Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Tarni Tarnee

Vina Jain · 2011/03

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वीणा जैन
जन्म सरदारशहर (राजस्थान)
जन्म-तिथि 13 फरवरी, 1946
शिक्षा प्रभाकर (हिन्दी)
लखन
हिन्दी में प्रकाशित कुछ प्रमुख पत्र-पत्रिव
म कविताआ का निरन्तर प्रकाशन और
अगणित पाठक-पाठिकाआ द्वारा प्रशसित
प्रेरणा
भावा की घनीभूत अनुभूतिया के साय म
प्रतिश्रुत अनुश्रुत से बहुश्रुत की आर
अभिरुचि
तेलचित्र चित्रण विशाखापट्टनम म एकल
प्रदर्शनी।
आवरण चित्र भी स्वय निर्मित
सम्मान
डॉ अम्बेडर फैलोशिप सम्मान 1999 के
लिये चयन

तरणि-तरणी वीणा जैन

(ii)
तरणि-तरणी
लसिका वीणा जैन
प्रथम सस्करण, 1999
प्रकाशक
प्रगति प्रकाशन
7 उपा कॉलोनी
मालवीय नगर जयपुर-302 017
दूरभाष 525286
सम्पादक
श्रीकृष्ण शर्मा
जयपुर
चित्राकन
सत्यदेव सत्यार्थी
जयपुर
प्रथम एव अन्तिम आवरण चित्र
वीणा जैन (पींचा)
मूल्य
100 रुपये
मुद्रक
जयपुर प्रिण्टर्स प्रालि
एम आई रोड, जयपुर

समर्पण
जब
बहुत अकेली होती हूँ
माँ, याद तुम्हारी आती है
तू नहीं
अब
इस दुनिया में
ये अहसास
हवाये दे जाती है,
और मेरी ये तनहाई,
मेर आँसू
मेरी खुशियाँ
अक्षर-अक्षर, गूंथ-गूंथ
समर्पित
मुझे कर जाती है।
वीणा जैन
कलकत्ता
22 जुलाई, 1999

--- | (v) परिचिति कल्याणमल लोढा वीणा जेन से मेरा व्यक्तिगत परिचय अनेक वर्ष से है। वे सद्गृहिणी है और अत्यन्त साम्य व सरल व्यक्तित्व की भारतीय महिला है। इधर मने उनक एक नए रूप आर स्वभाव का प्रमाण पाया। व कवयित्री भी है और उनकी यह मारस्वत प्रतिभा का प्रथम पुष्प 'तरणि-तरणी' मेरे सम्मुख है। यो गत कई वर्ष से उनकी कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाआ मे प्रकाशित होती रही है और मैंने उन्हे पढकर पाया कि इनकी रचनाधर्मिता का मूल स्रोत भावा की घनीभूत अनुभूतिया मे विद्यमान है और य अनुभूतियाँ ही सरल अभिव्यक्ति से कविताएँ बन जाती हैं। वीणा जैन की मान्यता है कि आज भी मनुष्य के हृदय मे करुणा और मोह है। वह कितना ही पशु बने पर उसका अन्तर, उसकी आत्मा हमेशा उसे पशु बनने से रोकती है। मनुष्यत्व की यह धारणा ही, वस्तुत जीवन की, जिजीविषा का शब्दाथ मे परिवर्तित होती है । यह कवल भावावेश नहीं होता वरन् वह जीवन की गहराइया से परिपोपित होकर प्रकृति के साथ सहिता बनकर जडजगत् को समायोजित करता है। इसके साथ ही युग- परिवेश ओर यथार्थ का अनुबन्धन कविता को वायवीय न बनाकर अपने अन्त प्रवाह मे मन, प्राण व हृदय को छूता है। यही व्यक्ति के अन्तर्मन की विराटता है और उसकी सकल्पना। वीणा जैन कहती है महलो के जगमगाते कँगूरो मे, दीयो की लम्बी कतारा मे एक दीया उस घर उठाकर उनके नाम लिख दे, जो जीते है, उन भर, अभावो मे मरते है, जो अंधेरा म, चलो उन्हें भी उनका हक दिला द। अनुभूतिया को यह प्रवरमानता व्यक्तिनिष्ठ न होकर व्यापकता का प्रमाण है। 'तरणि-तरणी की', 'अपनी कही' म वीणा जैन ने अपनी रचनाधर्मिता और उसकी प्रक्रिया को रूपायित किया है। कलकत्ता के व्यस्त सकुल आर यात्रिक जीवन स उन्ह विशाखापट्टनम म "उस ठाठे मारत समन्दर के साथ मेरे उद्वेलित भाव अपनापन महसूस करने लगे और मन का भाव-पक्षी उडने का आतुर हा उठा। उसी आतुरता को गिने-चुने शब्दा का वाना पहनाने की काशिश हैं ये शब्दचित्र।" वीणा जन चित्रकार भी है - उनके चित्र रगा और तूलिका से भाव- सोन्दर्य के उत्कृष्ट उदाहरण है क्याकि उनम चित्रकार की दृष्टि स्वत स्पष्ट है। कवि का तृतीय नेत्र देशकाल में समाहित होकर भी उनके परे देखता है और इसे ही अन्त दृष्टि कहा गया है। कवयित्री ने 'शब्दचित्र' कहा है और इसी से प्रत्येक कविता की प्रामाणिकता ओर उसकी भावभूमि को रेखाचित्रो से ओर प्रभावी बनाया है। कलकत्ता और विशाखापट्टनम के जीवन ने उन्हे युग सापेक्ष अनुभूतियाँ दी तो प्रकृति के अनिन्द्य सौन्दर्य से अभिभूत किया। वीणा जैन का कवयित्री-कर्म इसी का समायोजन है। 'कविता क्या है' म वे कहती है 'भावुक हृदय से बहता, निर्झर सा निर्बन्ध गान है, मेरे भारी मन को, हल्की सी प्यार की थाप है, कविता यही है बस यही है।" टी एस इलियट ने इसी से कविता को 'व्यक्तित्व से उन्मुक्त प्रवाह' कहा है और उसे वस्तुगत यथार्थ । ओब्जेक्टिव रियेलिटी। 'तरणि-तरणी' का यही रूप है । वह एक ओर कवयित्री के मन से स्वत स्फूर्त हे तो दूसरी ओर प्रकृति से जुडकर अपनी व्याप्ति को और रसमय बना देता है । सोन्दर्य M { vil) विषयक उन्नयन उस 'सोन्दर्य' की ओर प्रवाहित होता है। भावात्मकता ओर बाद्धिकता अपनी समसगति से लोकात्तरभूमिका मे पहुँच जाता ह आर लोकोत्तर स्मृति बन जाता है। लोगिनस ने जिस उदात्तता की विवेचना की है, उसका भी यही आधार है। वह कहता है, There can be true sublimity when the effect is not sustained then and the act of perusal when it makes a lasting hold on the memory then we have to be sure that we have lighted on the true sublimity वीणा जैन की काव्यानुभूति इसी औचित्य की ओर अभिमुख होती है। इस सग्रह की एक कविता है "बचैन मन"। इस कविता मे कवयित्री कहती है "घन उमड-घुमड कर, बरसा देते अपने मन की बैचेनी, सागर भर देता, उठती मचलती लहरो मे, मन का सारा बोझ, फूलो पर निखर जाता है। कलिया के मन का राज, इन्द्रधनुष के रगो मे, आसमान भी कह देता है अपने मन की बात।" 'अपने मन की बात" का कहना, सुनना और समझना ही कविता के 'असाधारण सत्य' को दीप्त करता है आर यह असाधारण सत्य ही कविता का मर्म है। वीणा जैन को एक और विशेषता है शब्द प्रयोग की सार्थकता। कविता का अभिधेय अन्तत शब्दा पर ही निर्भर रहता है, शब्द ही अर्थक सार्थवाह है। उनका अपना व्यक्तित्व होता है। कविता म शब्द का व्यक्तित्व वाविलासमय न होकर अर्थसौष्ठव की आधारभूमि होती है। प्रस्तुत सग्रह की अनेक कविताएँ इसी सौष्ठव का प्रतिमान है । एक अज्ञात पीडा व अभाव कवि मन का आहत-व्याहत करता है और वह बार-बार अपन से पूछता है। 'सारी सिसृभा इन सपना के मध्य भी कवयित्री मन्दिर क घण्टा-सा प्यार को वजन दता ह । वीणा जैन को काव्य-यात्रा अविराम गगा-मी वहती रहे ओर उसकी व्याप्ति व उसका विस्तार गहन अनुभूतिआ स पापित होकर अपनी अन्त बाध्य समसगति म प्रकृति क साथ युग से जुडती रह यही मरी आकाक्षा है। प्रस्तुत काव्य संग्रह मुझ यह विश्वास दिलाता है। कविता पलायन नहीं अपने म आत्मविलयन है आर यह विलयन एकागो नहीं होता वरन् नदी की भाँति सागर म सतति हाकर अपन अस्तित्व को और व्यापक बनाता है जिसके क्षितिज नित नए सतरगी सान्दर्य से अभिव्यक्त रहते हैं। में 'तरणि-तरणी' का इसी से स्वागत करता हूँ। वे अपन मन की बेचैनी का सदैव पन्ना पर लिखती रह । जनवरी 1, 1999 2-ए, देशप्रिय पार्क (पूर्व) कलकत्ता-700029 .

(ix) स्वर्णोज्ज्वल प्रत्यूष का प्रोज्ज्वल काव्य श्रीकृष्ण शर्मा साहित्यकार, कलाकार अपनी साधना के प्रबल पर निराकार सत्ता का विवेचन विभिन्न कलारूपो मे उन्मीलित-समुन्मीलित करते है । कलारूपी का सुसम्पृक्त एव सुसश्लिष्ट तथा घनीभूत छन्दबद्ध, ओर लयबद्ध शाब्दिक कलेवर ही काव्य साहित्य कहलाता है और जो छन्दरहित तथा लयविहीन हो किन्तु, सत्यम्, शिवम् सुन्दरम् की प्राप्ति में सहायक हो वह साहित्य कहलाता है। साहित्य, कला आर दर्शन के बीच, लगभग लगभग ऐसे ही त्रिकोणीय सम्बन्ध है, जिसे हम सस्कृति कहते है। साहित्यिक चिन्तन मनोलोक मे अकुरित ओर भावलोक मे प्रस्फुटित एव पल्लवित होता है, जो निर्झरणी के माध्यम से लिपिबद्ध होता हुआ पाठकीय सम्पदा बनता है। यही चिन्तन अभिव्यक्ति के लिए विविध साहित्यरूपी के माध्यम से अलग अलग रूप-स्वरूप ओर आकार ग्रहण करता है। शब्द चिन्तन, मनन, अध्ययन, अध्यापन और स्मरण की निराकार सत्ता ओर साहित्य के विविध कलात्मक रूपो के विविध विवर्तो को जब शब्दो म विस्ताराकित एव समाहित करन लगता है तब उसका परिणाम यह होता है कि कभी साहित्य की चेतना मानवीय ऊर्जा को सम्बलित करती है और कभी मानवीय गरिमा साहित्य की चेतना को चैतन्य एव जीवन्त अनुभव का रूपाकार पदान करती है। साहित्य सूत्र को समझने के लिए काव्य, काव्य के लिए सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश, हिन्दी भाषा आदि ओर काव्यशास्त्र, छन्दशास्त्र साहित्यशास्त्र का ज्ञान भी जरूरी माना गया है । साहित्य की दृष्टि, पूर्णता और समग्रता पर केन्द्रित है और वह साहित्यकार को अविभाज्य आध्यात्मिक अनुभूति तक ले जाती है। विश्वकवि कालिदास ने हसपदिका को स्वर साधना को वर्ण परिचय ही कहा है। 'वण' साहित्यलोक म 'अक्षर' कहलाता है सगीत मे उसे 'स्वर' कहते है आरचित्रकला-ससार मे वह 'रंग' है । इस प्रकार 'वर्ण' ।

