Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Hast Lipi Vigyan
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हस्तनिधि विज्ञान
राजकमल प्रकाशन
दिल्ली ६
पटना
राजकंगाल
हस्तलिपि-विज्ञान || बालकृष्ण मिश्न ||
6 बालकृष्ण मिश्र
प्रथम मस्करण
१९६८
प्रवाशक
राजकमल प्रकाशन प्रालि
दिल्ी६
भवरण
रिफार्मा स्टूडियो रिल्ला ६
मूय
१
नवान प्रम गिल्ली
समपण
उस मालिक को जिसने
ज्ञान के दीप
जलाये
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प्रस्तावना
कुछ वप हुए मैंने हस्तरिपि विज्ञान के विषय में एक रम्प
रिसा पा । यह विनानाग पत्रिरा' ग्वालियर मप्रका
गित हुआ था। प्रस्तुत पुस्तक को वास्तविर भूमिका यही
राप है। कुछ सगोधन के साप वह लेप इस पुस्तक में प्रारम्भ
में लिया गया है। विषय की सहज व्याख्या इमम मिगी।
हस्तलिपि विनान का उपयागिता-मामाजिर एव व्याव
सापित जीवन में प्रयाग इस प्रनि मरा अपना दृष्विाण
आनि मूर ना पा सक्षिप्त विवचन इम पम मिरगा।
इम एस प्रसाशन के उपरान्न बना गम्भीर प्रान
मरे सामने आए। हम्नलिपि विनान की दमानिकता के विषय
में बदन-सी पाराएं आगेचनाए प्रस्तुत हुन । जो विद्वान
गम्भीर विचार महानुभाव इस विषय की ओर आरपित हुए,
और जिन पारयों से इस विषय पी मनोवनानिव समता
प्रतिपा गइ तपाइमा युछ अनुभव हुआ, उन्हाने समय
गमय पर मुपे मवाचित प्रागाहन लिया। न महानुभावा में
मुमे एमा प्ररणा मिगे दि हम्नलिपि दिनान में विषय पर
और अपिर प्रm डाग जाए तपाइम विश्य की विधिवत्
प्रक्रिया का मुविस्तृत विवचन दिया जाए। इसी उद्दश्य म
प्रस्तुत पुस्नर कारपना का प्रपाम दिया गया है।
पाचारयणों म प्राय गत एक नाम विषय
पर गम्भीर गाज हो रहा है। मनर प्रयोग एव अनुमपान
पाप पा रहा है। पावाप्प हा विषय का पपान व गम्भीर
माहिर प्रापित हा घुपा है। यह माहि मूरत जमन एवं
पभाषाओंम है। यज्ञाम भी इस विषयमावाशी माहिर
सराप है। न देशों में यह विषम विषिष्ट नान र सम
पुष्टता पाप्त कर चुका है तथा मनाविनान गास्त्र का एक आव यक एव उपयागी अग मान पिया गया है। हैम्बग बोन म्यूनिख आदि कई महाविद्यालया म यह विषय प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है। परन्तु वहा के पण्टिता ने केवल रोमन लिपि का ही उपयाग किया है। जो मूल तत्त्व रोमन लिपि पर सिद्ध हो सजते हैं वे अथवा उस प्रकार के अय सिद्धात अय लिपि-लसा पर सामा यत लागू हा सकते हैं। इस प्रकार के विचार से मैंने हस्तपि विनान का उपयोग देवनागरी आदि उत्तर भारतीय लिपिया पर प्रारम्भ किया है। हिटीम इस विषय की कोई बादा पुस्तक प्राप्त न हो सकने म इस अनुस घान प्रयोग एव लेखन काय म असुविधाए रही हैं जिनको सुझाने का प्रयास मैंने क्यिा है सफरता कहा तक मिल सकी है इसका उचित अक्न पाठकगण ही कर सकेंगे। मेरा मूल प्रयास इस विषय से सम्बन्धित नान एव प्रारम्भिक सामग्री का सचय करना रहा है मौर आ रही है कि मह आगे आने वाले जिज्ञासु मनोविज्ञान के विद्वाना के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। पाश्चात्य देशो म हस्तलिपि विज्ञान का लक्ष्य जीवनो पयोगी व्यावसायिक, औद्यागिक आदि पक्षो म रहा है जिनमें मानव-स्वभाव के मनोव नानिक मूक्ष्म निरीक्षण की महत्ता है, जसे कि विभिन प्रकार के पदो के लिए प्रार्थी आवेदको का चनाव छात्रा के रिए गिभा सम्बधी सलाह नवयुवतियो एव नवयुवका के लिए व्यवसाय सम्बधी मागदान मानसिक स्वास्थ्य एव सेवाकाय म सलाह तथा बाल मनोविकार-सम्बधी परामा आदि । अत यदि भारतीय विगन समीक्षक इस विषय कारक्ष्य निर्धारित करके इसको गम्भीरता म प्रवेश करेंगे तो निश्चय ही विषय-परिचय एव तत्सम्बधी उपयोगिता अधिक सफल सिद्ध होगी। प्राय पिछ- पच्चीस वर्षों से यह काय धीरे धीरे अवानुकर चरता रहा है। इस काल म बहुत-स वितान महानुभावा शिका तया मनाविनान के वरिष्ठ अधिकारियो तया सहाय मित्रा में प्रासाहन एवं योगदान दिया है । इसरे रिए मैं अपना आभार प्रशित करता है। श्री प्रफुल्ल पर पानी भूतपूर्व प्रधानाचाय विपिनविहारी विद्यालय
झांसी तथा श्री एफ० सी० चौथिया वरिष्ठ अधिकारी, व्याव
सायिक परामा सस्था, महाराष्ट्र राय वम्बइ एव श्री रामचन्द्र
रिछारिया प्रचार अधिकारी, बद्रीय स्वास्थ्य मत्रालय का
विशप यामारी हूँ । इनके निर्देशन प्ररणा एव मह्योग में
बिना सम्भवत प्रस्तुत काय सम्पन नहीं पाता।
श्री राजेन्द्र शर्मा का भी मैं आभारी जिहोंने नताजी
सुभाषच बोम पुरषोत्तमदास टण्डन, राहुल सात्यामन,
सरलार बलममाई पटेल और ग्वीनाथ ठार आदि की
बहुमूय हस्त लिपियां प्रदान कर इस पुस्तक का महत्त्व बढाने
में मेरी सहायता की। महात्मा गाधी व पत्र के लिए मैं राजपाल
एण्ड स स दिल्ली या आभारी हूँ।
परमावश्यक आमार श्रीमती गोला सपूजी, निदेशक
राजकमर प्रकाशन प्रा०लि. को भी है जिनकी उदारता से
यह नवीन विषय प्रवासमा रहा है।
सामी
-~-बालकृष्ण मित्र
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सूची
६
हस्तलिपि विनान
२
हस्तलिपि योर व्यक्तिव
३
हस्तलिपि विनान का विकास
६
मनावनानिव विश्पण के उगहरण
४१
५३
व्यक्तित्व या विरेपण
६
अगर कम गिम जाए
६८
रिसावट वा मनोविनान
विाण रिपावटें, कुछ व्यक्तिगत अनुभव
६
हनापि दिनान से उपयोग
१२४
१४१
विविपरिपाव
परिशिष्ट-2
पुग्नरोकी गूची
परिशिष्ट-२
मरपामापी गूची
परिशिष्ट-३
देशोदीप मौगिर पपन
१४३
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हस्तलिपि-विज्ञान - हस्तलिपि विमान कार के स्वभाव व्यक्ति व और मानसिक अवस्था से सौधा सम्बध है। इस सत्य का अनुभव हम सब निय ही करते हैं। रिसने वाग की रिसीवर पहचानी जाती है। उदाहरणाय जमी मेरा ग्विावट है वसो आपली नहीं है। और जमा आप रिसते हैं वमा कवर आप हो लिखत हैं। आपको रिसावट वा अपना मौरिक स्प है जिसे आप परिचित व्यक्ति भी भांति पहचानते हैं। रिसावट ये पोडे से चिह्नों अधोगामी अप्रगामी अध्वगामी वत्राकार सीधी रंगाए कुछ विमग और विराम का गवरिखने वाले अपने विशेप ढग से लिगत है । एमा यया हस्तलिपि विमान को उत्पत्ति इम क्या? मूचक प्रन के सहारे हाती है । जसा आप रिमते है आप वमा हा क्या पिते हैं ? आप इस विपटग मे गिाने में अवय हो कोई रहम्य है। य रहम्य वा मनौवज्ञानिक विपण परना हम्नपि विनान का ध्यय है। हम्नलिपि विनान से रिसने वाल स्वभाव मानमिव गान तथा चरित्र से ऐमे विपणा का पता पाता है जो उस व्यक्तित्व का निमाण परत है। यह विद्या कोई भूत भविष्य बनान यानी यातिष विद्या नहा है परन् विनान पर आधारित मनुष्य रे चरित्र का दपण है । इगो द्वारा हम यह दमत है कि अमुके रित थाम्नय में क्या है। पितन गहर पानी में है। बात यह है कि मनुष्य य स्वभाव में, मन म तया चरित म जो भी नियो भरी-बुरी प्रवृत्तियो प्रधान होती हैं वै मनुप्प पीयर किया पर अपना प्रभाव अपना छापा मारता है। प्रोपी अयया अगान प्राति का मनप्प जिग विप प्रारम परवा पिता है अपवा विशप हाव भाव म वान चात भरला है उसी प्रसार यह पिप ग से घिराप चिहाँ रानों घुमाव बिओं मात्रामा द्वारा स्मिता भा है। उमा अनरण वाप्य करता है कि वह अपनी हस्तानी में अपनी विशेषता की छाप लगा दे। इस प्रकार से भिन भिन्न मानसिक अवस्था में लिखे गए पत्रो को देखते हुए एक ही प्रकार के चरित्र-गुण वाले भिन्न भिन्न व्यक्तिया की लिपि को देखते हुए इस विद्या को वज्ञानिक रूप मिलता है और हम विश्वासपूवक कह सकते हैं कि अमुक प्रकार की रेखन गरी वाला व्यक्ति अमुक प्रकार की मानसिक विशेषता रखता है। अमक प्रकार का आचरण करता है। उदाहरण के लिए कह सक्त हैं कि विभिन प्रकार के व्यक्ति जसे कि आत्म निर्मित व्यक्ति उत्साही यक्ति लोभी तथा कायर यक्ति चचल यक्ति अपनी विभिन्न लिखावटें लिखते हैं। इन लिखावटो पर उनकी सामयिक एव मानसिक परिस्थि तियो का प्रभाव पडता है। जसा कि भय घबराहट क्रोध दुख निरागा आदि उत्तजना की अवस्था म लिखी गई पक्तियां तथा अक्षर अपने स्वभाव के अनुरूप विभिन्नता प्रदर्शित कर देत हैं। जो मनुष्य स्वभाव से गम्भीर और स्थिर चित्त है उसे अपने उत्तजना जनित आवा तथा घबराहट को रोक रेने की आदत होती है। उसे अपने मन पर अधिकार होता है। उसको आत्माक्ति दढ होती है। परि स्थितियां उस हिला नहीं सकती। अत लेखनी भी उसके अधिकार म चलती है। उसके बनाए हुए अक्षर स्थिर रहते हैं। वारण क्या है ? उसके भावुक्ता के आवेग से उसकी आत्मशक्ति की मात्रा कही अधिक बरदान होती है। भावुक्ता में मनुष्य क्या नही दे डालता क्या त्याग नहा कर देता है तो क्या वही व्यक्ति लेखनी चलाते समय स्याही अथवा स्थान की कजूसी करेगा? उसकी लेखनी म स्याही उसकी भावुक्ता के प्रवाह की तरह प्रचर मात्रा म बहना स्वाभाविक ही है। भावु पता प्रधान यक्ति की लिखावट में परिवतनगीलता की मात्रा अधिक पाई जाती है। इसम आत्म निर्माण की शक्ति निबल रहती है। आध्यात्मिक वत्ति वाला व्यक्ति अपने मन को अपने विचारा को ऊपर अनत की ओर उठाने का प्रयत्न करता है। इसलिए जब वह लिखता है तब उसके अक्षरा का ऊपरी भाग अधिक स्पष्ट और उनत होता है । अपने आपका कुछ विशेष महत्त्वपूर्ण समझने वाले व्यक्ति अपनी बात को असाधारण और आवश्यक जोर देकर कहता अथवा दोहराता है । कारण यह है कि उसका अन्तमन अपनी दुवरता को जानता है कि उसकी बात को साधारण ढग स वह महत्त्व नहा मिलेगा जो दि वह प्राप्त करना चाहता है । इसम आत्म विश्वास की कमी है। यह व्यक्ति जब ग्यिता है अथवा अपने हस्ताक्षर करता है ता उमो नीच रखना पर विशेष दवाव देवर एक रेखा अथवा एक स अधिक रेखाए साच दता है। एमा का अय व्यक्ति बड आकार के अक्षर बनाता है । दखा गया है कि अधिकतर एस व्यक्ति अपने अक्षर बडे आकार दे तथा अस्पष्ट बना दत है । य आचरण विसा प्रकार की विपणनाव चिह्न बनाने के लिए हात है जिसम पारका का ध्यान उनकी आर विशप रूप से आकर्षित हो सके । मानो वह चिल्लाकर बहता ह कि दखिए श्रीमानली में है। मैं यहाँ हूँ मुझ भी देखिए । १४ हस्तलिपि विज्ञान मेरे महत्त्व की ओर ध्यान दीजिए। इस तरह म हम दबने हैं विलिसावर मनुष्य वो एक ऐमी क्रिया ह जिस पर उममी मानसिक अवस्या का तुरन सप्ट एव गुद्ध प्रभाव पड़ता रहता है। इस प्रकार मनावनानिर दपिकोण स इस विषय का अध्ययन तपा युद्ध वजानिक आधार तयार होता ह जिस पर मह नहीं दिया जा सकता। मनुप्यक प्पवितगत मूल्यारन उसकी वास्तविर पहचान बरने का मबम अच्छा और मही माध्यम उमरियावर ही ह । मनुष्य अपना काम निकालने के लिए एक बार अपना भाषा वाणी हाव भाव मुस चेष्टा यागिको ममयानुपूर नाटकीय बनाकर आपको साथै म डार मरता ह परतु अपनी रिसावट में रह अपन अन्तरण को मनान प्रेरणा का स्पष्ट होनस नहीं रोष मयता ह इससे पहचान हानी ह दिग्मिने वाध्यस्ति रिम प्रसारका व्यक्ति है। क्तिने गहर पानी म ह । आज म प्राय ६० वप पूर्व प्राम में प्रमिद तिहामवार पादरी मिको ने इम विद्यापी मोजबी थी और इस विषय अध्ययन की नीव हारर थी। उन्होंने बहुत से प्रयाग किए थे। उनके आधार पर रिपि विनान में अनेक मूर मा निर्माण किया या। तदुपरान्त नम से पतिपय तथ्य प्रामाणिक आधार को प्राप्त कर सके । अय अनर प्रयोगात्मक मनोविज्ञान की पौटी पर मरे नहीं व्हर सके।पारी मियाय वा पूराप व अनेर विरान विभिन्न परिस्थितियों म इसकी छानबीन में प्रयोग करते रह । मम अनर दृष्टिकोण जम शिरीर शास्त्र, সনাৰিদান পাপ বল পাস শিপু বিঙ্গান ও আসি মিলি যা ঘ। मन १८९५ से १९२० तर पास जमना, इटली स्विटजर व आस्ट्रिया म इस विषय पर बह-बड़े गम्भीर अनुमपान होत रह: fT विनान दिन हाकार प्रापर मनायिभान डाफरमायर दागनिर गवारगम द्वाराइम विषय की नीव मजवत और विधिवत् हाती गई। तदुपगन डाक्टर रावर मोहन और हन्म स्पायो नमो इम क्षेत्र म विप काय विमा ह । आज दिन भी रिचाह एडन हैरी आ टेलर एरिए गिंगर आदि बहुत से पूरोप और अमगेवाय महान् विनमा प्रचार और प्रचार व पाय म रग हुए हैं। इस विमा सबम अधिर प्रचार जमनी महुआ। द्वितीय महापुट के पदर पोन हेम्बा भाग म्यूनिक एपरिगया अनर महाविद्यालया मग विधायी शाहाने एगी पी। जो युद्ध के बाल म गेम्टापो व पि वारणोंग पर दी गई हो। युररे उपरान पुन इसरा पटन-पान वहीं प्रारम्भ हो चुका ২। মা বাবা মার কথা যাবি খুলে প্রথা পৰাৰ স্বণ महाला है। इसलिए उमनानामे अपना उन्नति और राजनीति का विशिष्ट मग मनापापही पाहिजमन अपन रमचारियों व विशिष्ट युनाव मदतन मन रहता है। अपनी म जास्तु रमपारीपाना बहुत ही महत्व माना जाता है। एनिमि मिान करने का प्रयास करता है और दूसरी तरफ अपने भाग्य का कोमने म लगा रहता है। कभी वह देह वी आर्थिक दशा को भग-युरा रहा है और अभी राय- प्रणारी एव उमकवणधाराम नाप निराना रन्ना। उमा जीवा मिमी प्रकार स यतीत होता जाता है। पश्चिमी यूरोप के देश और उमरियान इम विज्ञान का प्रयाग अपराध की छानबीन और अपराधी प्रति का सुधारन के काम म भा दिया है और जहां- जहा इसको अवसर मिला है टम सफरता मिली है। यायप्रियता उत्तरदायित्व आत्मसम्मान की भावना हर निचय उदारता सहगीरता और धय प्रत्यानि स्वस्थ रक्षण और इस विपरीत कपट मत्सरता आडम्बर वायरता इत्यादि हीन ल पण प्राय मानव समाज मे एसे साधारण अपितु यापक - पण है जो यक्तिगत आचरण का सचाग्न करत हैं। पर तु वहुधा यह मुख्य और जाव या रक्षण होते हुए भी तब तक अपन ययाय स्प और मात्रा म दृष्टिगोचर नहा होत जब तक यस्तिगत स्वभाव का गातार और बहुत समय तर गम्भीरतापूवर अ ययन न पिया जाए। ये स्वस्थ अथवा हीन श्रण नाचरण के द्वारा हा दृष्टिगोचर होत हैं। हस्तलिपि यक्तिगत आचरण का छपा हआ रिकाड है। ताजमा एप वार छप जाना है उस मिटाना जयवा बना सम्भव नही हो सस्ता और इसरो ममय समय पर पुन निरी रण बगिए प्रस्तुत किया जा सकता है। हस्तलिपि विनान नूतन अवश्य है पर तु अनुम धान और प्रयोग के क्षत्रा मे यह अपनी उपयोगिता पूणतया और बार बार मिद्ध कर चवा है । पिछ? महा- युद्ध म अमरिका का सरकार ने अपनी सेना करिए विश्वस्त पदाधिकारिया का चनाव और उनकी नियुक्ति जम बठिन काय का पूर्ति के लिए इस विद्या को महत्त्व पूण स्थान दिया था। हस्तलिपि द्वारा उच पाधिकारी अपने विभागा में नौकरी के लिए चुन जान वार पतिया की उपयोगिता या अनुपयागिता जान सकते हैं । सरकारी नौकरी म उत्तरदायित्व का बहुत ऊचा स्थान है और कौन सा व्यक्ति रिस स्थान गिए उपयुक्त है यह बहुत वा पान है यदि मनुष्य के यक्तित्वक महत्व का सम्बध उसा काय स है । इस प्रश्न का हर करने का अभी तरको विश्वसनीय साधन नहा है । यति सही आरमा सही पर पर नियुक्त हा सब तो हमारी बहुत सी पमा समस्याए जिना कारण जीवन कग्नि हो रहा है सुरझ जाए । हस्तलिपि- विनान टम क्षममा सत्या का हाय वगन लिए तयार है। १९ तिमिलान
हस्तलिपि और व्यक्तित्व
।
लिसानट मे मौलिकता
हस्तलिपि या गाय व्यक्ति माधा मम्बप है जोरम मय का अनुभव हम
राब नित्य हा परत हैं। प्रपर पक्ति बोरियावर वा एव जपना निरागम्प
हाता है। "मी मयामाचा जाच यह - विभत्र निवनवा वाग्विाव अग
मग पचाना जाता है। उपहरण व निगा वह मान जिमी मरी विावर
है यगा आपरी रियावर नहा है। जमा मैं बिना हू वावर मैं हा रिख मकना
है। जमा आपत्ति है यमा पर आप हा रिवन हैं।
गिपाट वाम मोरियताराम भगति र महज नी पहान
न हैं । या पान इतना मज है जिननी दिदिमा भी परिचित व्यक्ति का
थारतिग उमा पदमान ना। परिचित पनि अपन स्वर चार द्वार एव
बय वारणा ना पहनान जात है। परन्तु इस प्रकार व व्यवहारा का कार
स्थापित नहा है प्रसारक बनेगाना व्यक्तिगत वहाग का अपवा
अनानक स्तिग्न कारणों मम रिया भाग म्याया मान प्रमाप
सया प्रमाण ना है। यति नहा मान जा माना परन्तु हिवापर
इन गग भिन्न है। यह निपातिया आचरामा हा व्यक्तिगा
थापरण है जगारि उमरामर चरन सिग्न वा निजाग आपिन्नु गम
एर पिसपना है यह इमानिनरनि म्यापोरन पिया सामन
है। ममग वार परम्परामप्ट राग्मिा है और हम af
है। ममय पान पर निगमग गा एव प्रमागिय अनवानर
गिगावरें प्रानुन वी मरता है। मा पचना जा माता- 1 मरिमा
तिमी पिचाना जा॥17॥T f7 - जिव
1
आपके पास कोई पत्र आता है तो रिफाफ के ऊपर रिखे हुए पने को रिखावट से हा पत्र दिखने वार का पहचान हो जाता है यदि उम यक्ति या रियावर म परिचित होत हैं। एक या विद्यार्थी अपने सहपारी जय विद्यार्थिया को रिखाव प'चानते हैं । व सब अपन अयापका का रिखादरें पहचानते हैं। अन्यापरण भी अपनी कक्षा मव विद्यार्थिया की गिवावर पहचानत है । आप अपन माय म काम करन वाग को निपावर पहचानने है और क्मिी समय मा उनम स विमो एर को देयने ही कह उठते हैं कि यह जमुक यक्ति न रिखी है। इस तरह से हमरा बिग्वाम कर रन का अवसर प्राप्त होता है कि सब ग्विन वा का रिखावर अपना निजी मौरियता रपता हैं और रिसावट का उम+ रिसने वारे स इतना सीधा सम्बध है कि नाना का एक ही मान उन म हमको रिमी प्रकार की पठिनाई नहीं होता। टम प्रसग म एक और सक्त असगत प्रतान नहा हाता । राजकीय स्तर पर भी निखावट की मौलिकता को मायता प्राप्त है। वहुधा स्थान प्राप्ति लिए आव-न-पन जार की अपनी रिसावट म ही मगाए जाते हैं। अनर आवश्यक लेरा हस्तनिपि म ही लिख जात हैं। और ग्मिी भी स्थान पर जहाँ व्यक्तिगत जधिरार का प्राथमिकता देना आव यर है अपने हाय से ही हस्ताक्षर करना पड़ता है । वाम पास्ट आफ्मिा तथा क्चरिया म जहा कही भी बिमा प्रसार मान देन हाता है धर्ग निजा हम्नाभर का स्थिराा का दिएप मर व लिया जाता है। रिखावट क विषय म ये मामाय विचार हैं। जमावि हम सब अपने "यरमायी जावन म तथा परम्पर-व्यवहार म नि य ही देखते हैं अनुभव करत हैं तथा उनका मानन मा हैं। रिसावर मम्म पी एम प्रमार व जनन उदाहरण हम मिग्न हैं नया व प्रस्तुत भा किए जा मक्त हैं । परतु वनानिर व रिए इतना पयाप्त नहीं है । सस्ता है रि यह विचार सरसरी तौर पर सामने लाए हैं। गगमन पक्निया का अभित्रि म तथा गुणलाप निस्पा समागेवका की हरि मग "पार की लापन हा गगती है और यह याययुक्त भा है जर तर म रमो गमयन म पर्याप्त निश्चित प्रमाण नहा मिर जाए । घरत-मा बातें जा-मार मन न पन हाता है व हमारा अपनता के कारण भी हो साती है। गम्भार मानमिा परिपावता या है कि किसी भी धारणा का मान रन से पहल उमा विपप म पपात छानबान हा जाए और उमा मयुक्त प्रमाण मिल जाए। अन बनानिव परति मानन बार प्रनावान विचारया न म पिपय पर अना नया विभिन नरहक प्रगति और यह मिद्ध पियामि ग्गिावर की मौविता या कल्पना निराधार नग है। माना स्पष्ट जाधार है। विशमान ग्यिावर का मौग्यिता व मूग्नत्वा का पथकारण पिया और याक्तिया का गिगावार चिह्नाका मिगन करा पिया कि कोई हस्तलिपि विज्ञान भी दो ग्यिाउटें धूमप में समान नहीं हैं । इन महम्नलिपि विनान वे जा अनर विरापास्याति प्राप्त कर चुके है उनम म हैन्न TATRI RT नाम अग्रगण्य है । इहान अपनी पुस्तक म अपन तसम्बधी प्रयोग का बन ही गेवर वणन लिया है । वह गियत है हम्नलिपि विज्ञान इस मूर सिद्धान्त पर आधारित है कि प्रयक अवेरी लिगरावट अपना निजी अनावी मोल्वि विलक्षणता रखती है। यह भी मान लिया जा चला है कि हस्तरिपि पर लिपन व साधन जम रि रसना का नवानता का प्रभाव परता है । विविध भाषाआ के अक्षरा सिविन स्थापी बाग आपार विभिन्न होते हैं। अन इनरामी लिपायर की बनावट पर प्रभाव पडता है ।पर तु हम्नरिपि विनान का यद् अधिक्त वचन है कि हस्तलिपि की एमी मौलिर विविधता का मुख्यन भूरभूत पारण लिखने वार व्यक्ति के व्यक्तित्व की विचित्रता और अनूटापन है। तथापि प्रान यह उठता है कि रियावट बनान वाल तत्व क्या इननी লঘি ম ম ই ক ন ম মাস ম বন ফুহ হি ই সনদ ও एक दूसर से पूणन विभिन्न एव मोरिय हो जाते है। इस प्रकार की पटिनाच्या या मुशान गिा समस्या का साधारण रूप समा परारण रिया ना मरना है। इस समस्या यायिण वरन 7 मुख्य प्रश्न रह पता है कि हम्नलिपि म रिमी व चिह की बनावट व अधिव-म-अधिर तिन विभिप एव प्रसार हा मान हैं ? ऐमा पराभण परनराि निम्नलिगिरा विधि अपनाई गद्द था दामो मपि लिये गए जिन पर पना लिया हुआ था।प्न पिपापा परग wc'अगर । अलगमा यि गाया यमाचा विपाrय गधा य पुनरिगारटा उदाहरण माया (1) और (२) ५ प्रस्तुत विप गाए हैं। इस प्रकार से हम हनलिपि या एर अब रिहा म्पा परदा गौ विभिन नमूना म मिला है। पाटर इन चिहाना मावधानी ग निरीण पोहैं। निको बनारर या ए-दूगर स मिलन पर समत हैं मुराबायर गवत है । मा परन म उर पता चला fr मा भी दाचित पूषन र-दूगर म नहीं मिटत या उनम समानता भी नरीमाई नी(मा यह पर दना आय यर है शिगिराफा पर स गिय गर य बना बिहजपनी HिTAR आपार पर नरी fEmपाय गहन तया रामाविक रूपम भाा या पीपर मे ही वाटार सावित रिय गा५३) मस्त गार अनर उगहाणा या निरोप याग्नव म रोचर एप रपनामर है।नयागो पिताको बनाकर मजा विविधता है उगम स्पष्ट होता तिम प्रकाशाईनी एर चिह पर प्रसार गबन माना है। यह पिह प्रभावित मनी मास पौा मे तिराव ना हालिरि और परिणाय - न्याव रटता और अय रक्षणा से। कुछ चिह्न भाले का तरह ऊपर मार जोर नीच की तरफ पतर वन है कुछ चिह्न नाच आधार रया का नरफ आने हुए मार हो जात हैं । कुछ हिटत टरते हैं कुछ रखनी क सम दनाव से प्रभावित हैं। कुछ चिह्न सुगम तथा कामर हैं। कुछ माट तया वगैर है। कुछ महन मरठ सनी की गति स बन है । कुछ जरा की परिधि रेखाए स्पष्ट एव उपयुक्त हैं। कुछ अवर अस्पप्ट पहुए और भद्द हैं । कुछ जभर दाइ जार अरवा वाइ जार एक कुलावतार जस चिह्न से प्रभावित होते हैं। कुछ सशरा का जतिम रेया या कुरातार जस चिह्न स अत हाता है। कतिपय अक्षरा कानि तथा अन म कुछ अनिरिस्त रमाए जुनी हइ हैं जो कि यय हैं । कुछ अपरा का यकाव स्थिर एक मा है । कुछ जभर जपने झकाव म बार बार बटर रहे हैं। कुछ अक्षर सोच हैं । टूमरे हिरती हु हरियाटार रेखाला म हैं । कुछ सारा को रसाए नारदार हैं। दूसरे पर मिट हुए हैं। कुछ अक्षर बीच बीच म टट हुए हैं अथवा सभारे गए है। कुछ अन्य अक्षर पुन लिखे जान के कारण बाट म ठीक रिय गए हैं साध गए हैं। इस प्रकार के विवरण स विन्ति होता है कि रिखावट व चिह्ना के बहुत मे 7 तण है जो कि इस प्रयोग २०० उदाहरणाम मौगिक रूप में अग-अलग मिरते हैं । एस विवरण से यह सक्त भी मिरता है कि इस प्रकार की विभिन्न अनोषी मौरिस्ता स प्राप्त योग म भी क्तिना अनगणित अनूदापन जाता है। वितन प्रभार का विविध रिसाद मिलेगा सका गणित परन के लिए कई प्रकार से इन विविध रक्षणा का गुणन करते रटना परेगा। समय-समय पर मैंने अनव यक्तिया से पता गान का प्रयास किया है कि उनका ममझ म अनेक प्रकार के लिसने क क्तिन अधिक रक्षण हो सकते हैं। कुछ गा का कहना है कि य एव सौ स भी कम हाग । बहुत ही योड विचारक हैं जा कि इस प्रकार का विविधताआ की सम्या हजारा तर मम्भावित रहत हैं। पवर एक ही व्यक्ति एमा था जिसने अपनी कल्पना पचास हजार तक पहुचा दी था। कुछ दप पहर मरे मित्र एव सहयागी जूम पपू जामिन न भी इसी प्रकार का प्रयाग किया था और बनाया या कि उह ए मा एमा यक्ति नहा मिग जिमन गिवावट व प्रकारावी सव्या दम हजार स आग कल्पना का हो। में यह ममम्या अपन उत्व टिन पारका को वियागारता पर हा छोटता । उहें यह जानन के लिए रिपन व विविध कोणा का मख्या या अक्षरा की विविध रम्बा विविध चौता म पनी व दगाव व सराका परिघिया म अतिरिक्त चिह्न एव जनमानक प्रारम्भिक उतार चगव एव अन्तु व कुशवाय गाव म तया रखामा उतार चगवस गणन वरल रग्ना परेगा। अन इस प्रकार प्रग विचारगार पायजा मि हस्तरिपि विनान वा वानियता माग्ना चाल अपन स्पय व अनुभव नारा प्राप्त कर २२ हस्तलिपि दिनान सक्त है। लिसावट मे परिवतनशीलता रियावद बरती रहता है। प्रया व्यक्ति जाति एवं तरफ अपनी मौलिक ग्मिावट रिखता है मग तरफ उन समय-समय पर वर भी दता है। पर लोग तो कई बार अपनी रिपावर बल दत हे बोर म्वय भा उसको पहचानन म पग्निार का अनुभव करत हैं। वास्तव म यह कहना उचित नहा है कि रिखने वार अपनी रिवादट र दत हैं। यह कहना अधिक महा हागा विदन व्यक्तिया की रिवावट ममय ममम पर बना रहता है। यह परिवतन खन की सामयिर मानसिर अवस्था य अनुसार हाता है। कभी आप जन्नाम है और घमीट कर लिख दत है। कभी आपली मानसिक अवस्था अनिश्चितता की उरयन म है उस समय सबनी निश्चित म्प स आग बटन में अममय लगती है। एमा दाम लिखावट अस्थिर रहती है। जगह-जगर पर मादियां होती हैं। रखनी सती है -छांट है और कागज पर एक एमा उज्या हुआ चित्र बनता है जिसस काई भी निश्चित निप्पप निकारना सभव नहीं होता। अन हम यह महज हा दखते हैं शिव का मानसिक अवस्या का प्रभाव ग्विार पर रहता है और एक का अवम्या म परिवतन दूसरा अवस्था को प्रभावित करता है। मानसिक अवस्या का मम्ब ध व्यक्तिगत स्वभाव तथा चरित्र यो गीत म भा है। इसलिए यह वह्ना भी असगत नहा होगा कि ग्विावर म परिवननगीना व्यक्तिगत म्पमाव एव चरित्र विन म सम्बन्धित है। mमा करन हैं मिलियावट शियन के भौनिक माधना पर निभर रहती है, जग रोज प्रयाग में आन वागे रसना कागर मज वटन की गला प्रमाण आनियति भौतिक परिम्पिनियां एव रिपन व माधन पूर्ववत् रहें ता मनव है मिरियावर अपन पूर्व म्पपा तरह हा बनी रहेगी और उमम परिवतन नहीं आएगा। यर मरी है कि जब यापा पड होरर अयदा अपरिचित गयनो में अपया घरती हु गाडा के नियम वार गिना पहगा ता निश्चय ही आपरागिमावरम परिवतन आ जायग।सभव है कतिपय ग्पिन वागम चरती हारेगाहोम बटरर सिनहानहा धनगा।परनु अनभव म यह दया गया है कि ग अपनी महल भौतिर गुगमता महिनावारी हरिपावरिया मान हैं और यह मानते हैं रि मानसि पगिम्पिनि का प्रभार रिपावर का बनावर पर भौनिए पम्पिनि म अधिर है। ममान सपन-गविधा हान ए भारिपावर परिनन मानपि अयम्पा म परियन आन पारण महाही जाता है। 1 तरिस्।ि एतनिपि और व्यक्तिय २३ । स्वाभाविक मानसिक अवस्था का स तुरन गिटन म रिखावर म परिवतन आता है। स्थिरता जाती रहता है। जब चित्त स्थिर नहा हाता ता सनी को ग्रहण करने वाले और उसको सचान करने वारे स्नायु भी स्थिर नहीं रह पाते। इम प्रकार की परिस्थिति का उदाहरण हमन पर दिया है जबकि हम जला म घमीर रिखते हैं अथवा अनिश्चिनता का परिस्थिति में नटन जटक कर लिखते हैं। खद काध आवंग डर की अवस्था म सनी अपनी स्वाभाविक गनि प्राप्न ना करती। निश्चित मन निश्चित कायम पर नहा चरता । इस प्रकार क विचारा का जनभवा को पर हस्तरिपि विनान का विपिन आग वरना है और रियन वाठे पक्ति की मानमिक अवस्था म परिवतनगीरता के तथ्य एव उसी माना की जाच करता है। पचर बुद्धि वार यस्तिया के स्वभाव म परिवतनगीलता स्वाभाविक है । उनक मन की चचलता की माता के ममान ही उनकी रिखावट म भी चचलना रहती है । जसे छोट बच जर कम से सिन बटन है तो अनक प्रकार अभर बनाते है । उनको ग्विावट स्थिर होने गता है। गन गन जस उनम गभारता स्थिरता एकाग्रचित्त हान का वत्तिया पुष्ट हान रगती हैं यह सचार कुछ बच्चा म जल्दी होन लगता है और दूसरा म कुछ दर से धीरे धारे हाता है । प्रखर वृद्धि वाले बच जल्दी ही अपनी स्वभावसिद्ध मानसिक चचना पर काबू पा रेत हैं। दर विचार वारयक्तिया में इस प्रकार की चचलता का अभाव रहता है । उनका यवहार लाचार विचार स्थिर रहता है, जिमम अस्थिरता का स्थान नहा मिरता। एमे यक्ति अपनी मानसिक गस्ति का प्रयोग परत है। अपनी विचारधारा तथा कायक्षमता म विचम्ति नहा हात । वे भावुक्ता क आवग म बह नहा जाते । एस"यक्ति अपन निती चरित्रवार स अपनी मानसिक तया गारी रिक परिस्थितिया जपन अधिकार म रखते हैं। म पस्ति जिम परिस्थिति म भाठिखत हैं स्पष्ट और स्थिर लिवत हैं। एम भी रोग हैं जो चटनी नइ रेल्गारिया म नित्य ही रिसत है । यह उाका दिन चया है और य िव स्थिर और स्पष्ट ग्विावट न रिख तो उनका नाम ही नही चल सकता जग रगानिया व गा| चा भौतिक परिस्थिति अनकूर हा अथवा प्रतिकर राग गा का अपना मानसिम परिस्थिति इतना स्पष्ट करनी पता है कि वह अपना यात्रा का डायरी स्पष्ट रूप स रिखता चला जाए और उमा उच्च अधिकागजव चाह उमा स्पष्ट रूपम निरीक्षण एव अवरोरन कर सर । चरतारगारी म बठकर खिन मनपर्ने गरीर एव हाथ कोरम तरह स सभालना पना है कि जिसस वह कमन्स कम हिर। एकाग्रचित्त म विमा भी कायक्रममा रह्न लिए आवश्यक है कि भावुक्ताप्रधान आवास पर अधिकार पारिया जाय । यह क्यन रिखावट कनिए - २४ हस्तलिपि विज्ञान उतना हा स य है जितना वि विमी दूमर कायक्रम करिए। परिवतनगीलना रिखावर का एक अत्याज्य लपण है परतु मौरिकना रिखावर वा सवप्रथम लमण है। समय समय पर मवत्री ग्विावर परिवतन प्रगित करती है काइ कम कोइ अधिा परन्तु क्मिी भी हारन म इतना नहीं बरल जानी पि उमको पहचाना न जा मो। यह पग्वितन इतना अधिक नहीं हाता कि वह अपन मौगिक प यो वा दरियाव बान पर भी पहचाना जाती हैं। यदि ऐमा नहा हाता ता उसका मौलिकना का पहा -यण जोकि स्थिरता है स्थिर न रहेगा। रिचावट म परिवतन हात हुए भी मौरिकता बनी रहन का कारण है रित्रावर भौतिक अगो को बनावर जम कि मोवी रखाए कोण गोलाकार पाए मालाए एव विदु आदि। इनम मे चुछ एम भा हैं जिन पर परिवनन का प्रभाव कुछ कम होता है और दूमर एम हात हैं जा था से प्रभाव से ही बन गत हैं । इनम म पौन म स्थिर हैं अथवा कौन म अमियर हैं य अपनी-अपनी निजी रिखावता की बनावट म मम्य प रयत हैं। रिसावर म परिवतनगीलता एवं छाया र ममान है, जाममय-समय पर पियावर काम्प प्रभावित करता हुर भी मूर रिसावट का प्रभावित नहीं कर पाता। यम विपय म दूमग क्यन यह भा है कि प्रायर यक्ति ने स्वभाव में कुछ म पण हात है कि जो विभिन्न परिस्थितिया म ममान में स्थिर रहते हैं। दूमर कुट रयण समय तया परि स्थिति के अनुक्र प्रभावित हाते रहते हैं। यह मनुष्य की उम बत्ति की आर मात परना है जिमम वह समय तया परिस्थिति र अनुकूल अपन नापसरावर रता है। नई परिस्थिति म रहना तया उमम राम उठाना मापता है। परन्तु अपन आपका रिमामा परिस्थिति ममा नाता है। यपना निजी यक्तिव बनाए रखता है। य उसर व्यक्तित्व कहा जा माहार रहन हैं। य उमा म्याया स्तन हैं। म पपन पाम्पट हायर हम रियाय वा बनावट म मिली है जिना हम मानन म पग्निाई नहीं होती कि गियावर गार यो मानमित्र परिस्थितिया अनुगरण परती। और यह उतना हा पजार मचतुन मृमपाही तया गाला है जितना कि सपियन वाल व्यक्ति का अपना निजावितव हाता है। गरा और समापा-शिमावर में मौगिता का विववन परल दुर दामन हमार गामन मान है जारि गरा-युक्त प्रतीत हात हैं। (A) लिम्पायर पी भालपानी-विमा दूमर पति या मोबिगिया दर दना जागाजा है। पर पानून के विशद है और एरडनीय अपगपना हा सरना है। हगिपि विनाविप म या प्रश्न उठता है रिजव रिमा गिावट पालना सहा नरन वीना मरती है कि पति रिता इमर मातिमा एससिपि मरम्मनित्य ।
