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Shishupalvandh
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भूमिका 1 महाकवि श्रीमाघकृत शिशुपालवध महाकाव्य-सरसता, पदलालित्य तथा अर्थगाम्भीर्य इन तीनों गुणों के लिए सुप्रसिद्ध है। संस्कृतसाहित्य में किरात, माघ, नैपध इन तीनों को 'बृहत्रयी' कहते हैं। और रघुवंश, कुमारसम्भव, मेघदूत ये तीन काव्य 'लघुत्रयी' कहलाते हैं । इनका पढ़ना-संस्कृत साहित्य के जिज्ञासु के लिए सर्वथा आवश्यक समझा जाता है। उनमें भी माघकवि के इस शिशुपाल वध का विशिष्ट स्थान है। प्रौढबन्ध, शव्दमाधुरी, वर्णनचातुरी आदि अनेक विशिष्ट गुणों से शिशुपालवध का विद्वत्समाज में सम्प्रति बहुत आदर है । माघकवि का परिचय व समय- महाकवि माघ एक धनी द्विज (ब्राह्मण) कुल में उत्पन्न हुए थे। इनके पिता का नाम दत्तक था। गुजरात के भीनमाल नामक शहर में उत्पन्न हुए थे। इनका समय ६२५-६५० विक्रम संवत् के आस-पास ही है। क्योंकि ६०० संवत् के करीव के एक शिलालेख में माघ के पितामह सुप्रभदेव का नाम मिला है। और ६०० के निकट में वर्तमान आनन्दवर्धनाचार्य के ध्वन्या- लोक ग्रन्थ में माघ के कुछ श्लोकों का उद्धरण मिलता है। अतः ६२५ या ६५० विक्रम संवत् (५७५-५६० ई०) निकट समय में का समय स्थल-मान से ज्ञात होता है। ये
।
( २ )
कुछ विद्वान् माघ कवि को---'भोजप्रबन्ध' 'प्रबन्धचिन्त
मणि आदि के आधार पर धाराधीश भोज के समान काल में
मानते हैं। महाराज भोज का समय १००० संवत् के निकट
प्रसिद्ध ही है। अतः महाकवि माघ भी दशम शताब्दी के ही
सिद्ध होते हैं।
परन्तु भोजप्रबन्ध आदि की कथाओं के विशेप-प्रामाणिक
नहीं हाने के कारण बहुत से विद्वान् माघ को ६२५-६५० विक्रम
संवत् के निकट का ही मानते हैं । यही मत हमारा भी है।
माघ के विषय में किंवदन्ती
माघ के विपय में यह किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि-माघ के
जन्मसमय में ही ज्योतिषी लोगों से 'इनको दारिद्रय योग है।
ऐसा जानकर इनके पिता ने एक लाख रुपया प्रतिमास के
हिसाव से १०० वर्ष के लिए १०-१२ करोड़ रुपया सोने के
हण्डों में भरकर गाड़ दिया था, ताकि मेरे पुत्र (माघ ) को
धन की कमी न पड़े। पर दैवयोग कहीं टलता है ? । माघ को
दान देने का बड़ा व्यसन पड़ गया, बड़े बड़े विद्वानों को लाखों
रुपया एक वार उठाकर दे देना इनके लिए साधारण बात थी।
फल वही हुआ जो होना था। इनको वृद्धावस्था में दारिद्रथ से
वड़ा कष्ट भोगना पड़ा। और एक दिन किसी भिक्षुक विद्वान्
को पारितोषिक के लिए देने को धन पास में नहीं देखकर इन्होंने
दुःख से प्राण छोड़ दिया।
राजा भोज से माघ की बड़ी मित्रता थी, उनको जब यह
मालूम हुआ तब उनको भी बड़ा दुःख हुआ।
इस किंवदन्ती में कहाँ तक सत्यांश है यह तो नहीं कहा जा
सकता पर इतना निश्चित है कि ये बड़े ही उदार और विद्वत्प्रेमी
थे। और विद्वत्समाज में इनका बहुत अधिक सन्मान था ।
- ( ३ ) इनके बनाए हुए शिशुपालवध (माध) का पण्डितसमाज में बहुत अधिक आदर है। यह काशी आदि की परीक्षाओं में पाठ्य रूप से भी रखा गया है। अतःपरीक्षार्थी छात्रों की सुविधा के लिए हमने इस शिशु- पालवध को जगत्प्रसिद्ध मल्लिनाथी व अभिनवराजलक्ष्मी टीकाओं के साथ प्रकाशित किया है। मल्लिनाथी ( सर्वकषा)- इस टीका को परीक्षोपयोगी बनाने के लिए व्याख्येय भाग को मोटे अक्षरों में तथा अर्थ को सादे अक्षरों में दिया है। इससे अध्यापकों व विद्यार्थियों को बहुत अधिक सहायता मिलेगी। आज तक इस रीति से मल्लिनाथी कहीं नहीं छपी थी। अभिनवराजलक्ष्मी- इस टीका में समास विग्रह आदि में संक्षेप नहीं किया गया है, किन्तु छात्रों की सुविधा के लिए प्रायः पूरा पूरा समास व विग्रह दिया गया है । पर्याय भी एक एक शब्द के प्रायः ३-४ दिए गए हैं। इस प्रकार विद्यार्थियों को स्वयं पर्याय बनाने का अभ्यास हो सकेगा। कण्ठस्थ करने के लिए कोश पृथक् दे दिया है। पर्यायों में भी प्रचलित सरल पदों का प्रयोग दिया गया है। इस प्रकार संस्करण सर्वाङ्गपूर्ण हुआ है। परीक्षार्थियों के लिए इतनी अधिक सुविधा अभी तक सुलभ किसी संस्करण में नहीं थी जैसी सुन्दर उपयोगी व्यवस्था अभिनवराजलक्ष्मी में रखी गई है। इस टीकाद्वययुक्त शिशुपालवध के संस्करण से यदि विद्वानों व छात्रों को कुछ सन्तोप हुआ तो हम को सफल समझेंगे। भी लाभ व अपने श्रम कृतज्ञताप्रकाश- श्रीराजस्थान संस्कृत कालेज ग्रन्थमाला से प्रकाशित परी क्षोपयोगी पुस्तकों का विद्वत्समाज ने और छात्रमण्डल ने इतन अधिक आदर किया है कि जिसकी हमें कभी कल्पना भी नही थी। कोई पाठशाला ऐसी नहीं है, जिसमें इस कालेज की पुस्तके न पहुँची हों, और उनका यथेष्ट आदर न हो। सहृदय विद्वानों द्वारा दिए गए इस प्रकार आशातीत प्रोत्सा हन का ही फल है कि बहुत थोड़े ही समय में इस ग्रन्थमाला को बहुत अधिक प्रसार हो गया है। एतदर्थ हम सभी विद्वानों के नितान्त आभारी हैं। निवेदक- श्री राजस्थान-संस्कृत- कालेज ग्रन्थमाला, ५/१०९ त्रिपुराभैरवी काशी। प्रथम-संस्करण तिथि:- बैशाख शुक्ल १५ सं० १९६५ १५-५-३८ श्रीगुरुप्रसादशास्त्री
॥ श्रीः॥
श्रीमन्माघमहाकविप्रणीतं
शिशुपालवधम् ।
श्रीमल्लिनाथकृतया सर्वकपाब्याख्यया श्रीगुरुप्रसादशाचिकृतया
अभिनवराजलक्ष्म्या च विराजितम् ।
तस्यायं
प्रथमः सर्गः।
इन्दीवरदलश्याममिन्दिरानन्दकन्दलम् ।
वन्दारुजनमन्दारं वन्देऽहं यदुनन्दनम् ॥ १ ॥
दन्ताचलेन धरणीतलमुग्नमय्य पातालकेलिपु तादिवराहलीलम् ।
उल्लाधनोत्फणफणाधरगीयमानक्रीडाऽवदानभिभराजमुखं नमामः ॥ २॥
शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे ।
सर्वदा सर्वदाऽस्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥३॥
वाणी काणभुजीमजीगणदवाशासीच्च वैयासकी-
मन्तस्तन्त्रमरंस्त पञ्चगगवीगुम्फेषु चाजागरीत् ।
आचामाचकलद्रहस्यमखिलं यश्चाक्षपादस्फुरां
लोकेऽभूधदुपज्ञमेव विदुषां सौजन्यजन्यं यः ॥ ४ ॥
मल्लिनाथः सुधीः सोऽयं महोपाध्यायशब्दभाक् ।
निधत्ते माघकाव्यस्य व्याख्या सर्वकषाऽमिधाम् ॥५॥
२ शिशुपालवधम् । [प्रथमः- Ame ये शब्दार्थपरीक्षणप्रणयिनो ये वा गुणालक्रिया- शिक्षाकौतुकिनो विहर्तुमनसो ये च ध्वनेरध्वनि । क्षुभ्यद्भावतरङ्गिते रससुधापूरे मिमक्षन्ति ये तेषामेव कृते करोमि विवृति माघस्य सर्वकषाम् ॥ ६ ॥ नेताऽस्मिन्यदुनन्दनः स भगवान्वीरः प्रधानो रसः शृङ्गारादिभिरजवान्विजयते पूर्णा पुनवर्णना। इन्द्रप्रस्थगमायुपायविषयश्चैद्यावसादः फलं धन्यो माघकविर्वयं तु कृतिनस्तत्सूक्तिसंसेवनात् ॥ ७ ॥ इहान्वयमुखेनैव सर्व व्याख्यायते भया । नामूलं लिख्यते किञ्चिन्नानपेक्षितमुच्यते ॥ ८॥ अथ तत्रभवान्माधकविः 'काव्यं यशलेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतर- क्षतये। सद्यः परनिर्वृतये कान्तासंमिततयोपदेशयुजे ॥' इत्यालङ्कारिक- वचनप्रामाण्याकाव्यस्यानेकश्रेयःसाधनतां, 'काव्यालापांश्च वर्जयेत्' इति निषेधस्या ऽसत्काव्यविषयतां च पश्यशिशुपालवधाख्यं काव्यं चिकी- श्विकीर्षितार्थाऽविनपरिसमाप्तिसम्प्रदायाविच्छेदलक्षणफलसाधनत्वात् 'आशी- नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशोवाऽपि तन्मुखम्' इत्याशीराद्यन्यतमस्य प्रबन्धमुख- लक्षणत्वाच्च काव्यफलशिशुपालवधबीजभूतं भगवतः श्रीकृष्णस्य नारद- दर्शनरूपं वस्तु आदौ श्रीशब्दप्रयोगपूर्वकं निर्दिशन् कथामुपक्षिपति- श्रियः पतिः श्रीमति शासितु जग- जगनिवासो वासुदेवसद्मनि । वसन्ददर्शावतरन्तमम्बरा- द्धिरण्यगर्भाङ्गभुवं मुनि हरिः ॥ १ ॥ [सर्वकषा] श्रिय इति ॥ तत्रादौ श्रीशब्दप्रयोगाद्वर्णगणादिशुद्धेरभ्यु- चयः । तदुक्तम्- "देवतावाचकाः शब्दा ये च भद्रादिवाचकाः। ते सर्वे नैव निन्द्याः स्युलिपितो गणतोऽपि वा ॥” इति । - लगः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । ३ श्रियः-लक्ष्म्याः । पतिः । अनेन रुक्मिणीरूपया श्रिया समेत इति सूचितम् । 'राघवत्वे भवेत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि' इति विष्णुपुरा- णात् । जगन्निवास:-जगतामाधारभूतः। कुक्षिस्थाऽखिलभुवन इति यावत् । तथापि जगत्-लोकं । शासितु- दुष्टनिग्रहशिष्टानुग्रहाभ्यां नियन्तुं । श्रीमति- लक्ष्मीयुक्त । वसुदेवसद्मनि-वसुदेवरूपिणः कश्यपस्य वेश्सनि । वसन्-कृष्णरूपेण तिष्ठन् । हरिविष्णुरम्बरादव- रन्तम् --आयान्तम् । इन्द्रसन्देशकथनार्थमिति भावः । हिरण्यस्य गों हिरण्यगर्भो ब्रह्मा-ब्रह्माण्डप्रभवत्वात् । तस्य- अङ्गभुवं-तनूजम् । अथवा तस्याङ्गादवयवादुलझाझवतीति हिरण्यगर्भाङ्गभूस्तं, मुनिम्- नारदमित्यर्थः । 'उल्लङ्गानारदो जज्ञे दक्षोऽङ्गुष्टात्स्वयंभुवः' इति भागवतात् । ददर्श । कदाचिदिति शेषः । अत्राल्पीयसि वसुदेवसद्मनि लकलजगदाश्रयतया महीयसो हरेराधेयत्वकथनादधिकप्रभेदोऽर्थालङ्कारः । तदुक्तम्-'आधाराधेययोरानुरूप्याभावोऽधिको मतः, इति। जगजि- बासस्य जगदेकदेशनिवासित्वमिति विरोधश्च । तथा तकारसकारादेः केवट- स्या उसकृदावृत्त्या, जगजदिति सकृयञ्जनद्वयसादृश्याञ्च वृत्त्यनुप्रासभेदी शब्दालङ्कारौ । एषां चान्योन्यनरपेक्ष्येणैकत्र समावेशात्तिलतण्डुलवत्संसृष्टिः। सर्गेऽस्मिन्वंशस्थं वृत्तम् । जती तु वंशस्थमुदीरितं जरी' इति लक्षणात्॥१॥ [अन्वयः] श्रियः पतिः जगन्निवासः जगत् शासितुम् श्रीमति वसुदेवसद्मनि वसन् हरिः- अम्बरात् अवतरन्तम् हिरण्य. गर्भागभुवम् मुनिं ददर्श । [विग्रहः ] श्रयति हरि या सा श्रीः, तस्याः-श्रियः । श्रीविद्यते यस्मिन् तत् श्रीमत्, तस्मिन्-श्रीमति । निवसन्ति जना अस्मिन् असौ निवासः, जगतां निवासः-जगन्निवासः । वसुदेवस्य सद्म वसुदेवसन, तस्मिन्-वसुदेवसनि । हिरण्यस्य गर्भ:-हिरण्यगर्भः, अङ्गागवतीति अङ्गभूः, हिरण्यगर्भस्य अङ्गभूः-हिरण्यगर्भाङ्गभू, तम्-हिरण्यगर्भाङ्ग- भुवम् । .
शिशुपालवधम् ।
[प्रथमः
-
-
Pawa
-
[अर्थः] श्रियः = लक्ष्म्याः । रुक्मिण्या इति यावत् । पतिः
स्वामी । एतेन रुक्मिणीस्वयंवरानन्तरकालमियं काव्यकथा
प्रवृत्तेति सूचितम् । जगन्निवास: निखिलजगतामाधारभूतः ।
अखिलब्रह्माण्डनायकः। विश्वम्भर इति यावत् । जगत्-लोकम् ।
भूर्लोकादिकम् । शासितुं = दुष्टनिग्रह शिष्टानुग्रहादिभिर्नियन्तु
श्रीमति लक्ष्मीशालिनि । सर्वसम्पत्समृद्धे । धनधान्यसमृद्धे
शोभास्पदे चेति यावत् । वसुदेवसद्मनि = वसुदेवगृहे । वसन्
तिष्ठन् । मायामानुषविग्रहेण सञ्चरन्निति यावत् । हरिः
श्रीकृष्णः । अम्बरात् । = गगनात् । अवतरन्तम् = आयान्तम् ।
इन्द्रसन्देशकथनायागच्छन्तमिति यावत् । हिरण्यगर्भाङ्गभुवं-
ब्रह्मपुत्रम् । मुनि-मुनिश्रेष्ठं नारदम् । ददर्श = कदाचिद्विलोक
यामास।
[भावार्थः ] रुक्मिणीस्वयंवरानन्तरं यदुपुर्या द्वारकायां स्व-
पितुर्वसुदेवस्य गृहे सुखं निवसन् जगन्नियन्ता भगवान् श्रीकृष्णः
कदाचिदम्बरादवतरन्तं ब्रह्मपुत्रं नारदं ददर्श ।
[कोशः] 'कमला श्रीहरिप्रिया' इत्यमरः । 'त्रिष्वथो जगती लोको
विष्टपं भुवनं जगत्' इत्यमरः । 'गृहं गेहोदवसितं वेश्म सद्म निकेतनम्।
इत्यमरः ।
[वाच्यप० ] श्रियः पत्या जगनिवासेन जगत् शासितुम् श्रीमति
वसुदेवसद्मनि वसवा हरिणा-अम्बरात् अवतरन् हिरण्यगर्भाङ्गभूः मुनिः
(नारदः) ददृशे।
[भाषाटीका] त्रिलोकीपति भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जब कंस आदि.
दुष्टों को मार कर तथा रुक्मिणी को स्वयंवर में प्राप्त कर द्वारका में वसुदेव
जी के घर में सुख से निवास करते थे उस समय उन्होंने एक दिन
आकाश से उतर कर अपनी ओर आते हुए ब्रह्माजी के पुत्र भक्तराज
श्रीनारदमुनि को देखा ॥१॥
- - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । तदानीं जनैर्विस्मयादीक्षितु प्रवृत्तमित्याह- गतं तिरश्चीनमनूरुसारथः प्रसिद्धमूर्ध्वज्वलनं हविर्भुजः। पतत्यधो धाम विसारि सर्वतः किमेतदित्याकुलमीक्षितं जनैः ॥ २ ॥ [ सर्वकषा ] गतमिति । अविद्यमानावूरू यस्य सोऽनूरुः, स सारथि- र्यस्य तस्य-अनुरुसारथेः-सूर्यस्य । गतं-तिः । भावे क्तः । तिरश्चीनं-- तिर्यग्भूतम् । 'विभाषाञ्चेरदिस्त्रियाम्' इति तिर्यक्शब्दादञ्चत्यन्ताव्याति- पदिकात्स्वार्थे खप्रत्ययः । हविर्भुजः-अग्नेः। ऊज्वलनम्-उर्ध्वस्फुरणं- प्रसिद्धम् । इदं तु सर्वतोविसारि धाम-अधः पतति । किमेतदिति ? 'सूर्यानिविलक्षणमदृष्टपूर्वमिदं धाम किमात्मकं स्यादित्याकुलं-विस्म- यात्सम्भ्रान्तं यथा तथा जनैरीक्षितमीक्षणं कृतम् । सकर्मकादप्यविवक्षिते कर्मणि भावे क्तः । 'प्रसिद्धरविवक्षातः कर्मणोऽकर्मिका क्रिया' इति वच- नात् । केचित्कर्मणि कान्तं कृत्मा-ईक्षितं मुनि ददर्शति पूर्वेण योजयन्ति। अत्रोपमेयस्य मुनिधाम्नः सूर्याग्निभ्यामुपमानाभ्यामधः प्रसरणधर्मेणाधिक्य- वर्णनाद्वयतिरेकः । तदुक्तं काव्यप्रकाशे-'उपमानाद्यनन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः' इति । धाम रश्मौ गृहे देहे स्थाने जन्मप्रभावयोः' इति हेमचन्द्रः दिवाकरस्तु वृत्तरत्नाकरटीकायां प्रथमपठितेन–'द्विधाकृतात्मा किमयं दिवाकरो विधूमरोचिः किमयं हुताशनः' इति चरणद्वयेन सहेममेव श्लोकं षट्पदच्छन्दस उदाहरणसाह । लत्राधचरणद्वयेन सन्देहा- कारो, 'गत मिति तन्निरासश्च बोध्य इत्युपरिष्टात् ॥ २ ॥ -- [अन्वयः ] अनूसारथेः गतं तिरश्चीनम् (प्रसिद्धम् )। हविर्भुजः ऊर्ध्ववलनम् प्रसिद्धम् । ( इदन्त-) सर्वतः विसारि धाम अधः पतति । एतत् किम्' इति जनैः श्राकुलम् ईक्षितम् ।
शिशुपालवधम् । [प्रथमः- N %3- [विग्रहः ] अविद्यमानौ ऊरू यस्यासौ अनूरुः। अनूरुः सारथिर्यस्यासी अनूरुसारथिः, तस्य अनूरुसारथेः । हविर्भुङ्क्ते इति हविर्भुक् , तस्य हविर्भुजः । ऊर्ध्वञ्च तज्ज्वलनञ्च ऊध्र्वज्वलनम् । विसरतीति विसारि । [अर्थः] अनूरुसारथेः = अरुणसारथेः सूर्यस्य । गतं गमनम् । गतिः । तिरश्चीनं = तिर्यक् । तिर्यग्भूतम् । प्रसिद्धम् * । सर्वलोकविदितम् । हविर्भुजः = अग्नेश्च । ऊर्ध्वज्वलनम् = ऊर्ध्व स्फुरणम् । प्रसिद्ध विख्यातमेव । (इदन्तु पुरतो विभाव्यमानं-) सर्वतः = समन्ततः । विसारि-विसरणशीलम् । स्फुरत् । धाम = तेजः। अधः = नीचैः । गगनाङ्गणाद्भुवस्तलम् । पतति = प्रस. रति । आयाति । किमेतत् = किमिदं स्यात् । सूर्याग्निविलक्षणम- दृष्टपूर्वमिदं तेजः किमात्मकं स्यात् ? । इति = इत्थम् । इत्येवम् । आकुलं = विस्मयाकुलं ससम्भ्रमं सवितर्ककच यथा स्यात्तथा । जनैः = लोकैः । यदुप्रवीरैः । ईक्षितम् = विलोकितम् । दृष्टम् । [भावार्थः] गगनतलाभूलोकमागच्छदिदं सञ्चरिष्णु तेजः किमात्मकं । ? ननु भोः सूर्यस्य तु तिर्यग्गतिर्भवति, नाधी गतिः । अग्नेस्तूर्ध्वस्फुरण भवति न नीचैः स्फुरणं । तत्किरिवदिद धामेत्येवं वितर्कपरैर्द्वारकावासिभिर्जनैःसाश्चर्य सवितर्कञ्च विलो. कितम्। [ कोशः ] 'सूरसूतोऽरुणोऽनूरुः काश्यपिर्गरुडाग्रजः' इत्यमरः । 'धाम- रश्मौ गृहे देहे स्थाने जन्मप्रभावयोः' इति हेमः। 'समन्ततस्तु परितःसर्वतो विश्वगित्यपि इत्यमरः। [वाच्यप० .] अनूरूसारथेर्गतेन तिरश्चीनेन भूयते। हविर्भुज अर्ध्व- ज्वलनेन प्रसिद्धन भूयते । ( अनेन तु-) सर्वतो विसारिणा धान्ना अधः पत्यते । एतेन केन भूयते ? इति जना आकुलं यथा स्यात्तथा ईक्षितवन्तः । [भाषाटीका ] भगवान सूर्य तो आकाश में ही तिरछे (टेढ़े ) चला छदेहलोदीपकन्यायेन प्रसिद्धमित्यस्योभयत्रान्वयः। अस्तीति वा प्रकृते शेषः।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ७ है ?। - करते हैं, और अग्निकी ज्वाला भी ऊपर की ओर ही उठा करती हैं। पर यह तो कोई विलक्षण तेज है जो नीचे की ओर तेजी से आ रहा है। यह क्या इस प्रकार द्वारकानिवासी लोगों ने उस तेजको बड़ी व्याकुलता से देखा ॥ २॥ अथ भगवान्निरणैषीदित्याह चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम् । विभुर्विभक्कास्यवं पुमानिति क्रमादमुनारद इत्यबोधि सः॥ ३ ॥ [सर्वकषा] चय इति । विभुः-वस्तुतत्त्वावधारणसमर्थः । सः--हरिः, पुरा-प्रथम, त्विषां चय इत्यवधारितं-तेजः पुञ्जमानत्वेन विनिश्चितम् । ततः-प्रत्यासन्ने। विभाविता-विमृष्टा-आकृतिः-संस्थानं यस्य वं तथोक्तम्। अत एव शरीरी-चेतन इत्यवधारितम् । ततो विभक्ता-विविच्य गृहीता- अवयवा मुखादयो यस्य तं तथोक्तम् । अत एव पुमानित्यवधारितम् । अमुम्-आगच्छन्तं व्यक्तिविशेषं नारदं । वास्तवाभिप्रायेणेति पुंलिङ्गनिर्वाहः। क्रमात्-पूर्वोक्तसामान्यविशेषज्ञानक्रमेण । लोकदृष्ट येदमुक्तम् । हरिस्तु सर्व वेदैवेति तत्त्वम् । नारद इत्यबोधि । नारदं बुद्धवानित्यर्थः । नारदस्य कर्मत्वेऽपि निपातशब्देनाभिहितत्वान्न द्वितीया । तिङामुपसङ्ख्यानस्यो- पलक्षणत्वात् । यथाह वामन:-'निपातेनाभिहिते कर्मणि न कर्म- विभक्तिः । परिगणनस्य प्रायिकत्वात्' इति । बुध्यतेः कर्तरि लुङ् । 'दीप- जन-' इत्यादिना चिण् । 'चिणो लुक्' इति तस्य लुक् । अत्र विभा- विताकृति विभक्तावयवमित्यादिना आकृतिविभावनावयव विभावनयोः पदार्थयोर्विशेषणवृत्त्या शरीरित्वपुंस्त्वावधारणे हेतुत्वेनोपन्यासात्पदार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलङ्कारः। 'हेतोर्वाक्यपदार्थल्वे काव्यलिङ्गमुदाहृतम्' इति लक्षणात् ॥३॥ -- SY शिशुपालवधम् । [प्रथमः- - [अन्वयः।] विभुः सः पुरा त्विषां वय इत्यक्धारितम् , ततः विभाविताकृतिम् शरीरीति अवधारितम् , विभक्तावयवम् पुमानिति (अवधारिम् ) अमुम्-क्रमात् नारद इत्यबोधि । . [विग्रहः ] विभाविता आकृतिर्यस्यासौ विभाविताकृतिः, तम्-विभा- विताकृतिम् । विभक्ता अवयवा यस्य स विभक्तावयवः, तं-विभक्ता- वयवम् । [अर्थः] विभुः = तत्त्वावधारणकुशलः । विवेकशीलः। सः = हरिः। पुरा = प्रथमम् । आदौ। त्विषां = भासाम्। चयः = समूहः । इति = इत्येवम् । अवधारितं - तेजोराशितया विनिश्चि- तम्। तेज:पुञ्जतया निर्णीतम् । ततः = तदनन्तरं, किञ्चित्प्रत्या. सन्ने सति । विभाविताकृतिम् = वितर्कितावयवसंस्थानम् । शरीरी = प्राणी। इति = इत्येवम् । अवधारितं = विनिश्चितं । ततः-विभक्तावयवं = विविक्तावयवम् । तत्त्वतो दृष्टहस्तपादाद्य- वयवम् । ( अतएव-) पुमान् = पुरुषः। इति = इत्येवम् । अवधारितं = निश्चितम् । अमुं-समायान्तं तेजोराशिम् । मात्= पूर्वोक्तरीत्या सामान्यविशेषज्ञानक्रमेण । नारदः = नारदोऽयम् । इति = इत्थम् । अबोधि = बुद्धवान् । नारदं ज्ञातवान् । नारदो- ऽयमिति निश्चितवान् । [ भावार्थ :] तत्वनिर्धारणपटुर्भगवान् श्रीकृष्णः पूर्व तेजापुञ्जतया भासमानममुं क्रमशो नारदोऽयमायातीति निश्चिकाय । [कोशः ] 'स्युः प्रभारुग्रुचिस्त्विड्भामाश्छविद्युतिदीप्तयः' इत्यमरः । 'प्राणी त चेतनो जन्मी चेतनो जन्मी जन्त जन्युशरीरिणः' इत्यमरः । [वाच्यप.] विभुना तेन पुरा विषां चय इत्यवधारितः, विभाविता- कृतिः शरीरीति अवधारितः, विभक्तावयवः पुमानिति अवधारितः अयम् क्रमात् नारद इत्यबोधि । भाषाटीका ] पहिले तो भगवान् ने समझा कि यह कोई तेजका पुंज
सर्गः]
अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् ।
३
ही चला आ रहा है। फिर कुछ निकट आने पर जब आकृति-सी दिखाई
पड़ने लगी तब भगवान् ने समझा कि-यह कोई जीव है। फिर और
थोड़ा निकट आने पर हाथ पैर मुख आदि अङ्गों को देख कर उन्होंने
समझा कि यह कोई पुरुष है । इस प्रकार और अधिक साफ दिखाई देने
पर भगवान् ने पहिचाना कि-'यह तो नारद जी चले आ रहे हैं। ॥३॥
।
अथ सप्तभिर्मुनि विशिनष्टि-
नवानधोऽधो बृहतः पयोधरा-
न्समूढकर्पूरपरागपाण्डुरम् ।
क्षणं क्षणोत्क्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना
स्फुटोपमं भूतिसितेन शम्भुना ॥ ४ ॥
[सर्वङ्कषा] नवानित्यादि । कीदृशममुम्-नवान् सद्यः-सम्भृतसलि-
लान् । अतिनीलानिति यावत् । बृहतः-विपुलान् । पयोधरान-मेघान् ,
अधोऽधः । मेघानां समीपाधःप्रदेशे। 'स्थितमिति शेषः। 'उपर्यध्यधसः
सामीप्ये' इति द्विर्भावः । तद्योगे द्वितीया, 'उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्या-
दिपु त्रिपु' इत्यादिवचनात् । समूढः-पुजीकृतः । 'समूढः पुञ्जिते भुग्ने
इति विश्वः । कर्पूरस्य परागः-चूर्ण तद्वत्पाण्डुरम् । अत एव क्षण-
मेघसमीपावस्थानक्षणे । अत्यन्तसंयोगे द्वितीया । क्षणेषु-ताण्डवोत्स-
वेपु । '
निर्व्यापारस्थितौ कालविशेषोत्सवयोः क्षणः' इत्युभयत्राप्यमरः ।
उत्क्षिप्ता-उपरि धारिता-गजेन्द्रस्य कृत्तिः--चर्म येन तेन । 'अजिनं
चर्म कृत्तिः स्त्री' इत्यमरः । भूत्या-भस्मना, सितेन । 'भूविर्भस्मनि
सम्पदि' इत्यमरः । शम्भुना-स्फुटा उपमा-सादृश्यं यस्य तं-स्फुटोपमम् ।
स्फुटशम्भूपममित्यर्थः । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात्समासः। सदृशपर्याययो-
स्तुलोपमाशब्दयोः 'अतुलोपमाभ्याम्-' इति निषेधात्सादृश्यवाचित्वे
तृतीयेत्याहुः । केचिदिमं श्लोकं चयस्त्विषा मित्यतः प्राग्लिखित्वा व्याचक्षते।
तेषां पुंस्त्वावधारणामातंजःपिण्डमात्रस्य शम्भूपमौचित्यं चिन्त्यम् ॥ ४ ॥
[ प्रथमः-- . शिशुपालवधम् । [अन्वयः ] नवान् बृहतः पयोधरान् अंधोधः ( स्थितम् ) समूढकर्पूरपरागपाण्डुरम् क्षणं क्षणोत्क्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना भूति- सितेन शम्भुना स्फुटोपमम् (--अमुंनारद इत्यबोधि सः) [विग्रहः ] कर्पूरस्य परागः-कर्पूरपरागः । समूढश्चासौ कर्पूरपरा- गश्च समूढकर्पूरपरागः-समूढकर्पूरपराग इव पाण्डुरःसमूढकर्पूरपरागपाण्डुरः, तम् । क्षणे उत्क्षिप्ता क्षणोक्षिप्ता । गजेन्द्रस्य कृत्तिः गजेन्द्रकृत्तिः । क्षणो- क्षिप्ता गजेन्द्रकृत्तियेन असौ-क्षणोक्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिः, तेन क्षणोत्क्षिप्त- गजेन्द्रकृत्तिना। स्फुटा उपमा यस्य तं स्फुटोपमम् । भूत्या सितः भूतिसितः, तेन भूतिसितेन । [ अर्थः ] कथम्भूतममुं ? नारद इत्यबोधीत्यत आह- नवानिति । नवान् = नवीनान् । सद्यःसम्भृतजलान् । अतिनीला- निति यावत् । बृहतः = महतः, विपुलान् । पयोधरान् अधोऽधः = मेघानामधोभागे । मेघसमीपाधःप्रदेशे । 'स्थित मिति शेषः । (पुनश्च-) समूढकर्पूरपरागपाण्डुरं = पुञ्जीकृतकपूरचूर्णधवलम्। कर्पूरचूर्णशुभ्रवपुषम् । सुपिष्टकर्पूरचुर्णधवलमिति वा । (सुपिष्टस्य कर्पूरचूर्णस्य नितरां धावल्यं भवतीति लोकविदः) । अतएव क्षणं = क्षणमात्रम् । मेघसमीपावस्थानक्षणे । क्षणोरिक्षप्तगजेन्द्र- कृत्तिना = ताण्डवोत्सवावसरोपरिधारितगजेन्द्रचर्मणा । नृत्यो. त्सवोरिक्षप्तगजराजचर्मणा । भूतिसितेन = भूतिधवलेन । भसित. शुभ्रवपुषा । शम्भुना = शिवेन । स्फुटोपमम् = नितरां सदृशम् । शिवोपमं । शिवसदृशमिति यावत् । (अमुं हरिः क्रमानारद इत्यबोधीति पूर्वेणान्वयः)। [भावार्थः] स्वयं स्वच्छकर्पूरगौरदेहं मेघमण्डलाधः सञ्चर- न्तममुं ताण्डवप्रवृत्तेन भूतिधवलेन ऊर्ध्वक्षिप्तगजचर्मणा भगवता शिवेन सदृशं क्रमान्नारद इत्यबोधि भगवान् श्रीहरिः । मेघ- समीपप्रदेशस्थितिसमये गजचर्मधारिणा शिवेन साम्य- दर सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजिनम् ।। ११ मुद्वहन्तममु स हरिनारदोऽयमायातीति क्रमानिश्चिकायेति यावत् । [ कोशः ] 'समूढः पुञ्जिते भुग्ने' इति विश्वः। ' निर्व्यापारस्थिती कालविशेषोत्सवयोः क्षणः' इत्यमरः । 'अजिनं चर्म कृत्तिः स्त्रीत्यमरः । 'भूतिस्पनि सम्पदि' इत्यमरः । [वाच्यप० ] नवानधोधो बृहतः पयोधरान् समूढकर्पूरपरागपाण्डुरः क्षणं क्षणोत्क्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना भूतिसितेन शम्भुना स्फुटोपमोऽसौ तेन (नारद इत्यबोधि)। [भाषाटीका] पीसे हुए कपूरकी तरह गौरवर्ण नारदजी जब नीले २ मेघों (बादलों) के नीचे पहुंचे उस समय ऐसा मालूम होता था कि-मानों भग- वान् श्रीशङ्कर ही गजचर्म को शिर के ऊपर फैलाकर ताण्डव नृत्य कर रहे हैं । ( क्योंकि शिवाजी भी गौरवर्ण हैं, और नारदजी भी गौर वर्ण हैं। शिवजी का गजचर्म भी काला है तो मेघ भी काले हैं। नारदजी चल रहे हैं तो ताण्डव नृत्य के समय शिवजी भी तेजी से चलते-फिरते हैं, अतः नारदजी की शिवजी से उपमा ठीक ही है।) इस प्रकार शिवजी की तरह प्रतीत होते हुए नारदजी को भगवान ने पहिचाना ॥ ४ ॥ दधानमम्भोरुहकेसरद्युती- र्जटाः शरच्चन्द्रमरीचिरोचिषम् । विपाकपिंगास्तुहिनस्थलीरहो धराधरेन्द्र व्रततीततीरिव ॥ ५ ॥ [ सर्वकषा ] दधानमिति । पुनः-अम्भोरुहकेसरद्यु तीः पद्मकिञ्जल्कप्रभापिशङ्गीरित्यर्थः । जटा दधानम् । स्वयं तु-शरच्चन्द्रम- रीचिरिव रोचिर्यस्य तम् । धवलमित्यर्थः । अत एव-विपाकेन-परि- णामेन, पिङ्गाः-पिङ्गलास्तुहिनस्थल्यां-तुषारभूमौ रोहन्तीति तुहिनस्थ- लीरुहः । व्रततीतती:-लताब्यूहान् । 'वल्ली तु व्रतती लता' इत्यमरः ।
शिशुपालवधम् । [प्रथम:- दधानं-धराधरेन्द्रो-हिमवान् । 'तुहिनस्थली'ति लिङ्गानारदोपमान- त्वाच्च । तमिव स्थितम् ॥५॥ - - [अन्वयः ] अम्भोरुहकेसरद्यु तीः जटाः दधानम् शरच्चन्द्र- मरीचिरोचिषम् (अत एव-) विपाकपिङ्गाःतुहिनस्थलीरुहवतती- तती दधानम् धराधरेन्द्रमिव (स्थितम्- अमुं नारद इत्यबोधि। [विग्रहः] अम्भसि रोहन्तीति अम्भोरुहाणि, अम्भोरहाणां केसराणि- अम्भोरुहकेसराणि, अम्भोरुहकेसराणां द्युतिरिव द्युतिर्यासान्ताः-अम्भोरुह- केसरद्युतयः, ताः-अम्भोरुहकेसरद्युतीः । शरदः चन्द्रः-शरच्चन्द्रः। शरच्चन्द्रस्य मरीचय:-शरच्चन्द्रमरीचयः, शरच्चन्द्रमरीचय इव रोचिर्यस्य स-शरच्चन्द्र- मरीचिरोचिः, तं-शरच्चन्द्रमरीचिरोचिषम् । विपाकेन पिङ्गाः-विपाकपिङ्गाः- ताः । तुहिनस्य स्थल्यः तुहिनस्थल्यः, तुहिनस्थल्यां रोहन्तीति-तुहिन- स्थलीरुहः, ता:-तुहिनस्थलीरुहः। ब्रततीनां ततयः-व्रततीततयः, ता:-व्रत- तीततीः । धरन्तीति धराः, धराया धराः -धराधराः । धराधराणामिन्द्रः- धराधरेन्द्रः, तम्-धराधरेन्द्रम् । [अर्थः] अम्भोरुहकेसरधु तीः = पद्मकिञ्जल्कप्रभापिशङ्ग- वर्णाः। कमलकेसरसदृशपीतवर्णाः । जटाः = सटाः। केश- भारम् । दधानं = धारयन्तम् । (स्वयन्तु-) शरच्चन्द्रमरीचिरो- विष = शरदिन्दुकान्तिधवलम् । (अतएव-) विपाकपिङ्गाः परिणामपिङ्गलाः। परिपाकपिङ्गलाः । तुहिनस्थलीरुहः = हिम- प्रदेशप्रभवाः । व्रततीतती = लतासंहतीः । लतासमूहान् । दधानं धारयन्तम् । धराधरेन्द्रमिव-हिमवन्तमिव-(स्थित- ममुं हरिनारद इत्यबोधीति पूर्वेणान्वयः)। [भावार्थः] पिङ्गलजटाभारपरिशोभितं धवलवर्णममुं- हिमस्थलीसमुद्भूतपरिपाकपिङ्गललतासन्तानधारिणं हिमवन्तमिव विभाव्यमान-नारद क्रमादबोधि सः। - - - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सवङ्कषा-विराजितम् । १३. तु [कोशः] 'किअल्कः केसरोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । 'जटाः सटाः' इत्यमरः । 'रोचिः शोचिरुभे क्लीबे इत्यमरः । 'वल्ली व्रतती लता' इत्यमरः। [वाच्यप० •] अम्भोरुहकेसरद्युतीर्जटा दधानः शरच्चन्द्रमरीचिरोचिः विपाकपिङ्गास्तुहिनस्थलील्हो व्रततीततीर्दधानो धराधरेन्द्र इव स्थितः [भाषाटीका ] कमल के केसर की तरह पीली जटाओं को धारण किए हुए ( स्वयं शरत्कालिक चन्द्रमा की तरह स्वच्छ वर्ण) वे नारदजी ऐसे प्रतीत होते थे मानों पक जाने पर पीली पड़ी हुई (सुनहरी ), लताओं के समूह से शोभित हिमाचल ही हो ॥ ५ ॥ अबोधि । . पिशङ्गमौजीयुजमर्जुनच्छवि वसानमेणाजिनमञ्जनद्युति । सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बरां विडम्बयन्तं शितिवाससस्तनुम् ॥ ६ ॥ [ सर्वकषा ] पिशङ्गति ॥ पुनः कीदृशम् ? मुजस्तृणविशेषः, तन्मयी मेखला मौजी, पिशङ्गया मौज्या युज्यते इति पिशङ्गमौञ्जीयुक 'तम् । सत्सूद्विष-' इत्यादिना विप् । 'स्त्रियाः पुंवत्-' इति पिशङ्गशब्दस्य पुंवद्भावः । अर्जुनच्छवि-धवलकान्तिम् । 'वलक्षो धवलोऽर्जुनः इत्यमरः । अञ्जना ति-अञ्जनवर्णम् । एणाजिनं-कृष्णमृगचर्म, वसानम् आच्छादयन्तम् । 'वस आच्छादने' इति धातोः शानच् । सुवर्णसूत्रण- कनकमेखलया-आकलितं-बद्धम् , अधराम्बरमन्तरीयकं यस्यास्तां। शितिवाससः-नीलाम्बरस्य रामस्या, तनु विडम्बयन्तम् । अनु- कुर्वाणमित्यर्थः । आर्थीयमुपमा ॥ ६ ॥ [अन्वयः ] पिशङ्गमौञ्जीयुजम् अर्जुनच्छविम् अञ्जना ति एणाजिनम् वसानम् (अतएव) सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बराम् शितिवाससः तनुम् विडम्बयन्तम् (अमुं नारद इत्यबोधि)।
१४ शिशुपालवधम् । [प्रथमः - - [विग्रहः ]-मुञ्जस्य विकारो मौजी । पिशङ्गी चासौ मौञ्जी च पिशङ्गमौजी, पिशङ्गसौञ्ज्या युज्यते इति पिशङ्गमौजीयुक् , तं-पिशङ्ग- मौजीयुजम् । अर्जुना छविर्यस्य स अर्जुनच्छविः, तम्-अर्जुनच्छविम् । एणस्य अजिनम् एणाजिनम्, तत्-एणाजिनम् । अञ्जनस्य द्युतिरिव धुतिर्यस्य तत्-अञ्जनश्रुति । सुवर्णस्य सूत्रं-सुवर्णसूत्रम् । सुवर्णसूत्रेण आकलितं सुवर्णसूत्राकलितं, सुवर्णसूत्राकलितम् अधराम्बरं यस्याः सा सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बरा, ताम्-सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बराम् । शिति वासः यस्य स शितिवासाः तस्य-शितिवाससः । [अर्थः ] पिशङ्गमौञ्जीयुजम् = पिङ्गलवणमुञ्जमेखलाधरम् । स्वर्णवर्णमुञ्जमेखलाधारिणम् । (पुनश्च स्वयम्-) अर्जुनच्छविं धवलकान्ति । कर्पूरगौरम् । (किञ्च-) अञ्जना ति = नीला. ञ्जनच्छवि । श्लक्ष्णनीलाञ्जनरोचिः । एणाजिनं = मृगचर्म । वसानं = दधतम् । आच्छादयन्तम् । परिदधानम् । (अतएव-) सुवर्णसूत्राकलिताऽधराम्बरा = कनकनेख लासन्दानितान्तरीयव सनाम् । शितिवाससः = नीलाम्बरस्य । भगवतो बलभद्रस्य । तनु शरीरम् । विडम्बयन्तम् = अनुकुर्वाणम् । (-अमु नारद इत्यबोधि हरिरिति पूर्वेणान्वयः)। [भावार्थः] पिङ्गलमौञ्जीयुजं कर्पूरगौरं किञ्च मृगचर्म वसानं सुवर्ण मेखलापरिबद्धनीलाम्बरधारिणो बलभद्रस्य षपुरनुकुर्वाण- ममुं नारदं शनैर्हरिरबोधि । [ कोशः ] 'कडारः कपिलः पिङ्गपिशङ्गो कद्रुपिङ्गलौ' इत्यमरः । 'वलक्षो धवलोऽर्जुनः' इत्यमरः । 'अजिनं चर्म कृत्तिः स्त्री. त्यमरः । 'नौलाम्बरो रौहिणेयस्तालाङ्को मुसली हली' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] पिशङ्गमौजीयुक् अर्जुनच्छवि: अञ्जमद्युति एणाजिनं 'वसानः सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बरां शितिवाससः तनुं विडम्बयन् (स नारद इति तेन अबोंधि.)। . ..
