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Sahitya Ki Manytay

Bhagvatichran Varma · 2010/12

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हित्य की मान्यताएँ
भगवतीचरण वर्मा
हिन्दुस्तानी एकेडेमी
इमामवाद

प्रकाशक
हिन्दुस्तानी एफेडेमी
इसाहाबाद
प्रथम संसरण २. १९६२
मूल्य ४ रुपये २० म..
सरप प्रमाद पाण्डेय,
मागरी प्रेम दाराग, साहागार

प्रकाशकीय मी ममवतीचरण वर्मा सम्पप्रतिष्ठ पेवा है। कवि कहानीकार, पन्यासकार मौर के मेसक के रूप में इन्हें साहित्य क्षेत्र में अग्रणी स्थान प्राप्त है। हिन्दी साहित्य के कमगत विकास का बो युग इन्होंने देखा है पौर जिसके निर्माण में इनका कुछ कम हाल महीं हा या एकताकई ष्टि से नितान्त महत्वपूर्ण है। मगवती र साहित्य के पासौचक नहीं रहे हैं किन्तु प्रमुख साहित्यिक होने के नाते उसके प्रति मपनी माम्पतागों को पक करने के अधिकारी है। यह माम्पाएं समकालीम तपा भाषी साहित्यकारों के लिए मननीम एवं उपयोमो मो हो सकता है। भगवतीचरण जी के स्वानुस्ठ विचार साहित्प-सेवियों और अन्य सेवकों के रस में भी सम्मान उठवे होंगे। विचारों और माम्यतामों के परस्पर पावान प्रदान के बिना स्वस्म समान मा सुप्त- धारिस्य का निर्माण प्रवरा ही कहा बापगा। सम्भव है भगवती बार की माम्यवामों से कतिपय साहिरिएकरनों की सहमति म हो । बेसी अवस्था में भी इस पुस्तक का महल हिसी प्रकार न्यून महीं होता क्योंकि प्रापीम और प्राचीन तथा पौर्वात्य और पाश्चात्य साहिस्पिक निम्तन-पायमों का संगतिपूर्ण प्रभमन समी साहित्य प्रेमियों के लिए भाभकारी होना चाहिए। हिन्दुस्तानी एरोमी को श्री भगवतीचरण वर्मा की पुस्तक साहिप को माम्मवाएं प्रकाधित करते प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। हम पाया करत है कि इस मौखिक साहित्यिक सरोमन से हिन्दी साहित्य समद पासोहित होगा और उससे हिन्दी में स्वतन्त्र चिन्तन की परम्पराको बम मिनेमा। विद्या मास्कर मषिष तपा कोषाध्यक्ष हिन्दुस्तानी एकडेमो इमामबार

विषय-सूची
पृष्ठ
१
परिमय
२२
१२
१-भावना बुदिौर फर्म
२-साहित्य में शम्द कर स्पाम
साहित्य का स्रोत
४-साहित्य का प्रमाण
५--पार्षबाव और मादर्शवाद
६-भाव मोर भावमा
७-साहित्य का पावि म्प-मविवा
५-परम्परागत-पिता-पायावार
-प्रगतिवाद-उपयोगिता प्रपया प्रचार
१०-प्रयोगवाद पपवा नयी कविता
११-साहित्य का माध्यम गच
१२-कहानी प्रमुस-स्प-उपम्यास
१५-उपन्यास मोर सम्बी कहानी के शिल्प
१४-मोटो कहानीपा साहित्य पा पारि-रूप
१५-रेखामिन-साहित्य पी मबीन शामा
१५-पित्र-परमारिता का विकसित स्प
१७-मिबम्प-गका प्रति प्रपमित स्प
१८-माटप

पसना रोहना मामा- प्रियाएं हैं, इन्हें कर्म से पहा ना समस्या है? कर्म के साप सोपा का प्रश्न अनिवार्य सममाघ प्रथम परिच्छेद भावना, बुद्धि भोर कर्म मेरा मन मुम्से कहता है कि में साहित्य के सम्बप में अपनी मान्यतामों को पक करें। अपनी कमजोरियों और अपनी मममर्यता का पोड़ा बहुत मान मुझे है। मैं म पगितह पार न दार्शनिक हूँ। पानीय गान की पुस्तमें पढ़ने में मेरा मन नहीं ममता देर तक सोचने विधारने में मुझे एम उलमन- सी होने मगती है। प्रप्पयन एवं चिन्तन और मनन स में बहुत दूर रहा हूँ। मैं वो केवम प्रपन अनुभवों पर ही स्थित है। और इसी लिए इस समय यव में साहित्य के सम्बन्म में अपनी मान्यतामों को बनावट करके दर्शन के क्षेत्र में प्रवेश परने का प्रयान पर रहा हूँ मुझे पुष पनीर-सा मग रहा है । मेकिन क्या कहं में अपने मन से विषम हूँ जिसकी प्रेरणा को में अस्वीकार नहीं कर सम्वा । यह मेरा मन क्या है इस मन की परिमापा क्या है, इसका स्प क्या है ? स्वभावत यह प्रश्न मेरे सामने सब से पहले उठ खड़ा होता है। मेरी समस्त सत्ता इस मेरे मन में केन्द्रित है, मुझे जीवन में प्रत्येक कदम पर यह अनुभव होता है । मुझे वो ऐसा सगता है कि मेरा जीवन ही इस मेरे मन से संचालित होता है। में नीवितसलिए कि में कर्म करता हूँ। सांस पसती है, रत में प्रवाह है, दिम में पान है। एष गति है मुझमें। इस गति का स्रोत कहाँ है ? यह मैं मही पानता धाय पान भी नहीं सकता। सेफिन खाना सत्य है कि यह गति ही जीवन है और यही गति मर्म है। पसना प्रवाहित होना पाकमा- दाम गति के द्योतक है। गति हीनता मृत्यु की प्रतीक है। 'कर्म जीवन है, निफियता मृत्यु है। मैं अपने से स्वयम कह उठया हूँ माप ही भाप बिना सोचे-विचारे । मह मेय प्रापारमूल अनुभव है। वहाँ सांस का पसना बन्द हो जाय दिल की धड़कन एक बाय नहीं मृत्यु है, इससे में मेसे नसार कर सकता हूँ।

२ साहित्य पी मान्यताएं मावा है। और यह पर्वा मेरा मन है। में अपने का अपने प्राण को पौर अपने मन मो एक रूप देखता हूँ। पर्म में मो तुष्टि होती है अथवा मानन्द होता है उसे मेरा मन ग्रहण करता है। इसी मेरे मन में हमें गर्म परने पी प्रेरणा है। मनपा मोई मोतिम रूप नहीं है, भौतिक विज्ञान मन मा सम्पप मस्तिष्क से बससाता है। अनुभव करना मस्तिष्क का काम है, यह अनुभव शरीर के पिसी भाग द्वारा हो सुन्न पौर दुस्ख इस मनुमव की प्रतिक्रियाएँ भर है। भौतिक विज्ञान में प्रशिक सस्प है, अनुभव शरीर के किसी भाग द्वारा ही किया जा सकता है। हमारे शरीर मा प्रत्येर भाग मस्तिष्क र स्नायुमो द्वारा सम्बद है । मेसिन मे मो संकल्प विस्प है, यह जो सपना का नाम है, यह मो अमेरों सपनाएँ हैं इन सयो बी सृष्टि कहाँ से होती है ? और इसी लिए मुझे मन मी एक पयर एवं स्वतन्त्र ससा को स्वीकार गरना पड़ता है। वो भौतिक प्रझिया है मनमी प्रक्रिया उसके नियमों से नहीं पती। मन ता पेठन वस्य मन भाग है। यही पतन सत्व भौतिक प्रक्रियामों को संचालित परता है। में जो इस समय मपनी स्वाभाविक प्रवृत्तिया में विपरीत पारिय से क्षेत्र में भा रहा हूँ यह अपने अन्दर पी चिन्मी मावना से प्रेरित होकर । यह भावना शायद अपने को पारोपित परने की हो-में इस भावना पर स्प ठीर-ठीक नहीं समझ पा रहा हूँ। सेरिन यह नियय हे शि मिमी भायना से प्रेरित होकर ही में प्रपने मिश्यामों को अपनी मान्यतामों को व्यकपर रहा है। भावना मन पी घोतक है, भावना में ही गर्ममा योग है। 'क्या पिना मावमा रेगर्म राम्भव है ? मैने म माने रिसने पार यह प्रत प्रपने ही पन्दर पूछा है, और प्रत्येर बार मुझे यही उसर मिमा-- महीं। हमारा समस्त जीवन हमारे कर्मों का एक समूत्र हे स्वपम जीवित रहन की पम्या ही भावना है । हम नीवित इसलिए हैं कि हममें गोपिरा रहने मी दया है । जर मामी म पीविन हने मी या पातो हती है, वह मारमहया पर लेता है। प्रत्येो जीवित मनुष्य में जीवित रहने की इच्छा पापारमूल भावना है । पर गये यह अर्थ नहीं प्रया गोपित रहने की इम्मा गाने वाला मनुष्य जीवित रह माता है। जीविस एहना भौतिक प्रणिया है, प्रकृतिनियमा म पी हुई। जीवित हने में गोवित रहने मी दया मापारमून भाग्ग प्रयाप हे पर एपमाप पारण नहीं है।

भावना दुटि मौर मर्म प्रत्येक कर्म भावना बनित है। इसका प्रेरणा उन्माद---ये सब भावना अन्तर्गत पाते हैं। यहाँ भावना नहीं है वहाँ गर्म ममम्भव है। कर्म का मोन मावना में है.यह मेरी सर्वप्रथम मान्यता है सेपिन कर्म का संचासन भी भाषना वारा होता है...यह में नहीं मान समन्ता। कर्म का संघासन बुधि द्वारा होता है, और मुझे ऐसा मगमा है कि मानव होने के ना परि मेरे जीवन का उसना ही महत्त्वपूर्ण तत्व है जितनी भावना है। मावना यहाँ पतन है वहाँ मुदिपेतन सत्य है । मह चेतना स्वयम में भावमा का हो एक भाग कहला सरती है मेशिन इसको मावना से पूरक मानने में ही सुविधा होगी पाठों को ठीक तौर से समान के लिए। तो फिर मुझे इस निर्सप पर पहपमा पड़ता है कि मेरा को भेदन वस्व है वह अपने को दो भागों में विमल किये हुए है- मावना मौर बुदि। भावना पापारपूल व हे यो समभाव से प्रत्मक जीवित प्राणी में मिमी। एटिहमार जीवन के विकास की माप निर्धारित करती है और इसलिए उसमा प्रत्येर प्राणी में समान-माव से मिलना अमम्भव है। सुदिपटना की पूर्णता पपमा प्रपूणता निर्धारित करती है। इस बुद्धि तस्प को हममे नई विभागों में बोट कर उन्हें प्रमग-प्रसग नाम मे है मेकिन वे सब बुद्धि तत्व के विषसित भर्ष विकसित भमरा पपिमित म मर है । मुग समाप ये सब युति तस्य की व्याल्पाए हैं। बीटी पाना बटोरती है, कुसा अमनकी प्राथमी ना देख पर भूता है, मकरी पासा बुनकर उसमें मक्तियों को फंसाठी है। इस सव में हनी भावनाएँ तो पापार रूप में गर्म की प्रेरणा देती है, मेकित इनक कर्मों को स्म देती है दमकी मरिमसित वृदि। बुदि स्वयम प्रश्यि तत्व नहीं है, वह भावना का पूरक तत्व है। कर्मे परला भावना से प्रेरित है। नम कर्म को रूप देना बुद्धि का काम है। भावना पर बुद्धि का अनुशासन ही मानम-विकास का नियम है। दुदि स्वयम में निफिका है, पर वह कर्म से सम्बर होने का मारण सक्रिय बहसाने लगती है। मुदिको भावना मन करती है-भावना स प्रपा पति का कोई प्रस्तित्व ही नहीं है। मावना प्रस्पष्ट प्रस्प पोर अपर्व मना है जिसे एप देना जिसका सप्टरला निसे परिमापा की सीमा में गोपना वृमिया गम है। पौर इसी लिए मुझे तो ऐसा सगवा है कि दुदि ममुप्प के पेवन तत्व साहित्य मी माम्पठाएँ और उसके भौतिक तत्व में सामनस्य उत्पन्न परसी है, और इसी सामगस्य के फस स्वस्प फर्म की सृष्टि होती है । सेमिन महाँ में कुछ मनीष-मी उतभ्न में पड़ जाता है। मेरे सामने मनापास हो यह प्रश्न वा हो जाता है कि क्या युधिया भावना से सर्वपा पृषक कोई पम्तिस्व है। ना पुष पड़ा है या सुना है, इस प्रश्न का उत्तर पाने में मुझे उससे तो सहायता नहीं मिमसी मेरे निजी अनुभम उसके विपरीत हैं । कोई कई कोई विचार मनुष्य की भावना स मुक महीं है । कभी-कमी मुझे मगने लगता है कि पुदि स्ययम में स्पसत्र सप्ता म होकर पर्म का एक इम मात्र है। पर यह अनास्पा भथिए समप तर नहीं टिक पाती है। अगर बुद्धि कम हे सा निम पीरमर मम है ? मनुष्य फ मयि तल पा ही तो वहम है-उस सक्रिय खस्व को देय पाना समझ पाना- यह मेरे लिए एमम्मत्र है। हम उसे भारमा पहदें हम उस प्राण महदें-मोई मन्सुर नहीं पड़ता। कम ही मही युदिमी एक महसा तो है बिमस इनकार नहीं किया जा सकता। वैसे पुदिना विभाजन मीबाई वर्गों में लिया गा गमता हे, युठि के बर्म-रोत्र के अनुसार, मेरिन दो स्पर-विमानन वो अभी सर हो पाए हैं, ये हैं कान और विवेक मोनहम की वृप्ति परिणाम स्वरुप हमें जो कुछ अनुमत्र प्राप्त होते हैं, उन्हें रापमापर मरना नान पा क्षेत्र है। यही शान हमारे माँ पो निग्सि करता है। मफिन जान पा मान मान वस्तु जगत म सम्बट हे योनि हमारे जितने भी अनुमय हे यह सब के सब बस्तु जगत से सम्बट होते हैं । युमि मा गरा शेष है स्वपम भावना पर मनुधामन । यहाँ हमने कुटिपा पिता का नाम दे दिया है। पिपेनकी नौव अनुभवा पर मही है, पनुमतिपा पर है। शान पोर विवर पारिदम स्थान पर मना पारया प्रपवा महत्वपूर्ण नहीं है। मैं तामह रहा पारि हमारे पसुन तस्य रे दो प्रमुग भाग है--भावना और बुद्धि प्रोर दोनों ही दूगर + पूरन है। भावना वर्म माम्बात है बुदिपर्म का रुप हे बर्म बागपासता मोर सापरता है। हमारे प्राचीन दानिरों एवं पवियां मे स्थान-म्यान पर ममया पाषा मर्मणा वााप पा प्रपा पिया है। अंगग वााय का प्रयाग सध्याई पार ईमानदारी मिरा से हमा है मेरिन दम पाप में उत्निपित मन पचन पौरपर्म में मपूर्ण मम्निाय को गो पाया गया है गरो पहाट हे frसन पवियां पोर दानिशा ने भी गमाव पोवन - भावना बुद्धि पौर कर्म को मन-चपन पार कर्म में सीमित पर दिया है । मन वचन और कर्म के सम्पूर्ण सामगस्म को ही बीयन की पूर्णता पौर सफलया के रूप में स्वीकार किया गया है। 'मन शम्द 'भावना' का पोषक है-इसे स्वीकार करने में किसी को कोई मापत्ति नहीं हो सकती भेफिन 'वपन शम 'बुद्धि का घोतक है इसका स्पष्टीकरण करना में मामश्पक समझता है। मावना को स्पप्ट करमा भावना को स्स देना उस भावना पो परिमापा की सीमा में बांधना बुद्धि का काम है मेरा कुम ऐसा मस है। मह स्पष्टता स्म मार सीमा का कम माविक प्रकिया है जिसके लिए भौतिक साधनों की मामपाता है। यह मीतिक साधन हे राम जो विकसित मानव को वचन के रूप में प्राप्त हुमा है। स्वरों का विश्लेपण करके तथा उन स्वरों को नियमों में वोपकर सर को रपना हुई है, पीर यह सब मनुष्य मे अपनी बुद्धि के सहारे ही किया है । इसके बाद मनुष्य मे दुधिया घद का माधार देकर विक्सस के काम में पाये गाने की पति पौर धमता प्राप्त की। मुझे दो ऐसा सगवा है कि मनुष्य का परम विकास बौठिक विरास ही है। पर ही बुखि यो बहन करता है। यहाँ पर मावना का प्रश्न है, महम्मायी है, विकासमा प्रश्न ही बुद्धि के साय पुड़ा हमर है । शम्द बुटिको मदन करता है और इसी लिए इप थपियों मे सन को ब्रह्म की संशा दे दी है। माम का युग वैज्ञानिक युग हे भौर इस मेशानिक युग में शम्मी महत्ता निरन्तर बढ़ती जा रही है। पर इस मानविज्ञान की हिया-प्रति किया वारा शासित पर में भावना का निपल करने वाले दिन का संतुलन नहीं है । इसरे परिणामसम्प पुदि का शान-पक्ष मिक-मस से पहुत प्रषिक सवाल हो गया है। 'मनसा-पापा-ममा वामय में जो वचन राम का प्रयोग हुपा है बह युति के विवेप पक्ष के लिए हुमा हे, ज्ञान पक्ष के लिए नहीं किया गया है। पुदि का विवर पस ही भावना से पूर्गास सम्पर है, सान पदा नहीं है। शाम सा कौनदास की तुटि रूम में मोतिम पगत मी भौतिक प्रक्रियामों का पर्यायी है और इसलिए यह मावमा के कवस एर अंग का पूरर है। समस्त भावना पक्ष को पासिव परमे वाना विवेक है। परन पान एष प्रकार की साविन्दा है मो विवेश से प्रेरित है। इस विवेक में मानव के वन तत्व की एस स्मामाविर प्रवृत्ति है जो ४ साहित्य की माम्पवाएँ और उसके भौतिर तत्त्व में सामगस्य उत्पन्न भरती है, और इसी सामंजस्य के फल स्वरुप कर्म की सृष्टि होती है। मेशिन यहाँ में कुछ मगीय-सी उलझन में पा जाता हूँ। मेरे सामने मनापास ही यह प्रश्न खड़ा हो पाता है कि क्या दुखि वा भावना से सपा पुपक काई प्रतिस्प है। जो कुछ पढ़ा है या सुना है, इस प्रश्न का उत्तर पाने में मुझे उससे सौ सहायता नहीं मिलती मेरे निमी पनुमग उसके विपरीत है ।कोई तई पोई विचार मनुप्प पी भावना से मुक नहीं है । पमी-कमी मुझे लगने सगता है कि बुधि स्वयम में स्वतन्त्र सत्ता न होकर कम का एक कम मात्र है। पर यह पनामा प्रथिष समय ठन नहीं टिक पाती है। अगर बुद्धि कम है तो गिस पीज मन कम हे ? मनुष्य के सक्रिय तत्व नाही तो वह कम है-उस सक्रिय सस्प को देव पाना समझ पाना-यह मेरे लिए असम्भव है। हम उसे पारमा मह हम उसे प्राण पह-योई अन्तर महीं पड़ता। कम ही सही बुद्धिमी एम. महत्ता तो हे मिसस इनकार नहीं निन्या पा सकता। से बुद्धि का विभाजन भी वर्गो म रित्या जा सकता है, बुधि के कर्म-क्षेत्र के अनुसार, लेकिन वो स्पष्ट-विमामन जो प्रभी पर हो पाए हैं, वे हे शान पोर विधेम । कौमूहस पी एप्ति के परिणामस्वरूप हमें जो कुछ अनुभव प्राप्त होते हैं, उन्हें ऐसपायर परला ज्ञान मा क्षेत्र है । यही भान हमारे कर्मों को निर्धारित करता है। लेकिन मान का मारान-प्रदान वस्तु जगत से सम्बट हे योनि हमारे जितने भी अनुभव हैं बह राव के सब वस्तु जगत से सम्पन होते हैं। बुद्धि पा दूसरा दोष है स्वमम भावना पर अनुशासन । यहाँ हमने बुद्धिमा विया मा नाम वे दिया है। विवो मो मीय अनुभवों पर नहीं है, अनुभूतियों पर है। मान और पियेर मा विमेद इस स्थान पर सना मावश्या प्रथया इत्वपुण महीं है । में वो रह रहा पाहमारे पेवन सस्त्र के दा प्रमुग भाग है। -मायना और मुदि पोर दोनो ही एक दूसर ने पूरक है। भावना गर्म पा स्रोत है बुटिमर्म पाप है, गर्म को सफलता पौर ग्रार्यकता है। हमारे प्रामीम निरो एवं पमिया मे स्थानम्मान पर 'मनगा मागा मर्मणा' पारप पा प्रयाग दिया है। वैग मा पाय ना प्रयाग सम्पाई और ईमानदारी के लिए हो पा है सपिम ग पास्य में मिसित मन वचन पोर गर्म म सम्पूण मस्तिथ मामा यौया गपा है, इससे यह स्पष्ट है कि उन कवियों पौर दामिरों मे भी रामरत जीपन भावना बुधि और कर्म को मन-वचन पोर कम में सीमित कर दिया है। मन वचन और कर्म के सम्पूर्ण सामंजस्म को ही जीवन की पूर्णता पौर सफलता के रूप में स्वीकार किया गया है। 'मन' म 'भावना' मा पोता है--से स्वीपारपरने में किसी को कोई पापत्ति नहीं हो सकती मेकिन 'वचन' शम्द 'दुटि' का घोसर है इसका सष्टीकरण परना में प्रावश्यक समझता है भावना पो स्पष्ट करना भावमा को स्प देना उस भावना गो परिमापा की सीमा में योपना बुधिमा काम है मेरा कुछ ऐसा मत है। यह स्पष्टया रूप पौर सीमा पा कम भौतिक प्रक्रिया है जिसके लिए भौतिक सामनों की प्रावस्याता है। यह भौतिक साधन है शम यो विकसित मानष को वचन क मप में प्राप्त हुमा है । स्वरों का विश्लेपण परके सपा उम स्वरों को नियमों में बांधकर सदों की रचना हुई है, पीर मह सब मनुप्प मे मपनी पुद्धि के सहारे ही किया है। इसके बाद मनुष्य मे बुटिको सम्द का पापार देकर विकास के क्रम में मागे माने की शक्ति पौर क्षमता प्राप्त की। मुझे सो ऐसा मगता है कि मनुष्य का परम पिकास वोटिक विकास ही है । शम ही बुद्धिमो वहन करता है । जहाँ तर भावना मा प्रश्न है, वह स्थापी है, विपास पा प्रश्न ही मुखिये साप पुरा हुमा है । शम दुखिको वहन करता है और इसी लिए कुछ अपियों ने शब्द को ग्रामी संज्ञा दे दी है। पान का युग पेशानिए युग हे मोर इस वैज्ञानिक युग में घों की महत्ता निम्तर पढ़ती जा रही है । पर इस मान-विज्ञान पी मिया-प्रति रिया द्वारा शासित पद में भावना पा निमन्त्रण करने मासे विवेक ना संतुलन महीं है । इसके परिणामस्वस्म मुशि का शान-पक्ष विपेज-पक्ष से महुव प्रषिम सयस हो गया है। 'मनसा-वाना-मणा' वास्प में जो वमन थामा प्रयोग हुमा हे वह शुद्धि र विवेफ पक्ष में लिए हुमा है, मान पक्ष के लिए नहीं किया गया है। बुधिमा विवर पक्ष ही मायना से पूणत सम्पर है, ज्ञान पक्ष मही है। गान तो कौमूहम पी तुष्टि के रुप भौतिक जगत को मोतिष प्रध्यिार्पो ा पर्यायी है और इसलिए वह भावमा के केबस एक पंगमा पूरा हे । ममस्त भावना पा मो शामित करने मासा विवेक है। 'परन' पर में एक प्रकार की मायिस्ता हे यो विमेक से प्रेरित है। इस विवेक में मानव के फेवन तस्व पी एस स्वाभाविक प्रति है .

साहित्य की मान्यताएँ विद्वारा अनुशासित और परिमाणित है। इस विवेक मैं सप्त-मसतमा दोष है। विमुद्र मावना न स हेम प्रसत है, उस मावमा यो सत असत बनता हे वर्म जो बुधि द्वारा परिचालित है। मान पक्ष द्वारा उपाति मामर की प्रक्रिया गिवेकहीन भावना द्वारा प्रेरित गर्म में भयानक प से प्रसत पौर मास्याकरिणी प्रमाणित हो सकती है, मानव-समाज को इसम पपेप्ट अनुमब है। बुद्धि का वियफ तत्व महाँ मापना पर मनुभासन करता है वहाँ उसमें इतनी क्षमता है कि वह भारना में पपने को पूर्ण रुप रा मय परसे। वह विवेक को भावना से पृपक एकर मनुष्य में स्थित होता है, निर्वस है क्योंकि पाप परिस्पिसियों से विवश होकर मावना विवेक का अनुशासम योर सकती है। और इसी सिए साहित्य में भावमा पौर विर के एकीकरण को परिमक्षित करके उसकी सवप्रथम पौर पर पपिक महत्वपूर्ण मान्यता मामी गयी है-'भावना का उदात्तीकरण । उदात मारना स्वयम में समर्ष पौर सक्षम हे~वही बुद्धि का स्यान मोग होता है क्योंकि युधिभपने मो रियक के रूप में भाषमा से एफ रूप हो जाती है। उदाप्त मापना बुद्धि के निम्न स्तर पामे -विता माश्रम नहीं मेती उमास मावना धारा प्रेरित कर्म में मास्सिा होती है, यार्यता होती है। इस पाव पर मेरा दनिश्पय है कि कर्म प्रपपा सीपन का मूम स्रोत मानना में है। मेपिम भापना पर एक्षिका मनुशागन है मौर पीलिए विपसिय मानव में उयो वौदिर प्राणी होने के नाते उगा प्रपेर गर्म बुद्धि द्वारा निर्धारित होता है। मुदि के दो पर है, विदेह पोर मान । मानव का समस्त पस्सिस्व इस दियेश और मान के विकास के तिा है। मान मानव की पहिर परिस्थितियों में सम्पर है, उसरा मुम्बर प्रावि स है। मान मानसपी पति पनहार मानप को प्रति पा रहस्य गामने मो राया प्रति पर दागन परने को प्रेरित करना है और इगलिागी शान ना विकास मानव परम शिय माना पाया है। पर शिगि यह हो गाता है जो स्वपम म्पित है। मनुष्य भी स्थापना उमसी भावना द्वारा प्रेरिल उगप को परर गरे मारने में यह स्पापना मनुष्य की भाषा पर ही मि हो जाती है। भावना का मामन विया करमा गान मही मान सयम मारना द्वारा अनुरागत पोर ग्यापि विपादोन मानपनी भावना पनागिाल ७ भावना बुद्धि और कर्म से अपने मान का प्रयोग युट और बिनान में परके मानव को नष्ट परती मायी है। यह समस्त पान पो दर्शन में इतिहास में विमान में भरा पा है, यह भावना से परे है. -भव में यह कहवा हूँ तन मोग माश्चय कर सकते हैं। लेकिन यो कुछ में कह रहा हूँ वह सस्प है। स्वयम धर्म दर्शन का एक भाग होने के कारण भावना से अव साम्य स्थापित करता है सब पिप का सहारा सेवा है, यहाँ वह विवेक ने उपेक्षा पर भावना से साम्य नहीं स्थापित कर पाता पहीं वह विनाश का प्रेरक पस्व वन मावा है । मैं मो कुछ कह रहा हूँ वह इतिहास से प्रमाणित है। मनादिकाम से मानन दर्शन मर्म समानशास्त्र मौर विमान में पीछे दीवना रहा है लेकिन मामन अपने कर्मो से विनाश के तत्वों को पृषक नहीं कर पा । उसका समस्त शान उसके मनानार, प्रत्यापार, सोपण और उत्पीडन में सहायक ही पने हैं। और इसी लिए मिसे हम पसा कहते हैं उसका क्षेष बोरिक म होकर मावनात्मक माना गया है। कसा की जो मन में हैं पाप परिस्थितियों पर कसा स्थित नहीं है। बर्म वाहपरिस्मितियों से सम्पद है। इससे इनकार नहीं किया या समता पर हमें यह स्वोरार करना ही पड़ेगा कि कर्म का स्रोत मन में है । मर्म को केवम वाम परिस्थितियों से सम्बट पौर मावना से पृपर समझ सेना मार के भौतिकवाद में एक परिपाटी-सी हो गयी है, पौर इसी सिए फसा को भान-विज्ञान पी अपेक्षा निम्न-स्थान दिया जा रहा है। यही नहीं कसा मो केवल मनोरंजन पौर मन-यहताय पी संझा देकर विवादी विचारकों ने उसे अनुपयोगी सिट करने का प्रयत्न भी किया है। मता में मनोरंजन प्रपाम है, इसे स्वीकार परने में मुझे कोई समोन महीं और यहाँ एक प्रश्न मेरे अन्दर उठता है-में मनोरंजन यो निकृष्ट एवं मनपेक्षित क्यों समझ मू ? मैं मो इतना जानता कि मनुष्य का हरेर मर्म यही नहीं उसका समस्त मस्तित्व मनोरंजन के नियमों से शासित है। यह मो समम्द भान मोर विज्ञान है इसका स्रोत भी तो मनुष्य के अन्दर वासो मौतूहल की भावना में है। मनोरंमन इस पौतूहस पा प्रमुख अवयव है। कोई भा पति अपने मन को दुनी परने वाला पोई भी गर्म मुस्लमान से नहीं पता मान पौर विगान में निरन्तर विकास इसी लिए सम्भव हमा रिहनक उपासोंपा एमात्र मनोरंजन इसी मान विज्ञान में है। मनुष्य की प्राण-शक्ति मिसे हम संगी में माफ फोर्स साहित्य की माम्पनाएँ कहते हैं, यह अपने को मानन्द की सोग में ही प्रस्फुटित करती है। और इसी प्राण शक्तिमा स्म ही सो भावमा है। ऐसी हालत में मनोरंजन को हीन समझने मी यो प्रपा मार-मास पल पड़ी है वह मानव में इस वैज्ञानिक युग मी प्रविष्टियात्मा विकृति भर है। बहुत सोपने विचारमे के बाद में मनोरंजन पो हीन समझनेवामी प्रतिमो इतना अधिक प्रस्वामाविक भी महीं समझ पा रहा हूँ। मनोरंजन भी पदनामी का एक बहुत बड़ा कारण है मनोरंजन के साप माप्ती विति। मनुष्य में गुण के साप विकार भी समानमाव से मौजूद हैं। मेक्मि मानव का कर्म और जीवन गुणों से प्रेरित पौर पासित है। विकार मानव में मौजूद मवश्य है, लेकिन उसकी उपस्थिति निणिय-रूप में स्वीगरपी गयी है। मनुष्य सामाणिक प्राणी है, भौर गव-भव मनुष्य मी विकृतियां गर्म फेम में अपने को पारोपित करने का प्रयत्न करती है स्व-सग इन्हें समाज मा अनुशासन पवा देता है। मेकिन मस्पना में इन विभूतियों के मारोपण में तो समार मी पापा मा भय महीं रहा । मनोरंमन के क्षेत्र में इन मितियों की मानसिक उत्तेजना या गाने गा पछा-यासा मोगा रहता है । सामाजिम प्राणी के उत्तखायित्व से मुक्त सामारण मनुष्य मर्म में अपनी विवृतियों को दबाए रहता है, पर यह यिकसा मनुष्य की प्रर्प-वेतन अवस्था में उसके मन पर पपिमर घमा मेती है। पला मा मनोरंजन मनुष्य से पर्पपेतम अवस्पा से सम्बर हे बर मनुष्य पास्तविक परिस्थितियों से प्रसग हटकर अपने को पस्पना में खो देना पाहता है। पहा ता मेरा मत है, में मनोरंजन को नशा भी मोटि में रमने पर कोई भापति महीं कन्या । पर साधारण मया में सबसे बड़ा अवगुण यह है कि उसमें मनुष्य अपने समस्त सामाणिक पौर बौदिर प्रतिबन्धों की उपेक्षा करके अपने पसती मप में मा जाता हे जहाँ उगरी विकृतियां उस पर पूर्ण रूप स घा गाती हैं। मगा पर बहिर प्रभाव मही परवा उगमें हम पाहर से कुछ ग्रहण नहीं करते अपने अन्दर से ही प्रहण करते हैं। मनोरंजन में मनुष्य अपवन परस्पा को प्राप्त नहीं होता वहाँ हम बाबुछ पहण करते हैं यह मप गाहर से ग्रहण परते हैं पीर यह हमें मर्प-पतन प्रपस्या में ही सा रास्ता है. हमें समेत नहीं पर रामना। पता पार में सुरपि पोर परिमार्जन गा मामास है, विकृति में जो सुम्पता है पसा में उसापाई रयान मदीं। गुरचि और परिमार्जन पमा मावना बुद्धि मोर कर्म के सामनस्म वासे तत्त्व से प्रेरित है । सामेगस्य मनुष्य के गुर्गों में ही सम्भव है, विकृतियों में प्रसामंजस्य पोर अराजकता प्रेरक तत्व है। विकृतियों से पुफ बो वासनाएँ हैं वह सामानिक नियमों और प्रतिवर्षों के विरोधी तत्व होने के कारण केयस क्षणिक मनोरंजन कर सकती है, मेकिन उस मणिक मनोरंजन की विपाद और परितापयुक्त प्रतिक्रिया उसके साप सगी रहेगी यह निश्चय है। और इसी लिए इन विकृतियों से युक्त पासनामों बासी कला समान में समाहत नहीं हो सकती । ईमानदारी की बात तो यह है कि इस प्रकार की समाज विरोधी और विकत वासनामों को मसा में स्पान मिसना ही मही पाहिये, और प्रनादिकास से कसा के नाम पर विकृतियों के प्रवर्धन पर को सामाजिक प्रतिबन्ध मगाए गए हैं। कसा का प्राविम्म सामाजिक मनोरंजन में ही दिससा है और सामाजिक मनोरंजन होने के कारण ममा को म्यजिगत बासना से मुक होना चाहिये । प्रनादिकाम से कसा को मानवबीवन में एक उम्व तपा महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है क्योंकि कला सामानिक प्रावान- प्रवान से युक्त होती हे मोर पसमिए सामाजिक हित एवं भातृत्व कसा ध्येय रहा है। और इसी सिए कमा में सात्विाता की भावना को महत्त्व मिसा है क्योंकि यो सात्विक महीं है वह प्रसामानिकता को प्रेरणा देवी है। सामारिक दृष्टि से अश्मीतता को सात्विकता का विरोधी तत्व माना गया है क्योंकि प्रस्मीता मानव की उन विकठियों पर माषारिख यो नित्यप्रति के जीवन में नितान्त स्वामाविक रूप से अपमे को मारोपित करने का प्रयत्न करती है। कमा को परलीमठा से पाने के लिए म माने कितने प्रतिबन्धों की रचना हुई है, फिर भी पता भरमीसता से महीं वष सनी। मौर महो पर एक वाव पर मुझे और सोचना पड़ेगा । कता पा स्रोत भावमा में अवश्य है, मेरिन कला अपना स्म ग्रहण परती बुद्धि पी सहायता से। भावना सर्वपापी पौर कला का प्रभाय सर्वम्यापी है, मेग्नि मामा की सष्टि दो समान भाव से हर जगह नहीं हो सम्ठी । सुषि प्रौर परिमार्गन का माम मौद्धिक प्रपिक है. माननारमा कम है। मौर इसलिए पाता के मूम्यांकन में उसके बौदिक उत्तमी उपेक्षा नहीं की जा सकती। पाना मौटिव तत्वी पर सातपसी हे तब प्रश्न उठ सहा होता है-बुटिना कौन-सा भाग-मान प्रपवा विवेकला में पिर साहित्य मी मात्यताएँ महत्वपूर्ण है। सामानिक हितों को ध्यान में रखार विकलो ही महत्व दिया जा सकता है, मेक्नि मान-यस्व की उपेक्षा कैसे की जा सकती है? युति के पूर्णसी योग में ही पसा निचर समती है। पेतन प्राणी होने के माते मानव में भावना और युरि दोनों का ो सेतुमन मोर साममस्प होना पावश्यक है। मपि कन्ता का उद्देश्य भावनात्मा मान-प्रदान है, पर पता पपना स्प प्रहण परती है दुरि मी ही सहायता से । पीर यही विवेर-सत्व के साथ-साप मान तस्स की महत्ता स्पष्ट हो जाती है। विवेक पाला रे पारमा-सस्व को परिष्कृत करता है, जान पाला के परीर तत्व को विममित फरखा है। मला मा परियामी अंग्रेजी मद मार्ट है और भाई घर में कृषिमतप स संवारने को भावना है । मेरा तो कुछ ऐसा मत है कि मला सम्र में मृत्रिमता का पाप हे मोर पसा हर स्पान पर त्रिमता में निममा से भेषी हुई है। गो भौतिक तस्व हे प्रति माता का शरीर-- नसक साप सप्ट नियमों की परिपाटी है। यह कृषिमता के नियम ही मानव की पेटना घोता है क्योंकि इन नियमों में परित्याग करने का ज्या पयन करने का विधान है। जो कुस्प है पयवा विभुत हे उसका परियाग पापस्सा है। यही नहीं पता मा म्यारण प्रथया घरीर सस्प ताप्रिमवा में नियमों से गर्पया पंधा है। यह कृत्रिमता का नियम शान पाले पौष्टिक तत्व से यासित है। भावना मौर बुदिमा तुसन मन्ना की प्रथम मापश्मरता है पार फिर मुझे इस बात का स्मरण हो पाता है बिना इन के मामा पा भमाय मप्ट हो जाता है। यहाँ पाष मार विज्ञान मेयम मान प्रमरा बुद्धि पे वाह होने फेनारगा एपीपी होते हैं यहाँ पन्ना मायना पौर खिर की सहायता से रावती यन मरती है। मनुष्य में भायना पो प्रमाधिन सरनेमा राय प्रपिा पफिसाती माप्पम मामा का माना गया है, दयनिए हमारे मामानिस पोर पामिर मतामना के सम्पन्य में महव पपिए सत रहते हैं। यह गतांता पा में मनुदारता ही नहीं वरन प्रन्याप को गीमा ठा पहुंग मपी-दपारे मध्ययुगीन रामाज में तिहास में यह सार है। ना यास्तव में गुरला मी उपागना हे पोर गामासि निपमा गय प्रतिरपा मापही न पहा पुष भूपपता तो पपी ही है। पौर मिरा रामपगमय पर पमान गामाभिक प्रनिपग्धों पोर निपमा पो तोड़ने मी प्रेरणा देती है। गाना गुमान मायामी म प्रति मा मम्मा भामर है। पना पा यह भावना बुदिौरे कर्म विद्रोहारमक पत्त्य मुध इनेगिमे स्पों पर ही विवेकयुक्त सात्विकता की भावना से प्रेरित होता है, अधिकांश में यह विद्रोहात्मक तत्व अपने को विकृतियों में परिणत पर लेता है। उपयोगितावासा विवेकसत्व जिस समय फसा में शिपिस पड़ा उसी समय कला में असामायिक बनने की प्रवृत्ति पा जाती है। मौर इसी लिए मध्ययुग में जब सामाजिर नियम और वन्धन बहुत कम गए थे तथा किसी भी प्रकार की विद्रोहात्मक स्वच्छन्दवा या स्वतन्त्रता पमित मानी माने लगी पी यमाकारों को समान से युक्-सा कर दिया गया था। संगीता मर्तक अभिनेता चित्रकार, मूर्तिकार-ये मितने पालाकार ये उनका एक पृथक निगी सामाजिक वर्ग मनाकर उच्च मौर सम्भ्रान्त समान से उन्हें निकाल बाहर किया गया पा। पर यह दिग्रस्त मध्ययुगीन समाम साहित्यकार का निरादर नहीं कर सका और साहित्यकारों का कोई अलग वर्ग मघवा समाम नहीं बन समा । यपि पारणों के स में कवियों के एक भाग को समान से निष्कासित करने के प्रयत्न में उम मध्ययुगीन समाम को सफलता प्रवक्ष्य माप्त हो गपी पर उस सफलता का श्रेय समान के मेवाओं को उठना नहीं है, गिन्नी स्वयम उन परियो मी प्रपने फो प्रर्प पोर पन के लिए गिय सेने की कामगोरी रही है। स्वतन्त्र एवं प्रेता साहित्यकार वो समाममा मेवा रहा है वौटिक प्राणी होने के नाते। साहित्य ही एक ऐमी मना है जिसमें मनोरंजन के साप सदा में निहित ज्ञान पौर विवेक का सम्मियण रहा है मौर चम कसा में सात्विकता एवं मौधिपता को प्रमुखता मिसा है। पम्प मसानों की प्रपेक्षा साहित्य में स्वांत सुसाय वाले तत्व की प्रमुखा रही है और साहित्यकारों में यह प्रवृत्ति रही है कि वह अपने म्पत्तिस्व में दुनिया के पछिप को मय कर में मसि दुनिया को हरि के मनुसार यह पपने पतिय मोस्पदें। भावना पौर दुटि के योग से मानव रे हरे कर्म पी सृष्टि होती है और इसलिए में साहित्य के सुमन को एक प्रकार मा कर्म ही मानता हूँ। मेकिन ममा पौर साहित्य स्वयम में फर्म होते हुए दूसरों के कर्मों को प्रमावित कर सकते हैं और इसी लिए पसा पर विशेप रूप से साहित्य मी सफलता एवं सापकता लोपहित सया समाय-मस्याण पर भाधिन है। यह पता भो जनहित पौर मोक्ताल्यारण में सहायर महीं होगी यह मिरमन समझी जाती है । भैसे दूम या मनोरंजन मरना सथा मुप पढेपाना स्वयम में जनहित और सास-मस्याण ममम्न जा सकता है, पर साहित्य मी मा यताएँ माध्यम मान भी सिया जाय तो वह एकमात्र माध्यम नहीं माना मा समता है। सेविन में तो इन निर्णय पर पहुंचा है कि भावना पो पहन परने का माप्पम है ही नहीं सम मेवत्त सहायक प्रपवा पोपक तस्व है। पर मेरे सामने यह प्रश्न सहा हो पाता है 'भावना यो बहन परने मा माध्यम मया है? भावना मोबहन करती है गप्ति' मेरा तो यह मत है। माह नही कोष मी भावना प्रकट हो गयी होमें पर हसी नारी हर्प माप ग्रागार हो गया। सराये उतार-चढ़ाव में भावना निहित है परणों की सीर अपवा मन्द गति में मावना अपने को साकार परती है। रंगों के उतार पड़ाव में भावना व्यक्त होती जाती है। इस गति में भावना का म्परतीचरण है, लेकिन भावना या स्पप्टी- करण तो नहीं है। ऐसी हालत में इस गति से संवेदना पी मुष्टि से हो सकती है ? यह प्रश्न उठाया जा सकता है। संवेदना की सृप्ति में गति रयत पौर सक्षम कैसे है ? इस प्रश्न मन सप्तर पाना प्रावस्यक हो जाता है। पर बुद्धिमो घोग है, मन की नहीं है, पगर हम यह समझ में छो हमारे लिए इस महत्वपूर्ण प्रश्नमा यही-सही उत्तर पाना मासान हो मायगा । घर में भावना का स्पस्तीकरण नहीं है, केयम स्पष्टीकरण है, जय गि गति में भावनामा म्पच्करण है। व्यतीपरग को मन ग्रहण करता है, सप्टीकरण मोदि ग्रहण मरती है। हम एक प्पति को दुप में पीड़ित देखते हैं। उस पीटा से वह रो रहा है। उस समय उसके शरीर मी पो प्रक्रिया है, मानों से मामू पाना स्वर में हिपनियां अप गाना पीड़ा स मुग पर एक प्रपर की विकृति मा पा गाना यह गर प्रमिया हमारे मन को म सेती मोर उस पीड़ित व्यक्ति की भावना सीधे हमारे मन में पहुंच जाती है । दुग मी मावना मिना पारण के हमारे मन में पहुंच गपी। पर अमर दूसरा पा मी बहेवि अमुक व्यक्ति वा दुधी पा और रो रहा था तो उग दुमी मारमी को क्या भावना है वह हमें बुति द्वारा स्पष्ट हो जायगी पर मन उग रोने पाले पी भावना को प्ररण नहीं करेगा। यहाँ में यह पर नियुद्धि पक्षमा प्रयाग में उपके मानपालि हीर परमो म्युगति मुदि गहुई है इसलिए Tv पारिमाणिक है। परिभाषा का काम ही है मीमा निर्धारित परना पार इसिए में कह साहित्य में शुम का स्थान सकता है कि राम सीमित है। प्रसीम के छोटे से छोटे शष्ठ की परिमापा करके उसको स्स देना उसकी संना निर्धारित करना--यह राम का काम है। प्रत्येक शब्द किसी स्पष्ट वस्तु या गिन्सी स्पष्ट प्रकिया का घोसम है जो हमें ज्ञान के उपार्जन में सहायता देता है। इसे मैं एक उदाहरण देकर सिद्ध करने का प्रयत्न करूंगा। मान में किसी मे महा 'हम विकास की प्रक्रिया में अग्रसर है। प्रम इस मयन में प्रत्येक शम् का एक वैज्ञानिक प्रयोजन है। हम से हमारा प्रयोजन एव समूह से है, कहने पासा मिसका एक माग है। यह समूह किन मोगों का है, यह उस संदर्म पर निर्भर है जिसमें यह बात कही गयी है । यह यात समस्त मानव समान के लिए नही गयी हो सकती है या हम भारतवासियों के लिए कही गयी हो सकती है। पैसे इस 'हम यो पौर मी अधिक सीमित किया जा समता था 'हम मानव या 'हम भारतीय' या हम नवयुवफ कह पर क्योंकि 'हम' वासे समूह में प्राणि मात्र का दोष हो समन्सा है । दूसरा शन्द 'विकास' है। 'विकास' पर एक ऐसी स्थिति का घोतक है गो वर्तमान अवस्या सेपही प्रथिर अच्छी है, सुखकर है पौर परिष्कृत है। इस स्थिति की स्प-रेखा प्रनिश्चित है क्योंकि मच्चाई, सुस भौर परिवार का म अन्त है और न सीमा है। इसलिए उस प्रसीमत्य सेना का योष पराते हुए उस स्पिसि पी 'विकास' पम्प से परिमापा कर दी गयी है। 'पोर' सम्म विद्या मो इगित करता है जिसमें भमुसवा का मास है। प्रग्रसर' शब्द हमारे मागे वरने की प्रक्रिया का वोय करता है। पौर है' शम वर्तमान काम का सूचा है। इस प्रकार बम पोई महता है कि 'हम विकास की पोर अग्रसर है! उस समय वह किसी मानना पोम्पक मझें करता वह केवस एक पस्तु स्पिति का पोष कराता है। इस मयन में मावमा भी हो सकती है, मेगिन उम मावना का वोप इन पारणे में नहीं है बस्ति किस प्रकार यह यात पाही मयी इम कपन के शाप स्वयें का बो उतार पदाम है, परीर की बो प्रक्रिया है उसमें है । इसपा भी एप उदाहरण देने का में प्रयत्न करेगा। मरी पत्नी मुमस पहली है-'पानी बरस रहा है। उसक इन पदा में मेन्बम बस्तु-स्पितिमा पाप है, लेकिन इन शर्मा में न जाने कितनी मायना निहित हो सफ्ती है जो कपन मात्र घमा से प्पक नहीं होती पर जिस भावना व्यक्त करने में सहायफ भर होते हैं। मान मीमिय कि बरसात की ऋतु प्रारम्भ हो गयी है, मेकिन उस दिन - साहित्य की मान्यताएं परसा । सू के प्रचण झोके चल रहे हैं, पम्पे बीमार पड़े हैं और हमारा सारा परिवार इस गर्मी से त्रस्त है। दोपहर के समय अपने कमरे को पारों भोर से पन्द करके में दर्शन का एक प्रप पढ़ने में उन्मय हूँ। पत्नी दूसरे कमरे में गन्नों गी देसमाम कर रही है और उसी समय पूरब दिशा से एक घटा उमड़ी और भोड़ी ही देर में पानी बरसने मगा। मुझे ऋतु के इस अनायास परिवर्तन का कोई पता नहीं में तो उस प्रेप में हुवा हुमा हूँ और उसी समय मेरी पत्नी दौड़ती हुई मेरे पास माती है, उसके होठों पर मुसकान है, उसकी मानों में चमकहे । अपने सुरीमे कण्ठ से इंसते हुए वह रहती है- 'पानी बरस रहा है ! और मेरा हाम फका कर वह मुझे उठाती है। और मनापास ही मेरी पत्नी की भावना मुझ तक पहुँप जाती है, प्रेप बन्द करके में उठा हूँ। मेरे मुस पर भी मुसमान है मेरे अन्दर भी एर हर्ष है, मैं कहता है प्रधा! चमो पाए मिला। इस स्थान पर हम स्पष्ट स्म से देख है कि 'पानी परस रहा पायों ने सो मुझे केवम वस्तु-स्पिति का बोध कराया इन शम्मों मे मिन्सी भावना को पच नहीं किया। भावना को व्यक्त किया मेरी पत्नी की मपस पास मे उसके पपरों की गति में उसके स्वर की गति ने उसकी पाखों की गति ने और इसी गति ने मेरी भावना को प्रभावित भी रिन्या । पही पार पर पानी परस रहा है। जिन्होंने उत्तारा मोम्पक निमा हे निराधा मोर पस्या को भी पहन पर गमते हैं। एक किसान निराफा एप्पर टूटा हुमा है और बुरी तरह टपक्या है, जिसका मनार गुसे में पड़ा हुमा हे-पोर फागुन का महीना । वह अपनी झोपड़ी में मेटा सो रहा है और अनायास ही उसकी पत्नी माई है। उसके मुग़ पर हवाप्यो ही है, एक तरह मा भय उराकी भागों मे है, एक तरह की निराशा उराफे स्वर में है और यह अपने पति से एक ही रास मेपर पहती है- 'पानी पररा रहा है ! यहाँ इन्हीं पार धर्ने मे करणा और मिण्या पोम्प पिया। यहां भी भावना मोम्पकमरखी है उरा स्मिान पानीमा निपारा उसकी मां का उन्न हुमा सा होना उसके स्वर पा भारीपन। पमा सम्पन्य भावना से नहीं है, उसका सम्बन्प भान है। भावना पाप है, मान रिकारा भी पी है। भौर मीलिए मानव में विकास के साप-गाप धमों की संस्था बेतहाशा गावी जा रही है। समीम मोप्राडयम में पिमक से उसको सीमा प्रदान करता मान ।

१७ साहित्य में शम्ब मा स्पाम प्रक्षेत्र है मौर विना प्रषिक मनुष्य विकसित होवा गाता है, सम्दों को संख्या भी उसनी ही अधिक बढ़ती भावी है। शम्म को मौविक तस्व से समय मानने के लिए मेरा यही सब से मड़ा कारण है। भाग्य का सम्बन्ध चेतन सस्व से है में इस स्थान पर इससे इनकार नहीं कर रहा हूँ मेकिन यह सम्बध केबस पारिभापिफ होने का है-ऐसा मेग मत है । इस चेतन तत्व की अनुभूति में शब्द का कोई सम्बध फ्नुभूति स्वयम् में मुवि का माग हे अपवा नहीं है, मेरे लिए यह कहना कठिन है । पर यदि मैं बुद्धि को सर्वव्यापी मान भूतो मुझे अनुमति को भी शान के समक्स हो बुद्धि का एक भाग मानना पड़ेगा-जान से विस्कुम भिन्न पौर उसकी सीमा से बाहर । शान भौतिक यों से सम्बद्ध है, अनुसूति चेतन तत्व का गुण है। पेतन भपने को अनुमव कर सकता है, पर अपने से मर उठकर मपनी परिमापा करना बिना ज्ञान की सहायता के उसके लिए सम्मप मही है । भान का क्षेत्र त है, अनुभवि का क्षेत्र साधना है। एक का स्प सामाजिक रहा है, साधना व्यक्तिगत रही है। पचपि समय-समय पर सामना को नियों से पापकर उसे सामाजिक स्म देने का प्रयल लिया गया है, पर इसमें मानव दो हरदम प्रसफलता ही प्राप्त हुई है। छुछ समय के लिए कुछ स्थानों पर साधना ने इस प्रकार सामाजिक स्प भले ही पहप किया हो, पर जो प्राकतिक नियम के विस्व है वह हो ही -विहास इस बात का साक्षी है। सामना मा सामाजिक स्प वम विवेक सक सीमित रह सकता है। अनुमति इस सामारिक- सामन की पहप के बाहर रही है। वैसे अनुभूति हरेक म्पत्ति में मौजूद है, पर मनुमति भौतिक प्रक्रियामों से सम्बट नहीं है और इसलिए वह निसर्मों से नहीं गांधी जा सकती। ना और साहित्य का सम्बन्ध अनुभूति से है इसलिए यह शान की सोमापों से परे है। फिर भी कमा का उप-मर्मात् उसका शरीर सत्व- तो मौन है ही और यह कता के परीर तत्व का भौतिक होने के कारण नियों में षमा पनिवार्य है। पेशा में प्रमी कम मुह, भावना को बहन करने का माध्यम घरमही है। मानों में केवल साहित्य ही सार बसा है, अन्य समाएँ नियम है। और हम मानते हैं कि इस कला का उद्देश्य भागमा महीं सक्वान २ १८ साहिप की मान्यताएं पाप्पणीमरण है और हरेक कसा भावना को पहन करने में समर्प है उब फिर हमारे सामने प्रस्त ठ खड़ा होता है- भावना को यह सामवासामाध्यम क्या है? पौर उत्तर मेरे सामने हे भावना को गति वहन परती है। पार स्वरबाई-भासू बहे पोर मावना म्पल हो गयी। पैर पिरक-मापन मक हो गयी। स्वरों के उतार-चढ़ाव में भावना का व्यीकरए है। निकर रंगों को किस भय और पति के साप पटम पर विसरतो है- यहाँ भावना है। हरेक पला में गति ही एक ऐसा माध्यम है को भावन HTRAसा है। हरेक मसा में षो सर्वम्यापी सतहे वह गति हे। कमामों क वर्गीकरण उम सहायक सरवों से होता है जिनमें यह गति निहित होती है समीत में यह सहापन ताप स्मर है, मुष में पह सहायक पल पमिन पिपकमा में यह महापक तत्व रंग है, मतिमसा में यह सहायक ar फापर या बसा है। इन सहायक तस्यों को हम उपकरण का नाम से साहित्य में धम्प प्रपान है क्योंकि विभिन्न सार्मों का वर्गीकरए सन उपकरणों के आधार पर हुमा है जिनमें पमा केन्द्रित होती है गति तापामार-मम समय है। गति का सबस स्पष्ट माग सय हे पोर र सय को प्रापार पमाफर तीन सामों का पन्म हमा हे। मय और स्वा के योग से संगीत कलाबनी मय और अभिनय क योग से माय-मत बमी भय पोर रामक मोग से पाय पसा बनी। जिस प्रकार संगीत भापार सप है, स्वर उपारण है, मृत्य में पापार सप है, ममिन उपकरण है उसी प्रसार माध्य में मापार सय है, घम फेवर उपकरण है। पपिठा का मामार मम मथवा गति में है, और हम देस है कि प्रस्पेर साहित्य का मादि रूप कविता में ही मिलता है। पर सपही गरि का एपमान रूम महीं है, सप वो ऐगी गति है जिसका मौविप देगा पा अनुमय लिया जा सरग है। गति के दूसरे सभी हैं जो तप की माहि स्पष्ट मही है। सादिप में गा पर माग हे यह सय पर पापारित है पर उग गप भाग में एक दूसरे प्रकार की गति होती है जिस ममझ मेना पदमा । पहन पापा गति पयता पोहे पिसने बहानी रमा को राम दिया है। पहानी पापा से पार का वामदे पाकरे याने साहित्य में सम्म का स्थान की कल्पना को गति पर भाषारिख होती है। यहाँ यह मो प्यान में रखना पड़ा है कि अनाविकान से कहानी कविता की सहायता करती मामी है पपपि स्वयम् कहानी को कसा के प्रतर्गत बहुत बाद में माना गया है। से यह कल्पना की गति को बहामी के विकास पौर परियों के कर्म करने में मिलती है, वह मय की पार्मनस्म पासी गति को अपेक्षा मझम प्रपवा निम किसी हालत में नहीं मानी जा सकती। वस्तुत यह गति मानम के बौद्धिक विकास के साथ अधिक सक्षम पौर समभ बनती जा रही है, लेकिन यह सस्प है कि कहानो-कमा को कल्पमा वामी गति वौद्धिक होने के कारण विकास को चीन हे पोर उसे मान्यता बहुव बाद में मिली है। इसीलिए अधिकांश प्राचीन साहित्य पथ में मिलता है क्योंकि मय की गति मानव की मावि प्रवृत्ति है। से कहानी भी मानव की प्रावि प्रति है पर बौधिक होने के नाते मसामी में कमा का निसार पौर परिमार्जन उसके निरन्तर विकास के सामहीमा सका है। यह इस माव से स्पष्ट है कि भाविकास की कहानियों में देववानो की कहानियों मूत-प्रेतों की कहानियों एवं पशु-पक्षियों की कहानियो की प्रपुरखा है। और यह कहानियाँ धर्मशाख मीति पास सपा अन्य उपयोगी शाखों के पदाहरण कम में ही है कला पौर साहित्प में गुरु कहानी के रूप में यह स्वीका महीं हुई है। फिर भी कहानी की शक्ति और सक्षमता प्रादि काल में ही मनुमव कर मी गयी भी क्योंकि पाज के दिम हमें जो प्राचीन काष्य प्राप्त होता है मह महाकाव्यों के स्म में ही क्योकि महाकाव्यों मे बहामी सत्य को अपना कर ही भमरता प्राप्त की है। मह मानसे हए किकमा होने के नाते साहित्य का प्रारभूम उत्प भावना हे प्रति गति है, हमें साहित्य में शम्म एवं शम्ों पर जनित एवं शम्दों में संचित शान और विचार को साहित्य का प्रविसग भार सबसे पधिक महत्वपूर्ण माग तो मानना ही पड़ेगा। मानव अन्य को अपने से पुक कर ही नहीं सकया। बौशिक प्राणी होने के कारण मानव मा अमस्त अस्तित्व ही इन शम्बो में केन्द्रीमूत हो गया है। मनुष्प सामागिय प्रासी हे भौर पाम्द सामामि उपकरण है । समान से पृषक पिसी भी व्यक्ति को घर की काई मावश्यकता नहीं-सन्द सामाजिक पादाम प्रदान का प्रापार है और इसी सामाजिक प्रायान- प्राम में मानव का विकास है। इसीलिए मानव-विकास के गम में हम पप सबसे अधिक महत्वपूर्ण मामने को मिला। n साहिल की माम्यताएं हमारे प्रापीन विचारों और शाखा मे पम्प नसामा पीपेक्षा साहित्य को नो महत्वपूर्ण स्थान दिया है वह सम्भवत इसलिए साहित्य में मति के योग से सम्म भावमा को तो वहन परता ही है वह स्वयम् अपनी शक्ति सेवान का पर्यायी होने के कारण मानव-विकास में भी सहायक है। दमि धर्म विज्ञान, पथा मने पान, ये सभी पम में मोमिव हैं और ये सब मानव जीवन के महत्वपूर्ण पार पमिन माग बन पुके हैं। फिर एक पौर प्रश्न स्वाभाविकप से हमारे सामने उठ पा होता है। यह प्रश्न यह है-मागमा स्वयम् में ही शाम पौर विज्ञान से पृषर से कहो पा रामसी है ? हान पौर विमान पाखिर भागमा भी ही वो रुपम है ? मही महीं जब मनुष्य सामाजिक प्राणी है तब उसकी हरेक मापना का सामाजिक रूप भी होता पाहिमे । हम हरेक मारना पो सामाजिक उपकरण में ही देन पार समम सकते हैं। मह जो सम्द- हीन पसाएँ है, यह किसी हद तर अपूर्ण है क्योरि घम्द में निहित परिमापा के प्रभाव में भावना का पुरस्पो ममार से सम्बन्धि है. प्रस्तुत करने में भयमर्य है। रामों की महत्ता को स्वीकार करते हुए इतना प्रबाप मानना पदेगा वि साहित्य कला है मौर कसा होने के माते साहित्य र सम्पय मान-गा ये महीं है, भारमा-पता से है । पर हरेक गान के पीछे एक भावना तो रहती है। ऐग्री हासत में विकास में रत मानय के साहित्य रेश्य हो जाता है मान का भावनामक पोकरण। नाम का मावमारमर पतीकरण-यह एक नया मारा अवश्य है, सेक्ति मनोवैज्ञानिक रंग स यह माय येक है। पान भी दुनिया में और बिपत. पारपास्यतो में साहित्य शम काम पर पो में प्रयोग लिया वा पहा है गिरो दुध मोर्गों को एप प्रम भी हो सकता है। कोई पोर मई ईगर हुई, पा यागार में पायी तो समर साप उराम ग्राहिरप भी पाता है। उस साहित्य से मतलब मिगित मानाारी से है पाउस पीर समप में हमें बेवस समय ही म मापन मन्तुर पर गये। समता या समाना मौखिन प्रक्रिया है, मरिन संतुष्ट करना पा संतुष्ट होना मायनामा रोमा हे भौर इसीलिए विज्ञापन के मायना परको स्वीकार करफहमने उमे साहित्य मा नाम दिया है मान लियर के माप मान में यह सामठा तो मा दी गयी है। यह भावना को लिमीटर प्रमापिन पर मरे पोर इममिए हम रिसे - २१ साहित्य में पन्धमा स्थान प्रबारात्मक मेखन कहते हैं, उसे प्रचारात्मक साहित्य के नाम से पुकारा बाने लगा है। इस प्रचारात्मक साहित्य के सृजन के समय यह अनुभव रिया गाता है कि जब तक उस साहित्य में कमा को प्रमुखता नहीं मिमती तब वा भावनात्मकस्म से यह प्रमावशाली नहीं होता। पौर इस स्थान पर में भाप के साहित्य को दो मार्गों में विमल कर सकता हूं-(१) सजनारमा साहित्य पौर (२) प्रपायत्मा साहित्य । जो धावत मौर अमर साहित्य है, वह अधिकांश में समनात्मा साहित्य ही हो सकता है प्रमायरमक साहित्य प्राय सामयिक पौर प्रस्थायी होता है। प्रबारात्मक साहित्य के जीवन की भवपि उस पीन के गोवन को अबधि से वो मषिक महीं हो सकसी निसका यह प्रचार करता है। मेकिन प्रचारात्मक साहित्य भी कभी-कभी भमर पौर घाश्वत हो सकता है, यह साहित्यकार की पति मौर क्षमता पर निर्भर है। यदि साहित्यकार प्रचार की वस्तु को केवम साधन बना कर पसता है तो उस साहित्य का जीवन पपिर हो पाता है, जहाँ प्रचार की वस्तु साम्प हो गयी वहीं उसका जीवन सीमित हो वाता है। प्रत्येक वस्तु का प्रपना निजी स्पान हे पौर में साहित्य को मागीविका का सामन मानने में सेकोम नहीं करता। मागीविका के सिए लिसित अधिकांश साहित्य प्रमारात्मक होता है यपपि सृजनात्मक साहित्य से मी मागीविका की समस्या हल हो सकती है। यह तो देदा काम पौर परिस्पियों पर निर्भर है। वैसे इतिहास यह बतलाता है कि सपनारमा साहित्यकार हमेधा सापन रहे हैं और उन्हें अपने जीवन-मनन में भयानर पर्म-संकटों का सामना करना पड़ा है। पाद के विकास के साप कमा में साहित्य की महसा बढ़ती गयी। इसका कारण यह कि मानव मे हरेक निर्माण और विकास कार्य में उसके भावनात्मक पक्ष को अनुभव किया है और मावना-पक्ष साहित्य का अंग है। वैसे भावना इस सृष्टि का भाषारमून सत्व है, पर विकासोन्मुख मानव अपनी भावना से विचार मौर दुटिको पृषक मही रप प्रता पाप साहिप का उपारण है और पास में ही मानय मा विनय है।