7 लिखावट लक्षणा एक मी बना दे ता उममें मौग्यिता की जोकि रिसावट का प्रारम्भिक तथ्य है थप्ठता कहा रही इम प्रश्न का उत्तर दने के लिए हम लिखावट को मूर रचना का विवचन करना पडेगा। साधारण मौगिक रिखावट की रचना म रमनी स्वतत्र गति स चलती जाती है। इसमें स्वच्छ रता है और गति भी है। परतु गढी हुई रिखावर की रचा म परिस्थिति विपरीत होती है। उसम न म्ब उता है और न गति । यह चिह्न प्रतिचिह्न सावधानी से गरी जाती है । एमी गिवावट को हम लिखा घर नहीं कह सरत। लिखावट गढन वाग पवित जिम लिखावट को नकर परता है उसके प्रत्यक चिह्न को वह सावधानी स और अग अलग बनाता है । इसम रवनी चित्र वत बहुत धीरे धार और सावधानी स बार बार उठा-उठावर चलाई जाती है । इस रिसावट को बहुत सावधानी स तथा वह्ण-यत्र (आतगी गा) स अथवा अय वज्ञानिक विधि स निरीक्षण करने पर पता चलता है कि लिखावट गटी गई है। गढी हुई जालसाजी की लिखावट तुरत पहचानी जाती है। अत इस रिखावट म जालमाजी दिये जान के कारण लिखावट वे मौगिक तथ्य को थेप्ठता म कमी नहीं आती। व्यक्तिगत रिसावट से तात्पय स्व उदएव गतिगाल लिखावट से है । इसम अविच्छि नता का प्रवाह रहता है। यह लिसावट अनिवाय रूप से मौलिक होती है अत हम स्वय देख सकते हैं कि लिखावट का प्रथम तथ्य श्रष्ठ है और इसम क्मिी भी प्रकार का गायुक्त प्रन नहीं उठता। वास्तव म हस्तलिपि विज्ञान लिखावट की जालसाजी की जांच के बाय से कही आग बना हुआ है । इससे जालसाजी करने वाले 'यक्ति के व्यक्तिगत रुपण तथा जालमाजा करन के प्रयोजन तर का पता लगाना सम्भव हो सका है। (ब) रिसावट की परिवतनगीलता के विषय म-हस्तलिपि गितान के माध्यम स चरित्र निर्धारण करन के विषय म बहुधा एक प्रश्न और सामने आता रहता है । एमा कहत हैं कि रिखावट वरती रहती है । कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं वि व अपना श्यिावट विभिन प्रकार सखि सक्त हैं । फिर ऐसी रिपावटा म मनावजानिक विपण क्स क्यिा जा सस्ता है और उनस निर्धारित चरित्रा क्न विम प्रकार म वि वमनीय मान रना सम्भव है। वास्तव म यह प्रान हनिपि विनान व मूर तत्वा को पुष्ट करता है जमा कि हम गिमावर व विषय म पहा पर चर हैं। पिर गिमावट म यति स्वाभाविध परिवतन गीता का लक्षण न हो तो मनावनानिव धानवान + भिाध्यम हा न मिर। परिवननगीग्नाम ही मानव का पतन अवस्या वासरत है उमा जडता मनग। जिम प्रसार से व्यक्तिगत मानम चाता है माचता है विचार करता है आचरण नौर परस्पर-व्यवहार हस्तलिपि विज्ञान करता है उसी प्रकार से उसकी लिखावर ममय एव परिस्थिति के अनुरूप प्रति हाती रहती है। लिखावट का भौतिक आधार प्रत्येक भाषा का लियित रूप हाना है। जसे अग्रजी भाषा रोमन अक्षरो म लिपी जाती है। हिती भाषा देवनागरी लिपि म रिखी जाती है । मराठी भाषा भा देवनागरी म ही है। गुजराती भाषा भी देवनागरी स मिलती जुलती है। वगला व अपर भी बहुत कुछ इसी आधार पर मान जा मकन है । भन सय रिसित भापाओ म बहुत-सी बातें समान हैं। उस वाइ आर से दाइ ओर वारिसना मात्राए गाना अभग को मिलाना अनुम्बार विराम, अविराम आदि का प्रयोग करना। शिवना सीसन के लिए इन भापाआ का अपना एक निजी रूप है। स्थायी आयार है । अक्षरा के तथा मात्रामा आदि के निश्चित रूप है। ये स्थायी आकार छोटी पक्षाआ के विद्यार्थिया के निगन के लिए उदाहरण के रूप म कापिया म एपे हुए आते हैं । अध्यापकगण बहुधा वच्चा को इन पापिया पर ही सुरेय का अभ्यास कराने का प्रबध करते हैं। अथरा वी रम्याई और चौडाई भी निर्धारित है। माधारणत अग्रेजी के अक्षर चौथाई से तिहाई इच तर सम्म तथा चौडे लिखने का अभ्यास किया जाता है। इन बाता अतिरिक्त लिखावट म एमी भौतिक परिस्थितिया का ध्यान भी रपा ताता है जिनम मुरेप मुगम हा जाता है और नित्य व अभ्यास में बारका के स्वास्थ्य पर भी अनुचित दबाव नहा पडता । जम वि लिखन वठन की सही विधि जमीन पर हा अयवा डस्य या मज पर यथोचित प्रकाापी मुविधा सनी या सही तरह स पाना और घराना सपाई का ध्यान रखना आनियमी याने हैं जो मर लिखित भाषामा के लिए राग हैं। जब रिपा वाग व्यक्ति रिपन रिए मही विधि से वठता है तथा गिन म गाधना का उचित प्रयोग करता है तो उमर अगा पर यनुचित भार नहीं पहना । माय हा उमरा रियायः भीम्पष्ट स्थिर पद मुय्यरस्थिन वनती जानी है। गियन वा त्रिया ग परान पा नही होती और त्रिया के सफ'तापूवर गम्पन हान म आग्मिर मन्नोप मी प्राप्त होता है। अत भार पर है रिगने या त्रिया या उचित अभ्यासतिभावाय प्रारम्भ महा होना चाहिए। गिपना मागन बार विद्यार्थी यार या युवा गर पिपायर व परनिए दृप आधार पर गिा मोगना प्राराम मग्न हैं। अध्यापसगा भा गुपया या रसत हुए कार हि आधार पर हा अन्याम गरात है। गिन या तलिपि और परिवार अभ्याम होने पर प्रत्यक व्यक्ति अपना निजा गर्ग अपना लता है जिसका हम कहते है कि यह उसका मौरिक रिखावर है। निखित भाषा का विपण करने से विरित होता है कि मर मित भापामा म रिखावट के मूल तत्त्व समान ही हैं। जम कि रबाए खाचना । य रेसाए अधोगामी अग्रगामी अवगामी सीधी वनाकार कोणाकार, गोगवार हो जाती हैं। जहाँ जसी जरूरत पड़े और अक्षरो म जहाँ जसी निर्धारित कर दो गई हो। इसके जतिरिक्त मात्रा के चिह जग-अग निर्धारित कर दिए गए हैं। विराम तथा विसग नादि भी किसी न किसी रूप में प्रयाग पिए जाते है । यह लिखावट के चिह्न बनाते समय कभा लेखनी भारी हो जाती है जसे उपर स नीचे की तरफ रेखा साचते समय । कभी यह रेखा हल्ली हो जाती है उस कि नीच स ऊपर की ओर जाने पर । हस्तलिपि से मनावजानिय अध्ययन करने के लिए और व्यक्तिगत ती के सुधार के अभ्याम के लिए रिखावट के उपर दिए गए आधारा को जोति रिवा वट वे मूलतत्त्व है समझ ना आवयर है क्यानि हर बार इन मुग्तत्त्वो से ही काम पडता है। लिसावट का मनोवज्ञानिक आधार जमा कि हम पर कह आए है प्रत्यक ग्विावट सीखने वाला विद्यार्थी लिखने का अभ्याम ही जान पर अपनी निजी गती अपना रता है । एसा क्या हाता है? हस्तलिपि के मनावनानिक अ ययन तथा अनुसघान का प्रारम्भ इस छाट-स प्रानस होता है। आपनी ग्यिावर वी गली विचित्र है । अपनी निजी है मौरिव है किसी दूसरे स नहा मिनी एगा क्या है? आपके टस विशप ढग स ग्खिन म यवन्य हो वो रहस्य है । म रहस्य को खाज परना हस्तलिपि विनान का सभ्य है क्याकि यह वि'वाम किया जाता है कि रिमावर आपर स्वभाव एव व्यक्तिगत चरित आदि म रक्षणास प्रभावित होती है तथा उनको प्रगित बरती है। रिखना सावन यार विद्यार्थी शिान का प्रारम्भिर अभ्यास हा जान पर मुनम लिखते हैं ता उनका ग्यिावर प्राय रियावट के स्थायी आकार वे ममान बनती है। मा भी पर मक्त है मि इनय सब रिणावरें एक-सी बनी हुई प्रतीत होती है क्याफि मुलन ग्यित ममय मावधानी का विशप प्रयोग किया जाना है। किसान ममय धार धार लम्बना का बार-बार उठाना ध्यान एकाग्र करक लिलावट की बनावट क प्रयक चिह्नको धारे धार सावधाना समपूवर बनाना माल्या होता है। इन सावधानी की अवस्था में प्रमुख रमण रखनी की गति का अबरोष है। मेक इस रोष के साथ व्यक्तिगत मावधानी एकाग्रचित म । सुगमता स्थिरता आनि निमारत वतिया का प्रयोग धरता है। एमो परि पनि म हम मान न है वि सुयशाियरे समान है। और मार-गाय यह ना मान लहै दिन गिरणव पिन या में व व्यक्ति मौजूर * जिनस रिसावधाना राम कान काममा प्राप्त हा है। रमा विगत एनीमियाजोगिनना भीमारपानामारन पर भामुनस्यायोम्पर समान नहीं बननी । अपवा भागमा प्रारम्भिर मुनक जम्यास र वार हा अपना निसायपर आन राती है। मरियावर দা সামৰ স ৰিাৰ বগা সকলে । পশিৰ অসম ৭ हमार पास आते हैं। सनम महम देखत शिर पर है शनि वाराने मावधानो ममि और निम विपता यह है मित्र तर य प्रार भिर एरमा मुपगम शिमगा है। दूमर एम है पामर भाग म महिनि प्रशात हात है और अपनी स्वामापिपरीट पर आगर ममाना * हैं। इनम तीन प्रकार हैं। पर यजा प्रारम्भ म पुष्ट 'मुनिमित है न दो चार पक्तिस न कुछ पर पहली ही पतितक और बा में अपनाम्यामारित घमाट पर, अलम रिवन वार कहनाभर मा म्प पर नहा जा सरनादूगर न जाति पाच म घमाट वा निम अन्न में मनिषित है-रन पत्रा मनि वाल कहलातर सप्ट परन म वा जान है। और नारे पर हैं जा शिविमो निसा स्थान पर स्पष्ट पजामाते हैं। गेमा मागम परवाह पिन योन সিম এশষ কাছে কী কাৰ্য বড় তা এগ সখ্য गणका गवयानी मयि दिया है। जिसस "नना नोहामि पम-म रम पदन वार का आयआव"पर जग समयन मगदान रहा। म प्रारम पिसाई तीनापिका मनावानित किभी অ-সশস্য। ধংশ কানাধিনিলাম ন~~~ यह है ग्विावर म गति का प्रमाग । म तरह की गिरा गिान वारा यति सावधानी वा प्रयोग आवर नग समपना जिसन रिलायर वी गति वामम एव पिर राजाए। यह रणग्विादरम वावगति प्रगित रखा है। रिपन বাস সৎ মানা না বিবস্ত্যয় আশির ল শ ল পা है । वह स्वभाव से ही प्रणा स्वभाव का होता है। भावर व्यक्ति अपना तारिर भक्ति का उपयोग अपन निता माचरण में विपके लिए नहीं पर सरन जो अलि अपने विचारा के प्रवाहको गेरने म असमय है अथवा एकाग्रचित होवर सोधन अथवा काम करन म अममय है, इस प्रकार की रिखावट की गति का प्रयासरत है। यह भी कहा जा सकता है कि वे व्यक्ति है ना अपन विधारा मो अपन मन में आई बाता कातुरन हा वर हारना चाहते हैं। चाह उनगे इस तरह हस्तलिपि और व्यक्तित्व २६ अम्याम होने पर प्रयव व्यक्ति अपना निजी गरी अपना रता है जिसको हम कहत है कि यह उममा मौलिग मिपावर है। लिखित भाषा का विपण करने से विदित होता है कि मव निविन भाषामा म ग्विावर व मूर तत्त्व समान ही हैं। जस कि रखाए साचना । य रेमाए अधोगामी अग्रगामी वगामी सीधी दत्राकार काणाकार मोगकार हो जाती हैं। जहा जसी जरूरत पने और अक्षरा म जहा जसी निर्धारित कर दी गई हा । इसके अतिरिक्त मात्रामा चिह्न पग-अलग निधारित कर दिए गए हैं । विराम तथा विसग नारिभा क्सिी न किसी रूप में प्रयाग किए जात है । यह लिखावट के चिह्न बनाते समय कभी रेसनी भारी हो जाती है जसे अपर स नीचे की तरफ रेखा माचत समय । बभी यह रखा हल्की हो जाती है जस कि नीच स ऊपर की ओर जाने पर। हस्तलिपि से मनायनानिक अध्ययन करने के लिए और व्यक्तिगत गली सुधार के अभ्याम व लिए गिमावट के उपर दिए गए आधारा को गोकि रिवा- वर वे मूलतत्व हैं समा रना आवाया है क्याकि हर वार इन मूलतत्त्वा स ही काम पडता है। लिखावट का मनोवज्ञानिक आधार जसा कि हम पहल कह आए है प्रत्यक ग्विावट सीपने वाला विद्यार्थी ग्खिन का अम्याम हा तान पर अपनी निजी गरी उपना रता है । ऐमा क्या हाता है हस्तरिपि + मनावनानिए अध्ययन तया अनुमघान का प्रारम्भ टम छाट स प्रश्न स होता है। आपरा ग्विावर वी गरी विचित्र है। अपनी निजी है मौरिक है रिसी दूसर स नहा मिरती एसा क्या है ? जाप इस विरोण ढग से रिसन म अवश्य ही का रहस्य है। टम रहस्य का खाज करना हस्तलिपि बिनान वा लश्य है क्यापि यह वि वाम किया जाता है कि ग्यिावर आपा स्वभाव एवं व्यक्तिगत चरित्र आणि कणा स प्रभावित होता है तथा उनका प्रगित परती है। रिखना माखन वा विद्यार्थी ग्विन का प्रारम्भिक अम्याम हा जान पर मुरम निमदत है ता उनकी ग्विादर प्राय रिखावट के स्थायी आरार व समान बनता है। एमा भा वह मक्त हैं जिनकी सब गिवाव एव सी बनी प्रनात हाता: क्यापि मुग्ण रिपन समय सावधानी या विशप प्रयोग किया जाता है। गित ममय धार धार रखना का वार-बार उठाना ध्यान एकाग्र करत निपावर की बनावर व प्रया चिह्न का घार घार सारधानी सत्रमपूर्वक बनाना याव या हाता है । म सावधाना की अवस्या म प्रमुख रमण रसना की गति का बवराध है। परम अवराध साथ व्यक्तिगत मावधानी एकाग्रचित्त प्रम २८ हस्तलिपि विज्ञान सलामता स्थिरता आदि निर्माणकारण पत्तिया का प्रया करता है। एमी परि यिति महम मानात हैं कि सुरेप की य रिखारे समान हैं। और साथ-साथ यह भी मानत * दि इन शिपादक सिमन वागमवयक्तिात पण मौजूर हैं जिनस वि मावधानास काम करन की क्षमता प्राप्त होती है। इस विपरान एसीसिपावरें भी हैं जाक्तिनी भी मावधानी से प्रयाम बरन परमा सुपके स्थायी भए समान नहीं बननी । उयया थाडा-मा प्रारम्भिक मुसि व अभ्यास के बार ही अपनी निजीशन पर माने रगती हैं। इस गितावट वा अनुभव हम यीनगन पर-व्यवहार म करत हैं। इसनिमित बग्न म पत्र हमार पाम माने हैं । उनम से हम देपत हैं कि कुछ पत्र एमे हैं जामिन बाठा ने मावधानी स रिच हैं और जिनम पिता यह है गिजाति से अत तर व प्रार मिमा एक-सी मुबारीमलसे गए हैं। दूसरे एम हैं frना प्रारम्भिर भाग म मुलिखित प्रतीत होत है और अपनी स्वाभावित घसीट पर आकर समाप्त हो गा हैं। इनम तान प्रकार हैं। पह? य जो प्रारम्भ म कुछ गर मुलिखित हैं कुछ दो चार पक्तिया तर एक पली ही पस्ति तक और यार म अपनी स्वाभाविक पसीट पर अनम लिखने वा के हस्ताभर भी पप्ट पढे नहा जा सका। दूसरे एम जाति बीच म पसीट के पार फिर म अन्त म मुशिक्षित है...इन पाम दिने वाल ये हप्ता र स्पष्ट पनि म आ जाते है। और तोमर पर हैं जो कि किसी रिमी स्थान पर पर पर जा सकता है। ऐसा माम पटना है कि बिन वारेन जिस आशय का स्पष्ट करने की आवश्यक्ता समयी है उन अपरों को तयार को मावधानी स रिय लिया है। जिससे तना तो हाfr कम में कम पटने वार को आराम आवयक जग समयने मयान रह जाए । इस प्रकार से लिपी गई सोना लियारटा या मनावनानिर विश्लपण मा मगमग होगा परतु इनम अपना विभिनताए गते हए भी र समान है- वा है दिसावर म गति का प्रयोग । इस तरह की रिसावट रिपने वाला व्यक्ति सावधाता या प्रयोग आवश्यर नहा समयता जिमत लिलावरमा गति को सम एब स्थिर रखा जाए। यह रक्षण भिवावर मग वगति प्रगित करता है। रिमन वारा अपनी भावना पल्पना विचारधारा आदि काप्रति त म ब्यस्त रहता है। यह भाव स ही प्रदान स्वभाष या हाता है। भानुन व्यक्ति अपनी सावित भकिन का उपयोग अपन निजी आचरण के विश्लपण वेरिएनरीवर सरते।जो व्यक्ति अपने विचारा के प्रवाह को पान म असमय हैं अथवा एकाग्रचित्त हावर सोवन अथवा काम करने म असमय हैं इस प्रकार की लिखावट का गति । प्रयाग मरत हैं। यह भी कहा जा सकता है कि य व व्यक्ति है जा अपने विचार को अपने मन म आई हुई बातो का तुरन्त हो वह हारना चाहत हैं। चाहे उनकी इस तरह हस्तलिपि और व्यक्तित्य mtream से कही गई बात सुनने वारयक्ति की ममय म आइ हो अथवा न जाई हो । उह इसका आभास नहीं है परवाह भी नही है। व कह सकते हैं कि हमने तो अपनी बात कह दी और स्पष्ट कर दी। मुनने वाग व्यक्ति यदि उनकी बात का समझने को कापि न करे तो व क्या कर सक्त हैं। लिखने वाले का या या कहिए कि रखनी द्वारा व्यक्त करन वागेका भी यही हाल है। उनको तोखि देन स मनग्य पढन वाग समपने की कागि म लगा रहे । समने अथवा नहीं समझ यह उसकी समस्या है। टम स्थान पर यदि आप इस पुस्तक को बद कर दें और अपन मिल्ने वाठे यक्तिया की बातचीत हाव भाव आदि यावहारिक आचरण के विषय म सोचें तो सम्भव है कि तुरत ही आपका ध्यान ऊपर दिए हुए प्रकार स अपनी वान को व्यक्त करने वारे यक्निया की आर आइपित हो जाएगा। इस प्रकार के यक्ति समाज के प्रयक स्तर एव वग म मिल्न हैं। य यक्ति अपना वात को किसी न किसी तरह से कह डारना चाहत हैं। कई यति बहुत जल्दी-जल्दी बोलते हैं। कोई जोर जार मे वारत है। मालूम हाता है कि लडने वार ही हैं । कोई हरगते हैं फिर भी जार गाते है । ध्यान देने से इस प्रकार के भावावेग-व्यक्ती करण अनेक एव विभिन प्रभार व उदाहरण मिरते हैं। परन्तु समानता इनम एक व्यक्तिगत रक्षण की है । य सर वह्मिवी प्रवत्ति वाले व्यक्ति हैं। इनका जीवन गक्ति प्रमारित है। टम वग म आने वाले कुछ व्यक्निया मे एक क्षण और होता है। मनो वनानिक दृष्टिकोण म वह भी मह वपूण है । वह है जपनी वा परतु दूसरा को न सुनना। दाना दाता म मीधा सम्बध है। जिसे अपनी कह्न की जल्ली है उसे दसरा की बात सुनन का कहा अवकाश है। यह अवीरता है । दूसर को बान सुनने के लिए धय आवश्यक है। अधीर पक्निया क खिन म भी अधीरता की मात्रा का अधिकाधिक समावरा होना स्वाभाविक है और होता भा है। यावहारिक परिस्थिति म एसी मानमिक अवस्था वार यक्ति को आव "यक्ता म अधिक बालना परता है। कभी-कभी आप पास रम्ब चौत पत्र आत हैं जिनका यति सूक्ष्म स स विपण पिया ना तो तथ्य की बात थानी ही निरगा। मावधानी म साच हुए विचार था म ही स्पष्टत व्यक्त हो जात है। अमावधाना से कहा इवात का अन नहा हाता। । लिखावट की सामाजिकता लिलावर मामाजिक जावग्यकता है। य हनिपिवि नान म दूसरा दपियोग है। एक क्तिपिता है टमर व्यक्तिक पान व शि उमस कुछ जानन र निगा कुछ मग पान करिए कुछ रामगाव लिए पुरमारन ६० हस्तलिपि विज्ञान लिए। आप पत्र पात हैं पत्र रियन वार पक्तिक आगय का स्पन समय रन करिए। वाट म उम पत्र काम्याया रस कातरह रस मा रिया जा सकता है। ममय आन पर यह पुन दया जा सकता है। अन यह मान ना पडना है कि जा यति गुद और स्पष्ट लिखावट विन हैं व सामाजिक दृषि म रमर रक्तिया का भावनाआ का उनमा पक्तिगत सामय्य का ध्यान रखत हैं और जा व्यक्ति एमा धमार रियत हैं जो कि पनी नहा जा मक्ता अथवा जिमका साफ-माप अय हा नहा निकाला जा सकता व अपना काम ता करना चाहत हैं परन्तु दूसरा का अवहटना करत हैं। सहज हो व अपना मार दूमर यक्ति पर ढक दना चाहत है । ऐमा याचरण मामाजिर दृष्टिकोण से वाटनीय नहा है। अम्पप्ट लिपावटें जा कि माफ-माफ पता नहा जा मक्ता टियन वारे व्यक्ति की अव्यवस्थित अवस्या मूचित करती हैं। एमा व्यक्ति अपन भावावा म अपना यात कह डालता है। उम म बात का ध्यान नहा रहता कि या दूसरा व्यक्ति यम पढगा और वह अस्पष्ट ग्विावर का पदन म अममय रहगा। एम व्यविनया म अह का भावना मुग्य रहती है। व व्यक्त करत हैं कि जा व समयत हैं अथवा क्त हैं वहा ठीर है। और उसम अच्छी बात वो दूसरी नहा हो सकती। वछ राग नानपार सम्पप रिबन हैं। एस हस्ताक्षर बघा देवन म बात हैं जिनम कुछ मा पता नहा जा सकता। व कवर पानी मात्र वा तरह हात हैं। सभवन एमा रिबन वाला व्यक्ति परिस्थिति कासहजनक ही रखना चाहता है। जा महानुभाव अपनी स्वय का ग्पिावर सुगमता म न पा सक उनक लिला क्या कहा जाए। और जा अपना रिखावट म्वय न पहचान सरें उन रिए क्या कहा जाए नमी वपना पाठक स्वय कर लें। एम व्यक्ति का व्यक्तित्व तया चरित्र भरामा वरन याग्य है अथवा नहा यह मायात्मक तथा विचारणीय विषय है। हो सकता है कि यह कवर व्यावहारिक वास्तविकता का अनानता हा स्वाभा विक असावधाना हो अथवा अक्षारयुक्त स्वाथ की भावना हा या उद्दपरतायुक्त आचरण हा। निचय ही यह एक मावधान स्पष्ट और भरोसा करन याग्य व्यक्तित्व का द्यानर रपरिपि वनापि नहा है। अत रिवावट म गतिमीग्ना के विषय म कहा जा माता है कि एमी घसार ग्यिावर जिम पर रिबन वार व्यक्ति का जागरूक अवराध नहा है उमक अधिकार के बाहर है। एमा रिग्वावट विकृत है अस्प है और यहीन है। ग्विने वा व्यक्ति जस चाहलल्यहान रखनी चगता हआ स्वयं अपन लक्ष्य का सावटना है और उम माचरण म उमका निजी पक्तित्व भी विरीन हा जाता है। यह व्यक्तिव का नष्ट कर दन वाग स्षण है। मक विपरात एर एमा ग्विावट है जो वि गनिमाल हात हुए भास्पट है। यह रियन वार व्यक्तिका उ च एव अप्ठ मानमिन ममयता का व्यक्त करता हस्तलिपि और व्यक्तित्व ३१ है । एमा व्यक्ति क्मिी भी परिस्थिति मगतिगीता को अपनाता हुना अपने रश्य या प्राप्त करन म समय होता है। वह भाव आवशम यह नहा जाता। उसकी भावक्ता एव जीवन गति नियम एव सयम के अवरोध के बाहर नहीं जा सकती। वह जितना चाहता है स्पष्ट गाम कहता है। दृढता सकता है और चाहता है कि उसको पन्ने वार अय व्यक्ति भा उसा आगय को बिना किसी प्रकार का गका क समझ म । मम गति का सचार है आत्मग्विाम है स्वावरब है प्रज्ञा है मामाजिरता है और अधिकार की प्रप्ठना है। रिखावर म परिवतन के विषय में लिखते हुए यह कहा गया था कि रिमावट के कुछ चिह्न वदरत रह्न हैं और कुछ स्थाया आकार म बने रहते हैं । व बदलत नहा हैं। टना कारण ग्यिावर म मौरिकता बना रहती है। जो चिह्न बरन वार है वे लिखावर म गति का सचार हाने स बदन लगते हैं । इस प्रकार के चिह्नाम पग्वितन का माता एव प्रकार का निर्धारण लिखावट के मूक्ष्म নিশি स हाता है। उतारण के लिए कहा जा सकता है कि ये चिह्न पान्या अक्षरा के अतिम सिर मात्राए आदि आग वीजार भागते हुए स रियाई देते हैं । इस प्रकार क सूक्ष्म निरीक्षण स रिखावट की गति । लगा को मात्रा का निर्धारण होने लगता है । और यह समझ म आने गता है कि अमुक रिखावट धीरे धीरे मध्यमगति स अथवा तेज गति स रिखी गइ। हस्तलिपि विनान के विरोपनो ने विवेचन एव विधिवत प्रयोगा से हस्त लिपि के अनन चिह्ना व स्थायी एव परिवर्तित आकार से लिपावट म गति की मात्रा माप करन के गुर (फामूग) सिद्ध कर दिए हैं। इनके उपयोग स लिसावर योकिमा भी तस्वार म उमको गतिमीपता की मात्रा या माप पिया जा सकता है। अमुक रिपावर कितना गति स गिपी गई है। यह माप हस्तलिपि विनान के मनावनानिर विपण करिए पयाप्न हाता है । जसे कि तीन सम तथा मगति । व्यक्तित्व पग-मनावनानिक दृपियोण म ग्पिावट म गतिगीरता का तत्व व्यक्तिव वा माट नौर पर तान वर्गों म विभाजित कर देता है । बहिमयी प्रवत्ति वा पत्ति जतममा प्रति वा व्यक्ति और उभयमुपी जयवा समप्रवत्ति यार यक्ति। टम वर्गीकरण म पिपावर अय चिह्नाम भी ममयन मिरता है। किमी भा र चिह का भरामा करना यत्ति का वास्तविक निर्धारण करन व रिए सतरम पाटा नहा है। एप चिह्न अनस पणा की ओर सक्त वर मरना है। परतु उनम म किमाएक श्रण को पक्तित्व या स्थायी पण मान रने के लिए कम म-बम का दा अय चिह्ना का समयन मिरना आवाया है। जन ऊपर लिए हए नाना वर्गीकरणा व निवारण व माय रियावर म अय चिह्ना से पाए जाने वार का पान करना नितान आव यर है। यह ममथन उपर Pि डरा हस्तनिपि विज्ञान व्यक्तित्व क रमण जम कि यहि वा अतरमुमो, उभयमन्त्री के निर्धारण के लिए मिरना चाहिए। मै रियावट का आवार एक टूमरा पमा चिह्न है रियर गतिशीग्नास प्राप्त हुए सक्त का समयन करता है। नारिखावट बहिमुगी छाटी रिखावट अन्तमुना और मध्यम आकार का निवाबट उभयमुखा प्रवति मूचित करता टमका नीमरा चिह्न रिबन म पनी का दाव है। भाग रिवावट जिमम रखना दवाकर रिखती है वनिमुखी हल्को ग्यिावर जिमम रियावट चन्त हा हक हाथ स चरनी है अन्नमुगी और मध्यम दबाव वारा निखावट उभयमुवा प्रवत्ति की प्रतार हाता है। मिपावट व अय चिह्न टम प्रवार के अक्न में सहायक हात हैं। परतु व्यक्तित्व व रयणा के वनानि तथ्य व रिए यति उपर दिय हुए तीन चिह्ना काममान ममथन मिल जाए ता पयाप्त है। रिखावट के य चिह्न (१) गनिगोरना (२) आकार और (३) रखनी का भारी बाव एम माट चिह्न हैं जो कि प्रत्यक रियावर म मिरत हैं और इनका पहचानकर अनुभव करना बहुत ही मुगम हाता है। इमाया विावट म गतिशीरना का निधारण एव उमक ताव वग समवग वेगहान गनि म बहिमवी उभयमुखी एप सल्लमुखी प्रतिमा वार व्यक्तित्व का वर्गीकरण रिखावट क ऊपर तिय हुा तीन चिह्ना में जम कि गतिगालना आकार और रसना क भाग दवाव स ही किया नाता है। इसम यति किमा प्रकार का रा रह जाए ना अपन प्राप्त रिय हुए निधारण व ममयन करने क रिए लिखावट व बय चिह्ना का तगा करना ही सचिन हाना है। यह मूलत ध्यान ने का विषय है दिग्विावट का गनिमीना-तान एवं समगनि-चा प्रभाव रिखावर आकार और रखनी व दवाव मानिम्विावट के अय चिह्ना पर मा हाता है। इस प्रकार स व्यक्तित्व का एक माग-मा परतु निश्चित वर्गीकरण हो जाता है। हम यह पता चल जाता है कि अमुक रिवावट खिन वाला बहिमुखी अन्तमुवा तया उभयमुखी प्रति म म गिम क्षेत्र म आता है । इतना निर्धारण हो जान म हम्नलिपि विनान का प्रयक व्यक्ति का एक निचिन साचा मिर जाता है जिमक बय मूक्ष्म स्थान व्यक्तित्व व दूसरे अनव गुणा की पराना व द्वारा पूर पिए जा सक्त हैं। लिखावटो का वर्गीकरण व्यक्तिव व वर्गीकरण के अनुरूप रिसावता का वर्गीकरण भी किया गया है जिनका उपयाग व्यक्तित्व व तान वगों (बहिमुमा उभयमुखी तया अनर मुग्वी) का अवन करन म हा मत्र । हस्तलिपि और व्यक्ति व दुतगामी लिखावट ऐमी पिसावरें जिसकी गति तान है जो अपरा के जाकार म बड़ी हैं फरती हर्ष स्थान छोटती हुई लिखी गई है अक्षर प्राहयुक्त हैं एक दूसर से मिगार खि है तथा जिाम लेखनी का दबाव अधिक है मात्राए तथा विदु विमग आदि आगे की ओर भाग रहे हैं द्रतगामी लिखावटें कहलाती हैं । इस प्रकार कनिपावट व चिह्न प्राप्त हाने से बहिमुखी प्रवत्ति मूचित हाता है। समगति लिखावट ऐसी रिखावटें जिाकी गति सम है अभर जधिक बने अथवा अधिव छोटे आकार के नहीं हैं समान स्थान के प्रसार म लिखी गई हैं और जिनम रखनी का दगाव अधिक नहीं है समगति रिसावटें कहलाती हैं। ये उभयमुखी प्रवत्ति मूचित करती हैं। इनम वहिमुखी प्रवत्ति के कुछ लक्षण हैं तथा प्रतिरोध के भी हैं । 1 प्रतिरोधी लिखावट ऐसी लिखावटें जिाम मगति के चिह्न है जसे कि छोटे आवार के सभर रिक्त स्थानों का अभाव छोट हाशिए पोछ की ओर झुके अक्षर लेखनी का दवाव हाका प्रतिरोधी लिखावटें कहलाती हैं। य अतमखी प्रवत्ति चित करती हैं। वज्ञानिक खोज के लिए लिसावट हस्तलिपि विनान द्वारा व्यक्तिगत विश्ठपण के लिए स्याही से रिखी हुई रिसावटा कानावग्यस्ता है । यह कम से कम आवा पष्ठ सादे कागज पर हो। अच्छा हा यदि यह एक पूरा पप्ठ हो । हो सब तो सप रग का सारा कागज हा। ग्विावर स्वत तथा स्वच्छत गति एव चि म रिखी गहा। अच्छाता यह है कि वनानि खाज गिग विपन न लिखी गई हो । रेखक व मन म अपन बचाव की भावना नहीं हा । सहज रूप म रिखी हुई रिखावर उत्तम माना जाता है। ग्विन की क्रिया साधारण भौतिन परिस्थिति म बठकर की गई हो। गिवन वार व्यक्ति को पास इस बात की जागाही न हो नि उमकी निग्वावट मनावनानि विपण रिए प्रयाग म लान करिए उदाहरण माना जाएगी। लिखावर का गला महज स्वभाव म यहार म गई जान वारी हो । पास्ट का पर रिया गई पिपावसी आधार नगमानी जाता क्यापि रिखन वार का उस या म म्यानमात्र महा शिवना पना है और स्थानाभाव ६ कारण बहुधा उसम गिमावर व चिल अपना महज बनादर वारत हैं। टम प्रसार म ग्विावर व आधार क गिा सहा उगहरण मिग्ने पर हस्तलिपि-विनान नाग रिवन वार व्यक्ति के व्यक्तित्व का मगे निधारण ३४ हस्तलिपि विज्ञान निश्चित रूप से किया जा मकता है। यदि लिखावट की महल बनावट म का हो तो एक से अधिक नमुना का आवश्यकता पड़ सकती है। हस्तलिपि वितान व्यक्तिव का जांच करन पाएमा माध्यम है जिसस लिवन वार व्यक्ति के गूटनम लक्षणा का पता गाया जा सकता है। इस प्रकार की जांच करन को थमता क्मिा भी अय व्यक्तित्व निधारण प्रणारा म नहा पाई जाती। पाश्चात्य देगा विराना ने यह अपने वनानिक अनुमधाना स वारवार सिद्ध कर दिया है। हस्तलिपि और व्यक्तित्व ३ हस्तलिपि विज्ञान का विकास - किसी भी विषय का वणन करते समय यह आवायर समगा जाता है कि उसकी उत्पत्ति एव विकास पर भी प्रा डाग जाए । अत हस्तनिपि विज्ञान र विकास मा सतिप्त वणन यहा दिया जाता है जो कि इस छोटी-सी पुस्तक का आ"प समझने के लिए पर्याप्त हागा। साहिय की प्राचीन पुस्तका मे ग्यिावट से मनप्य के स्वभाव तथा गुणा की पहचान परन के मन मिल्ने रहते हैं। एक प्रचारित विचरती है पाग बाग बानी शक्ल ग्यानी द्धि विवेक अक्षर होय न एक से देखे पुरुष जनेक । इससे स्पष्ट है कि अगर अपना मौलिलता करण विचित्र माने गये हैं तथा अपने सर का निजी विचियता द्योतक भी माने गय हैं। ग्राफोजी अर्यात हस्तलिपि विनान की उत्पत्ति फ्रास देश के निवासी श्री जीन हिपोलाइट मिनों स माना जाता है। यह एक विनान पारी था बहुत समय तर इहोने विविध लिखानाका निरीण एव अ ययन रिया तया उन ग्पिावलियन बार व्यक्तियाक व्यक्तिगत चरित का भी अवगन पिया। हान अपन जनभर से पिसावराय मूर चिह्ना का पयसरण क्यिा उना सप्टना का पहचाना और उनमम प्रयाका ग्विन वा यक्लिया के विविध व्यक्तिगत गणाम सम्ब धारिया । जम कि ग्विावर क व अभर मूचित करत हैं । ग्गिन वार व्यक्ति वा विचारगति का विशाला उममी अधिगागरिर एव मानमिर गनि उठा रता बहादरा आदि। "मा तर म पाटाजार थक्न वारी गियावर गिवन वा पस्तिका मानमिर चिरिचार आमन्ति एव स्वमुरमा कानावना स्पष्ट वाग्न म राना आरि व्यक्तिगत मणा को मूचिन यरत हैं। प्रारमिता न अपन अनुमवावा मका क्यिा । या मारन एर छालामो पुम्निमा व रूपम सन् १८७१ मप्रतिमा। यह अपन विषय वा माना हुमा मननयम प्रगान वहा जाता है। इसके द्वारा मिवाने हस्तलिपि वितान को जन्म लिया तथा इस विषय का नामकरण भी किया। मिया क्थनानुसार हा यह विषय ग्राफोराजी मर्यात् हस्तलिपि विधान कराया। तत्पश्चात यह विषय दो प्रकार योगा के हाथ लगा। पहोतो व अव सरवाती व्यक्ति थ जा मानव स्वभाव को एव पहरी चतगत ५ और हस्तलिपि- विनान को उस पहेली को सुलझान का साधारण साधन । न व्यक्निया न रस विषय का तुरत हो अपनी जीविका कमान का अनचित साधन बना रिया। ये जिप्पिया की तरह जगह जगह पिरत थ और इस द्वारा नगा र स्वाभाविक रक्षण ही बताने का वामला ही रहा करतेष पवि उन भविष्य मम्बधी अनक प्रना का उत्तर भी हमने माध्यम से दन का दावा करत या एस व्यक्तियावावाम मानवीय दुवल्लामास ग्रस्त होगा का शिकार करना था। सीध-माद स्वभाव व रोग इनको बाता म आ जान थे । यग मिका के वास्तविर अनुयायी नहीं थे । मे तो अवसर सराम उठाने वार स्वार्थी गे थे। एम लामा र स्वायपूण भाचरण के कारण नीन हो ग्राफोगेजी मजाप का साधन बनकर रह गई। प्रनावान प्रतिभा- गाली दिनाना ने इस विषय को एक हीन साधन समझकर त्याग दिया तथा इस विषय को किसी भी बौद्धिक ग म स्थान प्राप्त नहा हा सका। इसी अवहग्ना होन रगी। फिर भी कुछ ऐमे गम्भीर विचार के थे जो कि मियो के प्रयासों को व्यय मानने को तयार नहीं थे। यह सय था मिमिका का हस्तलिपि विनान भूक्ष्म एव चौदिक परीक्षा की कसौटी पर पूणत सही नहीं उतर सका था। "स स्तर पर इस को चरित्र एवं यक्तित्व निधारण करन की प्रणाली के रूप म माना जा सरना भी सम्भव नहीं था । पर तु यह निश्चित या नि इसम एक नवीन क्षमता या आभास था। यह एक नवीन माग था मनुप्प व अन्य तत्वा के निरावरण का।नवितान विचारका ने मिका र आधारभूत तत्वा की गहराई को दवा और उनम प्रगतिशील अन्धपण व लिए पर्याप्त मसाला पाया। इन विचारतील महानुभावा म उन दगा के गरीर विनान मनाविनान अध्यात्म आनि त्रिपया चुछ माने हुए पण्डित भी थे। एस रोगान हरिपि विनान के पुन अध्ययन नवीन खोज तथा प्रयागा को रिया को बनाय रसा। कायन्तर म अपनी खोजाम अपन हरिपि पिनान को एक पूर्णतया नवान स्तर प्रान किया। मम हम्नलिपि विनान यो पुाज म मिरा । एक नया आधार मिग और धमकी प्रणा व्यक्तिगत कतिपय अच्छे अथवा बुर लक्षणा को बताने के बजाय एप पूर्णतया मनोवतानिय भूमिका पर आधारित छ गई। प्रापागजाय इम नवोन रूपम, मिरो की ग्राफोलोजी स बहुत अन्तर आ चुका था। इन विधारका ने हस्तलिपि दिनान के अनर चिह्नाको (मिका की हस्तलिपि विज्ञान का विशम - तरह) अलग-अलग आधार न मानकर सपूण लिखावट के चित्र को मनोवनानिक विश्लेषण का आधार माना था। और यह सिद्ध किया था कि रिखावट एक सपूण चित्र है जो कि कागज पर रिखने वाल ने स्वेछा से बना लिया है। लिखावर के चिह्न अलग-अलग अपनी महत्ता नही रखत और विभिनता मे उनरा काई अस्तित्व ही नहीं है। रिग्वावर के सपूण अगो का सयाग ही अपनी मौग्विता प्रगित करता है । यह लिखावट की अपनी निजी कहानी है और इस कहानी को ग्राफोलोजी विद्वान लिखने वाल के व्यक्तिगत मनोविनान का अवलोकन करने व लिए मनावनानिक आधार मान रते हैं। नवीन ग्राफोलाजी म ऐसा ही हाने लगा है। इसम सपूण लिखावट का उमके विलपण का मूलभूत आधार मान रते हैं। गियावट के विभिन्न चिह्न मूल आधार तत्वो के समथन मान क लिए माने जाते हैं। ग्राफालोजी की प्रारम्भिक अवस्था म रिखावट के अनेक चिह्न व्यक्तित्व के मूलनत्वा प्रणाक माने जाते थ। नवीन ग्राफोलोजी म यह परिस्थिति बदल चकी है। और अब एस अनेक चिह्नो का महत्ता गौण हा चकी है। एसी पुस्तकें अभी मिलती हैं जिनम ग्राफोलोजी की प्राचीन पद्धति का विवरण प्राप्त होता है। यह ग्विावट के विभिन चिह्ना का महत्ता प्रदान करती है। य पुस्तक पादरी मिका की प्रणाला पर ही आधारित है। जत इन पस्तकोस प्राप्त नान भी उसी तरह से गरायुक्त है जमा कि मिरा की ग्राफोरोजी की विश्पण प्रणागथी। नवी प्रणाली ग्राफागेजी मिका मे बातम क्यि गए अनुसघाना पर आधारित हान व कारण अधिकारी म भिन है। नवान ग्राफालाजी यक्तिगत चरित्र को साज करिए मनोवनानित क्षत्र म एस गम्भार विषय माना जान -गा है। प्राजबान पराना के रूप म भी यह एक विगप स्थान प्राप्त कर चबा है। यूराप एव अमरिया के अधिकृत माहिय म मा पयाप्त उदाहरण मिलत हैं। ग्राफालाजा जयात् हस्तलिपि विनान के 'म नवान युग म डा र पासार डा राट मौन तथा डा वागनर के नाम अग्रगण्य हैं। 7 रापपाफार दिमाग के निमित्मा है। हान हस्तलिपि विज्ञान व विषय पर दिमाग-मम्बधी अनक अनुमधान रिय * । प्नका बन्ना है जिविन का प्ररणा तया गति वदर निमाग स ही मिरता है हाथ तया रखनी कदर माधनमात्र हैं। जमन भाषा म पनर अनर ग्रय उपग्ध हैं। जमनी म हरिपि विमान का मब नए विवाम दुआ। पिटर महायुद्ध य पर वहां क वम-म-कम नौ मगविद्याग्य म विषय पर पियार। इनम पिता पाने वालाम अध्यापर वार चिकित्सा तया मनावनानिक भा थ। महाविद्यालय म आचाय का पर मम्म पहर टा. पापार को ही मिय ३८ हस्तलिपि विज्ञान था। यह आदर उनको हैम्बग विश्वविद्यालय स मिला था। टा० रावट सोडक चशेम्लोवाक्यिा क निवासी थे। अनेक भापाआ का ज्ञान होने के कारण ना पद प्रकार की लिखावटा का अच्छा ज्ञान था तथा इनका तत्सम्बधा गहन अध्ययन इनकी प्रकाशित पुस्ता म उपाय है। इनका कहना है कि ग्विावट पर यक्तिगत चरित्र व अरावा अनेक कारण अपना प्रभाव डालते हैं। रिखावर पर इनका असर बहुत अधिक रहता है । जसे कि ग्विन का सामान था हा गरीर वीमागे की हाल अारा क गुद्ध स्प यात न रख मकन को कमजारी प्रायमिर पाठगाला म क्यि हुए अभ्याम की कमी आदि । डा० सीडर न हस्तरिपि विज्ञान के प्रवाह म बौद्धिक अवराध देकर दमक 'म्प का विकृत हाने म बचाया तथा इम म्पप्ता गहनता तथा व्यावहारिक क्षमता प्रदान की। यह निश्चय हा सय है कि दिमाग के अलावा भी अनस कारण रिखा वट का प्रभावित करत हैं। चनका हमरा अनुस धान रिखावट की गति की नाप करना था। इनमें अनुसार लिखावत' म एम अनक चिह्न हैं जिनसे तीव्रगति व्यत हाती है। लिखावट व एम चिह्न भी हैं जिनस अवरोष व्यक्त होता है । य प्रसार एव अवरोध के दाना चिह्न किमी भी पर लिखावट म प्राप्त हो सकते हैं। जम नि एक व्यक्ति कुछ क्षमा म चचर होता है और वही यक्ति कुछ अय क्षत्रा म सयम का परिचय देता है। डा० सोडा का मुग्यत कहना यत है कि हम्नलिपि द्वारा चरिनाक्न करने से पहले यह निरीक्षण करना परम् आवश्यक है कि रिखावट स्वच्छ रचि से लिखी गई हो । यदि ऐसा है तो इसका वनानिक विश्"पण सफरता से पिया जा सकता है। उन्होंने इस मूत्रम जाच क कम भी विधिवत रतगए हैं। मवम आरपा गाधराय म विपय म या टल्गार का है। यह वास्तव म आस्टिया + निवासी हैं परन्तु कारान्तर में उत्तरी अमरिका में जाकर वम गए। उनकी पुस्तक हस्तलिपि स मनोवनानिय वाघ बहुत ही राचा और प्रभाव शाग है। यदि मिमी पाठ वा हस्तरिपि विनान की सत्ता म माय हा ता इस पुस्तक के अध्ययन स उस पयाप्त प्रमाण मिर सकते हैं। इनके हम्नलिपि-सम्बधी रखा स इस विनान का कलात्मक क्षमता प्राप्त हुई। एमा पता चलता है कि श्री टलार न अपन अध्ययन एव अनुम धान का क्षेत्र अस्पताग का बनाया था जहां रागी परे रहत थे । उपचार के कारण राग दूर होने स गरीर म गक्ति का संचार हान स रिखावट भी तनुसार परिवर्तित होतो रहती है यह उहाँने देखा और इमक कारणा पर वपन विचार निश्चित क्यि । जमनी मान्म स्विजरल्ण्ड इटनी आरि देगा म हम्नलिपि विनान की प्रगति बहुत आग बढ़ चुकी है तया प्राप प्रयेक प्रकार के यक्तिया की रिखावटा हस्तलिपि विज्ञान का विकास पर गोध ग्रय प्रकाशित हो चुके हैं। अग्रजी भाषा म जिन पुस्तका का भापान्तर हो चला है व प्राप्य है परतु यह निश्चित है कि इस विषय का अधिकारी बनानिक साहिय अभी जमन और फ्रन्च भापाआके वाहर नहीं आया है। यद्यपि अय व्यक्तिया न भी इस मोर प्रगति का है पर तु वास्तविक विपिन अभी भी जमनी और मास म ही हैं। हस्तलिपि विज्ञान ४ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के उदाहरण रिग्वावट वा आधार मानपर व्यक्तिगत मनावनानिक विपण करने का अभ्याम करने करिए तथा इम प्रणा वा भलीमानि समयन व लिए अनक ग्विावटा के उाहरणा की आवश्यक्ता पहनी है। जितन गरिखत हैं उननी ही अग अगरिखावटें बनती हैं। प्रत्यक यक्ति अपनी निजी मौरिकता का उदाहरण अपना लिवावट म प्रकाशित करता है। अत लिखावट व द्वारा व्यक्तिगत मनो वनानिक विश्पण का अभ्याम करन रिए प्रारम्भिक अवस्था म यह नितान्त आवश्यक है कि जहां तक सम्भव हो भने विभिन प्रकार की लिखावटा का सबरन कर लिया जाय । इन विभिन प्रकार का रिखावटा का विधिवत निरा क्षण करने मे प्रयेक् का स्थायी आधार विग्निहाता है। प्रयक भापा का लिंबावट का एक स्थायी स्प एव आकार हाता है। इसम विमा भा मौगिक गिवावट का मिगन वरन स उमम मौलिकता के चिह्ना का पहचान हाता है । इमम विनित हो मवेगा कि अमुक रिसावट स्थायी आकार से किन दिन वाना म किन किन रणों ममिन है और उसम अपनी मौग्विना का व्यक्तिगत अ क्या है। आगे चलकर एव लिखावट का दूसरा रिखावट म भी मिलन किया जा मक्ता है और उमम विभिनता के रक्षण एवं उनमे उपरथ मनावनानिय सरता का भा पता चगया जा सपता है। उदाहरण के लिए वहसरत हैं जमवि लिखावट का स्थायी यारर एक इच वा तीमरा भाग है एक अक्षर तिहाई इच रम्वा यौर इतना ही चौडा है। यदि किसी मोवि रिसावट व अक्षर इन माप स बडे हैं तो उम रिखा वट का वने आकार की गियावट वह मरत हैं। पिसावट कागज पर वना एव चित्र है। यदि आप एक अच्छे मुलिखित पत्र का नमूना देखेंगे तो आप पाएंगे कि कागज पर रिपने वाल ने अपन ग्मेि हुए चित्र को वागज उपर घ स्थान के बीच म इस तरह स जमाया है कि उमरे चारा तरफ वे हाशिए वरावर हैं। दखिए उगहरण सम्या १। इम चित्र म बाइ
MAYA
GEORGE TOWN
ALLAHABAD
January
1950
Mom
I am gratiful
letter
है
for
you
htm
tale Psycho on
I thall read it with fust
Fruily
interest
Yana turly
Quannete the
जोर दार आर व हागिए स्पप हैं। ऊपर और नीचे भी समान स्थान छोला गया
है । एमर चिन का दावन से आभास हा जाता है कि लिखनेवाले व्यक्ति ने रिखना
प्रारम्भ परन से वहुत पहर अपने रिमाग म एक नक्शा बना पिया होगा कि समुत्र
स्थान मर पास उपर है और इतना मसाग इस यि दुए स्थान म मुगका भरना
है। य निया म प्रकार स हाना चाहिए कि रिय हुए स्थान का सब मुटर तथा
सर्वोचित मापयाग हा जाए । अन यह समयना परिन नहा है रिसावधानी पूर्व
निचय तया कायगगता यस प्रकार करिखनदार व्यक्ति के प्रमुरा पण हैं।
आग रिसावर व चिह्ना स म प्रकार के व्यक्तित्व के दूसर धनात्मक तथा
ऋणामा भगा का पता चलाया जामगा।
हस्तलिपि विज्ञान