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । १५ [ भाषाटीका ] मूंजकी बनी हुई पीली मेखला ( 'करधनी' 'तागडी) को कमर में लपेटे हुए, तथा काले मृग की छाल को धोती की तरह बान्धे गौर वर्ण श्रीनारदजी ऐसे मालूम होते थे सानो-सोने की मेखला से नीले रंग के कौशेय (पिताम्बर मुकटा) को बान्धे ( पहिने) हुए भगवान् बलदाऊजी ही चले आ रहे हों । (-ऐसे नारदजी को भगवान् ने पहिचाना)॥६॥ विहङ्गाराजाङ्गरहैरिवायतै- हिरण्मयोविल्लितन्तुभिः । कृतोपवीतं हिमशुभ्रमुच्चकै- घनं घनान्ते तडिताङ्गणैरिव ॥ ७ ॥ [सर्वकषा] विहङ्गेति । पुनः-विहङ्गराजाङ्गरहेरिव-गरुत्मल्लोम- तुल्यैः। आयतैः-दीधैः । हिरण्यस्य विकारो हिरण्मयी । 'दाण्डिनायन-' इत्यादिना मयटि यलोपनिपातः । तस्याम्-उयां रुहा रूढाः। इगुपधलक्षणः कंप्रत्ययः । तासां वल्लीनां तन्तुभिः-तत्तुल्यैः सूक्ष्मावयवैः। उपादानगुणात् हिरण्मयैः। कृतोपवीतं शोभार्थं कल्पितयज्ञसूत्रं स्वयं हिसशुभ्रम् । अतएव धना ते शरदि तडिताङ्गणरूपलक्षितम्। 'तडिल्सौदामनी विद्युत्' इत्यमरः। उच्चैरेवोच्चकैः-उन्नतं । धन-मेघमिव स्थितम् ॥ ७ ॥ [अन्वयः] विहङ्गराजाङ्गरहैः इव आयतैः हिरण्मयोर्वीरुह- वल्लितन्तुभिः कृतोपवीतम् हिमशुभ्रम् धनान्ते तडितां गणैः (उपलक्षितम् ) उच्चकैः घनम् इव ( स्थितम् अमुमबोधि)। [विग्रहः ] विहायसा गच्छन्तीति विहङ्गाः । विहङ्गानां राजा विहङ्ग- राजः । विहङ्गराजस्य अङ्गहा:-विहङ्गराजाङ्गरुहाः, तैः-विहङ्गराजाङ्ग- रुहैः। हिरण्यस्य विकारः-हिरण्मयी, हिरण्मयी चासौ उर्वी च हिरण्म- योर्वी, हिरण्मयोया (रोहन्तीति) रुहा:-हिरण्मयोर्वीरुहाः, ताश्चता वल्लयश्च हिरण्मयोर्वीरुहवल्लयः, हिरण्मयो/रुहक्लीनां तन्तवः, तैः हिरण्मयोर्वीरुह-
१६
शिशुपालवधम् ।
[प्रथमः-
।
वल्लितन्तुभिः । कृत उपवीतो येन सः कृतोपवीतः, तं कृतोपवीतम् । हिम-
मिव शुभ्रः, हिमशुभ्रः-तम् । घनानाम् अन्तः-धनान्तस्तस्मिन्-धनान्ते ।
[अर्थः] विहङ्गराजाङ्गरहैरिवगरुडतनूरुहैरिव । गरुड-
लोमभिरिव । आयतैः-दीधैः । प्रलम्बैः । हिरण्मयोर्वीरुहवल्ली-
तन्तुभिः सुवर्णमयधरित्रीसमुद्भूतलतातन्तुभिः । सुमेरुसमु.
द्भूतलतातन्तुभिः। सुमेरुसमुद्भुतसुवर्णमयपादपलताप्रतानैः ।
कृतोपवीतं कल्पितयज्ञसूत्रम् । विरचितयज्ञसूत्रशोभितम् ।
(स्वयञ्च-) हिमशुभ्रम् = तुषारधवलम् । कर्पूरगौरम् ।
(अतएव-) घनान्ते= मेघापगमे । शरदृतौ । तडितां विद्यु ।
ताम् । गणैः-समूहैः । पंक्तिभिः। (-उपलक्षितम्-विराजित)
उच्चकैः-महोन्नतम् । घनं-मेघमिव, (-स्थितम्-) अमुंस
नारद इत्यबोधीति पूर्वेणान्वयः।
[भावार्थः] गरुडकेशप्रलम्बैः सुवर्णमयदिव्यप्रदेशोद्भुतैः
कनकलतासूत्रैविरचितयज्ञोपवीतं कर्पूरावदातदेहं भगवन्तं नारद
विद्युद्गणविराजितशारदाभ्रमिव शोभमानं वासुदेवः क्रमाद-
बोधि।
[कोशः ] 'वल्ली तु व्रततिलता' इत्यमरः । 'तडित्सौदामनी विद्युत्'
इत्यमरः । 'तुषारस्तुहिनं हिमम्' इत्यमरः ।
[वाच्यव०] विहङ्गराजाङ्गरहैरिवायतैर्हिरण्मयोर्वीरुहवल्लितन्तुभिः
कृतोपवीतः हिमशुभ्रः धनान्ते तडितां गणैः ( उपलक्षितः ) उच्चकैः धन
इव (स्थितः स तेन नारद इत्यबोधि)।
[भाषाटीका] बर्फ की तरह सफेद शरीर वाले वे नारदजी-सुमेरु
पर्वत पर होने वाली वृक्षों की लवाओं के सुनहरे लम्बे २ तन्तुओं से
बनाई हुई जनेऊ पहिने हुए थे, अतः बिजली के समूह से शोभित शरद्
अतु के मेघों की तरह वे मालूम होते थे। (शरत्काल का मेष सफेद
होता है और नारदजी भी सफेद हैं)। ऐसे नारदजी को भगवान् ने.
पहचाना॥ ७॥
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । - , निसर्गचित्रोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा लसद्धि सच्छेदसितांगसंगिना । चकासतं चारुचमूरुचर्मणा कुथेन नागेन्द्रभिवेन्द्रवाहनम् ॥ ८ ॥ [ सर्वाङ्कषा ] निसर्गेति । पुनः निसर्गात्स्वभावादेव चित्राणि शब- लानि-उज्ज्वलानि-भास्वराणि सूक्ष्माणि पक्ष्माणि-लोमानि यस्य- तेन । लसन्-यो बिसच्छेदः-मृणालखण्डः । 'छेदः खण्डोऽस्त्रियाम्' इति त्रिकाण्डशेपः। तद्वत्सिते-अङ्गे वपुषि सङ्गिना-सक्तन । चारुणा- मनोहरेण, चमूरुचर्मणा-मृगत्वचा, कुथेन-पृष्ठास्तरणेन । 'प्रवेण्यास्त- रणं वर्णः परिस्तोमः कुथो द्वयोः' इत्यमरः। इन्द्रवाहनं नागेन्द्रमैराबतमिद चकासतं-शोभमानम् । इन्द्रस्य वाहनमिति स्वस्वामिभावमात्रस्थ विवक्षितत्वात् 'वाहनमाहितात्' इति न णत्वम् । यथाह वामनः-'नेन्द्र- वाहनशब्दे णत्वमाहितत्वस्थाविवक्षितत्वात्' इति । चकासतेः शतरि 'नाभ्यस्ताच्छतुः' इति नुमभावः । 'जक्षित्यादयः षट् इत्यभ्यस्तसंज्ञा ॥८॥ [अन्वयः] निसर्गचित्रोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा लसद्विसच्छेद सिताङ्गसङ्गिना चार चमूरुचर्मणा कुथेन इन्द्रवाहनम् नागेन्द्रमिव चकासतम्-(अमुसः क्रमान्नारद इत्यबोधि)। [विग्रहः ] चित्राणि च उज्ज्वलानि च सूक्ष्माणि च चिन्नोज्ज्वल- सूक्ष्माणि । निसर्गेण चित्रोज्ज्वलसूक्ष्माणि पश्माणि यस्य तत्-निसर्ग- चित्रोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्म, तेन निसर्गचित्रोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा । लसंश्वास.- बिसच्छेदश्च लसद्दिसच्छेदः, लसद्दिसच्छेद इव सितम् लसद्बिसच्छेद- सितं, लसद्दिलच्छेदसितञ्च तदङ्गञ्च लसद्दिसच्छेदसिताङ्गम्, तत्र संगि- तेन-लसद्दिसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना । चमूरोः चर्म चमूरुचर्म, चारु च तत् चमूरुचर्म च चारुचमूरुचर्म, तेन-चारुचमूरुचर्मणा । इन्द्रस्य वाहनम् इन्द्रवाहनम्, तत्तथाभूतम् । नागानामिन्द्रो नागेन्द्रस्तं नागेन्द्रम् । . २ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः - [अर्थः] निसर्गचित्रोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा = सहजविचित्र- भास्वरसूक्ष्ममृदुलोमपरिवृतेन । स्वभावोज्ज्वलविचित्रवर्णरोम- राजिविराजितेन । लसद्विसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना = भास्वरमृणाल खण्डधवलस्वाङ्गसंसक्तन । चारुचमूरुचर्मणा = मृदुकमनीयतम- पराय॑मृगविशेषचर्मणा। कुथेन = पृष्ठास्तरणेन । इन्द्रवाहनं महेन्द्रवाहनं । नागेन्द्रमिव = गजराजमैरावतमिव-चकासतं शोभमानम्। (अनारद इति क्रमाबोधि सः)। [ भावार्थः] विचित्रवर्णमृदुतममृगचर्मणा परिवृतम्-अत एव नानवर्णकमनीयकुथास्तृतमहेन्द्रनागेन्द्रमिव शोभमानममु नारदमबोधि शनकैभगवान् वासुदेवः । [कोशः ] 'स्वरूपञ्च स्वभावश्च निसर्गश्चेत्यमरः । 'पक्ष्म सूत्रादि- सूक्ष्मांशे किअल्के नेत्रलोभनि' इति विश्वः। 'छेदः खण्डोऽस्त्रिया इति त्रिकाण्डशेषः। 'प्रवेण्यास्तरणं वर्णः परिस्तोमः कुथोद्वयोः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] निसर्गचित्रोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा लमबिसच्छेदसिताङ्ग- सङ्गिना चारुचमूरुचर्मणा कुथेन इन्द्रवाहनं नागेन्द्र इव चकासत् (स अबोधि) [ भाषा टीका ] अपने गोरे गोरे शरीर पर विचित्रवर्ण के चमूरुनामक मृग की बढिया चर्म (मृगछाला) को धारण किए हुए दे नारदजी-जाना- वर्ण की मनोहर झूल से शोभित ऐरावत हाथी की तरह-मालम होते थे॥८॥ अजस्रमास्फालितवल्लकीगुण- क्षतोज्ज्वलांगुष्ठनखांशुभिन्नया । पुरः प्रवालैरिव पूरिताऽर्धया विभान्तमच्छस्फटिकाक्षमालया ॥ ९ ॥ [ सर्वकषा ] अजस्रमिति । पुनः~अजस्र-प्राचुर्येण-आस्फा- लिताः-ताडिताः । सौष्ठवपरीक्षार्थं न्युब्जांगुष्ठेन तन्त्रीताडनं प्रसिद्धम् । क्षेषां वल्लकीगुणानां-वीणातन्त्रीणां क्षतन-संघर्षणेनोज्ज्वलैरंगुष्ठ- सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वषा-विराजितम् । १६ . नखांशुभिभिन्नया-मिश्रया। तदागरक्तयेत्यर्थः । अत एव पुरः- पुरोभागे, प्रवालैर्विद्रुमैः। 'अथ विद्रुमः पुंसि प्रवालं नपुंसकम्' इत्य- मरः । पूरितार्धयेव-स्थितया । अच्छस्फटिकाक्षमालया-स्वच्छ- स्फटिकानां मालया । जपमालयेत्यर्थः । 'अच्छो भल्लूके स्फटिकेऽमलेच्छा- भिमुखे ऽव्ययम्' इति हेमचन्द्रः । तथा प्रसिद्धस्फटिकग्रहणादृषेमोक्षार्थित्वं व्यज्यते। 'स्फटिको मोक्षदः परम्' इति मोक्षार्थिनां स्फटिकाक्षमालाभि- धानात् । विमान्तंभासमानम् । भातेः शतृप्रत्ययः । अत्र 'नखांशु- भिन्नयति स्वगुणल्यागेनान्यगुणस्वीकारलक्षणस्तद्गुणालङ्कार उक्तः । 'तद्गुणः स्वगुणत्यागात् ।' इति ॥ ९ ॥ [अन्वयः ] अजस्रम् आस्फालितवल्लकीगुणक्षतोज्ज्वलाङ्गुष्ठ- नखांशुभिन्नया पुरः प्रवालैः पूरितार्धया इव अच्छस्फटिकाक्ष- मालया विभान्तम्-(अनारद इत्यबोधि सः)। [विग्रहः ] अगुष्ठस्य लखम्-अङ्गुष्ठनखम् । अङ्गुष्टनखस्य अंशवः- अंगुष्टनखांशवः । वल्लक्याः गुणाः वल्लकीगुणाः। आस्फलिताश्च ते वल्लकी- गुणाश्च-अस्फालितवल्लकीगुणाः आस्फालितवल्लकीगुणानां--( गुणैर्वा ) क्षतम्-आस्फालितवल्लकीगुणक्षतम्, तेन उज्ज्वलाश्च ते अंगुष्ठनखांशवश्च आस्फालितवल्लकीगुणक्षतोज्ज्वलांगुष्टनखांशवः, तैः भिन्ना, तथा-आस्फा- लितवल्लकीगुणक्षतोज्ज्वलांगुष्टनखांशुभिन्नया । यूरितम् अर्ध यस्याः 'पूरितार्धा, तथा पूरितार्धया । स्फटिकस्य अक्षमाला स्फटिकाक्षमाला, अच्छा चासो स्फटिकाक्षमाला च अच्छस्फटिकाक्षमाला, तया-अच्छ- स्फटिकाक्षसालया। [अर्थः] अजस्र = निरन्तरं। मुहुमुहुः। आस्फालित. वल्ल कीगुणक्षतोज्ज्वलांगुष्ठनखांशुभिन्नया = परिवादितस्ववीणात- न्त्रीसंघर्षणोज्ज्वलांगुष्ठकररुहकिरणसम्पृक्तया । वीणातन्त्रीताडन- घर्षणोज्ज्वलनखांशुरागरक्तयेति यावत् । अतएव-)पुरः = पुरोभागे। अग्रभागे। प्रवालैः विद्र मैः। पूरिताद्धयेव गुम्फितार्धभागयेव -विभाव्यमानया । अच्छस्फटिकाक्षमालया सा २० m शिशुपालवजम् । [१ प्रथम स्वच्छरफटिकमणिमालया। विभान्तं = भासमानम् । शोभ- मानम् । (अमु नारद इति हरिः क्रमादबोधि)। [ भावार्थः ] तन्त्रीताडनरक्तांगुष्ठनखकिरणप्रभारागरक्तया पुरः प्रवालपूरितयेवाऽक्षमालया शोभमानम्-(अमु नारद इत्यबोधि स इति पूर्वेणान्वयः)। [ कोशः] 'सततानारताश्रान्तसन्तताविरतानिशम्' इत्यमरः । 'किरणोत्रमयूखांशुगभस्तिधृणिरश्मयः' इत्यमरः । 'अथ विद्रुमः पुंसि प्रवालं पुनपुंसकम्' इत्यमरः । 'अच्छो भल्लके स्फटिकेऽमले ऽच्छाऽभिमुखेव्ययम्" इति हैमः। [वाच्यप.] ...भिन्नया अच्छस्फटिकालमालया विभान् स अबोधि। [भाषाटीका] निरन्तर अपनी वीणा के तारों के बजाने (घर्षण से अधिक लाल रंगवाले अपने अंगूठे के नख की लाल रंग की प्रभा से जिस माला के मणि कुछ दूर तक लाल रंग के हो जाने से मूंगे की तरह मालूम होते हैं-ऐसी स्वच्छ स्फटिक की माला को हाथ में लिए हुए नारदजी को भगवान् ने पहिचाना ॥९॥ रणद्भिराघट्टनया नभस्वतः पृथग्विभिन्नश्रतिमण्डलैः स्वरैः । स्फुटीभवद्ग्रामविशेषमूर्च्छना- मवेक्षमाणं महतीं मुहुमुहुः ॥ १० ॥ [ सर्वकषा ] रणद्भिरिति। पुनः-नभस्वतः-वायोः, आघट्टनया- आवातेन, पृथग-असंकीणं, रणद्भिः-ध्वनद्भिः। अनुरणनोत्पद्यमानैरि- त्यर्थः । 'श्रुत्यारब्धमनुरणनं स्वरः' इति लक्षणात् । तदुक्तं रत्नाकरे- श्रुत्यनन्तरभावी यः स्निग्धोऽनुरणनात्मकः । स्वनो रञ्जयति श्रोतुश्चित्तं स स्वर उच्यते ॥ इति । श्रुति म स्वरारम्भकावयवः शब्दविशेषः। तदु- तम्-'प्रथमश्रवणाच्छब्दः श्रूयते हृस्वमात्रकः । सा श्रुतिः संपरिक्षया स्वरावयवलक्षणा ॥ इति ।
सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजित म् । विभिन्नानि-प्रतिनियतसंख्यया व्यवस्थितानि, श्रुतीनां मण्डलानि- समूहा येषां तैविभिन्नश्रुतिमण्डलैः । श्रुतिसंख्यानियसश्च दर्शित:- 'चतुश्चतुश्चतुश्चैव षड्जमध्यमपञ्चमाः । द्वे द्वे निषादगान्धारौ त्रिस्त्रिषभ- धैवतौ ॥ षड्जादयः सप्तोक्तलक्षणाः । तदुक्तम्---'श्रुतिभ्यः स्युः स्वराः पड्जषेभगान्धारमध्यमाः । पञ्चमो धैवतश्चाथ निषाद इति सप्त ते। तेषां संज्ञाः सरिगमपधनीत्यपरा मताः ॥” इति । तैः स्वर:-स्फुटीभवन्त्यो प्रामविशेषाणांषड्जाद्यपरनामकानां स्वरसंघातभेदानां त्रयाणांमूर्च्छना: स्वरारोहावरोहक्रमभेदा यस्यां तां । महती-महतीनाम्नी निजवीणाम् । 'विश्वावसोस्तु बृहती, तुम्बुरोस्तु कलावती । महती नारदस्य स्यात्सरस्व- न्यास्तु कच्छपी ॥” इति वैजयन्ती । मुहुर्मुहुरवेक्षमाणम् । तन्त्री योजना- भेदलक्षणमहिन्ना पुरुषप्रयत्नमन्तरेणैवाऽविसंवादं ध्बनतीति कौतुकादनुस- न्दधानमित्यर्थः ': । अथ ग्रासलक्षणम् यथा कुटुम्बिनः सर्वेऽप्येकीभूता भवन्ति हि । तथा स्वराणां सन्दोहो ‘ग्राम ' इत्यभिधीयते ॥ षड्जग्रामो भवेदादी मध्यसग्राम एव च। गान्धारग्राम इत्येतद्ग्रामत्रयमुदाहृतम् ॥' इति । तथा-'नन्द्यावर्तोऽथ जीमूतः सुभद्रो ग्रामकास्त्रयः । षड्जमध्यम- गान्धारास्त्रयाणां जन्महेतवः ॥' इति । मूर्च्छनालक्षणं च-'क्रमात्स्वराणां सप्तानामारोहश्चावरोहणम् । सा मूर्च्छत्युच्यते ग्रामस्था एताः सप्त सप्त च ॥ ग्रामत्रयेऽपि प्रत्येकं सप्त सप्त मूर्छना इत्येकविंशतिर्मूर्छना भवन्ति । तत्रेह नामानि तु ' नानपेक्षितमुच्यते । इति प्रतिज्ञाभङ्गभयान्न लिख्यन्ते इति सर्वमवदातम् । अत्र पंव्यापारमन्तरेण स्वराद्याविर्भावोत्त्या कोऽपि लोका- तिक्रान्तोऽयं शिल्पसौष्ठवातिशयो वीणायाः प्रतीयते । तेन सह स्वतः प्रसिद्धातिशयस्याऽभेदेनाध्यवसितत्वात्तन्मूलातिशयोक्तिरलङ्कारः । -सा च महत्याः पुंव्यापारं विना मूर्छाद्यसम्बन्धेऽपि सम्बन्धाभिधानादसम्बन्धे सम्बन्धरूपतया पुव्यापाराख्यरूपकारणं विनापि मूर्च्छनादिकार्योत्पत्तिद्योत नाद्विभावना व्यज्यत इत्यलङ्कारध्वनिरिति संक्षेपः ॥१०॥ [ अन्वयः ] नभस्वतः आघट्टनया पृथग् रणद्भिः विभिन्न- श्रुतिमण्डलैः स्वरैः स्फुटीभवद्बामविशेषमूर्च्छनां महतीं मुहुः मुहुः अवेक्षमाणम् । (-क्रमादनु नारद इत्यबोधि सः ।
२२ शिशुपालवधम् [ प्रथमः- - - were - अव- विग्रहः ] श्रुतीनां मण्डलानि श्रुतिमण्डलानि विभिन्नानि श्रुतिमण्डलानि येषां ते—विभिन्नश्रुतिमण्डलाः, तैः विभिन्न श्रुतिमण्डलैः । स्फुटीभवन्त्यः ग्रामविशेषाणां मूर्च्छनाः यस्यां सा - स्फुटीभवग्राम- विशेषमूर्च्छना, दाम् - स्फुटीभवद्भामविशेषमृळूनाम् । [अर्थः] नभस्वतः = वातस्य । पवमानस्य । आघट्टनया समाघातेन । तत्कृतेन ताडनेन । पृथक् = विस्पष्टम् । असंमिश्र यथा स्यात्तथा । रणद्भिः = ध्वद्भिः । अनुरणनोत्पद्यमानः । विभिन्नश्रुतिमण्डलैः = प्रतिनियतसङ्ख्यया व्यवस्थितविभिन्नश्रुति- समूहसमुद्भूतैः । स्वरैः = स-रि-ग-म प-ध नि- इत्येवं लोके प्रसिद्धैः षड्जादिभिः सप्तभिः स्वरैः। स्फुटीभवद्रामविशेपमूर्च्छ- नाम् = व्यक्तीभवत्स्वरसन्दोहरूपग्रामविशेपारोहावरोहात्मकमूर्छ नामनोहराम् । महती = महतीनाम्नी स्वकीयां वीणाम् । मुहमुहुः = वार वारम् । भृशम । अवेक्षमाण = विभावयन्तम। लोकमानम् । पश्यन्तम् । ( अमुं नारद इति हरिरबोधीति पूर्वेणान्वयः)। [भावार्थः] पवनाघातोद्भुतसुस्पष्टश्रुत्यात्मकस्वरारम्भकशब्द- समूह विशेषोत्पन्नः सरिगमादिभिः सप्तभिः स्वरैः स्फुटीभवत्स्वर- सन्दोहारोहावरोहां महतीनाम्नी स्ववीणां कौतुकान्मुहुर्मुहुरव- लोकयन्तं नारदं क्रमादबोधि भगवान् श्रीकृष्णः । [ कौशः] ‘विश्वावसोस्तु बृहती नुम्बुरोस्तु कलावती । महनी नारदस्य स्यात्सरस्वत्यास्तु कच्छपी ' इति वैजयन्ती। [वाच्यप० ] नभस्वत आधटनया पृथक् रणद्भिः श्रुतिमण्डलैः स्वरैः स्फुटीभवद्धामविशेषमूर्छनां महतीं मुहुर्मुहुरवेक्षमाणः ( असौ अबोधि )। [ भाषाटीका ] वायु के आघात से उत्पन्न हुई जो श्रुतियां ( मधुर झनझनाहट) उन से उत्पन्न जो स-रि-ग-म-प-ध-नि-ये सात स्वर [जिन स्वरों की श्रुतियों के मण्डल यथाक्रम व्यवस्थित है, तथा जिन म्बरों के ग्रामों (समूहों) की मुर्छना ( उतार चढ़ाव ) भी ] जिसमें अपने आ सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ही स्पष्ट हो रही है-ऐसी महत' नामक अपनी वीणा को वारंवार देखते हुए श्रीनारदजी को भगवान् ने पहिचाना ॥ १० ॥ निवर्त्य सोऽनुव्रजतः कृतानती- नतीन्द्रियज्ञाननिधिभासदः। समासदत्सादितदैत्यसंपदः पदं महेन्द्रालयचारु चक्रिणः ॥ ११ ॥ [ सर्वकषा] निवर्येति । अतीन्द्रिया इन्द्रियमतिक्रान्ता देशकाल- स्वरूपाहिप्रकृष्टार्थाः । 'अत्यादयः कान्तायर्थे द्वितीयया' इति समासः । 'हिगुमासापन्नालंपूर्वगतिसमासेषु परवलिङ्गताप्रतिषेधो वक्तव्यः' इति विशे- प्यलिङ्गन्यम् । तेषां ज्ञानं तस्य निधिः । सर्वार्थद्रष्टेत्यर्थः । कृतानतीन्- कृतप्रणासान् । अनुव्रजतः-अनुगच्छतः । नभसि-आकाशे सीदन्ति- गच्छन्तोनि-नभःसदः-सुरान् । 'सत्सूद्विष--' इत्यादिना विप । निवर्त्य- प्रतिषिय । सः-मुनिः । सादितदैत्यसंपदः-सादिताःविध्वस्तीकृताः दत्यानां संपदो येन तस्य, चक्रिणः-कृष्णस्य, पद-स्थानं, महेन्द्रालय चारु-इन्द्रभवनमिव भासमान, समासदत । समापूर्वात्षद्धातोर्लुङ्। 'पुषादि-' इत्यङ् । अत्र 'नतीनती' 'पदःपद'मिति च द्वयोर्व्यञ्जनयुग्स- योरसकृदावृत्या छेकानुप्रासः । अन्यत्र वृत्त्यनुप्रास इत्यनयोः संसृष्टिः ।।११॥ [अन्वयः] अतीन्द्रियज्ञाननिधिः कृतानतीन अनुजव्रतः नभःसदः निवर्त्य सः सादितदैत्यसम्पदः चक्रिणः महेन्द्रालयचारु पदं समासदत् ।। [विग्रहः ] इन्द्रियमतिक्रान्ताः अतीन्द्रियाः, अतीन्द्रियाणां ज्ञानम्- अतीन्द्रियज्ञानम् , अतीन्द्रियज्ञानस्य निधिः-अतीन्द्रियज्ञाननिधिः । कृता आनतयो यस्ते कृतानयतः तान् कृतानतीन् । नभसि सीदन्तीति नमः सः, तान्नभःसदः । दैत्यानां सम्पदो-दैत्यसम्पदः, सादिता दैत्यसम्पदो- सौ-सादितदैत्यसम्पत्, तस्य-सादितदैत्यसम्पदः । महेन्द्रस्य आलयः महेन्दालयः, महेन्द्रालय इव चारु महेन्द्रालयचारु, तत्तथाभूतम् ।
४ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः . - - : . [अर्थः] अतीन्द्रियज्ञाननिधिः चक्षुरादीन्द्रियाऽगोचर पदार्थतत्त्वज्ञानविशारदः । ब्रह्मसाक्षात्कारवान् । योगी । प्रतीतानागतवेत्ता च । सः = ब्रह्मपुत्रो नारदः । कृतानतीन = कृतप्रणामान् । कृतसपर्यान् । नम्रान् वा । अनुव्रजतः = अनु. च्छितः । नभःसदः = इन्द्रादिदेवान् । निवर्त्य = परावर्त्य । (स निः) सादितदैत्यसम्पदः = दैत्यकुलराजलक्ष्मीहरणपरायणस्य । वनाशितहिरण्यकशिपुहिरण्याक्षादिदैत्यसम्पदः । चक्रिणः वक्रायुधस्य श्रीविष्णा कृष्णस्वामहेन्द्रालयचार-इन्द्रभवनमनोहरं। महेन्द्रभवनशोभातिशायि । पदं = भवनम् । स्थानम् । समासदत् प्रापत् । समाससाद । आजगाम । [भावार्थः] कृतोचितसत्काराननुगच्छतो देवानिवर्त्य भग- न् नारदो महेन्द्रभवनातिशायि श्रीकृष्णभवनमाजगाम । [ कोशः ] ' चक्री कोके कुलालेऽही बैकुण्ठे चक्रवत्तिनि । इति हैमः । [ वाच्यप० ] अतीन्द्रियज्ञाननिधिना तेन कृतानतीन् अनुव्रजतः नम:- ग्दः निवर्त्य सादितदैत्यसम्पदः चक्रिणः महेन्द्रालयचार पदं समासादि । [ भाषाटीका ] जिन्होंने बड़ी श्रद्धा से पूजा व सत्कार किया है ऐसे अपने पीछे २ आते हुए) देवताओं को वापिस स्वर्ग को लौटाकर श्रीनारद नि इन्द्र के भवन से भी श्रेष्ठ श्रीकृष्णभगवान् के स्थान पर पधारे ॥११॥ पतत्पतङ्गप्रतिमस्तपोनिधिः पुरोऽस्य यावन्न भुवि व्यलीयत । गिरेस्तडित्वानिव तावदुच्चकै- जवेन पीठादुदतिष्ठदच्युतः ॥ १२ ॥ [ सर्वकषा ] पतदिति। पतन-यः पतङ्ग:-सूर्यःस प्रतिमोपमानं यस्य सः । 'पतङ्गौ पक्षिसूर्यो च' इत्यमरः । तपोनिधिः-मुनिरस्य-हरेः पुरो मुवि-पुरःप्रदेशे यावन्न व्यलीयत-नातिष्ठत् । 'लीङ् गतौ' इति धातो- देवादिकाकर्तरि लङ् । तावदच्युतः-हरिः, गिरेः-शैलात् । वडितोऽस्य .
