू पाने से भरे हुए वृक्ष की दशा को प्राप्त हुआ है । इस दुःख ही को तू विचार कर । काम की भी बडो दु.खदाता है। उत्पन्नोस्यतिदोपधातुमलबद्द होसि कोपादिमान् । साधिव्याधिरसि प्रहीणचरितोस्यऽस्यात्मनो वञ्चकः ।। मृत्युव्याप्तमुखान्तरोऽसि जरसा ग्रस्तोसि जन्मिन् वृथा- किं मत्तोऽस्यसि कि हितारिरहितो किं वासि बद्धस्पृहः ॥५४॥ भावार्थ-हे अनत जन्म के धरनहारे अज्ञांनी जीव ! तू इस संसार मे अनेक योनियों उपजा में है। अब यहां तेरा शरीर दोप मई धातु से बना अति मलीन है, तेरे भीतर क्रोधादि कपाय हैं । तू शरीर के -- रन तृष्णा - ।
भयानक गर्म - २०] ससार स्वरूप । रोग व मन की चिन्ता से पीड़ित है, हीन आचार में फंसा हैं अपनी आत्मा को ठग रहा है, जन्म मरण के बीच मे पडा हैं, बुढ़ापा सता रहा है, तो भी वृथा बावला हो रहा है, मालूम होता है तू आत्मा के हित का शत्रु है, तेरी इच्छा अपना बुरा ही करने की झलकती है। उग्रग्रीष्म कठोर धर्मकिरणस्फूर्जद्गभस्तिप्रभैः । संतप्तः सकलेन्द्रियैरयमहो संवृद्धतृष्णो जनः ।। अप्राप्याभिमतं विवेकविमुखः पापप्रयासाकुल- स्तोयोपान्तदुरन्तकर्दमतक्षीणोक्षवत् क्लिश्यते ॥ ५५ ॥ भावार्थ- ऋतु के सूर्य की तप्तायमान किरणों के समान इन्द्रियों की इच्छाओं से प्राकु- लित यह मानव हो रहा है। इसकी तृष्णा दिन पर दिन बढ रही है सो इच्छानुकूल पदार्थों को न पाकर विवेक रहित हो अनेक पाप रूप उपायों को करता हुआ व्याकुल हो रहा है व उसी तरह दुःखी है जैसे जल के पास की गहरी कीचड़ में फसा हुआ दुर्बल बूढा बैल कष्ट भोगे। शरणमशरणं यो बंधवो बंध मूलं । चिरपरिचितदारा द्वारमापद्गृहाणाम् ।। विपरिमृशत पुत्राः शत्रवः सर्वमेतत् । त्यजत भजत धम्म निर्मल शर्मकामाः ॥६॥ भावार्थ-जिस घर को तू रक्षक समझता है वही तुझे मरण से बचा नहीं सकना । ये भाई बन्धु सर्व स्नेह के बंधन के मूल हैं दीर्घकाल से परिचय में आई हुई तेरी स्त्री अनेक आपदाओं का द्वार है। ये तेरे पुत्र स्वार्थ के सगे तेरे शत्रु हैं । ऐसा विचार कर इन सबको तज और यदि तू सुख को चाहता है तो तू पवित्र धर्म की सेवा कर। अवश्यं नश्वरैरेभिरायुः कायादिभिर्यदि शाश्वतं पदमायाति मुभाऽऽयोतमवेहि ते ॥७०॥ भावार्थ-ये आयु शरीरादि सब अवश्य नाश होनेवाले हैं, यदि इनकी ममता छोड़ने से अविनाशी मोक्षपद तेरे हाथ में आसकता है तो सहज में ही आया जान । गलत्यायुः प्रायः प्रकटितघटीयन्त्रसलिलं । खलः कायोप्यायुर्गतिमनुपतत्येष सततम् ।। किमस्यान्यैरन्यद्वयमयमिदं जीवितमिह । स्थिता भ्रान्त्या नावि स्वमिव मनुते स्थास्नुमपधीः ॥७२॥ भावार्थ यह आयु प्रगट ही अरहट की घड़ी के जल की तरह छिन छिन गल रही है । यह दुष्ट शरीर भी आयु की गति के अनुसार निरन्तर पतनशील है । अरावान होता जाता है । जिनसे जीवन है वे सहज-सुख-साधन [२१ आयु व काय ही क्षणभंगुर हैं व विनाशीक है तब पुत्र स्त्री व धनधान्यादि के सम्बन्ध की क्या बात, छूटने ही वाले हैं तो भी यह आज्ञानी अपने को थिर मानता है । जैसे नांव में बैठा पुरुष चलता हुआ भी भ्रम से अपने को थिर मान लेता है। वान्ये वेसि न किंचिदप्यपरिपूर्णाङ्गो हितं वाहितम् । कामान्धः खलु कामिनीद्रु मघने भ्राम्यन्वने यौवने ॥ मध्ये वृद्धतृपाजितुम् वसु पशुः क्लिश्नासि कृष्यादिभि- वृद्धो वाद्धमृतः क जन्मफलितं धर्मो भवेनिर्मलः ॥ ८ ॥ -- भावार्थ-हे जीव ! बालावस्था में तू पूर्णाग न पाता हुआ अपने हित या अहित को कुछ भी नहीं जानता है । जवानी में स्त्री रूपी वृक्षों के वन में भ्रमता हुआ काम भाव से अन्धा बन गया। मध्य वय में बढ़ी हुई धन की तृष्णा से पशु के समान खेती आदि कमी को करता हुआ क्लेश पाता है। बुढापे मे अधमरा हो गया। तब बता नर जन्म को सफल करने के लिये तू पवित्र धर्म को कहा पालन करेगा। श्री पद्मनन्दि मुनि अनित्य पचाशद में कहते हैं- सर्वत्रोद्गतशोकदापदहनव्याप्त जगत्काननं । मुग्धास्तत्र वधू मृगी गतधियस्तिष्ठति लोकैणकाः ॥ कालव्याध इमान्निहति पुरतः प्राप्तान् सदा निर्दयः । तस्माज्जीवति नो शिशुन च युवा वृद्धोपि नो कश्चन ॥३४॥ भावार्थ-यह ससाररूप वन सर्व जगह शोक रूपी दावानल से रहा । यहां बिचारे भोले लोग रूपी हिरण स्त्री रूपी मृगी में प्रेम कर रहे हैं, अचानक कालरूपी शिकारी आकर निर्दयी हो सामने से इनको मारता है इस कारण न तो बालक मरण से बचना है न युवा बचता है न वृद्व बचता है। इस संसार में मरण सर्व को घात करता है। व्याप्त to है वांछत्यैव सुखं तदत्र विधिना दत्त परं प्राप्यते । नूनं मृत्युमुपाश्रयन्ति मनुजास्तत्राप्यतो विभ्यति ।। इत्थं कामभयप्रसक्तहृदया मोहान्मुधैव ध्रुव । दुःखोमिप्रचुरे पतत्ति कुधियः संसारघोरार्णवे ॥३६॥ भावार्थ-यह जीव इस ससार मे निरन्तर इन्द्रियजनित सुख ही की बाछा करता है परन्तु उतना ही मिलता है जितना पुण्य कर्म का उदय है । इच्छा के अनुसार नहीं मिलता है। निश्चय से मरण सव मानवों को आने वाला है इसलिये यह जीव मरने से भय करता रहता है । ऐसे यह कुबुद्धी जीव कायकी तृष्णा और भय से मलीन चित्त होता हुआ मोह से वृथा ही दु.ख रूपी लहरों से भरे हुए इस भयानक समुद्र मे गोते खाता है। - मसार सम्पा . भावाथ-इस ससार में यह प्राणी कमी के फल से ठगा हुआ, राजा पे भरकर लट हो जाता है अन २४] सकललोकमनोहरानमाः करण यौवन जीविन मंपदः । कमलपत्रपयोलवचंचलाः किमपि न स्थिरमस्ति जगत्रये ॥१०॥ भावार्थ-सर्व जन के मन को हरनेवानी इन्द्रिने, युवानी, जीतन्य व संपटाएं उसी तरह बचाई। जैसे कमल के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की यूद न है । उन नीनों लोकों में कोई भी पर्याय स्थिर रह नही सकती। जननमत्युजगनलदीपिनं जगदिद सकलोऽपि विलोफते । तदपि धर्ममति विदधाति नो समना विषयाकृलितो जनः ॥११॥ भावार्थ- -यह सर्व जगत जन्म, मरण, जरा को 'ग्नि में जल रहा है, ऐसा देखते हुए भी यह विकाई दाह से आकुलित प्राणी उनमे मन को लीन करता या धर्म माधन में बिलकुल बुद्धि को नहीं लगा है। श्री शुभचद्राचार्य ज्ञानार्णव में कहते है- चतुर्गतिमहावतं दास्यबाटवदीपिते । भ्रमन्ति भनिनोऽजन्न चराका जन्मसागरे ॥१॥ भावार्थ- चार गति रूपी महान भवग्याने नशा दुबपी बलवानल में प्रचलित इस मसार में समुद्र मे जगत के दीन प्राणी निरन्तर ध्रमा करते है। रूपाण्येकानि गहानि त्यजत्यन्यानि सन्ततम् । यथा रङ्गऽत्र शैलपन्तथायं यन्त्र बाहयः ॥ ८ ॥ भावार्थ-जैसे नृत्य के अन्वाडे मे नृत्यकार अनेक भेपो को बारता है और छोड़ता है त्रैमे यह छ सदा भिन्न भिन्न रूपो को-शरीरों को ग्रहण करना है और छोड़ता है। देवलोके नृलोक च तिरश्चि नरकेऽपि च ! न सा योनिने तद्रूपं न त शो न तत्कुलम् ।। १२ ॥ भावार्थ- इस ससार की चार गतियो मे फिरते हुए जीव के वह योनि, वह रूप, वह देश, वह पुन वह सुख दुख., वह पर्याय नहीं है, जो निरन्तर गमनागमन करने से प्राप्त न हुई हो । भूपः कृमिर्भवत्यन्न कृमिश्चामरनायकः । शरीरी परिवर्चेत कर्मणा वंचितो बलात् ॥१५॥ लट का जीव क्रम क्रम से इन्द्रपद पा लेता है। माता पुत्री स्वसा भार्या सैव संपद्यतेऽङ्गजा । पिता पुत्रः पुनः सोऽपि लभते पौत्रिकं पदम् ॥ १६ ॥ के में , । - सहज-सुख-साधना [२५ भावार्थ- - - इस ससार में प्राणी की माता मरकर पुत्री हो जाती है, बहन मरकर स्त्री हो जाती है, वहीं श्री मर कर अपनी ही पुत्री हो जाती है। पिता मरकर पुत्र हो जाता है। फिर वही मरकर पुत्र का पुत्र हो नाता है, इस प्रकार उलट पुलट हुआ करती है। श्वन शूलकुठारयन्त्रदहनक्षारक्षुरव्याहतै- स्तिर्यचु श्रमदुःखपावकशिखासंभारभस्मीकृतैः । मानुष्येऽप्यतुलप्रयासवशगैर्देवेषु रागोद्धसैः संसारेऽत्रदुरन्तदुर्गतिमये वम्ब्रम्यते प्राणिभिः ॥१७॥ भावार्थ-इस -इस दुर्निवार दुर्गतिमय संसार मे जीव निरन्तर भ्रमण करते हैं। नरको मे तो ये शूली, कुल्हाडी, घाणी, अग्नि, क्षार, जल, छुरा, कटारी आदि से पीड़ा को हुए नाना प्रकार के दुःखो को भोगते हैं। पशुगति मे अग्नि की शिखा के भार से भस्म होकर खेद और दुःख पाते हैं । मनुष्य गति में भी अतुल परिश्रम करते हुए नाना प्रकार के कष्ट भोगते हैं । देवगति मे राग भाव से उद्धत होते हुए दुःख सहते है। श्री ज्ञानभूषण भट्टारक तत्वज्ञान-तरगिणी में कहते हैं- दृश्यते गंधनादावनुजसुतसुताभीरुपित्रंबिकासु ग्रामे गेहे खभोगे नगनगरखगे वाहने राजकार्ये । आहायेंगे वनादौ व्यसनपिमुखे कूपवापीतडागे रक्ताश्च प्रेषणादौ यशसि पशुगणे शुद्धचिद्र पके न ॥२२-११।। भावार्थ-इस इस ससार मे कोई मनुष्य तो इत्रफुलेल आदि सुगधित पदार्थो में रागी हैं । बहुत से छोटा गई, पुत्र, पुत्री, स्त्री, पिता, माता, ग्राम, घर, इन्द्रिय भोग, पर्वत, नगर, पक्षी, वाहन, राज कार्य, भक्ष्य पदार्थ, शरीर, चन, सात व्यसन, खेती, कुआ, बावडी, सरोवर आदि में राग करनेवाले हैं, बहुत से मनुष्य व वस्तुओं को इधर उधर भेजने में, यश लाभ मे, तथा पशुओ के पालन में मोह करनेवाले हैं, परन्तु शद्ध आत्मा के स्वरूप के प्रेमी कोई नहीं। कीर्ति का पररंजनं खविषयं केचिनिनं जीवितं संतानं च परिग्रहं भयमपि ज्ञानं तथा दर्शनं । अन्यस्याखिलवस्तुनो रुगयुति तद्ध तुमुद्दिश्य च कुयुः कर्म विमोहिनो हि सुधियश्चिद्र पलब्ध्य परं ।।6-६ ।। भावार्थ-इस ससार में बहुत से मोही पुरेप कीति के लिये काम करते हैं, अनेक दूसरो को रजायमान' करने के लिये, बहुत से इन्द्रियों के विषयो की प्राप्ति के लिये, अपने जीवन की रक्षा के लिये संतान व परिग्रह प्राप्ति के लिये, भय मिटाने के लिये, बान दर्शन पाने के लिये, रोग मिटाने के लिये काम करते हैं। कोई बुद्धिमान ही ऐसे हैं जो शुद्ध चिद्र प की प्राप्ति के लिये उपाय करते है। है १ - संसार स्वरूप। एकेंद्रियादसंज्ञाख्यापूर्णपर्यंतदेहिनः । अनंतानंतमाः संति तेषु न कोऽपि तादृशः ॥ पंचाक्षिसंन्निपूर्णेपु केचिदामनभव्यतां । नृत्वं चालभ्य तादृक्षाः भवत्याः सुबुद्धयः ॥१०-११॥ भावार्थ-इस संसार में एकेन्द्रिय से लेकर असैनी पंचेंद्रिय तक अनंतानत जीव हैं उनमें किसी के भी सम्यग्दर्शन के पाने की योग्यता नहीं है । पचेंद्री सैनी में भी जो निकट भव्य मनुष्य हैं आर्य हैं व सुबुद्धी हैं वे ही मुख्यता से सम्यक्ती होकर शुद्ध चिद्र प का ध्यान कर सकते हैं। पूरे ग्रामेऽटव्यां नगशिरसि नदीशादिसुतटे मठे दर्या चैत्योकसि सदसि रथादौ च भवने । महादुर्गे स्वर्गे पथनभसि लतावस्वभवने स्थितो मोही न स्यात् परसमयरतः सौख्यलवभाक् ॥६-१७॥ भावार्थ-जो मानव मोही-पर पदार्थ में रागी हैं वे चाहे पुर, ग्राम, पर्ववका शिखर, समुद्र व नदी के तट, मठ, गुफा, वन, चैत्यालय, सभा, रथ, महल, किला, स्वर्ग, भूमि, मार्ग, आकाश, लतामण्डप, तम्बू आदि स्थानों पर कहीं भी निवास कर, उन्हें निराकुल सुख रंचमात्र भी प्राप्त नहीं हो सकता। पण्डित बनारसीदासजी बनारसीविलास में कहते हैं:- सवैया-३१। जामें सदा उतपात रोगनिसो छीजे गात कछू न उपाय छिन छिन पाउ खपनो । कीजे बहु पाप और नरक दुःख चिता व्याप आपदा कलाप में विलाप ताप तपनो ।। जामें परिग्रहको विपाद मिथ्या वकवाद विषै भोग सुख है सवाद जैसो सपनो । ऐसो है जगत वास जैसो चपला विलास जामें तू मगन भयो त्यागि धर्म अपनो ॥९॥ जगमें मिथ्याति जीव भ्रम करै है सदीव भ्रम के प्रवाह में वहा है आगे वहेगा। नाम राखिवे को महारम्भ करें दभ करै यो न जाने दुर्गति में दुःख कौन सहेगा। वारबार कहे मैं ही भागवत धनवंत मेरा नाम जगतमें सदाकाल रहेगा। याही ममतासों गहि आयो है अनन्त नाम, आगे योनि योनि में अनंत नाम गहेगा ||१०|| कवित्त- जैसे पुरुप कोई धन कारन हीडत दीप दीप चढ़ि यान । आवत हाथ रतनचिंतामणि, डारत जलधि जानि पापान ।। तैसे भ्रमत भ्रमत भवसागर पावत नर शरीर परधान । परम जतन नहिं करत बनारसि खोबत वादि जनम अज्ञान ||४|| ज्यों जड़मूल उखाड़ि कलपतरु बोवत मूढ कनक को खेत । ज्यों गजराज वेचि गिरिवर सम कूर कुबुद्धि मोल खर लेत ॥ - सहज-सुख-साधन [२७ । जैसे छांडि रतन चिंतामणि, मूरख कांच खण्ड मन देत । तैसे धरम विसारि बनारसि धावत अधम विषयसुख हेत ॥५॥ ज्यों मतिहीन विवेक बिना नर साजि मतंग जु ईंधन ढोवे । कचन भाजन धूरि भरै शठ मूढ सुधारससों पग धोवै ।। बीहित काग उडावन कारण, डारि महामणि मूरख रोवै । त्यों यह दुर्लभ देह बनारसि पाय अजान अकारथ खोवे ।।६।। सबैया-२३ मात पिता सुत बन्धु सखी जन मीत हितू सुख कामिन कीके । सेषक राजि मतगज वाजि महादल साजि रथी रथ नीके ॥ दुर्गति जाय दुःखी विललाय परै सिर श्राय अकेले ही जीके । पथ कुपथ सुगुरू समझावत और सगे सब स्वारथ ही के ॥१५॥ पडित द्यानतरायजी अपने द्यानतविलास में कहते हैं- हाट बनाय के वाट लगाय के टाट बिछाय के उद्यम कीना। लेन को बाढ़ सुदेन को घाट सुवाटनि फेरि ठगे बहु दीना ।। ताहू में दान को भाव न रचक पाथर की कहूँ नाव तरी ना। द्यानत याही ते नर्क में वेदनि, कोड़ किरोड़न और सही ना ।।४।। नर्कनमाहि कहे नहीं जाहि सहे दु.ख जे जब जानत नाहीं । गर्भ मझार कलेश अपार तले सिर था तब आनत नाहीं॥ धूल के बीच मे कीच नगीच में नीच क्रिया सब जानत नाहीं। द्यानत दात्र उपाय करो जम आवहिगो जब जानत नाहीं ॥४४॥ आए तजि कौन धाम चलवो है कौन ठाम करत हो कौन काम कछुहू विचार है । पूरब कमाय लाय यहां आइ खाय गए आगे को खरच कहा बाध्यो निरधार है। बिना लिये दाम एक कोस गाम को न जात उतराई दिये बिना कौन भयो पार आजकाल विकराल काल सिघ आवत है मैं करू पुकार धर्मधार जो तैयार है ॥२४॥ है। सवैया-३१ । -- " केई केई वार जीव भूपति प्रचण्ड भयो केई केई वार जीव कीट रूप धरो है। केई केई वार जीव नवग्रीवक जाय वस्यो केई केई वार जीव सातवें नरक जावतरो है। केई केई वार नीव राघो मच्छ होड चुक्यो केई केई वार साधारन काय वरो है। सुख और दुःख दोउ पावत है जीव सदा यही जान ज्ञानवान हर्प शोक हरो है ।। १६॥ याही जगमांहि चिदानंद आप डोलत है भर्म भाव धरे हरे आतम सकति को अष्ट कर्म रूप जे जे पुद्गल के परिनाम तिनको सरूप मान मानत सुमति को।।
२८] ससार स्वरूप । जाही समै मिथ्या मोह अन्धकार नाशि गया भयो परकाश भानु चेतन को तनको । ताही समै जान्यो श्राप थाप पर पर रूप मानि भव भावरी निवारो चारों गति को ||७|| छप्पय- कबहुँ चढत गजराज बोझ कबहुँ सिर भारी । कबहुँ होत धनवंत कबहुँ जिम होत भिखारी ।। कबहुँ असन लहि सरस कबहुँ नीरस नहीं पावत । कबहुँ बसन शुभ सघन कबहुँ तन नगन दिखावत ।। कबहुँ स्वछन्द बन्धन कबहुँ करमचाल बहु लेखिये । यह पुन्य पाप फल प्रगट जग, राग दोप तजि देखिये ॥५२ ।। कबहूँ रूप अति सुभग कबहुँ दुर्भग दु.खकारी । कबहुँ सुजस जम प्रगट कवहे अपजस अधिकारी ।। कबहुँ अरोग शरीर कबहुँ बहु रोग मतायत । कवहे वचन डित मधुर कबहुँ कछु वात न आवत ।। कबहुँ प्रवीन कवहुँ मुगध विविध रूप नर देग्विये । यह पुन्य पाप फल प्रगट जग, राग दोप तजि देखिये ॥५३।। सवैया रूजगार वनै नाहिं धन तो न घरमांहि खाने की फिकर बहु नारि चाहे गहना। देनेषाले फिरि जाहि मिलत उधार नाहिं साझ मिले चोर धन आवे नाहिं लहना ।। कोऊ पूत जारी भयो घरमाहिं सुत थयो एक पूत मरि गयो ताको दुख सहना । पुत्री वर जोग भई व्याही सुता मरि गई एते दुःख सुख मान तिसे कहा कहना ।।४।। शिष्य को पढ़ावत हैं हेम को गढावत है मान को बढ़ावत है नाना छल छान के। कौडी कौडी मांगत है कायर हो भागत है प्रात उठे जागत हैं स्वारथ पिछान के ।। कागद को लेखत हैं केई नग पेखत हैं केई कृपि देखत है आपनी युवनि' के । एक सेर नाज काज अपनो सरुप त्याज डोलत हैं लाज काज धर्म काज हान के ॥३६।। देखो चिदानंद राम ज्ञान दृष्टि खोल करि तात मात भ्रात सुन स्वारथ पसारा है। तू तो इन्हें आप मानि ममता मगन भयो वह्यो भर्म माहिं निज धर्म को विसारा है ।। यह तो कुटुम्ब सब दुःख ही को कारण है तजि मुनिराज निज कारज विचारा है। ताते धर्म सार स्वर्ग मोक्ष सुखकार सोई लहे भवपार जिनधर्म ध्यान धारा है ॥ ३४ ॥ कुण्डलिया- यह ससार असार है, कदली वृक्ष समान । यामें सारपनो लखै, सो मुरग्व परधान ।। सो मूरख परधान मान कुसुमनि नभ देखें। सलिल मथै घृत चहै शृङ्ग सुन्दर खर पेखे ।।
सहज-सुख-साधना [२९ अगिनि माहिं हिम लखें सर्प मुख माहिं सुधा तह । जान जान मन माहि नाहि संसार सार यह ॥ ३०॥ भैया भगवतीदास ब्रह्मविलास में कहते है- सवैया २३ । काहे को देह सों नेह करै तू अन्त न राखी रहेगी ये तेरी। मेरी ये मेरी कहा करै लच्छि सो काहू की है के कहूँ रहि तेरी ।। मानि कहा रहो मोह कुटुम्ब सों स्वारथ के रस लागे सवेरी। ताते तू चेत विचच्छन-चेतन झुठि ये रीति सवै जग केरी ॥८८|| 7 सवैया ३१ । कोटि कोटि कष्ट सहै कष्ट मे शरीर ढहे धूमपान किये पै न पायो भेद तनको । वृक्षनिके मूल रहे जटानिमें झूल रहे मानमध्य भूलि रहे किये कष्ट तनको । तीरथ अनेक नए तीरथ न कहूँ भये कीरति के काज दियो दान हूँ रतनको । ज्ञान विना वेर वेर क्रिया करी फेर फेर कियो कोऊ कारजन आतम जतन को ॥६४॥ सवैया २३ । बालक है तब बालक मी बुधि जोबन काम हुताशन जारे । वृद्ध भयो तन अङ्ग रहे थकि आये हैं श्वेत गए सब कारे ॥ पांव पसार परयो धरनी महिं रोवै रटै दुःख होत महारे। वीती यों बात गयो सप भूलि तू चेतत क्यों नहि चेत..हारे ॥५१॥ सवैया ३१ । 1 देखत हो कहां कहा केलि करै चिदानद आतम सुभाव भूलि और रस राचो है इद्रिन के सुख मे मगन रहे आठों जाम इद्रिन के दुख देख जानै दुख साचो है ।। कहूँ क्रोध कहूँ मान कहूँ माया कहूँ लोभ अहंभाव मानि मानि ठौर ठौर माचो है। देव तिरयंच नर नारकी गतीन फिरै कौन कौन म्याग धरै यह ब्रह्म नाचो है ॥३९।। पाय नर देह कहो कीना कहा काम तुम रामा रामा धन धन करत विहातु है। कैक दिन कैक छिन रही है शरीर यह याके सग ऐसे काज करत सुहातु है ।। जानत है यह घर मरवेको नाहि डर देख भ्रम भूलि मूढ फूलि मुसकातु है चेतरे अचेत फुनि चेतवेको ठौर यह आज काल पीजरेसो पक्षी उड जानु है ॥२१।। विकट भवसिंधु तारू तारिवेको तारू कौन ताके तुम तीर आये देखो दृषि धरिके । अबके सभारेते पार भले पहुँचत हो अपके सभारे विन बूडत हो तरिके ।। वहुरि फिर मिलयो न ऐसो सजोग कह देव गुरु ग्रन्थ करि आये यही धरिके। ताहि तू विचार निज आतम निहारि भैया धारि परमात्मा विशुद्ध ध्यान करिके ||७|| ( शरीर स्वरूप । घूअन के धौर हर देखि कहा गर्व करे ये तो छिन माहि जाइ पौन परसत ही। सन्ध्या के समान रंग देखत ही होय भंग दीपक पतंग जैसे काल गरसत ही ॥ सुपने में भूप जैसे इन्द्र धनु रूप जैसे अोसवू'द धूप जैसे दुरे दरसत ही। ऐसो ही भरम सब कर्मजालवर्गणाको तामें मूढ मग्न होय मरै तरसत ही ॥१७॥ जहा तोहि चलिवो है साथ तू तहां को ढदि यहा कहां लोगनिमो रहो तू लुभायरे। सग तेरे कौन चलै देख तू विचार हिये पुत्र के कलत्र धन धान यह कायरे । जाके काज पाप करि भरतु है पिंड निज ह है को सहाय तेरे नर्क जव जायरे । तहां तो इकेलो तू ही पाप पुण्य साथ दोय तामें भलो होड सोई कीजे हसरायरे ।। - दूसरा अध्याय शारीर स्वरूप। इस संसार में जितनी आत्माए भ्रमण कर रही हैं वे सब शरीर के संयोग में हैं। यदि शरीर का सम्बन्ध न होता तो सर्व ही आत्माए सिद्ध परमात्मा होती ससार का अभाव ही होता । वास्तव मे दूध पानी की तरह शरीर और आत्मा का सबंध हो रहा है । आत्मा बडा ही सूक्ष्म अतीन्द्रिय पदार्थ है जबकि शरीर जड़ मूर्तीक पुद्गल परमाणुओ के स्कधों से बना है इसलिये ससारी प्राणियों की स्थूल दृषि मे आत्मा के होने का विश्वास नहीं होता, क्यों कि राज दिन शरीर का ही प्रभुत्व व साम्राज्य हो रहा है आत्मा का महत्व ढक रहा है। यह मोही प्राणी बाहरी स्थूल शरीर को ही आपा मान रहा है, उमके जन्म में मैं जन्मा, उसके मरण में मै मरा, उसके रोगी होने पर मैं रोगी, उसके दुर्बल होने पर मै दुर्बल, उसके वृद्ध होने पर मैं वृद्ध, उसके निरोगी होने पर मैं निरोगी, उसके सबल होने पर मैं सबल, उसके युवान होने पर मैं युवान ऐसा मान रहा है । यदि वह धनवान माता पिता से जन्मा है तो यह अपने को धनवान मानता है। यदि निर्धन से जन्मा है तो निर्धन मानता है। राज्य कुलवाला अपने को राजा, या दालिद्र कुलवाला अपने को दालिद्री, कृषक कुलवाला अपने को किसान, जुलाहे के कुलवाला अपने को जुलाहा, दरजी कुलवाला अपने को दरजी, धोबी कुलवाला अपने को धोबी, चमार कुलवाला अपने को चमार, सुनार कुलवाला अपने को सुनार, लुहार कुलवाला अपने को लुहार, बढ़ई कुलवाला अपने को बढ़ई, थवई कुलबाला अपने को थवई, रगरेज कुलवाला अपने को रगरेज, माली कुलवाला अपने को माली मान रहा है । शरीर की जितनी दशाएँ होती हैं वे सब मेरी हैं ऐसा घोर अज्ञानतम छाया हुआ है । शरीर के म मे इतना उन्मत्त है कि रातदिन शरीर की चर्चा करता है। सबेरे से सध्या होती है, सध्या होता है। शरीर की ही रक्षा, शरीर के ही शृगार का ध्यान रहता है । इसे साफ करना है, इसे धोना है - से सहज-सुख-साधन। [३१ इसे कपडे पहनाने हैं, इसे चढन लगाना है, इसे भोजन पान कराना है, इसे व्यायाम कराना है, इसे परिश्रम - कराना है, इसे आराम देना है, इसे शयन कराना है, इसे आभूपण पहिनाने हैं, इसे वाहन पर ले जाना है, इसके लिये द्रव्य कमाना है, इसके सुखदाता स्त्री नोकर चाकरों की रक्षा करनी है, इसके विरोधी शत्रु ओं का संहार करना है इसी धुन मे इतना मस्त है कि इसे अपने आत्मा जानने की व समझने की फुरसत नहीं मिलती है। जिस शरीर के मोह में आपको भूलकर काम किया करता है वही शरीर पुराना पडते पडते या युवानी में ही या बालवय मे ही आयुकर्म के समाप्त होने पर छूटने लगता है तो महा विलाप करता है। मैं मरा, मै मरा, मेरे साथी छूटे, मेरा धन छूटा, मेरा घर छूटा, मेरा सर्वस्व लुट गया, ऐसा मेरा मेरा करता हुआ मरता है और तुर्त ही दूसरा स्थूल शरीर प्राप्त कर लेता है । जिसकी सगति ने यह बावला हो रहा है उसका स्वभाव क्या है इसका यदि विचार किया जावेगा। विवेक बुद्धि से इस बात का मनन किया जावेगा तो विदित होगा कि शरीर भिन्न सड़न गलन पड़न मिलन बिछुडन स्वभाव है जब कि मैं अखण्ड, अविनाशी, अजात, अजर, अमर, अमूर्तिक, शुद्ध ज्ञातादृष्टा ईश्वर स्वरूप परमानन्दमय अनुपम एक सत् पदार्थ हूँ। ससारी जीवों के सर्व शरीर पांच तरह के पाए जाते हैं-कार्मण, तैजस, आहारक, वैक्रियिक और औदारिक । सबसे सूक्ष्म अतीन्द्रिय कार्मण शरीर है । सबसे स्थूल औदारिक है तथापि सबसे अधिक पुद्गल के परमाणुओं का सघट्ट कार्मण में है, उससे बहुत कम तेजस-आदि मे क्रम से है। सबसे अधिक परम बलिष्ट शक्ति कार्मण मे है, उससे कम शक्ति क्रम से और शरीरों में है। कार्मण शरीर कामण वर्गणा रूपी सूक्ष्म स्कधो से बनता है । इसके बनने मे मुख्य कारण ससारी जीवों के शुभ व अशुभ राग द्वेप मोहमई भाव तथा मन वचन काय योगों का हलन चलन है। यही अन्य चार शरीरों के बनाने का निमित्त कारण है। इसी के फल से विजली (Electric) कीसी शक्ति को रखनेवाली तैजस वर्गणा रूपी सूक्ष्म स्कधो से तैजस शरीर (Electric) बनता है। ये दो शरीर प्रवाह रूप से ससारी जीव के साथ अनादिकाल से चले आरहे हैं । जब तक मोक्ष न हो साथ रहते हैं, मोक्ष होते ही छूट जाते हैं। तो भी ये एकसे नहीं रहते है, इनमें से पुरानी कर्म तथा तैजस वर्गणाए छूटती रहती हैं व नई कर्म व तैजस वर्गणाए मिलती रहती हैं। यदि किसी मिथ्यादृष्टी मोही बहिरात्मा सैनी पंचेन्द्रिय के कार्मग शरीर की परीक्षा की जावे तो पुरानी से पुरानी कार्मण वर्गणा उसके कार्मण शरीर मे सत्तर कोडा कोडी सागर ( सागर अनगिनती वर्षी को- कहते हैं ) से अधिक पुरानी नहीं मिल सकेगी। आहारक शरीर भी सूक्ष्म है । यह शरीर तपस्वी ऋद्धिधारी महा मुनियों के योग वल से बनता है । पुरुपाकार एक हाथ का सफेद बडा सुन्दर पुनला मस्तक द्वार से निकलता है और एक अन्तमुहूर्त तक ही बना रह सकता है, फिर दूसरा बन सकता है । यह शरीर साधु की भावना के अनुसार तार के समान किसी अरहंत केवली व श्रु त केवली के दर्शन को जाना है, कोई सूक्ष्म शका किसी तत्व में होती है वह दर्शन मात्र से मिट जाती है । काय लेने तक ही यह बना रहता है फिर विघट जाता है। वैक्रियिक शरीर और औदारिक शरीर दो शरीर ऐसे हैं जो चारों गतिधारी प्राणियो के स्थूल शरीर हैं-जीवन तक रहते है, फिर छूट जाते हैं, नए प्राप्त होते हैं । देवर्गात व नरकगतिवाले प्राणियों के स्थूल - ३२] शरीर स्वरूप। से शरीरों को चैक्रियिक तथा तिर्यंच और मनुष्यगतिवाले प्राणियों के स्थूल शरीर को औदारिक कहते हैं । नारकियों का वैक्रियिक शरीर बहुत ही अशुभ दुर्गधमय आहारक वर्गणाओं से बनता है। वे वर्णणाए नाम कर्म के फल से स्वयं मिल जाती हैं और एक अन्तर्मुहूर्त में जितना बडा शरीर होना चाहिये उतना बड़ा तैयार हो जाता है । यह शरीर बहुत ही असुहावना, डरावना, हुंडक सस्थानमय पाप कर्म के फलको दिखानेवाला होता है । इस शरीर को वैक्रियिक इसलिये कहते हैं कि इसमें विक्रिया करने की शक्ति होती है । नार की इच्छानुसार अपने शरीर को सिंह, भेड़िया, कुत्ता, नाग, गरुड आदि बुरे पशुरूपों में बदल सकते हैं, वे अपने अंगों को ही शस्त्र बना लेते हैं । परस्पर दुख देनेके साधन बनाने मे उनके शरीर नाना प्रकार की अपृथक विक्रियाए करते रहते हैं । इस शरीर में ऐसी शक्ति होती है कि छिन्नभिन्न होने पर भी पारे के समान मिल जाते हैं-नारकी निरन्तर पीड़ा से प्राकुलित हो चाहते है कि यह शरीर छूट जावे परन्तु वह शरीर पूरी आयु भोगे बिना छुटता नहीं, उसका अकाल मरण होता नहीं। वे ऐसे शरीर मे रत नहीं होते हैं इसी से उनको नारत भी कहते हैं। देवों के भी स्थूल शरीर को वैक्रियिक कहते हैं । यह शरीर भी एक अतर्मुहूर्त मे स्वय नामकर्म के उदय सुन्दर सुहावनी सुगन्धमय आहारक वर्गणाओं से बनता है । यह सुन्दर व क्रांतिकारी होता है । पुण्य कर्म के कमती बढती होने के कारण सर्व देवों का शरीर एकसा सुन्दर नहीं है, कोई कम कोई अधिक इसी से देव परस्पर एक दूसरे को देखकर ईर्षावान होकर मनमें घोर दु.ख पाते हैं। अपने को दूसरों के मुकाबले मे कम सुन्दर देखकर कुढ़ते हैं व रातदिन मन ही मन मे जलते रहते है। मिथ्याइष्टि अज्ञानी देवों को यह बड़ा मानसिक दु.ख रहता है। शरीर सुन्दर होने से वे देव शरीर के मोह में रत रहते हुए शरीर में प्राप्त पांचां इन्द्रियों के भोगों में बड़े अामक्त रहते है। इनके शरीर में अपृथक् तथा पृथक पृथक विक्रिया करने की शक्ति होती है। एक देव या देवी अपने एक शरीर के बहुत शरीर बनाकर आत्मा को सब मे फैला देते हैं और मन द्वारा सर्व शरीरों से काम लिया करते हैं । एकही शरीर से बने हुए भिन्न भिन्न शरीरों को भिन्न भिन्न स्थानों मे भेजकर काम लेते हैं । छोटा बड़ा, हलका भारी नाना प्रकार करने की शक्ति उनके वैक्रियिक शरीर में होती है। एक देवी अनेक प्रकार शरीर बनाकर क्रीड़ा किया करती है । इन देवों में शरीर सवधी सैर, भ्रमण, नाच, गाना, नाटक, खेल, तमाशा इतना अधिक होता है कि ये रात दिन उम ही रागरग मे मगन होकर शरीर के हो मुग्व में आसक्त हो शरीर रूप ही अपने को मान लेते हैं। मिथ्यात्वी देवो को स्वप्न मे भी ख्याल नहीं पाता है कि हम शरीर से भिन्न कोई प्रात्मा है । शरीर के गाढ मोह के कारण कोई प्रिय देवी मरती है तो देवो को महान कट होता है। अपना मरण निकट होता है तो बडा दु.ख होता है । वे चाहते हैं कि ओर अधिक जीते रहे परन्तु आयुकर्म के ममान होते ही उनको शरीर छोडना पड़ता है । अकाल मरण तो इनमें भी नहीं होता है । आनध्यान से शरीर छोड़ते हैं। कोई कोई श्रमर करके वृत वनस्पति काय मे या रत्नादि पृथ्वी काय में, कोई कोई मृग, यान, अश्व, हाथी, वृषभ पशुओं मे और मोर, कबूतर श्रादि पक्षियों में उत्पन्न हो जाते हैं। कोई कोई दीन हीन मनुप्यों में जन्म लेते है। जैमा मोहकर्म का पाप कर्म वाचते हैं वैसे ही कम बुरी व अधिक बुर्ग योनि में प्रार जन्म पान है। शरीर का मोह देवों को पन्चेद्रिय मे एकेन्द्रियनक की योनि मे पटक देता है, जहा में उन्नति करके फिर पन्चंद्रिय होना उनके लिये अनत काल में भी दुर्लभ हो जाता है।
है । - सहज-सुख-साधन [३३ तियंचगति में-एकेन्द्रिय पृथ्वी, जल, अग्नि व वायुकादिकों का शरीर भी आहारक वर्गणाओं से बनता । ये वर्गणाए कुछ शुद्ध हैं । वनस्पतियों का शरीर पृथ्वी आदि धातुओं से व आहारक वर्गणाओं से बनता है। विकलत्रय व पचेन्द्रिय पशुओं का शरीर भिन्न भिन्न प्रकार की अच्छी बुरी आहारक वर्गणाओं से बनता है जिससे किन्हीं का शरीर सुन्दर किन्हीं का असुन्दर होता है, किन्हीं का दुर्गधमय, किन्हीं का सुगन्धमय होता है । असैनी पंचेन्द्रिय तक सर्व पशुओ के मन नहीं होता है । इससे उनके विचारने की शक्ति ही नहीं होती है कि वे यह विचार सके कि आत्मा कोई भिन्न है व शरीर कोई भिन्न है। वे शरीर रूप ही अपने को माना करते हैं। उनकी तीव्र प्राशक्ति शरीर मे होती है। जो सैनी पचेन्द्रिय पशु है उनके मन होता है, वे विचार कर सकते है परन्तु उनको शरीर व आत्मा की भिन्नता के ज्ञान पाने का अवसर कचित् ही होता है। वे भी शरीर मे मोही होते हुए शरीर से ही अपना जन्म मरण मानते रहते हैं व शरीर के छेदन भेदन भूख प्यास से बहुत कष्ट भोगते हैं। मनुष्यगति में-इस कर्म भूमि के मनुष्यों का शरीर भी सुन्दर असुन्दर नाना प्रकार की आहारक वर्ग- णाओं से बनता है । पहिले तो शरीर की उत्पत्ति मे कारण गर्भ है । वहां अति मलीन, पुरुष का वीर्य व स्त्री के रज का सम्बन्ध होता है तब गर्भ बनता है। उसमें जीव अन्य पर्याय से आता है तब वह चारों तरफ की और भी आहारक वर्गणा रूपी पुद्गल को ग्रहण करता है । विग्रह गति से आया हुआ जीव मनुष्य गति मे एक साथ आहारक वर्गणा, भाषा वर्गणा, मनो वर्गणा को ग्रहण करता है । अन्तर्मुहूर्त तक अपर्याप्त अवस्था कहलाती है। जब तक उन वर्गणाओं में आहार, शरीर, इद्रिय, श्वासोछवास, भाषा और मन इनके बनने की शक्ति का प्रकाश न हो तब तक वह मानव अपर्याप्त कहलाता है, फिर वह पर्याप्त हो जाता है । मानव का शरीर-नौ मास के अनुमान महान कष्ट में पूग बनता है । तब तक इस जीव को गर्भ स्थान में उल्टा रहना पडता है । वह स्थान महा अपवित्र दुगंधमय होता है । माता द्वारा खाये हुए भोजनपान द्वारा वह वहां अपना खाद्य ग्रहण करके बढता है । अगोपांग सिकड़े हुए एक झिल्ली के भीतर रहते हैं । जब वह गर्भ से निकलता है तो उस बालक को बड़ा भारी कष्ट होता है । बाल्यावस्था में शरीर बडी कठिनाई से माता द्वारा पाला जाता है । भूख प्यास लगती है, समय पर दूध व अन्नादि मिलता है, कभी नहीं मिलता है तब रोता है, मल मूत्र से अपने को सान लेता है । मानव इस स्थूल शरीर को ऊपर से चिकना देखकर इसमें लुभा जाते हैं परन्तु इस औदारिक शरीर के सम्बन्ध में विचार नहीं करते हैं । यदि भले प्रकार शरीर के स्वभाव पर विचार किया जावे तो कोई भी बुद्धिमान ऐसे अशुचि, मैले, घिनावने शरीर की संगति पसन्द न करे । इसकी उत्पत्ति का कारण माता पिता का अत्यन्त मलीन रजवीर्य है । यह मलमई गर्भस्थान में बढ़ता है। इसके भीतर सात धातु व उपधातु हैं । सात धातुएँ —रस, रुधिर, मांस, मेद (चरबी), हाड, मिजी शुक्र (वीर्य )-जो भोजनपान किया जाता है वह इन दशाओं मे पलटते २ अनुमान एक मास मे वीर्य को तैयार करता है। सात उपधातुएं-बात, पित्त, श्लेष्म, सिरा, स्नायु, चर्म, उपराग्नि | इनके भरोसे पर शरीर बना रहता है। यदि इनमें से कोई उपधातु बिगड जाती है तो रोग पैदा हो जाता है । यदि कोई ऊपर की खाल का ढकना जरा भी हटादे तो इस शरीर पर मक्खियां बैठ जायगी। इतना घिनावना दिखेगा कि स्वय को ही बुरा लगेगा। इस शरीर के भीतर मल, मूत्र, पीप अनेक कीड़े बिलबिला रहे है । यह मैल के घड़े के समान । -
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महज-सुग्व-साधन । [ ३५ - 1 केवल व्रत रहित सम्यग्दृष्टि ही हो सकते है। सम्यग्दृष्टि ज्ञानी इन्द्रादि देव यह भावना भाया करते हैं कि कब आयु पूरी हो और कब हम मनुष्य देह पावे । जो तप साधन कर कर्माको जलावे अर आत्माको भक्त करे, जन्म मरण से रहित करे, उमे सिद्ध पद में पहुंचावे, ऐसे उपकारी मानव जन्म को पाकर मानवों के शरीर को चाकर के समान रखकर इसकी सहाय से गृहस्थाश्रम में तो धर्म, अर्थ, काम तीन पुरुपार्थी को साधना चाहिये और मुनिपद मे धर्म और मोक्ष को ही साधना चाहिये । बुद्धिमानों को धर्मसाधन मे यह भी नहीं देखना चाहिये कि अभी तो हम कुमार हैं, अभी तो हम युवान हैं, बुढ़ापे मे धर्म साधन करलेगे । अकाल मरण की संभावना होने से हमारा यह विचार ठीक नहीं है । मानवो के मिरपर सदा ही मरण खडा रहता है, मालूम नहीं कर पाजावे। इसलिये हर एक पन में अपनी शक्ति के अनुसार धर्म का साधन करते रहना चाहिये जिससे मरते समय पछताना न पडे। मानव शरीर का सम्बन्ध छूटेगा। उसी के साथ लक्ष्मी परिवार सम्पदा सब छूटेगी। तब इस शरीर व उसके सवधियो के लिये बुद्धिमान को पापमय, अन्यायमत्र, हिसाकारी जीवन नहीं बिताना चाहिये । स्वपर उपकारी जीवन विताकर इस शरीर को सफल करना चाहिये । इसमें रहना एक सराय का वास मानना चाहिये । जैसे सराय मे ठहरा हुआ मुसाफिर सराय के दृमरे मुसाफिरों से स्नेह करते हुए भी मोह नहीं करता है, वह जानता है कि सराय से शीघ्र जाना है वैसे ही शरीर में रहते हुए बुद्धिमान प्राणी शरीर के साथियों से मोह नहीं करते हैं, प्रयोजन वश स्नेह रखते है । वे जानते हैं कि एक दिन शरीर छोडना पडेगा तब ये सब संवध स्पान के समान हो जायेगे । शरीर झोपडी को पुद्गल से बनी जाकर हम इससे मोह या मूर्छा भाव नहीं रखना चाहिये। यह झोपडी है, हम रहनेवाले अात्मा अलग है। झोपडी जले हम नहीं जल सकते, झोंड्रीपड़ी गले हम नहीं गल मफते, झोपडी पडे हम नहीं पड सकते, झोपडी पुरानी पडे हम नहीं जर्जरित हो सकते । यह पुद्गलरूप है, पूग्न गलन स्वभाव हे, यह जड है, मूर्तीक है तब हम अमूर्तीक अखड आत्मा है । हमारा इसका वैसा ही सबब है जैसे देह और कपडो का । कपड़ा फटे, सडे, गले, छूटे हमारा देह नहीं कटता है, सडता है, व गलता है, कपडा लाल, पीला. हरा हो, देह लाल पीला इरा नहीं होता है, इसी तरह शरीर बालक हो, युवान हो, वृद्ध हो, रोगी हो, पतनशील हो हम आत्मा है, हम वालक नहीं, युवान नहीं, वृद्ध नहीं, गेगी नहीं, पतनशील नहीं । ज्ञानी को उचित है कि इस शरीरके स्वभाव को विचार करके इससे मोह न करे । इस शरीर की अपवित्रता तो प्रत्यक्ष प्रगट है । जितने पवित्र पदार्थ हैं शरीर का स्पर्श पाते ही अशुचि होजाते हैं । पानी, गंध, माला, बस्न आदि शरीर के स्पर्शवाद दूसरे उसको ग्रहण करना अशुचि समझते हैं। नगर व ग्राम में सारी गदगी का कारण मानवों के शरीर का मल है। ऐसे अपवित्र शरीर भी पूज्यनीय व पवित्र माने जाते हैं, यदि आत्मा धर्मरत्नों से विभूषित हो । अतएव हम सबको उचित है कि हम इस मानव देह को पुद्गलमई, अशुचि, नाशवत व आयु कर्म के आधीन क्षणिक समझकर इसके द्वारा जो कुछ आत्महित साधन हो सके यो गीव्र करले। यदि विलम्ब लगाया तो यह शरीर धोखा दे जायगा और मरते समय पछताना पडेगा कि हमने कुछ नहीं किया। शरीर का स्वरूप प्रात्मा के स्वरूप से बिलकुल विलक्षण है । इसे अपने से भिन्न जानकर इससे वैराग्यभाव ही रखना चाहिये और इसी शरीर से ऐसा यल करना चाहिये जिससे फिर हम गरीर की प्राप्ति ही न हो, फिर इस शरीर के जेलखाने में आना ही न पडे और हम सदा के लिये स्वाधीन परमानन्दमय हो जावे । हमको मिथ्यात्व रूपी अधकार से निकलकर सम्यक्त के प्रकाश में आने का पूग पूरा यत्न करना चाहिये । जैनाचार्योंने शरीर का स्वरूप कैसा वतलाया है सो नीचे के शास्त्रों के वाक्यो से प्रगट होगा 4- ३६]] शरीर स्वरूप । श्री कुन्दकुन्दाचार्य ने द्वादशानुप्रेक्षा में कहा है:- दुग्गंधं बीभत्थं कलिमल भरिदं अचेयणो मुत्तम् । सडणपडणं सहावं देहं इदि चिन्तये णिच्चम् ॥ ४४ ॥ भावार्थ-ज्ञानी को नित्य ऐसा विचारना चाहिये कि यह शरीर दुर्गंध मय है, घृणामय है, मैल से भरा है, अचेतन है, मूर्तिक है, इसका स्वभाव ही सड़ना व पडना है । देहादो वदिरित्तो कम्मविरहिओ अणंतसुहणिलयो । चोक्खो हवेइ अप्पा इदि णिच्च भावणं कुज्जा ॥ ४६ ।। भावार्थ-देह के भीतर बसा परन्तु देह से जुदा, कमी से भिन्न अनन्त सुख-समुद्र, अविनाशी, पवित्र आत्मा है ऐसी सदा भावना करनी योग्य है। श्री कुन्दकुन्दाचार्य भाव पाहुड में कहते हैं- एक्केक गुलि वाही छण्णवदी होति जाण मणुयाणं । अवसेसे य सरीरे रोया भण कित्तियो भणिया ॥ ३७ ।। भावार्थ- इस मनुष्य के देह में एक २ अगुल में छयानवे २ रोग होते हैं तब कहो सर्व शरीर मे कितने कितने रोग होंगे। ते रोया विय सयला सहिया ते परवसेण पुव्यभवे । एवं सहसि महाजस किं वा बहुएहिं लविएहिं ॥३८॥ भावार्थ-हे महावश ! तूने पूर्व भवों मे उन रोगों को परवश हो सहा है। ऐसे ही फिर सहेगा, बहुत क्या कहें। पिचतमुत्तफेफसकालिज्जयरुहिरखरिसकिमिजाले । उयरे वसिरोसि चिरं नवदसमासेहि पचेहिं ॥ ३९ ॥ भावार्थ-हे मुने ! तू ऐसे महान अपवित्र उदर में नौ मास तथा दस मास बसा जो उदर पित्त और आंतों से बेढा है, जहां मूत्र, फेफस, कलेजा, रुधिर, श्लेष्म और अनेक कीड़े पाये जाते हैं। सिसुकाले य अयाणे असुईमज्झम्मि लोलियोसि तुमं । असुई असिया बहुसो मुणिवर ! वालत्तपत्तरेण ॥ ४१ ।। भावार्थ-हे मुनिवर ! तू बालपने के काल मे अज्ञान अवस्था में अशुचि अपवित्र स्थान मे अशुचि में लोटा और बहुत बार अशुचि वस्तु मी खाई। मंसडिसुक्कसोणियपिचतसवत्तकुणिमदुग्गंधम् । खरिसवसपूयखिब्मिस भरियं चिंतेहि देहउडं ॥४२॥ ! ॥
सहज-सुख-साधन [३७ मे भावार्थ-हे मुने ! तु देह रूपी घड़े को ऐसा विचार कि यह देह घट मांस, हाड, वीर्य, रुधिर, पित्त, आंतों से झड़ती मुरदे की सी दुर्गंध, अपक्क मल, चरबी, पीप आदि मलीन वस्तुओं से पूर्ण भरा है । श्री वट्टकेर स्वामी मूलाचार द्वादशानुप्रेक्षा मे कहते हैं- असुइविलिविले गम्भे बसमाणो बत्थिपड लपच्छण्णो । मादृइसेभलालाइयं तु तिव्बासुहं पियदि ॥३३॥ भावार्थ-अपवित्र मूत्रमल श्लेष्मपित्त रधिगदि से घृणायुक्त गर्भ मे वसता हुआ, मांसकी झिल्ली से ढका हुआ, माता के कफ द्वारा पाला हुआ यह जीव महान दुर्गंध रस को पीता है । मंसहिसिंभवसरुहिरचम्मपित्त तमुत्तक्कुणिपकुडिं । बहुदुक्खरोगभायण सरीरमसुभं रियाणाहि ॥३४॥ भावार्थ-मांस, हाड, कफ, चरबी, रुधिर, चमडा, पित्त, प्रांतें, मूत्र, पीप आदि से मरी अपवित्र यह शरीररूपी कुटी अनेक दु.ख और रोगों का स्थान है ऐसा जान । अत्थ कामसरीरादियं पि सव्वमसुभत्ति णादूण । णिविज्जतो झायसु जह जहसि कलेवरं असुई ॥३५॥ भावार्थ- -द्रव्य, काम भोग, शर रादि ये सब तेरे विगाड करनेवाले अशुभ हैं ऐसा जानकर इनसे वैराग्य वान होकर ऐसा आत्म ध्यान कर जिससे यह अपवित्र शरीर का सम्बन्ध सदा के लिये छूट जावे । मोत्त णं जिणक्खादं धम्म सुहमिह दु णत्थि लोगम्मि । ससुरासुरेसु तिरिएसु णिरयमणुएसु चिंतेज्जो ॥३६॥ भावार्थ देव, असुर, तिर्थच, नारकी व मानवों से भरे हुए इस लोक मे एक जिनेन्द्र प्रणीण धर्म को छोड़कर कोई शुभ तथा पवित्र वस्तु नहीं है । उसी मूलाचार की अनगारभावना अधिकार मे है.- रोगाणं आयदण वाघिसदसमुच्छिदं सरीरघरं । धीरा सणमपि रागं ण करेंति मुणी सरीरम्मि ||७७॥ भावार्थ- -यह शरीर रूपी घर रोगों का भण्डार है । सैकडों आपत्तियों से व रोगो को झेलकर बना हुआ है। ऐसे शरीर में धीर वीर मुनि क्षणमात्र भी राग नहीं करते हैं एदं सरीरमसुई णिच्च कलिकलुमभायणमचोक्ख । अंतोछाइद ढिड्डिस खिभिसभरिदं अमेझघर ||७८॥ भावार्थ- -यह शरीर महान अशुचि है, नित्य रोगद्वेप पैदा करने का कारण है, अशुभ वस्तुओं से बना है, चमडे से ढका है, भीतर पीप, रुधिर, मांस, चरबी, वीर्य, आदि से पूर्ण है तथा मलमूत्र का भण्डार है। - ३८] शरीर स्वरूप। . अद्विणिछएणं णालिणिबद्ध कलिमलभरिदं फिमिउलपुरणं । मंसविलित्त तयपडिछगणं सरीरघरं तं सददमचोक्खं ।।३।। भावार्थ-यह शरीर रूपी घर हडिडयो से बना है, नसों वधा है, मलमूत्रादि से भरा है, कीडों से पूर्ण है, मांस से भरा है, चमडे से ढका है, यह तो सदा ही अपवित्र है। एदारिसे मरीरे दुग्गंधे कुणिमपूदियमचोक्खे । सडणपडणे असारे रागं ण करिति सप्पुरिसा ॥८४॥ भावार्थ-ऐसे दुर्गधित, पीपादि से भरे, अपवित्र, सडने पडनेवाले, सार रहित, इस शरीर में सत्पुरुप राग नहीं करते हैं। श्री समंतभद्राचार्य स्वयंभूस्तोत्र में कहते हैं :- अजङ्गमं जंगमनेययन्त्रं यथा तथा जीवधृतं शरं गम् । वीभत्सु पूति क्षयि तापकं च स्नेहो वृथा।ति हितं समाख्यः ॥३२॥ भावार्थ- हे सुपार्श्वनाथ भगवान् ! आपने जगत के कल्याण के लिये यह उपदेश दिया है कि यह शरीर स्वय जड है, जीव द्वारा काम करता है, जैसे किसी स्थिर यत्र को कोई चलने फिरनेवाला प्राणी चलावे तथा यह शरीर घृणायुक्त, अपवित्र, नाशवत व सताप उत्पन्न करनेवाला है, इससे राग करना वृथा है। श्री शिवकोटि आचार्य भगवती आराधना में कहते हैं:- देहस्स सुक्कसोणिय, असुईपरिणामकारणं जमा । देहो कि होइ असुई, अमेझघदपूरभो ब्व तदो ॥१००३॥ भावार्थ-इस देह की उत्पत्ति का कारण महा अशुचि माता का रुधिर पिता का वीर्य है। जैसे-मलीन से बनाया हुआ घेवर सो भी मलीन होता है, वैसे अशुचि बीज से पैदा हुआ देह भी अशुचि है। कललगदं दसरत्त, अच्छदि कलुसीकद च दसरत्त । थिरभूदं दसरत्त अच्छदि गम्भम्मि त वीयं ।।१००६॥ तत्तो मासं बुव्वुदभूदं, अच्छदि पुणो वि घणभूदं । जायदि मासेण तदो, य मंसपेसी य मासेण ॥१००७॥ मासेण पंच पुलगा, तत्तो हुँति हु पुणो वि मासेण । अंगाणि उवंगाणिय, णरस्स जार्यति गम्भम्मि ॥१००८॥ मासम्मि सत्तमे तस्स, होदि चम्मणहरोमणीप्पत्ती । फुदणमट्टममासे, णवमे दसमे य णिग्गमणं ॥१००६।।
सहज-सुख-साधन । [ ३९ 1 - सव्वासु अवत्थसु वि, कललादोयाणि ताणि सव्वाणि । असुईणि अमेज्माणि य, विहिंसणिज्जाणि णिच्चपि ॥१०१०॥ भावार्थ-गर्भ मे माता का रुधिर पिता के वीर्य से मिला हुआ दश रात्रि तक हिलता रहता है, फिर दश रात्रि काला होकर ठहरता है, फिर दश दिन मे थिर होता हैं, फिर दूसरे महिने मे बुदबुदा रूप होकर ठहरता है। तीसरे मास में वह कठोर होकर ठहरता है । चौथे मास मे मास की डली होकर ठहरता है । पांचवे मास में उस मास की डली में पाच पुलक निकलते हैं-एक मस्तक का आकार, दो हाथों का व दो पगों का आकार । छठे मास में मनुष्य के अग उपग प्रगट होते हैं। सातवे मास मे चाम, नख, रोम की उत्पत्ति होती है । पाठवे मास में गर्भ मे कुछ हिलता है । नवमें या दसवे मास में गर्भ से निकलता है । ऐसे जिस दिन गर्भ मे माता का रुधिर पिता का रुधिर स्थित हुश्रा, उसी दिन से यह जीव महान मलीन दशा मे ही रहा। कुणिमकुडी कुणिमेहि य, भरिदा कृणिमं च सवदि सव्वत्तो। भाणं व अमिज्झमयं, अमिझभरिदं सरीरमिणं ॥१०२५॥ भावार्थ-यह देह मलीन वस्तुओं की कुटी है व मलीन पदार्थों से ही भरी है व सर्व द्वारों से व शरीर के अग व उपगों से सडे दुर्गध मलको नित्य वहाती है । जैसे मल से बना बर्तन मल ही से भरा हो, वैसा ही यह शरीर है। अट्ठीणि होति तिरिण दु, सदाणि भरिदाणि कुणिममज्झाए । सम्मि चेत्र देहे संधीणि सर्वति तावदिया ॥१०२६॥ एहारूण णवसदाई, सिरासदाणि हवंति सत्त' च । देहम्मि मसपेसी, ण होति पंचेव य सदाणि ॥१०२७॥ चत्तारि सिराजाला-, णि होति सोलमय कंडराणि तहा । छच्चे व सिराकुच्चा, देहे दो मसरज्जू य ॥१०२८।। सत्त तयाओ काले-. जयाणि सत्तेव होंति देहम्मि । देहम्मि रोमकोडी-, ण होति असीदी सदसहस्सा ॥१०२६।। पक्कामयासयत्था, य अंतगुजाऊ मोलम हवति । कुणिमस्स आसया स- त होति देहे मणुस्सस्स ।।१०३०॥ धूण उ तिरिण देह-, म्मि होति सत्तत्तरं च मम्ममदं । रणव होति वणमुहाई, णिच्च कुणिमं सवंताई ॥१०३१।। देहम्मि मत्थुलिंगं, अञ्जलिमित सयप्पमाणेण । अलिमेचो मेदो, श्रोनो वि य तचित्रो चेव ॥१०३२॥ भ . រ
४०]
शरीर स्वस्प।
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-
तिरिण य वसजलीओ, छच्चेव य अंजलीउ पित्तस्स |
सिंभो पित्तसमाणो, लोहिदमद्धाढ्य हवदि ॥ १०३३ ।।
मुचं पाढयमेत्त, उच्चारस्म य हवंति छप्पत्था ।
वीसं णहाणि दंता, बत्तीसं होति पगदौए ॥ १०३४ ।।
फिमिणो व वणो भरिदं, सरीरियं किमिकुलेहि बहुगेहिं ।
सव्यं देहं अफ्फु-,दिऊण वादा ठिदा पंच ॥ १०३५ ।।
एवं मव्वे देह-, म्मि अवयवा कुणिमपुग्गला चेव ।
एक्कं पि णत्थि अंगं, पूर्व सुचियं च जं होज्ज ॥१०३६ ।।
भावार्थ-
इस देह मे सडी हुई मीजी से भरे तीनमो हाड है, तीनमौ सधिए हैं, नवसी (स्नायु ). नसे
हैं, सातसौ छोटी (सिरा) नसे है, पांचौ मांस की डली है, चार नसो के जाल है, सोलह कडरा हैं, छः
सिरामूल हैं, दो मास को रस्सी है, सात त्वचा हैं, सात कलेजे हैं, अस्मी लाख करोड़ रोम हैं, वक्राशय व
आमाशय में तिष्ठती सोलह श्रातों की पएि हैं, सात मल के आश्रय हैं, तीन स्थूणी है, एकमौ मात मर्म-
स्थान हैं, नव मल निकलने के द्वार हैं, देह मे मस्तिष्क अपनी एक अजली प्रमाण है, एक अजली प्रमाण
मेद धातु है । एक अजली प्रमाण वीर्य है, मास के भीतर चरबी या घी अपनी तीन अजली प्रमाण है, पित्त
छः अजली प्रमाण हैं, कफ भी छः अजली प्रमाण है, रुधिर आध आढ़क प्रमाण है, मूत्र आठ आढक
प्रमाण है, आठ सेर का श्रादक होता है, मल छः सेर है, देह में वीस नख है । वत्तीस दात है । यह प्रमाण
सामान्य कहा है, विशेप हीन व अधिक भी होता है, देशकाल रोगादि के निमित्त से अनेक प्रकार होता है ।
सड़े हुए घाव की तरह बहुत कीडो से भरा हुआ यह देह है, सर्व देह को व्यापकर पाच पवन है । ऐसे इस
देह मे सर्व ही अंग व उपग दुर्गन्ध पुद्गल है । इस देह में ऐसा एक भी अंग नहीं है जो पवित्र हो-सर्व
अशुचि ही है।
जदि होज्ज मच्छियाप-, त्तसरिसिया तयाए णो पिहिदं ।
को णाम कुणिमभरियं, सरीरमाल दुमिच्छेज्ज ॥१०३७।।
भावार्थ-जो यह देह मक्खी के पर समान पतली त्वचा से ढका न हो तो इस मैल से भरे हुए
शरीर को कौन स्पर्शना चाहेगा ?
परिदद्धस-वचम्म पंडुरगचं मुयतवणरसियं ।
सुट्ठ वि दयिदं महिलं, दळु पि णरो ण इच्छेज्ज ॥१०३८॥
भावार्थ-जो इस देह का सर्व चमड़ा जल जावे और सफेद शरीर निकल आवे और घावों से रस
मड़ने लग जावे तो अपनी प्यारी स्त्री भी उसे देखना पसन्द न करेगी।
इंगालो धोवंतो, ण हु सुज्झदि जहा पयत्तेण ।
सव्वेहिं समुद्देहिं, सुज्झदि देहो ण धुव्वतो ॥१०४३॥
सहज-सुख-साधन [४१ . भावार्थ- जैसे कोयले को सर्व समुद्र के जल से धोने पर भी वह उजला नहीं हो सकता वैसे देह को बहुत जलादि से धोने पर भी भीतर से पसीना आदि मल ही निकलेगा। सिराहाणम्भंगुन्च-, दृणेहि मुहदंत अच्छिधुवणेहिं । णिच्च पि धोवमाणो, वादि सदा पूदियं देहो ॥१०४४॥ भावार्थ -स्नान तथा अतर, फुलेल, उबटना से धोनेपर व मुख, दांत, नेत्रों के धोने पर व नित्य स्नानादि करने पर भी यह देह सदा दुर्गन्ध ही वमती है। अन्तो वहिं च मज्मे, व कोइ सारो सरीरगे णत्थि । एरंडगो व देहो, हिस्सोरो सबहिं चेव ।।१०४६।। भावार्थ-जैसे एरण्ड की लकडी में कुछ सार नहीं है, वैसे इस मनुष्य की देह मे भीतर बाहर कुछ भी सार नहीं है। जदि दा रोगा एकम्मि, चेव अच्छिम्मि होति छण्णउदी। समम्मि चेव देहे, होदय कदिहि रोगेहिं ॥१०५३।। पंचेव य कोडीओ, अट्ठासढ़ि तहवे लक्खा । णव णवदि च सहस्सा, पंचसया होत चुलसोदो ॥१०५४॥ भावार्थ- जो एक नेत्र में ९६ (छानवे) रोग होते हैं, तो सम्पूर्ण देह मे कितने रोग होंगे। पांच करोड़ अदसठ लाख निन्याणवे हजार पांच से चौरासी ५६८९९५८४ रोग देह में उपजने योग्य हैं। रूवाणि कट्टकम्मा,दियाणि चिट्ठति सारवेंतस्स | धणिदं पि सारत-, स्स ठादि चिरसरीरमिमं ॥१०५६।। भावार्थ- काष्ठ व पत्थर की मूर्तिये सवारी हुई बहुत काल ठहर सकती है परन्तु यह मनुष्य का देह अत्यन्त सस्कार करते हुए भी बहुत देर नहीं ठहरता है। श्री पूज्यपादस्वामी सर्वार्थ सिद्धि में कहते हैं - शरीरमिदमत्यन्ताशु चिशुक्रशोणितयोन्यशुचि सवर्धितमवस्करवत अशुचिभाजन त्वइमात्रप्रच्छादितम् अतिपूतिरसनिष्यन्दि स्रोतो विलम् अगारवत् आत्मभाव आश्रितमपि प्राश्वे वापादयति स्नानानुलेपनधूपप्रघर्प- वासमाल्यादिभिरपि न शक्यमशुचित्वम् अपहत्तु मस्य । भावार्थ- यह शरीर अत्यन्त अशुचि है । वीर्य और रुधिर की योनि में अशुचि पदार्थों से बढ़ा है। मलभाजन के समान अशुचिका वर्तन है । उपर से त्वचा से ढका है । इसके द्वारों से अत्यन्त अपवित्र मल वहा करता है। जैसे अगार को हाथ मे लेने से हाय जल जाता है, वैसे इस शरीर को अपना मानने से अपना शीघ्र ही घात होता है । स्नान, विलेपन, धूप वस्त्र मालादि कोई भी पदार्थ इस देह की अशुचिता दूर नहीं कर सकते हैं। - -- ४२] शरीर स्वरूप। , श्री पूज्यपादस्वामी इटोपदेश में कहते हैं:- भवंति प्राप्य यत्संगमशुचीनि शुचीन्यपि । स काय; संततापायस्तदर्थ प्रार्थना वृथा ॥१८॥ भावार्थ- यह शरीर निरन्तर क्षुधादि से पीडित रहता है व नाशवत है, इसकी सगति को पाकर पवित्र भी भोजन, वस्त्रादि पदार्थ भी अपवित्र हो जाते है । ऐसे नाशवंत व अपवित्र शरीर के लिये धनादि की वांछा वृथा है। श्री पूज्यपादस्वामी समाधिशतक में कहते हैं:- मूलं संसारदुःखस्य देह एवात्मधीस्ततः । त्यक्त्वनां प्रविशेदन्तर्वहिरव्यापतेन्द्रियः ॥१॥ भावार्थ-सर्व संसार के दुःखों का मूल इस देह से राग करना है । इसलिये प्रात्मज्ञानी इमसे राग छोडकर व इन्द्रियो को सकोचकर अपने प्रात्मा में प्रवेश करते है। शुभं शरीरं दिव्यांश्च विषयान भिवांछति । उत्पन्नात्ममतिदेहे तत्वज्ञानी ततश्च्युतिम् ॥४२॥ भावार्थ-जो मूर्ख देह को आत्मा मान लेता है वह यह चाहा करता है कि शरीर सुन्दर बना रहे व मनोहर इन्द्रियो के पदार्थ सदा प्राप्त होते रहें । तत्वज्ञानी इस शरीर से छूटना ही चाहता है। घने वस्त्र यथाऽऽत्मानं न घनं मन्यते तथा । घने स्वदेहेप्यात्मानं न घनं मन्यते बुधः ॥६३॥ जीणे वस्त्र यथाऽऽत्मानं न जीर्ण मन्यते तथा । जीणे स्वदेहेऽप्यात्मानं न जीर्णं मन्यते बुधः ॥६४॥ नष्ट वस्त्र यथाऽऽत्मानं न नष्ट मन्यते तथा । नष्ट' स्वदेहेऽप्यात्मानं न नष्ट बुध्यते बुधः ॥६५॥ रक्त वस्त्र यथाऽऽत्मानं न रक्त मन्यते तथा । रक्त स्वदेहेऽप्यात्मानं न रक्त मन्यते बुधः ॥६६॥ भावार्थ-जैसे मोटे कपड़ों को पहनने पर भी कोई आपको मोटा नहीं मानता है, इसी तरह अपने शरीर को मोटा देखकर ज्ञानी अपने आत्मा को मोटा नहीं मानता है। पुराने कपड़े देखकर कोई अपने को पुराना नहीं मानता है, इसी तरह अपने शरीर को पुराना देखकर बुद्धिमान आत्मा को पुराना नहीं मानता है । वस्त्रों को नाश होते जानकर कोई अपना नाश नहीं मानता है वैसे देह को नाश होते देखकर -- 4.
सहज-सुख-साधन ।
[४३
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बुद्धिमान अपना नाश नहीं मानता है । वस्त्र को लाल देखकर कोई अपने को लाल नहीं मानता है, वैसे
देह को लाल देखकर कोई बुद्धिमान अपनी आत्मा को लाल नहीं मारता है । शरीर से आत्मा भिन्न है।
प्रविशग्दलितां व्यूहे देहेऽणूनां समाकृतौ ।
स्थिति भ्रांत्या प्रपद्यन्ते तममात्मानमबुद्धयः ॥६६॥
भावार्थ-
समान आकार बना रहने पर भी इस शरीररूपी सेना के चक्र में नए परमाणु मिलते हैं
पुराने झडते हैं तो भी अज्ञानी इस शरीर को थिर मानकर अपना माना करता है।
गौरः स्थूलः कृशो वाऽहमित्यगेनाविशेषयंन् ।
अात्मान धारयेन्नित्यं केवलज्ञप्तिविग्रहम् ।।७०।।
भावार्थ-ज्ञानी जानते हैं कि शरीर ही गोरा, मोटा, दुबला होता है, आत्मा नहीं। आत्मा तो मात्र
सदा ज्ञान शरीरधारी है, वह पुद्गल नहीं शरीर पुद्गल है।
देहान्तरगते जिं देहेऽस्मिन्नात्मभावना ।
बीजं विदेह निम्पचेरात्मन्येवात्मभावना ॥७४॥
भावार्थ-इम शरीर
-इम शरीर मे ही आत्मापने की भावना करानी अन्य अन्य देह प्राप्त करने का हेतु है
तथा शरीर से भिन्न अात्मा में ही आत्मापने की भावना करनी इस शरीर से छूटने का उपाय है।
दृढात्मवुद्धिर्देहादावुत्पश्यन्नाशमात्मनः।
मित्रादिभिर्वियोगं च विभेति मरणाभृशम् ॥७६।।
भावार्थ-जो इस शरीर मे ही अपने पने की गाढ बुद्धि रखते हैं वे अपना नाश जानकर निरतर
डरते रहते हैं कि कहीं पुत्र, मित्र आदि का वियोग न हो जाय, कहीं मेरा मरण न होजाय ।
श्री गुणभद्राचार्य आन्मानुशासन में कहते हैं:-
अस्थिस्थलतुलाकलापघटितं नद्ध शिगस्नायुभि-
श्चर्माच्छादितमस्रसान्द्रपिशितैलिप्त सुगुप्त खलैः ।
कर्मारातिभिगयुरुचनिगलालम शरीरालयं ।
कारागारमवेहि ते हतमते प्रीतिं वृथा मा कृथाः ॥५६।।
भावार्थ-हे निर्बुद्धि ! यह शरीररूप घर तेरा बंदीघर के समान है इससे वृथा प्रीति मतकर ।
यह शरीररूपी कैदखाना हड्डी रूपी मोटे पापाणों से घडा हुआ है, नसों के जालरूपी बधनों से वेढा हुआ
है, चमडे से छाया हुआ है, रुधिर व मास से लिप्त है, इसे दुष्ट कर्मरूपी वैरी ने रचा है । इममे
आयुकर्मरूपी गाढी वेडी है ।
दीप्तोभयाग्रवातारिदारूदरगकीटवत् ।
जन्ममृत्युममाश्लिष्टे शरीरे वत सीदनि ॥६३॥
४४] शरीर स्वरूप। भावार्थ जैसे दोनों तरफ आग से जलते हुए एरंड के काष्ठ के बीच में प्राप्त क्रीडा महान दुःखी होता है वैसे जन्म तथा मरण से व्याप्त इस शरीर में यह प्राणी कष्ट पाता है। उपायकोटिदृरक्ष्ये स्वतस्तत इतोन्यतः । सर्वतः पतनःप्राये काये कोऽयं तवाग्रहः ॥ ६ ॥ .. भावाथ-हे प्राणी ! तेरा इस शरीर मे कौनसा आग्रह है कि मैं इसकी रक्षा कर लू गा, यह तो करोडों उपायों के करने से भी नहीं रहेगा। न आप ही रक्षा कर सकता है, न दूसरा कोई बचा सकता है, यह तो अवश्य पतनशील है। शरीरेऽस्मिन् सर्वाशचिनि बहुदुःखेऽपि निवसन् । व्यरंसीनो नैव प्रथयति जनः प्रीतिमधिकाम् ।। इमां दृष्ट्वाप्यस्माद्विरमयितुमेनं च यतते । यतिर्याताख्यानः परहितरतिं पश्य महतः ॥ ७ ॥ भावार्थ- सर्व प्रकार अपवित्र और बहुत दुःखों को देनेवाले इस शरीर मे रहता हुआ यह मानव इम देह से विरक्त नहीं होता है किन्तु अधिक प्रीति करता है तथापि ऐसा देखकर साधुजन सार उपदेश देकर इस प्राणी को शरीर से विरक्त करने का यत्न करते हैं । महान पुरुषों का अनुराग परहित मे रहा करता है ऐसा देखो । यह प्राणी शरीर के मोह से कष्ट पावेगा इसीलिये सत पुरुष शिक्षा देकर इसको आत्मज्ञान पर आरूढ़ करने का उद्यम करते हैं। इत्थं तथेति बहुना किमुदीरितेन भूयस्त्वयैव ननु जन्मनि भुक्तमुक्तम् । एतावदेव कथितं तव संकलय्य सर्वपदां पदमिदं जननं जनानाम् ॥ ६८ ॥ भावार्थ-ऐसा है वैसा है ऐसा बहुत कहने से क्या । हे जीव ! तूने इस संसार मे शरीर को वारवार भोगा है और छोड़ा है । अब तुझे सकोच करके इतना हो कहा जाता है कि प्राणियों के लिये यह शरीर सर्व आपदाओं का स्थान है। विमृश्योच्चैर्गर्भात्प्रभृति मृतिपर्यंतमखिलं मुधाप्येतत् क्लेशाशुचिभयानकाराघबहुलम् । बुधैस्त्याज्यं त्यागाद्यदि भवति मुक्तिश्च जरधीः स कस्त्यक्तुं नालं खलजनसमायोगसदृशम् ॥ १०५ ।। ज्ञानी लोगो के लिये यह शरीर त्यागने योग्य है, क्योंकि वे विचारते हैं कि यह सर्व शरीर गर्भ से लेकर मरण पर्यन्त वृथा ही क्लेश, अपवित्रता, भय, पराभव, पीप आदि से पूर्ण है। फिर जो इस शरीर के राग छोड़ने से मुक्ति का लाभ हो तो ऐसा कौन मूर्ख है जो इसको त्याग करने में , समर्थ न हो ? ..
सहज-सुख-साधन। [४५ भादौ तनोर्जननमत्र हतेन्द्रियाणि, कांक्षन्ति तानि विषयान् विषयाश्च मानम् । हानिप्रयासभयपापकुयोनिदाः स्युमूलं ततस्तनुरनीपरम्पराणाम् ।। १६५ ।। शरीरमपि पुष्णन्ति सेवन्ते विषयानपि । नास्त्यहो दुष्करं नृणां विपाद्वाञ्छन्ति जीविनम् ।। १६६ ।। भावार्थी-प्रथम ही शरीर की उत्पत्ति होती है उस शरीर में इद्रिया विपम विषयों को चाहती हैं, वे विषय भोग महानपने की हानि करते हैं, महाक्लेश के कारण हैं, भय के करनेवाले हैं, पाप के उपजाने वाले हैं व निगोदादि कुयोनि के दायक हैं । इसलिये यह शरीर ही अनर्थ की परंपरा का मूल कारण है। मूर्ख लोग कैमा न करने योग्य काम करते हैं, शरीर को पोपते हैं, विषय भोगों को सेवते हैं, उनको विवेक नहीं, वे विष पीकर जीना चाहते हैं। माता जातिः पिता मृत्युराधिव्याधी सहोदगतौ । प्रांते जंतोजेरा मित्रं तयाप्याशा शरीरके ॥२०१॥ भावार्थ- इस शरीर की उत्पत्ति तो माता है, मरण इसका पिता है, मानसिक शारीरिक दुःख इसके भाई है, अन्त मे जरा इसका मित्र है तो भी इस शरीर में तेरी आशा है यह बड़ा आश्चर्य है। शुद्धोप्यशेपविषयावगमोप्यमूर्तेप्यात्मन् त्वमप्यतितरामशुचीकृतोसि । मूर्त सदाऽशुचि विचेतनमन्यदत्र किंवा न दुपयति धिग्धिगिद शरीरम् ।। २०२ ॥ भावार्थ- हे चिदानन्द | तू तो शुद्ध है, सर्व पदार्थो का ज्ञाता है, अमूर्तीक है तो भी इस जड शरीर ने तुझे अपवित्र कर दिया है । यह शरीर मूर्तीक है, सदा अपवित्र चेतना रहित हैं, यह तो केशर कर्पूरादि सुगन्ध वस्तुओं को भी दूपित कर देता है । इस शरीर को धिक्कार हो, विक्कार हो । हा हतोसितरां जन्तो येनास्मिस्तव मां तम् । ज्ञानं कायाऽशुचिज्ञानं तत्यागः किल साहसः ।। २०३ ।। भावार्थ-हाय हाय ! हे प्राणी ! तू अत्यन्त ठगाया गया, नष्ट भया, तू शरीर से ममत्व करके प्रति दु.खी भया । अब तू विचार, यह शरीर अशुचि है, ऐसा जानना यही सच्चा ज्ञान है तथा इसका ममत्र तजना ही साहस का काम है। श्री अमितिगति तत्वभावना में कहते हैं- संयोगेन दुग्न्तकन्मपभुवा दुःख न किं प्रापितो। येन त्वं भवकानने मतिजराव्याघव जाध्यामिते ।। संगस्तेन न जायते तब यथा स्वप्नेऽपि दुष्टात्मना । किचित्कर्म तथा कुरुष्व ह्रदये कृत्वा मनो निश्चलम् ।। १७ ।।
४६]
शरीर स्वरूप।
भावार्थ-जरा व मरण रूपी व्याघ्र समूह मे भरे हुए इस संसार-वन में महान पाप को उत्पन्न करनेवाले
इस शरीर के सयोग से ऐसा कौनसा दुःख है, जो तूने प्राप्त नहीं किया है ? अब तू अपने मन को निश्चल
कर ऐसा काम कर जिससे तुझे स्वप्न मे भी इस दुष्ट शरीर का फिर सग न हो।
दुर्गंधेन मलीमसेन वपुपा स्वर्गापवर्गश्रियः ।
साध्यंते सुखकारिणा यदि तदा मंपद्यते का क्षतिः ।।
निर्माल्येन विगहितेन सुखदं रत्नं यदि प्राप्यते ।
लाभ: केन न मन्यते यत तदा लोकस्थितिं जानता ॥१८॥
भावार्थ-यह शरीर तो दुर्गंधमय अशुचि है । ऐसे शरीर से यदि स्वर्ग व मोक्ष देनेवाली सुखकारी
सम्पत्तिये प्राप्त हो सकें तो क्या हानि है, उसके लिये यत्न करना ही चाहिये ? यदि किसी निन्दनीक तुच्छ
वस्तु के बदले में सुखदाई रत्न प्राप्त हो सके तो लोक की मर्यादा को जाननेवाले को लाभ क्यों न मानना
चाहिये ?
एकत्रापि कलेवरे स्थितिधिया कर्माणि संकुर्वता ।
गुर्वी दुःखपरंपरानुपरता यत्रात्मना लभ्यते ॥
तत्र स्थापयता विनष्टममतां विस्तारिणी संपदम् ।
का शक्रेण नृपेश्वरेण हरिणा न प्राप्यते कथ्यताम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ-इस शरीर के साथ रहते हुए मूढ आत्मा ने शरीर को स्थिर मानकर जो पाप कर्म किये हैं
उससे दुःखों की परम्परा इसने उठाई है। यदि यह इस शरीर से ममता हटाले तो ऐमी कौनसी सम्पत्ति
है जो इसको प्राप्त न हो सके ? क्या इन्द्र की, क्या चक्रवर्ती की, क्या नारायण की ?
चित्रोपायषिवर्धितोपि न निजो देहोपि यत्रात्मनो ।
भावाः पुत्रकलत्रमित्रतनयाजामातृतातादयः ।।
तत्र स्वं निजकर्मपूर्ववशगाः केपां भवन्ति स्फुटं ।
विज्ञायेति मनीषिणा निजमतिः कार्या सदात्मस्थिता ॥ १२ ॥
भावार्थ-अनेक प्रकार के उपायों से पालते रहने पर भी जहां इस आत्मा के साथ देह नहीं रह सकती-
छूट जाती हैं तब पुत्र, स्त्री, मित्र, पुत्री, जमाई, पिता आदि कैसे इसके साथी रह सकते हैं ? ये सब अपने
अपने कर्म के वश जानेवाले हैं, ऐसा आनकर बुद्धिमान को सदा आत्मा के हित में अपनी बुद्धि रखनी
योग्य है।
श्री शुभचन्द्राचार्य ज्ञानार्णव में कहते हैं-
सर्वदैव रुजाक्रान्तं सर्वदेवाशुचेगृहम् ।
सर्वदा पतनप्रायं देहिनां देहपजरम् ॥ ८ ॥
सहज-सुख-साधन [४७ भावार्थ-इन जीवों का देह रूपी पीजरा सदा ही रोगों से व्याप्त सर्वथा अशुचिका घर व सदा ही पतन- शील है। तैरेव फलमेतस्य गृहीतं पुण्यकर्मभिः । विरज्य जन्मनः स्वार्थे यैः शरीरं कदर्थितम् ॥ ६ ॥ भावार्थ-इस शरीर के प्राप्त होने का फल उन्होने ही लिया, जिन्होंने ससार से विरक्त होकर अपने अपने आत्मकल्याण के लिये ध्यामादि पवित्र कर्मों से इसे क्षीण किया। भवोद्भवानि दुःखानि यानि यानीह देहिभिः । सह्यन्ते तानि तान्युच्चैर्वपुरादाय केवलम् ।। ११ ।। भावार्थ- -इस जगत मे ससार से उत्पन्न जो जो दुःख जीवों को सहने पड़ते हैं वे सब इस शरीर के ग्रहण से ही सहने पड़ते हैं। करिकु कुमागुरुमगमदहरिचन्दनादिवस्तूनि । भव्यान्यपि संसर्गान्मलिनयति कलेवरं नृणाम् ।। १२ ।। भावार्थ- -कपूर, केशर, अगर, कस्तूरी, हरिचन्दनादि सुन्दर सुन्दर पदार्थों को भी यह मनुष्यो का शरीर ससर्ग मात्र से मैला कर देता है । अजिनपटल गूढं पञ्जरं कीकसानाम् कुथितकुणपगधैः पूरितं मूढ गाढम् । यमवदननिषण्ण रोगभोगीन्द्रगेहं कथमिह मनुजानां प्रीतये स्याच्छरीरम् ॥ १३ ॥ भावार्थ-हे मूढ प्राणी ! इस ससार मे मनुष्यो का देह चर्म के परदे से ढका हुआ हाडों का पिंजरा है। तथा बिगडी हुई राध की दुर्गंध से परिपूर्ण है । रोग रूपी सर्पो का घर है । काल के मुख में बैठा हुआ है। ऐसा शरीर प्रीति करने योग्य कैसे हो सकता है ? ज्ञानभूपण भट्टारक तत्वज्ञानतरगिणी से कहते है दुर्गंधं मलभाजनं कुविधिना निष्पादित धातुभि- रंग तस्य जनैर्निजार्थमखिलैराख्या धृता स्वेच्छया । तस्याः किं मम वर्णनेन सततं कि निंदनेनैव च चिद्रूपस्य शरीरकर्मजनिताऽन्यस्याप्यहो तत्वतः ।। ६ - ८ ।। भावार्थ यह शरीर दुगंधमय है, विष्ठा, मूत्र, आदि मलों का घर है, अशुभ कर्म के उदय से मज्जा आदि धातुश्रो से बना है । तथापि मूढ जनों ने अपने स्वार्थ के लिये इच्छानुसार इमकी प्रशसा की श्री ४] शरीर स्वरूप । है । परन्तु मुझे इस शरीर की प्रशसा और निंदा से क्या प्रयोजन ? क्योंकि मैं तो निश्चय से, शरीर और कर्म से उत्पन्न हुए रागादि विकारों से रहित शुद्ध चिद्र प हूँ। देहोऽहं कर्मरूपोऽहं मनुष्योऽहं कृशोऽकृशः । गौरोऽहं श्यामवर्णोऽहमद्विजोऽह द्विजोऽथवा ॥१०-२॥ अविद्वानप्यहं विद्वान् निर्धनो धनवानह । इत्यादि चिंतनं पुसामहंकारो निरुच्यते ॥१०-३॥ युग्म।। भावार्थ-मैं शरीर हूँ, मैं कर्मरूप हूँ, मैं मानव हूँ, में दुबला हूँ , मैं मोटा हूँ, मैं गोरा हूँ , मैं काला हूँ, मैं क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हूँ, मै ब्राह्मण हूँ, मैं मूर्ख हूँ, मैं विद्वान हूँ, मैं निर्धन हूँ, मैं धनवान हूँ इत्यादि मनमें विचार करना अहंकार है । मूढ मानव इसी अहकार में चूर रहते हैं। प. बनारसीदास समयसार नाटक मे कहते हैं :- सवैया-२३। देह अचेतन प्रेत दरी रज रेत भरी मल खेत की क्यारी। व्याधिकी पोट अराधिकी ओट उपाधिकी जोट समाधिसों न्यारी ।। रे जिय देह करे सुख हानि इते पर तोहि तो लागत प्यारी । देह तो तोहि तजेगी निदान पै तू ही तजे क्यों न देह की यारी ।।६।। मवैया-३१। ३ -- r रेतकीसी गढ़ी किधो मढ़ी है मसान कीसी, अदर अन्धेरी जैसी कदरा है सैलकी । ऊपरकी चमक दमक पटभूषनकी, धोखे लागे भली जैसी कली है कनैनकी ॥ औगुनकी ओंडी, महा मोंडी मोहकी कनोंडी माया की मसूरति है मूरति है मैलकी। ऐसी देह याहीके स्नेह याकी संगति सो, होरही हमारी मति कोलू कैसे वैलकी ।।७८|| ठौर ठौर रक्त के कुन्ड कंसनिके झुन्ड, हाडनिसो भरी जैसे थरी है चुडैलकी । थोड़े से धकाके लगे ऐसे फट जाय मानो, कागद की पुरी कीधों चादर है चैलकी ॥ सूचे भ्रम वानिठानि मूढनिसों पहिचानि, करै सुख हानि अर खान बद फैलकी । ऐसी देह याहीके सनेह याकी संगति सो, हो रही हमारी मति कोल कैसे बैलकी ।।७९।। --- । -- सवैया-३१ । . कोउ कूर कहे काया जीव दोऊ एक पिंड, जब देह नसेगी तबही जीव मरेगो। छायाकोसो छल किधो मायाकोसो परपंच, काया मे समाय फिर कायाको न धरेगो।। सुधी कहें देह सो अव्यापक सदीव जीव समय पाइ परको ममत्व परिहरेगो। अपने सुभाव आइ धारना धरामें धाई आपमें मगन होके, आपा शुद्ध करेगो ।।९९।। पं द्यानतराय द्यानतविलास में कहते हैं : बालकबाल खियालन खियाल जुवान सियान गुमान भुलाने । घरबार सबै परिवार शरीर सिंगार निहार फुलाने ।।
सहज-सुख-साधन । [४९ वृद्ध भये तन रिद्ध गई खिदि सिद्ध व कामन पाट तुलाने । द्यानत काय अमोलक पाय न मोक्ष द्वार किवाड़ खुलाने ॥३८॥ प, भैया भगवतीदास ब्रह्मविलास में कहते हैं लाल वस्त्र पहरे सों देह तो न लाळ होय, लाल देह भये हस लाल तो न मानिये । वस्त्र के पुरान भये देह न पुरान होय, देह के पुराने जीव जीरन न जानिये ।। वस्त्र के नाश कछू देह को न नाश होय देह के नाश हुए नाश न बखानिये । देह दर्व पुद्गल कि चिदानद ज्ञानमई, दोउ भिन्न भिन्न रूप भैया उर बानिये ।।१०।। सवैया-३१ । मास हाड लोहू सानि पूतरी बनाई काहू, चाममों लपेट तामे रोम केश लाए हैं तामे मल मूत भरि क्रम कई कोटि धरे, रोग सचै करि करि लोकमें ले आए हैं ।। बोले वह खाउ खाउ बिन दिये गिरि जाउं, आगे को न धरु पांउ ताही वे लुभाए हैं। ऐसे मोह भ्रम मे अनादिके भ्रमाए जीव देखे परतक्ष तऊ चक्षु मानो छाए है।।१४|| चामके शरीर महि वसत लजात नाहिं, देखत अशुचि तऊ लीन होय तन मे । नारि बनी काहे की विचार कछू करे नाहि, रीझ-रीझ मोह रहे चामके बदन में ।। लक्ष्मी के काज महाराज पद छाडि देत, डोलत है रक जैसे लोभकी लगन मे। तनकसी आउने उपाय कई कोउ करे, जगत के वासी देख हामी आवे मन मे ॥७॥ अचेतन की देहरी न कीजे तालों नेहरी, सु औगुनकी गेहरी महान दु.ख भरी है। यादीके सनेहरी न आवे कर्म छेहरी, पावे दुःख तेहरी जिन याकी प्रीति करी है । अनादि लगी जेहरी जु देखत ही खेहरी, तू यामे कहा लेहरी रोगन की दरी है । काम गजकेहरी सुराग द्वप केहरी तू तामे, दृष्टि देयरी जो मिथ्यात हरी है ।। देख देह खेत क्यारी ताकी ऐमी रीति न्यारी, बोए कळू आन उपजत कछू पान है । पंच अमृत रम सेती पोखिये शरीर नित, उपजे रुधिर मास हाडनिको ठान है। एते पर रहे नाहि कीजिये उपाय कोटि, छिनक मे विनशि जाय नाउ न निशान है। एतो देख मूरख उछाह मन माहि धरे, ऐसी झूठ वातनिको सांच करि मान है॥१०१।। सवैया-२३ । बालपने तब बालनिके सग, खेलो है ताकी अनेक कथारे । जोबन आय रमो रमनी रम सोऊ तो बात विदित जथारे ।। वृद्ध भयो तन कपत डोलत, लारे परे मुख होत विथारे । देख शरीर के लच्छन भइया तू, चेतत क्यों नहिं चेतनहारे ।।५।। तूही जु आय वसो जननी उर, तूही रम्यो नित बालक तारे । जोवन ता जु भई कुनि तोही को, ताही के जोर अनेक ते मारे ।। वृद्व भयो तूही अग रहे सब, बोलत बैन कहे तु तरारे । देखि शरीर के लच्छन भइया तू , चेतत क्यों नहिं चेत-हारे ।।५।।
५०]
शरीर स्वरूप।
सबैया-३१।
सात धातु मलिन हैं महा दुर्गंधभरी, तामों तुम प्रीति करी लहत श्रानद हो।
नरक निगोद के सहाई जे करन पच, तिनहीकी सीख सचि चलत मु छंद हो ।।
आठों जाम गहे काम राग रस रग राचि, करत किलोल मानो माते जो गयद हो ।
कळू तो विचार करो कहां कहां भूलि फिरो, भले जु भले जु भैया भले चिदानंद हो ॥४६॥
सवैया-२३।
रे मन मूढ कहा तुम भूले हो, हम विचार लगे पर छाया।
या मे सस्प नहीं कछु तेरो जु, व्याधिकी खोट बनाई है काया ।।
सम्यक रूप सदा गुन तेरो है, और बनी सब ही भ्रम माया ।
देख तू रूप अनुप विराजत, सिद्ध समान जिनंद बनाया ||४||
चेतन जीव निहार हु अतर, ये सब है परकी जड काया ।
इन्द्र समान जो मेघ घटा महि, शोभित है पै रहे नहि छाया ।।
रैन समै सुपनो जिम देखि तु, प्रात भये सब झूठ बनाया ।
त्यों नदि नाव सजोग मिल्यो मव, चेतो चित्त जु चेतन राया ॥४८॥
देह के नेह लग्यो कहा चेतन, न्यारियको अपनी करि मानी ।
याही सो रीझ अज्ञान में मांनिके, याही मे आपके तू हो रहो थानी ॥
देखत है परतक्ष विनाशी, तऊ अनचेतन अन्ध अजानी।
होहु सुखी अपनो बल फोरिके, मानि कह्यो सर्वज की वानी ॥४९।।
वे दिन क्यों न विचारत चेतन, मात की ।प मे आय बसे हैं।
उरध पाउँ लगे निशिवासर, रच उमा सनुको तरसे
आउ सजोग बचे कहुँ जीवित अरु, लोगनकी तव दिणि लसे हैं।
अाज भये तुम जोवन के रस, भूलि गए किततै निकसे है ॥३२॥
सहज-सुख-साधन तीसरा अध्याय भोगोंका स्वरूप । जैसे ससार असार है, शरीर अशुचि है, वैसे इन्द्रियों के भोग अतृप्तिकारी, अथिर और तृष्णा बढानेवाले हैं। इनके भोगने से किमी को भी तृप्ति नहीं हो सकती है। जैसे जलरहित बन मे मृग प्यासा होता है वहा जल तो है नहीं परन्तु दूर से उसको चमकती घास मे या वालू में जल का भ्रम हो जाता है । वह जल समझकर जाता है परन्तु वहा जलको न पाकर अधिक प्यासा हो जाता है । फिर दूर से देखता है तो दूसरी तरफ जल के भ्रम से जाता है वहां पर भी जल न पाकर और अधिक प्यासा हो जाता है। इस तरह बहुत बार भ्रम मे भटकते रहने पर भीउसको जल नहीं मिलता। अन्त मे वह प्यास की बाधा सेतडफ तडफ कर प्राण देदेता है। यही हाल हम मसारी प्राणियों का है, हम सब सुख चाहते हैं, निराकुलता चाहते है। भ्रम यह हो रहा है कि इन्द्रियों के भोग करने से सुख मिल जायगा, तृप्ति हो जायगी । इसलिये यही प्राणी कभी स्पर्शनेन्द्रिय के भोग के लिये स्त्री सम्बन्ध करता है, कोमल पदार्थों को स्पर्श करता है, कभी रसना इन्द्रिय के भोग के लिये इच्छित पदार्थों को खाता है, कभी ब्राणइद्रिय के भोग के लिये अत्तर फुलेल पुष्पादि मू घता है, कभी चक्षुइंद्रिय के भोग के लिये रमणीक चेतन व अचेतन पदार्थों को देखता है, कभी कर्णेन्द्रिय के भोग के लिये मनोहर गानादि सुनता है । इस तरह पांचों इन्द्रियों का भोग बार-बार करता है परन्तु तृप्ति नहीं पाता है । जैसे खाज को खुजाने से और खाज का कट बढ़ जाता है वैसे इन्द्रिय भोगों को जितना किया जाता है उतनी ही अधिक तृष्णा बढ जाती है । तृष्णा ही क्लेश है, बाधा है, चिंता का कारण है । यदि किसी को स्त्री का भोग एकबार हुआ है तो वह बार-बार भोगना चाहता है । शक्ति न होने पर कष्ट पाता है या स्त्री की इच्छा न होने पर दुःख भोगता है। यदि कोई मिठाई खाई है तो उससे बढिया मिठाई खाने की बार-बार इच्छा होती है, यदि नहीं मिलती है तो बड़ा दुःख मानता है, यदि मिलजाती है तो अधिक इच्छा बढ़ जाती है । यदि किसी ने किसी सुगध को सूघा है तो उससे बढिया सुगध के सू घने की इच्छा हो जाती है, नहीं मिलती है तो बडा दुःख पाता है, यदि मिल जाती है तो और अधिक तृष्णा बढ जाती है। यदि किसीने किसी तमाशे को देखा है तो इससे वढिया तमाशा देखने की इच्छा होजाती है। यदि नहीं मिलता है तो कष्ट पाता है । यदि मिल जाता है तो अधिक तृष्णा बढा लेता है । यदि कोई मनोहर गाना सुना है तो उससे वढ़िया सुनना चाहता है। यदि नहीं मिलता है तो दुःख मानता है, यदि मिल जाता है तो इच्छा को अधिक बढा लेता है। बहुत मे प्राणियो को इच्छानुसार भोग नहीं मिलते हैं, चाहते वे कुछ हैं मिलते कुछ है, तब वे बहुत दुखी होते है। किसी के यहां निमन्त्रण था। जानेवाले ने यह इच्छा की, वहा बढ़िया मिठाइया मिलेगी, परन्तु वहां ऐसा भोजन था जो वह रोज खाता था उससे भी घटिया था। बस, इच्छानुमार न पाकर वह मनसे बहुत क्लेश मानता है। जिनको इच्छानुमार मिल जाता है उनकी तृष्णा बढ जाती है। मनुष्य का शरीर तो पुराना पडता जाता है । इन्द्रियो को शक्ति घटती जाती है परन्तु भोगो की तृष्णा दिन दूनी रात चौगुनी बढती जाती है। । ..
५२] भोगों का स्वस्प। . जब यह प्राणी तृष्णा होते हुए भोगो को असमर्थता के कारण भोग नहीं सकता है तो इसे बडा दुःख होता है । वृद्धो से पूछा जाये कि जन्म भर तक आपने इन्द्रियों के भोग भोगे इनसे अब तो तृप्ति हो गई होगी तब वे वृद्ध यदि सम्यग्हणी प्रात्मनानी नहीं है, मिथ्यादृष्टी बहिरात्मा हैं तो यही जवाब देगे कि यद्यपि विपयों के भोग की शक्ति नहीं है, शरीर निर्वल है. दात गिर गए है, आखो से दिखता नही, कानों से सुनाई नहीं देता, हाथ पगो मे बहुन देर खडे होने की व बहुत देर वैठने की शक्ति नहीं रही है तथापि पांचों इन्द्रियों के भोग की तृष्णा तो पहले से बहुत बढी हुई है। यह वस्तु का स्वभाव है कि इद्रियों के भोगों से तृष्णा बढती ही जाती है, कभी तृप्ति नहीं होती है। यह जीय अविनाशो है, अनादि अनन्त है । चारो गतियों में भ्रमण करते हुए हमने अनन्त जन्म कभी एकेन्द्रिय के, कभी द्वेन्द्रिय के, कभी तेद्रिय के, कभी चौद्रिय के, कभी पचेन्द्रिय के, पशु के, मानव के, देव के, नारकी के धारण किये । तथा नरक के सिवाय तीन गतियों में यथा सभव पांचों इन्द्रियो के भोग भी भोगे हैं परन्तु आज तक इस मानव की एक भी इन्द्रिय की तृष्णा शात नहीं हुई। इन इन्द्रिय के भोगो मे दूसरे पदार्थो की आवश्यकता होती है। यदि वे भोग्य पदार्थ नष्ट हो जाते है, उनका वियोग हो जाता है तो इस प्राणी को बडा भारी का होता है । कभी प्रिय स्त्री का वियोग हो जाता है तब यह गृहस्थी के सब श्राराम से छूट जाता है। कभी प्रिय पुत्र का, कभी प्रिय पुत्री का, कभी हित- कारिणी माता का, कभी पिता का, कभी प्रेमपात्र मित्र का, कभी आज्ञाकारी सेवक का, कभी आजीविका देनेवाले स्वामी का वियोग हो जाता है तब बडा भारी कष्ट होता है । कभी धन की हानि हो जाती है तब इन्द्रियों के भोग योग्य मनवांछित पदार्थ संग्रह नहीं कर सकता है, बड़ा ही दुखी होता है । इन्द्रियो के भोगों को भोगते भोगते तृष्णा को बढाते हुए कदाचित् अपना मरण आजाता है तब सर्व भोगो के व चेतन अचेतन पदार्थों के छूट जाने का वडा भारी शोक करता है, रोता है, तड़फता है । इन इन्द्रियों के भोगों में रातदिन मगन रहते हुए यह ऐसा भोग्य पदार्थों में मोही हो जाता है कि इसे धर्म की चर्चा बिलकुल सुहाती नहीं, सवेरे से ही शरीर की सेवा मे लग जाता है । दिनभर धन कमाता है, रात को थककर सो जाता है। तृष्णा की अधिकता से बहुत मनोहर पदार्थो को भोगना चाहता है । जब न्याय से धन नहीं आता है तब अन्याय पर कमर कस लेता है । असत्य बोलकर, विश्वास घातकर, चोरी कर, किसी के प्राण तक लेकर धन का सचय करता है। उसके भीतर से दया व प्रेम चले जाते है, परम प्रेमी मित्र को भी अवसर पाकर ठग लेता है। अधिक धन पाने की लालसा से जूआ खेलने लग जाता है । जूए मे धन हारता है तब चोरी करने लगता है । कुसगति मै पड़कर मदिरापान, मासाहार की आदत डाल देता है। स्वत्री में संतोप न पाकर वेश्याओं मे या परस्त्रियों में आमक्त हो जाता है । भोगों की तृष्णावश घोर से घोर पाप कर्म करने लगता है, अनाथ विववाओं का धन छीन लेता है, झूठा मुकदमा बनाकर धन लेने का उपाय करता है । यदि राज्य विरुद्ध काम करने पर कभी दड पाता है तो कारावास मे जाकर अपनी सब प्रतिष्ठा गमा देता है। सर्व ससार के दुःखो का मूल भोगों की तृष्णा है-घोर पापो से मरकर कुगति मे जन्म पाता है, मनुष्य से एकेन्द्रिय हो जाता है। यदि विचार कर देखा जावे तो ससार के सर्व ही मिथ्यादृष्टी प्राणो इन्द्रियों के भोगों की लोलुपता से रात दिन आकुल व्याकुल व प्रयत्नशील बने रहते हैं । पिपीलिकाए इसी तृष्णावश बहुत सा दाना एकत्र करती हैं, मक्खियां मधु को एकत्र करती है, पतगे चनु इन्द्रिय के रागवश दीपक की लों मे जलकर प्राण गमाते है, भ्रमर नाशिका इन्द्रिय के वश हो कमल के भीतर दबकर मर जाते हैं, मछलिये रसना इद्रिय के सहज-सुख-साधन [५३ वश हो जाल में फसकर तडफ तडफ कर प्राण गमाती हैं, हस्ती स्पर्श इन्द्रिय के वश हो पकड़ लिये जाते हैं । मृग कर्ण इन्द्रिय के वश हो जाल में घिरकर पराधीन हो जाते हैं । इन इद्रियों की तृष्णा के वशीभूत होकर यह प्राणी बिलकुल अन्धा हो जाता है । अनन्त जन्म बीत गए हैं, इसने इसी अन्ध भाव में जन्म गमाया और अब गमा रहा है। इन्द्रिय सुख सच्चा सुख नहीं है, माना हुआ है । जो जिसमे सुख मान लेता है उसीमे उसको सुख भासता है । यह बिलकुल पराधीन है । बिना दूसरे पदार्थों के सयोग के इन्द्रिय सुख नहीं होता । उनका समागम होने के लिये बहुत सा उद्यम करके कष्ट सहना पडता है तो भी यदि पुण्य कर्म की अन्तरग मदद न हो तो उद्यम करते हुए इच्छित पदार्थ का लाभ नहीं होता है । जगत में बहुत कम ऐसे पुण्यात्मा हैं जिनको चाहे हुए पदार्थ मिले बहुधा इसी दुःख से पीडित रहते हैं कि चाहते तो थे कि स्त्री आज्ञाकारिणी होगी परन्तु वह ऐसी नहीं निकली, चाहते तो थे कि पुत्र सुपुत्र, आज्ञाकारी होंगे परन्तु ये तो कुपुत्र निकल गये, चाहते तो थे कि यहां आने से दुःख घटेगा उल्टा दुःख बढ गया है। चाहते तो थे कि मुनीम सच्चा मिलेगा परन्तु यह तो स्वार्थी व हानिकारक निकल गया । यदि इच्छानुसार पदार्थ मिल भी जाते हैं तो सदा बने नहीं रहते, उनका वियोग हो जाता है तब फिर बडा कष्ट होता है । पाचों इद्रियों के भोगों की तृष्णा इतनी सताती है कि इच्छा होती है कि इन सबका सुख एक साथ भोगू । परन्तु ऐसा कर नहीं सकता। एक इद्रिय से ही एक काल में विषय भोग हो सकता है । तब यह एक को छोड़ दूसरे में, दूसरे को छोड़ तीसरे मे इस तरह आकुलता से भोगता फिरता है परन्तु तृप्ति किसी भी तरह पाता नहीं । इंद्रिय सुख की मग्नता से बहुधा प्राणी शक्ति से या मर्यादा से अधिक भोग कर लेते है तब शरीर बिगड जाता है, रोग पैदा हो जाता है । रोगी होनेपर सब विषय भोग छूट जाते हैं । इन भोगों से वे चक्रवर्ती सम्राट भी तृप्ति नहीं पाते जिनको अधिक पुण्यात्मा होने के कारण पाचों इद्रियो के भोग की सामग्री मन पाछित प्राप्त हो जाती है । बडे २ देव बड़े पुण्यात्मा होते हैं, इच्छित मोग प्राप्त करते है व दीर्घकाल तक भोग करते है तो भी तृप्ति नहीं पाते हैं, मरण समय उनके छूटने का घोर क्लेश भोगते हैं। इन्द्रियो के भोग जब अतृप्तिकारी हैं, तृष्णावर्धक हैं, व अथिर नारायन्त हैं तब यह प्राणी क्यों उनकी इच्छा नहीं छोडता है ? इसका कारण यही है कि इसके पास दूसरा उपाय नहीं है जिससे यह इच्छा को तृप्त कर सके । यदि इसको सच्चा सुख मालूम होता व सच्चे सुख का पता मालूम होता तो यह अवश्य झूठे इन्द्रिय सुखकी तृष्णा छोड देता । मिथ्यादर्शन के कारण इनकी अह बुद्धि अपने इस नाशवत शरीर मे ही हो रही है। इसको अपने आत्मा का पता नहीं है न इसको अपने आत्मा के स्वरूप का विश्वास है। सच्चा सुख आत्मा में है। जिसको अपने आत्मा का यथार्थ ज्ञान हो जाता है, वह सच्चे सुख को पहचान लेता है । सच्चा सुख क्या है वह आगे बताया जायगा। यहा प्रश्न हो सकता है कि जब इद्रियों से भोग करने से झूठा सुख होता है जो अधिक तृष्णारूपी रोग को बढाता है तो फिर इन इद्रियों से क्या काम लेना चाहिये ? ज्ञानी को यह विश्वास पक्का कर लेना चाहिये कि इन्द्रिय सुख सच्चा सुख नहीं है, यह सुखाभास है, सुखसा झलकता है, अतएव सुव्व की प्राप्ति के लिये इन इंद्रियों का भोग करना अज्ञान है, तब फिर इद्रियो से काम किस लिये लेना चाहिये ? शरीर धर्म का साधन है, शरीर की रक्षा के लिये व शरीर की रक्षार्थ न्यायपूर्वक धन पुरुषार्थ के लिये तथा धर्म के साधनों को प्राप्त करने के लिये इन्द्रियो से काम लेना चाहिये ।
५४] भोगों का स्वरूप। । स्पर्शनेद्रिय से पदार्थों को स्पर्श कर उनके गुण दोष मालूम करने चाहिये कि यह पदार्थ ठडा है या गर्म है, चीकना है या रुखा है, कोमल है या कठोर है, हलका है या भारी है । गृहस्थी को सतान की आवश्यकता होती है। इसलिये स्वस्त्री में इसका उपयोग सतान के लाभ के लिये लेना योग्य है, कभी शरीर में उष्णता बढ़ जाती है तब उसकी शांति के लिये भी स्वस्त्री में उसका उपयोग किया जासकता है । विषय- भोग के हेतु से यदि स्पर्शनेद्रिय का भोग होगा तो तृष्णा बढ जायगी। स्वस्त्री मे भी मर्यादा से अधिक प्रवर्तेगा तो आप भी रोगी व निर्बल होगा व स्त्री भी रोगी व निर्बल होगी तथा तृष्णा की अधिकता से स्वस्त्री को रमने योग्य न पाकर परस्त्री व वेश्या मे रमन करने लग जायगा। रसना इन्द्रिय से उन ही पदार्थों को खाना पीना योग्य है जिनसे शरीर का स्वास्थ्य ठीक बना रहे, शरीर सबल रहकर कर्तव्य कर्म को पालन कर सके । यदि शरीर रक्षार्थ उपयोग होगा तब तो इस इद्रिय का सदुपयोग है । यदि भोगार्थ उपयोग होगा तो यह प्राणी लोलुप हो जायगा। शरीर को हानिकारक पदार्थ भी खाने पीने लग जायगा, भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक छोड़ बैंठेगा । जिसका कुफल यह होगा कि रस के स्वाद की गृद्धता बढ जायगी तथा रोगों मे गृसित हो जायगा । रसना इन्द्रियवाले के ही वचन बोलने की शक्ति होती है। उन वचनों का सदुपयोग आत्म कल्याण व परोपकार मे व आवश्यक शरीर रक्षा व उसके साधनों के लिये करना योग्य है । वचनों का दुरुपयोग असत्य, गाली, असभ्य विकथाओं के कहने से होता है। यदि इनकी आदत हो जाती है तो इन ही कुत्सित बातों के कहने की तृष्णा बढ जाती है । घ्राण इद्रिय का उपयोग शरीर रक्षार्थ सुगध व दुर्गंध को पहचानना है । हवा, पानी, भोजन, स्थन स्वास्थ्य को लाभकारी हैं या अलाभकारी हैं ऐसा जानना है । चक्षु इद्रिय का उपयोग शरीर व उसके साधनों के लिये पदार्थों को देखना है । धार्मिक व लौकिक उन्नति के लिये शास्त्रों को व उत्तमोत्तम पुस्तकोंको पढना है अथवा ज्ञान की वृद्धि हेतु उपयोगी स्थानों व पदार्थों को देखना है । कर्ण इद्रिय का उपयोग शरीर व उसके रक्षार्थ साधनो के मिलाने के लिये वार्तालाप सुनना है तथा धार्मिक व लौकिक उन्नति के लिये उत्तम उपदेशों को सुनना है। । मानव इस तरह ये पाचों इद्रियां बड़ी ही उपयोगी हैं, इनसे योग्य काम लिया जावे । विषय भोग की तृष्णा- वश उनका उपयोग न करके आवश्यक कामों के लिये इनका उपयोग करना योग्य है तब ये की उन्नति में सहायक होजाती हैं। यदि भोगों की तृष्णावश इनका उपयोग होता है तो यह तृष्णा को बढ़ाकर क्लेश को बढ़ाकर रोग को पैदाकर प्राणी को इस लोक में भी आकुलित कर देती हैं व परलोक में भी इनकी तृष्णा से बहुत कटुक फल भोगना पड़ता है। ज्ञानी बुद्धिमान वही है जो इन इन्द्रियों का सच्चा उपयोग करके इस जीवन में भी लौकिक व पारलौकिक उन्नति करता है व भविष्य में भी मिष्ठ फल भोगता है। इद्रियों के भोग रोग के समान हैं, असार है । जैसे केले के खम्भे को छीला जावे तो कहीं भी गूटा या सार नहीं मिलेगा वैसे इन्द्रियों के भोगों से कभी भी कोई सार फल नहीं निकलता है। इद्रियों के भोगों की तृष्णा से कपाय की अधिकता होती है, लोलुपता बढती है, हिंमात्मक भाव हो जाते हैं, धर्मभाव से च्युति होजाती है, अतएव पापकर्म का भी वध होता है । पाप के उदय का यह फल होता है कि चक्रवर्ती सातवे नर्क चला जाता है। एक धनिक मरकर सर्प हो जाता है, श्वान हो जाता है, एकेन्द्रिय वृक्ष हो जाता है, ऐमी नीच गति में पहुंच जाता है कि फिर उन्नति करके मानव होना बहुत ही कठिन हो जाता है । इसलिये इन्द्रियों के सुख को सुख मानना भ्रम है, मिथ्यात्व है, भूल है, अज्ञान है, धोखा है । बुद्धिमान को उचित है कि इद्रियसुखो की श्रद्धा को छोड़े, इनकी लोलुपता, t सहज-सुख-साधन । [५५ से चमत्कार युक्त उन्नति कर छोडे, इनमें अधपना छोडे, इनही के जो दास हो जाते है वे अपनी सच्ची उन्नति नहीं कर सकते हैं । वे इद्रियों की इच्छानुसार वर्तते हुए कुमार्गगामी हो जाते हैं । हितकारीव उचित विषयभोग करना, अहितकारी व अनुचित विपयभोग न करना इस बात का विवेक भाव तन के भीतर से निकल जाता है। वे इन्द्रियों के दासत्व मे ऐसे अन्धे हो जाते हैं कि धर्म, अर्थ, काम तीनो गृहस्थ के पुरुपार्थों साधन में कायर, असमर्थ व दीन हो जाते है । चाह की दाह में जलते रइकर शरीर को रोगामात, रुधिर- क्षय, दुर्बल बनाकर शीघ्र ही इसको त्याग कर चले जाते है । जिस मानव जन्म मे आत्म कल्याण करना या परोपकार करना था उनको उभी तरह वृथा गमा देते है जैसे कोई अमृत के घडे को पीने के काम मे न लेकर पग धोने मे बहादे, अगर चदन के वन को ईंधन समझकर जला डाले, श्राम के वृक्षों को उखाडकर ववूल बो देवे, हाथ का रल काक के उडाने के लिये फेक देवे, हाथी पाकर भी उसपर लकडी ढोवे, राजपुत्र होकर के भी एक मदिरावाले की दुकान मे सेवकाई करे । हर एक मानव को उचित है कि वह अपनी पांच इन्द्रियों को और मन को अपने आधीन उमी तरह रखे जैसे मालिक घोडों को अपने प्राचीन रखता है । वह जहां चाहे वहा उनको ले जाता है । उनकी लगाम उसके हाथ में रहती है। यदि वह घोड़ों के आधीन हो जावे तो वह घोडों से अपना काम नहीं ले सकता । किन्तु उमको घोडो की मर्जी के अनुसार वर्तकर उनके साथ घाम के खेतों मे ही कूदना व चरना पड़ेगा। जो इन्द्रियो को और मन को अपने आधीन रख सकते हैं, वे इनकी सहायना सकते हैं । जो इनके दाम हो जाते हैं, वे भव भव मे दुःखो को पाते है । अतएव इद्रिय भोगे। को असार जानकर सच्चे सुख का प्रेमी होना योग्य है । इन भोगो के सम्बन्ध में जैनाचार्य क्या कहते हैं सो नीचे लिखे वाक्या से जानना योग्य है । (१) श्री कुन्दकुन्दाचार्य द्वादशानुप्रेक्षा में कहते हैं- वर भवणजाणवाहणसयणासण देवमणुवरायाणं । मादुपिदुमजण भिच्चसंबंधिणो य पिदिवियाणिचा ॥ ३ ॥ भावार्थ-बड़े २ महल, सवारी, पालकी, शय्या, आमन जो इद्र व चक्रवर्तियों के होते हैं तथा माता, पिता, चाचा, सज्जन, सेवक आदि के सब सवय अथिर हैं। सामग्गिदियरूवं आरोग्गं जोवणं बलं तेज । सोहग्गं लावण्ण सुरधणुमिव सस्सयं ण हवे ॥ ४ ॥ भावार्थ-सर्व इद्रियो का रूप, आरोग्य, युवानी, बल, तेज, सौभाग्य, सुन्दरता ये सत्र इन्द्रधनुप के समान चचल हैं। जीवणिबद्ध देहं खीरोदयमिव विणस्सदे सिग्घ । भोगोपभोगकारणदव्य णिच्चं कहं होदि ॥ ६ ॥ भावार्थ-जिस शरीर के साथ जीव का सम्बन्ध दूध जल के समान है वही जब शीघ्र नाश हो जाता है, तब भोग व उपभोग के साधन जो चेतन व अचेतन द्रव्य हैं वे थिर कैसे हो सकते हैं ? ।
५६] मोगां सायप। 4- - (२) श्री कुन्दकुन्दाचार्य प्रवचनमार में कहते हैं- मगुयाऽमुरामरिंदा, "यहिद या दिहिं महहिं । प्रसहता तं दः, रमंनि पिमासु रम्मेमु ।। ६३ ॥ भावार्थ-चायती राजा, भगन्द्र वर्ग के इन्द्र प्राति अपने शरीर के नाथ उपन्न हुई ट्रियों की पीढ़ा से घबडाये हुए-उम दिय गोग की ना, म्पो दुधको मानने यो अनर्थ होर भ्रम में रमणीक उद्रियों के पदाधी को भोगते परन्तु वृमि नही पान ।। गि विगयेसु दी. नगि दाग वियाग मनमा । जदि तंण हि गम्भावं, बाबारी गन्यि पिमयत्यं ।। ६४॥ भावार्थ- जिन प्राणियों की इन्द्रियों मे भोगों में रति उनको म्यभाव में ही दम जानो योकि यदि स्वभाव से पीटा गा ग्यालना गा चा, पीसा न हो तो कोई दिगो के भोगों में नहीं प्रवर्ने । तृणा की बाधा से भ्रम में भूलकर भी नगा गिट जायगी, या नमार विषयों में प्रवनता है परन्तु तृप्रणा तो मिटती नहीं। सोकसं सहायमिद्ध, गस्थि मुगापि मिद्धमुदसे । ते देहवेदगट्टा रमति निमयेमु रम्मेमु ॥ ७५ ।। भावार्थी -देवों को भी प्रात्मा के स्वभाव से उत्पन्न महज पात्मीक सुन्ब का लाभ नहीं होता उमीलिये सच्चे सुख को न पाकर शरीर की पीड़ा से घबड़ाये हुए कि हमारी बाधा मिट जायगी, रमणीक विषयो में रमते है परन्तु तृष्णा को शमन नहीं कर सकते । ते पुण उदिएणताहा, दुहिदा तहाहि विसयमोक्खाणि । इच्छंति अणुहवंति या आमरणं दुक्खमंतत्ता ।। ७६ ।। भावार्थ- थ-संसारी प्राणी तृष्णा के वशीभूत होकर तृष्णा की दाह से दुखी होते हुए इन्द्रियों के मोगा के सुख को वारवार चाहते हैं और भोगते हैं। मरण पर्यन्त ऐमा रहते है, तथापि दुःख से सतापित ही रहते हैं । इंद्रियों के भोगसे चाह की दाह मिटती नहीं, यहां तक कि मरण हो जाता है । जैसे जोक विकारी खुन को तृष्णावश पीती ही रहती है, सतोप नहीं पाती हैं, यहां तक कि उसका मरग हो जाता है। सपरं बाधासहिद विच्छिएणं बंध कारण विममं । जं इदिएहिं लद्धतं सोरख दुःक्खमेव तथा ।। ८० ॥ भावार्थ-जो पांचों इद्रियों के भोगों से सुख होता है वह सुख नहीं है किन्तु दुःख ही है क्यो कि एक तो वह पराधीन है, अपनी इद्रियो मे भोगने योग्य शक्ति हो व पुण्य के उदय से इच्छित पदार्थ मिले तब कहीं होता है, स्वाधीन नहीं है । दूसरे क्षुधा, तृपा श्रादि रोगादि की बाबा सहित हैं, बीच में विघ्न श्रा जाता है। तीसरे विनाशीक है, भोग्य पदार्थ बिजली के चमत्कारवत् नए हो जाते है या आप जल बुदबुद के समान शरीर छोड देता है। चौथे कर्म बन्ध के कारण हैं क्योंकि राग भाव विना इंद्रियों के भोग नहीं सहज-सुख-साधन । [ s৩ - होते । जहां राग है वहा बन्ध है, पांचवे विपम हैं - चचल हैं, एकसा सुख नहीं होता है तथा समताभात्र को बिगाडनेवाले हैं। (३) श्री कुन्दकुन्दाचार्य मोक्षपाहुड़ में कहते हैं:- ताव ण णज्जड अप्पा विमएसु णरो पट्टए जाम । विसए विरत्तचित्तो जोई जाणेई अप्पाणं ॥६६॥ भावार्थ- जबतक यह आत्मा इद्रियों के विषयभोगों मे आसक्त होकर प्रवृत्ति करता है तबतक आत्मा का ज्ञान नहीं हो सकता । जो योगी इन विपयभोगो से विरक्त हैं वही आत्मा को यथार्थ पहचान सकता है। अप्पा णाऊण णरा केई सम्भावभावपभट्टा । हिंडति चाउरंग विसयेसु बिमोहिया मूढा ॥६७॥ भावार्थ-कोई मानव शास्त्र द्वारा अनुभव पूर्वक आत्मा को नहीं जानकर भी अपने स्वभाव की भावना से भ्रष्ट होते हुए, मूढ़बुद्धि रखते हुएइद्रियोके विषयभोगों मे मोहित होते हुए चारों गतियो मे भ्रमण किया करते है। जे पुण विसयविरत्ता अप्पा णाऊण भाषणासहिया । छंडंनि चाउरंगं तवगुणजुत्ता ण संदेहो ॥६८॥ भावार्थ- परन्तु जो कोई इंद्रियों के असार भोगों से विरक्त होकर आत्मा को जानकर उसकी भावना तप व मुनियों के मूलगुणादि के साथ करते हैं वे अवश्य चार गतिरूपी संसार को छेद डालते हैं इसमें सदेह नहीं। (४) श्री कुन्दकुन्दाचार्य शीलपाहुड़ में कहते हैं:- वारि एक्कम्मि यजम्मे मरिज्ज विसवेयणाहदो जीवो। विसयविसपरिहया णं भभति संसारकांतारे ॥२२॥ भावार्थ यदि कोई प्राणी विष खाले तो उसकी वेदना से वह एक ही जन्म में कष्ट से मरेगा। परन्तु जिन प्राणियों ने इद्रियोंके भोगरूपी विष को खाया है वे इस ससार वन में बार-बार भ्रमते फिरते हैं, बार-बार मरते हैं। णरएसु वेयणाओ तिरिक्खए माणुएसु दुक्खाई । देवेसु वि दोहग्गं लहंति विसयामता जीवा ।। २३ ।। भावार्थ-जो जीव विषय भोगों मे आशक्त हैं वे नरक में घोर वेदनाओं को, पशु व मानव गति में दुःखों को व देवगति में दुर्भाग्य को प्राप्त करते हैं । आदेहि कम्मगंठी ना बद्धा विसयरागरागेहिं । तं छिदति कयत्था तवसंजमसीलयपुणेण ।। २७ ।। .
५८] भोगों का स्वरूप । भावार्थ- भावार्थ-इस प्रात्मा ने जो कमी की गांठ इन्द्रिय भोगो मे राग करने से पाधी है, उसको कृतार्थ पुरुप तप, संयम, शीलादि गुणों से स्वय छेद डालते हैं। (५) श्री वट्टकेर स्वामी मूलाचार द्वादशानुप्रेक्षा में कहते हैं- दुग्गमदुल्लहलामा भयपउरा अप्पकालिया लहुया । कामा दुक्खविवागा यमुहा से बिजमाणा वि ॥ ३२ ॥ -इन्द्रिय सम्बन्धी काम भोग बड़ी कठिनता से व परिश्रम से मिलते है । उनके छूटने का भय भरा रहता है, बहुत थोडे काल टिकनेवाले हैं, 'प्रसार है तथा कर्म बंध कारक दुःख रूपी फल को देनेवाले हैं । अतएव सेवन किये जानेपर भी अशुभ है, हानिकारक है। अणिहुदमणसा एदे इंदियविमया णिगेरिह दुक्खं । मंतोसहिहीणेण व दुट्ठा श्रासीविसा सप्पा ॥ ४२ ॥ भावार्थ- -जब तक मन को रोका न जाने, तब तक इन्द्रियों को रोकना यति कठिन है । जमे मन्त्र व प्रौपधि के विना दुए श्राशीविप जाति के सर्प वश नहीं किये जा सकते। धिनेसिमिदियाणं जेमि चसदो दु पावमज्जणिय । पावदि पापविवाग दुक्खमणतं भवगदिसु ॥४३ ।। भावाथ-इन इन्द्रियों को धिक्कार हो जिनके वश में पड के प्राणी पापो को बांधकर उनके फल से चारों गतियों में अनन्त दुःख को पाते हैं। (६) श्री वट्टकेरस्वामी मूलाचार समयमार अधिकार में कहते हैं- अत्थस्स जीवियस्स य जिभोवत्थाण कारण जीवो। मरदि य मारावेदि य अणंतमो सव्यकालं तु ।। ६६ ।। भावार्थ- -यह प्राणी सदा काल अनन्त बार गृह, पशु, वस्त्रादि के निमित्त व जीने के निमित्त व जिव्हा- इन्द्रिय और काम भोग के निमित्त भाप मरता है व दूसरों को मारता है। जिब्भोवत्थणिमित्त जीवो दुक्खं अणादिसंसारे । पत्तो अणंतसो तो जिभोक्त्थे जयह दाणि ॥ ७ ॥ भावार्थ इस रसना और स्पर्शनेन्द्रिय के निमित्त इस जीवने अनादिकाल से इस संसार मे अनंतबार दुख पाया है इसलिये इस जीभ को और उपस्थ इन्द्रिय को अव तो वश रखना योग्य है। वीहेदव्वं णिच्च कद्वत्थस्स वि तहत्थिरुवस्स । हवदि य चित्तक्खोभो पचयभावेण जीवस्स ॥१६॥ C . सहज-सुख-साधन [५९ न भावार्थ- -काठ के बने हुए स्त्री के रूप को देखने से भी सदा भय रखना चाहिये । क्यों कि निमित्त कारण से इस जीव का मन विकारी हो जाता है। धिदभरिदधडसरित्थो पुरिसो इत्थी बलंतअग्गिसमा । तो महिलेयं ढुक्का णट्ठा पुरिसा सिवं मया इयरे ॥१०॥ भावार्थ-पुरुष घी से भरे हुए घट के समान है, स्त्री जलती हुई श्राग के समान है । इस कारण बहुत से पुरुप स्त्री के संयो। से नष्ट हो चुके । जो बचे रहे वे ही मोक्ष पहुंचे हैं। मायाए बहिणीए धूप्राए मइ वुड इत्थीए । बीहेदव्यं णिच्चं इत्थीरूव पिरावेक्ख ॥१०॥ भावार्थ- स्त्री के रूप को देखने से बिना किसी अपेक्षा के सदा ही भयभीत रहना चाहिये । चाहे वह माना का रूप हो, चाहे बहन का हो, चाहे वह कन्या का हो, चाहे गूगी का हो व चाहे वृद्ध स्त्री का हो । (७) श्री समंतभद्राचाय स्वयंभूस्तोत्र में कहते हैं:- शतह्रदोन्मेषचलं हि सौख्यं तृष्णाभयाप्यायनमात्र हेतुः । तृष्णाभिवृद्धिश्च तपस्यजस्त्र तापस्तदायासयतीत्यवादीः ॥१३॥ भावार्थ- -यह इन्द्रिय भोग का सुख बिजली के चमत्कार के समान चचल है । यह मात्र तृष्णारूपी रोग के बढ़ाने का ही कारण है । तृष्णा वृद्धि निरन्तर ताप पैदा करती है, वह ताप सदा प्राणी को दुःखी रखता है । हे सभवनाथस्वामी। आपने ऐसा उपदेश दिया है- स्वास्थ्यं यदात्यन्तिकमेष पुंसां स्वार्थो न भोगः परिभङ्ग रात्मा । तषोऽनुषङ्गान्न च तापशान्तिरितीदमाख्यभगवान् सुपार्श्वः ॥३१॥ भावार्थ-जीवों का सच्चा स्वार्थ अपने स्वरूप मे ठहरना है, क्षणभगुर भोगों को भोगना नहीं है । इन भोगों के भोगने से तृष्णा बढ़ जाती है । दुःख की ज्वाला शात नहीं होती। हे सुपार्श्वनाथ ! आपने ऐसा उपदेश दिया है। तृष्णार्चिपः परिदहन्ति, न शान्तिरासा- मिष्टेन्द्रियार्थविभवैः परिवृद्धिरेव । स्थित्यैव कायपरितापहरं निमित्त- नित्यात्मवान्विपयसोख्यपराङ्गमुखोऽभूत् ।।८२।। भावार्थ- -तृष्णा की ज्वालाए जलती रहती हैं। इन्द्रियों की इच्छानुसार इष्ट पदार्थों के भोगने पर भी इनकी शाति नहीं होती है । उल्टी तृष्णा की ज्वालाए वढ जाती हैं । उस समय यह इद्रिय भोग स्वभाव से - । - ६० भोगों का स्वरूप । - शरीर के ताप को हरता है परन्तु फिर अधिक बढा देता है, ऐसा जानकर हे आत्मज्ञानी कुंथुनाथ । आप विषयों के सुख से वैराग्यवान हो गए। स्वामी समंतभद्र रत्नकरण्ड श्रावकाचार में कहते हैं:- कर्मपरवशे सान्ते दुःखैरन्तरितोदये । पारवीजे सुखेऽनास्था श्रद्धानाकांक्षणा स्मृता ।।१२।। यह इन्द्रिय सुख पुण्य कर्म के आधीन है, अत होने वाला है। दुःखों के साथ इसका लाभ होता है व पाप वाधने का कारण है, ऐसे सुख में श्रद्धान रखना निष्कांक्षिन अंग कहा गया है । (8) श्री शिवकोटि आचार्य भगवती आराधना में कहते हैं- भोगोपभोगसुक्खं, जं जं दक्खं च भोगणामम्मि । एदेसु भोगणासे, जादं दुक्खं पडिविसिट्ठम् ।। १२४६ ।। भावार्थ-भोग उपभोग करने से जो जो सुख होता है जब उन भोग उपभोग का नाश होता है तब जो जो दुःख होता है यह सुखको अपेक्षा बहुत अधिक होता है-भोग के संयोग होने पर जो सुख मालूम हुआ था, भोग के वियोग होने पर बहुत अधिक दुःख होता है। देहे छुधादिमहिदे, चले य सत्तस्स होज्ज किह सुक्खं । दुक्खस्य य पडियारो, रहस्सणं चेव सुक्खं खु ॥ १२५० ॥ भावार्थ-यह देह क्षुधा श्रादि से पीडित रहती है व विनाशीक है, इसमें रहते हुए जीवों को सुख कैसे हो सकता है । जो इन्द्रियों का सुख है वह दुख का क्षणिक उपाय है पीछे अधिक तृष्णा की बाधा बढ जाती है । ये सुख सुखाभास हैं, मोही जीवों को सुख से दीखते हैं, पीडा मालूम हुए बिना कोई इद्रिय सुख में नहीं पड़ता है। जह कोढिल्लो अग्गि, तप्पन्तो णेव उवसमं लभदि । तह भोगे भु-जन्तो, खणं पि णो उवसमं लभदि ॥ १२५१ ।। भावार्थ- -जैसे कोढ़ी पुरुष आग से तापता हुआ भी शांति को नहीं पाता है वैसे ससारी जीव भोगो को भोगते हुए भी क्षणभर भी शांति को नहीं पाता है। जितना २ वह तापता है उतनी उतनी तापने की इच्छा बढती जाती है वैसे जितना जितना इद्रिय भोग किया जाता है वैसे २ भोग की बाधा बढ़ती जाती है। सुट्ठ मग्गिज्जन्तो, कत्थ वि कयलीए णत्थि जह सारो। तह णत्थि सुह मग्गिज्जन्त भोगेसु अप्पं पि ॥ १२५५ ॥ भावार्थ-जैसे बहुत अच्छी तरह ढूढ़ने पर भी केले के खम्भेमे भी कहीं भी सार या गूदा नहीं निकलेगा वैसे भोगों को भोगते भी , हुए भी अल्प सुख नहीं है।
सहज-सुख-साधन। [६१ १ , ण लहदि नह लेहंतो सुखल्लयमद्वियं रसं सुणहो। मो सगतालुगहिरं, लेहंतो मण्णए सुक्खं ॥ १२५६ ॥ महिलादिभोगसेवी, ण लहइ किंचि वि सुहं तहा पुरिसो। सो मण्णदे वरात्रो, सगकायपरिस्समं सुक्खं ॥ १२५७ ॥ भावार्थ-जैसे कुत्ता सूखे हाड़ों को चाबता हुआ रस को नहीं पाता है, हाड़ों की नोक से उसका तालवा कट जाता है जिससे रुधिर निकलता है, उस खून को पीता उसे हाड से निकला मान सुख मान लेता है वैसे स्त्री आदि के भोगों को करता हुआ कामी पुरुप कुछ भी सुख को नहीं पाता है । काम की पीड़ा से दीन हुआ अपनी काय के परिश्रम को ही सुख मान लेता है। तह अप्पं भोगसुहं जह धावंतस्स अहिदवेगस्स । गिम्हे उण्हे तत्तस्स, होज्ज छाया सुहं अप्पं ॥ १२५८ ।। भावार्थ-जैसे अति गर्मी के समय बहुत वेग से दौडते हुए पुरुष को किसी वृक्ष की छाया मे ठहरने से अल्पकाल सुख होता है वैसे ही तृष्णा से अति दुःखी प्राणी को भोगों का अति अल्प क्षणिक सुख में होता है। दु . तृष्णा दीसइ जलं व मयतरिहया जह वणमयस्स तिसिदस्स । भोगा सुहं व दीसंति, तह य रागेण तिसियस्स ॥ १२६० ।। भावार्थ-जैसे वन में तृपा से पीड़ित वन के मृग को वन तृष्णा नाम की प्यास जलसी दिखती है, वह जल जानकर दौड़ता है, वहां जल नहीं, इस तरह कई तरफ भागते हुए भी जल नहीं पाता, वैसे तीव्र राग की से पीडित पुरुष के भोगो मे सुख दिखता है परन्तु सुख नहीं है। जहजह सुजइ भोगे, तहतह भोगेसु बढदे तरहा । अग्गी व इंधणाई, तण्हं दीवंति से भोगा ॥ १२६३ ॥ भावार्थ-ससारी जीव जैसे जैसे भोगों को भोगता है वैसे वैसे भोगों मे तृष्णा बढती जाती है । जैसे आग मे लकड़ी डालने से आग बढती है वैसे भोग तृष्णा को बढाते हैं। जीवस्य णत्थि तित्ती, चिरं पि भोगहिं भुजमाणेहि । तित्तीए विणा चिनं, उचूरं उव्वुदं होई ॥ १२६४ ॥ भावार्थ-चिरकाल तक भोगों को मोगते हुए भी जीव को तृप्ति नहीं होती है । तृप्ति बिना चित्त घबड़ाया हुआ उड़ा उडा फिरता है। जइ इंधणेहि अग्गी, जह व समुद्दो णदीसहस्सेहिं । तह जीवा ण हु सका, तिप्पेलु कामभोगेहिं ।। १२६५ ।। इस ६२] भोगों का स्वरुप । भावार्थ-जैसे ईंधन से आग तृप्त नहीं होती है व जैसे समुद्र हजारों नदियों से तृप्त नहीं होता है वैसे जीव काम भोगों से कमी तृप्त नहीं हो सकते । देविंदचक्कवट्टो, य वासुदेवा य भोगभूमीया। भोगेहिं ण तिप्पति हु, तिप्पदि भोगेसु किह अण्णो ॥ १२६६ ॥ भावार्थ-इन्द्र, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनागयण, मोगभूमिया जब भोगों से तृप्त ही नहीं हो सकते हैं तो और कौन भोगो को भोगकर तृप्ति पासकेगा। अप्पायत्ता अज्म-, परद। भोगरमणं परायचं। भोगरदीए चइदो, होदि ण अझप्परमणेण ।। १२७० ॥ भावार्थ-अध्यात्म में रति स्वाधीन है, भोगों में रति पराधीन है, भोगों से तो छूटना ही पड़ता है, अध्यात्म रति में स्थिर रह सकता है । भोगों के भोग मे अनेक विघ्न आते हैं, आत्मरति विघ्न रहित है। भोगरदीए णासो णियदो विग्धा य होति अदिबहुगा । अज्झप्परदीए सुभाविदाए ण णासो ण विग्यो वा ॥ १२७१ ॥ भावार्थ-भोगों का सुख नाश सहित है व अनेक विघ्नो से भरा हुआ है, परन्तु भले प्रकार पाया हुआ आत्मसुख नाश और विघ्न से रहित है। एगम्मि चेव देहे, करिज दुःक्खं ण वा करिज्ज अरी । भोगा से पुण दु:क्खं करंति भवकोडिकोडीसु ॥ १२७४ ।। भावार्थ-वैरी है सो एक ही देह मे दुःख करता है परन्तु ये भोग इस जीव को करोडों जन्मों में दुःखी करते हैं। णच्चा दुरन्तमध्दुव-, मत्तागमतप्पयं अविस्सामं । भोगसुहं तो तमा, विरदो मोक्खे मदि कुज्जा ।। १२८३॥ भावार्थ- -इन इद्रियो के भोगों को दुःख रूपी फल देनेवाले, अथिर, अशरण तथा अतृप्ति के कर्ता व विश्राम रहित जानकर ज्ञानियों को इनसे विरक्त होकर मोक्ष के लिये बुद्धि करनी चाहिये। (१०) श्री पूज्यपादस्वामी इष्टोपदेश में कहते हैं- वासनामात्रमेवैतत्सुखं दुःखं च देहिनां । तथा ह्य द्वजयंत्येते भोगा रोगा इवापदि ॥ ६ ॥ भावार्थ-संसारी प्राणियो को इन्द्रियों के द्वारा होनेवाला सुख दुःख आदि काल की वासना से भासता है। भ्रम से इंद्रिय सुख, सुख दीखता है। ये ही इन्द्रियों के भोग व भोग्य पदार्थ आपत्ति के समय ऐसे
सहज-सुख-साधन
[६३
भासते हैं, जैसे रोग-जब कभी संकट आ खड़े हो जाते हैं, तो स्री, पुत्रादिका सग भी बुरा मालूम पड़ता है।
शोक के समय इष्ट भोग भी सुहाते नहीं।
आरंभे तापकान्प्राप्तावतृप्तिप्रतिपादकान् ।
अंते सुदुस्त्यजान् कामान् कामं का सेवते सुधीः ॥१७॥
भावार्थ-ये इन्द्रियो के भोग प्रारम्भ में बहुत सताप देनेवाले हैं। उनकी प्राप्ति के लिये बहुत कष्ट
उठाना पड़ता है। जब ये भोग मिल जाते हैं तब भोगते हुए तृप्ति नहीं होती है, तृष्णा बढ़ जाती है, उनसे
वियोग होते हुए बड़ा भारी दुख होता है। ऐसे भोगों को कौन बुद्धिमान आसक्त होकर सेवन करेगा? कोई
नहीं । सम्यग्दृष्टि गृहस्थ त्यागने योग्य समभ कर सतोष से न्यायपूर्वक भोगते हुए भी उदास रहते हैं ।
भुक्तोज्झिता मुहुर्मोहान्मया सर्वेऽपि पुद्गलाः ।
उच्छिष्टष्विव तेष्वद्य मम विज्ञस्य का स्पृहा ॥३०॥
भावार्थ-
-ज्ञानी विचारता है कि मैं ने जगत के सर्व ही पुद्गलों को बार बार मोह के वशीभूत हो भोगा
है और त्यागा है । अब मैं समझ गया हूँ। मैं अब झूठन के समान भोगों में क्यों इच्छा करूं?