(x) अक्षर भी है, स्वर भी है और रग भी है जो साहित्य, संगीत, चित्रकलाआ के अद्वत एकत्व को प्रभावित एव प्रमाणित करता है । विश्वकवि कालिदास साहित्याकन की प्रक्रिया में साहित्यकार की तन्मयता, तल्लीनता, एकाग्रता को तत्परता से समाधि की अवस्था तक ले जाते है । समाधि शास्त्रीय शब्द हे भारतीय वाङ्गमय की अस्मिता, चेतना ओर तात्त्विक एकरूपता, आध्यात्मिक उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। आचार्य मम्मट ने काव्य प्रणयन के प्रयोजनार्थ कहा "काव्य यशसे अर्थकृते, व्यवहारविदे, सद्य परनिर्वत्तये, कान्तासम्मितपोउपदेशयुते" अर्थात् काव्य की रचना यश प्राप्ति के लिए, अर्थ प्राप्ति के लिए, परस्पर सवाद व्यवहार के लिए, अशिव के नाश के लिए, परम-आनन्द की प्राप्ति के लिए ओर कान्ता क उपदेश की तरह है किन्तु आज न तो महाकवि भारवि हे जो 'किरातार्जुनियम' जैसी कृति हमे दे सके आर न ही महाकवि माघ ही दृष्टिगोचर प्रतीत होते है जो हमे 'शिशुपाल वध' जैसी अद्भुत रचना दे सके आर न ही महाकवि श्री हर्प हमारे मध्य है जो नलदमयन्ती' जैसे ग्रन्थ का प्रणयन कर सक तथापि हिन्दी कविता के माध्यम से जनजागरण का कार्य हो रहा है और अहर्निश हो रहा है। मानवीय उदात्त भावनाओ और आकाक्षाओ से सम्प्रक्त कवि काव्य सर्जन कर रह ह । ढाँणी-ढाणी गली- गली नगर-नगर, उपनगर-उपनगर, महानगर-महानगर काव्य सर्जन हो रहा है। इससे निश्चय ही कविता की देह आन्दालित हुई और भूखी पीढी, नगी पीढी श्मशानी पीढी का झण्डा लिए हुए तुकान्त कविता, अतुकान्त कविता यथार्थवादी कविता ठोस कविता, प्रगतिशील कविता जनवादी कविता शाश्वत कविता, हास्य-व्यग्य का बाना पहनकर चुटकलेबाजी के रूप में प्रकट होती रही। गीत और कविता को कवि सम्मलना क मच से धकियाया जा रहा है पाठ्यपुस्तका से उस वनवासिनी बनाया जा रहा है पर कविता कविता है जो अनवरत, अहर्निश लिखती ही चली जा रही है। जितनी जमीन वह तोडकर 'शब्द' को 'मत्र' बना रही है अभिधा लक्षणा आर व्यञ्जना की यात्रा तय कर प्रतिध्वनि, रणतकार मे रुपान्तरित हो जाती है वह कविता का रूप ग्रहण कर रही है अर्थात् 'शब्द' जब कविता के . माध्यम से 'ब्रह्म' का रूप ग्रहण करता ह तो कविता जन-जन के कण्ठ मे वास करने लगती है, जन-जन को परम आल्हाद् की स्थिति में पहुँचाती है जो वस्तुत उसका प्रेय भी है और श्रेय भी। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर, प जयशकर पसाद, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, राष्ट्रकवि रामधारीसिह दिनकर, राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानन्दन पन्त एव महीयसी महादेवी वर्मा की टक्कर क कवि अब काव्यक्षितिज पर कहाँ दृष्टिगोचर होते है? और अव डॉ हरिवशराय बच्चन', डॉ शिवमगल सिह 'सुमन', गोपालदास नीरज, स ही वात्स्यायन 'अज्ञेय', रमानाथ अवस्थी, केदारनाथ मिश्र'प्रभात', बलवीरसिह रग, गोपालसिह नैपाली, नरेश मेहता, केदारनाथ अग्रवाल के बाद नयी पीढी म काव्य का वह उत्स कहाँ है? प्रोफेसर नन्द चतुर्वेदी के बाद कोन? हरीश भादानी के बाद कौन? रामनाथ कमलाकर, कर्पूरचन्द कुलिश, डॉ हरिराम आचार्य, डॉ मनोहर पभाकर तथा डॉ ताराप्रकाश जोशी के बाद कान??? जेसे जलते और उबलते प्रश्न उठ रहे है, अत नयी पीढी को काव्य के प्रति आकर्षित, प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। तीस-पैतीस साल पहले कर्पूरचन्द कुलिश की "मत छेडा उथे । यह सुहाग की रात बड़ी हो जाने दो। मत हँसो जागरण का रहस्य खुल जाएगा, नस-नस म लज्जा का अबीर घुल जाएगा, मत मारो पिचकारी सोने के पानी की, यह सपनो का सुरमई रग घुल जाएगा।" रामनाथ कमलाकर की "वेद होकर स्वय बाँचता पोथियाँ, देवता हूँ मगर अचना कर रहा हूँ साँस ली तो ऋचाएँ जन्मने लगी, मन हँसा तो बना चन्द्रमा रस कलश, प्राण बन कर समाया हुआ सब जगह, मे मगन हूँ, मगर कल्पना कर रहा हूँ।" डॉ मनोहर प्रभाकर की कविता "दिन भले दो-चार की हो जिन्दगी, उम्र भर त्यौहार-सी हो जिन्दगी।" तथा (II) । - डॉ तारा प्रकाश जोशी की कविता"प्राणो मे यदि पाहुन होगे तो, नयन बिना भी दर्शन होगे। भीतर यदि वृन्दावन हो तो, पॉव बिना भी नर्तन होगे।" जैसी कविताएँ कहाँ है? वीणा जेन का काव्य सग्रह 'तरणि-तरणी' मे सूर्य का तेज कुछ अधिक है। जबकि जीवन के सफर को नाकायन के माध्यम से पार लगाने का भाव प्रबल है। सोचता हूँ इन रचनाओ म जो तारुण्य है उसे दृष्टिपथ में रखते हुए यह 'तरणि-तरणी-तरुणी' होता तो ज्यादा अच्छा होता। वीणा जैन की कृति 'तरणि-तरणी' का स्वर्णोज्ज्वल काव्य प्रत्यूप प्रोज्ज्वल जीवनरस का सचरण करता प्रतीत होता है । दृष्टव्य है 'उन्मुक्त गगन मे' शीर्षक कविता 'चाँदी का घर सोने की दीवारें ओर चुगने को चुग्गा था मोतियो का, फिर भी मायूसी मे बैठे रहते दिन, आ रात मन मारे दो पञ्छी प्यारे प्यारे ।' सामाजिक बन्धन से मुक्तिकामना का एक कालबाह्य अनुभव है जो एशो-ए-आराम से रहने आर खान-पीने की समृद्ध सुख-सुविधा के उपरान्त भी उन्मुक्त गगन मे उडने की लालसा से सम्प्रक्त है। ऐसा ही एक भाव 'दो डग' शीर्षक से कविता में भी है कि थोडा सा आसमान चाहा था जहाँ उड सके पॉखो पर चढकर। "म क्या लिखू? क्या गाऊँ म' वीणा जन कहती ह "मन भुवन में, शब्द अक्षर, भाव ओर कल्पनाएँ, सुरो की मधुर रागिनी सब रेशम से उलझे है म क्या लिखू, क्या गाऊँ।"

(xiil)
-
वीणा जैन द्वन्द्व प्रधान ससार और अन्तर्मन मे आलोडित विलोडित मन
स्थिति को भी व्यक्त करती है क्योकि मन आगर मे नदियाँ सागर, झरने,
फूलो का मोन निमत्रण सभी कुछ है, पर चयन करना ओर फिर उसे वाणी
देने का काम नि सन्देह गुरुतर हे ।
'धागे धागे सपने' कविता में वे लम्बे अरसे से बुनती रहती है पर काँच
क टुकडे जैसे टूट-टूट कर बिखरे हुए सपने अपने बाह्य ओर अन्त जगत्
का कैसा विचित्र गुम्फन है कि जिसमे देहिक रूप से बुनने के अन्तर को
मानस मे बुने सपना से तादात्म्य स्थापित कर एकाकार रूप दे दिया है।
'मन के कोने मे' शीर्षक कविता म वही हो रहा है जैसा कि वयसन्धि
पर सर्वत्र होता है एक हुक सी उठती रहती है, एक नए उत्साह, उमग ओर
उल्लास का सचार होने लगता है जैसे अन्दर कोमल किसलय कुसुमित हो
रहा हो पर फिर भी जीवन के कटु अनुभव यही प्रकट करते हैं कि जेसे
कागजी खूशबू का शुरू-शुरू मे कभी अपना एक अलग ही आनन्द होता
है पर वह समय के साथ साथ धीर-धारे समाप्त होता जाता है, वह कभी
स्थायी नहीं रहता, यथा
"एक खूबसूरत खयाल,
जो बसा था
मेरे मे
जाने कब से
खूशबू जैसा
आज
जब, होश में आया मन
तो पाया - खुशबू ही नही थी,
वहाँ था
बस - एक रगीन फूल कागज जेसा
उसे ही सैंजोकर रख दिया है
मन के किसी कोने म।"

(xiv) 'चोरी हो गए सपने' शीर्षक स भी कविता से भी यही सिद्ध होता है कि जैस यौवन मे सपने कुछ ज्यादा ही दिखते है पर कभी-कभी वे आकार लेने से पहले ही चुरा लिये जाते है । 'धूप तलाशती म' शीर्षक से कविता मे वे कहती है "चातक सा मन साज रहा है एक धूप का शतदल बीच गगन म निकला ही था। फिर ज्योतिपुञ्ज सुनहरा कि घिर घिर आये गहराये बादल देख सखी ये नीर भरे कजरारे बादल।" वस्तुत यही वह तलाश है जिसके माध्यम से अप्राप्त को प्राप्त करने की चाह बनी रहती है। प्रकृति के इन रहस्या को किसने जाना है कि पत्तो पर हजारो रग, हजारा रूप, अनुपम छटाएँ कैसे कैसे उभर आती है ? खुशबू से महकते अगणित फूल कैसे डाल-डाल पर खिल जाते है । यह बाल सुलभ भोलापन भी है और जिज्ञासाएँ भी। यही जिज्ञासा "उजाले" मे भी है कि कहाँ गए मेरे घर के सारे उजाले, चेहरो से हँसी कहाँ गायब हो गयी है। पीडाआ का अपना अपनत्व होता हे वे मन्दाकिनी-सी बहती है, लहर-लहर बलखाती है उछलती है कूदती है, लचकती है, मटकती है, सिर पटखती है आर फिर बारिश की बूंदो सी झूमझूम कर बरस जाती है । टूटते किनारे, छूटते सहारे, पोछ लिये आँसू क्याकि न जाने कितन सवाल कर रहे थे - बेहाल, पर आ गया जब मोह ममता का ख्याल, तो फिर सुख-दु ख के बीच उलझा-उलझा मन हँसता रोता ओर रोता हँसता रहता है। चाँद की परछाई चाँदनी मे डूबा हुआ मुग्ध चाँद, लहरो के आइन मे अपनी ही परछाई देख ऐसे लगता है जैसे सोने के देश मे बरस रही है - चाँदी। इसी का नाम है जिन्दगी क्योकि वह न जाने कितने-कितने रग बदलती है, कितने-कितने रूप बदलती है कभी चम्पा कभी चमेली जैसे फूला-सी महकती है, कभी वह गुलाब जैसे काँटो के दश छिपाये रहती है कभी सितारो-सी दमकती (v) है, चमकती है, महकती ह तो कभी हिरणी जैसे कुलाँचे भरती हैं, कभी आवारा बनजारे सी भटकती है और अनदेखी, अनचीन्ही राहा पर चल पडती है आर फिर सुनती ह दरखता की कानाफूसी, कि इन दिनो बाग- बगीचा क चमन मे, शहर मे आया है पतझड, सूखे पत्ते सरसराती हवाओ के साथ उडकर चल देते ह आर बचे-खुच पत्ते करते रहते है बसन्त का इन्तजार । सपना म सजाते रहते है सितारा को, चाँद को, मूरज को। अपने आप मे खोई हुई जिन्दगी न वक्त की दस्तक सुन पाती है न अपने मन की बात बस अतीत की गुफाआ मे सपना के चिराग जलाती रहती है। हवा भी इतनी बेरहम हो जाती है कि मरुस्थल के विस्तार पर बमुश्किल उकर कदमो के चिन्हा को एक ही झोके में नेस्तनाबूद कर देती, सदा-सदा के लिए मिटा देती है नामानिशान ओर फिर मन नफरत के धुएँ म घुटता रहता है, भाई चारे के रिश्ता मे लुटता-पिटता रहता है । ढूँढता है चाहत के रिश्तो को, अकेलेपन का दर्द लिए, जगह-जगह की धूल फाँकता है, सात समुन्दर पार जाकर आकाश की उच्चतम ऊँचाइया मे नक्षत्रो का आलिगन करना चाहता है पर बेचैन, आकुल-व्याकुल मन क पँख पखेरु थक जाते है और परवाज अधूरी ही रह जाती है सपने बिखर जाते है ओर जब टूटे सपनो की किरच चुभती है तो कतरा-कतरा लहू निकलता है फिर जहाँ से मुखमण्डल प्रकाशित होता है वहीं ठहर जाता है अपना मामूली-सा दुख लिये और उसे वह पहाड सा भारी बताता है। 'यह केसा बचपन' शीर्षक कविता मे बाल श्रमिको के शोषण का उनकी भूख का कारुणिक चित्रण भी दृष्टव्य है "सर्द रात मे धूलधूसरित कचर का डिब्बा सा बच्चा, भूख से कुम्हलायी थी - कमल-सी आँखे, जूठन के खातिर प्लास्टिक का थैला लिए हाथ मे मासूम सा बच्चा"