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । .. सन्तीति तडित्वान-मेघ इव । 'मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः' इति मतुपो मकारस्य वकारः । 'तसौ मत्वर्थे' इति भसंज्ञायामेकसंज्ञाधिकारेणा- उपदत्वान्न जश्त्वम् । उच्चकैः-उन्नतात्पीठादासनाजवेनोदतिष्ठत् । मुनि- चरणस्य भूस्पर्शात्प्रागेव स्वयमुस्थितवान् । 'ऊवं प्राणा [ त्क्रामन्ति- यूनः स्थविर आयति । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ॥' इति शास्त्रसनुस्मरन्निति भावः । 'उदोऽनूर्ध्वकर्मणि' इति नियमादिहोर्ध्व- कर्मणि नात्मनेपदम् । पतत्पतङ्ग इत्यत्र पतङ्गस्य पतनासंभवाढ़ियमभूतो- पमेन्याचार्य दण्डिप्रभृतयो बभणुः । अत एवाप्रसिद्धस्योपमानत्वायोगादुरेक्षे- न्याधुनिकालङ्कारिकाः सर्वे वर्णयन्ति ॥ १२ ॥ [ अन्वयः ] पतत्पत्तङ्गप्रतिमः तपोनिधिः अस्य पुरो भुवि बावन्न व्यलीयत तावत् अच्युतः-गिरेस्तडित्वानिव-उच्चकैः पीठात् जवेन उदतिष्ठत् । [विग्रहः ] पतंश्चासौ पतङ्गश्च पतत्पतङ्गः, पतत्पतङ्गः प्रतिमा यस्याऽसौ-पतत्पतङ्गप्रतिमः । तपसां निधिः तपोनिधिः । तडितोऽस्य मन्तीति तडित्वान् । उच्चैरैव उच्चकैः । [ अर्थः] पतत्पतङ्गप्रतिमः = निष्पतन्मार्तण्डमण्डलोपमः । प्रसर्पत्सूर्यसङ्काशः । तपोनिधिः = तपोमूर्तिभंगवान् नारदः । अस्य = भगवतो वासुदेवस्य । पुरः = अने। भुवि = पृथिव्यां । यावत् = यावत्कालं । न व्यलीयत = नातिष्ठत् । नाजगाम। न सम्प्राप्तो, नावतीर्ण इति वा । तावत् = तावदेव। (मुनिचर- णयोभू स्पर्शात्प्रागेव)। अच्युतः = श्रीवासुदेवः । गिरेः = मही. धरात् । पर्वतशिखरात् । तडित्वानिव = मेघ इव । उच्चकैः समुन्नतात् । पीठात् = आसनात् । सिंहासनात् । जवेन = वेगेन । ससम्भ्रम, सत्वरळचेति यावत् । उदतिष्ठत् = समुत्तस्थौ । [ भावार्थः] सूर्यसङ्काशो भगवान तपस्विपरिवृढो मुनि- नारदो यावद्भुवि नावतीर्णस्तावदेव तत्सपर्यार्थ श्रीकृष्णचन्द्रः समुन्नतादासनात्-गिरिशिखराज्जलधर इव-उद तिष्ठत् । । - - २६ m १ प्रथम:- शिशुपालवधम् । [ कोशः ] ' पतङ्गो पक्षिसूर्यौ च ' इत्यमरः । [दाच्यप० ] पतत्पतङ्गप्रतिमेन तपोनिधिना तस्य पुरो भुवि यावन्न व्यलीयत तावगिरेस्तडित्वता इब अच्युतेन उच्चकैः पीठाजवेन उदस्थीयता [ भाषाटीका ] सूर्य की तरह तेजस्वी तपोमूर्ति श्रीनारदजी जब भगवान् श्रीकृष्ण के सामने पहुंचे और पृथिवी पर पैर रम्बले ही लगे तभी ( उससे पहिले ही) भगवान् श्रीकृष्ण अपने ऊँचे सिंहासन से--पर्वत में जैसे मेघ ऊपर उठते हैं वैले ही-उठ खड़े हुए ॥ १२ ॥ अथ यत्नोन्नमिताSSनमत्फणे- धृते कथंचित्फणिनां गणरधः । न्यधायिषातामभिदेवकीसुतं सुतेन धातुश्चरणौ भुवस्तले ॥१३॥ [ सर्वकषा ] अथ---अच्युताभ्युत्थानानन्तरं, धातुः सुतेन-नार- देन, प्रयत्नोन्नमितास्तथापि मुनिपादन्यासमारादानमन्त्यः फणा पां तैः, फणिनां गणैरधोऽधः प्रदेशे कथंचिद्धृते---स्थापित । भुवस्तल- भूपृष्ठे । अभिदेवकीसुतं-देवकीसुतमभिलक्ष्यीकृत्यत्यर्थः । 'लक्षणेनाभि- प्रती आभिमुख्ये' इत्यव्ययीभावः । चरणोपाई। 'पदंधिश्चरणोऽस्त्रि- याम् ' इत्यमरः । न्यधायिषाता-निहिती । दधातः कर्मणि लुहः । 'स्यसिच्सीयुट्' इत्यादिना चिण्वदिटि युक् । अत्र फणानां नमनानमना- सम्बन्धेऽपि मुनिगौरवाय तत्सम्बन्धाभिधानादतिशयोक्तिभेदः ॥ १३ ॥ [अन्वयः ] अथ धातुः सुतेन-प्रयत्नोन्नमितानमत्फणः फणिनां गणैः भुवस्तले अधः कथंचित धृते ( सति)-अभिदेवकी- सुतम् चरणौ न्यधायिषाताम् । [विग्रहः ] प्रयत्नेन उन्नमिताः प्रयत्नोअमिताः, प्रयत्रोन्नमिता अपि आनमन्त्यः फणा येषां ते प्रयत्रोअमितानमत्फणाः, तै:---प्रयत्नोन्नमितानम- त्फणैः । देवक्याः सुतः देवकीसुतः, देवकीसुतस्य अभि इति- अभिदेवकीसुतम् । .
सर्गः] २७ ब्रह्मणः - प्रयासपर- -- प AI अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । [अर्थः] अथ = श्रीकृष्णाभ्युत्थानानन्तरं । धातु: सुतेन = पुत्रेण । नारदेन । प्रयत्नोन्नमितानमत्फणैः म्परोन्नमितभरावनतफणामण्डलैः फणिनां = दर्वीकराणां सपणां । गणैः = समूहैः । अधः = अधःप्रदेशे। भूतलप्रदेशे । कथञ्चित् = महता प्रयत्नेन । धृते = उत्तोलिते सति । भुवः पृथिव्याः तले. भूपृष्ठे। अभिदेवकीसुतं = श्रीकृष्णमभिमुखी कृत्य । चरणौ = पादौ । न्यधायिषाताम् अस्थायिषाताम् । [भावार्थः] प्रयत्नशतेन फणिनां कुलैः सम्भूय भूतले कथञ्चिद्धृते सति श्रीकृष्णाभिमुखं श्रीनारदो भृतले पादन्यासं चकार । -[ कोशः ] 'फटायान्तु फणा द्वयोः' इत्यमरः । 'पदधिश्चरणोऽ- स्त्रियाम् इत्यमरः । वाच्यप० ] धातुः सुतः प्रयत्नोन्नमितानमत्फणैः फणिनां गणै वस्तले अधः कथञ्चिते सति अभिदेवकीसुतम् चरणौ न्यधित । [ भाषाटीका ] 'चाइजी के भार से पृथ्वी कहीं दब न जाए'-इस भय से पाताल निवासी सपा ने मिलकर बड़े प्रयल से जब पृथ्वी को किसी तरह सावधानतापूर्वक स्थिर किया उस समय श्रीकृष्णचन्द्र के सम्मुख भूतल पर भगवान् नारदजी उतरे ॥ १३ ॥ तमय॑मादिकयाऽऽदिपूरुषः सपर्यया साधु स पर्यपूपुजत् । गृहानुपैतु प्रणयादभीप्सवो भवन्ति नाऽपुण्यकृतां मनीषिणः ॥१४॥ [ सर्वङ्कपा ] तमिति । आदिपुरुषः-पुराणपुरुषः । 'अन्येषामपि दृश्यते' इति वा दीर्घः। सः-कृष्णः । अर्घ पूजामहतीत्ययः। 'दण्डादिभ्यो यः । तं नारदम् । अर्घार्थ द्रव्यमय॑म् । “पदार्घाभ्यां च' इति यत्प्रत्ययः । पमूल्ये पूजाविधावर्घः' । 'षट् तु त्रिष्वयंमर्धार्थ इति चामरः।
शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः - अर्घ्यमादिर्यस्यास्तया-अादिकया। 'शेषाद्विभाषा' इति विकल्पेन कप्प्रत्ययः । सपर्यया-पूजया। 'पूजा नमस्या ऽपचितिः सपर्या ऽर्चाs- ईणाः समाः' इत्यमरः । साधु यभा तथा पर्यपूयुजत्-परिपूजितवान् । णौ चङन्तं । कर्तव्यम् , युक्तं चैतदित्यर्थान्तरं न्यस्यति----गृहानिति । मनस ईषिणो मनीषिणः-सन्तः । पृषोदरादित्वात्साधुः । अपुण्यकृतां- पुण्यमकृतवताम् । 'सुकर्मपापमन्त्रपुण्येपु कृञः' इति भूते क्विप् । गृहान्प्रणयादुपैतुमभीप्सवः-माप्तुमिच्छवः। आमोतेः सन्नन्तादुप्रन्ययः । 'आप्ज्ञप्यधामीत्' इतीकारः । न भवन्ति । किन्तु पुण्यकृतामेव । अतः कृच्छलभ्याः सन्तः पूज्या इत्यर्थः ॥ १४ ॥ [ अन्वयः ] आदिपूरुषः स अयं तम् अादिकया सप. र्यया साधु पर्यपूपुजत् । मनीषिणः अपुण्यकृतां गृहानुपैतं प्रणयात् अभीप्सवो न भवन्ति । [विग्रहः ] आदिश्चासौ पूरुषश्च आदिपूरुषः। अर्धमहतीति अर्यः,तम्- अर्घ्यम् । अर्ध्यः आदिर्यस्याः सा अादिका, तथा-अादिकया। पुण्यं कृतवन्तः पुण्य कृतः, न पुण्यकृतः-अपुण्यकृतः, तेषाम्-अपुण्यकृताम् । [अर्थः ] आदिपूरुषः = पुराणपुरुषः। पुरुषोत्तमः। सः = श्रीहरिः । अयं = पूज्यं । तं = ब्रह्मपुत्र तपस्विश्रेष्ठ नारदम् । अादिकया = पाद्याादिप्रधानया । साधु = समुचितं यथा स्यात्तथा। पर्यपूपुजत् = पूजयामास । मनीषिणःमहान्तो विद्वांसः । अपुण्यकृताम् = अपुण्यशीला. 'नाम् । अधन्यानाम् । गृहान = वेश्मानि । प्रणयात् = स्नेहात् । उपैतुम् = आगन्तुम् । समागन्तुम्। अभीप्सवः = कृताभिलाषाः । औत्सुक्यवन्तः । उत्कण्ठिताः । न भवन्ति = नैव भवन्ति । [भावार्थः] पूज्यं तं नारदं भगवान् श्रीनारायणः शास्त्र- बोधितेन विधिना अर्घ्यपाद्याचमनीयादिभिर्यथोचितं पूजया- सत्कारकुशलानां विनीतानां पुण्यशीलानां कुले एव महान्तः प्रणयाद्गन्तुमिच्छति नापुण्यशीलानाम् । , सपर्यया = पूजया। । मास।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजिम् । [ कोशः ] 'पूजा नमस्यापचितिः सपर्याऽर्चाहणाः समाः' इत्यमरः। 'गृहाः पुंसि च भूम्न्येव निकाय्यनिलयालयाः' इत्यमरः। 'धीरो मनीषी ज्ञः प्राज्ञः' इत्यमरः । 'मूल्ये पूजाविधावर्घः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] आदिपूरुपेण अर्ध्यः स अादिकया सपर्यया साधु पर्यपूजि । मनीषिभिरपुण्यकृतां गृहानुपैतु प्रणयादभीप्सुभिर्न भूयते । [ भाषाटीका ] अतिथि के सत्कार करने में कुशल पुरातन पुमान् भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने पूजनीय नारदजी की ( अयं पाद्य आचमनीय आदि निवेदनपूर्वक ) शास्त्रीय रीति से पूजा की । महात्मा लोग विनीत व पुण्यात्मा लोगों के घर पर ही प्रेम से जाते हैं अविनीत पृष्ट लोगों के घरों पर नहीं ( अतः उनकी पूजा करना उचित ही है ) ॥ १४ ॥ न यावदेतावुदपश्यदुत्थिती जनस्तुषाराऽञ्जनपर्वताविव । स्वहस्तदत्ते मुनिमासने मुनि- श्चिरन्तनस्तावदभिन्यवीविशत् ॥ १५॥ [ सर्वपाः ] न यावदिति । उत्थितावेतौ--मुनिकृष्णौ, जन:- तुषाराञ्जन्योः पर्वताविव यावन्नोदपश्यत्-नोलोक्षितवान् । ञ्चिरन्तनः-पुराणो मुनिः--कृष्णः। 'पुरा किल भगवान्बदरिकाण्ये लारायणावतारेण] तपसि स्थितवान्' इति पुराणात् । 'सायंचिरम्-' इत्यादिना श्यप्रत्ययस्तुडागमश्च । स्वहस्तेन दत्ते आसने-मुनि-नारदमभिन्य- वीविशत्-स्वाभिमुखेनोपवेशितवान् । अभिनिपूर्वाद्विशतेय॑न्ताल्लुडि 'णिश्रि-' इति चङ्॥१५॥ [अन्वयः] उत्थितौ एतौ जनः तुषाराञ्जनपर्वतौ इव याव- नोदपश्यत् तावत् चिरन्तनः मुनिः स्वहस्तदत्ते आसने मुनिम् अभिन्यवीविशत्। [ विग्रहः ] तुषारश्च अञ्जनञ्च तुषाराजने, तुषारानयोः पर्वतौ तुषारा- ताव-
३०
शिशुपालवधम्।
Pain
अनपर्वतो, तौ। स्वस्य हस्तौ स्वहस्तौ, स्वहस्ताभ्यां दत्त स्वहस्तदत्तम्,
तस्मिन् स्वहस्तदत्ते । चिरं भवः-चिरन्तनः ।
[अर्थः] जनः द्वारकानिवासिलोकः । तुषाराञ्जनपर्वताविव
- तुहिनसौवीराऽञ्जनशैलाविव । हिमाञ्जनाचलाविव । उत्थितौ
समुत्थितौ । एतौ = नारदश्रीकृष्णौ। यावत् = यावत्कालं ।
उदपश्यत् = न वितर्कितवान् । नोत्प्रेक्षितवान् । नोदैवत । तावत् =
तावदेव । झटिति । चिरन्तनः = पुराणः । मुनिः = भगवान्नारा-
यणः । स्वहस्तदत्ते = ससम्भ्रमं स्वयमानीय विस्तारिते । आसने
स्वास्तरणे हेमपीठे। सुखासने च । मुनिं = नारदम् । अभिन्यवी-
विशत् = स्वाभिमुखं निवेशयामास । अतिष्ठिपत् ।
[भावार्थः] 'किमिमौ हिमालयाञ्जनपर्वतावुस्थितौ-' इति
यदुपुरी निवासिलोकाश्चकिता न यावन्नारदवासुदेवावुत्प्रेक्षन्ते
तावदेव ससम्भ्रमं भगवान्वासुदेवः स्वहस्तदत्ते आसने मुनि
निवेशयामास ।
[अत्र नारदः श्वैत्यात्तुपारगिरितुल्यः, श्रीकृष्णश्च घनश्याम-
तयाऽञ्जनशैलोपम इत्यप्यवधेयम् । ]
[ कोशः ] 'तुषारस्तुहिनं हिमम्' इत्यमरः। यावत्तावच्च साकल्येऽ-
बधी माने ऽवधारणे' इत्यमरः ।
[वाच्यप० ] जनेन उत्थितौ एतौ तुषाराअनपर्वताविव यावनोद-
दृश्येतां तावच्चिरन्तनेन मुनिना मुनिः स्वहस्तदत्ते आसने अभिन्यवेशि ।
[भाषाटीका] बर्फ की तरह उज्ज्वलवर्णनारदजी को और अञ्जन (सुर्मा)
की तरह नीलवर्ण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको एक साथ खड़े हुए देखकर
द्वारकानिवासी लोग जबतक यह उत्प्रेक्षा करें कि-'ये हिमालय और
अञ्जनगिरि एक साथ कैसे उठ खड़े हुए ?? तब तकाही भगवान् ने झट से
अपने हाथ से आसन बिछाकर उसपर नारद मुनि को ( अपने सामने ही)
बैठाया
॥१५॥
र्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम्। m महामहानीलशिलारुचः पुरो निषेदिवान्कंसकृषः स विष्टरे । श्रितोदयाद्ररमिल सायमुच्च कै रचूचुरचन्द्रमसोऽभिरामताम् ॥ १६ ॥ [ सर्वपा] महामहेति ।। महत्या महानीलशिलायाः--सिंहल- द्वीपसंभवेन्द्रनीलोपलस्य रुगिव रुग्यस्य तस्येत्युपमालङ्कारः। 'सिंहलस्था- करोद्भूता महानीलास्तु ते स्मृताः' इति भगवानगस्त्यः । कंसकृषः-हरेः। पुरः-अग्रे। उच्चकैः--उन्नते । विष्टरे---आसने । वृक्षासनयोबिष्टर' इति षत्वम् । निपेदिवान्---उपविष्टवान् । 'भाषायां सदवसभुवः' इति कसुः । सः---मुनिः, अभिसायं-सायङ्कालाभिमुखम् । अव्ययीभाव- समासः । सायङ्कालस्य कार्यात्कृष्णोपमानत्वम् । श्रित आश्रित उद- याद्रिरुदयाचलो येन तस्य चन्द्रमसोऽभिरामतां-शोभामचुचुरत्- चोरितवान् । प्राक्षवानित्यर्थः । 'चुर स्तेये 'णिधिर-इति चङ् । अन्यस्या- न्यधर्मसम्बन्धासम्भवाचन्द्रमसोऽभिरामतामिवाभिरामतामित्यौपम्यपर्यव- सानादसम्भवद्वस्तुसम्बन्धरूपो निदर्शनाभेदः । स चोक्कोपमयाऽङ्गाङ्गि- भावेन सङ्कीर्यते ॥ १६॥ [अन्वयः ] महामहानीलशिलारुचः कसकृषः पुरः उच्चकैः विष्टरे निषेदिवान् सः अभिसायं श्रितोदयाद्रश्चन्द्रमसः अभि- रामताम् अचूचुरत् । [विग्रहः] महानीलस्य शिला। महानीलशिला। महती चासो महानीलशिला च महासहानीलशिला । महामहानीलशिलाया रुगिव रुग्यस्य स महामहानीलशिलारुक् , तस्य-महासहानीलशिलारुचः । कंसं कृषतीति कंस्कृट् , तस्य कंसकृषः । श्रित उदयाद्रियेनासौ श्रितोद- याद्रिः, तस्य श्रितोदयाद्रेः । सायम् अभिलक्ष्मीकृत्येति अभिसायम् । उच्चैरेव- उच्चकैः । अभिरामस्य भावः अभिरामता, ताम्-अभिरामताम् । [अर्थः] महामहानीलशिलारुचः =: महामहेन्द्रनीलमणि- .
३२ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः शिलात्विषः । स्वच्छमहेन्द्रनीलमणिप्रभस्य । कंसकृपः = कंस द्विषः । कंसारेः । श्रीकृष्णस्य । पुरः = अग्रे । उच्चकैः = महो नते । विष्टरे = आसने । पीठे । निषेदिवान् = निपएणः । उपविष्टः । सः = नारदः। अभिसायं = सायङ्काले । रजनीमुखे। श्रितोदयाद्रः - उदयाचलचुडावलम्बिनः । समाश्रितोदयाचलस्य । चन्द्रमसः = इन्दोः। अभिरामता = रमणीयताम् । शोभाम् । अचूचुरत् = चोरयामास । तिरश्चकार । स्वीचकारेति च । [ भावार्थः ] स्वच्छमहेन्द्रनीलमणिकान्तेः कंसद्विपः पुरतो महोन्नते विष्टरे समुपविष्टस्य तुपारकान्तेनारदस्य-उद्याद्रिशि- खरमधिरूढस्य चन्द्रमस इव--महती शोभाऽऽसीत् । नीलरुचः कृष्णस्य पुरतः स्वर्णविष्टरे समुपविष्टश्चन्द्रशुभ्रा तिर्नारदः प्रदोप- समयोदितचन्द्रशोभा वभारेति यावत् । [ कोषः ] ' स्युः प्रभारुग्रुचित्विड्भाभाश्विद्युतिदीतयः । इत्यमरः । 'विष्टरः पीठमस्त्रियाम् ' इति विकाण्डशेपः । [ वाच्यपरि० ] महामहानीलशिलारुचः पुरो निषेदुपा तेन अभि- सायम् उच्चकैः चन्द्रमसोऽभिरामता अचोरि । [भाषाटीका ] विशाल महेन्द्रनीलमणि ( पन्ना) की तरह नीली कान्ति वाले श्रीकृष्णभगवान् के सामने ऊँचे सोने के सिंहासन पर बैठे हुए नारदजी ऐसे मालूम होते थे जैसे-सायंकाल के समय उदयाचल- शिखरारुढ चन्द्रमा। [सोने का सिंहासन-~सायंकालिक अरुण प्रभा के तुल्य । नीलवर्ण श्रीकृष्णचन्द्र-सायकालिक आकाश के तुल्य । नारदजी श्वेत चन्द्रमा के तुल्य । ] ॥ १६ ॥ विधाय तस्याऽपचितिं प्रसेदुषः प्रकामममीयत यज्वनां पियः। ग्रहीतुमार्यान्यरिचर्यया मूहु- महानुभावा हि नितान्तमर्थिनः ॥ १७ ॥ ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ३ ३ [ सर्वकषा] विधायेति । यज्वानो-विधिनेष्टवन्तः । 'यज्वा तु विधिनेष्टवान्' इत्यमरः । 'सुयजोः' इति यजिधातोर्ध्वनिप् । तेषां प्रियो- हरिः प्रसेदुषः-प्रसन्नस्य । ' सदेःक्व सुः' इत्युक्तम् । तस्य सुनेरपचिति- पूजाम् । 'पूजा नमस्यापचितिः' इत्यमरः । विधाय-विशेषेण मनोवाका- यकर्मभिस्तत्परतया कृत्वा, प्रकामम्-अत्यर्थम्, अप्रीयत-प्रीतोऽभूत् । प्रीयतेर्दैवादिकाकर्तरि लङ् । मुनिपूजायाः प्रीतिहेतुत्वेऽर्थान्तरं न्यस्यति- महानुभावाः-महात्मानः, आर्यान्-पूज्यान्परिचर्यया मुहुर्ग्रहीतु:-वशी- कर्तुम् । 'ग्रहोऽलिटि दीर्घः' इतीटो दीर्घः । नितान्तमर्थिनः-अभिलाष- वन्तो हि भवन्ति । अर्थनमोऽभिलाषः स एषामस्तीति मत्वर्थ इनिर्न तु णिनिः । 'कृवृत्तेस्तद्धितवृत्तिबलीयसीति भाप्यात् ॥ १७ ॥ [अन्वयः ] यज्वनां प्रियः (स) प्रसेदुषस्तस्य अपचिति विधाय प्रकामम् अप्रीयत । हि महानुभावाः आर्यान् परिचर्यया मुहुर्ग्रहीतुम् नितान्तमर्थिनः (भवन्ति )। [धिग्रहः ] विधिना इष्ट वन्त इति-यज्वानः, तेषां यज्वनाम् । महान् अनुभावो येषां ते महानुभावाः। अर्थनम्-अर्थः, अर्थ एषामस्तीति अर्थिनः । [अर्थः] यज्वनां विधिनेष्टवताम् । प्रिया-वल्लभः । (स-हरिः) प्रसेदुषः प्रसन्नस्य । तस्य-नारदस्य । अपचिति= पूजाम् । विधाय-कृत्वा। प्रकामं नितराम् । अप्रीयत-प्रासदत् । प्रसन्नोऽभवत् । हि-यतः । महानुभावा: तेजस्विनो महान्तो महाप्रभावाः प्रभवः। आर्यान्=पूज्यान । साधून् । परिचर्यया= सेवया । शुश्र षया । मुहुः भृशं, पौन-पुन्येन च । प्रहीतु वशीकर्तुम् । अनुकूलयितुम् । नितान्तं नितराम् । अर्थिनः= साभिलाषाः। (भवन्ति । विद्यन्ते । जायन्ते ।) [भावार्थः] पूज्यस्य मुने रदस्य पूजां विधाय भगवा- वासुदेवः प्रकाममप्रीयत । सतां हि शुश्रूषाङ्कर्तुं महानुभावा अप्यभिलाषं बिभ्रति । [कोशः ] 'पूजा नमस्याऽपचितिः' इत्यमरः । 'यज्वा तु विधिनेष्टवान्' ३ -- ."
शिशुपालवधम् । [प्रथमः- - इत्यमरः । 'परिचर्या तु शुश्रूषा वरिवस्या' इत्यमरः । 'अनुभावः प्रभावे च सतां च मतिनिश्चये' इत्यमरः । [वाच्यप० ] प्रसेदुषस्तस्याऽपचितिं विधाय यज्वनां प्रियेण अप्रीयत । आर्यान् परिचर्यया ग्रहीतु महानुभावैः हि-नितान्तम् अर्थिभिः ( भूयते ) [ भाषाटीका ] यज्ञयागशील ऋषिमुनियों में सहज भक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र नारदजी की पूजा कर के बड़ेही प्रसन्न हुए। यह ठीक भी है, क्योंकि नारदजी ऐसे साधु महात्माओं के कृपाकटाक्ष के पाने के लिए महानुभाव ( बड़े बड़े प्रभावशाली राजा तथा महाराजा व सम्राट) भी लालायित रहते हैं ॥ १७ ॥ अशेषतीर्थोपहताः कमण्डलो- निधाय पाणावृषिणाभ्युदीरिताः । अघौघविध्वंसविधौ पटीयसी- नतेन मूर्ना हरिरग्रहीदपः ॥१८॥ [ सर्वकषा ] अशेषेति । अशेषेभ्यस्तीर्थेभ्य उपहताः-आहृताः तथा पाणौ निधाय कमण्डलोः-उदकपात्रादुद्धत्य पाणौ निधायेत्यर्थः । क्रयान्तराक्षिप्तक्रियापेक्षया ' कमण्डलोरपादानत्वम् । 'अस्त्री कमण्डलुः ण्डी' इत्यमरः । ऋषिणाभ्युदीरिताः-आक्षिप्ताः, अत एवाघौघाना- पापसमूहानां विध्वंसविधौ-विनाशकरणे, पटीयसीः-समर्थतराः । पटुशब्दादीयसुनि ‘उगितश्च' इति कीप् । अपः-हरिनतेन मूर्ना अग्र- हीत-स्वीकृतवान् । ग्रहेर्तुङ् ॥ ५८ ॥ [अन्वयः ] अशेषतीर्थोपहृताः कमण्डलोः पाणौ निधाय ऋषिणा अभ्युदीरिताः अघौघविध्वंसविधौ पटीयसीः अपः हरिः नतेन मूर्ना अग्रहीत् । [विग्रह-] अशेषाणि च तानि तीर्थानि च-अशेषतीर्थानि । अशेषतीर्थेभ्य उपहृताः-अशेषतीर्थोपहृताः, तास्तथाभूताः । अधानाम् ओघः अघौधः, अघौघस्य विध्वंस:-अधौधविध्वंसः। अघौधविध्वंस एवं
सर्गः]
३५
-
पाप-
अभिनवराजलक्ष्मो-सवकषा-विराजितम् ।
विधिः-अबोधविध्वंसविधिः (अधीधविध्वंसस्य विधिरिति वा) तस्मिन्-
अवौधविध्वंसविधौ । अतिशयेन पटव इति पटीयस्यः, ता:-पटीयसीः ।
[अर्थः] अशेषतीर्थोपहृताः सकलतीर्थाहताः । निखिलेभ्य-
स्तीर्थेभ्य आनीताः । कमण्डलोः जलपात्रात् । आकृतिविशेष-
मनोहराजलपात्रात् । तत उद्धृत्येति यावत् । पाणौ-स्वकरे ।
निधाय = गृहीत्वा । स्थापयित्वा । ऋषिणा = नारदेन ।
अभ्युदीरिताः = स्वाभिमुखं प्रक्षिप्ताः । अघौधविध्वंसविधी
पापनिवहनिरासव्यापारे । कलुषसमूह विनाशकर्मणि ।
परम्परानाशविधौ । पटीयसीः = नितरां समर्थाः । अपः =
जलानि । हरिः = अच्युतः । नतेन = नम्रण । मूनो-मस्तकेन ।
शिरसा । अग्रहीत् = =जग्राह ।
[भावार्थः] महर्षि णा नारदेन कमण्डलोरुद्धृत्य स्वपाणी नि-
धाय निक्षिप्त सर्वतीर्थोदकं नतेन शिरसा सभक्ति हरिरग्रहीत् ।
[कोशः ] 'अस्त्री कमण्डलुः कुण्डी'त्यमरः । 'कलुषं वृजिनैनोऽधर्म-
होदुरितदुष्कृतम्' इत्यमरः । “विधिविधाने दैवे चेति हैमः । 'उत्तमाङ्गं
शिरः शीर्ष मूर्धा ना मस्तकोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । 'आपः स्त्री भूम्नि
वावारि सलिलं कमलं जलम् ' इत्यमरः ।
[वाच्यपरि० ] अशेषतीर्थोपहृताः अधौधविध्वंसविधौ पटीयस्य
आपः हरिणा नतेन मूर्धा अग्राहिषत ।
[भाषाटीका ] सम्पूर्ण तीर्थों से लाया हुआ जो पवित्र जल नारदजी
के कमण्डलु में था उसे उन्होंने अपने हाथ में लेकर भगवान् श्रीकृष्ण के
ऊपर छिड़का। और भगवान् ने भी उस पवित्र जल को भक्तिभाव से अपने
शिर पर धारण किया ॥ १८ ॥
स काञ्चने यत्र मुनेरनुज्ञया
नवाम्बुदश्यामतनुय विक्षत ।
जिगाय जम्बूजनितश्रियः श्रियं
सुमेरुशृङ्गस्य तदा तदासनम् ॥ १६ ॥
शिशुपालवधम् । १ प्रथमः- [ सर्वकषा ] स काञ्चनेति । नवाम्बुदश्यामतनुः स हरिर्मुने- रनुज्ञया काश्चने काञ्चनविकारे । वैकारिकोऽण्प्रत्ययः। यत्र-आसने न्य- विक्षत-उपविष्टवान् । निपूर्वविशो लुङि 'नेर्विशः' इत्यात्मनेपदे 'शल इगुपधादनिटः क्सः' । तत्-आसनं, तदा-हर्युपवेशनसमये जम्बू:-नील- फलविशेषः । 'जम्बूः सुरभिपत्रा च राजजम्बूमहाफला' इत्यभिधानरत्न- मालायाम् । तया जनिता श्रीर्यस्य सत्तथोक्तस्य । भाषितपुंस्कत्वात्पक्षे पुंवद्भावान्नुमभावः । सुमेरुशृङ्गस्य श्रियं जिगाय । अभिभावितवा- नित्यर्थः । 'सँल्लिोर्जेः' इति कुत्वम् । उपमानुप्रासयोः संमृष्टिः ।। १९ ॥ [अन्वयः] नवाम्बुदश्यामतनुः स मुनेरनुज्ञया काञ्चने यत्र (आसने ) न्यविक्षत सद् श्रासनम् तदा जम्बूजनितश्रियः सुमेरुशृङ्गस्य श्रियं जगाय। [विग्रहः ] नवश्चासौ अम्बुदश्च नवाम्बुदः, नवाम्बुद इव श्यामा नवाम्बुदश्यामा । नवाम्बुदश्यामा तनुर्यस्याऽसौ नवाजुदश्यामतनुः । जम्चा जनिता जम्बूजनिता, तादृशीश्रीर्यस्य तत्-जम्बृजनितश्रि, तस्य- जम्बूजनितश्रियः । सुमेरोः शृङ्ख-सुमेरुशृङ्ख, तस्य सुमेरुशृङ्गस्य । [ अर्थः] नवाम्बुदश्यामतनुः = नवीनमेघश्यामवपुः। नील. जलधरश्यामशरीरः । नवीनजलधररुचिरकान्तिरिति यावत् । अच्युतः । मुनेः = महर्षेनीरदस्य । अनुज्ञया = आज्ञया । निदेशेन । आदेशेन वा । काञ्चने = हिरण्मये। सौवर्णे । यत्र यस्मिन्नासने । न्यविक्षत - निविष्टः । निविविशे । तदासनं तत्काश्चनं सिंहासनम् । तदा = तस्मिन्समये । श्रीकृष्णोपवेशन- काले । जम्बूजनितश्रियः = दिव्यजम्बूमहाफलाऽऽहितशोभस्य । दिव्यजम्बूवृक्षसम्पादितशोभातिशयस्येति वा । सुमेरुशृङ्गस्य = हेमाद्रिशिखरस्य । श्रियं = शोभाम् । जिगाय = तिरश्चकार । आददे । जितवान् ।। [ भावार्थः] सुवर्णसिंहासनोपविष्टस्य घनश्यामस्य वासु- Mamme . m सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । देवस्य शोभा दिव्यजम्बूवृक्षफलाऽवस्थानमनोहरस्य सुमेरुशृङ्गस्य शोभामधश्चकार । [ कोशः ] 'जम्बूः सुरभिपत्रा च राजजम्बूमहाफला' इत्यमरः । 'मेरुः सुमेरुहेमाद्री रत्नसानुः सुरालयः' इत्यमरः। 'कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गम्। इत्यमरः। “विष्टरः पीठमस्त्रियाम्' इति त्रिकाण्डशेषः । [वाच्यपरि० ] नवाम्बुदश्यामतनुना तेन मुनेरनुज्ञया काञ्चने यत्र आसने न्यवेशि तेन आसनेन तदा सुमेरुशृङ्गस्य श्रीः जिग्ये । [ भाषाटीका ] नारदमुनि की आज्ञा ( अनुमति ) से श्रीकृष्ण जिल सोने के ऊँचे सिंहासन पर बैठे उसकी शोभा उस समय ऐसी मालूम हुई जैसे सुमेरुपर्वत के शृङ्गपर अवस्थित नीले जामुन के फल की शोभा होती है। (सिंहासन-सुमेरुङ्ग । श्रीकृष्ण-जामुन का फल ) ॥ १९॥ स तप्तकार्तस्वरभास्वराऽम्बरः कठोरताराधिपलाञ्छनच्छविः । विदिद्युते वाडवजातवेदसः शिखाभिराश्लिष्ट इवाम्भसां निधिः ॥२०॥ [सर्वकषाः] स तप्तति । तप्त-पुटपाकशोधितं, कार्तस्वर-सुवर्णम् । 'रुक्मं कार्तस्वरं जाम्बूनदमष्टापदोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । तद्भास्वरं-दीप्य- मानमम्बरं यस्य सः । पीताम्बर इत्यर्थः । कठोरताराधिपस्य-पूर्णेन्दो- लान्छनस्य छविरिव छविर्यस्य न इत्युपमानपूर्वपदो बहुव्रीहिरुत्तपदलो- पश्च । सः-हरिर्वाडवजातवेदसः-वाडवाग्नेः-शिखाभिः-ज्वालाभि- राश्लिष्टोऽम्भसां निधिरिव-समुद्र इव विदिद्यु ते-बभौ ॥२०॥ [ अन्वयः] तप्त कार्तस्वरभास्वराम्बरः कठोरताराधिपला छनच्छविः स वाडवजातवेदसः शिखाभिः आश्लिष्टः अम्भसां निधिरिव विदिधु ते । [विग्रहः ] तप्तं च तत् कार्तस्वरञ्च तप्तकार्तस्वरम् । तप्तकार्तस्वरमिव
शिशुपालवधम् ।
[प्रथमः-
भास्वरम्-तप्तकार्तस्वरभास्वरभास्वरं, तप्तकारीस्वरभास्वरम्-अम्बरं यस्या-
ऽसौ तप्तकार्तस्वरभास्वराम्बरः। कठोरश्चासौ ताराधिपश्च-कठोरताराधिपः,
कठोरताराधिपस्य लाञ्छनं कठोरताराधिपलाञ्छनम्,
तस्य छविरिव
छविर्यस्यासौ-कठोरताराधिपलाञ्छनच्छविः । वडवायां भवो वाडवः.
वाडवश्चासौ जातवेदाश्च-वाडवजातवेदाः, तस्य वाडवजातवेदसः ।
[ अर्थः ] तप्तकारीस्वरभास्वराम्बरः = सुतप्तसुवर्णोज्ज्वल-
वस्त्रः । सुवर्णसूत्रानुषङ्गोज्ज्वलवस्त्रः । कठोरताराधिपलाञ्छन.