(११) श्री पूज्यपादस्वामी समाधिशतक में कहते हैं:-
मत्तश्च्युत्वेन्द्रियद्वारैः पतितो विषयेष्वहं ।
तान्प्रपद्याहमिति मां पुरा वेद न तत्वतः ॥१६॥
भावार्थ-ज्ञानी विचारता है कि मैं अपने आत्मासे छूटकर पांचों इद्रियोंके द्वारा विषयों में बार बार गिरा
हूँ। उनमे लिप्त होने से मैं ने निश्चय से अपने आत्मा के स्वरूप को नहीं पहचाना, अब इनका मोह
छोड़ना ही उचित है।
न तदस्तीन्द्रियार्थेषु यत् क्षेमङ्करमात्मनः ।
तथापि रमते बालस्तत्रैवाज्ञानभावनात् ।।५५॥
भावार्थ इन इद्रियों के भोगों में लिप्त हो जाने से कोई भी ऐसी बात नहीं हो सकती जिससे प्रात्मा
का कल्याण हो । तो भी अज्ञानी अज्ञान के भाव से उन्हीं में रम जाया करता है।
(१२) श्री गुणभद्राचार्य अत्मानुशासन में कहते हैं:
आस्वाद्याद्य यदुज्झितं विषयिभिया॑वृत्तकोतूहलै-
स्तम्योप्यविकृत्सयन्नभिलपस्य प्रातपूर्व यथा ।
जन्तो किं तब शान्तिरस्ति न भवान्यावद्दुराशामिमा-
मंहःसंहतिवीरवैरिपृतनाश्रीवैजयन्ती हरेत् ॥५०॥
भोगों का स्वरूप । ६४] भावार्थ-हे मूढ । इस संसार मे विषयी जीवों ने कौतूहल करके भोगकर जिन पदार्थों को छोडा है, उनकी तू फिर अभिलाषा करता है। ऐसा रागी भया है मानो ये भोग पहिले कभी पाए ही न थे । इनको तो तूने अनतबार भोगा है और अन्त जीवों ने भी अनतबार भोगा है । तिनकी तुझे ग्लानि नहीं आती है ? ये तो झूठन के समान हैं, इनसे तुझे कभी शांति नहीं मिल सकती है । तुझे तब ही शांति मिलेगी जब तू इस प्रबल बैरी की ध्वजा के समान आशा को छोड़ेगा । विषयों की आशा कभी मिटती नहीं, यही बड़ी दुःखदायिनी है। भंवाभाविभवांश्च भोगिविपमान भोगान् बुभुक्षुभृशं मृत्वापि स्वयमस्तभीतिकरुणः सर्वाजिघांसुमुधा । यद्यत्साधुविगर्हितं हतमिति तस्यैव धिक्कामुकः कामक्रोधमहाग्रहातितमनाः कि किं न कुर्याज्जनः ॥५१॥ भावार्थ-काले नाग के समान प्राणों के हर्ता ये भोग हैं । इनके भोगने की अति अभिलाषा करके तूने कुगति का बध किया । परलोक का भय न किया, जीवों पर दया न करी, वृथा अपने सब सुख पाते । धिक्कार हो तेरी इस बुद्धि को। जिन पदार्थों की साधुओं ने निन्दा की है, उन ही का तू प्रेमी भया है, इन ही के कारण तू काम, क्रोध महा भयकर पिशाचों के वश में होकर क्या-क्या हिंसादि पापरूपी अनर्थ न करेगा? उग्रग्रीष्मकठोरधर्मकिरणस्फूर्जद्गभस्तिप्रभैः संतप्तः सकलेन्द्रियैरयमहो संवृद्धतृष्णो जनः । अप्राप्याभिमतं विवेकविमुखः पापप्रयासाकुल- स्तोयोपांतदुरन्तकई मगतक्षीणोक्षवत् क्लिश्यते ।।५।। . भावार्थ- गर्मी की ऋतु में तीव्र सूर्य की किरणों के समान आताप देनेवाले इन पांचों इद्रियों से सतापित होकर इस मनुष्य ने अपनी तृष्णा बढाली है । जब इस विवेकहीन को मनवाछित विषयमोग न मिले, तब यह अनेक पापरूप उपायों को करता हुआ उसी तरह घबड़ाता है, जैसे नदी के तट कीचड़ में फसा दुर्बल बूढ़ा बैल महा कष्ट भोगता है। लब्धेन्धनोज्वलत्यग्निः प्रशाम्यति निरन्धनः । ज्वलत्युभयथाप्युच्चैरहो मोहानिरुत्कटः ।।५६॥ भावार्थ-अग्नि तो ईंधन के पानेपर जलती है परन्तु ईंधन के न पानेपर बुझ जाती है । परन्तु इद्रियों के भोगों की मोह रूपी अग्नि बड़ी भयानक है जो दोनों तरह जलती रहती है। यदि भोग्य पदार्थ मिलते हैं तो भी जलती रहती है, यदि नहीं मिलते हैं तो भी जलती रहती है। इसकी शांति होना बड़ा दुर्लभ है।
सहज-सुख-साधन
[६५
दृष्टवा जनं व्रजसि किं विषयाभिलाषं
स्वल्पोप्यसौ तब महज्जनयत्यनर्थम् ।
स्नेहाथ पक्रमजुषो हि यथातुरस्य
दोपो निषिद्धचरणं न तथेतरस्य ॥१६॥
भावार्थ-हे मूढ । तू लोगों को देखकर उनकी देखा देखी क्यों विपयभोगों की इच्छा करता है । यह
विपय भेग थोड़े से भी सेवन किये जावें तो भी महान अनर्थ को पैदा करते हैं । जैसे रोगी मनुष्य थोड़ा
भी घी दूध आदि का सेवन करे तो उसको वे दोप उत्पन्न करते हैं, वैसा दोप दूसरे को नहीं उत्पन्न करते
हैं । इसलिये विवेको पुरुषों को विपयाभिलापा करना उचित नहीं है।
(१३) श्री अमितगति प्राचार्य तत्वभावना में कहते हैं:
बाह्य सौख्यं विषयजनितं मुंचते यो दुरन्तं ।
स्थेयं स्वस्थं निरुपममसौ सौख्यमाप्नोति पूतम् ।।
योऽन्यैर्जन्यं श्रतिविरतये कर्णयुग्मं विधत्त ।
तस्यच्छन्नो भवति नियतः कर्णमध्येऽपि घोपः ॥३६॥
भावार्थ-जो कोई दुःख रूपी फलको देनेवाले इस बाहरी इंद्रिय विषयों के सुख को छोड़ देता है वही
स्थिर, पवित्र, अनुपम आत्मीय सुख को पाता है । जो कोई दूसरो के शब्द कानों में न पडें इसलिये अपने
दोनों कानों को ढकना है, उसी के कान में एक गुप्त शब्द निरन्तर होता रहता है ।
व्यावृत्येन्द्रियगोचरोरुगहने लोल चरिष्णु चिर ।
दुर्वारं हृदयोदरे स्थिरतरं कृत्वा मनोमर्कटम् ।।
ध्यानं ध्यायति मुक्तये भवततेनिमुक्तभोगस्पृहो ।
नोपायेन विना कृता हि विधयः सिद्धि लभते ध्रुवम् ॥५४॥
भावार्थ-जो कोई कठिनता से वश करने योग्य इस मन रूपी बन्दर को जो इंद्रियों के भयानक वन
लोभी होकर चिरकाल से चर रहा था, हृदय में स्थिर करके बांध देते हैं और भोगों की वाछा छोडकर
परिश्रम के साथ ध्यान करते हैं वे ही मुक्ति को पा सकते हैं । बिना उपाय के निश्चय से सिद्धि नहीं होती है।
पापानोकहसकुले भवबने दुःखादिभिगमे ।
यैरज्ञानवशः कषायविपर्यस्त्व पीडितोऽनेकधा ।।
रे तान् ज्ञानमुपेत्य पूतमधुना विध्वसयाशेषतो।
विद्वांसो न परित्यजंति समये शत्रनहत्वा स्फुट ॥६॥
६६] भोगों का स्वरूप । भावार्थ-इस ससार बन में, जो पाप रूपी वृक्षों से पूर्ण है व दुःखों से अति भयानक है, जिन कषायों से और इद्रियों के भोगों से तू अपने अज्ञान से बार बार दुःखित किया गया है, उनको अब तू पवित्र ज्ञान को प्राप्त करके जड़मूल से बिलकुल नाश कर डाला द्विवान लोग समय पाकर शत्रुओं को विना मारे नहीं छोड़ते हैं। भीतं मुचति नांतको गतघृणो भैषीवृथा मा ततः । सौख्यं जातु न लभ्यतेऽभिलषितं त्वं माभिलाषीरिदं ।। प्रत्यागच्छति शोचितं न विगत शोकं वृथा मा कृथाः । प्रेक्षापूर्वविधायिनो विदधते कृत्यं निरर्थं कथम् ॥७३॥ भावार्थ-मरण जब आता है तब उससे भय करने पर भी वह छोड़ता नहीं । इसलिये तू उससे घृणा छोड़ दे और भय मत कर । जब तू इच्छित विषय भोगों को कदापि पा नहीं सकता तो उनकी वांछा मत कर । जिसका मरण हो गया वह शोक करने पर जब लौट के अाता नहीं तब तू वृथा शोक मत कर, विचार पूर्वक काम करनेवाले किसी भी काम को वृथा नहीं करते हैं। यो निःश्रेयसशर्मदानकुशलं संत्यज्य रत्नत्रयम् । भीमं दुर्गमवेदनोदयकरं भोगं मिथः सेवते ॥ मन्ये प्राणविपर्ययादिजनक हालाहलं वल्भते । सद्यो जन्मजरांतकचयकर- पीयूषमत्यस्य सः ॥१०१॥ भावार्थ-जो कोई मूढ मोक्ष के सुखको देनेवाले रत्नत्रय धर्म को छोडकर भयानक व तीव्र दुःख के फल को पैदा करनेवाले भोगों को बार बार सेवन करता है, मैं ऐसा मानता हूँ कि वह जन्म जरा मरण के नाशक अमृत को शीघ्र फेककर प्राणों को हरनेवाले हलाहल विप को पीता है। चक्री चक्रमाकरोति तपसे यत्तन्न चित्रं सताम् । सुरीणां यदनश्वरीमनुपमा दचे तपः संपदम् ।। तच्चित्रं परमं यदत्र विषय गृह्वाति हित्वा तपो । दत्त'ऽसौ यदनेकदुःखमवरे भीमे भवाम्भोनिधौ ॥१७॥ भावार्थ-यदि चक्रवर्ती तप के लिये चक्र को त्याग देता है तो इससे सज्जनों को कोई आश्चर्य नहीं भासता है । यदि तपस्वियों को यह तप अनुपम अविनाशी संपदा को देता है इसमे भी कोई आश्चर्य नहीं। बडा भारी श्राश्चर्य तो यह है कि जो तप को छोडकर विपयभोगो को ग्रहण करता है वह इस महान भयानक गंमार-समुद्र मे अपने को अनेक दुःखों के मध्य में पटक देता है। शुभचन्द्र आचार्य ज्ञानार्णव में कहते हैं:- यदक्षविषयोदभृत दुःखमेव न तत्सुखम् । अनन्तजन्मसन्तानक्लेशसंपादकं यतः ।। ५-२० ॥ (१४) श्री सहज-सुख-साधन । [६७ भावार्थ-इन्द्रियों के विषय सेवन से जो सुख होता है वह दुःख ही है, क्योंकि यह विषय सुख अनन्त ससार की परिपाटी में दुःखों को ही पैदा करनेवाला है। दु-खमेवाक्षज सौख्यमविद्याव्याललालितम् । मूर्खास्तत्रैव रज्यन्ते न विद्मः केन हेतुना ।। १० ।। भावार्थ- -इस जगत में इन्द्रियों का सुख दुःख ही है । यह अविद्या रूपी सर्प से पोषित है । मूर्ख न जाने किस हेतु से इस सुख मे रजायमान होते हैं। अतृप्तिजनक मोहदाववह्म महेन्धनम् । असातसन्तते/जमक्ष सौख्यं जगुर्जिनाः ॥ १३ ॥ भावार्थ-श्री जिनेन्द्रों ने कहा है कि यह इन्द्रियजन्य सुख तृप्ति देनेवाला नहीं है । मोहरूपी दावानल को बढाने को ईन्धन के समान है। आगामी काल में दु.खो की परिपाटी का बीज है । नरकस्यैव सोपानं पाथेयं वा तदध्वनि । अपवर्गपुरद्वारकपाटयुगल दृढम् ।। १४ ।। विघ्नगीजं विपन्मूलमन्यापेक्षं भयास्पदम् । करणग्राह्यमेतद्धि यदक्षार्थोत्थितं सुखम् ॥ १५ ॥ भावार्थ-यह इन्द्रियों से उत्पन्न हुआ सुख नरक के जानेके लिये सीढी है, या नरकके मार्गमें जाते हुए मार्ग का खर्च है । मोक्ष नगर का द्वार बन्द करने को मजबून किवाड़ों की जोड़ी है, विघ्नों का बीज है, विपत्तियों का मूल है, पराधीन है, भय का स्थान है तथा इन्द्रियों से ही ग्रहण करने योग्य है । वद्धते गृद्धिरश्रान्त सन्तोपश्चापसर्पति । विवेको विलय याति विपयश्चितात्मनाम् ॥ १८ ॥ भावार्थ- ये-जिनका आत्मा इन्द्रियों के विषयों से ठगाया गया है, उनकी विपय-लोलुपता निरन्तर बढती जाती है, सन्तोप चला जाता है तथा विवेक भी भाग जाता है । विपस्य कालकूटस्य विषयाख्यस्य चान्तरम् । वदन्ति ज्ञाततत्वार्था मेरुसर्पपयारिव ॥ १६ ॥ भावार्थ-तत्वज्ञानियों ने कहा है कि कालकूट विप और विपयमुख मे मेरु पर्वत और सरमत्र के समान अन्तर है । कालकूट विप जब सरसो के समान तुन्छ है तब विषयमाव मेरु पर्वत के समान महान दुःग्व दाई है। आपातमात्ररम्याणि विषयोत्थानि देहिनाम् । विषयाकानि पर्यन्ते विद्धि सौख्यानि सर्वथा ॥ २५ ।। है ६] भोगों का स्वरूप। भावार्थ-हे अात्मन् ! ऐसा जान कि विषयों के सुन्य प्राणियों को मेवते समय मुन्टर भामते है परन्तु उनका जब फल होता है तब विप के समान कटुक है। उदधिरुदकपूररिन्धनभित्रभानु- यदि कथमपि दवात प्तिमामादयेताम् । न पुनरिह शरीरी कामभोगविगंख्ये- श्चिरतग्मपि भुक्तैम्तृप्तिमायाति कश्चित् ।। २८ ।। भावार्थ- इस जगत में समुद्र तो नदियों से कभी तृप्त नहीं होता, और 'अग्निचन से कभी तृम नहीं होती सो कदाचित देवयोग से तृप्ति प्रान करले, परन्तु यह जोर चिरकाल पर्यन्न नाना प्रकार के काम भोगा- दिक भोगने पर भी कभी तृप्त नहीं होता। अपि संकल्पिताः कामाः संभवन्ति यथा यथा । तथा तथा मनुष्याणां तृष्णा विश्वं पियपनि ॥ ३० ।। भावार्थ-मानवों को जैसे जैसे इच्छानुसार भोगों की प्राप्ति होती जाती है वमे में ही उनकी तृष्णा चढती हुई सर्व लोक पर्यंत फैल जाती है। मीना मृत्यू प्रयाता रमनवशमिता दन्तिनः म्पर्गरुद्धाः ।। बद्धास्ते वारिबंधे जलनमुपगता पत्रिणश्चानिदोपात् ।। भृङ्गा गंधोद्धताशाः प्रलयमुपगता गीतलोलाः कुरझा । कालव्यालेन दयास्तदपि तनुभृतामिन्द्रियार्थेपु गगः ।। ३५ ।। भावार्थ- रसना इन्द्रिय के वश होकर मछलिये मरण को प्राप्त होती है, हाथी स्पर्श इन्द्रिय के वश होकर गढे में गिराए जाते हैं व वाधे जाते हैं; पतंगे नेत्र इद्रिय के वश होकर 'पाग की ज्वाला में जल कर मरते हैं, भ्रमर गध के लोलुपी होकर कमल के भीतर मर जाते है, मृग गीत के लोभी होकर प्राण गमाते है। ऐसे एक एक इन्द्रिय के वश प्राणी मरते हैं तो भी देहधारियों का राग द्रियों के विपयों में बना ही -- रहता है। यथा यथा हपीकाणि स्ववशं यांति देहिनाम् । तथा तथा स्फुरत्युच्चैह्र दि विज्ञानभास्करः ॥ ११ ॥ भावार्थ-जैसे जैसे प्राणियो के वश में इन्द्रियां पानी जाती है वैसे २ अात्मज्ञान रूपी सूर्य हृदय मे ऊंचा २ प्रकाश करता जाता है। (१५) श्री ज्ञानभूपण भट्टारक तत्वज्ञानतरङ्गिणी में कहते हैं:- कल्पेशनागेशनरेशसंभवं चित्त भुख मे सततं तृणायते । कुस्त्रीरमास्थानकदेहदेहजात् सदेति चित्रं मनुतेऽल्पधीः सुखं ॥१०-६।। - सहज-सुख-साधन । [ ६९ भावार्थ-मैंने शुद्ध चिद्रप के सुख को जान लिया है इसलिये मेरे चित्त मे देवेन्द्र, नागेन्द्र और इद्रों के सुख जीर्ण तृण के समान दीखते हैं, परन्तु जो अज्ञानी है वह स्त्री, लक्ष्मी, घर, शरीर और पुत्रादि के द्वारा होनेवाले क्षणिक सुखको, जो वास्तव में दुःख रूप है, सुख मान लेता है । खसुखं न सुखं नृणां किंत्यभिलाषाग्निवेदनाप्रतीकारः । सुखमेव स्थितिरात्मनि निराकुलत्याद्विशुद्धपरिणामात् ।।४-१७॥ भावार्थ-इन्द्रियजन्य सुख सुख नहीं है, किन्तु जो तृष्णारूपी आग पैदा होती है उसकी वेदना का क्षणिक उपाय है । सुख तो आत्मा में स्थित होने से होता है, जब परिणाम विशुद्ध हो व निराकुलता हो। पुरे ग्रामेऽटव्यां नगशिरसि नदीशादिसुनटे मठे दयाँ चैत्योकसि सदसि रथादौ च भवने । महादुर्गे स्वर्गे पथनभसि लतावस्त्रभवने स्थितो मोही न स्यात् परसमयरतः सौख्यलवभाक ॥६-१७॥ भावार्थ-जो मनुष्य मृढ और पर पदार्थों में रत हैं वे चाहे नगर में हों, ग्राम में हों, बन में हों, पर्वत के शिखर पर हों, समुद्र के तट पर हों, मठ, गुहा, चैत्यालय, सभा, रथ, महल, किले में हों, स्वर्ग में हों, भूमि, मार्ग, आकाश में हों, लतामण्डप व तबु आदि किसी भी स्थान पर हों उन्हें निराकुल सुख रचमात्र भी प्राप्त नहीं हो सकता। बहन् वारान् मया भुक्त सविकल्पं सुखं ततः । तन्नापूर्वं निविकल्पे सुखेऽस्तीहा ततो मम ||१०-१७|| भावार्थ-मैंने इन्द्रिय जन्य सुख को बार बार भोगा है, वह कोई अपूर्व नहीं है, वह तो श्राकुलता का कारण है । मैंने निर्विकल्प आत्मीक सुख कभी नहीं पाया उसी के लिये मेरी इच्छा है। विषयानुभवे दुःखं व्याकुलत्वात् सतां भवेत् । निराकुलत्वतः शुद्धचिद्रूपानुभवे सुख ॥१६-४॥? भावार्थ-इद्रियों के विषयों के भोगने में प्राणियों को वास्तव में आकुलता होने के कारण से दुख ही होता है परन्तु शुद्ध आत्मा के अनुभव करने से निराकुलता होती है तब ही सच्चा सुख होता है। (१६) पं० बनारसीदामजी बनारमीविलाम में कहते हैं:- सवैया ३१ । ये ही हैं कुगति की निदानी दु ग्व दोप दानी, इन ही की सगति सो संगभार बहिये । इनकी मगनतासों विभो को विनाश होय, इन ही की प्रीति मो अनीति पथ गहिये। ये ही तप भाव को विडार दुराचार धारें, इनही की तपत विवेक भूमि दहिये । ये ही इंद्री सुभट इनहि जीत सोई माधु, इनको मिसापी सो तो महापापी कहिये ।।७।।
७०] भोगों का स्वरूप । मौन के धरैया गृह त्याग के करैया विधि, रीति के सधैया पर निंदा सो अपूठे हैं। विद्या के अभ्यासी गिरिकदरा के वासी शुचि, श्रम के अचारी हितकारी वैन छूटे हैं ।। आगम के पाठी मन लाए महाकाठी भारी, कप के सहनहार रामा हूं सों रूठे हैं। इत्यादिक जीव सब कारज करत रीते, इन्द्रियन के जीते बिना सब अग झुठे है ।।७१।। धर्म तरू भंजनको महामत्त कुन्जर से, आपदा भन्डार भरन को करोरी है। सत्यशील रोकवे को पौढ़ परदार जैसे, दुर्गति का मारग चलायवे को धोरी है ।। कुमति के अधिकारी कुनय पन्थ के विहारी, भद्र भाव इधन जरायवे को होरी हैं। मृषा के सहाई दुर्भावना के भाई ऐसे, विषयाभिलापी जीव अघ के अघोरी हैं ।।७२।। ~ (१७) पं० द्यानतरायजी द्यानतविलास में कहते हैं: कवित्त । चेतनजी तुम जोडत हो धन, सो धन चलै नहीं तुम लार । जाको आप जानि पोषत हो, सो तन जरिके है है छार ।। विषयभोग को सुख मानत हो, ता को फल है दुःख अपार ! यह ससार वृक्ष सेमर को, मानि कह्यो मै कहूँ पुकार ||३२|| सवैया ३१ । + - सफरस फास चाहे रसना हू रस चाहे, नासिका सुवास चाहे नैन चाहे रूप को। श्रवण शबद चाहे काया तो प्रमाद चाहे, वचन कथन चाहे मन दौर धूप को ।। क्रोध क्रोध कर्यों चाहे मान मान गयो चाहे, माया तो कपट चाहे लोभ लोभ कूप को । परिवार धन चाहे आशा विषय सुख चाहे, एतै वैरी चाहे नाहीं सुख जीव भूप को ॥४६॥ जीव जोपै स्याना होय पाचो इद्री वसि कर, फास रस गन्ध रूप सुर राग हरिके । आसन बतावै काय वच को सिखात्रै मौन, ध्यानमाहि मन लावै चचलता गरिके ।। क्षमा करै क्रोध मारे विनय धरि मान गारे, सरल सो छल जारे लोभ दशा टरिके । परिवार नेह त्यागे विषय सेन छाड़ि जागे, तब जीव सुखी होय वैरि वस करिके ॥४॥ वसत अनन्त काल बीतत निगोद मांहि, अक्षर अनन्त भाग ज्ञान अनुसरे है। छासठि सहस तीनसे छतीस वार जीव, अन्तर मुहूरत में जन्में अर मरे हैं। अंगुल असख भाग तहा तन धारत है. तहां सेती क्यों ही क्यों ही के निसरे हैं। यहा आय भूल गयो लागि विषय भोग विषै, ऐमी गति पाय कहा ऐसे काम करे है ।।१८।। बार बार कहे पुनरुक्ती दोप लागत है, जागतन जीव तू तो सोयो मोह झग में। श्रातमसेती विमुष गहे राग दोष साय पंच, इन्द्री विषय सुवि लीन पग पग में। पावत अनेक कष्ट होत नाहि अष्ट नष्ट, महापद भृष्ट भयो भमे सिष्ट जग में। जाग जगवासी उदासी है के विषय सो लाग, शुद्व अनुभव जो आवे नाहि जग में ॥१८॥ 1
सहज-सुख-साधन
[७१
(१८) भैया भगवतीदास ब्रह्मविलास में कहते हैं-
सवैया-३३ ।
काहे को कूर तू भूरि सहे दुख पचन के परपच भपाए ।
ये अपने रसको नित पोषत है तो ही तुम लोभ लगाए ।
तू कछू भेद न बूझत रचक तोहि दगा करि देत वधाए ।
है अब के यह दाव भलो तोहि जीति ले पंच जिनन्द बताए । १४ ।।
छप्पै ।
रसना के रस मीन प्रान पल मांहि गवावै ।
अलि नाशा परसग रनि बहु सकट पावै ।।
मृग करि श्रवन सनेह देह दुर्जन को दीनी।
दीपग देखि पतग दृष्टि हित कैसी कीनी ।।
फरश इन्द्रीवश गज पड़ो सुकौन कौन सकट सहै।
एक एक विपवेल सम तू पचनि सेवत सुख चहै ॥ ४ ॥
सवैया-३१।
सुनो राय चिदानन्द कहे जो सुबुद्धि रानी, कहैं कहा वेर वेर नेक तोहि लाज है।
कैमी लाज कहो कहा हम कछु जानत न, हमे यहां इन्द्रिन को विषय सुख राज है ।।
अरे मूढ विपय सुख सेयेते अनन्तबार, अजहूँ अघायो नाहिं कामी सिरताज है।
मानस जनम पाय प्रारज सु खेत श्राय, जो न चेते हसराय तेरो ही अकाज है ॥ १४ ॥
देखत हो कहा कहां केलि करे चिढानद, आतम सुभाब भूलि और रस राच्यो है ।
इदिन के सुख में मगन रहे आठो जाम, इन्द्रिन के दुख देखि जाने दुख साचो है।
कहूँ क्रोध कहूँ मार कहूँ माया कहूँ लोभ, अभाव मानि मानि ठौर ठौर मान्यो है।
देव तिरयंच नर नारकी गतीन फिरे, कौन कौन स्वाग धरे यह ब्रह्म नाच्यो है ।। ३९ ।।
जौ-लो तुम और रूप ह रहे हे चिदानन्द, तालो कहूँ सुख नाहिं रावरे विचारिये ।
इन्द्रिन के सुख को जो मान रहे साचो सुख, सो तो सब दुःख ज्ञान दृष्टि सो निहारिये ।।
ए तो विनाशीक रुप छिन में औरे सरुप, तुम अविनाशी भूप कैमे एक धारिये।
ऐसो नर जन्म पाय नेक तो विवेव कीजे, आप रूप गहि लीजे कर्म रोग टारिये ।। ४२ ।।
जीवै जग जीते जन तिन्हें सदा रैन दिन, सोचत ही छिन छिन काल छीजियतु है।
धनी होय धन होय पुत्र परिवार होय, बडो विस्तार होय जस लीजियतु है ।।
देह तो निरोग होय सुख को सजोग होय, मन बछ भोग होय जो लो जीजियतु है ।
चहे वछ पूरी होय पै न बछ पूरी होय, आउ थिति पूरी होइ तौलों की जीयतु है ।। ४४ ॥
नागरिन सग कई सागरनि केलि कीये, रागरग नाटक सों तउ न अघाए हो ।
नर देह पाय तुम्हें अायु पल्ल तीन भई, तहा तो विपय कलोल नाना भांति गाए हो ।
जहा गए तहां तुम विपय सों विनोद कीनों, ताही ते नरक मे अनेक दुख पाण हो।
अज हूँ संभार विपय डारि क्यो न चिदानन्द, जाके मग दुःख होय ताही से लुभाए हो ॥ ८ ॥
७२] सहज सुख या प्रतीन्द्रिय सुख । -- नर देह पाए कहो कडा सिद्धि भई तो हि, विषय सुख सेये सब सुकून गवायो है। पचइद्र। दुष तिन्हे पुत्र करि पोप राखे, आई गई जरा तब जोर बिललायो है। क्रोध मान माया लोभ चारों चित रोक बैठे, नरक निगोद को सदेमो वेग आयो है खाय चलो गांठ की कमाई कौडी एक नाहिं, तोमो मूढ दूसरों न दढयो कोऊ पायो है ।।११।। देखहु रे दक्ष एक बात परतक्ष नई, अन्छन की संगति विचन्छन भुलानो है। वस्तु जो अभक्ष्य ताहि भन्छत है रेन दिन, पोपिवेको पक्ष करे मच्छ ज्यो लुभानो है ।। विनाशीक लक्ष ताहि चक्ष मो विलोके थिर, वह जाय गन्छ तब फिरे जो दीवानो है स्वच्छ निज अक्ष को विजक्ष के न देग्वे पास, मोह जक्ष लागै वच्छ मे भग्मानो है ॥७॥ अरे मन बौरे तोहि बारबार समयाऊ, तजि विपयभोग मन मो अपनि त । ये तो विप वेलि फल दीसत है परतन्छ, कैसे तोहिनी के लागे भयो है मगन तृ ! ऐसे भ्रम जाल मांहि सोयो है अनादि काल, निज सुधि भूलि ठग्यो करम ठगनि त । तोरि महा मोह डोरि आतम सो लब जोरि, जाग जाग जान अब नान को जगन तू ॥ ११ ॥ चौथा अध्याय सहज सुख या अतीन्द्रिय सुख । गत अध्याय में यह भले प्रकार दिखा दिया है कि जिस सुख के पीछे ससारी अज्ञानी जीव बावले हो रहे हैं वह सुख सुखसा भासता है परन्तु वह सच्चा सुख नहीं है । इद्रियो के भोग द्वारा प्राप्त सुख तृष्णा के रोग का क्षणिक उपाय इतना असार है कि उस सुख के भोगते भोगते तृष्णा का रोग अधिक अधिक बढ़ता जाता है । भ्रम से-भूल से-अज्ञान से जैसे रस्सी में सर्प की बुद्धि हो, पानी में चन्द्र की परछाई को देखकर कोई बालक चद्रमा मान ले, सिंह कुए में अपने प्रतिबिम्व को देख सच्चा सिंह जानले पक्षी दर्पण में अपने को ही देख दूसरा पक्षी मानले, पित्त ज्वरवाला मीठे को कटुक जानले, मदिरा से उन्मत्त परकी स्त्री को स्वस्त्री मानले, इसी तरह मोहाध प्राणी ने विषय सुख को सच्चा सुख मान लिया है । सच्चा सुख स्वाधीन है, सहज है, निराकुल है, समभाव मय है, अपना ही स्वभाव है । जैसे इग्नु का स्वभाव मीठा है, नीम का स्वभाव कड़वा है, इमली का स्वभाव खट्टा है, जल का स्वभाव ठडा है, अग्नि का स्वभाव गर्म है, चादी का स्वभाव श्वेत है, सुवर्ण का स्वभाव पीला है, स्फटिक मणिका स्वभाव निर्मल है, कोयले का स्वभाव काला है, खड़ी का स्वभाव श्वेत है, सूर्य का स्वभाव तेजस्वी है. चद्र का स्वभाव शीत उद्योत है, दर्पण का स्वभाव स्वच्छ है, अमृत का स्वभाव मिष्ठ है वैसे अपना या अपने प्रात्मा का स्वभाष सुख है । जैसे लवण में सर्वांग खारपना, मिश्री में सर्वोग मिष्ठपना है, जल में सर्वाग द्रवपना है, अग्नि में सर्वांग उष्णपना है, चन्द्रमा में सर्वांग शीतलता है, सूर्य में ताप है, स्फटिक में सर्वांग निर्मलता है, गोरस .
अत्तर में सर्वांग सुगध है, सहज-सुख-साधन [७३ मे सर्वांग चिकनता है, बालू में सर्वांग कठोरता है, लोहे में सर्वांग भारीपन है, रुई में सर्वांग हलकापन है, गुलाब के फूल में सर्वाग सुवास है, आकाश मे सर्वांग निर्मळता है वैसे आत्मा में सर्वांग सुख है । सख श्रात्मा का अविनाशी गुण है । श्रात्मा गुणी में सर्वांग तादात्म्य रूप है। जैसे लवण की कणिका जिह्वा द्वारा उपयोग में लवणपने का स्वाद बोध कराती है । मिश्री की कणिका उपयोग में मिष्टपने का स्वाद जनाती हैं वैसे आत्मा के स्वभाव का एक समय मात्र भी अनुभव सहज सुख का ज्ञान कराता है। परमात्मा सहजसुख की पूर्ण प्रगटता से ही परमानन्दमय अनत सुखी है, अनंते सिद्ध इसी सहज सुख के स्वाद मे ऐसे मगन हैं जैसे भ्रमर कमल पुष्प की गध में आसक्त होजाता है। सर्व ही अरहत केवली इसी सहजसुख का स्वाद लेते हुए पाच इद्रिय और मन के रहते हुए भी उनकी ओर नहीं झुकते हैं । इस आनन्दमयी अमृत के रसपान को एक क्षण को नहीं त्यागते हैं। सर्व ही साधु इस ही रर के रसिक हो सहज सुख के स्वाद के लिये मनको स्थिर करने के हेतु परिग्रह का त्यागकर प्राकृतिक एकांत वन, उपवन, पर्वत, कदरा, नदीतट का सेवन करते है । जगत के प्रपच से आरम्भ परिग्रह से मुंह मोड़ पाच इद्रियों की चाह की दाह को शमनकर परम रुचि से आत्मीक स्वभाव मे प्रवेश करके सहज सुख का पान करते हैं, तथा इसी सुख में मगन होकर वीतरागता की तीव्र ज्वाला से कर्म ईंधन को भस्म करते हैं- अपने आत्मा को स्वच्छ करने का सदा साधन करते हैं। - सर्व ही देशव्रती श्रावक पाच अणुव्रतों की सहायता से संतोषी रहते हुए इसी सहज सुख के अमृत के पान के लिये प्रातः मध्याह्न तथा सायकाल यथा सभव सर्व से नाता तोड़ जगत प्रपच से मुह मोड़, एकांत मे बैठ मोह की डोर को तोड, बड़े भाव से आत्मा के उपवन में प्रवेश करते हुए सहज सुख का भोग करते हुए अपने जन्म को कृतार्थ मानते हैं । सर्व ही सम्यग्दृष्टि अविरति भाव के धारी होते हुए भी सर्व जगप्रपच से उदासी रहते हैं । गृहस्थ में रहते हुए भी इन्द्रिय सुख को निरस, असुख व रागवई क जानते हुए तथा अपने भेदविज्ञान से अपने आत्मा के स्वभाव को आत्मामय यथार्थ षहचातते हुए, आत्मा मे परके स्वभाव को लेशमात्र भी सयोग न करते हुए, अपने को शुद्व सिद्धसम अनुभव करते हुए इसी सहज सुख का स्वाद लेते हुए अपने को कृतार्थ मानते हैं। सहज सुख अपने प्रात्मा का अमिट अटूट अक्षय अनन्त भडार है । अनन्त काल तक भी इसका भोग किया जावे तो भी यह परमाणु मात्र भी कम नहीं होता। यह जैसा का तैसा बना रहता है। कोई भी बलवती शक्ति ऐसी नहीं है जो इस सुख को हरण कर सके, आत्मा गुणी से इस गुण को पृथक कर सके, आत्मा को सहज सुख से रहित कर सके । हर एक आत्मा सहज सुख ममुद्र है । ससारी मोही जीव की दृष्टि कभी अपने आत्मा पर रुकती नहीं । वह आत्मा का पहचानता नहीं। आप अात्मा होते हुए भी आत्मा के प्रकाश में अपना जीवन रखते हुए भी आत्मा की महिमा से ही इद्रिय व मन से ज्ञान क्रिया करते हुए भी वह आत्मा को भूले हुए, आत्मा के प्रकाश से जो शरीर दिखता है उसी रूप अपने को मान लेता है। आत्मा के प्रकाश से जो चेतन व अचेतन पदार्थ शरीर को उपकारी दिखते है उनको अपना सखा मान लेता है व जो शरीर को अहितकारी दिखते हैं उनको अपना शत्रु जान लेता है । मैं स्वरूपवान, वान, मैं धनी, मै स्वामी, मै सेवक, मैं कृषक, रजक, सुनार, लुहार, मैं थवई, मैं जमींदार, ऐसा मानता हुआ शरीर के व इसके क्षणिक इद्रिय सुख के मोह मे ऐसा पागल हो जाता है कि यह कभी मी आत्मा मैं हूँ ऐसा विश्वास नहीं लाता । मैं शुद्ध वीतराग परमानन्द मय हूँ ऐसा ज्ञान नहीं पाता । मैं रागी मैं वल- मैं मैं मैं ७४] सहज सुख या अतीन्द्रियसुख । ! । से तृष्णा भी अपने घर .. + T द्वेषी नहीं, मैं बालक वृद्ध युवा नहीं, मैं शरीर मे रहते हुए शरीर से उसी तरह पृथक हूँ जैसे धान्य मे रहते हुए भी तुष से चांवल पृथक है, तिल में रहते हुए भी भूसी से तेल पृथक है, जल में रहते हुए भी जल से कमल पृथक है । अपने मूल स्वभाव को न जानता हुआ, सहज सुख का सागर होते हुए भी उस सहज सुख का किंचित भी स्वाद न पाता हुआ विपय सुख की अाताप को बढाता हुआ रात दिन सतापित रहता है। सहज सुख को न पाकर तृपा को शमन नहीं कर पाता है। जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में होती है वह उसकी सुगंध का अनुभव करता है परन्तु उस कस्तूरी को अपनी नाभि मे न देखकर बाहर बाहर ढूढ़ता है-जैसे हाथ मे मुद्रिका होते हुए भी कोई भूल जावे कि मुद्रिका मेरे पास नहीं है और उस मुद्रिका को बाहर बाहर दृढ़ने लगे । जैसे मदिरा उन्मत्त अपने घर में बैठे हुए को भूल जावे और बाहर ढूढता फिरे व पूछता फिरे कि मेरा घर कहां है, उसी तरह यह अज्ञानी प्राणी सहज सुख को अपने पास रखते हुए भी व कभी उसका बिलकुल मिलीन अनुभव, कभी कम मलीन अनुभव, कभी कुछ स्वच्छ स्वाद पाते हुए भी उस सहज सुख को भूले हुए हैं और भ्रम से इन्द्रियोंके विषयोंमें ढूढता फिरता है कि यहा सुग्व होगा। सुख आत्माका गुण है। इसका परिणमन स्वभाव व विभावरुप दो प्रकार का है जैसे-चारित्र आत्मा का गुण है उसका परिणमन स्वभाव तथा विभाव रूपदो प्रकार का है । वीतराग रूप होना स्वभाव परिणमन है, कषाय रूप होना विभाव परिणमन है। इस विभाव परिणमन के भी दो भेद है-एक शुभ भाव परिणमन, एक अशुभ भाव परिणमन । जब मद कपाय का रग होता है तब शुभ भाव कहलाता है, जब तीव्र कषाय का रग होता है तव अशुभ भाव कहलाता है । यदि चारित्र-गुण आत्मा मे नहीं होता तो शुभ भाव व अशुभ भाव भी नहीं हो सकते थे। इसी तरह सहज सुख का स्वभाव परिणमन तब है जब आत्मा ओर उपयोगवान होता है, आत्मा में तल्लीन होता है, इसका विभाव परिणमन सासारिक सुख चा सांसारिक दुःख का अनुभव है । जब साता वेदनीय का उदय, रति कपाय का उदय होता है तब सासारिक सुख रूप परिणमन होता है । जब असातावेदनीय का उदय तथा अरति कषाय का उदय होता है तब सासारिक दुःखरूप परिणमन होता है। यदि आत्मा मे सुख गुण नहीं होता तो इद्रिय सुख व दु ख का भान भी नहीं होता क्योंकि इसमें कषाय के उदय का मैल मिश्रित है। इसलियेसच्चे सुख का स्वाद न कर कषाय का ही स्वाद आता है, कभी प्रीतिरूप कभी अप्रीतिरूप या द्वेष रूप स्वाद आता है। जैसे लवण से मिले हुए जल को पीने से जल का स्वाद न आकर लवण का स्वाद आयगा, मिले जल को पीने से जल का स्वाद न आकर खटाई का स्वाद आयगा, नीम की पत्ती से मिला जल पीने से नीम का कटुक स्वाद आयगा, जल का स्वाद न आयगा । शक्कर से मिला जल पीने से शक्कर का मीठा स्वाद आयगा, जल का शुद्ध स्वाद न आयगा । इलायची, बादाम, पिस्ता, किसमिस, शक्कर से मिला जल पीने से इन ही का मिश्रित स्वाद पायगा, जल का अकेला निर्मल स्वाद न आयगा। इसी तरह राग द्वारा इन्द्रिय सुख व द्वेष द्वारा इन्द्रिय दुःख भोगते हुए राग द्वेप का स्वाद आता है, शुद्ध सुख का स्वाद नहीं आता है, इसीसे तृप्ती नहीं होती है। जैसे वीतराग भाव या शात भाव आत्माके लिये हितकारी है वैसे शुद्ध सुखका अनुभव श्रात्माके लिये हितकारी है । विभाव सुख की परिणति में राग द्वेष का मिश्रण होने से कर्म का बंध होता है । यहा यह कहने का प्रयोजन है कि यदि चारित्र गुण न होता तो राग द्वेष या कपाय भाव क्रोधादि भाव न होता वैसे ~ खटाई से - सहज-सुख-साधन । [७५ यदि सुख गुण न होता तो सांसारिक सुख या दुःख का अनुभव किसी को न होता । यह अज्ञानी जीव जैसे अपने चारित्रगुण को भूले हुए हैं वैसे यह अपने सुख गुण को भी भूले हुए हैं । इसे कपाय के उदय से जैसे क्रोध, मान, माया, लोम आदि विभाव की कलुपता का स्वाद आता है वैसे ही कपाप के उदय से इसे सांसारिक सुख या दु ख का मलीन अतृप्तिकारी स्वाद आता है । जैसे किसी गवार अज्ञानी पुरुप को मिट्टी से मिला हुआ पानी पीने को दिया जावे तो वह उस मटीले पानी को ही पी लेगा। खेद है कि उसे पानी का स्वाद नहीं आएगा किंतु जैसी मिट्टी होगी वैसी मिट्टी का ही स्वाद आयगा । यदि वही पानी किसी बुद्धिमान को पीने दिया जाय तो वह विवेकी जल के ही स्वाद लेने का इच्छुक उस मटीले पानी को नहीं पीनेगा किंतु उस पानी मे कनतफल डालकर मिट्टी को नीचे बिठा देगा और वह पानी को साफ करके ही पीएगा और उस जल का असली स्वाद पाकर प्रसन्न होगा, उसी तरह जो अज्ञानी विपयों के झूठे सुख लुब्ध हैं, सच्चे सुख का स्वाद न पाते हुए कषाय का ही स्वाद पाकर मगन हैं वे इन्द्रिय सुख को ही सुख मानकर इसी की चाह की दाह में जलते हैं व इसी को बार बार भोगते है। सहज सुख के स्वाद को न पाकर कपाय के या राग माव के स्वाद को पाते हैं, परन्तु भ्रम से मानते हैं कि हमने सुख भोगा, यही अनादि काल का वडा अज्ञान है। विवेकी सज्जन सत पुरुप सच्चे सुख के अर्थी होकर जैसे कनतफल को डालकर स्वच्छ जल पीनेवाले ने मिट्टी को अलग कर स्वच्छ जल पीया वैसे भेद विज्ञान से शुद्व निश्चय नय को डालकर राग के स्वाद को अलग करके निर्मल आत्मा का स्वाद लेते हुए सहज सुख का स्वाद पाकर परम तृप्त होते हैं । इद्रिय सुख का भोग मलीन कषाय की कलुपता का भोग है । सहज अतीन्द्रिय सुख का भोग स्वच्छ निर्मल श्रात्मा के सुख गुण का भोग है। इस मुग्व के भोग मे वीतरागता है, इससे कर्म का बन्ध नहीं है किन्तु कर्म की निर्जरा है। इद्रिय सुख जब पराधीन है तब सहज सुख स्वाधीन है । इसके लिये न इद्रियों की जरूरत है न बाहरी पदार्थों की जरूरत है । इद्रिय सुख जव अपने आश्रयी भूत पदार्थों के बिगड़ने से बाधित हो जाता है तब सहज सुख स्वाधीन व स्वावलम्बन पर निर्भर रहने से बाधा रहित है । इन्द्रिय सुख जब बिल्कुल नाश हो जाता है, अपने शरीर छूटने पर या आश्रयोभूत विषय पदार्थ के वियोग होनेपर नहीं रहता है तब यह सहज सुन्व अविनाशी आत्मा का स्वभाव होने से सदा ही बना रहता है। इद्रिय सुषराग भाव बिना भोगा नहीं जाता, इसलिये कर्म बन्ध का कारण है, तब सहज सुख वीतरागता से प्राप्त होता है इससे वहा बन्ध नहीं किन्तु पूर्व वध का नाश है । इद्रिय सुख जब आकुलतामय है, विपम है, समतारूप नहीं है तब अतीन्द्रिय मुख निराकुल है तथा समतारूप है । हद्रिय सुग्व जब विप है तब सहजसुख अमृत है । इद्रिय सुख जब अधकार है तव सहज सुग्व प्रकाश है । इन्द्रिय सुख जब रोग है तब सहज सुख निरोग है, इन्द्रिय सुग्न जब कृष्ण है तब सहज सुख श्वेत है, इन्द्रिय सुख जब कटुक है तब सहज सुख मिष्ठ है, इन्द्रिय सुख जब तापमय है तब सहज सुख शीनल है, इन्द्रिय सुख जब वेडी है तब सहज सुख आभूपण है, इन्द्रियं सुख जब मृत्यु है तब सहज सुख जीवन है, इन्द्रिय मुख जब इन्द्रायण फल है तब सहज सख मिष्ठ अाम्र फल है, इन्द्रिय सुख वासरहित पुष्प है तव सहज सुख परम सुगधित पुष्प है, इद्रिय सुख जत्र भयानक जगल है तब सहज सुख मनोहर उपवन है, इन्द्रिय सख खारा पानी है तब सहज सुख मिष्ठ जल है, इन्द्रिय सुख गर्दभ स्वर है तब महजसुख ७८] सहज सुख या अतीन्द्रिय सुख । 4 भावार्थ-केवली अरहत के इद्रिय जनित ज्ञान तथा सुख नहीं हैं, किन्तु सहज अतीन्द्रिय ज्ञान है व सहज अतीन्द्रिय सुख है। तिमिरहरा जइ दिट्ठी, जणस्स दीवेण णत्यि कादव्यं । तध सोखं सयमादा, विसया किं तत्थ कुचंति ॥ ६६ ॥ भावार्थ-जिसकी दृष्टि अधेरे में देख सकती है उसको दीपक की कोई जरूरत नहीं है । यदि सहजसुख स्वय आत्मा रूप है तब फिर इद्रियों के विपयो की क्या आवश्यकता है ? सोक्खं सहावसिद्ध णत्थि सुराणंपि मिद्धमुवदेसे । ते देहवेदणट्टा रमंति विसयेसु रम्मेसु ।। ७५ ॥ भावार्थ- -सुख तो आत्मा का स्वभाव है, सो देवों को भी प्राप्त नहीं होता, तब वे देह की वेदना से पीड़ित होकर रमणीक विषयों मे रमते हैं। तं देवदेवदेवं जदिवरवसहं गुरु तिलोयस्स । पणमंति जे मणुस्सा, ते सोखं अश्खयं जंति ॥ ८५ ।। भावार्थ-जो मनुष्य साधुओं मे श्रेष्ठ, तीन लोक के गुरू, देवों के देव, श्री अरहत भगवान को भात्र सहित नमन करते हैं वे अविनाशी सहज सुख को पाते हैं। (२) श्री कुन्दकुन्दाचार्य समयसार में कहते हैं- एदमि रदो णिच्चं संतुट्ठो होहि णिच्चमेदसि । एदेण होहि तित्तो तो होहदि उत्तमं सोक्खं ॥ २१६ ।। भावार्थ-इसी आत्म स्वरूप मे नित्य रत हो, इसी मे सतोप रख व इसी मे तृप्त रह, तो तुझे उत्तम सहज सुख प्राप्त होगा। जो समयपाहुडमिणं पठिदूणय अच्छतञ्चदो णादु । अच्छे ठाहिदि चेदा सो पाव दि उत्तम सुक्खं ॥ ४३७ ॥ इस समयसार ग्रन्थ को पढ करके और ग्रन्थ के अर्थ और भावों को जानकर शुद्ध आत्मीक पदार्थ में ठहरेगा वह उत्तम सुख को पावेगा। (३) श्री कुन्दकुन्दाचार्य दर्शन पाहुड में कहते हैं- लद्ध ण य मणुयत्त सहिय तह उत्तमेण शुगेण । लद्ध ण य सम्मत्तं अक्खयसुक्खं लहदि मोक्ख च ॥३४॥ भावार्थ- उत्तम गोत्र सहित मनुष्यपना पाकर प्राणी सम्यग्दर्शन को पाकर अविनाशी सुख को तथा मोक्ष को पाते है। - भावार्थ-जो - के सहज-सुख-साधन [७९ , -- राग, शुद्ध करके (४) श्री कुन्दकुन्दाचार्य चारित्र पाहुड में कहते हैं:- चारित्तसमारूढो अप्पासु परंण ईहए णाणी । पावइ अइरेण सुहं अणोवमं जाण णिच्छयदो ॥४३॥ भावार्थ-जो ज्ञानी आत्मा चारित्र को धारण कर अपने आत्मा मे परभाव या पदार्थ को नहीं जोड़े-सब पर से द्वप छोडे सो ज्ञानी शीघ्र ही अनुपम सहज सुख पाता है ऐसा जानो। (५) श्री कुदकुदाचार्य भावपाहुड़ में कहते हैं: भावेह भावसुद्ध अप्पा सुविसुद्धणिम्मलं चेव । लहु चउगइ चाऊणं जइ इच्छसि सासयं सुक्खं ॥६०॥ भावार्थ-जो चार गति रूप ससार से छूटकर शीघ्र ही अविनाशी सहज सुख को चाहते हो तो भावों को शुद्ध आत्मा की भावना करो। सिवमजरामरलिंगमणोवममुत्तमं परमविमलमतुलं । पत्ता वरसिद्धिसुह जिणभावणभाविया जीवा ॥१६२॥ भावार्थ- -जो जिन धर्म की भावना भाते है, वे जीव सहज मोक्ष के सुख को पाते हैं । जो सुख कल्याण रूप है, अजर है, अमर है, अनुपम है, उत्तम है, श्रेष्ठ है, प्रशंसनीय है, शुद्व है, महान है। (६) श्री कुदकु'दाचार्य मोक्षपाहुड़ में फहते हैं:-- मयमायकोहरहिरो लोहेण विवज्जियो य जो जीयो । हिम्मलसहावजुत्तो सो पावइ उत्तमं सोक्ख ॥४५॥ भावार्थ-जो जीव मद, माया, क्रोध, लोभ से रहित होकर निर्मल स्वभाव से युक्त होता है, वही उत्तम सहज सुख को पाता है। वेरग्गपरो साहू परदव्यपरम्मुहो य जो होदि । ; ससारसुहविरत्तो सगसुद्धसुहेसु अणुरत्तो ।।१०१।। भावार्थ-जो साधु वैराग्यवान हो, परद्रव से पराडमुख हो व संसार के सुख से विरक्त हो वही अपने श्रात्मीक शुद्ध सहज सुख में लीन होता है । (७) श्री बट्टकेरस्वामी मूलाचार द्वादशानुप्रेक्षा में कहते हैं: उबसम दयां य खंती वड्डइ वेरग्गदा य जह जह से । तह तह य मोक्खसोक्खं अक्खीणं भावियं होई ॥६३॥ 5 । , भावार्थ-जो ८०] सहज सुख या अतीन्द्रियसुख। भावार्थ-जैसे जैसे शांतभाव, दया, क्षमा, वैराग्य बढते जाते हैं वैसे वैसे अविनाशी सहज मोक्ष सुख की भावना बढ़ती जाती है-अधिक अधिक सुख अनुभव में आता है । उवसमखयमिस्सं वा बोधि लद्ध ण भवियपुडरिओ । तवसंजमसंजुत्तो अक्खयसोक्खं तदा लहदि ॥७०॥ भावार्थ-जो भव्य उपशम, क्षायिक या क्षयोपशम सम्यक्त को प्राप्त करके तप व संयम पालेगा वह तब अक्षय सहज सुख को पावेगा। (८) श्री वट्टकेरस्वामी मूलाचार अनगार भावना में कहते हैं:- एगंत मग्गंता सुसमणा वरगंधहत्थिणो धीरा । सुक्कझाणरदीयो मुतिसुहं उत्तमं पत्ता ॥२०॥ साधु एकान्त के द ढनेवाले हैं व गधहस्ती के समान धीर हैं व शुक्लध्यान मे लवलीन हैं वे मुक्ति के उत्तम सहज सुख को पाते हैं। (8) श्री समंतभद्राचार्य स्वयंभूस्तोत्र में कहते हैं:-- दुरितमलकलंकमष्टकं निरुपमयोगवलेन निर्दहन् । अभवभवसौख्यवान् भवान् भवतु ममापि भवोपशांतये ॥११॥ भावार्थ-हे मुनि सुव्रतनाथ स्वामी आपने अनुपम ध्यानके बलसे आठ कर्ममल कलकको भरमकर डाला और आप मोक्ष के सहज सुख को प्राप्त कर परम सुखी होगए। आपके प्रसाद से मेरा ससार भी अन्त होवे। (१०) स्वामी समंतभद्र रत्नकरंड श्रावकाचार में कहते हैं: जन्मजरामयमरणैः शोकैर्दु खैभयैश्च परिमुक्तम् । निर्वाणं शुद्धसुखं निःश्रेयसमिष्यते नित्यम् ।।१३१।। भावार्थ-निर्वाण जन्म, जरा, रोग मरण, शोख दु.ख, भय से रहित है । शुद्ध सहज सुख से पूर्ण है. परम कल्याण रुप है तथा नित्य है। (११) श्री पूज्यपादस्वामी इप्टोपदेश में कहते हैं:- स्वमवेदनसुव्यक्तस्तनुमानो निरत्ययः । अत्यतसोख्यवानात्मा लोकालोकविलोकनः ॥२१॥ भावार्थ-यह श्रात्मा यात्मानुभव मे ही प्रकट होता है । शरीरमात्र श्राकारवान हैं, अविनाशी है, सहज मुप का बनी अत्यन्त सुखी है व लोक अलोक का देखनेवाला है। यात्मानुष्ठाननिष्ठम्य व्यवहारबहिःस्थितेः । जायने परमानंदः कश्चिद्योगेन योगिनः ॥४७॥ - सहज-सुख-साधन [८१ जब भावार्थ-जो योगी व्यवहार के प्रपच से बाहर ठहरकर आत्मा की भावना में लीन होते हैं उनको योगाभ्यास के द्वारा कोई अपूर्व परमानन्दमई सहज सुख प्राप्त होता है । (१२) श्री पूज्यपादस्वामी समाधिशतक में कहते हैं:- प्रच्याव्य विषयेभ्योऽहं मां मयैव मयि स्थितम् । वोधात्मानं प्रपन्नोऽस्मि परमानंदनितिम् ॥ ३२ ॥ भावार्थ मैं इन्द्रियों के विषयों से अलग होकर अपने ही द्वारा अपने को अपने में स्थापित करता हूँ तब परमानन्दमई सहज सुख से पूर्ण ज्ञानमयी भाव को प्राप्त करता हू । सुखमारब्धयोगस्य बहिदुःखमथात्मनि । वहिरेवासुखं सौख्यमध्यात्म भावितात्मनः ।। ५२ ।। भावार्थ-जो ध्यानको प्रारम्भ करता है उसको आत्मामे कष्ट व बाहर सुख मालूम पड़ता है परन्तु जिसकी भावना आत्मा में दृढ हो गई है उसको बाहर दुःख व आत्मा में ही सहज सुख अनुभव में आता है । (१३) श्री गुणभद्राचार्य आत्मानुशासन में कहते हैं- स धर्मो यत्र नाधर्मस्तत्सुखं यत्र नासुखं । तज ज्ञानं यत्र नाज्ञानं सा गतियंत्र नागतिः ॥ ४६ ॥ भावार्थ-धर्म वह है जहां अधर्म नहीं हो, सुख वहीं है जहां कोई दुःख नहीं है, ज्ञान वही है जहां अज्ञान नहीं हो, वही गति है जहा से लौटना नहीं हो । आराध्यो भगवान जगत्रयगुरुवृत्तिः सतां सम्मता । क्लेशस्तच्चरणस्मृतिः क्षतिरपि प्रप्रक्षयः कर्मणाम् ।। साध्यं मिद्धिसुखं कियान् परिमितः कालो मनःसाधनम् । सम्यक चेतसि चिन्तयन्तु विधुरं किं वो समाधौ बुधाः ॥११२॥ भावार्थ-समाधि या ध्यान मे तीन जगत के गुरू भगवान की तो आराधना होती है । सतों से सराह- नीय प्रवृत्ति होती है । भगवान के चरणों का स्मरण यही कष्ट है, कर्मों की बहुत निर्जरा यही खर्च है, थोड़ा सा काल लगता है, मन का साधन किया जाता है, तथा इससे सहज भतीन्द्रिय सिद्धि सुख प्राप्त होता है। इसलिये भले प्रकार विचार करो, समाधि में कोई कष्ट नहीं है, किन्तु सहज सुख का परम लाभ है । त्यजतु तपसे चक्र चक्री यतस्तपमः फलम् । सुखमनुपमं स्वोत्थं नित्य तता न तद्भुतम् ।। इदमिह महचित्रं यत्तद्विप विषयात्मकम् । पुनरपि सुधीस्त्यक्तं भोक्तु जहाति महत्तपः ॥ १६५ ॥ ।
८२] सहज सुख या अतीन्द्रिय सुख । भावार्थ-चक्रवर्ती तप के लिये चक्ररत्न का त्याग कर देते हैं क्योंकि तप का फल अनुपम आत्मा से उत्पन्न, सहज सुख का लाभ है । इस काम मे तो कोई आश्चर्य नहीं हैं परन्तु यह बडे आश्चर्य की बात है कि जो कोई सुबुद्धि छोड़े हुए विप के समान विपय-सुख को फिर भोगने के लिये बड़े तप को छोड़ देता है। सुखी सुखमिहान्यत्र दुःखी दुःखं समश्नुते । सुखं सकलसंन्यासो दुःखं तस्य विपर्ययः ॥ १८७ ॥ भावार्थ-इस लोक मे जो सहज सुख को पाता हुआ सुखी है, वही पर लोक मे भी सुखी रहता है । जो यहां तृष्णा से दुःखी है सो पर लोक मे भी दुःखी रहता है । वास्तव में सर्व वस्तु से जहां मोह का त्याग है वहीं सुख है, जहा पर वस्तु का ग्रहण है, वहीं दुःख है । आत्मनात्मविलोपनात्मचरितैरासीद्द रात्मा चिरं स्वात्मा स्याः सकलात्मनीनचरितैरात्मीकृतंगत्मनः । आत्मेत्यां परमात्मतां प्रतिपतन्प्रत्यात्मविद्यात्मकः स्वात्मोऽत्थात्मसुखो निपीदसि लमन्नध्यात्ममध्यात्मना ॥१६३॥ भावार्थ-हे आत्मन् ! तू आत्मज्ञान के लोपनेवाले विपय कपायादि मे प्रवृत्त कर चिरकाल दुराचारी रहा । अब जो तू आत्मा के सम्पूर्ण कल्याण करनेवाले ज्ञान वैराग्यादिक अपने ही भावो को ग्रहण करे तो तू श्रेष्ठ परमात्मा की दशा को प्राप्त होवे और तू केवलज्ञानी हो जावे तथा अपने ही आत्मा से उत्पन्न जो श्रात्मीक सहज सुख है, उसमें शोभायमान होकर अपने शुद्धात्मीक भाव के साथ अपने अध्यात्मस्वरुप मे ही स्थिर रहे। स्वाधीन्याद्दुःखमप्यासीत्सुखं यदि तपस्विनाम् । स्वाधीनसुखसम्पन्ना न सिद्धाः सुखिनः कथम् ।। २६७ ॥ भावार्थ-जो तपस्वी स्वाधीन रहते हैं वे यदि काय क्लेश तप का दुःख बाहर से भोगते दिखते हैं परन्तु अन्तरग में सुखी हैं । तो फिर परम स्वाधीन सुख से पूर्ण सिद्ध भगवान सदा सुखी क्यों न होंगे ? सिद्ध सहज सुख में सदा मगन रहते हैं। (१४) श्री अमृतचन्द्राचार्य पुरुषार्थसिद्धयुपाय में कहते हैं:- कृतकृत्य: परमपदे परमात्मा सकलविषयविषयात्मा । परमानन्दनिमग्नो ज्ञानमयो नंदति सदैव ॥ २२४ ॥ भावार्थ-परमात्मा परम पद में रहते हुए, सर्व पदार्थों को जानते हुए, कृतकृत्य, ज्ञानमई सदा ही अपने परमानन्द में मगन रहते हैं। (१५) श्री अमृतचन्द्र श्राचार्य तत्वार्थसार में कहते हैं:- संसारविषयातीतं सिद्धानामव्ययं सुखम् । अव्यावाधमिति प्रोक्तं परमं परमर्षिभिः ॥ ४५-८॥ 4 सहज-सुख-साधन। 5 भावार्थ-सिद्धों को संसार के विषयों से अतीत बाधारहित अविनाशी उत्कृष्ट सहज सुख होता है ऐसा परम ऋपियों ने कहा है। पुण्यकर्मविपाकाच सुखमिष्टन्द्रियार्थजम् । कर्मक्लेशविमोहाच्च मोक्षे सुखमनुत्तमम् ॥४६-८॥ भावार्थ-पुण्य कर्म के फल से इष्ट इन्द्रियों का सुख भासता है, परन्तु मोक्ष में सर्व कर्म के क्लेश के मिट जाने से स्वाभाविक अनुपम उत्तम सुख है। (१६) श्री अमृतचन्द्राचार्य समयसारकलश में कहते हैं:- चेद्रूप्यं जडरूपतां च दधतोः कृत्वा विभाग द्वयो- रन्तरुणदारणेन परितो ज्ञानस्य रागस्य च । भेदज्ञानमुदेति निर्मलमिदं मोदध्वमध्यासिताः। शद्धज्ञानज्ञाघनौघमेकमधुना सन्तो द्वितीयच्युताः ॥२-६॥ भावार्थ-रागपना तो जड़ का धर्म है, आत्मा का धर्म चैतन्यपना है । इस तरह राग और ज्ञान गुण का भेद ज्ञान जब उदय होता है तब संत पुरुप राग से उदासीन होकर शुद्ध ज्ञानमई एक आत्मा ही अनुभव करते हुए सहज सुख का स्वाद लेते हैं। एकमेव हि तत्स्वाद्य विपदामपदं पदम् । अपदान्येव भासन्ते पदान्यन्यानि यत्पुरः ।।७-७॥ भावार्थ-जिस पद में आपत्तियां नहीं हैं उसी एक आत्मा के शुद्ध पद का स्वाद लेना चाहिये जिससे सहज सुख हो । इसके सामने और सब पद अयोग्य पद दिखते हैं। य एव मुक्वानयपक्षपातं स्वरूपगुप्ता निवसन्ति नित्यं । विकल्पजालच्युतशान्तचित्ताम्त एव साक्षादमृतं पिबंति ॥२४-३।। भावार्थ-जो कोई व्यवहारनय और निश्चयनय का पक्षपात छोड़कर अपने आत्मा के स्वरूप में नित्य मगन हो जाते हैं वे सर्व विकल्प जालों से छूटे हुए व शात चित्त होते हुए साक्षात् सहज सुख रूपी अमृत को पीते हैं- यः पूर्वभावकृतकर्मविषद्रु माणां भुड़े फलानि न खलु स्वत एव तृप्तः । आपातकालरमणीयमुदरम्यं निःकर्मशर्ममयमेति दशांतरं सः ॥३९-१०॥ .
८४] महज सुख या प्रतीन्द्रिय मुन। भावार्थ-जो कोई महात्मा पूर्व मे बांधे हुए कर्मस्पी विपक्षों के फलों के भोगने मे रजायमान नहीं होता है, किन्तु आप मे ही तृप्त रहता है, वह कर्मरहित महज सुप की प्रेमी दशा को पहुंच जाता है, जिससे इस जन्म में भी सुखी रहता है व ग्रागामी भी सुनी रहेगा। जिसमें इस जन्म में भी मुग्बी रहना है व आगामी भी सुसी रहेगा। अत्यन्तं भावयित्मा विगतमविरतं कर्मणम्नकला । प्रस्पष्ट नाटयित्वा प्रलयनमसिलामान संचेतनायाः ।। पूर्ण कृत्वा स्वभावं म्बरमपरिगतं ज्ञानसंचतनां म्यां । मानन्दं नाटयन्तः प्रशमरसमितः सर्वकालं पिबन्तु ।। ४०-१० ॥ भावार्थ-जो कोई कर्म से व कर्म के फल से अत्यन्तपने निरतर विरतापने की भावना करके तथा अन्नान चेतना को पूर्ण पने प्रलय करके तथा श्रात्मीकरमसे पूर्ण अपनी जानचेतना से अपने स्वभाव को पूर्ण करके उसे अपने भीतर नचाता है वह शांतरस से पूर्ण सहज सुप 'अमृत को मदा काल पीता है। (१७) श्री नागसेन मुनि तच्चानुशासन में कहते है- तदेवानुभवंश्वायमेकाग्र्यं परमृच्छति । तथात्माधीनमानंदमेति वाचामगोचरं ॥ १७० ।। भावार्थ-जो कोई अपने आत्मा को अनुभव करता हुआ परम एकाग्र भाव को प्राप्त कर लेता है वह वचन अगोचर स्वाधीन सहज श्रानन्द को पाता है। न मुह्यति न संशेते न स्वार्थानध्यवस्यति । न रज्यते न च द्वष्टि किंतु स्वस्थ प्रतिक्षणं ।। २३७ ॥ त्रिकाल विपयं ज्ञेयमात्मानं च यथास्थितं । जानन् पश्यंश्च निःशेषमुदास्ते स तदा प्रभुः ॥ २३८ ॥ अनन्तज्ञानदृग्वीर्यवैतष्ण्यमयमव्ययं । सुखं यानुभवत्येप तत्रातिन्द्रियमच्युतः ॥ २३६ ॥ ननु चाक्षैस्तदर्थानामनुभोक्तुः सुखं भवेत् । अतीन्द्रियेषु मुक्तेषु मोक्षे तत्कीदृशं सुखं ।। २४० ॥ इति चेन्मन्यसे मोहात्तन्न श्रेयो मतं यतः । नाद्यपि वत्स त्वं वेत्सि स्वरूपं सुखदुःखयोः ॥ २४१ ।। आत्मायनं निराबाधमतींद्रियमनश्वरं । घातिकर्मक्षयोद्भूतं यत्तन्मोचसुखं विदुः ।। २४२ ।। .
सहज-सुख-साधन [८५ . . - यत्तु संसारिक सौख्यं रागात्मकमशाश्वतं । स्वपरद्रव्यसंभूतं तृष्णासंतापकारणम् ।। २४३ ।। मोहद्रोहमदक्रोधमायालोभनिबंधनं । दुःखकारणबंधस्य हेतुत्वा : खमेव तत् ॥ २४४ ॥ तन्मोहस्यैव माहात्म्यं विषयेभ्योऽपि यत् सुखं । यत्पटोलमपि स्वादु श्लेष्मणस्तद्विज भितं ॥ २४५ ॥ यदत्र चक्रिणां सौख्यं यच्च स्वर्गे दिवौकसां । कलयापि न तत्तु ल्यं सुखस्य परमात्मनां ।। २४६ ॥ भावार्थ-शुद्ध दशा में यह आत्मा न मोह करता है, न सशय करता है, न अपने जानने योग्य पदार्थ में भ्रम भाव रखता है, न राग करता है, न द्वेष करता है किंतु प्रति समय अपने स्वरूप में लीन है। तीन काल सबधी सर्व जानने योग्य पदार्थ जैसे हैं उनको वैसे ही तथा अपने को भी जानते देखते हुए वह प्रभु तव वीतरागी बने रहते हैं । अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य व तृष्णा का अभावमयी और अविनाशी, अतीन्द्रिय तथा अव्यय सहज सुख को वे अनुभव करते रहते है । इद्रियों से पदार्थों को भोगने पर तो सुख हो सकता है परन्तु मोक्ष में इन्द्रियों के अभाव मे किस तरह सुख होता होगा। यदि तू ऐसी शका करे तो ठीक नहीं है। हे वत्स ! तू अभी भी सुख तथा दुःख का स्वरूप नहीं पहचानता है । मोक्ष का सहज सुख स्वाधीन है, बाधारहित है, इद्रियोंसे अतीत है, अविनाशी, है चार घाति कर्म के क्षय से उत्पन्न है । जो ससार का सुख है वह राग रूप है, क्षणिक है, अपने व पर पदार्थ के होने पर होता है तथा तृष्णा के ताप को बढानेवाला है। मोह, द्वेप, मद, क्रोध, माया, लोभ का कारण है अतएव दु.ख फलदायी कर्मबन्ध का कारण है इमलिये वह दुःख रूप ही है। विषयों से सुख की कल्पना होने मे मोह की महिमा है। जैसे श्लेष्मा के रोगी को कड़वे पटोल भी स्वादिष्ट भासते हैं। जो सुख चक्रवर्ती राजाओं को है व जो सुख स्वर्ग में देवों को है वह परमात्मा के सहज सुख की किंचित् भी तुलना नहीं कर सकता है। (१८) श्री पात्रकेशरी मुनि पात्रकेशरी स्तोत्र में कहते हैं: परैः कृपणदेवकैः स्वयममत्सुखेः प्रार्थ्यते । सुखं युवतिसेवनादिपरसन्निधिप्रत्ययम् ।। स्वया तु परमात्मना न परतो यतस्ते सुखं । ध्यपेतपरिणामकं निरुपमं ध्रुवं स्वात्मज ॥ २८ ॥ भावार्थ-दूसरे जो यथार्थ देव नहीं हैं, जिनको सच्चा सुख प्राप्त नहीं है वे पर पदार्थ से उम्पन्न स्त्री सेवनादि के सुख की काक्षा रखते है किन्तु श्राप तो परमात्मा है, आपको पर पदार्थ से सुख नहीं है, आपका सहज सुख न बदलनेवाला स्वाधीन अविनाशी व निरुपम है । .
-------- । । ८६] सहज सुख या 'अतीन्द्रिय सुप। (१६) श्री देवसेनाचार्य वचसार में कहते हैं:- जा किंचिवि चलई मणो झाणे जोइस्स गहिय जोयस्स । ताव ण परमाणंदो उप्पज्जा परमसोक्खयरो ।। ६० ।। भावार्थ-ध्यानी योगी का मन ध्यान में जब तक चंचल है तब तक वह परम सहज सुग्वकारी परमानंद का लाभ नहीं कर सकता है। (२०) श्री योगेन्द्राचार्य योगसार में कहते हैं:-- जो णिम्मल अप्पा मुणइ वय मंजमुमंजत्त । तउ लहु पावइ सिद्ध सुहु इउ जिणणाहह वृत्त ।। ३० ॥ भावार्थ-जो कोई व्रत व सयम सहित होकर निर्मल प्रात्मा को ध्याना है वह शीघ्र ही सहज सिद्ध मुग्ध को पाता है ऐसा जिनेन्द्रों ने कहा है। अप्पय अप्पु मुणंतयह किरणेहा फलु होइ । केवलणाणु विपरिणबइ सासय सुक्खु लहेड ॥ ६१ ॥ भावार्थ-आत्मा के द्वारा अपने प्रात्मा का मनन करने से क्यों नहीं प्रपूर्व फल होता है-केवलज्ञान पैदा हो जाता है तथा अविनाशी सहज सुख को प्राप्त कर लेता है। णागारुहु वि जो अप्पाणि बसेई । सो पावइ लहु सिद्धसुहु जिणवरु एम भणेइ ॥ ६४ ॥ भावार्थ-गृहस्थ हो या साधु हो, जो कोई अात्मा मे रमण करेगा वह तुर्त महज सिद्ध सुग्व पावेगा ऐसा जिनेन्द्र ने कहा है- जो सम्मत्तपहाणु वुहु सो तयलोय पहाणु । केवलणाण वि सह लहइ सासयसुक्खणिहाणु ॥ १० ॥ भावार्थ-जो ज्ञानी सम्यग्दर्शन को प्रधानता से धरता है वह तीन लोक मे मुख्य है, वही अविनाशी सहज सुख के भडार केवलज्ञान को पासकेगा। जो समसुक्खणिलीण बुहु पुण पुण अप्प मुणेड । कम्मक्खउ करि सो वि फुड लहु णिव्याण लहेइ ॥१२॥ भावार्थ-जो बुद्धिमान सहज सम सुख मे लीन होकर बार बार आत्मा का ध्यान करता है वह शीघ्र निर्वाण को पाता है। जो अप्पा सुद्ध वि मुणई असुइसरीरविभिएणु । सो जाणइ सच्छइ सयलु सासयसुक्खहलीणु ॥ १४ ॥ सागारू वि सहज-सुख-साधन। [८७ . - : भावार्थ-जो इस अशुचि शरीर से भिन्न शुद्ध आत्मा को अनुभव करता है वही सर्व शास्त्रों को जानता है तथा वही अविनाशी सहज सुख में लीन है। वज्जिय सयलवियप्पयह परमसमाहि लहंति । ।' जं वेददि साणंद फुड सो सिवसुक्खे भणंति ॥ १६ ॥ भावार्थ-जो सर्व सकल्प विकल्पों से रहित होकर परमसमाधि को पाते हैं वे जिस सहज सुख को पाते हैं वही मोक्षसुख कहा गया है । (२१) श्री अमितिगति आचार्य तत्वभावना में कहते हैं। सर्वज्ञः सर्वदर्शी भवमरणजीतकशोकव्यतीतो । लब्धात्मीयस्वभावः क्षतसकलमलः शश्वदात्मानपायः ।। दः संकोचिताःर्भवमतिचकितैर्लोकयात्रानपेक्षः । नष्टाबाधात्मनीनस्थिरविशदसुखप्राप्तये चिंतनीयः ॥ १२० ।। भावार्थ-जो कोई बाधारहित, आत्मीक, स्थिर, निर्मल सहज सुख को प्राप्त करना चाहते हैं, उन चतुर पुरुषों को उचित है कि जन्म मरण से भयभीत हो, संसार के भ्रमण से उदासीन हो, इद्रियो को सकोच कर उस परमात्मा का चिन्तवन करें जो सर्वज्ञ हैं, सर्वदर्शी हैं, जन्म, मरण, जरा, रोग व शोक से रहित हैं, अपने स्वभाव में लीन हैं, सर्व मलरहित हैं व सदा अविनाशी है। असिमसिकृषिविद्याशिल्पवाणिज्ययोगैः। तनुधनसुतहेतोः कर्म याकरोपि ।। सकृदपि यदि ताटक संयमाथं विधत्से । सुखममलमनंतं किं तदा माश्नुपेऽलम् ।। ६६ ।। भावार्थ-हे भव्य ! जैसा तू परिश्रम शरीररक्षा, धनप्राप्ति व पुत्र लाभ के लिये असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य इन छः प्रकार की आजीविकाओं से करता है, यदि वैसा परिश्रम एक दफे भी संयम के लिये करें तो क्यों नहीं निर्मल, अनंत, सहज सुख को भोग सकेगा? अर्थात् अवश्य परमानद को पावेगा। । • (२२) श्री पद्मनंदि मुनि धम्मरसायण में कहते हैं:- अव्यावाहमणंतं जमा सोक्खं करेइ जीवाणं । तमा संकरणामो होइ जिणो णस्थि मंदेहो ॥ १२५ ।। भावार्थ-जिस जिनेन्द्र के स्वरूप के ध्यान से जीवों को बाधा रहित व अनंत सहज सुख प्राप्त होता उस जिनेन्द्र को इसलिये शंकर नाम से कहते हैं। नइ इच्छय परमपयं अव्यावाहं अणोवमं सोक्खं । तिहुवणवंदियचलणं णमह जिणंदं पयरेण ॥ १३१ ।। है " - - - - । ८८] सहज सुख या अतीन्द्रिय सुग्व । भावार्थ-यदि तू बाधारहित, अनुपम, सहज सुप से पूर्ण परमपद को चाहता है तो तीन लोक से वदनीक हैं चरण जिनके ऐसे जिनेन्द्र को भाव सहित नमस्कार कर । ण वि अत्थि माणुसाणं पादसमुत्थं चिय विषपातीदं । अचुच्छिण्णं च सुहं अणोवमं जं च सिद्धाणं ।। १६० ।। भावार्थ-सिद्धों को जैसा प्रात्मा से उत्पन्न, विपयों से अतीत, अनुपम, अविनाशी सुख है वैसा सुख मनुष्यों को भी नहीं है। (२३) श्री कुलभद्राचार्य सारसमुच्चय में कहते हैं: कामक्रोधस्तथा मोहस्त्रयोऽप्येते महाद्विषः । एतेन निजिता यावत्तावत्सौख्यं कृतो नृणाम् ॥ २६ ॥ भावार्थ-जब तक मनुष्य काम, क्रोध, मोह इन तीन शत्रुओं को न जीतें तब तक महज सुख कसे मिल सकता है। धर्म एव सदा कार्यों मुकत्वा व्यापारमन्यतः । यः करोति परं सौख्यं यावनिर्वाणसंगमः ॥ ५८ ।। भावार्थ पदार्थ से राग हटाकर तुझे धर्म का पालन सदा करना चाहिये, जो सहज व उत्तम सुख देता ही रहता है व अत में निर्वाण पहुंचा देता है । धर्मामृतं सदा पेयं दुःखातङ्कविनाशनम् । यस्मिन् पीते परं सोख्यं जीवानां जायते सदा ।। ६३ ।। भावार्थ-दुःखरूपी रोग को नाशकरनेवाले धर्म रूपी अमृत का पान सदा ही करना चाहिये जिसके पीने से सदा ही जीवों को सहज व उत्तम सुख होता रहता है। धर्म एव सदा त्राता जीवानां दुःखसंकटात् । तस्मात्कुख्त भो यत्नं यत्रोनन्तसुखप्रदे ॥ ७२ ॥ यत्वया न कृतो धर्मः सदा मोक्षसुखावहः । प्रसन्नमनसा येन तेन दुःखी भवानिह ॥ ७३ ॥ भावार्थ-जीवों को धर्म ही सदा दुःख. सकटों से रक्षा करनेवाला है । इसलिये इस अनंत सुख के दाता धर्म में प्रयत्न करना चाहिये । तू ने प्रसन्न मन होकर अम तक मोक्ष सुख को देनेवाले धर्म का साधन नहीं किया इसी से तू दुःखी रहा है। इन्द्रियप्रसरं रुद्वा स्वात्मानं वशमानयेत् । येन निर्वाणमौख्यस्य भाजनं त्वं प्रपत्स्यसे ॥ १३४ ॥ - पर सहज-सुख-साधन [८९ भावार्थ इन्द्रियों के फैलावको रोककर अपने आप तू वश मे कर, तव तू अवश्य निर्वाण के सहज सुख को पा सकेगा। रोपे रोपं परं कृत्वा माने मानं विधाय च । संङ्ग सङ्ग परित्यज्य स्वात्माधीनसुख कुरु ।। १६१ ॥ भावार्थ-क्रोध से भलेप्रकार क्रोध करके, मानमें मानको पटक कर, परिग्रह में परिग्रह को छोडकर स्वाधीन सहज सुख का लाभकर । आतरौद्रपरित्यागाद् धर्मशुक्लसमाश्रयात् । जीवः प्राप्नोति निर्वाणमनन्तसुखमच्युतं ।। २२६ ।। भावार्थ-पात ध्यान व रौद्र ध्यान को त्यागने से व धर्म तथा शुक्ल ध्यान को करने से यह जीव निर्वाण का अनत व अविनाशी सहज सुख प्राप्त करता है। निर्मम वे सदा सौख्यं संसारस्थितिच्छेदनम् । जायते परमोत्कृष्टमात्मनः संस्थिते सति ॥ २३५ ।। भावार्थ-सर्व पर पदार्थों से ममता त्याग देने पर व आत्मा मे स्थिति प्राप्त करने पर सदा ही परम उत्कृष्ट सहज सुख प्राप्त होता है जो ससार की स्थिति को छेद डालता है। प्रज्ञा तथा च मैत्री च समता करुणा क्षमा । सम्यक्त्वसहिता सेव्या सिद्धिसौख्य सुखप्रदा ॥ २६७ ॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शन पूर्वक भेदविज्ञान, सर्व से मैत्री भाव, समता व ढया इनकी सदा सेवा करनी चाहिये । इनही से निर्वाण का सहज सुख प्राप्त होगा। आत्माधीनं तु यत्सौख्यं तत्सौख्यं वणितं बुधैः । पराधीनं तु यत्सौख्यं दुःखमेव न तत्सुखम् ॥ ३०१ ॥ भावार्थ-जो आत्मा से उत्पन्न स्वाधीन सुख है उसी को विद्वानों ने सुख कहा है । जो पराधीन इन्द्रिय सुख है वह सुख नहीं है, वह तो दुःख ही है। पराधीनं सुखं कष्टं राज्ञामपि मह.जसा । तस्मादेतत् समालोच्य आत्मायनं सुखं कुरु ।। ३०२ ।। भावार्थ-बड़े तेजस्वी राजाओं को भी पराधीन सुख दुःखदाई होता है, इसलिये ऐसा विचार कर प्रात्माधीन सहज सुख का लाभ कर । नो संगाज्जायते सौख्यं मोक्षसाधनमुत्तमम् । संगाच जायते दुःखं संसारस्य निवन्धनम् ॥ ३०४ ॥ -- -- ९०] सहज सुख या अतीन्द्रिय सुख । भावार्था-मोक्ष के कारण भूत उत्तम सहज सुख परिग्रह की ममता से नहीं पैदा होता है । परिग्रह से तो ससार का कारण दुःख ही होता है । श्री पननन्दि मुनि सिद्धस्तुति में कहते हैं:- यः केनाप्य तिगाढगाढमभितो दुःखप्रदः प्रग्रहः । बद्धोन्यैश्च नरो रुपा धनतरैरापादमामस्तकं ।। एकस्मिन् शिथिलेऽपि तत्र मनुते सौख्यं स सिद्धाः पुनः । किं न स्युः सुखिनः सदा विरहिता वाह्यान्तरैर्वन्धनैः ॥ ४ ॥ भावार्थ-यदि किसी पुरुष को किसी ने बहुत दुखदाई वधनों से क्रोध मे आकर सिर से पगतक बांधा हो उसका यदि एक भी बन्धन शिथिल होजावे, तो वह सुख मान लेता है। सिद्धभगवान जब सर्व बाहरी भीतरी बन्धनो से सदा ही रहित हैं तब वे सहज सुख के भोक्ता क्यों न रहेंगे ? अवश्य रहेंगे। येषां कर्मनिदानजन्यविविधक्षुतणमुखा व्याधय- स्तेपामन्नजलादिकौपधिगणस्तच्छान्तये युज्यते । सिद्धानान्तु न कर्म तत्कृतरुजो नातः किमन्नादिभि- नित्यात्मोत्थसुखामृताम्बुधिगतास्तृप्तास्त एव ध्रुवम् ॥ ११ ॥ भाषार्थ-जिन संसारी जीवों के कर्मों के उदय से क्षुधा, तृपा आदि अनेक रोग होते हैं, उनही की शांति के लिये वे अन्न, जल, औपधि आदि का सग्रह करते हैं । सिद्धों के न तो कर्म हैं न कर्मकृत रोग हैं। इसलिये अन्नादिकों से कोई प्रयोजन नहीं । वे नित्य आत्माधीन सहज सुख रूपी समुद्र में मगन रहते हुए सदा ही तृप्त रहते हैं। (२५) श्री पद्मनन्दी मुनि धर्मोपदेशामृत में कहते हैं:- ज्ञानज्योतिरुदेति मोहतमसो भेदः समुत्पद्यते । सानंदा कृतकृत्यता च सहसा स्वांते समुन्मीलति ॥ यस्यैकस्मृतिमात्र तोपि भगवानत्रैव देहांतरे । देवः तिष्ठति मृग्यतां स रभसादन्यत्र किं धावति ॥ १४६ ॥ भावार्थ- जब मोह रूपी अधकार दूर हो जाता है, तब ज्ञानज्योति का प्रकाश होता है उसी समय अतरग में सहज सुख का अनुभव होता है, तथा कृतकृत्यपना झलकता है । जिसके स्मरण मात्र से ही ऐसी ज्ञानज्योति प्रगट होती है । उस भगवान आत्मा देव को तू शीघ्र ही इस देह के भीतर खोज । वाहर और कहा दौडता है ? ३ ।
सहज-सुख-साधन। [९१ ? भिन्नोहं वपुपो बहिर्मलकृतान्नानाविकल्पौषतः । शद्वादेश्च चिदेकमूर्तिमरलः शांतः सदानंदभाक ।। इत्यास्था स्थिरचेतसो दृढतरं साम्यादनारंभिणः । संसाराद्भयमस्ति किं यदि तदप्यन्यत्र कः प्रत्ययः ॥ १४८ ॥ भावार्थ-मैं मल से रचे हुए इस बाहरी शरीर से भिन्न हूँ, तथा मन के विकल्पों से भी भिन्न हूँ, शब्दादि से भी भिन्न हूँ, मैं एक चेतना मूर्ति हूँ, निर्मल हूँ, शात हूँ, सदा सहज सुख का धारी हूँ। जिसके चित्त में ऐसी श्रद्धा हो व जो शात हो, प्रारम्भ रहित हो उसको ससार से क्या भय ? तब और भय का कोई कारण नहीं। सतताभ्यस्तभोगानामप्यसत्सुखमात्मजम् । अप्यपूर्व सदित्यास्था चिने यस्य स तत्ववित् ॥ १५० ॥ भावार्थ-वही तत्वज्ञानी है, जिसके चित्त में यह श्रद्धा है कि निरन्तर अभ्यास में आये हुए इद्रिय भोगों का सुख असत्य है, किन्तु आत्मा से उत्पन्न सहज सुख अपूर्व है। (२६) श्री पद्मनन्दि मुनि एकत्व सप्तति में कहते हैं: सम्यग्दृग्बोधचारित्रं त्रितयं मुक्तिकारणम् । मुक्तावेव सुखं तेन तत्र यत्नो विधीयताम् ॥ १३ ॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र इन तीनो की एकता ही मोक्ष का मार्ग है । मुक्ति में ही सहज सुख अनत है इसलिये मुक्ति का यत्न करना चाहिये। अजमेकं परं शान्तं सर्योपाधिविवर्जितम् । आत्मानमात्मना ज्ञात्वा तिष्ठेदात्मनि यः स्थिरः ॥ १८ ।। स एवामृतमार्गस्य स एवामृतमश्नुते । स एवार्हन् जगन्नाथ: स एव प्रभुरीश्वरः ॥ १६ ॥ भावार्थ-जो कोई जन्म रहित, एक स्वरूप, उत्कृष, शात, व सर्व रागादिकी उपाधि रहित आत्मा को द्वारा जानकर आत्मा मे थिर होजाता है वही सहजानदमई मोक्षमार्ग में चलनेवाला है, सहजानदमई अमृत को पीता है, वही अहत् है, वही जगन्नाथ है, वही प्रभू है, वही ईश्वर है । केवलज्ञानहक्सौख्यस्वभावं तत्पर महः । तत्र ज्ञानेन किं ज्ञातं दृष्टे दृष्टं श्रुते श्रुतम् ॥ २० ॥ भावार्थ- यह उत्कृए आत्मारूपी तेज है, वह केवलनान, केवलदर्शन, सहजानद स्वभाव का धारी है। जिसने उसको जान लिया उसने क्या नहीं जाना, जिसने उसको देख लिया उसने क्या नहीं देखा, जिसने उसको आश्रय किया उसने क्या नहीं श्राश्रय किया ? यात्मा वह - ९२] सहज सुख या अतीन्द्रिय सुख । अक्षयस्याक्षयानन्दमहाफलभरश्रियः। तदेवैकं परं बीजं निःश्रेयसलसत्तरोः ॥ ५० ॥ भावार्थ-यह ज्ञानानदरूप आत्मा ही अविनाशी और अनंत सहज सुख रूपी फलको देनेवाले मोक्ष रूपी वृक्ष का बीज है। शद्ध यदेव चैतन्यं तदेवाह न संशयः । कल्पनयानयाप्येतद्धीनमानन्दमन्दिरम् ।। ५२ ।। भावार्थ- यह शुद्ध चैतन्य है सो ही मैं हूँ, कोई संशय की बात नहीं है । वह सर्व कल्पनामय नयों से रहित है व सहज आनन्द का मदिर है। साम्य सद्बोधनिर्माणं शश्वदानन्दमन्दिरम् । साम्य शुद्धात्मनोरूपं द्वारं मोबैकसझनः ॥ ६७ ॥ भावार्थ-समताभाव ही सम्यग्ज्ञान को रचनेवाला है । समताभाव ही सहजानद का अविनाशी मदिर है । समताभाव शुद्धात्मा का स्वभाव है। यह मोक्ष महल का एक द्वार है। (२७) श्री शुभचन्द्र आचार्यज्ञानार्णवमें कहते हैं:- प्रत्यक्षं विषयातीतं निरौपम्यं स्वभावजम् । अविच्छिन्नं सुखं यत्र स मोक्षः परिपठ्यते ॥ ४-८॥ भावार्थ-जहां अतीन्द्रिय, इंद्रियों के विषयों से रहित, अनुपम, स्वाभाविक, अविनाशी, सहज सुख है वही मोक्ष कहा गया है। नित्यानन्दमयं शुद्ध चित्स्वरूपं सनातनम् । पश्यत्यात्मनि परं ज्योतिरद्वितीयमनव्ययम् ॥ ३५-१८ ॥ भावार्थ-मै नित्य सहजानंदमय हूँ, शुद्ध हूँ, चैतन्य स्वरूप हूँ, सनातन हूँ, परम ज्योति स्वरूप हूँ, अनुपम हूँ, अविनाशी हूँ, ऐसे ज्ञानी अपने भीतर अपने को देखता है। यत्सुखं वीतरागस्य मुनेः प्रशमपूर्वकम् । न तस्यानन्तभागोऽपि प्राप्यते त्रिदशेश्वरैः ॥३-२१ ॥ भावार्थ- वीतरागी मुनि के शातभाव पूर्वक जो सहज सुख प्राप्त होता है उसका अनंतवा भाग भी सुख इन्द्रों को नहीं मिलता। स कोऽपि परमानन्दो वीतरागस्य जायते । येन लोकत्रयैश्वर्यमप्यचिन्त्यं तृणायते ॥ १८-१३ ॥
सहज-सुख-साधन [९३ भावार्थ-वीतरागी महात्मा को ऐसा कोई परमानन्द उत्पन्न होता है जिसके सामने तीन लोक का अचिंत्य ऐश्वर्य भी तृण के समान भासता है । तस्यवाविचलं सौख्यं तस्यैव पदमव्ययम् । तस्यैव बंधविश्लपः समत्वं यस्य योगिनः ॥ १८-२४ ॥ भावार्थ-जिस योगी के समभाव है उसी के ही निश्चल सहज सुख है, उसी के ही बध का नाश है, उसी को ही अविनाशी पद प्राप्त होता है । अनन्तवीर्यविज्ञानदृगानन्दात्मकोऽप्यहम् । किं न प्रोन्मूलयाम्यद्य प्रतिपक्षविपद् मम् ॥ १३-३१ ॥ भावार्थ-मै अनन्तवीर्य, अनंतजान, अनतदर्शन, अनत सुख रूप ही हूँ, क्यों मैं अपने प्रतिपक्षी कर्मरूपी विप के वृक्ष को आज उखाड़ न डालु गा ? यदक्षविषय रूपं मद्र पात्तद्विलक्षणम् । आनन्द निर्भरं रूपमन्तज्योतिर्मयं मम् ।। ६४-३२ ।। भावार्थ-जो जो पदार्थ इंद्रियों का विषय है वह मेरे आत्मा के स्वभाव से विलक्षण हैं । मेरा स्वभाव तो सहजानंद से पूर्ण अन्तरङ्ग में ज्ञान ज्योतिमय है। अतीन्द्रियमनिर्देश्यममूर्त कल्पनाच्युतम् । चिदानंदमयं विद्धि स्वस्मिन्नात्मानमात्मनो ॥६६-३२ ॥ भावार्थ-हे प्रात्मन् ! तू आत्मा को आत्मा ही में आप ही से जान कि मैं अतीन्द्रिय हूँ, वचनों से कहने योग्य नहीं हूँ, अमूर्तीक हूँ, कल्पना रहित हूँ, व चिदानंदमयी हू । निष्कलः करणातीतो निर्विकल्पो निरञ्जनः । अनंतवीर्यनापन्नो नित्यानन्दाभिनन्दितः ।।७३-४२॥ भावार्थ-सिद्धात्मा शरीर रहित है, इद्रियों से रहित है, विकल्प रहित है, कर्ममल रहित है, अनतवीर्य- धारी है, नित्य सहजानद में मग्न है । (२८) श्री ज्ञानभूषण भट्टारक तत्वज्ञान-तरंगिणी में कहते हैं! स कोपि परमानदश्चिद्रूपध्यानतो भवेत् । तदंशोपि न जायेत त्रिजगत्स्वामिनामपि ॥ ४-२ ॥ भावार्थ-शुद्ध चैतन्य स्वरूप के ध्यान से कोई ऐसा ही महज परमानन्द होता है उसका अश भी इन्द्रादि को प्राप्त नहीं होता।
९४] सहज सुख या अतीन्द्रिय सुख । - -- ये याता यांति यास्यंति योगिनः शिवसंपदः । समासाध्यैव चिद्र पं शुद्धमानंदमंदिरं ।। १६-२ ।। भावार्थ-जो योगी मोक्ष सम्पदा को प्राप्त हो चुके होंगे व हो रहे है उममे शुद्ध चिढ़ प का ध्यान ही प्रधान कारण है, वही सहजानन्द का घर है। चिद्र पः केवलः शुद्ध आनन्दात्मेत्यहं स्मरे । मुस्त्यै सर्वज्ञोपदेशः श्लोकाद्धेन निरूपितः ।। २२-३ ।। भावार्थ-मैं चैतन्यरूप हूँ, असहाय हूँ, शुद्ध हूँ, सहजानन्दमय हूँ, ऐमा स्मरण कर मुक्ति के लिये सर्वज्ञ का क्या उपदेश है उसे आगे श्लोक में कहा गया । सर्वेषामपि कार्याणां शुद्धचिद्र पचिंतनं । सुखसाध्यं निजाधीनत्वादीहामुत्र सौख्यकृत् ।। १६-४ ॥ भावार्थ-सर्व ही कार्यों में शुद्ध चिद्र प का चिन्तवन सुख से साध्य है क्यों कि यह अपने ही श्राधीन है तथा इस चिन्तवन से इस लोक मे भी सहज सुख होता है और परलोक मे भी होता है । विषयानुभवे दुःखं व्याकुलत्वात् सतां भवेत् । निराकुलत्वतः शुद्धचिद्र पानुभवे सुखं ॥ १६-४ ॥ भावार्थ- -विपयों के भोगने मे प्राणियों को दुःख ही होता है क्यों कि वहा आकुलता है। किन्तु शुद्ध चिद्रप के अनुभव से सुख ही होता है क्यों कि वहां निराकुलता है। चिद्र पोऽहं स मे तस्मात्त पश्यामि सुखी ततः । भवक्षितिर्हितं मुक्तिनिर्यासोऽयं जिनागमे ।। ११-६ ।। भावार्थ-मैं शुद्ध चैतन्य रूप हूँ इसलिये मै उसी को देखता हूँ उसी से मुझे सहज सुख प्राप्त होता है। जिनागम का भी यही निचोड़ है कि शुद्ध चिद्र प के ध्यान से ससार का नाश व हितकारी मुक्ति प्राप्त होती है। चिद्र पे केवले शुद्ध नित्यानंदमये यदा । स्वे तिष्ठति तदा स्वस्थं कथ्यते परमार्थतः ॥ १२-६ ॥ भावार्थ-केवल, शुद्ध, नित्य सहजानदमई शुद्ध चिद्र पस्त्ररूप जो अपना स्वभाव उसमे जो सदा ठहरता है वही निश्चय से स्वस्थ कहा जाता है। नात्मध्यानात्परं सौख्यं नात्मध्यानात् परं तपः । मात्मध्यानात्परो मोक्षपथः क्यापि कदाचन ।। ५-८ ॥ -अात्म ध्यान के विना और किसी उपाय से उत्तम सहज सुख नहीं हो सकता है। श्रात्म ध्यान से मढ़कर और कोई तप नहीं है । श्रात्म ध्यान से बढ़कर कहीं ब किसी काल में कोई मोक्ष मार्ग नहीं है। । .
सहज-सुख-साधन। [९५ - भावार्थ- मैं ने सुख रंजने परिणामः स्याद् विभावो हि चिदात्मनि । निराकुले स्वभावः स्यात् तं विना नास्ति सत्सुखं ॥८-१५ ॥ भावार्थ-चिदात्मा में रजायमान होनेवाले परिणाम को विभाव कहते हैं । परन्तु जो प्राकुलता रहित शुद्ध चिद्रप में भाव हो तो वह स्वभाव है इसी स्वभाव मे तन्मय हुए विना सच्चा सहज सुख प्राप्त नहीं हो सकता है। वाह्य मंगतिमंगस्य त्यागे चेन्मे पर सुखम् । अन्तः संगतिसंगस्य भवेत् किं न ततोऽधिकं ॥ ११ - १६ ॥ भावार्थ-बाहरी स्त्री पुत्रादि की सगति के त्यागने से ही जब सहज सुग्व होता है तो अतरङ्ग मे सर्व रागादि व विकल्पों के त्याग से और भी अधिक सहज सुख क्यों नहीं हो । ? वहून् वारान् मया भुक्तं स विकल्पं सुखं ततः । तन्नापूर्व निर्विकल्पे सुखेऽस्तीहा ततो मम ॥ १० -१७ ।। बहुतबार विकल्पमय सांसारिक सुख को भोगा है, वह कोई अपूर्व नहीं है । इसलिये उस की तृष्णा छोड़कर अब मेरी इच्छा निर्विकल्प सहज सुख पाने की है। ज्ञेयज्ञानं सरागेण चेतसा दुःखमंगिनः । निश्चयश्च विरागेण चेतसा सुखमेव तत् ।। ११–१७ ।। भावार्थ- रागभाव पूर्वक चित्त से जो पदार्थों को जाना जाता है उससे प्राणियों को आकुलता रूप दुःख होता है, परन्तु वीतराग भाव से जो पढार्थों को जाना जावे तो सहज सुख ही है यह निश्चय है। चिंता दुःखं सुखं शांतिस्तस्या एतत्प्रतीयते । तच्छांति यते शुद्धचिद्रूपे लयतोऽचला ।। १३-१७ ।। भावार्थ-चिंता दु खकारी है, शाति सुखकारी है, यह बात जिस शांतिके अनुभव से मालूम होती है वह निश्चल शांति तब ही होगी जब शुद्व चिद्र प मे लयता प्राप्त होगी। यो रागादिविनिमुक्तः पदार्थानखिलानपि । जानन्निराकुलत्वं यत्ताचिक तस्य तत्सुखं ।। १७–१७ ।। भावार्थ-जो कोई रागद्वेपाटि छोडकर सर्व पदार्थों को जानता है उसे निराकुलता रहती है, उसी के वह सच्चा तत्वरूप महज सुख होता है। युगपज्जायते कर्ममोचनं तात्रिकं सुखं । लयाच्च शुद्धचिद्रूपे निर्विकल्पस्य योगिनः ॥ ५–१८ ॥
सहज सुख या अतीन्द्रिय सुख । भावार्थ-जो योगी संकल्प विकल्प त्यागकर शुद्ध चिद्र प मे लय होता है उसी को एक ही साथ सञ्चा सहज सुख भी मिलता है व कर्म की निर्जरा भी होती है। (२५) श्री पं. बनारसीदासजी वनारसी विलाम में कहते हैं:- सवैया ३१ । लवरूपातीत लागी पुण्यपाप भ्राति भागी, सहज स्वभाव मोहसेनाबल भेद की। ज्ञानकी लवधि पाई आतमलबधि आई, तेज पुज कांति जागी उमग अनन्द की। राहु के विमान बढ़े कला प्रगटत पूर, होत जगाजोत जैसे पूनम के चन्द की। बनारसीदास ऐसे आठ कर्म भ्रमभेद, सकति संभाल देखी राजा चिदानद की ।।१४।। (३०) पं. बनारसीदासजी नाटक समयसार में कहते हैं: । - कवित्त । जब चेतन सभारि निज पौरुप, निरखे निज गसों निज मर्म । तब सुखरूप विमल अविनाशिक, जाने जगत शिरोमणि धर्म ।। अनुभव करै शुद्ध चेतन को, रमे स्वभाव वमे सब कर्म । इहि विधि सघे मुकति को मारग, अरु समीप आवै शिव शर्म ||५|| सवैया २३ । राग विरोध उदै जबलों तबलों, यह जीव मृपा मग धावे । ज्ञान जग्यो जब चेतन को तब, कर्म दशा पर रूप कहावे ।। कर्म विलक्ष करे अनुभौ तहां, मोह मिथ्यात्व प्रवेश न पावे । मोह गये उपजे सुख केवल, सिद्ध भयो जगमाहि न आवे ॥५८।। छप्पै । जीव कर्म सयोग, सहज मिथ्यात्वस्वरूप धर । राग द्वेप परणति प्रमाव, जाने न आप पर । तम मिथ्यात्व मिटि गये, भये समकित उद्योत शशि । राग द्वेष कछु वस्तु नाहिं, छिन मांहि गये नशि ॥ अनुभव अभ्यास सुख राशि रमि, भयो निपुण तारण तरण । धरण प्रकाश निहचल निरखि, वनारसी वढत चरण ।।५९।। छप्पै । प्रगट भेदविज्ञान, आपगुण परगुण जाने । पर परणति परित्याग, शुद्ध अनुभौ थिति ठाने। करि अनुभौ अभ्यास सहज सवर परकासे । आश्रत्र द्वार निरोधि, कर्मघन तिमिर विनासे ।। - +4 सहज-सुख-साधन। [९७ क्षय करि विभाव समभाव भजि, निरविकल्प निज पद गहे। निर्मल विशुद्ध शाश्वत सुथिर, परम अतीन्द्रिय सुख लहे ॥११॥ सवैया - २३ । शुद्ध सुछन्द अभेद अबाधित, भेद विज्ञान सु तीछन आरा। अन्तर भेद स्वभाव विभाव, करे जड चेतन रूप दुफारा ।। सो जिन्ह के उर में उपज्यो, ना रुचे तिन्ह को परसग सहारा । आतम को अनुभौ करिते, हरखे परखे परमातम प्यारा ॥३॥ (३१) पं. द्यानतरायजी द्यानतविलास में कहते हैं: छप्पै । मैं - जीव चेतना सहित, आपगुन परगुन जाने पुग्गल द्रव्य अचेत, आप पर कछु न पिछाने ।। जीव अमूरतिवंत, मूरती पुग्गल कहिये । जीव ज्ञानमय भाव, भाव पुग्गल लहिये ।। यह भेद ज्ञान परगट भयौ, जो पर तजि अनुभौ करें। सो परम अतिंद्री सुख सुधा, भुजत भौसागर तिरै ॥८३ ॥ यह असुद्ध मैं सुद्ध, देह परमान अखडित । असख्यात परदेश, नित्य नित्य निरभै मैं पडित ॥ एक अमूरति निर उपाधि, मेरो छय नाहीं। गुन अनन्त ज्ञानादि, सर्व ते हैं मुझ माहीं ।। अतुल अचल चेतन विमल, सुख अनन्त मौमैं लसे जब इस प्रकार भावत निपुन, सिद्ध खेत सहजै बसे ।। ८४ ।। सुनहु हस यह सीख, सीख मानों सदगुर गुरू को पान न लोपि, लोपि मिथ्यामति उर को ।। उर की समता गहौ, गहौ आतम अनुभौ सुख। सुख सरप थिर रहै, रहै जग रुख ॥ रुख करौ नहीं तुम विपय पर, पर तजि परमातम मुनहु । मुनहु न अजीव जड़ नाहिं निज, निज आलम वर्नन सुनहु ।। ८८ ।। हत मिथ्यात मोहकर । करत सुगुरू परनाम, नाम जिन जपत सुमन घर ।। धरम दयाजुत लखत, लखत अमलपद। परमभाव रहत हुव दुष् अष्ट मद । मदनबल घदन समता प्रगट, प्रगट अभय ममता तजत । तजत न सुभाव निज अपर तज, तज सुदु ख सिब सुख भजत ।। ८९ ।। की। मैं उदास भजत देव अरहत, निज रूप गहि रहत, ९८] सहज सुख या अतीन्द्रिय सुख । लहत भेद विज्ञान, जीव सु अन्य जासम कोई। ज्ञानमय जानत। जानत पुग्गल अन्य, सौं नातौ भानत ॥ भानत मिथ्या-तिमिर, तिमिर नहि कोई विकलप नाहि, नाहिं दुविधा जस होई॥ होई अनन्त सुख प्रगट जब, जब प्रानी निजपद गहत । गहत न ममत लखि गेय सब, सब जग तजि सिवपुर लहत ॥ ९० ।। कुण्डलिया। जो जानै सो जीव है, जो मानै सो जीव । जो देखै सो जीव है, जीचे जीव सदीव॥ जीव जीव पीव अनुभौरस प्रानी। आनन्द कन्द सुछन्द, चन्द पूरन सुखदानी ॥ जो जो दीसै दर्व, सर्व छिन भगुर सो सो। सुख कहि सके न कोई, होइ जाकौं जाने जो ॥ ९ ॥ चक्री जुगलिये, भवनपती सुर्ग इन्द्र अहमिंद्र सब, अधिक अधिक सुख भाल ।। अधिक अधिक सुख भाल, काल तिहुँ लत गुनाकर । एकसमै सुख सिद्ध, रिद्ध परमातम पद धर ॥ सो निहचै तू आप, पाप बिन क्यों न पिछानत । दरस ग्यान थिर थाप, आप मैं आप सु द्यानत ।। ११ ।। सदीव, द्यानत पाताल। छप्पै । ग्यानकूप चिद्र प, भूप सिवरूप अनूपम । रिद्ध सिद्ध निज वृद्ध, सहज ससमृद्ध सिद्ध सम ।। अमल अचल अविकल्प, अजल्प, अनल्प सुखाकर । सुद्ध बुद्ध अविरूद्ध, सुगनगन-मनि रतनाकर ।। उतपात-नास-धुव साध सत, सत्ता दरव सु एकही। द्यानत आनन्द अनुभौ दसा, बात कहन की है नहीं ॥३॥ भोग रोग से देखि, जोग उपयोग बढ़ायौ। आन भाव दुःख दान, ग्यान को ध्यान लगायौ ॥ सकलप विकलप अलप, बहुत सब ही तजि दीनैं। आनन्द कन्द सुभाव, द्यानत अनादि भ्रम वासना, नास कुविद्या मिट गई। अतर बाहर निरमल फटक, झटक दसा ऐसी भई ॥१०॥ सबैया-२३ । लोगनिसौ मिलनौ हमको दुख, साहनिसौं मिलनौ दुख भारी। भूपतिसौ मिलनौं मरनैं सम, एक दसा मोहि लागत प्यारी ॥ परम समतारस भीनें ॥
सहज-सुख-साधम [९९ चाहकी दाह जलें जिय मूरख, वे-परवाह महा सुखकारी। द्यानत याहीतै ग्यानी अबंछक, कर्म की चाल सबै जिन टारी ॥२७॥ (३२) भैया भगवतीदास ब्रह्मविलास में कहते हैं: सवैया ३१ । भौथिति निकद' होय कर्मबध मंद होय, प्रगटे प्रकाश निज आनंद के कद को । हित को दृढाव होय बिनैको बढ़ाव होय, उपजै अकूर ज्ञान द्वितीया के चद को ॥ सुगति निवास होय दुर्गति को नाश होय, अपने उछाह दाह करै मोहफंद को। सुख भरपूर होय दोप दुःख दूर होय, यात गुणवृ द कहैं सम्यक् सुछन्द को ।।८।। . सवैया २३ । चेतन ऐसे में चेतत क्यों नहिं, आय बनी सबही विधि नीकी । है नरदेह यो अारज खेत, जिनद की बानि सुबूद अमीकी ।। तामें जु आप गहो थिरता तुम, तौ प्रगट महिमा सब जीकी । जामे निवास महासुखवास सु, आय मिलै पनिया शिवतीकी ॥२३।। द्रुमलता छंद । इक बात कहूँ शिवनायकजी, तुम लायक ठौर, कहा अटके । यह कौन विचक्षन रीति गही, विनु देखहि अक्षन सों भटके ।। अजहूँ गुण मानो तो शीख कहूँ, तुम खोलत क्यों न पटै घटके। चिनमूरति आपु विराजत है, तिन सूरत देखे सुधा गटके ॥१०॥ सवैया -३३ । जाही दिन जाही छिन अतर सुबुद्धि लसी ताही पल ताही समै जोतिमी जगति है। होत हैं उद्योत तहा तिमिर विलाइ जातु, आपापर भेद लखि ऊरधव गति है ।। निर्मल अतीन्द्री ज्ञान देखि राय चिदानद, सुखको निधान याकै माया न जगति है। जैसो शिवखेत तैसो देह में विराजमान, ऐमो लखि सुमति स्वभाव में पगति है ।।३।। कवित्त । निशदिन ध्यान करो निहचै सुजान करो, कर्म को निदान करो श्रावै नाहि फेरिकै । मिथ्यामति नाश करो सम्यक उजास करो, धर्म को प्रकाश करो शुद्व दृष्टि हेरिकै ।। ब्रह्म को बिलास करो, आतमनिवास करो, देव सत्र दास करो महामोह जेरिके। अनुभौ अभ्यास करो थिरता में वास करो, मोक्षसुख रास करो कहूँ तोहि टेरिकें ।।९४|| x x X X तेरो ही स्वभाव चिनमूरति विराजितु है, तेरो ही स्वभाव सुखसागर मे लहिये । तेरो ही स्वभाव ज्ञान दरसनहू राजतु है, तेरो ही स्वभाव ध्रुव चारित मे कहिये ।।
१००] सहज सुख या अतीन्द्रिय सुख । तेरो ही स्वभाव अविनाशी सदा दीसतु है, तेरो ही स्वभाव परभाव मे न गहिये । तेरो ही स्वभाव सब आन लसै ब्रह्ममाहि, यात तोहि जगत को ईश सरदहिये ॥१॥ सवैया ३१ । H नेकु राग द्वेष जीत भये वीतराग तुम, तीनलोक पूज्यपद येहि त्याग पायो है । यह तो अनूठी बात तुम ही बताय देहु, जानी हम अवहीं सुचित्त ललचायो है तनिकहू कष्ट नाहि पाइये अनन्त सुत्व, अपने सहजमाहिं आप ठहरायो है। यामें कहा लागत है, परसग त्यागही, जारि दीजे भ्रम शुद्ध प्रापही कहायो है ॥३॥ मोहके निवारे राग द्वेषहू निवारे जाहि, राग द्वेष टारे मोह नेक हूँ न पाइये। कर्म की उपाधि के निवारिवे को पेच यहै, जडके उखारे वृक्ष कैसे ठहराइये ।। डार पात फल फूल सबै कुम्हलाय जाय, कर्मन के वृक्षन को ऐसे के नसाइये। तबै होय चिदानन्द प्रगट प्रकाश रूप, विलसै अनन्त सुग्व सिद्ध में कहाइये ।।८।। कवित्त । सिद्धकी समान है विराजमान चिदानद, ताही को निहार निजरूप मान लीजिये। कर्मको कलंक अग पक ज्यों पखार हरयो, धार निजरूप परभाव त्याग दीजिये ।। थिरता के सुखको अभ्यास कीजे रैन दिना, अनुभोके रसको सुधार भले पीजिये। ज्ञानको प्रकाश भास मित्रकी समान दीसै, चित्र ज्यों निहार चित ध्यान ऐसो कीजिये ॥३॥ - -- छप्पै । अष्टकर्मते रहित, सहित निज ज्ञान प्राण धर । चिदानन्द भगवान, बसत तिहूँ लोक शीसपर ।। विलसत सुखजु अनत, संत ताको नित ध्यावहि । वेदहि ताहि समान, आयु घट माहि लखावहि ।। हम ध्यान करहि निर्मल निरखी, गुण अनत प्रगटहि सरव । तस पद त्रिकाल वदत मविक, शुद्ध सिद्ध श्रातम दरब ७॥ राग दोष अरु मोहि. नाहिं निजमाहिं निरक्खत । दर्शन ज्ञान चरित्र, शुद्ध आतम रस चक्खत ।। परद्रव्यनसों भिन्न, चिह्न चिह्न चेतनरद वेदत सिद्ध समान, शुद्ध निज रूप अखडित ।। सुख अनत जिहि पदवसत, सो निहचै सम्यक महत । 'भैया' सुविचक्षन भविक जन, श्रीजिनद इहि विधि कहत ॥१४॥ जैनधर्म परसाद, जीव मिथ्यामति खडे । जैनधर्म परसाद, प्रकृति उर सात विहडै । जैनधर्म परसाद, द्रव्यपटको पहिचान । जैनधर्म परसाद, आप परको ध्र व ठाने ।। मडित । --- सहज-सुख-साधन [१०१ जैनधर्म परसाद लहि, निजस्वरूप अनुभव करें। 'भैया' अनत सुख भोगवै, जैन धर्म जो मन धरै ॥२१॥ जैनधर्म परसाद, जीव सब कर्म सब कर्म खपावै । जैनधर्म परसाद, जीव पचमि गति पावै ।। जैनधर्म परसाद, बहुरि भवमें नहि श्रावै । जैनधर्म परसाद, आप परब्रह्म कहावै ॥ श्री जैनधर्म परसादतें, सुख अनंत विलसत ध्रुव । सो जैनधर्म जयवत जग, भैया जिहं घट प्रगट हुव ।।२२॥ सवैया ३१ । सुबुधि प्रकाश में सु प्रातम विलास मे सु, थिरता अभ्यास में सुज्ञानको निवास है। अरधको रीति मे जिनेशकी प्रतीतिमे सु, कर्मनकी जीत में अनेक सुख भास है ।। चिदानंद ध्यावतही निजपद पावतही, द्रव्यके लखावतही, देख्यो सव पास है। वीतराग वानी कहै सदा ब्रह्म ऐसे भाम, सुखमे सदा निवास पूरन प्रकाश है ।।२४|| अध्याय पांचवां। जीव का एकाद। इस संसार मे जीवको अकेले ही भ्रमण करना पड़ता है । हर एक जीव अकेले ही जन्मता है, अकेले ही मरता है । अकेला ही जरा से पीडित होता है, अकेला ही रोगी होता है। अकेला ही शोकी होता है, अकेला ही दुखी होता है। अकेला ही सुखी होता है, अकेला ही पाप व पुण्य कर्म बाधता है व अकेला ही उसका दुःख व सुख भोगता है । हरएक जीव अपनी करनी का श्राप उत्तरदायी है। जो जीव जैसे भाव करता है वह जीव वैसे कर्म बांधता है। दूसरा कोई किसी के पाप या पुण्य बध नहीं कर सकता है, न दूसरा कोई किसी के पाप या पुण्य के वध को हर सकता है, किसी के दुःख को कोई ले नहीं सकता है, किसी के सुखको कोई छीन नहीं सकता है। दुःख सुख अतरग भावों पर है, भावों का बदलना अपने ही आधीन है। जिस कुटुम्ब में या जिस सयोग मे कोई जन्मता है उसको यह अपना साथी मान लेता है परन्तु वे इस जीव के सच्चे साथी नहीं हो सकते है। माता पिता पास बैठे हैं यदि पुत्र रोगी है तो रोग का दुःख उसी को ही भोगना पडता है माता पिता बटा नहीं सकते हैं। यदि कोई भूखा है तो उसीको भोजन करने से उमकी भूख मिटेगी। दूसरे के भोजन से किसी की भूख मिट नहीं सकती है। कुटुम्ब में प्राणियों का १०२] जीव का एकत्व । सबध वृक्ष के वसेरे के समान है। जैसे साझ के समय भिन्न भिन्न दिशाओ से आकर पक्षी एक वृक्ष पर विश्राम करते हैं, सवेरा होने तक ठहरते है, फिर हरएक पक्षी अपनी इच्छानुसार अपनी भिन्न भिन्न दिशा को चला जाता है । उसी तरह एक कुटुम्ब में कोई जीव नर्क से, कोई जीव स्वर्ग से, कोई जीव पशुगति से, कोई जीव मनुष्य गति से आकर जन्मता है। वे सब अपनी अपनी प्रायु पर्यंत रहते हैं, जिनकी आयु पूरी होती है वह सबको छोड़कर चला जाता है, कोई किसी के पीछे मरता नहीं। जो पाप व पुण्य व जैसा आयु कर्म जो जीव वाधता है उसके अनुसार वह जीव चारों गतियों में से किसी गति मे चला जाता है। चार सगे भाई हैं:- एक विशेप धर्मात्मा है वह मर कर देव होजाता है। एक सामान्य धर्मात्मा है वह मरकर मनुष्य होजाता है। एक कम पापी है वह मरकर पशु जन्म पाता है । एक अधिक पापी है वह मरकर नारकी पैदा हो जाता है, फिर कोई किसी को याद भी नहीं करता है । साधारण नियम यही है कि हरएक अपने अपने सुख व दुःख मे रमजाता है। यदि कोई गृहस्थी अपने कुटुम्ब के मोहवश-स्त्री व पुत्रादि के मोहवश अन्याय व पाप करके धनादि सग्रह करता है और कुटुम्ब की उस पाप मे अनुमोदना नहीं है तो उस पाप का वध अकेले गृहस्थी को ही होगा। दूसरे यद्दपि साथ हैं, उस धनको भोगते हैं परन्तु उनका भाव पापमय न होने से वे उस पाप के फलको न पावेगे । एक कुटुम्ब में १० दस जीव है । एक आदमी चोरी करके सौ रुपये लाता है। पाच तो उसेसराहते हैं, पांच उसकी निन्दा करते हैं तव पाच तो पाप कर्म वांधेगे और दूसरे पांच पुण्य कर्म बांधेगे । एक घर मे दो भाई हैं-दोनो भोग्य पदार्थों के स्वामी है, स्त्री पुत्रादि सहित हैं । एक सम्यग्दृष्टि ज्ञानी है, वह उनके बीच मे रहता हुआ भी जल मे कमल के समान अलिप्त है, भोगों को रोग के समान जानकर वर्तमान इच्छा को रोकने को असमर्थ होकर कड़वी दवा लेने के समान भोग भोगता है। अतरग में यह भावना है कि कब वह समय आवे जब यह विपयवासना मिटे और मैं इन भोगों को न भोगकर केवल आत्मरस का ही पान करू । ऐसा ज्ञानी जीव भोगों को भोगते हुए आसक्त भाव के न होने से बहुत अल्प कर्म वन्ध करेगा। परन्तु दूसरा भाई जो मिथ्यादृष्टी अज्ञानी है। जिसका उद्देश्य ही ससार का विपय भोग है, जो सहज सुख को पहचानता ही नहीं, इन्द्रिय सुख के सिवाय किसी सुख को जानता ही नही, वह गृहस्थ के भोगों को बहुनु बड़ी आसक्ति से भोगेगा व यही चाहेगा कि ये भोग सदा बने रहें व इससे बढकर भोग जीवन भर मिले व परलोक मे भी मिले, वह अनानी तीव्र कर्म बाधेगा। एक भाई दूसरे के पाप को बटा नहीं सकता है । मरने के बाद सम्यग्दृष्टी स्वर्ग में देव होगा, मिथ्यावष्टि पशुगति में तिथंच होगा या नरक में नारको होगा। कुटुम्व में सर्व ही प्राणी अपने स्वार्थ के साथी है । अपना स्वार्थ जब तक संधता जानते हैं तब तक स्नेह करते हैं, जब स्वार्थ सधता नहीं जानते हैं तब स्नेह छोड बैठते हैं । यदि स्वार्थ मे बाधा होती है तो वे ही जो बन्धु थे शत्रु हो जाते है । पुत्र पिता की सेवा अपने शारीरिक सुख के लिये करता है । पिता पुत्र की पालना इस अाशा से करता है कि मेरे वृद्ध होनेपर यह मेरी रक्षा करेगा। स्त्री पति का स्नेह अपने शरीर पालन व अपने कामतृप्ति का साधन जान के करती है। पति स्त्री के साथ स्नेह गृह कार्य, सतान प्राप्ति व कामतृष्णा के शमन हेतु करता है। यदि स्त्री पति को रसोई न खिलावे, घर का काम न करे, कामतृप्ति मे सहाई न हो तो उसी क्षण पति का स्नेह मिट जाता है। पति यदि स्त्री को भोजन वस्त्र, आभूपण न दे, उसकी रक्षा न करे, उसकी कामतृप्ति में सहाई न हो तो स्त्री का स्नेह पति से उड जाता है । जो वृद्ध पिता घर का काम काज नहीं कर मकता व धन भी पास नहीं रखता उमसे कुटु- -- । - महज-सुख-ग्गाधन। [१०३ -- - ? म्बियों का स्नेह छूट जाता है। भीतर परिणाम यही रहते हैं कि यह वेकार है, इसका जीवन न रहे तव हो ठीक है । स्वामी सेवक से स्नेह प्रयोजनवश करता है, सेवक स्वामी से स्नेह, मतलव के हेतु से करता है। सारा जगत का व्यवहार स्वार्थ व परम्पर काम के ऊपर ही निर्भर है। किसान खेती करके राजा को कर देता है तब राजा किमानो की रक्षा करता है । मुनीम सेठ का काम करता है तब सेठ मुनीम को नौकरी देता है । यदि काम न निकले तो एक दिन सेठ मुनीम को रखना नहीं चाहता और यदि सेठ नौकरी न दे तो मुनीम सेठ का काम छोड देता है । वही भाई जो एक ही माता के गर्भ से निकले हैं दूसरे भाई की सम्पत्ति हडपजाने के लिये शत्र बन जाता है। सारे जगत के प्राणी इन्द्रियों के सुखों के दास हो रहे हैं । जिनसे इंद्रिय सुख की सहायक मामग्री प्राप्त करने में काम निकलता है उनसे तो स्नेह हो नाता है और जिनसे विषयभोगों में अतराय पडता है उनसे द्वेष पैदा हो जाता है । इन्द्रिय विपय के मोहवश ही जगत मे मित्र व शत्रु बनते हैं। राग द्वेप का सारा प्रसार विपय चाह के आधीन है । मेग शरीर है यह मानना भी भ्रम है, मिथ्या है क्योंकि यह शरीर एक धर्मशाला है, कहीं से श्राके जीव बसा है व आयुकर्म समाप्त होते ही इसे छोड़ना पडेगा । शरीर पुद्गल मय जड़ है. आप चेतन है । शरीर अपना कैसे हो सकता है ? यह परिवार मेरा है, यह भी मिथ्या है । यह सब परिवार शरीर से सम्बन्ध रखता है। प्रात्मा का कोई परिवार नहीं । आत्मा का कोई माता पिता नहीं, कोई भाई नहीं, कोई पति नहीं, कोई इसकी भार्या नहीं, पुत्री नहीं, भगिनी नहीं, कोई इसका पुत्र नहीं, भाई नहीं, चाचा नहीं, भतीजा नहीं सब सम्बन्ध शरीर से है जब शरीर ही अपना नहीं तब यह परिवार अपना कैसे हो सकता है ? यह धन मेरा है, यह ग्राम मेरा है, यह घर मेरा है, यह उपवन मेरा है यह बस्न मेरा है, यह श्राभूपण मेरा है, यह वाहन मेरा है, यह सब भी मानना मिथ्या है । इन सबका सम्बन्ध शरीर के साथ है । शरीर के छटते ही उनका सम्बन्ध छूट जाता है । एक धनी जीव मरकर एक चाडाल के यहा जन्म प्राप्त कर लेता है तथा एक चाडाल का जीव मरकर धनी के यहा पैदा हो जाता है । देव मरकर कुत्ता हो जाता है, कुत्ता मरकर देव हो जाता है। सारा शरीर के सम्बन्ध भोग विलास, कुटुम्ब परिवार, मकान, वाग कूप, तडाग सब शरीर के साथ ही रह जाता है । यह जीव अपने पाप तथा पुण्य कर्म को लिये हुए अकेला ही जाता है और कहीं जन्म धार लेता है । शरीर को व शरीर के सम्बन्ध मे आए हुए सर्व चेतन व अचेतन पदार्थों को अपना मानना मिथ्या है, भ्रम है, अचान है। इस जीव का मच पूछो तो ससार मे कोई साथी नहीं है। यदि कोई परम प्यारी स्त्री भी हो तो भी अपने पति के मरने पर ऐसा नहीं कर सकती कि उसी के साथ ही कहीं पर जन्म लेकर फिर स्त्री हो नावे । स्त्री मरकर पुत्री हो जाती है, भगिनी हो जाती है या स्त्री अपने पापकर्म के अनुसार तिर्यचनी हो जाती है, और पति अपने पुण्य कर्म के अनुसार राजपुत्र हो जाता है । कोई बड़ा भारी मित्र है तो भी मित्र के मरने पर उसके साथ न तो मर सकता है और यदि मरे भी तो एक साथ एक ही गति में जन्म पाने का कोई नियान नहीं है । एक मानव रोग से तड़फड़ा रहा है। सैकहो कुटुम्बी, मित्र, पुत्र, मित्रादि बैठे देख रहे हैं, सहानुभूति बता रहे है परन्तु यह किसी में शक्ति नहीं है कि उसके रोग को आप लेले व उसकी रोग पीडा को आप ओढलें । उसी अकेले को रोग का कष्ट भोगना पडता है । जगत मे यह नियम है कि यह जीव अकेला ही जन्मता है, अकेला ही मरता है, अकेला ही दुःख सुख भोगता है । इसलिये इस जीव को उचित है कि स्वार्थी जगत के प्राणियों के मोह में पडकर अपना बुरा न करे। अपने आत्महित को कुटु- म्बियों के पीछे न छोड बैठे। - - १०१] जीव का एकत्र । संसार असार है बता चुके, शरीर अपवित्र अथिर है समझा चुके, भोग चंचल अतृप्तिकारी व दुःख- दायी हैं यह कथन कर चुके तथा सहज सुख ही सच्चा सुख है जो आत्मा का स्वभाव है, आत्मा ही से मिल सकता है । इन्द्रिय सुख झूठा है, कल्पित है, विनाशीक है, श्रात्मीक सुख स्वाधीन है, अविनाशी है, अपने ही पास है, यह सब दिखा चुके । अब उचित है कि हरएक चेतन प्राणी इस मानव जन्म को सफल करे, सच्चे सुख पाने का यत्न करे, वह सच्चा सुख भी कोई किसी को दे नहीं सकता, कोई किसी से ले नहीं सकता, किसी से मांगने से मिल नहीं सकता, खुशामद से प्राप्त नहीं हो सकता, धन खरचने से नहीं आ सकता है, कहीं रक्खा नहीं है जो उठाया जासके । वह सुख हर एक का हर एकके पास है। हर एक आप ही अपने से ही अपने में अपने ही पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त कर सकता है । जो साधन करेगा वहपा सकेगा, जो आलसी रहेगा वह नहीं पा सकेगा। यह शरीर मेरा नहीं है यह प्रगट ही है, परन्तु आत्मा के एकत्व को या उसके एक स्वमाव को ध्यान में लेते हुए हमे यह भी देखना होगा कि ससारी प्राणियों में क्रोध कम या अधिक है मान कम या अधिक है, माया कम व अधिक है, लोभ कम या अधिक है, हास्यभाव कम या अधिक है, रतिभाव कम या अधिक है, अरतिभाव कम या अधिक है, शोक भाव कम या अधिक है, भय भाव कम या अधिक है, जुगुप्सा या घृणाभाव कम या अधिक है, कामभाव कमया अधिक है, ये सब भाव क्या जीव के स्वभाव हैं या नहीं इनका विचार भले प्रकार कर लेना उचित है । यदि पक्षपात छोड़कर विचारा जायगा तो इन क्रोध, मान, साया, लोभादि भावों को कोई भी पसन्द नहीं करता है। सब ही इनको औपाधिक मात्र, अशुद्ध भाव या दोष मानते है। एक अनपढ ग्रामीणसे भी पूछा जावे तो वह यही कहेगा कि क्रोधी श्रादमी अच्छा नहीं, मानी आदमी अच्छा नहीं, मायाचारी अच्छा नहीं, लोभी अच्छा नहीं, शोकी आदमी अच्छा नहीं, भयभीत मानव अच्छा नहीं, कामी मानव अच्छा नहीं, इसके विरुद्ध जगत भर को क्षमावान, विनयवान, सरल व्यवहारी, संतोपी, ब्रह्मचारी शीलवान, निर्भय, शोक रहित, प्रेमालु घृणा रहित मानव अच्छा लगता है । जैसे रुई के कपड़े सफेद होते हैं। किसी स्थान पर पचास आदमी एकत्र हैं, वे सब रुई के कपड़े पहने हैं परन्तु ऋतु के कारण सब के कपड़े मलीन है। तब दर्शकगण उनको देखकर यही समझते हैं कि इनके कपड़े स्वच्छ नहीं है, इनमें मैल चढ़ गया है और यदि कहीं किसी सभा में पचास आदमी जमा हो जो सब नए सफेद कपडे पहनकर पाए हों तो दर्शकों को वे सब वडे सुहावने लगते हैं क्योकि उन कपड़ों पर मैल नहीं है। इसी तरह जब क्रोध, मान, माया लोभादि से रगे हुए जीव होते है तव सवको बुरे लगते हैं और जब उनके विरुद्ध क्षमा, विनय, ऋजुना, संतोप आदि से सम्पन्न जीव होते है तव सबको अच्छे लगते हैं। उसका कारण यही है कि नमा, विनय, ऋजुता संतोप आदि तो जीव के स्वभाव है जब कि क्रोध, मान, मावा, लोभादि जीव के स्वभाव नहीं हैं दोप है, मैल हैं। क्रोधी मानव स्वय भी यदि अपने को देखे तो क्रोध के समय वह अपने आपे से बाहर हो जाता है । उमको बड़ी प्राकुनता पैदा हो जाती है । बड़ा दुःखित भाव हो जाता है, ज्ञान मैला हो जाता है, विवेक जाना रहता है, कुछ का कुछ सत्य अमन्य विचारने लगता है, वकने लगता है, चाहे किसी को मारने पीटने लगता है। उसका स्वभाव विगड जाता है । यदि क्रोधी को कुछ नवीन जान की शिक्षा दी जाये तो वह उसे ग्रहण कर नही मकना । उसका परिणाम बडा ही क्षोभित व मैला हो जाता है, और जब उसीका क्रोध चला जाता है, शानि श्राजानी है तब वही अपने को निराकुल मालम करता है, सुग्वी मालूम करता है। उम गर्मी -- सहज-सुख-साधन । [१०५ , समय विवेकी रहता है, मनमे भी ठीक ठीक विचारता है, वचन भी ठीक ठीक बोलता है, काय से भी ठीक २ क्रिया करता है, नवीन ज्ञान की शिक्षा को भी ग्रहण करता है भले प्रकार समझता है क्योंकि यह क्रोध रूपी पिशाच के वश नहीं है या क्रोध रूपी मदिरा के नशे में नहीं है, वह अपने आपे में हैं। इसी तरह यदि किसी को अभिमान हो उच्च कुल का, उच्च जाति का, धनवान होने का रूपवान होने का, बलवान होने का, अधिकारी होने का, विद्वान होने का, तपस्वी होने का, तो उसका भाव मैला रहता है । वह दूसरो को घृणा की दृष्टि से देखता है । मान के वशीभूत हो मन से ठीक विचार नहीं करता है, वचन भी मानयुक्त बोलता है, शरीर से भी विनययुक्त क्रिया नहीं होती है, मान के आवेश में उसका वर्ताव जगत को पसन्द नहीं आता है, वह भी आकुलित रहता है कि कहीं कोई अपमान न कर दे और यदि कोई अपमान कर देता है तो वह शीघ्र ही क्रोधी होकर और भी दुःखी हो जाता है । मानी को नवीन ज्ञान की शिक्षा दी जावे तो उसको वह ग्रहण नहीं करता है । यदि कोई मान रहित है, मार्दव धर्म का धारी है, कोमल चित्त है तो उसके भावो में शाति है, वह विवेक से विचार करता है, उसका मन कारण कार्य का ठीक विचार कर सकता है, उसके वचन हितमित प्रिय निकलते हैं, उसकी क्रिया प्रेम दया व विवेक पूर्ण होती है, उसे नवीन ज्ञान की शिक्षा दी जावे तो वह उसे बडे आदर से ग्रहण करता है, धारण करता है। उसका मन क्षोभित न होकर सुखी रहता है । इसका कारण यही है कि मानरूपी मदिरा ने उसे वापला व अधा नहीं किया है। मायाचार के आवेश मे यह प्राणी बड़ा ही गदा हो जाता है, इसके भावों में कुटिलता बस जाती है, मनमें स्वार्थ साधन के हेतु पर को वचना करनेवाले कुत्सित विचार होते हैं, वचन यद्यपि मीठे निकलते हैं परन्तु वह विप से पूर्ण भोजन के समान ठगने वाले होते हैं, शरीर की चेष्टा सर्व ही धोखे मे डालनेवाली कुटिल होती है । उसका भाव कुटिलता से व भय से पाकुलित रहता है, शाति नहीं रहती है, नवीन ज्ञान की शिक्षा भी उसके मलीन भाव में नहीं जमती है, परन्तु यदि सरलता हो, ऋजुता हो, आर्जव धर्म हो तो मन निर्मल रहता है, पर हितकारी बातों को ही विचारता है, वचनो से हितकारी बातें कहता है, काय से सरल व योग्य वचना रहित वर्ताव करता है, परिणामों में शाति रहती है। ऐसे को यदि नवीन ज्ञान की शिक्षा दी जावे तो बडी भक्ति से ग्रहण करता है, जैसे सफेद कपड़े पर लाल रंग खूब चढ़ता है। वह अपने भीतर सुख शाति का अनुभव करता है, इसका कारण यही है कि उसके भीतर माया पिशाचिनी का आक्रमण नहीं है, वह मलीन नहीं है, दापी नहीं है । लोम के वशीभूत होकर यह प्राणी बड़ा ही अपवित्र होजाता है। स्वार्थी होकर लोभ के सावने वाले विचारोंको मनसे करता है । मनमें तृष्णाके साधनके ही विचार करताहुआ दया व न्यायके विचारोंको छिपा देता है। वचनों से लोभयुक्त, तृष्णायुक्त वाणी कहता है । कायसे ऐसी क्रिया करता है जिससे तृष्णाका साधन हो । उसे न्याय, अन्याय, धर्म, अव कर्तव्य अकर्तव्य का ध्यान नहीं रहता है । लोभमें अन्धा हो अवला विधवा का भी धन हर लेता है । गरीब आदमी को भी ठगने हुए उसे दया नहीं आती है । अपने परम मित्र को भी ठग लेता है । लोभ से पाकुलित के परिणामों मे शाति नहीं रहती है, वह सुखी नहीं होता है। अति धनिक होनेपर भी दु.खी रहता है। ऐसे लोभी को कोई नवीन ज्ञान की शिक्षा नहीं सुहाती है । जैसे जल मिट्टी से मैला हो जाता है वैसे जीव का परणाम लोभ से मलीन हो जाता है। यदि किसी के भावों में लोभ न हो सतोष हो तो उसका मन स्वच्छ रहता है, वह उचित न्याययुक्त व्यवहार का ही विचार करता है, सतोष पूर्वक न्याय युक्त वचन बोलता है व न्याय युक्त ही वह काय से क्रिया करता है। उनका परिणाम प्रालित नहीं रहता है वह निर्लोभता के कारण सुख शाति का अनुभव । 1 १०६] जीव का एकत्व . करता है, वह जगत को प्रिय होता है। कारण यही है कि लोभ रूपी भूत ने उसको वश नहीं किया है, वह अपने आपेमे है, लोभ की मूर्छा से मूर्छित नहीं है । काम के वशीभूत होकर प्राणी ऐसा अंधाहो जाता है कि उसका शील स्वभाव बिगड़ जाता है, मन में बडा ही पाकुलित होता हुआ काम भाव सम्बन्धी ही विचार करता है । काम वर्द्धनकारक हास्ययुक्त, भड़ वचन, प्रलाप व गानादि करता है । काय से न्याय अन्याय का विवेक छोडकर चाहे जिस तरह काम चेष्टा करने लग जाता है । कामी को बड़ी अशाति रहती है, सुख- शाति उससे कोसों दूर रहती है । उसे कोई ज्ञान की नवीन शिक्षा दी जावे तो वह ग्रहण नहीं कर सकता इसके विरुद्ध जो काम के अन्धकार से बाहर हैं, शीलवान हैं, शुद्ध ब्रह्मचर्य के घारी हैं, उनका मन शुद्ध होता है, वह शुद्ध विचार करते हैं, वे शीलपोषक ब्रह्मचर्य प्रेरक वचन बोलते हैं व काय से ब्रह्मचर्य की रक्षा करते हुए चेष्टा करते हैं। उनका परिणाम सुख शांति का व साम्यभाव का अनुभव करता है । इसका कारण यही है कि काम भाव का अधकार उनके ज्ञान के ऊपर नहीं आया है। इस तरह यह विदित होगा कि क्रोधादि सर्व ही विभाव दोष हैं, उपाधि हैं, अपने को भी सम्लेश- कारी, हानिकारक, सुख शातिनाशक व ज्ञान के विरोधक भासते हैं व दूसरों को भी सर्व जगत को भी ये क्रोधादि दोप व मल ही दिखते हैं । वास्तव में यही यथार्थ बात है। जैसे मलीनपना कपडे का स्वभाव नहीं हैं, वैसे ही क्रोधादि मद हों व तीत्र हों ये जीव के स्वभाव नहीं हैं। मोहनीय कर्म के सयोग से इसी तरह जीव मे होते हैं जैसे रग के सयोग से पानी रगीन होता है, अग्नि के सयोग से पानी गर्म होता है, मैल के सयोग से कपड़ा मैला होता है, धुए के संयोग से भीत काली होती है, काले, पीले, हरे, लाल डाक के सयोग से फटिक मणि का पापाण काला, पीला, हरा व लाल हो जाता है। यदि पर का सयोग न हो तो पानी निर्मल रहे, शीतल रहे, कपडा उजला रहे, भीत सफेद रहे, स्फटिक मणि स्वच्छ चमकदार रहे। इसी तरह मोहनीय कर्म के अनेक भेद हैं-तीव्रतम, तीव्रतर, तीव्रमद, मदतर, मदतम उनके विपाक, या फल के सयोग से जैसे नाना प्रकार के मोहनीय कर्म का फल होता है वैसा ही कम व अधिक मैल व उपाधि या दोप जीव मे दिखता है। यदि सोहनीय कर्म का सयोग न हो तो जीव अपने वीतराग निराकुन उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जब, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिचन्य, व उत्तम ब्रह्मचर्यमय, स्वभाव में ही प्रकाशित रहे, अर्थात परम शांत रहे । इस जीव का स्वभाव जैसा शात है वैमी शाति न चदन मे है, न मोती की माला मे है, न अगर कपूर में है, न चन्द्रमा की चादनी मे है, न बर्फ मे है, न शीतल जल में है, न गंगा के पानी मे, न क्षीर समुद्र के जल मे है, न केवड़े के बन मे है, न कमल के बगीचे में है, न नदनवन की वाटिका मे है न किमी सूर्य प्राताप से अम्पर्शित पृश्वीतल मे है। इस तरह हमे यह निश्चय करना चाहिये कि जितने ये भाव तीन कवादि रुप व मद क्रोधादि रूप हैं वे कोई भी इस जीव के स्वभाव नहीं हैं, वे सत्र मोहनीय कर्म के सयोग से दिखनेवाले मैल है, विलाल विरुद्ध है । इम मोहनीय कर्म के विपाक से सलारी जीवो के दो प्रकार के भाव होते हैं-एक अशुभ भाव Bad thought activity दूसरे शुभ भाव Good thought activity, अशुभ भावों के दृष्टात है-(१) हिमा, (२) असत्य, (३) चोरी, (४) कुशील, (५) परिनइ की मूर्छा, (६) जूआ खेलना, (७) माम खाना, (८) मदिरापान, (९) शिकार खेलना, (१०) वेश्या प्रमग, (११) परस्त्री प्रसग, ( १२ ) तीव्र शोक, (१३) तीन तु.न्य, (१४) पर का अपकार, (१५) तीव्र क्रोध, (१३) तीव्र मान, (१७) तीन माया, (१८) तीन- लोभ । जिन २ कार्यो के करने के लिये मर्यादा, न्याय, व धर्म का उल्लबन हो बर्ताव करना पडे, वे सत्र - - से मा - सहज-सुख-साधन [१०७ काम अशुभ भावों के द्वारा होते हैं । जिन कामों मे मद कषाय करनी पडती है-राग तो होता है परन्तु अपने स्वार्थ का त्याग होता है, इद्रियो के विषयों की लम्पटता नहीं होती है, वे सब कार्य शुभ भावों से किये जाते हैं, जैसे-(१) दया, (२) आहार, औषधि, अभय व ज्ञानदान, (३) सत्य भाषण, (४) न्याय से वर्तन, (५) ब्रह्मचर्य पालन, (६) संतोष, (७) परोपकार, (८) सेवा टहल, (६) यथा योग्य विनय, (१०) हितकारी वर्तन, (११) परमात्मा की भक्ति, (१२) धर्म शास्त्र पठन, (१३) गुरु सेवा (१४) सयम पालन इत्यादि कार्य शुभ भावों से होते हैं। यहा राग या लोभ मद होता है। दोनों ही शुभ भाव या अशुभ भाव इस जीव के स्वभाव से दूर हैं। इस जीव का स्वभाव तो वीतराग, वीतद्वेष, वीतमोह व परम शांत उदासीन है, जहा न शुभ भाव से न अशुभ भाव से किसी व्यवहार करने का राग या द्वेप या मोह है इसीलिये आत्मा का स्वाभाविक भाव, शुद्ध भाव या शुद्धोपयोग है । जैसे पानी के चौदह बर्तन हैं, पहले में लाल रग सबसे अधिक मिला हो, फिर कमती कमती दस वर्तनो तक मिला हो, ११ वें से १३ चे तक मे पवन के द्वारा चचलता हो । १४ वें में चचलता भी न हो परन्तु कुछ मिट्टी हलकीसी मिली हो । १५ वें वर्तन मे ऐसा शुद्ध पानी हो, न जिसमें कोई रग हो न चचलता हो न मिट्टी मिली हो तब विचारा जाय तो उन चौदह बर्तनों में भी जो पानी है, वह पन्द्रहवें बर्तन के पानी के बराबर ही है । अतर डालने का कारण परवस्तु का सयोग है । रग, हवा व मिट्टी का सयोग है । उमही तरह सर्व ही जीव स्वभाव से शुद्ध वीतराग परमात्मा सिद्ध भगवान के समान हैं- सिद्ध पूर्ण शुद्ध आत्मा हैं । शेष ससारी आत्माए कम या अधिक कर्मरूपी रज से मिली हैं, इसीलिये नाना प्रकार रज मिश्रित जल के समान दिखती हैं, परन्तु स्वभाव सबका एक है । अतएव यह सिद्ध हुआ कि यह जीव न क्रोधी है, न मानी है, न मायावी है, न लोभी है, न कामी है, न भयभीत है, न शोकी है, न रागी है, न द्वेषी है, न मोही है, न दयादान का कर्ता है, न पूजापाठ का कत्र्ता है, न स्वाध्याय वरता है, न गुरुसेवा का कत्ता है । यह तो सर्व प्रपचजाल, सर्व प्रकार विकार व चिंता व सकल्पविकल्प से रहित पूर्ण वीतराग सिद्ध के समान है। तथा यह जीव ज्ञानी है, ज्ञान इसका स्वभाव है, हरएक जीव मे ज्ञान की पूर्ण शक्ति विद्यमान है। जैसे परमात्मा सिद्ध भगवान सर्वज्ञ है वैसा हरएक जीव स्वभाव से सर्वज्ञ स्वरूप है, परन्तु जो ज्ञानकी कमी ससारी जीवों में देखने में आती है वह ज्ञान को आवरण करनेवाले कर्म के सयोग से है । जैसे सूर्य का स्वभाव पूर्ण स्वपर प्रकाशक है, यदि मेघों का अधिक आवरण आता है तो कम प्रकाश झलकता है, कम आवरण होता है तो अधिक प्रकाश प्रगट होता है, यदि और भी कम आवरण होता है तो और भी अधिक प्रकाश झलकता है । मेघों के अधिक व कम आवरण की अपेक्षा प्रकाश के अनेक भेद हो जाते है, यद्यपि सूर्य का प्रकाश एक रूप है। इसी तरह ज्ञान का प्रकाश एकरूप है। उनके ऊपर बानावरण कर्म के पटल अनेक प्रकार के होने से किसी जीव मे कम, किसी में अधिक ज्ञान का प्रकाश है। अथवा जैसे शुद्ध जल में ऐसी निर्मलता होती है कि अपना मुख दिख जावे परन्तु, जल मे मिट्टी अविक मिली होने से कम निर्मलता होगी । कम मिट्टी मिली होने से अधिक निर्मलता झलकेगी इसी तरह निर्मल आत्मा मे सर्व जानने योग्य विश्व के पदार्थ प्रकट होते है परन्तु जिसमे जितना कम या अधिक जान है उसमें उतना ही अधिक चा कम कर्म का आवरण है। स्वभाव हरएक जीव का ज्ञानमयी है । ज्ञान जितना भी कही बढता है विद्या पढने से या पर के उपदेश से वह भीतर से ही अज्ञान मिटकर बढता है । कहीं बाहर से नान दिया जाता नहीं, बाहर से लिया १०८] जीब का एकत्व । L - 4 जाता नहीं । यदि ज्ञान में लेन देन हो तो ज्ञान दातारों का ज्ञान घटे तब ज्ञान लेनेवालों का ज्ञान बढे जैसे धन के लेन देन में होता है। यदि कोई किसी को अपनी एक हजार की थैली मे से सौ रुपये देता है तो उसकी थैली में नौ सौ रह जायगे तब दूसरे को सौ रुपये मिलेगे । ऐसा ज्ञान में नहीं होता। एक विद्वान सौ छात्रों को पढाता है, सर्व छात्रों का ज्ञान उनके आवरण हटने के अनुसार कम या अधिक बढता है परन्तु उस विद्वान का ज्ञान कुछ भी कम नहीं होता। यदि विचारा जावे तो जितना अधिक उसको पढाने का अनुभव होगा उतना ही अधिक उस विद्वान का ज्ञान बढ़ जायगा। इसलिये यही बात ठीक है कि हरएक जीव में उतना ही ज्ञान है जितना सिद्ध भगवान में है । जीव का स्वभाव निर्मल जल के समान स्वच्छ है, सर्व ही जानने योग्य को झलकाना व प्रकाश करना है। यह जीव आनन्दमय है । सहज-सुख अतीन्द्रिय सुख इसका स्वभाव है । यह पहले बताया जा चुका है। मोह के मैल से यह सुख अनुभव में नहीं आता है । जितना २ मोह हटता है यह सुख प्रगट होता है। परमात्मा जैसे आनन्दमय है वैसा हरएक जीव आनन्दमय है। परमात्मा अमूर्तीक है । परमात्मा में कोई वर्ण नहीं है, गंध नहीं है, रस नहीं है, स्पर्श नहीं है वैसे ही हरएक आत्मा में कोई वर्ण, गध, रस, स्पर्श नहीं है। हरएक आत्मा अपना कोई चैतन्य मई आकार रखता है; क्योंकि जिसका कोई आकार नहीं होता है वह शून्य अभावमय पदार्थ होता है । जीव ऐसा नहीं है, वह तो अनेक गुणों का धारी द्रव्य है, इसलिये जीव का आकार अवश्य है । जिस शरीर में रहता है उस शरीर प्रमाण उसका आकार हो जाता है । जैसे दीपक का प्रकाश कमरे में कमरे भर फैलता है, छोटे कमरे में छोटे कमरे भर, घड़े में घड़े भर, एक लोटे के भीतर लोटे भर फैलता है वैसे इस जीव का आकार हाथी मे हाथी के बराबर, ऊंट में ऊंट के बराबर, घोड़े में घोड़े के बराबर, बैल में बैल के बराबर, बकरे में बकरे के बराबर, कुत्ते में कुत्ते के बराबर, चूहे. मे चूहे के बराबर, सर्प मे सर्प के बराबर, नकुल में नकुल के बराबर, कबूतरमें कबूनरके बराबर, भ्रमरमे भ्रमर के बराबर, चीटीमें चीटी के बराबर, लट मे लट के बराबर, वृक्ष में वृक्ष के वराबर, इत्यादि जैमा शरीर होता है वैसा यह जीव सकोचकर या फैलकर छोटे या बड़े आकार का हो जाता है, तो भी इसमे शक्ति सर्व विश्व मे फैलने की है। स्वभाव को अपेक्षा लोक व्यापी है परन्तु शरीर के सम्बन्ध मे शरीर प्रमाण रहता है । नाम कर्म के कारण सकोच या विस्तार को प्राप्त होता है। ऐसा अमूर्तिक, ज्ञानाकार, ज्ञान स्वरूप, वीतराग, आनन्दमय जीव द्रव्य अपनी एकता को, अपनी सत्ताको भिन्नर ही रखता है । एक जीवका दूसरे जीव के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । जैसे गेहूँ के दस करोड दाने एक स्थल पर रक्खे हैं, हरएक दाना गेहूँ का अलग अलग है । यद्यपि गेहूँ के गुणोंकी अपेक्षा सब गेहूँके दाने समान हैं,परन्तु सत्ता सबकी अलग २ है । गेहूँका व्यापारी दस करोड़ गेहूँके दानोंमें से किसीको ५००, किसीको १०००, किसीको १००००, किस्सीको १००००० दाने बेच देताहे । लेनेवाले कोई थोडा आटा वनाते हैं, कोई ज्यादा बनाते हैं, आटे की रोटी, पूरी बनाते हैं, खाने, हैं, उन खाए हुए गेहूँका रस रुधिर मल आदि बनता है । जब कि बहुत से रेहूँ आटे के रूप मे मटके में भरे रहते हैं, कितने ही गहूँ के रूप में ही रहते है । यदि दस करोड गेहूँ की एक ही सत्ता हो तो जहां एक गेहूँ जावे वहा दूसरा भी जावे, एक पीसा जावे तो दूसरा भी पीसा जावे । एक चवाया जावे तो दूसरा भी चवाया जावे सो ऐसा नहीं है। गेहूँ के स्वभाव की अपेक्षा दस करोड़ गेहूँ समान है तो भी हर एक दाना गेहूँ का अपनी अपनी भिन्न भिन्न सत्ता रखता है, इसी तरह सर्व जीव अपनी अपनी भिन्न भिन्न सत्ता रखते हैं तब ही एक ही समय मे कोई शरीर में आता है, कोई शरीर को छोड़ता है, कोई दुखी होता है, कोई सुखी होता है, कोई क्रोधी है तो सहज-सुख-साधन । [१०९ - कोई शांत है, कोई विशेष ज्ञानी है, कोई कम ज्ञानी है, कोई सोता है, कोई नागता है, कोई पढाता है, कोई पढता है कोई लडता है,कोई प्यार करता है कोई खाता है,कोई मलमूत्र करता है,कोई रोता है,कोई हसता है, कोई न्याय करता है, कोई दड पाता है, कोई लिखता है, कोई रगता है, कोई पीसता है, कोई हल भोतता है, कोई सोता है, कोई धोता है, कोई नहाता है, कोई कपडे पहनता है, कोई कपडे उतारता है, कोई ध्यान करता है, कोई गाता है, कोई बजाता है-सर्व जीव भिन्न भिन्न हैं तब ही सर्व की क्रियाए प्रगट हैं। एक ही जीव की सत्ता बन नहीं सकती। एक ही समय में एक चोरी करता है, एक रक्षा करता है, एक हिंसा करता है, एक बचाता है, एक शील खडन करता है, एक शील की रक्षा करता है, एक ठगा जाता है, एक दान करता है, एक दान पाता है । जितने प्रकार के शरीर विश्व में हो सकते हैं उतने प्रकार के लगभग शरीर को एक जीव पुनः पुनः जन्म लेकर व मरकर धारण कर लेवें परन्तु एक जीव दूसरे जीव के साथ कभी मिलकर एक नहीं हो सकता, न एक जीव के खड होकर दो जीव या अनेक जीव वन सकते हैं । जीव अमूर्तीक पदार्थ है। जितने अमूर्तीक पदार्थ होते है वे न कभी परस्पर बंधते हैं न कभी उनके खड होते हैं । मिलना बिछुडना परमाणुओं में होता है जो मूर्तीक है। परमाणु परस्पर मिलकर स्कंध बन जाते हैं, स्कध के खड होकर परमाणु हो जाते हैं। इस तरह जीवों के मिलकर जीव स्कध नहीं होते न उनके खंड होते हैं। . हरएक जीव अकेला है. निराला है, स्वतंत्र है, स्वाधीन है । जब जीव के परके संयोग रहित एकत्र को विचार करते है तब तो यही झलकता है कि हरएक जीव बिलकुल अकेला है, स्वभाव से एक जीव मे न दूसरे जीव हैं न कोई परमाणु या स्कंध है, न कोई कर्म है, न कोई पुण्य है, न पाप है, न राग है, न द्वेष है, न मोह है, न सासारिक सुख है, न दुख है, न शुभ मात्र है, न अशुभ भाव है, न वह एकेन्द्रिय है, न द्वेन्द्रिय है, न तेन्द्रिय है, न चौन्द्रिय है, न पचेन्द्रिय पशु है, न नारकी है, न देव है, न मानव है, न स्त्री है, न पुरुष है, न नपु सक है, न वालक है, न युवा है, न वृद्ध है, न ब्राह्मण है, न क्षत्री है, न वैश्य है, न शूद्र है, न म्लेछ है, न आर्य है, न लघु है, न दीर्घ है, न साधु है, न गृहस्थ है, न बधा है, न खुला है। हरएक जीव सबसे निराला शुद्ध ज्ञाता दृष्टा वीतराग आनन्द मई सिद्ध परमात्मा के समान है। सिद्ध परमात्मा अनेक हैं, वे सर्व ही अपनी अपनी सत्ता भिन्न २ रखते हुए अपने २ ज्ञानानन्द का भिन्न २ अनुभव करते हैं । वे समान होनेपर भी सत्ता से समान नहीं हैं । जीव का एकत्व उसका शुद्ध निज स्वभाव है, यह हमें निश्चय करना चाहिये । परमाणु मात्र भी कोई अन्य द्रव्य या कोई अन्य जीव या कोई अन्य औपाधिक भार इस जीव का नहीं है। यह जीव रागादि भाव कर्म, ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म व शरीरादि नो कर्म से भिन्न है । यह बिलकुल निराला स्वतत्र है। Every soul is quite distinct and independent being. अशुद्ध अवस्था में भी हरएक को अकेले ही जगत मे व्यवहार करना पडता है, हरएक अपनी हानि व लाभ का स्वय उत्तरदायित्व रखता है, हरएक अपने सुख को व दु ख को आप अकेले भोगता है, हरएक अपनी हानि व लाभ का स्वय उत्तरदायित्व रखता है, हरएक अपने सुख को व दुःख को आप अकेले भोगता , हरएक अपनी उन्नति व अवनति स्वय करता है। हम न किसी के कोई न हमारा, झूठा है जग का व्यवहारा" यह लोकोक्ति बिलकुल सत्य है । यह जीत्र व्यवहार में भी अकेला है, अशरण है, निश्चय से भी अकेला व अशरण है। जैन शास्त्रों मे प्राचार्यों ने जो वाक्य जीव के एकत्व के सम्बन्ध मे कहे है उनका दिग्दर्शन नीचे प्रमाण है- -
११०]
जीव का एकत्व।
(१) श्री कुन्दकुन्दाचार्य द्वादशानुप्रेक्षा में कहते हैं-
एको करेदि कम्मं एको हिंडदि य दीहसंसारे ।
एको जायदि मरदि य तस्स फलं भुजदे एकको ॥१४॥
भावार्थ-यह ससारी प्राणी अकेला ही कमी को घांधता है, अकेलाही इमअपार मंमार में भ्रमण करता
है, अकेला ही यह जन्मता है, अकेला ही मरता है, अपने कमी का फल भी अकेला ही भोगता है।
एक्का करेदि पावं विमय णिमिण तिब्बलोहेण ।
णिरयतिरियेसु जीवो तस्स फलं भुजदे एक्को ॥ १५ ॥
भावार्थ-
यह प्राणी विषयों के लिये तीव्र लोभी होकर अकेला ही पाप वांधता है, वही जीव नारकी व
तिर्यच होकर अकेला ही उस पापकर्म का फल भोगता है ।
एको करेदि पुरणं धम्मणित्तरेण पत्तदाणेण ।
मणुवदेवेसु जीवो तस्स फलं भुजदे एको ॥१६॥
भावार्थ-यह अकेला ही धर्म के निमित्त पात्रो को दान देकर पुण्य को बाधता है तथा उम पुण्य का
फल अकेला ही देव तथा मनुष्य भव में भोगता है।
एक्कोहं णिम्ममो सुद्धोणाणदंसणलखणो ।
सुद्धयत्तमुपादेयमेवं चिंतेइ सव्वदा ॥२०॥
भावार्थ-मैं निश्चय से एक अकेला हूँ, मेरा कोई भी अन्य नहीं है, मैं शुद्ध हूँ, ज्ञान दर्शन लक्षणवाला
हूँ तथा शुद्ध भाव की एकता से ही अनुभव करने योग्य हूँ, ऐसा ज्ञानी सदा चिन्तवन करता है ।
मणिमतोसहरक्खा हयगयरहो य सयलविज्जायो।
जीवाणं ण हि सरणं तिसु लोए मरणसमयम्हि ॥८॥
भावार्थ-जब प्राणी के मरण का समय आता है तब मणि, मत्र, औषधि, राख, घोड़े, हाथी, रथ व
सर्व विद्याएं कोई भी प्राणी को मरण से बचा नहीं सकती हैं।
जाइजरमरणरोगभयदो रक्खेदि अप्पणो अप्पा ।
तम्हा आदा सरणं बंधोदयसत्तकम्मवदिरित्तो ॥११॥
भावार्थ-जन्म, जरा, मरण, रोग व भय से आत्मा ही अपनी रक्षा आप कर सकता है । इसलिये बध,
उदय, सत्वरूप कमी से मुक्त शुद्ध आत्मा ही अपना रक्षक है ।
अरुहा सिद्धा आइरिया उवझाया साहु पंचपरमेष्ठी ।
ते पि हु चेद्विदि जम्हा तम्हा श्रादा हु मे सरणं ॥१२॥
सहज-सुख-साधन [१११ -- भावार्थ- अरहत, सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय तथा साधु ये पाचों परमेष्ठी आत्मा का ही अनुभव करते हैं। इसलिये मेरे को भी एक अपना आत्मा ही शरण है। सम्मत्त सरणाणं सच्चारित्तच सत्तवो चेव । चउरो चेदि आदे तम्हा श्रादा हु मे सरणम् ॥१३॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र व सम्यक् तप ये चारो ही आत्मा के ध्यान से सिद्ध होते हैं इसलिये मेरे को एक अपना आत्मा ही शरण है । (२) श्री कुदकु'दाचार्य समयसार में कहते हैं: अहमिक्को खलु सुद्धो, दंसणणाणमइयो सयारूवी । णवि अस्थि मज्झ किचित्र अएणं परमाणुमित्त वि ॥४३॥ भावार्थ-मैं एक अकेला हूँ, निश्चय से शुद्ध हूँ, दर्शन शानमयी हूँ, सदा अरूपी हूँ । अन्य एक परमाणु मात्र भी मेरा नहीं है। जीवस्स णत्थि वराणो णवि गंधो णवि रसो णवि य फासो। णवि रू ण सरीरं णवि संठाणं ण संघदणं ॥५॥ भावार्थ-जीव के निश्चय से न कोई वर्ण है, न कोई गध है, न कोई रस है, न कोई स्पर्श है, न कोई रूप है, न कोई सहनन (हड्डी का प्रकार) है। जीवस्स णस्थि रागो णवि दोमो णेच विज्जदे मोहो । णो पच्चया ण कम्मं णोकम्मं चावि से णत्थि ॥५६॥ भावार्थ- "जीव के न तो राग है, न कोई द्वेष है, न कोई मोह है, न कर्म आने का भाव आस्रव है, न कर्म है, न शरीरादि नोकर्म हैं। जीवस्स णत्थि वग्गो ण वग्गणा णेय फड्ढया केई । णो अझप्पट्टाणा व य अणुभायठाणा वा ॥५७॥ भावार्थ- -जीव के न कोई वर्ग है (फलदान शक्ति का अश है), न कोई वर्गणा (कर्म स्कध ) है, न स्पर्द्धक (वर्गणा समूह) है, न रागादि अध्यवसाय स्थान हैं, न फलदान शक्तिरूप अनुभाग स्थान हैं। जीवस्स णत्थि केई जोगट्ठाणा ण बंधठाणा वा । णे वय उदयद्वाणा णो मग्गण हाणया केई ।।५८|| भावार्थ-जीव के न कोई योग स्थान (मन, वचन, काय के व्यापार) हैं न वध स्थान हैं न कर्म के उदय स्थान हैं, न गति इन्द्रिय आदि मार्गणा के स्थान हैं। 1
११२]
जीव का एकत्व
णो ठिदि बंधट्ठाणा जीवस्स ण संकिलेसठाणा वा ।
व विसोहिहाणा णो संजमलद्धिठाणा चा ॥५॥
भावार्थ-
--
-
-इस जीव के न कोई स्थितिबध स्थान हैं, न कोई सक्लेश भावके स्थान है न विशुद्धि के
स्थान हैं न संयम लब्धि के स्थान हैं।
णेव य जीवठाणा ण गुणट्ठाणा य अस्थि जीवस्स ।
जेण दु एदे सव्वे पुग्गलव्वस्स परिणामा ।। ६० ॥
भावार्थ-जीव के न कोई जीव समास अर्थात् जीवों के भेद हैं न गुणस्थान अर्थात् उन्नति की श्रेणियां
हैं क्यों कि ऊपर लिखित ये सब पुद्गल द्रव्य के संयोग से होनेवाली अवस्थाए हैं । जीव का निज
स्वभाव नहीं है।
अहमिक्को खलु सुद्धो य णिम्ममो णाणदमणममग्गो ।
तमि ठिदो तच्चित्तो सव्वे एदे खयं णेमि ।। ७८ ॥
भावार्थ-मैं निश्चय से एक हूँ, शुद्ध हूँ, ममत्व रहित हूँ, ज्ञानदर्शन से पूर्ण हूँ, मैं अपने शुद्ध आत्मा के
स्वरूप मे स्थित होता हुआ व उसी में तन्मय होता हुआ इन सर्व ही क्रोधादि भावों को नाश करता हूँ।
परमट्ठो खलु समओ सुद्धो जो केवली मुणी णाणी ।
तमिठिदा सम्भावे मुणिणो पति णिव्वाणं ॥ १५८ ॥
भावार्थ- आत्मा निश्चय से परम पदार्थ है, शुद्ध है, केवली है, मुनि है, ज्ञानी है। उसी के स्वभाव में
जो लय होते हैं वे मुनि निर्वाण पाते हैं।
उवोगे उवयोगो कोहादिसु णस्थि कोवि उवयोगो।
कोहे कोहे चेव हि उवोगे णत्थि खलु कोहो ॥१७१॥
भावार्थ-ज्ञानोपयोगी आत्मा में ज्ञानोपयोग धारी आत्मा है, क्रोधादि मे कोई भी ज्ञानोपयोग नहीं है।
क्रोध में क्रोध है, उपयोग में कोई क्रोध नहीं है । भावार्थ क्रोध भिन्न है, आत्मा भिन्न है ।
अष्ठवियप्पे कम्मे णोकम्मे चावि णत्थि उवोगो।
उवोगझिय कम्से णोकम्मे चावि णो अत्थि ॥१७२।।
भावार्थ-आठ प्रकार कर्म में व शरीरादि नोकर्म में भी ज्ञानोपयोगी अात्मा नहीं है, न ज्ञानोपयोगी
श्रात्मा मे कर्म व नोकर्म हैं।
(३) भी कूदकदाचार्य प्रवचनमार में कहते हैं:-
णाहं देहो ण मणो ण चेव वाणी ण कारणं तेसि ।
कत्ता ण ण कारयिदा अणुमत्ता व कत्तीणं ॥७१॥
सहज-सुख-साधन [११३ - भावार्थ-निश्चय से मै आत्मा अकेला हूँ, न मै देह हूँ, न मैं वचन हूँ, न मैं मन हूँ, न मैं मन, वचन, काय का कारण हूँ, न मैं इनका कर्ता हूँ, न करानेवाला हूँ, न करनेवालो की अनुमोदना करनेवाला हूँ । णा होमि परेमि ण गे परे सन्ति णाणमहमेको । इदि जो भायदि झाणे सो अप्पाण हवदि झादा ॥१०३॥ भावार्थ-ज्ञानी जानता है कि निश्चय से न मै शरीरादि का हूँ न शरीगदि मेरे हैं। मैं तो एक ज्ञान स्करूप शुद्व हूँ, ऐसा जो ध्यान में ध्याता है वही आत्मध्यानी होता है। एवं णाणप्पाणं दसणभृदं अदिदियमहत्थं । धुवमचलमणालंवं मण्णेऽह अपगं सुद्ध॥१०४॥ भावार्थ-मैं अपने आत्मा को ऐसा मानता हूँ कि यह आत्मा परभावों से रहित निर्मल है, निश्चल एकरूप है, ज्ञानस्वरूप है, दर्शनमयी है, अतीन्द्रिय है, महान पदार्थ है, निश्चल है, तथा परद्रव्य के आलम्बन से रहित स्वाधीन है। देहा वा दविणा वा सुहदुक्खो वाऽध सत्त मित्तजणा । जीवस्स ण सति धुवा धुवोवोगप्पगो अप्पा ॥१०॥ भावार्थ-औदारिक आदि पांच शरीर अथवा धन धान्यादिक अथवा इष्ट अनिष्ट पंचेन्द्रियों के सुख तथा दुःख अथवा शत्रु मित्र आदि लोक कोई भी इस जीव के नहीं है, ये सब नाशवंत हैं, जब कि जीब ज्ञान दर्शन स्वरूप अविनाशी द्रव्य है। (४) श्री कुदकुंदाचार्य भावपाहुड में कहते हैं:- एगो मे सस्सदो अप्पा णाणदंसणलक्षणो। सेमा मे बाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्खणा ॥५६।। भावार्थ मेरा आत्मा एक अकेला है. अविनाशी है, ज्ञान व दर्शन लक्षणधारी है, रागादि मर्व भाव मेरे नहीं हैं वे सब कर्म के सयोग से उत्पन्न हुए हैं। कत्ता भोइ अमुत्तो सरीरमित्तो अणाइनिहणो य । दसणणाणुवोगो णिट्ठिो जिणवरिंदेहिं ॥१४८॥ यह जीव निश्चय से अपने ही शुद्ध भावों का कर्ता है व शुद्व भावों का भोक्ता है, अमृर्तीक है, शरीर प्रमाण आकारधारी है, ऐसा जिनेन्द्रों ने कहा है। (५) श्री ,दकुदाचार्य ने मोक्षपाहुड़ में कहा है:- दुट्टकम्मरहियं अणोवमं णाणविग्गहं णिच्च । सुद्धजिणेहिं कहियं अप्पाणं हवइ सहव्वं ॥१८॥ भावार्थ- यह ११४] जीव का एकत्र । ३ भावार्थ-यह आत्मा एक सत् द्रव्य है, दुष्ट आठ कमी से रहित है, अनुपम है, ज्ञानाकार है, अविनाशी है, व शुद्ध है, ऐसा जिनेन्द्रों ने कहा है। सिद्धो सुद्धो आदा सव्वण्हू सव्वलोयदरसी य । सो जिणवरेहि भणियो जाण तुमं केवलं गाणं ॥३॥ भावार्थ- आत्मा ही सिद्ध है, शुद्ध है, सर्वज्ञ है, सर्वलोकदर्शी है, यही केवल ज्ञानमय है ऐसा जिनेन्द्रों ने कहा है। (६) श्री शिवकोटि आचार्य भगवती आराधना में कहते हैं- णिरुवक्कमस्स कम्मस्म, फले समुवट्ठिदंमि दुक्खमि । जादिजरामरणरुजा-, चिंताभयवेदणादीए ॥ १७३४ ॥ जीवाण णस्थि कोई, ताणं सरणं च जो हविज इदं । पायालमदिगदो विय, ण मुच्चइ सकम्मउदयाम्म ।। १७३५ ॥ भावार्थ-उदय आनेपर ना इलाज ऐसा कर्म का फल जब होता है तब जन्म जरा, मरण, रोग, चिंता, भय, वेदना, दुःख जीवों के ऊपर यकायक आजाता है, उस समय कोई रक्षा करने वाला नहीं होता है । जिस जीव पर इनका आक्रमण होता है, उस अकेले को ही भोगना पड़ता है । यदि जीव पाताल में भी चला जावे तो भी उदय में प्राप्त कर्म फल दिये बिना नहीं रहता है। दंसणणाणचरित्त तवो य ताणं च होइ सरणं च । जीवस्स कम्मणासण, हेदु कम्मे उदिएणम्मि ॥ १७४६ ॥ भावार्थ-जीव के कर्म की उदीरणा या तीव्र उदय होते हुए कर्म के नाश करने को सम्यग्दर्शन ज्ञा। चारित्र तप ही परम शरण हैं और कोई अन्य रक्षक नहीं है। पावं करेदि जीवो, बंघवहेदु सरीरहेदु च । णिरयादिसु तस्स फलं, एको सो चेव वेदेदि ॥ १७४७ ।। भावार्थ जीव अपने बाधवों के निमित्त व अपने शरीर के लिये पाप कर्म करता है बहुत धारभ व परिग्रह में लीन होकर ऐसा पाप वध करता है जिसका फल नरकादि कुगति में अकेला ही इसको भोगना यह पड़ता है। रोगादिवेदणाओ, वेदयमाणस्स णिययकम्मफलं । पेछंच्ता वि समक्खं, किंचिवि ण करंति से णियया ।। १७४८ ।। भावार्थ-अपने कर्म का फल रोगादि वेदना है उसको भोगते हुए जीव को कोई दुःख दूर नहीं कर सकता कुटुम्ब परिवार के लोग सामने बैठे देखते रहते है तो भी वे कुछ नहीं कर सकते हैं तब और कौन दुःख दूर कर सकेगा?