दूसरे उगहरण मख्या २, ३, और ४ म देखेंगे कि वाए तया अय हागिए पहले चित्र के विपरीत हैं। चित्र चिन३ चित्र उगहरण २ म बायां हाशिया वम हाता जा रहा है। यह स्वाभाविक- मानमिर प्रवाह म अवरोध का रमण है। यक्ति अपना आचरण प्रारम्भ करन के माय हा सावधानी में आग कदम रखता है। इसमें डर है कि वह वहा गरनी नहीं कर जाए और चाहता है कि वह सावधाना स अपन उपग्ध साधना म ही अपना गुजारा करमरन म सफर रह। उगहरण ३ इमर विपरीन है। इसम दायां हाशिया घट रहा है। हम इस लिखावट को पहचानत हैं । यह वापू हैं। काफी घटना और तेजी से रिसत थे। यह समझ म नही आया कि इनका पक्तिया के अतिम गद क्या वही थाडी-सी वची हुई जगह म भर दिए जान थ । देखेंगे कि पक्ति के अन्तिम अक्षर सामित स्थान म ही लिख दिय गए हैं। जव दिग्विार क अय रथण जस कि ताव गति और रखनी पर भारी वाव प्रगित करत हैं आन्तरिक गक्ति और आवग दाए हाशिए की कमी मूचित करती है भविष्य की योजना में पूर्वनिर्धारण का कमी। यद्यपि इसम मवश्रेष्ठ धना मन रमण जो नि प्राप्त होता है वह है हर निश्चय का। जिस काय का प्रारम्भ किया है उम पूणाक्ति स पूग करना इमम दर करन की आवश्यकता नहा। यह आत्मनिणय तया कायक्षमता का प्रेप्ट उदाहरण है। उदाहरण ४ को रिखावर म वाइ आर का हाशिया फटता हुआ है। यह नत्त्व रिखावट के सम्पूर्ण चित्र का प्रभावित करता है। जम रखनी बाग चन्ता और ग्मिनेवार यक्ति वा ध्यान अपन विषय का यक्त करन म सरग्न हा जाता गाया हागिया धीर पार चौडा हान गया है और फरन रगता है। यह रयण लिखावट म गति तथा उतारता का। इसम सावधाना का मात्रा कम और असावधानी की मात्रा अधिक है। यह व्यक्ति अपने याचरण म अधिकतर भाववना प्रधान है। भविष्य म क्या हागा यह नामाचता । जो होगा वह सामन आएगा एमा यक्ति बहुधा अपनी गक्ति का यथ नारा परता है जिनका कि सदुपयोग किया जा सकता था। फिर भी एम व्यक्ति अपना मानसिक उदारता 1 मनोवजानिक विश्लेषण के उदाहरण ४३ । उनके ऋणात्मक लक्षण इनकी अस्थिरता म हैं। ये स्वभाव से ही अधिक माना मे अस्थिर हैं । उचगी स्वभाव के है । आत्मनिश्चय सकल्प समान नाचरण की टनम कमा है। मिमी एक विषय म पिसी इस प्रकार की परिस्थिति म जिसम निश्चय म प नियम दृरता आदि रचणा की मुग्य आवश्यक्ता है य यक्ति उपयोगी सिद्ध नहा होत । ये कठिनाई का सामना नहीं कर सकते। इस प्रकार की लिखावर म समानता एव असमानता इनकी गति म भावुक आवा एव नतिक नियम इनके सद्गुणो म स प एव शिथिरता की माना क्या है और कितनी है इमम विगेपता क्या है यह सब यक्तिगत रिखावर के अय चिह्ना स यक्त होता है। इस रिएलिखावावा यक्तिगत निरीक्षण एव मनावनानिस निराकरण अधिक सूक्ष्म रूप से करना आवश्यक हा जाता है । इस परीक्षा नियमा का उल्लेख हम जाग चपर करेंगे। उाहरण संख्या २ म हाशिए बाइ आर समीण है। बहुत-से लोग बाइ आर वा हागिया छोन्ने ही नहीं हैं जथवा यदि खिना प्रारम्भ करते समय योग सा स्थान छोत भी है तो यह स्थान धीरे धीरे नीचे की पक्तियो म कम होता जाता है। यह मावधानी + लक्षण की अथित माता का एक समेत देता है । यह मानसिक मित ययिता का - रण भी है। इसम प्रारम्भिक सम्बारा का अनुभवो का तथा प्रशिक्षण का प्रभाव इनकी यावहामि सीणता म दृप्टिगोचर होता है। इसमें वगत्मा सुनसा भावुक्ता परत गनि कपनाजनक विचार एष वायगीना का अभाव रहता है ऐस विवागम धनका सम्पक नहीं है। एसे यत्रिन यह सोच ही नहा मक्त विव रिमा अय प्रभार स आचरण कर सकते हैं। यदि टनम कहा भी जाए कि व स्वन्छ टना म आवर सरते हैं तो वे मानने गगे कि यह कम हा सकता है। इनम स्वरक्षा की भावना प्रधान है। "मम अपने विचार एक अपना भावना का दमन करने की प्रवत्ति सक्रिय हाती है। एस गग अपा रिमाग को पिपिया नी खारना चाहते। महोत हुए भी दवना नरी चाहत । अपन हाय को रोज रहत हैं। विद्या च* पिर मदि काम च' सकता है ता घर स बाहर निसरना नहीं चाहते। हिचकिचाह आत्म विबाम की कमा डर अविनाम आश्रियणा वा मारधानी कम्पम प्रति करना चागत है। एमा व्यक्ति अपन यावगरिक आचरण म किमी भी प्रकार स आग बटने म पहलता दार माचता है रिचविचाना है और आग कदम उठान स र जाता है। यगिरिमा बगन म जान बच जाए ता अगा। मप्रकार की आरिव भावना म यतिका व्यक्तिगत भूमिका म सान रती है। रियावर जबरामव्यक्तिगत आवरण व भी मी प्रकार के सात मिना आवस व्यक्तिवरण लिजमा दिपा भार हागिराया ४. हस्तलिपि विज्ञान न होता बाइ मार मा हागिया छोहाना अथवा वाद आर वा हागिया छाग हाता जाना पर यि नुए ग्यण व्यक्त करता है। मन माय-माय हो सकता है दिग्नि हए अगर छोर हा पलिया के बीच में म्यान - और बीच म्यान भी पम प्रयाग दिय गए हा। यह ग्विावर मूग्न माण प्रकार की होगा । जिमम रिबन वाल अपनी म्वाभाविक प्रवत्तियों व बाणवपन आग बटन वार हाथ का रोक्न गिविवा है। मा प्रकार का मीण व्यवहार वह अपन अप पर वातावरण म करना है। रामप्रकार के व्यक्तिया माचन कमिमागवत कुछ मिग्गा परतु और किसी भी प्रकार का महायता प्राप्त हा मरना मानव नहा है । ममाज ममर प्रकार क व्यक्ति हात है और समय-समय पर "न सब प्रकार कगा मे एक्ट्रपरका मिगन हाता रहता है। ममान वत्ति वार लोग मिर बने हैं। परन्तु जिम व्यवस्थापक वा इन मव रागों म वाम रना हाता है वह इन गायी मनावतियों का आमाम पा करक इनम ययाचिन व्यवहार करत हुए अपने अभिरपित को प्राप्त करन में ममय हा सकता है। गर प्रवति के व्यक्तियों म भाबुपता प्रयान हान स भावना की मात्रा अधिक होती है। नम म्वर व्यवहार करन म कन्पना हास्य विनात भरजाल मत्री की भावना पारम्परिक प्रेम-व्यवहार सामूहिक सम्पार आदि की मात्रा अधिक रहता है और गम व्यक्तिया र साय म मनारजन बधिर हा जाता है। इनका पिबावट म रचना मर और बरवान रमण यति टन हैं तो निचय ही य व्यक्ति समय पान पर थारी दर करिए अपनी मम्पूण गतियों का एकाग्र करक अपन ग्य का आर अग्रमा हो जात है । परन्तु गगन म काम करत रहना बटल ममय के रिए अयवा एक जगह एक विचारधाग पर एव हारभ्य पर जम रहनाम प्रकार र व्यक्तिया गिरा विमा प्रभार म मा मम्भव नहा जाता । एम व्यक्तिया का वाफा बढा वाम भेष चाहिए। इस विपगत मितव्ययिता वा अपनान वार व्यक्ति स्वमाद महा अपना रगन को पा रहा है और अधिक म्यिग्ना व्यक्त करत है। मितन्ययिता मावधाना पायधमना का मारता अय रयानी उनका रिवार म पाच जाए ता उनका व्यक्लिव और अधिक स्पष्ट हो गता है। ध्य प्ररार पस्तिगा मनावनानिक विपण म हम दखत हैं कि व्यक्तिगत प्रवनिया म प्रायमिक मम्बाराम मूरत विभिन्ना की प्रधानता रहता है। जितन रोग हैं उतनी नरह के हैं। माटे तौर स उनका वर्गीकरण कर लाजिए सामाजिव राजकीय तया व्यागरिव परिस्थितियाम मव प्रसार व्यक्तियों का उपयोग हालाऔर अधिक अच्छ मलुपयाग हा नानक PिO अना पारिए मिन मिन प्रकार व्यक्तिववार व्यक्तिया का चुनाव किया जाता है। व्यक्तिगत प्रबत्तिया को छानरान में विरार मावधानाका आवश्यकता हाती है। मपा पर नियुक्ति व एि जिनमें प्रशासन यायता प्रबध याग्यता, मनोयजानिर पिलेपण उदाहरण
योजना की प्रवृत्ति नियम पाग्ने यो गमता आणि अनेर मार योग्यताए
परिस्थिनिया का मुराग वरन व गिा अनिपाय हाती हैं।
एमी प्रपत्तियां जिनम स्वाभाविर गम्भीरता मानसिक व भावा स्थिरता
सकल्प को हटता मावधाना म्पपता गगन आ-िपुए राणा को अधिकता रही
है सुयोग्य व्यक्तित्व का निमाण करती हैं। एम भणा व समावा स व्यक्ति
महान वनता है जिसस विवाग उत्पन होता है। प्रशासन म गति का सबर'
हाता है। एम व्यक्तियो से मचालिन प्रामन सर तरह की करिना या का मुका
बला करता हुआ अपने गन्तव्य माग से अपने निर्धारित मिशाना स व अपन एप
से विचरित नहा होता।
योजना र विचार विमप की अवस्था म विभिन प्रसार के व्यक्ति अपन |
अनुभव के अनुसार एव अपनी आतरिव वत्तिया के अनुसार अपनी गति प्रगिन'
कर सक्त हैं । क्या उचित है क्या अनुचित है क्या आवश्यक है क्या होना चाहिए
तथा क्या नहा होना चाहिए आदि का विमप किया जा सकता है पिसी एक योजना
का निर्धारण करन के रिए। इस अवस्था म कल्पना की उडान को स्वत त्रता है।
परतु योजना को क्रियावित करने म परिस्थिति बदल जाती है। एक
बार कायनम निधारित हो जाने के उपरान्त उस कायक्रम को कार्यान्वित पर
दाया
ની મા ઢ
। दालो रखा
चित्र
Ramayan is the story of Ram
and of Rames fight against
Pyare mohan
चित्र
Jawaharlal Nehre
चित्र ७
.1.7
Vultatusixi
चित्र
जिना
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पित्र म निसान के लिए हा निश्चय एक लक्ष्य लगन एव अनवरत उद्याग की आवश्यकता हानी है और काय को वेवर एस यक्ति सम्पूण सफल एव सम्पन कर सकते हैं जिनकी सक्रियता जसा कि ऊपर कहा जा चका है स्वभाव स ही स्थिर लक्ष्यपूण एव गक्तिशाली हो यह निता त आवश्यक है । उगहरण के लिए देखिए लिखावर सख्या ५ और ६ । लिवावर सध्या ७ ८६और १० । ये सुप्रसिद्ध प्रबधका की रिखावटें हैं । अगठ पृष्ठा म सख्या १४ से १७ तक के उदाहरण सब शुद्ध एव ऊंचे वग की रिखावटें हैं इसी प्रकार की हैं। उाहरण के लिए अनेक सुव्यवस्थित रिसावटें प्रस्तुत की जा सकती हैं जम मि सख्या ५ से १० तक की लिखावटें हैं। उदाहरण सख्या ५ स्पष्ट स्थिर सम्पूर्ण दृट और बडे आकार की रिखावट है। "सम आवश्यकता से अधिक कोई अतिरिक्त रेखाए पाइयाँ मात्राए विदु आदि नहा है । जितनारिखना आवश्यक है उतना लिसा गया है परतु पूण आत्म वि वाम स निचय से । ऐमा यक्ति सस्कार स ही ननिक है और अपन आचरण से उसकी पक्ति एव क्षमता स पूर्णतया परिचित है। जो वह चाहता है कहता है और करता भा है । मम सनेह नहा हाना चाहिए । इस रिखावट की एक अय विपता इस आधार का बना होना है। यह उ साह स्फूर्ति क्रियागीलता तथा उदारता का चाना है। उाहरण सम्या ६ भी ऐसी हा एक स्पष्ट और स्थिर रिसावट है। इसमें पांच उटाहरण से प्रवधवारव याग्यता अधिर है। अभरा का आकार मध्यम है जमा कि आरिपावटा का हाता है तो व बीच या स्थान भी आवश्यक्ता नुमार है अधिन पग नहीं है । अथग व उघगामी तया नीच जान वार भाग मा मम हैं। न अधिर वर हैं और न अधिर छोटे। म रिसावट वा मवश्रष्ठ याप्मका मम है। यह एक स्वच्छ लिवावर हाते हए भी रिसावर व नियमा का सयम म पारन करता है । यह रिपन वार यक्ति की उपार आत रिक शक्ति नया उमरा मयाजिन व्यवहार प्रणित करती है। ऊपर स नीच आने वाला रवाना मबर है। यना म प्रवार है परन्तु मुमामिन और मुव्यवस्थित । गिबाटा छा चिह्न नम निविदु आरि भी ययाम्यान बठ हुए ।यह आत्म वर स्वादरम्ब गियर रियासरता पर हटता मुयाजित सामाजिकता का एक बन हा नपयागा तथा अनुकरणीय उाहरण है । एमा स्पष्ट और मुव्यवस्थित हस्तलिपि विज्ञान लिखाय. स्वन उच्च आग का आभास देती हैं। उन्नाहरण ७ का रिखावट म प्राय हम सभी परिचित हैं। इम स्पष्टता और भक्ति में मागापाग परिपूर्णता है । वास्तविक प्रदान की भावना है । जसा मैं हूं वसा ही गेग मुझे देखें। रिखावट का काद मा अपर अशुद्ध और अपूण नहीं है। प्रयक रेखा तथा अब स्पष्ट और पूर्ण है। हर महान यक्ति म कुछ विशेष गुण होते हैं जिनक कारण ही वह महान वनता है । महानता के ये गुण विशप छाटी ठाटी घटनाओं में प्रत्यक्ष होते हैं। इसका उदाहरण म माननीय पहिन जवाहरगर नहर जीवन चरित स मिलता है। इसका उदाहरण प्रस्तुत है वह हिटुओ के इस विश्वास को पूरे तौर स समझे हुए हैं कि यह कम भूमि है कम ही के लिए जम हुआ है भोग के लिए नहीं। कभी-कभी यहा तक देखन में आया है कि जब उनके 'आनदं भवन म काग्रेस कमेटी के जरस हए और उन्हें यह मालूम हुआ कि इसम उनकी काई खास जरूरत नहा है तो वह मम्बरों की साधारण संवा रग गए । काम करते रहन का प्रबर पिपामा उनके हत्य म है। एक मिनट भी बेकार वरना इनके लिए असह्य है और एक क्षण भी आलस्य म नष्ट कर देना महापाप है । दिन का छोटे म छोटा काम भी आप इम मावधानी गौर और गम्भीरता के साथ करते हैं माना वह किसी राष्ट के भाग्य का फमला करते हों। अगर आप एक छोटा सा पत्र भी लिखते हैं तो भी यह देखते हैं कि उसका अक्षर अक्षर ठीक है, और को पाई या विदु छुट तो नहीं गया । आपला मिद्धात है कि जो अपने जीवन को और रोजाना की छोटी छोटी बाता में और कत्त य-पान में सावधान उद्यमशील और उत्साही है वही मनुप्य क्हाने याग्य है। जो लाग यह ममयत हैं किछार छोटे कामाम इतनी छान वीन या सावधानी करने की क्या जरूरत है जब कोई बडा और उत्तरदायित्व पूर्ण काम आयगा तो सावधानी कर ली जाएगी व वडा गलती करत हैं । जो रोग छोटी बाता म असावधानी बरते हैं उनक सामने बडी बातें आती ही नहीं और अगर आती भी हैं तो उनम उह सफरता नहीं मिरती। प० जवाहरगलजी को आप छोटे- छोट काम म भी उनना ही सावधान और उत्माही पाएग जितना वड वामा में। (मायुरी, कार्तिक ३०६ तु० स• वय ८ खण्ड १, सख्या ७ मे) पडितजी के जीवन-चार म उनके विषय म जा कुछ भी धारणा रही है और आज उनके पीछे भा रोगा को जो कुछ धारणाए बन गई हो पटिनजी वास्तव में ऐसे ही हैं जिसका उदाहरण ऊपर दिया गया है और जिमने मुस सर्वाधिक प्रमा वित दिया है। उनकी लिखावट तथा जीवनी म सत्तुग्न वे अभाव का प्रश्न ही दृष्टिगोचर नहा होता! मनोवज्ञानिक विश्लेषण के उदाहरण पडित द्वारकाप्रसाद मिश्र को जसा मि हम उनको जानते हैं उगहरण : में पाते हैं। बहुत ही म्पप साता प्रत्यक्ष बहुत ही अच्छी तरह सन्तुग्ति स्थिर और धारावाही रिखावट। एसी शुद्धता क्वा उच्च मानसिक स्तर सयम साहस तया क्मठता से ही प्राप्त होती है । इनकी प्रतिभा चतुमुखी है । टनको हम विविध क्षत्रो म पार है कवि राजनीतिक प्रशासक आदि । उनकी मान- सिक गक्तिया एक सुलझ हुए विचारक की तरह सास्कृतिक शुद्धता मानवीय सहानुभूति स्फूर्ति आत्मबल धय उनकी रेखनी के सम एव सतुन्ति दबाव और उसकी मीमित स्थिर प्रगति की अनेकानेक गक्तियो से प्रसारित हैं। मि वजी के सामने अनर ज्वार भाट जाते रहते हैं परतु उनकी गम्भीर शात हसमुख प्रवत्ति निरतर सघष करते रहने में उनका साथ दती रही है। श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन की रिखावट में भी यही गुण विद्यमान हैं। सावधानी गम्भीरता योजना की शात प्रवत्ति प्रशासन तथा प्रवध योग्यता का ध्यान आते ही सवप्रथम हमारे सामने सरदार पटेल का स्मतिचित्र जाग्रत होता है। दनको हम कुछ भूर-सा गए हैं। उदाहरण ८ में इनकी ओर मुखाकृति कीजिए क्तिन याड मे और छोटे अक्षर हैं इनके जिनकी याख्या बहुत ही थोडी सी भाषा मे हो सकती है। परतु इनको हम लौह-पुरुष कहते थे और जब तक मनुष्य का इतिहास हमारे सामने आता रहेगा सदा ही हम इनका सानी तलाश करते रहग । अक्षर कामर छोटे स्पष्ट और स्थिर हैं। बहुत सोचा परतु थोडा कहा | जो कहा वह पर्याप्त है और वायरूप म परिणत होकर ही रहेगा। इनके अनुसार अपने विचार भावुक्ता तक सास्कृतिक गुद्धता लक्ष्य एव प्रियाशीलता मासुझाय रखना ही महान लक्ष्य-माधन की विधि है। यदि यह गद्ध और सत्य है तो अपनी योजना का सफरता में कोई काका वारण हा नहा है । गुजराती और अग्र जी दोना ही भाषाओ की लिपि म सरदार पटेल के गुण समान हैं। सुभाषच वोम की लिखावट-पमता सीधी वगपूण सचाई और आत्म निभरता की है । यह उनका रिसावट म स्पष्ट है । वहुत ही भली भाति नियाजित सूक्ष्म और गतिशीर अक्षर उगहरण सम्या १ में प्रकाशित हैं। यह लिखावर सच बोलती है साफ बोरती है और आतरिक गति के वेग से बोरती है । गतिशील खनी म स्पष्टता अमरा का पूणता सास्कृतिक शुद्धता क्रियाशीलता का यह एक अष्टनम उदाहरण ।छोटे आकार की रिसावट अपनी जीवन गस्ति का उपयोग भटत ही दयपूण दपि स कग्न की दत्ति प्रगित करता है। चित्र १० अ म प्रमिद्ध विगन राहु' मात्र यायन के हस्ताक्षर हैं। लिखा वर वगपूण है अभर म्पप है। रिखावर लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करने की उत्कट या बनाता है। माय हा म्पष्ट और पूण असर म बात क द्योतक हैं कि रमा ६ मामन रम्य म्पर है। । ५२ हस्तलिपि विज्ञान ५ व्यक्तित्व का विश्लेषण कार लिए हुए उपहाणाम हमन हाशिए स पक्त हान वार रपणा का वर्णन किया है। परन्तु आपन अनुभव क्यिा होगा कि इन हाशिया म व्यक्त हाने वाल एपणा का कतिपय लिखावटों व अय दूमरे लथणा का ममयन भी लिया गया है। किमो भी वनानिक प्रयाग म किमी या एक चिह्न के ऊपर पूरा भरोसा करना प्रयोग की सपना का द्यानक नही हा सकता। उमका ममयन किमी दूमरी तरफ से भी मिलना आवश्यक होता है। यत यह आवश्यक हा जाता है कि हम लिखावट में पाए जान वार अय स्थणा का बार भा ध्यान दें। मम्पूण रिखावट चित्र को परायण वा आधार मानकर हम विपित हाता है कि लिखावट म हागिया एक मह वपूण लषण है । यह रिपन वारे को सयाजक क्रिया एव वत्ति का बार समेत करता है। परन्तु वनानिक नियम के अनुसार कवर इतने सही ग्खिन वार व्यक्ति की सयोजक एव असयोजक कल्पना तया क्रिया की अभिव्यजना मा य नही हो सकती। अन इम रिए हम निखावट में अय गणों की खोज करते हैं। इन चिह्ना स एव उनस साकतिक व्यक्तिगत रमणों म हम अपन पूर्व प्राप्न रक्षणा की पुष्टि मिटता है। वाम्तव म हाशिया रिक्त स्थान का सूचक है और रित्त स्थान लिखावट के वाच म और भी हो मकन हैं। स्थान का विषय सोचत समय लिखन वाला अपन उपर र स्थान का प्रयाग दिम प्रकार करता है साच-समझकर अयदा लापरवाही म मितव्ययिता स अयवा अपव्यय स सुदरता मे अयवा मद्दपन से? मप्रकार का रक्तिगत विचारधारा अयवा वायगारनाथण लिखावट के उन सब रमणा म मिग्न हैं जिनका स्थान स सीधा सम्घ है। जम कि हागिए अपराग पनिया के दाच हट हुए स्थान और असरार पर और नाचे की मात्रामा आरार स जिसम दनाय हुए मात्रामा के चिह्न लिखावट की व्यवस्था नष्ट कर दन हैं । उगाहरण के लिए कह सकते हैं - (१) नीचे की मात्राए जस ऊ की मात्रा इतनी लम्बी हो कि नीचे की लिखावट की पक्ति की ऊपर की मानाआ ऐ ओ आदि समिट जाए। (२) अथवा नीच की पक्ति रिसत ममय उपर की मानाए जम ई, ए ओ आदि अक्षरो की मात्राए ऊपर का पक्ति की नीचे की मात्राए जस कि को मानाआ से उलझ जाए। इस तरह की रिखावट जिसम माताए एक-दूसरे स स्पष्टत अग्ग-अलग नही हैं निश्चय ही रिवने वाल को मुल्यो हई मानमिक यवस्था मूचित नहीं परती । देखिए लिखावट चित्र सरया ११ । चित्र ११ स लिखावट में चौड हागिय के लपणा का समयन अपर शव एव पक्तिया के बीच म अधिक घटे हए रिक्त स्थाना से मिलता है । दूसरा ममयन हमे अमरावे आकार स भी मिरता है। वडे घर जा समान (स्थामी आचार) से अधिक स्थान पर रत है चौरे हागिए तथा अशरा सी एव पक्निया के बीच में अधिक रिक्त स्थान छाडने व लसणा का ममयन करते हैं। छो सकीण माण-हातन्हुए हागिए का ममयन समीण लिखावट और छोट छाट अक्षरो म रिखी हुई लिसावर स स्पष्ट होता है। नसभणा का एक स्थान पर पाया जाना स्वाभाविर है। जो व्यक्ति स्वभाव म हो मितव्ययी है वह अपन प्रपत्र व्यवहार म समान पाचरण करेगा। परन्तु जब रिमावर व चिह्नो ममूत्रा म अममानता निसा देती है तो परिस्थिति विचारणाय हा जाता है। और रिमा स्थिर निष्वप पर पहवन करिए गिवावर + बनर सभणा पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। जस कि घोड हागिए मारियावर म छाट आगर व अपराकाहाना तथा समीण स्थाना का पाया जाना। - हस्तलिपि विज्ञान इम विपरीत रिमावर में रिमी सत्रीण हाशिएक साथ परी हुइरिमा बरका पाया जाना, वह मापार व अथरावा पाया जाना तथा रिक्त स्थाना या अधिक प्रयाग दिया जाना हा सबना है। इस प्रकार की परिस्थितिया में रिबन वाल के स्वाभाविद एव अस्वाभाविक व्यक्तिगत रमणा मदद का मक्त मिला है। यह निश्चय हाना कठिन प्रतीत होता है कि निगान बाल व्यक्ति मुख्यत तिस प्रारका वति अपना रह है। लिखावट म मुपवस्था परम उपयोगी एव स्वस्थ चिह्न है। यह लिखने वा? व्यक्ति का बुद्धि यात्मवर एव वायगाना क पुष्ट रक्षणा का व्यक्त करता है। इस प्रकार का मुव्यवस्थित ग्मिावर म हागिए अभरा व आकार अर, शन पक्निया के बीच इट हुए रिक्त स्थान मात्राआ को शुद्ध वनावट तथा उन मापार आनि लिखावट के समस्त चिह्न उपयुक्त रूप स बन हुए रहत हैं। इस प्रकार की सुयवस्थित लिखावट अपने स्थायी रूप का ययाचित अनुगमन परता है। इसम लिपन वा व्यक्ति को मानमिक शारीरिक सुन्यवस्था एव स्नायुनन्द वा विनीता नथा उना यापम म एक-दूमर स सतुन स्पष्ट प्रति हाता है । इम अच्च उदाहरण सख्या ५ मे १० तक के उाहरणा मलिए जा चुप है। हस्तलिपि विनान क भूर तत्त्व ग्रहण करन क लिए इन रिग्वावरों को ध्यानपूवर पुन दम्बना आवश्यर है। इस परिस्थिति का युवावस्था म तथा बाल्यावस्था म ममान स्म स महत्व है। युवावस्था म एमा हाना स्वाभाविक हो मरना है। इस अवस्था म मानसिक वत्तियाँ परिपक्व हा चरती हैं। गारीरिक क्रिया सार हा चुकी होती हैं और उनका मतुलिन सचान किया जा सरना है । बालपन म मानमिर एव गारोरिक कामनाक कारण स्थिरता म्पपना पुष्टना आदि वत्तिया का सचार ययाचित मापा म नही हा पाता है। अन यह स्वाभाविक है कि इस अवस्था म गियावर म अस्तव्यस्तता प्टिगोचर हा जो शिबालपन स्वभाव की घातक है। यह मानसिक अपरिपक्वता है। अत इस बात का प्रयास किया जाना चाहिए और जहा म विषय की ययप्ट मा यता है, वहा एमा क्यिा भी जाता है कि प्रारम स हो पियार प्रवाम हो स्थिर मुव्यवस्थित गुख एव मपूण लिखावट का अभ्यास कराया जाता है। इस बम्याम और प्रशिक्षण स निश्चय हा लिखना सीखन वार वा मच्छागिबावर हो नहीं रिसत साथ-हा-माप अच्य और बुर का जान भी प्राप्त परत जात है। वफा अच्छा है अथवा क्या अच्छा नहीं है इसका मनन भी मरते जात है । जोनवाल म इस प्रकार का बना वा जिनका कि हम बहुत ही छाटी समय पर छो दत है ध्यान दन याग्य हाता है। इनका उरक्षा वरना माग व्यक्तित्व का विलेपण चलकर युवावस्था म अधिकाधिक हानिकारक सिद्ध हो जाता है। छाटी छोटी बाता को ध्यान में रस माना भी जीवनमाल की सपना का परम अभ्यास है। इस तथ्य का आभास हम तब होता है जब हम युवावस्था प्राप्त हो जाने पर भी कतिपय यक्तियों को बचा की तरह अव्यवस्थित अस्थिर आचरण करत देखने हैं । उस समय खेत है कि समय निकल चुक्न के कारण उनको क्तिा भी प्रार से अपना खोया हुआ समय एव सुअवसर फिर से प्राप्त नहीं हो सकता। छोटे आकार के अक्षर निश्चय ही थोडा और सकुचित स्थान रते हैं। इम लिखावट म और भी एक क्षण है। वह लिखावट का वाइ ओर का झरना है । इसकी विवेचना हम आगे के परिप्रेट म करेंगे। चचल स्वभाव की पहचान लिखावट में सनी को चचगति से होती है। जब लिखावट में कोई निश्चित व्यवस्था नहीं दिखाई देती पक्तिया ऊपर नीचे जाती हैं अक्षर अघकरे और विखरे हुए दिखाई देते हैं ता उसको पाने वाले महन हा समय रत हैं कि रिखने वाले यक्ति का मन स्थिर नहा है। वह अपना ध्यान एकाग्र नहा कर सकता। उसम आत्मबल का अभाव है। अथवा वह अपने आत्मबल का प्रयोग कर सकने में असमय है । देखिए चित्र संख्या ४ म निया हुआ उदाहरण। on पर गोलारस्पेशा यो सप नाले कर गो का शेध - 30 .. उमिला चित्र १२ Jots etc fast friend she rends lass with me see चित्र १३ ग्विावर मध्याए १२ और १३ विभिन होते हुए भी समान लाणा हैं । म पनि काम हाय तथा भावना प्रधान हाते हैं। उनके लिए भाव तरग म ब जाता स्वाभाविक है। महज हा क्सिा एक विचार वा पाराम उनरा उमाह वर जाता है। परन्तु नियमित यवहार का आभाम एव पयान्न अभ्याम न हान मगन गया उमाहटग प जाता है। वह फिर को नई याजना बनाने मा जाता है। एम यत्तिया म मानमिर उपर-सुथर पायन उग निरागा हस्तलिपि विज्ञान द्वत, विचारधारा तथा आचार विचार म समानता का अभाव रहता है। य क्सिी एक वाय को मन ल्गावर नही कर मक्ते । मिसी भी एक विचारधारा का, विमा भी एक आदा का दृढतापूर्वक पकने नही रह सक्त । इस बतिमी पमुखता मनुप्प व व्यावहारिक जीवन म है। सामाजिक परिस्थिति हा अयवा व्यापारिक, राज नीतिक वातावरण हा अथवा औद्यागिक घर म अपनी स्त्री एव व चो से व्यवहार हा अथवा इष्ट मित्रा से अपने नियम का पक्का होने की क्षमता अनिवाय है। अपनी बात को जो निभा सके, उसका आदर सब जगह हाता है। एसा व्यक्ति अपन लिए प्रत्यक वातावरण म विश्वासपूर्ण स्थान प्राप्त कर लेता है। लोग कहते हैं कि अमुक “यक्ति अपना बात का धनी है। जानते हैं कि वह अपना वचन पूरा करेगा पिमलगा नहीं । बच निक्लन वा बहाना नहा बनाएगा। किसी भी प्रकार क प्रलोभन उसको अपने लक्ष्य को प्राप्ति करने मे डिगा नही मरगे। वह पथभ्रष्ट नही होगा । उस व्यक्तिगत पण चाहे और कुछ भी हा परतु वह अमनो-कम अपनी बात का पता है। ऐमे यक्ति सामाजिक औद्योगिक राजनीतिक तथा किसी भी प्रकार के प्रशासन म ऊचा स्थान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार से उनके व्यक्तित्व का भरोसा सवसाधारण जनता म बना रहता है। स्थिर स्वभाव वाले सुव्यवस्थित मानमिक योजना वार यक्नि अपना प्रमुख एवं आन्तरिक गम्भारता के कारण रिसी भी परिस्थिति म हतात्माह नहा हाते। उनका आत्मद मदा ही उनम शक्ति का संचार करता रहता है। इस प्रकार को गभीर सुयवस्थित रिखा वट का स्पष्ट उदाहरण हमारे आदरणीय राष्ट्रनेता सरदार पटेल की रिसावट म सदव ही प्रस्तुत रहा है। ग्खिावट सख्या ८ उनकी लिखावट का उदाहरण है। एस स्थिरता व समेत हमको अय स्थिर एव पुष्ट रिखावटो म भी मिलते हैं जस विलिपावट सत्याए १४ एव १५ । ये व्यक्ति अपन व्यावहारिक क्षत्र म मुव्यवस्थित चरित्र की महत्ता प्रगित करते हैं। उनका आतरिक शक्ति देखते हुए ऐमा होना अनिवाय है। चित्र मख्या ६ की रिपावट में भी वह तनी ही पक्ति सपल ध है। अव्यवस्थित एव दुग्ल आरमरल वाल व्यक्तियो को जब कभी अपनी असफता का वास्तविक आभास होता है व ऐसे हतोत्माह हो जाते हैं जिससे उनसे जगा सकना असभव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता है। इनम एक विशेषता है वि य पुरानी बातें बहुत जल्ली भूल जाते हैं। और क्सिी नवान कल्पना में जानत हो जाने पर फिर से नवीन उत्साह के साथ सडे हो जाते हैं। फिर एक नई सहर आई और वह पा अव्यवस्थित रियाक्ट जब छोटे आकार की समीण म्यान म और गिचपिच होती है तो वह व्यक्तित्व के बरहीन अस्वस्थ हरण बात करती है। दलिए रिखावटें स० ११ १२ १३ । इन लिखावटो का दराने से पता चरता है व्यक्तित्व का पिटेपण असम्भव था । नित्य ही उपचार चरता रहता था। ऐमा मालूम नहीं होना था कि यह अधिक कष्ट सहन कर सकते हैं अथवा कोई भी काय नियमबद्ध तथा यथाश्म वर सक्त हैं। इतना गारारिक शिथिलता म सहज ही दिमाग और स्नायु कमजोर पड़ जाते हैं। परतु इनकी लिखावट को देखिए कितनी स्थिर हैं इनको रेखाएं। अक्षर मोतिया की तरह पिरोय हुए हैं। कारण उनको आन्तरिक शक्ति बहुत ही बरवान थी जिसके संचार से वह अपनी महान गारीरिक व्याधि का प्रभाव अपने मानस पर नहीं होने देते थे। उनकी गान्त एव सद्यवहार स्थिर सह्न गोरता की गति उनके स्थिर एव सदाचरण की भूमिका म सत्व श्रष्ठ स्थान प्राप्त करती रही है। इस गान्त-सरल सहनीरता तथा आत्मिक दृढता के उद्भव स जो दाप प्रबलित हुए हैं व सतिप्त होते हुए भा भारताम सास्कृतिक एव साहित्यिक क्षितिज को सीमित कार तक स्थायी रूप से सुप्रकाशित करते रहगे। यह लिखावट समगति वग म आती है अत उभयमुखी प्रवत्ति व्यान परती है। ऊपर लिय गए परिचय से हस्तलिपि विज्ञान का एक महत्त्वपूण मूल तथ्य सन्ज ही मिद्ध होता है । जसा कि प्रारम्भ में ही रहा जा चका है कि हस्तलिपि का सीधा सम्बध रिखनेवाले की मानसिक अवस्या से है। हस्तलिपियो का निरन्तर पपवक्षण करते रहन से अनुभव होता है कि स्वस्थ “यक्ति जिसका लि और दिमाग मजबूत है हाय जमाकर लिखता है। जिस तरह स उसे अपने गारी रिक अगा पर तया इन्यिा पर अधिकार है उसी तरह स उसको अपनी लेखनी पर भी अधिकार है । वद्धावस्था से अथवा किसी अय प्रकार से गरीर म कमजोरी आने म उसका गरीर तिथि हा जाना स्वाभाविक है। हाय पिने लगता है। लिखने म भा हाय कांपने के कारण लिखावट बिगड जाती है। यक्निया की स्वस्थ तथा मामारी की हारता म गिदी गई लिपावटा क तुलनात्मक मिलात से और विवचनात्मक जांच स एमा सिद्ध हा चबा है। और यह मूठ तथ्य फिर भी पय वगण तथा अनुभव के द्वारा सिद्ध किया जा सकता है। परन्तु श्री मियारामशरणजी गुप्त को शारीरिक अवस्था तथा उनकी पिसावट म काई एमा ममानता नहीं है क्याकि उनका मस्तिष्क उनकी मानमिय नवम्या पूतया स्वस्थ था। पर उना जम रुग्णावस्था वाले व्यक्ति मक्का अन्तिाय र आतरिक निकारा हा प्राप्त हो सकती है। इस तरह स हम्त पिदिनान व पति यह रिसावर अन्तिीय उनाहरण है। हद निचय कष्ट महिलाना नियम-पान का क्षमता रचनामा कल्पना कायरता तथा म्वन्धमा एम मजाव आहरण दिर' हा मिग्त है। • वदावनलाल वर्मा की गिवावर का उगहरण चित्र १६ मनिया हस्तलिपि विज्ञान गया है। यह एक दूमर श्रेष्ठ प्रतिभावान व्यक्तिव का जाप्रत प्रतिविम्ब है। इमका मौरिफ्ना उदाहरण सम्या ५ ६ विपरीत है, परन्तु अनूठा है। चित्र १ इस लिखावट का महत्त्वपूण रक्षण रखा की धाराप्रवाह गनिगीलता है। रखनी अपना यात्रा प्रारम्भ करते ही मुगमता म परन्तु तीव्रगति स बनती है। अक्षर मिल-जुट हैं। माय ही गिरा रेखाए भी बनती चली जाती हैं । मात्राए, विसग यादि भी आगे का चलते हुए माम हान हैं । ये सव रेखनी की तीव्रगति मूचक रमण हैं । अन बहिमुखी प्रवत्तिक वग म यात हैं। इस प्रकार का लिखावट मुभ्यत आन्तरिक उत्कट प्ररणा अनवरत लगन अपन विचारा को कायापम परिणन करने का उद्यम कल्पना उमका साकार पर दिखाना निर्भीकता आदि रचनात्मक यात्रा पण प्रकट करती है । एमी प्रवर शक्ति के समय को भी एमी समस्या उत्पन नहा हा मक्ती जिमका मुर- झान के लिए उम पठिनाई का अनुभव हा । ऐमी काई भी अडचन नहीं है जिम वह पार करने का माम न कर सकें। एमो कोई उल्यन नहीं है जिसे तुरन और मफलतापूर्वक मुग्यान को उसम ममय न हो। जिम ममय ममस्या उत्पन्न होती है उमका समाधान भी साथ-हा-माय स्वामाविक रूपमा प्रस्तुत हो जाता है। वास्तव म इस प्रकार के समय व्यक्ति पठिनाइया का सामना करन म ही भान प्राप्त करते हैं। नय-नये रचनात्मक कार्यो का उठाना और उनको मफ्ल कर दिवाना ओज नद्याग और परिश्रम में समाज म परस्पर व्यवहार म मय व्यक्तिया का संचालन करना नेतृव करना परिस्थितिया से सघप करना, उन पर विजय पान व रिए यह सब एसे पराक्रमी व्यक्तित्व के लिए महन व्यवहार है। इस गाविनारी रिखावट म तीव्रगति होत हुए भी स्थाया स्तम्भ व्यक्तित्व का विन्लेषण चाहता बहुत कुछ है परन्तु अपनी मानसिक तथा शारीरिक गक्ति का सतुलन तया मुव्यवम्यिन उपयोग न कर सक्न के कारण अपने लथ्य को धय एव स्थिरता से पर नहा रह सक्ता मानसिक दृढना क्प्ट-सहिष्णुता इनके व्यक्तित्व का प्रभावपूण तत्त्व नहीं है। सामाजिक यवहार म यह लखक बहुत ही सरस हैं। इनकी रगीनियां अपने सहयोगियों को सलाही विनोमय एव आर्पित रखती हैं। इनकी मिलन- सरसता उदार है। बात इतनी है केवल कि यह अपनी क्सिी नवीन कल्पना के सागर म उथ' पुथर न हो रही हा। इनकी चित्तवृत्ति किस समय सगमप्रिय अवस्था में है यह वास्तव में विचारणीय विषय है। इस लिखावट मजो बनावटीपन दिखाई देता है वह वास्तव म इनकी स्वाभाविकता है। जो प्रयाम दिखाई देता है वह वास्तविक है। इतना तीव्र भावुक्ता प्रधान यक्तित्व सहज ही दूसरे लोगा का ध्यान अपनी ओर आवपित करना चाहता है। दस तरह से लिखावटा के भौतिक चिह्न सामा य अथवा जाति-सम्बधी प्रतिरूप तया विशिष्ट प्रतिरूप-उनकी पहचान उनकी स्थिरताको परख उनकी नाप उनका योगायोग अनेक प्रकार की मौलिक लिखावटा का सूक्ष्म पयवेक्षण एव मनोवनानिर विश्लेषण करने से ही प्राप्त हो सकता है। इसका अभ्यास आवश्यक है। लिखावट के प्रतिरूप स्पष्ट पहचान में आने से अनेक यक्तिगत लक्षणो का मनोवनानिक विश्पण भी होने लगता है। रिखनेवाले का व्यक्तित्व स्पष्ट होने 7गता है । अभिरुचि और अम्याम पिसी भी वज्ञानिक रिया को मान- वीय मनीपी और विश्वासजनक रूप दने के लिए आवश्यक हैं। व्यक्तित्व के मनोवज्ञानिक लक्षण-मनुष्य की मूल प्रवत्तियां उमके सस्कार पावहारिक परिस्थितिया–माहित्यिर सामाजिक राजनीतिर अथवा आर्थिक –अनक हैं। वह भाति भाति से अपनी सम्पूर्ण युक्तिया से जितना कि उमर पिए पयाप्त है अपनी व्यक्तिगत सुगमता के लिए आचरण करता है । इसमें उम सफरता मिरती है और कभी नहीं भी मिगती। बहुत ही मुलझ हुए व्यक्तियो का मनावज्ञानिस दिएपण करक देखा। परन्तु विशेषता यह पाई कि प्रत्यक व्यक्ति म अनर स्वाभाविक पणा का समाव है। ऐमा विरला ही कोई व्यक्ति हागा जिम स्मिी एप विशष रमण में सात किया जा सके। प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका म अन मणा का याग पाया जाता है और यह योग अपना एक अनूठापन उान करता है। प्रत व्यक्तिव क उनाहरण म न गणो के अनूठे योग में जहाँ श्यिागार रिवाऊ गुण निहित हैं वहीं मो रचनात्मक अभिरचि वादान हाता है। जहाँ निष्क्रिय गुण मिरते हैं वहाँ रचनामा उद्योग के चिह्न प्राप्त नहीं हात । जम नि व्यक्तिव म बलियो प्रतिभा प्रधान हात हुए यदि उसम स्थिरता भाहै ना एमा व्यक्तित्र अपन मिया प्रतिभा गुण का सदुपयोग कर सकेगा। हस्तलिपि विज्ञान उपको भावमय कल्पना मल गार, प्रालित स्फूति मा नव को मुचिपूप, मुपयन और सरादेगे। उमदे उधम काराभायर बना देंगे। यदि यही बहिमुन्नी व्यक्तिववाभग अम्भिर गयमान व्यक्ति म पाया जाएगा ता वह उमा मतामाराम मदव उथल-पल बनाए रखगा। एमा व्यक्ति भी इधर भी उपर भकता रहमा और इस तरह म रहिमुनी व्यक्ति का आ स्थिर स्वभाव के साथ सद्गुण हो जाता है वहा अस्थिर स्वभाव के माय दुगण अथवा स्वभाव का मजारी पाएगी। इस तरह स मिययता और उमा विपरात उभारता भी व्यक्तित्व व प्रमुख पण हा मान हैं। पदूमर रम याग में त्र्यिागार और निस्क्रिय गुणाका न त है। जिस व्यक्ति का ध्यान केन्द्रित रहता है यह अपनी गलियों का मचय करता है। यदि उमम नतिरता का सामजस्य है ता वह कृपण न हारावयता पहन पर अपनी सचित क्विया का व्यय करने में उदारता प्रगित कर मरता है। उनल्य व्यक्ति यति आवश्यक और अनाव यर परि स्थिनिया कातुरमात्मा पहचान बरन म यममय होता है तो वह अपना सचिन प्रक्रिया का नया व्यय पर उनका गीघ्र ही नष्ट कर हारता है। मानव स्वभाव म रचि रुझान, गुण अवगुण आ'ि वा विपण करन म सम्पूर्ण स्थाणा का पपनगण आया हाता है। रणा , निशा भी याग को बन्छा या बुरा नहा कहा जा सरना । जास्वानावित एक व्यक्ति म अच्छा हा माग है वगै दूसर व्यक्ति म बुरा हा सकता है । अत व्यक्ति स्पचित्रण करिए चमो सम्पूर्ण व्यक्तित्व का अध्ययन यावश्यक है। गगनत है कि अमुक रिसावर अच्छा है अथवा अमुर निमावट अच्छा नहीं है। यह माधारणतया डिवावट को सुना वनावर वार हा कहा जाता है। रिसावट अच्छी है अथवा यी रहा है, वास्तव में इसका पता उमर भौति चिह्नों का रचना स रगता है। कुछ गिलाव ने मबद्भुत अच्छी गदा हैं। उनमें सागा सपाई और सम्पूर्णता पार जाती है परन्तु हम्नलिपि विनान की दृष्टि स व निर्जीव हाती हैं। सुरख व उप म सावधानी स बनाई दुइ हाता हैं स्वामाविन गनिम नहीं। इन खिा दणम पल्पना, प्रेरा जम माय रक्षण, जारि न्यनिक प्रधान सचारक तत्त्व हैं, प्रति नहा हात । अय लिया जा रचना म लना सुन्दर नहा हैं मम निराशा सव्यक्तिवाद अना जीवनापया TRI प्रकाशित करता है। ये स्वामाविर शिजाद हैं, जमावि रिसन वागम्यक्तिमजान है सजग है और स्वतत्र यावरणपरता है। हिवाटा के विभिन्न दलहरण देखत रहन सहन तिवावगे को पहचान हालो है। तथापि हस्तलिमि दिनान का उपयोग वरत हुए यह आवश्यक होता है कि रिसावर यो विधि विहाको पहचानकर का जाए उना मतावनानि रसों योगवाविरपण - का तास्कि विवचन दिया जाए और उन विविध रक्षणो वा सम वय करते हुए व्यक्तिव का मनोबनाशिकसान किया जाए । इम पराया म हस्तलिपि विनान 4 जाधारभूत तत्त्व उपयागी सात टने हैं। इन सरतो स मनावनानिक मतुलन तया सयाग स मानव स्वभाव का चित्रण मुगम हा जाता है। रिसावटा मे मनावजानिर सक्त-प्रत्यक यक्ति का जपनी पिसादर मौरिक होती है । भावना गभिन मानसिक अवस्या के अनुसार अपनी मत्रिय एवम् निप्रिय आचरण करती है जिमस समय-ममय पर यह रिसावट बदलती हुई प्रतीत होती है। हम दस वरती हुई लिखावट को पहचान रत है। इसका कारण यह है कि प्रत्यर लिखावट म कुछ स्थायी चिह्न हाते हैं। हस्तनिपि विनान म पहा नियम रिखावट के पूरे चित्र का निरीक्षण करना है जिसम उपल ध स्थानों वा सावधानी स किया हुआ उपयाग अथवा अमावधाना दिसाई दती है। टमसे लिखन का दाता प्रोटता सौम्यता एव सास्कृतिक सस्वार आदि भी रिखा दत हैं । दूसरा नियम लिखावर के स्थायी चिह्नो की पहचान तथा उनका निरी रण है। य चिह्न दो प्रकार(प्रतिरूप) मबाट दिए जा सकते हैं। एक सामा य अथवा जाति सम्बधी प्रनिम्प जस खिावट का स्पष्ट होना माटी और भद्दी लिखावट हाना तेज गति स गिता हु रिखावट साधारतल पक्तिया व गिरोरेखाए हाना न होना आदि। दूसरे विशिष्ट प्रतिरूप जमे ग्यिावर का निरठापन गिगावर का छोटा या बड़ा आकार पिसावट म मात्राआ गूय विमर्ग पाई आ'ि म सामा य अथवा असामाय आकार और उनका विविध बनावटें आदि हाना अथवा न होना। सामा य यानि सम्बधी प्रतिरूप और विशिष्ट प्रतिरूप मितने भी हो मरते हैं । यह प्रयक गियावर की बावा पर निभर है। पिसावट इन प्रतिरूपा सभ्यक्तित्व के विविध लक्षणा का मनावनानिक स्प मिटता है जस स्पष्ट अभर मानमिर स्पष्टता प्रगित करते हैं। परन्तु व्यतिनत्व म स्पष्टता व साथ-माय और भी बहुत-म गण हो सकते हैं जाति किमा भा व्यक्ति का वौद्धिक भावा आत्मपर और जना विपक्षणास प्रमा वित रहेंग। इनकी पहचान व रिएग्विावर १ अनव चिन्द्रो की परम और उनग सयोग करना आवश्यक हागा। जम निचौ अथवा सण नागिय रियावट बोच म हारे हा रिक्त म्यान मोग गियावर जरा वह आकार लगानी गा अधिर दाव कागज पर अधिक स्या का प्रयाग आगे की ओर झकना हुई ग्मिार गिरारमा याचना अथवा छा जाता अराका एक-दूसरस मिस्त जाना अपवा टनर प्रयर अग का अग अग गिया जाना आमिप्रसारस निमार सरानर विदामा मनावनानि विगतया उनका मामूहिक मात्र प्रति मानासि मानमिर मौगिता आदि पिरिष एनपि विज्ञान व्यक्तिगत रक्षण प्रस्तुत करता है। इसम पिसने वाले व्यक्ति वा मनावनानित स्वाभाविक तथा मौग्वि व्यक्तित प्राप्त होता है। इस तथ्य का विगि उगहरण पिछले अध्याय म प्रस्तुत रिपावटा स प्राप्त मनोवनानिक चित्रावन द्वारा प्रस्तुत किया जा चुका है। विपय व पयाप्त नान अनुभव एव अम्याम दाग लिखावटा मामाय चिह्न परवान जात है उनका जाति-मम्ब पी प्रतिस्प विशिष्ट प्रतिरूप, उनकी स्थिरता का परख ल्पना की गति की नाप अक्षरों के आकार मम्पूण लिखावट को यवस्मा आदि योगायाग