च्छविः= पूर्णचन्द्रचिह्वा तिः। परिपूर्णेन्दुमण्डलमध्यवर्ति (शश)-
लान्छनरुचिररुचिः। सः = श्रीकृष्णः। वाडवजातवेदसः :
वडवाग्नेः। शिखामिः = ज्वालामिः । आश्लिष्टः = विष्वव्याप्तः ।
आलिङ्गिततनुः । अम्भसा = निधिरिव । जलनिधिरिव । समुद्र
इव । विदिद्यु ते = शुशुभे ।
[ भावार्थः ] सुघटितनिष्टप्तसुवर्णसूत्रजालसमावेशोज्ज्वला-
म्बरधरो नीलाच्छविः स भगवान्कृष्णो वडवानलज्वालावलि-
व्याप्तवपुर्जलनिधिरिव शुशुभे । अत्र हि समुद्रोपमोहरिवंडवाग्नि-
तुल्यञ्च सुवर्णाम्बरम्।
[कोशः ] 'कठोरौ पूर्णकठिनौ' इति हैमः । 'रुक्मं कार्गस्वरं
जम्बूनदमष्टापदोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । 'कलङ्काको लान्छनञ्च चिहूं लक्ष्म
च लक्षणम्' इत्यमरः। 'और्वस्तु वाडवो वडवाऽनलः' इत्यमरः ।
'कृपीटयोनिवलनो जातवेदास्तनूनपात्' इत्यमरः ।
'अचिहतिः शिवाऽ-
स्त्रियाम्' इत्यमरः।
[वाचप० ] तप्तकार्तस्वरभास्वराम्बरेण कठोरताराधिपलान्छनच्छविना
तेन वाडवजातवेदसः शिखाभिराश्लिष्टेन अम्भसां निधिना इव विदिद्युते ।
[भाषाटीका ] भगवान् श्रीकृष्ण को कान्ति पूर्णचन्द्र के कलक की
तरह नीली थी और सुनहरी जरी के बने हुए बढ़िया पीताम्बर को उन्होंने
धारण कर रखा था अतः वे वडवाग्नि से घिरे हुए समुद्र की तरह उस
समय शोभित हो रहे थे ॥ २० ॥
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ३६ । रथाङ्गपाणेः पटलेन रोचिषा- मृषित्विषः संवलिता विरेजिरे । चलत्पलाशान्तरगोचरास्तरो- स्तुषारमूर्तेखि नक्तमंशवः ॥ २१ ॥ [ सर्वकषा ] रथाङ्गपाणेरिति । रथाङ्ग-चक्रं पाणौ यस्य तस्य- हरेः । 'प्रहरणार्थेभ्यः परे निष्ठासप्तम्यौ भवतः । इति पाणेः परनिपातः । रोचिषां-छवीनां, पटलेन-समूहेन, संवलिताः-मिलिता ऋषित्विषो, नक्त-रात्रौ । सप्तम्यर्थे ऽव्ययम् । तरोश्चलतां पलाशानां-पत्राणामन्त- राणि-विवराणि-गोचरः-आश्रयो येषां ते । तुषारा मूर्तियस्य तस्येन्दोः-अंशव इव विरेजिरे-चकाशिरे ॥ २१ ॥ [अन्वयः] रथाङ्गपाणेः रोचिषां पटलेन संवलिता ऋषित्विषः नक्त तरोः चलत्पलाशान्तरगोचराः तुषारमूर्तेरंशव- इव विरेजिरे। [विग्रहः ] रथस्य अङ्गम् रथाङ्गम् । रथाङ्गं पाणौ यस्य च रथाङ्ग- पाणिः, तस्य-रथाङ्गपाणेः । ऋषेः विषः ऋषित्विषः । चलन्ति च तानि पलाशानि च-चलत्पलाशानि, चलत्पलाशानामन्तराणि-चलत्पलाशान्त- राणि, चलत्पलाशान्तराण्येव गोचरो येषां ते-चलत्पलाशान्तरगोचराः। तुषारा मूर्तिर्यस्यासौ तुषारमूर्तिस्तस्य तुषारमूर्तेः । [अर्थः] रथाङ्गपाणेः चक्रपाणेभंगवतो वासुदेवस्य । रोचिषां = प्रभाणां । पटलेन = समूहेन । संवलिताः = मिलिताः। सम्पृक्ताः । ऋषित्विषः = नारददेहकान्तयः । नक्त = रात्रौ । तरोः = पादपस्य । चलत्पलाशान्तरगोचराः = स्फुरत्पत्रमध्याव- काशपरिदृश्यमानाः । तुषारमूर्तेः = तुहिनदीधितेः, शीतांशोश्चन्द्र- मसः। अंशव इव = किरणा इव । विरेजिरे = शुशुभिरे । प्रचकाशिरे। [भावार्थः] नीलतनोः कृष्णस्य तुषारकान्ते रदस्य च - %3D शिशुपालवधम् । [१प्रथमः .. शरीरप्रभाः परस्परं मिलिताः सत्यश्चञ्चल पिप्पलादिवृक्षपत्रान्तर- दृश्यमानेन्दु किरणा इव नितरां विरेजिरे । [ कोशः] 'रोचिः शोचिरुभेक्लीबे प्रकाशो छोत आतपः' इत्यमरः । 'स्युः प्रभारुघुचिस्विड्भानाइछबिद्युतिदीलयः' इत्यमरः । पत्रं पलाशं छदनम्, इत्यमरः । 'अन्तरसबकाशावधिपरिधानान्तर्धिभेदसादृश्ये' इत्यमरः । 'किरणोत्रसयूखांशुगभस्तिवृणिरश्मयः' इत्यमरः । [वाच्यप०] रथाङ्गपाणः रोचिपा पटलेन संबलिताभिः ऋषिन्विभिः न तरोः चल-पलाशान्तरगोचरैः तुभारमूरंशुभिरिव विरंजे। [भापाटीका ] श्रीकृष्ण की नीली कान्ति से नारद ऋषि की शुभ्र शरीरकान्ति परस्पर मिलकर ऐसी सुन्दर मालूम होती थी जैसे वृक्ष के चञ्चल पत्तों के बीच से छनकर आती हुई चन्द्रमा की किरणें मालस हुआ करती हैं ॥ २१ ॥ प्रफुल्लतापिच्छनिभैरभीपुभिः । शुभैश्च सप्तच्छदपांशुपाण्डुभिः । परस्परेण च्छुरिताऽमलच्छवी तदैकवर्णाविव तौ बभूवतुः ।। २२ ।। [ सर्वकषा ] प्रफुल्लेति । प्रफुल्लनीति प्रफुल्लं-विकसितम् । विकसने ' इति धातोः पचायजन्तम् । फले नेष्टायाम् अनुपसर्गानफुलझोत्र- कृशोल्लाघाः' इति निपातनात्प्रकुल्लामन्यवेति बोरस्वामी । तापिच्छस्य- तमालस्य-पुष्प-तापिच्छम् । — फले लुक् ' इति तद्धितलुक् । 'विहीनं प्रसवे सर्वम् ' इति नपुंसकत्वम् । ' कालस्कन्धस्तमालः स्यातापिच्छोऽपि इन्यमरः । तेन सदृशैः-प्रफुल्लतापिच्छनिभैः । निन्यसमासत्वादस्वपद- विग्रहः । अत एव 'स्युरुत्तरपदे त्वमी' इति, निभसंकाशनीकाशप्रतीकाशोप- मादयः' इत्यमरः । सप्त छदाः पर्णानि' पर्वसु यस्येति सप्तच्छदो वृक्ष- भेदः । 'सप्तपर्णो विशालत्वक्शारदो विषमच्छदः' इत्यमरः । सङ्खयाशब्दस्य वृत्तिविषये वीप्सार्थत्वं सप्तपर्णादिवदित्युक्तं भाप्ये । शेषं तापिच्छवत् ।तस्य पुष्पाणि-सप्तच्छदानि,तेषां पांशुवत्पाण्डभिः-शुभैः,अभीपुभिः-अन्योन्य- . , सगः ] ७ अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । रश्मिमिः । 'अभीषुः प्रग्रहे रश्मौ' इति शाथतः । परस्परेण छुरिते-रूषिते- अमले छवी-अन्योन्यकान्ती यथोस्तौ । छब्योरभीषूणासवयवावयविभा- वाझेदनिर्देशः । तौ हरिनारदौ, तदैकवर्णाविव बभूवतुः । उभयप्रभा- मलनादुभयोरपि सर्वाङ्गीणो गङ्गायमुनासङ्गम इव स्फटिकेन्द्रनीलमणिप्रभा- मेलनमायः कश्चिदेको वर्णः प्रादुर्बभूव, तन्निमित्ता चेयमनयोरेकवर्णत्वोत्प्रेक्षा! [ अन्वयः] प्रफुल्लतापिच्छनिभैः सप्तच्छदपांसुपाण्डुभिः शुभैः अभीषुभिः-परस्सरेण छुरितामलच्छवी तौ-तदा एकवौँ इव बभूवतुः। [विग्रहः ] तापिच्छस्य पुष्पम् तापिच्छम्, प्रफुल्लतीति प्रफुल्लं, प्रफुल्लञ्च तत्तापिच्छं च-प्रफुल्लतापिच्छम्, प्रफुल्लतापिच्छेन तुल्याःप्रफुल्लतापिच्छनिभाः, तैः-प्रफुल्लतापिच्छनिभैः । सप्त छदाः येषां ते ससच्छदाः, सप्तच्छदानां पुष्पाणि सप्तच्छदानि, सप्तच्छदानां पांशवः सप्तच्छदपशिवः, तद्वत् पाण्डवः सप्तच्छदपांशुपाण्डवः, तैः-सप्तच्छदपांशुपाण्डुभिः । छुरिते अमले छवी ययोस्ते-छुरितामलच्छवी । एक वर्ण ययोस्तो एकवौँ । [अर्थः] प्रफुल्लतापिच्छनिभैः = विकसिततमाल कुसुम- सन्निभैः । विकचतमालपुष्पनीलैरिति यावत् । सप्तच्छदपांशु- पाण्डुभिः सप्तपर्णपरागधवलैः । शुभैश्च-हृद्यैश्च । सहृदयहृदयाव- जकैः । अभीपुभि:-देहकान्तिभिः। शरीररश्मिभिः । परस्परेरण- अन्योन्यम् । छुरितामलच्छवी = सम्पृक्तस्वच्छकान्ती । व्यति- षक्तनिर्मलप्रभौ सन्तौ । तो = मुनिवासुदेवी । तदा तस्मिन्काजे । एकवर्णाविव = तुल्यवर्णाविव । समानरूपाविव । बभूवतुः अभूताम् । सञ्जज्ञाते। [ भावार्थः ] तमालनीलस्य भगवतो वासुदेवस्य देहप्रभया सह सप्तच्छदपरागरागगोराया मुनेः शरीरस्य कान्तेः सम्बन्धा- सरस्परं तयोस्तुल्यवणतेवाभूत् । [ कोशः ] 'कालस्कन्धस्तमालः स्यात्तापिच्छोऽपि' इत्यमरः । 'निभ- सङ्काशनीकाशप्रतीकाशोपसादयः' इत्यमरः । 'सप्तपर्णो विशालत्वक् शारदो mawat ४२ शिशुपालवधम् । [प्रथमः विषमच्छदः' इत्यभरः। 'अभीयुः प्रग्रहे रश्मौ' इति शाश्वतः। 'भाश्छ- विद्युतिदीप्हयः' इत्यमरः । [ वाच्यपरि० ] प्रफुल्लतापिच्छनिभैरभीषुभिः परस्परेण च्छुरिताऽमल- च्छविभ्यां तदैकवर्णाभ्यामिव ताभ्यां वभूवे ॥ [ भाषाटीका ] तमालनीलवर्ण भगवान् कृष्ण की देहकान्ति और मनोहर सप्तपर्ण ( सतौना ) के पुष्प के पराग की तरह गौरवर्ण नारद मुनि की शरीरकान्ति-इन दोनों के परस्पर मिलने से वे दोनों कृष्ण और नारद समान रूप से ही मालूम पड़ने लगे ॥ २२ ॥ युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनो जगन्ति यस्यां सविकासमासत । तनौ ममुस्तत्र न कैटभद्विष- स्तपोधनाम्यागमसम्भवा मुदः ॥ २३ ॥ [सर्वङ्कशा ] युगान्तेति । युगान्तकाले प्रतिसंहृतात्मनः आत्मन्युपसंहृता आत्मानो जीवा येन तस्य, कैटभद्विषः-हरयस्यां तनी जगन्ति सविकासं-सविस्तरमासत-अतिष्ठन् । 'आस उपवेशने लछ। तत्र तनौ-देहे, तपोधनाभ्यागमेन संभवन्तीति संभवाः-संभूताः । पचाद्यच् । मुद्ः-सन्तोषा न ममुः । अतिरिच्यन्ते स्मेत्यर्थः । चतुर्दश- भुवनभरणपर्याप्ते वपुषि मुदः अन्तर्न मान्तीति कविप्रौढौक्तिसिद्धातिशयेन स्वतः-सिद्धस्याऽभेदेनाध्यवसिताविशयोक्तिः, सा च मुदामन्तःसम्बन्धेऽप्य- सम्बन्धोक्त्या सम्बन्धासम्बन्धरूपा ॥२३॥ [अन्वयः ] युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनः कैटभद्विपः यस्यां तनौ जगन्ति सविकासमासत तत्र तपोधनाभ्यागसम्भवा मुदः न ममुः। [विग्रहः ] युगस्य अन्तः युगान्तः, युगान्तस्य काल:-युगान्तकालः, युगान्तकाले प्रतिसंहृता आत्मानो येनासौ- -युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मा, तस्य-युगान्तकालप्रतिसंहतात्मनः । तप एवं धनं यस्यासौ-तपोधनः, wheme सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी--सर्वकषा-विराजितम् । - तपोधनस्य--अभ्यागमः तपोधनाभ्यागमः, तपोधनाभ्यागमात्सम्भव- न्तीति--तपोधनाभ्यागमसम्भवाः । [ अर्थः] युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनः-प्रलयसमयोप. संहृतप्राणिजातस्य संवर्त्तवेलाकुक्षिस्थापितचराचरस्य । कैटभद्विषः कैटभारेः श्रीकृष्णस्य । यस्यां तनौ-यस्मिन्वपुषि । जगन्ति-भुवनानि । सविकाशं-सावकाशं । यथासुखम् । आसत-न्यविक्षन्त । अतिष्ठन् । तत्र-तस्यां तनौ । तस्मि- नव विभोर्वपुषि तपोधनाभ्यागमसम्भवाः-तपस्विश्रेष्ठ- नारदागमनप्रभवाः । मुदः प्रीतयः। प्रमोदाः । हर्षाः । न ममुः= न मान्ति स्म। [ भावार्थः] प्रलयकालोपसंहृतजगतः कुक्षिकुहरनिविष्ट- जीवजातस्य कैटभरिपोरपि तनौ नारदागमनप्रभवा मुदो न मान्ति स्म। (नारदं दृष्ट्वा परं प्रोतिमभजत भगवान् श्रीकृष्णः।) [कोश-] 'त्रिप्वथो जगती लोको विष्टपं भुवनं जगत्' इत्यमरः । 'मुग्रीतिः प्रमदी हर्षः' इत्यमरः । [ वाच्यप०] युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनः कैटभद्विषो यस्यां तनौ जगद्भिः सविकाशम् आस्यत तत्र तपोधनाभ्यागसम्भवाभिमुद्भिर्न ममे । [ भाषाटीका ] प्रलयकालमें जगत् जिनके उदर में बड़ी सुविधा से रहता है उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण के शरीर में नारदजी के आनेका हर्ष नहीं समाया। अर्थात् नारदजी को देखकर भगवान् रोमाञ्चित होगए ॥ निदाघधामानमिवाधिदीधिति मुदा विकाशं मुनिमभ्युपेयुषी । विलोचने बिभ्रदधिश्रितश्रिणी स पुण्डरीकाक्ष इति स्फुटोऽभवत् ॥२४॥ [ सर्वकषा] निदाघेति निदाघमुष्णधाम किरणो यस्य तंतथोक्तम् ।
ma- । . शिशुपालवधम् । [प्रथमः- 'निदायो ग्रीष्मकाले स्थादुप्गस्वेदाम्बुनोरपि' इति विश्वः । अर्कमिव । अधिदीधितम्-अधिकतेजसं, मुनिमभिलक्ष्य । 'अभिरभागे' इति लक्षणे कर्मप्रवचनीयसंज्ञा । 'कर्मप्रवचनीययुक्त द्वितीयाः। मुदा विकाम- मुपेयुषी उपगते । वसुप्रत्ययान्तो निपातः । अत एवाधिश्रिता प्राप्ता श्रीर्याभ्यां ते तथोक्ते । 'इकोऽचि विभक्तौ इति नुमागतः । विलोचने बिभ्रत् । 'नाभ्यस्ताच्छतुः' इति नुमभावः । स:--हरिः, पुण्डरीकाक्ष इत्ये । स्फुटोऽभवत् । सूर्यसंनिधाने श्रीविकासभावादशां पुण्डरीकमाधात । पुण्डरीके इवाक्षिणी यस्येत्यवयवार्थलाभे पुण्डरीकाक्ष इति व्यकम्-अन्वर्थ- संज्ञोऽभूदित्यर्थः । बिभ्रत्स्फुटोऽभवदिति पदार्थहेतुकस्य निदाघधामान- मिवेन्युपमा-सापेक्षत्वादनयोरङ्गाङ्गिभावेन सङ्करः ॥ २४ ॥ [अन्वयः ] निदाघधामानमिव अधिदीधितिम मुनिम् अभि मुदा विकाशम् उपेयुपी अधिश्रितश्रिणी विलोचने बिभ्रन् मः पुण्डरीकाक्ष इति स्फुटः अभवत् । [विन हः ] निदाधं धाम यस्याऽनौ निदाघधामा, तं निदाघधामानम्। अधि-अधिका दीधितिर्यस्याऽसौ अधिदीधितिः, तम्-~-अधिदीधितिम् । अधिश्रिता श्रीः याभ्यां ते-अधिश्रितश्रिणी, ते तथाभूते । पुण्डरीके इन अक्षिणी यस्यासौ पुण्डरीकाक्षः । [अर्थः] निदाघधामानमिव-उष्णदीधितिमिव । श्रादि- त्यमिव । अधिदीधितम् अरूढमहसम । प्रचण्डतेजसम् । मुनि-नारदम् । अभि-लक्ष्यीकृत्य । मुदा प्रमोदेन । प्रीत्या। हर्पण । विकासप्रसादं । प्रफुल्लताम् । विकचताच । उपयुषी प्राप्त । अत एव-अधिश्रितश्रिणी प्राप्तशोभे । विशेष शोभमाने । विलोचने-नयने । बिभ्रत् दधानः । सः श्रीकृष्णाः। पुण्डरी- काक्ष इति-पुण्डरीकाक्ष इत्येवं प्रसिद्धाभिधानः । स्फुटः अन्वर्थ- । अभवत् आसीत् अन्वर्या पुए डरीकाक्षतां भेजे इति यावत् । [ भावार्थः ] सूर्यवर्चसं मुनिं दृष्ट्वा प्रसन्नो विकसित- . galam नामा सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ४५ विलोचनश्वाच्युतः पुण्डरीकाक्षतामन्वर्थी वभार । पुण्डरीक हि सूर्योदये विकसतीति लौकिकी प्रसिद्धिः। भगवांश्च सूर्यमिव भासमानं नारदं दृष्ट्वा लोचनप्रसादं भेजे इति स्फुटा पुण्डरीका. क्षता भगवत इत्याशयः । [ कोशः] 'धास रश्मौ गृहे देहे स्थाने जन्मप्रभावयोः' इति हैमः । 'निदाघो ग्रीष्मकाले स्यादुष्णस्वेदाम्बुनोरपि' इति विश्वः । [ वाच्यप० ] निदाघधासानमिवाधिदीधिति मुनिमभि विकाशमुपेयुषी लोचने बिभ्रता तेन पुण्डरीकाक्ष इति स्फुटोपमेनाभूयत ॥ [ भाषाटीका ] सूर्य की तरह तेजवाले नारदजी को देखकर भगवान् के नेत्र विकसित हो गए (प्रसन्नता से खिल गए)। अतः भगवान् का पुंडरी- काक्ष (कमलनेत्र) नाम आज ही सच्चा सिद्ध हुआ। क्योंकि सूर्य को देखकर कमलों का खिलना प्रसिद्ध ही है और सूर्य रूप नारदजी को देखकर प्रभु के नेत्र खिल गए । अतः भगवान्के नेत्र जरूर कमल हैं-यह सिद्ध होगया॥२४ सितं सितिम्ना सुतरां मुनर्वपु- विसारिभिः सौधमिवाऽथ लम्भयन् । द्विजावलिव्याजनिशाकरांशुभिः शुचिस्मितां वाचमवोचदच्युतः ॥२५॥ [ सर्वकषा ] सितमिति । अथ-उभयोरुपवेशनानन्तरम् । अच्युतो हेतुकर्ता। विसारिभिः~-अभीक्ष्णं प्रसरद्भिः। 'बहुलमाभीक्ष्ण्ये' इति णिनिः । द्विजावलिः-दन्तपङ्क्तिः । 'दन्तविप्राण्डजा द्विजाः' इत्यमरः । सैव व्याजः-कपटं यस्य सः । तद्रप इत्यर्थः । स चासौ निशाकरश्च तस्य- अंशुभिः-किरणैः, सितं-स्वभावशुनं मुनेर्वपुःसौधं प्रासादमिव सुतराम्- अत्यन्तम् । अव्ययाद्घादाम्प्रत्ययः । सितिम्ना-धावल्येन प्रयोज्यकर्ता,लम्भ- यन्-व्यापारयन् । अतिधवलयन्नित्यर्थः। लभेरत्रगत्युपसर्जनप्राप्त्यर्थत्वेनाग- त्यर्थत्वात् 'गतिबुद्धि-' इत्यादिना अणिकतुन कर्मत्वम् । तथाह वामनः- 'लभेर्गत्यर्थत्वापिणच्यणौ कर्तुः कर्मत्वाकर्मत्वे' इति । प्राप्त्युपसर्जनगत्यर्थत्वे ४६ ४ शिशुपालवधम् । [प्रथमः त कर्मत्वमेवेति रहस्यम् । 'लभेश्च' इति नुमागमः। शुचिस्मितां वाच वोचत्-उक्तवान् । ब्रुवो वच्यादेशः । लुङ् । 'वच उम्' इत्युमागम गुण अत्र सौधमिवेत्युपमायाः सितिम्ना लम्भयन्नित्यसम्बन्धरूपातिशयोक्तः द्विः वलिव्याजनिशाकरति छलादिशब्दैरसत्यत्वप्रतिपादनरूपाऽपह्नवस्य च मि नैरपेक्ष्यात्संसृष्टिः ॥२५॥ [अन्वयः] अथ अच्युतः विसारिभिः द्विजावलिव्याजनिश करांऽशुभिः सितं मुनेवपुः सौधमिव सुतरां सितिम्ना लम्भर शुचिस्मितां वाचमवोचत् । [विग्रहः ] अभीक्ष्णं विसरन्तीति विसारिणः, तै:--विसारिभिः द्विजानामावलिः, द्विजावलिः, द्विजावलिरेव व्याजो यस्यापो द्विजावत व्याजः, द्विजावलिव्याजश्चासौ निशाकरश्च द्विजावलिब्याजनिशाकरः, तर अंशवः, तैः-द्विजावलिव्याजनिशाकरांशुभिः । शुचि स्मितं यस्यां र तां-शुचिस्मिताम् । [अर्थः] अथ तदनन्तरम् । नारदकृष्णयोरुपवेश नन्तरम् । अच्युतः = वासुदेवः। विसारिभिः = प्रसारिभिः प्रसरणशीलैः द्विजावलिव्याजनिशाकरांशुभिः :: = दन्तपङक्ति च्छद्मचन्द्रमयूखैः। सितं = स्वभावगौरम् । शुभ्रम् । मुनेः नारदस्य। वपुः = शरीरम् । सौधमिव = राजभवनमिव 'सितिम्ना - नितरां श्वैत्येन । लम्भयन = प्रापयन् । श्वैत्यप्रकर्षण योजयन् । शुचिस्मिता = विशदेषद्धास्ययुतां। वाचं = मधुरां वाणीम् । अवोचत् = उवाच । [भावार्थः] श्रीकृष्णो दन्तकान्त्या नारदं सौधमिव मुहुः श्वेतिमानं लम्भयवन्निव सम्मितमित्थं जगाद । [कोशः] 'सौधोऽस्त्री राजसदनम्' इत्यमरः । 'दन्तविप्राण्डजा द्विजाः' इत्यमरः । 'किरणोसमयूखांशुगभस्तिणिरश्मयः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] सितं मुनेर्वपुः सितिम्ना लम्भयताऽच्युतेन वागवोचि । [ भाषाटीका] जैसे सफेद राजमहलपर पुनः सफेदी की जाती है वैसे om ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । २ ही श्वेत ( गौर ) वर्ण नारदजी को श्रीकृष्णचन्द्र अपने दाँतों की स्वच्छ कान्ति से और भी श्वेत करते हुए इस प्रकार बोले ॥२५॥ हरत्यधं सम्प्रति हेतुरेष्यतः शुभस्य पूर्वाचरितैः कृतं शुभैः । शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ॥ २६ ॥ [ सर्वकषा ] हरतीति । भवदीयदर्शनम्-शरीरभाजाम् । द्रष्टणामित्यर्थः । 'भनो ण्विः । कालत्रितये-भूतादिकालत्रितयेऽपि । योग्यताम्-पवित्रता, व्यनक्ति-गमयति । कुतः ?-सम्प्रति- दर्शनकाले। अघ---पापं हरति । एष्यतः-भाविनः। शुभस्य- श्रेयसो-हेतुः । तथा पूर्वाचरितैः-प्रागनुष्ठितैः, शुभैः-सुकृतैः, कृतम् । एवं त्रैकाल्येऽपि कार्यत्वेन कारणत्वेन च पुंसि सुकृतसमवायमवगमयते । अत एतादृशं दर्शनं कस्य न प्रार्थ्यमिति भावः। अत्र हरतीत्यादिवाक्यत्रयस्यार्थस्य शरीरेत्यादिवाक्यत्रये हेतुतया वाक्यार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलङ्कारः ॥२६॥ [अन्वयः ] भवदीयदर्शनम् शरीरभाजाम् कालत्रितये अपि योग्यतां व्यनक्ति। [यतः-] सम्प्रति अघम् हरति । एष्यतः शुभस्य हेतुः । पूर्वाचरितैः शुभैः कृतम् । [विग्रहः ] भवत इदं भवदीयम् । भवदीयं दर्शनं-भवदीयदर्शनम् । शरीरं भजन्तीति शरीरभाजः, तेषां शरीरभाजाम् । त्रयोऽवयवा अस्य तत्- त्रितयम् । कालस्य त्रितयं-कालत्रितयम् । तस्मिन् कालत्रितये । योग्यस्य भावो योग्यता, तां-योग्यताम् । [अर्थ ] भवदीयदर्शनं = श्रीमतां तत्रभवतां भवतां दर्शनम् । शरीरभाजां = वपुष्मतां । शरीरिणाम् । प्राणिनाम् । द्रष्टृणामिति यावत्। कालत्रितये ऽपि = भूतादिकालत्रयेऽपि । योग्यतां- धन्यताम् । पवित्रताश्च । व्यनक्ति-गमयति । बोध यति । निशानिमानि उद्या तकाले uri राति - ४८ शिशुपालवधम् । [प्रथमः दिनाशयति । अपसारयति । किञ्च-एष्यतः = भाविनः । आगामिनः। भविष्यत इति यावत् शुभस्य = श्रेयसः । मङ्गलस्य । कल्याणस्य । हेतुः = कारणम् । किच-पूर्वाचरितैः = पूर्वमनु- ष्टितैः । प्रागाचरितैः । शुभैः = सुकृतैः । पुण्यैः। कृतं = लब्धम् । आपादितम् । उपनतम् । [ भावार्थः] हे मुने! भवतां दर्शनं भूतभविष्यद्वर्त्तमान- 'रूपकालत्रितयेऽपि द्रष्टणां मादृशां वपुःमतां धन्यतामेवानुमाप- यति । तथाहि-वर्तमाने दर्शनकाले पापमपनुदति । भविष्यतः शुभस्य भाग्यस्य निदानम् । पूर्वमनुष्ठितः शुभैरिदं दर्शन लब्ध- मिति सुकृतित्वं गमयतीति-कालत्रयेऽप्यस्माकं सौभाग्यं सूचयति भवतां दर्शनमिति सुष्ठूक्तम् । [ कोशः ] 'एतर्हि सम्प्रतीदानीमधुना साम्प्रतं तथा' इत्यमरः । 'कलुषं वृजिनैनोऽधम्' इत्यमरः । [ वाच्यप०] भवदीयदर्शनेन शरीरभाजां कालत्रितयेऽपि योग्यता व्यज्यते । (यतस्तेन) सम्प्रति अघं हियते । एष्यतः शुभस्य हेतुना भूयते। पूर्वाचरितैः शुभैः कृतेन भूयते ॥ [भाषाटीका ] हे मुने ! आपका दर्शन वर्तमान काल में पाप को दूर करनेवाला है। भविष्यकाल में मङ्गलकारी है और पूर्वकाल में किए हुए शुभकर्मों का सूचक है, क्योंकि पूर्व के बड़े पुण्यों के बिना आपका दर्शन दुर्लभ है। अतः आपके पधारने से तीनों कालों में हमारी योग्यता ही सूचित होती है ॥२६॥ जगत्यपर्याप्तसहस्रमानना न यनियन्तु समभावि भानुना प्रसह्य तेजोभिरसङ्घयतां गतै- रदस्त्वया नुत्तमनुत्तमं तमः ॥ २७ ॥ 'नुन मिति पाठान्तरम् ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ४६ - .. [ सर्वकषा ] जगतीति । जगति-अपर्याप्ताः-अपरिच्छिन्नाः सहस्र भानवोंऽशवो यस्य तेन । भानुना- -अर्केण । 'भानवोऽर्कहरांशवः' इति वैजयन्ती। यत्तमो नियन्तुं निवारयितुं -न समभावि- न शेके । भावे लुङ् । अविद्यमानमुत्तमं यस्मात्तत्-अनुत्तमं-सर्वाधि- कम्, अदः-तमो मोहात्मकम्, असङ्घयतां गतैस्तेजोभिः प्रसह्य- बलात् । त्वया नुत्तं-छिन्नम् । अतः श्लाध्यदर्शनो भवानिति भावः । 'नुदविद-इत्यादिना विकल्पानिष्ठानत्वाऽभावः। अत्रोपमानाद्भानोमुने- राधिक्यप्रतिपादनाद्वयतिरेकालङ्कारः ॥ २७ ॥ [अन्वयः] जगति अपर्याप्तसहस्रभानुना भानुना यत् (तमः) नियन्तुन समभावि अनुत्तमम् अदुस्तमः असङ्ख्यता गतैस्तेजोभिः प्रसह्य त्वया नुत्तम् । [विग्रहः ] अपर्याप्ताः सहस्रं भानवो यस्याऽसौ-अपर्याप्तसहस्र- भानुः, तेन अपर्याप्तसहस्रभानुना । नास्ति उत्तमं यस्मात्तदनुत्तमम् । अनोदीति नुत्तम् ॥१॥ [अर्थः] जगति लोके । अपर्याप्तसहस्रभानुना=अपरि- च्छिन्नसहस्रकिरणेन । भानुना-सूर्येण । यत् = अस्माकं यत्तमः। यदज्ञानध्वान्तम् । नियन्तु = निवारयितुम् । न समभावि न शेके । अनुत्तमं = नितरां प्रगाढं । सर्वतो बलीयः । अद. स्तमः अदोऽस्माकं मोहध्वान्तम् । असङ्खथताङ्गतैः = अनन्तैः असङ्खथैः । तेजोभिः = स्वतेजोभिः । प्रसह्य = बलात् । झटिति । सहसैव । अनायासेनैव । त्वया = भवता नारदेन । नुत्तं समूलं छिन्नम् । नुन्नमितिपाठेऽपि स एवार्थः। [ भावार्थः] भगवान् सहस्रकिरणोऽपि बद्धमूलमनादि यदस्माकं मोहान्धकारमुन्मूलयितु न समर्थोऽभूत्तदेवाऽस्माक- मज्ञानध्वान्तं भवता द्रागेवोन्मूलितमित्यहो ? सर्वातिशायि- माहात्म्यातिशयो महामुनेः ।। १ "नुन्न मिति पाठे 'नत्वभावः' इति पाठान्तरम् । ४ . wwwm- शिशुपालवधम् । [५ प्रथमः [ कोशः] 'भानवोऽर्कहरांशवः' इति वैजयन्ती । भानुहंसः सह- स्रांशुः' इत्यसरः । 'त्रिवथो जगती लोको विष्टपं भुवनं जगत् इन्यमरः। [वाच्यप० ] जगति अपर्याप्तसहस्रभानुर्भानुः यत्तमाः नियन्तुं न समभूत् त्वम् तेजोभिः प्रसह्य अनुत्तमम् अदः तमः नुत्तवान् । [भाषाटीका ] जिस जबर्दस्त अज्ञानरूपी अन्धकार को भगवान सूर्य नारायण अपनी हजारों किरणों से भी दूर नहीं कर सकते हैं (क्योंकि सूर्य बाहरी अन्धकार को हटाता है, अन्तःकरण के मोहान्धकार को नहीं) मेरे उस प्रबल मोहान्धकार को आपने तरन्त दूर कर दिया । अर्थात- आपके दर्शन से मेरा मोहान्धकार दूर हो गया ॥ २७ ॥ कृतः प्रजाक्षेमकृता प्रजासत्रा सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना । सदोपयोगेऽपि गुरुस्त्वमक्षयो निधिः श्रुतीनां धन-सम्पदामिव ॥ २८ ।। [ सर्वकषा ] कृत इति । प्रजानां-जनानामपत्यानां च, क्षेमकृता- कुशलकारिणा । 'प्रजा स्यात्सन्तती जने' इत्यमरः । सुमात्रे-योग्यपुरुष, कटाहादिदृढभाजने च, निक्षेपेग-प्रदानेन, निधानेन च, निराकुलात्मना- स्वस्थचित्तेन । 'योग्यभाजनयोः पात्रम्' इत्यमरः । प्रजामृजा-अत्मणा, पुत्रिणा च । त्वं धनसम्पदामिव श्र तीनां-वेदानां, सदोपयोगे- दानभोगाभ्यां व्ययेऽपि, अक्षयः । एकत्राऽऽनानादन्यत्रानन्याञ्चति भावः। गुरु:-~-उपदेष्टा । सम्प्रदायप्रवर्तक इति यावत् । अन्यत्र-महान् । निधि- यत इति निधिः -निक्षेपः कृतः । 'उपसर्गे घोः किः । श्रुतिसम्प्रदायद्वारा धर्माऽधर्मव्यवस्थापकतया जगप्रतिष्ठाहेतूनां भवादृशां दर्शनं कस्य न लाध्य- मिति भावः । अत्र शब्दमात्रसाधाच्छ्लेषोऽयं प्रकृतविषय इत्याहुः ॥२८॥ [अन्वयः ] प्रजाक्षेमकृता सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना प्रजा- सृजा त्वम् धनसम्पदामिव श्रुतीनाम् सदोपयोगे अपि अक्षयः गुरुः निधिः कृतः।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजिम् । । [विग्रहः ] प्रजानाम् क्षेमं प्रजाक्षेम, प्रजाक्षेमं कृतवान् प्रजाक्षेमकृत्, तेन प्रजाक्षेसकृता । सुपात्रे निक्षेपः सुपात्रनिक्षेपः, सुपात्रनिक्षेपेण निराकुल: सुपात्रनिक्षेपनिराकुलः, सुपात्रनिक्षेपनिराकुल आत्मा यस्य सः-सुपात्र- निक्षेपनिराकुलामा, तेन सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना । प्रजाः सृजति अजाट, तेन-प्रजासृजा । निधीयते इति निधिः । निधानं वा निधिः । [अर्थः ] प्रजाक्षेमकृता लोकहितकारिणा । जनकल्याण- कारिणा । स्वापत्यहितैषिणा च । सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना= योग्यपुरुषनिक्षेपस्वस्थचित्तेन ताम्रादिदृढपात्रनिधान- स्वस्थचित्तेन च । प्रजासृजा-ब्रह्मणा । प्रजापतिना, पुत्रिणा । त्वं भवान् नारदः । धनसम्पदामिव-धनसम्पत्तीना- मिव । श्रुतीनां वेदानाम् । सदोपयोगेऽपि दानोपभोगा- दिना सदा व्ययेऽपि । अध्ययनाध्यापनादौ सर्वदोपयोगेऽपि । अक्षयः विनाशरहितः । अयातयामः । सम्प्रदाया- म्नायादिशुद्धया, पक्षे आनन्त्याच क्षयरहित इति यावत् । गुरुः उपदेष्टा । अतिमहांश्च । निधिः निक्षेपः । निधानञ्च । शेवधिश्च । कृतः प्रवर्तितः । सम्यक संस्थापितश्च । [ भावार्थः ] यथा कश्चन पुत्री पित्रादिः स्वापत्यकल्या. णाय सुदृढे कटाहादौ भाजनेऽनन्त महान्त धनराशि स्वाप- त्योपभोगाद्यर्थं सुगूढ संस्थाप्य स्वस्थो भवत्येवं वेदसम्प्रदाय- रक्षायै भवन्तं योग्यतम सम्प्रदायप्रवर्तकं गुरु श्रुतिनिधानं कृत्वा प्रजापतिर्ब्रह्मा स्वस्थचित्तः प्रमोदते । तदेवं-सत्स- म्प्रदायप्रवर्तकानां भवाशां दर्शनं कस्य न कल्याणाय प्रभवे- दिति भावः । [ कोशः ] 'प्रजाः स्यात्सन्तती जने' इत्यमरः । 'योग्यभाजलयोः पात्रम्' इत्यमरः । 'श्रुतिः स्त्री वेद आम्नायः' इत्यमरः । [ वाक्यप० ] प्रजाक्षेमकृत् सुपात्रनिक्षेपनिरकुलामा प्रजासृट् धनस- म्पदामिव श्रुतीनां सदोपयोगेऽपि अक्षयम् गुरुम् त्वां निधिं कृतवान् । - ..