(७)
'बचैन मन' शीर्षक कविता म जितना धनी है वह शब्दा की पकड
से छूटती चली जाती है क्याकि 'मन' का ता स्वभाव ही है, चचलता है,
उसका काम ही ह वचनी म रमना यथा
"म। धन नहीं हूँ, सागर नहीं है
मुझम कलिया जैसा हुनर नहा
आर आसमान सा विस्तार नहीं,
म।
शब्दा का भण्डार नहीं
मुझे छन्दा की सीमा ज्ञात नहीं
फिर तुम्ही कहा में कस लियूँ
अपन मन की बचनी।"
'प्यार ही प्रभु है' म प्यार का कितना उदात्त भाव मण्डित किया है,
कितनी पवित्रता दी है वीणा जैन न कि उसे अहर्निश सुनन का मन करता
है दर्शनीय है
"छुपा कर रखते हा क्यो
मन की घाटिया म
प्यार को
छलकने दो
शोर मचाती नदिया सा
प्यार को
आढ रहा है, क्या
ये रूखापन
प्यार म ही प्रभु है
मन्दिर की घन्टियो सा
बजने दो प्यार को।"
'तरणि-तरणी' के माध्यम से वीणा जैन की काव्य यात्रा के पहले पडाव
म जीवन और जगत् अपन मन के बाहर और भीतर का द्वन्द्व आर अन्तर्द्वन्द्व
स्वप्न मञ्जिल अकेलापन, आँसू, आकाश सागर फूल क माध्यम से

(HI) अभिव्यक्त हुआ है। तृप्ति ओर अतृप्ति के मध्य झूलती आकाक्षाआ, कामनाओ ओर लालसाआ को जिस सहजता, सरलता, सुगमता से वीणा जेन ने वाणी दी है उससे उनकी कविता मे शब्द को ब्रह्म बनाने की तत्परता, तल्लीनता आर तन्मयता उजागर होती है, जो स्वाभाविक ही है। सामन्ती परिवेश का छाडकर परिवार आर समाज क ऊँच-ऊँचे दुर्गो और प्रासादो की प्राचीरा को लाँघ कर जब कोई महिला-मन, मुक्ति की तलाश म मीराँबाई की तरह चल पडता है तो उसे सदेव स्मरण रहती है मीराँ वाणी 'भगत देख राजी भई, जगत् देख राई' ज्ञान का पहला सोपान है जिज्ञासा द्वन्द्व-अन्तर्द्वन्द्व, जो परिस्थितिया के साक्षात्कार से मुमुक्षा के दर्शन मे रूपान्तरित होता जाता है। 'तरणि-तरणी' आनन्द से परमानन्द, परमानन्द से परिपूर्णानन्द, परिपूणानन्द से सर्वदानन्द सर्वदानन्द से सच्चिदानन्द सच्चिदानन्द से ब्रह्मानन्द की प्राप्ति का प्रयास है। यही इसका वैलक्षण्य है और वैचित्र्य भी। यही इसका पेय भी है और श्रेय भी। विश्वास है कि काव्य जगत् मे 'तरणि-तरणी' का हार्दिक स्वागत होगा। , अध्यक्ष, 'शब्द ससार' 'गीताजलि', 26 मगल मार्ग, बापूनगर जयपुर-302 015

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(A) अपनी कही वीणा जन मन की अतल गहराइयो मे भटकनवाल भाव पञ्छी को जब मिल जाता है मुक्त गगन पख पसारने को अठखलियाँ करती उन्मुक्त सागर की उत्ताल लहरें, छेड देती ह हृदय-वीणा के तार, खुली वादियाँ आर मोहक फूला की महक कर देती है मत्रमुग्ध, पहाडो को ऊँचाइयाँ देने लगती है मौन निमत्रण, नदिया और झरनो का कल-कल शब्द तब उसके मान को स्वर प्रदान करने लगत हे आर वह मुखर-मुखर हा उठता है। कभी-कभी यह मधुर करुण ध्वनि काव्य निर्झरणी बन बहने लगती है। फिर, वह जीवन का कोई भी मोड हो या पडाव हो। मेरी जिन्दगी का वह मोड भी मेरे लिये महत्वपूर्ण हो गया जब मुझे कलकत्ता को व्यस्त जिन्दगी से दूर, दक्षिण भारत के छोटे से, किन्तु खूबसूरत शहर विशाखापट्टनम म रहन का अवसर मिला। वहाँ के व तीन वर्ष वहाँ के मुक्त वातावरण, मनोहारी प्रकृति मे कल पख लगाकर उड गये। पता नहीं उस ठाठ मारत समन्दर के साथ मेरे उद्वलित भाव अपनापन महसूस करने लगे आर मन का भाव पछी उडन को आतुर हो उठा। उसी आतुरता को गिने-चुने शब्दा का बाना पहनाने की कोशिश ही मैने अपने इस शब्द- चित्र तरणि-तरणी मे। य शब्द-चित्र कविता का कोनसा रूप है, मै नही जानती। मन मे उठे भावा को मैने झरने -सा स्वच्छन्द बहने दिया है । बस, इनको लिखने मे मुझे न लयबद्धता की जरूरत महसूस हुई और न छन्दबद्धता की । इनमे छुपे हुए भाव किसी भावुक हृदय के दर्द को सहला सक तो ये कविताएँ सार्थक हो जायेगी।

(४)
अन्तम
कृतज्ञ हूँ
उन सब परिवारजना की
और मित्रा की
जिनकी प्रेरणा म
जिनक प्रयल से
य शब्दचित्र
जी उठ
कविता सग्रह 'तरणि-तरणी' के रूप म
'दवकुज'
29/10 बालीगज पार्क
कलकत्ता-700019
14 नवम्बर 1998
-
.

(x) किरण उत्तर माँगते प्रश्न 1 इच्छाआ की माटी मे 2 सपन 3 तरणी पार उतरणी A मन से मन की बात 5 दस्तक 6 उदास मन का सान्दर्य 7 मन के कान मे 8 चोरी हो गए सपने फूला की नियति 10 खामोशी 11 अच्छा है 12 जिन्दगी के कितने रग? 13 बिखरी किरच सपना की 14 बन्दिनी 15 मौत। तुम कहकर आना 16 एक नई किरण आस को 17 मजिल कहाँ है? 18 स्वप्न बचपन मे 19 म क्या लिखू ? क्या गाऊँ ? 20 उन्मुक्त गगन म 21 धाग-धागे सपने 22 अपने आप को खोजती, मैं। 23 चाट पर चोट 24 भीतर कही 25 एकाकी मैं । 27 भय की अनुभूति 28 आँखो म अटका सच 29 एक अकेला तारा 30 धूप तलाशती, मे 31 मन । तू धीर धर 32 चाँद का हर रुप मेरा अपना 33 मेहा दे मेघा 34 हवा भी बैरहम हुई 35 दर्द अकेलेपन का 36 बहारें आने वाली हे 37 तुम मुसकरा दो 38 मन तनहाई ढूँढता है 39 भीगा भीगा मन 40 जीवन निर्झर 41 पर्व 42 समय की परता म 43 कच्ची धूप से रिश्ते 44 मन का पछी 45 जिन्दगी 46 आरागी-बेरागी 47 झील का किनारा 48 हम घबराये नही है 49 अचरज 50 उड न जाएँ वे क्षण 51 टूटते किनारे छूटते सहारे 52 दो डग 26 4 (xru) 53 78 54 79 55 80 56 81 बचन मन अपना दर्द, उनका दर्द कल, फिर त अकेला है। अंधेरे मे उजाले मन कहाँ निराश एक पुलक मन म प्यार ही प्रभु है मै आर मेरी जिन्दगी 57 82 58 83 59 84 60 85 61 खिलता फूल 86 पीडाओ का अपनत्व थकान मे मुसकान चुपके से चली आती है आँसू कितना सुन्दर है आकाश? कितने वह गये आँसू उजाले निर्माण के लिए उठे हाथ हार क्या, जीत क्या खजूर का पेड कैसे गुजरी? काश। ममता भरी एक थपकी परछाई तब तक तट पर बैठी माँ वक्त है अभी मन मरुस्थल नियति बनजारो की 62 87 63 88 64 89 65 90 66 91 विसगतियाँ काई बार-बार कह जाये क्या रूठी है नींद, हमसे सुन्दर-असुन्दर बुझता नहीं दिया कुछ भी कहे दुनिया कहाँ ढूँढें सागर का विश्वासघात वो घरवाली क्या करें। 67 92 68 93 69 94 95 70 71 96 72 97 इन दिना खुदा जाने मजबूर पथिक 73 98 74 99 उस किशोर की व्यथा समाधान जागो है। जागो तब तुम देख लेना 75 यह कैसा बचपन बेखबर उसकी गोद में उसका दुख तुमने कभी देखा नहीं 100 - 76 101 77 तरणि-तरणी उत्तर मॉगते प्रश्न ये किसने रग फैलाये गगन मे? किसने फूलो को गध दी? झरना को मधुर सगीत दिया ओर, सागर को गहराई। किसने खिलखिलाहटे भरी वादियो मे? उछलती-बहती नदियो की दूर तक फैली शृखलाओ मे किसने बर्फ बरसाई? प्यार भरा हृदय मे, किसने और करुणा की भागीरथी बहाई, आँखो को अश्नु दिये अन्तर मे ममता छलकाई। सुन्दर है, विश्व। सुन्दरतम मानव जीवन है किसने भर दी, फिर, नफरत मन मे किसने थोपी, सरहदो की लडाई महावीर बुद्ध गाँधी की परम पावन धरती पर किसने दी मनुज को अनबुझी प्यास निर्दोष रक्त बहाने की क्यो भूल रहे भाई को भाई क्या बढ़ती जाती ऊँच-नीच की खाई? कोन आया प्यार लुटने किसने सस्कृति पर कर्ज चढाया? भटक रही नव सताने गुमराह हा रहे खुद लोग पुराने कान करेगा भरपाई ओर कौन है उत्तरदायो?

2
तरणि-तरणी
इच्छाओ की माटी में
इतनी तो
प्यास न थी, कि
सागर को आना पड़े,
बह चली निर्झरणी पास से
बुझ गई प्यास
एक बूंद-सी।
इच्छाआ की माटीम
बोये थे
कुछ सुमन, कभी
कब चाहा था मगर
मेरा हो
सारा चमना
कह चुके है
पहले भी तुम्हे, हम
खिला-खिला सा एक गुलाब
काफी है,
मेरे मन के सूनेपन मे
महक-महक जाने का।
अब यह मत कह देना
कि, सारा आकाश तुम्हारा है
मने तो
बरसता हुआ
एक बादल चाहा था।
बह चली
निर्झरणी पास में
बुझ गई प्यास
एक बूंद-सी।

तरणि-तरणी
3
सपने
जिन्दगी मे
उलझने इतनी, फिर भी
मन बुनता है,
धागे-धागे सपने।
जब भी हाता तनहा
टूटे सपनो के
घाव सहलाता,
मन ही मन देखा करता,
पर
कल के सुहान सपन।
सपनो मे उलझी
बीत चली जिन्दगी
प्राणो के तार साँसा मे उलझे
और मन ढूँढता है,
उलझनो मे भी सपने।
कैसा ये मन।
कैसी है उधेडबुन
कौन समझाये?
इतने अपने लगते हे?
ये सपने।

4
तरणि-तरणी
तरणी पार उतरणी
ओ नीर भरी बदली,
बिन बरसे मत जाना।
उमड-घुमड कर
रग जमा कर
आँखा मे सुन्दर सपने सजा कर,
किसी और देश ना जाना।
ओ नीर भरी बदली,
बिन बरसे मत जाना।
उमडेगी सूखी नदिया फिर
मॉझी लेकर आयेगे
तरणी पार उतरणी,
तुम सग हवा के उड न जाना,
ओ नीर भरी बदली
बिन बरसे मत जाना।
पत्ते झरे झर-झर सारे
बिन अमराई कूके कैसे
काली कोयल खुश होकर
रिमझिम गीत सुना जाना
ओ नीर भरी बदली,
बिन बरसे मत जाना।
तपता ऑगन बाट जोहे
सावन भादो लेकर आये कब
ठण्डी-ठण्डी फुहारें
तुम बिन बरसे मत जाना
ओ नीर भरी बदली,
बिन बरसे मत जाना।
wer