सहज-सुख-साधन।
[११५
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णीया अत्था देहा-, दिया य संगा ण कस्स इह होति ।
परलोगं मुएिंणता, जदि वि दइगंति ते सुट्ठ ॥ १७५० ।।
भावार्थ -परलोक को जाते हुए जीव के साथ स्त्री, पुत्र, मित्र, धन, देहादिक परिग्रह कोई नहीं जाते हैं,
यद्यपि इसने उसके साथ बहुत प्रीति करी है तो भी वे निरर्थक हैं, साथ नहीं रहते।
होऊण अरी वि पुणो; मिचं उवकारकारणा होइ ।
पुत्ता वि खणेण अरी, जायदि अश्यारकरणेण ॥ १७६१ ।।
तम्हा ण कोड कस्मइ, सयणो व जणो व अत्थि संसारे ।
वज्ज पडि हुंति जगे, णीया व अरी व जीवाणं ॥ १७६२ ।।
भावार्थ -बैरी भी हो परन्तु यदि उसको उपकार करो तो मित्र हो जाता है, तथा अपना पुत्र भी
अपकार किये जाने पर क्षण में अपना शत्रु हो जाता है, इसलिये इस जगत में कोई किसी का मित्र व
शत्रु नहीं है, स्वारथ के वश ही जगत में मित्र व शत्रु होते हैं।
जो जस्स वट्टदि हिदे, पुरिसो सो तस्स बधवो होदि ।
जो जस्स कुणदि अहिदं, सो तस्म रित्ति णायव्यो ॥ १७६३ ॥
भावार्थ-जिसका जो हित करता है वह उसका बाधव होजाता है व जो जिसका अहित करता है वह
शत्रु हो जाता है।
(७) श्री पूज्यपाद स्वामी इष्टोपदेश में कहते हैं:-
वपुगृहं धनं दाराः पुत्रा मित्राणि शत्रवः ।
सर्वथान्यस्वभावानि मूढः स्वानि प्रपद्यते ।।८।।
भावार्थ-शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र, शत्रु आदि सर्व का स्वभाव अपने से जुदा है, तो भी मढ़
पुरुप उनको अपना मान लेता है।
दिग्देशेभ्यः खगा एत्य संवसंति नगे नगे ।
स्वस्त्रकार्यवशायांति देशे दिक्षु प्रगे प्रगे ।।६।।
भावार्थ-पक्षीगण भिन्न भिन्न देशो से आकर सध्या के समय वृक्ष पर बैठ जाते हैं, मवेरा होते होते
अपने अपने कार्यवश भिन्न भिन्न दिशाओं मे उड जाते हैं, इसी तरह कुटुम्ब के लोग हैं, किसी का किसीसे
सम्बन्ध नहीं है।
एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगीन्द्रगोचरः ।
वाद्याः संयोगजा भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ॥२७॥
११६] जीर का कन्य न - भावार्थ- मैं एक 'अकेला हूँ, मेग कोई नहीं है, मैं निश्चय मे शुद्ध है, मानी हैं, योगियों के ध्यानगम्य हूँ, जितने कर्म के मयोग से होनेवाले भाव में चे मत्र बिलकुल मेरे से भिन्न हैं। से मृत्युः कुतो भीतिर्न में व्याधिः कृतो व्यथा । नाहं बालो न वृद्वोऽहं न युवनानि पुद्गले ॥२६॥ भावार्थ-मे प्रात्मा हूँ, मेग मरण नहीं, गुरे मरने से क्या भय ? न मेरे में रोग है, मुझे रोग का क्या कए न मैं बालक हूँ, न मैं युनान हूँ, न मैं नद, ये मप गरीरमयी पुरन की अवस्थाए हैं, मैं उनसे भिन्न हूँ। बस्मिन्सद मिला पित्वादभीष्टलापकन्वतः । स्वयं हितप्रयोक्तवादात्मयगुलगत्मनः ॥३४ ॥ भावार्थ आत्मा का सच्चा गुम अपना 'यामाही है. अपने ही में अपना भला करने को उच्छा होती है । आप ही अपने हित को जानता है व 'पाप ही अपने को हिन मागन मे प्रेरणा करता है। (८) श्री पूज्यपादम्बामी समाधिशतक में कहते हैं:- दहेप्यान्मधिया जाताः पुत्र भार्यादिकल्पनाः । सम्पत्तिमात्मनम्ताभिमन्यते हा हतं जगत् ॥ १४ ॥ भावार्थ-शरीर को अपना मानने मे ही पुत्र, स्त्री आदि फी मान्यनाए हो जाती है इसलिये अज्ञानी उन्हीं स्त्री, पुत्रादि को अपना मानना हुआ नए हो रहा है। यदग्राह्यन गहणाति गृहीतं नापि मुञ्चति । जानाति सर्वथा मर्व तत्स्वमवेद्यमस्म्यहम् ॥ २० ॥ भावार्थ-जो आत्मा से भिन्न है. वह ग्रहण करने योग्य नहीं है, उसे यह कभी ग्रहण नहीं करता है। जो इसका स्वभाव है, जिसे यह ग्रहण किये हुए है उसे यह कभी छोडता नहीं है। जो सर्व को सर्वधा जानता है और स्वानुभवगम्य है वही मैं हूँ । येनात्मनाऽनुभूयेऽहमात्मनैवात्मनात्मनि । सोऽहं न तन्न सा नासो नैको न द्वौ न वा बहुः ॥२३॥ भावार्थ-जिस स्वरूप से मैं अपने में अपने द्वारा अपने को अपने समान ही अनुभव करता हूँ वही मैं । न मैं पुरुप हूँ, न स्त्री हूँ, न नपु सक हूँ, न मैं एक हूँ, न दो हूँ, न मैं बहुवचन हूँ। यदभावे सुषुप्तोऽहं यद्भावे व्युत्थितः पुनः । अतीन्द्रियमनिर्देश्यं तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ॥ २४ ॥ भावार्थ- स्वरूप के न जानने से मै सोया हुआ था व जिस स्वरूप के जानने से मै जाग उठा यह मेरा स्वरूप इन्द्रिय गोचर नहीं है, कथन योग्य नहीं है । मात्र मैं अपने से ही अनुभव गोचर ह । Dhco -जिस - सहज-सुख-साधन। [११७ क्षीयन्तेऽत्रैव रागाद्यास्तचतो मां प्रपश्यतः । बोधात्मानं ततः कश्चिन्न मे शत्रुर्न च प्रियः ॥ २५ ॥ भाषार्थ- -जब मैं निश्चय से अपने ज्ञान स्वरूप को अनुभव करता हूँ तब मेरे रागादिभाव सब नाश हो जाते हैं इसलिये इस जगत मे न कोई मेरा शत्रु है, न कोई मेरा मित्र है। मामपश्यन्नयं लोको न मे शत्रन च प्रियः । मां प्रपश्यन्नयं लोको न मे शत्रुने च प्रियः ॥ २६ ॥ भावार्थ-यह जगत् मेरे सच्चे शुद्ध स्वरूप को देखता ही नहीं है, इसलिये न मेरा शत्रु हो सकता है न मित्र तथा जो ज्ञानी मेरे शुद्व स्वरूप को देखता है वह भी मेरा शत्रु या मित्र नहीं हो सकता है । यः परात्मा स एवाहं योऽहं स परमस्ततः । अहमेव मयोपास्यो नान्यः कश्चिदिति स्थितिः ।। ३१ ।। भावार्थ-जो कोई परमात्मा है यह मैं ही हूँ। तथाजो मैं हूँ । वही परमात्माका स्वरूप है। इसलिये मै ही अपनी श्राराधना करता हूँ। और किसकी मेवा करू यही सत्य बात है। यत्पश्यामीन्द्रियै स्तन्मे नास्ति यन्नियतेन्द्रियः । अन्तः पश्यामि सानदं तदस्तु ज्योतिरुत्तमम् ॥ ५१ ।। भावार्थ-जो कुछ में इन्द्रियों से देखता हूँ वह मेरा नहीं है । जब मैं इन्द्रियों को रोककर अपने भीतर देखता हूँ तो वहां परमानन्द मयी उत्तम ज्ञानज्योति को पाता हूँ, वही मैं हूँ नयत्यात्मानमात्मैव जन्मनिर्वाणमेव च । गुरुरात्मात्मनस्तस्मान्नान्योऽस्ति परमार्थतः ॥ ७५ ॥ भावार्थ-यह आत्मा आप ही अपने को संसार में भ्रमण कराता है व आप ही अपने को निर्वाण मे ले जाता है । इमलिये परमार्थ से आत्मा का गुरु आत्मा ही है और कोई गुरु या रक्षक नहीं है । (8) श्री गुणभद्राचार्य आत्मानुशासन में कहते हैं:- शरणमशरण वो बंधवो बंधमूलम् । चिरपरिचितदारा द्वारमापद्गृहाणाम् । विपरिमृशत पुत्राः शत्रवः सर्वमेतत् । त्यजत भजत धर्म निर्मल शर्मकामाः ।। ६० ॥ भावार्थ-यह तेरा घर तुझे मरणादि आपत्तियों से बचा नहीं सकता, ये तेरे बाधव तेरे स्नेह पाश मे वांधनेवाले हैं, दीर्घ काल की परिचित स्त्री आपदाओं के घर का द्वार है, ये तेरे पुत्र हैं, वे भी तेरी आत्मा के शत्रु हैं । इन सर्व से मोह छोड़ । यदि तू सहज सुख को चाहता है तो निर्मल धर्म का सेवन कर । 1 .
११८] जीव का एकत्व तत्कृत्यं किमिहेन्धनैरिव धनैराशाग्निसंधुक्षणः । सम्बन्धेन किमङ्ग शश्वदशुभैः सम्बन्धिभिर्बन्धुभिः । कि मोहाहिमहाविलेन सदृशा देहेन गेहेन वा । देहिन् याहि सुखाय ते सममम मा गाः प्रमादं मुधा ।। ६१ ॥ भावार्थ-हे प्राणी । तेरे पास यह जो धन है सो आशारूपी अग्नि को बढाने के लिये ईंधन के समान है, तथा हे भव्य ! तेरे सबधी बधुओं से तुझे क्या लाभ जिनके निमित्त से सदा तू अशुभ में प्रवृत्ति करता है, तथा यह देह रूपी घर, मोहरूपी सर्प का बिल है, इससे भी क्या ? तू इन सबसे स्नेह छोड और एक समताभाव को भज उसी से तुझे सुख होगा, प्रमाद मत कर । अकिञ्चनोऽहमित्यासस्व त्रैलोक्याधिपतिर्भवेः । योगिगम्यं तव प्रोक्तं रहस्य परमात्मनः ॥११०॥ भावार्थ-मेरा कोई नहीं है, मैं अकेला हूँ ऐसी भावना कर, इसी से तू तीन लोक का स्वामी हो जायगा। यह योगियों के जानने लायक भेद तुझे कहा गया है । इसी से परमात्मा का स्वरूप प्रगट होता है। ममेदमहमस्येति प्रीतिरीतिरिवोत्थिता । क्षेत्रे क्षेत्रीयते यावत्तावत् का सा तपाफले ॥२४२।। भावार्थ- 'यह शरीर मेग और मैं इसका, यह प्रीति इति या अकस्मात् टीड़ीदल, मृपकदल आदि के समान उपद्रव की करनेवाली है । जवतक शरीर में आत्मा मोहित है तबतक तप के फलकी आशा क्या अर्थात तब तक तप से मोक्ष पाने की आशा करनी वृथा है । मामन्यमन्य मां मत्वा भ्रान्तो भ्रान्तौ भवार्णवे । अमिता नान्योऽहमहमेवाहमन्योऽन्योऽन्योऽहमस्ति न ॥२४३।। भावार्थ-मरमाबुद्धि के होने पर तू ने अपने को शरीर रूम जाना और कायादिक को अपना सभात्र जाना । इस विपरीत ज्ञान से तू समार रूपी समुद्र में भ्रमण करता रहा । अब तू यह जान कि मैं पर पदार्थ नहीं हूँ, मैं मैं ही हूँ पर पर ही हैं, उनमें मैं नहीं, सो मैं नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ, और सब मुझ से भिन्न है। क्षीरनीरवदभेदरूपतस्तिष्ठतोरपि च देहदेहिनोः । भेद एव यदि भेदवत्स्वल बाह्यवस्तुषु वदात्र का कथा ॥२५३॥ भावार्थ-जिस देह के साथ इस जीव का दूध पानी के समान सम्बन्य चला आ रहा है वह देह ही जब जीव से भिन्न है तव और बाहरी चेतन व अचेतन पदार्थ की क्या कथा ? वे तो अपने से भिन्न ही है। तंजम व कामण शरीर भी जीव का नहीं है। तप्तोऽहं देहसंयोगाज्जलं वाऽनलमंगमात् । इह देहं परित्यज्य शीतीभूताः शिवैषिणः ॥२५४|| . न व सहज-सुख-साधन । [११९ भावार्थ-ज्ञानी विचारता है कि मै इस देह के सयोग से उसी तरह दुःखी रहा जैसे अग्नि के सयोग से पानी सतापित होता है। इसीलिये कल्याण के अर्थी साधुओं ने देह का ममत्व छोड़कर शाति लाभ की। अजातोऽनश्वरोऽमू : कर्ता भोक्ता सुखी बुधः । देहमात्री मलैमुनो गत्वोद्ध मचल प्रभः ॥२६६॥ भावार्थ-यह आत्मा कभी पैदा हुआ नहीं इससे अजन्मा है, कभी नाश नहीं होगा इससे अविनाशी है, अमूर्तीक है, अपने स्वभावों का कर्ता व अपने सहज सुख का भोक्ता है, परम सुखी है, ज्ञानी है, शरीर मात्र आकारधारी है, कर्ममलों से रहित लोकान जाकर ठहरता है, निश्चल है तथा यही प्रभु है, परमात्मा है। (१०) श्री नागसेन मुनि तत्यानुशासन में कहते हैं: तथा हि चेतनोऽसंख्यप्रदेशो मूर्तिवर्जितः । शुद्धात्मा मिगुरूयोऽस्मि ज्ञानदर्शनलक्षणः ॥१४७॥ भावार्थ-मैं चैतन्य हूँ, लोकप्रमाण असख्यात प्रदेशी हूँ, अमूर्तीक हूँ, शुद्धात्मा हूँ, सिद्ध समान हूँ व ज्ञानदर्शन लक्षणधारी हूँ। नान्योऽस्मि नाहमस्त्यन्यो नान्यस्याहं न मे परः । अन्यस्वन्योऽहमेवाहमन्योन्यस्याहमेव मे ॥१४८|| भावार्थ-अन्य मैं नहीं हूँ, मैं अन्य नहीं हूँ, न मैं अन्य का न अन्य मेरा है । अन्य है सो अन्य है, अन्य अन्य का है, मैं ही मेरा हूँ। भावार्थ - आत्मा सब से भिन्न हैं। अन्यच्छरीरमन्योऽहं चिदहं तदचेतनं । अनेकमेतदेकोऽहं क्षयीदमहमक्षयः ॥१४६॥ भावार्थ-शरीर जुदा है मैं जुदा हूँ मैं चेतन हूँ शरीर अचेतन जड है । शरीर अनेक परमाणुओं से रचा गया है, मैं एक अखड हूँ। शरीर नाशवन्त है, मैं अविनाशी हूँ। सद्व्यमस्मि चिदहं ज्ञाता द्रष्टा सदाप्पदासीनः । स्वोपानदेहगात्रस्तत. पृथग्गगनवदमनः ।।१५३।। भावार्थ-मैं सत द्रव्य हूँ, चेतन स्वरूप हूँ, ज्ञाता दृष्टा हूँ सदा ही उदासीन हूँ । अपने प्रति देह के श्राकार हूँ, तो भी आकाश के समान देह से जुदा हूँ। (११) श्री अमृतचद्राचार्य पुरुषार्थमिद्धयु पाय में कहते हैं: अस्ति पुरुषश्चिदात्मा विवर्जित स्पर्शगधरसवणः । गुणार्ययममवेतः समाहितः समुदयव्ययध्रौव्यैः ।।६।। मैं मैं हूँ, । ।
जीव का एकत्त। १२०] । - 4 भावार्थ- यह प्रात्मा चैतन्य स्वरूप है, स्पर्श, रस, गंध वर्ण से रहित जानादि गुण व उनकी शुद्ध पर्यायों को रखने वाला है । स्वभाव से ध्रुव है, परिणमन की अपेक्षा उत्पाद व्यय स्वरूप है। (१२) श्री अमृतचंद्राचार्य तत्वार्थसाग्में कहते हैं:- कस्याऽपत्यं पिता कस्य कस्याम्बा कस्य गेहिनी । एक एव भवाम्भोधी नीवो भ्रमति दुस्तरे ॥ ३४ ६ ॥ भावार्थ-फिसका पुत्र, किसका पिता, क्रिमकी माता, किमको नी ? यह जीव इस दुस्तर समार-ममुद्र में अकेला ही भ्रमता रहता है। अन्यः सचेतनो जीवो वपुरन्यदचेतनम् । हा तथापि न मन्यन्ते नानात्वमनयोजनाः ॥ ३५-६ ॥ भावार्थ-यह जीव सचेतन है, शरीर से जुदा है. शरीर अचेतन है, जीव से जुदा है । वेद है कि तो भी मानव इन दोनों के भेद को नहीं समझते है। (१३) श्री अमृतचन्द्राचार्य समयसारकलश में कहते हैं:- आत्मस्वभावं परभावभिन्नमापूर्णमाद्यन्तविमुक्तमेकं । विलीनसङ्कल्पविकल्पजालं प्रकाशयन् शुद्धनयोऽभ्युदेति ॥ १०-१ ।। शुद्ध निश्चय से वास्तव में इस श्रात्मा का स्वभाव रागादि परभावों से भिन्न है-अपने जानादि गुणों से पूर्ण है, अनादि अनत है, इसमें संकल्पविकल्प के जाल नहीं हैं, यह सदा प्रकाशमान है। चिच्छक्तिव्याप्तमर्वस्वसारो जीव इयानयं । अतोऽतिरिक्ताः सपि भावाः पोद्गलिका अमी ॥ ३-२ ॥ भावार्थ-यह जीव चैतन्यशक्ति से सम्पूर्ण भरा हुआ है । इसके सिवाय जितने रागादि भाव है वे सब पुद्गल जड़ के रचे हुए है। वर्णाद्या वा रागमोहादयो वा भिन्ना भावाः स एवास्य पुंसः । तेनैवान्तस्तत्वतः पश्यतोऽमी नो दृष्टाः स्युटमेकं परं स्यात् ॥ ५-२ ॥ भावार्थ-वर्ण, गध, रसादि व राग मोहादि भाव ये सब इस आत्मा से भिन्न हैं । जब निश्चय से भीतर देखा जाता है तो ये सब नहीं दिखते हैं, एक उत्कृष्ट आत्मा ही दिखता है। अनाद्यनन्तमचलं स्वसंवेद्यामवाधितम् । जीवः स्वयं तु चैतन्यमुच्चैश्चकचकायते ॥६-२॥ भावार्थ यह जीव अनादि अनत है, स्वभाव से निश्चल है, स्वानुभवगम्य है, प्रगट है, चैतन्यरूप है, अपने ही पूर्ण उद्योतरूप है। भावार्थ-शुद्ध निश्चय से सहज-सुख-साधन। [१२१ शुद्धद्रव्यनिरूपणार्पितमते तत्त्वं समुत्पश्यतो नैकद्रव्यगत चकास्ति किमपि द्रव्यान्तरं जातुचित् । ज्ञान ज्ञेयमवैति यत्तु तदयं शुद्धस्वभावोदयाः किं द्रव्यान्तरचुंबनाचलधियस्तत्वाच्च्यवन्ते जनाः ॥२२-१०॥ भावार्थ- शुद्ध द्रव्य की दृष्टि से देखा जाये तो तत्व का यह स्वरूप है कि एक द्रव्य के भीतर दूसरा द्रव्य कदापि भी नहीं झलकता है । जान जो पदार्थों को जानता है वह ज्ञान के शुद्ध स्वभाव का प्रकाश है, फिर क्यों मूढ जन परद्रव्य के साथ रागभाव करते हुए आकुल व्याकुल होकर अपने स्वरूव से भ्रष्ट होते है ? अन्येभ्यो व्यतिरिक्तमात्मनियत विम्नत् पृथक् वस्तुता- मादानोज्झनशून्यमेतदमलं ज्ञानं तथावस्थितम् । मध्यावन्तविभागमुक्तसहजस्फारप्रभाभासुरः शुद्धज्ञानघनो यथास्य महिमा नित्योदिप्तस्तिष्ठति ॥ ४२-१० ॥ भावार्थ-आत्मा का स्वभाव जो ज्ञान है वह अन्य द्रव्यों में नहीं है। आत्मारूपी द्रव्य में निश्चल ठहरा है, सर्व अन्य पदार्थों से पृथक है। इसमें न किसी का ग्रहण है, न किसी का त्याग है । यह शुद्ध वीतराग है, जैसा है वैसा ही स्थित है, अनादि व अनत है । प्रकाशमान शुद्ध ज्ञान का समूह यह आत्मा अपनी महिमा को लिये हुये नित्य उदय रहता है । (१४) श्री देवसेनाचार्य तत्वसार में कहते हैं- दंगणणाणपहाणो असंखदेसो हु मुत्तिपरिहीणो सगहियदेहपमाणो णायच्यो एरिसो अप्पा ।। १७ ।। भावार्थ-जो दर्शन व ज्ञानमयी है असंख्यातप्रदेशी है अमूर्तीक है, अपनी देह प्रमाण आकारधारी है उसे ही आत्मा जानो। जास ण कोहो माणो माया लोहो य सल्ल लेमाओ । जाडजरामरणं विय णिरंजणो सो अह भणियो ।॥ १६ ॥ भावार्थ-जिसके न क्रोध है, न मान है, न माया है, न लोभ है, न शल्य है, न लेश्याएं है, न जन्म है, न जरा है, न मरण है वही जो निरजन है सो मैं हूँ ऐमा कहा गया है । फासरसख्वगधा सद्दादीया य जस्स णत्थि पुणो। सुद्धो चेयणभावो णिरंजणो सो अह भणियो ।। २१ ॥ भावार्थ-जिसके स्पर्श, रस, वर्ण, गध, शब्दादि नहीं हैं, जो शुद्ध चैतन्यमय पदार्थ है, वही निरजन है, ऐसा ही मैं हूँ यह कहा गया है।
१२२] जीव का एकत्व मलरहिनो णाणमनो णिवसह सिद्धीए जारिसो सिद्धो । तारिसयो देहत्थो परमो वंभो मुणेयव्यो ॥ २६ ।। भावार्थ-जो मलरहित है, ज्ञानमयी है, चरम ब्रह्म स्वरूप है, व सिद्ध गति में विराजमान है, वैसा है आत्मा इस देह में है ऐसा जानना चाहिये । णोकम्मकम्मरहिओ केवलणाणाइगुससमिद्धो जो । सोहं सिद्धो सुद्धो णिच्चो एक्को णिरालंबो ॥२७॥ सिद्धोहं सुद्धोहं अणतणाणाइगुणसमिद्धोहं । देहपमाणो णिच्चो असंखदेसो अमुत्तो य ॥२८॥ भावार्थ-र यह आत्मा निश्चय से नोकर्म तथा कर्म रहित है, केवल ज्ञानादि गुणों से पूर्ण है, शुद्व है, सिद्ध है, अविनाशी है, एक अकेला है, परालम्ब रहित है, वैभा ही मै हूँ - मैं सिद्ध हूँ, शुद्ध हूँ, अनव ज्ञानादि गुणों से पूर्ण हूँ, शरीर प्रमाण आकारधारी हूँ, अविनाशी हूँ, असख्यात प्रदेशी हूँ तथा अमूर्तीक हूँ। (१५) श्री योगेन्द्राचार्य योगसागर में कहते हैं:- जो परमप्पा सो जि हउं जो हउं सो परमप्पु । इउ जाणेविणु जोइत्रा अण्ण म करहु वियप्पु ।।२२।। भावार्थ-जो परमात्मा है वही मैं हूँ, जो मैं हूँ वही परमात्मा हूँ । अर्थात् मेरा स्वभाव परमात्मारूप है। हे योगी ! ऐसा जानकर और विकल्प न कर । सुद्धपएसह पूरियउ लोयोयासपमाणु । सो अप्पा अणुदिण मुणहु पाबहु लहु णिव्याणु ॥२३॥ भावार्थ- यह आत्मा शुद्ध प्रदेशों से पूर्ण है, लोकाकाश प्रमाण है, इसी आत्मा का रात-दिन मनन करो, शीघ्र निर्वाण का लाभ होगा। सुद्ध सचेयण वुद्ध जिणु केवलणाणसहाउ । सो अप्पा अणुदिण मुणहु जइ चाहउ सिवलाहु ॥२६॥ भावार्थ आत्मा शुद्ध है, चैतन्यरूप है, बुद्ध है जिन है, केवलज्ञान स्वभाव है, उसी का रात-दिन मनन करो जो मोक्ष का लाभ लेना चाहते हो । अप्पा दंसणु णाण मुणी अप्पा चरणु वियाणि । अप्पा संजम सील तउ अप्पा पञ्चक्खाणि ॥८०॥ भावार्थ आत्मा ही सम्यग्दर्शन है, आत्मा ही ज्ञान है, अात्मा को ही चारित्र जानो, आत्मा सयम है, शील है, तप है, आत्मा ही त्याग है। - सहज-सुख-सावन । [१२३ - जो अप्पा सुद्ध वि मुणई असुइसरीरविभिएणु । सो जाणइ सच्छइ सयलु सासयसुक्खहलीण ॥४॥ भावार्थ-जो अपने प्रात्मा को इस अशुचि शरीर से भिन्न शुद्ध व अविनाशी सुख मे लीन अनुभव करता है वह सर्व शास्त्रों को जानता है। (१६) श्री अमितगति प्राचार्य सामायिक पाठ में कहते हैं: न सन्ति बाह्या मम केचनार्था, भवामि तेषां न कदाचनाहम् । इत्थं विनिश्चत्य विमुच्य बाह्य, स्वस्थः सदा त्वं भव भद्र मुक्यै ॥२४॥ भावार्थ- कोई भी मेरे आत्मा से बाहर के पदार्थ मेरे नहीं है, न मै उनका कदापि होता हूँ, ऐसा निश्चय करके सर्व बाहरी पढाथों से ममता त्यागकर हे भद्र । सदा तू अपने स्वरूप में स्थिर हो जिससे कि मुक्ति का लाभ हो। एकः सदा शाश्वतिको ममात्मा, विनिर्मलः साधिगमस्वभावः । वहिर्भवाः सन्त्यपरे समस्ता, न शाश्वताः कमभवाः स्वकीयाः ॥२६॥ भावार्थ-मेरा आत्मा सदा ही एक अविनाशी निर्मल ज्ञान स्वभावी है, अन्य रागादि भाव सब मेरे स्वभाव से बाहर हैं, क्षणिक हैं व अपने अपने कमों के उदय से भए हैं। यस्यास्ति नैक्य वपुषापि साद्ध, तस्यास्ति कि पुत्रकलत्रमित्रैः । पृथककृते चर्मणि रोमकूपाः, कुतो हि तिष्ठति शरीरमध्ये ॥२७॥ भावार्थ-जिस आत्मा की एकता इस शरीर के साथ ही नहीं है तो फिर पुत्र, स्त्री, मित्र आदि के साथ कैसे होगी, जिनका सम्बन्ध शरीर से है। ऊपर का चमडा अलग कर देने पर रोमों के छिद्र शरीर मे कैसे पाए जा सकते हैं ? रोमछिद्र चमडे के आश्रय है। संयोगतो दुःखमनेकभेद, यतोऽश्नुते जन्मवने शरीरी । ततस्विधासौ परिवर्जनीयो, यियासुना निवृतिमात्मनीनाम् ॥२८॥ भावार्थ-इस शरीर के सयोग से ही यह शरीरधारी, ससाररूपी वन में अनेक दुखों को भोगता है इसलिये जो अपने आत्मा की मुक्ति चाहता है उसको उचित है कि वह मन, वचन, काय से इस शरीर का ममत्व त्याग करे। सर्व निराकृत्य विकल्पजालं संसारकांतारनिपातहेतुम् । विविक्तमात्मानमवेच्यमाणो निलीयसे त्वं परमात्मतत्त्वे ॥२६॥ भावार्थ-सर्व ही मन के विकल्पो को दूर करके जो ससाररूपी वन में भ्रमण कराने के कारण हैं, सबसे भिन्न अपने प्रात्मा को निश्चय करके तू अपने ही परमात्म स्वरूप मे लय हो ।
१२४] जीव का एवत्त। . (१७) श्री अमितिगति प्राचार्य तत्वभावना में कहते हैं:- नाहं कस्यचिदस्मि कश्चन न मे भावः परो विद्यते । मुक्तमात्मानमपास्तकर्मसमितिं जानेक्षणाल कृतिम् ।। यस्यैपा मतिरस्ति चेतसि सदा जातात्मतत्वस्थितेः । बंघस्तस्य न यत्रित त्रिभुवनं सांसारिकर्वन्धनः ॥१२॥ भावार्थ-सर्व भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म रहित व ज्ञान दर्शन गुणों से विभूपित श्रात्मा को छोड़कर न मैं किसी का हूँ, न कोई परभाव मेरा है । जिग्न तत्वलानी के चित्त में एसी बुद्धि है उसका वध सामारिक वधनों से तीन भुवन में कहीं नहीं होता है। चित्रोपायविवधितोपि न निजो देहापि यत्रात्मनो । भावाः पुत्रकलत्र मित्रतनयाजामाततातादयः ।। तत्र स्वं निजकर्मपूर्ववशगाः केषां भवन्ति स्फुट । विज्ञावेति मनीपिणा निजमतिः कायर्या सदात्मस्थिता ॥ १२ ॥ के उपायों से बढाने पर भी यह देह भी जहा इस आत्मा की नहीं हो सकती तो पुत्र, खी, मित्र, पुत्र, जमाई, बन्धु श्रादि जो अपने २ पूर्व कर्म के वश पाये है व जायग, अपने कैसे हो सकते है ? ऐमा जानकर बुद्धिमान को अपनी बुद्वि सदा ही आत्मा के हित मे करनी योग्य है। मम गेहिनी मम गृह मे बांधत्रा मेंऽगजाः । तातो मे मम संपदो मम सुखं मे सज्जना मे जनाः ।। इत्थं घोरममत्वतामसपशव्यस्तावबोधस्थितिः । शर्माधान विधानतः स्वहिततः प्राणी सनीस्रस्यते ॥ २५ ॥ भावार्थ- मेरी माता है, मेरी स्त्री है, मेरा घर है, मेरे वधु है, मेरा पुत्र है, मेरा भाई है, मेरी सम्पदा है, मेरा सुख है, मेरे सज्जन हैं, मेरे नौकर हैं, इस तरह घोर ममता के वश से तत्वज्ञान मे ठहरने को असमर्थ होकर परम सुख देनेवाले आत्महित से यह प्राणी दूर होता चला जाता है। न वैद्या न पुत्रा न विप्रा न शक्रा, न कांता न माता न भृत्या न भूपाः । यमालिंगितु रक्षितु संति शक्ता, विचिंत्येति कार्य निजं कार्यमायः ॥ ३३ ।। भावार्थ-जिस शरीर को आत्मा जुदा से होते हुए न तो वैद्य बचा सकते हैं, न पुत्र, न ब्राह्मण, न इन्द्र न स्त्री, न माता, न नौकर, न राजागण । ऐसा जानकर आर्य पुरुषों को आत्मा के हित को करना चाहिये, शरीर के मोह मे आत्म हित को न भूलना चाहिये । भावार्थ-अनेक प्रकार माता से 7
सहज-सुख-साधन।
[१२५
भावार्थ- सै
में
विचित्रैरुपायैः सदा पाल्यमानः, स्वकीयो न देहः समं यत्र याति ।
कथं वाह्यभूतानि वित्तानि तत्र, प्रबुद्धयोति कृत्यो न कुत्रापि मोहः ॥ ३४ ॥
भावार्थ-
नाना उपायों से सदा पालते रहते भी जहा यह अपना देह साथ नहीं जा सकता तब बाहरी
पदार्थ किस तरह हमारे हो सकते हैं ? ऐसा जानकर किसी भी पर पदार्थ मे मोह करना उचित नहीं है ।
शरोऽहं शुभधीरहं पटुरहं सर्वाधिकश्रीरहं ।
मान्योहं गुणवानहं विसुरहं पुमामहं बाग्रणीः ।।
इत्यात्मन्नपहाय दुष्कृतकरी त्वं सर्वथा कल्पनाम् ।
शश्वद्ध्याय तदात्मतत्वममलं नैश्रेयसी श्रीर्यतः ।। ६२ ॥
शूर हूँ, बुद्धिमान हूँ, चतुर हूँ, सबसे अधिक धनवान हूँ, मैं मान्य हूँ, मैं गुणवान हूँ,
समर्थ हूँ, मैं सबसे बड़ा मुखिया हूँ। हे आत्मन ! तू इस पापकारी कल्पना को छोड़कर सदा ही अपने निर्मल
आत्म तत्व का ध्यान कर जिससे मोक्ष-लक्ष्मी का लाभ हो।
गौरो रूपधरो दृढ़ः परिवृढः स्थूलः कृशः कर्कशः ।
गीर्वाणो मनुजः पशनरकभूः पंढः पुमानंगना ।।
मिथ्या त्वं विदधासि कल्पनमिदं मूढो विवुध्यात्मनो ।
नित्यं ज्ञानमयम्वभावममलं सर्वव्यपायच्युतम् ।। ७० ।।
भावार्थ-मै गोरा हूँ, मैं रूपवान हूँ, दृढ हूँ, बलवान हूँ, मोटा हूँ, दुबना हूँ, कठोर हूँ, देव हूँ, मनुष्य हूँ,
पशु हूँ, नारकी हूँ, पुरुष हूँ, स्त्री हूँ, नपु सक हूँ । हे मूढ ! तू इस झूठी कल्पना पो को करके अपने आत्मा को
नहीं समझता है, जो नित्य ज्ञान स्वभावधारी है, सर्व मल रहित है व सर्व आपत्तियो से बाहर है।
सचिवमंत्रिपदातिपुरोहितास्त्रिदशखेचरदैत्यपुरंदराः ।
यमभटेन पुरस्कृतमातुर भवभृतं प्रभवति न रक्षितुम् ॥ ११२ ।।
भावार्थ-
-जव मरण किसी ससारी श्रातुर प्राणी पर आता है तव मत्री, पैदल सिपाही, पुरोहित, देव,
विद्याधर, असुर, इन्द्र आदि कोई भी रक्षा नहीं कर सकते है।
विविधसग्रहकल्मषमंगिनो विदधतेंगकुटुम्बकहेतवे ।
अनुभवत्यसुखं पुनरेकका नरकवासमुपेत्य सुदुस्सहम् ।। ११४ ।।
भावार्थ-प्राणी शरीर व कुटुम्ब के लिये नाना प्रकार के पापों को बांधता है परन्तु उनका फल उस
अकेले को ही नरक
में जाकर असहनीय
दुःख
भोगना पडता है।
(१८) श्री चन्द्रजी वैराग्यमणिमाला में कहते हैं
एको नरके याति वराकः स्वर्गे गच्छति शभस विवेकः ।
राजाप्येकः स्याञ्च धनेशः एकः स्यादविवेको दासः ॥ ६ ॥
. . मेरे स्वभाव १२६] जीत का एकत्व एको गेगी शोकी एको दुःसविहीनी दाबी एकः । व्यवहारी च दरिद्री एक एकाकी भ्रमतीह वराकः ॥ १० ॥ भावार्थ-यह जीव अकेला ही विचारा नर्क में जाना है, कभी पुण्य बांध के अकेला ही स्वर्गमे जाता है, अकेला ही कभी राजा, कभी घनिक, कभी अन्नान दास हो जाता है, अकला हा रोगी, गोकी होता है। अडला ही सुखी व दुःखी होता है । अकेला ही व्यवहारी व दलिद्र होता है । इस तरह मे विचाग अकेला ही भ्रमण करता रहता है। (१६) श्री कुलभद्र प्राचार्य सारसमुच्चय में कहते हैं- ज्ञानदर्शनसम्पन्न अात्मा चैको ध्र वो मम । शेपा भागाश्च मे बाह्या सर्व संयोगलनणाः ॥२४६।। सयोगेमूलजीवेन प्राप्ता दुःसपरम्परा । तस्मात्संयोगसम्बंधं त्रिविधन परित्यजेत ॥ २५० ।। भावार्थ-मेरा आत्मा ज्ञानदर्शन स्वभाव से पूर्ण है, एक है, 'प्रविनाशी है । और सर्व रागादि भाव से बाहर कर्म के सयोग से हुए हैं। गरीर और कर्म के सयोग से जीव बराबर दुख उठा रहे हैं, इसलिये इम सयोग सम्बन्ध को मन, वचन, काय में मैं त्यागना हूँ। (२०) श्री पद्मनंदि मुनि एकत्यसप्तति में कहते हैं अजमेकं परं शान्तं सर्वोपाधिविवर्जितम् । आत्मानमात्मना ज्ञात्वा तिप्टेदात्मनि यः स्थिरः ॥१८॥ स एवामृतमार्गस्य सः एवामृतमश्नुते । स एवार्हन् जगन्नाथः स एव प्रभुरीश्वरः ।। १६ ॥ भावार्थ-जो कोई अपने आत्मा को अजन्मा, एक अकेला, परम पदार्थ, शांत स्वरूप, सर्व रागादि उपाधि से रहित, आत्मा ही के द्वारा जानकर आत्मा मे स्थिर तिष्ठता है वही मोक्षमार्ग में चलनेवाला है, वही श्रानन्दरुपी अमृत को भोगता है, वही पूज्यनीय, वही जगत का स्वामी, वही प्रभु, वही ईश्वर है। विकल्पोर्मिभरत्यक्तः शान्तः कैवल्यमाश्रितः । कर्माभावे भवेदात्मा वाताभावे समुद्रवत् ।। २६ ।। भावार्थ-यह आत्मा की के छूट जाने पर सर्व विकल्परूपी तरगों से रहित, शांत व अपने केवल- ज्ञानादि स्वभाव में स्थिर ऐसा होजाता है जैसा पवन के सचार बिना समुद्र स्थिर रहता है। संयोगेन यदा यातं मत्तस्तत्सकल परम् । तत्परित्यागयोगेन मुक्तोऽहमिति मे मतिः ॥ २७ ॥ . - सहज-सुख-साधन। [१२७ भावार्थ-जो जो वस्तु या अवस्था परके सयोग से आई है वह सब मुझसे भिन्न है उस सबको त्याग देनेसे मैं मुक्त ही हूँ, ऐसी मेरी बुद्धि है, ऐसा ज्ञानी विचारता है। क्रोधादि कर्मयोगेऽपि निर्विकारं परं महः । विकारकारिभिर्भेधैर्न विकारि नभोभवेत् ॥ ३५ ॥ भावार्थ-क्रोधादि कर्मों के सयोग होने पर भी वह उत्कृष्ठ आत्मज्योति विकारी नहीं होती है, जैसे विकार करनेवाले मेघो से आकाश विकारी नहीं होता है, ऐसा निश्चय आत्मा का स्वरूप है । तदेकं परमं ज्ञानं तदेकं शचि दर्शनम् । चारित्रं च तदेकं स्यात् तदेकं निर्मेलं तपः ॥ ३६ ।। भावार्थ-शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा है, सो ही उत्कृष्ट ज्ञान है, सो ही पवित्र सम्यग्दर्शन है, सो ही एक निर्मल चारित्र है, वही एक निर्मल तप है । नमस्यञ्च तदेवैकं तदेवैकञ्च मंगलम् । उत्तमश्च तदेवैकं तदेव शरण सताम् ॥ ४० ॥ भावार्थः वही चैतन्य स्वरूप आत्मा नमस्कार करने योग्य है, वही एक मगल है, वही एक उत्तम पदार्थ है, सज्जनों के लिये वही एक शरण का स्थान है । तदेवैकं परं तत्वं तदेकं परं पदम् । भव्याराध्यं तदेकं तदेकं परं महः ॥ ४४ ।। भावार्थ-चिदानद स्वरूप आत्मा है सो ही एक उत्कृष्ट तत्व है, सो ही एक परम पद है, सो ही भव्य जीवा के द्वारा आराधने योग्य है, सो ही एक परम ज्योति है संसारघोरघण सदा तप्तस्य देहिनः । यन्त्रधारागृहं शान्त तदेव हिमशीतलम् ।। ४७ ।। भावार्थ- 'ससाररूपी आताप से सदा तातायमान प्राणी के लिये वह चिदानद स्वरूप आत्मा है, सो ही हिमालय के समान शीतल यत्रधारागृह है अर्थात् फवारो का घर है। तदेव महती विद्या स्फुरन्मन्त्रस्तदेव हि । औषधं तदपि श्रेष्टं जन्मव्याधिविनाशनम् ।।४६।। भावार्थ- -चिदानद स्वरूप आत्मा है, सो ही महान विद्या है, सो ही प्रकाशमान भत्र है । तथा वही ससार रूपी रोग को नाश करनेवाली औषधि है। अहं चैतन्यमेन नान्यत्किमपि जातु चित् । सबन्धोऽपि न केनापि दृढ़पक्षो ममेदृशः ।। ५४ ।।
१२८]] जीयमा पत्थ। । भावार्थ-ज्ञानी विचारता है कि मैं एक नैतन्य बन्यो, 'गोर कोई कापि नहीं है मेरे किसी के माथ कोई सबध नहीं है, मेरा या नद निश्चय ।। शरीरादिवहिचिन्ताचासम्पर्कजितम् । विशद्वात्मस्थिन चित्रं कुर्वन्नास्ते निरन्तरम् ॥ ५५ ॥ भावार्थ-नानी शरीरादि बाहरी पदाशी की चिता के समान्य में गहित होकर इद्धात्मा में चित्त को स्थिर करता हुआ निरतर विराजता है। (२१) श्री पननंदि मुनि उपायक मंकार में कहते हैं- स्वजनो वा पगे वापि नो कश्चित्परमार्थतः । केवलं स्वार्जितं कम जीवेनैकेन भुज्यते ॥ ४८ ॥ भावार्थ-इस जीव का माथी न तो कोई स्वजन है, न परजनौर। अपने बाधे हुए कर्म के फल को यह जीव अकेला ही भोगता है। क्षीरनीरवदेकत्र स्थितयो हदेहिनोः । भेदो यदि नतोन्येषु कलत्रादिपु का कथा ॥ ४६ ।। भावार्थ-दूध और पानी के समान एफ़ माथ मिले हुए शरीर ग्रोर प्रात्मा में ही जब भेद है तब अन्य स्त्री आदि की तो बात ही क्या है, वे तो जुदे है ही। कर्मभ्य कर्मकार्येभ्यः प्रथग्भूतं चिदात्मकम् । यात्मानं भावयेन्नित्यं नित्यानन्दपदप्रदम् ।। ६१ ।। भावार्थ-ज्ञानी को उचित है कि वह आत्मा के स्वरूप की एमी भावना करे कि बह आठ कर्मो से व आठ कर्म के कार्यों से जुदा है, चैतन्यमई है । नित्य है व नित्य अानन्दमई पद को देने वाला है। (२२) श्री पानंदि मनि सद्धोधचंद्रोदय में कहते हैं- कमबंधकलितोप्यवंधनो द्वपरागलिनोऽपि निर्मलः । देहवानपि च देहवनितश्चित्रमेतदखिलं चिदात्मनः ॥ १३ ॥ भावार्थ-यह आत्मा कर्मवध महित होने पर भी कर्मवध से रहित है, रागद्वप से मलीन होने पर निर्मल है, देहबान होनेपर भी देह रहित है आत्मा का सर्व महात्म्य आश्चर्यकारी है। व्याधिनाङ्गमभिभूयते परं तद्गतोऽपि न पुनश्चिदात्मकः । उच्छ्रितेन गृहमेव दह्यते बहिना गगनं तदाश्रितम् ।। २४ ॥ भावार्थ-रोगों से शरीर को पीडा होती है परन्तु उस शरीर मे प्रविष्ट चैतन्य प्रभु को पीडा नहीं होती है । जैसे अग्नि की ज्वाला से घर जलता है परन्तु घर के भीतर का आकाश नहीं जलता है । आत्मा आकाश के समान निर्लेप तथा अमूर्तीक है, जल नहीं सकता। भी सहज-सुख-साधन । [१२९ वोधरूपमखिलरुपाधिभिनर्णितं किमपि यत्तदेव नः । नान्यदल्पमपि तत्वमीदृशं मोक्षहेतुरिति योगनिश्चयः ।। २५ ॥ भावार्थ-सर्व रागादि उपाधियों से रहित जो कोई एक ज्ञान स्वरूप है सो ही हमारा है, और कुछ भी परमाणु मात्र भी हमारा नहीं है । मोक्ष का कारण यही एक तत्व है, यही योगियों का निश्चय मत है। आत्मबोधशुचितीर्थमद्भूतं स्नानमत्र कुरुतोत्तमं बुधाः । यन्न यात्यपरतीर्थमकोटिभिः क्षालयत्यपि मलं तदन्तरम् ॥ २८ ॥ भावार्थ- -आत्मज्ञान ही एक पवित्र अद्भुत तीर्थ है, इसी तीर्थ रूपी नदी में पडितजन उत्तम स्थान करो । जो अतरग का कर्म मल करोडों नदियों के स्नान से नहीं नाश होता है, उसे यह तीर्थ धो देता है । (२३) श्री पद्मनन्दि मुनि निश्चयपंचाशत् में कहते हैं- व्याधिस्तदति शरीरं न माममतं विशुद्धबोधमयम् । अग्निदहति कुटीरं न फुटीरासतमाकाशम् ।। २३ ।। भावार्थ-रोग शरीर को पीडा करता है, उससे अमूर्तीक व शुद्ध ज्ञानमयी आत्मारूप जो मैं हूँ सो मुझे पीडा नहीं होती है। आग कुटी को जलाती है, परन्तु कुटी के भीतर के आकाश को नहीं जला सकती है। आत्मा आकाश के समान अमूर्तीक व निर्मल है। नैवात्मनो विकारः क्रोधादिः किन्तु कर्मसंबन्धनात् । स्फटिकमणेरिव रक्तत्वमाश्रितात्पुष्पतो रक्तात् ॥ २५ ॥ भावार्थ -निश्चय से क्रोध आदि आत्मा के स्वाभाविक विकार नहीं हैं, परन्तु कर्म के उदय से सम्बन्ध से विकार है जैसे-स्फटिक मणि के नीचे लाल पुष्प है इससे वह लाल दिखती है । आत्मा तो स्फटिक मणि के समान स्वच्छ ही है। कुर्यात् कर्म विकल्पं किं मम तेनातिशुद्धरूपस्य । मुखसंयोगजविकृतेन विकारी दर्पणो भाति ।। २६ ।। भावार्थ-कर्मो के उदय से अनेक रागादि विकल्प होते हैं, परन्तु निश्चय से मैं तो परम शुद्व हूँ, मै विकारी नहीं होता है, जैसे विकारी मुख दृश्य दर्पण में देखने पर भी दर्पण स्वय विकारी नहीं होता है । प्राप्तां बहिरुपधिचयस्तनुवचन पिकल्पजालमप्यपरम् । कर्मकृतत्वान्मत्तः कुतो विशुद्धस्य मम किश्चित् ॥ २७ ॥ भावार्थ-कर्म के उदय से उत्पन्न बाहरी उपाधिकी बात तो दूर ही रहे। शरीर, वचन और मनके विकल्पों का समूह भी मुझसे भिन्न है । क्योंकि मैं तो शुद्व हूँ, मेरा शरीरादि कैसे हो सकता है। कर्म परं तत्कार्य सुखमसुख वा तदेव परमेव । तस्मित् हा विषादी मोही विदधाति खलु नान्यः ।। २८ ।।
1 १३०] जीत्र का शव है भावार्थ-कर्म भिन्न हैं तथा कर्म के कार्य मुग नया दु.य भी भिन्न है, इनके होनेपर गोही हर्ष तथा विपाद करता है, अन्य कोई नहीं करता है। नयनिक्षेपप्रमितिप्रभृतिविकल्पोजिगतं परं शान्नं । शुद्धानुभूतिगोचरमहमेकं धाम चिद्रपम् ।। ५४ ॥ भावार्थ-मै नय, निक्षेप इत्यानि विकल्पों से रहिन पग्म मान :, मैं ननन्य रुप एक नेज हुँ, मो शुद्धात्मा । अनुभव से ही । 'अनुभव करने योग्यो। (२४) श्री शुभचंद्र प्राचार्य ज्ञानार्णन में कहते हैं.... महाव्यमनसंकीर्ण दाम्यांचलनदीपिते । एकाक्येव प्रमत्यात्मा दुर्ग भवमरुस्थले ।। १४ ॥ भावार्थ-महा 'ग्रापदायों से भरे गये, दुःप स्पी अग्नि से प्रचलित और भयानक ऐसे समारस्पी मरुस्थल (रेती के जंगल ) में यह जीव 'यकेला ही ब्रमण करता रहता है। स्वयं स्वक निवृत्त फलं.भोक्तु शुभाशुभम् । शरीरान्तरमादचे एकः सर्वत्र सर्वथा ॥ २-४ ॥ भावार्थ-इस ससार में यह यात्मा 'अकेला ही तो अपने कमा के अनुसार सुग्न दु पम्प फनको भोगता है, और अकेला ही सर्व गतियों में एक शरीर से दृमरे शरीर को धारण करता है। संयोगे विप्रयोगे च संभवे मरणेऽथ वा । सुखदुःखविधौ वास्य न ससान्योऽस्ति देहिनः ।। ४-४ ॥ भावार्थ-इस प्राणी के सयोग में, वियोग मे, जन्म मे व मरण मे, सुख तथा दुःख भोगने मे कोई भी मित्र साथी नहीं है, अकेला ही भोगना पड़ता है। अज्ञातस्वस्वरूपोऽयं लुप्तबोधादिलोचनः । भ्रमत्यविरतं जीव एकाकी विधिवञ्चितः ॥ ८-४॥ भावार्थ-यह जीव अपने स्वरूप को न जानता हुअा व ज्ञानादि लोचन को बंद किये अपने अज्ञान से कमी से ठगाया हुआ एकाकी दीर्घकाल से भ्रमण कर रहा है। एकः स्वर्गी भवति वियुधः स्त्रीमुखाम्भोजभृङ्गः । एकः श्वानं पिवति कलिल छिद्यमानः कृपाणः एकः क्रोधाधनलकलितः कर्म बध्नाति विद्वान् । एक: सर्वावरणविगमे ज्ञानराज्य भुनक्ति ॥ ११-४ ।। हुए :
सहज-सुख-साधन। [१३१ चिरं । भावार्थ-यह जीव अकेला ही स्वर्ग में जाकर देव होता है, और स्त्री के मुख-कमल में भ्रमरवत् आसक्त हो जाता है, व अकेला ही नर्क में जाकर तलवारों से छिन्न भिन्न किया हुआ नरक के खारे जलको पीता है, व अकेला ही क्रोधादि की अग्नि से जलता हुआ कमी को बांधता है, तथा अकेला ही आप विवेकी होकर जब सर्व कर्मो के आवरण को दूर कर देता है, तव मोक्ष होकर ज्ञान राज्य को भोगता है। अचिच्चिद्र पयोरैक्यं वन्धं प्रति न वस्तुतः । अनादिश्चानयोः श्लेषः स्वर्णकालिकयोरिव ॥ २ ५ ॥ भावार्थ-चैतन्य स्वरूप आप व शरीरादि जड की एकता बंध की अपेक्षा से है। निश्चय से देखा जावे तो चेतन अलग है, जड़ अलग है । इन दोनों का अनादिकाल से सम्बन्ध चला आ रहा है, जैसे-खान में सुवर्ण और कालिमा का एकपना है, वस्तुतः कालिमा अलग है सुवर्ण अलग है । ये ये सम्बन्धमायाताः पदार्थाश्चेतनेतराः । ते ते सर्वेऽपि सर्वत्र स्वस्वरूपाद्विलक्षणाः ॥ ८ ५ ॥ भावार्थ- "इस जगत मे जिन चेतन व अचेतन पदार्थों का सम्बन्ध जीव के साथ हुआ है, वे सब ही सर्वत्र अपने अपने स्वरूप से भिन्न भिन्न है, आत्मा उन सब से जुदा है। मिथ्यात्वप्रतिबद्धदुर्णयपथभ्रान्तेन वाह्यानलं भावान् स्वान् प्रतिपद्य जन्मगह नेखिन्नं त्वया प्राक संप्रत्यातसमस्तविभ्रमभवश्चिद्रूपमेकं परम् स्वस्थ स्वं प्रविगाह्य सिद्धिवनितावक्र समालोकय ॥१२-५ ॥ भावार्थ-हे आत्मन ! तू इस ससार रूपी गहनवन में मिथ्या दर्शन के सम्बन्ध से उत्पन्न हुई सर्वथा एकांतरूप खोटी दृष्टि के मार्ग में भ्रमरूप होता हुआ बाहरी पदार्थों को अपने मान करके सदा दुःखी ही रहा है, परन्तु अब तू सर्व भ्रम को दूर कर दे और अपने ही में ठहरकर उत्कृष्ट चैतन्यरूपी तेज में प्रवेश कर और मुक्तिरूपी स्त्री के मुख को देख । अहं न नारको नाम न तिर्यग्नापि मानुपः । न देवः किन्तु मिद्धात्मा सर्वोऽयं कर्मविक्रमः ।। १२-३१ ॥ भावार्थ निश्चय नय से न मैं नारकी हूँ न तिथंच हूँ, न मानव हूँ, न देव हूँ, किन्तु सिद्ध स्वरूप हूँ। सब नारकी आदि अवस्थाएँ कर्मो के उदय से होती हैं। माकारं निर्गताकार निष्क्रिय परमाक्षरम् । निर्विकल्पं च निष्कम्पं नित्यामानन्दमन्दिरम् ।। २२-३१ ।। विश्वरूपमविज्ञातस्वरूपं सदोदितम् | कृतकृत्यं शिवं शान्तं निष्फलं करणच्युतम् ॥ २३-३१ ।।
१३२] जीव का एकत्व निःशेषभवसम्भूतक्लेशद्र महुताशनम् । शुद्धामत्यन्तनिर्लेप ज्ञानराज्यप्रतिष्ठितम् ॥ २४-३१ ॥ विशुद्धादर्शसक्रान्तप्रतिविम्बसमप्रभम् । ज्योतिर्मयं महावीर्य परिपूर्ण पुरातनम् ।। २५-३१ ॥ विशुद्धाप्टगुणोपेतं निन्द्र निर्गतामयम् । अप्रमेयं परिच्छिन्नं विश्वतत्त्वव्यवस्थितम् ॥ २६-३१ ॥ यदग्राह्य बहिर्भाव ग्राह्य चान्तर्मुखैः क्षणात् । तत्स्वभावात्मकं साक्षात्स्वरूपं परमात्मनः ॥ २७-३१ ।। भावार्थ- 'आत्मा का निश्चयनय से स्वरूप परमात्मा के समान है। यह ज्ञानाकार है तथा अमूर्तीक है, हलन चलन क्रिया रहित है, परम अविनाशी है, निर्विकल्प है, निष्कम्प है, नित्य है, आनन्द का मदिर है, ज्ञानापेक्षा सर्वव्यापी है, अज्ञानी जिसके स्वरूप को नहीं जान सकते हैं, सदा उदयरूप है, कृतकृत्य कल्याणरूप है, शात है, शरीर रहित है, इन्द्रियों से अतीत है, समस्त ससार के क्लेशरूपी वृक्षों को जलाने के लिये अग्नि के समान है, शुद्ध है, कर्मलेप से रहित है, ज्ञानरूपी राज्य मे स्थित है, निर्मल दर्पण में प्राप्त प्रतिबिम्ब की तरह प्रभावान है, ज्ञानज्योतिमय है, महा वीर्यवान है, पूर्ण है, पुरातन है, सम्यक्तादि आठ गुण ( सम्यक्त, ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सूक्ष्मत्व, अगुरुलघुत्व, अव्यावाधत्व, अवगाहनत्व) सहित है, उपाधि रहित है, रोगादि रहित है, प्रमाण अगोचर है, ज्ञानियों के द्वारा जानने योग्य है, सर्व तत्वों का निश्चय करनेवाला है, जो बाहरी इंद्रियादि से ग्रहण करने योग्य नहीं है, अतरगभावों से क्षण मात्र मे ग्रहण योग्य है, ऐसा स्वभाव इस परमात्म स्वरूप आत्मा का है। अवाग्गोचरमव्यक्तमनन्तं शब्दवर्जितम् । अजं जन्मभ्रमातीतं निर्विकल्पं विचिन्तयेत् ।। ३३.३१ ।। बचन भावार्थ-आत्मा का स्वरूप गोचर नहीं है, इन्द्रियों से व मनसे प्रगट नहीं है, अनत है, शब्द रहित है जन्म रहित है, भव भ्रमण से रहित है, निर्विकल्प है ऐसा विचारे । यः स्वमेव समादचे नादत्ते यः स्वतोऽपरम् । निर्विकल्पः स विज्ञानी स्वसंवेद्योऽस्मि केवलम् ॥ २७-३२ ।। भावार्थ-ज्ञानी ऐसा ध्याता है कि जो अपने को ही ग्रहण करता है तथा जो अपने से पर है उसको नहीं ग्रहण करता है ऐसा मैं आत्मा हूँ, उसमे कोई विकल्प नहीं है, ज्ञानमय है तथा केवल एक अकेला है, और वह अपने से ही अनुभवगम्य है। यो विशुद्ध प्रसिद्धात्मा परं ज्योतिः सनातनः । सोऽहं तस्मात्यपश्यामि स्वस्मिन्नात्मानमच्युतम् ॥ ३५-३२ ।। 7 सहज-सुख-साधन। [१३३ -- भावार्थ-जो विशुद्ध है, प्रसिद्ध आत्मा है, परम ज्ञानमय ज्योति स्वरूप है, सनातन है सो ही मैं हूँ, इसलिये इस अविनाशी आत्मा को मैं अपने में ही देखता हूँ । जीर्णे रक्ते घने ध्वस्ते नात्मा जीर्णादिकः पटे । एवं वपुषि जीर्णादौ नात्मा जीर्णादिकस्तथा ॥ ७२-३२ ॥ भावार्थ-कपड़े को जीर्ण, लाल, मोटा व नए होते हुए कोई अपने को जीर्ण, लाल, मोटा व नष्ट हुआ नहीं मानता है, वैसे ही शरीर को जीर्ण, लाल, मोटा व नष्ट होता हुआ जानकर आत्मा जीर्ण, लाल, मोटा तथा नष्ट नहीं होता है। अन्तदृष्टवाऽऽत्मनस्तत्त्वं बहिष्टवा ततस्तनुम् । उभयोर्भेदनिष्णातो न स्खलत्याऽऽत्मनिश्चये ॥ ८३-३२ ॥ भावार्थ-ज्ञानी आत्मा के तत्व को भीतर देखकर व शरीर को बाहर देखकर दोनों के भेद में चतुर होकर आत्मा के स्वरूप के निश्चय मे कभी शिथिल नहीं होता है । अतीन्द्रियमनिर्देश्यममृत कल्पनाच्युतम् । चिदानन्दमयं विद्धि स्वस्मिन्नात्मानमात्मना ।। ६६-३२ ।। भावार्थ-हे प्रात्मन् । तू आत्मा को आत्मा ही मे प्रात्माही के द्वारा जान कि यह अतींद्रिय है, वचनों से कथन योग्य नहीं है, अमूर्तीक है, कल्पना से रहित है, चिदानन्दमयी है। निखिलभुवनतत्त्वोद्भासनैकप्रदीपं निरुपधिमधिरूढं निर्भरानन्दकाष्ठाम् । परममुनिमनीपोद्भेदपर्यंतभूतं परिकलय विशुद्ध स्त्रात्मनात्मानमेव ।। १०३-३२।। भावार्थ-हे आत्मन् | तू अपने आत्मा को अपने अात्मा से ही इस प्रकार शुद्ध अनुभव कर कि यह आत्मा सर्व लोक के यथार्थ स्वरूप को प्रगट करनेवाला अद्वितीय प्रदीप है तथा अतिशय सहजानद की सीमा को उपाधिरहित प्राप्त हुआ है तथा परम मुनिकी बुद्धि से प्रगट उत्कृष्टता पर्यंत जिसका स्वरूप है। सोऽहं सकल वित्साः सिद्धः साध्यो भवच्युतः । परमात्मा परंज्योतिर्विश्वदर्शी निरञ्जनः ।। २८ ४० ॥ तदासौ निश्चलोऽमों निष्कलको जगद्गुरुः । चिन्मात्रौ विस्फुरत्युच्चैर्ध्यानध्यातृविवर्जितः ।।२६-४० ॥ भावार्थ-इस प्रकार अपने को ध्यावे कि मै ही परमात्मा हूँ, मै ही सर्वज्ञ हूँ, मैं सर्वव्यापक हूँ, मै सिद्ध हूँ, मैं ही साध्य हूँ, ससार से रहित हूँ, श्रेष्ठ आत्मा हूँ, परम ज्योति स्वरूप हूँ, विश्वदर्शी हूँ, निरजन हूँ, १३४] जीव का एकत्व । तब अपना स्वरूप ऐसा झलकता है कि यह अमूर्तीक है, निष्कलंक है, जगत में श्रेष्ठ है, चैतन्य मात्र है व अतिशय करके ध्यान ध्याता के विकल्प से रहित है। (२५) श्री ज्ञानभूपण भट्टारक तत्वज्ञानतरंगिणी में कहते हैं -- नाहं किंचिन्न मे किंचिद् शुद्धचिद्र पकं विना । तस्मादन्यत्र मे चिंता वृथा तत्र लय भजे ॥ १०-४ ।। भावार्थ-इस जगत मे शुद्ध चैतन्यरूप के सिवाय न तो मैं कुछ हूँ, और न अन्य ही कोई पदार्थ मेरा है, इसलिये शुद्ध चैतन्यरूप को छोडकर और कुछ चिंता करना वृथा है, इसलिये मै उसी मे लय होता हूँ । न देहोऽहं न कर्माणि न मनुष्यो द्विजोऽद्विजः । नैव स्थूलो कृशो नाहं किंतु चिद्र पलक्षणः ।। ५-१० ।। भावार्थ-न मैं देह हूँ, न आठकर्म हूँ, व मनुष्य हूँ, न ब्राह्मण हूँ, न अब्राह्मण हूँ, न मोटा हूँ , न दुबला हूँ , किन्तु मै तो एक चैतन्य स्वरूप लक्षणधारी हूँ। (२६) पं० वनारसीदासजी नाटकममयसार में कहते हैं: सौया ३१ । जहा शुद्ध ज्ञानकी कला उद्योग दीसे तहां, शुद्धता प्रमाण शुद्ध चारित्र को अश है। ता कारण ज्ञानी सब जाने ज्ञेय वस्तु मर्म, वैराग्य विलास धर्म वाको सरवस है। राग द्वेप मोहकी दशासों भिन्न रहे याते, सर्वथा त्रिकाल कर्म जालमों विधम है। निरुपाधि आतम समाधि में विराजे ताते, कहिये प्रगट पूरण परम हस है ।।८१|| ज्ञान भान भासत प्रमाण ज्ञानवत कहे, करुणा निधान अमजान मेरा रूप है । कालसों अतीत कर्म चालसों अभीत जोग, जालसों अजीत जाकी महिमा अनूप है ।। मोह को विलास यह जगत को वास मैं तो, जगत सों शून्य पाप पुण्य अन्ध कूप है। पाप किने किये कोन करे करि है सो कोन, क्रियाको विचार सुपनेकी दोर धूप है ।९१॥ निरभय निराकुल निगम वेद निरभेद, जाके परकाश मे जगत माइयतु है रूप रस गध फास पुदगलको विलास, तासों उदवस जाको जस गाइयतु है ।। विग्रहसों विरत परिग्रह सों न्यागे सदा, जामें जोग निग्रहको चिन्ह पाइयतु है। सो है जान परमाण चेतन निधान ताहि, अविनाशी ईश मानी शोश नाइयतु है ॥१०६|| जैसे निरभेदरूप निहचै अतीत हुतो, तैसे निरभेद अब भेद कोन कहेगो । दीसे कर्म रहित सहित सुख समाधान, पायो निज थान फिर बाहिर न वहे ।।।। कबहूँ कदाचि अपनों स्वभाव त्यागि करि, राग रन राचिके न पर वस्तु गहेगो । अमलान ज्ञान विद्यमान परगट भयो, याही भाति आगामी अनतकाल रहेगो ॥१०७|| जवहीते चेतन विभावसों उलटि आप, समे पाय अपनो स्वभाव गहि लीनो है। तवहीते जो जो लेने योग्य मो सो सब लीनो, जो जो त्यागि योग्य सो सो सब छाड़ि दीनो है ।। .
सहज-सुग्व-साधन। [१३५ लेवेको न रही ठोर त्यागवेको नाहि पौर, वाकी कहां उबोजु कारज नवीनो है । सग त्यागि प्रग त्यागि, बचन तरग त्यागि, मन त्यागि बुद्धि त्यागि आपा शुद्ध कीनो है ।।१०८।। करमके चक्र में फिरत जगवासी जीव, हे रह्यो वहिर मुख व्यापत विपमता। अन्तर सुमति प्राई विमल बडाई पाई, पुद्गलसों प्रीति टूटी छूटी माया ममता ।। शुद्धने निवास कीनो अनुभौ प्रभ्याम लीनो, भ्रमभाव छांडि दीनो भीनोचित्त समता। अनादि अनंत प्रविफलप 'प्रचल ऐमो, पद अबलवि अवलोके राम रमता ॥१४॥ रुप रसवत मूरतीक एक पुद्गल, रूप विन और यो अजीव द्रव्य द्विधा है। च्यार है अमृरतीक, जीव भी अमरतीक, याही ते अमरतीक वस्तु ध्यान मुवा है ।। औरसो न कबहू प्रगट आपापापही सों, ऐसो थिर चेतन स्वभाव शुद्ध सुधा है । चेतन को अनुमो प्राराधे जग तेई जीव, जिन्ह के अखड रस चाखवेकी क्षुधा है ।।११।। निहचे निहारत स्वभाव जाहि प्रातमाको, श्रातमीक धरम परम परकासना । अतीत अनागत वरतमान काल जाको, केवल स्वरूप गुण लोकालोक भासना ।। सोई जीव ससार अवस्था माहि करमको, करतासो दीसे लिये भरम उपासना । यहै महा मोहको पसार यहै मिथ्याचार, यह भी विकार यह व्यवहार वासना ॥४॥ एह छह द्रव्य इनही को है जगतजाल, तामे पांच जड एक चेतन सुजान है । काहू की अनत सत्ता काहूमों न मिले कोई, एक एक सत्ता मे अनत गुण गान है ।। एक एक सत्ता मे अनत परजाय फिरे, एकमे अनेक इहि भांति परमाण है। यहै स्यादवाद यह सतन की मरयाद, यहै सुख पोप यह मोक्षको निदान है ॥२२॥ सबैया-२३। चेतन मडित अग अखडित, शुद्ध पवित्र पदारथ मेरो। राग विरोध विमोह दशा, समझे भ्रम नाटक पुद्गल केरो।। भोग सयोग वियोग व्यथा, अवलोकि कहे यह कर्मजु घेरो। है जिन्हको अनुभौ इह भाति, सदा तिनको परमारथ नेरो ॥१७ । ज्यों कलधौत सुनारकी सगति, भूपण नाम कहे सब कोई। कचनता न मिटी तिही हेतु, वहे फिरि श्रीदिके कचन होई ।। त्यो यह जीव अजीव सयोग, भयो बहुरूप हुवो नहिं ढाई । चेतनता न गई कबहू तिहि, कारण ब्रह्म कहावत सोई ।।१२।। ज्यों नट एक धरै बहु भेप, कला प्रगटै जग कौतुक देखै । आप लखै अपनी करतूति, वहै नट भिन्न विलोकत पेखै ।। त्यों घटमे नट चेतन राव, विभाव दशा धरि रूप विसेखै । खोलि सुदृष्टि लखै अपनो पद, दुद विचार दशा नहि लेखै ॥१४॥ सवैया ३१। प्रथम सुदृष्टिमों शरीररूप कीजे भिन्न, तामें और सूक्ष्म शरीर भिन्न मानिये । अष्ट कर्म भाव की उपाधि मोई कीजे भिन्न, ताहू में सुबुद्वि को विलाम भिन्न जानिये ॥
१३६] जीव का एकत्व 1 + -- तामें प्रभु चेतन विराजत अखड रूप, वहे श्रुत जान के प्रमाण ठीक आनिये । वाही को विचार करि वाही में मगन हूजे, वाको पद साधिवेको ऐसी विधि ठानिये ।। ५५ ॥ अलख अमूरति अरूपी अविनाशी अज, निराधार निगम निरजन निरध है। नानारूप भेष धरे भेप को न लेश धरे, चेतन प्रदेश धरे चैतन्य का खध है ।। मोह धरे मोहीसो बिराजे तामें तोहीसों, न मोहीसो न तोहीसों न रागी निरवध है। ऐसो चिदानद याहि घट में निकट तेरे, ताहि तू विचार मन और सब धध है ।। ५४ ।। शुद्ध नय निहचै अकेला आप चिदानन्द, अपने ही गुण परजाय को गहत है। पूरण विज्ञान घन सो है व्यवहार माहि, नत्र तत्वरूपी पच द्रव्य मे रहत है । पच द्रव्य नव तत्व न्यारे जीव न्यारो लखै, सम्यक दरश यह और न गहत है । सम्यक दरश जोई आतम सरूप सोई, मेरे घट प्रगटा बनारसी कहत है ॥ ७ ॥ (२७) पं. द्यानतरायजी धानतविलास में कहते हैं- 4 - सवैया ३१ । चेतना सरूप जीव ज्ञान दृष्टि मै सढीव, कुम्भ ान आन घीव त्यौ सरीर सौ जुदा । तीनलोकमाहि सार सास्वतो अखण्डधार, मूरतीककौं निहार नीरको बुदैबुदा ।। सुद्धरूप बुद्धरूप एकरूप आपभूप, श्रातमा यही अनूप पर्मजोतिको उदा। स्वच्छ आपने प्रमानि राग दोप मोह भानि, भव्यजीव ताहि जानि छाडि शोक श्री मुदा । ८।। चेतना सहित जीव तिहुंकाल राजत है, ज्ञान दरसन भाव सदा जास लहिए । रूप रस गंध फास पुद्गल को विलास, मूरतीक रुपी विनासीक जड कहिये । याही अनुसार परदर्व को ममत्त डारि, अपत्नौ सुभाव धारि आपमाहिं रहिए । करिए यही इलाज जात होत आपकाज, राग दोष मोह भावको समाज दहिए ॥ ९३ ॥ सिंहावलोकन । ज्ञानी जानी ज्ञान मे, नमैं वचन मन काय । कायम परमारथविष, विषै-रीति बिसराय ॥ विषै रीति विसराय, राय चेतना विचारै ॥ चारै क्रोध विसार, सार समता विसतारै ।। तारै औरनि आप, आपको कौन कहानी । हानी ममता-बुद्धि, बुद्धिअनुभौतें ग्यानी ॥ ६ ॥ सोह सोह होत नित, सांस उसासमझार । ताको अरथ विचारिय, तीन लोक में सार ।। तीन लोक मैं सार, धार सिव खेत निवासी । अष कर्म सौ रहित, सहित गुण अष्टविलासी ।। जैसौ तैसौ आप, थाप निहचै तजि सोह । अजपा-जाप सभार, सार सुख सोह सोह ॥ ७ ॥ । र -- - सहज-सुख-साधन। [१३७ दरव करम नोकरमते, भाव करमते भिन्न । विकलप नहीं सुबुद्वकै, सुद्ध चेतना चिन्न ।। सुद्ध चेतना चिन्न, भिन्न नहीं उदे भोग मै। सुखदुख देह मिलाप, आप सुद्धोपयोग सै॥ हीरा पानी माहि, नाहिं पानी गुण है कब । आग लगै घर जले, जलै नहिं एक नभदरव ।। ८ ।। जो जानै सो जीव है, जो मानै सो जीव । जो देखै सो जीव है, जीवे जीव सढीव ।। जीवै जीव सदीव, पीव अनुभौरस प्रानी। आनन्द कद सुबन्द, चन्द्र पूरन सुखदानी ।। जो जो दीसै दर्व, सर्व छिनभंगुर सो सो। सुख कहि सके न कोई, होई जाकों जानै जो ।। ९ ।। सब घट मैं परमात्मा सूनी ठोर न कोई। वलिहारी वा घट्ट की, जा घट परगट होई ॥ जा घट परगट होई, धोइ मिथ्यात महामल । पच महाव्रत धार, सार तप तपै ग्यानबल ।। केवल जोत उदोत, होत सर्वज्ञ दसा तब । देही देवल देव, सेव ठानें सुर नर सब ।। १० ।। द्यानत चक्री जुगलिये भवनपती पाताल | सुर्गइन्द्र अहमिद्र सब, अधिक अधिक सुख भाल ।। अधिक अधिक सुखभाल, काल तिहूँ नत गुनाकर । एकसमै सुख सिद्ध, रिद्ध परमातम पद धर ।। सो निहचै तू आप, पापविन क्यों न पिछानत । दरस ग्यान थिर थाप आपमैं आप सु द्यानत ॥ ११ ॥ (२८) भैया भगवतीदास ब्रह्मविलास में कहते हैं: कवित्त । ज्ञान में है ध्यान में है वचन प्रमाण मे है, अपने सुथान में है ताहि पहचानिरे। उपजै न उपजत मूए न मरत जोई, उपजन मरन व्योहार ताहि मानिरे ।। रावसों न रकसों है पानीसो न पकसो है, अति ही अटकसो है ताहि नीके जानिरे । आपनो प्रकाश करै अष्टकर्म नाश करै, ऐसी जाकी रीति 'भैया' ताहि उर आनिरे ॥१३॥ - सवैया-३१। जैसो वीतराग देव कह्यो है स्वरूपसिद्ध, तैसो ही स्वरुप मेरो यामें फेर नाहीं है। अष्ट कर्म भावकी उपाधि मोमें कहूँ नाहिं, अष्ट गुण मेरे सो तौ सदा मोहि पाहिं है ।।
१३८] जीव का एकस्त्र । 'ज्ञायक खभाव मेरो तिहूँ काल मेरे पास, गुण जे अनन्त तेऊ सदा मोहिमाहीं हैं। ऐसो है स्वरूप मेरो तिहुँ काल सुद्धरूप, ज्ञान दृघि देखते न दूजी परछांही हैं ।।६।। सरैया-२३ । केवल रूप महा अति सुन्दर, आपु चिदानद शुद्ध विराजै । अन्तरदृष्टि खुलै जब ही तब, आपुहीमे अपनो पद छाजै ।। सेवक साहिब कोउ नही जग, काहेको खेद कर किह काजै। अन्य सहाय न कोउ तिहारै जु, अन्त चल्यो अपनो पद साजै ॥३६॥ ए मन मूढ कहा तुम भूले हो, हंस विसार लगे परछाया । यामे स्वरूप नहीं कछु तेरो जु, व्याधिकी पोट बनाई है काया ।। सम्यक रूप सदा गुण तेरो सु, और बनी सब ही भ्रम माया । देखत रूप अनूप विराजन, सिद्ध समान जिनन्द बताया ॥४७॥ चेतन जीव निहारहु अतर, ए सब हैं परकी जड काया । इन्द्रकमान ज्यों मेघघटामहि, शोभत है पै रहै नहिं छाया ।। रैन समै सुपनो जिमि देखतु, प्रात बहे सब झूठ बताया । त्यों नदि नाव सयोग मिल्यो तुम, चेतहु चित्तमे चेतनगया ।।४८|| सिद्ध समान चिदानन्द जानिके, थापत हैं घटके उरके बीच । वाके गुण सब बाहि लगावत, और गुणहि सब जानत कीच ।। ज्ञान अनत विचारत अतर, राखत है जियके उर सींच । ऐसे समकित शुद्ध करतु है, तिनते होवत मोक्ष नगीच ॥९३|| सवैया ३१ । जबै चिदानंद निज रूपको संभार देखे, कौन हम कौन कर्म कहाको मिलाप है। रागद्वेष भ्रमने अनादि के भ्रमाये हमे, तातें हम भूल परे लाग्यो पुण्य पाप है ।। रागद्वेष भ्रम ये सुमाव तो हमारे नाहि, हम तो अनत ज्ञान, भानमो प्रताप है । जैसो शिव खेत बसे तैसो ब्रह्म यहा लसै, तिहूं काल शुद्ध रूप 'भैया' निज आप है ।।९।। जीव तो अकेलो है त्रिकाल तीनोंलोकमध्य, ज्ञान पुज प्राण जाके चेतना सुभाव है । असंख्यात परदेश पूरित प्रमान बन्यो, अपने सहज माहिं आप ठहराव है। राग द्वेप मोह तो सुभावमें न याके कहूँ, यह तो विभाव पर सगति मिलाव है। आतम सुभावसौं विभावसौं अतीत सदा, चिदानद चेतवेको ऐसे मे उपाव है ॥१०॥ छौ। ऊरध मध अध लोक, तासुमें एक तिहूँ पन । किसिहि न कोउ सहाय, याहि पुनि नाहिं दुनिय जन ।। जो पूरव कृत कर्म भाव, निज आर बंध किय । सो दुख सुख द्वयरूप, आय इहि थान उदय दिय ।।
सहज-सुख-साधन। [१३९ तिहि मध्य न कोऊ रख सकति, यथा कर्म विलसत तिम । सब जगत जीन जगमें फिरत, ज्ञानवत भापत इम ॥१३॥ सवैया ३१ आतम अनोपम है दोसै राग द्वेप विना, देखो भव्य जीव ! तुम आपमें निहारकैं। कर्म को न अंश कोऊ भर्म को न वश को ऊ, जाकी सुद्धताई मैं न और आप ढारकैं। जैसो शिव खेत बसै तेसो ब्रह्म इहां लसै, इहां उहां फेर नाहि देखिये विचारकै। जेई गुण सिद्धमाहि तेई गुण ब्रह्मपाहि, सिद्ध ब्रह्म फेर नाहिं निश्चय निरधारकै ।।२।। छप्पै । त्रिविधि कमते भिन्न, भिन्न पररूप परसते । विविधि जगतके चिह्न, लखै निज ज्ञान दरसते ।। वसे आपथल माहि, सिद्ध सम मिद्ध विराजहि । प्रगटहि परम स्वरूप, ताहि उपमा सब छाजहि ।। इह विधि अनेक गुणब्रह्ममहि, चेतनता निर्मल लसै । तस पद त्रिकाल वदत भविक, शुद्ध स्वभावहि नित बसें ।।६।। ज्ञान उदित गुण उदित, मुदित भई कर्म कपाये । प्रगटत पर्म स्वरूप, ताहिं निज लेत लखाये ।। देत परिग्रह त्याग, हेत निहचै निज मानत । जानत सिद्ध समान, ताहि उर अन्तर ठानत ।। सो अविनाशी अविचल दरव, सर्व ज्ञेय ज्ञायक परम । निरमल विशुद्ध शास्वत सुथिर, चिदानद चेतन धरम ।। ८ ॥ सवैया ३१ । - वर्ण में न ज्ञान नहि ज्ञान रस पंचन में, फर्स मे न ज्ञान नहीं नान कहूँ गन्ध में। रूप में न ज्ञान नहीं ज्ञान कहूँ ग्रन्थन में, शब्द में न ज्ञान नहीं ज्ञान कर्म बन्ध में । इनते अतीत कोऊ आतम स्वभाव लसै, तहा बसै ज्ञान शुद्ध चेतना के खन्ध ऐसो वीतराग देव कह्यो है प्रकाशमेव, ज्ञानवत पावै ताहि मूढ धावै ध्वध में ॥ १० ॥ जहा तोहि चलबो है साथ तू तहा को ढू ढि, इहा कहा लोगन सो रह्यो तू लुभायरे । संग तेरे कोन चलें देख तू विचार हिये, पुत्र के कलत्र धन धान्य यह कायरे ।। जाके काज पाप कर भरत है पिड निज, है है को सहाय तेरे नर्क जव जायरे । तहां तौं अकेलो तू ही पाप पुण्य साथी दोय, तामे भलो होय सोई कीजे हसराय रे ।। ९ ।। आंख देखै रूप जहां दौड़ तू ही लागै तहां सुने जहा कान तहा तूही सुनै बात है । जीभ रस स्वाद धरै ताको तू विचार करें, नाक सू घे बास तहा तू ही विरमात है ।। फर्स की जु आठ जाति तहां कहो कौन भांति, जहा तहा तेरो नाव प्रगट विख्यात है। याही देह देवल में केवलि स्वरूप देव, ताकी कर सेव मन कहा दौड़े जात है ।। १७ ।। - १४०] सहज-सुख-साधन। . छप्पै । ओ जानहि सो जीव, जीव विन और न जाने । जो मानहि सो जीव, जीव विन और न मानें ।। जो देखदि सो जीव, जीव विन और न देखे । जो जीवहि मो जीव, जीवगुण यह विसेखें ॥ महिमा निधान अनुभूत युत, गुण अनन्त निर्मल लसै। सो जीव द्रव्य पेखत भवि, सिद्व खेत सह..हिं बसें ॥ १४ ॥ छठा अध्याया सहज सुख साधन। यह बताया जा चुका है कि संसार असार द.खमय है, शरीर अशुचि व अथिर है इन्द्रियो के भोगों का सुख अतृप्तिकारी व तृष्णाबर्द्धक है तथा सहज सुख अपने ही आत्मा का स्वभाव है । और यह अात्मा अपनी सत्ता को भिन्न रखता है । आप अकेला ही कर्म के सयोगवश दुःख सुख उठाता हुआ भव भव जन्म मरण करता हुआ भ्रमण करता है । यह अपनी करणी का श्राप ही उत्तरदायित्व रखता है। कोई इसके दुःख को बटा नहीं सकता, हर नहीं सकता। तथा इस आत्मा का स्वभाव बिलकुल शुद्ध ज्ञाताहा आनन्द- मई तथा परम शांत और निर्विकार है । सिद्ध भगवान के समान ही हर एक आत्मा का स्वभाव है । अब यह बताना है कि सहज सुख जो अपने ही पास है, अपना गुण है वह अपने को कैसे मिले १ सहज सुख का स्वाद आना ही हमारी विषय सुख की तृष्णा के रोग को शमन करने का एक मात्र उपाय है। किसी वस्तु का स्वाद लेने के लिये यह आवश्यक है कि स्वाद को लेनेवाला ज्ञानोपयोग उस वस्तु ओर एकाग्र हो जावे और उससमय दूसरी चिन्ताओं से रहित हो जावे । उस वस्तु की ओर ज्ञान की थिरता ही उस वस्तु का स्वाद अनुभव कराने में कारण है। जैसे मिष्ट जल सरोवर में है ऐसा जानते हुए भी मिष्ट जलका स्वाद तब ही श्रावेगा जब जलको लेकर जिला इन्द्रिय के द्वारा स्पर्श कराया जायगा और मति ज्ञानोपयोग थिर होकर उधर एकाग्र होगा। यदि किसी और कामकी तरफ उपयोग आकुलित होगा तो जलको पीते हुए भी जल का स्वाद नहीं भासेगा। यदि हमारा ध्यान किसी और कार्य में है और कोई खटमल काट रहा है तो हमको वेदना नहीं होगी। जब उपयोग स्पर्श इन्द्रिय के द्वारा उस काटे हुए स्थल पर जाकर रुकेगा तब ही उस वेदना का ज्ञान होगा। उदास चित्त होने पर बढ़िया वस्त्र व रत्नमय आभूषण पहनने पर भी सुखकी बेदना नहीं होती, क्योंकि उपयोग उनकी सुन्दरता की ओर उपयुक्त नहीं है । जब उपयोग उन वस्त्र व आभूषणों की तरफ राग सहित लवलीन होगा तब उनके स्पर्श का स्वाद आयगा। की के सहज-सुख-साधन। [१४१ एक शोकाकुल मानव तीव्र धनकी हानि से पीड़ित है, उसकी प्रियतमा स्त्री उसको प्रेमपूर्वक आलिंगन करती है तो भी उस शोकातुर का उपयोग स्त्री के स्पर्श मे लवलीन न होने से उसको स्त्री के स्पर्श का स्वाद नहीं आयगा । कचहरी जाने की शीघ्रता में बहुत ही सुन्दर व रसीली रसोई भी खाई हुई अपने स्वाद रस को भान नहीं कराती है क्योकि उपयोग रसोई के खाने मे लवलीन नहीं है कितु व्यग्र है । एक वैरागी साधु के गले मे बहुत ही सुगधित पुष्पों की माला डाल दी जाती है, उस साधु का उपयोग रागसहित उस माला की सुगन्ध लेने में उपयुक्त नहीं होता है इसलिये उस साधुको उस सुगन्धी का सुख वेदित नहीं होता। एक बडी सुन्दर स्त्री का चित्र किसी रोग की पीडा से पीड़ित मानव के आखों के सामने लाया जाता है, वह पीड़ा के अनुभव में लीन है। उसके भीतर रागसहित उस चित्र के देखने का भाव नहीं होता है । अतएव उस सुन्दर चित्र देखने का स्वाद उस व्यग्रचित्त रोगी को नहीं आयगा । एक पतिव्रता स्त्री पति के वियोग से अातुर चिन्तातुर बैठी है, उसके सामने नाना प्रकार के सुरीले गान किये जाते हैं परन्तु उसका ज्ञानोपयोग रागसहित उनको नहीं सुनता है, उन पर उपयोग नहीं लगाता है इसलिये गान सुनने का सुख उस दुखित अबला के अनुभव मे नहीं आता । इससे सिद्ध है कि इन्द्रिय सुख व दुःख का भान तब ही होता है जब ज्ञानोपयोग की स्थिरता होती है । एक मजदूर नगे पैर ज्येष्ठ की धूप मे भार लिये कोसों चला जाता है उसको पगके जलने का दुःख नहीं होता क्योंकि उसका उपयोग पैसा लाभ करने में उलझा है, वह उस पगकी पीड़ा सरागभाव से अनुभव नहीं करता है । उसी जेठ मासकी धूप में यदि किसी धनिक को जो बिना जूता पहने व छतरी लगाए कभी नहीं चलता है,दस कदम भी नंगे पैर चलने को बाधित किया जावे तो वह उपयोग उधर को ही लगाता हुआ बहुत दुःख अनुभव करेगा। एक साधु आत्मध्यान मे तल्लीन है, शरीर पर डांस, मच्छर काटते है, साधु को किचित् भी कष्ट नहीं होता है क्योंकि उपयोग उस तरफ नहीं आया है। ध्यान हटते ही जैसे ही उपयोग उधर आता है वह काटने की वेदना को अनुभव करता है । इसी तरह जब सहज सुख आत्मा में है, आत्मा का स्वभाव है तब उसके लाभ का यही साधन है कि हम अपना उपयोग सर्व ओर से खींचकर एक अपने आत्मा ही पर लगावे । आत्मा के स्वभाव के ज्ञानमें थिरता से जमे । जिस समय उपयोग सर्व अपने आत्मा से भिन्न द्रव्य तथा भावों से हटकर अपने आत्मा ही शुद्ध गुणों में रमण करेगा तब ही सहज सुख का स्वाद आएगा। इसलिये आवश्यक है कि सहज सुख जिसमे है उस आत्मा को भले प्रकार पहचाना जावे । यह विश्वास लाया जावे कि आत्मा है और उसका स्वभाव इस तरह का है और उसी विश्वासयुक्त आत्मा के बानमें उपयोग को स्थिर किया जावे । इसी को रत्नत्रय मार्ग कहते हैं। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र की एकता को रत्नत्रय मार्ग कहते हैं। यही सहजसुख का साधन है। श्रात्मा का स्वभाव शुद्ध सिद्ध समान ज्ञानानंद वीतरागमय है । यह दृढ़ श्रद्धान सम्यग्दर्शन है। इसी दृढ श्रद्धा सहित आत्मा के स्वभाव का जान सम्यग्ज्ञान है तथा इसी श्रद्धा सहित ज्ञान में थिर होना सम्यक्चारित्र है । ये तीनों भी आत्मा से भिन्न नहीं है, आत्मा हो हैं । जैसे श्री महावीर स्वामी का श्रद्धान व महावीर स्वामी का ज्ञान ब महावीर स्वामी का ध्यान महावीर स्वामी से भिन्न नहीं है,तीनों का लक्ष्यबिंदु एक महावीर स्वामी है । सुवर्ण का श्रद्धान, सुवर्ण का ज्ञान व सुवर्ण का ध्यान सुवर्ण मे भिन्न नहीं है, सुवर्णही है । अतएव आत्मा ही स्वय अपने लिये आप ही सहज सुख का साधन है । अर्थात् आत्मा श्राप ही अपने १४२] मागमा । ग . . - 71 . . ? FREE: ध्यान से राजन गागा ilt : ' ' ", रास साधन है। यह जानोपयोग पाप दि विमा गगन हटाकर जन यात्म किया जाना | RELIEFTA बैठा है जिगत nिi l : ini; : मारा करना है। एप की मेर 27 -श्री मतो गोड कर पांचमी में, उनको रोग, म. सी. मीi, ", "rfriमाग बाहर छोया करता. मीभी ने ... 11:1यह विधकियो में देना... - Mi , Tी मारे छ. शिपिया ना र :- ने | Ri rगतमा । उनी हरापन 1.मा.. भी . अगवाने और भीतर रेना || जिमका रनको सान रिना व 111 नजर मारे मियान जो जो पन्य पान ।', '. मचा तान च समागमा । सद्या जान तोकrinar मा ? -- नि...' कि मेरे आगामी प्रामारि । 1 "इव 'पमिट जव सम्पांच: । उसे ना पार 17121 मे 17! ज्ञान दो अपेक्षामो से करना चाहिये-निम्न ... 75...:: : 1. शुद्र स्वभाव देखने गे याना । उस एि, पापना, ना! 1 11 11 1 3 7 नाना। जिस दृधि से पदार्थ का भाप स्वरुप गुमान ने 12, 3:11. "पप-11, 57 तो व्यवहारनय कहते है । TRJ को शुदरमा माग ::: नगनार नय दोनों से जाना जाये। हमारे सामने एक मेला सपा । जान दमको निना नाना न जाना जायगा तब तक उनको मापने का उपाय नही नामांगा। निनाना पा स्वभाव में नफेद रुई का बना हुआ है उन्मलिगे ,फेद या नि नि नयाग गत वही गला पड़ा मफेद स्वच्छ दिग्यता है क्योकि कपडा नो उतना।।, मल तो अपर से नामा, याची रज है, या चढा हुन्या पसीना कपडे का स्वभाव अलग है, मेल का स्वभा“लग से ! कपडा है मो मेल नही उसलिये असल से मृला स्वभाव से काटा पफेद बिर को देखना निश्चयनय का काम है। व्यवहारमा से कपागल क्याविनाने त्या ना को ढक दिया है । कपडा मैला दिग्नता है । मैल के सयोग से मलीनता पा से हो रही है ।पडे को वर्तमान अवस्था विभावरूप है, अशुद्ध है, दोनों ही प्रिया से दो भिन्न गानों को बना ठीक है. निश्चयनय से कपडा स्वच्छ हे,यह स्वभाव की हएि भी ठीक है । व्यवहारनय से कपडा मलीन है,यह विभावकी ति भी ठोक है । यदि कोई एक ही दृष्टि को माने दूसरी दृष्टि को सर्वथा न माने तो जान उग गले कपडे ना ठीक न होगा। और कभी भी कपडा साफ नहीं किया जासकेगा। - - कपडा नहीं मा ही काडे सहज-सुख-सावन । १४३] sho यदि कोई निश्चयनय का पक्ष पकड कर यह ही माने कि यह कपडा स्वच्छ ही है, उजला ही है, यह मला है ही नहीं तो ऐसा माननेवाला कभी कपडे को साफ करने का उद्यम न करेगा। इसी तरह यदि कोई व्यवहारनय का पक्ष पकडकर यह ही माने कि यह कपडा मैला ही है, मैला ही रहना इसका स्वभाव है, तो ऐसा माननेवाला भी कभी कपडे को स्वच्छ न करेगा। दोनो मे से एक दृष्टि से देखनेवाला कभी भी कपड़े को माफ नहीं कर सकता । जो कोई दोनो दृपियो से कपड़े को देखेगा कि यह कपडा स्वभाव से तो स्वच्छ परन्तु वर्तमान में इसकी स्वच्छता को मैल ने ढक दिया है, मैल कपडा नहीं, कपडा मैल नहीं, दोनो अलग २ स्वभाव वाले हैं तब अवश्य मैल को किसी मसाले से धोया जा सकता है, ऐसा यथार्थ नान एक बुद्धिमान को होगा और वह कपडे को अवश्य स्वच्छ कर डालेगा। इसी तरह यह आत्मा दोनो नयों से जानने योग्य है । निश्चयनय से यह बिलकुल निराला, अकेलार, सिद्ध समान शुद्ध है, ज्ञाता है, दृष्टा है, निर्विकार है, वीतराग है, अमृर्तीक है, परमानन्दमय है, इसमे कोई मलीनता व अशुद्धता नही है । न इसके आठों कमी का बन्धन है न रागद्वप क्रोधाधि भावकर्म है, न शरीरादि नोकर्म है । न इसके पास मन है न वचन है न काय है । यह एकाकी स्वतत्र परम शुद्ध स्फटिकमणि के समान है । यही इस आत्म द्रव्य का निज स्वभाव है, मूल स्वभाव है, निजतत्व है। व्यवहारनय से यह अपना प्रात्मा कर्म बध सहित है, पाप पुण्य को रखता है, सुख दुःख को भोगता है । क्रोधादि भावों में परिणमता है इन्द्रियो से व मन से बहुत थोडा जानता है। यह बहुत सी बातों का अज्ञानी है । वर्तमान मे पुद्गल के सयोग से जो इसकी अशुद्ध सासारिक अवस्था हो रही है इस बात का ज्ञान व्यवहार नय या पर्याय दृषि द्वारा देखने से होता है। दोनों ही बाते अपनी २ अपेक्षा से सत्यार्थ हैं। - । स्वभाव आत्मा का शुद्ध है, विभाव अशुद्व है । यदि निश्चयनय का पक्ष हो ग्रहण करके सर्वथा ही आत्मा को शुद्ध मानले तो कभी आत्मा को शुद्ध करने का यत्न नहीं हो सकेगा और जो व्यवहारनय का पक्ष ही ग्रहण करके सर्वथा ही आत्मा को अशुद्ध ही मानले तो भी शुद्ध करने का यत्न नहीं हो सकेगा। यत्न तब ही हो सकेगा जब निश्चयनय से स्वभाव मे शुद्ध होनेपर भी व्यवहारनय से विभाव मे हो रहा है इसलिये अशुद्ध है । यह अशुद्धता पुद्गल के सयोग से है । इसलिये इस सयोग को हटाया जा सकता है, ऐसा भाव जब होगा तब ही आत्मा के शुद्ध करने का प्रयत्न हो सकेगा । यही आत्मा का सच्चा ज्ञान है। सच्चा वैराग्य यह है कि प्रात्मा का स्वभाव मे रहना ही आत्मा की सुन्दरता है । यदि यह स्वभाव में हो, इसे किसी बात के जानने देखने की चिन्ता न हो, कोई क्रोध, मान, मागा, लोभ का क्लेश न हो, कोई तृष्णा न हो, कोई दु ख न हो, कोई विकार न हो, कोई जन्म मरण न हो, सदा ही अपने स्वाभाविक सहज सुख का अनुभव हो । कर्म का सयोग तथा शरीर का सम्बन्ध इमके गुणो का धातक है, इसकी सुन्दरता को बिगाडने वाला है, इसे श्राकुलित, खेदित, शोकित रखने वाला है। अतएव मुझे किसी भी परमाणु मात्र पुद्गल से प्रयोजन नहीं है, न पुण्य से न पाप से, न सामारिक क्षणिक सुख से, न दु ख से, न इन्द्र अहमिंद्र पद से, न चक्रवर्ती विद्यावर, नरेन्द्र पद मे | कोई भी ससार की अवस्था मेरे लिये हितकारी नहीं है । ऐसा सच्चा वैराग्य हो कि समार मात्र विरत दीखे । सर्व ही कर्म का सयोग त्यागने योग्य पर दीखे, सिवाय निज स्वभाव के और सबको अकार्यकारी-स्वभाव विका- रक नानकर सबसे मोह रागद्वप छोड देना यही सच्चा दैराग्य है । मच्चे ज्ञान व सच्चे वैराग्य के साथ अात्म ध्यान करना ही रत्नत्रय धर्म है या सहज सुख का माधन है । -- - १४४] सहज-सुख-साधन। - आत्मध्यान से से जैसे मलीन कपड़े को स्वच्छ करने के लिये कपड़ा स्वच्छ है, मैल के सयोग से मैला है इस सच्चे ज्ञान को तथा कपड़े के स्वभाव को ढकने वाले मैल की कोई जरूरत नहीं है, यह कपड़े के लिये अहितकारी है, ऐसे सच्चे वैराग्य की जरूरत है, और साथ साथ इस सच्चे ज्ञान व नैराग्य को लिये हुए कपडे पर ध्यान लगाने की जरूरत है, तब कपडा स्वच्छ होगा वैसे ही ज्ञान वैराग्य के साथ आत्मा के ध्यान से आत्मा शुद्ध होगा। यदि कोई कपडे को स्वच्छ करने की इच्छा रखता हुआ कपडे पर मसाला रखके इधर उधर ध्यान रक्खे, कपड़े पर ध्यान न रक्खे व एक चित्त हो कपड़े पर बल पूर्वक रगड न लगावे तो कभी भी कपडे का मैल न कटेगा और वह कपडा कभी भी स्वच्छ न होगा। इसी तरह कोई सच्चे ज्ञान वैराग्य सहित होकर व्यवहार चारित्र का मसाला लेकर यदि आत्मा को शुद्ध करना चाहे,जप तप करे, सयम पाले परन्तु उपयोग को एकाग्र न करे, आत्मा मे ध्यान न लगावे आत्मानुभव न करे तो कदापि आत्मा शुद्ध न होगा। आत्मा के शुद्ध करने का व सहज सुख के पाने का एक मात्र उपाय आत्मध्यान है । जो उपाय सहज सुख पाने का है वही उपाय आत्मा के मैल काटने का है । आत्मा के कर्म मैल का सयोग रागद्वेप मोह भावों से होता है । तब कर्म मैल का कटना-दूर होना वीतराग भावो से होता है । जब आत्म-ध्यान किया जाता है, सच्चे ज्ञान व सच्चे वैराग्य के साथ शुद्ध आत्मा के स्वभाव मे एक तान हुआ जाता है तब वीतरागता का अश बढ़ता जाता है । यही ध्यान की अप्ति है जो कर्म ईंधन को जलाती है। जिस सहज सुख का स्वाद आता है उसी आत्मध्यान आत्मा का कर्ममैल कटता है। तथा इसी आत्मध्यान से आत्मा का बल अधिक अधिक प्रगट होता है । अतराय कर्म का मैल जितना- जितना कटता है उतना उतना आत्मबल (soul force) बढ़ता जाता है । प्रात्मध्यान के भीतर एक गुण और प्रगट हो जाता है, वह है धैर्य (firmness) धैर्य इतना अधिक बढ़ जाता है कि अचानक सकटों के व आपत्तियों के आनेपर वह आकुलित नहीं होता है, कमें। का उदय मानकर सतोपी रहता है, तथा आत्मा को अविनाशी व अजर अमर मानता हुआ वह सासारिक आपत्तियों से आत्मा का कुछ भी विगाड नहीं समझता है । बड़े बड़े उपसर्ग आने पर भी वह मेरु पर्वत के समान अचल रहता है । जैसे मिश्री का कण एक क्षण मात्र जिह्वा पर रहे तो भी वह उतनी देर ही मिष्ट स्वाद देता है, वैसे मात्मा का ध्यान यदि वहुत ही अल्प समयतक रहे तो भी वह सहज सुख का स्वाद देता है । एक मिनट के साठ सेकन्ड होते हैं, एक सेकन्ड के भी सौ भाग करो । इस सौवें भाग भी यदि उपयोग आत्मस्थ होजावे तो भी सहज सुख अनुभव में आएगा। अतएव आत्मध्यान के अभ्यासी को समता भाव के साथ जितनी देर तक लगातार ध्यान लग सके, आकुलता न हो, उतनी देर ही आत्मध्यान करके सतोष मानना चाहिये। अधिक समय तक आत्म स्थिरता करने की चिन्ता व घबड़ाहट नहीं लानी चाहिये । बड़े बडे शक्तिशाली व बड़े बड़े वीर वैराग्यवान पुरुप भी आत्मा का ध्यान लगातार दो घडी के भीतर ही-भीतर कर सकते हैं । दो घडी अडतालीस (४८) मिनट की होती हैं। एक बात और याद रखनी चाहिये कि आत्मध्यान पैदा करने की माता आत्मा के शुद्ध स्वरूप की भावना है । भावना बहुत देर तक की जा सकती है। भावना करते करते यकायक ध्यान पैदा होता है जो कम या अधिक देर तक बिलकुल एकाग्र रहता है । ध्यान के समय मन, वचन, काय तीनों के व्यापार बन्द हो जाते हैं, चिन्तवन नहीं होता है । आत्मा के स्वरूप में उसी तरह रमणभाव हो जाता है जैसे किसी सहज-सुख-साधन । [१४५ . सुन्दर रूप के देखने मे उपयोग एकाग्र हो जाता है। उस समय ध्याता को यह विचार भी नहीं होता है कि ध्यान करता हूँ या आत्मा को ध्याता हूँ। वह दशा एक ऐसी है जिसका वर्णन नहीं हो सकता है । उम दशा को अद्वैत भाव कहते हैं । वहा एक आत्मा का ही स्वाद विकल्प व विचार रहित होता है। इस स्वानुभवरूप श्रात्मध्यान को पैदा करनेवाली आत्मा की भावना है। जैसे दूध को बिलोते बिलोते मक्खन निकलता है वैसे आत्मा की भावना करते करते श्रात्मध्यान या अात्मानुभव हो जाता है। सच्चे ज्ञान के लिये कहा जा चुका है कि हमें आत्मा को निश्चय नय तथा व्यवहार नय दोनों से जानना चाहिये । इन दोनो दृष्टियों में से प्रात्मा की भावना करने के लिये निश्चय दृष्टि को ग्रहण कर लेना चाहिये, व्यवहार दृष्टि के विषय को धारणा मे रखना चाहिये, भावना के सामने न लाना चाहिये । जिस स्थान पर पहुंचना है उस स्थानपर ले जानेवाले मार्ग पर चलने से ही हम उस स्थान पर पहुंच सकते हैं। हमें शुद्धात्मा का अनुभव प्राप्त करना है अतएव शुद्धात्मा के स्वरूप की ही भावना करनी चाहिये ! निश्चयनय ही आत्मा को शुद्ध बनाती है, दिखाती है । इसलिये मैं शुद्ध हूँ, निर्विकार हूँ, जायक हूँ, परमानन्दमय हूँ, परमात्मा रूप हूँ , यही भावना वार वार करना ही आत्मानुभव को जागृत करने वाली है। जब अात्मानुभव हो जाता है तब भावना बद हो जाती है। तव अद्वैतभाव, निर्विकल्पभाव, स्वात्मरमण भाव, एकाग्रभाव ही रहता है । जव तक स्वात्मानुभव रहता है, जब तक न निश्चय-नय का पक्ष या विचार है, न व्यवहार नय का पक्ष या विचार है । आत्मानुभव नयों से बाहर, विकल्पों से बाहर, अनिर्वचनीय, अचतिनीय एक परमानन्दमयी अमृत का समुद्र है। इसी समुद्र में स्नान करते हुए डुबकी लगाना आत्म ध्यान है। आत्मानुभव या आत्मध्यान ही निश्चय रत्नत्रय है या निश्चय मोक्षमार्ग है । इसके बाहरी साधनों में व्यवहार रत्नत्रय या व्यवहार मोक्षमार्ग उपयोगी है जिसका वर्णन आगे किया जायगा । यहा पर श्रात्म ध्यान करने के कुछ जरूरी निमित्त कारणों को बता देना उचित होगा । ध्यान करने वाले में दृढ व पक्का श्रद्धान आत्मा का निश्चय नय तथा व्यवहार नय से होना चाहिये तथा उसके मनमें सच्चा ज्ञान व सञ्चा बैराग्य होना चाहिये, ऐसा ध्याता आत्मरसिक होता है, आनन्दामृत पीने का प्रेमी होता है। जैसे कोई के घरमें बड़ा ही मिष्ठ रस हो वह पुनः पुन. उसे पीकर स्वाद को लेकर सुख भोगता है वैसे ही आत्मरसिक चार वार जितना ही अधिक हो सके आत्मध्यान करके आत्मा के अानन्दामृत का स्वाद लेता है। इस घोर आपत्तिमय संसार के भीतर रहता हुआ वह एक अात्मानद का ही प्रेमी हो जाता है । अतएव जिन निमित्तों से ध्यान हो सकता है उन निमित्तों को अवश्य मिलाता है । ध्यान करनेवाले को समय, स्थान, मनशुद्धि, वचनशुद्धि, कायशुद्धि, आसन बैठने का व आसन लगाने का योग्य उपाय करना चाहिये तथा उस विधि का सेवन करना चाहिये जिमसे ध्यान हो सके । (१) ध्यान-करने का समय अत्यन्त प्रातःकाल सूर्योदय के पहले से लेकर सूर्योदय के पश्चात तक छ घड़ी, चार घही, या दो घड़ी है । यह उत्तम, मध्यम, जघन्य है । अभ्यास करनेवाला जितना मो समय दे सके उतना ही ठीक है । यदि दो घड़ी करना हो तो १ घडी सूर्योदय के पहले से लेकर एक घडी पीछे तक करे इसी तरह मध्यम व उत्तम मे करे । दोपहर को ब साझ को भी इसी तरह तीन काल हैं । मध्मय रात्रिको भी ध्यान इसी तरह किया जा सकता है । इसके सिवाय जिम समय मन लगे उसी समय ध्यान किया जा १४६] सहज-सुख-साधन। सकता है । सर्व से श्रेए समय प्रातःकाल का है । तव समय बिलकुल शात रहता है, वातावरण शीतल व सुहावना होता है। (२) स्थान-ध्यान के लिये स्थान पवित्र व शांत व नोभ रहित होना चाहिये, जहांपर स्त्रियों का य बच्चों का शब्द न आवे, पुरुषों की बात भी न सुनाई दे । हवा अनुकुल हो । न बहुत शीन हो न बहुन उष्णता हो । जितना एकांत होगा उतना ध्यान अधिक अच्छा हो सकेगा। पर्वत का शिखर, पर्वत की गुफा, वन, उपवन नदी व समुद्र तट, नगर बाहर उद्यान या नशिया, श्री जिन मदिर का एकांत स्थान, का या उपाश्रय का एकांत स्थान, व अपने घर का ही एकात स्थान जहां निराकुलता रहे ऐसा स्थान ध्यान के लिये खोन लेना चाहिये। धर्मशाला, (३) मन की शुद्धि-जितनी देर ध्यान करना हो उननी देर और सर्व कामों से निश्चित हो जावे । यदि कोई काम दूसरों की देखभाल, रक्षा या प्रबन्धका हो तो दूसरे के सुपुर्द करदे, अपने ऊपर कोई चिन्ता न रहे । निश्चित हुए विना ध्यान में मन न लगेगा। जहा भय का कारण हो वहा न बैठे अथवा भय का कारण सभवित हो तो किसी भी अन्य मानव को अपने साथ मे रखे जिससे वह रक्षा रखे । ध्याता के मन में श्राकुलता न होनी चाहिये । मन से शोक, विपाद श्रादि दूर कर उतनी देर के लिये मन का ममत्व सबसे छोडकर ध्यान करने बैठे। (४) बचन शुद्धि-ध्यान में जितनी देर लगानी हो उतनी देर मौन रहे व ध्यान के सहकारी मत्रों को पढे या पाठ पढे परन्तु और फिमीसे बातचीत न करे। (५) काय शुद्धि-शरीर मे बहुत भूख न हो, बहुत भरा न हो, दर्द न हो, मलमूत्र की बाधा न हो। शरीर भीतर से स्वस्थ हो, बाहर से भी पवित्र हो । शरीर पर जितना कम वस्त्र हो उतना ठीक है। वस्त्र रहित भी ध्यान किया जा सकता है । जिस तरह डांस मन्छरादि की बाधा को होते हुए थिरता रहे वैसे उपाय करना चाहिये । शरदी की गधा नहीं सह सके तो अधिक वस्त्र ओढले । शरीर भीतर व बाहर से निराकुल हो । शरीर के कारण से कोई बाधा मनमे न आवे ऐसा शरीर को रक्खे । (६) आसन बैठने का ध्यान के लिये कोई घास का आसन या चटाई या पाटा या शिला नियत करले । यदि कुछ न मिल सके तो पवित्र भूमि पर भी ध्यान किया जा सकता है। (७) आसन लगाना-ध्यान करते हुए पद्मासन, हुए पद्मासन, अर्द्ध पद्मासन या कायोत्सर्ग तीन आसन सुगम हैं तथा बड़े उपयोगी हैं । श्रासन लगाने से शरीर थिर रहता है। शरीर की थिरता से श्वासोछ्वास सम तरह से चलता है व मन निश्चल रह सकता है । दोनों पग जांघों पर रक्खे, दोनों हथेली एक को दूसरे पर रक्खे, सीधा मस्तक सीधी छाती करके इस तरह बैठे कि दृष्टि नाक पर मालूम होती हो। यह पद्मासन है। एक जांघ के नीचे एक पग ऊपर रख के पद्मासन की तरह बैठने को अर्ध पद्मासन कहते हैं। सीधे खडे हो दोनों पग आगे की तरफ चार अगुल की दूरी पर रखकर दोनों हाथ लटकाकर ध्यान मय रहना कायोत्सर्ग है । जिस आसन से ध्यान जने उसी आसन से बैठा जा सकता है। ध्यान के वीरासन, मयूरासन हैं। आदि बहुत से आसन सहज-सुख-साधन । [१४७ - मल (E) ध्यान की विधि- बहुत सीधी विधि यह है कि अपने शरीर के भीतर व्याप्त आत्मा को शुद्ध जल की तरह निर्मल भरा हुआ बिचार करे और मन को उसी जल समान आत्मा मे डुबाये रक्खे, जब हटे तब अहं, सोह, सिद्ध, अरहत, सिद्ध, ॐ आदि मत्र पढने लगे फिर उसीमें डुबोए । इस तरह वार २ करे। कभी कभी आत्मा का स्वभाव विचार ले कि यह आत्मा परम शुद्ध नानानन्दमई है। (२) दूसरी विधि यह है कि अपने आत्मा को शरीर प्रमाण आकारधारी स्फटिक मणि की मूर्ति समान विचार करके उसीके दर्शन मे लय हो जावे । जव मन हटे तब मत्र पढता रहे, कमी कभी आत्मा का स्वभाव विचरता रहे। (३) तीसरी विधि यह है कि पिंडस्थ ध्यान करे । इसकी पांच धारणाओं का क्रमश अभ्यास करके आत्मा के ध्यान पर पहुँच जावे । पाच धारणाओं का स्वरूप यह है: (क) पार्थिवी धारणा- इस मध्य लोक को सफेद निर्मल क्षीर समुद्रमय चितवन करे । उसके मध्य ताए हुए सुवर्ण के रग का एक हजार पत्रों का कमल एक लाख योजन का चौडा जम्बूद्वीप के समान विचारे इस मध्य में कर्णिका को सुमेरू पर्वत के समान पीत वर्ण का सोयो । इस पर्वत के ऊपर सफेद रंग का ऊचा सिंहासन विचारे । फिर ध्यान करे कि मैं इस सिहासन पर पद्मासन बैठा हूँ। प्रयोजन यह है कि मैं सर्व कर्म को जलाकर आत्मा को शुद्ध कर । इतना चिन्तवन पार्थिवी धारणा है। (ख) आग्रेयी धारणा-उसी सिंहासन पर बैठा हुआ यह सोचे कि मेरे नाभिमडल के भीतर एक सोलह पत्रों का निर्मल सफेद खिला हुआ कमल ऊपर की ओर मुख किये हुए है। उसके. सोलह पत्रोंपर मोलह अक्षर पीत रग के लिखे विचारे । अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ल ए ऐ ओ औ अश्रः। उस कमल के नीचे कणिका मे चमकता हुआ है अक्षर विचारे । फिर इस नाभिकमल के ऊपर हृदय में एका अधोमुख औंधा पाठ पत्रों का कमल विचारे जिसके पत्रों पर जानावरण आदि आठ कर्मों को स्थापित करे । फिर यह सोचे कि नाभि कमल के मध्य में जो है मन्त्र है उसकी रेफ से धूआ निकला, फिर अग्नि का फुलिगा उठा, फिर लौ उठी और वह बढकर हृदय के कमल को जलाने लगी। वही अग्नि की शिखा मस्तक पर आगई ओर चारो तरफ शरीर के उसकी रेखा फैलकर त्रिकोण में बन गई । तीन रेखाओं को र र अग्नि मय अक्षरो से व्याप्त देखे तथा तीनों कोनों के बाहर हरएक में एक एक साथिया अग्निमय विचारो भीतर तीनों कोनो पर ॐ अग्निमय विचारे तब यह ध्याता रहे कि बाहर का अग्नि मडल धूम रहित शरीर को जला रहा है व भीतर की अग्नि शिखा आठ कर्मों को जला रही है । जलाते जलाते सर्व राख हा गई इतना ध्यान करना सो आग्नेयी धारणा है। (ग) मारुती धारणा वही ध्याता वहीं बैठा हुआ सोचे कि तीव्र पवन चल रही है, जो मेघों को उड़ा रही है, समुद्र को क्षोभित कर रही है, दशों दिशाओं में फैल रही है, यही पवन मेरे आत्मा के ऊपर पडी शरीर व कर्म के रज को उडा रही है । ऐसा ध्यान करना पवन धारणा है । (घ) वारूणी धारणा-वही ध्याता सोचे कि बड़ी काली काली मेघों की घटाए आ गई । उनसे मोती समान जल गिरने लगा तथा अर्घचद्राकार जलका मडल आकाश में बन गया, उससे अपने आत्मा पर जल पढता हुआ विचारे कि यह जल बची हुई रज को धो रहा है। ऐसा सोचना जल धारणा है। । - के १४८] महन-सुख-साधन। (३, तत्वरूपवती धारणा--फिर वही ध्यानी सोचे कि मेरा प्रात्मा सर्य कमी मे रहित व शरीररहित पुरुपाकार सिद्ध भगवान के समान शुद्ध है। ऐसे शुद्ध यात्मा मे तन्मय हो जाये । यह तत्वरूपवती धारणा है। (४) चौथी विधि यह है कि पदों के द्वारा पदस्थ भ्यान किया जाये । उसके अनेक उपाय है। कुछ यहां दिये जाते है कि है मत्रराज को चमकता हुया नाशाय पर या भौहो के मध्य पर स्थापित करके चित्त को रोके । कभी मन हटे तो मंत्र कहे व अहत सिद्ध का स्वरूप विचारा जावे । (ख) ॐ प्रणव मंत्र को हृदयकमल के मध्य में चमकता हुया विचारे । चारों तरफ १६ सोलह स्वर व कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग व य र ल व श प स ह उन सब व्यजनो से वेष्टित विचारे । कर्णिका में १६ स्वर विचार ले व पाट पत्तों पर शेष अनरों को बांट ले और ध्यान परे । कभी कभी को उच्चारण करे कभी पांच परमेष्ठी के गुण विचारे । (ग) नाभि स्थान में या हदय स्थान में सफेद रगका चमकता हुया पाठ पत्रों का कमल विचारे । मध्य कर्णिका मे सात अक्षर का "णमो अरहताण" लिन्या विचारे- चार दिशाओं के चार पत्रो पर क्रम में णमोसिद्धाण, णमोबाइरियाण, णमोउवमायाण, णमोलोग सव्यमारण" इन चार मन्त्र पढों को लिये, चार विदिशाओं के चार पत्रों पर 'सम्यग्दर्शनाय नम' सम्यग्नानाय नमः सम्यक चारित्राय नम., सम्यक् तपसे नमः" इन चार मन्त्री को स्थापित करे, फिर क्रम से एक एक पद पर मनको रोक कर कभी कभी पद बोलकर कभी अरहन आदि का स्वरूप विचार कर ध्यान करे । (घ) मुख मे सफेद रंग का एक कमल अाठ पत्रों का सोचे । उन आठो पत्री पर कम से आठ अक्षरों को स्थापित करे, a णमो अरहताणं" एक एक अक्षर पर चित्त रोके । कभी मंत्र पढे कभी स्वरूप विचारे । (ड) इसी कमल के बीच मे कर्णिका मे सोलह स्वरों को विचारे, उनके बीच में ही मंत्र को विराजित ध्याये। (५) रूपस्थ ध्यान की विधि यह है कि समयोंसरण मे विगजित तीर्थकर भगवान को ध्यानमय सिंहासन पर शोभित बारह सभाओं से वेष्ठित इद्रादिकों से पृजित ध्यावे । उनके ध्यानमय स्वरूप पर दृष्टि लगावे। (६) छठी विवि रूपातीतध्यान की है-इसमे एकदम से सिद्ध भगवान को शरीर रहित पुरुषाकार शुद्ध स्वरुप विचार कर के अपने आपको उनके स्वरूप मे लीन करे । ध्यान का स्वरूप श्री ज्ञानार्णव ग्रथ अध्याय ३७, ३८, ३९, ४० में है वहां से विशेप जानना योग्य है । जय ध्यान करने में मन लगे व ध्यान के समय के सिवाय भी प्रात्ममनन करना हो तो नीचे लिखे काम किये जा सकते है। इन कामों के करने में भी मध्य मध्य मे कुछ कुछ देर वृत्ति में आत्मा का विचार अाता रहेगा , धर्मध्यान होता रहेगा। (१) आध्यात्मीक वैराग्यमय ग्रथों को ध्यान से पढे तथा सुने । (२) आध्यात्मीक भजनों को गावे , गाजे के साथ भी गा सकता है। (३) जिनेन्द्र की वैराग्य स्तुति पढ़े, स्तोत्र पढ़े। (४) जिनेन्द्र की थ्यानमय प्रतिमा के सामने खडा हो ध्यान करे या उनके स्वरूप को देखता हुआ सहज-सुख-साधन । [१४६ पूजा करे, भक्ति करे । जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल इन आठ प्रकार शुद्व द्रव्यों को लेकर इनके द्वारा भक्ति करके आत्मा की भावना करे । इन आठ द्रव्यो की भावना क्रम से नीचे प्रकार है- (१) जल-मैं जल चढ़ाता हूँ , मेरा जन्म, जरा, मरण, रोग नष्ट हो । (२) चंदन-मै चन्दन चढाता हूँ, मेरा भव का आताप शांत हो । (३) अक्षत-मैं अक्षत चढाता हूँ, मुझे अक्षय गुणो की प्राप्ति हो। (४) पुष्प-मै पुष्प चढाता हूँ, मेरा काम विकार शांत हो । (५) नैवेद्य-मैं नैवेद्य (चरु) चढाता हूँ, मेरा क्षुवा रोग शांत हो, (मिठाई व गोले के खंड चढ़ाना)। (६) दीपक-मैं दीपक चढ़ाता हूँ, मेरा मोह अंधकार नए हो । (७) धूप-मैं अग्नि मे धूप खेता हूँ, मेरे आठ कर्म दग्ध हों। (८) फल-मैं फल चढाता हूँ, मुझे मोक्षफल प्राप्त हों। फिर श्री जिनेन्द्र की जयमाल स्तुति पढे । इस पूजा से भी आत्मध्यान जग जाता है । जैसे मिठाई की चर्चा करने से, मिठाई को देखने से, मिठाई के स्मरण करने से सराग भाव के कारण मिठाई के स्वाद लेने के समान स्वाद सा जाता है । वैसे आत्मा की चर्चा करने से, आत्म ध्यान को देखने से, आत्मा के स्मरण करने से सहज सुख का स्वाद सा आजाता है । सहज सुख के अभिलाषी को वे सन प्रयत्न कर्तव्य है, वह सत्र सगति कर्तव्य है जिससे आत्मा के मनन व ध्यान में उपयोग रम सके व आत्मा के सिवाय सम्पूर्ण जगत के प्रपचजाल से उपयोग विरक्त हो सके। वास्तव में अद्वैत अात्मानुभव ही मुख्यता से सहज सुख का साधन है। इस अनुभव की प्राप्ति के लिये जो जो यत्न किया जावे वह भी परम्परा से सहज सुख का माधन है । जीवन को सफल करने के लिये, कटकमय ससार के भीतर गुलाब के सुख समान चमकता हुआ जीवन बिताने के लिये सहज सुख का साधन अवश्य कर्तव्य है । रत्नत्रय मार्ग ही सहज सुख का साधन है। अब देखिये, जैनाचार्य इस सबन्ध में क्या २ अमृतवाणी की वर्षा करते हैं । (१) श्री कुन्दकुन्दाचार्य समयसार में कहते हैं- जीवो चरित्तदंसणणाणद्विद तं हि ससमयं जाणे । पुग्गल कम्मुवदेस छिदं च तं जाण परममयं ॥ २ ॥ भावार्थ-जब यह जीव अपने ही आत्मा के शुद्ध स्वभाव के श्रद्धान ज्ञान व चारित्र की एकता रूप होता है अर्थात् स्वानुभवरूप होता है, तब इसको स्वसमय अर्थात् आत्ममथ जानो और जब यह पुद्गल कर्म के उदय से होनेवाली रागादि या नर नारकादि पर्यायों में लीन होता है, तम इसको पर समय या आत्मा से बाहर पर में रत जानो। एयत्तणिछय गदो समत्रो, सव्वत्थ सुन्दरोलोगे । बंधकहा एयचे, तेण विसंवादिणी होदि ॥ ३ ॥ - १५०] सहज-सुख-साधन। ते , भावार्थ-इस लोक में यह आत्मा अपने एक शुद्ध स्वभाव में तिष्टा हुया सर्वत्र सुन्दर भासता है क्योंकि वह अपने स्वभाव में है ऐसा सिद्ध समान शुद्ध स्वभाव होते हुए भी इसके साथ कर्म का वध है, यह बात भी कहना प्रात्मा के स्वरूप की निन्दा है। णाणमि भावणा खलु, कादवा दंसणे चरित्त य । पुणु तिरिणवि आदा, तम्हा कुण भावणं यादे ।।११।। भावार्थ- सम्यग्दर्शन मे, मम्यग्ज्ञान में व सम्यक्चारित्र मे भावना करनी चाहिये परन्तु ये तीनों ही रत्नत्रय आत्मा का ही स्वभाव है इसलिये एक श्रात्मा की ही भावना करो। दंमणणाणचरित्ताणि, सेविदगणि साहुणा णिच्च । ताणि पुण जाण तिरिणवि अप्पाणं चेव णिच्छयदो ॥ १६ ॥ भावार्थ-स -साधन करनेवाले को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यकचारित्र की सदा सेवा करनी चाहिये, परन्तु निश्चय से ये तीनों ही श्रात्मा ही हैं, आत्मा से भिन्न नहीं है। इसलिये आत्मा की ही आराधना करनी चाहिये। रत्तो बंधदि कम्मं मुचदि जीयो विरागसपण्णो । एमो निणोवदेसो तमा कम्मेसु मारज्ज ।। १५७ ।। भावार्थ-ससार मे जो जीव रागी है, ग्रामक है वह कर्मों को बाधता है, परन्तु जो ससार से वैरागी है वह कमी से मुक्त होता है, यह जिनेन्द्र का उपदेश है। इसलिये पुण्य या पापकी में रजायमान मत हो, आसक्त मत हो। वदणियमाणि धरता सीलाणि तहा तवं च कुचंता । परमवाहिरा जेण तेण ते हॉति अण्णाणी ॥ १६० ॥ भावार्थ- व्रत व नियमो को पालते हुए तथा शील और तपको करते हुए भी यदि कोई परमार्थ जो आत्मानुभव है उससे रहित है, केवल व्यवहार चारित्र में लीन है, निश्चय चारित्र से शून्य है वह अज्ञानी मिथ्यादृष्टि है। अप्पाणमप्पणोरु भिदण दोसु पुरणपावजोगेसु । दंसणणाणम्हिठिदो इच्छाविरदो य अण्णामि ।। १७७ ।। जो सव्वसंगमको झादि अप्पाणमप्पणो अप्पा । णवि कम्म णोकम्मं चेदा चिंतेदि एयचं ॥ १७८ ।। भावार्थ-जो कोई आत्मा अपने आत्मा को अपने आत्मा के द्वारा पुण्य तथा पाप-रूप मन वचन काय के योगों से रोककर सर्व प्रात्मा के सिवाय परपदार्थों में इच्छा को दूर करता हुआ आत्मा के दर्शन और ज्ञान स्वभाव में स्थिर होता है तथा सर्व परिग्रह से मुक्त होकर सर्व ममता को छोड़कर अपने प्रात्मा के द्वारा सहज-सुख-साधन । [१५१ । । अपने आत्मा को ध्याता है, द्रव्य कर्म व शरीर को नहीं ध्याता है वह ज्ञानी एक शुद्ध आत्म स्वभाव का अनुभव करके उसीका आनन्द लेता है। णाणगुणेहिं विहीणा एदं तु पदं वहूवि ण लहति । तं गिराह सुपदमेदं जदि इच्छसि कम्मपरिमोक्खं ।। २२१ ॥ भावार्थ-बहुत भी जीव आत्मज्ञान तथा आत्मानुभव से रहित होते हुए निस निज स्वाभाविक पदको नहीं पा सकते हैं, तू उसी एक अपने निज स्वभाव को ग्रहण कर, यदि तू कमा से छूटना चाहता है । कह सो घिप्पदि अप्पा परणाए सो दु पिप्पदे अप्पा । जह परणाए विभत्तो तह पएणा एव वित्तव्यो ॥३१८॥ पएणाए पित्तव्यो जो चेदा सो अहं तु णिच्छयदो। ग्रवसेसा जे भावा ते मज्झपरित्त णादव्या ॥३१॥ भावार्थ-शिष्य प्रश्न करता है कि-श्रात्मा को कैसे ग्रहण करके अनुभव किया जावे । प्राचार्य कहते हैं- प्रजा या भेद विज्ञान या विवेकभाव से ही आत्मा को ग्रहण करना चाहिये । जैसे प्रज्ञा के द्वारा इस आत्मा को सर्व रागादि भावकर्म, ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म, शरीरादि नोकर्म तथा सर्व अन्य जीव व पुद्गलादि द्रव्यों से भिन्न जाना गया है उसी प्रज्ञा से ग्रहण करना चाहिये । जैसे जिस बुद्धि से चावल व तुष को अलग अलग जाना जाता है उसी बुद्धि से चावल को प्रयोजनभूत जानके ग्रहण किया जाता है, उसी तरह जिस विवेक से आत्मा को परसे भिन्न जाना गया उसी विवेक से उसे ग्रहण करना चाहिये । तथा जिसको प्रना ग्रहण करना है वह ज्ञाता आत्मा में ही तो निश्चय से हूँ इससे मैं आप में ही स्थिर होता हूँ, और अपने से भिन्न जो सर्वभाव हैं उन सबको पर है ऐसा जानता हूँ । व ऐसा ही जानना उचित है । णवि एस मोक्खमग्गो पाखडी गिहमयाणि लिंगाणि । दंसणाणचरित्ताणि मोक्खमग्गं जिणा विति ॥ ४३२ ।। जमा जहित्तु लिंगे सागारणगारि एहि वा गहिदे । दंगपाणणाणचरिचे अप्पाणं जुजमोक्खपहे ॥ ४३३ ।। मुस्खयहे अप्पाणं ठवेहि वेदयहि झायहि तं चेत्र । तत्थेव विहर णिच्चं माविहरसु अण्णदव्वेसु ।। ४३४ ।। भावार्थ-निश्चय से साधु के व श्रावकों के बाहरी भेष मोक्षमार्ग नहीं हैं, सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान व सम्यक् चारित्र को जिनेन्द्रों ने मोक्षमार्ग कहा है । इसलिये गृहस्थ व साधु के ग्रहण किये हुए भेपों में ममता छोड करके अपने आत्मा को सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र की एकतारूप मोक्षमार्ग मे स्थापन कर । इसी स्वानुभव रूप मोक्षमार्ग में अपने को रख, इसी का मनन कर व इसी का ध्यान कर व इसी मे रमण कर । अपने आत्मा को छोडकर दूसरे द्रव्य के चितवन मे मत जा । है * से १५२] सहज-सुख-साधन। (२) श्री कुन्दकुन्दाचार्य पंचास्तिकाय में कहते हैं- सम्मत्तणाणजुत्त चारित्तं रागदोसपरिहीणं । मोक्खस्स हवदि मग्गो भव्याणं लद्धवुद्धीणं ।। १०६ ।। भावार्थ-आत्मज्ञानी भव्य जीवो के लिये रागद्वेप से रहित सम्यग्दर्शन व ज्ञान युक्त चारित्र ही मोक्ष का मार्ग है। जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व जोगपरिकम्मो । तस्स सुहासुहडहणो झाणमयो जायए अगणी ॥ १४६ ॥ भावार्थ-जिमके भावों में राग, द्वेष, मोह नहीं है, न मन, वचन, कार्यों की क्रिया है, उसी के भाव में शुभ तथा अशुभ भावों को दग्ध करनेवाली स्वात्मानुभव रूपी ध्यानमई अग्नि पैदा होजाती है। दंसणणाणसमग्गं झाणं णो अण्णदव्बसंजुनं । जायदि णिज्जरहेद् सभावसहिदस्स साधुस्स ।। १५२ ।। भावार्थ जो साधु अपने आत्मा के स्वभाव को जानता है। उसके लिये सम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान सहित आत्मरमणता रूप ध्यान जिसमें आत्मा के सिवाय अन्य द्रव्य का सयोग नहीं है, उत्पन्न होता है। इसी ध्यान से कमी का क्षय होता है। जो सव्वसंगमुक्को णण्णमणो अप्पण सहावेण । जाणदि पस्सदि णियदं सो सगचरियं चरदि जीवो ॥ १५८ ॥ भावार्थ-जो कोई सर्व परिग्रह त्यागकर एकाप्र मन होकर अपने आत्मा को स्वभाव के द्वारा निरन्तर जानता देखता रहता है वही जीव स्वचारित्र में या आत्मानुभव में या आत्मा के ध्यान मे वर्त रहा है। णिच्चयणयेण भणिदो तिहि तेहिं समाहिदो हु जो अप्पा। ण कुणदि किचिवि अण्णं ण मुयदि सो मोक्खमग्गोत्ति ॥ १६१ ॥ भावार्थ-निश्चयनय से यह कहा गया है कि जो आत्मा रत्नत्रय सहित होकर किसी भी अन्य द्रव्य पर लक्ष्य नहीं देता है और न अपने स्वभाव को त्यागता है। आप आपमें मगन होता है वही मोक्ष मार्ग है। जस्स हिदयेणुमत्त वा परदव्वम्हि विज्जदे रागो। सो ण विजाणदि समय संगस्स, सबागमधरोवि ॥ १६७ ॥ , भावार्थ-जिसके मन को जानता में परमाणु मात्र भी जरा सा भी राग पर द्रव्य में है वह सर्व आगम हुआ भी अपने प्रात्मा को नहीं जानता है । आत्मा तो सबसे भिन्न एक शुद्ध ज्ञायक स्वभाव है, उसमें राग द्वेष के मोह का रच मात्र भी लेश नहीं है।
सहज-सुख-साधन । [१५३ तमा णिज्युदिकामो णिस्संगो णिम्ममो य हविय पुणो। सिद्धसु कुणदि भत्ति णिव्याणं तेण पप्पोदि ॥ १६६ ॥ भावार्थ-इसलिये सर्व इच्छाओं को छोड़कर किसी भी पदार्थ में कहीं भी राग मत कर, इस तरह जो भव्य जीव वीतराग होता है वही भवसागर को तर के पार हो जाता है। स्वात्मरमणरूप वीतराग भाव ही मोक्ष मार्ग है। (३) श्री कुन्दकुन्दाचार्य प्रवचनसार में कहते हैं - संपज्जदि णिव्वाणं, देवासुरमणुयरायविहवेहिं । जीवस्स चरित्तादो, दसणणाणप्पहाणादो ॥ ६ ॥ चारित्त खलु धम्मो, धम्मो जो सो समोति णिदिवो । मोहनखोहविहीणो, परिणामो अप्पयो हि समो ॥ ७ ॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान सहित चारित्र से ही जीव को निर्वाण प्राप्त होता है और जब- तक निर्वाण न हो वह इन्द्र चक्रवर्ती आदिकी विभूति प्राप्त करता है । यह चारित्र ही धर्म है । धर्म एक समभाव कहा गया है । रागद्वेप मोह से रहित जो अपने आत्मा का स्वभाव है सो ही समभाव है । यही मोक्षमार्ग है, यही स्वात्मानुभव है। जीवो ववगदमोहो, उवलद्धो तच्चमप्पणो सम्म । जहदि जदि रागदोसे, सो अप्पाणं लहदि सुद्ध।।८७॥ भावार्थ-मोह रहित जीव अपने आत्मा के स्वभाव को भले प्रकार जानकर जब रागद्वेप स्यागता है तब वह शुद्ध आत्मा को पा लेता है अर्थात शुद्ध आत्मा में ही रमण करता है । जो मोहरागदोसे णिहणदि उपलद्ध जोण्हमुवदेस । सो सब्यदुक्खमोक्खं पावदि अचिरेण कालेण ॥६॥ भावार्थ-श्री जिनेन्द्र के उपदेश को समझकर जो रागद्वष मोह त्याग देता है वही अति शीघ्र सर्व दुःखों से मुक्त हो जाता है। णाह होमि परेसिं ण मे परे सन्ति णाणमहमेको । इदि जो झायदि मांणे सो अप्पाणं हवदि झादा ॥१०३-२॥ भावार्थ-न मैं किन्हीं पर पदार्थों का हूँ न पर पदार्थ मेरे हैं। मैं एक अकेला ज्ञानमय हूँ । इस तरह जो ध्याता ध्यान में ध्याता है वही आत्मा का ध्यानी है। एवं णाणप्पाणं दंसणभूदं अदिदियमहत्थं । धुवमचलमणालंयं मण्णेऽहं अप्पगं सुद्धं ॥१०४-२॥ .