। ५२ शिशुपालवजम् । [१ प्रथमः [ भाषा टीका ] जैसे कोई गृहपति ( पिता पितामह आदि ) अपनी सन्तान के कल्याणार्थ अक्षय अनन्त धनराशि को सुदृढ़ पात्र ( कण्डाल. कलसा आदि) में रखकर उसे भूमि में गाड कर स्वस्थ होता है, वैसे ही जापति ब्रह्माजी भी आपको वेदसम्प्रदाय की रक्षा के लिए महान् ( गुरु ) निधि (खजाना ) के रूप में उत्पन्न करके स्वस्थ व निश्चिन्त हो रहे हैं ऐसे सम्प्रदाय प्रवर्तक जगद्गुरु आपका दर्शन किसके लिए कल्याणकारक नहीं होगा ? ॥ २८ ॥ विलोकनेनैव तवामुना मुने ! कृतः कृतार्थोऽस्मि निवहिताऽहसा । तथापि शुश्रूषुरहं गरीयसी- गिरोऽथवा श्रेयसि केन तृप्यते ? ॥२६॥ [ सर्वङ्कपा] विलोकनेनेति । हे मुने ! निबर्हितां हसा-अप- हृतपाप्मना, अतएव-अमुना तव विलोकनेनैव कृतार्थः कृतोस्मि । तथाऽप्यहं गरीयसी:-अर्थवत्तराः। 'द्विवचन-' इत्यादिना ईयसुन्प्रत्ययः। उगितश्च' इति डीप । 'प्रियस्थिर-' इत्यादिना गुरोगरादशः। गिरः-तव वाचोऽपि-शुश्रूषुः-श्रोतुमिच्छुरस्मि । शृणोतेः समन्तादुप्रत्ययः । न चैतद्वथेत्याह-अथवा । तथाहीत्यर्थः । 'अथवेति पक्षान्तरप्रसिद्धयो रिति गणव्याख्यानात् । श्रेयसि विषये केन तृप्यते । न केनापीत्यर्थः । कृतार्थताया इयत्ताऽभावादिति भावः । भावे लट् ॥ २९ ॥ [अन्वयः ] मुने ! निबर्हितांहसा अमुना तव विलोकने- नैव कृतार्थः कृतः अस्मि । तथाऽपि अहं गरीयसीः गिरः शुभपुरस्मि । अथवा श्रेयसि केन तृप्यते । [विग्रहः ]-निबर्हितम् अंहो येन तत्-निहिताहः, तेन निहिता- ऽहसा । कृतः अर्थो यस्य येनवाऽसौ वा कृतार्थः । श्रोतुमिच्छुः-शुश्रूपुः । अतिशयेन गुय:-गरीयस्यः । ता:-गरीयसीः ।
सर्गः]
अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् ।
५३
-
[अर्थः ] मुने = हे मुनिश्रेष्ठ नारद ! । निबर्हितांहसा
अपहृतकिल्विषेण । अपहृतपाप्मना । अमुना = पवित्रतमेन ।
शुभेन च । तव = भवतः। विलोकनेनैव = दर्शनेनैव । कृतार्थः =
कृतकृत्यः । धन्यश्च । कृतोऽस्मि = विहितोऽस्मि । तथाऽपि
एवमपि । अथाऽपि । अहं = वासुदेवः । गरीयसीः अर्थ-
वत्तराः । अर्थगुर्वीः । गिरः : = तव वाचोपि । शुश्रूषुरस्मि
श्रोतुमिच्छुरस्मि । अथवा = तथाहि । श्रेयसि कल्याणकारिणि
विषये । केन तृप्यते = केन पुसा तृप्यते ? । न केनाऽपि तृप्यते
%3D
इत्यर्थः ।
[ भावार्थः ] हे मुने ! भवदर्शनेन कृतार्थस्याऽपि मम भव-
द्राणीमपि श्रोतु मनः साभिलाषमस्ति । तत्किञ्चिदाज्ञापय ।
श्रेयसि विषये हि कस्य तृप्तिर्भवति ? । न कस्यापि ।
[ कोशः ] 'कलुषं वृजिनैनोऽयमहोदुरितदुष्कृतम्' इत्यमरः । 'श्रेयो
निःश्रेयसाऽमृतम्' इत्यमरः ।
[वाच्यप०] हे मुने ! निबर्हितांहः अदः तव विलोकनमेव ( मां )
कृ तार्थं कृतवत् , तथापि गरीयसीः ते गिरः शुश्रूषुणा मया भूयते ।
अथवा श्रेयसि कस्तृप्यति ।
[ भाषाटीका ] हे मुने ! यद्यपि आपके दर्शन से ही मैं कृतार्थ हो
गया। तथापि आपकी पवित्र व मीठी वाणी सुनने को भी मेरी इच्छा प्रबल
हो रही है। ठीक ही है-कल्याणकारक विषय में किसको तृप्ति होती
है ?, किसी को नहीं । अतः मुझे आपकी वाणी सुनने की इच्छा होनी
उचित ही है। कृपया आज्ञा करिए कि आपकी मैं क्या सेवा करूँ ? ॥२९॥
गतस्पृहोऽप्यागमनप्रयोजनं
वदेति वक्तुं व्यवसीयते यया ।
तनोति नस्तामुदितात्मगौरवो
गुरुस्तवैवागम एष धृष्टताम् ॥ ३० ॥
शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- mama . - [ सर्वकषा ] गतस्पृहोऽपीति । गतस्पृहः-विरक्तोऽपि, त्वमा- गमनप्रयोजनं वदेति वक्तुं यया-पृष्टतया व्यवसीयते-उद्यम्यते । स्यतेर्भावे लट् । उदितमुत्पन्नमुक्तं वा आत्मनो सस गौरवं ग्रेन मः। गुरुः- श्लाघ्यः, एष तवागमः-आगमनमेव, नोऽस्माकं तां धृष्टता तनोति- विस्तारयति । 'तनु विस्तारं लट । भवतो निःस्पृहन्वेपि प्रेक्षा- वत्प्रवृत्तः प्रयोजनव्याप्त्या सावकाशः प्रश्न इति भावः ॥ ३० ॥ [अन्वयः ] गतस्पृहोऽपि ( त्वम् ) आगमनप्रयोजनं वद इति वक्तुं यया व्यवसीयते उदितात्मगौरवो गुरुः एप तव श्रागम एव नः तां वृष्टतां तनोति । [विग्रहः ] गता स्पृहा यस्यासौ गतस्पृहः । आगमनस्य प्रयोजनम्- आगमनप्रयोजन, तत्-आगमनप्रयोजनम् । गुरोर्भावः कर्म वा गौरवम् , आत्मनो गौरवम्-आमगौरवम् उदितं आत्मगौरवं येनाऽसौ उदितात्मगौरवः। [अर्थः ] गतस्पृहोऽपि निःस्पृहाऽपि । विरक्तोऽपि च त्वम् । आगमनप्रयोजनम् आगमनकारगण । वद - ब्रूहि । इति = इत्थम् । इत्येवम् । वक्तुं = निगदितुम् । यया = धृष्टतया । व्यवसीयते = उद्यम्यते । उदितात्मगौरवः = अभिहितमदीय. गौरवः । प्रख्यापितमदीयमाहात्म्यातिशयः । गुरुः महीयान् । श्लाध्यतमः । एषः-अयं । तव-भवतः । आगमः नमेव । नः-अस्माकम् । तां धृष्टताम् = अनुचितामपीमा मम धृष्टतां । तनोति वर्द्धयति । विस्तारयति । [ भावार्थः ] 'गतस्पृहाणां वीतरागाणां भवतामिहागमनस्य प्रयोजनं कि'मिति मदीयं जिज्ञासाधाष्ट्य प्रकटितमद्गौरवभर एष भवतामागम एव वर्द्धयति । [भवदागमनस्य प्रयोजन ज्ञातुमिच्छामीति यावत् ।] [कोशः] 'इच्छा काक्षा स्पृहेहा तृड्वान्छा लिप्सा मनोरथः इत्यमरः। [वाच्यप० ] 'गतस्पृहेणापि आगमनप्रयोजनमुच्यताम्' इति वर्नु या व्यवस्यति, उदितात्मगौरवेण गुरुणा तव आगमेनैव सा पृष्टता तायते । - mmar आगम- - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [भाषाटीका ] हे मुने ! 'आप ऐसे निःस्पृह व वीतरागमहात्माओं के यहाँ आने का क्या कारण है कहिए' यह प्रश्न करने की जो मैं पृष्टता कर रहा हूँ उस सृष्टता को आपके आगमन में (जिस आगमन से जगत् में मेरा गौरव बहुत बढ़ गया है-) ही बढ़ाया है। अर्थात्-आपके आगमन से मेरा गौरव इतगा बढ़ गया है कि मैं आपसे यह पूछने की पृष्टता कर रहा हूँ कि-'श्रीरान के आने का क्या कारण है ?' । कहिए,--यहाँ पधारने का श्रीमान् ने क्यों कष्ट किया ? ॥ ३० ॥ इति ब्रुवन्तं तमुवाच स व्रती नवाच्यमित्थं पुरुषोत्तम ! त्वया । त्वमेव साक्षात्करणीय इत्यतः किमस्ति कार्य गुरु योगिनामपि ॥ ३१ ॥ [ सर्वधा ] इति अवन्तमिति । इति ब्रबन्तं तं--हरिं स व्रती- --मुनिरुवाच । किमिति ?-हे पुरुपोत्तम-पुरुषेषु श्रेष्ठ । 'न निर्धा- रणे' इति षष्ठीसमासप्रतिषेधः । त्वया इत्थं-'गतरपृहोऽपीति, न वाच्यम् । निःस्पृहस्याप्यत्र प्रयोजनसम्भवादिति भावः । तदेवाह-योगि- नामपि त्वमेव साक्षात्करणीयः-प्रत्यक्षीकर्तव्य इत्यतः-अस्मा- दन्यद्, गुरु कार्य किमस्ति ?-न किञ्चिदित्यर्थः । तस्मान्न प्रयोजना- न्तरप्रश्नावकाश इति भावः ॥ ३१ ॥ [ अन्वयः ] इति ब्रुवन्तं तं स व्रती उवाच---गुरुपोत्तम ! त्वया इत्थं न वाच्यम् । योगिनामपि त्वमेव साक्षात्करणीय इत्यतो गुरु कार्य किमस्ति ? । [विग्रहः ] व्रतमस्यास्तीति प्रती । पुरुषेषु उत्तमः पुरुषोत्तमः, तत्स- म्बुद्धी हे पुरुषोत्तम ! योगोऽस्येषां ते योगिनः, तेषां योगिनाम् । [अर्थः] इति = इत्थं । ब्रुवन्तं = कथयन्तम् । तं हरिम् । सः = ब्रह्मणो मानसस्तनूजः । व्रती - मुनिारदः । उवाच = जगाद । पुरुषोत्तम = हे नरोत्तम । त्वया = भवता । इत्थम् = , सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [भाषाटीका ] हे मुने ! 'आप ऐसे निःस्पृह व वीतरागमहात्माओं के यहाँ आने का क्या कारण है कहिए' यह प्रश्न करने की जो मैं पृष्टता कर रहा हूँ उस सृष्टता को आपके आगमन में (जिस आगमन से जगत् में मेरा गौरव बहुत बढ़ गया है-) ही बढ़ाया है। अर्थात्-आपके आगमन से मेरा गौरव इतगा बढ़ गया है कि मैं आपसे यह पूछने की पृष्टता कर रहा हूँ कि-'श्रीरान के आने का क्या कारण है ?' । कहिए,--यहाँ पधारने का श्रीमान् ने क्यों कष्ट किया ? ॥ ३० ॥ इति ब्रुवन्तं तमुवाच स व्रती नवाच्यमित्थं पुरुषोत्तम ! त्वया । त्वमेव साक्षात्करणीय इत्यतः किमस्ति कार्य गुरु योगिनामपि ॥ ३१ ॥ [ सर्वधा ] इति अवन्तमिति । इति ब्रबन्तं तं--हरिं स व्रती- --मुनिरुवाच । किमिति ?-हे पुरुपोत्तम-पुरुषेषु श्रेष्ठ । 'न निर्धा- रणे' इति षष्ठीसमासप्रतिषेधः । त्वया इत्थं-'गतरपृहोऽपीति, न वाच्यम् । निःस्पृहस्याप्यत्र प्रयोजनसम्भवादिति भावः । तदेवाह-योगि- नामपि त्वमेव साक्षात्करणीयः-प्रत्यक्षीकर्तव्य इत्यतः-अस्मा- दन्यद्, गुरु कार्य किमस्ति ?-न किञ्चिदित्यर्थः । तस्मान्न प्रयोजना- न्तरप्रश्नावकाश इति भावः ॥ ३१ ॥ [ अन्वयः ] इति ब्रुवन्तं तं स व्रती उवाच---गुरुपोत्तम ! त्वया इत्थं न वाच्यम् । योगिनामपि त्वमेव साक्षात्करणीय इत्यतो गुरु कार्य किमस्ति ? । [विग्रहः ] व्रतमस्यास्तीति प्रती । पुरुषेषु उत्तमः पुरुषोत्तमः, तत्स- म्बुद्धी हे पुरुषोत्तम ! योगोऽस्येषां ते योगिनः, तेषां योगिनाम् । [अर्थः] इति = इत्थं । ब्रुवन्तं = कथयन्तम् । तं हरिम् । सः = ब्रह्मणो मानसस्तनूजः । व्रती - मुनिारदः । उवाच = जगाद । पुरुषोत्तम = हे नरोत्तम । त्वया = भवता । इत्थम् = , सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । परास्कन्दिपाटचरमलिम्लुचाः' इत्यमरः । अभीक्ष्णमक्षुएणतया-अन- भ्यस्तत्वेन, अप्रतिहतत्वेन च, जनैरतिदुर्गमं मोक्षपथम्-अपवर्गमार्ग, कान्तारं च, उपेयुषः-प्राप्तवतः । 'उपेयिवान्-'इत्यादिना क्वस्वन्तो निपातः । मनस्विनः-सुमनसः, धीरस्य च। प्रशंसायां विनिः । त्वमेव निरपायः-पुनरावृत्तिरहितः संश्रयः प्राप्तिर्यस्याः सा तथोक्ता । 'न स पुनरावर्तते इति श्रुतेः । अग्रभूमिः -प्राप्यस्थानम् । 'अग्रमालम्बने प्राप्ये' इति विश्वः। 'सोऽहम्' इत्यादिश्रुतेस्तत्प्राप्तेरेव मोक्षत्वादिति भावः । तस्मान्मुमुक्षूणामपि त्वमेव साक्षात्करणीय इति सिद्धम् । 'तमेव विदित्वा- ऽतिमृत्युमति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' इति श्रुतेः । यथा कस्यचित्कु- तश्चित्संकटान्निर्गतस्य केनचित्कान्तारेण गतस्य किंचिन्निर्बाधस्थानप्राप्ति- रभयाय कल्पते तथा त्वमपि मुमुक्षोरिति ध्वनिः ॥ ३२ ॥ [विग्रहः ] उदीर्णश्चासौ रागश्च उदीर्णरागः, उदीर्णराग एव प्रति- रोधको यस्मिन्नसौ-उदीर्णरागप्रतिरोधकः, तम्--उदीर्णरागप्रतिरोधकम् । अन्यत्र--उदीर्णो रागो यस्यासो उदीर्णरागः--चौरादिः । स एव प्रति- रोधको यस्मिन्नसौ उदीर्णरागप्रतिरोधकः, तमितिविग्रहः । दुःखेन गम्यते इति दुर्गमः, अतिशयितो दुर्गमः-अतिदुर्गमस्तम् । मोक्षस्य पन्थाः मोक्षपथः, तम् । निरपाय ः संश्रयो यस्याः सा निरपायसंश्रया। अग्रेभूमिः-अग्रभूमिः। [अन्वयः ] उदीर्णरागप्रतिरोधकं अभीक्ष्णम् अक्षुण्णतया जनैः अतिदुर्गमम् मोक्षपथम् उपेयुषो मनस्विनः त्वमेव निरपाय- संश्रया अग्रभूमिः [ असि] । [अथः] उदीर्णरागप्रतिरोधक-प्रवृद्धविषयाभिलाषप्रतिरोध. काकुलम् । अनादिवासनापरिप्राप्तप्ररूढविषयाऽभिलाषनिरोध- विसङ्कटम् । कान्तारपक्षे-मोहान्ध चौरादिविरोधिगणसङ्कुलम् । अभीक्ष्णम्-पौनःपुन्येन अक्षुण्णतया-अनभ्यस्तत्वेन । ( कान्तारपक्षे- )--अपरिचितत्वेन, अप्रतिहतत्वेन जनैः मुमुक्षुभिः । पान्थलोकैश्च । अतिदुर्गमम्-अतिगहनम् । गन्तुमशक्यम् । निविडतमम् । ( कान्तारपक्षे-) अतिदुस्तरम् । .
- । . शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः दुलचञ्च । मोक्षपथम्=अपवर्गमार्गम् । निःसरणमार्गम् । निर्गमनमार्गम् । कान्तारमार्ग च । उपेयुपः परिशीलयतः । प्राप्तवतश्च । मनस्विनः-आत्मचिन्तनपरायणस्य मोक्षार्थिनो वीतरागस्य ममनसः । कान्तारपक्षे--उत्साहवतो निर्भयस्य धीरस्य च । त्वमेव = भवानेव । निरपायसंश्रया - पुनरावृत्तिर- हिता । संमृतिरहिता! जन्ममरणभयरहिता। कान्तारपक्ष सकलभयवर्जिता च । अग्रभूमिः :=प्राप्यस्थानम । असीति झपः । त्वमेव भयवर्जित परम पदमसि । [ भावार्थः ] यथा दस्युचौरसिंहादिहिंस्रसङ्कले पान्थजन भीषणेऽप्रतिहते कान्तारे गच्छतः पान्थस्न अग्रे प्रापव्यं निभयमाश्रयस्थान भवति तथैव कामक्रोधादिपरिपन्थिसङ्कल दुर्गम मोक्षमार्ग प्रविचरतो मुनेर्भवानेव संसरणभयविकलं परमं पदमस्ति । [ कोशः] 'प्रतिरोधिपरास्कन्दिपाटचरमलिम्लुचाः' इत्यमरः । 'अप्रम- वलम्बने प्राप्ये' इति विश्वः । [वाच्यप० ] उदीर्णरागप्रतिरोधकं मोक्षपथमुपेयुपी मनस्विनः स्वया निरपायसंश्रयया अग्रभूम्या भूयते । [भाषाटीका ] जैसे चोर डाकुओं से भरे हुए बीहड़ उजाड़ दुर्गा जंगल में जाता हुआ पथिक अपने गन्तव्य ( सर्व सुबमाधनों से परिपूर्ण । भयरहित आश्रयस्थान (धर्मशाला या ग्राम आदि) को प्राप्त होकर कृतकृत्य होता है वैसे ही बीहड़ गहन दुर्गम तथा काम क्रोधादि विनों से परिपूर्ण मोक्षमार्ग में चलनेवाले योगियों के लिए आपही प्राप्तव्य निर्भय परम पद हैं । अर्थात्---आपके पास पहुँचने के लिए ही योगिजन कठिन मोक्षमार्ग का परिशीलन करते हैं अतः आपका दर्शन ही परम पुरुषार्थ है ॥ ३२ ॥ ननु प्रकृतिविविक्तपुरुषसाक्षात्कारान्मोक्षो नास्मसाक्षात्कारादित्याशङ्कर सोऽपि त्वमेवेत्याह- - सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ५६ - उदासितारं निगृहीतमानसै- गृहीतमध्यात्मशा कथंचन । बर्हि विकारं प्रकृतेः पृथग्विदुः पुरातनं त्वां पुरुषं पुराविदः ॥ ३३ ॥ [ सर्वङ्गषा ] उदासितारमिति । पुराविदः-पूर्वज्ञाः कपिलादयः । त्वां निगृहीतमानसैः-अन्तर्निबद्धचित्तैर्योगिभिः-आत्मनि अधि इत्यध्या- मम् । विभक्त्यर्थे ऽव्ययीभावः । 'अनश्च' इति समासान्तष्टक् । अध्यात्म याहक ज्ञानं तया---अध्यात्मशा--प्रत्यग्दृष्टया, कथंचन गृहीतं- साक्षात्कृतम् । केन रूपेण गृहीतमित्यत आह-उदासितारम्--उदासी- नम् । प्रकृती स्वार्थप्रवृत्तायामपि स्वयमप्राकृतत्वादस्पृष्टमित्यर्थः । आसेस्तृच । विकारेभ्यो बहिः-बहिर्विकारम् । महदादिभ्यः पृथग्भू तमित्यर्थः । 'अप- परिबहिरञ्चवः पञ्चम्या' इत्यव्ययीभावः । किञ्च प्रकृतेः-त्रैगुण्यात्मनो मूल- कारणात्पृथग-भिन्नम्। 'प्रकृतिः पञ्चभूतेषु प्रधाने मूलकारणे' इति यादवः। पुरा भवं पुरातनम्-अनादिम् । 'सायंचिरम्-' इत्यादिना ट्य प्रत्ययः । पुरुष-पुरुषपदवाच्यं विज्ञानधनं । विदुः-विदन्ति । 'विदो लटा वा इति झेरुसादेशः । यथाहुः-'मूलप्रकृतिरविकृतिमहदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडपकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ इति 'अजामेकां लोहित- शुक्लकृष्णाम्' इत्यादिश्रुतिश्च । सोऽपि त्वमेव, 'तत्त्वमसि' इत्यादिवाक्य- रैक्यश्रवणात् । तस्मात्त्वमेव साक्षात्करणीय इति सुष्ठूतमिति भावः ॥३३॥ [ अन्वयः] पुराविदः त्वां निगृहीतमानसैः अध्यात्मशा कथंचन गृहीतम् उदासितारम बहिर्विकारम् प्रकृतेः पृथक् पुरातनम पुरुपं विदुः। [विग्रहः ] निगृहीतं मानसं यैस्ते निगृतमानसाः, तै:-निग्रहीत- मानसैः। आत्मनि इति अध्यात्मम्, अध्यात्मं या दृक् सा अध्यात्मदृक् । तया,-अध्यात्मशा । विकारेभ्यो बहिरिति बहिर्विकारम् । पुरा भवः पुरा- तनः, तं-पुरातनम् ।
६०
शिशुपालवधम् ।
[ प्रथमः
-
[अर्थः ] पुराविदः = पूर्वज्ञाः। पुराणतत्त्वविदः कपिलादयो
मुनयः । त्वां = भवन्तम् । निगृहीतमानसैः = अन्तनिवद्धचित्तैः ।
संयतचित्तैर्योगिभिः । अध्यात्मदशा = प्रत्यग्दृष्ट्या । अन्तई शा।
कथञ्चन = महता प्रयासेन । गृहीतं = कथमपि साक्षात्कृतम् ।
उदासितारम् = प्रकृतौ स्वार्थी प्रवृत्तायामपि उदामीनम् । बहिर्वि-
कारं = प्रकृतिविकारेभ्यो महदादिभ्यो बहिर्भूनम् । महदादि-
विकारभिन्नम् । प्रकृतेः = मूलप्रकृवे स्त्रिगुणात्मिकायाः। पृथक =
भिन्नम् । पुरातनम् = अनादिम् । पुराणम् । पुरुपं = पुरुषपद.
वाच्यम् । विदुः = विदन्ति । जानन्ति ।
[ भावार्थः ] मूलप्रकृतेर्महदादिभ्योऽपि भिन्नं प्रकृती व्याप्रिय-
माणायामप्युदासीनं विज्ञानघनं त्वां कपिलादयो महामुनयः
पुरुषपदवाच्यं क्षेत्रज्ञं विदन्ति ।
[ कोशः ] 'प्रकृतिः पञ्चभूतेषु प्रधाने मूलकारणे' इति वैजयन्ती ।
'क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः' इत्यमरः ।
[ वाच्यप० ] पुराविद्भिः निगृहीतमानसर्गृहीतः बहिर्विकार उदास्मिता
प्रकृतेः पृथक्त्वं पुरातनः पुरुषो विद्यसे ।
[ भाषाटीका ] कपिल आदि पुरातन मुनि लोग आपको प्रकृति और
उसके महत्तत्त्व आदि विकारों से पृथक् प्रतिपादन करते हैं और आपको
ही पुरुषपद से कहते हैं ॥३३॥
एवं भगवती निर्गुणस्वरूपमुक्त्वा संप्रति प्रस्तुतोपयोगिनया सगुणमा-
श्रित्य षड्भिः स्तौति-
निवेशयामासिथ हेलयोद्धृतं
फणाभृतां छादनमेकमोकसः ।
जगत्रयकस्थपतिस्त्वमुच्चकै-
रहीश्वरस्तम्भशिरस्सु भूतलम् ॥ ३४ ॥
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम्। ६१ - .. । [सर्वकषा] निवेशयामासिथेति । जगत्रयस्य एकस्थपतिः एकाधिपतिः, एकशिल्पी च । 'स्थपतिरधिपतौ तक्षिण बृहस्पतिसचिवयोः' इति वैजयन्ती। त्वं हेलयोद्धृतम् । वराहावतारे इति भावः। फरणा- भृताम् अोकसः-आश्रयस्य, सद्मनश्च । 'ओकः सद्मनि चाश्रये' इति विश्वः । एक छादनम्---आवरणं, भूतलमुच्चकैरुन्नतेपु च,-- --अहीश्वरः- शेषएव स्तम्भस्तस्य शिरःसु-मूर्धसु, अग्रेषु च । फणासहस्रविति भावः । निवेशयामासिथ--निवेशितवानसि । विशतेय॑न्ताल्लिटि थल् । 'कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि' इत्यस्तेरनुप्रयोगः । अत्र श्लिष्टाश्लिष्टरूपकयोहेतु- हेतुसद्भावाच्छिलष्टं परम्परितरूपकम् ॥ ३४ ॥ [अन्वयः] जगत्त्रयैकस्थपतिः त्वं हेलया उद्धृतं फणाभृताम् अोकसः एकं छादनं भूतलम् उच्चकैः अहीश्वरस्तम्भशिरःसु निवेश- यामासिथ । [विग्रहः ] जगतां त्रयम् जगत्त्रयम् । एकश्चासौ स्थपतिश्च एकस्थ- पतिः । जगत्त्रयस्य एकस्थपतिः-जगत्त्रयैकस्थपतिः । फणा बिभ्रतीति फणाभृतः, तेषां फणाभृताम् । अहीश्वर एवं स्तम्भ:--अहीश्वरस्तम्भः, अहीश्वरस्तम्भस्य शिरांसि--अहीश्वरस्तम्भशिरांसि, तेषु-अहीश्वरस्तम्भ- शिरःसु । [अर्थः] जगत्त्रयैकस्थपतिः = त्रैलोक्यै फाधिपतिः । त्रैलो- क्यैकशिल्पी च । त्वं = भवान् । हेलया = लीलया । उद्धृतम् = उत्थापितम् । वराहावतारे समुद्धृतम् । फणाभृतां = सर्पाणाम् । फणिनाम् । ओकसः = आश्रयस्य, सद्मनश्च । पातालरूपस्य फणिनिलयस्य । एक = मुख्यम्। प्रधानम् । छादनम् = आवरणम् । भूतलं- भूवलयम् । उच्चकैः = उच्छ्रितेपु । उन्नतेपु । अहीश्वरस्तम्भ- शिरःसु-साधिपतिशेपशिरोरूपस्तम्भाग्रभागेषु । शेषसम्बन्धि- फरणासहस्रयु । निवेशयामासिथ = विनिवेशितवानसि । [ भावार्थः ] वराहावतारे जगत्त्रयैकसूत्रधारेण भवता शिशुपालवधम्। लीलया पातालाच्छादनं भूवल यमुद्धृत्य शेषशिरःस्तम्भेषु विनि- वेशतमित्यहो ! महिमातिशयो भगवतो जगदीश्वर य भवतः। [ कोशः ] 'स्थपतिश्चाधिपे तक्षिण बृहस्पतिसचिवयोः' इति वैजयन्ती। 'ओकः सद्मनि चाश्रये इति विश्वः । [वाच्यप० ] जगत्त्रयैकस्थपतिना त्वया भूतलमहीश्वरस्तम्भशिरःसु निवेशयाम्बभूवे । [भाषाटीका ] आपने बराह अवतार के समय समुद्र में से पृथ्वी का उद्धार कर और उसे शेषनाग के हजारों शिररूपी स्तम्भोंपर म्थापना कर अपनी जगत् निर्माण की शिल्पचातरी प्रदर्शित की है ॥ ३१ ॥ अनन्यगुर्वास्तवः केन केवल पुराणमतॆमहिमाऽवगम्यते मनुष्यजन्माऽपि सुरासुरान्गुण- भवान्भवच्छेदकरः करोत्यधः ॥ ३५ ॥ [सर्वधा ] अनन्येति । न विद्यतेऽन्यो गुरुयस्यास्तस्याः- न्यगुर्वा इन्यनीकारान्तः पाठः । समामान्प्राल्डोषि 'नघनश्च' इति कप्रसङ्गः स्यात् । पश्चात्तनुपसर्जनाधिकारात् 'वोतो गुणवचनात' इति न पामोति । 'डिति हस्वश्च' इति वा नदीसंज्ञात्वात् "आपनद्याः' इन्याडा- गमः । केचित्तु समासान्तविधिरनित्य इति कपं वारयन्ति । तस्या:--सर्वो- त्तमायाः, तव पुराणमूर्तः -अमानुषस्वरूपस्य । केवल:-कृतः । 'केवलः कृत्स्न एकः स्याकेवलश्वावधारणे' इति विश्वः । महिमा केनाव- गम्यते । न केनापीत्यर्थः । कुतः ? । मनुष्याजन्म यस्य स मनुष्य जन्मा भवान् । ' अवो हि बहुव्रीहिय॑धिकरणो जन्मायुत्तरपदः । इति भवच्छेदकरैः--संसारनिवर्तकैः, गुणैर्शानादिभिः सुरासुरान् सुरासुरविरोधस्य कार्योपाधिकत्वेनाशाबवि- ॐ अनन्यगुा इति पाठान्तरम् । mein वामनः सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ६३ .. कत्वात् 'येषां च विरोधः शाश्वतिकः' इति न द्वन्द्वकवद्भाव इत्याहुः । अधः करोति । 'शेषे प्रथम:' इति प्रथमपुरुषः। भवच्छब्दस्य युष्मदस्मदन्यत्वेन शेषत्वादिति। मानुष एव ते महिसा दुरवगाहः, अमानुषस्तु किमितीति तात्पर्यार्थः । द्वितीयार्धेऽसकृद्वयञ्जनावृत्त्या छेकानुप्रासः ॥ ३५ ॥ [अन्वयः ] अनन्यगुर्वाः तव पुराणमूर्तेः केवलः महिमा केन अवगम्यते ? । मनुष्यजन्माऽपि भवान् भवच्छेदकरैः गुणैः सुरासुरान् अधः करोति । [विग्रहः ] न विद्यते अन्यो गुरुय॑स्याः सा---अनन्यगुरुः, तस्याः-- अनन्यगुर्वाः । पुराणा चासौ मूर्तिश्च पुराणमूर्तिः, तस्याः पुराणमूर्तेः । मनुष्यात् जन्म यस्याऽसौ मनुष्यजन्मा । भवस्य च्छेदः सवच्छेदः, भवच्छेद कुर्वन्तीति भवच्छदकराः, तैः भवच्छेदकरैः । सुराश्च असुराश्च सुरासुराः, वान् सुरासुरान् । [अर्थः ] अनन्यगुर्वाः = अनितरश्रेष्ठायाः। अनन्यसाधारण. गौरवशालिन्याः । सर्वश्रेष्ठायाः। तव = भवतः। पुराणमूर्तेः वामनादिपुरातनस्वरूपस्य । दिव्यस्य वपुषः । केवलः = अशेषः । सर्वोऽपि । महिमा-माहात्म्यातिशयः। केनावगम्यते-केन पुरुपेण ज्ञायते ? । न केनापि तत्त्वतो भवतो महिमा ज्ञायते इत्यर्थः । मनुष्यजन्मा-धृतमानुषवपुः । वसुदेवादुद्भूतोऽपि मर्त्यदेहधार्यपि खलु । भवान् त्वम् । भवच्छेदकरैः संसार- जालनिवर्त्तकैः । भववन्धनकर्त्तनपटुभिः। गुणैः-दयादाक्षिण्यानु. ग्रहादिभिर्जानैश्वर्यादिभिश्च गुणैः । सुराऽसुरान् =देवासुरान् । अधः करोति-तिरस्करोति । भावार्थः] सर्वातिशायिन्यास्तव पुरातनमूर्त्तः (वामना- दिमूर्त्तः) महिमानं कात्स्न्येन वक्तुं कः किल पुमान् समर्थः १ । न कोऽपि । यन्मानुषेऽप्यस्मिन्नवतारे भवच्छेदकरैर्गुणैर्भवान सुरांश्वाऽसुरांश्च तिरस्करोति । यस्य मानुषावतारस्यापि .
६४ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः .. सुरासुरातिशायी महिमा वर्तते तस्य दिव्यावताराणां महिमानं कास्र्नेन वक्तुं कः प्रभुः ?, न कोपीत्याशयः । [ कोशः] 'केवलः कृत्स्न एकः स्याकेवलश्वावधारणे' इति विश्वः । [बाच्यप० ] अनन्यगुर्वास्तव पुराणमूर्तेः केवलं महिमानं कोऽव- गच्छति ? मनुष्यजन्मनाऽपि भवता भवच्छेदकरैः गुणैः सुरासुरा अधः क्रियन्ते । [ भाटीका ] आपके दिव्य वासन आदि अवतारों की सर्वश्रेष्ट महिमा का यथार्थ वर्णन तो असम्भव ही है, क्योंकि आप मनुष्यावतार ( रामकृष्ण- वतार ) में भी जब देवासुरों को अपने गुणों से नीचा दिखा रहे हैं, ( उनमें श्रेष्ठ आपके गुण हैं ) तो आपके दिव्य अवतारों की महिमा को कोन वर्णन कर सकता है ? ॥ ३५ ॥ लघुकरिष्यन्नतिभारभगुरा- मम किल त्वं त्रिदिवादवातरः । उदूढलोकत्रितयेन साम्प्रतं गुरुर्धरित्री क्रियतेतरान्त्वया ।। ३६ ॥ [ सर्वकषा ] लघुकरिष्यन्निति । त्वमतिभारणोजन स्वरूपण भङ्गुरां-स्वयं भज्यमानाम् । 'भाभासभिदो घुरच' । 'भगुरः कम- कर्तरि इति वामनः । अमूम् । भुवमित्यर्थः । लघुकरिष्यन-निर्भारा करिष्यन् किल । 'कृभ्वस्ति-इत्यादिनाऽभूनतद्भावे विः । 'वो छ' इति दीर्घः । तृतीया यौः-त्रिदिवः-स्वर्गस्तम्मात । 'घम) कविधानम् । वृत्तिविषये सङ्खयाशब्दस्य पूरणार्थत्वं, त्रिभागादिवत् । अवातर:-अब- तीर्णो ऽसि । साम्प्रतं-सम्प्रति । उदूढलोकत्रितयेन । 'कुक्षाविति शेषः। त्वया धरित्री गुरु:-पूज्या, भारवती च, क्रियतेतराम- अतिशयेन क्रियते । 'तिजश्व इति तरप । 'किमत्तिकम्ययधात्-' इत्यादिना आमुप्रत्ययः । लघुकर्ता गुरुकति विरोधाभासोshaरः । 'आभासत्वे विरोधस्य विरोधाभास उच्यते' इति लक्षणात् ।। ३६ ॥ గు - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ६५ - [अन्वयः] त्वम् अतिभारभगुराम् अमूम् लघु करिष्यन् किल त्रिदिवात् अवातरः । साम्प्रतम् उदूढलोकत्रितयेन त्वया धरित्री गुरुः क्रियतेतराम् । [विग्रहः ] अतिशयितो भारः-अतिभारः, अतिभारेण भङ्गुरा अति- भारभङ्गुरा, ताम् अतिभारभङ्गुराम् । लोकानां त्रितयं लोकत्रितयम् । उदूद लोकत्रितयं येनासौ उदूढलोकत्रितयः, तेन-उदूढलोकत्रितयेन । [अर्थः ] त्वम् भवान् । अतिभारभङगुराम्-अतिभारेण स्वयमेव भज्यमानाम् । अमूम् भुवम् । लघूकरिष्यन् किल- निर्भारां करिष्यन् किल । व्यपगतभारां विधास्यन् ।त्रिदिवात स्वर्गात् । वैकुण्ठाख्यान्निजधाम्नः । अवातरः अवतीर्णोऽसि । वसुदेवगृहे लीलामानुषरूपेणावतीर्णोऽसि । किन्तु-साम्प्रतम्- इदानीम् । उदूढलोकत्रितयेन-कुक्षिविनिवेशितलोकत्रयेण । त्वया भवता श्रीकृष्णेन । धरित्री पृथ्वी । गुरु: भाराक्रान्ता, पूज्या च । क्रियतेतराम अतिशयेन क्रियते । विशेषतो विधीयते । [ भावार्थः] हे पुरुषोत्तम ! भूभारावतारणायावतीर्णोऽपि त्वं (विपरीतं--) स्वकुक्षिस्थत्रैलोक्यभारेण पृथ्वी भारवतीमेव करोषि, स्वचरणन्यासेन पूज्यां च विदधासीत्याशयः । तदत्र त्रिलोकीपतिर्भवान् . भूभारापहरणायावतीर्णोऽस्तीति तत्वम् । [ कोशः ] 'धरा धरित्री धरणिः' इत्यमरः । 'स्वर्गनाकत्रिदिवत्रिदशा- लयाः' इत्यमरः। वाच्यप० ] अतिभारभङ्गुरामिमां लधूकरिष्यता भवता त्रिदिवात् अवातीयंत । साम्प्रतम् उदूढलोकत्रितयः धरित्री गुरुं करोषितराम् । [ भाघाटीका ] हे अच्युत ! आपका यह अवतार यद्यपि पृथ्वी के भार [जिस भारसे पृथ्वी टुकड़ा टुकड़ा होना चाहती है ) को दूर करने के लिए हुआ है। परन्तु भार हटाना तो दूर रहा है-अपनी कुक्षि में स्थित त्रैलोक्य के भार से उलटे आप इस पृथ्वी पर और अधिक भार बढा रहे हि ह विरोधा- .