तरणि-तरणी
मन से मन की बात
मन । साँझ पडी
घर आजा
दिन का सूरज डूब रहा,
बिखर रही
रक्तिम आभा।
शान्त सुहानी किरणे
फैल उठी, बन
अम्बर की शोभा।
मन । साँझ पडी घर आजा,
थके पक्षियो का
शोर उठा
उड चले जिधर है बसेरा।
आकुल मन के
कलरव से
गूंज उठा
अम्बर का घेरा,
मन, साँझ पडी घर आजा।
गोधूलि की बेला
रजनी का इन्तजार है
झाँक रहा है
चन्द्रमा
नन्हे-नन्हे तारा के सग,
मुसकराता रूप देख कर,
रह गया
अम्बर भी चकित
मन । साँझ पडी घर आजा।

6
तरणि-तरणी
दस्तक
अपनी ही दुनिया में
इस कदर
खोई रही
वक्त की दस्तक भी न सुन सकी।
अतीत की गुफाओ मे
रोशनी के
चिराग जलाती रही
जमाने की दस्तक भी न सुन सकी
दिन के उजाला मे भी,
सपनो मे
सितारो को सजाती रही कि
रात की दस्तक भी न सुन सकी।
जो भी
हालात बने
खुद उलझती रही, कि
अपने मन की दस्तक भी न सुन सकी।

तरणि-तरणी
उदास मन का सौन्दर्य
मन, तू मुस्कुराना सीख,
मन तू गुनगुनाना सीख।
व्यर्थ ही किया,
उदासियो का वरण।
खिल रहा प्रकृति का ओर-छार
समा ले मन मे,
यह सोन्दर्यबोध,
मन, तू मुस्कुराना सीख,
मन, तू गुनगुनाना सीख।
खोल द
यह आवरण,
उतर रही
बूंद-बूंद
फूलो पर शबनम,
नयना को पी लेने दे
यह रूप-अनूप
मन, तू मुस्कुराना सीख,
मन, तू गुनगुनाना सीख।
कैसा डर?
बाहर रख चरण
दूर कही
कोयल की कुहू कुहू,
कानो मे रस घोल रही
सजा ले होठा पर,
यह सुन्दर साज,
मन तू मुसकराना सीख
मन तू गुनगुनाना सीखा

00
तरणि-तरणी
मन के कोने मे
एक खूबसूरत खयाल
जो बसा था,
मेरे मन मे
जाने कब से
खुशबू जैसा।
आज
जब, होश में आया मन
तो पाया
खुशबू ही नही थी,
वहाँ था
बस
एक रगीन फूल कागज, जैसा।
उसे ही
सँजो कर रख दिया है
मन के किसी कोने मे।
आ जाये
कभी फिर से
खुशबू से भीगा
कोई खयाल,
और, मन महक उठे
चमन जैसा।
न

तरणि-तरणी
9
चोरी हो गए सपने
रोज की तरह
आज भी,
खिड़की से झाँक कर
सुबह का सूरज,
मुझे जगाना चाहता है।
बन्द आँखो मे
रग-बिरगी झिलमिलाहट,
जबरन
घुसती चली आ रही है,
पर
उदास आँखे,
चुपचाप ढूँढना चाहती है।
आज
फिर,
उन सपना की,
जिन्हे चुराया है
दुनियावालो ने।

10
तरणि-तरणी
फूलो की नियति
मैने कब कहा
फूलो से
कि उपवन मे ना खिलो।
मैने कब कहा
फूलो से
कि, हवाओ को ना महकाओ।
मैने कब कहा
फूलो से
-
कि, रगो के सपने ना गूंथो।
मैंने कब कहा
फूलो से,
कि खिल कर फिर मुरझा जाओ।
फूलो ने कहा मुझसे
कि, खिलना
और महक लुटाना
रगो के सपने बुनना फिर
महाप्रयाण की ओर चल देना
यही तो नियति है हमारी।
2
"मना-
HI

तरणि-तरणी
11
खामोशी
चुप क्यो है, आसमान,
.
चुप क्यो है
आज हवा?
ऐसी उदास साँझ
रग नही,
कही रगा का जादू नहीं,
उजडी-उजडी लगती
नभ की बस्ती,
सूरज भी चुपके से सो गया।
दूर खडे वो
दरख्त,
किसी कलाकार के चित्र-से
मौन है।
जाने किस दिशा में मुडी हवाये
कि, पत्ते भी चुप है,
पक्षी भी चुप है,
चहकते नही,
कही मोठे सुरो का जादू नही
नि स्तब्ध वातावरण है
कही कोई हलचल नही,
शायद
सबको खबर हुई है
मरे मन में छाई है
जो खामोशी।

तरणि-तरणी
12
अच्छा है
लगता है
परेशानियाँ
जीते-जी मेरा,
पीछा नहीं छोडेगी।
अच्छा है
हमी
मेहमानबाजी छोड दे।

तरणि-तरणी
13
जिन्दगी के कितने रग?
जिन्दगी, तुम।
कितने रग बदलती हो?
गुलाबो-सी महकती हो,
काटो के दश छुपाये,
घुट-घुट कर रोती हो, कभी।
सपनो मे
सितारो-सी चमकती हो,
सपनो को चूर-चूर कर,
जीना मुश्किल कर देती हो कभी।
चञ्चल हिरणी-सी
चपल चाल से,
कभी, कुलाचे भरती हो,
और, सहम कर
डरी हुई हिरणी की
आँखो मे ठहर जाती हो कभी
बिजली-सी कौध
किसी भोले-से मन को
गुमराह करती हा,
हाथ पकड कर
धीरे से
सब कुछ समझा देती हो, कभी
कितने रग बदलती हो
जिन्दगी, तुम।
PAN
-

14
तरणि-तरणी
बिखरी किरचे सपनो की
टूटे हुए सपनो की
छोटी-सी किरच भी
जब, दिल मे चुभती है, किसी
सुनहरी सॉझ मे
ज्यो बिजली कडकी हो,
बादल रोने-रोने को हा,
साँझ सिमट कर बैठी हो
मटमैली धोती मे, मै
सिहर उठती हूँ।
मन ही मन,
ठहर गया हो
कतरा-कतरा लहू, ज्यो
एक पल को।
वो सपने
सपने कहाँ थे? जिया था,
किन्ही आँखो ने मुद्दत से उन्हे,
और, टूट कर
जब बिखरी किरचे,
किरचे।
जब दिल मे चुभती है,
वो मटमैली साँझ
मेरे आस-पास घिर आती है, और
मेरी आँखे
नम हो जाती है।

तरणि-तरणी 15 बन्दिनी मै बाहर आना चाहती हूँ पर क्या इस अंधरे कारागृह में मेरी उजडी हुई जिन्दगी, न जाने कब स सोग मना रही है उन गुनाही का, जो मैन शायद किए ही नहीं। अन्दर-बाहर सब ओर घनघोर अंधरा, भयानक ख्यालो के साये, रात के सन्नाटो मे जब मुझे बुरी तरह घेर लेते है, मैं चीख पडती हूँ, कि मै बाहर आना चाहती हूँ। एक बार अपने उस नन्हे बच्चे को सीने से लगाना चाहती हूँ जो अब तक बड़ा हो गया होगा, पर क्यो। एक अपराध बोध से भयभीत माँ, उसकी माँ कैसे हो सकती है? और ममता का उफनता सैलाब आँसुओ मे बह जाता है, सिसकियाँ गूंज उठती है ठण्डी और सीलन भरी कोठरी मे पर बहरी है दुनिया गूंगे हैं लोग खुदगर्ज या फिर लाचार है अपने - मैं कण्ठ फाड कर चिल्लाना चाहती हूँ मैं बाहर आना चाहती हूँ।

16
तरणि-तरणी
मौत! तुम कहकर आना
मोत।
तुम कह कर आना
दबे पाँव चली आती हो,
देख अचानक तुम्हे
प्राण उड जाते है
खिडकी मे रखे कागज के टुकड़े की तरह।
मोत।
तुम कह कर आना
कितने काम अधूर है,
कैसे होगे पूरे
कुछ देर ठहर जाना,
मै आऊँगी तेरे घर,
सज-धज कर मेहमानो की तरह।
मौत।
तुम कह कर आना
बहुत दूर है आसमान,
छूना है मुझे सितारो को,
अँधेरो-उजालो की इस मायानगरी मे
मुझे जीना है
चिरागो की तरह,
मौत
तुम कह कर आना।

तरणि-तरणी
17
एक नई किरण आस की
किस मुकाम पर
आ पहुँच हम
कोई डगर पहचानी नहीं,
आगे बढ़े, कि
मुड जाये
-
कोई राह नजर आती नहीं।
यह कैसे अँधेरे,
सब चिराग
बुझे-बुझे से
ऐसे में
किसे आवाज दे?
हवाओ का रुख पता नहीं।
कोई
कह दे जाकर,
आकाश के तारो से
इन बुझे-बुझे चिरागो को, थोडा-सा
रोशन कर दे।
मन मे उतरे, जो
ज्योतिकिरण
हम राहो मे उजाला कर लेगे,
अपने अन्दर ही ढूँढेगे
एक नये सफर की तैयारी।
बाहर फैले अँधेराम,
कोई ठौर
नजर आती नहीं।

18 तरणि-तरणी मजिल कहाँ है? ऊँचे पहाडो की वादिया मे, फैला हुआ सूनापना नाते-रिश्तो से दूर निरभ्र अकेलापन। उभर आई है मन की पीडा, कभी हँसाती कभी रुलाती फुर्सत के इन क्षणो मे। किसी पहाडी नदी का शोर, तोड रहा है वादियो की चुप्पी, और, मुखर हो उठी है मन की चुप्पी भी। मैं कौन हूँ? कहाँ हूँ क्यो हूँ? सारे प्रश्न एक साथ बह आये हैं, फुरसत के इन क्षणो मे। बर्फ से ढके कगूरो पर उतर आई है, सुनहरी भोर। गूंजने लगा है पक्षियो का शोर, और ढूँढता है मन मेरी मजिल कहाँ है, फुरसत के इन क्षणो मे ऊँचे पहाडो की वादियो मे।

तरणि-तरणी
19
स्वप्न में बचपन
कल रात,
देखा मैने एक सपना,
शोख गुलाब नहा रहे थे
बूंद-बूंद बरसात में।
झूम रही थी
कलियाँ,
भी भी, अभिमान मे।
कल रात,
देखा एक सपना, मैने
गुपचुप बाते करते थे,
एक दूजे से तारे,
आसमान मे
देख रहा था,
हँस कर चन्दा,
तारो को अनजान-से,
कल रात
देखा मैने एक सपना।
जानी-पहचानी-सी,
एक बच्ची,
निकली मेरे पास से
जो भीग रही थी,
बूंद-बूंद बरसात मे,
टुकर-टुकर देख रही थी,
तारो को आसमान मे,
कल रात
देखा मैने एक सपना।

20
तरणि-तरणी
में क्या लिखू ? क्या गाऊँ ?
मैं क्या लिखू, क्या गाऊँ?
मन आगर मे
नदियाँ, सागर
झर-झर झरते झरनो का
पाखी, और
फूलो के मौन निमत्रण का
आकुल शोर मचा है,
मैं क्या लिखू, क्या गाऊँ?
मन आकाश में,
सूरज, तारे
नूर लुटाता चदा
साँझ और
कोमल-मना सुबह,
साथ-साथ उगती छिपती है,
मै क्या लिखू, क्या गाऊँ?
मनभुवन मे,
शब्द, अक्षर,
भाव और कल्पनाएँ,
सुरो की मधुर रागिनी,
सब रेशम से उलझे हैं,
मै क्या लिखू, क्या गाऊँ?