१५४ ]
सहज-सुख-साधन।
भावार्थ-ध्याता ऐसा जानता है कि मै इस तरह अपने ग्रात्मा को ध्याता हूँ कि यह परभावों से रहित
शुद्ध है, निश्चल एकरूप है, मानस्वरूप है, दर्शनमयी है, अपने अतीन्द्रिय स्वभाव से एक महान पदार्थ है,
अपने स्वरूप में निश्चल है तथा पर के पालम्बन से रहित स्वाधीन है। यही भावना आत्मानुभव को
जागृत करती है।
जो खविदमोहालुमो विसयविरत्तो मणो णि6 मिना ।
समवहिदो सहावे सो अप्पाणं वदि धादा ।।१०८-२
भावार्थ-जो मोह के मैलको नाशकर इद्रियों के विपनों से विरक्त होकर तथा मन को रोककर अपने
स्वभाव मे भले प्रकार स्थित होजाता है वही श्रात्मध्यानी है।
परमाणुपमाणं वा मुच्छा देहादियेसु जस्स पुणो ।
विज्जदि जदि सो सिद्धिं ण लहदि सब्यागमधरोवि ॥५६-३॥
भावार्थ-जिसकी मूर्छा देह श्रादि पर पदार्थो मे परमाणु मात्र भी है वह सर्व शास्त्र को जानता हुआ
भी सिद्धि को नहीं पा सकता है।
सम्मं विदिदपदत्था चत्ता उवहि बहित्थमज्मत्थं ।
विसएसु णावमत्ता जे ते सुद्धत्ति णिदिवा ॥१५-३॥
सुद्धस्स य सामगणं भणिय सुद्धस्स दंसणं णाण ।
सुद्धम्स य णिव्वाणं सोचिय सिद्धो णमो तस्स ॥६६-३॥
भावार्थ-जो जीव यथार्थ रूप से जीवादि पदार्थों को जानते है तथा बाहरी व भीतरी परिग्रह को छोड-
कर पाचो इन्द्रियों के विषयों मे आसक्त नहीं होते हैं, उन्हीं को शुद्ध मोक्षमार्गी कहा गया है । जो परम
वीतराग भाव को प्राप्त हुया मोक्ष का साधक परमयोगीश्वर है उसी के सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र की एकतारूप
साक्षात् मोक्षमार्गरूप श्रमण पद कहा गया है । उसी शुद्धोपयोगी के अनत दर्शन व अनत ज्ञान प्रगट होता
है, उसी को ही निर्वाण होता है, वही सिद्ध है, उनको बार बार नमस्कार हो।
(४) श्री कुदकु दाचार्य चारित्रपाहुड़ में कहते हैं:-
एए तिगिण वि भावा हवंति जीवस्स मोहरहियस्स ।
नियगुणमाराहतो अचिरेण वि कम्म परिहरइ ॥१६॥
भावार्थ-जो मोहरहित जीव सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यफचारित्रमयी गुणो को धारते हुए अपने
आत्मीक शुद्ध गुणों की आराधना करता है वह शीघ्र ही कमी से छूट जाता है ।
चारित्तसमारूढो अप्पासु पर ण ईहए णाणी ।
पावह अइरेण सुहं अणोवर्म जाण णिच्छयदो ॥४३॥
सहज-सुख-साधन । [१५५ भावार्थ-जो आत्मज्ञानी स्वरूपाचरण चारित्र को धारता हुआ अपने आत्मा में परद्रव्य को नहीं चाहता है अर्थात केवल आत्मरमी हो जाता है, परद्रव्य से रागद्वेप मोह नहीं करता है सो शीघ्र ही उपमारहित सहज सुख को पाता है ऐसा निश्चय से जानो। (५) श्री कुदकुंदाचार्य भावपाहुड़ में कहते हैं:- अप्पा अप्पम्मि ओ रायादिसु सयलदोसपरिचचो। संसारतरणहेदू धम्मोचि जिणेहिं णिढि ॥८॥ भावार्थ-जो अात्मा रागद्वेपादि सर्व दोपों को छोड़कर अपने आत्मा के स्वभाव मे लवलीन होता है वही ससार-सागर से तिरने का उपाय धर्म जिनेन्द्रो ने कहा है। (६) श्री कुदकुंदाचार्य मोक्षपाहुड़ में कहते हैं:-- जो देहे हिरवेक्खो णिदो णिम्ममो णिरारंभो । ओदसहावे सुरो जोई सो सहइ णिव्वाणं ॥१२॥ भावार्थ-जो योगी शरीर के सुख से उदासीन है, रागद्वेप के द्वन्द से रहिन है, पर पदार्थ में जिसने ममता छोड़ दी है, जो प्रारम्भ रहित है और श्रात्मा के स्वभाव मे लीन है वही निर्वाण को पाता है। सव्वे कसाय मुत्त गारवमयरायदोसवा मोहम् । लोयववहारविरदो अप्पा झाएह झाणत्थो । २७ ।। भावार्थ- -ध्याता सर्व कपायों को छोडकर अहकार, मद, राग द्वेप, मोह व लौकिक व्यवहार से विरक्त होकर ध्यान में लीन होकर अपने ही आत्मा को ध्याता है । जो सुत्तो ववहारे सो जोई जग्गए सकज्जम्मि । जो जग्गदि ववहारे सो सुत्तो अप्पणो कज्जे ॥ ३१ ॥ भावार्थ- -जो योगी जगत के व्यवहार में सोता है वही अपने आत्मा के कार्य में जागता है तथाजो लोक व्यवहार में जागता है वह अपने आत्मा के कार्य में सोता है। जो रयणचयजुत्तो कुरणइ तवं सजदो ससत्तीए । सो पावइ परमपयं झायन्तो अप्पयं सुद्धम् ।। ४३ ।। भावार्थ-जो सयमी सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र रूप रत्नत्रय को धारता हुआ अपनी शक्ति के अनुसार तप करता हुआ अपने आत्मा को ध्याता है वही परमपद को पाता है । होऊण दिढचरित्तो दिढसम्मत्रेण भावियमईयो। झायन्तो अप्पाणं परमप यंपावए जोई ॥ ४६ ।।
१५६] सहज-सुख-साधन। भावार्थ-जो योगी दृढ समयक्त की भावना करता हुआ दृड चारित्र को पालता है और अपने शुद्ध आत्मा को ध्याता है वही परम पद को पाता है । चरण हवई सधम्मो धम्मो सो हवड अप्पसमभावो । सोरागरोसरहियो जीवस्स अणण्णपरिणामो ।। ५० ॥ भावार्थ-चारित्र आत्मा का धर्म है। धर्म है वही आत्मा का स्वभाव है, या स्वभाव है वही राग द्वेप रहित आत्मा का ही अपना भाव है । अप्पा झायंताणं दंसणसुद्धीण दिढचरिचाणं । होदि धुवं णिव्याणं विसएसु विरचचित्ताणं ॥ ७० ॥ भावार्थ-जो विषयो से विरक्त चित्त हैं और जिनका सम्यक्त शुद्ध है और चारित्र दृढ है और वे अात्मा को ध्याते हैं उनको निश्चय से निर्वाण का लाभ होता है। णिच्छयणयस्स एव अप्पा अप्पमि अप्पणे सुरदो। सो होदि हु सुचरित्तो जोई सो लहइ णिचाणं ॥ ८३ ॥ भावार्थ-निश्चय नय का यह अभिप्राय है कि जो आत्मा आत्मा ही में, अात्मा ही के लिये भले प्रकार लीन होता है वही स्वरूपाचरण रूपी चारित्र को पालता हुआ निर्वाण को पाता है । वेरग्गपरो साहू परदव्यपरम्मुहो य जो हादि । संसारसुहविरत्तो सगसुद्धसुहेसु अणुरचो ॥ १०१ ।। गुणगणविहूसियंगो हेयोपादेयणिच्छिनो साहू । माणज्झयणे सुरदो सो पावइ उत्तमं ठाणं ॥ १०२ ॥ भावार्थ-जो साधु वैराग्यवान है, पर द्रव्यों से परांमुख है, ससार के क्षणिक सुख से विरक्त है, अात्मा के सहज शुद्ध सुख में अनुरक्त है, गुणों के समूह से विभूषित है, ग्रहण करने योग्य व त्याग करने योग्य का निश्चयज्ञान रखनेवाला है, ध्यान में तथा आगम के अध्ययन में लगा रहता है वही उत्तम स्थान मोक्ष को पाता है। (७) श्री वट्टकरस्वामी मूलाचार द्वादशानुप्रेक्षा में कहते हैं- जह धादू धम्मतो सुज्झदि सो अग्गिणा दु संतत्तो । तवसा तहा विसुज्झदि जीवो कम्मे हि कणयं च ।। ५६ ।। भावार्थ-जैसे सुवर्ण धातु अग्नि से धौके जाने पर मल रहित सुवर्ण में परिणत हो जाती है वैसे ही यह जीव आत्मा में तपत रूप तप के द्वारा कर्म मल से छूटकर शुद्ध हो जाता है । णणवरमारुदजुदो सीलवरसमाधिसंजमुज्जलिदो। दहइ तवो भवनीयं तणकट्ठादी जहा अग्गी ।। ५७ ॥
सहज-सुख-साधन ।
[४९
वृद्ध भये तन रिद्ध गई खिदि सिद्ध व कामन पाट तुलाने ।
द्यानत काय अमोलक पाय न मोक्ष द्वार किवाड खुलाने ॥३८||
प. भैया भगवतीदास ब्रह्मविलास मे कहते हैं।
लाल वस्त्र पहरे सो देह तो न लाल होय, लाल देह मये हस लाल तो न मानिये ।
वस्त्र के पुरान भये देह न पुरान होय, देह के पुराने जीव जीरन न जानिये ।।
वस्त्र के नाश कछू देह को न नाश होय देह के नाश हुए नाश न वखानिये ।
देह दवं पुदल कि चिदानंद ज्ञानमई, दोउ भिन्न भिन्न रूप भैया उर आनिये ॥१०॥
सबैया-३१।
मास हाड लोहू सानि पूतरी बनाई काहू, चामलों लपेट तामे रोम केश लाए हैं।
तामे मल मूत भरि क्रम कई कोटि धरे, रोग सचै करि करि लोकमें ले आए हैं ।
वोले वह खाउ खाउ विन दिये गिरि जाउं, आगे को न धरु पांउ ताही वे लुभाए हैं ।
ऐसे मोह भ्रम में अनादिके भ्रमाए जीव देखे परतक्ष तऊ चक्षु मानो छाए हैं ।।१४।।
चामके शरीर महि वसत लजात नाहिं, देखत अशुचि तऊ लीन होय तन में ।
नारि वनी काहे की विचार कछू करे नाहि, रीझ-रीम मोह रहे चामके वदन में ।।
लक्ष्मी के काज महाराज पद छाडि देत, डोलत है एक जैसे लोभकी लगन मे।
तनकसी आउमे उपाय कई कोउ करे, जगत के वासी देख हांसी आवे मन में ||७||
अचेतन की देहरी न कीजे तामों नेहरी, सु औगुनकी गेहरी महान दुख भरी है।
याहीके सनेहरी न आवे कर्म छेहरी, पावे दु ख तेहरी जिन याकी प्रीति करी है ।
अनादि लगी जेहरी जु देखत ही खेहरी, तू यामे कहा लेहरी रोगन की दरी है ।
काम गजकेहरी सुराग द्वप केहरी तू तामे, दृष्टि देयरी जो मिथ्यात हरी है ।।
देख देह खेत क्यारी ताकी ऐसी रीति न्यारी, बोए कछू पान उपजत कछू आन है ।
पंच अमृत रस सेती पोखिये शरीर नित, उपजे रुधिर मास हाडनिको ठान है ।।
एते पर रहे नाहि कीजिये उपाय कोटि, छिनक मे विनशि जाय नाउ न निशान है।
एतो देख मूरख उछाह मन माहि धरे, ऐमी झूट वातनिको सांच करि मान है ॥१०१।।
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सवैया-२३ ।
बालपने तब वालनिके सग, खेलो है ताकी अनेक कथारे ।
जोबन आय रमो रमनी रस सोऊ तो वात विदित जथारे ॥
वृद्ध भयो तन कपत डोलत, लारे परे मुख होत विथारे ।
देख शरीर के लन्छन भइया तू, चेतत क्यों नहिं चेतनहारे ।।५२।।
तूही जु प्राय वसो जननी उर, तूही रम्यो नित बालक तारे ।
जोवन ता जु भई कुनि तोही को, ताही के जोर अनेक ते मारे ।
वृद्ध भयो तूही अग रहे सब, बोलत वैन कहे तु तरारे ।
देखि शरीर के लच्छन भइया तू , चेतत क्यों नहिं चेत-हारे ॥५३॥
५०] शरीर स्वरूप। सवैया-३१ । सात धातु मलिन हैं महा दुर्गंधभरी, तासों तुम प्रीति करी लहत आनद हो। नरक निगोद के सहाई जे करन पच, तिनहीकी सीख सचि चलत सु छंद हो । आठों जाम गहे काम राग रस रग राचि, करत किलोल मानो माते जो गयढ हो । कछू तो विचार करो कहां कहां भूलि फिरो, भले जु भले जु भैया भले चिदानंद हो ॥४६॥ - सवैया-२३। रे मन मूढ कहा तुम भूले हो, हंस विचार लगै पर छाया । या मे सरूप नहीं कछु तेरो जु, व्याधिकी खोट बनाई है काया । सम्यक रूप सदा गुन तेरो है, और बनी सब ही भ्रम माया देख तू रूप अनूप विराजत, सिद्ध समान जिनंद बताया ॥४७॥ चेतन जीव निहार हु अतर, ये सब हैं परकी जड काया । इन्द्र समान जो मेघ घटा महि, शोभित है पै रहे नहि छाया ।। रैन समै सुपनो जिम देखि तु, प्रात भये सब झूठ बनाया । त्यों नदि नाव सजोग मिल्यो सब, चेतो चित्त जु चेतन राया ।।४।। देह के नेह लग्यो कहा चेतन, न्यारियको अपनी करि मानी । याही सो रीझ अज्ञान में मानिके, याही मे आपके तू हो रहो थानी ।। देखत है परतक्ष विनाशी, तऊ अनचेतन अन्ध अज्ञानी। होहु सुखी अपनो बल फोरिके, मानि कयो सर्वज की वानी ॥४९।। वे दिन क्यों न विचारत चेतन, मात की फॅप मे आय बसे हैं। उरध पाउँ लगे निशिवासर, रच उसा सनुको तरसे हैं। आउ सजोग बचे कहुँ जीवित अरु, लोगनकी तब दिष्टि लसे हैं। आज भये तुम जोवन के रस, भूलि गए किततै निकसे है ॥३२।। A सहज-सुख-साधन [५१ तीसरा अध्याय भोगोंका स्वरूप। जैसे ससार असार है, शरीर अशुचि है, वैसे इन्द्रियों के भोग अतृप्तिकारी, अथिर और तृष्णा के वढानेवाले हैं । इनके भोगने से किसी को भी तृप्ति नहीं हो सकती है। जैसे जलरहित बन मे मृग प्यासा होता है वहा जल तो है नहीं परन्तु दूर से उसको चमकती घास मे या वालू मे जल का भ्रम हो जाता है। वह जल समझकर जाता है परन्तु वहा जलको न पाकर अधिक प्यासा हो जाता है । फिर दूर से देखता है तो दूसरी तरफ जल के भ्रम से जाता है वहां पर भी जल न पाकर और अधिक प्यासा हो जाता है। इस तरह बहुत बार भ्रम मे भटकते रहने पर भीउसको जल नहीं मिलता । अन्त मे वह प्यास की बाधा सेतडफ तडफ कर प्राण देदेता है । यही हाल हम मसारी प्राणियों का है, हम सब सुख चाहते हैं, निराकुलता चाहते हैं। भ्रम यह हो रहा है कि इन्द्रियों के भोग करने से सुग्व मिल जायगा, तृप्ति हो जायगी । इसलिये यही प्राणी कभी स्पर्शनेन्द्रिय के भोग के लिये ली सम्बन्ध करता है, कोमल पदार्थों को स्पर्श करता है, कभी रसना इन्द्रिय के भोग के लिये इच्छित पदार्थों को खाता है, कभी घ्राणइद्रिय के भोग के लिये अत्तर फुलेल पुष्पादि सू घता है, कभी चक्षुइंद्रिय के भोग के लिये रमणीक चेतन व अचेतन पदार्थों को देखता है, कभी कर्णेन्द्रिय के भोग के लिये मनोहर गानादि सुनता है । इस तरह पाचों इन्द्रियों का भोग बार-बार करता है परन्तु तृप्ति नहीं पाता है । जैसे खाज को खुजाने मे और खाज का कप बढ जाता है वैसे इन्द्रिय भोगों को जितना किया जाता है उतनी ही अधिक तृष्णा बढ जाती है । तृष्णा ही क्लेश है, बाधा है, चिंता का कारण है । यदि किसी को स्त्री का भोग एकबार हुआ है तो वह बार-बार भोगना चाहता है । शक्ति न होने पर कष्ट पाता है या स्त्री की इच्छा न होने पर दुःख भोगता है । यदि कोई मिठाई खाई है तो उससे बढ़िया मिठाई खाने की बार-बार इच्छा होती है, यदि नहीं मिलती है तो बडा दु ख मानता है, यदि मिलजाती है तो अधिक इच्छा बढ़ जाती है । यदि किसी ने किसी सुगध को सूघा है तो उससे वढिया सुगध के सू घने की इच्छा हो जाती है, नहीं मिलती है तो वडा दुख पाता है, यदि मिल जाती है तो और अधिक तृष्णा बढ़ जाती है। यदि किसीने किसी तमाशे को देखा है तो इससे बढिया तमाशा देखने की इच्छा होजाती है । यदि नहीं मिलता है तो कष्ट पाता है । यदि मिल जाता है तो अधिक तृष्णा बढा लेता है । यदि कोई मनोहर गाना सुना है तो उससे बढिया सुनना चाहता है । यदि नहीं मिलता है तो दुख मानता है, यदि मिल जाता है तो इच्छा को अधिक बढा लेता है। बहुत से प्राणियों को इच्छानुसार भोग नहीं मिलते हैं, चाहते वे कुछ हैं मिलते कुछ हैं, तब वे बहुत दुखी होते है। किसी के यहां निमन्त्रण था। जानेवाले ने यह इच्छा की, वहा वढिया मिठाइया मिलेगी, परन्तु वहा ऐसा भोजन था जो वह रोज खाता था उनसे भी घटिया था । वस, इच्छानुसार न पाकर वह मनसे बहुत क्लेश मानता है । जिनको इच्छानुमार मिल जाता है उनकी तृष्णा बढ जाती है। मनुष्य पुराना पडता जाता है । इन्द्रियो की शक्ति घटती जाती है परन्तु भोगो की तृः ।। . बढती जाती है।
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सहज-सुख-साधन । [१६१ भावार्थ जो साधु राग द्वेष को जीतने वाला है, इन्द्रियों को वश करनेवाला है, भय रहित है, कपायों को जीतनेवाला है, रति अरति व मोह का मथन करनेवाला है वही सदा ध्यान में उपयुक्त हो सकता है। जह जह णिब्वेदुवसम-, वेरग्गदयादमा पवड्ढंति । तह तह अब्भासयरं, णिधाणं होइ पुरिसस्स ।।१८६२।। भावार्थ--जैसे जैसे साधु मे धर्मानुराग, शांति वैराग्य, दया, इन्द्रिय संयम बढ़ते जाते हैं वैसे २ निर्वाण अति निकट आता जाता है। वयरं रदणेसु जहा, गोसीसं चदणं व गधेसु । वेरुलियं व मणीणं, तह झाणं होइ खवयरस ।।१८६४॥ भावार्थ-जैसे रत्नो में हीरा प्रधान है, सुगध द्रव्यो मे गोसीर चन्दन प्रधान है, मणियों में वैडूर्यमणि प्रधान है तैसे साधु के सर्व व्रत व तपों में आत्म ध्यान प्रधान है। माणं कसायवादे, गब्भधरं मारूए व गम्भहरं । झाण कसायउण्हे, छाही छाही व उराहम्मि ॥१८६६॥ भावार्थ-जैसे प्रबल पवन की बाधा मेटने को अनेक घरों के मध्य में गर्भग्रह समर्थ है वैसे कषायरूपी प्रबल पवन की बाधा मेटने को ध्यान रूपी गर्भग्रह समर्थ है । जैसे गर्मी को आताप में छाया शातिकारी है वैस ही कपाय की श्राताप को मेटने के लिये आत्म ध्यान की छाया हितकारी है। झाणं कसायडाहे, होदि वरदहो व दाहम्मि । झाणं कसायसीदे, अग्गी अग्गी व सीदम्मि ॥ १८६७ ।। भावार्थ-पाय रूपी दाह के हरने को आत्मा का ध्यान उत्तम सरोवर है तथा कषाय रूपी शीत के दूर करने को आत्मा का ध्यान अग्नि के समान उपकारी है। झाणं कसायपरच- कभए वलवाहणड्ढो राया । परचक्कभए वलवा-, हणड्ढो होइ जह राया ॥ १८६८ ।। भावार्थ-जैसे पर चक के भय से बलवान वाहन पर चढ़ा हुआ गजा प्रजा की रक्षा करता है वैसे कपाय रूपी पर चक्र के भय से समताभाव रूपी वाहन पर चढा आत्म ध्यान रूपी राजा रक्षा करता है। माणं कसायरोगे, सु होइ विज्जो तिगिछदो कुसलो। रोगेसु जहा विज्जो, पुरिसस्स तिगिंछो कुसलो ।। १८६६ ।। भावार्थ-जैसे रोग होनेपर प्रवीण वैद्य रोगी पुरुष का इलाज करके रोग को दूर करता है, वैसे कपाय रुपी रोग के दूर करने को आत्म ध्यान प्रवीण वैद्य के समान है ।
१६२] महज-सुननाधना - झाणं विषयहाण, य होड अछुहाइ अण्ण या । भाणं विमयतिसाए, उदयं उदयं व तरहाए । १६०० ॥ भावार्थ-जैसे क्षुधा की वेदना को ग्रन्न दूर करता है, तैसे विगयों की चाह म्पी ऋधा को आत्म ध्यान मेटता है जैसे प्यास को शीतल मिष्ट जल दूर करता है, वैसे विषयों की तृष्णा को मेटने के लिये आत्म- ध्यान समर्थ है। (१३) श्री पूज्यपाद प्राचार्य टोपदेश में कहते हैं- संयम्य करणग्राममेकाग्रत्वेन चेतपः । श्रात्मानमात्मवान्ध्यायेदात्मनवात्मनि स्थितं ।। २२ ।। भावार्थ-ग्रात्मज्ञानी ध्याता को उचित है कि इन्द्रियों के ग्राम को मयम में लाकर और मन को एकाप करके प्रात्मा ही के द्वारा श्रात्मा में स्थित अपने आत्मा को ध्यान । यभित्रचित्तविक्षेप एकांते तचमस्थितिः । अभ्यस्येदभियोगेन योगी तचं निजात्मनः ॥ ३६ ।। भावार्थ-जहां मन गे 'प्राकुल्लता न श्रावेसे एकान में बैठकर श्रात्मा के तत्व को भले प्रकार निश्चय करनेवाला योगी योगवल से अपने ही प्रात्मा के स्वरूप के ध्यान का अभ्याम करे । यथा यथा समायाति संवित्ती तचमुत्तमम् । तथा तथा न रोचंते विषयाः सुलभा अपि ॥ ३७ ।। भावार्थ-जैसे जैसे स्वात्मानुभव में उत्तम आत्मा का तत्व भले प्रकार प्राता जाता है वैसे वैसे सुलभ भी इन्द्रियों के विषय नहीं रुचते है। निशामयति निःशेपमिंद्रजालोपमं जगत् । स्पृहयत्यात्मलाभाय गत्वान्यत्रानुतप्यते ॥ ३९ ॥ भावार्थ-ध्यान करनेवाला सर्व जगत को इन्द्रजाल के तमाशे के समान देखता है, श्रात्मा के अनुभव की ही कामना रखता है। यदि श्रात्मानुभव से उपयोग दूसरे विषय पर जाता है तो पश्चात्ताप करता है । त्रु बन्नापि हि न व्रते गच्छन्नपि न गच्छति । स्थिरीकृतात्मतत्त्वस्तु पश्यन्नपि न पश्यति ।। ४१ ॥ भावार्थ-जिसने श्रात्मध्यान मे स्थिरता प्राप्त करली है व प्रात्मा के मनन का भले प्रकार अभ्यास कर लिया है वह इतना स्वभाव में मगन रहता है कि कुछ कहते हुए भी मानो नहीं कहता है, चलते हुए भी नहीं चलता है, देखते हुए भी नहीं देखता है । अर्थात् वह आत्मानद का ही प्रेमी रहता है, और कार्य में दिल नहीं लगाता है। - सहज-सुख-साधन। [१६३ आनन्दो निर्दहत्युद्ध कर्मेन्धनमनारतं । न चासौ खिद्यते योगीहिदुःखेष्वचेतनः ।। ४८ ॥ भावार्थ-योगी आत्मध्यान करता हुआ ऐसा एकाग्र हो जाता है कि बाहर शरीर पर कुछ दुःख पड़े तो उनको नहीं गिनता हुआ कुछ भी खेदित नहीं होता है । तथा परमानन्द का अनुभव करता है । यही आनन्द ही वह ध्यान की अग्नि है जो निरन्तर जलती हुई बहुत कमी के ईंधन को जला देती है। (१४) श्री पूज्यपाद स्वामी समाधिशतक में कहते हैं- त्यक्त्वैवं वहिरात्मानमन्तरात्मव्यवस्थितः । भावयेत्परमात्मानं सर्वसंकल्पवजितम् ।। २७ ।। भावार्थ-बहिरात्मा बुद्धि को छोडकर, आत्मा का निश्चय करनेवाला अतरात्मा होकर, सर्व सकल्प से रहित परमात्मा स्वरूप आपने आत्मा की भावना करनी चाहिये। सोऽहमिच्यातसंस्कारस्तस्मिन्भावनया पुनः । तत्रैव दृढसंस्काराल्लभते ह्यात्मनि स्थितिम् ।। २८ ।। भावार्थ-सोहं इस पदके द्वारा मैं परमात्मा रूप हूँ, ऐसा बार वार सस्कार होने से व उसी आत्मा में वार बार भावना करने से तथा इस भावना का बहुत दृढ़ अभ्यास होने से योगी आत्मा में तन्मयता को प्राप्त करता है। यो न वेति परं देहादेवमात्मानमव्ययम् । लभते स न निर्वाणं तप्त्वाऽपि परमं तपः ।। ३३ ॥ भावार्थ-जो कोई शरीरादि परपदार्थों से भिन्न इस अविनाशी आत्मा का अनुभव नहीं करता है वह उत्कृष तप तपते हुए भी निर्वाण को नहीं पा सकता है। आत्मदेहान्तरज्ञानजनितोहादनिवृतः । तपसा दुष्कृतं घोरं भुञ्जनोऽपि न खिद्यते ॥३४॥ भावार्थ-जब योगी को आत्मा और देहादि पर पदार्थों के भेदविज्ञान से व आत्मा के अनभव से आनन्द का स्वाद आता है तब कठिन घोर तप करते हुए भी कोई खेद विदित नहीं होता है। रागद्वपादिकल्लोलैरलोलं यन्मनोजलम् । स पश्यत्यात्मनातत्त्वं स तत्त्वं नेतरो ननः ॥ ३५ ॥ भावार्थ-जिस योगी का मनरूपी जल रागद्वेपादि की तर गों से चचल नहीं है वही आत्मा के शुद्ध स्वभाव का अनुभव कर सकता है, और कोई आत्मा का अनुभव नहीं कर सकता है।
१६४] सहज-सुख-साधन। व्यवहारे सुषप्तो यः स जागांत्मगोचरे । जागर्ति व्यवहारेऽस्मिन् सुपुतश्चात्मगोचरे ।। ७८ ।। भावार्थ-जो योगी लोक व्यवहार में सोता है वही श्रात्मा के अनुभव में जागता है परन्तु जो इस लोक व्यवहार में जागता है वह आत्मा के मनन में सोता रहता है। आत्मानमन्तरे दृष्ट्वा दृष्ट्वा देहादिकं बहिः । तयोरन्तरविज्ञानादभ्यासादच्युतो भवेत् ।। ७६ ॥ भावार्थ-शरीरादि को बाहरी पदार्थ देखकर जो भीतर मे अपने आत्मा को देखता है और उसके स्वरूप को भले प्रकार समझकर आत्मा के अनुभव का अभ्यास करता है वही निर्वाण को पाता है । यत्रैवाहितधीः पुंसः श्रद्धा तत्रैव जायते । यत्रैव जायते श्रद्धा चित्त तत्रैव लीयते ॥६५॥ भावार्थ जिस पदार्थ को बुद्धि से निश्चय कर लिया जाता है उसी पदार्थ मे प्राणी की श्रद्धा होजाती है । तथा जिस किसी में श्रद्धा हो जाती है उसी में ही यह चित्त लय होजाता है । श्रद्धा ही ध्यान का है भिन्नात्मानमुपास्यात्मा परो भवति तादृशः । वर्तिीपं यथोपास्य भिन्ना भवति तादृशी ।। ६७ ॥ भावार्थ-यदि आत्मा अपने से भिन्न सिद्ध परमात्मा को लक्ष्य में लेकर ध्यान करे तो भी वह दृढ़ अभ्यास से आत्मानुभव प्राप्त करके परमात्मा के समान परमात्मा हो जायगा। जैसे वत्ती अपने से भिन्न दीपक की सेवा करके स्वय दीपक होजाती है। उपास्यात्मानमेवात्मा जायते परमोऽथवा । मथित्वाऽऽत्मानमात्मैव जायतेऽग्निर्यथातरूः ॥ १८ ॥ भावार्थ. अथवा यह आत्मा अपने ही आत्मा की आराधना करके भी परमात्मा होजाता है । जैसे वृक्ष स्वय लड़कर आप ही अग्निरूप होजाते हैं। आत्मा का अनुभव सिद्ध भगवान के ध्यान द्वारा व अपने आत्मा के ध्यान द्वारा दोनों से प्राप्त हो सकता है। (१५) श्री गुणभद्राचार्य आत्मानुशासन में कहते हैं- एकाकित्त्वप्रतिज्ञाः सकलमपि समुत्सृज्य सर्वं सहत्वात् भ्रान्त्याऽचिन्त्याः सहायं तनुमिव सहसालोच्य किचित्सलज्जाः । सज्जीभूताः स्वकार्ये तदपगमविधि बद्धपल्यङ्कमन्धाः ध्यायन्ति ध्वस्तमोहा गिरिगहनगुहा गुह्यगेहे नसिंहाः ॥ २५८ ॥ ।
सहज-सुख-साधन।
[१६५
भावार्थ-मानवों में सिंह के समान साधु, जिनकी प्रतिज्ञा एकाकी रहने की है, जिन्होंने सर्व परिग्रह त्याग
दिया है व जो परीपहों को सहनेवाले है, जिनकी महिमा चिन्तवन में नहीं आ सकती, जो शरीर की सहायता
लेते हुए लज्जा को प्राप्त हैं, जिसको अबतक भ्रांति से सहाई जाना था परन्तु जो आत्मा के स्वभाव से
विपरीत है, जो अपने प्रात्मा के कार्य में आप उद्यमवत है, जो पलयकासन से सिष्ठे है तथा जिनके यह
भावना है कि पुनः शरीर प्राप्त न हो, जिन्होंने मोह को दूर कर दिया है तथा जो पर्वत की भयानक गुफा
आदि गुप्त स्थान में तिष्ठते हैं, ऐसे साधु प्रात्मा के स्वभाव का ध्यान करते हैं।
अशेषमद्वैतमभोग्यभोग्यं निवृत्तिवृत्योः परमार्थकोट्याम् ।
अभोग्यभोग्यात्मविकल्पबुद्धथा निवृत्तिमभ्यस्तु मोक्षकांक्षी ॥ २३५ ॥
भावार्थ-यह सर्व जगत मोक्ष मार्ग की अपेक्षा भोगने योग्य नहीं है , ससार की प्रवृत्ति की अपेक्षा
भोग्य है । परमार्थ की अपेक्षा इस जगत को अभोग्य और भोग्य जानकर भी ससार के त्याग का अभ्यास
करो, तब इस जगत को अभोग्य ही जानो क्योंकि इस ससार के भोगों में लिप्त होने से संसार होगा व
वैराग्य भाव से मोक्ष होगा।
तावदुःखाग्नितप्तात्माऽयःपिण्ड इव सीदसि ।
निर्वासिनि ताम्भोधौ यावत्वं न निमज्जसि ॥ २३३ ॥
भावार्थ-हे भव्य ! तू लोहे के गर्म पिंड की तरह ससार के दुःखों की अग्नि से संतापित होकर उसी
समय तक कष्ट पा रहा है जब तक तू निर्वाण के आनन्दरूपी समुद्र में अपने को नहीं डुबाता है । तात्पर्य
यह है कि आत्म ध्यान से सर्व सताप मिट जाता है।
यमनियमनितान्तः शान्तपाद्यान्तरात्मा
परिणमितसमाधिः सर्वसच्चानुकम्पी।
विहितहितमिताशी क्लेशजालं समूलं
दहति निहतनिद्रो निश्चिताध्यात्मसारः ॥ २२५ ॥
के
भावार्थ-जो
साधु यम नियम में तत्पर हैं, जिनका अतरग व बहिरंग शात है, परसे ममता रहित है,
समाधिभाव को प्राप्त हुए हैं, सब जीवो में जो दयालु हैं, शास्त्रोक्त अल्प मर्यादित आहार के जो करनेवाले
हैं, निन्द्रा को जिन्होंने जीता है, आत्म स्वभाव का सार जिन्होंने निश्चय कर लिया है वे ही ध्यान के बल
से सर्व दुखों के जाल को जला देते हैं ।
समधिगतसमस्ता: संवसायद्यदूराः ।
-स्वहितनिहितचित्ताः शांतसर्वप्रचाराः ।
स्वपरसफलजल्पाः सर्वसंकल्पमुक्ताः
कथमिह न विमुक्तेर्भाजमं ते विमुक्ताः ॥ २२६ ॥
१९६] गहतसम्प-गाधन। भावार्थ-जिन्होंने सर्व शानोंका रहस्य जाना है, जो सर्व पापों में दूर , जिन्होंने 'प्रात्मकल्याण में अपना मन लगाया है, व जिन्होंने सर्व न्द्रियों के विषयों को शमन कर दिया, जिनकी वाणी स्वपर कल्याण- कारिणी है, जो सई सकल्प से रहित है, ऐसे विरक्त साधु मिद्ध मुख के पान क्यों न होगे अवश्य होंगे। हृदयसरसि यारनिर्मलप्यत्यगाधे चमति बलु कपायग्राहननं समन्तात् । श्रयति गुणगुणोऽयं तन्न तावद्विशवम् समदमयमगेम्नान विजेतु यतम्ब ॥२१३।। भावार्थ-हे भव्य ! जबतक तेरे निर्मल य 'प्रगाव हदयस्पी सरोवर में कमायापी जलचरों का समूह वसता है तबतक गुणों का मह नि.गफ होकर तेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकता है, उमलिये त ममताभार, इन्द्रिय सयम व हिमादि महारती के द्वारा उस कापायों के नीतने का यत्न र । मुहुः प्रसार्य सज्जानं पश्यन भावान् यथास्थितान । प्रीत्यप्रीती निराकृत्य ध्यायेदध्यात्मविन्मुनिः ॥१७७।। भावार्थ 'प्रात्मनानी मुनि बारबार यात्मज्ञान की भावना करता हु ना तथा जगन के पदार्थों को जैसे हैं बैंसे जानता हुआ उन सब से रागद्वेप छोड़ के 'प्रात्मा का ध्यान करता है। ज्ञानस्वभावः स्यादात्मा स्वभावावाप्विरच्युतिः । तस्मादच्युतिमाकांक्षन् भावयेज् ज्ञानभावनाम् ।।१७४॥ भावार्थ-श्रात्मा ज्ञानस्वभावी है। उसी ज्ञान स्वभाव की प्राप्ति मोही अविनाशी गुक्ति है, इसलिये जो निर्वाण को चाहता है उसे प्रात्मज्ञान की भावना करनी चाहिये। ज्ञानं यत्र पुरःसरं सहचरी लज्जा तपः संबलम् चारित्रं शिविका निवेशनभुवः स्वर्गा गुणा रक्षकाः । पंथाश्च प्रगुणं शमाम्बुबहुलः छाया दया भावना यानं तन्मुनिमापयेदभिमतं स्थानं विना विप्लवैः ॥१२५॥ भावार्थ-जिसके सम्यग्ज्ञान तो श्रागे आगे चलनेवाला है, लज्जा साथ चलनेवाली सखी है, सम्यक चारित्र पालकी है, बीच में ठहरने के स्थान स्वर्ग हैं, प्रात्मीक गुण रक्षक है, शातिमई जल से पूर्ण मार्ग है, दया की जहां छाया है, आत्मभावना यही गमन है, ऐसा समाज जहा प्राप्त हो वह समाज बिना किसी उपद्रव के मुनि को अपने अभीष्ट स्थान मोक्ष को लेजाता है। दयादमत्यागसमाधिसन्ततः पथि प्रयाहि प्रगुणं प्रयत्नवान् । नयत्यवश्यं वचसामगोचरं विकल्पदरं परमं किमप्यसौ ॥१०७॥ ।
सहज-सुख-साधन । [१६७ --- भावार्थ-हे साधु ! तू दया, संयम, त्याग व श्रात्मध्यान सहित मोक्षमार्ग में सीधा कपट रहित प्रयत्न- शील होकर गमन कर, यह मार्ग तुझे अवश्य वचन भगोचर, विकल्पों से अतीत उत्कृष्ट मोक्षपद में ले जायगा। (१६) श्री देवसेनाचार्य तत्वसार में कहते हैं:- जं अवियप्पं तच्चं तं सारं मोक्खकारणं नं च । सं णाऊण विसुद्ध झायह होऊण णिग्गंथो ॥३॥ भावार्थ-जो निर्विकल्प आत्म तत्व है वही सार है, वही मोक्ष का कारण है उसी को जानकर और निग्रंथ होकर उसी निर्मल तत्य का ध्यान कर । रायादिया विभाषा बहिरंतरउहवियप्प मुत्त णं । एयग्गमणो झायहि णिरंजणं णिययअप्पाण ॥१८|| भावार्थ- रागादि विभावो को तथा बाहरी व भीतरी सर्व मन, वचन, कायके विकल्पों को छोड़कर और एकाग्र मन होकर तू अपने निरजन शुद्ध आत्मा का ध्यान कर । जह कुणइ कोवि भेयं पाणियदुद्धाण तक्कजोएण । णाणी व तहा भेयं करेइ वरझाणजोएण ॥२४॥ झाणेण कुणउ भेयं पुग्गलजीवाण तह य कम्माणं । घेत्तव्यो णियअप्पा सिद्धसरूवो परो बंभो ॥२५॥ मलरहियो णाणमो णिवसइ सिद्धीए जारिसो सिद्धो । तारिसो देहत्थो परमो बंभो. मुणेयव्वो ॥२६॥ भावार्थ-जैसे कोई अपनी तर्क बुद्धि से पानी और दूध के मिले होने पर भी पानी और दूध को अलग अलग जानता है वैसे ही जानी उत्तम व सूक्ष्म भेदविज्ञान के वल से आत्मा को शरीरादि से भिन्न जानता है। ध्यान के बल से जीव से पुद्गल और कर्मों का भेद करके अपने आत्मा को ग्रहण करना चाहिये जो निश्चय से सिद्ध स्वरूप परम ब्रह्म है । जैसे कर्म मल रहित, ज्ञानमई सिद्ध भगवान सिद्ध गति में हैं वैसा ही परम ब्रह्म इस शरीर मे बिराजित है ऐसा अनुभव करना चाहिये । रायद्दोसादीहि य डहुलिज्जा णेव जस्स मणसलिलं । सो णियतच्चं पिच्छइ ण हु पिच्छइ तस्स विवरीअो ॥४०॥ सरसलिले थिरभूए दीसइ णिरु णिवडियपि जह रयणं । मणसलिले थिरभूए दीसइ अप्पा तहा बिमले ॥४१॥ भावार्थ-जिसके मनरूपी जल को रागादि विभाव चचल नहीं करते हैं वही अपने अात्मा के तत्व का अनुभव कर सकता है उससे विपरीत हो तो कोई स्वात्मानुभव नहीं कर सकता है । जव सरोवर का पानी
१६८]
सहज-सुख-साधन।
थिर होता है तब उसके भीतर पड़ा हुआ रतन जैसे साफ साफ दिख जाता है वैसे निर्मल मनरूपी जलके
थिर होने पर प्रात्मा का दर्शन हो जाता है।
दंसणणाणचरित्त जोई तस्सेह णिच्छयं भणियं ।
जो वेयइ अप्पाणं सचेयणं सुद्धभाव? ॥४॥
भावार्थ-जो कोई शुद्ध भाव में स्थिर, चेतन स्वरूप अपने आत्मा का अनुभव करता है उसी योगी के
निश्चय सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र कहे गए हैं ।
सयलवियप्पे थक्के उप्पज्जह कोवि सासओ भावो ।
जो अप्पणो सहावो मोक्खस्स य कारणं सो हु ॥६१॥
भावार्थ-सर्व संकल्प विकल्पों के रुक जाने पर योगी के भीतर एक ऐसा शाश्वत शुद्ध भाव प्रगट हो
जाता है जो आत्मा का स्वभाव है तथा वही मोक्ष का मार्ग है।
(१७) श्री योगेन्द्राचार्य योगसार में कहते हैं:-
जिण सुमिरहु जिण चितवहु जिण झायहु समणेण ।
सो माहंतह परमपउ लभइ इक्कखणेण ॥१६॥
भावार्थ-श्री जिन परमात्मा का स्मरण करो, उनका ही चिन्तवन करो, उन ही का शुद्ध मन होकर ध्यान
करो, उसी के ध्यान करने से एक क्षण में परम पद जो मोक्ष है उसका लाभ होगा।
जो णिम्मल अप्पा मुणइ वयसंजमुमंजुत्त ।
तउ लहु पावइ सिद्ध सुहु इउ जिणणाहह वुत्तु ॥३०॥
भावार्थ-जो कोई व्रत व संयम के साथ निर्मल आत्मा की भावना करता है वह शीघ्र ही सिद्ध सुख
को पाता है ऐसा जिनेन्द्रों ने कहा है।
जे परभाव चएवि मुणी अप्पा अप्पु मुणंति ।
केवलणाणसरूव लिया ते संसारु मुंचति ॥६२॥
भावार्थ-जो मुनि रागादि पर भावों को छोड़कर आत्मा के द्वारा आत्मा का अनुभव करते हैं वे केवल-
ज्ञान स्वरूप को पाकर संसार से मुक्त हो जाते हैं।
जह सलिलेण ण लिप्पियइ कमलणिपत्त कया वि ।
तह कम्मेण ण लिप्पियइ जइ रह अप्पसहावि ॥११॥
भावार्थ-जैसे कमलिनी का पत्ता कभी भी पानी में नहीं डूबसा है वैसे जो कोई आत्मा के स्वभाव में
रमण करता है वह कमी से नहीं बंधता है।
(१८) श्री नाग सेनाचार्य तस्वानुशासन में कहते हैं:-
निश्चयनयेन भणितस्त्रिभिरेभिर्यः समाहितो भिक्षुः ।
नोपादचे किंचिन्न च मुश्चति मोक्षहेतुरसौ ॥३१॥
सहज-सुख-साधन। [१६९ यो मध्यस्थः पश्यति जानात्यात्मानमात्मनात्मन्यात्मा। हगवगमचरणरूपम्स निश्चयान्मुक्तिहेतुरिति जिनोक्तिः ॥३२॥ भावार्थ-निश्चयनय से जो भिक्षु सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र इस रत्नत्रय सहित होकर न कुछ ग्रहण करता है न कुछ त्यागता है, आप आप में एकाग्र हो जाता है यही मोक्ष मार्ग है। जो कोई वीतरागी आत्मा आत्मा को आत्मा के द्वारा आत्मा में देखता है जानता है वही सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र रूप होता हुआ निश्चय मोक्षमार्ग है ऐसा जिनेन्द्र का वचन है , क्यों कि व्यवहार और निश्चय दोनों ही प्रकार का मोक्षमार्ग ध्यान में प्राप्त होता है। इसलिये बुद्धिमान लोग आलस्य को त्यागकर सदा ही आत्मध्यान का अभ्यास करो। स्वात्मानं स्वात्मनि स्वेन ध्यायेत्स्वस्मै स्वतो यतः । पटकारकमयस्तस्माद्धथानमात्मैव निश्चयात् ।।७४।। भावार्थ-क्यों कि ध्याता आत्मा अपने आत्मा को अपने आत्मा में अपने आत्मा के द्वारा अपने आत्मा के लिये अपने आत्मा में से ध्याता है । अतएव निश्चय से छः कारकमई यह आत्मा ही ध्यान है । संगत्यागः कपायाणां निग्रहो व्रतधारणं । मनोऽक्षाणां जयश्चेति सामग्री ध्यानजन्मने ॥ ७५ ।। भावार्थ- 'असगपना, कषायों का निरोध, व्रत धारना तथा मन और इन्द्रियों की विजय, ये चार बातें ध्यान की उत्पत्ति में सामग्री है । संचितयन्ननुप्रेक्षा स्वाध्याये नित्यमुद्यतः । जयत्येव मनः साधुरिन्द्रियार्थपरांगमुखः ।। ७६ ।। भावार्थ- -जो साधु इन्द्रियों के पदार्थों की ओर से ध्यान हटाकर भावनाओं का चितवन करता हुआ नित्य स्वाध्याय में लगा रहता है वही मन को जीत लेता है । स्वाध्यायः परमस्तावज्जयः पंचनमस्कृतेः । पठनं वा जिनेन्द्रोक्तशास्त्रस्यैकाग्रचेतसा ।। ८० ।। भावार्थ-उत्तम स्वाध्याय पाच परमेष्ठी के नमस्कार मत्र का जप है अथवा एकाग्र मन से जिनेन्द्र कथित शास्त्रों का पढ़ना है। स्वाध्यायाथानमध्यस्तां ध्यानात्स्वाध्यायमामनेत् । ध्यानस्वाध्यायसंपन्या परमात्मा प्रकाशते ॥ ८१ ॥ मावार्थ- -स्वाध्याय करते करते ध्यान में आना चाहिये । ध्यान में मन न लगे तव स्वाध्याय करना चाहिये । ध्यान और स्वाध्याय की प्राप्ति से ही परमात्मा का स्वभाव प्रकाशमान होता है। --
१७०]
सहज-सुख-साधना
दिधासुः स्वं परं ज्ञात्वा श्रद्धाय च यथास्थितिं ।
विहायान्यदनधित्वात् स्वमेवाचतु पश्यतु ॥ १४३ ॥
भावार्थ- ध्याता प्रात्मा और पर का यथार्थ स्वरूप जान करके श्रद्धान में लाये फिर पर अकार्यकारी
समझकर छोड दे, अपने को एक ही देखे व जाने ।
यथा निर्वातदेशस्थः प्रदीपो न प्रकंपते ।
तथास्वरूपनिष्ठोऽयं योगीनैकाग्रयमुज्झति ॥ १७१ ।।
भावार्थ-जैसे पवन रहित स्थान में रक्खा हुआ दीपक निश्चल रहता है तैसे अपने आत्मा के स्वरूप
मे लीन योगी एकाग्रता को नहीं त्यागता है।
पश्यन्नात्मोनमैकाग्र्यात्क्षपयत्यार्जितान्मलान् ।
निरस्ताहंममीभावः संवृणोत्यप्यनागतान् ॥ १७८ ॥
भावार्थ-जो अहकार व ममकार भाव को त्यागकर एकाग्र मन से श्रात्मा का अनुभव करता है, आगामी
की का सवर करता है और पूर्व सचित कर्म मल का क्षय करता है।
येन भावेन यदूपं ध्यायत्यात्मानमात्मवित् ।
तेन तन्मयतां याति सोपाधिः स्फटिको यथा ॥ १६१ ॥
भावार्थ-आत्मज्ञानी जिस भाव से जिस स्वरुप का ध्यान करता है उसी भाव से उमी तरह तन्मय हो
जाता है । जैसे स्फटिकमणि के साथ जिस प्रकार के रग की उपाधि होती है उसीसे वह तन्मय हो जाती है।
(१६) श्री अमृतचन्द्राचार्य पुरुषार्थसिद्धय पाय में कहते है-
विपरीताभिनिवेशं रस्य सम्यग्यस्य निजतत्वम् ।
वत्तस्मादविचलनं स एव पुरुषार्थमिद्धयु पायोऽयम् ॥ १५ ॥
भावार्थ-राग द्वेष मोह रूप विपरीत अभिप्राय को दूर कर तथा भले प्रकार अपने प्रात्मीक तत्व का
निश्चय करके जो अपने आत्मा में स्थिर होकर उससे चलायमान न होना सो ही मोक्ष पुरुषार्थ की सिद्धि
का उपाय है।
दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपारज्ञानमिष्यते बोधः ।
स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बन्धः ॥ २१६ ॥
भावार्थ-अपने आत्मा का दृढ़ निश्चय सम्यग्दर्शन है, आत्मा का ज्ञान सो सम्यग्ज्ञान है, अपने
आत्मा में स्थिति सो चारित्र है, इनसे बंध कैसे हो सकता है ।
(२०) श्री अमृतचन्द्राचार्य तत्वार्थसार में कहते हैं-
पश्यति स्वस्वरूपं यो जानाति च चरत्यषि ।
दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमात्मैव स स्मृतः ॥ ८ ॥
सहज-सुख-साधन। [१७१ : भावार्थ-जो अपने आत्मा के स्वभाव को श्रद्धान करता है, जानता है व अनुभव करता है वही दर्शन ज्ञान चारित्र रूप आत्मा ही कहा गया है। (२१) श्री अमृतचन्द्राचार्य समयसार कलश में कहते हैं- उदयति न नयश्रीरस्तभेति प्रमाणं । क्वचिदपि च न विद्यो याति निक्षेपचक्र । किमपरमभिदध्मो धास्नि सर्वकपेडिम- ननुभवमुपयाते भाति न दूतमेव ।। ६-१ ॥ भावार्थ-जब सर्व तेजों को मन्द करनेवाले आत्मा की ज्योति का अनुभव जागृत होता है तब नयों की या अपेक्षावादों की लक्ष्मी उदय नहीं होती है। प्रमाण के विकल्प भी अस्त होजाते हैं। अधिक क्या कहें, सिवाय अात्मानन्द के कुछ और दूसरा झलकता ही नहीं। भूतं भान्तमभूतमेव रमसा निर्मिद्य बधं सुधी- येद्यन्तः किल कोऽप्यहो कलयति व्याहत्य मोहं हठात् । आत्मात्मानुभवैकगम्यमहिमा व्यक्तोऽयमास्ते ध्र वं नित्यं कर्मकलङ्कपविकलो देवः स्वयं शाश्वतः ॥ १२-१ ॥ भावार्थ-जब कोई भेद्ज्ञानी महात्मा अपने श्रात्मा से भूत, भावी व वर्तमान कर्मवन्ध व रागादि भावबन्ध को भिन्न करके व बलपूर्वक मोह को दूर करके भीतर देखता है तब उसको साक्षात् अपना आत्मादेव अनुभव में आजाता है जो प्रगट है, निश्चित है, नित्य ही कर्मकलक से शून्य है, अविनाशी है तथा जिसकी महिमा आत्मानुभव के द्वारा ही विदित होती है । कथमपि समुपात्तत्रित्वमप्येकताया अपतितमिदमात्मज्योतिरुद्वच्छदच्छम् । सततमनुभवामोऽनन्तचैतन्यचिह्नम् न खलु न खलु यस्मादन्यथा साध्यसिद्धिः ॥२०-१॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र इन तीन रत्नों की अपेक्षा तीनपना होनेपर भी जो आत्मज्योति अपने एक स्वभाव से निश्चल है, शुद्धरूप प्रकाशमान है, अनन्त, चैतन्य के चिह्न को रखती है उसे हम निरन्तर अनुभव करते हैं क्योंकि शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति जो हमारा स्वभाव है वह इस स्वानुभव के विना हो नहीं सकती है। त्यजतु नगदिदानी मोहमाजन्मलीढं रसयतु रसिकानां रोचनं ज्ञानमुद्यत् ।
१७२] गहन-सम्म.साधन। उह कथमपि नात्माऽनात्मना माकमेकः किल कलयति काले कापि तादात्म्यवृत्तिम् ॥२२-२॥ भावार्थ हे जगत के प्राणियो! 'प्रनाटिकाल में साथ 'पाये हुए प्रम मोह-शत्रु को अब तो छोड और श्रात्मा के रसिक महात्मानों को जो रमीला है, ऐसे प्रकाशित 'प्रात्मा के शुद्ध मान का स्वाद लो क्योकि यह 'शात्मा कभी भी कहीं भी 'पनामा के साथ एक भारको नही प्राप्त हो सकता है। अयि कथमपि मृत्वा नचकीतहली म- अनुभव भवमृत पायवर्ती मुहर्तम् । पृथगथ बिलरांतं वं यमालोक्य येन त्यजसि झगिति मूर्त्या मामेकन्यमोहं ॥२३-१॥ भावार्थ-परे भाई । किसी तरह हो मरकर के भी यात्मीकतन्य का प्रेमी हो 'पौर दो पड़ी के लिये शरीरादि सर्व मृतीक पदार्थो का तू निकटवर्ती पहोमी बन जाय उनको अपने मे भिन्न जान और आत्मा का अनुभव कर । तो तु अपने को प्रकाशमान देवता हुा मूर्तीक पदार्थ के माय एकता के मोह को शीन ही त्याग देगा। विरम किमपरेणाकार्यकोलाहलेन स्वयमपि निभृतः सन् पश्य परमायमेकं । हृदयसरसि पुसः पुद्वलादिन्ननानो ननु किमनुपलब्धिर्भाति किं चोपलब्धिः ॥२-२॥ भावार्थ-अरे भाई ! वृथा अन्य कोलाहल से विरक्त हो और स्वय ही निश्चिन्त होकर छ. मामतक तो एक आत्मतत्व को मनन कर तो तेरे हृदयरूपी सरोवर मे पुल से भिन्न तेजधारी आत्माराम की क्या प्राप्ति न होगी ? अवश्य होगी। निजमहिमरतानां भेदविज्ञानशक्तया भवति नियतमेपां शुद्धतचोपलम्भः । अचलितमखिलान्यद्रव्यदूरेस्थितानां भवति सति च तस्मिन्नक्षयः कर्ममोक्षः ॥४-६॥ भावार्थ जो भेदविज्ञान की शक्ति से अपने आत्मा की महिमा में रत होजाते है उनको शुद्ध आत्मतत्व का लाभ अवश्य होता है । सर्व अन्य पदार्थो से सदा दूरवर्ती रहनेवाले महात्माओं को ही स्वानुभव होने पर सर्व कमी से मुक्ति प्राप्त होती है जिसका कभी क्षय नहीं है। आसंसारात्प्रतिपदममी रागिणो नित्यमत्ताः सुप्ता यस्मिन्नपदमपदं तद्विवुध्यध्वमन्धाः। -- सहज-सुख-साधन। [१७३ एततेतः पदमिदमिदं यत्र चैतन्यधातुः शुद्धः शुद्धः स्वरसभरतः स्थायिभावत्वमेति ॥६-७॥ भावार्थ-हे अन्ध पुरुपों ! अनादि ससार से लेकर प्रत्येक शरीर में ये रागी प्राणी उन्मत्त होते हुए जिस पद में सो रहे हैं वह तेरा पद नहीं है। वह तेरा पद नहीं है ऐसा भले प्रकार समझ ले । इधर श्रा, इधर श्रा, तेरा पद यह है जहां चैतन्य धातुमय आत्मा द्रव्यकर्म व भावकर्म दोनों से शुद्ध अपने आत्मीक रससे पूर्ण सदा ही विराजमान रहता है। सिद्धान्तोऽयमुदात्तचित्तचरितमोक्षार्थिभिः सेव्यता शुद्ध चिन्मयमेकमेव परमं ज्योतिः सदैवास्म्यहम् । एते ये तु समुल्लसन्ति विविधा भावाः पृथलक्षणा- स्तेऽहं नास्मि यतोऽत्र ते मम परद्रव्यं समग्रा अपि ॥६-६।। भावार्थ- -दृढ चित्त से चारित्र को पालनेवाले मोक्षार्थी महात्माओं को इसी सिद्धान्त का सेवन करना चाहिये कि मैं सदा ही एक शुद्ध चैतन्य मान्न ज्योति हूँ और जितने नानाप्रकार के रागादि भाव झलकते हैं, उन रूप मै नहीं हूँ क्योंकि वे सर्व ही परद्रव्य हैं। समस्तमित्येवमपास्य कर्म कालिकं शुद्धनयावलम्बी । विलीनमोहो रहितं विकायैश्चिन्मात्रमात्मानमथाऽवलम्बे ॥३६-१०॥ भावार्थ-मैं शुद्ध निश्चय नय के द्वारा तीन काल सम्बन्धी सर्व ही कर्मों को दूर करके मोह रहित होता श्रा निर्विकार चैतन्य मात्र आत्मा का ही आलम्बन लेता हूँ। एको मोक्षपथो य एष नियतो दृग्ज्ञप्तिवृत्त्यात्मक- स्तत्रैव स्थितिमेति यस्तमनिशं ध्यायेच्च तं चेतति । तस्मिन्नेव निरन्तरं विहरति द्रव्यान्तराण्यस्पृशन् सोऽवश्यं समयस्य सारमचिरान्नित्योदयं निंदति ॥ ४७-१० ॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र रूप एक यही मोक्ष का मार्ग है । जो कोई रात दिन उसीमें ठहरता है, उसीका मनन करता है, उसीका अनुमव करता है, उसीमे ही निरन्तर विहार करता है, अन्य द्रव्यों को स्पर्श भी नहीं करता है, वही नित्य उदय रूप शुद्ध आत्मा को शीघ्र ही अवश्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। ये ज्ञानमात्रनिजभावमयीमकम्पां भूमि श्रयन्ति कथमप्यपनीतमोहाः । ते साधकत्वमधिगम्य भवन्ति मिद्धाः मूढास्त्वमूमनुपलभ्य परिभ्रमन्ति ॥२०-११॥ भावार्थ-जो महात्मा किसी भी तरह मोह को दूर करके इस निश्चल ज्ञान मात्र आत्मीक भाव की भूमिका आश्रय लेते हैं वे मोक्ष के साधन को पाकर सिद्ध हो जाते हैं । अज्ञानी इस आत्म भूमि को न पाकर ससार मे भ्रमण करते रहते है।
१७४ ] साजनमुन साधना - -- (२२) अमितिगति प्राचार्य मामायिकपाट में कहने :- न सन्ति बापा मम कचनार्था, भवामि नेपां न कदाचनाहम् । इत्थं चिनिनित्य विमुन्य याग, स्वस्थः सदा त्वं भव भद्र मुक्तये ॥२४॥ भावार्थ-मेरे यात्मा से बाहर जितने पदार्थ वे मेरे कोई नहीं है और न में कभी उनका हूँ | मा निश्चय करके सर्व बाहरी पनायी से मोहरकर हे भव्य ' न मना 'प्रपने ही प्रान्मा में लीन हो, हमीमे गुक्ति का लाभ होगा। यात्मानमात्मन्यवलोषयमानस्त्वं दर्शनज्ञानमयो विशद्धः । एकाग्रचित्तः खलु यत्र तत्र, स्थितोपि माधुर्लभने समाधिम् ॥२५॥ भावार्थ-हे भद्र ! तृ अपने प्रात्मा में ही प्रात्मा को देख्दा या दर्शन शानमई विशुद्ध एकाग्र चित्त होजा, क्योंकि जो साधु निज यात्मा के शुद्ध स्वभाव में स्थित होता है वही प्रात्म नमाधि को पाता है। सर्व निराकृन्य विकल्पजालं संसारकान्तारनिपातहेतुम् । विविक्तमात्मानमवेच्यमाणो निलीयसे तं परमात्मतचे ॥२६॥ भावार्थ-समार वन मे भटकाने वाले सर्व ही रागादि विकल्प जाली को दूर करके यदि तू मर्व से भिन्न ऐसे शुद्ध आत्मा का अनुभव करे तो त अवश्य परमात्म तत्व में लीनता को प्राप्त कर लेगा। (२३) श्री अमितिगति प्राचार्य तत्वभावना में कहते हैं:- येषां काननमालयं शशधरो दीपस्तमश्छेदकः । भक्ष्यं भोजनमुत्तम वसुमती शय्या दिशस्त्वम्बरम् ।। संतोषामृतपानपुटवपुपो निधूय कर्माणि ते । धन्या यांति निवासमस्तविपदं दीनदुरापं परैः ॥२४॥ भावार्थ-जिन महात्माओं का घर वन है, अन्धकार नाशक दीपक चन्द्रमा है, उत्तम भोजन भिक्षा है, शय्या पृथ्वी है, दश दिशाए वस्त्र हैं, सतोपरूपी अमृत के पानसे जिनका शरीर पुए है वे ही धन्य पुरुप का का क्षय करके दुःख रहित मोक्ष के स्थान को पाते है, जो दीनो से प्राप्त नहीं किया जा सकता। अभ्यस्ताक्षकषायवैरिविनया विध्वस्तलोकक्रियाः । वाह्याभ्यंतरसंगमांशविमुखाः कृत्वात्मवश्यं मनः ।। ये श्रेष्ठ भवभौगदेह विषय वैराग्यमध्यासते । ते गच्छन्ति शिवालय विकलिला वुद्ध्वा समाधि वुधाः ॥ ३६ ॥ भावार्थ-जिन महात्माओं ने इन्द्रिय विषय और कपायरूपी वैरियों के विजय का अभ्यास किया है, जो लौकिक व्यवहार से अलग है, जिन्होंने बाहरी भीतरी परिग्रह को त्याग दिया है वे ही ज्ञानी अपने मनको सहज-सुख-साधन । [१७५ वश करके संसार शरीर भोगो से उत्तम वैराग्य को रखते हुए आत्मसमाधि को प्राप्त करके शरीररहित हो मोक्ष को प्राप्त करते हैं। शूरोऽहं शभधीरहं पटुरहं सर्वाधिकश्रीरहं । मान्योहं गुणवानहं विभुरहं पुसामहं चाग्रणीः ।। इत्यात्मनपहाय दुष्कृतकरी त्वां सर्वथा कल्पनाम् । शश्वद्ध्याय तदात्मतत्वममलं नैश्रेयसी श्रीर्यतः ।। ६२ ।। भावार्थ-हे आत्मन ! मैं शूर हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ, मैं चतुर हूँ, मैं सब से अधिक धनवान हूँ, मैं प्रतिष्ठित हूँ, मैं गुणवान हूँ, मैं समर्थ हूँ, मैं सब मानवों में मुख्य हूँ। इस तरह की पाप बंधकारी कल्पना को सर्वथा दूर करके तू निर्मल श्रात्मीक स्वभाव का ध्यान कर जिससे निर्वाण की लक्ष्मी प्राप्त हो । लब्ध्वा दुर्लभभेदयोः सपदि ये देहात्मनोरंतरम् । दग्ध्वा ध्यानहुताशनेन मुनयः शुद्धन कमॆधनम् ।। लोकालोकविलोकिलोकनयना भूत्वा द्विलोकार्चिताः । पथान कथयंति सिद्धिवसतेस्ते सतु नः सिद्धये ।। ६४ ।। भावार्थ-जो मुनि शरीर और आत्मा के भेद को जिसका पाना दुर्लभ है, पाकर के और शुद्ध ध्यानरूपी अग्नि से कर्मरूपी ईंधन को जला देते है वे लोकालोक को देखनेवाले केवलनान नेत्रधारी इस लोक परलोक पूज्य होकर हमारी शुद्धि के लिये मोक्षनगर जाने का मार्ग बताते हैं। (२४) श्री पद्मनंदि मुनि धर्मोपदेशामृत में कहते हैं:- वचन विरचितैवोत्पद्यते भेदबुद्धि गवगमचरित्राण्यात्मनः स्व स्वरूपम् । अनुपचरितमेतच्चेतनकस्वभावं ब्रजति विषयभाव योगिनां योगदृष्टः ।।७६ ।। भावार्थ-सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र भेदरूप मोक्षमार्ग की बुद्धि वचनों से रची हुई हैं । वास्तव में यह रत्नत्रय आत्मा का अपना स्वभाव है। योगी ध्यान दृष्टि के द्वारा इसी चेतनामय स्वभाव का ही अनुभव करते हैं ' (२५) श्री पद्मनंदि मुनि एकत्वसप्तति में कहते हैं:- दर्शनं निश्चयः पुसि बोधस्तद्धोध दृष्यते । स्थितिरत्रैव चारित्रमितियोगः शिवाश्रयः ॥१४॥ भावार्थ-शुद्धात्मा का निश्चय सम्यग्दर्शन है, शुद्धात्मा का ज्ञान सम्यग्ज्ञान है, शुद्धात्मा में स्थिति सम्यक्चारित्र है, तोनों की एकता ही मोक्ष का मार्ग है। से
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सहज-सुख-साधन।
एकमेव हि चैतन्यं शुद्धनिश्चयतोऽथवा ।
कोऽवकाशो विकल्पानां तत्राखण्डैकवस्तुनि ॥१५॥
भावार्थ-अथवा शुद्ध निश्चयनय से एक चैतन्य ही मोक्षमार्ग है । अखड वस्तु श्रात्मा में भेदों के उठाने
की जरूरत नहीं है।
साम्यमेकं परं कार्य साम्यं तत्वं परं स्मृतम् ।
साम्यं सर्वोपदेशानामुपदेशो विमुक्तये ॥६६॥
भावार्थ- उत्तम समताभाव एक करना चाहिए, समता का तत्व उत्कृष्ट है। समताभाव ही सर्व उपदेशों
में सार उपदेश मुक्ति के लिये कहा गया है।
साम्यं सद्बोधनिर्माणं शाश्वदानंदमंदिरम् ।
साम्यं शुद्धात्मनोरूपं द्वारं मोक्षैकसझनः ॥६७।।
भावार्थ-
-समताभाव ही सम्यग्ज्ञान को रचनेवाला है, यह अविनाशी श्रानन्द का मदिर है । समताभाव
शुद्धात्मा का स्वभाव है । यही मोक्षमहल की सीढ़ी है।
साम्यं निश्शेपशास्त्राणां सारमाहुविपश्चित्ः।
साम्यं कर्ममहादावदाहे दापानलायते ॥६॥
भावार्थ--समताभाव सर्व शास्त्रों का सार है ऐसा विद्वानों ने कहा है । समताभाव ही कर्मरूपी महावृक्ष
के जलाने को दावानल के समान है। यह समताभाव प्रात्मध्यान से ही जागृत होता है ।
हेयश्च कर्मरागादि तत्कार्यश्च विवेकिनः ।
उपादेयं परंज्योतिरुपयोगैकलक्षणम् ॥७५।।
भावार्थ-रागादि उपजानेवाले कर्म तथा रागादिभाव उनके कार्य ये सव ही ज्ञानी द्वारा त्यागने योग्य
हैं । मात्र एक उपयोग लक्षणरूप आत्मा की परमज्योति ही ग्रहण करने योग्य है ।
(२६) श्री पद्मनंदि मुनि सद्बोधचंद्रोदय में कहते हैं:-
तचमात्मगतमेव निश्चिनं योऽन्यदेशनिहितं समीक्षते ।
वस्तु मुष्टिविधृतं प्रयत्नतः कानने मृगयते स मूढधीः ।।६।।
भावार्थ-आत्मतत्व निश्चय से आत्मा में ही है। जो कोई उस तत्व को अन्य स्थान में खोजता है वह
ऐसा मूढ है जो अपनी मुट्ठी में धरी वस्तु को वनमें द ढ़ता है।
संविशुद्धपरमात्मभावना संविशुद्धपदकारणं भवेत् ।
सेतरेतरकृते सुवर्णतो लोहतश्च विकृती तदाश्रिते ॥२०॥
सहज-सुख-साधन । [१७७ भावार्थ- शुद्ध परमात्मा की भावना शुद्ध पद का कारण है । अशुद्ध आत्मा की भावना अशुद्ध पद का कारण है । जैसे सुवर्ण से सुवर्ण के पात्र बनते हैं और लोहे से लोहे के पात्र बनते है। बोधरूपमखिलैरुपाधिभिर्वजितं किमपि यत्तदेव नः। नान्यदल्पमपि तत्वमीदृश मोक्षहेतुरिति योगनिश्चयः ॥२५॥ भावार्थ-सर्व रागादि की उपाधि से रहित जो एक ज्ञानरूप तत्व है सो ही हमारा है और जरासा भी कोई हमारा तत्व नहीं है ऐसा योगी का निश्चय मोक्ष का कारण है। निश्चयावगमनस्थितित्रयं रत्नसंचितिरियं परात्मनि । योगदृष्टिविषयीभवन्नसौ निश्चयेन पुनरेक एव हि ॥३०॥ भावार्थ-परमात्मा के स्वरूप में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र इन तीनों रत्नों का संचय है। इसलिये योगियों की दृष्टि का विषय एक निज श्रात्मा ही है । सत्समाधिशशलाञ्छनोदयादुल्लसत्यमलबोधवारिधिः । योगिनोऽणुसदृशं विभाव्यते यत्र मन्नमखिल चराचरम् ॥३३॥ भावार्थ-योगी के श्रात्मध्यान रूपी चद्रमा के उदय से निर्मल मानरूपी समुद्र बढ़ जाता है । उस समुद्र में यह चर अचररूप सर्व जगत् डूब करके एक भणुमात्र दिखलाई पड़ता है। शुद्ध ज्ञान में ऐसी शक्ति है जो ऐसे अनत लोक हों तो भी दिख जावे । जल्पितेन बहुना किमाश्रयेद् बुद्धिमानमलयोगसिद्धये । साम्यमेव सकलैरुपाधिभिः कर्मजालजनितैर्विवर्जितम् ।।४।। भावार्थ- बहुत अधिक कहने से क्या ? ध्यान की सिद्धी के लिये बुद्धिमान को उचित है कि सर्व कर्म- जनित रागादि की उपाधि से रहित एक समताभाव को अंगीकार करें। (२७) श्री पत्ननदि मुनि निश्चयपंचाशन में कहते हैं:- सम्यकसुखगोधदृशां त्रितयमखण्डं परात्मनोरूपम् । तत्तत्र तत्परो यः स एव तल्लब्धिकृतकृत्यः ॥१३॥ भावार्थ-सम्यक् सुख ज्ञान दर्शन ये तीनों ही अखंड परमात्मा का स्वभाव है। इसलिये जो कोई परमात्मा में लीन है वह सच्चे सुख व ज्ञान व दर्शन को पाकर कृतकृत्य हो जाता है । हिसोज्झित एकाकी सर्वोपद्रक्सहो वनस्थोऽपि । तरुरिव नरो न सिध्यति सम्यग्रोधाहते नातु ॥१६॥ भावार्थ-यदि सम्यक् आत्मज्ञान न हो तो यह मानव कदापि मोक्ष को नहीं प्राप्त कर सकता है । चाहे वह हिंसा से रहित एकाकी सर्व उपद्रव को सहता हुआ वन में वृक्ष के समान खड़ा रहे ।
१७८] सहज-सुख-साधन । (२८) श्री कुलभद्र आचार्य सारसमुच्चय में कहते हैं:- संगादिरहिता धीरा रागादिमलवर्जिताः । शान्ता दान्तास्तपोभूपा मुक्तिकांक्षणतत्पराः ॥१६॥ मनोवाकाययोगेषु प्रणिधानपरायणाः । वृत्ताढ्या ध्यानसम्पन्नास्ते पात्रं करुणापराः ॥१७॥ भावार्थ-जो परिग्रह आदि से रहित हैं, धीर हैं, गगादिमल से रहित है, शांत हैं, इन्द्रिय विजयी हैं, तपस्वी हैं, मुक्ति प्राप्ति की भावना रखते हैं, मन, वचन, काय तीनों योगों को वश रखनेवाले हैं, चारित्रवान हैं, दयावान है, वे ही ध्यानी उत्तम पात्र मुनि है। आत्त रौद्रपरित्यागाद धर्मशुक्लसमाश्रयात् । जीवः प्राप्नोति निर्वाणमनन्तसुखमच्युतं ॥२२६॥ भावार्थ-आर्त व रौद्रध्यान को त्यागकर जो धर्मध्यान और शुक्लध्यान का आश्रय लेता है वही जीव अनतसुखमयी अविनाशी निर्वाण को प्राप्त करता है। आत्मा चै सुमहत्तीर्थं यदासौ प्रशमे स्थितः । यदासौ प्रशमो नास्ति ततस्तीर्थनिरर्थकम् ।।३११।। शीलवतजले स्नातु शुद्धिरस्य शरीरिणः । न तु स्नातस्य तीर्थेषु सर्वेष्वपि महीतले ॥३१२॥ रागादिवर्जितं स्नानं ये कुति दयापराः । तेषां निर्मलता योगर्न च स्नातस्य वारिणा ॥३१३॥ आत्मानं स्नापयेन्नित्यं ज्ञाननीरेण चारुणा । येन निर्मलतां याति जीवो. जन्मान्तरेष्वपि ॥३१४॥ भावार्थ- नब यह आत्मा शांतभाव में तिष्ठता है तब यही महान तीर्थ है । यदि आत्मा में शांति नहीं है तो तीर्थयात्रा निरर्थक है। शील व ब्रतरूपी जल में स्नान करने से आत्मा की शुद्धि होती है किन्तु पृथ्वीभर की नदियों में स्नान करने से नहीं हो सकती है। जो कोई दयावान रागद्वेषादि भावों को छोड़कर आत्मा के वीतरागभाव में स्नान करते हैं उन्हीं को ध्यान से निर्मलता प्राप्त होती है मात्र जल के स्नान से पवित्रता नहीं आती है । आत्मज्ञानरूमी जल से आत्मा को नित्य स्नान कराना चाहिये, जिससे जन्म जन्म के पाप धुल जाते हैं। (२६) श्री शुभचन्द्र आचार्य ज्ञानार्णव में कहते हैं:- मोहवहिमपाक स्वीकत संयमश्रियम् । छेत्त रागद्र मोद्यानं समत्वमवलम्ब्यताम् ॥१-२४॥
सहज-सुख-साधन। [१७९ भावार्थ हे आत्मन् । भावार्थ-हे आत्मन् । मोहरूपी अग्नि को बुझाने के लिये संयमरूपी लक्ष्मी को स्वीकार करने के लिये तथा रागरूपी वृक्षो के समूह को काटने के लिये समताभाव को धारण करो। विरज्य कामभोगेषु विमुच्य वपुपि स्पृहाम् । समत्वं भज सज्ञानलक्ष्मीकुलास्पदम् ॥३-२४॥ 'हे प्रात्मन् । तू कामभोगों से विरक्त हो, शरीर मे राग को छोड़ और समभाव को भज क्योंकि केवलज्ञानरूपी लक्ष्मी का कुल ग्रह समभाव है । समभाव से ही अरहत पद होता है । साम्यसूर्याशभिभिन्न रागादि तिमिरोत्करे। प्रपश्यति यमी स्वस्मिन्स्वरूपं परमात्मनः ॥५-२४॥ भावार्थ-सयमी समताभावरूपी सूर्य की किरणों से रागादि अधकार के समूह को जब नष्ट कर देता है तव वह अपने आत्मा मे ही परमात्मा के स्वरूप को देख लेता है। साम्यसीमानमालम्व्य कृत्वात्मन्यात्मनिश्चयम् । पृथक् करोति विज्ञानी संश्लिष्ट जीवकर्मणी ॥६-२४॥ भावार्थ-भेदविज्ञानी महात्मा समताभाव की सीमा को प्राप्त करके और अपने आत्मा में आत्मा का निश्चय करके जीव और कर्मों को जो अनादि से मिले हैं, पृथक कर देता है। भावयस्व तथात्मानं समत्वेनातिनिर्भरम् । न यथा द्व परागाभ्या गृह्वात्यर्थकदम्बकम् ।।८-२४॥ हे आत्मन् ! तू अपने आत्मा की समताभाव के साथ अति गाढ इस तरह भावना कर कि जिससे पदार्थ के समूह को रागद्वेष मे देखना बन्द हो जावे । आशाः सद्यो विपद्यन्ते यान्त्यविद्याः क्षयं क्षणात् । म्रियते चित्तभोगीन्द्रो यस्य सा साम्यभावना ।। ११-२४ ।। भावार्थ-जो महात्मा समभाव की भावना करता है उसकी आशाए शीघ्र नाश होजाती हैं, अज्ञान क्षण भर में क्षय होजाता है, चित्त रूपी सर्प भी मरजाता है । साम्यमेव परं ध्यानं प्रणीत विश्वदर्शिभिः । तस्यैर व्यक्तये नूनं मन्येऽयं शास्त्रविस्तरः ॥१३-२४ ॥ भावार्थ-सर्वज्ञो ने समता भाव को ही उत्तम ध्यान कहा है, उसीकी प्रगटता के लिये सर्व शास्त्रों का विस्तार है, ऐसा मैं मानता हूँ। तनुत्रयविनिमुक्तं दोपत्रयविवर्जितम् । यदा वेत्यात्मनात्मानं तदा साम्ये स्थितिभवेत् ।। १६-२४ ॥ भावार्थ १८०] सहज-सुख-साधन। भावार्थ-जब योगी अपने आत्मा को औदारिक, तैजस, कार्माण इन तीन शरीरों से रहित व राग, द्वेप, मोह इन तीन दोषो से रहित आत्मा ही के द्वारा जानता है, तब ही समभाव में स्थिति होती है। अशेषपरपर्यायैरन्यद्रव्यैर्विलक्षणम् । निश्चिनोति यदात्मानं तदा साम्यं प्रसूयते ॥ १७-२४ ॥ भावार्थ-जिस समय यह आत्मा अपने को सर्व परद्रव्यों की पर्यायों से व परद्रव्यों से विलक्षण निश्चय करता है उसी समय समता भाव पैदा होता है। सौधोत्सङ्ग स्मशाने स्तुतिशपनविधौ कर्दमे कु कुमे वा पल्यंके कण्ठकाग्रे दृषदि शशिमणौ चर्मचीनांशकेषु । शीर्णाङ्क दिव्यनार्यामसमशमवशाद्यस्य चित्र विकल्पै- र्नालीढं सोऽयमेकः कलयति कुशलः साम्यलीलाविलास ॥२६-२४॥ भावार्थ-जिस महात्मा का चित्त महलों को या स्मशान को देखकर, स्तुति व निन्दा किये जानेपर, कीचड व केशर से छिडके जानेपर, पल्यंक शय्या व कांटों पर लिटाए जानेपर, पाषाण और चन्द्रकांतमणि के निकट आनेपर, चर्म व चीन के रेशमी वस्त्रों के दिये जाने पर, क्षीण शरीर व सुन्दर स्त्री के देखने पर अपूर्व शान्तभाव के प्रताप से रागद्वेष विकल्पों को स्पर्श नहीं करता है वहीं चतुर मुनि समताभाव के को अनुभव करता है। यस्य ध्यानं सुनिष्कम्पं समत्वं तस्य निश्चलम् । नानयोर्विद्धयधिष्ठानमन्योऽन्यं स्याद्विभेदतः ॥२-२५ ॥ भावार्थ-जिसके ध्यान निश्चल है उसीके समभाव निश्चल है। ये दोनों परस्पर आधार है । ध्यान का आधार समभाव है, समभाव का आधार ध्यान है। साम्यमेव न सद्धथानातिस्थिरी भवति केवलम् । शुद्धयत्यपि च कौंधकलङ्की यन्त्रवाहकः ।। ३-२५ ॥ भावार्थ-प्रशंसनीय आत्म ध्यान से केवल समताभाव ही नहीं स्थिर होता है किन्तु यह शरीर रूपी यन्त्र का स्वामी जीव जो कमी के समूह से मलीन है सो शुद्ध हो जाता है। भवज्वलनसम्भूतमहादाहप्रशान्तये । शश्वद्धयानाम्बुधेधीररैवगाहः प्रशस्यते ॥ ६-२५ ॥ भावार्थ-ससार रूपी अग्नि से उत्पन्न हुए वडे आताप की मंति के लिए धीरवीर पुरुषो को ध्यान रुपी ममुद्र का स्नान ही श्रेष्ट है। ज्ञानवैराग्यमंपचः संवृतात्मा स्थिराशयः । मुमुक्षुद्यमी शान्तो ध्याता धीरः प्रशस्यते ॥ ३-२७ ॥ आनन्द सहज-सुख-साधन । [१८१ - भावार्थ-धर्म ध्यान का ध्याता वही होता है जो सम्यक्ज्ञान और वैराग्य से पूर्ण हो, इन्द्रिय व मन को वश रखनेवाला हो, जिसका अभिप्राय स्थिर हो, मोक्ष का इच्छुक हो, उद्यमी हो तथा शांतभाव धारी हो तथा धीर हो। ध्यानध्वंसनिमित्तानि तथान्यान्यपि भूतले । न हि स्वप्नेऽपि सेव्यानि स्थानानि मुनिसत्तमैः ॥ ३४-२७ ॥ भावार्थ-जो जो स्थान ध्यान में विघ्न कारक हो उन सबको स्वप्न में भी सेवन न करे। मुनियों को एकांत ध्यान योग्य स्थान मे ही ध्यान करना चाहिये । यत्र रागादयो दोषा अज यान्ति लाघवम् । तत्रैव वसतिः साध्वी ध्यान काले विशेषतः ॥ ८-२८ ॥ भावार्थ-जहां बैठने से रागादि दोष शीघ्र घटते चले जावे वहां ही साधु को बैठना ठीक है। ध्यान के समय में इसका विशेष ध्यान रखना चाहिये । दारुपट्ट शिलापट्ट भूमौ वा सिकतास्थले । समाधिसिद्धये धीरो विदध्यात्सुस्थिरासनम् ।। ६-२८ ।। भावार्थ-धीर पुरुष ध्यान की सिद्धि के लिये काठ के तखते पर, शिलापर, भूमिपर, व बालू रेत में भले प्रकार आसन लगावे । पर्यकमर्द्ध पर्यडू वन वीरासनं तथा । सुखारविन्दपूर्वे च कायोत्सर्गश्च सम्मतः ।। १०-२८ ॥ भावार्थ-ध्यान के योग्य आसन हैं (१) पर्यकासन (पद्मासन), अर्द्ध पर्यकासन (अर्द्ध पद्मासन), वना- सन, वीरासन, सुखासन, कमलासन और कायोत्सर्ग । स्थानासन विधानानि ध्यानसिद्ध निवन्धनम् । नैकं मुक्त्वा मुनेः साक्षाद्विक्षेपरहितं मनः ।। २०-२८ ।। भावार्थ-ध्यान की सिद्धि के लिये स्थान और आसन का विधान है। इनमें से एक भी न हो तो मुनि का चित्त क्षोभ रहित न हो। पूर्वाशाभिमुखः साक्षादुत्तराभिमुखोऽपि वा। प्रसन्नवदनो ध्याता ध्यानकाले प्रशस्यते ।। २३-२८ ।। भावार्थ-ध्यानी मुनि जो ध्यान के समय प्रसन्न मन होकर साक्षात् पूर्व दिशा मे मुख करके अथवा उत्तर दिशा में भी मुख करके ध्यान करे तो प्रशसनीय है। . 1 - १८२] सहज-सुख-साधन। अथासनजयं योगी करोतु विजितेन्द्रियः । मनागपि न खिद्यन्ते समाधौ सुस्थिरासनाः ॥ ३०-२८ ।। भावार्थ-इन्द्रियों को जीतनेवाला महात्मा योगी आसन को भी वश करे। जिसका आसन ध्यान में स्थिर होता है वह कुछ भी खेद नही पाता है। नेत्रद्वन्द्व श्रवणयुगले नासिकाग्रे ललाटे वक्रे नाभौ शिरमि हृदये तालुनि भ्र युगान्ते । ध्यानस्थानान्यमलमतिभिः कीर्तितान्यत्र देहे तेष्वेकस्मिन्निगतविपर्य चित्तमालम्बनीयम् ॥ १३-३० ॥ भावार्थ- "शुद्ध मतिधारी प्राचार्यों ने दश स्थान ध्यान के समय चित्त को रोकने के लिये कहे हैं-(१) नेत्रयुगल, (२) कर्ण युगल, (३) नाक का अग्र भाग, (४) ललाट, (५) मुख, (६) नाभि, (७ ) मस्तक, (८) हृदय (९) तालु, (१०) दोनों भौहों का मध्य भाग । इनमें से किसी एक स्थान में मनको विपयों से रहित करके ठहराना उचित है । उन्हीं में कहीं पर ॐ या है मन्त्र को स्थापित कर ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है। सोऽयं समरसीभावस्तदेकीकरणं स्मृतम् । अपृथक्त्वेन यत्रात्मा लीयते परमात्मनि ।। ३८-३१ ।। भावार्थ-जहां आत्मा परमात्मा में एकतानता से लीन हो जावे वही समरसीभाव है, वही एकीकरण है, वही आत्मध्यान है। ज्योतिर्मयं ममात्मानं पश्यतोऽत्रैव यान्त्यमी । क्षयं रागादयस्तेन नारिः कोऽपि प्रियो न मे ॥ ३२-३२॥ भावार्थ ध्याता विचारे कि मैं अपने को ज्ञान ज्योतिमय देखता हूँ । इसीसे मेरे रागादिक क्षय हो गए हैं। इस कारण न कोई मेरा शत्रु है न कोई मेरा मित्र है। आत्मन्येवात्मनात्मायं स्वयमेवानुभूयते । अतोऽन्यत्रैव मां ज्ञातु प्रयासः कार्यनिष्फलः ॥४१-३२ ॥ भावार्थ-यह आत्मा आत्मा में ही आत्मा के द्वारा स्वयमेव अनुभव किया जाता है इससे छोडकर अन्य स्थान में आत्मा के जानने का जो खेद है सो निष्फल है। स एवाहं स एवाहमित्यभ्यस्यन्ननारतम् । वासनां दृढयन्नेव प्राप्नोत्यात्मन्यवस्थितिम् ।। ४२-३२ ॥ भावार्थ- - वही मैं परमात्मा हूँ, वही मैं परमात्मा हूँ, इस प्रकार निरन्तर अभ्यास करता हुआ पुरुष इस वासना को दृढ़ करता हुआ श्रात्मा में स्थिरता को पाता है, आत्मध्यान जग उठता है।
सहज-सुख-साधन । [१८३ शरीराद्भिन्नमात्मानं शण्वन्नपि वदन्नपि । तावन्न मुच्यते यावन्न भेदाभ्यासनिष्ठितः ॥ ८५-३२ ॥ भावार्थ-शरीर से आत्मा भिन्न है ऐसा सुनता हुआ भी तथा फहता हुवा भी जब तक दोनों भेद का अभ्यास पक्का नहीं होता है तब तक देह से ममत्व नहीं छूटता है । अतीन्द्रियनिर्देश्यममूर्त कल्पनाच्युतम् । चिदानंदमयं विद्धि स्वस्मिन्नात्मानमात्मना ।। ६६-३२ ॥ भावार्थ-हे आत्मन् ! तू आत्मा को आत्मा ही में आपही से ऐसा जान कि मैं अतीन्द्रिय हूँ, वचनों से कहने योग्य नहीं हूँ, अमूर्तीक हूँ, मन की कल्पना से रहित हूँ तथा चिदानन्दमई हूँ । इत्यविरतं स योगी पिण्डस्थे नातनिश्चलाभ्यासः । शिवसुखमनन्यसाध्यं प्राप्नोत्यचिरेण कालेन ॥ ३१-३७ ।। भावार्थ-इस तरह पिडस्थ ध्यान में जिसका निश्चल अभ्यास हो गया है वह ध्यानी मुनि ध्यान से साध्य जो मोक्ष का सुख उसको शीघ्र ही पाता है। वीतरागस्य विज्ञेया ध्यानसिद्धिध मुने । क्लेश एव तदर्थ स्याद्रागात्तस्येह देहिनः ॥ ११४-३८ ॥ भावार्थ-जो मुनि वीतराग है उनके ध्यान की सिद्धि अवश्य होती है परन्तु रागी के लिये ध्यान करना दुःख रूप ही है। अनन्यशरणं साक्षात्तत्सलीनैकमानसः । तत्स्वरूपमवाप्नोति ध्यानी तन्मयतां गतः ।। ३२-३६ ॥ भावार्थ-जो सर्वज्ञ देव की शरण रखकर अन्य की शरण न रखता हुआ उसी के स्वरूप में मन को लीन कर देता है वह ध्यानी मुनि उसीमें तन्मयता को पाकर उसी स्वरूप हो जाता है । एष देवः स सर्वज्ञः सोऽहं तद्रूपतां गतः । तस्मात्स एव नान्योऽहं विश्वदर्शीति मन्यते ॥ ४३-३६ ॥ भावार्थ-जिस समय सर्वज्ञ स्वरूप अपने को देखता है उस समय ऐसा मानता है कि जो सर्वज्ञ देव है उसी स्वरूपपने को मै प्राप्त हुआ हूँ। इस कारण वही सर्व का देखनेवाला मैं हूँ। अन्य मैं नहीं हूँ ऐसा मानता है। त्रैलोक्यानंदबीजं जनमजलनिधेर्यानपात्र पवित्रम् लोकालोकप्रदीपं स्फुरदमलशाञ्चन्द्रकोटिप्रभात्यम् । कस्यामप्यग्रकोटौ जगदखिलमतिक्रम्य लब्धप्रतिष्ठम् देवं विश्वैकनाथं शिवमनमनघं वीतरागं भजस्व ।। ४६-३६ ।।
१८४] सहज-मुख-साधन। 4 भावार्थ-हे मुने ! तू वीतरागदेव का यान कर । जो देव तीन लोक को श्रानन्द के कारण हैं, समार पार करने को जहाज है, पवित्र हैं, लोकालोक प्रकाशक हैं, करोड़ों चन्द्रमा के प्रभा से भी अधिक प्रभावान हैं, किसी मुख्य कोटि मे सर्व जगत का उलंघन करके प्रतिष्ठा प्राप्त है, जगत के एक नाथ हैं, आनन्द स्वरूप है, अजन्मा च पापरहित हैं। इतिविगतविकल्पं क्षीणरागादिदोपं विदितसकलवेद्य त्यक्तविश्वप्रपञ्चम् । शिवमजमनवध विश्वलोकैकनाथं परमपुरुषमुच्च वशुद्धया भजाय ।। ३१-४० ।। भावार्थ-हे मुनि ! इस प्रकार विकल्परहित, रागादि टोपरहित, सर्वज्ञायक ज्ञाता, सर्व प्रपन्च से शून्य, आनन्दरूप, जन्ममरण रहित, कर्मरहित, जगत के एक अद्वितीय स्वामी परमपुरुप परमात्मा को भावको शुद्ध करके भजन कर। यात्मार्थं श्रय मुञ्च मोहगहनं मित्रं विवेक कुरु वैराग्यं भज भावयस्व नियतं भेदं शरीरात्मनोः । धर्मध्यानसुधासमुद्रकुहरे कृत्वावगाहं परं पश्यानन्तसुखस्वभावकलितं मुक्तेमुखाम्भोरुहम् ॥ २-४२ ॥ भावार्थ-हे आत्मन् ! तू अपमै श्रात्मा के अर्थ का ही श्राश्रय कर, मोहरूपी वन को छोड, भेद विज्ञान को मित्र बना, वैराग्य को भज, निश्चय से शरीर और आत्मा के भेद की भावना कर । इस तरह धर्मध्यानरूपी अमृत के समुद्र के मध्य में अवगाहन करके अनंतसुख से पूर्ण मुक्ति के मुखकमल को देख। (३१) श्री ज्ञानभूपण भट्टारक तत्वज्ञानतरंगिणी में कहते हैं:- क्क यांति कार्याणि शुभाशुभानि क यांति संगाश्चिदचित्स्वरूपाः । क यांति रागादय एव शुद्धचिद्र पकोहं स्मरणे न विद्मः ॥ ८-२ ॥ भावार्थ-मैं शुद्ध चैतन्य स्वरूप हूँ ऐसा स्मरण करते ही न जाने कहा शुभ व अशुभ कार्य चले जाते हैं, न जाने कहा चेतन व अचेतन परिग्रह चले जाते हैं तथा न जाने कहा रागादि विला जाते हैं । मेरुः कल्पतरु सुवर्णममृतं चिंतामणिः केवलं साम्यं तीर्थंकरो यथा सुरगवी चक्री सुरेंद्रो महान् । भूभृद्भूरुहभातुपेयमणिधीवृत्ताप्तगोमानवा- मत्येष्वेव तथा च चिंतनमिह ध्यानेषु शुद्धात्मनः ॥ ६-२ ।। भावार्थ-जैसे पर्वतों में मेरु श्रेष्ठ है, वृक्षों में कल्पवृक्ष बडा है, धातुओं में सुवर्ण उत्तम है, पीनेयोग्य पदार्थों में अमृत सुन्दर है, रत्नों में उत्तम चिन्तामणि रत्न है, ज्ञानों में श्रेष्ठ केवलज्ञान है, चारित्रों मे श्रेष्ठ . सहज-सुख-साधन। [१८५ समतामात्र है, आत्माओं में तीर्थंकर बड़े हैं, गायों मे प्रशंसनीय कामधेनु है, मानवों में महान चक्रवर्ती है, तथा देवों में इन्द्र महान व उत्तम है उसी तरह सर्व ध्यान में शुद्ध चिद्र प का ध्यान सर्वोत्तम है । तं चिद्र पं निजात्मानं स्मर शुद्ध प्रतिक्षणं । यस्य स्मरणमात्रेण सद्यः कर्मक्षयो भवेत् ॥ १३-२ ॥ भावार्थ-हे आत्मन् ! तू चैतन्यस्वरूप शुद्ध अपने आत्मा का प्रतिक्षण स्मरण कर जिसके स्मरण मान से शीघ्र ही कर्म क्षय हो जाते हैं। संगं विमुच्य विजने वसंति गिरिगह्वरे । शुद्धचिद्र पसंप्राप्त्यै ज्ञानिनोऽन्यत्र निःस्पृहाः ।।५-३॥ भावार्थ-ज्ञानी अन्य सर्व इच्छाओं को त्यागकर, परिग्रह से अलग होकर शुद्व चैतन्यरूप के ध्यान के लिये एकान्त स्थान पर्वत की गुफाओं में वास करते है। कर्मागाखिलसंगे निर्ममतामातरं विना । शुद्धचिद्र पसद्ध्यानपुत्रसूतिनं जायते ॥११-३॥ भावार्थ सर्व कर्मों से, शरीर से व सर्वपरिग्रह से निर्ममतारूपी माता के बिना शुद्ध चैतन्यरूप सत्य ध्यानरूपी पुत्र की उत्पत्ति नहीं हो सकती है। नाहं किंचिन्न मे किंचिद् शुद्धचिद्रूपकंविना । तस्मादन्यत्र मे चिता वृथा तब लयं भजे ॥१०-४|| भावार्थ- शुद्ध चैतन्य स्वरूप के सिवाय न तो और मैं कुछ हूँ न कुछ मेरा है । इसलिये दूसरे की चिता करना वृथा है, ऐसा जानकर मैं एक शुद्ध चिद्र प में ही लय होता हूँ। रागाद्या न विधातव्याः सत्यसत्यपि वस्तुनि । ज्ञात्वा स्वशुद्धचिद्र पं तत्र तिष्ठ निराकुलः ॥१०-६॥ भावार्थ-अपने शुद्ध चैतन्यमय स्वरूप को जानकर उसी में तिष्ठो और निराकुल रहो । दूसरे भले बुरे किसी पदार्थ में रागद्वेपादि भाव न करना उचित है। चिद्र पोऽहं स मे तस्मात्त पश्यामि सुखी ततः । भवक्षितिहितं मुक्तिनिर्यासोऽयं जिनागमे ॥११-६॥ भावार्थ-मैं चैतन्यरूप हूँ इसलिये मैं उसी को देखता हूँ और सुखी होता हूँ। उसी से संमार का नाश और मुक्ति का लाभ होता है, यही जैनागम का सार है। स्वात्मध्यानामृतं स्वच्छ विकल्पानपयार्य सत् । पिबति क्लेशनाशाय जलं शैवालवत्सुधीः ॥४-८॥
१८६] सहज-सुख-साधन । भावार्थ-जिस तरह प्यास . "जिस तरह प्यास के दुःख को दूर करने के लिये बुद्धिमान् सैवाल को हटाकर जलको पीता है उसी तरह ज्ञानी सर्व सकल्पविकल्पों को छोड़कर एक निर्मल आत्मध्यानरूपी अमृत का ही पान करते हैं। नात्मध्यानात्परं सौख्यं नात्मध्यानात् परं तपः । नात्मध्यानात्परो मोक्षपथः क्यापि कदाचन ॥५-८॥ भावार्थ- -आत्मध्यान से बढ़कर कहीं कभी सुख नहीं है, न अात्मव्यान से बढ़कर कहीं कभी कोई तप है न आत्मध्यान से बढकर कहीं कभी कोई मोक्षमार्ग है। भेदज्ञानं प्रदीपोऽस्ति शुद्धचिद्रूपदर्शने । अनादिजमहामोहतामसच्छेदनेऽपि च ॥१७-८॥ भावार्थ-यह भेदविज्ञान शुद्ध चिद्र प के दर्शनके लिये तथा अनादिकाल के महा मिथ्यात्वरूपी अधकार के छेदने के लिये दीपक है। शुद्धचिद्र पसद्धयानादन्यत्कार्यं हि मोहज । तस्माद् बंधस्ततो दुःखं मोह एव ततो रिपुः ॥२१-६॥ भावार्थ-शुद्ध चिद्र प के ध्यान के सिवाय जितने कार्य हैं वे सब मोह से होते हैं । उस मोह से कर्म बन्ध होता है, बध से दुःख होता है, इससे जीव का वैरी मोह ही है। निर्ममत्वं परं तवं ध्यानं चापि व्रतं सुखं । शीलं खरोधनं तस्मानिर्ममत्वं विचिंतेयत् ॥१४-१०॥ भावार्थ-सबसे ममता का त्याग ही परम तत्व है, ध्यान है, व्रत है व परमसुख है शील है, व इन्द्रिय निरोध है। इसलिये निर्ममत्व भाव को सदा विचार करे । रत्नत्रयाद्विना चिद्र पोपलब्धिन आयते । यथर्द्धिस्तपसः पुत्री पितुष्टिलाहकात् ॥३-१२॥ भावार्थ-जिस तरह तप के बिना शुद्धि नहीं, पिता के बिना पुत्री नहीं होती, मेघ बिना वृष्टि नहीं होती वैसे रत्नत्रय के बिना चैतन्य स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती है। दर्शनज्ञानचारित्रस्वरूपात्मप्रवत्तनं । युगपद् भण्यते रत्नत्रय सर्वजिनेश्वरैः ॥४-१२॥ भावार्थ- जहा सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्ररूप अपने ही आत्मा की प्रवृत्ति एक साथ होती है इसी को जिनेन्द्रों ने रत्नत्रय धर्म कहा है। यथा बलाहकवृष्टर्जायते हरितांकुराः । तथा मुक्तिप्रदो धर्मः शुद्धचिद्र पचिंतनात् ॥१०-१४॥
- सहज-सुख-साधन। [१८७ भावार्थ-जैसे मेघों की वृष्टि से हरे अकूर फूटते हैं वैसे शुद्ध चैतन्यरूप के चितवन से मोक्षदायक । धर्म की वृद्धि होती है। संगत्यागो निर्जनस्थानकं च तत्वज्ञान सर्वचिंताविमुक्तिः । निर्वाधणं योगरोधो मुनीनां मुक्त्यै ध्याने हेतवोऽमी तिरुताः ॥८-१६।। भावार्थ-इन नीचे लिखे कारणों से मुनियों को ध्यान की सिद्धी मुक्ति के लिये होती है। येही मोक्ष कारण हैं (१) परिग्रह त्यागकर असंगभाव, (२) निर्जन एकांत स्थान, (३) तत्वज्ञान, (४) सर्व चिंता से छुट्टी, (५) वाधारहितपना, (६) तथा मन, वचन, काय योगों को वश करना । (३२) बनारसीदासजी बनारसीविलास में कहते हैं:- सवैया-३१। पूरब करम दहै, सरवज्ञ पद लहै; गहै पुण्यपथ फिर पाप मै न आवना। करुना की कला जागै कठिन कपाय भागै; लागै दानशील तप सफल सुहावना ।। पावै भवसिंधु तट खोले मोक्षद्वार पष्ट, शर्म साध धर्म की धरा मैं करै धावना । एते सब काज करै अलख को अग धरै, चेरी चिदानन्द की अकेली एक भावना ।।८।। प्रशम के पोपवे को अमृत की धारासम, ज्ञानवन सींचवेको नदी नीर भरी है। चचल करण मृग बाधवे को वागुरासी, कामदावानल नासवेको मेघ झरी है । प्रबल कपायगिरि भंजवेको बज्र गदा, भो समुद्र तारवेको पौढी महा तरी है। मोक्षपन्थ गहवेको वेशरी विलायतकी, ऐसी शुद्ध भावना अखंड धार ढरी है ।।८।। कवित्त । श्रालश त्याग जाग नर चेतन, बल सभार मत करहु विलम्ब । इहा न सुख लवलेश जगतमहि, निंब विरपमैं लगै न अम्ब ।। ताते तू अन्तर विपक्ष हर, कर विलक्ष निज अक्षकदम्ब । गह गुन ज्ञान वैठ चारितरथ, देहु मोष मग सन्मुख वब ॥ ३॥ सरैया--२३ । धीरज तात क्षमा जननी, परमारथ मीत महारुचि मासी। ज्ञान सुपुत्र सुता करुणा, मति पुत्रवधू समता अतिभासी ॥ उद्यम दास विवेक सहोदर, बुद्धि कलत्र शुभोदय दासी। भाव कुटुम्ब सदा जिनके लिंग, यो मुनि को कहिये गृहवासी ।। ७ ।। (३३) पं. पनारसीदासजी नाटक समयसार में कहते हैं:- सनैया ३१ । जैसे रवि मडल के उदै महि मडल में, आतम अटल तम पटल विलातु है । तैसे परमातम को अनुभौ रहत जोलों, तोलो कहूँ दुविधान कहूँ पक्षपात है ।।
१] सहज-सुख-साधन। नय को न लेस परमाण को न परवेस, निक्षेप के वस को विध्वंस होत जातु है । जेजे वस्तु साधक है तेऊ तहा बाधक है, बाकी राग द्वेष की दशा की कोन बातु है ॥ १० ॥ कवित्त । सतगुरु कहे भव्य जीवन सो, तोरहु तुरत मोह की जेल । समकित रूप गहो अपनो गुण, करहु शुद्ध अनुभव को खेल ।। पुद्गल पिंड भाव रागादि, इनसो नहीं तिहारो मेल । ये जड़ प्रगट गुपत तुम चेतन, जैसे भिन्न तोय अरु तेल ।। १२ ।। सपैया २३ । शुद्ध नयातम आतम की, अनुभूति विज्ञान विभूति है सोई, वस्तु विचारत एक पदारथ, नाम के भेद कहावत दोई ।। यों सरवंग सदा लखि आपुहि, भातम ध्यान करे जब कोई । मेटि अशुद्ध विभाव दशा तब, सिद्ध स्वरूप को प्रापति होई ॥ १४ ॥ . सनैया ३१ । घनारसी कहै भैया भव्य सुनो मेरी सीख, केहू भांति कैसे हूँ के ऐसो काज कीजिये। एकहू मुहूरत मिथ्यात्व को विध्वस होई, ज्ञान को जगाय अंस हस खोज लीजिये । वाही को विचार वाको ध्यान यह कौतूहल, यों ही भर जन्म परम रस पीजिये । तजिये भववासको विलास सविकार रूप, अन्त का मोह को अनन्त काल जीजिये ।। २४ ।। भैया जगवासी तू उदासी व्है के जगत सों, एक छह महीना उपदेश मेरो मानरे । और सकलप विकलप के विकार तजि, बैठि के एकत मन एक ठौर आन रे ।। तेरो घट सरिता में तू ही व्है कमल बाकों, तू ही मधुकर व्है सुत्रास पहिचान रे । प्रापति न है हे कछू ऐसौ तू विचारत है, सही व्है है प्रापति सरूप योंही जान रे ॥३॥ भेदज्ञान प्रारम्सों दुफारा करे ज्ञानी जीव, आतम करम धारा भिन्न भिन्न चरचे । अनुभौ अभ्यास लहे परम धरम गहे, करम मरम को खजानो खोलि खरचे ॥ योंही मोक्ष मग धावे केवल निकट आवे, पूरण समाधि लहे परम को परचे । भयो निरदोर याहि करनो न कछु और, ऐसो विश्वनाथ ताहि बनारसि अरचे ॥२॥ जामें लोक वेद नांहि थापमा अछेदु नाहि, पाप पुन्य खेद नांहि क्रिया नांहि करनी। जामे राग द्वेष नाहि जामें बध मोक्ष नांहि, जामें प्रभुदास न आकाश नाहि धरनी ।। जामे कुल रीति नाहि, जामे हार जीत नाहि, जामें गुरु शिष्य नांहि विपयनाहि भरनी। आश्रम वरण नाहि काहुका सरण नाहि, ऐसी शुद्ध सत्ता की समाधि भूमि वरनी ॥ २४ ॥ सवैया २३ । जो कबहूँ यह जीव पदारथ, औसर पाय मिथ्यात्व मिटावे । सम्यक् धार प्रवाह बहे गुण, ज्ञान उदै सुख अरध धावे ।।
सहज-सुख-साधन। १८९ तो अभिअन्तर दर्वित भावित, कर्म कलेश प्रवेश न पावे । आतम साधि अध्यातम के पथ, पूरण है परब्रह्म कहावे ॥ ४ ॥ भेदि मिथ्यात्वसु वेदि महारस, भेद विज्ञानकला जिनि पाई। जो अपनी महिमा अवधारत, त्याग करे उरसों जु पराई ।। उद्धत रीत बसे जिनके घट, होत निरन्तर ज्योति सवाई। ते मतिमान सुवर्ण समान, लगे तिनको न शुभाशुभ काई ।।५।। सया ३२॥ जिन्हके सुदृष्टि में अनिष्ट इष्ट दोउ सम, जिन्ह को आचार सुविचार शुभ ध्यान है । स्वारथ को त्यागि जे लगे है परमारथ को, जिन्ह के बनिज में नफा है न ज्यान है ।। जिन्ह के समझ में शरीर ऐसो मानीयत, धानकीमो छीलक कृपाणकोसो म्यान है। पारखी पदारथ के साखी भ्रम भारथ के, तेई साधु तिनहीका यथारथ ज्ञान है ॥ ४५ ॥ सनैया २३। काज विना न करै जिय उद्यम, लाज बिना रणमाहि न जूझे । डील विना न सधे परमारथ, सील विना सतसों न अरूझे ।। नेम बिना न लहे निहचे पद. प्रेम विना रस रीति न बूझे । ध्यान विना न थमै मनकी गति, ज्ञान विना शिवपथ न सूझे ॥२३ ।। ज्ञान उदै जिह के घट अन्तर, ज्योति जगी मति होत न मैली। वाहिज दृष्टि मिटी जिन्ह के हिय, आतम ध्यानकला विधि फैली ।। जे जड़ चेतन भिन्न लखे, सुविवेक लिये परखै गुण थैली । ते जगम परमारय जानि, गहे रुचि मानि अध्यातम सैली ।। २४ ।। सनैया ३१ । श्राचारज कहे जिन वचन को विस्तार, अगम अपार है कहेंगे हम कितनो। बहुत बोलवेसों न मकसूद चुप्प भलो, बोलियेसों वचन प्रयोजन है जितनो । नानारूप जल्पनसों नाना विकलप उठे, ताते जेतो कारिज कथन भलो तितनो। शुद्ध परमातमाको अनुभौ अभ्यास कीजे, येही मोक्ष पथ परमारथ है इतनो ।।१२४|| जे जीव घरवरूप तथा परयायरूप, दोऊ नै प्रमाण वस्तु शुद्धता गहत है । जे अशुद्ध भावनिके त्यागी भये सरवथा, विपैसों विमुख है विरागता चहत है ।। जे जे ग्राह्य भाव त्याज्यभाव ढोउ भावनिकों, अनुभौ अभ्यास विर्षे एकता करत है । तेई ज्ञान क्रिया के आराधक सहज मोक्ष, मारगके साधक अवाधक महत है ॥३५॥ (३४) पं० द्यानतरायजी द्यानतविलास में कहते हैं:- सया- २३ । कर्म सुभासुभ जो उदयागत, आवत हैं जब जानत जाता। पूरव भ्रामक भाव किये बहु, सो फल मोहि भयौ दुखदाता ।। , १६०] सहज-सुग्व-साधन । सो जड़रूप स्वरूप नहीं मम, मैं निज सुद्ध सुभावहि राता। नास करौं पलमे सबको अब, जाय बसौं सिवखेत विख्याता ॥६५|| सिद्ध हुए अब होई जु होइगे, ते सब ही अनुभौ गुनसेती। ताविन एक न जीव लहै सिव, घोर करौ किरिया बहु केती ।। ज्यों तुपमाहिं नहीं कनलाभ, किये नित उद्यम की विधि जेती। यो लखि प्रादरिये निजभाव, विभाव विनास कला सुभ एती ॥६६॥ सौया-३१ । जगतके निवासी जगही मे ति मानत है, मोख के निवासी मोखही में ठहराये हैं। जग के निवासी काल पाय मोख पावत है, मोखके निवासी कभी जगमे न आये हैं। एतौ जगवासी दुखवासी सुखरासी नाहि, वे तो सुखरासी जिनवानी मे बताये है। ताते जगतवासतें उदास होइ चिदानंद, रत्नत्रयपथ चलें तेई सुखी गाये हैं ।।७३।। याही जगमाहिं चिदानद आप डोलत है, भरम भाव धरै हरै प्रातमसकतकौं । अष्टकर्मरूप जे जे पुगल के परिनाम, तिनकौं सरूप मानि मानत सुमत कौं । जाहीस मिथ्या मोह अधकार नामि गयौ, भयौ परगास भान चेतन के ततकौ । ताहीसमै जानौ श्राप श्राप पर पररूप, भानि भव-भांवरि निवास मोख गतको ।।७४॥ रागढोप मोहभाव जीवको सुभावनाहि, जीवको सुभाव सुद्ध चेतन वखानियै। दर्व कर्मरूप ते तौ भिन्न ही विराजत है, तिनको मिलाप कहो कैसे करि मानिये ।। ऐसो भेद ज्ञान जाके हिरर्दै प्रगट भयो, अमाल अबाधित अखण्ड परमानिये । सोई सु विचच्छन मुकत भयौ तिहुँ काल, जानी निज चाल पर चाल भूलि भानिये ।।७।। अशोक छन्द । रागभाव टारिके सु दोपौं विडारिकै, सु मोहभाव गारिकै निहारि चेतनामई । कर्म को प्रहारिकै सु भर्मभाव डारिकै, सुचर्म दृष्टि दारिक विचार सुद्धता लई ॥ ज्ञानभाव धारिकै सु दृष्टि कौं पसारिकै, लखौ सरूप तारिक, अपार मुद्धता खई। मत्तभाव मारिकै सु मारभाव छारिकै, सु मोखको निहारिकै विहारकौं विदा दई ।।७९।। सुद्ध आत्मा निहारि राग दोप मोह टारि, क्रोध मान वंक गारि लोभ भाव भानुरे । पापपुण्यकौ विडारि सुद्धभावको सॅभारि, भर्मभावको विसारि पर्मभाव आनुरे ।। चर्मदृष्टि ताहि जारि सुद्धदृष्टिकौं पसारि, देहनेहकौं निवारि सेतध्यान ठानुरे । जागि जागि सैन छार भव्य मोखको विहार, एक बार के कहे हजार बार जानुरे ॥८२॥ छप्पै । जपत सुद्धपद एक, एक नहि लखत जीव तन । तनक परिग्रह नाहिं, नाहिं जहँ राग दोष मन ।। मन वच तन थिर भयौ, भयौ वैराग अखडित । खंडित प्रास्रवद्वार, द्वारसवर प्रभु मडित ।।
सहज-सुख-साधन। [१९१ मडित समाधिसुख सहित जब, जब कपाय अरिगन खपत । खप तनममत्त निरमत्त नित, नित तिनके गुण भवि जपत ॥११॥ सवैया २३ । जिनके घटमें प्रगटयौ परमारथ, रागविरोध हिये न विथाएँ । करकै अनुभौ निज आतम को, विपया सुखसौं हित मूल निवाएँ। हरिकै ममता धरिक समता, अपनौवल फोरि जु कर्म विडारे । जिनकी यह है करतूति सुनान, सुआप ति पर जीवन तारै ।।१२।। सवैया ३१ । मिथ्याभाव मिथ्या लखौ ग्यानभाव ग्यान लखो, कामभोग भावनसौं काम जोरजारिकै। परकौ मिलाप तजौ आपनपो आप भजी, पापपुन्य भेद छेद एकता विचारिकै । श्रातम अकाज करै श्रातम सुकाज करे, पावै भवपार मोक्ष एतौ भेद धारिक । यातै हूँ कहत हेर चेतन चेतो सवेर, मेरे मीत हो निचीत एतौ काम सारिकै ॥९४।। छप्पै । मिथ्याइष्टि जीव, आपकौं रागी माने। मिथ्यादृष्टी जीव, आपकौं दोपी जाने ।। मिथ्यादृष्टी जीव, आपको रोगी देते। मिथ्यादृष्ठी जीव, श्रापकौं भोगी पेखै ।। जो मिथ्यादृष्टी जीव सो, सुद्धातम नाही लहै । सोई ज्ञाता जो आपकौं, जैसाका तैसा गहै ॥१०६।। , सवैया ३१ । चेतनके भाव दोय ग्यान औ अग्यान जोय, एक निजभाव दूजों परउतपान है। तातै एक भाव गहौ दूजो भाव मूल दहौ, जातें सिवपद लहौ यही ठीक वात है ।। भावको दुखायो जीव भावहीसौं सुखी होय, भावहीकौं फेरि फेरै मोखपुर जात है। यह तौ नीको प्रसग लोक कहैं सरवग, आगहीको दाधौ अग आग ही सिरात है ।।१०७।। बार बार कहैं पुनरुक्त दोप लागत है, जागत न जीव तूतौ सोयौ मोह झगमैं । आतमासेती विमुख गहै राग दोषरूप, पचइन्द्रीविषैसुखलीन पगपगमैं ।। पावत अनेक कष्ट होत नाहिं अष्ट नष्ट, महापद भिष्ट भयो भमै सिष्टमगमैं। जागि जगवासी तू उदासी ह के विषयसौं, लागि सुद्ध अनुभौ ज्यौं आवै नाहिं जगमैं ॥११७॥ (३५) पं० भैया भगवतीदासजी ब्रह्मविलास में कहते हैं:- सवैया ३१ । कर्म को करैया सो तौ जानै नाहि कैसे कर्म, भरम में अनादिही को करमैं करतु है। कर्म को जनैया भैया सो तौ कर्म करै नाहि, धर्ममाहि तिहूँ काल धरमें परतु है ।।
१९२]
सहज-सुख-साधन।
दुहूँनकी जाति पांति लच्छन स्वभाव भिन्न, कवहूँ न एकमेक होइ विचरतु है ।
जा दिनाते ऐसी दृपि अन्तर दिखाई दई, ता दिनाते आपु लखि श्रापु ही तरतु है ।।२२।।
सवैया २३ ।
जव अपनो जिउ पापु लख्यो, तवतें जु मिटी दुविधा मनकी ।
यो सीतल चित्त भयो तय ही सव, छाड दई ममता तनकी ।।
चिंतामणि जब प्रगढ्यो घरमे, तव कौन जु चाहि करै धनकी ।
जो सिद्धमें आपुमे फेर न जाने सो, क्यों परवाह करै जनकी ।।३।।
केवल रुप महा अति सुन्दर, आपु चिदानन्द शुद्ध विराजै ।
अन्तरदृष्टि खुलै जब ही तब, पापुही में अपनो पद छाजै ।।
सेवक साहिब कोउ नहीं जग, काहे को बंद करै किहूँ काजै ।
अन्य सहाय न कोउ तिहारै जु, अत चल्यो अपनो पद साजै ॥३६॥
जबलों रागद्वेप नहिं जीतय, तवलों मुकति न पावै कोइ ।
जयलों प्रोध मान मन धारत, तवलों सुगति कहांते होइ ।।
जबलों माया लोभ बसे उर, तबलो सुख सुपनै नहिं कोइ ।
ए अरि जीत भयो जो निर्मल, शिवसपति विलसतु है सोइ ॥४॥
सवैया ३१ ।
पचनसों भिन्न रहै कंचन ज्यों काई तजै, रच न मलीन होय जाकी गति न्यारी है।
कचन के कुल ज्यों स्वभाव कीच छुए नाहि, बसै जलमांहि पै न ऊर्धता विसारी है ।।
अजन के अंश जाके वंशमें न कहूँ दीखे, शुद्धता स्वभाव सिद्धरुप सुखकारी है।
ज्ञानको समूह ज्ञान ध्यान में विराजि रह्यो, ज्ञानदृष्टि देखो भैया' ऐसो ब्रह्मचारी है ।।५५||
चिदानद 'भैया' विराजत है घटमाहि, ताके रूप लखिवेको उपाय कछू करिये ।
अष्ट कर्म जालकी प्रकृति एक चार आठ, तामे कछू तेरी नाहि अपनी न धरिये ।।
पूरव के बध तेरे तेई आइ उदै होहि, निज गुणशकतिसो तिन्है त्याग तरिये ।
सिद्धसम चेतन स्वभावमें विराजत है, वाको ध्यान धरु और काहूसों न डरिये ॥५६॥
एक शीख मेरी मानि आप ही तू पहिचानि, ज्ञान हग चर्ण आन वास बाके थरको।
अनंत बलधारी है जु हलको न भारी है, महाब्रह्मचारी है जु साथी नाहिं जरको ।।
आप महा तेजवत गुणको न ओर अंत, जाकी महिमा अनत दूजो नाहिं वरको ।
चेतना के रस भरे चेतन प्रदेश धरे, चेतना के चिन्ह करे सिद्ध पटतरको ॥५५॥
रेखता
अबै भरमके त्योरसों देख क्या भूलता, देखि तु आपमें जिन आपने.बताया है ।
अन्तरकी दृष्टि खोलि चिदानंद पाइयेगा, बाहिरको दृष्टिसों पौद्गलीक छाया है।
गनीमनके भाव सब जुदे करि देखि तू, आगे जिन ढूढा तिन इसी भांति पाया है।
वे ऐब साहिब विराजता है दिलबीच, सच्चा जिसका दिल है तिसी के दिल पाया है ॥६०॥
सहज-सुख-साधन। [१९३ सवैया-३१ । देव एक देहरे में सुन्दर सुरुप बन्यो, ज्ञानको विलास जाको सिद्ध सम देखिये। सिद्धकीसी रीति लिये काहसो न प्रीत किये, पूरब के बंध तेई आइ उदै पेखिये ॥ वर्ण गध रस फास जामे कछु नाहि भैया, सदा को अवन्ध याहि ऐसो करि लेखिये । अजरा अमर ऐसो चिदानद जीव नाव, अहो मन मूढ ताहि मणं क्यों विशेखिये ।।६९।। निशदिन ध्यान करो निहचे सुज्ञान करो, कर्म को निदान करो श्रावै नाहि फेरिकै । मिथ्यामति नाश करो सम्यक उजाम करो, धर्म को प्रकाश करो शुद्ध दृष्टि हेरिकै ॥ ब्रह्म को विलास करो, आतमनिवास करो, देव सव दास करो महामोह जेरिके। अनुभी अभ्यास करो थिरता में वास करो, मोक्षसुख रास करो कहूँ तोहि टेरिक ।।९४॥ सातवां अध्याय । । सम्यादर्शन और उसका महात्म्य । यह बात कही जा चुकी है कि यह संसार असार है, देह अपवित्र और क्षणिक है । इन्द्रियों के भोग अतृप्तिकारक तथा नाशवत हैं । सहज सुख प्रात्मा का स्वभाव है, तथा इस सहज सुख का साधन एक आत्म- ध्यान है । इसको रत्नत्रय धर्म भी कहते है । इसमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकूचारित्र की एकता है । श्रात्मा के शुद्व स्वभाव का यथार्थ श्रद्धान निश्चय सम्यग्दर्शन है। इसीका विशेष वर्णन उपयोगी जानकर किया जाता है, क्योंकि आत्मज्ञान का मुख्य हेतु सम्यग्दर्शन ही है । सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान कुज्ञान है, चारित्र कुचारित्र है, सम्यग्दर्शन के बिना सर्व साधन मिथ्या है। जैसे वृक्ष मूल बिना नहीं होता, नींव बिना मकान नहीं बनता, एक के अक विना शून्यों का कोई मूल्य नहीं होता वैसे सम्यक्त के बिना किसी भी धर्म- क्रिया को यथार्थ नहीं कहा जा सकता है । सम्यग्दर्शन वास्तव में प्रात्मा का एक गुण है, यह आत्मा सदा काल ही रहता है । ससारी आत्मा के साथ कर्मों का सयोग भी प्रवाह की अपेक्षा अनादि काल से है। इन्हीं कमी में एक मोहनीय कर्म है । उसके दो भेद हैं-दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय । दर्शन मोहनीय के तीन भेद हैं-मिथ्यात्र कर्म, सम्य- मिथ्यात्व कर्म और सम्यक्त मोहनीय कमें । जिस कर्म के उदय से,सम्यग्दर्शन गुण का विपरीत परिणमन हो, मिथ्यादर्शन रूप हो, जिससे आत्मा व अनात्मा का भेद विज्ञान न उत्पन्न हो सके सो मिथ्यास्त्र कर्म है। जिसके उदय से सम्यग्दर्शन और मिथ्यादर्शन के मिले हुए मिश्रित परिणाम हों उस कर्म को सम्य- मिथ्यात्व या मिश्र कर्म कहते हैं । जिस कर्म के उदय से सम्यग्दर्शन मलीन रहे, कुछ दोष या मल या अतीचार,लगे उसको सम्यक्त मोहनीय कहते हैं । -- १९४] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । ? है - चारित्र मोहनीय कर्म मे चार अनन्तानुवन्धी कापाय कर्म हैं जिनके उदय से दीर्घ काल स्थायी कठिनता से मिटनेवाली कपाय होती है । जैसे पत्थर की लकीरे कठिनता से मिटती है। अनादि मिथ्यादृष्टि जीव को जिसको अब तक सम्यक्त नहीं हुआ है, मिथ्यात्व कर्म और चार अनन्तानुबन्धी कपायों ने सम्यग्दर्शन गुण को ढक रखा है । जब तक यह उदय से न हटे तब तक सम्यग्दर्शन गुण प्रगट नहीं हो सकता है। इन कमी के आक्रमण को हटाने के लिये व्यवहार सम्यग्दर्शन का सेवन जरूरी है। जैसे औषधि खाने से रोग जाता है वैसे व्यवहार सम्यग्दर्शन के सेवन से निश्चय सम्यग्दर्शन का प्रकाश होता है व मिथ्यात्र रोग जाता है। जैसे रोगी को इस बात के जानने की जरूरत है कि मै मूल मे कैसा हूँ, रोग किस कारण से हुआ है व रोग के दूर करने का क्या उपाय है । इसी तरह इस समारी जीव को इस बात के जानने की जरूरत कि वह मूल मे कैसा है, क्यो यह अशुद्ध हो रहा है व इसके शुद्ध होने का क्या उपाय है । जैसे नौका मे पानी आरहा हो तब इस बात के जानने की जरूरत है कि क्यों नौका में पानी भर रहा है व किस तरह इस नौका को छिद्र रहित व पानी से रहित किया जावे, जिससे यह समुद्र को पार कर सके, इसी तरह इस ससारी जीव को इस बात के जानने की जरूरत है कि उसके पुण्य पाप कर्म का वंध कैसे होता है। नये वध को रोकने का व पुरातन वन्ध के काटने का क्या उपाय है, जिससे यह कर्म रहित हो जावे । जैसे मैला कपडा उस समय तक शुद्ध नहीं किया जा सकता जिस समय तक यह ज्ञान न हो कि यह कपडा किस कारण से मैला है व इस मैल के धोने के लिये किस मसाले की जरुरत है। उसी तरह यह अशुद्ध आत्मा उस समय तक शुद्ध नहीं हो सकता जब तक इसको अशुद्ध होने के कारण का व शुद्ध होने के उपाय का ज्ञान न हो । इसी प्रयोजन भूत बात को या तत्व को समझाने के लिये जैनाचार्यों ने सात तत्व बताये हैं व इनके श्रद्धान को व्यवहार सम्यग्दर्शन कहा है। वे सात तत्व इस प्रकार है :- (१) जीव तत्व-चेतना लक्षण जीव है, ससारावस्था मे अशुद्ध है। (२) अजीव तत्व-जीव को विकार का कारण पुद्गल, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, अाकाश और काल ये पाच चेतना रहित अजीव द्रव्य इस जगत में हैं। (३) आश्रय तत्व-कर्मों के आने के कारण को व कमी के आने को आश्रय कहते हैं । (४) बंध तत्व-कर्मों के प्रात्मा साथ बन्धने के कारण को व कमी के बध को बध कहते हैं । (५) संचर तत्व-कमी के आने के रोकने के कारण को व कमी के रुक जाने को संवर कहते हैं। (६) निर्जरा तत्व-कमों के झड़ने के कारण को व कर्मों के झड़ने को निर्जरा कहते हैं। (७) मोक्ष तत्व-सर्व कमी से छूट जाने के कारण को व कमाँ से पृथक् हो जाने को मोक्ष कहते हैं। यह विश्व जीव और अजीव का अर्थात छः द्रव्यों का जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल इनका समुदाय है । पुद्गलों के सूक्ष्म जाति की पुद्गल कर्म वर्गणा हैं या कर्मस्कध है। उन्हीं के सयोग से आत्मा अशुद्ध होता है । आश्रय व बध तत्व अशुद्धता के कारण को बताते हैं । सवर अशुद्धता के रोकने का व निर्जरा अशुद्धता के दूर होने का उपाय बताते हैं, मोक्ष बन्ध रहित व शुद्ध अवस्था बताता है। ये सात तत्व बड़े उपयोगी, इनको ठीक ठीक जाने बिना आत्मा के कर्म की बीमारी मिट नहीं सकती है । इन्हीं -- सहज-सुख-साधन । . का सच्चा श्रद्धान व्यवहार सम्यग्दर्शन है, इन्हीं के मनन से निश्चय सम्यग्दर्शन होता है। इसलिये ये निश्चय सम्यक्त के होने में बाहरी निमित्त कारण है । अतरग निमित्त कारण अनन्तानुबधी चार कषाय और मिथ्यात्व कर्म का उपशम होना या दवना है । जीव और अजीव तत्व । जीव और अजीव तत्वों में गर्भित छ द्रव्य सत्रूप हैं, सदा से है व सदा से रहेगे, इनको किसी ने न बनाया है, न इनका कभी नाश होगा। सो यह बात प्रत्यक्ष प्रगट है । हमारी इद्रियों के द्वारा प्रगट जानने योग्य पुद्गल द्रव्य है। इसकी परीक्षा की जायगी तो सिद्ध होगा कि यह सत् है, अविनाशी है, कभी नाश नहीं हो सकता है । एक कागज को लिया जाय, यह पुद्गल स्कध है । इसको जला दिया जाय राख हो जायगा, राख को कहीं डाल दिया जाय दूसरी राख में मिल जायगी । इस राख को कोई शून्य नहीं कर सकता हैं। एक सुवर्ण की अगूठी को लिया जाय, इसको तोड़कर बाली बनाई जाय, वाली तोडकर कठी वनाई जाय, कठी तोडकर नथ बनाई जावे, नथ तोडकर कडा बनाया जावे । कितनी भी दशा पलटाई जावें तो भी सुवण पुद्गल का कभी नाश नहीं होगा । मिट्टी का एक घडा है, घडे को तोडा जावें बडे ठीकरे बन जायगे, ठीकरों तोडेगे छोटे टुकड़े हो जायगे उनको पीस डालेंगे राख हो जायगी। राख को डाल देगे राख मे मिल जायगी। मिट्टी की कितनी भी अवस्थाए पलटे मिट्टी पुद्गल स्कध का नाश नहीं होगा । जगत में पुद्गलों को एकत्र कर मकान बनाते हैं । जब मकान को तोड़ते हैं तब पुद्गल ईंट, चूना, लकड़ी, लोहा अलग होता है । यह देखने मे आयगा व प्रत्यक्ष अनुभव में आयगा कि जगत में जितने भी दृश्य पदार्थ हैं वे पुद्गलों के मेल से बने है । जब वे बिगडते हैं तब पुद्गल के स्कध बिखर जाते है । एक परमाणु का भी लोप नहीं हो जाता है । मकान, बर्तन, कपडा कुरसी, मेज, कलम, दवात, काग) पुस्तक, चौकी, पलग, पालकी गाडी, मोटर, रेलगाडी, पखा, दरी, लालटेन, जजीर, आभूपण आदि पुद्गल की रचना है, ये टूटते हैं तो अन्य दशा में हो जाते है । हमारा यह शरीर भी पुद्गल है, पुद्गल के स्कधों के मेल से बना है । जब मृतक हो जाता है तब पुद्गल के स्कध शिथिल पड जाते हैं, विखर जाते हैं जलाए जाने पर कुछ पवन में उड़ जाते हैं । कुछ पड़े रह जाते हैं । पुद्गलों मे यह देखने आता है कि वे अवस्थाओं को पलटते हुए भी मूल में बने रहते हैं । इसी- लिये सतका लक्षण यह है कि जिसमें उत्पादं व्यय ध्रौव्य ये तीन स्वभाव एक ही समय में पाए जावे । हरएक पदार्थ की अवस्था समय २ पलटती हैं । स्थूल बुद्धि में देर से पलटी मालूम होती है । एक नया मकान बनाया गया है वह उसी क्षण से पुराना पडता जाता है । जब वर्ष दो वर्ष बीत जाते हैं तब स्थूल बुद्धि को पुराना मालूम पड़ता है । वास्तव में उसका पलटना हर समय ही हो रहा है । एक मिठाई ताजी बनी है, एक दिन पीछे बासी खाए जानेपर स्वाद ताजी की अपेक्षा बदला हुआ मालूम होता है। यह एक दम नहीं बदला, बनने के समय से ही बदलता हुआ चला रहा है । एक बालक जन्मते समय छोटा होता । चार वर्ष पीछे बड़ा हो जाता है वह एक दम से बड़ा नहीं हुआ । उसकी दशा का पलटना बराबर होता रहा है वह वालक हर समय बढ़ता चला आरहा है पुरानी अवस्था का नाश होकर नई अवस्था के जन्म को ही पलटना या परिवर्तन कहते हैं । श्वेत कपड़े को जिस समय रंग में भिजोया उसी समय श्वेतपना पलटकर रगीनपना हुआ है । श्वेतपने का व्यय व रगीनपने का उत्पाद हुआ है । चने के दाने को हथेली मे मसला जाता है तब चने की दशा नाश होकर चूरे की दशा बन जाती है । क्योंकि अवस्था की पलटन होते हुए भी जिमकी अवस्था पलटती है वह बना रहता है । इसीलिये उत्पाद व्यय ध्रौव्य सत का लक्षण किया गया है । पर्याय पलटने की अपेक्षा उत्पाद व्ययपना व मूल द्रव्य के बने रहने की अपेक्षा ध्र वपना सिद्ध है।
१६६] सम्यग्दर्शन प्रोर उमका महात्म्य । इसीलिये द्रव्य को नित्य अनित्य रूप उभयप कहते हैं। द्रव्य स्वभाव से नित्य है, दशा पलटने की अपेक्षा अनित्य है । यदि द्रव्य में उत्पाद व्यय धीयपना न हो या नित्य अनित्याना न हो तो कोई द्रव्य कुछ भी काम नहीं दे सकता । यदि कोई दव्य मर्वथा नित्य ही हो तो वा जमा का नेमा बना रहेगा। यदि मर्वथा अनित्य हो तो क्षण भर में नाश हो जायगा । जय वाठारेहीगा नहीं तय उसमें कुछ काम नहीं निक्नेगा। यदि सुवर्ण एकमा ही बना रहे, उसमे कटे, बाली कठी, पगठी न घने को यह व्यर्थ ही ठहरे उमे कोई भी न ग्वरीदे । यदि सुवर्ण प्रनित्य हो, ठहरे ही नहीं तो भी उसे कोई नहीं खरीदे । उममें बने रहने की तथा बदलने की शक्ति एकही माय प्रथया वह सही मगय नित्य व 'अनिन्य उभयम्प, तत्र ही वह कार्यकारी हो सकता है। में यह उत्पादव्यय ध्रौव्यपना मनका लक्षण सही द्रव्यों में पाया जाता है। जीवों में भी है। कोई बोधी होरहा है, जबोध का नाश होता नप क्षमा या मान्तभार का जन्म होता है तथा श्रात्मा धाव्यम्प है ही। किमी प्रात्मा को गणित में जोर निकालने का शान नहीं था। अर्थात जोर कायदे का प्रजान था, जब जोड निकालने के कायदे का ज्ञान प्रा तब 'प्रगान.का नारा या पीर सान या जन्म हुआ, इम अवस्था को पलटते हुए भी प्रात्मा वही बना रहा । इस तरह उत्पादव्यय धोव्य आत्मा में भी सिद्ध है। एक प्रात्मा ध्यान में मग्न है, जिम क्षण ध्यान हटा तय ग्यान की दशा का नाश हा 'नौर ध्यान रहित विकल्प दशा का जन्म हुया पोर जीव वही बना है। 'प्रगुन्द्र जीवों में नया पुटलों में प्यवस्थाओं का पलटना अनुभव भाताह इससे उत्पाद व्यय नोव्य लक्षण की गिद्रि होती है परन्तु शुद्द जीवो मै ब धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश व कालमें किस तरह एम लजण की सिद्धि की जाये । वस्तु का स्वभाव जब अशुद्ध जीव व पुद्गल में सिद्ध हो गया है तय वही स्वभाव उनमें भी जानना चाहिये । शुद्ध द्रव्यों में किमी परद्रव्य का ऐसा निमित्त नहीं है जो द्रव्य को मलीन कर सके । इमलिये उनमें विभार या प्रशुद्ध पर्याय नहीं होती हैं । शुद्ध सहश पर्याए स्वभाविक होती हैं, जैसे - निर्मल जलम तरंगें निर्मल ही होगी वसे शुद्व द्रव्यों में पर्याय निर्मल ही होंगी। द्रव्यों के छः सामान्य गुण-सर्व छहो दृव्यो मे छःगुण मामान्य है। सवमें पाए जाते हैं- (१) अस्तित्व गुण-जिम शक्ति के निमित्त से द्रव्य का कभी नाश न हो उसे 'अस्तित्वगुण कहते हैं । (२) वस्तुत्व गुण-जिस शक्ति के निमित्त से वन्तु कुछ कार्य करे व्यर्थ न हो उसे वस्तुत्व गुण कहते हैं । जैसे पुद्गल में शरीरादि बनाने की अर्थ क्रिया है । (३) द्रव्यत्व गुण-जिस शक्ति के निमित्त से द्रव्य ध्रुव रहते हुए भी पलटता रहे। उसमें पर्याये होती रहें, उसे द्रव्यत्वगुण कहते हैं, जैसे पुद्गल मिट्टी से घडा बनना। (४) प्रमेयत्व गुण-जिस शक्ति के निमित्त से द्रव्य किसी के ज्ञान का विषय हो उसे प्रमेयत्व गुण कहते हैं। (५) अगुरुलघुत्व गुण-जिस शक्ति के निमित्त से एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप न हो, एक गुण दूसरे गुण- रूप न हो व एक द्रव्य मे जितने गुण हो उतने ही रहें, न कोई कम हो न कोई अधिक हो, उसे अगुरुलघुत्व गुण कहते हैं । (६) प्रदेशत्व गुण-जिस शक्ति के निमित्त से द्रव्य का कुछ न कुछ आकार अवश्य हो उसे प्रदेशत्व गुण कहते हैं। प्राकार विना कोई वस्तु नहीं हो सकती है। आकाश में जो वस्तु रहती है । - । सहज-सुख-साधन। [१९७ यह जितना क्षेत्र घेरती है वही उसका आकार है । छहों द्रव्यों में अपना अपना आकार है, पुद्गल मूर्तीक है, उसका आकार भी मूर्तीक है । स्पर्श, रस, गध वर्णमय है । शेप पांच द्रव्य अमूर्तीक हैं उनका आकार भी अमूर्तीक है। छ। द्रव्यों के विशेष गुण-जो गुण उस एक द्रव्यही मे पाए जावें, अन्य द्रव्य मे न पाए जावें उनको विशेष गुण कहते हैं। जीव के विशेष गुण हैं-- ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य, सम्यकचारित्र आदि । पुद्गल के विशेष गुण हैं-स्पर्श, रस, गध, वर्ण । धर्मद्रव्य का विशेष गुण- गमन करते हुए जीव पुगलों को उदासीन रूप से गमन में सहकारी होना है । अधर्मद्रव्य का विशेष गुण-ठहरते हुए जीव पुद्गलों को ठहरने में उदासीनपने सहाय करना है । आकाश द्रव्य का विशेष गुण-सर्व द्रव्यों को आकाश या जगह देना है । कालद्रव्य का विशेष गुण--सर्व द्रव्यों की अवस्था पलटने मे सहायकारी होना है। छः द्रव्यों के आकार-जीव का मूल आकार लोकाकाश प्रमाण असख्यातप्रदेशी है । आकाश एक अखड द्रव्य अनंत है । उसके मध्य मे जहां जीवादि द्रव्य पाए जाते हैं उस भाग को लोकाकाश कहते है। इसको यदि प्रदेशरूपी गज से मापा जावे तो यह लोक असंख्यातप्रदेशी है । इतना ही बड़ा मल में जीव है। एक अविभागी पुद्गल परमाणु जितने आकाश को रोकता है उतने क्षेत्र को प्रदेश कहते हैं। तथापि यह जीव जिस शरीर मे रहता है उतने बड़े शरीर को माप कर रहता है । नाम कर्म के उदय से इसमें सकोच विस्तार शक्ति काम करती है, जिससे शरीर प्रमाण संकुचित व विस्तृत होजाता है । पुद्गल स्कध अनेक आकार के गोल, चौखटे, तिखू टे, बड़े छोटे बनते हैं । एक परमाणु का एक प्रदेश मात्र आकार है । धर्म व अधर्म द्रव्य दोनों लोकाकाश प्रमाण व्यापक है। आकाश का अनन्त श्राकार है । कालाणु असख्यात लोकाकाश के प्रदेशों में एक एक अलग अलग हैं- कभी मिलते नहीं हैं, इसलिये एक प्रदेश मात्र हरएक कालाणु का आकार है। छः द्रव्यों की संख्या-धर्म, अधर्म, आकाश एक एक द्रव्य हैं, कालाणु असख्यात हैं, जीव अनत हैं, पुद्गल अनंत हैं। पांच अस्तिकाय-जो द्रव्य एकसे अधिक प्रदेश रखते हैं वे अस्तिकाय कहलाते है । कालका एक ही प्रदेश होता है। काल को छोडकर शेप पांच द्रव्य जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश अस्तिकाय हैं। जीव द्रव्य के नौ विशेषण-(१) जीनेवाला है, (२) उपयोगवान है, (३) अमूर्तीक है, (४) कर्ता है, (५) भोक्ता है, (६) शरीर प्रमाण प्राकारधारी है, (७) ससारी है, (८) सिद्ध भी हो जाता है, (९) स्वभाव से अग्नि की शिखा के ममान ऊपर जानेवाला है। इनका विशेष नीचे प्रकार है- इनका कथन करते हुए निश्चयनय तथा व्यवहारनय को ध्यान में रखना चाहिये । जिस अपेक्षा से वस्तु का मूल निज स्वभाव जाना जावे यह निश्चयनय है । शुद्ध निश्चयनय शुद्ध स्वभाव को व अशुद्ध निश्चयनय अशुद्ध स्वभाव को बतानेवाला है। व्यवहारनय वह है जो परपदार्थ को किसी में आरोपण कर के उसको पररूप कहे, जैसे जीव को गोरा कहना । गोरा तो शरीर है। यहा शरीर का आरोप जीव में , १९८] सम्यग्दर्शन पौर उनका महात्म्य । करके संयोग को बतानेवाला व्यवहारनय है । कभी व कही अशुद्ध निश्चयनय को भी व्यवहारनय कह देते हैं । शुद्ध निश्चयनय शुद्ध मूल स्वभाव को ही बताता है । (१) जीवत्व-निश्चयनय से जीव के अमिट प्राण, सुख, सत्ता, चैतन्य बोध है । अर्थात् स्वाभाविक आनन्द, सत्पना, स्वानुभूति तथा ज्ञान है । व्यवहारनय से जीवो के दश प्राण होते है जिनके द्वारा एक शरीर मे प्राणी जीवित रहता है व जिनके बिगडने से वह शरीर को छोड़ देता है । वे प्राण हैं पांच स्पर्शनादि इन्द्रिया-मनवल, वचनबल, कायवल, आयु और श्वासोछ्वास । (१) एकेन्द्रिय पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति के चार प्राण होते हैं- स्पर्शनेन्द्रिय, कायबल, आयु, श्वासोछवास (२) लट श्रादि द्वेन्द्रियों के छ. प्राण होते है रसना इद्रिय और वचनबल अधिक हो जाता है । (३) चींटी आदि तेंद्रियों के नाक अधिक होती है, सात प्राण होते है । (४) मक्खी श्रादि चौद्रिय के श्राख अधिक कर के आठ प्राण होते है । (५) मन रहित पचेन्द्रिय समुद्र के कोई सपदि के कर्ण सहित नौ प्राण होते है । (६) मन सहित पंचेद्रियों के देव नारको, मानर, गाय, भैसादि पशु, मछली, मयूरादि के दशो प्राण होते हैं। , (२) उपयोगवान--जिसके द्वारा जाना जाय उसे उपयोग कहते हैं। उसके पाठ भेद है-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान, कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान और अवधिज्ञान । ज्ञानोपयोग के आठ भेद हैं । दर्शनोपयोग के चार भेद हैं-चक्षुदर्शन, श्रचक्षुदर्शन, अवधि- दर्शन, केवलदर्शन । ये बारह उपयोग व्यवहारनय मे भेदरूप कहे जाते हैं। इनका विशेप स्वरूप आगे कहेंगे । इनही से ससारी जीवों की पहचान होती है । आत्मा अमूर्तीक पदार्थ है । शरीर में है कि नहीं इसका ज्ञान इसी बात को देखकर किया जाता है कि कोई प्राणी स्पर्श का डान रखता है या नहीं, रसको रसना से, गधको नाक से, वर्ण को श्राख से, शब्द को कर्ण से जानता है कि नहीं या मन से विचार करता है या नही । मृतक शरीर मे इन बारह उपयोगों में से कोई भी उपयोग नहीं पाया जाता है । क्योंकि वहा उपयोग का धारी आत्मा नहीं रहा है। निश्चयनय से वास्तव में न ज्ञानोपयोग के आठ भेद हैं न दर्शनोप- योग के चार भेद हैं। ज्ञानोपयोग व दर्शनोपयोग एक एक ही हैं, आत्मा के सहज स्वाभाविक गुण हैं । कर्म के सबध से बारह भेद हो जाते हैं, इमलिये निश्चय से आत्मा के उपयोग शुद्ध ज्ञान, शुद्ध दर्शन हैं । (३) अमर्तीक--जीवमे निश्चयनय से असल मे न कोई स्पर्श रुखा, चिकना, हलका, भारी, ठड़ा, गरम, नरम, कठोर है, न कोई रस खट्टा, मीठा, चरपरा, तीखा, कसायला है, न कोई गध सुगंध या दुर्गध है, न कोई वर्ण सफेद, लाल, पीला, नीला, काला है । इसलिये मूर्तीक पुद्गल से भिन्न अमूर्तीक चिदाकार है । व्यवहारनय से इस जीव को मूर्तीक कहते हैं क्योंकि संसारी जीव के साथ मर्तीक कर्म पुद्गलों का मेल दूध और जल के समान एक क्षेत्रावगाहरूप है । कोई भी प्रदेश जीव का शुद्ध नहीं है, सर्वांग पुद्गल से एकमेक है, इसलिये इसे मूर्तीक कहते हैं। जैसे दूध से मिले जल को दूध, रग से मिले पानी को रग कहते हैं। (४) कर्ता है-यह आत्मा निश्चयनय से अपने ही जानदर्शनादि गुणों के परिणाम को ही करता है। शुद्ध निश्चयनय से शुद्ध भावों का ही कर्ता है, अशुद्ध निश्चयनय से रागादि भायकों का कर्ता कहा जाता सहज-सुख-साधन । १९९ 2 में है । शुद्ध निश्चयनय से या स्वभाव से यह आत्मा रागादि भावों का करनेवाला नहीं है । क्योंकि ये इसके स्वाभाविक भाव नहीं हैं, ये औपाधिक भाव हैं। जब कर्मों का उदय होता है, मोहनीय कर्म का विपाक होता है तब क्रोध के उदय से क्रोधभाव, मान के उदय से मानभाव, माया के उदय से मायाभाव, लोभ के उदय से लोभभाव, काम या वेद के उदय से कामभाव, उसी तरह हो जाता है जिस तरह स्फटिकमणि के नीचे लाल, पीला, काला डाक लगाने से स्फटिक लाल, पीला, काला झलकता है। उस समय स्फटिक का स्वच्छ सफेद रंग ढक जाता है । आत्मा स्वय स्वभाव से इन विभावों का कर्ता नहीं है, ये नैमित्तिक भाव हैं-होते हैं, मिटते हैं, फिर होते हैं, क्योंकि ये सयोग से होते हैं । इसलिये इनको आत्मा के भाव अशुद्ध निश्चय से कहे जाते हैं या यह कहा जाता है कि आत्मा अशुद्व निश्चय से इनका कर्ता है । इन भावो के होने से आत्मा का भाव अपवित्र, श्राकुलित, दुखमय हो जाता है । अात्मा का पवित्र, निराकुल, सुखमय स्वभाव विपरीत हो जाता है । इसलिये इनका होना इष्ट नहीं है । इनका होना ही आत्मा का हित है । जैसे मिट्टी स्वय मैली, विरस स्वभावी है इसलिये इस मिट्टी के सयोग से पानी भी मैला व विरस स्वभाव हो- जाता है, वैसे मोहनीय कर्म का रस या अनुभाग मलीन, कलुषरूप, व श्राकुलता रूप है इसलिये उसके सयोग से प्रात्मा का उपयोग भी मलीन व कलुषित व आकुलित हो जाता है। इनही भावों का निमित्त पाकर कर्म वर्गणारूप सूक्ष्म पुद्गल जो लोक में सर्वत्र भरे हैं, खिचकर स्वय अाकर बध जाते हैं । ज्ञानावर- णादि रूप होकर कर्म नाम पाते हैं, जैसे गर्मी का निमित्त पाकर पानी स्वय भापरूप बदल जाता है वैसे कर्मवर्गणा स्वय पुण्य या पाप कर्मरूप बध जाती है । यह वध भी पूर्व विद्यमान कार्माण शरीर से होता है । वास्तव में आत्मा से नहीं होता है । आत्मा उस कर्म के शरीर के साथ उसी तरह रहता है जैसे आकाश धुश्रा या रज फैल जाय तब आकाश के साथ मात्र सयोग होता है । या एक क्षेत्रावगाहरूप संबध होता है । आत्मा ने कर्म नहीं बांधे हैं, वे स्वय बधे है । आत्मा का अशुद्ध भाव केवल निमित्त है तो भी व्यव- हार नय से आत्मा को पुद्गल कर्मों का कर्ता या बाधनेवाला कहते हैं। उसी तरह जैसे कुम्हार को घड़े का बनानेवाला, सुनार को कडे का बनानेवाला, स्त्री को रसोई बनानेवाली, लेखक को पत्र लिखनेवाला, दरजी को कपडा सीनेवाला, कारीगर को मकान बनानेवाला कहते हैं । निश्चय से घड़े को बनानेवाली मिट्टी हैं, कडे को बनानेवाला सोना है, रसोई को बनानेवाली अन्नपानादि सामग्री है, पत्र को लिखनेवाली स्याही है, कपडे को सीनेवाला तागा है--कुम्हारादि केवल निमित्त मात्र है । जो वस्तु स्वय कार्यरूप होती है उसीको उसका कर्ता कहते है । कर्ता कर्म एक ही वस्तु होते हैं । दूध ही मलाई रूप परिणमा है इससे मलाई का कर्ता दूध है । सुवर्ण ही कडेरूप परिणमा है इससे कडे का कर्ता सुवर्ण है । मिट्टी ही घडेरूप परिणमी है इससे घड़े की कर्ता मिट्टी है । कर्ता के गुण स्वभाव उससे बने हुये कार्य में पाए जाते हैं । जैसी मिट्टी वैसा घडा, जैसा सोना वैसा कहा, जैसा दूध वैसी मलाई, जैसा तागा वैसा उसका बना कपड़ा । निमित्त कर्ता किन्हीं कार्यों के अचेतन ही होते हैं, किन्हीं कार्यों के चेतन व अचेतन दोनों होते हैं। गर्मी से पानी माप रूप हो जाता है, भाप से मेघ बनते हैं, मेघ स्वय पानी रूप होजाते हैं, उन सब कार्यों मे निमित्त कर्ता अचेतन ही है। हवा श्वास रूप होजाती है, इसमे निमित्तकर्ता चेतन का योग और उपयोग है । या कर्म- वर्गणा कर्मरूप हो जाती है उनमें निमित्तकर्ता चेतन का योग और उपयोग है । मिट्टी का घडा बनता उसमें निमित्तकती कुम्हार का योग उपयोग है तथा चाक आदि अचेतन भी हैं । रसोई बनती है, निमित्त कती स्त्री के योग उपयोग हैं तथा चूल्हा, वर्तन श्रादि अचेतन भी है। नहा चेतन निमित्तकर्ता घट, पट, वर्तन मोजनादि बनाने में होता है वहा व्यवहारनय से उसको घट, पट, वर्तन व भोजनादि का की कह देते हैं। है २००] सम्यग्दर्शन नीर उसका महास्य । ने घडा । यदि निश्चय से विचार किया जाये तो गुदात्मा किसी भी कार्य का निमित्तानी भी नहीं है। जबतक संमारी आत्मा के साथ कमी का सयोग है व कमी का उदय हो रहा है तबतक श्रात्मा के मन, वचन, काय योग चलते रहते हैं घ ज्ञानोपयोग अशुद्ध होता है। राग वेप सहित या कपाय सहित होता है। ये ही योग और उपयोग निमित्ताती है । उन्हीं से कर्म बंधते हैं, इन्हीं से घटादि बनते हैं | कुम्हार बनाया, घट बनाने में मनका संकल्प किया, शरीर को हिलाया व राग सहित उपयोग किया । कुम्हार के योग उपयोग ही घटके निमित्तानी है, यात्मा नहीं । बी के मनने रमोई बनाने का सकल्प किया, वचनसे किमी को कुछ रखने उठाने को कहा, काय ने किया उठाया, राग महिन ज्ञान भाव किया। योग व उपयोग ही रसोई के निमित्तकनी है, ची का शुद्ध आ-पा नही । योग और उपयोग यात्मा के विभाव है इमलिये अशुद्ध निश्चय से उनका कनी आत्मा को कहते हैं। त निश्चय से प्रात्मा मन बचन काय योग का तथा अशुद्ध उपयोग का कती नहीं है । यद्यपि योग शक्ति • कर्म 'याकर्षण शक्ति श्रात्मा की है परन्तु वह कमी के उदय से ही मन वचन काय द्वारा काम करती है। कर्म का उदय न हो तो कल भी हलनचलन काम न हो। अशुद्ध सराग उपयोग भी कयाय के उदय से होता है, प्रात्मा का स्वाभाविक उपयोग नहीं। निश्चवनय से आत्मा में न योग का कार्य है न रागद्वेप प उपयोग का कार्य है । इमलिये शुद्ध निश्चय नय ने यह अान्मा केवल अपने शुद्ध भागो का ही की है । परभागेका न आदान या मृल की है न निमित्त की है। समार के परिणमन से जो परिणाम या कर्म हो उस परिणाम या कम का उपादान की उसको कहा जाता है। ज्ञान स्वरूपी आत्मा है इसलिये शुद्ध नानोपयोग का ही वह उपादान की है । अतानी जीत्र भूल से अात्मा को रागादि का कनी व अच्छे बुरे कामों का कनी व घटपट 'यादि का कर्ता मानकर अहकार करके दुःखी होता है । मैं कर्ता में कर्ता इस बुद्धि मे जो अपने स्वाभाविक कर्म नहीं है उनको अपना ही कर्म मानकर राग द्वेप करके कर पाता है। - । - नानी जीव केवल शुद्वज्ञान परिणति का ही अपने को कर्ता मानता है । इसलिये सर्व हो पर भावों का व पर कार्यो का में कर्ता हूँ, इस अहंकार को नहीं करता है। यदि शुभ राग होता है तो उसे भी मद कपाय का उदय जानता है । यदि अनुभ राग होता है तो उसे भी तीव्र कपाय का उदय जानता है। अपना स्वभाव नहीं जानता है, विभाव जानता है । विभाव को रोग विकार व उपाधि मानता है व ऐसी भावना रखता है कि ये विभाव न होतो ठीक है। वीतराग भाव मे ही परिणमन हो तो ठीक है । जैसे बालक खेलने का ही प्रेमी है, उसे माता पिता व गुरु के डर पढ़ने का काम करना पड़ता है। वह पढता है परन्तु उधर प्रेमी नहीं है, प्रेमी खेल का ही है। इसी तरह ज्ञानी जीव वीतराग प्रात्मीक शुद्ध भाव का प्रेमी है । पूर्वबद्व कर्म के उद्य से जो भाव होता है तदनुकूळ मन, वचन, काय वर्तते है । इनको वह पसट नहीं करता है। कर्म का विकार या नाटक समझता है व भीतर से वैरागी है। जैसे बालक पढने से वैरागी है। ज्ञानी श्रात्मा विना श्रामक्ति के परोपकार करता हुआ अपने को कर्ता नहीं मानता है-मन, वचन, काय का कार्य मात्र जानता है। यदि वह गृहस्थ है, कुटुम्ब को पालता है तथापि वह पालने का अहंकार नहीं करता है । ज्ञानी सर्व विभावों को कर्म कृत जानकर उनसे अलिप्त रहता है। ज्ञानी एक अपने ही प्रात्मीक वीतराग भावों का ही अपने को कती मानता है। सम्यग्दर्शन की अपूर्व महिमा है । जो कोई ज्ञानी आत्मा को परभावों का अकर्ता समझेगा वही एक दिन साक्षात् अकता हो जायगा । उसके योग और उपयोग की चंचलता जब मिट जायगी तब वह सिद्ध परमात्मा हो जायगा । इस तत्व का यह मतलब लेना योग्य नहीं है कि ज्ञानी सराग कार्यों को उत्तम प्रकार -- सहज-सुख-साधन । [२०१ से नहीं करता है, विगाड रूपसे करता होगा, सो नहीं है । ज्ञानी मन, वचन, काय से सर्व कार्य यथा योग्य ठीक ठीक करता हुआ भी मैं की इस मिथ्या अहन्बुद्धि को नहीं करता है। इस सर्व लौकिक प्रपंच को कर्म का विकार जानता है, अपना स्वभाव नहीं मानता है । कदाचित् अज्ञानी की अपेक्षा बानी कुटुम्ब का पालन, जप, तप, पूजा, पाठ, विषय भोग आदि मन, वचन, काय के शुभ, अशुभ कार्य उत्तम प्रकार से करता है-प्रमाद व आलस्य से नहीं करता है, तो भी मैं कता हूँ इस मिथ्यात्व से अलग रहता है । जैसे नाटक में पात्र नाटक खेलते हुए भी उस नाटक के खेल को खेल ही समझते हैं, उस खेल में किए हुए कार्यों को अपने मूल स्वभाव में नहीं लगाते है । नाटक का पात्र खेल दिखलाते वक्त ही अपने को राजा कहता है । उस समय भी वह अपनी असल प्रकृति को नहीं भूलता है व खेल के पीछे तो अपने असल रूप ही वर्तन करता है । ब्राह्मण का पुत्र अपने को ब्राह्मण मानते हुए भी खेल में राजा का पाठ बड़ा ही उत्तमता से दिखाता है तथापि में राजा हो गया ऐसा नहीं मानता है । ससार को नाटक समझकर व्यवहार करना ज्ञानी का स्वमाव है। ससार को अपना ही कार्य समझना, व्यवहार करना अज्ञानी का स्वभाव है। इसीलिये अज्ञानी ससार का कती है, ज्ञानी ससार का की नहीं । अज्ञानी संसार मे भ्रमेगा, जानी ससार से शीघ्र ही छूट जायगा । वह श्रद्धा में व ज्ञान मे ससार कार्य को आत्मा का कर्तव्य नहीं मानता है । कषाय के उदयवश लाचारी का कार्य जानता है। (५) भोवता है-जिस तरह निश्चय नय से यह जीव अपने स्वाभाविक भावों का कर्ता है उसी तरह यह अपने स्वाभाविक ज्ञानानन्द या सहज सुख का भोक्ता है । अशुद्ध निश्चय नय से मैं सुखी, मैं दुःखी इस राग द्वेप रूप विभाव का भोक्ता है, व्यवहार नय से पुण्य पाप कर्मों के फल को भोगता है। मैं सुखी मैं दुःखी यह भाव मोहनीय कर्म के उदय से होते हैं । रति कपाय के उदय से सासारिक सुख में प्रीति भाव व अरति कषाय के उदय से सांसारिक दु ख में अप्रीति भाव होता है । यह अशुद्ध भाव कर्म जनित है इस लिये स्वभाव नहीं विभाव है । आत्मा में कर्म सयोग से यह भाव होता है तब आत्मानन्द के सुखानुभव का भाव छिप जाता है इसलिये ऐसा कहा जाता है कि अशुद्ध निश्चय नय से यह सुख दुःख का भोक्ता है। भोजन, वस्त्र, गाना, बजाना, सुगध, पलग आदि बाहरी वस्तुओं का भोग तथा साता वेदनीय असाता- वेदनीय कर्म का भोग वास्तव मे पुद्गल के द्वारा पुद्गल का होता है । जीव मात्र उनमें राग भाव करता है इससे भोक्ता कहलाता है, यहा भी मन, वचन, काय द्वारा योग तथा अशुद्ध उपयोग ही पर पदार्थ के भोग में निमित्त हैं। जैसे एक लड्डू खाया गया । लड्डू पुद्गल को मुख ने चबाकर खाया । जिव्हा के पुद्गलों द्वारा रस का ज्ञान हुआ । लड्डू का भोग शरीर रूपी पुद्गल ने किया । उदर मे पवन द्वारा पहुंचा। जीव ने अपने अशुद्व भाव इन्द्रिय रूपी उपयोग से जाना तथा खाने की क्रिया में योग को काम में लिया। यदि वैराग्य से जाने तो खाने का सुख ना माने । जब वह राग सहित खाता है तब सुख मान लेता है । इसलिये लड्डू का भोग इस जीव ने किया यह मात्र व्यवहार नय का वचन है । जीव ने केवल मात्र खाने के भाव किये व योगी को व्यवहार किया, योग शक्ति को प्रेरित किया। इस तरह सुन्दर वस्त्रों ने शरीर को शोभित किया, आत्मा को नहीं, तब यह जीव अपने राग भाव से मैं सुखी हुआ ऐसा मान लेता है । एक उदासमुखी, पति के परदेश गमन से दुखी स्त्री को सुन्दर वस्त्राभूषण पहनाए जावे, शरीर शोभित हो जायगा परन्तु वह राग रहित है, उसका राग मात्र उन वस्त्राभूषणों मे नहीं है इसलिये उसे उस सुख का अनुभव नहीं होगा। इसीलिये यह बात ज्ञानियों ने स्वानुभव से कही है कि ससार के पदार्थों में रूपी पुद्गल , २०२] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । -- भी रस सुख व दुःख मोह राग द्वेष से होता है । पदार्थ तो अपने स्वभाव में होते हैं । एक जगह पानी बरस रहा है, किसान उस वर्षा को देखकर सुखी हो रहा है । उसी समय मार्ग में विना छतरी के चलनेवाला एक सुन्दर वस्त्र पहरे हुए मानव दु.खी हो रहा है । नगर में रोगो की वृद्धि पर रोगी दुःखी होते हैं, अज्ञानी लोभी वैद्य डाक्टर सुखी होते हैं । एक ही रसोई में जीमनेवाले दो पुरुष हैं। जिसकी इच्छानुकूल रसोई मिली है वह सुखी हो रहा है, जिसकी इच्छा के विरुद्ध है यह दुखी हो रहा है। जैसे पुद्गल का कती पुद्गल है वैसे पुद्गल का उपभोग कता पुद्गल है। निमित्त कारण जीव के योग और उपयोग हैं । शरीर में सर्दी लगी, सर्दी का उपभोग पुद्गल को हुआ, पुद्गल की दशा पलटी। जीव का शरीर से ममत्व है, राग है, उसने सर्दी की वेदना का दुख मान लिया। जब गर्म कपडा शरीर पर डाला गया, शरीर ने गर्म कपड़े का उपयोग किया, शरीर की दशा पलटी, रागी जीव ने सुख मान लिया । स्त्री का उपभोग पुरुष का अग, पुरुप का उपभोग स्त्री का अग करता है, पुद्गल ही पुद्गल की दशा को पलटता है । राग भाव से रागी स्त्री पुरुष सुख मान लेते हैं । जितना अधिक राग उतना अधिक सुख व उतना ही अधिक दुःख होता है। एक मानव का पुत्र पर बहुत अधिक राग है, वह पुत्र को देखकर अधिक सुख मानता है । उसी पुत्र का वियोग हो जाता है तब उतना ही अधिक दु ख मानता है । जो ज्ञानी ऐसा समझते है कि मैं वास्तव में शुद्ध आत्मा द्रव्य हूँ, मेरा निज सुख मेरा स्वभाव है । मैं उसी ही सच्चे सुख को सुख समझता हूँ, उसी का भोग मुझे हितकारी है, वह ससार से वैरागी होता हुआ जितना अश कपाय का उदय है उतना अश बाहरी पदार्थों के सयोग वियोग सुख दुःख मानेगा, जो अज्ञानी की अपेक्षा कोटि गुणा कम होगा। भोजन को भले प्रकार रसना इन्द्रिय से खाते हुए के स्वाद को तो जानेगा व तृप्ति भी मानेगा परन्दु रसना इन्द्रिय जनित सुख को अल्प राग के कारण अल्प ही मानेगा। इसी तरह इच्छित पदार्थ खाने में न मिलने पर अल्प राग के कारण अल्प दुःख ही मानेगा । वस्तु स्वभाव यह है कि जीव स्वभाव से सहज सुख का ही भोक्ता है। विभाव भावों के कारण जो कषाय के उदय से होते हैं, यह अपनी अधिक या कम कषाय के प्रमाण में अपने को सुख या दु.ख का भोक्ता मान लेता है । मै भोक्ता हूँ यह वचन शुद्ध निश्चय नय से असत्य है । कषाय के उढय से राग भाव मोक्ता है । आत्मा मोक्ता नहीं है । आत्मा राग भाव का भोक्ता अशुद्ध निश्चय से कहलाता है यह मानना सम्यग्ज्ञान है.। पर वस्तु का व कमी का भोक्ता कहना बिलकुल व्यवहार नय से है । जैसे घट पटादि का का कहना व्यवहार नय से है। कर्मों का उदय जब आता है तब कर्म का अनुभाग या रस प्रगट होता है । यही कर्म का उपभोग है । उसी कर्म के उदय को अपना मानकर जीव अपने को सुखी दुःखी मान लेता है । साता वेदनीय का उदय होनेपर साताकारी पदार्थ का सम्बन्ध होता है । रति नो कषाय से यह रागी जीव साता का अनुभव करता है। अर्थात् राग सहित ज्ञानोपयोग सुख मान लेता है । असाता वेदनीय के उदय से असाताकारी सम्बन्ध होता है। जैसे शरीर में चोट लग जाती है उसी समय अरति कषाय के उदय सहित जीव द्वेष भाव के कारण अपने को दुःखी मान लेता है । वास्तव में कर्म पुद्गल है तब कर्म का उदय व रस या विपाक भी पुद्गल घातीय कर्मों का उदय जीव के गुणों के साथ विकारक होकर झलकता है, अघातीय कर्मों का रस जीव से भिन्न शरीरादि पर पदार्थों पर होता है। जैसे जानावरण के विपाक से ज्ञान का कम होना, दर्शनावरण के उदय से दर्शन का कम होना, मोह- नीय के उदय से विपरीत श्रद्धान होना व क्रोधादि कपाय का होना, अन्तराय के उदय से आत्मबल का कम होना, आयु के उदय से शरीर का बना रहना, नाम के उदय से शरीर की रचना होना, गोत्र कर्म के उदय है।