शिशुपालवधम्। [१ प्रथमः- - - भास है। इसका परिहार-'आपके अवतार लेने से पृथ्वी का गौरव ( मान मर्यादा) बढ़ गई। अब पृथ्वी का भार जल्दी दूर करिए यह भावार्थ है]॥३६॥ निजौजसोज्जासयितु जगव्हा- मुपाजिहीथा न महीतलं यदि। समाहितरप्यनिरूपितस्ततः पदं दृशः स्याः कथमीश ! मादृशाम् ? ॥३७॥ [ सर्वकषा] निजेति । निजौजसा स्वतंजमा । जगद्भयो द्रुह्य- न्तीति जगद्रुहः-कंसादयः। ‘सत्सूद्विप-' इत्यादिना क्विम् । तेषां उज्जासयितुम् । तान्हिसितुमित्यर्थः । 'जासिनिप्रहण--'इन्यादिना कर्मणि शेपे षष्ठी। 'जसु हिंसायाम्' इति चुरादिः। महीतलं नोपाजिहीथाः यदि-नावतरेश्चेत् । “ओहाङ् गती' लङिथासि रूपम् । ततः--तर्हि समाहितः-समाधिनिष्टैरपि । सकर्मकादप्याशितादिवविवक्षिते कर्मणि कतरिक्तः । अथवा-समाहितः। समाहितचितरित्यर्थः। विभक्तधनेषु 'विभक्ता भ्रातरः' इतिवदुत्तरपदलोपो दृष्टव्यः । गम्यमानार्थस्याप्रयोग एव लोप इति कैय्यटः । अनिरूपितः-अगृहीतस्त्वमीश माहशाम् । धर्मचक्षुषामिति भावः। विनयोक्तिरियम् । दृशः-दृष्टेः, पद-गोचरः, कथं स्याः । न कथञ्चिदित्यर्थः । यस्मात्वत्साक्षात्कार एवागमनप्रयोजनमिति भावः ॥३॥ [अन्वयः] निजौजसा जगद्गुहामुज्जासयितु महीतलं न उपाजिहीथाः यदि ततः समाहितरपि अनिरूपितः त्वम् ईश मादृशां दृशः पदं कथं स्याः । [विग्रहः ] जगद्भयो बुह्यन्तीति जगद्रुहः,तेषां जगदुहाम् । निज- ञ्चतदोजश्च निजौजः, तेन निजीजसा । मह्यास्तलं महीतलं, तत्-महीतलम् । [अथः] निजौजसाश्वतेजसा । जगद्गुहां-जगदुत्पीड- कानां । कंसादीनाम् । उज्जासयितु प्रोजासयितुम् । तान विनिहिंसितुमित्यर्थः । महीतलं-भुवस्तलम् । पृथ्वीतलम् ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । .. ६७ नोपाजिहीथा यदि-नावतरेश्चेत् । ततः तर्हि । समाहितैरपि- समाधिनिष्ठरपि । समाहितचित्तैरपि। अनिरूपितः= अगृहीतः । अनधिगतः । ज्ञातुमशक्यश्च । त्व-भवान् । ईश हे विभो । माहशा-मत्सहशानां चर्मचक्षुषाम् । दृशः दृष्टेः । पदं गोचरः। कथ स्या कथं सवेः । न कथञ्चिदपीत्यर्थः । [भावार्थः ] यदि स्वतेजसा कंसादीन विश्वगु हो विनिहन्तुं त्वमत्र नावतरेस्तहिं योगिभिर्ध्यानादिनाऽपि ज्ञातुमशक्यस्त्वं कथं मादृशां लोचनातिथिः स्याः ? । नैव स्याः। अतो द्रष्टुमेव त्वामहमत्रायातोऽस्मि। [कोशः ] 'ओजोदीप्ताववष्टम्भे प्रकाशबलयोरपि' इति मेदिनी । [वाच्यप०] निजौजसा जगद्ब्रहामुजासयितुं त्वया महीतलं नोपाहीयत यदि । हे ईश ! समाहितैरपि अनिरूपितेन मादृशां दृशः पदेन कथं भूयेत?। [भाषाटीका ] हे इश ! यदि जगत् को क्लेश देनेवाले कंसादिको मारने के लिए आप अवतार न लेते तो योगियों से भी अगभ्य यह आपकी मूर्ति (छबि) हम लोगों को देखने को कैसे मिलती है। अतः आपका दर्शन करना ही मेरे आने का सबसे बड़ा कारण है ॥३७॥ ननु कोऽयं नियमो यन्ममैवायं दुष्टनिग्रहाधिकार इत्याशङ्कयानन्य- साध्यत्वमेवाह- उपप्लुतं पातुमदो मदोद्धतै स्त्वमेव विश्वम्भर ! विश्वमीशिषे । ऋते रवेः क्षालयितुं क्षमेत कः क्षपातमस्काएडमलीमसं नमः ॥ ३८ ॥ [ सर्वकषा] उपप्लुतमिति । विश्वं बिभर्तीति विश्वम्भरस्तत्सम्बुद्धौ हे विश्वम्भर ! विश्वत्रातः । 'सज्ञायां भृतृवृजि-' इत्यादिना खच्प्रत्यये मुमागमः । मदोद्धतैः-कंसादिभिः-उपप्लुतं-पीडितम् । अदो- विश्वं पातु त्वमेव ईशिषे-शक्तोऽसि । विश्वम्भरत्वादिति भावः । 4 ६८ शिशुपालवधम्। [१ प्रथमः ८ . विना। ईश ऐश्वर्ये । लिटि थासि रूपम् । अत्र वैधम्र्येण दृष्टान्तमाह-क्षपायास्त- मस्काण्डैः-तमोवगैः। 'काण्डोऽस्त्री दण्डबाणाऽर्ववर्गावमरवारिपुर इत्यमरः । कस्कादिषु च इति विसर्जनयस्य सत्वम् । मलीमसं-सलिनम्। 'मलीमसं तु मलिनं कच्चरं मलदूषितम्' इत्यमरः । 'ज्योत्स्नातमित्रा इत्यादिना मत्वर्थीयो निपातः । नभः क्षालयितु रवेः ऋते-रविं अन्यारादितरते-, इति पञ्चमी । कः-क्षमेत-शक्नुयात् । न कोऽपीत्यर्थः । अत्र वाक्यद्वये समानधर्मस्यैकस्यशिषेक्षमतेति शब्दद्वयन बस्तुभावेन निर्देशात्तत्रापि व्यतिरेकमुखत्वाद्वैधर्येण प्रतिवस्तूपमाल कारः । तदुक्तम्-'सर्वस्य वाक्यार्थगतत्वेन सामान्यस्य बाक्यद्वये पृथनिर्देश प्रतिवस्तूपसा' ॥ ३८ ॥ [अन्वयः] विश्वम्भर ! मदोद्भुतैः उपप्लुतम् अदः विश्वं पातुम् त्वमेव ईशिषे । क्षपातमस्काण्डमलीमसम नभः लालयितुम रवेः ऋते कः क्षमेत ?। [विग्रहः ] विश्वं बिभर्तीति विश्वम्भरः, तत्सम्बुद्धी हे विश्वम्भर ! । मदेन उद्धताः मदोद्धताः, तैः-मदोद्धतैः। तमसः काण्डानि तमस्काण्डानि। क्षपायाः तमस्काण्डानि क्षपातमस्काण्डानि । -क्षपातमस्काण्ः मलीमम क्षपातमस्काण्डमलीमसम्, तत् । [अर्थः ] विश्वम्भर - हे जगत्रातः । हे जगदीश ! हे त्रैलो- क्यरक्षक ! मदोद्धतः = दुर्मदोद्वृतैः । उन्मत्तैः कंसादिभिः। उपप्लुतं = पीडितम् । अदः- इदं । विश्वं जगत् । पातु : रक्षितुम् । त्वमेव = भवानेव। ईशिषे =समर्थोऽसि । शक्तोऽसि । क्षपातमस्काण्डमलीमसं निशाऽन्धकारसन्तानमलिनम् । रात्रिप्रगाढान्धकारपरम्परामलिनितम् । निशान्धकारपटलाव- लीढम । नमः = गगनं । क्षालयितु विशदीकर्तुम् । प्रकाश- यितुम् । रवेः ऋते-आदित्यं विना ।कः क्षमेत = कः खलु शक्नुयात् ? । नकोऽपि शक्नुयादित्यर्थः ।
सर्गः अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम
[ भावार्थः ] हे प्रभो ! उद्वृत्तैर्दुष्टः कंसादिभिरुपप्लुतं जग-
दिदं भवानेव त्रातुं समर्थो विश्वम्भरत्वान्नान्यः। ननु प्रचण्ड-
महसं मार्तण्ड विना रात्रेघनमन्धकारं गगनतलादपसारयितुं
कः समर्थः । न कोऽपीति भावः ।
[ कोशः ] 'काण्डोऽस्त्री दण्डबाणावर्गावसरवारिषु इत्यमरः । 'मली-
मसन्तु मलिनं कच्चरं मलदूषितम्' इत्यमरः ।
[ वाच्यप०] विश्वम्भर ! मदोद्धतैरुपप्लुतम् अदो विश्वं पातुं त्वथा
गुव ईश्यते । ऋते रवेः......मलीससं नभः क्षालयितुं केन क्षम्येत ? ।
[ भाषाटीका ] हे विश्वम्भर ! कंस आदि दुष्टों से सताये गए इस
त्रैलोक्य की रक्षा आप ही कर सकते हैं, दूसरे की मामर्थ्य नहीं है।
क्योंकि रात्रि के गहरे अन्धकार को आकाश से भगाने की शक्ति सूर्य
भगवान् में ही है, दूसरे में नहीं ॥ ३८ ॥
करोति कंसादिमहीभृतां वधा-
जनो मृगाणामिव यत्तव स्तवम् ।
हरे ! हिरण्याक्षपुरःसरासुर-
द्विपद्विषः प्रत्यत सा तिरस्क्रिया ॥३६॥
[ सर्वकषा] करोतीति । किञ्च-जनो मृगाणामिव कंसादि-
महीमृतां वधाद्धेतोः स्तवं-स्तोत्रम् । 'स्तवः स्तोत्रं स्तुतिर्नुतिः
इत्यमरः । करोति यत् । हे हरे-हे कृष्ण । हे सिंहेति च गम्यते । सा
स्तुतिक्रिया । हिरण्याक्षपुरःसराः-हिरण्याक्षप्रभृतयो येऽसुरास्त एव
द्विपास्तेषां द्विषः। हन्तुरित्यर्थः । तस्य
तव प्रत्युत-वैपरीत्येन ।
'प्रत्युतेत्युक्तवैपरीत्ये' इति गणव्याख्यानात् । तिरस्क्रिया-अवमानः ।
यदिति सामान्ये नपुंसकम् । सेति विधेयलिङ्गम् । गजघातिनः सिंहस्य
मृगवधवर्णनमिव महासुरहन्तुस्तव कंसादिक्षुदनृपवधवर्णनं तिरस्कार
एवेत्यर्थः । अत्रासुरद्विपानामिति हरिवद्धरिरिति श्लिष्टपरम्परितरूपकं
मृगाणामिवेत्युपमयाऽङ्गाङ्गिभावेन सङ्कीर्यते ॥ ३९ ॥
शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- - [अन्वयः] जनः मृगाणामिव कंसादिमहीभृतां वधात् यत् (तव) स्तवं करोति, हरे ! सा स्तुतिक्रिया हिरण्याक्षपुरः सरा. सुरद्विपद्विषः तव प्रत्युत तिरक्रिया [ भवति । [विग्रहः ] कंस आदिर्येषां ते कंसादयः, कंसादयश्च ते महीभृतश्च कंसादिमहीभृतः, तेषां-कंसादिमहीभृताम् । हिरण्याक्ष एव पुरःसरो येषां ते हिरण्याक्षपुरःसराः, हिरण्याक्षपुरस्सराश्च ते असुराश्च--हिरण्याक्षपुरः- सराऽसुराः त एव द्विपाः हिरण्याक्षपुरःसरासुरद्विपाः, तेषां विट हिरण्याक्ष- पुरस्सरासुरद्विपद्विट्, तत्य' हिरण्याक्षपुरस्सरासुरद्विपद्विषः। तिरस्करणं तिरस्क्रिया। [अर्थः] जनः लोकः। मृगाणामिव हरिणानामिव । कंसादिमहीभृतां कंसादिनृपाणाम् । वधात निबर्हरगान । मारणाद्धेतोः । यत् (तव-भवतः)। स्तोत्रं-स्तुतिम् । 'हे कमनि- षूदन ! हे कालियमर्दन ! हे केशिहन्' इत्येवं भवतः प्रशंसाम् । करोति-विदधाति । विरचयति । हरे हे कृष्ण ! हे केसरिन् ! हे नृसिह ! । सा-स्तुतिक्रिया । हिरण्याचपुरस्सराऽसुरद्विपद्विषः= हिरण्याक्षहिरण्यकशिपुमधुकैटभाद्यसुरगजेन्द्रहन्तुः। तव-भवतः। प्रत्युत-वैपरीत्येन । तिरस्क्रिया-तिरस्कारः। अपमान एव भवति न स्तुतिः। [भावार्थः] हे नृसिंह ! यथा गजेन्द्रयूथाधिपनिवहरण- परायणस्य कराठीरवस्य मृगादिक्षुद्रपशुवधात्स्तुतिक्रियापमान एव, एवं हिरण्याक्षाद्यपुरराजमहागजेन्द्रहन्तुर्भवतः क्षुद्रकंसादिरूप- मृगवधात् (हे कंसारे इत्यादिना) लोके स्तुतिः प्रत्युत तिरस्क्रियेव न स्तुतिः। [कोशः] 'यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिंहांऽशुवाजिषु । शुकाहिकपिभेकंषु हरिर्ना कपिले त्रिषु' इत्यमरः । 'प्रत्युतोक्तविरोधे स्यात्' इति गणव्याख्या । [वाच्यप०] मृगाणामिव कंसादिमहीभृतां वधात्-जनेन यत्तव स्तवः क्रियते तया स्तुतिक्रियया तव विरस्क्रियया भूयते ।
सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [ भाषाटीका ] हे हरे ( हे नृसिंह ! ) जैसे मत्त हाथियों के झुण्ड को मारनेवाले सिंह की मृगों के मारने से स्तुति करना निन्दा के समान है, वैसे ही हिरण्याक्ष आदि दुर्दान्त असुर रूपी हाथियों के मारनेवाले आपकी कंस आदि छोटे २ असुररूपी हरिणों को मारने से स्तुति करना आपका अपमान ही करना है ॥ ३९ ॥ एवं स्तुत्या देवमभिमुखीकृत्यागमनप्रयोजनं वक्तुमुपोद्धातयति- प्रवृत्त एव स्वयमुज्झितश्रमः क्रमेण पेष्टुं भुवनद्विषामसि । तथापि वाचालतया युनक्ति मां मिथस्त्वदाभाषणलोलुप मनः ॥४०॥ [ सर्वङ्कपा] प्रवृत्त इति । त्वम्---उज्झितश्रमः-त्यक्तश्रमः सन् । क्रमेण--भुवनानि द्विषन्तीति भुवनद्विषः-दुष्टास्तेषां पेष्टुम् । तान्हिसितुमित्यर्थः । 'जासिनिग्रहण--' इत्यादिना कर्मणि शेषे षष्टी । स्वयम्-अपरप्रेरित एव प्रवृत्तोऽसि । एवं तर्हि पिष्टपेषणं किमिति चेत्त- त्राह-तथापि--स्वतः प्रवृत्तेऽपि, मिथो-रहसि, त्वदाभाषणे---त्वया सह संलापे, लोलुपं-लुब्धम् । 'लुब्धोऽभिलाषुकस्तृष्णक्समौ लोलुप- लोलुभौ' इत्यमरः । मनो मां वाचालतया सह युनक्ति । वाचालं करोती- त्यर्थः वाचा बह्वयोऽस्य सन्तीति वाचालः । 'आलजाचटौ बहुभाषिणि' इत्यालच् । 'स्याजल्पाकस्तु वाचालो वाचाटो बहुगडंवाक्' इत्यमरः ॥४०॥ [अन्वयः]-( त्वम् ) उज्झितश्रमः ( सन्) क्रमेण भुवन- द्विपां पेष्टुं स्वयम् एव प्रवृत्तोऽसि । तथापि मिथस्त्वदाभाषणलोलुपं मनः मां वाचालतया (सह) युनक्ति । [विग्रहः] उज्झितः श्रमो येनाऽसौ उज्झितश्रमः । भुवनानि द्विषन्तीति भुवनद्विषः, तेषां भुवनद्विषाम् । बढ्यो वाचोऽस्य सन्तीति वाचालः, तस्य भावो वाचालता, तया-वाचालतया । त्वया आभाषणं त्वदाभाषणं, मिथ:-त्वदाभाषणे लोलुपं मिथस्त्वदाभाषणलोलुपम्, तत् ।
७२ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- [अर्थः] त्वम्- उज्झितश्रमः परित्यक्तपरिश्रमः सन् । अविश्रान्तः सन् । क्रमेण क्रमशो। यथायथम् । भुवन द्विषां= जगदुहां कंसादिदुष्टानाम् । पेष्टुम् =उजासयितुम् । तान विनि हन्तुम् । स्वयमेव =आत्मनैव। प्रवृत्तोऽसि= प्रवृत्त एवासि । तथापि =स्वतः प्रवृत्तेऽपि । मिथस्त्वदाभापणलोलुप-परस्पर रहसि च त्वया सह संलापे समुत्सुकम्। मनः-मच्चतः। मां- निःस्पृहमपि मां नारदम । वाचालतया-वाचालत्वेन साकं । युनक्ति-योजयति । मां वाचाल करोति । [भावार्थः ] यद्यपि स्वयमेव त्वं क्रमशोऽविश्रान्तो दुष्टान् विनिहन्तु प्रवृत्तोऽसि, तथाऽपि मिथस्त्वदालापसमुत्सुकमानसः किञ्चिद्वच्मि । [ कोशः ] 'स्याजल्पाकस्तु वाचालो वाचाटो बहुगडंवाक्' इत्यमरः । 'लुब्धोऽभिलापुकस्तृष्णक समौ लोलुपलोलुभो' इत्यमरः । [वाच्यप० ] उज्झितश्रमेण त्वया स्वयमेव भुवनद्विषां पेष्टुं प्रवृत्तेन भूयते । तथापि मिथस्वदाभाषणलोलुपेन मनसाऽहं वाचालतया युज्ये । [भाषाटीका] यद्यपि किसीके कहे बिना ही आप अविश्रान्त रूप से दुष्ट असुरों को क्रमशः मारने में प्रवृत्त हो ही रहे हैं तथापि आपके साथ एकान्त में कुछ देर वार्तालाप करने की इच्छा से ही में कुछ कहना चाहता हूँ॥४०॥ अथ स्ववाक्यश्रवणं सहेतुकं प्रार्थयते- तदिन्द्रसन्दिष्टमुपेन्द्र ! यद्वचः क्षणं मया विश्वजनीनमुच्यते । समस्तकार्येषु गतेन धुर्यता- महिद्विषस्तद्भवता निशम्यताम् ॥४१।। [ सर्वकषा ] तदिति । तत्-तस्मादिन्द्र मुपगतः उपेन्द्रः-इन्द्रा- अत एवेन्द्रसन्दिष्टम् श्रोतव्यमिति भावः । किञ्च-विश्वस्मै । वरजः।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १ जनाय हितं विश्वजनीनम् । 'आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात्खः । यद्वचः क्षण, नतु चिरं मयोच्यते, तत्-वचोऽहिद्विषो-वृत्रघ्नः । 'स- वृत्रासुरे ऽप्यहिः' इति वैजयन्ती । समस्तकार्येषु धुर्यतां-धुरन्धरत्वं गतेन । अतोऽपि भवता निशम्यताम् । प्रार्थनायां लोट् । धुरं वहतीति धुर्यः। 'धुरो यड्ढको' इति यप्रत्ययः । स्फुटमत्र पदार्थहेतुकं काव्य- लिङ्गमलङ्कारः ॥ ४१ ॥ [अन्वयः]-तत् उपेन्द्र ! इन्द्रसन्दिष्ट विश्वजनीनं यद्वचः क्षणं मया उच्यते तत् अहिद्विषः समस्तकार्येषु धुर्यताङ्गतेन भवता निशम्यताम्। [विग्रहः ] इन्द्रमुपगतः- उपेन्द्रः, तत्सम्बुद्धौ हे उपेन्द्र !। इन्द्रेण सन्दिष्टम् इन्द्रसन्दिष्टम् । विश्वस्मै जनाय हितं विश्वजनीनम् । समस्तानि कार्याणि समस्तकार्याणि, तेपु समस्तकार्येषु । धुरं बहतीति धुर्यः, धुर्यस्य भावो धुर्यता, तां धुर्यताम् । [ अर्थः ] तत् = तस्मात् । उपेन्द्र = हे इन्द्रानुज । हे श्रीकृष्ण । इन्द्रसन्दिष्टम् = महेन्द्रसन्दिष्ट । महेन्द्रोक्तम् । विश्व- जनीनम् = सर्वलोकोपकारकम् । सर्वजगद्धितावहम् । यद्वचः = यद्वाक्यम् । क्षणं = किञ्चित्कालम् । क्षणमात्रम् । मया = नार- देन । उच्यते = कथ्यते । तत् = तद्वचः । अहिद्विषः = वृत्रघ्नः । समस्तकार्येषु = सर्वेषु कार्येषु । धुर्यता = धुर धरताम् । गतेन प्राप्तन । भवता = त्वया । निशभ्यतां = श्र यताम् । [ भावार्थः] हे कृष्ण ! भवानिन्द्रकायधुरन्धरः । तत्कि- ञ्चित्क्षणं महेन्द्रसन्देशं जगदुपकाराय वच्मि तच्छृणु। [ कोशः ] 'उपेन्द्र इन्द्रावरजश्चक्रपाणिश्चतुर्भुजः' इत्यमरः। 'सपें वृत्राऽसुरेऽप्यहिः' इति वैजयन्ती । [वाच्यपरि०] उपेन्द्र इन्द्रसन्दिष्टं विश्वजनीनं यद्वचः क्षणमहं वच्मि अहिद्विषः समस्तकार्येषु धुर्यतां गतो भवान् तन्निशामयतु । [ भाषाटीका ] हे श्री कृष्ण ! इन्द्र ने आपको लोकोपकारार्थ कुछ सन्देश ( सन्देशा ) कहलाया है उसे मैं संक्षेप से आपको सुनाऊँगा। - -. शिशुपालवधम्। [प्रथमः- सो आप ध्यानपूर्वक सुनें। क्योंकि इन्द्र के कार्यों को पूरा करनेवाले आ. ही तो एक हैं ॥ ४१ ॥ अथ 'शिशुपालो हन्तव्य' इति वक्तुं तस्यावश्यवध्यत्वेऽनन्यवध्यन्व- ज्ञापनौपयिकतयोद्धत्यप्रकटनार्थ जन्मान्तरवृत्तान्तं तावदुद्धाटयति- अभदभूमिः प्रतिपक्षजन्मनां भियां तनूजस्तपनद्युतिर्दितेः । यमिन्द्रशब्दार्थनिपूदन हरे- हिरण्यपूर्व कशिपु प्रचक्षते ॥ ४२ ॥ [ सर्वकषा ] अभूदिति । प्रतिपक्षात्-शत्रोः जन्म यासां नामा भियामभूमिः-अविषयः । निर्भीक इत्यर्थः । तपनद्य तिः-सूर्यनापः, दितेस्तनूजो-दैत्योऽभूत् । कोसावत आह • हरेः - इन्द्रस्य, इन्द्र- शब्दार्थनिपूदनम् । इन्दतीति, इन्द्रः । इदि परमैश्वर्य' 'ऋजेन्द्र-' इन्या- दिना रन्प्रत्ययान्त औणादिकनिपातः । तस्य इन्द्र इति शब्दम्येन्द्र इति सज्ञापदस्य, योऽर्थः परमैश्वर्यलक्षणस्तस्य निपूदनं-निवर्तकम् । करि ल्युट्। हरेरैश्वयनिहन्तारमित्यर्थः । यदैन्यं, हिरण्य शब्दपूर्व कशिपुशब्द प्रचक्षते । हिरण्यकशिपुमाहुरित्यर्थः । अत्र हिरण्यशब्दपूर्वकन्वं कशिपुशरद- स्यैव नतु सन्जिनस्तदर्थस्येतिशब्दपरस्य कशिपुशब्दस्य कशिपुशब्दस्याथ- गतत्वेनाप्रयोज्यस्य प्रयोगादवाच्यवचनाख्यार्थदोषमाहुः । 'यदेवावाच्यवचन- मवाच्यवचनं हि तत्' इति । समाधानम्-एवंविधविषये शब्दपरणार्थलक्ष- णेति कथंचित्सम्पाद्यमित्युक्तमस्माभिर्देवपूर्व गिरिं ते इनि 'धनुरुपपदमम्मै वेदमभ्यादिदेश' इत्येतद्वयाख्यानावसरे सोविन्यां घण्टापये च। विशेष- श्शात्र-यं दैत्यमुद्दिश्य हिरण्यपूर्व कशिपुंप्रचक्षते-सम्ज्ञात्वेन प्रयुञ्जते॥४२॥ अन्वयः] प्रतिपक्षजन्मनां मियाम, भभूमिः (सः) तपन शु तिर्दितेस्तनूजः अभूत, हरेः इन्द्रशब्दार्थनिषूदन यं हिरण्यपूर्व कशिपुम्प्रचक्षते।
सर्गः]
अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम्।
[विग्रहः] न भूमिः अभूमिः। प्रतिपक्षाजन्म यासांताःप्रतिपक्षजन्मानः,
तासाम्-प्रतिपक्षजन्मनाम् । तपनस्य' द्युतिरिव द्युतिर्यस्यासौ तपनद्युतिः ।
इन्द्रशब्दस्य अर्थः इन्द्रशब्दार्थः, इन्द्रशब्दार्थस्य निषूदनम्-इन्द्रशब्दार्थ-
निपूदनम् । तम् । हिरण्यं पूर्वो यस्याऽसौ हिरण्यपूर्वस्त-हिरण्यपूर्वम् ।
[अर्थः ] प्रतिपक्षजम्मनां = शत्रुसमुद्भूतानाम् । विपक्षा-
दागतानाम् । भियाम् = भीतीनाम् । अभूमिः अविषयः ।
निर्भय इति यावत् । तपना तिः सूर्यप्रभः । प्रचण्डतेजाः ।
(सः) दितेस्तनूजः = दितिसुतः-दैत्यः । अभूत = बभूव । हरेः=
इन्द्रस्य इन्द्रशब्दार्थनिषूदनम् = इन्द्रपदार्थनिवर्त्तकम् ।
इन्द्रपदार्थभूतैश्वर्यविनाशकम यं--हिरण्यपूर्व कशिपु =
हिरण्यशब्दपूर्वकं कशिपु । हिरण्यकशिपुमिति यावत् ।
प्रचक्षते-कथयन्ति । निगदन्ति । लोका इति शेषः ।
[ भावार्थः] शत्रुसमुद्भूतभीतिवर्जितो भास्करप्रभो दैत्यो
हिरण्यकशिपु म बभूव यः किल महेन्द्रस्य इन्द्रशब्दार्थभूत-
परमैश्वर्यनिवर्त्तक आसीत् । महेन्द्रराजलक्ष्मीर्येन हठादाच्छिद्य
गृहीतेति यावत् ।
[कोशः] भीति ःसाध्वसं भयामित्यमरः। इन्द्रोमरुत्वान्मधवा' इत्यमरः।
[वाच्यप० ] प्रतिपक्षजन्मनां मियामभूम्या तपनद्युतिना दितेस्तनू-
जेनाऽभावि । यो हरेरिन्द्रशब्दार्थनिपूदनो हिरण्यपूर्वः कशिपुः प्रख्यायते ।
[ भाषाटीका ] शत्रुपक्ष से जिसे कभी भय नहीं होता था ऐसा
( निर्भय ) हिरण्यकशिपुनामक दैत्य' पूर्वकाल में हुआ, जो के
इन्द्रत्व-परमैश्वर्य-का ही निवर्त्तक था। अर्थात् इन्द्र की राजलक्ष्मी
को जिसने बलपूर्वक छीन लिया था ॥ ४२ ॥
समत्सरेणाऽसुर इत्युपेयुषा
चिराय नाम्नः प्रथमाभिधेयताम् ।
भयस्य पूर्वावतरस्तरस्विना
मनस्सु येन धु सदां न्यधीयत ॥ ४३ ॥
७६ शिशुपालवधम्। [१ प्रथमः [ सर्वङ्कपा ] समत्सरेणेति । समत्सरेण-अन्यशुभपसहितेन । 'मत्सरोऽन्यशुभद्वेपे'-~-इत्यमरः । अस्यतीन्यसुरः । अमेग्न । असुर इति नाम्नः चिराय-चिरकालेन । 'चिराय चिररात्राय चिरस्याद्याश्चिरार्थकाः, इत्यमरः । प्रथमाभिधेयतामुपेयुषा-अन्वर्थतया मुख्यार्थतां गतंन । तर- स्विना-बलवता । 'तरसी बलरंहसी' इति विश्वः। येन-हिरण्यक- शिपुना । दिविसीदन्तीति ासदा-देवानां, मनस्सु भयस्य पूर्वावतर:- प्रथमप्रवेशः। 'ऋदोरप । न्यधीयत-निहितः । धानः कर्मणि लङ् । अस्मादेव देवानां प्रथमं भयस्योत्पत्तिरभूदिन्यर्थः ॥ ४३ ॥ [अन्वयः] समत्सरेण असुर इति नाम्नः चिराय प्रथमा- भिधेयतामुपेयुषा तरस्विना येन | सदाम मनःसु भयस्य पूर्वी- वतरः न्यधीयत । (-सोऽसुरोऽभूत् )। [विग्रहः ] मत्सरेण सहितः समन्सरस्तेन समन्मरेण । प्रथमम् अभिधेयं, प्रथमाभिधेयं, तस्य भावः प्रथमाभिधेयता, नाम्-प्रश्रमाभि- धेयताम् । दिवि सीदन्तीति घुसदः, तेषां घुसदाम् । [अर्थः ] समत्सरेण = अन्यशुभद्वेषिणा । असुर इतिनाम्नः =असुर इत्यभिधानस्य । चिराय-चिरेण। चिरकालेन । प्रथमा- भिधेयताम् = अन्वर्थतया मुख्याभिधेयताम् । गतेन प्राप्तेन । तरस्विना = बलवता। येन% हिरण्यकशिपुना। द्य सदां देवा- नाम् । मनःसु= मानसेषु । भयस्य =भीतेः। पूर्वावतरः-प्रथम- प्रवेशः । न्यधीयत=निहितः । कारितः। विहितः। (सदैत्योऽभूत) [ भावार्थः] जगदुद्रुजकतया असुरपदस्य मुख्येनाभिधेयेन बलिना येनासुरेण देवानां मनस्सु भयस्य प्रथमः प्रवेशो विहितः स हिरण्यकशिपुर्बभूवेतिपूर्वेण सम्बन्धः । [कोशः ] 'मत्सरोऽन्यशुभद्वेषे' इत्यमरः । 'चिराय चिररावाय चिरस्याद्याश्चिरार्थकाः' इत्यमरः । 'तरसी बलरंहसी' इति विश्वः । [वाच्यप० ] समत्सरः असुर इति नान्नः प्रथमाभिधेयतामुपेयिवान् तरस्वी यः घुसदां मनःसु भयस्य पूर्वावतरं न्यदधात् ।
सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम । [ भाषाटीका ] जगत् का द्रोह करनेवाला वह हिरण्यकशिपु अपने नाम के अनुसार सच्चा असुर हुआ। (असुर = फेंकनेवाला, पीड़ा देने वाला )। वह बड़ा बलिष्ठ भी था और इसीने देवताओं के मनमें पहिले पहल भय का सञ्चार किया ॥ ४३ ॥ दिशामधीशांश्चतुरो यतः सुरा- नपास्य तं रागहताः सिषेविरे । अवापुरारभ्य ततश्चला इति प्रवादमुच्चैरयशस्करं श्रियः ॥४४॥ [ सर्वकषा] दिशामिति । श्रियः-सम्पदः । यतः। यदेत्यर्थः । दिशामधीशान्-दिक्पतीनपि चतुरः सुरान्-इन्द्रवरुणयमकुबेरान्, अपास्य-त्यक्त्वा, तं-हिरण्यकशिपुं, रागहृताः-रागकृष्टाः सत्यः । नतु बलादिति भावः। सिषेविरे। यतोवीर प्रियाः श्रिय इति भावः । तत आरभ्य तदाप्रभृति । अयशः करोतीति-अयशस्करम् । दुष्कीर्तिहेतुमि- त्यर्थः । 'कृो हेतुताच्छील्यानुलोम्येपु' इति टप्रत्ययः । 'अतः कृकमि-' इत्यादिना विसर्जनीयस्य सत्वम् । उच्चैः-प्रचुरं, चलाः-अस्थिरा, इति प्रवाद-जनापवादमवापुः । दिगीशानामपि सर्वस्वहारित्वात्तदौद्ध- त्यस्य प्राकटयमिति भावः ॥४४॥ [अन्वयः] श्रियः यतः दिशामधीशान् चतुरः सुरान अपास्य तं रागहृताः (सत्यः) सिषेविरे ततः आरभ्य अयशस्करम् उच्चैः चला इति प्रवादमवापुः। [विग्रहः ] रागेण हृताः रागहृताः । -अयशः, अयशः करोतीति अयशस्करः, तम्-अयशस्करम् । [अर्थः ] श्रियः = राजलक्ष्म्यः। सम्पदः । यत: यदा। दिशाम् = पूर्वादिदिशाम् । अधीशान् = अधिपतीन् । दिक्पाला- चतुरः सुरान् = चतुरो देवान् इन्द्रयमवरुणकुबेरान् । पास्य त्यक्त्वा। तान् विहाय । हिरण्यकशिपुम्। न यश:-- नपि।
% 3D . शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- रागहृताः = गुणानुरागाकृष्टाः सत्यः । सिषेविरे = भेजिरे। सेवि- तुमुपचक्रमुः। तत आरभ्य = ततः प्रभृति । तदा प्रभृति । अयश- स्करम् = अकीर्तिकरम् । उच्चैः = महान्तम् । प्रकटम्। इति = लक्ष्म्यश्चञ्चला भवन्तीति । प्रवाद = लोकापवादम् । अवापुः = प्रापुः । हिरण्यकशिपुभजनात्प्रभृति 'चला लक्ष्म्य' इति प्रवादो लक्ष्मीनामिति यावत् । [ भावार्थः ] चतुर्णा दिशामधीशान दिक्पालानिन्द्रादीनपि विहाय गुणलुब्धा राजलक्ष्म्यो यदा हिरण्यकशिपु भेजुस्तदा- प्रभृति 'चञ्चला भवन्ति लक्ष्म्यः' इति दुष्कीर्तिकरं लोकप्रवाद प्रापुः। सकलगुणनिधानं स हिरण्यकशिपुस्त्रैलोक्याधिपतिश्चा- सीदित्याशयः। [ कोशः ] 'दिशस्तु ककुभः काष्टा आशाश्च हरितश्च ताः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] श्रीभिः यतः रागहताभिः सिपवे तत: चला इति अय- शस्करः प्रवादः अवापे । [ भाषाटीका ] पूर्व आदि दिशाओं के मालिक इन्द्र यम बरुण कुबेर ऐसे देवताओं को छोड़कर भी सब [दिशाओं की राजलक्ष्मी गुणों के लोभ से हिरण्यकशिपु के पास चली गई तभी से 'लक्ष्मी चाल है। यह अकीर्ति- कर लोकप्रवाद उनके विषय में प्रसिद्ध हुआ ॥४४॥ पुराणि दुर्गाणि, निशातमायुधं, बलानि शूराणि, धनाश्च कञ्चुकाः। स्वरूपशोभैकफलानि नाकिनां गणैर्यमाशङ्कय तदादि चक्रिरे ॥४५॥ [ सर्वकषा ] पुराणीति । किन-नाकिना-सुराणां, गणैः यं- हिरण्यकशिपुमाशङ्कय-बाधकत्वेनोप्रेक्ष्य, स कालः आदियस्मिस्तदादि तत्-तदाप्रभृति। स्वरूपशोभैवैर्क फलं मुख्य प्रयोजनं येषां नपा पुरादीना वानि तथोक्तानि । प्रागीगसाध्यशत्रोरभावादिति भावः । नपुंसकमनपुस- सर्गः] ७६ me- .. .. अभिनवराजलदमी-सर्वकषा-विरजिताम् । 'इत्यादिना नपुंसकशेषः । पुराणि दुर्गाणि-प्राकारपरिखादिना अगम्यानि चक्रिरे । 'सुदुरोरधिकरणे' इति गमेर्डः । आयुधं निशातं- निशितं, चक्र इति विभक्तिविपरिणामेनान्वयः। 'शो तनूकरणे' इति धातोः 'शाच्छोरन्यतरस्याम्' इतीत्त्वविकल्पात्पक्षे आत्वम् । बलानि- सैन्यानि । शूराणि-शौर्यवन्ति, चक्रिरे-सम्पादितानि । कञ्चकाःवार- बाणाः। लोहवर्माणीत्यर्थः । 'कञ्चको वारबाणोऽस्त्री' इत्यमरः। घनादुर्भेदा- श्चक्रिरे । इत्थं नित्यसन्नद्धा जाग्रति स्मेत्यर्थः ॥४५॥ [अन्वयः] नाकिनां गणैः यमाशङ्कय तदादि स्वरूपशोभैक- फलानि पुराणि-दुर्गाणि चक्रिरे, आयुधं-निशातम् चक्र, बलानि-शूराणि चक्रिरे, कचुका:-धनाः चक्रिरे । [विग्रहः ] स आदिर्यस्मिंस्तत् तदादि तथास्यात्तथा । स्वरूपस्य शोभा स्वरूपशोभा, स्वरूपशोभा एव एकं फलं येषां तानि स्वरूपशोभैक- फलानि, तानि तथाभूतानि। नाकोऽस्त्येषान्ते नाकिनः, तेषां नाकिनाम् । [अर्थः ] नाकिनां स्वर्गिणाम् । देवानाम् । गणैः = सङ्घः। यम् = य हिरण्यकशिपुम् । आशङ्कय = शत्रुमाशङ्कय । तत्कृतां बाधामाशङ्कय । तदादि = ततः प्रभृति । स्वरूपशोभैकफलानि शोभामात्रफलानि । पुराणि-नगराणि । दुर्गाणि प्राकारपरिखा- कण्टकादिनाऽगम्यानि । चक्रिरे = कृतानि । (किञ्च-) आयुधं शस्त्रजातम् । निशातं = निशितं । तीक्ष्णम् । चक्र [इति विभक्तिः विपरिणामेनान्वयः] । (तथा-) बलानि = सैन्यानि । शूराणि आयाससहानि, बलोपबृहितानि च । चक्रिरे । कञ्चुकाः = वार- बाणाः। कवचाः । धनाः = सुदृढाः । दुर्भेदाः । चक्रिरे = कृताः। सम्पादिताः । इत्थं तद्भयाद्द वा नित्यं सन्नद्धा जाग्रति स्मेत्यर्थः। [ भावार्थः ] देवा यद्भयादहर्निशमतन्द्रिताः कृतसन्नाहाश्च सन्तो जाग्रति स्म। किच-पूर्व स्वरूपशोभैकफलानि पुराणि- सम्प्रति दुर्गाणि कृतानि, आयुधानि तीक्ष्णतां नीतानि, सैन्यानि शिशुपालवधम् । १ प्रथमः- । शूराणि आयाससहानि कृतानि, कवचाश्च सुदृढःकृताः । एवञ्च ततो महद्भयं देवानामुत्पन्नमिति भावः। [ कोशः ] 'कञ्चुको वारबाणोऽस्त्री' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] नाकिनां गणाः पुराणि दुर्गाणि...... चक्रुः । [भाषाटीका] देवताओं ने उस हिरण्यकशिपु के डर से अपने नगर आदि को दुर्ग-अगम्य बनाया, और शस्त्रों को शानपर चढ़ाया, पलटनी को मजबूत किया, कवच आदि सेना के उपकरणों को सुदृढ़ किया। और उसके भय से देवताओं को रातदिन जागते ही बीतना था और उन्हें निद्रा भी नहीं आती थी॥४५॥ स सञ्चरिष्णुर्भुवनान्तरेषु यां यदृच्छयाऽशिश्रियदाश्रयः श्रियः । अकारि तस्यै मुकुटोपलस्खल- करेस्त्रिसन्ध्यं त्रिदर्शर्दिशे नमः ॥४६॥ [ सर्वकषा ] स इति। अन्येषु भुवनेषु भुवनान्तरंषु । 'सुप्मुपा इति समासः । सञ्चरिष्णुःसञ्चरणशील: । 'अलका-' इग्यादिना चरेरिष्णुच् । श्रियः-लक्ष्म्याः, आश्रयः स-हिरण्यकशिपुः । यह च्छया-स्वैरवृत्या । 'यहच्छा स्वैरवृत्तिः' इत्यमरः । यो दिशमशि श्रिय- त्-अगमत् । श्रयतेर्लुङ् । 'णिनि--' इत्यादिना चहि द्विभावः । इयादेशः। मुकुटोपलेषु-मौलिरत्नेषु-स्खलन्तः करा येषां नः । शिरसि बद्धान- लिमिरित्यर्थः । 'उपलः प्रस्तरे रखे' इति विश्वः । तिम्रो दशा बाल्यकौमार- यौवनानि, जन्मसत्तावृद्धयो वा येपो तैत्रिदशैर्दवः। यदा विवंश परिमाण. मेषामिति, 'बहुव्रीही सङ्खयेये खजबहुगणान' इति समामान्तः । निग्य:- सन्ध्याः समाहृतास्त्रिसन्ध्यम्। 'तद्धितार्थोत्तरपद--' इत्यादिना समाहारे द्विगुः । द्विगुरेकवचनम् वा टावन्त इति पक्षे नपुंसकत्वम् । अत्यन्तसंयोग द्वितीया। तस्यै दिशे करैर्हस्तैः । 'नमःस्वस्तीत्यादिना चतुर्थी । नमः-नमस्कारोऽकारि-कृतः । कर्मणि । ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मो-सर्वकषा-विराजितम् । . 'चिण्भावकर्मणाः' इति चिण् । सन्ध्यावन्दनेऽपि दिनियमं परित्यज्य तदागमनभयात्तस्यै दिशे नमस्कारः कृत इति भावः ॥ ४६ ॥ [अन्वयः ] भुवनान्तरेषु सश्चरिष्णुः श्रिय आश्रयः स यह- च्छया यां दिशम् अशिनियत् मुकुटोपलस्खलत्करैः त्रिदशैः त्रिसन्ध्यं तस्य दिशे नमः अकारि । [विग्रहः ] अन्यानि भुवनानि भुवनान्तराणि, तेषु भुवनान्तरेषु । मुकुटेषु उपलाः मुकुटोपलाः तेषु स्खलन्तः करा येषां ते मुकुटोपलस्खल- त्कराः, तैः मुकुटोपलस्खलत्करैः । तिस्रः दशा येपांते त्रिदशाः, तैः त्रिदशैः। तिसृणां सन्ध्यानां समाहारस्त्रिसन्ध्यं, तत्तथा । [अर्थः ] भुवनान्तरेषु अन्येषु भुवनेषु । लोकान्तरेषु। सश्चरिष्णुः सञ्चरणशीलः। श्रियः-लक्ष्म्याः। सर्वसम्पदाम् । आश्रयः निवासस्थानम् । विश्रामभूमिः । स हिरण्यकशिपुः। यदृच्छया स्वैरवृत्त्या । स्वेच्छया । या दिशम्यां पूर्वादिककुभम् । अशिश्रियत-अगमत् । मुकुटोपलस्खलत्करैः मौलिरत्नव्या प्रिय- माणपाणिभिः। मौलिमणिसञ्चरत्करैः। शिरसि बद्धाञ्जलि- भिरिति यावत् । त्रिदशैः-देवैः। त्रिसन्ध्यं त्रिसृष्वपि सन्ध्यासु। तस्य दिशे-तस्य एव दिशाये । नमः नमस्कारः । अकारि कृतः । [ भावार्थः] भुवनान्तरेषु सञ्चरणशीलो हिरण्यकशिपुर्यह- च्छावशाद्यां दिशमगमत्सन्ध्यावन्दनेऽपि दिनियमं विहाय तदागमनभयाद्देवैस्तस्यै दिशे एव नमनमकारि । [ कोश: ] 'यदृच्छा स्वैरवृत्तिः' इत्यमरः । 'उपलः प्रस्तरे रत्ने' इति विश्वः । 'त्रिदशा विबुधाः सुराः' इत्यमरः । वाच्यप०] भुवनान्तरेषु सञ्चरिष्णुना श्रियः आश्रयेण तेन यदृच्छया या दिक् अश्रायि मुकुटोपलस्खलत्कराः त्रिदशास्तस्यै दिशे त्रिसन्ध्यं नमो ऽकार्पः। ६ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- - - - [ भाषाटीका] वह हिरण्यकशिपु धूमता-फिरता जिस दिशा में जाता था, देवतालोग भी सन्ध्या--पूजा के समय (जिस ओर वह जाता था)-उधर मुख करके ही सन्ध्या वन्दन करते थे। [अर्थात् उसके आने के भय से उसी ओर मुख करके डरके मारे काँपते हुए हाथों से नमस्कार करते थे इतना उससे देवता डरते थे।] ॥ ४६॥ अथ सोऽपि त्वयैव हत इत्याह- सटाच्छटाभिन्नघनेन बिभ्रता नृसिंह ! सैंहीमत, तनुं त्वया । स मुग्धकान्तास्तनसङ्गभङ्गरे- रुरोविदारं प्रतिचस्करे नखैः॥४७॥ [सर्वकषा] सटाच्छटेति । हे नृसिंह । ना सिंहइवेत्युपमितसमासः। ना चासौ सिंहश्चेति प्रस्तावात् । सिंहस्येमां सैंही तनु-कायं, बिभ्रता- नृसिंहावतारभाजेत्यर्थः । किम्भूताम् ? । अतनु--विस्तीर्णाम् । अत एव सटाच्छटाभि:--केसरसमूहैः भिन्ना घना--मेघा येन। अभ्रंङ्कप- विग्रहत्वादिति भावः । 'सटा जटाकेसरयोः' इति, 'तनुः काये कृशेऽल्पे च? इति विश्वः । त्वया स-दैत्यः। मुग्धौ--नवौ। 'मुग्धः सौम्ये नवे मूढे' इति वैजयन्ती । यौ कान्तास्तनौ तयोः सङ्गनापि भङ्गरैः कुटिलै खैरुरोविदारम्--उरो विदार्य। 'परिक्तिश्यमाने च' इति णमुल्- प्रत्ययः। प्रतिचस्कर--हतः । किरतेः कर्मणि लिट् । 'ऋच्छत्यताम्' इति गुणः । 'हिंसायां प्रतेश्च' इति सुडागमः । वज्रकठिनोऽपि नखैर्विदारित इति बाङ्मनसयोरगोचरमहिम्नस्ते किमसाध्यमिति भावः ॥ ४७ ॥ [अन्वयः ] नृसिंह ! अतनु सैंही तनु बिभ्रता सटाच्छ- टाभिन्नघनेन त्वया स मुग्धकान्तास्तनसङ्गभङ्ग रैः नखैः उरो- विदारं प्रतिचस्करे। [विग्रहः ] ना सिंह इव नृसिंहः, तत्सम्बुद्धौ हे नृसिंह । [ पक्षे-ना १ मुग्धा चासौ कान्ता चेति समासं त गौडा अभिप्रयन्ति । १ । s
सर्गः]
वतारभाजा
अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ८३
चासौ सिंहश्च नृसिंहः, तत्सम्बुद्धौ हे नृसिंह ] । न तनुः अतनुः, ताम्
अतनुम् । सिंहस्य इयम् सैंहो, तां सैंहीम् । सटानां छटाः सटाच्छटाः,
सटाच्छटाभिः भिन्ना घना येनासौ सटाच्छटाभिन्नघनः, तेन सटाच्छटाभिन्न-
धनेन । कान्ताया स्तनौ कान्तास्तनौ, मुग्धौ च तो कान्तास्तनौ च मुग्ध-
कान्तारतनौ, मुग्धकान्तास्तनयोः सङ्गः,
तेन
भङ्गुराः-मुग्धकान्तास्तनसङ्ग-
भङ्गुराः । तैः-मुग्धकान्तास्तनसङ्गमङ्गुरैः । उरो विदार्येति उरांविदारम् ।
[अर्थः] नृसिंह = हे पुरुषोत्तम । हे नरसिंहावतारधारि.
निति च । अतनु विस्तीर्णाम् । अतिमहतीम् । सैंहीं=
सिंहाकाराम् । तनु शरीरम् । बिभ्रता दधता । नृसिहा-
सटाच्छटाभिन्नघनेन-केसरसमूहोरिक्षप्तमेघ.
जालेन । केसरभारविदारितबलाहकमण्डलेन । अभ्रषवपुषा ।
त्वया भवता । सः हिरण्यकशिपुर्नाम दैत्यः ।
मुग्धकान्ता.
स्तनसङ्गभङ्गुरैः = अभिनववधूकुचकुड्मलसम्पर्कभज्यमानैः ।
मुग्धाङ्गनास्तनकलससंस्पर्शकुटिलाप्रैः । मृदुभिरपि । नखैः=
नखरैः । करजैः। उरोविदारम्-उरो विदार्य । प्रतिचस्करे-हतः।
विपोथितः। विदारितः।
[भावार्थः] हे पुरुषोत्तम ! नृसिंहं रूपं धारयता भवता
स दैत्यो नखैरो विदार्य हतः। ननु वज्रदेहोऽप्ययं केवलं
नरेव हत इति वाङ्मनसयोरगोचरस्ते महिमातिशयः ।
किमसाध्यं भगवतस्तवेत्याशयः।
[ कोशः ] 'जटा जटाकेसरयोर इति विश्वः । तनुः
काये कृशेऽल्पे
चेति विश्वः । 'मुग्धः सौम्ये नवे भूढे । इति वैजयन्ती ।
[वाच्यप०] नृसिंह सैंहीं तनुं बिभ्रत्सटाच्छटाभिन्नघनः त्वं तम्
उरोविदारं नखैः प्रतिचस्कथं ।'
[ भाषाटीका] वज्रके समान कठिन शरीरवाले उस हिरण्यकशिपु को
आपने नृसिंहावतार धारण करके कोमल नखों से (पेट फाड़कर ) मार
डाला । अतः आपकी महिमा कैसे वर्णन की सकती है ?॥ ४७ ॥
शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- - - अथास्य जन्मान्तरचेष्टितान्याचष्टे- विनोदमिच्छन्नथ दर्पजन्मनो T रणेन कड़वास्त्रिदशैः समं पुनः । स रावणो नाम निकामभीषणं बभूव रक्ष : क्षतरक्षणं दिवः ॥ ४८ ॥ [ सर्वकषा] विनोदमिति । अथ स-हिरण्यकशिपुः । पुनः भूयोऽपि, त्रिदशैः सम-सह । 'साकं साधं समं सह' इत्यमरः । रणेन- दोदन्तःसाराज्जन्म यस्यास्तस्याः कण्डवाः-भुजकण्डूतेविनोदमपनोद- मिच्छन् । प्राग्भवनखक्षतैस्तदपनोदाभावादित्यार्थः। दिवः-स्वर्गस्य, क्षतं नष्टं रक्षणं रक्षा येन तत् । क्षतधुरक्षणमित्यर्थः । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात्समासः । अनेन देवसर्वस्वापहारित्वमुक्तम् । भीषयते इति भीषणः । नन्द्यादित्वाल्ल्युः। 'भियो हेतुभये पुक्' इति पुक् । निकामं भीषणः । 'सुप्सुपा' इति समासः । रावणो नाम-रावण इति प्रसिद्धं. रक्षो बभूव । राक्षसयोनौ जात इत्यर्थः । विश्रवसोऽपत्यं पुमान्रावण इति विग्रहः । 'तस्यापत्यम्' इत्यणि कृते 'विश्रवसो विश्रवणरवणौ' इति प्रकृत रवणादेशः ।पौराणिकास्तु रावयतीति व्युत्पादयन्ति । तदुक्तमुत्तरकाण्डे- 'यस्माल्लोकत्रयं चैतद्रावितं भयमागतम्। तस्मात्त्वं रावणो नाम नाम्ना वीरो भविष्यसि ॥ इति । रौतेय॑न्तात्कर्तरि ल्युट् । रावणरक्षसोनियत- लिङ्गत्वाद्विशेषणविशेप्यभावेऽपि स्वलिङ्गता ॥ ४८ ॥ [ अन्वयः ] अथ स पुनः त्रिदशैः समं रणेन दर्पजन्मनः कण्ड्वाः विनोदमिच्छन् दिवः क्षतरक्षणं निकामभीषणं रावणो नाम रक्षो बभूव । [विग्रहः ] दर्पाज्जन्म यस्याः सा-दर्पजन्मा, तस्याः दर्पजन्मनः। भीषयतीति भीषणं, निकामम् भीषणं-निकामभीषणम् । क्षतं रक्षणं येन तत्-क्षतरक्षणम् । विश्रवसोऽपत्यं पुमान-रावणः । [अर्थः] अथ-स्ववधानन्तरम् । सः = हिरण्यकशिपुः । :
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । 3D पुनः = पुनरपि । भूयोऽपि । त्रिदशैः समं = देवैः सह । रणेन : युद्धन । दर्पजन्मनः = अवलेपोद्भवायाः । दर्पोद्भूतायाः । कण्ड्वाः = भुजकण्डूतेः । विनोदम् = अपनोदं । विगमनम् । इच्छन् = अभिलषन । दिवः = स्वर्गस्य । क्षतरक्षणं = विनाशित- रक्षणम् । हतस्वर्गरक्षणम् । वित्रासितद्युलोकम् । निकाम- भीषणं = नितरां भीषणम् । जगद्विवासनः । अतएव-रावणो नाम = रावणनाम्ना प्रसिद्धः । रक्षः = राक्षसः । बभूव = जातः। उदपद्यत । जज्ञे। [भावार्थः] स हिरण्यकशिपुः पुनर्देवैर्योद्भुमिच्छन् पुना राक्षस- योनो रावणनाम्ना जातः । त्रैलोक्यञ्च तेन वित्रासितम् । देवाश्च वशीकृताः । तदेवं स जगतां निकामं भीषणो बभूव । [ कोशः ] 'दर्पोऽवलेपोऽवष्टम्भः' इत्यमरः । 'नैर्ऋतो यातुरक्षसी' इत्यमरः । [वाच्यप० ] तेन पुनर्दपजन्मनः कण्डूते:-रण विनोदमिच्छता निकामभीषणेन दिवः क्षतरक्षणेन रावण इति नाम्ना रक्षसा बभूवे । [भाषाटीका]पुनः वह हिरण्यकशिपु-फिर भी देवताओं से लड़कर अपनी भुजाओं की कण्डू (खाज) को मिटाने के लिए रावण नामसे राक्षसयोनि में उत्पन्न हुआ। और उस ने स्वर्ग की शान्ति और व्यवस्था को भी तहस- नहस करदिया। तथा त्रैलोक्य को पीड़ा देना ही उसका प्रधान कार्य था॥४८॥ अथास्यौद्धत्यमष्टादशश्लोक्याचष्टे- प्रभुबु भूषुभुवनत्रयस्य य: शिरोऽतिरागादशमं चिकर्तिषुः । अतर्कयद्विघ्नमिवेष्टसाहसः प्रसादमिच्छासदृशं पिनाकिनः ॥ ४९ ॥ [ सर्वकषा] प्रमुरिति । यो रावणः भुवनत्रयस्य प्रभुः- स्वामी बुभूषुः-भवितुमिच्छुः । भुवः सन्नन्तादुप्रत्ययः। अतिरागात- - - शिशुपालवधम्। [ प्रथमः उत्साहात्, नतु फलविलम्बन निर्वेदादिति भावः । दशमं शिरः चिक- तिषुः--कर्तित छेत्तुमिच्छुः । 'कृती छेदने' इति धातोः सन्नन्तादुप्रत्ययः । इष्टसाहस:-प्रियसाहसः। अत एवेच्छासदृशम्-इच्छानुरूपं,पिनाकिनः प्रसाद-वरं विघ्नमिवाऽतयदुत्प्रेक्षितवानिति परमसाहसिकत्वोक्तिः। इत आरभ्य श्लोकपटकेऽपि यच्छब्दस्य स रावणो नास रक्षो बभूवेति पूर्वेणान्वयः। रङ्गराजन्तु-'न चक्रमस्याक्रमताधिकन्धरम्' इति उपरिष्टादन्वय इत्याह । तदसत् । 'गुणानां च परार्थत्वात्' इति न्यायादारुण्यादिवत्प्रत्येक प्रधानान्वयिनां मिथः सम्बन्धायोगादित्यलं शाखाचक्रमणेन । पुरा किल रावणः काम्ये कर्मणि पशुपतिमीणनाय नव शिरांस्यग्नौ हुत्वा दशमारम्भ सन्तुष्टात्तस्यत्रैलोक्याधिपत्यं वने इति पौराणिकी कथाऽत्रानुसन्धेया ॥४९॥ [अन्वयः ] यः भुवनत्रयस्य प्रभुः बुभूषुः अतिरागादशमं शिरः चिकर्तिषुः इष्टसाहसः इच्छासदृशं पिनाकिनः प्रसादं विनम् इव अतर्कयत् । [विग्रहः ] भुवनानां त्रयं भुवनत्रयं, तस्य-भुवनत्रयस्य । इष्टं साहसं यस्याऽसौ इष्टसाहसः । इच्छया सदृशःइच्छासदृशः, तम्-इच्छा- सदृशम् । पिनाकोऽस्यास्तीति पिनाकी, तस्य पिनाकिनः । [अर्थः ] यः = रावणः भुवनत्रयस्य = त्रैलोक्यस्य । प्रमुः = ईश्वरः । स्वामी । बुभूषुः = भवितुमिच्छुः । अतिरा- गात् = महोत्साहात् । उत्कटात्संरम्भात् । दशमं शिरः = स्वं दशमं मूर्धानम् । चिकर्तिपुः = छेत्तुमिच्छुः । इष्टसाहसः = साहसप्रियः । अतिसाहसी । इच्छानुरूप = स्वेच्छानुकूलम् । स्वेच्छासदृशम् । पिनाकिनः = शूलपाणेवृषभध्वजस्य शिवस्य । प्रसादं = वरम् । विघ्नमिव = शिरश्च्छेदनकर्मान्तरायमिव । अतर्कयत् = उत्प्रेक्षितवान् । [ भावार्थः] यो रावणस्त्रैलोक्याधिपत्यकामनया शिव- माराधयन स्वशिरांसि च्छित्वाऽग्नौ जुह्वन नवमशिरश्छेदना- नन्तरं दशमं शिरश्छिन्दन प्रसन्नेन शिवेन वरप्रदानेन तोषि- .. ।
सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । तोऽपि शिववरप्रदानं स्वशिरःकत ने विघ्नमेव गणयति स्मेत्यहो महासाहसिकता रावणस्य !। [ कोशः ] 'प्रभुः परिवृढोऽधिपः' इत्यमरः । 'विघ्नोऽन्तरायः प्रत्यूहः ' इत्यमरः। 'पिनाकी प्रमथाधिपः । इत्यमरः।: [वाच्यप० ] भुवनत्रयस्य प्रभुणा बुभूषुणा अतिरागादशमं शिरः चिक- तिषुणा इष्टसाहसेन येन इच्छासदृशः पिनाकिनः प्रसादो विघ्न इवाऽतयंत । [ भाषाटीका ] त्रैलोक्य के राज्य की कामना से जब रावण शिवजी की आराधना कर रहा था उस समय उसने अपने नौ शिर तो काटकर अग्नि में हवन कर दिए। पर जब दशवाँ शिर काटकर हवन करने लगा तब भगवान् शङ्कर प्रसन्न हो रावण को वर देने लगे। तब रावण ने १० वाँ शिर न काट सकने के कारण शिवजी के ( त्रिलोकी पति होने के वरदान को भी अपने कार्य में विघ्न ही समझा। इतना बड़ा साहसी वह रावण था ! ॥४९॥ अथ कैलासोत्क्षेपणवृत्तान्तमाह- समुत्क्षिपन्यः पृथिवीभृतां वरं वरमदानस्य चकार शूलिनः। त्रसत्तुषाराद्रिसुताससम्भ्रम- स्वयङ्ग्रहाश्लेषसुखेन निष्क्रयम् ॥ ५० ॥ [ सर्वकषा] समुत्क्षिपन्निति । यो--रावणः, पृथिवीभृतां- पर्वतानां, वरं--श्रेष्टं कैलासं । समुत्क्षिपन् । दर्पादिति शेषः । शूलिनो वरप्रदानस्य-पूर्वोक्तस्य। सन्त्याः शैलचलनेन बिभ्यत्यास्तुषारा- द्रिसुतायाः-पार्वत्याः, ससंभ्रमो यः स्वयङ्ग्रहः-प्रियप्रार्थनां विना कण्ठग्रहणम् । 'सुप्सुपा-' इति समासः । तेन आश्लेष:-सम्मेलनं तेन यत्सुखं तेन । त्रैलोक्याधिपत्यसुखादुत्कृष्टेनेति भावः । निष्क्रयं- प्रत्युपकारनिर्गतिं-चकार । 'निष्क्रयो बुद्धियोगे स्यात्सामर्थ्य निर्गतावपि इति वैजयन्ती । यद्वा-निष्क्रयं चकार-क्रयेण व्यवहारेण याच्नादोषदैन्यं ममार्जेत्यर्थः । अत्र सुखवरदानयोर्विनिमयात्परिवृत्तिरलङ्कारः ॥ ५० ॥ -- ८८ शिशुपालवधम् । १प्रथमः- चक्र [अन्वयः ] यः पृथिवीभृतां वरं समुत्क्षिपन् शूलिनो वर- प्रदानस्य त्रसत्तुषाराद्रिसुताससम्भ्रमस्वयङ्ग्रहाश्लेषसुखेन निष्क्रय -स रावणो नाम निकामभीषणं रक्षो बभूव । [विग्रहः ] वसन्ती चासौ तुषाराद्रिसुता च त्रसत्तुषाराद्रिसुता, सम्भ्रमेण सहितः समम्भ्रमः । ससम्भ्रमश्चासौ स्वयङ्ग्रहश्च ससम्भ्रमस्वय- सत्तुषाराद्विसुतायाः ससम्भ्रमस्वयङ्गहः-सत्तुषाराद्भि- सुताससम्भ्रमस्वयङ्ग्रहः । तेनाश्लेषः-सत्तुषारादिसुताससम्भ्रमस्वय- महाश्लेषः, तेन सुखम्-सत्तुषाराद्विसुताससम्भ्रमस्वयङ्गहाश्लेषसुखम् । तन-सत्तुषाराद्विसुताससम्भ्रमस्वयङ्गहाश्लेषसुखेन । [अर्थः] यः = यो रावणः । पृथिवीभृतां - धरणीधराणां । पर्वतानां । वरं = श्रेष्ठ मुख्यञ्च कैलासम् । समुत्क्षिपन = दर्पा- दुत्तोलयन् । शूलिनः = शूलपाणेः शिवस्य । वरप्रदानस्य = त्रैलोक्याधिपत्यादिवरप्रदानस्य । त्रसत्तुषाराद्रिसुताससम्भ्रमस्वय- महाश्लेषसुखेन = बिभ्यन्तुहिन गिरिसुताससम्भ्रमाऽप्रार्थितकण्ठ- सम्मेलनसुखेन । - उद्विजमानपार्वतीसत्वरसभयस्वयंकण्ठग्रहणा- श्लेषसुखेन । निष्क्रयं = प्रत्युपकारमिव । चकार = कृतवान् । 'स रावणो नाम रक्षो बभूवेति पूर्वणान्वयः। [ भावार्थः ] यो रावणः कैलासाचलोत्थापनेन सभयपार्वती- स्वयङ्ग्रहाश्लेषानन्दं शिवाय प्रदाय शिववरप्रदानस्य निष्कृति चकार (--स रावणो नाम निकामभीषणं रक्षो बभूव )। [ कोशः ] 'देवाढते वरः श्रेष्टे त्रिषु क्लीबं मनाप्रिये' इत्यमरः । "शिवः शूली महेश्वरः । इत्यमरः । —तुषारस्तुहिनं हिमम् ' इत्यमरः । अदिगोत्रगिरिग्रावाऽचलशैलशिलोच्चयाः ' इत्यमरः । 'निष्क्रयो बुद्धियोगे स्यात्सामध्ये निर्गतावपि । इति वैजयन्ती। [वाच्यप० ] येन पृथिवीभृतां वरं......समुत्क्षिपता शूलिनः निष्क्रयः चक्रे। ..