तरणि-तरणी 21 उन्मुक्त गगन मे उन्मुक्त गगन मे उड चले, दो पछी प्यारे-प्यारे। कल तक थे पिजरे के बदी। साँस-साँस पर थे पहरे, आज करते हवाओ से वारे-न्यारे, दो पछी प्यार-प्यारे। सोने का घर, चाँदी की दीवारें, और चुगने को चुग्गा था मोतियो का, फिर भी मायूसी में बैठे रहते, दिन औ' रात मन मारे, दो पछी प्यारे-प्यारे। चाह जिन्हे हो उड़ने की, मस्त पवन की लहरो पर, कब तक रहते, सजे हुए यूँ, पिजरा के आरे-बारे, दो पछी प्यारे-प्यारे। जिस पल टूटे बन्धन, पखो ने आलस छोड दिया, हर्षित आँखो से, बह चले सजल सरगम के धारे, दो पछी प्यारे-प्यारे।

22
तरणि-तरणा
धागे-धागे सपने
अरसा हुआ
बुनती रहती थी,
मैं
धागे-धागे सपने,
आज, काँच के टुकडो जैसे
टूट कर,
बिखर गये सब सपने।
जब
बिखर गये हो सपने,
नीद कहाँ आती है।
रातो को बैठे-बैठे
गिनती रहती,
टूटे हुए सितारे।
काश।
थक कर सो जाती, में
एक नीद गहरी-सी।
बचे सितारे
जोड-जोड कर
फिर से
बुनती,
धागे-धागे सपने।
6

तरणि-तरणी
23
अपने आप को खोजती, मै।
मेरा खो जाना,
खुद अपने आप में,
मेरे जीवन की एक घटना थी।
मैं ढूँढ रही हूँ
आज,
खुद अपने आप को, अपने म हो।
ये चाँद लग रहा
मन्दिर के अंधेरै गर्भगृह में,
कोई जला गया हो
ज्यो, दिया, और
झिलमिला उठी हो,
मूरत
सोने-सी,
मद्धम-मद्धम रोशनी में।
आज, य चाँद
चला आ रहा है,
अपनी स्निग्ध चाँदनी लिये
मर मन के अँधेरे में
झिलमिला उठे
छुपी हुई कोई मूरत,
और मे पा लूँ मुझे।
-
मेरा मिल जाना,
मेरे जीवन की अहम घटना होगी।
मरा खो जाना,
मेरे जीवन की एक घटना थी।

24
तरणि-तरणी
चोट पर चोट
क्या करूँ।
इस नाजुक मन का।
जरा-सी
चोट खा कर,
बेघरबार हुआ जाता है।
जमाना
क्या जाने
हाल मेरे मन का,
नगाडा समझ कर
चोट पर,
चोट दिये जाता है।
LAIMIMMIND

तरणि-तरणी
25
भीतर कही
मन मे
उग आया है
एक पहाड, पथरीला।
फोहे-फोहे गिरती बर्फ का बोझ
झेलता है, जो
भीतर, कही
दिन-रात।
सुनती हूँ
नदी की कल-कल,
कही, गहराइयो से आती हुई
दरकते पहाडो को
साथ ले कर
सुनती रहेगी
उन्ही मे घुल कर,
उनक दुख-दर्द।
-
निस्पन्द मौज से झरती हुई-सी
है एक हँसी भी, वही कही,
घाटियो मे बिखरे फूलो की,
मेरा श्रम, मरी थकान
मेरा टूटना-जुडना, डूबना-उतरना,
सब कुछ हर लेती है,
पल मे।

26
तरणि-तरणी
दो डग
थोडा-सा आसमान
चाहा था,
जहाँ उड सके
पाँखो पर चढ कर,
मेरे मन का
पागल पछी।
थोडा-सा आसमान
चाहा था,
कि, देखू सुन्दर सपने।
कैसे कैसे होते है,
नभ को छूने के सपने
आर
जमी पर पडे
निशा अपने
थोडा-सा आसमान
चाहा था
और
दो डग भरूँ,
इतनी-सी जमीन
पर आसमान
तो आसमान है,
इतना बडा, इतना बडा
इतना बडा

तरणि-तरणी
27
एकाकी मै।
एक बूंद का दुख
कौन सुनेगा?
गहराते सागर मे।
फूल। तुम्हारे मुरझाने की
किसे फिक्र है।
फूलो से
महकते चमन मे।
कम न होती
तारो की गिनती,
टूट जाये, अगर
एक तारा, आसमान मे।
मैं जीऊँ,
या मर जाऊँ
क्या फर्क पड़ता है।
इस नश्वर जग मे
बूंद फूल,
तारे और मैं
क्या इतने एकाकी है।

28
तरणि-तरणी
भय की अनुभूति
रातो के घने अंधेरे,
और
छोटा-सा
जलता दिया।
आने वाला कोई तूफान
बुझा न दे,
उसे भी।
बन्द कर देती हूँ
सारी खिडकियाँ।
सारे दरवाजे
पर मन
उसका क्या करूँ?

तरणि-तरणी
29
ऑखो मे अटका सच
दुनिया का सच।
आँखो मे
अटका,
आँसू लगता है
न पीते बनता है
न बहात बनता है।

30
तरणि-तरणी
एक अकेला तारा
ओ साँझ के नीरव तारे
चकित नयन से
देख रहा तू,
ज्यो जलता
सूने अम्बर के आर-पार क्या?
तू
मेरा हृदय जलता, सुन
और भी है सूने चौबारे,
ओ साँझ के नीरव तारे।
तनहाइयो के घेरे में
यूँ न समझ
तू है एक अकेला,
हम भी बैठे मन को मार,
जब गहरायेगा
कल्मष नभ मे, मैं देखू
निकल पडेगे
तेरे साथी सारे,
ओ, साँझ के नीरव तारे।
मेरे तनहा घर मे
खिलेगी
कब कलियाँ
कब होगी तारा से बाते ।
टूटेगी
कब, बूंदो की लडियाँ, ओर
कब होंगी बरसाते
हम सोच-सोच कर हारे,
ओ साँझ के नीरव तारे।

तरणि-तरणी 31 धूप तलाशती, मै नभ के उच्चछोर से सतरगी किरणो के रथ पर, निकला ही था, सूरज फैली ही थी ललाई, घिर-घिर आये काले बादल। कैसे करूँ? किरणो का स्वागत, दृग मे घुस कर बरस पडे है, ये नीर भरे कजरारे बादल। शून्य गगन मे भटक-भटक कर, ले बिजलियो की चटक-मटक, आँख मिचौनी खेल रहे है, देखो, ये मतवारे बादल। मुझे कहाँ विश्राम, सखी मेरे घर आँगन मे, बरसात भरी है। जाने कहाँ से उड कर आये, बिन मौसम हरकारे बादल। चातक-सा मन खोज रहा है, एक धूप का शतदल बीच गगन में निकला ही था फिर ज्योतिपुज सुनहरा, कि घिर घिर आये गहराये बादल, देख सखी ये नीर भरे कजरारे बादल।

32
तरणि-तरणी
मन। तू धीर धर
कई बार समझाया
मन को
मन । तू धीर धर।
ये, जो
पथ चुना है, चलने के लिये
फूलो का आरामगाह नही,
काँटो के शूल
उगते है यहाँ, उन्हे भी प्यार कर
मन । तू धीर धर।
माना कि,
बहुत अँधेरा है
दीवारो के इस पार
पख लगा कर मत उड,
आकाश में अँधेरा हे
निकलेगा, चॉद इक दिन
मन । तू धीर धर।
ये धूप -छाँव की परछाइयाँ,
सुख-दुख के मेले है,
आज भले वीराने हो, कल
मौसम सुहाना होगा
देख, क्षितिज की ओर
मन । तू धीर धर।

तरणि-तरणी
33
चॉद का हर रूप मेरा अपना होता है
कभी-कभी
जब
अधूरा-अधूरा,
पीला-पीला-सा चाँद निकलता है,
असीम
अंधेरे नभ मे,
उस रात
चाँद
मेरा अपना होता है।
स्निग्ध चाँदनी मे डूबा,
सुनहरे
थाल-सा चाँद
जब निकलता है,
असीम
अंधेरै नभ मे
तारो को लेकर साथ
उस रात भी, चाँद
मेरा अपना होता है।

32
तरणि-तरणी
मन तू धीर धर
कई बार समझाया
मन को,
मन तू धीर धर।
ये जो
पथ चुना ह, चलने के लिये
फूलो का आरामगाह नहीं,
काँटो के शूल
उगते है यहाँ उन्हे भी प्यार कर,
मन तू धीर धर।
माना कि
बहुत अँधेरा है
दीवारो के इस पार
पख लगा कर मत उड
आकाश मे अँधेरा है
निकलेगा, चाँद इक दिन
मन तू धीर धर।
ये धूप-छाँव की परछाइयाँ
सुख-दुख के मेले है,
आज भले वीराने हो कल
मोसम सुहाना होगा
देख क्षितिज की ओर
मन । तू धीर धर।

तरणि-तरणी
33
चॉद का हर रूप मेरा अपना होता है
कभी-कभी
अधूरा-अधूरा,
पीला-पीला-सा चाँद निकलता है,
असीम
अँधेर नभ मे,
उस रात
चाँद
मेरा अपना होता है।
स्निग्ध चाँदनी मे डूबा,
सुनहरे
थाल-सा चाँद
जब निकलता है,
असीम
अंधेरै नभ मे
तारो को लेकर साथ
उस रात भी, चाँद
मेरा अपना होता है।

34
तरणि-तरणी
मेहा दे मेघा
ओ। ऊपर वाले
इस बरस
यह कैसी रुत आई?
फागुन बीता
बादल ना उमडे
घर आँगन सूखे-सूखे,
पनघट भी सूने-सूने
कगन खनके नहीं
पानी बरसा नहीं।
उड रही है धूल
तप रही है धूप
नटखट बालगोपाल
कागज की नावे लेकर
गलियो मे
धूम मचाते नहीं
पानी बरसा नहीं।
बच्चे भी
अपने बच्चो को लेकर
परदेश गये,
ये लम्बी दुपहरियो वाले दिन,
काटे कटते नही
ओर मन लगता नही।
पानी बरसा नही
ओ। ऊपर वाले
अब तो मेहा मेघा दे।

तरणि-तरणा
35
हवा भी बेरहम हुई
बालू के विस्तार पर
मुश्किल से,
क्दमा के चिन्न उकेर थे।
चररम
हवाक झाका ने,
क्षण भर म
सार चिन्त,
मिटा डाले।

36
तरणि-तरणी
दर्द अकेलेपन का
आज
हम कितने अकेले
सूना सूना हे आँगन,
सूने से दरवाजे।
लगता है
रूठ कर कही
चली गई है बहारें।
याद आते ह
हँसी के खिलखिलाते बहते झरने।
याद आते ह
बातो के अकूत खजाने
गुमसुम है
आकाश भी,
अँधेरे मे डूबी है छत,
किसी ओर ठौर पर
निकलेगे चाँद सितारे।
आज
फूलो से मन भरता नही
कोई गीत हमे बहलाता नहीं,
यादो के सागर मे डबे,
आज हम
कितने अकेले।
-

ताणि-तरणी
37
बहारें आने वाली है
फूल चिला
गन्ध उडोहवामा
खुशबू का काई झौंका,
पास से गुजरत
कह गया कि
चहारें आने वाली हैं।
बैंठा कोई पछी
डाल पर
गान लगा मीठे सुरा म
गूंज उठी अनुगूंज
चमन-चमन म कि
वहार आने वाली हैं।
उडी तितलियाँ
इधर-उधर
वाते की
फूल-फूल से
खुल गई
रगा की दहलीजे।
मन ने कहा
कि
वहार आने वाली हैं।

38
तरणि-तरणी
तुम मुसकरा दो
चेहरे से
उदासी के बादल
छट जाने दो,
आकाश मे बदरी छाने लगी है।
सूखी डालो पर
हरियाली
दिखने लगी है।
बीत रही यामिनी
भोर होने को है,
एक नन्हीं-सी चिडिया
फिर
घर के आँगन मे चहकने लगी है।
उदासी
धीरे-धीरे जान, कहाँ
जाने लगी है,
मुसकरादो
आकाश से बूंद झरने लगी है।
चहुँ-दिशी
हवाये
महकाने लगी है।

तरणि-तरणी
39
मन तनहाई ढूँढता है
भूलभूलैया म
खो गया
अब राह हूंढता है,
मन तनहाई हूंढता ।
नफरत के धुएँ म
घुट रहा
चाहत ढूंढता है,
मन तनहाई ढूँढता है।
नाते-रिश्ते
प्रश्नचिन्ह बने,
जवाब ढूँढता है,
मन तनहाई हँढता है।
बेकार की बातो मे
बेबस हो रहा
विश्राम ढूँढता है,
मन तनहाई ढूँढता है।
उडने को आकुल
पख पसारे
आकाश ढूँढता है,
मन तनहाई ढूँढता है।

40
तरणि-तरणी
भीगा-भीगा मन
आज
अम्बर से रस बरसा है।
बूंदो ने
पायल पहनी है,
निर्झर का जल बहका है।
शिखरो पर
बर्फ बरसी है और
मन हुलसाया-सा लगता है।
चॉद के चेहरे पर
नूर उतरा है
तारो की हँसी शरमाई है,
फूलो का रंग
निखरा-निखरा है।
पत्तो पर रोनक छाई है, और
मन हुलसाया-सा लगता है।
आज
मन मे
कोई गीत जागा है,
कही कोयल गुनगुनाई है,
यूँ तो
मासम सूखा-सूखा है,
बिन बारिश के भीग रहा मन
तेरे आने की खबर जो आई है,
और
मन हुलसाया-सा लगता है।

तरणि-तरणी
41
जीवन निर्झर
झरना
झरता झर-झर,
पथरीले रास्तो म
गिरता
उछलता हर-हरा कर।
सौन्दर्य बिखर जाता
सुनसान वादियो में
मधुर स्वर लहरियां लुटाता,
हर डगर पर।
तू भी बहता चल
ओ, मेरे मन के निर्झर, कि
जीवन के
उबड़-खाबड़ रास्तो पर।
खिल उठे
जीवन का राग
उठता, गिरता, लहराता चल कि,
बिखर जाये
किरणो के रग
हर डगर पर।