- सहज-सुख-साधन । [२०३ से ऊची या नीची लोकमान्य व लोकनिन्द्य दशा होनी । वेदनीय के उदय से साताकारी व असाताकारी पदार्थों का संयोग होना । जीव अपने स्वभाव से अपने सहजसुख का ही भोक्ता है । पर का भोक्ता अशुद्ध- नय या व्यवहार नय से ही कहा जाता है । (६) शरीर प्रमाण आकारधारी है- निश्चयनय से जीव का आकार लोक प्रमाण असख्यात प्रदेशी उससे कभी कम या अधिक नहीं होता है । जीव अमूर्तीक पदार्थ है इससे इसके न तो टुकड़े हो सकते हैं और न यह किन्ही से जुड करके बडा हो सकता है । तथापि जैसे जीव में कर्म को आकर्पण करनेवाली योग शक्ति है वैसे इसमे सकोच विस्ताररूप होने की शक्ति होती है। जैसे योगशक्ति शरीर नामकर्म के उदय से काम करती है वैसे सकोच विस्तार शक्ति भी शरीर नामकर्म के उदय से काम करती है । जबतक नाम कर्म का उदय रहता है तब तक ही आत्मा के प्रदेश सकुचित होते हैं व फैलते हैं। जब नाम कर्म नाश हो जाता है तब आत्मा अतिम शरीर मे जैसा होता है वैसा ही रह जाता है। उसका सकोच विस्तार बन्द हो जाता है। एक मनुष्य जब मरता है तब तुत ही दूसरे उत्पत्ति स्थान पर पहुच जाता है, बीच में जाते हुए एक समय, दो समय, या तीन समय लगते हैं तब तक पूर्व शरीर के समान आत्मा का आकार बना रहता है । जब उत्पत्ति स्थान पर पहुंचता है । तब वहा जैसा पुद्गल ग्रहण करता है उसके समान आकार छोटा या बड़ा हो जाता है । फिर जैसे जैसे शरीर बढ़ता है वैसे वैसे आकार फैलता जाता हैं । शरीर मे ही आत्मा फैला है बाहर नहीं है, इस बात का अनुभव विचारवान को हो सकता है। हमे दुःख या सुख का अनुभव शरीर भर में होता है, शरीर से बाहर नहीं । यदि किसी मानव के शरीरभर मे आग लग जावे व शरीर से बाहर भी आग हो तो उस मानव को शरीरभर के आग की वेदना का दुःख होगा, शरीर के बाहर की आग की वेदना न होगी। यदि आत्मा शरीर के किसी स्थान पर होता, सर्व स्थान पर व्यापक न होता तो जिस स्थान पर जीव होता वहीं पर सुखदुःख का अनुभव होता-सांग नहीं होता । परन्तु होता सर्वांग है इसलिये जीव शरीर प्रमाण आकारधारी है। किसी भी इन्द्रिय द्वारा मनोज्ञ पदार्थ का राग सहित भोग किया जाता है तो सर्वांग सुख का अनुभव होता है । शरीर प्रमाण रहते हुए भी नीचे लिखे सात प्रकार के कारण हैं जिनके होने पर प्रात्मा फैलकर शरीर से बाहर जाता है फिर शरीर प्रमाण हो जाता है इस अवस्था को समुद्घात कहते है। (१) वेदना-शरीर में दुःख के निमित्त से प्रदेश कुछ बाहर निकलते हैं। (२) कषाय-क्रोधादि कषाय के निमित्त से प्रदेश बाहर निकलते हैं। (३) मारणांतिक-मरण के कुछ देर पहले किसी जीव के प्रदेश फैलकर जहा पर जन्म लेना हो वहां तक जाते है, स्पर्शकर लौट आते है, फिर मरण होता है । (४) वैक्रियिक-वैक्रियिक शरीरधारी अपने शरीर से दूसरा शरीर बनाते हैं, उसमे आत्मा को फैला- कर उससे काम लेते हैं। (५) तैजस (१) शुभ तैजस-किसी तपस्वी मुनि को कहीं पर दुर्भिक्ष या रोग मचार देखकर दया आजावे तब उसके दाइने स्कध से तैजस शरीर के साथ आत्मा फैलकर निकलता है । इसमे कप दूर होजाता है। - २०४] सम्यग्दर्शन और उनका महात्म्य । (२) अशुभ तैजस-किसी तपस्वी को उपसर्ग पड़ने पर क्रोध पाजावे तब उसके पाए स्कध से अशुभ तैजस शरीर के साथ आत्मा फैलता है और वह शरीर कोप के पात्र को भस्म कर देता है तथा वह तपस्वी भी भस्म होता है । (६) आहारक-किसी ऋद्धिधारी मुनि के मस्तक से श्राहारक शरीर बहुत सुन्दर पुरुपाकार निकलता है, उसी के साथ प्रात्मा फैलकर जहां केवली या श्रुत केवली होते हैं वहां तक जाता है, दर्शन करके लौट आता है, मुनि का संशय मिट जाता है । (७) केवल-किसी अरहंत केवली की आयु अल्प होती है और अन्य कमों की स्थिति अधिक होती है, तब आयु के बराबर सब कमी की स्थिति करने के लिये श्रात्मा के प्रदेश लोक व्यापी हो जाते हैं। (८) संसारी है-सामान्य से ससारी जीवों के दो भेद हैं-स्थावर, अस । एकेन्द्रिय पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति काय के धारी प्राणियों को स्थावर कहते हैं तथा द्वेन्द्रिय से पचेन्द्रिय पर्यंत प्राणियों को त्रस कहते है । विशेष में चौदह भेद प्रसिद्ध हैं जिनको जीव समास कहते हैं। जीवों के समान जातीय समूह को समास कहते है। चौदह जीव समास-१ एकेन्द्रिय सूक्ष्म (ऐसे प्राणी जो लोकभर में हैं किसी को बाधक नहीं, न किसी से बाधा पाते स्वय मरते है), २ एकेन्द्रिय बाहर (जो बाधा पाते हैं व बाधक हैं), ३ द्वेद्रिय, ४ तेंद्रिय, ५ चौन्द्रिय, ६५चेन्द्रिय असैनी (बिना मनके), ७ पचेन्द्रिय सैनी । ये सात समूह या समास पर्याप्त तथा अपर्याप्त दो प्रकार के होते हैं। इस तरह चौदह जीव समाम हैं। पर्याप्त अपर्याप्त- जब यह जीव किसी योनि मे पहुचता है तब वहां जिन पुद्गलों को ग्रहण करता है उनमे आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोछवास, भापा, मन बनने की शक्ति अतर्मुहूर्त में (४८ मिनिट के भीतर भीतर ) हो जाती है उसको पर्याप्त कहते हैं । जिसके शक्ति की पूर्णता होगी अवश्य परन्तु जवतक शरीर बनने की शक्ति नहीं पूर्ण हुई तबतक उसको नित्यपर्याप्त कहते हैं। जो छहों में से कोई पर्याप्ति पूर्ण नहीं कर सकते और एक श्वास (नाडी फड़कन) के अठारहवे भाग में मर जाते हैं उनको लब्ध्यर्याप्त कहते हैं । छः पर्याप्तियों में से एकेन्द्रियों के आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोछवास चार होती हैं, द्वेन्द्रिय से असैनी पचेंद्रियतक के भाषा सहित पांच होती हैं, सैनी पंचेंद्रिय के सब छहो होती हैं । पुद्गलों को खळ (मोटा भाग) व रस रूप करने की शक्ति को आहार पर्याप्ति कहते हैं। ससारी जीवों की ऐसी अवस्थाए जहां उनको ढूंढने से वे मिल सके, चौदह होती हैं जिनको मार्गणा कहते है। चौदह मार्गणाएँ-गति, इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, सयम, दर्शन, लेश्या, भव्य, सम्यक्त, सैनी, श्राहार । इनके विशेष भेद इस भांति है:- (१) गति चार-नरक, तिर्यच, मनुष्य, (२) इन्द्रिय पांच-स्पर्शन, रसना घ्राण, चक्षु, श्रोत । (३) काय छः-पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय, नस काय | देव।
सहज-सुख-साधन । [२०५ - (४) योग तीन-मन, वचन, काय अथवा पन्द्रह योग-सत्य मन, असत्य मन, उभय मन, अनुभय मन, सत्य वचन, असत्य वचन, उभय वचन, अनुभय वचन, औदारिक, औदारिक मिश्र, वैक्रियिक, वैक्रियिक मिश्र, आहारक, आहारक मिश्र, कार्माण । जिस विचार या वचन को सत्य या असत्य कुछ भी न कह सके उसको अनुभय कहते है। मनुष्य तिर्यंचों के स्थूल शरीर को औदारिक कहते हैं। इनके अपर्याप्त अवस्था मे औदारिक मिश्र योग कहते हैं, पर्याप्त अवस्था मे औदारिक योग होता है । देव व नारकियों के स्थूल शरीर को बैंक्रियिक कहते हैं । इनके अपर्याप्त अवस्था में वैक्रियिक मिश्रयोग होता है, पर्याप्त अवस्था में वैक्रियिकयो । होता है। श्राहारक समुद्घात मे जो आहारक शरीर बनता है उसकी अपर्याप्त अवस्था में आहारक मिश्रयोग होता है, पर्याप्त अवस्था मे आहारक योग होता है । एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को प्राप्त होने तक मध्य की विग्रह गति में कार्माणोयग होता है । जिसके निमित्त से आत्मा के प्रदेश सकम्प हों और कमें। को खींचा जासके उसको योग कहते हैं । पन्द्रह प्रकार के ऐसे योग होते है । एक समय मे एक योग होता है । (५) वेद तीन-स्त्रीवेद, पु वेद, नपुंसकवेद-जिससे क्रम से पुरुपभोग,सीभोग व उभयभोगकी इच्छा हो। (६) कषाय चार-क्रोध, मान, माया, लोभ (७) ज्ञान आठ-मति, श्रुत, अवधि, मनः पर्यय, केवल व कुमति, कुश्रुति, कुअवधि । (८) संयम सात-सामायिक, छेदोपस्थानपना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय, यथाख्यात, असयम । सयम का न होना असयम है। श्रावक के व्रतों को पालना देशसयम है । शेप पाचों संयम मुनि के होते हैं। ममताभाव रखना सामायिक है । समता के छेद होने पर फिर समता में आना छेदोपस्थापना है । विशेष हिसा का त्याग जिसमे हो सो परिहारविशुद्धि है । सूक्ष्म लोभ के उदय मात्र मे जो हो सो सूक्ष्मसापराय है । सर्व कषाय के उदय न होने पर जो हो मो यथाख्यातसयम है। () दर्शन चार-चक्षु, अचा, अवधि, केवल । (१०) लेश्या छ:-कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म, शुक्ल । कपायों के उदय से और मन, वचन, काय योगों के चलन से जो भात्र शुभ व अशुभ होते हैं उनको बतानेवाली छ. लेश्याए हैं पहली तीन अशुभ हैं, शेष शुभ हैं । बहुत ही खोटे भाव अशुभतम कृष्णलेश्या है, अशुभतर नील है, अशुभ कापोत है, कुछ शुभ भाव पीतलेश्या है, शुभतर शुभ है, शुभतम शुक्ल है । (११) भव्य दो-जिनको सम्यक्त होने की योग्यता है वे भव्य, जिनकी योग्यता नहीं है वे अभव्य (१२) सम्यक्त छ:-उपशम, क्षयोपसम, क्षायिक, मिथ्यात्त्र, सासादन मिश्र । इनका स्वरूप गुणस्थान देश सयम, - . के शीर्पक में देखें। (१३) सज्ञी दो-मन सहित सैनी, मनरहित असैनी । (१४) आहार दो-आहार अनाहार । जो स्थूल शरीर के बनने योग्य पुद्गल को ग्रहण करना वह श्राहार है । न ग्रहण करना अनाहार है ।
२०६] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । सामान्य दृष्टि से ये चौदह मार्गणाएं एक साथ हरएक प्राणी मे पाई जाती हैं । जैसे दृष्टान्त मक्खी व मनुष्य का लेवें तो इस भाति मिलेगी। - मक्खी के मानव के १ मनुष्य गति २ mr ४ w कपाय चारों ७ कुमति, कुश्रुत or तियच गति इन्द्रिय चार इन्द्रिय पांच बस काय त्रन काय वचन या काय मन, वचन या काय नपुंसक वेद स्त्री, पुरुप या नपुंसक कपाय चारों आठों ही ज्ञान हो सकते हैं असयम सातों ही सयम हो सकते हैं। चक्षु व अचक्षु दर्शन चारों ही दर्शन हो सकते है १० कृष्ण नील, कापोत लेश्या छहों लेश्याएं हो सकती हैं। ११ भव्य या अभव्य कोई भव्य या अमव्य कोई १२ मिथ्यात्व छहों सम्यक्त हो सकते हैं १३ असेनी सैनी १४ आहार व अनाहार आहार व अनाहार चौदह गुणस्थान-ससार मे उलझे हुए प्राणी जिस मार्ग पर चलते हुए शुद्ध हो जाते हैं उस मार्ग की चौदह सीढिया हैं । इन सीढियों को पार करके यह जीव सिद्ध परमात्मा हो जाता है । ये चौदह क्लास या दरजे हैं । भावों की अपेक्षा एक दूसरे से ऊचे ऊंचे हैं । मोहनीय कर्म तथा मन, वचन, काय योगों के निमित्त से ये गुणस्थान बने है । श्रात्मा मे निश्चयनय से नहीं हैं । अशुद्ध निश्चयनयसे या व्यवहारनय से ये गुणस्थान आत्मा के कहे जाते हैं । मोहनीय कर्म के मूल दो भेद हैं- एक दर्शन मोहनीय, दूसरा चारित्र मोहनीय । दर्शन मोहनीय के तीन भेद हैं- मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, और सम्यक्त मोहनीय । इनका कथन पहले किया जा चुका है । चारित्र मोहनीय के पच्चीस भेद हैं- चार ४ अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ-दीर्घकाल स्थायी कठिनता से मिटनेवाले, जिनके उदय से सम्यग्दर्शन व स्वरूपाचरण चारित्र नहीं प्रगट होता है । उनके हटने से प्रगट होता है । चार ४ अप्रत्याख्यानावरण कषाय-कुछ काल स्थायी क्रोधादि, जिनके उदय से एक देशे श्रावक का चारित्र ग्रहण नहीं किया जाता। चार ४ प्रत्याख्यानावरण कपाय-जिन क्रोधादि के उदय से मुनि का सयम ग्रहण नहीं किया जाता। चार ४ संज्वलन क्रोधादि तथा नौ नोकषाय-( कुछ कपाय) हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगप्सा, स्त्री वेद, पुवेद, नपुंसकवेद । इनके उदय से पूर्ण चारित्र यथाख्यात नहीं होता।
सहज-सुख-साधन । [२०७ चौदह गुणस्थानों के नाम हैं-(१) मिथ्यात्व (२) सासादन (३) मिश्र (४) अविरत सम्यक्त (५) देश विरत (६) प्रमत्त विरत (७) अप्रमत्त विरत (८) अपूर्व करण (९) अनिवृत्ति करण ( १०) सूक्ष्म सांपराय (११) उपशांत मोह (१२) क्षीण मोह (१३) सयोग केवली जिन (१४) अयोग केयली जिन । (१) मिथ्यात्व गुणस्थान-जब तक अनन्तानुबन्धी कपाय और मिथ्यात्व कर्म का उदय बना रहता है, मिथ्यात्व गुणस्थान रहता है । इस श्रेणी में जीव ससार में लिप्त, इन्द्रियों के दास, बहिरात्मा, आत्मा की श्रद्धा रहित, अहकार ममकार में फसे रहते हैं। शरीर को ही आत्मा मानते हैं। प्राय ससारी जीव इसी श्रेणी में हैं। इस श्रेणी से जीव तत्वज्ञान प्राप्तकर जब सम्यग्दृष्टी होता है, तब अनन्तानुबंधी चार कषाय तथा मिथ्यात्व कर्म का उपशम करके उपशम सम्यग्दृष्टि होता है । यह उपशम अर्थात् उदय को दबा देना एक अन्तर्मुहूर्त अधिक के लिये नहीं होता है। उपशम सम्यक्त के होनेपर मिथ्यात्व कर्म के पुद्गल तीन विभागों में हो जाते हैं-मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त मोहनीय । अतमुहूर्त के होते होते कुछ काल शेष रहते हुए यदि एक दम से अनन्तानुबधी कपाय का उदय आजाता है और मिथ्यात्व का उदय नहीं होता है तो यह जीव उपशम सम्यक्त में प्राप्त अविरत सम्यक्त गुणस्थान से गिरकर दूसरे सासादन गुणस्थान में आजाता है, वहा कुछ काल ठहर कर फिर मिथ्यात्व में पहले गुणस्थान में आजाता है । यदि कदाचित् मिथ्यात्व का उदय आया तो चौथे से एकदम पहले गुणस्थान मे आजाता है। यदि सम्यग्मिथ्यात्व का उदय आगया तो चौथे से तीसरे मिश्र गुणस्थान मे आजाता है। यदि उपशम सम्यक्ती के सम्यक्त मोहनीय का उदय आगया तो उपशम सम्यक्त से क्षयोपशम या वेदक सम्यक्ती हो जाता है। गुणस्थान चौथा ही रहता है। (२) सासादन गुणस्थान--चौथे से गिरकर होता है, फिर मिथ्यात्व मे नियम से गिर पडता है । यहा चारित्र की शिथिलता के भाव होते है। (३) मिश्र गुणस्थान- चौथे से गिरकर या पहले से भी चढकर होता है। यहां सम्यक्त और मिथ्या- त्व के मिश्र परिणाम दूध और गुड़ के मिश्र परिणाम के समान होते हैं । सत्य अमत्य श्रद्धान मिला हुआ होता है । अत मुहूर्त रहता है फिर पहले में आता है या चौथे में चढ़ जाता है । (४) अविरत सम्यक्त- इस गुणस्थान में उपशम सम्यक्ती अतर्मुहूर्त ठहरता है । क्षयोपशम सम्यक्ती ठहरता है । जो अनन्तानुबधी कषाय व दर्शन मोहनीय की तीनों प्रकृतियों का क्षय कर डालता वह क्षायिक सम्यक्ती होता है । क्षायिक सम्यक्त कभी नहीं छूटता है । क्षयोपशम सम्यक्त मे सम्यक्त मोहनीय के उदय से मलीनता होती है। इस श्रेणी मे यह जीव महात्मा या अतरात्मा हो जाता आत्मा रूप जानता है, ससार को कर्म का नाटक समझता हैं । अतीन्द्रिय सुख का प्रेमी हो जाता है, गृहस्थी मे रहता हुआ असि मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प या विद्या कर्म से आजीविका करता है, राज्य प्रबन्ध करता है, अन्यायी शत्र को दमनार्थ युद्ध भी करता है । यह व्रतों को नियम से नहीं पालता है इस लिये इसको अविरत कहते हैं । तथापि दमके चार लक्षण होते हैं-( १ ) प्रशम-शात भाव, ( २ ) सवेग- धर्मानुराग-ससार मे वैराग, (३) अनुकम्पा दया, (४) आस्तिक्य-प्रात्मा व परलोक मे विश्वास । इस श्रेणी अधिक भी है । है। । प्रात्मा को २०८] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । वाले के छहों लेश्याए हो सकती है । सर्व ही सैनी पचेन्द्रिय तिर्यच, मनुष्य, देव, नारकी इस गुणस्थान को प्राप्त कर सकते हैं। यही दजी मोक्ष मार्ग का प्रवेशद्वार है । यह प्रवेशिका की कक्षा है। इस गुणस्थान का काल क्षायिक व क्षयोपशम की अपेक्षा बहुत है। (५) देश विरत--जब सम्यक्ती जीव के अप्रत्याख्यानावरण कपाय का उदय नहीं होता है और प्रत्या- ख्यानावरण कपाय का क्षयोपशम या मद उदय होता है तो श्रावक के व्रतों को पालता है । एक देश हिंसा असत्य, चोरी, कुशील व परिग्रह से विरक्त रहता है। पांच अणुव्रत, तथा सात शीलों को पालता हुआ साधुपद ही की भावना भाता है । इस चारित्र का वर्णन आगे करेंगे । इस गुणस्थान में रहता हुआ श्रावक गृही कार्य को करता है व धीरे धीरे चारित्र की उन्नति करता हुआ साधुपद में पहुंचता है । इसका काल कम से कम अन्तर्मुहूर्त व अधिक से अधिक जीवन पर्यंत है । इस श्रेणी को पचेन्द्रि सैनी पशु तथा मनुष्य धार सकते हैं । छठे से लेकर सब गुणस्थान मनुष्य ही के होते है। (६) प्रमत्त विरत--जब प्रत्याख्यानावरण कपाय का उपशम हो जाता है तब अहिंसादि पांच महाव्रतों को पालता हुआ महाव्रती महात्मा हो जाता है । यह हिंसादिका पूर्ण त्याग है इससे महाव्रती है तथापि इस गुणस्थान में आहार, विहार, उपदेशादि होता है। इससे पूर्ण आत्मस्थ नहीं है अतएव कुछ प्रमाद है इसीसे इसको प्रमत्तविरत कहते है, इसका काल अन्तर्मुहूर्त से अधिक नहीं है । (७) अप्रमत्त विरत-जब महाव्रती ध्यानस्थ हो जाता है, प्रमाद विलकुल नहीं होता है तब इस श्रेणी मे होता है । इसका काल भी अतर्मुहूर्त से अधिक नहीं है । महाव्रती पुनः पुनः इन छठे सातवें गुणस्थानों में आता जाता रहता है। आठवें गुणस्थान से दो श्रेणियां हैं-एक उपशम श्रेणी, दूसरी क्षपक श्रेणी । जहा कषायो को उप- शम किया जावे, क्षय न किया जावे वह उपशम श्रेणी है, जहा कपायो का क्षय किया जावे वह क्षपक श्रेणी है । उपशम श्रेणी में आठवा नौमा, दशमा व ग्यारहवां गुणस्थान तक होता है, फिर नियम से धीरे २ गिर कर सातवें मे आजाता है। क्षपक श्रेणी के भी चार गुणस्थान है-आठवां, नौमा, दशवां व बारहवां । क्षपकवाला ११ वे को स्पर्श नहीं करता है, बारहवे से तेरहवे में जाता है। (८) अपूर्व करण--यहां ध्यानी महाव्रती महात्मा के अपूर्व उत्तम भाव होते है, शुक्ल ध्यान होता है, अन्तर्मुहूर्त से अधिक काल नहीं है । (E) अनिवृत्तिकरण-यहां ध्यानी महात्मा के बहुत ही निर्मलभाव होते हैं, शुक्लध्यान होता है । ध्यान के प्रताप से सिवाय सूक्ष्म लोभ के सर्व कषायों को उपशम या क्षय कर डालता है, काल अन्तर्मुहूर्त से अधिक नहीं है। (१०) सूक्ष्म सांपराय-यहा ध्यानी महात्मा के एक सूक्ष्म लोभका ही उदय रहता है, उसका संयम भी अतमुहूर्त से अधिक नहीं है । (११) उपशांत मोह-जब मोह कर्म विलकुल दब जाता है तब यह कक्षा अंतर्मुहूर्त के लिये होती है । यथाख्यात चारित्र व आदर्श वीतरागता प्रगट हो जाती है।
सहज-सुख-साधन । [२०९ (१२) क्षीणमोह-मोह का बिलकुल क्षय क्षपक श्रेणीद्वारा चढ़ते हुए दश गुणस्थान में हो जाता है तब सीधे यहा आकर 'प्रतमुहर्त ध्यान मे ठहरता है। शुक्ल ध्यान के बल से ज्ञानावरण, दर्शनावरण, और अंतरायकर्मों का नाश कर देता है और तब केवलज्ञान का प्रकाश होते ही अरहंत परमात्मा कहलाता । गुणस्थान तेरहवां हो जाता है। (१३) सयोगकैवली जिन-अरहत परमात्मा चार घातीयकर्मों के क्षय होने पर अनतज्ञान, अनत- दर्शन, अनतवीर्य, अनंतदान, अनतलाभ, अनतभोग, अनतउपभोग, क्षाधिक सम्यक्त, क्षायिक चारित्र इन नौ केवललब्धियों से विभूपित हो जन्मपर्यंत इस पद में रहते हुए, धर्मोपदेश देते हुए विहार करते हैं, इंद्रादि भक्तजन बहुत ही भक्ति करते हैं। (१४) अयोगकेवली जिन-अरहत की -अरहत की आयु मे जब इतनी देर ही रह जाती है जितनी देर अ, इ, उ, ऋ. ल ये पाच लघु अक्षर उच्चारण किये जाय तब यह गुणस्थान होता है। आयु के अत मे शेप अघातीय आयु, नाम, गोत्र, वेदनीय का मी नाश हो जाता है और यह आत्मा सर्व कर्मरहित होकर सिद्ध परमात्मा हो जाता है। जैसा भुना चना फिर नहीं उगता वैसे ही सिद्ध फिर ससारी नहीं होते है । चौदह जीव समास, चौदह मार्गणा, चौदह गुणस्थान, ये सब व्यवहार या अशुद्धनय से ससारी जीवो में होते है। जीवसमास एक काल में एक जीव के एक ही होगा, विग्रहगति का समय अपर्याप्त में गर्भित है। मार्गणाएं चौदह ही एक साथ होती है जैसा दिखाया जा चुका है । गुणस्थान एक जीव के एक समय में एकही होगा। (८) सिद्ध-सर्व कर्म रहित सिद्ध परमात्मा ज्ञानानन्द मे मगन रहते हुए आठ कर्मो के नाश से आठ गुण सहित शोभायमान रहते है। वे आट गुण हैं ज्ञान, दर्शन, सम्यक्त, वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अगुरुलधुत्व, अव्यावाधत्व । अर्थात सिद्धो मे अतीन्द्रियपना है, इन्द्रियों से ग्रहण योग्य नहीं हैं। जहा एक सिद्ध विराजित है वहां अन्य अनेक सिद्ध अवगाह पासकते हैं, उनमे कोई नीच ऊचपना नहीं है, उनको कोई बाधा नहीं दे सकता है । वे लोक के अग्रभाग मे लोक शिखर पर सिद्धक्षेत्र में तिष्ठते हैं। (6) ऊगमन स्वभाव-सर्व कमी से रहित होने पर सिद्ध का आत्मा स्वभाव से ऊपर जाता है। जहातक धर्मद्रव्य है वहांतक जाकर अत में ठहर जाता है । अन्य संसारी कर्मबद्ध आत्माए एक शरीर को छोडकर जब दूसरे शरीर में जाते है तब चार विदिशाओ को छोडकर पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर, ऊपर, नीचे इन छः दिशाओं द्वारा सीधा मोड़ा लेकर जाते हैं, कोनों में टेढा नहीं जाते हैं। जीवों की सत्ता सबकी भिन्न भिन्न रहती है । कोई की सत्ता किसी से मिल नहीं सकती है । जीव की अवस्था के तीन नाम प्रसिद्ध हैं - बहिरात्मा, अंतरात्मा, परमात्मा । पहले तीन गुणस्थानवाले जीव बहिरात्मा है । अविरत सम्यक्त चौथे से लेकर क्षीणमोह बारहवे गुणस्थान तक जीव अतरात्मा कहलाता है । तेरहवें व चौदहवें गुणस्थानवाले सकल या सशरीर परमात्मा कहलाते है । सिद्ध शरीर या कल रहित निकल परमात्मा कहलाते हैं । तत्वज्ञानी को उचित है कि बहिरात्मापना छोडकर अतरात्मा हो जावे और परमात्मा पद प्राप्ति का साधन करे । यही एक मानव का उच्च ध्येय होना चाहिये । यह जीव अपने ही पुरुषार्थ से मुक्त होता है । किसी की प्रार्थना करने से मुक्ति का लाभ नहीं होता है । अजीव में-पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल गर्भित हैं। स्पर्श, रस गंध, वर्ण, भय पुद्गल के दो भेद होते हैं-परमाणु और स्कध । अविभागी पुद्गल के को परमाणु कहते है। दो व अनेक परमाणुओं के - - खड -- । २१०] सम्यग्दर्शन और उसका महास्य । मिलने पर जो वर्गणा वनती हैं उनको स्कंध कहते है। स्कों के बहुत से भेद हैं उनके छः मूल भेद जानने योग्य हैं। छः स्कंध भेद-स्थूलस्थूल, स्थूल, स्थूल सूक्ष्म, सक्ष्म स्थूल, सृष्टम, सूक्ष्म सूक्ष्म । जो स्कंध कठोर हों, खंड होने पर बिना दूसरी वस्तु के सयोग के न मिल सके उनको स्थूल स्थूल कहते हैं जैसे लकड़ी, कागज, वस्त्र, आदि । जो स्कघ बहनेवाले हों, अलग किये जाने पर फिर स्वय मिल जावे जैसे पानी, शरबत, दूध आदि उनको स्थूल कहते हैं । जा स्कध देखने मे स्थून दिग्वे परन्तु हाथों से ग्रहण न हो सके उनको स्थूल सूक्ष्म कहते हैं । जैसे धूप, प्रकाश, छाया । जो रकध देखने में न आवे परन्तु अन्य चार इन्द्रियों से ग्रहण हो उनको सूक्ष्म स्थूल कहते हैं, जैसे हवा, शब्द, गध रस । जो स्कंध बहुत से परमाणुओ के स्कध हो परन्तु किसी भी इन्द्रिय से प्राण मे न आवे उन्हें सूक्ष्मस्कंध कहते हैं जैसे- भाषावर्गणा, तैजसवर्गणा, मनोवर्गणा, कार्माणवर्गणा श्रादि । जो स्कध सर्व से सूक्ष्म हो जैसे दो परमाणु का स्कध उसे सूक्ष्म सूक्ष्म कहते है। जीव और पुद्गल का सयोग ही समारी आत्मा की अवस्था है। सर्व पुद्गल का ही पसारा है । यदि पुद्गल को निकाल डाले तो हरएक जीव शुद्ध दिखेगा इमी से शुद्ध निश्चयनय से सर्व जीव शुद्ध है । संसार में जीव और पुद्गल अपनी शक्ति से चार काम करते है-चलना, ठहरना, अवकाश पाना और बदलना । हर एक कार्य उपादान और निमित्त दो कारणों से होता है । जैसे मोने की अगुठी का उपादान कारण सुवर्ण है परन्तु निमित्त कारण सुनार व उसके यत्रादि हैं। इसी तरह इन चार कामो के उपादान कारण जीव पुद्गल है । तब निमित्त कारण अन्य चार द्रव्य है । गमन में सहकारी धर्म है, स्थिति मे सहकारी अधर्म है, अवकाश मे सहकारी आकाश है, बदलने में सहकारी काल द्रव्य है । समय, श्रावली, पल आदि निश्चय काल की पर्याय है, इसी को व्यवहार काल कहते है । जब एक पुद्गल का परमाणु एक कालाणु पर से उल्लंघ कर निकटवर्ती कालाणु पर जाता है तब समय पर्याय पैदा होती है। इन्हीं समयों से प्रावली, घडी आदि काल बनता है । यद्यपि ये छहो द्रव्य एक स्थान पर रहते हैं और एक दूसरे को सहायता देते है तथापि मूल स्वभाव मे भिन्न भिन्न बने रहते हैं, कभी मिलते नहीं है । न कभी छः के सात होते हैं न पाच होते है। अाश्रव और बंध तत्व । कार्माण शरीर के साथ जीव का प्रवाह की अपेक्षा अनादि तथा कर्म पुद्गल के मिलने व छूटने की अपेक्षा शादि सम्बन्ध है । कार्माण शरीर में जो कर्म वधते है उनको बतानेवाले श्राश्रव और बध तत्व हैं। कर्म वर्गणाओं का बध के सन्मुख होने को आश्रव और बध जाने को बध कहते है। ये दोनों काम साथ साथ होते हैं। जिन कारणों से आश्रव होता है उन्हीं कारणों से वध होता है। जैसे नांव में छिद्र से पानी आकर ठहर जाता है वैसे मन, वचन, काय की प्रवृत्ति द्वारा कर्म आते हैं और वधते हैं। साधारण रूप योग और कपाय ही आश्रव व वध के कारण हैं । मन, वचन, काय के हलन चलन से श्रात्मा के प्रदेश सकम्प होते हैं उसी समय आत्मा की योग शक्ति चारों तरफ से कर्म वर्गणाओ को हीच लेती है। योग तीव्र होता है तो अधिक कर्म वर्गणाए आती हैं, योग मद होता है तो कम आती है। योग के साथ कषाय का उदय क्रोध, मान, माया, लोभ किसी का उदय मिला हुआ होता है इसलिये कभी आठ कमी के योग्य कभी सात कर्मों के योग्य वर्गणाए खिचती हैं । यदि कपाय का बिलकुल रंग न मिला हो तो केवल साता वेदनीय कर्म के योग्य वर्गणाए खिचकर पाती है । बंध के चार भेद हैं- , सहज-सुख-साधन । [२११ प्रकृति वंध, प्रदेश वध, स्थिति बंध, अनुभाग बंध । योगों से ही प्रकृति और प्रदेश बंध होते हैं। कपायों से स्थिति और अनुभाग बध होते हैं। मिस २ प्रकृति योग्य कर्म बधते हैं व कितने बंधते हैं यही प्रकृति और प्रदेश बध का अभिप्राय है । जैसे योगो से आते है वैसे ही योगों से ये दोनों बाते हो जाती हैं, जैसे जाना वरण के अमुक सख्या के कर्म बधे, दर्शनावरणा के अमुक संख्या के कर्म बधे । क्रोधादि कषायों की तीव्रता होती है तो आयु कर्म के सिवाय सातो ही कमों की स्थिति अधिक पड़ती है। कितने काल तक कर्म ठहरेंगे उस मर्यादा को स्थिति वध कहते है। यदि कपाय मद होती है तो सात कर्मों की स्थिति कम पडती है । कपाय अधिक होने पर नर्क आयु की स्थिति अधिक व अन्य तीन आयु कर्म की स्थिति कम पडती है । कपाय भेद होनेपर नर्क आयु की स्थिति कम व अन्य तीन श्रायु की स्थिति अधिक पड़ती है। कमों का फल तीव्र या मद पड़ना इसको अनुभाग बन्ध कहते हैं। जब कपाय अधिक होती है तव पाप कमी में अनुभाग अधिक व पुण्य कर्मों में अनुभाग कम पड़ता है। जब कषाय मद होती है तव पुण्य कर्मों में अनुभाग अधिक व पाप कमा मे अनुभाग कम पड़ताहै । पुण्य पाप कर्म-आठ कर्मो मे से साता वेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम व उच्च गोत्र पुण्य कर्म है जव कि अमाता वेदनीय, अशुभ आयु, अशुभ नाम, नीच गोत्र, तथा ज्ञानावरणादि चार घातीय कर्म पाप कर्म हैं। योग और कपाय सामान्य से आश्रय और वध के कारण हैं। आश्रव और बध के विशेष कारण-पांच है-मिथ्यात्व, अरति, प्रमाद, कपाय और योग । (१) मिथ्यात्व पांच प्रकार सच्चा श्रद्धान न होकर जीवादि तत्वों का मिथ्या श्रद्धान होना मिथ्या- स्व है। यह पाच प्रकार है- (१) एकांत-आत्मा व पुद्गलादिक द्रव्यों मे अनेक स्वभाव हैं उनमें से एक ही स्वभाव है ऐसा हठ पकडना सो एकांत मिथ्यात्व है । जैसे-द्रव्य मूल स्वभाव की अपेक्षा नित्य है । पर्याय पलटने की अपेक्षा अनित्य हैं । नित्य अनित्य रूप वस्तु है ऐमा न मानकर यह हठ करना कि वस्तु नित्य ही है या अनित्य ही है सो एकात मिथ्यात्व है या यह संसारी श्रात्मा निश्चय नय की अपेक्षा शुद्ध है, व्यवहार नय की अपेक्षा अशुद्ध है ऐसा न मानकर इसे सर्वथा अशुद्ध ही मानना या इसे सर्वथा शुद्ध ही मानना एकान्त मिथ्यात्व है । । विनय -धर्म के तत्वों की परीक्षा न करके कुतत्व व सुतत्व को एक समान मान के आदर करना घिनय मिथ्यात्व है । जैसे-पूजने योग्य वीतराग सर्वज्ञ देव हैं । अल्पज्ञ रागी देव पूजने योग्य नहीं है तो भी सरल भाव से विवेक के बिना दोनों की भक्ति करना विनय मिथ्यात्व है। जैसे-कोई सुवर्ण और पीतल को समान मान के आदर करे तो वह अज्ञानी ही माना जायगा । उसको सुवर्ण के स्थान में पीतल लेकर धोखा उठाना पड़ेगा, सच्ची सम्यक्त भाव रूप आत्म प्रतीति उसको नहीं हो सकेगी। अज्ञान-तत्वो के जानने की चेष्टा न करके देखादेखी किसी भी तत्व को मान लेना अज्ञान मिथ्यात्व है । जैसे-जल स्नान से धर्म होता है, ऐसा मानकर जल स्नान भक्ति से करना अज्ञान मिथ्यात्व है । संशय- कुतत्व की तरफ निर्णय न करके सशय मे रहना कौन ठीक है कौन ठीक नहीं है एक तरफ निश्चय न करना सशय मिथ्यात्व है । किसी ने कहा राग द्वेप जीव के हैं, किमी ने कहा पुद्गल के हैं । सशय रखना कि दोनो मे कौन ठीक है सो सशय मिथ्यात्व है। सुतत्व और ऐमा २१२] सम्यगर्शन 'श्रीर उमा महात्म्य । विपरीत-जिसमे धर्म नहीं हो सकता है उसको धर्म मान लेना विपरीत मिथ्यात्य है । जैसे पशुबलि करने को धर्म मान लेना। (३) अदिति भाव-इसके बारह भेट भी है और पान भेट भी है। पांच इन्द्रिय और मनको वश मे न रखकर उनका दाल होना तथा पृची 'ग्रादि छकाय के प्राणियों की रक्षा के भाव न करना इस तरह वारह प्रकार अविरत भार है । 'अथवा हिंमा, 'यसत्य, पोरी, गुशील नीर परिग्रह मृा ये पांच पाप अविरनि भाव है। (४) प्रमादप्रात्मानुभव में धर्माचान में श्रालय करने को प्रमाद काने हैं। उनके अम्मी (८ भेद है- चार विकथा ४ चार कपाय x पाचन्द्रिय x १ ५ १ निद्रा चार विकथा-ली, भोजन, देश, राजा । गा बढानेवानी वियों के स्प, मौन्दर्य, हावभाव, विभ्रम, संयोग, वियोग की चर्चा करना ची विकया है। राग बढाने वाली, गोजना के मरम नीरन पाने पीने व चबाने श्रादि की चर्चा करना मोजन विगया है। देश में लूटपाट, मारपीट, जू या, चोरी, व्यभिचार व नगरादि की सुन्दरता सम्बन्धी रोगप बढानेपानी तथा परना, देश विस्था है । रानात्रों के रूप की, रानियों की विभूति की, मेना की, नोकर चाकर 'यादिती गग बढ़ानेवानी कया करना राजा विकथा है। हरक प्रमाद भाव में एक विकया, एक कपाय, इन्द्रिय, एक स्नेह व एक निद्रा के लय का सम्बन्ध होता है । इसलिये प्रमाद के 10 भट हो जाने से पुष्प घने की इच्छा होना एक प्रमाद- भाव है । इसमें भोजन कथा (इदियभोग सबधी कथा भोजनकथा में गर्भित है), लोभ कपाय, ब्राणइन्द्रिय, स्नेह व निद्रा ये पांच भाव मयुक्त है। किमी ने किमी सुन्दर वस्तु को देखने में अंतराय किया उमपर बोध करके कष्ट देने की इच्छा हुई । इम प्रमाद भाव में भोजनकथा, क्रोधकपाय, चइन्द्रिय, स्नेह और निद्रा गभित है (४) कपाय-के २५ भेद है जो पहले गिना चुके है। (५) योग-के तीन या १५ भेट हैं जो पहले गिना चुके हैं। चौदह गुणस्थानों की अपेक्षा प्राश्रय बंध के कारण-मिथ्यात्व गुणस्थान मे मिथ्यात्व, अविरत, मे- प्रमाद, कपाय, योग पाचो ही कारण है जिनमे कर्म का बंध होता है । सासादन गुणस्थान मिथ्यात्व नहीं है शेप मर्व कारण हैं। मिश्र गुणस्थान में-अनतानुवधी चार कपाय भी नहीं हैं, मिश्रभाव सहित अविरत, प्रमाद कपाय व योग है। अविरत सम्यक्त गुणस्थान में न मिथ्यात्व है, न. मिमगाव है, न अनन्तानुवधी कपाय हैं । शेप अविरत प्रमाद, कपाय व योग शेप है । में- -एक देशव्रत होने से अविरत भाव कुछ घटा तथा अप्रत्याख्यानावरण कपाय भी छूट गया। शेप अविरत प्रमाद, कपाय व योग वध के कारण है। छठे प्रमत्त गुणस्थान में महाव्रती होने से अविरत भाव विलकुल छूट गया तथा प्रत्याख्यानावरण कपाय भी नह रहा। यहा शेप प्रमाद, कपाय व योग शेप हैं। - - देश विरत गुणस्थान महज-सुख-साधन। अप्रमत्त गुणस्थान में प्रमाद भाव नहीं रहा, केवल कपाय व योग हैं अपूर्वकरण में भी कपाय व योग है परन्तु अतिमद है। अनिवृत्तिभरण नौमे गुणस्थान में-हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा नो कपाय नहीं हैं। सज्वलन चार कपाय व तीन वेद अति मन्द हैं। सूक्ष्मसांपराय में केवल सूक्ष्म लोभ कपाय और योग हैं। उपशांत मोह, क्षीणमोह तथा संयोग केवली जिन इन तीन गुणस्थानों में केवल योग है। चौदहवे मे योग भी नहीं रहता है। इस तरह बंधका कारणभाव घटता जाता है। कर्मों का फल कैसे होता है-कर्म का जब बध हो चुकता है तब कुछ समय उनके पकने मे लगता है, उम समय को प्रावधाकाल कहते है। यदि एक कोड़ाकोड़ी सागर की स्थिति पडे तो एकसौ वर्प पकने में लगता है। इसी हिसाब से कम स्थिति कम समय लगता है। किन्ही कमी के आवाधा एक पलक मात्र समय ही होती है, बधने के एक प्रावली के पीछे उदय आने लगते है। पकने का समय पूर्ण होनेपर जिस कर्म की जितनी स्थिति है उस स्थिति के जितने समय ( Instants या Minutest moments) है उतने समया में उम किमी कर्म के स्कध वट जाते है । बटवारे मे पहले पहले समयों मे अधिक कर्म व आगे आगे कम २ कर्म आते है। अतिम समय में सबसे कम आते हैं । इस वटवारे (Distribution) के अनुमार जिस समय जितने कम पाते हैं उतने कर्म अवश्य झड जाते हैं, गिर जाते हैं । यदि बाहरी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव अनुकूल होता है तो फल प्रगट करके झडते हैं नहीं तो बिना फल दिये झड़ जाते हैं। जैसे किमी ने क्रोध कपाय रूपो कर्म ४८ मिनिट की स्थिति का वाधा और एक मिनिट पकने में लगा और ४७०० कर्म हैं। तो वे कर्म ४७ मिनिट मे वट जाते हैं। जैसे ५००, ४००, ३००, २००, १०० इत्यादि रूप से तो ये क्रोध कपाय के स्कध इमी हिसाब से झड जायगे। पहले मिनिट में ५०० फिर ४०० इत्यादि । यदि उतनी देर कोई सामायिक एकान्त में बैठकर कर रहा है तो निमित्त होने से क्रोध के फल को बिना प्रगट किये हुए वे कर्म गिर जायगे। यदि किन्हीं क्रोध कर्मो का बल तीव्र होगा तो कुछ द्वेष भाव किमी पर आजायगा। यदि मढ होगा तो कुछ भी भावो में विकार न होगा बधे हुए कर्मों में परिवर्तन-एक दफे कर्म का बध होजाने पर भी उनमें तीन अवस्थाए पीछे से हो मकती हैं-संक्रमण-पाप कर्म को पुण्य में बपुण्य को पाप मे बदलना । उत्कर्षण-कर्मों की स्थिति व अनुभाग को पढ़ा देना । अपकर्पण कमी की स्थिति व अनुभाग को घटा देना । यदि कोई पाप कर्म कर चुका और वह उसका प्रतिक्रमण (पश्चाताप) वडे ही शुद्ध भाव से करता है तो पाप कर्म पुण्य में बदल सकता है या पाप कर्म की स्थिति व अनुभाग घट सकता है । यदि किसी ने पुण्य कर्म वांधा है पीछे वह पश्चाताप करता है कि मैंने इतनी देर शुभ काम में लगा दी इमसे मेरा व्यापार निकल गया तो इन भावों से बंधा हुआ पुण्य कर्म पापकर्म हो सकता है या पुण्यकर्म का अनुभाग घट सकता है व स्थिति बढ़ सकती है। जैसे औपधि के खाने से भोजन के विकार मिट जाते, कम हो जाते व बल बढ जाता इसी तरह परिणामो द्वारा पिछले पाप व पुण्य कर्म में परिवर्तन हो जाता है । इसलिये बुद्धिमान पुरुष को सदा ही अच्छे निमित्तो मे, सत्संगति में, किसी सच्चे गुरू की शरण में रहकर अपने भावों को उच्च बनाने के लिये ध्यान व स्वाध्याय में लीन रहना चाहिये । कुमगति से व कुमार्ग से बचना चाहिये । । है २१४] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । भविष्य की आयु कर्म का बंध कैसे होता है-हम मानवों के लिये यह नियम है कि जितनी भोगने- वाली आयु की स्थिति होगी उसके दो तिहाई बीत जाने पर पहली दफे अंतर्मुहूर्त के लिये वध का समय होता है । फिर दो तिहाई बीतने पर दूसरी दफे, फिर दो तिहाई चीतने पर तीसरी दफे, इस तरह दो तिहाई समय के पीछे पाठ दफे ऐसा अवसर प्राता है। यदि इनमे भी नहीं वधे तो मरने के पहले तो श्रायु वधती ही है। मध्यम लेश्या के परिणामों से श्रायु वधती है । ऐसे परिणाम उस श्रायुबंध के काल में नहीं हुए तो आयु नहीं बधती है । एक दफे बंध जाने पर दूसरी दफे फिर बध काल आने पर पहली बंधी आयु की स्थिति कम व अधिक हो सकती है। जैसे किसी मानव की ८१ वर्ष की श्रायु है तो नीचे प्रमाण पाठ दफे आयुबंध का काल अायगा - (१) ५४ वर्ष बीतने पर २७ वर्प शेप रहने पर or ७८ ३ " " or . (२) (३) (४) (५) (६) (७) (८) " ८० ८ माम बीतने पर ४ मास ठप रहने पर १० , २० दिन बीतने पर ४० दिन शेष रहने पर ११ ,, १६ दिन १६ घटे बीतने पर १३ दिन ८ घटे रहने पर ११ २५ दिन १४ " ८० ४ संवर और निर्जरा तत्व। आत्मा के अशुद्ध होने के कारण पाश्रव और वन्ध है, यह कहा जाचुका है । यद्यपि कर्म अपनी स्थिति के भीतर फल देकर व बिना फल दिये झड़ते हैं तथापि अज्ञानी मिथ्याष्टि जीव कमी भी रागद्वेप मोह से खाली नहीं होता है, इसमे हर समय कमी का वध करता ही रहता है । अज्ञानी के कर्म की निर्जरा हाथी के स्नान के समान है । जैसे हाथी एक दफे तो सूड से अपने ऊपर पानी डालता है फिर रज डाल लेता है वैसे अज्ञानी के एक तरफ तो कर्म झड़ते हैं, दूसरी तरफ कर्म बंधते हैं । अज्ञानी के जो सुख या दुःख होता है या शरीर, स्त्री, पुत्र, पुत्री, धन, परिवार, परिग्रह का सम्बन्ध होता है उसमें वह आसक्त रहता है, सुख में बहुत रागी दु.ख मे बहुत द्वेपी हो जाता है। इस कारण उसके नवीन कमी का बन्ध तीव्र हो जाता है । ज्ञानी सम्यग्दृष्टि जीव ससार शरीर व मोगों से वैरागी होता है। वह पुण्य के उदय में व पाप के उदय में सम भाव रखता है, श्रासक्त नहीं होता है इससे । उसके कर्म झड़ते बहुत हैं तथा सुव्व मे अल्प राग व दुख में अल्प द्वेष होने के कारण नवीन का का बध थोड़ा होता है । चौदह गुणस्थानों में चढते हुए जितना जितना वध का कारण हटता है उतना उतना जो बंध पहले होता था उसका सवर हो- जाता है तथा ज्ञानी सम्यग्दृधी जितना जितना प्रात्म मनन व आत्मानुभव का अभ्यास करता है उसके रत्नत्रयमय भात्र के प्रताप प्रचुर कों की निर्जरा होती है । कमी की स्थिति घटती जाती है। पापकर्म का अनुभव बढता जाता है, पापकर्म बहुत शीघ्र झड़ जाते हैं। पुण्य कर्म में अनुभाग बढ जाता है वे भी फल देकर या फल दिये विना झड जाते हैं।
महज-सुख-साधन । [२१५ जिन भावों से कर्म बंधते है उनके विरोधी भावों से कर्म रुकते हैं। श्राश्रव का विरोधी ही संवर है। मिथ्यात्व के द्वारा आते हुए कमी को रोकने के लिये सम्यग्दर्शन का लाभ करना चाहिये । अविरति के द्वारा आनेवाले कमों को रोकने के लिये अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, परिग्रह त्याग इन पांच व्रतों का अभ्यास करना चाहिये । प्रमाद के रोकने के लिये चार विकथा को त्यागकर उपयोगी धार्मिक व परोप- कारमय कार्यों में दत्तचित रहना चाहिये । कपायों को हटाने के लिये प्रात्मानुभव व शास्त्र पठन व मनन, तत्वविचार व क्षमाभाव, मार्दवभाव, आर्जवभाव, सतोपभाव का अभ्यास करना चाहिये । योगों को जीतने के लिये मन, वचन, काय को थिर करके आत्मध्यान का अभ्यास करना चाहिये । सबरतत्व का सामान्य कथन इस प्रकार है:- विशेष विचार यह है कि जो अपना सच्चा हित करना चाहता है उसको अपने परिणामों की परीक्षा सदा करना चाहिये । तीन प्रकार के भाव जीवो के होते हैं- अशुभोपयोग, शुभोपयोग, शुद्धोपयोग । अशुभोपयोग से पापकमी का, शुभोपयोग से पुण्यकमा का बन्ध होता है। परन्तु शुद्धोपयोग से कमी का क्षय होता है । इसलिये विवेकी को उचित है कि अशुभोपयोग से बचकर शुभोपयोग में चलने का अभ्यास करे । फिर शुभोपयोग को भी हटाकर शुद्धोपयोग को लाने का प्रयत्न करे । ज्ञानी को भी सदा जागृत और पुरुषार्थी रहना चाहिये । जैसे साहूकार अपने घरमे चोरों का प्रवेश नहीं चाहता है, अपनी सम्पत्ति की रक्षा करता है उसी तरह जानी को अपने प्रात्मा की रक्षा बंधकारक भावो से करते रहना चाहिये व जिन जिन अशुभभावों की टेव पड गई हो उनको नियम या प्रतिज्ञा के द्वारा दूर करते चला जावे । जुआ खेलने की, तास खेलने की, चौपड खेलने की, सतरज खेलने की, भांग पीने की, तम्बाकृ पीने की, अफीम खाने की. वेश्यानाच देखने की, कम तौलने नापने की, चोरी के माल खरीदने की, अधिक बोझा लादने की, मिथ्या गवाही देने की, मिथ्या कागज लिखने की, खरी में खोटी मिलाकर खरी कहकर बेचने की दिन में सोने की, अनछना पानी पीने की, रात्रि भोजन करने की, वृथा बकवाद करने की, गाली सहित बोलने की, असत्य भापण की, पर को ठगने की आदि जो जो भूल से भरे हुए अशुभ भाव अपने में होते हों उनको त्याग करता चला जावे तब उनके त्याग करने मे जो पाप का वध होता सो रुक जाता है। प्रतिज्ञा व नियम करना अशुभ भावों से बचने का बड़ा भारी उपाय है । ज्ञानी भेद विज्ञान से आत्मा को सर्व रागादि परभावों से भिन्न अनुभव करता है। मैं सिद्धसम शुद्ध हूँ उसका यह अनुभव परम उपकारी होता है । इस शुद्ध भात्रों की तरफ झुके हुए भावों के प्रताप से उसके नवीन कमी का सवर व पुरातन कमाँ की निर्जरा होती है। सिद्वात मे मवर के साधन व्रत. समिति, गुप्ति, दस धर्म, बारह भावना, बाईस परीषह जय, चारित्र तथा तप को बताया गया है और निर्जरी का कारण तप को कहा गया है । इन सबका कुछ वर्णन आगे किया जायगा । वास्तव में तात्पर्य यह है कि जितना जितना शुद्ध प्रात्मीक भाव का मनन या अनुभव बढ़ता जायगा उतना उतना नवीन कमी का सवर व पुगतन कर्म का क्षय होता जायगा। मोक्ष तत्व । सातवा तत्व मोक्ष है, जब ध्यान के बल से आत्मा सर्व कर्मो से छूट जाता है तब वह अकेला एक आत्म द्रव्य अपनी सत्ता मे रह जाता है इसे ही मोक्ष तत्व कहते है । मोक्ष प्राप्त प्रारमा सिद्धात्मा कहलाते वे परम कृतकृत्य परमात्मा रूप से अपने ज्ञानानद का भोग करते रहते हैं । -- - २१६] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । व्यवहार नय से जीवादि सात तत्व का स्वरूप सक्षेप से कहा गया है जिससे सहज सुख के साधक को पर्याय का ज्ञान हो । रोग का निदान व उपाय विदित हो । निश्चय नय से इस सात तत्वों में केवल दो ही पदार्थ हैं-जीव और अजीव । उनमें से अजीव त्यागने योग्य है । जीव पदार्थ में अपना एक शुद्ध जीव ही ग्रहण करने योग्य है ऐसा जानना व श्रद्धान करना निश्चय नय से सम्यक्त है । जीव और कर्म का सयोग ही ससार है । जीव और कर्म के संयोग से ही आश्रव, बध, संवर, निर्जरा, मोक्ष पांच तत्व बने हैं जैसे- शक्कर और मावा के सम्बन्ध से पांच प्रकार की मिठाई बनाई जावे तब व्यवहार में उस मिठाई को पेडा, बरफी, गुलाब जामुन आदि अनेक नाम दिये जाते हैं परन्तु निश्चय से उनमें दो ही पदार्थ हैं-शक्कर और मावा । इसी तरह आश्रवादि पाच तत्वों में जीव और कर्म दो हैं, उनमें से जीव को भिन्न अनुभव करना ही सम्यग्दर्शन है। सात तत्वों का श्रद्धान व्यवहार सम्यग्दर्शन है । इसी तरह सच्चे देव, सच्चे शास्त्र व सच्चे गुरु का श्रद्धानभी व्यवहार सम्यग्दर्शन है । देव,शास्त्र,गुरु की सहायता से ही पदार्थो का ज्ञान होता है व व्यवहार सम्यक्त का सेवन होता है। ससारी जीवों में जो दोष पाए जाते हैं वे जिनमें न हों वे ही सच्चे देव हैं। अज्ञान व कषाय ये दोष हैं, जिसमें ये न हों. अर्थात् जो सर्वज्ञ और वीतराग हो वही सच्चा देव है । यह लक्षण अरहत और सिद्ध परमात्मा में मिलता है। पहले कहा जा चुका है कि तेरहवे और चौदहवें गुणस्थानवर्ती को अरहत कहते हैं और सर्व कर्मरहित आत्मा को सिद्व कहते हैं । ये ही आदर्श हैं व ये ही नमूना हैं । जिन समान हमको होना है । अतएव इन्हीं को पूज्यनीय देव मानना चाहिये । अरहत द्वारा प्रगट धर्मोपदेश जो जैन आचार्यों के द्वारा ग्रंथों में है वह सच्चा शास्त्र है, क्योंकि उनका कथन अज्ञान और कषायों को मेटने का उपदेश देता है । उन शास्त्रों में एकसा कथन है, पूर्वापर विरोध कथन नहीं है । उन शास्त्रों के अनुसार चलकर जो महाव्रती अज्ञान और कषायों को मेटने का साधन करते हैं वे ही सच्चे गुरु है । इस तरह देव, शास्त्र, गुरु की श्रद्धा करके व्यवहार सम्यक्ती होना योग्य है । व्यवहार सम्यक्त के सेवन से निश्चय सम्यक्त प्राप्त होगा। इसलिये उचित है कि नीचे लिखे चार काम नित्य प्रति किये जावे (१) देव भक्ति, (२) गुरुसेवा, ३) स्वाध्याय, (४) सामायिक । ये ही चार औषधियां हैं जिनके सेवन करने से अनतानुबधी कषाय और मिथ्यात्व कर्म का बल घटेगा । इसलिये श्री जिनेन्द्रदेव अरहत सिद्ध की स्तुति नित्य करनी चाहिये । भावों के जोड़ने के लिये अरहतो की ध्यानमय मूर्ति भी सहायक है । इसलिये मूर्ति के द्वारा ध्यान के भाव का दर्शन करते हुए गुणानुवाद करने से बुद्धि पर शुद्ध भाव रूपी श्रादर्श की छाप पडती है। ससार अवस्था त्यागने योग्य व मोक्षावस्था ग्रहण योग्य भासती जाती है। इसलिये मर्ति के सयोग से या मूर्ति के सयोग बिना जैसा संभव हो अरहत सिद्ध की भक्ति आवश्यक है । गुरू सेवा भी बहुत जरूरी है। गुरु महाराज की शरण मे बैठने से, उनकी शांत मुद्रा देखने से, उनसे धर्मोपदेश लेने से बुद्धिपर भारी असर पड़ता है । गुरु वास्तव में अज्ञान के रोग को मेटने के लिये ज्ञानरूपी अजन की सलाई चला देते हैं जिससे अतरङ्ग ज्ञान की आख खुल जाती है। जैसे पुस्तको के होनेपर भी स्कूल और कालेजों में मास्टर और प्रोफेसरों की जरूरत पड़ती है, उनके बिना पुस्तकों का मर्म समझमें नहीं आता इसी तरह शास्त्रो के रहते हुए भी गुरु की आवश्यकता है। गुरु तत्व का स्वरूप ऐसा समझाते है जो शीघ्र समझ में आ जाता है। इसी लिये गुरु महाराज की सगति करके ज्ञान का लाभ करना चाहिये । उनकी सेवा चैय्यावृत्य करके अपने जन्म को सफल मानना चाहिये । सच्चे गुरु तारणतरण होते है । आप भवसागर से तरते है और शिष्यो को भी पार लगाते हैं। यदि गुरु साक्षात ।
महज-सुख-साधन । [२१७ पैंतीम अक्षर न मिले तो नित्य प्रति उनके गुणों का स्मरण करके उनकी भक्ति करनी चाहिये। तीसरा नित्य काम यह है कि शास्त्रो को पढ़ना चाहिये। जिनवाणी पढ़ने से ज्ञान की वृद्धि होती है, परिणाम शात होते हैं । बुद्धि पर तत्वज्ञान का असर पड़ता है । बडा भारी लाभ होता है । शास्त्रों की चर्चा व मनन से कर्म का भार हलका हो जाता है। जिन शास्त्रो से तत्वों का बोध हो जिनसे अध्यात्मज्ञान विशेष प्रगट हो, उन शास्त्रों का विशेप अभ्यास करना चाहिये । चौथा काम यह है कि प्रात काल और संध्याकाल या मध्यान्हकाल तीन दफे दो दफे या एक दफे एकांत में बैठकर सामायिक करनी चाहिये । जितनी देर सामायिक करे सर्व से रागद्वेष छोड़कर निश्चय- नय से आत्मा को सिद्धसम शुद्व विचारना चाहिये, ध्यान का अभ्यास करना चाहिये। देवपूजा, गुरुभक्ति, शास्त्रस्वाध्याय व सामायिक इन चार कामो को नित्य-भद्विान भावसहित करते रहने से व इन्द्रियों पर स्वामित्व रखते हुए, नीतिपूर्वक प्राचार करते हुए, ससार शरीर भोगो से वैराग्य- भाव रखते हुए यकायक ऐमा समय आजाता है कि सामायिक के समय परिणाम उतने निर्मल व आत्मप्रेमी हो जाते है कि अनतानुवधी कपाय का और मिथ्यात्व का उपशम होकर उपशम सम्यक्त का लाभ हो जाता 1 अभ्यास करनेवाले को इस णमोकार मत्र पर ध्यान रखना चाहिये। णमो अरहताणं-सात अक्षर णमो सिद्धाण-पाच अक्षर णमो आइरियाणं-सात अक्षर णमो उवज्झायाण-सात अक्षर णमो लोए सव्यसाहूण-नव अक्षर अर्थ-इस लोक मे सर्व अरहतों को नमस्कार हो, इस लोक मे सर्व सिद्धों को नमस्कार हो, इस लोक में सर्व प्राचार्यों को नमस्कार हो, इस लोक में सर्व उपाध्यायों को नमस्कार हो, इस लोक मे सर्व माधुओं को नमस्कार हो, महाव्रती साधुओं में जो सब के गुरु होते हैं उनको आचार्य कहते हैं। जो साधु शास्त्रों का पठन पाठन मुख्यता से कराते हैं उनको उपाध्याय कहते हैं । शेप साधु सज्ञा मे हैं। १०८ दफे पैंतीस अक्षरों का णमोकार मत्र जपे या नीचे लिखे मन्त्र जपे। अईसिद्धाचार्योपाव्यायसर्वसाधुभ्यो नमः "-सोलह अक्षरी। अरहतसिद्ध-छः अक्षरी । असिआउसा-पांच अक्षरी । अरहत-चार अक्षरी। सिद्ध, ओह्रीं, सोह-दो अक्षरी । ॐ-एक अक्षरी। जिस समय सम्यग्दर्शन का प्रकाश होता है मानो सूर्य की किरण का प्रकाश होता है । सर्व अन्नान व मिथ्यात्व का अंधेरा व अन्याय चारित्र का अभिप्राय भाग जाता है । सम्यग्दर्शन के होते ही रत्नत्रय प्रगट होते हैं । नान सम्यग्ज्ञान होता है व स्वरूपाचरण चारित्र अनन्तानुबधी कषाय के उपशम से प्रगट हो जाता है । सम्यक्त के प्रगट होते ममय स्वानुभव दशा होती है, उसी समय अपूर्व अतीन्द्रिय प्रानन्द कालाभ होता - २१८] सम्यग्दर्शन और उनका महात्म्य । है । उस सहज सुख का बोध होते ही-भले प्रकार अनुभव होते ही इद्रिय सुख तुच्छ है यह प्रतीति दृढ होती है। सम्यक्त होते ही वह ससार की तरफ पीठ दे लेता है और मोक्ष की तरफ मुख कर लेता है । अव से सम्यक्ती की सर्व क्रियाए ऐसी होती हैं जो आत्मोन्नति मे बाधक न हो । वह अपने आत्मा को पूर्ण ब्रह्म, परमात्मा रूप वीतरागी ज्ञाता हा अनुभव करता है । सर्व मन, वचन, काय की क्रिया को कर्म पुद्गल जनित जानता है । यद्यपि वह व्यवहार मे यया योग्य अपनी पदवी के अनुसार धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष पुरुपायों की सिद्धि करता है तथापि वह यह जानता है कि यह सब व्यवहार आत्मा का स्वभाव नहीं कर्म का नाटक है। मन, वचन, काय की गुप्ति न होने से स्वानुभव में सदा रमण न होने से करना पड़ता है । वह सम्यक्त्ती व्यवहार चारित्र को भी त्यागने योग्य विकल्प जानता है । यद्यपि उसे मन को रोकने के लिये व्यवहार चारित्र की शरण लेनी पडती है तो भी वह उसे त्यागने योग्य ही समझता है । जैसे ऊपर जाने के लिये सीढ़ी की जरूरत पडती है परन्तु चढ़नेवाला सीढ़ी से काम लेते हुए भी सीढ़ी को त्यागने योग्य ही समझता है । और जब पहुंच जाता है सीढी को त्याग देता है । सम्यक्ती अपने आत्मा को न बंध में देखता है न उसे मोक्ष होना है ऐसा जानता है । वह आत्मा को आत्म द्रव्य रूप शुद्ध सिद्धसम ही जानता है बन्ध व मोक्ष की सर्व कल्पना मात्र व्यवहार है, कर्म की अपेक्षा से है । आत्मा का स्वभाव बन्ध व मोक्ष के विकल्प से रहित है । निश्चय नय से आत्मा आत्मारूप ही है । आत्मा ही सम्यग्दर्शन रूप है । जब निश्चय नय से मनन होने मे प्रमाद आता है तब माधक व्यवहार नय से सात तत्वों का मनन करता है या देव पूजा, गुरु भक्ति, स्वाध्याय तथा सामायिक का आरम्भ करता है। इन व्यवहार साधनों को करते हुए भी सम्यक्ती की दृष्टि निश्चय नय पर रहती है । जब निश्चय नयका आलम्बन लेता है,शुद्ध आत्माका ही मनन करता है । जव मनन करते २ स्वानुभव मे पहुँच जाता है तब निश्चय तथा व्यवहार दोनों का पक्ष छूट जाता है। सम्यक्ती सदा सुखी रहता है । उसको सहज सुख स्वाधीनता से जब चाहे तब मिल जाता है । सांसा- रिक सुख व दु ख उसके मनको सम्यक्त से नहीं गिराते है । वह इनको धूप व छाया के समान क्षणभगुर जानकर इनमे मसत्व नहीं करता है । जीव मात्र के साथ मैत्री भाव रखता हुआ यह सम्यक्ती अपने कुटुम्ब की आत्माओं को भी आत्मा रूप जानकर उनका हित विचारता है । उनके साथ अन्ध मोइ नहीं रखता उनको आत्मोन्नति के मार्ग मे लगाता है, उनके शरीर की भले प्रकार रक्षा करता है। दुःखी के दुःख को शक्ति को न छिपाकर दूर करता है, वह करुणा भावना भाता रहता है। दूसरे प्राणियो के दुःखों को देखकर मानों मेरे ही ऊपर ये दुःख हैं ऐसा जानकर सकम्प हो जाता है और यथा शक्ति दुखों के दूर करने का प्रयत्न करता है । गुणवानो को देखकर प्रसन्न होता है, उनकी उन्नति चाहता है व आगे उनके समान उन्नति करने की उत्कठा करता है । जिनके साथ अपनी सम्मति किसी तरह नहीं मिलती है उनके ऊपर द्रुप भाव नहीं रखता है, किन्तु माध्यस्थ भाव या उपेक्षाभाव रखता है। जगत मात्र के प्राणियों का हितैषी सम्यक्ती होता है । लाभ मे हर्प हानि में शोक नहीं करता है। गुणस्थान के अनुमार कपाय के उदय जावे तो भी वह अज्ञानी मिथ्यादृष्टी की अपेक्षा बहुत ही अल्प होता है। सम्यक्ती सदा निराकुल रहना चाहता है । वह ऐसा कर्जा नहीं लेता है जिसे वह सुगमता से चुका न सके । पुत्रादि के विवाह मे वह अाम- दनी को देखकर खर्च करता है । अनावश्यक खर्च को रोकता है। बहुधा सम्यक्ती जीव आमदनी के चार भाग करता है। एक भाग नित्य खर्च मे, एक भाग विशेष खर्च के लिये, एक भाग एकत्र रखने के लिये, एक भाग दान के लिये अलग करता है। यदि दान मे चौथाई अलग न कर सके तो मध्यम श्रेणी में छठा या आठवा भाग तथा जघन्य श्रेणी में दशवा भाग तो निकालता ही है और उसे श्राहार, औषधि, अभय तथा शास्त्रदान मे खर्च करता है । से कुछ हो सहज-सुख-साधन। [२१९ PM - सम्यक्ती विवेकी विचारवान होता है, किसी पर अन्याय या जुल्म नहीं करता है। दूसरा कोई अन्याय फरे तो उसको समझता है, यदि वह नहीं मानता है तो उसको शिक्षा देकर ठीक करता है। विरोधी को युद्ध करके भी सीधे मार्ग पर लाता है। अविरत सम्यक्ती आरम्भी हिंसा का त्यागी नहीं होता है । यद्यपि सम्यक्ती संकल्पी हिंसा का भी नियम से त्यागी नहीं होता है तो भी वह दयावान होता हुआ वृथा एक तृण गत्र को भी कष्ट नहीं देता है। सम्यक्ती के आठ अग-जैसे शरीर के आठ अंग होते हैं-मस्तक, पेट, पीठ, दो भुजा, दो टांगे, एक कमर-। यदि इनको अलग अलग करदिया जाये तो शरीर नहीं रहता है । इमी तरह सम्यक्ती के आठ अंग होते हैं । यदि ये न हों तो वह सम्यक्ती नहीं हो सकता है। (१), निशिंकित अंग-जिन तत्वों की श्रद्धा करके सम्यक्ती हुआ है उन पर कभी शका नहीं लाता । जो जानने योग्य बातें समझ में नहीं आई हैं और जिनागम से जानी जाती हैं उनपर अश्रद्धान नहीं र करता है तथापि वह ज्ञानी से समझने का उद्यम करता है । तथा वह नीचे प्रकार कहे गये सात प्रकार के भयों को ऐसा नहीं करता है जिससे श्रद्धान विचलित हो जावे । चारित्र मोह के उदय से यदि कभी कोई भय होता है तो उसे वस्तु स्वरूप विचार कर आत्मबल की स्फूर्ति से दूर करता है । .:: (१) इस लोक का भय-मैं यह धर्म कार्य करू गा तो लोक निंदा करेंगे, इसलिये नहीं करना ऐसा भय सम्यक्ती नहीं करेगा। वह शास्त्र को कानून मानकर जिससे लाभ हो उस काम को लोगों के भय के कारण छोड नहीं देगा। (२) परलोक का भय-यद्यपि सम्यक्ती दुर्गति जाने योग्य काम नहीं करता है तथापि वह अपने । आरमा के भीतर ऐसी दृढ़ श्रद्धा रखता है कि उसे यह भय नहीं होता है कि यदि नर्कादि में तो बड़ा दुःख उठाऊगा ] वह शारीरिक कष्ट से घबडाता नहीं व वैषयिक सुख का लोलुपी नहीं होता है-अपने कर्मो- दयपर सन्तोष रखता हुश्रा परलोक की चिन्ता से भयभीत नहीं होता है। (३) वेदना भय-वह रोगों के न होने का यत्न रखता है । मात्रापूर्वक खानपान, नियमित आहार, विहार, निद्रा के साधन करता है तथापि भयातुर नहीं होता है कि रोग आजायगा तो मैं क्या करूंगा। वह समझता है कि यदि असातावेदनीय के तीव्र उदय से रोग भाजायगा तो कर्म की निर्जरा ही है ऐसा समझकर भयारहित रहता है, रोग होने पर यथार्थ इलाज करता है। (४) अनरक्षा भय-यदि सम्यक्ती अकेला हो व कहीं परदेश में अकेला जावे तो वह यह भय नहीं करता है कि मेरी रक्षा यहां कैसे.होगी, मैं कैसे अपने प्राणों को सम्हाल सकू गा । वह अपने प्रात्मा के अमरत्व पर व उसके चिरसुरक्षित गुणरूपी सम्पत्ति पर ही अपना दृढ़ विश्वास रखता है । अतएव ,मेरा रक्षक नहीं है ऐसा भय न करके अरहतादि पाच परमेष्टियों की शरण को ही बडी रक्षा समझता है। (५) अमुप्त भय-सम्यक्ती यह भय नहीं करता है कि यदि मेरा माल व असबाब चोरी चला जायगा तो क्या होगा। वह अपने माल की रक्षा का पूर्ण यत्न करके निश्चिन्त हो जाता है और अपने कर्म पर आगे का भाव छोड़ देता है । वह जानता है कि यदि तीन अमातावेदनीय का उदय भाजावेगी तो लक्ष्मी को जाने में देर न लगेगी, पुण्योदय से बनी रहेगी। आया -- ܝܪ " ܟܐ + २२० सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । वह ऐसे (६) मरण भय-सम्यक्ती को मरने का भय नहीं होता है। यह मरण को कपड़े बदलने के समान जानता है । आत्मा का कभी मरण नहीं होता है, मैं अजर अमर है ऐमा दृढ़ विश्वास उसे मरण भय से दूर रखता है, वह जगत मे वीर योद्धा के समान वर्तन करता है। (७) अकस्मात् भय-वह अपनी शक्ति के अनुमार रहने व बैठने व आने जाने के माधनों को सम्हाल कर काम में लेता है । यह भय नही रखता है कि अकस्मात छत गिर जायगी तो क्या होगा? भूकम्प प्राजायगा तो क्या होगा ? इन भयों को नहीं करता है। प्रयत्न करते हुए भावी को कर्मोदय पर छोड देता है, अकस्मात् का विचार करके भयभीत नही होता है। (२) निःकांक्षित अंग-सम्यक्ती ममार के इन्द्रिय जनित सुग्यों में सुविपने की श्रद्धा नहीं रखता है। सुख को पराधीन, दुम्व का मूल, पाकुलनामय, तृष्णापक व पापकर्मबन्धक जानता है। (३) निर्विचिकित्सित अग-सम्यक्ती हगएक पदार्थ के स्वरूप को विचार किमी से ग्लानिभात्र नहीं रखता है । दु.खी, दलिद्री, रागी प्राणियों पर दयाभाव रखकर उनसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करके उनका क्लेश मेटता है । मलीन को देखकर व मल को देखकर ग्लानिभाव नहीं करता है । मलीन को स्वच्छ रहने का यथाशक्ति साधन कर देता है । मलीन पुद्गलों में स्वायलाभ की अपेक्षा बचते हुए भी फिमी रोगी के मलमूत्र कफ उठाने में ग्लानि नहीं मानता है (४) अमूढदृष्टि अंग-हरक धर्म की क्रिया को विचारपूर्वक करता है । जो रत्नत्रय के माधक धर्म के कार्य है उन्हीं को करता है । देखादेखी मिथ्यात्ववक व निरर्थक क्रियाओं को धर्म मानके नहीं पालना है । दूमरो की देखादेखी किसी भी अधर्मक्रिया को धर्म नहीं मानता है, मूढ बुद्धि को बिलकुल छोड देता है। (५) उपगूहन अग-सम्यक्ती दुसरे के गुणों को देखकर अपने गुणों को बढाता है । परके श्रीगुणों को ग्रहणकर निन्दा नहीं करता है। धर्मात्माओं से कोई दोप हो जावे तो उमको जिस तरह बने उससे दूर कराता है। परन्तु धर्मात्माओं की निन्दा नहीं करता (६) स्थितिकरण अंग-अपने आत्मा को सहा धर्म में स्थिर करता रहता है तथा दूसरों को भी धर्म- मार्ग मे सदा प्रेरणा करता रहता है। (७) वात्सल्यांग-धर्म और धर्मात्माओ से गोवत्स के समान प्रेम भाव रखता हुआ सम्यक्ती उनके दुःखों को मेटने का यथा शक्ति उद्यम करता (८) प्रभावनांग-धर्म की उन्नति करने का सदा ही प्रयत्न करना एक सम्यक्ती का मुख्य कर्तव्य होता है। जिस तरह हो अन्य प्राणी सत्य धर्म से प्रभावित होकर सत्य को धारण करे ऐसा उद्यम करता व कराता นี้ - me -- रहता है। है । सम्यक्ती मे इन आठ अगो का पालन सहज ही होता है। उसका स्वभाव ही ऐसा हो जाता निश्चय नय से सम्यक्ती के आठ अंग इस प्रकार हैं कि वह निज आत्मा मे निःशक व निर्भय होकर ठहरता है, यही नि शकित अग है। अतीन्द्रिय आनन्द में मग्न रहता है यही निकाक्षित अग है । श्रात्म स्वरूप की मगनता में साम्यभाव का अवलम्बन करता है यही निर्विचिकित्सित अग है । आत्मा के स्वरूप सहज-सुख-साधन। [२२१ में मूढता रहित है, यथार्थ श्रात्मवोध सहित है यही अमूढदृष्टी अग है । आत्मीक स्वभाव की स्थिरता में लीन है, परमाव को ग्रहण नहीं करता है यही उपगूहन अंग है। आत्मा में आत्मा के द्वारा स्थिर है यही स्थितिकरण अग है। आत्मानद में भ्रमरवत् आसक्त है यही वात्सल्य अग है। आत्मीक प्रभाव के विकाश में दत्तचित्त है यही प्रभावना अग है। सम्यक्ती के भीतर से आठ लक्षण और भी प्रगट होते हैं । इन आठ चिन्हों से भी सम्यक्ती लिखा जाता है- (१) संवेग-संसार, शरीर भोगों से वैराग्य सहित आत्मीक धर्म व उसके साधनों से सम्यक्ती को बहुत प्रेम होता है, वह धर्म के प्रेम मे रगा होता है। (२) निर्वेद-संसार असार है, शरीर अपवित्र है, भोग अतृप्तिकारी व विनाशीक है ऐसी भावना मम्यक्ती में जागृत रहती है । (३) निन्दा-(४) गर्दा "सम्यकी अपने मुख से अपनी प्रशंसा नही करता है, वह जानता है कि यद्यपि मेरा आत्मा सिद्धसम शुद्ध है तथापि अभी कर्म मल से अशुद्ध हो रहा है । जब तक पूर्ण शुद्ध न हो तब तक मैं निन्दा के योग्य हूँ, ऐसा जानकर अपने मनमे भी अपनी निन्दा करता रहता है तथा दूसरों के सामने भी अपनी निन्दा करता रहता है। यदि कोई उसके धर्माचरण की प्रशसा करे तो वह अपनी कमी को सामने रख देता है । जो कुछ व्यवहार धर्म साधन करता है उसमें अहंकार नहीं करता है । (५) उपशम-सम्यक्ती की आत्मा मे परम शांत भाव रहता है, वह भीतर से शीतल रहता है, किसी पर द्वेष नहीं रखता है। यदि कारणवश कभी क्रोध आता भी है तो भी उसका हेतु अच्छा है और क्रोध को भी शीघ्र दूरकर शांत हो जाता है । (६) भक्ति-सम्यक्ती देव, शास्त्र गुरु का परम भक्त होता है, बड़ी भक्ति से पूजन पाठ करता है, शास्त्र पढता है, गुरु भक्ति करता है, धर्मात्माओं की यथा योग्य विनय करता है। (७) वात्सल्य-धर्म और धर्मात्माओं मे गौ वत्स समान प्रेम रखता है। धर्म के ऊपर व धर्मात्मा के ऊपर कोई आपत्ति आवे तो उसे दूर करने का मन, वचन, काय से व धन से व अधिकार बल से जिस तरह हो प्रयत्न करता है। (८) अनुकम्पा-सम्यक्ती बडा ही दयालु होता है। दूसरे प्राणियो पर जो दुःख पडता है उसे अपना ही दु.ख समझता है उसको दूर करना कराना अपना धर्म समझता है । 'ऐसा सम्यक्ती जीव अपने बर्ताव से जगत भर का प्यारा हो जाता है व सतोपी रहता है । अन्याय धन कमाना पाप समझता है न्याय पूर्वक जो प्राप्त करता है उसीमे अपना व अपने सम्बन्धियों का निर्वाह करता है, वह कर्ज लेने से बचता है । कर्जदार ऐसा आकुलित रहता है कि वह धर्म कर्म में वर्तन नहीं कर सकता है । आमदनी के भीतर २ खर्च करनेवाला सदा सुखी रहता है । अविरत सम्यक्ती भी चौथे गुणस्थान में ऐसे कर्मों का बन्ध नहीं करता है, जिससे नर्क जासके व एकेन्द्रियादि तियंच हो सके। देव हो तो उत्तम मनुष्य होने का व मनुष्य हो तो स्वर्गवासी उत्तम देव होने का ही कर्म बाधता है। । - २२२] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । आठ कर्म की १४८ प्रकृतियां-पाठ कमी के १४८ भेद नीचे प्रकार हैं- ज्ञानावरण के पांच भेद-मतिज्ञानावरण, श्रुत ज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मनपर्यय झानावरण, केवल ज्ञानावरण ये पांचों ज्ञानों को कम से ढकती है। दर्शनावरण के नौ भेद-चक्षुदर्शनावरण, अञ्चक्षुदर्शनावरण, अवधि दर्शनावरण, केवल दर्शनावरण, निद्रा निद्रा निद्रा, प्रचला (ऊघना), प्रचला प्रचला, स्त्यानगृद्धि, (नींद में वीर्य प्रगट होकर स्वप्न में काम कर लेना)। वेदनीय के दो भेद-साता वेदनीय, असाता वेदनीय । मोहनीय के २८ भेद-दर्शन मोहनीय के तीन भेद व चारित्र मोहनीय के २५ भेद पहले कह चुके हैं। आयु के ४ भेद-नरक, तिर्यंच, मनुष्य, देव । नाम के ६३ भेद-गति ४, एकेन्द्रिय आदि ५ जाति, औदारिक, वैक्रियक, श्राहारक, तैजस, कार्माण शरीर ५, औदारिक, वैक्रियक, श्राहारक, अगोपाग ३, औदारिकादि बधन ५, औदारिकादि सघात ५, प्रमाण (कहां पर व कैसे अगोपाग रचे जावे ), सस्थान ६ ( समचतुरस्र, सुडौल शरीर, न्यग्रोध परिमंडल- उपर बड़ा, नीचे छोटा, स्वाति-ऊपर छोटा नीचे वड़ा, वामन-बौना, कुम्बज-कुबडा, हुंडक-बेडोल ), संहनन ६ (वनऋषभ नाराच-वन के समान दृढ़ हड्डी, नसे व कौले हों, वा नाराच सह-वन के समान हड्डी व कीले हो, नाराच हड्डी के दोनों ओर कीलें हों, अर्द्धनाराच एक तरफ कीले हों, कीलित-हड्डी से हड़ी कीलित हो, असंप्राप्तासृपाटिका-मेरु से हड्डी मिली हो । स्पर्श ८, रस ५, गध २, वर्ण ५, श्रानुपूर्वी ४ (चार गति अपेक्षा-आगे की गति में जाते हुए पूर्व शरीर के प्रमाण आत्मा का आकार रहे) अगुरु लघु ( न शरीर बहुत भारी, न बहुत हल्का), उपघात-(अपने अंग से अपना घात), परघात-(अपने से पर का घात), आताप (पर को आतापकारी शरीर), उद्योत-(पर को प्रकाशकारी), उछ्वास, विहायोगति २ (आकाश में गमन शुभ व अशुभ), प्रत्येक-(एक शरीर का एक स्वामी), साधारण-(एक शरीर के अनेक स्वामी ) त्रस-(द्वन्द्रियादि) स्थावर, सुभग-(पर को सुहावना शरीर), दुर्भग-(असुहावना), सुस्वर, दुस्वर, शुभ (सुन्दर), अशुभ, सूक्ष्म (पर से बाधा न पावे), बादर पर्याप्ति (पर्याप्ति पूर्ण करे), अपर्याप्ति, स्थिर, अस्थिर, श्रादेय (प्रभाववान), अनादेय, यशःकीर्ति, अयश कीर्ति, तीर्थकर | गोत्रकर्म २ प्रकार-उच्चगोत्र (लोकपूजित), नीच गोत्र । अंतराय ५ प्रकार-दानातराय, लाभांतराय, भोगा०, उपभोगा०, वीयांतराय ! इनमे से बंध मे १२० गिनी गई हैं । ५ बधन, ५ संघात शरीर पांच मे गर्भित हैं । स्पर्शादि २० की ४ गिनी गई हैं, तथा सम्यग्मिथ्यात्व व सभ्यक्त प्रकृति का बन्ध नहीं होता है इस तरह २८ घट गई । १ मिथ्यात्व गुणस्थान में-१२० में से ११७ का बन्ध होगा, तीर्थकर व आहारक व आहारक अंगोपांगका बन्ध नहीं होता। - ।
सहज-सुख-साधन। [२२३ २ सासादन में-१०१ का बन्ध होता है, १६ का नहीं होता। मिथ्यात्व, नपुसकवेद, नरकायु, नरक- गति, नरकगत्वानुपूर्वी, हुँडक संस्थान, असं० सहनन, एकेन्द्रियादि चार जाति, स्थावर, आतप, सूक्ष्म, अपर्याप्त साधारण। ३ मिश्र में-१०१ मे २७ कम ७४ का ही बंध होता है ।। निद्रा, निद्रा, प्रचला प्रचला, स्त्यानगृद्धि, अनतानुवधी कपाय चार, स्त्रीवेद, तिर्यंचायु, तिथंचगगि, तिथंच गत्यानुपूर्वी, नीच गोत्र, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय, न्यग्रोध से वामन चार संस्थान, वज्रनाराच से कीलक संहनन चार, मनुष्यायु, देवायु । ४ अविरत सम्यक्त में •७४ मे मनुष्यायु, देवायु, तीर्थकर मिलाकर ७७ का बंध होता है । ४३ प्रकृति का वध होता है। इसमे सिद्ध है कि सम्यक्त होनेपर सिवाय देव व उत्तम मनुष्य के और नहीं होता है। यदि पहले नर्क, तिथंच व मानव श्रायु बाध ली हो तो उस सम्यक्ती तिथंच या मानव को इन तीन गतियों में जाना पडता है। चौथे से आगे के सब गुणस्थानों में सम्यक्त रहता है । ५ देशविरत में-७७ मे १० कम ६७ का बध होता है। अप्रत्याख्यान कपाय चार, मनुष्यायु मनुष्यगति, मनुष्यगत्या०, औदारिक शरीर, औदारिक अंगोपांग, वप्रवृपभनाराच सं०। ६ प्रमविरत में-६७ मे ४ कम ६३ का बध होता है, चार प्रत्याख्यानावरण कपाय घट जाते हैं । ७ अप्रतविरत में-६३ मे ६ घटकर व दो मिलाकर ५९ का बन्ध होता है, अरति, शोक, अमाता- वेदनीय, अस्थिर, अशुभ, अयश घटती है व आहारक शरीर, आहारक अगोपांग मिल जाती है। ८ अपूर्वकरण में-५९ में देवायु घटाकर ५८ का बंध होता है । ६ अनिवृत्तिकरण में-५८ में से ३६ घटाकर २२ का वध होता है । निद्रा, प्रचला, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, तीर्थकर, निर्माण, प्रशस्तविहायोगति, पचेन्द्रियजाति, तैजस, कार्माण शरीर २, श्राहारक २, चैफियिक २, समचतुरस्रसस्थान, देवगति, देवगत्या०, स्पर्शादि ४, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उछ्वास, बस, बादर, पर्याप्ति, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय = ३६ । '१० सूक्ष्मसांपराय में-२२ में से ५ निकालकर १७ का वध होता है। सञ्चलन क्रोधादि चार व पुरुपवेद नहीं बधते हैं। ११ उपशांत मोह में-१७ मे से १६ कम करके १ सातावेदनीय का वध होता है। ज्ञानावरण ५,+ दर्शनावरण ४, + अतराय ५, + उच्च गोत्र, + यश = १६ । आगे दो गुणस्थानो मे भी सातावेदनीय का वध होता है। प २२४] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । प्रभाव से मरकर इस ऊपर के कथन से सिद्ध है कि सम्यक्ती जैसे जैसे गुणस्थानों में बढता जाता है वैसे वैसे कम कर्मों का बन्ध करता है । मद कपाय में वन्ध योग्य कर्मों में स्थिति थोड़ी पडती है व पुण्य का अधिक बन्ध होकर उनमें अनुभाग अधिक पडता है । सम्यग्दर्शन की अपूर्व महिमा है । सम्यक्ती सदा सतोपी रहता है । एक चांडाल भी सम्यक्त के स्वर्ग में उत्तम देव होता है । नारकी भी सम्यक्त के प्रभाव से उत्तम मानव होता है। सम्यक्ती यहां भी सुखी रहता है व आगामी भी सुखी रहता है । वह तो मोक्ष के परमोत्तम महल का अनुयायी हो गया है । मार्ग से यदि विश्राम करेगा तो उत्तम देव या उत्तम मनुष्य ही होगा। उभय लोक में सुखदाई इस सम्यक्त का लाभ करना ज़रूरी है । जो पुरुपार्थ करेंगे वे कभी न कभी प्राप्त करेंगे । सम्यक्त का पुरुषार्थ सदा ही कल्याणकारी है। सम्यग्दर्शन और उसके महात्म्य के सम्बन्ध में जैनाचार्य क्या क्या मनोहर वाक्य कहते हैं उनका कथन नीचे प्रकार है-पाठकगण आनन्द लेकर तृप्ति प्राप्त करे । (१) श्री कुन्दकुन्दाचार्य पंचास्तिकाय में कहते हैं:- जीवोत्ति हवदि चेदा उपभोगविसेमिदो पह कत्ता। भोत्ता य देहमत्तो ण हि मुत्तो कम्मसंजुत्तो ॥२७॥ भावार्थ--यह जीव जीनेवाला है, चेतनेवाला या अनुभव करनेवाला है, ज्ञान दर्शन उपयोगधारी है, स्वय समर्थ है, कर्ता है, भोक्ता है, शरीर मात्र आकारधारी है, अमृर्तीक है, ससार अवस्था में कर्म महित है। कम्ममल विप्पमुक्को उड्ड लोगस्स अंतमधिगंता । सो सव्वणाणदरिसी लहदि सुहमणिदियमणत ॥२८॥ भावार्थ-जब यह जीव कर्ममल से छूट जाता है तब लोक के अन्त में जाकर विराजमान हो जाता है। सर्वज्ञ, सर्वदर्शी होते हुए वे सिद्ध भगवान अनंत अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करते हैं। भावस्स णत्थि णासो णत्थि अभावस्स चे उप्पादो। गुणपज्जयेसु भावा भावा उप्पादवए पकुवंति ॥१५॥ भावार्थ- सत् पदार्थ का कभी नाश नहीं होता है तथा असत् पदार्थ का कभी जन्म नहीं होता है। हरएक पदार्थ अपने गुणों की अवस्थाओं में उत्पाद तथा व्यय करते रहते हैं अर्थात् हरएक द्रव्य उत्पाद व्यय ध्रौव्य युक्त है। ोगाढगाढणिचिदो पोग्गलकायेहिं सम्बदो लोगो। सुहमेहि वादरेहिं य ताणंतेहि विविहेहिं ।।६४॥ भावार्थ-यह लोक सर्व तरफ नानाप्रकार अनतानत सूक्ष्मता बादर पुद्गल कायों से ग्खूब गाढ रूप भरा है। इसमें सर्व जगह सूक्ष्म तथा बादर स्कध पाए जाते हैं। - - से -
सहज-सुख-साधन ।
[२२५
अत्ताकुणदि सहावं तत्थ गदा पोग्गला समावेहिं ।
गच्छंति कम्मभावं अण्णोण्णागाहमवगाढा ॥६५॥
भावार्थ-आत्मा के अपने ही रागादि परिणाम होते हैं उनका निमित्त पाकर कर्म पुद्गल अपने स्वभाव
से ही आकर कर्मरूप होकर प्रात्मा के प्रदेशों में एक क्षेत्रावगाह सम्बन्धरूप होकर ठहर जाते हैं । जीव
उनको बाधता नहीं है, जीव के रागादि भाव भी पूर्वबद्ध कर्म के उदय से ही होते है।
उदयं जद मच्छाणं गमणाणुग्गयरं हवदि लोए ।
तह जीवपुग्गलाणं धम्म दव्वं बियाणेहि ॥८॥
भावार्थ-जैसे इस लोक में पानी मछलियों के गमनागमन में उपकारी है वैसे जीव पुद्गलों के गमनागमन
धर्मद्रव्य सहकारी है।
जह हवदि धम्मदव्वं तह तं जाणेह दव्यमधमक्खं ।
ठिदिकिरियाजुत्ताणं कारणभूदं तु पुढचीव ॥८६॥
भावार्थ-धर्म द्रव्य के समान अधर्म द्रव्य जीव पुद्गलों के ठहरने में सहकारी है जैसे पृथ्वी प्राणियों
के ठहरने में सहकारी है।
सव्वेसि जीवाण सेसाणं तह य पुग्गलाणं च ।
जं देदि विवरमखिलं तं लोए हवाद प्रायासं ॥१०॥
भावार्थ-जो सर्व जीवों को, पुद्गलों को व शेष धर्म अधर्म व कालको स्थान देता है वह आकाश है।
जहा आकाश खाली है वह अलोकाकाश है, शेष लोकाकाश है।
कालो ति य ववदेसो सम्भावपरूवगो हवदि णिच्चो ।
उप्पण्णप्पद्धसी अवरो दीहतरछाई ॥१०१॥
भावार्थ-
-सत्तारूप निश्चय कालद्रव्य नित्य है जो सर्व द्रव्यों के परिवर्तन में सहकारी है । दूसरा
व्यवहार काल समयरूप है जो उत्पन्न व नाश होता है । बहुत समयों की अपेक्षा व्यवहार काल दीर्घ
स्थाई होता है।
एदे कालगामा धम्माधम्मा य पुग्गला जीवा ।
लब्भंति दन्त्रसरणं कालस्म दु णत्थि कायनं ॥१०२॥
भावार्थ-काल, श्राकाश, धर्म, अधर्म, पुद्गल और जीव ये छ ,द्रव्य हैं । उनमें से कालद्रव्य को छोड़-
कर पाच को अस्तिकाय कहते हैं।
वादरसुहुमगदाणं खंधाणं पुग्गलोत्ति ववहारो।
ते होति छप्पयारा तेलोक्कं जेहिं णिप्पएणं ॥७६॥
२२६] सम्यग्दर्शन और उनका महास्य । -- पुढवी नलं च छाया चउरि दियविमयकम्मपाश्रोग्गा । कम्मादीदा येवं छन्भेया पोग्गला होति ।।१।। भावार्थी-ब -चादर व सूक्ष्म स्कंधो को पुद्गल कहते हैं। यह व्यवहार है । वे छः प्रकार के हैं, उन्हीं से तीन लोक रचा हुआ है । पृथ्वी-स्थूल स्थूल स्कध है, जल-स्थूल है, छाया-स्थल सूक्ष्म है चार इन्द्रिय के विषय सूक्ष्मस्थूल हैं, कार्मणवर्गणा सूक्ष्म है । उनसे भी सूक्ष्म स्कंध दो परमाणु के स्कध तक सूक्ष्म मूक्ष्म है। सुहदुक्खजाणणा वा हिदपरियम्मं च अहिदभीरुतं । जस्म ण विज्जदि णिच्चं तं समणा विंति अज्जीवं ॥१२॥ भावार्थ-जिममे सदा ही सुख व दु.प का मान, हितमे प्रवृत्नि व अहिन मे भय नहीं पाया जाता है उसी को मुनियों ने अजीव कहा है । रागो जस्म पमत्थो अणुकपासंमिदो य परिणामो । चित्ते णस्थि कलुस्सं पुण्णं जीवस्म अामवदि ॥१३॥ भावार्थ-जिमके शुभ राग है, दया महिन परिणाम है, चित्त में मलीनना नहीं है, प्रमन्नता है उसके पुण्य कर्म का आभव होता है। अरहतसिद्धसाहुसु भत्ती धम्मम्मि जाय खलु चेट्ठा । अणुगमणं पि गुरूणं पसत्थरागो ति बुच्चंति ।। १३६ ।। भावार्थ- प्रशस्त या शुभराग उसको कहते हैं जहां अरहंत, सिद्व व साधु की भक्ति हो, धर्म साधन का उद्यम हो व गुरुओं की आज्ञानुसार वर्तन हो । ति सिदं बुभुक्खिदं वा दुहिदं दट्ठाण जो दु दुहिदमणो । पडिवज्जदि तं किंवया तस्सेसा होदि अणुकम्पा ।। १३७ ॥ भावार्थ-जो ग्यासे को, भूखे को, टु खी को देखकर स्त्रय दु ग्वी मन होकर दयाभाव से उसकी सेवा करता है उसीके अनुकम्पा कही गई है । कोधो व जदा माणो माया लोभो व चित्तमासेज्ज । जीवस्स कुणदि खोहं कलुसो ति य तं बुधा वेति ॥ १३८ ॥ भावार्थ-जब क्रोध या मान या लोभ चित्त मे आकर जीव के भीतर क्षोभ या मलीनता पैदा कर देते हैं उस भाव को ज्ञानियो ने कलुपभाव कहा है। चरिया पमादबहुला कालुम्सं लोलदा य विसयेसु । परपरितावपवादो पावस्स य आसवं कुणदि ॥ १३ ॥ 1.
सहज-सुख-साधन । [२२७ भावार्थ- -प्रमाद पूर्ण वर्तन, कलुपता, पांच इन्द्रियों के विपयों में लोलुपता, दूसरों को दुःखी करना व दूसरों की निन्दा करनी ये सब पाप के आश्व के कारण हैं। सण्णाश्रो य तिलेस्सा इंदियवसदा य अत्तरदाणि । णाणं च दुप्पउचं मोहो पावप्पदा होति ॥ १४० ॥ भावार्थ- 'आहार, भय, मैथुन, परिग्रह, ये चार संज्ञाए कृष्ण, नील, कापोत तीन लेश्या के भाव, इद्रियों के वश मे रहना, आत तथा रौद्र ध्यान, कुमार्ग मे लगाया हुआ ज्ञान, ससार से मोह ये सब भाव पाप को वाधनेवाले है। जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व सम्पदव्वेसु । णासवदि सुहं असुहं समसुहदुक्खस्स भिक्खुस्स ।। १४२ ।। भावार्थ-जो साधु दु.ख व सुख पडने पर समभाव के धारी है व सर्व जग के पदार्थों में जो राग द्वेष, मोह नहीं करते हैं उस साधु के शुभ व अशुभ कर्म नहीं आते हैं। जो संवरेण जुत्तो अप्पट्टपसाधगो हि अप्पाणं । मुणिऊण झादि णियदं गाणं सो संधुणोदि कम्मरयं ।। १४५ ।। भावार्थ-जो मन, वचन, काय को रोक करके श्रात्मा के प्रयोजन रूप सिद्धिभाव को साधनेवाला आत्मा को जानकर नित्य आत्मज्ञान को ध्याता है वही कर्मरज को दूर करता है । जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व जोगपरिकम्मो। तस्स सुहासुहडहणो झाणमत्रो जायए अगणी ॥ १४६ ॥ भावार्थ-जिसके भावो में राग द्वेष मोह नहीं है न मन वचन काय की क्रियाए हैं उसी के शुभ व अशुम कमी को जलानेवाली ध्यानमई अग्नि पैदा होती है। जोगणिमिचं गहणं जोगो मणवयणकायसंभूदो। भावणिमित्तो बंधो भावो रदिरागदोसमोहजुदो ।। १४८ ॥ भावार्थ-योग के निमित्त से कर्म वर्गणाओ का ग्रहण होता है, वह योग मन वचन काय के द्वारा होता ' है । अशुद्ध भाव के निमित्त से कर्म का वध होता है । वह भाव रति, राग द्वेष मोह सहित होता है। जो संवरेण जुत्तो णिज्जरमाणोध सव्यकम्माणि । वरगदवेदाउस्सो मुयदि भनं तेण सो. मोक्खो ॥ १५३ ॥ भावार्थ-जो कमी के आने को रोककर सवर सहित होकर सर्व कमी का क्षय कर देता है वह वेदनीय, आयु, नाम, गोत्र से रहित होकर ससार को त्याग देता है । यही मोक्ष का स्वरूप है। मोक्ष प्राप्त प्रात्मा के शरीर कोई नहीं रहता है ।
२२८] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । - - (२) श्री छन्दकुन्दाचार्य समयसार में कहते हैं- भदत्थेणाभिगदा जीव जीवा य पुण्णपाणं च । अासव संवर णिज्जर बंधी मोक्खो य सम्म ॥१५॥ भावार्थ-जीव, अजीव, पुण्य, पाप, श्राश्रव, सवर, निर्जरा, बध व मोक्ष इन नौ पदार्थो को जब निश्चय नय से जान लेता है तब सम्यक्त होता है अर्थात् निश्चय नय से जीव और अजीव इन दो सत्रों से ये नो पदार्थ बने हैं। उनमे अजीव से ममस्व त्यागकर एक अपने शुद्ध जीव को ग्रहण करने योग्य मानना ही निश्चय सम्यग्दर्शन है। मोहणकम्मस्सुदया दु वरिणदा जे इमे गुमट्ठाणा। ते कह हंवति जीवा ते णिच्चमचेदणा उत्ता ।। ७३ ॥ भावार्थ-मिथ्यात्व प्रादि चौदह गुणस्थान मोहनीय कर्म के उदय की अपेक्षा से कहे गए हैं । मोह- नीय कर्म जड़ अचेतन है तब ये गुणस्थान जीव के स्वभाव कैसे हो सकते हैं ? निश्चय से ये जीव से भिन्न सदा ही अचेतन जड़ कहे गए हैं, इनमें कों का ही विकार है । ये जीव के स्वभाव नहीं है । यदि स्वभाव होते तो सिद्धों में भी पाए जाते । कम्मस्स य परिणामं णोकम्मस्सय तहेव परिणामं । ण करेदि एदमादा जो लाणदि सो हवदि णाणी ॥८॥ भावार्थ-निश्चय से यह आत्मा अाठ को की अवस्था का तथा शरीरादि की अवस्था का कर्ता नहीं है। आस्मा तो ज्ञानी है । यह तो मात्र जानता ही है । पर का कर्तापना श्रात्मा का स्वभाव नहीं है। नीवपरिणामहेदु कम्म पुग्गला परिणमति । पुग्गलकम्मणिमिर्च तहेव जीवो वि परिणमदि ॥८६॥ भावार्थ-जीवों के रागादि भावों का निमित्त पाकर कर्मवर्गणा रूप पुद्गल स्वयं ज्ञानावरणादि कर्मरूप परिणमन कर जाते हैं। इसी तरह पूर्वबद्ध पुद्गल कर्मों के उदय का निमित्त पाकर जीव भी रागादि भायों मे परिणमन करता है । यह निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध अशुद्ध निश्चयनय से है। णवि कुवदि कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीवगुणे । भएणोएणणिमिण दु परिणाम जाण दोएहपि ।।८७॥ भावार्थ-न तो जीव पुद्गलकर्म के गुणों को करता है न पुगलकर्म जीव के गुणों को करता है, परस्पर एक दूसरे के निमित्त से ही दोनो में परिणमन होता है। एदेण कारणेण दु कत्ता आदा सएण भावेण । पुग्गलकम्मकदाणं ण दु कसा सव्वभावाणं ||८||
सहज-सुख-साधन ।
[२२९
भावार्थ-
-इस कारण से ही यह आत्मा अपने ही भावो का कर्ता है, पुद्गलकर्म कृत सर्व भावों का कभी
भी कर्ता नहीं है।
णिच्छयणयस्म एवं श्रादा अप्पाणमेव हि करेदि ।
वेदयदि पुणो त चेव जाण अत्ता दु अत्ताणं ॥८६॥
भावार्थ-निश्चयनय से श्रात्मा अपने ही परिणामों का कर्ता है। और अपने ही आत्मस्वरूप को
भोगता है।
ववहारस्स दु आदा पुग्गलकम्मं करेदि अणेयविहं ।
तं चेव य वेदयदे पुग्गलकम्मं अणेयविहं ॥१०॥
भावार्थ-
-व्यवहारनय का यह अभिप्राय है कि यह आत्मा अनेक प्रकार पुद्गलकों का कर्ता है वैसे
ही अनेक प्रकार पुद्गल कमी को भोगता है।
जीवो ण करेदि घडं णेव पड गणेव सेसगे दवे ।
जोगुवोगा उप्पादगा य सो तेसिं हयदि कत्ता ॥१०७||
भावार्थ-न तो जीव घटको बनाता है न पट को बनाता है न और द्रव्यों को बनाता है । जीव के योग
और (अशुद्व) उपयोग ही घटादि के उत्पन्न करने मे निमित्त है । अशुद्व निश्चयनय से उन योग व उपयोग
का जीव कर्ता कहलाता है।
उवभोजभिदियेहिय दव्याणमचेदणाणमिदराणं ।
ज कुणदि सम्मदिट्ठी तं सव्वं णिज्जरणिमित्रं ॥२०२।।
भावार्थ-सम्यग्दृष्टि प्रात्मा जो पांचों इन्द्रियों के द्वारा अचेतन और चेतन द्रव्यों का उपभोग करता है
सो सर्व का की निर्जरा के निमित्त होता है । सम्यग्दृष्टी अतरंग मे किसी पदार्थ से आसक्त नहीं है,
इसलिये उसके कर्म फल देकर झड जाते हैं । वह ससार कारणीभूत कर्मबध नहीं करता है । रागभाव के
अनुसार कुछ कर्म बधता है सो भी छूटनेवाला है ।
पुग्गलकम्म कोहो तस्स विवागोदो हवदि एसो।
ण हु एस मज्मभावो जाणगभावो दु अहमिक्को ॥२०७॥
भावार्थ-सम्यग्दृष्टी समझता है कि मोहनीय नाम का पुद्गलकर्म क्रोध है, उसी का विपाक या रस मेरे
भावों के साथ झलकनेवाला यह क्रोध है सो यह मेरा स्वभाव नहीं है । यह तो पुद्गल का ही स्वभाव है,
मैं तो इस मात्र इसका ज्ञाता एक आत्मा द्रव्य क्रोध से निराला हूँ।
उदयविवागो विविहो कम्माणं परिणदो जिणवरेहिं ।
ण दु ते मज्झ सहावा जाणगभावो दु अहमिक्को ॥२१०॥
। २३०] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । भावार्थ-सम्यग्दृष्टी ऐसा जानता है कि नानाप्रकार कर्मों का विपाक या फल जिसे जिनेन्द्रों ने बताया है मेरे आत्मा का स्वभाव नहीं है । मैं तो एक अकेला मात्र ज्ञाता हूँ, जाननेवाला ही हूँ। छिज्जदु वा भिज्जदु वा णिज्जदु या अहव जादु विप्पलयं । जमा तमा गच्छदु तहावि ण परिग्गहो मज्झ ॥२१८।। भावार्थ- ज्ञानी के यह भेद भावना होती है कि यह शरीर छिदजाहु, भिटजाहु, अथवा कोई कहीं लेजाहु अथवा चाहे जहा चला जाहु तथापि यह शरीर व तत्सम्बन्धी परिग्रह मेरा नहीं है । मैं तो अकेला ज्ञाता दृष्टा पदार्थ हूँ। णाणी रागप्पजहो सव्वदव्वेसु कम्ममज्झगदो। णो लिप्पदि कम्मरएण दु कद्दममज्मे जहा कणयं ।।२२६।। अण्णाणी पुण रत्तो सबदव्वेसु कम्ममझगदो। लिप्पदि कम्मरएण दु कद्दममज्झे कद्दममज्झे जहा लोहं ॥२३०॥ भावार्थ-सम्यग्दृष्टी ज्ञानी अात्मा कमी के मध्य पड़ा हुआ भी सर्व परद्रव्यों से रागभाव को त्याग करता हुआ इसी तरह कर्मरूपी रज से लिप्त नहीं होता है, जिस तरह कीचड़ में पड़ा हुआ सोना नहीं बिगड़ता है। परन्तु अज्ञानी जीव कमी के मध्य पडा हुआ सर्व परद्रव्यों में रागभाव करता हुआ कर्मरूपी रज से लिप्त हो जाता है । जैसे लोहा कीचड़ मे पडा हुआ बिगड जाता है । सम्यग्दृष्टी ऐसा भीतर से बैरागी होता है कि कर्म का फल भोगते हुए भी कर्म की निर्जरा कर देता है तथा बध या तो होता नहीं यदि कपाय के अनुसार कुछ होता भी है तो वह बिगाड करनेवाला ससार में भ्रमण करानेवाला नहीं होता है। सम्यक्त की अपूर्व महिमा है। सम्मादिट्टी जीवा णिस्संका होति णिब्भया तेण । सत्तभयविष्पमुक्का जमा तह्मा दु णिस्संका ॥ २४३ ॥ भावार्थ-सम्यग्दृष्टि जीव शका रहित होते है। वे निर्भय होते हैं। वे सात प्रकार भय से रहित होते है । उनको आत्मा में दृढ़ विश्वास होता है। उनके मरण का व रोगादि का भय नहीं होता है । एवं सम्मादिट्ठी वट्ट तो बहुविहेसु जोगेसु । अकरंतो उवोगे रागादि णेव वझदि रयेण ॥ २६१ ॥ भावार्थ-सम्यग्दृष्टी कार्यवश से नानाप्रकार मन वचन काय के योगों द्वारा वर्तता है तो भी उपयोग में गगादि भावो को नहीं करता हुआ कर्मरूपी रज मे नहीं बंधता है । मिथ्यादृष्टी की तरह बन्धता नहीं है । वीतरागी सम्यक्ती अबन्ध रहता है अथवा मराग सम्यक्ती के जितना राग होता है उतना अल्पवध होता है जो बाधक नहीं है। -- महज-सुख-साधन। [२३१ णवि रागदोसमोहं अब्बदि णाणी कसाय भावं वा । सयमप्पणो ण सो तेण कारगो तेसि भावाणं ॥ ३०२ ॥ भावार्थ -सम्यक्ती ज्ञानी जो स्वय ही अपने में बिना कर्मों के उदय से रागद्वेप, मोह व कपाय भाव नहीं पैदा करता है इसलिये आत्मा इन रागादि भावो का निश्चय से कर्ता नही है । वंधाणं च सहावं वियाणिदु अप्पणो सहावं च । वंधे सु जोण रज्जदि सो कम्भ विमुखणं कुणदि । ३१५ ।। भावार्थ-कर्मवंधों का स्वभाव तथा आत्मा का शुद्ध स्वभाव जानकर के जो कर्मवधों में रजायमान नहीं होता है, कमा से विरक्त हो जाता है वही ज्ञानी का से अवश्य मुक्ति पालेता है। णवि कुदि णणि वेददि णावि कम्माइ बहु पयाराइ । जाणदि पुण कम्मफलं बंधं पुण्णं च पावं च ।। ३४० ।। भावार्थ- "ज्ञानी न तो नानाप्रकार की को कर्ता है न भोक्ता है, वह कर्म के करने व भोगने से उदासीन रहता हुआ कमी के फल पुण्य व पाप को व उनके बन्ध को मात्र जानता है। कर्मोदय से जो कुछ होता है उसका ज्ञाता दृष्टा रहना बानी का कर्तव्य है, वह कर्प के नाटक मे लीन नहीं होता है। वेदतो कम्मफलं अप्पाणं जो कुणदि कम्मफलं । सो तं पुणोवि वधदि वीयं दुक्खस्स अट्ठविहं ॥ ४०६ ।। भावार्थ-कमी के फल को भोगते हुए जो उस कर्म-फल को अपना कर लेता है । अर्थात् उनमें तन्मय होकर फस जाता है । वह फिर आठ प्रकार का को बांधता है, जो दुखों का बीज है। (३) श्रीकुन्दकुन्दाचार्य प्रवचनसार में कहते हैं- मोहेण य रागेण य दोसेण य परिणदस्स जीवस्स । जायदि विविहो बंधो तम्हा ते संखबइदव्या ।। ६१ ।। भावार्थ-जो जीव मोह से, राग से या द्वेष से परिणमन करता है उसको नानाप्रकार कर्म का बन्ध होता है । इसलिये इन रागादि का क्षय करना योग्य है । जो मोहरागदोसे णिहणदि उवलद्ध जोएहमुवदेसं । सो सव्वद क्खमोक्खं पावदि अचिरेण कालेण || ६५ ॥ भावार्थ-जो जिनेन्द्र के उपदेश को पाकर राग द्वेष, मोह को नाश कर देता है वह शीघ्र ही सर्व ससार के दुःखो से छूटकर मुक्त होजाता है । 1 २३२] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । दव्यं सहावसिद्ध सदिति जिणा तच्चदो समक्खादो। सिद्ध तध आगमदो, णेच्छदि जो सो हि परसमो ॥ ७-२ ॥ भावार्थ-द्रव्य स्वभाव से सिद्ध है । सरूप है ऐसा जिनेन्द्र ने तत्वरूप से कहा है, अागम से मी यही सिद्ध है ऐसा जो नहीं मानता है वह नियम से मिथ्याही है। समवेदं खलु दव्वं संभवठिदिणाससएिणदहोहिं । एकम्मि चेव समये तम्हा दव्वं खु तत्तिदयं ॥ ११-२॥ भावार्थ-हरएक द्रव्य एक ही समय में उत्पाद व्यय प्रौव्य भावो से एक मेक है। इसलिये द्रव्य उत्पाद व्यय ध्रौव्य रूप तीन प्रकार है। पाडव्भवदि य अण्णो पज्जाओ पज्जो वयदि अण्णो। दव्यस्स तंपि दळणेव पणटुण उप्पण्ण ॥ १२-२ ।। भावार्थ- "किसी भी द्रव्य की जब कोई पर्याय या अवस्था पैदा होती है तब ही दूसरी पूर्व की अवस्था नाश हो जाती है तो भी मूल द्रव्य न न होता है न उत्पन्न होता है । पर्याय की अपेक्षा द्रव्य उत्पाद व्ययरूप है द्रव्य की अपेक्षा ध्रुव है । आदा कम्ममलिमसो परिणामं लहदि कम्मसंजुनं। तत्तो सिलिसदि कम्मं तम्हा कम्मं तु परिणामो ।। ३०-२ ॥ भावार्थ-यह आत्मा अनादिकाल से कमी से मलीन चला आया है इसलिये राग द्वेष मोहरूप सयोग मय भाव को धारण करता है तब इन रागादि भावों के निमित्त से पुद्गल कर्म स्वय बध जाता है । इसलिये रागादि भाव ही भाव कर्म है या कर्मबन्धकारक भाव है। आदा कम्ममलिमसो धारदि पाणो पुणो पुणो अपणो । ण जहदि जाव मम देहपधाणेसु विसएसु ।। ६१-२॥ भावार्थ-यह कमी से मलीन प्रात्मा जबतक शरीरादि इन्द्रियों के विषयों मे ममत्व भाव को नहीं छोड़ता है, तबतक वार वार अन्य अन्य प्राणों को धारता रहता है । अर्थात् एकेन्द्रिय से पचेन्द्रिय पर्यंत प्राणी होता रहता है। जो इन्दियादिविजई भवोय उवोगमप्पगं झादि । कम्मे हिं सो ण रंजदि किह त पाणा अणुचरंति ॥ ६२-२॥ भावार्थ- -परन्तु जो कोई इन्द्रिय विषय व कपायों का विजयी होकर अपने शुद्ध चैतन्यमय शुद्धोपयोग का ध्यान करता है और सर्व ही शुभ व अशुभ कमी मे राग नहीं करता है उसको ये इन्द्रियादि दश प्राण किस तरह सबंध कर सकते हैं ? अर्थात् वह जन्ममरण से छूट ही जायगा।
सहज-सुख-साधन । [२३३ रत्तो बन्धदि कम्मं मुच्चदि कम्मेहिं रागरहिदप्मा । एसो बंधसमासो जीवाणं जाण णिच्छयदो ॥ ६०-२ ॥ भावार्थ-रागी जीव कमी को वाधता है, वीतरागी कमी से छूट जाता है, ऐसा बध तत्व का सक्षेप जीवों के लिये निश्चय से जानना चाहिये। आगमहीणो समणो णेवप्पाणं परं वियाणादि । अविजाणतो अत्थे खवेदि कम्माणि किध भिक्खू, ॥ ५३-३ ॥ भावार्थ-जो साधु आगम ज्ञान से रहित है, न अपने आत्मा को सर्व कमी से रहित शुद्ध जानता है और न पर पदार्थों को ही जानता है वह पदार्थो के भेद ज्ञान को न पाता हुआ किस तरह का का क्षय कर सकता है ? शास्त्र ज्ञान के द्वारा स्व पर पदार्थ का बोध होता है । इसलिये मुमुक्षु को शास्त्र का मनन सदा कर्तव्य है। ण हि आगमेण सिज्झदि सद्दहणं जदि ण अस्थि अत्थेसु । सद्दहमाणो अत्थे असंजदो वा ण णिवादि ।। ५७-३॥ भावार्थ-जिसकी श्रद्धा जीवादि जीवादि पदार्थों में नही है, वह मात्र शास्त्रो के ज्ञान से सिद्धि नहीं पा- सकता । तथा जो पदार्थ की श्रद्धा रखता है, परन्तु सयम को धारण नहीं करता है वह भी निर्वाण को नहीं पा सकता । शास्त्र ज्ञान यदि सम्यग्दर्शन सहित हो और तब सम्यक्चारित्र को पाले वही मुक्त होता है। परमाणुपमाणं वा मुच्छा देहादियेसु जस्स पुणो । विज्जदि जदि सो सिद्धि ण लहदि सबागमधरोवि ॥ ५६-३ ॥ -जिसकी शरीरादि पर द्रव्यों में परमाणु मात्र भी जरा सी भी मूर्छा विद्यमान है वह सर्व भागम का ज्ञाता है तो भी मोक्ष नहीं पा सकता है । ण हवदि समणोत्ति मदो संजमतवसुत्तसंपजुत्तोवि । जदि सद्दहदि ण अत्थे आदपधाणे जिणक्खादे ॥ ८५-३ ।। भावार्थ- जो कोई साधु संयमी हो, तपस्वी हो तथा सूत्रों का ज्ञाता हो परन्तु आत्मा पदार्थों मे जिसकी यथार्थ श्रद्धा नहीं है वह वास्तव में साधु नहीं है । (४) श्री कुन्दकुन्दाचार्य द्वादशानुप्रेक्षा में कहते हैं- मिच्छ अविरमणं कसायजोगा य पासवा होति । पणपणचउतियभेदा सम्म परिकित्तिदा समए ॥ ४७ ।। भावार्थ-मिथ्यात्व भाव एकांत आदि पाच प्रकार, अविरत भाव हिंसादि पाच प्रकार, कपाय भाव क्रोधादि चार प्रकार, योग मन, वचन, काय तीन प्रकार, ये सब कर्मों के आश्रव के द्वार है, ऐसा आगम मे भावार्थ- भले प्रकार कहा गया है।
२३४] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । किएहादितिरिण लेस्साकरणजसोक्खेसु गिद्धिपरिणामो । ईसाविसादभावो असुहमणंचि य जिणा वेंति ॥ ५१ ॥ भावार्थ-कर्मों के अनेक कारण अशुभ व शुभ मन, वचन, काय हैं सो यहां कहते हैं । कृष्ण, नील, कपोत तीन लेश्या के परिणाम, इद्रियों के सुख में लम्पटता, ईर्षा भाव, शोक भाव, अशुभ मन के भाव ऐसा जिनेन्द्रों ने कहा है। रागो दोसो मोहो हास्सादी-णोकसायपरिणामो । धूलो वा सुहुमो वा असुहमणोति य जिणा वेति ॥ ५२ ॥ भावार्थ- राग द्वेष, मोह, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्री वेद, पु वेढ, नपु सक वेद सम्बन्धी परिणाम चाहे तीव्र हो या मन्द हो अशुभ मन के भाव हैं ऐसा जिनेन्द्र कहते हैं। भत्तिच्छिरायचोरकहारो वयणं वियाण असुहमिदि । बंधणछेदणमारणकिरिया सा असुहकायेत्ति ॥ ५३ ।। भावार्थ-भोजन, स्त्री, राजा व चोर इन चार विकथाओं को कहना अशुभ वचन जानो, बाधना, छेदना, मारना आदि कष्टप्रद काम करना अशुभ काय की क्रियाए हैं। मोत्त ण असुहभाव पुवुत्तं णिरवसेसदो दव्य । वदसमिदिसीलसजमपरिणाम सुहमणं जाणे ।। ५४ ॥ भावार्थ-पहले कहे हुए सर्व अशुभ भावों को व द्रव्यों को छोड़कर जो परिणाम अहिंसादि व्रत, ईर्या आदि समिति, शील, सयम में अनुरक्त है उनको शुभ मन जानो। संसारछेदकारणवयणं सुहवयणमिदि जिणुट्टि। जिणदेवादिसु पूजा सुहकार्यत्ति य हवे चेट्टा ॥ ५५ ॥ भावार्थ-जिन वचनों से ससार के छेद का साधन बताया जावे वे शुभ वचन हैं ऐसा जिनेन्द्र ने कहा है । श्री जिनेन्द्र देव की पूजा, गुरू भक्ति, स्वाध्याय, सामायिक, संयम तथा दान आदि में चेष्टा व उद्यम मो शुभ काय है। सुहजोगेसु पवित्ती संवरणं कुणदि असुहजोगस्स । सुहजोगस्स गिरोहो सुद्ध वजोगेण संभवदि ॥ ६३ ।। भावार्थ- शुभ मन, वचन, कायके मोगों में प्रवृत्ति करने से अशुभ योगों के द्वारा आस्रव रुक जाता तथा जव शुद्धोपयोग में वर्ता जाता है तब शुम योगों का भी निरोध होजाता है-पूर्ण सवर होता है। सुद्ध वजोगेण पुणो धम्भ सुक्कं च होदि जीवस । तम्हा संवरहेद् भाणोत्ति विचितये णिच्चं ॥ ६४ ।।
सहज-सुख-साधन। [२३५ भावार्थ-शुद्धोपयोग से ही इस जीव के धर्मध्यान व शुक्लध्यान होता है । इसलिये कमा के रोकनेका कारण ध्यान है ऐमा नित्य विचारना चाहिये । (५, श्री कुन्दकुन्दाचार्य दर्शन पाहुड़ में कहते हैं - दंसणभट्टा भट्टा दसणभट्टस्स णत्थि णिव्याणं । सिझति चरियभट्टा दंसणभट्टा ण सिझति ॥ ३ ॥ भावार्थ-जो सम्यग्दर्शन से भ्रत है वे ही भ्रए है । क्योंकि सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट जीव को कभी निर्वाण का लाभ नहीं हो सकता है । जो चारित्र से भ्रष्ट हैं परन्तु सम्यक्त से भ्रष्ट नहीं हैं वे फिर ठीक चारित्र पालकर सिद्ध हो सकेंगे परन्तु जो सम्यग्दर्शन से भ्रए हैं वे कभी भी सिद्धि न प्राप्त करेगे। छह दव्य णव पयत्था पंचत्थी सत्त तच्च णिदिवा । सद्दहइ ताण रूवं सो सद्दिट्टी मुणेयव्यो ॥१६॥ भावार्थ-जो जीवादि छः द्रव्य, पाच अस्तिकाय, जीव तत्त्र आदि सात तत्व व पुण्य पाप सहित नव पदार्थ इन सब का यथार्थ स्वरूप भद्धान में लाता है उसे ही सम्यग्दृष्टि जानना योग्य है । जीवादी सद्दहणं सम्मत्त जिणवरेहि पण्णचं । ववहारा णिच्छयदो अप्पाणं हवइ सम्मत्त ॥ २० ॥ भावाथ-व्यवहारनय से जीवादि तत्वों का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है परन्तु निश्चयनय से अपना आत्मा ही सम्यग्दर्शन रूप है या शुद्वात्मा ही मैं हूँ ऐसा श्रद्धान सम्यक्त है। यह बात जिनेन्द्रों ने कही है। (६) श्री कुन्दकुन्दाचार्य मोक्षपाहुड में कहते हैं- परदव्वादो दुग्गइ मद्दव्वादो हु सग्गई होई । इय णाऊण सदव्वे कुणह रई विरय इयरम्मि ॥ १६ ॥ भावार्थ-पर द्रव्य में रति करने से दुर्गति होती है । किन्तु स्वद्रव्य में रति करने से सुगति होती है ऐसा जानकर पर द्रव्य से विरक्त होकर स्व द्रव्य मे प्रेम करो। मिच्छत्त अण्णाणं पावं पुण्णं चएवि तिविहेण । मोणबएण जोई जोयत्थो जोयए अप्पा ॥ २८ ॥ भावार्थ-मिथ्यात्व, अज्ञान व पुण्य पाप को मन, वचन, काय द्वारा त्याग करके मौन व्रत के साथ योगी ध्यान में तिष्ठकर अपने शुद्ध आत्मा को ध्यावे । जीवाजीवविहत्ती जोई जाणेड जिणवरमरण । तं सण्णाणं भणियं अवियत्थं सव्यदरसीहिं ॥ ४१ ।।
२३६ मम्मान और उसका मारा। भावार्थ-जो जोगी जीव और पीय परमो जिनेन्द्र के मन पं. 'अनुमार यथार्थ जानना है ची समगग्दर्शन गनिशान यह fift मामय मा म दगी जिनेन्द्रों ने कहा है। परमायय भायंती जोई मुन्चेड मलदलोहेग । गादियादि गावं का गिदि जिगदिहि ॥ १८ ॥ भावार्था-परमाला कामा नोनी पाया 32 जाना है। उसके नरे कर्म का प्राय नातानिन । देन गुरुम्मिय गनी गाम्पिय मजदेगु अगुरनो । गमगत्तम यांनी मागायो रोई जाई गो ।। १२ ।। भावार्थ-जो गागी न नाणा, देव मानको भनि करता है. गावी मयमी साधु यो में प्रीतिमान , गान निरवाना गठिऊग ग मम्मन मुगिम्मलं मुगिरीय नि। नं जागे भारज्जर मानय ! दक्यम्पयट्टाए ॥८६॥ भावाथ-हे यावर ! पन्य गुमान को प्रहर मे पतन मे निकम्प रबर ममार के एखों के भय के लिये जमीन गान में यागार | मम्मन जो भायट सम्माट्टी हवेड मो जीती। मम्मनपरिगदो उग्ग पवेड दुसम्मागि ।। ८७ ॥ भावार्थ-जो जीव निश्चय सम्यक्त गात्मा की तु पनाको गाबही सम्यग्दृष्टि है । जो कोई श्रात्मानुभव रूप सम्यक्त में रमण करता है सो दुष्ट 'पाठमा को नग कर देना है। कि बहुगा भगिएणं जे सिद्धा णरबरा गए काले । मिझिहहि जे वि भविया तं जाणइ सम्ममाहप्पं ॥ ८ ॥ भावार्थ-बहुत क्या कहें, जो महात्मा भूतकाल में मिद्ध गए है व अागामी काल में मिद होगे सो सब सम्यग्दर्शन का महात्म्य है ऐमा जानो। ते धरणा सुकयस्था ते मग ते नि पंडिया मणुया । सम्मत्त मिद्धियरं मिविणे वि ण मइलियं जेहिं ||८|| भावार्थ-वे ही धन्य है, वे ही कृतार्थ है, वे ही वीर है, वे ही पडित मानव हैं जिन्होंने स्वप्न सिद्धि को देनेवाले सम्यग्दर्शन को मलीन नही किया। निरतिचार सम्यग्दर्शन को पाकर प्रात्मानन्द का विलाम किया । शुद्ध सम्यक्त्व आत्मानुभूति ही है। भी सहज-सुख-साधन । [२३७ हिंसारहिए धम्मे अट्ठारहदोसवज्जिए देवे । णिग्गंथे पव्ययणे सद्दहणं होइ सम्मत्तं ॥ १० ॥ भावार्थ-हिसा रहित धर्म मे, अठारह दोप रहित देव मे व निग्रंथ मोक्ष मार्ग या साधु मार्ग मे जो श्रद्धान है सो सम्यग्दर्शन है। (७) श्री बट्टकेर आचार्य मूलाचार द्वादशानुप्रेक्षा में कहते हैं- रागो दोमो मोहो इंद्रियसण्णा य गारवकसाया । मणवयणकायसहिदा दु आसवा होंति कम्मस्स ॥३८॥ भावार्थ- राग, द्वीप, मोह पांच इन्द्रियो के विषय आहार, भय, मैथुन, परिग्रह, सज्ञा, ऋद्धि गारव, रस गारव, सात गारव व ऐसे तीन अभियान व क्रोधादि कपाय तथा मन वचन, काय कम। के श्राने के द्वार हैं। हिमादिएहि पंचहिं आसवदारेहिं आसवदि पाव । तेहितो धुव विणासो सासवणावा जह समुद्दे ॥ ४६॥ भावार्थ-हिंसा, असत्य चोरी, कुशील. परिग्रह ये पाच आश्रव के द्वार हैं । उनसे ऐसा पाप का आश्रव होता है, जिनसे सदा ही आत्मा का संसार समुद्र में नाश होता है । जैसे छेद सहित नौका समुद्र में डगमगा कर डूबती है। द्रियकसायदोसा णिग्धिप्पंति तवणाणविणएहिं । रज्जूहि णिघष्पंति हु उप्पहगामी जहा तुरया ।। ५० ।। भावार्थ-जैसे कुमार्ग में जानेवाले घोडे लगामो से रोक लिये जाते हैं वैसे ही तप, ज्ञान व विनय के द्वारा इन्द्रिय व कषाय के दोष दूर हो जाते हैं। संमारे संसरंतस्स खोवसमगदस्स कम्मस्म । सव्यस्स वि होदि जगे तवसा पुण णिज्जरा विउला ।। ५५ ॥ भावार्थ-ससार में भ्रमण करते हुए जब कर्मो का क्षयोपशम होता है तब इस लोक में सर्व जीवों के एक देश निर्जरा होती है परन्तु तप करने से बहुत अधिक कमी की निर्जरा होती है। चिरकालमज्जिद पि य विहुणदि तवसा रयत्ति णाउव । दुविहे तवम्मि णिच्चं भावेदव्यो हदि अप्पा ॥ ५८ ॥ भावार्थ- -चिरकाल के बाधे कर्म रज तप के द्वारा धुल जाते हैं ऐसा जानकर दो प्रकार बाहरी भीतरी तप के द्वारा नित्य ही आत्मा की भावना करनी योग्य है। हुए .