तीसरा परिच्छेद साहित्य का स्रोत हरेक भादमो में मारना है पर हरेक पादमी कसासर महीं है। हरेक मावना से पुरु प्रादमी में बुधि है, पर हरेक भावमी कमाकार नहीं बन सकता। कसा का स्रोत म भावना में है न पुति में है। कमा एक प्रवृति है पौर प्रत्येक प्रमृति का प्रोव मनुष्य की पन्तप्रेरणा में है। इस मन्त्रणा को नियमों में नहीं बोषा या समता, यह मन्तप्रेरणा एक रहस्य की भांति हरेक मनुष्य के अन्दर स्थित है, इसकी मनुष्य के जीवन में एक महत्वपूर्ण सत्ता है । इस प्रतिप्रेरणा को हम कर्म अपना सरन पर प्रक्रिया कह सकते हैं। मुझे कुछ ऐसा ममता है कि इस मन्तप्रेरणा का योटिक विश्लेपण नहीं किया जा सकता। बुद्धि की पहुँप के बाहर, मानव के पेतन सस्प से सम्बसमान की सीमा से परे ऐसी कोई पति है जिससे समस्त सृष्टि पासित है। उस पति के मानव के धर्म और पिपार को प्रेरित करने वाले माम को हमने मन्तप्रेरणा का माम दे दिया है। जो पर्म को प्रेरित करती है, उसे हम प्रवृति यह साये हैं मोर पसा फो में प्रवृत्ति ही समस्या है। प्रवृत्तियों के भनेक वर्गीकरण रिसे गा सकते हैं, पौर समस्त मान-विज्ञान प्रमका पम्प सपनामक कार्य जो मनुष्य करता है, इसी प्रवृत्ति द्वारा प्रेरित हैं। प्रवृत्ति स्वयम् ही एक प्रकार की भावना नही पा सरनी है, पर गिस प्रकार हरेफ भावना सर्वव्यापी है, प्रवृत्ति उस अपार सपम्यापी नहीं है। विमिन मनुष्यों में विभिन्न प्रमर की प्रवृत्तिया है। इन प्रपत्तियों का रेश्य समन हे पार इनकी उपसम्मि मानन्द है। गरिएम को गणित के प्रश्न मुसम्बने में पानन्द प्राप्त होता है, पेमानिकको प्रकृति के रहस्य मोरन में पानन्द प्राप्त है । यही नहीं, एक सापारण मासी या चार-पेडों में योग से एक नए रिस्म मा फूल पेरा करने में मगा है, वह मी परने मानन्द के लिए यह सब रखा है। फमा कामेश्य मारना का समन है। इस मावना के यन को मापना सपोकरण कहना पधि पित होगा-ऐसा मेरा मत है। भावना हरेक प्राणी में है, यह उस भापमा मे अनुमम करता है,

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सीसरा परिच्छेद साहित्य का स्रोत हरेक पादमों में भावना है पर हरेक मा मी कसाकार नहीं है। हरेक भावना से पुछ प्रादमी में एदि है, पर हरेक मादमी कलाका नहीं बन सकता। कसा का स्रोत म मावमा में हे म बुद्धि में है। कना एक प्रवृत्ति पौर प्रत्येक प्रवृत्ति का स्रोत मनुष्य को अन्तरणा में है। इस पन्वरण को नियमों में नहीं पाया जा सकता, यह प्रस्तप्रेरणा एक रहस्य माति हरेक मनुष्य के पर स्थित है, इसकी मनुष्य के जीवन में एक महत्वपूर्ण सत्ता है । इस प्रस्तप्रेरणा को हम कर्म पथवा एरन के प्रक्रिया कह सकते हैं। मुझे कुछ ऐसा लगता है कि इस मन्सप्रेरणा का यौशिक निश्पए नहीं किया था सकता । बुद्धि की प? पाहर, मानव के पेवन सरा से सम्बरमान की सीमा से परे ऐसी कोई शक्ति है जिससे समस्त सपि शासित है। उस शक्ति के मानव के धर्म पीर विचार को प्रेरित करने वा भाग को हमने प्रतारणा का माम रे दिया है। गो धर्म को प्रेरित करत है उसे हम प्रवृति कह सकते हैं मोर कला को में प्रवृत्ति ही समझता हूँ प्रवृत्तियों के भनेक वर्गीकरण पित्ये पा सकते है, मौर समस्त मान-पिमान अपना मन्य सरनारमक कार्य जो मनुष्य करता है, इसी प्रवृति द्वारा खि हैं। प्रवृत्ति स्वयम् ही एक प्रकार की भावना कही या समन्ती है पर विस प्रकार हरेक भावना सम्पापी है, प्रवृत्ति उस प्रकार समस्या महीं है । रिमिस मनुष्यों में विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तिया है। इन प्रवृत्तियों का उद्देश्य घमन है पोर इनकी उपसम्धि पानन्द है। गणितान को गणित के प्रश्न सुनने में मातम प्राप्त होता है, हानिक को प्रकृति के रहस्य खोसने में पानर प्राप्त है। यही नहीं, एक सापारण मासी को पार के फूलों के योग से एक मए किस्म का फूस पेरा करने में ममा है, वह भी अपने भानन के लिए यह सब करता है। कला का देय भावना का समन है। इस मावना के घमन को भावना का मोफरणा कहना मषिक उपित होगा-ऐसा मेरा मत है। मावना वो हरेक प्राणी में है, वह उस भावना को अनुमव करता है,

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साहित्य की मान्यताएँ को बौशिक और सामाषिक मानव प्रासानी से मानने के लिए तैयार नहीं होता यह भी सत्य है, और इसका कारण यह है कि सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य के हरेक काम का एक सामाजिक स्प तो होना ही चाहिये । यहाँ तक समाव का प्रश्न है, यह कसा पर अपना निर्णय सामाणिक मान्यतामों भौर परम्परामों के अनुसार ही वेगा। वैसे हरेक कमा स्वान्तः सुखाय होती है, जिस कसा का कलाकार अपने में तन्मय होकर समन नहीं करता उसमें कलाकार प्राण-प्रतिष्ठा नहीं कर सकता, पर साकार के निजी पक्ष के साथ परोक्ष पक्ष प्रमिन-स्प से पुरा हमा है, क्योंकि कला का सनम दूसरों के लिए किया माता है, पौर इसलिए सामाजिक मान्यतामों के अनुसार कला का बहुरन हिवाय होना नितान्त मावश्यफ है। भो कसा बहुजन हिताय नहीं होती यह समाज में स्थान नहीं प्राप्त कर सकती। पर कमा की उत्कृष्टता उसकी शक्ति और उसकी सफलता कमा स्वान्त सुसाय वाले पक्ष में निहित है क्योंकि मामा का स्रोत वो मामाकार को प्रवृत्ति और पन्तप्रेरणा प्रपाद कमाकार की चेतन प्राण-शक्ति में है, और कलाकार का उद्देश्य अपने निजी मानन्द का हनन है। यह वो भस्पायी अपना प्रदर्शन वासी कमाएँ है-संगीत मृत्य और पमिनय, इनमें स्वान्सा सुखाय वामा पक्ष स्पष्ट दीसता है क्योंकि इन कमानों पमा प्रभाव वालासिक होता है। इन प्रमों में यदि कमाकर को अपनी कमा के प्रदर्शन में स्वयम् मानन्द महीं मिसता तो पसाभर अपनी कसा से दर्शकों या योतामों को प्रभावित नहीं कर सकता। मसाकार के सूर पर ही इन कमानों की सफलता प्रवसम्पिस रहती है। पर वहाँ स्थायी कसाों का सम्बन्म है, पाद में पसाएँ जिनमें मनुष्य को अपनी बुटिकी सहायता से किसी स्थायी कसा का घमन करना हाता है, वहाँ यह स्वान्त सुखाय और बहन हिताय वाता प्रश्न भयानर सप से उसमा हुपा है। साहित्य में सम्म उपकरण है मौर दाद विधार भौर मान को बहन परखा है, विज्ञान मौर विचार सामाजिक उपकरण हैं, म्पत्ति के उपकरण महीं है। ऐसी हासत में भौतिक विचारवारों पर यह मापन कि यह जिसनी प्रवृत्तियां हैं, यह सब सामायिक वना से प्रभावित है, गमत महीं दीसता । समस्त प्रगतिवादी साहित्य में में इसी सिदाम्म में हैं। जो सामाजिक विकास मौर बेतना की थीम है, उसमें नियंत्रण एवं परिकार मावस्या है।

साहित्य का स्रोत प्रगतिवाद में साहित्य को सामाजिक नियमों पर प्रतिबन्यों में जका लिया गया है। वहाँ साहित्य समार-चाव एवं रामनोवि-धाम से प्रेरित पौर अनुशासित है मौर इसलिए साहित्य का स्थान इन शारों की अपेक्षा नीचा माना जाता है। पब तक साहित्य सामाजिक मान्यतामों के मनुसार महुवन हिताय नहीं है तब तक उसको समान में स्थान नहीं मिस सक्सा । प्रगतिवाद साहित्य का स्रोत सामाजिक पेतना में मानवा है, वैयधिक प्रेरणा में नहीं। मेकिन यह सामायिक तना क्या है ? इस सामाजिक चेतना का स्म क्या होना चाहिये ? यही नहीं महजन हिताय की मान्यता क्या हो सकती है या क्या होना चाहिये । यो उसझे हुए प्रश्न है यह। इन पलों का उत्तर देने का अधिकार म्मति को नहीं है-दन प्रश्नों मा नसर समान ही दे सकता है। समाज का प्रतिनिधित्व करता है शासन और फलतः इन प्रश्नों का उत्तर शासन ही दे सकता है। शासन ही यह निर्णय पर सकता है कि सामाजिक हित-अहित क्या है क्योंकि वह सामाजिक विक- महित का उत्तरदायी है । और हमें यहाँ पर यह भी स्पष्ट रूप से समझ सेना पड़ेगा कि पान के बौदिक युग में शासन परम्पराएं राजनीतिक दर्शनों पौर विधारषारामों पर स्थित है। और यह भी सत्य है कि पासकों का हित साहित्य को विरार प्रपान बना कर अपने राजनीतिक दर्शन को प्रतिपारित करने में ही है क्योंकि इसी से यह कायम रह सकता है। अपने निजी विधायें को माननवाजा हित प्रतिपादित करके मनप्ता पर मायेपित करना राजनीतिक दलों की स्वामाविन प्रवृत्ति है। मैमानिक दृष्टि से प्रस्मैक प्रवृत्ति कारण और कार्य के सिद्धान्त के मन्तर्गत माती है, और सामाजिक प्रवृत्ति का वैमानिक विश्लेषण करके उन्हें कान सम्वर्गव पर दिया गया है। पर वैयकिर प्रवृत्तियों के मानिक विश्पण में समा उन प्रवृत्तियों पर अनुशासन करने में सभी वर मानव को सफलता नहीं मिली है, और मेरे मय से मिस भी नहीं सगी क्योंकि वैयक्तिक प्रवृत्ति सथक मार सक्षम मानम में प्रवप्रेरणा के स्म में स्पित है। इस मन्तरण में ही मानव का समस्त विकास है। इस प्रतिप्रेरणा की प्रस्वीननकि मानव-विकास की प्रस्वीरोचि है, इस पन्धरणापी भस्वीकारोकि भावना की पुटन है वहाँ जीवन रहने योग्य म रह नाम इस प्रस्वीनारोणि एस मयामक मानसिक गुमामो का पारोपण है यहाँ पूरारों में घुटन पोर पुष्ण के सिवा और कुछ नहीं है। इस स्माम पर मुझे गुष ऐसा सग रहा है कि में भावना में पनामा साहित्य को मान्यताएं बहने मगा है। पर मेरी यह भावना ही तो मेरा समस्त सरप है । में बहुजन हिताय वासे सियास्त को स्वीकार अवश्य करता हूँ पर इस बहुनन हिवाम वाले सिद्धान्त को साहित्य का स्रोत मानने को में तैयार मही है। स्वान्त सुखाय पामे तत्व में ही साहित्य का समन है, समान धारा उस साहित्य की स्वीकृति बहुमम हिवाम पाने सत्व पर निर्भर है। साहित्य का क्षेत्र जैशा में पहले निवेदन कर चुका हूँ मानन्द की सीमा तक पहुँचने वाला मनोरंजन है क्योंकि इस मानन्द प्रयका मनोरंवन को भावना प्रहण करती है, दुखि प्रहण नहीं करती। यह वर्शन यह समान- घाम यह समस्त मान-विज्ञान यह सब साहित्य को उपसम्बि नहीं है। दर्शन समाज-शाम तपा अन्य प्रकार के मान-विज्ञान को में साहित्य का सामन मान सकता हूँ में उन्हें साहित्य का साम्य मानने को तैपार नहीं हूँ। प्रगतिनाव में रामनीतिक वन पौर समाय-शाम को साहित्य का साम्य माना गया है, भानन्द और मनोरंजन को केवल सापम के रूप में स्वीकार किया गया है। मेरे मन में यहीं प्रगविवाद की सबसे बड़ी कमरोगे है, क्योंकि प्रगविवाद में कमा के मूल-स्रोत को ही अस्वोपर करके साहित्य की महत्ता हरण कर सो गया है। मान में अनुमति नहीं है, अतुमति साहित्य और कता में है। यह अनुभूति का तय हो साहित्य का मूम अस्प है कर्मोकि इसो में मानन्द फा समन है । जैसे हम शान का उपान निदेश्य महीं करते मानव के समस्त पापार का एक मात्र उद्देश्य है पारम नुपि। पर मारम-सुष्टि पौर भनुभूति में अन्तर है। पारमन्तुष्टि पैकिक है, यह केवल मणि तक सीमित है, मनुमति में पतिक पप होने के साप उसमा सामाभिक पक्ष भी है, यह दूसरों को वितरित को मा सकती है। यह अनुमति भावना का पत्रपर हे गो कि समस्त मानर समाज में प्राप्त हे व मान जैसा मैं पहले कह पुका हूँ विकास का घोष हे पार उसका एक। सीमित माग ही कुछ इने-गिने मांगों को प्राप्त हो सकता है। वैसे शान समयम् भो सामानिक संशा है, लेकिन यह सामात्रिक समा विकास के निपों भी हुई है। इतना सब कह लेने के बाद में इस बात को अस्वीकार नहीं कर सकता कि दुनिया का पधिकांश साहित्य ज्ञान से प्रमारित है। इस साहित्म में मानन्द और मनोरंजन स्वयम् में साप्य महीं हैं परन् सापन है। इस साहित्य में साम्य है दूसरे उपकरण । यह बात वर्तमान युग साहित्य पर ही मागू नहीं होती है, यह बात हरेक युग के साहित्य पर के साहित्य का स्रोत २० समान मात्र से मागू होती रही है। बौधिक मानव ने मनादि कान से यह मममय किया है कि किसी भी बात को सिद्धि के लिए उसमें मनोरंजन-पमा होना पावश्यक है क्योंकि मनोरंजन ही भावना को प्रभावित कर सकता है। सम्पामय में पलने वाले कपियो और साहित्यकारों मे अपने संरक्षकों की कितनी खुशामद नहीं की उनसे प्रर्य प्राप्त करने के सिए । विसासी सोपण करने वाले प्रत्यापारी और कर रामानों को इन्द्र कुरेर, शिव विष्णु मावि देवतामों की उपमा देकर क्या नहें देवतामों की कोटि में विसमा कर उनसे रूपया मेने में और मामीविका प्राप्त करने में साहित्य का मनोरंजन पक्ष उन कवियों का साधन हो बन पाया हे साम्प कम रहा है? उनका साध्य ता हा हे प्रय-प्राप्ति प्रयमा प्रपने पाण्टिरप का प्रदर्शन । पैसे उस युग की गय रायामों को ईश्वर का पंस माना मासा पा मान्यतामों पौर विश्वासों के अनुसार कलाकार को इस भूठी प्रश्सा में कोई फष्ठा नहीं होती थी और इस प्रकार के साहित्म में कुछ समर कृतियों का भी घबन हो गया क्योंकि इन कृतियों को मिवने पामा साहित्यकार सथक पौर सक्षम पा सभा उसके पास विस्वास के स्प में युग की माम्यवा पी पर इस प्रकार के उनाहरण बहुत पोरे हैं। मणित म्पोसिप पीपषि प्रावि अनेक वैज्ञानिक विपर्यों को पन्दोपट कर देने से विवापियों का मनोरंजन होता है और उन्हें यह विषय मासानी से कण्ठस्य हो पाते हैं। इसलिए इन विपयों को पावरपरके संस्कृत में बहुत मा साहित्य की रचना हुई है। पर इस साहित्य में स्पष्ट-स्म से मनोरंजन सापन है, साम्प नहीं है, और यहाँ कहीं मनोरंजन साप्प केस में दिखता है वहाँ बह भावना से यहत दूर है। सफल साहित्य यह है मिससे मान के स्पाम पर मानन्द प्रमा मनोरंजन की प्राप्ति हो । पैसे मान पीसिन मानव का प्रबिसग माग है पर साहित्य का क्षेत्र उस मान की उपलब्धि के नियों से नहीं बचा है। मान को प्रहण करने वाला मन महीं है, मान को प्रहण करती है दुठि मह हमें किसी भी दशा में न भूसना पाहिये । माता का सम्बन्ध मन से है, मुविसे नहीं है, मन का क्षेत्र अनुभूति है, मान महीं है। यहाँ फिर से एक बात स्पष्ट कर देनी पड़ेगी। कसा एक प्रवृत्ति है पो हमें पन्य दूसरी प्रवृत्तियों की मांति प्राप्त होती है। कना की प्रवृत्ति के विकास में बुधि उसी प्रकार सहायफ होती हे मिस प्रकार यह मन्य प्रवृत्तियों के विकास में सहायक होती है। मिसे हम अपनी भाषा में अन्वप्रेरणा या अंग्रेजी में ट्यूशन (Intuition) कहते हैं, प्रवृत्ति उस २८ 1 साहित्य की मान्यताएं म्यापन शक्ति का एक सापारण माग मर है । मन्तप्रेरणा मपनी व्यापकसा पौर सक्षमता के साप कसाकार में उसी प्रकार स्पित हो समन्ती हे मिस प्रकार किसी उम्र मोटि के दार्शनिक वैज्ञानिक अपवा अन्य पिन्सी क्षेत्र के व्यक्ति में मेकिन यह कोई प्रावश्यक नहीं है कि मन्तप्रेरणा हरेर कमाकार में अपने शक्तिशासी पौर म्यापक स्म में मिले ठीक उसी तरह से हरेक दार्शनिक प्रथया वैज्ञानिक में इस मन्तप्रेरणा मा होना मावस्यक नहीं है। भाग के दिन पुष साहित्यकारों मोर कवियों में यह प्रथा सी पन गयी है कि वह कलाकार को द्रष्टा गहमर थोपित मरें। न माने कितने उठते हुए मवयुवक नो कला के पीछे दीवाने है मपने मो इप्टा पोपित फरते घूम रहे हैं - अपनी पिवृतियां और कमजोरियां सिए हए । मुझे पो इन मोगों पर इसी मा जाती है। अन्य कलाकारों की बात छोड़ दें स्वयम् पवियों और साहित्यकारो में द्रष्टा कोटि के व्यक्ति एम या अनेक युगों में एक या दो ही मिलेंगे। साहित्यकार को प्रप्य कहने की प्रपा स्वयम् गैरजिम्मेवार भोर कच्ची बुद्धि के साहित्यका वारा अपनी महत्ता बढ़ाने के सिए ही घस पड़ी है। मन्सप्रेरणा साहित्य को महानता प्रदान करती है, पर पन्तप्रेरणा पी प्रपनी निमी स्वतन्त्र सप्ता है। प्रवप्रेरणा ना प्रवृतिवामा भाग ही साहित्य प्रपवा कला से पम्प है, अपने व्यापर क्षेत्र में पन्तप्रेरणा महानता का सपन परखी है । महानु संतों में महान वैज्ञानिकों में और प्राय समस्त महान् पक्तियों में अन्सप्रेरणा का यह पापग-म मिमेगा। इसनिए पन्सप्रेरणा बने महान् साहित्य का ही स्रोत माना गा सकता है, हरेक साहित्य का स्रोत नहीं। एक बहुत बड़ी प्रान्त पारणा मोगों में फैसी हुई है कि कलाकार भावना प्रधान प्रारमी होता है। वह क भावना का प्रश्न है, वह समान भाव से हरेक व्यक्ति में मौदूद है। भावना की प्रपुरखा प्रमवा जिसे हम भायुक्ता महते हैं, उससे कला का कोई सम्बन्ध नहीं है। पता केवल भावना के व्यतीकरण मी प्रवृति भर कही ना सकती है। कमाकार द्वारा मावना के स्पीकरण से साधारण पछि में पर भ्रान्त मारणा फेस माना स्वामाविक है कि वसापरभावना प्रपान- प्राणी होता है। वास्तविरसा ो यह है कि मसाकार पुद्धि प्रपानप्राणी है गोंकि भावना के सफल पौर प्रमावोत्पादक पोकरण में बुद्धिमा महत परा हास रहता है। शान पौर बुदि मानव के प्रविसग अंग है साहित्य का स्रोत २ मौर इसलिए मसा को प्रभृत्ति को स्म ग्रहण करने के लिए बुद्धि की सहायता की भावस्यकता होती है। इपर कुछ समय से मसा को मामु अपवा जिसे हम अंग्रेजी में सान्टेनिपस ( Spontaneorm) कहते हैं, कहने को प्रपा-सी चल पड़ी है। इस बात को प्रतिपादित करने वाले अधिकांश में यह साकार हैं यो केवस शोक के लिए कमा को देखते-सममसे हैं । केलस बसा की प्रवृत्ति कसा का निनी पक्ष मते हो हो बह कसा का परोक्ष प्रथवा सामाबिन पा सो नहीं है । यह कसा की प्रवृत्ति व्यकिवी अपनी निजी पीय है लेकिन इसे सामानिक रूप ग्रहण करने के लिए काला को वोटिक नियर्मो से वैधना पड़ता है। इसीलिए अंग्रेजी में कला का पर्यायी शम् पार्ट में कृत्रिमवा ( Artificiality ) मा पोप है क्योंकि यह कृत्रिमता ही कला को सामानिक रूप देती है। भागना में प्रान्सरिक प्रेरणा प्रवक्ष्य है पर यह भावना हो कता का रूप-हीन प्राण मर है, इस प्रस्प प्राण की प्रतिष्ठा मो शरीर में ही हो सकती है। इसीलिए जिसे हम कसा का उपकरण कहते है यम्ब स्पर, प्रमिमय पादि मह सब बौद्धिक नियमों में मैप कर कला के शरीर-सत्व का निर्माण करते हैं। भावना-रपी प्राण की प्रतिष्ठा इस शरीर में हो की जा सकती है। धम्म को गति प्रदान करना—यह पोटिक प्रक्रिया है। श पौटिक प्रण्टिया को हम घेतन अवस्था में ग्रहण करें, यह भावश्यक महीं है । पेतन अवस्था में इस यौगि प्रश्यिा यो प्रहण परने सेपमा के प्राण-तस्व की क्षति होती है, इसे हम अपेतन अपना पर्प पेठन पपस्मा में ही पहरण कसे हैं। मन्तरसा द्वारा पनित प्रवृत्ति में ही हरेक मसा पा स्रोत हे पर पमा को रुप मे पासी पना को समाग द्वारा प्राप बनामे पासी संझा बुद्धि है। पोर इसीलिए मनादि नाम से ही समर्प पोर सफल साहित्यकार वहीं बन सका है जो बहुत बड़ा मौखिक प्राणी रहा है। लोग साहित्य में भावना प्रभान बहुत कुछ लिया गया है, सेफिन बह मय प्रस्मायी रहा है स्थापिम्प प्राम परना बौदिर परिष्कार कामाम रहा है। बास्मोकि प्यास कानिवास तुनमी-ये सब के सब महान् मौखिक प्राणी रहे हैं। यहाँ मुरिकी म्पूनता प्रमवा प्रवाहमना रही है, वहाँ कोई भी प्रवृत्ति पमा काम प धारण महीं कर गयी। गिम सोराला पौर मोग-माहित्य यी पान दुहाई दो पाती है, वह मेवत फैशन के रूप में ही। इस मोक- कसा पोर सोमन्साहित के वस्त्र कमी रहे ही नहीं रह, भी साहित्य की मान्यताएँ महीं सक्स पे। मौर सोकसा या लोक-साहित्य को समाज में पुम जीवित करने में विसना बम पौर म्पय किया जा रहा है, वह निरक हो साबित हो रहा है। मुद्धिनमा मा भाषार नहीं है, यह स्वीकार करते हुए भी हमें यह दो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि विना पुमि की सहायता के प्रतिप्रेरणा की कोटि सक पहुँचने वाली प्रवृत्ति मी मसा का मुवन नहीं कर सकसी। फमा में भावना मौर बुद्धि का संतुसन निवांत मावश्यक है। पन्य कमामा को प्रपेक्षा साहित्य का पुदि से प्रत्यधिक निकट समन्प है, क्योंकि साहित्य पा उपकरण एम है। शम्य ही मान को पहन करता है। इस शान ने साहित्य को प्रेरित पौर प्रभावित किया है। जो साहित्य जान से प्रेरित है उसे कसा की कोटि में महीं रस्सा जा सकता यह पालोचनात्मक या विधेमनारमक साहित्य रहा है, और उस पास के अन्तर्गत रममा पाना पाहिये । मह मासोपनात्मक या विवननारमक साहित्य हमेशा से सृजनात्मक साहित्य के मोचे रहा है क्योंकि इस साहित्य में हरमात्मा साहित्य के विश्लेपण से ही मिष्कर्ष निकामे जाते हैं । सबनारमा साहित्य मान द्वारा प्रभावित होता है, लेकिन वह शाम प्रवर्मुसो होकर मनुमति का स्प ग्रहण कर मेवा है, वह विवेचनात्मक नहीं हुपा करता। एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न गो उठ खड़ा होता है वह यह है-या साहित्य पफिक पेतना की उपग है या वह सामानिक बेतमाको उपग है ? भौतिकता के दर्शन पर विश्वास वामों का कहना है कि साहित्य सामाजिक चेसमा पो उपर है। यह वैयकिक वना को मानते हो महीं। पह सामाजिक न्ना को ही एकमाम समझते हैं, और वह प्रवृत्ति को म्यक्ति के ऊपर मचेतन अपवा पर्ष पेवन अवस्था में सामाजिक वना के प्रभाव से मुक्त समझ ही नहीं सकते। उन लोगों का वर्क नियम मा निरर्षक नहीं पहा पा सकता पेशानिर दृष्टि से इस प्रवृत्ति पौर मन्त्रणा का स्रोत भी तो कहीं न कहीं होना चाहिये । सामाजिक प्रभाव को तो में स्वीकार करता है लेकिन इस सामाणिक प्रमाव को मुम स्रोत में नहीं समझ सकता । यही उन मोर्गों से मेरा मतभेद है। पचिपौर समाम का पारस्परिक सम्बन्ध बहुत उमम्म्र हमा है, या यह पहना पपिक उपित होगा कि उस समय को ठीक तरह से समझने में हमें बड़ी सम्मम हाती है। यही का मेरा मत है, में व्यक्ति को समाग द्वारा निर्मित नहीं मानता मेपास म्पतिको समाजमाप प्रभावित मानता प्रमाव पूरी शोर म हो सकता है, मोपिक हो मकता है और नहीं मी साहित्य का स्रोत हो सकता है। यही नहीं, मैं तो यह भी समझता है कि समाज का जो भी स्म हमारे सामने है, उसे व्यक्ति ने बमाया है। पति का साधारण जीवन समाज द्वारा परिचासित प्रवश्य है क्योंकि यति समाज का भाग बन कर समाज में स्थित रहता है, पौर सो समाम के साप सामवस्य स्थापित करना ही पड़ता है, पर में व्यक्ति की एक पृषक माषारमूस सप्ता मानता समाज से हट कर । इस स्पान पर मुझे लगता है कि मैं अपने विषय से दूर हट गया हूँ। पति और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध इस समय मेरा विषय महीं है। मुझे तो यह प्रतिपादित करना है कि साहित्यकार पकि है पौर यह प्रपनी निमी मावना से प्ररित होकर उस साहित्य का समम करता है जो ससका सत्य है । उसका निजी सत्य सामाणिक सत्य होने के कारण समाज द्वारा या दूसरो द्वारा स्वीकार किया जाय या दूसरों द्वारा प्रति समान वारा प्रमाम्य होने के कारण प्रस्वीकार किया नाय यह दूसरी बात है। ऐसी हालत में में साहित्य का मोत समाज को किसी भी हासत में नहीं मान सकता। समाज द्वारा प्रेरित साहित्य को परम्परा पति प्राचीन है-मैं यह स्वीकार करता हूँ। धर्म को मावि काम में साहित्य के हमम मे बहुत मंध तक कारण हा हे समाज का मुस्य रूप है। पर ऐसे साहिस्य में जीवित वही साहित्य रह सका है जिसमें समाज की प्रेरणा और पति की प्रवृत्तियों एक स्म हो गए हैं। मो शुख सामाजिक-मान्यता द्वारा प्रेरित साहित्य है अर्थात् जिसमें साहित्यकार के विश्वास तपा उसकी भान्तरिक प्रवृत्तियों के प्रभाव की शिथिलता है, यह साहित्य भमरवा प्राप्त करना तो दूर रहा प्रभावशासी भी नहीं बन सका। साहित्यकार की सफलता प्रथवा पसफलसा सामाजिक उपकरण है, वैयक्तिक उपकरण नहीं है, इस बात को भी में यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। यदि समान किसी साहित्य को स्पोकार नहीं करवा वो उस साहित्य का कोई पस्तिस्प नहीं। समार में साहित्य का स्रोत तो नहीं है, पर साहित्य को ग्रहण समान हो करता है। साहित्य का सोस दो पति की प्रवृत्ति में है पीर महान् साहित्य यह होता है महाँ प्रवृत्ति मम्सप्रेरणा का रूम पारण पर से। यह प्रवृत्ति प्रौर पन्तप्रेरणा क्या है? इनका मोस कहाँ है, इनका स्स क्या है ? यह ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर देना मेरी सामर्य के बाहर है। इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए केवल मनुमान से मम मिया मा सकता है।

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साहित्य का प्रमाव सिग नहाँ गुण है वहाँ विकार का होना अवश्यम्मावी है। हमारे ऋपियों द्वारा मो ब्रह्म की परिभाषा की गयी है, वहाँ ब्रह्म को निर्गुण पौर निर्विकार कहा गया है। गुण की रचना के साथ विकार की रचना स्वत होती मावी है। क्या हम विना पणा को मनुमम किये प्रेम शम्द की स्पिति स्वीकार कर सकते हैं ? प्रेम सम्द ही निरर्थक है यदि घणा सन्द म हो । प्रेम मामक गुण का जैसे ही सुजन हुमा वेसे ही प्रतिक्रिया के रूप में घृणा स्मी विकार का उसी समय सृजन हो गया। इसी प्रकार बिना मिप्या के सत्य का कोई अस्तित्व ही नहीं रह गावा । दया शम्ब की हम मस्पना ही नहीं कर सनसे यदि हम क्रूरता क रूप को न मान में। मानम में गुण सक्रिय माना जाता है क्योंकि समाग जिसे रचनात्मक समस्या है उसी को गृण का नाम देता है । स्वयं समाज की रचना हो गुण से हुई है । सत्य विश्वास प्रेम क्या ममता पहिंसा के बल पर ही परिवार, फूटम्ब कुम बासि राष्ट्र प्रादि सामानिसहकार्यों की स्थापना हो सकी है। इस सामागिक इकाइयों पर समय-समय पर यो प्यापात पहुँचवा रहवा हे वह मानव के अन्दर प्रतिक्रिया के रूप में स्थित विकारों के कारण, मो बेस सो मानव के अन्दर निष्ठिय-स्म में विद्यमान है, मेक्नि प्रतिक्रिया के रूप में ठेनी के साप सक्रिया हो जाते हैं और अपने विनाशोकारिणी प्रावेश को गति से सराफ होकर कुछ समय के लिए गुणों को ठक मेते हैं। इन्ही विचारों के कारण प्रनादि पास से विश्व में महायुद्ध तपा प्रनेक विनाशकारी पायव होते रहे हैं। विपार सपि न बन सके मनुष्य में गुण ही सक्रिय रहे, यह माम विवेक का है मो मायना पर दामन और मावना का संचालन करता है। विवेक किस प्रकार गुरण और विनार की मर्माता कायम रक्से यह प्रश्न बोटिक भी है, भावनात्मा भी है। विवेक या मौखिक प्रश्न दर्शन-चास्म केस में माता है, विवेकमा भावनात्मक पक्ष साहित्य के रूप में प्राता है। भोर इम्रो लिए हम देखते हैं कि धर्म पर मावि स्म दार्शनिक होने के साप-माम साहिस्पिक मी है। गुण और विशार पी मीमा का निर्धारण या नटिस माम रहा है। गुगा पौर विकार मामामिक मान्यताएं हैं और मानते हुए समाज के साप यह माम्पताएँ भी पाहीयहत यवमती जाती है। ऐसी हालत में फेवल उन मान्यतापो को मो रपनारमक है, बिना किसी सामाबिक संवर्म के पुण की कोटि में रखना उपित होगा। ३ धौषा परिच्छेद साहित्य का प्रभाव किसी भी पाठझ पर साहित्य का सा प्रभाव पड़ता है, इसी से उस साहित्य की सार्थकता सक्षमवा मोर सफलता निर्धारित की जा सकती है। इस सत्य को स्वीकार कर लेने के बाद हमें साहित्य के प्रभाव का पया स्प होगा इसे समझना पड़ेगा। साहित्य पा क्षेत्र मावना है। भावना को मानव की भावना हो पहण कर सासी है, पुति नहीं। मेरा वो अनुभव है कि साहित्य एवं अन्य फसाभों की उपलम्यि भावना पा एकीकरण है यहाँ साहित्यकार या अन्य कलाकार दूसरों को अपनी भावना में सग्मय कर देता है । मसाकार को भावना का मिनी स्म प्रति कसाकार मासा रूप उसका भैयक्तिक अवश्य है, पर उस भाग्ना का पदा पमा सामानिक मपमा पाठक या दर्मक पाना स्म ही सामाजिक सरस है। इस सामाजिक सत्य की उपेक्षा नहीं पी मा सकती। मावना पर स्पयम निगुगा संमा है, इस भावना को गुणों भोर विकृरिया में विभाषित किया हे समान ने इसलिए भावना के मुरण एवं विवियां मानिस संभाए हैं। गुण पोर रिकार की मीमांसा दर्शन पास का निपय है, पर साहित्य के रूप में मुगा पौर विमर का सम्बन्प प्रत्येक स्थान पर उठ खड़ा होता है। इसलिए गुए और शिकार कर पारस्परिक सम्पन्प हमें निपारित कर मेना पड़ेमा गुण मौर रिकार भी परिमापा परके। पुरण मावना की बह प्रवृत्ति है जो मानव में सक्रिय है। रिपर इस गुए भी प्रतिक्रियात्मक प्रवृति है जो मानव में विधमान तो है मेटिन साधारणत सक्रिय नहीं होते। समाज का निर्माण मान-भावना दी सहिय प्रवृत्ति से ही हुमा है, यह यो प्रतिक्रियारमा प्रवृत्ति है यह सामाभिक पफिक्रम सम्पन्न करती है और इसीमिरा यह प्रविनियारमा प्रवृत्ति यमाय के सिए बिमारिणी मामीजाती है। इस प्रतिक्रियात्मक प्रकृति को सौसिए विकार प्र नाम दिया गया है। पर यहां किया है पहाँ उसी प्रतिघ्यिा अवस्य होगी, और इस साहित्य का प्रभाव लिए यहाँ गुण है वहाँ विकार का होना अवश्यम्भावी है । हमारे ऋपियों द्वारा जो ब्रह्म की परिमापा की गयी है, वहां ब्रह्म को निर्गुण और निर्विकार कहा गया है। गुण की रचना के साथ विकार को रचना स्वत होती जाती है। क्या हम बिना घणा को अनुभव किये प्रेम पाम्ब की स्थिति स्वीकार कर सकते है ? प्रेम चन्द ही निरर्षक है यदि पूणा शम्द न हो । प्रेम नामक गुण का वैसे ही सूजन हुमा वैसे ही प्रतिक्रिया के रूप में घृणा स्पी विकार का उसी समय सृजन हो गया। इसी प्रकार मिना मिप्या के सस्प का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता । दया क्षम्य की हम कल्पना ही नहीं कर सरसे यदि हम क्रूरता के रूप को न मान लें। मानव में गुण सक्रिय माना जाता है क्योंकि समाज रिसे रचनात्मा समझता है उसी को गुरु का नाम देता है। स्वयं समान की रचना ही गुण से हुई है । सत्य विश्वास प्रेम क्या ममता अहिंसा के बस पर ही परिवार, फरम्ब कुल चाति राष्ट्र प्रादि सामाजिक कार्यों की स्थापना हो सकी है। इस सामाजिक इकाइयों पर समय-समय पर बो प्यामात पहेपता रहता है वह मानव के अन्दर प्रतिक्रिया के रूप में स्थित विकारों के कारण को वेमे तो मानव के अन्दर निष्म्यि-स्स में विद्यमान है, सेचिन्न प्रतिक्रिया के रूप में ठेमी के साप सक्रिया हो जाते हैं और अपने मिनाशीकारिणी मावेश की गति से साफ होकर कुछ समय के लिए गुणों को एक सेते हैं। इन्ही विचारों के कारण भनारि मास से विश्व में महायुर वया भनेक विनाशकारी साण्डव होते रहे हैं। विचार सक्रिय न मन सके मनुष्य में गुण ही सक्रिय रहे, यह काम विवेक का हे गो भावना पर शासन पौर भावनामा बामन करता है। विवेक पिन्स प्रकार गुण पौर विपार की मर्यादा कायम राखे यह प्रश्न पौखिक भी है, भावनात्मक मी है। विवेक का बौद्धिक प्रश्न दान-शास्त्र के रूप में माता है विवेक का भावनात्मक पक्ष साहित्य के रूप में माता है। और इसी लिए हम देखते हैं कि धर्म का मादि स्स दानिफ होने के साप साप माहित्यिा भी है। गुण और विकार पी सीमा का निरिए बड़ा गटिस काम रहा है। गुण पीर विपार मामाजिक मान्यताएं है मौर बदसते हुए समान में साप यह मान्यताएं भी पोहो-बहुत बदसती जाती है । ऐसी हासत में केवम उन माग्यवानों को जो रचनारमा है, बिना किसी सामागिर संदर्भ में गुण की कोटि में रमना रचित होगा। ३ १४ साहित्य की मान्यताएँ अब इस स्मान पर एक प्रश्न पौर उठसा होता है।मो प्रतिख्यिात्मक निष्क्रिय विमार है वह समय-समय पर सझिय बनकर समाम को नष्ट केसे कर सकता है ? यही महीं मिम्हे हम गुण पहले है उन्हें हम मानव के सक्रिय सत्य कसे समझ लें पौर विकारों को प्रतिनियारमक निपिय पस्त कैसे माम से ? इन प्रश्नो का उत्तर देने के लिए मुझे मपने विषय से कुछ हटना प्रवस्य पड़ेगा मेफिन बिमा इन प्रश्नों का उत्तर दिये में अपनी मान्यता को स्पष्ट रूम में प्रस्तुत न कर पगा। मेरा माधारपूस कपन है कि साधारण मनुष्य में गुण समिध्य है पौर विकार निष्क्रिय है। पर हर नियम के साथ उसका पपबाद भी हवा हे। यदि यह नियम निम्नानबे प्रतिशत मोर्गों के सम्बन्म में स्वामाविक हे सो एक व्यक्ति ऐसा भी मिल सकता हे जिसमें पपवाद के रूप में विकार सक्रिय हो मोर पुण निष्क्रिय हो । उदाहरण के रूम में प्रत्येक व्यक्ति स्वाभाविक स्म से सत्यवादी है। मवि वह झूठ बोलता है तो इसलिए कि वह मुह मोसने के सिए किन्हीं कारणों से निषध है। हम बिन्सी भी अनमान स्थान में प्रनमाने मोर्गों के बोर मे पर जाते हैं, हम मोगों से उनके सम्बन्प में उस स्थान के सम्पन्य में पूफ्ते हैं पौर में हमें भानी सामर्थ्य के अनुसार सही-सही उत्तर देते है। यह इसलिए कि उममें सत्य सक्रिम गुण के स्म में विद्यमान है। पर हमें एकाष मादमी ऐसा भी मिस नामगा यो स्वभाव से मिम्मामापी है पौर पकायत ही भूठ बोलता है। उसे इस भूठ बोलने में मामन्द पाता है। मान में कि हम किसी मनमाने गौर में पहुंच गए। वहां हमे यह समापार मिमा कि हमें समाप्त हो पहली गाड़ी से पास देना चाहिये मिससे हमारा एक बार पड़ा भुषमान वप मापगा । हमें स्टेशन का रास्ता नहीं मासूम । हम एम यस्ता पसते हुए पादमी से स्टेसनमा यस्ता पूको है। स्वामाविक ये हम यह मामा करखे है कि यह ग्पकि हमें स्टेसन का सही रास्ता वतनापपा म उसके बदमाग gए मार्ग पर मागे पड़ते हैं। पर दुर्माप्पा यह पादमी मामय-समागमा नियम न होपर प्रपवार निगमा । रमन ठीक रास्ता मल्लाने के स्थान पर विपरीत दिशा की भोर संबित कर दिया पोर हम उसी मोर पस पो। परिणाम यह हुमा कि हम ठीक समय से स्पान नहीं पहुँच सके विलम्ब हो पाने के कारण हमारा बहुत बड़ा मुसमान हो गया। यही नही हमें शारीरिक और मामसिंग गष्ट मार से हमा। जिस भारमी मे हमें गमस रास्ता मामामा पा उसमें मिप्या का ।

साहित्य का प्रभाव विकार सक्रिय पा। उसने हमारे हित-अहित पर कमो दुख सोपा ही नहीं उसने तो वम अपनी स्वामाविक प्रवृत्ति के मनुसार कर्म किया। पर उसके कर्म का प्रभाव हम पर पड़ा हमारे सगे-सम्बन्धिर्मा पर पड़ा हमारे कुटुम्बवालों पर पड़ा। उसमे उस घोटे-से प्रकारण मिथ्या भाषण से हम मोगों का जो प्रहित हो गया उसका बदसा उससे भी अधिक भयानक मिथ्या-मापण से हमने दिया। पौर इसका परिणाम यह हुमा कि हममें हमारे सम्बन्धियों में हमारे कुटुम्बवामो में जो मिप्या का विकार निप्च्यि पड़ा पा वह सब्यि हो गया। हमारे सगे-सम्बन्धियों के इस प्रतिक्रियारमा मापण की प्रतिक्रिया उसके सगे-सम्बधियों पर पड़ेगी। और इस प्रकार भनेक मानवों में सस्प के गुण के स्थान पर मिया का विकार सक्रिय हो जयमा। मेरा पुष ऐसा अनुभव रहा हे नि सामारण मनुष्यों में गो विकृतियाँ दीसती है वह उनकी स्वाभाविक प्रवृत्तियो म होकर प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्तियां हैं। स्वामाविक प्रवृत्तियां वह है जो प्रकारण हो। अकारण ही भूठ बोसनेवासा र घृणा से भरा हुमा मादमी मुझे या काही विसा है। अधिकांश में विभातियों रेमो दर्शन हम सोर्गों को होखे है वह प्रतिक्रियारमा विकृतियां ही होती है और इसी स्थान पर साहित्य की सामाचिस उपयोगिता हमारे सामने प्राती है। भावनात्मक होने के कारण साहित्य ही हमें इन प्रतिक्रियात्मा विकृतियों से बना सकता है। सामाभिक संदर्भ में प्रतिक्रिमारमर विचार को दबाना भौर मनुष्य के स्वामाविक गुण को विकसित करना साहित्य का क्षेत्र माना मा सकता है। यह क्षेत्र अन्य सामों का भी हो सकता है, मेक्नि साहित्य पर इसकी जिम्मेदारी सब से अधिर है क्योंकि साहित्य का उपपरए पर है मौर पम्द स्वयम् में सामाजिक उपकरण है। भावना का पचीकरण कसा का मेष होने के नाते साहित्य मा क्षेत्र प्रवस्य पर धा के सामागिर उपकरण होने के कारण साहित्यकार को भावना के सम्बन्ध में सतर्क होना पड़ेगा। केवल वह भावना को गुण की कोटि में भाती है और जो समाय के निर्माण एवं उसकी सुम्पवस्था में सहायर होती है, साहित्य में स्थान पाने के योग्य हैं। वह भावना जो विधार की कोटि में प्राती है रामारा विरोधी तत्व होने के कारण साहित्य में परिव समझी जायगी। पौर इसी लिए भावना के स्पोकरण साय-साप माहित्य मा क्षेत्र भावना का उदात्तीकरण भी हो जाता है।

साहित्य की मान्यताएँ मम इस स्थान पर एक प्रश्न पौर उठ खड़ा होता है । वो प्रतिक्रियारमक निश्यि विचार है वह समय-समय पर सहिय बनकर समाग को मष्ट कैसे कर समता है ? यही नहीं जिन्हें हम गुण कहते हैं उन्हें हम मानव के समय तत्व कैसे समझ से पौर विकारों को प्रतिक्रियात्मक निक्रिय तत्व कैसे मान में ? इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए मुझे अपने विपप से कुछ हटना प्रथम पड़ेगा मेकिन बिना इन प्रश्नों का उत्तर दिये में अपनी मान्यता को स्पष्ट रूप में प्रस्तुत म पर सर्केगा। मेय पामारमूस कथन है कि साधारण मनुष्य में गुण सक्रिय है पौर विकार निषिध्य है। पर हर नियम के साथ उसपा अपवाद भी रहता है। यदि यह नियम निन्लानमे प्रतिशत लोगों क सम्बन्ध में स्वाभाविक है तो एक व्यक्ति ऐसा भी मिल सकता हे मिसमें मपवाद के रूप में विकार मध्यि हो मौर मुरण निष्च्यि हो । उदाहरण के स्म में प्रत्येक पकि स्वामानिक स्म से सत्पबादी है। यदि वह झूठ मोसता हे तो इसमिए कि वह भूठ मोसने के लिए किन्हीं कारणों से विवश है। हम पिसी भी अनजाने स्थान में मनमाने मोगों के बीच में पा पाते हैं, हम सोगों से उनके सम्बन्ध में उस स्थान के सम्बन्ध में पूछते हैं पौर ये हमें अपनी सामथ्य के अनुसार सही-सही बत्तर देते हैं। मह इसलिए कि उनमें सस्प सक्रिय गुण के रूप में विद्यमान है। पर हमें एपाप मादमी ऐया भी मिल जायगा नो समाव से मिप्पामापी है और प्रकारण ही भूठ मोसता है । उसे इस भूठ बासने में पानन्द मावा है । मान में हिम पिन्सी पनगाने गांव में पहुंच गए । यहाँ हमें यह समापार मिला कि हमें कलपन ही पहली गाड़ी से पस देना चाहिये मिससे हमारा एक बहुत का मुफ्यान बच बापगा । हमें स्टेशन का रास्ता नहीं मानुम । हम एक रास्ता ममते हुए प्रादमी से स्टेशन का रास्ता पूछते हैं। स्वाभाविक रूप से हम मह माशा करते है कि वह पति हमें स्टेशन का सही रास्ता पासाएगा । हम उसके रवनाए हुए मार्ग पर पागे गाते हैं। पर दुर्माम्यबग वह पारमी मानव-समाज का निपम म होकर अपवाद निपसा । उसमे ठीक रास्ता सम्मान में स्थान पर विपरीत दिशा को मोर रांगेस कर दिया पौर हम उसी मोर पस परे। परिणाम यह हुमा कि हम ठीक समय से स्टेशन नहीं पहुंच सके विसम्म हो पाने के घरण हमारा बहुत बड़ा मुगन्मान हो गया। यही नहीं हमें पारीरिक और मानसिप नष्ट ठार जिस मादमी ने हमें गमत पस्ता बताया था उसमें मिप्या का साहिम का प्रभाव विकार सविमना । उसने हमारे हिस-अहित पर कभी कुछ सोपा ही नहीं उसने सो कदम अपनी स्वामाविक प्रवृत्ति के अनुसार कर्म किया। पर उसके कर्म का प्रमान हम पर पड़ा हमारे सगे-सम्बन्धियों पर पडा हमारे कुदम्बवानों पर पा । उसके उस घोटे-से प्रकारण मिष्या-मापण से हम सोगों का जो प्रहित हो गया उसका बदला उससे भी प्रषिक भयानक मिष्या-मापण से हमने दिया । मौर इसका परिणाम मेह हुमा कि हममें हमारे सम्बन्धिों में हमारे पुदम्बमानों में जो मिथ्या का विकार निष्क्रिय पड़ा था यह सक्रिय हो गया। हमारे सगे-सम्बषियों के इस प्रतिक्रियात्मक भापण की प्रतिकिया उसके सगे-सम्बषियों पर पड़ेगी। और इस प्रकार अनेक मानों में सस्प रे गुण के स्पान पर मिया का विकार सकिम हो जपमा। मेरा कुछ ऐसा अनुभव रहा है कि साधारण मनुष्यों में पो विकृतिमा दीसती है वह समकी स्वाभाविक प्रवृतियो न होकर प्रतिक्रियास्मक प्रवृत्तिमा है। स्वामाणिक प्रतियां यह है वोपकारण हो । भकारण ही भूठ बासनेवाला शूर, पुण से भरा हुमा भादमी मुझे पराकमा ही दिसा है। अधिकांस में विकृतियो के जो पर्सन हम मोगों को होते हैं वह प्रतिक्रियात्मक विवृतियां ही होती हैं और इसी स्पाम पर साहित्य की सामाजिक उपयोगिता हमारे सामने भावी है। भावनारमक होने के कारण साहित्य ही हमें इन प्रतिक्रियारमा पिकृतियों से बना सकता है। सामाणिक संदर्भ में प्रतिक्रियात्मक विचार को रवाना पीर मनुष्य के स्वामाविक गुण को विकसित करना साहित्य का क्षेत्र माना जा सकता है । मह क्षेत्र पम्प कसामों का भी हो सकता है, लेकिन साहित्य पर इसकी निम्मारी सबसे अधिक है क्योंकि साहित्य का उपकरण ग्रम हे पोर शम्म स्वयम् में सामाजिक उपकरण है। भावमा का व्यतीकरण कला का क्षेत्र होने के माते साहित्य का दोष प्रयस्प है, पर शम के सामाणिक उपकरण होने के कारण साहित्यकार को भाषमा के सम्बन्ध में सतई होना पड़ेगा । यस वह भावना को गुण की मोटि में पाती है और जो समाय के निर्माण एवं उसकी सुव्यवस्था में सहायक होता है, साहित्य में स्थान पाने के योग्य है। वह भावमा गा विधार की प्रेटि में प्राठी हे समाज का विरोधी तत्व होने के कारण साहित्य में पमित समझी गायगो। भौर इसी लिए भाषना के स्पकीररण साप-माप साझिय पर शेष भावना का उदासीकरण भी हो जाता है।

३५ साहित्य की मान्यताएं मनुष्य बाविक प्राणी हे पौर शमशान का वाहक है। ऐसी हालत में साहित्य से मौविस्वा को प्रसग रमना असम्भव होगा। में मौलिकता मो साहित्य का प्रमिवार्य पीर प्रबिसग अंग समझता हूँ। पर यहाँ मुझे एक मात और मासित होती है, मो मौरिकता साहित्य का मषिलग पौर पनिवार्य अंग है वह विवेकपक्ष वासी बौद्धिकता है, ज्ञान-पक्ष पाली बौद्धिकसा नहीं है, क्योकि विवेक दुदि शासित भावना है पौर भान कौतूहम मे पासित बुद्धि है। पर इससे यह न समझ मिया जाय कि में साहित्य में मान को कोई महत्त्व ही नहीं देता। मेरा तो ऐसा मत है कि मनुष्य निम्ना प्रपिक विकसित होता जायगा नवना ही अभिम यह साहित्य में भान को पम्मिलित परेगा । इस विकसित-मानव के जीवन मा अधिकांश भाग मान के दोन में बीतगा प्रति वह उस समम भावमा-हीन प्राणी के समान दिखेगा। हम अकसर मोर्गों के लिए कर दिया करते हैं कि यह प्रादमी महीं मशीन है। मनुष्य रे साप मभीन की तुलना भावना की अनुपस्थिति को प्रोतक है। पर में यह भी अनुभव करता है कि मावनाहीन ज्ञान मियाण होगा साहित्य का प्राण तो उसकी भावना ही है। उम्भत मोर विकसित साहित्य में मान का भावनात्मक व्यत्तीकरण होमा चाहिये ऐसा भनेक पापार्यों और विपारकों का मत है और मुझे इस मत से प्रसहमत होने का कोई कारण मही विसमा । पर यह माम भौतिक तस्म की प्रफेक्षा चेतन तस्व का होना चाहिये । और इसीलिए दर्शम-शाम मनोविज्ञान सपा समायद्यात साहित्य प्रधिष निकर । माये हैं। प्रधिषांपा पाचारप मामोधक भोर विद्वान् साहित्य पी महामवा पचन-दाना पी पृष्ठभूमि में बेगम है। यह स्वाभाविक ही है मोंकि दान शास्त्र में विमेकमा एक मिशेष-स्पान है, मौर इस विवेक के कारण ही उम विद्वानों एवं मानोवों का ऐसा मत है । मनुष्य पी मारमा-उसमी पाशा-निराशा उसको सत्-प्रसत् की मीमांसा स्वपम् स दर्शन-वासमा विपय बन गाया परती है। घिस हम मावना पर उशप्तीकरण पदसे है पह स्वयम में ही दान-पान मा विषय है। या में पहले कह पुरा साहित्य की सार्मका सदामता पोर मफमता मामय पर साहित्य के प्रभाव से मापी ना माती है। वह मादित्य गो मनुष्य में विकृत भावनामों पो मगावा है या उमारता हे, समान दारा साहित्य का प्रमाव ३७ स्वीकृत न होगा। पर ऐसा साहित्य कुछ मोग बड़े चाव से पड़ते हैं। समार पौर पति में हमेशा से एक प्रकार संघर्प बमवा रखता है। मिवियाँ पछिगत हपा करती हैं, गुणों को सामाजिक मान्यता मिसती है। कुछ लोगों की पसन्द के कारण वह विवृतियों पा माहित्य समाज में स्वीयत्व पर मिया जाय इसके प्रर्म तो सामाजिक पराममया होंगे। पह विभूतियों मा साहित्य समाम द्वारा स्वीकृत ही नहीं होगा तणनीय माना जायगा। विमृतियों के साहित्य की रचना समय-समय पर प्रतुरखा के साप होती रहती है, पर यह विवृतियों का साहित्य एष तो समार द्वारा दनीय मामा गाता है, पौर मगर समाग या राष्ट्र उस पर पिन्हीं पारणों से ध्यान नहीं देते तो समय से पाप वह स्वत' नष्ट हो जाता है क्योंकि मनुप्प में गुए प्रवृति-रूप में विद्यमान है, विकार को कुछ पोरसे सोग पार से समय के लिए ममे ही स्वीकार करलें मप्राकृतिक एवं प्रस्वामाविर होने के कारण विकार नष्ट हो हो मायगा। मिस साहित्य का नितना व्यापक प्रभाव होगा मह उतना ही महान् होगा यह एक ऐसा सत्य है रिसको उपेक्षा महीं की गा सकती। दुनिया के साहित्य का एक बहुत पग भाग विशिष्ट या सिए निसा गाता है पौर उस विशिष्ट वर्ग बारा वह मान्य भी होता है। पर उसना पापन प्रमाव म होने के कारण उस साहित्य की गणना महान् साहित्य में नहीं होती और इसी समय एक प्रस्न मेरे सामने सड़ा हो जाता है- 'वास्तव म अमरता की मोटि में पहुँबनेगामा महान् साहित्य इस विश्व में हेही कितना ? अपिश माटिय समय पी मांग को पूरा करने के लिए मिता गाता है। शिक्षा प्रभार पौर प्रसार के इस युग में मुर मनोरंजन दोत्र में भी साहित्य पम्प मन्तामा को पीछ घोर रहा है क्योंकि पुर पोदिन हाने के कारण घर पपने फो मनुष्य में प्रधिम से प्रमिप पारोपित मरखा जा रहा है। ऐसी हासत में साहित्य को महानता की परिधि में सीमित महीं किया गा सान्ता मान पौर बुटि मा सामानिय उपकरण होने के कारण उसमा प्रचार और प्रसार हरे निया में पगा। पाहिप के प्रचार पौर प्रगारमी महत्ता उममे मानय समाज पर प्रभाव के कारण है पोर इस प्रभाव पाम साहित्य की उपयोगिता में ? ३८ साहित्य की मान्यताएँ दिखता है। यह उपयोगिता सामाजिक इकाई है, यहाँ तम म्यक्ति का प्रश्न है, उपयोगिता की वहाँ कोई निश्चित परिभाषा नहीं की जा सकती। मौर इसी लिए कुछ समाजवादी विचारों मे साहित्य भी परस उपयोगितावाद के सामाणिक सिकायों के अनुसार की है। साहिय मा परोक्ष-स्म प्रयवा सामाजिक-स्म क्या उपयोगितावाद के नियमो से पाषा मा समया है ? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। जिसे इन दिनों दुनिया में प्रगतिवाव कहा मासा हे उसमे साहित्य को उपयोगितावाव के नियमो से पूर्ण स से बकरने का मरपूर प्रयत्न किया है। इस प्रगतिबाव के सिवाम्स को अधिकांश समाजवादी देशों में शासन-व्यवस्था की पूर्ण सहायता मिमी है मौर मिस रही है । लेकिन इसमें प्रगतिवादको बेबस प्राधिक सफलता ही मिस सकी है। प्रगतिवाद के प्रयत्नों के बो परिणाम हमारे सामने पाए है उनसे उपयोगिताबार मा सिदान्त सिम नहीं हो पाया है। फिर भी पौटिक प्टि से साहित्य के साप उसमा पनिवार्य सामायिक पक्ष होने के कारण साहित्य को उपयोगितावाव के नियमों के अन्तर्गत सो माना ही पड़ेगा। ऐसी हालत में प्रगतिवादियों की उपयोगितावाद भी परिमापा में कहीं न कहीं कुछ भूस हो सकती है। साहित्य मी उपयोगिता क्या है ? सर से पहले हमें इस प्रश्न का उत्तर पाना पड़गा। साहित्य का क्षेत्र भावना है पौर साहित्य का प्रमुस उद्देश्य मनोरवन है। सामाजिक रूप से यह भावना 'गुण' की कोटि की होनी चाहिये 'विकृति प्रसामागिक है। पौर साहित्य काय गो मनोरंजन प्राप्त हो वह सामाणिक मियर्मों की प्रबहेमना की प्रेरणा देने मामा न होमा पाहिये। सामाभिक निपों की रक्षा मामय की स्वाभाविक मा सास्विर प्रवृत्ति ही फरसी है, और इसलिए मह मनोरंजक प्रसात्विक न होना पाहिये। ऐसी हासत में यह प्रत्येक साहित्य यो मानन को सास्थित मनोरंजन प्रदान गरे, यह समारमिए उपयोगी है ऐसा मेरा मत है, क्योकि इस साहित्य से मानव की सद् पौर कल्याणकारिणी प्रवृत्ति को सहायता मिलती है, और समाजस्वयम् मानव की सद् मोर मस्याएनाग्गिी प्रवृत्तियों पर पायम है। पर प्रगतिवादी इस पेपटिक सुस और मनोरंजन पो उपयोगितावार पन्तर्गत नहीं मानता क्योंपि यह इस पनि सुख पौर मनोरंमन का कोई स्पष्ट तमामीन सामाजिक महत्व नहीं देसता । प्रगतिवाद ततामीन सामागिन समस्यामा मा ही देखता है, और इस बात पर गोर देता है कि साहित्य पो पलासीन समस्यामों को सुसझनने में सहायक होना साहित्य का प्रभाव ३९ पाहिये । सम्पमीन समस्यामों को सुनमाने में निर्माण के साय-साप विनाप उतना ही महत्वपूर्ण और मावस्या है। मही नहीं रचना के पूर्व निस विनाश की पावश्यकता होती है उसके प्रति जन को उत्तेमित करना प्रगसिगाद साहित्य का मंग समझता है, मौर इमसिए नहीं मही कोप पौर हिंसा को प्रगतिवाद यान्ति पौर प्रहिंसा से अधिक महत्व देता है। मो विस्त है, प्रकल्पावारी हे उस मष्ट परना समाजमा पर्म है । युट रकपात हिंसा कोप पूणा-इनके बस पर ही समाम प्रनादिशाम से प्रनाचार, अत्याचार, घोपण और उत्पीड़न पो मष्ट करता रहा है । यह हिसा पुणा कोष-ये मानव को स्वाभाविक प्रवृत्तियां नहीं है तना हम सब मानते हैं, यह प्रतिध्यिारमा विकृतियाँ हैं। पर म्यति मी साई को प्रस्तीपार करने वाला प्रगतिवादी इन बिसारा को मानव में प्रेम दया पान्ति के समकम सामानिक प्रवृत्तियां मानता है, पर्मित विवृतियाँ नहीं मानता पौर इसीमिए प्रगविवार प्यक्ति के मनोरंजन पी मास्विता के पक्ष को प्रस्वीर परता है। मानसमा एक वन तत्व भी है-समान से परे प्रगतिवाद को यह बात स्वीकार नहीं है, वह वो मानव के मौतिक तत्व पो ही जानता है क्योंकि यही भौतिक सत्व मानव का सामाजिक तत्व है । स्वभावत प्रगतिवाद का उपयोगितावाद विज्ञान प्रौर समाज-शास्त्र के मनस्प मानव भौदिन निवास में सीमित है। सामाजिक विकास को प्रगतिवादी भौतिक विकास के रूप में ही देसवा है मौर प्रनारिकास से मानव के भौतिक विकासमा सापन रहा है संघर्प और पुर। इसलिए जिसे हम सात्विकता महते हैं वह प्रगतिवादी रष्टि में अनुपयोगी है। मही नहीं यह सात्विस्या नभीनमी अकर्मण्यता से युक समान वा विरोपी तस्प होने के कारण समाज के लिए हानिप्रय भी है। प्रगतिवाद को सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह कल्याणकारिणी सामाणिक प्रवृत्तिया के विकास में मक्ति पी सप्ता को स्वीकार महीं परवा नब निसस्य यह है कि समागमी रचना ही पति की रपनारमा पौर सस्पारणमरिणी प्रवृत्तियों के कारण हुई है। पापिर ममारमा संचामन व्यति ही सो परते हैं, और समाज का संचालन मरने वाले कुछ इनेमिने पकि पपनी माम्पतामों को समान पर पारोपित परमे हैं। यह जितना मान-विज्ञान का विकास है, यह पक्तिकी मूल प्रवृत्तियों में परिणाम के कारण है, पौर समाज में समस्त पक्तियों को प्रतियाँ संग्रहीत होती जाती है।