42
तरणि-तरणी
पर्व
एक दिन।
जीवन का पर्व बना
जब, हम
महलो से बाहर आये।
ओर, सॉसे ली खुली हवा मे,
धीरे-से छुआ
माटी को
फूलो से भर उठी धरती,
ॲजुरी भर
पानी के बहाने
लहरो ने आकर
तन-मन भिगो दिया सारा।
स्नेह से
नजर उठाई, उन
आँखा मे
प्यार का सागर उमड आया।
क्यूँ मायूस रहे, तुम
अब तक, इस प्यार से
क्यूँ रुके हुए थे, अब तक
महलो मे
लाचार से
घुटती हुई साँसो ने
बार-बार पूछा है हमे।
वे क्या जाने,
कभी कभी आते है,
जीवन में ऐसे पर्व।

तरणि-तरणी
43
समय की परतो मे
।
है। मेरे चोते हुये कल
मेरे अतीत
सा गये हो
गहरी नींद मा
पर
समय की परता का तोड कर,
में जाग रही हूँ।
याद है मुझे
जूही, बेला के फूलो-से
वो
छोटे-छोटे सुख,
आज भी बस हैं
मन की गहराइयो मे।
भूल कहाँ पाई में
उन दर्द भरे उपहारो को भी
सहजते, सम्भालते
कहता था, मन,
कही और चल
छूट-छूट जाती थी,
मन की डार।
आज भी
तुम
समय की परता मे,
सोते जा रहे थे, पर
जाग रही हूँ।

44
तरणि-तरणी
कच्ची धूप से रिश्ते
-
कुछ रिश्ता की धूप
इतनी कच्ची
क्यो
होती है?
एक टुकडा बादल
आते ही
आँगन से
खिसक जाती है।
कच्ची धूप के रिश्ते
शायद ऐसे ही होते है।
ॐ
1

तरणि-तरणी
45
मन का पछी
नील गगन मे उडता फिरता
मन का पछी अकेला।
आज यहाँ, और
सात समन्दर पार
कहाँ-कहाँ की
धूल छानता
मन का पछी अकला।
ना कोई डेरा
ना बसेरा
पल भर का विश्राम नहीं,
रातो को भी
चैन नहीं
सपना मे चञ्चल विचरता रहता
मन का पछी अकेला।
सुबह हुई, या
साँझ ढली,
बादल गरजे, बरसे, चाहे
आने वाला
कोई तूफान हो।
हर मौसम में
सुख में
दुख मे
यूँ ही भटकता रहता
मन का पछी अकला।

46
तरणि-तरणी
जिन्दगी
तुम
इस गलतफहमी मे मत रहना
कि जिन्दगी
तुम्हारे घर के आगे से
निकलती हुई
छोटी-सी गली है।
जिन्दगी तो
मीला लम्बी एक सडक है,
जिस पर
सरपट दोडते वाहन,
किसी
दहशत की तरह
पास से गुजर जाते है।
और, हम
बर्फ के बुत बने,
देखते रह जाते है।
हाँ
जिन्दगी
काँटो से चुभता दर्द भी है,
केवल
लाल गुलाबो का
गुलदस्ता नही है।

तरणि-तरणी
47
अनुरागी-बैरागी
सुख-दुखको
मन्दाकिनी
किनार बैठे,
मन
बैरागी हुआ जाता है।
घर की
चौखट तक आते-आत,
अनुरागी हुआ जाता है।

48
तरणि-तरणी
झील का किनारा
झुकता हुआ
आसमान
एक अकेला सितारा
पेडो के पीछे छुप कर
सूरज ने किया
साँझ का इशारा
झील का किनारा।
चाँद
अम्बर से उतरा
करने, पानी मे अठखेलियाँ,
ये चाँद, कि
वा चाँद है
भरमा गया मन बेचारा
झील का किनारा।
ठण्डी हवा
छू कर तन-मन
कहने चली
उडते हुए श्वेत-श्याम मेघो से
ठहरा-ठहरा मन यहाँ,
लो उग आया कही
एक और तारा,
झील का किनारा
.

तरणि-तरणी 49 हम घबराये नही है लहराते हुए महासिन्यु की गहराइयो से आती हुई लहरा को देख रही मैं रत मे विखरते हुए। अनन्त आकाश की ऊंचाइया पर, चमकत हुए सूरज को, अपने ही ताप से जलते हुए। फिर क्या? उदास हो बैठी हूँ, मैं लहरा से झकृत इस तट पर, अकेली अनमनी-सी सोच रही कि मैं छली गई, अपने ही विश्वासा से। हर लहर पल दो पल का जीवन जी रही, किस उछाह से, उमग से, न थकना, न रुकना निरन्तर बहते रहना, उठो। मेरे मन। तुम भी लिखो एक कहानी वक्त की किताब के कुछ पन्ने कोरे है, अभी कि, हम घबराये नहीं है, जिन्दगी के विश्वासघातो से।

50
तरणि-तरणी
अचरज
जो हमे
जानते नहीं थे
सच है कि
वो हमे पहचानते नहीं।
जो हमे
पहचानते थे,
अचरज है, कि
आजकल
वो हमे जानते नही।
(

तरणि-तरणी
51
उड़ न जाएँ वे क्षण
एक अन्तराल से
इन्तजार था
जिस वक्त का, वो
आकर चला गया।
यलम्बो चाहे
लगी बहुत छाटी, जय
फडफडात पख-सा, वा वक्त
दखते ही देखत
उड गया हाथा से।
वे, थोडे से क्षण
दे गये इतना सुय, कि
एक और अन्तराल जी लूंगो, मैं,
इन्तजार मा
कोई ऐसी सुबह
जय, उजाले फैले हागे,
पाखी चहकगे
नहा उठेगा मन
किरणा को घरसात से,
मैं थाम लूंगी, तब
उस वक्त को
इस तरह, कि
फिसल न जाये फिर हाथो से।
Team

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तरणि-तरणी
53
पीडाओ का अपनत्व
पांडाएं
मन्दाकिनी-सी पाती।
लहर-लहर
बलखाती-सी
मर मन में।
बारिश की बूंदा-सी
बरस-बरस जाती हैं।
झूम-झूम कर,
मरे मन म!
दरख्ता की
दूर-दूर तक फैली जडा 1-सी
घर कर जाती हैं,
अन्दर ही अन्दर,
मेरे मन मा
क्या मुझे धरती समझ लिया?
पीडाआ ने।
घर बमाना चाहती है,
मेरे मन मे।

थकान में मुसकान 17

तरणि-तरणी
55
चुपके से चली आती है
हजारो रग
हतारा रूप
अनुपम छटाये लेकर
उभर आते हैं
कामल पता पर, कैसे
मुझ पता नहीं।
रग-बिरगे फूल
खूशबू से महकते फूल,
खिल जाते हैं
डाल-डाल पर, कैसे
मुझे पता नहीं।
अनगिनत तारे
ये चमकते सितार,
बिखर जात हैं,
सुरमई अंधेरा मे, कैसे
मुझे पता नहीं।
ये छटाये
ये खुशबू
ये चमक
चुपके से चली आती है
मेरे मन के
अँधेरो मे कैसे?
मुझे पता नहीं।

आंग ताणि-तरणी 57 कितना सुन्दर है आकाश? लहरा कामचलत शार ने दस्तक दी जब से मन के दरवाजे पर बादल चन मन उडन चला है सागर से उठती धुध-सा सपना न भी करवट ली है, ता मन की पीडा कम हुई चली आती है, सतरगी साँझ नये-नय धर रूप सुनहरे, हमे देख अकेल वतियाने को कितना सुन्दर र आकाश। क्यूँ कभी देखा नहीं? ये तन्हाई जो मिली, तो मन से मन की बात हुई है। भीगे-भीगे आसमान मे इस छोर से उस छोर तक खिला, जा कोमल रगा का इन्द्रधनुष जाना हमने, कि एक फूल का खिलना क्यूं भर दता है मन में इतने सारे रग? नयनो की अजुरिया मे बन्द हुए यूँ रग घनी उदासी कम हुई है। अपनी पीडा अपनी तन्हाई अपने सपना से चाहत हुई है।

58 तरणि-तरणी कितने बह गये आँसू थक चली ये अँखियाँ बरस-बरस सावन। अब तुम बरसो। बहारो के नगमे किसने छीने धरती के होठो से? दर-दर भटकते पीले पात कुछ कहते, सुनो सावन, हे सावन सावन है, सावन अब तुम बरसो। आँधियो का मासम गुजर गया, थक कर सो रही है पेडो की परछाइयाँ। कितने बह गये आँसू कि प्यासी हो चली ये खियाँ सावन अब तुम बरसो। घिरती घटाये बार-बार तपते हुए सूरज को बादलो की टोह मे प्यासे-प्यासे मोर पपीहे प्यासी हो चली अखियाँ बरस-बरस सावन अब तुम बरसो। .

तरणि-तरणी
59
उजाले
कहाँ गये
मेरे घर के सारे उजाल
अंधेरै साया म
आज
सहमा-सहमा-सा घर मेरा।
मान है
आवाज भय से
चेहरा से हंसी गायव है।
ऐसे म
कौन है, जो
उठकर
दीया-वाती कर दे।
सहमे हुए दिला मे,
नन्ही-सी
जोत जला दे,
जोत से जोत जले
ओर, हो जाये
घर मे उजाले।

निय के लिए उठे राध

तरणि-तरणी
61
हार क्या, जीत क्या
चलो
चलते रह हम
कर्म-पथ पर
हार क्या
और जीत क्या?
क्या उलझे
मन।
फैसला
ईश्वर को करने दा
कुछ
खो कर ही
कुछ पाना है,
फिर क्यो
इसकी फिक्र करें।
छोडे मायूसी,
होठो पर हँसी रहने दे।
(CC
दुख भी
और सुख भी
क्यू, ना
आपस में बाँट ली
चलो
चलते रहे
कर्म-पथ पर।
हार क्या
और, जीत क्या?

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ताणि-तरणी
63
कैसे गुजरी?
मत पूछो,
कैसे गुजरी रात
चाँद निकला नहीं
और ना ही
तारा की रल-पेल मची।
घटाटाप अंधेरे म
सहमे-स,
सारी रात चैठ रहे।
मत पूछो,
कैसे गुजरी रात।
आसमा रोता रहा,
आस गिरती रही,
आंसू
पलका पर सजते रहे।
कर पौ फटे
यही इन्तजार करते रहे,
मत पूछो,
केस गुजरी रात।
हवा थी खामोश
दरख्ता के साये
मन में
दहशत जगाते रहे।
मन का उजाला ले कर
सारी रात
अंधेरा से लडते रहे,
मत पूछो,
कैसे गुजरी रात।

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65 तरणि-तरणी ममता भरी एक थपकी निपट अकला उडता तू आसमान मे पछी ऊंची उडाने मुश्किल राहे थकान भरी है पखामा सुस्ता ले थाडी देर ओ, मेर भोल पछी। सूरज के उस देश मे तू हूँढ रहा मजिल कहाँ सूखे कठ व्याकुल मन कोई तो तेरा साथी होगा कह दे उसे दुख सुख अपने मन का ओ मेरे भाले पछी। आबँठ - तनिक- मेरी मुंडेर पर मैं पखो को सहला दूंगी, दो बाते कर लूँगी मजिल का पता दूंगी ओ मेरे भोले पछी।

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तरणि-तरणी
67
तब तक
उजली सुबह
सोने-सा सूरज
रूई से विखर बादल
मदमस्त रजत लहरा पर
तैर रह
सोने के शतदल
इन खूबसूरत पलो म
हँस पडी है
प्रकृति वाला
कब
चिलचिलाती धूप
बरसा देगी
लाल-लाल अगारे।
तब तक
कुछ पल
मन
तू भी मुसकराले
मन
तू भी मुसकराले।

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-
तरणि-तरणी
69
वक्त है अभी
थम गया है
तूफान,
कहर बरपा कर,
थक कर
सो गया हागा कहीं।
रुक गई है
बरसात भी
घरा, झापडिया-गांवा, शहरा को
अपने
सैलाब मबहाकर,
शर्मस
चेहरा छुपा लिया होगा कहीं।
पर तुम
अभी थके नहीं हो,
दिन-रात
बुना करते हो
मकड़ी जैसे नये जाल कहीं।
वत है, अभी,
थम जाओ
वरना,
समय थक कर सो जायेगा कहीं।

तट पर बैठी माँ
मै
अक्सर सोचती हूँ,
पत्थर का बुत बन जाऊँ।
पर,
कामयाब कहाँ होती हूँ?
मन के अन्दर
पिघलता है, कुछ
बर्फ-सा, निरन्तर।
एक झील है
जो लहराती है, निरन्तर।
तट पर बैठी
एक माँ
यादो मे डूब कर,
आँसू बहाती है।
बूंद-बूंद बहता
खारा पानी,
चट्टाना को तोड कर,
जब रिसता है, दरारो से
-
टूट कर बिखर जाता है
बुत बनने का इरादा।
फिर एक कोशिश करूं?
अक्सर सोचती हूँ.
पत्थर का बुत बन जाऊँ।

तरणि-तरणी 69 वक्त है अभी थम गया है तृफान, कहर बरपा कर, थक कर सा गया होगा कहीं। रुक गई है बरसात भी घरा झापडिया-गांवा शहरा को अपने सैलाव मे बहाकर, शर्म से चेहरा छुपा लिया होगा कहीं। पर तुम अभी थके नहीं हो, दिन- बुना करते हो मकडी जैसे नये जाल कहीं। वक्त है, अभी, धम जाओ वरना, समय थक कर सो जायेगा कहीं।

70
तरणि-तरणी
मन मरुस्थल
जिस दिल मे लहराता नही
प्यार का सागर,
उग आता है
सूखी रेतो वाला
मरुस्थला
जो सोख तो लेता है
पूरा का पूरा
सागर, पर
लौटाता नही
छोटी-सी
छलकती गागर।
Kaal

तरणि-तरणी
71
नियति बनजारो की
मन तो था वनजारा
रहा भटकता और
गुनगुनाता, पर
कहाँ और है,
कब उठा कबीला।
इस चिन्ता से दूर
उडता रहा पछी बन-बन।
अब तो
कहने लगे हैं
लोग हम भी कि
हम भी हुए बनजारे।
किस ने पूछा
हाल हमारा
जब छाड चले थे, हम
घर अपना
रीत न जानी इस जग की,
आर टूट गया
एक सुन्दर सपना।
अब तो
काफिला चल पडा
अनचीन्ही राहो पर,
कौन जाने
कहाँ बसेगी
हम बनजारो की बस्ती?