२३८] सम्यग्दर्शन पीर उसका माला ! (८) श्री वट्टकर स्वामी मूलाचार समयमार अधिकार में कहते हैं...- सम्मत्तादो गाण णागादो मनमायउयलद्री। उक्लद्धपयत्यो पृग सेयासेयं वियागादि ॥ १२ ॥ सेयासेयपिदराह उद्ध दम्पील मीलयं हादि । गोल फलेगशुदयं तत्तो पुग्ण लहदि गिणवागं ॥ १३ ॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शन होनेपर सम्यग्ज्ञान होना । मन्यज्ञान से सर्व पदार्थ का यथार्थ ज्ञान होना । जिसको पदायी का भेट विवान वहिना अहितकर भात्रों को टीक २ जानता है । जो श्रेय व कुत्रेय को पहिचानता है, वह कुशागार को देना है। शीलवान हो जाता है। शील के फल मे सम्पूर्ण चारित्र को पाता है। पूर्ण चारित्र को पार निर्माण को पार कर लेता है। गाणपिएगागरंपरागो म गमगतवजुदो । कसाथगारबुम्मुक्को गंगार तरीदे लई ।। ७७ ।। भावार्थ-जो ज्ञान र चारित्र में सम्पन हा 'यान, म्यागाय व नप में लीन है तथा कपाय व अभिमान से मुक्त है, वह शीघ्र संमार मे तर जाता है। (8) श्री वट्टकरी म्वामी मूलाचार पचाचार में कहते हैं . गहोउप्पिदगत्तम्ग रेणुगो लगदे जघा अंगे। तह रागदोसमिणेहोल्लिदम्म कम्मं मुरगेयम् ॥ ३० ॥ भावार्थ-जैसे तेल से चिकने शरीर पर न लग जाती है, वैसे राग प रूपी तेल मे लिप्त है उसके कर्म का बंध हो जाता है जं खलु जिणोवदिट्टतथिचि भावदो गहणं । सम्म ६सणभावो तविवरीदं च मिच्छतम् ॥ ६८ ॥ भावार्थ-जैसे पदार्थ का स्वरूप जिनेन्द्र ने कहा है वे ही पदार्थ है ऐसा भावपूर्वक श्रद्धान करना सम्य- ग्दर्शन है, इससे विपरीत मिश्यादर्शन है। जे अत्थपज्जया खलु उवदिटा जिणवरेहिं सुदणाणे । ते तह रोचेदि णरो दमणविणयो हदि एसो ॥ १६६ ॥ भावार्थ-जो जीवादि पदार्थ जिनेन्द्रों ने श्रुतज्ञान में उपदेश किये हे उनकी तरफ जो मानव रुचि करता है उसी के ही सम्यग्दर्शन की विनय होती है । (१०) श्री वट्टकेरी स्वामी मूलाचार पडावश्यक में कहते हैं- जिदकोहमाणमाया जिदलोहा तेण ते जिणा होति । हंता अरिं च जम्मं अरहंता तेणु वुच्चंति ॥ ६४ ॥ - सहज-सुख-साधन । [२३९ भावार्थ -जिसने क्रोध, मान, माया, लोभ कपायों को जीत लिया है वे जिन है । जिन्होंने ससार रूपी शत्रु को नाश कर दिया है वे ही अरहत हैं ऐसे कहे जाते हैं। अरिहंति बंदणणमंसणाणि अरिहंति पूयसकारं । अरिहति सिद्धिगमरणं अरहंता तेण उच्चति ॥ ६५ ॥ भावार्थ-जो वदना व नमस्कार के योग्य हैं व जो पूजा सत्कार के योग्य हैं। तथा जो सिद्ध होने योग्य हैं उनको अरहत ऐमा कहते हैं। सनं केवलकप्पं लोगं जाणंति तह य पस्संति । केवलणाणचरित्ता तहमा ते केवली होति ॥ ६७ ।। भावार्थ-क्योकि श्री अरहत भगवान केवलज्ञान के विपय रुप सर्व लोक अलोक को देखते जानते हैं व केवलज्ञान में ही आचरण कर रहे हैं इसलिये वे केवली होते हैं। मिच्छत्तवेदणीयं णाणावरणं चरित्तमोह च । तिविहा तमाहु मुक्का तमा ते उत्तमा होति ॥ ६८ ॥ भावार्थ- क्योंकि अरहत भगवान ने मिथ्यात्वमय श्रद्धान को, ज्ञानावरण को, चारित्र मोइ को इन तीनों को त्याग कर दिया है, इसलिये वे उत्तम हैं। भत्तीए जिणवराणं खीयदि जं पुव्वसंचियं कम्मं । आयरियपसाएण य विज्जा मंता य सिझांति ॥ ७२ ॥ भावार्थ-श्री जिनेन्द्रों की भक्ति से पूर्व सचित कर्म क्षय हो जाते हैं। आचार्य की भक्ति से व उनकी कृपा से विद्याए व मत्र सिद्ध हो जाते हैं। जे दबपज्जया खलु उवदिट्ठा जिणवरेहिं सुदणाणे । ते तह सद्दहदि णरो दंसणविणोत्ति णादव्यो ॥ ८८ ॥ भावार्थ-जो द्रव्यों की पर्याये जिनेन्द्र ने श्रुतज्ञान मे उपदेश की हैं उनको जो श्रद्धान करता है, वह दर्शन विनय है ऐसा जानना योग्य है। (११) श्री समन्तभद्राचार्य रत्नकरण्ड में कहते हैं- श्रद्धान परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् । त्रिमूढापोढमष्टाङ्ग सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥ ४ ॥ भावार्थ- सत्यार्थ देव, शास्त्र, गुरु का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है । वह नि शकितादि आठ अग सहित हो, लोक मूढता, देव मूढता, गुरु मूढता रहित हो तथा जाति, कुल, धन, बल, रूप, विद्या, अधिकार, तप इन आठ मदों से रहित हो । - २४०] सम्यग्दर्शन और उमका महास्य । सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातङ्गदेह जम् । देवा देवं विदुर्भस्मगृहाङ्गारान्तराजसम् ॥ २८ ॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शन सहित एक चाडाल को भी गणधर देवों ने माननीय देव तुल्य कहा है। जैसे भस्म मे छिपी हुई अग्नि की चिनगारी हो । श्रात्मा उसका पविन हो गया है, किन्तु शरीरम्पी भस्म में छिपा है। गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो निर्मोहो नैव मोहवान् । अनगारो गृही श्रेयान निर्माहो मोहिनो मुनेः ॥ ३३ ॥ भावार्थ-जो सम्यग्दृष्टि गृहस्थ है, वह मोक्ष मार्ग पर स्थिर है, जबकि मिथ्यादृष्टि मुनि मोक्षमार्गी नहीं है । इसलिये सम्यग्दृष्टि गृहस्थ मिथ्यादृष्टी मुनि मे श्रेष्ट है। न सम्यक्त्वममं किञ्चित्काल्ये त्रिजगत्यपि । श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनुभृताम् ॥ ३४ ॥ भावार्थ-तीन लोक व तीन काल में मम्यग्दर्शन के समान प्राणियों को कोई कल्याणकारी नहीं है । इमी तरह मिथ्यादर्शन के समान कोई अहितकारी नहीं है । सम्यग्दर्शनशद्वा नारकतिर्यड्नपुसकत्रीत्वानि । दुष्कुलविकृताल्पायुर्दरिद्रतां च व्रजन्ति नाप्यवतिका ॥ ३५ ॥ भावार्थ-शुद्ध सम्यग्दृष्पि व्रत रहित होनेपर भी नारकी पशु, नपु सक स्त्री, नीचकुली, विकलागी, आयु धारी तथा दरिद्री नहीं पैदा होते हैं। (१२) श्री शिवकोटि प्राचार्य भगवती आराधना में कहते हैं- अरहतमिद्धचेय, सुदे य धम्मे य साधुबग्गे य । पायरियेसूबझा, एसु पवयणे दंसणे चावि ।। ४६ ॥ भत्ती पूया वएणज-, णण च णासणमवएणवादस्य । आमादणपरिहारो, दमणविणो समासेण ।। ४७ ।। भावार्थ-श्री अरहत भगवान, सिद्ध परमेष्टी, उनकी मूर्ति, द्वादशाग श्रुत, धर्म, साधु समूह, प्राचार्य, उपाध्याय, प्रवचन और सम्यग्दर्शन इन दस स्थानो में भक्ति करना, पूजा करनी, गुणों का वर्णन करना,कोई निन्दा करे तो उसको निवारण करना, अविनय को मेटना यह सब सक्षेप मे सम्यग्दर्शन का विनय है। णगरस्स जह दुवारं, मुहस्स चक्खू तरुस्स जह मूलम् । तह जाण सुमम्मत्त, णाणचरणबी रियतवाणम् ॥ ७४० ॥ भावार्थ-जैसे नगर की शोभा द्वार से है, मुख की शोभा चक्षु से है, वृक्ष की स्थिरता मूल से है, इसी तरह ज्ञान, चारित्र, तप और वीर्य की शोभा सम्यग्दर्शन से है। -- सहज-सुख-साधन। [२४१ -- . से सम्मत्तस्स य लम्भो तेलोकस्स य हवेज्ज जो लम्भो। सम्मदसण लम्भो, वरं खु तेलोकलंभादो ॥ ७४६ ॥ लध्दण य तेलोक्क, परिवड दि परिमिदेण कालेण । लध्दूण य सम्मत्त, अक्खयसोक्खं लहदि मोक्खं ॥ ७४७ ॥ भावार्थ- एक तरफ सम्यग्दर्शन का लाभ होता हो दूसरी तरफ तीन लोक का राज्य मिलता है तो भी तीन लोक के लाभ से सम्यग्दर्शन का लाभ श्रेष्ठ है । तीन लोक का राज्य पाकर के भी नियत काल पीछे वहां पतन होगा । और जो.सम्यग्दर्शन का लाभ हो जायगा तो अविनाशी मोक्ष के सुख को पाएगा। विधिणा कदस्स सस्स-, इस जहा णिप्पादयं हवदि वासं । तह-अरहादियभत्ती, णाणचरणदसणतवाणं ।। ७५५ ।। भावार्थ-विधि सहित बोए हुए अन्न का उत्पाद जैसे वर्षा से होता है से ही अरहत आदि की भक्ति ज्ञान चरित्र सम्यक्त व तप की उत्पत्ति होती है। जो अभिलासो विसए-, सु तेण णय पावए सुह पुरिसो । पादि य कम्मबंध, पुरिसो विसयाभिल्लासेण ।। १८२७ ।। भावार्थ-जो पुरुप पाच इद्रियों के विषयों में अभिलाषा करता है वह अात्मसुख को नहीं पा सकता है। विषयों की अभिलाषा से यह पुरुप कर्म का बन्ध करता है। कोहि डहिज्ज जह चं-, दणं णरो दारुगं च बहुमोल्लं । णासेड मणुस्सभवं, पुरिसो तह विसयलोभेण ॥ १८२८ ॥ भावार्थ-जैसे कोई मानव बहु मूल्य चदन के वृक्ष को लकडी या ईंधन के लिये जला डाले तैसे ही अज्ञानी पुरुप इद्रिय विषयों के लोभ से इस मनुष्य भव को नाश कर देता है। छडिय रयणाणि जहा, रयणद्दीवा हरिज्ज कट्ठाणि । माणुसभवे वि छंडिय, धम्मं भोगेऽभिलसदि तहा ॥ १८२६ ।। भावार्थ-जैसे कोई पुरुप रस्नद्वीप में रत्नों को छोडकर काष्ट को ग्रहण करे वैसे ही इस मनुष्य भव में अज्ञानी धर्म को छोडकर भोगों की अभिलापा करता है। गंतूण णंदणवणं, अमियं छडिय विमं जहा पियह । माणुसभवे वि छंडिय, धम्म भोगेऽभिलमदि तहा ॥ १८३० ॥ भावार्थ-जैसे कोई पुरुष नन्दन वन मे जाकर अमृत को छोड विष पीवे वैसे ही अज्ञानी इस मनुष्य भव में धर्म को छोडकर भोगों की अभिलापा करता है । . - २४२] सम्यग्दर्शन और उसका महास्य । - . 2 - , है गुत्तिपरिखाहिं गुत्त, संजमणयरं ण कम्मरिउसेणा। वधेड़ सत्त सेणा, पुरं व परिखादिहि सुगुत्त ॥ १८३८ ॥ भावार्थ-जैसे खाई कोट से रक्षित नगर को शत्रु की सेना भग नहीं कर सकती है |से तीन गुप्त रूपी खाई कोट से रक्षित सयम नगर को कर्म रूपी वैरी की सेना भग नहीं कर सकती है। अमुरांतो सम्मत्त, परीसहचमुक्करे उदीरंता । णेण सदी मोत्तव्या, एत्थ हु अाराधणा भणिया ।। १८४२ ।। भावार्थ-परीपहों की मेना समूह पाने पर भी छानी को सम्यग्दर्शन को न छोडते हुए भेद 'विज्ञान की स्मृति को नहीं छोडना चाहिये । डहिऊण जहा अग्गी,. विद्धसदि सुबहुगं पि तणगसीं । विद्ध सेदि तबग्गी, तह कम्मतरणं सुबहुगं पि ॥ १८४६ ।। भावार्थ-जैसे अग्नि आप ही जलकर बहुत तृण के ढेर को जला देती है वैसे ही तप स्पी अग्नि बहुन काल के सचित करें। को जला देती है । धादुगदं जह कणय, सुज्झा धम्मतमग्गिणा महदा। सुज्झइ तबग्गिधम्मो, तह जीयो कम्मधादुगदो ॥ १८५१ ।। भावार्थ-जैसे पापाण में मिला हुआ सोना महान अग्नि से धमा हुअा शुद्ध हो जाना है वैसे कर्म धातु से मिला हुआ जीव महान् तपरूपी अग्नि से धमा हुआ शुद्ध हो जाता है। एवं पिणद्धसंबर-, धम्मो सम्मत्तवाहणारूढो । सुदणाणमहाधणुगो, झाणादितवोमयसरेहि ॥ १८५३ ॥ संजमरणभूमीए, कम्मारिचमू पराजिणिय सळां । पावदि संजयजोहो, अणोवमं मोक्खरज्जसिरि ।। १८५४ ॥ भावार्थ-इस तरह जो कोई सयमी योद्धा सवर रूपी वख्तर पहरकर, सम्यग्दर्शन रूप वाहन' पर चहा हुआ श्रुतज्ञान रूपी महा धनुप द्वारा ध्यानमई तप के बाणों को संजम रूपी रणभूमि में कर्म रूप नैरी पर चलाकर सर्व कर्म की सेना को जीत लेता है वही अनुपम मोक्ष की राज्य लक्ष्मी को पाता है णिज्जियदोसं देवं सव्वजीवाण दयावरं धम्म । वज्जियर्गथं च गुरू', जो मरणदि सो हु सदिट्ठी ॥ १ ॥ भावार्थ-वही सम्यग्दृष्टी कहा जाता है जो दोष रहित देव को, सर्व जीवो पर दया करनेवाले धर्म को व परिग्रह रहित गुरू को ही मानता है। । . । 1 4 महज-सुख-साधन। [२४३ (१३) श्री गुणभद्राचार्य श्रात्मानुशासन में कहते हैं :- सर्वः प्रेप्सति सत्सुखाप्तिमचिरात् सा सर्वकर्मक्षयात् । सद्वृत्तात्स च तच्च बोधनियतं सोप्यागमात् स श्रुतेः ।। सा चाप्तात्स च सर्वदोपरहितो रागादयस्तेप्यत- स्तं युक्त्या सुविचार्य सर्वसुखदं सन्तः श्रयन्तु श्रियै ।। ३ ।। भावार्थ-सर्व जीव सच्चे सुख को शोघ्र चाहते हैं । सो सुख सर्वे कर्मों के क्षय से होगा। कमी का क्षय सम्यक्चारित्र से होगा । चारित्र सम्यग्ज्ञान पर निर्भर है । सो ज्ञान आगम से होता है । आगम श्री जिनवाणी के उपदेश के आधार पर है । यह उपदेश अरहंत प्राप्त से मिलता है । प्राप्त वही यथार्थ है जो रागादि दोषों से रहित हो । इसलिये सत्तुरुप भले प्रकार विचार करके सुख रूपी लक्ष्मी के लिये सच्चे देव की शरण ग्रहण करो। शमबोधवृत्ततपसां पापागस्येव गौरव पुसाः । पूज्यं महामणेखि तदेव सम्यक्त्वसंयुक्तम् ।। १५ ।। भावार्थ-शात भाव, ज्ञान, चारित्र, तप इन सबका मूल्य सम्यक्त के बिना ककड पत्थर के समान है । परन्तु यदि इनके साथ सम्यग्दर्शन हो तो इनका मूल्य महामणि के समान अपार है। अस्त्यात्माऽस्तमितादिवन्धनगतस्तद्वन्धनान्यास्रवे- स्ते क्रोधादिकृताः प्रमादजनिताः क्रोधादयस्तेऽत्रतात् । मिथ्यात्वोपचितात् स एव समलः कालादिलब्धौ क्वचित्- सम्यक्त्ववतदक्षताऽकलुपताऽयोगैः क्रमान्मुच्यते ॥ २४१ भावार्थ-आत्मा है सो अनादि काल से कमी से बधा है । कमाँ का वध आश्रवों से होता है, अाश्रव क्रोधादि से होता है, क्रोधादि प्रमाद से होते हैं, प्रमाद हिंसा आदि पांच अव्रतों से होता है, ये अव्रत मिथ्यादर्शन से पुष्ट होते हैं, इस ही मिथ्यादर्शन से यह आत्मा मलीन है काल आदि की लब्धि पाकर जो सम्यग्दर्शन, चारित्र, विवेक, कपाय रहितपना पावे तो यह अनुक्रम मुक्त हो जावे। (१४) श्री देवसेनाचार्य तत्वसार में कहते हैं- मणवयणकायरोहे रुज्झइ कम्माण प्रासवो राणं । चिरवद्ध गलइ सई फलरहियं जाड जोईणं ॥ ३२ ।। भावार्थ-मन, बचन, काय को रोक लेने पर नियम से कर्मों का पाश्रव रुक जाता है तथा चिरकाल के बंधे हुए कर्म फल रहित होकर योगी की आत्मा से स्वय जल जाते है । भ ८ से . , २४४] मम्यग्दर्शन और उसका महास्य । लहइ ण भव्यो मोक्खं जावइ परदव्यवावडो चित्ती । उग्गतवंपि कुणतो सुद्ध भावे लडं लहह ॥ ३३ ।। भावार्थ-घोर तप करते हुए भी जब तक पर द्रव्यों में मन लवलीन है तब तक भव्य जीव मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता है किंतु शुद्ध भाव में लीन होने से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है । परदव्वं देहाई कुणइ ममत्तिं च जाम तस्सुवरि । परसमयरदो तानं वज्झदि कम्मेहिं विविहेहिं ।। ३४ ॥ भावार्थ-शरीर आदि पर द्रव्य हैं । जब तक यह जीव उनके ऊपर ममता करता है तब तक वह पर पदार्थ में रत बहिरात्मा है और तब तक नाना प्रकार का से वधता है । रूमइ तूसइ णिच्चं इन्दियविमयेहिं संगो मुढो । सकसायो अण्णाणी णाणी पदो द् विवरीदो ॥ ३५ ॥ भावार्थ- कपायवान अनानी मूढ नित्य ही इन्द्रियों के विपयों को मनोज पाकर सतुष्ट होता है, अमनोज पाकर क्रोधित होता है परन्तु ज्ञानी इससे विपरीत रहता है । ण मुण्ड सगं भागं ण परं परिणमइ मुणड अप्पाणं । नो जीवो संवरणं णिज्जरणं सो फुडं भणिो ॥ ५५ ।। भावार्थ-जो जीव अपने शुद्ध प्रात्मीक भाव को छोडता नहीं है तथा पर रागादि भावों में परिणमता नहीं है और अपने आत्मा का अनुभव करता है वही प्रगट रूप से सवर रूप और निर्जरा रूप कहा गया है। ण मरह तावेत्थ मणो नाम ण मोहो खयगयो सम्बो। खीयंति खीणमोहे सेमाणि य घाडकम्माणि ॥ ६४ ।। भावार्थ-जब -जब तक सर्व मोह का क्षय नहीं होता है तब तक मन का मरण नहीं होता है । मोह के क्षय होनेपर शेष तीन घातीय कर्म भी क्षय हो जाते हैं। णिहए राए सेएणं णामइ सयमेव गलियमाहप्पं । तह णिहयमोहराए गलंति णिस्सेसघाईणि ।। ६५ ।। भावार्थ-जैसे राजा के मरने पर राजा की सेना प्रभा रहित होकर स्वय भाग जाती है वैसे ही मोह राजा के नाश होनेपर सर्व घातीय कर्म जल जाते हैं। धम्माभावे परदो गमणं णस्थिति तस्म सिद्धस्स । अत्थइ अणंतकाल लोयग्गणिवासिउ होउं ॥ ७० ॥ .
महज-सुख-साधन । [२४५ भावार्थ-अलोकाकाश मे धर्म द्रव्य नहीं हैं इससे श्री सिद्ध भगवान का गमन लोक के बाहर नहीं होता है वे लोक के अग्र भाग मे अनन्त काल तक निवास करते रहते हैं। संते वि धम्मदव्वे अहो ण गच्छइ तह य तिरियं वा । उर्दू गमणसहाश्रो मुक्को जीवो हवे जम्हा ॥ ७१ ॥ भावार्थ-लोक मे सर्वत्र धर्म द्रव्य होते हुए भी मुक्त जीव न नीचे जाता है न आठ दिशाओ में जाता है किन्तु ऊपर को ही जाता है क्योंकि जीव का अर्ध्व गमन स्वभाव है। (१५) श्री योगेन्द्रदेव योगसार में कहते हैं:- मग्गणगुणठाणड कहिया ववहारेण वि दिहि । णिच्छइणइ अप्पा मुणहु जिम पावहु परमेट्ठि ॥ १७ ॥ भावार्थ-चौदह मार्गणा, व चौदह गुणस्थान व्यवहार नय से जीव के कहे गए हैं । निश्चय नय से आत्मा को इनसे रहित ध्याश्रो जिससे परमेष्ठी पद की प्राप्ति हो सके। णिच्छइ लोयपमाण मुणि ववहारइ सुसरीरु । एहउ अप्पसहाउ मुणि लहु पावहु भवतीरु ॥ २४ ॥ भावार्थ- निश्चय नय से वह आत्मा लोक प्रमाण आकारधारी है परन्तु व्यवहार नय से अपने शरीर के प्रमाण है, ऐसे प्रात्मा के स्वभाव का मनन करो जिससे शीघ्र ही ससार सागर के तट पर पहुंच जाओ। चउरासीलक्खह फिरिउ काल अणाइ अणंतु । पर मम्मत्त ण लद्ध जिउ एहउ जाणि णिभंतु ॥ २५ ॥ भावार्थ-यह जीव अनादिकाल से अनन्त काल हो गया चौरासी लाख योनियों में फिरता चला आरहा है क्योंकि इसको सम्यग्दर्शन का लाभ नहीं मिला, यही बात बिना भ्राति के जानो । सम्यक्त रत्न हाथ लग जाता तो भव मे न भ्रमता । पुरिण पावइ सग्ग जिय पावइ णरयणिवासु । वे छडि वि अप्पा मुणइ तउ लब्भइ सिक्वासु ॥ ३२ ॥ भावार्थ-पुण्यवध से जीव स्वर्ग में जाता है, पाप बध से नरक में वास पाता है । जो कोई पुण्य पाप दोनों से ममता छोडकर अपने आत्मा को ध्याता है वही मोक्ष में वास पाता है । छहदव्वह जे जिणकहिआ णव पयत्थ जे तत्त । ववहारें जिणउत्तिया ते जाणियहि पयत्त ॥ ३५ ॥ भावार्थ-श्री जिनेन्द्र ने जो छः द्रव्य तथा नौ पदार्थ कहे हैं उनका श्रद्धान व्यवहार नय से सम्यक्त भगवान ने कहा है उनको प्रयत्न पूर्वक जानना योग्य है ।
२४६] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । चा तित्थहु देउलि देउ जिणु सव्व बि कोई भणेइ । देहादेउलि जो मुणड सो चुह को वि हवेह ।। ४४ ॥ भावार्थ-तीर्थ स्थान में व देवालय में श्री जिनेन्द्र देव हैं ऐसा सब कोई कहता है । परन्तु जो अपने शरीर रूपी मदिर मे आत्मा देव को पहचानता है वह कोई एक पडित है। आउ गलइ ण वि मणु गलह ण वि अासाहु गलेड । मोह फुरइ ण वि अप्पहिउ हम संसार भमेड ।। ४८ ॥ भावार्थ- -आयु तो गलती जाती है । परन्तु न तो मन गलता है न श्राशा तृष्णा गलती है। मोह की गहलता झलक रही है । इससे यह प्राणी श्रात्म हित नहीं करता हुश्रा इस ससार मे भ्रमण किया करता है। जेहउ मणु विसयह रमइ तिम जे अप्प मुण्ड । जोडउ भणइ रे जोहहु लहु णिव्याण लहेइ ।। ४६ ॥ भावार्थ-जैसा यह मन इन्द्रियों के विषयों में रमता है वैसा यदि अपने आत्मा के अनुभव में रम जावे तो योगेन्द्रदेव कहते है कि हे योगी ! यह जीव शीघ्र ही निर्वाण को प्राप्त कर लेवे । जो पाउ वि सो पाउ मुणि सव्वु वि को वि मुण्ड । जो पुराण पाउ विभणइ सो बहु को वि हवेइ ॥ ७० ॥ भावार्थ-जो पाप है सो पाप है ऐसा तो सब कोई मानते हैं । परन्तु जो कोई पुण्य को भी पाप कहता है, आत्मा को बाधक कहता है ऐसा बुद्धिमान कोई ही होता है । जइ बंधउ मुक्कर मुणहि तो बंधियहि णिभंतु । सहजसरूवि जइ रमइ तो पावइ सिव संतु ॥ ८६ ॥ भावार्थ-जो कोई ऐसा विकल्प करता है कि मैं बन्धा हूँ मुझे मुक्त होना है वह अवश्य वध को प्राप्त होता है । जो कोई सहज अात्म स्वरूप में रमण करता है वही परम शांत मोक्ष को पाता है। सम्माइट्ठीजीवडह दुग्गइगमणु ण होइ । जइ जाइ वि तो दोम ण वि पुवक्किउ खवणेइ ॥ ८७ ॥ भावार्थ सम्यग्दृष्टी जीव का दुर्गति मे गमन नहीं होता है । यदि पूर्वबद्ध श्रायु फर्म के योग से दुर्गनि आवे भी तो दोष नहीं है, वह पूर्वकृत कमाँ का नाश ही करता है। अप्पसरूवह जो रमइ छंड वि सहुववहारु । सो सम्माडट्ठी हवइ लहु भवपारु ॥ ८८ ॥ भावार्थ-जो सर्व व्यवहार को छोडकर एक आत्मा के स्वरूप में रमण करता है वही सम्मग्दृष्टी है, वह शीघ्र भव सागर से पार हो जाता है। - ।
सहज-सुख-साधन । [२४७ जो सम्मत्तपहाणु बुहु सो तयलोय पहाणु । केवलणाण वि सह लहई सासयसुक्खणिहाणु ॥ १० ॥ भावार्थ-जो पडित सम्यग्दर्शन मे प्रधान है वह तीन लोक मे प्रधान है। वह शीघ्र ही अविनाशी सुख के निधान केवलज्ञान को झलका लेता है। जे सिद्धा जे सिज्झसिहि जे सिझहि जिण उत्त । श्रप्पादंसण ते वि फुड एहउ जाणि णिभंतु ॥ १०६ ॥ भावार्थ-जो सिद्ध हुए है व जो सिद्ध होगे व जो सिद्ध हो रहे हैं, वे सब आत्मा के दर्शन से ही निश्चय सम्यग्दर्शन से ही होते हैं ऐसा जिनेन्द्र ने कहा है। इसी बात को बिना किसी भ्राति के जान । (१६) श्री नागसेन मुनि तत्वानुशासन में कहते हैं: तापत्रयोपतप्तेभ्यो भव्येभ्यः शिव शर्मणे । तचं हेयमुपादेयमिति द्वधाभ्यधादसौ ।। ३ ।। भावार्थ-- -जन्म जरा मरण के ताप से दुखी भव्य जीवो को मोक्ष का सुख प्राप्त हो जावे इसलिये सर्वज्ञ ने हेय और उपादेय ऐसे दो तत्व वताए हैं। बन्धो निवन्धनं चास्य हेयमित्युपदर्शितं । हेयं स्याद् खसुखयोर्यस्माद्वीजमिदं द्वयं ॥ ४ ॥ भावार्थ-कर्म वध और उसका कारण हेय तत्व या त्यागने योग्य तत्व कहा गया है क्योंकि ये ही दोनों त्यागने योग्य मासारिक दुःख तथा सुख के बीज है। मोक्षस्तत्कारणं चैतदुपादेयमुदाहृतं । उपादेयं सुखं यस्मादस्मादाविर्भविष्यति ॥ ५ ॥ भावार्थ-मोक्ष और उसका साधन उपादेय तत्व या ग्रहण करने योग्य तत्त्र कहा गया है क्योंकि इसी ही से उपादेय मोक्ष सुख का प्रकाश होगा। तत्र बंधः सहेतुभ्यो यः संश्लेषः परस्परं । जीवकर्मप्रदेशानां स प्रसिद्धश्तुविधः ॥ ६ ॥ भावार्थ-राग द्वेषादि कारणों से तो जीविका और कर्म वर्गणान्त्रों का परस्पर सम्बन्ध होना सो बन्ध प्रकृति प्रदेश, स्थिति अनुभाग से चार प्रकार का प्रसिद्ध है। स्युमिथ्यादर्शनज्ञानचारित्राणि समासतः । बंधस्य हेतमोऽन्यस्तु त्रयाणामेव विस्तरः ॥ ८॥ ३ , २४८] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । भावार्थ-बंध के हेतु सक्षेप से मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान व मिथ्याचारित्र हैं । इससे अधिक जो कुछ कहना है सो इन्हीं का विस्तार है। स्यात्सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रितयात्मकः । मुक्तिहेतुर्जिनोपज्ञं निर्जरासंवरक्रियाः ॥ २४ ॥ भावार्थ-मोक्ष का साधन जिनेन्द्र भगवान ने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, व सम्यक्चारित्र की एकता को कहा है । इसीसे नवीन कर्मों का संवर होता है व पुरातन कमी की निर्जरा होती है । जीवादयो नवाप्यर्था ते यथा जिनभाषिताः । ते तथैवेति या श्रद्धा सा सम्यग्दर्शनं स्मृतं ।। २५ ॥ भावार्थ-जीव, अजीव, आश्रव, बन्ध, पुण्य, पाप, संवर, निर्जरा, मोक्ष इन नव पदार्थों का जैसा स्वरूप श्री जिनेन्द्र ने कहा है वे उसी ही तरह हैं । ऐसी श्रद्धा उनको सम्यग्दर्शन कहते हैं। पुरुषः पुद्गलः कालो धर्माधर्मों तथावरं । पविध द्रव्यमानातं तत्र ध्येयतमः पुमान् ॥ ११७ ॥ भावार्थ-जीव, पुद्गल, काल, धर्म, अधर्म तथा आकाश छ प्रकार द्रव्य कहा गया है। उनमें ध्यान करने योग्य एक शुद्ध आत्मा ही है। कर्म बंधन विध्वंसाचं व्रज्यास्वभावतः । क्षणैनैकेन मुक्तात्मा जगच्चूडाग्रमृच्छति ।। २३१ ॥ भावार्थ-कर्मो के वन्ध क्षय हो जाने पर मुक्त श्रात्मा एक समय में ही स्वभाव से ऊपर को जाता है और लोक शिखर पर विराजमान हो जाता है। पुंसः संहारविस्तारौ ससारे कर्मनिर्मिती । मुक्तौ तु तस्य तो नस्तः क्षयात्तद्ध'तुकर्मणां ॥ २३२ ॥ भावार्थ- -ससार अवस्था में कर्मों के उदय के निमित्त से जीव के आकार में सकोच या विस्तार होता था, मुक्त होनेपर संकोच विस्तार के कारण कर्मों का क्षय हो जानेपर आत्मा के प्रदेशों का सकोच विस्तार नहीं होता है जैसा अन्तिम शरीर से आत्मा होता है वैसा आकर सिद्ध भगवान का स्थिर रहता है। तिष्ठत्येव स्वरूपेण क्षीणे कर्मणि पौरुषः । यथा मणिस्वहेतुभ्यः क्षीणे सांसर्गिके मले ॥ २३६ ।। भावार्थ -जव सर्व कमी का क्षय हो जाता है तब आत्मा अपने स्वरूप में ही ठहरता है जैसे रत्न के भीतर से ससर्ग प्राप्त मल उसके हेतुओं से निकल जानेपर रत्न अपने स्वभाव में चमक्ता है। - n सहज-सुख-साधन। [२४९ भावार्थ- : (१७) श्री अमृतचंद्राचार्य पुरुषार्थमिद्ध्य पाय में कहते हैं :- परिणममाणो नित्यं ज्ञान विवत्तरनादिसन्तत्या। परिणामानां स्वेपां स भवति का च भोक्ता च ॥ १० ॥ -यह जीव अनादि काल से ज्ञानावरणादि कमी से मलीन है, उन कमां के द्वारा जिन विभावों में यह परिणमन करता है उनका यह जीव अपने को कर्ता तथा भोक्ता मान लेता है। जीवकृत परिणामं निमित्तमात्रं प्रपद्य पुनरन्ये । स्वयमेव परिणमन्तेऽत्र पुद्गलाः कर्मभावेन ॥ १२ ॥ भावार्थ-जीव के राग द्वेपादि विभावों के निमित्त होते हुए अन्य कर्मवर्गणा योग्य पुद्गल स्वय ही ज्ञाना- वरणादि कर्म रूप परिणमन कर जाते है। परिणममाणस्य चितश्चिदात्मकः स्वयमपि स्वकै वैः । भवति हि निमित्तमात्रं पौदगलिक कर्म तस्यापि ॥ १३ ॥ भावाथ- -यह जीव आप ही अपने चैतन्यमई रागादि भावो से जब परिणमन करता है तब वहां पुद्गल कर्म का उदय निमित्त मात्र होता है । रागादि नैमित्तक भाव हैं, जीव के स्वभाव नहीं है । एवमयं कर्मकृतैर्भावैरसमाहितोऽपि युक्त इव । प्रतिभाति वालिशानां प्रतिभासः स खलु भवबीजम् ॥ १४ ॥ भावार्थ-इम तरह जो कमी के निमित्त से रागादि भाव होते है उनका आत्मा के साथ तादात्म्य सम्बध नहीं है । निश्चय से आत्मा उनसे भिन्न है तो भी अन्नानी जीवों को यही प्रतीति में आता है कि ये रागादि भाव जीव के ही हैं यही प्रतीभास अज्ञान है और ससार भ्रमण का कारण है। जीवाजीवादीनां तवार्थानां सदैव कतव्यम् । श्रद्वानं विपरीताऽभिनिवेशविविक्तमात्मरूपं तत् ।। २२ ॥ भावार्थ जीव और अजीव आदि तत्वों का श्रद्वान विपरीत अभिप्राय रहित यथार्थ रूपसे रखना चाहिये यही व्यवहार सम्यक्त है, निश्चय से यह सम्यक्त आत्मा का स्वभाव है । असमग्र भावयतो रत्नत्रयमस्ति कर्मबन्धो यः । सविपक्ष कृताऽवश्य मोक्षोपायो न बन्धनोपायः ।। २११ ॥ जब साधक के रत्नत्रय की भावना पूर्ण नहीं होती है, जब जो कमी का बन्ध होता है उसमे रत्नत्रय का दोष नहीं है। रत्नत्रय तो मोक्ष का ही साधक है, वह बध कारक नहीं है । उस समय जो रत्न- त्रय भाव का विरोधी रागाश होता है वही बन्ध का कारण है । येनांशेन सुदृष्टिातेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनागेनाम्य बन्धन भवति ।। २१२ ।। भावार्थ-ज - , २५० ] सम्यग्दर्शन और उसका महास्य । - - भावार्थ-जितने अंश सम्यग्दर्शन होता है उतने अश से बन्ध नहीं होता है । उसीके साथ जितना अंश राग का होता है उसी राग के अश से बन्ध होता है। योगात्प्रदेशबन्धः स्थितिवन्धो भवति यः कपायात्त । दर्शनयोधचरित्रं न योगरूपं कपायरूप च ॥ २१५ ॥ भावार्थ-योगो से प्रदेश वन्ध और प्रकृति वध होता है, कपायो से स्थिति बध व अनुभाग वध होता है । सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र न योग रूप है, न कपाय रूप है । इसमे रत्नत्रय वध के कारण नहीं है। (१८) श्री अमृतचन्द्राचार्य नाटक समयसार कलश में कहते हैं- एकत्वे नियतस्य गद्धनयतो व्याप्ततुर्यदस्यात्मनः । पूर्णज्ञानधनम्य दर्शन मिह द्रव्यान्तरेभ्यः पृथक् ।। मम्यग्दर्शनमेतदेवनियमादात्मा च ताबानयम् । तन्मुक्तनवतत्त्वसन्ततिमिमामात्मायमेकोऽस्तु नः ॥ ६-१ ॥ भावार्थ-शुद्ध निश्चय नय की अपेक्षा से अपने इस आत्मा को जो अपने एक द्रव्य स्वभाव मे निश्चल है, अपने स्वरूप में व्याप्त है व पूर्ण ज्ञान समूह है सर्व अन्य द्रव्यों से भिन्न देखना या अनुभव करना सम्यग्दर्शन है । नियम से यही निश्चय सम्यग्दर्शन आत्मा का गुण है आत्मा में व्यापक है, आत्मा जितना है उतना ही उसका गुण सम्यग्दर्शन है ! इसलिये नव पदार्थों की परिपाटी के विचार को छोडकर हमें एक अपना आत्मा ही ग्रहण करने योग्य है। व्याप्यव्यावकता तदात्मनि भवेन्नैवातदात्मन्यपि । व्याप्यव्यापकभावसम्भवमृते का कर्तृ कर्मस्थितिः ।। इत्युद्दामविवेकघस्मरमहो भारेण भिन्द तमो । ज्ञानभ्य तदा स एष लसितः कतृत्वशून्यः पुमान् ।। ४-३ ॥ भावार्थ-व्याप्य व्यापकपना तत्व स्वरूप में ही होता है अतत् स्वरूप में नहीं होता है। अर्थात् गुण गुणी में ही होता है, एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के साथ व्यापकपना नहीं होता है । इसलिये जीव का पुद्गल के साथ व्याप्य व्यापक सम्बन्ध नहीं है। ऐसे दृढ़ भेद विज्ञान रूपी महान तेज के भार से जब अतरग का अज्ञान मिट जाता है अर्थात् अज्ञान से जो आत्मा को पुद्गल का व रागादि का कर्ता मानता था वह अज्ञान चला जाता है तब यह सम्यग्दृष्टी जोव-ज्ञानी होता हुआ परभाव के कर्तापने से रहित ही शोभता है । ज्ञानी को तब दृढ निश्चय हो जाता है कि आत्मा मूल स्वभाव से पुद्गल का व रागादिका कर्ता नहीं है । रागादि' भाव नैमित्तिक भाव हैं-आत्मा स्वभाव से कर्ता नहीं है। आत्मभावान्करोन्यात्मा परभावान्सदा परः । आत्मैव ह्यात्मनो भावाः परस्य पर एव ते ॥ ११-३ ॥
माज-सुग्व-साधन । [२५१ . भावार्थ मत्मा अपने भावों को करना है, पर पदार्थ पर भावो का करता है, सटा का यह नियम है । इसलिये प्रात्मा के जितने भाव , वह प्रात्मा रूप ही हैं। पर के जितने भाव हैं वे पर रूप ही है। यात्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानादन्यत्करोति किं । परभावम्य कात्मा मोहोऽयं व्यवहारिणाम् ।। १७-३ ।। भावार्थ-आत्मा ज्ञानमय है, स्वय सान ही है तब वह ज्ञान के सिवाय और क्या करेगा। यह आत्मा पर भानों का कर्ता है, यह व्यवहारी जीयों का कहना मात्र है । व्यवहार में ऐमा जाता है कि आत्मा ने अशुभ भार किये व शुभ भाव किये । निश्चय से ये सल भाव मोह कर्म के निमित्त से हुए है। श्रात्मा तो मात्र अपने शुद्ध भाव का ही कर्ता है। जानिनो ज्ञाननिवृत्ताः सर्वे भावा भवन्ति हि । मर्वेऽप्यज्ञाननिवृत्ता भवन्त्यजानिनम्तु ते ।। २२-३ ॥ भावार्थ-शानी के सबही माव जान द्वारा किये हुए नानमई ही होते हैं । अज्ञानी के सर्व ही भाव अडान द्वारा किये हुए प्रदान स्प ही होते है । सम्यग्दृष्टी ज्ञानी के विषयभोग सम्बन्धी भाव भी ज्ञान की भूमिका में ही है जब कि अनानी मियादृष्टी के व्रत व तप के भाव भी अज्ञान की भूमिका में अज्ञानमई है । कर्म ममपि मर्वविदो यद्वन्धमाधनमुशन्त्यविशेषात् । तेन पर्वमपि तत्प्रतिपिद्धज्ञानमेव विहितं शिवहेतुः ॥ ४-४ ॥ भावार्थ-यज्ञो ने कहा है कि सर्व ही शुभ व अशुभ क्रिया काड सामान्य से वध का ही कारण है इमलिये मर्य हो त्यागने योग्य है । एक शुद्व है। वीतराग आत्मनान ही मोक्ष का कारण कहा गया है। निपिद्धे सर्वस्मिन् सुकृतरिते कर्मणि किल । प्रवृत्ते नैः कम्य न खलु मुनयः मन्त्यशरणाः ।। तदा जाने ज्ञान प्रतिचरितमेपां हि शरणं । म्बय विन्दन्त्येते परमममृत तत्र निरताः ।। ५-४ ।। भावार्थी-मोक्षमार्ग में शुभ कर्म व अशुभ कमें दोनों का निषेध होनेपर भी मुनि इन कर्मो से रहित अवस्था में प्रवृत्ति करते हुए अशरण नहीं होते है । आत्मज्ञान का ज्ञान में वर्तना यही उनके लिये शरण है । वे मुनि श्रात्मानुभव में लीन रहते हुए परम आनन्दामृत का स्वाद निरन्तर लेते है-निष्कर्म आत्मध्यान । ही मोक्ष मार्ग है। वृत ज्ञानम्बभावेन ज्ञानस्य भवन सदा । एकद्रव्यस्वभावत्वान्मोक्षहेतुस्तदेव तत्, ।। ७-४ ।। -आत्मज्ञान के स्वभाव से वर्तना सदा ही ज्ञान मे परिणमन करना है क्योंकि वहां एक आत्म द्रव्य का ही स्वभाव है इसलिये यही मोक्ष का मावन है । जब आत्मा आत्मा में ही वर्तता है-अात्मस्य हो जाता है तब ही मोक्ष का मार्ग प्रकट होता है । भावार्थ-श्रा in २५२] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । वृत्तं कर्मस्वभावेन ज्ञानस्य भवनं न हि । द्रव्यान्तरस्वभावत्वान्मोक्षहेतुर्न कर्म तत् ।। ८-४ ॥ भावार्थ- -जब यह जीव पुण्य व पाप कर्म में वर्तता है तब वहा श्रात्मज्ञान मे वर्तन नहीं है । पर द्रव्य के स्वभाव में रमण करने के कारण कर्म मे वर्तना मोक्ष मार्ग नहीं है। सम्पद्यते संवर एप साक्षाच्छुद्धात्मतत्वस्य किलोपलम्भात् । स भेदविज्ञानत एव तस्मात्तभेदविज्ञानमताब भाव्यम् ।। ५-६ ॥ भावार्थ- शुद्धात्मा का अनुभव होने से साक्षान कमी का आना रुक जाता है, सवर हो जाता है जब यह शुद्वात्मानुभव भेदविज्ञान से होता है इसलिये मेद विज्ञान की भावना उत्तम प्रकार से करनी चाहिये । आत्मा को सर्व रागादि से व कर्मादि मे भिन्न मनन करना चाहिये। सम्यग्दृष्टेर्भवति नियतं ज्ञान वैराग्यशक्तिः । स्वं वस्तुत्वं कलयितुमयं म्यान्यरूपाप्तिमुक्त्या । यस्माज ज्ञात्वा व्यक्तिकमिट तत्वतः म्ब पर च ॥ स्वस्मिन्नास्ते विरमान पगपर्यतो रागयोगात् ।। ४-७ ।। भावार्थ-सम्यग्दृष्टी के भीतर नियम से आत्मज्ञान की तथा वैराग्य को शक्ति पैदा हो जाती है वह अपने स्वरूप की प्राप्ति व पर स्वरूप से मुक्ति के लिये अपने वस्तु स्वभाव को अनुभूति का प्रेमी हो जाता है क्योंकि उसने अात्मा को व अनात्मा को तत्वदृष्टि से अलग २ जान लिये है। इसलिये वह सर्व ही राग के कारणों से विरक्त रहता हुआ अपने आत्मा के स्वभाव में विश्राम करता है। सम्यग्दृष्टय एव साहसमिदं कर्तुं क्षमन्ते पर । यद्ववेऽपि पतत्यमी भयचलत्त्रैलोक्यमुक्ताध्वनि ।। सर्वामेव निसर्गनिर्भयतया शङ्कां विहाय स्वय । जानन्तः स्वमवध्यबोधवपुपं बोधाच्च्यवन्ते न न हि ॥ २२-७ ॥ भाषार्थ-सन्यादृष्टी जीव बडे साहमी होते हैं। ऐमा वनपान पडे की जिसके होते हुए भयभीत हो तीन लोक के प्राणी मार्ग से भाग जावे तो भी वे सम्यक्ती महात्मा स्वभाव से निर्भय रहते हुए सर्व शकाओं को छोडकर तथा अपने आपको अविनाशी ज्ञान शरीरी जानते हुए आत्मीक अनुभव से व आत्मज्ञान से कभी पतित नहीं होते हैं। प्राणोच्छेदमुदाहरन्ति मरणं प्राणाः किलस्यात्मनो। ज्ञानं तत्स्वयमेव शाश्वततया नोच्छिद्यते जातुचित् ।। तस्यातो मरणं न किञ्चन भवेत्तद्भीः कुतो ज्ञानिनो । निःशङ्कः सतत स्वय स सहज ज्ञानं सदा विदन्ति ।। २७ --७ ॥ .
सहज-सुख-साधन । [२५३ भावार्थ-प्राणों के वियोग को मरण कहते हैं । निश्चय से इस आत्मा का प्राण ज्ञान है । वह स्वयं ही नित्य है । उसका कभी नाश होता ही नहीं तब उस ज्ञान प्राण का मरण कभी नहीं हो सकता । इसलिये ज्ञानी को सरण का भय नहीं होता है । वह निःशक रहता हुआ सदा ही स्वयं अपने सहज ज्ञान का स्वाद लेता है। सर्व सदैव नियतं भवति स्वकीय- कर्मोदयान्मरणजीवितदुःखसौख्यम् । अज्ञानमेतदिह यत्तु : परः परस्य । कुर्यात्पुमान् मरणजीवितदुःखसौख्यम् ।। ६ - ८ ॥ भावार्थ-सर्व को नियम से सदा ही अपने ही पाप पुण्य कर्मो के उदय से दुःख तथा सुख होता है । दूसरे ने दूसरे को मार डाला, जिलाया, या दुःखी तथा सुखी किया ऐसा मानना अज्ञान है । जबतक अपने श्रायु कर्म का छेद नहीं होता, मरण नहीं हो सकता । अपने ही साता असाता के उदय से सुख दुःख होता है। विश्वाद्विभक्तोऽपि हि यत्प्रभावादात्मानमात्मा विदधाति विश्वम् । मोहैककन्दोऽध्यवमाय एप नास्तीह येषां यतयस्त एव ।। १०-८ ॥ भावार्थ- -यह अात्मा अन्य सर्व जगत के पदार्थो से भिन्न है तो भी जिस अज्ञान के प्रमाव से यह अपने को जगत के पदार्थों के साथ अपनापना मानता है उस अज्ञान का मूल कारण मोह का उदय हैं । जिन महात्माओं के भीतर यह पर को अपना मानने का खोटा अभिप्राय नहीं होता है वे ही सच्चे यति हैं। न जातुरागादिनिमित्तभावमात्माऽऽत्मनो याति यथार्ककान्तः । तस्मिन्निमित्त पर मंग एव वस्तुस्वभावोऽयमुदेति तावत ।। १३-८॥ भावार्थ-यह आत्मा अपने से कभी रागादिभावो में परिणमन नहीं कर सकता। जैसे स्फटिक मणि अपने से ही लाल, पीली, काली नहीं होती । जेसे स्फटिक को लाल, पीली, काली क्रांतिवाली दीखने में लाल, पोले, काले [फ की सगति का दोष है वैसे आत्मा मे राग द्वेषादि विभावों में परिणमने मे मोहनीय कर्म के उदय का दोष है । अकेने आत्मा में कभी रागादि नहीं होते हैं । अनवरतमनन्तैर्वध्यते सापराधः, स्पृशति निरपराधो बन्धन नैव जातु । नियतमयमशुद्ध स्वं भजन्सापराधो भवति निरपराधः साधु शुद्धात्मसेवी ।। ८ -- भावार्थ-जो परभाव या पर पदार्थ को अपनाता है वह अपराधी श्रात्ममावना से पतित होता हुश्रा अनन्त कर्म वर्गणाओं से बंधता है । परन्तु जो अपराधी नहीं है, स्वात्मा में ही आत्मापने का अनुभव करता e . - 1 है। है २५४] सम्यग्दर्शन और उसका महास्य। है, वह कभी भी बंध को नहीं प्राप्त होना है। 'अपराधी मया प्राने को अशुद्ध ही भजता है जय कि निरपराधी भले प्रकार अपने शुद्ध स्वरूप की भागधना करता हुआ अग्रन्ध रहता जानी करोति न न वेदयते च कर्म जानाति केवलमय किन नतम्बमाणे । जान-पर करावेदनयोरममावा- न्छनम्यभारनियतः स हि मुक्त एव ।। ६--१० ।। भावार्थ-मम्यादी शानी न नो गगादि कमी को गाना न उनको भोक्ता है-यह मात्र उनके स्वभाव को जानता ही है। वह की व भाका अपने स्वभाष पशु भात्रों का ही है। परभाय तो कमजन्य है, उनका कर्ता भोक्ता नहीं होना है। भोक्तापना न करना हुया व मात्र जानना हुधा ज्ञानी अपने शुद्ध स्वभाव मे निश्चलता आ अपने को पर में गुक्त पही अनुभव करता विगलतु कर्मविपतरुफलानि मम भक्तिमन्तरेणव । मंचेतयेऽहमचलं चतन्यान्मानमान्मानं ॥ ३७ -१० ॥ भावार्थ-कर्म रूपी विप वृक्षों के फल मेरे भोगे बिना ही गल जायो । में तो अपने ही निश्चल एक चैत यमाय को ही भोगता है। पानी रोना मनन करना है। व्यवहार विमुढएयः परमार्थ कनयन्ति नो जनाः । नपापविमुग्धयुद्धयः कलगंताह तपं न तंदलम् ।। ४६-१०॥ भावार्थ-जो व्यवहार क्रिया काड मल्ही मूदता से मन है वे मानव परमार्थ स्वरूप शुद्ध आत्मा का अनुभव नहीं कर सकते । जिनको चावलों की भूमी में है। चायनों का ज्ञान है वे तुलों को ही पावेंगे। उनके हाथ मे कभी चावल नहीं आसकते है । व्यवहार धर्म कंवल बाहरी महकारी है। प्रात्मानुभव ही परमार्थ धर्म है । जो परमार्थ धर्म का अनुभव करते हैं वे ही शुद्वात्मा को पाते है । (१६) श्री अमितगति प्राचार्य तत्वभावना में कहते हैं- जीवाजीयपदार्थतत्वविदपो बधासायौ रु'धतः । शश्वत्मवर निर्जरे विदधतो मुक्तिप्रिय कांक्षतः ।। देहादे: परमात्मतचममलं मे पश्यतस्तवतो । धर्मध्यानसमाधि शद्धमनमः कालः प्रयात प्रभो ॥ ४ ॥ भावार्थ-सम्यक्ती ऐमी भावना माता है कि हे प्रभो। मैं जीव और अजीव पदार्थो के स्वरूप को ठीक ठीक जानता रहूँ, बध और आस्त्रवों को रोकता रहूँ, निरन्तर सबर और निर्जरा को करता रहूँ, मुक्ति रुपी लक्ष्मी की श्राकाक्षा रखता रहूँ, तथा शरीरादि से निश्चय से मेरा परमात्मा स्वरूप शुद्ध तथा भिन्न है ऐसा अनुभव करता रहूँ । इस तरह शुद्ध मन से धर्मध्यान और समाधिभाव मे मेरे जीवन का काल व्यतीत होवे।
सहज-सुख-साधन।
[२५५
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नरकगतिमशुद्धः सुन्दरैः स्वर्गवास ।
शिवपदमनवद्य याति शुद्धरैरकर्मा ॥
स्फुटमिह परिणामैश्चेतनः पोष्यमाणे-
रिति शिवपदकामैस्ते विधेया विशुद्धाः ॥ ७८ ॥
भावार्थ-
-अशुभ भावों से नरकगति होती है, शुभ भावों से स्वर्गवास होता है, कर्म रहित यह जीव शुद्ध
भावों से प्रशसनीय शिव पद को प्राप्त करता है यह बात प्रगट है, तब जो मोक्ष पद की काक्षा करते हैं
उनको चैतन्य को पोपनेवाले परिणामों के द्वारा शुद्ध भावो को ही रखना योग्य है । शुभ व अशुभ भावों से
विरक्त होना उचित है।
यो चाह्याथै तपसि यतते बाह्यमापद्यतेऽसौ ।
यस्त्वात्मार्थ लघु स लभते पूतमात्मानमेव ।।
न प्राप्यंते क्वचन कलमाः कोद्रवै रोप्यमाणे
विज्ञायेत्थं कुशलमतयः कुर्वते स्वार्थमेव ।। ८४ ॥
भावार्थ-जो कोई बाहरी इद्रिय भोगों के लिये तप करता है वह बाहरी ही पदार्थों को पाता है । जो
कोई प्रात्मा के विकाश के लिये तप करता है वह शीघ्र ही पवित्र आत्मा को ही पाता है । कोदवों के बोने से
कदापिचावल नहीं प्राप्त हो मकते, ऐसा जानकर प्रवीण बुद्धि वालों को प्रात्मा के हित में ही उद्यम करना
योग्य है।
भवति भविनः सौख्य दुखं पुराकृतकर्मणः ।
स्फुरति हृदय रागो द्वषः कदाचन मे कथम् ।।
मनसि समतां विज्ञायेत्थ तयोनिदधाति यः ।
क्षपयति सुधीः पूर्वः पापं चिनोति न नूतनम् ॥ १०२ ॥
भावार्थ-ससारी प्राणियों को पूर्व बाधे कर्मों के उदय के अनुकूल सुख तथा दुःख होता है। मेरे मन में
उनमें राग व द्वेष कदापि भी नहीं प्रगट होता है। इस तरह जो कोई जानकर उन सुख व दुख के होनेपर
समभाव को रखता है वह बुद्विवान पूर्व सचित कर्मो को क्षय करता है और नवीन कमी को एकत्र नहीं
करता है।
चित्रोपद्रवस कुलामुरुमला निःस्वस्थतां सम्मति ।
मुक्ति नित्यनिरतरोन्नतसुखामापत्तिभिर्वजिताम् ।।
प्राणी कोपि कषायमोहितमतिर्नो तातो बुध्यते ।
मुक्त्या मुक्तिमनुत्तमामपरथा कि संमृतो रज्यते ॥ ८१ ॥
२५६ ] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । - भावार्थ-यह ससार नाना प्रकार उपद्रवों से भरा है. अत्यन्त मलीन है । अाफुलताओं का घर है, इसमें स्वस्थपना नहीं है तथा मुक्ति नित्य निरन्तर श्रेष्ठ आत्मीक सुम्ब से पूर्ण है और सर आपत्तियों से रहित है। इस बात को कोई कषाय से मोहित बुद्वि वाला ही प्रागी यथार्थ न समझे तो न समझे अन्यथा जो कोई बुद्धिमान है वह अनुपम श्रेष्ठ मुक्ति को छोड़कर इस असार संसार में किस तरह राग करेगा ? (२०) श्री पद्मनंदि मुनि एकत्वसप्तति में कहते हैं- संयोगेन यदा यातं मत्तस्तत्सकलं परम् । तत्परित्यागयोगेन मक्तोऽमिति मे मतिः ।। २७ ।। भावार्थ सम्यग्ही ऐसा विचार करता है कि जिन जिनका सयोग मेरे साथ चला आया है वे सब भाव- कर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म मुझ से भिन्न है । उनका मोह छोड़ देने से मैं मुक्त रूप ही हू ऐमी मेरी बुद्धि है। किं में करिष्यतः करौ शुभाशुभनिशाचरौ । रागद्वपपरित्यागमोहमत्रेण कीलितो ॥ २८ ॥ भावार्थ-सम्यग्वामी विचारता है कि मैंने रागद्वेप के त्यागरूप साम्यभाव महामत्र से शुम व अशुभ कर्म रूपी दुष्ट राक्षसों को कील पिया है तब वे मेरा क्या बिगाड कर सकते है । जन मैंने समताभाव धारण किया है तब पुण्य, पाप कर्म, उदय मे आकर अपना फल भी दें तो भी मैं उनसे आफुलित नहीं हो सकता हूँ। (२१) श्री पद्मनंदि मुनि देशव्रतोद्योतन अधिकार में कहते हैं- एकोप्यत्र करोति यः स्थितिमति प्रीतः शुचौ दर्शने । स श्लाध्यः खलु दुःखिोप्युदयता दुष्कर्मणः प्राणिभृत् ।। अन्यैः किं प्रचुरैरपि प्रमुदितैरत्यन्तदुरीकृत- स्फीतानन्दभरप्रदामृतपथैमिथ्यापथप्रस्थितैः ॥ २॥ भावार्थ--इस इस जगत में वह प्राणी जो निर्मल सम्यग्दर्शन में अपनी निश्चल बुद्धि रखता है कदाचित् पूर्व पापकर्मो के उदय से दुःखित भी हो और अकेला भी हो तो भी प्रशसा के योग्य है । इसके विरुद्ध मिथ्यादर्शन में रहनेवाले अनेक उन प्राणियों की कोई प्रशना नहीं है, जो धन सम्पदा से सुबो हैं परन्तु अत्यन्त आनन्द देनेवाले सभ्यग्दर्शनमई आत्मीक मोक्ष मार्ग से दूर रहनेवाले है। वीजं मोक्षतरोदृशं भवतरोमिथ्यात्वमाहुर्जिनाः । प्राप्तायां दृशि तन्मुमुक्षुभिरलं यत्नो विधेयो बुधैः ।। मसारे बहुयोनिजालजटिले भ्राम्यन् कुकर्मावृतः । क्व प्राणी लभते महत्यपि गते हि तां तामिह ॥ ३ ॥ भावार्थ- मोक्षरूपी वृक्ष का बीज सम्यग्दर्शन है । ससार रूपी वृक्ष का बीज मिथ्यादर्शन है ऐसा जिनेन्द्रों ने कहा है। जब ऐसा सम्यग्दर्शन प्राप्त हो जाये तो मोक्ष के इच्छुक पडितों को योग्य है कि वे उस सहज-सुख-साधन । [ २५७ सम्यग्दर्शन की रक्षा का यत्न करते रहें । पाप कमी से घिरा हुआ यह प्राणी चौरासी लाख योनि सहित इस ससार में भ्रमता रहता है तब कहीं दीर्घकाल जाने पर बड़े भाग्य से किसी प्राणी को कभी इस सम्यग्दर्शन का लाभ होता है। (२२) श्री पद्मनंदि मुनि निश्चयपञ्चाशन में कहते हैं - प्रास्ता बहिरुपधिचयस्तनुवचनविकल्पजालमप्यपरम् । कर्मकृतत्वान्मत्तः कुतो विशुद्धस्य मम किञ्चित् ॥ २७ ।। भावार्थ-सम्यग्दृष्टी विचारता है कि कमा के द्वारा प्राप्त बाहरी परिग्रह आदि उपाधि का समूह तो दूर ही रहो-शरीर, वचन और विकल्पों का समूह मन भी मुझ से भिन्न है क्योकि निश्चय से मैं परम शुद्ध हूँ। तब ये सब मेरे कैसे हो सकते हैं ? कर्म पर तत्कार्य सुखमसुख वा तदेव परमेव । तस्मिन् हर्पविषादौ मोही विदधाति खलु नान्यः ॥ २८ ॥ भावार्थ- -सम्यग्दृष्टी विचारता है कि पाठ कर्म मुझ से भिन्न है तब उनके उदय से जो सुख दुःख कार्य होता है वह भी मुझ से भिन्न है । मोही मिथ्यात्वी प्राणी ही सुख में हर्ष व दुःख में शोक करता है, सम्यग्दृष्टी ऐसा कभी नहीं करता है । कर्म न यथा स्वरूपं न तथा तत्कार्यकल्पनाजालम् । तत्रात्ममतिविहीनो मुमुक्षुरात्मा सुखी भवति ।। २६ ।। भावार्थ-आठ कर्म जैसे अपना स्वरूप नहीं है वैसे उन कमी का कार्य सुम्ब दुःखादि कल्पना जाल भी मेरा स्वरूप नहीं है । जो इनमें आत्मबुद्धि नहीं रखता है वही मुमुक्षु आत्मा सुखी है । (२३) श्री सारसमुच्चय में कहते हैं- कपायातपतप्तानां विषयामयमोहिनाम् । संयोगयोगखिन्नानां सम्यक्त्वं परम हितम् ।। ३८ ।। भावार्थ- जो प्राणी कयाय के अाताप से तप्त है, इन्द्रियों के विषयों के रोग से पीड़ित है, इष्ट वियोग अनिष्ट सयोग से दुखी हैं, उन सबके लिये सम्यग्दर्शन परम हितकारी औषवि है। वरं नरकवामोऽपि सम्यक्त्वेन समायुतः । न तु सम्यत्वहीनम्य निवामो दिवि राजते ।। ३६ ॥ भावार्थ सम्यग्दर्शन सहित नग्क मे रहना भी अच्छा है किन्तु मन्यग्दर्शन रहित स्वर्ग में रहना भी सुखदाई नहीं है। क्योकि जहा आत्मज्ञान है वहीं सच्चा सुग्व है। सम्यक्त्व परमं रत्नं शकादिमलवर्जितम् । संसारदुःखदारिद्य नाशयेत्सुविनिश्चितम् ॥ ४० ॥ कुलभद्राचार्य -- है २५८] मम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । . निकार भावार्थ-शंका, कांक्षा आदि दोषों से रहित सम्यग्दर्शन ही परम रत्न है । जिसके पास यह रत्न होता है उसका समार दुःखरूपी दालिद्र निश्चय से नष्ट हो जाता है । सम्यक्त्वेन हि युक्तस्य ध्रुवं निर्वाणसंगमः । मिथ्याशास्य जीवस्य संसारे भ्रमणं सदा ।। ४१ ।। भावार्थ-सम्यग्दर्शन सहित जीव को अवश्य निर्वाण का लाभ होगा। मिथ्यापि जीव सदा ही संसार में भ्रमण करता रहेगा। पडितोऽसौ विनीतोऽसो धर्मज्ञः प्रियदर्शनः । यः सदाचारसम्पन्नः सम्यक्त्वहढ़मानसः ॥ ४२ ॥ भावार्थ-जिसका भाव सम्यग्दर्शन में दृढ़ है और जो सदाचारी है वही पडित हे, वही विनयवान है, वही धर्मजाता है, वही ऐसा मानव है जिसका दर्शन दूसरों को प्रिय है। सम्यक्त्वादित्यसम्पन्न कर्मध्वान्तं विनश्यति । आसन्नमव्यसत्यानां काललब्ध्यादिसन्निधौ ।। ४६ ।। भावार्थ-सम्यग्दर्शन रूपी सूर्य के प्रकाश से करें। का अधकार भाग जाता है। यह सम्यग्दर्शन निटक भव्यों को काललब्धि आदि की निकटता पर होता है। सम्यक्त्वभावशुद्धन विपयामङ्गवजितः । कपायविरतेनैव भवदुःखं विहन्यते ॥ ५० ॥ भावार्थ-जिसके भावो मे सम्यग्दर्शन से शुद्धता है, व जो विषयो के सग से रहित है, व कपायों का विजयी है वही ससार के दुःखों को नाश कर डालता है । प्रज्ञा तथा च मैत्री च समता करुणा क्षमा । सम्यक्त्वसहिता सेव्या सिद्धिसोख्यसुखप्रदा ॥ २६७ ।। भावार्थ- आत्मा व अनात्मा का विवेक सो ही प्रज्ञा है, प्राणी मात्र का हित सो ही मैत्री है, सर्व पर ममान भाव समता है, दुखियों पर दयाभाव करुणा है । यदि सम्यग्दर्शन सहित इनका सेवन किया जावे तो मोक्ष सुख का लाभ होता है । (२४) श्री शुभचन्द्राचार्य ज्ञानार्णब में कहते हैं- कपायाः क्रोधाद्याः स्मरमहचगः पञ्चविषयाः। प्रमादा मिथ्यात्व वचनमनसी काय इति च ॥ दुरन्ते दुर्ध्याने विरतिविरहश्चेति नियतम् । सवन्त्येते पुसां दुरितपटलं जन्मभयदम् ।। ६-७ ।।
सहज-सुख-साधन । [२५९ भावार्थ- प्रथम तो मिथ्यात्व रूप परिणाम, दूसरे अविरति रूप परिणाम, तीसरे काय के सहकारी पांचों इन्द्रियों के विपय, चौथे स्त्री कथा आदि प्रमादभाव, पांचवे क्रोधादि कषाय, छठे आतेरौद्र दो अशुभ ध्यान, सातवे मन, वचन, काय की अशुभ क्रिया ये सब परिणाम प्राणियों को ससार में भयकारी पापकर्म के आश्रव के कारण हैं द्वारपालीव यस्योच्चैविचारचतुरा मतिः । हृदि स्फुरति तस्याघमतिः स्वप्नेऽपि दुर्घटा ॥ १०-८ ॥ भावार्थ-जिस पुरुप के हृदय मे द्वारपाली के समान विवेक बुद्धि प्रगट है उसके पाप की उत्पत्ति स्वप्न में भी नहीं होगी । विवेक से वह हितकारी प्रवृत्ति ही करता है। विहाय कल्पनाजालं स्वरूपे निश्चलं मनः । यदाधत्त तदैव स्यान्मुनेः परमसंवरः ।। ११-८ ।। भावार्थ-जिस समय मुनि सर्व कल्पनाओं के समूह को छोडकर अपने शुद्ध आत्मा के स्वरूप में मन को निश्चल करते है, उमी समय मुनि महाराज को परम सवर की प्राप्ति होती है, कर्म का आना रुकता है । सकलममिति मलः सांयमोदामकाण्डः । प्रशमविपुलशाखो धर्म पुष्पावकीर्णः ।। अविकलफलबन्धैर्यन्धुरो भावनाभि- जयति जितविपक्षः संवरोदामवृक्षः ॥ १२-८ ।। भावार्थ-इर्या समिति आदि पाच समितिया जिस वृक्ष की जड हैं, सामायिक आदि सयम जिसका स्कध है, शात भाव रूपी जिसकी बडी २ शाखाए हैं, उत्तम शमादि दश धर्म जिसके खिले हुए पुष्प हैं, ऐसा पूर्ण फल उत्पन्न करनेवाली बारह भावनाओं से सुन्दर यह सवर रूपी महावृक्ष जगत मे जयवत हो जिसने अपने विपक्षी आश्रय को जीत लिया है। ध्यानानलसमालीढमप्यनादिसमुद्भवम् । मद्यः प्रक्षीयते कर्म शद्धयत्यङ्गी सुवर्णवत् ।। ८-६ ।। भावार्थ-यद्यपि कर्म जीव के साथ अनादिकाल से लगे हुए है तो भी ध्यान की अग्नि के स्पर्श से शीघ्र उसी तरह जल जाते हैं जैसे सुवर्ण का मैल भस्म हो जाता है और यह आत्मा सुवर्ण के समान शुद्ध हो , जाती है। तपस्तावद्वाह्य चरति सुकृती पुण्यचरित- स्ततश्चात्माधीन नियतविषय ध्यानपरमम् । क्षपत्यन्तल्लीनं चिरतरचितं कर्मपटलम् ततो ज्ञानाम्भोधि विशति परमानन्दनिलयम् ॥ 5-6 ।।
२६० सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । - भावार्थ-पवित्र श्राचारधारी पुण्यात्मा पुरुष प्रथम अनशनादि बाहरी तपों का अभ्यास करता है फिर अन्तरग छ तपों का अभ्यास करता है फिर निश्चल होकर आत्म ध्यान रूपी उत्कृष्ट तप को पालता है। इस ध्यान से चिरकाल के सचित कमी को नाश कर डालता है और परमानन्द से पूर्ण ज्ञान समुद्र में मग्न हो जाता है अर्थात केवली अरहत परमात्मा हो जाता है। सदर्शनमहारत्नं विश्वलोकैकभूषणम् । मुक्तिपर्यंतकल्याणदानदक्षं प्रकीर्तितम् ।। ५३-६ ॥ भावार्थ- यह सम्यग्दर्शन महारत्न है, सर्व लोक मे अत्यन्त शोभायमान है । यही मोक्ष पर्यन्त सुख देने को समर्थ कहा गया है चरणज्ञानयो/जं यमप्रशमजीवितम् । तप:श्रताद्यधिष्ठानं सद्भिः सद्दर्शन मतम् ।। ५४-६ ॥ भावार्थ- यह सम्यग्दर्शन ही ज्ञान और चारित्र का बीज है, यम और शात भाव का जीवन है, तप और स्वाध्याय का आधार है, ऐमा आचार्यों ने कहा है। अप्येकं दर्शनं श्लाध्य चरणज्ञानविच्युतम् । न पुनः संयमज्ञाने मिथ्यात्व विषदृषिते ।। ५५-६ ।। भावार्थ-विशेष ज्ञान व चारित्र के न होनेपर भी एक अकेला सम्यग्दर्शन ही हो तो भी प्रशमनीय है परन्तु मिथ्यादर्शन रूपी विष से दृषित ज्ञान और चारित्र प्रशसनीय नहीं है। अत्यल्पमपि सूत्र दृष्टिपूर्वं यमादिकम् । प्रणीत भवसम्भूतक्लेशप्राग्भार भेषजम् ।। ५६-६ ।। भावार्थ-आचार्यों ने कहा है कि यदि सम्यग्दर्शन के साथ मे थोड़ा भी यम, नियम, तपादि हो तो भी वह ससार के दुखो के को करने की औषधि है। मन्ये मुक्तः स पुण्यात्मा विशुद्ध यस्य दर्शनं । यतस्तदेव मुक्त्यङ्गमग्रिमं परिकीतितम् ॥ ५७-६ ॥ भावार्थ-श्राचार्य कहते है कि जिसको निर्मल सम्यग्दर्शन मिल गया है वह बडा पुण्यात्मा है, वह मानो मुक्तरूप ही है क्योंकि यही मोक्ष का प्रधान कारण कहा गया है । प्राप्नुवन्ति शिव शश्वच्चरणजानविश्रताः । अपि जीवा जगत्यस्मिन्न पुनदर्शनं विना ।। ५८-६ ॥ भावार्थ- -इस जगत में जो ज्ञान और चारित्र के पालने में प्रसिद्ध महात्मा हैं वे भी सम्यग्दर्शन के बिना मोक्ष को नहीं पा सकते हैं। भार हलका 1 सहज-सुख-साधन । [२६१ अतुलसुखनिधानं सर्वकल्याणवीज जननजलधिपोतं भव्यसच्चैकपात्रम् । दुरिततरुकुठारं पुण्यतीर्थप्रधान पिवत जितविपक्षं दर्शनाख्यं सुधाम्बुम् ।। ५६-६ ॥ भावार्थ-श्राचार्य कहते हैं कि हे भव्य जीवो ! तुम सम्यग्दर्शन रूपी अमृत को पीओ, यह अनुपम अतीन्द्रिय सहज सुख का भडार है, सर्व कल्याण का बीज है, ससार समुद्र से पार करने को जहाज है, भव्य जीव ही इसको पा सकते हैं। यह पाप रूपी वृक्ष के काटने को कुठार है, पवित्र तीर्थों में यही प्रधान है तथा मिथ्यात्त्र का शत्रु है । ध्यानशुद्धिं मनःशुद्धिः करोत्येव न केवलम् । विच्छिनत्यपि निःशङ्ककर्मनालानि देहिनाम् ।। १५-२२ ॥ भावार्थ-मन की शुद्धता केवल ध्यान की शुद्धि ही नहीं करती है किन्तु निश्चय से समारी प्राणियों के कर्म के जालों को काट देती है। यथा यथा मनःशुद्धिमुनेः साक्षात्प्रजायते । तथा तथा विवेकश्रीढदि धचे स्थिरं पदम् ।। १८-२२ ।। भावार्थ-मुनि के मन की शुद्धता जैसे जैसे साक्षात होती जाती है वैसे वैसे भेदज्ञान रूपी लक्ष्मी हृदय में स्थिरता से विराजती जाती है। शमश्रुतयमोपेता जिताक्षाः शंसितव्रताः । विदन्त्यनिर्जितस्त्वान्ता: स्वस्वरूपं न योगिनः ॥ ३२ २२ ।। भावार्थ-जो योगी शातभाव, शास्त्रज्ञान तथा यम नियम को पालते है व जितेन्द्रिय हैं तथा प्रशसनीय व्रतों के धारी हैं वे भी यदि मन को नहीं जीते तो आत्म स्वरूप का अनुभव नहीं कर सकते । विलीन विषयं शान्तं निःसङ्ग त्यक्तविक्रियम् । स्वस्थ कृत्वा मनः प्राप्त मुनिभिः पदमव्ययम् ॥३३-२२॥ भावार्थ-जिन मुनियो का वित्त इन्द्रियों के विषयों से छूट गया है व जिनका मन शात है, परिग्रह की मूर्खा से रहित है, निविकार है तथा आत्मा मे स्थित है, उन्हीं मुनियों ने अविनाशी पद को प्राप्त किया है मोहपङ्क परिक्षीणे प्रशान्ते रागविभ्रमे । पश्यन्ति यमिनः स्वस्मिन्स्वरुप परमात्मन ॥११-२३॥ भावार्थ-मोहरूपी कीचड़ के चले जाने पर तथा रागादिक मावों के शात होनेपर मुनिगण अपने आत्मा में ही परमात्मा के स्वरूप को अवलोकन करते है।
२६२] सम्यग्दर्शन और उसका महास्य । - महाप्रशमय ग्रामे शिवश्रीसंगमोत्सुकैः । योगिभिर्जानशस्त्रण रागमन्लो निपातितः ॥१२-२३॥ भावार्थ-मोक्षरूपी लक्ष्मी की प्राप्ति की भावना करनेवाले योगियों ने महा शातिमय युद्ध के भीतर ज्ञान रूपी योद्धा को गिरा दिया। विना राग के जीते मोक्ष का लाभ कठिन है। नित्यानंदमयीं सार्थी शाश्वतीं चात्मसंभवाम् । वृणोति वीतसंरंभो वीतराग: शिवश्रियम् ।।२४ - २३॥ भावार्थ- रागादि के विकल्पो से रहित वीतरागी साधु ही नित्य अानन्दमयी, सुन्दर, अविनाशी, अपने आत्मा से ही प्राप्त मोक्षरूपी लक्ष्मी को वरता है । स पश्यति मुनिः माक्षाद्विश्वमध्यक्षमञ्जमा । यः स्फोटयति मोहाख्यं पटलं ज्ञानचनुपा ॥३३-२३॥ भावार्थ-जो कोई मुनि मोह के परदे को दूर कर देता है वही ज्ञान रूपी नेत्र से सर्व जगत को प्रत्यक्ष एक साथ देख लेता है। यस्मिन्सत्येव संसारी यद्वियोगे शिवीभवेत् । जीवः स एव पापात्मा मोहमल्लो निवार्यताम् ।।३५--२३॥ भावार्थ हे आत्मन् । जिस पापी मोह मल्लके जीने रहते हुए यह जीव ससारी होता हुआ भ्रमता है व जिसके नाश हो जाने पर यह मोक्ष का स्वामी हो जाता है उस मोह मल्ल को दूर कर । मोहपङ्क परिक्षीणे शीर्णे रागादिवन्धने । नृणां ह्नदि पदं धने साम्यश्रीविश्ववन्दिता ॥१०-२४॥ भावार्थ-जब मोह की कीच मूख जाती है व राग द्वेषादि के बन्धन कट जाते हैं तब ही मानवों के हृदय मे जगत से वदनीय समता रूपी लक्ष्मी अपना पग रखती है । शाम्यन्ति जन्तवः क्रूरा बद्धवैराः परस्परम् । अपि स्वार्थे प्रवृत्तस्य मुनेः साम्यप्रभावतः ॥२०-२४॥- भावार्थ-जो मुनि अपने आत्मा के ध्यान में लवलीन हैं उनके साम्यभाव के प्रभाव से उनके पास वैर करनेवाले क्र र जीव भी शांत हो जाते हैं। सारङ्गी सिंहशावं स्पृशति सुतधिया नन्दिनी व्याघ्रपोतं । मार्जारी हंसवालं प्रणयपरवशा केकिकान्ता भुजङ्गम् ।। वैराण्याजन्मजातान्यपि गलितमदा जन्तवोऽन्ये त्यजन्ति । श्रिया साम्यैकरूढं प्रशमितकलुषं योगिनं क्षीणमोहम् ॥२६-२४॥
सहज-सुख-साधन। [२६३ भावार्थ-जिस योगी का मोह क्षय हो गया है व जो क्रोधादि कलुपभावो को शांतकर चुके हैं व जो समताभाव में आरुढ है उस योगी के निकट हिरणी तो सिंह के बच्चे को पुत्र की बुद्धि से प्यार करती है गऊ बाघ के बच्चे को खिलाती है, बिल्ली हस के बच्चे को प्रेम से स्पर्श करती है तथा मोरनी सर्प के वच्चे को प्यार करती है। इसी तरह अन्य प्राणी भी जिनका जन्म से वैर होता है वे मद रहित हो वैर छोड़ देते हैं। भावार्थ- अनादि विभ्रमोद्भुतं रागादितिमिरं धनम् । स्फुटयत्याशु जीवस्य ध्यानार्कः प्रविन म्मितः ।।५-२५॥ भावार्थ-अनादि काल के मिथ्या भ्रम से उत्पन्न हुआ रागादि अन्धकार बहुत घन है । जब जीव के भीतर ध्यानरूपी सूर्य प्रगट होता है तब वह अन्धकार शीघ्र ही विलय हो जाता है। (२५) श्री ज्ञानभूपण तत्वज्ञानतरंगिणी में कहते हैं:- स्वकीय शुद्धचिद्र पं भेदज्ञान विना कदा । तपः श्रुतवतां मध्ये न प्राप्त केनचिद् क्वचित् ।।११-८|| -यह अपना शुद्ध चैतन्य स्वभाव भेदन्नान के बिना कभी भी कहीं भी किसी भी तपस्वी व शास्त्रन ने नहीं पाया है । भेद ज्ञान से स्वात्मलाभ होता है। क्षयं नयति भेदज्ञश्चिद्रूपप्रतिघातकं । क्षणेन कर्मणां राशिं तृणानां पावको यथा ॥१२-८।। भावार्थ-जिस तरह अग्नि तृणों की राशि को क्षणमात्र में जला देती है उसी तरह भेद ज्ञानी महात्मा चैतन्य स्वरूप की घातक की की राशि को क्षणमात्र में भस्म कर देता है । संवरो निर्जरा साक्षात् जायते स्वात्मबोधनात् । तभेदज्ञानतस्तस्मात्तच्च भाव्यं मुमुक्षुणा ॥१४-८॥ भावार्थ- "सवर तथा निर्जरा साक्षात् अपने आत्मा के ज्ञान से होती है । वह आत्मज्ञान भेद ज्ञान से होता है । इसलिये मोक्ष के इच्छुक को उचित है कि वह भेद ज्ञान की भावना करता रहे। ममेति चितनाद् बंधो मोचनं न ममेत्यतः । बंधनं यक्षराभ्या च मोचन त्रिभिरक्षरैः ॥१३-१०॥ भावार्थ- -पर पदार्थ मेरा है ऐसी भावना से कर्मबन्ध होता है, तथा पर पदार्थ मेरा नहीं है इस भावना से मुक्ति होती है । मम इन दो अक्षरों से वध है, नमम इन तीन अक्षरों से मुक्ति है । नास्त्रवो निर्ममत्वेन न बंधोऽशुभकर्मणां । नासंयमो भवेत्तस्मान्निर्ममत्वं विचिंतयेत् ।।१८-१०॥ ३
२६४]
सम्यग्दर्शन श्रीर उसका महात्म्य ।
भावार्थ-पर पदार्थ मेरा नहीं, इस भावना में न अशुभ कमी का श्राव होता है न उनका बंध होता
है न कोई असंयमभाव ही होता है समलिये निर्गमन्त्र की मदा भावना वग्नी योग्य है।
श्रद्धानं दर्शनं गप्नतचानां व्यवहारतः ।
अष्टांगं त्रिविधं प्रोक्तं तदीपशामिकादितः ॥ ६-१२ ॥
भावार्थ-जीवादि सात तत्वों का मान करना व्यवहार नग में सम्यग्दर्शन है । यह निःशकिनादि आठ
गुण सहित होना चाहिये । उसके 'पोपामिक, भयोपशामक, शायिक ये तीन भेद है।
म्बकीये सद्भचिद्रपे रुचिर्या निधयेन तन ।
महर्शनं मनं तज्जः कमधनहुनाशनं ॥८-१२।।
भावार्थ-अपने शाल चैतन्य स्वरूप में जो मनि मे निम्नय सम्यग्दर्शन तत्वज्ञानियों ने कहा है । यह
सम्यग्दर्शन कभी के ईयन को जलाने के लिये अग्नि के समान है।
संक्लेशे कर्मणां बंधोऽगभानां द.सदायिनां ।
विशद्धौ मोचनं तेषां बंधो: या शभकर्मणां ॥१४-१३॥
भावार्थ-टुग्विन क्लेशिन परिणामी से दुपदायक पाप कमी का बध होता है । विशुद्ध परिणामो से
उन पाप कर्मी को निर्जरा होती है अथवा शुभ रमों का बन्ध होना है।
यातायांतरान मंगान न मुचंति मुनीश्वराः ।
तापदायाति नो नेपां चित्स्वरूप विशुद्धता ।।२१-१३।।
भावार्थ-जब तक मुनिगण बाहरी व भीतरी परिग्रहो को नहीं त्यागते हैं तब तक उनकी चैतन्य स्वरूप
में निर्मलता नहीं हो सकती है।
कारणं कर्मबंधस्य परद्रव्यस्य चिंतनं ।
स्वद्रव्यम्य विशद्धस्य तन्मोक्षस्यैव केवलं ॥१६-१५॥
भावार्थ-पर
पर द्रव्य को चिंता कर्म बन्ध करनेवाली है जब कि शुद्ध आत्म द्रव्य की चिन्ता मात्र कमी से
मुक्ति देनेवाली है।
(२६) पं० बनारसीदासजी नाटक समयमार में कहते हैं-
-
मया २३ ।
भेद विज्ञान जग्यो जिन्हके घट, सीतल चित्त भयो जिन चन्दन ।
केलि करे शिवमारग मे, जगमाहि जिनेश्वर के लघु नन्दन ।
सत्य स्वरूप सदा जिन्ह के, प्रगटयो अवदात मिथ्यात निकन्दन ।
शातदशा तिनकी पहिचानि, करे कर जोरि बनारसी वदन ॥ ६ ॥
महज-सुख-साधन । [२६५ सवैया ३१ । स्वारथ के साचे परमारथ के सांचे चित्त, सांचे सांचे चैन कहे साचे जैनमती है काहू के विरुद्धी नाहि परजाय बुद्धी नाहि, आतमगवेषी न गृहस्थ है न यती है ।। रिद्धिमिद्धि वृद्वी दीमै घट मे प्रगट सदा, अन्तर की लछिमौं अजाची लक्षपती है। दास भगवत के उदाम रहै जगत सौं, सुखिया सदैव ऐसे जीव समकिती है ॥७॥ जाकै घट प्रगट विवेक गणधर कोसो, हिरदे हरख महा मोह की हरतु है। सांचा सुख माने निज महिमा अडोल जानें, आपुहीमें अपनो स्वभाव ले धरतु है ।। जैसे जट कर्दम कतकफल भिन्न करे, तैसे जीव अजीव विलच्छन करतु है। आतम सकतिसाधे ग्यान को उदो आराधे, सोई समकिती भवसागर तरतु है।॥ ८ ॥ शुद्ध नय निहचै अकेला श्राप चिढानन्द, अपने ही गुण परजाय को गहत पूरण विज्ञान घन सो है व्यवहार माहि, नव तत्वरूपी पच द्रव्य में रहत है ।। पच द्रव्य नव तत्व न्यारे जीव न्यारो लखे, सम्यक दरस यह और न गहत है। सम्यक दरस जोई आतम सरूप सोई, मेरे घट प्रगटा बनारसी कहत है ।। ७ ।। . कवित । मतगुरु कहे भव्य जीवन मो, तोरहु तुरत मोह की जेल । ममकित रूप गहो अपनो गुण, करहु शुद्ध अनुभव को खेल ।। पुद्गलपिड भाव रागादिक, इनसो नहीं तिहारो मेल । ये जड प्रगट गुपत तुम चेतन, जैसे भिन्न तोय अरु तेल ।। १२ ।। सोया ३१ । प्यार निज रूपमों उच्छाह धर्म में न संशै शुभ कर्म फलकी न इच्छा, अशुभ को देखि न गिलानि आने चित्त में । माचि दृष्टि राखे काह प्राणी को न दोप भाखे, चॅचलता भानि थिति ठाणे बाध चित्त में ।। की तरग उठे, एह आठों अग जब जागे समकित में। ताहि समकित को धरे सो समलितवत, वेहि मोक्ष पावे वो न आवे फिर इत में ॥ ५९ ॥ जबलग जीव शुद्ध वस्तु को विचारे ध्यावे, तबलग भोग सों उदासी सरवग है। भोग । मगन तब ज्ञान की जगन नाहि, भोग अभिलाष की दशा मिथ्यात अग है ।। ताते विष भोग में मगन मों मिथ्याती जीव, भोग सों उदासिसों समकित अभग है। ऐसे जानि भोग सों उदासि व्है सुगति साधे, यह मन चग तो कठोठी माहि गग है ।। १२ ।। जिन्दके सुमति जागि भोगसों भये विरागी, परसग त्यायि जे पुरुष त्रिभुवन मे । रागादिक भाव निसों जिन्ह की रहनि म्यारी, कबहूँ मगन है न रहे धाम धन में ।। जो सदैव श्रापकों विचारे सरवाग शुद्ध, जिन्ह के विकलता न व्यापे कछु मन में। तेई मोक्ष मारग के साधक कहावे जीव, भावे रहो मदिर मे भावे रहो बन मे ।। १६ ।।
२६६] सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य । सवैया २३ । जो कबहूँ यह जीव पदारथ, औसर पाय मिथ्यात मिटावे मम्यक् धार प्रवाह व्हे गुण, ज्ञान उटै मुख ऊरध धावे ।। तो अभिअतर दर्वित भावित, र्भ कलेश प्रवेश न पावे । आतम साधि अध्यातम के पथ, पूरण है परब्रह्म कहावे ।। ४ ।। भेदि मिथ्यात्वसु वेदि महार स, भेद विज्ञानकला जिनि पाई। जो अपनी महिमा अवधारत, त्याग करे उरसों जु पराई । उद्धत रीत वमे जिनके घट, होत निरन्तर ज्योति सवाई। ते मतिमान सुवर्ण समान, लगे तिनको न शुभाशुभ काई ।। ५ ।। मवैया ३१ । जाके परकाश में न दीसे राग द्वेप मोह, आश्रव मिटत नहि बध को तरम है तिहुँ काल जामें प्रतिबिम्बित अनन्त रूप, आपहु अनन्त सत्ताऽनन्तते सरस है ।। भावश्रुत ज्ञान परिणाम जो विचारि वस्तु, अनुभौ करै न जहा वाणी को परस है। अतुल अखण्ड अविचल अविनासी धाम, चिदानन्द नाम ऐसो सम्यक् दरस है ॥ १५ ॥ जैसे फिटकरी लोद हरडे की पुट विना, श्वेत वस्त्र डारिये मजीठ रग नीर में। भीग्या रहे चिरकाल सर्वथा न होइ लाल, भेदे नहि अन्तर सुपेढी रहे चीर में ।। तैसे समकितवंत राग द्वेष मोह बिन, रहे निशि वासर परिग्रह की भीर मे । पूरव करम हरे नूतन न बध करे, जाचे न जगत सुख राचे न शरीर में ॥ ३३ ॥ जैसे काहू देश को बमैया बलवत नर, जगल मे जाई मधु छत्तो को गहत है। घाकों लपटाय चहु और मधु मच्छिका पै, कंबल की ओट मे अडकित रहत है ।। से समकिती शिव सत्ता को स्वरूप साधे, उदेके उपाधी को समाधिसी कहत है। को उच्छाह, ठाने सुख राह उढवेग न लहत है ॥ ३४ ॥ पहिरे सहज सनाह मनमें मया ३१ । केई मिथ्यादृष्टि जीव धरे जिन मुद्रा भेप, क्रिया में मगन रहे कहे हम यती है। अतुल अखड मल रहित सदा उद्योत, ऐसे ज्ञान भाव सों विमुख मूढ मती है ।। आगम संभाले दोष टाले व्यवहार भाले, पाले व्रत यद्यपि तथापि अविरती है। आपको कहावे मोक्ष मारग के अधिकारी, मोक्ष से सदैव रुष्ट दुष्ट दुरगति है ।। ११८॥ सबैया ३१ । चाकसो फिरत जाको ससार निकट आयो, पायो जिन्हे सम्यक् मिथ्यात्व नाश करिके । निरद्वद मनमा सुभूमि माधि लीनी जिन्हें, कीनी मोक्ष कारण अवस्था ध्यान धरिके ।।
सहज-सुख-साधन । [२६७ सो ही शुद्ध अनुभौ अभ्यासी भयो, गयो ताको करम भरम रोग गरि के । मिथ्यामति अपनो स्वरूप न पिछाने ताते, डोले जग जालमें अनत काल भरिके ॥३४|| जाके घट अतर मिथ्यात अधकार गयो, भयो परकाश शुद्ध समकित भानुको । जाकी मोह निद्रा घटि ममता पलक फटि, जान्यो निज मरम अवाची भगवान को ।। जाको ज्ञान तेज बग्यो उद्दिम उदार जग्यो, लग्यो सुख पोप समरस सुधा पान को। ताही सुविचक्षणको समार निकट आयो, पायोतिन मारग सुगम निरवाण को ॥३९॥ जाके हिरदे मे स्यादवाद साधना करत, शुद्ध प्रातमको अनुमौ प्रगट भयो है। जाके सकल्प विकलपके विकार मिटि, सदाकाल एक भाव रस परिणयो है ।। जाते वध विधि परिहार मोक्ष अगीकार, ऐसो सुविचार पक्ष सोउ छांडि दियो है । जाकी ज्ञान महिमा उद्योत दिन दिन प्रति, सोही भवसागर उलघि पार गयो है ॥४०॥ (२७) पं. द्यानतरायनी धानतविलाम में कहते हैं: छापे । नमो देव अरहत, अष्टदश दोष रहित है। बढौं गुरु निरग्रन्थ, ग्रन्थ नाहिं गहत हैं। बदौं करुनाधर्म, पापगिरि दलन वन वर । बदौं श्रीजिनवचन, स्यादवादाक सुधाकर ।। सरधान द्रव्य छह तत्वको, यह सम्यक विवहार मत । निइ. विसुद्ध आतम दरब, देव धरम गुरु ग्रन्थ नुत ।।६२।। सवैया-३१। जीव जैसा भाव करै तैसा कर्मवध परे, तीव्र मध्य मद भेट लीने विस्तारसो। वधै जैसा उदय आवै तैसा भाव उपजाचे, तैमो फिर बन्धे किम छूटन संसारसों ।। भाव सारू बध होय बध सारू उदय जोय, उदयभाव भवभगी साधी बढवारसों। तीव्र मद उदै तीव्र भाव मूढ धारत हैं, तीव्र मद उदै मद भाव हो विचारसों ॥३९॥ कवित्त । जीवादिक भावनकी सरधा, सो सम्यक निज रूप निहार । जा विन मिथ्या ज्ञान होत है, जा विन चारित मिथ्या धार ।। दुरनयको परवेश जहा नहिं, सशय विभ्रम मोह निवार । स्वपर स्वरूप यथारथ जाने, सम्यग्ज्ञान अनेक प्रकार ||४६।। सवैया ३१ । इष्ट अनिष्ट पदारथ जे जगतमाहि, तीने देख राग दोप मोह नाही कीजिये। विपयसेती उचटाइ त्याग दीजिये कपाय, चाह दाह घोय एक दशामाहि भीजिये ।।
२६८]]
सम्यग्दर्शन और उसका महात्म्य ।
तत्वज्ञानको सभार समता सरूप धार, जीतके परीसह आनंद सुधा पीजिये।
मनको सुवास आनि नानाविध ध्यान ठानि, आपनी सुवास आप आपमाहि भीजिये ॥५१॥
जीव और पुद्गल धरम अधरम व्योम, काल एई छहौं द्रव्य जगत के निवासी हैं।
एक एक दरव मे अनत अनत गुण, अनत अनत परजायके विकासी है।।
अनत अनंत शक्ति अजर अमर सबै, सदा असहाय निज सत्ताके विलासी हैं।
सर्व दर्व गेयरूप परभाव हेयरूप, सुद्धभाव उपादेय बातें अविनासी है ॥१००||
ग्रन्थनके पढ़ें कहा पर्वत के च कहा, कोटि लच्छि बढ़ें कहा कहा रकपन में ।
संजम आच% कहा मौनव्रत धरै कहा, तपस्या के करें कहा कहा फिर वन में ।।
छद कर नये कहा जोगासन भये कहा, दानहू के ढये कहा बैठे साधुजन में ।
जौलों ममता न छूटै मिथ्याडोरी हू न टूटै, ब्रह्मज्ञान विना लीन लोभकी लगन में ।।५।।
मया २३ ।
मौन रहै वनवास गहैं, वर काम दई जु सहैं दुख भारी।
पाप हरै सुभरीति करें, जिनवैन धरै हिरदे मुग्वकारी ।।
देह तपैं बहु जाप जपैं, न वि आप जपै ममता विमतारी ।
ते मुनि मूढ करें जगस्ढ, लहैं निजगह न चेतनधारी ॥५६॥
(२८) भैया भगवतीदास ब्रह्मविलास में कहते हैं:-
सवैया ३१ ।
भौथिति निकद होय कर्मबंध मद होय, प्रगटै प्रकाश निज अानंद के कद को।
हितको दृढाव होय विनैको बढाव होय, उपजै अक्रूर ज्ञान द्वितीयाके चद को ।।
सुगति निवास होय दुर्गतिको नाश होय, अपने उछाह दाह करै मोहफद को।
सुख भरपूर होय दोष दुख दूर होय, यातै गुणवृन्द कहैं सम्यक सुचन्द को ||८||
सवैया २३ ।
जीव अकर्ता कह्यो परको, परको करता
पर ही परवान्यो।
ज्ञान निधान सदा यह चेतन, ज्ञान करै न करै कछु आन्यो ।
ज्यों जग दूध दही घृत तक्रकी, शक्ति धरै तिहुँ काल बखान्यो ।
कोऊ प्रवीन लखै दृगसेति
सु, भिन्न रहै वपुसो लपटान्यो ।।२३।।
सवैया ३१ ।
केवल प्रकाश होय अधेकार नाश होय, ज्ञान को विलास होय ओर लों निवाहयो ।
सिद्ध में सुवास होय, लोकालोक भास होय, आपु रिद्ध पास होय औरकी न चाहवी ।।
इन्द्र श्राय दास होय अरिनको त्रास होय, दर्व को उजास होय इष्टनिधि गहिवी।
मस्व सुखराश होय सत्य को निवास होय, सम्यक भयेत होय ऐमी सत्य माहिवी ॥९१॥
सहज-सुख-साधन ।
[२६९
सवैया २३ ।
जाके घट समकित उपजत है, सो तो करत हसकी रीत ।
क्षीर गहत छादत जलको सग, बाफे कुल की यहै प्रतीत ।।
कोटि उपाय करो कोउ भेद सों, क्षीर गहै जल नेकु न पीत ।
तैसे सम्यकवत गहे गुण, घट घट मध्य एक नयनीत ॥९२।।
सिद्धसमान चिदानद जानिके, थापत है घटके उर बीच ।
वाके गुण सब बाहि लगावत, और गुह सब जानत कीच ।।
ज्ञान अनत विचारत अतर, राखत है जियके उर सींच ।
ऐसे समकित शुद्ध करतु है, तिनत होवत मोक्ष नगीच ॥९३।।
नर सरयकवत करै अनुभव, नित श्रातममो हित जोडन को।
परमारथ साधि यहे चितवै, विपया सुखसों मन मोडन को ||
घटये समता प्रगटी तिहतै, न डरै लपि कर्म झकोरन को।
निज शुद्ध सरूपहि ध्यावत है, तब ध्यावत है शिव तोरन को ॥९॥
कवित्त ।
मिथ्या भाव जौलों तोलो भ्रमसो न नातो टूटै, मिथ्या भाव जौलो तौलों कर्म सो न छूटिये।
मिथ्या भाव जौलों तौलों सम्यक न ज्ञान होय, मिथ्याभाव जौलों तोलों अरि नाहि कूटिये ।।
मिथ्या भाव जौलों तौलो मोक्षको अभाव रहै, मिथ्याभाव जौलो तौलों परसग जूटिये ।
मिथ्यात्वको विनाश होत प्रगटै प्रकाश जोत, सूधौ मोक्ष पथ सूधै नेकु न अहूटिये ॥१२॥
मया ३१ ।
वापुरे विचारे मिथ्यादि जीव कहा जाने, कौन जीव कौन कर्म कैसे के मिलाप है।
सदा काल कर्मनसों एकमेक होय रहे, भिन्नता न भासी कौन कर्म कौन आप है।
यह तो सर्वज्ञ देव देख्यो भिन्न भिन्न रूप, चिदानद ज्ञानमयी कर्म जड व्याप है।
सिंह भाति मोह हीन जानै सरधानवान, जैसे सर्वज्ञ देखो नैसो ही प्रताप है ॥१०॥
छप्पै ।
जैनधर्मको मर्म, दृषि समकित सूझै ।
जैनधर्मको मर्म, मूढ कैसे कर बुझे ।।
जैनधर्मको मर्म, जीव शिवगामी पावै ।
जैनधर्मको मर्म, नाथ त्रिभुवनको गावै ।
यह जैनधर्म जगमें प्रगट, ढया दुहूँ जग पेखिये ।
'भैया' सुविचक्षन भविक जन, जैनधर्म निज लेखिये ॥३॥
२७० ] सम्यग्दर्शन और उनका महात्म्य । संवैया २३ । जो जिनदेवकी सेव कर जग, ताजिवदेषनो श्राप निहारे। जो शिवलोक बने परमातम, तामम आतम शुद्ध विचार ।। आपमें आप लव अपनो पद, पाप 5 पुण्य दुई निरवार। सो जिनदेवको सेवक है जिय, जो इहि भाति क्रिया करतार ॥१२॥ छप्पे । गग दोप 'यस मोह, नाहि निजमाहिं निरकावत। दर्शन जान चरित्र, शुद्र 'पातम रम चक्वत ।। परदन्यन भिन्न चिन्ह चेतनपट मडित । वेदत मिड ममान, गह निज म्प 'अन्वरित ।। सुप अनन्न जिहि पद चमत, मो निमचे सम्यक महन । 'भैया' सुविच नन भविक जन, श्री जिनन्द हि विधि कहत ॥१४॥ छहों द्रव्य नघ नत्व, भेद जाके सब जाने । दोप "अठारह रहित, देव ताको परमाने ।। संयम महित सुमायु, होय निरमन्थ, निगगी। मति अविरोधी ग्रन्थ. ताहि मान परत्यागी।। वर केवल भापित धर्मधर, गुण धानक वृो मरम । 'भैया' निहार व्यवहार ग्रह, सम्यक लश्नण जिन धरम ||१५|| चहे गतिमे नर बडे, बड़े तिनमे समहनी । समदृष्टि तै बड़े, माधु पदवी उतकृती ।। माधुनने पुन बडे, नाथ उवझाय कहावे । स्वझायनते बड़े, पच आचार तिन प्राचार्यन जिन बड़े, वीतराग तारन तरन । तिन कयो जैनवृप जगतमे, भैया तस बनत चरन ॥२४॥ बताये ॥
-- सहज-सुख-साधन । [२७१ आठवां अध्याथ। सम्याज्ञान और उसका महात्म्य । है यह बताया जा चुका है कि यह समार अमार है, शारीरिक तथा मानसिक दुःखों का सागर है, शरीर अशुचि, क्षणभगुर है, इन्द्रिय भोग अतृप्तिकारी, तृष्णावर्द्वक व नाशवत है । सहज सुख प्रात्मा का स्वभाव है सुख का साधन स्वात्मानुभन है, या आत्मध्यान है । यह आत्मध्यान सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की एकता रूप है निश्चय मे ये तीनो ही एक आत्मारूप ही है । व्यवहार से ये भिन्न २ कह- लाते हैं व निश्चय के साधन रूप से व्यवहार का बहुत विस्तार है । इन तीनों में से सम्यग्दर्शन के व्यवहार व निश्चय का कुछ स्वरूप प्रात्मानन्द के पिपासुओ के लिये किया जा चुका है। अब सम्यग्ज्ञान का निश्चय व्यवहार कथन इस अध्याय मे किया जाता है। जैसे सम्यग्दर्शन गुण आत्मा का स्वभाव है वैसे ज्ञान गुण भी आत्मा का स्वभाव है । सम्यग्दर्शन सहित ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते है । निश्चय से घान स्वय सम्यक् है यथार्थ हैं, क्योंकि ज्ञान एक ऐसा विशेष गुण है जो पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश तथा काल इन पांच द्रव्यो में नहीं पाया जाता है। इसीलिये वे जड़ हैं किन्तु आत्मा मे पाया जाता है । वे मब अन्धकार रूप है। ज्ञान ही एक प्रकाशरूप है । ज्ञान का स्वभाव सूर्य के प्रकाश के तुल्य है । जैसे सूर्य एक ही क्षण में जगत के पदार्थों को प्रकाश करता है वैसे ज्ञान भी सर्व ही जानने योग्य को एक काल मे प्रकाश करता " सर्व ज्ञेय जानाति तत् ज्ञान " जो सर्व ज्ञेयों को जाने वह जान है । प्रत्येक आत्मा स्वभाव से शुद्ध है, ज्ञायक स्वभाव है, मिद शुद्व आत्मा के महश ही हरएक अात्मा का स्वभाव है। प्रदेशों की भिन्नता की अपेक्षा हरएक आत्मा की सत्ता भिन्न २ है परन्तु गुण व स्वभावों की अपेक्षा मे परस्पर कोई अन्तर नहीं है । सर्व ही सिद्ध तथा ससारी जीव समान हैं, परमात्मा या सिद्धात्मा को सर्वज्ञ व सर्वदर्शी या अनन्तज्ञान व अनन्त दर्शन से युक्त इसीलिये कहते हैं कि उनके ज्ञान गुणपर कोई प्रावरण या परदा या मैंल नहीं है-वह शुद्ध है-ज्ञान दीपक के प्रकाश की तरह स्वपर प्रकाशक होता है । ज्ञान अपने द्रव्य गुणी आत्मा को भी दिवाना है व अन्य सर्व पदार्थों को भी दिखाता है । क्रम रहित सर्व को जान लेना यह ज्ञानगुण का स्वभाव है । इसीलिये इस ज्ञान को अनुपम, अद्- भूत व महान कहते है । जिनको ज्ञानावरण कर्म के उदय से अर्थात् क्षयोपशम से कुछ ज्ञान की शक्ति प्रगट है कुछ अप्रगट है उनको जानने का प्रयास करना होता है तब वह ज्ञान क्रम से पदार्थों को जानता है। तथापि जान लेने के पीछे धारणा मे अनेक पदार्थ का ज्ञान एक साथ अल्पज्ञानी के भी पाया जाता है। जब वह अल्पज्ञानी उसका व्यवहार मन, वचन, काय से करता है तब वह क्रम से होता है परन्तु भडार मे -सचय तो एक साथ अनेक पदार्थों का ज्ञान रहता है । जैसे एक पचास वर्ष का विद्वान है, जो सस्कृन और अग्रेजी में एम ए है, बहुतप्ता पूर्वीय व पाश्चात्य साहित्य को पढ चुका है, वह एक माथ सस्कृत ग्रेजी के ज्ञान को य वैद्यक को, व्यापार को, मकान बनाने की कला को, व्याख्यान की कला को, लिग्वने की कला को, ताम, चौपद, सतरज खेलने की कला को, अपने सम्बन्धियो के नामठामादि इतिहास को, नाना देशो के २७२] सम्यग्ज्ञान और उसका महात्म्य । भूगोल को देखे हुए समझे हुए अनेक पदार्थे। के स्वरूप को, गान विद्या को, बाजा बजाने को, तैरने को, व्यायाम को, खडग चलाने को, रसवती बनाने को, पूजा पाठ को, आत्मध्यान की कला को, जीवन की अनु- भूत घटनाओं को इत्यादि बहुत से विपयों को एक साथ ज्ञान में भडार के समान रख रहा है । यदि कोई महात्मा निमित्त ज्ञानी है, ज्योतिषी है या अवधिज्ञानी है तो वह मविष्य की बहुत सी बातों को भी अपनी व पराई जानकर जान के भडार मे रख लेना है। योगाभ्याप के बल से जितना जितना -ज्ञान का विकाश होता जाता है उतना उनना ज्ञान मे त्रिकाल गोचर ज्ञान का भडार अधिक अधिक सचय होता है। सचित ज्ञान अक्रम ही विराजमान रहता है । एक मति व श्रुतज्ञानी कई भाषाए जानता है। सस्कृत पुस्तक पढ़ने का काम पड़ता है तब सस्कृत पढने लगता है, गुजराती पढने का काम पडता है, तब गुजराती पढने लगता है, मराठी पढ़ने का काम पडता है तब मराठी पढने लगता है, इग्लिश पढने का काम पडता है तब इग्लिश पढ़ता है। एक व्याख्याता किमी विपय पर भापण करता है, उसने अनेक पुस्तकों को को पढ़कर एक विषय पर जो ज्ञान सचय किया है वह सब उसके ज्ञान में मौजूद है एक माथ विद्यमान है, उसीमें से धीरे २ वह वक्ता बहुतमा ज्ञान अपने १॥ व २ घटे के वक्तव्य से प्रकाशित कर देता है । ज्ञान का प्रकाश मन द्वारा सोचने मे, वचन द्वारा कहने मे, काय द्वारा सकेत करने मे अवश्य क्रम से होगा, परन्तु श्रात्मा के भडार मे ज्ञान का संचय एक साथ बहुतसा रहता है यह बात हरएक प्रवीण पुरुष समझ सकता है। यह बात भी ठीक है कि अपने अपने ज्ञान की प्रगटता के अनुसार तीन काल का ज्ञान भी किसी मर्यादा तक अल्प ज्ञानियों के पाया जाता है। एक स्त्री रसोई बनाने का प्रबन्य कर रही है, वह जानती है फि मै क्या कर रही हूँ, क्या २ सामान एकत्र कर रही हूँ यह वर्तमान का नान है। क्या २ सामान एकत्र कर चुकी हूँ व यह सामान कैसे व कप आया था व घर में कहा रक्खा था, जहा से लाकर अब रसोई में रक्खा है । ऐसा भूतकाल का ज्ञान भी है । तथा रसोई में अमुक २ वस्तु बनानी है, इतनी तैयार करनी है, इतने मानवों को जीमाना है, अमुक्त २ जीमेगे, रसोई के पीछे मुझे कपडे सीना है, अनाज फटकना है, पुस्तक पढना है, अमुक के घर सम्बन्धी होने के कारण एक रोगी की कुशल पूछने जाना है, अमुक से यह बाते करनी है ऐमा बहुतसा भविष्य का ज्ञान भी है। तीन काल का एक साथ ज्ञान हुए बिना सुनार गहना नहीं घड सकता, थवई या इजीनियर मकान नहीं बना सकता, अध्यापक पङ्गी नहीं माना, एक यात्री किसी स्थान पर पहुच नहीं सकता । पर्वत की चोटी पर पहुँचकर एक मदिर के दर्शन करने है, मैं अमुक स्थान से चलकर यहा आया हूँ, पर्वत का मार्ग दो घटे में अमुक २ मार्ग से तय करू गा, यह सब ज्ञान एक साथ होता है । इस ज्ञान को लिए हुए ही वह पर्वत के शिखरपर पहुंच जाता है । अल्पज्ञानी को अपने ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम अनुसार थोडा त्रिकालज्ञान होता है तब सर्वज्ञ को व अनंतज्ञानी को व सर्व आवरण से रहित निर्मल प्रकाशमान ज्ञानज्याति को त्रिकालगोचार सर्व विश्व की अनत द्रव्यों का व उनके गुणों का व उनकी पर्यायों का ज्ञान हो जावे तो इसमें कोई आश्चर्य की व सशय की बात नहीं है । शद्ध ज्ञान भी यदि कुछ न जाने तो वह बान श द्व ही क्या हुआ, वह तो अवश्य कुछ या उतने अश अशुद्ध हुआ जितने अंश वह नहीं जानता है। शब्द ज्ञान दोपहर के सूर्य के समान विश्व व्यापी जेय को एक साथ जानता है, एक साथ प्रकाश किये हुए है । उसको कुछ जानना के । शेप नहीं रहा।
सहज-सुख-साधन । [२७३ सर्वज्ञत्व की शक्ति आत्मज्ञानी मे भी है। जितना जितना अज्ञान का परदा हटता जाता है उतना उतना ज्ञानका विकास या ज्ञान का प्रकाश होता जाता है, उतना उतना ज्ञान उन्नति रूप या वर्द्धमान होता जाता है । एक बालक जन्मते समय बहुत अल्प जानता है, वही जितना जितना अनुभव पाता है व जितना जितना विद्या पढता है उतना उतना अधिक ज्ञानी होता जाता है। उसमें ज्ञान की वृद्धि कहीं बाहर से ज्ञान का सचय करके इस तरह नहीं हुई है जैसे द्रव्य को दूसरो से सचय करके बढाया जाता है व फैले हुए पानी को एक सरोवर में एकत्र किया जाता है । ज्ञान एक ऐसा अद्भुत गुण है जो कोई किसी को दे नहीं सकता कोई किसी से ले नहीं सकता । यद्यपि लोक व्यवहार में ऐसा कहा जाता है कि इस आचार्य ने अपने शिष्य को बहुत ज्ञान दिया, शिष्य ने प्राचार्य से बहुत ज्ञान पाया परन्तु यह वचन केवल व्यवहार मात्र है, वास्तव में असत्य है । यदि आचार्य ज्ञान देते तो उनका ज्ञान घटता तब शिष्य का ज्ञान बढता सो ऐसा नहीं हुआ है। आचार्य ने जबसे शिष्य को पढ़ाना शुरु किया और दस वर्ष तक पढाया तबतक जो कुछ पढाया, समझाया, बताया वह सब ज्ञान आचार्य में बराबर स्थित रहा। इतना ही नहीं समझाते समझाते, बताते बताते प्राचार्य का ज्ञान भी बढ़ता चला गया और पढ़नेवाले शिष्य का ज्ञान भी बढ़ता गया । जहा देन- लेन के शब्दों का व्यवहार है वहा देन-लेन कुछ नहीं हुआ तथापि दाता व प्राप्त कर्ता दोनों में ज्ञान बढ गया ऐमा क्यों हुआ ? क्यों नहीं एक तरफ ज्ञान घटा तब दूसरी तरफ बढा। इसका सीधासाधा उत्तर यही है कि ज्ञान का सदा विकास या प्रकाश होता है । गुरु के समझाने से व पुस्तकों के पढ़ने से जितना जितना अज्ञान का परदा हटता है, जितना जितना ज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम होता है उतना २ ज्ञान अधिक अधिक चमकता जाता है । यह भी जगत में कहने का व्यवहार है कि इसने अपने ज्ञान में बहुत उन्नति की, बहुत निर्मलता की, बहुत विकास किया । उन्नति या विकास शब्द वहीं प्रयोग में आते हैं जहा शक्ति तो हो पर व्यक्ति न हो व्यक्त होने ही को प्रकाश या विकास कहते हैं। सूर्य का प्रकाश हुआ या विकाश हुआ अर्थात् सूर्य में प्रकाशक शक्ति है ही उसके ऊपर से अन्धकार हटा, मेघों का परदा हटा । सूर्य का प्रकाश इधर झलका यह रत्न चमक उठा । अर्थात रत्न पापाण मे रत्न बनने की व चमकने की शक्ति तो थी ही, उसके मल को हटाने से वह रत्नरूप से चमक उठा । तेजाब में डालने से यह सुवर्ण का श्राभूपण चमक उठा । अर्थात सुवर्ण के आभूषण में चमकने की शक्ति तो थी ही उसपर मैल छागया था। तेजाब से जितना मैल कटता गया, सुवर्ण की चमक झलकती गई । हर एक के ज्ञान मे अनन्त पदार्थों के ज्ञान की अमर्यादित शक्ति है यह कभी सीमित नहीं किया जा सकता है कि इससे आगे ज्ञान प्रकाशन करेगा । आज के विश्व में पदार्थ विद्या ने कैसा अपूर्व विकाश किया है जिससे हजारों मील शब्द पहुच जाता है । अमेरिका में बैठे हुए भारत में गाया हुआ गाना सुना जा सकता है । हवाई विमानों से लाखों मन बोमा आकाश में जा सकता है । बिना तार के सबन्ध से क्षण- मात्र में हजारों मील सामान पहुच जाते हैं । पदार्थो के भीतर अद्भुत ज्ञान है, यह ज्ञान पदार्थ वेत्ताओ को कैसे होता है | इसका पता लगाया जायगा तो विदित होगा कि पदार्थ के खोजी एकात में बैठकर अपने भीतर खोजते है । खोजते खोजते कोई बात सूझ जाती है उसीका प्रयोग करते हैं । उसको ठीक पाते हैं तब् और सोचते हैं और नई २ बातें सूम जाती हैं । वश प्रयोग से उन बातों को जमाकर नई खोज ( New Invention ) प्रगट करदी जाती है। जितना २ मैले बर्तनको माजा जायगा वह उतना २ चमकता जायगा। . - २७४] सम्यग्जान और उमका महास्य। - इसी तरह जितना २ इस अपने शुद्ध ज्ञानको मांजा जायगा, इममे ग्वोज की जायगी उतना २ ज्ञानका विकास होता जायगा। प्रत्येक प्राणी की आत्मामे यदि अमर्यादित नान न हो तो नान का विकास संभव ही न हो। ज्ञान का काम मात्र जानना है, मात्र प्रकाश करना है । जैमा द्रव्य गुण पर्याय है वैसा ही जानना है, न कम जानना है न अधिक जानना है न विपरीत जानना है । शुद्व नान छहों द्रव्यो के भिन्न २ स्वभावां को जानता है मूल स्वभावों को जानता है तथा वे द्रव्य परस्पर एक दूसरे को किस तरह सहायक होते हैं यह भी जानता है। धर्म, अधर्म, आकाश, काल क्रिया रहित स्थिर है, स्वय विभाव रूप या उपाधिरुप नहीं परिणमते हैं-केवल द्रव्यों के हलन चलन, थिर होने, अवकाश पाने व परिवर्तन मे उदासीन रूप से महाय करते हैं। काँ से ससारी जीप अनादि काल से सम्बन्धित है-कर्म पुद्गल हैं-जोत्र और पुद्गल में पर के निमित्त से विभावरूप होने की शक्ति है। इससे जीवो में कर्मों के उदय से विभार भाव, रागादि भाव, अज्ञान भाव, असयत भाव होते है, उन भावों के निमित्त से कर्म पुदल आकर जीव के कार्मण शरीर के साथ बन्ध जाते है । उनका बन्ध किम तरह होता है, वे क्या २ व किस २ तरह अपना असर दिखलाते हैं व कैसे दूर होते है । जीव और कर्म का परस्पर निमित्त नैमित्तिक क्रिया से क्या २ होता है इस सर्व व्यवस्था को भी शुद्ध ज्ञान जानता है। अभिप्राय यह है कि छ. द्रव्यो को,उनके सामान्य व विशेष गुणो को, उनकी स्वाभाविक व वैभाविक पर्यायों को-जगत की सर्व व्यवस्था को शुद्व ज्ञान ठीक ठीक जानता है । जैसा सूर्य का प्रकाश घटपट, नगर, द्वार, गली, महल, वृक्ष, पर्वत, ककड़, पत्थर, ताबा, लोहा, पीतल, नदी, सरोवर, झील, खाई आदि सर्व पदार्थो को - उनके आकार को जैसा है वैसा दिखलाता है वैसे शुद्ध ज्ञान सूर्य प्रकाश के समान सर्व पदार्थों का सब कुछ स्वरूप जैसा का तैसा जानता है और जैसे सूर्य सर्व को प्रकाश करता हुआ भी किसीपर राग- द्वेप नहीं करता है । कोई सूर्य को अर्घ चढ़ावे तो उस पर प्रसन्न नहीं होता है, कोई सूर्य की निन्दा करे तो उस पर अप्रजन्न या क्रोधित नहीं होता है - पूर्ण समदर्शी है । अपने नाप व प्रकाश स सर्व पदार्थों को गुणकारी हो जाता है - वह कुछ विचार नहीं करता है कि मैं किसी को लाभ पहुंचाऊ व हानि पहुँचाऊ । वह तो पूर्ण वीतरागता से प्रकाश करता है। भले ही कोई लाभ मानलो व कोई हानि मान लो । उसी तरह शुद्ध ज्ञान सर्व द्रव्य, गुण, पर्यायो को यथार्थ जानते हुए भी न किसी से राग करता है न द्वेप करता है न प्रशंसा किये जाने पर उन्मत्त होता है न निंदा किये जाने पर रुष्ट होता है। पूर्ण समदर्शी, वीतरागी, निराकुल रहता है। जैसे सर्वच वीतरागपना सिद्ध परमात्मा का स्वभाव है वैसे ही मर्वज वीतरागपना हरएक आत्मा का स्वभाव है। आत्मा के स्वभाव मे मोह का किचित् भी मल नहीं है इसलिये' आत्मा का ज्ञान जानता हुआ भी न क्रोध करता है न मान करता है न माया करता है न लोभ करता है न हास्यभाव करता है न रति करता है न अरति करता है न शोक करता है न भय करता है न जुगुप्सा या घृणा करता है न कोई काम का विकार करता है । वह मोह मदिरा के सयोग मिना किंचित् भी मोहित नहीं होता, दोपित नहीं होता। आत्मा का स्वभाव सर्वज्ञ वीतरागता है, यही ज्ञान सम्याज्ञान है। विभावयना, अल्पज्ञानपना ज्ञानावरण कर्म के से है। रागद्वेष मोह, मोहनीय कर्म के उदय से है। जितनी कुछ अन्तरग अवस्थाएँ आत्मा की वैभाविक होती है वे सब चार घातीय कमी के उदय से हैं। जितनी कुछ बाहरी सामग्री का सयोग आत्मा - . उदय सहज-सुख-साधन। [२७५ से होता है, वह चार घातीय कम। के उदय से है, यह सब जानना ही सम्यग्ज्ञान है । सिद्ध परमात्मा अरहंतकेवली परमात्मा के ज्ञान में और सम्यग्दृष्टी अविरति या विरती के ज्ञान में पदार्थों के स्वरूप के जानने की अपेक्षा कोई अतर नहीं है । जैसा केवली जानते हैं, वैसा स्याद्वादी श्रुतज्ञानी सम्यग्दृष्टी भी जानता है । अर्थात् द्रव्य की अपेक्षा वस्तु का क्या स्वरूप है, स्वभाव या विभाव पर्याय की अपेक्षा वस्तु का क्या स्वरूप है, यह सव ज्ञान जैसा केवभगवान को होता है,ली वैसा सम्यग्दृष्टी को होता है । मात्र अतर यह है कि केवली भगवान शुद्ध स्वाभाविक केवलज्ञान से जानते हैं और यह श्रुतज्ञानी श्रुतज्ञान के परोक्ष जानता है । केवलज्ञानी अधिक पर्यायों को जानते हैं । श्रुतज्ञानी कम पर्यायों को जानता है । परन्तु जितना कुछ श्रुतज्ञानी जानता है वह केवलज्ञानी के सदृश ही । अनुकूल ही जानता है प्रतिकूल नहीं जानता है और जैसे केवलज्ञानी सर्व कुछ जानते हुए भी पूर्ण वीतराग हैं वैसे ही सम्यग्दृष्टी का ज्ञान भी वीतराग भाव से जानता है, वह भी राग द्वेप बिना किये हुए अपनी व दूसरों की कर्मजनित अवस्था को वस्तुस्वरूप से जानता है इसलिये सम्यग्दृष्टी को भी ज्ञाता कहते हैं, उदासीन कहते हैं। द्वारा केवल अतर यह है कि सम्यग्दृष्टी दो प्रकार के होते हैं-एक वीतराग दूसरे मराग । ध्यानस्थ आत्मलीन सम्यग्दृषी को वीतराग कहते हैं, वह सम्पूर्ण मन, वचन, काय की क्रियाओं से विरक्त रहता हुआ उमी तरह आत्मा के आनद का स्वाद ले रहा है जैसे सर्वज्ञ वीतराग परमात्मा लेते हैं । सराग सम्यक्ती मन, वचन, काय की क्रियाओं को रागपूर्वक करता है । तथापि वह इन सर्व क्रियाओं का कती अपने को नहीं मानता है । अात्मा ज्ञातादृष्टा है, यही बुद्धि रखता है, कषाय के उदय से उसे व्यवहार कार्यों को अपनी अपनी पदवी के अनुकूल करना पड़ता है। उनको वह अपना कर्तव्य नहीं जानता है, कर्मोदय जनित रोग जानता है । उस सराग सम्यक्ती का ज्ञान व श्रद्वान तो वीतराग सम्यग्दृष्टी के समान है, केवल चारित्र मोह के उदय का अपराध है, उसको वह सम्यग्दृष्टी कर्म का उदय जानता है उसे पर ही अनुभव करता है । सर्व मन, वचन, कायकी क्रियाओं को भी पर जानता है । इसलिये वह भी पूर्ण उदासीन है। भावना यह है कि कब यह सरागता मिटे और मैं वीतराग हो जाऊ । तत्वज्ञानी सम्यक्ती का यह ज्ञान कि मैं निश्चय से परमात्मावत् शुद्ध निर्विकार ज्ञाता दृष्टा हू, आत्मज्ञान कहलाता है । यही आत्मज्ञान परम सुग्व साधन है । इस आत्मज्ञान को ही निश्चय सम्यग्ज्ञान कहते हैं। इसी को जिनवाणी का सार भाव श्रुतज्ञान कहते हैं। इसी प्रात्मज्ञान में उपयोग की थिरता को स्वरुपाचरण चारित्र कहते हैं स्वानुभव कहते हैं या आत्मध्यान कहते है । भावश्रुतज्ञान के द्वारा आत्मा का अनुभव दुईज का चद्रमा है,वही अभ्यास के बल से बढते बढते पूर्णमामी का चन्द्रमा रूप केवलज्ञान हो जाता है । जिस रत्नत्रय से सहजसुख की सिद्धि होती है, उसमें आत्मज्ञान ही निश्चय सम्यग्ज्ञान है । इस अात्मज्ञान की प्राप्ति के लिये द्रव्यश्रुत द्वारा छ द्रव्य,पचास्तिकाय,सात तत्व,नौपदार्थो का ज्ञान आवश्यक है जिसके ज्ञान के लिये परमागम का अभ्यास करना बहुत आवश्यक है । इम शास्त्राभ्याम को व्यवहारसम्यग्ज्ञान कहते है। - व्यवहार सम्यग्ज्ञान--जिनवाणी मे बहुत से शास्त्रो का सग्रह है उनको चार अनुयोगों में विभाजित किया गया है, जिनको चार वेद भी कहा जा सकता है।
२७६] सम्यग्ज्ञान और उसका महात्म्य । - प्रथमानुयोग-प्रथम अवस्था के कम ज्ञानी शिष्यों को तत्वज्ञान की रुचि कराने में जो समर्थ हो उसको प्रथमानुयोग कहते है । इनमें उन महान पुरुषों के व महान स्त्रियों के जीवन चरित्र हैं जिन्होंने धर्म धार के आत्मा की उन्नति की है। इसमे उन चरित्रों का भी कथन है जिन्होंने पाप बांधकर दुःख उठाया है व जिन्होंने पुण्य बाधकर सुख साताकारी साधन प्राप्र किया है । इस तरह के वर्णन को पढने से यह असर बुद्धि पर पड़ता है कि हमको भी धर्म का साधन करके अपना हित करना योग्य है । दूसरा अनुयोग करणानुयोग है। इसमें चार गति का स्वरूप और लोक का स्वरूप बताया है तथा जीवो की अवस्था के भेद गुणस्थान व मार्गणा स्थानो का कथन है तथा कमी के बन्ध, उदय, सत्ता आदि का निरूपण है। वह सब हिसाब बताया है जिससे आत्मा की अवस्थाए कर्म के सयोग से भिन्न भिन्न प्रकार की होती हैं । इस ज्ञान की अध्यात्मज्ञान के लिये बहुत आवश्यकता है । जो गुणस्थानों को समझेगा वही ठीक २ जानेगा कि सम्यग्दृष्टी किस अपेक्षा बंधक है तथा किस अपेक्षा अवधक है । तथा कर्म वध कौनमे गुणस्थान तक होता है । तथा कमी की अवस्था कैसे बदली जा सकती है । यह आत्मज्ञान का बड़ा ही सहकारी है । कर्म पुद्गल की सगति से जीव के सर्व व्यवहार नृत्य का दिग्दर्शन इस अनुयोग मे होता है। तीसरा अनुयोग चरणानुयोग है-मन वचन काय को थिर करने के लिये स्वरूपाचरण मई निश्चय चारित्र में उपयुक्त होने के लिये जिस जिस व्यवहार चारित्र की आवश्यकता है वह सब इस अनुयोग में बताया है। साधु का क्या चारित्र है व गृहस्थ भावक का क्या चारित्र है, वह सब विस्तार पूर्वक इस तरह बताया गया है कि हरएक स्थिति का मानव अपनी योग्यतानुसार उसका आचरण कर सके तथा सहज सुख का साधन करता हुआ राज कर्तव्य, देश रक्षा कर्म, वाणिज्य कर्म, कृषि कर्म, शिल्प कर्म आदि गृहस्थ योग्य कर्म भी कर सके, देश परदेश में नाना प्रकार वाहन द्वारा भ्रमण कर सके । लौकिक उन्नति सर्व तरह से न्याय पूर्वक करते हुए सहजसुख का साधन किया जा सके । जैसे २ वैराग्य बढ़े वैसे २ चारित्र को अधिक २ पाला जासके व अधिक २ आत्मध्यान की उन्नति की जासके । आवश्यक । २ चौथा अनुयोग द्रव्यानुयोग है। इसमें छः द्रव्य, पाच अस्तिकाय, सात तत्त्व, नौ पदार्थ का व्यवहार नय से पर्याय रूप तथा निश्चय नय से द्रव्य रूप कथन है । इसीमें शुद्धात्मानुभव की रीतियां बताई है,जीवन- मुक्त रहने का साधन बताया है, अतीन्द्रिय सहजसुख की प्राप्ति का साक्षात् उपाय बताया है । इन चार अनु- योगों के शास्त्रों को निस्य प्रति यथा सम्भव अभ्यास करना व्यवहार सम्यग्ज्ञान का सेवन है ।- जैसे सम्यग्दर्शन के आठ अग हैं वैसे इस सम्यग्ज्ञान के भी आठ अंग हैं । यदि पाठ अंगों साथ शास्त्राभ्यास को किया जायगा तो ही ज्ञान की वृद्धि होगी, अज्ञान का नाश होगा । तथा भावो, की शुद्धि हागी, कषायों की मदता होगी, ससार से राग घटेगा, वैराग्य बढ़ेगा, सम्यक्त की निर्मलता होगी, चित्त, चित्तनिरोध की कला मालूम होगी। आठ अगों को ध्यान रखते हुए शास्त्रों का अभ्यासी मन, बचन, काय वो लीन कर लेता है-पढते २ आत्मानन्द की छटा छाजाती है । सम्यग्ज्ञान के आठ अंग-(१) शुद्धि ग्रन्थ-शास्त्र के वाक्यों को शुद्ध पढना । जब तक शुद्ध नहीं पड़ेगे तब तक उसका तब तक उसका अर्थ नहीं भासेगा । x म सहज-सुख-माधन । [२७७ (२) अर्थ शुद्धि-शास्त्र का अर्थ ठीक २ समझना । जिन आचार्यों ने ग्रन्थ रचना की है उन्होंने अपना शान पदों की स्थापना में रख दिया है तय उन्हीं स्थापना रूप पदों के द्वारा वही शान ग्रहण कर लेना जरूरी है जो ज्ञान ग्रन्थ कर्ताओ के द्वारा उसमें भरा गया था या स्थापित किया गया था। जैसे दिशावर से आया हुआ पत्र जब ऐसा पढ़कर समझा जाता है कि जो मसलन भेजनेवाले ने लिखा था वही जान लिया गया तथ ही पत्र पढने का लाभ होता है इसलिये ग्रन्थ के यथार्थ भाव को समझना अर्थ शुद्धि है। (३) उभय शुद्धि -- ग्रन्थ को शुद्ध पढ़ना और शुद्ध अर्थ समझना, दोनों का ध्यान एक साथ रखना उभय शुद्धि है। (४) कालाध्ययन-शास्त्रों को ऐसे समय पर पढना जब परिणामो में निराकुलता हो । सध्या का समय आत्मध्यान तथा सामायिक करने का होता हैं उस समय को सवेरे दोपहर व सांझ को बचा लेना चाहिये तथा ऐसे समय पर भी शास्त्र पढने में उपयोग न लगेगा जब कोई घोर आपत्ति का समय हो, तूफान हो, भूचाल हो रहा हो, घोर कलह या युद्ध हो रहा हो, किसी महापुरुप के मरण का शोक मनाया जारहा हो, ऐसे आपत्तियो के समयपर शाति से ध्यान करना योग्य है। (५) विनय-यढ़े आदर से शास्त्र को पढ़ना चाहिये, बड़ी भक्ति भावो में रखनी चाहिये कि मैं शास्त्रों को इसीलिये पढता हूँ कि मुझे अात्मज्ञान का लाभ हो, मेरे जीवन का समय सफल हो । अतरंग प्रेम पूर्ण भक्ति को विनय कहते हैं। यह पीछे स्मरण (६) उपधान-धारणा करते हुए ग्रन्थ को पढना चाहिये । जो कुछ पडा जावे यह भीतर जमता जावे जिसमे में श्रासके। यदि पढते चले गये और ध्यान में न लिया तो अज्ञान का नाश नहीं होगा । इसलिये एकाग्र चित्त होकर ध्यान के साथ पढना, धारणा मे रखते जाना उपधान है । यह बहुत जरूरी अग है, ज्ञान का प्रबल साधन है। (७) बहुमान-शास्त्र को बहुत मान प्रतिष्ठा में विराजमान करके पढना चाहिये । उच्च चौकी पर रख कर आसन से बैठकर पढना उचित है तथा शास्त्र को अच्छे गत्ते वेष्टन से विभूषित करके जहा दीमक न लगे शास्त्र सुरक्षित रहें इस तरह विराजमान करना चाहिये । (८) अनिव-शास्त्रज्ञान अपने को हो उसको छिपाना नहीं चाहिये, कोई समझाना चाहे तो उसको समझाना चाहिये । तथा जिस गुरु से समझा हो उसका नाम न छिपाना चाहिये । इस तरह जो आठ अगों को पालता हुआ शास्त्रों का मनन करेगा वह व्यवहार सम्यग्ज्ञान का सेवन करता हुआ आत्मज्ञान रूपी निश्चय सम्यग्ज्ञान को प्राप्त कर सकेगा। क ज्ञान के पाठ भेद-यद्यपि जान एक ही है, वह आत्मा का स्वभाव है, उसमें कुछ भेद नहीं है जैसे सूर्य के प्रकाश में कोई भेद नहीं है तथापि सूर्य के उपर घने मेघ पाजावें तो प्रकाश कम झलकता है मेघ उससे कम हो तो और अधिक प्रकाश प्रगट होता, और अधिक कम मेघ हो तो और अधिक प्रकाश २७८] सम्यग्ज्ञान और उसका महात्म्य | झलकता । और भी अधिक कम मेघ हों तो और भी अधिक प्रकाश प्रगट होता। बिलकुल मेघ न हो तो पूर्ण प्रकाश प्रगट होता है । इस तरह मेघों के कम व अधिक आवरण के कारण सूर्य प्रकाश के पांच भेद हो सकते हैं । तथा और भी सूक्ष्म विचार करोगे तो सूर्य के प्रकाश के अनेक भेद हो सकते हैं उसी तरह ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम या क्षय के अनुसार ज्ञान के मुख्य पांच भेद हो गये हैं-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, तथा केवलज्ञान । मति, श्रुत, अवधि तीन ज्ञान जब मिथ्यादृष्टी के होते हैं। कुमति, कुश्रुत, कुअवधि कहलाते हैं, सम्यग्दृष्ट्री के मति, श्रुत, अवधि कहलाते हैं । इस तरह तीन कुज्ञान को लेकर ज्ञानके आठ भेद हो जाते हैं। मंतिज्ञान-पाच इद्रिय तथा मन के द्वारा सीधा किसी पदार्थ का जानना मतिज्ञान है । जैसे स्पर्शद्रिय से स्पर्श करके किसी पदार्थ को ठडा, गरम, रू'वा, चिकना, नरम, कठोर, हलका, भारी जानना । रसनाइद्रिय से रसना द्वारा रसनायोग्य पदार्थ को स्पर्श करके खट्टा, मीठा, चरपग, कडवा, कसायला या मिश्रित स्वाद जानना । नानिका इंद्रिय से गंधयोग्य पदार्थ को छूकर सुगन्ध या दुर्गन्ध जानना । चक्षु इद्रिय से बिना स्पर्श किये दूर से किसी पदार्थ को सफेद, लाल, पीला, काला या मिभित रग रूप जानना । कानों से शब्द स्पर्श कर सुरीला व असुरीला शब्द जानना । मन के द्वारा दूर से किसी अपूर्व बात को यकायक जान लेना। इस तरह जो सीधा ज्ञान इन्द्रिय व मन से होता है उमको मतिज्ञान ( direct knowledge through senses and mind ) कहते है। जितना मतिज्ञानवरण का क्षयोपशम होता है उतनी ही अधिक मतिज्ञान की शक्ति प्रगट होती है । इसलिये सर्व प्राणियों का मतिज्ञान एकसा नहीं मिलेगा। किसी के कम, किसी के अधिक, किसी के मन्द, किसी के तीव्र । जानी हुई चीज का स्मरण होजाना व एक दफे इद्रियों से व मनसे जानी हुई चीज को फिर ग्रहण कर पहचानना कि वही है यह सजा ज्ञान, तथा यह चिंता ज्ञान कि जहा- जहा धूम होगा बहा वहा आग होगी । जहा जहा सूर्य का प्रकाश होगा कमल प्रफुल्लित होंगे । तथा चिन्ह को देखकर या जानकर चिन्हों का जानना, धूम को देखकर अग्नि का जानना यह अनुमान ज्ञान, भी मतिज्ञान हैं क्यों कि मतिज्ञानवरण फर्म के क्षयोपशम से होते हैं। । ये सब श्रुतज्ञान-मतिज्ञान से जाने हुए पदार्थ के द्वारा दूसरे पदार्थ का या विषय का जानना श्रुतज्ञान है । जमे कान से आत्मा शब्द सुना यह मतिज्ञान है। आत्मा शब्द से अात्मा के गुण पर्याय आदि का बोध करना श्रुतज्ञान है । इसीलिये शास्त्रज्ञान को अतज्ञान कहते हैं । हम अक्षरों को देखते है या सुनते है उनके द्वारा फिर मन से विचार करके शब्दों से जिन जिन पदार्थों का सकेत होता है उनको ठीक ठीक जान लेते हैं यही श्रुत ज्ञान है, यह श्रुतज्ञान मनके ही द्वारा होता है । श्रुतज्ञान के दो भेद हैं-अक्षरात्मक श्रुतज्ञान,अनक्षरात्मक श्रुतज्ञान । जो अक्षरों के द्वारा अर्थ विचारने पर हो वह अक्षरात्मक श्रुत ज्ञान है जैसे शास्त्र द्वारा ज्ञान । जो स्पर्शनादि इद्रियों से मतिज्ञान द्वारा पदार्थ को जानकर फिर उस ज्ञान के द्वारा उस पदार्थ में हितरूप या अहितरूप बुद्धि हो सो अनक्षरात्मक श्रुतज्ञान है। यह एकेन्द्रियादि सब प्राणियों को होता है । जैसे वृक्ष : कुल्हाड़ी लगाने से कठोर स्पर्श का ज्ञान होना सो मतिज्ञान है, फिर उससे दुख का बोध होना श्रुतज्ञान है । लटको रसना के द्वारा स्वाद का ज्ञान होना मतिज्ञान है, फिर उसे वह सुखदाई या दुःखदाई भासना श्रुतज्ञान है । चींटी को दूरसे सुगन्ध आना मतिज्ञान है फिर सुगधित पदार्थ की ओर आने की बुद्धि होना श्रुतज्ञान है । पतग को श्राख से दीपक का वर्ण देखकर ज्ञान होना मतिज्ञान है । वह हितकारी भासना को सहज-सुख-साधन। [२७९ श्रुतज्ञान है । कर्ण से कठोर शब्द सुनना मतिज्ञान है, वह अहितकारी भासना श्रुतज्ञान है । मतिश्रुतज्ञान सर्व प्राणियों को सामान्य से होते हैं। एकेन्द्रियादि पचेन्द्रिय पर्यंत सबके इन दो ज्ञानों से कम ज्ञान नहीं होते हैं। इन दो जानो की शक्ति होती है, परन्तु ये ज्ञान भी क्रम से काम करते हैं। अवधिज्ञान-अवधि नाम मर्यादा का है । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावकी मर्यादा लिये हुए पुद्गलों को या पुद्गल सहित अशुद्ध जीवों का वर्णन जानना इस ज्ञान का काम है। द्रव्य से मतलब है कि मोटे पदार्थ को जाने कि सूक्ष्म को जाने, क्षेत्र से मतलब है कि कितनी दूर तक की जाने, एक कोस की या १०० या १००० या १०००० आदि कोस तककी जाने । काल से मतलब है कि कितने समय आगे व पीछे की जाने । १० वर्ष, १०० वर्ष एक भव या अनेक भव को आगे पीछे । भाव से मतलब अवस्था विशेष या स्वभाव विशेष से है । अवधिज्ञान के बहुत से भेद हो सकते हैं, जिसको जितना अवधिज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम होता है उतना कम या अधिक अवधिज्ञान होता है । इस ज्ञान के होने में मन व इद्रियों की जरूरत नहीं है । आत्मा स्वय ही जानता है । देव तथा नारकियों को तो जन्म से ही होता है। पशुओं को व मानवों को सम्यक्त के व तैपके प्रभाव से होता है। यह एक प्रकार की ऐसी विशेष शक्ति का प्रकाश है जिससे अवधिज्ञानी किसी मानव को देखकर विचारता हुआ उसके पूर्व जन्म व आगामी जन्म की घटनाओं को जान सकता है। योगी तपस्वी ऐमा अधिक अवधिज्ञान पा सकते हैं कि सैकडों जन्म पूर्व व आगे की बातें जान लेवें । ज्ञान की जितनी निर्मलता होती है उतना ही उसका अधिक प्रकाश होता है । मनःपययज्ञान-दूमरों के मनमें पुद्गल व अशुद्ध जीवों के सम्बन्ध में क्या विचार चल रहा है व विचार चुका है व विचार होवेगा उम मर्व को जो कोई आत्मा के द्वारा जान सके वह मनःपर्ययज्ञान है, यह ज्ञान बहुत सूक्ष्म बातों को जान सकता है । जिनको अवधिजानो भी न जान सके इसलिये यह ज्ञान अवधि- ज्ञान से अधिक निर्मल है । यह ज्ञान ध्यानी तपस्वी योगियों के ही होता है-सम्यग्दृष्टी महात्माओं के ही होता है । मन.पर्यय ज्ञानावरण कर्म के कम व अधिक क्षयोपशम के अनुसार किसी को कम या किसी को ho । अधिक होता है। केवलज्ञान-सर्व ज्ञानावरण कर्म के क्षय होने से अनन्तज्ञान का प्रकाश होना केवलज्ञान है। यही स्वाभाविक पूर्ण ज्ञान है, जो परमात्मा अरहत तथा सिद्ध मे सदा व्यक्ति रूप से चमकता रहता है । ससारी जीवों में शक्ति रूप से रहता है उमपर ज्ञानावरण का पर्दा पड़ा रहता है । जब शुक्ल ध्यान के प्रभाव से सर्व ज्ञानावरण कर्म का क्षय हो जाता है तब ही यह ज्ञान तेरहवे गुणस्थान में सयोग केवली जिनको प्रगट होता है । एक दफे प्रकाश होनपर फिर वह मलीन नहीं होना है, सदा ही शुद्ध स्वभाव में प्रगट रहता है। पाच ज्ञानों में मति, श्रुति परोक्ष हैं क्योकि इन्द्रिय व मन से होते हैं परन्तु तीन ज्ञान प्रत्यक्ष हैं-अात्मा से ही होते हैं। १ श्रु तज्ञान ही केवलज्ञान का कारण है - इन चार ज्ञानों मे श्रुतडान ही ऐसा ज्ञान है जिससे शास्त्र ज्ञान होकर आत्मा का,भेदविज्ञान होता है कि यह आत्मा भावकर्म रागादि, द्रव्यकर्म ज्ञानावरणादि व नौकर्म शरीरादि से भिन्न है, सिद्धसम शुद्ध है । जिसको आत्मानुभव हो जाता है वही भाव श्रु तज्ञान को पा लेता है। यही आत्मानुभव ही केवलज्ञान को प्रकाश कर देता है । किसी योगी को अवधिज्ञान व मन.पर्ययज्ञान ।
०८०] सम्यग्ज्ञान और उसका महात्म्य । है एक अंश नहीं भी हो तो भी श्रुतज्ञान के बल से केवलज्ञान हो सकता है । अवधि मनःपर्ययज्ञान का विषय ही शुद्धा- स्मा नहीं है, ये तो रूपी पदार्थ को ही जानते है जब कि श्रु तज्ञान अरूपी पदार्थों को भी जान सकता है इसलिये श्रुतज्ञान प्रधान है। हम लोगों को उचित है कि हम शास्त्रज्ञान का विशेष अभ्यास करते रहें जिससे आत्मानुभव मिले । यही सहज सुखका साधन है व यही केवलज्ञानका प्रकाशक है। चार दर्शनोपयोग-पहले हम बता चुके है कि जीव के पहिचानने के आठ ज्ञान घ चार दर्शन साधन हैं । दर्शन और ज्ञान में यह अन्तर है कि ज्ञान साकार है, दर्शन निराकार है । दर्शन में पदार्थ का बोध नहीं होता है । जब बोध होने लगता है तब उसे ज्ञान कहते है । जिम समय आत्मा का उपयोग किसी पदार्थ के जानने की तैयारी करता है तब ही दर्शन होता है, उसके पीछे जो कुछ ग्रहण में आता है वह ज्ञान है । कर्ण में शब्द आते ही जब उपयोग उधर गया और शब्द को जाना नहीं तब दर्शन है। जब जान लिया कि शब्द है तब ज्ञान कहा जाता है । अल्पज्ञानियों के दर्शन पूर्वक मतिज्ञान होता है, मतिज्ञान पूर्वक श्रु तज्ञान होता है । सम्यग्दृष्टी महात्माओं को अवधि दर्शन पूर्वक अवधिज्ञान होता है । केवलज्ञानी को केवलदर्शन, केवलज्ञान के साथ २ होता है । चक्षु इन्द्रिय द्वारा जो दर्शन हो वह चक्षुदर्शन है । जैसे आंख ने घडी को जाना यह मतिज्ञान है । इसी तरह चक्षु इन्द्रिय के सिवाय चार इन्द्रिय और मन से जो दर्शन होता है वह अचक्षुदर्शन है । अवधिदर्शन सम्यक्ती ज्ञानियों को प्रात्मा से होता है। केवलदर्शन सर्वदर्शी है, वह दर्शनावरण कर्म के सर्वथा क्षय से प्रगट होता है। निश्चय और व्यवहार नय प्रमाण जव वस्तु को साग ग्रहण करता तब नय वस्तु को ग्रहण करता है व बताता है । पहले कहे गये पाचों ज्ञान प्रमाण हैं व तीन कुज्ञान प्रमाणाभास है । जैसे कोई मानव व्यापारी है और मजिस्ट्रेट भी है, प्रमाणज्ञान दोनों बातों को एक साथ जानता है । नय की अपेक्षा किसी समय वह व्यापारी कहा जायगा तब मजिस्ट्रेटपना गौण रहेगा व कभी मजिस्ट्रेट कहा जायगा तव व्यापारी गौण रहेगा । अध्यात्म शास्त्रों में निश्चयनय और व्यवहाग्नय का उपयोग बहुत मिलता है। स्वाश्रयः निश्चयः पराश्रय' व्यवहार. जो नय एक ही वस्तु को उसी को पर की अपेक्षा बिना वर्णन करे वह निश्चयनय है । जो किसी वस्तु को परकी अपेक्षा से और का और कहे वह व्यवहारनय है । एक खडग सोने की म्यान के भीतर है, उसमे खड़ग को खड़ग और भ्यान को म्यान कहना निश्चयनय का काम है । तथा सोने की खड़ग कहना व्यवहार नय का काम है । लोक मे ऐमा व्यवहार चलता है कि परके मयोग से उस वस्तु को अनेक तरह मे कहा जाता है। जैसे दो खडग रक्खी हैं, एक चादी के म्यान में है और एक सोने की म्यान में है। किसी को इनमे से एक ही खड़ग चाहिये थी, वह इतना लम्बा वाक्य नहीं कहता है कि मोने की म्यान में रक्खी हुई खडग लाओ, किन्तु छोटा वाक्य कह देता है कि मोने की खडग लाओ। तब यह वचन व्यवहार मे असत्य नहीं है, किन्तु निश्चय से असत्य है, क्यों कि वह भ्रम पैदा कर सकता है कि खडग सोने की है जबकि स्वांग मोने की नहीं है। इसी तरह हमारी आत्मा मनुष्य आयु व गति के उदय मनुष्य के शरीर में है, आत्मा भिन्न है । तैजस कार्माण और औदारिक शरीर भिन्न हैं । निश्चयनय से श्रात्मा को आत्मा ही कहा जायगा। व्यवहारनय से श्रात्मा को मनुष्य कहने का लोक व्यवहार है क्योंकि मनुष्य शरीर मे बह विद्यमान है। श्रात्मा को मनुष्य कहना व्यवहार मे सत्य है तो भी निश्चय नय से अमत्य है, क्योंकि आत्मा मनुष्य नहीं है, उमया कर्म मनुप्य देह - । . से है . उसका मनुष्य है सहज-सुख-साधन । [२८१ निश्चयनय को भूतार्थ, सत्यार्थ, यथार्थ, वास्तविक, असल मूल कहते हैं। व्यवहारनय को असत्यार्थ, अभूतार्थ, अयथार्थ, अवास्तविक कहते हैं। ससारी आत्मा को समझने के लिये व पर के सयोग में प्राप्त किसी भी वस्तु को समझने के लिये दोनों नयों की आवश्यकता पड़ती है । कपडा मलीन है उसको शुद्ध करने के लिये दोनों नयों के ज्ञान की जरूरत है। निश्चयनय से कपडा उज्ववल है, रुई का बना है, व्यवहारनय से मैला कहाता है, क्योकि मैल का सयोग है। यदि एक ही नय या अपेक्षा को समझे तो कपड़ा कभी स्वच्छ नहीं हो सकता है । यदि ऐसा मानलें कि कपडा सर्वथा शुद्ध ही है तब भी वह शुद्ध नहीं किया जायगा । यदि मानलें कि मैला ही है तब भी वह शुद्ध नहीं किया जायगा । शुद्ध तब ही किया जायगा जब यह माना जायगा कि असल में मूल में तो यह शुद्ध है परन्तु मैल के सयोग से वर्तमान में इसका स्वरूप मैला हो रहा है । मैल पर है छुड़ाया जा सकता है ऐसा निश्चय होने पर ही कपड़ा साफ किया जायगा । इसी तरह निश्चयनय कहता है कि आत्मा शुद्ध है। व्यवहारनय कहता है कि आत्मा अशुद्ध है, कर्मों से वद्ध है-दोनों बातों को जानने पर ही कमी को काटने का पुरुषार्थ किया जायगा । निश्चयनय के भी दो भेद अध्यात्म शास्त्रो मे लिये गये हैं- एक शुद्ध निश्चयनय, दूसरा अशुद्ध निश्चयनय । जिसका लक्ष्य केवल शुद्ध गुण पर्याय व द्रव्य पर हो वह शुद्ध निश्चयनय है व जिसका लक्ष्य उसी एक द्रव्य के अशुद्व द्रव्य, गुण पर्याय पर हो वह अशुद्ध निश्चय है जैसे जीव सिद्धसम शुद्ध है यह वाक्य शुद्व निश्चयनय से कहा जाता है। यह जीव रागी द्वेषी है यह वाक्य अशुद्ध निश्चयनय से कहा जाता है । राग द्वेप जीव के ही नैमित्तिक व औपाधिक भाव हैं। उन भावों में मोहनीय कर्म का सयोग पा रहा है इसलिये वे भाव शुद्व नहीं हैं, अशुद्व भाव हैं । इन अशुद्ध भावों को आत्मा के भाव कहना अशुद्ध निश्चयनय से ठीक है, जबकि शुद्व निश्चयनय से ठीक नहीं है। ये दोनो नय एक ही द्रव्य पर लक्ष्य रग्वते है। व्यवहारनय के कई भेद है- अनुपचरित अमद्भूत व्यवहारनय । यह वह नय है कि पर वस्तु का किसी से सयोग होते हुए ही पर को उमका कहना । जैसे यह घी का घडा है । इसमें घी का सयोग है इमलिये घडे को घी का घडा कहते हैं । यह जीव पापी है, पुण्यात्मा है । यह जीव मानव है, पशु है । यह गोरा है, यह काला है। ये मब वाक्य इस नय से ठीक है, क्योंकि कार्माण व प्रोदारिक शरीर का सयोग है इसलिये अनुपचरित हैं परन्तु है आत्मा के मल स्वरूप से भिन्न इमलिये असद्भत त है । बिल्कुल भिन्न वस्तु को किमी की कहना उपचरित असद्भूत व्यवहारनय है । जैसे यह दूकान रामलाल की है, यह टोपी बालक की है, यह स्त्री रामलाल की है, यह गाय फतहचन्द की है, यह कपडे मेरे हैं, यह अाभूपण मेरे हैं, यह देश मेरा है। निश्चयनय का विपय जय वस्तु को अभेद रूप से अम्बन्ड म्प मे ग्रहण करना है तब उनी को खण्डरूप से ग्रहण करना सदभूत व्यवहारनय का विषय है ! ऐमा भी शास्त्रो मे विवेचन है । जैसे आत्मा को अभेद एक ज्ञायक मात्र ग्रहण करना निश्चयनय का अभिप्राय है तब अात्मा को चारित्ररूप इस तरह गुण व गुणी भेद करके कहना मद्भूत व्यवहारनय का विषय है। कहीं कहीं इस सद्भुत व्यवहार को भी निश्चयनय में गर्भित करके कथन किया गया है क्योकि यह मद्भुत व्यवहार भी एक ही द्रव्य की तरफ भेदरूप से लक्ष्य रखता है, परकी तरफ लक्ष्य नहीं है । जहा पर की तरफ लक्ष्य करके परका कथन है वह असद्भत व्यवहारनय है या सामान्य मे ही व्यवहाग्नय है । दर्शनस्प, ज्ञानरूप, २८२] गायन ir का महाय। -- द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक नय-जो नय या अपेक्षा कवन, द्रव्य को मय में लेकर वस्तु को कह यह द्रव्यार्थिक है। जो द्रव्य की किमी पर्याय काय गे लेकर गया पर्यायाधिक है। जैसे द्रव्याथिकनय से हरएक प्रात्मा समानरूप में मा, निज बम्प में है। पर्यायानिकलय में प्रारमा मि. समारी है, पशु है, मानव है, नक्ष है, इत्या । र, यागा नियन्यानिन वाक्य है । यह प्रात्मा ममारी अनित्य है, यह पर्यायाधिक नय का वापर : गोकनगमभी नाश ना होना, पाय बाण में चलती है। नंगमादि सतनय-जगन में पेशावान नही माना है। भिन्न भिन्न अपेक्षा में वास्य गत्य मान जात । अपेक्षा आधी या नको मनानक नये सिरे लोक गे व्यवहार होना है, जैन मिलात में मान नग मिनाम, माSIR, मानमत्र, गट, मर्माभन्द, भन । इनमें पहले तीन नय यायिक नगमित नही दग पर मनी रे, र पार नय पर्यायार्थिक में गभित है क्योंकि उनकी पर्याय पर ही मानी नाका तीन नयोती श्री गट पर रहती है, इमलिये वे समान है। नारी पत्र पर गा पा से गली ममे वे अर्थनय है। 3 नैगमनय-जिगमे नाम किया जाने नगमानय । न रान 711 को वर्तमान में मान्य करना यह भृतनंगमनग है । जय कार्तिक मुली १ को ना आन न मानमानी का निर्माण दिवम है। भावी नगमनय भविष्य की बात को मानना जमे-अप.या में विगजिन किमी रेवली को गिद् काना । ननमान नंगमनग ना जो वर्तमान की अगवान को पी को जैम- कोई लकडी काट रहा है, उससे शिमी ने गदा या करो' मने ITI iral: नना चोरि उममा उदय लकडी काटने में रिवाती बनाने । मंग्रहनय-जोक नानि के वन में दगी से माय बनाये बा मंग्रहनय है । जैसे कहना कि मन द्रव्य का लक्षण है । यह वापय सर्व द्रव्यागमन बनाता है। जाय का उपयोग लनण है यह वाक्य सब जीवो का लक्षण उपयोग सिद्ध करना है व्यवहारनय-जिम अपेक्षा से समानय से ग्रहीत पदार्थों का भेद करते चले जाव नह व्यवहारनय है। जैसे कहना कि द्रव्य छ. हैं जीव नमारी और सिद्ध है। ममाग स्थावर व नम है स्थावर पृथ्वी आदि पाच प्रकार के है इत्यादि। ऋजूस नय-जो सूक्ष्म तथा स्थूल पर्याय मात्र को जो वर्तमान में है 5मी को ग्रहण करे वह ऋजुसूत्र नय है। जैसे स्त्री को स्त्री, पुरुप को पुरुप, श्वान को श्वान, अश्व को क्रोध पर्याय सहित को क्रोधी दया भाव महित को दयावान कहना। अश्व, - शब्द नय-व्याकरण व माहित्य के नियमो की अपेक्षा से शब्दो को व्यवहार करना शब्दनय है। उसमें लिंग,वचन, कारक काल आदि का दोप झलकता हो तोभी उसे नहीं गिनना सो शब्द नय है । जैसे स्त्री को दारा, भार्या, कलत्र कहते हैं । यहा दारा शब्द पुल्लिग है, कलत्र नपु मक लिग है तो भी ठीक है । कोई महान पुरुप आरहा है उसे प्रतिष्टावाचक शब्द मे कहते हैं-वे आरहे है । यह वाक्य यद्यपि बहु । सस्कृत मे - सहज-सुख-साधन। [२८३ वचन का प्रयोग एक वचन मे है तथापि शब्दनय से ठीक है। कहीं की कथा का वर्णन करते हुए भूत काल में वर्तमान का प्रयोग कर देते है जैसे सेना लड रही हैं, तोपे चल रही हैं रुधिर की धारा बह रही हैं, मृतकों के मुण्ड लौट रहे हैं, ये सब वाक्य भूतकाल के वर्तमान काल में प्रयोग करना शब्दनय से ठीक है । शब्द नय में शब्दो पर ही दृष्टि है कि शब्द भाषा साहित्य के अनुसार व्यवहार किया जावे । समभिरूढ नय-एक शब्द के अनेक अर्थ प्रसिद्ध हैं। उनमें से एक अर्थ को लेकर किसी के लिये व्यवहार करना समभिरूढ नय है । जैसे गो शब्द के अर्थ, नक्षत्र, आकाश, बिजली, पृथ्वी, वाणी आदि हैं, तो भी गाय के लिये भी व्यवहार करना समभिरूढ नय से ठीक है । यद्यपि गो शब्द के अर्थ जानेवाले के हैं । तथापि सोई, बैठी हरएक दशा में गाय पशु को गो कहना समभिरूढ नय से ठीक है या एक पदार्थ के अनेक शब्द नियत करना, चाहे उनके अर्थों में भेद हो, यह भी समभिरूढ नय से है । जैसे स्त्री को स्त्री, अबला, नारी आदि कहना । अथवा इन्द्र को शक, पुरन्दर, इन्द्र सहस्राक्षी आदि कहना। यहां इन शब्दों के भिन्न २ अर्थ हैं तो भी एक व्यक्ति के लिये व्यवहार करना समभिरूढ नय से ठीक है । एचभत - जिस शब्द का जो वास्तविक अर्थ हो उसी सामान किया करते हुए को उसी शब्द से व्यव- हार करना एवभूतनय है । जैसे वैद्यक करते हुए वैद्य को वैद्य कहना, दुर्वल स्त्री को ही अबला कहना, पूजन करते को पुजारी कहना, राज्य करते हुए न्याय करते हुए को राजा कहना। लोक व्यवहार इन नयों की बडी उपयोगिता है। । में स्याद्वादनय या सप्तभगवाणी-पढार्थ मे अनेक स्वभाव रहते है जो साधारण रूप से विचारने में विरोधरूप भासते हैं परन्तु वे सब भिन्न २ अपेक्षा से पदार्थ में पदार्थ रूप से पाए जाते है उनको समझाने का उपाय स्याद्वाद या सप्तभग है। हरएक पदार्थ में अस्ति या भावपना, नास्नि या अभावपना ये दो विरोधी स्वभाव हैं । नित्यपना तथा अनित्यपना ये भी दो विरोवी स्वभाव है। एकपना और अनेकपना ये भी दो विरोधी स्वभाव हैं । एक ही समय में एक ही स्वमाव को वचन द्वारा कहा जाता है तब दूसरा स्वभाव यद्यपि कहा नहीं जाता है। तो भी पदार्थ मे रहता अवश्य है, इसी बात को जताने के लिये स्याद्वाद है । स्यात अथवा कथचित् अर्थात किमी अपेक्षा से वाद अर्थात कहना मो स्याद्वाद है । जैसे एक पुरुप पिता भी है पुत्र भी है उसको जव किमी को समझायेगे तब कहेंगे कि स्यात पिता अस्ति । किमी अपेक्षा से (अपने पुत्र की अपेक्षा से) पिता है । यहा स्यात् शब्द बताता है कि वह कुछ और भी है । फिर कहेंगे स्यान पुत्र. अस्ति-किसी अपेक्षा से (अपने पिता की अपेक्षा से) पुत्र है । वह पुरुप पिता व पुत्र दोनो है ऐमा दृढ करने के लिये तीमरा भग कहा जाता है ' स्यात् पिना पुत्रश्च किसी अपेक्षा मे यदि दोनो को विचार करतो वह पिता भी है। पुत्र भी है। वह पिता व पुत्र तो ही समयमें है परन्तु शब्दों मे यह शक्ति नहीं है कि दोनों स्वभावोंको एक साथ कहा जा सके । अतएव कहते हैं चौथा भग-स्यात अवक्तव्यं । किसी अपेक्षा से यह वस्तु अवक्तव्य है, कथन गोचर नहीं है । यद्यपि यह पिता व पुत्र दोनो एक समय मे है, परन्तु कहा नहीं जा सकता । माया अवक्तव्य नहीं है इसी बात को बढ करने . । , एक ।
२८४] सम्यग्ज्ञान और उसका महात्म्य । के लिये शेष तीन भंग है। स्यात पिता अवक्तव्यं च । किसी अपेक्षा से प्रवक्तव्य होनेपर भी पिता है, स्यात पुत्रः श्रवक्तव्य च । किसी अपेक्षा अवक्तव्य होने पर भी पुत्र है । स्यात् पिता पुत्रश्च श्रवक्तव्य च किसी अपेक्षा अवक्तव्य होनेपर भी पिता व पुत्र दोनों है । इस तरह दो विरोधी स्वभावों को समझाने के लिये सात भग शिष्यो को दृढ ज्ञान कराने के हेतु किये जाते हैं। वास्तव में उम पुरुष में तीन स्वभाव हैं- पिता बना, पुत्र बना, घ अवक्तव्य बना । इसी के सात भग ही हो सकते हैं न छः न आठ । जैसे १ पिता, २ पुत्र, ३ पिता पुत्र, ४ अवक्तव्य, ५ पिता अवक्तव्य, ६ पुत्र अवक्तव्य, ७ पिता पुत्र श्रवक्तव्य । यदि किसी को सफेद, काला, पीला तीन रग दिये जावें और कहा जावे कि इसके भिन्न २ रग बनाओ तो वह नीचे प्रमाण सात ही बना देगा। १ सफेद, २ काला, ३ पीला, ४ मफेद काला, ५ सफेद पीला, ६ काला पीला, ७ सफेद पीला । इससे कम व अधिक नहीं बन सकते हैं। ६ आत्मा के स्वभाव को समझने के लिये इम स्याद्वाद की बडी जरूरत है। आत्मा में अस्तित्व या भावपना अपने अखड द्रव्य, अपने असख्यात प्रदेश रूप क्षेत्र, अपनी स्वाभाविक पर्याय रूप काल व अपने शुद्ध ज्ञानानन्द मय भाव की अपेक्षा है उसी समय इस अपने प्रात्मा में सम्पूर्ण अन्य प्रात्माओं के, सर्व पुद्गलों के, धर्म, अधर्म, आकाश व काल के द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भाव का नास्तिपना या अभाव भी है। अस्तित्व के साथ नास्तित्व न हो तो यह आत्मा है । यह भी श्री महावीर स्वामी का आत्मा है अन्य नहीं है यह बोध ही न हो । आत्मा में आत्मापना तो है परन्तु आत्मा में माव कम रागादि, द्रव्य कर्म ज्ञाना- वरणादि, नोकर्म शरीरादि इनका तथा अन्य सर्व द्रव्यों का नास्तित्व है या अभाव है ऐमा जाननेपर आत्मा का भेदविज्ञान होगा, आत्मानुभव हो सकेगा। इसीको सात तरह से कहेंगे- १-स्यात् अस्ति आत्मा, २ स्यात् नास्ति आत्मा, ३ स्यात् अस्ति नास्ति आत्मा, ४ स्यात् अवक्तव्य, ५ स्यात् अस्ति आत्मा अवक्तव्य च, ६ स्यात् नास्ति आत्मा अवक्तव्य च, ७ स्यात् अस्ति नास्ति अात्मा अवक्तव्य च । इसी तरह यह आत्मा अपने द्रव्य व स्वभाव की अपेक्षा ध्रुव है नित्य है तब ही पर्याय की अपेक्षा अनित्य है । इस तरह एक ही समय मे आत्मा में नित्यपना तथा अनित्यपना दोनों स्वभाव हैं इसी को सात भगों द्वारा समझाया जा सकता है। १ स्यात नित्यं, २ स्यात् अनित्य, ३ म्यात् नित्य अनित्य, ४ स्यात अवक्तव्यं, ५ स्यात नित्य अवक्तव्य च, ६ स्यात अनित्य अवक्तव्य च, ७ स्यात नित्य अनित्य अवक्तव्य च । इसी तरह आत्मा अनत गुणों का अभेद पिंड है, इसलिये एक रूप है। वही आत्मा उमी समय ज्ञान गुण की अपेक्षा ज्ञानरूप है, सम्यक्त गुण की अपेक्षा सम्यक्त रूप है, चारत्र गुण की अपेक्षा चारित्र । रूप है , वीर्यगुणकी अपेक्षा वीर्यरूप है । जितने गुण अात्मा में है वे सर्व आत्मामें व्यापक हैं । इसलिये उनकी अपेक्षा आत्मा अनेक रुप है। इसीके सप्तभग इस इस तरह करेंगे-स्यात् एक स्यात अनेकः स्यात् एक: अनेकश्व, स्यात अवक्तव्य, स्यात एक. अवक्तव्य च, स्यात अनेकः अवक्तव्यं चः स्मात् एकाः अनेक प्रवक्तव्य च।
सहज-सुख-साधन। [२८५ यह ससारी आत्मा स्वभाव की अपेक्षा शुद्ध, है उसी समय कर्म सयोग की अपेक्षा अशुद्ध है। इसके भी सात भग बनेंगे । स्याव शुद्धः, स्यात् अशुद्धः, स्यात् शुद्ध अशुद्धः, स्याव अवक्तव्य, स्यात् शुद्ध अवक्तव्यं च, स्याव अशुद्ध अवक्तव्य च, स्यात् शुद्ध अशुद्ध अवक्तव्यं च । स्याद्वाद के बिना किसी पदार्थ के अनेक स्वभावों का ज्ञान अज्ञानी शिष्यको न होगा । इसलिये यह बहुत आवश्यक सिद्धात है, आत्मा के भेद विज्ञान के लिये तो बहुत ही जरूरी है । तथा यह स्याद्वाद का सिद्धांत अनेक एकान्त मत के धारी दृढ करनेवालों को उनका एकान्त हठ छुड़ाकर उनमें प्रेम व ऐक्य स्थापन करने भी साधन है। का . , . जैसे दूरमे किसी का मकान पाच आदमियों को दिखाई दिया, वह मकान भिन्न भिन्न स्थानों पर पाच तरह के रंगों से रंगा है। जिसकी दृष्टि सफेदी पर पडी वह कहता है (मकान सफेद है), जिसकी दृष्टि लाल रग पर पडी वह कहता है, मकान लाल है, जिसकी दृषि पीले रग पर पडी यह कहता है, मकान पीला है, जिसकी दृष्टि नीले रग पर पडी वह कहता है, मकान नीला है, जिसकी दृष्टि काले रग पर पड़ी वह कहता है, मकान काला है। इस तरह आपस में झगडते थे, तब एक समझदार ने कहा कि क्यों झगडते हो, तुम मब एकाश से मच्चे हो परन्तु पूर्ण सत्य नहीं हो । यह मकान पांच रग का है, ऐसा तुम समझो। जव पाचों ने यह बात समझली तब उन सब का एकात हट गया तब सबको बडा आनन्म हुआ । इसी तरह अनेकान्त मय-अनेक स्वभाववाले पदार्थ को अनेक स्वभाववाला बताने को स्याद्वाद दर्पण के समान है व परस्पर विरोध मेटने को एक अटल न्यायाधीश के समान है । सहज सुख साधन के लिये तो बहुत ही उपयोगी है । कल्पित इन्द्रिय सुम्ब को त्यागने योग्य व अतीन्द्रिय सुख को ग्रहण योग्य बतानेवाला है। किमी सशय सम्यग्ज्ञान का फल-निश्चयन्य से आत्मा को आत्मारूप ही जानना सम्यग्ज्ञान है। जैसे सूर्य पर मेघों के आजाने से प्रकाश अत्यल्प प्रगट है तो भी समझदार जानता है कि सूर्य का प्रकाश उतना ही नहीं है, वह तो दोपहर के समय मेघ रहित जैसा पूर्ण प्रकाशमान रहता है वैसा ही है मेघों के कारण कम प्रकाश है । सूर्य का स्वभाव ऐमा नहीं है। ऐसा जो सूर्य के असली प्रकाश को-पूर्ण प्रकाश को भले प्रकार विना के जानता है वही सम्यग्ज्ञानी है, इमो तरह अपने आत्मा पर ज्ञानावरणादि की मेघ होने पर ज्ञान का प्रकाश कम व मलीन हो रहा है। रागी द्वेषी अज्ञानमय हो रहा है तो भी यह आत्मा वास्तव में सर्वज्ञ वीतराग है, पूर्ण ज्ञानानद है ऐमा जो सशय रहित, विपरीतता रहित, अनध्यवसाय (आलस्य) रहित जानता है वही मम्यग्ज्ञानी है । आत्मा द्रव्य चाहे वह वृक्ष मे हो चाहे वह कीट मे, पतग मे, श्वान मे, अश्व मे, मानव मे, नीच मे ऊच में राजा में, रक मे, निरोगी में, रोगी मे, कुरूप में, सुरूप में, वृद्ध मे, बाल मे, युवा मे, किसी भी सजीव प्राणी में हो, सबका आत्मा एक समान शुद्ध ज्ञान, दर्शन, वोर्य, सुख आदि गुणों का धारी, भावकर्म आगादि, द्रव्यकर्म ज्ञानावरणादि, नौ कर्न शरीरादि रहित परमात्मा के समान है । ऐमा पर्याय ज्ञान ही सम्य- ज्ञान है । रुई के (१००) सौ वस्त्र सौ प्रकार के रगों से रगे हुए रक्खे है । जो उन सबको एक रूप सफेद रुई के वस्त्र देखता है और भिन्न २ रगों को उनसे भिन्न देखता है, वही ज्ञानी है । इसी तरह पुद्गल के मयोग से विचित्र रूप दिखनेवाले नाना प्रकार आत्माओं को जो एक समान शुद्व नानानन्दमय देवता है और पुद्गल को भिन्न देखता है वही सम्यग्ज्ञानी है । . , - - २८६] सम्यग्ज्ञान और उसका महाल्य । इस सम्यग्ज्ञान के प्रभाव से राग, द्वेप, मोह मिटता है, समताभाव जागृत होता है, आत्मा में रमण करने का उत्साह बढ़ता है, सहजसुख का साधन बन जाता है, स्वानुभव जागृत हो जाता है, जिसके प्रताप से सुख शांति का लाभ होता है । आत्मवल बढ़ता है, कर्म का मैल कटता है, परम धैर्य प्रकाशित होता है, यह जीवन परम सुन्दर सुवर्णमय हो जाता है । अतएव हरएक स्वहित वाचक को जिनेन्द्र प्रणीत परमागम के अभ्यास से आत्मज्ञान रूप निश्चय सम्यग्जान का लाभ लेकर मदा सुखी रहना चाहिये। आगे सम्यग्ज्ञान के महात्म्य व स्वरूप के सम्बन्ध में जैनाचार्यों के वाक्यो को पाठकगण मनन करके आनन्द उठाचें--- (१) श्री कुन्दकुन्दाचार्य प्रवचनसारमें कहते हैं- परिणमदो खलु णाणं, पच्चक्खा मव्यपज्वाया । सोणेव ते विजाणदि प्रोग्यहपुब्बाहि किरियाहि ।। २१-१ ।। भावार्थ-केवल ज्ञान मे परिणमन करते हुए सर्वज्ञ वीतराग अरहत परमात्माको मर्व द्रव्य तथा उनकी सर्व पर्याय प्रत्यक्ष रूपसे प्रगट हो जाती हैं जैसे-स्फटिक मणिके अन्दर तथा वाहर में प्रगट पदार्थ दीखते हैं उसी तरह भगवान को सब प्रत्यक्ष है। वे भगवान उन द्रव्य व पर्यायों को अवग्रह ईहा आदि मतिज्ञान द्वारा परकी सहायता से व क्रम पूर्वक नहीं जानते हैं, एक समय मे सबको जानते हैं। णत्थि परोक्ख किंचिवि. समंत सव्यक्खगुणममिद्धस्म अक्खातीदस्स सदा, सयमेव हि णाणजादस्स ॥ २२-१ ॥ भावार्थ-उन केवली भगवान के कोई भी पदार्थ परोक्ष नहीं है। एक ही समय मा द्रव्य,क्षेत्र काळ भावों को प्रत्यक्ष जानते है व भगवान इद्रियो से अतीत हैं, इन्द्रियासे नहीं जानते हैं । सर्व इन्द्रियों के विषयो को कम से क्रम जाना जाता है, उसको वे एकदम सब जानते हैं तथा यह ज्ञान स्वय ही केवली का प्रकाशित है। यह स्वाभाविक है, परजन्य नहीं है । णाणं अप्पत्ति मदं, चट्टदि णाणं विणा ण अप्पाणं । तम्हा णाणं अप्पा, अप्पा णाणं व अण्ण वा ॥ २८-१ ।। भावार्थ- ज्ञान गुण आत्मा ही रूप कहा गया है । प्रात्मा को छोडकर ज्ञान गुण और कहीं नहीं रहता है इसलिये ज्ञान गुण जीवरूप है और जीव ज्ञान स्वरूप है तो भी गुण गुणी के भेद की अपेक्षा से नामादि भेद से ज्ञान अन्य है आत्मा अन्य है परन्तु प्रदेश भेद नहीं है । जहा आत्मा है वहीं ज्ञान साग व्यापक है। पाणी णाणसहावो अत्था णेयापमा हि णाणिस्स । रूवाणि व चक्खूणं, णेवएणोरणेसु वट्ट ति ॥ २६-१ ॥ भावार्थ-ज्ञानी आत्मा ज्ञान स्वभाव को रखनेवाला है। तथा सर्व पदार्थ उस ज्ञानी द्वारा ज्ञेयरूम है, जानने योग्य है । यह जानी ज्ञेयों को इसी तरह जानते हैं जिस तरह आखरूपी पदार्थों को जानती है। , सहज-सुख-साधन । [२८७ श्राख पदार्थों में नहीं जाती पदार्थ आंख में नहीं प्रवेश करते हैं उसी तरह केवलज्ञानी का ज्ञान ज्ञेय पदार्थों में नहीं जाता और ज्ञेय पदार्थ ज्ञान में आकर प्रवेश नहीं कर जाते हैं । आत्मा अपने स्थानपर है, पदार्थ अपने स्थान पर रहते हैं । ज्ञेय ज्ञायक सम्बन्ध से आत्मा का शुद्ध ज्ञान सर्व ज्ञेयों को जान लेता है। गेण्हदि णेव ण मुचदि, ण परं परिणमदि केवली भगवं । पेच्छदि समंतदो सो, जाणदि सव्वं णिरवसेसं ।। ३२.१ ।। भावार्थ-केवलज्ञानी सर्वज्ञ देव ज्ञेय रूप पर पदार्थों को न तो ग्रहण करते हैं न छोडते हैं और न उन रूप बदलकर होते हैं । वे भगवान सर्व पदार्थो को सांग पूर्ण रूप से मात्र देखते घ जानते हैं। किसी पर रागद्वेष नहीं करते हैं। जैसे आंख देखती मात्र है किसी को ग्रहण नहीं करती है और न कुछ त्यागती है । भगवान सर्वज्ञ वीतरागता पूर्वक सर्व को जानते देखते है। तक्कालिगेव सच्चे, सदसम्भदा हि पज्जया तासि । वट्टते ते णाणे, विसेसदो दव्यजादीणं ।। ३७-१ ।। भावार्थ-उन प्रसिद्ध जीवादि द्रव्य जातियों की वे सर्व विद्यमान तथा अविद्यमान पर्याय निश्चय से ज्ञान में भिन्न २ भेद लिये वर्तमान काल सम्बन्धी पर्यायों की तरह वर्तती हैं या झलकती हैं। जदि पच्चक्खमजादं, पज्जायं पलयिदं च णाणस्य । ण हदि वा तं णाण, दिव्वत्ति हि के परूविति ॥३१-१॥ भावार्थ-यदि केवलज्ञान के भीतर द्रव्यों को भावी पर्याय और भूतकाल की पर्यायें प्रत्यक्ष प्रगट न होवें उस ज्ञान को उत्कृष्ट या प्रशसनीय निश्चय से कौन कहता ? केवलज्ञान की यही अनुपम अद्भुत महिमा है जो त्रिकाल गौचर पर्यायें हस्त रेखावत् झलकती हैं। जं तकालियमिदरं, जाणदि जुगव समंतदो सव्यं । अत्थं विचित्तविसम, तं णाण खाडयं भणियं ॥ ४७-१ ॥ भावार्थ-केवलज्ञान को क्षायिक ज्ञान इसीलिये कहा है कि वहां कोई अज्ञान नहीं रहा तथा वह ज्ञान वर्तमान काल सम्बन्धी व भूत भावी काल सम्बन्धी सर्व पर्यायों को सर्वांग व अनेक प्रकार मूर्तीक व अमूर्तीक पदार्थों को एक ही समय में जानता है । कोई मी विपय केवलज्ञान से बाहर नहीं है । जो ण विजाणदि जुगव, अत्थे ते कालिके तिहुवणत्थे । णादु तत्म ण मक्कं सपज्जयं दचमेकं वा ।। ४८-१ ।। पुरुष तीन लोक में स्थित अतीत अनागत वर्तमान' इन तीन काल सम्बन्धी पढाथों को एक ही समय में नहीं जानता है उम पुरुप के अनन्त पर्यायों के साथ एक द्रव्यों को भी जानने की शक्ति नहीं हो सकती है । जो अपने आत्मा के द्रव्य गुण व अनन्त पर्यायो को जान सकता है वह ज्ञान सर्व द्रव्यों की भीअनन्त पर्यायों को जान सकता है । है 2 भावार्थ-जो - २८८] सम्यग्ज्ञान और उसका महात्म्य । (२) श्री कुन्दकुन्दाचार्य समयसार में कहते हैं:- णाणी रागप्पजहो सब्वदव्वेसु कम्ममझगदो। णो लिप्पदि कम्मरएण दु कदम मज्झे जहा कणयं ॥२२६॥ अण्णाणी पुण रत्तो सम्बदन्वेसु कम्ममझगदो। लिप्पदि कम्मरएण दु कद्दममज्मे जहा लोह ॥२३०॥ भावार्थ- सम्यग्ज्ञानी आत्मा कर्मवर्गणाओं के मध्य पडा हुआ भी शरीरादि सर्व पर द्रव्यों में राग, द्वेष, मोह नहीं करता हुआ उसी तरह कर्म रज से नहीं बधता है जिस तरह सुवर्ण कीचड़ मे पडा हुआ नहीं विगड़ता है-सोने में जंग नहीं लगती, परन्तु मिथ्या दृषि अज्ञानी की के मध्य पडा हुआ सर्व पर द्रव्यों में रागभाव करता हुआ कर्म रज से बंध जाता है जैसे लोहा कीचड़ में पडा हुआ बिगड़ जाता है। आत्म- ज्ञानकी बड़ी महिमा है वह अपने स्वभाव को ही अपना समझता है, इसको परमाणु मात्र भी ममत्र परभाव से नहीं है, सराग सम्यक्ती के यदि कुछ कर्म वध होता भी है बह रज ऊपर पडने के समान है जो शीघ्र झड़ जानेवाला है, अनंतानुबन्धी कषाय और मिथ्याल से ही भव भ्रमणकारी कर्मवध होता है, अन्य कृपायों से बहुत अल्प बध होता है जो बाधक नहीं है । णिव्वेदसमावण्णो णाणी कम्मफलं रियाणादि । महुरं कडुवं बहुविहमवेदको तेण पण्णत्तो ।।३३६।। भावार्थ-संसार शरीर भोगों से वैराग्य भाव रखने वाले महात्मा कमा के नाना प्रकार मीठे व कडवे फलको-साताकारी व असाताकारी उदय को जानता मात्र है। उनमें रजायमान नहीं होता है इमलिये वह अभोक्ता कहा गया है। णवि कुञ्चदि णवि वेददि णाणी कम्मई बहु पयाराइ । जाणदि पुण कम्मफल वध पुण्णं च पावं च ।। ३४० ।। भावार्थ-सम्यग्ज्ञानी महात्मा नाना प्रकार के कमी को तन्मय होकर नहीं करता है, न कों को बाधता है और न कमा के सुख दु.ख रूप फलको तन्मय होकर भोगता है, वह अपने ज्ञान से मात्र जानता है, यह कमी का फल हुआ, यह बंध है, यह पुण्य है, यह पाप है । कमों के उदय मे नाना प्रकार को मन, वचन काय की अवस्थाए होती हैं उन सबको बाता होकर जानता है। शरीर में रोग हुआ सो भी जानता है । शरीर ने भोजन किया यह भी जानता है । ज्ञानो केवल मात्र अपने ज्ञान भाव का कर्ता व भोक्ता है, परका कर्ता भोक्ता नहीं होता है । मन, वचन, कायका जो कुछ परिणमन होता है उसे कोदय का विकार जानकर ज्ञाना टष्टा नाक्षीभूत रहता है। दिट्ठी सयंपि णाण अकारय तह अवेदयं चेव । जाणदिय बंधोमोक्ख कुम्मुदय णिज्जरं चेव ॥३४१।। भावार्थ-जैसे श्राव की दृष्टि अग्नि को देखती मात्र है, न अग्नि को बनाती है न अग्नि का ताप भोगती है, वैसे ज्ञानी महात्मा न तो कमेंा को करते हैं न भोगते हैं, केवल मात्र बध, मोक्ष, कमी का अप शास्त्र सहज-सुख-साधन । [२८९ और कों की निर्जरा को जानते ही हैं । ज्ञानी मन, वचन, काय, आठ कर्म सबको भिन्न जानता है । उनकी जो कुछ भी अवस्थाए होती हैं उनको अपने आत्मा की नहीं जानता है, उनको परकी समज्ञकर उनमें रागी नहीं होता है, उदासीन भाव से जानता रहता है कि कर्म क्या क्या नाटक खेलते हैं- वह संसार नाटक को दृष्टा होकर देखता मात्र है, उनका स्वामी व कर्ता व भोक्ता नहीं बनता है। निश्चय से वह बिल्कुल अपना सम्बन्ध उनसे नहीं जोड़ता है । उसका आत्मरसिकपन उसे अलिप्त रखता है। सत्थं णाण ण हवादि जमा सत्थं ण याणदे किंचि । तमा अण्णं णाणं अण्ण सत्थं जिणा विति ॥४१२।। अज्झवसाण णाणं ण हवदि जमा अचेदणं णिच्चं । तमा अण्ण गाणं अज्झवसाण तहा अण्ण ॥४२४॥ जला जाणदि णिच्च तह्मा जीवो दु जाणगो णाणी । णाणं च जाणयादो जाणयादो अव्यदिरिनं मुणेयव्वं ॥४२५।। भावार्थ- जो पुद्गलमय ताडपत्र या कागज, स्याही आदि है या वाणीरूपी द्रव्यश्रुत है सो ज्ञान नही है, क्योंकि पुद्गल जडमई द्रव्य शास्त्र कुछ भी नहीं जानता है। इसलिये शास्त्र अन्य है व जानने वाला ज्ञान अन्य है ऐसा जिनेन्द्र कहते है। रागादि कलुप भावरूप अध्यवसान ज्ञान नहीं है क्यों कि वह कमी का उदयरूप विपाक सदा ही अचेतन है । इसलिये ज्ञान अन्य है और कनुपरूप अध्यवसान अन्य है । क्योकि यह नित्य ही जाननेवाला है इसलिये जीव ही नायक है । ज्ञान ज्ञानी से भिन्न नहीं है, उसी का स्वभाव है, ऐमा जानना योग्य है । (३) श्री कुन्दकुन्दाचार्य पचास्तिकाय में कहते हैं:- ण वियप्पदि णाणादो णाणी णाणाणि होति णेगाणि । तम्हा दु विस्सख्वं भणियं दवियत्ति णाणीहि ॥४३॥ भावार्थ-ज्ञान गुण से श्रात्मा ज्ञानी भिन्न नहीं है, नाना प्रकार जानने योग्य पदार्थों की अपेक्षा ज्ञान अनेक प्रकार है । ज्ञान विश्वरूप है सर्व को जानता है तब ज्ञानी द्रव्य भी विश्वरूप कहा गया है । जैसे ज्ञान सर्वव्यापक है वैसे ज्ञानी आत्मा भी ज्ञानकी अपेक्षा सर्वव्यापी है अर्थात् ज्ञान सर्व को जाननेवाला है । (४) श्री कुन्दकुन्दाचार्य बोधपाहुड में कहते हैं:- संजममंजुत्तस्म य सुझाणजोयाम मोक्खमग्गस्म । णाणेण लहदि लक्ख तम्हा णाण च णायव्यं ॥ २० ।। भावार्थ युक्त और ध्यान के योग्य जो मोक्ष का मार्ग है उसका लक्ष्य जो शुद्ध आत्मा का स्वरूप है सो सम्यग्ज्ञान से ही प्राप्त होता है इसलिये ज्ञान का स्वरूप जानना योग्य है । णाणं पुरिसस्म हवदि लहदि सुपुरिसो वि विणयसंजुत्तो। णाणेण लहदि लक्खं लक्खंतो मोक्खमग्गस्म ॥ २२ ॥ । . सयम से २९०] सम्यम्मान और उसका महात्म्य । सकता है भावार्थ ज्ञान का लाभ पुरुप को होता है परन्तु जो मानव विनय सहित है यही जान का प्रकाश कर । ज्ञान के ही मनन से मोक्ष के मार्ग को पहचानता हुया ध्यान का लक्ष्य जो शुद्ध आत्मा का स्वरूप उसको भले प्रकार समझ लेता है। (५) श्री कुन्दकुन्दाचार्य भावपाहुड में कहते हैं--- णित्थयरभागियत्थं गगाहरदेवेहिं गंथियं सम्म । भावहि अणुदिणु अतुलं विशुद्धभावेण मुयणाणं ।। ६२ ।। भावार्थ-हे मुने ! तृ रातदिन निर्मल भाव मे भक्ति पूर्वक शान्नम्पी श्रुतज्ञान का मनन कर, जो अनुपम है व जिसे मूल में तीर्थकरो ने कहा हे उमको जानकर गणधरों ने भन्ने प्रकार शान्त्र में ग था है। पाउण णाणसलिलं गिम्महतिस डाहमोमउम्मुक्का । हुँनि मिवालयवामी तिहबगाचूडामणि सिद्धा ॥ १३ ॥ भावार्थ- आत्मज्ञान रूपी जल को पीकर कठिनता से दूर होने योग्य तृष्णा को दाह व जलन को मिटा कर भव्यजीव सिद्ध हो जाते हैं और तीन लोक के शिखर पर मिद्धालय में अनन्तकाल वाम करते है। णाणमयविवलसीयलसलिलं पाऊगा भविय भावंग। वाहिजरमरणवेयणहाहविमुक्का मिवा होनि ॥ १२५ ॥ भावार्थ-भव्यजीव भाव सहित प्रात्मनानमर्द निर्मल शीतल जल को पीकर व्याधम्प मरण की वेदना की दाह को शमनकर सिद्ध हो जाते है। (६) श्री कुन्दकुन्दाचार्य मोक्षपाहुड में कहते है- मिद्धो सुद्धो श्रादा मन्चएह मलोयदरमी य । मो जिणवरेहि भणियो जाण तुमं केवलं गाणं ॥ ३५ ॥ भावार्थ- -यह आत्मा ही सिद्ध है, शुद्र है, सर्वज्ञ है. गर्वदर्शी है तथा यही केवलज्ञान स्वरूप है ऐसा जानो, ऐसा श्री जिनेन्द्र भगवान ने कहा है । उग्गतबेणण्णाणी जं क्म्म खयदि भवहि भहुएहि । तं णाणी तिहि गुत्तो खबेइ अन्तोमुहरेण ॥ ५३ ॥ भावार्थ-मिथ्याज्ञानी घोर तप करके जिन कर्मो को बहुन जन्मों में क्षय करता है उन कर्मो को आत्म- ज्ञानी सम्यग्दृष्टी मन, वचन, काय को रोक करके ध्यान के द्वारा एक अन्तमुहर्त मे क्षय कर डालता है। सुहजोएण सुभावं परदव्ये कुण्ड रागदो साहू । सो तेण हु अण्णाणी णाणी एत्तो हु विवरीओ ॥ ५४ ॥ भावार्थ -शुभ पदार्थों के सयोग होनेपर जो कोई साधु रागभाव से पर पदार्थ में प्रीतिभाव करता है वह अज्ञानी है। जो सम्यग्जानी है बह शुभ सयोग होनेपर भी राग नहीं करते हैं समभाव रखते हैं। .