साहित्य भी मान्यताएं मिसे परम्परा के अनुसार मानव की भावना कहा जाता है उसे प्रगतिवाद समान की प्रवृत्ति मानता है। प्रगतिबाद इन प्रवृत्तियो में सद पौर प्रसद् के वर्गीकरण को उखना अधिक महत्व नहीं देता जितना परम्परा के अनुसार व्यक्ति की भावना के सम्बन्ध में दिया जाता है। प्रगतिवाद में वर्ग-संघर्प पोर भौतिक-संघर्प को ही प्रमुखता मिनती है। पर यह वर्ग-संघ पौर मौतिक संघर्ष उसी हासत में सामाणिक तना मन सकते हैं नव यह संघर्ष वैयक्तिक पेतना गर्ने यह सस्प धीरे-धीरे प्रगतिवाद के प्रवतकों दमा उसके अनुपामियों पर प्रकट होने मगा है। प्रगतिवादी वेों में मानव की भावना को प्रापारमूस साप्य न मानते हुए भाषारमूल सामन तो माना गया है, और इसी लिए समाजवादी देशों में शासन द्वारा साहित्य मो दूसरे देशों की अपेक्षा प्रापमिकता दी गयी है। इस दिशा में समाजवादी देर्शो में साहित्य की मान्यतामों में भी परिवर्तन हुए हैं। साहित्य का प्रभाव पछि पर पाता है, समान तो प्रनिश्चित पौर परिमापा हीन संशा है। पौर इसलिए उपयागितावाद के सिमाम्त यो स्वीकार करते हुए हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि साहित्य को पति के विकास में सहायक होना चाहिये । मानव का विकास दो दिशामों में होता है-एक तो मानव-वारा प्रकृति पर मिगय पाने पी दिशा में मौर दूसरे मानव द्वारा स्वयम् प्रपने विकारां पर विजय-पाने की विणा में। गहाँ तक प्रसूति पर विजय पाने का प्रश्न है, यहाँ यह अपनी सुवि का सहारा मेता है और बुटिमा क्षेप है शान-विज्ञान । स्वयम् अपनी विकृतियों पर विजय पाने में भावना का सहारा सिया जाता है और भावना मा क्षेत्र है कमा । पर पुटि मानव में सर्वम्पापी हे मसिए स्वयम् भावना बुदि द्वारा शासित होती है । भावमा का गौटिन या येहानिमा क्षेत्र हे समान-शान धर्म-शाम, दन पाष भारि जो सय के सबसई पर पापित है, भावना का अनुभूति गाला क्षेत्र साहिप और मामा है। मैं पहले ही कह पुरा हूँ कि विना त पौर भान है, वह सब मा सब मीविन क्षेत्र से सम्बट है । पेवन मानव के विकार में अनुभूति ही सर्व प्रपम पाती है। संवेदना इमी अनुभूति का मंग है। यह गिवने सामाजिक शाख जन मनोविज्ञान पर्म प्रातिपा विमान यह सब साहित्य रे पन्तर्गत मा साते हैं पौर साहित्य को सात एवं प्राणवान् मनाने में सहायक हा मम्ने है सपा होये भी हैं, पर यह । मान-विमान माहिरप मा पभिन्न अंग नहीं है यह मेरा मत है । मानव साहित्य का प्रभाव जीवन पविभारित इकाई है इसलिए समस्त ज्ञान-विज्ञान स्वत बौद्धिक पौर विकासोन्मुस मानय का पविलग और मभिन्न भाग मन पुका है। हम अपने शान मो पौर अपनी बुद्धि को अपने से अलग से रस सबवे हैं ? पर इस सब के बाद भी मुझे तो यही महिना पड़ता है कि साहित्य में मनुभूति पोर मावना प्रधान है। सामाजिक शाम अपवा विज्ञान की बौशिकता यहाँ साहित्य में भावना तथा अनुमति पर अपने को पारोपित फर देते हैं वहीं साहित्य को सार्थकता मप्ट होमाती है और वह निष्पारण तपा प्रभावहीन हो जाता है। सामायिक धान एवं विज्ञान साहित्य में उपारण प्रपया सापन भर ही ए सबसे हैं, इन्हें साप्म बनाने मी में कल्पना ही नहीं कर सकता। पौर यहीं मेरा प्रगतिवाद से सब रो वग मतभेद है। में इसे प्रगतिवाद की सब से बड़ी कमजोरी समझना हूँ जिवह विज्ञान एवं अन्य सामाजिक शाों को साप्य समझता है । यही महीं सामाजिक शाओं में प्रर्प-व्यवस्था को यह सम से प्रपिप प्रमुखता देता है। भावना की अनुभूति मोर उस भनुमति माता पानम्व अपवा मनोरंजन प्रगसिवाद में मेमस साधन माने पर पन्ततोगस्वा जीवन भामुष्ण पौर प्रविमानित संझा है, मैं तो इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ । मनुष्य अपनी युति द्वारा पीवन के न जाने किसने विमामन मने ही कर से पर जीवन के यह मनगिनती सण्ट एक दूसरे के पूरक है। यही नहीं पन्हीं-कहीं तो यह विमानक पड़े अस्वाभाविक दिसने समते हैं और हमें प्रम में गस देते हैं। सापन प्रौर साम्य का विभाजन बहिप्टि से सामाणिक मम ही मगे और सामामिन रष्टि से यह सापन भौर साध्य वामी समस्या भने ही वास्तरिय मानी जाय पिन यहाँ सह पति का प्रश्न है, उसका लिए पह सापन और साप्य एक रूप होते हैं। इस बात को ध्यान में रमते हए, यहाँ वामनाकार मपया साहित्पपारमा प्रश्न है, उसके लिए यह साधन और साध्य की समस्या एर प्रसर से मौजूद ही नहीं है। उसके मन्दर मसा एष प्रवृत्ति मात्र है, भौर ममापार या साहित्यकार पा पर्म है अपनी प्रवृत्ति को प्रस्फुटित परना। कला भारीर प्रपवा भाधारहीन वो नहीं है भावना को भ्पक मरने के लिए पोई म कोई माप्पम चाहिये । प्पमितामर पो अपनी भावना को प्रस्फुटित परने के लिए जिन याम माम्पतामा को सापनप में अपनाना पड़ता है, साहित्य की मान्यताएँ वही समाज के लिए साध्य वन बाते हैं। पौर इसलिए साहिल्पकार जिस किसी समस्या को प्रपना साधन बनाता है, समान के सिए नही समस्या साम्य बन सकती है क्योंकि वह समस्या प्रपने सवल पौर प्रभावशाली मनोरंजन पक्ष के कारण सामाजिक सस्म पम जाती है। जिसे हम प्रौद्योगिक कला ( Commercial Art पहते हैं उसपी गों उपरोक सत्य में ही हैं। कुछ मोड़े से घबनारमा साहित्य को मोड़ कर दुनिया का अधिकांश साहित्म समय की मांग को पूरा करने के लिए लिखा जाता है। यह समय की मांग केवम समान की मांग है (यहाँ समार को मैं उसमें व्यापक पौर सीमित-दोनों ही क्षेत्रों में लेता हूँ। पौर समाज की मांग होने के कारण प्रस्पायी मांग है क्योंकि समाम मा स्प और उसकी मान्यताएँ, यह निरन्तर बदससे रहते हैं। को नहीं पदसवा वह हे मानव की मावि प्रवृत्ति -मानब पी मल्याणकारी भावना। यह जो दूसरों की मांग को पूरी करने वाली कला है, एमा विशिष्ट वर्ग में उस हीन समझने का मानकल एक फेसन-सा हो मया है । पर विश्व की अधिकांश कमा का स्रोत ही दूसरों की मांगों में रहा है। जिसे हम 'केवम स्वाम्त सुखाय' साहित्य कहते हैं-जैसे तुमसीवाय मे राम चरित मानस को 'स्वान्त सुखाय तुमसी रघुनापगापा' पोपित निन्या है-यह वो फेवम कुछ सापों का दोष रहा है, पौर उस स्वान्त सुखाप साहित्य में बहुत बोझ ऐसा है वो उन कसा की परिमाषा में मा समता हो क्योंकि उस साहित्य में परोक्ष प्रथवा सामाजिक रुपमा प्रभाव रहना है। फिर भी यह सत्य है कि यह बहुत पोड़ा पो गिगुर स्वान्त' सुनाय सिसा गया है, सबसे प्रषिक समर्ष पौर सपाम रहा है क्योंकि यह पसागार की सद् प्राम्पा पर मापारित होने से पारण समान भी मांग तो पूरी नहीं करता बल्कि सबस गन्ना भी सहायता से समान को मार्ग दिखसाता है। इस प्रकार के साहित्य का रचयिता मार्ग-दस पौर सुम-निर्माता महा गाता है। मसामों में मेवम साहिरप ऐमा है जिसका उद्देश्य मात्र माजीविका नहीं होता बह इस कारण रि बौदिर होने के पारण साहित्य में युम निर्माण और विचार-मेतरव की क्षमता है। सबस माहिय यह है जो दूसरों की रषि पूर्ति करने के स्थान पर दूसरों में प्रपने प्रति रुपि पैदा करे। पीर इसी लिए साहित्य समस्त दर्शन पीर रिमान के आर रहता साहित्य का प्रभाव है पर्योकि साहित्य उस भागमा पर घासन करता है जिससे विज्ञान मौ. वर्सन की दृष्टि होती है। यो कुछ भी मैंने कहा है उससे यह वास तो स्पष्ट ही है कि साहित्य की सफलता अपवा प्रसफलता साहित्य की सार्पकता मपमा निरपकस की परम उसके समाज के पर प्रभाव से ही की जा सकती है। साहिर मागीविवा प्रदान कर सकता है या नहीं प्रदान कर सकता है, इस साहित्य की महानता ममे ही न मापी ना सके पर इससे इस निर्णय प अवश्य पहुँचा मा सकता है कि वह साहित्य समाज को प्राप है म महीं है।

- पाया परिच्छेद यथार्थवाद भोर भादर्शवाद पपार्ष यह है या हमारे सामने है, जो मानव के प्रस्तिरमा सत्य है । पारी यह है जो हमारे सामने वासी भोगों में हिवार और सदमें म में स्वीकार पिया गावा है। उसे हम मानवता का सस्प कह सकये है क्योंकि वह पस्तिरव के विकारा पा सत्य है। भादर्श यपापं नाही एस भाग हे मिसगी कोई स्पष्ट परिमापा अभी तप नहीं को मा सकी है। यपाप मा विभाजन करके ही हम मावर्ड को प्रमग पर सकते हैं। यह विभाजन भी मासान नाम नहीं है। उलमी हुई सामाजिक मान्यतापों में पार्य का विभाजन पति की प्रवृति- मात् विभामन करने वासे पक्ति की प्रवृति पर ही निर्भर होगा। ऐमी हासस में पादर्स सामागिय संगा हासे हुए भी उसका म यकिन माम्पठानों के अनुसार ही यना करता है। विश्लेपण परना और मर्गीकरण करना योटिक मानय फी भोतिक प्रवृति है। माविक होमे के माते यह प्रवृत्ति ज्ञान के प्रम्सर्गस पाती है जा मौतिक सय में सम्पय है । जहाँ सर मावनारमा मोर मनुसूति रो पुक्त मानव र प्रश्न है, वहाँ मैं गीवन को एम पमिमामित साईरेस में ही मान सका हूँ। पर मुझे यह भी स्वीकार करना पड़या नि समाग स्वयम् में ही भोतिक सस्प हे पार इसलिए एक सामाणिक प्रापी के नावे हमें हर पदम पर जीवन प्रौर अस्तित्व का वर्गीकरण करमा मड़वा हे पोर इस पर्मोगरण मापार पर निणार्ग निमासन पाते हैं। हम जो कुछ भी पहले या भरते हैं, उगमा मूत्पान ममाय मपनी मिपारिख मान्यतामों पे अनुसार ही करेगा। रामाम द्वारा मान्य हों इम उद्देश्य से हम माने पर्म को या पानी पाठ को समाजपो प्रपमित मम्पटापों में प्रमुमार मप भी इसे हैं। माना की हग प्रवृत्ति में ही उम मादसवार का बीज है जो साहित्य में एक महत्वपूण स्थान बना पादावाद को साहित्य में महल इमनिरा मिमा Pि भारत में सुन्दरका पपायी होने के अवयव मामव को प्रागानी से दिन गाते हैं, - यथार्थवाद मौर माववाद पौर मानव फी यह प्रवृत्ति है कि वह सुन्दरता द्वारा हो अपना मनोरंजन प्राप्त करता है। मतभेद इसमें हो सकता है कि सुन्दर' की परिभाषा क्या है ? यहाँ तक मेय मत है, हम मिसके पम्यस्त हैं या हम को कुछ मी पाहते हैं वह सब सुन्दर है । सुन रता को मैं मानव का गुण मानता हूँ। पौर इसलिए सुन्दरता को दुस्मा से पृथक करने के लिए मुझे कुरूपता की परिमापा करनी पड़ेगी। कुम्मता मानव की विकृति है मो मानव-समाग के लिए महितकर है। मानव-समाम के लिए क्या हितकर हे पौर क्या पहिवार है, यह स्वयम् मतमेद का विषय हो सकता है लेकिन इतना सत्य है कि मो पहिल्कर हे उसके प्रति सामामिक वितृष्णा सष्ट रूप में विमती है। कुस्पता द्वारा मनोरंजन कुछ इने-गिने लोगों को मौर कुछ पोडेसे समय के लिए भने ही प्राप्त हो पाय लेकिन सामाजिक काल मौर प्रसार इस पुस्मता को वितृष्णा की ही पीज घोपित करेगा । पौर सुन्दर वही हे मो मानव की सामाविर प्रवृत्ति है। बो प्रतिघ्यिारमक विकृति हरेक मनुष्य में स्पित है, उसके पस्सिस्प यो स्वीकार करते हुए हममे उसे कुरुपता का नाम वे लिया है। जीवन स्वपम् में एक साई होने के कारण इस जीवन में पुरण पोर विकृति मुन र मोर कुरुप यमान भाव से स्थित है। यह गुण और विकृति सपा सुन्दर पौर बुम्म सामामि वर्गीकरण है और इसलिए साहित्य का परोग प्रयवा सामामिण इरा सुन्दर पीर मसुम्दर से बुरी तरह रसम्म हुमा है। 'सुन र घर में शिव' पौर सरय पी मान्यता को भी में निहित प्रममता जो सत्य नहीं है वह पम्याणकारी महीं है, जो कल्याणकारी नही है वह मुम्बर महीं हो सकता । 'सुन्दरता की धारणा सामागिय धारणा हे और यह घारग्गा हमें सामाजिक मान्यतामा द्वारा प्राप्त होती है। सामाजिक मान्यता स्वयम् में एर प्रापण साई है और इसलिए समान पी सुन्दरसा स सम्बम्पित मान्यता में सत्प पोर शिष के स्व गुपे हुए हैं। वैस आरी रष्टि से पभी-कमी यह सिरसा है कि मुम्दर और शिष या मुर पौर राय विरोपी तत्व हैं, सबिन यह फेवल दृष्टि प्रम हो होगा जिसमें अपमान पी प्रमुखता एती है, नियम प्रतिक्रियारमा मिसियो ने प्रायरण में का माता है। सामाजिक स्प से सम्पर वही है जो मल्याणकारी हे मौर साहित्य को मम्पवाएँ पस्यामारी मह हे गो सस्प है। यह सत्य मानव की स्वामाणिक पौर क्रियाधीन प्रप्ति है । इसी कारण से विद्वानों में साहिप पो 'सरय, शिव सुन्दर की परिमापा में गोपने की प्रपा-सी पन परी है । प्रादवाव इसी सत्य शिव मौर सुन्दर के तत्वों को मेकर मामे बढ़ता है और इसी सस्प शिब पौर सुन्दर में भादर्मबाप का बस है। दुनिया का प्रषिकाध साहिस्प प्रादर्थवाद को लेकर भागे पड़ा है। योटिक और पेवन मानब सस्प विष प्रोर सुन्दर में ही मानव-समाज का मस्तिस्य पौर विकास देखता है। इसी सिए विद्वानों मोर पापाों ने भी साहित्य को साविकता का प्रतीक मान कर साहित्य में पावसाद को प्रमुखता दी है। मारवाद 'जो है उसे सस्य न मानकर जो होना चाहिये इसे सरप मानता है और यही मादर्शवाद की सयसे बड़ी कमजोरी है। पादबाव एक दृष्टिकोण हे मो सामाजिक मान्यतामोशाय भारोपिस है और उस प्टिकोए में भीवन की वास्तविकता के रूप पड्मू को कोई स्थान नहीं है। 'जो होना पाहिये वह मनुष्य पौर पमान में मौजूद है, पर यह प्रासानी से पहबाना नहीं मा साया क्योंकि उसके साथ-साथ पमित स्प में जीवन में बह भी है जो नहीं होना चाहिये । पावर्षवार में 'भो होना पाहिए उसे 'यो म होना पाहिए' इससे पृपा करके यह प्रतिपादित या गावा है कि 'भो न होना चाहिए' यह स्याम्प ही नहीं परम् वपनीय "भम मोर दगा ये भषिकमित मानब समान की परस्पा मोर इसी पविकम्ति मानव-गमापी मान्यता प्राववार है। पारवाद का यस मानपका विश्वास है मेरा प्रयोजन गमाज द्वारा भारोपित उस विपास से है मिसमें वका कोई स्थान नहीं पौर बहादप एवं भय मापार पर स्थापित है और इसी लिए विकमिव बुद्धि मे उसे प्रेम विश्वास का माम दे रिया है। भाववार में पारापन' पप संवेदन तत्व कोरक मेता है, और इमलिए भादगाद मन पर रसना प्रपिक प्रमाव नहीं राम मनता मिठना प्रतित है। मादिस्य यह महान हे वो पारोपित नहीं करता परन् बिरामे ग्रहण पिया जाता है क्योंकि मापन में परस्पा की विवशता है और प्रहण करने में स्पेम्पा की सम्पता है । यो पारोपित परवा है उये हम उपदेश यपापवाद और प्रादर्शवाद ह. सकते हैं, उसे साहित्य तो नहीं कहा मा समता । प्रादर्शवाद चिो पारोपित करने की प्रवृत्ति है वही भादर्सवादको निवस मना 'यमाबाद' शम अपेक्षाकृत नया है। कम से कम प्राचीन भारतीय बाहिय में सो मारवाद पौर पयार्पवाद का कोई ऐसा स्पष्ट वर्गीकरण नहीं मिलता जिसमें साहित्य को निमरू मिया जा सके। वैसे प्रादर्श के ति भास्था प्राचीन साहित्यकारों में हमेशा से रही है। प्रादि कवि सम्मीकि ने 'रामायण नामक महाकाम्य की रपना ही पादश पुरुप को राम में स्म में उपस्पित करने के लिए की है। पर माल्मीकि ने रामायण को मादर्शवाद का अन्य नहीं पापित किया। महामारख' में प्रो घोर पार्पवार मौजूद है यद्यपि उस यथार्य के साप-साप प्रादर्श को लेकर हामाखकार यड़ा है। दान्वे के मा इन्फों और मिस्टन के पैराडाइन नास्ट तपा पैरागान रिगेड सपा शेक्सपियर के हैम्स्सेट पोर मैकमेप मादर्शवाव प्रचुरता के साप मौजूद है। पर शेक्सपिपर और मिस्टम * समय क पादर्भमाद और यथार्पवाय का गम महीं पा । कविता तय के मापार पर भाषना का सुमन करती है मौर इसलिए करिता पावाद तथा पपावाद के वर्गों में विमामित नहीं दी गयी। मारसंगाद और यथार्थवाद का वर्गीकरण महानो के विकास के फलस्वरूप दश हुमा पौर विश्व-साहित्य में पवार्पवाद का प्रपम पसाकार माना जाता है मांस का वासजान । मैं पहले ही मह चुका हूँ कि मनुष्य के बौगिक विकास के साथ कहानी अमित हो पायी है पौर नन्नीसवीं शती के मध्य में फ्रांस में यपार्ववाद के नाम पर वो साहित्य सिखा गया उसमें मानव समाग ने साहित्य की विसिव मान्यतामा से भी पृपक मोई नई चीन देखी । मडिग्रस्त मानवाों पर प्राधारित नो सालिय सिमा मा रहा पा उससे मोग क्य है गए थे और तस्कास इस मवीन कोटि क साहित्य का स्वागत मी हुमा । र म मबीन प्रसार के साहित्य में प्राण है सपा यह साहित्य साहिरिपक नान्मवानों को ही वाम देगा यह सोगों मे म सापा पा । उस समय तक वाहित्य पविययाति द्वारा विरोपामास का सहारा लेकर अपना यस प्राप्त खा रहा पा पर इस नवीन प्रकार साहित्य में भीवन को भैसा है मा चित्रित कर इस पविपयाति पौर उमा विरापामाम पो हरण कर लिया गया था। साहित्य में इस नयीन पारा के प्रवेश करने पापारण पहा है मनुप्या मौलिक विकास । पौटिय रूप से विकसित मानव साहित्य मी मम्पवाएं कस्याएवारी वह है जो सत्य है। यह सत्य मानव की स्वामायिक मौर किमाशील प्रवृत्ति है। इसी कारण से विद्वानों में साहित्य को 'सत्य, शिव सुन्दर की परिभाषा में बांधने की प्रपा-सी पस पड़ी है। मादर्थवाद इसी सस्य शिव मौर सुन्दर के तत्वों को लेकर भागे वड़वा हे मौर इसी सत्य शिव और सुन्दर में प्रादर्शवाद का बन है। दुनिया का ममिकांच साहित्य प्रादर्शवाद को लेकर प्रागे बड़ा है। बौदिक भौर पेतन मानव सत्य शिव पौर सुन्दर में हो मानव-रामान का अस्तित्व और विकास देखता है। इसी सिए विद्वानों और प्राचार्यों मे भी साहित्य को सास्तिकवा का प्रतीक माम कर साहिप में प्रावर्शवाद को प्रमुखता दी है। प्रादर्शवाद यो है उसे सत्य म मानकर 'यो होना चाहिये इसे सत्य मानता है और यहीं प्रादर्शगाव की सबसे बड़ी बामगोरी है। मादर्शवाद एक दृष्टिकोण हे पो सामागिल मान्यवानों द्वारा मायेपित है और उस प्टियोग में जीवन की वास्तविकता के कुम्प पहम्मो कोई स्पान नहीं है। 'भो होना चाहिये' वह मनुष्य मौर समाज में मौरब है, पर वह पासानी से पहपाना महीं मा सकता क्योंकि उसके साप-साम पमिन स्प में जीवन में वह भी है जो नहीं होना पाहिये। पाववाद में 'जो होना पाहिए' उसे 'यो म होना चाहिए इसस पृषर करके यह प्रतिपादित किया माता हे दि मो म होना चाहिए' यह स्याम्प ही नहीं वरन् दपनीय भी है। 'भप पौर द ये पविकसित मानव समाज की व्यवस्पा हे पोर इसी विकसित मानव-समाम की मान्यता प्रान्तबाव है। मारवाद पर बस मामय मा विश्वास है मेरा प्रयोजन गमाज द्वारा पारोपित उम विश्वास से है मिसमें सईपा कोई स्पान महीं और बह दण एवं भय के प्रापार पर स्पापित है और इसी मिए पिपरित बुद्धि ने उसे प्रेष विश्वास का माम दे दिया है। मावर्सबाद में पारापन' तत्त संबेदन प्रस्व को रक मेता है, पौर इसलिए मावर्शवाद मन पर उतना प्रषिक्ष प्रभाव नहीं गत राकसा मिखना अपमित है। साहित्य पह महाम् हे जो मारोपित नहीं करता परन् निरासे प्रहण किया गाता है क्याम्पिारेपन में परस्पा की विषमता हे पौर ग्रहण करने में सम्पापी स्वतन्त्रता है। जो पारोपित करता है उस हम उपरेस देती है। पादर्शवाद तथा यथावाद के वर्मों में विभानित नहीं की गयी। पादावाद और यपार्थवाद का वर्गीकरण कहानी विस के फलस्वरूप फेवा हुमा मार विश्व-साहित्य में यभार्पवाद का प्रपमध्यापर माना मैं पहसे हो गह चुका हूँ कि मनुष्य के बोटिक विप्रस के साथ महानी विकसित हो पायी हे मोर उभीसीती के मध्य में प्रेस में यावा नाम पर मो साहित्य सिसा गया उसमें मानव समाज ने साहित्य प्रवप्नित माम्पतामा से भी पृषक कोई नई पीर देवी । सम्म मानताों पर भाषारित जो साहित्य निखा मा रापा स्मन शोप व से गए थे पीर वलास इस नवीन मोटि माझिपकासात भीमा। पर इस नवीन प्रकार के साहित्य में प्राण हे समाप मानिन माहित्यिक माम्यवाणोंमोही बदल देगा यह मोगा मे म मारामाराम फरक परखा रहा मा पर इय मषीन प्रगर साहिप में गममा साहित्य प्रतिश्योकि द्वारा विरोपामास का सहारामारपसारनप्रात वेमा चिपित करके इस प्रतियोछि प्रौर उस रिमन्ना हार कर लिया गया था। साहित्य में समान धागप्रससाकारत रहा है मनुप्या मौदिय विस्मस । पौशिक सो यमापवाद और पादर्शवाद कह सकते हैं, उसे साहित्य तो नहीं कहा गा सकता। प्रादर्शवाद में पो पारित करने की प्रवृत्ति हे वही भादर्शवाय मो निर्बल बना 'मबार्षवाद' धम्म मपेक्षाकृत नया है। कम से कम प्रापीन भारतीय साहित्य में वो मावर्शवाद मौर यथार्थवाद का कोई ऐसा स्पष्ट वर्गीकरण नहीं मिलता मिसमें साहित्य को विमझ पिया ना सके। वैसे प्रादर्श के प्रति भास्पा प्राचीन साहित्यकारों में हमेशा से रही है। प्राविवि बाल्मीकि मे 'यमामण नामफ महाकाव्य की रचना ही पावश पुरुष को राम के रूप में उपस्पित करने के लिए की है। पर वाल्मीकि ने रामायण को मादर्णवाव का प्रम्प महीं भापित किया। 'महामाख' में तो पोर पार्षवार मौजूद है यद्यपि उस पयार्य के साथ-साम भाव को लेकर महामारतकार पड़ा है। वान्ते के मा इन्फों और मिस्टन के पैरागल मास्ट तथा पैरागान रिगेण तपा शेक्सपियर के हैम्स्सेट पौर मेवे में मावाद प्रघुता के साप मौजूद है। पर शेक्सपियर और मिल्टन के समय तक पादर्शवाद पौर पपार्भवा' का झगड़ा नहीं मा । कविता सय के प्रापार पर भावना का सृजन करती है और इसलिए करता बाता है मास का वामनाक ।

साहित्य मी मम्मताएं प्रतिसयोक्ति को छोड़सा पसा माता है, सत्य और वास्तविकता को ही वह देसता है। इसी सत्य और वास्वविक्सा पर यवापबाव की नींव है। पर विकृति पौर कुस्मता सत्य भौर वास्तविासा गा मावश्यक अंग महीं है, हमें यह ध्यान में रखना पड़ेगा । यपार्पवाद के नाम पर विकृतियों मो पारापित करने की एक प्रवृत्ति मनुष्य में स्वामाविर स्म में पा जाती हे मा साहित्य और कमा की सुन्दरता को मष्ट कर देती है। विवि हमारे जीवन में मौजूद है, इससे तो किसी हासत में इनकार नहीं किया जा सकता पर इस विकृति को हम सुम्पर नहीं कह सकसे स्वाभाविक भत्ते लें। प्रादर्शगाव में भी मानव की विकृति को स्वीकार पिन्या पाता है, पर उस विकृति को पतिशयोकि द्वारा परिव-विक्षेप में केन्द्रित करके उस म्यक्ति के प्रति मामय में पूरणा उत्पन्न की जाती है। विकृतियों के प्रति संवेदन पीर विकृवियों से ग्रसित मानब के प्रति संवेदन में मन्तर होता है। मादबाद संवेन्न के वस्त्र पो स्वीकार नहीं कारखा महाँ तक विकृति या विभूति से ग्रस्त मानव का प्रश्न है । विकृतियों के प्रति सेबेन्न प्रसामाबिमसा को जन्म देना होता है क्योंकि इस संवेदन से मनुष्य में विकृति को स्वाभाविन' समम कर उसके प्रति वितृष्णा के स्पान पर एक प्रभार की उदासीनता ही हो समन्ती है । इसलिए विकृतियों में प्रति संवेदन यपावाद में भी वजित है। प्रादर्शवाद पार पपार्पवाद में मूस अन्तर परवा हे विकृतियो से प्रस्त मानव के प्रति प्टिकोण में । मानावाद में वितिर्यों से प्रस्त मनुष्य को विकृति का प्रतीक मानकर उसके प्रति पुरणा उत्पन्न करने की परिपाटी है जहाँ ममापवाव में विकृतियों रा ग्रम्स गनुष्य पो हम दया तपा संवेदना पा पात्र समझने सगते हैं। पानवाव मा मापार पुरणा पर है यपार्पबारमा मापार पसगा पर हे-सहा सा मानव-मस्थ का प्रश्न है। विकृति के प्रति वितृष्णा तपा पृणा होते हुए भी विकृति रा प्रस्त मनुष्य के प्रति दया भोर कम्णा का भाव उत्पन्न करमा प्रादर्शवाद का सम्य है। हममें दूमय के दोप देयने की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, पपने दोर के प्रति हम सब अपनी पायें बन्द कर सेठे हैं। मारण है कि पो देगने के स्थान पर हमेशा दोप के पार को ही देखते हैं। और मह इसलिए कि हम दोप पोर पाप को एक-दूसरे से प्रसग नहीं कर पाते। यह जो प्रापीन प्राववादी साहिय में गमनाया मी परम्परा हे यह इसी मिए किसन मौर समता मो एक में देखने की हमारी प्रवृत्ति है। मपार्षगाव खला दोप या निवृति पो म्यक्ति से मसग परके रेग्नता है। हम दोष ययामेयार और पाववाद YE जिस समय बसता दोप या विकृति कोम्पति से पृपक कर दिया गया उसी समय पान विकृति क स को पहचानने मगता है, वह विकृति पाहे पराए में हो पाहे अपने में हो । दुनिया भर में परनिना की एक प्रवृत्ति नगर पाती है। इस पनिना की प्रवृत्ति में हम स्पष्ट देखते है कि सोग म्पति की निन्दा करते हैं, उस पछि मर्म की निन्दा महीं करते। यदि मनुष्य मा प्यान कर्म पर पमा गाय तो परनिम्न की मन्दता बहुत अधिक कम हो जाय क्योंकि यह कम जिसके कारण व्यक्ति की निना की मावी है, हम सब सोर्गों में पाभिर भाव से मौजूद मिलेगा। परनिन्दा में प्राय यह भी देखा जाता है कि किसी व्यक्ति के मिस काम के पारण निन्दा की प्राप्ती है उसके प्रति एक प्रकार का मोह निन्दा करमे मामे के मन में होता है। चपाहरण के रूप में हम एक ऐस पातमी को में जो बेईमानी से मतपती या करोगपती बन जाय । उस सक्षपती या करोड़पती कि निन्या सोग प्राय' इसलिए करते हैं कि वह स्वयम् प्रपनी मेमिानी से ससपती या करोड़पती नहीं बन पाए। पयार्पवाद में मानव को इस मनोवैज्ञानिक कमजोरी का हल है। पपापवाद वैज्ञानिक है मौर इसलिए यथार्थवाद की सफलता मनुष्य के बौद्धिक विकास पर निर्भर है। वैज्ञानिक तया मोहिम होने के कारण यथार्यवाद के अन्तर्गत कहानियो पोर उपन्यासों में मने मे और प्रकार विकसित हुए हैं जिन पर प्रकाश गसने का प्रयत्न मागे के प्रप्पार्यों में में करुंगा। इस स्थान पर तो में यमार्पवाद को सही-सही परिमापा करने का प्रयल कर रहा हूँ। पपार्यवाद के नाम पर बहुत कुछ ऐसा लिया जा रहा है नो यपार्ष तो है पर बिसे साहित्य महीं कहा जा सकता गर्योकि उसमें कमा पक्ष कर सर्वपा प्रमाब है। मुझे तो यहाँ सक कहने में संकोच म होगा कि यपार्य बार को भाग पा फैशन बनाकर उसे प्रमगसता का म्प ३ दिया गया है। स मार खा कुछ हो रहा है कम मो कुछ हपा मार मविप्य में जो पुष होने की हम पम्पना करते हैं वह सब यपामाद के अन्तमत प्रा पाता है क्योंकि हम यपाप है हमारा प्रस्तित्व यपार्ष, हमारा कर्म पपाय है, हमारा विचार यथार्य है। पर हर पयार्प माहिप नहीं है क्योंकि बामा होने के मासे साहित्य प्रसुम्दर वस्व से परे है। पाम यपाषा पर प्रमुन्दर बनाने की एक प्रवृत्ति दुनिया में बुरी तरह फैल रही है । उस प्रतिमा समझ मेने से ही हम पाविर साहित्य की मान्यताएं माम्पसा को पा सकते हैं। यह मो मगह-जगह विकृतियो से प्रस्त साहित्य का हनन हो रहा है क्या वास्तव में यह ययापनावी कमा हे? साधारण मनुष्य के सामने यह प्रश्न स्वाभाविक रूस से मा पाता है। साहिस्प में एक चीन मो महत्त्वपूर्ण है, मह 'मीनता' है। अन्य कमामा में इस ममीनता मो इन्ना अधिक महत्व नहीं है क्योंकि यह स्थापी नहीं होती । संगीत में कुछ इने-गिने पग मनारि काम से गाए पाते हैं, और उनी यों में प्राण भरन से हर मामी कलाकार धन सकता है। यही हाल नस्प-यमा का है। पर साहित्य प्रमर है म जाने किसने ग्रन्थ प्रभी तक निवे जा चुके हैं। साहित्य कसम्म से सम्बर होने के पारण साहित्य में बाहिर विकास एक भावश्यक मंग बन गया है। यह मवीमता साहित्य में दुर्मम है। इस नवीनसा का दूसरा नाम मौमिकता है और महान साहित्य यह कहलाता हेमो मौलिक होता है। यह मी निश्चित है कि बहुत कम ऐसा हे मो मौलिए कहा जाता है या कहा पा सकया है। इने-गने पाम्य भावनामों कहने-गिने गप पहानियों के इने गिने वाप-सारा साहिप इनमें केन्द्रित है। इनसे उपर उठकर एक मया स्प कोई गढ़ सके मयी बाप कोई कह सके-ऐसे माहित्यकार पुग में एक या दो ही हो सकते हैं। जो सत्य है, मिय है, सुन्दर हे वह सब परम्परागत होने के कारण साहित्य में घर-घेर अनेक रूपों में मा घुका हे पौर माता रहता है। फेवम समुन्दर भमस्याणकारी पोर असद ऐसा है मापसामामिक होने के नाते मानम रामाज द्वारा ममित रहा है और इसलिए साहित्य में समाविष्ट नहीं हो रापता । फमठ यह मसुन्दर विकृति हो ममीन है, और मबीनता के सृजन के नाम पर इस विकार-युक्त प्रसुन्दर मोमपामार काम मानने की एक परिपाटी मी साहित्य में प्रविष्ट हो चुकी है। यहीं पर वास्तविक पताकार बने गसई रहना पड़ेगा क्योंषि प्रमुभर कमा का विरोपी तत्व है। पेवत नबीनता माम पर भमुनर पिति को तो समान नहीं पामा समया कृष यो स मोग बुध पोर समय के लिए मने ही इस ममीनता के नाम पर सिसे गए वितियुक्त माहिम्प को मासदें। समाज मभी भी इस प्रकार के साहित्य पो स्वीपर म फरगा पाकिस भवार के साहित्य में मानवस्वमावर विपरीत एवं पिरोपी तत्व है। यमार्पया सुमर और प्रसार के मलमूत मेव को स्वीरारमही करणा-पही यवागाद की सबसे बड़ी बमोरी है। वो सस्य मोर स्वाभाविक है उसमें मुम्दर और प्रमुगर का भेद पैसा ! फिर सून्दर मौर यपापवाद मौर प्रादर्शवाद प्रमून्दर का भव सामानिस मान्यतामों पर निर्भर है जो समय-समय पर बदलती रहती है। पयार्पवाद के उपर्युक तर्क बहुत मंच तक ठीक लिखते हैं। वदसती हुई सामाजिक परम्परामों द्वारा निर्धारित सुन्दर पौर प्रसून्दर की परिमापा स्थायी नहीं मानी ना सकती। समाग द्वारा निर्धारित सुन्दर पौर प्रमुर का रुपम सता रहता है । रान दरवारों एवं देवासयों मव से प्रसग होकर हम प्राम मगदूरों पर किसानों की झोपड़ियों से सुन्दरता मो देखने मगे हैं-यह वदसती हुई सामागि मान्यतामों का उदाहरण ही है न ! पर यहां यह भी ध्यान में रसना पड़ेगा कि मानव की कुछ प्राचारमून प्रवृत्तियाँ है पौर उनी विरोधी प्रवृत्तियों का सप्रन निएमय ही प्रमुनरता का सनम है। में पहसे ही वह पुका हूँ कि साहित्य में पपावा- अपेक्षाकृत एक मगीन धारा के रूप में विषसित हो रहा है मौर इस यमार्यवार के निस्प मगीन सप प्रकट हो रहे हैं । पारम्म में ययार्यवाद र प्रतियोक्ति मे विरोपामास से मुक्त माहित्य के लिए ही प्रयुक्त हमा। फिर धीरे-धीरे पपार्षवाद के अन्तर्गस मनोवैज्ञानिक कहानी का साहित्य माया रिसका उद्देश्य वैज्ञानिटंग से मानव को मनोमावना का विरोपण परफे मानव और उसके कर्म में एक सीमा-रेखा स्थापित करना था। इस सोमा-रेखा की स्थापना से मनुष्य मवेदन का केन्द्र हो जाता है क्योंकि हम मनुष्य के कर्म + रूप मो मममने मगते है-मनुष्य की विवशता मनुष्य पी पक्षमता-यह सब हमारे सामने मा जाते हैं। ययापवाद की यह पारा सब से अधिक सक्षम प्रौर समर्प पारा पी गिमक पारण पावसंवाद के विकास को एक गहरा पा लगा। पर मागे पस कर यपार्यमाद की दमी पारा ने विकृतियों को समरिया । ययार्यवादी साहित्यकार इस धारा को प्रफ्ना पर अपनी विभूतिया को ही समान पर मारोपित परने लगा। प्रागिर साहित्य साहित्यकार के म्पकिम की प्रमिभ्यक्ति ही तो है। इस पक्किम में गुण पौर विकार दोनों ही मिलते हैं। पुरण को सामाजिक मुंशर माना गया है, वियर परिका होटे हुए भी असामाजिक माना पाया है। जिस समय हम गुण पौर विकार का मे हा कर मामानिक माम्यवामों को सिसागलि देने पर परिवद हो जाते हैं उस समय हममें गुण को छोड़ पर अपने प्रदर बाले विवार को प्रतिपान्ति परने पी प्रवृति माग पन्नी है। और इमीतिग ययायवाद के माम पर वितियों मा साहित्य प्रचुरता के साथ मिया जाने मगा।

१२ साहित्य की मान्यताएं यक्तिक विकृतियो को दो वर्गों में विमल किया जा सकता है। पहले वर्ग में वह विकृतियां माती गोसष्ट रूप से समाम विरोधी है और दूसरी वे बो शुर-स्म से वैयधिक है। यह दूसरे प्रकार की विकृतियो परोक्ष-स्म से समाग-बिरामी बन सकती है पर यह विकृतियां उसका ही पहित भरती हैं जिनमें यहहै। साहित्य में यो विकृति सर्व प्रथम प्राप्ती है पीर पो निश्चय-पप से समाविरोधी है, वह पौन सम्बधी विगठिहै। विवाह-वन्दन को मोड़ना सुस्तम-गुस्सा भ्यभिचार, पह एक यौन सम्पपी वे विकठिया है या अधिकांश सोर्गों में पायी माती है। पर समाज के सुपार संपालन में मह मिकतियाँ वामा होती है मौर इसी सिए मानव-सपान इन विमतियां के प्रति सताई रहता है। मौत-विकसिमों पर साहित्य की प्रपुरमात्रा में सृष्टि हुई है और न विकवियों पर साहित्य का कुछ भाग दानीय मी माना गया है। मान-विकवियों का साहित्य को प्टिकोणों से लिखा गया है जिसका उस्सेख कर देना पनुपित न होगा क्योंकि इन दो प्टिमोणों को समझ कर ही इस प्रकार के साहित्यमा सही मूल्यांकन विन्या मा मस्या है। इसमें पहसा दृष्टिकोण माभिक है। भश्तील मौर गन्ने साहित्य के प्रति कम्ची उम्र के मुव-युवतियों में एक प्रकार मा मोह रहता है पौर इसलिए इस प्रकार के साहित्य प्रपुरमात्रा में धन उपामित किया जा समता है। बहुत तेपी मे फेयस पैसा पैदा करने लिए इस प्रकार के साहित्य भी रखना की है। यह सच है कि इस मेवकों के पहिय में मो प्रय प्रसार की विवि मोजूद है, लेकिन प्रपिकाध मनुष्य मितियां पते हुए भी उन वित्तियों का प्रवन नहीं करते पोंकि वह उन मितियों को रित मानते हैं और उन्हें छिपाते हैं। इस मौन विकृति को लेकर ग्राहित्य की रपना करने वाला साहित्यकार उन विकृतियों को वित मामधे हुए उनका प्रार्थन करता है। इस प्रागन में बह विकृति का समर्पम नहीं करता-बहतो विकृति को वानीय मौ घोषित कर देता है। पर प्रवर्णन से उस धन मिलता है और इसलिए यह इस प्रकार के साहित्य की रपना परसा है। इस प्रभार का साहित्य स्पष्ट-कारो निम्न मारिका चाहिस्प कहलाता है मेरा भी यह मानता है। पर सेवक का ओपय पेसा होता है, वह महान और प्रमावणाती साहित्य के मजन का वाया नहीं करता। विठियों के साहिप में सतरनाक दूसरी कोटि म साहित्य है । यह पयार्यवाद और पादर्शवाद १३ दूसरा रष्टिकोण वितिको विकृति नहीं मानता मसुन्दर नहीं मानता। इस प्रकार के साहित्य पा रचपिता विठियो को स्वाभारिप मानार बमा की सहायता से उन्हें सुन्दरमा के प्रावरण से ढक देता है । उस विपति के पीछे कलाकार पा पक्किम रहता है, उसके विश्वास बर यल रहता है। यहाँ स्पष्टसप से कलाकार का उद्देश्य प्राधिक माम उतना प्रथिप नहीं रहता जितना अपने विश्वासों और मपनी मायनामों पा समाज पर पारोपित करने का प्रयत्न रहता है। पमार्षमाद के नाम पर सवत और सशक्त बसाकार द्वारा विकृतियों का मारोपण समान के लिए माफी खतरनाक साबित हो समता है क्योंकि इस प्रकार के साहित्य पर शासन राकानून मना कर कोई रोक नहीं मगाई जा सकती जबकि प्रपम कोटि क साहित्य पर राप मगाना सम्भव है। इस दूसरे रप्टिकोण के साहित्य पर केवल सामागिर पेसना हो अपना प्रतिबन्य सगा सकती है। समान गिरोपी विकति के बाद दूसरा स्थान मनुष्य के अन्दर पाली स्वाभाविप और समाज से सम्पर विकति का मावा है। इम विसति पो मदि हम प्रवृत्ति का माम दे सके तो मषिष पन्छा होगा। हम सब अधिकांग-रूप में प्रसम्पद मौर विपास से मोरते हैं मोर माम मरते हैं । साधारण मनुप्य मम सभी एषान्त में बैठार सोपता हे वो वस-पाप मिनट में ही सेकड़ा विमार उसके मन में भारर निगम मात है जिनमें कोई सारसम्म महीं जिनका एम-दूसरे से मोई सम्बन्ध नहीं हाता । दस-याच मामी सव भी सामाजिक टा से एक स्थान पर बैठ कर वासे परखे हैं उम समप मो वह न माने कितने विषयो पर मो एक-दूसरे से बिम्युम प्रसम्बर है, गार्मे करते हैं। मेरा तो कुछ ऐसा मनुमब है कि ऐपलावद सोपना बात करना या काम करना यह सप पेतन मौर रिपमित्र मानव पुष परियम के साप ही कर पाता है, बामाविक रूप से उममा विपार और कर्म विरागस है। मानव की इस स्वाभाविक प्रवृत्ति ने यथार्पवार माम पर पता क्षेत्र में प्रवेग पिया और इसका प्रथम प्रदर्शन मास में चित्रकला में हुमा । यह चो Sur Realism (प्रति-यथार्यबार) दुनिया में फैला उसकी ब इमी प्रवृति में हैं। पौर यही यपार्पवाद साहित्य में प्रारम्भ में प्रयोगवाये नाम से प्रविष्ट हमा यद्यपि या में इसके नाम मासते गए हैं और पार भी बदनसे रहते हैं । यह ययार्पबाद सबस प्रपिट पविता में पिता है स्यादि कविता पुस मावना पी पीर होती है । लेकिन महानी पौर उसम्पास ।

पाहित्य की मान्यताएं हमाय होते हैं इसलिए इनमें प्रयमकोटि का मौन विवतिया से युक) पार्षगाव तो बड़ी भासानी से मा पाया पर दूसरी कोटि के याबाद को अपने में सन्निहित करने के लिए इन्हें अपना रूप पदमना पड़ा। गि, हम अंग्रेजी में स्केप पोर रिपोरि कहते हैं, इस दूसरी कोटि के मपापंवार को ग्रहण करने के प्रम्छे माध्यम समझे गए पोर पान विस्व- साहित्य में उपन्यास मोर कहानी इन्हीं रिपाषाओं और सेवों के विरसित स्मों में मिसे जा रहे है। यहाँ हमें यह भी समझ मेना है कि यह मिलवा वेकिक है, समाज की रचना रक्षणावर विचारों और कर्मों के प्राधार पर ही हो सकी है। प्रयोगवाए प्रपया किसी भी नाम वासे मषीनपारा बासा साहित्य को पाय परिकार में सिसा गा रहा है, गरूप से व्यक्तिगत है, अन साधारण में इस प्रसार के साहिय की मांग नहीं है और हो भी नहीं समासी । मनुष्य स्पर्म बाहे जितने नियस दर से सोरे भरमा धर्म परे दुसर्ये से यह यद्धमाबत विचार मोर पर्म की ही अपेक्षा रखा है। श्रेष्ठ कला मानसिक सन्तुमन पर ही पापारित होती है क्योंकि यह मानसिक संतुमन सामाषिक भयमय दे मोर साहित्य का ग्रहण करने पासा समान होता है। यहां संतुलन पा प्रमार है वहाँ मना र मिसना पसम्मर है। मैं यह मानता हूँ जि संतुलन की ठीक-ठीक परिमापा नहीं पीना सपती संतुमन के माप-शा भी नहीं निर्धारित किये गा माते। हमारी निति मान्यताओं के अनुसार कमीनभी जा पमन्तुलन रिम्नवा है, वही वास्तव में नपित संतुमन हो मस्सा है बोलि समम मौर परिस्थितिक मनुसार समान के म पदसने के समान में प्रमतुमन पाता हवा है, लेकिन उस प्रसतुसन को समान संतुसन समझ कर उससे पिपता रहता है। संतुसन समझे जाने वाले उस प्रसतुमन पो तोड़कर बास्तविक संतुसन स्थापित करने बामे गाहित्यकार, मेता विपारस पपरा पम्म पुरय प्रारम्भ में पसंतुसन के पाप के भागी पहनाया गरते हैं। पर में पूछा है कि इस प्रकार के मोनिक दिपारस प्रौर प्रप्टा साहित्यमार युग में होते ही सिने है मो युग को पाय को मार समें? पपिनश में माहिपगार अन्य फमाकारों की भांति भावना मा म्योपार करने गाने प्राणी होते हैं और भावना के म्यवयाय में मादिग्पारों को समान की प्राप्तित मान्यताओं का ही सहारा लेना पड़ता है। पाने को प्रप्टा प्रपया समान पर नेता पदने दाता गाहित्पर पुनिया का पोमा देवा है पीर पपिपास में अपने को पोगा देता है। ५. - पचापाद मौर मादर्शवाद । पपार्षवार मी अपनी निमी सीमाएं हैं। इन सीमामों को तोरने वामा साहित्य सामाजिक माम्पता नहीं प्राप्त कर माता यह घर सस्य है। वैसे दुनिया में जो कुछ भी सित बावा है वह सब सत्य है, वह मव यपाप है, जो महीं है उसरी हम कम्पना ही नहीं कर सकते क्योंकि कल्पना प्रन्सर्मत नो कुछ पा सकता है वह सम हमारे सामने मौजूद है । पर हमारे सामने निवना सत्य और यपाप हे यह सब मा सब सो मुनार नहीं है। ममा का उद्देश्य सुन्दरता का समन है, कुरूपता का सृजन नहीं है। सुन्दरता और पुम्पता की मान्यताएं समान द्वारा निर्धारित की गयी है-यह मैं मानता हूँ पर समाज ने यह माम्यवाएँ पक्तियों से ही तो पहण की है। यफि ममय और परिस्पिति के योग से समार पनता है। समय पौर परिस्मिति परिवर्तनशील संशाएँ है पर पति मपरिवर्तन पीस पौर प्रथा है। यहाँ मेरा प्रयोयन व्यक्ति के वन मोर भावनात्मा सस्व से है उसमे शारीरिक अपना मौतिक तत्व से नहीं है। साहित्य की पुरूपता प्रपमा सुम्दता सामामिक पास मोर परिस्थिति से ऊपर उठ पर पति के अन्दर सुम्परता और कुस्पता भी पमिम्पति करती है। कुरूपता से युक पथावा कुछ पो से समय लिए कुछ पोरे से म्पक्तियों को मते ही प्रभावित कर मरे पर उसे मानव समुदाय सके मिए रिमी भी हालत में स्वीकार नहीं करेगा। प्रादाबाय सामामिक सत्य है, यमार्यबाद धैयमि सत्य है । म्पति के विस्मय के साप विश्वास पीर प्रतिवन्प से युक्त समारपी मान्यताएं बरमती रहती है और इममि इस सामागिर सरप कर रूप मगातार मना रहता है। 'रामा घिर है किसी समय यह एक बहुत बड़ा सामाजिक सत्य था। सेपिन पास यह सत्य मोप हो गपा-रामवन्त्र टूटते गए और उनका स्थान समतपत्रों मे से लिया है। प्रतिम्पमिनारी पाहो पोर कर पति मरे पूजा परना हरेक पवित्रता स्त्री का धर्म है किसी ममप का पह सामाजिक सस्प प्रौर लिया के उत्पीड़न और शोपण गेम्प में ही पिता है। मावाद ममय और परिस्मिति से सामनस्य महीं स्पापित पर पाता, उमपी मान्यताएँ अपरिवर्तनशील और कठोर होती हैं। में पार्यवार को बह पाया सुममता(बोमात पार परिम्पिति ये अनुमामिन है। मयागा अपनी प्रेरणा समान से म प्रहण पग्मे मानव को प्रापारमूल प्रवृत्तियों से ग्रहण करता है। पयार्पवार म्ययम् में मान्यताप्रा को निर्णारित नहीं करता-मान्यतामों को निर्धारित परमे का पाम पात्रों ने पम्मर्गत पाता है जो मौदिर है, पयागाद माग्यतामों साहित्य को मान्यताएं को निर्धारित करने वाले चेतन प्रचुर मार भावनामय मानव में संवेदन पी सृष्टि करता है जो मारनारमा प्रक्रिया है। मैं पादर्शबाद पीर मपार्पबाद में केवल इतना भव देखता हूँ । साहित्य पौर मला का भाग होने पारण पादर्शवाद और यपार्पवाद दोनों में ही कुरूपता को मोई स्पान महीं प्रसद् और प्रकस्याण से दोनों ही परे हैं । वस्तुस प्ररपेर सपार्षवाद में मानव की उदात्त भावना का समावेश होना चाहिये क्योंकि इसी उवाप्त मावना में सदमीर नस्यारण है पौर प्रत्येक भादर्शबाद में सहनशीलता होनी चाहिये शाश्वत सस्प मौर मान्यतामों पर ही उसपी स्थापना होनी पाहिये।

छठा परिच्छेद भाव और भावना प्रत्येर साहित्य में एष भावना रहती है, प्रत्येक साहिय में एर भाव होता है । भाव और भावना दो मतग-ममग वस्तुएँ हैं पौर माव वषा भावना के अन्तर को समझ सेने से हमें साहित्य के मूल्योगन में बहुत बड़ी सहायता मिसेगी। जिसे हम भाव महते हैं उसका पापार भावना में है लेकिन भाव की भावना से पूपर प्रपनी निगी पर संहा है। भावना पौर बुद्धि के योग से भाव का चम्म होता है और इसलिए यदि हम भाव को भावना मा पीरिक स्म पहें तो मनुपित म होगा। वहाँ भावना विशुद्ध वैयक्तिक उपकरण है वहाँ माव बौद्धिक होने के कारण सामाजिक उपररण बन गया है। भावना हमारी म्पतिगत चीन है, पुटिने क्षेत्र के बाहर । शुस पौटिन प्रक्रिया से हम भावना को म्यक नहीं पर सबसे । बुधि के दाग हम भावना को गोप देते हैं, वह भाव महलाता है। भावना वैयक्तिक होने के पारण भागन-प्रदान के बाहर की पीग है, भाव सामाणिक होने के कारण मान-पान से युक्त है। भावना रो माव का रूप देवर ही पसा में प्पक च्यिा या समया है। पर यहां हम इस घाव की उपेक्षा नहीं पर सबसे कि ममामा माघारमून वस्त्र भावना है, भाव महीं । वैसे बोरिक होने के नाते मसाकार मभीकमी भावना का साय एकर म छोड़ देता है। यहीं कसाकार मी सबसे बड़ी कमजोरी हमारे मामने प्राती है। अपनी इस बात में समझता हूँ मुझे पोर पषिम स्पष्ट करना चाहिये क्योंकि ममा पार साहित्य के सही मूल्पोनन में इस दोपमा हमें मार-चार सामना करना पड़ता है। माय' यह समझा जाता है कि उन्च साहित्य यह है जिसमें पिटी प्रकार का दर्शन हो । बुधपाचारय प्रामोचकों ने साहित्य के इस दानिर पटर पर फापो गोर Pिया है। प्राग साहित्यकारों में यह परम्परा-मी चन गपी हेरि साहित्य में मोईन पोई दर्सन वे प्रतिपादित करें। यर्तमान ग्राहित्य का यह दार्शनिम पा भावारमा है-भावनारमा मर्ग है मुझे तो पुष ऐमा मगठा है। यहां यह भी ध्यान में रखना पड़ेगा निप्ररपेट ।

साहित्य की मान्यताएं पशन के पीछे उस म्पति की भावना है जिसने उस वर्शन को प्रतिपादित किया है। तर्फ प्रौर एशि का एक स्प होता है, एक कम होता है, भावना के ममेर रूप पौर कम हुमा करते हैं। इसलिए प्रत्येक दर्गम भावनारमक होता हे पौर सम्मवत यही मासा हे कि पाश्चात्य मातोचपर्ने मे साहित्य के दार्शनिक पक्ष मो इतनी मथिप महत्ता दी है। मेकिन दर्शन स्वयम् में भावनात्मम होते हुए साहित्य में प्राप' भावारमा स्म से ही प्राप्ता है। प्रपा का फर्मवाद बुर का प्राचारवाद मार्स मा समावबाद यह नितने वाद है ये सब मून प्रणेसामों द्वारा सनी मामना से ही बमे हैं। पर मागे पसार इन भावमात्मक पारोंगा बौद्धिक-रूप ही पन-सापारगा के लिए रह गया और इन पादों के समर्थकों मे इन दर्शनों को पौरिक मार्यों के म्प में ग्रहण किया तथा प्रतिपादित किया। मौर फिर भी भावनारमय साहित्य में वर्धम को मो इतनी महत्ता दी गई है, उसका कोई कारण सो होना ही चाहिये। यह दान भाव स्प में ही पपियाप्त मप में हमारे सामने प्राता है, फिर भी साहित्यकार रा पर्सन मो अपनी मेसिनी द्वारा भावमास्मन बना देता है प्रम्पपा साहित्यकार प्रसफल है। इस म्पान पर अच्छी तरह समझ ना पड़ेगा कि भावको भावना बना देने पर साहित्यकार र कम क्या होता है। माहिस्य या मसा को प्राणवान बनाता है कलाकार या साहित्यकार फे पजिया कसा और माहिस्प में निक्षेप प्रत्येप्रागगवान् पौर सफल साहिय में साहित्यकार का यह व्यकिय मूर्त होता है। यह ग्यचिस्व साहित्यपार मे सीवनमा प्रमित माग होने कारण उसके कतिरव का भी महत्वपूर्ण भाग हुमा करता है । साहित्यनार के कृतित्व में उस व्यक्तित्व की मियामीमठा शरीर मी म होफर उसके मन की होती है। हमारा प्टिकोण हमारे विश्वास हमारी अभिरपि । यह सब हमारे म्पचिव मा निर्माण रखे हैं। प्रौर यह दृष्टिकोण प्रमिाथि एवं विश्वास मामानिम उपारण न होरर मेपछिक उपारण हुमा करते हैं, यहां यह भी स्पष्ट कर देना उपित होगा कि यह दृष्टिकोण पभिरवि पौर विश्वास तां मौर विशेष के माहर के है-यह पुदम्ण ये भावनारगर है। और सब तो मह है कि हमारे वर्क और युटि भी एही भावनात्मक अभिनि रप्टिकोण एवं विश्वामा से प्रभावितहमा करते हैं। हम पिसी भी साहित्पार की रमना पाते समय उसमें किसी विप दन को महीं दूरसे पार न रचना रा हम कोई धाम्रीय मान पाना चाहते ६। सामाणिक माम्पठामों का प्रतिपादन साहित्य क्षेत्र नहीं है, हम ।