प्राप्त होते हैं। इसका अभ्यास आवश्यक है। व्यक्तित्व की एक माटी परतु विग्रस्त म्परेवा विमा भी लिखावट के विधिवत् अध्ययन से प्राप्त हो जाती है। "सस समय म बा जाता है कि लिखने वाल व्यक्ति के स्वभाव अथवा चरित्र के स्थायी स्तम्भ कौन-म हैं । स्वाभाविक वृनियो स्पष्ट हो जाती है । अधिक छानबीन से यक्तित्व की गहनता म भी परचा जा सकता है । हस्तलिपि विज्ञान वी वनानिर प्रिया महल तथा विधिवत् है। पर्याप्त अभिरुचि रान, अध्ययन से इसका अभ्यास किया जा समता है तथा इसके द्वारा किसी भी यक्ति के मौरिक मनोवज्ञानिय अस्त करने में सफलता प्राप्त हो सकती है। हस्तलिपि * मूल तत्वा तया तत्सम्बधी पक्तिगत चरित्र के रक्षणा का वणन आग करेंगे। मस्तित्व का विलेषण १७ ६ अक्षर तसे लिखे जाएँ इस विषय पर मराठी साहित्य से एक बहुत ही उपयुक्त किंवन्ती प्राप्त होती है। इस क्थन का सीधा सम्ब ध अक्षरा की बनावट अथवा लिखावट से है एसा कहा गया है। बाटोळे सरळ मोकळे मुकमाळा जैश। पहिले अक्षर जे काटिले अथ सपेतो पहात गेले ।। चित्र १० मरर मापा म कह सकते हैं कि अगर गोलाकार हो मुगल यने हा सर पता स बनाये गए हा तथा अपग-अलग बन हा मोतिया की मालाममान इनका आवार एक ममान हो मुडौ तथा सरल जम कि ग्रप रिपना प्रारम्भ करन म अमर बने हैं बस हा अपर समान १५ से प्रत्यक अत-पय त बनत चले जाए। विव-न्तियाँ मवमा य तथ्य पगिन करती हैं। मैं एम तय्य दती हैं जो बहत हा पग्नि एवं व्यावहारिक अनुभव भ प्राप्त हात हैं। एम तथ्य का महत्व क्सिी भा पार एव परिस्थिति म ममान रहता है। यह विवानी भान्सी प्रकार एवं मनमा प तप्य प्रगित करती है। इस सत्य का महत्त्व गिवन की प्रत्यर परिस्थिति म समान प म हा पाया जाएगा। रिवन वाग व्यक्ति का भी हो रियन का लिपिमा मा हा तपाबुछ मागिम रहा गिपन की धरी अपरा की मनावर मग एक रगी। अगर मा हा एक्स बनें मुगेर पर्ने सरतास गिहा तदा मातिया का माग द ममान एक वा दूसरा स्पष्ट पस अग अलग बनते हुए चले जाएं यह नितान्त आवश्यक है। किंवदन्ती, अपने स्पष्ट तथ्य के कारण आवश्यक सुझाव उपर ध करनी है। ये मुझाव इतने सहज रूप स तथा इतनी सरर भाषा में दिए जाते हैं कि सदा ही स्मरण रहें और उसकी याद दिलाते रह । कोई भी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति मे इनकी यथाथता समपन म वा न कर सके उसके अनुसार आचरण भी कर सके। सत्य तो यह है कि व्यावहारिक जीवन के लिए ये थोडे से चुन हुए सुदर, सरल उपयुक्त महापुरुषावे द्वारा लिय हुए महान् निर्देश हैं । इनका अनुसरण करने से आत्म नान आत्म-धर स्वावलम्ब तया सृजनकारी क्रियाशीलता प्राप्त होती है जिससे हमारे जीवन में से लक्ष्यहीनता की मात्रा कम हाती है और हम अपना जीवन व्यवहार आचरण अधिक उन्नत करने के लिए एक आदश प्राप्त हो जाता है। अधिक कुशलता एव सफलता प्राप्त कर लेने के लिए इसका आभास स्वत हाने लगता है। बगला साहित्य म भी इस विषय पर गहन विचार प्राप्त होते हैं। हमारे आदरणीय गुरु श्री प्रफुल्लकुमार चटर्जी प्राय एक वगला क्यन दोहराया करते हैं. वह है नाली क्लम मन लेखे तीन जन । चित्र १९ स्याही रखनी तथा मन इन तीन के मन्तुग्न से सुलेख बनता है । केवल स्याही और रेसनी ही लिखावट के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अच्छी सिवावट के लिए यह परम आवश्यक है कि स्पाही और रखनी के साथ ही हमारे मन का सह्याग भी हो। जब हमारा मन लिखन म माथ नहीं देता तो निश्चय ही लिखना कठिन हो जाता है। जब किसी परिस्थिति म विना मन व सहयोग के रिसा जाता है तो देवर एव अस्वस्थ लिखावट का चित्र उपस्थित होता है। देखिए लिखावट सख्या २० का चित्र । इम लिखावट वे अक्षर अनेक स्थाना पर अशुद्ध हैं कटे फटे हैं तथा अव्यवस्थित है। रखनी म सहज गति आना असम्भव है । अच्छा सुल्ख तथा अच्छी अदक्षर कसे लिखे जाएँ - स्थिर सुयवस्थित तथा प्रभावगागैरिगावट रिखने के लिए आवश्यक है कि खित समय हमारा मन गात हो स्थिर हो स्वस्थ हो और खिावर म स्वाभाविक गति के लिए हमारे मन वे विचार भी सुलझ हुए हो। जन्छी सुयवस्थित रिसावट के उदाहरण रिखावर सख्या १८ और १६ हैं। रिसावट सख्या १८ मध्यम आकार के सुडौल अमरा की बनी है, रिक्त स्थान सम है पक्तिया सीधी हैं मात्राए भा उचित एव समाकार की हैं। सम्पूण रिसावट एक सुसयमित चित्र के समान प्रभावशाली एव आरपक है । यह लिवावर खिन वार यक्नि म सहज सावधानी ययात्रम रचनात्मक क्रियाशीरता स्पस्ता मानसिम एव भावात्मक सतुलन विवक आत्मायता के मद्गुण यक्त करती है। यह व्यक्ति अपने व्यावहारिक आचरण म गम्भीरता रगन स्वावलम्ब गात एव स्थिर प्रवृति उद्योग और के सास्कृतिक संस्कार प्रगित करता है । इसकी मधुर मानवीय सुशीठता म हीनता की भावना नहीं है । इसकी सादगा म आत्म प्रशासन का निजी प्रासा मा जाहम्वर भी नहीं है । यह रिमावर रिपन वाले व्यक्तिक मुटर अतमन का वास्तविक हृदयग्राही प्रतिविम्व है जसा शुद्ध मन अदर है वसा ही उसायावहारिक आचरण है । मी प्रपु कुमार चटर्जी को रिखावर घडे आकार की है। इस रिखावट म स्वाभाविक मानवीयता जात्मीयता प्रस-गति सुदर का प्रम तथा उदारता स्पष्ट है । नियम-पान आत्म-सयम आत्मविश्वाम अनुगामन आगप्रमक सद्गुण प्रसारित हैं यह व्यक्तित्व बुद्धिवर भावबत तया आत्मरतम समानन महान् मुसयोजित एव विरमित है प्रियाशीला बहुमुग्पा होते हुए भी मुव्यस्थित है तथा विवर के आवरण स नियमित है । एक साथ ही अनेर कार्यों का सफरता स पूरा भरते रह्न की क्षमता आपम स्वाभाविा है । कोमर, भावर पावान् आत्मीयता * अना पण इस रिसावट म मिरत हैं नरा हाप सहन हा पिघर उन्ना है तथा श्मिा भी व्यक्ति का सहायता करने के लिए यह त पर है। माय ही स रिखावर म मरता व अना 7 Tण मिरत हैं। नियम-पाग्न तथा अपने नाम का ऊचा उठाए रटने म य पूर्णतया समय हैं। समार की कार्य भी माया इनवा प्रभावित नहा कर माना या उमम विवर ननिकता तया उच मानव नारा का रिमा प्रारम भी वा कमी है। गम्गिावट की सपना मरियानट का पनव दर नया गति मगहनाप है। यह शारारिक अवम्यास कार है। मत्तर वप म अधिरजापु हान पर ना आपसी पना मलता है। बाजार मग यत यम आनु म हा गियन वाट व्यक्तिया र हाय नागता तया गपना यापन गत है। अनग्यि निबनावमट माग है। ार गिय गरा यता उगहाण एम पतिय प्रगित करत हैं जा जावन राम्पिति का नाव में प्रहग कर मात हैं । इनरा मन विचम्ति नहा हस्तलिपि विमान होता बारिक द्वन्द्व नवा प्रभावित ना करता य अपना आरण माग जानने हैं तथा उसका अनुसरण करा रहन की आनरिक गनि रमत हैं। "नका आवरण सलाही पिठ एव यायसगत रहता है। मानमिक्ता जागत है भावरना मजग है, आत्मवर धय प्रगति एवं गति प्रगित करता है । टनका प्रना एमी किमी भी प्रिया म सरग्न है जिमम मिनन भी अध्यवमाय परिथम गन तथा उगर सामा जिव सहयोग की आवश्यक्ताए परतु ननि माग सर्वोच्च हो । एम व्यक्ति समाज म आग व्यक्तित्व उनाहरण प्रस्तुत करत हैं तथा अय अनजानक व्यक्तिया का मुमर्यामन मुनियाजित मुमास्कृतिक मागान करत हैं। दातानियावान व्यक्तिगत विभिनता है। पदी लिखावट अन्नमुखा सौर दूमरी गिगावट बहिमुया प्रवत्ति प्राट करती है। रिग्वावर सस्या २० २ अनद उपहरण हम मिलत हैं ! अधिका लिखावटें दम प्रकार व निर्जीव निबर दरमुक्त यक्तित्व हमार सामन राती हा रहती हैं । व्यक्तिया म बौद्धिक वर भावामा स्पन या गति लिना मा पर हो परन्नु र यह सुमयाजित तथा सुनियमित नहा हा तो माया नहा है। यह रिमी एक विचारधारा का रगन म अनुवरण बल म अममय है। मानसिक उथल-पुथल मची ही रहती है और इस कारण अपने चित्त का स्थिर कर मकना असम्भव हा जाता है। एम व्यक्ति को विचारधारा म नवीनना भर ही हो वह परिवर्तित हाती रनी है तथा उसा विचार वारन हा रहते हैं। उनम हरता का आमाम नहीं मिला। अपने जीवन काल में हम अनेकानक व्यक्तिया सम्पक म आन हैं । काई व्यक्ति एम उच्च स्थान पर हात हैं जिनस हम सहज ही प्रभावित हा जात है, परन्तु नव हम उन जावन की व्यवस्था को कुछ निकट मावर देखत हैं तो हमार आश्चय का सीमा नहीं रहती। इनके आचरण म किसी भी प्रकार के नियम तथा विवा का छाया दिखाई नहीं देता। उनम नतत्व दि वाम उत्पन नहा हाता । हम विपरीत अन साधारण मनुप्या म समाधारण आमिर क्लिक उनाहरण प्राप्त हान है जा साधारण जीवन-यापन करते हुए भा ऊँचे व्यक्तित्व का प्रगान करते हैं। इनका व्यक्तिव अच्च आदर्गो पर आधारित है नया चरित्र यादरणीय है। इस प्रकार का अध्ययन रिक्षावटा के उदाहरणाम महज ही हो जाता है। उपरति गए तथ्या तथा उनाहरणा सहमन देखा नि गिवावर रिखना एक निश्चिा मारय वाम है । रुपनी को चाना श्यहीन नहा है कि लिखन वाग व्यक्ति रिक्त ममय मनचाहा हाथ चलता जाए। गिवन वार व्यक्ति का एक निविन पाण्डरिपि बनानी पड़ती है। इस काय म उस जा मानमिक, गारी लि और मनावनानिक बाधाए माना हैं जिनम लिसन क य म वाघा हाता है, गान्त भाव स सहन बरनी पडवो हैं और उनका पार परत हुए स्पप्ट, गुद्ध और असर कसे लिखे जाए स्थिर लिखावट लिखनी पडती है। यह क्रिया लिखने का काय प्रारम्भ करने से उसके अन्त तक चलती रहती है। इससे पता चलता है कि ग्विने की निया एक निश्चित काय है और इससे पता चलता है कि लेखक इस काय को किस प्रकार सम्पन करता है। इससे यह भी पता चलेगा कि उसकी नतिक शिक्षा का स्तर कसा है उसकी स्मरण गक्ति अक्षरा के आकार के ज्ञान के विषय म कसी है उसकी चतुरता स्फूर्ति जीवन गक्ति सयम गक्नि रुचि रुझान आदि लक्षणा का स्तर कसा है। लिखावट का आशय अभरो की पुन रचना स भी है । लिखावट के अभरा का आकार एव भान पूर्वनिर्धारित है। लिखने वाला यक्ति इन पूर्वनिर्धारित आवारा को कुछ परिवतन के साथ बनाता है। य परिवतन दो प्रकार के हैं और स्वत अन्तमन द्वारा प्रकट होते हैं। अभरा की कुछ रेखाआ तया अय चिह्नो को छोड जाना जिनको वह व्यक्ति आवश्यक नही समझता अथवा जो उसके लिए लिखने की त्रिया म कठिन हैं बाधक है। और दूसरे अक्षरो की कुछ रेखाओ तथा अय चिह्नों को अतिरिक्त जोड देना अथवा उनकी आकृति अपनी रझान के अनुमार बदल देना जिसे वह आवश्यक समझता है अथवा जो उसके लिए लिखने मे सहन हैं। स्झान प्रगित वरती इस दृष्टिकोण से हस्तलिपि लिखने वाले व्यक्ति के अन्तमन की स्वाभाविक । इससे व्यक्त होता है कि वह किम आचरण को पसद करता है और क्सि व्यवहार को पसन् नहीं करता। कुछ अभरा की ऐमी आकृतिया को अपनाता है जो अय व्यक्ति लिखते हैं और वह व्यक्ति यह व्यक्त करता है कि उनके आचरण वह अपनाता है। अमराव आवार परिवर्तित करने म रखनी को इस प्रकार से निजी रुचि से चगना काफी मात्रा म बर सकता है । उगहरण के लिए कह सक्त हैं कि यति का व्यक्ति क्मिी चित्रकार से प्रभावित है तो वह अपने अभर भी चित्रकारी ने समान बनान म तथा उनकी रचना चित्रवत् वरन म अपनी शक्ति का प्रयोग परेगा। न चित्रा म उमर अन्नमन की छाया निहित होगी। यतिकिमी कारणवालियन बार व्यक्ति व चित्त स काय उचित रूप से परन का लय मिट जाए तारिखावर म एकाता सयम स्थिरता दृढ़ना शिष्टता का अल हो जाएगा और गियावर एमा बनगी जिसका लिखावट कह मकना ही बग्नि हाम। वन-मा रियाव जा नि वाम्नद म उाझा हुई-मी रखाए हैं प्रतिनिधिताचर हाता है। वनानि विचारतों न इस विषय पर कुछ प्रयाग मा पिए है। जम रिविमा ममर आर पान चिन म एकाय हाार अपन विचारा को ७२ हस्तनिपि विज्ञान सुन्शाते हुए रिपन के लिए बने है तो आपको रिसावट शुद्ध स्पष्ट और सौम्य बनती है। रिमो दूसरे अवसर पर जव आपरी मानमिर परिस्थितिम उद्विग्नता होती है भाषा में दूद होता है लिखने बठने हैं तो आपकी लिसावर उतनी गुट स्पष्ट और सौम्य नहीं बनती। अथवा जब आप अपनी सहज लिवावट विमी अय कारण सबलनी हुई पाते हैं तो आपको तुरन्त आगाह हो जाना आवश्यक है। लिवावट की परिस्थिति हराकरे अन्तमन को छाया है जोकि सामयिक आचरण से प्रभावित एव यक्त होती रहती है । अत अपनी रिखावट को स्थिर करने के लिए मन को भी शान्त करना आवश्यक होता है। ये दोना राय एर माय होते हैं। एक सहन प्रयोग इसके लिए है कि रोमन लिपि में बडे (कपिटर ) अक्षरो मता देवनागरी लिपि में बड़े आकार के अाराम रिखना प्रारम्भ कीजिए। मह त्रिया जल्लीम नही होनी चाहिए । जहाँ न हो मरे अक्षर म्पष्ट पूरे, शुद्ध और मग-अलग निषे जाने चाहिए। इस तरह से सावधाना से रिपन स थोडी ही देर में चित्त गान्त हो जाएगा विचार मुलझ जाएगे और लिखावट की आकृति एव आकार अपने निजी वास्तविक प म आ जाएंगे। स प्रयोग का आशय मानसिक गति पर अवरोध लगाना है तथा अव्य वस्थित स्नायुतत्र को स्थिर करना है जिसमे मन हाथ और रेवनी सामाय रूप से काम कर सकें। जो वारक लिखना सीख गए हैं और नित्य ही रिसते रहते हैं फिर भी उनको लिखावटें अशुद्ध अस्पष्ट अस्थिर तथा भद्दा दिखाई देता हैं । हमारे बाकषण के विपके होने चाहिए। इन मालदो के चरित्र निर्माण में कोई ऐमी निबरता रह गई है जिससे उनके यावहारिक स्वभाव म सन्तुलन नहीं आया है। अभी इन बालरोको जीवन के प्रारभिर नत्वो का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका है। अभी ये बालक पर नही निश्चित कर पाए हैं कि आचरण कसा गुद्ध हाना चाहिए। आचरण म मौम्यता मपूर्णता व सामजम्म होना चाहिए एमा ये बाल्ब जानने ही नहीं हैं। अपवा यह कहा जाए कि वे जानते हुए भी उचित शली अपनाने में असमय हैं। हो सकता है कि इसके कोई शरीरिक मानसिर तथा भावना मन कारण हो । अथवा यह कहा जाए कि य वारक उचित एवं अनुचित परिस्थिति से परिचित होते हुए भी उचित आचरण को अपहेलना करते हैं। इसका कारण उनकी लापरवाही, मिथ्याभिमान उपन्ता तथा समाज साधारण एवं आवश्यक नियमों से बसपाग मागि विभिन रक्षण हो सकते हैं। अमुक बालक विममानमिव शारीरिक तथा भावात्मक कारण से अशुद्ध अक्षर से लिखे जाएं जस्पष्ट जस्थिर तथा भद्दा लिखता है इसका पता उसकी लिखावट के विस्तृत मनोवनानिक विशेषण स चलेगा। गारीरिक निबरता-गारीरिक निबलता जिसका पभाव रिखावट पर पडता है हस्तलिपि विनान के विश्लषण से नात नहीं होती। सक्त प्राप्त होता है। अत यह आवश्यक होता है कि एसा लिखनवाल बारको की स्वास्थ्य परीक्षा की जाए। हो सकता है कि एस बालको की उगलिया कमजोर हो सन्ति हा टेढा हो उनकी क्लाई म कोई कमजोरी हो। स्नायुतत दृढ न हो तथा उमम बम्पन हो दृष्टि स्वस्थ न हो रोट की हडडी म कोई निवलता हो। न्न दातो का पता डाक्टरी जाच से ही चल सकता है। निक्ट सम्बघ होन से रिखावर द्वारा सकेत मिलने से अध्यापक इस प्रकार की परिस्थिति का पता चला सकता है । इस प्रकार के सपत की गहरी छान वोन पाठशाला म स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा की जा सकती है। सही निदान हो जान स वाल्क उचित उपचार का प्राध किया जा सकता है। करिनाई का पता पर जाना ही बरी बात है। फिर तो वालक के माता पिता अभिभावक आदि भी सावधानी स बालक के स्वास्थ्य की चिता कर सक्त है। यति एसा ध्यान नहीं दिया जाएगा तो वाठक अपनी पारीरिक निचलता से ग्रमित रहते हुए किसान किमी तरह अपना काम चलाते रहने का प्रयास करता रहगा और आग चठकर अपने स्वास्थ्य की परिस्थिति और भी कठिन सम्भवत अधिक जटिल बना रगा जो कि बाद में अचे से अचे उपचार स भी ठीक नहीं की जा सकगी। फिर भी यह देखा गया है कि अभ्यास से तथा उचित निगन स नारी रिक कमजारी वार यक्ति भी अपनी कमजोरी पर अधिकार पा रेते हैं। ऐस व्यक्ति जिनकी उगरियां किमी अनहानी घटना से टेटी हो गई हैं शुद्ध एव स्पष्ट ग्मिावत रिपत हैं, क्यानि उना चरित्र म आत्मार की मात्रा कहा अधिक है जव एक व्यक्ति या करता है और उमको प्राप्त करन का प्रयास भी करता है ता उमरी प्रबर छा गाक्ति ही उमका सफरता का कारण होती है। रोग अपना विमा भा छानी-स छाग बात को बढ़ावर अपना उत्तरदायिव न निमान वा वगना निकाल रा है। यर क्वर उनके व्यक्तिगत चरित्र की कमनाग है । मैं या कम कर सकता हू? एमा वस हा मरता है ? हमम अच्छा मैंरिमा प्रकार में नहा बना मरता आणि अनार प्रकार उत्तर जो कि लोगों समित है नवागमा डा गक्ति व प्रताप हाल हैं । म स साग हैं जो अपनी निबरसागतिकाधिपान व पिए चागरी वामदारी उत्पडना अभपता निप्पामा आदि अनर आचगा का प्रयोग करते हैं। जानत हुए भी अन्न स्वमार म अधिक अशाई पानगंबरना चाहत। यह प्रवृत्ति यापन हस्तलिपि विज्ञान - से ही उपयुक्त अभ्याम एव निर्देगन व अमाव के कारण बनता है। यदि वाल्या वस्या म उनी निवपनाया को मही जांच हा जाए तथा उनका उचित उपचार हा जाए तो वन सम्भव है नि उनका युवावस्या का आचरण अधिक शुद्ध, गि स्पष्ट तया बापा हो जाएगा। बाल्यावे लिए दिय गए य विचार एव प्रयाग युवा नव निषिता करिए भी उपयुक्त है। भावक विषमतारिखावट म अशुद्ध अम्पप्ट अस्थिर तथा महा बनावट का द्रुमरा कारण क्ति की भावना का प्रभाव है। एसा देखा गया है कि सागा के स्वभाव म भावुकता का चडाव तार इतना अधिक हाता है जिसका विमा प्रभार स निगन कर सकना सम्भव होता है। इन व्यक्तिया में से कुछ एसे हान हैं जोकि अपन माचरण म अपनी पूरा गवित का प्रयोग करते हैं। उसे गि ऊँचे स्वर सवारना साधारण वातचीत म भागमा माटम हा दि वालन वाग चिल रहा है अथवा जला-जल्दी याना, दूसर व्यक्ति की समय म कुछ लाए या न पाए पहने वाग भी अपनी बात पूरी तरह स बह सक या न रह सके । एस व्यक्ति समयत हैं कि जो कुछ भी जसा भी व वार रह हैं सुनन वारे न अवस्स हो ग्रहण कर लिया है। इनम दूसर व्यक्तिया विचार सुनने का धय नही होता। समाज म ऐम व्यक्ति प्राय मिरत हैं। य व्यक्ति अपनी कहना जानते हैं मुनना नहीं जानते । इनकी रिसावरम करम दवाव का उनार-चढाव रखामा कालम्बी की, नया छाटा टांगें बहुत-स रग का प्रयोग आदि प्रमुख हाता है । शिवावर अस्पष्ट अस्थिर होती है जिसका शुद्धस्य स पद पाना कठिन होता है। दूसरे भावुक यति एम होते हैं जिनका उत्साह गीघ्र ही उडा पड़ जाता है। किसी माय परिस्थिति म इनरी भावना का प्रभाव भी बम हा जाता है। इस प्रकार की भावनाज य प्रवृत्ति म गति है अथवा गति की विहीनता है 'भागते हुए भार एव अपर अपर इन पत्तिया की सहन पहचान हैं। भावुरता की चचत्ता को स्थिर करन कएि स्पिर सुरेख का अभ्याम उपयागो है। विमा भा परिस्थिति के कारण जाव्यक्ति आवाम मा जाते हैं और मानसिक सन्तुस्न खो वठते हैं उन लिग मुगग का प्रयोग बटन ही हितार है। एसी परिस्थिति में पुन मानमिर सतुरन प्राप्त करन frए, धीरे धीरे और य आधार ने मार गिवना प्रारम्भ करना चाहिए। म तरह स दो चार पक्तियां रिसन म घ्यान एकाग्र हो जाता है। मानसिक उपल-युयल-तीसरी परिस्थिति मानसिक अस्थिरता है। जिस समय रिसा प्रकार की उरमन निमाग म होती है उम ममय प्रयत्न करने पर मा रिवी वाम म मन नहीं लगता। प्रयन रन पर मा इसम सफरता नहीं मिलकमी भी प्रकार को सयोजक उपज रिमाग से नही होती। एमी हालत अक्षर से लिख जाएं ३ ७५ मे भी लिखावट अस्थिर रहती है तथा अस्थिर लिखावट से जिसमे कि अक्षरो के आकार तथा उनके झकाव अनेक प्रकार के होते हैं मानसिक अस्थिरता प्रणित हानी है। वास्तव म यह मानसिक शिथिलता का उदाहरण है। अपनी नसर्गिक भक्ति का ऐसा प्रदशन होने देना एक बडी निबलता है। समझदार लोग अपने नित्य के सहज व्यवहार मे इस प्रकार का असगत आचरण प्रदर्शित नहीं होने देते क्योकि वे जानते है कि इस प्रकार के आचरण से वे केवल अपनी कमजोरियो को दूसरे व्यक्तियो के सामने प्रदर्शित कर देंगे। वे जानते हैं कि ऐसे आचरण से उनके चरित्र मे व्यक्तित्व मे कमी होने लगेगी। अस्त ऐसी मानसिक अवस्था के अवसर पर बुद्धिमान यकिन घय का उपयोग कर अपना सतुलन प्राप्त कर लेते हैं तथा पुन अपने निर्दिष्ट काय में अग्रसर हो जाते हैं। हस्तलिपि के विषय में राष्ट्रपिता महात्मा गाधी का क्थन महत्वपूर्ण है। यह बहुत ही यक्तिगत सरठ एव स्पष्ट होते हुए भी सारगर्भित है। मेरी समझ मे यह आया कि बुरी लिखावट अधूरी शिक्षा का चिह्न है। बाद मे मैंने अपनी लिखावत सुधारने का प्रयत्न क्यिा परन्तु (इस अभ्यास का) सुअवसर बहुत पीछे निकल चुका था। मैं अपनी युवावस्था की इस भूल को भी सुधार नही सका। हर युवा तथा नवयुवती को मेरा उदाहरण कर सतक हो जाना चाहिए और समझ लेना चाहिए कि अच्छी लिखावट शिक्षा का आवश्यक अग है इस स स यह स्वत सिद्ध है कि यावहारिक जीवन म सफता प्राप्त करने के लिए लिखावः जस साधारण आचरण में भी सतकता अपनाना विशेष महत्त्व रखता है। लिग्वना एक निश्चित किया है जिसमे किसी भी मानवीय प्रिया के प्राय पूण तत्व निहित हैं और इस काय को सफलतापूर्वक करना आवश्यक है। इसम उपयोग होने वाली सम्पूण शक्तियां सही होनी चाहिए और उनका सही प्रयोग होना चाहिए। ७६ हस्तलिपि विज्ञान लिखावट का मनोविज्ञान अभी तक हमन यह देखने का प्रयाम किया है नि हनलिपि क्या है? लेखनी स्वच्छन्न गति से आचरण करता है, रिखावट सुव्यवस्थित है स्थिर है, परिपक्व है, सौरवपूर्ण है अथवा उपषित है आदि।रिखावट म प्रयाग हान वाल ऐसे अनेक सक्रिय सचप अथवा निस्क्रिय नि'चष्ट रक्षणा वा विवचन किया जा चुका है। हमने यह भी देख लिया है कि मनाविनान के आधार पर गिगावट का व्यक्तित्व स सीधा सम्बध है तयापि सम्पूर्ण व्यक्तिगत गनिया का प्रवृत्तिया का भाव नााका तया य य विविध म्वाभाविक गुणा का भी लिखावट में सीधा सम्बध । जब हम किसी भी लिखावर व मौपि उनाहरण पर दधिपान करत हैं तो हमारे मन म तुरन्त एक प्रश्न उठता है कि यह व्यक्ति ऐमी रिखावट लिम्बना है ता क्या लिखता है । इम यक्ति न इस प्रकार की रिखावट अपनाई है ता क्या? इस मौकिनास इसका क्या मम्ब प है? क्या विशपता है इस गली म जिमन इम रिखने वार का इतना आकर्षित किया है। इन प्रना की तह म जान से हम उस व्यक्ति व व्यक्तित्व और उस चरित्र के अलावन का अवसर प्राप्त होता है। प्रत्यक पिसावट विभिन्न है। यह व्यक्ति परिचय वास्तविक सत्य और निष्पक्ष हाता है, क्योंकि इस चरित्र प्रणारी म किसी भी प्रकार की छिपावर नहीं होती। धोखा हान की भी सम्भावना नहीं है। वास्तव में यह प्रणाली सम्मुख व्यक्तिगत परिचय से अधिक महत्वपूण हा रोग बातें बनाना जानत है, अपनी भावना को छिपाना भी जानत है । यहुधा चतुर व्यक्ति अपने विषय म जसा व्यका करना चाहते हैं वसा बना भा देत हैं। उनका वास्तविकता का ममनना सहन नहीं होता। मन म बुछ और है, कहत कुछ और हैं । एमे व्यक्ति प्राय मिग्न है। परन्तु रिसावट म ऐमा वाद वात नहीं। ग्विावर अपने वास्तविक स्प म ही प्रस्तुन हाती है। फिर रिखावर की क्तिनी ही वार हस्तलिपि विमान में मूतत्त्वावे आधार पर परीक्षा की जा सकती है । और इमम जो निष्कप निकलगा वह वनानिक प्रमाणयुक्त हागा न कि केवर यक्तिगत समन के आधार पर जाधारित एव प्रत्यर परी ा म वही एक विपण प्राप्त होगा एक समान निप्प प्राप्त होता रहेगा। दूसरी बात यह ह वियक्तिगत प्रभाव भी अनक होते हैं। जितन अधिन यक्तिया से जाप मिलगे उतन ही अधिक प्रकार की धारणाए आपर विषय में बनेंगी। यति इन अनेकानेक धारणाआ का सचय दिया जाए तो जो चित्र बनेगा उमका पहचानना असम्भव होगा। कारण यह ह कि प्रत्यक व्यक्ति विमा भी दूसरे यक्ति को अपने निजी दृष्टिकोण अपनी निजी प्रवत्ति तथा शक्ति के अनमार देखता है । अत उमकी आपके विषय म धारणा अपना निजी होती ह। और यह धारणा जारि वास्तव में आपके यस्तित्व वा अपन ह वह दूसरे किमी भी यक्ति के समान अनि में भिन होगी। लिखावट का चित्र एक सा रहता है। कोई भी व्यक्ति उसे देखे और किमी भी समय दमे एक बार चित्रित कर दी गई लिखावट अमिट रहती है । कोई भी व्यक्ति उसे देखे उसको धारणा समान हो रहेगी और उस रिखावट के मनोवज्ञानिक अक्न के प्रयोग म हस्तलिपि विनान क मूलतत्त्व ममान रूप से प्रयोग म आएंगे। रोग कहते हैं कि व अपनी रिखावट बदल सकते हैं और समय-समय पर उम बरते भी रहते हैं । एमा वे जब चाहे कर सकते हैं। ऐसा रोगो का क्यन रहता है। परन्तु इम क्यन मे ये व्यक्ति भने ही अपने आपको समझा अपन मन म मन्नोप करते परन्तु मय यह हरिएमा करके और कतर व पन व्यक्तिव को और अधिक प्रयन प्रगित कर देत हैं। वारण क्या है? शिवाव पिन वार रक्तिम अनमन की छाया का रूप है। यह उमी सम्पूण आलरिद गनिया म निर्मित होती है और सामयिर चिनन एव भावना स प्रमावित होता रहता है। जिन व्यक्तिया का गिपाव स्वभाव से बाती रहती हैं व अस्थिर चित्त हात है और निचयपूवक बन जा माना है कि उनम दड सकल्प गति तथा निणय करन वी गति का अभाव रहता है। बच्चा भी रिसा दाम मात्र है क्यानि व म्वभाव म हाचच हात हैं। परनु वयम वारिमा म जमा दिउमा व्यक्तिगत अप आचरण म नागा की जाती है बचम अधिक गम्भारला म्यिग्ना दनना हाना हा चागिा। य िएमा नहीं है तो पना हा पहामिदनमा वती पिादक म उना व्यक्तिव की अम्पिरता दन मा है। पाराम पर ना सिर वगन' अयदा बने रहत है व हस्तपि विनान - ममय-समय पर अम यमापा हा जान हैं क्यानि व वाि की नग्ह बावरपा करत हैं । कमा कुछ कमा पुरजा वाम्नविकता है उनका नपान करन हैं । एम व्यक्तिहान भाव के शिकार रहा हैं मार अपन चिन्धि आचरणा म जपन व्यक्ति व काहानसामागप्रति मन रन है । यद्यपि बग्या उना इस बात वा आमान नहा हाता और पति उनका ध्यान टम आर मारपित दान का प्रयास किया भी गए ना ना एमा भावना अयवा परियिनि का विश्वास नहीं हाता। ग्विावर क बन रहन उहण वग्धा हम्नानग का बनायर में मिग्न हैं। हनाभर एक स्थिर नमून का त बनाया जाता है। महज स्वभाव क गग अपना माघा-माना नाम म्पपखित हैं। इमस म्पष्ट बन हा जाता है कि यमुनम्तार किम व्यक्ति का उम व्यक्ति का नाम म्पप्ट भापा म अमरण पर रिया जाना है । एम स्पष्ट उगहरण हम पनि जवाहरगर ना थी मुनाप चद्र वाम, मरवार पर आदि क हमारगें म मिरन हैं। परन्तु बात-म लोग अपन हम्नावर एमा रमा म बनात हैं जिनका मुनाना दुगम वाय हाता है। पर पता ही नहीं पता किरिमन ग्थिा है। ग्मिन वागम्बय मा अपना उनर दापिय मिटाता है। एमा गरायुक्त पर्गियति म क्वर अमत्य धाग्या दन की प्रवनि ददरिया कामाला अपन निधारित सरत्य म दिग्ति हो जाना नियमानुवतिता का अभाव आनि हान धारणामा की बल्सना हा मरती है। जिना अपन बनाय हुए हम्नारा म परिवतन हाता रहता है उहें अपना पग्निा वा सामान पोन्ट आफिन एव बकाम होता है क्योंकि यहा पनि वापर हम्नावर आपर पूर-परिचित दृम्नासर म चिह्नत नहा मिग्न तो आपका विश्वास कलापि नहा दिया जाएगा। बरन की क्रिया म पग्विनुनमारता में वाम्नविन परिस्थिति कापान प्राप्त होता है । जा मलव एक स्थिर एन दर प्रकार का याचरण करत है उनके मन गे पर-पुपर व्यवन नहा हाती। उनम कौनमें विशेष गुण एव अवता लिप हुए हैं व पता नहीं चरन । जब कहा स परिवतन हावा है ता प्रमाण मिना है और ग्मिा पहना है कि माम क्या है। अत का व्यक्ति अपना परिवतनमारता कीवी मारन है यार इमवा अपना मामय गति पात है व अपन-आपका एक माधारण व्यक्तिम अधित व्यक्त करत है और एम व्यक्तिया व चरित्र निधारण बरन में मुगमता मिला है। एम प्रभार विश्वन एव उगहरण द्वारा हसन पिठले पष्ठा म हम्न लिपि विज्ञान व अपन पहल तय्य का वितरण किया है। जम कि- पिकावर मनोवनानि विपण मग्विन वा व्यक्ति र व्यक्तित्र का मनावमानिर सरन किया जा सरता है। पाव वा मनोविज्ञान ७६ उदाहरणा से विदित होगा कि लिखावटो के मनोवज्ञानिक विशेषण स क्सिी आश्चयजनक उद्घाटन प्रवान का प्रयास नहीं किया गया है और हस्त लिपि विज्ञान म इस प्रकार के विवेकहीन प्रयास की कल्पना भी नही ह । हस्तलिपि विज्ञान गुप्त भेदो के प्रत्यक्षीकरण की विधि नही है। और यह ऐमी कुजी भी नही ह जिसमे कि लिखने वाले व्यक्ति अतमन सब ताठे खोले जा सकें और सम्पूण अप्रत्यक्ष बातो को प्रत्यभ कर दिया जा सके। हां इतना अवश्य ह कि लिखावट के विधिवत् निरीक्षण उसके लक्षणो के वर्गीकरण एव मनोवनानिक विलेपण से व्यक्तिगत चरित्र का एक मोटा ढाचा तयार हो जाता है। इससे हम मनुष्य की वास्तविक्ता को पहचान पाते हैं । यह ऐसा साधन मिल जाता है जिससे मानवीयता के विविध उदाहरण प्रत्यक्ष होत हैं। इसके वज्ञानिक प्रयोग किये जा सकते हैं । मनप्य को अछी तरह से और निक्ट रूप से समझा जा सकता ह जिससे उमको सामाजिक और व्यावहारिक परिस्थिति म उचित स्थान एव महत्त्व दिया जा सकना सम्भव हो जाता ह। एम अभ्यास को सुगम और क्रमबद्ध बनाने के लिए लिखावट के विविध चिह्ना का मनोवनानिक विठेपण किया गया ह । हस्तलिपि विनान के विशेषज्ञा नेम विषय म अनकानेक प्रयोग क्यि है तथा उनको अपने अनुभवा सहित विम्नारपूवर लिखा है । य सब प्रयोग यूरोपीय देशा म हुए हैं और विशेषकर रोमन लिपि पर ही हुए हैं। मैंन अपना प्रारम्भिक मान भी इन विगना कथनानुसार प्राप्त किया ह । तनुमार प्राप्त तथ्य रोमन लिपि पर आधारित हैं। इन तथ्या को मैंन भार तीय रिपिया पर जस वि देवनागरी लिपि बगला मराठी गुजराती म लिखी जान वालरीगरी पर अपनान का प्रयास स्मिा ह । जितना इमम प्रमाणित हो सका उनना मैं हिली-पाठवा की मूचना व पिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। य मनोरनानिक विपण हस्तपिपिया आधारभूत तवा की सही पहचान एव उनके मनावजानिए सवता का ययाचिन ममशन म महाया हांगे। लिसावट जाति-सम्बधी प्रतिरूप १ रिखावर स्यायो रप-गियावर र स्यापी रूप में आय उन गिमावरा म ह जमा किरिपना मासन की पुस्तिकामा मरिया रहती हैं। लिखने 4 अभ्याम-मार म बार इन पुम्निामा म मीम्बत हैं तथा उन रिम तया ना गिबन को गका अनमरण करत हैं। यह रिपावर गिमा भी किम होता ह । य माग अगर हैं। बग्मिन वायव्यक्ति अपना स्वरयन रियावर म गिवन र नियमा नुमार पिता ह और मन वमा हा रिमता बन जाता ह ना उगम हम यह हस्तरिरि विज्ञान हुए अपरा समझते हैं कि यह व्यक्ति अपने आचार-व्यवहार में भी अभद्ध ह अपना ध्यान एकाग्र कर सकता ह नियम पालन पर सवता, धपचान ह रीनिम्म मानता ह तया नियमानुमार चरने वागह। अपने दनिक याचरण मे यह यक्ति सावधान है, उतना हा वियागोल है जितनी कि उमको नियम पारन वरन की आवश्यकता है। एमे पति अपने स वही का आदर करते हैं । आशावारी हैं परिपाटी पर चलने वाले हैं इन यवहार म यये रिपचार है तथा न्यवगर के प्रयक छोटे से छार आचरण पर ध्यान दते हैं। यदि ऐसा न हो तो लिखावट के छोटे से छोटे चिह्न का यथोचित अनुगमन किस प्रकार से कर सकेंगे। ऐसे यक्तिया में कल्पना नवीनता करात्मरता भावुक्ता आति स्व छन् लक्षणो की स्वत ता कम प्रदर्शित हाती है। ये व्यक्ति अपना वास्तविक भावना यक्न काना नही चाहने यति वे नियमानुमार आचरण व विरद्ध हैं। य सिद्धान्तवानी अधिक है प्रियाशीत कम। वास्तव म ऐसी लिखावटा के उताहरण बहुत कम मित हैं क्यानि इसम “यक्ति की भावर मौलिकता पर अवरोध रहता है। और जिन पक्तिया म आतरिक जीवन शक्ति वा सवार अधिक है और जो अपने मौलिक विचार का व्यका करने २ लिए अधीर रहत है इतनी सावधानी तथा नियम निष्ठा वा पारत नहीं कर सकते। उनकी मौलिकता यथेष्ट नियम पालन के विश्व विद्रोह करता है और जसे कि परस्पर आचरण म लिखावट में भी अपना निजा का प्रस्तुत कर देती है। लिखना माखन के प्रारम्भ म यह प्रयोग और अभ्यास आवश्यक है कि वाल्क इस तरह की रिखावट का नियमित अभ्यास अवश्य करें। इसस गमयुक्न विधार नियम-पालन एमाग्रता चयनमा पर अवरोध स्पपता गालभाव रचना काममूत्ति आदि लक्षणा या अभ्यास हो जाता है । यह एक प्रारम्भिक प्रशिक्षण का माना हुआ आधार है। (२) सायधानी से बने सदर अक्षर~इसम दो शम आवश्यक है साव पानी और सुन्दरता । नियम-पान इसका आधार है परतु इम म रेखक इस परिघि से आगे बता है और सावधानी का प्रयोग करते हुए लिखावट म मात्मव सुदरता प्रदर्शित करने का प्रयास करता है। लिपात्रट का यह मुटरला मुचिपूण अक्षरा की रचना से प्रदर्शित होती है। इसम रचना की प्रवत्ति नियम पान को वत्ति से आग है । जो यक्ति इस प्रकार की रिसावट लिवत हैं उनम विपारगारता को मात्रा अधिक होती है अपना ध्यान एकाग्र कर सकते है आचरण म सास्कृतिक विकाम यक्त होता है। जो कुछ भी करत है मला तरह स करना चाहते हैं । ऐसे व्यक्ति सुखावादी होते है प्रम नचित्त रहते है अपने सिवावट का मनोविज्ञान पर तया अय यक्तियो वे सारसतिक सच्चे सवारो म विश्वास करते हैं। इन व्यक्तिया मे नामविश्वास, स्वावगम्बन एव आत्मनिणय की क्षमता होती है। (३) सगोभित लिखावट-कुछ दिखा ऐसी भी देखने में आती है जिनम देखते ही यह स्पट हो जाता है जिलिखनेवाला व्यक्ति अपनी अतिरिक्त स्फूर्ति में अपनी लिखावर को सजाने का प्रयास कर रहा है । इसम लिखने का ध्यान गोभा की ओर अधिक है वास्तविक अक्षरा की ओर कम । इस शोभा के लिग लिखनेवाला “यक्ति अपरो के प्रारम्भ एव आदि म अनेक रेखाए इस प्रकार से बनाता है जिसम रिसावट अधिकाधिक प्रभावशाली और आक्षक दिवाई दे। यह आश्पक चिह्न और रेखाए अनेक प्रकार की हो सकती हैं। उन्ाहरण के लिए वह सक्त हैं कि जसे कोई लेखक विसग के स्थान पर छोटे-से गोल बना दे गूय व चिह्न बना दे इत्यादि । इस गोभा का वणन कठिन है। यह केवल देया ही जा सकता है क्याकि जितन लिगनेवारे लिखेंगे प्तने भिन प्रकार के लेख लिखेंगे। इतना कहना पर्याप्त है पि यह व्यक्ति अपने सहज आवश्यक यवहार से आओ अतिरिक्त आचरण करता है। योग्ने बात करने में अपने विचार पर अधिन जार देगा सुनगा कम बनेगा अधिक । प्रटान की भावना प्रधान है । प्रचलित प्रथा से आग अपनीनवानता व्यस्त परता है। वास्तव म यह अतिरिक्त गुटरता की प्ररणा तथा सजावट आगम्बर है। रिसावट के अय रक्षणा में पता चरेगा कि यह रिवायत स्तिनी नति अथवा अनतिक है। यति नतिकता व गुण अधिर हैं ता यह अतिरिक्त शोभा स्पति वियागीता मातिय परिपार आनि पुष्ट रक्षणा की साक्षी है । यति या भटी है तो म्वायपरता नायर स्वाभिमान जाति नकारा हाणाको प्रगत करता है। पमा गिगावर वाघा दवन वा मिरती हैं। अनुभव बताता है मिरिया व जमा भो हा ग अपन हम्ना र मजान को बागि परत हैं। नराएर उहाण गियावर मन्या १७ भी हो सकती है। यह लभिाचि क्या है पना करिन है। परंतु स्तना ता निश्चित है जि गह आचरण सहज व्यवहार म जनावयर है। वग्न मजार मिया मिपि स्वभाव नगरवी भावना वाप्रमरम्बभाव अपना प्रामा बपियापन स्वार्थी प्रवत्ति नवानता की भावना मुचित करता है। (४) सहन मरल रचना-गान स्वभाव गरहाय गुढ मन ॥ हनिपिपा मगर मा माता म और मर' आवरण वनाए रगत है। गि पिम मा १५ दयामा मागया है ये गिमा मात्र गनिम रिमाजाती c हातमिरि विज्ञान मदनी स्वच्छत गति स चरनी हुई भी भागती नहा है। गिवने की व्यवस्था प्रम युक्त रहती है। अथरा के आकार सम उना युकाव मीचे जथर सम्पूण और मावधानी स बने रहत हैं। रेखनी में अवरोध नहीं है । तीव्रगति भी नहीं है। यह समगति रिखावट है। लिखनेवाले यक्ति के स्वाभाविक आचरण म मानवीयता प्रधान रहती है। नतिकता स्पष्ट व्यवहार सास्कृतिक संस्कार स्थिर स्पस विद्यमान रहते हैं। आत्म-मयम है। रचनात्मक कुगालता है। मानसिक सन्तुलन है । एक काय को हाथ म लेने और उसको सफलता से ममाप्त करने म बुद्धि बर का मदुपयाग है । एस व्यक्निया म आत्मिक व कामचार रहता है जो प्रभावकारी होता है। चित्त को एकाग्र करने के गुण आत्मविश्वास मयुक्न आचरण की प्रेरणा रहती है। नियमापालन करने की वत्ति का अभ्यास करने के लिए एमा रिखावट का अभ्याम हितकर होता है। सहज सरर खिावट की रचना करने वार व्यक्तिया का व्यक्तिगत जीवन माना शुद्ध और सुरक्षा हुआ रहता है। इसम आरम्पर और कपट नहीं है। य अपने काम और सामाजिक आचरण का सम्पादन गातभाव और बुगताम करत हैं। यरि इनकी लिखावट म रेखना का दवाव भारी रहना है तो चरित्र को दृटता प्रगित होती है । जात्मवर अधिक है। अपनी बात पर वजन दत हैं जिसस किमी प्रकार कीगका न रह जाए। यदि यह रिखावट कोमरता से लिखी होती है तो स्वभाव म कोमरता की मात्रा अधिक रहती है । नम्रता मत्री भाव कटना का अभाव मधुर भापा का प्रयाग आदि महज गुण हैं । ऐस यक्ति नहा चाह कि उनम को क्टु गत वाल। इस प्रकार की लिखावट म दो पार्ने दखन की और हैं। पह यह कि रिखावट के अक्षर स्पष्ट और स्थिर हैं अथवा एम नहीं हैं। यदि ये नभर स्पष्ट और स्थिर हैं तो यह मानना पडता है कि रबर का यक्तित्व स्वच्छत आचरण परत हुए भी बरसाती है। चरित म गविन है आत्मवर दढ है और यपा सभ्य प्राप्त करने की लगन है, क्रियागीलता सफल है। परि लिखावट मे अक्षरा का आधार वरना रहता है तो हम समझत हैं कि ग्वक म एकाग्रता की कमी है। एकचित हार पिसा काम म ग रहन का मानसिक गति पयाप्त नहीं है । एक काम अधूरा छाथ दूसरा प्रारम्भ पिया एसो वत्ति देखन म आती है । वल्पना गदिन अच्छा है। अना विचार मन म जानन होते रहते हैं। उनम से किसी एक को पक्टवर उसको काय म्प दे सकना कठिन है। दूसरी बात देखने को यह है कि अन्न व चिह्न जस कि अक्षर पाइया आपूिरे बने हैं अथवा अधकर हैं अस्पष्ट हैं। यदि य अत के अधर चिह्न रेखाए आदि अपूण व अस्पष्ट हैं तो य सुविकमित चरित्र-बर की सूचना नहीं लिखावट का मनोविज्ञान - - देते। इस अस्पष्टता का कारण यह है कि लेखक को अपना निर्धारित काय आद्यो पान्त पूरा करने का अभ्याम नहीं है अपना वचन पूरा करने की बत्ति नहीं है । इस प्रकार की लिखावट स वह परिस्थिति का सदिग्ध अवस्था म छोड देता है। निश्चय ही यह लिखावट का लक्षण विश्वासपात्र व्यक्तियो का नहीं है। इसम जिम्मेवारी की पत्ति नहीं है । कुछ लिखावटो मे जिसका निणय लिखावटो के अय लक्षणो व साथ होता है यह लक्षण कूटनीति एवं वास्तविक तथ्य को गुप्त रखने की भावना से भी है। (५) स्व छ दता से आगे बढते हुए जक्षर---लखनी की स्वच्छत प्रगति उत्साह साह्म उद्योग घुमक्कड वत्ति वाग्य चातुरी आनि प्रगतिसूचक व्यक्तिगत रक्षण यान करती है। ' का ३1111 LAA साटमा गलती 600 चित्र २ इस प्रकार का रियावर म अगर लिवन के स्थान पर पहुए बनत हैं। आगे कबीच वीच पक्तिया के बीच म छोरा हुआ रिक्त स्थान अग शिपाई पर जाता है । अपर आग की आर झक हुए भी हो मक्ते हैं। कारों के रखान आदि भी आग की आर प्रसारित हा सरत हैं । मात्राए आदि अय चिह्न यथास्थान नही। गिरोरेवाण नहा अयवा कहा वही हा । म प्रकार के चिह्न गिमावर म तात्र गति के हैं। यचिह्न स्वर आग बना हुई रिसावट म हाते हैं। म प्रकार के गया स्वभाव म वहिमयी प्रतिमावा' होते हैं । इनम किसी भी ममम्या का तुरन्त ममप रन की बुद्धि होती है और इनके मन यो प्रतिक्रिया भी तुरल हा होती है । मावावग जनी प्रगित होते हैं । अनेक बाता का गुप्त नहीं गर मरत। कहा-न-वहा यात करत हैं। (६) रचनामा सल्ति निखार-मुन्यदम्यित निपावरम अगर गुद और मम्पु वनन । उनर आगर स्थिर रन हैं रिपावर गिन र उपर म्यान पर ययात्रम विस्तृत ता । "मम चारागारक हागि प्राय वरावर ग्यान याग्मिार का पमिया माधा और मया ह रता है । गिवावर छ- निह जनवि माण, विमग बिट पाइयो आनि भी यया-आर तया पपाम्यान वनात गात | मा रिमादर मरिमावरका छोटे-बमब हतारपि विज्ञान अगा को प्यास्यान महत्त्व दिया जाता है। यह लिखावट दूर म दखन म ही सुव्य वस्थित मुसतुलिन और सुसयाजित दिखाई पड़ती है। देखिए लिखावट सख्या २१॥ अनिल नारी । चित्र २१ यह वास्तव माण लिखावट है। इसके लिए लिखने वाल के स्वभाव म लिखने की प्ररव "क्ति के अतिरिक्त धय सावधाना म गम्भीरता मानमिव एव भावुक मन्तुग्न सामजस्य स्वनिय त्रण आनि गुणा के यम्याम की अधिकता रहती है । ध्यान एकाग्र करके रगन से दर तक श्रम करने स ही ऐसी मुव्यवस्थित लिवावट बनती है। एमी लिखावट मानव स्वभाव र तत्मम गुण प्रगित करती है। इस प्रकार व व्यक्ति अपन आचरण म जल्दबाज नहीं होते। व जल्दी म तिमी निश्चय पर नहा पहनना चाहत । परन्तु उनकी विचारधारा यथारीति परिपक्वता पर पहुचती है । उन्हें नियम पालन की क्षमता प्राप्त करना पड़ती है। य एक पूर्व निश्चित स्परखा पर चलत रहने वा अम्याम मरत हैं। यह यक्तित्व का निमाणकारन वत्तियां बनाती है जिसम चरित्र क्रियाशील और बरवान बनता है। जिनको किमी भी योजना का काय रूप म परिणत करने की आवश्यकता हानी है उना पाम एम सुव्यवस्थित यक्तित्व विना सम्पन नही हाता । विसी भी महत्त्वपूण काय म चचलना तथा लापरवाही में सफलता नहा मिलती। इसम मानमिय सतुग्न दृढ आनरिक शक्ति विचारा की प्रौढता अपन स्नायुआ पर आधकार तथा आचरण पर अधिकार, स्वाभाविक लमण हैं। रचनात्मय मन्ति गिमावट यक्तित्व व पुष्ट एव सदुपयागी रयण यक्त करती है । ये हैं रचना-कोर धय यायप्रियता क्रियागीरता नियम पालन आस्था सुयवस्थित विचारधारा, सुनिमित आचरण आत्मसयम सहयोग मिग्नसारता बुद्धि प्रधान परिश्रमी युक्तियुक्त मूधमष्टि अध्यवसाय आदि उरमुक्ता अधिक है परन्तु अपना वचन निभाने की क्षमता कम है। इस प्रकार की अम्पप्टना अच्छा नतिक रमण नहीं है । लिखावट स्वतत्रता से रिखी हो गतिशील हा परन्तु अपर गर आदि स्पष्ट तया स्थिर हाना मादा है। यदि ऐसा नहा है तो रिखावर सफर नही कही जा सकती प्रियात्मा ननिक तथा सामाजिक दृष्टिकाण सारिखावट की निश्चित रूपरेखा म ही ध्यक्तिगत चरित्र एव रुचि रुझान को स्परेखा स्पष्ट है। (७) स्पाही की मात्रा-स्याही की मात्रा अघिन होने के दो कारण होत हैं। पहला यह लिखिने ममय लखनी पर दवाव अधिक होता है । इस परिस्थिति लिखावट मनोविज्ञान ८५ म लिम्बनवारे यक्ति को अधिक भावुर प्ररणा दष्टिगोचर होती है । इसम जीवन शक्ति, प्रेरक गति चेप्टा स्वेच्छाचार छ आनि रक्षणो का प्रादुर्भाव अधिक और स्पष्ट रहता है। एसा यक्ति अपने निणय पर विश्वास करता है। इम प्रकार का दवाव स्वेच्छाचार प्रगित करता है। इसमें गरीर-सुस की भावना स्वाथपरता तथा भौतिम सुखा की इछा अधिक है। अच्छा माना अच्छा भोग वरना यक्तिगत रझान म निहित है। दूमरी परिस्थिति एसी रेखनी के प्रयोग करने की है जिससे रखनी पर दवाव अधिक न होने पर भी अधिक मात्रा म स्याही आती है। एमा हो सकता है कि लखक की दृष्टि कमजार है और क्म दिखाई देने रगा है। इसलिए स्याही के गहरे रंग की आवश्यकता है। अयया अधिक स्यारी का प्रयोग गहरे रंग के प्रति आरपण सुदरता के प्रति आपण कग प्रम आदि की रुचि प्रगित होती है। यति एमी रिखावर अगिप्ट अभट होती है तो स्वभावगत अभद्र व्यवहार 'गाचर हाता है । एसा व्यक्ति स्वभाव से रूखा और अविश्वासी हो सकता है। मम भी स्व टाचार की भावना अधिन हागी। इसके विपरीत योमर भार कीपिखावटी म स्वभाव के वोमर गुण अधिक हान है । यति स्याही की मात्रा कम है ता भावुक्ता अधिक नहीं है। भारी लिखावट-जब रिपन में गपनी नीचे की ओर अधिक दबाई जाता है ता रिसावर भारी हा जाती है । कुछ लोग बहुत हलवे हाय से गिरते है। रिपावर वे कुछ चिह्न जिनम पनी नाच की आर म ऊपर या जाती है हरक हाय म टिम जात है । य रेवाए पनी हाती हैं । एनम स्याही की मात्रा कम रहती है। एमा रमाए जा उपर म नीच की आर चरती हैं अथवा बाइ आर से आग ता" आर को गोवा जाता है रखना वा दवाव प्रगित करती हैं। भारी ग्पिावर पतिपय रण म प्रकार पाए जाते हैं । (विए रियावर मथ्या १४) मम उमार स्पति का भावना अच्छा स्वास्थ्य गहरे रगाव प्रति आरपण आत्म क्ति हडता नाश्यिाम वग एव शक्ति का मचार व्यक्त हाता है। निरन्तर चा बरत रह्न का क्षमता प्यान हाता है। मनावग स बयान जीवन "तिरपन हाता है निभीरता जाता है पप तया प्रबर आमरण करन की गतिमलिहा है। मारा गिगारमा बग्मिया प्रति कारण है। यह व्यक्ति भी अपना बयान तिनत करता है भावना प्रधान है, निचय पर मान म ममथ » नतिर बम र अनर व्यक्तियाग प्रभावित करता है परिश्रम करता है। मना रा भाग वाव बयान जावन गस्ति या दर एनपि विज्ञान - भाराग्विावट पनि छार आवार को है ता लिखनवाल व्यक्ति में अपना चित्त एकाग्र करल कामा क्षमता है और यह व्यक्ति बन्न दर ता ध्यान मार राम में लगा रह सकता है । इम रिखावट में वग-गतिशीरता नाव यक है। हाथ का वपन रोक्न के लिए भी कुछ रोग रेसनोका दवाते हैं परन्तु इस परिस्थिति म रिपावट घोरे धीरे गियी हु माटम पहती है और कहा-कहा रखनी म कम्पन प्रगित हा ही जाता है। यह चिह्न भारी ग्विावट का नहीं है, फिर भी निश्चय की मानमिक हटना को कुछ मात्रा मूचित करता है। यद्यपि उतना नहा जितना विगतिर खिावर स व्यक्त होता है। कुछ लियाव मागरिया दता है परन्नु भारा नहा होना। य रमनी के दबाव के कारण माग नहीं है। य रिमाप मानी रखनी म तथा अधिक स्यारीको माना म रिदा हुइ हाता है। यरियाव या भद्दा निखाइ दतो हैं ताम्वभाव काम्यापन स्वाय-वसि इन्द्रियजनित सुख भाग विगम की भावना भौतिक वस्तुआ म आकपण अविवक पक्षपातयुक्न मनावग बगात प्रवृति आदि अभद्र आचरण व राणा का मूचना दता हैं इसम का नहा है । (८) सुगम ययाक्रम, समगति-यह रिमावर सभगति म रियो जाना है । इसम रखनी क वा कलपण नहा हैं। अपर T” पक्तिया आनि ययाम्यान हाग। इसम क्रमवद्धता होगा। इमम मावधाता प्रधान है। पूवनिधारण चिंतन निपुणता व्यवहार मयम आत्मविश्वास आम पूर्णता विचार यक्त करने की गमारता निणय वा गविन आनि चरित्र क गुण यक्त हात हैं। भावा भर गति तथा चपा ति नहा है। (E) -तगामी गिवावर-टम रिपावर का तगामी निवावट करता है। तीव-गति म लिनावर म अना परिवतन आ जात हैं । हस्तलिपि वितान व दृष्टिकोण से य परिवतन बहुत हा गैचर है नया व्यक्तित्व क अनकानन पणा का स्पष्ट म्पस व्यक्त कर नई म नि अपराका आग का आर युवना अपरा का अस्पष्ट हो जाना भारावा एवन्दूमरम मिट जाना थालि स्वच्छता मे रिम आग बन हा अभर लिवन वाल व्यक्ति व स्वभाव म व्यक्त करने का भावना उत्साह माहम उद्याग का भावना तथा स्वावलव का चेप्टा प्रधान रहती है। एमा व्यक्ति वहया म्पपवाराहाता है उमर माचरण म सह का भावना प्रगित नहा हाता । अन्य व्यक्तिया को वात पर महज मरोमा परने वाप्रति उममें हाता है। इसम व्यावहारिक समीणता नहीं होता। यह व्यक्ति एव साय अनेर काय हाय मग्न में नहीं हिचरता। (देखिए रिखावर मख्या ७, १० १६ आणि मानमिक उरतामा मुख्य प्राण है। रिखावटका मनोविज्ञान । (१०) व्रतगति मे अस्पष्ट अक्षर- -जने लिखावटें तीव्र गति के कारण अस्पष्ट हो जाती हैं। ऐमी लिखावट की मूल रेखा ऊची-नीची लहरियादार हो जाती है, हागिये की बाइ रेखा भी आगे तथा पीछे की ओर बनती है। अक्षर अशुद्ध तया अस्पष्ट बनते हैं। ऐसी लिखावट लिखने वाले के स्वभाव मे जल बाजी रहती है वह अपनी लिखावट घसीटता है । जो कुछ उसके मन में आता है जल्दी से घसीट देना चाहता है । उसम यह भावना नही ह कि उस पढने वाला उमनिवावट से क्या समझ सकेगा। सके निम्मे जाने का वास्तविक जाशय प्राप्त होगा अथवा नहीं। ऐसे यक्ति स्वार्थी उद्दण्ड असावधान क्रोधी अभिमानी तथा भावावेश म अशिष्ट यवहार करने वाले होते हैं। उसम सहज सामाजिक मानवीयता का अभाव रहता है । गोप नीयता असत्य भापण उत्तरदायित्व न लेना अपना वचन पूरा न करना आदि अनेक सस्वारा की सम्भावना भी रहती है। यह यक्ति उत्साही होते हुए भी रचनात्मक काय में सलानता दृढता उत्तरदायित्व तथा अपने बाय को सुरचि पूण युक्ति से पूरा करने की प्रवत्ति प्रदगित नहीं करता। उतावलेपन म लेसक गतिपूर्वक अपनी लेखनी का सचालन करता है। बहुधा आवश्यक बातें छोड जाता है और अनावश्यक बातो पर जोर देता है। ऐसे व्यक्ति असावधानी करते है और पीय पछताते भी ह। (११) गतिगोल शुद्ध और स्पष्ट अक्षर-प्रतिगामी लिखावट हाते हुए भी गुद्ध और स्पष्ट अगर लिखने की दशता विलक्षण निर्माणशारर प्रवृत्तिया का मूचा है । एमा व्यक्ति अपन आचरण म तत्पर होत हुए भी रीति के विरुद्ध आचरण नहीं करता । अपन उमाहम भी सावधानी सगनता आमवि'वाम गात स्वभाव मामाजिकता रचनात्मक स्पष्टता शुद्धता तथा सद्व्यवहार करते रहने म सफर रहता है। एमा व्यक्तित्व विभिन व्यावहारिक परिस्थिनिया म अपने मानगिर मतुरन वा बनाए रखता है। उमको मानमिर स्थिरता उमर साल्प को हद विवा का प्रावर प्रतिभा का बहिमपी और वापता एव क्षमता का परवान बनाता है। किमी भी काय व छार में छा अभी उमकी दृष्टि समूर नहीं जान। उसकी परत गति उमाह उनान करता है। माय ही उमे नियम पारन करते रवा भागनिताह । म व्यक्ति कग्नि परिस्थितिम भी अपना मानमिर मनुग्न बनाए रमत हैं। मारियावर मदा गराका पाग तया रमनी वा अधित दवाव यमिवर एगों का अधिकाधिन प्रब बनाता ह। एम व्यक्ति प्रभावारी हात अपमाका मचान नहव करत। उनम मूग-बूम आज उद्योग परियम आलाक प्रणा बल्पना निमाण तथा रचनामा आगों की मात्रा हस्तलिपि विमान अधिक रहती ह। (१२) मिले-जुले अपर-रिवार म अपरों का एक-दूसरे स मिरन जाना अथवा गिरोरेखाओं दो साय ही मिलता याग बन जाना पंय क्षमता दाता, सावधानी उमाह, कायदुगरताका रमण है। एम व्यक्ति ममारने माहिद सस्वारों में मपरता प्राप्त करन की समता रखत हैं। यह रियाक्ट स्पष हाना बाद यक है। Fulgi merlm gif -eNA Juunauso - चित्र रामनलिपिम यारा को मिलाकर रिबन की प्रथा है । इस लिपि में यार मुगमना स मिग्ने हैं। एक अधर क अन्त स ही दूसरा अक्षर प्रारम्भ हाता है। कुछ पार पद न बक्षरों को वहा मुरता तया मागी स मिला है। यह बुद्धि की प्रवरता का परिचायक - । अय स्थानों म रव बनावटी ढग अथवा बाटिना म इन अपरा को मिगत हाय चार पोरन वार व्यक्ति है। महत बुद्धिवार “यक्जिया का माध्यम मुगम हाला ह । जन अवरा का मिगन भुगमता सकिया जा सकता ह, पररिया जाता है। अपरिनाइ हाता ह वहन्मिनी उतर पुन बिना प्रारम्भ कर लिया जाना है। मित जुरी रिमावर में तत्परता मित्रता भाव विषय-मामजन्य मापूहिक सम्बार प्रवर बुद्धि विचारों म नवीनता नवीन प्रकार से प्रभार मिगन म उमुरता वाक्य-चातुरी आदि रक्षण व्यक्त हात है। यदि ग्यिावर मकरम पर दगाव भारी ह ता एम यति अधिक स्वच्छाचारो हान हैं ताप्रिय हात ह आगचना मह्न नहीं कर मकन । वट भी हान। गिन गियावाम अगर अलग भगा काकी भांनि ग्धि जात हैं, गिमावर विचार-प्रधान ह । एम भक्ति भावुक कम और बौदिर अधिन हात है। म यान्तरित प्ररणा मानत हैं। पय व्यक्ति रिमन म समय 'तु रहत हैं। यह एक प्रकार का विचार प्रवाह का अवराध है। इस प्रकार व्यक्ति वाचार नहा हात । दुमरा का दृष्टि रिसावटा मनोविज्ञान (१०) द्रतगति मे अस्पष्ट अक्षर-3 -अनेक लिखावटें तीव्र गति के कारण अस्पष्ट हो जाती हैं। ऐमी लिखावर की मूर रेग्वा ऊची-नीची लहरियादार हो जाती है हाशिये की बाइ रेखा भी आगे तथा पीछे की ओर बनती है । अक्षर जशुद्ध तथा अस्पष्ट बनते हैं। ऐसी लिखावट रिखने वाले के स्वभाव में जदबाजी रहती है वह अपनी लिखावर घसीटता है । जो कुछ उसके मन में आता है जल्दी से घसीट देना चाहता है। उसम यह भावना नहीं ह नि उसे पढन चाला उम लिखावट से क्या समझ सरगा। इमक लिखे जाने का वास्तविक जागय प्राप्त होगा अथवा नहीं। ऐसे व्यक्ति स्वार्थी उद्दण्ड अमावधान क्रोधी अभिमानी तथा भावावे म अगिप्ट यवहार परले वारे हाते हैं । उमम सहन सामाजिक मानवीयता का अभाव रहता है । गोप नीयता असत्य भाषण उत्तरदायित्व न स्ना अपना वचन पूरा न करना आदि अना सस्वारो की सम्भावना भी रहती है। यह व्यक्ति उत्साही होते हुए भी रचनात्मक काय म सरनता दृढता उत्तरदायित्व तथा अपने काय को सुरचि पूर्ण युक्ति स पूरा करने की प्रवृत्ति प्रदगित नहीं करता। उतावलेपन में टेसर गनिपूवक अपनी लेखनी का सचान करता है। बहुधा आवश्यक वातें छोड़ जाता है और अनावश्यक बाता पर जोर देता है। ऐसे व्यक्ति असावधानी बरत हैं और पीछे पछताते भी। (११) गतिमील, शुद्ध और स्पष्ट अक्षर-प्रतिगामा लिखावट हाते हुए भी गुद और स्पष्ट अपर लिखने की दाता विरभण निर्माणकारण प्रवृत्तिया का मूचा है। एमा व्यक्ति अपन आचरण म तत्पर होत हुए भीरीति के विरद आचरण नहीं करता। अपन उत्माह मभी मावधानी सलानता आमविश्वास गात स्वभाव मामानिाता रचनात्मक स्पप्टता शुद्धता तथा सद्व्यवहार करा रहने म सफर रहता है। ऐमा व्यक्तित्व विभिन यावहारिक परिस्थितिया म अपन मानसिर गतुरन को बनाए रखता है। उमको मानमित्र स्थिरता उस साल को हर विवा का प्रसार प्रतिभा राबहिमया और पायता एव क्षमता का वरदान बनाता है। किसी भी काय ? म छोटे अभी उमकी दपि सहन नहीं जाने। उमरी पर क्ति उमाह उत्पन करता है। माष ही यम नियम पाग करत रामा पनि दता ह। एम व्यक्ति पनि परिस्थिति म मा अपना मानमिा मतुलन बनाए रमन। मारिमावर मवड यशराका याग तया एपना का अधिर पार मात्तिक का अधिकाधिक प्रदल बनाता है। एम यति प्रभावशागे हान अयप्पा मारत नव वरत। उनम मुस-यूम आज उद्योग परिया अनगिरा यता निमाण तपा पनामा आगोरी मात्रा हस्तनिधि विहान अधिक रहती है। (१२) मिले जुले अक्षर लिखावट म अक्षरावर एर दूसरे से मिलते जाना अपवा गिरोरेखा को साय हो मिराते हुए आगे बढ़ते जाना धय, क्षमता दासता सावधानी, उत्साह कायकुगलना का लक्षण ह । एसे व्यक्ति समाज के सामूहिक सस्वारा म सफलता प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं। यह रिखावट स्पष्ट होना यावश्यक है। Mizgi (morsom چہری Irrierandure -er की Jusunceler चित्र २२ रोमन लिपि में जारी को मिलाकर रिखने की प्रथा ह। इस लिपि में अक्षर सुगमता से मिलते हैं। एक अदार के अत से ही दूसरा अक्षर प्रारम्भ होता ह। कुछ दुगर पर इन अक्षरों को बडो सुदरता तथा सादगी म मिलात है। यह बुद्धि की प्रखरता का परिचायक है। अय स्थानोम पर बनावी ढग अथवा वठिनाइ स इन अक्षरा को मिलात हाय कीर पीटने वार व्यक्ति हैं। सहज बुद्धिवार पस्तिया का माध्यम सुगम होता है । जहाँ अक्षरा का मिगन सुगमता स किया जा सकता ह कर लिया जाता है। जहां कठिनाई हानी ह वहाँ ग्वनी उठाकर पुन रिखना प्रारम्भ कर दिया जाता है। मिली जुरी लिखावट म तत्परता मित्रता के भाव विषय-सामजस्य मापूहिक सस्कार प्रखर-बुद्धि विचारो म नवीनता नवीन प्रकार से अक्षर मित्राने म उत्सुकता वाक्य चातुरी आदि लक्षण यक्त होत ह । यदि लिखावर मे परम पर दबाव भारी ह ता एसे रक्ति अषिव स्वच्छाचारी होते ह तकप्रिय होत ह आलाचना सहन नहा पर मक्ते । वट भी होते है। जिन लिग्नावरम बसर अलग अलग अको की भांति लिये जाते हैं, वे रिपावटें विचार प्रधान ह । ऐसे व्यक्ति भाव कम और बौद्धिक अधिक होते है। ये आन्तरिक प्ररणा मानत ह। एम व्यक्ति लिम्बने म समय रेते रहत हैं। यह एक प्रशर का विचार प्रवाह वा अवरोध है। इस प्रकार के स्पषित वाचार नहा हाले । दुमरा वादष्टि लिखावटमनोविज्ञान कोण समझने का प्रयास करत हैं दूसरो की सुनते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि यह रीति लिखना सीखने के प्रथम अभ्यास पर आधारित है। कुछ पाठशालाआ म अक्षर अलग-अलग लिखने की प्रथा है । बालक बडे होकर भी इस प्रथा का पालन करते हैं। पर तु ऐसा नही है । मानसिक अपरि पक्वता म ही ऐसा होता है । मानसिक परिपक्वता प्राप्त हो जाने पर तथा विचार प्रवाह सहज हो जाने पर असरो म सहज ही मिलान आने लगता है । यह भारतीय रिपियाम भी प्रदर्शित है। कतिपय हिती रिखने वार भी अक्षरा का मिलान करने लगते हैं। (१३) सकोण लिखावटें-इस प्रकार की लिखावटो म रिक्त स्थान की कमी होती है । अक्षर एक-दूसरे के बहुत करीब खि जाने है । यह भी लिखावर म अवरोध का लक्षण है । कतिपय निखावटा म अक्षरो के मुख ब द रहते है । गाठ सी भी बनी हुई खिाई देती हैं । यह सकुचित विचारधारा है जिसमे यक्त होता है मिसिन वाला यक्ति एकाग्रता पर जोर दे रहा है और स्वरक्षा के ध्यय म है । कुछ मात करना नहीं चाहता। उतारता से कुछ देना नहीं चाह्ना वृषण है दूसरे व्यक्तिया का विश्वास करना नहा चाहता। जात्म विश्वास की कमी सामा जिप विचारा का अभाव वातें न कहने की आदत कूटनीति पर आदि रमण व्यक्त हो सकत हैं। चरित्र निर्धारण के लिए रिखावट के अय लक्षण भी देखना आवाया है। (१४) लिखावट मे अवरोध-लियावर का स्वाभाविक रक्षण वाइ आर स नाइ आर बना है। मम अराव ऐस अग जो आगे बढ़ सक्त हैं आगे की आर बनत हैं । मम विपरात रमण नियाई देन हैं जस रिसावर का पीछे की आर झवना अभर की यतिम रेखाना का पीछे की आर धूम जाना छाटे अर बनना मात्रामाका छाटा बनना जयवा म प्रकार म घूमना कि अभरा का । अना गिलावा काम् म पराा म रम प्रकार के अवरोधर चिह्ना की पचान हानी है। नवगेत चिह्न जना प्रारक *य जहाँ रेवनी उरती है वहाँ प्राप्त हात हैं। मज प्रवाह व जाता है । स्वभाव पर भीम प्रसार का प्रभाव रहना है। अपरिपक्व मानमिर अवम्या म मानर्मित एव भावाम गुप्त परिस्थिति म पनाति पागनी म नया नविग्वाम की परिस्थिति म "मार व अपराध हरिणाचा हात है। मायसिमाज म्वमाव ममय भाषण यरत हैं और जिना पाम हिमान सिसामनागना है वम प्रगर व अवराध का प्रयागरी करत । गमा निखारें मन कामिना बिनम रिमा क्गिो अगर को प्रारम्भिा ज्यवा अनिममा अगा पूरा नाम मागकारक सता है । एमा रमा म्वरमा एतषि विज्ञान की प्ररणा है और अपने स्वार्थ को प्रगिल होने देना नहीं चाहती। (१५) अव्यवस्थित लिप्दावर---रस दिवाकर म हर तरह म अथवा प्स अन अगाम लापरवाहा रहता है। कोई अगर वहै, बाई अक्षर छोरे वन हाते हैं। रेखाए सीधी नहीं होती, रूपनी का झुकाव भी विमिन होता है । एमो ग्विावट चाहे जहाँ क्टी-पटी होती है ! एसी रिसावट म अपर भी अधिक वर अधरने हाा हैं। इसका उदाहरण लिखावट संख्या २० है । यह लिखावट न तो मही तरह स पश्ते बनती है और न वह किसी प्रकारका स्थिर पागल करती है। हागिय भी अनिश्चित हात हैं। या मानसिक उपर पुयर का द्योता है । अस्थिर स्वभाव मारपूण चपर आचरण परायन निरा द्वन्द विचारधारा म परिवतन आचरण म क्षणिक ममानता, विचारा का भयना हानता की भावना, अमय मापण पोला देन वी भारत आनि बना असामाजिर लमण मिलते हैं। यह गियावर लापरवाही का नमूना है। पुष्ट रक्षण न मिलन स निश्चय ही यह स्वस्थ व्यक्तित्व का उदाहरण नहा है। यक्तिगत आचरण समगीरता का महत्व है। यदि उसम अम नहीं है ता उसम किमी प्रकार की निश्चितता का सम्भावना नहीं रहती। प्रमर बुद्धिवाल व्यक्ति यदि इस प्रकार की लिखावर लिखें तो उमरा अव म ही बाई वारण होना चाहिए जस अमावधानी शारीरिक अपवा मानसिक पकान अस्वस्थता निराशा की भावना, मानसिक पठिनाई परेशानी आनि अयथा अपरिपत्र मानसिक अवस्था बाल व्यक्ति हा अव्यवस्थित रिपाका लियत है जिनका रिपन या अभ्याम नहा है और न अपन विचार मुलझा पर निश्चित नाय करने की आदत है। (१६) लखनो का दवाव हलका--पर कामर खिानट बाम चित्त त्ति प्यान करता है। महनगोरना तथा सगप्रियता इस प्रिय एपण हैं । सन्ताय का भावना है प्रसन्न चित रहना चाहत हैं । अप्रिय बारीपना पसंद नहा करत। कुछ उगहरण एमे दवन म आत हैं जिनम रिपि म कोमरता है और अपर बहुत सावधाना स रिम हुए हैं-छोटे आकार म। विनवारयक्ति बहुत ही स्वस्थ और कठार है। उनका स्वभाव भी बहुत कठार है। यह विपरीत परि स्थिति है। एसा अनुभव हुआ है कि ऐसे व्यक्ति वास्तव में आलपि हीनता को भावना कारण हा स्पन स्वभाव म क्हारता आदि का व्यवहार प्रति रल है। यह स्वभाव एव चरित्र को विचित्रता है। जीवन की विविध अप्रिय परि स्थितियों कुछ व्यक्तिया में परिवतन ला देती हैं। अयया हल्या रिक्षावट वार व्यक्ति विमी प्रकार का बर प्रयोग पमन नहा परत । धौर स्वर म बारना भर यवहार करना ही उनका प्रिय है। व वास्तव म मानसि वित्त वत्ति के यति है। यतिनिपावर गेहुई है तो लिखावटा मनोविज्ञान । उतारता परत करती है अयमा मित ययिता का लपण है । अवरोधक चिह्नो मे भी हलको लिखावट का रेख है। किसी समय यति कोई यक्ति अपने मनोवेग के प्रवाह को रोकने का अभ्यास करना चाहता है तो हरके हाथ से लिसने का प्रयास करेगा। यदि हल्के हाथ से लिखना इस पक्ति के गि स्वाभाविक नहीं है तो उसका यह प्रयास एक मानमिक अवरोध का काम करेगा। इससे उसका मनोवग म तुलित हो सकेगा तथा चित्त मे शान्ति धय एव एकाग्रता वा सञ्चार पुन हा सकेगा। सलिपि की नकल करने वाले यक्ति इस प्रकार को हल्क हाथ सरिखी गई लिसावर का प्रयोग करते है। व बार-बार लखनी उठाकर अपनी वास्तविक चित्त वृत्ति रान रहते हैं और मावधानी से धय एव गन मे किमी भी रिपि की अच्छी नकर कर मक्ते हैं । इस लिखावट म स्वच्छ दता नहा है गति नहा है। हला हाथ की लिखावट का अध्ययन सूत्रम रूप से किया जाना चाहिए। इमम आनिती मीशा काम दता है जिसम साधारण रेगाए बडी दिखाई देती हैं। भी ऐसा भी होता है कि लारनी का सम्न निर जिमम स्याही कम आती है और पनगरी रेखाए बनाता है पाए जाने पर भी पनरी ही रेखाए बनाता है धोखा दे जाता है। लिखावट के विशिष्ट प्रतिस्प (१७) आधार तलरेखा सीधी-आधार तरेपा का सीधा होना यायप्रियता कारण है जिसम यायप्रियता की आनरिव क्ति निहित है और अपन आचरण रा याय करता भी है। दवनागरी लिपि म आधाररेया अधरा पर है। रोमन लिपि म यह रखा अपराक नाच ह । इसका सीधा रिखा जाना आतरिक शक्ति पर निभर है। आमिक माता क्षमता, गनियुक्त किया नियम-पारन अपने आग पर स्थिर रहना मूचित करता है। (१८) आपार तलरेगा हरियार—य रिपन म अनिश्चिन आच रण है तया चरित्र वा निबरताका मूर। चिन स्थिर न हाना धमनियाँ वामर वरान हाना गिनता अपरि पावता मूचित करता है। मुममत तथा अम्पए रियाद म पर नाति पागरा अविवाग पापात घर प्राव आदि मण यात पाता है। रिवाया व अयप्रगा चिह्न मागमन बानिए। (१६) ऊपर को भार उटती हुई पक्तियां-यह भावुकता प्रधान रणग है। नाह आ मूनि क्रिया कारता विधाम प्रति करता है। इसम पक्ति एतलिपि विज्ञान वाइ ओर म चलकर दाइ ओर ऊपर को उटती जाती है। (२०) पश्तियां नीचे की ओर मुक्ती हुइ-यह अघोगामी पक्ति है। बाइ और स प्रारम्भ होकर नीच की ओर ढगनी जाती है। थकान हतारमाह अस्वम्य अवस्था सिनना उदामीनना मरिनता प्रणित करती है। (२१) मोटो गदी और फलो हुई-इस प्रकार की रिखावट अभद्र है। स्थापन विषयामान इद्रियमनिन मुष भौनिय वस्तुपा म आपण अविवर परपातयुक्त स्वार्यो व्यवहार उद्दप आचरण व्यक्त करती है। स्वाभाविक भद्दपन महा एमा लिखावटें बनता है। पनि इम लिखावर की रखा र अन्तिम भाग म भारीपन अधिक है ता आवेगपूण आचरण भी व्यक्त है। एसी परिम्यिति म भन्पन का भौतिक कारण भी देखना आव यक है अयवा पुन टूमरी रिसावर मनी चाहिए। सम्भवत एमी भद्दी रियावर का कारण रावनी हो अयवा एमा कागज हा जिम पर लिखावट को स्याही फल जाता है । अय पणा पर भी ध्यान दना चाहिए। मोटी भद्दी लिपावट एमे रागा की पाई गई है जो अपगधयुक्न काम करते हुए पकने जात हैं। (२२) शिरोरेखाओं पर लिखना पुरानो प्रया है। पहर गिरारखा खाचना फिर उमर नाच अगर लिखना । यह प्रवत्ति पहल मावने फिर काम करन की है । यह मावधानी का स्पण है तथा गम्भीर प्रकृति प्रगित करता है। इस प्रकार की ग्विावट म रखनी का प्रवाह स्वच्छद रहता है क्याकि एक बार रखा सीवने व उमरान पनी उमर आधार म स्वत चानी जाती है। यह रेषा विना प्रारम्भ करन म पहर एक प्रकार का अपराध है जिमम चितन प्रारम्भ कग्न का अवसर प्राप्त हो जाना है। (२३) अपर लिखने के बाद गिरोरेखा खींचना-यह भा मावधानी का एक र पण ह अवरोध ह । इम द्वारा रक्तिगत आचार विचार नियमित रहन हैं शक्ति का प्रवाह सम रहता है अस्पष्टता आता है तथा लिखावट का आकार T का बनावट अथर रचना आणि गुद्ध पद पूण हो जाते हैं। इस प्रकार का अभ्यास अपना काय सम्पन करने के उपरान्त उसका पुन निरायण करन वा अवमर दता ह । आगे बटो परन्नु पीच भी दबन जाभा इस प्रकार की भावना है। (२४) गिरोरेखाओं क साय अक्षर मिलाते हुए आगे बढना--यह प्रगति नीर रेसर यो वृत्ति हा अपनपूव-परिचित निममाका पक रह्ना जो पुरान रुटि वा म आगे निरना चाहते हैं परतु उस छाड भा ना मरते। पर तु यह रिवन वाले की चतुराई और मावधानी है कि वह ग्विावर म स्वच्छता एवं प्रवाह का संचार करते भी अशरा म म्पप्ता सम्पूणता एव नियम-पारन करता रहता है। लिखावट का मनोविज्ञान यह अवरोध सामूहिक सम्बार सावधानी दक्षता धय, वायकुशता का एक्षण है। (२५)गिरोरेखा न होना --यह स्वच्छ द आचरण है। पर तु इस सतुलिन रवन के लिए एकाग्रचित्त होन की अधिर आवश्यक्ता पडतो है । गम्भीर विचारक जिनको अधिक लिखना पन्ना है और जिनके विचार सुलझ हुए हैं और जिनम अपने विचार को सहज ही यक्त करने की क्षमता है बहुधा शिरोरेखाओ का सहारा नहा लते हैं। इसमे उसाह अधीरता कल्पना प्ररणा प्रवाह गनिशीलता आदि रक्षण हैं। यदि रिखावट के जय रक्षण अस्पष्ट है तो अमावधानी अस्पष्टता उतावला पन भी प्रति हाते हैं फिर भी यह विचार प्रकाशन में आत्मविश्वास एव स्वच्छ ‘दता प्रदर्शित करता है। (२६) लिखावट का बडा आकार-इम लिखावट म सब अक्षर बड आकार व वन हुए होते हैं अथवा अधिकतर अक्षर व आकार के होते हैं। इससे परनेवा । यक्ति आवपिन होता है । ये अक्षर स्व छटता से चलती हुई रखनी स रिखने में अधिक स्थान घेरते हैं । इन बड आकार समान ही ऊपर तथा नीच की माराए आदि अनेक चिह्न भी बड आकार के होत है। (देखिए लिलावट सख्या १४ और २३ ी ओर से यह घोषणा वि- पाच लाभार्थव अप्प पा जतिबन्ध रित्र २३ रियावर म वा आकार वग्मिया प्रतिभा का प्रमुख गण है। पर व्यक्ति अपन दिमाग पर अधिन तार टना पम नग करता और यहाँ वहाँ पर फिरवर अपना काम करता पम करता है। मरा मन ए जगह नहीं रगता यमान मित्र उतारना का भा पण ह निमम मिन पपिता का मारना नहीं - पह भावना प्रधान पनिहाय बनाम आचरण करतागमम आत्मविश्वाग आमनिमरता का भावना अधिक रहती - । भानावराम बन जाना गा गिा मनन । रममप मग्नका गक्ति अधिर गिारकाआवर गति या परि चरन्तारासिवन गन म कल्पना मजग रमाना अनेकाना विषयापीआर आरपगातार मुगताका प्रममग्न वा प्रति उगाह अधिरगना प्रमनदिन रन का स्वभाव नविय का मुघ वल्पना आरि अना Tar १४ हस्नलिपि विज्ञान लिखावट स व्यक्त होत हैं। रिसावर वा वडा आकार कुछ अय मूचनाएं भी दता ह जस वि नना से कम दिखाई देना, एकाग्रता का अभाव युक्तियुक्त रचनात्मक काय का अभाव अभिमान दिखाने की प्रवत्तिया आदि ऐम लभणा की पुष्टि के लिए रिचावट के अय चिह्ना की जाच भी वरना आवश्यक होगा। इसके कुछ सावतिक भाव इस प्रकार हैं-~आत्मप्रतिष्ठा गस्ति का परिचय भावक्ता वहिमखी प्रति भावावग मानसिक उतारता विविधता निर्भीकना प्राक स्वभाव स्वच्छता भविष्य की कल्पना सूझबूय विश्वामी प्रभावित होने वाली प्रकृति अन आर ध्यान कलात्मक्ता प्रसनचित्त अस्थिर लिखावट म अप यय एकाग्रता का अभाव सावधान लिखावट म नत्र शिथिलता। रियावट के अय रमणा के अनुसार ये गुण सिद्ध हाते हैं । (२७) छोटे असर-मुव्यवस्थिन लिवावर म छोटे अथरा में भी महत्ता बुद्धि बल की अधिकता तया चित्त को एकाग्र करन का मनोयाग प्रदर्शित करती है। ऐसे "यक्तिया में अतनि की नगीनता स्वाभाविक नम्रता विचार गक्ति निर परता रचना का कौगर उद्दश्य, आचरण मग्रह भाव नियमिन व्यवहार विचार शीरता अन्नमखी प्रवत्ति के विशेष स्थण पाए जाते है । तब कर सकना परि स्थितिया की जांच करना अपन लयको वेरित करना आदि विचार प्रधान काय "नके लिए स्वाभाविक हैं। यक्तित्व के ऐस सपण स्वाभाविक मानमिन प्रवाह को रोक्त हैं। कमजोर लिगवावटा म सूक्ष्म अपर इच्छा गक्ति की कमजोरी श्रम से बचने की भावना आलस्य भय मानसिक निर्जीवता याति कमजोर सम्भावनाओ पो मूचित करत हैं। यह अतमुखी प्रवत्ति का प्रधान रक्षण है । इसम चिन्तन अधिक ह एकाग्र चित्त है मित ययिता ह रचना का प्रवत्ति ह उपर घ साधना का सदुपयाग ह अल्प भापण करना अपन वास्तविक विचार को छिपा जाना मावधानी आदि 'गुण पाए जाते हैं। (२८) अक्षरों का सम आकार-रिखावट म सम आगर रोतियुक्त आचरण एव आत्म-सयम का लक्षण है। यह पक्नि अवसर व अनुमार आचरण कर सकता है प्ररणा से उत्माह प्राप्त करता है । सावधानी से एकाग्रता यक्त पर सकता है । एमा व्यक्ति बहुधा अपने विचार वतमान स्थिर रखता है गम्भीर है उभयमुखी प्रति प्रति वरता है अपन उपर ध साधना का सदुपयोग करता है होनता की भावना नहा आन नेता व्यवहार गर है। इसका व्यवहार नियमित रहा है। प्रवाह को ग्रहण करता है उतावस्पन का अवरोध करता है। उद्योगी व्यक्तियो की रिखावट सदव अभयेर सम आवार में प्रकाशित शिखावटा मनोविज्ञान यह अवरोध सामूहिक सस्कार सावधानी दक्षता धय, कायरता का लक्षण है। (२५)गिरोरेखा न होना—यह स्व छट आचरण ह । परन्तु इसे मतुलिन रखने के लिए एकाग्रचित्त होन की अधिक आवश्यकता पडतो है । गम्भीर विचारक, जिनको अधिक रिखना पन्ना है और जिनके विचार सुलझ हुए हैं और जिनम अपने विचार को सहज ही व्यक्त करने की क्षमता है बहुधा गिरोरेग्वाओ का सहारा नहा लत हैं। प्सम उत्साह अधीरता कल्पना प्ररणा प्रवाह गतिशीलता आदि लक्षण हैं । यति रिवावर व जय लक्षण अस्पष्ट हैं तो सावधानी अस्पष्टता उतावला पन भी प्रगित हात हैं फिर भी यह विचार प्रकाशन में आमविश्वास एव स्वछ रना प्रदर्शित करता है। (२६) लिखावट का बड़ा आकार–स लिसावट म सब अलर बड आकार के वन हुए होते हैं अथवा अधिकतर अक्षर वर आकार के होते है। इससे परनवाला व्यक्ति आकर्षित गता है । य जवर स्व छ दता से चलती हुई लेसनी स लियने म अधिक स्थान परते हैं । इन बड नाकार के समान ही ऊपर तथा नीच की मात्राए आनि जनेर चिह्न भी बड आकार के होत हैं। (नगिए लियावर सख्या १४और२३ की ओर से यह धोष) वि- पायो लाभदायक अप्प पा जतिबध पिन २३ निवावर म बना आकार वह्मिषा प्रतिभा का प्रमुग रमण है । या व्यक्ति अपन निमाग पर अधिक जार देना पमना करना और यहाँ-वहाँ चर फिरवर अपना काम करना पमन करता है। मत्रा मन एक जगहना रगता या मान मित उगरता का भाषण र जिमम मितयपिना का भावना नहा है। यह भावना प्रधान व्यक्ति यह स्वनाम आचरण करता-मम आमविश्वाम आ मनिमरता का भावना अधिक रहती है। मावावा म वर जाना "मक शिा मजामम मग्नमानि अघित: गिगावर का आकार स्तिका परि चम्यागसिवान नमकपना मजमाना बनाना विषयायी आर प्रामुकाका प्रममा करने का प्रनि उमार अधिगिरना प्राचिन रहन वा बभाव मविया गुमर कल्पना आनि अना एमावा हस्तलिपि विमान लिखावट से व्यक्त हाते हैं। लिसावट वा बहा आकार कुछ अय मूचनाए भी दता ह जस दिनत्रास कम निवाद देना एकाग्रता का अभाव युक्तियुक्त रचनात्मक काय का अभाव अभिमान लियाने की प्रवत्तियां आनि एमे रमणा की पुष्टि के लिए रिचावट के अय चिहा की जाच भी करना आवश्यर होगा। रसा कुछ साकतिक भाव इस प्रकार हैं-आत्मप्रतिष्ठा गक्ति का परिचय भावना बह्मिवी प्रवत्ति भावावा मानसिक उतारता विविधता निर्भीकता प्राक स्वभाव स्वच्छता, भविष्य की कल्पना मूझवूम विश्वामी प्रभावित होने वाली प्रकृति अनेक आर ध्यान बलात्मक्ता प्रसन्नचित्त अमियर खिात्र म अपव्यय एकाग्रता वा अमाव मावधान लिखावट म नेत्र शिथिलता। लिखावट वजय लक्षणा + अनुसार य गुण सिद्ध हान हैं। (२७) छोटे अक्षर-सुव्यवस्थित रिखावट म छोरे अशरा म भी महत्ता बुद्धि वर का अधिरता तथा चित्त को एकाग्र करने का मनोयाग प्रगित करता है। एम व्यक्तिया म अतर्ज्ञान की नवीनता स्वाभावि नम्रता विचार क्नि निर पेरता रचना वा बोगर उद्दश्य माचरण संग्रह भाव नियमित व्यवहार, विचार शीलता, अन्तमुखी प्रवत्ति के विप लक्षण पाए जाते हैं । तक कर सकना परि स्थितियों की जांच करना अपन रभ्य को केरित करना आदि विचार प्रधान काय नके लिए स्वाभाविक हैं। यक्तित्व क ऐस रमण स्वाभाविक मानसिक प्रवाह को रोक्ते हैं। कमजोर खिावाम सूक्ष्म अक्षर इच्छा शक्ति की कमजारी श्रम में बचने की भावना आलस्य भय मानमिन निर्जीवता यानि कमजोर सम्भावना को मूचित करत हैं। यह अतमम्वी प्रवत्ति का प्रधान रक्षण है। इमम चितन अधिक ह, पयाय चित्त है मितव्ययिता ह रचना की प्रवत्ति ह उपर ध साधना का सदुपयाग ह, अल्प भाषण करना अपन वास्तविक विचार वा छिपा जाना सावधानी आदि गुण पाए जाते हैं। (२८) अक्षरा का सम आकार-पिसावट म सम आगर रीतियुक्त आचरण एव आत्म-सयम का रमण है । यह यक्ति अवसर वे अनुमार आचरण कर सकता है प्ररणा से उमाह प्राप्त करता है। सावधानी से एकाग्रता व्यक्त पर सकता है। एमा व्यक्ति बहुधा अपन विचार वनमान मस्थिर रखना है गम्भार है, उभयमुखा प्रवत्ति प्रगित करता है अपन उपर च साधना का मदुपयोग वरना है, होनता की भावना नही आन लेना व्यवहार-युगर है । इसा व्यवहार नियमित रहता है। प्रवाह का प्रण करता है उतावलपन का अवरोध करता है। उद्योगा व्यक्तिया की रिखावट सदव अमरो व सम आरम शान्ति सितावटा मनोविज्ञान हुए दिखाई होती है जिसमे योजना पूर्वनिर्धारण एव प्रगति तथा उतारता का समुचित नियो जन रहता है। इम प्रकार की लिखावट म यति शोके अत म जयरो का आकार छोग होन लग तो निश्चय