सहज-सुख-साधन । [२९१ तवरहियं जं गाणं णाणविजुत्तो तबो वि अफयत्थो। तम्हा णाणतवेणं संजुत्तो लहइ णिवाणं ॥ ५ ॥ भावार्थ-तप तप रहित जो ज्ञान है व सम्यग्ज्ञान रहित जो तप है सो दोनों ही मोक्ष साधन में अकार्यकारी है इसलिये जो साधु सम्यग्जान सहित तप पालते हैं वे ही निर्वाण को पासकते हैं। ताम ण णज्जड अप्पा विसएसु णरो पवट्टए जाम । विसए विरत्तचित्तो जोई जाणेइ अप्पाणं ॥ ६६ ॥ भावार्थ-जब तक यह मनुष्य इद्रियों के विषयो मे आसक्त होकर प्रवर्तता है तब तक वह आत्मा को नहीं पहचान सकता है । जो योगी विपयों से विरक्त चित्त होते हैं वे ही आत्मा को जानकर अनुभव कर सकते हैं! जे पुण विसयविरत्ता अप्पा णाऊण भावणासहिया । छंडंति चाउरंगं तवगुणजुत्ता ण संदेहो ॥ ६८ ॥ भावार्थ-जो कोई साधु विषयों से विरक्त होकर आत्मा को जानकर उसकी बारबार भावना करते हैं और तप व मुलगुणों को पालते है वे चार गति रूप संसार से मुक्त हो जाते हैं । परमाणपमाणं वा परदव्वे रदि हवेदि मोहादो। सो मूढ़ो अण्णाणी आदसहावस्स विबरीश्रो ॥ ६६ ॥ भावार्थ-जो कोई मोह से परद्रव्यो में परमाणु मात्र भी रागभाव रखता है वह मूढ अचानी है, वह आत्मा के स्वभाव से विपरीत वर्तन करता है। आत्माजानी वही है जो प्रात्मा को आत्मारूप जाने और अपना मोह किसी भी पर द्रव्य से र चमात्र भी न करे। (७) श्री वट्टके रिस्वामी मूलाचार प्रत्याख्यान अधिकार में कहते हैं- जिणवयणे अणुरत्ता गुरुवयणं जे करति भावेण । अमवल अमंकिलिहा ते होंति परित्तसंसारा ॥७२॥ भावार्थ-जो माधु जिनवाणी मे परम भक्तित्रत है तथा जो भक्तिपूर्वक गुरु की आजा को मानते हैं वे मिथ्यात्व से अलग रहते हुए व शुद्ध भावों में रमते हुए ससार से पार हो जाते हैं । पालमरणाणि बहुसो बहुयाणि अकामयाणिमरणाणि । मरिहंति ते घराया जे जिणवयणं, ण जाणंति ॥७३॥ भावार्थ-जो जिनवाणी के रहस्य को नहीं जानते हैं ऐसे सम्यग्ज्ञान रहित प्राणी बार-बार अज्ञान मरण करते है, वे बार-बार विना चाहे हुए ही अकाल मे मरते है। उन विचारों को मरण का दुःख बार-बार सहना पड़ता है। , 4 . २९०] सम्यग्नान और उसका माहात्म्य । । भावार्थ ज्ञान का लाभ पुरुप को होता है परन्तु जो मानव विनय महित है यही ज्ञान का प्रकाश कर सकता है । ज्ञान के ही मनन से मोक्ष के मार्ग को पहचानता हुश्रा ध्यान का लक्ष्य जो गुद्व आत्मा का स्वरूप उसको भले प्रकार समझ लेता है। (५) श्री कुन्दकुन्दाचार्य भानपाहुड में कहते हैं... णित्थयरभारियन्थं गणहरदेवेहि गंथियं मम्म । भावहि अणु दिगु अतुलं विशुद्धभावेण मुयणाणं ।। ६२ ।। भावार्थ-हे मुने । तृ रातदिन निर्मल भाव मे भक्ति पूर्वक शारस्पी श्रुतज्ञान का मनन कर, जो अनुपम है व जिसे मूल में तीर्थ करो ने कहा है, 'उमको जानकर, गणधरों ने भले प्रकार मात्र में ग था है । पाउण णाणसलिलं गिम्महतिसडाहयोमउम्मुक्का। हुँति शिवालयवासी तिवणचडामणि मिद्वा ।। ६३ ।। भावार्थ-आत्मज्ञान रूपी नल को पीकर कठिनता से दूर होने योग्य तृष्णा की दाह व जलन को मिटा कर भव्यजीव सिद्ध हो जाते हैं और तीन लोक के शिम्बर पर मिनालय में अनन्तकाल वाम करते है। णाणमयविवलसीयलसलिलं पाऊण भरिय भावेण । वाहिजरमाणवेयणहाहनिमुक्का सिवा होनि ॥ १२५ ।। भावार्थ-भव्यजीव भाव सहित प्रात्मनानमई निर्मल शीतल जल को पीकर व्याधम्प मरण की वेदना की दाह को शमनकर सिद्ध हो जाते है। (६) श्री कुन्दकुन्दाचार्य मोक्षपाहुड में कहते है- सिद्धो सुद्धो अादा मचगह सचलोयदरसी य । सो जिणवरेहिं भणियो जाण तुमं केवलं णाणं ॥ ३५ ॥ भावार्थ- -यह आत्मा ही सिद्ध है, शुद्ध है, सर्वज है. सर्वदर्शी है तथा यही केवलज्ञान स्वस्प है ऐमा जानो, ऐसा श्री जिनेन्द्र भगवान ने कहा है । उग्गतबेणण्णाणी जं कम खबदि भवहि भहएहि । तं णाणी तिहि गुत्तो खवेइ अन्तोमुहत्रेण ॥ ५३ ॥ भावार्थ-मिथ्याज्ञानी घोर तप करके जिन कर्मों को बहुत जन्मों मे क्षय करता है उन कर्मो को आत्म- ज्ञानी सम्यग्दृष्टी मन, वचन, काय को रोक करके ध्यान के द्वारा एक श्रान्तमुहर्त में क्षय कर डालता है। सुहजोएण सुभावं परदब्बे कुणड रागदो साहू । सो तेण हु अण्णाणी णाणी एत्तो हु विवरीनो ॥ ५४ ॥ भावार्थ-शुभ पदार्थों के सयोग होनेपर जो कोई साधु रागभाव से पर पदार्थ में प्रीतिभाव करता है वह अज्ञानी है । जो सम्यग्ज्ञानी है बह शुभ मयोग होनेपर भी राग नहीं करते हैं समभाव रखते है ।
सहज-सुख-साधन । [२९१ । जे तवरहियं जं णाणं णाणविजुत्तो तबो वि अकयस्थो । तम्हा णाणतवेणं संजुत्तो लहइ णिव्याणं ॥ ५ ॥ भावार्थ-तप -तप रहित जो ज्ञान है व सम्यग्ज्ञान रहित जो तप है सो दोनों ही मोक्ष साधन में अकार्यकारी है इसलिये जो साधु सम्यग्जान सहित तप पालते हैं वे ही निर्वाण को पासकते हैं। ताम ण णज्जड अप्पा विसएसु णरो पवट्टए जाम । विसए विरत्तचित्तो जोई जाणेइ अप्पाणं ।। ६६ ।। भावार्थ- जब तक यह मनुष्य इद्रियों के विपयो में आसक्त होकर प्रवर्तता है तब तक वह आत्मा को नहीं पहचान सकता है। जो योगी विषयो से विरक्त चित्त होते हैं वे ही आत्मा को जानकर अनुभव कर सकते हैं। जे पुण विसयविरत्ता अप्पा णाऊण भावणासहिया । छंडंति चाउरंगं तवगुणजुत्ता ण संदेहो ।। ६८ ।। भावार्थ-जो कोई साधु विषयों से विरक्त होकर आत्मा को जानकर उसकी बारबार भावना करते हैं और तप व मुलगुणों को पालते हैं वे चार गति रूप ससार से मुक्त हो जाते हैं। परमाणुपमाणं वा परदचे रदि हवेदि मोहादो । सो मूढो अण्णाणी आदमहावस्स विबरीश्रो ॥ ६६ ॥ भावार्थ-जो कोई मोह से परद्रव्यो में परमाणु मात्र भी रागभाव रखता है वह मूढ अज्ञानी है, वह आत्मा के स्वभाव से विपरीत वर्तन करता है । आत्माजानी वही है जो आत्मा को आत्मारूप जाने और अपना मोह किसी भी पर द्रव्य से रचमात्र भी न करे। (७) श्री वट्ट के रिस्वामी मूलाचार प्रत्याख्यान अधिकार में कहते हैं- जिणवयणे अणुरत्ता गुरुवयणं जे करंति भावेण । अमवल अमंकिलिट्ठा ते होंति परित्तसंसारा ॥७२।। साधु जिनवाणी मे परम भक्तिवत है तथा जो भक्तिपूर्वक गुरु की आना को मानते हैं वे मिथ्यात्व से अलग रहते हुए व शुद्ध भावों में रमते हुए ससार से पार हो जाते हैं । पालमरणाणि बहुसो बहुयाणि अकामयाणिमरणाणि । मरिहंति ते वराया जे जिणवयणं, ण जाणंति ॥७३॥ भावार्थ-जो जिनवाणी के रहस्य को नहीं जानते हैं ऐसे सम्यग्नान रहित प्राणी बार-बार अनान मरण करते है, वे बार-बार बिना चाहे हुए ही अकाल में मरते है । उन विचारों को मरण का दुःख बार-बार सहना पडता है। भावार्थ-जो - J २५२] सम्यान और उसका महास्य । ज्ञान की जिणवयणमोमहमिणं विषयसुहविरयण श्रमिदमदं । जम्मग्णवाहिवेयगाखयकरणं मन्बटक्याणं ||६|| भावार्थ- -यह जिनवाणी का पठन, पाटन गनन कमी प्रीपधि है जो इन्द्रियविषय के सुख से वैराग्य पैदा करानेवाती है, अतीन्द्रिय सुगम्पो 'अमृत को पिलाने रालो है; जग मारण व रोगादि से उत्पन्न होने वाले सर्व दुःखो को क्षय करनेवाली है। (e) श्री वट्टकरिस्वामी मूलाचार के पन्चाचार प्याधिकार में कहते हैं:- विजणमुद्ध सुगं अत्यविसुद्ध च तदुभयपिसुद्ध। पय देगा य जपतो गाणविमुद्धो हवा एसो ||८|| भावार्थ-जो कोई शानों के बास्यों को य मारो के अर्थ का तथा दोनों को प्रयत्न पूर्वक शुद्ध पडता है उसी को शुहता होती है। विणएण मुदमधीदं जदिवि पमादेग होदि विम्मरिदं । तमुवट्ठादि परभवे केवलगााण च प्रावहति ॥८६॥ भावार्थ-जो विनयपूर्व क शास्त्रों को पढ़ा हो और प्रमाद से कालातर में भूल भी जाये तो भी परभव में शीघ्र याद हो जाता है. थोरे परिथम मे आ जाता है तथा विनय महित शास्त्र पढने का फल केवलज्ञान होता है। गाणं मिक्खदि णाणं गुणेदि णाण परम्म उदिमदि । गाणेण कुणदि णायं णाणविणीदो हदि एसो ॥१७॥ भावार्थ-जो ज्ञानी होकर दसरा को सिखाता है ज्ञान का पुन. पुनः मनन करता रहता है, ज्ञान दूसरो को धर्मोपदेश करता है, तथा ज्ञानपूर्वक चारित्र पालता वही सम्यग्ज्ञान की विनय करता है। (६) श्री बट्टकेरस्वामी मूलाचार पडावश्यक में कहते है:- णाणी गच्छदि णाणी वचदि णाणी णवं च णादियदि । खाणेण कुणदि चरणं तया गाणे हवे विणो ॥८६॥ भावार्थ- सम्यग्ज्ञानी ही मोक्ष जाता है, सम्यग्ज्ञानी ही पाप को त्यागता है, सम्यग्ज्ञानी ही नए कर्म नहीं बाधता है । सम्यग्ज्ञान से ही चारित्र होता है इमलिये ज्ञान की विनय करनी योग्य है। (१०) श्री चट्टकेर स्वामी मूलाचार अनगारभावना में कहते हैं:- ते लद्धणाणचक्खू णाणुज्जोएण दिट्ठपरमट्ठा । णिस्मंकिदणि व्विदिगिंछादवलपरकमा साधू ।।६२॥
सहज-सुख-साधन । [२९३ भावार्थ-जो साधु ज्ञान के प्रकाश को रखनेषाले हैं वे ज्ञान की ज्योति से परमार्थ जो परमात्व तत्व है उसको जाननेवाले होते हैं। उनके भीतर जिन भाषित पदार्थों में शंका नहीं होती है तथा वे ग्लानिरहित होते हैं तथा वे ही आत्मबल से साहसपूर्वक मोक्ष का साधन करते हैं। सुदरयणपुगणकपणा हेउणयविसारदा विउलवुद्धी । णिउणथमत्थकुसला परमपयवियाणया समणा ॥६७॥ भावार्थ-वे ही मुनि मोक्षरूपी परम पद के स्वरूप को जाननेवाले होते हैं जो अपने कानों को शास्त्र- रूपी रत्नों से विभूपित रखते हैं अर्थात् जो जिनवाणी को सुरुचि से सुनते हैं, जो प्रमाण और नय के ज्ञाता हैं, विशाल बुद्धिशाली हैं तथा सर्व शास्त्र के ज्ञान मे कुशल हैं । अवगदमाणत्थंभा अणुस्सिदा अगबिदा अचंडा य । दता मद्दवजुत्ता समयविदण्ह विणीदा य ॥६॥ उचलद्धपुण्णपावा जिणसासणगहिद मुणिदपज्जाला । करचरणसवुडंगा माणुवजुत्ता मुणी होति ।।६।। भावार्थ-जो मुनि मानके स्तम्भ से रहित है, जाति, कुल आदि के मद से रहित हैं, उद्धतता रहित हैं, शांतपरिणामी हैं, इन्द्रियविजयी हैं, मार्दव धर्म से युक्त है, आत्मा व अनात्मा के ज्ञाता है, विनयवान हैं, पुण्य पाप के स्वरूप के ज्ञाता है, जिनशासन मे दृढ शृद्धानी हैं, द्रव्यपर्यायों के ज्ञाता है, तेरह प्रकार चारित्र सवरयुक्त हैं अथवा दृढ आसन के धारी है वे ही साधु ध्यान के लिये उद्यमी रहते हैं। (११) श्री वट्टकेर स्वामी मूलाचार समयसार अधिकार में कहते हैं:- सज्ज्ञाय कुव्वत्तो पंचिंदियसंपुडो तिगुत्तो य । हवदि य एयग्गमणो विणए ण समाहिलो भिक्ख ॥ ७८ ॥ भानाथ-शास्त्र स्वाध्याय करनेवाले के स्वाध्याय करते हुए पाचो इन्द्रिय वश मे होती है, मन, वचन, काय स्वाध्याय में रत हो जाते हैं, ध्यान में एकाग्रता होती है, विनय गुण से युक्त होता है, स्वाध्याय परमो- से " पकारी है। वारसविधलि य तवे सब्भतरबाहिरे कुसल दिट्ट । ण वि अत्थि ण वि य होहदि सज्झायमम तवोकम्मं ।। ७६ ॥ भावार्थ-तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित बाहरी, भीतरीबारह प्रकार तप मे स्वाध्याय तप के समान कोई तप नहीं है न होवेगा, इसलिये स्वाध्याय मदा करना योग्य है । सूई जहा ससुत्ता ण णस्मदि दु पमाददोसेण । एव ससुत्तपुरिसो ण णस्सदि तहा पमाददोसेण ।। ८० ॥
२९४] सम्यग्ज्ञान और उसका महात्म्य । भावार्थ-जैसे सूत को एकान्त साथ सुई हो तो कभी प्रमाद से भी खोई नहीं जा सकती है वैसे ही शास्त्र का अभ्यासी पुरुप प्रमाद के दोष होते हुए भी कभी ससार में पतित नहीं होता है-अपनी रक्षा करता रहता है। ज्ञान बडी अपूर्व वस्तु है। (१२) श्री समंतभद्राचार्य स्वयभूस्तोत्र में कहते हैं- बंधश्च मोक्षश्च तयोश्च हेतुः बद्धश्च मुक्तश्च फलं च मुक्तेः । स्याद्वादिनो नाथ तवैव युक्तं नैकान्तदृष्टे स्त्वमतोऽसि शास्ता ॥१४॥ भावार्थ हे संभवनाथ भगवान ! आपने अनेकांत वस्तु का स्वरूप स्याद्वाद नय से उपदेश किया है इसीलिये आपके दर्शन में बधतत्व, मोक्षतत्व, सिद्ध होता है, दोनों का साधन भी ठीक २ सिद्ध होता है। बद्ध व मुक्त आत्मा को भी सिद्धि होती है व मुक्ति का फल भी मिद्व होता है। परन्तु जो वस्तु मानते हैं उनके यहां ये सब बातें सिद्ध नहीं हो सकती हैं। सर्वथा नित्य या सर्वथा अनित्य मानने से ही ये सब बातें नहीं बनेगी, द्रव्य की अपेक्षा नित्य व पर्याय की अपेक्षा अनित्य मानने से ही बन्ध व मोक्ष सिद्ध हो सकते हैं। विधिनिषेधश्च कथंचिदिष्टो विवक्षया मुख्यगणव्यवस्था । इति प्रणीतिः सुमतेस्तवेयं मतिप्रवेकःस्तुवतोऽस्तु नाथ ॥२५॥ भावार्थ-हे सुमतिनाथ भगवान ! आपका यह कथन ठीक सिद्ध होता है कि पदार्थ में किसी अपेक्षा से अस्तिपना है व दूसरी किसी अपेक्षा से नास्तिपना है । इनका वर्णन स्याद्वाद द्वारा मुख्य व गौण रूप किया जाता है। इसीमे हमारे द्वारा आप स्तुति योग्य हैं। मर्वथा नियमत्यागी यथादृष्टमपेक्षका । स्याच्छब्दस्तावके न्याये नान्येपमात्मविहिपाम् ॥ १०२ ।। भावार्थ-हे अरहनाथ । आपके स्याद्वाद न्याय में जो स्यात शब्द है वह एक स्वभाव को जिसकी ओर वर्णन है यथार्थ प्रकाश करता है, तो भी पदार्थ सर्वथा ऐसा ही है इम एकान्त को निषेध करता है । यही वस्तु का स्वरूप है । जो एकाती स्याद्वाद के से शून्य है वे अपने आपके अनिष्ट करनेवाले है । एकान्त मान के यथार्थ वस्तु स्वरूप को नहीं पाते हैं । (१३, श्री ममन्तभद्राचार्य रत्नकरण्ड श्रावकाचार में कहते हैं- अन्यूनमनतिरक्तं याथातथ्य बिना च विपरीतात् । निःसंदेहं वेद यदाहुस्तज्ज्ञानमागमिनः ॥ ४२ ॥ स्वरूप को न कम जाने न अधिक जाने, न विपरीत जाने, किन्तु जैसा का तैसा सन्देह रहित जाने उसको आगम के ज्ञाता सम्यग्ज्ञान कहते हैं। प्रथमानुयोगमाख्यानं चरितं पुराणमपि पुण्यम् । बोधिममाधिनिधानं बोधति बोध: समीचीनः ॥ ४३॥ से ज्ञान भावार्थ-जो वस्तु के .
सहज-सुख-साधन । [२९५ चार भावार्थ-प्रथमानुयोग को सम्यग्ज्ञान इस प्रकार जानता है कि इससे धर्म, अर्थ, काम, मोज्ञ चार पुरु- पार्थों के साधन का कथन है, जीवनचरित्र है व त्रेसठ महापुरुषांका पुराण है। जिससे पुण्य का आश्य मिलता है व जिसमें रत्नत्रय व ध्यान का भडार है । चौवीस तीर्थकर, बारह चक्रवर्ती, नौ बलभद्र, नौ नारा- यण, नौ प्रतिनारायण को त्रेसठ महापुरुष कहते हैं। शलाका लोकालोकविभक्तेयुगपरिवृतेश्चतुर्गतीनां च । आदर्शमिव तथामतिरवैतिकरणानुयोगं च ॥ ४४ ॥ भावार्थ-करणानुयोग उसको कहते हैं जो लोक और अलोक के विभाग को, काल की पलटन को, गति के स्वरूप को दर्पण के समान प्रगट करता है-सम्यग्ज्ञान ऐसा जानता है। गृहमेध्यनगाराणां चारित्रोत्पत्तिवृद्धिरक्षाङ्गम् । चरणानुयोगसमयं सम्यग्ज्ञानं विजानाति ॥ ४५ ॥ भावार्थ-जिसमे गृहस्थ और मुनियों के आचरण की उत्पत्ति, वृद्धि व रक्षा का कथन हो वह चरणानुयोग है ऐसा सम्यग्ज्ञान जानता है । जीवाजीवसुतत्वे पुण्यापुण्ये च बंधमोक्षी च । द्रव्यानुयोगदीपः श्रतविद्यालोकसातनुते ॥ ४६ ॥ भावार्थ-द्रव्यानुयोग रूपी आगम वह है जो जीव, अजीव तत्वों को, पुण्य व पाप के रवरूप को, बंध के को अर्थात् आत्मज्ञान को करे (१४) श्री ममंतभद्राचार्य प्राप्तमीमांसा में कहते हैं- तत्त्वज्ञान प्रमाणं ते युगपत्सर्वभासनम् । क्रमभावि च यज्जानं स्याद्वाद नय संस्कृतम् ।। १०१ ॥ भावार्थ-हे जिनेन्द्र ! आपका केवलज्ञान प्रमाण ज्ञान है । इसमे एक ही साथ सर्व पदार्थ झलकते है। अल्प ज्ञानियों में क्रम वर्ती ज्ञान होता है वह भी प्रमाणीक है, यदि वह जान स्याद्वाद नय द्वारा सस्कृत हो अर्थात् स्याहाट से सिद्ध हो सके । उपेक्षा फलमाद्यस्य शेषस्यादानहानधीः । पूर्व वाऽजाननाशो वा मर्वस्य स्वगोस्यचरे॥१ १०२ ॥ भावार्थ-केवलज्ञान होने का फल वीतराग भावो का होना है। अन्य अल्पज्ञानियो के होनेवाले प्रमाण- रूप ज्ञान का फल त्यागने योग्य व ग्रहण योग्य के भीतर विवेक बुद्धि का प्राप्त करना है तथा वीतराग भाव ' भी है। सर्व ही मतिज्ञान आदि का फल अपने अपने विषय मे अज्ञान का नाश है । वाक्येष्वनेकान्तद्योती गम्यम्प्रतिविशेषकः । स्यान्निपातोऽर्थयोगित्वात्तव केवलिनामपि ॥१०३॥ , तथा मोक्ष को तथा भावश्रुत प्रकाश प्रगट - है
२९६]
सम्यमान और उनका महात्म्य ।
है
भावार्थ-हे जिनेन्द्र ! आपके मत मे तथा श्रुत केवलियों के मत में म्याद्वाद में जो स्यात् शब्द है वह
अव्यय है उसका अर्थ किसी अपेक्षा से है । यह शब्द बनाता है कि जो वाक्य कहा गया है उसमें किमी
विशेप स्वभाव की तो मुख्यता है, दूसरे स्वभावों को गोगता है। यह वाक्य ही प्रगट करता है कि वस्तु
अनेकान्त है, अनेक धर्मों को रखनेवाली है जैसे स्यात अस्ति घटः इस वाक्य में किसी अपेक्षा से घट है
ऐसा कहते हुए घट में भावपने की मुख्यता है तब यभावपने की गौणता है, एमा स्यात् शन बताता है
स्याद्वादः सर्वथैकान्तत्यागात्किवृत्तचिद्विधिः ।
सप्तभङ्गनयापेक्षों हेयादेय विशेषकः ॥१०४॥
भावार्थ-यह स्याद्वाद न्याय है वह किमी अपना ये एक स्वभाव को कहनेवाला है तथापि वस्तु सर्वथा
ऐसी ही है इस एकांत को निषेध करनेवाला है। मुख्य गोण कथन को अपेक्षा उसके मान भग होजाते हैं,
जैसा पहले बताया जा चुका है।
स्याद्वाददेवलनाने सर्वतचप्रकाशन ।
भेदः माक्षादमाक्षाच्च एवम्त्वन्यतम भवेत् ॥१०५॥
भावार्थ-जैसे केवलज्ञान सर्व तत्वों को प्रकाश करता है वैसे स्याद्वाहनय गर्भित श्रुतज्ञान भी मर्व तत्वों
को प्रकाश करता । इन दोनो मे भेट इतना ही है कि केवनज्ञान जय प्रत्यक्ष जानता है तब श्रुतज्ञान परोक्ष
जानता है। इनके सिवाय जो कुछ ज्ञान है वह वस्तु का स्वरूप यथार्थ नहीं है।
न सामान्यात्मनोदेति न व्येति व्यक्तमन्वयात् ।
व्येत्युदेति विशेपाचे महकोदयादि मत् ।। ५७।।
भावार्थ-वस्तु द्रव्यको अपेक्षा न उत्पन्न होती है और न व्यय होती है, वह वरावर नित्य प्रगटरुपसे
बनी रहती है तथापि पर्यायकी अपेक्षा उपजती विनशनी है । अापके सिद्धांतमें जो सत् पदार्थ है वह एक
ही समयमे उत्पाद व्यय ध्रौव्यरूप है । अर्थात् द्रव्यको अपेक्षा नित्य है उमोसमय पर्यायकी अपेक्षा अनित्य है ।
घटमोलिसुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम् ।
शोकप्रमोदमाध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम् ॥५६॥
भावार्थ-वस्तु उत्पाद व्यय ध्रौव्यरूप है इसीका दृष्ात है कि कोई मानव सुवर्ण के घटको तोडकर
मुकुट बना रहा था उसी समय तीन आदमी आए, जो सुवर्ण के घट को लेना चाहता था, वह घट को तोडते
हुए देखकर शोक में हो जाता है । जो मुकुट का अर्थी है वह हर्षित होता है परन्तु जो केवल स्वर्ण को ही
लेना चाहता है वह उदासीन है। क्योंकि सुवर्ण द्रव्य घटरूप से नए होकर मुकुट रुप मे बदल रहा
तथापि सुवर्ण वही है।
पयोव्रतो न दध्यत्ति न पयोऽत्ति दधिव्रतः ।
श्रगोरसवतो नोभे तस्मात्तत्त्वं त्रयात्मकम् ॥६०॥
सहज-सुख-साधन । [२९७ भावार्थ-दूसरा दृष्टांत है कि कहींपर दही और दूध दोनों रक्खे थे। जिस किसी को दही का त्याग था दूध का त्याग न था वह दूध को पीता है । जिसे दूध का त्याग था दही का त्याग न था वह दही को पीता । परन्तु जिसे गोरस का ही त्याग था वह दोनों को नहीं खाता है । दूध की पर्याय पलटकर दही वना तथापि गोरसपना दोनों में है । इसलिये हरएक वस्तु सदा ही उत्पाद व्यय ध्रौव्य रूप है, नित्य अनित्यरूप है जिसकी सिद्धि स्याद्वाद से भले प्रकार की जाती है। (१५) श्री शिवकोटि प्राचार्य भगवती आराधना में कहते हैं:- पिउणं विउलं सुद्ध, णिकाचिदमणुचरं च सव्वाहिदं । जिणवयणं कलुसहरं, अहो व रचि च पठिदव्वं ॥१०१॥ भावार्थ-हे प्रात्मन् ! इम जिनवाणी को रात्रि दिन पढना चाहिये। यह जिनेन्द्र का वचन प्रमाण के अनुकूल पदार्थों को कहनेवाला है, इससे निपुण है तथा बहुत विस्तारवाला है, पूर्वापर विरोध से रहित दोपरहित शुद्व है, अत्यन्त दृढ है अनुपम है तथा सर्व प्राणी मात्र का हितकारी है और रागादि मैल को हरनेवाला है। आदहिदपरिणाणभा, वसंवरोणवणवो य संवेगो। सिक्कपदा तवोभावणा, य परदेसिगनं च ॥१०२॥ भावार्थ-जिनवाणी के पढने से श्रात्म हित का ज्ञान होता है, सम्यक्त आदि भाव सवर की दृढता होती है. नवोन नवीन धर्मानुराग बढता है, धर्म में निश्चलता होती है, तप करने की भावना होती है और पर को उपदेश देने की योग्यता आती है। छहमदसमदुवादसेहि अण्णाणियस्स जा सोधी । तत्तो बहुगुणदरिया, होज्ज हु जिमिदस्स णाणिस्स ।।१११॥ शास्त्रज्ञान के मनन बिना जो अज्ञानी वला, तेला, चौला आदि उपवास के करने से शुद्धिता होती है उससे बहुतगुणी शुद्विता सम्यग्ज्ञानी को आत्मज्ञान को मनन करते हुए जीमते रहनेपर भी होती है। अक्खेविणी कहा सा, विज्जाचरण उवदिस्सदेजत्थ । सममयपरसमयगदा, कहा दु विस्खविणी णाम ॥६५६ ।। संवेयणी पुण कहा, णाणचरित्ततवविरियहट्टिगदा । णिव्वेयणी पुण कहा, सरीरभोगे ,भउघेए ॥६६०॥ सुकथा चार प्रकार की होती हैं-(१) आक्षेपिणी-जो ज्ञानका चारित्रका स्वरूप वताकर दृढता करानेवाली हो। (२) विक्षेपिणी-जो अनेकान्त मतकी पोषाक व एकांत मतको खंडन करनेवाली हो। (३) संवेजिनी कथा-जो ज्ञान चारित्र तप वीर्य मे प्रेम बढ़ानेवाली व वर्मानुराग करानेवाली कथा हो । भावार्थ- J भावार्थ-सुकथा २९८] मन्यमान गौरमा माग re (४) निर्येदिनी-जो संसार शरीर भोगों में गाय प्रदानयानी की। गाणोयोगहिदेग ग मकको चित्त गिरगही कायं। गाणं अंगभृदं, मनग्य , चिनहथिम्य ॥७६३|| भावार्थ-सान का उपयोग मा करना चाहिये । जो शारजान का मनन नहीं करते चे चित्त को रोक नहीं सकते । मनस्पी मोहाली के लिये मान ही पगा। उबसमा किराहमणो, जह मंतंग रिधिणा पटनाग । तह हिदय किरामापी, मुदाउनेगण गागोगा ।।७६५।। भावार्थ- विदि में प्रयोग कि मप्र में माना माप भी मान हो जाता है वैसे भले प्रकार मनन किये हुए जान के बाग मनापी काना माप शांत हो जा। रणागपदीयो पजला जम्म हिया पि मुद्रलेगम । जिग्गदिमोक्यमन्गे, पणामयभय ग नम्गन्धि ||७७०॥ भावार्थ-जिम शुर लेदया ना भावों के धारी के अलग गे मम्मान म्पी दीपक जलता है उसको जिनेन्द्रकथित मोतमार्ग में चलते कभी भी भ्रष्ट होने का य समाग में जाने का भय नहीं है । णाणुज्जोएगण विणा, जो इंदि मोकायमग्गमुनर्गनु । गतुकडिल्लमिच्छदि, अंचलया अंधयारम्मि ॥७७४॥ भावार्थ जो कोई सम्यग्ज्ञान के प्रकार के बिना मोक्षमार्ग में जाना चाहता है, वह अधा होकर महान अधकार में अति दुर्गम स्थान में जाना चाहता है। भावे मगविमयत्थे, मूगे जुगवं जहा पयारोड । सव्यं वि तधा जुगनं, केवलणाणं पयासेदि ॥२१३८॥ भावार्थ-जैसे सूर्य अपने विषय मे तिष्ठते हुए सर्व पदाची को एक साथ प्रकाश करता है वैसे केवलज्ञान समस्त पदार्थों को प्रकाश करता है। (१६) श्री पूज्यपादस्वामी इष्टोपदेश में कहते हैं:- अज्ञानोपास्तिरज्ञानं ज्ञानं ज्ञानिसमाश्रयः । ददादि यत्तु यस्यास्ति सुप्रसिद्धमिदं वचः ॥२३॥ भावार्थ-अज्ञान स्वरूप शरीरादि की या अज्ञानी गुरु की या मिथ्या शास्त्र की आराधना करने से मोह भ्रम से देहादि अज्ञान की प्राप्ति होगी कितु ज्ञान स्वमावी आत्मा की या सम्यग्ज्ञानी गुरु की या सम्यक शास्त्र की आराधना करने से आत्मज्ञान व आत्मानुभव की प्राप्ति होगी।
सहज-सुख-साधन । [२९९ (१७) श्री पूज्यपाद स्वामी समाधिशतक में कहते हैं:- अविद्याभ्याससंस्कारैरवशं क्षिप्यते मनः। तदेव ज्ञानसस्कारैः स्वतस्तत्वेऽवतिष्ठते ॥३७॥ भावार्थ-अविद्या या मिथ्याज्ञान के अभ्याससे यह मन अपने वश में न रहकर अवश्य आकुलित होगा पर पदार्थ में रमेगा वही मन सम्यग्ज्ञान के अभ्यास के बल से स्वय ही आत्मतत्व के रमण में ठहर जायगा। - . आत्मज्ञानातपरं कार्यं न बुद्धौ धारयेच्चिरम् । कुर्यादर्थवशात्किञ्चिद्वाकायाभ्यामतत्परः ॥५०॥ भावार्थ- ज्ञानी को उचित है कि आत्मज्ञान के सिवाय और कार्य को बुद्धि में चिरकाल धारण न करे । प्रयोजनवश कुछ दूसरा काम करना पड़े तो वचन व काय से करले, मनको उसमे आशक्त न करे । अव्रती व्रतमादाय व्रती ज्ञानपरायणः । परात्मज्ञानसम्पन्नः स्वयमेव परो भवेत् ॥८६॥ भावार्थ-जो कोई अवती हो वह व्रती होकर आत्मज्ञान के अभ्यास में लीन हो । जिसको परमात्मा का यथार्थ ज्ञान हो जाता है और वह इसी का अनुभव करता है वह अवश्य परमात्मा हो जाता है । विदिताशेषशास्त्रोऽपि न जाग्रदपि मुच्यते । देहात्मदृष्टिर्जातात्मा सुप्तोन्मत्तोऽपि मुच्यते ॥१४|| भावार्थ-जो देह मे आत्मा की बुद्धि रखता है ऐसा बहिरात्मा अज्ञानी जीव सर्व शास्त्रों को पढ चुका है तथा जाग रहा है तो भी वह कर्मों से मुक्त नहीं हो सकता है कितु जो आत्मनानी है वह सोते हुए हैं कदाचित उन्मत्त है-गृहस्थ में फसा है तो भी कभी न कभी मुक्त हो जायगा । (१८) श्री गणभद्राचार्य आत्मानुशासन में कहते हैं- अनेकान्तात्मार्थप्रसवफलभारातिविनते वचः पर्णाकीर्णे विपुलनयशाखाशतयुते । समुत्त ङ्ग सम्यक् प्रततमतिमले प्रतिदिनं श्रतस्कन्धे धीमान् रमयतु मनोमर्कटममुम् ।। १७० ॥ भावार्थ-बुद्धिमान का कर्तव्य है कि वह इस मानरूपी वदर को शास्त्ररूपी वृक्ष में प्रतिदिन रमावें । इस । शास्त्र रूपी वृक्ष में अनेकात स्वरूप अनेक स्वभाव व गुण व पर्याय रूपी फलफूल हैं उनसे यह नम्री भूत है। यह वृक्ष वचन रूपी पत्रों से व्याप्त है। सैकडों महान नयो या अपेक्षाओं की शाखाओ से शोभित है, तथा इस शास्त्ररूपी वृक्ष का बहुत बडा विस्तार है तथा इसका मूल प्रखर मतिज्ञान है। शास्त्राग्नौ मणिवद्भव्यो विशुद्धो भाति निवृतः । अंगारवत् खलो दीप्तो मली वा भस्म वा भवेत् ॥ १७६ ।। में । .
३००] सम्यग्नान श्रीर उमका महास्य । : है है भावार्थ-जैसे रन अग्नि में पड़कर विशुद्ध हो जाता है व शोभता है बसे भव्यजीव रुचिवान शास्त्र में रमण करता हुआ विशुद्ध होकर मुक्त हो जाता है । परन्तु जमे अगारा 'अग्नि मे पड़कर कोयला होजाता है या राख हो जाता है वैसे दुष्ट मानव शान्त्र को पढ़ता हुया भी रागी द्वेपी होकर कर्मी से मैला हो जाता है। मुहः प्रमाय मज्जानं पश्चन भावान् यथास्थितान् । ग्रीन्यनीती निराकृत्य ध्यायेदध्यात्मविन्मुनिः ।। १७७ ॥ भावार्थ-अध्यातम का ज्ञाता गुनि बाग्बार सम्यग्ज्ञान को फैलाकर जैसे पदाधीकाम्बम्प है वैसा उनको देखता हुअा राग व द्वेप को दूर करके प्रात्मा को श्याता है। (१६) श्री योगेन्द्राचार्य योगसार में कहते हैं सत्थ पढ़तह ते वि जड अप्पा जे ण मुणति । निह कारण ऐ जीव फुद ण हु शिव्याण लहंति ॥ ५२ ॥ भावार्थ - जो कोई शान्या को पढ़ने है परन्तु आत्मा को नहीं जानते है वे जीव कभी भी निर्वाण को नहीं पा सकते है। जह लोयम्मिय णियडहा तह सुगाम्मिय जागि । जे सुह असुह परिच्चयहि ते वि हवंति हु णाणि ॥ ७१ ॥ भावार्थ-वे ही ज्ञानी हैं जो पुण्य व पाप को सुवर्ण का तथा लोहे की बेडी जानते है दोनो को बन्धन मानते हैं। मन्चे जीवा णाणमया जो समभाव मुणेड । सो सामाडड जाणि फुडु जिणवर एम भणेड ।। ६८ ॥ भावार्थ-सर्व ही जीव शुद्ध ज्ञानमई है ऐसा जो जानता है वही समभाव का धारी है इमी के सामा- यिक जानो ऐसा जिनेन्द्र देव कहते हैं। (२०) श्री नागसेन मुनि तत्वानुशासन में कहते हैं- श्रुतज्ञानमदासीनं यथार्थमति निश्चल । म्वर्गापवर्गफलद ध्यानामातमुहुर्ततः ।। ६६ ।। भावार्थ- है । उसीका अनुभव है. आत्मध्यान श्रुतध्यान का ध्यान है । द्वादशाग वाणी का सार आत्मज्ञान तथा वही ध्यान है। यह वीतराग रूप, यथार्थ, अति निश्चल एक अन्तर्म हूर्त तक रह सकता है जिसका फन स्वर्ग व मोक्ष की प्राप्ति है। श्रु तज्ञानेन मनसा यतो ध्यायन्ति योगिनः । ततः स्थिरं मनो ध्यानं श्र तज्ञानं च ताचिकं ॥ ६८ ॥ भावार्थ-क्योंकि योगीगण मन द्वारा श्रुतज्ञान के बल से ध्यान करते हैं, इसीलिये स्थिर मन ही ध्यान है, यही निश्चय तत्वरूप श्रुतज्ञान है। के ॥
सहज-सुख-साधन । [३०१ ज्ञानदातरादात्मा तस्माज्ज्ञानं न चान्यतः । एक पूर्वापरीभृतं ज्ञानमात्मेति कीर्तितं ॥ ६६ ।। भावार्थ-ज्ञान कहो चाहे आत्मा कहो दोनों एक ही बात है क्योंकि ज्ञान आत्मा का गुण है, आत्मा से ही होता है, किसी अन्य द्रव्य से नहीं होता है । यह ज्ञानगुण जो बराबर पूर्वापर चला आरहा है वही आत्मा है ऐसा कहा गया है। स्वरूपं सर्वजीवानां स्वपरस्य प्रकाशनं । भानुमंडलवतेषां परस्मादप्रकाशनं ।। २३५ ।। भावार्थ-सर्व जीवों का स्वभाव अपने को व पर को एक साथ उसी तरह प्रकाश करता है जैसा सूर्य मडल अपने को तथा पर को प्रकाश करता है । उन जीवों में ज्ञान का प्रकाश स्वाभाविक है, दूसरे पदार्थ से नहीं है जैसे सूर्य स्वयं प्रकाशरुप है । तिष्ठत्येव स्वरूपेण क्षीणे कर्मणि पौरुषः । यथा मणिस्वहेतुभ्य. क्षीणे सांसर्गिके मले ॥ २३६ ॥ भावार्थ- -जब सर्व कर्म का क्षय हो जाता है तब यह आत्मा अपने स्वरूप में ही ठहर जाता है, और एक समय में ही स्वपर को जानता है । जैसे योग्य कारणों से ससर्ग में आया हुआ मल निकल जानेपर मणि स्वभाव से चमक उठती है । न मुह्यति न संशेते न स्तार्थानध्यवस्यति । न रज्यते न च द्वोष्टि किंतु स्वस्थः प्रतिक्षण ॥२३७।। भावार्थ-अरहत व सिद्ध परमात्मा घाति कर्मों के क्षय होने पर न तो किसी पर मोह करते हैं, न सशय किसी बात मे करते हैं, न उनके भीतर अनध्यवसाय ( ज्ञान में प्रमाद ) है न वह राग करते हैं न द्वेष करते हैं। किंतु सदा ही प्रतिक्षण ही अपने ही शुद्ध स्वरूप मे स्थित हैं। त्रिकालविषय जेवमात्मानं च यथास्थितं । जानन् पश्यश्च निःशेषमुदास्ते स तदा प्रभुः ॥२३८॥ भावार्थ-वे केवलज्ञानी परमात्मा अपने आत्मा को तथा तीन काल के ज्ञेय पदार्थों को जैसा उनका रवरूप है वैसा पूर्णपने जानते हुए वीतरागी रहते है। (२१) श्री अमृतचन्द्र आचार्य पुरुषार्थमिद्ध्य पाय में कहते हैं:- निश्चयमिह भूतार्थ व्यवहार वर्णयन्त्यभृतार्थम् । भूतार्थबोधविमुखः प्रायः सर्वोऽपि ससारः ॥ ५ ॥ भावार्थ-निश्चयनय वह है जो सत्यार्थ मूल पदार्थ को कहे। व्यवहारनय वह है जो सत्यार्थ पदार्थ को कहे । प्राय सर्व ही ससारी प्राणी निश्चयनय से कथन योग्य सत्यार्थ वस्तु के ज्ञान से बाहर हो रहे हैं। . - ३०२] सम्यग्ज्ञान और उनका महात्म्य । व्यवहारनिश्चयो यः प्रबुध्य तत्वेन भवति मध्यस्थः । प्राप्नोति देशनायाः स एव फलमविकलं शिप्यः ॥ ८ ॥ भावार्थ -जो कोई व्यवहारनय और निश्चयनय दोनों को जानकर मध्यस्थ हो जाता है वही शिष्य जिनवाणी के उपदेश का पूर्ण फल पाता है। सम्यग्ज्ञानं कार्य सम्यक्त्वं कारणं वदन्ति जिनाः । ज्ञानाराधन मिष्ट सम्यक्त्वानन्तरं तस्मात् ।। ३३ ।। भावार्थ-जिनेन्द्र भगवन्तों ने सम्यग्ज्ञान को कार्य तथा सम्यग्दर्शन को कारण कहा है । इसलिये सम्यग्दर्शन के पीछे जान की आराधना करना उचित है । कारणकार्य विधानं ममकालं जायमानयोगपि हि । दीपप्रकाशयोरिव सम्यक्त्व ज्ञानयोः सुघटम् ।। ३४ ।। भावार्थ- यद्यपि सम्यग्दर्शन के माथ ही सम्यग्ज्ञान की उत्पत्ति होती है उसी तरह जैसे दीपक से प्रकाश होता है तो भी जैसे दीपक कारण है, प्रकाश कार्य है, वैमे सम्यग्दर्शन कारण है, सम्यक्ज्ञान कार्य है । कर्तव्योऽध्यवमायः सदनेकांतात्मकेषु तत्वेषु । मंशय विपर्ययानध्यवसाय विविक्तात्मात्मरूपं तत् ।।३।। भावार्थ- -व्यवहार नय से सतरूप व अनेक धर्म स्वरूप तत्वों को मंशय, विपर्यय व अनध्यवसाय रहित जानना चाहिये । यही सम्यग्नान है। निश्चयनय से यह सम्यग्ज्ञान आत्मा का स्वरूप है। ग्रंथार्थोभयपूर्ण काले विनयेन सोपधानं च । बहुमानेन समन्वितमनिन्हव ज्ञानमाराध्यम् ।। ३६ ॥ भावार्थ- -सम्यग्ज्ञान को आठ अग महित सेवन करना चाहिये । (१) ग्रथशुद्धि-शुद्ध पढना (२) अर्थ शुद्धि-अर्थ शुद्ध करना, (३) उभय शुद्धि-शब्द व अर्थ शुद्ध पढना, (४) कालाध्ययन-ठीक समय पर पढना, (५) विनय, (६) उपधान-धारणा सहित पढना, (७) बहुमानेन समन्वित-बहुत मान से पढना, (८) अनिव- गुरु को व ज्ञान को न छिपाना । येनांशेन जानं तेनांगेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य पन्धनं भवति ।।२१३।। भावार्थ-जितने अश किसी के परिणाम में सम्यग्ज्ञान होता है उतने अश से कर्म का बन्ध नहीं होता है किन्तु जितने अश राग होता है उतने अंश कर्म का बन्ध होता है। सम्यग्ज्ञान बन्ध का कारण नहीं है, बन्ध का कारण औदयिक भाव रागद्वेप मोह है। (२२) श्री अमृतचंद्राचार्य तत्वार्थसार में कहते हैं:- वाचनापृच्छनाम्नायस्तथा धर्मस्य देशना । अनुप्रेक्षा च निर्दिष्टः स्वाध्यायः पंचधा जिनैः ॥१६-७॥ - सहज-सुख-साधन । [३०३ वाचना सा परिजेया यत्पात्रे प्रतिपादनम् ।। ग्रन्थस्य वार्थ पद्यस्य तत्त्वार्थस्योभयस्य वा ॥१७.७॥ तत्संशयापनोदाय तन्निश्चयवलाय वा। परं प्रत्यनुयोगाय प्रच्छनां तद्विदुर्जिनाः ॥१८-७।। श्राम्नायः कथ्यते घोपो विशद्ध परिवर्तनम् । कथाधर्माद्यनुष्ठानं विज्ञेया धर्मदेशना ॥१६-७॥ साधोरधिगतार्थस्य योऽभ्यासो मनसा भवेत् । अनुप्रेक्षिति निर्दिष्टः स्वाध्याय: ल जिनेशिभिः ।।२०-७॥ भावार्थ-शास्त्रों का स्वाध्याय व्यवहार सम्यग्ज्ञान है, सो स्वाध्याय पांच प्रकार जिनेन्द्रों ने कहा है । वाचना, पृच्छना, आम्नाय, धर्मदेशना, अनुप्रेक्षा । किसी ग्रथ का व उसके पद्य का तथा उसके अर्थ का या दोनों का दूसरे पात्र को सुनाना या स्वयं पढना, बाचना है । सशय दूर करने को, पदार्थ को निश्चय करने को व दूसरों को समझाने के लिये जो पूछना उसे जिनों ने पृच्छना कहा है । शुद्ध शब्द व अर्थ को घोखकर कठ करना आम्नाय कहा जाता है । धर्म कथा आदि का उपदेश करना धर्मदर्शना है। भले प्रकार जाने हुए पदार्थ का मन से बार-बार अभ्यास करना अनुप्रेना नाम का स्वाध्याय है ऐसा जिन्द्रों ने कहा है। ज्ञानस्य ग्रहणाभ्यासमरणादीनि कुर्वतः । बहुमानादिभिः सार्धं ज्ञानस्य विनयो भवेत् ॥ ३२-७ ।। बहुत मान व आदर से ग्रहण करना व स्मरण करना, मनन करना आदि ज्ञान की विनय कही जाती है। (२३) श्री अमृतचन्द्राचार्य श्री समयसार कलश में कहते हैं- उभयनय विरोधध्वंसिनि स्यात्पदाङ्क जिनवचसि रमन्ते ये स्वयं वान्तमोहाः । मपदि समयसारं ते पर ज्योतिरुच्चै- रनवमनयपक्षाक्षुण्णमीक्षन्त एव ।। ४ ।। भावार्थ-निश्चय नय और व्यवहार नय के विरोध को मेटनेवाली स्याद्वाद रूप जिनवाणी में जो रमण करते हैं, उनका मिथ्यात्व भाव स्वय गल जाता है । तब वे शीघ्र ही अतिशय करके परम ज्योति स्वरूप, 'प्राचीन, किसी भी खोटी युक्ति से अखडित शुद्व आत्मा का अनुभव कर ही लेते है । आत्मानुभूतिरिति शुद्धनयात्मिका या ज्ञानानुभूतिरियमेय किलेति बुद्धया । भावार्थ-ज्ञान को ३०४] सम्यमान और उनका महात्म्य । --- आत्मानमात्मनि निविश्य सुनिःप्रकम्प- मेकोऽम्ति निन्यमवयोधनः समन्तात् ॥ १३ ॥ भावार्थ- -शुद्ध निश्चय नय के द्वारा जो शह प्रात्मा का अनुभव है याही निश्चय सम्यग्ज्ञान अनुभव है ऐसा जानकर जब कोई अपने "पात्मा को अपने प्रात्मा गं निगल रूप में धारण करता है तब यहा सर्व तरफ से नित्य ही एक मानधन आत्मा ही स्वाद में प्राता है। जान द्विवेचकनया तु परमात्मनोर्या जानाति हम इव वाः पयमोविशे। चैतन्यधातुमचलं म मद्राधिरूढो जानीत एप हि कंगेति न किचनापि ॥ १४-३ ॥ भावार्थ-ज्ञान के ही प्रताप से प्रात्मा यौर पर का भेद विजान जाना जाता है। जैसे दूध पानी अलग अलग है। ज्ञानी अपनी निश्चल चतन्य धातुमई मृति मे सदा दृढ निश्चय रग्बना हुआ जानता ही है, कुछ भी कर्ता नहीं है। ज्ञानादेव ज्वलनपयगोरीएयशन्थव्यवस्था ज्ञानादेवोल्लमति लवणस्वादभेदव्युदामः । ज्ञानादेव स्वरमविकन्नित्यचंतन्यधाती: क्रोधादश्च प्रभवनि भिदा भिदन्ती कत भावम् ।। १५.३ ।। भावार्थ- -ज्ञान के ही प्रताप से गर्म पानी में यह पलकता है कि पानी का स्वभाव शीतल है तथा उष्णता अग्नि की है। ज्ञानी के ही प्रताप से किमी बने हुए साग में माग का स्वाद अलग और लवण का स्वाद अलग भासता है । यह ज्ञान का ही प्रभाव है जिससे क्रोध का मैं कर्ता ह, इम अजान का नाश होकर ऐमा झलकता है कि मैं क्रोधादिको फलुपता मे भिन्न अपने प्रात्मीक रम से नित्य भरा हुआ चैतन्य धातुमय श्रात्मा मात्र है। ज्ञानवान बग्यतोऽपि यतः स्यात्सरागसवर्जनशीलः । लिप्यते मकलकर्मभिरेषः कर्ममध्यपतितोऽपि ततो न ॥ १७-७ ॥ भावार्थ-सम्यग्ज्ञानी अपने स्वभाव से ही सर्व रागादि भावों से भिन्न अपने को अनुभव करता है। इसलिये कमी के मध्य पडे रहने पर भी कर्मबन्ध से नहीं बन्यता है । यह प्रात्मज्ञान की महिमा है। • अज्ञानी प्रकृतिस्वभावनिरतो नित्यं भवेद्वदको ज्ञानी तु प्रकृतिस्वभाविरतो नो जातुचिद्व दकः । इत्येवं नियमं निरूप्य निपुणैरज्ञानिता त्यज्यतां । शुद्ध कात्ममये महस्सचलितैरासेव्यतां ज्ञानिता ॥ ५-१० ॥ - 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सहज-सुख-साधन । [३०५ भावार्थ-अज्ञानी सदा ही कर्म की प्रकृतियों के स्वभावों में अर्थात् जैमा कर्म का उदय होता है उसमें लीन होकर सुख दुव का भोक्ता हो जाता है । जानी प्रकृति के स्वभाव मे अर्थात् कर्मों के उदय से विरक्त रहता है, इसलिये कभी भी भोक्ता नहीं होता है, वह नाता रहता है। ऐसा नियम समझकर अज्ञानपना त्याग देना चाहिये, और शुद्ध एक आत्मा की निश्चल ज्योति मे थिर होकर ज्ञानभाव का सेवन करना चाहिये । शुद्धद्रव्यनिरूपणापितमतेस्तत्वं समुत्पश्यतो नैकद्रव्यगतं चकास्ति किमपि द्रव्यान्तरं जातुचित् । ज्ञानं ज्ञेयमवैति यत्त तदयं शुद्धस्वभावोदयः । किं द्रव्यान्तरचुम्बनाकुलधियस्तचच्च्यवन्ते जनाः ॥ २२-१० ॥ भावार्थ- वार्थ-जो शुद्ध द्रव्य के विचार में है और तत्व को देखनेवाला है उसके मत में एक द्रव्य के भीतर दूमरा द्रव्य कभी भी प्रवेश नहीं कर सकता है । जो शुद्ध आत्मा का ज्ञान सर्व ज्ञेय या जानने योग्य पदार्थों को जानता है सो यह उस ज्ञान के शुद्ध स्वभाव का उदय है तब फिर अज्ञानी जन आत्मा को छोडकर पर द्रव्य के ग्रहण के लिये आकुल व्याकुल होकर आत्म तत्व के अनुभव से क्यों पतन कर रहे हैं ? ज्ञान में कोई पदार्थ आता नहीं, ज्ञान किसी पदार्थ में जाता नहीं, तो भी ज्ञान सर्व ज्ञेयों को अपने स्वभाव जानता है । यह ज्ञान के प्रकाश का महात्म्य है। म्याद्वाददीपितलमन्महसि प्रकाशे शुद्धस्वभावमहिमन्युदिते मयीति । कि बन्धमोक्षपथपातिभिरन्यभावै- नित्योदयः परमय स्फुरतु स्वभावः ॥६-१२।। भावार्थ-स्याद्वाद के द्वारा मेरे भीतर आत्म तेज का प्रकाश हो गया है । जब मेरे में शुद्ध स्वभाव की महिमा प्रगट हो रही है तब वहा वंध मार्ग व मोक्ष मार्ग सम्बन्धी भावों से क्या प्रयोजन रहा ? कुछ भी नहीं । इसलिये सदा ही यह मेरा उत्कृष् स्वभाव मेरे में प्रकाशमान रहो । शुद्ध निश्चयनय से आत्मा सदा ही एकाकार शुद्व अनुभव में आता है । वहा बध व मोक्ष के विचार की कोई जगह नहीं है। (२४) श्री अमितिगति महाराज तच्चभावना में कहते हैं:- येषां ज्ञानकृशानुरुज्ज्वलतरः सम्यक्त्ववातेरितो । विस्पष्टीकृतसर्वतत्वसमितिर्दग्धे विपापैधमि ।। दत्तात्तप्तिमनम्तमस्ततिहतेदैदीप्यते मर्वदा । नाश्चर्य रचयंति चित्रचरिताश्चारित्रिणाः कस्य ते ॥६॥ भावार्थ-जिनके भीतर सम्यकदर्शन की पवन से प्रेरित सम्यग्ज्ञानरूपी अग्नि की तीव्र ज्वाला सर्व तत्वों को स्पष्ट दिखाती हुई, पापरूपी ईधन को जलाती हुई, मनके अधकार के प्रसार को दूर करती हुई सदा जलती O .
३०६] सम्यमान 'पीर उसका महात्म्य । है वे नाना प्रकार पारित्र का पालन करते हैं। जिनको देखकर किनको आश्चर्य न पायेगा ? अर्थात वे अदभुन चारित्र का पालन करते है। ये लोकोत्तरतां च दर्शनपगं दती निमुक्रिश्रिये । रोचन्ते जिनभारतीमनुपमा जन्पति श्रृण्वंति च ।। खोके भूरिकपायदोपमलिने ने गज्जना दुर्लभाः । ये कुर्वति तदर्थमनमधियम्नेषां फिमत्रोच्यते ॥१०॥ भावार्थ-जो कोई परमार्थ ग्यम्प को बनानेवाली, उत्कृष्ट सन्यकदर्शन को देनेवाली, मोक्षरूपी लक्ष्मी की दूती के समान 'अनपम जिनवाणी को पढ़ते है, सुनते . प उस पर मचि करते है मे मजन इस कपायो के दोपी से मलीन लोक गे दुर्लभ है-कठिनता से मिलने और जो उम जिनवाणी के अनुसार श्राचरण करने की उत्तग वृद्धि करते है उनको बान गया दी जावे ? महान दुर्लभ है। मी परोपकारिणी जिनवाणी को समझाकर उसके अनुमार यथाशक्ति चलना हमारा कर्तव्य है। सर्वज्ञः सर्वदर्शी भवमरगजरातकशाकव्यतीतो । लधात्मीयम्बभावः शतमकलमल: शवदान्मानपायः ।। दनैः संकोचिताभवमृतिचकिनै लोभयात्रानपेतः । नष्टावाधात्मनीनस्थिरविशदसुमनाप्नये चिननीयः ॥१२०॥ भावार्थ- परमात्मा मर्यत है, सर्वदर्शी है. जन्म, मरण, जग, रोग व शोकादि दोषों मे रहित है, अपने स्वभाव से पूर्ण है, मर्व कर्म मलरहित है, नाशहित नित्य है। जो लोग चतुर हैं, इन्द्रियों के विजयी है, जन्म मरण से भयभीत है, नसार की यात्रा को नहीं चाहते है उनको मे शुद्ध प्रात्मा का चिन्तवन बाधा रहित, अतीन्द्रिय स्थिर व शुद्व सुरव की प्राप्ति के लिये करना योग्य है । निश्चय से अपना प्रात्मा भी ऐसा ही है। अपने आत्मा को भी परमात्मा के ममान जानकर सदा म्पनभव करना चाहिये जिमसे सहज सुख का लाभ हो। (२५) श्री पद्मनंदि मुनि सिद्धस्तुति में कहते हैं:- म्याच्छब्दामृतगर्भितागममहारत्नाकरम्नानतो धोता यम्य मतिः स एव मनुते तत्तं विमुक्तात्मनः । तत्तस्यैव तदेव याति सुमतेः साचानुपादेयता भेदेन स्वकृतेन तेन च विना स्वं रूपमेकं परम् ॥१४॥ भावार्थ जिस पुरुष की मति स्याद्वादरूपी जल के भरे समुद्र मे स्नान करने से धोई गई है-निर्मल हो- गई है वही शुद्ध व मुक्त श्रात्मा के यथार्थ स्वरूप को जानता है, तथा वह उसी स्वरूप को ग्रहण करने योग्य साक्षात मानता है । व्यवहार से सिद्ध मे व ससारी मे भेद किया हुआ है। यदि निश्चय से इस भेद कोदूर कर दिया जावे तो जो सिद्ध स्वरूप है वही इस अपने प्रात्मा का स्वभाव है,उसी को ही अनुभव करना योग्य है। - - सहज-सुख-साधन । [ ३०७ है यः सिद्ध परमात्मनि, प्रविततज्ञानकमतौं किल ज्ञानी निश्चयतः स एव सकलप्रज्ञावतामग्रणी । तर्कव्याकरणादिशास्त्रसहितैः किं तत्र शुन्यैर्यतो उधोगं विदधाति वेध्यविषये तद्वाणमावर्ण्यते ॥२४॥ भावार्थ-जो पुरुप विस्तीर्ण ज्ञानाकार श्रीसिद्ध परमात्मा को जानता है वही सर्व युद्धिमानों में शिरोमणि है । जो सिद्ध परमात्मा के ज्ञान से शून्य होकर तर्क व्याकरण आदि शास्त्रों को जानता है तो उससे क्या प्रयोजन होगा ? बाण तो उसे ही कहते हैं जो निशाने को वेध सके अन्यथा व्यर्थ है। आत्मज्ञान ही यथार्थ ज्ञान है, उसके बिना अनेक विद्याए आत्महितकारी नहीं हैं। (२६) श्री पद्मनंदि मुनि सदोधचन्द्रोदय में कहते हैं: तावदेव मतिवाहिनी सदा धावति श्रुतगता पुरः पुरः। यावदन परमात्मसंविदा भिद्यते न हृदयं मनीषिणः ॥ ३६ ॥ भावार्थ इस जगत मे जब तक परमात्मा का ज्ञान मानव के हृदय में नहीं विराजता है तब तक ही बुद्धि रूपी नदी, शास्त्ररूपी समुद्र की तरफ आगे आगे दौड़ती रहती है । प्रात्मा का अनुभव होते ही बुद्धि स्थिर हो जाती है। बाह्य शास्त्रगहने विहारिणी या मतिर्वहुविकल्पधारिणी । चित्स्वरूकुपलसद्मनिर्गता सा सती न सदृशी कुयोषिता ॥ ३८ ॥ भावार्थ-जो बुद्धि अपने चैतन्यरूपी कुल घर से निकलकर बाहरी शास्त्रों के वन में बिहार करती हुई नाना विकल्प करनेवाली है वह बुद्धि सती स्त्री के समान पतिव्रता नहीं है किन्तु खोटी स्त्री के समान व्यभिचारिणी है । पुद्वि वही सफल है जो अपने ही आत्मा में रमण करें, अनेक शास्त्रों के विकल्प भी न करें। सुप्त एवं बहुमोहनिद्रया दीर्घकालमविरामया जनः । शास्त्रमेतदधिगम्य सांग्रतं सुप्रबोध इह जायतामिति ॥ ४६ ।। भावार्थ- -यह मानव दीर्घकाल से लगातार मोहरूपी निद्रा से मो रहा है । अब तो उसे अध्यात्म शास्त्र को जानना चाहिये और आत्मज्ञान को जागृत करना चाहिये । (२७) श्री पद्मनदि मुनि निश्चयपंचाशत में कहते हैं व्यवहृतिरबोधजनबोधनाय कर्मक्षयाय शुद्धनयः । स्वार्थ मुमुक्षुरहमिति वच्ये तदाश्रित किंचित् ॥ ८ ॥ भावार्थ-व्यवहार नय अज्ञानी को समझाने के लिये है परन्तु शुद्ध निश्चय नय की के क्षय के लिये है । इसलिये मैं मोक्ष का इच्छुक होकर अपने आत्मा के कल्याण के लिये “ उस शुद्व निश्चय नय के आश्रित ही कुछ कहेंगा।"
३०८] सम्यग्ज्ञान और उसका महात्म्य । । हिंसोज्झित एकाकी सर्वोपद्रवसहो वनस्थोऽपि । तरुरिव नरो न सिद्धयति सम्यग्नोधाते जातु ॥ १६ ॥ भावार्थ-जो मुनि अहिसा धर्म पालता हुआ, एकाकी सर्व प्रकार के कणों को व उपसर्गों को सहता हुश्रा वन में रहता है परन्तु आत्मज्ञान मई सम्यग्ज्ञान से शून्य है वह मुक्त नहीं हो सकता । वह वन में वृक्ष के समान ही रहनेवाला है। (२८) श्री पद्मनन्दि मुनि परमार्थविंशति में कहते हैं- यत्सातं यदसातमङ्गिपु भवेत्तत्कर्मकार्य तत- स्तत्कमैवतदन्यदात्मन इदं जानन्ति ये योगिनः । ईदृग्मेद विभावनाकृतधियां तेषां कुतोहं सुखी । दुःखी चेति विकल्पकल्मपकला कुर्यास्पदं चेतमि ।। १२ ॥ भावार्थ-प्राणियों को साता तथा असाता होती है सो कमी के उदय का कार्य है । इसलिये वह कार्य भी कर्मरूप ही है । वह आत्मा के स्वभाव से भिन्न है ऐसा योगीगण जानते हैं। उनके भीतर भेदज्ञान की वृद्धि होती है तब यह विकल्प कि मैं सुखी हू या मैं दुःखी हूँ उनके मनमें कैसे हो सकता है ? (२६) श्री कुलभद्राचार्य सारसमुच्चय में कहते हैं--- ज्ञानभावनया जीवो लभते हितमात्मनः । विनयाचारसम्पन्नो विषयेषु पराङ्गमुखः ॥ ४ ॥ भावार्थ-यह जीव पांचों इन्द्रियों के विषयो से विरक्त होकर विनय और प्राचार सहित ज्ञान की भावना करने से आत्मा के कल्याण को प्राप्त करता है। आत्मानं भावयेन्नित्यं ज्ञानेन विनयेन च । मा पुनर्पियमाणस्य पश्चात्तापो भविष्यति ।। ५ ।। भावार्थ-हे भव्य जीव ! नित्य आत्मा के शुद्ध स्वरूप की भावना ज्ञान के साथ विनय पूर्वक करो नहीं तो मरने पर बहुत पश्चाताप होगा कि कुछ न कर सके । मरण का समय निश्चित नहीं है इससे आत्मज्ञान की भावना सदा करनी योग्य है। नृजन्मनः फलं सारं यदेतज्ज्ञानसेवनम् । अनिगृहितवीर्यस्य संयमस्य च धारणम् ॥ ७ ॥ भावार्थ- मानव जन्म का यही सार फल है जो सम्यग्ज्ञान की भावना की जावे और अपने वीर्य को न छिपाकर संयम को धारण किया जावे। ।
सहज-सुख-साधन । [३०९ १ ज्ञानाभ्यास: सदा कार्यों ध्याने चाध्ययने तथा। तपसो रक्षणं चैव यदीच्छेद्धितमात्मनः ।। 8 || भावार्थ-हे भाई ! यदि अपने आत्मा का हित चाहते हो तो ध्यान तथा स्वाध्याय के द्वारा सदा ही ज्ञान का मनन करो और तप की रक्षा करो। ज्ञानादीत्यो हदिर्यस्य नित्यमुद्योतकारकः । तस्य निर्मलतां याति पंचेन्द्रियदिगङ्गना ।। १० ॥ भावार्थ-जिसके हृदय मे ज्ञान सूर्य सदा प्रकाशमान रहता है उसकी पांचों इन्द्रियों की दिशारूपी स्त्री निर्मल रहती है । अर्थात द्रिया विकार रहित अपना २ काम ऐसा करती हैं जिससे आत्मा का अहित न हो। सर्वद्वन्द्व परित्यज्य निभृतनान्तरात्मना । ज्ञानामृतं सदापेयं चित्ताल्हादनमुत्तमम् ।। १२ ।। भावार्थ-अतरात्मा सम्यग्दृष्टी को निश्चिन्त होकर सर्व रागद्वेषादि के झगड़े को छोड़कर चित्त को आनन्द देनेवाले उत्तम आत्मज्ञानरूपी अमृत का पान सदा करना चाहिये। ज्ञानं नाम महारत्न यन्न प्राप्त कदाचन । ससारे भ्रमता भीमे नानादुःखविधायिनि ॥ १३ ॥ अधुना तत्चया प्राप्त सम्यग्दर्शनसयुत्तम् । प्रमादं मा पुन: कार्षीविषयास्वादलालसः ॥ १४ ॥ भावार्थ-आत्मज्ञानरूपी महा रत्न है उसको अब तक कभी भी तू ने इस अनेक दुःखों से भरे हुए भयानक ससार में भ्रमते हुए नहीं पाया । उस महारत्न को आज तूने सम्यग्दर्शन सहित प्राप्त कर लिया है तब आत्मज्ञान का अनुभवकर विषयों के स्वाद की लालसा में पड़कर प्रमादी मत बन । शुद्ध तपमि सद्वीयं ज्ञान कर्मपरिक्षये । उपयोगिधन पात्रे यस्य याति स पडितः ॥ १८ ॥ भावार्थ-वही पडित है जिसका आत्मा का वीर्य शुद्ध तप में खर्च होता है, जो ज्ञान को कमी के क्षय में लगाता है तथा जिसका धन योग्य पात्रों के काम आता है। गुरुशुश्रूपया जन्म चित्त सद्धथानचिन्तया । श्रुतं यस्य समे याति विनियोगं स पुण्यभार ।। १६ ।। भावार्थ- वही पुण्यात्मा है जिसका जन्म गुरु की सेवा करते हुए बीतता है, जिसका मन धर्मध्यान की चिता में लीन रहता है तथा जिसके शासन का अभ्यास साम्यभाव की प्राप्ति के लिये काम में आता है।
३१०] सम्यग्ज्ञान और उसका महास्य । है नियतं प्रशमं याति कामदाहः सुदारुणः । ज्ञानोपयोगसामर्थ्याद्विपं मंत्र पदैर्यथा ॥ ११३ ।। भावार्थ-भयानक भी काम का दाह, श्रात्मध्यान व म्याध्याय में ज्ञानोपयोग के बल से नियम से शांत हो जाता है जैसे मंत्र के पदों से सर्प का विप उतर माता प्रज्ञाङ्गना सदा सेव्या पुरुपेण सुखावहा । हेयापादेयतत्वज्ञा या रता सर्वकर्मणि ॥ २५८ ॥ भावार्थ-प्र प्रज्ञा या भेदविनानमई विवेक बुद्धि सर्व कार्यों में त्यागने योग्य व ग्रहण करने योग्य तत्व को जाननेवाली रहती है। इसलिये हरएक पुरुप को उचित है कि इस सुखकारी प्रज्ञारूपी स्त्री की सदा सेवा करें। सत्येन शुद्धयते वाणी मनो ज्ञानेन शुद्धयति । गुरुशुश्रुपया कायः शुद्धिरेप सनातनः ॥ ३१७ ।। भावार्थ-वाणी की शुद्धि सत्य वचन से रहती है, मन सम्यग्ज्ञान से शुद्व रहता है गुरुसेवा से शरीर शुद्ध रहता है, यह सनातन से शुद्धि का मार्ग है (३०) श्री शुभचन्द्र प्राचार्य ज्ञानार्णव में कहते हैं:- त्रिकालगोचगनन्तगुणपर्यायसंयुताः । यत्र भावाः स्फुरन्त्युच्चैस्तज्ज्ञानं ज्ञानिनां मतम् ॥ १-७॥ भावार्थ-जिसमें तीन काल के गोचर अनन्त गुण पर्याय मयुक्त पदार्थ अतिशय रूप मे प्रतिभासित होते हैं उसी को ज्ञानियों ने ज्ञान कहा है। ज्ञान वही है जो सर्व लेयों को जान सके । अनन्तानन्तभागेऽपि यस्य लोकश्वराचरः। अलोकश्च स्फुरत्युच्चैस्तज्जयोतियोगिनां मतम् ।। १०-७॥ भावार्थ-केवलज्ञान ज्योति का स्वरूप योगियों ने ऐसा कहा है कि जिस ज्ञान के अनंतानन्द भाग में ही सर्व चर चर लोक तथा अलोक प्रतिभासित हो जाता है। ऐसे अनत लोक हों तो भी उस ज्ञान में झलक जावें । इतना विशाल व आश्चर्यकारी केवलज्ञान है। अगम्यं यन्मृगाङ्कम्य दुर्भेद्य यद्रवेरपि । तदुर्योधोद्धतं ध्वान्तं ज्ञानभेद्य प्रकीर्तितम् ॥ ११-७ ।। भावार्थ-जिस मिथ्यात्व के अधकार को चन्द्रमा नहीं मेट सकता, सूर्य नहीं भेद सकता उस अज्ञाना- धकार को सम्यग्ज्ञान मेट देता है, ऐसा कहा गया है। बोध एव दृढः पाशो हृषीकमृगवन्धने । गारुडश्च महामंत्र: चित्तभोगिविनिग्रहे ।। १४-७॥
सहज-सुख-साधन। [३११ भावार्थ-इन्द्रियरूपी मृगों को बांधने के लिये सम्यग्ज्ञान ही दृढ फांसी है, और चित्तरूपी सर्प को वश करने के लिये सम्यग्ज्ञान ही एक गारुड़ी महामन है। यज्ञानपूर्विका चेष्टा यतेर्यस्यात्र भूतले । स बध्नात्यात्मनात्मानं कुर्वन्नपि तपश्चिरं ॥ १६-७ ।। भावार्थ-इस पृथ्वीपर जो साधु अज्ञानपूर्वक आचरण पालता है वह दीर्घकाल तक तप करता रहे तो भी अपने को कर्म से वाधेगा। अज्ञानपूर्वक तप वन्ध ही का कारण है। ज्ञानपूर्वमनुष्ठान निःशेष यस्य योगिनः । न तस्य बन्धमायाति कर्म कस्मिन्नपि क्षणे ॥ २०-७ ॥ भावार्थ-जिस मुनि का सर्व प्राचरण ज्ञानपूर्वक होता है उसके कमी का वध किसी भी क्षण में न ही होता है। दुरिततिमिरहंसं मोक्ष लक्ष्मीसरोजं । मदनभुजगमन्त्रं चित्तमातङ्गसिंह । व्यसनघनसमीरं विश्वतत्वैकदीपं । विषयशफरजाल ज्ञानमाराधय स्व ॥ २२-७ ।। भावार्थ-हे भव्य जीघ ! सम्यग्ज्ञान की आराधना करो । यह सम्यग्ज्ञान पापरूपी अधकार के हरने को सूर्य के समान है, मोक्षरूपी लक्ष्मी के निवास के लिये कमल के समान है, कामरूपी सर्प के कीलने को मत्र के समान है, मनम्पी हाथी के वश करने को सिंह के समान है, आपदारूपी मेघों को उडाने के लिये पवन समान है, समस्त तत्वों को प्रकाश करने के लिये दीपक के समान हैं, तथा पांचों इन्द्रियों के विषयों को पकड़ने के लिये जाल के समान है । तद्विवेच्य ध्र वं धीर ज्ञानार्कालोकमाश्रय । विशुष्यति च य प्राप्य रागकल्लोलमालिनी ॥ २२-२३ ॥ भावार्थ-भले प्रकार विचार करके हे धीर प्राणी तू निश्चय से आत्मज्ञानरूपी सूर्य के प्रकाश का श्राश्य ले जिस सूर्य के प्रकाश के होने से रागरूपी नदी सूख जाती है । अलब्धपूर्वमासाद्य तदासौ ज्ञान दर्शने । वेत्ति पश्यति निःशेष लोकालोकं यथास्थितम् ॥ ३१-४२॥ तदा स भगवान् देवः सर्वज्ञः सदोदितः । अनन्तसुखवीर्यादिभूतेः स्यादग्रिमं पदम् ।।३२-४२।। भावार्थ-केवली भगवान चार घातीय कर्म के नाश होने पर जिनको पहले कभी प्रगट नहीं किया था उन केवलज्ञान व केवलदर्शन गुणों को प्रगट कर सर्व लोक और अलोक यथावत देखते जानते हैं तब ही वे . के - ३१२] मम्यग्ज्ञान और उसका महात्म्य । भगवान् सर्व काल प्रकाश करनेवाले सर्वज्ञ देव होते हैं और अनत सुग्व और अनंत वीर्य श्रादि विभूति के प्रथम स्वामी होते हैं। (३१) श्री ज्ञानभूपण भट्टारक तत्वज्ञानतरंगिणी में कहते हैं: अर्थान् यथास्थितान् सर्वान् समं जानाति पश्यति । निराकुलो गुणी योऽमौ शुद्धचिद्रूप उच्यते ॥ ३-१ ।। भावार्थ-जो सर्व पदार्थों को जैसा उनका स्वरूप है इसी रूप से एक ही साथ देखता है व जानता है तथा जो निराकुल है और गुणों का भण्डार है, उसे शुद्ध चैतन्य प्रभु परमात्मा कहते हैं। दुर्लभोऽन जगन्मध्ये चिद्र्परुचिकारकः । ततोऽपि दुर्लभं शास्त्र चिद्रूपप्रतिपादकं ॥ ८-८ ॥ ततोऽपि दर्लभो लोके गरुस्तदुपदेशकः । ततोऽपि दुर्लभं भेदज्ञानं चितामणिर्यथा ॥ ६-८ ॥ भावार्थ-इस लोक मे शुद्ध चैतन्य के स्वरूप की रुचि रखनेवाला मानव दुर्लभ है, उससे भी कठिन चैतन्य स्वरूप के बतानेवाले शास्त्र का मिलना है। उससे भी कठिन उनके उपदेशक गुरु का लाभ होना है। भी मिल जाय तो भी चिन्तामणि रत्न के समान भेदविज्ञान का प्राप्त होना दुर्लभ है । यदि कदाचित भेदभिज्ञान हो जाय तो यात्मकल्याण मे प्रमाद न करना चाहिये । अछिन्नधाग्या भेदघोधन भावयेत् सुधीः। शुद्धचिद्रूपसप्राप्त्यै मर्यशास्त्रविशारदः॥ १३-८ ॥ भावार्थ-सर्व शास्त्रों का ज्ञाता विद्वान को उचित है कि शुद्व चैतन्य स्वरूप की प्राप्ति के लिये लगातार धारावाही भेदविज्ञान की भावना करे, आत्मा को आनात्मा से मिन्न मनन करे । सता वस्तूनि सर्वाणि स्याच्छब्देन वचासि च । चिता जगति व्याप्तानि पश्यन् सद्दृष्टिरुच्यते ।। ७-१२ ॥ भावार्थ वही सम्यग्दृष्टी व सम्यग्ज्ञानी कहा जाता है जिमको विश्वास है कि सर्व वस्तु सतरूप है तथा जो स्यात् शब्द के साथ वाणी बोलता है अर्थात् जो अनकात पदार्थ को समझाने के लिये भिन्न-भिन्न अपेक्षा से एक एक स्वभाव को बढ़ाता है तथा जिमको यह विश्वास है कि ज्ञान अपने विषय की अपेक्षा जगत व्यापी है। स्वस्वरूपपरिज्ञानं तज्ज्ञानं निश्चयाद् वर्ष । कर्मरेणूच्चये बातं हेतु विद्धि शिवश्रियः ।। १२-१२ ॥ भावार्थ-अपने शुद्ध आत्म स्वरूप का जानना वह श्रेष्ठ निश्चय सम्यग्ज्ञान है । इस ही से कमी का श्वय होता है तथा इसी को मोक्षलक्ष्मी की प्राप्ति का साधन जानो। वह सहज-सुख-साधन। [३१३ यदि चिद्रूपेऽनुभवो मोहाभावे निजेत्तचात् । तत्परमज्ञानं स्यादहिरंतरसंगमुक्तस्य ॥ १३-१२ ।। भावार्थ-बाहरी भीतरी दोनो प्रकार के परिग्रह से रहित साधु के मोह के अभाव होने पर जो अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का अनुभव होता है वह उत्कृष निश्चय सम्यग्ज्ञान है । शास्त्राद् गरोः सधर्मादेर्ज्ञानमुत्पाद्य चात्मनः । तस्यावलमनं कृत्वा तिष्ठ मुचान्यसंगति ॥ १०-१५ ॥ शास्त्र को मननकर, सद् गुरु के उपदेश से व साधर्मी भाइयों की सगति से अपने आत्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर के उसीका आलम्बन लेकर तिष्ठ, उसीका मनन ध्यान और चितवन कर, परपदार्थों की सगति छोड । ज्ञेयावलोकनं ज्ञानं सिद्धानां भविनां भवेत् । आद्यानां निर्विकल्पं तु परेपां सविकल्पकं ॥ ८ १७ ॥ भावार्थ-जानने योग्य पदार्थो का देखना व जानना सिद्ध और संसारी दोनों को होता है। सिद्धों के ह ज्ञान दर्शन निर्विकल्प है, निराकुल स्वाभाविक समभाव रूप है, जब कि संसारी जीवों के ज्ञान दर्शन विकल्प है, अाकुलता सहित है। भावार्थ- शास्त्र (३२) प० बनारसीदासजी समयसारनाटकमें कहते हैं सवैया २३ । जोग धरे रहे जोगसु भिन्न, अनत गुणातम केवलज्ञानी । तासु हृदे द्रहसो निकसी, सरिता समव्है श्रुत सिंधु समानी ।। याते अनत नयातम लक्षण, सत्य सरूप सिद्धात वखानी। बुद्धि लखे न लखे दुरबुद्धि, सदा जगमाहि जगे जिनवाणी ॥ ३ ॥ मवैया ३१ । निहचेमें एकरूप व्यवहार में अनेक, याही नय विरोधने जगत भरमायो है । जगके विवाद नाशिवेको जिनागम है, ज्यामें स्याद्वादनाम लक्षण सुहायो है ।। दर्शनमोह जाको गयो है महजरूप, आगम प्रमाण ताके हिर देमे आयो है । अनयसो अखडित अनूतन अनत तेज, ऐसो पद पूरण तुरन्त तिन पायो है ।। ५॥ परम प्रतीति उपजाय गणधर कीसी, अतर अनादिकी विभावरा विदारी है। भेदज्ञान दृष्टिसों विवेककी शकति साधि, चेतन अचेतनकी दशा निरवारी है ।। करमको नाशकरि अनुभौ अभ्यास धरि, हियेमे हरखि निज शुद्धता संभारी है। अतराय नाश गयो शुद्ध परकाश भयो, ज्ञानको विलास ताको वदना हमारी है ।। २ ॥
३१४] सम्यम्झान और उसका महात्म्य । कवित्त । क्षेयाकार शानको परिणति, पं वह शान शेय नहिं होय । यरूप पट् द्रव्य भिन्न पद, मानम्प यातम पद मोय ॥ जाने भेद भाव सुविक्षण, गुण लक्षण सम्यक हग जोय । मरत कहे मान महि आकृति, प्रगट फलक लय नहिं कोय ॥५२॥ (३३) पं. द्यानतरायजी धानतविलास में कहते है- मया २३। कर्म सुभासुभ जो अन्यागत, आवत है जब जानत माना। पूरव भ्रामक भाव किये बह, सो फल मोहि भयो सुग्रहाता ।। गो जइस्प सरूप नही मम, मैं निज सुद्ध सुमावहि राना। नाश करौं पलमे सत्रौं श्रय, जाय यमी मियत विख्याता ||५|| मिद्ध हुए "प्रय होइ जु होडने, ते सय ही अनुभागुनमेती। नाविन एक न जीव लद मिव, घोर करो किरिया यह ज्यौ तुपमा नहीं कनलाभ, किये नित उगमकी विधि जेती। यो लग्वि श्रादरिये निजभाव, विभाव विनाम कला शुभ एनी १६६॥ केती॥ सया ३१ । है चेतन के भाव दोय ग्यान ओ अग्यान जोय, एक निजभाव दूजों परउतपात तातै एक भाव गही दूजी भाव मूल दही, जाने मिवपद लहो यही ठीक बात है। भावको दुबायो जीव भाव ही सौं सुन्वी होय, भाव ही कौं फेरि फेरै मोखपुर जात है । यह सौ नीको प्रसंग लोक कहैं सरवग, प्रागही को दाधो अग प्राग ही सिरात है ।।१०७॥ केई केई चार जीव भूपति प्रचंड भयो, केई केई बार जीव कीटरूप धया है। केई केई वार जीव नौ ग्रीवक जाय वस्या, कई बार सात मैं नरक अवतरयों है । केई केई बार जीव राघौ मच्छ होइ चुक्यौ, केई वार माधाग्न तुच्छ काय वरगो है। सुख और दुःख दोऊ पावत है जीव सदा, यह जान ग्यानबान हर्प सोक हरयौ है ।।११५।। बार बार कहैं पुनरुक्त दोष लागत है, जागत न जीव तू तो सोयौ मोह झग मै। श्रातमासेती विमुख गहै राग दोपरूप, पचइद्रीविपैसुखलीन पग पग मे ॥ पावत अनेक कष्ट होत नाहिं अष्ट नष्ट, महा पद मिष्ट भयो भमै सिएमग में। जागि जगवासी तू उदासी है के विषयसौं, लागि शुद्ध अनुभौ ज्यौ श्रावै नाहिं जग मैं ।।११७।। . छपे । तिय मुख देखनि अध, मूक मिथ्यात मननौं । बधिर दोष पर सुनन, लुज पटकाय हननको ।।
महज-सुख-साधन । [३१५ पगु उत्तीरय चलन, सुन्न हिय लेन धरनको। "प्रालमि विपयनि माहि, नांहिं चल पाप फरनकौं ।। यह 'प्रगहीन विछ कामकी, कर कहा जग बैठकै । पानत ताते आठौं पहर, रहै श्राप घर पेठकैं ।।५।। होनहार सो होय, होय नहिं अन-होना नर । हरप सोक क्यो करे, देख सुख दुख उटैंकर ।। हाय कह नहि परै. भाव-मसार बहावै । मोद्द करमको लिया, तहा सुख रच न पावै ।। यह चाल महा मूरएतनी, गेय रोय आपद सहै। ग्यानी विभाव नासन निपुन, ग्यानरूप लखि सिव लहै ।।६।। कवित्त । देव गुरु सुम धर्मको जानिये, सम्यक श्रानिय मोखनिसानी । मिनित पहले जिन मानिय, पाठ पढे हूजियै श्रुतग्यानी ।। सूरज दीपक मानक चदने, जाय न जा तम सो तम हानी। घानत मोहि कृपाकर दो वर, दो कर जोरि नौं जिनवानी ॥२०॥ मवैया २३ । जाहीको ध्यावन भ्यान लगावत, पावत है रिमि पम पदीको । जा थुति इद फनिंद नरिद, गनेस करें सब छाडि मयीकौं । जाहीको वेद पुरान बतावत, धारि हरै जमराज पदीकौं । द्यानन मी घट माहि लखौ नित, त्याग अनेक विकल्प नहीको ।।३३।। (३४) मैया भगवतीदासजी ब्रह्मविलाम में कहते हैं:- - सर्वया ३१ जो पैं तोहि तरिवेकी इच्छा कछू भई भैया, तो तौ वीतरागजू के वच उर धारिये । भौसमुद्रजल में अनादि ही तै बूडत हो, जिननाम नौका मिली चित्त न टारिये ।। खेवट विचारि शुद्व थिरतासो ध्यान काज, सुग्वके समूहको सुदृष्टिसौ निहारिये । चलिये जो इह पय मिलिये श्यौ मारग में, जन्मजरामरन के भय को निवारिये ॥८॥ X X x वीतराग वानीकी न जानी बात प्रानी मूढ, ठानी से क्रिया अनेक प्रापनी हठाहठी । कर्मनके वध कौन अन्ध कछू सूझै तोहि, रागट्ठोष पर्णितमों होत जो गठागठी ।।
३१६] सम्यम्मान और उनका महात्म्य । प्रन्थनके पाठ आतमा के जीत की न रीत कहूँ जाने रच, तू कर कहा पठापठी। मोहको न कियो नाश सम्यक न लियो भाम, सृत न कपास कर कोरीसो लठालठी ॥१०॥ x x x X सुन जिनवानी जिह पानी तज्यो गगद्वप. तई धन्य धन्य जिन श्रागममें गाये है। अमृत समानी यह जिहें नाहिं उर 'प्रानी, तेई मूढ़ प्रानी भावभवरि भ्रमाये है ।। याही जिनवानी को सवाट सुखचाग्यो जिन, तेही महाराज भये करम नमाये हैं। ताते हग खोळ 'भया' लेहु जिनवानी लग्वि, सुग्वके समूह मय याही में बताये हैं ||४|| x X x x केवली के ज्ञानमे प्रमाग आन मब भास, लोक प्रो अलोकनकी जेती कछु बात है । अतीत काल भई है अनागतम होयगी, वर्तमान ममेकी विदित यो विख्यात है। चेतन अचेतन के भाव विद्यमान सबै, एक ही समैमें जो अनत होत जात है। ऐसी कछु क्षानकी विशुद्धता विशेष बनी, ताको धनी यह हम कमें विललात है ।।२।। छप्पै । जान उदित गुण उदित, मुदित भई कर्म कपायें। प्रगटत पर्म स्वरूप, ताहि निज लेत लखायें । मन परिग्रह त्याग, हेत निठ, निज मानत । जानत सिद्ध समान, ताहि उर अन्तर ठानत ।। सो अविनाशी अविचल दरय, सर्व ज्ञेय ज्ञायक परम । निर्मल विशुद्ध शाश्वत सुथिर, चिदानंद चेतन धरम ||८|| कवित्त । ग्यारह अंग पर्दै नब पूरव, मिथ्या बल जिय करहि बखान । दे उपदेश भव्य समुझावत, ते पावत पदवी निर्वान ।। अपने उरमें मोइ गहलता, नहि उपज उपजे सत्यारथ ऐसे दरवश्रुत के पाठी, फिरहिं जगत भारखें भगवान ॥११॥ ज्ञान। . स all सहज-सुख-साधन । [३१७ अध्याय नवां। सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । है। यह बात बताई जा चुकी है कि यह संसार असार है, दुःखों का सागर है, शरीर अपवित्र व नाशवत है, भोग तृप्तिकारी व आकुलतामय है । अतीन्द्रिय सहज सुग्व ही ग्रहण करने योग्य सच्चा सुख है । वह सुख आत्मा ही का स्वभाव है । इसलिये सहन सुस्त्र का साधन आत्मानुभव है या आत्मध्यान इसी श्रात्मानुभव को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र की एकता कहते हैं। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का निश्चयनय तथा व्यवहारनय से कुछ स्वरूप कहा जा चुका है। अब इस अध्याय में सम्यक्- चारित्र का कुछ सक्षिप्त कथन किया जाता है । निश्चयनय से सम्यकचारित्र-अपने शुद्ध आत्मरवरूप मे स्थिरता प्राप्त करना, रागद्वेष मोह के विकल्पों से रहित हो जाना, निश्चय सम्यक् चारित्र है। प्रात्मा का स्वभाव यदि विचार किया जावे तो वह शुद्ध अखड ज्ञानानन्दमय द्रव्य है । वही परमात्मा, वही भगवान, वही ईश्वर, वही परब्रह्म, वही परम ज्योतिस्वरूप । उसका यह स्वभाव कभी मिटा नहीं, मिटता नहीं, मिटेगा नहीं। उस आत्मा के स्वभाव में न कुछ बध है जिससे मुक्ति करने की कल्पना हो, न कोई रागादिभाव है जिनको मिटाना हो, न कोई ज्ञानावरणादि कर्म हैं जिनसे छूट ना हो, न कोई शरीरादि नोकर्म है जिनकी सगत हटाना हो । यह प्रात्मा विकारों से रहित यथार्थ एक ज्ञायक स्वरूप परम शुद्ध समयसार है, स्वसमय है, निराबाध है, अमृतिक है. शुद्ध निश्चयनय से उसमें किसी साधन की आवश्यकता नहीं है । वह सदा ही सहजानंद स्वरूप है । वहा सहज सुग्व के साधन की कोई कल्पना नहीं है । यह सब द्रव्यार्थिक नय से शुद्ध द्रव्य का विचार है । इम दृधि में किसी भी साधन की जरूरत नहीं है । परन्तु पर्यायार्थिक नय या पर्याय की दृष्टि देख रही है। और ठीक ठीक देख रही है कि इम ससारी आत्मा तेजस कार्माण दो सूक्ष्म शरीर प्रवाह रूप से माथ साथ चले आ रहे हैं । इम कार्माण शरीर के ही कारणों से रागद्वेप, मोह आदि भाव कर्म पाए जाते हैं तथा औनारिक, वैक्रियक, अाहारक व अन्य बाहरी मामग्रीरूपी नोकर्म का मयोग है। इस अवस्था के कारण ही इस जीव को जन्म मरण करना पडता है, दुःख व सुखके जालमें फमना पडता है, बार-बार कर्म बंध करके उसका फल भोगते हुए इस ससार में ससरण करना पड़ता है। इसी ० पर्याय दृष्टि से या व्यवहार नय से सहज सुाव साधन का विचार है। रत्नत्रय का साधन इसी दृष्टि से 'करने की जरूरत है, सम्यग्दर्शन से जब आत्मा का सच्चा स्वरूप श्रद्वा में, प्रतीति में, रुचि में जम जाता है, सम्यग्ज्ञान से जब श्रात्मा का स्वरूप सशयादि रहित परमात्मा के समान ज्ञाता दृष्टा आनदमय जाना जाता है, तब सम्यक्चारित्र से इसी श्रद्धा व ज्ञान सहित शुद्ध श्रात्मीकभाव में रमण किया जाता है, चला जाता है, परिणमन किया जाता है, तिष्ठा जाता है । यही सम्यक चारित्र है। के साथ ।
३१८] सम्यग्ज्ञान पीर उमका महास्य । इसीलिये चारित्र की बडी भारी आवश्यकता है। किसी को मात्र श्रद्धा व नान करके हो मतोपित न हो जाना चाहिये । किन्तु चारित्र का अभ्यास करना चाहिये । बिना चारित्र के श्रद्धान और ज्ञान अपने अभीष्ट फलको नहीं दे सकते। एक मनुष्य को श्रद्धान व ज्ञान है कि यह मोती की माला है, पहिनने योग्य है, पहिनने से शोभा होगी परन्तु जब तक वह उसको पहिनेगा नहीं तब तक उनकी शोभा नहीं हो सकती। बिना पहिने हुए ज्ञान श्रद्धान व्यर्थ है । एक मानब के सामने रसीले पकवान बरफी, पेठा, लाडू. श्रादि पदार्थ रवसे हैं वह उनका ज्ञान व श्रद्धान रखता है कि ये मेवन योग्य है, इसका सेवन लाभकारी है, स्वादिष्ट है, परन्तु जबतक वह उन मिष्ट पढाथों का सेवन एकाग्र होकर न करेगा तबतक उसका श्रद्धान व ज्ञान कार्यकारी नहीं है। एक मानव के सामने पुप्पो का गुन्छा पडा हुआ है । वह जानता है व श्रद्वान रखता है कि यह सू घने योग्य है । सूधने से शरीर को लाभ होगा परन्तु यदि वह मू घे नहीं तो उसका ज्ञान व श्रद्धान कुछ भी काम का नहीं होगा। एक मानव को श्रद्धान है व जाल है कि बम्बई नार देखने योग्य है। परन्तु जय तक वह बम्बई में आकर देखेगा नहीं तर तक उसका ज्ञान अद्वान सफल न होगा। एक मानव को श्रद्धान व ज्ञान है कि लाला रतनलालजी बडा ही मनोहर गाना बजाना करते हैं, बहुत अच्छे भजन गाते है । जबतक उनको सुनने का प्रबन्ध न किया जाय तबतक यह गाने बजाने का ज्ञान व श्रद्धान उपयोग नहीं दे सकता है । विना चारित्र के लान व श्रद्वान की मफलता नहीं। एक मदिर पर्वत के शिखर पर है । हमको यह अद्वान व ज्ञान है कि उम मदिर पर पहुचना चाहिये व उसका मार्ग इस प्रकार है. इस प्रकार चलेंगे तो अवश्य मदिर में पहुँच जावेंगे, परन्तु हम पालमी बने वैठे रहे, चलने का पुरुपार्थ न करें तो हम कभी भी पर्वत के मदिर पर पहुच नहीं सकते हैं । जो कोई अयथार्थ तत्वज्ञानी अपने को परमात्मावत ज्ञाता हण अकर्ता अमोक्ता वन्ध व मोक्ष से रहित मानकर, श्रद्वान कर, जानकर ही संतुष्ट हो जाते हैं और स्वच्छद होकर रागद्वेप बर्द्धन कारक कार्यों में प्रवृत्ति रखते रहते हैं कभी भी आत्मानुभव का या प्रात्मध्यान का साधन नहीं करते हैं वे कभी भी अपने श्रद्धान व ज्ञान का फल नहीं पा सकते । वे कभी भी सहज सुख का लाभ नहीं कर सकते । वे कभी भी कमा से मुक्त स्वाधीन नहीं हो सकते । - यथार्थं तत्वज्ञानी स्वतत्व रमण को ही मुख्य सहजसुख का माधन व मुक्ति का मार्ग मानते हैं । यही जैन सिद्धात का सार है । अतएव निश्चासम्यक् चारित्र के लाभ की आवश्यकता है, की जरूरत है, आत्म ध्यान करना योग्य है । इसका स्वरूप पहले बताया जा चुका है । आत्मा का यथार्थ ज्ञान व यथार्थ श्रद्धान होते हुए जितने अश में स्वस्वरूप में थिरता, एकाग्रता, तन्मयता होगी वही निश्चय सम्यक्चारित्र है। जैन सिद्धात ने इसीलिये स्वात्मानुभव की श्रेणिया बताकर अविरत सम्यग्दृष्टि स्वात्मानुभव को दोज का चन्द्रमा कहा है। वही पाचवे देशविरत गुणस्थान में अधिक प्रकाशित होता है ।छठे प्रमत्तविरत में इससे अधिक, अप्रमत्त विरत में इससे अधिक-श्रेणीमें उमसे अधिक, क्षीण मोह गुणस्थान में उससे महज-सुख-साधन । [३१९ अधिक, संयोग केवली परमात्मा के पूर्णमामी के चन्द्रमा के समान स्वात्मानुभव प्रकाशित हो जाता है। इमी स्वानुभव को ही धर्म ध्यान तथा शुक्ल ध्यान कहते हैं । इसी को शुद्व योग कहते हैं । इसी को कारण समय सार कहते हैं, परमात्मा के स्वानुभव को कार्य समयसार कहते हैं। इसी को सहज सुख साधन कहते हैं । परमात्मा के स्वानुभव पूर्ण अनंतसुख को सहज सुख साध्य कहते हैं। वास्तव में मन, वचन, कार्यों की चचलता रागद्वेष मोह से या कपायों के रंग से रगी हुई स्वास्मा- नुभवमें बाधक है । जितनी २ यह चचलता मिटती जाती है उतनी उतनी ही स्वात्मानुभवकी कला अधिक अधिक चमकती जाती है । जैसे पवन के झोंको मे समुद्र क्षोभित होकर थिर नहीं रहता है, जितना २ पवन का झोका कम होता जाता है उतना २ क्षोभपना भी कम हो जाता है। जब पवन का सचार बिलकुत नहीं रहता है तब समुद्र बिलकुल थिर हो जाता है उसी तरह रागद्वेष या कषायों के झकोरे जितने अधिक होते हैं उतना ही श्रात्मा का उपयोग रूपी जल शोभित व चचल रहता है। जितना २ कषायों का उदय घटता जाता है, चचलता कम होती जाती है, कपायो का अभाव शुद्वात्मचर्या को निष्कम्प प्राप्त करा देता है। स्वपर को - निश्चय सम्यकचारित्र या आत्मानुभव की प्राप्ति का एक सहज उपाय यह है कि विश्व को व व्यवहार नय से देखना वद करके निश्चय नय से देखा जावे। निश्चय नय की दृष्टि में जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म आकाश, काल ये छहों द्रव्य पृथक २ अपने मूल स्वभाव में ही दिखलाई पड़ेंगे। धर्म, अधर्म, काल, आकाश तो सदा ही स्वभाव मे रहते हैं, वे वैसे ही दिख पडेगे। पुद्गल रूप शुद्ध परमाणु रूप दिखलाई देंगे। उनकी शोभनीक व अशोभनीक मकान मदिर महल वस्त्र आभूषण वर्तन आदि की अवस्थाए बिलकुल नहीं दिखलाई देंगी। तथा जितने जीव हैं सब शुद्ध परमात्मा के समान दिखलाई पड़ेंगे। आप भी परमात्मा रूप अपने को मालूम पड़ेगा। इस दृष्टि से देखते हुए रागद्वेष की उत्पत्ति के सब कारण हट जावेंगे। छोटे बड़े ऊच, नीच की, स्वामी सेवक की, मित्र शत्रु की, वधु अबंधु की, स्त्रो पुरुष की, मानव या पशुकी सर्व कल्पनाएँ दूर होजायगी । सिद्ध ससारी का भेद भी मिट जायगा । अशुचि व शुचि पदार्थकी कल्पना भी चली जायगी । फल यह होगा कि परम समताभाव जागृत हो जायगा, समभावरूपी सामायिक का उदय हो जायगा । यह स्वात्मानुभवकी प्राप्ति की सीढ़ी है। फिर वह समष्टि ज्ञाता आत्मा केवल अपने ही प्रात्माकी तरफ उपयुक्त हो जाता है । कुछ देर के पीछे निर्विकल्पता आजाती है, स्वरूपमें स्थिरता हो जाती है, स्वानुभव हो जाता है, यही निश्चय सम्यक्चारित्र है । निश्चय सम्यक्चारित्र स्वात्मानुभवरूप ही है। न यहा मनका चिन्तवन है न वचनका जल्प या मनन है, न कायका इलन चलन है-मन, वचन, कायकी क्रियासे अगोचर वास्तव मे स्वात्मानुभव होते हुए मनका मरण ही हो जाता है या लोप ही हो जाता है या उसका अस्त ही जाता है । मन, वचन, कायके विकारों के मध्यमें पड़ा हुआ निर्विकार आत्मा आत्मारूपसे झलक जाता है, घिकार मब मिट जाते हैं। सम्यक्चारित्र बड़ा ही उपकारी है । इमीका अभ्यास वीतराग विज्ञानमय भावकी उन्नति करना है व सराग व अज्ञानमय भावको दूर करता है । यह बात साधकको बराबर ध्यानमें रखनी चाहिये कि जबतक आत्मानुभव न हो तबतक निश्चय सम्यक्चारित्र का उदय नहीं हुआ । जैसे व्यापारी को हर एक व्यापार ne हो ३२०] सम्यग्झान और उसका महास्य । करते हुए धनागम पर लक्ष्य है, कुटुम्ब के भीतर सर्व प्राणियो का परिश्रम करते हुए, मकान में अन्नादि सामग्री एकत्र करते हुए, वर्तनादि व लकडी जमा करते हुए, रमोई का प्रबन्ध करते हुए, यही लक्ष्य रहता है कि हमारा सबका क्षुधारोग मिटे । इसी तरह साधक का लक्ष्य स्यात्मानुभव रहना चाहिये । सम्यक्चारित्र जितने अंश है वह एक अपूर्व प्रात्मीक भाव का झलकाव है जहा मम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान भी गर्भित है। वास्तव में उपयोगात्मक या भाव निक्षेपरूप सम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान वहीं होते है जहां सम्यक्- चारित्र होता है । जब स्वानुभव मे एकाग्रता होती है वहीं सम्यक्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व मम्यक्चारित्र तीनों की एकता है, वहीं मोक्षमार्ग है, वहीं कर्मों के संवर करने का उपाय है, वहीं ध्यान की अग्नि है जो पूर्व बद्ध कमी को दग्ध करती है । जैसे अग्नि की ज्वाला जलती हुई किसी चूल्हे में एक साथ दाहक, पाचक, प्रकाशक का काम कर रही है, वैसे स्वात्मानुभव की ज्योति जलती हुई सम्यकदर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्- चारित्र मई परिणमन करती हुई अपना काम कर रही है। अग्नि की ज्वाला एक साथ लकड़ी को जला रही है, भोजन को पका रही है, अंधकार को नाश कर रही है । इसी तरह स्वात्मानुभवरूप सम्यक्चारित्र से एक साथ ही कर्म जलते हैं, आत्मबल बढते हुए आत्मानन्द का स्वाद आता है तथा आत्मज्ञान की निर्मलता होती है, अज्ञान का अधकार मिटता जाता है। इसी सम्यक्चारित्र के धारावाही अभ्यास से मोहकर्म दग्य हो जाता है। फिर ज्ञानापरण, दर्शनावरण तथा अंतराय कर्म जल जाते है । अनंत बल, अनंत सुग्व का प्रकाश हो जाता है, अनत दर्शन व अनत ज्ञान झलक जाता है, आत्मा परमात्मा हो जाता है । सम्यक्चारित्र ही जीव को ससारी से मिद्ध अवस्था में बदल देता है। निश्चय सम्यकचारित्र की तरफ प्रेमभाव, प्रतिष्ठाभाव, उपादेयभाव, भक्तिभाव, अाराधकभाव, तीव्र रुचिभाव रहना चाहिये, तव ही इसकी वृद्धि होती जायगी। यह भी याद रखना चाहिये कि निश्चय सम्यक्चारित्र आत्मा के पूर्ण थिरतारूप चारित्र का उपादान कारण है-मूल कारण है । जैसे सुवर्ण की थोडी शुद्धता अधिक शुद्धता का उपादान कारण है । जैसे सुवर्ण की शुद्धता के लिये मसाले की व अग्नि की सहायता की जरूरत है, केवल सुवर्ण अपने आप ही शुद्ध नहीं हो सकता। हरएक कार्य के लिये उपादान तथा निमित्त दो कारणों की आवश्यकता है । उपादान कारण कार्यरूप वस्तु स्त्रय हुआ करती है, निमित्तकारण बहुत से सहकारी कारण होते हैं। गेहूँ से रोटी अपने ही उपादान कारण से पलटती हुई बनी है परन्तु निमित्त कारण चक्की, बेलन, तघा, अग्नि आदि मिले है । इसी तरह निश्चय सम्यक्चारित्र के लिये किनही निमित्तों की जरूरत है, जिससे उपयोग, निश्चिन्त होकर- निराकुल होकर स्वरूप रमण कर सके । ऐमे निमित्तों को मिलाने के लिये व्यवहार सम्यक्चारित्र की आवश्यकता है। व्यवहार सम्यक्चारित्र की सहायता से जितना जितना मन व इन्द्रियों पर विजय लाभ किया जायगा, जितना जितना मन, वचन, काय की प्रवृत्ति को रोका जायगा, जितना जितना इच्छा को घटाया जायगा, जितना जितना जगत के चेतन व अचेतन पदार्थों से सपर्क या संयोग दूर किया जायगा, जितना जितना ममता का घटाव किया जायगा, जितना जितना समता का बढाव किया जायगा, उतना उतना निश्चय सम्यक्चारित्र के प्रकाश का साधन बनता जायगा। इसीलिये व्यवहार सम्यक्चारित्र की आवश्यकता है। व्यवहार सम्यकचारित्र-जो असली चारित्र तो न हो परन्तु चारित्र के प्रकाश में सहायक हो उसको ही व्यवहार चारित्र कहते हैं । यदि कोई व्यवहारचारित्र पाले परन्तु उसके द्वारा निश्चय सम्यकचारित्र का सहज-सुख-साधन । [३२१ लाभ न कर सके तो वह व्यवहारचारित्र यथार्थ नहीं कहा जायगा, सम्यक् नहीं कहा जायगा । जैसे कोई व्यापार वाणिज्य तो बहुत करे परन्तु धन का लाभ नहीं कर सके तो उस व्यापार को यथार्थ व्यापार नहीं कहा जायगा। जैसे कोई भोजनादि सामग्री तो एकत्रकरे परतु रसोई बनाकरपेट में भोजन न पहुचा सकेतो उसका श्रारम्भ यथार्थ नहीं कहा जायगा, जहा निश्चय सम्यक्चारित्ररूप स्वात्मानुभव पर लक्ष्य है, उसी की खोज है, उसी के रमण का प्रेम है और तब उसमे निमित्त साधनों का संग्रह किया जाता है तो उसको व्यवहार सम्यक्चारित्र कहा जायगा। व्यवहार सम्यक्चारित्र दो प्रकार का है-एक अनगार या साधुचारित्र दूसरा सागार या भावकचारित्र । अनगार या साधचारित्र-यहां सक्षेप से सामान्य कथन किया जाता है । यह प्राणी क्रोध, मान, माया, लोभ इन कपायों के वशीभूत होकर रागी, द्वेपी होता हुआ अपने स्वार्थ साधन के लिये पांच प्रकार के पापकर्म किया करता है । हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म तथा परिग्रह (धन धान्यादि में मूर्छा) इनही का पूर्ण त्याग करना साधु का चारित्र है। इनही के पूर्ण त्याग को महाव्रत कहते हैं, इनही की दृढता के लिये पाच समिात तथा तीन गुप्ति का पालन किया जाता है। अतएव तेरह प्रकार का व्यवहारचारित्र साधु का धर्म कहलाता है। इनमें पांच महाव्रत मुख्य हैं:- पांच अहिसादि महाव्रत-अहिसा, सत्य अचौर्य, ब्रह्मचर्य, परिग्रह त्याग, ये पांच महाव्रत हैं । यद्यपि ये पांच हैं तथापि एक अहिसा महाव्रत मे शेप चार गर्भित हैं, असत्य बोलने से, चोरी करने से, कुशील भाव से, परिग्रह की तृष्णा से आत्मा के गुणों का घात होता है । अतएव ये सब हिंसा के ही भेद जहा हिंसा का सर्वथा त्याग है वहां इनका भी त्याग हो जाता है । शिष्य को खुलाशा करने के लिये इनका विस्तार इस प्रकार है:- है अहिंसा का बहुत साधारण स्वरूप तो यह है कि जो बात हम अपने लिये नहीं चाहते हैं वह वात इम दूसरों के लिये न चाहें, हम नहीं चाहते हैं, हमारे सबध में कोई बुरा विचार करे, कोई हमे झूठ बोल के व अन्य तरह से ठगे, हमे अपशब्द कहें, हमें मारे पीटे व हमारी जान लेवें व हमारी स्त्रीपर कोई कुदृष्टि करे, वैसे उनको भी दूसरों का बुरा न विचारना चाहिये । दूसरों को असत्य बोलकर व अन्य तरह न ठगना चाहिये , अपशब्द न कहना चाहिये, न दूसरों को मारना पीटना चाहिये न प्राण हरण करना चाहिये, न पर की स्त्री पर कुभाव करना चाहिये। ० इन सब बुरे कामों की प्रेरणा भीतर अशुद्ध भावों से होती है। इसलिये जिनरागद्वप या क्रोध,मान, माया,लोभादि या प्रमाद भाव से आत्मा के शुद्ध शातभाव का घात होता है उन भावों को भावहिंसा कहते हैं तथा अपने व दूसरों के द्रव्य प्राणों का घात करना द्रव्य हिंसा है । द्रव्य प्राणों का स्वरूप जीव द्रव्य के वर्णन में हो चुका है । भावहिंसा द्रव्यहिसा का कारण है । जिस समय क्रोध भाव उठता है वह उम आत्मा के शांतभाष का घात करदेता है । तथा क्रोधी के मन, वचन, काय आदि द्रव्य प्राणों में भी निर्वलता होजाती है । पीछे जब वह क्रोधवश किसी को मारता पीटता है व हानि पहुचाता है तब दूसरे के भाव प्राणों की व ३२२] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । द्रव्य प्राणों की हिंसा होती है । क्योंकि जय सब जीव सुख शाति चाहते हैं व जीते रहना चाहते है। तब अहिंसा महाव्रत ही सबकी इस भावना को सिद्ध कर सकता है । जो पूर्ण अहिंसा को पालेगा वह अपने भावों में क्रोधादि न आने देगा व वह ऐसा बर्ताव करेगा जिससे कोई भी स्थावर व त्रस प्राणी के प्राण न घाते जावे। यही साधुओं का परम धर्म है जो अनेक प्रकार कष्ट दिये जाने पर भी कष्टदाता पर क्रोधभाव नहीं लाते हैं. जो भूमि निरखकर चलते हैं व वृक्ष की एक पत्ती भी नहीं तोडते हैं । हिंसा दो प्रकार की होती है- संकल्पी और आरंभी । जो प्राण घात हिंसा के सकल्प से किया जावे वह सकल्पी हिसा है, जैसे धर्म के नाम से पशुबलि करना, शिकार खेलना, मांसाहार के लिये पशुओं को कटवाना आदि । आरंभी हिंसा वह है जो गृहस्थी को आवश्यक ससारी कामो में करनी पड़ती है। वहा हिंसा करने का सकल्प नहीं होता है किन्तु सकल्प अन्य श्रावस्यक प्रारम्भ का होता है, परन्तु उनमे हिंसा हो जाती है । इस हिंसा को आरम्भी हिसा कहते हैं। इम हिंसा के तीन भेद हैं- (१) उद्यमी-जी आजीविका मावन के हेतु असिकर्म (शस्त्रकर्म), ममिर्म (लिखना), कृषिकर्म, वाणिज्यकर्म, शिल्पकर्म और विद्यार्म ( arts ) इन छः प्रकार के कामों को करते हुए होती है । - (२) गृहारंभी-जो गृह मे आहार पान के प्रबन्धार्थ, मकान बनाने, कूप खुदाने, बाग लगाने आदि में होती है। (३) विरोधी-जो दुष्टों के द्वारा व शत्रुओं के द्वारा आक्रमण किये जानेपर उनसे अपनी, अपने कुटुम्बकी, अपने माल की, अपने देश की रक्षार्थ और कोई उपाय न होने पर उनको मारकर भगाने मे होती है। अहिसा महाव्रती इस सकल्पी और आरभी दोनों ही प्रकार की हिंसा को त्याग कर देते है। त्रम व स्थावर सर्व की रक्षा करते हैं, भावों मे अहिंसात्मक भाव को पालते हैं कपाय भावों से अपनी रक्षा करते हैं। सत्य महाव्रत-मे चार तरह का असत्य नहीं कहते हैं-(१) जो वस्तु हो उसको नहीं हैं ऐसा कहना । (२) जो वस्तु न हो उसको है ऐसा कहना । (३) वस्तु कुछ हो कहना कुछ और (४) गर्हित, अप्रिय व सावद्य वचन जैसे कठोर, निदनीक, गाली के शब्द व हिसामई आरभ बढाने वाले बचन । महाप्रती साधु सदा हितमित मिष्ट वचन शास्त्रोक्त ही बोलते हैं। अचौर्य महाव्रत में बिना दिये हुए किसी की कोई वस्तु नहीं ग्रहण करते हैं, जल मिट्टी भी व जंगल की पत्नी भी बिना दी नहीं लेते हैं। - सहज-सुख-साधन । [३२३ ब्रह्मचर्य महाव्रत-में मन, वचन, काय कृत कारित अनुमोदना से कभी भी कुशील का सेवन नही करते हैं। काम भाव से अपने परिणामो की रक्षा करते हैं। भाषा परिग्रह त्याग महाव्रत-मे मूर्छा भाव का त्याग करते हैं, चौबीस प्रकार परिग्रह को त्यागते हैं। चौदह अतरग विभाव भाव जैसे मिथ्यादर्शन, क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पु वेद, नपुंसकवेद, दस प्रकार बाइरी, परिग्रह जैसे क्षेत्र, मकान, चादी, सोना, धन (गो आदि), वान्य, दासी, दास, कपडे, बर्तन । पांच समिति- इन पाच महाव्रतोंकी रक्षा हेतु पाच समिति पालते हैं। प्रमाद रहित बताव को समिति कहते हैं। ईर्या समिति-जतु रहित प्राशुक व रौंदी भूमिपर दिनके प्रकाशमें चार हाथ आगे देखकर चलना । सामिति- -शुद्ध, मिष्ट, हितकारी, भापा बोलना। एषणा समिति-शुद्व भोजन भिक्षा वृत्तिसे लेना जो साधुके उद्देश्य से न बनाया गया हो । आदान निक्षेपण ममिति-कोई बात को देखकर रखना व उठाना । प्रतिष्ठापना या उत्सर्ग समिति 'मलमूत्र निर्जतु भूमिपर देखकर करना । तीन गुप्ति-मनको वश रख के धर्मध्यान में जोडना मनोगुप्ति है। मौन रहना या शास्त्रोक्त वचन कहना वचन गुप्ति है-एकासन से बैठना व ध्यान स्वाध्यायमे कायको लगाना कायगुप्ति है, यह तेरह प्रकार साधु का चारित्र है । साधु निरंतर ध्यान व स्वाध्यायमें लीन रहते हैं । इन पाच महावतों की दृढताके लिये एक एक व्रतकी ५-५ भावनाए हैं जिनपर व्रती ध्यान रखते हैं । (१) अहिंसाव्रतकी पांच भावनाएं (१ वचनगुप्ति, (२) मनोगुप्ति, (३) ईर्या समिति (४) श्रादान निक्षेपण ममिति, (५) भालोकित पान भोजन-भोजन देखभालकर करना । -- (१) सत्यव्रतकी पांच भावनाए- (१) क्रोधका त्याग, (२) लोभका त्याग, (३) भयका त्याग (४) हास्यका त्याग । क्योंकि इन्हीं चारोंके वश असत्य घोला जाता है, (५ अनुवीची भापण, शास्त्रोक्त वचन कहना। A (३) अचौर्यव्रतकी पांच भावनाएं - शून्यागार-शूने ' स्थानमे ठहना, (२) विमो-चिता वास- छोडे हुए-उनडे हुए स्थान पर ठहरना, (३) परोपरोधाकरण आप जहा हो दूमरा आवे तो मना न करना य जहा कोई मना करे वहा न ठहरना, (४) भैक्ष्यशुद्वि-भिक्षा शुद्ध अतराय व दोप टालकर लेना (५) साधर्मी अविमंवाद-माधर्मी धर्मात्माओंसे विसम्वाद या झगडा न करना ।
३२४] सम्यफचारित्र और उसका महात्म्य । (४) ब्रह्मचर्य व्रतकी पांच भावनाएं- (१) स्त्री राग कथा श्रवण त्याग-स्त्रियोंके राग बढाने वाली कथाओ के सुननेका त्याग, (२) तन्मोहरांगनिरीक्षण त्याग-स्त्रियों के मनोहर अगोंके देखनेका त्याग (३) पूर्वरतानुस्मरण पहले किये हुए भोगोंका स्मरण त्याग (४) वृष्टष्टरस त्याग-कामोद्दीपक पुष्ट रस का त्याग, (५) स्वशरीर संस्कार त्याग-अपने शरीर के श्रृंगार का त्याग । (५) परिग्रह त्याग व्रतकी पांच भावनाएं-मनोज्ञ व अमनोज्ञ पांचों इन्द्रियों के पदार्थोंको पाकर रागद्वेष न रखकर सतोष पालना । साधुओका कर्तव्य है कि दशलाभणी धर्मकी, बारह अनुप्रेक्षाओंकी भावना भावे, बाइस परीषहों को जीते, पांच प्रकार चारित्रको बढ़ावें तथा बारह प्रकार तपका साधन करें । उनका सक्षिप्त स्वरूप यह है- दशलाक्षणी धर्म-कपायों पूर्णपने निग्रह करके दश धर्मो को पूर्णपने पालें । कष्ट पानेपर भी उनकी विराधना न करें । (१) उत्तम क्षमा, (२) उत्तम मार्दव-मानका अभाव, (३) उत्तम आर्जव-मायाचार का अभाव, (४) उत्तम सत्य, (५) उत्तम शौच-लोभ का प्रभाव (६) उत्तम संयम- मन इंद्रियों पर विजय व छः काय के प्राणियों पर दया । (७) उत्तम तप-इच्छानिरोध करके तप पालना, (८) उत्तम त्याग-ज्ञानदान व अभयदान देना, (६) उत्तम आकिंचन्य-सर्व से ममता छोडकर एकाकी स्वरूप को (१०) उत्तम ब्रह्मचर्य । ही अपना मानन, वारह भावनाएं- (१) अनित्य -धन धान्य, स्त्री पुत्र शरीरादि सर्व क्षणभगुर है, नाशवत है, (२) अशरण--मरण से व तीव्र कर्मोदय मे कोई बचानेवाला नहीं, (३) संसार-चार गतिरूप ससार दु.खोंकाभडार है, (४) एकत्व-यह जीप अकेला है। अपनी करपी का श्राप ही मालिक है, (५) अन्यत्व इस जीव से शरीरादि सब पर हैं, (६) अशुचि-यह शरीर अपवित्र है, (७) आश्रव-इन इन भावों से कर्म आते हैं, (८) संवर-इन इन भावों से कर्म रुकते हैं, (६) निर्जरा-तप से कर्म झड़ते हैं, (१०) लोक-य यह जगत अनादि अनंत अकृत्रिम है, छः द्रव्यो का समूह है, द्रव्यापेक्षा नित्य व पर्यायापेक्षा अनित्य है। (११) रत्नत्रय का लाभ बहुत कठिन है, (१२) धर्म, -आत्मा का स्वाभाव धर्म है, यही परम हितकारी है। बाईस परीषह जय -नीचे लिखी बाईस परीषहों के पड़ने पर शाति से सहनी (१) क्षुधा, (२) तृषा, (३) शीत, (४) उष्ण, (५) दंशमशक-डास मच्छरादि पशु बाधा, (६) नग्नता, (७) अरति, (८) स्त्री, (९) चर्या- चलने की, (१०) निषद्या-बैठने की, (११) शय्या, (१२) श्राक्रोश गाली, (१३) बध, (१४) याचना मांगने के अवसर पर भी न मागना, (१५) अलाभ-भोजन अतराय पर सतोष, (१६) रोग, (१७) तृण स्पर्श, (१८ मल, (१६) सत्कार पुरस्कार-आदर निरादर, (२०) प्रज्ञा-ज्ञान का मद न करना (२१) अझान-अज्ञान पर खेद न करना, (२२) अदर्शन-श्रद्धा न बिगाड़ना।
सहज-सुख-साधन । [३२५ चारित्र पांच प्रकार--(१) सामायिक-समभाव रखना (२) छेदोपस्थापना-सामायिक से गिरने पर फिर सामायिक मे स्थिर होना (३) परिहार विशुद्धि-ऐसा श्राचरण जिसमें विशेष हिसा का त्याग हो (४) सूक्ष्म सांपराय-दशवें गुणस्थानवर्ती का चारित्र, जहा मात्र सूक्ष्म लोभ का उदय है, (५) यथाख्यात- पूर्ण वीतराग चारित्र । , धारह तप-छः बाहरी (१) अनशन-उपवास खाद्य, स्वाद्य लेह्य (चाटने की) पेय चार प्रकार आहार का त्याग । (२) ऊनोदर- भूख से कम खाना, दो भाग अन्नादि से एक भाग जल से एक भाग खाली रखना । (३) वृत्तिपरिसंख्यान-भिक्षा को जाते हुए कोई प्रतिज्ञा लेना, पूर्ण होने पर ही आहार लेना। (४) रसपरित्याग-मीठा, लवण, दूध, घी, दही, तेल इन छ: रसों में से एक व अनेक का त्याग। (५) विविक्त शय्यामन-एकांत मे शयन व आमन रखना । (६) कायक्लेश- शरीर का सुखियापन मेटने को कठिन कठिन स्थानों पर जाकर तप करना । छ. अतरङ्ग (७) प्रायश्चित-कोई दोष लगने पर दड लेकर शुद्ध होना । (८) विनय-धर्म व धर्मात्माओं की प्रतिष्ठा । (8) वैश्यावृत्य-धर्मात्माओं की सेवा करनी। (१०) स्वाध्याय-शास्त्रो का पठन पाठन व मनन । (११) व्युत्सर्ग-शरीरादि से ममता त्याग । (१२) ध्यान-धर्मध्यान व शुक्लध्यान करना । माधुओं का कर्तव्य है कि इन पाच महाव्रत, पाच ममिति, तीन गुप्ति, दश धर्म, बारह भावना, बाईम परिपह जय, बारह प्रकार तप मे मन, वचन, काय को ऐमा स्वाधीन करें जिससे निश्चय सम्यक्- चारित्र का लाभ कर सके । स्वरूप मे रमण ही सामायिक चारित्र है। गृहस्थ का कारावास चिन्ताओं का स्रोत है । अतएव निराकुल होने के लिये गृहस्थ त्यागकर साधुवृत्ति में रहकर विशेष सहज सुख का साधन कर्तव्य है। सागार या श्रावक का एक देश चारित्र-अनगार का चारित्र जैसे पाच महाव्रत हैं वैसे सागार का एक देश चारित्र पाच अणुव्रत पालन है। महाव्रत व अणुव्रत का अतर इस तरह जानना योग्य है कि यदि १०० एक सौ अश महाव्रत के करें उनमें से एक अश से लेकर ९९ अश तक अणुव्रत है १०० अश महाव्रत हैं . पांच अणुव्रत-जहा सकल्पी हिंसा का त्याग हो, आरभी हिसा का त्याग न हो वह अहिंसा अणुव्रत है । अहिंसा अणुव्रत धारी राज्य कार्य, राज्य प्रबन्ध, देश रक्षार्थ युद्ध, सज्जन पालन, दुर्जन दमन, कृषि, वाणिज्य, शिल्पादि सर्व श्रावश्यक गृहस्थ के कर्म कर सकता है। समुद्र यात्रा, विदेश गमन आदि भी कर सकता है । वह सकल्पी हिंमा से बचे, शिकार न खेले, माम न खाए, मास के लिये पशुवध न करावे । जिस असत्य से राज्यदड हो-जो दूसरों के ठगने के लिये, विश्वासघात के लिये कहा जावे ऐसा असत्य वचन न कहना, तथा प्रिय हितकारी सज्जनों के योग्य वचन कहना मत्य अणुव्रत है। ऐसा श्रावक जिम सत्य वचन से कलह हो जावे, हिंसा की प्रवृत्ति हो जावे, परका बुरा हो जावे उम सत्य वचन को भी नहीं - । ३२६]] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । वोलता है । न्याय व धर्म की प्रवृत्ति में हानि न आवे व वृथा किसी प्राणी का वध न हो,उसको कष्ट न पहुंचे इम वात को विचारकर मुख से वचन निकालता है। गिरी, पड़ी, मूली किसी की वस्तु को नहीं लेना अचौर्य अणुव्रत है । विश्वासघात करके, छिप कर के, धमकी देकर के, वध कर के किसी की सम्पत्ति को श्रावक नही हरता है । न्यायपूर्वक अल्प धन में संतोष रखता है। श्रन्याय से संग्रहीत विपुल धन की इच्छा नहीं करता है। जिस वस्तु की राज्य से व प्रजा से मनाही नहीं है केवल उन ही वस्तुओं को बिना पूछे लेता है । जैसे नदी का जल, हाथ धोने को मिट्टी, जगलके फल व लकडी आदि । यदि मनाई हो तो वह ग्रहण नहीं करेगा। अपनी विवाहिता स्त्री में सतोष रखकर सर्व पर स्त्रियों को बडो को माता समान बराबरवाली को वहिन के समान, छोटी को पुत्री के समान जो समझता है वह ब्रह्मचर्य अणुव्रतको पालता है । भावक वीर्य को शरीर का राजा समझकर स्वस्त्री में परिमित सतोष के साथ उपभोग करता है जिससे निर्वलता न हो। दश प्रकार के परिग्रह का जो अपनी आवश्यकता, योग्यता व इच्छा के अनुकूल जन्मपर्यत के लिये प्रमाण कर लेना उससे अधिक की लालसा त्याग देना सो परिग्रह प्रमाण अणुव्रत है। जितनी मम्पत्ति का प्रमाण किया हो उस प्रमाण के पूरा हो जाने पर वह श्रावक व्यापागदि बन्द कर देता है फिर सतोप से अपना समय धर्म साधन व परोपकार में व्यतीत करता है । इन पाच अणुव्रतों के मूल्य को बढाने के लिये श्रावक सात शील तीन गुणव्रत चार शिक्षाव्रत भी पालता है। तीन गुणवत-जो पाच अणुव्रतो का मूल्य गुणन करे बढादे उनको गुणव्रत कहते हैं जैसे ४ को ४ मे गुणा करने से १६ और १६ को १६ से गुणा करने से २५६ होते है दिग्विरति-जन्म पर्यंत के लिये लौकिक प्रयोजन के हेतु दश दिशाओं मे जाने का व व्यापारादि करने का नियम कर लेना उससे अधिकमे जाने की व व्यापार करने की लालसा को त्याग देना दिग्विरति है। इससे फल यह होता है कि श्रावक नियम किये हुए क्षेत्र के भीतर ही प्रारम्भ करेगा उनके वाहर श्रारम्भी हिना भी नहीं करेगा। देशविरति-जन्म पर्यत के लिये जो प्रमाण किया था उसमेसे घटाकर एक दिन, दो दिन, एक सप्ताह के लिये जाने का व्यवहार करने का नियम करना देशविरति है। उमसे इतना अधिक लाभ होगा कि वह नियमित काल के लिये नियमित क्षेत्र ही में प्रारम्भ करेगा, उसके बाहर आरभी हिंसा मे बचेगा। अनर्थदंड विति-नियमित क्षेत्र में भी प्रयोजनभूत कार्य के सिवाय अर्थ के आरम्भ करने का त्याग अनर्थदड विरति है । इसके पाच भेद हैं:- १ पापोपदेश- दूसरों को पाप करने का उपदेश देना, २ हिंसादान- हिसाकारी वस्तुए दमरों को मांगे देना, ३ प्रमादचर्या प्रमाद या श्रालस्य से वृभा वस्तुओं को नष्ट करना, जैमे वृथा वृक्ष के पत्ते तोंड़ना, ४ दुःश्रुति-राग द्वेप बढानेवाली, विपय भोगो में फसाने- सहज-सुख-साधन । [३२७ वाली खोटी कथाओं को पढना सुनना, ५ अपध्यान- दूसरों के अहित का विचार करके हिंसक परिणाम रखना । वृथा पापों के त्याग से व सार्थक काम करने से अणुव्रतों का मूल्य विशेष बढ़ जाता है । चार शिक्षात्रत-जिन व्रतों के अभ्यास से साधुपद मे चारित्र पालने की शिक्षा मिले उनको शिक्षा व्रत कहते हैं । (१) सामायिक-एकात में बैठकर रागद्वेष छोड़कर समता भाव रखकर श्रात्मध्यान का अभ्यास करना प्रातः काल, मध्यान्हकाल या सायंकाल यथासंभव ध्यान करना सामायिक है। (२) प्रोषधोपनास-एक मास में दो अष्टमी, दो चौदस प्रोपध दिन है। उनमें उपवास या एकासन करके धर्मध्यान में समय को विताना प्रोषधोपवास है। (३) भोगोपभोग परिमाण-जो एक दफे भोगने मे आवे सो भोग हैं । जो बार-बार भोगने में आवे सो उपभोग हैं । ऐसे पांची इद्रियों के भोगने योग्य पदार्थों की संख्या प्रतिदिन प्रातःकाल एक दिन रात के लिये सयम की वृद्धि हेतु कर लेना भोगोपभोग परिमाणव्रत हैं। (४) अतिथि संविभाग-साधुओ को या अन्य धर्मात्मा पात्रों को भक्तिपूर्वक तथा दुःखित भुखित को करुणापूर्वक दान देकर आहार कराना अतिथि सविभाग शिक्षाव्रत है। इस तरह एक भावक को पांच अणुव्रत और मात शील एसे बारह व्रत पालने चाहिये । तथा तेरहवें व्रत की भावना भाना चाहिये। वह है- (१३) मल्लेखना--मरन के ममय अात्मसमाधि व शात भाव से प्राण छूटे ऐमी भावना करनी मल्लेखना या समाधिमरण व्रत है । जानी श्रावक अपने धर्मात्मा मित्रों का वचन ले लेते हैं कि परस्पर समाविमग्ण कराया जावे । इस तेरह व्रतों को दोप रहित पालने के लिये इनके पाच पाच अतीचार प्रसिद्ध हैं। उनको दूर करना श्रावक का कर्तव्य है। [१] अहिंसा अणुव्रत के पांच प्रतीचार-(१) बन्ध-कषाय द्वारा किसी को बाधना या बन्धन में डाल देना, (२) वध-कषाय से किसी को पीटना, घायन करना, (३) छेद कपाय से किसी के अंग व उपग छेदकर स्वार्थ साधना, (४) अति भारारोपण-मर्यादा से अधिक भार लाद देना, (५) अन्नापान निरोध-अपने आधीन मानव या पशुओं का अन्नपान रोक देना । (२) सत्य अणुव्रत के पांच अतीचार-(१) मिथ्योपदेश-दूसरे को मिथ्या कहने का उपदेश दे देना, (२) रहोभ्याख्यान-स्त्री बातो का प्रकाश कर देना, (३) कूट लेख क्रिया- कपट से असत्य लेख लिखना, (४) न्यासापहार – दूसरे की धरोहर को अमत्व कहकर कुछ न देना, . D पुरुष की एकात गुप्त - २२८] सम्यकचारित्र और उमका महात्म्य । (५) साकार मंत्र भेद-किमी की गुप्त सम्मतिको अगों के इलन चलन से जानकर प्रकाश कर देना । इन सब में कपाय भाव हेतु होना चाहिये। (३) प्रचौर्य अणुव्रत के पांच भनिचार-(१) म्तेन प्रयोग मरे को चोरी करने का मार्ग बता देना, (२) तदाहतादान--चोरी का लाया हुश्रा माल जानथम कर के लेना व अफा से लेना, (३) विरुद्ध राज्यातिक्रम-राज्य का प्रबन्ध न हो पर मर्यादा को उल्लघ का के श्रन्यायपूर्वक लेना देना, (४) हीनाधिकमानोन्मान-कमती तौल नाप के देना व पढ़ती तौल नापके लेना, (५) प्रतिरूपक व्यवहार- भूटा सिक्का चलाना व खरी गं खोटी मिलाकर ग्वरी कहकर विक्रय करना। (४) ब्रह्मचर्य अणुव्रत के पांच प्रतीचार- (१) पर विवाह करण-अपने पुत्र पौत्रादि मिवाय दसरों के सम्बन्ध जोडना । (२) परिग्रहीता इत्वरिका गमन-विवाही हुई व्यभिचारिणी स्त्रीके पास आना जाना । (३) अपरिग्रहीता इत्वरिका गमन-बिना विवाही वेश्यादि के पास श्रामा जाना, 1 (४) अनंगक्रीडा- काम सेवन के अंग छोडकर अन्य अगों से काम सेवन करना, (५) कामतीत्राभिनिवेश-काम सेवनकी तीन लालसा स्व स्त्रीमं भी रखना। (५) परिग्रह प्रमाण व्रत के पांच प्रतीचार-दस प्रकार के परिग्रह के पाच जोड़े होते हैं जगह मकान, चादी सोना, धन धान्य, दामी दास, कपडे वर्तन, इनमें से किसी एक जोड में एक को घटाकर दूसरे की मर्यादा वढा लेना ऐसे पांच दोप है। (६) दिग्विति के पांच अतिचार-(१) ऊर्ध्व व्यतिक्रम-ऊपर जितनी दृर जाने का प्रमाण किया था उसको किसी कपाय वश उल्लधकर यागे चले जाना,(२) अधः व्यतिक्रम-नीचे के प्रमाण का उल्लघर आगे चले जाना, (३) तिर्यक व्यतिक्रम-अन्य अाठ दिशाओं के प्रमाण को उल्लघकर आग चले जाना, (४) क्षेत्रवृद्धि-क्षेत्र की मर्यादा एक तरफ घटाकर दूसरी ओर बढ़ा लेना, (५) स्मृत्यन्तराधान- मर्यादा को याद न रखना। (७) देशविरति के पांच अतीचार-(१) श्रानयन-मर्यादाके बाहरसे वस्तु मंगाना । (२) प्रेष्य प्रयोग-मर्यादाक बाहर कुछ भेजना। (३ शब्दानपात-मर्यादाके वाहर बात कर लेना । (४) रूपानुपात-मर्यादाके बाहर रूप दिखाकर प्रयोजन बता देना । (५) पुद्गलक्षेप-मर्यादासे बाहर पत्र व कंकड़ आदि फेंककर प्रयोजन बता देना। (८) अनर्थ दंड विरतिके पांच प्रतीचार-[१] कन्दर्प-भड वचन असभ्यतापूर्ण बोलना ! (२) कौकुच्य-भड वचनोंके साथ माथ कायकी कुचेष्टा भी करना। [३] मौखर्य-बहुत बकवाट करना । [४] श्रममीक्ष्य अधिकरण-बिना विचारे काम करना । [५] उपभोग परिभोगानर्थक्य-भोग व उप- भोगके पदार्थ वृथा ममह करना ।