भाव और मावना वा साहिल्यावर मी रमना मानन्द प्राप्त करने के लिए पड़ते हैं, और हमें पानन्द मिसता है उस साहित्पार की भावना में बो वराबर हमारे मन को पुनपिस कर देती है। प्रानन्द को ग्रहण परने वाता मन होता है, मुद्धि नहीं होती। भावनारमक होने के कारण साहित्य मन पर प्रभाव गसता है, बुद्धि पर नहीं । पर इसके ये प्रर्प महीं मि मावनारमा माहिस्प बुटि के क्षेत्रसे वित्तुन बाहर है। वि स्वयम् भावना से प्रभावित हुमा करती है-इस सत्य की उपेक्षा हम किस प्रकार कर सकते हैं ? मावनात्मक साहिपमा प्रभाव दूसरों की बुद्धि पर उनके मन में माध्यम से परता है। मेकिन मूम ध्येय माहित्य मा मन मो प्रमावित करता है। और यौषि प्राणी होने से माते हम प्रत्येक पग पर बुद्धिमी महसा को स्वीकार करते हैं। ऐसी हासत में वह साहित्य महान् बहा मा सकता है जिसमें उस साहित्यमा प्रभाव मन पर इस हद तर पो कि मन मुटि को वादारम पर से। पौर महत्ता यहाँ मन को ही मिलेगी बुद्धि को महीं मिलेगी। हम तुतमीसमें साहित्य से प्रभावित होते हैं उनके रिसी दान के कारण नहीं । सुनसीस ना साहित्य पड़ते समय हम दर्शन शास्त्र विज्ञान प्रादि यौविस उपकरणों को अनुमव ही नहीं करते हम सो तुमसीदास की भावना में अपने को यो देते हैं। कानिनमा पभिमान पामुम्तम रघुवंश प्रयवा मेषदूत हम मान प्राप्ति के लिए महीं पढ़ते और न हम इन ग्रंथों में गौरिकता प्राप्त करने मी पाशा ही मरते हैं, हम तो मालिदासपी भावना से अपने मन्दर भावनारमर एकरसता का मानन्द करना चाहते हैं। पासिदास शेषमपियर होमर-इन विश्वविन्यास मारियों में मौयिकता और अनुमबगनित ज्ञान की प्रचुरता अवश्य मिलेंगे पर यह मनुभव शान पड़ने वाले की भावना के माध्यम से प्राप्त होते हैं। मावारमा साहित्य प्रागन नवीन बौद्धिक युग मी अग नहीं है, प्रनालिकात से इस प्रसारमा साहित्य सिता गया है। मापनामा भाव में परिणत हो गाना यह वोलि प्रदिया है, पौर प्रनापिास से मनुप्य बौषि विकास के कम में रख रहा है। बरे-बड़े पापार्यों मे जिनमें मोटिसा प्रपान रही है, भाव रे सम्मष में न जाने पिठना महा है और सिमा है । साहित्य में और कमा में उन्होंने भाव को प्रपानसा दी हेमोमि पपनी विद्वता पौर अपने ज्ञान र प्रविनय प्रमाव मदे मया का पमनी सटीक तरह से नहीं देप पाए। फिर सामागिर नपरगा हाने कपारण माव हमारे जीवन का महत्वपूर्ण प्रवयव भी रन गाया ६२ साहित्य की मान्यताएं गए हैं। लेकिन यह कोई कैसे कह सकता है कि पमित व्यावसायिक पम से सर्वथा मुक्त है? जैसा मैं पहले निवेदन कर पुका हूँ केवम मनीपी और सामा-या फिर जिन्हें हम प्रषं पागात या दीवामा कह सकते हैं, मेकिन इन्हें में सापकों में गिमता है-इस म्यावसायिक पा से मुक्त रहते हैं। माकी सम सोग इनमें में हरेफ गर्ग पार हरेक समाव के पति को सम्मिमित समझता हूँ अपने श्रम को अपनी प्रतिमा को और भपनी क्षमता को मामीविका के लिए क्रय करते हैं। मामा के साप -साहित्य को फसा के रूप में ही देखा जाय-प्रमादि कास से उममा मावसायिक पा रहा है, मार मार क्ता के इस व्यावसायिक पक्षका प्रतिनिधित्व करता है। वेसे भावात्मक साहित्य मनादि काल से रहा है, मेकिन इस मावारमक माहित्य को सामामिक महत्व घेवन रूप में मतमाम समापनादी व्यसम्पा द्वारा ही दिया गया है तथा इस भावात्मक साहित्य को प्रमुख म्म से प्रोत्साहित किया गया है। समाजवादी मान्यतामों ने साहित्य के मान पा को ही साहित्य का एकमात्र पक्ष माना है। भावना पक्ष तो इस समाबवावी व्यवस्था द्वारा प्रस्वीकार भौर भमाम्य कर दिया गया है। पौर शासन के भाषीन समस्त सामाजिक शकिमा गाने के कारण इस मावात्मक साहित्य की धारा मी एकामी और सीमित हो मयी है। व्यावसायिक होमे के नाते ममा स्वभाषत उपयोगिता के नियमों से बय पाती है। मतमेद इस पर हो सकता है कि क्या उपयोगी है और क्या उपयोगी महीं है। यही नहीं कुछ पीनें जो कुछ मोगों के लिए उपयोगी हो गाती हैं, दूसरें के मिए वही अनुपयोगी सरें। फिर उपयोगिता की सामाजिक मान्यता भी काम मोर परिस्थिति के अनुसार तरह अवमती रहती है। सामंतवादी युग में कमा की यह उपयोगिता कलाकारों को प्रायय और मागीविका प्रधान परने माने सामन्तों के मनोरंजन में सीमित पी बनवादी पुग मह उपयोगिता ममता के मनोरंजन में मा गयी । विस समय मुमसे किसी माटन-मममी का मामिक एक नाटय लिखने को कहता है उस समय मुझे उस माटर की लोकप्रियता का प्यान रखना मनिवार्य हो पाता है क्योकि नाटक मण्डली का मासिक पावसायिक रूप से माटम की सफलता पाइसा है। वह मुझे समय की षिमा ध्यान रखते हुए नाटक का विषय यठमाता है, उसके पास किस प्रकार के पमिनेता है, और उन भभिनेतामा के मोन फोन स पुण हैं जिनका प्रदर्शन किया था सकता है इसकी सूचमा मुझे -- कमा और भाष और भावना ६३ देता है । इस प्रकार यो नाटक उसके लिए मैं लिखता हूँ यह उपयोगिता वाद के नियमा से या होता है। रेडियो में भी विषय देकर नाटक सिखाए जाते हैं, कहानियां सिखाई माती हैं, निवप लिसाए माते हैं। यहाँ भी उपयोगितावाद मा पहम् हो हमारे सामने रहता है। यही नहीं इस व्यावसायिक युग में भावनात्मक रूप से किसी मास के प्रति अनुरकि पौर सगाव पैदा करने के लिए कविताएं वपा कहानियाँ सिम्बाई याती है । इस प्रकार उपयोगितावाद पमा पौर साहिप का महत्वपूर्ण मंग बनता जा रहा है । यह स्पायसायिक उपयोगितामा समामबादी म्यवस्था में तो सबसे अधिक प्रबस मीर स्पष्ट हो गया है। समाजवावी उपयोगितावार में मला का मनोरंजन-पास फेवात साधन रेम में स्वीकार किया गाता है, उसे साम्य माना ही महीं जाता। समाजवादी व्यवस्था हित्य का साम्य है घासम म्यवस्था द्वारा मान्य जन-कस्पाए और समार-निर्माण का कार्य। पर जिसे हम प्रमर साहित्य कहते हैं वह भावात्मा साहित्म नहीं भावनात्मक साहित्य ही हो सकता है। जहाँ भावारमा साहित्य में साहित्यकार दूसरों की भावना को समाता है, उस भावना को भाव के म्प में प्रहण करके उसे प्रतिपारित करता है यहाँ भावनारमा साहित्य में साहित्यकार प्रपनी भावना मो मूर्त करता है। मेरा कुछ ऐसा मत है कि फेवन भावनात्मक साहिप ही समनारमा साहित्य कहलाने की पति रम्मता है, मावात्मा साहित्य प्रषिकांश में प्रचारात्मक साहित्य की कमनोरो से प्रस्त हुमा करता है। इस स्थान पर 'प्रबार घर का उसके म्यापन भर्य में प्रयोग पर रहा है। इस 'प्रपार' सम्म को मैं उदाहरण दे कर ही समझा सकता हूँ और यह में प्रागे कगा। एजनारमा साहित्पार पी रपना हम साहित्यारम्पतिय से प्रमाणित हार पहवे हैं, हम उस रचना में पियो प्रकार के दसन पिसी प्रकार का मान या पिसी विशिष्ट भाष को उपलब्धि नहीं लते। तुममादाम ने किसी विशेष वर्णन को नहीं प्रतिपादित किया है, न हम गिन्सी सामाजिक मा यता मा जान प्राप्त करने के लिए तुनमीदाममा साहित्य पाते हैं। हम तुसमीदाग का साहित्य केवल इससिए पाते हैं कि वह साहित्य तुममीदाम द्वारा मिना गया है, उगमें तुमसीदास ने अपनी भावना स पाठायो विमार करने का प्रयत्न किया है। हम उस साहिप को पड़ते ममप तुमसोगरा कम्पनिस प्रभावित होते हैं। उस म्पत्तिय का स्पान्तर तुमसीदाम को भावना ही है, भाव नहीं है । तुममीरास साहित्य की मान्यताएं ने किसी भाव को अपनाया है-सेकिन उस भाव मे तुलसीदास को भावना से तादारम्प स्थापित र निमा है । स्रष्टा साहित्यकार में प्रधान होती है भावना भाव प्रधान नहीं होता। मावात्मक साहित्य में प्रधान होता है कोई रिशिष्ट भाव साहित्यकार का स्थान वहाँ नगप्प-सा माना जाता है। मान में एक फिल्म कम्पनी दानी कर्ण पर एक फिल्म बनवाना पाहती है । इस फिम की कहानी मिसने का माम किसी योम्म साहित्यपार को सौंपा जाता है। दस-पाच साहित्यकारों से बात करके जिससे स्सए पैसे की पात हुई उसी को इस कहानी को लिसने का काम सौप दिया गया । सो इस स्पाम पर विपय प्रभवा भाव प्रमुख है, कौन साहित्यकार इस कहानी को सिखता है इसकी अधिक महत्ता नहीं है । इसी तरह मान में कि मासरा नंगस या मण विकास योजनार्मों पर सरकारी प्रभार के लिए परकार कोई उपन्यास सिमाना चाहती है जिससे मनता पा मामनारमक सहयोग इन कार्मों में सरकार को मिस सके । इस उपन्यास को सिमने के लिए पस उपम्यासकारों से बात की पाठी है और एक से सौदा पट जाता है। यह साहित्यकार उपन्यास मिमता है और उपन्यास गापार में प्रा पाता है। यहाँ भी प्रधानता माव को मिप्ती साहित्यकार के म्यजिम्प को गौरा स्मान ही प्राप्त हो सका। पर इसम यह मर्प नहीं कि कर्ण पर मिसा माने वाला माटक या मान्परा मंगल से सम्बधित ये शुद्ध रूप से प्रचारात्मक ही होंगे समारमा प्रैप ये किसी हासत में हो ही नहीं सकते । मेरा तो कुम ऐसा मय है कि प्रत्येक प्रचारात्मक साहित्य सुमनारमक हो गया है मदि भाव मेखक में मावना का प धारण कर से पर्थात् विषय में पीर सेवक में तादात्म्म स्पापित हो जाय । मह जो संसों मे पौराणिक मास्थानों प्रमवा उपास्यानों पर अमर रचनाएं मिली है वहाँ विपप में पौर पनि में तादाम्प स्पापित हो गया है, वहाँ भाव ने मेसक में भागमा का रूप ग्रहण कर लिया है। मपिकास में यह देखा जाता है कि मावनारमक याहिप काल पौर परिस्थिति की सीमा से मुक होता है। मनुष्य की भावना मनादि मौर प्रमन्त है। यह भावना स्वयम् में कास पोर परिस्थिति की सीमा से मुक है। वहीं भावारमर साहित्य पाल पोर परिस्पिति की सीमा न बमा हमा होता है। में हो साहित्य नै लप्टना पौर उसके सामने की माप इसमें माम भार मावना इसमें ऐसता हूँ कि साहित्य मावात्मक हे अपवा भावनात्मक हे । नेसा कि में पहस ही निवेदन पर दुका हूँ। माव के साप मालाकार को भावनात्मक वात्म्य ही मसा को समनारमर पोर ससम मना सकता है। हरेक मन्सा की मासि साहित्य भी भाजीविका का साधन हुमा करवा है, इस सत्य को स्वीकार कर मेमे में किसी को भापति मया हो सकती है और क्यों हो समसी हे--यह मेरी समझ में नहीं पाता। यही नहीं साहिय का उद्देश्य मान नहीं है, मनोरंचन हे यह मी धूम सत्य है। म दोनों बातों को जोड़ देने के बाद में भावात्मक साहित्य मी उपक्षा महीं कर सकता यह मावारमक साहित्य उस साहित्य से निम्न मप्ले ही हो मिसे हम मुमनारममा भपमा भावनात्मक साझिय कहते हैं। मैं तो यहाँ तक रहने को तैयार हूँ कि साहित्य की जितनी भी मान्यवाएँ स्थापित की जा सकती हैं यह सब इस मावारमक साहित्य के यस पर, भावनारमफ साहित्य के प्रापार पर महीं। पस स्थान पर यदि में कई कि में साहित्यकारों को सीन घेरियों में विभक्त कर सकता हूँबनारमा साहित्यकार, पवसायिक साहित्यकार पौर शौकिमा साहित्यकार, तो इस गर्मीकरण से भावात्मक साहित्य मोर भावनात्मक साहित्य के मूस्पोकन में हमें परी सहायता मिलेगी। सप्टा साहित्यकार साहित्य की स्थापित मान्यतामों के प्रति उदासीन हुपा रखा है। यह सो एक मसात शक्ति मौर प्रेरणा के रूप में माता है, जन-सपि का अनुसरण म करके वह स्वर्व मन-मधि को एक मवीन पारा प्रदान करता है और दूसरों के मनोरजन फा दास म होकर वह दूसरों द्वारा अपने मनोरंजन को स्वीकृति कराने की क्षमता रखता है। पर यह सप्टा साहिपकार साहित्य के क्षेत्र में नियम म होकर अपवाद हमा करता है। एक युग में या दो बार पुगों में एक या दो इस प्रकार में सप्य ममातार होते हैं जो भमर पहना सके। यह सोग स्थापिस मान्यताओं के अनुसार महीं बसते पस्कि नगीन मान्यताओं और परम्परागों की स्थापना पर हैं। दूसरी कोटि में प्यवसायिक साहिपकार पाते हैं। यह उन साहिपकारों पा बर्य है गो भागोरिया के लिए अपने साहित्य पर निर्भर रहते हैं। पानीविष प्रा करने के लिए इसके साहिस पार इमकी पसा मो समय की मांग के नियमों में बँधमा पाता है। पक्तिगत रूप से मैं साहित्य पी मान्यताओं पर स्थापनापों को इन्हीं लोगों में पाता हूँ क्योकि यह स्विनी स्पापनाएं पीर मान्यताएँ हैं वह सब पमा प्रपया साहित्य भी 1 साहित्य की मान्यताएं क्षमता और उपयोगिता के प्राधार पर बनी है। यदि यह मोग कमा प्रयमा साहित्य की स्पापित मान्यतामों के विषय पर्ने सो यह साहित्यकार ममता की दृष्टि में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते मौर इस प्रकार यह प्रपनी मागीविका के उपार्जन में मसफल होंगे। सीसरी कोटि शोकिया साहित्यारों की है। यह पौकिया साहित्यकार अनादिकाम से रहे हैं। प्राचीन कास में रागा मौर राईस चौक से कविताएँ लिमते प यही नहीं बनता में भी कुष मनचसे लोग कविताएँ सिस मेवे पे मेकिन इन लोगों का उद्देश्य बीविकोपार्मन कमी नहीं रहा । शिक्षा और सम्पन्नता के साथ भार के युग में सोकिया साहित्यकारों की संस्पा मेव्हाचा पर गई है। इस पौकिया साहित्यकारों में प्रान्तरिक प्रेरणा होती है, इससे इनकार नहीं किया गा सकता और इनमें से कुछ के पास प्रतिमा भी होती है। इनकी ममा मा उद्देश्य मानीषिका नहीं है इससिए इनमा साहित्य अधिकार में मावमारमक होता है, भावारमक नहीं। लेकिन वहीं बिना प्रतिबन्ध के और इस प्रकार के साहित्यकारों में मिष्ठा के प्रभाव से यह भावनात्मक साहित्य प्ररामकता की सीमा में पहुँच गाया है । इन साहित्पनरों का जीवन विभिन्न पारामों में मटा हमा होता है इसमिए पह साहित्य मी सापमा कर ही नहीं पाते ऐसी हासत में चौकिमा साहित्यकारों की कृतियों में संयम मोर गम्भीरता का प्रभाव होना स्वाभाविक है। सम-सामपिक पाहित्य की प्रासोपनामों पौर प्ररयासोपनापों में अपर मुघ दिनों से इन पौकिया साहित्यकारो का यह वमा हाम रहा है। लेकिन इन सोगों की मान्यतामों में पौर स्पापनामों में स्थापित का अमाव है क्योंकि सीक स्वयम् में प्रस्थापी होते हैं। इसके पनामा मह पोनिन्या साहित्य धोरीम साहित्यकारों तक सीमित रह जाता है, मन सापारण में यह प्रपना स्पान नहीं बना पाता। साहित्य मी मान्यतामों पर विचार करते समय में भावनारमा तपा समसायिक साहित्य को ही अपने सामने रखता है। मावास्मा साहिप साहित्यकार की भावना के धावारम्प से प्रमर साहित्य बम साया हे इसके अनगिनती उपाहरप मेरे सामने हैं। 'राम' एक भाव का प्रतीक है जिसे बास्मीकि ने प्रथम बार साहित्य में समाविष्ट किया था। राम को मेपर भवमूति ने उत्तर रामचरित को रखना जो मरमूति भावमारमक वाारम्प से प्रमर साहित्प बन गया। उसी यम को लेकर तुलसीदास ने ।

६७ माव और भावना रामपरित मानस को रपना पी यो हिन्दी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ ग्रंप मामा नावा हे प्रौर भमरता प्राप्त कर चुका है। विगुट भावारमक साहित्य प्रभिक दिनो तक मीमित नहीं रहता और यह भी नहीं सकता। यह गितना रीतिकासीन साहित्य है-मसशिस नायिका मेदजनमें परियों की भावना दी मपेक्षा उनके पाणिस्य की प्रपुरता हे और पाष्टिय सपा कौशल के यम पर कुछ समय के लिए तो अवस्य इस प्रकार मा साहित्य पमा सेकिन भावना के प्रभाव से यह साहित्य धीरे-धीरे मिटता जा रहा है। केसवास को रामपन्द्रिका मिसारीवास का काम्य निर्णय-प्राधिस्य के इतने महान् ग्रंप भी नवीन युग में बहुट पीछे पड़ गए हैं, पर इस प्रकार का साहित्य अपने समय ही नहीं वरन् पीड़िों तक रुमि के साप पड़ा गया यही क्या कम है।

सावाँ परिच्छेद साहित्य का भादि-रूप---कविता पसा मानव की प्रादि-प्रवृत्ति है, मेकिन कसा का वर्गीकरण सपा उसमा विरसेपण मानर के दौतिक विकास के साथ ही हो सका है। पौर इसीमिए परिष्कार का नियम बो योटिक विकास काही एक अंग है, पसा के वर्गीपणा में स्पष्ट-स्म से दिखता है। साहित्य की माम्पछामों के विवेपन में में पहले ही स्पष्ट कर पुका हूँ कि भावना को शव वहन नहीं कमा परन् गति वहन करती है। इस गति का सबसे स्पप्ट पौर मुबोष-स्म हे मय । इस मप के माधार पर टीम कासाओं का बम हुमा एघा मेरा मत है । यह तीन पलाएँ हैं--- संगीत मुत्य और पमिता। पविकसित मपया जिसे हम पारिम समाप कहते हैं, उसमें भाग मी मृत्य और संगीत प्रपुर मात्रा में मोप है यद्यपि कविता माम की कोई पीर उस समान में है यह कहना कठिन है। अनुसरण करना बेसा दूसरे परते हैं पेसा करना~यह मानव पी मारि प्रवृत्ति है। पम्मा में नास बनाने की स्वाभाविक प्रमृत्ति प्हवी है मौर इसभिए में पमिनय को मनुष्य की पादि प्रवृत्ति माना है। मृत्य गति और प्रमिनम के सोग से मना है। मृत्य प्रमुखत गति में सीमित है, पोर इसलिए प्रस्पन्स पविकसित मुमार में भी नृस्प मोपुर है। मृत्य में पमिनय गो गम्मिलित करके उसे पला का माम दिया गया है। पौर इसी लिए में मृत्य को सबसे प्राचीन समझना । पनु-पक्षी भी नृत्य करते है। मपुर के मुत्य को हो हम लोग जानते ही हैं। मिसाए गाने पर पम्प पशु भी मनुष्य की वोटिक परम्परा के अनुसार पमिमय पर साते हैं। मनुष्य की इस मापार मूल प्रवृधि सय मे सर के साप संगीतको मम्म दिया। यह संगीत प्रमुफ्त स्वरश्रपान होता है, पर मनुष्य के गोषिक प्राणी होने के भरण स्वर समावट शम का रूप पारण कर सेता हे पोर इसलिए संगीत के साप चार मनिवार्य न होते हुए भी परमन्त महत्वपूर्ण है। मनुष्य में सरप माम्पम पम है। स्वर को सप समाबत साम सर को मय हो जाती ।म मानिक नियम के अनुसार ही पविणामा जन्म हुमा ।

- । -- - साहित्य का मावि-स्म-कविता पौर इसी मिए मेरा मत है कि साहित्य का प्रादि स्म कविता है और पविता का प्रावि-स्म गीत है। मायना अनादि है, बुदि सिरस की पीज है। साहित्प शन्द की कला है, अब पुदि का वाहक है। मनादि भावना पा मावि-स्प गीत ही हो सकता है। साहित्य के अन्य वर्ग मानव-युगि के विकास के साथ ही विकासित हए । पौर शायद इसी मिए हमें मारतीय करिता के प्रथम दर्शन सामवेद की भूधामों में ही होते हैं। पैसा में पहले निवेदन कर पुका हूँ मादि कसामों में नृत्य संगीत मौर कविता को मैं मानता है। यह तीनों कमाएँ मय के माधार पर विकसित हुई पर वौतिक विकास के साप मय का भी विकास होता गया। सामवेद कीमत्रों में लय वो है, पर उनमें छन्दों का स्म विकसित नहीं है। छन्द की घेखना हममें उस समय नहीं थी। इस स्थान पर मुझे पद की परिभाषा अनायास ही मिस गयी। सय की प्राति ही छन्द है, और यह मावृत्ति विशेष नियमों से येमा होती है यह सप को मासि नृत्य पौर संगीत में समान रूप से मौजूद है। वहाँ यह वास कहलाती है, कविता में उसे पद का नाम दे दिया गया है। भौर इसी लिए यहाँ सामवेद के मन्त्रों में कविता का बीजम्प मिसवाहे वहाँ याल्मीकि की रामायण में हमें मय की प्रावृत्ति से युक्त छन्द के प्रपम दर्शन होते हैं। सम्मवत बास्मीकि के लिए जो मादि कमि का विशेपण प्रपुर पिया गया है, उसका यही कारण है। पार के युग में परिसा के क्षेत्र में एम्दों मी महसा मा विरोध पघानक सड़ा हो गया है मौर कुछ पढ़े-निवे अध्यापक वर्ग के लोग भी इस विरोध में सम्मिसिस हैं। धन्दामा यह पिरोष मनुष्य में ममीनता के प्रति मासकि की पोतक प्रवृत्ति हो सकती है, पर इस विरोप को सिद्धान्त मी पत्र-छाया में प्रकट किया जा रहा है, यह दुर्भाग्य की बात है। यौतिक विकास में जय-सव बौशिक रामासा भी मा माया मरती है- पौर कविता में एन्दों के इस विरोम में यह बौद्धिक पराममता मुझे सप्टम्प से दिसती है। एफ मार नयी कविता के प्रतिनिधि-प्रध्यापक नेता वर्ग एक सग्जन मे मुझसे कहा पा 'यह एन-प्रावृत्ति के नियम में बंपने के कारण उपन (Hormonony) से मरो एकरसता के प्रतीर है । और इसलिए यह उबन से भरी एकरसता स्वयम् में कुम्प्पता है। हम इस पावृति की योमा पा तोहपर कविसा पो मुख करना चाहते हैं। पौर उन सम्पन पो प्रोमो में विवाद परमे मासे के विश्वासपी पमा मा गयी पी। - साहित्य की माम्मताएँ मैने पोड़ी देर तक उन सम्पम के कमन पर सोचा।क्या वास्तव में इस पात्ति में उबन से भरी एकरसता (Monotony) है? और अगर हे वो क्या मह एकरसता कुम है? उसके बाद मैंने उनसे एक प्रश्न पिया क्या माप मावृति की एकरसता को उगन से भरी हई मानते हैं ? पापमो माप्ति से मो शिकायत है, वह क्यों है ? में तो समस्या हूं कि इसी मावृत्ति में जीवन पा है, यही प्रावृत्ति हमारी स्थापना है। इस मावृति को घोड़ने में मुचि है, भापकी यह बात सही हो सकती है मेफिन बह मुफि मुत्युवासी मुति होगी। और कसा को मैं भीवन पर प्रतीक मानता हूँ, मृत्यु की नहीं। में पापी बाद ममम नहीं।" उन्होंने कुध भाक्ये हए कहा। उनके इस प्रकार भौंकने से मुझे हंसी मा गयी। मैने पब मपनी बात स्पष्ट की। 'देखिये पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा तीन सौ पैसठ दिन बार पाटे में करती है क्या इसमें प्रावृत्ति नहीं है ? दिन पोर रात का बारी पारी में माना गया इसमें भावृत्ति महीं है? यह जितने प्रह-उपग्रह है इनकी चाम प्रावृत्ति के नियमों से बंधी हुई है और इसी लिए यह स्पित हैं। यदि यह मह उपपद भापतिमा नियम तोहरें तो यह जितने यह उपग्रह है यह सब एक-दूसरे से टकरा मागे-पौर इसके बाद प्रसय की अवस्थामा बामगी। 'पही नहीं एक स्वस्थ भावमी अब पसवा हे वो क्या उसके पदम मपे हुए महीं पाते । बिस समय उसके पैर में नाबाहट मा पाप उसी समम उसमें मस्पस्पता का पोप होने मगता हे 1 और धागे बदिये हमारे व्यय की पमन भी इस भावृप्ति के नियम से बंधी हुई है, बस रोगी केवपापी महान में इस प्रावृत्ति का नियम भंग होता है। हमारे सब नाम मासिक नियों से रेपे हुए हैं, हमारा मस्तिष प्राप्ति के नियमों से बंधा है। कुछ प्रावृतियाँ हम देख पाते हैं मुष हम महीं दम पावे। पर इसलिए माप में पह भापति वियप पी भावना भाग पड़ी है, यह मेरी समझ में नहीं पाती।' यह सरबन मेरे इस पर से संतुष्ट तो नहीं हए क्योंकि वह इस धन्यहीन नवीन कविता के भावार्य एवं मेता है। अपने इस मैतस्य के पसमकान में रुपा गपानी में बह इतना प्रपिक म्पस्त है कि उन्हें एन्द सिसने के परिधम पा समय ही नहीं मिलता । सेपिम इस पविता प्रसंग मो उम्होंने यही बन्द कर दिया। एष दूसर सम्बन में गो नई विंग के प्रमुख पति है, छन्दों में साहित्य का प्रादि-रस-कविता शिरोप में एक दूसरी ही बात कही 'वर्मा भी प्रामकस को पद-नद गीत सिसे गाते हैं उनमें कविता नहीं के बराबर होती है । वही पिसे-पिटे मुहावरे, बही घिसी-पिटी उपमाएँ-उत्प्रेक्षाएँ । इसका कारण यह है कि हम कविता को पदपी सीमा में रोप देते हैं। मैने चनकी मात के सत्य को स्वीकार करते हुए कहा 'अधिकांश कविताओं के सम्बन्ध में प्रापका कपन ठीक है, लेकिन प्राप इसमें छन्द को कैसे दोप देते हैं ? मेकिन यह पवित्व क्या है ? निसे माप मौमिक पवित्व कहेंगे, वह तो बहुत कम मिलता है। विश्व की परिभाषा करना भी पड़ा मठिन है। प्रय माप मुझे यह बसाइये कि कविता को भाप स्म (Form) के मतगत मानते हैं या विपय (Substance) के मन्तंगत मानते हैं? 'मैं वो कविता को विषय के मन्वंगत मानता हूँ। यद्यपि कविता का कुछ भाग रूप (Form) रे मतगत पाता है। उन्होंने महा पपपि मुझे उनके इस कथन में कुछ उसमन के भाव स्पष्ट दिखे। 'यहीं में पाप से असहमत हूँ। मैमे उत्तर दिया। यहां तक विषय का सम्बग्ष है, दुनिया के दो प्रादमी किसी भी विषय की येष्ठता पर सहमत नहीं होंगे। बुध मोग गुमाय के फूल में रस दमे कुछ के मन में कुकुरमुत्ते को देसकर रस उपमेगा । कुछ लोग ग्योत्स्ना स्वप्न भौर इन्द्रधनुप में सौन्दर्य को पाते हैं, कुछ को सौन्दर्य मोरी रे कोरे पिसी की टोग सिगरेट के घुये में मिलता है। यरि विपय को ही पविता की कसौटी बना लिया जाय तो कविता और कमाक्षेत्र में एक भयानर प्रयाता फैममाएगी । मैं सो पेवस स्प (From) को करिता पर पापार मानता हूँ। "वो इसके ये प्रर्य हुए नि प्राप विपप को कोई महत्व नहीं देते।" उन्होंने मुंह बनाते हुए कहा। 'नहीं विपप पविता के क्षेत्र में महव महत्त्वपूर्ण है, मेसिन पमिता का पापार महीं है । जातिवास के काम्प में और पूरनवाने के सटके में विषय मा गो पन्तर हे उसे कोई मेस मूम सकता है ? विषय से पनुसार कविता की श्रेष्ठता प्रपया निकृष्टता प्रतिपादित होती है। यह ममर पाप है यह उत्कृस्ट कविता है, यह साधारण विमा है यह निप्ट पविता है, यह सदी बदबूदार बविता है-यह सब प्यान देते समय हमारे साममे सविता का विषय ही रहना है, स्प महीं हवा । कविता में विषय मी महत्ता को किसी प्रसार मस्वीनर नहीं किया जा सकता। मेनिन मासिवास का ७२ साहित्य मी माग्पनाएं मेषदूत पौर गुपई का पूरन मासा मटका-यह दोनों ही मपने स्प कारण कविताएँ कहलाती है। कविता को साहित्य के मन्य स्मों से पूया फारसे समय हमें कविता के रूप को ही देखना पड़ता है, ठीक उसी प्रतार बैसे साहित्य को अन्य कमामों से पृथक करते समय हमें साहित्य के रूप को देखना पड़ता है। उन सम्मन को भी मेरी बात से संतोष नहीं हुमा क्योंकि अभी हम में मैंने उनकी एक कविता छपी हुई ऐसी है जिसकी प्रपम पंछिया मुष इस प्रकार है- पिसबिसाती धूप बिसविसाते बम्ने किसविसावे की पौर मेरी सिगरेट के धुएं में पुस्तके प्रसर रेंगते रंगते- यह युवा मौका! पुरन के सटके को पीर कासिदास के पद को मैं वो समान भाव से कविता मानता हूँ क्योंकि इन दोनों का भाषार छन्दों की प्रावृत्ति से बंधी मय है। प्रन्तर कवत इतना है कि बा काप्तिदास का छन्द प्रमर पौर महान कविता है वहीं वह पूरन बामे का सटका निकृष्ट कोटि मी क्षणिक कविता है। 'बविता' सय में पुष भान्ति संस्मत के काम्प शम्द के पारण उत्पन्न हो गयी है । 'काम्प' धद उस भावनात्मक साहित्य का पोता है जो पौटिक और विवेचनात्मक साहित्य से भिन्न है। पाष्य के अन्तर्गत गव पौर पर दोनों ही पाते हैं। उस बयत में गय और पद्य मा विस्तृत स्पष्टीकरण शायद इसलिए नहीं किया गया कि उन विमों पत्र लिखने की प्रपा नहीं के बराबर पी प्रपिश साहिस्पकार पर में ही साहित्य पी रचना कर पे। पौर इसी लिए शिवने माटक हैं उनमें प्रपिताप में पद्य मिलता है। मपि स्पान स्थान पर गप समान रूप से पाता रहता है, फिर भी उन माटों को काम्प कहा गया है। क्योंकि वह मावनारमक साहित्य है। बाग भट्ट की कादम्बरी भी रचना रिशुट गद्य में की गयी है पीर पिर भी कादम्बरीमो माय माना गया है। माम्प पन्य उस भावनारमक साहित्य के लिए प्रयुक हपा है जो साहित्य रे दर्षन सपा प्रामोपना पदा से भिन्न है। एक तरह से उस समय के लिए यह वर्गीकरण ठीप भी पा क्यानि उस समय रसपी परिपुष्टि का साधन प्रयिम में पव ही समझ पाता पा पार य िरस पी परिपुष्टि का सामन कही गय समझा गया वो साहिय का मादि-स्प-कविता उसे मी काम्प में समाविष्ट कर लिया गया। सम्भवत इसी लिए भागे पसकर काम्य और पच पर्यायी समझे गाने सगे । महानी-सस्व को उस समय साहित्य का पृपक भाग मानकर उसके सम्बन्ध में संस्मत साहित्प में कोई विषेषना नहीं मिलती। इसपा मारण यह है कि महानी-साहित्य मौदिर विकास के साप ही विकसित हुई है और बहुत वाद में कहानी को साहित्य का पृपक पंग माना गया है। प्राचीन मास में पहानी पर सत्ता को प्रसग से म स्पोपार परमे महानी को प्रधानता दो ही महीं गयी। पर इसके प्रई यह नहीं कि कहानी की उपेक्षा को गयी है उस समय । पहानी को उस समय साहित्य का अंग नहीं माना गया यह सत्य है, पर पहामी की रचना प्राचीन काल में प्रपुर मात्रा में हुई है । वे कहानियाँ उपदेश के म्प में मषवा पुंस मनोरंजन के लिए सिसी गयी हैं। नीति एवं उपरेश के प्रांत के रूप में इन कहानियों की रचना हुई है पौर धार्मिक प्रों में यह कहानियां प्रपुरमा के साथ मिलेंगी। इसका कारण यह पा कि पहानी का क्षेत्र उस समय समझा गया भावनात्मक नहीं। पहानी स्वयम् में कल्पना की गति पर माघारिस होने पे कारण एप पसा है, और प्रशास रुप में माम्य में कहानी को माध्यम के रूप में स्वीकार लिया गया है। पर कहानी पो पसा का विकास कहानी में बोटिस तस्व की प्रमुसतारे कारण यहुत धीरे धीरे हमा है। संस्कत के महान् माचार्यों के सामने कहानी की महत्ता मासा के रस में प्रमट नहीं हुई पी पर उसने ममाय को स्वीकार करते हुए उसे विशेष परिस्थिति में काव्य का भाग मान लिया गया था। महामाया में नाटकों में हर जगह कविता के साथ कहानी मुनी हुई मिलती है। माटों में सो विशुद्ध मग से महानी माघार मानी जाती है फिर मी महानी मी प्रपेशा कविता की महता मषिक मानी गयी है उन नाटकों में। क्योंकि नाटमसार महानी कार के रूप में अपने को प्रकट नहीं मारता था वह तो अन्य किसी को महानो को मापार बना पर नाटक को रपना करता था उसपी रचना वो काम्प की होती पो। यह माय प्रपिकाश में पय में होवा पा से पायोपम्पन के स्प में पावश्यातानुसार पदाकया गय मा प्रयोग संसद नाटकों में मिसता है। पेगा में पढ़ने का सुपर हूँ प्राचीन माविता हमें मयिकांश में महापार्यो एवं नाटकों के रूप में मित्तठी हे नेग्नि इरा समस्त प्राधीन पपितामा प्राधार राय-युक छन्द है। इस स्मान पर मुख रिहान् मह साहिय की मान्यताएँ कहेंगे कि प्राचीन मापार्यों में काम्प अथवा कविता का प्राभार रस माना है, पद नहीं। इस कपन में लोग एक गतवी कर पाते हैं। काम्प' शम्प रस का पर्यायो है, काम्प पीर रस प्रसग प्रसग संज्ञाएँ नहीं हैं। 'काय रसारमा वामयम्' वासी उठि से यह स्पष्ट है कि जिस वाक्म में रस हो वही काम है। प्रपात् काम और रस एक ही संज्ञा है। इस रस को उत्पन्न करने का साधन पद है जो प्राप्ति वासी मय से बना है। भावना को वहन करने पर माध्यम मय है । इस प्रकार काव्य का भापार बाद में पद मान सिया गया । महुत प्रापीन कास से काम पौर छन्व पर्यापी माने माने मगे हैं। सय पौर शन्द के योग से कविता बनती है वहाँ धन्य उपकरण है पीर प्रापार मम है। इस स्थान पर मैं एक ऐसी पात कह रहा हूँगो प्रामीन भाषायों की मात से कुछ भिन्न है । मिसे में सबनात्मक या भावनात्मक साहित्य कहता हूँ उसे प्राचीन पापार्यों ने काम्प माना है, प्रपात उन्होंने काम्य पौर रस को एक सप में ऐसा है। वेसे हमारा समस्त जीवन ही भावना से पुज हे पर भावना को रूप देने की प्रक्रिया को हम कला कहने लगे है। साहित्य के दो पक्ष होते है -एक वो सुगनारमा पल बिसे प्राचीन प्राचार्यों ने काम्प का माम दिया है और दूसरा विचनात्मक एवं माप्तोचनात्मक पक्ष या फिर यदि उसे शामीप पक्ष कहा पाय तो अधिक स्पष्ट होगा। यह शास्त्रीय पक्ष पाठिस्प पीर शान का पोषक है और इसलिए यह पस भावमारमक न होकर बौगिक है। प्राचार्यों ने गिसे काम्प कहा है वह, मिसे हम कविता कहते हैं, उससे वित्नुस मिप्त है। पर पाम्प और कविता क्षम्य इस हद तक एक-दूसरे से मिलते जुलते हैं कि इन दोनों के एक होने का भ्रम हो जाता है। माटम माम्य है, पर मह पविता महीं है, इसी प्रकार बादम्बरी गो संसठ साहित्य पर उपन्यास है उसे पाप नाम से सम्बोपित किया गया है। इसलिए प्राचीन पासोपनारमा परिपाटी से हट कर मैं रस चोय के लिए 'काम्या पल का प्रयोग नहीं गया। उसे में केबम 'एननारमा साहित्य मी ही संझा देना उमित सममता हूँ। कविता से पृपक गय को भावनारमा बनाने के मिए वर्तमान युग में महानो का माम्यम प्रमुमत माना जाता है, वैसे नियम भी घरनारमक साहिल्प में माना जाता है। कहानी में वो परिमपित्रण मी प्रथ्यिा है, उसी में भावना का योत है। पर महानी में परिम-पित्रण 1 साहित्य का प्रावि-सविता में जो कल्पना की गति है उसे प्राथोन प्राचार्यों ने स्पर-कम से नहीं देवा।पहानी का विकास वो नवीन युग की उपलम्पि है। प्रामीन फान में साहित्य में प्राने यामी कहानियों का रस मी सृष्टि में सहाग भर सिया माता पा पहानी से रस मी सृष्टि नहीं पी गावी पी। बहानी मा स्वयम् में साहिप के क्षेत्र में कोई वम स्वीकार नहीं किया गातापा वह महानी फेवात रस क समावेश मा माध्यम समय गावी पी। महता मययुक्त पदों को तथा सय शम्द मौर पनि यो समाने वासे भलकारों कोपी पाठी पी। मविता को प्रासामी से रो पों में दिमक क्रिया मा सकता हे-अपम स्फुट पारिता जिसमें कोई महानी नहीं होती दूसरी कहानी युक्त मविता निस संसस में प्रबन्ध काम कहा माता है। कपिता का भादि म मेरे मत से स्फुट भविता है क्योगि नहाँ तक मेरा अनुमान हे कविवामा मम संगीत के साप साप गीतों के स्म में हुमा है। गीतों में प्रधानता सय पी होती है मौर स्वर में निकटम्प पनि की होती है। पर यह गीत संगीत और नृत्य गमामा की भौति प्रस्मायो होते हैं क्योंकि गीतों पर भावना में मावेग प्रपिर होता है । मानना का पावेग क्षणिक होता है, उसे स्पायित्व प्रान मरते हैं वोटिक गम्भीरता मोर संतुमन । पन्यारत्मक पसकारों माधोपर गिराने प्रसंगार है वे सब पौविकता से मुक्त है। मेकिन यह यौदिमता भावनारमर है-इसे मानना से मुक्त गिन्सी भी हासत में नहीं कहा मा सकता। सुननास्मन मम्माकारों में ये प्रकार स्वत मौलिकता ने पतन भषवा मवेतन प्रभाव से प्राते रहते है क्योंकि प्रचेतन प्रपवा अर्धपेतम प्रवस्था में दुद्धि स्वयम् भावना के पम्तर्गत प्रा जाती है। यहाँ मौदिकवा पेतन रूप में मामी नहीं पह भावना से प्रसग हो गयी। मानव के वोटिन विकास के साथ इस स्फुट कविता ने गीत की सीमा तोड़कर नछिया पा सहारा लिया। यही नहीं पुदि के विकास के साप शाम पर प्रमिडिई, विवेक पी पभिवृद्धि हुई और मानव पारीर-तस्प से उपर उठ फर पारमारप की महता पनुमद करने सगा। पौर इसी लिए ममा मन से मार ठार मीभिर प्राणियों में स्थायित्व प्रहण परने समी। प्राचीम स्मृत माहिय पी स्फुट कविता में हमें गीवों की पपेक्षा उहियों के दर्शन प्रपिक होते हैं । इसके ये प्रर्य नहीं कि प्राचीन संस्कृत साहित्य में गीत लिपे ही नहीं गए होंगे कुछ ऐसा नपवा है कि विगुट । साहित्य को मान्यताएं भाषना के प्रावेग वामे गीत कास मोर परिस्थिति की सीमा को तोड़कर स्वामित्व नहीं प्राप्त कर सके मय कि उहिमों में वोटिक्या के योग से भावना पास पौर परिस्थितियों की सीमा वोड़ने में सफम हुई। काल पौर परिस्थिति की सीमा तोड़ने में सबसे अधिक सफसता प्राप्त हुई है प्रबन्ध-फाष्प को क्योंकि प्रबन्ध-काम्य में कविता के सापकहानी सत्य भी पुरा रहा है, यह कहानी तत्त्व मिसना भी शिपिम मौर अविकसित क्यों म रहा हो । कहानी के प्रति मानव में एक स्वाभाविक मभिरुचि रही है, पचपि मापीन मापार्यों मे कहानी को कला के रूप में स्वीकार नहीं किया कहानी का उपयोग उन्होंने रप्टाम्तों पौर प्रतिपादनामों के रूप में ही किया है। और इसी लिए कहानी का सम्बन्ध कसा की अपेक्षा पर्म अधिक माना गया है। मेरे इस कपन की पुष्टि पौराणिक कमार्मों पातक की कयामों सपा हितोपदेश की कमामो में मिलेगी । पर प्रबन्ध- माष्य में पहानी को प्रमुखता मिमती ही है, और इस लिये इस कहानी सस्व केमारण प्रवन्म-काम्य काम पौर परिस्मिति की सीमा लोग्ने में सफल हप्रा। जिस प्रकार समय-समय पर स्फुट कवितामों के रूप बदसते रहते हैं, उसी प्रार प्रबन्य-काम्प के स्मों में भी परिवर्तन होता रहा है। पर सामाजिक मान्यतामों विश्वासों पौर स्थापनामों के कारण प्रबन्ध-काम्प शास्त्रीय सम्धों में प्रषिक बंध गया और इसलिए प्रयम्बकाष्यों के स्प बासा परिवर्तन बहुत प्रस्पष्ट और संयत है। सम्भवतः यही कारण है कि वर्तमान युग में प्रबन्ध-काम्प लिखने की प्रभा धीरे-पीरे घटती जा रही है गोंकि स्थापित धालय प्रतिबन्धों को तोड़मर प्रबन्ध-काव्यों के मपीन रूपों पी स्थापना करने का साहस बहुत कम लोगों में हुमा करता है। प्रवम्प काम्प मुक्काम्य भी प्रपेक्षा प्रपिक विमा है, इसलिए उसमा सस्लामिक भावनात्मक प्रभाव मनुष्य पर उतना अधिक नहीं पाता भितना मुछ-पम्प का पड़ता है। मुख्माम्य मन्तर्गत गीत पाते हैं, उपिया पाती है, पर माते है मेमिन मुचकाम्य के पास बहानीमा पस न होने मेवारण उसका जीवन पमित नहीं होता। फिर मनुष्य बौशिक प्राणी है, यह बौशिक तत्त्व को ही स्पायी महल देता है । मायना तो बनती-मिटठी रहती है। महापाव्य पौर माटकों में केन्द्रित कविता ही जीवित रहने की सामथ्य रसती है। इसका सष्ट उदाहरण सूरदास और तुमसीदास पीकरितामों में मिलता है। यहाँ सूरदास पी एस समय महान् पौर शक समभ्ये साहित्य का मादि-स्प-कविता गाने वासी कविता मात्र के युग में सोप-सी हो रही है वहाँ सुससीवास के रामचरित मानस का विश्व भर में प्रचार हो रहा है। पाज का युग मपिता का युग नहीं है-अकसर यह यास सुनने को मिलती है। इस कपन में बहुत बड़ा सत्य हे पोर बह सत्य स्पष्ट सब होगा गर हम यह कह दें कि पाच का युग प्रवन्य-काष्य का युग नहीं है । यदि हम काव्य की प्राचीन परिमापा को सामने रखें तो हम यह कह सक्से है कि प्रबन्ध-काव्य में पदका प्राधार गवने से लिया है। उन्पयास और नाटक दोनों ही गय में पिसेमा रहे हैं। साहिय में छन्दों की मय का स्थान कल्पना की गति ने से सिया हे, मावना को पहन करने वाली गति का माध्यम छन्दों से हट कर कहानी के पात्रों को किया प्रतिक्रिया की पस्पना में भा गया है। फिर भी मनुष्य की मादि प्रवृत्ति के रूप में संगीत मौर भन्द पोषित हे पौर कविता इस पुग में गीतों में सिमट रही है। मेफिन गोतों में एक मुसीबत यह है कि उनमें मधीनता कवल एक प्रष्टा साहित्यकार ही भर सकता है । साहिस्प का व्यवसायिक पक्ष छन्दों में निर्वस होता मा रहा है । और इसलिए करिता के क्षेत्र में कुछ प्रमीय समस्याएं पैदा हो गमी हैं मुष मयीन पाया पदा हो गयी हैं। पविता मान के युग में पौविक पार्दो से ष गयी है। पर्समाम पुग में पविता मी वापों के अनुसार तीन धाराएं स्पष्ट दिखती है जो इस प्रकार है-प्रगतिवाद प्रयोगवाद और परम्पय-गस । इन सीनों पायमों पी प्रपनी निनी मान्यताएं हैं, जिन्हें समझ भेना पड़ेगा।

पाठयाँ परिच्छेद परम्परागत-कविता-छायावाद जिसे हम परम्परागत पविता मरहते हैं उसका क्षेत्र या विस्वत है, पर पार के दिन वह सिमटकर घामावाद की परिभाषा में मा गई है। से परम्परागत कविता के नाम पर इस युग में जो कविताएँ लिखी मा रही है उनका रूप प्रमग-अलग है, उनके विषय अलग-मसग हैं और उनमें प्रमुक भाषा के मानदण मी अलग-ममग है। परम्परागत परिवा से मेरा प्रयोजन स कविता से है जो छन्दों में सिखी गयी है पौर मान के प्राधुनिकवादों से जो प्रमग है। पान के माधुनिक पार्यों में प्रगतिवाद पौर प्रयोगगाव मावे है मिनमा विश्लेषण में पाये के परिभवों में काँगा इस स्थान पर तो मुझे बस इतना कहना है कि इन वार्यों से दूर, कविता को सय पर मापारित मान कर यो कविता लिखी जाती है उसे में परम्परागत कामिया कहता है। इस परम्परागत कविता का रूप समय की गति पौर घेतना के साप बदससा रहता है। परम्परागत कविण का वर्तमान रुप कुछ दिनों पहले तक और पान भी घयावाद के माम से सम्बोषित किया गया है, इसको सबसे पहने हमें ग्रमझ मेना पड़ेगा। बीसगी प्रवामि के प्रारम्भ में हिन्दी में छायावाद की महर पाई इसके पहले तक घायाबाप का नाम भी लोगों में नहीं पुना पा । पर धापावाद मी मनेक परिभाषाएँ की गई हैं पर उन परिमापापों से कम से कम मुझे सो संतोप नहीं हुमा । बीसवीं शतीमा प्रारम्म ही पार्यों के साप हुमा पौर इसलिए परिवागो बालों से ग्राम देने की एक प्रयान्सी पस पड़ी। पाखिर यह घायावाद है पया? प्रपन हमारे सामने यह है। रहस्यवाद और प्रयावाद में दानिक सत्वों को भापार नहीं माना ना समता यद्यपि ध पासोषको ने इन पोर्नो पादों के ननिम सत्रों पर पापी सिक्षा महा है। छायावाद मो समझने के लिए हमें अपनी प्रापीन कविता की पाराको सममना पड़ेगा। पर तत्व बने प्रयानता देने की प्रपा मनादिसात से मानव-गमार में रही है क्योंकि हमें जो दिसता है वह परीर तत्व है। यह शरीर तत्त प्राण को मोर भावना को वहन करता है, मेपिन यह प्राण और यह परम्परागत-कविता-छायावाद भावमाएं स्वयम् में शरीरस्वत्व के माध्यम से ही प्रपमे को प्रकट करती है। स्वमावत प्राचीन कविता में बब मौद्धिक विश्लेषण मषिष नहीं हमा था इस प्राण तत्व और घरोर सत्व को प्रसग करके नहीं रेसा गया। प्रतिपादित वो भावना हो की जाती थी लेकिन भावना को सूक्ष्म-स्म में ग्रहण करने की प्रपा महीं रही। अपने अन्दर वासे एप उस्सास, विषाद, पीड़ा-यह सब किसी म्पति या परिस्थिति से सम्बर माने गए हैं। पति से भावना को प्रसग परसे उसे प्रतिपादित करना मह मासान महीं है। वैसे हरेक भावमा किसी वस्तु या परिस्थिति में मूर्त रहती है, पर इसमें एक बहुत बड़ा खतरा भी पा विश्वेपन वहाँ महाँ मिस वस्तु के साप भावमा समट की बाय उसमें एक दूसरी भावना का प्रनोमन मी हो। यह पतरा विश्प-रूप से प्रेम की भावना में रहता है। प्रेम पौर ऐगार यह दोनों साप साप पमते हैं अधिकांश में । मृगार शुर म से शरीर-तत्त्व का भाग हे वव कि प्रेम प्रारमा भयवा प्राण तत्त्व भी भीम है। हमारे प्राचीन प्राचार्यो मे रसों की विवेचना करते समय 'प्रेम' को महत्व नहीं दिया उन्होंने तो श्रृंगार रस को ही माना है। इसका परिणाम यह हुमा कि श्रृंगार-रस अधिकांश में कविता का मुस रस होने के कारण नमिता प्राण तत्व से प्रसग हो कर परीर-तत्व में स्थित हो गयी थी। नव-शिम मापिया-भेद, रंगार रस में यह प्रमुख माने माने सगे। रीविपासीन कविता में तो कोई पवि सन तक माम्य न होता था जब तक मस-शिर और नारिका-भेद पर यह कोई ग्रंप न सिसे। मम्प रसों में भी यही हासत पेवा हो गई। पीर रस पी कविता में सेनापों के वर्णन ततगारों मा वर्णन समा मन्य विविध पोनों के वर्णन प्रपुरवा के साथ मिलेंगे पर यह वीरता को भावना कहाँ केन्द्रित है, देश भक्ति प्रपमा उत्पीडन के विरोध के म्प में यह वीरता की भावना जागृत होती है, इसका उस्सेस यदा-कदा ही मिलेगा। मति रस की तो विमासीन कविता में प्रौर भी अधिक दुपा हुई। मह मक्ति सिमट कर रापा पौर नम्ण के घोर वासनामय गंगारारमक प्रतीक में पेन्द्रित हो गयी। पासना पारीरिक तत्व है-भावना मारिमप प्रपवा मानसिर । मपियश पासापों को वासना में पेन्द्रित हो जाने की प्रवृत्ति मिसती है, शरीर प्रपना पर्म तो निबाहेगा ही। भारतीय मामार्गों में उसके हास के ८० साहित्य की मान्यवाएँ कास में वासना में केन्द्रीभूत हो जाने की प्रवृत्ति प्रा गयी थी। दूसरी मोर बौविक यमलार को भी पविता में महत्त्व दिया माने मगा पा। यह वोटिक पमत्कार भी भावना से प्रति दूर भौतिक मगत की ही पीम है। विगुट भावना में कविता को केन्द्रीमूत करने की प्रवृत्ति प्रमहवीं पौर उन्नीसवीं पाती के अंग्रेजी साहित्य में मुखर हो उठी। रंगलेप्प में इस नवीन पारा को रोमांटिक रिवाइवल मा नाम दिया गया । वायरन शेती कीट्स पर सवर्ष मादि पवियों ने इंगमेण में कुछ काल के लिए कविता की धारा ही मोड़ दी पीर एक तरह से उस समय कविता में एक नमीन बागृति कविसा के प्रति एक प्रकार की नमीन भासकियहाँ पैदा हो गयी। भारतयप मा वह मंग्रेजों की गुलामी का काम या पीर प्रप्रेमी मापा सपा अंग्रेजी साहित्य का भारतीय शिक्षित वर्ग पर काफी अधिक प्रभाव पा रहा था। यह प्रमान बंगास में तो स्पष्ट रूप के दिख रहा पा पौर ईगसेप वासी कविता की इस मवीम पारा का प्रभाष मारफेस मधुसूदन वत्त रसीमनाप ठाकुर प्रादि पवियों पर बहस पषिफ पड़ा। पाश्चात्प पविता की धारा का प्रमाव हमारी उस समय की माध्यारिमा संस्मप्ति पर पड़ना बहुत मासान पाम तो नहीं पा । हमारी यह माम्यारिमावा एप मोर सो रहस्पात्मक और पारसीविकपी पेया कबीर, सुमसो मूर, दाव पावि कवियों में दिखती है, और दूसरी पोर पोर मासनामयी होती पी पेसा जयदेव विद्यापति पण्डीदारा रसखाम तपा प्रन्य प्रगमापा के पवियों में मिलती है। रंगसैर की समस्त संस्मृति माम्यारिमा म होकर भौतिक पी।स मोतिम संस्कृति का भावनात्मक स्पाम्तरही तो पा यह रोमेस्टिक रिवाइयन। हमारे देश में यह स्पान्तर कुछ महत्वपूण मापारमूल परिवर्तनों के माप ही मा समता पा । रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उस कविता में प्रापारमूम परिवर्तन करके भारतीय कविता को नया मोड़ दिया। रवीन्द्रनापकी कविता में एक पौर तरह की नवीनता पी एर पुछ ऐसी यात पी गिसमें पाश्चात्य विद्वानों पौर मासोचमोंगोप्रभावित किया। रवीन्द्रनाम मयुर ने भारतीय सुन्न परम्परा के रहस्यवाद को प्रपना कर अपनी पविता यो पा चास्प पारा अनुसार भागनारमक मोर दिया।बारामामय परीर स्व से सम्पद को परम्परा वामे देश में पहले तो यह कविता बड़ी उपेक्षा के साय देनी पौर इसका पड़ा गिरोम हुमा मेपिन पीरे-धीरे पापात्य साहित्य संसदि से प्रभावित शिक्षित वर्ग मे पिता के नवीम सरप के स्प परम्परागत कविता-धामावाय ८१ स्वीकृत कर लिया और रबीन्द्रनाप की कविता का प्रमाव प्रकले बगासी कविता ही नहीं अन्य मारतीम भापामों की कविता पर भी बहुत प्रधिम पड़ा। मारतवर्ष की प्रायः समस्त भाषामों की कविता पर रवीन्द्रनाप की कमिता के एक पत्र प्रभाव का एक कारण मौर है, वह है रवीन्द्रनाप मकुर को नोवल पुरस्कार की प्राप्ति। मेसा कि में निवेदन कर चुका है रबीन्द्रनाप ठाकुर ने इस पाश्चात्य रोमास्टिस रिवाइवल की धारा को मेसा का तैसा नहीं अपनाया उन्होंने उसमें पामूल परिवर्तन किये। इस भावमात्मक भाग को प्रघ्यारम का रंग देकर उन्होंने विश्व-साहित्य को एफ मनूठी बीच दी पौर विश्व के भासोचकों तथा विद्वानों ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिमा और उनकी महानता स्वीकार कर ली। इसका परिणाम यह हुमा कि प्राचीन परम्परा मामी भारतीय कविता के विद्वानों का विरोष पर गया नवीन शिक्षा पौर पेतना के साप मागे बढ़ने वाले शिक्षित युवक समुदाय मे रवीन्द्रनाम का अनुकरण पौर अनुसरण किया। हिन्दी में बायाबाप का जन्म इन्हीं ऐतिहासिक कारणों से हमा है। पारम्भ में यह प्रभाव वंगासी भाषा के माध्यम से पाया। रविवादूको देमके गौरव के भम में स्वीकार किया गया। पर बाद में यह प्रभाव सीपे अंग्रेजी साहित्य से पाया। इस चायावाद में और इसके पहले बासी कविता में विषय का बहुत बड़ा मम्तर पा। महाँ इसके पहले माप्ती कविता में भावना की अपेक्षा परीर प्रममा स्पको प्रधानता मिसती थी यहाँ छायावाद में भावना को इस पर प्रमानसा मिसने सगी कि उससे सरीर-तत्व का एक प्रकार से प्रभाव-सा दिखने मगा। हमारे प्राचीन कविता-प्रेमियों एवं प्राचार्यों का इस नई कविता का पर्व समझने में कठिनाई पड़ो। रवीन्द्रनाप ठाकुर को नोबस पुरस्कार मिलने के कारण मनमत इस मई कविता के पस में हो गया या पौर इसलिए प्राचीन पनियों मोर प्राचार्योपा विरोष सफल नहीं हो पाया। घापापा की कविता के पाने के पहले हिन्दी कविता का स्प महा विकृत हो गया था। नपीम पेवना के कारण सिमानीन कविता के प्रति सम-समुदाय में अनास्पा पैदा हो गयी पी।पासमा के विभिप्त वस्त्रों को तपा मोटिक ममगाम को मोगा मे स्वीपर परमा बन्द कर दिया मा। मबीन पेतमा पौर यिोग पारपास्य शिक्षा एवं सम्पर्क कारण मोगों में प्रा ऐ पे पोर कविता का विषय एक बार ही बस गया। यही नहीं बपिता पी माषा भी उन्हीं दिनों मी। प्रमाला का म्पान 1 ८२ साहित्य की मान्यताएं बड़ी बोसी ने मे लिया क्योंकि हम पद के युग से निकल कर गद्य के युग में मा गए पेपौर हिम्दी गय मे सड़ी वोली को अपना लिया था। गद्य-युग के प्रारम्भ होने पर हिन्दी साहित्य की स्मिति कुछ विपित्र-सी हो गयी पी। हिन्दी साहित्य के पास बमभाषा में सिसा हुमा कविता का मनन्स भाडार पा और कविता की भाषा की हैसियत से प्रजमापा का स्प निखर पुका था । बम कि गध की नवीन मापा होने के कारण सहरी बोसी घुटनों के बम पस रही पी। इसका परिणाम यह हमा फि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के युग में गव की मापा सो सड़ी योती स्पीत हो गयी थी मेकिन कविता की भापा बममाषा ही मानी जाती रही। पर साहित्य में भापा के दो स्पो का अस्तित्व सम्भव नहीं था मीर सोगों ने कविता भी सही मोमी में मिसनी पारम्भ कर दी। पर सड़ी बोली में इसना यस म पा कि यह भावनारमक रूप में अपने फो मारोपित पर सक्ती। यह दो बौद्धिक विकास के क्रम में पी पौर सविता की वस्तुबादी परम्परा भी मौजूद थी। इसका परिणाम यह हुमा कि छायावाद के प्रामे के पहले तक बड़ी वोमी में जो भी हिन्दी कविता सिसी गयी उसमें प्राणतत्व मा नितान्त प्रमाव दिखता है। वह पविता पर्णनात्मक प्रबना प्रभायरमक ही हो पाई भावनात्मक महीं हो पापी। छायावाद के साप हिन्दी में एक नवीन धारा चप्सी। पायावाद की कविता प्रपने प्रस्पन्त मस्परसम में ही हिन्दी की प्रतिनिधि कविता पम गयी पौर पनवा मे उस कविता को भावनात्मक रूप में प्रहण भी पिया। पर घायापाव के अन्तर्मत पिनी गाने मामी हरेक पविता में दानिक सस्प का होना मावश्यक नहीं । मह दार्शनिक वस्व पुष कपिर्यों की कविता में मिल सकता है, प्रपिाश में इसका प्रमाव है। पारम्म में छायावाद और एस्पमाद को एप प हो मामा गया बाद में रहम्पपाद को छायावाद से प्रसग करना पग । महाँ रहस्यवाद दायनिक प्रमूमूतियों के साप पसता हे यहाँ पापाबाद में केस भावनारमा म्पचीकरण है। प्रारम्म में छायावार ने घरीर वत्व की उपेक्षा मी पर मीरे-धीरे शरीरराव उस कविता में प्रपुरता के साप माना गया। लेकिन छायावाद में प्रमुखता प्रास्मतत्व प्रपमा भावना पक्षमा ही दी जाती है। यह पायावाद नवीन भारत को पेठना के प्रतीक-सप में प्रयवरित हमा। पान के दिन जब दा नगीन बा-प्रपतिवाद और प्रयोगवाद-- साहित्य में प्रवेश कर पुके हैं, हिन्दी कविता में प्रमुग्रता धायानगरको परम्परागत-कविता-यायावाद ५३ ही है। पौर इसलिए मैं जिसे हम छायावाद की कविता कहते हैं उसे परम्परागत कविता ही मानता हूँ। कविता की समी मान्यताएँ म कविता में मौजूद है-सप छन्द अनुप्रास और प्रतंकार । केवस विषय का परिवर्तन हुपा है । दुध मोगों का कहना है कि छन्दों में भी परिवर्तन हमा है, लेकिन उनका यह कपन प्रर्ष सत्य है । परिवर्सन विकास-क्रम का ही एक माग है और छन्दों में परिवर्तन सो प्रनाविकास से होते पाए हैं। संस्कृत के एम्वों में तपा प्रवषी के दोहा-दीपाई और प्रगमापा के पनामरी पौर सरेया में छन्दोंपा कितना अन्सर है। एम्ब समय की पति के साप बदसते रहते हैं। एक प्रस्न पौर हमारे सामने खड़ा हो जाता है या छायावाद की फविता में प्रवन्ध-काम्प मिसा ना सकता है ? जयशंकर प्रसाद का मामू धायाबाद में सिखा हुपा प्रथम सप्प काम्य अपवा प्रबन्ध-काम्य है। 'पासू' का केवल ऐतिहासिक महत्व है, कविता के क्षेत्र में इस प्रम- पाप की महता स्वीकार को आएगी, यह प्रमी पनिश्चित है। छायापाद की वास्तविक प्रतिनिधि कविता है । वह पमिका में छोटे छोटे गीतों में या सिसि मही प्रमापशासिनी हा सकती है जहाँ भावना बिना किसी ठोस पापार के प्रस्तुत की जाती है। प्रवन्म-काव्य में ठोस परावन पर पाना पाता है। पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि 'मासू' का एक ऐतिहासिक महत्व है। जिस समय घायावाद की परम्परा ठोस परातम मासे प्रवध काप्य के क्षेत्र में प्रवेश करती है, बह दर्पन से वोमिल हो पाती है। प्रसार पी मनमापिनी इस सत्य मा एक बात स्पष्ट उदाहरण है। कामायिनी अपने दर्शन के कारण जम मापारण में प्रचलित महीं हो सकी उस प्रर्प में गिसमें जायसीमा पदमारत पोर तुलसीदास प रामचरित मानम पाते हैं। प्रबपनाम्प के वास्ते वो पी मैपित्तीशरण गुम्न की परम्परागत मविता हो सफ्स माध्यम बन सकती है-साफेव मौर यघोषय इसके अच्छे उदाहरण हैं। थी सुमिषानन्दन पंत ऐसे सघक पौर प्रविमाषाम् पवि के लिए भी प्रबन्ययाव्य की पृष्ठभूमि कठिन ही सी दिखती है, उनकी प्रथप काम्य के नाम पर निबी पई हात को मम्मो कवितामों में दर्मन प्रमुरा हो पाता है। पर बैसा में पहले ही निवान पर पुगाई यह युग प्रबन्ध-माप का युग ही नहीं है । सम्भवतः इसीलिए वर्तमान परम्परागत पविता सापाबाद में सिमट कर रह गयी है। घामाबाद में प्रमुमता पती हे मारमगत - माहित्य की मान्यताएं भावना की। घायावाद को शेमी में निस्प मवीन स्मान्तर हो रहे है और बहस सम्भव है प्रारमगत मागमा को अपना कर भविष्य में कोई प्रवन्प-काम्य सिता गाय पर वस्तुगत भावना को म्यक करने के लिए मच जितना सशत और सफस माध्यम बन चुका है उसे देखते हुए छायागार क्षेसी में प्रबन्प-काय की रचना पनिश्चित ही दिखती है। मैं पहले ही कह चुका है कि साहित्य की मान्यतामों पर विचार करते समय मेरे सामने साहित्य का म्यावसायिक पक्ष ही है। पौर व्यावसायिक स में कविता की मांग तीन स्थानों में है। प्रपम मावा है कवि-सम्मेलन । भारतवर्ष में पौर विशेपस हिन्दी में कवि-सम्मेमन की परम्परा बहुत पुरानी है। यह काम-सम्मेसन मन-मनोरंजन के प्रमुस सापन है। सेकिन कवि-सम्मेसनों में पसन्द की जाने वासी कवितामों का स्तर बहस ऊँपा महीं होता हो भी नहीं सकता। उदास भावमा को समूह मासानी से पहण नहीं करता समूह को तो पाहिए वकास उसन मन को छू मेने वासी भावना। सम-पम्प के साप-साय इस तकास मन को नु सेने वाली भावना को और भी कुष प्रषिक सापन चाहिये। इन सापनों में महत्ता मिसती है सुरीसे फंठ को मंच पर सफल अभिनय को सपा जनता को उमसान मासे प्रपया हसाने बामे विपया को। मेकिन छायावाद की सम्बी कविता इन कवि-सम्मेसनों में अधिक सफल नहीं होती। हाँ गीतों को प्रमुखता मिलती है तब जब वे गाकर पढ़े पाय । कविता की दूसरी मांग हे गीतों के रूप में पौर यह मांग सिनेमा तया रेग्मिों में विशेप-म्प से दिखती है। प्रचार कार्य के लिए विभिन्न सरकारी विभाग भी गीत सिखाते हैं, और विज्ञापनों क तौर से भी कवितामों की मांग होन मगी है। पर इस प्रकार के प्यावसायिक-गीता की अपनी एक सीमा है, अपना एक क्षेत्र है। सफम कवि जो भी गीत मिलता है, उसकी उपेक्षा नहीं दी जा सकती लेकिन व्यावसायिक मान्यताएं बरसती रहती है। पर एक बहुत बड़ा समुदाय ऐसा है गो मए-नए गीतों के प्रति प्रास्ट होता है, और पविता-पुस्तमा नी मा भी पोड़ी-बहुत विश्ध होती है, उनमें मनही गाई वा सफने बामी करिता को ही महत्व मिलता है। कविता की सीसरी मौर सबसे प्रपिर महत्वपूण मांग हे पाठय- पुस्तक में। परिवा मी नवीन पाय का मध्ययन गरने के मिए उन्हें वर्तमान परियों को कविताएँ पदना प्रावस्या हा जाता है। पर पास परम्परामत-कविता-पायावाद पुस्तकों में हरेक व्यक्ति की कविता जो सम्मिलित नहीं की जा सकती कुछ इने-गिमे सोर्गों की ही कविता घलती है। कविता का यह प्यावसायिक पक्ष अनादिकात से मौरख रहा है। भावना के उगतीकरण की सीमा तक भावनात्मक मनोरमन कविता को स्मायित्व प्रदान कर सकता है, बेस वासना को मरफाने वासी कविताएँ भी मन-साधारण में गी प्रिय होती हैं, पर इस कविता का मोवन स्वस्प होता है और वह बड़ो मस्दी समान द्वारा पहिपत कर दी जाती है। हमारे मोकगीतों में इस बासना-प्रधान मोंड़ी पौर प्रप्सीम कवितामों को प्रचुरता के साप पाया जा सकता है, विष्ट-साहित्य में परिष्फत सामामिक मान्यतामों के कारण इस प्रकार की कविता के पैर महीं ममने पाते। फिल्मों में वो गीत सेंसर कर के काट दिये जाते है, उनमें मोक्नपि वाली यह प्रश्स्तीनवा और भोंगन ही सब से बड़ा कारण है। व्यवसाय में सरा माम और मोटा माम दोनों ही पमते हैं, मन्तर फेरम इतना है कि हरा मास प्रपना स्थान ममा मेता है, मोटा माम बहुत जल्दी सोग छोड़ दिया करते हैं। कविता भी म्यवसाय के इन नियमों से बंधी हुई है। परम्परागत कविता सिरिक में पौर गीतों में सिमट रही है, कास पौर परिस्पिति ने साहित्यिक मान्यतामों में मापार मूस परिवर्तन कर दिये गए हैं। वैसे म्पतिपत भावना समय-समय पर अपना विस्फोट पाहतो है, और कभी-कभी यह पक्किात भावना एक छोटे गीत में नहीं सिमट पाती। इसलिए सम्मी पौर केवल पड़ी पाने वाली कविताएँ मिनी यो गाएँगो उनका विशेप म्यावसायिक महत्व न होगा। कविता साहित्य का महत्वपूर्ण पहन होते हुए भी प्रव पावसामिक पहलू नहीं रह गयी है, उसमो माध्यमिक महत्व हो मिस सकता है। भविष्य के साहित्य में प्रमुख महत्त्व वह वो भुकी है।