72
तरणि-तरणी
इन दिनो
सुनती रही हूँ
रात भर
दरख्तो की कानाफूसी,
बात कर रहे थे
किसी पतझड की।
इन दिनो
शहर में आया है पतझड,
भर लूँ
कुछ पत्ते
आँचल मे, यह
कोशिश कई बार की,
पर
हर पत्ता
उडता चला गया
सूख कर
सनसनाती हवा के साथ।
थक कर
बैठ गई हूँ, सूखे
दरख्त के सहारे
इन्तजार है,
बहती हवा करेगी इशारे
शहर मे
वसन्त आने वाला है।

तरणि-तरणी
73
खुदा जाने
देख
खुशी की लहर
तुम्हारे चेहरे पर
हतारा झरने बहने लगे,
मर मन मे।
और, अगर
कहीं देख लिया
खुशिया का वहता झरना
तुम्हार
चेहरे पर
तब
मेरे मन का क्या होगा?
खुदा जाने।

74
तरणि-तरणी
यह कैसा बचपन
वो मासूम बच्चा,
झाड लगा रहा था
रेल के डिब्बो मे।
फटे कपडे,
या कहूँ अधनगा,
काँपता जिस्म,
ओर, कूडा बुहारता।
सर्द रात मे,
धूल-धूसरित,
कचर का डिब्बा-सा,
बच्चा।
भूख से कुम्हलाई थीं,
कमल-सी आँखे,
जूठन के खातिर
प्लास्टिक का थेला लिये हाथ में
मासूम बच्चा।
यह कैसा बचपन

तरणि-तरणी
75
बेखबर, उसकी गोद में
एक चाँद का टुकडा
उसकी गोद म
रजत धवल चाँदनी में नहाया,
गुलाव
उसकी गोद मे।
फिरे चहकती
मुसकान महकती
आँखो मे छलकता प्यार
जैसे
एक सुन्दर बालक
उसकी गोद मे।
गाती लोरियाँ
ज्यो मीठी रसभरियाँ
होकर सबसे बेखबर,
भानो
दुनिया की सारी दौलत,
उसकी गोद मे।
शिशु विहँसता, देख
विहंस उठती दो आँखे
हो गया
सपना कोई साकार-सा
दो कमल-नयन
उसकी गोद मे।

76 तरणि-तरणी उसका दुख माई ऐ। क्यूँ भेजा परदेश इतनी दूर सलमा-सितारा वाली चूनर म, समट लाई थी, जो सपने किस्मत ने कर दिये चूर-चूर । तर आँगन की थी कभी में सोनचिडी, जो प्यार की प्यास मे भटकती रही मरुधर मे, काँटे लदी खेजडियो मे फट गई चूनर मेरो, टूट गये वो लडियाँ, झूमर कगन, पायल बारी-बारी, बहुत अकेली थीम किसको कहती तन-मन की पीर, इस काली अँधेरी कारा मे ले आई है तकदीर। काला हुआ माँग का सिन्दूर अंधेरी हो गई जिन्दगी, आँसुओ मे बह गया ममता का सेलाब मजबूर। छूट गये सब रिश्ते-नाते भूल गये मेरे बाबुल मुझे सखी, सहेलियाँ, बन्धु-बान्धव कभी न होगी अब सितारा स बाते। माई ऐ। तू तो याद करती होगी सलमा सितारा वाली चूनर ओढ जब कोई बेटी पराई होती होगी।

तरणि-तरणी 77 तुमने कभी देखा नही पानी में फूलो की तरह मुसकराते हैं हम शान्त बने रहते हैं शायद यही वजह है कि कांटा के रिसते हुए घाव तुमने कभी देखे नहीं। हम धूप हैं सूरज ने चाहा तो विखर कर विहंस पड, बादला की रुसवाई ने परछाई मात्र रह गये है। एक लहर आ कर सारा वजूद हिला जाती है तुमने कभी देखा नहीं। आँखा म आँसू भर दिये जा, तुमने कभी देखे नहीं। तूफाना ने चिथड-चिथडे कर डाली पोशाक बिना हारे खड़े हैं वक्त को दहलीज पर छुपा जाते हैं पैवन्द जो, तुमने देखा नहीं कभी लहरें तो नहीं कि बार-बार चट्टाना स टकरा सके, चट्टान बनने की कोशिश में मन का टूट-टूट जाना, तुमने कभी देखा नहीं। तुम समझते हो कि हम सिर्फ फूल हैं हर पाँखुरी के टूटने पर आत्मा ने जा दश झेल हैं तुमन कभी दखा नहीं। बहते हे हवाओ की तरह, कि मुश्किलो के दुर्गम पर्वता पर तुम सांस ले सको अन्दर जो घुटन पल-पल बढती जा रही है तुमने कभी देखा नहीं। हम चाँद थे आकाश के कभी

78
तरणि-तरणी
बेचैन मन
घन उमड-घुमड कर
बरसा देते
अपने मन की बेचैनी।
सागर भर देता
उठती-मचलती लहरो मे,
मन का सारा बोझा
फूलो पर
निखर आता है
कलियो के मन का राज।
आसमान भी,
इन्द्रधनुष के रगो मे
कह देता
अपने मन की बात।
में।
घन नही हूँ,
सागर नही हूँ,
मुझमे कलियो जैसा हुनर नहीं,
और, आसमान-सा विस्तार नही,
में।
शब्दो का भण्डार नहीं,
मुझे, छन्दो की सीमा ज्ञात नही
फिर, तुम्ही कहो
मे कैसे लिखें
अपने मन की
बेचैनी।

तरणि-तरणी
79
अपना दर्द, उनका दर्द
पहचान हुई
लहरा से जिस दिन
अपना दर्द ही
लहरा मखा गया।
आत-जाते
दे गई
अपने मन की सीप सुन्दर,
ले गई, आंखो का आँसू
जो सागर में घुल गया।
कुछ कर रहीं लहरें
न आकाश ने सुना
न धरती ने सुना,
अपना दर्द
अपने मे ही घुल गया।
प्यार भरी
ये दुनिया मेरी
फिर, क्यूँ औरो से त्रस्त हुआ मन'
कि, एक दर्द
मुझमे घुल गया।
पहचान हुई लहरो से जिस दिन,
ये दर्द लहरो मे घुल गया।

80
तरणि-तरणी
कल, फिर तू अकेला है।
मौसम मेहरबान है
खुशियो का लगा अम्बार है
कहकहो की रुत है, और
उडते दिनो का त्यौहार है।
कह दो
जो कुछ कहना है
कि ये दो दिन का,
बस मेला है।
आज मिल रहे
बाहे फैलाये
कल फिर तू अकेला है।
वक्त का पछी
स्वच्छन्द विचरता
कब पिजरे मे टिकता है?
हर पुलकित पल के
आगे-पीछे
गुमसुम-सी उदासी है
गा दो
जीवन्त धुन कोई
कल किसने देखा है कि
जीने की तमन्ना हो, ना हो।
आज गा रहे गीत मिलन के
कल फिर तू अकेला है।
TRA
사

तरणि-तरणी 81 अँधेरे मे उजाले तमस ढोती है, जिन्दगी। जीने की बेबसी म और, लिखती है इतिहास अंधेरो का सदी-सदी मे चलो वहाँ एक दीप जला दे। पको रोटी की खुशबू का तरसती है जिन्दगी। थक जाती ह हथेलियाँ, भूख से बिलखते लाडलो को थपकाते चलो वहाँ, जीवन की सरगम सुना दे। अनपढ, बेजुबान, दलित रहते हैं गदी बस्तियो मे। नाचती है गरीबी, नगा नाच जहाँ चला उन्हे भी गले से लगा ले। दीया की लम्बी कतारें, महलो के जगमगाते कगूरे एक दीया वहाँ से उठाकर उनके नाम लिख दे जो जीते है उम्र अभावो में जो मरते है गुमनाम अँधेरो मे चलो उन्हें अपना हक दिला दे।

82
तरणि-तरणी
मन कहाँ निराशा
मन क्यूँ रहता है इतना उदास,
कि, छिन गया मेरे अधरो का हास।
ऐसा भी नहीं कि बहार नही,
ओर, गाते मेघ मल्हार नही।
तालाबो मे धूप सेकती कमलिनी
चाँदनी रात में खिली-खिली सी कुमुदिनी।
मन कहाँ निराश है।
प्राणो मे लगी फिर ये कैसी प्यास है।
सपनो मे जो खिले थे गुलाब
जागे तो, मुरझाने को थे बेताब।
फेला है अनचाहे लम्हो का ससार
सूने पडे है, आज, घर-बार।
मुसकरा कर बहारें, कर जाती है उदास,
कही खो गया है मेरे मन का उजास।
ढूँढती मै, नन्ही सी आस जो
लौटा दे मेरे अधरो का हास।
मन क्यो रहता है इतना निराश
मन क्यो रहता है इतना उदास।

तरणि-तरणी
83
एक पुलक मन मे
असफलताओ की चट्टान पर
आकर, जब भी मैं
उदास, गुमसुम-सी बैठ जाती हूँ
सागर की शीतल लहरें,
अनवरत
पॉवो को पखारती हैं,
एक पुलक, तब
तन-मन में फैल जाती है।
उठ जाती हूँ मे
चट्टान से तुरन्त, और
चहलकदमी करती हूँ लहरो मे।
बहुधा ऐसा होता है, कि
एक नई उमग लेकर
हर रोज घर लौटती हूँ, मै
यह सोचते हुए, कि
वो दिन भी कभी आयेगा
जब उदास मन लेकर
चट्टान पर जाकर, ना बेहूँ,
लहरो के साथ दौडूं
बस, दौड़ें।

84
तरणि-तरणी
प्यार ही प्रभु है
छुपा कर रखते हो,
क्यो
मन की घाटियो मे
प्यार को
छलकने दो
शोर मचाती नदियो-सा
प्यार को।
ओढ रखा है
क्यो
ये रुखापन
प्यार मे ही प्रभु है
मन्दिर की घण्टियो-सा
बजने दो
प्यार को।

तरणि-तरणी
85
मै और मेरी जिन्दगी
जिन्दगी से मिले
तो, जाना
कि, क्या है जिन्दगी?
कैसी है जिन्दगी
जीते जा रहे थे, दिन और रात
ढोते जा रहे थे
दुख औ' सुख, मरते-जीते,
इसी को कहते रहे
जिन्दगी।
सामने खडी थी
उस दिन जब जिन्दगी
बडी प्यारी लगी,
अपनी-सी लगी।
एक उम्र खो गई
बियाबानो की उडती धूल मे,
आँखो मे आँसू थे
मगर
मुसकराती लगी जिन्दगी।
कैसे बताऊँ, तुम्हे
ढलती हुई साँझ का आसमा
लेकर आयेगा
हर दिन, नूतन इन्द्रधनुष
हो रहा है यकी
धीरे-धीरे
कि, मैं ही हूँ मेरी जिन्दगी।