सहज-सुख-साधन । [ ३२९ [6] सामायिकके पांच प्रतीचार-(१) मनः दुःप्रणिधान-सामायिककी क्रियासे बाहर मनको चचल करना । (२ वचन दुःप्रणिधान-सामायिकके पाठादि सिवाय और कोई बात करना। (३) काय दुःप्रणिधान-शरीर को थिर न रखकर आलस्य मय प्रमादीर खना। (४) अनादर- सामायिक करने में आदरभाव न रखना । (५) स्मृत्यनुपस्थान-सामायिक करना या सामायिकका पाठादि भूल जाना। (१०) प्रोषधोपवासके पांच प्रतीचार-(१) (२) (३) अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित उत्सर्ग, आदान, सस्तरोपक्रमण-बिना देखे बिना झाडे मलमूत्रादि करना, उठाना व चटाई आदि बिछाना (४) अनादर- उपवास में आदरभाव रखना । (५) स्मृत्यनुपस्थान-उपवास के दिन धर्मक्रिया को भूल जाना। (११) भोगोपभोगपरिमाण व्रत के पांच प्रतीचार-जो कोई श्रावक किसी दिन सचित्त का बिलकुल त्याग रे या कुछों का त्याग करे उसकी अपेक्षा ये पांच अतीचार हैं । (१) सचित्त- त्यागे हुए सचित्त को भूल से खा लेना। (२) सचित्त संबंध-त्यागे हुए सचित्त से मिली हुई वस्तु को खा लेना । (३) सचित्त सम्मिश्र-त्यागे हुए सवित्त को अचित्त में मिलाकर खाना । (४) अभिषव कामोद्दीपक पौष्टिक रस खाना । (५) दुःपक्काहार-फम पका व अधिक पका व न पचने लायक आहार करना । (१२) अतिथि सविभाग व्रत के पांच अतीचार-साधु को आहार देते हुए ये अतीचार हैं। (१) सचित निक्षेप-सचित्त पर रखकर कुछ देना। (२) सचिच अपिधान-सचित्त से ढकी हुई वस्तु दान करना । (३) परव्यपदेश-श्राप दान न देकर दूसरे को दान की आज्ञा करनी। (४) मात्मय- दूसरे दातार से ईर्पाभाव रखकर दान देना। (५) कालातिक्रम-दान का काल उल्लघकर अकाल में देना। (१३) सल्लेखनाके पाच अतीचार-(१) जीवित प्राशंसा-अधिक जीते रहने की इच्छा करना। (२) मरणाशंसा-जल्दी मरने की इच्छा करना । (३) मित्रानुराग-लौकिक मित्रों से सासारिकराग बताना। (४) सुखानुबन्ध-भागे हुए इन्द्रिय सुखों का याद करना । (५) निदान- आगामी विषय भोगों की इच्छा करना। 'ये साधारण तेरह व्रत श्रावक के हैं । विशेष यह है कि दि० जैन शास्त्रों में ग्यारह प्रतिमाए व श्रेणियां श्रावक की बताई हैं जिनको क्रम से पार करते हुए साधुपद की योग्यता पाती है । ये ग्यारह श्रेणिया पचमदेशविरति गुणस्थान में हैं । चौथे अविरत सम्यग्दर्शन गुणस्थान में यद्यपि चारित्र का नियम नहीं होता है तथापि वह सम्यक्ती अन्याय से बचकर न्यायरूप प्रवृत्ति करता है । पाक्षिक श्रावक के योग्य कुछ स्थूलरूप नियमों को पालता है। वे नियम नीचे प्रकार है. - ३३० ] सम्यक्चारित्र और उनका महात्म्य । (१) मांस नहीं खाता है, (२) मदिग नहीं पीता है, (३) मधु नहीं खाता है, (४) वर्गत का फल नहीं खाता है, (५) पीपल का फल नहीं खाता है, (६) गूलर को फल नहीं खाता है, (७) पाकर का फल नहीं खाता है, (८) अजीर का फल नहीं खाता है, (९) जुश्रा नहीं खेलता है, (१०) चोरी नही करता है, (११) शिकार नहीं खेलता है, (१२) वेश्या का व्यमन नहीं रखता है, (१३) परस्त्री सेवन का व्यमन नहीं रखता है। पानी दोहरे कपडे से छानकर शुद्ध पीता है, रात्रि के भोजन के त्याग का यथाशक्ति उद्योग ग्खता है । तथा गृहस्थ के यह छ' कर्म . साधता है । V -- (१) देवपूजा- श्री जिनेन्द्र की भक्ति करता है, (२) गुरुभक्ति- गुरु की मेवा करता है, (३) स्वाध्याय- शास्त्र नित्य पढता है, (४) तप-रोज सामायिक प्रतिक्रमण करता है, (५) संयम-नियमादि लेकर इन्द्रियदमन करता है, (६) दान- लक्ष्मी को आहार, औषधि, विद्या, अभयदान में व परोपकारमें लगाता है, दान करके भोजन करता है। ग्यारह प्रतिमा स्वरूप-ग्यारह श्रेणियोंमे पहलेका चारित्र आगे आगे बढना जाता है । पहलेके नियम छूटते नहीं हैं। (१) दर्शन प्रतिमा इस श्रेणीमे पाक्षिक श्रावकके योग्य नियम जो ऊपर कहे है उनको पालता हुआ सम्यग्दर्शन को निर्मल रखता है, उसको आठ अग सहित पालता है । नि शमितान्दका वर्णन मम्यग्द- र्शनके अध्यायमें किया जाचुका है । यहा अहिसा, सत्य, अचौर्य, स्वस्त्रोसताप तथा परिग्रह प्रमाण इन पाच अणुव्रतोका अभ्यास करता है स्थूलपने पालता है, अतीचार नहीं बचा सक्ता है । (२) व्रत प्रतिमा-इस श्रेणीमे पहले के सर्व नियमों को पालता हुआ पांच अणुत्रनोंके पच्चीस अतीचारोंको बचाता है तथा सात शीलोको भी पालता है। उनके अतीचार पूरे नहीं टलते हैं अभ्यास करता है । सामायिक शिक्षाव्रतमें कभी रागादिके कारण न भी करे व प्रोपधोपवासमे भी कभी न कर सके, तो न करे, एकासन या उपवास शक्तिके अनुसार करे । (३) सामायिक प्रतिमा-इशश्रेणीमे पहलेके नियम पालता हुआ श्रावक नियमसे प्रातःकाल मध्यान्हकाल व सायकाल सामायिक करता है। दो घड़ी या ४८ मिनट मे कम नहीं करता है किसी विशेष कारणके होनेपर अतर्मुहूर्त ४८ मिनटसे कुछ कम भी कर सकता है । सामायिकके पांचों अतीचारों को बचाता है। (४) प्रोषधोपवास प्रतिमा-इस श्रेणीमे नीचे के नियमोंको पालता हुआ नियमसे मासमें चार दिन प्रोपधपूर्वक उपवास करता है । अतीचारों को बचाता है, धर्मध्यानमे समय बिताता है । इसकी दो प्रकार, की विधी है । एक तो यह है कि पहले व आगेके दिन एकासन करे, बीचके दिन उपवास करे, १६ प्रहरतका धर्मध्यान करे । यह उत्तम है । मध्यम यह है कि १२ प्रहरका उपवास करे, सप्तमीकी सध्यासे नौमीके प्रात. काल तक आरभ छोड़े, धर्ममे समय बितावे । जघन्य यह है कि उपवास तो १२ प्रहर तक करे परन्तु लौकिक प्रारभ आठ पहर ही छोड़े-अष्टमीको दिन रात ।
सहज-सुख-नाधन । [३३१ दूसरी विधि यह है कि उत्तम तो पूर्ववत् १६ प्रहर तक करे । मध्यम यह है कि १६ प्रहर धर्मध्यान करे परन्तु तीन प्रकार के आहार का त्याग करे, आवश्यकतानुसार जल लेवे । जघन्य यह है कि १६ प्रहर धर्मध्यान करे, जल आवश्यकतानुसार लेते हुए बीच में एक मुक्त भी करले । इन दो प्रकार की विधियों में अपनी शक्ति व भाव को देखकर प्रोषधोपवास करे। । (५) सचित्त त्याग प्रतिमा -इस श्रेणी में नीचे के नियमों को पालता हुआ चिच पदार्थ नहीं खावे । कच्चा पानी कच्चा साग आदि न खावे, प्राशुक या गर्म पानी पीवे। सूखी, पकी गम की हुई व छिन्न- भिन्न की हुई वनम्पति लेवे । पानी का रग लवगादि डालने से बदल जाता है तब वह पानी प्राशुक हो जाता है । साँचत्त के व्यवहार का इसके त्याग नहीं है । (६) रात्रिभोजन त्याग-इस श्रेणी में नीचे के नियमों को पालता हुआ रात्रि को नियम से न तो आप चार प्रकार का आहार करता है न दूसरों को कराता है। मन, वचन, काय से रात्रि भोजन के करने कराने से विरक्त रहता है। (७) ब्रह्मचर्य प्रतिमा स्वस्त्री का भी भोग त्याग कर ब्रह्मचारी हो जाता है, सादे वस्त्र पहनता है, सादा भोजन खाता है, घर मे एकात मे रहता है या देशाटन भी कर सकता है। पहले के सब नियमों को पालता है (८) आरंभ त्याग प्रतिमा-पहले के नियमों को पालता हुआ इस श्रेणी में सर्व ही लौकित प्रारंभ व्यापार कृपि आदि त्याग देता है। आरभी हिसा से विरक्त हो जाता है। देखकर भूमिपर चलता है, वाहनों का उपयोग नहीं करता है, निमत्रण पाने पर भोजन कर लेता है, परम सतोषी हो जाता है । (६) परिग्रह त्याग-पहले के नियमों को पालता हुआ इस श्रेणी मे धनधान्य, रुपया पैसा मकानादि परिग्रह को वाट देता है या दान कर देता है । थोडे से आवश्यक कपडे व खान पान के दो तीन बर्तन रख लेता है। घर से बाहर उपवन या नसियों में रहता है । निमत्रण से भोजन करता है । (१०) अनुमति त्याग प्रतिमा-यह श्रावक यहा से पहले तक लौकिक कार्यो मे गुण दोप वताता हुआ सम्मति देता था, अब यहा मासारिक कार्यो की सम्मति देना भी त्याग देता है। भोजन के समय निमत्रित होकर जाता है। पहले के सब नियम पालता है । (११) उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा-इस श्रेणी मे पहले के नियम पालना हुआ निमत्रण से भोजन नहीं करता है । भिक्षा वृत्ति से जाकर ऐमा भोजन लेता है जो गृहस्थीने अपने ही कुटुम्ब के लिये तैयार किया हो । उनके उद्देश्य से न बनाया हो । तब ही इस प्रतिमा को उहिष त्याग प्रतिमा कहते है। इसके दो भेद हैं-(१)नुल्लक-जो श्रावक एक लगोट व एक ऐसी चद्दर रक्खे जिससे सर्व अग न ढका जावे । मस्तक ढका होतो पग खुला रहे,पग ढके होतो मस्तक खुलाहो जिससे इसको शरदी दशमशक श्रादि की -
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सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य ।
बाधासहने का अभ्यास हो । यह श्रावक नियमसे जीवदयाके लिये मोर की पिच्छिका रखता है,क्योंकि वे बहुत
ही मुलायम होते हैं, उनमे क्षुद्र जंतु भी नहीं मरता है । तथा कमडल शौच के लिये जल के वास्ते रखते है ।
जो कई घरों से एकत्र कर भोजन करते है वे एक भोजन का पात्र भी रखते हैं। पांच सात घरों से एकत्र
कर अंतिम घर में जल लेकर भोजन करके अपने वर्तन को साफ कर माथ रख लेते है। जो क्षुल्लक एक
ही घर में श्राहार करते हैं वे भिक्षा को जाकर पाटर से भोजन दिये जाने पर एक ही घर में थाली में बैठ
कर जीम लेते हैं । यह भोजन का पात्र नहीं रखते हैं। ये मुनिपद की क्रियाओं का अभ्यास करते हैं।
स्नान नहीं करते हैं । एक दफे ही भोजनपान लेते हैं।
(२) ऐलक-जो चद्दर भी छोड़ देते है, केवल एक लगोटी ही रखते हैं। यह साधुवत भिक्षाथ
जाते हैं। एक ही घरमे बैठकर हाथमें ग्राम रक्खे जानेपर भोजन करते हैं। यहां कमडल काठका ही रखते हैं
केशोंका लोंच भी यह नियमसे करते हैं। अपने हाथोसे केश उपाइते हैं।
इस तरह उन ग्यारह श्रेणियों के द्वारा उन्नति करते२ श्रावक व्यवहार चारित्रके श्राश्रयमे निराकुलताको
पाकर अधिक २ निश्चय सम्यच्चारित्रस्प स्वानुभवका अभ्यास करता है । पचम श्रेणीमे अनंतानुबन्धी और
अप्रत्याख्यान कपायें तो रहती ही नहीं, व प्रत्राख्यान कपायोंका भी उहय मद मंद होता जाता है, ग्यारवी
श्रेणीमे अति मद होजाता है। जितनी जितनी कपाय कम होती है वीतरागभाव बढता है उतना उतना
ही निश्चय सम्यक्चारित्र प्रगट होता जाता है। फिर प्रत्याख्य न कपाय के उदय को बिलकुल जीतकर
साधुपद में परिग्रह त्याग निग्रंथ होकर स्वानुभव का अभ्यास करते कर; गुणग्थान क्रम से अरहत हो
फिर
गुणस्थान
से बाहर सिद्ध परमात्मा हो जाता है ।
सहज सुख साधन-वास्तव मे निश्चय रत्नत्रयमई श्रात्मा की एक शुद्व परिणति ही है । जब ही
मन वचन काय के सयोगों को छोडकर श्रात्मा अात्मस्थ हो जाना है तब ही सहज सुख का स्वाद पाता है-
चारित्र के प्रभाव से आत्मा में थिरता बढ़ती जाती है तब अधिक अधिक सहज सुख अनुभव में आता
जाता है। साधु हो या श्रावक सबके लिये स्वानुभव ही सहज सुग्व का साधन है ।
इसी हेतु को सिद्ध करने के लिये जो कुछ भी प्रयत्न किया जावे वह सहकारी है । वास्तव में सइज
सुख प्रात्मा मे ही है । आत्मा मे ही रमण करने से वह प्राप्त होगा। प्रात्मरमणता का महात्म्य वर्णनातीत
है-जीव को सदा सुखदाई बनानेवाला है । इस जैन धर्म का भी यही सार है । प्राचीनकाल में व आधुनिक
जो जो महात्मा हो गए हैं उन्होंने इसी गुप्त अध्यात्म विद्या का अनुभव किया व इसीही का उपदेश दिया।
इसी ही को अवक्तव्य कहो या सम्यग्दर्शन कहो या सम्यग्ज्ञान कहो या सम्यक्चारित्र कहो या
केवल आत्मा कहो, या समयसार कहो, स्वममय कहो, परमयोग कहो, धर्म ध्यान कहो, शुक्ल ध्यान कहो,
सहज सुख साधन कहो सबका एक ही अर्थ है । जो जीका को सफल करना चाहें उनको अवश्य अवश्य
सहज सुख साधन के लिये आत्मविश्वास प्राप्त करके श्रात्मानुभव का अभ्यास करना चाहिये । जैनाचार्यो
के सम्यक्चारित्र सम्बन्धी वाक्य नीचे प्रकार मनन करने योग्य हैं:-
(१) श्री कुदकुदाचार्य प्रवचनसार में कहते हैं:
चारित्रं खलु धम्मो, धम्मो जो समोति णिद्दिट्ठो।
मोहक्खोहविहीणो, “परिणामो अप्पणो हि समो ॥७॥
महज-सुख-साधन । [ ३३३ भावार्थ-चारित्र ही धर्म है । जो समभाव है, उसको ही धर्म कहा गया है । मोह, क्षोभ या रागद्वेष मोह रहित जो आत्मा का परिणाम है वही समभाष है, वही चारित्र है। धम्मेण परिणदप्पा, अप्पा जदि सुद्धसंपयोगजुदो । पावदि णियाणसुह, सुहोवजुत्तो य सग्गसुहं ॥११॥ भावार्थ-धर्म में आचरण करता हुआ आत्मा यदि शुद्ध उपयोग सहित होता है तो निर्वाण के सुखको पाता है। यदि शुभ उपयोग सहित होता है तो स्वर्ग के सुख को पाता है। सुविदिदपदत्थसुत्तो, संजमतवसंजुददो विगदरागो । समणो समसुहदुक्खो, भणिदो सुद्धोवोगोचि ॥१४॥ भावार्थ-जो साधु भले प्रकार जीवादि पदार्थों को और सिद्धांत को जाननेवाला है, सयम तथा तपसे युक्त है, रागरहित है, सुख व दुःख में समान भाव का धारी है वही श्रमण शुद्वोपयोगी कहा गया है। जीवो ववगदमोहो, उबलद्धो तच्चमप्पणो सस्मं । जहदि जदि रागदोसे, सा अप्पाणं लहदि सुद्ध॥८७॥ भावार्थ-मिथ्यात्व से रहित आत्मा अपने आत्मा के स्वरूप को भले प्रकार जानता हुआ जब रागद्वेष को भी छोड़ देता है तब शुद्ध आत्मा वो पाता है । जो णिहदमोहदिट्ठी, आगमकुसलो विरागचरियम्मि । अभुट्टिदो महप्पा, धम्मोत्ति विसेमिदो समणो ॥१६॥ भावार्थ- जो दर्शनमोह को नाश करनेवाला है, जिनप्रणीत सिद्धात के ज्ञान में प्रवीण है वीतराग चारित्र सावधान है वही महात्मा साधु धर्मरूप है ऐमा विशेष रूप से कहा गया है । जो णिहदमोहगठी रागपदोसे खवोय सामणणे । होज्ज समसुहदुक्खो मो सोक्खं अबखयं लहदि ॥१०७-२॥ भावार्थ-जो मोह की गाठ को क्षय करके माधुपद में स्थित होकर रागद्वेष को दूर करता है और दु ग्व तथा सुख में समभाव का धारी होता है वही अविनाशी सुखको पाता है । जो खविदमोहकलुसो विसयविरत्तो मणो णिरु भित्ता । समविदो सहावे सो अप्पाणं हवदि धादा ॥१०८-२।। भावार्थ-जो महात्मा मोहरूप मैल को क्षय करता हुआ तथा पाचों इन्द्रियों के विषयों से विरक्त होता हुआ, मनको रोकता हुआ चैतन्य स्वरूप में एकाग्रता से ठहर जाता है सो ही आत्मा का ध्याता होता है। इहलोग णिरावेक्खो अप्पडिबद्धो परिम्मि लोयम्मि । जुत्ताहार विहारो रहिदकसानो हवे . में समणो ॥४२-३॥
३३४ ] - सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । भावार्थ-जो मुनि इस लोक में विपयों की अभिलापा से रहित है व परलोक में भी किसी पदकी इच्छा नहीं रखते हैं, योग्य आहार तथा विहार के करनेवाले हैं, कपाय रहित है वे ही श्रमण है। पचसमिदो तिगुत्तो पंचेंन्द्रियसंवुडो जिदकमाओ । दसणणाणसमग्गो समणो सो संजदो भणिदो ।। ६१३ ॥ भावार्थ-जो महात्मा पांच समितियों को पालते हैं, तीन गुप्ति को रखते है, पाचों इन्द्रियों को वश रखनेवाले हैं, कपायों के विजयी है तथा सम्यग्दर्शन और मम्यग्ज्ञान से पूर्ण हैं, सयम को पालनेवाले हैं ही श्रमण या साधु हैं। सममत्तवंधुवग्गो समसुहदुक्खो पसंसणिंदसमो। समलोटू ठुकंचणो पुण जीविदमरणे समो समणो ।। ६२-३ ॥ भावार्थ-जो शत्रु, तथा मित्र वर्ग को समभाव से देखते हैं। जो सुख व दुग्न मे समभाव के धारी हैं, जो प्रशसा तथा निन्दा किये जाने पर समभाव रखते है जो सुवर्ण और ककड को एक दृष्टि से देखते हैं, जिनके जीना तथा मरण एक समान है वही श्रमण कहाते हैं। दंसणणाणचरित सु तीसु जुगवं समुट्ठिदो जो दु । एयग्गगदोत्ति मदो सामण्ण तस्स परिपुण्ण ॥ ६३-३ ॥ भावार्थ-जो महात्मा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र इन तीन भावों में एक साथ भले प्रकार स्थित होते है व एकाग्र हो जाते हैं उन्हीं के साधुपना पूर्ण होता है । (२) श्री कुदकुंदाचार्य पंचास्तिकायमें कहते हैं - मुणिऊण एतदट्ठ तदणुगमणुज्झदो णिहदमोहो । पसमियरागद्दोसो हवदि हदपरावरो जीवो ॥ १०४ ॥ भावार्थ-जो कोई जोवादि नव पदार्थों को जानकर उनके अनुसार आचरण करने का उद्यम करता है और मोह का क्षय कर डालता है वही जीव रागद्वेष के नाश होनेपर ससार के पार पहुंच जाता है । सम्मत्त सद्दहण भावाणं तेसिमधिगमो णाण । चारित्त समभावो विसयेसु विरूढमग्गाणं ॥ १०७ ॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान सहित जो रागद्वेष रहित चारित्र है वही बुद्धि व योग्यता प्राम भव्यों के लिये मोक्ष का मार्ग है। जो सव्वसंगमुक्को णाएणमणो अप्पणं सहावेण । जाणदि पस्सदि णियदं सो सगचरियं चरदि जीवो ।। १५८ ।।
महज-सुख-साधन। [३३५ भावार्थ-जो महात्मा सर्व परिग्रह को त्याग कर व एकाग्र होकर अपने आत्मा को शुद्ध स्वभावमय देखता जानता है वही नियम से स्वचारित्र या निश्चय चारित्र का आचरण करता है। तमा णिवुदिकामो राग सवत्थ कुणदि मा किंचि । सो तेण वीदरागो भवियो भवसायरं तरदि ॥ १७२ ॥ भावार्थ-राग मोक्ष मार्ग मे बाधक है । ऐसा समझकर सर्व इच्छानो को दूर करके जो सर्व पदार्थों में किंचित् भी राग नहीं करता है वही भव्य जीव ससारसागर को तर जाता है। (३) श्री कुंदकदाचार्य ममयमार में कहते हैं आयारादीणाणं जीवादी दंसणं च विणणेयं । छज्जीवाणं रक्खा भरणदि चरिन तु ववहारा ॥२६४॥ आदा खु मज्भणाणे आदा मे दंसणे चरित्त य । श्रादा पच्चक्खाणे अादा मे संवरे जोगे || २६५ ॥ भावार्थ -आचागग आदि शास्त्रों का ज्ञान व्यवहार सम्यग्ज्ञान है । जीवादि तत्वों का श्रद्वान व्यवहार सम्यग्दर्शन है, छःकाय के प्राणियों की रक्षा व्यवहार सम्यक्चारित्र है। निश्चय से मेरा ही अात्मा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र है । मेरा आत्मा ही त्याग है सवर है व ध्यानरूप है । (४) श्री कुदकुन्दाचार्य द्वादशभावनामें कहते हैं- एयारसदसभेयं धम्म सम्मत्तपुव्यय भणियं । सागारणगाराणां उत्तमसुहसपजुनहि ॥ ६८ ॥ भावार्थ- -उत्तम सुख के भोक्ता गणधरों ने श्रावक धर्म ग्यारह प्रतिमारूप व मुनिका धर्म दशलक्षणरूप सम्यग्दर्शन पूर्वक कहा है। दमणवयसामाइयपोसहसच्चित्तरायमचे य । बम्हारंभपरिग्गहअणुमणमुहिट देश विरदेदे ॥६६॥ भावाथ-देशविरत नाम पचम गुणस्थान में ग्यारह प्रतिमाए या श्रेणिया इस प्रकार हैं -(१) दर्शन, (२) व्रत, (३) सामायिक, (४) प्रोषध, (५) सचित्त त्याग (६) रात्रि भुक्ति त्याग (७) ब्रह्मचये, (८) श्रारभ त्याग, (९) परिग्रह त्यगा, (१०) अनुमति त्याग, (११) उद्दिष्ट त्याग । उत्तमखमामवज्जवमच्चसउच्चं च. सजमं चेव । तवतागमकिचएह बम्हा इदि दविहं होदि ॥७॥ भावार्थ-उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम सयम, उत्तम नप, उत्तम त्याग, उत्तम अकिचन्य, उत्तम ब्रह्मचर्य, ये दश प्रकार मुनि धर्म है। - ३३६] सम्यकचारित्र और उसका महात्म्य । से णिच्धयणएण जीवो सागारणगारधम्मदो भिएणो । मज्झत्थभावणाए सुद्धप्पां चिंतये णिच्चं ॥२॥ भावार्थ-निश्चय में यह जीव श्रावक व मुनि धर्म दोनों से भिन्न है । इसलिये वीतराग भावना से मात्र शुद्धात्मा का नित्य अनुभव करना चाहिये । यही निश्चय सम्बचारित्र है। मोक्खगया जे पुरिसा अणाइकालेण बारअणुवेक्खं । परिभाविऊण सम्म पणमामि पुत्रो पुत्रो तेसि ॥८६॥ भावार्थ-अनादि काल से जितने महापुरुष मोक्ष गए हैं वे अनित्यादि बारह भावनाओं की बारबार भले प्रकार भावना करने से गए हैं, इसलिये इम प्रकार भावनाओं को बारबार नमन करता है । (५) श्री कुदकुंदाचार्य चारित्र पाहुड में कहते हैं- जं जाणड तं गाणं नं पिच्छड तं च दंणणं भणियं । णाणप्स पिच्छियस्स य समवण्णा होइ चारिचे ॥३॥ भावार्थ-जो जानना है मो ज्ञान है, जो शृद्वान करता है वह सम्यग्दर्शन कहा गया है। सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्लान के संयोग से चारित्र होता है। एए तिगिण वि भावा हवंति जीवस्स अक्खयामेया । तिराहं पि माहणत्थे जिणभणियं दुविह चारिचं ॥४॥ भावार्थ-ये तीन ही भाव सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र जीव के अक्षय और अन्त स्वभाव हैं । इन्हीं की शुद्धता के लिये चारित्र दो प्रकार का-सम्यक्तको आचरण तथा सयम का आचरण कहा गया है। चारिचसमारूढो अप्पासु परं ण ईहए णाणी । पावइ अइरेण सुई अणोवमं जाण णिच्छयदो ॥४३॥ भावार्थ-जो सम्यग्ज्ञानी महात्मा चारित्रवान है वे अपने आत्मा में किसी भी पाद्रव्य को नहीं चाइते है । अर्थात किसी भी पर वन्तु में रागद्वेष नहीं करते हैं। वे ही ज्ञानी अनुपम मोक्ष सुख को पाते हैं, ऐसा हे भव्य ! निश्चय से जानो। (६) श्री कुदकुटाचार्य श्री बोधपाहुड में कहते हैं- गिहगंथमोहमुक्का बावीसपरीषहा जियकषाया। पाबारभविमुक्का पव्वज्जा एरिसा भणिया ॥४॥ भावार्थ दीक्षा वह कही गई है जहा गृह व परिग्रह का व मोह का त्याग हो, बाईस परीषहों का सहना हो, कषायों का विजय हो व पापारभ से विमुक्ति हो । है ।
सहज-सुख-साधन । [ ३३७ भावार्थ सत्त मिचे य सभा पसंसणिद्दाअलद्धिलद्धिसमा । तणकणए समभावा पव्वज्जा एरिसा भणिया ॥४७॥ "जहा शत्रु व मित्र मे समभाव है, प्रशसा, निन्दा, लाभ व अलाभ में समभाव है, तृण व कचन मे समभाव है, वही जैन मुनि दीक्षा कही गई है। उत्तममज्झिमगेहे दारिद्द ईसरे णिरावेक्खा । सव्वत्थ गिहिद पिंडा पयज्जा एरिसा भणिया ॥४८॥ भावार्थ-जहा उत्तम राजमदिरादि व मध्यम घर-सामान्य मनुष्य आदिका इनमें कोई विशेष नहीं है । धनवान व निर्धन की कोई इच्छा नहीं रखते हैं, सर्व जगह भिक्षा लेते हैं वही जैन दीक्षा कही गई है। णिग्गंथा णिस्संगा णिम्माणासा अराय जिद्दोसा । णिम्मम णिरहंकारा पव्वज्जा एरिसा भणिया ॥४६॥ भावार्थ -जो निग्रथ हैं, असग है, मान रहित हैं, आशा रहित हैं, ममकार रहित हैं, अहकार रहित हैं, उन्हीं के मुनि दीक्षा कही गई है। णिगणेहा णिल्लोहा णिम्मोहा णिब्धियार णिक्कलुसा । विभय णिरासभावा पधज्जा एरिसा भणिया ।।५०॥ भावार्थ-जो स्नेह रहित हैं, लोभ रहित हैं, मोह रहित है, निर्विकार हैं, क्रोधादि कलुषता से रहित है, भय रहित हैं, आशा रहित हैं उन्हीं के जैन दीक्षा कही गई है। उवसमखमदमजुत्ता सरीर कारवज्जिया रुक्खा। मयरायदोसरहिया पव्यज्जा एरिसा भणिया ॥५२॥ भावार्थ-जो शातभाव, क्षमा व इन्द्रिय सयम से युक्त हैं, शरीर के शृगार से रहित हैं, उदासीन है, मद व राग व दोप से रहित हैं उन्हीं के जिनदीक्षा कही गई है। पसुमहिलसंढसंग कुमीलसंगं ण कुणड विकहायो । सज्झायमाणजुत्ता पन्चज्जा एरिसा भणिया ॥५७।। भावार्थ-जो महात्मा पशु, स्त्री, नपु सक की सगति नहीं रखते है, व्यभिचारी पुरुषों की संगति नहीं करते है. विकथाए नहीं कहते है न सुनते है, स्वाध्याय तथा प्रात्मधान मे लीन रहते हैं, उन्हो के जिन- - दीक्षा कही गई है। तववयगुणेहि सुद्धा संजमसम्मागुणविसुद्धा य । सुद्धा गुणेहि सुद्धा पवजा एरिसा भणिया ॥५८|| ३३८]] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । भावार्थ-जो महात्मा बारह तप, पांच महाव्रत, भूलगुण व उत्तर गुणों से शुद्ध है, सयम व सम्यग्दर्शन गुणों से निर्मल है व आत्मीक गुणों से शुद्ध हैं-उन्हीं के शुद्ध दीक्षा कही गई है। (७) श्री कुन्दकुन्दाचार्य भावपाहुड में कहते हैं । बाहिरसंगच्चायो गिरिसरिदरिकंदराइ आवासो। सयलोणाणज्मथणो णिरत्थयोभावरहियाणं दहा भावार्थ-जिन महात्माओं के भावों मे शुद्धात्मा का अनुभव नहीं है उनका बाहरी परिग्रह का त्याग, पर्वत गुफा, नदीतट, कदरा आदि स्थानों में तप करना, तथा सर्व ध्यान व आगम का पढ़ना निरर्थक है । भावविसुद्धिणिमित्र बाहिरगथस्स कीरए चारो। बाहिरचायो विहलो अभंतरगंथजुत्तस्स ||३|| भावार्थ-बाहरी परिग्रहका त्याग भावोंकी शुद्धताके निमित्त किया जाता है। यदि भीतर परिणामोंमें कषाय है या ममत्व है तो बाहरी त्याग निष्फल है। भावरहिएण मपुरिस अणाइकालं अणंतसमारे । गहिउज्झिायाइ बहुसो बाहिरग्गंथरूबाई ॥७॥ भावार्थ-शुद्धोपयोगमई भावको न पाकर हे भव्य जीव । तूने अनादि कालसे लगाकर इस अनत ससारमें बहुतबार निग्रंथरूप धार करके छोडा है। भावेण होइ लिंगी णहु लिंगी होइ दव्वमिचेण । तम्हा कुणिज्ज भावं किं कीरइ दबलिगेण ॥४॥ भावार्थ- -भाव सहित भेषधारी साधुका लिंग होसक्ता है, केवल द्रव्यलिंगमे या भेषमात्रसे साधु नहीं हो सक्ता । इसलिये भावरूप साधुपनेको या शुद्धोपयोगको धारण कर भाव विना द्रव्यलिंग कुछ नहीं कर सकता है। देहादिसंगरहियो माणकसाएहिं सयलपरिचतो। अप्पा अप्पम्मि रो स मावलिगी हवे साहू ।।५६|| भावार्थ-जो साधु शरीर श्रादिकी मूर्खासे रहित है, मान कपायादिसे पूर्ण पने अलग है तथा जिसका आत्मा अात्मामें मगन है वही भावलिगी है । जो जीवो भावंतो जीवसहाव सुभावसंजुत्तो। सो जरमरणविणामं कुणइ फुड लहड णिव्याणं ॥६१।। भावार्थ-जो भव्य जीव अात्माके स्वभावको जानता हुआ आत्माके स्वभावकी भावना करता है सो जरा मरणका नाश करता है और प्रगटरुपसे निर्वाणको पाता है। है सहज-सुख-साधन । [३३९ जे रायसंगजुता जिणभावणरहियदव्वंणिग्गंथा। न लहंति ते समाहिं वोहि जिणसासणे विमले ॥७२।। भावार्थ- -जो केवल द्रव्यसे निग्रंथ हैं मेंप साधुका है परन्तु शुद्धोपयोगकी भावनासे रहित हैं । वे रागी होते हुए इस निर्मल जिन शासनमें रत्नत्रय धर्मको व आत्मासमाधिको नहीं षासत्ते हैं। जे के वि दध्वसवणा इंदियसुहयाउला ण छिदति । छिदंति मावसवणा झाणकुठारेहि भवरुक्खं ॥१२२।। भावार्थ--- जो कोई भी द्रव्यलिंगी साधु है "और वे इद्रियोंके सुखोंमें श्राकुल हैं वे ससारके दुःखों को नहीं छेद सक्त हैं परन्तु जो भावलिंगी साधु हैं । शुद्धोपयोग की भावना करनेवाले हैं वे ध्यानरूपी कुठारता से ससार के दुःखों के मूल कमी को छेद डालते है । (६) श्री कुन्दकुन्दाचार्य मोक्षपाहुड़ में कहते हैं:- जो इच्छइ णिस्सरिई ससारमहराणघाउ रुदायो। कम्मिधणाण डहण सो झायइ अप्पयं सुद्ध ॥२६॥ भावार्थ-जो कोई महात्मा भयानक संसाररूपी महान समुद्र से निकलना चाहता है उसे उचित है कि कर्मरूपी ईधन को जलाने के लिये अपने शुद्ध आत्मा को ध्यावे-यही चारिन है । मिच्छनं अण्णाणं पावं पुण्णं चएवि तिविहेण । मोणव्यएण जोई जोयत्यो जोयए अप्पा ||२८|| भावार्थ-मिथ्यादर्शन, अज्ञान, पुण्य व पाप इन सबको मन वचन, कायसे त्यागकर योगी योगमें थिस्त हो, मौनव्रत के साथ आत्माका ध्यान करे। पंचमहव्वयजुचो पंचसु ममिदीसु तीसु गुत्तीसु । रयणतयसंजुचो माणज्झयणं सदा कुणइ ॥३३॥ भावार्थ साधु के को उचित है कि पांच महाव्रत, पांच समिति व तीन गुमि इस तरह तेरह प्रकार चारित्र से युक्त होकर सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र सहित श्रात्मध्यान तथा शास्त्रपठन इन दो कार्यों में सदा लगा रहे। जं जाणिऊण जोई परिहारं कुणइ पुण्णपावाणं । त चारित्रं भणिय अवियप्प कम्मरहिएहि ॥४२॥ भावार्थ कमरहित सर्वज्ञो ने उसे ही निर्विकल्प शुद्धोपयोगरूप चारित्र कहा है जिसको अनुभव करता हुआ योगी पुण्य तथा पाप बंधकारक भावों का त्याग कर देवे ।
. ३४०] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । होऊण दिढचरित्तो दिढसम्मण भावियमईयो। झायंतो अप्पाण परमपयं पावए जोई ॥४६॥ भावार्थ -दृढ सम्यग्दर्शन से परिपूर्ण योगी दृढ चारित्रवान होकर यदि आत्मा को ध्याता है तो वह परमपद को पाता है। चरणं हवई सधम्मो धम्मो मो हवइ अप्पसमभावो । सो रागरोसरहियो जीवत्स अणण्णपरिणामो ॥५०॥ भावार्थ -आत्मा का धर्म सम्यक्चारित्र है, वह धर्म आत्मा का समभाव है, वही रागद्वेष रहित आत्मा का अपना ही एकाग्र परिणाम है । आत्मस्थ भाव ही समभाव है व बही चारित्र है। वाहिरलिंगेण जुदो अभंतरलिंगरहियपहियम्मो । सो सगचरित्र भट्ठो मोक्खयहविणासगो साहू ॥६१।। भावार्थ-जो साधु बाहरी लिंग या भेप सहित है परन्तु भीतरी भावलिंग से रहित है, शुद्ध भाव से शून्य है वह निश्चय सम्यक्चारित्र से भ्रष है तथा मोक्षमार्ग का नाश करनेवाला है। उद्धृद्धमझलोये केई मज्झ ण अयमेगागी। इयमावणाए जोई पावंति हु सासयं ठाणं ॥८१॥ भावार्थ- -इस उर्व, मध्य व अधोलोकमें कोई पदार्थ मेरा नहीं है, मैं एकाकी हुँ। इम भावनासे युक्त योगी ही अविनाशी स्थानको पाता है । णिच्छयणयस्य एवं अप्पा अप्पम्मि अप्पणे सुरदो। सो होदि हु सुचरित्तो जोई सो उहइ णिच्वाणं ॥८३॥ भावार्थ-निश्चयनयसे जो आत्मा अपने प्रात्मामें अपने आत्माके लिये मग्न होजाता है वही योगी सम्यक्चारित्रवान होता हुआ निर्वाणको पाता है। (8) श्री वट्टकेर स्वामी मूलाचार पंचाचार में कहते हैं - पाणिवहमसावादअदत्तमेहुणपरिग्गहा विरदी । एस चरित्ताचारो पचविहो होदि णादव्यो ॥११॥ भावार्थ-प्राणीवध, मृपावाद, अदत्तग्रहण, मैथुन, परिग्रह इनसे विरक्त होना चारित्राचार साच तरहका जानना चाहिये। सरवासेहिं पडतेहिं जह दिढकवचो ण भिज्जदी सरेहिं । तह समिदीहिं ण लिप्पा साहू काएसु इरियतो ॥१३१॥ भावार्थ-जैसे संग्राममें दृढ कत्रच पहरे हुए सिपाही सैकड़ो बाणोंके पड़नेपर भी बाणोंसे नहीं भिदता है वैसे माधु ई समिति आदिसे कार्य सावधानीसे करता हुआ पापोंसे लिप्त नहीं होता है।
सहज-सुख-साधन। [२४१ के खेत्तस्स वई णयरस्स खाइया अहव होइ पायारो । तह पावस्य गिरोहो ताश्रो गुत्तीउ साहुम्स ॥१३७ ॥ भावार्थ-जैसे खेत की रक्षा को बाड होती है व नगर की रक्षा को खाई व कोट होता है, वैसे साधु सीन गुप्तियें पापों से बचानेवाली हैं। (१०) श्री चट्टकेरस्वामी मूलाचार पडावश्यकमें कहते हैं- सामाइयमि दु कदे समणो इर सावनो हवदि जमा । एदेण कारणेण दु बहुसो सामाइयं कुज्जा ॥ ३४ ॥ भावार्थ-सामायिक ही करने से वास्तव में साधु या श्रावक होता है इसलिये सामायिक को बहुत बार करना चाहिये। पोराणय कम्मरयं चरिया रित्तं करेदि जदमाणो । णवकम्मं ण य बंधदि चरित्तविण श्रोत्ति यादव्यो ॥१०॥ भावार्थ-जो सम्याचारित्र पालने का उद्यम करता है उसके पुराने कर्म मड़ते नाते हैं व नए कर्म नहीं विनते हैं चारित्र का प्रेम से पालन ही चारित्र विनय है । (११) श्री वट्टकेरस्वामी मूलाचार अनगारभावना में कहते हैं- वसुधम्मि वि विहरंता पीडं ण करेंति कस्सइ कयाई । जीवेसु दयावण्णा माया जह पुत्तभंडेसु ॥३२॥ भावार्थ-साधुजन पृथ्वी मे बिहार करते हुए किसीको भी कभीभी पीड़ा नहीं देते हैं । वे सर्व जीवोंपर ऐसी दया रखते हैं, जैसे माताका प्रेम पुत्र पुत्री आदिपर होता है। देहे विरावियक्खा अप्पाणं दमरुई दमेमाणा । धिदिपग्गहपग्गहिदा छिदंति भवस्स मूलाई ॥४३॥ भावार्थ-साधुजन शरीर में ममत्व न रखते हुए, इन्द्रियों को निग्रह करते हुए, अपने आत्मा को वश रखते धैर्ध को धारते हुए, ससार के मूल कमी का छेदन करते हैं। अक्खोमक्खणमेत्त भुजंति मुणी पाणधारणणिमित्त । पाणं धम्ममिचं धम्म पिचरंति मोक्ख ॥४६॥ ' भावाथ-जैसे गाड़ी के पहिये में तेल देकर रक्षा की जाती है वैसे मुनिगप्प प्राणों की रक्षार्थ भोजन करते हैं, प्राणों को धर्म के निमिच रखते हैं, धर्म को मोक्ष के अर्थ आचरण करते हैं । पंचमहव्ययधारी पंचसु समिदीसु संजदा धीरा । पचिदियत्थविरदा पंचमगइमग्गया सवणा ॥१०॥ . " ।
३४२] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । भावार्थ-जो - साधु पांच महावत के पालने वाले हैं, पाच समितियोंमें प्रवर्तनेवाले हैं, धीर धीर हैं, पांचों इद्रियोंके विषयोंसे विरक्त हैं वे ही पचमगति जो मोक्ष उसके अधिकारी हैं। समणोत्ति संजदोचि य रिमि मुणि साधुचि वीदरागोचि । रपामाणि सुविहिदाणं अणगार भदंत दंतोचि ॥१२० भावार्थ-भले प्रकार चारित्र पालनेवाले साधुओंके ये नाम प्रसिद्ध हैं -(१) आत्मा को तपसे परिश्रम कराने वाले श्रमण, (२) इन्द्रिय व कषायोंके रोकनेवाले सयत (३) रिद्धियोंको प्राप्त करने वाले ऋषि, (४) स्वपर पदार्थ के ज्ञाता मुनि, (५) रत्नत्रयके साधनेवाले साधु, (६) रागद्वेप रहित वीतराग (७) सर्वकल्याण प्राप्त भदत, (८) इन्द्रिय विजयी दात । (१२) श्री वट्टकेरस्वामी मूलाचार समयसार में कहते हैं- भिक्खं चर वम रगणे थोव जेमेहि मा बहू जंप । दुक्ख सह जिण णिद्दा मेचि भावेहि सुठ्ठ वेरग्गं ॥४॥ अव्यवहारी एक्को झाणे एयग्गमणो भव णिरारंभो। चरकसायपरिग्गह पयतचेट्ठो असंगो य ॥५॥ भावार्थ-श्राचार्य शिष्यों को चारित्र के पालने का उपदेश देते हैं । मिक्षा से भोजन कर, वन में रह, थोड़ा जीम, दु.खों को सह, निद्रा को जीत, मैत्री और बेराग्यभावना को भले प्रकार विचार कर, लोक- व्यवहार न कर, एकाकी रह, ध्यान में एकाप्रमन हो, प्रारम्भ मत कर, कषायरूपी परिग्रह का त्याग कर, उद्योगी हो, असग रह अर्थात् निर्मोह रह या आत्मस्थ रह । थोवलि सिक्खदे जिणई बहुसुद जो चरित्तसंपुषणो । जो पुण चरितहीणो कि तस्स सुदेण बहुएण ॥६॥ भावार्थ-थोडा शास्त्रज्ञ हो या बहु शास्त्रज्ञ हो जो चारित्र से पूर्ण है वही ससारको जीतता है । जो चारित्र रहित है, उसके बहुत शास्त्रों के जानने से क्या लाभ है ? मुख्य सच्चे सुख का साधन आत्मानुभव है। मव्यं पि हु सुदणाणं सुट्ठ मुगुणिदं पि सुट्ठ पढिद पि । समण भट्टचरित्तण हु सक्को सुग्गई णेदु ॥१४॥ जाद पड दि दीवहत्थी अवडे किं कुणदि तस्म मो दीवो । जदि सिक्खिऊण अणय करेदि किं तस्म सिक्फलं ॥१५॥ भावार्थ-जो कोई साधु वहुत शास्त्र को जानता है, बहुत शास्त्रों का अनुभवी हो व बहुत शास्त्रों को पढ़नेवाला हो तो भी यदि वह चारित्र से भ्रष्ट है तो वह सुगति को नहीं पा सकता है । यदि कोई दीप को हाथ में रखकर भी कुमार्ग में जाकर कूप में गिर पडे तो उसका दीपक रखना निष्फल है वैसे ही जो शास्त्रों फो सीखकर भी चारित्र को भग करता है उसको शिक्षा देने का कोई फल नहीं है।
सहज-सुख-साधन । [३४३ णो कप्पदि विरदाणं विरदीणमुवासयहि चेहूँ। तत्थ णिसेज्जउवट्टणसज्झायाहारवोसरणे ॥६१।। भावार्थ-साधुओं को साध्वियों के आयिका प्रो के उपाश्रय मे ठहरना उचित नहीं है। न तो वह वहां बैठना चाहिये, न सोना चाहिये, न स्वाध्याय करना चाहिये, न साथ श्राहार करना चाहिये, न प्रतिक्रमणादि करना चाहिये। भावविरदो दु विरदो ण दव्यविरदस्स सुग्गई होई । विसयवणरमलोलो धरियचो तेण मणहत्थी ॥१०४॥ भावार्थ-जो अतरग भावो से विरक्त है वही भावलिंगी साधु है । जो केवल बाहरी द्रव्यों से विरक्त हैं, अन्तरग रागद्वेपादि का त्यागी नहीं है, उस द्रव्यलिंगी साधु को सुगति कभी नहीं होगी। इसलिये पांचोद्रियों के विपयों मे रमनेवाले मन रूपी हाथी को सदा बांधकर रखना चाहिये । जद चरे जदं चिट्ठ जदमासे जदं सये जद भुजेज्ज भासेज्ज एवं पावं ण वज्झइ ॥१२२।। जदं तु चग्माणस्स दयापहुस्स भिक्खुणो । णवं ण वज्झदे कम्म पोराणं च विधूयदि ॥१२३।। भावार्थ-हे साधु । यत्न पूर्वक देखके चल, यत्न से व्रत पाल, यत्न से भूमि शोधकर बैठ, कर, यन से निर्दोप आहार कर यत्नपूर्वक सत्य वचन बोल, इस तरह वर्तन से तुझे पाप का बन्ध न होगा । जो दयावान साधु यत्नपूर्वक आचरण करता है उसके नए पापकर्म का बन्ध नहीं होता है और पुरातन यत्न से शयन . कर्म झडता है। (१३) श्री ममन्तभद्राचार्य स्वयम्भूस्तोत्रमें कहते हैं- अपत्यवित्तोग्लोकतृष्णया तपस्विनः केचन कर्म कुर्वते । भवान्पुनजन्मजराजिहामया त्रयी प्रवृत्तिं शमधीरवारुणात् ॥४६॥ भावार्थ-अज्ञानी कितने तपस्वी पुत्र, धन व परलोक की तृष्णा के वश तप करते हैं परन्तु हे शीतलनाथ । आपने जन्म जरा मरण रोग के दूर करने के लिये मन, वचन, काय की प्रवृत्ति को रोककर वीतरागभाव की प्राप्ति की। - परिश्रमाम्बुर्भयवीचिमालिनी त्वया स्वतृष्णासग्दिार्य शोषिता । अमगधर्मार्कगस्तितेजसा परं ततो नितिधाम तावकम् ॥६॥ हे अनतनाथ ! आपने असग धर्म अर्थात् ममत्वरहित वीतराग धर्मरूपी सूर्य के तेज से अपनी तृष्णारूपी नदी को सुखा डाला। इस नदी में प्रारभ करने की प्राकुलतारूप जल भरा है तथा भयकी तरगें उठ रही है इसलिये आपका तेज मोक्षरूप है । भावार्थ- ३४४] सम्यक चारित्र और उमा महात्म्य । माय नपः परमदुश्चरमाचरंस्थमाध्यात्मिकस्य तपसः परिहरणार्थम् । ध्यानं निरम्य कलुगद्रयमुनरम्मिन ध्यानद्वये वनिपेऽतिशयोपपन्ने ||३|| भावार्थ-हे थुनाथ भगवान ! आपने प्रात्मध्यान पी आभ्यार तप की वृद्धि के लिये ही उपवाम आदि बाहरी तप बहुत ही दुर्दर 'प्राचरण किया था। नया 'पाने रोट दो ग्योटे ध्यानों को दर कर श्राप अतिशय पूर्ण धध्यान पोर शालण्यान में वर्तन करते हए । दुरितमल कलंकमाष्टकं निरुपमयोगानेन निर्दहन । श्यभवदभवमौख्यवान् भवान भरतु ममापि भयोपशांतये ।।११।। मावार्थ-हे मुनिसुनतनाथ ! अापने प्यनुपम योगाभ्यास के बल में पाठों कमी के महा मलीन कला को जला सला तथा पाप मोशमग के अधिकारी होगप । प्राप मेरे भी मार के नाम के लिये कारण हो । हिमा भूतानां जगनि पिदिनं ब्रह्म परम न मातम्भोम्यगुरपि च यत्राभरियो । ततम्तत्मिययं परमकरणी ग्रन्थमुभयं भवानवात्यातीन व विकृतवेपोपधिरतः ||११६॥ भावार्थमर्च प्राणियोपर प्रतिमागई भावको को जगतमें पम प्रयभार करते है । जिसके आश्रम में जरामा भी प्रारम्भ है वहां अहिंमा नहीं रहती है। इसलिए हेनमिनाथ ! आप बड़े दयालु है, आपने अहिंसा ही के लिए भीतरी बाहरी परिमहका त्याग कर दिया और श्राप रिकारी भेयोंमें रत न हुए। (१४) श्री ममन्तभद्राचार्य रत्नकरण्ड श्रावकाचार में कहने है- मोहतिमिरापहरणे दर्शनलाभादवाप्तसजानः । रागढ पनिवृत्पै चरणं प्रतिपद्यते साधुः ॥४७॥ भावार्थमिध्यादर्शनके अन्धकारके मिटनेमे मन्यादर्शन तथा मम्यग्ज्ञानके लाभ होजाने पर साधु रागद्धपको दूर करनेके लिये चारित्रको पालते हैं। हिंसानृतचौर्येभ्यो मैथुनसेवापरिग्रहाम्यां च । पापप्रणालिकाम्योविरतिः संज्ञम्य चारित्रम् ||४६।। भावार्थ-पापकर्मके आनेकी मोरियां-पाच अशुभकर्मको सेवा है-हिंसा, मूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इनका त्याग करना सम्यग्ज्ञानीके चारित्र है। सकलं विकलं चरणं तत्सकलं सर्वसङ्गविरतानाम् । भनगाराणां विकलंसागाराणां ससङ्गानाम् ।।५०|| सहज-सुख-साधन । [ ३४५ . भावार्थ-चारित्र दो प्रकारका है-सकल और विकल । सर्व सगसे रहित साधुओं के लिये सकल चारित्र है चा महाव्रत है । सग सहित गृहस्थोके लिये विकल चारित्र या अणुव्रतरूपचारित्र है। गृहिणां त्रेधा तिष्ठत्याणुगुणशिक्षावतात्मक चरणम् । पञ्चत्रितुर्भेदं त्रय यथासङ्कथमाख्यातम् ॥ ५१ ॥ भावार्थ-गृहस्थियोंका चारित्र तीन प्रकार का है-पाच अणुव्रत, तीन गुणत्रत तथा चार शिक्षाव्रत । श्रावकपदानि देवैरेकादश देशितानि येपु खलु । स्वगुणाः पूर्वगुणौः सह संतिष्ठन्ते क्रमविवृद्धाः ॥ १३६ ।। भावार्थ-श्री गण परादि देवोंने श्रावकोके ग्यारह पद (प्रतिमाए) बनाए हैं । हरएक पदमें अपने चारित्रके साथ पूर्वक पदका चारित्र क्रमसे बढ़ता रहता है । जितना २ आगे पदमे जाता है पहला चारित्र रहता है और अधिक बढ़ जाता है । (१५) श्री शिवकोटि प्राचार्य भगवतीअाराधनामें कहते हैं- बाहिरतवेण होदि हु, मव्वा सुहसीलता परिचत्ता । सल्लिहिदं च सरीर, ठविदो अप्पा य सवेगे ॥२४२।। दताणि दियाणि य, ममाधिजोगा य फासिया होति । अणिमूहिदवीरियदा, जीविदतण्हा य वोछिण्णा ॥२४३॥ भावार्थ-उपवास ऊनोदर श्रादि बाहरी तपके साधन करनेसे सुखिया रहनेका स्वभाव दूर होता है । शरीरमें कृषता होती है । ससार देह भोगोंसे वैराग्यभाव आत्मामे जमता है । पा! इन्द्रिया वशमें होती हैं, समाधि-योगाभ्यासको सिद्वी होती है, अपने आत्मबलका प्रकाश होता है, जीवनकी तृष्णाका छेद होता है। णत्थि अणूदो अप्प, आयामादो अणूणय णत्थि । जह तह जाण महल्लं, ण वयमहिंसासय अन्थि ॥७८७।। जह पचएसु मेरू, उच्चाओ होड़ मचलोयम्मि । तह जाणसु उच्चाय, मीलसु वदेसु य अहिंमा ||७८८|| भावार्थ-जैसे परमाणुसे कोई छोटा नहीं है और आकाशसे कोई बड़ा नहीं है तैसे अहिंसाके समान महानब्बत नहीं है जैसे लौकमें सबसे ऊँचा मेरु पर्वत है वैसे सर्व शीलोमे व सर्व व्रतोमें अहिंसावत ऊँचा है। सव्वग्गविमुक्को, सीदीभूदो पसण्णचिचो य । ज पावइ पीडसुह, ण चकवट्टी वि त लहदि ॥११८२॥ रागविवागसत्तबहाः, इगिद्धिअवितिचि चक्कट्टिसुह । हिस्संगणिव्वुसुह-, स्स कहं अग्घड अणंतभागं पि ॥११८३।। , .
. ३४६] सम्यकचारित्र और उसका महात्म्य । भावार्थ-जो महात्मा सर्व परिग्रह रहित है, शातचित्त है व प्रसन्नचित्त है उसको जो सुख और प्रेम प्राप्त होता है उसको चक्रवर्ती भी नहीं पा सकता है। चक्रवर्ती का सुख राग सहित तृष्णा सहित व बहुत गृद्धता सहित है व तृप्ति रहित है जबकि असंग महात्माओं को जो स्वाधीन आत्मीक सुख है उसका अनंतवां भाग भी सुख चक्री को नहीं है । इंद्रियकसायवसगो, बहुस्सुदो वि चरणे ण उज्जमदि । पक्खी व छिण्णपक्णो, ण उप्पददि इच्छमाणो वि ॥१३४३॥ भावार्थ-जो कोई बहुत शास्त्रों का ज्ञाता भी है, परन्तु पाच इन्द्रियों के विपयों के व कषायों के श्राधीन है वह सम्यय चारित्र का उद्यम नहीं कर सकता है । जैसे पख रहित पक्षी इच्छा करते हुए भी उड नहीं सकता है। णासदि य सगं बहुगं, पिणाणमिदियकमायसम्मिस्सं । विससम्मिसिदं दुद्ध, णस्सदि जध सक्कराकढिदं ॥१३४४|| भावार्थ-इन्द्रिय विषय और कषायो से मिला हुआ बहुत बड़ा ज्ञान नाश हो जाता है जैसे मिश्री मिलाकर श्रौटाया हुआ दूध भी विपके मिलने से नष्ट हो जाता अभंतरसोधीए, सुद्धणियमेण बाहिरं करणं । अम्भतरदोसेण हु, कुणदि णरो बाहिरं दोसं ॥१३५०।। भावार्थ- -अतरग आत्मा से परिणामों की शुद्धता से बाहरी क्रिया की शुद्धता नियम से होती है। भीतर भावों में दोष होने से मनुष्य बाहर भी दोषों को करता है । होइ सुतवो य दीवो, अण्णाणतमंधयारचारिस्म । सव्यावस्थासु तवो, वट्टदि य पिदा व पुरिसस्स ॥१४६६॥ भावार्थ-अज्ञान रूपी अन्धेरे में चलते हुए उत्तम तप ही दीपक है। सर्व ही अवस्था में यह तप प्राणियों के लिये पिता के समान रक्षा करता है। रक्खा भएसु सुतवो, अब्भुदयाणं च ागरो सुतवो । हिस्सेणी होड़ तवो, अक्खयसोक्खस्स मोवखस्स ।।१४७१।। भावार्थ-भयों से रक्षा करने वाला एक तप ही है । उत्तम तप- सर्व ऐश्चर्यों की खान है । यही प्रात्मा नुभाव रूपी तप मोक्ष के अविनाशी सुख पर पहुंचने की सीढ़ी है । तं णस्थि जंण लब्भइ, तवसा सम्मंकरण पुरिसस्स । अग्गोव तणं जलिङ, कम्मतणं डहदि य तबग्गी ॥१४७२।। भावार्थ- -जगत में ऐसी कोई उत्तम वस्तु नहीं है जो सग्यक् तप करने वाले पुरुष को प्राप्त न होवे जैसे अग्नि तृण को जला देती है वैसे तपरूपी अग्नि कर्म रूपी तृणों को जला देती है।
सहज-सुख-साधन । [३४७ जिदरागो जिददोसो जिदिदिश्रो जिभयो जिदकसायो । रदिअरदिमोहमहणो, झाणोवगो सदा होई ॥१६६८॥ भावार्थ-जिसने राग को जीता है, द्वेष को जीता है, इन्द्रियों को जीता है, भय को जीता है कषायों को जीता है, रति अरति व मोहभाव को जिसने नाश किया है, वही पुरुष सदाकाल ध्यान में उपयुक्त रह सकता है। (१६) श्री पूज्यपादस्वामी समाधिशतक में कहते हैं-- मुक्तिरेकान्तिकी तस्य चित्त अदयाचला धृतिः । तस्य नैकान्तिकी मुक्तिर्यस्य ना यत्यचला धृतिः ॥७१।। भावार्थ-जिसके चित्त मे निष्कम्प प्रात्मा में थिरता है उसी को मोक्ष का लाभ होता है । जिसके चित्त मे ऐसा निश्चल धैर्य नहीं है उसको मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती है । जनेभ्यो वाक् ततः स्पन्दो मनसश्चितविम्नमाः । भवन्ति तस्मात्संसर्ग जनैर्योगी ततस्त्यजेत् ॥७२॥ भावार्थ-मानवो से वार्ता करने से मन की चचलता होती है जिससे मन में अनेक विकल्प रूप व भ्रम पैदा होता है, ऐमा जानकर योगी मानयों की संगति छोडे । अपुण्यमव्रतैः पुण्यं व्रतैर्मोक्षस्तयोय॑यः । अव्रतानीव मोक्षार्थी व्रतान्यपि ततस्त्यजेत् ॥८३॥ भावार्थ-हिसादि पापों से पाप का बन्ध होता है । जीवदया आदि व्रतों से पुण्य बन्ध होता है । मोक्ष तो पुण्य पाप के नाश से होता है। इसलिये मोक्षार्थी जैसे हिंसादि पाच अग्रतों को छोड़ता है वैसे वह अहिंसादि पांच व्रतों के पालने का भी विकल्प छोड देता है। अवतानि परित्यज्य व्रतेषु परिनिष्ठितः । त्यजेत्तान्यपि सम्प्राप्य परमं पदमात्मनः ॥८४॥ भावार्थ-ज्ञानी जीव पहले अव्रतों को छोड़कर अहिसादि व्रतों मे अपने को जमाता है । पश्चात् आत्मा, का श्रेष्ठ निर्विकल्प पद पाकर व्रतों को भी छोड़ देता है अर्थात घ्रतों के पालने का ममत्व भी उसके छूट जाता है। (१७) श्री गुणभद्राचार्य श्रात्मानुशासन में कहते हैं- अधीत्य सकलं श्रुतं चिरमुपास्य घोरं तपो । यदीच्छसि फलं तयोरिह हि लाभपूजादिकम् ।।
: के ? ३४८] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । छिनत्सि सुतपस्तरोः प्रसवमेव शून्याशयः कथं समुपलक्ष्यसे सुरसमस्य पक्व फलम् ||१८६।। भावार्थ-सर्व शास्त्रों को पढ़कर तथा दीर्घ काल तक घोर तप साधन कर यदि तू शास्त्र ज्ञान और तप का फल इस लोक मे लाभ बड़ाई आदि चाहता है तो तू विवेकशून्य होकर सुन्दर तपरूपी वृक्ष को ही तोड़ डालता है । नब तू उस वृक्ष के मोक्षरूपी पक्के फल को कैसे पा सकेगा ? तप का फल मोक्ष है यही भावना कर्तव्य है। तथा श्रुतमधाव शश्वदिहलोकपनि विना शरीरमपि शोषय प्रथितकायसंक्लेशनैः । कपायविपयद्विवो विजय से तथा दुजय'न् शमं हि फलमामनन्ति मुनयस्तपः शास्त्रयोः ॥१६॥ भावार्थ-हे भव्य । तू इस लोक में लोगों की सगती बिना शास्त्रों को ऐसा पढ व महान कायल्केश तप से शरीर को भी ऐसा शोप जिससे तू दुर्जय कपाय और विपय रुपी वैरी को विजय कर सके क्योंकि महामुनि तप व शास्त्र का फल शातभाव को ही मानते हैं। विषयविरतिः संगत्यागः कपायविनिग्रहः । शमयमदमास्तत्वाभ्यामस्तपश्चरणोद्यमः। नियमितमनोवृत्तिभक्तिजिनेषु दयालुता भवति कृतिनः संसाराब्धेस्तटे निकटे यति ॥२२४॥ भावार्थ- -ससार समुद्र का तट निकट होते हुए विवेक पुण्यात्मा जीव को इतनी बातों की प्राप्ति होती है- (१) इन्द्रियों के विपय मे विरक्तभाव, (२) परिग्रह का त्याग, (३) कपार्यों का जीतना, (४) शातभाव, (५) श्राजन्म अहिसादि व्रत पालन (६) इन्द्रियों का निरोध, (७) तत्व का अभ्यास, (८) तप का उद्यम, (९) मन की वृत्ति का निरोध, (१०) जिनेन्द्र में भक्ति, (११) जीवों पर दया । निवृत्तिं भावयेद्यावन्निवर्यं तदभावतः । न वृचिर्न निवृत्तिश्च तदेवपदमव्ययम् ॥ २३६ ।। भावार्थ -जब तक छोडने लायक मन काय का सम्बन्ध है तब तक पर से निवत्ति की या वीतरागता की भावना करनी चाहिये । और जब पर पदार्थ से सम्बन्ध न रहा तब वहा न वृत्ति का विकल्प है। और न निवृत्ति का विकल्प है । वही आत्मा का अविनाश पद है । रागद्वषो प्रवृत्तिः स्यानिवृत्तिस्तनिषेधनम् । ती च बाह्यार्थसम्बन्धौ तस्माश्चि परित्यजेत् ॥२३७|| भावार्थ- -राग द्वेष होना ही प्रवृत्ति है । उन्ही का न होना निवृत्ति है। ये रागद्वेष बाहरी पदार्थो के सम्बन्ध से होते हैं इसलिये बाहरी पदार्थों का त्याग करना योग्य है। - सहज-सुख-साधन । [३४९ सुखं दुःखं वास्यादिह विहितकर्मोदयवशात कुतः प्रीतिस्तापः कुत इति विकल्पाद्यदि भवेत् । उदासीनस्तस्य प्रगलितपुराणं न हि नवं समास्कन्दत्येप स्फुरतिसुविदग्धो मणिरिव ।।२६३॥ भावार्थ-अपने ही किये हुए कर्मों के उदय के वश से जब सुख या दुःख होता है तब उनमें हर्ष या विपाद करना किस लिये ? ऐमा विचार कर जो रागद्वेष न करके उदासीन रहते हैं उनके पुरातन कर्म झड जाते हैं और नए नही वधते हैं। ऐसे ज्ञानी तपस्वी महामणि की तरह सदा प्रकाशमान रहते हैं। (१८) श्री अमृतचन्द्राचार्य पुरुषार्थसिद्धय पाय में कहते हैं- चारित्रं भवति यसः समस्तसावद्ययोगपरिहरणात् । सकलकपायविमुक्त विशदमुदासीनमात्मरूपं तत् ॥३६॥ भावार्थ-सर्व पाप सम्बन्धी मन, वचन, काय की प्रवृत्ति का त्याग व्यवहार सम्यक्चारित्र है । निश्चय सम्यक्चारित्र सर्व कपायों से रहित, वीतरागमय, स्पष्ट आत्मा के स्वरूप का अनुभव है अर्थात आत्मा रूप ही है । हिंसातोऽनृतवचननात्स्तेयादब्रह्मतः परिग्रहतः । कात्स्न्यैकदेशविरतेश्चारित्रं जायते द्विविधम् ॥४०॥ भावार्थ-चारित्र दो प्रकार है-हिसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन पाच पापों मे पूर्णतया विरक्त होना महाव्रतरूप चारित्र है तथा इन पापों से एकदेश विरक्त होना अणुव्रतरूप चारित्र है। निरतः कास्य निवृत्तौ भवति यतिः समयसारभूतोऽयम् । या त्वेकदेशविरतिनिरतम्तम्यामुपासको भवति ॥४१॥ भावार्थ-पांचों पापों से बिलकुल छूट जाने पर जब यह आत्मा समयसार या शुद्धानुभव रूप होता है तब वही यति या साधु है जो इनके एकदेश त्याग में रत है । उसको श्रावक कहते हैं। आत्मपरिणामहिंसनहेतुत्वात्सर्वमेव हिंसैतत् । अनृतवचनादिकेवलमुदाहृतं शिष्यबोधाय ॥४२॥ भावार्थ- -हिंसादि पाचों ही पापों में आत्मा के शुद्ध भावों की हिंगा होती है, इसलिये ये सबही हिंसा से गर्मित हैं । अनृतवचन चोरी आदि चार पापो के नाम उदाहरण रूप शिष्यों के समझाने के लिये हैं यत्खलु कपाययोगात्प्राणानां द्रव्यभावरूपाणाम् । व्यपरोपणस्य करण सुनिश्चिता भवति सा हिसा ॥४३॥ - - -- ३५०] सम्यकचारित्र और उसका महास्य । भावार्थ-जो क्रोधादि कषाय सहित मन वचन काय की प्रवृत्ति से भावप्राण और द्रव्यप्राणों का वियोग करना व उनको कष्ट पहुंचाना वास्तव में हिसा है। अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति । तेपामेवोत्पत्तिर्हिसेति जिनांगमस्य संक्षेपः ॥४४॥ भावार्थ-अपने परिणामों मे रागादि भावों का प्रगट न होने देना वही अहिसा है और उन्हीं का प्रगट होना सो ही हिंसा है । यह जिनागम का सार है। येनांशेन चरित्रं तेनांशेनास्य बन्धनं-नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनाशेनास्य बन्धन भवति ॥२१४॥ भावार्थ-जितने अंश परिणाम में वीतरागरूप चारित्रगुण प्रगट होता है उतने अश वह गुण बन्ध नहीं करता है। उसी के माथ जितना अंश राग रहता है उतना अंश बन्ध होता है। (१६) श्री अमृतचन्द्राचार्य समयसार कलश में कहते हैं स्याद्वादकौशलमुनिश्चलमयमाभ्यां यो भावयत्यहरह: स्वमिहोपयुक्तः । ज्ञान क्रियानयपरस्परतीत्रमैत्रीपात्रीकृतः श्रयति भूमिमिमां स एकः ।।४-१२।। भावार्थ-जोकोई ज्ञानी स्याद्वादनयके ज्ञान मे कुशल हैं और संयम के पालनेमें निश्चल है और निरतर अपने आत्माको तल्लीन होकर ध्याता है वही एक आत्मज्ञान और चारित्र दोनोंके साथ परस्पर तीव्र मैत्री करता हुआ इस एक शुद्वोपयोगी भूमिको प्राप्त करता है जो मोक्षमार्ग है और कर्मनाशक है। चिःात्मशक्किममुदायमयोऽयमात्मा सद्यः प्रणश्यति नयेक्षणखण्ड्यमानः। तस्मादखण्डमनिराकृतखण्डमेकमेकान्तशान्तमचलं चिदहं महम्मि ॥७-१२।। भावार्थ- -यह आत्मा नानाप्रकारकी शक्तियोंका समुदाय है । यदि इसको एक एक अपेक्षासे खंड रूप देखा जाय तो इसका वास्तविक स्वरूप ही नष्ट हो जाता है । इसलिये भेद रहते हुए भी मैं अपने को अभेदरूप अखंड एक परम शांत निश्चल चैतन्य ज्योतिरूप अनुभव करता हूँ। यही सम्यक्चारित्र है। (२०) श्री अमितगति श्राचार्य तत्वभावना में कहते हैं- कामक्रोधविषादमत्परमदद्वषप्रमादादिभिः । शुद्धध्यानविवृद्धिकारिमनसः स्यैर्य यतः क्षिप्यते । काठिन्यं परितापदानचतुरैहें नो हुताशैरिव । त्याज्या ध्यायविधायिभिस्तत इमे कामादयो दूरतः ॥५३॥ भावार्थ-क्योंकि काम, क्रोध, विषाद, ईर्षा, मद, द्वेष, प्रमाद श्रादि दोषों के होनेपर शुद्ध प्रात्मध्यान को बढानेवाली मनकी स्थिरता बिगड़ जाती है इसलिये जैसे तापकारी अग्नि की ज्वालाओं से सुवर्ण की कठिनता - T सहज-सुख-साधन। [ ३५१ है मिटादी जाती है उसी तरह प्रात्मा के ध्यान करनेवालों को उचित है कि वे इन कामादि विकारो को दूर से ही त्याग करें। स्वात्मारोपितशीलसंयमभरास्त्यनान्यसाहाय्यकाः । कायेनापि विलक्षमाणह्रदयाः साहायकं कुर्वता ।। तप्यते परदुष्कर गुरुतपस्तत्रापि ये निस्पृहा । जन्मारण्यमतीत्य भूरिभयदं गच्छंति ते नितिम् ।।८।। भावार्थ-जो अपने मे शील व संयम के भार को रखते है, परपदार्थ की सहायता त्याग चुके हैं, जिनका मन शरीर से भी रागरहित है तथापि उसकी सहायता से जो बहुत कठिन तप करते हैं तो भी जिनके भीतर कोई कामना नहीं है वे ही इस भयभीत संमार वन को उल्लघकर मोक्ष को चले जाते हैं। पूर्व कर्म करोति दु:खमशुभं सौख्यं शुभं निर्मितम् । विज्ञायेत्यशुभ निहतु मनसो ये पोषयंते तपः ।। जायते शमसयमैकनिधयस्ते दुर्लभा योगिनो। ये त्वत्रोभयकर्मनाशनपरास्तेषां किमत्रोच्यते ॥१०॥ भावार्थ-पूर्व बाधा हुअा अशुभकर्म उदय आकर दुःख पैदा करता तथा शुभ कर्म सुम्व को पैदा करता है । ऐसा जानकर जो महात्मा अशुभकर्म को क्षय करने के लिये तप करते हैं वे साम्यभाव व मयम भडार योगी इस जगत में दुर्लभ हैं । तिसपर भी जो पुण्य व पाप दोनो ही कमी के नाश मे तत्पर है, ऐसे योगियों के सबध में क्या कहा जावे ? उनका मिलना तो बहुन कठिन है हो । चक्री चक्रमपाकरोति तपसे यत्तन्न चित्रं सताम् । सूरीणां यदनश्वरीमनुपमां दत्त तप. सपदम् ।। तच्चित्रं परमं यदत्र विपयं गृहाति हित्वा तपो । दत्तऽमोय यदनेकदुःखमवरे भीमे भवाम्भोनिधौ ॥१७॥ भावार्थ-चक्रवर्ती तप करने के लिये सुदर्शन चक्र का त्याग कर देते हैं इममें सज्जनोंको कोई प्राचार्य नहीं होता है क्यों कि वह तप वीर साधुओं को अविनाशी अनुपम मोक्ष की सपना को देता है । परम आश्चर्य तो इस बात में आता है जो कोई तप को छोडकर इन्द्रिय विषय को ग्रहण कर लेता है. वह इस महान व भयानक ससार समुद्र में पडकर अनेक दुखों में अपने को पटक देता है। सम्यक्त्वज्ञानवृत्तत्रयमनघमृते ज्ञानमात्रेण मूढा । लंबित्वा जन्मदुर्ग निरुपमितसुखा ये यियासंति मिद्धिः ।। ते शिश्रीपन्ति नूनं निजपुरमदधि वाहुयुग्मेन तीा । कल्पांतोद्भुतवातक्षुमितजलचरासारकीर्णान्तरालम् ।।१६।।
३५२] सम्यक्चारित्र और उमका महात्म्य । भावार्थी-जो मुढ प्राणी निर्मल सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्रमई मोक्षमार्ग को छोडकर मात्र ज्ञान मे ही इस ममार के किले को उल्लघकर अनुपम सुविमई मुक्ति की इच्छा करते हैं वे मानो कल्पकाल की उडी हुई वायु से क्षोभित और जलचगे मे भरे हुए इस समुद्र को दोनों भुजाश्रो से तरकर अपने नगर में पहुंचना चाहते हैं सो कठिन है। वचन भजति धर्म काप्यधर्म दुरंतम् । कचिदुभ यमनेकं शुद्धबोधोऽपि गेहि ।। कथमिति गृहबासः शद्धिकारी मलाना- मिनि विमलमनस्कैस्त्यज्यते स विधापि ॥११॥ भावार्थ-शुद्ध यात्मज्ञान धारी गृहस्थी भी घर में रहकर कभी तो धर्म सेवता है, कभी महान अधर्म सेवता है, कभी दोनों को मेवता है, तब बताइये यह गृहवाम किस तरह सर्व कर्ममल मे शुद्ध करनेवाला हो सकता है ? ऐसे निर्मल मनधारकों ने विचार कर हम गृहवास को मन बचन काय म त्याग ही किया। (२१) श्री पद्मनदमुनि पद्मनंदीपच्चीसीके धर्मोपदेशामृत अधिकार में कहते हैं- आराध्यन्ते जिनेन्द्रा गुरुपु च विनतिर्धार्मिकः प्रीतिरुचैः। पात्रेभ्यो दानमापन्निहतजनकृते तच्च कारुण्यबुद्धया । तत्वाभ्यामः स्वकीयव्रतिरतिरमलं दर्शनं या पूज्यं । तद्गार्हस्थ्य बुधानामितरदिह पुनःखदो मोहपाशः ॥१३॥ भावार्थ-जिस गृहस्थपने मे श्रीजिनेन्द्र की आराधना की जावे, गुरुओं की विनय की जावे, पात्रों को भक्तिपूर्वक दान दिया जावे, आपदा से दु.वित दीनो को दया से दान दिया जावे, अपने नियम व्रतों की रक्षा मे प्रेम किया जाये, तथा निर्मल सम्यग्दर्शन पाला जावे वही गृहस्थपना बुद्धिमानों के द्वारा माननीय है । जहां ये सब बाते नहीं बह गृहस्थपना नहीं है किन्तु दुःखदाई मोह का फंदा है । अभ्यस्यतान्तरदृशं किमु लोकभक्त्या मोहं कृशीकुरुत किं वपुपाकृ शेन । एतद्वयं यदि न कि बहुभिनियोगः क्लेशैश्च किं किमपरैःप्रचुरैस्तपोभिः ॥५०॥ भावार्थ-हे मुने । अपने भीतर शुद्ध ज्ञानानन्द स्वरूप का अभ्यास करो, लोगों के रिझाने से क्या लाभ ? मोह भाव को कृष करो, कम करो, शरीर को दुबला करने से क्या लाभ ? यदि मोह की कमी और आत्मानुभव का अभ्यास ये दो बाते न हो तो बहुत भी नियम, व्रत, सयम से व कायक्लेशरूप भारी तपो से क्या लाभ ? (२२) श्री पद्मनंदिमुनि पद्मनंदीपच्चीसी के यतिभावना में कहते हैं- भेदज्ञान विशेषसंहृतमनोवृत्तिः समाधिः परो । जायेताम्दुतधाम धन्यशमिनां केषांचिदत्राचलः ।। ?
सहज-सुख-साधन । [ ३५३ वज्र मूर्ध्नि पतत्यपि त्रिभुवने बह्निप्रदीप्तेऽपि वा । येपां नो विकृतिमनागपि भवेत्ताणेषु नश्यत्स्वपि ॥७॥ भावार्थ-इस जगत में कितने ही साम्यभाव के धारक धन्य योगीश्वर हैं जिनके भीतर भेदविज्ञान के बल से मन की वृत्ति रुक जाने से उत्तम ध्यान का प्रकाश परम निश्चल हो रहा है जिसको देखकर आश्चर्य होता है। वे ऐसे निश्चल ध्यानी हैं कि कोई प्रकार के उपसर्ग आने पर भी ध्यान से चलायमान नहीं होते । यदि मस्तकपर वज्रपात पडे या तीन भुवन मे अग्नि जल जावे व प्राणों का नाश भी हो जावे तो भी उनके परिणामों में विकार नहीं होता है। (२३) श्री पद्मनंदिमुनि पद्मनंदिपच्चीसी उपासक संस्कार में कहते- देवपूजा गुरूपातिः स्वाध्यायः संयमस्तपः । दानश्चति गृहस्थानां षट् कर्माणि दिने दिने ॥७॥ भावार्थ-देवपूजा, गुरुभक्ति, स्वाध्याय, सयम, तप, और दान ये गृहस्थों के नित्य प्रतिदिन करने के - कर्म हैं। । (२४) श्री पद्मनंदि मुनि निश्चयपंचाशत में कहते हैं- सानुष्ठानविशुद्ध दृग्योधे जम्भिते कुतो जन्म । उदिते गभस्तिमालिनि किं न विनश्यति तमो नैशम् ॥१६॥ भावार्थ-चारित्र की शुद्धता से जब दर्शन ज्ञान गुण विस्तार को प्राप्त हो जाते हैं तब ससार कहां से रहेगा ? अर्थात् नहीं रहता है। जैसे सूर्य के उदय होने पर रात्रि सम्बन्धी अन्धकार क्या नाश नहीं होगा ? अवश्य होगा। (२५) श्री कुलभद्र आचार्य मारसमुच्चय में कहते हैं- छित्वा स्नेहमयान पाशान् भित्वा मोहमहार्गलाम् । सच्चारित्रसमायुक्तः शूरो मोक्षपथे स्थितः ॥२०॥ भावार्थ-वही वीर पुरुष मोक्षमार्ग में चलनेवाला है जो स्नेहमयी जालों को छेद करके व मोह की महान जजीरों को तोडकर के सम्यक्चारित्र को धारण करता है। विषयोरगदष्टस्य कपायविषमोहितः । सयमो हि महामंत्र स्त्राता सर्वत्र देहिनाम् ॥३०॥ भावार्थ-जो इन्द्रिय विषयरूपी सर्प से डसा हो व जिसको कपायरूप विप से मूर्छा आ गई हो उसके लिये संयम ही महामन है, यही सर्व जगह प्राणियों का रक्षक है । ' ३५४] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । उत्तमे जन्मनि प्राप्त चारित्रं कुरु यत्नतः । सद्धौ च परां भक्ति शमे च परमां रमिम् ॥४७॥ भावार्थ-उत्तम नरजन्म पाया है तो यत्नपूर्वक चारित्र का पालन कर, रत्नत्रय धर्म में दृढ़ भक्ति कर व शातभाव मे श्रेष्ठ प्रीति कर । धर्ममाचर यत्नेन मा भवस्न्यं मृतोपमः । सद्धर्म चेतसा पुसा जीवितं सफलं भवेत् ॥६॥ मता नैव मनास्ते तु ये नरा धर्मकारिणः । जीवंतोऽपि मृतारते वै ये नराः पापकारिणः ॥६२॥ भावार्थ-हे प्राणी ! तू यत्नपूर्वक धर्म का आचरण कर मृतक के समान मव बन । जिन मानवो के चित्त में सच्चा धर्म है उन्हीं का जीवन सफल है । जो धर्माचरण करनेवाले है वे मरने पर भी अमर हैं परन्तु जो मानव पाप के मार्ग में जानेवाले है वे जीते हुए भी मृतक के समान हैं चित्तसंदूषकः कामस्तथा सद्गतिनाशनः । सद्धत्तध्वंसनश्चासौ कामोऽनर्थपरम्परा ॥१०३॥ दोषाणामाकरः कामो गुणानां च विनाशकृत् । पापस्य च निजो बन्धुः परापदां चैव संगमः ॥१०४॥ तस्मात्कुरुत सद्धत्त जिनमार्गरताः सदा । ये सत्खंडितां यांति स्मरशल्यं सुदुर्धरम् ॥१०२॥ भावार्थ- काममाव मन को दूषित करनेवाला है, सद्गति का नाशक है सम्यकचारित्र को नष्ट करने- वाला है । यह काम परम्परा अनर्थकारी है। काम दोषों का भंडार है, गुणों का नाश करनेवाला है, पाप का खास वन्धु है। बड़ी बड़ी आपत्तियों को बुलानेवाला है इमलिये सदा जैनधर्म मे लीन होकर सम्यक्- चारित्र का पालन करो जिससे अति कठिन काम की शल्य चूर्ण-चूर्ण हो जावे । उपवासोऽवमोदय रसानां त्यजनं तथा । अस्नानसेवनं चैत्र ताम्बूलस्य च वर्जनम् ॥११॥ असेवेच्छानिरोधस्तु निरनुस्मरण तथा । एते हि निर्जरोपाया मदनस्य महारिपोः ॥११६।। भावार्थ-उपवास करना, भूख से कम खाना, रसों का छोड़ना, स्नान न करना, ताम्बूल को न खाना, काम सेवा न करना, कामकी इच्छा को रोकना, कामभाव का स्मरण न करना ये सब कामरूपी महा शत्रु के नाश के उपाय हैं।
सहज-सुख-साधन ।
[ ३५५
सम्पत्तौ विस्मिता नैव विपत्तो नैव दुःखिताः ।
महतां लक्षणं ह्यतन्न तु द्रव्यसमागमः ॥१७०॥
भावार्थ-
महान पुरुषो का यह लक्षण है कि सम्पत्ति होने पर आश्चर्य न माने पषिपत्ति पड़ने पर
दुःखी न हों, केवल लक्ष्मी का होना ही महापुरुप का लक्षण नहीं है ।
गहाचारकवासेऽस्मिन् विपयामिपलोमिनः ।
सीदति नरशार्दूला बद्धा बान्धववन्धनैः ॥१८३।।
भावार्थ-नरसिंह के समान मानव भी बंधुजनों के वधनों में वधे हुए, इन्द्रिय विषयरूपी मांस के
लोभी होकर इस गृहस्थी के कुवास में कष्ट पाते रहते हैं ।
मानस्तंभ दृढं भंवत्वा लोभाद्रिं च विदार्य वै ।
मयावल्लीं समुत्पाठ्य क्रोधशत्रुनिहन्य च ॥१६४॥
यथाख्यात हितं प्राप्य चारित्रं ध्यानतत्परः ।
कर्मणां प्रक्षयं कृत्वा प्राप्नोति परमं पदम् ॥१६॥
भावार्थ-जो कोई महात्मा दृढ मानके खभको चूर्ण कर डालता है, लोभरूपी पर्वत के खंड खंड कर
देता है, माया की वेल को उखाड़ के फेंक देता है, क्रोध शत्रु को मार डालता है वही ध्यान में लीन होकर
परम हितकारी यथाख्यात वीतराग चारित्र को पाकर परमपद को प्राप्त कर लेता है।
परीपहजये शूराः शूराश्चेन्द्रियनिग्रहे ।
कषाय विजये शूरास्ते शरा गदिता बुधैः ॥२१०॥
भावार्थ-जो
महात्मा परीषदो को जीतने में वीर हैं, इन्द्रियों के निरोध में शूर हैं, कषायों के विजय
में पराक्रमी हैं, उन्हीं को बुद्धिमानों ने वीर पुरुष कहा है ।
समता सर्वभूतेषु यः करोति सुमानसः ।
ममत्वभावनिमुक्को यात्यसौ पदमव्ययम् ॥२१३।।
भावार्थ-जो सज्जन सुमनधारी सर्व प्राणीमात्र में समताभाव रखता है और ममता के भावको छोड
देता है वही अविनाशी पद को पाता है।
रागादिवर्जनं सङ्ग परित्यज्य दृढव्रताः ।
धीरा निर्मलचेतस्काः तपस्यन्ति महाधियः ॥२२३॥
ससारोद्विग्नचित्तानां निःश्रेयससुखैपिणाम् ।
सर्वसंगनिवृत्तानां धन्य तेषां हि जीवितम् ॥२२४॥
- ३५६] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य | भावार्थ-जो महाबुद्धिमान रागद्वेषादि भावों को हटाकर, परिग्रहों को त्यागकर, महावनों में दृढ होकर निर्मल चित्त से तप करते हैं वे ही धीर हैं। जो संसार से वैराग्यवान हैं, मोक्ष सुख की मावना रखते हैं व सर्व परिग्रह से मुक्त हैं उन्हीं का जीवन धन्य है। संगात्संजायते गृद्धिगद्धौ वाञ्छति संचयम् । संचयाद्वर्धते लोभो लोभाइ खपरंपरा ।।२३२॥ भावार्थ - परिग्रह से गृद्धता होती है । गृद्धता होने पर धन सचय करना चाहता है। धन के सचय से लोभ बढ़ता है, और लोभ से दुःखों की परम्परा बढती जाती है । सद्धत्तः पूज्यते देवैराखण्डलपुरःसरैः । असद्धत्तस्तु लोकेऽस्मिन्निन्द्यतेऽमौ सुरैरपि ॥२७॥ भावार्थ सम्यक्चारित्रवान की पूजा इन्द्रिादि देव भी करते हैं, किन्तु जो चारित्रवान नहीं है उसकी इस लोक में देवगण भी निन्दा करते हैं। व्रतं शीलतपोदानं सयमोऽर्हत्पूजनम् । दुःखविच्छिचये सर्व प्रोक्तमतन्न संशयः ॥३२२॥ भावार्थ- दु.खोंके नाश करनेके लिये व्रत, शील, तप, दान सयम व अहंत पूजा इन सबको कारणरूप कहा गया है इसमें कोई संशय नहीं है। तृणतुल्यं परद्रव्यं परं च स्वशरीरक्त् । पररामा समा मातुः पश्यन् याति परं पदम् ॥३२३॥ भावार्थ-जो परके धनको तृण समान, परके शरीरको अपने शरीरके समान व परकी स्त्रीको माताके समान देखता है वही परम पदको पाता है। (२६) श्री शुभचन्द्रचार्य ज्ञानार्णव में कहते हैं - यद्विशद्ध परं धाम यद्योगिजनजीवितम् । तवृत्त सर्वसावधपयुदासैकलक्षणम् ॥१-८॥ भावार्थ-जो श्रात्माकी शुद्धताका उत्कृष धाम है, जो योगीश्वरोंका जीवन है, जो सर्व पार्पोसे दूर रखनेवाला है वही सम्यक्चारित्र है । पञ्चव्रतं समिपंच गुप्तित्रयपवित्रि तम् । श्रीवीरवदनोद्गीर्ण चरणं चन्द्र निर्मलम् ।।५-८|| भावार्थ-श्री वीर भगवानने वर्णन किया है कि पाच महाव्रत, पाच समिति, तीन गुप्ति ये तेहर प्रकार का चारित्र चंद्रमाके समान निर्मल है। -- सहज-सुख-साधन। [ ३५७ नि: स्पृहत्वं च नैराश्यं दुष्करं तपः । कायक्लेशश्च दानं च हिंसकानामपार्दकम् ॥२०-८॥ भावार्थ-जो हिसक पुरुप है उनकी निस्पृहता, महत्ता, आशारहितपना, उनका कठिन तप, कायक्लेश तथा दान ये सर्व धर्मकार्य निष्फल हैं। अहिसैव जगन्माताऽहिंसवानन्दपद्धतिः । अहिंसैव गतिः साधी श्रीरहिंसव शाश्वती ॥३२-८॥ अहिंसैव शिवं सूते दचे च त्रिदिवश्रियं । अहिंसैव हितं कुर्यायसनानि निरस्यति ॥३३-८॥ भावार्थ-अहिसा ही जगतकी रक्षिका माता है, अहिंमा ही श्रानदकी सतान बढ़ानेवाली है, अहिंसा ही अविनाशी लक्ष्मी है, अहिंसासे ही उत्तम गति होती है, अहिंसा ही अविनाशी लक्ष्मी है, अहिंसासे ही उत्तम गति होती है, अहिंसा ही मोक्षसुखको देती है, अहिंसा ही स्वर्ग सम्पदा देती है, अहिंसा ही परम हितकारी है, अहिंसा ही सर्व आपदाओं को नाश करती है। तपःश्रुतयमज्ञानध्यानदानादिकर्मणां । सत्यशीलवतादीनामहिंसा जननी मता ।।४२-८।। भावार्थ- तपस्या, शास्त्रज्ञान, महाव्रत, आत्मज्ञान, धर्मध्यान, दान आदि शुभकर्म, सत्य, शील, व्रत आदि की माता अहिंसा ही कही गई है। अहिसा के होते हुए ये सब यथार्थ है। दुयते यस्तुणेनापि स्वशरीरे वदर्थिते । म निर्दयः परस्याङ्ग कथं शस्त्र निपातयेत् ॥४८-८॥ भावार्थ-जो मनुष्य अपने शरीर में तिनका चुभने पर भी अपने को दुःखी मानता है वह निर्दयी होकर परके शरीर पर शस्त्रों को चलाता है यही बडा अनर्थ है। अभयं यच्छ भूतेषु कुरु मैत्रीमनिन्दिताम् । पश्यात्मसदृश विश्व जोवलोकं चराचरम् ।।५२-८॥ भावार्थ-सर्व प्राणियों को अभयदान दो, उनके प्राणों की रक्षा करो, सर्व से प्रशसनीय मित्रता करो। जगत के सर्व स्थावर व त्रस प्राणियों को अपने समान देखो। व्रतश्रुतयमस्थानं विद्याविनयभूपणम् । चरणज्ञानयो/जं सत्यसंज्ञ व्रतं मतम् ।।२७-६।। भावार्थ- -यह सत्य नाम व्रत सर्व व्रतो का शास्त्रज्ञान का व यम नियम का स्थान है। विद्या व विनय का यही आभूषण है । चारित्र व ज्ञान का यही बीज है। .
३५८] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । विषयविरतिमूलं संयमोदामशाखम्, यगदलशमपुष्पं ज्ञानलीलाफलाढ्यम् । विबुधजनशकुन्तैः सेवितं धर्मवृक्षं दहति मुनिरपीह स्तेयतीवानलेन ॥२०-१०॥ भावार्थ-जिन धर्म वृक्ष की जड विपयों से विरक्ति है, जिसकी वडी शाखा सयम है, जिसके यम नियमादि पत्र हैं, व उपशम भाव पुष्प हैं। ज्ञानानन्दरूपी जिसके फल हैं। जो पण्डितरूपी पक्षियो से सेवित है ऐसे धर्म वृक्ष को मुनि भी हो तो भी चोरीरूपी तीव्र अग्नि से भस्म कर डालता है। पर्यन्तविरसं विद्धि दशधान्यच्च मैथुनम् । योसित्संगाद्विरक्तन त्याज्यमेव मनीषिणा ॥६-११।। भावार्थ-ब्रह्मचर्य व्रत के पालनेवाले को जो स्त्री के सगसे विरक्त है, इस प्रकार मैथुन को अवश्य न्यागना चाहिये । इस मैथुन का फल अंत में विरस होता है । आद्य' शरीरसंस्कारो द्वितीयं वृष्यसेवनम् । तौर्यत्रिकं तृतीयं स्यात्संगस्तुर्यमिष्यते ।।७-११॥ योषिद्विषयसंकल्पः पञ्चमं परिकीत्तितम् । तदङ्गवीक्षणं षष्ठं संस्कारः सप्तमं मतम् ।।८-११॥ पूर्वानुभोगसंभोगस्मरणं स्यात्तदष्टमम् । नवम भाविनी चिन्ता दशमं वस्तिमोक्षम् ॥६-११॥ भावार्थ-दश प्रकारका मैथुन यह है (१) शरीरका अगार, (२) पुष्ट रसका सेवन, (३) गीत नृत्यवा दित्रका देखना सुनना, (४) स्त्रियोंकी सगति, (५) स्त्रियोंके विषयोंका सकल्प करना, (६) स्त्रियोंके अग देखना (७) देखनेका सस्कार मनमें रखना, (८) पूर्वके भोगोंका स्मरण, (९) कामभोगकी भावना करनी (१०) वीर्यका झड़ना। स्मरदहनसुतीव्रानन्तसन्तापविद्ध भुवनमिति समस्तं वीच्य योगिप्रवीराः । विगतविषयसङ्गाः प्रत्यहं सश्रयन्ते प्रशमजलधितीरं संयमारामरम्यम् ।।४८-११।। भावार्थ-इस जगतको कामकी अग्निके प्रचड और अनन्त सतापोंसे पीड़ित देखकर विषयोंसे विरक्त योगीश्वर प्रतिदिन संमयरूपी उपवनमें शोभायमान ऐसे शांतिसागरके तटका ही श्राश्रय लेते हैं । वाही कामसे विरक्त होकर अतरग आत्मानुभव करते है। सत्संसर्गसुधास्यन्दैः पुंसा हृदि पवित्रिते। ज्ञानलक्ष्मी: पहं धने विवेकमुदिता सती ।।१४-१५॥ .
सहज-सुख-साधन। [३५९ भावार्थ-सत्पुरुषोंकी सत्संगति रूपी अमृतके झरनेसे पुरुषोंका हृदय पवित्र होजाता है तब उसमें विवेकसे प्रशन्न हुई ज्ञानरूपी लक्ष्मी निवास करती है। शीतांशुरस्पिसंपर्काद्विसर्पति यथाम्बुधिः । तथासद्व टत्तसंसार्गान्नृणां प्रज्ञापयोनिधिः ॥१७-१५।। भावार्थ-जैसे चन्द्रमाकी किरणोंकी सगतिसे समुद्र बढ़ता है, वैसे सम्यक्चारित्रके धारी महात्माओंकी सगतिसे मनुष्योंका प्रज्ञा ( भेदविज्ञान ) रूपी समुद्र बढ़ता है। वृद्धानुजीविनामेव स्युश्चारित्रादिसम्पदः । वित्यपि च निर्लेपं मन क्रोधादिकश्मलम् ॥१६-१५॥ भावार्थ-अनुभवी सुचारित्रवान वृद्धोकी सेवा करनेवालोंके ही चारित्र आदि सम्पदाए प्राप्त होती हैं तथा क्रोधादि कपायोंसे मैलापन भी निर्मल होजाता है। मनोऽभिमतनिःशेषफलसंपादनक्षमं । कल्पवृक्षमिवोदारं साहचर्य महात्मनाम् ॥३७-१५॥ भावार्थ-महात्मानोकी संगति कल्पवृक्षके समान सर्व प्रकारके मनोवाछित फल देनेको समर्थ हैं अतएव चारित्र की रक्षार्थ महान पुरुषो की सेवा कर्तव्य है। दहति दुरितकक्ष कर्मबन्ध लुनीते वितरति यमसिद्धिं भावशुद्धि तनोति । नयति जननतीरं ज्ञानराज्यं च दचे ध्र वमिह मनुजानां वृद्धसेवैव साध्वी ॥४१-१५।। भावार्थ-वृद्ध महात्माओं की सेवा मानवों के लिये निश्चय से परम कल्याणकारिणी है, पापरूपी वन को जलाती है, कर्मबंध को काटती है, चारित्र को सिद्ध कराती है, भावो को शुद्ध रखती है, ससार के पार पहुंचाती है तथा ज्ञान के राज्य को या केवल ज्ञान को देती है। विरम विरम संगान्मुन्च मुश्च प्रपंचं विसृज विसृज मोहं विद्धि विद्धि स्वतच्चम् । कलय कलय वृत्तं पश्य पश्य म्वरूपं कुरु कुरु पुरुषार्थ निवृतानन्दहेतोः ॥४२-१५॥ भावार्थ-हे आत्मन् ! तू परिग्रह से विरक्त हो, जगत के प्रपच को छोड छोड, मोह को विदाकर विदाकर, आत्मतत्व को समझ समझ, चारित्र का अभ्यास कर, अभ्यास कर, चारित्र का अभ्यास कर, अभ्यास कर, अपने अात्मस्वरूप को देख देख तथा मोक्ष के सुख के लिये पुरुषार्थ को बार बार कर ।
३६०] सम्यकचारित्र और उसका महात्म्य । - ~ - अतुलसुखनिधानं ज्ञानविज्ञानबीज विलयगतकलाई शान्तविश्वप्रचारम् । गलितसकलश' विश्वरूपं विशालं भज विगतविकारं स्वात्मनात्मानमेव ॥४३-१५॥ भावार्थ-हे आत्मन् ! तू अपने ही आत्मा के द्वारा, अनंत सुस्त्र समुद्र, केवल ज्ञान के बीज कलक रहित, निर्विकल्प, निःशक, ज्ञानापेक्ष विश्वव्यापी, महान, तथा निर्विकार आत्मा को ही भज उसी का ही ध्यान कर । सर्वसंगविनिमुक्ता, संवृताक्षः स्थिराशयः । धत्ते ध्यानधुरां धीराः संयमी वीरवणितां ॥३३-१६॥ भावार्थ-जो महात्मा सर्व परिग्रह रहित है, इन्द्रियविजयी है, स्थिरचित्त है वही सयमी मुनि श्री महावीर द्वारा कथित श्रात्म ध्यान की धुरा को धारण कर सकता है। सकल विषयवीजं सर्वसावद्यमलं नरकनगरकेतु वित्तजातं विहाय । अनुमर मुनिबन्दानन्दि सन्तोपराज्य- ' मभिलपसि यदि त्वं जन्मवन्धव्यपायम् ।।४०-१६॥ भावार्थ-हे प्रात्मान् ! यदि मसारके बन्धका नाश करना चाहता है तो तू सर्व विषयोंका मूल, सर्वे पापोंका बीज, नरकनगरकी ध्वजा रूप परिग्रहके समूहको त्याग कर, मुनियों के समूहको आनन्द देनेवाला सतोषरूपी राज्यको अगीकार कर । आशा जन्मोग्रपङ्काय शिवायासाविपर्यय । इति सम्यक्समालोच्य द्धितं तत्समाचर ॥१६-१७|| भावार्थ-संसारके पदार्थोकी आशा ससाररूपी कर्दममें फंसानेवाली है। जबकि आशाका त्याग मोक्षको देनेवाला है, ऐसा भले प्रकार विचारकर, जिसमें तेरा हित हो वैसा आचरण कर । नि शेषक्लेशनिमुक्किममूर्त परमाक्षरम् । निष्प्रपञ्च व्यतीताक्षं पश्य स्वं स्वात्मनि स्थितम् ॥३४-१८॥ भावार्थ-हे आत्मन् ! तू अपने ही आत्मामे स्थित सर्व क्लेशोंसे रहित अमूर्तीक, परम उत्कृष्ट, अविनाशी, निर्विकल्प और अतीन्द्रिय अपने ही आत्मास्वरूपका अनुभव कर । उसीको देख । यही निश्चयचारित्र है। व्यमिह परमात्मध्यानदत्तावधानाः परिकलितपदार्थास्त्यनसंसारमार्गा । - .
सहज-सुख-साधन। [३६१ यदि निकपपरीक्षासु क्षमा नो तदानीं भजति विफलभावं सर्ग प प्रयासः ॥४६-१६॥ भावार्थ-गुनिराज विचारते है कि इम जगतमें हम परमात्मा के ध्यानमे लीन हैं, पदार्थोके स्वरूपके ज्ञाता हैं, ससारके मार्ग के त्यागी है । यदि हम ऐमा होकरके भी उपमर्ग परीपहोकी कसोटोसे परीक्षामें असफल होजावे तो हमारा मुनिधर्म धारणका सर्व प्रयास वृथा ही होजावे । इसलिये हमें कभी भी शांतभावका त्याग न करना चाहिये, कभी भी क्रोधके वश न होना चाहिये। स्वसं वित्ति समायाति यमिनां तत्वमुत्तमम् । आसमन्ताच्छमं नीते कपायविषमज्वरे ॥७७-१६॥ भावार्थ-जब कपायोका विषमज्वर बिल्कुल शात हो जाता है तब ही सयमी मुनियों के भीतर उत्तम प्रात्मतत्व स्वसवेदनरूप झलकता है । प्रार्थात् तब ही वे शुद्वात्माका अनुभव कर सकते है। रागादिपङ्कविश्ल पात्प्रसन्ने चित्तवारिणि । परिरफुरति निःशेष मुनेर्वस्तुमदम्बकम् ।।१७ २३।। भावार्थ-रागद्वेपादि कर्दमके अभावसे जब चित्तरूपी जल प्रसन्न या शुद्व हो जाता है तब मुनिको सर्व वस्तुओंका स्वरूप स्पष्ट भासता है । म कोऽपि परमान्दो वीतरागस्य जायते । येन लोक यैश्वर्यमप्यचिन्त्यं तृणायते ॥१८-२३॥ भावार्थ-वीतरागी साधु के भीतर ऐसा कोई अपूर्व परमानन्द पैदा होता है कि जिसके सामने तीन लोकका अचिन्त्य ऐश्वर्य भी तृणके समान भासता है। निखिलभवनतच्चोद्भासनैकपदीपं निरुपधिधिरूढं निर्भरानन्दकाष्ठाम् । परममुनिमनीषोभेदपर्यन्तभृत परिकलय विशुद्ध स्वात्मनात्मानमेव ॥१०३-३२॥ भावार्थ-हे अात्मन् । तू अपने ही आत्माके द्वारा सर्व जगतके तत्वोंको दिखानेके लिये अनुपम दीपकके समान, उपाधिरहित, परमानदमय, परममुनियोंको भेदविज्ञानसे प्रगट ऐसे आत्माका अनुभव कर । (२६) श्री ज्ञानभूषण भट्टारक तत्वज्ञानतरंगिणी में कहते हैं। संगं विमुच्य विजने वसंति गिरिगहरे । शुद्धचिद्रूपसंप्राप्तय ज्ञानिनोऽन्यत्र निस्पृहाः ॥५-३॥ - - ३६२] सम्यकचारिन श्रोर उमका महात्म्य । भावार्थ-ज्ञानी महात्मा इक्छा रहित होकर शुद्ध चैतन्य स्वरूप की प्राप्ति के लिये परिग्रह को त्यागकर एकांत स्थान पर्वत की गुफा श्रादि मे तिष्ठते है। नित्तिर्यत्र सावद्यात प्रवृत्तिः शुभकर्मसु । त्रयोदशप्रकारं तच्चारित्रं व्यवहारतः ॥१४-१२॥ भावार्थ- -जहां पापों से विरिक्त हो व शुभ कामों में प्रवृत्ति हो वह व्यवहार नय से चारित्र है। मुनियों के वह तेरह प्रकार हैं। संगं मुक्त्वा निनाकारं धृत्वा माम्यं दृशं धियं । यः स्मरेत शुद्धचिढ़ पं वृत्तं तस्य किलोत्तमं ।१६-१२॥ भावार्थ-जो कोई परिग्रह को त्याग कर घ जिनेन्द्र के ममान निथरूप धारण कर समता, सम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान का धारी हो, शुद्ध चैतन्य स्वरूप का ध्यान करता है, उसी के उत्तम चारित्र होता है। शुद्ध' म्वे चित्स्वरूपे या स्थितिरनिश्चला । तच्चारित्र परं विद्धि निश्चयाकर्मनाशकृत् ॥१८-१२॥ भावार्थ-निश्चयनय से अपने शुद्ध चैतन्य स्वरुप मे जो निश्चनता मे स्थिति प्राप्त करना वह कर्मों का नाशक निश्चय सम्यक चारित्र है ऐसा जानो। मत्पूज्यानां स्तुतिन तियजनं पटकर्मावश्यकानां वृत्तादीनां दृढतरधरणं सत्तपम्तीर्थयात्रा । सगादीनां त्यजनमजननं क्रोधमानादिकाना- माप्तरुक्तं वरतरकृपया सर्वमेनद्धि शुद्धये ॥४-१३।। भावार्थ-श्री अरहत भगवन्तों ने अत्यंत कृपा करके बताया है कि सब काम आत्मा की शुद्धि के लिये ही करने योग्य हैं-(१) परमपूज्य देव, शाल, गुरु की स्तुति, बन्दना व पूजा । (२) सामायिक प्रति- क्रमण आदि छः नित्य कर्मो का तथा सम्यक्चारित्र का बढ़ना से पालना । (३) उत्तम तप करना, (४) तीर्थयात्रा करनी, (५) परिग्रह आरम्भ श्रादिका त्यागना, (६) क्रोध मान आदि कपायों का जीतना । विशद्धिसेवनासक्ता वमति गिरिगह्वरे । विमुच्यानुपमं राज्यं खसखानि धनानि च ॥१७-१३।। भावार्थ-जो जो मनुष्य अपनी आत्मा को शुद्ध करना चाहते हैं वे उसकी सिद्धि के लिये अनुपम राज्य, इन्द्रियसुख तथा धनादि परिग्रह को त्यार्ग कर पर्वत की गुफा में निवास करते हैं। विशुद्धिः परमो धर्म: पुसि सैव सुखाकरः । परमाचरणं सैव मुक्त: पंथाश्च सव हि ॥१६-१३॥ . :
सहज-सुख-साधन । [३६३ । तस्मात् सैव विधातव्या प्रयत्नेन मनीपिणा। प्रतिक्षणं मुनीशेन शुद्धचिद्रूपचिंतनात् ॥२०-१३॥ भावार्थ-आत्मा विशुद्धि ही परम धर्म है, यही श्रात्मा को सुब की खान है । यही परम चारित्र है, यही मोक्ष मार्ग है । इसलिये बुद्धिमान मुनिका कर्तव्य है कि प्रतिक्षण सदा शुद्ध चैतन्यस्वरुपके मननसे इसी आत्मशुद्धिका अभ्यास करे । व्रतानि शाखाणि तांसि निर्जने निवासमंत हि:संगमोचन । मौनं क्षमातापनयोगधारणं चिञ्चिनयामा कलयन् शिवं श्रयेत् ॥११-१४॥ भावार्थ-जो कोई महात्मा शुद्ध चैतन्यरूपके मनन के साथ २ व्रतोंको पालता है, शास्त्रोंको पढ़ता है, तप करता है, निर्जन स्थानमे रहता है, बाहरी भीतरी परिग्रहका त्याग करता है मौन धारता है, क्षमा, पालता है व आतापनयोग धारता है वही मोक्षको पाता है। शास्त्राद् गुरोः सधर्मादेर्ज्ञानमुत्पाद्य चात्मनः । तस्यावलंबनं कृत्वा तिष्ठ मुचान्यसंगति ॥१०-१५॥ भावार्थ-शास्त्रको पढकर, गुरूसे समझकर व साधर्मिकी सगति से प्रात्माके ज्ञानको पाकर उसी का सहारा लेकर बैठ और ध्यान कर, अन्य सगति का त्याग कर । संगत्यागो निर्जनस्थानक च तचज्ञानं सर्वचिताविमुक्तिः निर्वाधत्वं योगरोधो मुनीनां मुक्त्यै ध्याने हेतबोऽमी निरुताः ॥८-१६।। भावार्थ-परिग्रह का त्याग, निर्जन स्थान, तत्वज्ञान, सर्व चिंताओं का त्याग, बाधा रहितपना, मन वचन काय का निरोध, ये ही ध्यान के साधन मोक्ष के प्रयोजन से कहे गए हैं। क्षणे क्षणे विमुच्येत शुद्धचिद्र पचिंतया । सदन्यचितया नूनं वध्येतैव व संशयः ॥६-१८॥ शुद्ध चैतन्य स्वरूप का चिन्तवन किया जावे तो क्षण क्षण में कमी से मुक्ति होती चली जायगी और यदि पर पदार्थों का चिन्तवन होगा तो प्रति समय कमाँ का बन्ध होता ही रहेगा, इसमें कोई सशय नहीं है। (२८) पं० बनारसीदासजी बनारसीविलास में कहते हैं भावार्थ-यदि छप्पै । जिन पूजहु गुरुनमहु, जैन मत बैन घखानहु । संघ-भक्ति आदरहु, जीव हिंसा नविधानहु ।।
३६४] सम्यक्चारित्र और उसका महात्स्य । झूठ अदत्त कुशील, त्याग परिग्रह परमानहु । क्रोध मान छल लोभ जीत, सज्जनता ठानहु ।। गुगिसग कर हु इन्द्रिय दमहु, देहु दान तप भावजुत । गहि मन विराग इहिविधि चहह, जो जगमै जीवनमुकत ॥ ८ ॥ मवैया ३१ । , सुकतकी खान इद्र पुरीकी नसनी जान, पापरजखडनको, पौनगसि पेखिये । भषदुखपावकबुझायवेको मेघ माला, कमला मिलायवेको दूती ज्यों वशेखिये ॥ सुगति वधूसों प्रीत, पालवेको आलीसम, कुगतिके द्वार दृढ़, आगलसी देखिये । ऐमी दया कीजै चित; निहुँरोकप्राणीहित, और करतून काहू, लेखे मे न लेविये ।।२५|| जाके यादरत महा रिद्धिमा मिलाप होय, मदन अव्याप होय कर्म बन दाहिये । विधन विनास होय गीरवाण दाम होय, नानको प्रकाश होय भो समुद्र थाहिये ।। देवपद खेल होय मगलसों मेल होय, इन्द्रिनिकी जेल होय मोक्षपथ गाहिये । जाकी ऐसी महिमा प्रघट कहै कौरपाल, निहुँ नोक तिहुंकाल सो तप सराहिये ।।८२॥ पूरव करम दहै; सरवज्ञ पद लहै; गहै पुण्यपथ फिर पापमैं न श्रावना । करुनाकी कला जागै कठिन कपाय भाग; लागै दान गील तर मफल सुहावना ।। पाव भवसिंधु तट खौले मोक्षद्वार पट, गर्म साध धर्मकी धरामे करै धावना । एते सब काज कर अलखको अग धरै; चेरी चिदानद की अकेली एक भावना ॥८६॥ सवैया २३ । , धीरज तात क्षमा जननी परमारथ मीत महा रुचि भासी। ज्ञान सुपुत्र सुता करुणा मति, पुत्रवधू समता प्रति भासी । उगम दास विवेक सहोदर, बुद्धि कलत्र महोदयदासी। भाव कुटुम्ब मदा जिनके दिग, यो गुनको कहिये गृहवामी ।।७।। (२६, पं. वनारसीदासजी नाटक समयसार में कहते हैं:- सगेया ३१ । लज्जावत दयावत प्रसन्न प्रतीतवत, पर दोपको ढकैया पर उपकारी है। सौम्यदृष्टि गुणग्राही गरिष्ट सबको इष्ट, मिष्ट पक्षी मिष्ठवादी दीरघ विचारी है ।। विशेषज्ञ रसन्न कृतज्ञ तज्ञ धरमज्ञ, न दीन न अभिमानी मध्य व्यवहारी । सहज विनीत पाप क्रियासों अतीत ऐसो, श्रावक पुनीत इकत्रीस गुणधारी ॥५५॥ कोई क र कष्ट सहे तपसों शरीर दहे, धूम्रपान करे अधो सुख व्हेके झूले हैं। केई महावत गहे क्रियामें मगन रहे, वहे मुनिभार पै पयार कैसे पूले हैं।
1 [ ३६५ सहज-सुख-साधन । - इत्यादिक जीवनिको सर्वथा मुकति नाहि, फिरे जगमाहि ज्यों वयारके बघूत्ले है। जिन्हके हियेमें ज्ञान तिन्हहीको निरवाण, करमके करतार भरममें भूले हैं ॥२०॥ ज्ञान भान भासत प्रमाण ज्ञानवत कहे, करुणा निधान अमलान मेरा रूप है। कालसों अतीत कर्म चालसों अमीत जोग, जालसो अजीत जाकी महिमा अनूप है ।। मोह को विलास यह जगतको घास में तो, जगत सों शून्य पाप पुण्य अँध कूप पाप किने किये कोन करे करि है सो कौन, क्रिया को विचार सुपनेकी दोर धूप है ।।१।। भेप मे न ज्ञान नहि ज्ञान गुरु वर्तन मे, मंत्रजन गुरुतंत्र में न बान की कहानी है । ग्रन्थ मे न ज्ञान नहीं ज्ञान कवि चातुरी में, बातनि मे ज्ञान नहीं ज्ञान कहा वानी है ।। ताते भेप गुरुता कवित्त ग्रन्थ मंत्र वात, उनीते अतीत ज्ञान चेतना निशानी है। ज्ञान ही में ज्ञान नहीं ज्ञान और ठोर कहू, जाके घट ज्ञान सोही ज्ञान की निदानी है ॥१११।। हामी मे विपाद बसे विद्या में विवाद बसे, काया में मरण गुरु वर्तन मे हीनता । शुचि में गिलानि बसे प्रापतीमे हानि बसे, जय में हारि सुंदर दशामें छबि छीनता ।। रोग बसे भोग में सयोग मे वियोग बसे, गुण में गरव वसे सेवा माहि दीनता । और जग रीत जेती गभित असाता तेति, साता की सहेली है अकेली उदासीनता ॥९॥ जे जीव दरवरूप तथा परयायरूप, दोऊ नै प्रमाण वस्तु शुद्धता गहत जे अशुद्ध भावनिके त्यागी भये सरवथा, विषैसों विमुख है विरागता चहत है ।। जे जे ग्राह्य भाव त्याज्यभाव दोउ भावनिकों, अनुभौ अभ्यास विर्षे एकता करत है। तेई ज्ञान क्रिया के आराधक सहज मोक्ष, मारग के साधक अबाधक महत है ॥३५।। (३०) पं. द्यानतरायनी द्यानतविलास में कहते हैं- . 8 सवैया-३१ । काहूसौं ना बोलें बैना जो बोलें तौ माता दैना, देखें नाहीं नैना सेती रागी दोषी होइ कै । आमा दासी जानें पाबै माया मिथ्या दूर नाई, राधा हीयेमाहीं गदै सूधी दृष्टी जोइ कै ।। इद्री कोई दौरे नाहीं आपा जानै आपा माहीं, तेई पाढं मोख ठांहीं कमैं मैले धोइकै । ऐसे साधू वदो प्रानी हीया वाचा काया ठानी, जाते कीजै अापा ज्ञानी भमैं बुद्धी खोइकै ॥२०॥ छप्पै । एक दया उर रौध, करौ हिंमा कछु नाहीं । जति श्रावक आचरौ, मरौ मति अव्रतमाहीं ।। रतनत्रै अनुसरो, हरौ मिथ्यात अँधेरा। दसलच्छन गुन वरौ, तरौ दुख-नीर सबेरा ।। इक सुद्ध भाव जल घट भरौ, डरौन सु-पर-विचार मै ए धर्म पच पालौ नरौ, परौ न फिरि ससार मैं ।।११।। ।
३६६] सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । सवैया ३१ । आवके घरस घनै ताके दिन केई गर्ने, दिनमें अनेक स्वास स्वासमाहि आवली । ताके बहु समै धार तामैं दोप हैं अपार, जीव भावके विकार जे जे वात वावली ॥ ताको दंड अब कहा लैन जोग शक्ति महा, हौ तौ बलहीन जरा श्रावति उतावली। धानत प्रनाम करै चित्तमाहिं प्रीत धरै, नासियै दया प्रकास दासकी भवावली ॥११॥ मवैया २३ । भौतन-भोग तज्यों गहि जोग, सजोग वियोग समान निहारें। चन्दन लावत सर्प कटावत, पुष्प चढ़ावत खर्ग प्रहारें ।। देहसौं भिन्न लई निज चिन्न, न खिन्न परीसहमै सुग्व धाएँ । धानत साध समाधि आराधिके, मोह निवारिक जोति विथा ॥१६॥ पाठ धरै गुनमूल दुअआदश, वृत्त गहे तप द्वादस साधैं । चारि हु दान पिबै जल छान, न राति भई - समता रस लापैं ।। ग्यारह भेद लहै प्रतिमा सुभ, दर्सन ग्यान चरित्त अराधैं । धानत बेपन भेद क्रिया यह, पालन टालत कर्म उपाधैं ॥१९॥ लोगनिसौं मिलनौं हमको दुःख, साहनिसौं मिलनौ दुःख भारी । भूपतिसौ मिलनौं मरनै सम, एक दसा मोहि लागत प्यारी ॥ चाहकी दाह जलै जिय मूरख, वेपरवाह महा सुग्वकारी। द्यानत याहीत ग्यानी अबछक, कर्म की चाल सबै जिन टारी ॥२७|| निंदक नाही क्षमा उरमाहीं, दुखी लखि भाव दयाल करें हैं। जीवको घात न झूठकी बात न, लैंहि अदात न सील धरैं हैं ।। गर्व गयौ गल नाहिं कहू छल, मोम सुभावसौं जोम हरॆ है। देहसौ छीन हैं ग्यानमे लीन हैं, द्यानत ते सिवनारि वर हैं ।। ४६ ।। 1 सनैया ३१ -- वच्छ फलैं पर-काज नदी और के इलाज, गाय-दूध संत-धन लोक-सुखकार है। चदन घसाइ देखौ कंचन तपाई देखौ, अगर जलाई देखौ शोभा विसतार है। सुधा होत चदमाहि जैसे छाह तरु माहि, पाले मैं सहज सीत आतप निवार है। तैसैं साधलोग सब लोगनिको सुखकारी, तिनहीको जीवन जगत माहिंसार है ।। ८ सनैया क्रोध सुई जु करै करमौपर, मान सुई दिढ़ भक्ति बढ़ाएँ । माया सुई परकष्ट निवारत, लोभ सुई तपसौ तन ता ।।
सहज-सुख-साधन। [ ३६७ राग सुई गुरु देवपै कीजिये, दोप सुई न विषै सुख भावै । मोह सुई जुलखै सब आपसे, द्यानत सज्जन सो कहिलावै ॥ ११ ॥ पीर सुई पर पीर विढारत, धीर सुई जु कषायसौं जूझै । नीति सुई जो अनीति निवारत, मीत सुई अघसौन अझै। औगुन सो गुन दोष विचारत, जो गुन सो समतारस झै । मजन सो जु करे मन मंजन, अंजन सो जू निरंजन सूझै ॥ १२ ॥ (३१) भैया भगवतीदासजी ब्रह्मविलास में कहते हैं:- सनैया-३१ । दहिक करम-अघ लहिके परम मग, गहिके धरम ध्यान ज्ञानकी लगन है। शुद्ध निजरूप धर परसों न प्रीति करै, बसत शरीर पै आलिप्त ज्यों गगन है ।। निश्चे परिणाम साधि अपने गुणें अराधि, अपनी समाधिमध्य अपनी जगन है। शुद्ध उपयोगी मुनि रागद्वेष भये शून्य, परसों लगन नाहिं आपमें मगन है ।।६।। मिथ्यामतरीत टारी, भयो अणुव्रतधारी, एकादश भेदभारी हिरदै बहतु है । सेवा जिनराजकी है, यहै सिरताजकी है, भक्ति मुनिराजकी है चित्तमें चहतु है। वीसवै निवारी राति भोजन न अक्षप्रीति, इद्रिनको जीति चित्त थिरता गहतु है। दयाभाव सदा धरै, मित्रता प्रगट करै, पापमलपक हरै मुनि यों कहतु है ॥७॥ आतम सरूप ध्र व निर्मल तत्त्व जानि, महाव्रतधारी वन माहिं जाहि बसे हैं। मोहनी जनित जे जे विकलप जाल हुते, तिनको मिटाइ निज अतरग बसे हैं ।। मनरूप पवनसो अचल भयो है ज्ञान, ध्यान लाइ ताहीके आनन्द रस रसे हैं। तजि सबसग भए गिरि ज्यों अडोल अग, तेई मुनि जयवत जगतमे लसे है ।।७।। परमाणु मात्र पर वस्तुमों न रागभाव, विषय कपाय जिन्हें कबही न छाय हैं। मन वच कायके विकारकी न छाया रही, पाया शुद्ध पद तहा थिरभावथाय हैं ।। जिनके विलास में विनाश दीसें बध हीको, सहज प्रकाश होई मोक्षको मिलाप है। धर्मके जहाज मुनिराज गुनके समाज, अपने स्वरूपमे बिराजि है श्राप हैं |शा सौया २३ । पथ बहै सरवज जहा प्रभु, जीव अजीवके भेद बतये । पथ वहै जु निप्रेन्थ महामुनि, देखत रूप महासुख पैये ।। पथ वहै जहे ग्रथ विरोध न, आदि औ अतली एक लखैये । पथ वहै जहा जीवदयावृप, कर्म खपाइक सिद्धमें जैये ।। २३ ।। पथ वहै जहें साधु चलै, सब चेतनकी चरचा चित्त लैये । पथ वहै जह आप विराजत, लोक अलोकके ईश जु गैये ।।
३६८] सम्यकचारित्र और उसका महात्म्य । पथ वहै परमान चिदानद, जाके चलै भव भूल न ऐये । पथ वहै नहं मोक्षको मारग, सूधे चले शिवलोकमें जैये ॥ २४ ।। सवैया ३१ । नरदेह पाये कहा पडित कहाये कहा, तीरथके न्हाये कहा तीर तो न जैहै रे । लच्छिके कमाये कहा अच्छके अघाये कहा, छत्रके धराये कहा छीनता न ऐहै रे ॥ केशके मुंडाये कहा भेपके बनाये कहा, जोवनके आये कहा, जराहू न खैहै रे । भ्रमकों विलास कहा दुर्जनमे वास कहा, आतम प्रकाश विन पीछे पछितैहै रे ॥६॥ जाके होय क्रोध ताके बोध को न लेश कहूँ, जाके उर मान ताके गुरुको न ज्ञान है। जाके मुख माया वसै ताके पाप केई लश, लोभके धरैया ताको आरतको ध्यान है ।। चारों ये कपाय सु तौ दुर्गति ले जाय 'भैया' इहां न वसाय कछुजोर वलपान है। आतम अधार एक सम्यक प्रकार लशै, याहीत आधार निज थान दरम्यान ॥ है छष्पै । जो अरहंत सुजीव, जीव सब सिद्ध भणिज्जे । आचारज पुन जीव, जीव उवझाय गणिज्जे॥ साधु पुरुप सब जीव, जीव चेतन पद राजै। सो तेरे घट निकट, देख निज शुद्ध विराजे ॥ सब जीव द्रव्य नय एकसे, केवलज्ञान स्वरुप मय । तम ध्यान कर हु हो भव्यजन, जो पावहु पदवी अखय ।। ११ ।। सवैया । जो जिनदेवकी सेव करै जग, ता जिनदेवसो आप निहारै। जो शिवलोक वसै परमातम, तासम आसम शुद्ध विचारै ।। आपमें आप लखै अपनो पद, पापरु पुण्य दुहूँ निरवारै। सो जिनदेवको सेवक है जिय, जो इहि भाति क्रिया करतारै ।।१२।। सवैया ३१ । . . , एक जीव द्रव्य में अनत गुण विद्यमान, एक एक गुण में अनत शक्ति देखिये। ज्ञान को निहारिये तो पार याको कहुं नाहिं, लोक श्रो अलोक सब याही में विशेखिये ॥ दर्शन की ओर जो विलोकिये तो वही जोर, छहों द्रव्य भिन्न भिन्न विद्यमान पेखिये । चारित सों थिरता अनत काल थिररूप, ऐसे ही अनंत गुण भैया सब लेखिये ॥१३॥ महा मंत्र यहै सार पच पर्म नमस्कार, भो जल उतारै पार भव्य को अधार है। विघ्न को विनाश. करै, पापकर्म नाश करै, आतम प्रकाश करै पूरव को सार है ।
- सहज-सुख-साधन। [३६९ दुख चकचूर कर, दुर्जनको दूर करै, सुख भरपूर करै परम उदार है । तिहूँ लोक तारन को प्रात्मा सुधारन को, ज्ञान विस्तारन को यहै नमस्कार है ||५|| छप्पै। दुविधि परिग्रह त्याग, त्याग पुनि प्रकृति पच दश । गाहिं महा व्रत भार, ल्हहिं निज सार शुद्ध रस ॥ धरहि सुध्यान प्रधान, ज्ञान अम्रत रस चक्खहि । सहहिं परीपह जोर, व्रत निज नीके रक्खहिं ॥ पुनि चढहि श्रेणी गुण थान पथ, केवल पद प्रापति करहिं । सत चरण कमल वदन करत, पाप पुज पकति हरहिं ।।११।। सवैया ३१ । भरमकी रीति भानी परमसों प्रीति ठानी, धरमकी बात जानी ध्यावत घरी घरी। जिनकी बखानी वानी सोई उर नीके आनी, निहचै ठहरानी दृढ हेकें ग्वरी खरी॥ निज निधि पहचानी तब भयौ ब्रह्म ज्ञानी, शिवलोक की निशानी श्रापमें धरी धरी। भौ थिति विलानी अरि सत्ता जु हठानी, तबभयो शुद्वप्रानी जिन वैसी जेकरी करी ॥१२॥ अन्तिम मंगल और प्रशस्ति । मंगल श्री अरहंत पद, मंगल सिद्ध महान । मंगल श्री आचार्य हैं, मंगल पाठक जान ॥१॥ मगल श्री जिन साधु हैं, पच परम पद मान । भक्ति करें गुण हिय हिय धरै, पावै नित कल्याण ॥ २ ॥ सहज समाधि दशा भई, है भातम अविकार । ज्ञान देश सुख वीर्य मय, परम ब्रह सुखकार ॥ ३ ॥ नहीं कर्म पाठों जहां, नहीं शरीर मलीन । मोहादिकी, नहीं व्यथा नहीं हीन ॥ ४ ॥ परमातम परमेश जिन, परम ब्रह्म- भगवान । बातमराम सदा सुखी, गुण अनन्त अमलान ॥ ५ ॥ जो जाने निज द्रव्यको शुद्ध सिद्ध मम सार । करै रमण होचै मगन, पाच गुण अधिकार ॥ ६ ॥ राग द्वष सम्पयापारिख धीर टस महात्म्य । यातम , ग्रानान विलागी, सुपी होय यह जीव । भव दप सुबमें सम रहे, ममना त सदीय ।। ७ ।। गृही होय या मात्र हो, जो जाने अध्यात्म । नरभव सकन फर वही, भामै रम निज शाम !! = || वान विचारसे, जग नातकसा गेल। देखत है तानी गदा, करन न नामें मेल ॥ ॥ निधन हो या हो धनिक, सेवक मामी होय । गदा सुग्नी अभ्यामसे, दगी न करहै होय ॥ १० ॥ जगत जी जानै मभी, निज मम आन समान । मंत्री भार गदा २२, ही महाय माप मान ॥ ११ ।। दुखित भुषित रोगी जगन, नापं करुणा धार । मदद कर दम पर हरे, धरै विनय हर बार ॥१२॥ गुण जन धर्मी तत्य चिन, देश प्रमन्न सवार । गुणग्राही सज्जन गढा, शुद्र भावना मार ॥१३॥ विनय रहिन हट जो, की घरं उपेना भार । प भाव चित न धरै, है सम्यक म्यमाव ।। १४ ।। म्वभावसे, करे यक्ष मम मार। अथवा सरिता जल गमा, को दान उपकार ॥ १५ ॥ लक्ष्मी पल अधिकार मब, पर हित आवे काज । यही बान सम्यत की, धेरै सुजन तज लाज ॥१६॥ राष्ट्र जाति जन जगत हित, करें धरै नहिं चाह । महिमा सम्मक् ज्ञानकी, प्रगटे हृदय अथाह ॥ १७ ॥ लाभ हानिमें सम रहे, जीवन मरण ममान । सम्यक्ती यम भावसे, करै कर्म की हान ।। १८ ॥ सहज परम सुख श्याप गुण, आपीमें हर आन । जो श्रापा को जानता, पावै सुख अघ हान ॥ १६ ॥ ताके साधन कथनको, लिखा ग्रन्थ मन लाय । रुचि धारी अध्यात्मके, पडो सुनो हरखाय ॥ २० ॥ भारतीय अति-दर्शन केन्द्र पर उपकार + 1 सहज-सुख-साधन । [ ३७१ धर्म श्राप आपी साधन साध्य है, श्रापी शिव मग जाय । आपी शिवमय होत है, आप श्राप समाय ।। २१ ॥ माही • बसे, पापी धर्मी जान । जो धर्मी सो मुक्तिपथ, वही मुक्त सुख खान ॥ २२ ॥ इसी तत्वको जानकर, ररिये ज्ञानी होय । सम दमसे निज ध्यानकर, बन्धे कर्म सव खोय ॥ २३ ॥ होय निरंजन सिद्ध प्रभु, परमातम यति माथ । नित्य सुखी बाधा रहित, मूरत विन जगनाथ ॥ २४ ॥ श्रीमद् रायचन्द्र कवि, शत अवधान कराय । गुर्जर भू भूपित कियो, परम बुद्धि प्रगटाय ॥ २५ ।। जैन शास्त्र बहु देखकर, अध्यातम रुचि धार । निश्चय नयके मननसे, उपजो सम्यक् सार ॥ २६ ॥ सहजानन्द विलासमें, रत्नत्रयको पाय मफल जन्म कविने किया, चारित्र पंथ बढ़ाय ॥ २७ ॥ दिव्य ज्योति निज तत्वकी, प्रगट भई उमगाम । वाणी सरस सुहावनी, बुधजन प्रेम बढ़ाय ।। २८ ।। व्यवहारी कितने हुते, क्रियाकांडमें लीन । आतम तत्व लखे नही, कहैं साधु संगहीन ॥ २६ ॥ निजको तत्त्व दिखाइयो, भए सत्य पथ धार । निजानन्द को पायके, उमगे अधिक अपार ॥ ३० ।। साधुवर, बहु व्यवहार प्रवीण । निश्चय पथ ज्ञाता नहीं, बाहर तप में लीन ॥ ३१ ।। सो श्रीमद् परसाद से, पायो तत्त्व असंग । परम शिष्य उनके भए, श्री लघुराज अभग ॥ ३२ ।। श्रीमद् के पश्चात् बहु, किया प्रकाशु स्वतत्व । बहु जन शिव मारग लखो, तजा स्वकल्पित तत्व ।। ३३ ।। निकटानन्द श्रगास में, आश्रम रम्य बनाय । नाम सनातन जैन का, दियो सफल सुखदाय ॥ ३४ ॥ थानक धारी , 4 सम्यक्चारित्र और उसका महात्म्य । मंदिर तहं लसे, उभय जु एकी थान दिगम्बरी श्वेतांबरी, करें भक्ति करें भक्ति सर आन ।। ३५ ॥ सर्व धर्म पुस्तक मिलें, अध्यातम रस पोप । पढ़ें बहुत नरनारि तहं, जानें मारग मोप ॥३६ ।। नितप्रति धर्म उपदेश की, वर्षा करत महान । श्री, लघुराज दयालु हो, सुनें भव्य दे कान ॥ ३७ ।। बहुत चार संगति मिली, महाराज लघुगज । अध्यातम चर्चा चली, भयो सु ातम काज ॥ ३८ ॥ सहज सुख साधन निमित्त, जैन रिपिन के वाक्य । जो सग्रह हो जाय तो, पढ़ें भविक ते वाक्य ।। ३६ ।। ऐसी इच्छा पाय के, लिखा ग्रन्थ यह मार । भूलचूक कुछ होय तो, विद्वन् लेहु सम्हार ॥ ४० ॥ लेखक नाम निक्षेप से, है सीतलपरसाद । लक्ष्मणपुर वासी सही, भ्रमत हरत परमाद ॥४१॥ ब्रह्मचारि श्रावक कहें लोग भेष को देख । प्रेम कछुक वर्ते सही, श्री जिन आगम पेख ॥ ४२ ।। छप्पन वय अनुमान में, अमरावतिपुर प्राय । वर्षाकाल विताइयो, बहु श्रावक संग पाय ॥ ४३ ।। सिंहई पन्नालालजी, प्रोफेसर हीरालाल । श्री जमनापरसाद हैं, सब जज चित्त रसाल ॥४४॥ साधर्मी जन संग में, सुख से काल बिताय । लिखो ग्रन्थ निज हेतु ही, ज्ञान ध्यान मन लाय ॥४५॥ पाश्विन सुदि अष्टम दिना, मगल दिन शुभ पूर्ण । वीर मुकत सम्बत् तभी, चौविस साठ अपूर्ण ॥४६॥ विक्रम उनिस इक्यानवे, सन् उनिम चौतीस । सुभग, चदहुँ वीर मुनीश ।। ४७.।। जगजन भाव वढाय के, पढ़ें सुनें यह सार । मनन करें धारण करें, लहैं तच अविकार ॥४८॥ सोलह अक्टूबर
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