ही समझ लेना चाहिए कि यह यक्ति अपनी अधीरताका अवरोध कर रहा है और अपन विचार को सावधानी तथा गम्भीरता से ही व्यक्त करना चाहता है। ऐसे अक्षर स्पष्ट हो जाने से जात्मविश्वास तथा त्रियागीलता का ह्राम प्रकट करते हैं। अमरो के सम आकार की वास्तविक शक्ति सगठन की क्रिया म है। अछी स्पष्ट गुद्ध तथा ससयाजित सम आकार की लिखावट वाले यस्ति का किसी भी कठिन परिस्थिति में विश्वास किया जा सकता है। (२९) दाइ और मकान-सिने का सहज गुण सीधी खडी हुई सम्बा कार लिखावट बनाने का है । इसम अपर नीच की रेखा पर सीधे खडे देत हैं । भारतीय लिपियो मे जहाँ शिरोरेखाए बनाने की प्रथा है ये अक्षर ऊपर से सीधनीच की ओर बनते हैं। वास्तव म प्रयक लिखावट ऐमी नही होती। कुछ लिखावटें मूल रेखा से जो कि रोमन लिपि म नीचे और भारतीय लिपियो में ऊपर होती है पीछे की ओर अथवा आगे की ओर झुक जाती हैं। पीछे की ओर का झुकाव रेखनी को बाइ आर र जाता है तथा नाग की ओर झक्ने वाली लिखावट म रेसनी को दाइ ओर र जाता है। अनेकानेक गिवावटा म देखा जाता है कि लेग्वनी कभी पीछे की ओर झकता है और कभी आगे की ओर झकती है और यह स्पष्ट दिखाई देता है कि रिखावट की रम्बाकार रेवाआ का यकाव निश्चित नहीं है तथा मिश्रित है। (पिए गिवावट सध्या ११ स १६ त) रिवावर म अशरो क आग तथा पोचे झुक्न की परिस्थिति विशिष्ट र पण प्रस्तुत करती है। मनोवज्ञानिक व्याम्या में मिका महत्व अधिर है। आग का आर पकन वाली लिसावर स मनावग का व्यग्रता व्यक्त होती है। यह पक्ति अपना अनमन स्पष्ट कर दन व निगा आतुर है । इसी भावनामो म अवराध नहीं। यह जगम है मिग्नमार है। समाज म अय पत्तिया व साथ मुगमता म व्यावरित मगर म्यापित कर मक्ता है। यह राचा उमा म काम करता है। पुराना दातों को भूमर भविष्य की कल्पना करना है। ममें आमदिवाम अपन ऊपर भगमा है। अपनी प्ररणा म काम करता है। बता पिता है नया आन कायक्रमम आग बढ़न का प्रय न करता है। यह गिमावर मी भावना प्रधान रागामा मनानि प्रगतबरलीम व्यक्ति अनाना वारक्रम दनात है और ना मनवाद छार भारत है और रिमा नय काम में मग बात है। (मिस पिार मम्या १६) हस्तलिपि विज्ञान याग की ओर परने वारा रिवाइट रिबन कागति प्रगित करती है। बहुधा यह ग्यिावर आा का बार यवता नहा है। यह पिन क बादाम आग की आर विचती है। रखनी अपनी प्रानि म आग का आर भागती है और रम्बा बार साध अपरों का अपने नाइ मार झवाती जाता है। रामकी तुनाम प्रकार की जाती है कि जब कोई व्यक्ति जली भागताह तव उमर गरीर वा कारा भाग म्वन भाग का ओर पर जाना ह। मी प्रकार यह व्यक्ति रिमा व्यक्ति तया परिस्थिति म मिरन करिए स्वत अपना हाय याग वाता ह। mतीभ कला कर YVताबिर बिर),#मनाम पनि व्यायाम Ans ऑभूति कत्ता सौन्दर्य पस- वित्र०४ अध्यवमाय टत्माह पग्थिम की शक्ति नतृव की भावना बहिमवी प्रवति निर्भीकता मनावेग का प्रधानता गतिगाता द्वेग यावा प्रमानचिन मिग्नमार रागात्मक मनोवत्ति गैरिसता यात्मविश्वान आदि रथण टम प्रकार की रिसावट म प्रगित हा मरत हैं। (३०) पीछे सनवाली लिप्साय-एमा रिसावटों म अक्षरा की गम्वा यार रमाए जिना अधिकतर याधार अथर मह हाल हैं नाचे भाग में लाग की भार बढ़ता हैं और टखने म माम पत्नी हैं कि यमर पीर वी आर युक हुए हैं। रामन लिपि म मूर रेखा मन रम्बावार रवाना का कोण वाइ यार .. रिग्रीस बम रहता है। यह पाछ की आर का यकाव हम्नलिपि व स्वच्छ प्रमार म यवराय वा चिह्न ह । लिम्बन वाला व्यक्ति आग वन म हाय रोक्ना ह। (दखिए ग्विावर सख्या ११) मानमिन द्वन्दम भी यह अदम्या याती है। कुछ व्यक्ति अपन मिला काल म ही अपन वटा को म प्रकार का रिया गई रियावट की नकर करना सामरत हैं। यह प्रारम्भिर अभ्याम ह । प्रारम्भिर अन्याम कारण यनिरिया वर पाये का आर युक्ती - तब मम गति विद्यमान रहती ह यभर मुरदुष होन हैं और माय अवराधा चिह्न प्राप्त नहीं हात । *म प्रकार की रियावर व मूचा मनावगनिक हैं। फिर मा एमा लिखावर उगहरण म गावी भावना तया सरह का दष्टि सत्व ही सम्भावित लिलावट का मनोविज्ञान । रहती है । इसकी मनोवनानिक यारया म सावधानी महज मत्य को छिपाने की वत्ति आत्मरक्षा की भावना आचना से डरना अधविश्वास आत्मविश्वास की कमी सग्रही स्वभाव आनि अय इस प्रकार के लक्षण प्रधान रहते हैं । फिर पीछे झक्ने वाली लिखावट प्रचरित प्रथा के विपरीत है तथा ऐमा लिखने वाले व्यक्ति ने मानसिक गठन म भी एसे रक्षण पाए जाने की सम्भावना रहती है। यह खिावट म जवरोध का एक निश्चित चिह्न है। ग्मिानट म अवरोध के अय अनक चिह्न होते हैं। साधारणतया मावधानी के विशिष्ट क्षण हैं। इसका एक उदाहरण लिसावट सख्या २३ म है। पर लिखावट स्थिर है स्पष् ह तया एक अस्वस्थ हाथ स रिसी गई है। आगे की ओर थाा झक्न से प्रगतिशील पिखावट निखाई देती है। परतु टमम अपर टी को काटने वाली छोटी समतल रेसाए अक्षर की खडी रेमा तर आरर म जाता हैं -सरा काटने के लिए जागे नहीं बनी। इममा साधारण प्रम नभर की पडी रेग्मा को काटता ह तथा जाग बनता ह जसा नि रोमन लिपि कालय अनेक रिपावटो म दमने को मिटता है। इस प्रकार का व्यक्ति अपने काय म आग बटन म सावधानी मतक्ता पर विशष ध्यान देता ह। एसके उत्माह नया अय प्रगतिवादी सश्रणा पर आवश्यक्तानमार हाथ राक्न का अवरोध रहता है । एम यक्ति जा कुछ भी काय करते हैं माच विचारका युक्ति से तथा अछी तरह म करना चाहत हैं । जार नहीं दते। नियम-पान के लिए "न यस्तिया का वि'वाम किया जा सकता है। एक अय पण भा टमी प्रसार वा ह जो किम निवावर मनिपाई हताह । गरम अतिम बार की अतिम रेया पाभाविर स्प म दा आर नाग नग बटनी । यह भी पियारत में जवरोध का विगप चिह्न ह और पर गिरा विवरण का समय है। मगिवावर क विशिष गुण म प्रसार है अवराधमूचर मावधाना मजना अतममा हिवा महल मय का छिपाना जम्वाभाविक सतक्ता गरम्य आमराका भावना मान जागचना म डरना स्वाय पर अध वि'वाम का छा माना म्वनियत्रण जामविवागनावमी। गिगाजय प्रति मायना ममावशक्यिा जा गाताह। (३१) अनिश्चित राय-गम आय यह मिरियागर कुछ अगर पाद का आर र कु" मार रम्नागार म' और कुछ नाग का जार मरे मिनि भाव में रहत। "मपरार कागिमावर में दिविता- घचना भावर हजा शिपिचार ममा चरित्र गग निधारित पिया जा माता है। 'म तिर दाता चिद्र' उम्दम्यता अम्यिग्ना शारारिस १६ हस्तनिधि विज्ञान 7 यवावर वद्धावस्या असमान आचरण परिवानगीना मानमिर अपरिपक्वता बच्चे-बुरे व नान का अभाव रुचि ज्यान पप न हाना मानसिक उथर-थर । यति ग्यिावर हो इस प्रकार का ह जान लियावर वे अय उनाहरणों म नम्बा जा मस्तीह ता अविश्वसनाय छर पर बमसमापण आरिचरित काशियिता कसभा समयना यावाया। (३२) सोधे खडे अक्षर अनुगामिनु म विश्वास करत हैं । ननिकता एव स्वतत्र विचार आत्ममयम मम वय यात्मनियत्रण परिपक्वता गम्भारता म्वावलम्ब नीति एव रौनियुक्त निणय हारापन आत्मसम्मान की भावना निर पयता की भावना, पायप्रियता अल्पभापण आदि ग्यण व्यक्त गेत हैं। माध बडे यपरा को वनावर म मम यातार को ग्विावर की भावना है। यह भी समकोण - जा मस्त हैं जिमम अनावश्यक उमाह एव अपराध नहा ह । म प्रकार असर यति अघिर गम्ब हा अयवा ऊपर या नाच की मात्रा अधिक रम्बारार हों ता विचार गनि एव प्रमान गक्ति की अधिकता समयना चाहिए । सर आमाम करता ह पि उमम सामा य व्यक्ति म अधिक बुद्धि ह भान ह एक क्रियागीता है। यदि ग्यिावर को गति अच्छी हो ता य गुण सिद्ध है। (३३) गोलाकार लिदाव गायकार रमाए बनाना मज होता है । यह कोमाता वा साधारण नाह। गागवार रिसाव जावन का महज सुगम माग अपनाना पमत करता हैं । एमा निखावरें अपनी स्वाभाविक चतुरता म अपनाय प्राप्त करना चाहती हैं। गागवार ग्विावट म कोरता बना दवार सिना अवराया रमण ह । एमा यक्ति अपनी भावना का प्रदान नहा परता। अपन विचार एव भाव का रहस्यमय रखना ह तया वास्तविकता व्यक्त नहा हान रता। कोमल शिवावट म गोगकार अक्षर मन म्वभाव को व्यक्त करत हैं। ये किमी प्रकार की उग्रना महन नहीं करन । यह वर स नहीं बुद्धि म अपना निवाह करना चाहते हैं । मधुर अमिरचि म मामाजिर प्रभाव पन करत हैं। कामर और गायकार रेखाए कोमट अमिरचिव चिह्न हैं। पामा अमिरचि कोमल मानवीय प्रवत्तिया महनगीना मग्नप्रवाह ग्रा स्वभाव बौदिर सहानुभूति नम्र स्वभाव हास्य विनोर मत्री की भावना प्रमन्व्यवहार साचा आग्मा शैविध माल मधुर स्वभाव आदि प्राम चरिषण हैं। यदिग्विावर स्थिर ह तो चरित्र स्थिर एन स्वस्य गण प्रस्तुत हाग व यया मय अपरिपाव पण व्यक्त होंगे। (३४) कोणाकार अपर--ग्विावर म वागों का अधिरता म्बमाय म कठोरता की मूचा है। भागग्विायर में योग उग्रना तया वटुता के रक्षण हैं। लिलावट का मनोविज्ञान ऐम व्यक्ति अपन विचारा पर रहता है। य किसी तरह से दवन वाउ नहीं । पलोहे की तरह है। टूट जाएग मगर झुकेंगे नहा । अम्मर इनक हठ म बिधा त्रि २८ चारा स्वभाव प्रति हान लगता है। विरोध इनको असहनीय है । श्रोध प्नका स्वभाव है (रिसावट सम्या २४)। इस प्रकार के पति स्वभाव म तार्षिक निर्भीय उग्न म्वभाव सचत हात हैं । इनम तुरत निणय गने की क्षमता होती है। परतु एमी बहुत कम लिगामें दिया देती हैं जिनम अधिकतर वोण प्रिया दते हैं। अधिकतर मी लिपावरें मिटती हैं जिनम कोण तथा गागर बारा सम्मिग्नि रहता है। रेखाए मिनित और गोलाकार-यन सम्मिश्रण उचित मात्रा म तथा उचित स्थाना पर सन्तुलित मानसिक गठन प्रगित परता है। जमी आवश्यकता हा यायाचित आपरण जिगम युद्धिकर तथा भावुर नपता का सामजस्य प्रगित हाता रहता। एम व्यक्ति मत्री की भावना महृल्यता मौपि वल्पना वाय चातुगेर माय ही परिथम आमगम्मान विचार गक्ति तथा प्रियागीरता का परिचय त है। मामाजिक जावन म मफर निगन इनरी परममता। पना पतिरामानवीयता तया गम्भारताम जय जना व्यक्ति प्रभावित हाग्निा नगरन । अपना प्रपर बुद्धि व द्वारा अपन मनारग का म पयाग एम ध्यति जावन का विभिन्न परिस्थितियों म मफ्रतापूस करत रहत। यमिप्रसारागिरावगम तया पाणावर ग्गिावाम रमागर पाए मना कन्याव म भागना नियगय पनि हटी और पडाचारी मग ना वरना युक्तियुक्त नग है। मम मन्याग प्राप्त करन का माध्यम पनिपूण ना आव पर। (५) हाता रहाता र का प्रथम य र अग और स्पाट तथा अन्य मार मि। प निम्ता पयायप्रियता का पिन पाया गया है। यह सिरिमा भा ममम्या वा निगाना गाव गाता यानी गमन मयत पनि व्यक्ति वा जान ताममाज मय आचरण म पर गमगता है। निगमागरम सरगरा म यता रामगम्मान का भावना मचित करता है और मर विनया म मसारका मावा माना है। नाना राममानामानित। पटा बम र गन ज्या उमर मान या अना प्रसार काम मानत पर गामापा और पहा मागिरण एनिषि विकास १म है ता -पाक विचार का अन्तिम निणय मूचित भरनी है । वास्तव म यह रखा एक सजावर की तरह है और सर यामिर मूर रमाया को गमा तया प्रशनकारिता ही है। इस रवा या आवश्यस्ता न है । परनु मानव स्वभाव ही मानै जिमम वामविकता से आग माचरा करना स्वाभाविक है। य रखाए विविध प्रकार की होता है तथा इनर व्यक्तिगत चरित्राक्न क्यि जा मरन हैं। (३६) ययाय छोटे चिह्नवन-मरपा लिवावद व अनर छाट चिह्ना का अवहरना करत हैं जम मात्रा अनुम्बार बानि पिरतु या निश्चित है नि एम लोग मूश्म पान प्राप्त नहीं कर पात-रातियुक्न मुमयाजित आचरण म छोटी भी बातें बहुत महत्त्वपूग सिद्ध हा मक्ता है। गीता म पिना छाट चिह्नाका छो जान करि उचिा नहा है। छार चिह्नों का उपयुक्त प्रयाग चरित्र निमाण काय म प्रभावकारी है। (३७) अक्षरों के अतिम चिह्न पूण-अन्तिम रेखाए एव चिह्न यति पूण हैं और अधकर नहा है ता रिसा काम का पूरी तरह करन को शक्ति एव वृत्ति प्रगित करन हैं। यलिय छानिय गए हैं अथवा अपूण एव अस्पतालमा घयपूवर अपना नाम पूरा ना कर माता । अपना वचन भी पूरा नहीं कर मरना । मम उनावगपन है नया विश्वमनाय प्रिया म मारता प्राप्त नाबर पाता । इस रिए रिपार एर सम्पूण किया है जानि यदि अपूरी रह गइ ता रिमीतहम मा वाम पूरा नहीं हुआ यह निश्चित है। (३८) मानव-स्वभाव-मानव-स्वभाव एक गहन परिस्थिति है। इसम अनेकतत्व हैं जाण्क्मरस अनिवाय स्ससमधिन तया उग्न हुए हैं । जीवन व प्रारम्भ महा व्यक्ति मानम पर अनकाना प्रभाव पडत हैं और उन मवत्रा अमर उमक ऊपर अनिवाय स्पस यना रहता है । जिस तरह स व डास्टर क्मिी भाबीमारी व निगन पिए गरीर का अनकानव अवम्याआभाविपण करता है और भन्न म उनक याग म स्मिा निवप पर पहुंचता है उसी प्रकार मनावना निर भी व्यक्तित्व का प्रकाशित करन वा अनवाना रयणा वा विपण करक व्यक्तिगत याग पर पहुंचना है। प्रपर व्यक्ति एस अनाया उगहरण है जिमम अनकाना व्यक्तिगत स्गणों का मम्मिया है। दन रक्षा का पहबानना उनकी नाप-तोर करना ही व्यक्तित्व आन काय है। हरिपि दिनान कटारा अनानक गिमावट कीरचना सप्रकाशित हात हैं। एक माधा-मा प्रश्न है, परतु परम वाव पर प्रपन है। एक व्यक्ति जमी ग्विावट रिखता है वमी क्या पिता है किमी अय प्रारी गिरावर क्यों नहाश्मिना इस प्रान के उत्तर म उम गित वार यप्ति व व्यत्तिल वा थाम्नविर चित्र मिग्ना चाहिए। यही हमारा प्रयाम है। रिक्षावट या माविज्ञान १०१ ऐम व्यक्ति अपने विचारा पर हट रहत हैं। य क्सिा तरह में दबने वार नहीं। ये लोहे की तरह हैं। टूट जाएग मगर युकेंगे नहीं। अक्मर दनक छ म स्वछा चित्र चारा म्वभाव प्रगित हाने गता है। विराध इनको अमहनीय है। श्रोध इनका स्वभाव है (लिखावट सत्या २४) । म प्रकार के यक्ति स्वभाव स ताविक निर्भीक उग्र स्वभाव सचत होत हैं । टनम तुरन्त निणय रेन की क्षमता होता है। पर तु एसी बहुत कम रिखाव दिखाई देती हैं जिनम अधिस्तर वाण दिखा दते हैं। अधिकतर एमी लिखावटें मिलती हैं जिनम काण तथा गागमार रेखाए सम्मिरित रहती है। रेखाए मिश्रित और गोलाकार-यह मम्मिश्रण उचित मात्रा म तथा उचित स्थाना पर मन्तुलित मानसिक गठन प्रगित करता है । जसी आवश्यकता हो पायोचित आचरण जिमम बुद्धिबल तथा भावुक नम्रता का सामजस्य प्रति हाता रहता है। ऐसे यक्ति मनी की भावना सहृत्यता मौलिक कल्पना वाक्य चातुरी क साथ ही परिधम आत्मसम्मान विचार गक्ति तथा नियागीलता का परिचय देते है। सामाजिक जीवन म सफल निर्देशन दनकी देख रेख म होता है। इनन “यक्तित्व की मानवीयता तथा गम्भारता से जय अनन पनि प्रभावित हए बिना नहा रहत । अपनी प्रखर बुद्धि व द्वारा अपने मनावग का मदुपयोग ऐम यक्ति जावन की विभिन्न परिस्थितिया म सप तापवर बरत रहत हैं। यदि स प्रकार का लिखावाम तथा काणाकार खिावटा मलम्बाकार रवाए लेखनी के दबाव से भागे हैं तो निश्चय ही यह यक्ति हठी और स्वच्छाचारा है । मस तक करना युक्तियुक्त नहीं है । इमसे सहयोग प्राप्त करने का माध्यम युक्तिपूण हाना आवश्यक है। (३५) हस्ताक्षर हस्ताक्षर का प्रथम अक्षर अग और स्पष्ट तथा अय अभर मि हए। यह निस्पृहता एव यायप्रियता का चिह्न पाया गया है। यह यक्ति क्मिी भी समस्या का निप्प रता म देख सकता है। अपनी समय स यत व्यक्ति अपन व्यक्तित्व का अपन तथा समाज के अय जाचरण स परे समझता है। यरि यह पहला पर आरार म जय जमरा स बडा हा ता आत्मसम्मान की भावना मूचित करता है और दूमरे व्यक्तिया स सत्कार की भावना चाहता है । या एमा न हो तो उमा दृष्यिाण सम है नया मामाजिर है। अनर पक्ति हस्ताभर क उपरात जथवा उमक नीचे एर तया जनेक प्रकार का रसाए वाचत हैं। परि यह रेखा सीधी और स्प हा जमी मि उदाहरण हस्तलिपि विज्ञान १ म है ता या विचार का अन्तिम निणय मूचित करता है । वास्तव में यह रेखा एक सगावर की तरह है और इसका आमिर मूल रमण या को गलमा तया प्रानकारिता ही है। इस रखा की आवश्यकता नहीं है । पर तु मानव स्वभाव ही ऐसा है निमम वास्तविकता से आग आचरण करना स्वाभाविक है। य रमाएँ विविध प्रकार का होती हैं तथा इन यक्तिगत चरित्राक्न विय जा सक्त हैं। (३६) ययाय छोटे चिह्नबन मरखक रिसावर व अनव छार चिह्ना की अवहना करते हैं जम मात्राए अनुस्मार आदि। पर तु यह निश्चित है कि ऐन लोग भूम भान प्राप्त नहीं कर पात -रीतियुक्त सुसयाजित आचरण म छोग छोटी बातें बहुत मन्त्त्वपूण सिद्ध हा सकती है। गीता मे रिखना छोट चिह्ना का छोट जान क लिए उचित नहीं है। छार चिह्ना का उपयुक्त प्रयोग चरित्र निर्माण काय म प्रभावशाली है। (३७) अक्षरों के अतिम चिह्न पूर्ण-अन्तिम रेवाए एव चिह्न यति पूर्ण हैं और अधक्टे नहीं हैं ता किमा काम वा पूरी तरह परन की गनि एव वत्ति प्रगित करन हैं। यनिय छानिय गए हैं अथवा अपूर्ण एव अस्पष्ट हैं तावक घयपूवक अपना काम पूरा नहीं कर सकता। अपना वचन भा पूरा नहीं कर सकता । इगम उतावलापन है नया विश्वमनीय निया म मफ्ना प्राण नहीं कर पाता । इस लिए रिमावर एक मधूण क्रिया है जापि यनि अधूरी रह गइ ता किसी तरह स भी काम पूरा नगै हुआ यह निश्चिा है। (३८) मानव-स्वभाव-मानव-म्वभाव एक गहन परिस्थिति है। इसम भनेक्तत्त्य हैं जो एक-दूसरे से अनिवाय रूप स सम्बधित तया उग्न हुए हैं । जीवन के प्रारम्भ से ही व्यक्ति के मानम पर अनकाना प्रभाव पडत हैं और उन सबरा लासर उसक ऊपर अनिवाय रूप से बना रहता है । जिस तरह से एक डाकर किसी भा वीमारी निदान के लिए गरीर की अनानक अवस्थामा का विश्पण करता है और मत म उन याग में मिमी निष्कप पर पहुंचता है उमी प्रकार मनावना निव भी यक्तित्व को प्रगति करत वार अनेकाना रक्षणा वा विर'पण करके व्यक्तिगत योग पर पहुचना है। प्रत्यक व्यक्ति एक अनोखा उदाहरण है जिमम अनकानन पक्तिगत गणों का सम्मिश्रण है। इन सभणा का पहलानना उनकी नाप-तोर करना ही व्यक्तित्व अमन का रक्ष्य है। हस्तलिपि विनान के द्वारा अनेकानक क्षण रिसावट को रचना म प्रकाशित होत हैं। एक सीधा-सा प्रश्न है परन्तु परम आवश्यक प्रश्न है । एक व्यक्ति जमी शिवावट लिखना है बसी ही क्या लिखता है किमा मय प्रकार की लिखावट क्या नहीं रिसता सप्रन के उत्तर म उस रिवन वार व्यक्तिक पमित्व का वास्तविक चित्र मिग्ना चाहिए । यही हमारा प्रयास है। लिखावट वा मनोविज्ञान इसके लिए जो प्रयोग सिद्ध हो चुके हैं उनका नान उत्सुक्ता मौलिक क पना तथा अभ्यास से नावश्यक है। रिखावट के अनः तत्वो में पाए जान वारे चरित्र के समान यक्ति के प्रधान निर्देगर एव विश्वासयुक्न रक्षण पाए जाते हैं। लिखावट के भौतिक चिह्नो का मनन तथा उनक मनावनानिक विवरण का चितन समवय हस्तलिपि के द्वारा चरित्राक्न करिए पयाप्त है । तथ्य पर ध्यान देना चाहिए। प्ररणाजनक कल्पना का प्रवाह उतावलापन आदि भाचरण इस काय म वाधक हैं। हस्तलिपि विज्ञान E विलक्षण लिखावटे-छ व्यक्तिगत अनुभव समार बहुत बग है और इसम अनगिनत पक्ति है इतन कि जिनका आरिअर मा नहा। चार युवा और युद्ध स्त्री और पुरुप सब हैं और मनाविनान वे नात मन मग अरग व्यक्तिगत दवाइयाँ हैं। इन सका अपना निजी अस्तित्व है। मद अपन-अपने क्षेत्र म रातावरण म, ममाज में अपना काम करत हैं अपना स्थान बनाल हैं और अपने चरित्र की मौरियता प्रति वरते रहते है। सबकी निजी विशेषताए और समस्याए हैं। इन सबकी विपतामों को समयना अथवा यह वह सपना दिएमा सम्भव है वास्तव म बहुत कठिन है । समिरा यह आवश्यक हा जाता है कि कुछ माटा-सा वर्गीकरण दिया जाए। बहुत-स लोग तो एस हैं और इसम समार की अधिकतर जनता आ जाती है जाबरत हा माधारण व्यक्तित्व का है। यह है जनता का सामाय मनुष्य । यह यहुन वटा समूह है निमम कोई पास बात नहा है। नोट इतनी विशपता नहा है जिमनास्तर मामा य स्तर स ार उठा हा । स तो ये सब व्यक्ति अपन अपने भए म जपनी अपनी जगह बनाय हुए हाते हैं परन्तु कोई कुछ अधिर प्रवर-वृद्धि है का कमाण-युद्धि है । माई आमा म आग बरा हुआ है तो कोर किया गीरता म, चपराम सुरपपरम या दरमचोरी म माग बढा हुआ है । परन्तु मम समाज के वातावरण पर पाइ अधिक असर नहा पडता । एस मलिया का चरित्र चित्रण करने म उनके व्यक्तित्व करमण इधर उधर मनावरल पडते हैं। बीचमा नहीं रिपाई दनी। म पार एम व्यक्तियों का ग है जो मवसाधारण स्तर से नीच है। य ऐम है जो परितगत चरित्र के सामाय पणा म यपूण हैं हान हैं। याता पना बुद्धि म सामाय मानदार म कम है या यह व्यक्तिगत चरित्र के किमी एषण म रम है या उमरा अभाव है। अपनी इस प्रकार वा कमी व वारण इम प्रकार के यक्ति पिछले हुए यक्ति बाते हैं और इनक जा भी अच्छे धनात्मक गुण है व सामने नहीं जात । मनावनानिक विओपन इन व्यक्तिया का यक्तित्व निर्धारण करते हैं और इनमें सुधार लान का प्रयास करते हैं। कम से कम उनका निदान करने व प्रयत्न करते हैं। जिन लोगा स हम प्रभावित होते हैं व हैं बचे हुए व व्यक्ति जिनम महानता के कुछ रक्षण प्रणित होते है। बहुमा उनका सम्पूण यक्तित्व प्रभाव गाली होता है उनकी बुद्धि की प्रखरता सामाजिक्ता आत्मबल क्षमता निया गीता मौलिक कल्पनागीरता आनि अनकानेक गुण एसा यक्तित्व प्रस्तुत करते हैं जिमका हम सहज ही अभिनत्न करते हैं । उनकी वदना करने के लिए बाध्य हो जाते हैं। इनकी निजी विपतामा की खोज करन का प्रयास मानव-म्वभाव की दुल्हता की ओर ले जाता है। ऐमे यकितया म कुछ दस प्रकार की विशालता होती है जिसमे हम प्रभावित हए विना नहीं रहते। मेरा सवप्रथम सम्पन हुआ था टम प्रकार के पनर महान् “यक्ति से सन् १९३६ म । आकाशवाणी स्टेगन रखनऊ म मुय भाग्य से नौकरी मिल गई थी। नियुक्ति अस्थायी थी परतु थी आक्पा । यह वहा के नाटक विभाग म थी जिसक छारे अधिकारी स्वर्गीय श्री गोक्त थानवी थे। यह नौकरी ठके पर होता थी मामिन वेतन पर नहीं । और नियुक्ति पत्र पर हस्ताक्षर होत थे स्टशन मचालक के । स्टान सवार थ श्रीमान् एन ए एस 7 मन । कभी इनके दान का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था क्या नाम सुना था। जन मुझ नियक्ति पत्र दिया गया तव इनक पहर दान हुए। यह व्यक्तिगत परिचय नहीं था—केवर उनक हस्ताभर से सामना हुआ था। ग्विावट उदाहरण संख्या २६ म प्रस्तुत है। Yoh SITHA governor Jeneral in Council चित्र २६ बाम इस कार्याग्य म मुझ कुछ अस्थायी टाइप का काय भी करना पहा । म ममय मर सामन वहा में अधिकारिया के रिम हुए पत्र भी टाइप के गि यायावरत थ। हरिपिया को विविधता स भी यह मरा पहरा सम्पर्क हस्तलिपि विज्ञान था। कुछ गिमाव एमी हाती थीं जिनका टाप करन म आन माता याय मरर म्प और पिष्ट हाता था जोर इनगा परना महत हाता था परन्तु यनर जिवावरें एमा हाती यों जिनको न्वत ही मन वा हा जाता था। म नरह का लिबावाम मान-मचार महान्य को रियावर भी थी। इनको मन रिया वट व असर प्राय एक इच ऊँचे होते य और अगरा वा बनावर वर मीषा वर्ग कार हाती या । दम तरह में वह एक पूरा का प्राय उ अथवा आठ मतराम भरत थे। बमबम पर इस तरह का ग्विावट टाप व लिमर पाम पहुंची ता मैं समा गया कि आज नौररा का अन्न है। माय हो उनका चपरामा भा आया योर उमन कहा कि ब* माह्य न बुगया है। प्रकार की रिचावटग्मिनवार महापुरुप वा नबनाता था। अत टन मामन प्रस्तुत हुना। वह मरा करिनाद वो कल्पना पहर मगै क्यि -ए य और उन्होंने मुये अपना जिवावर पना निखाया। टमर बार उनक परीव पचन व अनर ववमर मि। आज बीम वप म अघित्र हा चुक हैं विविध प्रकार का रियाव- दग्दन ना और उनका व्यक्तिगत चरितारन करत हए परन्तु ता इस प्रकार की का दूसरी रिसावट रखन का मिरी और न श्री यमणन जमा का व्यक्ति हा मिग । आज तायर भी समय म नग बाया कि उन चग्यि म एमी शैन-मा गति था अयवा विपण या जिमा कारण यह कहा जामद कि वह दम प्रबारकारितावर रिखनये अयवा इस प्रकार हनाभर परमपम कि प्रस्तुत । उनका जानन वार मराजानाथ विना व्यक्तिव विगार था। वह रमाह माग्म निभावना का आगया वह जमाना जग्रजा राय का था। मग महायुद्ध प्रारम्भनीया था। पिनाक व्यवगरम श्री रममगन बहुत ही कुगर थे । परनु यति निमा ओर म भी योग अगिर यवहार का मस्त होता था ता उसका उत्तर तुरा हो न य । क्मिी का तना मजार नहीं या जा ममानता से उनका सामना करन का साह्म महाही कर मरे। उनर व्यवहार म मब तरफ म विचारता था-वियाना महयता उगमा गामन आयाजन मत्री मवगुण-अप्ठ एव महान ५। हम्नामा म स्तन व आगरकी २१ममा नालर यार याचना और प्रम हम्ताभर म मर एक्-मा बनान म विधिवत विधा पय जोर परिपूर्णता का अपूर्व ममागम या जानि एव साय हा गम्भार विषार निपय निष्ठा और चतुर किया ीरता प्रगित करते हैं। विमग्विादर म य पदा परिचय था जाग्मिावक अध्ययन काव्यमन बनकर रह गया। मन् १९४२ मद दूसर अधिकारी सम्प-चरक वा वाम वरन पी विलक्षण रिक्षानटें- कुछ व्यक्तिगत अनुभव १०५ नियुक्ति प्राप्त हुई। यह काम दिल्ली में था। अधिकारी अग्रज था। भारतीय सरकार के मनालय म । यह श्रीमान्जी मुयको नीवरख दिया करत थे। मैं इनका शीघ्र उखक था। कभी तो इनके गीघ्ररख उनक अपन य शास्त्र विपयर हुआ करते थे और कभी-कभी यक्तिगत चरिन चित्रण के छोट विवरण | मैं दखता था कि इनके पास अनक और विभिन विभागा से फाइलें आती रहती थी जिनम अनेकानेक अधिकारियों के हाथ के रिसे हुए ल्ख प्रतिवरन आदि हुआ परत थे इनका निरी तण करते हुए यह यक्तिगत चरित्र चित्रण बार जात थे। य रेख बहुत ही गुप्त हात थे। क्मिक विषय म हैं यह मुझ कभी पता नहा चला । केवट जो पिसा जाता था वह मुये मिरता था टाइप करने के लिए। बाद में पता चला कि अनेकानेक अधिकारिया की लिखावतें होती था। इन फाइठो पर और इस तरह से हस्तलिपि विनान के द्वारा उनके "यक्तिगत परतु गोपनीय चरित्राक्न लिखे जाते थे। अभिप्राय यह था कि कौन सा यक्नि कितना विश्वसनीय है उसका कितना और किस प्रकार के काय पर विश्वास किया जा सकता है । स्वेछा से निणय करने की शक्ति क्तिनी है प्रशासन की क्षमता कितनी है निस्पृहता कितनी है कूटनीति कितनी है आदि। इस प्रकार की रिपोर्टों पर ऊच तथा विशिष्ट पना पर अफ्सरा की नियुक्ति की जाती थी। गल्ड वापस जात समय हमारे य अधिकारी मुय कुछ हस्तलिपि विनान का साहित्य दे गए । कुछ नोटस थे हस्तलिपि विनान के मूर तत्त्वो के विपय म। तब इस विषय का पहला परिचय मिला। बाद म उहाने मुये कुछ जधिकृत साहित्य भी इग्ल से भेजा जा आज भी काम आता है । इसके बाद लिखावटो की तलाश निरलर होती रही और दूसरी एक लिखावट मिरी जिसका चित्रलिपावट सख्या २७ म प्रस्तुत है। hão aadla Surga Date Pantra चित्र २७ हस्तलिपि विज्ञान इसका पहा चित्र श्री दुगात पत के हम्नायर हैं और दूसरा ना सहज रिसावट का उगहरण है। हम्नायर एव चाव्यूह के समान है जिसम प्रवा पा मकना दुरद है। श्री पतनी ममूरी व पाम एव पाटगाराम मुन्य शिपिर थ। हरम दूर हिमालय पवत की गहाता में पाठशाला स्थित थी और उमा निक्ट ही उनका बंगरा था जिसमें उनका प्राय सम्पूर्ण जीवन व्यतीत दृआ था। अधिकतर समय अध्ययन म तया चितन म व्यतीत हुना था। आत्म चिन्तन का विशप रचि थी या बन गईथा। हम्नपिपि म व्यस्त है शिधा पतजी वग्न हा प्रनावान् विचारवान, जीवन गतियार और हर याम बिग्वाम वार व्यक्ति हैं। ना जीवन अथवा विचार प्रिया का गली गुद्ध सवल और स्पष्ट है निणय नि चया मर है। यह एक दूमरा महान् व्यक्तित्व था जिसन प्रभावित किया और उना हस्ताक्षर न पुन विपणना की समस्या प्रस्तुत कर दी जो आज तर वाम्नव में अच्छा तरह स मुग्न नहा मका है। स्वाथरों का सचय करना एक बहुत ही मना रजा तया गियाप्रट प्रिय काय कहा जाता है। वारा तथा युवा विद्याथिया का बहुधा म्वार प्रान करन क रिए प्रात्मान लिया जाता है। प्ठ पनि भा उनको अपन स्वापर प्रान कर दिया करत हैं। यह स्वाथर-पुस्तिका वहमू य तथा रखन को अमू य वस्तु है। मुथ प्न स्वाथरों की वास्तविर आवश्यकता रटा है। और साथ ही यह देखने का भी वि यह महान व्यक्ति लियत कम हैं नया नर अयमाचरण कम हैं। एक चाय को स्वाशर दे देता महर है। उमरा म्वाय रबर स्वापर सञ्चय म है परन्तु प्रोड हरिपि विनान विद्यार्थी का अपना रियावद का स्ववित उगहरण दे दना दूसरी बात है। अनुभव न यह सिम्बाया कि कुछ साग यद्यपि नतत्व पर पर मुगामिन है अपना रियावर का साहरण दे दना उचित नहीं समझत। वर नमूना हस्तासर होता दुमरा बात है, यह यि जाएं कान मम जाग्याशा का हर है। परन्तु सहा लिंखावर या माधारण स्वावर भा प्रदान बरन स परहज बरन हैं। सम्भवत आराय यह है कि उनका वास्तविक यक्तित्व जा जाना हुया है उतना हा पर्याप्त है। पद चिन्तन का विषय है मरे लिए। দী সীৰ মধু সবুর কি ই বা বসিবিন সন্ধা हम्ना पर देन मप्रसनताप्रति वरत। पापी मश्रा सम्पूगानन जी का अभिनन-मय छपा था उनका साठवा वषगांठ पर। इमम इनरी हम्नलिपि आधार पर एक हातमा अभिनन्न लियन का अवसर मिल था। यह पाना सन् १९५० का है। उमर मम्पाय विलक्षण लिखावटे व्यक्तिगत अनुभव -
मण्टन मनी बनारसीदासजी चतुर्वेदी भी थे। श्री चतुर्वेदीजी की उतारता एवं
सहानुभूति प्रमिद्ध है। उत्तान मरी प्रायना म्वीगर को नौर सहप अपना आशीर्वाद
สาวx) ตรัง
CH
चित्र २८
प्रदान किया। यह पत्र मरे पत्र सचय म अप्ठ है। उम पर लिये गए हस्ताक्षर का
चित्र लिखावट सख्या २८ में प्रस्तुत है।
यहा हस्तलिपि दिनान के सदभ म इनके लिए कुछ कह सकना सम्भव
नहीं है। अपन क्षत्र व यह महान् स्तभ हैं तथापि उनके विषय म सम्भवत ऐस
काई व्यक्तिगत गुण नही हैं जो प्रकाशित नहा हैं। परतु "तना चिन्ता नाज भी
-गी हुई है कि इहाने लपन हस्ताक्षर व नीच इतनी बहुत सी गोगगार रेखाए
क्या खीच दी थी (जिनकी वास्तव म जावग्यकता नहीं थी)। यह सम्भवत
Keep Your Chan
affer what they
John
वित्र २६
हस्तलिपि विज्ञान
था चतुर्वेगेना का विना' प्रियता मा एव उगहाण है। प्राप्वीराज कपूर मान हुए मिना। इनश नाटकीय व्यक्तित्व अन्दा तरह प्रभागिल और प्रसारित है। सम्भवन भारतवपम यह उन कुछ गिन-बुन व्यक्तिया में म है जो भाविक या है। गियावट य विचिश्ता है, हस्तायरों म बिलगणता। ग्विावट इन शिव का प्रar है, हस्तागर प्रानकारिता । (दखिए चित्र २६) रिखावर जापार म बबरगवा है रिक्त ग्यान वाफा है। रेवा माधा पर नाच जाता हैं, पाह' हैं और रसाया व अन्त म महा-यहा तोर म चिह्न मन हुए हैं। यह एक शक्तिवान ही कमठ पति का प्रतार है। "नको कापा वडा कापारण चाहिए, निमम नत्री प्रसारित कियारा मुगमनाम पर मर तया इनरा महान् प्रगान प्रिया का व्यक्त किए जान का अवसर मि मा । इनका रिवावट की तोगति या मागे रखना के दबाव म बाग बार अपना स्थान बनान की गति है और इसम होगपन है । मीधी रेखाना र नतिम चिह्न तीरा कहा हटना प्रकार हैं। ऊचा आा है और उनका पूरा तरह म प्राज परन की गति है। ऊंचे, रम्प हम्वाभर ययाय में अपना आनरिव नारायना व प्रसार हैं। यह तर अमन का छाया है जा मार मानव प्रिसिद्ध और जिसर लिगा यह सपन रजतपर की प्रारम्भिक पवम्या स यानि प्राप्त करत आ रहे हैं। उनसरा नाम आज मा उन दिनार माति मामन राना है। चाह चित्रपट हा अयथा नाटय मच न नाम म प्रया का प्रमोश पिचा चरा जाता है। विप मारपण इनर हस्ताक्षर हैं भावावा वहिए एव प्रा ला 4frए। माधारण बाजार म कहा बधिर * याकार वार एक और हम्नायर हैं। यह रामन मितिया बनाारा लिपि दोना म उपाय तया प्रस्तुत हैं। are १ ชา नित्र३ या रिसावर मा अपना निजी विचित्रना रखती है गौर अपन निजी प्रमाम प्रभावारी है। उन समय या परमानना गुप्त उत्तर प्राय मषि मर ममत्रा थ। मोमो आय हुए थे और बहुत हा व्यम्न कापक्रम र मुख्य अतिथि विनमा रिलायरे कुछ व्यक्तिगत अनुभव थे। स्वाक्षर की याचना के लिए उनके पास तक पहुचना असम्भव नही तो कठिन अवश्य था । झांसी के तमाम सरकारी अधिकारी तथा नेतागण उनको घरे हुए थे। एक नता मित्र द्वारा क्मिा प्रकार अपनी स्वाार पुस्तक उनके पास पहुंचाई। हस्ताक्षर मिल गए हिटीम तथा रोमनिपिम परतु उन पास तक न पहुच सक्ने का सद मिट गया-उनके हस्ताक्षर इनन प्रणानकारी प्रतीत हुए कि उनको रिखते नहीं देख मरने की काई बात नहीं रह गई। Bhupen 13-8 - ५ चित्र ३ () हि हस्ताक्षर का लिखावट कापी फ्ली हुई है बड़े अक्षर है परन्तु स्पष्ट परम नहीं आत। अग्रजी के हस्ताक्षर के प्रथम दो अक्षर स्पष्ट पढने म आते है। जागे वे असर यस्पष्ट हैं। उखना म स्फूति प्रचर मात्रा म है । प्रवाह है शक्ति है बल है और साथ ही साथ प्रदान की भावना है । हस्ताक्षरा की बनावट पूर्णतया तक्सगत नहा ह विपकर हिटीम। एसा प्रतीत होता है कि इनका आत्मवग इनके मानसिक तक से अधिक है। पूरी ताक्न गा रहे हैं चा उसकी आवश्यकता हो अथवा न हो। सतुरन वरावर नहीं है। यह लिखावट पूर्णतया वहिमखी प्रवत्ति प्रगित करती है जिसम चना फिरना अधिक और मानसिक विधिवत् प्रिया कम रहती है । इसम विधिवत् योजना और धययुक्त स्थिर "गा एव उद्योग का प्रवाह नियाजन नही है । इनसो रिसावट से यह पता लगाना कठिन है कि यह मोन-सी आदा रेखा का जनुमरण करते हैं जयवा इनका अपना निजी जादा है अपनी निजी कायारी है । इनकी जीवन शक्ति तथा आतरिक प्ररव बर अपनी विल नणता से अवश्य ही वन्नीय है। जमा कि हम पहर वह च है ग्यिावर स्पप गुद्ध और सहानि म हाना आव या है। यरियावर व मूररमण हैं। कोई भी लिखावट विण बनाया जाना आव या नहीं है तथा ससार म अनकाना व्यक्ति हैं जो वास्तव में महान हैं और विरमण हैं इस प्रकार की गुद्ध रिपावटें गियत हैं। अन अमामा य रिपावर जाति विग्मण शिवाई देता है, निश्चय ही बनावापन प्रगित करती है । इमम वाम्नविक गावित जितना है यह गवायुक्त है। हस्तलिपि विज्ञान x x x हस्तलिपि विज्ञान के उपयोग हम्नलिपि व्यक्तिगत वस्तु है। इसका उपयाग भी व्यक्तिगत है । पर तु काई भा व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत इकाई म उपयागी नहीं है। समाज म ही उसी व्यक्तिगत मामय्य का वास्तविक उपयाग है। "मगिए यह महज नी स्पट है कि हम्नलिपि को उपयागिता उमा रिखन वारक लिा वह जितनी पक्तिगत है उतना ही अथवा उसम भी यधिक उमकी सामाजिक उपयोगिता उम समाज के लिए है जिसकी वह एक इकाई है। प्रत्यर यकिन उद्योग करता है । उद्योग करना प्रया व्यक्ति का जन्म जान रमण है। हम मब कुछ-न-कुछ वरत ही रहत हैं। परतु वाम्नविर प्रिया तया काय वह है जिसम हम पूण मन्ताप प्राप्त हाता है। हम उम काम का अधिक अच्छी तरह में करन हैं जिम गिा हमारा यातरिक शक्तियां उपयुक्त हैं और जिम काम म हमारी अतवर्ती स्वाभाविक स्थान है। पर तु ममस्या यह "त्पन होता है कि हमारा झिान क्या है ? हमारी गस्तियां क्या है और एम कौन-म काम हैं जो कि हमारी गपिन-मामथ्य के अनुकूल हैं और उनम हमारी अन्तवर्ती स्वाभाविक म्यान भी है। ऐसा देगा जाता है कि हाएर वा पाटावर बनना चाहता है। वकील का वा वकार बनता है। दुकानदार का या दुगान करता है । और कभी एमा नहीं मा होता है । उपयुक्त मा प्राप्त कर ग्न व यार गग अपन अपनाय हुए व्यवसाय म मार नहीं हात । रामा भी देखा जाता है कि वटा अपन पिता व्यवमाय म पूणतया विपरीत यवमाय अपनाता ह योर सफर हाता है। विमान का बग सना वा उच्च अघि कारी बनता है अथवा शानियर डाकपरका व्यवमाय अपनाता ह और मफर हाता है। यह एक अवमर की हा बात रहती ह रि कौन-सा युवक अथवा युवती क्मि प्रसार को गिमा प्राप्त करत हैं और दोन-म व्यवमाय म परत हैं। विसी अधिक यवमाय एव परिस्थिति म अपना पाम चलाने हैं और कुछ एर मफर ताए भी प्राप्त कर रेत है परतु एम व्यक्तिया या पूर्ण रूप स सदुपयोग हो गया है । यह कह सवना कठिन होता है। गिति एव समय व्यक्तिया की कमी नहीं है । आज प प्रगनिगोल युग म “यक्तिगत विकास की सुविधाए तथा अवमर अधिराधिर उपर ध हैं। साथ ही साथ जनेकानेक यवसाय भी प्राट हो गए हैं। जोद्यागिक यावमायिक वनानिक कारमय जाति जना पत्रो का विधिवत् पृथकारण हो चुका ह और प्रया यव साय में विरोप योग्यता के उम्मीदवार उपग्ध हैं। प्रत्यर यवमाय का मना वनानिक अध्ययन किया जाता है यह निर्धारण करन के लिए नि विस अन्लवर्ती याग्यता कायक्ति उमरो सफरता से निभा मागा। इसको पावमायिक माग्यता अथवा क्षमता कह सक्त हैं। इसी प्रकार प्रत्यक यक्ति जो रिउम पवमाय अथवा पके लिए प्रार्थी है उसरा भी मनोवनानिक विपण रिया जाता ह ।