Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Hansh Rajnidhanam

2012/08

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Front matter

(३) 1.- भाशय पत्र भाशय २७ कफसंग्रहणी लक्षण पाण्डुरोग २८ त्रिदोप संग्रहणी लक्षण ३५ पांडुरोग उत्पत्ति २८ सन्निपात की संग्रहणीके लक्षण ३६. वातके पीलिया के लक्षण. '२८ संग्रहणी रोगकी समाप्ति ३६ पिचके पीलिया के लक्षण. २८ ग्रहणी रोग़में पथ्य ३६ कफके पीलिया के लक्षण अर्शनिदान ३६ सत्रिपात के पांडुरोग के लक्षण ३६ पांडुरोग के असाध्य लक्षण २६, यवासीर के लक्षण ३७ पांडुरोगे पथ्यम् बात की बवासीरके लक्षण पित्तकी बवासीर के लक्षण ३७ इलीमककामला कुंभकामलापान... ३०. -कफकी बवासीर के लक्षण की रोग लक्षण २० सन्निपातकी बवासीरके लक्षण ३७ कामलाके लक्षण ३० पासकी बवासीर में पथ्य ३७ कुंभ कामला के लक्षण पित्तकी बवासीरमें पथ्य २७ हलीमक रोगके लक्षण, ३१ कफकी यवासीरमें पथ्य ३८ पानकी रोगके लक्षण रक्तपित्त भगन्दर भगन्दर रोगके लक्षण ३८ रक्तपित्त रोगकी उत्पत्ति वातके भगन्दरके लक्षण रक्तपित्त के लक्षण वातपित्त कफके रक्तपित्तके लक्षण पित्त जनित भगन्दर के लक्षण ३६ ३२ सन्निपात जनित भगन्दर के लक्षण साध्यासाध्य विचार रक्तपित्त रोगे १२. अजीर्ण रोगकी उत्पत्ति पथ्यम् सम विषम तीक्ष्ण मन्दाग्निका वर्णन राजयक्ष्मा .३ . वाताजीर्णके लक्षण क्षयी रोगकी उत्पत्ति ३५ पिताजी के लक्षण क्षपीरोगनिदान- ३३ कफाजीर्ण के लक्षण ४१ वातकी क्षयीके, लक्षण अलस विलंबिकाके लक्षण पित्तकी क्षयीके लक्षणं, ३४ · विसूचिका के लक्षण ४१. कफकी क्षयीके लक्षण कृमिरोग ४१. श्रसाध्य क्षयीके लक्षण कासरोग. ३४. कृमिरोग निदान ३५ कृमिरोगकी उत्पचि १२ स्वांसी रोगकी उत्पत्ति ३५ कृमिरोगे पथ्यम् . ४२ खांसी के लक्षण . ४० - 17 पत्र ४८ दि रोगकी संख्या और उत्पत्ति ४६ र वासकी छदि के लक्षण ४६ पित्तकी छर्दिक लक्षण ४६ कफकी छोदके लक्षणे ... । ४६. सन्निपात की छदिके लक्षण ५० दि रोगके उपद्रव. ५० छदि रोगों सध्यिासाध्य लक्षण * ....णा १२ वातमी सांसी के लक्षण ४२ पिनकी खांसी के. लक्षण, १२ कफकी खांसीके लक्षण १३ त्रिदोष की खांसीको लक्षण. १३ असाध्य खांसी के लक्षण हिका ४३ हिचकी रोगकी उत्तिः । ४३ वालंककी हिंधकी के गुण ४३ वरुण पुरुपकी हिचकी के लक्षण: ; १४ वृद्धपुरुषकोटिचकी केलं १४ पांचहिचकीन केनाम और लक्षण " श्वास ४४ श्वासरोगके लक्षण १५ त्रिविधश्वासके लक्षण ४५ स्वाभाविकश्वासके लक्षण ४५ अतिश्वासके लक्षण स्वरभेद ४६ : स्वरभेदकी उत्पत्ति १६ वारके स्वरभेदके लक्षण ४७ पित्तके स्वरभेदको लक्षण ४७ कफके स्वरभेदके लक्षण मसाध्या स्वरभेदके लक्षण, अरुचि ४७ अरुनि रोगकी उत्पषि. ४७. चातकी भरुचिके लक्षण ४७ पित्तकी अरुचिके लक्षण १८. कफकी अरुचिके लक्षण १८ वाकी मचि में पथ्य १८ पिचकी अरूचि में पथ्य १८...काकी अरूचि पथ्य वृषणा रोगकी संख्या और उत्पति घातकी तृपाणाके लक्षणं ५?" पिचकी तृष्णाके लक्षण ५१ कफकी चपणाके लक्षण ५१ निदोपजीनत तृष्णाके लक्षण तृपा रोगमें साध्यासाध्य विचार तृपा रोगमें पथ्य . मूछ । - . ५२ मूळ..रोगकी उत्पत्ति : ५२ मूर्धा रोगकी संख्या और लक्षण: ५२ बाराकी मूर्चा के लक्षण...:: ५२: पित्तकी मूछ के लक्षणं ५३ कफकी मूछी के लक्षणे :: ५३ सन्निपातकी मूछोंके लक्षण ५३ रुधिरकी मूछों के लक्षण : ५३ मयकी मूछ के लक्षण... ५३ विपकी मूर्चा के लक्षण ५४ लमि रोगके लक्षण दाह. ५४ दाह रोगके लक्षण... ५४ · धानुक्षीण दाइके लक्षण -- SN. पत्र है 3 । १ - গাহ। मदात्या। ५४ मदात्पर्य रोगके लक्षण. ५५ भयुक्ति मद्यपानके दूषण ५५ युक्तिसे मधपानके गुण ५६ प्रथम मद्यपानके गुण / ५६ द्वितीय मद्यपानके अवगुण ५६ तृतीय मद्यपाने के अवगुण ५६ चतुर्थ मद्यपानके अवगुण । ५६ पित्त मदात्ययके लक्षण ५६ कफ मदात्ययके लक्षण । ५६ वास मदात्ययके लक्षण । २७ त्रिदोष मदोत्ययके लक्षण मद्यपानोत्य जीर्णके लक्षण ५७ मयदानोत्थ-भ्रमके लक्षण उन्माद उन्माद रोग के लक्षण उन्माद रोगका हेतु चात उन्मादलक्षण ५८ पित्त उन्मादके लक्षण '५८ कफ उन्मादके लक्षण ५९ सन्निसराउन्मादके लक्षण ५९ औरभी कारणउन्मादके लक्षण ५६ भूतोन्मादके लक्षण ५६ दैत्यसे पैदा उन्मादकेलक्षण ५९ गन्धर्व लगाहो उसके लक्षण ६. यक्षग्रस्तके लक्षण ६० महासर्प ग्रहाके लक्षण ६० पिनीश्वरग्रस्तनरके लक्षण राक्षसग्रस्त नरके लक्षण ६१ मतग्रस्तके लक्षण ६१ देव आदिकोंके प्रवेशका लक्षण आशय अपस्मार ६२ वातकी मृगी रोगके लक्षण - ६२ पिचकी मृगी रोगके लक्षण ६२ कफकी मृगीके लक्षण - ६२ सनिपातकी मृगी के लक्षणं वातव्याधि ६३ वातव्याधि रोगके लक्षण ६३ सर्वाग वातके लक्षण ६४ वच में माप्तवातके लक्षण ६४ रुधिरमें प्राप्त बाराके लक्षण ६४ मास मेदागत वात के लक्षण ६४ मज्जास्थिगत वानके लक्षण ६४ शुक्रगत वातके लक्षण ६५ नाहीगत वातके लक्षण ६५ कोटगत वातके लक्षण ६५ सर्वागत वात के लक्षण ६५ सन्धिर्म स्थित वातके लक्षण पाच वातके जुदे२लक्षण ६६ पित्तावित माणवान- के लक्षण ६६ कफान्वित प्राणवासके लक्षण कफ पित्तयुक्त उदान वातके लक्षण - ६६ पित्तकफयुक्त समान चातके लक्षण ६६ पिचयुक्त अपान वातके लक्षण ६६ कफ युक्त अपान वास के लक्षण । ६६ पित्तकफयुक्त व्यान वासक लक्षण: ६७ ऊर्वगत चातके लक्षण ६७ अधोगत वासके लक्षण ६७ पित्तयुक्त वात के लक्षण ६७ कफयुक्त चासके लक्षण ६७. 'कफपित्तयुक्तापातके लक्षण अशोभागमें मात्र चाशके लक्षण ६ TE . ।

, ७५ ७५ अरुस्तम्भ रोगकी समाप्ति 4 आमवात रोगकी उत्पत्ति 7 भाशय পায় वातरक्त ७५ मूत्र रोकने उपद्रव ७५ जभाई-रोकनेके उपद्रव ६८ यातरक्तकी उत्पत्ति ও! पास रोकने के उपद्रव ६८ घातरक्तके लक्षण ७५ छीक रोकने के उपद्रव ६९ पित्तान्वित वातरक्तो लक्षण डकार रोकने के उपद्रव ६९ कफयुक्त वातरक्त के लक्षण रह रोकनेके उपद्रव ६९ बारारक्तके उपद्रव भूख मारनेके उपद्रव ऊरुस्तम्भ ७६ पास रोकने के उपद्रव ७६ श्वास रोकनेके उपद्रव , ७६ निद्रा रोकने के उपद्रच अरुस्तम्मके लक्षण ७६ उदावर्त रोग होनेके कारण ७६ वातके उदावर्त के लक्षण भामवात रोगके लक्षण ७१ पिचसे कुपित आमवातके लक्षण गुल्मरोम ७१ कफसे कुपित प्रामवातके लक्षण ७७ गुल्मरोग की संरया ७१ साध्यासाध्यकप्टसाध्यआमवातलक्षण | ७७ गुल्मरोगका स्वरूप ७. त्रिदोपज भामवातके लक्षण वास गुल्मके लक्षण परिणामशूल पित्त गुल्मके लक्षण कफ गुल्मके लक्षण ७२ शून रोगकी उत्पत्ति ७७ रक्तगुल्मके लक्षण ७२ वादीके शूलका लक्षण असाध्य गुल्मके लक्षण ७२ पित्तके भूलका लक्षण सन्निपातन गुल्मके लक्षण कफ के शूल का लक्षण ७८ गुरमरोगके दशोपद्रव वात कफ शूलके लक्षण हृद्रोग ७१ वासपिचननित शूलके लक्षण ७३ शूलकी उत्पत्ति ७९ पित्तके छद्रोगके लक्षण असाध्य शूछके लक्षण ७४ शूलके दश उपद्रव ७९ कफके हृद्रोगके लक्षण ७२ सन्निपातके हृद्रोगके लक्षण घानाह उदावरी ७६ कृमिरोगके हृद्रोगके लक्षण ७४ मानाइ रोगकी उत्पचि हदय रोगके उपद्रव ७४ अधोवातरोकनेसेउदावर्त के लक्षण मूत्रकृच्छ विष्ठा रोक्ने के उपद्रव “मूत्रकृचन्द की उत्पत्ति । ৩৩ - ৩৩ ७८ J ७९ बादीके हृद्रोग के लक्षण । ७४ . T ७५ .

(७) पत्र पत्र आशय त्वचागत पीडिकाके लक्षण ८९ रक्तम गत पीडिका के लक्षण ८९ मांसमें प्राप्त पीडिकाके लक्षण ८९ मेदामें माप्त पीडिकाके लक्षण ८९ मज्नामें माप्त पीडिकाके लक्षण ८९ हाइमें प्राप्त पीडिकाके लक्षण ८९ शुक्रमें प्राप्त पीडिकाके लक्षण असाध्य शीतलाके लक्षण पिटिका पिटिकाके दशभेद ९० प्रमेहसे उत्पन्न पिटिकाके लक्षण ९० वर्णसे पिटिकाके लक्षण ९० सराविकाके लक्षण ९१ कच्छापका जालनी सर्पपिकापुत्रिणी ८९ - के लक्षण भाशय वासके मूत्रकृच्छूके लक्षण 16. पित्तके मूत्रकृच्छू के लक्षण ८१ कफके मूत्रकृच्छूके लक्षण ८१ मूत्रकृच्छू साध्यासाध्यपरिधान ८१ मूत्राघातकी उत्पत्ति ८२ वातके मूत्राघातके लक्षण ८२ पिचके मूत्राघातके,लक्षण ८२ कफके मूत्राघातके लक्षण अश्मरी ८. पथरी रोगकी उत्पत्ति ८३ पातकी पथरीके लक्षण ८३ पित्तकी पथरीके लक्षण ८३ कफकी पथरीके लक्षण ८४ वीर्यरोधकी पथरी के लक्षण प्रमेह, ८४ प्रमेहरोगकी उत्पत्ति ८४ वातकी प्रमेहका लक्षण पिचकी प्रमेहका लक्षण कफकी प्रमेहका लक्षण ८६ ममेहरहितके लक्षण '८६ साध्यासाध्यकष्टसाध्य ममेहकेल. पिटिका ८६ पिटिका रोगकी उत्पत्ति ८६ पिटिका रोगके लक्षण । ८६ पीडिका रोगका पूर्वरूप ८६ वातकी पीर्डिका के लक्षण ८६ पिचकी पीडिका के लक्षण ८६ ककी पीडिका के लक्षण वात पित्तकी पीडिका के लक्षण ८७. कफवात के विस्फोटकके लक्षण ८७. कफ पिचके विस्फोटककै लक्षण ८८ त्रिपातकी पीडिका के लक्षण ८५ ८५ । T - ९१ विद्रधिका विदारिका विततांजली के लक्षण ९२ पिटिका विनाशार्य पूजा मेदवृद्धि ९२ मेदरोगोत्पत्ति ९२ मेदरोग लक्षण गण्डमाला ९३ वातकी गण्डमालाके लक्षण ९३ पिचकी गण्डमालाके लक्षण ९३ कफकी गण्डमालाके लक्षण इलीपद ९४ श्लीपद के लक्षण ९४ वातकी श्लीपदका लक्षण, ९४ पिचकी श्लीपदका लक्षण: ९४ कफकी रीपदका लक्षण 1 .

पत्र पत्र श्राशय १०६ विसपेरोगके उपद्रव क्षुद्ररोग १०६ अजगल्लिकाके लक्षण १०६ यवमताके लक्षण १०६ अजली नाम फुसीके लक्षण १०७ वित्तानामफुसीके लक्षण १०७ कच्छपिकाके लक्षण १०७ वल्मीकफुसीके लक्षण १०७ इन्द्रष्टद्धिके लक्षण १०७ गर्दभिकाके लक्षण १०७ पापाणगर्द्धभिकाके लक्षण १०८ पनसिकाके लक्षण १०८ जळगईमिकाके लक्षण १०८ इरिवल्लिकाके लक्षण १.८ करबलाईके लघण १०८ गन्धमालाके लक्षण १०८ अग्नि रोहिणीके लक्षण १०९ विदारिकाके लक्षण १०९ शर्करावुदके लक्षण १०९ कदरफुसीके लक्षण १०९ बिवाई के लक्षण १०९ खास्येके लक्षण १०९ इन्द्रलुप्त रोगके लक्षण ११० अरूपिकाके लक्षण ११० मुखदूपिकाके लक्षण ११० तिलके लक्षण ११० मस्सेके लक्षण १११ न्यच्छ अर्थात् ल हसन के लक्षण १११ व्यग अर्थात् झाईके लक्षण १११ नीलिकाके लक्षण १११ कर्णिकाके लक्षण १११ अवपाटिकाके लक्षण भाशय १११ निरुद्ध प्रकाशके लक्षण ११२ सनिरुद्ध गुदके लक्षण ११२ गुदभ्रंशके लक्षण ११२ शूकरदंष्ट्र रोगके लक्षण ११२ हपणकच्छरोगके लक्षण मुखरोग ११२ ओष्ठरोगके लक्षण ११२ सन्निपातके भोष्टरोगके लक्षण ११२ दन्तरोगनिदान ११३ दन्त पुप्पुटरोगके लक्षण ११३ दन्तशरोगके लक्षण ११३ सौपिरनाम दन्तरोग के लक्षण ११३ महासौपिरके लक्षण ११३ सोफकस दन्तरोग के लक्षण ११४ वैदर्भरोगके लक्षण ११४ करालरोगके लक्षण ११४ अधिमासरोगके लक्षण ११४ कीटदन्तरोगके लक्षण ११४ भजनक दारोगके लक्षण ११४ दन्तचिद्रधिके लक्षण ११५ दन्तहर्पके लक्षण ११५ दन्त शर्कराके लक्षण ११५ दन्तश्यावके लक्षण जिहा ११५ जिहारोग निदान ११५ उल्लासनाम जिहारोगके लक्षण ११५ जिह्वाशोथके लक्षण ११६ कंठतुएडके लक्षण ११६ तुएडकेरीके लक्षण ११६ कच्छपरोगके लक्षण ११६ सालुपाफके लनण (१०) पन शाशय पत्र । आशय गलरोग १२२ क्षयरोगके लक्षण ११६ गलरोगको निदान', १२२ प्रतिनश्यके लक्षण ११७ पासरोहिणी के लक्षण १२२ नाशापाकके लक्षण ११७ पित्तरोदिणीक लक्षण १२२ पूयरकके लक्षण १२२ प्रदासरोगके लक्षण ११७ कफरोहिणी के लक्षण १२३ प्रतीनाहके लक्षण १२७ रुधिरकीरोहिणी के लक्षण १२३ नाशाशोपके लक्षण ११७ पठशालूकरोगके लक्षण - १२३ पकपीनसके लक्षण ११७ अधिनिहाका लक्षण १२३ पीनसरोगसी उत्पत्ति ११: वलासाक्ष रोगके लक्षण १२३ वालकी पीनसरोगके लक्षण ११८ नाशाशतघ्नीके लक्षण १२४ पित्तकी पीगसके लक्षण ११८ गलायुरोगके लक्षण १२४ कफकी पीनसके लक्षण ११८ बलविद्रधिके लक्षण १२४ रुधिरकी पीनसके लक्षण ११८ गलौघरोगके लक्षण १२४ सन्निपातकी पीनसके लक्षण ११८ वातपित्तकफकीमुखपीडिकाके लक्षण नेत्ररोग कर्णरोग १२४ नेत्ररोगोत्पत्ति १९ कणरोग निदान १०४ पातके नेत्ररोगके लक्षण ११९ कर्णनादके लक्षण १२५ पिचकेनेत्ररोगके लक्षण ११६ बधिरके लक्षण १२५ कफनेत्ररोगके लक्षण १२० शब्दलेडके लक्षण १२५ नेत्रमन्धके लक्षण १२० स्रावगदरोगो लक्षण १२५ वातभ्रमणरोगके लक्षण १२० कर्णगय के लक्षण १२५ कफसे नेपासके लक्षण १२. प्रतीनाहने लक्षण १२६ नेत्रपाक के लक्षण १०० कृमिकणके लक्षण १२६ मोतियाविन्दके लक्षण १२० कर्णपाकके लक्षण १२६ असायमोतियाबिन्दक लक्षण १०१ पित्तार्णपाकके लक्षण १२७ नेत्रमियमपटलके रोग 01 फर्णपाकके लक्षण १२७ नेत्र केद्वितीयपटल के रोग १२१ यासकेपतिकर्णरोगके लक्षण १२७ नेत्र केन्तीयपटलके रोग १२१ सिके पूतिकर्णरोग के लक्षण १२७ नेत्रकेचतुर्थपटलके रोग १२१ कफके पूतिकार्यरोग के लक्षण १२७ वातकेनेत्ररोगके लक्षण १२८ पित्तके नेत्ररोगके लक्षण । १.२ पानसरोगके लमाण १२८ कफकेनेत्ररोगके लक्षण - 7 नाशारोग (११) पत्र . , . -- । I , । आशय भाशय १२८ अर्वअधोगतष्ठिरोग लक्षण १३४ पूतिगन्धके लक्षण १२८ धूम्रदर्शी अर्थात् रतीधी के लक्षण १३१ वंध्यायोनिके लक्षण . १२८ गंभीररोगके लक्षण १३४ खंडितायोनिके लक्षण १२९ पूयलाख्यरोग लक्षण , प्रसूति १२९ उपनाहक लक्षण- १३५ प्रसूतिरोगकी उत्पत्ति १२९ परिचालरोग के लक्षण १३५ सावनऔर पातकालक्षण : १२९ ब्राह्मणीरोगके लक्षण १३५ मसूतिरोगके लक्षण १२९ वातपित्तकफी पिटिकाके लक्षण, १३५ प्रसूतिरोगके उपद्रव मस्तक वालरोग १३० मम्तकरोगकी उत्पत्ति , १३६ घातलदुग्धके गुण १३० वातपित्तकफके मस्तकरोग १३६ पित्तदूपित दुग्धके लक्षण १३० रुधिरकेमस्तकरोग १२६ कफदूपितदुग्धके लक्षण १३० सन्निपातकेमस्तकरोग १३६ दोपरहिस दुग्धकी परीक्षा १३० कृमिफेमस्तकरोगलक्षण १३६ दोपहीनदुग्धके गुण १३१ आधाशीशीके लक्षण १३६ पालकोंकीअन्तर्गत पीडा जानने रवीरोग १३१ भदररोगकी उत्पत्ति १३७ कुझुनपारिगर्भिकके लक्षण १३१ चासपित्तकेपदरके लक्षण १३७ सानुकंठकतालपाकके लक्षण १३१ कफकेमदरके लक्षण १३७ सामान्य ग्रहयुक्तके लक्षण १३२ सन्निपातफेदरके लक्षण १३७ स्कन्दग्रहशकुनीग्रहनस्तके लक्षण १३८ रेवतीग्रह पूतनाग्रहग्रस्वके लक्षण १३२ योनिकन्दकी उत्पत्ति १३२ पित्तके योनिकन्दके लक्षण १३८ मंडिताग्रहनेगमेयग्रहग्रस्तकेलक्षण १३२ कफकेयोनिकन्दके लक्षण विपरोग १३२ सन्निपातकेयोनिकन्दके लक्षण १३९ स्थावर जंगमविप १३३ 'खंडाख्य और सूचीमुख योनिके लक्षण | १३९ स्थावर विपके लक्षण १३३ वातकी योनिके लक्षण १३९ जंगमविपके लक्षण १३३ पित्तकी योनिके लक्षण १३९ विपदेनेवालेकी परीक्षा १३३ कफकीयोनिके लक्षण १३६ मूलपत्रफलविपके लक्षण १३४ वातसे पित्तसे कफसे जिसका पुष्प १४० फूलगोंद त्वचाके विपके लक्षण नष्टहुआहो उसके लक्षण १४० दुग्धधातुके विपके लक्षण १३४ विप्लुता के लक्षण १४० सर्पकाटेके लक्षण काटपाय

(१२)
पत्र
पत्र
थाशय
याशय
१४० देशविशेपकाल और नक्षत्र विशेष में | १४२ टूपी विपके लक्षण
सर्पकाटे उसके लक्षण
मूत्रपरीक्षा
१४० भूपकके विपके लक्षण
१४३ साध्य असाध्यमनुष्यकी मूत्रपरीक्षा
१४१ कीरआदि विपके लक्षण १४४ वातपित्त कफसे मूत्रलक्षण
१४१ काले बी के विपके लक्षण १४४ विदोपौर त्रिदोपके मूत्रकीपरीक्षा
१४१ वहीसर्पकाटेके लक्षण
१४५ नपुसकभेद और लक्षण
१४१ मेंडक मछली जोंकछिपकली शत १४५ लानेक्य नपुसक के लक्षण
पदीके विपके लक्षण
१४५ सौगन्धिक नपुंसकके लक्षण
१४२ मच्छरके विषके लक्षण १४५ कुभिकपडके लक्षण
१४२ लूताविपके लक्षण
१४५ ईर्यकपडके लक्षण
१४२ मक्खी और नसके विपके लक्षण ११५ महापंडके लक्षण
१४२ सादिक काटेका असाध्यलक्षण १४६ नारीपडके लक्षण
इति
J
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-

भूमिका॥ धन्यहै वह परमेश्वर जिसकी कपासे सारे संसारमें कैसे कैसे विचित्र चरित्र होरहे हैं देखिये यह कैसी ईश्वरकी अद्भुत रचनाहै कि सृष्टि में अगणित जीवहैं परन्तु यहनहीं कि एकसे दूसरे की भ्रान्ति हो-इसी प्रकारसे जितने पदार्थ सृष्टि में हैं हरएकके गुण दोष पृथक् पृथक् दिये हैं-देखिये बुद्धिमान महात्मा पुरुषों ने जीवोंकी रक्षा और केश निवारण के निमित्त कैसे २ विचार कियेहैं-वैद्यक विद्यामें अनेकों प्रकारके ग्रन्थ बने हैं जिनके द्वारा प्रौपधियों करके कैसाही रोगहो विधिपूर्वक सेवनसे तुरन्तही लाभ होगा औपधियोंका तो फल प्रत्यक्ष है दृष्टान्त की आव- श्यकता नहीं॥ प्रथम महात्माओं ने जो ग्रन्ध वैद्यकविद्याके वनाये वह संस्कृत में हैं जो इससमय विशेपतर उपयोगी नहीं होते इसकारण वर्तमानकालके अनुसार विद्वान् सज्जनों ने उन ग्रन्थोंपर भापा टीका बनानेका प्रारम्भ कियाहै और बहुतसे ग्रन्थों में भापा टीका वनभी गई है। हम अतीव प्रसन्नतापूर्वक इसबातको प्रकट करते हैं कि एक ग्रन्थ हंसराजनिदान जोभापाटीकासहित है अवलोकन करने योग्यहै-एक तो इस कविकी कविता श्लोकबद्ध अति अनूठी है और श्लोक ऐसे ललित हैं कि जिनके पढ़ने और श्रवणमात्रही से चित्तको आनन्द होताहै-दूसरे यह ग्रन्थ बहुत बड़ाभी नहीं है कि जिसके पढ़नेकेलिये अवस्थाका एक भाग आवश्यकहो-और बहुत छोटाभी नहीं है इसीसे बहुधा लोग इसको पसन्द करते हैं कि केवल इसीके कपठाय करने से छोटे और बड़े सम्पूर्ण अपने अभीष्ट फलको पहुँचते हैं। इन सब गुणों के होतेहुये इस ग्रन्थमें हंसराजार्थ बोधिनीटीका भापा में ऐसी हुई है कि मानो अमृतकुण्ड जो अतिकठिन स्थल है उसके लाने के लिये रेलगाड़ी वनगई। प्रथम तो यह ग्रन्थ केवल संस्कृत जाननेवालोंही के लिये फलदायक था अब भाषा जाननेवाले वैद्यलोग भी उसी प्रकार अपना यवं प्राप्त करसक्के हैं।

श्रीमन्महामहोपाध्याय श्रीवर पपिरत देतराम चौधेजी ने इस ग्रन्थ की टीका भाषामें ऐती बनाई है मानो 'प्रथम ग्रन्यकार महात्माने अव: तार धारणकर.संस्कृतका भापारूप किया। प्रथम यह अपूर्व ग्रन्थ बम्बई मोहप्रदयन्त्रालय में श्रीउक्त पण्डित दत्तरामके प्रबन्धसे छपाथा अब मुंशी वंशीधरसाहय मुइतमिम मुम्बउल अलुमंकी आज्ञानुसार इस छापेखाने में पुष्टाक्षरों में छापागया है जिन संज्जनोंको आवश्यकताहो कीमतभेजकर मंगवालेव-इस छापेखाने की हरएक दूकाने देहली व कानपूर आदिमें भी यह ग्रन्थ मिलेगा मैनेजर नवलकिशोर प्रेत लखनऊ.

ॐ गणाधिपतये नमः॥ हंसराजनिदानम् ॥ - M अथ हंसराज कवि हंसराज ग्रन्यके की ग्रन्थके आदि में शिष्टाचार परिपालनके निमित्त और ग्रन्थकी निर्विघ्न समाप्ति के निमित्त भले प्रकार उचित अपना इष्टदेव श्रीवालाजी तिनकाध्यानपूर्वक श्रग्धराछन्द करके मंगलाचरण करते हैं। ध्यायेति ध्यायेवालाम्प्रभातेविकसितबदनाम्फुल्लराजीवनेत्रांमुक्तावैदू यंगभैरुचिरकनकभूपणै पितांगीम् ॥ विद्युत्कोटिच्छटामांप हिमलबहुलांदिव्यसिंहासनस्थां गीर्देवीतस्यदासीभवतिसुरवनं नन्दनंकेलिगेहम् १ धत्तेतेचरणांबुजस्वहृदयेमात रोयोऽनिशं तस्याऽऽस्येपरिनर्त्ततेप्रतिदिनंबाग्गद्यपद्यात्मिका ॥ लक्ष्मीस्त स्थग्रहेस्थिताकरतलेमुक्तिःस्थिताःसिद्धयो द्वारेतस्यविभूपिता इचनिधयस्तिष्ठन्तिनित्यंमुदा २॥ हम प्रातसमय श्री बालाका ध्यान करते हैं कैसीहै बाला कि लितहै मुख फूले कमल के समान नेत्र मोती और वैदूर्यमणि करके जटित सुन्दर सुवर्णके भूपण करके भूपितहै देह कोटि बिजली के समान प्रकाश बहुतसी सुगन्धयुक्त देह श्रेष्ठ सिंहासनपर स्थित ऐसी वालाका जो मनुष्य ध्यान करता है तिसपुरुपकी सरस्वती दासीहो और देवताका नन्दनवन क्रीडाकास्थान हो १ हे मातः। जो मनुष्य तेरे चरण कमलोंका निरन्तर अपने हृदयमें ध्यानकरताहे तिसके मुख में गद्म पद्य रचना रूपो सरस्वती नित्य नाचती है उसके घरमें लक्ष्मी स्थिररहे मोक्ष उसकेहाय में स्थिररहे अष्टसिद्धि और नवनिधि तिसके द्वारपर नित्य प्रसन्नतापूर्वक शोभायमान स्थिररहैं इस श्लोकका छन्द झार्दूलविक्रीडित है २ ॥

२ हंसराजनिदानम्। जगन्मातर्नमस्तेस्तुवरदेमंगलेशिवे ॥ हायंकुरुमेऽनिशम् ३ अहमजि. रयत दि. ८टया तितवहानिःक्वापिदृष्टे कदाचित्॥स्वजनहितपरायाःशंकरस्यपि यायाःअमृतरसहदिन्याहंसनाथोभवामि ४ भिषक्चक्रचित्तोत्स वंजाड्यनाशंकरिष्याम्यऽहंबालबोधायशास्त्रम् ॥नमस्कृत्यधन्वं तरिवैद्यराजंजगद्रोगविध्वंसनंस्वेननाम्ना ५ ॥ हे जगन्मातः।हे वरदे । हे मंगले । हे शिवे । तुम्हारे अर्थ नमस्कारहै ग्रन्थ करनेको प्रवृत्त मेरी निरन्तर सहायकरो ३ हे जगदम्बे। मुझे दिव्य दृष्टि से देख तेरी दृष्टिकी कभी कहीं हानि नहीं हो कैसी तुमहो कि अपनेभक्त जनके हितमें तत्परहो और श्रीशंकरकी प्यारीहो अमृत रसकी सरोवरी हो मैं तुम्हारी दृष्टीक करने से सनाथ होऊंगा इस श्लोकका मालिनी नाम छन्दहै ४ मे वैद्यन के राजा धन्वन्तरि को नमस्कार करके बालकन के वोधके अर्थ जगत्के रोगन का नाशक वैद्य समुदायके चित्तको उत्सव कारक मूर्खता का नाशक अपने नाम करके अर्थात् हंसराज नाम करके विख्यात ग्रन्थको करताहूं इस श्लोकके छन्दकानाम भुजंगप्रयातहै ५॥ ब्रह्मेशोगरुडध्वजोमगुसुतोभारद्वजोगौतमो हारीतश्चरको त्रिकःसुरगुरुर्धन्वंतरिर्माधवः ॥ नासत्योनकुलःपराशरमुनिर्दा मोदरोवाग्भटो येन्येवैद्यविशारदामुनिवरास्तेभ्योपरेभ्योनमः ६ श्रात्रेयधन्वंतरिसुश्रुतानांनासत्यहारीतकमाधवानाम् ॥ सुषेण दामोदरवाग्भटानां दस्रस्वयंभूचरकादिकानाम् ७॥ ब्रह्मा शिव विष्णु शुक्र भारद्वाज गौतम हारीत चरक अत्रि वृह- स्पति धन्वंतरि माधव अश्विनीकुमार नकुल पराशरमुनि दामोदर वाग्भट और जे वैद्यनमें चतुर मुनीनमें श्रेष्ठ तिन सवनके अर्थ नमस्कार हैं ६ ॥ प्रात्रेय धन्वंतरि सुश्रुत अश्विनीकुमार हारीत माधव सुपेण दामोदर वाग्भट सनत्कुमार चरकादिकन का ७॥ एपांसमालोक्यमतमुहुर्मुहुर्ग्रथोमनोज्ञःक्रियतेमयाऽधुना॥प येरदोपैरचितोल्पमेधसांज्ञानायननंभिपजात्ममानिनाम् ८ दर्श हंसराजनिदानम् । '३ नस्पर्शनःप्ररांगीणोरोगनिश्चयम्॥ आदौज्ञात्वाततःकुर्याच्चि कित्सांभिपजांवरः ६ 'देशंबलंवयःकालं गुर्विणीगदमौषधम् ।। उद्धवैद्यमतज्ञात्वाचिकित्सामारभेत्ततः१०॥ मत बारयार देखकर वैद्य ऐसे अपने नापेको माने अल्पबुदीवारेन को निश्चय ज्ञानके अर्थ दोपकरकेरहित जे पद तिनकरके रचितमनको प्रसन्न करनेवाला अवमें ग्रन्थरचताहूं ८ देखता स्पर्शकरना पूछना इन तीन तरहसे पहिले रोगीके रोगको निश्चय करके वैद्यों में श्रेष्ठहै सो रोगी की चिकित्सा करे देश वल अवस्था काल गर्भिणी का रोग औषध और वृद्ध वैद्य के मतकोजानके फेर चिफिरता करै १०॥ (अंथनाडीलक्षणानि)करांगुष्ठमलोद्भवाप्राणभूतान्नृणांरोगि णांसाक्षिणीसौख्यभाजामजिलोकोरमानांगतिनाडिकायाविधत्ते निरुक्ताचवातात्मिकासा ११ विधत्तेगतिकाकमंडूकयोर्यामुनीन्द्र 'निरुक्ताचपित्तात्मिकासा ॥ शिराहंसपारावतानांगतियादधाति स्थिराइलेमकोपान्वितासा १२ नाडीचंचलतांकचिच्छिथिलतां शैत्यंक्वचिदुष्णतां धत्तेमंदगतिविदोषकुपितास्थानच्युतिक्षीण ताम् ॥ वक्राकारगतिवचिद्वितनुते प्राप्नोतिकंपंक्वचिद्वैकल्यंविद धातियातिकुपितामासान्तरेसानिशम् १३॥ प्रथम नाडी परीक्षा लिखे हैं हायके अंगुठा के निकट रोगी मनुष्य के सुख दुःखकी साक्षी देनवारी सौख्यभाजा नाडी जो जोंक वा सर्प कीसी चाल चले तो धातकी नाडी कहिये ११ और जो नाडी काक मेढ- .. क कीसी चाल चले तो मुनियोंने पित्तकी नाड़ी कहीहै और जो हंस कबूतर कीसी चाल चले तो कफकोप की नाडी कहिये १२ हिदीप कोप की नाड़ी चञ्चल कभी शिथिल कभी शीतल कभीगरम और मंद विक- लताको प्राप्तभई गमन करैहै और स्थानको छोड़देय और बहुत धीरे २ चले और कभी टेढ़ीचले कभीकांप विकलताको प्राप्त भई ऐसी नाड़ी - एक महीने के भीतर रोगीको मारडार १३ ॥ त्रिदोषान्वितानाडिकांचंचलोणार स्फुरद्वित्रिरूपावरायु- विभिन्ना ॥ गर्तितैत्तरीयांविधत्तेतिक्रपक्षणक्षीणतांयातिमूर्छ . .

४ हंसराजनिदानम्। क्वचित्सा १४ शिरायस्यवातादितापित्तदग्धाकफेनातिकोपेन नाडीकृतासा ॥गदीसोल्पकालेन मृत्योर्विदीर्णेमुखेयास्यतेदंतदं ट्राभिकीर्णे १५॥ सन्निपातकी नाडीचपल और गरम और दोतीन प्रकारकी चाल चले वहनाड़ी जल्दी यायुकी काटनेवारी जाननी और तीतरकीसी चाल चले और वहुतकांपै और मंदचले और कभी चलने से रहिजाय १४ जिस रोगीकी नाडी घात करके दुखित पित्त करके दग्ध और कफके कोप करके खेदितहो वहरोगी थोडे कालमें मौतके खुलेहुये दंतदाढ़ा करके युक्त ऐसे मुखमें जायगा अर्थात् मरेगा १५॥ शिरायस्यसूक्ष्माऽतिशीतान्वितावासरोगीनजीवेत्प्रयत्नैःकदा चित् ॥ चलद्वित्रिरूपात्रिदोषान्वितावासरोगीयमस्यालयेशीघ्र गंता १६ नाडीशीघ्रगतिधत्तेज्वरकोपेनसोष्णताम् ॥ रक्ताधि क्येनसाकोष्णागु-वेगवतीभवेत् १७ सुखिनोमनुजस्यशिरा परितःस्थिरतांसमुपैतिदधातिवलम् ॥ क्षुधितस्यभवेच्चपलासत तंतृपितस्यशिराव्रजतिस्थिरताम् १८॥ जिस रोगीकी नाड़ी अतिमंदचत और शीतकरके युक्तहो वो रो- गी यत्नोंके करनेसे नहीं जी और जिस रोगीकी नाडी त्रिदोषयुक्त दो तीन प्रकारकी चले वोरोगी जल्दी यमराज के घर पहुंचेगा १६ ज्वरके कोपसे नाडी गरम और जल्दी चलती और रुधिर के बिगड़नेकी नाड़ी गरम और भारी तथा जल्दी चलती है १७ सुखी मनुष्य की नाड़ी चल युक्त और स्थिर चलतीहै और क्षुधित मनुष्यकी नाडी चपल और भोजन करे कीनाड़ी स्थिर चलतीहै इसश्लोकके छन्दका नाम तोटकवृत्त है १८ ॥ मोहेनकामेनभयेनचिंतयाक्रोधेनलोभेनबहुश्रमेणवा॥ मंदा. ग्निनोद्वेगतरेणपीडयास्यान्नाडिकामन्दतराणाम्भृशम् १६ ॥ इति हंसराजनिदानेनाडीलक्षणम् ॥ मोहसे कामते भयसे चिन्तासे क्रोधसे लोभसे बहुतपरिश्रमसे मदाग्नि से उद्वेगसे पीडासे मनुष्यों की नाड़ी निरन्तर मंदचलतीहै १६ ॥ इति श्रीहंसराजार्थतोधिन्यानाडीलक्षणम् ।।

.. हंसराजनिदानम्। ५ दोषैर्विनानरोगाःस्युर्नदोषा हेतुभिर्विना ।। हेतवःकर्मसम्भू तास्तान्हेतून्कथयाम्यहम् १(अथवातकोपकारकवस्तु)प्राणा पानगतेविघातकरणैःचन्मत्रतट्रोधनैः व्यायामव्रतशोकशीत • सलिलस्नानैःस्त्रियासेवनैः ॥ रूक्षाम्लामिषमिष्टपिष्टकटुकैरत्यंबु पानाशनैः वर्षाशीतशरत्सुचैत्रसमयेवातस्यकोपोभवेत् २(अथ पित्तकोपकारकवस्तु) तीक्ष्णोष्णाम्लविदाहिशाककटुकै क्षारान्न पित्ताशनायामाध्वपरिश्रमर्दिनपतेरातापमंसेवनैः ॥ क्रोधो प्णोत्प्लवनैःकषायमदिरा पानैर्निशाजागर ग्रीष्मशरत्सुमध्य दिवसेपित्तस्यकोपोभवेत् ३॥ विना दोपोंके रोग नहीं होते और विना हेतुओं के दोप नहीं होते और हेतु कर्मसे पैदा होतेहैं सो उन्हीं हेतुओं को मैं कहताहूं १ प्राण और अपान पवनकी गति: बिगड़ने से भूख प्यास मूत्र इनके रोकने से दण्ड कसरतके करनेसे व्रतके करनेसे शोचसे शीतल जलके नहाने से बहुत स्त्रीके संगसे रूखा खट्टा मीठा पिसा कडुआ ऐसे पदार्थ के भोजन से बहुत जल और भोजन के करनेसे वर्षावातु शरदऋतु शीतकाल और चैत्रके महीनेमें वात कुपित होती २ तीक्षणमिरच आदि गरम खट्टा दाहका करनेवाला पदार्थ शाक कडुआ खार मिलाअन्न और पित्तकारक ऐसेभोजनके करनेसे दण्डकसरतके करनेसे रास्ताके चलनेले परिश्रमके करनेसे घाममें रहने से क्रोधले गरमीसे खेलने कूदनेसे कसैली वस्तु मय केपीनेसे रात्रिजगनेसे वाकतु शरदनानु मध्याह्नमें पित्तकोपकरताहै ३॥ क्षारक्षीरविकारशाकमधुरैः पानाशनातिकमैलस्निग्धगरि ष्टकंदपिसितैःशीताम्लमाषाशनैः ॥ नाशानेत्रमुखेपधूमरजसो. पातैमहाघोपणेः श्लेष्माकोपतरंदधातिशिशिरेहेमंतकेमाधवे॥ खार दूध का पदार्थ ,शाक मिष्ट भूख प्यासके समयको उल्लंघन करने से कन्द चिकना गरिष्ठ मूल पदार्थ पिसा अन्न शीतल खट्टा उई इनके खानेसे नाक नेत्र मुख इनमें धुयें के और रजके गिरनेसे पुकारने से शिशिरमातु हेमन्तऋतु वैशाख में कफ कोप करता ४॥ ज्यराणांघोररूपाणांयानिचिह्नानितान्यहम्॥ वक्ष्येज्ञानेनतेनेव क + ६ हंसराजनिदानम्।। रोगःसंज्ञायतेवुधैः ५(तस्यप्राणुसत्तिमाह )दक्षायमानसंक्रुद्धः द्रनिश्वाससम्भवः॥ज्वरोऽष्टधाप्थक्लुद्व संघातागन्तुजःस्मृतः १ (ज्वररयसंप्राप्तिमाह) मिथ्याहारविहारस्य दोषाहामाशयाश्र यावहिनिरस्यकोष्ठाग्निज्वरदास्यरसानुगाः२ (ज्वरके पूर्वरूप को कहैहैं) तापःशरीरेगुरुताऽलसत्वेसर्वांगपीडाबिरसत्वमास्ये ॥ शीतःश्रमोवीर्यबलस्यहानिः ज्वराग्रचिह्नानिवदंतिसंतः६(वान ज्वरकेलक्षण ) जम्भोद्वारतृषाकपायवदनंनिद्राविनाशोऽरुचिः श्वासोरुक्षवपुर्धमोविकलताशोपोमुखेऽक्षिस्रवः।। हिकाध्मानवि वर्णतांगचलनरोमोद्गमोंगव्यथा हल्लासोंत्रविगुंजनं भवतितद्वा तज्वरेलक्षणम् ७॥ घोर रूप ज्वरोंके चिह्न हैं तिन्हें मैं कहता हूं जिन चिह्न अर्थात् लक्ष- णों करके पंडितोंकरके रोग सब जानेजायें दक्षो करेहुये तिरस्कार से क्रोधित शिव तिनकी श्वास से उत्पन्न हुआ जो ज्वर सो आठ प्रकार का है १ वातसे २ पित्तते ३ कफसे ४ वातपित्तसे ५ वातकफले ६ पित्त कफसे ७ वात पित्तकफसेदभागन्तुजसे १ मनुष्यों के मिथ्या मादार और मिथ्या विहारसे आमाशय में रहते जो वात पित्त कफ सो प्रामाशयको विगाड़ करके फेर रसको बिगाड़ें और कोठेकी जो अग्नि उमकी गरमी को बाहर निकाल देहको तत्ता करदेवै उसीको ज्वरकहते हैं २ ॥ इति माधवकरः॥शरीरमें तप तथा शरीरका भारीपना आलस्य और सब शरीर में हडकल मुखमें स्वाद न रहे शीतका लगना अनायास श्रनमालूम हो। वीर्य बत्तकानाश होना ये चिह्न ज्वरके पूर्व होते हैं ६ जभाई डकार तथा प्यास का लगना मुखका कदुआहोना नींदका न आना अरुचि श्वास, शरीरका रूखापन भ्रम तथा शरीरमें वेकली मुखसूखे आंवले भांमूका चुवना हिचकीआना पेट फूलना शरीरका औरही वर्ण होजाना अंगका फडकना रोमांचकाहोना शरीरमें व्यथा सूखी उलटीका साना आतोंका घोलना ये लक्षण वातज्वर में होते हैं ७॥ (पित्तज्वरकेलक्षण)हत्कंठोष्ठकरांघ्रिदाहमरतिस्फोटंतषासंभ्रम योमाणश्वसनमुखेकटुकतांमूर्छामतीसारकम् ॥ हृत्कंपनयने हंसराजनिदानम्। रुणेविकलताशीतेरुचिंशोषणं खेदंदेहगतःकरोतिकुपितःपित्त ज्वरोन्तर्व्यथाम् ८ (इलेष्मज्वरलक्षणम्)स्तैमित्यंवमनंजडत्वम लसंनिष्ठीवनगौरवंमाधुर्यवदनेतनौमलिनतास्वेदचरोमोद्गमम्।। । कंठेघुघुरतांचीतनयनंनिद्रांत्वचिस्तिग्धतां कासशीर्षरुजकरो तिविकलंश्लेष्मज्वरोङ्गव्यथाम् (वातपित्तज्वर) भ्रमोरोमह । पोरुचिःश्वासकासौतृषांगेषुदाहःशिरोतिर्वमित्वम् ॥ विनिद्रांग पीडातिशोषोल्पमू.ज्वरेवातपित्तोद्भवेचिह्नमेतत् १० ॥ हृदय कंठ मोठ हाथ पायें इनमें दाहहोना इच्छाकानाश हडकलका होना प्यास भ्रम गरमी श्वास कडुमा मुख मूर्छा दस्त हृदय में कंप नेत्र स्तोल देहमें बेकरती शीतलता का प्यास लगना मुखसूखे खेदका होना अन्तःकर्ण में दुःख ये लक्षण कुपित पित्तज्वर देहमें करताहै ८ शरीर गीले कपड़े से पोंछे सरीखा मालूमहो उलटीका होना शरीरका जकड़ जाना आलस्य कफका थूकना देहकाभारीहोना मुखमीठाहो देह मेला पसीनेका आना रोयां खडाहोना कंठमें घुरघुर शब्दहोना कुछ पीलाई लिये नेत्रहों निद्राका अाना त्वचा चिकनाई लिये होय खांसी शिरमें दर्द ये लक्षण कफज्वरके हैं भ्रम रोमका खडाहोना अरुचि श्वास खांसी प्यास देह में दाह शिरमें दर्द वमन निद्रामा नाना देहमें पीडा अत्यन्त मुखका सूखना मूर्छाका पाना ये वातपित्तज्वरके लक्षगहें १० ॥ (वातकफचर )स्तैमित्यंगुरुतारुचिर्षिकलतातंद्रापिपासा लसं कासोङ्गस्फुटतावनिःश्वसनताशोथोमुखेलिप्तता। स्वेदःपर्व भिदारतिश्चजडतारोमोद्गमःशीततां वातश्लेष्मसमुद्भवस्यकथि तचिह्नज्वरस्याऽऽर्षिमिः ११॥ शरीर गीले कपड़े से पोंछे समान मालूम पड़े तथा शरीरका भारीपन शरुचि वेफली तंद्रा-प्यास पालकस खांसी अंगोंका फडफना रह इवास सूजन कफसे लिहसामुख पसीना गांठों में दर्द चैन न पडे जड़पना रो. मांच शीत लगना पुराने ऋपियों ने वात कफ ज्वरके लक्षण कहे हैं ११ ॥ (पित्तकफज्वर)तिक्तास्योरुचिताकफस्यवदने लेपोमुहुः ततातंद्रासंधिपुवेदनाचहृदयेदाहःपिपासाभ्रमः॥कास..