नौवा परिच्छेद प्रगतिवाद-उपयोगिता अथवा प्रचार बीसवीं शसी समाजमाव की शती कहसा सकती है, भौर समानवाद परम्परागत मान्यतामों को बहुत बड़ी चुनौती के रूप में अपने को स्थापित करता पा रहा है। यह कहना कठिन है कि समाजवाद अपने को पूण भ्म से दुनिया में स्थापित कर सकेगा या पह प्राचीन मान्यतामों को धीरे-धीरे अपनाता हुमा विश्व के विकास-छम का ही एक भाग बन बापमा । समाजमार में सामामिक सस्य का बहुत पपर्वस्त पहलू है, मेकिन यह सामाजिक सस्प मुझे वो एकामी दिखता है। उन देशों में नहीं समागवार मरने को स्थापित कर पुका है, समासाद की मान्यतामों में मापार-गम परिवर्तन प्रारम्म छो पुके हैं। समाजवाद की सबसे पमिक प्रकाव्य मान्यता है-उपयोगितावाद । यह उपयोगिताबाद सामानिक सत्य है और इसी उपयोमितावाद सिवान्त पर समाम की स्थापना हो सकी है। वोसमी पती के सोसरे दशक में समाजवाद को मन तक पहुँचाने के निए साहित्य का सहारा लेने वाले एक नवान मान्दोलन का रूस में बम्म हमा पार पोरे-पीरे इस पान्दोमन मे साहित्य की माम्पदामों पर अपना प्रमाव सा। इस पाम्दोमन को जन्म देने मामा सिरान्त पोरे-धीरे समानबादी देशों का साहिस्पिक सत्प घम गया और उन देशों में पो भो साहित्य सिखा गया वह इसी-सिद्धान्त पर। यही नहीं शासन मे उस साहित्य के सेखक पौर प्रकासन पर को प्रतिवम्प सपा पे पौर साहित्य को उन्होंने शासन द्वारा रित कानूनों से बाप दिया। इस मान्दोमन का उद्देश्य मादि में पा उत्पीडित पौर घोपित वर्ग में पेतना उत्पन्न करता तया शोपकों और उत्पीफों के प्रति भणा पौरपानेम। का प्रचार । यह दोनों ही उद्देश्य मानववा के लिए उपयोगी है, पौर मानव निपस में इनका महत्व है। समावत इस पाम्दोमन को प्रारम्भ में पायातीत सफलता प्राप्त हुई क्योंकि पेवम साहित्यकार स्वयम् में उत्पीड़न पौर घोपण मा पिरोपी पा। मेकिन इस भाम्दोलम के गा में एक और भावना निहित पी वह पी इस पान्दोसन द्वारा विश्व साहित्पकाएँ में समाजवाद का प्रचार। धीरे-धीरे यह भावना सप्ट होती गयी 4 प्रगठियाद-उपयोगिठा पपका प्रचार पौर भाव में उन साहित्यकाऐं ने मिन्हें सक्रिय यमनीति में कोई विसपम्पी नहीं पी, अपने को इस माम्दोसन से प्रसग कर लिया। प्रगतिवाद का सबसे बड़ा यम हे उसकी उपयोगिता और जन- कल्याण के प्रति पास्मा। साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन पोर मानन्द अवश्य है, मेकिन हम साहित्य समन करने वाले और साहित्य को पहरण करने वाले सबसे पहले सामाशिम प्राणी है। हमारा मस्तिस्य पारमगत पवश्य हे मेकिन हमारे सामामिक प्राणी होने के माते मह वस्तुमत भी है। निरय प्रति विकसित हाने मासे सपा विकास के इस क्रम में संपर्प-शील हमारी सामामिकता प्राचीन मान्यताओं को छोड़ कर नवीन मान्यताओं को अपनाती पसी गावी है। मान व्यक्तिस्वातश्य बड़े सीमित प्रयों में ही स्वीपार पिया ना सकता है। यही नहीं, वेज्ञानिक विकास के साप उसका माननारमक पक्ष दुरी घय युगाहमा है, यह सत्य सोगों को भापित हो गया है और इसलिए साहित्य का सहारा हरेक निर्माण पौर निवास पाम में अनिवार्य सममा पाने लगा है। योरोम में नवीन सामामिक पोर राजनीतिक चेतना में साहित्य ने बहुत बड़ी सहायता की है- योरोपीय साहित्य पदमे पर यह स्पष्ट हो जाता है । यही महीं, राजनीतिक सपा सामामिक दर्भम सयम में बौदिर है, यह बौदिक मन-सापारण को मान्य हो सारे इसके लिए नन्न भावमारमा-प्रतिपादन पावश्यक है। यह मावनात्मक प्रतिपादन कना पौर साहित्य का क्षेत्र है। भावमा स्पयम् में न पुरी होती है, न प्रग्छी होती है और इसलिए हमारे प्राचीन समान में भावना के म्पच्चीकरण पर कोई प्रतिवष नहीं मगाए गए पे पोर प्रगर पसामारिया या प्रश्मीनता को रोकने के मिए कमी प्रतियम्प मगे भी तो वह बहस दीने थे। पर यह को समारवा' के मामार पर नवोन समाज को स्थापना का कार्यक्रम उठाया गया यहाँ अभिकरिफास का कम नहीं था यह वो कान्ति की प्रवस्मा पी।कान्ति के समय मी मान्यताएं हमारी प्रचलित मान्यतामों से भिन्न हुमा करती है। कान्तिमारी परिवर्तन पी भवस्था में प्रतिबन्ध नितान्स प्रावस्या माने पाव रे कोई भी ऐसी बात नहीं की या नही वा सफ्टी मिसम काम्बि मी सफलता में वापा पहुँचे । क्रान्ति का पक्ष हिसा हुमा करताह पौर पह हिंमा उन प्रतिबों पर सागू करने में पली गती है। समायवादी देशों में प्रवियों का सहारा तो सिया ही गया साहित्य के सजन में मेनिन एकत्रम पार प्रपनाया गया समाजवादी क्रान्तिको ८८ साहित्य की माम्पताए सफल बनाने के लिए, और यह प्रम बहा दिवस था। इस म को अंग्रेजी में Regimentanon of thought वे हैं। इस म हिन्दी में हुमा विचारों का केन्द्रीकरण । इस क्रम में विचारों को केवल एक निर्धारित-पाय में बसना पाहिए, दूसरी पारा पति है। प्रतिबन्ध का स्म नकारात्मक होता है। यह यही करता है कि अमुक बात न हो । सेकिन यह विचार का केन्द्रीकरण स्वीकारात्मक है इसमें विवार की एक पारा निर्धारित कर दी जाती है, और उसी धारा में हरेक पति के विधार को पलना पड़ता है । उस निपारित-मारा में जो विचार नहीं पाता, वह वर्जित है। इस गम के विश्व यह मारोप कि यह मानसिक गुलामी का गम है, सही विक्ष सकता है, लेकिन हमें इस पारोप पर विचार करते समय काम और परिस्थिति पर ध्यान रखना पड़ेगा। विमारों पर नियन्त्रण वोहर काम में और हर समाज में पायापक माना गया है कि पिधारों की निरासमता पराजकता और सामाजिकता के पोषक है। यह नियम्पए सयम में मुसामी का मक्षण है, मेकिम हमारा समस्त अस्तित्व ही प्रतिमन्यों से मासाहुमा है। ऐसी हालत में पति सि काम में विचारों की पाय यदि मन्ति के उभामक निर्धारित कर देते है वो इसमें कोई ऐसी मापत्तिजनक वास नहीं दिखती। पर यह व्यवस्था प्रस्पकामीम ही हो सकती है क्योंकि अम्ति समयम् में मस्पकासीन मानी पाती है । इस व्यवस्मा को हमेशा के लिए मागू कर देना एक प्रहकी मई मुसामी को सम्म बेमा है जिसे मानव-समार स्वीकार नहीं कर सकता। फिर एक प्रश्न और हमारे सामने नम हो पाता हैबिपायें पाप को निरित करने का अधिकार मिसे है ? उत्तर सप्ट है यह अधिकार से है जो सप्तासहै। सत्तासम्पति हो सकता है, सत्ता- म समुदाय हो एस्ता है। समाजवादी क्रान्ति के इतिहास को रेखने के पता चलता है कि शाम प्राय म्पति ही हुमा करता है, और इस सिए समाजवाद का मर तक का इतिहास शिक्टेटरों (पानाशाहों) का इतिहास रहा है। इस एक पछि मोर उस समर्पक पाटे से समुदाय पारा मिपाणि मान्यताएँ पर कार्यक्रम समस्त समाज ना सत्य बन पाय यह स्पिति समान के विस क लिए पातक हो सकती है। समय ने यह सिटकर दिया है कि मह सम्भव नहीं, पौर भाव के दिन स्स में इस Regimenudon of thought नियम स्वपम ही गमे हो गए हैं।

८९ प्रगतिवाद-उपयोगिता प्रपवा प्रचार प्रगतिवाद की सबसे बरी कामगोरी यह रही है कि उसने निषेपात्मक प्रतिवर्षों के क्षेत्र से उठकर कुछ मान्यतामों को प्राधार मूस सत्य की तब मनता पौर सेसकों पर पारोपित मरने का प्रयत्न किया । वैसे यह मान्यताएं अधिकांस में कम्याणकारिणी रही हैं, इस सत्य की उपेक्षा नहीं को पा सकती–पर कल्याण के माप-यम भी दो मानव-समाज के विकास के साप बदमते रहते हैं। पारोपित करने की प्रक्रिया स्वामाविका विकास के लिए पावक हा करती है पौर शायद इसीमिए प्रगतिवाद + नाम पर सिता गया कोई भी साहित्य अभी तक महानता को कोटि में नहीं पा पाया है, भविष्य के सम्बन्ध में कुछ कह नहीं सकता। प्रगतिवाव का पसनी स्म एक रागनीतिकवाद है जो भावनात्मक म होकर मोसिप अधिक है, पौर यह प्रमविवाद का महुत बड़ा वोप है। प्रगविवाद का साहित्य साहित्यकार की निनी भावना की उपम नहीं है। बह वो राम्म अपवा शासन द्वारा निर्देशित हुमा करता है। निर्देशन पर पसना बुद्धि का काम है, भावना का काम नहीं है । वैसे साहित्य फा उपकरण सम्व हे मौर पद स्वयम् में दौतिक संशा हे मेकिन साहित्य का क्षेत्र मानना का क्षेत्र है, पुति का क्षेत्र नहीं है । प्रगतिवाद के साहित्य की रचना पपिकाध में निर्देशन पर होती है, और स्वमावत' साहित्यकार में पौटिक म्म से उस साहित्य में मावना को समाविष्ट करमा पड़ता है। पर मासिर बौद्धिकता का इतना विरोष क्यों ? पचानक यह प्रश्न मेरे सामने पग हो पाता है। कमा मपपा साहित्य के व्यावसायिक पक्षको देखते हुए मुझे पौरिकता का विरोध कृष प्रयीव-सा मगठा है। इस वस्तु बगद में यहाँ कला का मूल्म पैसों में प्राका माता है,कमाकार या साहित्यकार को मन्य पहियों की रुचि के अनुसार ही तो अपनी कला का प्रदर्शन करना पड़ता है। प्राचीन रीतिकालीन कवियों में क्या भपने पाषयवावार्मों को प्रसन्न करने के लिए उनकी मनचाही पविता नहीं सिखी ? प्रगति पाद को कविता में यदि कमार की भावना बौदिक निमन को छू सके तमी समर्ष पौर प्रमावधामी साहित्य बन सकेमा प्रन्मया महीं। प्रगतिमाद का साहित्य प्रभायरमक साहित्य है, इस बात पर प्रगति- वाद के प्रवर्तक तपा उसके अनुयायी मापत्ति कर सकते हैं, मेकिन मैं सनसे केवल इतना निवेदन करना चाहता कि मैं मह यात किसी धर्मापना से मिथ्या पायप केस में महीं कह रहा हूँ और न में इस प्रकार के साहित्य की निन्दा ही कर रहा हूँ। प्रचार की प्रक्रिया का दोपपूर्ण कौन कह सकता है, हम सब अपने प्रचार में दिन-राव संमम यते।हम को साहित्य को मान्यताएं कुछ भी कहते हैं, जो कुछ भी सिखते हैं, यह सब अपने दृष्टिकोण पौर पपने मव के प्रचार के लिए छ सो करते हैं। मन्सर केवल इतना है कि इस स्थान पर हम अपने भाषनारमक सत्य को प्रतिपावित करते हैं। पर हमारा यह मापनारमा सस्य क्या वास्तव में सामाभिक सत्य पन सकता है? क्या हमारा भावनारमा सत्य दूसरों के लिए कल्याणकारी मन सकता है? मेरा ऐसा मत है कि अपने सत्य का प्रचारित करने की अपेक्षा सामायिक सस्प को प्रचारित करना पमिक प्रेयस्कर है। बहाँ तक वोविक प्रकिया का प्रप्तहे, वहाँ में प्रगतिवाद को प्रचायत्मक प्रति को किसी भी हालत पर साहिय का क्षेत्र मावमा है, और भावना के क्षेप में में प्रगतिवाद को निर्मस पाता हूँ। प्रगतिवाद में मावना क उदात्तीकरण मासा कम नहीं है। इस माव को मुझे सष्ट करना पड़ेगा। प्रगतिबाप एक रायनीतिक वर्शन है, यह वर्णन इसके प्रवर्तक के मन में भावना के गम में ही पाया होगा लेकिन उस भावना का बुद्धि ताप पुष्टीकरण किया गया। अपने बोरिफ पुष्टीकरण के कारण ही यह एक सामामिक दर्षन बन सन और बाद में यह रामनीति में अपनाया गया। दायनिक प्रतिपादनामों में मंटन की प्रपेक्षा यान पधिक होता है, और राजनीतिक दर्तन मो मार्यान्वित छिया पाय उसमें स्पापना के लिए प्रथमित राजनीतिक व्यवस्था का विनाच प्रत्यावश्यक है। बिनाशके कम में हिंसा और पूणा का पाना भी पनिवार्य है। हिंसा पौर पूणा को बहन करने के लिए मनुष्य में काप का होना भी मावश्यक है। इससे मह स्पष्ट है कि प्रगतिवाद समार की मोटिक म्पबस्मा पर विश्वास करता है, भावना के उवाप्पीकरण पर उसमा विश्वास नहीं है। प्रगतिबाद एक ऐसे भौतिक दर्शन का माय हे जिसमें प्रास्पा नहीं है, सिमें मानव के भागमात्मक विकास पर विश्वास नही समारकी पावत्यमसामों पौर समाज के प्रति मनुष्य के उत्तारवायिस्व को स्वीकार कसे हुए भी इस बात से इनकार से किया जा सकता है कि समान पछियों का समूह है, और धमाके निर्माण में तमा संपालन में अधिक प्रमाण बहन मषिक है। मार्क सभी बेकिक भावनाों से ही वो समाजवाद का वर्णन मिसा सेनिन के म्पधिप ने उस समारबाव मो एक स्प दिया। प्रगतिवाद में वेयचिन सवत्रता को स्वीकार नहीं दिया जाता। मेरा पुष ऐसा अनुभव है कि कोई भी रामनीतिक प्रपना सामाजिक प्पबस्मा इमानदार, संवेन्नधीस और त्याग की भावना से युक्त पति के झप में पमर रख दी पाप तो जनता कर उससे पस्पारा होमा और प्रगतिवाद-उपयोगिता प्रपमा प्रभार मगर वही म्यवस्था छूर, येईमान अपने में वे हुए प्रादमो के हाप में पर माय तो उसका परिणाम भयंकर होगा। दार्शनिक अपवा गबनीतिक व्यवस्पा बितना महत्वपूर्ण है उससे कुछ अधिक ही व्यवस्था को पसाने वासा यति है। ऐसी हामध में यह मापनारमफ कसा पौर साहित्य को मावना के उदात्तीकरण का सबसे अधिक सक्षम पोर समर्थ माध्यम है, उसे यमनीतिक निम से बाँप देना अन्सवोगस्था अहितकर ही होगा। प्रगतिबाद समाजबादी देशों के दायरे के बाहर पासे देशों में गोमपना स्पान नहीं बना सका उसका एक कारण यह भी है। प्रगतिवाद का एक बहस या प्रवगुण है प्रसहिप्णुता। कोई दूसरी विचारभारा प्रगतिबाव के लिए पर्मिस पार त्याम्प हे । कृष ऐसा मगता है कि प्रगविवाद मार्क सवाद के प्रागे किसी अन्य प्रकार के बोटिक और सामायिक विकास पर विश्वास ही नहीं करता। हिन्दी साहिल्य में प्रगतिवाद ने प्रारम्भ में एता के साथ अपना कदम यममा। इसका कारण मह पा कि बिस समय प्रगतिवादमा पन्म हमा, हिन्दुस्तान मिवेशियों की गुलामी में जमा हुमा पा । पचपि प्रमविवाद में उस समय गुलामी के प्रति विद्रोह की कोई व्यवस्था नहीं थी यह दो फेवस वर्ग-संघर्ष को लेकर मागे मढ़ा फिर भी हमारे विदेशी-सत्ता से युद्ध में वर्ग संघर्ष को एक अस्पप्ट-मानना प्रवक्ष्म पी क्योंकि जमींदार पौर उम-मध्यवर्ग के मोग विदेधिों में साप थे। और इसीलिए प्रगति बाप का असली स्म प्रारम्भ में सेवळ पोर साहित्यकारों मे मही देवा। उस समय प्रगतिवादी एक महर-सी दौड़ गई पो सारे देश में। प्रनासिवाद का प्रसमी स हमारे देश के सामने भामा रितीय महापुर के समय बर मारतवर्ष की कम्यूनिस्ट पार्टी मे १९४२ मामे पान्योसन में मोर-पुत्र के नाम पर अंग्रेज शासकवर्ग का साम दिया। उन्हीं दिनों या उसके कुछ बाप ही सप्ट स्म से प्रपतिबाव के करापारों मे यह पोपित भी पर दिया कि प्रगतिवार सम्पूनिस्ट पार्टी का सांस्कृतिक पोर प्रपापरमा पक्ष हे। और उसके बाद हमारे देश में प्रगतिवार का हास भारम्भ होता है। प्रगतियोस पोर प्रगतिवादी साहित्य में एक स्पष्ट प्रस्तर हे, पिसे इच स्थान पर समझ मना पाया। प्राचीन परम्मपर्मों से भिन नवीन मान्यताएं स्थापित करते हुए यो मी माहिन्य सिमा माय वह प्रगतिशील साहित्य है। इस प्रगतिशील साहित्य पर कोई प्रतियम्भ नहीं होने दो भी नहीं सकते। रवीन्द्रनाथ बकुर के सादिप पो प्रारम्भ में प्रगतिशील साहित्य पहा यया क्योंकि वह प्राचीन परम्परा से मिल पासायावादी ૨ साहित्य को मान्यताएं कापियों की कवितामों को भी कुछ लोगों ने प्रगतिशीस हा। इस 'प्रगति शम्द में एक प्रकार का माकर्पण है नबयुषक वर्ष मो अनायास ही इस प्रगति शुम पर एक प्रकार की भास्पा हो माती है। पौर प्रगति शम्द में इस सम्मोहन-युक्त प्रार्पण के कारण ही समारवादी परम्परा ने इस सम्य को अपने साहित्य के विशेषण के स्म में अपना मिया । उसका प्रयोमन यह पा कि अपने सिद्धान्तों को वह सारी दुनिया में प्रगतिशीम घोषित करके दुनिया में उनका प्रपार करे, मौर उसके विष्य बो भी मत है उनका संग्न करे। अपने दार्शनिक पक्ष से ममग प्रगतिवाद के कुछ सिवान्त भाग दुनिया में अपना लिए गए हैं। उत्पीड़न पौर सोपण को प्रान कोई भी उचित नहीं कह सकता वर्गभेद मिटमा चाहिये, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता । समामवाद ने कुछ सस्य तो इस दुनिया को दिये ही है, पौर समस्त विश्व की बौद्धिक पेतना इन सत्यों को स्वीकार गरी है। यह सत्य समस्त विश्व की मान्यता के माग बन चुके हैं। साहित्यकार भाखिर मनुष्य है, अपनी एडियो वह अपने से प्रसग तो नहीं कर सकता। विश्व की बारिक पेतना की भावनात्मक संवेदना को ग्रहण करमा प्रत्येक श्रेष्ठ-साहित्यकार का स्वाभाविक कम हुपा करता है। इसलिए पापारसूस म सही मेकिन कुछ महत्वपूर्ण मानताएँ तो प्रगतिबाद ने हमें दी ही हैं। प्रगतिवारमा एक महत्वपूर्ण सिंमान्स मो अन्य विधारपारा बासे देशों में भी अपना लिया है, यह है कि राष्ट्र के विकास और निर्माण में जनवा में भावनात्मक सहयोग जगाने के लिए साहित्य को सहायता मेमा नितान्त प्रावश्यक है। हमारे देश में भी विकास कार्यों पर गीत नाटक कहानियां और उसम्पास सिसवाए गए हैं। पपपि ऐसे साहित्यमा भावना-पक्ष मोड़ा-बहुत शिपिस हाता है, पर यह वो मेखका और साहित्यकारों के पुनाव पर तवा उनका उचित सुमिमाएं प्रदान करने पर निर्भर है। एक प्रथा साहित्यमार भगर यह प्रयत्न करे तो इस प्रसर के साहित्य में सबम मानना-पक्ष दे सकता है। पर इस काम के लिए साहित्यकार में स्वयम् एक प्रकार का उत्साह होना चाहिए, और भाग के भौतिक नगर पा समस्त उत्साह माजीविका में है। यहाँ मुझे एक रोपर यातपीठ को दिल्ली के एक माई० मा एस. सेक्रेटरी सहई पो याद मा रहा है। वह मधिकारी ममता में भावनात्मक प्रचार के लिए साहित्य पो भावस्पर समझ कर पिसी रिसेपनिकास कार्यक्रम पर एक नाटक निसवाना पाहते थे। उन्होंने मुझसे कहा, 'हम पार-मौ रुपए का एक पुरस्कार पापित करना पाहते है उस ममेष्ठ नाटग प्रगतिवार उपयोगिता अथवा प्रचार पर पो इस विषय पर लिखा जाय । इसके लिए मैं एम. नाटक-प्रतियोगिता का विज्ञापन दे रहा हूँ। इसस में एक प्रधा माटक मिस गापगा। मैंने उनकी बात पर कुछ देर तक सोपा फिर मैने कहा "मापको एक प्रम्या पौर सफस नाटक किसी हासत में नहीं मिल सकेगा। उन्होंने पाश्चर्य के साम प्रा क्यों क्या यह पुरस्कार मेडकों के लिए यथेष्ट मानर्यण न होगा ? पुरस्कार के लिए हम सम ५००) से बड़ा कर १०००) कर सकते है। इस समय तक मुममें एक तरह की मुझमाहट मा गई थी। मैंने कहा 'देखिये मापको चार हजार रूपया महीना मिलता है-इस कार्य कम से प्रशासन सम्बन्धी कार्य सम्हासने के लिए । पाप सफल है अपवा पसफल है, इसकी कोई शर्स महीं। मौर एक सेना को पाप केवल ५००) पा १०.०) रुपया देना चाहते हैं एक अच्छा नाटक लिलवाने के लिए पिस लिखने में से प्राय तीन चार महीने मग जाएंगे। पार महीनों में भापको तो १६०००) मिम गएपोरमेखक कोमिना १००० रुपया। फिर प्रतियोगिता में किसका नाटक सफल होगा यह नहीं कहा जा सकता। मगर धासीस मेसकों ने प्रतियोगिता में माटक भेने तो ३६ लेखों मे मुफ्त में कलम पिसी पोर तीन चार महीने मप्ट किये केवल एक मो एक हमार मिमा । तो मेम्पक को यह समा मिलेमा इसका भी ता भरोसा उसे नहीं है क्योंकि नाटक को पुरस्कार मिसने में उसके साहित्यिा मूल्य के साप प्रतियोगिता + निर्णायकों पी सनक भी सम्मिसित है। प्रम पाप हो समझ से कि कोई सफर स्माभिमानी और समर्ष मसक फिम प्रकार प्रापो सपना महयोग दे सकता है?" मुझे म्पचिगव मनुमन तो नहीं है, पर प्रपन स्प के पास मेखक- मिों मे ममे सुनारे रिकम में माहित्यकारों को साधारण प्रयासकों स प्रधिष रुपमा मिपता है । किसी भी योपना का भावनात्मक पर उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उममा बोरिक और उपासन पर। पूंगीवारी ममारवादी पौर पर हास में रिफासत होने वासो पफसर वाली मिमी-जुसी परम्परा में मिसान्त क रूप में समाजवाद का प्रतिवादी एप्टिकोण मिसान्त कम्प में भले ही मौकार कर लिया गया हो पर इस एप्टिोरम को माम्बित करने में बहुत अधिक कठिनाइयो पदम-मयम पर मिमेगी। प्रगति के प्राधार-मूम मिदामों में प्रमर पौरपावत साहित्य की रचना बोर नहीं है-यह भी में निसंकोष पड़ सकता हूँ। सामपिक समस्यामों पोर मावश्यावाों पर निया जाने वाला साहिम्म बम सब १४ साहित्य की मान्यताएं तक जीवित रह सकता है जब तक ये सामाजिक समस्याएं और मावश्यकताएं मौजूद है। वैसे अधिकांश म्यावसायिक साहित्य समय की माय ही पूरा करता है, मेकिन उसके कुछ भाग में प्रमर और शाश्वत साहित्य में सम्मिलित किये जाने की सम्भावमा अवश्य रहती है। प्रगतिवादी साहित्य में यह सम्मावना एक तरह से नहीं के बराबर है। कविता के रूप में तो प्रगतिवाद सबसे अधिक निर्वस उतरता है, पौर कभी-कभी वह हास्यास्पद दिखने मगता है। किसानों पौर मजदूरों की समस्या पर तथा उनमें चेतना पैदा करने वामा शिष्ट साहित्य उन किसामों और मजदूरों की समझ में नहीं भाता। बौधिक मा मौर बौदिक वादों को समझने की क्षमता उन ये पड़े मजदूरों भौर किसामों में नहीं है, और शिक्षित मध्यवर्ग वासे पावमी के लिए वह कविता है नहीं क्योंकि उसकी संवेदना को यह जागृत महीं करती। कविता के क्षेत्र में प्रगतिवाद की इस कमगोरी के प्रवर्तकों में स्पष्ट देख लिया है, और समाजवादी देशों ने पव प्रगतिवादी कविता के स्थान पर सोकगीतों तपा प्रम्य मोकासामों को महत्व देना प्रारम्भ कर दिया है। पर भारतीय भापामों में और हिन्दी में मान के दिन भी प्रगतिवादी कविताएँ सिमी पा रही है। परम्परागत कविता में तमा प्रतिवादी पविता में भेव रूप मा नहीं है, बस्तुविषय का है। पोर इस पस्तु-विषम में भी भेद दृष्टिकोण का है। मगदूर पर एक कविता मिसी पासावी है, मजद का शापण करने वालों में मजदूरो के प्रति संवेदना उत्पन्न करते हुए या समान में मगद के प्रति संवेदमा उत्पन्न करने के लिए। पौर मगदूर पर दूसरी कविता सिखी पा सकती है उसे अपने प्रपिसार पौर शक्ति का मान कराते हुए सपा उसे उमसाते हुए कि वह पूगीपतियों के मकानों में प्राग भगा दे वह पूनीवारी को कत्ल कर रे बहहातान करके पूरीवादी र दिमामा निकममा दे। और यहीं साहित्य के उद्देश्य में अन्तर पर जाता है। जहाँ पहली मपिता भावना से उरातीकरणका सिमान्त स्वीकार करके परम्परागत कविता को कोटि में मागाएमी वहीं दूसरी मविता समारवादी व्यवस्था का प्रचार करते हुए क्रान्ति पौर मूट-मार तो करवा देगी वहसमान में विकास काम महीं सा सकेगी। प्रगतिवाद का मूल रूप धीरे-पीरे मप्ट हो रहा है, भाव विषय में पुणा-हिंसा रख्यात के प्रति ममास्या पैदा हो गयी है, मोर प्रमुप समार बादी रेशम्स शान्ति पा सबसे बड़ा समर्षक बन गया है।

दसवी परिष्वेद प्रयोगवाद अथवा नयी कविता कविता के क्षेत्र में मात्र नौ सबसे प्रषिक मुसर है, का सबसे अधिक प्रचलित है, और साहित्य में मान्यतामों के लिए यो एक बहुत महो पुनौती के रूप में स्थित है, यह है प्रयोगवाद । इस प्रयोगवाद का कोई व्यावसायिक पक्ष महीं है. यह प्रयोगवाद की कविता बीविका के उपार्जन केसिए महीं सिखी बाती इस प्रयोगवाद के प्रवर्तक ये लोग हैं जिन्हें थममीवी साहित्यकार नहीं कहा जा सवा षो या तो दूसरे मों में मगे। मेकिन जिहें साहित्यकार कहलाने का शौक है, या फिर वे शिक्षित और प्रपिकाश में उठते हुए मपयुवक है मो साहित्य को अपना पापार-स्पस बना कर दूसरे पेक्षों पर प्रसोग मारना चाहते हैं। कविता के क्षेत्र में प्रयोगवाद पवना सबल पन बाने का एक बहन का कारण यह है कि यह मुग कविता का नहीं है, कविता की मिन्या किती नहीं है और इसलिए मणिबंध में कविता स्वान्त सुचाय मिबी जाती है । बैसे मनादिकाल से स्वान्स मुखाय, पदि फेसन सोक के लिए विवा मिखने की परम्परा रही है, मेकिन साहित्य का प्पापणाविक पक्ष विकसित हो पाने के भाव मह चौक के लिए मिसी पामे बासी कमिवा साहित्य की माम्मवामों से दूर हट गयी थी। र पोरामास पविता मिलते है या दूसरों से सिसवा कर स्वयं अपनी महार से पाते थे और उनके मामियों को वन कवितामों की प्रशंसा मी करनी पड़सी थी पर बह कविता कमी मी प्रथसित नहीं हो सकी। कमा मनुष्य में एक सामाविक और प्राकृतिक प्रवृत्ति केस में चन्म सेती है, लेकिन उस पसा के निसार में सापना पौर परियम की मावश्या होती है। इस परियम और साधना का प्रत्यन्त प्रावश्यक प्रेम माना गया है 'एनिष्ठा । इस 'एनिष्ठा' भी उपसम्धि के लिए कसा का पत्ताकार में व्यावसायिक प मेना निवास्त भाषश्यक है क्योंकि जीवित रहने के लिए पानीविका सबसे प्रपम पाती है। महान् पौर प्रप्टा कमारों के सूखे पहार प्रपनी पमा साधना करने के पो उगहरप पिबा है, वह कला में इसी एनिम्य को महत्व देने के मिए । पौर इसीलिए जब किसो बमा प्रप्यावसायिक प्रपया मामीविन साहित्य की माम्यवाएं देने मामा पक्ष मायब हो गाम तब उस फसा का हास अनिवार्य हो पाता है। इने गिने परिवारों में कला के सिमट पाने के उदाहरण कसा के इस, पानीविका पक्ष के कारण ही मिसते है । महोवनों मर्सकों, चित्रकारों मूर्तिकारों के पानों की परम्परा प्राय भी हमारे देश में यदा-कदा दिस पाती है। यही नहीं कक्षा के इस म्यावसायिक पक्ष के प्रापार पर हमारे देश में जातियां तक बन गयो पी। कथिों में पारणों की प्रमवा भाटों की बाति को हम पो तरह बानवे है, मर्दो की मातियाँ भी भागों की पाविया पी। कला के व्यावसायिक फम के स्पान्ठर के कारण म हमें पाप पारण मिमते हैं, न हमें पाग नट दिसते है पौर म भोर ही दिखते हैं। वैसे प्रशस्ति-गायन की प्रवृत्ति हमारे समाज में वैसी की वैसी मौजूद है पौर हर समान में प्रशस्ति-गायन करने वाले मोम मिसेमे । राजाओं और सामन्तों के स्थान पर मान मन्त्रिों और पूंजीपतियों पर कविता सिसे पाने के भनेक उदाहरण मुझे विते रहते हैं । भेडेती करने वाले मनुष्यों की समान में कमी नहीं है, प्रपिक से अधिक सम्प और शिक्षित समाज से सेकर मधिक से अधिक विकसित समाग में दो-चार पचि ऐसे मिलते हैं जो पूरी समा को हंसा सकें। नट की कमा में कुश्चम कुछ मोप हर जगह मौजूप हैं। इस प्रकार के कुछ मोग समान पौर जाति की परम्परा में रहते हुए भी अपनी कला को अपनी पाजीविका का सामन मना मेते हैं । राम्यापम में पुरस्कृत होने वाले पापियों को में मानवाई यपि में धारण नहीं है, फिल्मों एवं नाटकों में हास्य का अभिनय करने वार्मों को मैं जानता हूँ यद्यपि वे मार नहीं है सकंध में काम करने वाले कुछ मोगों को मैं मानता हूँ यपि वे नट नहीं है। में पहले ही निवेदन कर पुत्र हूँ कि साहित्य में धम के उपारस होमे के कारण साहित्य का बौद्धिक पक्ष सबस हो गया है और परिणाम रूम में बोक्षिक विकास के युग में साहित्य को मन्य मामों की प्रपेक्षा मषिक विशिष्ट परि श्रेष्ठ समय आता है। प्रमुक कलाकार की कप्ता ग्रेष्ठ हे पपपा निकृष्ट है अमुक पसापर भी कमा समाज के सिए उपयोगी है मपवा समान विरोधी है, इसका वर्गीकरग मी सो मौलिक प्रक्रिया है। यह पौरिम प्रमिया वैयक्तिक हो सकती है, यह सामामिक भी हो सकती है। पर इस मौद्धिक प्रकिया सरा वर्गीकरण सामाजिक ।

प्रयोगवाद मपवा मपी कविता पर ही महत्त्वपूर्ण है, वैयधिक पसन्द पपवा नापसन्द से मन्य मोगों को का प्रयोगन नहीं होता। इसके ये प्रर्य नहीं कि मैं कला के पेयक्तिक प्रपवा पारमगत पक्षको अस्वीपर करता हूँ कमा का यह प्रात्मगत पस ही कला को प्राणवाम् बनाता है। पर समाव में कसा की स्वीकृति उसके वस्तुगत पक्ष पर ही निर्भर हे क्योंकि यह बस्तुगत पक्ष ही सामायिक पल है । कमा का यह बस्तुगत पक्ष उमर से सप्ट पोर सीपा-सादा दिससे हुए भी कुछ मजीव नममनों से भरा है । म्यावसायिक कमा सर्वया इस पस्तुगत पक्ष के अन्तर्गत माती है, लेकिन नित्य प्रति पदलतो हुई सामाणिक मान्यताओं के कारण पता का मह पस्तुगत प्टिकोण भी बदमता रहता है । फिर व्यावसायिक कसा निक्षेप काल और परिस्थिति की सीमामों में बंधी होती है। कमा को समर्म और सक्षम मनासा हे कसा का मास्मगत पक्ष। कसा का यह प्रारमगत पक्षषो फमा को महान बनाता है, वह कला को निकृष्ट कोटि की मी बना देता है। क्या महान है और क्या निकृष्ट है माघिर इसका निर्णय कौन करेगा? उन्माद भनीसवा उदात्ती करण-ये सव सामाणिक वर्गीकरण हैं पति के साप तो यह सव स्वामाविन पौर प्राकृतिक प्रवृत्तिया भर है। पता का उद्देश्य तो अपने को समान पर प्रारोपित करना होता है मौर समाव केवम उस पीज को स्वीकार करेगा जिसे वह नबित प्रमषा श्रेष्ठ समझता है। इसलिए पमा या पारमगरा पक्ष विना उसके वस्तुगत पक्ष के निरर्पक पौर हिन्दी में प्रयोगमाद मिवेशी प्रमाव से पाया है मोर प्रयोगवाद के प्रवर्तक और उपासक वे मोग हैं जो सप्ट रूप से अपवा गौण स्म से पारधारय विचारपाप से प्रभावित हुए हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से प्रयोमपाद प्रगविवाद से प्रषिक पुराना है, प्रयोपवाव का गम अमेरिका में पास्ट हिटमैन की कविया के साप हुमा है। इस प्रसय को प्रागे बहाने के पहले मुझे एक पान पोर सप्ट कर रनी पड़ेगी वह यह किकमा की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है नवीनता की सष्टि। यही नवीनता तो पति को निमी रखता है। इसी प्रवृत्ति के कारण सा पिनसोरमुख होती है। नवोनता का गो सर्वमान्य रूप पपिच मोगों मे समम पसा है वह है प्रपत्तित परम्परा से मिल किसी चीज को पक करना। यह मवीनता मामे पढ़ने में हो सकती है, यह पीछे हटने में मो हो सकती है। 'पीछे हटने से मेरा प्रयोगन चन निप्ययोजन है।

साहित्य की मान्यताएं वीवों को प्रस्तुत करने से है जिन्हें हम बहुत पहले छोर के हैं। मोक मामा को अपनाने की प्रवृत्ति बो माग दिसती है वह मबीनवा के नाम पर इस पीछे हटने की प्रवृत्ति की घोतक है। पास्ट हिटमैन ने छन्दों के बाषन को तोड़फर केवल मय के साभार पर कविता सिसी। छन्दों के बन्पन में रहते पाहुव कुछ महीं सिसा या सक्ता पो बिना पद पासी केवल सम्युक्त कविता में सिया मा समता पा। पास्ट सिटमैन ने छन्दों के बन्धन को तोड़कर कविता में विविध प्रकार के ऐसे विपर्यों को समाविष्ट करने का जो उसके पहले कविता में नहीं मिसे पाते पे एक साहसपूर्ण कदम उठाया । पास्ट सिटमैन की कविता का अमेरिका में गो का स्मागत किया गया और बास्ट विटमैन का एक ऐतिहासिक स्वाम बन गया है। इसे हम वास्ट हिटमैन की सफलता अवश्य कह सकते हैं पर इसे उस मबीन कविता को सफलता नहीं कहा जा सकता विसकी नींव वान्ट विटमैम मे गमी थी। मैं वो कुछ कह रहा हूँ उसे स्पष्ट करमा मेरे लिए प्रावस्या हो बाया है। मामब-समाज में नियमों में बंधने की विपित्र प्रवृत्ति है और इसी प्रवृत्ति के कारण मनुष्य सामायिक प्राणी बन सका है। और इसीसिए मानव के हर एक विचार मौर हर एक कर्म में यह मियम की अनिवार्यता मिसती है । पर ममुप्य सामानिक प्राणी होने के साप-साप विकासोन्मुख भी है। इसलिए मनुष्य उन नियमों को पो पुराने पर जाने के कारण हानिप्रद सिट होने लगते हैं, वोड़कर नवीन नियमों की रचना करता है पौर नम नबीन नियों के अनुसार मापरण परते समता है। मानव में इस प्रकार के नियम परिवर्तन मा कम बोटिक नहीं है, यहम्म गुरु म से भावमात्मक है, बुटिका फेवस सहाप मिमा पाता है। हानिप्रय वर्तमान के प्रति विद्रोह समाज द्वाप नहीं भारम्म होता है, यह तो प्पच्यिों द्वारा भारम्भ होता है। प्रारम्भ में समाज ग्रिोही पहियों का विरोध करता है, उन्हें वासित मरता है, उमें दण देता है। पर पो स्वाभाविक हे और सत्य हे वह दबसा महीं समाय द्वारा दमन के होते हुए मी प्रम्य म्पति मावमारमक रूप में इस विद्रोह को प्रपनाने समते हैं पौर सध्यि विद्रोह करने वालों की संस्था बहती रहती है। पन्त में मावनारमक चेतना धमान में इनी प्रपिक गागृत हो जाती है कि दमम बन्द हो पाता है और यह विद्रोह नाय पारोपित नियम समस्त समान द्वारा स्वीकृत हो जाता है। प्राचीनता के विषय यह मेपनि विद्रोह सही भी हो समन्या है, मसत । प्रयोगवाद अपवा नयी कविता भी हो सकता है। इस सही-गमत का निर्णय कर्म-प्रपान परम्परामों में तो पस्वी ही हो जाता है, विचार-अपान परम्परागों में यह निर्णय काफी समय मेवा है। वाट विटमैम का यह विद्रोह विधार-प्रधान परम्परा के पन्तर्गत पाता है। फिर यह विद्रोह कम प्रधान परम्परा के अन्तर्गत न पाने के कारण स्पष्ट रूप से समाज विरोधी भी नहीं कहा मा समता। वास्ट हिटमैन के इस विद्रोह मे दुनिया को पकित कर दिया। उसने दुनिया को एक मनोम पीप दी यह निश्चित पा प्रौर मवीनसा के प्रति मोह मानय की स्वाभारिक प्रवृति है। परम्परामों से जानी दुनिया को बास्ट हिटमैन में एक तप की नवीनता मिली पौर मोगों ने इस मयीनता का स्वागत किया। बास्ट हिटमैन का साहिस्पिक महत्व उतना अधिक नहीं है जिसमा पपिक ऐतिहासिक महत्व है। दुनिपा को वास्ट लिटमैम की कपिल ने सना भपिक प्रभावित नहीं किया निवना पपिक उसकी मबीनता ने प्रभामित किया । मौर बास्ट हिटमैन की यह नवीन प्रकार की कमिठा फेवस मवीन होने के कारण काफी प्रषिक रिकी । इसका परिणाम यह इमा कि पम्प उठते हए कवियों में भी वाल्ट हिटमैन का अनुसरण पिया। इस कविता में प्रधानता पिता के विषय वस्तु को तो दी ही गयी पी, पुष ऐसे विपर्यों का समावेश कर के जो परम्परागत कविता में नहीं समाविष्ट किये गाते थे पर इस कविता में कविता के रुप के साप एक बहुत बड़ा प्रयोग किया गमा पा। मावृति युक मय मिसे हम छन्द कहते है, उसका परियाग तो घ्यिा ही गया था स्वयम् सप की रिमिनवा के साप मए-नए प्रयोग किए गए। इस रूप परिवर्तन में नवीनता के पमस्कार मा प्रश्रय बहुत प्रपिक सिया गया। पास्ट हिटमैन के बाद वाले पारियों मे दो पुछ यो प्रभीर-गरीय प्रयोग किये जोहास्यास्पद तक कहे गा सकते हैं। पर इस नए प्रकार की कविता या स्म निरित करने में किसी भी पकिको ममी तक कोई सफससा नहीं मिल सकी। सय अपनी प्राप्ति के कारण ही स्थित है पौर पहवानी पासी है प्रावृत्ति हटने के बाद-सय स्वयम् हो कविता से गायब हो गया । इस अपार सय पौर सही पावृत्ति का परिपागतो किया गया पर उसके स्थान पर पिता का कोई दूसरा स्प बन हो नहीं सका । पुठ म्यागरण युक गय के स्थान पर वोड़ा-मरोगा पौर प्याकरणहीन गप पुष मनीष वए के मस्पष्ट पार पुस मावों को बाप कर या तीन कविता बनी।

साहित्य की मान्यताएं मोगों को पाश्चर्य हो सकता है कि यह कविता प्रपनी इन समस्त विकृतियों के साप मागे से बड़ सको। दुनिया भर में मोइस ममीन प्रकार की कविता का मिया जाना प्रारम्भ हो गया यह क्यों ? यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। जनता में इस प्रकार की कविता का इसके धादि फास में बो स्वागत किया वह इससिए नहीं कि उसमें किसी प्रकार का रस पा स्फि इसलिए कि इस प्रकार की कविता में कुछ नयापन दिखा उन्हें । यहाँ पर यह भी स्पष्ट कर देना अनुचित म होगा कि इस प्रकार की कविता + युग का प्रारम्म उस समय हुमा सव इस सारी दुनिया में कविता का युग समाप्त हो रहा पा मोर कविता के स्थान पर कहानी- साहिय ने साहित्य में अपना प्रमुख स्पाम बना सिमा पा। उन्नीसवीं सती से दुनिया में एक मए युग का प्रारम्भ हुमा बिसे हम मौविक वस्तुवादी युग कह सकते हैं। इस बोरिक वस्तुवादी युम का श्रीगणेश गिसे हम अंग्रेजी में स्ट्रियम रिवोल्यूशन ( Industrial Revolution ) कहते हैं पौर हिन्दी में प्रौद्योगिर झान्ति का सफते हैं उसके साम पारम्म हमा । मनुष्य ने विज्ञान को भीवन की उपयोगिता का सापन मनाया तत्वों के इस्र्पो को मानकर मनुष्य में इन तत्वों का अपमे मोयोगिक विकास में सहारा सेना भारम्भ किया। भाप मिममी पनि हर तरफ मनुष्य ने प्रगति की पौर उसके अन्दर यह धारणा वैठ गयी कि मनुप्य स्वयम् का है, मनुष्य की युति ही समर्प मौर सक्षम है। विज्ञान के नवीन माविष्कारो से मनुष्य की बुधि एक बारगी सक्रिय हो उठी और मनुष्य में जीवन की माम्मताएँ ही बदम गीं । दाम मोर पर्म से दूर हट कर मनुष्य की दुटि मौठिक ज्ञान से उसझ गयी प्रकृति पर विजय पाने की होर-सी मग गयी मामय समाज में। मशीनों के निर्माण के परिणाम- स्वम्म मनुप्प के स्थान पर मधीम ही उत्पादक बन गयी उन मपीमों पर काम करने पाले मनुप्प भी मशीनों के कम पुरनों की मांति काम फरमे सगे। प्रेरणा प्रमपिनव मनुष्यों से सिमट कर एक पति में केन्द्रित हो गयी मिसे मिल-मासिक कहा जाता है मोर इसी स्ट्रियन रियोस्पशन के परिणाम स्वरूप पूजीवाद का भग्म हुमा। मीबन की मान्यतामों में मामूल परिवर्तन का प्रभाव साहिस्य की मान्यतार्मों में मामूल परिवर्तन के रूप में पड़ना अनिवार्य पा। मनुष्य का मीवन पुर भावनात्मक स्वर से हट कर बोरिफ-स्तर पर मा पहा मौर इसका सपसे पड़ा प्रभाव करिता पर पड़ा। इंगसैप में उप्तीसगी पती के पूर्णर में भो रोमेन्टिक रिवाइवल ( Romantic Reviral) प्रदि ।

प्रपोगवाद प्रपया नयी कविता . नववना को महर पाई उसने पिता को माया-पक (Abhtract) बनाने के साप एक प्रकार से उसके हास की दिशा मी रमित कर दी। पद् समर्प, गाइरन ोसी कीट्स प्रादि कवियों की परम्परा टेनोसन पौर राबर्ट बुक्स वफ पाते मावे समाप्त-सी हो गयी युझने के पहले मिस तरह दोपक को सौ एकवारगी हो प्राग्यस्यमान हो जाती है, उसी प्रकार कबिता भी प्रापपीन पार दशकों के लिए एनधारमी हो महत्वपूण वन कर हास की प्रोर ममिमुख हो गमी 1 यही हास हिम्मी को कविता का मो हुमा कुछ काम के बाद क्योंकि मशीन युग हमारे देश में कुछ बाद में पाया । पंत प्रसाद निरामा प्रावि कषिर्यो ने घायावाद के रूप में विता को जो मया मोड़ दिया उसके बाद कविता एकबारगी हो हास की पोर बढ़ गयी। इस हास का कारण मनुष्य का प्रारमगत दृषिको उतना अधिक नहीं हे मिटना प्रषिक मनुष्य का वस्तुगत प्टिकोण हे । जेसा में पहसे कह चुका कला का वस्तुगत मूल्यांकन कसा के घमन में सबसे पपिक महत्वपूर्ण हुमा करता है । जिस समय बसा को ग्रहण परमे वासे कम हो बाप या मोप हो गाय उस समय कला का गोवित रहना प्रसम्मव हो पाता है। भौतिक मोर वैज्ञानिक युग का मनुप्य कविता के प्रति उदासीम हो गया और समावस कविता की पुस्तकों की सिको बहुत कम हो गयी। राजामों मोर सामन्तों की समाप्ति के साथ पवियों के लिए राग्यामय समाप्त हो गया और शिक्षित मध्यवर्ग मी जीवन के संपों में इवना अधिक व्यस्त हो गया या उसझ गया कि उसके पास इतमीमान के साप कविता को पड़मे उसको इमामों का मानन्द उठाने काम समय गया न मर गया। येसे मनुष्य का जीवन हो भावमारमग हे पौर इससिए परम यौतिक विकास की अवस्था में मो कविता मीवित ऐगी पर कविता से सम्बपित माम्पतामों में मामून परिवर्तन होना पनिवार्य है। समय के साप कविता को समन्वय करने में समय लगेगा। पार पस्पना द्वारा प्रसम्मन की स्थापमा सोगों को स्वीकार नहीं होती पविता की प्रविधयोचिये प्रति पान के बोरिक मानव में प्रातिर स्प में मपि उत्सान हो गयी है। इस मबीन प्टिकोण मे यहाँ उपन्यास पोर पन्हानी साहित्य के विकास में सहायता दी है. यहाँ उसने कविता पो एफ्नारगो ही समाप्त कर दिया। इसका परिणाम यह हुमा कि पच्छे से मचे कपि की परिवाों की मांग भी जनता से गवो रही मौर इन बदसो हुई सामाजिश माम्पदामों के पुग में जहाँ पगियों को प्रश्रय पेने माने पमा और सामन्त १०२ साहित्य की मान्यताएं समाप्त हो गए, कनियों को भूखों मरने की मौरत मा गयी। ऐसी हासत में करिया को कविता छोड़कर गय की सरण मेनी पड़ी। माटक उपन्यास महानी, स्केष निवप मावि मितमे मी यच में फसा के साहिस्पिक स्पपे देविकसित हुए और प्यावसायिक रष्टि से साहित्यकारों ने इन कमों को अपना सिया । कविता फेवल मनबहसाव की पीन रह गयी भाजीविका के लिए कविता का कोई महत्व नहीं रह गया। मौर फसस्वस्थ प्राम के रिन कविता के प्रति साहित्यारों का गम्भीर रप्टिकोण जाता रहा। साहित्यकारों की परिमि के बाहर सापारण बनता में कविता की उपेक्षा ही मही होन सगी प्रार्षिक कारणों से कवियों का निरापर भी होने सगा। इसका परिणाम यह हुमा किकविता के माम पर जो कुष मिता जाने सगा वह केवस विद्रूप और प्पम बन गया क्योंकि मंग और विद्रुप स्वयम् में मनबहलान का बहुत बा सापम होता है "क्या कविता मर की। यह प्रश्न दुनिया भर के साहित्यकारों के सामने है। वैसे हिन्दी में प्रभी कविता की पुस्तफै पोड़ी-बहुत बिक माया करती है पर यह विकी भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। कविता पायकम पाठ्य पुस्तकों के रूप में ही बिकती है मौर जिम मावियों की कमिताएँ पाठ्य-पुस्तकों के रूप में विसती है,उनकी प्रम्य पुस्तकों की पोड़ी बहत निको हो पाया करती है, विशेष रूप से पुस्तकामयों में गिन वों की कविता पाठ्य-पुस्तकों में महीं सम्मिलित होती उनकी वितामों मने निकी बहुत मम होती है। पर फिर भी कवितामों के प्रति मोह तो बन-साधारण में है ही। हमारे देश में होने वासे अनगिनती कवि-सम्मेसन इमफे उदाहरण हैं, पथपि यह कवि-सम्मेमन कर सक समते रहेंगे यह कहना बहुत कठिन है। कवि-सम्मेलन माप तमाचां की भांति मनारसमा सापन है, पौर पानी मनिश्चित मान्यतामों के युग में पवि-सम्मेमों को में केवल प्रस्थायी सामूहिक मनोरञ्जम कर सापन समझता हूँ।यो पुष भी हो इन पवि-सम्मेसनों को देखने और इनमें भाग लेने के बाद मुझे कुष ऐसा अनुमय हमा मिना म्प सहित कविता है, यानी मिस कविता में मय है, छन्द है, तुकान्त हे-पानी जिस कविता को गति के पापार पर लिया गया है,वह कविता तो जनता द्वारा पाप होती है और जिम मागिता नोस्मि महीं, गो केवल एक प्रकार पापम्दवास है, उस परिवा को मनवा प्रहण नहीं करती।

1 प्रयोगवाद प्रभया मयो कविता प्पंग स्वयम् में मार के बोटिक पुग का प्रमुख अवयव होने के मासे भाषनारमक भी बन सकता है, मेकिन उसे मारनारमक बनाने के लिए उसे न्द की गति को प्रदान करनी ही पड़ेगी। यहाँ तक विप का प्रस्न है, यही नियम उसके साप मी सागू होता है, यद्यपि विप सयम् में एक प्रकार की निकृष्ट पौर प्रसुन्दर विकृत होने के नाते भावनात्मक बन सकता है इस पर मुझे पाक है। इतना सब होते हुए भी प्रयोगवाद साहित्य का एक निश्चित अंप बम पुर है, पौर इसको स्थापना के पीछे एक बहुस वही पाक्ति रहो है-राजनीतिम पेठना । प्रयोगवाद के इस सननीतिक पक्ष को समझे बिना हम प्रयोगवाद को वास्तविकता को नहीं समझ सकेंगे। यह राजनीतिक पक्ष प्रयोगवाव को मन्म देने वासा तो नहीं है, यह प्रयोगबाव का प्रमुख पोपक सव अवश्य है। प्रयोगवाद मे प्रगविवाद की क्रिया में अपना बस प्राप्त किया है। मेरे इस कवन पर प्रयोगबाव के समर्षक मौर प्रवर्तक मापत्ति भने ही करें, पर यह एसा सस्प हे मिससे इनकार नहीं किया जा सकता। समावणारी दो म विचार के नियत्रण (Regimentanan of thought) बाप्ती मोति पपनाकर जो प्रगतिवाद के माध्यम से मनुष्य को मानसिक गुमामी में बापने का प्रपन किया, उसकी प्रतिक्ष्यिा के रूप में प्रमोगवाद को मानसिक अपमाता के अपनाने में बहुत बड़ी सहायता मिलो । पैसे प्रपामगाव प्रगठिबाद से कहीं अपिक प्राचीन है पर विपायें की प्रपगमता का मुस्पष्ट रूप उसने धारण किया प्रगतिवाद की स्थापना के बाद प्रगतिवार को प्रतिध्या के रूप में। मानसिक या यों कहें कि विचारों की पराबाठा समान पिरोपी वस्व है, इससे बहुत कम लोग इनकार कर सकेंगे। प्रश्म इवना ही उटता है किस परामरवा काप पया है और समान विरोधी तत्वों को उभारने में यह पराजम्मा कहाँ तक सहायक होती है। बनतम्मवादी (Democratic) परम्परा में विचार-स्पात भ्य को बहुत बड़ी महत्ता दो गयी है, पर यह उमी समय वा पर कक वह समारपरोपी प्रवृत्तियो को उमारने में सहायक न हो। पश्मीन साहित्य के विषय विभिन्न मनतात्र पादो देवा में नो का प्रतिबन्ध मगाए गए हैं, यह इसी सत्य को प्रषिक्ष करता है माएम्म में कविता के क्षेत्र में प्रमविवाद मे प्रयोगवाद पर मनुसरण किया, पन्दों के मामा में पौर पदानमा दिपा के मामले में भी साहित्य की मान्यताएं मुझे याद है कि भारम्भ में पो छन्वहीन कविता हिन्दी में सिपी गयी उसे प्रगविवार का माम पिया पया। प्रगठियाय की नींव विचार-नियत्रण ( Regimentation d thoughu) पर पड़ी है और इसलिए इस प्रगतिवाद का भावनात्मक होने की अपेक्षा बौकिक होमा पधिक प्राकृतिक है। बोटिक्सा के मार्ग में पव महुव पड़ो रुकावट के रूप में माता है, इसलिए प्रगतिवाव मे कविता के रूप में परिवर्तन किया। विचारों के सम्बप में प्रगतिवार का पासा करम मा परम्परागत विचारों को नष्ट करना । इसलिए विचार के क्षेत्र में परम्परा के उपासकों को भरायकता के दर्शन होना स्वामाविक था। पर धीरे-धीरे प्रगतिवाद में विचार पुस्पिर हए, अमाववाद का रपनात्मक रूप पामे पहा पीर प्रपतिवाव मे पपना सुस्पष्ट रूम बना लिया। पर प्रयोगवाद में फसा के रूप पक्ष को स्वीकार करने से इनकार किया क्योंकि प्रयोगवाद पुर प्रयकता की मांग पर सग है । विषय मिरिण की प्रस्वीकृति फसा के स्म-निरिण की स्वीकृति से मिल कर एकाकार हो गयी। प्रयोगवाद की कविता को उसकी म्पहीनता के कारण कविता कहने में भी मुझे संकोच होता है। सन पारधारय देधों में बी प्रयोमगाद में पम्म लिया प्रव यह पनुभव किया चामे गा है कि प्रयोगवाद की पारा या समाप्त होनी पाहिये । कविता के साप यह सिलवार मासिर मय तक किया पापमा ! यह पग कविता का नहीं है, या कविता मर पुती है-यह धारणा मी नितान्त सत्य नहीं है। भावना दो प्रविनश्वर है, पौर मास होये हुए भी मनुष्य भाषमा को किसी हासत में महीं छोड़ सकता क्योकि मावना ही पोवन है। भावना को वहन करने वाले गय के भनेक प्रकार विकसित हो पुके हैं, पर गप में पाति पानीमम तो नहीं है जो भावमा पो पहन करने वाता मुसष्ट पौर सीधा-सावा माम्पम है। मनुप्य रोएमा मनुष्य गाएगा इस कदम मोर मापन के साप पर भी वो होने चाहिये। प्रपोगवाद में महता विषय-वस्तु को दो पाती है, स पौर शिम्प मो नहीं दी माती। मनुष्य बौशिक प्राणी है पौर पद मौलिक संसा है। स्वमावत मानव-समान पनादिकाम से साहित्य में विषय-वस्तु को महप्ता देता रहा है। मेफिन मापनारमक प्राणी होने के नाते पदों मो सय या किसी अन्य प्रकार की गति प्रदान करके मनुप्य मे पुट भावनारमा पसा का विकास मिया । स्म पीर जिस में ही मह मारनारमा गति पाई पाती है।