86
तरणि-तरणी
खिलता फूल
देखती रही में
अपलक
नन्हीं पाँखुरियो वाले
गुलाबी चितवन लिये,
उस फूल को।
मेघ, आकाश, चाँद-तारे
पहाड, नदियाँ और झरने
फोके लगे,
देख कर उस फूल को।
किसी
भोले शिशु-सा कोमल था
सुन्दर, मोहक, पवित्र था
ससार के सारे रग भूली, मै
देखा जब से
खिलते हुए उस फूल को।

तरणि-तरणी
87
विसगतियाँ
आसमाँ नही था
उडने को
मगर
जमीं तो थी,
पाँव रखने को।
आज
आसमा मिला उडने को
तो देखा
जमीं नहीं थी
पाँव रखने को।

88
तरणि-तरणी
कोई बार-बार कह जाये
हवा ऐसी चले, लहरा मे अजब हलचल मचे,
साथ उनके बहने से, कैसे मन आज बचे।
जहाँ तक नजरें जाय पानी ही पानी दिखे,
ऊपर से, रग-ढग, बदले-बदले स लगा
तरल उर्मियों कहती, सिसकते स्वरा को विराम दे
वापस कभी ये मजर, नयनो को मिले ना मिले।
कैसे अपन मन को कहूँ, कि अब घर लौट चले,
हँस देता मन कि चलो हवाओ के साथ उड चले।
कहो तो, कुछ दर ठहर कर मन ही मन गुनगुना ले,
बँध गये पग लहरो के, धुंघरू बजे, तो कैसे बज ।
हवा एसी चले लहरा मे अजब हलचल मचे
देखती रहूँ सौदर्य सुधा, पर कोई बार-बार दिखाये।

तरणि-तरणी 89 क्यो रूठी है नीद, हमसे नींद अजनबी हो गई है हमसे, मगर बेचैन अब, होते नहीं हम। पलका के नीचे बैठा मन देखता है अक्षर-अक्षर झरत हुए जो मनोभाव कहेगे। रगो के मोहक ससार मे खो जाता है, जो कभी कैनवास पर उतरेंगे। आँखो को बन्द कर सोने की झूठी कोशिश, अब करते नहीं, हम, खिडकी से झाँक कर आकाश से बाते करते हैं। अपने अनजान अन्तर को खोजते है, कि क्यो रूठ गई नींद हमसे क्यूँ जाग-जाग कर सपने देखत है, कभी नींद से ही पूछेगे। नीद, अजनबी हो गई है, मगर बेचैन, होते नही अब हम। क्यो रूठी है नीद हमसे। " 17 90 तरणि-तरणी सुन्दर-असुन्दर कैसे कहूँ असुन्दर सुन्दरतम यह जीवन मेरा। जलते मरुस्थल मे श्रात हो जाते थे कदम और हो जाते थे प्यासे अधर, तब मन की निर्झरणी से बहे, कुछ गीत मधुर-मन्दिर। था, वो बनजारो-सा जीवन अनजान पथ पर चल पडे हम हो कर निडर जब, बनती गई हर डगर बसेरा। असफलताओ के बीहड वन पत्ते-सा काँपता था मन, तब खोजती थी मे आनन्द के कुछ क्षण उडते हुए ज्या सुनहरे घना निर्मम हवाओ से बुझ रह थे जब जलते हुए चिराग, रो कर तम से लडने, तब जल उठी अन्तर म, एक बाती हँसकर। कैसे कहूँ असुन्दर? सुन्दरतम यह जीवन मरा।

तरणि-तरणी
91
बुझता नहीं दिया
धूल उडाते
कहर ढाते,
तूफानी के बवण्डर
बढ़े चले जा रहे,
जीवन के आर-पार
ये कैसी लो जल रही
ये कोन तेल डाल रहा,
कि, बुझता नहीं दिया।
एक के बाद एक
मुसीबतो के पहाड
रोक रहे
बढते हुए, मुस्कुराते हुए, कारवाँ
ये किसका हाथ मिला,
ये कौन साथ हुआ
कि, रुकते नही, कदम साथिया।
उफनता सिन्धु
क्रोध मे
मदहोश लहरें, बार-बार
खो रही शोर मे
ये कौन नाव खे रहा?
ये कौन गीत गा रहार
कि, डरता नहीं जिया।

92
तरणि-तरणी
कुछ भी कहे दुनिया
अपने थे जो चेहरे
बस गये है देश-विदेशा मे जाकर,
बेजान दीवारी का घर
अब,
नीलाम करे दुनिया, तो क्या?
थोडे-से खुशियो के पल
सजाये थे
जिन्दगी मे
उनसे भी, अगर
जलती है दुनिया, तो क्या।
बहुत चले है
चिलचिलाती धूप
मे
जलते रेगिस्तानो को
पार करने को कहे दुनिया, तो क्या?
सुन कर
किसी का दुख
हँस देती हे दुनिया।
चल रहा है जब तक
साँसो का काफिला
कुछ भी कहे दुनिया तो क्या?
हमे चलना है
अपने बनाये रास्तो पर
रास न आये ये मञ्जर
दुनिया को, तो क्या?

तरणि-तरणी
93
कहाँ ढूँढें
जल रहा है आसमान,
जल रही है धरा।
छाँव नहीं, कहीं
आतप मे जल रहा है
पल-पल जीवन, तन औ' मन
कहाँ हूँदै, जल भर लाते घन?
दुबके बैठे
खग कोटरो मे
गीत घुट रहे कण्ठो मे,
निर्निमेष ताकते
नभ की ओर, भोले नयन
कहाँ ढूँढूँ, जल भरे घन?
तड-तालाब सूखे
सूखे नदी, निर्झर,
कही नहीं सगीत-लहरियो की गूंज,
गमगीन लगते खेत-खलिहान,
वन 'ओ' उपवन,
कहाँ ढूँढूँ, जल भरे घन?
तप्त ससार मे
बन्धक हुई
कल्पनाओ की उडती पॉखे
हृदय आहत हुआ
सूखा, सागर-सा लहराता ये मन,
कहाँ हूँढूँ, जल भरे घन?
मदया

94 तरणि-तरणी सागर का विश्वासघात शान्त गम्भीर कहलाने वाले ओ सागर विशाला क्यो उफन पडे हो क्रोध से कि, नीला गहराता रग तुम्हारा, फेनिल झागो से दूधिया गया। घाव हृदय के छेडे किसने, किसने कहर ढाया तुम पर? कब से झेल रहे हो झझावातो को अपने मे उद्वेलित हो उठा अन्तर आज कि अपनी सीमा भी भूल गया। क्यो रहे घन पीछे तुम से? ताण्डव नर्तन कर दे रहे निमत्रण प्रलय को क्रूर कोलाहल मे बिजलियो की चकाचौध मे यह कैसा निर्मम खेल जो मेरे मन को दहला गया। पागल होकर लहरें भी उछल रही नभ को छूती-सी सुन्दर रेतीला वो तट तुम्हारा, तुम मे ही डब गया। अब क्या आकर बेतूंगी मैं पास तुम्हारे लेकर मन को उथल-पुथल। ओ मेरे सागर विशाल तुम्हारा यह विश्वासघात हमे दुखी कर गया।

तरणि-तरणी
95
वो घरवाली
बडे प्यार से
लीप-पात कर
माटी के उस चूल्ह का,
झोपडे के आगे
बैठी-बेठी
खाना बनाती है, रोज
वो घरवाली।
आज
बरसात में भीग गया
माटी का वो चूल्हा
कैसे खाना बने
क्योकि-
नहीं जलेगा चूल्हा
सोच रही, उदास-सी
वा घरवाली।

96
तरणि-तरणी
क्या करें?
क्या करें, कही मन नही लगता,
कुछ भी तो अच्छा नही लगता।
ये धूप-छाँव
बादल बरसते
पंख हवा के भोगे-भीगे
मन्दिर म बजते घण्टे
पारखी बेठे कगूरे
उन्मुक्त गगन के रग
य घर ये दुनिया
ये चाँद सितारे
फूला के पौधे साँचे-सींचे
कुछ भी तो अच्छा नहीं लगता।
क्या करें? कहीं मन नहीं लगता।
मन जो कहे
पन्ना पर लिख दे,
इन्द्रधनुष के रंग बिखर
कैनवास पर
आडे-तिरछे
फिर भी, ता
वह पचता है
यादा का समन्दर उमडता है
कुछ भी ता अच्छा नहीं लगता।

तरणि-तरणी 97 मजबूर पथिक सोचा भी नहीं था कि, आयेगा एक दिन, मौसम वीराना। उड जायेगे पछी किसी दूर देश दाने पानी की तलाश मे, छोड कर बरसो पुराना बसेरा। फूल-पात पतझर मे झरे, झरे अमलतास, गुलमोहर, पलाश। बिन पानी सूखे ताल तलैया, अब इधर क्यो आयेगा, भूला भटका कोई बटोही, कि उजड गया, वो पेडो का घना बसेरा। सूनी-सूनी आँखो से देखा करेगा तोता-मैना का वो जोडा, थकाहारा भूली-बिसरी यादो मे खोया ढूँढा करेगा वक्त बिताने का बहाना। पखो मे वो पुलक कहाँ, अब जो नाप सके पथ की दूरी टूटे सपनो का बोझ ढो कर उम्र का यह मोड हुआ, लो, आज पथिक की मजबूरी कब सोचा था, कि इतना तनहा होगा इस मौसम का ये बहाना।

98
तरणि-तरणी
उस किशोर की व्यथा
वही लहरें उठती है, रोज
सागर की विशाल जलराशि मे
वही सूरज उगता है
वही चाँद-तारे
उगते हैं रोजा
मगर
मेरे अन्दर क्यूँ जन्मते है,
हर रोज नये खयाल?
एक कोयल
मधुर कूकती है
सपने ताने-बाने बुनते हैं।
जगल मे खिला फूल हूँ
जिसे, वीराने में मुरझाना है।
मैं।
मरस्थल में उगा कोमल पौधा हूँ
जिसे, विन पानी मर जाना है।
क्या करूं।
इन त्याला का।
कैसे गाऊँ
कोयल की कृक पर बनते गीत।
कौन सुलझाय
सपना को भूलभुलैया
कि फाई
मसीहा बन
इधर आता नहीं।

तरणि-तरणी
99
समाधान
शायद
उस दिन, तुम
बात को ठीक से बता न पाये,
या फिर
मैंने ही सुना न हो,
सुना भी हो तो समझा न हो।
पिछले कई वर्षों मे
वो बात
मेरे जेहन में कई बार आई
कभी मुझे लगा, कि
मे,
उस बात पर
गौर करना नहीं चाहता
और, सिर को धीरे से झटक कर
उस बात से
भागना चाहता हूँ,
लेकिन, आज
उस बात को कहो, तुम
एक बार फिर से
शायद
वही बात करे
हमारी उलझनो का समाधान।

100 तरणि-तरणी जागो, हे। जागो सोई-सोई अलसाई-सी कुहरे मे डूबी भार जो छेडा ये रगो का राग किसने जाग उठी ले अंगडाई कुहरे में डूबी भार। ज्याति निर्झर झरने लगा जब छन-छन कर पेडो से पाँवा में बाँध पेजनियाँ किरण उतरीं धरती पर फूलो का मकरन्द उडा महकी दसा-दिशाये। ओझल थीं, जो लहरें अब तक तम के झीने आंचल में स्वर्ण-धूलि सा विखरा सूरज लहरी की धुन पर मचल कर मुसकरा दो उजली दिशाएँ। थकित नयन साये-सोये थे, योत तम क अशुभ सपना-से चकित हुए जाग ज्याही दय किरण दिवाकर रग उजाले ये कैसा उपा काला रहा आज हदय प्रणाम जागा जा जाग नुको सरमा दिशायें।

101
तरणि-तरणी
तब तुम देख लेना
ओ मेरे साथी।
तुम ये ना समझ लेना
कि, ये दुख-दर्द, य पीडा
जो कुछ अपना है
सब कुछ लेकर जायेगे,
खाली हाथ,
हम, रह जायेगे।
मानता हूँ
कि, ये समय बडा दुखदायी है,
अजीब-सी बेबसी है।
और, जीवट
धीरे-धीरे चुक रहा है
मगर,
यह भी सच है
कि, ये जिन्दगी
और जिन्दगी को जीने की तमन्नाये
टकरायेगी, जब
दर्द से
तुम देख लेना, तब
बरसती, बरसातो को
जलकणा से भरी हुई अँजुरियो को,
जीवन के प्रति निष्ठा से
जगमगाती आँखा को
ओ, मेरे साथी, तुम
यूँ ना समझ लेना, कि
यही जीवन है।

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Tarni Tarnee

Author
Vina Jain
Title
Tarni Tarnee
File name
Tarni Tarnee
Text
OCR done
Citation
1964
Published
2011/03
Publisher
Pragati Prakashan Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551534
Barcode
4990010032264.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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