7 हसराजनिदानम्। स्तनौमलिनतास्वेदोवमिर्मोहता चिह्नपित्तकफज्वरे मुनिवरैः संकीर्तितंपूर्वजेः १२(तेरहसन्निपातोंकेनाम) संधिकश्चतिकश्चे व रुग्दाहश्चित्तविभ्रमः॥शीताङ्गस्तंद्रिकाप्रोक्ताकंठकुजश्चक पर्णकः॥विख्यातोभुग्ननेत्रश्च रक्तष्ठीवीप्रलापकः । जिहश्चेत्य भिन्यासस्सन्निपातास्त्रयोदशः॥ इतिसंग्रहीतपाठ (तेषांमर्यादा) संधिवासरासप्तश्चांतफेदशासराः । रुग्दाहेविंशतिज्ञेयावह न्यष्टौचित्तविभ्रमे।पक्षमेकंतुशीतांगस्तंद्रिकेपंचविंशतिः । विज्ञे.. याबासराश्चैव कण्ठकुब्जेत्रयोदशःकर्ण चित्रयोमासाःभग्नने दिनाष्टकमारक्तष्ठीवीदशाहानिचतुर्दशप्रलापके। जिनकेषोड शाहानिकलाभिन्याससंज्ञके।परमायुरिदंप्रोक्तमयतेतत्क्षणादपि कडा मुख अरुचि। मुख कफसे लिहसा वार २ जाड़ा गरमी का लगना तन्द्रा सन्धि में पीडा हृदय में दाह प्यात भ्रम खांसी श्वासका. जोर देहमें मलिनता स्वेद वमन मोह ये लक्षण पहिले मुनीश्वरों ने पित्त कफ ज्वरके कहेहैं १२॥ १ संधिक २ अन्तक ३ रुग्दाह ४ चित्त- विभ्रम ५ शीतांग ६ तन्द्रिक ७ कंठकुब्ज = कर्णफ ह भुग्ननेत्र १० रक्त- टीवी ११ प्रलापरु १२ जिह्वक १३ अभिन्यास ये तेरह तन्निपात हैं (तेरहों सन्निपातों की अवधि) सन्धिककी ७दिनकी यन्तककी १०दिन रुग्दाद की २०दिन चित्तधन की २४ दिन शीतांग की १५ दिन तन्द्रिक की २५ दिन कंठकुब्जकी १३ दिन कर्णककी ६० दिन भग्ननेत्र की दिन रक्तष्ठीची की १०दिन प्रलापकके १४ दिन जिहरुके १६ दिन अभिन्याम के १६ दिन कहे। यह सन्निपातों की परमाधिकहीहै परन्तु तत्काल भी रोगी मरजाताहै ये श्लोक संगृहीत है। (तेरहसन्निपातमें साध्यासाध्यवि०). संधिकस्तन्द्रिकश्चैत्र कर्णकःठकुजका जिककश्चित्तविभ्रंशःपट्माध्याःसप्तमारकाः संग्रहीतपाठः ॥ सन्धिक तन्द्रिक कर्णक कंठकुब्ज जितक चित्तविभ्रंश ये ६ साध्य बाकी सात असाध्य हैं। - . 1 7 M हंसराजनिदानम्। (सन्धिकसन्निपातके लक्षण) त्रिदोषोत्थितेसन्धिकसन्निपाते भवेत्संधिपीडाऽस्यशोषोथशूलं ॥ भ्रमोवीर्यनिद्राविनाशोतितंद्रा पिपासोप्टपाकोरुचिाहकासौ १३ (अन्तकमन्निपात केलक्षण) करोत्यंगभंगंभ्रमंप,यःशिरःकंपनंकंडुरंरोदनंच ॥ प्रलापंसता पंचहिकामसाध्यंबुधत्वं विजानीहितंचान्तकाख्यं १४ (चित्तवि भ्रमसन्निपातकेलक्षण) · चोमोहाद्रुदतिक्वचिद्विकलताप्राप्नोति शोकंक्वचित् फूत्कारंकुरुतेदधातिमदतांगीतकचिद्गायते ॥ स न्तापंसहतेमुदवितनुतवाचंभ्रमानाषते नित्तभ्रमसन्निपातम निशंजानीहिदुस्साधनं १५ ॥ तीनों दोपोंसे उत्पन्न हुआ जो संधिक सन्निपात तिसके ये लक्षण हैं सन्धीनमें दर्द मुखकासूखना शूज भ्रम वीर्य और निद्राका नाश तन्द्रा प्यास ओठोंका पकना अरुचि दाह और खांसी १३ अंगोंका टूटना भ्रम कम्प और शिरका हिलना खाज तथा रोना याहियातवकना सन्ताप हिचकीका माना जिसमें ये लक्षगहों उत्तको हे वैद्य तू शताध्य अन्तक सन्निपात जान १४ जो मोहसे रोवै कभी विकलताको प्रातदोकभी शोच करै कभी फूत्कार करे कभी मस्तपने को प्राप्तहो गीतगावे कभी संताप हो कभी प्रसन्नहोवे कभी भ्रमसे धानेलगे ये लक्षण जिसमेंहों उसे नहीं उपाय जिसका ऐता चित्तनम सन्निपात जानों १५ ॥ (रुगाहसन्निपातकेलक्षण)यःशूलंवितनोतिदारुणभयंहस्तां घ्रिशैत्यंतथा जिहांकंटकितांभ्रमविकलतांमोहंचकंठव्यथां ॥ श्वासंकासतरंनिरन्तरतृषांहत्कंठयोशोषणं सन्तापंश्रमरोदनंप्र लपनंजानीहिरुद्नाहकम् १६ (शीतांगसन्निपातलक्षणम्) शी तत्वविदधातियोऽखिलतनौरोमोद्गमवेपथु श्वासंकासतमंकचि च्छिथिलतांमूर्छामतीसारकं ॥ चेष्टांक्षीणतरांछवमथुतांहि कांशिरश्चालनं तंशीतांगमवेहिवैद्यहरिजमृत्योःसखाऽयंध्रुवं १७ (तन्द्रिकसन्निपातकेलक्षण). कंठेकंडुतृषाऽरुचिःलमथुता पीडार्तिकर्णद्वयोः जिहाश्यामतराचकंटकयुतातन्द्रातिसारोर हंसराजनिदानम्। तिः । सन्तापःकफवेदनाबहुतराश्वासोधिकःकाशता मृत्युस्या त्खलुतन्द्रिकोनिगदितश्चिह्नग्मीभिःपरैः १८ ॥ पेटमें शूत हाथ पैर ठंढे जीभमें कांटे भ्रम बेकली वेहोशी कंट मेंपीडा श्वास खांसी प्यास बहुत लगे हृदय कंठ का सूचना सन्ताप श्रम रुदन करना प्रताप ये लक्षण रुद्गाह सन्निगतके जानना १६ जिममें ये लक्षण मिलतेहो उसको वैष्णव पर मौत का मित्र शीतांग सन्निपात जानना चाहिये जो सर देहको शीतल करदे रोमखडे होजाये कंपवास खांनी अँधेरा सुस्ती कभी मूछी और दस्तकाहोना जितकी चेष्टा मन्दपडिजाय चिना श्रमकरे श्रमझे रद्द हिचकी शिरका कांपना १७ कंटमें खुजलीचले प्यास भमचि ग्लानि दोनों कानों में पीडा काली और कांटेयुक्त जीभ तंद्रा अतिसार अरति सन्ताप कफसे पीडा बहुत श्वासचले और खांनी इन लक्षणों से रोगीका मारनेवाला तन्द्रिक सन्निपात जानना १८ ॥ (कंठकुब्जसन्निपातकेलक्षण) कंठग्रहयःकुरुतेहनुग्रहमच्छी प्रलापंज्वरकंपवेदनाः ॥ मोहंचदाहहृदयशिरोरुजतंकंठकुजंप्र वदन्तिसाधवः १६ (कर्णकसन्निपातकेलक्षण) ग्रंथि:कर्णान्तदे शेभवतिबहुतराकंठदेशेतिपीडा ग्लानिःश्नासःप्रसेकोवचनशि थिलताश्लेष्मणरुद्धकंठः ॥ मूर्छाकंपःप्रलापोवपुपिकृशतमाये दनोष्माचकासः ॥ स्वस्वरूपंचरोगाविदधतिसततंकर्णकेसन्नि पाते २०॥ जो कंठमें पीडाकरै ठोडी जकड़ जावे मूछी तथा ककना ज्वर कंप देहमें पीड़ा बेहोशी हृदय में दाह शिरमें दर्द ये लक्षण कंठकुब्ज सन्नि- पातके महात्मा कहते हैं १६ कर्णक सन्निपातके ये लक्षणहैं कान के पास गांठ बहुतसीहों कंठमें दर्द ग्लानि श्वास लारकागिरना मन्द २ बोलना कफसे कंठका रुकना मूछी कंप और वकना शरीर कश तया पीडा भोर गरमी और खांसी तथा अनेकरोग प्रगटहाँ २०॥ इति कर्णक सन्निपातके लक्षण समाप्तहुये। (भुग्ननेत्रसन्निपातकेलक्षण)स्मृतिभ्रंशनंभुग्नक्सन्निपातःक रोत्यंगपीडांभ्रमभुग्ननेत्रं ।। ज्वरंवेपनंशून्यतांश्वासकासोप्रलापं प्रसेकंपिपासामसाध्यः२१(रक्तष्ठीवीसन्निपातकेलक्षण)छरिक्त हंसराजनिदानम्। ठीवनंकृष्णजिहांकासश्वासंमंडलंदाहमुग्रं॥संज्ञानाशंतापमध्मा नतृष्णांरक्तष्ठीवीप्राणनाशंचकुर्यात् २२ (प्रलापीसन्निपातकेल क्षण) प्रलापीरवःपुत्रगेहंप्रयातिज्वरोतापपीडांगकंपप्रयासः॥ पाशोकसंज्ञाविनाशप्रवादःशिरःकंपमोहांगदाहोविनिद्राः २३ ॥ बेहोशी हो अंगों में दर्द भौर का पाना नेत्रोंका बुरा होना ज्वर तथा कॉपना देहमें शून्यता श्वाम खांसी वकना लारका बहना प्यास ये ल- क्षस असाध्य भुग्ननेत्र सन्निपात के हैं २१ रुधिरकी उलाटीकरना जीभ फाती हो स्यांती श्वास चकत्ता पड़जावे घोर दाह हो संज्ञा जाती रहे ताप ज्यर तथा पेट का फूलना तृष्णाप्यात ये लक्षणहों तो प्राणकानाश फर्ता रक्तष्ठीवी सन्निपात जानना २२ प्रक्षापी सन्निपातवाला रोगी यम- लोक को जाता है और उसके ये लक्षण होते हैं ज्वर ताप पीडा कॉपना विना कारण श्रमहो प्यास शोच संज्ञानाश बकना शिरका हिलाना वे होशी अंगों में दाह नींदका न आना २३ ॥ ( जितकसन्निपातकेलक्षण ) जिहांकंटकवेष्टितांशिथिलतां श्वासाधिकंमूकतां रात्रौजागरणंतृषांवधिरतांवीर्यक्षयंक्षीणतां॥ हृत्पाश्र्वोदरनासिकाधरगलेशोथंविसंज्ञज्वरं कायेयःकुरुतेरुज बहुतरंजानीहितंजिक कम्२४(अभिन्याससन्निपातकेलक्षण)अ भिन्यासकोयस्यदेहेस्थितःस्याद्भवेत्तस्यमृत्युविनिद्रातितृष्णा ॥ ज्वरपाददाहोङ्गकंपोतिजाड्यंभ्रमाश्यासताकाशताक्षीणचेष्टा२५ (अजीर्णज्वरलक्षण) अजीर्णज्वरोलक्षणैरप्टभिभिषक्सत्तमै ज्ञायतेसप्तभिर्वा ॥ अतीसारउद्गारऊष्मातिनिद्राशिरोतिःला पोहिजृम्भोदरेरुक् २६ ॥ जीभ काटन करके युक्त तथा शिथिल श्वास का ज्यादह चलना गूंगा- पना रातमें जागना प्यास तथा बहिरापना वीर्य का नाशहोना दुर्वलता ® सविपचसप्ताहादशाहाहादशादपि । एकविंशदिन शुदःसन्निपातीसुजीवती ? (निदोपज्वरस्यमर्यादा) सप्तमीद्विगुणायावभवम्यैकादशीतथा ॥ एपानिदोपमर्यादामो क्षायवधायच २ पित्तकफानिलद्धचादशदिवसहादशाहसप्ताहात् ।। इन्तिविमुखिपुरुपनि दोपजोधातुमलपाकात् इति ३॥ ।

। १२ 'हंसराजनिदानम्। हृदय पसवाड़े पेट नाक मोठ गला इनमें सूजनहो बेहोशीज्वर ये जिसकी देह में हों उनको जिसक सन्निपात जानो २४ जिसकी देह में अभिन्यास सन्निपातहो उसके ये लक्षण हैं नींद पावै नहीं प्रति प्यास दो ज्वर पैरों में दाह अंगोंका कांपना बेहोशीमार श्वास खांसी चेष्टा मंद ये लक्षणवालेकी मौत होय २५ इतित्रयोदशलन्निपाताः॥ अजीर्णज्वर पाठलक्षणों से अथवा सात लक्षणोंसे जाने सो ये हैं भती- सार १ डकार २ गरमी ३ अतिनिद्रा ४ शिरमेंदर्द ५ खोटायोलना ६ सँभाई ७ पेटका दूखना ८ । २६ ॥ (आमज्वरलक्षण) हल्लासलालाश्रुतिवांत्यरोचकैःक्षुन्नाश निद्राबहुमूत्रतालसेवकाल्पवरस्यबलातक्षपैरामज्वरोवैद्यवरै विलक्ष्यते २७(रक्तज्वरकेलक्षण) प्रलापोङ्गदाहोमुखाद्रक्तपात स्तृषास्फोटनामोहतांगप्रपीडा॥भ्रमोरक्षनेत्रेथनिद्राविमूर्छाभ वंतीहरक्तज्वरेलक्षणानि २८ (दृष्टिज्वरलक्षण) मुहुर्महुर्जुम्भन मंगदाहविस्फोटनसंधिषुशूलमुग्रं ॥ स्तब्धेक्षिपीछर्दिमनाहतां योदृष्टिज्वरःसंकुरुतेविवर्ण २६ ॥ खाली भोकी भावे लार वहे रहहो भरुचि भूख न लगे नींद मूतका ज्यादा उतरना पालस मुख घेरसहो वल भोर भूख का घटना तथा सई हो इन लक्षणों से पद्यों में चतुर सो धामज्वर जाने २७ चकना और अंगों में दाह मुख से रुधिर का गिरना प्यास हडकल बेहोशी अंगों में पीडा भोर लाल नेत्र नींवका.भाना मूर्छा ये रक्तज्वर के लक्षण, २८ यारबार भाई का माना शरीर में दाह शरीरका टूटना सन्धि २ में दर्द भयानक नेत्र वमन धानाह शरीरका वर्ण घोर तरहका होजाय ये दृष्टि ज्वर के लक्षण हे २६ ॥ (भूतज्वरकेलक्षण) भूतप्रेतपिशाचदैत्यदनुजैर्जातोज्वरोरा क्षसैर्यस्तापहदिवेपथुवितनुतेमूर्छाप्रलापमदं॥ जृम्भामंगविम ७ (मसगावहारिदकसग्निपातस्यलक्षणग्रन्यान्तरात ) हारिद्रदेवनखनेत्रकरांघ्रिताप निष्टीवनादिकसनरूपलखितोयः ॥ हारिद्रास्सकथितःकिलसन्निपातः साध्योनचैवभिपना ऽपरकालरूप.५॥

१३ हंसराजनिदानम् । ईनंविकलतांहास्यकचिद्रोदनंगीतंरक्तविलोचनंमनुजतंजानीहि भूतज्वर ३०॥ भूत प्रेत पिशाच दैत्य दानव राक्षस इनसे जो ज्वरहो उस्तके ये ल- क्षणहें शरीरतत्ता हृदय में कम्प मूर्छा व्यर्थ बकना मस्तहोना जंभाईका भाना शरीरको तोड़ना बेकली हँसना कभीरोना कभी गीतगाना लाल२ नेत्र ये लक्षण भूतज्वरके हैं ३० ॥ ( मलज्वरलक्षण) प्रलापोंगतापोश्रमोहद्विदाहस्तृवोद्गार निष्ठीवनेपूर्णदृष्टिः। सकृन्मेहनंकंठजिह्वोष्ठशोष शिरोगौरवंविट ज्वरेलक्षणानि ३१ (खेदज्वरलक्षण)विष्टंभनंस्फोटनमंगदेशे श्वासःपिपासालसताप्रसेकास्वेदोतिनिद्रामदवीर्यनाशोभवंति खेदज्वरलक्षणानि ३२ (शापज्वरकेलक्षण ) श्यावास्यतोद्वेग वमीपिपासाविनष्टचेष्टाभ्रमतापमूर्छाः॥दुर्गधतांगेहदिवेपथुत्वं भवंतिशापज्वरलक्षणानि ३३ ॥ खोटा बोलना शरीरतत्ता हृदयमें साह प्यास डकार बार २ थूकै टेढ़ा देखे थोड़ा थोड़ा दस्त उत्तर कंठ जीभ ओठ इनका सूखना शिरभारी ये मलज्वर के लक्षण, ३१ पेटका फूलना शरीरमें हड़कल श्वास प्यास पालस लारका गिरना पसीना अतिनिद्रामस्तपना वीर्यकानाश ये खेद- ज्वरके लक्षप ३२ मुद्दकाला उद्देग रह प्यास शरीरकी चेष्टाका नाश - होजाना भौर शरीर तत्ता मूछी देहमें यासका आना हृदयफा कांपना ये सब शापज्वरके लक्षण ३३ ॥ ( औषधजनितज्वरकेलक्षण ) भवेदौषधीगंधजेचिह्नमेत ज्ज्वरेचित्तविभ्रंशतारक्तनेत्रे ॥ शिरोरुग्वमिर्मूर्च्छतागात्रशोपि पासालमत्वचनिद्राविनाशः३४ (भयज्वरकालक्षण) भयात्कस्य चिदुद्भवेघोररूपेज्वरेचिह्नमेतद्भवेदंगकंपः ॥ मुखेशुष्कताभ्यंत रेत्यतपीडाप्रलापोथचित्तभ्रमःशोकमूर्छा ३५ ॥ विपेल औपधके सूंघने से जो ज्वर पैदा होताहै उसके ये लक्षण होते हैं चित्तफा डामाडोलहोना लाल २ नेत्र मथवाय उलटीनका होना मूर्छा . हंसराजनिदानम् । -शरीरफा सूखना प्यास ग्लानि नींदका न घाना ये लक्षण औषध जनित ज्वरकेहे ३४ जिप्स किसीको भय से ज्वर पैदा हुआहो उसके ये लक्षण हैं शंगों का कांपना मुखका सूखना शरीर में बहुत पीडा व्यर्थ चकना चित्त चलायमान शोच और मूर्छा ३५ ॥ (कोपज्वरकेलक्षण)भवतीहकोपज्वरेलक्षणानिस्फुरद्गात्रभं गचलद्रक्तनेत्राप्रलापोथहल्लासकंपार्तिमू विवर्णःप्रसेकोमुख स्तालुशोषः३६(शस्त्रघातज्वरलक्षण)शस्त्रास्त्रदंडाश्मकशादि घाततोजातेज्वरेघोरतरेहिलक्षणं ॥ तापापिपासाकफकंठरुद्धता शोथःप्रलापोऽरुचिरार्तिताभवेत् ३७ (अभिचारज्वरकेलक्षण) ज्वरेभिचारसंज्ञकेभवंतिलक्षणानिषट्॥प्रलापशूलमोहतास्तषां गपतारुचिः३८॥ ये कोपज्वरके लक्षण, अंगोंका फड़कना शरीरका टूटना चलायमान जाल २ नेत्र वाहियात पकना खाली रदका पाना कांपना दुःश्वका होना मूच्छी शरीरका वर्ण शोरही तरहका होजाना लारका टपकना मुख और तालूका शोप ३६ शस्त्र कहिये तलवार और छुरी शादि और अस्त्र वो दंड कहिये लकड़ी यादि अवस कहिये पत्थर कशादि कहिये कोरड़ा आदि इ- नके लगने से जो ज्वर पैदाहो उसके ये लक्षण हो ज्वरहोप्पासहो कफसे कंठका रुकना सूजन बड़बड़ाना अरुचि दुःख ये लक्षण हैं ३७ अभियार से तथा मंत्रको उमटा जपने से जो ज्वरहो तथा किसीने जादू कियाहो, इस ज्वरमें मुख्य ६ लक्षण होते हैं बडबडाना पेटमें शूल बेहोशी प्यास शरीरकाापना अरुचि ये ३८ ॥ (कामज्वरकेलक्षण)रोमोद्गमःसाहसहर्षजृम्भाभीतिर्विषादो मदशोकरोषाः॥ एतानिचिहानिभवंतियस्यकामज्वरतंकथयंति वैद्याः ३६ (अथस्त्रीप्रसंगाजनित) स्त्रियोत्यंतसंगाद्भवेञ्चित मेतज्ज्वरोग्लानिनिष्ठीवनश्वासकाशं ॥ भवेद्वेपथुर्गात्रदेशेम्बुपूर स्तृषानिर्वलत्वञ्चपीडांचशोथः ४०॥ रोमांच साइस जंभाई डरका लंगनी दुःखका होना मोहदो औरतथा शोच क्रोध ये लक्षण लिसमेंहों उसको वैद्य सब कामज्वर कहतेहैं३६ नो ITS- हंसराजनिदानम्। १५ मनुष्य बहुत स्त्री से मैथुन करै उससे पैदाज्वरके ये लक्षण है ज्वरकाहोना ग्लानि वेरवेरमें थूकना श्वास खांसी कंप शरीरमें पतीना भाना प्यास नाताकती पीड़ा सूजन ये ४० ॥ (क्षीणधातुमंदाग्निजज्वरलक्षण)धातोःक्षीणतयाथवाग्निराम नाज्जातोज्यरश्चितया शैथिल्यंकुरुतेरुचिंवितनुतेधत्तेतनौपा एडुतां॥सर्वागन्तुदतेददातिकृशताहर्षपरंनाशते ॥ वीर्यत्वंज यतरुतंनसहतेश्वासंभ्रमविभ्रते ४१ (सन्ततज्वरकेलक्षण) वसतिरुधिरधातीयोज्वरोद्वादशाहं क्वचिदपिचदशाहंसन्ततंस न्ततोय॥ प्रभवतिखलुनाम्नाश्वासकाशंविधत्तेज्वरयतिनरदेहं यातिनाशंसपश्चात् ४२(विषमज्वरकेलक्षण) निरन्तरंतिष्ठ, तिसर्वदेहेसूक्ष्मोज्वरोयोविदधातिशैत्यं ॥ अत्युष्णतांयातिकदा चिदेवतंकष्टसाध्यंविषमंवदन्ति ।। ४३ ॥ धातुके क्षीण होने से तथा मंदाग्निके होनेसे तथा चिन्तासे जो ज्वर पैदाहो उसके ये लक्षण शिथिलता अरुचि शरीर पीलाहो सर्वाग में पीडा हो तथा शरीर का शहोना दर्प जातारहे वीर्यकानाश उवासीर का होना ४१ जो ज्वर रुधिर धातुमें पहुंचजाय वो ज्वर १२ तथा १० दिन बराबर बनारहे उसको संतत ज्वर कहते हैं उसमें प्रवास खांसी तथा सबदेह का जरना बाद थोड़े दिन यह ज्वर मारडाले है ४२ जो ज्वर मन्द होके सब देह में बराबररहे और कभी शीतलगे कभी ज्यादा शरीरगरमहो जाय उत्तको कष्टसाध्य विषमज्वर कहै हैं ४३॥ (महेन्द्रज्वरकेलक्षण) अहोरात्रयोर्वाद्विकालेत्रिकालेचतु कालकेवाप्रतिनित्ति ॥ करोतिज्वरोयःस्वतन्त्रोतिरौद्रोमहे न्द्रोहिनाम्नानिरुक्तोमुनीन्द्रः ४४ (वेलाज्वर केलक्षण)अहोरा त्रयोरेकदेशेज्वरोयः समागत्यदेहेस्वरूपंविधाय । नरंपीडयेन्नि त्यशोनिर्दयन्तं विजानीहिवेलाज्वरंवेवराजः४५॥ जो दिनरातमें दोदफेवा तीन वा चार दफे भावे और उत्तरजाय उस स्वतंत्र ज्वर घोरकामदेन्द्र नाम मुनियोंने फहाद ४४ जो ज्वर दिन रात में एक टफे एक अंगमें मायके फेर सब शरीरमें फैलकर शरीर को बहुत दुःख दे नित्य उसको वैद्य बेला ज्वर जाने ४५॥

१६ हंसराजनिदानम्। (एकांतरज्वरकालक्षण) दिनैकांतरेयोविधायोग्ररूपं नराणां शरीरेप्रपीडेन्नितान्तं ॥ दिनैऋविमुच्याथधातंश्चशेतेतमेकान्त रत्वंविजानीहिवैद्यः ४६ (एकान्तरज्वरलक्षण) एकान्तरोज्व रोघोरोद्विविधापरिकीर्तितः ॥ शीतेनैकासमायातितापेनायाति योपरः ४७ (वाहिकज्वरलक्षण) दिनयन्तुविश्राम्यमेदोम ज्जास्थिधातुषु ॥ यःकुप्यतितृतीयेह्नित्राहिकन्तंविदुर्बुधाः ४८॥ उसको हे वैद्य तू एकान्तर ज्वरजानजोएकदिनमेंघोररूपहोके मनुष्योंके शरीर को दुःखदे और एक दिन छोड़ कर आवै और धातून को सुखाय ढाले उसको ४६इकतरा घोरज्वर दोप्रकारकाईएकशीत लगकरावे और एक गरमीसे आवै ४७ जो ज्वर मेदा मज्जा हड्डीमें पहुंचजाताहै और दो दिनबीचमें देकर तीसरे दिनावैउसको त्राहिक अर्थात् तिजारी पण्डित लोग कहते हैं ४८॥ (चातुर्थिकादिज्वरलक्षण) एवंचातुर्थिकोज्ञेयःपाक्षिकोमासि कस्तथा ॥ वार्षिकोमुनिभिःत्रोक्तोवर्षमायातिनाऽन्यथा ४६ (देव कोपजनितज्वरलक्षण) वापीकूपतडागगोपुरमठप्राकारवेदिन पा देवांगोपवनानिदेवसदनंछिन्दन्तियोमण्डपं ॥ माधुब्राह्मण योगिनांपिलगवांपीडांप्रकुर्वन्तिये तेषांदेवधरप्रकोपजनितोघोर ज्वरोजायते ५० (एकांगज्वरलक्षण) प्राणिनामेकमंगंयोज्वरो रुजयतिध्रुवं ॥ तस्यांगस्य चयन्नामतन्नाम्नावरउच्यते ५१॥ ऐसेही चातुर्थिक ज्वरजाने तथा पाक्षिक भर्थात् जो पंद्र: दिनावे तथा मासिक जो महीना में आवे तथा वार्षिक नो वर्षदिनमें आवेधीच नहीं श्रावे ये मुनिन ने कहा है ४६ जो मनुष्य वावली कुमा तालाब गोपुर मढ़ी प्राकार यज्ञकी वेदी प्याऊ देवप्रतिमा बाग मंदिर मंडप इनको तोड डाले तथा साधु ब्राह्मण योगी माता पिता गऊ इनको दुःखदेते हैं तिन को ईश्वरके कोपसे घोर ज्वर पैदाहोताहै ५० मनुष्योंके कोई से एक अंगमें ज्वरचढ़े और उस अंगका जो नामहो वह ज्वर उसी नामकरके कहा जाता ५१॥ ।

हंसराजनिदानम् । ज्वरस्तुयस्यसंस्पर्शाद्गन्धाहादर्शनादपि ॥ ज्वरोभवतितन्ना स्नाइतिरोगविदोविदुः ५२ ( अंतकज्वरलक्षण) श्वासोमांच हतेगलंकफचयैःसंरुद्धतेयोमुखास्फेनंसंवमतेशिरांविधमतेकाशं विधत्तरति।आध्मानंकुरुतेचमोहमचिंहिकामतीसारतविद्या ज्ज्वरमंतकप्रियसखंमृत्योरसाध्यमशं५३(शोकज्वरकेलक्षण)अ थीऽपत्यकलत्रनामुहृदांशोकोद्भवायोज्वरःशैथिल्यंकुरुतेनरंवि मनसंश्वासमुहुर्वेदनास्तैिमित्यंविकलंभ्रमंबधिरतामच्छीवलोज क्षयंप्रस्वेदंबहुमोहतामरुचितांनिद्रांतनौपांडुतां ५४ ( रस गतज्वरलक्षण) कुर्यात्वचिस्थःपवनज्वरोनिशरोद्दमरूपत्वंगा क्षिमीलनं ॥ जृम्भांगमईश्रवणाक्षिवेदनां विण्मूत्रवंधमुखमिष्ठ तारती ॥५॥ और जो ज्वर किसीवस्तु के छूनेसे अथवा सूंघनेसे वा देखनेसे हो वह उती नाम से विख्यात होताहे ऐसे रोगके जाननेवाले कहते हैं ५२ - श्वासका ज्यादा चलना गला कफके समूह से रुकाहो और जो मुखले झागगेरे नाडीका बोरसे चलना खांसी इच्छा का नाश पेटका फूलना बेहोशी और अरुचि हिचकी दस्त का होना ये लक्षण कालज्वर मृत्युका प्यारामित्र जानना ये अलाध्य५३ द्रव्य पुत्रादि स्त्री भैया सुहृद इनके नष्टहोने के शोकसे जोज्वर होताहे उसके ये लक्षण, शरीरमें शिथिलता मनका बिगड़नाना श्वास बेर २में दुःखका होना शरीर गीलेकपडेसे पोछा साहो बेकली बहिरापना मूर्ती तथा बल तेज इनका नाशहोना पसीना बहुतहो येहोशी अरुचि नींद शरीर पीला ५४ घातज्वर त्वचा में होतो येलक्षण हों रोमांच तथा त्वचाका रूखापन योरखाका मीचना जंभाई अंगों का टूटना कान अांखमें दर्द दस्त पेशाब का बंदहोना मुख मीठा तथा भरति ५५ ॥ (त्वग्गतवातज्वरलक्षण)रक्तत्वचंदाहमतीवतृष्णामास्येकटु वंपरिदेहशोषंाऊष्मानमातिवहुशीतलेच्छोपित्तज्वरश्चर्मगतः करोति ५६ (त्वग्गतपित्तज्वरलक्षण) लालामुखेगौरवमालसत्वं निष्ठीवनंशीतवपुःशिरोति ॥ निद्रांचमूत्राधिकतांप्रलापंश्लेष्म ज्वरश्चर्मगतःकरोति५७(त्वग्गतकफवरलक्षण)ज्वरःशोणित 1 हंसराजनिदानम्। स्थोभ्रमंदेहदाहंसरत्वंचनिष्ठीवनंतायनेत्रं ॥ शिरःपीडनंशोपमू प्मानमातिपिपासामरोचंकरोतीतिमू.५८ (रक्तगतज्वरलक्ष प)पिपासाशिरोतिर्वमिःशुलमुग्रंप्रलापोंगकंपोरुचिमनस्यं । वपुःस्वेदरोमांचितंकंठदाहोरसस्थोज्वरोलमणैर्ज्ञायते ः ५६ ।। लालत्वचादाहअत्यन्तप्यासमुखकडुवाशरीरकासूरखनागरमीमालूमहो घबडादट शीतलवस्तुकीइञ्छा लक्षण पित्तज्वरत्वचामें होयतोहोते ३५६ मुखसे लारकावहना शरीर भारी भालस कफका थूकना देह शीतल मथ- वाय निद्रा पेशावका ज्यादा गिरना बड़बड़ाना येलक्षण कफवर चर्ममें पहुंचता है तब होते ५७ जोज्वर रुधिरमें पहुँचजावे उसके ये लक्षणहें । भौर देहमें दाह रुधिरमिला थूकना तांबेसरीखे नेत्रलाल शिरमेंदर्द शोप गरमी घबड़ाहट प्यास अरुचि और मू ५८ प्यास मथवाच वमन दर्द बड़बड़ाना अंगोंमें कॅपकँपी अरुचि मनका बिगड़ना शरीरमें रोमांच तथा पसीना कंठमें दाह येलक्षणोंसे जानो फि इसकेरसमेंज्वरपहुँचगयाहै५.६॥ (मांसगतज्वरलक्षण) भवंतिज्वरेमांसगेलक्षणानितमोष्मां गमर्दोश्रमोमूत्रकृच्छ्रः॥ वपुःस्वेदमभ्यंतरेतीव्रदाहस्तृषावेदनाछ दिरार्तिःप्रलापः६० ( मेदगतज्वरलक्षण) भवंतिज्वरेमेदगेल क्षणानिशरीरेतिदुर्गधितादंतपीडा ॥ मुहुमूत्रतावनिनाशःकृश स्वविषादोल्पसारोरुचिःश्वासकाशो६१ (अस्थिगतवरलक्षण) ज्वरेस्थिप्रदेशेगतेलक्षणानिभवंत्यस्थिविस्फोटनंपर्वभेदः॥शरी रस्यविक्षेपनंदेहदाहस्तृषोप्माविलापोभ्रमःस्वेदतापी ६२॥ मांसमें जब ज्वर पहुँचजाताहै उसके ये लक्षण होते हैं अंधेरा पाना गरमीका लगना शरीर का टूटना भार पेशाब का रुक २ के गिरना शरीर में पसीना हृदयमें ज्यादादाह प्यास वेकली रद्द दुःख बड़बड़ाना ६० मेंदामें ज्वर पहुँच जाताहै उसके ये लक्षण, शरीरमें बासमानादांतों में दर्द वेर २ मूतना जठराग्निका नाश देहलश दुःख वस्तका घटना अरुचि इवास और खांसी ६१ जिसका ज्वर हंडोमें पहुँच जाताहै उसके येलक्षण है हडफूटनहोसंधि२ में पीडा देहका इधर उधर पटकना तथा देहमेंदाह वास गरमी बिलाप भ्रम पसीना तथाज्वर ६२ ॥ .. - Tr हंसराजनिदानम्। १९ (मज्जागतज्वरलक्षण) वहिःशीतताभ्यंतरेत्यंतदाहातमः कंपनमर्मभेदःप्रलापः। तृषाश्वासहिकातयोमूत्ररोधंभवतिज्वरे मज्जगेलक्षणानि ६३ (शुक्रगतज्वरलक्षण) जरःशुक्रदेशेस्थि तेमृत्युदूतस्तदाज्ञायतेसप्तचिह्नभिषग्भिः ॥ भ्रमोवीर्यनाशःत्व चाहीनशोफोबलोजःक्षयश्वासकासौलमत्वं ६४ (धातुपाकीज्वर लक्षण) निद्रावलोजोरुचिवीर्यनाशोहद्वेदनागौरक्ताल्पचेष्टा ।। विष्टंभतायस्थ किलारतिःस्यात्सधातुपाकीमुनिभिःप्रदिष्टः६५ ॥ बाहर से जाडालगे भीतर अत्यन्त दाहहो अंधेरा भाना कापना मर्म स्थानों में दर्द बड़बड़ाना प्यास श्वास हिचकी वेकली मूतका रुकना ये लक्षण मेदामें ज्वर पहुंच जाताहै तब होते हैं ६३ जवमौतकादूत ज्वर शुक्र याने वीर्य मे पहुंचजाय उसको वैद्य सातलक्षणों से जाने भौर वीर्य कानाश त्वचाका हीनहोंना सूजनहोना बल तेज इनका नाश श्वास खाली ग्लानि, ६४ नींद बल तेज इच्छा वीर्य इनका नाश हृदयमें दुख शरीरका भारीपना अल्पचेष्टा दस्तका रुकना मनका न लगना लक्षण जिसमें हों उसको धातुपाक मुनियोने कहाहै ६५॥ (तथाच) कायेधातुविपाकिनांपरकरस्पोंपिवजायते रात्रिः कल्पशतार्यतेल्पतरभोदीपोपिदावायते ॥ शब्दोबाणसमायते मृदुगतित्तिस्त्रिशूलायते यूकाशूचिकुलायतेतनुतनवासोपिमा रायते ६६ ( ज्वरस्यदशोपद्रवाः) ज्वरस्यप्रसिद्धादशोपद्रवाः स्युस्तृषाविद्ग्रहोछद्यतीसारहिका ॥ शरीरस्यभेदोरुचि.श्वास कामौसमू हिभागहेंयंतेप्रदद्युः ६७ ॥ धातुपाकी मनुष्य की देहमें हाथका स्पर्श वजके समान मालम पड़े अल्परोशनीवालाभी जो दीपक सोभी ज्वालाके समान मालूमहो बोल- ना वाणके समानलगे मन्दगति चलनेवाला पवन त्रिशूल के समानलगे जुयां खटमल आदिका काटना सुईके समानलगे छोटाभीवस्त्र शरीरपर भारा लगे ६६ ज्वरके उपद्रव दश प्रसिदह प्यास दस्तका बंदहोना रद्द अतीसार हिचकीअरुचि श्वास खासी ६७॥ 1 जो २० हंसराजनिदानम्। शरीरस्यबाह्येयदाश्लेष्मवातीभवेतांतदाशीतलबाह्यदेश ॥य दाभ्यंतरेऽभ्यंतरेशीतलत्वंभवेद्यत्रपित्तंविदाहोपितत्र ६८ यस्मि नङ्गेवायुर्यातितस्मिन्नंगेपीडांकुर्यात् ॥ पित्तंदाहश्लेष्माशीतंसर्वा नदोषान् सर्वेकुर्युः ६६ अंतर्दाहःप्रलापःश्वसनमतितृषानिग्रहो दोषवर्धेस्वेदःसंध्यस्थिशूलंभ्रमविकलतनसंधिदेशेषुपीडां॥ अं तरवेगस्यचिह्ननिगदितमपरैवैद्यराजे रस्य दाहादीनांलघुत्वं यदिभवतिबहिर्वंगरोगस्यचिह्न ७० ।। यदि वात कफ शरीरके वाहरहोवे तो बाहरका सवभाग शीतलरहे और वातकफ शरीरके भीतरहो तो भीतरही शीतलतारहै मौर पित्त जिस जगह होय तो दाहभी उसी जगहजाने ६८ जिस अंगमें वाय यानी वादी हो उसी अंगमें दर्दहो और जिस अंगमें पित्तहो उसी अंगमै दाहहो और जिस अंगमें कफहो उसी अंगमें शीतलता हो और जिस जगहपरजितने दोपहों उतनेही रोगोंको पैदा करें है दो होय तो दो और तीन होय तो तीन और एक होयतो एक ६६ शरीरके भीतर दाह हो वाहियात वकना श्वास अत्यन्त प्यास का रुकना दोपोंका बढ़ना पसीना संधिनमें तथा हड्डीनमें शूलका चलना भौंर ७०॥ (असाध्यलक्षण ) भवेद्यस्यदुर्गधताश्वासवाहेतथांगप्रदेशे तिकंपोविवर्णः ॥ वहिःशीतताभ्यंतरेत्यंतदाहःसरोगीरवःपुत्रगेहं प्रयाति ७१ कृशःपिच्छलांगोमहाश्वासवाहोभ्रमोहटरोमारुणा क्षोंगकंपः । तमोरात्रिदाहो दिवाशीततार्तिःसरोगीनजीवेत्कदा चित्सुधाभिः ७२ जिलाश्यामतराथकंटकयुताराौदिनेजागर मुश्वासोनिर्गतलोचनेशिथिलतानासामुखेशुष्कता॥ यस्यांगेप रिमंडलानिबहुशोमूप्रिलापस्तमः काशोरुद्धगलोगदीसगदि तोसाध्योभिषग्भिःपरैः ७३ ॥ ऐसा रोगी रविकापुत्र जो यमराज ताके घर जाताहै कैसा कि जिसके श्वास निकसने में वास आवे तथा शरीरमें अत्यन्त कँपकँपी शरीर का विवर्ण बाहरसे शीतलता और भीतर अत्यन्त दाह ७१ कश पिच्छलदेह m . हंसराजनिदानम्। २१ बड़ी २श्वासका चलनाभ्रम हट रोमलालनेत्र अंगमें कंप अंधेरेकायाना रातमें दाहहोना दिनमें जाड़ा लगना तथा दुःख ऐसा रोगी अमृतकरके भी नहीं जीवे ७२ जीभ जिलकी काली और कॉटेलेव्याप्त दिनरात जा- गना श्वामका चलना नेत्रों में सुस्ती नाक मुखका सूखना जाके देहमें सविरके चकत्ता पड़गये होय मूर्छा बड़बड़ाना अँधेरा आना खाती से गलेका रुकना ऐता रोगी वैद्योंने असाध्य कहाहै ७३ ॥ भवेद्यस्थनेत्राश्रुपातोंगहीनोमुखान्नासिकायापतेदूक्तधारा ।। मुखंकुंकुमाभंगलेकर्णमूलंसरोगीनजीवेत्कदाचित्प्रयत्नैः७४कृश स्थूलतास्थूलताया कृशत्वं स्फुटन्नेत्रगोलंस्वभावोऽन्यथास्या त् ॥ शरीराईशूलं त्वचाहीनशेफोगमिष्येत्मरोगीयमस्यालय ७५ गदीजिकयायोरसंवेत्तिनैवश्रुतिभ्यांनशब्दंननेत्रेणरूपं ॥ त्वचापशमुग्रंनसानैवगंधंसरोगीनजीवेत्सहोरुपायैः ७६ ॥ जिसके नेत्रोंसे आंशूका गिरना शून्यदेह मुख नाकसे लोहका गिरना मुंह जिसका लाल गलेमें कर्णमूल रोगहो वह रोगी कदाचित् यत्नों से न जीवे ७४ कश तो मोटा और मोटा कृश और नेत्रों के गोल फटेसे मा- लूमहों स्वभाव पलट जावे आधे शरीर में गूल चलै त्वचाहीन लिंगेन्द्री हो वह रोगी यमराजके घर जायगा ७५ जिस रोगीको जीभसे स्वादन मालूमहो और कानों से शब्द न सुने और नेत्रोलेजिसे दीखैनहीं त्वचा में स्पर्श न मालूमहो नाकसे गंध न मालूमहो ऐसा रोगी हजार उपाय करने परभी नहीं बचेगा ७६ ॥ भवेद्यस्यबाह्यांतरेशीतगात्रंनजीवेगदीचंडरश्मेसुताभ्यांप्र लापंशिरचालनंयाकरोति सुपेणादिवैद्यैरसाध्योनिरुक्त ७७ ग तायुमनुष्योनपश्येत्स्वजिबाँध्रुवनासिकाग्रंवशिष्ठस्यभार्याम् ॥ स्वकीयांचछायांविशीप सरंध्रांभृशंयातिनाशनरो योनुपश्येत् ७८ स्वरोयस्यहीनोगुदायस्यभ्रष्टाशरीरेकृशत्वंबलोजोविहीनः निमग्नेक्षणीसंभ्रमः श्वासकाशोसरोगी यमस्यालयेयातिशी घ्रम् ७४॥ जिसका बाहर भीतर शीतल शरीर हो वह रोगी चंदरदिम जो सूर्य -- २२ हंसराजनिदानम्। तिसका पुत्र यमराज तिस करके मरे तथा बडबडाना शिरका इधर उधर पटकना जो रोगी करे वो सखेणादि वैद्यों करके असाध्य कहा है ७७ भरनेवाला मनुष्यअपनी जीभ ध्रुवका तारा नासिकाकाभग्रभाग अरुंधती इनको नहीं देख तया अपनी छाया का मस्तकनहीं दीखे तथा अपनी छाया में छेददीखे वो रोगी निश्चयमरे ७८ स्वरजिस रोगीका मदहो गुदा जिसकी भ्रष्ट शरीर कृश तथा निर्बल चार तेतरहित नेत्र जिसके भीतरी धेसजायँ संत्रम श्वास खांनी ऐसारोगी यमपुरको जल्दी जावे ७६ ॥ रुदतिहसतिगीतंगीयतेक्वापिकालेश्वसतिमुदतिचिसेभाषतेदु चांसि।प्रलपतिपरिदेववादतेनृत्यतेयोवहत्तिबहुलतापयास्यते मृत्युवकेट ० (अथरोगमुक्तस्यलक्षणं) विमुक्तरोगस्यनररयलक्ष एंविड्वंधमोक्षौमनसिप्रसन्नता ॥ देहेलघुत्वरसनातिकोमलास्व ल्पाषेच्छारसभोजनेभवेत्८१ उरसिशिरमिकंडूरात्रिनिद्रांत्रगुं जाभवतिविशदचेतःस्वल्पतृष्णांगरौक्ष्यं ॥ मुखकर्णविपाकास्त्रे दयुक्तंशरीरंकृमिमलपरिपूर्णरोगमुक्तस्यचिह्न ८२॥ रोवै हसे कभी गीतगावै श्वासले कभी चित्तमें प्रसन्नहो कभी खोटा घोले बडबडावे कभी वेदनाहो कभी ताली बजावै कभी उठकर नाचने लगे और ज्वर बड़े जोरसों हो वो रोगी निश्चय मौतका ग्रासहोवै ८० नीरोगी मनुष्यके ये लक्षणहें दस्त खुलकरहो मन प्रप्तन्न हलका शरीर जीभकोमल प्यासकम रसभोजन में इच्छाहो८१ हृदय में और माथेमें खुजालचले रातमें अच्छीतरह नींदाचे प्रांतोंका योलना चित्तप्रसन्न अल्प प्यास शरीर रूखा मुख और कानका पकना पतीने का आना मत कीडोंसेपरिपूर्ण ये रोग दूर हुयेके लक्षणहे ८२ ॥ शीतंगदंयस्यशुभाचदृष्टिश्चैतन्यकायःकफहीनकंठं ॥ स्व ल्पांगतापोरसनातिशुद्धाशीर्षलघुत्वंसरुजाप्रणश्येत ८३ तारु एयंविदधातिषट्सुदिवसेष्वाद्येषु घोरज्वरस्तस्मिन्नौषधमुत्कटंग दहरोदयानकालेकचित् ॥ दोषापद्रवसंयुतेतितरुणेदेयंझटित्यौ पर्धवार्दिक्यंदिनपंचतेषुपुरुतोजीर्णज्वरोतःपरं८४(ज्वराणांस्व रूपाणितेषां) गत + स्थिति .

. करते हैं इस हंसराजनिदानम्। २३ पिंगाक्षोथमहोदरोथपरतोरौद्रौज्वलद्विग्रहः ॥ शंभोश्वाससमुद्भ वाभयकरादक्षकतुध्वंसका घोराघधरनादिनोमुनिवरैः प्रोक्ताज्व रास्तेष्टधाः ८५॥ शीतलतो गुदाहो शुभजिसकी दृष्टी शरीरमें चैतन्यता कफरहित कंठ देहमें मंद गरमी जीभ शुद्ध शिर. हलका ये लक्षण गत रोगके हैं ८३ पादिके छः दिनमें तो घोरज्वर तरुण होताहै तिसमें करडी रोग इर्ती दवाई कभीनदे और कदाचित् तेरुणज्वरमें दोपों का उपद्रवहोतो जल्दी दवाई देवै तो छः दिनसे परे पांचदिन तक ज्वरको बूढ़ा उपरात अर्थात् ग्यारह दिन उपरांत जीर्णज्वर कहाता ८४ रुद्रके श्वाससे पैदाहुये भयके देनेहारे दक्षप्रजापतिके यज्ञके बिगाड़नेवाले घोर घरै घर नादके कर्ता ज्वर मुनीश्वरोंने आठ तरहके कहे हैं सो लिखते हैं १ वीभत्स २ त्रिशिरा ३ कपिल भस्मप्रहारी ५ त्रिपात् ६ पिंगाक्ष ७ महोदर ८ ज्वलद्विग्रह ये ८५॥ (वीभत्सज्वरस्वरूपमाह) वीभत्सोरुधिरारुणांवरटतोमुण्डा स्थिमालाधरो रक्ताक्षःकृमिसंकुलस्त्रिनयनोदुर्गधिपूर्णोनिशं ॥ न ग्नोरुद्रममुद्भवोतिबलवान्कोपीजगत्घातकःकृष्णागोमलिनोम दान्धदमनःपुष्णोईिजध्वंसकः८६ (अथत्रिशिराज्यस्यलक्षणं) अभूदक्षविध्वंसकोरुद्रकोपात् त्रिशीर्पस्निपान्नंदनेत्रोतिकायः ॥ चलजिह्नयामृक्वणीलेलिहंतोटहत्तालुजंघोरुणाःतिक्रोधी८७॥ अभूद्रुद्रकोपाज्ज्वरःकापिलाख्यो मुखांगारपुंजोनिरन्तोतिकायः॥ मदापूर्णिताक्षःस्फुरत्तायकेशोमहामेघगर्जीमनोहर्पहर्ती ८८ ॥ रुधिरसे रंगेहुये वस्त्रों को पहिरै मुण्ड और हडियोंकी मालाका धारण करनेवाला लाल २ नेत्ररुमिते जिसकी देह व्याप्त तीननेत्र वासजिसकी देहमें सदा भाती है नंगा रुद्रसे पेदाहुआ अतियली कोपचान् जगत्का घातक कालेरंगका मलिन मस्तों को सीधा करनेवाला पुपादेवताके दांतों का तोड़नेवाला ऐसा वीभत्सज्वरहै ८६ श्रीमहादेवजीके कोपसे तीनमाथे का त्रिशिरानाम ज्वर दक्षका मारनेवाला हुआ तीन जिसके पांव नव नेत्र अत्यन्तलंबा चलायमान छुरासी जीभसे अोठों को चाटता बड़े ताल वृक्ष 4 * - २४ हंजरासनिदानम् । के समान जंघा जिसके लाललालनेत्र जिसके शत्यन्तक्रोधी ७ रुद्र भगवान के कोप में एक कपिलनामा बिरख्यात ज्वर पैदा हुआ मुख में अंगारों की उलटी करता अतिलंवा मद में चलायमान नेत्र जिनके प्रकाशमान तांबेके समान घालहैं जिसके घोर मेघकी सी गर्जना करने वाला मनके हर्पका दूरकरनेहारा ॥ (भस्मविक्षेपकज्वरलक्षणं) अभूदरमविक्षेपकोरुद्रकोपात्म. हाहाहासोमुहुर्जुम्भमानः ॥ चलत्सप्तजिह्वःकरालोग्रदंष्ट्रःस्फुर त्तप्तताघारुणाश्मश्रुकेशः ८६ त्रिपाद्रुद्रकोपाद्वभूवारुणाक्षोमगो श्मश्रुविध्वंमकस्तव्धकर्णः ॥ ज्वरोदीर्घकायोमुहुःश्वासकारणे नृत्यमानोंगदाहीरूपातः ६० (त्रिपादज्वरस्यस्वरूपम्) अभू द्वीरभद्रेश्वरादुक्कटास्योज्वरःपिंगनेव्रोल्पजंघोग्निवर्णः ॥ तपा तौद्विजिहोनृसिंहद्वितीयश्चलत्तीबकेशःकृशःशुष्कमांसः ६१ ॥ श्रीरुद्रफे कोपसे एक भस्मविक्षेपकज्वर पैदाहुआ महान् अट्टहासका करनेवाला बेर २ में जंभाईलेता चलायमान सातछुरासी जीभई जिसके भयानक कीलासी डाढ़वाला प्रकाशमान तपाये तांबेके समानहै डाढ़ी और बाल जितके ८८ श्रीरुद्र के कोपसे एक त्रिपाद नामक ज्वर पैदाहुया तीनपैरवाला लालनेत्रवाला औरभृकुटीडाढीका उखाड़नेवाला खडेकान जिसके बड़ीदेह जिसकी बारबार श्वासका कती संग्राम में नाचनेवाला शरीरमें दाह तथा प्यासका कर्त्ता ६० बीरभद्र गणमें एक पिंगाक्षनामक ज्वर पैदाभया बेडेमुख छोटी जांव वाला अग्निसरीखा वर्ण वाला प्यास में दुखी दो जीभका मानो दूसरा नृसिंहही है चलायमान तीखेकेशवाला सशसूरखाहुशा शरीरका माप्त जिसका ११ ॥ (महोदरज्वरस्यस्वरूपं)वभूवातिदीर्घोदरोलंबकर्णोज्वलद- ग्निरूपश्चलद्रक्तनेत्रः ॥ तृषाश्वासजृम्भान्वितांगप्रमर्दोभटेशो ज्वरोरक्तवर्णःप्रमत्तः ६२ (पिंगाक्षकास्वरूप) ज्वलद्विग्रहोमुक्त केशश्चलद्भूस्त्रिशूलासिहस्तोभुजंगेशपाशः॥ज्वरेशोतिवीर्योह रश्वासजातःकृशःशुष्कमांसोवलीभैरवेशः६३भिषचित्रचित्तो .

1 हंसराजनिदानम्। २५ त्सवेकर्कशानांज्वराणांस्वरूपंमयाकीर्तितंतत्॥सुषेणाश्विनीजा त्रिधन्वन्तराणां विलोक्याखिलंशास्त्रमन्यागमत्रै ६३ ॥ इति श्री भिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेहंसराजनिदानवैद्यशास्त्रे ज्वरलक्षणानि ॥ एक ज्वर महोदर नामक पैदाहुआ जिसका बड़ापेट लम्बेफान जलती अग्निके समान स्वरू। चंचल लाल २ नेत्र प्यास श्वास जभाई युक्त अंग का तोड़नेवाला वीरों का मालिक लालवर्ण भौर मतवाला ६१ श्रीहर भगवान् के स्वाससे पैदा हुआ ज्वलद्वियहनामकज्वर खुलेभयेहैं बाल और चलायमान भ्रू त्रिशूल तलवार नागफास ये हैं हाथमें जिसके ज्वरों का राजा अतिबली कश सूखे मांसवाला पराक्रमी भैरवेश प्रसिद्ध ६२ हंसराज कवि कहते हैं कि भिषकुचक्रचितोत्सव ग्रन्थमें कठोर ज्वरों के स्वरूप तथा लक्षण मैंने कहे कदाचित् कोईकहै कि तुम्हारे कहनेका क्या प्रमाण है उसी शंकाको दूरकरते हैं सुपेण अश्विनीकुमार अत्रिऋपि धन्वंतरि इनके बनाये हुये ग्रन्थों को देखकर तथा और जे माधवादि अवीचीन प्राचार्योंकामत उसको देखकर यह ग्रन्थ मेंने निर्माण किया है इससे यह ग्रन्थपठन योग्यहै १३॥ इतिहंसराजार्थबोधिनीटीकायांवराधिकारस्त माप्तमगमत् ॥ (अतिसारलक्षणानि वातातिसारकेलक्षण) तृष्णाग्लानि नितांतहदिजठरगुदेशूलमुग्रंसदाहं स्वल्पस्वल्पंपरीप्रभवति सततैनैवमर्वच्युतिःस्यात्।। अन्तर्दाहश्चश्वासौरुचिविकलतन वक्तनाशातिशोषः वातातीसारचिह्ननिगदितषिभिःपूर्वजेवैद्य विद्भिः १ (पित्तातिसारकेलक्षण) नानावर्णपुरीपंमधुवससदृशं दुष्टदुगंधियुक्तं वारंवारंसतप्तंप्रचलतिगुदतःकंपसंतापयोगः ॥ शलदाहोगुदाग्रेहदिनशिवदनेशोपतृष्णाश्रमत्वं पित्तातीसार चिहंकथितमृपिवरैरत्रिभारहजायैः २ (कफातिसारकेलक्षण) सकष्टगुदातःपुरीपप्रवाहश्चलत्फेनिलोमेदुरोदुष्टगंधिः॥ हरित् श्वेतकृष्णाकृतिःकष्टसाध्योभवेचिह्नमेतत्कफस्यातिसारे ३ ॥ तृषा ग्नानि अत्यन्त हृदयमें पेटमें गुदामें घोरदर्द तथा दाह थोडा २ २६ हंसराजनिदानम् । मलनिकसै सब न निकसे भीतरदादहोश्वासअरुचि देह मेंयेकली मुख नाक इनका अत्यन्त सूखना ये लक्षण वातातिसारके पहले गृषि तथा वैद्याने कहेहें १ दस्त जिस रोगीका चित्र विचित्ररंगका निकसे तथा सहतके रंग का व बसाके रंगकानिकले और दुर्गंधयुक्तहो वारवार तत्ताजावे कंप तथा संतापके साथ और शूल दाह ये गुदाके द्वारपरहों तथा हृदयमें नाकमें मुख इनमें शोपहो प्यास योर मनायासश्रमहो ये लक्षण ऋपिन में श्रेष्ठ अत्रिऔर भारद्वाजादिकोंने पित्तातिसार के कहे २ जिसके दस्तकाप्रवाह गुदासे बडेदुःखसे जावे जिसमें भागहो चिकनाहो दुष्टगंधहो हरा श्वेत कालावर्णहो वे कष्टसाध्य कफातिसारके लक्षण है ३॥ (सन्निपातातिमारलक्षणम्) अतीसारेसारेकफपवनपित्तप्रज निते गुदेपाश्र्चेकुक्षौजठरहृदयेशूलमरुचिः॥मुखेकंठेशोपोभवति सततंबर्दिररतिः तृषाकासःश्वासोवपुषिपरिशोफोङ्गदहनम् ४ (रक्तातिसारकेलक्षण ) वारंवारपुरीपंभवतिमरुधिरकंठतालो एशोषो वस्तौपादौप्रपीडाहदिजठरगुदेपार्श्वदेशेषशूलम् ॥ग्ला निःकायेकृशत्वंपरिगलिततनुर्निर्बलत्वंशरीरे रक्तातीसारचिटंप्र वरमुनिजनैःप्रोक्तमेतन्नितांतम्५(आमात्तिसारकेलक्षण) आमं स्वल्पंपुरीपंसितरुधिरनिभंपीतवर्णसकटंवारंवारंप्रतप्तंप्रचलति गुदतःपयदुर्गधियुक्तमास्निग्धंशूलंगुदाग्रेप्रभवतिपरितःफेनिलं पिच्छलबा आमातीसारचिह्नमुनिवरवचनात्कीर्त्तितेहंसराजैः। वातपित्त कफसे पैदाहुमा घोरअतिसार उसमें ये लक्षण होते हैं किगुदा पीठ कोख पेट हृदय शूलका चलना अरुचि मुख कंठका सूखना रद्द तथा मनका न लगना प्यास खांती श्वास शरीर में सूजन शरीका दहन ४ वारवार दस्त रुधिर मिलाहुआहो कंठ तालू ओठ इनकासूखना मूत्रस्थान तथा पैरों में पीड़ा हृदयमें पेटमें गुदामें पीठमें शूल तथा ग्लानि शरीर का रुश तथा गलना तथा निर्बल होना ये लक्षण रक्तातिसारके मुनीश्वरों ने निश्चय करके कहे हैं। आममिला थोडा २ दस्तहो श्वेत तथा रुधिर के समान तथा पालावर्ण साथ कष्टके दस्तहो वारबार तत्तागुदासे रांद दुर्गध युक्त चिकना गुदाय में पीडा तथा झाग युक्त और गाढा ये लक्षण अतिसारके मुनीश्वरों के वचनसे हंसराजने कहाहै ६॥

हमराजानेदानम् । २७ (अतिसारकाअसाध्यलक्षण) अतीसारिणतंत्यजेच्छीतगात्रं तृपाशोथशूलान्वितश्वासयुक्तम् ॥ ज्वराध्मानहिकान्वितंदाह मू गुदाभ्रष्टशोषार्तिकासादिजुष्टम्७ (अतिसारकोउत्पत्ति) विरुद्धाशनैःस्निग्धदुग्धान्नदोषैः द्रवरनेहदुष्टांबुमद्यादिपानैः ॥ गरिष्ठाम्लपिष्टैःकृमीणांविकाररतीसाररोगोभवेन्मानवानाम् = (अतिमारेपथ्यम् ) अतीसारेत्यजेत्स्नानसंतापंवह्निसूर्ययोः ॥ तैलाभ्यंगंचव्यायामगुरुस्निग्धादिभोजनम् ॥ इतिश्रीभिषक् चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रे अतीसारलक्षणम् ॥ ऐसे अतिसारी मनुष्यको वैद्य इलाज न करें कैसेको कि जिप्तका शीतल शरीरहो प्यास शूल युक्तही श्वास ज्वर अफरा हिचकी सूजन इन करके युक्तहो दाइ मूछी तथा काचका निफरपरना शोकदुःख खांसी युक्तको ७ विरुद्ध भोजन करनेसे चिकनी तथा दूध तथा अन्नइनकेदोपसे पतलीतथा तेजकी तथा दुष्टजलके पीनसे मदिरादिके पीनेमे भारी खट्टा तथा पीसा अन्नके खाने से और कमीनके विकारसे मनुष्य के प्रतिमार रोगपैदाहोय है। अतिसारवाला मनुष्य ये काम न करै नहाना अग्नि और सूर्य इनकेतेजका सहना तेलका लगाना तथा कसरत कुस्तीका करना भारी चिकना आदि भोजनका करना ६ ॥ इतिहंसराजार्थबाधिन्याअतिसारनिदानम् ॥ अथसंग्रहणीनिदानम् ॥ ( वातसंग्रहणीलक्षणम्) वातोत्थाग्रहणीगदःप्रकुरुतेविड्वं धनंमूर्च्छतं कासंश्वासतरंमुखंचविरसंकंपंशरीरेमशम्॥ कुक्षौता लुनिमस्तकेहदिगलेशोपोगुदेवेदनां कष्टंप्रच्यवतेपुषिमशक न्सामसशब्दंघनम् १ (पित्तसंग्रहणीकेलक्षण) चिह्नपित्तग्रहण्यां प्रभवतिहृदयेकंठदेशेतिदाहःशूलमेढ़ेगुदारुधिररतिरतः शुष्क फेनंपुरीषम्॥ तुच्छंतुच्छंसकप्टंक्वचिदपिबहुशोदुष्टगन्धिप्रयुक्तं पी तंवाकृष्णरूपंक्ससहशनिभरोमहर्षोनितृष्णा २ (कफसंग्रहणी केलक्षण) कफसंग्रहणीकुरुतेहृदयेजडतामुदरेगुरुतामरुचिम् ॥ मनसिभ्रमतांगरुजंशिथिलंसितफेनयुतंचपुरीषमरम् ३ ॥