प्रयोगवाद मभवा नयी कविता माग के निम प्रयोगवादी कपि प्रपमी विसा को 'मयी कविता कहने सपे हे, और मुझे इस 'नयो कविता" शम्म पर कुछ पोड़ी-सी भापति है। प्रत्येक पिता मो सिसी गाठी है, पर सिसी पाठी हे मयी कविता होती है। 'नए प्रकार की गवा सम्य इस कविता के लिए मधिक उपयुक्त होगा। ऐसा भगता है कि स्वयम् इस मयी कविता के कवि इसकी महीनता के कारण इसकी सुस्पष्ट व्यास्या नहीं कर धाम के प्रषिको कपि यह मयो कविता सिस रहे हैं। इन कमियों मैं प्राय सब के सब धौक के लिए यह कविता मिखते हैं, मागोरिका के मिए यह कविता महीं विसी पासी। मौर मिस कला को बनता प्रहण महीं करती उसका वो स्पष्ट रूप से देखा वा सकता है।

ग्यारहवाँ परिच्छेद साहित्य का माध्यम गद्य सय मौर छन्दों की गति से होन गप में भावना को महन करने पर मक्षा हो सकती है हमारे मापोन भाषायो पौर साहित्यकारों में इस पय में सदा से कर रही है और सम्भवत इसी लिए हमारे प्राचीन हिम में गव का सपा प्रभाव दिखता है, सिवा माटफों के। टकों में भी गध मा महाँ-वहाँ, कपोपकपन केस में सहाय मर या गया है, उसे प्रमुखता नहीं दी गयी है । वस एक ग्रंप मिलता कावम्बरी' गिसमें घुस गय में कहानी के माध्यम से कसा का बन करने का प्रयान किया गया है। मादम्बरी का मेसा बाणमट्ट महान प्रतिमान् साहित्यपार पा टा साहिस्पकारों में पाएमट्ट का स्थान बहुस अमर पाता है। लेकिन टा-साहित्यकार होने के नाते यहां वारणमट्ट मे अपनी मेकिक प्रतिमा उगा तथा कहानी के सम्बन्प द्वारा मा की मष्टि में सफलता की वहाँ उनके बाद वाले अन्य कलाकार बाणभट्ट के मार्ग का सरण नहीं कर सके । इसका कारण सम्भवत मह रहा हो कि हमारी फोन साहित्यिक माम्पतामों के प्रमुसार पसानी को स्टाम्त मान कर जएवं पर्माको पोपक तप माना गया था उसे कमा मानने साहस पिसी मे महीं किया । पचपि प्रशात-रूप से कहानी को विधिप्ट मा प्रत्येक महान् कलाकार मे हमेशा पी. पर इन कमाकारों मे कहानी सहायक वस्व भर मामा कहामी को स्वयम् में कमा का मामार पिसी ही मामा । स्वयम् पाणमट्ट को पारम्परी प्रमकुत गव में मिमी है, और उसो पसंन्स गव को साम्य मामा गया है। पैसा में पहले मिदम कर पुष बहानी धर्मशाल पौर समार प्रका भाग होने के कारण भाववाद के नियमों से पी पी मोर भाववादयुक्त कहानी को ही माहिय में मापार केप में सीपार ग गया। बहानी के मौतहस मासे पक्ष को सा में वो भी स्वीकार मिया गया पौर म पिसा पायगा क्योंकि इन अहस से मरी मी में म पिसी प्रकार की माबनारमर प्रमिम्पति हैपौर म बौमिक टीकरण ।

१०७ साहित्य का माध्यम गर कहानी का माध्यम गय बनाया सबसे पहले बारसमट्ट मे। पाणमट्ट की कादम्बरी की कपा किसी विशिष्ट प्रादर्गको प्रतिपादित करने को नहीं लिसी गयी वह मुर भावनात्मक प्रमिम्मति की चीय है। एक विषिष बात है कि वारणमट्ट को इसमें इतनी सफलता मिती यहां साहित्य को उसने इतमा प्रपि प्रमावित किया कि बागमट्ट के बाद सुगठित पार सम्बी कहानी की पुस्तक का नाम ही कादम्बरी पर गया। प्राय महाराष्ट्र में उपन्यास को कादम्बरी कहते हैं। स्पष्ट म से सो नहीं पर गौए-म से मप में मिले उपन्यास या कहानी को साहित्य का अंग तो स्वीकार किया गया पर उसको शाखोय महत्ता नहीं दी गयी। भारतवर्ष में वो बीसवीं पाती तक कहानी को कोई महत्व नहीं मिला। भारतवप में मुरगद में मिखी कहामी को महमा मिसी अंग्रेवी साहित्य प्रमाव के स्म में। से गम में सपक पौर प्रभावशासी कहानिय संस्कृत साहित्य में बहुत पहले मिची मा भुकी है-महामारत दुनिया क प्रपम महान् उपन्यास कहा जा सकता है मिसने अपनी कहानी शिल्प के कारण प्रमरता प्राप्त कर मी है । हितोपदेश पंचतन्त्र पावक एवं कपासरिसामर की कहानियो के घोड़ का साहित्म दुनिया के किसी साहित्य में महीं मिलेगा । मेकिन इन कहानियों को धर्मधाम पौर समार शाम के अन्तर्गत मानकर इनका साहित्यिक मूल्यांकन कभी नहीं किया गया। भारतवर्ष की किस मापा में कहानी के रूम में गय विकसित हुमा इस पर कोई विक्षेप मतभेद नहीं हो सकता। बंगला साहित्य ही सर्व प्रथम प्रप्रेमी से प्रभावित हुमा क्योंकि भारतवर्ष में प्रप्रेमी-सामाग्य ने अंगास के द्वारा प्रवेश पाया और जिसे हम मप्रेमी प्रेतना प्रपवा पाधुनिक सम्मता कहते हैं वह हमें अंग्रेजी मापा के माप्यम से ही प्राप्त हुई। अंग्रेजी मास पोर कलकत्ता के मार्गों से भारतवर्ष में प्रविष्ट हुई लेकिन यहाँ दक्षिण मे यह बोसपास मौर दफ्तरों की मापा ही बन सकी यहाँ बंगास में अंग्रेजी मे बंगाल की संस्कृति मौर रप्टिकोण में मासूम परिवर्तन किये । संस्मृति पौर एप्टिकोण पर अंग्रेजी मापा एवं अंग्रेजी सम्यता के प्रभाव का असर मात के साहित्य पर भी हुमा पौर पंकिमचन्द्र पटी क स में हमें भारतवर्ष का सबसे पहमा उपन्यासकार मिलता है। में बहुत पहले कह पुराहूं कि कसा का पापार गति है, धम्द महीं। धम्म साहित्य कला का उपकरण माग है। यहां कविता में मय पौर पदमी पति है, यहाँ गप में इस सप प्रौर पन्दपुछ गति का प्रमाण १०८ साहित्य को मान्यताएं है। और इसीलिए प्रारम्भिक काम में गध को काम्म नहीं माना गया । काम रसारमक वाक्य है । कास्य प्रति साहित्य में इस परिमापा में भी गोर रस पर दिया गया है पौर रसपीयुत्पत्ति में प्रमुखता मय एवं छन्द को ही दी गयी है। मेगिम घरद भौर सय के प्रमावा गति का एक स्म भोर हे मिस पर साहित्य के प्राचार्यों का ध्यान पहने नहीं गया । सप्टा कमानारों में भी भषेशन प्रथवा अचेतन रूम में ही इस गति को स्वीकार पिया पौर अपनी पगम प्रकिया में इस गति का प्रयतम्ब निया मेकिन यह गति बोरिक होने के माते उस समय साहित्य के प्राचार्यों आप स्यीकृत नहीं हई। यह गति हेपमा की। कल्पना की इस गति को सहायता मिसती हे स्पना द्वारा बनित परिमों की किया और प्रतिष्यिा से । फर्म सयम में गठि का पोठा हे पौर इसलिए कहानी के पात्रों का कर्म मोर उस कर्म को प्रविरिया इससे रस की शुष्टि होती है। यही रस ो भावना मा पौसक है। देहातों में बहामी महनेवामे कहानी पर कर रस की घष्टि करने हैं। यह कहानी मनारिवान से ममुष्य में भावना पी सप्टिरती माई है, सोकगीतों के साप-साप सोमाया का हमारे जीवन में भी एक स्वान पा । मेगिन यहाँ लोकगीतों को विकसित करणे साहित्य की रपना हुई वहीं सोकणापापों को विकसित करके प्रमुख मानव मे सिद्धान्तों एवं धर्म सपा वर्तन को भावनात्मक रूप से प्रतिपावित करने वाले स्टांतों के रूप में पपने सम्वर्गव फर मिया । विश्व का महान् प्रेप महाभारत साहिप न रहर पर्म अप माना गया । वौखिर मानव मे कपार्मों द्वारा मादों की पुष्टि की। पादर्पवाद संवेदमा की दृष्टि महीं करता है, पौर पगर यही मिदना को सृष्टि परता भी है तो यह संवेदना स्वम् सेवान्तिक मान्यतामों में पने के पारण प्रपनी पति क्षय कर देती है सपा विश्वासों पोर मान्यताओं पर पदसम्बित हो पाती है। यह कहानी की गति कला के मुगम में पौटि-स्तर पर पुर सप पौर पद वाली गति से भमित सराक है, इससे इनकार नहीं किया जा धाता है। महाँ कविता मुमत प्रारमगत होती है वहाँ पहानी वस्तुगत होती है। काम्प को बस्तुगत बनाने के लिए हमारे महान कवियों मे इसोसिए पहानी की सहायता ली है। पर भावना पार वेदना को मागूठ मारने का माध्यम उनके पास एप और सम रहे हैं, पुर महानो को मापना को जागृत करने का मापन उन्होंने महीं पनापा । सेक्ति -- १०६ साहित्य का माम्पम गप समय ज्यों-ज्यों बौदिक-विकास होता गया त्यों-त्यों पहानी फो साहित्य में अधिक महत्वपूर्ण स्थान मिसता गया। साहित्य के क्षेत्र में कहानी की महत्ता योरोप में पहले बड़ी पोंकि यहां के धर्मधाम और दर्शन का पाम् मय मधिक विकसित म पा यो कहानी को मवर्दस्ती अपने में सीम सेवा । साहित्य में कहानी को महत्ता देने की परमरा हमने मोरोप से मी-यह निर्विवाद सस्प है। विश्वविद्यालयों में प्टिक्षा देने वाले भनेक हिन्दी के प्राचार्यों को मैं मानता हूँ यो माज भी उपम्पास पीर कहानी को हीन दृष्टि से देखते हैं। प्राध्यापक होने के मासे इनका अध्ययन विदमा को ग्रहण करने के लिए नहीं होता निर्धारित प्रामोपनारमा सिमान्तों पर ही यह साहित्य को वोसते हैं। मौर भारतबप में कहानी पर कोई प्रामोधनात्मक सिवान्त अभी तक निर्धारित नहीं हो पाए हैं इसलिए प्राप्यापक प्राचार्यों के वर्ग में कहानी की घोर उपेक्षा है। हो अंग्रेभी प्रामोपना-चामा प्रभाव सब कृष मोगों पर पाने लगा है और धीरे-धीरे कहानी को महया पर उनका प्यान पाकर्षित होने मगा है, तया कुछ मोगों मे कहानी को मुखममा के क्षेत्र में स्वीकार करना मारम्भ भी कर दिया है। लेकिन मान का युग स्वयम् योरोप में बरसती हुई अस्सप्ट पोर मा सो शुद्ध नियंत्रण मपवा पुरा भरागारवा का युग है, इसलिए कहानी के मूल्यांकन में उन्हें उठनी सफलता नहीं प्राप्त होती जितनी अपेक्षित है। इसका कारण सम्भवत यह है कि हमारे भाचार्यों में अपनी विद्वत्ता एवं प्राचार्यरव से ऊपर उठकर मौनिक रप्टिकोण से कमा को पाने की प्रति महीं पाई है। प्रेमा में पहले मिवेदन कर पुका हूँ पम भावना को पहन करने का माप्पम महीं है। पम्प स्वयम् में वौधिक होने के मासे बुद्धि को पहन करता है। पों के उस समूह को यो वौदिक म्याकरण से शासित है और जिसमें मप अपवा धन्द का कोई योग महीं लिया जाता हमने गवकी संभारी है और इसलिए हम यह कह सकते हैं कि गप दुनियो पहन करने का माध्यम है, भावना को पहन करने का माप्पम नहीं है। मनुष्य का पमस्त पादान-प्रदान बौटिक होने के माते गय के माध्यम से होता है, मामा समस्त मौविर विकास बौद्धिक होने के मावे गय द्वारा हो सकता है। पार पाय के बीपिकाम के युग में गध मे परपधिक महत्ता प्राप्त कर सी है। मेरिन दुटि भावना से सर्वया मुछ हो सकती है यह स्वयम् साहित्य की मान्यताएं में पिबावग्रस्त प्रश्न है। मेरा सो ऐसा मत है कि मनुष्य अपनी भावना से म कमी अलग हो सका है, और न कमी प्रसग हो सकेगा। में दो इस समय साहित्य को माम्यतामों का शास्त्रीय विवेचन करने बैठा है यह स्वयम् अपने अन्दर वासी भावना से प्रेरित होकर । बिन तर्कों का में सहारा ले हाईवे प्रवक्ष्य यौगिक पर मेरा गो उद्देश्य है, पत्ि पाने वाले मेरो गाउँ स्वीकार करने वह मावनारमक है, सोग विश्वास करें, लोप स्वीकार करें मोग संतुष्ट हो पाय-यह स्वयम् में भावनात्मक प्रक्रियाएं हैं। मानव पीवन में भावना मौर दुरि को एक दूसरे से एकदम प्रसग करना नितान्त मसम्मर है। प्राय मुझे ऐसा दिखा है कि हम अपने भावनारमक रष्टिकोण को प्रतिपारित करने के लिए तर्का सहारा मे मिया करते हैं। हमारे यौशिक न एक-दूसरे से बिस्लम मित्र होते है और इसलिए गव को नितान्त बोरिक मान लेने का साहस में महीं कर सकता। ममस्म से बौद्धिक होते हुए भी गव में कहीं एक भावनात्मक रंग मौदूद है, में यह स्वीकार करता हूँ। गध में साहित्य की कसारमक अभिम्पछि मौजूर है, यह इस बात से सप्ट हो माता है कि साहित्य में निमन्मों मा एक स्थान माना गया है। सफल निवन्यों का सिखना पड़ा कठिन काम है, सरियों तक पीरिय रहने पामे साहित्य में सफल निबन्यों पी संस्था पहुत कम मिसेमी और निवप साहित्य का सम प निर्वस भाग है-इसना सब मामये हुए भी हमें निबन्म करे साहित्य का माग तो मानना ही पड़ेगा। गद्य को जो भीरकलामा म प्रदान करती है यह एक प्रकार की गति है, जिसे हम पस्पमा पर गति कह सम्से हैं। इस पसना की गति को दूसरों तक पहुंचाने के लिए हमें कहानी से सबसे अधिक सहायता मिलती है। कहानी में किया और प्रतिक्रिया के सहारे कम्पना गतिको प्रहण करती है। निबन्यों में यह क्रिया प्रतिक्रिया यो सिपिल रूप में मिसती है। गध के माध्यम वासी साहित्य की कसा ही पान साहित्य में सरात समझी जाती है। इस मा के विकास के कारण पारिता को अपार क्षति पहुँबी हे पौर मब तो कुच ऐसा दिखता है कि भविष्य में भपिश साहित्य गम में ही लिया जायगा। गरा में दौसी मामा महत्वपूर्ण स्थान है। यह दोपी बनासर के पचिप की पाप होती है। ग्रेमी से यह समझ साते हैं किमुक साहित्य का माध्यम गद्य कति किस साहित्यकार की है। कलाकार के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति निवना प्रमिक उस कलाकार के विषय-वस्तु में है, मैं समझता है उससे कहीं अधिक उस कलाकार को पौसी में है । क्षेती का महत्त्व पप भयवा कगिता में भी काफी अधिर है, लेकिन कविता में सो क्षेसी स्वयम् ही कविता मन मातो है, इसभिए कविता के क्षेत्र में सेनो को सात स्प में मसग से पमिक महल महीं दिया गया । सी के गिवने भी प्रमयप हे उनका वर्गीकरण करके उन्हें कविता के उपांगो में विमल कर दिया गया। मेक्नि गव में विषय-वस्तु की म्यापस्या के कारण जैसी का स्पिस मोर वर्गीकरण प्रसम्भव-सा है। यह वैसी केवल भ्यधिगत ही होती है। फिर भी बोरिक मानव अपनो विश्तेपण पोर वर्गीकरण की प्रवृति को छोड़ नहीं सकता और शैमियों के मर्गीकरण एवं विपण मये है। गाव विकास के क्रम में है, गय के निरय नए रूप में दिसते रहते हैं। एक मुग सूत्रों का पा नव हम बहुत पोहा कस्कर न गामे कितनी मात कह गनवे पे पार भी विज्ञान में बरे-बड़े फार्मूलों का छोटे पोटे सूत्रों में गोप दिया गया है । पर या तो मौदिक कम पा। पर्यन- धानों के प्रपों में इतनी सूक्मता की बातें सिसी गयी हैं कि उन्हें पाकर सर दर्द करने मगे पर यह हम भी दौटिक है । कला में पौर विशेपत उस कसा में जो ग क माम्मम से समित हो विस्तार और प्रसार पापस्यक मंग समझे गाठे हैं। पोड़ा मिखी पपिकांश पाने वाले की कल्पना के लिए छोड़ दो" मामा सिरान्त गप में सिमा दुध स्मों को छोड़ कर, नहीं मागू होता । शेतीप्रधान गप यो विस्तार पौर प्रसार के सहारे हो बसता है। यपि साहित्य में गड मो प्रमुखता प्रपणा माम्पता नहीं दी माती पी पर प्रापीन ग पो भावमारमा एप्टि से सिसा बागा पा यह विस्वार पौर प्रसार से पुक पेसी प्रमाम होगा पा। 'भवि सर्वत्र वयेत्' बाले सिमान्त के अनुसार गैसो में भी विस्तार पौर प्रसार को मान के युग में बहुम प्रन्या महीं समझा जाता। यह प्रसार पौर विस्तार कुछ मोगों को मने ही प्रसन्न कर सके पपिकास पति इससे माते। प्रसार भोर विस्तार भी मैती के समर्थक यह साते हैं कि साहिम्म सुधइने गने मोगों के लिए है, सर्व-सापारण के लिए नहीं है, और उनके इस कपन में पोड़ा बहर बम पी है। सर्वसाधारण की इषि । t૧૨ साहित्य की मान्यताएँ प्रषिकक्ष में सम-सामपिक होती है, अमर साहित्य को युग-युग क जीवित रहे इस सम-सामयिक मासे नियम से सर्वपा मझेशासिव होता। पर यहाँ एक बात और भी ध्यान में रखनी पड़ेगी। अपने युग को वही साहित्य नाम समता हे मो अपने युग में ही माम्य रहा हो । मानर विकास के क्रम में मान्यताएँ एक बार मिट कर फिर स्थापित नहीं हो पाती विकासकामही मागे बदमा है, सम्म में पीछे सौटमा प्रसम्भव है। ऐसी हामत में बो मी ऐसी एक बार छोड़ दी जाती है, वह किर वापस नहीं मौट सकती। साहित्यिक गध सभाधार शेमी ह विपरमस्तु नहीं है, बिनास पास को स्वीपर किये साहिप फी माम्पवाएं निरपंक हो जाएंगी पौर इसलिए हमें मी पर विशेष-स से रिचार कर मेना पड़ेगा। 'पार्यो को विप प्रकार से संबार कर रसमे की प्रमिया को ऐसी करते है।-ौमी को यह सीपी-सादी छोटी-सी परिमापा मैं कर रहा है। यह संवारना कई लंगों से हो सकता है । यह पग मय के मायार पर संपारेरा सबसे हैं, पनि मामार पर सबारे पा सम्से हैं। कविता में इस पोसी को पसंकारों मनाम भी दिया गया है। यह सर प्रक्रिया करिता के क्षेत्र की है। गप में जो पुष संपाय मावा है उसका पापार हे पर माप्यम जिससे विषय-वस्तु को प्रस्तुत किया जाता है। यदि हम एक बहामी के माध्यम में से किसी भावना को प्रतिपादित करना पाहते है वो उस कहानी के विषय-वस्तु को जिस प्रकार संवारा बाम इसमें हमें प्रेमी का मास मिलेगा। यदि हम निवर द्वारा भावना को प्रतिपादित करना पाहते हैं तो निबन्प के विषय-वस्त को किस प्रकार माय गया है, उसमें पेनीसमास पिमेगा। मेरा तो निश्चित मत है कि मा निमा पाता है, इसमें मा महीं है, जैसे सिवा पाता है। इसमें कप्ता है। में पिपय-वस्तु के पापार परममा से मान्यता पने में परा में हो नहीं, मेरे मठ में यह सम्भव ही नहीं है। में कमात्र समापार घेसी मानता हूँ, पोर मी हमेशा पगित हुमा करता है। नी के मुत प्रवास को लेकर प्राचार्यों में सो को निया में पापने का प्रस्पन किया है मोर कमिण साय का एक मुख्य कारण यह भी रहा है कि प्राप्तोबनासिदान्त के अनुसार पिता पिस्सुम्स चामिम मम गयी। गप कहानी भाम के सम्बन्ध में भी यही बात मान होने समी साहित्य का माध्यम गच है। उपन्यासों पर, कहानियों पर कुछ इस प्रकार के प्रप सिखे गए है पौर मिसे पा रहे हैं। सम्मपत इसका एक कारण यह भी है कि माय के युग में प्रचार में भावनात्मक अभिव्यक्ति को महत्ता वी पाने मगी है। जगह-जगह मेसन की शिक्षा देने के लिए सूल सुम गए है, पारपास्य देशों की देखादेखी हमारे देश में भी कुछ पोरे से कम वन-सा की शिक्षा देने लगे हैं। ऐसी का म्याकरण-भाग प्रत्यधिक महत्त्वपूर्ण है और पाकरण की शिक्षा हरेक मेखक के लिए पनिवार्य है। में इस प्रकार के फलों की सार्यकता हो स्वीकार करता है, लेकिन कला के म्याकरण शाम से ही मावमी सफल कसापार नहीं बन सकता इस सत्य को भी में स्पष्ट कर देना चाहता है। कसा में एक प्रकार का निमत्व रहता हे को कहा को सफा पौर सक्षम बनाता है और यह निवस्व बड़े परियम पोर नहीं सापमा के बाद अन्दर से प्रस्फुटित होता है। कहा के प्यावसायिक पक्ष होने के कारण यह सामना बहुत ममिक कम्नि हो मपी है क्योंकि मागीविन के लिए एक सम्बे काम सक विवाषर्षी की मांति बीवन व्यतीत करमे का यह युग महीं है । धन साधारण विकसित मा विकस कसा को ही तत्काल स्वीकार करता है। विकास में सापना धैर्य पौर प्रतीक्षा का प्रश्न है इसलिए मनुष्य साधारण स से विकत कता की भोर प्रप्रसर हो पाता है और विकति मनुष्य को बरी नस्वी समाप्त कर देती है, यह भी सत्य है। सौमाम्म से पान के पीरिक युग में साहित्य से सम्पद भनेक विभाग सुस गए हैं जिनमें प्रवेश कर के उठवा हुमा साहित्यकार अपनी पानीपिका के प्रश्न को हस कर सता हे मोर इस प्रकार अपनी साहित्य ने सामना को जारी रख सकता है। प्राभीन काल में केबस प्रध्यापन-दिमाग ही ऐसा पा सेरिम अध्यापन विभाग शासीय माम्पतापों से इतना अधिक बोभित है कि पम्यापक बनने के बाद पहुव पोड़े से व्यक्ति प्रपनी मौसिकता कायम रह पाते हैं। वर्तमान काम में पत्रकारिता का दिमाग रेग्यो विमाप एवं सरकारी प्रचारप्रनेकों विमाग गुप्त पए हैं, जिनसे समस्या यह हद तक सुसम मयो हे। पान सर पिमामों में प्रमुखता मच को ही मिलती है, और गपका कहानी-माग हो प्राय की पावरमकतापों की पूर्ति के लिए उपयोगी समय पाता है। इसलिए में नि संकोच यह कह सकता है कि पार का युग पहानी का पुप है और हमें कहानी के विभिन्न-कपों को समझ मेना पड़ेगा। .

साहित्य की मान्यताएं महानी का प्रामार मानव की फापना है, कहानी सत्य पटना नहीं है प्रम्पया कहानी महानो म रह कर इतिहास यन पायगी । वैसे परय पटनामों को सेफर मी कहानियाँ सिसी गयी है पौर सिधी पा रही है, पर ऐसी कहानिर्यो में गो भावनारमक दृष्टिकोण है यह मेखक र निजी सपना होता है । पोर यहीं कहामी इतिहास से मिन्न हो जाती है। फिर कहानी में कोई विशेष भावना प्रतिपादित की जाती हे भवकि इतिहास में यह प्रविपारित नहीं की याठी वह केवस पाई माती है। बहानी सेसक का मुख्य उद्देश्य होता है प्रतिपादमा, पौर अपनी प्रतिपादना के लिए वह ऐतिहासिफ सस्य को तोड़-मरोड़ पर अपना सत्प बना लेता है। कहानी का पाषार क्या है 'म होकर 'क्या होना चाहिये हमा फरता है । लेकिन यही प्राधार प्रादाबाद ना भी है। दो फिर महानो में पौर मादर्शवाद में क्या प्रन्तर है, हमारे सामने स्वामाविक रूप से यह प्रश्न उठता होता है। प्राचीन काप्त का प्रायः समस्त कहानी-साहित्य प्रादर्शवाद में प्रवर्गठ माता है, और प्रादर्णयाद की सबसे बड़ी कमगोरी मह है, पैसा में पहने निवेदन कर पुरा हूँ कि ससमें प्रतियोगि का सहारा सेमा स्वामाविक हो जाता है, और यह प्रतियोफि बर्तमान समाज के बोधिन मानव के गले महीं उतर पाती । भाववाद में को मिलती है संघेवमा पा गौण स्वान रहा परखा है। पादःयाद के भाषार पर सिखी गयी कहानी में प्रमुखता सेवान्तिम प्रतिपान्ना रहती है, यपार्पवाद के अन्तर्गत सिखी गयी महामो में संवेदनारमा प्रतिपादना रहती है। महहाम प्रत्येक प्रवस्था में पहानी में पास्तयिफ सस्प नहीं हो साता वास्तविक सत्य सम्भव भी नहीं है । यपार्यमाप के पन्वर्मत पोनहानी माती है उसमें माक्षणिर सरप ही रहा परता है। उस मापारिएक सत्य मापार पर हो हम वास्तविरसा पी भावनात्मक अभिम्पतिकार सनते हैं और सम्भवत इसी मारण कहानी इन दिनों पपिकांथ में प्रतीवारमा वनती ना रही है। गिसे कविता में प्रयोमबाद कहा गाता है, महानी-दोत्र में उसे प्रारम्भ में प्रप्तीकवाद का नाम दिया गया था पापि प्रसीपया सिटाम्स पिक रिनों तक टिर महीं सके और इसलिए प्रतीमन्याय पमप महीं सका । मृट प्रतीकवादी साहित्य मारमगत होने के माते बस्तुगत प्रमुखता सिवान्त 1 साहिप का माप्यम गप या उसे सामागिन गहना प्रषिक तषित होगा पीवन में प्रभावहीन साबित एमा पौर कहानी का तो सुख रूप से बस्तुगत होना नितान्त पावश्यक है। मानव को किया प्रतिक्रिया मनोवैज्ञानिक राजनीतिक पार्पिक अपवा सामाजिक क्षेत्रों में सीमित होने क नावे बस्तुगत होनी ही चाहिये। प्रतीमयाद मा यह प्रारमगत रप्टिकोण मानव का सत्य है, इससे तो इनपार नहीं पिया बा सकता और इसलिए इस दृष्टिकोण की नरें साहित्य में प्रारोपिस हो गयी हैं स्कप पौर रिपोर्ता के स्म में । सेच के लिए हिन्दी में पारद-पित्र का प्रयोग किया गया है, मनिम केष पान में जो संवेदना की मौजूदगी का मामास है वह "शम पित्र" शम्न में नहीं मिसता । इसलिए मैं केष पाम का ही प्रयोग करगा।सेच में एक परित्र-विपकी किया तो होती है मिन्न उस क्रिया को समान पर किसी प्रकार की वस्तुगक्-प्रतिक्रिया नहीं होती । उसी घ्यिा की मिटनी भी प्रसिमिया है यह मेसर के अन्दर वाली भरमगत प्रतिक्रिया के रूप में पाती है। यह प्रारमगत प्रतिक्रिया संमेलनात्मक है, इससे इनकार नहीं निसा जा सकता और इसलिए रूप कहानी साहिस्स पा एक अनपेक्षित भाग बन गया है। सेप से बुध अधिक महत्वपूर्ण पान के साहिरप में रिपोर्ताज हो रहा है। यह रिपोर्ताम इस युग मी पत्रकारिता की देन है यहाँ सामूहिक ठ्यिा प्रतिध्यिा को एव स्प में किया माना पाता है और उसकी मारम गत प्रविध्यिा सेना में समाहत होकर संवेदना के समन की भोर पग्रसर होती है। इस रिपोर्याय का क्षेत्र मनोरंजन प्रधिक होता है क्योंकि सामूहिक किया प्रतिध्यिा के फम स्वम्स मेसक के अन्दर पासी पारमगत प्रतिक्रिया देवत कोहल के रूप में प्राती है। किसी प्रभार भी गहरी संवेदना का उसमें प्रमाव-सा रहता है। सरात मालापारने हाम में यह रिपोर्वास काफी दूर तक भावनात्मक संबना का मुनम र समता है, इससे तो में इनकार नहीं परवा पौर कोतूहल स्वपम् में नाम के विकास मा माध्यम होने के कारण साहित्य का महत्त्वपूर्ण माग माना जाता है। ऐसी हालत में सिोनि पत्रकारिता रो प्रसग हटकर साहित्य का एक भाग बन गया है और सम-सामयिक गाहित्य में रिपोनिमा मुख्य स्थान बनता जा रहा है। मागे पम पर में स्पेच पोर रिपोनि के याहिरियर मुम्यो । विवेचन भरनेपा प्रयत्न पगा। गध साहित्य के दो प्रम्प रूप है, निबन्य मौर माटर । यह दोनों ही साहित्य की मान्यताएं रूम ममादिफास से प्रपिमित रहे और इस स्थल पर इन रूपों के सम्मप में पोहा-यह कह देना प्रापश्यफ हो जाता है। माटक को में साहित्य का प्रत्यन्त सशक माध्यम मानता हूँ पार माटक का गत में होना पनिवार्य नहीं है। प्राचीन संस्त के प्राय समी नाटक कविता में मिलते हैं। प्रोक माटक पप में हैं दुनिया का महान कपि कसपियर ने अपनी प्रमिकांच प्रमर कविता माटों के माध्यम से भिखी है। इसलिए माटम को में मपिता मोर गध के अन्तर्गत म मान कर उसे एक स्वत्र सप्ता के रूप में स्वीकार परखा हूँ। गध साहित्य का प्रति प्रतिसत और सबसे प्रभाव एवं निर्यस भाग हे निमन्य । परचे नियमों का कम से कम हिन्दी भारतीय साहित्य में प्रमाव-सा ही है। विश्व मे अन्य साहित्यों में भी नियों की महत्ता मपिक है। ये मिसम्म अपिकाध में पाठ्य पुस्तकों में ही मिलते हैं। पुर साविक मनोरंजन के लिए परे बामे बामे निबन्ध बहुत कम हैं पौर जो है भी उममा प्रयोग मूचियों के स्प में होता है। सूतियों में भावमारमा संवेदना तो है और इसलिए मियन्म, साहिप में उपेभित कभी नहीं हो सासा । हाँ उसके गोवन की मपि अपेक्षाश्त कम हो सकती है पर एक सपस पौर सक्षम पनागर के लिखे हए निगप सूक्तियों के रूप में प्रमरता भी प्राप्त कर सकते हैं।

पारहवाँ परिच्छेद कहानी का प्रमुख-रूप-उपन्यास मापार के अनुसार कहानी को दो भागों में बांटने की प्रथा मनसाधारण में पस पदी है । सम्बी कहानी को सौ पृष्ठ से सर मी हो उसे मोटे सौर से उपम्पास का नाम दिया भावा हे और छोटी कहानी भो प्राय फन्द्रह-बीस पृष्ठ को हो ससे कहामी का नाम दिया माता है। इस विमतीकरण को प्राय पोयो हिन्दी के विद्वान् तर स्वीकार करते हैं। मेकिन यह विमलीकरण गलत है। कहानो-साहित्य तीन भागों में विभक्त होता है-उपन्यास मम्मी कहानी और छोटी कहानी । या फिर प्रगर हम कहानी को दो भागों में ही विभक्त करें धो हमें प्राकार का प्रपन छोड़ कर कहानी के मूस अवययों के मापार पर ही कहानी को उपन्यास और कहानी के दिमागों में विमल करना होगा। इस स्पाम पर हमें उपयास मोर कहानी के मे पो समझ मेमा पड़गा। उपन्यास कई कहानियों के उस एकीकरण को कहते है को एक सूत्र में पी हो मिसमें प्रप्तग-अलग म गाने कितनी घटनाएं हों वो एक दूसरे से सम्मय हो सकती है, नहीं भी हो सकती हैं, मेकिन बो सब सामूहिक रूप से मिलकर एक प्रकार की पूर्णता उत्पन्न करती हों। उपन्यास का प्रमुन कपासूत्र गठा हुमा हो सकता है, वह महत रोसा हो सम्या है मपिम प्रमुम्न पासूत्र ही उपयास फा मापार होता है मौर उस प्रमुस कपासूत्र के इर्द-गिर्द यह न गाने पितमी उपापाएँ सती पड़ती हैं मो उप पास के कपासूत्र को परिपुष्ट करती हैं पोर पूर्णता प्रदान करती हैं। यह प्राव यक नहीं है कि उपग्यास + निमित परिप एक दूसरे के सम्पर्क में माही । उपन्यास काप्त भौर स्माम की सीमा को भी सीपार करता है। फिर भी उपन्यास पा प्रभाव पाने वाले के मम बहुत गहरा पड़ता है, वह एक ऐसा वातावरण उत्तम कर देता है सरनारमक स्प से पाठक के मन पर एक प्रकारका पापी प्राय । पाता है। उपन्यास नाम से पुकारी माने पानी पिच पुस्तमें उपन्यास है हा महीं, पह मेवस सम्यो बहानियाँ भर होती है। यह महानियों अपने .

साहित्य की मान्यताएं को मार के कारण उपन्यास कहलाती है। यहाँ तक शिस्प का प्रश्न है, उपन्यास का शिस्प कुछ उमन हमा पौर बटिम होता है। सेवक के लिए स्वयम् ही उपन्यास पौर सम्बी कहानी की सीमा रक्षा निर्धारित करना कठिन हो जाता है। माकार अपनी समन प्रक्रिया में समय शिल्प व्याकरण के प्रति जागरूक कमी हो ही नहीं सकता पर मामाकार के चिस्प पाण्यासरण प्रमात-स्म से पूर्ण हुमा करता है। मग कसाकार के पास उसके पिसके कोई नियम नहीं होते। नियम सो मासोवक प्रप्टा कलाकार के चिस्य के पप्पयन के मापार पर बनाते हैं। पर पर इस विस्म की शालोप विपना की पापी है हम इस शिप के मावार पर नियम बना लिए जाते हैं। यह नियम मोटे पौर प्रस्पष्ट वेग पर ही ठीक होते हैं, पौर म मियों से एक प्रकार का गित प्रपा समित ही मिलता है। मेरे मन से दुनिया का प्रपम उपयास महामारस पहा मा समसा है और अभी तक उवना बड़ा उपम्यास नहीं लिया जा सका है। महामारस का कपासून एक है कौरवों-पाणयों का पुल सेमिन इस कपासूत्र के इर्द गिर्द न गने स्विमे उपन्यास समाहत है । मुस्प ममासूम को भागे बढ़ाने में ये उपास्यान गिन्सी भी प्रकार की सहायता महीं करते, फिर भी ये एप उपास्पान मुस्स पा से गुपकर उस प्रन्य को पूर्णवा प्रदान करखे हैं। हमारे देश में क्या-साहित्य का विकास साहिप के अन्तर्गव म होकर पर्म के प्रवर्मठ हमा है पोर इसीलिए महाभारत को साहित्य का प्रप म मान कर धर्म का प्रन्य माना गया है ठीक उसी प्रकार और पास भी पपामों एवं पयासरित्सार को धर्म-पन्य हो माना गया है। पर इस समस्या कपा-शाहिदप पा सम सप्टा-गाहित्यका नारा ही हमा है। महामारत में तो मोई विशेष पार्मिक प्रतिपादना भी नहीं है। भारत में एक महत्वपूर्ण पात है--संवेदना महामारख के हरेक परिपके साप । पौर यही भावनारमा वेिदना महामारत को युग-युगान्तर के घबसे महान उपन्यास के रूप में स्थापित करती है। ऋध मोग महाभारत को गोटि में ही विविध पुराणों का माम भी से सक्से हैं पर पुराणे पोकमा भाग समनारमा साहित्य में नहीं सम्मिप्तित गिया मा रामया नोकि पुराणों में मायमारमा संपेना नहीं है मेषस पार्मिक प्रतिपादना है। पुराणों में भारत का इतिहास मौर है पौर पुष साग पुराणों को ऐधिहासिक महल ये सस्ते है, यद्यपि पुराणों की कहानी का प्रमुख स्प-उपन्यास २१९ ऐतिहासिब प्रामाणिस्ता पर का करने वाला की एक बहुत परी संस्था है। पर ना निश्चित है नि पुराणों को साहित्य में स्थान नहीं पिस समता, भाषनारमक संवेदना के प्रभाव के कारण। महाभारत का प्टिसोए सामामि है, रोमांचक नहीं है और घायद यह भी एक बहुत बड़ा कारण रहा हो महाभारत के साहित्य में न सम्मिनित किये जाने का। धर्म और समाज को एक स्म माने माने को भारतवर्ष में प्राचीन परम्परा है। बाणभट्ट को कादम्बरी प्रेमाख्यान होने के मावे साहित्य के अन्तर्गत मानो गयी मेफिन यहाँ भी जैसा पहले ही महा ना तुका है महत्ता मतदत मापा पौर उसकी दोनो पो हो मिसी। चपन्यामों की परम्परा मारतवप में नहीं स्मापित हो पायी मध्य युमीन समान ने उपम्पासों को साहित्य में स्वीकृत ही नहीं किया। फारसो साहिरप में उपन्यासों और कहानियों की परम्पप, धर्म और समाजशास्त्र से हटकर, ममोरक साहित्य के रूप में पसी सकिन यहाँ मी साहित्यिक माम्यवाों के प्रति आगस्मता नहीं थी। उपन्यासानी परम्परा का विकास योरोप में हा यह एतिहासिक सत्य है पौर यह विकास भी सपही पातो के वार दिपता है । मनवीं चठी पास-पास एक मई चेतना मी सहर योरोप में पाई मौर मनुष्य ने नवीन मान्यतामों का प्रपनाना प्रारम्भ किया । यह युग फसा क विपास का युग महा करा सकता है। कहानी साहित्य के समय के साप पुछ विशेष रोपे यन गए है पौर को छांचा मासिकास में ही मही बलि मध्य युग तक सबसे अधिक सपल पौर मासान माना जाता पा वह पा कहानी मा वान पाभा में सोमित पारने पा-मायक, नापिपरा और ससनायक । इस यमनापा स्थान पर सप्सनायिका भी हो सकन्दो पो पौर महानी के प्रसार में नायर करिता माता वायु प्रपवा मिप्र यदाए जा सकते है। इसी परार सतनायक या मापिका सहायक पात्र मसाते हैं। नायिका के भो सहायमसाप बासे हे पोर इन सबका परिणाम यह होता हे शिवदानी विस्तार ग्रहण परतो गावी हे । स्वयम् महामारत पर्नुन दुर्योपन पोर प्रोपोनिमाण पर स्थापित उपन्यास महा पा साता है। महानी रस पिकोण वाले नुस्से में स्वाभारिप कप गे एपरमता माती गयी और हम मुम्पपी घोड़कर नएमए दषिों पर महानियों को सुष्टि होती गयो । मेक्नि बहानी का मुगर रस गंगार का है। मनुष्य पान-गुम्ब पों। पपने जीवन में मोरन के पार प्रम्य पाठों में सबसे साहित्य की माम्पवाए अधिक महत्त्व देता है । भोयन की समस्या नीरस है, मध्ययुग के सम्पन्न पौर शिक्षित समान सामने भोजन की समस्या स्पष्ट रूप से कमी रही ही मही पौर इससिए मौन-भावना ही साहित्य की प्रमुख भावमा रही है। इस यौन-भावना का सबसे प्रमिक कोमम, मपुर और निफर्मक म हे रोमास । हरेक रोमास की परिणति होती है विवाह । मेकिम इस रोमांस में नायक मौर मायिका को स्वतप्रति गोपनीय है। हमारे पर्तमान भारतीय समाज में श्री के सामाजिक स्वतन्त्रता म होने के कारण सम सामयिक रोमांस की रपमा पठिन पी।पर भारतवर्ष में जो सामायिक कान्तियां हो रही है, उन्होंने इस प्रकार की सामायिक स्मिति मवश्य उत्पन्न कर दी है कि समसामयिक जीवन पर सफम रोमांस सिखे गाय मेकिम मह सामानिम काम्तियां मिस नवीन चेतना से प्रेरित हो रही है उसने मनुष्य को रोमास के क्षेप से हटाकर भयानक संपर्य की अवस्था में फेंक दिया है। पर कसा का क्षेत्र संपर्प की कटवा में वो नहीं है उसका क्षेत्र संवेवनारमक प्रानन्द में हे मोर इससिए प्रत्येक मनुष्य के जीवन का भाग होने के कारण रोमास प्राव भी पाहिम-कसा का प्रमुख माग माना बाता है। महो तर मुख कारी प्रत्यापार, पोपण का प्रश्न है ये राजनीति और समागमायके पमिक निकट हैं। इनका मावनात्मक भाग ही साहित्य के अन्तर्गत पाता है और इसलिए साहित्य इन प्रश्नों में सहायर तस्व ही बन सकता है, प्रमुख तत्व महीं बन सकता । इस प्रकार हम दलते है कि रोमांस उपन्यास साहित्य की प्रमुख कोटि में पाता है। मेकिन शुट रोमांस को सफल बनाने में रोमांस का कवित्व बहुत प्रभिक सहायक होता है। यहाँ ममे यो पवित्व' पाम्बमा प्रयोग किया है वह कविता के मर्प में नहीं परन् मस्पना की रंगीनी एवं प्रसन्न सी और भाषा के स्म में। रोमांस में प्रायः प्रविश्य मायुगया ( Melodroma) के पा माने से उसके पवित्व को बुध पोड़ी-बहुत सहायता वो मिमती है, मेकिन यह अतिशय-भावुकता उसके महानी तल को प्रमाविक बना देती है जिससे उसमा ममा-सदा निर्वस हो पाता है। रोमास मपिकाश में मुगकों एवं युवतियों को भाषिक प्रिय होते हैं। परिपत्र बुदि एवं पय पामे म्पत्ति इस रोमोस से अधिक प्रमाबित नहीं हो पाते क्योंकि इनका मीयन पेमास की अवस्था से बहुत प्रमग हा गया होता है। मध्य युग में अधिकांश कहानियाँ रोमांस को ही प्रामार बना कर कहानी का प्रमुख-रुप-उपन्यास १२१ सिखी गयी है, और इसी रोमांस के मनोवेगानिक कहानियों एवं उपन्यासों का सम्म हुमा है। यहाँ मुझे एक मात पोर स्पष्ट कर देनी होगी। रोमांस अधिकांश में मावर्षमाद के निकट होता है। जैसा में पहले कह का है-महानो कापा नायक मापिका और लप्सनायक के त्रिकोण के प्रापार पर होता है। नायक गुण का प्रतिनिधित्व करता है। इसमायर विकृति का प्रतिनिधित्व करता है । मापिका यह पुरस्कार हे भो गुण से युक नायक को पात होती है। इस स्थान पर यह प्रश्न किया जा सकता है या मायिका का पपमा क्रियाशील कोई व्यकिय नहीं होता इस रोमास में ? और उत्तर सष्टम से यह होगा- महों। मभ्ययुम में नारी को सम्पत्ति केस में ही देखा बावा पा पौर इसलिए मप्यपुगोम माम्यतामा के अनुसार मारी का कम से कम प्रेमिका के स्स में कोई पृथक क्तिरप हो हो नहीं सकता पा । नायिका को मायक मी प्राप्त कर सकवा पा, समनायक मी प्राप्त कर सकसा पा-प्रमुख संघर्प दो माया पौर हलनायक के बोष में होता था। मायिका की ममिचि मस्र नायक-मी मोर रहती पी गर्योकि गुण को स्वीकार करमा नायिका का प्राकृतिक पर्म है। मेकिन महतनी प्रोप निरीह और पाव्हिीन होती थी कि स्वयम् में उसका किसी प्रकार का पस्तिस्व कहानी के संपर्ष में नहीं पा पाता पा। मम्म पुग में कहानियों को गिवनी भी कोटिया को या कहानी के बितमे भी प्रकार पे, सब के सब इस मादर्शबाद से पुक्त रोमांस के अन्तर्गत हो पाए। कहानियों का मापार सूप तस्व तो रोर्मास या प्रेमाश्याम ही होता पाइस रोमास के अन्तगत ऐतिहासिक सामानिक बामिक नपाने कितने प्रकार की हानियो लिखी गयी । साहित्य की माम्यतामों में यह मा परिवर्तन हुमा वर्तमान युग में जा पादकाय पर स्पान साहित्य में गपामा मे सिया । पपार्यगाव मावे ही रोमांस को पारा विपिन पाफर लोप होने ममी क्योंकि यमार्यबाद स्वयम् में समस्यामूमक है। गौरिक मानव कस्सना क क्षेत्र से हटकर ययाएं की गहयों से गुम्ने सगा और इसी यपार्य में अपनी संवेदना को प्राप्त करने की प्रवृत्ति उसमें जागृत हुई। इस यपावाद का पहला परिपट स्स इमें मनावेगानिर उपन्याओं में दिखाई देता है इस मनोवैज्ञानिक विपसेपरा की प्रवृत्ति एकाएक समान में नहीं प्रवृपा सा भी मिक विद्यास ही हुमा । नारीको सम्पत्ति समझने भीपापी साहित्य की मान्यताएँ में स्वीकृत हुई तब श्री के गुण-दोपों को पोर भी सेसों का मान गया। सममायिका की परम्परा मध्ययुगीन अपश्य है पर मह सस मायिका प्रायः सामागिय प्रास्पामों के प्रतीक के रूप में ही पाती थी। वर्तमान युग में प्रस्मैक स्पति गुण-गोप युक माना जाने सगा और यही नियम नारी पर भी मागहमा । झोस में वासमाफ के साप मिस यथार्प शादी साहित्य को एष्टि हई उसमें परम्परा तो रोमांस की ही पी पर उस रोमांस को यथार्थवादी ममोविज्ञान सय में डाला गया । रोमारा की प्रेम भावना का काल्पनिक यौन्दर्य भौर पकिस्प हटा लिया गया, ससफे स्पान पर योन-विकृतियो मा गयो मिनके पम पर महानी भी प्रिया-प्रविछिया मागे बढ़ो । प्रेम पाल्पनिक सौ से भय एक मुमाया है, यह कयी उम्र का एक मथा है। प्रेम के पर पासी मूलभावमा तो मौन भावना ही है। इसी योन-भावना के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर पर्तमान मुग की अधिकांश प्रारम्भिा महानियाँ मापारित है। इस प्रकार के उपन्यासों मो हम मनोवैज्ञानिक उपन्यास कह सकते हैं। मनोमेशानिक उपन्यास' मय पा मम में प्रयोग करता हूँ पर मेय प्रयोदन उस साहित्य से है जिसमें मानव पी मनोवैमानिक पियों को खोसनेमा मयस्न किया गया है। मानव की मनोवैज्ञानिक प्रपिया प्रमुखत उसके पारिवारिक जीयम में फेखित होती है और परिवार मा प्रमुस मंग है-पति-पत्नी का पारा । पति-पत्नी का सम्बन्म मार्पिक है सामागिर है, पार्मिक है-इन प्रश्नों पर मिमिप्न मत हो सकते हैं, पर मह राम्बाप मौन-सम्पन्य है, इससे कोई इमार नहीं कर सकता। यह मनोवैमानिक साहित्य मन्तमुबी भी हो समसा है पहिमुसो भी हो सकता है। इस प्रकार के साहित्य में संतुसन स्थापित करने में हो पसार भी सफलता निहित है। इस मनोवैज्ञानिक पाहिरप के पापार पर पुनिया में म मागे पिवमा प्रस्तोम मार रामाविरोधी साहित्य सिता गया है जो पाय मी उत्तमना माता मोर रिसको बिको बहुत अधिक होती है । इस प्रकार का परलीस साहित्य पिकाय में बहिर्मुगी होवा है । मनाविमान का यहाँ पर केवल वहाना हावा है, पौन विकृतियो को मग्न पोर मापक रूप में रिपित फरसे यौन-मारमा से मुक मोप और पपरिपस्य पुषा ण्य युवतियों में प्रचार पाने के लिए इस साहिम पी रचना होती है। और समाज मे इस प्रकार साहित्य पर रोक मगा दी है। मगर समान इस प्रसार के साहित्य पर न भी येरममाये फिर भी इस प्रसार का साहित्य कमा पी पोटि में मही पा समता पारि गर्भ -- कहानी का प्रमुखमय-उपन्यास १२३ सेमेवना नहीं होती बस उत्तयना होती है। इस प्रकार के साहित्य में पौन-विकृतियों से वितृष्णा हाने के स्थान में उनके प्रति एक प्रकार का माध्पण गमाया बाता है। वर्तमान मुग के विकास के साम इस मनोवैज्ञानिक साहित्य मी दूसरी पारा भी प्रस्फुटित हुई सम्पर्पसी उपन्यास के रूप में ! पान का युग ही इस अन्तर्मुखी उपन्यास का युम कहा जा सकता है। इस प्रकार के उपन्यास में स्वयम् उपन्यासकार एक पात्र स्म में अपने को प्यक करवा है। अपनी कुण्ठायों को, विकृतियों को सीमाओं को बह प्रदर्शित करता है सामाजिक संदर्भ में । यह यह दिखलाना चाहता है कि मनुष्य का हरेक म उसकी प्रवृत्तियों से नपा परिस्पितियों से शासिस है। अपने मान्तरिक संपर्प का प्रक्षेप वह पाठक पर करके अपने प्रति वह उनकी संबेदना प्राप्त करमे का प्रयत्न करता है। इस काम में उस गितनी पपिक सफलता मिलती है वह उतना ही अफस कसार माना जाता है। इस पन्समुंदरी कहानी को में मनोमेसानिक कहानी से प्रसग इसलिए मानता कि इसमें कलाकार का प्टिकोण प्रमुफ्त मात्मगत होता है, वस्तुगत नहीं होता। साहित्यमा उद्देश्य दो वैयक्तिक सत्य को सामाजिक एत्म के रूप में रखने में होता है, पर इस प्रकार के साहित्य में देवकिा सस्य केवल पेमफिक ही रह पाता है, सामरिक महीं बन पाता। इस पेणिमुण्ठा से उत्पन्न संभवना को समस्त समार पर पारोपित करके संवेदना की सप्टि करने बासा कसाकार वास्तव में महान् परमागर है, यह सत्य है, लेकिन अभी सब इस दिशा में पासाकाये को पूर्ण राफमा महीं प्राप्त हो समे हे। मह मन्तkपो साहित्य पूर्ण रूप से मनोयेज्ञानिक है, यह स्वीकार कले हुए भी मा में इसे मनोवैज्ञानिक साहित्य स मतग रस रहा है पसका कारण यह है कि इस साहित्य में सामानिक मनोविज्ञान का सपा प्रमाण है। एक पा से या वैयफिर मनोविमान स्वयं मसाकार की एक समस्या है जिसमें योन-मनागितान के साप-याप मोर भी न जाने तिमी प्रकार की समस्याएं होती हैं। हमारे पापुनिप गया-याहित्य पर फायर के यौम-मनोपिधान का बहुप पहा प्रभाव पड़ा है, और इस भन्तपुपी मया-पाहित्य का प्रेरणा-योत प्रयत ही माना जाता है। मायर के मतानुसार हर एक मनुप्प पा जीवन प्रमुमत मान-मायना ये पासित होता है। मेरा आपके बहुत पहले सभ्यता के प्रादिपरए में साहित्य की मान्यताए ही यौन पूमा धार्मिक रूप से स्वीकार हो की पी मेकिन दुनिया इस योन-परम्परा में ही अपने को सीमित नहीं रख सकी। पम्तर्मुखी पन्हानी में प्रन्य अनगिनती समस्यामों के साप मान- समस्या ही प्रमुख होती है । सामामिक दृष्टिकोण के विस्तार के पार एक अवस्था ऐसी प्रावी हे महाँ बह सीमा को पार कर जाता है पौर यही अवस्था उस प्रसीम सामागिम रमिकोप के पति में सिमट पाने की होती है। सम्भवत इसीलिए पाप के पौसिम पुग में मम्तर्मुसी-साहित्य की महता बढ़ती पाती है। पर इस अन्तर्मुसी-साहिप की अपनी निजी बामगोरियां भी हैं जिनके उमर उठ सकना साधारण ससाकार के लिए निवाम्त कठिन हो जाता है । इस प्रकार के साहित्य की एक बहुत बड़ी कमगोरी की पोर इस पुस्तक के प्रापमिक परिमोद में में संकेत कर पुका है। पौर वह है इस प्रकार के साहित्य का कुछ इस प्रकार से मार गिरोपी होनामा मिस पर समाज दण की कोई भी व्यवस्पा म कर सके। इस प्रकार के साहित्य में कमाकार प्रपनी विकृतियों पौर मुष्ठामों के बावजूद अपने प्रति संवेदना उत्पन्न करता है । पर होता माय ऐसा है कि कसाकर अपनी विकृतियों और कुछामों के प्रति संवेदना पाएत कर देता है। विकृतियों पोर कुण्ठामों से प्रस्व पति के प्रति विपना कल्याणकारी तस्व होने के मासे सामामिक दे, विकृतियों पौर कुष्ठामों के प्रति संवेदना समान विरोधी तत्व है। पोपी कोटि में प्राते है सामाजिक उपन्यास । दुनिया में सामाजिक अन्यारों का युग समाप्त हो पा है परिधि मोगों का ऐसा मत है, पर मेरा मत यह नहीं है। कुछ वर्ष पहले तक हमारे प्रपिाय उपम्यास सामाजिक होते थे। सामाजिक कुरीतियो को दूर करने में साहित्य एक बहर का सहायक वरय माना जाता है। पाहत प्रदतोहार, दिपाों को समस्या पिया वर्ग की समस्या प्रशिक्षा गन्दगीम गाने सिने सामाजिक पोप दूर किये जाने पाहिये । गम्प पवस्पाएँ नपुरीतियों यो दूर करने की जिम्मेदार अवश्य है, मेक्नि त प्रश्नों पर भावनात्मक रेतना को भगाने की जिम्मदारी साहित्य पर भी है। इस कोटि के साहित्य को हम प्रपायरमक साहिप माह सरते है पौर पपिपि में इस प्रकार के साहित्य की जीवन पबपि बहुत मम्मी नहीं दावी । मह साहित्य समय भी मांग के रूप में ही पाता है। पिम एप समर्प और सम फसाकार प्रपने पिस्परे द्वारा इस प्रकार के साहित्य /- कहानी का प्रमुख-रूप-उपन्यास १२५ को भी पमरता प्रदान कर सकता है, प्रपर यह उस समस्या से एकरस हो बाय मिस पर बह लिप रहा है। सामानिक उपन्यास हमेशा लिखे गए हैं और हमेशा लिसे पायेंगे। समान में ताकामिक समस्यामों के प बदलते रहते हैं, सेरिम यह समस्याएँ तब तक रहेंगी वब तक समान पा प्रस्तिस्व है । हरेक समस्या प्रपना निदाम पाहती है। पाम हमारे समाज की बहुस-सी समस्याएं दूर हो गयी हैं तो उनके म्पान पर उतनी ही महत्वपूर्ण अन्य समस्याएं प्रा गई है। दुनिया में विचार-नियन्त्रण (Regimentation of thought) मा जो दौर समाजवादी देशों में प्रसा, महसी सामायिक सुपा को मान में रखकर। सेफिन यह सामारिक उपयास तात्कालिक सामाजिक समस्यामों को सुनाने में कितना भी सहायक हो उन समस्यामों के सुसम गाने के बाद इन उपन्यासों का महत्व सोप हो पाता है। इस प्रकार का साहित्य वस्तुत प्यावासायिक साहित्य बन सकता है क्योंकि यह समय की मांग को पूरा करता है। पर इस प्रकार के सामामिक उपन्यासों में एक समी भी रहती है, जिसे समझ सेना येना म होगा । सामाजिक समस्यामों का कौन सा निदान सही है, मौर कौन-सा मियान गुमत है इसका निर्णय किसके हाप में हैं ? साहित्यकार स्वपम् कोई मिवान नहीं दे सकता निदान देमा पौखिक या पासीय प्रक्रिमा है। प्राय साहित्यकार अन्य बौसिक सोगों द्वारा दिये हुए निनान को ही प्रपनाता है और उस वोटिक मिवाम की वह भावनारमा अभिव्यक्ति करता है। पर यह मौलिक निदान उसे पुष मनीव-प्रमीय स्मनों से प्राप्त होता है। समारमाव के प्राने के पहले तक यह बौधिक मिशन उसे सामानि-सुपारों के मत से मिलता था। समारवाद के पाने के पार यह निदान उसे पासन से मिसमे ममा । सामामिक सुधारकों से निधान प्रहण करते समय साहित्यकार को यह स्पवयता रहती थी कि पह किसी निदान-विशेप को प्रहण करे प्रपपा म करे, समायवादी व्यवस्था के अन्तर्गत उसे इस प्रकार की कोई स्वतन्त्रता नहीं है। समारवादी परम्परा में साहित्यपारमी प्रपनी पोई स्पसत्र सत्ता मही है-यह समाज पा एक अंग है, मौर उस अंग को समस्त समाग के साप सामप्रस्प स्थापित करना है। यह निदान पाहे वह समाज-सुधारफों से पिया माप या रह वामन से सिया गाय सही भी हो सकता है. गमत भी हो सस्ता है। पर १२५ साहित्य की मान्यताएं यह निवान समय की मसौटी पर सही सामितहमा छो टोर मेचिन अगर वह गमत सावित हुमा सो वह माहिपकार के नाम पर एक प्रकार कर पालक होगा। सामायिक समस्याएं प्रस्पापी या माणिक होती हैं, पर इनम निदान मानव की शाश्वत मावनारमा समस्याों में है। ये समस्पाए मनादिमनस से मानव के सामने रही हैं और ऐसा विवठा है कि इनकम कोई भी ऐसा निवाम पभी रुक नहीं पाया जा सका हे यो पर्वमान्य हो। कुछ लोगों का मत है कि इन समस्यामों का पौखिक निदाम मिल ही नहीं सकता इनका एकमात्र निदान मो हो सकता हे वह भावनात्मक निदान है। इस मापनारमक निदाम में युटि रहवी अवश्य है, लेकिन वह गौए-स्प में। उवाहरण के लिए हम मुसको ही से में। पुर के विनापारमा साम्य से मामय मनन्त काल से पस्त रहा है। पुट के पीछे भानर की म जाने कितनी प्रवृत्तियों काम करती है। एक व्यक्ति की सत्ता के प्रति महत्वापक्षा एक कारण हो सकता है। एक राष्ट्र द्वारा अनेक राष्ट्रों का पोपण भी एक दूसरा कारण रहा है । यग्य विस्तार दूसरे देशों के मामलों में हस्वदोष मनहर्मा का विस्तार, सिवातों का पारोपण-मनामे कितने कारण युख फे रहे हैं । पिम मुख की प्रति हिंसा के रूप में मानव में सवा रो मौरख रही है, पौर महो हिसारमक प्रवृत्ति युद्ध का मूस पारण है । हिंसा मी प्रवृत्ति भाषनारमक है, बौधिक नहीं पुखि बाय इस प्रवृति पर नियन्त्रण मझे ही हो सकता हो । इस प्रवृत्ति का दमन भाषना स्मक प्रकिया है। मूस येकारी--ये सब मानप के सामने शाश्वत प्रश्न रहे हैं। मुप्स पौर पारी में भी अनगिनत पारण हो सकते हैं। फमों का नष्ट हो माना, दुर्मिी, निधनमा कितने ही कारण है । इस भूम को दूर करने में सहायक हो सकसी मानव समान असंवेदनारमा भीर सहानुमकि- युफप्टिकोण । फसमें मप्ट होती है एक विशेष स्थान की, पुनिया का सामूहिक प्रम भणार दो इकना है कि कोई प्रादमी भूखों मर ही मही समता यदि विस्त के इस प्रस-मागर का वित विवरण हो सके। मानव मन स्वामाविक गुण है दया, म्याय सहानुभूति । पर सामाजिक म्पास्मानों पौर सौमानों में चाहा हा मानव प्रपने गुणों को परत ऐ नहीं पाता । हर जगह प्रतिनियारमा मितियों काही सामाग्य उसे Pिuarहे।