मनाविनान के विपिन इस तरह से दोना का मिलान करते हैं और निष्कप पर पहुचन है कि यौन-मा यक्ति क्रिम प्रसार के व्यवसाय अथवा पट के लिए मनोयोग के अनुसार उपयुक्त है । इस मिया म विसी एक निश्चित व्यवसाय तथा पर की यावसायिक एव स्वभावजय योग्यता का यक्तिगत स्वभावजय याग्यता से मिलान किया जाता है। मनावज्ञानिक विगपज्ञा ने इस प्रकार का जांच के लिए विविध प्रयोगा का आविष्कार क्यिा ह और निश्चय ही य उपयोगी हैं। इस प्रकार प्रयोगा से यक्तिगत बुद्धि उपरीघ विचार गरिन कल्पनाशीता उत्साह साहस निर्भीकता क्रिया गीता मानसिक सन्तुलन भावुक्ता अनुशासनप्रियता जीवन पनि नया पक्तिगत रुचि ध्यान का पता लगाया जाता है। इस उपयाग दो प्रकार स है (१) व्यवसाय व रिए यक्तिगत चुनाव के लिए। जनेक प्राथियो मस किम व्यक्ति का सर्वोत्तम चना जाए यह निणय करने के लिए और (२) नवयुवक नवयुवती आनि प्रत्यक व्यक्ति को इस प्रकार के पावसायिक मगह टन व रिए कि वह निम प्रकार के यवसाय के लिए उपयुक्त है। यह सगह व्यवमाय व आवश्यर जतवर्ती रपणा का और यक्तिगत निभा याग्यता एव स्वाभाविर चारियिर गुणा का दसत हुए की जाती है। एम मनावनानिक प्रयाग नया सगह देने जनरानेर विपन तयः वाया'य हैं। यह क्रिया यूरोप अमरिका व देगा म प्रचग्नि हो चुकी है तथा सर कार विशाल उद्याग विज्ञान आश्मि भा मा यता प्राप्त कर चुकी है। भारतवर्ष हस्तलिपि विज्ञान म भी यह प्रयास कापी आग वर चकाह। परतु म वनानिय क्रिया म सबस वही समस्या एक यह है नि जिस व्यक्ति का मनावनानिय निरीक्षण होना है उममा उपस्थित हाना आवश्यक है तया उमर महा और म्बच्यापूण मत्याग वा बायरना है। मा विना उमका वालविर एव निणयारी निरीण किया जा मरना करिन । हम करिना टम प्रयाग मह व्यक्तिगत प्रभाव । जब व्यक्ति मनायनानिक ममय उपम्यिन हाता है उसका पूरा व्यतित्र प्रभावित करता है। यह न्यक्तित्व का वह भाग है ता मामन ग्गिावर हाता है। मनावनानिक अपन विप नानस प्रक्नि अवनी गण का निरीक्षण करना चाहता है। इम मुगवान मजा प्रभाव वाह्य वा भूपा वातपाल आदि म हाता है वह अत वर्ती जिनामा की प्रिया म वाधा हारता है और इस तरह म मिमी भी व्यक्ति का वास्तविक निरापण एव चरित्रावन निप्पल नग रह पाना हा साता है कि मना- वनानिक बुद्धि-अब भावक्ता आदि कुछ एक चारिपिा लक्षणाको जाँच निप्परता में कर सर पर तु स्थान अभिरचि आनि अय मनकाना स्मण हैं जिनस समूण व्यक्तित्व बनता है, उन सवकी जांच निप्पलता म बटापि नहीं की जा सकती। "म तरह की व्यक्तिगत समस्या बना हा रहती है। मानव-स्वभाव दुल्ह है, व्यक्तिगत चतुरता का मत नहीं और यह किसी भी “यक्तिगत मुलाकात म करिनाइयां एव अमुविधाएं उस न करता रहती है। यहा सबम बडा कारण है कि कई मदे मे अच्छे चुनाव-म निप्पल एव निणयात्मर चुनाव करल अथवा मनानानिय सराह देन म गरता कर जाते हैं। या विविध विवरणा द्वारा अच्छी तर म विन्ति होता रहा है। नयापि मानव स्वभाव को टुम्हता का निरापरण वग्न प्रयाम जारी रहे हैं और विवारव इस विषय म अग्रसर होन व प्रयत्न निरन्तर करत हा रह हैं। व इस प्रकार मानवीय आधार को पान करने म एग रहे हैं जिसब द्वारा मनोवनानि वोज वी करिनाश्या तथा अमुविधाला का निरागरण किया जा सके और इस प्रकार व माधन प्राप्त हो जाए जिनम मनुष्य के स्वभाव के निकट-म निकर पहुंचा जा सके। “म प्रकार का निप्पर मानवीय माघार हम हम्नलिपि म मिला है। हस्तलिपि विमा मा व्यक्ति में सम्पूर्ण व्यक्तिव का चित्र है जो कि एक तथा अनन बार उपर क्यिा जा सकता है । इसका निरीगण एव परवषण पर तथा बनेर विपन एर तथा अनेर वार घर मरत हैं। हर्गिप प्राप्त हो जान पर का यक्तिगत मुगवान रिसा मना वनानिय विपन मे हान की यार'याना नहा रहती। इसम व्यक्तिगत प्रभाव में तत्व भी सामन ना आना हम्नरिपिस प्रकार का बाधार प्रस्तुत कर देता है हस्तरिपि विज्ञान के उपयोग जिममे चरित्राक्न का वाय बहुत हद तक वज्ञानिक विधि से किया जा मकना सम्भव है। इसके द्वारा बनाव सम्बधी तथा यावसायिक सगह निणयात्मक रूप से दी जा सकती है। हस्तलिपि विनान द्वारा इस प्रकार के विभिन प्रयाग किय गए हैं। यूरोप के विद्वान् डा हैस जेकोबी तया हैरी नो टगर आदि न इस विषय पर बहुमूल्य तथा नवीत खोज करखे पयाप्त प्रकाश डाला है जिसमें हस्तलिपि विनान वा वनानिक स्तर प्राप्त हो सरा और इसका मान स्थायी तथा विश्वमनाय मना- वनानिक स्तर पर होने लगा। आपने समाचार पत्राम देखा होगा कि अनेक सेवायोजक स्वामी आवेदन- पत्र हस्तलिखित मागते । एसा प्रकाशित होता है कि विसा पर की प्राप्ति के गि आवेटर प्रार्थी अपना आवेदन-मन अपनी स्वय की लिखावट म लिखकर भेज जाकि टाइप द्वारा प्रपिन प्राथना-पत्र कही अधिक स्पष्ट हा सक्त हैं फिर भी स्वलिखित आवदन-यव ही मांगते हैं। यूराप आदि अनक स्थाना म इस प्रकार स्वनिखित आवरन-पत्रीका जाच हस्तलिपि नान के विशेषनों द्वारा की जाती है और उस उपरात आवे- दक प्राथिया की विशप योग्यता की जाच होती है उन अ य अनक योग्यताआ को देखन के रिए जो शिक्षा स्वास्थ्य आदि के अनुसार लावण्या हैं । चरित्र स्वभाव ग्यान आनि सम्बन्धी जांच हस्तलिखित आवेदन पत्रो से ही हो जाती है। हैरी ओ० टेलर जो कि पिछले महायुद्ध के समय से सयुक्त राष्ट अमे- सिराम निवास परत हैं लिखते हैं सबसे महत्त्वपूण काय हस्तरिपि विनान ने दूमरे महायुद्ध म किया है जबकि इसका उपयोग सयुक्त राष्ट्र अमरिका सना- विभाग ने चरित्र एव पवितव की वारीर जाच वरन के लिए सफरतापूर्वक दिया था। इस महायुद्ध म सयुक्त राष्ट्र अमेरिकी सना के उच्च अधिकारी ससार व अना मन्त्त्वपूण मोचों पर ग हुए थे और टम महायुद्ध का अन्तिम निणय वास्तव म न अधिकारिया की उच उत्तरदायित्व की भावना पर हा निर्धारित था। यह स्वत सप है कि इन अधिकारिया बहुत हा ऊर चरित्र तथा वरगायतित्व व हात वा जाव यस्ता था। म पुस्तब म टार न अयत्र गिा है कि हम्नलिपि विज्ञान सम्बन्धी काप करन प गिा यह स्वय सयका राष्ट्र समरिका के प्रतिरता विभाग म नियन या Hand Uniting The key To Succe sful Living published in London 1946 हातलिपि विज्ञान 1 इस विषय म अय विएपना ने महत्वपूण क्यन निम्नरिखिन हैं डन्यू०एल० कच रिखत है प्राय एक गता से शाम एव जमनी में और बाद म इगलण्ड म भी हस्तलिपि विनाना यध्ययन एव प्रयाग दिया जाना रहा है। इसका महत्व अपराध मामलो म “यायालया में माना जाने लगा है। यह काय लिपि विनान सभा कहा आग है। (FMपि विनान शिरोपर लिपि की जालमा जो पहचानने तर सीमित हैं।) यावमाविक्षनाम हस्तलिपि विनान का उपयोग विविध हम्नलिपिया स 'मानदारी नीलनिष्ठा प्रामाणिकता भूम शुद्धता जाति अनेक यक्तिगत एव परम प्ठ गुणो की जाच करन करिए किया जाता है। लेपनी तथा यक्तिव ने इस प्रकार स मामूहि महत्ता प्राप्त कर ग है। महत्वपूण उद्योगा एव पदमायाम यक्तिगत श्रेष्ठनापर हा सम्पूण हानि राम निर्धारित रहता है तथा ईमानदार मर निष्ठावान एव विश्वस्त काय मातांसापी नितान्त आवश्मक्ता रहती है। इण्ड में हस्तलिपि विनान विशषज्ञ हैम जबावी याक्थन है कि * अभी कुछ बाल स अट विरेन म भी दरी व्यापारी सस्थाको द्वारा क्मचारिया की नियुक्ति र मम्ब ध म हस्तलिपि म मनो বানি “পি বিগ ব্য বা শিবা সান আ জ अथवा इस बात को खाज वरन के लिए कि किसी अच्छे कमचारी काकाक्षमता का हाम हान वा मनावजानिक कारण क्या है। सम्भवन या प्रतीत होगा कि अधिकाधिक देगो म प्राप्त अकासे पता चरता है जिएम यक्निया की गणना कही अविव है जाति मानसिक व्याधि में रागी हैं आज रहित हैं मानसिक दुबरता शिकार हैं नया ऐम यक्ति जिनका धमनिया गणित होन एव अस्त व्यस्त हा गर हैं जाथाडी मी वठिन परिस्थितिम अपना मानमिक भन्नुलन त्याग रत हैं वनिम्बत सल्यक्तियो के जा विग्यि "याधिया वास्तविष रोगी हैं मत गतिहीन हा गए है (जिम कारण उनकी वायक्षमता रम ह गई है। हस्तलिपि विनान का सफर उपयाग एक अन्य क्षत्र में भी हुआ यह नापारी सम्यामा कमवारिया की अविर गुणकारी काय रमता की तरावग्न म दिया गया है जिमम उनकी नियुक्ति अधिक अच पता पर की जा मक (जिमम मम्यूण औद्यागिक मस्या TWL French Th Psychology of Hand Unitiog हस्तलिपि विज्ञान में उपयोग 3 x का उथान एव उसको अधिक लाभ हो सा) I स्विर जररए- क माय हस्तपिपि-वनानिम एरिक सिंगर न भी दम विषय म महत्त्वपूर्ण प्रागटारा है जाजक हस्तरिपि विज्ञान के अग्रगष्य अपर बिजर र म हैं जहा प्रियक सामाय नागरिक हस्तलिपि विनान के हित एव विकास में अधिकाधिर रचि प्रगत करता X वह्मिसी प्रवत्ति वारे “यक्ति अपनी अन्तवर्ती शक्तिया को बाहर निकालते हैं दूसरे पक्तिया क साथ मामाजिक मम्पक भ्यापित करना चाहते हैं। उनसरी मुस दुख की समस्याआ में उनका साथ देने क लिए उनम मिलना चाहत हैं । एस “यक्ति अपन पाय क्षर तथा अपने यक्तिगत जावन में जय अनस यक्निया का साथ चाहते हैं। अपनी भावनाभा का अपनी मनतरंग के अनुमार स्व छन्ता स यक्त करना चाहते हैं और ऐमा करते भी हैं । एसे व्यक्ति एक स्थान पर जमकर बठना तथा काम करना नहीं चाहते । व चल पिरकर अपन सम्पा स्थापित परत हैं ससार की विविधताए देखना चारते है। ऐसे यक्ति स्फूर्तिवान् रिसाई दत हैं उतार प्राति के होते हैं और अपने भावर विचारों का स्वत व्यक्त करत रह्न हैं। इस प्रकार की भावना उनको अपने स आग साचती है जिससे स्वन स्वछन् गति से उनकी रिमावट आग वी आर बाती है तथा अपर आदि लिखन के स्थान पर आजादी से करते हैं अधिराधिक स्थान घरते हैं। लिसावट म ये चिह्न बहिमखा प्रवत्ति के हैं। बहिम वा प्रति बार यक्ति इम प्रभार स एस काय भय का अपनाना चाहते हैं जिमम उनकी जन समुदाय की सवा की आतरिक प्ररणा का स्वतत्र गति प्राप्त होती है जन-ममुद्राम का प्रम आक्पण तथा उनगर स्वभाव के नाम का पूरा करने का अवमर प्राप्त हाता है। इस तरह स वहिमखी प्रत्ति के वग म हम धार्मिक प्रचार करो वार व्यक्ति प्राप्त होते हैं जा धय गन तया वास्तविक समाज प्रेम म जीवनपयन्न अपना काम करत रत हैं। व्यापार म नियुक्त व अधिकारी जिनो अय अनक व्यापारिया से मिन का अवसर रहता है तथा घर म बाहर आय काय मा म फिरना पडता है दौर रोग जिनरी सामाजिकना प्रगाव वृत्ति है चित्मिा जिनराप्रम मानवता स है गाह जिमम तुग्न विचार स्पष्टता एव व्यक्त करने के स्वाभाविक 1 2 HANS JACOBY in his Book Analysis of Hand Uniting ERIC SINGER in his book Graphology For Every Man हस्तलिपि विज्ञान प्रागन एव विनापन करने पर रोग जिनको विमी भी प्रकार का व्यावमायिक प्रवास करना है। एम मर यक्ति वहिमती प्रवत्ति + ग स हा मान है तथा इस प्रकार कार्यों म सफलता प्राप्त करत हैं। पदिय मिस्त्री प्रवृत्ति वान व्यक्ति विमा मारण म अन्तमाली वाम हर दि नारे हैं अथवा वतन व गम म इस ग काम मा जात हैं ता जीवनपयन्त उह अपनी रियाणीना में मुष व सन्नाप प्रान नग हाता अपने भाग्य को कोमल रहा है। उन बाप म मा उननी अामफरता प्राप्त नहा हाती जाति उनका मिखा प्रनिन्मम्ब धो वाय-भत्र म प्राप्त हो सकनी थी। मन्तमुवी प्रानि वार व्यक्ति अपना आन्तरिक भावना की मार मुपरित हात हैं । यह वनिमया प्रवति वा विग्र उरटा है । बदिमसा प्रवृत्ति वाग व्यक्ति जिम स्फूति को अपन स बाहर प्रमारित करता है, अनमुखी प्रति बाग व्यक्ति उस स्फूनि का अपनी हो आर अग्नि करता है। उसका ध्यान बवर अपनी हा समस्यामा की ओर पद्रित रहता है। उसका अपना मुष दुप अपना आव याताए अपना स्वाय रिसाई रेला है। अय मामाजिक समस्याएं उमारिए नहीं हैं। उम तरफ उसका ध्यान आर्पित नहीं है। उमा चिन्तन नाक्षत्र अय व्यकितनही है वस्तुए हैं के विचार हैं जिनम उमरा स्वाथ है। वह दूमरे गा को समता भरी है उनम विश्वास नहीं करता अवि वाम का भावना अधिक है। प्रपर बुद्धि वार अन्नमवी व्यक्ति अवि'वामपूण तर शक्ति प्रदगित करत हैं। आरावना तथा यग्य शनमा माध्यम है। उनग्ला का वाम्नविना उना स्वभाव म नहीं है। लियावर में भी इस प्रकार की आन्तरिक वत्तिया निहित हैं। इनकी स्वाभाविक शिवावर मम्वच्छ गति न विपरीत पवरोधमचा चिह्न अधिर मिस्त हैं जस कि छार याकार कामरिमावर माण अक्षर गार गौ मुख बन पोछे की ओर झुक्न बाले तश घूमा बाल वत्त एव रेवा मा । अन्तमुखी प्रतिभा काग व्यक्ति अय व्यक्निया म मुख माहता है तथा अपने म हा खिमा रहना चाहता है। अन उसकी प्रियावद भी इसी प्रकार स पछि बाइ बार जान वार चिह्ना म बनी हुई होती है। उसम प्रगार विह्न नहा हात । यनि हान भी हैं तो एस ही जिनम वह अपने व्यक्तित्व को अपनी गस्ति अनुमार यावरण म छिपाए रहना चाहता है। गप ममान मास अनकाना व्यक्ति हैं जो वास्तव म अन्नमुखी हैं परन्तु प्रतिकूल परिस्थितिवश रिमुवी व्यस्सिया नवग म पम जान है । अपन वास्त विम्बमान रामम वय नगर पात और प्रतिक्रियावादी बन जात हैं। इनर आचरण समान नहीं रहत और इनर व्यवहार म विश्वास एवं उनरतापि वपण हस्तलिपि विज्ञान के उपयोग आ वामन कापि प्राप्त नहीं होता। किस व्यक्ति का एक स्थान पर एकाग्र चित्त किसी विषय पर जमना अछा रगता है व बास मान क सधप म रिस प्रकार से आन प्राप्त करना यह चिनन का विषय है। जतमन्त्री प्रतिभा वाले व्यक्तिया का काय पत्र नम प्रकार है सन-चाय कायाया क रिपिक तथा रपये-पम कारमा जाखा रखने वा? रसपाल । य जपन काम म मूभ्म दप्ति विधिवत् काय यवम्या आरिपूर्ण रूप स रप मक्त है। रनका चित्त जपनी रसना जारि अन्य कायाग्य-मम्मी वस्तुना पर एकाग्र रहता है। नरा जय अन यक्तिया स तया उनकी यक्ति गत भावनाओ स मम्बध नहा रहता। वास्तुका तथा अभियानिक काय मे सम्बध रखने वाले यवमाय जिनम वस्तुमा म यत्रास तथा उन काम म आन वागे अनजाने मगीना मे काम पता है। मम भा मानव से माधा सम्पक नहीं है। अपना चितन एव प्रियागी एकाग्र एव विधिवत् आचरण की नावश्यकता नहीं है। एसे यकिन बिना रिमा गाव के जपना काम करत रह सस्ते हैं। समागेचा खर जिनको वतुत ही निप्पथ होकर सोचना विचारना पड़ता है और जाज बुरे का तुलना कर सकते हैं तया यथाय TT प्रयाग कर सकते हैं। वज्ञानिक एव कूटनीतिन आनि एस यकिन जिनको अपना प्रत्यक आचरण पूर्व निधारित राति २ अनुमार साधना पडता है । टम प्रकार व व्यवमाय में बहुत साच-समपर काम करना पाता है और प्रयक रिया पूर्व निधारित हानी है तथा एस काय का चनाव वन्त ही सावधाना स वरना परता है। वनानिर एव कूट नीतिन का नाचरण वास्तविक अतमयी प्रवत्ति का उगहरण है। x x उभयमुनी प्रवत्ति वार यक्निया म वह्मिपी एव ज तमखी का सम वय रहता है । "नम वह्मिया का प्रपरता एव प्रगचि नया जनमुखी की विचार गीलता एव नक्सगत रचि नाना विद्यमान रहता है। जाव' यातानुमार उभय मुवा प्रतिभावार यक्ति अपना जातरित्र एव वाह्य वत्तिया का उपयोग कर सक्त हैं। ममम्वभाव नानक वारण य व्यतिरियावर म भा समआचरण करते हैं। नवी रिवावर व जाग या आसार प्रमार उनी जाग तथा पीछ शरान आनि मर ममश्रवस्था म रहती हैं। नवा तावनि वा जावयाना नहा है भावा वानहा है नया क्मिा प्रसार का जगप भा नगें है। उच म्नर का बुद्धि प्रमग्दा र माय उभयमुवा प्रतिभावार यकिन अचे प्ररघर मिशन है। प्रद पवार प्रवति इनर समस्वभाव का प्रथम तया मूल ११८ हस्तलिपि विज्ञान y सषण है । अनाव म्वाभाविक है। उत्तरदायित्व जिस यवमाय म आवश्यक है, उसम उभयमुखी प्रतिमा मन मा य है। X पर नियुक्ति के बिना गइ चुनाव-ममिनिया वहया आवक व्यक्तिया के माय माशालार का आधार नी हैं। यह मौखिक परीक्षा है। "म मौखिर परीक्षा का आगय जमा कहा जाता है उम्मीवार आवका व्यक्तिगत रयणा का जाच वरना है जिसम उनका उपयुक्तता का अान दिया जा सर म विगप पर पर नियुक्ति के लिए निमा लिए परी ा की ना रही है। इस प्रकार का परीक्षा म मानमिक प्रवरता सामाजिक्ता एव ननिर 7Tणा का पता रमाया जाना है जम कि मानमिन तत्परता समयटागे स्पाट एव तक्युक्त विवचन निणय का मम वय चि ग्यान मामानिकता नेतव कोगक्ति नया नतिर शक्ति यानि म प्रकार करणाका जानन वी त्रिया इस प्रकार की विगप बातचान करन का है जांच कमटी तया आवन्य व्यक्तिम कि य म उभर आए। इस प्रकार का व्यक्तिगत मुगात क्या कुछ मिना म पूरी हो जाती है क्यावि जावर यक्तिया की सख्या अधिक होती है अत प्रत्यक का थाहा समय मिरता है । यह नाचय का विषय है कि कुछ एक प्राना म हा जाच कमरिया यह निषाग्नि कर रना है कि मि आवक का व्यक्तित्व किम प्रकार है जबकि मानव-म्बमाव एक दुह समस्या कग जाती है। यह जाच की रीति यावत्कार साय क्व' ययाय है यनिमय माधन नहा अपनाए जात तो इसका परिणाम यह हाता है कि विभिन पा पर अनुपयुक्त प्रसार व व्यक्ति नियुक्त कर दिए जाते हैं जारि पक्तिगत मनायाग स उन पाक लिए विपरीत हैं । जम कि निवल आत्म वर वारा व्यक्ति क्मिी यवमाय का अधिकारी नियुक्त करना किमी उग्र स्वभाव बार व्यक्ति का ममाज-कल्याण + पर पर नियुक्त करता निमी प्रगक प्रवृत्ति यार यक्ति वा एम पद पर नियुक्त करना जहाँ का कारवार गुप्त रखने का आवश्यकता है। जिस व्यक्ति का निणय एन म चित्र है उमको मतृत्व ६ पर पर नियुक्त करना जिस व्यक्ति म बनिहित भावना भागविलाम गारीरिक मुग एव आराम म रह्ने की प्रवत्ति है उस पारीरिक परिथम व काय पर रखना जा स्वभाव म स्वार्थी एव धनगनुप है उम आय-व्यय का भार टना। मि व्यक्ति ही हैं जो अपन स्वभाव स विपरीत काय भार पावर अपन नतिक उत्तरदागित्व या दूवत हैं और अपनी मानमिव चतुरता स अपना निजी वचाव भी करते रहन का प्रयास करते रहते हैं। कुछ भी हो, इस प्रकार व्यक्तिगत साक्षात्कार मे सहा एव उपयुक्न आवेटका का चुनाव मम्भव नही है। व्यक्तिगत स्वभाव की गहरी जांच का साधन हस्तरिपि विनान ही है हस्तलिपि विज्ञान से उपयोग १२६ जिमसे स्वभावजय अना प्रवत्तिया और शक्तिया पियावत के विभिन चिह्नामे पहचाना जाती हैं। इस पहचान से पिसी भी व्यापार व्यवसाय पद एवं उत्तर दायित्व रिए यक्तिगत चुनाव रिया जाना सम्भव है तथा व्यक्तिगत व्याव सायिर सलाह दे सक्ना भी सम्भव है। यही कारण है कि यूरोप के अनेक देशाम हस्तलिपि विज्ञान यावसायिक महत्ता प्राप्त कर चुका है और जिन विभि नक्षत्रा में मानव स्वभाव महत्त्वपूण समझा जाता है उन क्षधाम इसका उपयाग किया जा रहा है जसा कि ऊपर कहा जा चुका है। x x वालको का यक्तिगत चरियावन बग्वान तथा सुग्या हुआ यस्तित्व बनान के लिए दिया जाता है। उनकी लिखावट से पता चला है जिउनम अपन विचार एव क्रियागीरता का नियोजन करन को कितनी गति जागरूक हो चुकी है। अनेर बालक रिना विचार काम करने की जान्न म पड जात हैं उतावलापन और अनियत्रित नाचरण सहज प्रदगित हार लगते हैं । उद्दण्डता अधीरता नियम अधिकार आजा की अवह ना करना नीति के विरुद्ध वाम करना आनि अनतिक भण उत्पन हो जात है। यह रिया बहुत ही छोटी और प्रभावशाली अवस्था म प्रारम्भ हो जाती है। यपि इसकी सही पहचान प्रारम्भिक जवम्या मही हो जाए तो उचित निर्देशन तथा मागदान स बहुत ह तक एसी आरता से वारया को बचाया जा सकता है और उनम इस प्रकार के स्व लक्षण प्रबल रिये जा सकते हैं जिनस उनका व्यक्तित्व त्रियातील एक उपयोगी बनाया जा सके। पक्तिगत रुचि रुयान एव उपयुतआतरिक गस्तिया प्रतिया में अध्य यन से उह शिक्षा तथा “यावसायिर गिभण-मम्वधा सलाह भी दी जा सकती है। बाबा के स्वभाव-मम्बधी मागगन में टम विनान का महत्त्व है जिसका परामा वारया माता पिता अभिभावक शिक्षा निदेंगव पानि सामाजिक वायकर्ताआ को गभावित कर सकता है। x x सरस अधिक उपयाग हस्तलिपि विमान वा साधारण नागरिक को है जिमम एक यक्ति का दूमर यक्ति मे काम परता रहता है तथा उस किसी अय व्यक्ति के माम अपना पक्तिगत एव यावमायिक निर्वाह करना पता है। प्रत्यक हम्नलिपि म दिखने वार यक्ति का यक्तित्व प्रगित हाता है। एसो लिपावटें हमम म प्र या व्यक्ति मामन निय हा आता रहती हैं जस वि साथ म काम बरन वार अय यस्निया रम थधिकारिया तरिमित म नताआदी पियावर मित्रा पत्र निरर मम्बा घया तथा आय व्यक्तियाक पत्र आदि। पनामाधारण मनावनानिए विग्यण म आ चयजनर स्वभायजय आचरणो का निराकरण हा जाता है। हम्नपि वितान का अधिकाधिन एव महजतान १२० हस्तलिपि विज्ञान मुगमता से उपल ध पर देता है। साधारणतया जब हम किमी प्रति विशप के मम्मा म भात हैं उसके व्यक्तित्व के विषय म कुछ न-कुछ अपनो निजा धारणा बना रत हैं। यह धारणा তম ফিল । অঙ্গিকার বা হৰি স্বাৰ, পিথাশীষ্য নিন্য মামা जिक्ता ममझदारी स्वाय एव उतरदायित्व की निजी वत्ति आनि सम्ब पी होती है। यह हम अपने सामयिक अनुभव द्वारा करत हैं। परतु अनेकानेर यक्ति अपने आवरण को प्राय शुद्ध रूप में यक्त नहीं करते और एमा हो जाता है कि हमारी धारणा वास्तविक परिस्थिति के अनुकूल न होकर उमव विपरीन हो जाती है। अथवा विमी चतुर यक्तिक सौम्य आचरण में हम प्रभावित होकर उसका विश्वास करने लगते है। जो यक्ति हम दान म अच्छा लगता है प्रियभापी है म स्वत उसकी ओर आकर्षित हो जान है । एसे अनेक पवितया स सम्पक गहरा हान पर हमारी प्रारम्भिक धारणा दृढ होती है और इसके विपरीत हमारी यह प्रारम्भिर धारणा परिवर्तित भी हाती रहती है। जिस व्यक्ति को हम विश्वासपात्र समझ थ वह अविश्वासी सिद्ध हाता है । जिम हम समनदार मम र य वह रच' हा सकता है। जिमका रतव्यपरायण समझ प वह कपल बहत अच्छा वात बनान वाला सिद्ध हा सकता है। जिस व्यक्ति को हम समझे थे कि यह अपना वचन पूग बनेगा वह स्वार्थी और लाभी सिद्ध हुआ। जिस पक्ति की सुन्दरता से हम प्रभावित हुए थे वह गाधी निकला और जिसका साथ हमन बरना चाहा था वह झाडार और स्वाभिमानी निकला या अनेक विपरीत परिस्थितिमा प्रस्तुत होता है। परस्पर स्नह एवं सहमाग में समझदारी परस्पर महायता महृदयता सन्नीलता समान दृप्टिवाण आतान प्रदान की अनुरूपता सन्म का समानता अपने-अपन उत्तरदायित्व का ममान भावना आदि म अनेक गुण हैं जो कि मफर एव ममान आचरण तया सहयोग के लिए नितान आवश्यर हैं। ये समानता एक्षण प्रत्यक्ष व्यक्ति अपित करता रहता है और अन्त म भी यह निश्चित नही कर पाता कि यह मित्रता तथा माझदारी वास्तर म सपर उपयोगा एव समान राम को अथवा नही। इस प्रकार के अध्ययन म दो यस्तिया के स्वाभाविक रमण रवि झिान व्यक्तिगत समना मनोयोग यतिवग आदि मूर तत्त्वों का समय नितात आप पर है : या जांच रिपावर के मनोरनानिर अध्ययन से सुगम हो जाता है। अनर यूरोपियन विचारदाने, जो पि पारस्परिक सहवाग के पक्षपाती हैं विराहनिया के लिए, जिमम एक व्यक्ति अपना जीवनमाथी तलाश करता है हस्तरिपि विनान का प्रयाग उचित ममला है। इमरा उपडएर मन्च ट्रेलर Vा मानफड लोयन गाह गिर असन यादि अनर रिया हस्तरिपि विज्ञान के उपयोग मनावनानिक याय्यानाआ ने अपने मुसयोजित अध्ययना म दिया है। दनमा क्थन है कि जीवन के सुख सतोष और गानि का प्राप्ति के लिए तथा आग मह यागी की प्राप्ति के लिए गहर चितन एव छानबीन की आवश्यकता है और इसम स्वाभाविक समवय की समयारी प्राप्त करने के लिए लिसावर वा सहज मनो वनानिक अध्ययन पर्याप्त महायता प्रदान कर सकता है। एम अनकानेर निविधा जनक प्रश्न हैं जाकि रिखावट के मा यम स महज ही स्पष्ट हो जात हैं। विवाह विच्छेद के कारणों के विषय म गिरर अमन का विवचन बहुत ही यथाथ एव विचारग्राही है। जो दो यक्ति कभी विवाह मूत्र में वध गय थे उनका पथक हाना जा वचन दिय गए थ जीवनपय न मह्वास क उनका टूटना जा घर बन चके थे जिस सुम्बी भविष्य की कल्पना की जा चुकी थी उसका मिट जाना कितना अधिक दुखात एव असफर सामाजिक्ता का प्रतीक हो सकता है इसरा कल्पना कर सकना कठिन है। फिर भी यह हो रहा है और इसकी वद्धि भी होती जा रही है। इम कारण जनेक हो सकते हैं। वाई कुछ कहता है और काई कुछ और। आज का प्रगतिवाद मगाई उद्दण्डता स्वाथ आदि अनेक कारण प्रस्तुत किए जाते हैं । परतु वास्तव म कोई भी यक्ति साधारणतया ऐस बने हुए सम्पक तथा सम्बध को तोटना नहीं चाहता। यथाथ म सका कारण यक्तिगत मनायाग की असमानता ही है। सामयिक भावन उद्वग की परिस्थिति म तर प्रवा नहीं कर पाता।रोग भूल जाते है कि विवाह के प्रथम उल्लास एव रोमाध के उपरान्त दनिक जावन का साधारण नित्यत्रम प्रारम्भ होता है इसम दा यक्तिया का पारस्परिक सम्बध बन ही निक्ट हा जाता है दो यविनया का निजी अपनापन मिट जाता है पथक जीवन नही रहता तया दोना व्यक्तिया का निजा रुचि रझान स्पप्ट हार सामने आन रगता है। पति रम प्रभार कदा प्रक्रिया के स्वभाव की यथाथ वास्तविनाए एप विपनाए विवार ६ मम्ब घर पूर्व उना मामन ना जाए जिनम विपरीतताये भण प्रधान हा तो मम्भवत व विवाह व मगध प्रारम्भिक उद्धग मिट जाए और जागे जानवार विदक वष्ट उत्पननशन पाए । एक यक्ति स्वभाव म बहुत मयुक्त है मिन ययी है अल्पभाषी है मावधान है और पुगन रीति रिवाजा व अनुसार यवतराचित आचरण करने वाग है । उमका सम्द च एव म व्यक्ति म हा जा कि स्वभाव स उस विपरीत भावन धचर माग अपन्ययी बग्भापी है जिसर स्वभाव म प्रटानी प्रबत्ति अधिर और माश्याना का कम अपयाप्त है। इस प्रकार साझदारी अवगुण दनिक जावन म गाघ्र हा प्रगत हान -गंग और स्तिनी भी सहगीरता १२२ हस्तलिपि विज्ञान धय एव मौज यता इस विषय म पर्याप्त नहीं हागो। य मूर विभिनताएं मना ही वष्टकारक रहगी। दूसरा व्यक्ति अपन सहज स्वभाव से समाज प्रिय है अपन टनिक जीवन म यवहार-युगल है उमर महगामी का यावरण यनि दम विपगत मकपन का हो और जिसको अय यक्लिया स ममाज म मिलना जुग्ना प्रिय न हा तो जीवन सन्ज हा भारी हो जाएगा और स्वाभाविक विपगनता वारी ही मान सिक पान उत्पन हो जाएगी। इस प्रकार के अनवानर कारण हैं । लियावर म अनमुखी वहिमुपी नथा भावुकता, मानसिकता प्रधान विचारधारा उतारता वृपणता अपभाषण तथा बहुभाषण आनि लिलावद चिह्ना द्वारा सहन हा भाव व्यक्त हाना है । "न चिह्ना का पहचानना तया इनका विहा भी दो गिलावटा म मामजन्य एव विभि न्नता दवना कटिन नदी है। समाज म एस सन्नगीर एव चीर व्यक्तिगत मामय्य व उनारायण मिलते हैं जो जीवन के विविध कारणा स कितना भी मानमिर विपरात आचा होते हुए भी अपना गुजारा करते हैं । परतु एम उदाहरण कम हैं । बहुत-म घरा म स्वाभाविक विपरीतता व कारण आग्नि झगडे होते रहत हैं। इस प्रकार व उनाहरणाम जी दाना व्यक्तियामा विवचन स्पष्ट हो जाता है तो कुछ सम्भावना इम प्रभार की हा जाता है कि य दाना व्यक्ति अपन दृष्टिकाण म स्वयट हात हुए भी अपन रक्ष्य की एकता को ध्यान म रखत हुए, अपन दनिक जीवन आचरण म सन्नीरता व्यवहार स अधिकाधिक मुगम मोजमता प्राप्न पर। इसम वाम्नविर यक्तिगत तथ्याना विपण उनी स्वच्या स्वीकृति गहनवितन अमरिश्वाम उत्तरदायित्व की उच्च भावना तथा रातियुक्न माचण प्ररय तत्व हैं। व्यक्तिगत मनायाग मम प्रकार नयो हाना अथवा उनी अनुपस्थिति रिसाव ग्वन प्रगिताव प्रस्तुत करती हैं। हस्तलिपि विमान उपयोग मनोवज्ञानिक याख्याताआ ने अपन सुमयोजिन अध्ययना में किया है। टनका कथन है कि जीवन के सुख सतोष और गाति का प्राप्ति के लिए तथा आटग मह योगी की प्राप्ति के लिए गहरे चि नन एव छानबीन की आवश्यकता है और इमम स्वाभाविक समवय की समझदारी प्राप्त करने के लिए रिखावट का सहज मनो वनानिक अध्ययन पयाप्त सहायता प्रदान कर सकता है। एसे अनेकानेक निविधा जनक प्रश्न हैं जोकि लिखावट के माध्यम में मन ही स्पप्ट हा जात है। विवाह विच्छेट के वारणा के विषय म गिरर असन या विवेचन बहुत ही यथाथ एव विचारग्राही है। जादो यक्ति भी विवाह मून मे बघ गय थ, उनका पथक हाना जो वचा रिय गए य जीवनपय त सहवास के उनका टूटना, जा घर वन चक थे जिस सुखी भविष्य की कल्पना की जा चुकी थी उसका मिट जाना किनना अधिक दु खान एव सफल मामाजिक्ता का प्रतीक हो सकता है टमका कल्पना कर सकना कठिन है। फिर भी यह हो रहा है और "सकी वद्धि भा होती जा रही है। इसके कारण जनेक हा सकते हैं। कोई कुछ कहता है और कोई कुछ और। आज का प्रगतिवाद मगाई उद्दप-ता स्वाथ आदि अनेक कारण प्रस्तुत किए जाते हैं । परतु वास्तव म कोई भी यक्ति माधारणतया ऐस बने हुए सम्पक तथा सम्बव को तोरना नहीं चाहता। यथाथ म इसका कारण यक्तिगत मनोयोग की असमानता ही है। सामयिक भावक उद्वग की परिस्थिति म तक प्रवा नहीं कर पाता । लोग भूल जाते हैं कि विवाह के प्रथम उल् स एव रोमाच व उपरान्त दनिक जावन का माधारण नित्यक्रम प्रारम्भ हाता है इसम दो पक्तिया का पारस्परिक सम्बध बहुत ही निक्ट हा जाता है दो यक्तियों का निजा अपनापन मिट जाता है पथक जीवन नहीं रहता तथा दाना यसिया की निजा रचि रझान स्पष्ट हाकर सामने आन रगती है। यदि इस प्रकार के दो पस्तिया स्वभाव की यथाय वास्तविकताए एव विगपताए विवाह के सम्बध के पूर्व उना सामन ना जाए जिनम विपरीतता के लमण प्रधान हा तो मम्भवन व विवाह ६ मम्बघ क प्रारम्भिर उग मिट जाएँ और आगे जानवार विच्दर व व उत्पन न न पाए। एक “यक्ति स्वभाव म बहुत मयुक्त है मिन ययी है अल्पभाषा है सावधान है जोर पुरान रीति रिवाजा क अनुसार व्यवहाराचिन आचरण करने वाग है। उमका मम्बध एक म व्यक्ति सहा जामि स्वभाव स उसक विपरीत भावर चचर माग अपन्ययो वभाषा है जिसके स्वभाव म प्रगान की प्रत्ति अधिर और मावघाना का म अपयाप्त है। इस प्रकार क साझदारी के अवगुण दनिर सावन म शाघ्र हा प्रगित हान रगग और कितनी भी सहनशीलता १२२ हस्तलिपि विज्ञान घय एव सौज यता इस विषय में पर्याप्त नहीं होगी। य मूर विभिनताएं सदा ही कप्यारक रहेंगी। दूमरा व्यक्ति अपने सहज स्वभाव से समाज प्रिय है अपन दनिय जीवन म व्यवहार कुगर है उमर सहगामी का माचरण यनि दसक विपरात अपन का हा और जिमको अय यक्तिया स ममाज म मिलना जुग्ना प्रिय न हा तो जावन महज हा भारा हो जाएगा और स्वाभाविक विपरीतता के कारण गीघ्र ही मान मित्र थकान उतान हो जाएगी। इस प्रकार के बनानक कारण हैं। लिखावट म अतमुखी वहिमुगी नया भावक्ता, मानमिक्ता प्रधान विचारधारा उतारता कृपणता जल्पभाषण तया बहुभाषण आनिक शिवावट व चिह्ना ग मन हा भाव व्यक्त हाता है। इन चिह्ना को पहचानना तया इनका विहा भी दा रिसावटा म मामजस्य एव विभि लता दखना करिन नहा है। समाज म एम महनगीर एव चीर व्यक्तिगत सामय्य के उदाहरण मिरत हैं जो जीवन के विविध कारणा स क्तिना भा मानमिव विपरीत आचरण हाते हुए भी अपना गुजारा कर रते हैं। परतु एम उदाहरण कम हैं । वहुत-म घरा म स्वामाविर विपरीतता के कारण आएदिन झगड़े होते रहत हैं। इस प्रकार के उदाहरणा म जाति नाना यक्तिया का विवचन स्पष्ट हो जाता है तो कुछ सम्भावना इस प्रकार की हो जाती है कि य दोना व्यक्ति अपने दृपियाण म स्व रद होत हुए भी अपने रदय की एकता का ध्यान म रखने हा अपन दनिक जीवन क आचरण म सग्नगीना व व्यवहार स अधिकाधिक मुगम मौज यता प्राप्त कर। इसम वास्तविर यक्तिगत तय्या का विपण उनकी स्वछ- स्वीकृति गहनचितन आगम विश्वाम उत्तरदायित्व की उच्च भावना नया रीतियुक्न आवरण प्ररव तत्त्व हैं। व्यक्तिगत मनायाग म स प्रकार चमूर तत्त्वा का होना अथवा उनी अनुपस्थिति रिसाव स्वत प्रगित एव प्रस्तुत करता हैं। एस्तलिपि विज्ञान से उपयोग १२३ १० विविध लिखावटे इस अध्याय म हम एस विगिप्ट यक्तिया की लिखावटा का विवचन करेंगे जिनको हमन देखा है अथवा जिनक विषय म हमन सुना या पटा है। इमम हमारा लक्ष्य लिखावट व आवश्यक तत्त्वाका पवानना एकल करना तथा उनके मनोवनानिक महत्त्व को रखक के यक्तित्व स सम्बधित बरना है रिखावट एव व्यक्तिगत चरित म समानता स्थापित करना है। प्रत्यक लिपि की पूर्व निर्धारित धणमाला तथा उस रूप दने की नि िचत विधि है। प्रत्यर "यक्ति न अक्षरा तथा रिखने की विधि को अपनी निजी गली में क्रियान्वित करता है । यह उमकी अपनी मौरिक्ता है । रिखावट म मूल तत्त्व हैं जसे निम्पिने का कोरा स्यान रखनी स्याही का मात्रा एव प्रकार रेसाए अग्रगामी अधोगामी मीधी गागकार आधार रेखा ऊपर अथवा नाच तथा अना छोट चिह्न जम पि मात्राए पिट विमग विराम तथा उनकी गति प्रमार अवराध आदि । “सा प्रकार व्यक्तित्व के स्थायी रक्षण हैं प्रयक यक्ति की जीवन भक्ति भावुकता बुद्धि प्रभावग्राहिता प्रभावीरता रुचि रझान आदि।दना आन्तरिक प्ररणाम यक्ति वा नियागीरता कल्पना प्रगान मामाजिकता कात्मवता यक्त हात हैं । दना सुनियोजित सयम स नम स्थायित्व प्रसरता प्रौटता आत्मविश्वास गन क्षमता दाता उतारता आदि अनकाना व्यक्तिगत रक्षण प्राप्त हात तथा व्यक्त होत हैं जिनक समान नाचरण स व्यक्तिगत स्वभाव मनावग प्रगति आदि चरिम व लसण विरमित होते हैं जिन द्वारा प्रया व्यक्ति निजा आचरण एव कृतित्व स सम्मानित हाता है। एर साधारण व्यक्ति वास्तव म अपनी गागरिव एव वौद्धिक विनया का माधारण एव मामित प्रयाग करता है। विवामित एव सपः पतिरव इसस कही आग है । व अपना गक्तिया वा वारतत्पिता का साज करता है तथा गगन पग्यिम धय मात्वरितामा म आग वरना । अपनी अतवर्ती गस्ति या विकास करता है त अनित गारीरिक मानसिक व भावुक प्रवत्तिया का मान मुसयमित एव मुनियाजित करता रहता है। चिर३१ गुरुत्व की रेष शिपि उन+ सौम्य व्यक्तित्व की चित्रवन् आत्मा है चेतन, गम्भीर क्लात्मक, सम्पूर्ण सुसंस्कृत तथा महन मजनात्मक । उनकी चमुसी प्रतिमा व अनिवाय गुण जस कि प्रा स तुरन, महन्यता सहानुभूति गातभाव ग्विावर समाधार ययाचिन मम प्रवाह गालाकार रेखाए उनका विस्तार रखनी की समस्पता म निहित हैं। इस प्रकार की सम्पूर्ण और भरी हुइ लिवावर म सहज सावधानी पूर्व निर्धारण औपचारिक्ता निपुणता आत्मविश्वास सर्वांगीण विकास, मत्री का भावना बलात्मवता अपन बाद विचार व्यक्त करने की सुगमता आनि अनेका नर पुष्ट रक्षण व्यक्त हान हैं। महान् माहित्यकार की हनिपि एव हम्नाभर समान सीध और स्पष्ट हैं। न दोना के आधार म समानता है। आम्बर नहीं है। इसा प्रकार में इनके सम्पूण वृति व म स्पष्ट रचनात्मकता है आत्मीयता है आत्माभिमान नहीं है। पायाजाका स्मति एक महान् परम वेग है, सरव्यापी है प्रभावपाली है। हम सब इसका अनुभव करत हैं । व्यक्त करना कठिन है भाषा का मामय्य के थाहर है। सरिपि प्रस्तुत है । रेवनी की गरिमा और उसका प्रवाह अद्भुत है। इसम आत्मविश्वास की दृढता नतिक्ता पूति प्रियागीलता हठ मानवीयता स्पष्ट है। सम्पूण लिखावर मे चिनिनधारा एक है एक ही रक्ष्य है। एव हा आण है । सशप नहीं है । बाधा नहीं है । कोई अवराधर चिह्न नहीं है। अपना रक्ष्य प्राप्त करत क लिएकप गहन बरन की आरिवपित है। कठिनाइयो पर विजय पान के रिएक्सिामा प्रकार का त्याग करने की क्षमता है । अपन विचार स्वच्छ नापूर ध्यान करने की निर्भीकता है। सम्पूर्ण लियावर माशापान्त मुसगठिन है। यह सफर आयोजक का प्रतीर है। विविध रिसाद
भाई 11
14 मत मिलता है
और राकानस भी
मारा के में
रोज आध घटा रामायण
eacाहूं। तीन से
Paiu की पुस्तक पता
हाजोसंग चल रहा
सोलापता ही है और
शनि का आरकिया
है अपनी चलती
मेशतो आपको
3.gaia
पर है
ar
५-३:३८
m4401
nirma
सिर ३२
जिना माहब का रियावर श्रमयुक्त है प्रगतिशील है और स्पष्ट है। यह
विधिवत् लिलावर प्रतिमाशी नाविरता चिन्ननगारखा औपचारिक जाचरण
हस्तलिपि विज्ञान
वीप्रतीक है।
मरिगावट म दो विल प्रधान है। पहा, हस्ताक्षर के अन्त का असर
पूरा गुद बना हुआ और उसका अय अपरा स बगहाना । अविम्नीण सकरी
लिखावट म जिमम नि अक्षर एक्ट्रमरे मे मिरा और पाम पाम वन हाते हैं
और जिमका प्रभाव सनकना, गापनायना, वुद्धि प्रधान चतुरता एव अवराध वा
है एम अतिम अक्षर की स्पष्टता अद्भुन है । मका अय है वि लिपि-रमक अपनी
रगनम हटता स अन्त तक लगा रन अपने वाय की माता के प्रयाम म सत्व
क्रियाशील रह। रमन साथ ही इमम आत्म प्रदान की भावना भी अनिवायत
निहित है।
ha Jannah
1572147
चित्र ३३
दूमरा चिह्न हम्नायर व प्रथम अथर का आदि भाग है। इसम म अक्षर
को प्रारम्भ करन वारी रखा एक गागार मुम्बर द आरनि बनाता है। इसका
तात्पय मा पहर चिह्न के समान है। यह बात्म अभिमान एव गापनीयता का
रमण प्रस्तुत करता है । रिपि.खक अपन व्यक्तिगत विचार का व्यक्त नहीं करना
चाह्ना । सावधाना तवयक्त है एव पापान-महित नीतियुक्त है।
पोर MAYS
लम
Ans = पात्र है।
मपी
song
नित्र ३४
आचाय महावीर प्रमात विजा वाद लिपि अद्मन मघाप्रपा
गगन एव नाव वा स्वाभाविक भावना का मजाव उरण
लिखावर द सीध एम्यावार सरे हए अगर तीबगनि म गुद्ध पण
अनगना वहा यावार आदि अनर चिह्नमग्नता, निर्मापार प्रवत्ति माह
आमविश्वाम, विविधता पता गन्तव्यता वात्मसयम नातियुक्त निणय
विविध लिवाव?