२८ हंसराजनिदानम्। घादीसे उठी संग्रहणी दस्तको बंदकर है मूर्छा खांसी श्वास मुखबेरस शरीरमें फंप फोरख तालुधा माथा छातीगलाइनका सूखना फष्टले धोडार विष्ठाका त्यागहोना आम मिलाहुमा शब्दके साथ गाढ़ा १ पित्तकी संग्र. हणीके ये याक्षणहें हृदय में शोर कण्ठ में दाह किंगमें शून गुढाके भय- भागमें रुधिरका गिरना सूखा तथा झागमिता तथा कष्टसे थोड़ा थोड़ा फभी ज्याशा बासको लिये पीला वा काला वा बताके समान दत्त हो रोमांष तथा प्यास हो २ कफकी संग्रहणी में हृदयका जकडना पेट का भारीहोना मनमें घरुचि भौर वेहमें दुःख तथा शिथिलता सपेदभागों का मिला परत ये लक्षण कफसंग्रहणी के होते हैं ३ ॥ (त्रिदोषसंग्रहणीकेलक्षण)ग्रहण्यांत्रिदोषोद्भवायांसकटपुरीष द्रवंशब्दयुक्तंवसामम्॥मवेदल्पमल्पंक्वचिद्रक्तवर्णगरिष्ठोदरंदुष्ट दुर्गंधिमिश्रम ४(सन्निपातकीसंग्रहणी) विष्टंभंग्रहणीगदःप्रकुरु तेदोर्षेलिभिःसंभवो वैरस्यशिरसिव्यथांगुरुतमांशूलंगुदापीड नम् ॥ मालस्यहृदयेगुरुत्वमरुचिंकासंतृषासंभ्रमं श्वासाध्मान विवर्णतोदरकृमीन्दाहकरांध्रोर्वमिम् ५ अतीसारेगतेमंदवही च्छाद्यातिभोजनैः॥ वर्ततेयोभवेत्तस्यग्रहणीदारुणाभृशम् ६॥ सन्निपातसे पैदाहुई जो संग्रहणी उसमें ये लक्षण होते हैं साथ कष्टके मौर शब्दके वस्तफा होना तथा यता के समान और थोड़ा २ कभी लालरंगका पेटभारीरदे और बासमिला दस्तहो ४ पेटमें अफरा करती है तथा मुखमें विरसता शिरमें दर्द और शूल तथा गुदामें पीडा माल- कस हदयका भारीहोना अरुचि खांसी प्यात भौर श्वाप्त पेटका फूलना शरीर युरेरंगका पेटमेहमी हाथ पॉवों में दाद और वमन ५ जय अति- सार चलाजाय भोर-जठराग्निकी इच्छा अतिभोजन से बंदकरदे उसके घोर संग्रहणी होती है ६॥ (संग्रहण्यांपथ्यम) व्यायाममैथुनरुक्षभोजनंवह्नितापनम् ॥ तैलाभ्यंगदिवाश्वापंग्रहणीरोगवान्त्यजेत् ७ इतिश्रीविषक्चक्र चित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेग्रहणीलक्षणम् ॥ स्त्रीसमरूखाभोजनांचसेतापना तेललगाना दिनमें सोना ये संग्रहणी 4 हंसराजनिदानम् । २६ रोंगवाला त्यागदे ७॥ इतिदचरामछतहंसराजार्थबोधिनीटीकासंग्रह- गीरोगतक्षणसमाप्तहुमा। (अर्थमर्शनिदानम् )गुदाग्रेषुजातानिमांसांकुराणिचतुस्त्रीणि संख्यानिसांगानियानि ॥ भवन्तीतिदुर्नामसंज्ञानिनूनमरुतश्ले ष्मपित्तोद्भवानीहतानि १ (वातकीबवासीरकेलक्षण) शुष्कावात समुद्भवाश्चिमिचिमास्तब्धागुदास्यांकुराः म्लानाःश्यामतराःख • राश्चविकटानीलासित्तामाक्वचित् ॥ खजूराकृतयोज्रिहस्तसहि ताःशीर्षाननासंयुताः भिन्नाविस्फुटिताननावरकरा:पापोस्थिता दुःखदारवातासिकृशत्वमेवबहलंकुर्वन्तिविबंधनंक्षन्नाशंव लवीर्यकांतिहरणंशूलंगुदापीडनम् ॥ शोषंकंडुरुजविकारसंधि कंशब्दगुदातोनिशम् ॥ आध्मानंजठरव्यथांगुरुतमालीहंत नोपांडुताम् ३॥ ' गुदाफे भयभागमेहुये तीन वा चार मालफेअंकुर अंगकरकेसहितखोटा नामसंज्ञा जिनकी ऐसे वात पित्त फफसे पैदा होते १ वादीसे पैदाहुए ये जो गुदाके मस्ते उपडेहों सूखेदों धिमचिमी लियेहों टेढ़ेहों कुम्हिता- येहुयेहों कालेहों खरदरे बाँके नीले सुपेदहों खजूरफलके सदृशहों हाथ पैर शिर मुँरकेचिह्न संयुक्तदों मजग २ फटे मुखके ज्वरकरनेवाले पापसे पैदा दुःखके देनेवाले २ षादीकी बवालीर मनुष्यको रुश करै है तथा दस्तकोपंदकर भूखको बंदकरै बलवीर्य तेजको दूरकरेहै शूल पेटमें गुदा में दर्द शरीरकोसुरवावे खुजलीचले दुःखकरें अधिक बिकार तथा गुदासे सबके साथ अधोवायु च धफरा पेट में भारी व्यथा मोह शरीर पीसारैहे ३॥ (पित्तकीबवासीरकालक्षण ) गुदांकुरास्तुपित्तजामवंतिप कबिम्बमाःसर्वतिरक्तमुल्वणंचमासिमासिमेदुरामजाविशूक राशुनीगवांस्तनोपमाहिते॥खराजलौकिकाननामहांतदोषसंभ वाः ४ स्वल्पात्स्वल्पतरपुरीषमरतिविड्बंधनंकूजनं कष्टवातस मन्वितसरुधिरंशूलंगुदागर्जनम् ॥ प्लीहवीर्यवलक्षयंशिथिलतां गुल्मांत्रदिनमः पित्ताशास्यरुचिटपांवहुतरांकुर्वत्यताहंश्र हमराजनिदानम्। मम् ५ (कफबवासीरकेलक्षण) कंड्वाड्यागुदसंभवाखरतरामो सांकुरापिच्छलास्तब्धाःश्वेतनिभाःमृगीस्तनसमा स्निग्धाइच स्पर्शप्रियाः ॥ स्थूलामूलढाभवंतिमिलिताःकसिबीजोपमा चंध्यावन्दमुखाव्यथादिजनकाःपापोद्भवादारुणाः ६॥ पित्त बवासीरके मरसे पके कुंदूरूफलके समान हों जिनसे खूनटपके महीना महीनामें छिपाहुआ बकरी शूकरी कुतिया गो इनके थनोंके सदृश हों खरदरहों जोंकके मुखके आकारहों ये बहुत दोपमे होतेहैं पित्तकी ववासीर दस्तको बहुत कम निकारै मनकहीं न लगे दस्तका बंद होना गूंजना कष्ट पूर्वक अधोवायु रुधिर के साथ निकसना शूल के साथ गुदा का गर्जना प्लीह वीर्य चलका नाश शिथिलता गोला अंत्रवृद्धि भ्रम अरुचिं प्यास ज्यादा आनाह श्रम ये लक्षण पित्तकी वासीरकरे ५ गुदाके मस्सों में खुजली चले खरदरेदों और गाढ़े टेढ़ेदों सददों मृगीके स्तनों के स- मानहों चिकने और सिरानाप्रियलगे स्थूल ढ़ जड़वाले कपास बीजके समानहरुधिर न निकलेबद्दमुवधालेदुःखदेनेवाले पापसेउठेदारुण ६॥ (कफकीबवासीरकलक्षण),संकोचंगुदबंधनंचजठरेकुवैत्य माहंदृढं तुच्छंकटतरंपुदीषमशकृन्निद्रांतोपांडुताम् श्राध्मानंगु रुताभृशशिथिलतांहर्षक्षयंक्षीणतांश्लेष्माशीसिशिरोरुजंबहुत रंजाज्यम्बलौजःक्षयम् ७ (रान्निपातबवासीरकालक्षण ) अस्यिसाध्यानिगुदोवानित्रिदोषजातानिसमस्तरोगान् ॥ तन्वंतिकाथरुधिरंवंतिदहंतिवीर्यददतीहदुःखम् ८ (वातकी ववासीरकापथ्य) त्यजेदर्शमासंयुतोवातजेन नासर्वदामैथुन रुक्ष्यभोज्यम् ॥ कवायंशमंमद्यपानविदाहि जलस्यावगाव हिश्यापमेतत् ६ ॥ गुदाका बंधन तथा संकोच उदर में अनाह थोडाकटके साथ मलका त्याग नींद तथा पीलिया अफरा भारीपना शिथिलता हर्पक्षय क्षीणपना मधवाय बल तेजका क्षय ये कफी बवासीर के लक्षणहे ७ निवोप में पैदा हुई बवासीर सव असाध्यहें और राघरोगों को पैदा कर है कशताको पैदाकरे हपिरको ज्यादा निकारै वीर्यको दुहन करै दुःख को देय ८ वातकी यया.

। ३ हंसराजनिदानम्। ३१ • सौरवाला मैथुन रूखा भोजन कसैली वस्तु श्रममद्यपान दाइकर्तावस्तु, जलमें घुसिके स्नान बाहरेकासोना है। (पित्तकीयबासीरकापथ्य) पित्तजेनार्शसायुक्तस्त्यजेल्ला रोष्णभोजनम्॥ व्यायामंसूर्यमतापंकट्वाललवणानिच १० (कफकीबवासीरकापेथ्य )कफार्शसायुक्त नरःप्रवातंजलावगाहम धुराम्लशीतम् ॥ त्यजेदतिस्निग्धगरिष्ठभोज्यंश्वापदिनेजांग रणरजन्याम ११ इतिश्रीभिषक्चकचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैः प्रशास्त्रेअर्शसांलक्षणम् ॥ पित्तकी बवासीरवाला मनुष्य इतनी वस्तु त्यागदेय क्षार मिला. अन्न स्था गरमभोजन दंड कसरत सूर्य के घाम में ढोलना कडवी खट्टी चर- फरी नोनकीवस्तुकफकी बवासीरवाला नर हवा जल में घुसकरन्हाना मीठीवस्तु शीरी तथा. खट्टो अतिचिकनी भारी वस्तुका भोजन दिनमें - सोनी रातमें जागदा त्यागदे ११ इतिहंसराजाधवोधिनीटीकामेघवा- १ सीररोगसमाप्तहुआ। (भगंदरलक्षणम्) गुदतःपरितोद्वितीयेंगुल के पिडिकार्तिक रोरतिकृज्ज्वरदःभगदारुणकोरुधिरेणयुतोमुनिभिर्गदितस्तुम, गदररुक १(वातकेभगंदरकालक्षण) भगदरोमरुद्भवोरुजांकरो तिदारुणाह्यपानवातसंभवोगुदंप्रपीडयेन्निशम् ॥ करोतिपैडिका शतविषाकदाहसंयुतंत्रणेश्चरोधिरीनदीपुरीषमूत्रबंधनम(पित्त जनितंभगंदरकेलंक्षण)भगंदरोतिदारुणःकरोतिपित्तजोहितंग देचपैदिकांरुणाविपाकदुःखभूमिकाः॥अनेकधामुखाखरास्तुपूय. शोणितावहः कटौव्यथामनेकधामपानकोपतोभवाम् ३॥ गुदांके चारों तरफ दूसरे अंगुलमें मरोरी दुःखकी देनेवाली अरतिकी करनेवाली ज्वरकी करनेवाली भगके और गुदाके बीच में भगकीसी तरह भगदारणक रुधिर युक्त होताहै इसीसे मुनियों ने इसका नाम भगंदर कहा है यादी से और अमानवायुसे उत्पन्न जो घोर भगन्दर वो दारुण पीडा कर है। मोर गुदा में अत्यन्त दुःखहो और सैकड़ों मरोरी गुदाने ऊपर करें और वे पक जावें तथा दाहहो और घाव होजाय रुधिर वह दस्त पे. शॉवकी चन्दहोना ये लक्षण होते, २ पित्तसे पेदा जो भातदारुण भगन्दर ५ ३२ हंसराजनिदानम्। उसके ये लक्षणहें दुःखहो गुदाके ऊपर लाल २ मरोरीदों मोर पकिजा- वे खेदको पैदाकर भनेकमुखड़ो करडीहो राधरुधिर ज़िनसे सवै कमरमें दर्ददो पंह भी अपानवायु के कोपसे पैदाहोताहे ३ ॥ गुदांतेपीडिकांकुर्याद्भगंदरगदोनिशम॥डूशोपंव्यथांपाकेरक्त पूयवहाःकृमीन्४(सन्निपातजनितभगंदरलक्षणम्) आहुस्तंचभ गंदरंकफमरुतपित्तोद्भपडिताः विस्फोटैर्दहतेगुदंकृमिकुलैरत्या मिषयोनिशम् ॥ पक्कैश्छिद्रसमन्वितःसरुधिरंपूयंत्रवत्यामिपंशो थंकडुरुजादिकवितनुतेऽपानेनविड्बंधनम् ५इतिश्रीभिषक्चक्र चित्तोत्सवेहंसराजकृसेवेद्यशास्त्रेभगंदरलक्षणम् ॥ भगंदरकारोग गुदामें मरोडी पैदाफरे और उनमें खुजलीचले तथा शोप हो पकने में यर्वहो रुधिर तथा राघवहे और कृमि पडजाय जिस भगंदर में ये क्षक्षणहो उसको पण्डित सन्निपातका कहते हैं जिसमें बड़े २ फोड़े करके गुदा में दुःखदो भोर कमीन के समूइसे निरंतरव्यागुलहो भोर पक नाय तथागुदाके वारपार छेद होजाय उनछेदों में राधरुधिर मलमास नि- फसे सूजनखुजलीहो भपान पवनसे गुवाहारा मलकानहीं उतरना ५॥ इतिहंसराजार्थबोधिनीटीकामेभगंदररोगसमाप्तहमा ॥ (अजीर्णरोगलक्षण) भुक्तानपाचितंनैववहिनोदरजेनतत् ।। तस्योपरिपुनर्भुक्तमजीतविदुव॒धाः १ भुक्तान्ननविपाकमेतिजठ रेविएसूत्रयोस्तंमनाद्रात्रौजागरणादिवातिशयनादत्यंवुपानान्नृ पाम् ॥ दुर्भक्ष्याद्विपमाशनादतिभयात्क्रोधाद्विरुडासनात् मंदा ग्नौबहुभोजनाद्गुरुतरात्प्रहेषतश्चिंतया २ वाताधिकेविषमतास मुपैतिवहिःपित्ताधिकैभवतिवहिरतीवतीक्षणः ॥ श्लेष्माधिके जठरजोहुतभुक्समंदोवाताधिकेषुसमकेपुसमोग्निरंत्ये ३॥ : खाया हुआ तो भन्न जठराग्नि करके पचानहीं और तिसके ऊपर फेर खावे उसको पंडित अजीर्ण कहतेहैं १ मलमूत्र रोकनेसे रात में जागना दिनमें सोना बहुतपानीपीना गरिष्ठभोजनकरना विषमभोजनसे अतिभय से कोधकेकरने से' विरुद्धभोजनसे मंदमग्निमें ज्यादा भोजन से पते चिन्ताके करने से खायाहुभा अन्न पेटमें पचता नहीं है २ वाताधिकसे 4 3 हसराजनिदानम्। चिपमाग्नि पिसाधिकसे तीक्षणाग्निकफाधिकसे मन्दाग्नि शोर वात पित्त कफके समान होनेसे समाग्नि होती है ये चार प्रकार की अग्नि मनुष्यों के होतीहे ३॥ विष्टव्धंविषमोनल प्रकुरुतेरोगांश्चवातोद्भवान् तीक्ष्णाग्नि विदधातिपित्तजनितान्रोगाविदग्धाशनम् ॥ आमंश्लेष्मस मुंगवान वितनुतेरोगांश्चमन्दानलो नैरोग्यंहुतभुक्समोहिसत तधत्तचिमानसीम ४ (वाताजीर्ण केलक्षण) वाताजीर्णेचिह्नमे तत्प्रसिद्धजृम्भाशूलंक्षुत्पिपासांगमर्दः॥साम्लोद्गारोधूमयुक्तो तिकष्टःश्वासःशोषोमूत्रघातोथहिका ५ (पित्ताजीर्णकेलक्षणा) मादाहसंचमःशूलमुग्रंकृष्णोद्गारोधूमयुक्तोतिसाम्लः॥मो हःस्वेदाछर्दतंगन्धिसांद्र पित्ताजीर्णेलक्षणंसद्भिरुक्तम्६॥ विषमाग्नि अफरा और वातके रोगोंको पैदाकर तीक्षणाग्नि पित्त के रोगोंको भोर मनको दग्ध करदे मन्दाग्नि कफके रोगोंको भोर माम को पैदा करहै समाग्नि नेरोग्य और रुचिको पैदाकरेहै इसीसे यह अग्निश्रेष्ठ है ४ वातके शजीर्णमें ये लक्षण होते हैं जभाई शूल प्यास धूमयुक्तखट्टी डकार भूख अंगोंका टूटना शतिकष्ट श्वास शोप मूत्रपात हिचकी ५ मू- ▪️ वाह भ्रम घोरशूल प्याम धूमयुक्त खट्टी डकार घेहोशी पसीना वासके साथ मोर गाढ़ीरद ये पित्ताजीर्ण के लक्षण ६ ॥ ( कफाजीर्णकेलक्षण ) कफस्याजीनेभवतिगुरुताछ दिरधिकाअतीसारःशोथोरुचिरपितृषाक्षुहिकलता. ॥ चमिर्ला लावतादरतिरुदरेभारमधिकंशिर कंठेनाभौगुदपवनसंचारम धिकम् ७ इतिश्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशाने अजीर्णनिदानसमाप्तंशुभम् ॥ शरीर भारी बहुत रहका होना अतीतार सूजन भरुचि प्यास क्षुधा वेकली वमन मुखसे लारका बहना मनका न लगना पेटभारी शिरकंठ नाभि इनमें अपानवायुका चलना ७ इति हंसराजायोधिनौटीकामें अजीर्णनिदान समाप्तहुआ। -- ३४ हसराजांनदानम्। (अलसविलम्बिकानिदानम्)अजीर्णतोविसूचिकाभवेहिलंबि काथवाविसाचेकोर्ध्वगामिनीक्षणेननाशयेन्नरम्॥अधोगतिविलं विकाविलम्बकारिणीतिसाअपानवातप्रेरितामनोजत्तिहारिणी १ भुक्तानंप्रहरात्पूर्वद्रवंकृत्योर्ध्वमानयेत्॥ यासाविमूचिकाप्रोक्ता धोनयेत् माविलंबिका २ (विसूचिकाकेलक्षण) अतीसारमूर्छा पिपासांगपीडाप्रमोल्लासहिकाविमुक्तांगमन्धिः॥ निमग्नेक्षिणी कृष्णदन्तोष्ठजित्राविसंज्ञाविसच्याभवन्तीहशूलम् ३॥ अजीर्णसे विसूचिका वा विलंधिका पेदा होती है जिसमें वमन हो उसे विसूचिका कहते हैं और जिसमें दस्तहो उसे विलंबिका कहते हे विसूचिका क्षणमें मनुष्यको मारडार और विलंबिका. कुछ देरमेमारह अपान वात करके प्रेरित मनतेज इनकी वृत्तिको दूर करनेवाली है १ ये माधव कहै पहले श्लोकमें जो कहिआये उसेही फेर कहते हैं खाया हुआ अन्नको पहरभर पहले पतलाकर जो ऊपरकी रास्ता अर्थात रहलावै उसे विसूचिका कहते हैं और जो नीचे मार्ग अर्थात् दस्तलावै उसेविलंबिकाकह- ते हैं २ दस्त मूळ पास अंगोंमेंपीडा भ्रम उल्लास हिचकी अंगकीसंधि २ ढीली होजायें नेत्र धैठजायँ दांत जीभओठ काले बेहोशी शूल ये लक्षण विसूचिकाके हैं ३॥ विसूच्यामशुदिमिर्मूत्रघातोभद्वेपथुःकंठवकोष्ठशोषः । 'विसंज्ञारंतिदेहदाहोल्पशव्दस्त्वचाकोचनाद्विनाशोल्पचेष्टा,४ इतिश्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेअजीर्णविसू चिकालक्षणम्॥ अपवित्रता वमन भूत्रपात कंप कंठ मुख ओठ इनका सूखनाबेहोशी मनडामाडोल शरीरमें दाह मन्द २ वोलना त्वचा का सुकड़ना भूख का नाश चेष्टा रहित येभी विसूचिकाके लक्षण होते हैं ४ इतिश्रीहंसराजार्थ बोधिनीटीकाविसूचिकारोगतथाविलंविकारोगसमाप्तहुआ।, (अथकृमिनिदानम्)जायन्तेकृमयोनरस्यजठरेवाह्येचयकादयो वाह्याभ्यन्तरभेदतोवहुविधाःसूक्ष्मातिसूक्ष्मास्तथा।दीर्घादीर्घत राभवन्तिमिलिताभिन्नाःपराजन्तवो नानावर्णसमन्विताबहुपदः पादेविहीनाःपराः १ मूर्छार्तिकेंडुपिटिकाइचकोटरानकुर्वन्त्यती हंसराजनिदानम्। ३५ सारमनाहसंभ्रमम् ॥ दाहंविवर्णवमथुविगन्धितां कार्यशरीरे कृमयोमुहुर्मुहुः २ उदरगतकृमीनांचिह्नमेतन्नराणांभवतिहृदय दाहसंभ्रमोगेविकारः ॥ अरतिरुधिरकासंछर्यतीसारशूलं सकलविकलकायाष्ठीवननिर्वलत्वम् ३॥ कृमिरोग दो तरहका है एक बाहिरी दूसरा भीतरीपेट में गिडोहेआदि हो सो 'भीतरी और बाहर जुयें लीख आदि होते हैं ऐसे बाहर और भीतरके भेदसें तथा छोटेरो छोटे और बडेसे बड़े के भेद करके बहुतभेद हैं नाना वर्णके बहुत पाद तथा पादरहित होते हैं १मूर्छा,नाति, खुजली, पिटिका इनका खजाना अतीसार, आनाह, भौर,दाह,शरीरका वर्ण औ- रही तरहका, वमन, दुर्गध,शरीरकृश, कमि ये लक्षण कृमिरोगमें होते हैं । उदरमें कृमि पड़गये हों उसके ये चिहहें हृदयमें दाहौर शरीर में विकार मन न लगे दस्तमें रुधिरका गिरना खांसी वमन दत्त शूल सब शरीरमें बेकली बार बार में थूकना निर्बलता ३ ॥ (कृमिरोगोत्पत्तिम् ) भुक्तस्योपरिभोजनेनमधुराम्लाभ्यां मृदाभक्षणाद्दध्नामापपयोभिरामिषयुतैःश्लेष्मोद्भवाजन्तवः ॥ सन्तापक्षतशोफशाकमधुभिर्गनरक्लोद्भवा अन्यैर्वाकृमयोभव न्तिजठरेनृणांसदादुःखदाः ४ (कृमिरोगेपथ्यम् ) कृमिवान् संत्यजेन्मिष्टंपिष्टशाकंपयोगुडम् ॥ अव्यायाममृदचाम्लंमा मसिद्रचंदधि ५ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृते वैद्यशास्त्रेकृमिलक्षणसंपूर्णम् ॥ भोजनके ऊपर भोजन करनेसे मीठा खट्टा मट्टी दही दूध उर्द मांस इन से कफकी कृमि पैदा होतीहै सन्ताप चाव सूजन सागके खाने से सहत म. य इनसे रुधिरके कृमि पैदा होते हैं और प्रकार से भी कमी मनुपके पेट में दुःखके देनेवाले होते हैं ४ कृमिरोगवाला मीठा पिताअन्न शाक दही दूध गुड दंड कसरत का न करना माटीखाना खट्टोवस्तु उई मांस पतली वस्तु इनको त्यागदे ५ इति हंसराजार्थयोधिनीटीका तमिरोग समाप्तहुआ। (पाण्डुरोगनिदानम्) दोषाःसंकुपितास्त्रयोपिधतेपाण्डेश ३६ 'हसराजानंदानम्। 'रेरुजं नृणांतक्षिणतमंद्रवञ्चलवणंरूक्षामिपंसेविनम् ॥ मृत्पूगीफ लभोजिनाहिसततंरात्रोदिवाशायिनां स्त्रीप्यत्यंतविलासिनांत्र तिदिनंशाकाम्लसंभक्षिणाम् १ (वातन्केपीलियाकेलक्षण) पाण्डु तिसमुद्भवोनयनयोरूक्षत्वचःस्फोटनं तोदानाहकृमीनकरोति कृशतांगुह्यस्थलेशोफताम् ॥ हकंपंश्वसनंतनौमलिनतांपीतद्यु तिक्षीणतां मन्दाग्निबलवीर्यकान्तिहरणंछर्दिषांदारुणाम् २ (पित्तकेपीलियाकालक्षण) अक्ष्णोर्मूत्रपुरीषयोस्त्वचिनखेष्य न्तेषुपीतप्रभा श्वासंकाससमन्वितंकृशतर्नुमीमतीसारकम्॥ हल्लासंहदिसंभ्रमविकलंतांदाहंतषासंयुतं पाण्डुःपित्तसमुद्भवः प्रकुरुतेशोषमुखेशोफत्ताम् ३॥ जो मनुष्य तीखी पतली ज्यादा नोन रूखामांस मट्टी और सुपारी इनको खावे तथा रातदिन सोवै बहुत मैथुनके करनेसे नित्य साग और खट्टा खानेसे तीनों दोप कुपितहो पीलियाके रोगको पैदा करते हैं १ वात से पैदाहुये पीलियाके ये लक्षणहें नेत्रों में रूखापन त्वचाका फटना सुई की तरह चुभनेका दर्द यानाह तथा शरीर कृशभ्रम गुह्य इन्द्रियपरसूजन हृदयमें कंप श्वास शरीर मलिन तथा शरीर पीला मन्दाग्नि बलवीर्य कांति का नाश वमन प्यास मुखका सूरखना २ नेत्र पेशाब दस्त शरीर की त्वचा नख इनका पीला होना श्वास खांसी शरीर लश मूछीदस्तों का होना सूरवी उलटी हृदयमें भ्रम बेकली दाह प्यास मुखका सूखना तथा सूजन ये पित्तसे पैदाहुये पांडुरोगके लक्षण, ३ ॥ (कफपीलियाकालक्षण) शुलाननंशुक्लपुरीषमूत्रंतन्द्रालसं स्त्रीष्वरुचिकृशत्वम् ।। लालावमित्वंश्वयथुगुरुत्वंपांड्डामयश्श्ले मभवःकरोति ४ (सन्निपातकेपाण्डुरोगकालक्षण) त्रिदोषो द्भवेपाण्डुरोगेकृशत्वंभवेच्छासकासंतृषांवेपथुत्वम् ॥ शिरोतिष सेकोरुचिःसंभ्रमत्वं वलौजोविनाशःलमश्चर्दिशूलम् ५ त्रिदोषा न्वितःपाण्डुरोगीभिषग्भि रसायोनिरुक्तोहताक्षोविचेष्टः॥ज्वरः श्वासहल्लासकासातिसारस्तृषासंभ्रमोंगेपुकंपाप्रलापी ६॥;

हंसराजनिदानम्। सपेदमुख सपेद पेशाब और मल तन्द्रा पालकस स्त्रोसंगकी इच्छा का नाश कृशता लार का पड़ना वमन शरीरका भारीहोना ये लक्षण कफ से पैदा हुआ पांडुरोग करताहै ४ सन्निपातसे उत्पन्न हुनाजो पांडुरोग उस में ये लक्षण होतेहैं शरीर शश्वास खांसी प्यास कंप शिरपीडापसीनेका थाना अरुचिभ्रम बल कांतिकानाश ग्लानि वमन शूल ५ त्रिदोष युक्त पां- डुरोगी ऐसा वैद्योंने असाध्य कहाहै नेत्रसेरहित चेष्टाकरकेहीन ज्वर श्वास सूखी उलटी खांसी अतीसार प्यास भौंर अंगोंमेंकंप वाहियात चकना ६॥ यःस्रोतांसिरुपदिसोमुनिवरैस्त्याज्योमशंदूरतस्तेजोवीर्यवलो जसांप्रतिदिनंहानिकारोतिध्रुवम् ॥ पाण्डुत्वंत्वचिनेत्रयोःकररुहे यंत्रेषुविएमूत्रयोर्धत्तेवह्निविनाशकोऽतिबलवान्पाण्डुमनुष्याद, नः७(पाण्डुरोगेपथ्यम्) पाण्डुरोगीत्यजेदम्लंदिवास्वापञ्चमैथु नम्॥शाकमांसाशनरूक्षंमृद्धलमतितीक्ष्णकम् इतिश्रीभिषक्च चित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेपाण्डुरोगलक्षणम् ॥ ऐसा पांडुरोगी वैद्यों करके त्याज्यहै जो कानों से बहिरा करदे तेज वीर्य बल कांति इनकी प्रतिदिन हानिकरै त्वचा नेत्र नख आंत मल मूत्र ये पीलेहों जठराग्नि से रहित ऐसा पांडुरोग वली मनुष्य का मारने- वाला जानना७पीलिया रोगवाला मनुष्य खटाईका खाना दिनमें सोना तथा स्त्रीसंग करना शाक मान रूखी वस्तु मट्टीखाना अतितीखी मिरच श्रादि वस्तुका खाना त्यागकर ८॥ इति हंसराजाबोधिनीटीकापा- डुरोगकानिदानसमाप्त हुआ। (हलीमकाकामलाकुंभकामलापानकीरोगनिदानम्)हृत्पद्धेमल मूत्रयोनयनयोर्धत्तेतिपीतद्युति दौर्बल्यंबलवीर्ययोरनुदिनंनाशं भ्रमंकामलाम्॥अस्थिस्फोटवतीकरोतिविकलंमांसाशनाद्रक्तपा संतापंकरयोर्मुखेषणयोःशोफंचपादद्वयोः १ (हलीमकरोगनि दानम्)करोतिकुम्भकामलानखेषनेत्रयोर्मुखे पुरीपमूत्रयोर्मुशंस कृपणतांतृषार्तिकृत् ॥ वलाग्निवीर्यतेजसांविनाशिनीप्रकंपिनी ज्वरांगदाहर्दिनीविमोहशूलदायिनी २ पट्चक्नेषुनखेपमूत्रयुग लेविएमूत्रयोनलितांसंधत्तेचहलीमकंकृशतनुःस्त्रीपुषहर्पक्षयम्।।

* हंसराजनिदानम्। संतापंकुरुतेरुजंचितनुतेपित्तानिलोत्थंगदंतन्द्राअंगविमर्दनशि थिलताइवासंभ्रमंवेपथुम् ३ नखेप्नंगदेशेषुमत्रेपुरीपेडगोनॆत्रयोः पांडुताउट्प्रसेकः॥ बहिःशीतताभ्यन्तरेत्यंतदाहोवदेत्पानकील क्षणेलक्षणज्ञः४इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवहंसराजकृतेवैचशा स्त्रेकामलाकुम्भकामलाहलीमकपानकीलक्षणम् । 'जो मनुष्य मांस खावै तथा रुधिर पियाकरै उसके कामलारोग प्रकटहो और ये लक्षणको करै छाती मल मूत्र नेत्र ये पीलेहों दुर्वलता बलवीर्यका नाश भ्रम हडफूटन वेफली संताप हाथ मुख अंडकोश इनमें सूजन तथा पैरों में सूजनहो १ कुम्भकामला देहमें ये लक्षण कर है नख नेत्रमुखपीला तथा दस्त पेशाब काला प्यास पीड़ा और वल अग्नि वीर्य तेजोनाशक कम्प ज्वर देहमें दाह मोह शूलकरैहै२छःचक्रोंमें नखोंमें नेत्रोंमें मलमूत्र में जो नीलापनाकरदे औ शरीर पतला स्त्रीसंगकी इच्छाको दूर करदे वेकली तंद्रा अंगोंका टूटना शिथिलता श्वास भ्रम पीडा इन लक्षणों को वात पित्तसे पैदाहुआ हलीमकरोग करताहै ३ नखोंमें शरीरमें मलमूत्र में नेत्रों में पिलाईहो प्यास पसीना वाहिरीजाड़ा भीतरीदाह इन लक्षणे से लक्षणका जाननेवाला पानकी रोग जाने ४॥इति हंसराजार्यबोधि न्यांकामलाकुम्भकामलाहलीमकपानकीरोगनिदानम् ॥ अथ रक्तपित्तनिदानम् ॥ (रक्तपित्तकीउत्पत्तिलक्षण) व्यायामैरविवह्नितापसहनैस्ती क्षणोष्णकट्वामिषैरत्यंतंसुरतैर्दिवातिशयनैः स्निग्धान्नसंभोज नैः॥ एतैःसंकुपितंतुपित्तमधिकनिर्गत्यवाह्यांतराच्छदिलोहितता चनेत्रयुगलेरक्तनौमण्डलम्पनिःश्वासेलोहगंधिःप्रभवतिशिर सोरक्तधाराचकोष्णा सन्तापाकोष्ठपीडानयनविकलतारोचकाष्ठी वनत्वं ॥तष्णामप्रिसेकोमनसिशिथिलतासंभ्रमोदेहदाहाका सःश्वासोल्पचेष्टाकृशतरहुतभुग्रहपित्तस्यकोपात २ अधोईभ वेद्रक्तपित्तप्रवृत्तिःश्रुतिघ्राणवकाक्षिभिश्चोर्ध्वदेशे ॥ गुदायोनि मेढैरधोयातिरक्तंसमस्तैश्चरोमैःशरीररयबाझैः ३ ।। .

1 हंसराजनिदानम्। ३६ दंड कसरतके करनेरो घाममें डोलनेसे अग्निके तापनेसे तीखीगरमी कडुई मांस इनके खानेसे अति स्त्रीसंगसे दिनमें सोनेसे स्निग्ध अन्न के भोजनसे कुपित हुआ जो पित्त सो रुधिरको बिगाड़कर रुधिरकी उलटी करावे तथा नेत्रों से रुधिर गिरै और शरीरमें खून बिगड़ने से चकत्ते हो- जायँ १ रक्त पित्तके कोपसे ये लक्षण हों श्वास लेनेमें लोहकीसी गंधहो शिरसे रुधिरकी गरमधार पड़े प्यास व्याकुलहो उदरपीडा नेत्रोंमेंबेक- ली अरुचिरुधिरका थूकना मूळ तथा पसीनेका आनामनमें शिथिलता भ्रम देह मेंदाह खांसी श्वासहीन चेटा अग्निमंद २ रक्त पित्तकी प्रवृत्ति ऊपर तथा नीचे के रास्तासे निकस सो लिखते हैं जो कानों से नाकते मुखसे नेत्रसे रुधिर गिरै उसे ऊर्ध्व प्रवृत्ति जाने और गुदाके द्वारा तथा योनिद्वारा लिंगसेरुधिर गिरै उसे अधःप्रवृत्ति जाने और सबरोमों सेशरीर के बाहर निकसताहै ३॥ रूक्षारुणश्यामतरंचरक्तवातात्मकंतप्रवदन्तिवैद्याः ॥ पित्तों त्थितंरक्ततमंकषायस्निग्धञ्चसांद्रङ्कफजंसफेनम् ऊर्ध्वगंकफर्ज रक्तमधोगमारुतोद्भवम् ॥ रोमकूपैर्वहिर्यातंतविद्यापित्तसंभव म५.अधोर्ध्वगंवातकफप्रकोपाहिदोषजंतंजपदानसाध्यम्॥अधो रोमैजनितंत्रिदोषकोपादसाध्यमुनिभिःप्रदिष्टम् ६॥ रूखा लाल काला जो रुधिर निकतै उसे वातका रक्तपित्त वैद्य कहते हैं और लाल कसैला पित्तका तथा चिकना गाढ़ा झागयुक्त कफका कहते हैं जो ऊपरी मार्गसे रुधिगिरै उसे कफका जानो और नीचे मार्गों से गिरै उसे वातका जानो और जो रोमों से गिरे उसे पित्तका जानो ५ वात कफ के कोपसे ऊपर तथा नीचे मागाँसे रुधिर गिरताहै उसे विदोपहाजानो वह जपदानके करनेसे अच्छाहो और नीचे तथा ऊपरका तथा रोममासि जो रुधिरगिरे उसे सन्निपातका जानै यह मुनियों ने असाध्य कहाहै ६ ॥ रक्तपित्तंसुखसाध्यनिरुपद्रवमेवतत् ॥ सोपद्रवंतुदुःसाध्यंजप होमौषधादिभिः ७ उद्गारेलोहितंयस्यक्षनिष्ठीवनेतथा ॥ भवे न्मूत्रपुरीषेवारक्तपित्तीवियेन्नरः ८ (रक्तपित्तरोगेपथ्यम् )व्याया मंघर्मसंतापंतीक्ष्णोष्णकटुकानिच ॥ दिवास्वापमतिस्निग्धंरक्त हंसराजनिदानम् । पित्तीनरस्त्यजेत् ६ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृते द्यशास्त्रेरक्तपित्तलक्षणम् ॥ जो उपद्रवरहित रक्त पित्तदोवो सुख साध्यहे और जो उपद्रवके साथ हो वो असाध्यहै सो जपके करानेसे होम और औपधि करनेसे भी नहीं अच्छाहो ७जिसमनुप्यके डकार लेने में लोहे की वासमारे तथा छीकनेमें थूकने में मूत्रमें मलमें रुधिर गिरे वो रक्तपित्नी मनुष्य मरै ८ दंड कसरतका करनाधूपमें डोलना खेद तीखी गरम कटु वस्तुका भोजन दिनमेलोना अ- त्यंत चिकनी वस्तु रक्तपित्तवाला त्याग करदेवै । इति हंसराजार्थपोधिनी टीकामेरक्तपित्तरोगकानिदानसमाप्तहुआ । (यक्ष्मणोत्पत्तिः)योभारंवहतेनरोगुरुतरसंपीज्यतयक्ष्मणाश स्त्रास्त्रैःपरिघातितोदृढधनुःप्राकर्षतःपीडितः॥ उच्चैपतिनोमहा इमतरुभिःसंदीपितोमर्दितो दंडैर्मुष्टिकमादिभिःपरिहतःसंधर्षि तःशापितः १(अथनिदानम्) देहस्थोराजयक्ष्मादिकफनिचयं वर्द्धतेशोषतेंगं नाडीमार्गरुणद्दिज्वरयतिमनुजंक्षीयतेधातुमंघा न्॥वीर्योजकांतितेजोऽनलबलपिशितंहतिपांडुविधत्ते ऊर्ध्वश्चा संतनोतिप्रसरतिहृदयेक्षीणशब्दकरोतिश्यक्षमारुक्कुरुतेरुचिकृ शतनुसूक्ष्मज्वरंगौरवं देहज रितक्षतंचगलकेकासाधिकंशोष णम् ॥ संतापहादिवेपथुमरुधिरनिष्ठीवनंपूयभं मोहच्छरतिभ्रम शिथिलतांशूलंक्वचिद्दारुणम् ३॥ जो मनुष्य भारी बोझको उठावै यक्ष्मारोगसे पीडितहो तथा शस्त्र अस्त्रसे घायलहो दृढ़ धनुप के खींचनेसे कोई कारणकरपीडित होनेसे उच्चपर्वत वा वृक्षके गिरनेसे जलनेसे और मीडनेसे तथा दंड कोड़ा चूंसे आदिके पिटने से डरपने से महात्माओंके शापसेक्षयीरोग पैदा होता है १देह में क्षयीरोग स्थि- त ये लक्षणों को करहै हृदयमें कफको बढ़ावै शरीरको सुग्वदेवै नाडीके मा- गाँको रोकदे ज्वरवान् करदे धातुके समूहको सुखायदे वीर्य वल तेज ताकत कांति जठराग्नि के वलको तथा मांसफोक्षीण करदे पीलियाको करै ऊर्य श्वासकोकर तथा क्षीण शब्दको कर है २ अरुचि तथा लशदेह मंदज्यर शरी- रभारी जर्जरशरीर गलेमें घाव खांसीशोप खेद हृदय में कंपरुधिर रादमि- लाथूकना बेहोशी रहकरना मनका डामाडोल होना भ्रम शिथिलता कभी हंसराजनिदानम्। महाशूल होजाय अथवा शूल जोर से चलना ये लक्षण क्षयीरोग करहै ३॥ विवर्णशरीरंशकृद्रक्तमूत्रंकरोत्यंगपीडामहाराजयक्ष्मातनों शून्यतांबुद्धिनाशंप्रलापंगलेघर्घरत्वंयुक्त्याप्रहर्ष ४ (वातकीक्ष पीकालक्षण)मन्दाग्निर्बलवीर्ययोरनुदिनहानिःकृशत्वंवपुःकासः शुष्कतरोरुतंकृशतरंश्वासोरुचिःशोषता॥रूक्षोमंदतमौज्वरल मथुतानिष्ठीवनंपूचनं छर्दिा यदिवेपथुर्भवतितद्वातक्षयेलक्ष णम् ५ (पित्तकीक्षयीकेलक्षण ) पीडाकुक्षिशिरोगलेषुहृदयरक्तं चनिष्ठीवनं शीतेम्लेधिकतारुचिलनताकंठेविगन्धिर्मुखे। का सःश्वाससमन्वितःकृशतनुर्भिन्नस्वरोल्पज्वरस्तत्पित्तक्षयलक्षणं निगदितवैद्यैःसुखेणादिभिः ६॥ शरीरका नर्ण औरहीप्रकारको होजाय वार बार लाल पेशाब उतरै शरीरमें पीडाहो सुन्न शरीर पड़ जाय तथा बुद्धिका नाश वर्शना गले में घर घरंशब्दहो स्त्री के साथ रमणकी इच्छाहो ये लक्षण महाराजयक्ष्मा करता है ४ वातकी क्षयीके ये लक्षणहें मंदाग्नि वल वीर्यकी हानि शरीर कश श्वास मद शब्द और खांसी अरुचि शोप शरीर रूखामंदज्वर ग्लानिराध का थूकना तथा उलटी करना हृदय में कंप ५ कांख मस्तक गला हृदय इनमें दर्दहो रुधिर मिला थूकना शीतकी तथा खटाईकी इच्छाहो अरुचि तथा कंठमें जलन मुखमें बास आवे खांसी श्वासहो कशदेहहो बुरीमा- वाजही मंदज्वर थे लक्षण सुपेणादि वैद्योंने पित्तकी क्षयीके लक्षणकहेहे ॥ (कफकीक्षयीकेलक्षण ) शोफ कासरुजाग्निमंदजडताइवा सोरुचिर्वेपथुःशैथिल्यस्वरभंगतांगकृशतावक्रेविगन्धान्वितम्॥ तंद्राकुक्षिरुजःकर्फबहुतरंनिष्ठीवनपयनं स्यात्श्लेष्मक्षयलक्षणं चहृदयेकंठंदृढंश्लेष्मणः७(असाध्यक्षयीकेलक्षण) सहस्रदिन पर्यंतंनजीवेदितिमानवः॥ग्रहेणयक्ष्मणाग्रस्तोऽसाध्येनातिबली यसा८ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेवैद्यशास्त्रेहंसराजकृतैयक्ष्म पोलक्षणंसमाप्तम् ॥ सूजन खांती: अग्निमंदजडता श्वास अरुचि कंप.शिथिलता गले का बैठ जाना शरीर पतला मुखमें वासका आना तंद्रा कांख में दर्द कफ का •. ४२ हसगजनिदानम्। तथा पीचका थूकना कंठमा कफमे रुकना ये कफी क्षयीके लक्षणहें ७ जिस मनुष्यको क्षयी रूप असाध्यग्रह बलवान्ने असलिया हो यो मनुष्य हजार दिनतक बड़ी कठिनता से जीसके ८ ॥ इतिहंसरालार्थबोधिन्यां राजयक्ष्मारोगनिदानसमाप्तम् ।। (अथकासरोगलक्षणम् ) वामिनासासुरजोभिपातास्मो परदात्गुरुभारवाहात् ॥ रूक्षादनाइंडकशादिघातात् कासोति घोपादुपजायतेवे १ (खांसीकलक्षण) प्राणःकंठगतोत्युदानप वनोहत्स्थोतिपीडाकरःशव्दाकांस्यविभिन्नघोपसहशोनिष्ठीवनंपू यभम॥ कंठेघुरघुरशब्दताकृशतनुस्त्वपीतवर्णाचिद्विद्भिःप रिकीर्तितंहिसकलंकासस्यचिह्नमहत् २ ( वातकीखांसीकेलक्ष ण) उरसिशिरसिकुक्षौवेदनाकंठदेशे भवतिबलविनाशःष्ठीवनं तुच्छतुच्छमागलमुखपरिशोषःशुष्ककासोंगमर्दःक्षवथुररतिरु ग्रावातकासस्यचिह्नम् ३॥ मुखमें नेत्रमें नाकमें धूलिके पड़ने से तथा धुमांके जानेसे भारीबोझके उठाने से रूखा खानेसे दंड कोड़ा आदि के पिटनेसे अत्यन्त पुकारने से खांसी पैदाहोतीहै १ हृदयकी रहनेवाली जो प्राणवायु सो कंठमें प्राप्तहो और कंठकी रहनेवाली जो उदानवायु सो हृदयमें यातीहै तब इसरोगी को बहुत दुःख देतीहै और इसमनुष्यका शब्द जैसा कांसेका फूटा बरतन बोलताहै इस तरहकी आवाजहो और कफमिला थूकें कंठमें घुरघुर शब्द हो शरीर लटजावे त्वचा पीली होजाय अरुचिं ये लक्षण पंडितों ने खां. सीके कहे हैं २ हृदय में मस्तकमें कांखमें कंठमें दर्द हो बल का नाश थोड़ा थोड़ा थूकना गले का तथा मुख का सूखना सूखी खांतीका उठना शरीर का टूटना छींक का आना मनका न लगना ये वादी की खांप्तीके लक्षण हैं ३॥ (पित्तकीखांसीकेलक्षण) भवेद्वीर्यहानिज़रोवकशोपः सर तंचनिष्ठीवनशूलमुग्रम्॥तृषासंभ्रमंतिक्तमास्यविदाहोनिरुक्तंप रैपित्तकासस्यचिह्नम् ४ (कफकीखांसीकेलक्षण) निष्ठीवनसांद्र कफेनयुक्तं कासेनछर्दिर्बलवीर्यनाशः॥शीर्षप्रपीडाजडतांगगौरव -- .