म्हानी का प्रमुख-स्म-उपम्पास बर-बरे गोरिक प्राणियों समागशास्त्रियों रामगीतिनों पौर दार्शनिको मो भी कहीं न कहीं यह स्वीकार फरना परता है कि इन शास्वत समस्याओं का निवान भावनात्मक ही हो सकता है । राजनीतिक पपवा सामानिक दर्शन इतके निदान की मोर एक पक्ति के स्म भर में ही मा सकता है। प्रापीनवास में कहानी को धर्मशाल वपा समानशास्त्र के अन्तर्गत हप्टान्त के रस में प्रस्तुत करने की नो प्रथा थी वह इसी प्रनुभव के कारण। पर पर महानी ने कसा के क्षेत्र में अपना निजी विशिष्ट स्थान रमा लिया है तब कहानी की कमास्मक महसा को घोग्ना नितान्त मसम्भव हो गया। ऐसी हालत में विभिन्न समस्पाों को कहानी का भाग घमा कर उनका मावात्मक निरान देने की प्रया पिछले कई दशकों से बात पठी है। ऐसी कहानिया समस्यामूमक महानियो कही माती है। साहित्य में वर्तमान युग समस्यामूसक उपम्यासा का युग है। सामाजिक उपन्यासों और समस्यामूलक उपन्यासों में भन्तर यह है कि नही सामाजिम उपमारों में निहित समस्याएं सामायिक होती है मौर उनका एक निश्चित मियात्मक निदान रहता है वहाँ समस्यामूलक उपन्यासों में पाश्वत समस्यामा का समावेश हावा है पौर उनमें एक प्रकार के भावनारमा निदान पा संमेस मर हुमा करता है। वहीं समस्यामूलक उपन्यास किसी निश्चित निदान को निर्धारित करता है नहीं वह रामनीतिक प्रचार का माध्यम बन कर अपनी कमा मोखो देता है। वैसे समस्यामूनक उपन्यास में साकार पा एम निश्चित एप्टिमोग होता है, किसी एक निश्चित वर्णन की यह प्रतिपादना करता है, लगिन यही समस्पामूमा उपन्यास पीकमगोरी है जिसके ऊपर एक समर्प पौर सदाम कमातार ही उठ सावा हे । साधारण दर्शनशाख में पौर रामनीसिक दर्शनशास में भेव इतना है कि साधारण दर्शनशास्त्र का क्षेत्र वैयक्ति विश्वास है, रामनीतिक दर्शन का पेच सामाजिक पर्म है । भावना धैयमि क्षेत्र की पीस है, सामानिफ कर्म पी पार प्रेरित करती है उत्तेबना। जब में पहता हूँ कि पान का युग हो समस्पामुनक उपम्यारा पा है, सय में इन पन्तर्मुगी उपन्यास को समस्यामूमा उपन्यास मन्तर्गत पुष मसग काटि में सम्मिलित कर सेवा हूँ। अन्तर्मुती उपन्यास का दम सामाणिक प्रथमा रायनीतिक महीं है, वह पुर रूप से पैफिक है। अन्तमुपी उपन्यासों का भावार्य सान अपने को दानिए महमे में १२८ साहित्म की माम्पताएं गर्ष करता है । उसके दर्शन का स्वागत दुनिया मे महीं किया दुनिया ने उस दर्शन को सभम्ब ही नहीं मोर एक दार्शनिक की हैसिपत से उपेक्षित रहा । मेकिन अब उसमे अपने दर्शन को अपने उपन्यासों के माम्पम से प्रतिपादित किया तप मोगों का ध्यान उस मोर माफपित हमा । इसका कारण यह है कि पार्म का पनि बस्तुगत म होकर पारमगत है, जब कि वसनतास स्वयम् में बस्तुगत होता है। भारमगत पानि पौटिक हो ही नहीं सफता, वह केवल मारनारमक हो सकता है। पौर यह भावना भी बौद्धिक वारसम्म के प्रभाव के कारण मन्तर्मुसी ही हो सकती है। ठो कोटि में माता है ऐतिहासिक उपन्यास । ऐखिहासिक उपन्यास पो कोटियों में बिमक किये जा सकते है-अपम हो मे उपन्यास निममें इतिहास की प्रतिपादना की पाठी है दूसरी कोटि के उपन्यास ये हैं जिनमें इतिहास को प्रापार पना कर अन्य बातों की प्रतिपादमा की पाती है। यदि प्यानपूर्वक देखा पाय वो अपम कोटि के उपम्पान ही ऐतिहासिक उपन्यास महला सकते हैं। ऐतिहासिक उपन्यासों में इतिहास के यो पात्र मिये गाये हैं उनके ऐतिहासिक भीवन-क्रम में हेर-फेर करना सम्भव नहीं नहीं तो यह ऐतिहासिक प्रामाणिकता यो देंगे। हो, उनके उस ऐतिहासिक जीवन- हम को पम्पासकार अपने मिगी प्टिकोण से देसार एक मावनारमक वातावरण की रचना करके अपनी भावना को पाठकों पर मारोपित करता है। ऐतिहासिक उपन्यासों का कपासूत्र प्राय लिपिम होता हे मोकि ऐतिहासिक प्रामाणिवा की मौजूदगी में पस्सना से काम सेमा सतरनाक काम समझा जामगा। ऐविहासिक उपन्यास सिबसे समय पापार को सतर्क रहना पाता है कि ऐतिहासिक प्रामाणिकता को मरण बनाए पसे मिस तरह पौर फिन स्थलों पर पाल्पनिक परिमो एवं पटमामों का धमन करके कथानक को सुखममाया मा सस्ता है। मुझे ऐसे ऐविहासिक उपन्यास बस कम विच विकका कमाना पुष्ट कहा जा सके। फिर भी ऐतिहासिक उपन्यासों का माहिल्स में बहुत बड़ा महत्व माना जाता है। हमारी जो हमारे इतिहास में है और हमें प्रपने इसिहायक प्रति एक प्रकार का मोह रहा है। मानव-सिस क्रम को मध्यपन परमे में भी इठिहास बहुत बड़ा महापात समन्न माता है। हमारे इतिहास में हमार राष्ट्र का सम्मान भी हो सपना है, ।

महानो मा प्रमुपाप-उपन्यास ૧૨ अपमान भी हो सकता है। यह अपमान और सम्मान उस इतिहास के भावनात्मक वस्या पर बात अधिक निर्भर है। कमजोर मासूमों के स्मान पर कल्पना बी रंगीमी से सदे हुए वर्णनों से उपन्यास को रोषक बमाया मा सकता है। ऐतिहासिक उपन्यासों में कुछ ऐसे उपम्मास पा सकते हैं जिनमें ऐतिहासिक परित्र न हो केबस ऐतिहासिक वातावरण से उस ऐतिहासिक समाग तपा उसफी प्रवृत्तियों का विम्दर्शन कराया गया हो। ऐसे उपन्यासों में पस्पना को दुस-सेममे की माफी छूट मिमदी है। इस यूट के कारण अधिकांश में बन्पना इस कदर बहक माती है कि वह प्रस्वामाविरवा पा रूप धारण कर लेती है। जो मार के जीवन में सस्य नहीं है उसे प्रदर्षित करने का एक पन्धा मार्ग है-उसे ऐविहासिक पावावरण मेंदीप देना। पौर इमीलिए दूसरी कोटि के ऐतिहासिक उपन्यासों को ऐतिहासिक उपन्यास न कहना अधिक उचित होगा। यह रोमांचक हो सकते हैं और प्रमिकशि में होते भी हैं या फिर ये समस्यामूमन होते हैं। पौराणिक सपन्यासों का साहिरम में एफ स्पान है, यद्यपि इन्हें पक्तिगत रूप से में समस्यामूमम अपवा रोमांचन उपन्यासों की कोटि में रपमा प्रमिक पसन्द पगा। पौराणिक मन्यामों में ऐतिहासिकता माकर पपनी जाति और धर्म का गौरम बढ़ाया जा सकता है, लेकिन वर्तमान युग में ये पौराणिक उपन्यास इसलिए महीं मिले माते। बात पट मग सम्सी है मेकिम मेरा ऐसा पनुमर है कि पौराणिक पौर ऐतिहासिक पामों को पसमारने पासे प्रपित वह सोग है गो मुहमहानी की रचना नहीं पर सकते और मिनिए प्रपमित कहानी की यह परण मेमे में पेय देखते हैं। मई पानी गदना प्रामान नाम नहीं है, पौर प्रचलित वा से हट पर मनोरंजक पौर भौतिक महानी गदना तो बहुत मठिन है। इसलिए यदि लोकमायामों पुराणों या इतिहास की कहानियों को प्रापार बमा कर उपन्यास सिवा गाय तो इसमें मुझे किसी प्रकार पी भापत्ति नहीं हो सकती । पास पौर पुग की सीमा को पोदार ऐसी महानिया या सगी इस पर भी कुछ निषित रूप से नहीं कहा जा सपा । मासिर यह कहानियों को पुषणों में, सोकमयामों में अपवा इतिहास में है, कास पौर पुगी सीमा को पोकर ही हो पान तक जीवित है। उपन्यासों के पौर भी प्रकार हो सकते हैं पर उनके सप्ट रूप मेरे सामने नहीं है। अपने सीमित अनुमों और ज्ञान के बस पर उपन्यासों के सम्बग्प में जो पुषह सकता हूँ पहो मैने कहा है। 1 तेरा परिच्छेद उपन्यास मोर लम्बी कहानी के शिल्प दुनिया में उपन्यास के नाम पर पो पुस्तके प्रकाशित होती हैं उनमें पपिकांस ममी कहानियां होती है। यह वाव में प्रारम्भ में ही सप्ट कर पुकाई पोर मेरा ऐसा मत है कि उपन्यास का गिस कुछ पनीय तरह का उसमा हुमा पौर दुरूह होता है। यह भी निश्चित है कि उपन्यास को मम्मी कहानी को मपेक्षा पुछ पपिक टरे स्तर पर देखा पाता है क्योंकि मानवीय संवेदना को प्रभावित करने की जिवनी क्षमता उपम्पास में होती है उतनी मम्बी कहानी में नहीं समझी माती- कम से कम पाम के यौगिक वातावरण में। उपम्पास पऔर मम्मी महामी के एक ही क्षेत्र में प्राते हुए भी इस दोनों के शिस्सों में बड़ी विभिन्नता होती है पोर एक ही पति में उपन्यास मोर मम्मी कहानी का सफरस पिल्प कम ही मिलता है। इन दोनों के शिल्प पर पोटा-सा प्रकार गलमा में इस स्थान पर पावश्यक समझता। मनुष्य में कपा गड़ने की एक प्रवृप्ति होती है और इसी प्रवृति पर समस्त महानी कमा पापारित है। भूठ बोस कर वहानाबमामे की मांगों में जो कमी-कमो प्रावत पर पाठी हे वह इसी प्रवृति के पारण। अपने देनिक पोषन में हम म पाने गितमा भूठ बोनसे हैं और नस्पना से फिस्से गड निया करते हैं अपने मूठ को प्रतिपादित करने के लिए। सम्मोहोरनों के प्रपं ही होते हैं पस्सनारनिष्ठ पहानी दारा अपनी प्रविधयोकिको स्पापित करना। गप हॉफ्ना के माने मूठी पहानी को इस प्रकार महना कि यह सनी मासूम हो। पहानी के लिए अंगमा में पो 'गस्प अब प्रपसित हैगामी गप का रूपान्तर है। लेकिन यह ग छोटी कहानियों के म में ही हो सकती है। इन्हीं गर्मों का एक रूप हे पुरसुसा। मुरथुमे में पहने वामे पी हास्य प्रमिम्मेजना (Sense of Humour) भी महत्व की होती है। हम मस्पना द्वारा ऐसी मनोरंगा परिस्थिति को गाते हैं तपा उसमें पुष ऐसे हास्य मोर पंग को सम्मिलित रखे है कि मुनने पामे इस पड़े।

उपम्पास पार सम्बी कहानी के शिस्त यहाँ पुटकुलों का प्रयोगन होता है हास्य को सृष्टि वहाँ गप का प्रयोमन होता है मोर्गों में कौतूहम बपाना । गप्प प्राय अपने में ही होती हे जहाँ गप हाँक्ने वासा नायक बनता है और प्रपनी कल्पना में पह नायिका को बम मायक को जन्म देता है। चिकारियों की गप्पें तो प्रसिद होती ही है, भूत-प्रेतों से मिडमे वातों को संरमा पिछले काल में काफी पी। पर स्वयम् नामक बन जाने से इस गप पर विस्वास भी माफी किया जाता था इससिए भीरे धीरे स्वयम् नायक न पम कर किसी मम्प पुरुप को नायक बनाने की प्रथा बस पड़ी मेकिन इस पन्य पुष्प के साप गप होकने बामे का तावारण्य प्रणाम होता था। कहानी का सुनहत-सत्व विस्तार वाहवा है पीर इममिए भीरे धीरे गहामी सम्पी होती गयी । यहाँ कहानी किसी दृष्टान्त के लिए कही पावी है वहाँ बह सीमा के अन्दर रहती है। पुर मुराहत की कहानियों में विस्तार प्रहण करने की प्रवृति होती है और यहीं कहानीकार को क्षमता को परख है, कि वह अपनी कहानी को किसना पिक विस्तार दे सकता है। देहार्यों में पो बहामी कहने बासे मोग है-अब तो यह परम्परा मिटवी मी पा रही है-वह एक पहानी प्रारम्भ करके उसे इस कदर बड़ाते रहते हैं कि सुमने वासे सो जाय। एक ही कपा को बहुत अधिक पींपना प्रासाम नहीं है इसलिए एककपा में कई मम्सकंपाएं सम्मिसित कर मेमे की प्रथा पसी जिससे कहानी अधिक से अधिक सम्मी होती गाय । यह मतकपाएँ मूम बहामी का माम म होते हुए भी कहीं नहीं मूल पया से सम्बद्ध होती थी और इस प्रकार कहानी का यह स्म विकसित हुमा जिसे हम उपयास रहते हैं। पहानी को साहित्य का भाग स्वीकार किया गया बहानी में म पाने कितने परिष्कार के बाद। पोर इससिए सोकपामों में पहानी के को प्रादि-म मिलते हैं उनमें पौर साहित्यक कहानी के रूप में काफी प्रपिक पन्तर विमता है । साहित्य में पाने के बाद महानी का रूप निमरा स्पष्ट सीमा रेसाएँ उमरी मौर कहानी विभिन्न चिों का विकास हुमा । उपन्यास पर सम्बी कहानी लिस्प में बहुत एह पन्तर है, सेरिन पह माना नि निसका शिल्प श्रेष्ठ है, पड़ा कठिन है। मम्मी पपाएँ कहने के लिए एक कपा में पनेक उपम्मामों को सम्मिसित कर सेना सामायिक प्रवृत्ति तो है, लेकिन ये उपकपाएँ इस प्रसार सम्मिमित की माम शिवह मुस्प कहानी के भाप ही दिसे, मा मुस्लिम है। मोर इसलिए हमें उपन्यास के पित्स पर पम्मीणापूर्वक विपार कर सेना परगा।

। tપર साहित्य की मान्यताएं मस पहानी से पृपक उपाया का कोई महत्त्व न होमा चाहिमे- उपन्यास का यह मापारसूम तत्व है। यदि उपमानो का अपना नियी मस्तित्व है वो यह उपकपाएं कपाभों के संग्रह के स्म में प्राऐगी यह एक उपन्यास की रपना करने में असमर्प होंगी। ऐसा नहीं कि सपकपा में उसकी निमी भावनात्मक प्रमिष्यति न हो या उसमें संवेदमारमकता म हो इसका होना सो नितान्त प्रावश्यक है, पर यह सब मूल कथा के संदर्भ में होमा पाहिए, उससे तारतम्म स्थापित करते हुए। कमी-कभी ऐसा भी होता है कि एक उप पास में वो तीन पार या इससे भी मषिक महामियां एक साप चलती रहती है। यह कहानियाँ मावमारमा प्रमिष्यत्ति में एक-दूसरे से सर्वमा मिन्न हो सकती है, पर इन महामियों को एक सूत्र में बांपने याप्ती एक प्रमुख कहानी अवश्य हमा करती है मो सस्कास प्रमुख मले ही म दिवे पर किसी स्थान पर पस कर जो इन कहामियों पी एमसूत्रता को स्पापित फर देती है। वह प्रमुख कहानी बड़ी रोती-साप्ती हो सकती है, उसका इन उपकपामों से प्रमग मस्तित्व भी अनुमय न निमा पा सकता हो । कमी-कमी यह प्रमुख कहानी एक भाव (Idea) के म्म में ही प्रकट होकर रह पाठी हो मेकिन उपम्यास का भावनारमक पौर संवेदनात्मक पार इस प्रमुख कहानी में ही रहता है। उपम्पास में देश पौर काम की सीमाओं का होना अनिवार्य नहीं है, उसका विस्तार प्रमीम है, पर मनुष्य सीमिप्ठ है इसलिए मनुष्य तो सपम्पास को अपनी सीमाएँ देता ही पसेगा। विषय-वस्तु की मिमिन्नग से उपम्पासों की पति पौर दामता को भी कभी-ममी पा सहारा मिलता है क्योंकि उन विभिन्न विषयों में निहित एकरूपता को प्राप्त करा देना उपन्यासकार की बहुत बड़ी उपसम्मि समभी पा सकती है। पिनी बाते उपम्पास के सम्बध में कह पुका हूँ उनसे यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि उपम्पास मा शिल्प प्रमुखत पौटिक है। उपन्यासकार को अपने बिल के प्रति काफी समेत रहना पड़ा है। पर या उपम्पास का शिल्प इन बौदिक नियमों से वापा जा सकता है यह प्रान सामाजिक रूप से उठ खड़ा होता है। पौर मेरा ऐसा मत है कि बौद्धिक नियमा सेक्सामा गिस्प बात एक हर तक ही पंप सकता है। उपन्यास अन्ततोगत्वा सुगनारमकपमा है, इसलिए बुठि में तो उपन्याम पा स्रोत नहीं है । पुदि का काम बम सहारा भर देना है । उपम्पास के सफल कपा-वस्तु को मापने को सामना । उपम्पास पोर मम्मी कहानी के चिस्प बुधि महीं प्रदान मरती यह क्षमता तो फलानर को जम्म से ही प्राप्त होती है। पर इस प्रवृत्ति के विकास में मुहि महुत बड़ा सहायक तस्व है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। जिसे हम व्यावसायिक साहित्यकार कहते है वह बुद्धि का सहारा मकर एक मन्यानवासा उपन्यास सो निस ही सस्ता है, वह महान् पौर सफल उपम्यास भस्से ही न हो । पान गो प्रचार कार्य में भावनात्मा प्यकीकरण के लिए साहित्य का सहारा लेन की प्रथा बस पड़ी है, उसमें कहानी को प्रपेक्षा उपन्यास भपिक सयस माध्यम समझा जाता है क्योकि उप यास की विभिन्न उपक्रयामों म उन मनगिमठी समस्यामों एवं दृष्टिकोणों को रसा पा सकता है जो प्रचार के विषय के अन्तर्गत पाते हैं। प्रपार बौमिक है, पौर दुति की माधारयिता तर्क है। तर्क में विस्तार का हो मम्त नहीं। यह प्रभार दूसरे द्वारा कही बातों का हो सकता है, यह प्रभार स्वयं अपनी बाटा का भी हो सकता है। ऐसी हालत में उपन्यासों में विस्तार का दोप प्राय दिसने लगता है। मषिकास उपन्यार्थी के सैकड़ों पृष्ठ तर्क-मिवर्क से मरे रहते हैं । यह वर्क-वितर्क बुध पोड़े से योधिक मोगो को ममे ही पसन्द मावे, भावनात्मक समिति के प्रमाप के कारण इन तकों में साधारण पाठक को कोई दिसपस्सी महीं हमा करखी। सविसर वह भी छोटे छोटे टुकड़ों में वहीं सफल हो सकते हैं यहाँ तक वह उपन्यास के कपानक वामे कर्म की भावनात्मक पमिम्पति को निरिक्त पोधिक रूप देने में सहायक हो। कहानी की कमा फर्म पीर गति की है वह पिन्टन पीर मनन की मही है। ममन पौर पिम्तन का क्षेत्र मसम है । मनन पीर चिन्तन को सहायक स्थ के रूप में ही लिया जा सकता है। वैसे मार के युग में उपन्यास में मनन और चिन्तन को महत्ता दी जाती है, प्रपिकांप उपन्यासों में प्रति. पावना के रूप में तो को मरमार रहती है। लेकिन इस प्रकार के उपन्यास केवल एक रिशिष्ट पर्ग वरु हो सोमित रहेंगे उनका सार्वदेशिक पौर सार्वमोमिक महत्व नष्ट हो जाता है। यही नहीं, समय की गति के साप उन उपग्यासा मा मनन मोर चिन्तन भी पसामयिक (out of Datc) होता भावा है और इन प्रकार के उपन्यासोंगी महत्ता नष्ट होती भाती है। बात पोड़ी-सी अप्रिय प्रपश्य है, सेमिन उसे बह देना में इस स्पस पर मावश्यक समम्ता हूँ । प्राय यह होता हे दि उपन्यासकार एक गांव मोटे उपन्यास पो सिसने के मोम में इस सरह के तर्क-वितर्क से पन्ने साहित्य की मान्यताएं पर पस्ने रंगवा पसा वाता है । उनको पड़ने पर एक प्रमोव तरह की मिया होती है. प्रफसर वितृष्ण सी पैदा हो जाती है। उपन्यासकार को इन बातों के प्रति काफी ससक रहना चाहिये । कमा का शिल्प भावनात्मक अभिव्यक्ति का होता है, पौर इसलिए उपन्यास में कपा-वस्तु का विस्तार ही एक माप विस्तार माना मा सस्ता है। पम्प प्रसार के विस्तार उपम्पास को शिपिसता प्रदान करखे हैं। मम्मी कहानी का शिस्त उपन्यास के पिस्स की अपेक्षा दुरुह तो नहीं है, पर यह उपन्यास के घिस्प की अपेक्षा कठिन अवस्य है । मम्मी कहानी में केवल एक कहानी रहती है और कुछ इने गिमे पार पहते हैं। ऐसी हामत में मम्मी कहानी का शिल्प पड़ा कसा हुमा मौर मुपहोना चाहिये। मेसा में पहले कह पुका हूँ मम्मो कहामी रोमास या पटना-प्रधान बहानी कहने में ही सफल होती है सम्बो कहानी समस्यामूक बड़ी मुस्विस से बन पाती है। एक कहानी का बहुत सम्या विस्तार कठिन है-यही घम्बी कहानी पो मर्यादा है। पाम तौर से समस्यामूसा न होने के कारण सम्मी कहानी का विस्तार तर्क-वितर्क या सिनाम्वों की प्रतिपादमा से करना प्राय हास्यास्पर हो पाया करता है-यह विस्तार फेवस उपन्यास में से सम्मय है। मम्मी पहानी का विस्तार प्रायः कवित्वमप वर्णनों से ही किया जा समता है जो रोमांस के मूस प्रवयब हैं। वैसे अन्तर्युसी शिल्प प्राय प्रपने को सम्बी कहानी में ही समिहित रखता हे पयोकि अन्तर्मुखी पादिस्य स्वयम् में सीमित और संकुपित है। इस पन्तर्मुवी कहानी का विस्तार वितर्क प्रौर सिसाम्तों की प्रतिपादना से निमा पाता है। मान साहित्य के माम पर प्राम पन्तमुपी सम्मी कहानिया ही दिखाई देती हैं, या गहना मह उपित होगा कि बस अन्तर्मुखी मम्मी कहानियों का ही साहित्य में उस्मेप होता है, और इसमायण हे मम्मी कहानी के शिस्त को पठिनाई। पहिर्मुखी मम्मी पाहानी में क्या का विस्तार पाहिये पौर विस्तृत कमा पर उगम पासान काम नहीं है। यह पुग रोमांस का महीं है, इस बात से तो इनसर पिया महीं पा सम्वा' मम्बी बहानी के लिए मनोवैमानिक क्षेत्र में सबसे उपपुछ समझा पाता है। मनोवैज्ञानिक साहित्य में परिवपिमण के माध्यम से कपा मा विस्तार सम्भव ही नहीं कहीं-कहीं बड़ा रोष हो जाया करता है। इन मनोवैज्ञानिक पहामियों को वित्तमय वर्णनों से भी यपेप्ट मत प्राम उपम्यास मोर सम्बी कहानी के शिस्त होता है । पर इस प्रकार का वर्णन करना हरेक कलाकार के परा में नहीं है। पर इस प्रकार के वनों में एक विशेष प्रकार के शिस की पावरसस्ता होती है जो हरेक कमाकार के पास महीं है। पही में शिल्प के मोटे-सौर से दो दो प्रकार हैं, उनका भी उस्लेस कर । एक चिस्प है अमकर दूसरा पिस हे गति प्रपान । पसंत शिल्प की गति बड़ी धीमी होतो हे, पच्चीकारी के कम से एक-एक परित्र को गढ़ा माता है। यही मही, घटनाओं के सूक्ष्म वर्णनों से सहाय मिया बाता है। सम्बी पहामियों में प्राय यह प्रसक्त जैसी बड़ी सफरत मानी पाती है। गति प्रपात मी पापुनिक युग की मनोवृत्ति के अनुसार हे । कृष पोड़ से वर्णन से परिम के पो एक कमों से वहाँ परित की स्थापना र दी माती है। पर उपन्यासों में यह गति-प्रपाम सैमी ही प्रायः सफल हुमा करती है। पटना-प्रमान कहानियों में कपा-वस्तु का विस्तार स्वामाविक सस से होता है । एक कहानी में मनाने कितनी पटनाएं हो सकती है और यह पटनाएँ स्वयम् में इसनी मपिक रोचक हो सकती है कि यहां पर सो की पावश्यकता हो म पड़े। पटना प्रधान सपा मासूसो उपन्यासों को साहिहय में स्थान नहीं दिया गया। इसका कारण यह है कि इन कहानियों में भावनात्मक संवेदना का एक तरह से ममाव-सा होता है। पर मेरा मत है कि पटना- प्रपान कहानियों में भी संबेदनारमस्या हो सस्ती है। पौर में सो यह पहने ही निवेदन कर पुराई कि कहानी ममी विकास के क्रम में हे पहानियों के निस्य मीन रप प्रकट हो रहे हैं। कहानी मा एक मया म मिसका उत्सेस करना में भूम गया पा पेशानिक महानो है। प्रमी तक मैंने जिवनी वेशानिक कहानिया पड़ी है उनमें कोतहस है, कुछ मनोरंजन है, कुछ पोड़ी-सी बेशानिक बानकारी है, सेमिन उन कहानियों में संबेदारमा अभिम्पति का मुझे ममाप दिया। से उनमें किसी वर्ग विशेष के लिए वेदनात्मकता हो सकती है। इन वैनानिक कहानियों को साहित्य में स्वीकार परमा मागम हो गया है । यह वैज्ञानिक कहानी मम्मा कहानियों के लिए बझे उपयुक्त है। सापारण पाठक के लिए समीकहानी उपन्यास की अपेक्षा पपिक ऐमक और सुगम होती है । गिस्य का उनझार पार गिस को मारीगने मम्मी कहानी में होवे पपस्स हैं, मेचिन पाठक को इमरा पता नहीं साहित्य की मान्यताएं पसता ! पोरे से पापों और एक ही कपार विभिन्न परनामों को यह मम्ही वह समझ मेवा है। उपन्यासों में दो साधारण पाठक कमी- भी पुरीवरह उत्तम जाता है, मग्नि सम्बी महानिर्या में उसे यह उममम नहीं दिसती । सम्मो महानी अपने प्रभाव में उपम्पास की भांति व्यापक सपा सराक ममे ही म हो, पर मनोरंजक यह प्राय उपन्यास की प्रपेक्षा अधिक होती है। कहानी गा मुस शिल्प पम्पो महामी सिमने का पिस है और पहानी का भी प्रकार कमी विमसित होता है यह लम्बी कहानी के स्प में। मासूसी नफ्यास पैमानिक उपन्यास पटना प्रधान उपन्यास-- ये सर मम्मी कहानियों के रूप में ही विकसित हुए हैं और हो रहे है। उपम्पास मम्मी कहानी पा ही विकसित रूप है। से.पन सम्मो बहानी के लेखक के लिए अनिवार्य है कि यह महानी को पम्ही तरह से माप सके । महामो ना अन्धा गठन ही सम्मी पहानी का प्रारण है। नहाँ उपम्पास में कथा पहने का पिल्प प्रमुख होता है वहाँ सम्मी महानी में समा गाँधने का शिरुप प्रमुख पा करता है। भपिकाध में पटमा प्रपान मम्मो कहानियां प्रपिक हपिकर होती है। कौतूहल के क्षेत्र में और मनोरंजन करने में सम्बी कहानी उपन्यास की अपेक्षा पनि सक्षम होती है, । सेफिन यहाँ सक मावमारमक संवेदना का प्रपन है, उपम्याए इसमें प्रपिक सक्षम है । मापना को पति बहन करती है, इस बात को मानते हुए हमें यह भी मान पड़ेगा कि उपन्यास में हानी पहाती की अपेक्षा गति पपिक है। कहानी मी यह गति है क्या? देनी घटमा झम पाने में एक प्रकार की विमवश्य है, मेनिमबह मसापी पति मही कही जा सकती। करसमापी समेरमारमक गति ही वास्तविक पला दी गांव पही जा सकती है। माषना दी प्रापेपित परने मे सिए सिवनी विविधता से काम मिया पाप उतनी ही सपसवा माहारमो मिलेगी। उपन्यास में प्रा नपामों में समर प्रमेक परिष पाते हैं मपनी अपनी विशेषता मिए इए। ये कम करते है, दूसरे पर इनके कर्मों की ममिश्रियाएँ होती है और इस प्रकार भावनात्मक संवेदन को उसरोपर वृद्धि होती रहती है। इस मापनारमक संवेदमा की एक निश्मिा पाय होती हैहर मगह से घूमती, फिरती, भटमती भोर राह पाती हुई मह संवेदना प्रम्त में एक विहो जाती है और इतना प्रपिक तपमे तपा परिपम्प होने के बाद यह भावनात्मक संवेदना पाठा के मन में गहराई थाप दे पाती है।

उपन्यास पौर सम्बी कहानी के शिल्प घटनाक्रम की गति भावनात्मक संवेदना की गति नहीं है, वह केवल नहस पार उत्सुकता को गति है वो क्षणिक है। जब तक पटमा कम प्रधान हामी हाप में रहती है सव तक पाठक की हपि उसमें रहती है कहानी समाप्त होने के बाद कौतूहल की तृप्ति हो जाती है और इस राप्ति के बाद मनुष्य उस घटनाक्रम के प्रति उदासीन हो जाता है। पन्धे- से पच्चे मनोरंमा मासूसी मेज्ञानिक प्रयवा भम्य पटना प्रमान कहानियों को मो येष्ठ साहित्य में मही सम्मिसित पिया माता उसका कारण यह है कि उनमें भावमारमक संवेदना का प्रभाव रहता है। मम्मी कहानी में कहानी एक होती है और परिण भी कम होते हैं। पसी हासत में लम्बी कहामी फेवम अपनी कहानी के बम पर भावनात्मक संवेदना के मामले में उपन्यास की अपेक्षा अधिक कममोर होती है। कहानी की भावनात्मक संवेदना को यहाँ कवित्व का या मनोविज्ञान का सहारा लेना पड़ता है। दुनिया में यो अन्तर्मुसी साहित्य पान फस प्रधुरता के साथ मिसा जा रहा है, उन सब में सेसक के अन्दर का फविस्व सपा उसका निजी मनोविज्ञान ही होता है। वस्तुगव न होने के कारण अन्तर्मुखी महानी साधारण पाठन के लिए दुरूह होती है लेकिन इस पुरहता के दोप को मेस का कवित्व तथा उसमा निजी मनोविज्ञान काफो पंश तक 6क मेता है। इसी कपिरव मौर मनोविज्ञान के कारण कुष पन्तर्मुसी कहानियां काफी प्रभावशाप्ती बन गयी है। पौर इसलिए मेरा यह निश्मित मठ है कि गप-साहित्य में भावनारमा संवेदना पीरष्टि से उपन्यास सब स भपिकमियानी माध्यम है । यह ठीक है कि उपम्यास में रस मेमे के लिए पाठक में पोड़ी सी गौविकता होनी पाहिपे सेक्नि मौखिक प्राणी होने के मावे मानव, दुटियोता हमेशा प्रमुसता देता । उपन्यास प्रमुपत चिस्प प्रभाम है. पौर घिस्स स्वयम् में पौरिक चेतना पर प्रक्रिया है। में यह मानता हूँ किमन्साकार को शिल्प बम से ही उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होता है, सेमिम उस पिस्स विकास में पीवन के म जाने पिसने अनुभवों की सहायता की भावश्यकता होती है मौर इम पनुमयों को पहरण करने के मिए मनुष्य में बोटिम पेतना का होना मावश्यर है। पुस्तकों को पाकर सो गान प्राप्त होता है, वह प्रपि में सैलातिक प्रपया मनुमान मूमक होता है, व्यावहारिक पौर थ्यिात्मक नहीं होता । ऐसी हासत में उपन्यास के पिस्प के विकास में सिवान्दों में साहित्य की मापवाएं मामकाये म पोड़ी बहुत सहायता मसे कर दे, मसाकार को इस शिस विकास प्राने अनुभवों से ही करना होता है। यहाँ पक पौर भ्रम का निराकण कर देना प्रावस्पक होगा। मोगों का ऐसा मत है कि साकार प्रायः पौलिक प्राणी नहीं होता। में इस मत को गुमठ समझता हूँ मासाकर माक्षेम पनि म हो कर मारना प्रबाप है, मेति भावमा को धमन करने की तमाम देने की प्रक्ष्यिा निश्चय ही मौरिक प्रक्रिया है। कला के पधमान में वृद्धि का प्रदर्शन ममे ही अनिवार्य न मामा माप वैसे कासिवास और शेक्सपियर बुद्धि के प्रवर्धन से पमित रह पाना पाता है, सेगिन्न कसा के यक- भाग में वो मह मुधि का प्रवर्तन नितान्त अनिवार्य है । भाषनारमक मोमिया में यहाँ तक शिल्प का प्रश्न है उपन्यास गप-साहिम का सबसे समठ माध्यम है-सम्बी कहानी उपन्यास के बाद माती है।

चौदानों परिच्छेद छोटी कहानी-कथा साहित्य का श्रादि रूप दुनिया में मिस साहित्य की रचना सबसे अधिक हो रही है वह छोटो कहानी है। और यह भी सस्प है कि छोटी कहानी का महत्व प्रतिदिन कम हो पा रहा है। इसका कारण यह है कि छोटी कहानी का संवेदनात्मक प्रमाण उपम्पास या सम्बी कहानी के संबेदनाएमक प्रभाव की अपेक्षा शिपिस होता है। इस छटी कहानी की प्राभार भूमि पुटकुलों मर्पो पा ष्टान्वों पर ही महीं भीवन की वास्तविक भटनामों पर भी है। जीवन में नित्य प्रति पटने बासी पटनामों में अनमिनवी कहानियां मिल सकती हैं पर भो कठिन काम है यह है न पटनामों का मनोरंयकग से वर्णन पौर इन भटनामों में संवेदना उत्पन्न करने की क्षमता । बीवन की इन पटनामों में उस माटकीयता का प्रभाव हमा करता हे को उन्हें मापनारमक संवेदना के प्रादान-प्रदान के योम्प मना सके और इससिर कहानी-सेपक प्राय न पटनामों में माटकोयता माने के लिए पस्पना से काम सेवा है और इस प्रकार मीवन की घटना कहानी या पामार भर बनकर पनाती है। पीरन मी पटनाओं के वर्णन अतिशय रोषक होते हुए भी साहित्य मैं बोस्थान नहीं पा समें उसका कारण यह है कि उनमें फेवन कठोर पौर भावनाहीन सत्य हा रखा है, उनमें संवेदनारमा प्रतिम्पिा मही होती। किसी भी घटना को देखने का मानव का अपना निजीष्टिकोण होता है। पोर होता प्राय यह है कि गोयन पे पटना को अपने राष्टि कोण से देपार उप्स मम्सना तारा स्मान्तर कर देने की प्रवृत्ति मनुष्य में पाग उठती है। इसी प्रध्यिा से कहानी पा भन्म होता है। पहानी रहने की पीर है उसमा सिखिय स्प साहित्य में प्रामे के पहसे पर्मयों में एवं समामपाल की प्रतिपादना करने पाने प्रमों में एप्टाम्तों के रूप में प्रापा । एष्टान्त में केवल कुछ इने-पिने परिवों हाय एक पटना पटित करा के उमसी प्रतिध्या में सिद्धान्तको प्रतिपारित किया जाता पा। इन पटनामों का मापार बोरम में नित्ल प्रति घटित साहित्य की मान्यताएं होने बासी घटनामों को बनाया जाता था मेकिन कहानी मेसक उसमें प्रपमी कस्पना पौर प्रपने दृष्टिकोण को उसमें समारत कर देता था। मनुष्य में सपने देसने की प्रवृत्ति होती है। उसके जीवन में पो नहीं प्राप्त है, मेक्नि भो कुछ वह प्राप्त परना पाहता है, इस वास्तविकता के पोर पोर कुरुप जगत् से उठार वह उन्हें प्राप्त करने के सिए मरूपमा के भगत का निर्माण करता है मोर कस्पना में ही यह उस सवको पाने का प्रयत्न भी करता है। इस मनोवैज्ञानिक प्रापार पर प्रमगिनती कहानियों का हनन हुमा यो लोग्नपार्मों के नाम पर प्रतित हुई। इम कहानियों में प्रादिकासीन मानव की पविकसित मल्पना की रंगीनी पी उसके अन्तरवामा कवित्व था । पर साहिय में यह कहानियाँ स्वीकृत नहीं हो पामी पर्योकि उनमें यौटिक म्प से पकर में माने वामी संवेदना का प्रभाष पा। मानब के बौद्धिक विकास के साप बदामी में भी मौद्धिक संवेदना को पहण करने की क्षमता बढ़ती गयी । मतियोकि पौर प्रतिरंगना बौगिक संवेदना के क्षेत्र में बहुत बड़ी पापा के रूप में प्राते हैं पौर समिए महामी से पतितयोक्ति मौर अतिरंजना को कमजोरियां दूर होती गी। बिस्छन स्वाभाविक ममने वानी पटनामों में सम भावनात्मक संवेदना पाई व कहानी स्वत साहित्य मा माग बन गयी। कहानी का एक रूप प्रौर हे प्रतीकारमा । पानपर एक दूसरे से बात करते हैं, भग्हर अपनी कहानी कहत है-यह सव बड़ा अस्मामाविक पौर हास्यास्पद है, मेक्नि प्रतीकात्मक कहानियों में यह सब होता है, और इन प्रतीकात्मक पहानियों के पास में इस प्रस्थामाविमता से मोई वितृष्णा नहीं होती, यह बड़े चाव से इन कहानियों को पासर उनसे विदमा को प्रहण करता है। पहानी मा क्षेत्र इन्हीं कारणों से, पाहत प्रपिर प्यापर है। मितान्त प्रस्वाभाविक दिपने पाप्ती पटनाएं भी अपनी प्रतीकात्मम्सा के पारण कहानी में सम्मिमित की गा सकती है अब नि मम्मी पहामी प्रपना उपन्यास में उना मा समना प्रसम्मव है। मारम्म में प्रवीयरमक महानियों को साहित्य में पा स्थान मिलता पा। बहुत पोहे में बरी पात ह सपने की दामता रखने के कारण हमारे पाचार्यों ने सबसे पहले प्रतीकात्मक महानियों को ही साहित्य में माम्यता दी। प्रतीसारमा कहानिया को मान्यता पने को प्रपा माग के यस्तुबादी युग में पीरे-धीरे शिपित्त पदयो पा रही है । प्रवीरमरसा स्मयम् में बोटिक छोटी कहानीकपा साहित्य का प्रादि स्प तत्व हे कक्षा में प्रतीक बस एक हद तक सहायक हो सकता है। पौर इससिए कहानी मा विकास यथार्थ चित्रण केस में ही प्रस्पधिक हमा! पाम मी कहानी यपाप रे चित्रण के सबसे निकट है। पहानी के तीन प्रमुख प्रवमय है पटना परित्र और भावनात्मक संवेदना । बिना पटना के मोई कहानी नहीं हो सकती। यह घटना परिषों को प्रिया-प्रसिडिया केस में होती है। भावनात्मक संवेदना परित्रों के साप होती है, उस भावनारमक संवेदना को उत्पन्न करता है पटना में परित्रों का कर्म। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि घटना को रोचकता कहानी का पहसा सिदान्त है। हमारी भावनात्मक संवेदना को पागत करती है पटमा में रोपरसा । घटमा की रोमकवा और पटना-बेमिश्य ये दोनों प्रसग-अलग पी में है। पटमा-पिध्म सयम् में महामो पा पाधार बन सम्ती है सेमिन पटना-पैनिध्य में भावनारमक संवेदना हो यह भावश्यक नहीं । मटना की रोपासा में भावनात्मक संवेदमा का होना अनिवार्य है। पहानी प्राय जीवन के किसी एप पहसू मी मारी के रूप में पाती है। उसका उद्देश्य बीवन को या उसके किमी पहन को पूर्ण रूप से प्रतिविमित करना नहीं होता । मोर इसलिए कहामी के पनर यासी भावनारमा संवेदना प्यापक मही झवी प्रमाव पाहे उसका पिसना भी प्रप्सर मयों म हो। और यहीं पहानी-पसा उप पास मा मम्मी कहानी की पसा की प्रपेक्षा अधिक पठिन है। महामी के माध्यम से स्वामी प्रभाव उत्पन्न करना बहुत सस पिस्पी का पाम है। उपन्यास पार सम्बो पहानी की प्रफेमा पहामी मिसना दितना सरस है, हानी द्वारा भावनात्मक विदना उत्पन्न करमा चसमा ही परिन है। छोटो महानी का स्पापिस्व भी बहुत कम होता है यह निषित गात है । पुर्गो-युर्गो तर मीवित रहने पाले पपिकाध में पम्पास होते हैं। सेपिन युपपी माँग घोटी कहानियों की हमशा रही है यह सत्य हे पौर छोटी महानियों को माप हमेशा रहमी । मनुष्य के प्रति पस्त जीवन में साधारण मनुष्य के पास इतना समय महीं कि वह अपने समय का बा भाग पाने में बिताए, पर-उपर से जो समय पप गया उसी को यह पाने में बिठा समय है। हमारा मान-सा समय प्रठीक्षा में बीयता हे-पिसी के यहाँ गए तो दस-बीस मिनट हाईग स्म में प्रवीक्षा फरमी पही गाटर के यहां गए वहाँ प्रतीक्षा करनी पड़ी। पोर ऐसे मोमों के पहा धमय बिताने के लिए हानियों के म में पाट्य-सामग्री प्रावश्यक १४२ साहित्य की मान्यवाएं होती है जिससे मनोरंजन के साप समय पाटा पा सके। पर ऐसे अवसरों पर हमारे पास इसना समय दो महीं रहता कि हम न्सिी सम्बी कहानी की पुस्तर को पढ़ें। कया पो एक बार उठा मेने पर उस कथा का प्रन्ठ पान मेना हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। दो पाल्प-सामग्री हमें दूसरों के यहाँ प्राप्त होती है वह उस दूसरे व्यक्ति की होती है, हमें वह पाठप-सामग्री फिर पाप्त होमी यह प्रनिश्चित है। ऐसी हालत में रस-पन्द्रह मिनट की छोटी कहानी समप काटने के मिए पम्ही होती है क्योंकि प्रतीक्षा का समय प्रायः इवना ही हमा करता है। यदि मधिक प्रतीक्षा परनी पड़ो सो एक से पपिक कहानियां पड़ी बा सकती है। और इससिए प्राय इन लोगों के यहाँ यो पाठय-सामग्री समय काटने के लिए मिमती हे उसमें छोटी-कहानियों का होना भी पनिवार्य है। पुनिया में छोटी महानियों की पत्रिकामों की पो श्वनी अधिक पपत है, उसका यह बहस वड़ा कारण है। छोटी पहामी का उद्देश्य स्थायी प्रमाव के स्थान पर तालासिक प्रभाव होता है। इन वालासिक प्रमाण की नीनों में यदा-कदा स्थापी प्रभाव भी पीछे भी मिस पाती हैं और इसलिए छोटी कहानी अमर साहिम की भी निधि हो सस्तो है। उपम्पास अपवा मम्मी कहामी की अपेदा छोटी कहानी का दोष पपिप व्यावसायिक है। एप मा दो पृष्ठ से मेकर तीस पानीस पृष्ठ पर की छोटी बहनी हो सकती है, और इस कहानी का क्षेत्र प्रमुलक मनोरंजन होता है । यह मावश्यक नहीं कि संवेदनारमा अनुमति हमें घोटी महानी से प्राप्त हो हो महीं सकती, यही संवेदनारमा पनुमति तो कहानी को महान् पनासी हे तपा अमरता प्रदान करती है। मेग्नि इस प्रकार की पवनी मपिक छोटी पहामिया सिसी कैसे पा सकती है। अन्य प्रकार के रोषक तपा जानकारी प्रदान करमे बास नियन्मों की कोटि में ही घोसीपहानी को रखा गा सरता है । इस पाठ्य-सामग्री उत्पादन "एकप दोभान गासे सिद्धान्त के अनुसार होता है। समय का सदुपयोग हो मौर साफ-साप मनोरंजन हो । पापसायिफ प्टि से छोटी कहानी में एक पोप भी है। छोटो कहानिमा अधिकांश में पत्र-पत्रिकामों में यिनसी है जिससे मेयकको देवम एक बार ही पारिपमिक प्राप्त होता है। अधिकार छोटो पहामियों पम पम-पत्रिपापों से निकल कर पुस्तक-एप में पा ही मही पाठीं। पपा साहित्य में कहानी संग्रहो की निको बहुत कम होती है, हरेक पोटी कहानी- कपा साहित्य का प्रावि म्म प्रकाशकास बात को स्वीकार करेया।कया-संग्रहों में भी काहानीकारों की हानियों का सामूहिक संग्रह वो पोम पाव विक भी पासा है पर एक कमाकारको महानियों का संग्रह बड़ी मुश्किल से विक पाता है। मान कि हमने एकाहानी संग्रह मरीबा गिसमे विभिन्न बहानीकारों की सानिया संग्रहीत है। हो सकता है कि हमने उनमें अधिकांश कहानियाँ पम्पत्रिकामों में परसी हों। ऐसी हासत में यह पुस्तक हमारे लिए निरर्थक होगी। और यहाँ तक एक कहानीकार की कयामों के संग्रह का प्रश्न है होता प्राय यह है कि उसकी दो-चार महानियां तो हम भने ही बरे पार से पढ़ पाय वाद में हमें ऐसा मगता है कि भन्म कहानियों में सेवक अपनी ही पुनरावृत्ति कर रहा है और वहाँ यह मास हुभा वहीं वह कहानिया हमें परोपक सगने मगती है। पुनयति (Monotony) का कोप प्रायोगिक समान में बड़ी मासानी से पत्र में प्रा जाने मगा है। किस प्रकार कविता के क्षेत्र में गीतों में पुनपत्ति मा दोप सहन ही दिन माता है उसी प्रकार कपा साहित्य मे छोटी महानियों में पुनराप्तिमा दोष बसी मुस्किन से सम्हासा पा सकता है। वैसे उपन्यासों पौर मम्बी कहानियों में भी पुमरावृत्ति का रोप मा जाता है पर यहाँ वह इतना अधिक स्पष्ट नहीं होता। हो यह भी सत्य है कि वो बहुत अधिक यौशिक पाठक है, वह एक कलाकार की दो-तीम कुतियों से अधिक रुपि के साप महीं पद समेगा क्योंकि माये पप्त पर उसे एक ही मेसक के व्यघिय के बार-बार दर्शन होने मगते है। वस्तुत मासा कसाकार के पचिस्व का प्रक्षेप तो है ही। फुपास शिस्पी हमेशा अपनी क्षेती प्रपने वस्तुविषय तपा अपनी मापा में परिवर्तन करके इस पुनरावृत्ति के दोष से बचा रह सकता है। मेगिम इस सब की सीमा होती है । मौर कहानी में तो इस दाप से अपने को बचाए मना नितान्त पाटिम हो पाता है ।बाँ तक प्रागीविय का प्रस्म है कहानी कलाकार को प्रागीविका में सहायता तो कर सस्ती है, मेक्नि वह प्रागीवित का मापार नहीं बन सकती । भाग के युग में पहानी-साहिप पौर परमरिता के पीप में पिनो जाने सगी है पानीरिया के प्टिमोण से । पहानियों में पटमा प्रधान पा हास्य एसपी महानियां पारिता के प्टिकोण से अधिक सफल होती है। बरनारमा पहानियां गुरु कोनहस पासी होती है और वकास मम को उत्तमा रेमे में बह गहरी सहायक होती है। पिना किसी भावनात्मक संवेदना के पटना-प्रधान पहानियों की मिस्प के पीवम में बहुत बराबर साहित्य की मान्यताएं परी उपयोगिता है मौर इन घटना-प्रधान कहानियों में पुनरावृत्ति (Monotony) का सतरा सबसे कम रहता है। वैसे दूसरों में पुनहल को बात कर देना सयम् में भावनात्मक प्रदिया है और एक कुशल शिस्ती इन घटना प्रधाम कहानिर्यो में ऐसी भावमा उपर कर सकता है जो पाठक के दिमाग में काफी समम तक रहे। पर घटना-प्रपान कहानी लिसने के लिए कपासूत्र को दोषने की मिस क्षमता की मावश्यकता होती है वह बहुत कम साहित्यकारों को प्राप्त है। रसों में हास्यरस की भावना होते हुए भी हमारे कमाकारों ने हास्य रस की मोर अधिक ध्याम महीं दिया और सम्भवत इसका कारण यह था कि हमारा साहित्य गम्भीर सापों प्रौर मनीपियों के हाथों विकसित हमा है । गुर निर्दोप हास्म का विकास हमारे देश में पुटकुनों के रूप में हमा है, साहित्य में इस प्रकार के हास्य को स्थान नहीं मिला है । मैंने सोगों को प्रायः यह कहते हुए सुना है कि भारतवासियों में गिनोव-प्रियता (Sense of humour) की कमी है। एक हव तक मह वात ठीक भी हो सकती है क्योंकि हमारे यहाँ गम्भीर विधायें की ही प्रमा रही है । समता में ओ बिमोव-प्रियता रही है उसका प्रमावेश साहिहय में नहीं हो पाया। छोटी कहानी हास्परस का अच्छा और सफस माध्यम है । मह हास्य, हास्यास्पद चरित्रों क सृमन से माया वा सकता है यह हास्य अप्रत्याशित पटनाओं पौर परिस्थितियों से पैग किया जा सकता है। इसमें दूसरी बोटि मा हास्य अधिक निप और सफल होता है। तोसरी मोटि का झस्य है म्मंग का । मंग वासा हास्प प्रपिक पौठिक हे मौर वर्तमाम बौदिक युग में यह मंगारमा हास्य भेष्ठ समझा जाता है। पर मंग वासे हास्य में पढ़ता के प्रा गाने का सतरा रहता है, पौर मभिकाश सेसक प्यम से कटुप्ता को महीं दूर रस ह होता है, और व्यंग से पता को इम हद गौण बना देना कि सामारण पाठक को उस पीठा का मामाम मी म हो बहुत पाड़े से पसासार ही कर सकये हैं। । भ्यंग स्यम् .