१२७
निष्पक्षता आदि प्रर क्षण यन करते हैं। उपर से नीच की ओर आ। बाला भारी तथा लम्बा पाइयो निश्चयात्मक हठीलापन स्वा प्रकृति तथा अटूर प्रम गस्ति वी द्योता हैं। ग्विीजी की रिसावरम गिगरेसात्रा का अशरा साय मिन हुए अग्रमर होना प्रभावणारी रमण है। यह स्वाभाविक चितनधारा के प्रवाह म नौतियक्त अपराध का चिह्न है। सामना एव जागरुकता प्रगित करता है। यह पूर्व परिचित आटा नियमा का पाग्न करना है, प्रगति म भी नका न त्यागने का प्रत्ति है नया इनक मा यम से अपना प्रगतिवाना स्वरता को स्प देना है । यह प्रचरित एव नवान विचार का सतुरित सम वय है मानसिक चातुम का प्रतीक है । इस सयम नियम के हर विश्वास एव आधार को मानते हुए निवरीजा न अपनी नवीनता का स्पष्ट दिया । यह सफल हुआ नात्मिर अभिरुचि लगन जयक परि सम त्याग एव साधना के कारण। एक नवीन युग वा सजन हुआ। हस्ताभर में प्रथम अपर म एव द्वितीय जवर प्र' क उपरात वितुक स्थान पर छाटे वत्ती के चिह्न बने हैं। य पुन स्पष्टता पर जोर देने के स्मारक हैं । इनके यक्तिगत कृतित्व म भा समान आचरण है स्पष्ट करना तथा पुन स्पष्ट करना । यह एक ऐमी नतिर शक्ति है जा निश्चित एव गतव्यता की सफलता को श्य करती है उसकी प्राप्ति का पुन स्पष्टीकरण चाहती है। अधार एव अनेक रेयाआ का वगयुक्त एव कोणाकार होना स्वाभाविक अधीरता यक्त करत हैं । मम रीतियुक्त तामिता अधिक मानसिकता परिश्रम ही एव उनस्वभाव आलाचना तथा तुरन्त निणय लेन की विशपता है । प्रतिकूल परिस्थिति का निर्भीकता म मुवाबत्रा करना सहज गुण है । Zasan russin चित्र ३८ जाकिर हमा मान का व्यक्तिव गम्भीर चिन्तनगी एव अनमपी है । गहन गम्भार गान्त विवचन तया निष्पाता दना मगन् पथ प्रदार गुण हैं। इनर हम्नागर के अनकानक भूम अमर सम तथा रोनियुक्त मिवर अग्रसर हात हुए इनकी अनवी मूम दृष्टि आगचनामा तक तया नोनियुस्त आचरण व्यात करताना नान एव क्रियाशीना वाक्षत्र वन्द है। परन्तु उमम लगन का वास्तविकता तथा एकाग्रता अधिक तया प्रानकारिता कम है। जो कुछ १२८ हस्तलिपि विज्ञान - व करत हैं उसम मूरतस्य मदभावना है उच्च आदा है तथा रक्ष्य प्राप्त पग्न की गति है । उमम गात भाव है वास्तविकता है भागम्बर नहा है। मम्भव है कि इनकी नानिप्रियता म कुछ दानिक-नित्रिमता कामास का धावा हो और एमा प्रनीहि दि इनरो मामारिक्ता स अरगाव हा गया है। परन्तु वाम्नविकता रमस निलान्न विपगत है जमा कि इन हस्ताक्षर की रचना एव गति प्रस्तुत करता है । १० जाकिर हमन की रिखावट उना वास्तविक अनमन की शुद्ध प्रतिच्याया है। यह वनुत हा सच मत्रिय मनक है । शारीरिक मानमिव एव भावात्मक म्फूति है। हम्ना र व पहर दोना अगर ज एव ह काफी बडे और परे हुए हैं। यह अन्नमन को विशारता है जो मप यापी है और वह क्षत्र में फरी हुई । ना ध्यान का प्रसार भी बहुत पग हुआ है। कोई बात सी नहीं होगी जो "नकी दृष्टि म न आ जाए। कार्द विषय ऐसा नहीं होगा जो "नम छुट गया हो । विगपता यह है कि पियानोरता म य मव एकाग्र हा जात हैं नया गत प प्राप्त करन म एकचिन हा जान हैं। हम्नाभर के नीच बनी हुई म्पट व निणयात्मर मीधा रखा म दनक पतव्य की निणयात्मक शक्ति है । वहन हा निष्पक्ष होकर गान चिनन स अपना य एक बार निधारित करना तथा उमका गतिप्रियता म गगन म मह्याग म प्राप्त वरन म रग रहना हा इनर पस्तित्व की महानना है। गष्ट्र की नीति एव उम मचान का भार इन गम्भीर वास्तविक मृजनामा एव गान्तिप्रिय व्यक्तित्व म सुरक्षित है। यह एसी सतुरित गरिमा है जिममा प्रभाव मवन्यापी है मपप्रिय नै मवमा य है । इनकी म्वाभावित मधुरता म गावित है। Catara Her- - चित्र३६ मह गिवावर सर मम असरा स बनी है। कामल और मष्ट बनावही गिरोरया भी बनी है। स्वभाव म महज मरग्ना मधुरता मवेदन नाता मन्योग एव मत्री की भावना मारि अनर पामर मानधीय गुण व्यक्त हैं। रवि रझान में विविधता है। व्यक्तिगत जीवन व विमिन क्षत्रा मनवा ध्यान आवपित है। भावुकना पर मम्निम की प्रधानता है । दरिए अपर चुट पीये की आर तय हुए प्रतीत हात हैं। यह अवगध स्वाभाविक है। परतु भारी और म्म विषय मस्निप्न मानीन ही थमा दन। इनम सनर रहना है दूर रहना है। अपने - विविध लिखाव १२६ वास्तविक विचार एव भावना का अपने तक ही मोमिन रपना है। उनका प्रपन करना उचित नहा है। सहज और सुखद विषय आर्पित करते हैं जिनसे सहानुभूति का सामा जिक सुख प्राप्त होता है । जीवन को सुखद क्लाभक्ता सुलर वस्तुभो का सचय बार एव स्त्रियोचित आचरण म आक्षण स्वाभाविक है प्राकृतिक वस्तुआ स प्रम है-अछा घर वच्च और यक्तिगत जीवन महज 7 पण है छोटो कोमल एव गोकार लिखावट की रसाआ का। आलोचना प्रिय नहीं है उत्साह निष्क्रिय करने वारी है प्रतिक्रियामर है सामाजिक प्रो माहन की जावश्यक्ता है अतिम अग्रगामी रेखा स्पष्ट है । यह अपना निणयमूचक चिह्न है जोकि निश्चित है और निश्चय ही स्वरक्षा की भावना स्पष्ट यवन करती है। R-782 Deedrande (लान बहादुर) (Lal Bahadur) पित्र ३७ दोनो हस्ताक्षरो की रचना रेवाए प्रमार आदि ममान है। छोटे नन गोलाकार अक्षर है । गातभाव अल्पभाषण मृदभाषण महानुभूतिपूर्ण मद् यवहार मत्री की भावना मानवता की मूर्ति सहृदय दया। टोना हस्तारो की रेखाए अधिकाग मिगे जुला हैं तथा प्रगतिशीर वग म * । अतिम रमाए आग वी आर बनी हुई हैं । य- क्रियाशीलता है। उत्साही आग बढकर काम करन वारा मत्व समान गत भाव मानमिक मतुरन रखने वार जिनामु रीनियुक्त जया परिसम बरनवार निष्पा परतु मदव टूमरे यविनया नया परिस्थितिया को समयन म चितनगर । जसरोक मम आवार स अधिक ऊपर-नीच को रखाओम प्रस्तार नहीं है । अग्रजी तथा हिन्दी ६ मब जभर समान आवशरम छर । व्यक्तिगत वियागीरता निक्ट परिस्थिति पर वेरित है। भावुक क पना विवचन जिसरी नितान्त नाव यवना है उसमे आग नहीं है । स्फूर्ति उम काम म गी है जा अभी हाथ म है। रसरियावर म एक लिपि विपा है। मह है रेखनी का मालकार म चरना गार मुखदर गांठे बनाना । यह अवराध अतमसी व्यक्तित्व का एक प्रधान चिह्न है। महज मामाव उगर चित्त होन हुए भी कामर स्वभाव होते हुए ना गाम्बाजी व मन का थाह पा रना अमाभव है । न एस जनक विचार एव भावनाआता जिनरावर वास्तव म यस ना करना चाग्त व्यक्त करेंग। हस्तरिपि विज्ञान उतना हा मापण करेंगे उतना ही प्रगक आचरण करेंगे जितना कि नितान्त आवश्यर है। Erindes ख माह्व क हम्नाशर म बना रमाए हैं प्रगतिवारी हैं और निणया भक तर रवाना है। मम उमा है सावन गावित है म्फूर्ति है। इस प्रगनिशाल शिपि राव म नावन याग्य चिह्न अवराघव चिह है ताकि बना हैं । मबम पहर आनि म कम-म-बम नान गार चक्कर हैं यह मावना कि आग बनें अभा अथवा कुछ ठहरकर । अथर पौदे को आर या टए हैं यह दूसरा चिह्न है मुरथा की भावना एव गमायुक्न चिनन । अन्न की रमा वाद भार घूमता है। त' रेमा यद्यपि मीधा है इनम गरिमा नग है बौर "माा भी अन्न भाग पाद की ओर घूमता है। य अना लथण मज प्रयाक प्रगति म्फूर्ति यानिमियागोर नाचरण विपद हैं तथा इनम मनावनारि बाचरण रिपि रबर उन्नमन म निहित है ठिप हुए हैं। यह व्यक्ति व क विपरात रमणा सगम का नाहरण है जिमम महन गति का प्रगान है वास्तविकता गुप्त भावना म्पायचिन्नन एव स्वाय माधन का है। रामा।। २/मी चित्र यह रिपि-रम म्वन प्रयत्न है । व्यक्तिव मा म्वत व्यम्यान है। लिपि-लय का प्रयम प्रभाव एव आपण अशरा का वा आकार है। यह अत्यधिक जावा गति का परिचय है। हमम ययधिक म्पूनि ह मत्रियता है। सम क्रियाभत्र विगा है। आत्म विश्वास है, निर्भीरता है उद्याग है, अना मार ध्यान दन वा वत्ति एव क्षमता है। गति प्रगित । यह गति का परिचय है भावुन आवेग है। स्थिरता है दृढना है । यह माक्त भावना का मतुति रवन का मानमिरहता है । कुछ आया आर यवान हान म मिना का प्रभाव पान होता है। मिर- बायरों म बागका रेलामा मात्राओं व निगरवाआ का मन्तुग्ति मामन्नम्य विषय सामजस्य प्रमा बुद्धि तत्परता प्रगाव है। रियावर आद्यापान सम्पूण एव विविध हिसाब ३.
सुसस्कृत है। यह नियात्मा क्षमता है तथा व्यक्तिव को नतिक्ता एव गुन्ता है। बने अक्षर द्रतगामा सतुरित आगे की ओर याने हुए मि* जुर स्पप एव मम्मूणता के लिपि चिह्ना का याग एक बहुत ही स्वस्थ यक्तित्व प्रस्तुत करत हैं। सम प्रतिभा चमखो है विचार स्वच्छत हैं काय गली स्वतन है नवीनता है यक्तीकरण स्वतन एव स्पष्ट है । इस प्रकार के महान् यक्ति विभिन परिस्थितिया की वास्तविक्ता तुरल समय 'ते हैं । उचित-अनुचित आवश्यक अनावश्यक का निणय स्वत एव तुरन्त कर सकते हैं। अपने विचार गुद्धता निष्पक्षता एव विश्वास से यात करने की क्षमता रखते हैं। समाज में इनका मोयाग सहानुभूति उतारता मित्रता की भावना का रहता है । शक्ति प्रग्क है । कुछ-न-कुछ अवश्य करते रहते हैं। जनका नक काय एर साय ही हाथ म लिए रहत है। इनके अ य गुण उत्साह प्रसन्नचित्त मिस्नसारी भविष्य को सुखात्मक आशावादी कल्पना मानवता के सद्गुणा की कल्पना एव उमम विश्वास विश्वामी प्रकृति का सीधापन आदि हैं। एक नितान्न अपरिचिन भी इनके पास पूण स्वत ता तथा आत्मविश्वास से पहुच सकता है और उस निरागा नहा हागी। एस शुद्ध एव स्वय पूण यक्तित्व व दान कम हाते हैं । २०३५4- दिर चिन४ यह महानुभाव मानवना व आता हैं । कोमत खस हुए अक्षर आपस म सुचि एव स्व छल्ना स मित्र-जुर एव जममर हात हुए टन शुद्ध विगार- हृदय प्रेरणा सनियता सहन रक्षण हैं। यह लिखावट मरः एव इमकी रचना प्रवाह्युक्त है। व्यक्तित्व भी यापा है । सक्रियता सामानिकता प्रवाह आदि यक्तिगत रसण उत्साह लगन एव सवहित के कार्यो म ग रहन की प्ररणा देत हैं। एम यक्ति कभी पुरमत म नहीं रहते । अनेकानेक काय उन हाय म रहते हैं । त्रियागीता नका विगप गुण है। रोगास मिलना जुग्ना उनकी समस्या को समझना तथा तत्सम्बधी कार्यों को सम्पन्न करना व्यक्तिगत वत्ति है। हरिपि विनान के प्रारम्भिर वाठ म मुझ इनमें दान करने तथा ना निक मम्पक में बान का अवसर प्राप्त हुआ था। उन गिना यह भारतीय भविमान क मरम्य य तया ममूरी म थ। कुछ अवबागम थे। मैं उन दिनो विविध नप्पिया का सवय कर रहा था। १९४८ का समय था । आपम मिन्ने मग्निानगर। १३२ हस्तलिपि विज्ञान तव से बातचीत करना कठिन था। आपका स्वभाव एव नान विरक्षण है। नवानना का प्रामाहन दत। दानिक तत्त्वनानी भी हैं। मन म्वच्छन्दता पूण मलिपि का उारण प्राप्त हा गया । भाग्यवा उनर साथ ही डा० वार कृष्ण सार भी ठहर हए थे। उन दान तो नी हा सके। परनु उनको भी रिखावट निवाकरजा व आग्रह से प्राप्त हा गर्द । दिवाकरजा का मानव पर विकमित एव श्रठ है उनकी महानुभूति शुद्ध सहृत्य एदयापक है। सामाजिर ननत्व का प्रतिपादन इनके यक्तिगा म्वभाव में है। चित्र ४१ डा० नगद प्रसिद्ध समागेचा हैं। उनकी सूक्ष्म दृष्टि गम्भीरता विचारामवता एव रिमक्ता मुप्रसिद्ध है और मनावज्ञानिक दृष्टिकोण से यह स्वत सिद्ध है। रिपि-लेन छोटा और सक्षिप्त है देखिए उमरा उाहरण । इसम मूक्ष्म दपि अवेषण तकनीता एकाग्रता एव निणयात्मक निश्चय है। भावुर उन्मा पर प्रतिवध है। विचार चिन्तन गम्भीर मयत और प्राट हैं जस विस्वलिखित हस्तावर हैं। अन्तिम रेसा जानि हरियागार वाफा रम्बी है और नोच तक चरी गई है, स्वत तास मा म प्रशान-मूचर यक्त होती है। परन्तु वास्तव म रमवा मना वमानिस प्रवा- इस ग्विावट म उल्टा है। नगेद्रजी वा म्बभाव शुद्ध अन्लमुखी है। प्रान की यत्ति इसम है नहीं । यह रमा एर एमा चिह्न है विचारक कपिए उनसे मिग्न वार अन्य व्यक्ति करिए कि इसस याग कुछ मन वहा । नगे द्रजी पारा बगे स्पट वा परन्नु मही नातियुक्त और गैनियुक्त कहेंगे। उनके विचार मूम पने स्पप एव सम्पूण हैं । राना विषय म जा भी मुनन तथा पढने म माता है उसम उनरे स्वर्गीय पिता नयाहरगर नम का उल्गव अवश्य हाता है। उनके व्यक्तित्व यी छाप उनके स्वभाव की छाया, प्रभाव पारिरक्षणा का विवरण दिया जाता वियिय रिवायटें है इंदिराजा के यक्तित्व के विषय म । यह एक तुलनात्मक विवरण होता है, जबकि यह सत्य है कि श्रद्धय पन्तिजी के महान् सवव्यापा व्यक्तित्व की छाया उसका प्रभाव इटिराजा के यक्तिव पर होना अनिवाय एव उचित है। यह इनिराजी क निजी यक्तित्व के प्रतिपादन, निस्पण के रिए पाययुक्त नहीं है । श्रद्धय पडितजी एक महान् जात्मा थे। उनका प्रभाव सरव्यापी था। ममार के अनेकानेक सत्रिय व्यक्ति उनस प्रभावित हैं । परन्तु दिराजी का पक्तित्व जिसमे समाज सहज सम्बायत है अपना निजी है यक्तिगत है स्पष्ट है तथा पयाप्त है। Indus fanda चित्र ४२ इदिराजी क यक्तित्व का निरूपण हम उनको लेख लिपि में पयाप्त मामा म पात हैं। इटिराजी का यक्तित्व शुद्ध है स्पष्ट है स्थिर है स्वय पूर्ण है तथा प्रभावशाली है। छोटे आकार वे सीध अक्षर विदु जाति चिह्न ययास्थान मुखबर तथा गोलाकार रेखाए अन्लमुखी प्रवत्ति के युद्ध विह्न हैं । इनम पिसी प्रकार का उद्ग प्रदान की भावना तथा अतिरिक्त यक्तीकरण नहीं है। रिखावट स्थिर है प्रोट जमी हुई है अक्षर स्वावलम्बी सीध सरे। प्रगति स्वाभाविर है । तो वे बीच रिस्त स्थान अधिर है गोम अशरा का सयमित प्रतिपादन है। स्पष्ट है कि राजा अपने यक्तित्व म आत्मविश्वासी है स्वतत्र हैं और त्रियात्मर हैं। जिनामु है छानपान करना चाहती हैं। वास्तमिता को समझना तथा उस अनुमार निप्प काय वरना अपना स्वतत्र निणय ना ना स्वाभाविन गुण है । वह सना ही साफ बात करेंगी। उनम चतुरता नहीं है । स्पष्ट बागी। जमकर काम करेंगा। अपना उत्तरदायिव नतिरता और पूरी तरह से समझेंगी एव सम्मान करेंगा । उनका विपण म्वावलम्ब है निप्पलता है त्रियाणालता है आग्घर नहा निरयर मापण नहा है मिदाता पर अटर रहना है। नमी स्वतत्र मुनियामित मुमस्त एव साप्त ग्विावर घमा माती है। उनर प्रधानमत्री हान व विषय म आलोचना की जाना है कि उनम युद्धि धानुप नहीं है। यह कहना अधिक उचित है कि उनम गियावा नहा है । यह भी रहा जाता है कि नम अपन पूर्ववर्ती प्रधानमत्रा का पति उत्माह, पहुच एस्तलिपि विज्ञान प्रवरता एव निर्भीकता की कमी है । इस प्रकार की समानता उचित नहीं है। पडितजी म जितनी वास्तविक शक्ति थी उसम अधिक उसकी प्रानकारिता थी। वह यक्न बरन अभ्यामी 4 तया अपन उत्माह में कही भी पहुंचकर अपना प्रभाव पगित बरते थे । यह एक युक्ति है । परतु मपर यक्तित्व एव नतृव की केवर यही एक युक्ति नहीं है। सरग्नता ययाथना गैश्विता तथा प्रतिपादन को त्तिया भी इसी प्रकार की दूसरी युक्तिया हैं जो कि मफल नतृत्व वे माग की अग्रगण्य विनपताएं Total चित्र ४३ मारारजा देनाइने अपनी मामय्य वायक्षमता एव सरग्नता का कचा म्तर स्थापित कर लिया है। यह नई बात नहीं है। उनके प्रारम्भिा जीवन स ही इस प्रारक निपुणता के गुण प्रतशित हैं। मम अधिक इनका आत्मविश्वास है जा निश्चित एव सबल है। यह आगजीवी हैं। जीवन म अपना आता एक ही बार म्यापित हाना है । उमा उपरान्त के आचरण अनुकरण करते हैं। लिपि-लेख म रखनी पर दवाव अधिक अग्रगामा रेखाएँ स्वच्छ एव मुविस्तृत यडे अपर मानाए ऊषा और सम्बो स्पष्ट और मोधी ना रेसा महत्त्व पूण हैं। ये स्पष्टता एवं गहनना के रक्षण हैं। व्यक्तिगत जीवन म पनि एव गरिमा के रक्षण हैं। मारारजी दसाई का व्यक्तित्व अपन म स्वतत्र वरणाली प्रेरक पक्तित्व का उदारण है । इमम आत्माभिमान है जो कि विमा भी याययुक्त क्षमतायुक्त सफर यक्तित्व म होता है परतु सामाजिक्ता एव सहयोग भी है। रिखावट का वेग एमा है जा स्वच्छ आचरण करता है और चाहता है। परतु उसका सतुलित प्रतिपादन भा है जा कि अनेकानेर परिस्थिलिया म युक्तियुक्त सहयाग भी प्राप्त कर सकता है । यहि स्वाभाविक होलापन न हो तो यक्तिगत कठिनाइया का सामना रिस प्रकार मे दिया जा सकता है परिस्थितिया पर विजय दिम प्रकार से पाई जा सकती है। टिपावट का सीधा आवार स्पपता एव स्थिरता निणयात्मक आत्मबर के प्रतीक है। इसकी शुद्धता ण्व कलात्मकता सौत्य-आरपण एवं भावात्मक सवेगनगीरता के भी स्रोत हैं। विविध लिखावट १३५ амрамі з སྟེགས་ root चित्र ४४ एक रक्ष्य क्रियागोर यावगरिक्ता तथा रमन क्सकरजी के व्यक्तित्व के सरल साधन हैं । स्वच्छ स्पष्ट साधारण अक्षर इस उदाहरण हैं । समगति चित्त की स्थिरता गातभाव गम्भीरता एव सौम्यता प्रान करती हैं। प्रत्या आचरण के छोट-से छारे रक्षणा को समयना उमका उपयाग करना तथा उमसे अपनी क्रिया गरी का पर्याप्त सम्पूणता देना क्सकरजी का विपना है। यह “यक्तित्व मुग्यत अतमुसी है चिन्तन लाल गिप्ट अल्पभापी एव व्यावहारिक । अपन काम म ध्यान लगाए रहना सहज स्वभाव है।यक्तिगत भावना रुचि रुवान आचार विचार आणि का प्रान करना इनके अन्तवर्ती मनोयोग के बाहर है। 4 विद्वान् पपिरत के विरोप गुण हैं जिसम पाण्त्यि की मात्रा महान् तथा भावुप प्रगान आडम्बर की मात्रा यूर है। Bronsoanten Hi रियारिया चित्र ४५४ पति रामच जा रिछारिया का गिरिवी स्पष्टना आगरणीय है। अयक अशा पा एव माना गुद तया मम्पूश है उपना में गति है वजन है ना है। नवा माग्म गगन नया व्यक्तिगत निणयारमा यति अपार है । जिस काम म लग जात उम पूरा कर हा छात्र हैं। उमक पीय रग ही रहत हैं । वाचा हस्तलिपि विज्ञान एर कप जमी वस्नु म 'ना परिचय ही नहीं है। किमी प्रकार का अ एवं आरम्बर नवा टूबर नहा निसग है।मरर गुद्ध मित्रता का भावना माना सामानिकता का प्रामाल एना है ! महानुभूति एव उगरना इन महान गुग हैं। माघाण निटक स्थान पर धन का निमाण रनकी नवाननाएद मान बग्ने की गति का परिचय है। मगमत्रता भा है परतु यति नरा मनावग विगड जाए ना यह अपनी जिट पर जा जान हैं तथा उम समय टनका ममय मरना करिन ही नहा दुम्माय है महिना दमोहम्नायर के उनाहरण म यत है। परन्तु जब यह वपन टूमर हस्ताक्षर की मानसिक बदम्या म आ जान हैं परिस्थिति अनुकूर हा जाती है। नियामवता अपनी वास्तविक निवना पाह ती है । उस समय इनो मनाया का सामना कर माना कठिन हो जाता है। UA (V.V. Giri) निर ४७ रमरित्रावर की मुम्ब रेग्नाए स्पष्ट है अघागामी तया अग्रगामी रवाएँ घरगाएव काफी लम्बी हैं। जीवन गति तथा नियागालता वा वाल्य है वर महल है। लियावट अगर रम्बार हात हुए कुछ मार हैं विस्ताप अधिक नग है नथा काणाकार हैं। इसम मानसिकता अधिर है भावरता भी है परन्नु आमबर म मुमयमित है। ता विवचना प्रत्यक छार-ब या पर ध्यान दना वगन स परिश्रम करना आदि नियामक स्थग म्वभाव में उग्रता निभयता पन निणय पर जम रहना आनि व्यक्तिव प्रधान पण प्रतीत होत हैं। मुम्ब रपारा वा अनर दिलाआम पना बरे वाय-पेय विनन नान एव विशारा प्रगत करता है। स्वरता मग्राम में प्राय प्रारम्भ महाश्री गिरिजी व नाव तित्व एव पक्तिगत विद्वत्ता स भारतीय जनगण परिचित है। Shera Late विष ४० प्रथम हस्ताक्षर अग्रेजाम हैं । एमा प्रवाहाता है कि हस्तागर का वास्त विर मनायाग यहा है। अन हम इसा हा मनावनानिव विश्रपण कान का विविध लिखावट प्रयाम करेंगे। समस्या कठिन है। इम लिपि रेप को बर आकार का नहा कह सकते क्यापि इसका अन्तिम भाग छोटे अभरा का है। छोग आरार भी ना कह सक्त क्याकि इसका आनि भाग वड नावार का है। फिर इमर मव अपर मिल हुए हैं। वेवर एक जगह रेवनी उठाई है सम्भवत सुगमता के लिए । अनिम अक्षर की अतरेखा आगे नहा वढती पीछे भा नहा जानी सीधी नीच की जार चरी जाती है। हिंदी म हस्ताक्षर को पूरो रेस लिपि छारे अभरा आकार की है। दोना हस्ताक्षर प्रगति म ऊपर की ओर उठन हुए हैं । दोना हस्ताक्षरा के नीचे छोटी परतु हर निश्चयात्मक तरेया बनी हुई है। वने जभर एव ऊपर उठती रिपावर उत्साह आमविश्वास स्पति के रक्षण हैं । जसा कि श्रीच हाण यक्तिगत सामाजिक जीवन म हैं प्रमनचित्त और मिलनसार । क्रियाशीलताका दृष्टिकोण भिन्न है। रसम एकाग्रता है रगन है और हरता है। किसी भी काय की योजना हाथ मरने के बाट एकाग्रता अधिकाधिय बरती जाती ह जिमम प्रचार एव प्रदान इत्ति नहा ह । और जब तक यह योजना सम्पूण न हा जाए उनका ध्यान इधर उधर विचलित नही होता। इस प्रकार के काम म तथा अपनी काय-त्ति म वह किसी प्रकार का हस्त क्षप नहीं होने देंगे। उनक मन की बात जान सक्ना कठिन ह । यह गुप्त मत्र ह सम्भवत सरदार पटेल का जाकि अपन क्तव्य के विषय म यथ एव अतिरिक्त वाट विवाद करना तथा अपनी प्रिया शरीयत करना पमद नहा करते थे। जा काम करना है उसके विषय म अधिक वान करना यथ है। जहां तक गम्भीर विपया का सम्बध है चहाणजी से रहस्याद्घाटन की आगगा नहा है। यह निश्चयात्मक है हर है। पूरी रिखावट गम्भीर एव निश्चयात्मक शलरी को प्रतीक है। विनीता, RMIRAL (सुशीला नैयर) चित्र ४६ मुगीगजा की गव रिपिस्वच्छत वह आरार की तथा स्पष्ट ह रसनी का दबाव हाका है परन्तु स्थिर है। स्वभाव म मुगालाजी सरर उमाही प्रमन्नचित्त हैं । यहिमपी प्रतिभा के स्पष्ट हैं। अनकानन परिम्यितिया में मम्पा रपन म समय हैं । समाज १३८ हस्तलिपि विज्ञान प्रिय हैं। समाज के विभिन स्तराम रोगा से मिलना जुलना उनको वात को समझना उनक लिए सहज है। क्रियाशीता म उनकी लगन पक्की है अनेस कार्यों का सचालन कर सक्ने म समथ हैं। अपने उत्माही सरल उदार स्वभाव में समाज म प्रभावशाली एव प्रिय हैं। भावुक्ता व चिह्न अधिक हैं। मनोवग सवेनगील है। विविध रिसावटा के प्रस्तुत उगहरणो से तथा उनकी मनोवनानिक समीक्षा से प्रस्तुत है कि लिपि-रेख क्वल वौद्धिक एव शारीरिक क्रिया नहा है। इसम वास्तविक मौलिकता है और यह मौलिक्ता व्यक्तिगत मनोयोग से प्रभावित हाती है तथा यह एसा सुसम्मिलित चित्र प्रस्तुत करती है जिसम लिखने वाल व्यक्ति के व्यक्तित्व के सम्पूण रक्षण प्रस्तुत एवं प्रगित रहते हैं। हस्तलिपि विनान इस लिखावट की रचना विलक्षणता एव "यक्तिगत सस्कार के माध्यम से व्यक्तिगत मनावनानिक विवेचन का प्रयास करता है। यह कितना सफर है तथा इसे कितना सफल बनाया जा सकता है यह व्यक्तिगत पापित्य प्रतिभा एव दक्षता पर निभर है। परन्तु इतना तो मानना ही पड़ता है कि लिपि-रेख एव व्यक्तित्व की सफलता स्व छ- विचार एव आचरण अथवा भाग्यपक्षी धारणा पर निर्धारित नहीं हैं। सफर रेख लिपि एव व्यक्तित्वसयम लगन दृढ निश्चय जीवन शक्ति समझ मारि रीतियुक्ल आचरण की गक्ति की साधावाफ है। मान एव विवाद में आगे ये लिपि-रखा के मनोवनानिक विग्लपण प्रगत करते हैं कि सफल व्यक्तित्व की प्राप्ति लगातार दृढ निश्चय एवं सघप स प्राप्त होती है। जिन पक्तिया की जीवन शक्ति जाग्रत तथा सुसस्कृत है वे अपनी वृत्तिया के ममुचित विकास के सकल्प म लगे ही रहते हैं जिनसे उनका अधिकाधिक नियार होता रहता है तथा उनकी क्रियागीर क्षमता, दक्षता एव व्यक्तिगत प्रतिभा म प्रगति होती रहती है । एस व्यक्ति अपने जीवन कारभ्य एक बार केंद्रित कर रेत है तथा उसके माग पर निरन्तर धय चतुरता एव निश्चया त्मक शक्ति से सगे रहार अपनी सफलता की चरम मीमा पर पहुचते हैं। लिपि-रेख पक्तित्व वी क्षमता मनायोग एव सजीव सतकता अपने सहज छायावत् स्वभाव स सदव यक्न रहते हैं। विधिप लिखावटें GERMAN (1) Graphologische Praxis yon Alfred German (2) Der Wille in der Handschrift von Mercel De Trey (3) Trieb und Verbrechen in der Handschrift Ausdrucksbilder asozialer Personlichkeiten von Dr Max Pulver (4) Kleines Handbuch moderner Graphologie Praktische Einfuhrung die Handschriften-Deutung von Dr Kurt Rohder Berne (5) Intelligenz im schrift ausdruck von Max Pulver Zurich FRENCH (1) Initiation Grapbologique by Charles Dietrich Paris (2) L Ecriture Ne Ment Pas Preface De J Crepreux Jamın Tradint Par Ivan Goll by Raphael Scbertuado Parix (3) La Graphologie mise a la portce de Tous Texte orne de 800 modeles d ecritures Paris (4) Graphologie Georges de B auchamp Paris हतलिपि विज्ञान परिशिष्ट-२ सस्थाओं की सूची INSTITUTIONS Graphology is studied in various Universities in Europe and in other Institutions given exclusively to Graphology Some of these are as follows West Germany Institute of Psychology University Mainz Saarstrasse Maipz Association of German Graphologists Detsche Graphologische Vereinguing V Berufsverband deutscher Graphologen -M3 3 Manbeim University of Hamburg Facilities for studies in graphology are available in almost every Uni University of Munich versity in Germany as a part of studies in Psychology FRANCE La Societe de Graphologie 6 rue Casimir-Delavigne Paris VI The activities of this society consist of Publisting a Quarterly known under the title of La Graphologie-and ofleniog courses at the end of which a diploma is delivered SWITZERLAND University of Zurich lostitute of Angewandte Psychologie Zurich A student who wants to go in for examinations and Diploma in Graphology has to attend emipar lectures in Grapbologie as well as other courses of Psychology for three years Schweizerische Graphologische Gesellschaft Luiseostr- 46 Bero A strict examination ja Graphology can be taken A student who passes the exam can become a member of the above society The only requirement for this examination is the talent the ability and the knowledge of Graphology as well as some knowledge of Psychology Z ntral Institute for Schrift Psychologie Berlio Zehlendror Am Fuchspass 44 Tostitute for Psychology and Characterolooy at the Freiburg University Freiburg I Be Belfortstrasse-11 United Kiøgdom The Insight Institute--School of Personal Analysis and Development New Malden Surrey Offers postal tuition courses and thereafter Associate Membership of the Institute USA The New School for Social Research 66 West 12th Street New York II NY This school has two courses on graphology (a) Graphology I Handwriting Analysis (b) II Advanced The first course is designed to introduce the student to the Fundamental concepts and techniques of graphological analysis Competence in at least one other projective method is pre requisite Students who complete the course in handwriting analysis in the previous year may enroll for the second year only for one point of credit at a fee of 25 s The pre requisite for the advanced course is a basic course in graphology some Psychology or clinical training equivalents It is concerned with the problems of screening personnel and analyzing prsonality for individual productivity Empha SLS 15 on the practical application of graphological procedure or परिशिष्ट-३ जैकोबी का मौलिक कयन The science of graphology is based on the fundamental principle that every single handarting has a character of its own and claims that this manifoldness of handwriting apart from minor influence of writing materials of various school models etc is primarily due to the uniqueness of its writers personality Therefore the question arises whether the properties of handwriting are numerous enough for the structure of cvery individual handwriting to be different from that of all others In order to avoid intricate details the problem shall be reduced to the question How mary different ways of shaping a single stroke are possible? The following procedure was adopted from two bundred addressed envelopes the is of WCI were cut out and pasted side by side as illustrated in Fig 1 and Fig 2 The read r may carefully compare these strokes with each other but he will not be able to discover (Ho strokes which are completely identical or even conspicuously similar to each other it may be pointed out that these samples were by no means selected on account of their dissimilarity they were cut out from envelopes just as they happeoed to arrive he result however is interesting enough The considerable coce betrech these two kusdred strokes displays the Idness of shapiog a single trok The strokes differ in woth writing angle pressure decisiveness and other cteristics Some strokes are drawn rapier like downwar other th chening found the hec sam shno un teady and some cien pressure some strokes arc facile and tcoder A strict examination 10 Graphology can be taken A student who passes the exam can become a member of the above society The only requirement for this examination is the talent the ability and the knowledge of Graphology as well as some knowledge of Psychology Z ntral institute for Schrift Psychologie Berlia Zehlendrof Am Fuchspass 44 Institute for Psychology and Characterology at the Freiburg University Freiburg 1 Br Belfortstrasse 11 United Kingdom The Insight Institute-School of Personal Analysis and Development New Malden Surrey Offers postal tuition courses and thereafter Associate Membership of the Institute USA The New School for Social Research 66 West 12th Street New York 11 NY Thts school has two courses on graphology (a) Graphology I Handwriting Analysis (b) JI Advanced The first course is designed to introduce the student to the Fundamental concepts and techniques of graphological analysis Competence in at least one other projectre method is pre requisite Students who complete the course in bandarting analysis in the previous year may enroll for the second year only for one point of credit at a fee of 25 s The pre requisite for the advanced course is a basic course in graphology some Pychology or clinical training equivalents It is concerned Aith the problems of screening per opnel and analyziog personality for individual productivity Empha SLS is on the practical application of graphological procedure Or