+ हमराजनिदानम्। ४३ प्रोक्तंभिपग्भिःकफकासचिह्नम् ५ (त्रिदोषकीखांमीकेलक्षण ) भवेद्यस्यनिष्ठीवनंपूयवर्णमुखान्नासिकायाविगंधिविवर्णम्॥महा श्वासवाहोंगतेजोल्पवीर्यःसकासीनजीवेत्कदाचित्सुधाभिः६ ।। वीर्यका नाश ज्वर मुखका सूखना रुधिरमिला थूकना उपशूल प्यास भौर कडुवा मुख दाह ये लक्षण पिनकी खांसीफे पूर्वाचारहोंने कहे हैं ? गाढ़ा कफका थूकना रदहो बल वीर्यका नाश शिरमें दर्द जड़ता देहका भारीहोना ये लक्षण वैद्यों ने कफकी खांतीके कहे ५ सदके वर्णकेसमान थूकना मुख नाक में वासआवै तथा विवर्ण महाश्वास का चलना देह तेज वीर्य इन का घटना ऐसा खासी वाला अमृत सेभी नहीं जावै ६॥ (असाध्यखांसीकेलक्षण) मुखेयस्यशोथोचिर्वेपथुत्वंसरक्त चनिष्ठीवनफेनिलंबा ॥ तृपाशूलमुग्रंभोदुष्टगंधिसकासीनीवे सहस्रषिग्भिः७ दक्षीणतमःकासी साध्योदानजपादिभिः।। तरुणोबलवान्साध्यः पथ्यैरौषधिभिर्बुधैः८॥ इति श्रीभिपक्चक्र चित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेकासलक्षणम् ॥ मुखपर जिसके सूजनदो अरुचि कंप रुधिर मिला तथा झाग मिला थूना प्यास शूल दुर्गधि का मुखमें पाना ऐते लक्षणवाला रोगी हजार वैद्योंसे भी नहीं जीवै ७ बूढा तथा जो क्षीण पड़गयाहो वो रोगी दानज- पादिकों से साध्यहै और जो रोंगी तरुणहो तथा बलवान्दो वो पथ्य और औपधियोले पंदितों ने खानीवाला साध्य कहाहै ८ ॥ इति हंसराजार्य बोरियांकासरोगलक्षणंसमाप्तम् ।। अथ हिकालक्षणम् ॥ (हिकारोगकी उत्पत्ति.) रजोधूम्रपानान्मुखेनासिकायां गरि प्टान्नपानाज्जलस्थावगाहात्॥श्रमादध्ववेगात्तृषार्तेरसच्याभवेयु नृणांपंचधारौद्रहिका १.प्राणोदानसमानकोपजनिताहिकान्त्र वृद्धिप्रदा कष्टहतिकरोतिजन्मसमयेवालस्परद्धिमुखम् ॥ तेजो जोबलवीर्यटदिमधिकांहर्षरुचिंबईते रक्तास्यतन रुपननयनयो विम्फारमार्द्रगलमरतारुण्येवयसिस्थितेकफमरुज्जातानहिका - । हसराजान५/नम् । हिता वैरस्यंवदनेगलेसरसतांकुऔप्रपीडारुतम् ॥ आटोपहृदये रुणदिपवनेमर्माणिसंतोदते छार्दै सा कुरुतेरतिवितनुने हल्लास मुल्लासते ३॥ धूलि धुआं इनका मुख और नाकमें जानेसे गरिष्ट अन्न के भोजन मे जलमें बहुतदेरके रहनेस श्रमसे रस्तेके चलने से चौदह वेगों के रोकने से प्याससे अरुचिसे मनुष्यों के पांच प्रकारकी घोर हिचकीका रोग पैदा होता है १ प्राण उदान समान पवनों के कोप करनेसे हिचकी प्रांतों को बढ़ावे कष्टकर तथा रोगीको मारती है औं बालकके जन्मसमय बालक को बढ़ावै तथा सुखदे और तेज चले वीर्य बढ़वारको करें तथा हर्प रुचिको बढ़ावै मुखको लालकरदे शरीरको कॅपावै नेत्रों को फटे से करदे कंठको गीलाकरदे २ तरुण अवस्थामें जो वातकफ से पैदा हुई हिचकी सो अहित है मुखको विरस करदे गले में सरसता करदे कांख में पीडाकरे छातीको घेरले श्वासको रोकरे मर्ममममें पीडाकर वमन तया मकान लगना खांसी सूखी रद्द ये लक्षण करें ३ ॥ वार्दिक्येवयसिस्थितेसतिमहाहिकायदाजायते पित्तग्लेम मरुद्भवाप्रकुरुतेपीडांगलेमस्तके॥शूलधिमानतृषारुचिंबितनुने हल्लासहपीडनम् पंचत्वंवितनोतिरोगमखिलंप्राणान्निहतिद्रुतम् ४ उदानवायुकोपेनपंचहिक्काभवंतिताः॥कुतिविविधानरोगान तासांनामानिकथ्यते ५ गम्भीरामहनीतथाचयमलाक्षुद्रान्नजों पंचवागम्भीरोदरगर्जनीचरकरीमर्माणिसंतोदतासापद्रवका रिणीबलहरीनाभःप्रटत्ताहिसा अन्यायामहतीकरोतिचतनौकंप शिरःपीडनम् ६॥ वृद्ध अवस्था में जो हिचकी हो वो वातं पिच कफ तीनों दोपों से पैदा होती वो घोर हिचकी कंठमैं तथा शिरमें दर्दको करैहै शूल अफरा प्यास अरुचि खालीरद हृदय में दर्द और सबरोग ये लक्षणहों तोमनुष्य जल्दी मरजावै उदान पवनके कोपसे पांच तरहकी हिचकी पैदाहोती है और.. अनेक तरह के रोगी को पैदा करती है उन पांचों के नाम कहते हैं,५, १ गंभीरा २ महत्ती ३ यमता ४ क्षुद्रा ५ अन्नजा प्रथम गंभीरा के लक्षण कहते हैं गंभीरा पेटमे गुडगुडाइटकरे ज्वरको करै मर्ममर्भ में पीडाकरे ४ na हंसराजनिदानम्। और सब उपद्रवों को करें वलको नाशकर यह हिचकी नाभी से उठती है अब दूसरी महती का लक्षण कहते हैं शरीर कापै शिरमें दर्दहो ६॥ वातश्लेष्मभवाकरोतियमलाहिकांपीडारुजीवातानुविभे दिनीवलहरीग्रीवांशिरःपनम् ॥ क्षुद्रानाभितलोद्भवारसचयंचो धनयेत्कष्टदा वैरस्यवदनेन्नजावितनुतेगानेगुरुत्वंतथा७॥इति भिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेहिकालक्षणसमाप्तम् तीसरी वात कफसे पैदाहुई जो यमलानाम हिचकी सो प्रांतोंको पीडा दे कंठतालु में दईकरै वाका नाशकरें नाडशिर इनको कपावै चौथी -दानासकर प्रसिद्ध जो हिचकी सोनाभीके नीचे उठती है वो रसको ऊपर लेजातीहै. अर्थात् उलटी करावैःऔर कष्टको पैदाकर मुखको विरस करती है पांचवीं जो अन्नसे पैदाहुई हिंचकी सो शरीर को भारी करती है ७॥ इति हंसराजबोधिनीमहिकालक्षासमाप्तहुया ॥ (श्वासरोगनिदानम्) प्राणोदानसमानकोपजनितःश्वासो रुषावईनेक्रुद्दों_बजतेमुहुर्मुहुरथोदोधूयमानंनरम॥निद्रोहंतिम हातषांवितनुतेशीतज्वरकंपनं प्रस्वेदंकुरुतेतनौविकलतांदाहं भ्रमबिभ्रतेशुष्कास्यंकुरुतेरुणद्धिपरतःस्रोतांसिरक्ताननं हृत्कं ठोष्ठमुखेषुशोषमरतिश्वासोरुचिनाशते॥आध्मानंतनुतेशिरांवि. धमतेनगांतर्नुकंपते शूलंवेदनयायुतधिकलतांशब्दंपररुंधते २ श्वासःस्वाभाविकोमंदाह्यतिश्वासारुजाकरः॥ मृतिप्रदोमहाश्वा संस्त्रिंविधश्वासलंक्षणम् ३ ॥ 'प्राण उदान समान इनतीनों पवनों के कोप करनेसे क्रोधकर बढ़ती और ऊपर नीचे विचरती है कमी ऊपर चढ़े कभीनीचे उतरै नींदका नाश तथा घोर प्यासको पैदाकर शीतज्वर कंप.पसीना इनको पैदाकरे शरीर में वेकली दाह भार ये लक्षण श्वासरोग करताहै १ श्वास मुखको सुखावै नाड़ियों के मार्गको रोकदे चेहरेको लाल करताहै हृदय कंठ मोठ मुख • इनमें शोपहो मनका न लगनी अरुचि अफडी नाडीनको धमावै शरीर क- पावै वेदनायुक्त शूल तथा बेकली और आवाजको निहायत कम करती है २ और जो श्वास सो स्वभावसेही मंदहोती है परंतु.अतिश्वासरोग करती है. और महाश्वास मौतकी देनेवाली है ये तीनप्रकारकै लसग ३॥

४६ हंसराजनिदानम्। इछर्दिर्भवेदध्वपरिश्रमैःपरैः २.(वातकीर्दिकेलक्षण) छर्दितिः भवाकरोतिविविधानोगानलंभोजनी कृष्णाभाहरितारुचिःशि थिलंतहत्पार्श्वपीडांभ्रममा उद्गारस्वरभेदनंचमहतीजम्भांगले पीडनशलंरूक्षवपुस्तषांचशमनवहेस्तनौशोषणम् ॥ वातपित्त कफंसे तथा सन्निपातसे तथाबुरीवस्तुके देखनेसेउलटीकारोग चप्रकारकाहीतादे१चिकनीसूगलीनोनकीपतली तथालतीग्रादिकखाने बहुत्तभोजनसे क्रोधसे बहुत जलके पीनेसे डरके लगनेसे सूंगली वस्तु देखने से बहुत रास्ताके चलने से अपर कहिये कृमिके पड़नेसे स्त्रीके. गर्भ रहनसे छर्दिनाम रदकारोग पैदा होताहै २ जो मनुष्य बहुत भोजनकर, उसके वातकी छर्दैि अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न करती है तथा कालेरंगकी तथाहरेरंगकीहो और शिथिलतांकोंकर हृदयमें पसवाडोंमें पीडाकर भ्रम कोकरें डकारबुरीकाओना स्वरभंग घोरभाईकंठ पीडा शूलशरीरमेंरूला पन-प्यासका अवरोध शरीरमें पागसी जल और शोपको करै ३ ॥ (पित्तकोछर्दिकेलक्षण) छर्दिीपित्तंसमुद्भवारुणनिभापीतानि भासांवचित् कोष्णादाहयुतांगपीडनपरा तृशूलम.न्विता ॥ हरकंठोष्ठमुखषुतालुरसनाशीर्षेषुपीडाप्रदा संतापभ्रमकारिणीरु चिहरीलमाशकासाभवेत् ४ (कफकीछर्दिकेलक्षण)छदिले मसमद्भवासितनिभाफेनान्वितामेदुराक्षारास्यंकुरुतेरुचिंबित नुतेतंद्रांप्रसेकंवमिम् ॥ आलस्यंजडतांवपुर्गुरुतरंलालांचनिष्टी चनं रोमांचंहदिवेपथुमुखमलंकासंतनौशीतताम्.५ ( सन्निपात कीर्दिकैलक्षण) छर्दिीपित्तमरुत्कफे प्रजनितानानानिभाकष्ट दा श्वासंकासयुतंतनोतिकृशतांदाहंतपाकंपनम्॥ हल्लासंतमकं वपुर्विकलतांमच्छमितीसारक शलमत्रविरोधर्मज्वरतमंहिकांवि वर्णवमिम् ६॥ पिनकीछदिरोगके ये लक्षण हैं लालरंग तथा पीलारंगकी तथा गरमहो दाहयुत शरीरमें पीड़ा प्यास शूल मूर्छा हृदय कंठ ओठ मुख तालू जवान शिर इनमें पीडाहो खेदभ्रम रुचिको नाशकर कफ को नाश करे ४ पित्तकी छंदिरोगके ये लक्षण हैं सफेदरंगहो भागसेंआच्छादितहो चिकनी खारामुख भरुचि तन्द्रा पसीनेका आना रद्द सुस्ती जड़पना देहभारी . + . - हंसराजनिदानम्। लारका गिरना वारवार थूकना रोमांच 'हृदयमें कंप मुखमलीन खामी . शरीरको शीतलेगे ५ त्रिदोपसे पैदाहुई जो छर्दि उसको चित्रविचित्र रंग हो,कप्टको पैदाफरै श्वास खांसी तथा शरीरमें रुशता दाह प्यास कंप खालीउलटी तमक देहमें वेकली मूर्छा अतीसार शूल मूत्रका रुकना ज्वर अंधेरेकााना हिचकी वर्ण घोरही तरहका और वमन ये लक्षणदों६ ॥ (छदिरोगकेउपद्रव) कासोहिकातृपाश्चासो हृद्रोगस्तमको ज्वरःमूर्छावैचित्यमित्येतेज्ञेयाश्नरुपद्रवाः ७(छर्दिरोगका साध्यासाध्यलक्षण) छर्दिःसोपद्रवाऽमाथ्यारक्तपूयवहातथा ॥ नोपद्रवाभवेत्साध्याज्ञात्वाभैषज्यमाचरेत् ८ ॥ इति श्रीभिषक्च ऋचित्तोत्सवेहंसराजकृतवैद्यशास्त्रेछदिलक्षणसंपूर्णम् ।। खांसी हिचकी प्यास श्वास हृदयमें पीड़ा तमक,ज्वर मूर्छा होगी ये छर्दिरोगके उपद्रव ७ उपद्रवसहित छर्दिरोग असाध्यहै, और जि- समें रुधिर और रादगिरती हो वोभी असाध्यहै और जिसमें उपद्रव नहीं वोसाध्यहें ऐसे साध्य असाध्य परीक्षाकरपीछेयादे॥ इतिहंसराजार्थबो- धिन्याछदिरोगनिदानसमाप्तम् ।। (अथ तृष्णालक्षणम् ) कफ़ोद्भवापित्तभवामरुद्धवात्रिदोष जांभक्तभवाक्षतोद्भवा ॥ भगश्रमाभ्यांजनिताक्षयोद्भवाभवंतित पणाप्टविधाईचदुःसहाः १ (तृष्णारोगकीउत्पत्ति) वाताशनाध्य श्रमतापरक्त स्रोतस्त्वपांवाहिषुशुष्फितेषु ॥ हत्कंठतालनिदहंति दोपास्तृषातदासंजनितानराणाम् २ ( वातकीतृष्णारोगकाल क्षण)तृष्णावातसमुत्थिताचकुरुतेस्रोतोनिरोधश्रमशोषंशंखशि रोगलेषविरसंवत्तनिरुत्साहसम्। संकोचंपरितस्तनौप्रलपनंचि त्तभ्रमंरक्षतांशीतोदैःपरिवर्दितावितनुतेहिकामजीर्णज्वरम् ३॥ तृष्णा अर्थात् प्यासका रोग भाठतरेहकाहै ऐसे वैद्य कहते हैं १ कफसे पित्तसे ३ वादीसे ४ सन्निपातले ५ भोजनके करनेसे ६ घावसे ७ भय और श्रमसे - क्षयीरोगके होनेसे १ वातसे भोजनके करनेसे मार्गके चलनेसे श्रमके करनेसे गरमीसे रुधिरके बिगड़नेसे कुपितहुये जो बात पित्त कफ सो जलके वहनेवाली नाडीनको सुखाकर हृदय कंठ तालूमें हंसराजनिदानम् । ५१: दाहको पैदाकरें तव मनुप्योंके तृपारोग पैदा होताहै २ वातकी तृपा.ये. लक्षण पैदाकरती है बहिरापना परिश्रम कनपटी मस्तक गला इनमें शोप; मुखमें विरसता तथा साहसहीन देहमें संकोच, बकना चित्तम भ्रम तथा देह रूवा शीतल जलके पीनेसे जो तृपा पैदाहो वो हिचकी और अजीर्ण ज्वर को बढ़ावै ३॥ पित्तकीतृषारोगकालक्षण) अाधिव्याधिसमन्विताभयक रोपित्तात्मिकाशोषणी: तृष्णादाहविवहिनीसुखहरीकार्यस्यवि. ध्वंसनी ॥ उपणत्वेविदधातिदोषमखिलंशीतेसुखविभ्रते रक्ता स्यकुरुतेमुखेविरसतांमूच्छीप्रलापंभ्रमम् ४ (कर्फकीतृष्णाकेल क्षण) मूत्रावरोधजठराग्निनाशंनिद्रांविधत्तेगुरुतांशरीरे ॥ ह कंठपीडांवितनोतिकासंश्लेमात्मिकाछर्दिकरीचतृष्णा ५ (त्रि दोषजनितहषाकेलक्षण ) त्रिदोष जनितातृष्णातेजोवीर्यबलौ जसाम् ॥ नाशिनीस्करीघोरामनोक्षप्राणहारिणी ६॥ आधि कहिये मानसिकरोगव्याधिकहिये ज्वरादिरोग तथा भय पैदाकरे शोप दाहको बढ़ावै सुखको दूरकरै देहको विध्वंस करै गरमीसे सकल रोग पैदाकरे और शरदीके होनेसे सुग्व मालूमहो लाल और रसरहित मुखहो मूर्छा प्रलाप भ्रम येलक्षण पित्तकी तृष्णाके हैं ४ मूत्रका रुकना तथा मंदाग्नि नींदकामाना शरीरभारी हृदयमें कंठमें पीड़ाखांसी रद ये लक्षण, कफकी प्यास रोगकेहैं ५ सन्निरातकीतृया तेज वीर्य बल ताकत का नाश करनेवाली है घोररोग पैदाकरै मन प्राणकी हरने वाली ६॥ (तृषारोगसाध्यासाध्यविचार) अल्पदोपकरीकृष्णाश्रम घाताध्वभोजनैः ॥ जाताशीतोदयानेननाशमेतिगरीयसी ७ (अथ तृषारोगेपथ्यम् ) गुर्वन्तभोजनंस्निग्धंतीक्षणोणंलव पामिपम् ॥ व्यायामसर्यसंतापतृष्णावान्परितस्त्यजेत् ८ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्तृष्णालक्षणम् ॥ लोश्रमसे चोटसे रास्ताकेचलनेसे भोजनसे जो तृपाअर्थात् प्यासलगैवो साध्यहै और जो ठंडेपानी पीने से प्यासलगैसो प्राणकीनाशकरनेवाली ५.२ हंसराजनिदानम् । जाननी चाहिये ७ भारीभन्नकाभोजन.चिकनीवस्तु तीखीगरम नोनको मांस डंड कसरतका करना सूर्यका तेज ये तृपारोगवालात्यागदे ८ इति श्रीहंसरानार्थवोधिन्यांतृष्णारोगनिदानं सम्पूर्णम् ॥ (मू रोगकीउत्पत्ति ) क्षीणस्यगतसत्त्वस्यविरुद्धाहारसे- विनः॥धाविनःसक्षतस्यापित्रीभत्सस्यविलोकिनः१तस्यनाडीपु सर्वासुदोषाःसर्वेप्रकोपिताः ॥ रुषाविशंतिकुर्वतिमूछवैिचित्य कारिणीमरवातपित्तकफैर्मद्यैःशोणितेनविषेणच॥म भवन्ती साकुर्यान्नरंकाष्ठमिवानिशम् ३॥ अथ मूर्छारोगनिदानम् ॥ जो मनुष्य क्षीणहो ताकत रहितहो विरुद्ध आहारका खानेवालाहो दौडनेवालाहो और जिसके शरीर में घावहो घिना- यदी वस्तुदेखीहो १ ऐसे पुरुपके कोपको प्राप्तहुये नो तीनों दोपतो सर्व नाड़ियों में क्रोधले धसकर बेहोशी करनेवाला मच्छीरोग पैदाकरतेहें २ सो मूर्छारोग वात पित्त कफ और सन्निपातसे और मद्यके पीनेसे रुधिरसे विपभक्षण करनेसे सातप्रकारका होताहै वो मूछीमनुष्यको काष्ठकीतरह सृथ्वीपर बारबार गेरदेतीहै ३॥ (वातकीमूर्छाकालक्षण) दृष्ट्वाकाशंश्यामनीलावभासंपश्चा दुव्यावातजामेतिमू म्॥ योमर्त्यस्तंपीडयंतीतिरोगाजृम्भाकं 'पश्चासतृष्णाप्रसेकाः ४ (पित्तकीमूर्छाकालक्षण) पीतारुणन भःपश्यं स्तमःपश्यंस्ततंपरम् ॥ नरोयःपततेभूम्यां ताम.पित्त जांवदेत ५ जंतौप्रवुद्धेतमसिप्रणष्टे मतिपित्तप्रभवाकरोति॥ प्रस्वेदतृष्णापरिवेपथुत्वं दाहंचतापमुखशोषमारतिम् ६॥:

हंसराजनिदानम्। (कफकीमूर्छाकालक्षण) शुभ्रन्नभोनरःपश्यन्मूर्च्छयोपि नेद्यथा॥निश्चेष्टोदंडवन्नूनं तांविद्याञ्चकफात्मिकाम्७प्रबुद्धे मनु जेकुर्यान्मू.निद्रांकफात्मिका ॥ शैथिल्यंगौरवंतंद्रोहल्लासंकास तृड्ज्वरम् ८ (संनिपातकीमू केलक्षण) त्रिदोषजनितामूर्छा सर्वरोगवहानरम्॥पातयत्याशुमोहाब्धीविनाबीभत्सदर्शनम्॥ जो मनुष्य आकाशको धवलादेवै फिर गिरपडे चेष्टारहित लकड़ी कीसी तरह उस मच्छीको कफकी कहतेहैं७ जब मनप्यसावधान होजाय तबनींद आवे तथा शिथिलता होय देहभाराहो तंद्राहो सूखी रहभावे खांसी हो तथा प्यासहो ये कफकी मू के लक्षणहें = त्रिटोप अर्थात् संनिपात से पैदा हुई मूर्छा सर्वरोग प्रकट करें और मनुष्यकोमोहरूपी समुद्र गेरदेवे विनासूगली वस्तु केदेखे जोपैदाहो उसको सन्निपातकी मूर्छाकहते ६ ।। (रुधिरकीम कालक्षण)घ्राणेनरक्तस्यचदर्शनेनमूर्च्छति कौस्त्रीजनभीरुबालाः ॥ बुद्धेषुचिह्नानिभवंतितेषांमोहोंगकंपोति भयोजडत्वम् १० (मद्यकीमूर्छाकालक्षण) मद्येनम जडतां करोतिने।रुणत्वंशिथिलशरीरम् ॥ हर्षप्रलापंपरिबुद्धिनाशनि द्रांवमित्वंभ्रमतांप्रसेकं ११ (विषकीम केलक्षण) नासाकर्ण मुखेपशोपमधिकं मू विषात्संभवादाहंतीव्रतरंदधातिहदयेक ठेतिपीडारती ॥ हष्टिनाशयतेकरोतिविकलंदेहस्यविक्षेपणं तेजो वीर्यवलोजसांप्रतिपलंविध्वंसिनीशोषणी १२ ।। नाकसे रुधिर फेगिरनेसे स्त्रीजन तथा दरपोकना तथा बालक ये देखकर मूछीको प्राप्तहोतेहैं होश होने पर ये लक्षण होते हैं मोह शरीरका कांपना डरका लगना तथा जड़त्व १० घरत व दुष्टमद्य के पीनेसे जोमूर्चा हुई उसके ये लक्षण हैं जड़त्व और नेत्रलाल शरीर शिथिल हर्षवकना बुद्धिका नाश निद्रा वमन भ्रम मुखसे लारका गिरना ये ११ विपके खानेसे व सूंघनेसे जो मूच्छीहो उसके ये लक्षणहें नाक कान मुख इनका सृखना तीव्र दाह हृदयमें कंठमें दर्द मनका न लगना नेत्रोंसे कम देखना बेकली देहका पटकना तेज वीर्य बल ताकत इनकानित्यघटना और शोपहो १२॥

हंसराजनिदानम्। (छमकेलक्षण)व्यायामेनविनाकायेश्रमःस्याच्छामवर्जितः।। इंद्रियाणांहित्तिघ्नःछमामेवोच्यतेवुधेः १३ इतित्राभिपक्चक्र चित्रोलवेहंसराज वैद्यशास्त्रमू लक्षणंसमाप्तम् ।। जिस मनुष्यके दंड कसरतके विनाही श्वासरहित श्रमहो और इंद्रियों का जो स्वभाव तिसको पलटदे उसको पंडित कमरोग कहतेहैं १३॥ इति हंसराजार्थवोधिन्या मूछीरोगनिदानं तम्पूर्णम् ।। (दाहरोगनिदानम् ) देहेशोणितमुच्छ्रितंप्रकुनेदाहंमहादरु पंचांगयडूजतेतदेवदहतेबाह्यत्वचंचांतरेः ।। मांसंशोणितनाडि कास्थिनिचयान्श्लेष्मवसमज्जिकांमागेषुगतंदहत्यवयसर्व रुषाहर्निशम् १ (धातुक्षीणदाहकालक्षण) क्षीणेघाताबुस्थितोघोर दाहोमूछीकुर्यान्मर्मघातज्वरार्त्तिम् ॥ तृष्णाशोपंक्षीणशब्दंश बवैद्यैरुत्तोसौनर कष्टमाध्यः २ मर्यादादधिकरतंदेहसंस्थितमा मयं । लोहगंधंदहत्यंगपित्तवातस्यभैषजम् ३ इति श्रीभिषक्च चित्तोत्मवेहंसराजनेवैद्यशास्त्रेदाहलक्षणंसम्पूर्णम् ॥ जिस मनुष्यके देहमें रुधिर बढ़ता उसके महावाहका रोग पैदाकरता जिस अंगमें रुधिर प्राप्तहो उस अंगको दाहन करै और भीतर दाहके होने से बाहरकी त्वचामे दाहहो और मास रुधिर नाडी हड्डी इनके समूहको तथा कफ और बसाको मज्जाको दहनकरे सर्वांगमें प्राप्तदाह सब अंगके अवयवों को क्रोध.करके निरतर दहनकरै १ जिप्त मनुष्यकी धातु क्षीणहो उसके घोर दाह रोग पैदाहो उनके ये लक्षण माहो मर्म मर्म पीडाहो ज्वरहो प्यास शोप मंदशब्द हो और रुशदेइहो वो रोगीवैद्योंने कष्टमाध्य कदाई २ मर्यादासे अधिक रक्त देहमें बढ़ताहै तब दाह्रोग होता और सब रुधिर निकले तब लोहफीसी बासमावे सबदेहमे दाइहो उस में वातपित्तकी दवाई करना चाहिये ३॥ इति हंसराजार्थबोधिन्यांदाहरोग लक्षणंसमाप्तम् ॥ (मदात्ययरोगकालक्षण)दोषाविपस्ययेसर्वसुधायाश्चापियेगु णाः॥तेमद्यपरितिष्ठतियुक्त्यायुक्तयापिवेन्नरः १ अयुक्त्यायःपिये हंसराजनिदानम्। ५५ न्मयन्तरयरोगोभवेदृशम् । तस्माद्युक्तयापिबेन्मासौख्यायाम तवन्मुहुः२(अयुक्तिमद्यपानेदूपणं) सूर्याग्नितप्तेनबुभुक्षितेनरो गान्वितेनापिपिपासितेन॥श्रमान्वितेनाध्यपरिश्रमेणवेगावरोधे नभयान्वितेन ३॥ विपके सर्वदोप और अमृत के सर्वगुगमद्यमें रहतेहे युक्तिमे प्रो.अयुक्ति से पीवे तो गुण और भवगुण करताहे १ उमीको दिखाते हैं जो मनुष्य बेतरकीबमे मद्य पीता है उसके बराबर रोगपैदाहोता है इसीसे मद्यपान विधिपूर्वक करना चाहिये क्योंकि विधिपूर्वक पियाहुमआमद्य अमृतोगुणों को करताहै २ सूर्य के धामसे वा अग्निसे तपाहुआ भूखते ब्याकुल रोगी प्यासा श्रमसे थका रास्तेके चलनेसे चौदहवेगोंके रोंकनेते व्याकुल भययुक्त ३॥ क्षीणेनशोकाभिभयेनचेवकोपाभिभूतेनचनिर्वलेन ॥ अत्य म्लभक्ष्येणचमेवितंबहुकरोतिमद्यविविधान्विकारान् ४ लज्जा बुद्धिविनाशनंविकलतांछर्दिगुरुत्वंतनौ पांडत्वंकृशतांमुखेविरस तांनिद्राविमूच्छतृषां। हल्लासनमकंवमिशिथिलतांगुह्यप्रकाश तमःकार्याकार्यविमूढतांप्रकुरुतेमद्यञ्च दोषाकरं ५ मये संत्यम तोपमागुणगणायुक्तयाप्रपीतनिशक्षुबोध स्मृत्तिपाटेतुष्टिरुचयो नारोगताकांतयः ॥ आनंदांकुरुकोटयोमधुरतास्त्रीपुत्रहोत्मवा वीयौजोवलधैर्यशौर्यमतयःसौजन्यसौख्यादयः ६ ॥ क्षीणमनुष्य शोकयुक्त कोपयुक्त निर्बलता अत्यंतखटाई खाई हो और बहुत मद्यपियाहो ऐसे मनुष्यों के मद्य अनेक विकार करता है ४ लग्ना बुद्धिको दूरकरता है वेकली रद्द देहभारी पीलिया श्रीरकश मुख में सवाद नहो निद्रामूर्छा प्यास सूरखी उलटी तमक वमन शिथिलता छिपीवातको कहना अंधेराभाना कार्य मकार्यको न जानना दोपोंकी खानि ऐसी अयुक्ति से पियाहुआ मद्य करता है ५ अथमद्यपानगणम् ॥ युक्तिसे मद्यपानकिया अमृतके समानगुण करताद क्षुधाको बढ़ावै स्मृति पुष्टता तुष्टतारुचिनीरो- गता कांति शानंदके अमेकअंकुरपैदाकर मधुरतास्त्रियों में रुचि उत्सव वीर्य भोजवल धार्यता शूरतामातिसुजनता सुखादिइत्यादिकोकोपेदाकरताहै ॥

+ ५६ हंसराजनिदानम्। मद्येनबुद्धिःप्रथमेनमोदःस्त्रीपुप्रहबहुभोजनेच्छा ॥ वादित्र गीतेपुरुचिःसुखंचनिद्रारतिःस्यान्मनसोत्सवंच ७ मद्यहितीयेषु रुषाप्रमत्तःस्यान्नष्टवुद्धिर्विगतात्मचेष्टः ॥ घूर्णाननोहर्पयुत्तोति निद्रोदुर्वाक्यशीलोबहुलीलयायुक्८ तृतीयेमदेनष्टदृष्टिमनुष्यो वदेत्सर्वगुह्यानिगच्छेदगम्याम् गुरुंनैवपश्येदभक्षेत्समंताद्विल ज्जास्वतंत्रोभवेद्भग्नशीलः ॥ प्रथम पियाहुआ मद्य बुद्धिको बढ़ावै मोदको स्त्रीगमन में रुचि पैदा करे बहुत भोजनकी इच्छा वाजे और गीत सुनने में इच्छा सुखनींद मनका एकायलगना मनमें उत्साह ये गुणकरता है ७ दूसरी दफे मद्य पियाहुआ आदमीको मस्तकरदेताहै बुद्धिनष्टकरदे चेष्टारहित करदे तिरछी दृष्टि हर्पयुक्त अतिनिद्रा खोटाबोले अनेक लीलाकरे - तीसरीदफे पिया मद्य मदसे नष्टदृष्टी करदे और सब छिपीवात को कहै और मा बहिन बेटी गुरूकी स्त्रीसे भी खोटाकाम करने की इच्छाहो गुरुकोभी न देखे अभक्ष्य भोजनकरै लज्जात्यागदे अपनी इच्छाकाकाम करै मारधाइकरै। चतुर्थेमदेमृत्युतुल्योमनुष्योभवेज्ञानहीनः स्वकार्येविका ये ॥ क्रियाचारशीचादिहीनोविमूढः परस्वनजानातिमत्तोविल ज्जः १०॥ (पित्तकेमदात्ययकेलक्षण) पार्श्वशूलशिरकंपश्वा सहिक्काप्रजागरैः॥मुखशोषणपित्तस्यतमवेहिमदात्ययम् ११ ॥ (कफकेमदात्ययकेलक्षण) तंद्राहल्लासस्तैमित्यर्थरोचकगौ रवैः ॥ शीतलाङ्गस्यतंविद्यात्कफप्रायमदात्ययम् १२ ॥ चौंधीवार पियाहुआ मद्य मुरदेके समानकरदे ज्ञानरहित करदे अपने पराये कामको न समझे क्रिया आचार शौच इनकरके रहित करदे मूढ़ . करदे अपना परायान जाने और मस्त लज्जारहित होजावे १०पसवाडोंमें शलहोशिरकांपेश्वासहिचकी जागनामुखकासूखनाये पित्तके मदात्ययके लक्षण ११ तंद्रा सूखीरद गीलेकपड़े से पोंछासादेह वमन अरुचि देह भारी और शीतल अंगहो उसको कफका मदारपयकहते हैं १२॥ अंगमर्दतषाशूलरूक्ष्यगात्रविवर्णता॥ हिक्काभ्रमेश्चतंविद्यात् है । हंसराजनिदानम्। वातप्रायंमदात्ययम् १३ (त्रिदोषकेमदात्ययकालक्षण ) सोपद्र वैःसर्वलिंगैस्त्रिदोषोत्थैर्मदात्ययम्॥त्रिदोषजनितोज्ञेयःसाध्योयं चभिषग्वरैः १४ चिह्नंचतत्परमदस्यवदंतिवैद्याश्चिकातृषांगगु रुताबहुपर्वभेदः ॥ विएमूत्रशक्तिररुचिर्विरसास्यताचश्लेष्मो ज्वरस्तुकृशतारुजताकपाले १५ ॥ भंगोंका टूटना प्यास शूल रूखा शरीर तथा विवर्णदेहका हिचकी भ्रम ये लक्षण बातके मदात्ययकेहैं १३ जो उपद्रवके साथहो और तीनों दोषों के लक्षणमिलतेहों उसको सन्निपातका मदात्यय जानना १४ और भी सन्निपात मदास्ययके चिह्न कहते हैं जिसमें छींक प्यास शरीरभारी संधि में पीड़ा विष्ठा मूत्रका निकलजाना अरुचि मुखसे सवाद नातारहै कफ और ज्वर तथा मस्तकमें पीडाहो १५ ॥ (मद्यपानोत्थअजीर्णकेलक्षण) अजीर्णमद्यपानोत्थंकुर्यादाह मचेतसम् ॥ तृष्णामाध्मानमुद्गारसंधिभेदःशिरोरुजम् १६(मद्य पानोत्थभ्रमकेलक्षण)भ्रमोमद्यपानोत्थितःकंठधूमं कर्फदाहमुग्रं ज्वरश्यामजिहम् ॥प्रशोपंपिपासांवमिपावशूलंगरिष्ठोदरंनील मोष्टं प्रकुर्यात् १७ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तौत्सवेहंसराजकृते वैद्यशास्त्रमदात्ययपरमदअजीर्णविभ्रमाणांलक्षणानि । मद्यपीनेसे हुभा अजीर्ण वो ये लक्षण करताहै होश न रहै ऐसादाहको करै प्यास भौर पेटकाफूलना तथा डकारका आना संधि संधिमें पीडा मस्तकमें दर्द१६ मद्यके पीनेसे हुया जो भ्रम वो ये लक्षणकोकरै कंठसे धुंयेंका निकलना कफनिकलना दाहहो ज्वर जीभ काली पड़जाय मुख शोपप्यास वमन पसवाडोंमें दर्द या शूल उदर में भारीपना मोठनीले१७॥ इति हंसराजार्थयोधिन्यामदात्ययरोगस्तमाप्तः॥ (अथोन्मादलक्षणानि)विक्षिप्ततामनोवृत्तिर्दोषैर्वातादिभिर्भवे तासमस्तैर्वांसमस्तैर्वासोन्मादःकथितोवुधैः १ वाीयाविस्मृति येनगानेगीतस्यविस्मृतिमाशौचाशीचमजानातिसोन्मादः कथि तोवुधैः२(उन्मादरोगकेलक्षण) उन्मादहेतुर्हिजदेवतानांसंन्या - हंसराजनिदानम्। सिनांसाधुपतिव्रतानाम्॥आधर्पणंकुत्सितमंत्रसाधनं दुष्टाशुची नामशनंचपानम् ३॥ उसको पण्डितोंने उन्माद रोग कहाहै जिसमें समस्त वां न्यून वातादि' दोपोंकरके मनकी वृत्ति विक्षिप्तती अर्थात् बावलापना पायाजाय १. वात करनेकी विस्मृति और गानेमें गीतकी विस्मृति जिस करके हो और शांच भ्रष्टताको.जो न जाने उसको पंडितोंने उन्मादरोग फहाहै २ ये उन्मादरोग होने के कारण हैं ब्राह्मण देवता संन्यासी साधुं पतिव्रता स्त्री. • इनको दुःख देने से और खोटेमंत्रके साधनसे अपवित्र और दुष्टपदार्थ के भोजनसे वा पीने से ३॥ (वातोन्मादकेलक्षण) वातोन्मादग्रहीतःक्वचिदपिहसतेरोद तेक्वापिकालेरूक्षांगःशून्यचित्तःपरिवदतिवचोनिष्ठुरंह्यर्थहीनम्।। शीघ्रोत्साहंविधत्तेस्मितचलनयनोगीतनृत्यंकरोति स्वांगानाक्षे पणवाविकलकृशतनुःक्षीणधातुर्मनुष्यः ४(पित्तउन्मादकेलक्षण) पित्तोन्मादेनयक्तः सततजलरुचिर्भोजनेदत्तदृष्टीरक्ताक्षस्तब्धने प्रोभ्रमविकलतनुःशुष्ककंठौष्ठतालुः॥शीतेच्छामर्मदाहःपरिवद तिवचोरौत्यमर्षविधत्ते भक्ष्याभक्ष्यं परेषांपरिहरतिहठाहाग्विवा दंकरोति ५ (कफउन्मादकेलक्षणं) कफोन्मादेचिह्नभवतिकृश ताछर्यरुचयाकफोद्रेक कंठेमनसिजडतांगेविकलता ॥गतोजो. मकत्वंश्रुतिवधिरता देहगुरुतावमिर्निद्रालालोरसिकृमिशतवा क्छिथिलता ६॥ वातउन्मादयुक्त मनुष्य के ये लक्षण होतेहैं कभीहसे कभी रोवै रूखा शरीर होजाय शून्यचित्त दुष्टवचन बोले व्यर्थवोले कभी उत्साह युक्तहो कभीस्मितयुक्त चंचलनेत्र कभी गीतगावै कभी नाचनेलगै कभी अंगोंको चलाने लगै विकलहो शरीररुश क्षीणधातु ४ जलपीने और भोजनकी इच्छाहो लाल तिरछे नेत्रहोंभ्रम और देह में बेकलीहो कंठ तालु-मोठ इनका सूखना शीतल वस्तुकी इच्छा मर्म मर्म में दाह बुरावोले रोवै क्रोधयुक्तहो पराया भोजन भक्ष्य अभक्ष्यको हठसे लूटले वादकरने लंगे: येलक्षणपित्तोन्मादयुक्त के, ५ देह कश वमनं अरुचि कफकाबढ़ना कंठ में मनमें जहता देह विकल गति और ताकत इनका बंद होना गंगापना .

ar -- - d हंसराजनिदानम् । बहिरापना देहभारी रहहोना निद्रा और लारका गिरना पेटमें कृमि पड़ जायें वाणी शिथिल ये कफके उन्माद के लक्षणहै ६ ॥ (संनिपातकेउन्मादकेलक्षण) उन्मादेनत्रिभिर्दोषैर्जातेनन सितोनरः ॥ सोपद्र वैरसाध्योयं कथितोभिषजांचरैः ७ (औरभी कारणलिखते हैं) चौरैर्नृपेन्द्रैररिभिस्तथान्यैःसंत्रासिताक्षीणध नोभिघातः ॥ शोकाभितप्तोमुनिभिःप्रशप्तःसंजायतेतस्थमनो विकारः ८॥ इति श्रीहंसराजकृतवैद्यशास्त्रउन्मादलक्षणम् ॥ त्रिदोपउन्मादकरके ग्रसागया जो मनुष्य और उपद्रवयुक्तहो यो रोगी असाध्यहै ऐसे श्रेष्ठ वैद्योंने कहाहै ७ चोरोंने राजाने वैरियोंने और किसी ने इस मनुष्यको त्रास दिखायाहो और जिसका धन नष्टहोगयाहो चोट लगीहो शोकयुक्तहो ऋषिमुनिकरके शाप दियागयाहो ऐसे मनुष्यके मन विकार अर्थात् उन्मादरोग होताहै ८ इति हंसराजार्थवोधिन्यामुन्माद रोगममाप्तिमगमत् ॥ (अथ भूतोन्मादलक्षण) ब्रह्मण्योगुरुदेवपूजनरंतोदाताप्र व्यक्ताक्षरः संतुष्टोमितभुक्सुगंधिवनिताप्रीतिविनिद्रोऽनिशम् ॥ तेजस्वीवलवाञ्छुचिर्नयपरोभिज्ञोतिहर्षान्वितो देवोन्मादयुतो नरःसभवतिब्रह्मात्मकोब्रह्मवित् १ ( दैत्यलगेहुये मनुष्य के लक्षण) देवब्राह्मणसाधुवैष्णवगवांस्त्रीणांचसंन्यासिनां विद्वेषी भयंदोतिनिष्ठरवचोतुष्टोन्नपानादिषु॥दुष्टात्मापरमर्ममिद्तमयः क्रोधीचमानीनरः स्तब्धोगर्वसमन्वितोदनुजयुक्क्रूरोसहिष्णुत्र ली २ (गंधर्वलगाहोउसकेलक्षण) संचारीविपिनेनदीपुलिन योरम्यस्थलेपर्वते हटात्मारूपकंजवारुनयनो वादित्रगीतप्रि यः ॥ तुष्टोनीतिपरायणोतिचतुरोवाग्मीसुगंधान्वितो गंधर्वग्रह पीडितःसुवचनःस्वाचारभुग्मानवः ३॥ जो ब्राह्मण गुरु देव इनका पूजन कराकरे दाताहो शुद्धबोले संतुष्टहो थोडारखानेवाला सुगन्धी और स्वीमें प्रीतिहो रातदिन निद्रा न आवै तेजस्वीहो बलवान्हो पवित्ररहै नीलिका जाननेवालाहो सर्व बातोंको जाने हर्पयुक्तहो ब्रह्मका जाननेवाला ब्रह्मात्मक ऐसा मनुष्य देवताका उ.

६० हंसराजांनदानम्। न्मादवाला जानना १ जो मनुष्य देव ब्राह्मण साधु वैष्णव गोत्री संन्यासी इनसे वैरकर इनको भयदे तथा खोटाबोले अन्नजलसे जो तुष्ट न हो दुष्ट हो पराये मर्मका छेदनेवालाहो निडरहो क्रोधीहोमानीहो स्तब्धहो गर्व युक्तहो क्रूरहोसहनशील तथा बलीहो ऐसे मनुप्यको दैत्यकी बाधाजाने २ जो मनुष्य वन नदी पुलिन रमणीकस्थल पर्वत इनमें विचरनेवालाहो प्रसन्नचित्त तालकमलकेसे नेत्रहों याजा भोर गीत जिसको प्यारालगे तुष्टहो नीतियुक्तहो अतिचतुरहो शुभ बोलनेवालाहो सुगन्धयुक्तदेहहो वा- ग्मी अपने वित्तमाफिकभोजनकरे ऐसेमनुष्यको गंधर्वकी बाधाजाननी ३॥ (यक्षग्रस्तकेलक्षण) गंभीरोस्यवचोऽरुणाम्बरधरोधीरोतिशू रोमहान भोमाःप्रवदन्तुमेझटितिकिंदास्यामिकस्मैवरम् ॥ योयक्षग्रहपीडितोवदतिनानान्योरुणाक्षोनिशं तेजस्वीवलवान् वरोद्रुतगतिर्वाग्मीसहिष्णुर्भशम् ४ (महासर्पादियुक्तउन्माद केलक्षण)कोधात्माभुजगग्रहेणपरितोयस्तोहियोमानवी रक्ताक्षो रुधिरप्रियोतिवलवान्प्रेप्सुःपयःपायसे ॥ शौचाचारवहिर्मुखो विलिहितोऽसक्सकपीजिकया शून्यागाररतःक्वचित्प्रसरतेस वहिंसाप्रियः५ (पित्रीश्वरोंकेदोषकालक्षण) दध्योदनेपायसश करासु मध्वाज्यमांसेषुचरक्तवस्त्रे ॥ सुगन्धपुष्पेष्वतिशीतलोदे पितृग्रहग्रस्तनरोभिलाषी ६॥ जो मनुष्य गंभीर और अल्पवाणीका बोलनेवालाहो लालकपड़े प- हिने धीर अतिशूरहो और जो कहे कि हे मनुष्यो ! मुझसे वरमांगो क्याएं और लाल नेत्रहों तेजस्वीहो बलवान्हो जल्दी चलनेवालाहो श्रेष्ठ बोलनेवाला सहनशील ऐसामनुष्य यक्षकी वाधायुक्त जानना ४ क्रोधीहो और रुधिर प्यारालगे वलीहो दूध और खीरके भोजनकी इच्छाहो शौच और आचार रहितहो विले सरीखा घर प्यारालगे लालनेत्रहों जीभ से अोठों के रुधिर लगेको चाटे शून्यघर में रहोकर कभी पसरजाय सांप कीसीतरह हिंसा करना प्यारालगे ऐसे मनुष्यको भुजंग अर्थात् महासर्प कीवाधासमझनी चाहिये ५ दहीभात खीर वरा शहद घी मांत लालवल सुगन्ध पुष्प शीतलजल पे पदार्थ जिसको प्यारेहों उससनुष्यको पित्री; इवरों की बाधा जाननी ६॥

हंसराजनिदानम् । ६१ (राक्षसलगेहुयेमनुष्य केलक्षण) सुरामांसरक्तेषुलिप्सुर्विल ज्जोमहाक्रोधयुक्तोतिशूरोसहिष्णुः॥ वलीनिष्ठुरः क्रूरकर्माविरू पोग्रहीतोनिशाचारिभिर्योमनुष्यः७ (प्रेतग्रस्त केलक्षण)भ्रम तिरुदितिनित्यंगहरारण्यसेवी विलपतिकिलमामेतिकंपविध ते ॥ हसतिलिखतिभूमिभक्ष्यपानैरतृप्तोवदतिविकलवाणींप्रेत ग्रस्तोमनुष्यः ८ बालभीरुस्त्रियादेहेप्रविशतिसुरादयः॥ शीता दयोयथाकायेमन्यतेप्रतिविम्बवत् ६॥ मद्य मांस रुधिर इनकी इच्छाहो लज्जारहित महाक्रोधी शूर सहि- प्णु बली निष्ठुर क्रूरकर्म का करनेवाला विरूप ऐसा मनुष्य राक्षसयस्त जानना ७ डोलाकरे निस्परोयाकर पर्वत वनमें रहाकर विलापकरै कभी मच्छीसे गिरपड़े कांप हेसे धरतीको लिखे भोजन और पीनेसे तृप्त न हो विकलवाणीबोले ऐसा मनुष्य प्रेतमस्त जानना ८ बालक डरपोंके स्त्री इनके देहमें देवताभादि प्रवेश करते हैं जैसे शीत घाम देहमें लगे तिसी तरह प्रतिबिम्ब उनका मालूम होताहे ॥ विशन्तिदेहेमनुजस्थसर्वतोमहादयःकैरपिदृश्यतेनते॥ कुवैति पीडांमहतीसुदुस्सहांगच्छन्तिशांत्याबलिमंत्रकादिभिः १० वि शन्तिनरदेहेषुपूर्णमास्यामरग्रहाः॥ संध्ययोर्दानवादेत्यागन्धर्वा चाष्टमीद्वयोः ११ पितर:कृष्णपक्षेचयक्षायेप्रतिपत्तिथौ ॥ पञ्च म्यामुरगारात्रौगन्धर्वा राक्षसादयः १२इतिश्रीभिषक्चक्रचित्तो त्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेभूतोन्मादलक्षणसंपूर्णम् ।। यहावि संपूर्ण मनुष्यके देहमें प्रवेशकरते किसीको नहीं दीखे और दुस्तह तथा भारी पीडाको करते हैं वो सर्वशाति और बलिदान तथा मन्त्रजाप से शान्ति होते हैं १० देवता यह मनुप्यके देहमें पूर्णमासीको प्रवेश करते हैं और असुर दानव पूर्णमासी और अमावास्या इनकी स. न्धिमें प्रवेश करते हैं और गन्धर्व दोनों शुक्ल व कृष्णपक्षकी अष्टमी में प्रवेश करते हैं ११ पितर कृष्णपक्षमें और यक्ष पड़वामें सूर्य पंचमी में रात्रिमें राक्षप्तादिक चतुर्दशी में पिशाच ये प्रवेश करते हैं १२ इति श्री- हंसराजार्थबोधिन्याभूतोन्मादलक्षणंसम्पूर्णम् ॥

. ६२ हंसराजनिदानम् । (वातअपस्माररोगकेलभण)मासेपलेदशाहेप्रकुपिनमरुतामं भवोघोररूपोरोगोपस्मारसंज्ञःसपदिमकुरुतेपातयित्वानगंगा श्वासंकासंचमूच्चीकरचरणशिरःक्षेपणशून्यदेहं दोषोनेविसं ज्ञांकफचयवमनस्वेदशोषांगपीडाः १(पित्तकीमृगीरोगकेलक्षण) पित्तापस्माररोगीपततिभुविनभःपीतरक्तंचदृष्ट्वाफेनपीतंकफस्य प्रवमतिमुखतःपीतनेत्रास्थकायः ॥ उत्तप्ताक्षोविसंज्ञःक्षिपतिकर पदकंपतेसप्रसेकः संरंभश्वासमूभ्रिमतिवहुतरंशुष्पहत्कंठ तालुः २(कफीमृगीरोगलक्षण) श्लेष्मापस्माररोगीवितर तिबहुशोहस्तपादप्रकंपं संरंभादर्शयित्वासपदिसितनभःपात यित्वामनुप्यम् ॥शीतांगंशुल्लनेत्रंसितकफनिचयं वदेशोद्भिर तंरोमांचश्वासशीतंजडनरहृदयंगौरवांगस्फुरन्तम् ३ ॥ . मासमें पक्षमें दशदिनमें कुपितहुआ जो बात तो अपस्मारनाम मि- रंगीरोगको पैदाकर ये लक्षणों को करताहै मनुष्पको पृथ्वीपर गेरदेता है और श्वास खासी मूछी तथा हाथ पैरोंफो इधर उधर पटना तथा शिरको पटकनाशून्यदेह दोपोंको बढ़ावे बेहोशी कफी उलटी करें पसीने शोप गङ्गों में पीडा १ पिनकी मृगीवाला रोगी धरती में गिरपडे और आ- काशको लाल पीला देवै और मुखले पीले झाग कफके मेरे पीलेनेत्र पीलाहीदेह होजाय नेत्र तप्त होजायँ पेहोशी हो हाथ पैर पटके कांप पत्तीने हो श्वासका बढ़ना मूर्छा बहुत डोले तालू कण्ठ हृदय सूरखें ये पित्तकी मृगी रोगवाला करै २ कफी मृगीरोगवाला मनुष्य ये लक्षणों को कर हाथ पैरको कॅपावै जल्दी से श्वेत प्रकाशको देख पृथ्वीपर गिर पड़े देह शीतल होजाचे नेत्र सफेद श्वेत कफको मुखसे गेरे रोमांचहो श्यामहो शरदीलगे हृदय जकडजावे शरीरभारी तथा देइफड़के ३॥ (सन्निपातकीमृगीरोगलक्षण) वातपित्तकफैर्युक्तश्चिह्नःसर्वेः समन्वितः॥ अपस्मारःप्रकुरुतेपंचत्वंरोगिणोनिशम् ४ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेऽपस्मारलक्षणम् शादी कफ पित्त तीनोंदोपों के चिहॉकरकेयुक्त जो मृगीरोगवाला सो मरजावे ४ इति हंसराजार्थवोधिन्यामपस्माररोगनिदानसमाप्तम् ॥1 11 11:। . . . . हंसराजनिदानम्। ६३ (वातव्याधिरोगकेलक्षण) व्यायामेनक्षुधांतृषातिकटुकक्षारा म्लरक्षाशनःशोकव्याधिविकर्षणातिगमनेर त्यम्बुपानादिकैः ।। वातःसंकुपितःक सिसर्वाणिशरीर. जानिरिक्तानिधातुप्रवहानितानिः॥ प्रपूयित्वातिरुषाशरीरमर्माः णिसंतोदतिचंडवातः २ हृत्पाश्र्बोदरचस्तिहस्ताचरणग्रीवाशिरः कूजननासाकर्णमुखाक्षिदंतरसनागुल्मांत्रसंपीडनम् ॥ कुज त्वंवधिरंकृशत्वमरतिखांज्यंशिरकपनं. चा गेजडतांकरोतिकु पितोवातोमहादारुणः३॥ दण्ड कंसरत के करनेसे क्षुधा तृषा के रोंकनेसे प्रतिकडुमा खारा खट्टा रूखा ऐसे पदार्थ के खानेते शोचतें देहमें रोगके होनेसे बहुत चलनेसे बहुत जलपीनेसे धातुकेक्षयहोने से घातसे गिरपड़ने से स्त्रीके बहुतसङ्गकर- नेसे वातकुपितहो मनुष्योंको महादारुण अनेकांत के रोग पैदाकरें १ जितनी शरीरमें धातुकी बहनेवानी नाडी तिनको वात शुभककरदे माँ रोपको प्राप्तहुई जो वात सो सर्वनों में प्रवेशकर प्रचण्डवात मर्म मर्म में पीडा करती है २ हृदय पसवाड़ा पेट वस्ती हाथ पैर नाइ शिर इनका गूंजना नाक कान मुख नेत्र दांत जीभ टकना प्रांत इनमें पीडाहो कुबड़ा होजाय बहिरा तथा लटजावे मनका न लगना खापना शिरका हिलना वायुहोजायतथाबादीसेजकडजाययेलक्षणकुपितमहावातकरतीहे३ सर्वांगेषुगतोमरुद्गुरुतरंशूलंकरोतिद्रुतं भेदंतंधिपुकंपनंकरप दामस्थनांचसंस्फोटनम् ॥ सर्वांगस्फुरणविनिद्रमनिशंशोफेशरी, रेभ्रमंचाध्मानकटिपीडनंदिरुजविण्मूत्रयोस्स्तंभनम् ४ वातः कुर्यात्कोपितोदंतबंधंजिवास्तंभकर्णयोजशब्दम् ॥ नाडीस्त ब्धंरक्तवीर्यादिशोपंह्यस्थिस्फोटंदेहसंकोचसद्धिः ५.जुम्भोद्गारंच हिकांवितरतिपवनःपीतवर्णशरीर हल्लासंश्वासकासमनसिवि कलतांछर्यतीसारगुल्मम् ॥ अंतर्दाहविसंज्ञांकृशतनुमरतिकाम लांपांडुरोग द्वेगंसधिभेदंव्यथयतिसततंसर्वकायेमनुष्यम् ॥ संपयों में प्राप्तहुई जो वात तो ये लक्षणोंकोप्रकटकरै प्रवलशूल संधीन हंसराजनिदानम्। मेंपीडा हाथपेरोंका कांपना हड्डी हड्डीका फूटना सबशरीरका फड़कनानी- दका न पाना सूजन तथा भ्रम पेटका फूलना कमरमेंपीडा हृदयमें दुःख विष्टामूत्रका रुकजाना ४ कुपित वात दन्तवन्ध जीभकास्तम्भन कानों में गुआरशब्द नाड़ियोंका स्तम्भरुधिर और वीर्य का सूखना हड्डीहड्डीपी- डा देहका घटना पढ़ना ये लक्षण करतीहे ५ जम्भाई,डकार हिचकी पीलि- या सूखी रह श्वास खांसी मनमें बेकली उलटी अतीसार गोला भीतरी दाद बेहोशीशरीरकश मनका न लगना कामला शरीरका रंग पीला उद्देग सन्धिनमेंपीडा सवशरीरमें व्यथा ये लक्षण सर्वांगकी पवन करती है ६ ॥ करोतिकोपितोनिलोहलीमकंचगृध्रसीं ॥ विसूचिकांविलम्बि कांप्रलापमंगपीडनम् ७ (त्वचा प्राप्तवातकालक्षण) त्वग्गतः पवनःकुर्याद्रूक्षत्वंवचिकृष्णताम् ॥ कार्कश्यंशून्यताकार्यवे वण्यस्फुटितारुजम् ८ (रुधिर प्राप्तवातकालक्षण) वातोरक्त गतःकुर्यात्कार्यरुधिरशोषणम्॥तीव्रतापत्रणंगुल्मखर्जुदद्रु विचर्चिकाम् ॥ कुपितहुई जो वात सो मनुष्यकी देहमें हलीमक गृहसी विसूचिका विलम्बिका प्रताप अंगोंमें पीडाकरतीहे ७त्वचामें प्राप्त पवन शरीररूरखा तथा कालावर्ण को करे कर्कशस्वभाव तथा देहमें शून्यता और कशपना विवर्ण तथा देह को फटना ये लक्षण करती है रुधिरसे प्राप्तबादी शरीर कशकरे रुधिरमात्र को सुखाय देय तीव्रज्वरकरे फोड़ा और गोलान को पैदाकरे खुजली दाद खाज को करती है ६ ॥ (मांसमेदागतवायुकेलक्षण) मांसमेदगतोवातोगुर्वगंकुरु तेश्रमम् ॥स्तब्धांगमरुचिंतापमरतिरक्तशोषणम् १० (मज्जा स्थिगतवात केलक्षण) वातोमज्जास्थिगःकुर्याद्भेदापर्वास्थिसंधि पु ॥ वलमांसक्षयंशूलंबिनिद्रवीर्यनाशनम् ११ (शुक्रगतवात कैलक्षण) शुक्रस्थःपवनःकुर्यादरुचित्रिषुपीडनम् ॥ वीर्यशोषं मनस्तापंचलकांतिसुखक्षयम् ॥ १२ ॥ मांसमेदामें प्राप्त वात देह को भारीकरै अनायास श्रम को करे शरीर जकडजाय अरुचि ताप मनका न लगना रुधिरका सूरखना १० मज्जा और हड्डी में प्राप्तहुई जो वात सो गांठोमें पीडा हडी और संधिनमें पीड़ा हंसराजनिदानम्। ६५ मांस और बलका क्षयहोना शूल और नींदकानाश तथा वीर्यका नाश ये लक्षणोंको करै ११ शुक्रमें प्राप्तहुई वात सो अरुचि मन वाणी देह इनमें पीडा वीर्यकाशोपमनमें ताप बल कान्ति सुखकोनाशये लक्षणोंकोकरे१२ (नाड़ीगतवात केलक्षण) वातःशिरागतःकुर्यात्कुब्जखांज्यं महारुजम् ॥ शिरासंकोचस्तब्धत्वंबधिरंवमनंकृशम् १३ (कोष्ठ गतवातकेलक्षण) कोष्ठस्थानगतोवातःकुरुतेमूत्रवन्धनम् ॥ शूलाध्मानमुदावर्तगुल्माशीसिभगन्दरम् १४ (सागगतवा तकेलक्षण) सर्वांगस्थोपिकुपितः पवनोविविधानुजान् ॥ कुरुते वईतेसर्वानवाह्याभ्यन्तरपीडकान १५॥ नाडीगत वातरोग ये लक्षणोंको करें कुबडापना खंजापना नाडीनका सुकड़ना तथा जड़ता वहिरापना बौनापना और कश १३ कोटमें प्राप्त भई जो वात सो मूत्रवन्ध को करे शूल और भफराको करै उदावर्त गोला बवासीर भगन्दर इनको करती है १४ सर्वांग में प्राप्तभई पवन सो तरह तरहके रोगोंको पैदाकरतीहै और सब कुपित धाहरके रोगोंको तथा भीतर के रोगोंको बढ़ाती है १५॥ (सन्धिनस्थितवातकेलक्षण) संधिस्थःपवनःकुर्याच्छोफं शूलंचदारुणम् ॥संधीन्विस्फोटयेत्सद्यःसचकर्षतिवर्द्धति १६ धातवःपंचदेहस्थाहेतवःसुखदुःखयोः । स्वस्थानेसुखदाःसर्वेपर स्थानेषुदुःखदाः १७(पंचवातकेअलगअलगलक्षण)प्राणोवा युर्वसतिहृदयेऽपानसंज्ञोगुदान्ते नामेश्चक्रेभ्रमतिपरितोजीवभू तःसमानः ॥ कण्ठस्थानेचलतिपवनोयोतिरात्रावुदानः सर्वांगे पुप्रसरतिमरुद्व्यानसंज्ञोनितांतम् १८ ॥ सन्धियों में प्राप्त वात सूजन और दारुणशूल संधिनमें पीडा और सु- खावें तथा बढ़ाथै १६ पांच वात देहमें सुख दुःखकी देनेवाली रहती हैं यदि वो अपने स्थानपर रहें तो सुखदायक और दूसरे के स्थानपर जानेसे दुःख- दायफहोती है १७१ प्राणवात हृदयमें रहती है २ अपानवायु गुदामें रहती है३जीवभूतसमानवायुनाभीचक्रमें रहतीहै और ४ रातदिनकी बहनेवाली उदानवायु कंठमें रहती है और ५ सब देहमें रहनेवाली व्यानवायु है१८॥ .