पन्द्रा परिच्चन रेखाचित्र-साहित्य की नवीन शाखा कृष समय पहले तक रेसात्रि की मणना मामतौर पर छोटी पहानी में की थाती पीमेक्नि पाठक रेखाचित्र पढ़ते समय यह मनुस्य प्रस्य परवा पाकिबह फेटी कहानी से कुछ भिन्न है। रेसापिन किसी पटना पर प्रामाप्ति नहीं होता वह पति पर प्रापारिख होता है। परमा वासेम और उसकी प्रतिघ्यिा के प्रभाव के कारण रेखाचित्र में उप पति काममा-सा हवा है गो मावना को वहन करती है और इसलिए रेखाचित्र को सक्षम पोर समर्म साहित्य में नहीं माना पाताया। रेखाचित्र को साहित्य में स्पान किन हमों में मिला, इस पर पनुमान मगाना कठिन है। मुझे रुप ऐसा ना है कि रेखाचित्र प्र प्रयोग मागम में किसी पनि विशेष की ऐसी नहाने के लिए किया जाता पा। भाव मी हास्यरस के रेसापिस प्रारखा के साप मिससे हैं। कोई पति रिस तरह चमता है, किस उरह बात करता है, किस तरह सोचता है, किस वह माय भोगों से पेश पाता है-रेपवित्र में प्राय इन विपर्यो म समापेश हवा है। कुपस मेधक बाय सिझे गए यह वर्णन कमी- कमी पर ऐसा होते हैं और न वर्णनों में बिस चरित्र का वर्णन किया बावा हे उसय कर्म तो रहा ही है। वहीं नहीं न कमो को प्रतिख्यिा को भनक भी मिस भावी हे पर यह प्रविधिया सामूहिक होती है। रेखाचित्र मारमक गति के क्षेत्र में प्राय: एकोगी होता है। उसके म तो होता है, मेरिन उस कमी प्रतिश्यिा नहीं होती। हमारा समस्त जीवन ही वागत है, इस बस्तुगत प्रवर्धन सो भावनात्मक उपसम्धि होती है। रेखाचित्रभ्याम्या में परितका प्रवर्धन केवल प्रारमयत होता है। उस परिण का किसी व्यर्मियोप से सम्बन्धित कोई कर्म नहीं होना उस कम को परिपाटी की पोर रफित मर होता है। साप ही उसपर्म की किसी म्पतिविप पर प्रविधिमा का भी कोई प्रश्न नहीं उमा, उन पो की प्रतिक्ष्यिा क्या हो सकती है, इसका संकेत भर मिलता है। रेयाचित्र परिमणिय सरा स मर है। रेखाचित्र प्रसेगी के क्षेत्र (Scach ) अनवाद है और हमने साहित्य की मान्यताएं साहित्य के इस नवीन म्प को मान्यता पाश्चात्म मान्यतामों से प्रहण की है। स्केच धम्म में ही कमहीनता का संकट है, वह किसी भी पति का पादों द्वारा चित्र मर होता है। इस पति के चित्र की प्रतिक्रिया उसके कर्म की प्रतिक्रिया के रूप में किसी अन्य व्यक्ति पर पाने के स्मान पर सीपी पाठक पर होती है। रेखाचित्र क स्पान पर परिष-चित्रण एम्ब मगि उपयुक होता लेकिन परित्र-चित्रण फेवम प्रक्रिया भर है। बड़े-पड़े उपम्यारों में विशिष्ट परितों में सविस्तार परिष-विश्लेषण की परम्परा-सी रही है जिससे उपन्यास की घटनाओं के सन्दर्भ में उस परित्र की क्रियामों और प्रतिक्रियामों के सपो हम पन्छी तरह समझ सके। इन विपक्षेपणारमक वर्णनों को अधिक से अधिक मनोरंजक बनाना उपन्यासकार + मिए मावस्यक होता था मिससे पाठय बिना उताए हए उन वर्णनों को पढ़े पोर उनमें रस मे। ऐसा हरेक पणन एक स्वतंत्र रेखाचित्र माना ना सकता है। एसी हासत में रेशापित्र की स्वयम् स्वतम सत्ता कि केसे पौर किन कारणों से स्मापित हुई, यह प्रश्न उठ खड़ा होता है। जैसा कि मैं इस परिषद के प्रारम्म में ही कह पुका रेसापित की स्वतंत्र सत्ता मनुष्य को परिहासात्मक दृति के कारण बनी। मेय किसी व्यछि से परिपपहे, पौर में उसे नहीं पसन्द करता। पा किसी पादमी को देखते ही मुझे इसी मा भावी है, इतना भॊग और मदा वितसा हे वह मुझे । पर अगर मुझ में कनारमा वर्णन करने की पमठा हे सो मैं उस व्यक्तिका विमण कर + उसका मयाम उमाताई कि वह उस वर्णम को पाने या सुनने वाले को उतना हो हास्यास्पद विखे। मेरे इस परिहास में म्पंग भी हो सकता है। अपने सम वर्णन से मैं मापना दूसरो तक पहुँचा देता हूँ इसलिए इसमें मुझे मनारमा सफलता मिसती है। इस पए की प्रवृति मानव की नितान्त स्मामाविक प्रवृत्ति है पौर इस कसा का प्रदर्शन सपसे पहिले प्रमिनय में ही हुपा है। छोटे-छोटे पासक हक मिसको वह नहीं पसन्द करते उसमा हास्पारमा प्रभिनय गरसे उसका मबार उराते हैं। भागों में तो इस प्रकार का पभिनय पूर्व विपास पा सा है। इस तरह के पुष परिहासात्मक रेखाचित्र अपनी ही पति से ताहिरप में प्रसृप्ट हो गए और रेखाचित्रों ने साहित्य में अपना स्थान पना सिया । फिर बस रेसापियों ने अपनी स्थापना र मी तर उन्होंने स्पपम् विस्तारमा मार्ग-ग्रहण पर सिया । परिहास मनुष्य के रेशापित्र-साहिप की नवोन पासा मस्तिस्व का एक छोटा-सा भाग मर ही है, मनुष्य का प्रस्तित्व सो संपर्प पौर कर्म का है। स्वभावत रेखाचित्र में अपनी स्थापना के बाद मानव को पम्प भावमारमक संवेदनाओं को प्रहण किया। हास्य रस से हटकर करूणा बीर भादि विभिन्न रसों की प्रतिपादमा भी रेखाचित्रों ारा फरमे की प्रथा बस पड़ी। रेखाचित्रों में गति का मेन और गतिक्रम बहुत सीमित होता है मौर इसलिए रेखाचित्र का मापनारमा प्रभाव भी साधारणतौर से उतना सरल नहीं हो पाता जिवना महामो का होता है। मेकिन एक बल मौर सूक्ष्म साकार ऐसा रेषापित्र प्रस्तुत कर सम्मा हे भो पाठक के मन पर अमिट छाप छोड़ पाय । रेखाचित्र में ऐसी पौर अभिम्बना को प्रधानता मिलती हे मम कि हानो में प्या भोर घटनाक्रम को। रसाचिन को हम नस रेखाचित्र के मेसक द्वारा को गयी यह परिभाषा कह सगर है मो उसने उस व्यक्ति को को है जिस पर उसने यह रेखाचित्र सिखा है। पावत और म्पापक सस्प से रेखाचित्र का क्षेत्र कुछ मनग सा है, वह एक भ्यति पर केन्द्रित हुपा करता और इसलिए रेशा पिन का सम-सामयिक महत्व काफी अधिक है। रेखाचित्र कहानी मौर निबम्प के बीच की कमी के रूप में प्राठा है। पर इतना सत्य है कि उच्च साहिय में बहुत कम रेखाचित्र सम्मिसित निय मा सम्ते हैं क्योंकि मेमा में पहले हो संकेत कर पुका है रेता पित्र सांगी नहीं है और इसलिए गहरी भावनात्मक संवेदना का माध्यम पद नही मुश्किल से बन पाता है । पुस्तक के रस में रेखापियों की मांग म कमी रही है पोर न भविष्य में एने की प्रेई सम्भावना है। पत्र-पत्रिकामों में रेतापित्र प्रकाशित होते हैं पौर विभिन्न कारणों से पड़े भी मावे हैं। उठते हुए कहानीनारों में रेवाचिों को कहानी समझ र पिसने मी प्रवृत्ति बन तर दिससाई दे जाती है, मोर उनको इस पोर समेत रहना होगा । यदि कोई व्यक्ति रमापित्र लिखा है तो इसमें किसी को कोई मापत्ति नहीं हो सकती मेक्नि पह रेखाचित्र समझ कर सिखे मोए । प्रपनी दृतियों को श्रेष्ठ सममले पर मो स्वाभाविक प्रवृत्ति है, उसके पोर रेषापित्र को महानी समझने मी गसत पारणा के योग से न नवीन मेरों को अपने रेसाविमों की उपेसा से दुध कुष्ठा हो सकती है। उस गुमा से वमी बधागा धावा है अब हम पावित्रा भी सीमापों के प्रति सचेत हो पाए । एक दुधम शिल्सी कया-वस्तु के प्रभाव में पत्र साहित्य की मान्यताएं पत्रिकामों की मांग पूरी करने के लिए कमी-कमी पन्चे रेवाविष सिव मेवा हे मेछिन यह उस पिस्पीभी फममोर कति ही मानो गाएगी। रेसाषिों की व्यावसायिक प्टि से उपयोगिता प्रदाय गोंकि रेशापियों द्वारा किसी विशेष-समाय की पदस्थाों भौर पारणामों से मदे हुए पछियों का चित्रण किया जा सकता है। यही नहीं मानय को पुष्टायो उसकी विवशतामों और उसकी मममोरियों का चित्रण करके उनके प्रति संवेदमा सपना की जा सकती है । रेसावित्रो में पपेप्ट मनोमिक सामग्री सम्मिसिद की मा सकती है। रेखाधिों में ममोविमान की सामग्री प्रमुख हो सकती है पर्योंकि पिसी भी पचिस्व के पीछे उसमा मनोविज्ञान ही तो रहता है। मेरा दो ऐसा मत है कि मम् रेखारिज सिसमे मामे में मनायेगानिक पकामधी होनी चाहिए, इस मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से ही रेखाचित्रों में माननारमा संवेदना की पुष्टि की जा सकती है। कुम दिन पहसे रखाचित्रों पर एक बाद-सी मा मयी दी बोंकि रेखापिम मया-नमा विकसित मा पा और अपेक्षाकृत प्रासान भी पा । नवीन होने के कारण पाठकों में और विषेप रूप से समाप्तोगको मे रेखाचित्रों को प्रसंसा मौकी पी। मेकिन धीरे-धीरे रेखाचिों की सीमा उसकी पपूर्णता मोगों की नगर में पाने मी पौर रेखाचित्र सिखने की प्रवृत्ति कम होती गयी। रेखामिक साहित्य का वह भाग हे वो किसी भी साहित्यकार द्वारा किसी भी समय बिना प्रयास के सिसा पा सकता है और इसलिए साहित्मगीनी के लिए व्यावसापिक रष्टि से रेपावित्र महत या सहारा है। -- सोडायाँ परिच्छेद शब्दचित्र-पत्रकारिता का विकसित रूप साहित्य का सबसे मबीम स्प है शम्दचित्र मिसे अंग्रेजी में रिपोर्ताज (Reporrage) कहते है पीर यह मया म्म विकसित हुमा हे पश्चिम में पत्रकारिता के विकास के साप । पौर प्राय के युग में रिपोर्वाय हमारे साहित्य का प्रमुख भाम बन गया है। पत्रकारिता का श्रीगणेश होता है समाचार-भगत से। कहाँ क्या हो रहा है, इसे जानने की पभिसापा हरेक व्यक्ति में इती है और विकास युक मानव की इम समाचारों के प्रति कृषि धीरे-धीरे बढ़ती ही माती है। समाचारों को जानने की उत्सुकता मनुष्य के जीवन का एक पविलम-भाग है पर्योकि व्यचि का जीवन सामाणिक जीवन है और यह सामाजिक मीवन समष्टि के जीवन का ही एक माग । दुनिया के किसी माग में युट हो उसका पोड़ा बहुत प्रसर हम पर पड़ेगा ही। पाग के जीवन में कहा गया रामनीतिक उपम गुपत हो रही है वहाँ पौन-सा सासूतिक प्रमिपान उठ रहा है, कहाँ कौन-सी महामारी फैस रही है, इस सब की जानकारी हम प्राप्त करना चाहते हैं, केवस कौतूहमवश हो नहीं परन् इसलिए भी कि उन सब का प्रमाव हमारे भीवन पर, हमारी सामाजिक व्यवस्था पर पोड़ा-बहुत पाता है। एक स्पान पर निकलने पाने पत्र के संवादाता पुनिया के हरेक कोने में फैले हुए हैं, पुखों उत्सों पर कान्तियों का सही-सही पर्णन प्राप्त करने के लिए विशिष्ट पनों के संवादाता उस स्पाम पर भेने भावे वहाँ यह सब पीमें होती है । पौर यह संवाददाता पों को केवस समाचार ही नहीं भेमते, यह सम्मे-समे रोषक वर्णन भी भेजते हैं। लेकिन यह मम्मे पर्णन समापा के भाग तो होते ही हैं। न मएँनों में कमी-पभी बड़ा परिव रवा हे मोर इनमें भावनारमा संवेदना मी रहती है। इसका कारण यह है कि पुट साहित्य पारम्म में पानीविना का पापन नहीं बन पाता इसलिए साहित्यपर को प्रागीपिका के लिए साहित्य समपया दूसरे कामों को प्रपनाना पड़ता है। परमाप्तिा साहित्य के बहुत निट है। प्राय साहित्यकार या तो प्रारम्भ में पत्रार पमते है या प्रध्यापक पनठे हैं। इसमें साहित्य को माम्पताएं पत्रकारिता साहित्य के प्रधिक निकट है क्योंकि पत्रकार से हैसियत से मनुष्य को सिखने का काम परमा पाता है, जबकि प्रध्यापन कार्य में मेपन का कम नहीं है, केवस पठन काम है। मेरा तो कुछ ऐसा मनुमन हा है कि एयनारमा साहित्यकार बनने में पत्रकारिता प्रध्यापन की प्रपेक्षा प्रपिक सहायक होती है। प्रध्यापक प्राप' प्रन्या पासोप तो बम जाता है, प्रधामपानर या कलाकार बनना उसके लिए मठिम होता है। पमकार मगर मन्या कहानीकार है वो मह काफी अधिक सफल होता हे मयोंकि कहानी के स्म में समापारों को सिसने से उन समाचारों की रोषान्ता काफी बढ़ पाया करती है। यही नहीं वह उस क्षेत्र में मपने ग्न समापारों से मापनारमा उपम-पुषस भी कर सकता है अपने सन समापारों के पणन से और इस प्रकार के वर्णन वस्तुव' साहित्य के भाग ही बन जाते हैं। पो-बो मेमों मोर समारोहों के वर्णनों से उन मेर्मो और समारोहों के प्रति एक प्रकार की भावनात्मकता जगाने में भी सहायता मिलती है। यह मन कमी-कमी सामयिक पार क्षेत्रीय महल से कार उठकर सार्वभौमिक और वीर्घकालीन महत्व भी प्राप्त कर सेते हैं। पौर स्वाभाविक रूप से इन पनों के मेधकों में इन वर्णनों को उन पर्मों से ममग मिनमें यह वर्णन प्रकाशित हुए हैं, पुस्तक रूप में इन वनों के वग्रह को प्रसारित कराने की प्रवृत्ति माग पाती है । इस प्रकार रिपोर्तान पा माविर्भाव साहित्य में हुमा। एक दूसरे से सम्पद सामौमिक मानव-समान में इस प्रकार के साहिल्य की महत्ता दिनोंदिन वापी गाती है क्योंकि इस साहित्य से शान की वृधि तो होती ही है, एक प्रकार की भावमारमक संवेदना मी मोगों को प्राप्त होती है। इस साहित्म के अन्दर पामी मापनारमा सबेदना बहुत मधिक प्रसर नहीं होती, में यह स्वीकार करता है वह पायद घा-पित्र (Sketch) के मन्दर मामी भावनारमा वेिना से भी मुग्ध क्षीण होती है । नेकिन पापद पार के संपर्कों से प्रस्त अन्तर्मुखी मानन को दूसरे मोगा की भावमा के प्रति संवेदमा में रपि नहीं है, यह फेवस अपने में ही सीमित पौर मेन्द्रित हो गया है। पत्रकार मला का एक निपमहे, पत्रकार को नहाँ तक सम्मय हो सके पतिगत भाषमा से लगर रहना चाहिये पयोंकि यहाँ पत्रिमत भावना पत्रकारिता में पाई वहीं पत्रकार तटस्पता से ममम हट माता है। बेयधिक पपवा मानिस मायना सटस्य पड़ी मुशिस से रह पाती है, 1 पामचिन-पत्रकारिता का विकसितम इतना मानते हुए भी मावमा से लदे हुए वर्णन पत्रकारिता में सफल महीं होते यह भी सत्य है । और इसी लिए पका के संवादों में सनी भावनात्मक संवेदना नहीं हो सकती निवनी साहित्य में प्रपेक्षित है। सम्मवत' इसी कारण रिपोर्तान गव साहित्य में सम्मिमिस हुमा सब उसके साप कुष मसीन प्रयोग किये गए । इन प्रयोर्गों में कुछ महे सफल भी साबित हए हैं। रिपोर्ताज का क्षेत्र वातावरण होता है, पति के कर्मों तथा उन कर्मों की प्रतिकियामों को रिपोर्वास का क्षेत्र नहीं बनाया जाता है। इस प्रकार रिपोर्तान में पिसी वातावरण को प्रस्तुत किया जाता है। उस पातावरण में सामूहिक पटनापों तपा सामूहिक गतिविपि का चित्रण उपस्पिस करके उनसे पाठप में भाषनारमक प्रतिकिया पैदा करन का इन रिपोर्तामों में कम होता है । गो परिष इम रिपोर्तामों में पाते हैं वे कर्ता म होकर इस सामूहिक वातावरण के अंग भर होवे हैं। इस प्रकार धनों में किसी वातावरण का चित्र उपस्थित कर दिया जाता है और प्रत्येक पाठक अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भावनात्मक अनुमति प्राप्त करने के लिए स्वतत्र छोड़ दिया जाता है । हिन्दी में रिपोर्णम यो धम्द मित्र की संज्ञा दी गयी हे मर्योकि यह किसी वातावरण मा एक मित्र ही होता हे गो शन्नों द्वारा प्रस्तुत किया पाता है। चित्रकला में एक प्रकार की मायनारमशता हो रहवी है अन्यमा यह मामा म कहनावी । चित्रकार यो पिन प्रस्तुत करता है उसमें गावावरण से सम्बन उस नसाकार की भावना रहती है जो पर्यक में एक प्रकारको स्वेता की सृष्टि रखी है। ठीक इसी प्रकार गो चित्र मेराम राम दारा प्रस्तुत करता है उसमें सेसक पी भावना रहती है, मौर इन शमरिमोहाय वह अपनी भावना पाठक मा पहुँचाने पा प्रयत्न करता है। पहाँ म पित्रकता पा प्रश्न है, रंगों और मावृतियों में उनकी एक निजी सय होती है गो भावना को वहन करती है । पर धमपिन में दोन रंगों का पहारा होता है पौर म माति का सहारा होता है। उसमें वो शब्दों द्वारा ही स्पमा पो उभाग पाता है। इस पत्पना की गति फा भापार होता है परिवों की झ्यिा प्रतिक्रिया । वातावरण में परित्रों को किया-प्रविञ्यिा पड़ी क्षीण होती है इसलिए पामपित्र का मन पर उतना गहरा प्रमाप महीं पड़वा बितमा परसा में अपेक्षित है। धमपिन कोपा बनाने में मेगा स्मयम् को अपने किसी एक साहित्य की माम्यवाएं प्रमुख परिष में केन्द्रित कर देता है, मोर इस प्रमुख परिष के सन्दर्भ में ही समस्त वासावरण का चित्रण किया जाता है। उस चरित्र में मति होती है, उसकी गति के अनुसार पातावरण बदलते रहते हैं। उन वासावरगों को सजीव बनाने वाले पात्र यवमते रहते हैं, सेफिन भावना का मूम स्रोत वह प्रमुख परिण सामने रहता है । कभी-कमी तो वातावरण में वह प्रमुख परित्र सो-सा गाया करता है, वह वम प्रतिलिया को ही प्रहण कर पाता है। इस स्पस पर सम्पचित्र की रोगकवा तो बढ़ जाती है, उसका भावना-पक्ष निर्वस पर माया करता है। पीर इसलिए रिपोर्वान मे उस भन्तर्मुसी साहित्य को पम्म दिया वो पाग पुनिया में इसनी प्रचलित है । इस अन्तर्मुदी कहानी में प्रमुख परित्र परामर सामने रहदा है वातावरण उसकी सुविधा के अनुसार बदमसे रहते हैं और हरेक पातावरण पर यह माया रहता है। पक्तिगत रूप से में हरेक अन्तर्मुखी पवा दो पदधिम प्रपया रिपोर्माम की कोटि में रखवा महो वक मापनात्मक पभिष्पछिका प्रश्म है। दोनों में ही प्रमुख परिम ही प्रतिक्रिया के म्स में भावना को पहण करता है और भारोपित करता है, दोनों में ही मेखक परिस्पितियों के साप बहता है। दोनों में ही कर्म की गति प्रति शिपिस होती है। पर रिपोवि वर्णनात्मक होता है, मन्तमुनी कहानी मनोवैज्ञानिक होती है-यह इन दोनों में मौसिक पम्तर है। रिपोर्वाग रेखाचित्र की भांति पनिवार्यता छोटा महीं होवा उसका पामार काफी बड़ा हो सकता है। मागमस तो तीन-पार सौ पृष्ठ के रिपोर्ताओं को उपन्यासों के नाम से मिलने को प्रपा पत पड़ी है पोर हिन्दी में इन्हें मोचसिर उपम्पास कहा जाने लगा है। इन उपन्यासों पर मुस्प ध्येम होता है प्राथमिक वासावरण प्रस्तुण करमा ।इम उपम्यासों का मो स्वागतमाहे वह उनके अन्दर पामो भावनारमफ संवेदमा + कारण इसमा महीं जितना जन-जीवन के उन पहनुमों के प्रवर्धन के कारण जो अभी तक उपेक्षित पड़े हुए थे। वैसे यह प्रवित्तिक भीनम मोर समाव साधारण उपन्यासों में मामार-भूमि की मांति प्रायर पिमित होता रहा है मौर होता रहता है, पर सन उपन्यासों में देश्य होता है मानव की मावनारमा किया प्रतिळ्यिा का मित्र उरा प्रोपमिहणीवन भौर समाज का प्रदर्शन। प्रचितिक कपामों में भूगोस, इतिहास उमाबसाय प्रौर बीवन के शवपित्र-पत्रकारिता का विकसित रूप विभिन्न पहलुओं का कुछ मिचिन-सा सम्मिश्रण होता है पौर उनकी सफसवा मावनात्मक संवेदन पर म निर्भर हो कर इस विभिन्न पहनुमों के सफल प्रदर्शन पर निर्भर रहती है। में यह मानता है कि इन सबों का प्रवर्धन मौर इनका ग्रहण करने का क्रम स्वयम् में कहीं न कही भावनात्मक प्रथ्यिा है, पर यह मावनात्मक प्रक्रिया साहित्य में इष्ट भावमारमक संवेदमा से मिप है। पाश्चात्य देशों में शुद्ध रूप से शम्दचित्रों को महत्ता देना पर कम हो रहा है, समषिों को मापार वमाकर साहित्य के नए-नए रूपों को हूंठा पा रहा है। वही हाल हमारे देश में भी है। एक तरह से यह महा था सकता है कि प्राम का युग ही रिपोर्ताजों का युग है । मेकिन यह रिपोर्तामों का युम एक फैशन मर है। मए प्रयोग हमेशा होसे रहे हैं पौर होवे गे किसी सक्षम और सप्टा कसाकार का नया प्रयोग सफरस मी हो पाता है। मेकिन यह सफलता उस भए प्रयोग को सत्य के रूप में यो स्थापित महीपर पाती। यहाँ तक भावनात्मक संवेदना का प्रश्न रिपोर्ताज पहाँ काफी कमजोर देता है । ममी कमो कृष रिपोर्वाग के माम पर सिमा गया है, उसक मापार पर मैं यह कह रहा हूँ। पर ममी तो रिपोर्ताम में मए-नए प्रयोग पस ही रहे हैं, बहुत सम्भव है कि मागे पस कर इसका कोई समपं मोर सक्षम प विकसित हो माय । महाँ त घिमिक सपम्यासों का प्रश्न है उनमें कुछ मावनारमा संवेदमा में काफी प्रागे बड़े हुए है क्योंकि उनमें अगर कोई सवत कहानी वैषी हुई हे तो वह भावनारमा संवेदना उत्पन्न करेगी हो । पर दुर्भाग्यवश मपिसिकता के प्रवन के फेर में एक पोर तो साहित्पार अपने कथावस्तु के साय पूर्ण न्याय नहीं करवा दूसरी पोर पाठक के मन मा जारी स्वर ही इस प्राप्तिमता को प्रहण करने में समग रहता है, अधिक गहराई मे साप वह उसमपावस्तुमो देश नहीं पाता। मवीनता पौर फेसान माम पर पोपीरों लिखी जाती है, समान पर एक वर्ग उना परे पोरदार एप में स्वागत करता है। सेरिन उस वर्ग की यह प्रशंसा कमी-कमी ही भाम होती है। साधियार एक हम हम ही फैशन के पीछे दोसता है, पेन्शन साये में अपने को राम सने से दो उसमा मस्विस्व ही मप्ट हो गया है। प्रारलिपसा गीवन के सहयों में एक है, वह भीवन का सपस्य सत्य को नहीं है वो से साहित्य का सस्य बना लिया गाय ! मापसिाता प्रनयापन पैस-जैसे -- साहित्य को माम्पसाएं मिटता बायपा, वैसे-वैसे यह मरितिक साहित्य विस्मृति के गर्व में रवा पामगा। रिपोान की म जाने कितनी द्याधाएँ है, उदाहरम के लिए मात्रा वर्णन (Travelogues) पारपास्य देशों में यात्रा सम्बधी म जाने कितना साहित्प मौजूर है पर हमारे देश में इस यात्रा साहित्य की बात की कमी है। पर हाम में एक प्रपा पल पी है कि जो भी पछि वित की यात्रा करके लौटता है, वह प्रपमे पाना के संस्मरण लिखने मेठ मावा है। इसमें मधिक साहित्य प्ररोषक होता है। अगर इसम स्पिी अपने पनुभयों के वस पर याभा-साहित्य मिसे ठो इसमें उसे सफलता प्राप्त हो सम्ती है। रेखाचिन की माठि पदविण को कमा मी मूमन' म्यावसायिक कमा है। रामपित्र की फसा का वो बन्म ही व्यावसायिक पत्रकारिता से हुमा है। पौर रिपोआप रेसारिणी मपेक्षा प्रषित समम है, योकि इसमें सेखक के लिए सम्भावनाएं भी बहुत अधिक होती है। यह बैक है कि पुस्तक स्स में पुरा पदमिनों की परत संदिग्ध है पर पत्र-पमिकामों में इनकी मांग मत मपिक हे गोंकि अपनी विविपठा कारण पाठों को मह काफी प्रिय होते हैं।

मत्रहरी परिच्छेद निवन्ध-गद्य का थति प्रचलित रूप मेरे मत से पासा का सबसे प्रषिक कममोर और संदिग्ध रूप निवन्ध है, और यह मी ठीक है कि मालोचनात्मक साहित्य का प्राधार ही निवप है। पौटिक पावाम प्रदान के लिसित रूप अधिकांश में निबन्ध में रिहै । निबम्ब का विकास ही साहित्य में गव के विकास के साप हुमा है। निवन्म बोटिक विज्ञान और शान के प्रपिक निपट हे मसा पी अपेक्षा । निबन्य पद्य का पति प्रपमित स्म है, यह बात स्पष्ट भौर सदिग्ध है। गय में स्वयम् की कोई गति महीं होती ग तो ध्वनि प्रयवा कल्पना की गति को वहन करता है। इसलिए पुर बौद्धिक मादान प्रदान से पुल निव ष कसा मा भाग नहीं बन सका। निबन्ध को कसा पा भाग बनाने के लिए उसे प्वनि भौर म्यवना पी गति प्रदान की गयी है । यह पनि पौर म्य॑मना की गति निवन्ध को देना स्वयम् में बौविक प्रक्रिया है और इससिए ऐसे मिव प बहुत पम दिखते हैं मिनमें पनि भौर म्पंगमा की गति मुसर होकर पत्रिमता का स्पष्ट पोप करा के निबन्प पी मामारमकता को नष्ट न कर दें। सापारण दौखिक प्राणी के सिए मिव प सिखना कठिन नहीं है, भौतिक शान की प्रतिपादना के लिए नित्य हो पनगिमती निवप लिसे गा रहे हैं। पर इन नियमों में बौखि प्रपया भौतिक पभियक्ति है, भावनारमा और सूक्ष्म अभिम्पति महीं होतो। भावमारमा और सूक्ष्म पमिम्पतिमी मी हरेर दोत्र में प्रावस्याता पड़ती है और इसी सिए निवपों में कमारमाता की उपेक्षा होती है। निवप साहित्य पसा का सबसे गमगोर अंग हे पोंरि भावना को पहन करने वासी गति पा नियरों में एक तरह से प्रभाव-सा रहता है। पनि मोर पंचना मी गति ऐसी नहीं है जो हरेर पति के वास्ते स्पष्ट भपया सुगम हो पौर इसलिए इन नम्सारमनियों गाभाबनारमा प्रभाव दिग्य-सा प्हा हे। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में ही निवप को सार्थकता सममी जाती है। मेपिन नो पादमी अपनी मावना म्पक परमा पाहता है, मगर यह बग्म से पसापार महीं है तो वह पारने द्वारा ही भावना भ्पत करेगा उस म्पोफरण का प्रभाय दूस पर पया मोर पेना पड़ेगा साहित्य की मान्यताएं इससे उसे कोई प्रमोगन नहीं। और इसी सिए कलात्मक निबन्ध प्रपुरता के साथ हमेशा लिखे गए हैं मोर पाम भी सिसे गा रहे हैं। निवन्म में वैसी को सबसे अधिक महत्ता प्राप्त है । 'क्या' कहा जाता है, कमा पौर साहित्य का भाषार इसमें नहीं है, केसे कहा जाता है, कसा की परख इसमें है। ऐसी की समस्त साकवा किसी बात को कहने के ढंग पर होती है। इस जैसी की न कोई मीमांसा हो सकती है न इसका कोई विश्लेपण हो सकता हे क्मोकि पोसी में कलाकार का अस्तित्व मौर उसकी ममिम्पति है। पहा तक साहित्य-कला के अन्य पों का प्रश्न है, पहाँ मप कथावस्तु पादि के साप जैसी पनेक गुणों के साप एक है । पर निबन्ध में सो क्षेत्री एकमात्र गुण है। जिसे हम मौसत का भावमी ( Average-mea) कह पाये हैं, उसके पास ऐसा कोई विशिष्ट व्यचिस्व नहीं होवा पो इसरों से पृषक स्पष्ट रूप से विखे और इसी प्रकार गो मौसत का मेखक है उसके पास भी कोई ऐसी विशिष्ट क्षेसी नहीं होती को अपने बस पर साहित्य में अपना गिधिष्ट स्थान प्राप्त करे। विशिष्ट शैली पिविष्ट साकार के पास ही होती है पोर इससिए एक साधारण पछि प्रका साहित्यिक मिबत्यकार नहीं हो सकता । निबम्ब में भावनात्मक कसा की प्रवृत्ति के साप-साप सेसक के पास विषायत्मक बौधिक प्रवृत्ति की नितान्त मावश्यक्या है क्योंकि निबन्ध में वो कुछ दिया जाता है यह मौलिक शब्दों के माध्यम से। निगम में दी पाने मामी मेवमा सुस्पष्ट और सुगम होनी चाहिये यो बौविक प्रक्रिया से समझ में पा सके । एक पनि ऐसी है जो भावनात्मक है, लेकिन यह ध्वनि भी धो प्रमों को हीदी गाती है मिमका क्षेत्र मौद्धिक । अपूर्ण- स्पर्को प्याकरण के तोड़-मरोम से पुछ वारयों बोटिकतारतम्प से होम मंगमामों से पुल निमपों को स्वीकार नहीं किया जा रास्ता । मेय तो कुछ ऐसा अनुभव है कि निय यों में मौखिकता की प्रचुरता एती है, और प्राप यह बौद्धिकता दर्शनशान की होती है। दुनिया के यो प्रसिस निगम कहे या सकते हैं उन सबों में एक पाना निगो पार्शनिगप्टिकोण है। वनशासबोटिक होने के साप मापनारमा भी है और इसी लिए पेष्ठ साहित्य होने के लिए साहित्य में दशम का समावेश एप्ट समन जाता है। निबन्ध का उपयोगिता पसा-सदा उसके मनोरंजन के पप से प्रषिक बस है, दुनिया में गुर मनोरंजनारमा नियन्मों की संख्या बहुत पानी है। र मनोरंजनामा निव पों में हास्य रस के निबम्य पपिक सरुप होसे ४७ निवम-पक प्रति प्रममित स्प है । हाम्प रस में मी यंग प्रधान नियमों को अधिक महत्त्व मिमता है परेंकि व्यंग स्वयम् में बीवन प एक दार्शनिक दृष्टिकोण है। साधारण हास्य रस के नियमों में छोटी-छोटी कहानियों (पुटकुर्मो) का संग्रह उन्हें मनोरंबक बनाता है पुर निबन्ध-सल पिक सहायक नहीं हुमा करता। मध्ये निवन्धकार का शैसीकार होना नितान्त प्रापश्यक है, पैसा में पहले सिख पुका है, पौर प्राय मच्छे कहानीकार निवप-सेना नहीं बनते होंगे क्योंकि उनके पास साहित्य म एक सक्षम भाप्पम होता है । सेमिन कमी-कमी मोग में प्राकर मगर ये मोग नियन्द भी सिख देते पौर उन निबन्यों में कुछ बड़े सफम होते हैं। पार का मान-विमान पासा बौदिक युग ही निबन्यों का युग है, मेपिन पह साहित्यिक नियों का पुग नहीं है । साहित्य क माम पर यो भी निबन्ध सिसे पासे है मह पासोबनारमक होते हैं। भालोपमा स्वयम् में ही धामीय विपम है और इसलिए मौखिक है। मैंने साहित्य को फमा केम में ही स्वीकार कर उसकी मान्यताएँ वी है, उसके पासीय पक्ष को मैने अपनी न मान्यतामों में महीं उसया हे। में यह स्वीकार करता हूँ कि प्रामोधनात्मक साहित्य पर न जाने कितने पंप मिसे या पुके हैं पौर लिखे जा रहे हैं, और इन प्रों में यदा-कदा साहित्य के प्राधार मूम सिमान्त भी प्रतिपादिन किये गए है पर ये ग्रंप सबनारमक साहित्य से समझने तपा उस साहित्य का रस प्रहण करने में सहायक मर होते हैं। निगम का क्षेत्र महा व्यापक है और साहिप के कई ऐसे अंग बो निवप्रति विकसित हो रहे हैं, निगमों की काटि में रासे पा सकते हैं। साहित्य के इन प्रमों में भावनात्मक संबेदना निश्वयम से होती है। निबन्ध पी प्राधारभूम मगोरौ को स्वीकार करते हुए भी निबन्य की उपेक्षा मही की या सनी । उदाहरण के लिए जीवन परित एक बरे निबम्प के रूप में ही साहित्य में स्वीकृत है, और वीपन-परिस में भावनात्मक सवेदना प्रपुर मात्रा में मिमती है। निबन्ध का एक गुरस सारी दुनिया में स्वीकार किया माता है कि उसमें कोमात पस्पना को प्रापार बमा कर नहीं हो पाती। निरन्न स्पष्ट सिने पासे सरप को मेकर ही मागे बढ़ता है, उसमें भावमास्मक पोगदान पैसो का ही होता है । बौवनयरित मी मेखक कौमी से हो उभर पाता है, ऐतिहासिकता को मायम रखते हुए उन ऐतिहासिक तत्वों का भावनात्मक निम्मण बोवन परित का प्राधारमून पुरण हुमा कला है । निबन्ध में स्पना की गति सबसे शिषित होती है क्योंकि सत्य के साहित्य की मान्यताएं क्षेत्र में कल्पना का स्थान नहीं हुमा करता है। निवन्ध में जो भी गति होती हे वह पनि लय प्रादि की होती है। साहित्य में निवन्ध कोस्मान मिसता हे प्राय साहित्य के प्रासोचनारमक पक्ष में मो शास्त्रीय पम है, लेकिन प्रासोचना में मोटिक तत्व के साथ-साप भावनारमक पक्ष निश्चय रूप से मौजूद रहता है। स्वयं प्राप्तोबना की ही सीम स्पष्ट शैलियां मानी जाती हैं-रपनारमफ पामोपना विनाधारमक पामोपना पौर निप्पक्ष मासोचना । पासोचना की प्रमम दोनों फोटियों में मेखक पपवा पासोचक की भावना स्पष्ट स्म से सामने रहती है । रपमारमक मालोचना में मासोचक की मालोच्य विषय पर एक प्रकार की संवेदना होती है। उस विषय के पोों को नगरन्दार करने की उसमें प्रति होती है और उस विषय के गुणों के प्रति वह मुखर हो उठता है। यह पालोचक का भावमात्मक दृष्टिकोण तो होता ही है । यही नहीं सम-सामयिक पासोचना में तो पामोषक पासोम्प विषय के प्रति जागरूक न होकर उस विषय के सेवक पा कलाकार के सम्बन्ध में अपनी धारणा व्यक्त करने मेठ पाता है। ठीक यही मात विनाधात्मक मासोचना पर सागू होती हे यहाँ प्राप्तोपक मामोम्य विषय या उसके सेस के दोपों को ही महत्ता देता है । यह गिसनी सम-सामयिक प्रामोमनात्मक होती हे वह सब विशेपम्प से भावमारमक होती है। माग के वस्तुवादी और मौतिक यगत में मिवर्षों की महत्ता कयम मान के क्षेत्र में ही नहीं भावना के क्षेत्र में भी बढ़ती मा रही है । पिसी भी वस्तु के सम्बग्म में प्रचार केवन यौशिक म होना चाहिये यह भावनात्मक भी होना पाहिये । हम बीनों को इस प्रकार रखना चाहते हैं कि दूसरे उसे बौद्धिक ही नहीं भावनारमा म से भी स्वीकार कर में। अमेरिका में वो किसी पीन के गानकारी के विवरण को उस चीज पर साहित्य ( Literature) कहते हैं। यह इसलिए कि इस विबरण से मनुष्य उस घी के सम्बन्ध में पौविक रूप से ही जान म प्राप्त करे पत्ति भावनारमा स्प से उसकी उपयोगिता को भी समोर बरसे। इस प्रकार के साहित्य में निवन्म पा महरा या हाप है । पैसे इस भावनात्मक विवरण में कई म्पबसायी फर्म पहानी, नाटा कविता पादिमा प्रथम सेते हैं, पर इन सबों में निबम्प ही प्रमुख होते है। निगम साहित्य पसा का सबसे सुगम प्रौर सवम्यापी स्प है, साप हो निवप राबसे कमोर माप्पम भी है। पौर इसलिए इस कममोर माम्यम को मड़े प्रयत्न से ही सफल बनाया जा सकता है।

अठारहवा परिच्छेद नाटक । नाटक साहित्य का ऐसा चंग है जिसमें अन्य कसाओं का बहुत बड़ा योग-दान है और इसलिए नाटक की मायवाएं साहित्य की भापारभूत मान्यताओं से कुछ भिन्न है। हमारे प्राचीन साहित्य में ही महीं वरन् विश्व के प्राचीन साहित्य में माटो का सदा में विशिष्ट स्थान रहा है पौर इसके कारणों की प्यास्पा से हम इस तप्प पर मासानी से पहुँप सम्ते हैं कि पारम्म में विभिन्न कमाएँ पुछ प्रवीय तरह से मिश्रित रही हैं । मनामों के स्पष्ट विमानन बहुत बाद में हुए हैं। नाट्य सम्म प्रमुखत पमिनय न मोर नृत्य का घोतक है । यह मृत्य पौर भमिनय ही नाटक का पाषार रहा है प्राचीन काल में । हमारे मोर-जीवन में सीन प्रवृत्तिया हमें स्पष्ट रूप से दिखती है- मुत्य, संगीत पौर अमिनप । इन तीनों प्रवृत्तियों में प्रमुख कौन है, मह कहना कठिम हे सेगिम जहाँ पिनट नृत्य मौर विYA संगीय को कमामों में स्थान मिना हे वहाँ विमुर अभिनय कमा में कभी भी सम्मिमित नहीं किया मया । नाटक में प्रमिनप प्रधान है, फिर भी प्राचीन विद्वानों ने नाटक को उत्पत्ति मूरप पौर संगीत से मानी है, अभिमय से महीं। इस मत को प्रतिपादित करने पामे विद्वान अधिकार में पारपास्य देशों के हैं, और उन्होंने अपना मत पनाम पीर स्म को नाटक परम्पयमों से बनाया है। अमिनप मानय को प्रादि प्रवृत्ति है, इसे समाने के लिए हमें अपने- पपने जीवन को ही देखना पड़ेगा । छोटे-छोटे बच्चों में दूसरों का मभिनय करके मनोरंजन प्राप्त करने पर एक प्राकृतिक प्रवृति पाई जाती है। हंसी-मगाः परने में दूसरों की नास करना प्रमिमय ही तो है। यही नहीं पाने पनगाने बयत मोग भी इस को मास करते रहते है। यह महम प्राय जीवित सोगों की ही को गाती है और इस प्रमिनय में उन पीवित म्पधियों का मनाम ही नहाया पाता है। सम्भवसः इसो सिए विशुस ममिमप ममा म अंग नहीं बन सका क्योंकि यही बहिणी हाने के साप साप नष्प मौर संगीत प्रस्तमसी भी हैं, उनमें - साहित्य की मान्यताएं अपने अन्दरवामी प्रेरणा प्रधान है और प्राय' उनका सम्पप दूसरों से प्रसम्म विपुग भपनी भावना से है, यहाँ भमिनय शुर-म से रहिमुखी हे, यहाँ अपने मन्दरमामी भावना किसी दूसरे से सम्पन होती है। पमिनम ने छहानी के साप मिसकर ही कसा का म पारण किया क्योंकि महानी के पात्र काल्पनिक होते है और इसलिए पमिनेशा उन परित्रों के साप बिनका वह प्रभिमय करता है, अपनी निजी मारना के मनुस्म तादारम्य स्थापित करता है। वैसे मुल पोर संगीत को भभिनय के सहयोग से प्रभावशामी पनामे की प्रवृत्ति प्राविकाल से दिसाई देती है। दक्षिण भारत का भरतनाट्य इस प्रवृत्ति का स्पष्ट उदाहरण है। सम्मवत' इसी लिए कुछ विद्वानों में नाटक की उत्पत्ति नृत्य से मानी है। पर यहां के विद्वान इस मनोवैज्ञानिक सस्प की उपेक्षा करने की गमती कर बाते हैं कि प्रभिनय केवस परिों का एवं उनकी भाव-भंगिमा का होता है, मोर यह पोनों ही कहानी के अंग है, मुत्य सपा संगीत के अंग नहीं हैं। अभिनय का मादि म हमें स्वांगों में दिखता है। इन स्वांगों में प्रषिकांष मूक मिनय होता है, और इन स्यांगों की प्रपा पाव भी मानव समाज में मौतुर है । पर इन स्वागों में भी मिसी ऐसी प्रपलित कहानी का प्रापार हे निसे समस्त समान मानता है । कहानी के पिसी एक अंग को पाभार बनाकर स्वोम मरे पाते हैं, पार यह स्वांग मूक पमिनय के प्रतीक होते हैं। स्वांगों का विकसित रूप 'मीमा या दमाता कहसावलमीप्तामों पर उमाशों में प्रधानता कर्म की गतिको मिसती है और इसलिए यह दोनों गन्ना के प्रमिक निष्ट पाते हैं। इन सीसामों पोर उमाशों में स्पष्ट रूप से कोई महानी नही माती है। पर महानी प्रायः कोई प्रचलित कहानी ही होती है और इरासिए भीसा या प्रमाणे मूर भी हो सकते हैं। इन सरों में प्रमुखता पमिनय पो हो मिसटी है। ममिनय को यह परस्पा नाटक से पहले की परस्पा है क्योंकि उस समय ममिनोव महामी साहित्य का भंग नहीं मानी जाती थी। इन स्वागों मीप्तामों पर धमाशों में पेयात पसा का प्रादि स्प है, यह पूर्ण विकसित पसा नहीं है। बहानी, याति में पहने पर सुझा! मानव की भापि प्रवृत्ति होते हुर भी मार मार में अपने पम पर साहिरप में स्वीकृत हुई है, लेकिन रहायक तस्य के रूप में यह पहानी काम्प, नृत्य तपा अन्य मार्गों में - माटक हमेशा से स्वीकृत रही है। इस प्रकार एक बात हमें स्पष्ट होती है, कहानी पोर प्रभिनय दोनों ही बौद्धिक वर कि नस्य पौर संगीत भावनात्मक है। बहरों में कहानी के प्रति माकर्षण चहना हो सामायिक है बितनी उनमें पमिमय की प्रवृत्ति है । वोमों में ही पुदि मौर कस्पना का सम्मिषरण है। भावना की यह रोनों बोविक प्रवृत्तिया-अभिनय और कहानी- यह एक दूसरे के पूरक अंग कहे जा सकते हैं, और हन्नी दोनों के योग से नाटक का धम्म हुमा । पौर नाटक में मौखिक तत्व प्रभान होने के कारण नसमें घर का सपकरण मामा गया इसलिए माटफ को साहित्य के पन्तर्गत माना गया । मकिन नाटक की मान्यतामों पर कुछ कहने के पहले माटक का मादि रूम हमें समझ सेना परमा। कसा के वर्गीकरण के पहले हम मानय की प्रवृत्ति देखते हैं, वह यह कि उस समय मनुष्य में विभिन्न सामाँ के सम्मियण को प्रपा पी। कविता मृत्य, कहामी पमिमय-यही नहीं मूर्तियमा, मित्रता पारस्पापरय कमा प्रदर्शम साप साप होता था। मोग एक स्पाम पर एपषित होते पे भौर इन सब कसामों के मिश्रित प्रदर्शन से रस ग्रहण करते थे। मानव के गौरिक विकास के साप हन मार्यों को एक दूसरे से पृषक करके सामों के मिमित वर्मीकम्स किये गए। पर मानम की पादिप्रति उसके बौधिक विकास के क्रम में पैसी की देसी पनी रही, पौर इन विभिन्न सामों के योग से जो एक सबनता है उसाल माम नाटक पर गया। ( २ ) मारक के दो माम स्पष्ट है-सिसित और सस सिरिजको सय एवं अन्य काम्पम्प में प्रस्तुत करने की मोगना । सस्य एवं मपस में प्रस्तुत करने के सापों में संगीत मुरप सपा प्रमिमय पाते हैं। इनके मसाबा एक और भी भाम है-रेयमास रेप-अप के निर्माण में विषयमा स्पापस्य कमा एक मविकता का योगदान है। नाटक को हमारे साहित्यकारों ने पाप की संज्ञा दी है और हम इस सबकी विपना करते हैं तर रंग-मैप जिस पर नाटक का पमिनय होता है महत्व र स्थान से सेवा है। रंग-पक निर्माण पर माटक की सफलता महत प्रेस तम निर्भर पोकि पभिनय का चषित मावनात्मक प्रमार मय पर ही निर्भर है। अनेक प्रयों में निधखरपा भी ममिनम मौर रंग-मेगनी समावट से प्रभावपासी हो १९२ साझिय की मान्यताएँ भाया करती है। प्रादि कास में अब नाटक मोक्ममा का हो माग पा रंग-मंच का निर्माण प्रयल सापडिया माया पा। मेफिन मोक कमामों में गिनी पक्षमा पार सामर्दी हसी है उतनी ही मादि काम के नाटकों में दिखती है मौर इसलिए साहित्य के अन्तर्गत मा नाटक स्वीकार किया गया उस समय उसके विपिप-कसारमक पक्षों की निर्वसमा को स्वीकार करके उसके पाहिस्पिक माग को परिपुष्ट बनाने काही प्रपल किया गया। संस्कृत-साहित्य के विकास का पर हम मध्ययम करते हैं तब हमें यह स्पष्टरूप से दिखता है कि संस्कृत साहित्य का प्रथम भाग माटक- साहित्य हे । संस्कृत का प्रपम माटमकार मास पाना पाता है को सम्भवत ईसा से पूर्व तीसरी या पोपी पहामि में प्रा है। भार पाद प्रश्नमोप कालिवास प्रमा, इविय भवभूति प्रादि संसा को मितने साहित्यकारों की कृठिया हमारे सामने मानी उनमें नाटकों की प्रारता है। अपरेड के समय से माटकों की रपना का प्रमाण संस्कृत- साहित्य में विसने लगता है। इन प्राचीन काल के नाटकों में हमें कहानी कविता, नृत्य संगीत पोर पमिनयम सब सामगस्य मिमवा है और सम्मपत इसी सामरस्य के कारण माटकों ने संस्कृत-साहित्य में इतना प्रपिक महत्त दिया गया है। साहित्य जन द्वारा परसरमी से पाय हो इसके लिए माटक मधिक उपमुख समा माठा है पर्योंकि माटक में गाहित्य की मावमा के व्यक्तीकरए को शो को गति के प्रमावा अन्य सामों में निहित गतियों की सहायता मिमी है। अंग्रेजी में माटकमा पर्यापनाची बार हामा है पोर मा पद में उस गति का बो पौवहस का समन परे माम है। हिन्दी में भी माटमीप अपवा नाटकीयता पलों में भी कम की इस गति वा भास है। दानी में कम और उसको गतिमी पो मी किया प्रतिक्यिा होती हे मारक में यह परपपिक प्रभाव के साप उपस्पितमी गाती है। नाटक में साहित्यिक पएनों के प्रसार के लिए कोई स्थान नहीं है और इसलिए माटक का कमानक मुगठित होता है । माटा साहिस्पिक भाग कपोपापम होता है, और इस पोपम्पम के में पिहानी बापी जाती है। मो साहित्यकार माटम लिखता है उसे मप ममामों का पोगबाट नाम तो होना ही चाहिये । नाटा पानी पहानी को मारता उसके ममिमप में ही है और इसलिए माटर की कहानी में पस्सना को नाटक । मति ममिक मुखर नहीं हो पाती। मिखित कहानी या उपन्यास में मेवर पार पाम के बीच में केवल धम्म होते हैं, और धर्म वाय मादान-प्रदान शुर-प से योखिक होता है। नाटक में यह प्रारान-प्रवान मांस और कान द्वारा किया जाता है, और इसलिए कल्पना का क्षेप पति-सीमित हो जाता है। रंग-मंच पर ममिनय से पृपक नाटक का अस्तित्व विगुण साहित्यिक स्प में कुछ संदिग्म-सा है। माटक के साप ममिमय पी व्यवस्था पनिवार्य रूप से पुटी हुई होती है। इतना मान लेने के बाद फिर यह प्रश्न उठना होता है कि क्या पठिस-साहित्य में नाटक का स्थान कमजोर है? इंगलेश का सर्वश्रेष्ठ शेक्सपियर प्रमुखत माटककार है, पौर उसके माटकों में गोपवित्व है वह केवल प्रमिनय का ही नहीं है, यह पठित-साहित्य में सर्वोत्कृष्ट माना जाता है। कालिदास के प्रमिझान भान्वस को विश्व में गो मान्यता मिमी है वह पठित काय के कारण इसलिए माटक के विशुट साहित्यिक मत्व भी भ्याक्पा कर मेना मनुपयुक म होगा। पैसा में पहले कह चुका है, नाटक में वर्णन के विस्तार और प्रसार की सम्भावना नहीं है, नाटक में कल्पना का क्षेत्र भति-सीमित होने के कारण कल्पना बहर महीं पाती । पपिश साहित्य अनपेमित विस्तार पौर प्रसार से दोपपूर्ण हो पाया करता है। नाटक के शिल्प में साहित्यकार एक प्रकार की मर्यादा मौर सोमा में बंपर भागे बनता है। ससे प्रमावश्यक प्रसार पौर विस्तार का पोप उसमें महीं माने पाता। सिस पीर का प्रभिनय न घ्यिा ना सके या भिम बीनों का समावेश पमिनय में म हो सके यह माटक में मा ही नहीं सकती। प्रमिमय की सीमा से परिमानित साहित्य निश्चय प से प्रभावशाली होगा। मिसे हम अंग्रेगो में गाइरेर एक्सप्रेशन (Direct Expresnon) कहते हैं और हिन्दी में हम सष्ट चि कह सकते हैं, नाटक में यह निसरता पन्य पठित-साहित्य में यह दोप पुक माना जाता है। पाठक पर इस स्पष्ट उक्ति का प्रभाव प्रत्पपिए पड़ता है क्योरि उसमें प्रसाद पुण होता है पीर में प्रसाद गुणदो साहित्य का प्रमुख गुण हमेशा से मामता प्हा हूँ। नाटक में माटकीयता होने के कारण तीन अनुमति के गुरग प्रमुग्न होते है और यही कारण है कि हामी नाटक तिल में पार बड़ी मासानी म दूसरा में संवेदना को पति कर गाती है।

साहित्य की मान्यताएँ बाया करती है। मादि काम में बर माटा सोनचा काही भाग पा रंग-मंच का निर्माण प्रपल के साथ रित्या मावा या। सेक्सि मोक- फसामों में मिवनी सक्षमता और सामर्दा होती है उतनी ही मादि काम के माटकों में दिखती है और इसलिए साहित्य के अन्तर्गत पर नाटक स्वीकार किया गया उस समय उसके विविध-कसारमक पर्मों को निर्मसता को स्वीकार करके उसके साहित्यिक माग को परिपुष्ट बनाने का ही प्रयत्न किया गया। संस्कृत-साहित्य के विकास का जब हम अध्ययन करवे हे सर हमें यह स्पष्ट रूप से दिसता हे कि संस्कृत-साहित्य का प्रमुख माग नाटक साहित्म है। संस्कृत का प्रथम नाटककार भास माना जाता है जो सम्भवत ईसा से पूर्व तीसरी मा पोपी शताम्नि में हुमा है। मास के बाद पासषोष कामियास पूरक, हर्षीय मनमूति मावि संमत के गिवने साहित्यकारों की कृतिया हमारे सामने पाती हैं उनमें नाटों की प्रपुरता है। परदेव के समय से माटों की रचना का प्रभार संस्कृत- साहित्य में दिखने मगता है। हम प्राचीन काम के नाटकों में हम कहानी कविता नृत्य संगीत और ममिनयन समका सामयस्य मिलता है पोर सम्भवत इसी सामंजस्य के कारण माटों को ऐसत माहिम में इतना अधिक माल दिया गया है। साहित्य जन द्वारा मासानी से पाप हो इसके लिए नाटक मधिक उपयुछ समझा जाता है क्योंकि माटक में साहित्य की भावना के पोकरण को धमौ गति के प्रतावा अन्य कसामों में मिहिस मतियों की सहायता मिलती है। अंग्रेजी में नाटक का पर्यायवाची पम्मामा हे और डामा भर में उप गति का मो कौतूहम नएपन करे मास है। हिन्दी में भी माटकीय अपवा नाटकीयता पम्यों में भी कर्म को इस यति पा मास है। कहानी में कम और उसको गति की वो भी क्रिया-प्रतिक्रिया होती हे माटक में बह भस्पषिक प्रभाव के साप उपस्मित की बाती है। माटक में साहिस्पिक भएनों के प्रसार के लिए कोई स्पान नहीं है और इसलिए माटक का कपानक सुगठित होना है। माटकमा साहिस्पिक माग पोपकपन होता है, पर इस कमोपापन के साये में पिहानी बोपी बाती है। बो साहित्यकार नाटक सिसवा हे उसे प्रम्य कसाों मोड़ा बहुत माम तो होना ही चाहिये । नाटक बासी कहानी की सार्थकता उसके प्रमिनप में ही है और इसलिए माटी कहानी में कस्पमा की नाटक गति प्रषिक मुखर नहीं हो पाती। सिसित कहानी या उपम्पास में मेवर पार पाठक के बीच में केवल सम्म होते हैं और धों द्वारा पादान-प्रदान गुरु-स्म से मौद्धिक होता है । माटक में यह प्राशन-प्रदान प्रांख मौर कान द्वारा किया जाता है, और इसलिए कल्पना का क्षेत्र परि-सीमित हो जाता है। रंग-मंच पर अभिनय से पृयक माटक का अस्तित्व विशुद्ध साहित्यिक स्प में कुछ संदिग्प-सा है। माटक के साप अमिनय की व्यवस्था अनिवार्य रूप से ही हुई होती है। इतना मान लेने के बाद फिर यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या पठिस-साहित्य में माटक का मान कमजोर है ? गले का सर्वश्रेष्ठ शेक्सपियर प्रमुखत नाटककार है और उसके माटों में योगविस्व है वह केवस प्रमिनय का ही नहीं है, बह पठित-साहित्य में सर्वोत्कृष्ट माना जाता है। कालिदास के पमिशान धान्तम को विश्व में गो माम्पवा मिली है वह पठित काम्प के कारण इसलिए माटक के विमुट साहिस्पिक तल को पास्या कर मेना ममुपयुट म होगा। मेसा में पहले कह गुफा हूँ माटर में वर्णन के विस्तार भौर प्रसार की सम्भावना नहीं है, माटक में पल्पना का क्षेत्र प्रति-सीमित होने के कारण कल्पना बहरू नहीं पाती। पभिवंध साहित्य अनपेक्षित विस्तार पौर प्रसार से दोपपूर्ण हो माया करता है। माटक के शिस में साहित्यकार एक प्रकार की मौत मौर सोमा में बंधकर भागे पढ़ता है। इससे मनापश्या प्रसार पौर विस्तार का दोष उसमें महीं माने पाता। मिस भीष का ममिमय न किया जा सके मा मिन बीगों का समावेश पमिनय में म हो सके वह माटक में मा ही नहीं सकता। प्रमिनय की सीमा से परिमानित साहित्य निश्चय रूप से प्रभावशासी होगा। मिसे हम अंग्रेगो में गहरेषा एक्सप्रेशन (Direct Expression) कहते हैं और हिम्गे में हम स्पट उचि कह सकते हैं, माटक में यह निखरता है पम्प पठित-साहित्य में बह दोप पुल माना गाता है। पाठक पर इस सप्ट उक्ति का प्रमाण प्रत्यभिम पड़ता है यदि उसमें प्रसाद पुण होता है पौर में प्रसाद गुण साहित्य का प्रमुख गुण हमेशा से मानवा रहा हूँ। माटक में माटकीयता होन के कारण तीन अनुभूति के पुण प्रमुस होते हैं और यही कारण हे शिबहामी मारक पिस्स में पार बड़ी मासानी में दूसरों में संवेदना को घष्टि पर सरती है।

साहित्य की मान्यताएं पापुनिक काल में इम्सन, पर्मा पा, गास्सवर्दी प्रारि साहित्यकारों में माटक के शिल्प के माप्पम पे ही अपना साहित्य प्रस्तुत किया है। मारतवर्ष में रंग मंच के प्रभाव के कारण माधुनिक युग में नाटकों की भोर विशेप भ्यान नहीं दिया गया। मो कुछ यो से नाटक कुछ विशिष्ट साहित्यकारों ने लिये यह ममिनय पी एप्टि से महीं सिखे गए- उमका फेवस पठिस महत्व है। वैसे उम माटकों का प्रमिमय भी हुमा है, मेकिन उनकी लोकप्रियता रंग मंच के नाटकों के रूप में म होकर पठित साहित्य के रूप में ही है । रवीनमाप ठाकुर पपीकर प्रसाद पादि अनेक महावियों के नाटकों से इसी निर्णय पर पहुंचा बाता है। माटक को हम साहित्य का याग्त्रिक उपकरण कह सकते हैं । नाटक का प्रमुख तत्व कहानी है और इससिए कहामी को हम नाटक का पापार बह सकते हैं। रंग-मंच पर जो नाटक होता है उसमें पाठक महानी को पड़ कर नहीं पहण करता वह उसे सुन कर और उसे रेल कर ग्रहण करता है । माटक में मापार-म से शब्द माम्यम होते हुए भी कमामों के अन्य उपकरण मौजूद रहते हैं। मृत्य संगीत विन स्पापल्प मूर्ति, इन सम कमाों का समावेश होता है। मेकिन इन सब कसामों की अपनी एक मिनी सीमा है । उस सीमा को पत्रों की सहायता से दूर किया जा सकता है, पौर इसलिए मेकानिक विकास के साप भाम के याग्निक युग में नाटक म रूम क्या उसकी माम्पवाएं बदल गयी हैं । हरेक कसा के साप उसका एक मात्रिक पहन भी विकसित होता ना रहा है। नाटक के क्षेम में सो बात को परिवर्तम यहाँ उपन्यास मोर कहानी में परिमों एवं घटनामों को हम अपनी कस्पना द्वारा प्रहण करते हैं वहाँ नाटक में हम यह सब देख कर पौर सुन कर ग्रहण करते हैं। कर्मों के मदर म्पिा-प्रतिडिया मासी मति के बस पर नाटक पसवाहे, पौर यह गति शुभस्म से साहित्य की गति मानी जाती है, पम्य कसाों की महीं इससिए नाटक साहिय का ही भाग है। पर इस कर्म की झिया पौर प्रविठिया का स को प्रस्तुत किया जाता है, वह स्वयम् में सीमित हो पाता है और कहीं-कहीं वित भी हो गासा हे गव कि माटक को प्रस्तुत करने पासे में कल्पना का प्रभाव हो, क्योंकि नाटा को प्रस्तुत करने मासा पति स्यम् मेवा महीं होगा।

नाटक सेफिन में इस स्थान पर यह भी सप्ट कर देना चाहता है कि नाटक-सेवक को भी रंग मंचका सान होना चाहिये । बिस माटक-सेम्पक को रंग-भप का ज्ञान नहीं है, वह सफल नाटककार नहीं हो सकता। नाटक में समस्त कहानी कयोपकपन में होती है। कहानी का मो वर्णन माग होता है, पह रंग-मंप पर दिसमापा जाता है। ऐसी हासव में महत से ऐसे वर्णम हो सकते हैं मो रंग-मय पर नहीं दिससाए जा सकते। इस प्रकार के वनिों को नाटक में महीं सम्मिसित किया जा सम्ता । उपम्पास में मिलने वाली कहानी की सम्पूर्सवा पौर कहानी का प्रसार माटक में नहीं मिल सकते मारक का कहानी पक्ष अपेक्षाकृत निर्वस होता है । इस निर्वस महामी पक्ष को अन्य कलाभों के सहयोग से संगारा बाता है। इससिए बिस सेएक में पम्प कसामों का मान नहीं हे वह सफल माटककार महीं हो सकता। कमा क मारम्भिक विकास की समस्या में हरेर माघर में हरेक कमा समान होता था क्योंकि विषिष्ट वर्गीकरण के पहले मोक- सामों में प्रायः समस्त फसाएँ सन्निहित पाई भावी पी रिसका वार में मारक के नाम से वर्गीकरण पिया गया-उन स्वांगों और समाओं में ही कामामों के सामूहिक रूप का प्रदर्शन किया जाता था। जिस समय में माटक को कमा का याविक उपकरण कहता हूँ उस समय मेरे सामने मह सम्म पवश्य पता है कि माटक म्पतिगत कसा नहीं है, पह दम गत-अमुमन (Tam Work) को कता है। नाटक माम के दिन भी उस (Team Hort) स-गठ मनुष्ठान में लाहमा है, कहानीमा रिसमा प्रमुत्र प्रापार है। प्राय ऐसा भी होता है कि कममोर कहानी के पापार पर लिखा हुमा नाटक रंग-मंच पर बहुत सफल उसरे । पार वेगानिक विकास के साप नाटक में पहानी की महत्ता कम होतो पा रही है। पचास वर्ष पहले रंग-मंच परमो कुछ नहीं दिखतापा पा सकता है, माम यह सब दिखलाया ना सस्ता है। प्रकाशको म्यबस्पा रयों की व्यवस्था विज्ञान की सहायता से यह सब इवने यह गए है कि नाटक को यह सीमा यो माटा में गहत पुष महने से ऐश्वी पी कम होती जा रही है। मात्रिक उरकामों के कारण नाटक का एक नया स्पही इस युग में प्रष्ट हुपा है मिसे हम पावित पा सिनेमा कहते हैं। पवित्र में सभी उप दिसाया गा सम्या है, और कहानी पयवा उपन्यास की प्यापरता माटक के इस नवीन स्प पापित में सम्मिलित हो सकती है। पापों साहित्य की माम्मताएँ से परम्परागत नाटकों के विकास को एक पका-सा सपा और भाग की दुनिया में नाटकों का स्मान पातपित्रों ने मे सिमा हे। पमपित्रों में हम भमिनेतामों को नहीं देखते रंग-मंच को नहीं देखते-केवस छाया के रूप में सब कुछ हमारे सामने माता रहता है। मसात्मक प्रवृत्ति पाप्तों को यह बसवित्र स्वाभाविकप में निष्पाण- से दिखते हैं। और इससिए विदेशों में वहाँ पेशानिक कारण इस प्रहरवा के साप उपसम्प है कि उनका प्रयोग माटकों में किया जा सके नाटक की परम्परा कामम है । पर उन क्षेत्रों में नहीं मानिक उपकरणों का प्रमाव हे माटम हासोन्मुख है। उदाहरण के सिए हिम्दी के क्षेत्रों में कहीं भी मने बासा ( Revolving ) रंग-मंच महीं है जिस पर नाटक बेला पा सके। प्राचीन ढंग से पेमे जाने वाले माटकों को माम शानिक युग का मार शानिक चेतना मासा ममुष्य स्वीकार नहीं कर सकता। पौर समिए हिन्वी क्षेत्रों में नाटों का कोई क्षेत्र नहीं है । शोपिया नाटक सोमने नामों की टोमियो पब-सा माटक बम मिमा करती है मेकिन सामों के प्रमान * कारण उन माटों के बरे मोरस पार भदे प्रदर्शन होते हैं। पौर उन प्रवर्धनों का परिणाम यह होता हे किनाटों का मूल्य मनता की मगर में मिरवा पमा भा रहा है। हिन्दी में भार के दिन नाटक मुख रूप से पठित-साहित्य का स्मान लिए हुए है। लेकिन लिखित नाटकों में दो फेवस कपोषकपन होता है, कबिस्वमय मोर विस्तृत वर्णनों का उममै प्रभाव होता है। इसलिए पाल्प-सामग्री के रूप में माटकों को मांग नहीं के बराबर है। मक्सर हिन्दी के साहित्यकारों से यह शिकायत की जाती है कि वह माटक की उपेक्षा करते हैं। मौज में प्राकर कुछ साहित्यकारों में दोबार एकत्रकी माटक मसे ही लिब रिपे हों, उन्होंने सम्पूर्ण नाटक नहीं मिसे हैं। मिस पीरा की विकी नहीं है उसका उत्पादन किस प्रकार सम्मन है ? एनकी माटों का स्मान कहानियों के समकक्ष माता है । कहानी स्वयम् में उपन्यास को प्रपेक्षा सीमित है, इसलिए एकांकी मारकही- कहीं कहानी की अपेक्षा प्रमिक सफा पाठप-सामग्री के प में मा मासे हैं। मेफिन इस प्रकार एकोकियों को सिखने में जो परिपम करना पड़ता है, यह कहानी की अपेक्षा बहुत अधिक होता है। मेरा कुछ ऐसा मत है कि अब तक हिन्दी में रंग-मंच की स्थापना महीं होती तब तक हिन्दी साहित्य में नाटक उपेक्षित पड़ा हेमा । योरोप 1 माटक में बर्नार्ड था, गास्थवर्दी मावि मो नाटककार हो गए है उसका कारण है कि यहाँ ज्ञानिक विकास मे नाटकों को सत्कास प्रमाणित किया और महका रंग-मंच निरन्तर विकासोन्मुख रहा है। (४) माटक को हमारे प्राचार्यों में श्पकास्य की संज्ञा दी है, लेकिन जानिक विकास के युग में रेरियो के माविष्कार के बाद नाटक का एयरप पहीं-कहीं गायब हो गया पौर श्रम्प-रूप भर रह गया । रहियो माट को रपना फेवस थम्य उपकरणों को मान में रसकर की माती है। नाटक का यह प्रम्प-स्प साहित्य के प्रषिक निकट है। रेडियो नाटक कपोपकपन एवं संगीत पर ही पता है । कमा यस्तु की मुन्नमा यहाँ पाभकवापिया के शब्दों में गोड़ी पा सकती है, यद्यपि बार-बार पापक पोर माधिपायो माना नाटककार पी प्रक्षमता का मोष कराता है। रेडियो नाटा में दो कसाों का सम्मियण सो पड़ो मासानी से हो सकता है साहित्य और संगीत । साहित्य के अन्तर्गत भी बहामी पौर कविता रेडियो नाटों पर एक साप पा सकते है। मेरा कुछ ऐसा मनुभव है कि रेरियो नाटकों में यदि पिता मौर संगीत का धमावेगा हो सके तो वह बहुत सफल नाटक होंगे। कुछ इस प्रकार के गो प्रमोग रेडियो नाटकों में हुए हैं वह काफी सफल माने जाते है, मेग्मि मह भी ध्यान में रमना पड़ेगा कि इन माटों का महानी भेग इवना महत्वपूर्ण नहीं होता बिना उनका कविता का भंग होता है। जिसको हम पुरु मारक पा शिस्प पहठे हैं रेशियो माटक को नाटक कहते हुए भी उस पिस्प का नमें प्रमान होना अनिवार्य है। प्रमी बुध दिन पहले रंग-मंप के माटों के रेडियो पर प्रसार की परस्मा की गयी पी पौर यह प्रयोग सफल नहीं हो सका। रंग-मंच के मारक के चित्र में पौर रेग्यिो माटर के पिल्स में बहुत पन्तर है। रेडियो माटक में गो मी प्रमिनप हो सकता है यह धर्मों द्वारा हो सकता हेमो कान से सुने गाय । योपरमन के मन में भावनारमा उतार बाप सरना और उस उतार पड़ाव को प्रहण करना यह सब पुष संदिग्प-सा रहा करता है। मो माटक रंग-मब लिए सिमा गया है बह रेरियो पर सफलतापूर्वक प्रसारित ही नहीं मिया मा सक्सा जहाँ हा उसम्म प्रसारमा पदा है। रेरियो माटक का प्रपना मिली शिस है ना पिास के क्रम में है।

साहित्य को मान्यताएं ऐसी कहानी भो सम्पूर्ण स से कपोपकपन में भी हुई हो, रेडियो नाटा में सफल होती है । इस कमोपकपन का काम्पमय होना या प्रभावसान होना ही अनिवार्य है । मेकिन रेग्यिो माटों की एक सीमा भी होती है यदि मपिक पात्र हुए तो उसमें म्याषात पहुंचा है। दो-पार पात्रों की प्रापाजों से तो हम उन्हें पहचान सकते हैं, पर वहाँ पामों को संम्पा मपिफ हुई योता भटकने लगता है। रेग्यिो माटों की पुस्तकों के रूप में पिये बहुप कम होती है। सुनने पर जो कयोपकबन पन्धा मगता हे उसमें भपिकोण में सस्ते किस्म को भावुकता होती है कामे पर यह कपोपकपन प्रभावहीन ही मही कमी-कमी हास्यास्पद भी लगने सगता है । फिरमों में दो कमोपकमान (Dialogues) पाते हैं, उनमें भी यही दोष है। म्यावसायिक कला होने के कारण रेडियो के माटों की मांग है पौर यह रेशियो माटम प्रधुरता के साप लिखे भी गा रहे हैं। यह सम्भव पा कि मगातार विकास के साप रेडियो माटक का एक निश्चित पोर सुस्पष्ट रूप निमरता सेकिम इस मीच विज्ञान मे फिर अपना अपना कदम उठा दिया पौर टेलीविजन मा मया । टेलीविजम में नाटक के दृश्य पाध्य पाले समी ममयर मौररहे पौर इसलिए रेडियो नाटक के विकास में जो प्रगति मा ही बी र सिपिस पड़ गयी । काम्यमय मम्बेसम्म कमोपकपन मिनमें कर्म ( Action) का प्रभाव हो रेडियो पर तो सरमसापूर्वक प्रस्तुत किये जा सकते हैं, यह टेनीवान में नहीं पा सकसे । मारसवर्ष में तो टेलीविजन प्रमी नहीं के बराबर मामा है और उसे यहाँ पूर्ण रूप से स्थापित होने में प्रमी समय मगेगा । मेकिन कसा करको मवीन स्म प्रकट हो गया है उसकी उपेक्षा कैसे की पा सकती है। प्रगमा पुग टेमीविषम का युग कहा जाता है और दुनिया के पम्प मार्गों में टेलीविरन की फिल्मों से प्रतियोगिता होने मगी है। टेतीविन में रंग-मंच के माटकों की सीमा प्रमिक से अधिक कम की गा सकती है। टेमीविजन पर प्रस्तुत किये जाने वाले माटों का मिस निकट मविष्य में विकसित होगा और व्यावसायिक साहित्यकारों को इस दिशा में सचेत रहमा चाहिये । पैसे फिल्मों में गिस कपा-शिल्प का प्रयोग किया जा रहा है, उससे मिमवा-युसता शिल्प ही टेलीविजन में टेमीविजन के सिप में उस सेपन की सम्भावना कम रहेमी दो फिल्मों का अनिवार्य माग बम बुकी है क्योंकि टेमोरिन प्राभिमास्य वर्ग की माएमा मेकिन

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साहित्य की माम्यवाएं
यह कहना कठिन है कि कब यह प्रस्पा पाएगी पर मेग ऐसा
विश्वास है कि माटकों की परम्परा मेसकों के हाल में पा कर ही सम्हस
सकती है। पार की बदसती हुई राजनीतिक सामाविक एवं भाषिक
माम्पतामों को म्मान में रख कर किसी भी प्रकार को मविष्यवासो मही
की जा सकती।
मेकिन यह भी सत्य है कि कहानी तत्व मनुप्प के मनोरमन की
पादि प्रवृत्ति है, और मह कहानी नाटकों के द्वारा प्रमामलामी रंग से
प्रस्तुत
की पा सकती है।

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Sahitya Ki Manytay

Author
Bhagvatichran Varma
Title
Sahitya Ki Manytay
File name
Sahitya Ki Manytay
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2010/12
Publisher
Eilhabad,hindustani Acadmi
Language
Sanskrit
Pages
184
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514673
Barcode
4990010022368.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
sm9AS8gpUMa
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Sahitya Ki Manytay