६६ हंसराजनिदानम्। (पित्तान्वितप्राणवात केलक्षण) प्राण पित्तान्वितःकुर्याद माणचित्तनिधगम् ॥ नृगांशलं नहलासंहिकाछर्दिश्चदुस्सहा मु१६ (सफाजिनामाक्षण) प्राण:कफ़ाटताकर्यादोर्व ल्यालस्यसादनम् ॥ वैरस्यमचितंद्रामुत्लेदंदोपसंचय २० (पित्तकर्फयुक्तउदानवात केलक्षण) उदानःपित्तयुक्कुन्मिच्छी दाहंभ्रमलमेम्॥ कंफान्वितोतिमंदाग्नि शीतंहर्षचकंपनम् ॥ -पित्तसंयुक्त प्राणपवन देहमें गरमीको करें तथा चित्तभ्रम प्यास शूल सूखी रद्द हिचकी वमन घे लक्षणों को करे १६ कफसंयुक्त प्राण वात येल- क्षण करती है दुर्घलता आलस्यका स्थान विरसंता अरुचि तंद्रा उकलाट दोपके समूहको बढ़ाती है २० पित्त के साथ मिली जो उदानवायु सो ये लक्षण करें मूच्छी दाह भ्रम ग्लानि और जो उदानवायु कफके साथ मिलीहो तो मंदाग्नि शीत हर्प तथा कंपको करती है,२१ ॥ - (पित्तकर्फयुक्तसमानवात केलक्षण) समानपित्तयुक्तृष्णाम _ममाणमेवच ॥ कुर्यात्कफान्वितोहर्ष विएमत्ररोमहर्षण म्.२२ (पित्तयुक्तअपानवातकेलक्षण) अपानःपित्तयुक्कुर्याद्र क्लातीसारमुल्वणम्॥ ऊष्माणमरतिदाहमशीसिचभगन्दरम्२३. (कफयुक्तअपानवात केलक्षण:) कफयुक्तोयदापानोगुदान्तकृमि संचयम् ॥ कुरुतेगुरुतांमूत्रमालस्यंवलनाशनम् २४ समानवायु पित्त के साथ. मिलीहुई तृष्णा मूछो. गरमीको-करती है इसीतरह कफयुक्त समानवायुहर्प विष्ठा मूत्रका रुकना रोमांचकों, करती है २२ अपानवायु पित्त के संयुक्त ये लक्षणकरती है रक्तातीसार गरमी म- नका कहीं नं. लंगना दाह ववासीर भगंदर २३ कफयुक्त अपानवायु गुदा में कृमिरोगकरे. शरीरभारी-बहुत मूत्रकाहोना आलस्य बलकानाश ये लक्षणोंको, करै २४ ॥ (पित्तकर्फयुतव्यानवात केलक्षण)व्यानःपित्तान्वित कुथ्योदंगवि क्षेपणक्लममादिंडकंस्तम्भनंदाहंशोफेशूलंकफान्वित:२५ नाडीय हंसराजनिदानम् । दासमभ्येत्यकुपितःपवनोबली ॥ देहविक्षेपर्णकुाच्छिर कंपं करोतिच २६ यदासंकुपितोचातो नानाहेतुभिर्ध्वगः ॥ तदासं कुरुतेदोष हच्छिरःशंखपीडनम् २७॥ व्यानवायु पित्तके साथ मिलीहुई अंगोंका पटकना ग्लानिको करती है उपतापस्तंभ दाह सूजन शूल ये व्यानवायु कफसंयुक्त करतीहै २५ बली पवन कुपित नाडीनमें प्राप्तहो शरीरका इधर उधर पटकना करती है और शिर कंपको करतीहै २६ जब बादी नाना हेतून ते कुपित उपजती है तब हृदयमस्तकमें कनपटीमें पीडाकरतीहै और अनेकदोपोंकोकरती है२७॥ गत्वोवस्वग्रहात्करोतिपवनोदेहंचकोदण्डवत् कण्ठःकूज तिकोकिलेवसततंगात्रंमुहुःक्षेपणम्॥ स्तब्धत्वंनयनहयोर्वितनु तेशोषंमुखेवक्रिमां श्वासंकाससमन्वितंचजठरेशूलं वृषांसंभ्रम म् २८ (पित्तयुक्तवात केलक्षण) दाहपित्तान्वितःकुर्यात्तृष्णांक दिशिरोव्यथाम् ॥ हल्लासंहृदयग्रंथिहिकांकंठहनुग्रहम २६ (क फयुक्तवात केलक्षण)कफान्वितोचमिंकुत्तिंद्रान्निद्रांगगौरवम्।। जाड्यंशैत्यंसरोमांचंक्षवंशोफंचवेपथुम ३०॥ अपने स्थानसे ऊपरको चढ़ीहुई बात मनुष्यके देहको धनुपकी तरह बांकाकरदे और कंठकोकिलाकी बतौर बोले तथा शरीर को इधर उधर पटके दोनोंनेत्रों का स्तब्धत्त्वहो मुखका सूचना तथा मुस्खटेढ़ा होजाय श्वास.खांप्लीके साथ पेटमें दर्दहो और प्यास तथा भ्रमहो २८ पित्तयुक्त वात दाहकरें प्यास और वमनकोकरै शिरमेंदर्द सूखीरह हृदयमें गांठ हिचकीकंठमें हनुग्रह इन रोगोंकोकरै २६ कंफयुक्तवात वमन तन्द्रा निद्रा देहभारी जदताशीतलगना रोमांच छींक सूजन कंप ये रोगकरती है ३०॥ (कफपित्तयुक्तवातकेलक्षण) कफपित्तान्वितोवायुःपक्षाघातक टिग्रहम् ।। कुन्जखंजंशिरःकंपमंगभंगप्रपीडनम् ३१ (अधोभा गौप्राप्तवात केलक्षण) गत्वाधाकुपितःकरोतिमरुतोरुस्तंभनं कुण्डलं शूलाध्मानविलम्विकागुदरवंगुल्मोपदंशंभृशम् ॥ शूका शसिभगंदरंकटिरुजविएमूत्रयोस्स्तम्भनम् ॥ जंघोरुगुदशि । योनिचषणानांपीडनंदण्डकम् ३२ हेतुभिःकुपितोवातोयति .. - हंसराजनिदानम्। कोपोन्यदोषयुक्॥ महाकोपस्त्रिदोपाभ्यांसवैभवतिरोगदः ३३ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेवातव्याधि लक्षणम् ॥ कफ पित्त मिलीहुई वात पक्षाघात कमरमें दर्द कुबडापना खंजत्व शिरकाहिलना अङ्गभङ्ग और पीड़ा करती है ३१ नीचेके भागमें प्राप्तहुई जो पवन सो ऊरुस्तंभ कुंडलरोग शूल अफरा वित्तविका गुदामेंशब्द पेटमें गोला उपदंशशकरोगबवासीर भगन्दरकमरमेंदर्द दस्त पेशावकारुकजाना जंघाऊरू लिंगेन्द्रिय योनि अंडकोश इनमें दर्द तथा दंडकरोग इनकोकरती है ३२ हेतूनसे कुपित वातरोग करती है और दोपके मिलने से प्रति कोप को प्राप्त होती है और त्रिदोपसे महाकोपको प्राप्त होती है तब बरावर रोग करती है३३इति हंसराजार्थवोविन्यांवातव्याधिरोगनिदानसम्पूर्णम्।। अथ वातरक्तरोगनिदानम् ॥ (तत्रादौवातरक्तरोगोत्पत्तिः) रूक्षोष्णाम्लकषायतीक्षणकटुक स्निग्धाशनै यसः निष्पामांसकुलत्थशाकमधुरक्षारान्नपित्ताश नैः॥तकाम्लासववारुणीदधिपयःपानैर्निशाजागरेःप्रायःकुप्यति वातरक्तमपरैव्या॑यामशोकादिभिः१विरुद्धदुष्टाशुचिपानभोजनै जलावगाहर्बनितातिसंगमैः ॥ रात्रौदिवाजागरणैःप्रधर्षितोरक्त प्रकोपंकुरुतेमरुत्तदा २ स्रोतांसिरक्तप्रवहानिरुध्वाकरोतिवा तोरुधिरंचकृष्णम् ॥ रोषात्तथाशोणितमुच्छलन्तिसमस्तरोगा न्वितनोतिननम् ३॥ . रूखा गरम खट्टा कषैला तीखा कडुआ चिकना भोजनकरनेसे निष्पाव तथा मांस कुलधी शाक मीठा खारमिला अन्न पित्तकी करनेवाली वस्तुके खानेसे छांछ आन आसव मद्य दही दूध के पीनेसे रातमें जागनेसे दंड कसरतके करनेसे शोचसे वातरक्त कोपको प्राप्त होताहै १ विरुद्धदुष्ट अप- वित्र वस्तुके पीनेसे तथा खाने से स्नानसे बहुत स्त्रीसंगसे रातदिन के जागनेसे और डरनेसे वातरक्तरोग पैदा होताहै २ रुधिरकी वहनेवाली नाडीनके मार्गको रोककर वातरुधिरको कालारंगकाकरदेवै फिर क्रोधको प्राप्त हुआ जो रुधिर सोदेहके बाहर तथा भीतर अनेकरोगोंको पैदाकर ३॥

हंसराजनिदानम्। ६६ करोत्यालसंमंडलंवातरक्तंशरीरविवर्णरुजंरक्षगात्रं ॥ भ्रम मूत्रकृच्छंक्लममर्मतोदज्वरंवेपथुत्वंशिरःपीडनंतत् ४ (पित्तान्वित वातरक्तकेलक्षण) करोत्येवपित्तान्वितंवातरक्तंमुदंदाहसम्मोह तृष्णांगशोषम् ॥ भ्रमोप्मारतिश्छर्दिस्वेदांगतोदंकटुत्वंमुखेशो फम विनिद्रम् ५ (कफयुक्तवातरक्तलक्षण) कफेनान्वितंवा तरक्तंगुरुत्वंकरोत्यालसंमंडलरक्तपीतम् ॥ वर्मिमंदचेष्टेन्द्रियेषु प्रलापंशरीरेतिपामाकृशत्वंक्षवत्वम् ६॥ पालकस कालेकाले देहमें चकत्ता तथा शरीरका विवर्ण रूखा देहकरदे पीडाहो भ्रम मूत्ररुच्छ्र ग्लानि मर्ममर्ममें पीडा ज्वरकंप शिरमें पीडा ४ पित्तान्वित जो वातरक्तस्तो मस्तपना दाह मोह प्यास अंगशोप भ्रम गरमी मनकाडमाडोलपना वमन पसीनेकााना अंगमिपीड़ा मुखकडुवा सूजन मूर्छा निद्राका नाश इनलक्षणों को करताहै५ कफयुक्त वातरक्त देह भारी करै आलकस देहमें लालपीले चकते करे वमन इंद्रियोंकी मंदचेप्टाहोना वकना देहमखाज तथा देहकश और छींकका आना इन लक्षणको करै६॥ पांगुल्यंचविसर्पिकारुचिमदौमूगुलीवक्रता हिक्कादाहा वेपिकाभ्रमतृषाश्वासलमःस्फोटता॥ कासोमोहशरीरशोपमधि कमर्मग्रहश्चार्बुदः संप्रोक्तास्समुपद्रवामुनिवरैस्तेवातरक्तेऽहि ताः ७सोपद्रवंत्याज्यतमंभिषम्भिाईिदोषजंकटतरणलाध्यम् ।। जपेनदानेनशिवार्चनेनयत्नौषधीभिर्ननुवातरक्तम् ८ इति श्री भिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेवातरक्तलक्षणम् ॥ पांगुरा विसर्परोग अरुचि मद मूर्छाउंगली टेढ़ीहोजायँ हिचकी दाह कंप भ्रम पास श्वास ग्लानि शरीरका फटना खांती मोह देहमें शोप मर्म स्थानों में पीड़ा अर्बुदरोग ये वातरक्त रोगके उपद्रव मुनीश्वरों ने अ- साध्य कहेहैं ७ बैद्यों करके उपद्रवकेसाथ जोवातरक्त सोत्याज्यहे और दो दोपसे पेदाहुआ जो वातरक्त सो कहप्ताध्यहे वो जप दान शिवपूजन और उपाय तथा औषधीकरके अच्छाहो - इति इंसराजार्थबोधिन्यांवातरक्त . निदानंसम्पूर्णम् ॥

७०. हंसराजनिदानम्। (अथऊरुस्तम्भनिदानम् ) नीत्वाधःकुपितोवातःसञ्चयं श्लेष्ममेदयोः ॥ घोरुसक्थिगुल्फेपुपर्यिवास्तम्भयेद्गतिम् १ (जंघोौश्लेप्ममेदाभ्यांसम्पूर्णीभवतौबलौ ॥ अरूस्तम्भःसवि ज्ञेयोभिषग्भिःप्राकृतैर्मशम् २(ऊरुस्तम्भलक्षणम्) ऊरूस्तम्भे तिपीडाभवतिचरणयोरोमहर्पोजडत्वं शीलंसर्वाङ्गकम्पोवयसि शिथिलतादिनिद्राकृशत्वम् ॥ कृच्छोन्न्यासम्पदानामरुचि रतिवमिमन्दवह्निर्गुरुत्वं चिह्नान्येतानिनूनमुनिगणवचनात्की र्तिताहंसराजैः ३ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृते वैद्यशास्त्रेऊरुस्तम्भलक्षणम् ॥ अथजरुस्तम्भलक्षण ॥कोपको प्राप्त हुई जो वात सो कफ और मेदाके समूहको नीचेलेजायकर जांघ ऊरू जानू टकना इनमेंव्याप्तकरके चलनेकी शक्ति को स्तंभन करवे उसे ऊरुस्तम्भरोग कहतेबांचऊरू जव कफ और च/से परिपूर्णहोजाय और चलान जावे तो उत्तको वैद्योंने ऊरूस्तंभ रोग कहाहै २ ऊरूस्तंभ रोग में ये लक्षण होते हैं दोनों पैरोंमें पीडा रोमांच जडत्व शीतका लगना सर्वदेहमें कंप अंगोंमें शिथिलता रद निद्रा रुशता पैरोंका कठिनतासे उठना अरुचि मनका न लगना वमन मन्दाग्नि देह- भारी घे ये करूस्तंभरोगके लक्षण मुनीश्वरों के वचनके अनुसार इंसराज कविने कहे हैं ३ इति हंसराजार्थचोधिन्यामूरूस्तंभरोगनिदानसम्पूर्णम् ॥ (अथामवातलक्षणम्)व्यायाममन्दाग्निविरुखभोजन:स्निग्धा शनेनातिविहारचेष्टया ॥ रात्रौदिवाजागरणेनकोपितःश्लेप्मस्थ लेहामचयंनयेन्मरुत् १ आमानस्यरसोपक्कोमरुताक्रियतेपुनः॥ दूषितःकफपित्ताभ्यांनाडीभिःपीयतेनिशम् २आमसंज्ञःसरावायं योजीर्णजनितोरसारोगाणामाश्रयोघोरःस्रोतांसितुदतेभृशम३ तीनश्लोककरिके प्रथमशामरोगकी उत्पत्तिलिखते दंड कसरतके करने से विरुद्ध भोजनसे चिकने पदार्थखानेसे अत्यन्त स्त्रीयादिसेवन करने से रातदिन जागनेसे कोपको प्राप्तहुई जो वात सो कफके स्थान में भामके सगूदको प्राप्त करती है १ अन्नका जो रस विना पका उसको वात दूषित फरें तथा पित्त कफकर दूपित भयाहो उसको नाडीपीती है २ उसी अजीर्ण हंसराजनिदानम्। ७१ से पैदाड्डये रसको सामरोग घोररोगोंका आश्रय करतेहैं और नाडीके मागों को रोकदेती है ॥ आमोरुग्विदधातिशोफमधिकंसंकोपितोवायुना जंघोरूकर सन्धिपादषणस्कन्धास्यनेत्रेषुच ॥ मांसास्थित्रिककुञ्चनञ्चहृद येकम्पंज्वरंशोषणं स्तब्धांगंवितनोतिदारुणभयम्पाकंतुषांशू न्यताम् ४ (पित्तसेकुपितआमलक्षा) आमःसंकुरुतेरुषाङ्गमरु शंपित्तनसंकोपितः शीर्षसन्धिषुपीडनंकटिरुजसर्वाङ्गदाहंज्वरं मुर्छासंभ्रमशोषणंचहृदयेशूलंमहादारुणं वन्धंसूत्रपुरीषयोर्नय नयोःपीतत्वमातिषाम् ५ (कफसेकुपितआमवातकेलक्षण) आमःश्लेष्मयुतःकरोतिजडतांनिद्रागुरुत्वन्तना वालस्यंबहुम वताश्चगलकेसंकूजनशीतताम् ॥दौर्बल्यंमुखपादहस्तषणेशो षङ्गतेस्तम्भनं वी?जोरुचितेजसांबलधियांनाशंप्रसेकंक्लमम६ वादीसे कुपित भामरोग जांघ ऊरू हाथ तथा देहकी संधी पैर अंडकोश कंधेनमें मुखतया नेत्रों में सूजन करदे माप्त हड्डी त्रिककहिये मकड़ इनका घटना हृदयमें कंपज्वर शोप देहका जकड़ जाना घोर भय तथा देह का पकना और प्यास और देहमें शून्यता ये लक्षण करतीहै ४ पिनसे कुपित जो भामरोग तो देहको लालकरदे मस्तक तथा संधीनमें दर्द सब देहमें दाह तथा ज्वर मूच्छी भ्रम शोप हृदयमें महा दारुण शूल मूत्र पुरीप का रुकना नेत्रपीले प्यास और खेद ये लक्षण करता ५ कफयुक्त प्रामरोगके ये लक्षणहैं शरीरजकडजाय निद्रा देहभारी आसकस पेशाब ज्यादा उत्तरे गलेका गूंजना जाडालगे दुर्बलपना मुख हाथ पैर अंडकोश इनमें सूजन गतिका रुकना वीर्यताकत रुचि तेज बल बुद्धि इनकानाश लारका गिरना ग्तानी ६ ॥ प्रामस्त्रिदोषजोऽसाध्यःकष्टसाध्योद्विदोपजः ॥ दोषैकसंयुतः साध्यासुखेनैवभिषग्वरैः ७ त्रिदोषजनितैःसर्वलक्षणैर्लक्षितो हियः॥ सन्निपातःसविज्ञेयोद्विदोषोहिद्विदोषजैः ८ इति श्रीमि पक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेआमवातलक्षणम् ॥ त्रिदोष से पैदाहुया आमरोग असाध्यहै भोर दो दोपसे जो हुमा तो ७२ हंसराजनिदानम्। कष्टसाध्य है और एकदोषयुक्त साध्यहै ऐसे सुपेणादि वैद्यों ने कहा ७ जिसमें त्रिदोप के सव लक्षण मिलतेहों उनको सन्निपातका आमवात रोग कहते हैं और जिसमें दोदोप के चिह्नहों उसे द्विदोपज कहते हैं - इति हंसराजार्थवोविन्यामामवातलक्षणंसम्पूर्णम् ॥ अथ परिणामनिदानम् ॥ (अथपरिणामशूललक्षणम् ) विएमूत्ररोधाद्विषमासनस्था च्छीताम्बुपानात्पवनस्यरोधात् ॥ अत्युच्चभाषादतिभक्ष्यपाना द्रुक्ष्याशनात्कुत्सितयानरूढात् १ अपक्वपिष्टान्नविरुद्धभक्षणा कषायतिक्ताशुचिदुष्टभोजनात् ॥ दिवानिशाजागरणाद्विलंघ नात् करोतिशूलंपवनोरुषान्वितः २ नाभिमूलेगुदेवस्तीयोनौ पाश्र्वेत्रिकेस्थिषु ।।शूलंबातकृतंज्ञेयंभिषग्भि त्रसंशयः ३ ॥ विष्ठामूत्रके रोकनेते खोटी सवारीपर बैठनेसे शीतल जलपीनेसेपव- नके वेगरोंकनेसे ऊंचेवोलने मे अत्यंत भोजन और पानसे तथा रूखेपदार्थ केभोजनसे यह रोग होताहै १ बिनापकापिसाहुआ ऐमे अन्न के खाने से विरुद्ध भोजनसे कसैला तीखा अपवित्र दुष्टभोजनसे दिनरात के जागनेसे लइनकरनेसे रोपको प्राप्त हुई जो पवन सो शूलरोग को पैदाकरतीहै २ नाभीमूलमें गुदामें मूत्रस्थानमें योनीमें पसवाडोंमें त्रिकस्थानमें हाडोंमें बादीकाशूल वैद्य जाने इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ३ ॥ (वादीकेशूलकालक्षण) शूलंबातोद्भवंकुर्यात्नभातेंगविमर्द नम् विएमूत्रवन्धनंहिकामाध्मानोद्गारस्तव्धताः ४ (पित्तकेशूल केलक्षण) तीक्ष्णोष्णापिण्याकविदाहिपूगैस्तैलाम्लनिष्पाकटुस यतापैः ॥ व्यायामसौवीरसुराविकारैः प्रद्धपित्तंकुरुतेहिशूल म् ५ पित्तोद्भवंशूलमतीवरौद्रमध्यंदिनेकुप्यतिचाईरात्रौ ॥ क रोतिमूच्छीभ्रमदाहमोहास्तृट्स्वेदमार्तिज्वरमुग्रशीतम् ६॥ प्रातःकाल शरीरका टूटना दस्त और पेशावका बन्दहोना हिचकी पेट फा फूलना डकारका आना जड़ता ये वात शूलके लक्षण हैं ४ तीक्षण गरम पिण्याक दाहकरनेवाली वस्तु सुपारी तेल खट्टा निष्पा कर्दु सूर्य - हंसराजनिदानम्। ७३ कीघाममें डोलने से दंडकसरतफे करनेले कांजीके पीने से मद्यविकार से कोपकोप्राप्त हुआ जो पित्त सो शूलरोगको करताहै ५ पित्तसे पैदाहुआ घोरशूल सो मध्याह्न और अर्द्धरात्रमें कोपकरताहै और मूछी भौंर दाह बेहोशी प्यास पसीने खेद घोरज्वर और शीत ये करहै ६ ॥ कुक्षौसजठरेपार्श्वेशूलंपित्तसमुद्भवम् ॥ सोमाणंदारुणंज्ञेयं वैचैराधुनिर्धवम् ७ (कफकेशलकालक्षण ) मध्वाज्यमांसम धुराम्लत:न्ताकशीतोदकदुग्धपानैः ॥ मापेक्षुमज्जातिलतै लशीतैःश्लेष्माप्रदःकुरुतेहिशूलम् ८ वक्षस्थलभवंशूलंकफा न्तस्यसमुद्भवम् ॥ वमनेनशमंयातिसंध्ययोबलवत्तरम् ९॥ कूख पेट पसवाडोंमें पित्तकाशूल होताहै और दारुण गरमी ये लक्षण अबकेवैद्योंने कहे ७ सहत घी मांस मीठा खट्टा छांछ बैंगन शीतलजल दूध इनके सेवन से उडद ईखचरवी तिलतेल शरषीसेकुपितहुआ जोकफ सो शूलरोग पैदा करताहै ८ कफसे पैदाहुआ जो शूल वक्षस्थल तथा सन्धीनमें सो वमनके करानेसे आरामहो ६ ॥ शूलंकफात्म्यंकुरुतेप्रसेकंतंद्रालसंगौरवतांप्रकम्पम् ॥ हृ ल्लासकासारुचिछबिदाहंकंठेतिपीडातिमितांगशीतम् १० (वा तकफशूलकेलक्षण ) पाश्र्वेषुवस्तीहृदयेचशूलंवदंतिवैद्याःकफ वातजातम् ॥ पित्तानिलाभ्यांजनितंसदाहंकुक्षिद्वयेतद्धृदयेप्रपी डयेत् ११ (शूलरोगकीउत्पत्ति ) चण्डीशशस्त्रंकफपित्तसम्भ वंजानीहितत्वहृदयोदरस्थम् ॥ रूपाणिस्वस्वकुरुतेस्वकाले दो पैःसमस्तैःप्रभवंत्यजेत्तम् १२॥ कफसे पैदा हुआ जोशूल सो पसीना तंद्रा पालकस देहभारी कैप सूख रह खांसी अरुचि वमन दाह कंठमें पीडा मंद जाडा लगै येलक्षणकरै १० जिसमें येलक्षणहों उसको वातकफका शूल वैद्यकहते हैं पसवाडोंमें मूत्र स्थानमें हृदयमें शूलहो वातपित्तजनितशूललक्षण ॥ और जिसमें दाह हो फूखमें और हृदयमें पीडा हो उसे वात पित्तका शूल रोग जाने ११ श्रीम- हादेवके शूलसे तथा कफपित्नसे पैदा हुआ शूल सो हृदयमें पेटमें अपना तरह तरहका रूप धारणकरे और सब दोपों से पैदाहो ऐसाशूलवान् रोगी को वैद्यत्यागदे १२॥

ड ७४ हंसराजनिदानम्। (शूलकाअसाध्यलक्षण) वायुःसंनिहितश्चपित्तकफयोस्स्था नंसमावर्त्तयेद्यःशूलंकुरुतेतदेवमपरंभुक्तेतिशांतिव्रजेत् ॥ त च्छूलंपरिणाममुनिवरैःप्रोक्तंचदोषान्वितं ज्ञेयंप्राकथितैनरैःक फमरुत्पित्तोद्भवलक्षणैः १३ सोपद्रवंत्रिदोषोत्थमसाध्यंकथितंबु धैः॥ कष्टसाध्यंद्विदोषोत्थंसुखेननिरुपद्रवम् १४ (शूलकेदशउप द्रवकेभेद) तंद्राम▪️ज्वरोदाहःश्वासःकासोतिवेदना ॥ हिकाङ्ग गौरवश्चर्दिःशूलस्योपद्रवादश १५इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्स वेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेपरिणामशूललक्षणंसम्पूर्णम् ॥ जिसमें ये लक्षणहों उसे परिणामशूल जानना जो वादीसेयुक्त भोर पित्त कफके स्थानमें प्राप्तहोकर पीछेदर्द कोकरे और दूसराखाने से शांतिहो मौर त्रिदोपयुक्तहो उसेभसाध्य मुनीश्वरों ने तथा प्राचीनवैद्यों ने कहाहै १३ जो उपद्रवके साथहो और सन्निपातसे पैदाहुाहो वो शूलरोग असा- ध्य ऐसावैद्योंने कहा और जो दोदोपसे पैदा हो वो शूल कष्टसाध्य है मौर जो उपद्रव रहित हो वो सुखसाध्यहे १४ । १ तंद्रा २ मा ३ ज्वर ४ दाह ५ श्वास ६ खांसी ७ अतिदुःख ८ हिचकी : देहभारी और १० वमन ये शूलरोगके दशउपद्रव हैं १५॥ इति हंसराजार्थबोथिन्यांशूलरोग निदानसमाप्तम् ॥ (अथआनाउदावर्तरोगनिदानंतस्योत्पत्तिः)पुरीषमत्रानिल वेगरोधादनाहरोगःकिलमर्मभेत्ता ॥संजायतेसौकुरुतेविकारान् वातामयानुवैद्यवरावदन्ति १ अपानवातसंरोधादूर्ध्वात्तगति भवेत्॥ अनाहोसौपुरैःप्रोक्तोमुनिभिस्तत्ववादिभिः २ हिक्काइवा सवम्युद्गारक्षुत्तृष्णायाऽवरोधनात् ॥उदावोभवेद्रोगोवातरद्धि प्रवर्तकः ३॥ दस्त पेशाब अधोवायु इनके रोकनेसे मर्म मर्म में पीडाका करनेवाला अनाह रोग होताहै और बादीके विकारको करताहै ऐसे वैद्यकहते हैं? अधोवायुके रोकनेसे उपलेमार्ग होकर वायुकी गति होतीहै इसी को अनाहरोग तत्ववादी फपियोंने कहा २ हिचकी श्वास वमन डकार भूख प्यास इनके रोकनेसे वातको बढ़ानेवाला उदावत रोग पैदा होता ३॥ (अधोवातरोकनेसपैदा०)अपानवातसंरोधाद्वातविएमत्रसं- हंसराजनिदानम् । ७५ गमः ॥ शूलंकमोरुजाध्मानःपीडाटोपोमरुद्भूमी ४ (विष्ठाकेवेग रोकने केलक्षण ) विड्वेगेनिहतेपुंसोवातशूलंगुदेरुजम् ॥ जठरे वातजान्थिःपीडावस्तीभवेद्भशम् ५ ( मत्रकेरोकनेसेहुयेउ दावर्तलक्षण) मूत्रस्यरोधनात्पुंसोमूत्रकृच्छंशिरोव्यथा॥ वस्ति मेहनयोःशूलमानाहोयमितिस्मृतः ६ ॥ अधोवायु रोकनेसे विष्ठामूत्र अापसमें मिलकर शूल ग्लानि खेद अफ- रा दुःखका आटोप याने समूह पवनका मंदचलना भौर ये रोग होते हैं ? विष्ठाके वेग रोकनेसे मनुप्यके वादीसे दर्दहो गुदामें पीडाहो पेटमें बादासे गोलाहो और मूत्रस्थानमें पीडाहो ५ पेशावके रोकनेसे पुरुषों के मूत्ररूच्छू शिरमें पीडा मूत्र स्थानमेहन इनस्थानमें शूलहो इसीकोआनाहकहतेहैं। अँभाईरोकनेसेहुयेउदावर्त्तलक्षण) जृम्भास्तम्भागलस्त म्भोमन्यास्तम्भःशिरोव्यथा ॥ कर्णास्यनेत्रनासासुरोगस्तीवो भवेदृशम् ७ (आंसकेरोकनेकेउपद्रव) शोकानंदभवस्यास्रो 'प्राप्तौदनैवमुंचति ॥ सरुशिरोगुरुत्वंस्यान्नेत्ररोगस्तुपीनसः८ (छीककेरोकनेकेउपद्रव) छवथोरणात्शूलंमन्यास्तम्भःशि रोईरुक् ॥ इन्द्रियाणांचदौर्बल्यंभवेत्पीडास्यचक्षुषु ६ ॥ जंभाई रोकने से गलाबैठनाय गलेके पिछली नसका जकड़ना शिर में पीडा कान नेत्र नाक मुख इनमें पीडाहो ७ जो पुरुष आनन्द से अथवा शोकसे पैदाहुआ आंसूरोकै उसके शिरमेंदर्द तथा शिरमें भारीपना नेत्ररोग और पीनसरोग होय छींक रोकनेसे शूल गलेकी पिछलीनस का जकड़ना प्राधेशिरमें दर्द इन्द्रीनमें दुर्बलता नेत्रों में और मुख में पीडा होवै ६॥ (डकाररोकनेकेउपद्रव)उद्गारेभिहतेतोदःपूर्णत्वंवक्त्रकंठयोः॥ पवनस्याप्रत्तित्वंकूजत्वंहृदयेभवेत् १० छर्देर्निग्रहणाद्भवंतिवि विधारोगामहादारुणाहल्लासारतिशोफकष्टऽरुचयोहिकाविसर्प ज्वरा कोष्ठाशुद्धिविवर्णदाहकृमियोवातप्रसूतारुजाकडूमोहवि जृम्भणानिबहुशःपांड्वङ्गमर्दभ्रमाः ११ (भूखरोकनेकेउपद्रव) क्षुधाभिघातालवीयहानिःस्यान्मन्ददृष्टि कृशताशरीरे (प्यास .७६ हंसराजनिदानम्। रोकनेकेउपद्रव) तृष्णाभिघाताबहुरोगबाधाहृत्कंठशोपभ्रमदा हमूर्छाः १२॥ डकार आईहुईको रोकनेसे मुख और कंठमें पीडाहो और दकारकान पाना हृदयमें गुंजान शब्दहो १०॥ अथ वमनोपद्रव ॥ आईहुई रहको रोकनेसे दारुण अनेक तरहके रोगहों सूरखी उलटीहो अरति सूजन कोढ़ अरुचि हिचकी विसर्परोग ज्वर कोठे में अशुद्धता विवर्ण दाह कमिरोग वातव्याधि खुजली बेहोशी बहुतजंभाईकाभाना पीलिया अंगोंकाटूटना भौंर ये रोग होते हैं '१.१ भूख रोकनेसे बलवीर्यका नाश हो तथा मंददृष्टि हो शरीरमें कशताहो प्यासरोकनेसे बहुतरोग:सतावें तथा हृदय व कंठ- सूखे भौंर दाह मूर्छा ये रोग होते हैं '१२ ॥ (श्वासरोकनेकेउपद्रव) श्वासस्यनिग्रहानुल्मोहद्रोगोविरतिर्भ 'वेत्॥मोहोवातकृतोरोगोह्याटोपोविद्रधिस्तथा १३(निद्रारोकने केउपद्रव)निद्राघाताद्भवेज्जृम्भातंद्रालस्यांगगौरवम् ॥ अक्ष्णो घूर्णत्वरक्तत्वद्रवत्वंजडतारुचिः १४ कषायाम्लद्रवरूविरुद्ध कटुभोजनैः ॥ वातःसंकुपितःकुर्यादुदावहिलक्षणम् १५ ॥ • श्वासरोकनेसे पेटमेंगोला हृदयकारोग मनका न लगना मोह और वात के रोग पेटमें गुडगुडाहट विद्रधिरोग ये होते हैं १३ निद्रारोकनेसे जंभाई तन्द्रा पालकस देहकाभारीहोना नेत्रटेढ़े तथा लाल अश्रुपात युक्त जड़ता और अरुचि ये रोग होते हैं १४ कसैली खट्टी पतली रूखी विरुद तथा कटुवस्तुके खानेसे कुपितहुई जो वात सो दारुण उदावर्तरोगकोकरे ॥ १५॥ श्रोतांस्युदावर्त्तयतेनिलोयमपानविणमूत्रकमादिकानाम् ॥ वहानिहत्पाश्र्वगुदोदरेपुह्याटोपशूलंकुरुतेशिरोर्तिम् १६ उदाव तवातःकरोत्संगमर्दमरुद्गन्थिमार्तिपुरीषंसकष्टम् ॥ तृषोद्वारहि काभ्रमश्वासकासंवमिंशून्यतारूक्षतांगंप्रकम्पम् १७ इति श्री भिषक्चकचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेआनाहोदावर्तलक्षणं सम्पूर्णम् ।। विष्ठा मूत्र कफ आदिकी बहनेवाली जो अपान वायु सो नाडीन के मार्गको रोककर हृदय पसवाड़ा गुदा पेट इनका फूलना और शूल तथा शिरमें दर्द को करहै १६.वातका उदावर्तरोग हडकल पेंटमें पवनकी गांठ .

" हंसराजनिदानम्। तथा खदहा कप्टस दस्तका होना प्यास डकार हिचकी भ्रमश्वास खांसी वमन देहमें शून्यता शरिरूवा तथा कंप ये लक्षण करताहै १७ इति हंस राजाबोधिन्यामुदावनिदानसमाप्तम् ॥ (अथगुल्मरोगनिदानम् )गुल्मवातोद्भवपत्त्यंकफर्जहंद्वसम्भ वम् ॥ सन्निपातोत्थितंरौद्ररक्तजंकीर्त्तितंवुधैः १ हृन्नाभ्योरंतरे वस्तौग्रन्थिरूपंचलाऽचलम् ॥ चतुरंगुलपर्यंतंगुल्मन्तत्परिकी र्तितम् २ ( वातगुल्मकेलक्षण ) निबूढुंवरयोःफलस्यसदृशं गुल्ममरुत्सम्भवाद्गारंचमुहुर्मुहुर्वितनुते विण्मूत्रयोर्वधनम् ॥ जृम्भाध्मानशरीरशोषकृशताः शूलं तृषांहगुजं पीडामंत्रविकूजनं रुचिहरं क्लेमदुत्वंत्रजेत् ३॥ वातसे पित्तसे कफसे इंहज सन्निपातसे तथा रुधिरसे पाठ प्रकारका गोलेकारोग वैद्यों ने कहाहै १ हृदय नाभिके बीच में मूत्रस्थानमें गांठके आकार गोलाहो एकतो चलायमान दूसराअचल चार अंगुलके वीचमें उस को गुल्म अर्थात् गोलेकारोग कहते २ जो नींबू गूलर फलके समानहो उसे बादीका गोलाजाने जिसमें डकार बेरवेरमें आवे दस्तपेशाबका बन्द होना जंभाई पेटकाफूलना शरीरमें शोप तथा कशपना और शूल प्यास हृदयरोग पीडा प्रांतोंका वोलना अरुचि और भोजन करनेसे नरम हो- जाय ये बादीके गोलाके लक्षण, ३ ॥ (पित्तगुल्मकेलक्षण)गुल्मंकुक्षिगतंकपित्थसदृशंपीतपुरीषभवेत् ऊष्माहगलकेरतिर्नसिमुखेशोषाःपिपासाधिका॥प्रस्वेदज्वरशूल दाहमधिकंस्पर्शासह संभ्रमश्चिहंपीतसमुद्भवस्यकथितंगुल्मस्य वैद्योत्तमैः४(कफगुल्मकेलक्षण)स्तैमित्यंकठिनोदरंशिथिलता लस्यंगुरुत्वंतनौ बाह्येशीतलतांतरेज्वलनता निद्राव्यथामस्त के ॥ स्यात्कंडूत्वचिगुल्ममाघसदृशंकासोरुचिपडुता गुल्मश्ले प्मसमुत्थितस्यभणितंचिह्नसुषेणादिभिः ५ (रक्तगुल्मकेलक्षण) गुल्मरक्तसमुद्भवंदृढतरंजवीरनिम्बूसमं हन्नाभ्यंतरभूमिकासुज नितं पुंसस्त्रियोयोनिषु ॥ हृत्कंठास्यविशोषणंचकुरुतेदाहमहा दारुणंप्रस्वेदंज्वरशूलमुग्रमधिकातृष्णारतीसंलमा ६॥

७८ wit हंसराजनिदानम्। जो कैथाके फलसमान हो काखमें हो पीला दस्तउतरे हृदय और गल में गरमीहोमनका न लगना नाक मुखमें शोप प्यास अधिकपसीना ज्वर शूल दाह अधिक स्पर्श न सहाजावे भोर ये लक्षण वैद्योंने पित्तके गोलाके कहे हैं देहगीला पेट कर्रा शिथिलताालकस देहभारी वाहर शीतलता भीतर ज्वालासी मालूमहो निद्रा मस्तक में पीडा देहमें खाज आम्रफल के समान गोला खांसी अरुचि पीलिया ये लक्षण सुपेणादि वैद्योंने क. से पैदागोला के कहेहैं ५ जोगोला. जंभीरी नींवूके समानहो पुरूपकेह- दयनाभी के बीच में पैदा हुनाहो स्त्रियोंकी योनि के समीपहो हृदयकण्ठ मुखका सूखना दारुण दाह पसीनाज्वर शूल अतिप्यास भरति ग्लानि चे लक्षण रुधिरसेपैदा हुये गोलाके हैं ६ ॥ (असाध्यगुल्मकेलक्षण) अतीसारहिकारतिश्छादशलैःपिपा साकृशत्वातिहल्लासदाहैः ॥ ज्वरश्वासकासांगशोफेर्यतोयःस गुल्मीनजीवेत्सुषेणादिवैद्यैः७ (सन्निपातगुल्मकेटक्षण) त्रिदोष संभवैःसर्वेर्लक्षणैर्लक्षितहियत् ॥ तद्गुल्मसन्निपाताख्यंद्विदोषो त्थंहिदोषजैः८ ( साध्यजाप्यअसाध्यकेलक्षण ) एकदोषोद्ध वसाध्यंद्विदोषंजाप्यमुच्यते ॥ असाध्यंयत्रिदोषोत्थंगुल्मसोप द्रवंत्यजेत् ॥ अतीसार हिचकी अरतिरह शूल प्यास कशता खेद सूखी उलटी दाह ज्वर श्वास खांसी देहमें सूजन ये लक्षण युक्त जो गुल्मरोगवाला वो सुपे- णादिवैद्योंसे अच्छा नहीं हो अर्थात् असाध्यहे ७ जिसमें तीनों दोपोंके चिह्न मिलतेहों उसे सन्निपातका गोलाजाने और जिसमें दो दोपोंके चि- ह मिलतेहों वो द्विदोपज गुल्मजाने में जो एक दोपते पैदा हुआहो वो साध्यहें दो दोपयुक्त जाप्यद त्रिदोपोत्थ असाध्यहे और उपद्रवयुक्तगुल्मी को वैध त्यागदे ॥ (गुल्मकेदशउपद्रव ) शोफस्तंबारुचिश्छदिहल्लासःकृश तातृषा ॥ शूलं स्वेदोङ्गदाहश्चगुल्मस्योपद्रवादशः १० ॥ इति हंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेगुल्मलक्षणम् ॥ १ सूजन २ तन्द्रा ३ अरुचिं ४ वमन ५ हल्लास ६ रुशता ७ प्यास T हंसराजनिदानम्। ७६ ८ शूल : पसीना १०दाह ये गुल्मरोग के दश उपद्रव १० इति हंसरा- जार्थबोधिन्यांगुल्मरोगनिदानम् ॥ (अथहृद्रोगनिदानम्)शस्त्राभिघातात्पवनस्यरोधनादत्युष्ण तिक्ताम्लकषायभोजनात् । अत्युच्चपाताद्वमनादतिश्रमादृदाम; यःस्याद्गुरुभारधारणात् १ (वादीकेहद्रोगकालक्षण) हवाधाकुरु तेमरुत्प्रकुपितःसदूषयित्वारसं हृत्स्थोगुंजत्तिपीडयत्यऽनुदिनम माणिसंतोदते ॥ पाश्र्वास्थीनिविदारयन्त्यविरतं शोषंमुखहृद्गले आध्मानंचमुहु हुर्वितनुतेश्वासंसकासंज्वरम् २ (पित्तकेहद्रोग कालक्षण) पित्तःकोपसमन्वितोहदिगतःसंशोषयित्वारसंहृत्पी डामधिकांनिरन्तरतृषांदाहंशिरःपीडनम् ॥ ऊष्माणंहृदयोदरेन सिमुखेशूलंमहादारुणं मूर्छास्वेदविपाकमोहमरतिंजानीहितं हृद्रुजम् ३॥ शस्त्रकेलगनेसे पवनके वेगों को रोकनेसे अतिगरम तथा कडुआ खट्टा कसैला भारी ऐसेभोजनसे उच्चस्थानके गिरने से वमनसे अतिश्रमसे भारीबोझ उठानेते हृदयमें रोगहोताहै १ कुपित वात हृदय में स्थित रसको विगाडकर हृदय रोगकोकरे तथागंजे नित्य हृदयमें पीडाहो मर्म स्थानों में पीडाहो पसवाडोंकी हड्डीनमें पीडा हो मुखहृदय गलेमें शोप अफरा वारवार मेंहो श्वास खांसी ज्वर ये वात के हृदयरोगके लक्षण हैं २ कुपित हुआ जो पित्त सो हृदयमें प्राप्तहोकर रसको बिगाड हृदयमें पीडा प्यास दाह शिरमें दर्द गरमी हृदय में पेट में नसों में मुख में शूलहो मूर्छा पसीना पाक वेहोशी अरति ये लक्षण पित्तके हृद्रोगकेहैं ३ ॥ (कफकेहद्रोगकालक्षण) श्लेष्मासंकुपितःकरोतिहृदयेपीडांस कएठेरुचिं माधुर्यंवदनेऽनलस्यकृशतांतंद्रांगुरुत्वंतनौ ॥ संसा वंकफसंचयस्यवमनंहल्लासशूलंज्वरं हृद्रोगोभिषगुत्तमर्निगदित श्चिकैरमीभिर्मशम् ४ (सन्निपातकेहद्रोगलक्षण) तदृद्रोगंत्रि दोषोत्थंविद्याचिह्नस्त्रिदोषजैः ॥ युक्तंसोपद्रवंवैद्यस्त्यजेन्नूनविदूर तः५ (कृमीकेहद्रोगकालक्षण) शोफश्चेतसिसंभ्रमोनयनयोःका एयतमोगौरवं द्युत्क्लेदोविकृतिस्तृषाभवतितन्निष्ठीव मेहनम् ॥

८० हंसराजनिदानम्। हल्लासोरुचिरंतरेकृशवपुः शूलंसकडूव्यथा हृद्रोगेकृमिसंभवेनि गदितंचिहंसुषेणादिभिः ६ शोषःलमोभ्रमःस्वेदो हदुजःस्युरुप द्रवाः ॥ चत्वारोघोररूपास्ते मुनिभिःपरिकीर्तिताः ७ इति श्री भिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेहद्रोगलक्षणम् ॥ कुपित हुआ जो कफ सो हृदयमें कंठ में पीडाकरे भरचि मुखमीठा अग्निमन्द तन्द्रा देहभारी कफका गिरना वमन हल्लास शूल ज्वर ये लक्षणों से कफका हृदय रोग कहाहै ४ त्रिदोपयुक्त चिह्नोंसे सन्निपातका हृद्रोग जाने भोर उपद्रवयुक्त हो उसे वैद्य असाध्य जानकर त्यागदे ५ सूजन चित्त में भ्रम नेत्रकाले अंधेरा आवे देहभारी उकलाहट देहकी विकृति प्यास बारवारथूकना मेहन हल्लास अरुचि देहकश शूल खुजली व्यथा इन लक्षणोंसे सुपेणादि वैद्योंने कृमीका हृदय रोग कहा है ६ । १ शोक २ ग्लानि ३ भ्रम ४ पसीना ये चार हृदयके घोर उपद्रव मुनी- श्वरोंने कहे हैं ७ इति हंसराजार्थबोधियां हृद्रोगनिदानम्॥ (अथ मूत्रकृच्छलक्षणम्) अनूपमांसाशनमद्यसेवनैः कषाय तीष्णोषणविदाहिभोजनैः ॥ व्यायामधर्माध्यशनाध्वजागरैःस्या न्मूत्रकृच्छंबहुकष्टदंनृणाम् १ प्रपीडयत्यधोगत्वा मार्गरुध्वाक फादयः॥ मूत्रंमुहुर्मुहुःस्वल्पंसकृच्छंकारयतिते २ (वातकेमूत्रकृ च्छकालक्षण) मुहुर्मुहुःकप्टतरेणातुच्छंमूत्रं भवेत्पीतनिभंसशूल म् ॥मेट्रेचवस्तौमहतीप्रपीडा तन्मूत्रकृच्छंपवनात्प्रसूतम् ३॥ अनूप मांसके खानेले मद्य पीनेते कसैली तीखी गरम दाहकरनेवाली ऐसी वस्तु के खानेसे दंड कसरतके करनेसे घाम अध्यशन अर्थात् भोजन के ऊपर भोजनसे रास्ताके चलने से रातमें जागनेसे मनुष्यों के बहुत कष्ट का देनेवाला भाठ प्रकारका मूत्रकृच्छू रोग होताहै १ कफादिक दोप नीचेजायकर मूत्रके मार्गको रोककर और पीडाकर तब मनुष्यके कठिन से वारवार थोडाथोडा पेशाब उतरै उसे मूत्रन्छ रोग कहते हैं २ जोम. नुष्य बारबारमें थोडाथोडा मूते पीला शूलयुक्त अंडकोश तथा मूत्रस्थान मैं पीडाहो उसे वातका मूत्ररुच्छू कहते हैं ३ ॥ (पित्तकेमूत्रकृच्छ्रकालक्षण) मूत्रभवेद्दाहयुतंमुहुर्मुहुः पीतारु लक्षण हंसराजनिदानम् । ८१ णाभरुधिरेणसंप्लुतम्॥तप्तंसकटंगुदमेट्योwथा तन्मूत्रकृच्छु विलपित्तजवदेत् ४ (कफकेमूत्रकृच्छकालक्षण) मत्रंसिताभंपरि बहुदान्वितं सपिच्छिलमेदुरमार्तिदंगुदे ॥ लिंगेचयोनौवहुशो फगौरवं तन्मत्रकृच्छ्रङ्कफसंभवंत्यजेत् ५ (कष्टसाध्यअसाध्यल क्षण)द्विदोषोद्भवंमत्रकृच्छंसदाहं भवेत्कष्टसाध्यंप्रयत्नौषधीभिः॥ त्रिदोषोत्थितंदारुणंप्राणनाशं निरुक्तमुनींद्रेरसाध्यंनितांतम६॥ जिसरोगीका पेशाय दाहकेसाथ उत्तरै बारवार और पीलाहो लाल हो रुधिर मिलाहो तप्त और कष्टसे उतरै गुदा और अण्डकोश में दर्दहो उसे पित्तका मूत्रकृच्छ्र कहतेहैं ४ जिसका मूत्र सफेद और बबूले संयुक्त गाढ़ा और चिकनादो गुदामेंदर्दहो लिंग और योनि में सूजनहो देहभारी ये कफके मूत्रकृच्छ्रकेहैं ५ दो दोपतेहुआ जो मूत्रकृच्छूदाहयुक्त सो मंत्र औपधीनसे कष्टमाध्य कहाहै और त्रिदोषसेहुआ सो प्राणकानाशक मुनीश्वरों ने असाध्य कहाहै ६ ॥ मूत्रकृच्छ्रम्भवेद्घातात्संरोधान्मूत्रशुक्रयोः॥ शल्यात्पातारक्ष तात्कष्टाहस्तिमेहनशलकृत् ७ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहं सराजकृतेवैद्यशास्त्रसूत्रकृच्छलक्षणंसमाप्तम् ॥ मूत्र और वीर्यके रोकनेसे घात शल्यसे पड़नेसे घावसे कष्टसे मूत्रस्थान मेहनमें दर्दका करनेवाला मूत्रकृच्छ्ररोग पैदा होता ७ इति हंसराजार्थ बोधिन्यांमूत्रकृच्छ्रनिदानम् ॥ (मूत्राघातकीउत्पत्ति) नाभेरधोधःप्रगतास्त्रिदोषा भवन्ति तेकुण्डलिकासमानाः ॥ स्वहेतुभिःसंकुपिताभ्रमन्ति कुर्वन्तिप श्चाबहुमूत्रघातान १नाभेरधोयदावायुःकुण्डलाकारसंस्थितः॥ आध्मापयनगुदांवस्तिम्मूत्राघातोभवेत्तदा २ मूत्रस्यवेगंविद धातितीव्रमपानवायुःकुपितस्तुतेन । नाभेरधो_महतींप्रपीडां करोतियस्तस्यनरस्यनूनम् ३॥ दोपनाभीके नीचेजाय कुंडली के समान होकर और अपने हेतून से कुपितहो भ्रमणकरै पश्चात् मूत्राघात रोग को प्रगट करते हैं १ जवपवन ८२ हंसराजनिदानम् । नाभीकेनीचे कुंडलाकारहो गुदा मूत्रस्थानमें भरजावै तब मनुष्य के मूत्रा- घात रोगहोता २ जो पुरुप मूत्रके वेगको रोके तब उसके अपान वायु कुपितहो नाभीके ऊपरनीचे भारी पीडाकरे उसे मूत्ररूच्छू कहते ३ ॥ (वातकेमूत्रकृच्छूकालक्षण) वातोधःप्रगतारुणद्विपुरुतोमू पुरीषान्वितं मेदेवस्तिगुदेदधातिमहतींपीडांचशोफान्विताम्॥ आध्मानंकुरुतेमुहुर्मुहुरतोमूत्रंसकृत्कष्टदम् ॥ कृष्णाभंपवनोद्वं निगदितंतन्त्रघातपरैः ४ (पित्तकेमूत्राघातकेलक्षण) मेट्रेव स्तिगुदागंदहतिबहुतरं मूत्रमार्गरुणद्विस्वल्पस्वल्पंसकृच्छ्रम्बहु रुधिरयुतंकारयत्येवमूत्रम् ॥ धत्तेधोगत्यकोपवितरतिबलया काररूपंचपित्तं तत्पैत्यंमूत्रघातंनिगदितमृषिभिर्मानसैःसद्भिप ग्भिः ५ (कफकेमूत्राघातकालक्षण) इलेज्माधोगत्यशोफंवितर तिगुरुतांमूत्रमार्गरुणद्धि मेट्रेवस्तौगुदायप्रवहतिसरुजकारय त्येवमूत्रम् ॥ तुच्छंतुच्छंसकप्टंक्वचिदपिबहुशोमेदुरंश्वेतवर्ण सां ईशीतसफेनंकथितमृषिवरैत्रघातंकफस्य ६॥ वातनीचे जायकर दस्त पेशाब को रोक अंडकोश और मूत्रस्थान में सुजनकेसाथ में भारीपीडा करें अफरा और वारवार कष्टसे थोडापेशाव कालेरंगका उतरे उसे वातका मूत्राघात कहते हैं ४ कुपितहुया जो पित्त सो नीचेजायकर कंकणके आकारहो अंडकोश और मूत्रस्थानमें तथा गुदायमें पीडाकर मूत्रके मार्ग को रोकदे थोडाथोडा कठिनतासे बहुत रुधिरमिला मते उसे ऋपि और वैद्योंने पित्तका भूत्राघात रोग कहाहै ५ कफनीचे प्राप्तहो सूजन को करै देहभारी मूत्रके मार्गोंको रोकदे मेवस्ति गुदा इनमेंपीडा करै थोडा २ कठिनता से कभी बहुतसा चिकना सफेदरङ्ग का गाढ़ा शीतल झागमिला ऐसा पेशाव उत्तरे उसे कफका मूत्राघातरोग पियोंने कहाहै ६॥ मूत्राघातद्विदोषोत्थंत्रिदोषोत्थंभिषग्वरैः ॥ज्ञायतेलक्षणैःस तिपित्तकफोद्भवैः ७ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराज तेवैद्यशास्त्रेमूत्राघातलक्षणम् ॥ दो दोपोंके लक्षणोंसे द्विदोपका मूत्राघात रोग जानना त्रिदोषसेसन्नि; - हंसराजनिंदानम्। पात का मंत्रापास वैद्यों करके जानना ७.इति हंसराजार्थदोधिन्यांमूत्रा घातनिदानम् ।। (अथाइमरीरोगनिदानम्) स्त्रियायोनिरंधेशिशूनांचमेद्रेम वत्यश्मरीमत्रवेगस्यरोधात् ।। मरुच्छ्लेष्मपित्तैर्भवाशुक्रजान्या महादुःखदाप्राणहन्त्रीप्रसिद्धा : १ (वातकीअश्मरीकालक्षण) रुक्षाचातभवाश्मरीगुरुतराभल्लातमज्जासमा शिष्णछिद्गता रुणद्विपरितो मविगन्धान्वितं ॥ पीडांमूत्रपुरीषयोर्वितनुते मे २गुदेवस्तिपु आध्मानंकुरुतेरुचिंकृशतनुंग्लानिज्वरंबिभ्रते २ (पित्तकीपथरीकेलक्षण) सूक्ष्मापित्तसमुद्भवामणिनिभा खजूर तुल्यारुणा तप्ताकंटकसंयुताथचिपिटाशिष्णेगतायाश्मरी ॥ छि मूत्रपुरीषयोर्दहतियायोनीरुजवईते मूत्रकृच्छतमंसदाहमनि शं तृष्णाङ्करोतिद्रुतम् ३ ॥ मूत्रके वेग रोकनेसे स्त्रियोंकी योनि में और चालकों के अंडकोशमें प- परीकारोग होताहै १ बांदीसेपित्तसे ३ कफसे । शुक्रसे चार तरहकी है महादुःखकी देनेवाली प्राणकी नाशक प्रसिद्ध १ वातकी पथरी रूरवीभारी भिलावेकी मज्जाके समानहो इन्द्रिय में प्राप्तहो इन्द्रियके छिद्रको रोक दे मूत्रमें बासगावै पेशाव और दस्त के समय गुदा मूत्रस्थान और पोतों में दर्द हो अफरा अरुचि कशंदेह ग्लानि ज्वर ये लक्षण वातकी पथरी हैं, २ छोटीहोमणिके समानहो खजूरके फलके तुल्य लालहो गरमतथा कांटे और चपटी लिंगमेहो.मूत्रं दस्तके छिद्रको दहन करै योनि में दर्दहो कठिनतासे दाहयुक्त पेशाब, उत्तर प्याप्सहो ये लक्षण पित्तकी पथरीक ३॥ -शूलंमेगुदेभगेप्रलपनंकाइयचरंकंपनं ह्यष्माणविदधातिव स्तिगुदयोमंत्रस्यधारारुणमाक्षिण्यंपरितोरुणद्धिसहसापावों दरेपीडनघोरापित्तभवाश्मरीनिगदितावैद्योत्तमैःप्राणहा ४(क फकीपथरीकालक्षण) स्निग्धामज्जासहशाकफोद्भवा श्वेताश्म रीकंटकवेष्टिताहढाशीतातिमध्येगुदशिश्नयोर्भवासंजायतेमूत्र निरोधनाच्छिशोः ५ शैथिल्यं कुरुतेश्मरीकफभवाशिश्नांतरेतौद हंसराजनिदानम्। नंधैर्यनाशयतेरुचिंवितनुतेह्यङ्गंमुहुःकंपते ॥ मूत्रंश्वेतनिभरुण द्विगुरुतांकायेशिरःपीडनं धत्तेपाण्डुरुजंतनौकशवपुर्निद्रालसं विभ्रते ६॥ अंटफोश गुदा भग इनमें शूलहो प्रलाप कशता ज्वर कम्प गुदा मौर- सूत्रस्थान गरमी तथा सूत्रकीधारा लालहोक्षीणता पेशावका रुकना पस- वाडोंमें तथा पेटमें दर्द ऐसे लक्षणों से वैद्योंने प्राणकी नाशक पित्तकी पथरी कहीहै ४ चिकनी धामकी गुठली के समान हो सफेद और कांटेयुक्त दृढ़ शीतल तथा गुदा और लिङ्गेन्द्रिय के मध्य हुई हो ये वालकके मूत्र वाधारोकनेसे पैदा होती है ये लक्षण कफकी पथरी के हैं ५ शिथिलता इन्द्रियमें पीड़ा धैर्यका नाश भरुचि अंगों में कम्प सफेद पेशायहो चौर रुकरुक कर उतरै देहभारी शिरमें दर्द पाण्टु और कशता देहमें निद्रा आलस्य ये लक्षण फफकी पथरी के हैं ६॥ (वीर्यरोधकीपथरीकालक्षण) यूनांवीर्यस्यरोधाद्भवतिच महतीशुक्रजाताइमरीया शिश्वस्तिगुदावैरुजयतिषणंमत्र मार्गरुणहि ॥ दौर्बल्यंकुक्षिरोगवितरतिसहसाशुक्रनाशंकरोति तुच्छंतुच्छंसकष्टंकचिदपिबहुशः कारयत्येवमूत्रम् ७ इति श्री भिपक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतवैद्यशास्त्रेअश्मरीलक्षणम् ॥ जवानपुरुषों के वीर्य के रोकनेसे जो पथरी रोगहो उसके ये लक्षण हैं लिंग मूत्रस्थान गुदामें पीडाहो तथा अंडकोशों में दर्दहो मूत्रके मार्ग को रोकदे दुर्बलता कूखमें दर्द शुक्रका नाश कटसे कभी थोड़ा कभी बहुत पेशाब उतरे ७ इति हंसराजार्थबोधिन्यामश्मरीलक्षणम् ॥ (अथ प्रमेहलक्षणम्)दधिमधुघृतदुग्धंमद्यपानंनवान्नं फलरस मतिमिष्टंतऋमिक्षोर्विकारम् ॥ रविकृतपरितापःसुन्दरीस्त्रीकटाक्ष भवतिविषमचेतोमेहहेतुनितांतम् १ (वातकीप्रमेहकालक्षण)म त्राओवाथपश्चात्प्रपततिसततंशुक्रमिक्षोरसाभं यामेयामेद्वयेवा क्वचिदपिसमयेपातमाप्नोतिदोषैःनिर्गधंतकरूपलवणजलनिर्भ दुग्धतुल्यंसुराभम् ॥ रूक्षवातप्रमेहंप्रवदतिचरकःकृष्णवर्णच नीलम२ मेहोचातसमुद्भवःप्रकुरुतेशूलंमहादारुणं हृद्रोगंपिटिका हंसराजनिदानम्। मुखेमधुरतांश्वासंशरीरंकृशम्॥आध्मानंतनुपीड विकलतांशोपं चकासान्वितंचोन्निद्राम्बलनाशनश्चपलतारुक्षालचंसाहसम्३ दही सहत घी धमयके पीनेसे नवीन अन्न फलरस अतिमीठा छांछ ईखकेविफारसे सूर्यकेघामसे सुन्दरस्त्रीके कटाक्षसे चित्तमें प्रमेहका हेतु होताहे १ पेशाब करनेके पहिले वा पीछे ईखकासारंग ऐसाशुक्र गिरनेसे पहर पहरमें या दोपहर में दोपोंके होनेसे दुर्गंधयुक्त छांछके समान वा नोन के पानीसरीखा धकेसमान मद्यकेसमान रूखाहो ये लक्षण वातकी प्रमेह के चरफमापिने कहेहे २ वातका प्रमेह दारुणशूल हृदयरोग मरोडी मु- खमें मिठास भ्वास देहरूश अफरा देहमें पीडा वेकली शोप खांसी निद्रा पत्तका नाश चपलता त्वचामै रुवास साहस ये लक्षण करताहै ३॥ (पित्तकीप्रमेहकालक्षण) धनंपावकामहरिद्रानिभंवारुणर क्ततुल्यंचसिंदूरवर्णम् ॥ प्रमेहचपित्तोद्भववैद्यराजविजानीहिम जिष्ठकावर्णतुल्यम् ४ कपायश्चमबंकरोतिप्रमेहो रतिपित्ततःक एसाध्योतिकृच्छ्रम् ॥ ज्वरंवस्तिशूलंकृशांगपिपासां लममेदाहं भ्रमंशोषमंगे ५ (कफप्रमेहकालक्षण) घृतदधिवसरूपंदुष्ट दुर्गंधयुक्तंघनमधुमदृशवापिच्छिलंमेहवर्णम् ॥ सितलवणनिर्भ वामेदुरंतंतुमिश्रबुधजनकिलमेहंविद्धिसाध्यंकफात्म्यम् ६ ॥ गाढ़ा अग्निके समान वर्ण तथा पीला वालाल अथवा जलकेसहश वा मंजीठका वा सिंदूरके रंगकासा पेशाब उतरे उसे हे वैद्यराज! पित्तका प्रमेहमान ४ फसैले रंगका रुधिरकरंगका ज्वरके मूत्रस्थानमें पीडा कुश देह प्यास ग्लानि अंडकोशोंदाह भ्रमशरीरमशोप अरति ये पित्तकी प्र- मेह के लक्षण हैं ये कष्टसाध्य ५ दही घृत चरवीके समान मते दुर्गन्धयुक्त गाढ़ा सहतके समान तथा सफ़ेद मिश्री और नोनके रङ्गसा और चिकना पेशाव उतरे तन्तुयुक्तहो उसको पंडित कफका प्रमेह कहतेहैं ६ ॥ मेहःश्लेष्मसमुद्भवोबलहरःशुक्रस्यविध्वंसको ह्यालस्यकुरुतेरु चिदृषणयोःशोर्थतनौपांडुताम्॥शैथिल्यंगुरुतांवमिनयनयोःशौ मंत्वचिस्फोटनंतंद्रारानिदिनेनिशंमलचयंदतेंघ्रिहस्तेप्पलम् ७ + हंसराजनिदानम्। ८५ मुखेमधुरतांश्वासंशरीरंकृशम्॥आध्मानंतनुपीडनविकलतांशोपं चकासान्वितंचोन्निद्राम्बलनाशनश्चपलतारूक्षांत्वचंसाहसम्३ वही सहत घी दृध मद्यके पीनेसे नवीन अन्न फलरस अतिमीठा छांछ ईखकेविकारसे सूर्यकेघामसे सुन्दरस्त्रीके कटाक्षसे चित्तमें प्रमेहका हेतु होताहे १ पेशाब करनेके पहिले वा पीछे ईखकासारंग ऐसाशुक्र गिरनेसे पहर पहरमें या दोपहरमें दोपोंके होनेसे दुर्गंधयुक्त छांछके समान वा नोन के पानीसरीखा दूधकेसमान मद्यकेसमान रूखाहो ये लक्षण वातकी प्रमेह के चरकमापिने कहेहैं २ वातका प्रमेह दारुणशूल हृदयरोग मरोड़ी मु- खमें मिठास श्वास देश अफरा देहमें पीडा वेकली शोप खांसी निद्रा बलका नाश चपलता त्वचामे रुखास साहस ये लक्षण करताहै ३॥ (पित्तकीप्रमेहकालक्षण) घनपावकामहरिद्रानिभंवारुणंर ततुल्यंचसिंदूरवर्णम् ॥ प्रमेहंचपित्तोद्भवंवैद्यराजविजानीहिम जिष्ठकावर्णतुल्यम् ४ कपायञ्चमूत्रंकरोतिप्रमेहो रतिपित्ततःक ष्टसाध्योतिकृच्छ्रम् ॥ ज्वरंवस्तिशूलंकृशांगपिपासां क्लममेदाहं भ्रमंशोषमंगे ५ ( कफकेप्रमेहकालक्षण) घृतदधिवसरूपंदुष्ट दुर्गंधयुक्लंघनमधुमदृशवापिच्छिलमेहवर्णम् ॥ सितलवणनिभं वामेदुरंतंतुमिश्रंबुधजनकिलमेहविहिसाध्यंकफात्म्यम् ६॥ गाढा अग्निके समान वर्ण तथा पीला वा लाल अथवा जलकेसहश वा मंजीठका वा सिंदूरके रंगकासा पेशाब उत्तरे उसे हे वैद्यराज ! पिनका प्रमेहजान ४ फसैले रंगका रुधिरकेरंगका ज्वरके मूत्रस्थानमें पीड़ा कश देह प्यास ग्लानि अंडकोशों में दाह भ्रमशरीरमशोप अरति ये पित्तकी प्र. मेहके लक्षण हैं ये कष्टसाध्यहँ ५ दही घृत चरवीके समान मूते दुर्गन्धयुक्त गाढ़ा सइतके समान तथा सफेद मिश्री और नोनके रससा और चिकना पेशाब उतरे तन्तुयुक्तहो उसको पंडित कफका प्रमेह कहतेहैं ६ ॥ मेह श्लेष्मसमुद्भवोवलहरःशुक्रस्यविध्वंसको ह्यालस्यंकुरुतेरु चिर्टषणयोःशोथतनौपांडुताम्॥शैथिल्यंगुरुतांवमिनयनयोःशा छंत्वचिस्फोटनंतंद्रारानिदिनेनिशंमलचयंदतेंघ्रिहस्तेष्पलम् ७ - । ८६ हंसराजनिदानम्। (प्रमेहरहितकेलक्षण) यदाप्रमेहिनोमूत्रंकटुतिक्तमपिच्छिलम। शुहरूक्षशुभधारतदारोग्यंवदेशिपक ८ (साध्यअसाध्यकष्ट साध्यविचार ) मेहःकफोत्थितःसाध्यःसाध्यःकप्टेनपित्तजः॥ वा तजोऋषिभिःपूर्वरसाध्यापरिकीर्तितः ६॥ इति श्रीभिपक्चक्र चित्तोत्सवेहंसराजकृतेवेद्यशास्त्रप्रमेहलक्षणम् ॥ कफका प्रमेह घलहरता शुक्रका नाशकरता थालफस अरुचि पोतोपर सूजन शरीर पीता और शिथिल तथा भारी वमन नेत्र सफ़ेद त्वचाको फटनारात दिन तन्द्राफा होना दांत जीभ हाथपैरोंमें मेलकासंग्रह दोनाये लक्षण करताहे ७जिस प्रमेहवालेका पेशाब कडुमा तीखा पतला शुद्ध रूखा सफेद धारका उत्तरे उसका प्रमेह दूरंभयो जानिये कफका प्रमेह साध्यहै पित्तली फष्टसाध्य वातका प्रमेह पूर्व ऋपियोंने असाध्यकहा है । इति हंसराजार्थवोधिन्पांप्रमेहनिदानम् ॥ (अथ पिटिकारोगनिदानम् )तिक्ताम्लोमविदाहिरूक्षकटक क्षारातपाध्याशनैर्मवस्निग्धविरुद्धभोजनरसैर्दुष्टैनवान्नद्रवेः॥दो पंपित्तमरुत्कफाद्विदधतेसंदृष्यरक्तामिषत्वकसभेद्यचहिर्गताश्च पिटिका रूपेणकुप्यन्तिते १ दुष्टग्रहप्रकोपेनदोपामर्मप्रभेदिनः।। जनयंतिशरीरेषु पिटिकाबहुधामताः २ ज्वरश्छर्दिरतीसारोरक्ता गोतीव्रवेदना ॥ स्वेदस्तीरुचिःश्वासो वैवयोविकलोरतिः३॥ तिक्त खष्टा गरम वाहकरनेवाले कटु रूखी खारी घाममें डोलनेसे भोजन पर भोजनकरनेसे मय चिकनी विरुद्ध भोजन और पानसे दुष्टनवान्न घोर पतली वस्तुसे कुपितहुये जो वात पित्त कफ सोरुधिर चौरमासको विगाड कर त्वचायो फाडकर फुसीरूप पिटिकारोग फोप करताहै १ दुष्ट ग्रहके कोपसे तीनोंदोप मर्मस्थानको भेदकर देहमें अनेक प्रकारके पिटिकारोग पैवाकरते २ ज्वर रहमतीसार देह लाल तीबदुःख पसीना प्यास भरुचि श्वास विवर्ण वेफपी शरति३॥ (पिटिकाकापूर्वरूप)अस्थिस्फोटोङ्गदाहश्चशोषकंड्वरुचिर्भ मः॥पिटिकानांपूर्वरूपमुनिमिपरिकीर्तितम् ४ (वातकीपिटिका केलक्षण) कृपणापांवकसंनिभाश्चपिटिकावातोद्भवास्त्वगातार ८७ हंसराजनिदानम्। सूक्ष्मामुद्गसमामसूरसदृशाःसप्ताह्निपाकारुजाः॥ सूक्ष्माभाश्चि पिटाघनाबपरितः कुर्वतिपीडाभयं दाहानाहतृषाक्षवार्तिवमथुः श्वासातितापाकराः५ (पित्तकीपिटिकाकालेक्षण) अस्थिस्फोटः पर्वभेदोङ्गदाहःश्वासःशोषोविड्यहोमूत्रकृच्छ्र । रौद्रास्फोटा रक्तजोरक्तवर्णा वैद्यैरुक्तंपित्तकोपस्यचिह्नम् ६॥ हडफूटन देहमें दाह शोप खुजली अचिभ्रम ये मुनीश्वरोंने पिटिको रोगका पूर्वरूप.कहाहै.४ काली अग्निके रङ्गकी त्वचामें फुसीहों छोटी और मुंगके समान तथा मसूरके समान सात दिनमेंपके कमदीखे चपटी और कठोरहों और पीडाभयको देनेवाली दाह आनाह प्यास छींक मथवाय इवास अत्यंत तापकी करनेवाली -वातकी पिटिका जाने ५६ हड़फूटन गांठों में दर्द अंगों में दाह श्वास शोप दस्तका रुकना मूत्रकृच्छ्र रोद्र, फोड़े रक्तसे पैदा लालरंगके हो तो वैद्य पिचकी पिटिका जाने ६ ॥ 11 : (कफकीपिटिकाकेलक्षण) पिटिकाःकफकोपभंवा कठिनाः स्फटिकद्युतयोवहुधाकृतयः ॥ चिरपाकरुजास्तनुशोफकरावद रोफलपक्कसमारु चयः ७ श्लेष्माकोपेनकुर्यात्त्वचिपिटकशतंबुद्ध दाकारतुल्यंशोफप्रांतंकठोरं बदंरफलसममांसत्वग्भेदजातम् ।। निद्रांतन्द्रापिपासांभ्रममरु चित्रमिकासमंगेपुपीडांश्वासंकंडूप्रसे कंह्यवयवशिथिलंशीर्षरोगज्वराति ८ वातपित्तभवानीलामध्ये निम्नावरान्विताः॥भवंतिपिटिकाःक्षुद्राःशोपदाहसपायुताः । कफकोपकी पिटिका कठिन स्फटिकमणिके समान तरह तरहकी देर में पके देहमें सूजनहो बेर पकेके समान कान्तिहो ७ कफकोपी पिटिका त्वचा में सैकरों फुसीको ययूले के आकार उसके चारों ओर सूजन तथा कठिन वेरफलके समान मांस त्वचाको फाडफ़र प्रकटहो निद्रा तंद्रा प्यास भ्रम अरुचि-वमनं खांसी अंगों मेंपीडा श्वास खुजली लारका गिरना शरीर के अवयव शिथिल शिरमेंदर्द, ज्वर तथा खेद ये कफकी पिटिकाके लक्षण है ८ वात पिनकी, पिटिका नीलेरंगकी बीचमें बैठीसीहो ज्वरहो और क्षुद्रा पिटिका दाह शोपप्यासयुक्त होती है ६ ॥ स्थूलाःश्वेताःप्रोन्नतांदुश्चिकित्स्याः पूर्यस्रावास्फोटकाःकष्टपा है ." हंसराजनिदानम् । तःपाटलाकष्टदामटताः ४किंचित्कष्टप्रदाःपीता-पिशंगासिंग लास्तथा ॥ रत्रभ्रा.स्फटिकमंकाशाःस्निग्धाःसुखकराःस्मृताः ५ मर्मस्थलेषुसमेघुजायतेसंधिपन्नताः ॥ पिटिका श्वेतरक्ताभाम ध्यगतःसराविकाः ६॥ धसरे रंगकी नीलेरंगकी मलिन भीतर सफेठहो वो मृत्युकी देनेवाली पिटिकानाननी और लाल वा गुलावीरंगकी कष्टदेनेवाली होतीहै ४ पीले रंगकी पिशंगरंगकी पिटिकाकुछ कष्टदेतीहै स्वच्छस्फटिक मणिके रंगकी चिकनी सुखकरनेवाली होतीहै ५ मर्म में और मालमें तथा संधीनमें उठीहुई सफेद खाल रङ्गशीबीचमें गडहाहो उसको सराविका कहते हैं ६॥ कूर्मरूपामहापुष्टा वर्तुलाबरदाहदाः॥ जायंतेपिटिकाःसर्वाः कच्छप्यस्ताउदाहृताः७ तीवदाहप्रदामांसे सलेदावर्द्धतेरुजम्॥ जालवद्वेष्टयत्यंतं प्रोक्तासाजालिनीवुधैः ८ मसूरदेहवत्सूक्ष्मार क्ताभासाममरिका ॥गौरसर्षपभास्निग्धातत्प्रमाणाचसर्पपाह। कछुये कासा स्वरूपहो ज्यादा मोटीहो बत्तीकी तरहहो ज्वर जलन ये लक्षण कच्छपिका हैं ७ तीव्र जलन मांसमेंहो क्लेशयत पीडाको बढ़ावै और जालकी तरह चिपटे उसे पंडित जालिनी कहते हैं ८ मसूरकी दाल की समानछोटी और लाल हो उसे मसूरिका कहतेहैं और सफेद सरसोंके समानहो और चिकनीहो उसे सर्पपिका कहते हैं । ।। पिटिकासुप्रजायंतेपिटिकाघोरदर्शनाः॥पुत्रिण्यस्त्वार्तिदानी लाःप्रोक्तावैद्यैर्विशारदैः १० अतिदीर्घासशोफाया परस्परयुता रुणा ॥ विद्रधेर्लक्षणैर्युक्ताप्रोक्ताविद्रधिकावधैः ११ विदारकंद वदीर्घा कठिनादुःखकारिणी ॥ ज्वरार्तिदाक्षुधाहारी विज्ञयासा विदारिका १२॥ जो फुसी में दूसरीफंसी घोरपैदाहो और पीडायुक्तहो और नीलेरंगकी हो उसे पुत्रिणी कहते हैं १० बहुत बड़ी सूजन युक्त और परस्पर मिली हुई हो, लालरंगहो और विद्रधिके लक्षण मिलते हों उसे वैद्योंने विद्रधि- का कही है ११ विदारीकंदके समान मोटीहो कडी दुःखफारक ज्वर खेद भूखंका नाशकरनेवाली उसको विगारिका कहते हैं १२ ॥

. ६२ हंसराजनिदानम्। पिंडीवत्पिंडिकाज्ञेयादहशोफकरीसिता ॥ व्यक्तांजुल्याकृति ईयावैद्यैःसावित्ततांजुलाः १३ पिटिकातैर्विनाशायशीतलांपूजये त्सुधीः॥ पुष्पैधूपाक्षतैदीपनवेद्यर्मगलैस्तथा १४ इति श्रीभिषक् चक्रचित्तौत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेमसरिकापिटिकालक्षणम् ॥ जो पिंडीके भाकारहो उसे पिंडिका जाननी वो देहमें सूजनको करती है व्यक्तांजुलीके जो प्राकारमेंहो उसे वैद्य विततांजुली कहते हैं १३ पि- टिका और शीत्तला एकही है इसीवास्ते पिटिकाके दुःखके नाशनार्थ शीतलाका पूजन धूप दीप चावल पुष्प नैवेद्य और मंगलाचरण के साथ करै १४ इति हंसराजार्थबोधिन्यांपिटिकामसूरिकारोगनिदानसमाप्तम् ॥ अथ मेदरोगनिदानम् ॥ (भेदोत्पत्तिः) अव्यायामर्दिवास्वप्नेसिमिष्टान्नभोजनैः॥ अतिस्निग्धाशनैर्देहेमेदोवृद्धिःप्रजायते १ जठरेमेदसोटन्धिःक रोतिवलसंक्षयम् ॥ निद्रांदौर्गन्ध्यमंगेष्वशक्तिसर्येषुकर्मसु २ स्थूलोदरमनुत्साहंगौरवंतनुशीतलम् ॥ जठराग्ने क्षयंजाड्यं श्वासंकंपनसादनम् ३॥ दंड कसरतके न करनेसे दिन में सोनेसे मांस मिष्टान्न के खानेसे अति चिकनी वस्तुके खानेसे देहमें मेद बढ़ता १ पेटमें मेदके बढ़नेसे वल का नाश होताहै और निद्रा तथा दुर्गंध देहमें और सनकर्ममें अश्रद्धा २ पेट को बढ़ावे उत्साह रहित तथा देहभारी तथा शीतल जठराग्निका नाश और जडता श्वास कंप सादन ये होते हैं ३ ॥ कार्यस्थलतरंमेदसस्वेदस्वल्पमैथुनम् ॥ धातुक्षयंत्वचंपीतां वहुमत्रांसितेक्षिणी ४ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृते वैद्यशास्त्रेमेदसोन्डिलक्षणम् ॥ जिसकी देह मोटी मेदसे और पसीने युक्त मैथुन थोड़ा कराजाय और धातु गिराकरे पीली त्वचा होजाय मूत्र बहुत उतरे सफेद नेत्रहों ये मेदरोगके लक्षण हैं ४ इति इंसराजार्थबोधिन्यांमेदरोगलक्षणम् ॥ (गण्डमालारोगनिदानम्) विस्फोटमालागलकेशशोफमे हंसराजनिदानम्। दोद्भवातोदयुतातिरता ॥ कर्कन्धुजम्बामलकप्रमाणांतांगण्ड मालांप्रवदन्तिवैद्याः १ (वातकीगण्डमालाकेलक्षण) वातोद्भ वायागलगण्डमाला कृष्णारुणाभाकुरुतेतितोदम् ॥ स्तब्धा शिरातालुगलेप्रशोषं भिन्नस्वररूक्षतमंशरीरम् २ वैरस्यमास्ये विदधातिकष्टं संखावयेद्रक्तनिभचपूयम् ॥ भिन्नस्वरंकष्टतरेण पाकं करोतिवातात्मकगण्डमाला ३॥ फोडे मालाकी तरह सूजनयुक्त गलेमेंहो और लालहो तथा वेर जामुन आमलेके प्रमाणहो मेदसे पैदाहुआहो उसे वैद्य गंडमालारोग कहते हैं ? वातकी गंडमालाके ये लक्षण, काली लालंदो प्रतिपीडाकरे नाडिनको स्तंभन करदे तालू गलेमें शोषहो बुरास्वर शरीररूखा २ मुखमें स्वाद न रहै कष्टको बढ़ावै तथा रादरुधिरबहै बुरास्वर होजाय कष्ट से पके येभी वातकी गंडमाला के लक्षणहैं ३ ॥ (पित्तकीगण्डमालाकालक्षण) ज्वरंशोफशूलंकरोत्युग्रदाह कटुत्वंमुखेकण्ठताल्योष्ठशोषम् ॥ महत्पित्तकोपोद्भवारक्तवर्णा गलेमुष्कपंक्तयाकृतिगण्डमाला ४ (कफकीगंडमालाकालक्षण) जम्बूकर्कन्धुपगीफलकलितरुभापक्वनारंगपिंगा काठिन्याग्रन्थि पंक्तिर्वितरतिपरतः कंठदेशेषुशोफम् ॥ कंडूपीडांविधत्तेप्रतिदि नमरुचिंगौरवानंचकासं पूर्वरक्तसगन्धंस्रवतिभवतिसाश्लेष्म जागण्डमाला ५ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्य शालेगण्डमालालक्षणंसमाप्तम् ॥ ज्वर सूजन शूल दाह मुख कटुमा कंठ तालू अोठ इनका सूखना लाल वर्ण गलेमें अंडकोश की पंक्तिके आकारहो उसे पित्तकी गंडमाला कहते हैं ४ जामुन कर्कधु सुपारी पहेड़ा पके नारङ्गीके समान पीलीहो कठिन गांठकी पंक्तिभीहो और कंठमें सूजनहो खुजली पीडाको बढ़ावै अरुचि देहभारी खांसी रादरुधिर वासके साथ निकले उसे कफकी गंडमाला कहते हैं ५ इति हंसराजार्थवोधिन्यांगंडमालारोगनिदानम् ।। (अथ इलीहपदरोगनिदानम्) शोफोनृणांपादगतोतिरौद्रो ६४ हंसराजनिदानम्। वल्मीकतुल्योतरमांसवर्ती ॥ मेदाश्रयःकंटकवेष्टितांगो वेद्योत्त मेःश्लीहपदोनिरुक्तः १(वातकीश्लीहपदकालक्षण) निमित्तश न्यबहशोफपादं कृष्णंचरूक्षस्फुटतीव्रतोदनम् ॥ वातोश्लीह पदवरातिनिरूपितवेद्यवरैनितांतम् २ (पित्तकीउलीहपढ़का लक्षण) शोफाधिकरतज्वरार्त्तिदाह संसावयुसंबहुरक्तवर्णम् ।। पित्तात्मकंश्लीहपदंगुरुत्वं शेयंभिपरिभाकिलकप्टमाध्यम् ३ ॥ मनुष्योंके पेरमें सूजनहो और क्रमसे बढ़के सर्पकी वांबीके समान लम्बी पैदू जंघा मांसमें प्राप्तहो और मेदके भाश्रयहो कांटेयुक्त देहहो उसे वैद्य श्लीहपदरोग कहते हैं १ विनाकारण बहुत सूजनहो काले रुखे फटे तीव्रवेदनायुक्त ज्वरखेदहो उसे वैद्य वातका श्लीह पदरोग कहते हैं २ जिसमें सूजन ज्यादा हो लालरंगहो ज्वर खेद दाह रूधिर गिर भारी हो वो वैद्यों ने कष्टसाध्य पित्तका इलीहपद कहाहै ३ ॥ (कफकेश्लीहपदकालक्षण) स्निग्धश्लीहपढंगुरुत्वमनिशं शोकाधिकंसज्वरं श्वेताभंबहुरंटकैः परिखनंवल्मीकतुल्यंढम् ।। मेदोमांसपराश्रयंचरणगंस्थूलंचशीतान्वितम् भोभोवैद्यविशा रदाःकफभवंजानीततत्पाण्डुरम ४ ॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तो त्सवेहंसराजकृतैवेद्यशास्त्रेश्लीहपदराक्षणम् ।। चिकना भारी सूजन विशेष ज्वर सफेदरंग बहुत कांटेयुक्त चांदी के तुल्यहो और दृढ़हो मेमांतके आश्रयहो पैरों में हो मोटी और शीतल हो उसे हे वैद्यो! तुमलोग कफका श्लीहपदरोग जानो ४ इति हंसराजा- धगोविन्यांश्लीहपदरोगनिदानम् ॥ (अथ विद्रधिरोगनिदानम्) त्वयक्तानिपमेदांसिदूष्यदोषास्थि गाःपुनः॥ नाभेरधोमहच्छोफंज्वरंकुर्वतितेशनैः १ सविद्रधीरुक परितोविचार्यप्रीतैर्भिपग्भिःकिलशास्त्रपारगैः ॥ महार्तिकृद्दाह विवईनोसोशोफान्वितोहज्जठरेचशलम् २ चिद्रधिःपविधःप्रो तोमुनिभिस्तत्वदर्शिभिः ॥ दोपैय॑स्तैःसमस्तैश्चरक्तजःसप्त मास्ता ३॥

हंसराजनिंदानम्। ६५ वात कफ पित्त त्वचा रुधिर मांस मेदा इनको बिगाड़कर हड्डी में प्राप्त हो नाभीके नीचे नीचे भारी सूजन और ज्वर को पैदा करताहै १ बहुत खेद और दाह और सूजन को बढ़ावै तथा हृदय पेट में दर्दहो उसे वैद्यों ने विचारकर विद्रधि रोग कहाहै २ विद्रधिरोग छःप्रकारकाहे १ वात २ पित्त ३ फसे ४ वातपित्तसे ५ वातरुफसे ६ पित्तकफसे और सातवा ७रुविरले ३ ॥ वातविद्रधिकालक्षण ) २ रक्तश्यामोतिविपनोवेदनाबहुभि युतः॥ शीर्पपाकोविचित्राभोवातजोविद्रधिःस्मृतः ४ (पित्तकी विद्रधिकेलक्षण) पक्वनिम्बूफलाकारोरक्ताभोज्वरदाहकृत् ॥शी र्षपाकोमहत्यातिर्विद्रधिःपित्तजोभवेत् ५ ( कफकीविद्रधिकेल क्षण) स्निग्धःशीतश्चिरोत्थोयंचिरपाकोल्पवेदनः॥श्लेष्मजो विद्रधिःपांडःशरावसहशोभवेत् ६॥ लाल और काली तथा विपम बहुतपीडायुक्त जल्दीपके और विचित्र स्वरूप हो ये वातकी विद्रधि के लक्षण हैं ४ पकेनिम्बू के समान सूजन हो लालरंग ज्वर दाहके करनेवाली शीर्पपाक हो अत्यन्त पीडायुक्त ये पित्तकी विद्रधि के लक्षण हैं ५ चिकनी शीतल बहुत दिनकी उठी और बहुत काल में पके मंदपीडा हो पीलेरंगकी शराब के समान हो ये कफ की विद्रधि के लक्षण हैं ६॥ (सन्निपातकीविद्रधिकेलक्षण) नानावर्णोदाहशलोज्वराशिः कोष्ठोत्थानंकष्टपाकोतिरौद्रः ॥ आधिनावोबस्तिहत्कुक्षिशोथोवै यैःप्रोक्तोविद्रधि सन्निपातः ७(रुधिरकीविद्रधिके लक्षण) दी? प्णापरिपक्कचूतसहशोविस्फोटकोमामलः कृष्णाभोवहुदाहक ज्ज्वरकरस्तृष्णान्वितःक्षदरः कुक्षौवस्निगदोदरेपुहृदयेपीडाक रोहर्निशंप्रोक्तोरक्तभवोभिषग्वरगणै.पित्तात्मकोचिद्रधिः ८ विद्र धिरक्लविद्याकुक्षौलग्नमचञ्चलम् ॥ मांसशोणितयोथिव स्तिहन्नाभिसंभवम् ६ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृते वैद्यशास्त्रविद्रधिलक्षणम् ॥ विचित्र रंग हो दाह शूल ज्वर पीडा कोट में पैदाहुई कष्टसे पके अति -- हंसराजनिदानम्। रोद्र आधिनाव मूत्रस्थान हृदय कूरव इनस्थानों में सूजन हो इसे वैद्यों ने संनिपात का विद्रधिरोग कहा ७ दीर्घ गरम पक्के प्रामके समान फोडा हो तथा मोटा हो कालेरंग के समान बहुत दाइ ज्वर भूखका नाशकरे । प्यास बढ़ावै कूख मूत्रस्थान गुदा पेट हृदय इनमें रात दिन पीडाकरे ऐसी विधि को वैद्यगणोंने पित्तात्मक रुधिरकी कही है और नाभी मूत्रस्थान हृदय में मांसकी गांठ हो उसे रुधिरकी विद्रधिः कहते हैं तथा ; कांख में स्थिर जो हो । इति हंसराजार्थबोधिन्यांविद्रधिरोगनिदानम् ! (अथोपदंशलक्षणम् ) हस्तस्यघातात्करजस्यपाताईतस्य दंशात्तृणकाष्ठलग्नात् ॥ दुष्टस्त्रियोयोनिविकारसेवनात्पञ्चोपदं शाःप्रभवन्तिशिश्ने १(वात केउपदंशकेलक्षण) वातोपदंशीवहुवे दनान्वितोविस्फोटसूक्ष्मैःस्फुरणैस्तुकृष्णभैः ॥ युक्तःसंतोदैःकि लजायतेनृणांशिश्नस्यबाह्यापरितोन्तरेनिशम् २ (पित्तकेउप दंशकेलक्षण) पित्तोपदंशंतमहिननंतीवार्तिदाहंपिशितावमा समाविशीर्णमांसपिटिकाभिषिक्तंशिश्नांतरेगतमतीवरौद्रम३॥ हाथकी चोटसे तथा नखके लगनेसे किसी तरह से दांतके लगने से तिनका लकडीके लगने से गरमीवाली औरत के संगकरनेसे लिंगपांच प्रकार का उपदंशरोग पैदा होताहै १ वातका उपदंशवाला पुरुप बहुत वेदनायुक्त हो प्रकाशमान छोटी छोटी मरोडी हों कालेरंग की पीडा युक्त लिंगके बाहर भीतर मनुष्यों के होती हैं २ उसे पित्त का उपदंश जानो जिसमें ये लक्षणहों तीव्रपीडा दाह मांस के रंगसरीखा तथा बिखरा हुमा मांसहो पिटिकायुक्त लिंग के भीतरी भारी गढ़ाहो ३ ॥ (कफकेउपदंशकालक्षण) वैद्योपदंशंकफर्मभवंहितंजानीहि कंडुपिटिकाभिराश्रितम् ॥ शोफाधिकंपांडुरवर्णशीतलंस्निग्धंग रिष्ठपिशितांकुरान्चितम् ४ (मन्निपानके उपदंशकालक्षण) आ मुष्कशोफंकृमिजंतुजग्धंविशीर्णमांसंबहुगतशोफम् ॥ त्रिदोषजं विड्युपदंशमेतमसाध्यमार्तिज्वरशूलदाहम् ५ जातमात्रेमहारो गेचिकित्सानैवकारयेत्॥वमूलेनरोगेणरोगीयातियमालयमद .

। हंसराजनिदानम्। १७ हे वैद्य! उसे तू कफका उपदंशजानो कि जिसमें खुजलीहो पिटिकाहाँ अधिक सूजनहो पीलारंगहो शीतल और चिकना भारी मांसांकुरयुक्तहो ? लिंगसे अंडकोशो पर्यंत सूजनहो कृमि पड़गये हो मांस बिखर गयाहो बड़ा गड्ढाहो सूजनहो ज्वर शूल दाहयुक्त ऐसे लक्षणोंसे अमाध्य त्रिदोपका उ- . पदंशजानना जो मनुष्य उपदंशरोगके पैदा होतेही औषध नहीं करे और रोग वद्धमूल होजाय तो वह रोगी यमराजके घरजाताहै ६ ॥ महाक्षतोभवेद्यस्यशिश्नेस्फोटानिशीर्यते ॥ शिरःपीडाज्य रोदेहे निर्लोमोमुखमण्डले ७गुह्यदेशेमहाशोफोनेत्रयोर्वरक्त ता॥ पतेच्छिश्नःसमुष्काभ्यांसरोगीनवजीवति ८ इति श्रीभि पक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराज कृतेवैद्यशास्त्रेउपदंशलक्षणम् ॥ जिसके लिंगमें बड़ा घाबहो और वह घाव फट जाये तथा शिरमें दर्द और ज्वर मुखपर बाल न रहे ७ गुह्यइन्द्रियमें महासूजनहो और नेत्र लालहों और जिसकाअंडकोशके साथ लिंग गिरपड़े वह रोगी नहीं जीताहै ८ इति हंसराजार्थबोधिन्यामुपदंशरोगनिदानम् ॥ (अथ शूकदोषलक्षणम्) योलिंगरद्धिमनुजोभिवाञ्छति शूको द्भवास्तस्यभवन्तिव्याधयः ॥ अष्टादशाख्याःकफवातपित्तजाई होद्भवारक्तभवास्त्रिदोषजाः १ (सर्षपिकाकालक्षण) सर्पपिकासा सर्षपरूपालिंगसमीपेदारुणशका ॥वातकफाभ्यांसंजनितारुक् स्यास्पिटिकेयं पुंस्त्वहरीति २ (कुम्भिकाकालक्षण) रक्तपित्तो स्थिताकुम्भीपिटिकारक्तपूरिता । शिश्नोपरिगताशूकदोपजाती वेदना ३॥ जो मनुष्य लिंगबढ़नेकी इच्छाकरें और मूढ़ वैद्यके कहनेसे लेप वा पट्टी बांधे उसके अठारह तरहकी वात पित्त कफ दो दोषके ३ और त्रि- दोपकी १ शूकसेपैदा व्याधियाँ होती हैं १ सर्पपिका सरसों के समान छोटी फुसी लिंगपर होती है और वात कफले पैदा तथा पुरुषपनेको दूर करती है २ रक्तपित्त से पैदा कुंभिका फुसी रुधिरसे पूरित और लिंगपर शूकदोपसे पैदाहुई तीव्र पीडायुक्त होती है ३ ॥ (मूढपिटिकाकालक्षण) पाणिभ्यांमृदितंशिश्नपीडितंवातको हंसराजनिदानम्। पतः॥ तरिमन्यातसमुदूनामसूढपिटिकाभवेत् (दीर्घकापिटिका लक्षणं) दीयतेमध्यतोवद्धाःपिटिकारोमहर्षदाः॥ संधिमध्यगताः शुभ्राःकफजादीर्घ कास्मृताः ५ (पुष्करिकापिटिकाकालक्षण)पि त्ताद्वापुष्कग्यर्णिकागमासिंदूरनर्णानिविडाऽतिदुःखदा ॥ दाहा दिपीडामहनीकरोतियायोक्तापपुष्करिकानुनीन्द्रः ६॥ हाथ के मीलनेसे वातके कोपले पैदा हुई लिगपर फुनीउने मूढपिटिका कह रोमांचकोकरे और बीच फटजाय और सन्धान केवीचमें स- फेद रंगकीहो वो कफसे पैदाहुई दीर्घकानाम पिटिशाजाननी पित्तमे पैदा कमलकी कणिकाफे रामानहो तथा लाल रंगहो चिपर्टी अतिदुःवदेनेहारी दाह पीड़ा बहुतकरै उसे मुनीश्वरोंने पुष्फरिका पीडिका कहीहै ६॥ स्पर्शनोत्लहतेज्वरंवितनुने पीडांकरोतिद्रुतं यशपिटिकाश तंबहुरुलिंगेविधत्तेचिरम् ।। कृष्णारक्तनिभविपाककठिनंपाका र्तिकृत्मद्रवं विद्यालित्तमरुद्भवंतमनिशंमुद्गादलाभरुजम् ७ (क फपित्तकेशूककालक्षण) कफपित्तभवाविविधाकृतयःपिटिकाबहु शोफयुता कठिनाः ॥ज्वरदाहविलापरुजोदधतेकृमिशोणितपय वहाविपमाः ८ (विदोपजनितशूककेलक्षण) मांसपाकंबहुच्छिद्रं लिगभंगंत्रिदोषज-कुर्याच्छूकोज्वरंदाहंशोथंचपिटिकान्वितम्ह स्पर्श न सहाजाय ज्वर पीड़ा और सैकरों फुसी लिंग के ऊपर काली लाल हों कठिनसे पकै दुःखकी देनेवाली और चुचावै उसे वात पित्तने पैदाहुई पोडि का मूंगके पत्ते के समान जाननी ७ कफ पित्तसे पैदा हुया जो शूकरोग उसके अनेकतरहकी फुमीकी आकृतिहो और सूजन हो कटिनज्यर के करनेवाली रुदनकरै कमि और रुधिर तथा रादबहे और विषम हो ८ मांतका पाक तथा बहुत से छिद्र होजा और लिंग गिरपड़े तथा घर दाह सूजन और अनेक मरोडीहों ये सन्निपातके शूक रोगके लक्षण ॥ मांसशोणितयोग्रन्थिमवुदन्तंविदुर्बुधाः॥ विद्रधेविद्रप्रिंविद्या संनिपातसमुद्भवाम् १० इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराज कृतेवैद्यशास्त्रेशूकदोपलक्षणम् ॥ -- 1 .

. हंसराजनिदानम्। -88 मांस और रुधिरकी गांठ उसे पण्डित अर्बुद कहते हैं और विधिक प्राकार हो उसे सन्निपात से पैदा विद्रधि कहते हैं १०॥ इति श्रीहंसरा- जार्थबोधिन्यांशूकरोगनिदानम् ॥ अथ कुष्ठरोगलक्षण ॥ (अथकुष्ठरोगोत्पत्तिः) महापापतःकुष्ठिनोदेहदाहात्तथात्यंत संसर्गतोमांसभक्षात् ॥ भवेत्कुष्ठरोगोगुडक्षीरपानादजीर्णाशना द्रक्तपित्तस्यकोपात् १ विरुद्धानपानास्त्रियोत्यन्तसंगादिवास्वा पतोरौद्रघर्मादित्तापात् ॥ गुरुस्निग्धरूक्षाशनान्मूत्रबंधाद्भवे द्रौद्रकुष्ठोजलस्थावगाहात् २ मांसचर्मविकारोत्थाः कुष्ठाष्टादश संज्ञकाः॥ वातपित्तकफोद्भूता इंद्वोत्थाःसन्निपातजाः ३॥ ब्रह्महत्या आदि महापापोंके करने से कुष्ठीको दाह देनेसे कोढ़ीकेपास रहने से मांसके खानेसे भारी तथा दुग्ध आदि पदार्थ के सेवन करने से अजीर्ण में खानेसे रक्त पित्तके होनेसे कुष्ठ रोग पैदा होताहै १ तथा वि- रुद अन्न और जलके सेवन करने से अत्यन्त स्त्रीके संगकरने से दिन में सोनेसे धूप आदि गरमीके खानेसे भारी चिकना रुखे आदिके खाने से मूत्रबन्ध होनेसे बहुत जल में रहनेसे घोर कुष्ठरोग पैदा होता है २ मांस और चर्म के बिकारसे पैदा कोढ़ रोग अठारह प्रकारकाहे वात से पित्तसे कफसे इन्दज और सन्निपातसे ३ ॥ (उदुम्बरकुष्ठ केलक्षण) यद्रूक्षंपरुपंकपालसदृशंतोदकपाले धिकं तत्कुष्ठंविषमंवदन्तिसुधियःकृष्णारुणाभंभृशम् ॥ यत्कुष्ठं स्फुटितंयुदुम्बरसमंरुग्दाहकंडरनं शुष्करक्तनिभंपरैर्निगदितं तत्कुष्टमौदुम्बरम् ४ (मूकजिवनामकुष्ठके) वृषजिहोपमाजिका रोमहर्षोन्तरव्यथा ॥जायतेयेनकुष्ठेनमूकजिवन्तदुच्यते ५ (मं डलकुष्ठकेलक्षण) श्वेतरक्तनिर्भस्निग्धंस्थिरंकृच्छसमुन्नतम् ॥ परस्परसमालग्नंकुष्ठमण्डलसंज्ञकम ६॥ जो रूखा कठोर खोपड़ीके समान कपाल में पीडा करे तथा काला लाल उसे संज्ञक कुष्ठ कहते हैं और जो फटगयाहो गूजरके समान पोड़ा , हंसराजनिदानम्। दाह खुजली तथा सूखाहुआ रुधिरके समान उसे वैद्य उदुम्बर नाम कुष्ठ कहते हैं ४ बैलकी जीभके समान जीभहो रोमांच तथा भीतर पीड़ा हो उसे मूकजित कुष्ठ कहते हैं ५ सपेद लाल चिकना स्थिर करडा ऊंचा और मापसमें मिला हुआ हो उसे मण्डल कुष्ठ कहते हैं ६ ॥ (करवालकुष्ठकेलक्षण) वर्द्धतेहर्निशंस्थूलंकृष्णकंडूभिरारत म् ॥रूक्षेत्रतरंकुष्ठकरवालंतदुच्यते ७ (किणिकुष्टकालक्षण) त स्कुष्ठकिणिसंज्ञस्यात्किणंशोथसमन्वितम् ॥ श्यामवर्णखरस्पर्श परुषबहुवेदनम् ८ (दादनामकोढ़केलक्षण) कृष्णा मंडलाकारं कंडुभिर्वहुभिर्युतम्॥ अतापेदुष्कररूक्षं तत्कुष्ठदद्रुसंज्ञकम् ॥ जो नित्य बढ़ता जावे और मोटाहो काला और खुजली युक्त रूखा और बहुतहो उसे करवाल कुष्ठ कहते हैं ७ वो कोढ़ किणिसंज्ञकहै कि जिसमें डंक सूजनके साथ हो कालावर्ण खरदरा स्पर्श कठोर बहुत खेद युक्त हो ८ काला गोल चकत्ते खुजली होती हो गरमी में दुःख बहुतहो रूखा उसको दादनाम कोढ़ कहते हैं । (चर्मदलकोढ़केलक्षण) कंडुमद्रक्तवर्णच विस्फोटकसमन्वि तम्॥साईस्पर्शासहंशूलंकुष्ठंचर्मदलंभवेत् १० (गजचर्मकोढ़ केलक्षण) गजचर्मसमाकारंस्थूलंबहुतरंदृढम् ॥ कंडूमच्छयामव र्णयत्कुष्ठंतच्चमसंज्ञकम् ११ (पामाकुष्ठकेलक्षण) स्फोटाभिहु भिर्युक्ता सूक्ष्माभिःपाटलादिभिः ॥ कंडूदाहार्तिभिर्युक्तापामासा कीर्तिताबुधैः १२॥

हंसराजनिदानम्। 22016 लक्षण)श्यामारुणंखरस्पर्श रूक्षंवेदनयान्वितम् ॥विवर्णवात जंकुष्ठंकथितंतद्विषग्वरैः १४ (पित्तकेकुष्ठकेलक्षण) श्यामारु पनि स्रावकंडुरोगार्तिदाहदम् । तीक्ष्णपित्तोद्भवंकुष्ठं कीर्तितं वैद्यसत्तमः १५॥ और पामा बहुत बहै तो उसेही विचर्षिका कहते हैं और जिसकापुष्प के वर्णके समान रंगहो उसे चित्रकुष्ठ कहते हैं १३ जिप्तका काला लाल और खरदरा स्पर्श हो रूखा तथा पीडायुक्त विवर्ण उसे वात का कुछ कहते हैं १४ जिसका काला लालरंगहो और बहै तथा खुजली दाह पीडा हो उसे तीखा पिनका कुष्ठ वैद्यों ने कहाहै १५ ॥ (कफकेकुष्ठकेलक्षण) कुष्टंकफोद्भवंविद्यास्निग्धंकडुयुतधन म् ॥ गौरवंशीतलं दिशोथस्रावसमन्वितम् १६ चिलैईिदोष जैर्युक्तं द्विदोषोत्थंविदुर्बुधाः ॥ त्रिमिषैिर्विमिश्रयत्कुष्ठंकप्टतरे भवेत् १७ (त्वचामस्थितकुष्ठ केलक्षण)बहूपद्रवसंयुक्तमसाध्य तत्प्रकीर्तितम् ॥ त्वक्थेकुष्ठेशरीरेषुवैवर्य रूक्षताभवेत् १८॥ जो चिकना और खुजली युक्त धनभारी शीतल क्लेदीसूजन युक्त तथा बहै उसे कफका कुष्ठ कहते हैं १६ जिसमें द्विदोष के लक्षण मिलते हों उसे पण्डित द्विदोष का कुष्ट कहते हैं और त्रिदोपके लक्षण मिले हों उसे कष्टतर जान वैद्य को त्यागदेना चाहिये १७ और जो बहुत उपद्रवों से युक्तहो उसे वैद्यों ने असाध्य कहाहै त्वचामें स्थित कुष्ठ शरीरको विवर्ण कर रूरवा कर देताहै १८॥ (रक्तगतकुष्ठकेलक्षण) कुष्ठेरक्तगतेनेत्रेक्लमोहोरुचिर्भवेत्॥प्र स्वेदःकंठशोषश्च विसरिक्तमंडलम् १६ (मांसगतकुष्ठकेलक्ष ण) हस्तांघ्रिषुनृणांशोफ विस्फोटंतोद गौरवम् ॥ कुष्ठेमांसगते तस्यविरेकोवमनंभवेत् २० (मेदगतकुष्ठकेलक्षण) गात्रभग्नोंग दुर्गेधक्षतेपूयंचजंतवः॥गतिक्षयोग्निमंदत्वंकुप्ठेमेदगतेभवेत्२१ नेत्रों में कम तथा हर्पका नाशअरुचि पसीना कण्ठ का सूखना और विसर्प रुधिरके मण्डल ये रक्तगत कुछ के लक्षण १६ हाथ पैरों में सूजन ~ .. १०२ हंसराजनिदानम्। तथा फोड़ा पीड़ा शरीर भारी रद्द दस्त ये मांसगत कुटके लक्षण । २० शरीरका टूटना देहमें दुर्गन्ध व्रण पीब कमिहों गतिका नाश मन्दाग्नि ये मेदगत कुष्ठके लक्षणहैं २१ ॥ (अस्थिमज्जागतकुष्ठकेलक्षण) नासा गोक्षिणीरत्तेक्षतेषुक मिसंभवः॥स्वरघातोत्रणेदाहः कुप्ठेमज्जास्थिसंस्थिते २२ दंप त्योःकुष्ठिनोयिशोणिताभ्यांचसंभवः॥यदपत्यविकाराभ्यां ज्ञेयं तदपिकष्ठितम् २३ (कुष्ठकेसाध्यलक्षण) त्वयक्तमांसगंकुष्ठंसाध्य यंत्रौषधादिभिः॥मेदोजंचद्विदोषोत्थंदानस्नानपादिभिः२४॥ नाकका भंग नेत्रलाल घावों में कीड़ा पड़जायें मन्दस्वर व्रणों में दाह ये हड्डी और मज्जागत कुष्टके लक्षण हैं २२ माता और पिता के कोढ़ी होनेसे उन्होंकेवीर्य और रजसे पैदा जो सन्तान वोभी कोढ़ी होती, २३ त्वचारुधिर मासमे जो स्थित कुष्ठसो यंत्र मंत्र व औपधियों से साध्य होता है और जो मेदा व मज्जा में प्राप्तहो और जो दिदोपते उठाहो वो स्नान दान जपादिकों से शाति होजाताहै २४॥ (कुष्ठके असाध्यलक्षण) नरंकुष्ठिनंहतिकुष्ठंप्रद्धं त्रिदोषोद्ध वंसंधिमज्जास्थिसंस्थम् ॥ प्रभिन्नस्वरंश्वासवाहंसदाहं कृमीणां क्षतेसृक्स्रवरक्तनेत्रम् २५ अंगानियेनशीर्यतेक्षतेषुकृमिसम्भ वः॥ध्रनासाक्षिस्वरामग्नाः कुष्ठंतंपरितस्त्यजेत् २६॥ इति श्री भिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेकुष्ठलक्षणम् ॥ संधि मज्जा अस्थिगत त्रिदोपसे पैदाहुआ जो कुछ और बढ़ाहुआ वो कोढ़ी मनुष्यको मारडाले तथा भ्रष्टस्वर श्वासवान् दाह और कृमियुक्त घाव रुधिरबहै लालनेत्र २५ जिससे अड्ग फटजायें और घावों में रुमिपड़ जायें तथा भृकुटी नाक नेत्र जाते हैं स्वर बैठजाय उस कोढ़ी को वैद्य. त्यागदे २६ इति हंसराजार्थवोधिन्यांकुष्ठरोगनिदानम् ॥ (शीतपित्तोदर्दलक्षणम् )शीतवातस्यसंस्पर्शाहातपित्तकफास्त्र यः॥ त्वयक्तमांसंसंदृष्यविसप्तोतरेबहिः १ (उदर्दकेलक्षण) घरटीदष्टवच्छोथोजायतेत्वचिसर्वतः ॥ दाहकंडूशिरस्तोद स्या १०३ हंसराजनिदानम्। दुदर्दस्यलक्षणम् २ मंडलानिविचित्राणि रागवंतिबनिच ॥ सकंडूनिसतोदानिस्थलानिपरितस्त्वचि ३॥ शीतल पवनके स्पर्शसे वात कफ पित्त तीनों रुधिर मांस त्वचा बिगाड कर भीतर और बाहर शीत पित्तरोगको पैदातरै हैं १ जैसे वरटी मोहार' कीमक्खीके काटने से सूजन होतीहै इसीतरह सब त्वचामेंहो और दाह खुजली शिरमें दर्द हो उसे शीतपित्तवायु जिसे लोकमें पित्तोदर्दरोग कहते हैं और जिसमें चित्रविचित्र चकत्ते रागवान हों और बहुतसेहों उनमें खुजली और पीडाहो तथा मोटी त्वचाहो ३ ॥ भवन्तिसर्वतोदेहेशीतवातोद्भवानिच ॥ कफात्मकानिचिह्ना निउदर्दस्यविदुर्बुधाःपित्ताधिकंभवेत्कोष्ठमुददैतुकफाधिकम्॥ वाताधिकशीतपित्तंसन्निपातंत्रिदोषजम् ५ (उदर्दरोगकापूर्व रूप) पर्वरूपमुदर्दस्यनेत्रयोरक्ततारुचिः ॥ हल्लासतृड्ज्वरोदा हो देहसादोंगगौरवम् ६॥ सब देह में शीतल पवनसे और कफाधिक्यसे जो चकत्तेहों उसे पंडित लोग उर्दरोग कहतेहैं ४ पित्ताधिकसे कुष्ठहोताहै कफाधिकसे उदर्द हो- ताहै वाताधिक से शीतपित्त सन्निपातसे त्रिदोषज उक्तरोग होतेहैं ५ नेत्र तालहों अरुचि खाली रद्द प्यास ज्वर दाह देह में पीड़ा तथा भारीपना ये उदर्दके पूर्वरूप ६॥ (कोढ़उत्कोढकालक्षण) त्वक्संदूप्यबहिर्गतोरुक्महाकाये मरुच्छीततो देहेमंडलमंडितंवितनुतेशोफंसरोगान्वितम् ॥ कं इनिस्त्वचिसर्वतोवमितरांतोदंचविड्वन्धनं शैथिल्यंबलनाशनं प्रकुरुतेरोमोद्गमंगौरवम् ७ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवेहंसरा जकृतेवैद्यशास्त्रेउदर्दकुष्ठलक्षणम् ॥ शरदीले पवन त्वचाको बिगाड शरीरके बाहर महादारुण रोगको प्रकट कर देहमें रुधिरके चकत्ते सूजनयुक्त हों उनमें खुजलीचले त्वचा न रहे वमन और पीडा तथा दस्तका बंदहोना शिथिलता वलनाश रोमांच और देहेभारी ७ इति हंसराजार्थवोधिन्यांशीतपित्तउर्दकोढ़उकोढ़निदानम् ॥

५ १०४ हंसराजनिदानम्। (अम्लपित्तकीउत्पत्ति) स्निग्धाम्लैबहुभोजनैरप्रचितैःश्वा नरैनॊदरे रात्रौजागरणेनवासरमुखंस्वापेनतापेनवा ॥ संक्षोभ्यो पचिताम्लपित्तमुदरेहृत्कंठयोमस्तके नाभौवस्तिगुदांतरेषुविवि धंधत्तेरुजंदारुणम् १ आध्मानंकुरुतेम्लपित्तमनिशंशोपंतनौक प्णतामुद्गारंवितनोतिधूमसहितंसाम्लंमुहुर्दुःखदम् ॥ हल्लासंभ्र ममोहकंपमरुचिंदाहंचहत्कंठयोः कंडूमंडलमडितंसपिटिकंदेहंवि धत्तेरतिम् २ अम्लत्वमेतिभुक्तान्नमपक्कंयातिवह्निना ॥ शिरोर्ति शूलहच्छोषमम्लपित्तस्यलक्षणम् ३॥ - चिकना खट्टा बहुत भोजन करनेसे मंदाग्निसे रातमें जागनेसे दिन में सोने से गर्मी में डालने से कुपित हुआ अम्लपित्त सो पेटमें हृदयमें कंठ और मस्तक तथा नाभी और मूत्रस्थानमें गुदामें नानाप्रकारका रोगपैदा होताहै १ अफरा शोप शरीर काला धूमसहित खट्टी डकार बारवारमें आवे खाली रद्दहो भौंर मोह कम्प अरुचि हृदय कण्ठमें दाह खुजली देहमें चक- ते और फुसी तथा अरति को करै २ खायाहुअाअन्न मंदाग्नि के कारणले अपक्क हुआ खट्टेपनेको प्राप्त होताहै शिरमें दर्द शूल हृदय में शोप ये अ. म्ल पित्त के लक्षण हैं ३॥ (वातकेअम्लपित्तकेलक्षण) वाताम्लपित्तंप्रकरोतिपीडांशू लंभ्रमंहत्कमलेतिशोषम् ॥ मूप्रिकंपपिटिकानिदेहे कृष्णानि सूक्ष्मानिचमण्डलानि ४ (पित्ताम्लपित्तकेलक्षण) पित्ताम्लंशी तजन्यरुजयतिमनुजं पित्तकोपाधिकारं रक्तांगंमण्डलामंत्वचि गतमनिशं छर्दिमूर्छाविपाकम् ॥ कंडूरूपंसशोफंपिटिकशतचि तं मोहशोकादिकारि चान्तर्बाह्येतिदाहहृदिजठरगुदेशूलकृचर्म हारि ५(कफाम्लपित्त केलक्षण) पित्ताम्लंकफजंकरोतिपिटिका देहेसशोफान्वितामालस्यंमलबंधनंवितनुते कंडूरुजंदारुणम् ॥ निद्राभंगविमर्दनेचजडता मुद्गारमम्लान्विताहृत्पीडामरुचिंतमः कफचयंकायेगुरुत्ववमिम् ६ ॥ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहं सराजकृतेवैद्यशास्त्रेअम्लपित्तलक्षणम् ॥ वातका अम्लपित्त पीडा शूल भ्रम हृदयमें शोप मूर्छा कंप फुप्ती काले T हंसराजनिदानम्। १०५ और छोटे चकत्ते करताहै ४ पित्तका अम्ल पित्त शीतसे पैदाहुया मनुष्य को रोगीकरै देहमें लाल चकत्ते हों रद मूर्छा पाक खुजली सूजन अनेक फुसी मोह शोक भीतर बाहर दाह हृदयमें पेट गुदा इनमें शूल चर्म को दूरकरैहै ५ कफको अम्ल पित्त फुसी सूजन पालकस मलबंध खुजली जड़ता दारुणपीड़ा निद्राकानाश अङ्गोंको टूटना खट्टीडकार हृदयमें पीडा अरुचि अंधेरा कफगिरेभारीपना और रहये लक्षण करैहै ६ इतिहंसराजा- र्थबोधिन्यामम्लपित्तरोगनिदानम् ॥ (विप्तपरोगलक्षणम्) लवणकटुरसानांसेवनाधर्मतापात् , प्रभवतिकिलरोगोदोषकोपाद्विसर्पः : ॥ वपुषिचलनशीलोदग्ध विस्फोटरूपोवदरफलसमानःश्वेतपीतारुणाभः १ (वातकेविस पैरोगकालक्षण ) संदृष्यामिषमेदचर्मरुधिरंजातोविसोबहि वातात्माविदधातिविद्रुमनिभाविस्फोटकानचञ्चलान् ॥ दीप्तां गारसमानदाहजनकान्पीडाकरान्कंडुरान् कासाध्मानमहाज्वर श्रमतथाशीर्षार्तिमोहाकरान् २( पित्तकेविसर्परोगकालक्षण) मच्छीकुर्याद्विसर्पःप्रसरतिबहुशःपैत्तिकोघोररूपस्तप्ताग्न्यंगार दाहंपिटिकचयशरानीलपीतारुणाभम् ॥ निद्रानाशंशरीरंज्वरय तिसततरक्तमांसावशोषं कासंश्वासंविचेष्टांभ्रममरुचितृषास्फो टमंगेषुमोहम् ३॥ नोनका खट्टाआदि पदार्थ खानेसे धूपमें रहने से कुपितहये जो वात पित्त कफ सो विसर्प रोग फैलनेवाला दग्ध फोडारूप बेरके समान सपेद पीला लालरंगके पैदाकरतेहैं १वातका विसर्परोग मांतमेदाको बिगाडकर वाहर मूंगेके समान चंचल फुसीको पैदाकरे जैसा प्रज्वलित अङ्गार दाह को करनेवाले तथा पीडायुक्तकारक खुजली खांसी अफरा महाज्वर श्रम प्यास शिरमें दर्द मोहको करनेवाले करता है २ पित्तका विसर्प देहमें फैल जावे मूछाहो अङ्गारके समान दाह नीली पीली लालरंगकी कुंती निद्रा कानाश ज्वर रुधिर मांसका शोप खांसी श्वास चेष्टाहीन भ्रम अरुचि प्यास अगोंका फटना और मोहको करैहै ३ ।। (कफकेविसर्परोगकेलक्षण) पिटिकाइचविसर्पकृतारुचिराः स्फटिकद्युतयोबलवीर्यहराः ॥ कफजामिलितावहुदुःखयुताज्वर १०६ हंसराजनिदानम्। कासतपालसशोफ कराः ४ आग्नेयाख्योविसर्पःस्याहातपित्तस मुद्भवः ॥ कफवातोद्भवोग्रथिःकईमःकफपित्तजः ५ ससान्निपाति कोज्ञेयःसर्वलक्षणसंयुतः ॥ विसपोहंद्वजःमाध्योऽमाध्यःस्याद्य स्त्रिदोषजः ६ (विसर्परोगकेउपद्रव) विसर्पोपद्रनाज्ञेयामांसशो थोज्वरोमदः॥मर्मरोधस्तृपाश्वासोहिक्कादाहोभ्रमोरुचिः ७इति श्रीभिषक्चक्रचित्तात्मवेहंसराजकृतवैद्यशास्त्रविमर्पलक्षणम् ॥ कफका विसर्प रोग रुचिर स्वरुपवाली स्फटिक मणि के समान वल वीर्य की नाशक बहुत दुःखकी देनेवाली ज्वर स्पांती प्यास आलफल सूजन को करे है ४ वात पिनने आग्नेय विसर्प रोग होताई कफवात से ग्रन्थिनाम रोग होता है और कफपित्तसे कर्दमनाम विसर्प रोग पैदाहोता है ५ और जिसमें सब लक्षण मिलतेहों उसे सन्निपातका विसर्प रोग जानना द्विदोपते पैदा विसपेरोग साध्यहै और त्रिदोपका असाध्य कहाहै ६ ये विसर्परोग के उपद्रव जानने मांसमें सूजन ज्वर मस्तीमर्मों का रुकना प्यास श्वास हिचकी दाह भ्रम अरुचि७ इति हंसराजार्थबोधि न्याविसपरोगनिदानम् ॥ . क्षुद्ररोगलक्षणम् ॥ (अजगल्लिकालक्षण ) मुद्रासमानापिटिकासवर्णास्निग्धा मरुतश्लेष्मविकारजाता॥ देहेशिशूनांग्रथिताचनीरुजातामा जगल्लीप्रवदन्तिसन्तः १ (यवपच्छाकालक्षण) अरुणभापि टिकाबहुवेदनाकफमरुज्जनिताग्रथितामिषायवरामाकठिनाभि पजांवरैनिंगदिताज्वरकृत्किलमायवा २(अंजनीनामफुसीकेल क्षण) उन्नतामंडलाकारा विततांजलिसंनिभा ॥धनावकाद्विदो पोत्था ताजानीहिबुधांजलीम् ३ ॥ जो फुसी मंगके समान देह के वर्ण सरीखी हो और चिकनी हो वो वातकफसे पैदाहुई अजगल्लिका कहतेहैं ये बालक की देहमें पीडारहि- तहोती है ? जो फुसी लाल रंगकी और पीडा युक्त मांसमें रहतीहो यव . हंसराजनिदानम् १११ कहतेह २६ तिलक समान पीडारहित स्थिर देहमें जो करिता दागहों उसे वात पित्तसे पैदा तिल नाम कहते हैं २६ दृढ़ और ऊंचा तथा उड़द के समान मंसिकी गांठकोली और पीडा तथा पाकरहितहो उसे वैद्य मस्सा कहते हैं ३०॥ (न्यच्छकोलक्षण) गात्रोत्थमंडलंकृष्णांसितंबामहदल्पकम् ॥ नीरुजंकफविद्यात्रुजन्यच्छसंज्ञकम् ३१ (व्यगअर्थातझा- इकेलक्षण) नोतिमण्डलम् । न्तिसाधवः ३२(नालिकाकैलक्षण) ऊष्मणासहितीवायुबहिरी गत्यकोपतः ॥ विदधातिमुखेलायोनीलिकांताबिदुर्बुधाः ३३ ॥ शरीरमें काला वा सफेद मंडल छोटा वा बडाहो और पीडा रहितहो उसे लहसन संज्ञक कहते हैं ३१ कोप और अंमसे कुपित हुये वात पित्त सो मुखमें प्राप्त हो मंडलको करें हैं और वो कालाहो पीडारहित उसे महात्मा व्यगरोग कहते हैं. ३२ गर्मी के साथ पवन कोपहो बाहर निकल मुखपर जो छाया करदे ठसे पंडित नीलिका कहतेहैं ३३॥ - (कर्णिकाकेलक्षण) संमर्दनात्पीडनतोभिघातान्मेंद्रस्यचर्मा नुगतोहि तः ॥ मणेरधस्तात्प्रेकरोतिकोशंग्रंथिंचविद्याकिलक णिकांताम३४(अक्पीटिकाकेलक्षण) नखाभिघातायुवतीप्रसंगां दुद्वर्तनाद्वीर्यगतेःप्ररोधात् ।। संपीडनाद्यस्यंचचर्मपाट्यतेवुधैर्नि रुक्ताकिलपाटिकासा ३५ (निरुद्धप्रकाशरोगलक्षण) स्रोतीसिं मत्रस्यरुणदिवांतोमणिस्थितोवीर्यगतेनिरोधात् ।। मूत्रप्रवर्तत मणिविदीयविद्यान्निरुवनकशहिवैद्यः ३६।। मसलनेसे वा पीडाले यथवा चोट लगनेसे अंडकोशकी चर्म में प्राप्तभई वात सो कुपितहो सुपारीके नीचे गाठको पैदाकरे उसे कर्णिका कहते हैं ३४ नखके लगनेसे.अथवा-जिसस्त्रीकी योनि छोटीहो उससे संगकरने से उबटने से वीर्य की गतिरोकने से.लिंगेन्द्रिय के मीचने से लिंगको चाम उतर जाय उसे पंडित अवमाटिका कहते ३५ वायकी गति रोकनेसे '. लिंग की सुपारी बीचस्थित जो बात सो मूत्रके मार्गको रोकदे फेर मूत्र ११२ हंसराजनिदानम्। सुपारीको खेदकरता हुप्रा उत्तरै उसे वैद्य निरुदप्रकाशरोग कहते हैं ३६ ॥ (सन्निरुद्धगुदकेलक्षण) अपानवातस्यगतेर्विघातात्प्रकुप्य वातोचिहितोगुदस्थः ॥ रुणद्धिमार्गकुरुतेतिसूक्ष्मद्वारंचविद्या किलदुस्तरंतत् ३७ (गुदभ्रंशरोगकालक्षण) निर्गच्छन्तित्र हिर्गुदा कृशतनो रूक्षाशिनोरोगिणोऽतीसारेणयतस्यतंमुनिग णाः प्राहुर्गुदभ्रंशकम् ॥ (शूफरदंष्ट्ररोगकालक्षण) त्वक्पाकोव हिनिर्गतःकिलगुदः कंडूधरोदाहकृद्रोगः शूकरदंष्ट्रकोमुनिवरैः प्रोक्तोज्वरात्तिप्रदः ३८ (दृषणकच्छुररोगकैलक्षण) दृषणस्थं मलंस्वेदात्कंडूस्फोटंवितन्वते ॥ संसावंकफपित्तोत्थंविद्यादृपण कच्छुरम् ३६ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्मवेहंसराजकृते वैद्यशा स्त्रेनानाप्रकाराणांक्षुद्ररोगाणांलक्षणम् ॥ अपान वातकी गति रोकनेसे कुपित हुई गुदाकी पवन सो गुदाके मार्ग को छोटा करदे उसे दुस्तररोग कहते हैं ३७ कृशदेहवाले पुरुपकी तथा रूवा खानेवालेकी तथा अतीसारवाले पुस्पकी गुदा बाहर निकल आवे उसे गुदभ्रंश रोग कहते हैं जिसकी गुदा बाहर निकास पावै और त्वचा पफजाय उसजगह खुजली चलै तथा ज्वर पीडा दाहहो उसे मुनीश्चरों ने शूकरदंष्ट्ररोग कहाहै ३८ अंडकोशों के नहीं धोनेसे मैल जमजावे तब उस जगहपसीना आवै और खुजली चलै और खुजाने से फोड़ा होजावे और वो चहे उसे तृपणकच्छररोग कहते हैं ये रोग कफ पित्तसे होताहै ३६ इतिहंसराजार्थबोधिन्यांक्षुद्ररोगनिदानम् ॥ (अथ मुखरोगलक्षणम्) ओष्ठीमारुतफोपतोतिपरुषोरतब्धौ महावेदनौ भिद्यतेदलसंयुतौमुनिवरैःप्रोक्तौचवातात्मकौ ॥ रक्तो ठौखरदाहपाकपिटिकायुक्तौचतौपित्तलौ ॥ कृष्णौपिच्छिलशोफ शीतपिटिकापीडान्वितौश्लेष्मलौ १ (सन्निपातजनितओष्ठलक्ष ण)नानावर्णधरायोष्ठीनानारोगसमन्वितौ ॥ पिटिकाभियुतौस्थू लौविज्ञयौसान्निपातिकौ २(दन्तरोगनिदानम्) आरत्यदन्ता हसराजानदानम्। ११३ परितोपिरक्तप्रवर्ततेदन्तपलंविशीर्यते ॥ सक्लेददुर्गंधयुतंचक पणशीतोदसंज्ञःकफरक्तजोयम् ३ ॥ प्रथम अोठके रोग कहते हैं ।वादीले ओठ कठोर और टेढ़े तथा पीडायु. क्त और फट जाय ऐसे मुनीश्वरोंने कहाहै और लाल करड़े दाहयुक और पकजाचे पीडिकायुक्त हों उनको पित्त के कोपसे जानना और काले तथा गाढ़े सूजनयुक्त शीतल पिडिकायुक्त तथा पीडायुक्त ऐसे लक्षणों से कफ का धोठमें रोग जानना १ जिनका अनेक प्रकारका वर्ण हो और अनेक रोगयुक्त हों पीडिका और मोटेहों ऐसा मोठाकारोगसन्निपातका जानना २ दांतों में प्राप्त हो और रुधिर निकाले और दांतों में जो मांस उसको दांतों में छुडाय दे तथा क्लेद और दुर्गधयुक्त हो तथा काला हो वो कफ रुधिरसे पैदा शीतोद संज्ञक दांतरोग जानना ३॥ दंतपुप्पुटरोगकेलक्षण ) मध्येषुत्रिषुदंतेपुनीरुक्छोफःप्र जायते ॥ दंतपुप्पुटकोरोगोगदिनोभिपजांवरैः ४ (दंतवैशरोग केलक्षण) रचयतिबहुशोफंदंतमुत्पादनायपचयतिकिलमांसंद तसंलग्नजातम् ॥ व्यथयतिमुखदेशंस्रावयत्याशुरक्तं कफपवन विकारात्सम्भवोदंतवेशः ५ (सौषिरनामदंतरोगलक्षण ) ला लास्रावीनहातापीदंतमूलेपुशोफवान् ॥ सौषिराख्योहिविज्ञेयो रोगोरक्तसमुद्भवः ६॥ जो मध्य के तीन दांतों में पीडारहित सूजन हो उसे दंतपुप्पटरोग कहते हैं ४ जो दांतों के उखाड़ने के लिये सूजन को प्रकट करें और दांत के संलग्न मांस को पृथक् करें और मुखमें पीडाकरैरुधिर बहे उसे वात कफसे पैदा दंतवेश नाम रोग कहते है ५ लार टपका करै महाताप होय दांतोंकी जड़में सूजन हो वो रुधिर से पैदा सौपिर नामक दंतरोगहै ६ ।। (महासौषिरदंतरोगलक्षण )दंतानावेष्टययस्ताखंदारयेचवि सर्पवत् ।। नानाव्याधिकरंविद्यामहासौषिरंरुजम् ७ दंतसंल ग्नमांसानिविदारयतिशोणितम् ॥ निष्ठीवयतियःपित्तादसकप रिषरोहिसः = (शोफकशदंतरोगकेलक्षण) देतानापाड्ययोरो गइचालयेतमुहुर्मुहुः॥पित्तरक्तकफोद्भूतोज्ञेयःशोफकशोवुधैः ॥

११४ हंसराजनिदानम् । जो दांतों को ढक कर और विसर्परोग कीसी तरह तालुये को विदी- ण करें और नानाप्रकार के रोगयुक्त हो उसे महासौपिर दंतरोग कहते है ७ जो दांतसे लगे मांस को विदीर्ण करें और रुविर मुखसे गिर वो पित्तसे पैदा असूक् परिपर दंतरोग जानना ८ जो दांतों को पीडाकर और बारवार चलायमान करदे पित्त कफ और रुधिर से पैदा सो शोफकश रोग जानना ॥ (वैदर्भरोगकेलक्षण ) वैदर्भरोगःकथितोभिघातजःसरक्त पित्तानिलकोपसंभवः ॥ संपीड्यदंतानपरिचालयत्यलंकचित्त चित्वावयतीवशोणितम् १० (करालनामदंतरोगलक्षण) वा युर्दतांतरेदंतान्कुरुतेतीवेदनाम् ॥ वईनेविकटानुरूक्षानमक रालोविधीयते ११ (अधिकमांसरोगकेलक्षण) हनुगतेदशने किलपश्चिमेधिकतरार्तिकरेबहुशोफवान् ॥ कफकृतःपवनेनयु तोनिशंमुनिवरैर्गदितोधि कमांसकः १२॥ - वैदर्भग चोटके लगने से रुधिर से वात और पित्त के कोपते दांतों में पीडाकरे और चलायमान करदे और कभी कभी रुधिर भी मुखसे गिर १० बादी दांतोंके अन्दर दांत को पैदा करें और उनमें,दर्द हो तथा वे टेढ़े हों रूखे हों और बढ़े वो करालनाम दन्तरोग कहाहै ११ ठोड़ी के पश्चिमदेशमें दांत पैदा हो और उसमें पीड़ा अधिक हो और सूजन हो वो वात कफसे पैदा मुनीश्वरोंने अधिकमांतरोग कहाहै १२ ॥ (कीटदंतरोगलक्षण ) दंतेदंतेकृष्णछिद्रंकरोतिलालासावी चंचलोदुष्टगंधिः ॥ पीडायुक्त शोफमरभकारीप्रोक्तोवैद्यैःकीटदं तःसरोगः १३ (भजनकदंतरोगकलक्षण ) योदंतभंगंकुरुते हिवरूपापात्मनांभोजनदुःखितानाम् ॥ वातेनजातःकफमिश्रि तेनजानीहितंभंजनकहिवैद्य १४, ( दंतविद्रधिरोगलक्षण) दंतसंलग्नजमांसंमलाख्यम्बहुशोफयुक् ॥ रक्तपूयाश्रयंक्छिन्नंतं विद्याइतविद्रधिम् १५ ॥ * दांतदांतमें काले छिद्र करदे लार टपके चंचल और दुष्ट गन्यावे पीड़ा और सूजन को बढ़ावे वो वैद्योंने कीटदंतरोग कहा है १३ पापी मनुष्यों २ हंसराजनिदानम्। १०७ के आकारहो करडीहो वो वातकफसे पैदा ज्वरक" यवप्रच्छा कहते हैं २ जो फुनी ऊंचीहो मंडलके आकारहो वितंतांजली सदृशहो भारीहो टेढी हो उसे विदोपने पैदा पंडित अंजलीनाम कहते हैं ३ ॥ (विटतानामफुपीकेलक्षण ) पक्कोदुम्बरिसहशाविसतास्या मण्डलाकारा ॥ पिटिकाबहुदाहयुताविज्ञेयाविटताख्या ४ (कच्छपिकाकेलक्षण) पिटिकाकच्छपाकाराकफवातसमुद्भवा । अन्थियुक्तोन्नवाघोराज्ञेयासाकच्छपीवुधैः ५ (वाल्मीकफुसीके लक्षण) ग्रीवासंध्यसकक्षोदरहृदयकटीहस्तपादेषुघोरोरोगोवा ल्मीकसंज्ञःप्रभवतिबहुशोवई नेसंक्रमे ॥ कायाकायान्तरेषुप्र सरतिबहुधाउलेष्मपित्तानिलोत्थः पूयंवरनेकैर्वमतिचरुधिरं वीर्यसौख्योपकारी ६॥ पके गूलरके समान फटे मुखकी मंडलके आकार और जिसमें दाह ज्यादाहो उगे विकृता फुनी कहत ४ जो फुसी कछयेके समान ऊंचीहो गाठहो वात कफ़से पैदाहो उसे घोर कच्छंपिका कहते ५ ग्रीवासन्धि कंधे कांख पेट हृदय कमर हाथ पैर इनमें वात्मीक नामका धोररोग पैदाहोता है और बारीकी तरहहो और क्रमसे देहमें फेले और अनेक मुखहों उन से रादनिकले रुधिर गिरे वो वीर्यसुखको दूर करनेवाला तीनों दोपों से पैदा होताहै ६ ॥ (इन्द्रद्धिकेलक्षण) शोफान्वितापद्माकर्णिकावद्दाहार्तित प्रशारतिमोहदानी ॥ पित्तानिलोत्थापिटिकाचिताया तामिन्द्रह विङ्कथयन्तिवैचाः ७ (गई भिकाकेलक्षण) उन्नतामण्डलाका रा शोफयुपिटिकान्विता ॥ वातपित्तभवारक्तातांविद्यादर्दभी (पापाणगर्दभिकाकेलक्षण) हनुसंधिगतःशोथोमैन्दरु कपातजः॥ स्थिरःस्निग्धोबुधैयः सैवपाषाणगईभः ६ ॥ सूजनहो तथा कमलकी कर्णिकाके समान हो दाह पीडा तृष्णा अर- ति मोह युक्त फुमीहो उसे वातपित्नसे पैदा इन्द्रवृद्धि नाम कहतेहैं ७ जो ® एच स्त्री या न भवति विदेहपचन व्याख्यापयन्ति यदुक्तम् अत्यन्रासुकमारागा रजोदुष्ट सानिनच ॥अव्यायामनीयस्मानस्मानस्खन तित्रिय इति ।।

៦។ हंसराजनिदानम्। फैंसी मंडलकेाकार गोलहो ऊंचीहो सूजनकोलिये लालहो उसेवातपित्त से पैदा गर्दभिका कहते हैं जो फुसी ठोड़ीकी संधीमें सूजन मंदपीड़ा को लियेहो स्थिरचिकनी उसे कफवातसे पैदा पापाणगर्दभिका कहते हैं । (पनसिकाकेलक्षण) विटिकाकफवातविकारभवावहुवेदन कृच्छवणेन्तरजा ॥ ज्वरदाहतृपारतिमोहकरापनसामुनिभिर्गदि ताकिलसा १० (जलगर्दभिकाकेलक्षण) विसर्पवत्सर्पतियो हिशोफोरुजाकर पित्तविकारजातः ॥ ज्वरार्तिदाहारतिमोहपूय कृत्परनिरुक्तोजलगर्दभोयम् ११ (इरिवेल्लिकाकेलक्षण) पि टिकांमर्वदोषोत्यां सर्वचिह्नशिरोगताम् ॥ वर्तुलांतांविजानीहि बुधत्वमिरिवेल्लिकाम् १२॥ जो फुसी वात कफके विकारसे पैदाहो और पीडायुक्त कानके भीतरहो ज्वर दाह प्यास अरति मोह लियेहोउरोमुनीश्वर पनसिकाकहतेहैं१०जो सूजन पहले थोडौहो फिर वितर्परोगकी तरह फैजजाय पीडाकारकज्वर दाह अरति मोह रावद उसे जलगर्दभिका कहते हैं वो पित्त के विकारसे होतीहै ११ जो मस्तकमें फनी त्रिदोपले हो गोलदो और त्रिदोपलक्षण मिलतहों उसे इरिवेल्लिका कहते है १२॥ (कखलाईकेलक्षण) कृष्णास्फोटापार्श्व कक्षांसबाहौसंस्थान नंवेदनादाहयुक्ता । कक्षासंज्ञापित्तकोपाभिजातां जानीहित्ववैद्य राजोरुजाताम् १३ (गन्धमालाकेलक्षण) कक्षाकुक्षिभवामेकांपि टिकाम्पित्तकोपजाम् ॥ त्वग्गतांदाहकृत्कृष्गांगन्धमालांचतांव देत् १४ (अग्निरोहिणीलक्षण) कक्षायांपिटिकोद्भवावरक रादीप्ताग्निदाहप्रदा मांसंभेद्यविनिर्गताःकफमरुपित्तोच्छिता दारुणाः ॥ सप्ताहेदशमेदिनेचमनुजहतीहनूनहठ इस्रायैर्भिप जांवर्निगदिताञ्चालामुखीरोहिणी १५ ॥ पसवाड़ों में व भुजाके एकदेशमं व कंधाके एक देशमें काला फोडाहो और पीडा दाहयक्तहो उसे हे वैद्यराज! तू करखलाई जान ये पित्त के कोप- से होतीहै १३ फॉरवमें अथवा पसवाडौमें काले रंगका फोडाहो त्वचा हंसराजनिदानम्। महो दाहयुक्त उसे गंधमाला कहते हैं येभी पित्तके कोपसे होतीहै १४ काखमें मांसको विदीर्णकर दीप्त अग्निके समान जो फोडाहो ज्वरदाहका करनेवाला उसे अश्विनीकुमारको आदिले वैद्यों ने ज्वालामुखी रोहिणी नाम कहाहै ये रोग मनुष्यको सात या दशदिनमें मारडाले ये सन्निपात से पैदाहोतीहै १५ ॥ (विदारिकाकेलक्षण) कक्षायांसंधिदेशेषु विस्फोटोजायते नृणाम् ॥ विदारीकंदववृत्तःसर्वलक्षणलक्षितः १६बहुशीर्षाविदी स्या वातपित्तकफोद्भवा ॥ चिरपाकारुणाभयंप्रोक्तावैद्यैर्विदा रिका १७ (शर्कराचुद केलक्षण ) मेदःष्णायुर्शिरामांसं दृष्यवा युर्वहिर्गतः ॥ ग्रंथिशोप्यामिषंकुर्यात्तविद्याच्छकराव॒दम् १८॥ कांख में या संधीनमें फोड़ा विदारीकंद के समान गोल हो और सबल- क्षग मिलतेहाँ १६ बहुतसे शिरहों और खुनेमुखकी देरमें पकै लालरंग की इसे वैद्याने विदारिकानाम कही है येभी सन्निपातसे होतीहै १७ वात मेदा मांस नस इनमें प्राप्तहो और इनको बिगाड़कर बाहर प्राप्तहो फेर गांठको पैदाकरे और शोपको करे उसे शरार्बुद कहतेहैं १८ ॥ शर्कराव॑दसर्याच्छरासहशामिषम् ॥ शिराखावचदुर्गंध छिन्नगा–निरामिषम् १६ (कंदरफुमीकेलक्षण) कंटकैःशर्करैःपा देसंबतेग्रन्थिरुद्भवा ॥ कीलबद्वईतेनित्यं विद्याकंदरंबुधैः२० ( बिवाई केलक्षण ) अतिक्रमणशीलस्यपादयोरूक्षयोमहत् ॥ दारीचकुरुतेकोपात् तंविद्यात्तलसंश्रितम् २१ ॥ शर्करावुदरोग मांसको शर्कराके समान करदे और नस चुचावै तथा दुर्गंधयुक्तहो शरीरखेदित और मांसरहित करदेयहै १६ कांटे व कंकरीके पैरमें लगने से जो गांठ पैदाहो और कीलकी तरह बढ़े उसे कन्दर नाम कहते हैं २०जो मनुष्य बहुत टोलाकरै उसके पैरों में रूग्वापनहो और पैर की ऍडी फटजाय उसे तलसंश्रित कहतेहैं २१ ॥ (खारुराकेलक्षण ) दुष्टकर्दमसंस्पर्शात् पादांगुल्यांतरेबहुः ।। कंड्रमुखाप्तिदाहार्तिशोथयुक्तोऽजसंविदुः२२(इन्द्रलुप्तकेलक्षण) ११० हंसराजनिदानम् । रोमाणांकूपमध्येपुवातपिन प्राच्यावयतेहठात् २३::::::::: शम ॥ वनात्युत्पत्तिमन्येषामिन्द्रलुप्तन्तमादिशतु २४॥.., दुष्टकीच पेरकी उँगलियों में लगनेसे सूजनहो और खुजानेसे सुखदो दाद और पीड़ाहो उसे अलसनाम,अर्थात् खारुरा कहते हैं. २२ रोमकू. पसे वात पित्त निकलकर बालों को मूच्छित कर हटसे दूर करदेवै २.३ फेर कफ और रुधिर बाल जमने के स्थानको रोकंदे बाल उगने नहींदे उसे इन्द्रलृप्त कहते हैं-२४ ॥ इन्द्रलुप्तस्यनामानिप्रोक्तानिभिपजांवरैः ॥ खालित्यमंपरी रुह्याप्राहुश्चाचेतिचापरे ३५ (अरुषिकाकोलक्षण) अंतिरू क्षेतमेशीर्षेवहुकंडुसमन्विते॥ जायतेदारुणोरोगः कमारुतरोग तः २६. अत्यंतश्रमकोपाभ्यांजातपित्तंचमईनि ॥ तेनपक्काः कृता केशाज्ञेयानिपलितांनिच २७॥ इन्द्रलुप्तके ये नाम और भी वैद्य कहते हैं खालित्य और रुला तथा चांदलो ये रोग स्त्रीके नहीं होता २५ केश पैदा होने की भूमिमें खुजली चले और वह जगह रूखी होजाय उसके वात कफलें असेंपिका दारुण रोगहो २६ अतिश्रम और क्रोधसे पित्त शिरमें प्राप्त होकर वालोंको सफेद करदेताहै २७॥ (मुखदूपिकाके लक्षण ) कफानिलाभ्यांसंहशोणिताभ्यां यू नांशरीरैपिटिकाभिजाता ॥ दाहार्तिकृत्कण्टकतीव्रवेधीवुधेर्निरु तामुखदूषिकासा २८ (तिलकेलक्षण) विलप्रमाणानिचनीरु जानिस्थिराणिगात्रेषुसमुद्भवानि ॥ कृष्णानिपित्तानिलकोपजा नितिलानितानिप्रवदंतिसंतः २६ ( मरसेंकलिक्षण) ढोन्नतं पित्तकफानिलोत्थमाषप्रमाणपल ग्रन्थिरूपम् ॥ कृष्णस्थिरनीरु जवहिपातमाषसंज्ञकथयन्तिवैद्माः ३०॥ चात कंफ और रुधिरके कोपसे जवान पुरुपों के जो फँसी मुवंपरहो दाह और पीडा तथा सेमलके कांटेकेसमान उसे मुखपिका अर्थात् मुहांसे हंसराजनिदानम् । ११५ के मुखसे दांतों को उखाइडाले इसीसे भोजन करने में दुःखित हो यो यादीसे और फफसे प्रकट ऐसा भजनक नाम दंतरोग जानना १४ दांतोसे मिलाहुमा जो मांस उसाई मैल बहुनहो और सूजन हो तथारु- विर रावचले वो दंतविद्रधि रोग जानना १५॥ (दन्तहर्षरोगफेलक्षण) शीतवाताम्लसंस्पर्शाहन्तपीडासहो गदः ॥ दन्तहर्षःसविज्ञेयोवातपित्तसमुद्भवः १६ (दन्तशर्करारो गलक्षण) मलोदन्तगतःस्थूल शर्करेवचिरस्थितः ॥ कफोद्भू तोबुधैज्ञेयःसारु जादन्तशर्करा १७(दन्तश्यावरोगकेलक्षण) दण्डादीनांविघाताहाकोपाच्छोणि नपित्तयोः ॥ प्राप्नोतिकृष्णता दन्तोदन्तश्याबोरुगुच्यते १८ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्संवे हंसराजकृतेद्यशास्त्रेओष्ठदनारोगलक्षणम् ॥ शीतल वात खट्टी ऐसी वस्तु के स्पर्श से जो दांतोंमें पीडाहो वो वातपित्त से प्रकट दंतहपरोग जानना १६ दांतोंमें मैल बहुत शर्फराकीसीतरहरहे उसे पण्डितोंने शरारोग कहा १७ दंड भादिकोंकी चोट लगनेसे मार रुधिर पित्तके कोपसे जो कालेदांत पडजायँ उसेवन्तश्यावरोग कहतह १८ इतिमाथुरदत्तरामळतेहंसराजार्थबोधिनीभापाविवर्णे मोठदन्तरोगलक्षणम् (अथ जिहारोगनिदानम्) वातेनस्फुटिताकठोररसनारूक्षा प्रसुप्तातिदा पित्तेनोपणतरार्तिदाहमाहितादीर्घारुणैःकंटकैः॥ सं युक्ताचकफेनसागुरुतरामांसोत्थितैरंकुरैः शेतैःशाल्मलिकंटका कृतिधरैर्युक्तातिशोफान्विता १ (उल्लासनामजिदारोगलक्षण) जिहातलेमहाशोथोगुरुग्रन्थियुतोदृढः ॥ पूयशोणितयुक्पाका सोल्लासःकथितोबुधैः २ जिहाग्रमानम्यकरोतिशोथं लालान्वितं तीव्रविपाकमुग्रम् ॥ कंडूयुतंरक्तकफाधिशूलरुक्छोफजिहाकथि ताभिषग्भिः३॥ वादीसे जीभ कठोर और फटी तथा रूखी प्रसुप्तपीडायुक होती? पित्त से गरमदाहयुक्त बड़े और लाल कांटोंसे युक्त जाननी कफ से भारी सफेद सेमरके.कांटे सरीखं कांटे और सूजनयुक्त होतीहै १ जीभके नीवे सूजन बहुत हो तथा भारी और कठिन गांठहो रुधिर और राद युक्तहो वा पक T - ११६ हंसराजनिदानम्। जाय उसे उल्लासनाम जीभका रोग कहते २ जीभके अग्रभागमें सू. जन हो और लारगिरे बहुत पके तथा खुजलीचले और रुधिर कफसे शूल ज्यादा हो उसे शोफाजद्वानामरोग वैद्योंने कहा है ३॥ तालमूलोत्थितःशोथःकासश्वासषान्वितः ॥ सव्यथःकफ रक्तात्माकंठतुण्डःसकथ्यते ४ तालुकोशगतःशोथश्चिरपाकीज्य रान्धितः ॥ दाहार्तिकासकृत्वावीतुण्डकेशीसउच्यते ५ (कच्छ परोगकेलक्षण) कूर्माकारःप्रोन्नतस्तालुदेशे शोथःसोक्तःकच्छपो वैद्यराजः ॥ रक्लाज्जातोरक्तवर्णोज्विराज्यास्तब्धःशोफाकोलमा- कफात्मा ६॥ और जो तालुयेके मूलमें सूजन खांती श्वासयुक्त तथा प्याससे संयुक्त हो और दर्द होताहो वो कफ पित्तसे प्रकट तुंडनाम रोग कहा ४ जो तालु के कोशमें सूजनदो और देरमें पके ज्वरयुक्त और उसमें खांसी दाह पीडा हो वहै उसे तुंडकेशी रोग कहते ५ तालुयेमें कछुये के आकार ऊँची सूजनहो उसको वैद्योंने कच्छप नाम रोग कहाहै रक्तसे पैदा भया और लाल वर्ण तथा ज्वरयुक्त टेढ़ा और सूजन हो घेरके प्रमाण वो कफ से पैदा जानना ६॥ (तालुपाकतालुशोपलक्षण) पित्ताज्जातंशोथमुग्रंमदाहंत प्णायुक्तालुपाकंवदेज्ञः ॥ चातोद्वतःश्वाप्तकासातिशोषैर्युक्तः शोथस्तालुशोपोभवेत्सः ७ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंस राजकृतेवैद्यशास्त्रेजिहातातूनांलक्षणानि ॥ सूजन और दाइ तथा प्यासहो उसे पण्डित तालुपाक रोग कहते हैं यह पित्त से पैदा होताहै और जिसमें श्वास खांसी शोप चौर सूजनहो वो वातते पैदा तालुशोप रोगहे ७ इति माथुरदत्तरामपाठकप्रणीतायां हंसराजार्थबोधिनीटीकायांजिदातालुरोगनिदानं समाप्तम् ॥ (गलरोगस्यनिदानम्) पित्तश्लेप्मशरीरिणांगलगताःसंदृष्यर काभिपं तेतत्रैवविमूञ्चिताःप्रकुपिताःकुर्वतिनानागदान् ।मांसो त्थैः कठिनांकुरैश्चपरितोरुधेतिकंठानिलं प्राणानाशुविकर्षयन्ति हंसराजनिदानम्। ११७ मुनिभिःसारोहिणीप्रोच्यते १ (वातरोहिणीकेलक्षण) चि हानिवातरोहिण्यागलेमांसभवांकुरा ॥ ज्वरार्तिकारिणीतीवा शोपिणीकण्ठरोधिनी २ (पित्तरोहिणीकेलक्षण) मांसांकुराग लोत्पन्नादाहिनस्तीत्रवेदनाः ॥ सूक्ष्मत्वचस्त्वरापाकाश्चिह्नः स्थापित्तरोहिणी ३॥ मनुष्यों के वात पित्त कफ गले में प्राप्तहो रुधिर और मांस को बिगा- ड फेर आप दुष्ट हो नानाप्रकारके गले में रोग करते हैं और मांत से प्रकट भये जो कठिनग्रंकुर उनमे कंठको रोक तथा श्वास को रोकदे और प्राण को निकाल दे उसे रोहिणी नाम कंठरोग कहते हैं १ वातरोहिणी के ये लक्षण, गले में मांस के अंकरहों सो ज्वर और पीडा शोप तथा कंठको रोफदे २ मांसके अंकुर जो हों उनमें दाह और तीनपीडा छोटे जल्दीप ये पित्तरोहिणी के लक्षण३३॥ (कफरोहिणीकेलक्षण ) मांसांकुरैःस्थूलतरैरपाकै कंठांतरो स्थैः कठिनैरवेदनैः ॥ दीर्धेःस्थिरैःकंडुरशोथवनियाभिषग्भिःक फरोहिणीसा ४ (रुधिरकी रोहिणी केलक्षण) कंठांतरोत्थैःपिटि फैजान्वितैः सूक्ष्मःसशोथैर्गलरोगकारकैः । श्वासार्तिकासज्व रदाहमोहै याबुधैरक्तभवाचरोहिणी ५ (कंठशालूकरोगकेल क्षण ) कंठेजातंग्रन्थिरूपंकफोत्थं साध्यंशासैःकोलमज्जासमान म् ॥ स्थैर्यकडूशोफयुक्तङ्कठोरंविज्ञेयन्तकंठशालूकरोगम् ६॥ मांस के अंकुर गले में मोटेहों पकेंनहीं तथा कठिन पीडारहिन लन्देहों स्थिरहों खुजली सूजन रहितहों उसे वैद्योंने कफरोहिणी दीदमें अंकुर छोटेहों और उनमें पीडाहो और सूनन तथा गलेके गेनोमस्ट करनेवाले श्वास पीडा खांती ज्वर दाह मोहयुक्तहो उने पिरली गेटिनी रोग कहते हैं ५ कोल की मज्जा अर्थात वेरकी गठतीनमान कंटमें गांठ पैदा हो वो कफसे प्रकट साध्यहै स्थिर को लोन स्वर ये कंठशालूक रोगके लक्षण कहे हैं ६ ॥ (अधिजिहारोगकेलक्षण) शोधोनिमगत्या कर .. ११८ हंसराजनिदानम्। कफोन्द्रवः॥ जिंदायन्धोमहोग्रार्तिरधिजिहाविधीयते ७ (वलासा क्षरोगकेलक्षण) श्लेष्मानिलोगलेशोथंकुरुतःश्वाससंभवम् ॥ मर्मच्छिद्रंगुरुस्थूलंवलारााक्षविदुर्बुधाः = (नासाशतघ्नीरोगके लक्षण ) वर्तिर्गलस्थाबहुवेदनान्वितामांसांकुरस्थापरिकंठरोधि नी॥दोषैर्युताप्राणहरीसकंटकानासाशतघ्नीपरिकीर्तितावधैः ।। जिला के अग्रभाग में सूजन हो पके जीभ को स्तम्भन करदे बहुत पीडाहो उसे रुधिर कफसे प्रकट अधिजिह्वरोग कहा ७ कफ और वात गलम सूजन करै तथा श्वास और मर्मस्थान में छिद्र तथा मोटा घोर भा- रहो उस वलासाक्ष रोग कहाई ८ उसे पंदितों ने नासाशतघ्नीरोगकहा जिसमे पीडायुक्त गले में बत्तीप्ती हो तथा मासके अंकुरनसे कंट रुकाही दोपों से परिपूर्ण हो प्राण के हरनेवाली वांटेयुक्त हो । (गलायुरोगकेलक्षण) ग्रन्थिर्गलस्थोबदरप्रमाणोनीस्थि रोऽसाध्यतमःकफात्मा ॥ प्रोक्तोगलायर्मुनिभिःकदाचिद्रोगंसप क्षपरितोनपश्येत् १० (बलविद्रधिरोगलक्षण) शोथःसर्वंग लंव्याप्यवर्द्धतेबहुरोगवान् ॥ त्रिदोपोत्थोमहान्वद्यःसज्ञेयोवल विद्रधिः ११ (गलीघरोगकेलक्षण)शोथोगलस्थोबहुरूपधारी कंठावरोधीगलदाहकारी ॥ श्लेष्मासृगुत्थोबलवीर्यहारी प्रोक्तो गलौघोमुनिभिर्विकारी १२॥ गले में गांठ बेर के समान हो पीडारहित स्थिरहो तो असाध्य कहा है यह कफसे प्रकट होताहे पक्षउपरांत नहीं रहै १० जो सूजन सबगले में व्याप्तहो फिर बढ़े और बहुतसे रोगयुक्तही उसे सन्निपातसे प्रकट बल विद्रधिरोग यहाहे ११ अनेकप्रकार की सूजन गले मेंदो और कंठको रो- कनेवाली तथा गलेमें दाहके करनेवाली और घत वीर्यका नाशक कफ रुधिरसे पैदा गलौघनाम रोग मुनीश्वरों ने कहाहै १२॥ अतिसूक्ष्मतरावदनांतरगाःपरितःखचितामुखतोदकरा॥पवन स्यविकारभवाबहुधापरिपाकयुतासितभाज्वरदा १३ अरुणद्युत योमुखमध्यभवारतनुरूपधरावलवीर्यहराः ॥ वदनार्तितपावर हंसराजनिदानम्। ११8. दाहकराः पिटिका:किलपित्तभवाभणिताः १४ चिरपाकयुतावि रुजाःकठिनाः कफकोपविकारभवामुखजाः॥ गुरवोल्पमसूरदला कृतयःखरकंडुरदामुखपाककराः १५ ॥ बहुत छोटी'मी मुखके भीतर पैदा होय और मुख में पीडाकरें तथा सफेद और ज्वरके करनेवाली और पकनेवाली ये वातके विकारसे पैदा होती हैं १३ लालरंगकी फुसी मुखमैहों छोटी तथा बलवीर्यकी नाशक मुखमें पीडाकरें तथा प्यास ज्वर दाहको करें वो पित्तके विकारसे पैदा होती, १४ जो फुसी देरमें पके पीडाहो या नहीं कठिन और मसूरकेदाल कीसमानहों तीखी खुजलीचलै भौर बडोहों तथा मुख के पाककरनेवाली ये कफके विकारसे होती हैं १५ ॥ पित्तशोणितकोपेनमुखपाकोभिजायते ॥ ऊष्मारतिव्यथादा हज्वरशोषतषार्तिकृत १६ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंत राजकृतेवैद्यशास्लेगलमुखरोगाणांलक्षणानि ।। पित्त और रुधिरके कोपसे मुखपाक होताहे वो गरमी तथा अरतिपीड़ा दाह ज्यर शोप प्यास इनका करनेवाला होताहै १६ इति माथुरदत्तराम पाठाप्रणीतहंसराजार्थवोधिनीटीकायांगलमुखरोगनिदानसमाप्तम् ।। (अथ कर्णरोगनिदानम् ) वातःप्रचण्डःस्वगतिनिरुयश्ले मान्वितोवक्रगतिविधाय॥ कातरेपीडयतीवकोपात्तत्कर्णशू लंकथितंभिषग्भिः १ (कर्णनादकेलक्षण) कर्णःस्रोतांसिसंवे ट्यसंभ्रमन्मारुतोवली ॥ करोतिविविधाञ्छब्दानकर्णनादःस कथ्यते २ स्रोतांसिकर्णयोर्यस्य वहन्तिश्लेष्ममारुतौ ॥ समनु प्योल्पकालेनवधिरत्वंप्रजायते ३॥ प्रचंड जो वात सो अपनी गतिको रोक और कफके संगकै टेढीगतिसे चले और कानमें पीडाकर उसे वैद्य कर्णशूल कहते हैं १ प्रबल जो वात सो भ्रमणकरताहुआ कानोंके छिद्रों को बंदकर और अनेक प्रकारके शब्द करें उसे कर्णनाद कहते हैं २ जिसके कानमें वात और कफ प्राप्त होजाय वह मनुष्य थोडेही कालमें वहिरा होजाताहै ३ ॥

१२० हंसराजनिदानम्। (शब्दवेडकेलक्षण) पित्तश्लेष्मान्वितोवायुःकर्णरन्ध्रेषुसं स्थितः॥ करोतिगुंजवच्छन्दमशब्दावेडउच्यते ४ (श्रावगद रोगलक्षण) जलस्यपातात्श्रुतिरन्ध्रमध्येशस्त्रादिकैर्वाशिरसो भिघातात् ॥ वातार्दितोयःश्रवणःसरक्तंपूयंत्रवेतश्रावगदोनिरु क्तः ५ (कर्णगूथरोगकेलक्षण) वातेरितःकफकुर्यात्कंडूश्रवणयो ईयोः ॥ श्लेष्मापित्तोष्मणाशुष्कःकर्णगूथःसजायते ६ ॥ पिन कफयुक्त जो वात सो कानों के छिद्र में स्थित होय तव मनुष्यके कानों में गुञ्जार शब्दहो उसे शब्द छ्वेदरोग कहते हैं ४ कानमें जलके पड़नेसे तथा शस्त्रयादि के लगनेसे अथवा शिरमें चोटके लगनेसे वातसे पीडित कानमें से जो रुधिर और रादनिकले उमे श्रावगदरोग कहते हैं ५ वातकरके प्रेरित जो कफ सो दोनों कानों में खुजली पैदाकरै ओर पित्तकी गर्मी से कफ शुष्क होजाय तब कर्णगूथरोग पैदा होताहै ६ ॥ (प्रतीनाहकेलक्षण) सकर्णगूथोद्रवतायदानयेत्पुनश्चतत्रै चविलीयतेनिशम् ॥ मुखंचनासांमपुनःप्रपद्यतेबुधैःप्रतीनाहमि होच्यतेतत् ७ (कृमिकर्णगेगकैलक्षण) श्लेष्मामछौंगतःकर्णे जंतूंश्चसृजतेबहून्॥शिरोईकुरुतेपीडांकृमिकोंबुधै स्मृतः = श्रवणेश्लेष्मणापूर्णसंप्रविश्येवमक्षिका ॥ जंतूंश्चस्रवतेशीघ्रंक मिकोंविधीयते ॥ वोही कर्णगूथरोग पतलाहोकर फेर जातार, फेर मुख और नाकमें पैदाहो उसे वैद्योंने प्रतीनाहरोग कहाहै ७ कफ कानमें मूछित हो बहुत कृमि पैदाकरे और आधे मस्तक पीडाहो उसे कृमिकर्णरोग कहा है - कफसे परिपूर्ण कानमें मक्खी प्रवेशकर कीडेनको पैदाकरै उसकोभी कृमिकर्णरोग कहतेहै ॥ पतंगोवांथवाकीटःप्रविश्यश्रवणांतरे ॥नराणांकुरुतेपीडांव्या कुलंमतसंचयम् १० कीट.प्रविश्यकातेकिल्लीस्फोटयतेनिश म् ॥विद्रधिंकुरुतेशीघ्रम्बधिरत्वंप्रकल्पयेत् ११ (कर्णपाकरोग केलक्षण) कर्णस्यमध्येपिटिकाजकर्णिकाकाराकृतिस्तोदषा ..

हंसराजनिदानम्। १२० ज्वरान्विता ॥ शोपोल्पपाकःपवनात्मकोयं प्रोक्तोभिपरिभ.किल कर्णपाकः १२॥ पतंग अथवा कीडा कानमें प्रवेशकर मनुप्यको पीडितकरे तथा कान में घावकरदे १० कीडाकानमें धसकर फिलीमार वो विद्रधि और वहिरापना करदे ११ कानमें फुसी कमलमणिका के प्राकार पैदाहों तथा पीडा तृपा ज्वर शोप थोडा पाकयुक्तदो वो वातसेपेदा बंद्योंने कर्णपाकरोग कहाई १२ (पित्तर्णपाककेलक्षण) कर्णीतरेकोशविदीर्णकारीदाहार्ति क्लेदस्यविकारधारी ॥ वैकल्यवीर्यवलोपहारीपित्तात्मकोयंकिल कर्णपाकः १३ (कफकर्णपाककेलक्षण) स्थूलत्वकर्णविस्फोटकंड शोपार्तिपाकवान् ॥ पूयस्रावीमहाछेदीकर्णपाकाकफात्मकः १४ क्षतोत्पाटनातकर्णपाम्बुपूर्णाद्भवद्विद्रधिःकर्णविध्वंसकारी ॥म हारुकरोर्तिप्रदोदीर्घशोफमुहुःस्रावदुर्गधकृत्कष्टपाकी १५ ॥ जो फुसी कानके भीतरी झिल्लीको फोड कर दाह पीडा क्लेदयुक वेकली कर तथा वीर्य बलका नाशकरें उसे वैद्योंने पित्तका कर्णपाकाहाहै १३ स्थूज त्वचा और कानमें फूटन खुजली शोष पीडा पाकयुको रादनिकले मह केटयुक्त उसे वैद्य कफका कर्णपाकरोग कहते हैं १४ कानमें घावदो- गयाहो उसपरसे खंड उखाड़ने से तथा कर्णपाऊमें पानीफेपडनेसे कान में विद्रधि रोग कानका विध्वंस करनेवाला पैदाहोताहै उसमेंपीड़ा चौर सूजन तथा स्त्राव और दुर्गंध मोर कष्ट से प. ये लक्षण होते हैं १५॥ , (वातपूतिकर्णरोगकेलक्षण) पूर्वस्रवेद्य-श्रवणोथपूर्तिविरको टपीडारतिगुंजघोषः ॥ शोपादेयंग्यरशूलयुक्तोवातात्मकोयं खलुपतिकर्णः १६ (पित्तपूतिकर्ण केलक्षण) अत्यन्तदाहोबहुती वेदना नित्यंस्रवेद्यःश्रवणोतिपूतिः ॥ पूयंचपीतंपरिपित्तजोयं प्रोक्तोभिपग्भिःकिलपूतिकर्णः १७(कफपूतिकर्ण केलक्षण) कर्ण स्रापयमुग्रंसपूर्तिशोथः स्निग्ध क्लेदश्रुत्यकंडूः ॥ शुक्लस्थैर्यइले मजदीपाकं विद्याद्रीगंपत्तिकर्णनितांतम् १८ इति श्रीभिषक चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेकर्णरोगलक्षणानि ।। .

१२२ हंसराजनिदानम्। जिसमेंसे राव कानमें पूति तथा फूटन पीडा अरति गुंजारहोना शोप अर्बुद ज्वर शूल इनकरके युक्तहो वो वातको कर्णपूतरोग कहाई १६ जिस में दाह तीव्र दुःख नित्यहो कानमें रादनवै तथा राद पीली निकसे उसे वैद्योंने पित्तका कर्णपूतिरोग कहाहे १७ कानमें से पीव वासकेसाथ निकले तथा चिकनी सूजन केदयुक्तहो तथा कानमें खुजली चलतीहो सफेदहो देरमें पके वो कफका कर्णपूतिरोग जानना १८ इति श्रीमाथुर दत्तरामपाठकनिर्मितायांहंसराजार्थबोधिनीटीकायांकर्णरोगास्समाप्ताः । (नासारोगलक्षणम्) आनह्यतेयेनगदेननासिकाविशुध्यते पूय्यतितुद्यतेक्वचित्॥नगंध्यतेछिद्यतिखिद्यतेथवा सपीनसोरु कथितोभिषग्वरैः १(क्षवथुरोगकेलक्षण) यदाघ्राणमर्मस्थलेसं विकारेकफेनावलिष्टोमरुनासिकायाः॥ तदायातिबाह्यान्तराच्छ व्दयुक्तोनिरुक्तोभिषग्भिर्वरिष्ठःक्षवोऽयम् २(पतिनस्यरोगकेलक्ष ण) पक्वषिर्यदावातस्ताल्वादोमछितोभवेत् ॥ नासौनिस्सर तेपूतिःपूतिनस्यंचतहदेत् ३॥ जिसमें कफ से नाकबंधजावे और पीब वहै तथा केशहो और जिस में सुगन्ध दुर्गन्धका ज्ञान न हो तथा पीडाहो उसे वैद्योंने पीनसका रोग कहा १ जिसकी नाकमें पवन दुष्टहोकर नाकके मर्मस्थानोंको दुःखित करें फिर वही नारुकी पवन कफसे मिलकर शब्दयुक्त भीतरसे बाहर निकसै उसे वैद्योंने क्षवथु अर्थात् छींककारोग कहाहै २ जिसके गला तालूके मूलकी पवन दोपोंको बिगाड़कर आप गलेमें मूर्षित हो नाकसे दुर्गधयुक्त निकसे उसे पूतिनस्य कहतेहैं ३ ॥ (नासापाककेलक्षण) नासिकायांस्थितपित्तंपरुषीकुरुतेनि शम् ॥ नासिकापाकमित्याहुहिछेदव्यथान्वितम् ४ (पूयरक्तका लक्षण) दोपेषुपक्केषुललाटमध्येपूयंसरक्तंमुखनासयुक्तम् ॥ दुर्ग धियुक्तंबहुशःस्रवेत्तत्प्रोक्तम्भिषग्भिःकिलपूयरक्लम ५ (प्रदीप्त रोगकेलक्षण) दाहान्वितायाःपरिनासिकायाः संनिःसरेडूमधनं जयाभ्यांसाईसतोदीपवनःप्रचंडोरोगम्प्रदीप्तंप्रवदंतित्रैद्याः ६ हंसराजनिदानम् । १२३ नाकमें पित्तदुखितहो फुलीको पैदाकर और वो पकजाय तथा टाक राद व्यधायुक्तहो उसे नासिकापाकरोग कहते हैं । ललाटमें दोषोंके पकने से रुधिर राद और दुर्गधयुक्त मुख नाक बहुत सवै उत्ते पूयरक्तरोग कहते हे ५ जिसकी नाकसे दाहयुक्त प्रचंड पवन निकले तथा धुआं निकले और पीडाहो उसे प्रदीप्तरोग कहते हैं ६॥ (प्रतीनाहरोगकेलक्षण) रुंध्यान्मार्गनसोवायुःश्लेष्मणास हितोवली ॥ प्रतीनाहंचतंरोगविद्यादाधुनिकोभिषक् ७ (नासा शोषकेलक्षण) घ्राणोत्थःश्लेष्मसंघातःपक्वपित्तोष्मणानिशम् ॥ वातेनशोषितःसोयंशोषःप्रोक्तोभिषग्वरैः ८ (पक्वपीनसकेलक्ष ण) श्लेष्मातिसांद्रःपरिगन्धहीनःशिरोलघुत्वस्वरवर्णशुद्धिः ॥ नासावकाशंपवनप्रवृत्तिश्चिहानिपक्कस्यहिपीनसस्य ह ॥ नाककी पवन कफसे मिलकर इवासको रोकदे उत्तेप्रतीनाहरोग अब- के वैद्यकहते हैं ७ नाकमें उठा जो कफका समूह वो पित्तकी गर्मीसे पक- जाय फिर बात उसको सुखायदेय तव मनुष्य श्वास कठिनसे ले उसे नासाशोप कहते है जब जुखाम पकजाताई तब ये लक्षण होतेहैं गंधर- हित गाढ़ा कफ निकले शिर हलका हो स्वरका वर्णशुद्धहो नाकशुद्ध पवन भन्छीतरह निकले ये पकीपीनसके लक्षण, ६॥ (पीनसरोगकीउत्पत्ति) घ्राणांतरेसूक्ष्मरजोनिपातादुन्नापणा न्मैथुनतोर्कतापात् ॥ शीर्षावघाताहहुशीतसेवनाहातःप्रतिश्या यगदंप्रकुर्यात् १० (पीनसरोगकापूर्वरूप) शिरोगुरुत्वं वप्रह प्टरोमशरीरमाक्षवथुप्रवृत्तिः ॥ निद्रालसत्वंनयनाश्रुपातोमवे प्रतिश्यायपुरोहिचिह्नम् ११ (वातकीपीनसकेलक्षण) स्वरोप घातोगलतालुजिवाशोषोथनासापिहिताक्वचित्स्यात् ॥ सावो तसूक्ष्मःपरिशंखपीडामरुत्प्रतिश्यायरुजोपचिह्नम् १२ ॥ नाकमें धूलिके जानेसे उद्भापणसे मैथुनकेकरनेसे सूर्यके घाममें रहने से शिरमें चोट लगनेसे बहुतशीतके सेवनकरनेसे कुपित जो वात सोपीनत रोगको पैदाकरे१०शिरभारी रोमांच शरीरका टूटना बारघार छींककामाना - १२४ हंसराजनिदानम्। नींद और मामकस तथा नेत्रों से अश्रुपातहो ये पीनसके पूर्व में होते ११ स्वर बैठजाय गला तालू जीभ इनका सूखना नाफका मार्ग रुकजाय थोडा पतला गरमपानी गिराकर कनपटीदूरखें ये वातकीपीनसके लक्षण, १२॥ (पित्तकीपीनसकेलक्षण) नासास्रावोमहातप्तपीनसोवहिधू मवान् ॥ सदाह पैत्तिकोज्ञेयःश्लेष्मजःकथितोबुधैः १३(कफ कीपीनस केलक्षण)शुल्लाभोनासिकास्रावोगलोष्ठातालुकंडुवान॥ शिरस्तोदःप्रतिश्यायःश्लेष्मजःकथितोवुधैः १४ (रुधिरकीपी नसकेलक्षण) रक्तस्राव:शिरःपीडादाहःशंखद्वयेऽनिशं ॥ रक्तत्वं नेत्रयोज्ञेयःप्रतिश्यायःसरक्लजः १५॥ जिसकी नाक में गरम गरम पानी गिरे और अग्निके समान धुंबां निकले तथा दाहहो वो पित्तकी पीनस कही है १३ नाकसे पानी सफेद और गला तालू ओठ इनमें खुजली चले मस्तक भारीरहै उसे कफकी पीनस कहते हैं १४ जिसकी नाकसे रुधिर गिरे मस्तक में और दोनों कनपटीन में दर्द नेत्र लाल इन लक्षणों से रुधिरकी सरेकमा, अर्थात् पीनस जाननी १५॥ (सन्निपातकीपीनसकेलक्षण) श्वासपूतिवहोनाह लेदोजंतुषुनि ईितः॥चिह्नरेतैरलाध्योयंप्रतिश्यायस्त्रिदोषजः १६इतिश्रीभिष क्चकचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रनासारोगलक्षणानि ॥ जिसकी नाकले वास युक्त पवन निकले आनाहरोग हो क्लेदयुक्त तथा कृमि पड़जाय इनलक्षणों से सन्निपातकी पीनस कहीहै १६ इति माथुरद- सरामपाठकप्रणीतायाहंसराजार्थबोधिनीटीकायांनासारोगलक्षणानि ॥ अथ नेत्ररोगनिदानम् ॥ (नेत्ररोगोत्पत्तिः) शीर्षापघाताद्विषतीक्ष्णसेवनान्नेत्रांतरेधूमर जोतिपातात् ॥ सूर्येक्षणात्सूक्ष्मनिरीक्षणान्मुहुर्दोषारुजसंजनय न्तिनेत्रयोः १शुक्रावरोधायुवतीप्रसंगादातोर्विकाराज्ज्वलनस्य तापात् ॥ नाड्यादिमोक्षाहहुमैथुनाच्च नेत्रेरुजसंजनयन्तिदो पाः,२(वातकेनेत्ररोगकेलक्षण)विशुष्कतास्पंदनतातिरूक्षता or हंसराजनिदानम् । १२५ प्रतोदताकर्कशताद्यशुद्धताः ॥प्रधर्षतास्तंभनताश्रुपातान्नृणां चनेत्रेपवनात्मकोभवेत् ३॥ शिरमें चोटलगनेसे विष अथवा तीखी वस्तु के सेवनसे नेत्रों में धुआं और धूलि के पड़ने से सूर्य के सामने देखनेसे छोटी वस्तुके देखने से कुपितहुये जो वातपित्त कफ सो नेत्ररोगको पैदा करते हैं १ वीर्यके रोकने से बहुत स्त्रीके संगले धातुके विकारसे अग्निके तापसे फस्तछुड़ाने से बहुत मैथुनसे नेत्रमें तीनों दोष नेत्ररोग करते हैं २ नेत्रों का सूखना तथा फड़कना रूखापन पीडा कर्कशता अशुद्दता प्रधर्षता स्तंभनता अश्रु- पातका गिरना ये लक्षण वातके नेत्ररोग होते हैं ३॥ (पित्तकेनेत्ररोगलक्षण) उष्णोष्णबाष्पोरविणातितापःशूला रतिःपांडुरताशिरोतिः ॥ दाहोल्पपाकोमहतीचपीडानेत्रेभवेत्पि त्तमयेनराणाम् ४ (कफकेनेत्ररोगलक्षण) तन्द्रातिशोफोगुरु ताशिरोतिर्दाहोल्पपाकोमहतीचपीडा ॥ ऊष्माविशेषोग्निसमा नदाहः स्त्रावोरतिःशूलमतीवपीडा ५ (नेत्रमंथकेलक्षण) विव ताशोणितमाविपाकोरक्तस्रवःस्यान्नयनेनराणाम् ॥ निर्मथ्यने जन्दधिमन्थलक्षणेर्वायुस्ततोगच्छतिमूनिविक्रमम् ६ ॥ सूर्यके घामसे गरमीहो तथा गरम गरम पानी निकले शूल और अरति पीलियाहो शिरमें दर्दहोदाह हो थोडापफे पीडा ज्यादा हो ये लक्षण पित्तके नेत्ररोगके हैं ४ तंद्रा सूजन मस्तक भारी दाह थोड़ापके पीडा बहुत हो गरमी बहुत हो अग्निके समान दाह हो अश्रुपात हो यरति शूल ये कफके मेत्ररोगकै लक्षण हैं ५ जिसके नेत्र वुरेहों पकजायें रुधिर गिरे और दधि- मंथ लक्षणों से नेत्रों को मथनकर पवन मस्तकमें प्राप्तहोताहै ६॥ निपीड्यशीर्षपुनराक्रतोततोजानीहितंपण्डितनेत्रमन्थनम् ॥ आयातियातिप्रकरोतिवेदनांवातःप्रचण्डोनयनांतरेभ्रुवोः (वा तभ्रमणरोगकेलक्षण) शीर्षास्थिशंखन्त्वथरक्तनेने जानीहिवांत भ्रमणंगदन्तम् ॥ अवेदनाकंडुविशुष्कतास्याल्लघुत्वमक्ष्णोश्च प्रसन्नमार्गः ८. मलप्रत्तिहुधानिशान्तेविपक्कदोपं नवदन्तिस - - १२६ हंसराजनिदानम् । न्तः । पक्कोदुम्बरवतस्निग्धोगरिष्ठःकंडुशोफवान् ॥ जलस्रावो ऽल्पसन्तोदोनेत्रपाकाकफोनवः ।। शौर मस्तक पीडाकर फेर लौटकर नेत्र में प्राप्तहो ऐसेही था और जाय और नेत्र में तथा भूकुटीमें पीडाकरे उसे पण्डितों ने नेत्रमंथ रोग फहाद ७नत्तककोहली कनपटीमें मातमें तथा नेत्रलालहों उत्ते वात भ्रमण रोग कहा नेत्रपाककेलक्षण पीडारहित तथा खुजली न चले तथा शशुगत रहितहो थोर नेत्रों में हलकापन हो नेत्रों का मार्ग स्वच्छहो । विशेष कीचड मायाना रात्री के अंतमेंहो तव जानना कि दोपपाकहुआ पके गूलरके समान तथा चिकने और भारी तथा खुजली और सूजनयुक्त जल यह थोड़ी पीडाहो इसको कफसे प्रकट नेत्रपाक जानना ॥ (शिरपाकनेत्रफलक्षण) नेत्रेसमत्]परिवीक्षितुंदिशः स्फोटो ललाटेवहुवेदनान्वितः ॥ शूलश्चदाहोग्निसमोभ्रमोभवेद्रोगोमि परिभाशिरपाकईरितः १० आच्छाद्यदृष्टिनयनेविनिर्गतं शुक्रस्ति ताभंपरिवर्द्धतेनिशम् ॥ सूच्याप्रविधंखलुनाशमेति नोचेदुधाःशु वशंवदन्ति ११ नेत्रांतरकज्जलिमासमीपेशकद्वयंसूक्ष्मतरंचि रोत्यम्॥मुक्तावभासंगततोदपाकंतत्कष्टलाध्यमुनयोवदंति १२॥ नेत्रचारों शोर देखने को समर्थहों बहुत पीडा और शूजयुक्त ललाट में फूटनहो शाग्निके समान दाह होभ्रम हो उसे वैद्योंने शिरपाक रोग कहा १० जिराके नेत्रमें शुक्रकी बूंद पायजावे उससे कुछ न दीखे और वो दिन दिनमें पढ़े चोर सई छिदने के समान बीवनेवाला होकर यदि नाश को न प्राप्तदो तो उसे पण्डितलोग शुक्रवण कहते हैं ११ जिप्तके नेत्रकी काली जगे पर छोटोछोटी दोबूंद मोती के समान बहुत फालकी प्रकटभई हो और उनमें पीड़ा न होतीहो और न पके उसे कष्टसाध्य मोतियाबिंद मुनियों ने कहाहै १२ ॥ (असाध्यमोतियाविलक्षण)शुक्रवयंवात्रितयंचतुष्टयंनिर्वेदन नेत्रगतंनिपाकं विहायसीचाभ्रदलावभासंस्यादप्यसाध्यनिवि डंचिरोत्थम् १३दोपत्रयोत्थंनयनांतरस्थंनीलावभासंनिविडविस प्पमा स्निग्धंदृढंदृष्टिपथावरोधंस्पंदात्मकंशुक्रमसाध्यमाहुः १४ 1 हंसराजनिदानम्। १२७ नेत्रांतरस्थंरुधिरावमासं मांमोत्थितंस्थूलदलंविशालम् ॥ वि च्छिन्नमध्यपरिचंचलंचशुक्रभिषग्भिस्तदसाध्यमुक्तम् १५॥ जिसके नेत्र में दो वा तीन वा चार बंद नेत्रके धीचहो उनमें पीडाहो और पकजावे और बादल वा भाकाशके रंगकी बूंदहो मिलीभई तथाव- हुत दिनकी ये असाध्यहे १३ जो तीनों दोषों से उठी होय और नीलेरंग ही मिलीहुई किश्चित् चलायमान चिकनी और दृष्टिको रोकदे ऐसीशुक्र की बूंदभी असाध्यहै १४ नेत्रमे रुधिरके रंगकी शुक्रकी बूंदहो और वो मोटी तथा लंबीहो विच्छिन्न मध्यहो और चंचलहो ऐसा रोगी वैयोने असाध्य ' कहाहै १५ ॥ .. एकंद्वयंवात्रितयंचतुष्टयंसंछाधनेत्रंपरिवईतेनिशम् ॥ शो फोष्णाबाप्पोरविपाकसाधनंशुक्रविदग्धंतदसाध्यमादिशेत् १६ (इतिनेत्रशुलक्षणानि) (नेत्रकेप्रथमपटलकेलक्षण) आरत्य नेत्रपटलेव्यवस्थितेव्यतानिरूपाणिनःप्रपश्येत् ॥(नेत्रद्वितीय पटलकेलक्षणा) एवंद्वितीयेपटलेक्षिसंस्थे सूचीमुखंदृष्टिगतंनप पति १७ (नेत्रत्तीयपटलकेलक्षण ) नेत्रांतरस्थेपटलेतृती येष्टि शविह्वलतांसमेति ॥ आभासमात्रंखलुपश्यतीहसाध्यं शिशुत्वेखलुनान्यवस्थाम १८ ॥ एक दो तीन चार नेत्रहों और नेत्रकी दृष्टिको ढकदेवें और नित्य बढ़े तथा सूजन गर्मी अश्रुपातका पड़ना ये शुक्र विदग्धके लक्षणहें येभी घताध्यौ १६ इतने रोग नेत्रके शुक्लभागमें होते हैं नेत्रके प्रथम पटल में दोपों के पहुंचने से मनुष्यको यथार्थ न दीखे ऐसेही नेत्रके दूसरे पटल में दोप पहुँचनेसे सुईका तथा मझवी मडर बालकाभी समूह नहीं दीखें १७ नेत्रके तीसरे पटका में दोप पहुँचने से दृष्टि विह्वल होजाय कुछ कुछ ज्ञाई मालूमहो ये बालअवस्थामें साध्यहै भोर में नहीं १८ ॥ (नेत्रचतुर्थपटलकेलक्षण) यस्यावरुद्धेफ्टलेननेत्रेदृष्टयान पश्येत्सनरोक्कविम्बम् ॥ विद्युल्लतांचन्द्रसमंसतारंतत्काचसंज्ञ पटलंचतुर्थम् १६ (वातकीदृष्टिरोगकेलक्षण) दृष्ट्यामहत्यापट - १२८ हंसराजनिदानम् । लेनरुदयासमीरणोत्थेनविकारकारिणा॥रूपाणिसाण्यरुणा निमानवाःपश्यन्तिपीतप्रभयाविदग्धया २० (पित्तकीदृष्टिरोगके लक्षण) पटलेनावृतादृष्टिःपित्तकोपोत्थितेनसा ॥ नीलानिसर्व वर्णानि परिपश्यन्तिसम्भ्रमम् २१॥ नेत्रके चतुर्थ पटल में दोप पहुंचने से मनुष्यको सूर्य चंद्र और विजली मौर तारागण ये नदीखें वो कांचतंज्ञक और इसीको लिंगनाशक औरन- नला तथा मोतियाबिंदभी कहते हैं १९ जिसकी दृष्टिवादीके विकारसे भाच्छादितहो उसे लालरंग पीला दीखे २० जिसकी दृष्टि पित्तके कोपसे. ढकीहो उसे भ्रमते सबरंग नीले दीरखें २१ ॥ (कफकीदृष्टिरोगकेलक्षण) आच्छादितायापटलैःकफोत्थैदृष्टिः सिताभैरिवसूर्यमभ्रः ॥ नेत्रांतरस्थैःपरितोविपश्येत्सर्वाणिरूपा णिसितप्रभानि २२ दृष्टेरू स्थितेदोषेनपश्येदूर्ध्वसंस्थितान् । दृष्टेरधःस्थितेदोषेनरोधस्थानपश्यति२३दृष्टेःपाइस्थितेदोषेपा वस्थान्नैवपश्यति ।। दृष्टेमध्यगतेदोषे यदेकंमन्यतेद्विधा २४॥ कफके विकारसे पटल जिसकी दृष्टि रोकदे उसको सूर्य और भाकाश तथा सबरंग सफेद दीखे २२ दृष्टिके ऊर्श्वभागमें दोपस्थित होय तो ऊपर की वस्तु न दीखे और नीचेके भागमें दोपहो तो नीचेकी कोई वस्तु नदीर २३ गौर दृष्टिक पृष्ठभागमें दोप होतो पृष्ठस्थित को नहीं दीखें तथा दृष्टिले मध्यमें दोपहोय तो एक वस्तुको दो दीरखें २४॥ । रक्तबिन्दुर्भवेन्नेत्रेचंचल परुषोनिलात् ॥ पित्तात्पीतंतथानी लंस्निग्धःपांडुःसितःकफात् २५ यःसर्वधूपाणिनरोविपश्येसंधू घदर्शीमुनिभिःप्रदिष्टः ॥ यश्चित्ररूपाणिदिवाप्रपश्येत् सवैम नुष्योनकुलांधसंज्ञः २६ संकुच्याभ्यंतरेयाति मुहुर्दृष्टिकपर्दि का-॥ बाह्यमायातिसंवत्यगम्भीरतविदुर्बुधाः २७ ।। वादीसे मनुष्य के नेत्र चञ्चल और लाल बिन्दू युक्तहों और पित्तले पीले तथा नीले और कफसे चिकने और सफेद तथा पांडरंगके होते हैं २५ जिस मनुष्यको सब वस्तु धुंयेंके रंगकीदीखें उसे धूम्रदीमुनियोंने कहा और रातमें जिसको चित्रविचित्र रंगकीदीखें उसे नकुलांधमर्थात रतौंधकारोग -- हंसराजनिदानम्। १२६ कहा २६ जिस मनुष्यकी दृष्टि दर्पणकी संकोचको प्राप्त हो जब दर्पण हट मावे तब यथार्थ होजावे उसे गंभीररोग वैद्य कहते हैं २७॥ नेत्रसंधौस्थितःशोफःपक्वंपूर्यसवेत्तुयः ॥ पूतिसांद्रसरक्तवापूय लाख्यंविदुर्बुधाः २८ संधौचैवग्रहदन्थिरपाकीनीरुजोदृढः॥ उप नाहःसविज्ञेयोगदशेकंडुरोगदः २६ नेत्रसन्धीसमुत्पन्ना पिटिका शोणितोद्भवा ॥ रक्तमुष्णस्रवेन्नित्यमसाध्यारुक्प्रकीर्तिता ३०॥ जिप्त मनुष्यफे नेत्रकी संधी में सूजनहो और वो पकजावे तथालवे और पासयुक्त तथारुधिरसवै उसे पूयलारख्य रोगवैद्यकहतेहैं २८ जिसमनुष्यके संधीबडीगांठहो और वह पकेनहीं न पीडाकरे दृढ़हो खुजली चले उसे वैद्योंने उपनाह रोग कहाहै २६ नेत्रकी संधी में रुधिरसे फुसी पैदा हों उनसे रुधिरनवे वो असाध्य कहिये ३०॥ उद्धृत्यवर्त्मरोगाणिजायतेभ्यंतरेमुहुः॥ रुन्धतिगोलकेनेपरि वाराणितानिवे ३१ संधौपक्ष्माणिमांसामा कंडूशोफममन्विता॥ चिमुचिमांबुयुतायैाह्मणीसानिगद्यते३२अक्षणोर्वमनिसम्भ वाश्चपिटिकाःसूक्ष्माघनाःसंताः पीताभावहुवेदनाखरतराज्ञे याश्चवातोद्भवाः ॥ पित्तोत्थाःपिटिकाःखरानयनयोरभ्यन्तरेसं स्थिता दुःस्पर्शाबहुदाहशूलसहिताःलावान्विताःकण्डुराः३३ ॥ जिस मनुष्यके कोयेके बाल उखडकर भीतर चलेजायँ और नेत्रके गोलको रोकदें उसे परवाल कहते हैं ३१ संधी पखवारों में मांसके भाकार फुसीहो उसमें खुजली और सूजन तथा चिमचिमी युक्तहो जलस्रवै उसे ब्राह्मणी रोग कहतेहैं ३२ नेत्रके मार्गमें जो फुसीहो वह छोटी कड़ी गोल पीली पीडायुक्त खरदरीहो सो वातकी जाननी और खरदरी तथा नेत्रके भीतरीहो स्पर्श सहाजाय दाह शूल और स्वै तथा खुजली चलै वो पित्त की फुती जाननी ३३ ॥ अक्षणोर्वमनिजायन्तेपिटिकाःकफसम्भवाः । स्थूलामांसांकु साहिन्नाकंडशोफार्तिपाकिनः ३४ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सा वेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेनेत्ररोगलक्षणानि ॥ तथा मोटी मांसके अंकुरयुक्त गीली खुजलीयुत सूजन पीडा भौर पक' १३० हंसराजनिदानम्। जावै वो कफकी मरोडी जाननी ३४ इति हंसराजार्थचोधिन्यांनेत्ररोगलक्ष समाप्तम् । ..(अथ मस्तकरोगनिदानम्) अत्यम्लसेवाच्छिरसोभिघाता भूमौशयानाज्जलमध्यपातात् ॥ रात्रीदिवाजागरणाचशीताहा तादिदोषाःप्रभवन्तिशीर्षे ३५(वातपित्तकमस्तकरोगलक्षण) शीतेनशीर्षेनिशिवातपीडाक्वचिदिवापिप्रभवेत्सशूला ॥ तापेन पित्तप्रभवातितीवाज्वालान्विताशूलवतीसशोषा ३६ (कफके मस्तकरोगकेलक्षण) शीर्षगुरुत्वश्चकफेनपीडास्यादालसत्वंमु हुरश्रुपातः॥ निद्रावमित्वमुखनासिकाभ्यांनावोविपाकासशिरो भिघातः३७॥ अत्यन्त खटाई खानेसे शिरमें चोट लगनेसे पृथ्वीपर सोनेसे जलमें गिरनेसे रातदिन जागने शरदीसे कुपितहुये जो वात पित्त कफसोम- स्तकरोग पैदा करते हैं ३५ बांदीसे मस्तक रातको दर्दहो कीदिनमें भी शूल चले पित्तसे पित्तजनितही अत्यन्त तीव्रज्वाला और शोषयुक्त पीडा हो ३६ शिरभारी भालस्य अश्रुपातका पड़ना निद्रा वमन मुखनाकका नाव तथा पाक और पीड़ा ये कफके दोपमें होता है ३७ ॥ (रुधिरकेमस्तकरोगकेलक्षण) शीर्षेतिदाहोमहतीचपीडा. नासामुखाभ्यांबहुरक्तपातः ॥ भवेद्ब्रमोधमवतीचनासारक्तप्र कोपेनशिरोभिघातः ३८ दोषेषुसर्वेषुशिरोगतेषु लिंगानिसा, णिभवन्तिशीर्षे ॥ कासप्रत्तिश्चिरकालंपाकः प्रोक्लोभिषंग्भिः शिरसोभिघातः ३६ (कृमिकेमस्तकरोगलक्षण) निर्भिद्यतेज न्तुभिरुग्रतुण्डेः संतुद्यतेयस्यशिरोनितान्तम् । घ्राणाच्छ्वेच्छो णितमुग्रवेदना शिरोभिघातःकृमिभिर्भवेत्सः ४०॥: : शिरमें दाह घोर पीडा नाक और मुखसे रुधिर गिरे भ्रम तथा नासे धम निकले ये रुधिरसे मस्तक रोगजानना ३८ सन्निपातके मस्तकरोगमें त्रिदोपके चिह्न मिलतेहों तथा खांती और देरमैपके वो चैद्योंने सन्निपात का कहाहै ३६ जिसके शिरमें कृमि पड़जावै उसके. शिरमें घोर पीडादो नाकसे रुधिर पड़े वो कमिका मस्तकरोग.कहाहै.४०॥...'

हंसराजनिदानम् । (आधाशीशीकालक्षण) भानूदयेईशिरसिप्रपीडासंबईते चांशुमतासहैव ॥ निवर्ततेशीतकरोदयेया सूर्यात्प्रतंतमवेहि वैद्य ! ४१ कफयुक्पवनःशीर्षकरोतिविविधानूगदान ॥ शिरोभू शंखकर्णाक्षिललाटेतीब्रवेदनाम् ४२ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तो त्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेशीर्षरोगलक्षणम् ॥ जिसका सूर्योदयसे आधा मस्तक क्रमसे दूखने लगै जब सूर्यास्तहो और चन्द्रमा उदयहो तब दर्दभी बंद होजाय उसे आधाशीशी कहते हैं ४१कफयुक्त पवन शिरमें अनेक रोग पैदाकर और शिर कनपटी भ्रुकुटी कान नेत्र ललाट इनमें घोरपीड़ा होय ४२ इति माथुरदत्तरामहतस- राजार्थवोधिनीटीकायांशीर्षरोगनिदानसमाप्तम् ॥ अथ लौरोगलक्षणम् ॥ (प्रदररोगकीउत्पत्ति) आयासतःकुत्सितयानरोहाच्छोका हिरुद्धाशनतःप्रपात्तात् ॥ अत्यन्तभारोहहनादजीर्णात्स्याद्गर्भ पातात्प्रदरोतिमैथुनात् १ योनिविदीर्यसंजातं शोणितंसर्वदा स्त्रियाः॥प्रदरन्तविजानीहिवातपित्तकफोद्भवम् २ प्रत्तेप्रदरे नित्यं पाण्डुत्वंजायतेस्त्रियाः ॥ मूनिमस्तृषादाहःप्रलापाकृ शतारुधिः३॥ परिश्रमसे खोटी सवारी में बैठनेसे शोकसे खोटे भोजनसे गिरपड़ने से भारी बोझउठाने से मीणसे गर्भके पड़ने से अतिमैथुनसे प्रदरनाम स्त्रियों के रोग होताहै १ योनि को विदीर्ण कर जो रुधिर सदापडे उसे वातका पित्तका कफका प्रदर रोगजानो २ प्रदर रोग पैदा होनेसे स्वीका वर्ण पीलाहोजाय और मूर्छा भ्रम प्यास दाह बडबडाना हाता अलचि ये रोग होते हैं ३॥ (वातपित्तप्रदररोगकेलक्षण) योनिःस्रवेच्छोणितमल्पमल्पं श्यावंसकप्टंपवनात्मकतत् ॥पित्तोत्थितंसामिपरक्तमुष्णंदाहार्ति शलभ्रमकंपकारी४(कफकेप्रदररोगलक्षण) योनिक्षनोत्थंधि रञ्जफेनिलंपीतारुणस्निग्धतरचपिच्छिलम् ॥ शेथिल्यकंडूकृमि शोथशीतकृज्जानीहितत्वंप्रदरंकफोद्भवम् ५ (सन्निपातकप्रदर १३२ हंसराजनिदानम्। कालक्षण) दोपत्रयोत्थेप्रदरेयुवत्याःसाणिलिंगानिभवन्ति काये ॥ उच्छासशूलारतिपूतियुक्तेतस्मिन्नकुवातभिपचिकि ताम् ६॥ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रे प्रदरलक्षणम् ॥ जिसस्त्रीकीयोनिसे कालेरंगकारुधिर कष्टसे थोड़ा थोड़ा निकले उसे वादीका जानो गौर मांसयुक्त गरम और दाहयुक्त रुधिर निकलै तथा शूल भ्रम कंप से पिनका जानना ४ योनि में से रुधिर झाग मिला चिकना पीला गाढ़ा लाल निकले और खुजली कृमी शिथिलता सूजन शीतल- ता युक्तहो उसे कफका प्रदररोग जानना ५ सन्निपात के प्रदरमें त्रिदोप के चिह्न होते तथा श्वास शूल भरति दुर्गधि युक्त ऐसे प्रदर की वैद्य चि. कित्सा न करै ६॥ इति इंसराजार्थबोधिन्यांप्रदररोगस्समाप्तः॥ (अथ योनिकन्दलक्षणम्) उच्चैःप्रपातान्नखदन्तघातादध्य श्रमात्कुत्सितवीर्ययोगात् ॥ कुयानरोहादतिमैथुनाद्वायोनौभवे स्कन्दकसंज्ञकोरुक् ७ योनौसंजायतेकन्देलकुचाकृतिपूययुक् ॥ विवर्णस्फुटितंरूकंवातकन्तंविदुर्बुधाः ८ (पित्तकेयोनिकन्दकेल क्षण) रक्तालयोनिसम्भूतंचिचिणीबीजसन्निभम् ॥ज्वरदाहान्वि तपैत्तंयोनिकंदन्तमादिशेत् ॥ ऊँचेस्थान के गिरने से नख दात के घात से रास्ता चलने से खोटा वीर्य होनेसे खोटी सवारी में बैठने से अति मैथुन से योनि में कैदसं- ज्ञक रोग होताहै ७ योनि में बडहल के समान कंद हो उसमें से राद निकले और विवर्ण तथा फटा रूखा हो उसे वातका योनिकंद कहते हैं ८जिसमें से रुधिर निकले और वह इमली के बीजके समान हो तथा ज्वर दाह युक्त हो उसको पित्त का योनिकन्द कहते हैं ॥ (कफकेयोनिकन्दकेलक्षण) तिलपुष्पसमंस्निग्धंयोनिमध्योद्भ वंदृढम् ॥ कंडूशोफान्वितंक्लिन्नयोनिकैदकफात्मकम् १० (सन्निपा तकेयोनिकन्दकेलक्षण) सन्निपातोत्थितंरौद्रंस+लिंगसमन्वित म्॥योनिकंदभिषक्तस्यचिकित्सांनवकारयेत् ११इतिश्रीभिषक् चक्रचित्तोत्सचेहंसराजकृतेवैद्यशास्त्रेयोनिकन्दलक्षणंसमाप्तम्॥ ।

हंसराजनिदानम्। १३३ जो तिल के फूल के समान चिकना भौर दृढ़ कंद हो तथा खुजली गौर सूजन गीला हो उसे कफका योनिकंद कहते हैं १० जिसमें सन्नि. पातके सब लक्षण मिलते हों उसे घोर सन्निपात्त का जानकर वेद्य इलाज न करै ११ इति हंसराजार्थवोधिन्यायोनिकंदलक्षणसमाप्तम् ॥ (अथ योनिकेद्वादशरोगकेलक्षण) योनौद्वादशदोषाःस्युःप्रो क्तावैद्य पथक्टथक्केचिन्नैसर्गिका केचिद्दोपजावीर्यदोषजाः १ अच्छिद्रायाभवेद्योनिःषंढाख्यासाविधीयते ॥ सूक्ष्मछिद्रातुयासू चीमुखीसाकथ्यतेबुधैः २ विस्तास्यामहास्थूलामहायोनिःप्रको तिता ॥ रजोवातहतंयस्याअसौख्यासोच्यतेवुधैः ३॥ योनि में चारह दोप पृथक पृथक् वैद्योंने फहे हैं कोई तो नैसर्गिक कोई दोषोंसे और कोई वीर्य के दोपते १ जिसकी योनि में छिद्र न हो उसे पढास्य योनि कहतेहैं और जिसमें छोटा छिद्र हो उसे सूचीमुख योनि कहते हैं २ जो गोल मुख की और मोटी हो उसे महायोनि कहते हैं और जिसका रजोदर्श वातसे चलागया हो उसे घसौख्ययोनि कहते हैं ३॥ (वातकीयोनिकेलक्षण) ह्रस्वातिरक्षाकृशताल्पपुष्पाश्यामा विवर्णास्फुटिताविशुष्का । वक्ताल्परोमापरुषासरोगायोनिर्बुधै त्तिवतीनिरुक्ता ४ (पित्तकीयोनिकेलक्षण) ऊष्मान्धिताकामव तीविशालालाक्षारसाभापरिपूर्णमासा ॥ नीरोगतागर्भवतीवि शुद्धायोनिर्बुधैःपित्तवतीनिरुक्ता ५ (कफीयोनिकेलक्षण) स्थू लासदाबहुकंडुरासा कामान्वितादीर्घमुखीमनोज्ञा ॥रोमाधि कास्निग्धतरातिशीतायोनिर्निरुक्ताकफयुग्भिपग्भिः६॥ जो-योनि छोटी और रूखी कृश अल्पपुष्पकी काली श्यामवर्ण की फटी हुई शुष्कमुख पर थोडे बालहों कठोर रोग युक्त ये वातकी योनि के लक्षण, ४ गर्मी युक्त कामवत्ती वडी लाखके रंगझीसी पूर्णमास युक्त निरोगगर्भवान् शुद्ध हो ये पित्तकी योनि के लक्षण, ५ मोटी सदा गाली रहे बहुत कंदुरा युक्त कामयुक्त दीर्घमुख की सुंदर यहुत रोम युक्त चिक- नी शीतल ये कफकी योनि के लक्षण, ६ ॥

हंसराजनिदानम्। वातेनयस्यानिहतंचपुष्पं तस्याःफलंनैवभवेत्कदाचित् ॥यो न्यंतरस्थेनमहाबलेनहन्नाभिकट्यांतरदुःखवेदनाम् ७ पित्तेनद ग्धंकुसुमंविशुदंशुक्रेणमिश्रम्बहिरुद्रेिद्या ॥ नात्यूष्मणाधारयि तुसनप्रिलंसिनीयोनिरुदाहृतासा ८ (विप्लुताकेलक्षण) रतिक्री डारुचिर्यस्याःपरितोयाप्लुताभवेत् ॥ नित्यवेदनयायुत्ताविजुत्ता साप्रकीर्तिता ॥ योनि में पलवान् वात पुष्पको नाश करदे तब सन्तान नहीं हो और हृदय नाभी कमर इनमें पीड़ा हो ७ जिसका पुप्प पित्तदग्ध करदे और शुक्रयुक्त रजको बाहर निकालदे और पित्तकी गर्मी से गर्भ न रहै उसे संसिनी योनि कदीहै - रति क्रीडाके आनन्दसे जिसकी योनि आईरहै और नित्य पीडाहो उसे विप्लुता योनि कहतेहैं ६ ॥ (पूतिगन्धयोनिकेलक्षण) सन्निपातान्वितायोनि गधंवहते निशम् ॥ शूलदाहार्तियुक्तासापूतिगन्धिर्विधीयते १० (बन्ध्या योनिकेलक्षण) पित्तानिलास्यांपरिकोपिताभ्यांसंपीडिताकृच्छ तरेणयोनिः ॥ कृष्णरजोगुँचतिफेनिलंयावन्ध्यामुनींद्रेःपरिकीर्ति तासा ११ (खंडितायोनिकेलक्षण) योनेरभ्यंतरेचा खरस्पा तुमैथुने ॥ नगृह्णातिसदावीर्यखण्डिनीसाविधीयते १२॥ सन्निपातसे योनिमें दुर्गध आवै तथा शूलदाह भीहो उसे पूतिगंधयोनि कहतेहैं १०जितकी योनि वात पित्तके कोपसे परिपीडित हो और जिस की योनि से काला और झागयुक्त रुधिर निकले उले पि बंध्यायोनि कहतेहैं ११ योनिके वाहर चौर भीतर मैथुन के समय खदरास्पर्श मालूम पड़े और वीर्यका जो ग्रहण न कर उसे खंडितायोनि कहते हैं १२॥ पिटिकान्वितसर्वांगीगणिनांतरवाहयोः॥ सायोनिरुपदंशेन भूत्रफेनरुजार्दिता ५३ इति श्रीभिषक्चक्रेचित्तोत्तवेहंसराज तैवेधशालेयोनिरोगलक्षणंलमाप्तम् ॥ योनिके बाहर भीतर फुसीनो योनि उपदंशरोगकरके व्याप्त जाननी १३ इति इसराजार्थवोधिन्यांयोनिरोगलक्षणंसमातम् ॥ d हंसराजनिदानम्। १३५ (अथ प्रसूतिकारोगकालक्षण) उच्चैःप्रपातादृढमैथुनाहाती क्षणोष्णदुष्टौषधिसेवनाहा ॥ दण्डाभिघाताहहुवेदनाहागर्भच्यु तिःस्याद्भयतःश्रमाहा १४ साबोमासाञ्चतुर्थात्प्राक्षातःपंचम पष्ठयोः॥मासयोर्भवतिस्त्रीणांप्रसूतिस्तदनन्तरम् १५ प्रसूति समयेवायुःस्त्रियाःकुक्षिगतोयदि ॥, निरुध्यशोणितलावंकरोति बहुवेदनाम् १६॥ उच्चस्थानके गिरनेसे दृढ़मैथुनले तीखी गरम दुष्ट औपचके खानेसे दंड आदिकी चोट लगनेसे बहुत पीडासे भयसे श्रमसे गर्भपात होताहै १४ चार महीनासे पूर्व गर्भ गिरे उसे स्त्राव कहते हैं और पांचवें छठे महीनामें पात कदाता इसके अनन्तर अर्थात् सातवें महीनासे उपरान्त प्रसूति कहते हैं १५ प्रसूतिसमयमें पवन स्त्रीकी कूवमें प्राप्तहो रुकजावै वह रुधिरको निकाले तथा पीडाकरै १६ वालेष्टथिव्यांपतितेतदानिशंसंरक्षणीयामरुतःप्रसूता॥ यस्याः शरीरेपवनेप्रविष्टेनूनंभवेद्रोगवतीसदासा १७ हत्कुक्षिशूलंगुरु ताशरीरकपःपिपासाकटिवस्तिपीडा ॥ दाहोंगमर्दोल्परुचिःप्रला पः शोथःकृशत्वंप्रदरोतिसारः १८ निद्रालसत्वंबहुपांडुतांगेशी तंशिरोत्तिधमताविशुद्धिः ॥ तापोप्चनाहोबलतातिकासःस्यात्सू तिकायाःपरिरोगचिह्नम् १६ ॥ जिस समय वालक पृथ्वीमें गिर उप्ती समय प्रसूता स्त्रीकी पवनसे रक्षा करनी कदाचित् पवन स्त्री के लगजाय तो निश्चय प्रसूतिका रोग पैदाहोय १७जिस बीके प्रसूतिरोग हो उसके ये रोगहों हृदय कूख इन में शूलहो शरीर भारी कंप प्यास कमर और भूत्रस्थानमें पीड़ा दाह धंगों का टूटना अल्परुचि प्रलाप सूजन कराता प्रदर यतीलार १८ निद्राना- लकस पीलिया शरदी मस्तकमें दर्दभ्रम भ्रटता ज्वर अनाह दुर्बलता खांसी इतने रोग प्रसूति से होते१६ ॥ (प्रसूतिरोगकेउपद्रव) अतीसारोज्वरःशूलंबलहानिःशिरोव्य था।शोफोनाहोतिदाहोप्टोसूतिकायामुपद्रवाः २० इति श्रीभिष चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतवैद्यशास्त्रेप्रसूतिकारोगलक्षणानि॥.

१३६ हंसराजनिदानम्। १ अतीसार २ ज्वर ३ शूल ४ बलहानि ५ मस्तकमें दर्द ६ शोष ७ पनाह ८ दाद ये प्रसूतके पाठ उपद्रव हे २० इति माथुरदत्तरामपाठक प्रणीतायांहंसराजाधवोधिनीटीकायांसूतिकारोगास्समाप्ताः ॥ अथ वालरोगलक्षणम्॥ (वातलदुग्धकेगुण)स्तन्यंदुग्धंवातलंतोयतुल्यंरूसंगौरंतुच्छ सारंकषायम्॥वालोनित्यंतंपिवेत्स्यात्कृशांगःशब्दक्षामोवद्धवि एमूत्रवातः १ (पित्तयुक्तदुग्धकेगुण) सक्षारमुष्णंकटुपित्तदूषितं वालोल्पसारःकुचजपयःपिवन ॥ तृष्णालुरूक्षावयवासपैत्तिकः खिन्नोभवेद्भिन्नमलासकामलः २(कफदूषितदुग्धकेगुण) दुग्धं श्लेष्मविदूषितंकुचभवंस्निग्धंधनंपिच्छिलं योवाल प्रतिवासरं परिपिवनस्थूलोदरोजायते ॥ लालाढ्यःकफरोगवानबलयुतो निद्रारतश्छर्दिमाञ्छून्यान्तष्करणोल्पघूर्णनयनः कंड्वादिरोगा चित्त.३॥ स्तनका दूध जलके समान हो रूखा तथा भारी वलरहित हो कसैला हो वो वातपित्त दुग्य है उसे बालक जो पीवै तो रुशागहो मन्द शब्द तथा मल मूत्र कमउतरे १ जो खारा गरम तथा कटुवा हो पित्तदूपित दुग्ध है उसे जो पालक पीवे तो बलहीन हो तृष्णालू रूरया देह पित्तप्र. हतिवाला दस्त बहुतहो पीलि युक्त हो तथा खिन्नहो २ जो कुवका दूध कफसे दूषित हो वो चिकना गाढ़ा मलाईदार होता है जो वालक ऐसे दूध को पीवै उसका बड़ा पेट होजाय लार बहे कफ रोगसे यसित रहै बल युक्त नींद बहुत मावे उलटी करै शून्य अंतःकरण कुछ टेढ़े नेत्र खु- जली आदिरोग करके युक रहे ३॥ (दोषरहितदुग्धकीपरीक्षा) जलेस्तन्यपरिक्षिप्तमेकीभूतंचपां डुरम्॥मधुरंस्वादुतहुग्धंनिर्दोषतंविदुर्बुधाः ४ निर्दोषजपयःपी त्वानीरोगोवालकोभवेत् ॥ बलवीर्यान्वितोधीरोवहुशक्तिसमन्वि तः५शिशोरंगपीडाचतीवामतीबाबुधोरोदनालक्षयेदंगदेशात नोःस्पर्शनाचक्षुपांदर्शनाडाविदित्वारुजकारयेद्वैचिकित्साम६॥

हराजानदानम् । १३७ जो दूध जलमें मिलाने से पीला होजावै तथा मीठा स्वादयुक्त हो उसे निर्दोप दूध जानना ४ जो चालक दोपहीन दूध पीताहै वह बल वीर्य धीरता शक्तिमान होताहै ५ वैद्य वालककी अंगपीड़ा रोनेसे तथा शरीर के स्पर्शसे वा नेत्रों के देखनेसे जानकर फेर इलाज करै ६॥ मातुस्तन्यविकारेणवालानांनेत्रवर्मनि॥जायतेकुक्कुणंतेननेत्र यो कंडुरंभवेत् ७ कुक्कुणेनरुजातेन सूर्याभापरिवीक्षितुम् ॥ नसम र्थोभवेहालौनेत्रोन्मीलितुमक्षमः ८ (पारिगर्भिककेलक्षण) भवेदा लकोगुर्विणीदुग्धपानामःश्वाप्सनिद्रान्वितोवह्निसादः ॥ कृशां गोतिकासोरुचिर्दतपातस्तमाहुर्बुधागर्मिकंकोष्ठवन्धम् ६ ॥ माताके स्तनविकार से बालकके नेत्रों में कुक्कुणरोग हो उससे नेत्रों में खुजली चलती है ७ जय बालकके कुकुणरोग होजाताहै वो सूर्यके देख- ने को समर्थ नहीं हो और नेत्रमिचे भी नहीं गर्भिणीमाताके दुग्यपान से बालककोभ्रम श्वास निद्रा अग्निमंद कृशांग अतिरवासी अरुचि दंतपा- त ये होतेहैं इसे वैद्य गर्मिक कोष्ठबंध वा पारिगर्भिक कहतेहैं ६ ॥ (तालुकंठरोगकेलक्षण) शिशोस्ताल्वामिषश्लेष्मवातयुक्ता लुकंटकम्॥कुर्यात्तेनरुजामूर्ध्नि भवेत्तालुनिनिम्नता १० तालुपा कस्त्रिदोषोत्थःसर्वोगेषुविसर्पति ॥ असाध्योयंबुधैरुतोयंत्रमंत्रै इचसाधयेत् ११क्षुद्ररोगेचकथितेअजगल्ल्यहिपूतने ॥ ज्वराया व्याधयःसबैमहतायेपुरोगताः ॥ बालदेहेपितांस्तद्वजानीयात्कु शलोभिषक् ॥ (सामान्यग्रहयुक्तबालकलक्षण) ग्रहैग्रहीतोल्पशि शुःप्रवेपतेमुहुर्महुस्त्यस्यतिरौतिजृम्भते॥परंनखैर्जुश्चतिखंसमी क्षतेक्वचितक्वचित्कूजतिहन्तिरोदिति १२॥ वालकके तालूके मासमें वात युक्त कफ प्राप्त होकर तालू कंटक रोग पैदाकर उसे तालू नीचे लटक आवै १० त्रिदोपका सालुपाक सब अंगमें फैल जावै सो असाध्यहै वो यंत्रमंत्र आदिसे भच्छाहो ११ जोक्षदरोगों में अजगल्ली अहिपूतना रोग कहै हैं वो और ज्वरादि सर्वरोग जो बड़े मनुष्योंके होतेहैं वो सब बालककी देहमें होतेहैं ऐसे कुशल वैद्य जाने। इति माधवः ॥ जो वालक ग्रहोंकरके गृहीत हो वो कभी कांपै त्रासखाय हंसराजनिदानम्। प्रलाप कंष श्वास मोह दाह चेष्टाहीन होताहै ५ मुखशोष देहशोष ये अपगुण पत्र का विप भक्षण करै है दाह थानाइ बेकली दृष्टिनाश ये फलांवपके अवगुण हैं ६॥ (फूलगोंदत्वचाकेविप)पुष्पोत्थंदिराधमानमोहंचकुरुतेविषम्।। त्वनिर्यासोद्भवंसावंतिकंपशिरोरुजम्७ (दुग्धविपकेलक्षण) विषक्षीरसमुद्धतमाध्मानकंठशोषणम् ॥ विबंधमत्रसंरोधंदृढांग कुरुतेभ्रमम् (धातुहरतालआदिकेलक्षण) धातूत्थंयहिपंकुर्या न्मूछौंदाहंचतालुनि ॥ विषाणिप्राणघाती निसर्वाणिकथिता निच॥ फूल का विष रद अफरा मोह को करै तथा गोंद और त्वचा का विप नाव दुर्गध कंप शिरमें दर्द ७ दूधका विप अफरा फंठ शोप दस्त मूत्रका रुकना दृढ़ाग और भ्रम करै ८ हीरा हरताल आदि धातुका विष मूछी दाह तालुये में सर्व विप प्राण के हर्ता जानने ॥ (सर्पकाटेकेलक्षण) भुजंगेनदष्टस्यनासामुखाभ्यांपतेद्रक्तधा रांगदेशेषुशोफः ॥ भवेन्मडलैमैडितांगोविवर्णोविशीणीगमांसो थनिःशोणितांगः १० विषादोंगकंपोभयोरोमहर्षःशरीरेगुरुत्वंभ्र मोदृष्टिनाशः ॥ तृषाध्मानमानीलतागात्रदेशेपनाहोरतिर्जुम्भ णमूर्च्छतास्यात् ११ (देशविशेषऔरकालविशेषजोसर्पकाटे उसकेलक्षण)अश्वत्थमूलेपिचुमंदमलेचतुष्पथेदेवगृहश्मशाने। वाल्मीकदेशेदिनसंध्ययोर्वासणदष्टःसुधयानजीवेत् १२॥ जिसे सप्र्पकाटे उसकी नाक और मुखसे सविर की धार गिरै सव देह में सूजन हो रुधिर के देहमें चकत्ता हो तथा विवर्ण हो. देहका मांस बिखर जाय तथा देहमें रुधिर न रहै १० खेद अंगकंप भय रोमांच देह भारीभ्रम नेत्रों से न दीखे प्यास अफरा शरीर नीला आनाह.अरति मी जंभाई ये लक्षण सर्प काटेके हैं ११ पीपल के वृक्षके नीचे तथा नीम के वृक्ष के नीचे चौराहे में मन्दिर में श्मशानमें बांबी के पास संध्या के समय भरणी आनी श्लेपा मघा मूल कृत्तिका इननक्षत्रों में जो सर्प फाटे तो मनुष्य मरजावै १२ ॥ (सूषविषलक्षण) मूषकस्यविषंकुर्याच्छर्दिशोफविवर्णताम् ॥ ।

हंसराजनिदानम्। मूछौंमंदश्रुतिश्वासंलालास्रावंशिरोरुजम् १३. (कीटआदि विषकेलक्षण ) दष्टस्यकीटर्षिपदिग्धतुंडे कृष्णाभमंगंवहुवेदना स्यात्॥शोफोतिदाहापरिभिन्नवर्चामोहप्रलापोधिकरोमहर्षः १४ (कालेविच्छूकेकाटेकालक्षण.) दष्टोमनुष्योऽसितश्चिकेनना नाविचेष्टांकुरुतेविषार्तः । भीतोविषएणोग्निसमानंदाहःपीडा बितोरौतिविलापमुच्चैः १५ ॥ विपैल मूपेका विप रद सूजन विवर्ण मूर्छा मंद सुने श्वास लार टपके शिरपीडा..ये. लक्षण हो १३ कीट अथवा. जिसे विपैल टाढवाला जानवर काटे उसके लक्षण देह काला तथा पीडायुक्त सूजन दाह तेज- रहित मोह प्रलाप रोमांच ये हों १४ काले बिच्छू काटेके ये लक्षण है नाना प्रकारकी चेष्टाकर डरपे शून्यता अग्निके समान दाह घोर पीड़ा पुकार कर रोवै.१५ ॥ विषश्चिकंदुःसहप्राणहारिमहामोहदंसौख्यविध्वंसकारि॥ बलंज्ञानविज्ञानतेजोपहारिव्यथाशोफवैकल्यदाहार्तिकारि १६ (वींसर्पकाटेकेलक्षण) ज्वरोघोरतरंशूलंछर्दिशोफोविसर्पति । वर्णनाशोभवेत्पीडावर्हिदष्टस्यलक्षणम् १७ प्राणीदशेनसंदष्टो इष्टरोमोक्षतातिमान् । स्तब्धलिंगोभवेच्छोफोविनिद्रश्चकितो निशम् १८॥ बिच्छूका विप नहीं, सहाजाय प्राणहती महामोह करै सुखं को करै बलं ज्ञान तेज इनको दूर करे व्यथा सूजन बेकली दाह. और पीडा करें १६ घोर ज्वर.शूल रह सूजन बढ़े वर्णका नाश और पीडा होय ये. वीं नाम सर्पकाटेके लक्षण हैं १७ प्राणी के विपसे डसेहुये के ये लक्षणहें रोमांच पावसे,पीडित टेढ़ा लिङ्ग सूजन निद्राहीन और चकित.१८ ।। (मेडकमछलीकेविषलक्षण) शोफछबिस्तृपानिद्रामंडूकविष लक्षणम् ॥ मत्स्योत्थितंविषकुर्यादाहंशोफंटषांव्यथाम १६ (जो ककेविषकालेक्षण ) मूच्छशिौफज्वरकडूतपांकुर्यु लोकसः ॥ (छिपकलीकेविषकालक्षण) दाहस्वेदव्यथांशोथंकुर्याञ्चगृहगो धिका २० (शतपदीखनखजूराकेविपकैलक्षण) शतपद्यादि .

. हंसराजनिंदानम्। ईर्पाकःसतुविज्ञेयः दृग्योनिरयमीर्ण्यकः ४(महाषपंढकेलक्षण, योभाव्यामृतौमोहादंगनेवप्रवर्तते॥ तत्रस्त्रीचेष्टिताकारोजाय तेषएढसंज्ञितः५ (नारीषण्ढकेलक्षण) ऋतौपुरुषवहापिप्रवर्ते तांगनायदि ॥ तत्रकन्यायदिभवेत्साभवेन्नरचेष्टिता ६ ॥ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृत्तवैद्यशास्त्रेनपुंसकलक्षणानि समाप्तानि॥ 'जो पुरुप दूसरे को मैथुन करतादेख आप मैथुन करनेको प्रवृत्त हो उसे ईर्यक नपुंसक कहते हैं दूसरा नाम क्योनि है , जो पुरुष ऋतु के समय स्त्री के प्रमाणप्रवृत्त हो अर्थात् विपरीत रतिकर उसके वीर्य से पैदा जो बालक वो स्त्रीकीसी चेष्टावान हो और स्त्री के आकार युक्त हो उसे महापण्ढ कहते हैं ५ ऋतुकालके समय जो स्त्री पुरुष के प्रमाण प्रवृत्तहो अर्थात् पुरुपको नीचे सुलाव आप ऊपर चढ़ मैथुन कर उसमें जोकन्या पैदाहो वह पुरुपके आकार हो और पुरुषकी सी चेष्टावालीहो॥ इति श्रीमाथुरवंशोत्पन्नप्रशंसनीयगुणगणालंकतकन्हैयालालपाठकतनय दत्तरामप्रणीतहंसराजार्थसुबोधिनीटीकासमाप्तिमगात् ॥ इति हंसराजनिदानसम्पूर्णम् ॥ क

Hansh Rajnidhanam

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Hansh Rajnidhanam
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Hansh Rajnidhanam
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OCR done
Citation
1902
Published
2012/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
146
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312312
Barcode
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