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ८६ [भाषाटीका] रावण ने जब शिवजी के कैलासपर्वत को उखाड़ा था उस समय उस पर्वत के हिलने से घबड़ाकर पार्वती जी ने शिवजी के गले में स्वयं बाँह डाली थी। इस प्रकार शिवजी को प्रिया के स्वयङ्गहालिङ्गन के सुख को देकर मानों रावण ने (अपने को) दिए हुए वरदान का बदला चुका दिया ॥५०॥ पुरीमवस्कन्द लुनीहि नन्दनं मुषाण रत्नानि हराऽमराङ्गनाः । विगृह्य चक्रे नमुचिद्विषा बलो य इत्थमस्वास्थ्यमहर्दिवं दिवः ॥५१॥ [ सर्वकषा] पुरीमिति । यो बली--बलवान्रावणो, नमुचि द्विषा- इन्द्रेण विगृह्य--विरुध्य, पुरीम्-अमरावतीम् । अवस्कन्द-अवरुरोध । नन्दनम्-इन्द्रवनम् । 'नन्दनं वनम्' इत्यमरः । लुनीहि-चिच्छेद । 'ईहल्यधोः' इतीकारः । रत्नानि-श्रेष्ठवस्तूनि, मणीन्वा। 'रत्नं श्रेष्ठे मणा- वपि' इति विश्वः । मुषाण-मुमोष । 'मुष स्तेये'। 'हलः श्नः शानज्झौ' इति इनः शानजादेशः । अमराङ्गनाः-हर-जहार । सर्वत्र पौनःपुन्येने त्यर्थः : । इत्थम्-अनेन प्रकारेण । अहनि च दिवा च-अहर्दिवम् । अहन्य- हनीत्यर्थः । 'अचतुर-' इत्यादिना सप्तम्यर्थवृत्तौ द्वन्द्वे समासान्तो निपातः । दिवः-स्वर्गस्य, अस्वास्थ्यमुपद्रवं चक्रे । अत्रावस्कन्देत्यादौ ‘क्रियास- मभिहारे लोट् , लोटो हिस्वौ, वा च तध्वमोः' इत्यनुवृत्ती 'समुच्चयेऽन्यतर- स्याम्' इति विकल्पेन कालसामान्ये लोट् । तस्य यथोपग्रहं सर्वतिङादेशो हिस्वौ च । प्रकरणादिना त्वर्थविशेषावसानम् । 'अतो हेः' इति यथायोग्य हिलुक्। पौनःपुन्यं भृशार्थो वा क्रियासमभिहारः। अवस्कन्दनादिक्रिया- विशेषाणां समुच्चयः क्रियासमभिहारः। तत्सामान्यस्य करोतेः । * समुच्चये सामान्यवचनस्य' इत्यनुप्रयोगे 'चक्र' इति । अत्र विबैचित्र्यात्सौ- शब्दाख्यो गुणः। 'सुपां तिङां परावृत्तिः सौशब्दम्' इति लक्षणात् । समुच्चयश्चालङ्कारः ॥५१॥ [अन्वयः] यो बली नमुचिद्विषा विगृह्य पुरीम् अवस्कन्द,
।
६०
शिशुपालवधम् । [प्रथमः-
नन्दनं लुनीहि, रत्नानि मुषाण, अमराङ्गनाः हर । इत्थं अहर्दिवं
दिवः अस्वास्थ्यं चके।
[ विग्रहः ] न मुञ्चतीति नमुचिः। नमुचिं द्वष्टीति नमुचिद्विट् , तेन
नमुचिद्विषा । अहनि च दिवा च अहर्दिवम् । बलमस्यास्तीति-बली।
असराणामङ्गना:-अमराङ्गनाः, तास्तथाभूताः
[अर्थः] यो बली-बलवान् रावणः । नमुचिद्विषा%3
इन्द्रेण विगृह्य विरुद्धाय पुरीम्-अमरावतीम् ।
अवस्कन्द-पुनःपुनरवरुरोध नन्दनम् = इन्द्रकानाम् ।
लुनीहि-पुनःपुनश्चिच्छेद । रत्नानि श्रेष्टवस्तूनि, मणीन्
वा । मुषाण-पुनःपुनमुमोष । जहार । अमराङ्गनाः-देवाङ्गनाः।
देवस्त्रियः । अप्सरसो वा। हर - पुनःपुनर्जहार । इत्थम् -
अनेन प्रकारेण । अहर्दिवम् = अहन्यहनि । प्रतिदिनम् । दिवः-
स्वर्गस्य । अस्वास्थ्यम् - उपद्रवम् । चक्र चकार । (-स
रावणो नाम निकाम-भीषणं रक्षो बभूवेति पूर्वेणान्वयः)।
[ भावार्थः] रावणेन अमरावती पौनःपुन्येनावरुद्धा।
नन्दनं च पौनःपुन्येन च्छिन्नम् । रत्नानि तथैव चोरतानि ।
अमराङ्गनाश्च हृताः । इत्थ स्वर्गस्य तेनाऽस्वास्थ्यं कृतम् ।
[ कोशः] ' नन्दनं वनम् ' इत्यमरः । 'रत्नं श्रेष्ठे मणावपि' इति
विश्वः । 'जम्भभेदी हरिहयः स्वारापनमुचिसूदनः ' इत्यमरः ।
[वाच्यप०] बलिना येन नमुचिद्विषा विगृह्य पुरी अवस्कन्धस्व,
नन्दनं लयस्व, रत्नानि मुष्यस्व, अमराङ्गनाः हियस्व । इत्थं अहर्दिवं
दिवः अस्वास्थ्य चक्रे ।
[भाषटीका ] रावण ने इन्द्रपुरी पर वारंवार चढ़ाई की और देवताओं
के नन्दनवन को विध्वंस किया, स्वर्ग के रत्नों को अच्छी २ वस्तुओं
को-चुरा लिया। देवताओं की स्त्रियों को भी जबरदस्ती छीन ले गया। इस
प्रकार स्वर्ग में उस रावण ने गड़बड़-अव्यवस्था अशान्ति-मचादी।
इस तरह रात दिन वह स्वर्ग में उपद्रव मचाए रहता था ॥ ५१ ॥
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । - सलील-यातानि न भतुरभ्रमो- न चित्रमुच्च श्रवसः पदक्रमम् । अनुद्रुतः संयति येन केवल बलस्य शत्रुः प्रशशंस शीघ्रताम् ॥ २॥ [ सर्वकषा] सलीलेति । संयति-युद्ध । 'समुदायः स्त्रियां संयत्स- मित्याजिसमिद्युधः' इत्यमरः । येन-रावणेन, अनुद्रुतोऽनुधावितः, बलस्य शत्रु:-इन्द्रः । अभ्रमोर्भ:-ऐरावतस्य, सलीलयातानि- सभङ्गीकगमनानि, न प्रशशंस । तथा उच्च श्रवसः-स्वाश्वस्य ।। चित्र-नानाविधं, पदक्रम-पादविक्षेपम् । अर्धपुलायितादिगति- विशेषमित्यर्थः । न प्रशशंस । किन्तु केवलं शीघ्रतां--शीघ्रगामित्वमेव । प्रशशंस । अन्यथा शीघ्र मामास्कन्ध ग्रहीप्यतीति भयादिति भावः ॥५२॥ [ अन्वयः ] संयति येन अनुदूतः बलस्य शत्रु:-अभ्रमो- भर्तुः सलीलयातानि न प्रशशंस । उच्च श्रवसः चित्र पदक्रमम् न (प्रशशंस )। किन्तु केवलं शीघ्रतामेव--(प्रशशंस)। [विग्रहः ] लीलया सहितम् सलीलम् । सलीलम् यातानि सलील- यातानि तानि । पदयोः क्रमः पदक्रमः, तम् पदक्रमम् । [ अर्थ.] संयति-युद्धे । येन-रावणेन । अनुद्रुतः अनुधावितः । बलस्य बलाख्यस्यासुरस्य । शत्रु : रिपुः। इन्द्रः। अभ्रमोः पूर्वदिक्करिण्याः। भतु:स्वामिनः । स्वगजस्य ऐराव तस्य । सलीलयातानि-सविलासगमनानि । सभङ्गीकान पद- विन्यासान्। न प्रशशंसन साधुवादेन तुष्टाव । किच-- उच्च श्रवसः- स्वकीयस्याश्वस्य । चित्र नानाविधम् । उच्चावचं सलीलच । पदक्रमं पदन्यासम् । पादविक्षेपम्। न प्रशशंस= न तुष्टाव । ( किन्तु--) केवलम्-एकाम। शीघ्रता =शै यमेव । शीघ्रगतिमेव केवलम्, प्रशशंस-तुष्टाव । . -- शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- [भावार्थः ] इन्द्रस्तद्भयादितस्ततः पलायमानो दुर्दशा- मनुबभूव । [ कोशः] समुदायः स्त्रियां संयत्समित्याजिसमिद्युधः । ऐरावतोऽभ्रमा- तङ्गरावणाऽभ्रमुवल्लभाः' इत्यमरः । 'हय उच्चैःश्रवाः' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] संयति येन अनुद्रुतेन बलस्य शत्रुणा अभ्रमोः भर्तुः सलीलयातानि न प्रशशंसिरे। उच्चैःश्रवसः चित्रः पदक्रमः न प्रशशंसे । केवलं तस्य शीघ्रता एव प्रशशंसे । [ भाषाटीका ] युद्ध में रावण से हारकर जब इन्द्र भागने लगे और रावण उसका पीछा करने लगा उस समय-इन्द्र ने अपने हाथी ऐरावत की तथा उच्चैःश्रवा घोड़ेको उत्तमोत्तम गतियों की ( चालों की ) प्रशंसा न करके केवल उनकी तेज चाल की ही प्रशंसा की। अर्थात् ऐरावत आदि ने अपनी तेज चाल के कारण ही युद्ध में इन्द्र भगवान् के प्राण बचाए ॥ ५२ ॥ अशक्नुवन् सोढुमधीरलोचनः सहस्ररश्मेरिव यस्य दर्शनम् । प्रविश्य हेमाद्रिगुहागृहान्तरं निनाय बिभ्यदिवसानि कौशिकः ॥५३॥ [ सर्वकषा ] अशक्नुवन्निति । अधीरलोचनः--अस्थिरदृष्टिः । कौशिक:--महेन्द्रः, उलूकश्च । 'महेन्द्रगुग्गुलूलूकव्यालग्राहिपु कौशिकः, इत्यमरः। सहस्ररश्मेः-सूर्यस्येव, यस्य-रावणस्य विक्रमकर्मणः, दशनं सोढुमशक्नुवन् । हेमाद्रगुहैव गृहं, तस्यान्तरं प्रविश्य बिभ्यत् तत्रापि वेपमान एव । बिभेतेः शतरि 'नाभ्यस्ताच्छ तुः' इति नुमभावः । दिवसानि--वासराणि। निनाय। 'वा तु क्लीबे दिवसवासरौ' इत्यमरः । यथा पंचकः सूर्योदये भीतः सन्तिष्ठति तथा सोऽपीति भावः । कौशिक इत्य- भिधायाः प्रस्तुतैकगोचरत्वेनोभयश्लेषेऽपि विशेष्यश्लेषासम्भवादुलूकविषय- शब्दशक्तिमूलो ध्वनिः-सहस्ररश्मेरिवेत्युपमाननिर्वाहकत्वाद्वाच्यसिद्ध-यङ्गम्।५३ सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी--सर्वकषा-विराजितम् । [अन्वयः] अधीरलोचनः कौशिकः सहस्ररश्मेरिव यस्य दर्शनं सोढुम् अशक्नुवन् हेमाद्रिगुहागृहान्तरम्प्रविश्य बिभ्यत दिवसानि निनाय। [ विग्रहः ] अधीरे लोचने यस्याऽसौ अधीरलोचनः। सहस्रं रश्मयो यस्याऽसौ सहस्ररश्मिः, तस्य सहस्ररश्मेः । हेम्नः अद्रिः हेमाद्रिः, हेमाद्रेः गुहा हेमाद्रिगुहा, हेमाद्रिगुहैव गृहम् हेमाद्रिगुहागृहम् । तस्य अन्तरम् हेमाद्रिगुहागृहान्तरम्, तत्तथाभूतम् । [अर्थः] अधीरलोचनः = अस्थिरदृष्टिः । चञ्चलकातर नेत्रः । भयतरलितदृष्टिः । अशक्तनेत्रश्च । कौशिकः = महेन्द्रः। इन्द्रः उलूकश्च । सहस्ररश्मेरिव = सूर्यस्येव । यस्य = रावणस्य दर्शनं =प्रेक्षणं । विलोकनम् । सोढुमर्षयितुम् । अशक्नु- वन् = अपारयन् । असमर्थः सन् । हेमाद्रिगुहागृहान्तरं सुमेरुगह्वरकुटीकोणं । सुवर्णगिरिगुहानिकेतनमध्यं । काञ्च- नाद्रिगुहान्तरालं । प्रविश्य -सम्प्रविश्य । अध्यास्य । तत्र स्थित्वा । ( तत्रापि-)बिभ्यत् सन्सन् । भीतः सन् । दिव. सानि=दिनानि । निनाय = नयति स्म । अतिवाहयामास । यापयति स्म। [ भावार्थः ] यथा दिवसे उलुकः सूर्यदर्शनाद्भीतो गिरिगु- हासु दिवसानि नयत्येवं रावणाद्भीतो महेन्द्रो हेमाद्रिगुहान्तरं प्रविश्य दिनानि कथञ्चिनिनाय । [ कोशः ] 'महेन्द्रगुग्गुललूकव्यालग्राहिषु कौशिकः' इत्यमरः । 'मेरुः सुमेरुहेमाद्रिः' इत्यमरः । 'वा क्कीबे दिवसवासरौ' इत्ययरः । 'देव- खातबिले गुहा' इत्यमरः । [वाच्यप०] अधीरलोचनेन कौशिकेन सहस्ररश्मेरिव यस्य दर्शनं सोढम् अशक्नुवता कौशिकेन हेमाद्रिगुहागृहान्तरम्प्रविश्य बिभ्यता दिवसा निन्यिरो [भाषाटीका ] जैसे सूर्य के भय से दिन में उल्लू पहाड़ की कन्दराओं में छिपकर दिन बिताता है वैसे ही बेचारा इन्द्र भी रावण के भय से सुमेरु तु - [१ प्रथमः शिशुपालवधम् । पर्वत की गुफाओं में रहकर किसी तरह दिन बिताता था ॥ ५३ ॥ बृहच्छिलानिष्ठुरकराठघट्टना- द्रिकीर्णलोलाग्निकणं सुरद्विषः । जगत्प्रभोरप्रसहिष्णु वैष्णवं न चक्रमस्याक्रमताधिकन्धरम् ॥ ५४ ॥ [ सर्वकषा ] बृहच्छिलेति । बृहति शिलेव निष्ठुरे कण्ठे घट्टनात् अभिघातातू-विकीर्णा विक्षिप्ताः लोलाश्चाग्निकणाः स्फुलिङ्गा यस्य तत् । अत एव अप्रसहिष्णु-अनभिभावकम् । प्रसहनमभिभव इति वृत्तिकारः। 'अलकृञ् इत्यादिना इष्णुच् । वैष्णवं चक्र-सुदर्शनं जगत्प्रभोःसकललोकै- कस्वामिनः । अस्य सुरद्विषो-रावणस्य । कन्धरायामधि अधिकन्धरम्- अधिग्रीवम् । विभक्तयर्थेऽव्ययीभावः । 'अव्ययीभावश्च' इति नपुंसकत्वात् 'हस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य' इति ह्रस्वत्वम् । 'कण्ठो गलोऽथ ग्रीवायां शिरोधिः कन्धरेत्यपि इत्यमरः । नाक्रमत-अप्रतिहतं न क्रमते स्म । न प्रवर्तते स्म । किन्तु प्रतिहतमेवेत्यर्थः । 'वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः' इति वृत्तावात्मनेपदम् । वृत्तिरप्रतिबन्धः ॥ ५४ ॥ [अन्वयः] बृहच्छिलानिष्ठुरकराठघट्टनात् विकीर्णलोलाग्नि- कणम् ( अतएव ) अप्रसहिष्णु वैष्णवं चक्रम् जगत्प्रभोः अस्य अधिकन्धरं न अक्रमत । [विग्रहः ] शिलेव निष्ठुरः शिलानिष्ठुरः, शिलानिष्ठुरश्चासौ कण्ठश्च शिलानिष्ठुरकण्ठः । बृहंश्चासौ शिलानिष्ठुरकण्ठश्च बृहच्छिलानिष्ठुरकण्ठः । तत्र घट्टनं तस्मात्-बृहच्छिलानिष्ठुरकण्ठघटनात् । यद्वा-वृहत्पदं शिला- विशेषणं। बृहती चासौ शिला च बृहच्छिला, बृहच्छिलेव निष्ठुरः बृहच्छि- लानिष्ठुरः, स चासौ कण्ठश्च बृहच्छिलानिष्ठुरकण्ठः, तत्र घट्टनं तस्मादिति विग्रहः । विकीर्णा लोला अग्निकणाः यस्य तत् विकीर्णलोलाग्निकणम् । सुरान् द्वेष्टीति सुरद्विट् , तस्य सुरद्विषः । न प्रसहिष्णु अप्रसहिष्णु। विष्णोरिदम् वैष्णवम् । कन्धरायामिति अधिकन्धरम् । ..
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १५ [अर्थः] बृहच्छिलानिष्ठुरकराठघट्टनात् = विपुलप्रस्तरकठोर- कण्ठाभिघातात् । विकीर्णलोलाग्निकणं = विक्षिप्तविस्फुरस्फु- लिङ्गम् । अत एव-अप्रसहिष्णु = अनभिभावकम् । असमर्थ वा । वैष्णवं = भगवतो विष्णोरिदम् । चक्रं = रथाङ्ग । सुदर्शनं नाम चक्रम् । जगत्प्रभोः = सकललोकैकस्वामिनः । सुरद्विषः सुरवैरिणः । अस्य = रावणस्य । अधिकन्धरम् = अधिग्रीवम् । नाक्रमत =अप्रतिहतं न क्रमते स्म । न प्रावर्तत । [ भावार्थः] महाशिलाकठोरतत्कण्ठसंघट्टनादुद्भूताग्निकणं भ्राजिष्णु सुदर्शनं नाम वैष्णवमप्रतिहतं चक्रमपि तदीये विपुले गले न प्रावर्तत । [ कोशः ] ' कण्ठो गलोऽथ ग्रीवायां शिरोधिः कन्धरेत्यपि इत्यमरः। अथ चक्रं सुदर्शनम् ' इत्यमरः । [वाच्यप०] बृहच्छिलानिष्ठुरकण्ठबट्टनाद्विकीर्णलोलाग्निकणेन अप्र- सहिष्णुना वैष्णवेन चक्रेण जगत्प्रभोरस्याधिकन्धरं नाऽक्रम्यत । [ भाषाटीका ] जैसे शान चढ़ानेवाले पत्थर पर शस्त्रके संघट्ट होने से ( लगने से ) अग्निके कण (स्फुलिङ्ग) चारों ओर छूटने लगते हैं परन्तु उस शस्त्र का असर शाणचक्रशिला पर कुछ नहीं होता वैसे ही रावण की गोल व पुष्ट कन्धरा ( गला ) पर भगवान् श्रीविष्णु के सुदर्शन चक्र का भी कोई असर नहीं हुआ । गलं पर चक्र का आघात लगने से अग्निस्फुलिङ्ग चारों और छिटक गए पर गला कुछ भी नहीं कटा । अर्थात् उस रावण के गलेपर सुदर्शन चक्र का भी कुछ असर नहीं होता था ॥५४॥ विभिन्नशङ्ख कलुषीभवन्महु- मैदेन दन्तीव मनुष्यधर्मणः। निरस्तगाम्भीर्यमपास्तपुष्पक प्रकम्पयामास न मानसं न सः॥५५॥ [ सर्वकषा] विभिन्नति । स रावणो मदेन-दर्पण, इभदानेन च ।
६६ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- .. . 'मदो दर्पेभदानयोः' इति विश्वः । दन्तीव-गज इव । विभिन्नो-विध- ट्टितः शङ्खो-निधिभेदः, कम्बुश्च येन सः । सन् 'शङ्खो निध्यन्तरे कम्बुलला- टास्थिनखेषु च ' इति विश्वः । अकलुष कलुषं क्षुब्धमाविलं च भवत्- कलुषीभवत् । निरस्तं गाम्भीर्यम्-अविकारित्वं, अगाधत्वं च यस्य तत् । अपास्तानि पुष्पाणि, पुष्पकं विभानं च यस्मात्तत् । पुष्पपक्षे वैभाषिकः कप्प्रत्ययः। मनुष्यस्येव धर्मः-इमलत्वादिर्यस्येति स्वामी। तस्य मनुष्यधर्मणः। 'धर्मादनिच्केवलात् ' इत्यनिच् । मानसं-चित्तं, तदीयं सरश्च । 'मानसं सरसि स्वान्ते' इति विश्वः । मुहुर्न कम्पयामास न- शोभयामासेति न, किन्तु कम्पयामासैवेत्यर्थः । कुबेरस्य महामहिमतया सम्भाविताऽप्रकम्पित्वनिवारणाय नद्वयम् । 'सम्भाव्यनिपेधनिवर्तने नद्वयम्' इति वामनः । अत्र दन्तिरावणयोः प्रकृताऽप्रकृतयोः श्लेषः॥ ५५॥ [अन्वयः ] स मदेन दन्तीव विभिन्नशङ्खः कलुषीभवत्- निरस्तगाम्भीर्यम् अपास्तपुष्पकम् मनुष्यधर्मणो मानसं मुहुः न प्रकम्पयामास (इति) न ( --किन्तु प्रकम्पमायासैव)। [विग्रहः ] विभिन्नः शङ्खो येनासौ विभिन्नशङ्खः । न कलुषम् अक- लुषम्, अकलुषं कलुष सम्पद्यमानं कलुषीभवत् । निरस्तं गाम्भीर्ययस्य तत्-निरस्तगाम्भीर्यम् । अपास्तानि पुष्पाणि (पुप्पकं नाम विमानं च) यस्मात् तत् अपास्तपुष्पकं, तत्तथाभूतम्। मनुप्यस्येव धर्मो यस्यासी मनुष्यधर्मा, तस्य-मनुष्यधर्मणः । [अर्थः ] सः रावणः । मदेन = दर्पण । दन्तिपक्षे-गजमदेन च । दन्तीव हस्तीव । विभिन्नशङ्ख विनाशितशङ्खनिधिः । गज- पक्षे-प्रस्फुटितकपालास्थिविशेषः । प्रस्रवल्ललाटास्थिविशेषः । विघट्टितकम्बुर्वा । कलुषीभवत्-आविलीभवत् । मलिनीभवत् । क्षोभं गच्छत् । निरस्तगाम्भीर्य = निर्धूताऽविकारित्वम् । व्यपगताऽगाधभावञ्च किश्च-अपास्तपुष्पकं = निर- स्तपुष्पम् । विध्वरतकुसुमम्। व्यपगतपुष्पकाख्यविमानश्च ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । . मनुष्यधर्मणः = कुबेरस्य । मानसं = चित्तं । तदीयं मानस- नामकं सरोवरञ्च । न प्रकम्पयामास न = न प्रकल्पयामा- सेति न, किन्तु प्रकम्पयामासैव । [ भावार्थः ] यथा मदोन्मत्तो हस्ती मदस्रवच्छङ्खप्रदेशः- स्वच्छं गभीरं पुष्पोपशोभितं सरः स्वप्रवेशेन-कलुषीभवत् निरस्तगाम्भीयं निरस्तपुष्पकं च कृत्वा प्रकम्पयति-क्षोभयति, एवमेव मदोन्मत्तो रावणः-कुबेरस्य स्वच्छ गम्भीरं पुष्पोप. शोभितं मानसं सरः, अप्रकम्प्यं, प्रसन्न, गभीरं, पुष्पकमाव- भावितं मनश्च न प्रकम्पयामासेति न, किन्तु प्रकम्पयामासैव । [ कोशः] 'मदो दभदानयोः' इति विश्वः । 'शङ्खो निध्यन्तरे कम्बु- ललाटास्थिनखेपु च इति विश्वः । 'मनुष्यधर्मा धनदो राजराजो धनाधिपः' इत्यमरः । 'मानसं सरसि स्वान्ते' इति विश्वः ।. [वाच्यपरि०] मदेन दन्तिनेव विभिन्नशङ्खन कलुषीभवत्, निरस्तगाम्भीर्यम् अपास्तपुष्पकं मानसं न प्रकम्पयामासे इति न । [भापाटीका] जैसे मद से मस्त हाथी साफ सुथरे गहरे व फूलों से लह- लहाते हुए सरोवर (झील) को गदला और दूषित तथा पुष्पों से रहित कर देता है, वैसे ही मद से उन्मत्त रावण ने कुबेर के मानससरोवर को और साथ ही पुटपकप्रियकुबेर के गम्भीर अविकारी मन को भी व्याकुल और कलुपित कर दिया (घबड़ा दिया)। [शङ्ख = शङ्ख नामक कुबेर का एक खजाना, या कनपटी या शङ्ख । पुष्पक = फूल, या कुबेरका पुष्पक विमान । ] ॥५५॥ रणेषु तस्य प्रहिताः प्रचेतसा सरोषहुङ्कारपराङ्मुखीकृताः। प्रहतु रेवोरगराजरजवो जवेन कण्ठं सभयाः प्रपेदिरे ॥ ५६ ॥ [ सर्वकषा] रणेष्विति । किञ्च-रणेषु प्रचेतसा-वरुणेन, प्रहिताः-प्रयुक्ताः । उरगराजा महासस्तेि रज्जवइव उरगराजरज्जवः।
शिशुपालवधम्। [ १ प्रथमः नागपाशा इत्यर्थः । तस्य--रावणस्य । सरोषहुङ्कारेण पराङ मुखीकृता ब्यावर्तिताः । अतएव--सभयाः सत्यः । जवेन-वेगेन । प्रहतु:- प्रयोक्तुः प्रचेतस एव, कण्ठं प्रपेदिरे--प्राप्ताः । अत्र परहिंसाप्रयुक्तस्या- युधस्य वैपरीत्येन स्वकन्ठग्रहणादनर्थोत्पत्तिरूपो विषमालङ्कारः। 'विरुद्धकार्य. स्योत्पत्तिर्यत्रानर्थस्य वा भवेत्। इति लक्षणात् ॥ ५६ ॥ [अन्वयः ] रणेषु प्रचेतसा प्रहिता उरगराजरज्जवः तस्य सरोषहुङ्कारपराङमुखीकृताः (अतएव) सभयाः (सत्यः ) जवेन प्रहतुरेव कण्ठम्प्रपेदिरे। [विग्रहः ] उरगाणां राजानः उरगराजाः, उरगराजा रजव इव उरग- राजरजवः। रोषेण सहितं सरोषं, सरोषं यथा स्यात्तथा हुङ्कारः, सरोषहुङ्कारः । न पराङ्मुखाः अपराङ्मुखाः, अपराङ्मुखाः पराङ्मुखाः सम्पद्यमानाः कृताः पराङ्मुखीकृताः । सरोषहुङ्कारण पराङ्मुखीकृताः--सरोपहुंकारपरा- ङ्मुखीकृताः । भयेन सहिताः समयाः । अर्थः] रणेषु = युद्धषु । प्रचेतसा = जलाधिराजेन वरुणेन । प्रहिताः प्रयुक्ताः । उरगराजरज्जव: महासर्परज्जवः। नाग- पाशाः । तस्य = रावणस्य । सरोषहुङ्कारपराङ मुखीकृताः सामर्षहुङ्कारव्यावर्तिताः । ( अतएव-) सभयाः = ससाध्वसाः सत्यः। जवेन = वेगेन । सत्वरम् । प्रहर्तुं रेव = प्रयोक्तर्वरुण. स्यैव । कण्ठं = गलम् । प्रपेदिरे = प्राप्ताः। [भावार्थः] युद्ध रावण बन्धनाय वरुणेन प्रयुक्ता नागपाशा रावणहुङ्कारभीताः परावर्त्य वरुणमेव बन्धुः । रावणेन वरुणो विजित्य पाशैर्बद्ध इति यावत् । [कोशः ] 'प्रचेता वरुणः पाशी' इत्यमरः । उरगः पन्नगो भोगी' इत्यमरः । 'रजुर्वेण्यां गुणे योषित्' इति विश्वः । [वाच्यपरि० ] रणेषुप्रचेतसा प्रहिताभिः तस्य सरोषहुंकारपराङ्मुखी- कृताभिः सभयाभिः उरगराजरज्जुभिः... 'प्रहर्तुरेव कण्ठः प्रपेदे । [भाषाटीका ] युद्ध में वरुण भगवान् ने रावण पर नागपाश फेंका। - - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । ६६ तब रावण ने क्रोध से हुङ्कार किया उससे नागों ने डर करके रावण को छोड़ दिया और वापिस आकर वरुण को ही ( उन्होंने ) बान्ध लिया ॥५६॥ परेतभतु महिषोऽमुना धनु- विधातुमुत्खातविषाणमण्डलः। हृतेऽपि भारे महतस्त्रपाभरा- दुवाह दुःखेन भृशानतं शिरः ॥५७॥ [ सर्वकषा ] परेतभतु रिति । अमुना--रावणेन, धनु:--शाह, 'विधातु-निर्मातुमुत्खातमुत्पाटितं विषाणयोः--शृङ्गन्योर्मण्डलं वलयं यस्य स परेतभतुर्यमस्य महिषः। वाहनभूत इति भावः। भारे-- विषाणख्थे । भृजो घज् । हृतेऽपि, महतस्त्रपैव भरस्तस्मात् । ततोऽपि दुर्भरादिति भावः । भृधातोः क्रैयादिकात् 'ऋदोरप्' इत्यष्प्रत्ययः। भूश- मत्यर्थमानतं---ननं शिरोदुःखेनोवाह-वहतिस्म । 'असंयोगाल्लिट कित्' इति कित्त्वात् 'वचिस्वपि इत्यादिना सम्प्रसारणम् । हृतेऽपि भारं नतमिति विरोधः । तदनुप्राणिता चेयमवनतिहेतुत्वसाधयात्रपाभारत्वोत्प्रेक्षा ॥५॥ [अन्वयः ] अमुना धनुः विधातुम् उत्खातविषाणमण्डलः परेतभर्तुः महिषः भारे हृतेऽति महतः त्रपाभरात् मृशानतं शिरः दुःखेन उवाह । [विग्रहः ]-विषाणयोर्मण्डलं विषाणमण्डलम् , उत्खातम् विषाण- मण्डलं यस्यासी उत्खातविपाणमण्डलः। परेतानाम् भर्ता परेतभर्ता, तस्य परेतभर्तुः। अपैव भरः-त्रपाभरः, तस्मात् पाभरात् । भृशम् यथा स्यात्तथा आनतम् भृशानतम् , तत्तथाभूतम् । [अर्थः] अमुना-रावणेन । धनुः शाङ्ग कोदण्डं। विधातु निर्मातुम् । उत्खातविषाणमण्डल: उत्पाटित- शृङ्गवलयः। परेतभत्तु: प्रताधिपस्य यमराजस्य । महिषः सैरिभः। लुलायः। यमराजस्य वाहनभूतो महिषः । भारे- विषाणमण्डलरूपे भारे। हृतेऽपि-अपहृतेऽपि। उत्सारितेऽपि ।
शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः महतः अतिमहतः । दुर्भरात् । त्रपाभरात-लज्जाभरात् । भृशानतम् अत्यर्थनम्रम् । शिरः==मूर्धानम्। दुःखेन-क्लेशेन । उवाह-वहति स्म । [ भावार्थः ] शाङ्ग धनुर्निर्मातु यमराजवाहनमहिषस्य रावणेन शृङ्गमण्डले उद्धृते सति-मन्ये भारापगमात्सञ्जात- सुखोऽपि यममहिषोऽपमानदुःखभरेणैव भृशानतं शिर उवाह । [कोशः ] 'उत्तमाङ्गं शिरः शीर्ष मूर्धा ना मस्तको ऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । 'धर्मराजः पितृपतिः समवर्ती परंतराट्' इत्यमरः । [वाच्यपरि० ] परेतभर्तुर्महिषेण अमुना...धनुर्विधातुमुत्खातविपाण- मण्डलेन भृशानतं शिर ऊहे । [भाशाटीका ] सींगों का धनुष बनाने के लिए यमराज के भैंसे के सींगों को रावण ने जब उखाड लिया तब सींगों के बोझ के कम होजाने पर भी लज्जा और अपमान के बोझ से दबा हुआ वह महिप ऊपर सिर नहीं उठा सकता था, और नीचा सिर किए ही चलता था ॥ ५७ ॥ स्पृशन्सशङ्कः समये शुचावपि स्थितः करारसमग्रपातिभिः। अधर्मधर्मोदकविन्दुमौक्तिकै रलञ्चकारास्य वधूरहस्करः ॥५८|| [ सर्वकषा ] स्पृशन्निति । अहः करोतीति, अहस्करः-सूर्यः । 'दिवाविभानिशा' इत्यादिनाटप्रत्ययः।कस्कादित्वात्सत्वम्।शुचौ समये-- ग्रीष्मकाले, अनुपहते आचारे च स्थितोऽपि । 'शुचिः शुद्धेऽनुपहते शृङ्गाराषाढ- योरपि । ग्रीष्मे हुतवहेऽपि स्यात्' इति विश्वः । 'समयाः शपथाचारकाल- सिद्धान्तसंविदः' इत्यमरः। असमग्रपातिभिः। सकुचितवृत्तिभिरित्यर्थः। कराणामंशूनां, हस्तानां चाग्रैः । 'बलिहस्तांशवः कराः' इत्यमरः । सशङ्कः-स्पृशन्। अविश्वासमयादिति भावः। अधर्मा--अनुप्णा धर्मोदकबिन्दवः-स्वेदोदबिन्दवः। 'मन्थौदन- इत्यादिना विकल्पा- १ सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । दुदकशब्दस्योदादेशाभावः । तैरेव मौक्तिकैरस्य वधूरलञ्चकार । प्रोप्ने तद्भयानासह्य तपतीत्यर्थः। अत्र प्रस्तुतसूर्यविशेषणमात्रसाम्यादप्रस्तुत- असाधकप्रतीतेः समासोक्तिरलङ्कारः ॥ ५८ ॥ [ अन्वयः ] अहस्करः शुचौ समये स्थितोऽपि असमग्र- पातिभिः कराप्रैः सशङ्कः स्पृशन अधर्मधर्मोदकबिन्दुमौक्तिकैः अस्य वधूः अलञ्चकार । [विग्रहः ] शङ्कया सहितः सशङ्कः । कराणासग्राणि करामाणि, तैः- कराग्रैः । अहः करोतीति अहस्करः । समग्रं पतन्तीति समग्रपातीनि, न समग्रपातीनि असमग्रपातीनि, तैः असमग्रपातिभिः। धर्मस्य उदकन् धर्मोदकम्, धर्मोदकस्य बिन्दवः-धर्मोदकबिन्दवः । न धर्मा अधर्माः, अधर्माश्च ते धर्मोदकबिन्दवश्च अधर्मधर्मोदकबिन्दवः। अधर्मधर्मोदक- बिन्दव एव मौक्तिकानि-तैः, अधर्मधर्मोदकबिन्दुमौक्तिकैः । [अर्थः ] अहस्करः दिनकरः । सूर्यः । शुचौ समये= ग्रीष्मकाले । शुद्ध आचारे च । स्थितोऽपि अवस्थितोऽपि । वर्तमानोऽपि असमयपातिभिः असमस्तपातिभिः । सङ्कचितवृत्तिभिः । करात्रैः = किरणाग्रैः । हस्तात्रैश्च । सशङ्कः = सभयः । स्पृशन = अामृशन् । संस्पृशंश्च । अधर्मधर्मोदकबिन्दु- मोक्तिकैः अनुष्णस्वेदोदबिन्दुमौक्तिकैः । अस्य-रावरपस्य । वधूः अङ्गनाः । अलञ्चकार-भूषयति स्म । [ भावार्थः] भगवान भास्करो ग्रीष्मेऽपि काले (शुद्ध आचारे च ) वत्तैमानोऽपि किरणाग्रेभैयादसमनपातिभिर नुष्णधर्मोदकविन्दुमौक्तिकैरस्य भार्या अलञ्चकार । [ कोशः ] 'शुचिः शुद्धेऽनुपहते शृङ्गाराषाढयोरपि । ग्रीष्मे हुतवहेऽपि स्यात्' इति विश्वः । 'बलिहस्तांशवः कराः । इत्यमरः । 'वधूर्जाया स्नुपा श्री च' इत्यमरः । 'समयाः सपथाचारकालसिद्धान्तसंविदः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] अहस्करेण शुचौ समये स्थितेनापि असमनपातिभिः कराग्रः सशङ्केन स्पृशता अस्य वध्वोऽलञ्चक्रिरे ।
mas १०२ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- [भाषाटीका] भगवान सूर्यनारायण ग्रीष्मऋतु में भी ( पूरी २ नहीं पड़ने वाली) अपनी किरणों से शङ्कित भाव से स्पर्श करते हुए रावण की स्त्रियोंको ठण्ढे पसीने के बिन्दुरूपी मोतियों से अलङ्कृत किया करते थे । अर्थात् सूर्य भी उससे डरते थे। और अपनी किरणों को गर्मी में भी पूरी २ नहीं फैला सकते थे ॥ ५८ ॥ कलासमग्रेण गृहानमुञ्चता मनस्विनीरुत्कयितु पटीयसा । विलासिनस्तस्य वितन्यता रतिं न नर्मसाचिव्यमकारि नेन्दुना ॥५६॥ [ सर्वकषा ] कलासमग्रणेति । कलाभिः----घोडशांशः, शिल्प- विद्याभिश्च, समग्रेण-सम्पूर्णेन । 'काले शिल्पे वित्तवृद्धौ चन्द्रशे कलने कला' इति वैजयन्ती । गृहानमुरुचता--सदा तद्गृहेप्वेववसता। दण्डभयात्सेवाधर्मत्वाच्चेति भावः । मनस्विनी:--मानिनीः, उत्सुकाः कर्तुम्--उत्कयितुम् । 'उत्क उन्मनाः' इति निपातनादुत्कशब्दात् 'तत्करोति' इति ण्यन्तात्तुमुन् । पटीयसा । मानभेदचतुरेणेत्यर्थः । कुतः। रतिं वितन्वता-चन्द्रिकाभिश्चतुरोक्तिभिश्च विलासिनः-विलसनशीलस्य । 'वौ कषलस---' इत्यादिना घिनुण प्रत्ययः । तस्य-रावणस्य । नर्मसाचिव्य-क्रीडासम्बन्ध्यधिकारित्वे सचेष्टत्वम् । 'लीला क्रीडा च नर्म च' इत्यमरः। नाकारीति न- किन्त्वकार्यवेत्यर्थः। अनौचित्यात्प्राप्तनर्मसाचिव्यनिषेधनिवारणार्थ नद्वयम् । 'सम्भाव्यनिषेधनिवर्तने नन्द्वयम्' इति वामनः । अत्रेन्दोः प्रकृतस्याऽ- प्रकृतेन नर्मसचिवेन श्लेषः॥ ५९॥ [अन्वयः] कलासमण गृहान् अमुचता मनस्विनीः उत्कयितुपटीयसा विलासिनः तस्य रतिं वितन्वता इन्दुना नर्म- साचिव्यं न अकारि (इति)न । [विग्रहः ] कलाभिः समग्रः कलासमग्रः, तेन कलासमग्रेण । सचिवस्य भावः कर्म वा साचिव्यं, नर्मणि साचिव्यं नर्मसाचिव्यम्। उत्काः- -- रागं वर्धयता । इन्दुना- सर्गः] .. अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [अर्थः] कलासमग्रेण = सम्पूर्णकलेन । सकलकलाकलाप- कुशलेन च । गृहान् = रावणसौधम् । अमुञ्चता = अपरित्यजता। सदा तद्गृहेष्वेव निवसता । मनस्विनीः =मानिनीः। उत्कयि- तुम् = उत्कण्ठयितुम् । सोत्सुकाः कर्तुम् । पटीयसा=चतुरेण । मानिनीमानभङ्गदक्षेण । विलासिनः=मन्मथता त्रविलासप्रस. क्तस्य । तस्य -रावणस्य । रतिरागं । सुरतानुरागं। रत्यौत्सु- क्यम् । वितन्वता=वर्द्धयता । इन्दुना=चन्द्रमसा । नर्मसा- चिव्यं-सुरतक्रीडासाहाय्यम्१ । नर्मसचिवता । न अकारि न= न कृतमिति न । कि तु कृतमेवेत्यर्थः । [ भावार्थः ] भगवान् सकलकलापूर्णश्च द्रो विलासिनोऽस्य रावणस्य मानिनीमानविनोदादिरतिक्रीडासाचिव्यं चकार । [ कोशः] 'काले शिल्पे वित्तवृद्धौ चन्द्रशे कलने कला' इति वैजयन्ती । 'क्रीडा लीला च नर्म च ' इत्यमरः । [ वाच्यप०] कलासमग्रेण गृहान् अमुञ्चन् मनस्विनीः उत्कयितुं पटीयान् विलासिनस्तस्य रतिं वितन्वन्निन्दुर्नर्मसाचिव्यं तस्य नाकार्षीदिति न [किन्त्वकार्षीदेव। [ भाषाटीका ] सकल कलाओं से पूर्ण (सकलशास्त्ररहस्यवित् तथा षोडश कलाओं के ज्ञाता ) भगवान् चन्द्रमा भी विलासप्रिय उस रावण के यहाँ रह कर मानिनी स्त्रियों के मानको भङ्ग करने का (नर्म- सचिव का) कार्य करते हुए उस रावण की रतिको बढ़ाते थे ॥ ५९ ॥ विदग्धलीलोचितदन्तपत्रिका विधित्सया नूनमनेन मानिना। न जातु वैनायकमेकमुद्धृतं विषाणमद्यापि पुनः प्ररोहति ॥६॥ १ अन्योऽपि नर्मसचिवः कलासु कुशलो नायकस्य निकटवर्ती मान- वतीमाननिरासरत्यौत्सुक्यवर्द्धनादिपटुर्भवति ।
१०४ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः N - [ सर्वकषा] विदग्धेति । मानिना-अहङ्कारिणा । अनेन- रावणेन । विदग्धलीलाः । चतुरविलासिन्य इत्यर्थः । तासामुचिताश्च वा दन्तपत्रिकाश्च-कर्णभूषणानि । 'विलासिनीविभ्रभदन्तपत्रिका' इति साधीयान्पाठः । अन्यथा विप्रकृष्टार्थप्रतीतिकत्वेन कष्टाख्यार्थदोपापत्तेः । 'कष्टं तदर्थावगमो दूरायत्तो भवेत्' इति लक्षणात् । विलासिनीनां या विभ्रमदन्तपत्रिका-विभ्रमार्थानि यानि दन्तमयपत्राणि । विभ्रम- दन्तशब्दयोः षष्ठीसमासपर्यवसानात्तादर्थ्यलाभः। तासां-विधित्सया- विधातुमिच्छया । विपूर्वाद्दधातेः 'सनिमीमा--' इत्यादिना अच इस् । 'सः सि' इति तकारः। 'अन लोपोऽभ्यासस्य इत्यभ्यासलोपः । ततः 'स्त्रियाम्' इत्यनुवृत्तौ 'अ प्रत्ययात्' इत्यकारप्रत्यये टाप् । नून-निश्चितं, जातु-कदाचिदपि । 'कदाचिजात' इत्यमरः। उद्धतमुत्पाटितं विनाय- कस्य-गणेशस्येदं वैनायकम् एकं विषाणं-दन्तः । 'विषाणं पशुशृङ्गे स्यात्क्रीडाद्विरददन्तयोः' इति विश्वः । अद्यापि पुनने प्ररोहति-न प्रादुर्भवति । अपूर्वात् ‘रुह प्रादुर्भावे' इत्यस्माल्लट् । किमन्यदकार्यमस्येति भावः । एतदन्यथा कथं गजाननस्यैकदन्तत्वमित्युत्प्रेक्षते--'नून मिति॥६॥ [अन्वयः] मानिना अजेन विदग्धलीलोचितदन्तपत्रिका. विधित्सया नूनं जातु उद्धृतम् एक वैनायकं विषाणम् अद्यापि न प्ररोहति । [विग्रहः ] मानोऽस्यास्तीति मानी, तेन--मानिना। विदग्धा लीला यासां ताः--विदग्धलीलाः, विदग्धलीलानामुचिता विदग्धलीलोचितोः। विदग्धलीलोचिताश्च ता दन्तपत्रिकाश्च विदग्धलीलाचितदन्तपत्रिकाः । विधातुमिच्छा विधित्सा । विदग्धलीलोचितदन्तपत्रिकाणां विधित्सा विदग्धलीलोचितदन्तपत्रिकाविधिल्सा, तया। विनायकस्येदम् वैनायकम् । [अर्थः] मानिना= अहङ्कारिणा । दोधुरेण च । अनेन = रावणेन । विदग्धलीलोचितदन्तपत्रिकाविधित्सया = चतुर विलासिनीधारणोचितदन्तमयकर्णभूषणनिर्माणेच्छया । विला- सिनीप्रियगजदन्तमयकर्णाभरणनिर्माणाभिलाषण नूनं ] %3D अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । म् । जातु - कदाचिदपि उद्धृतम् = उत्खातम् । तम् । वैनायकं = गाणपतम् । एक विषाणम् = एको अद्यापि सम्प्रत्यपि। गतेऽपि बहुतिथे कालेऽपि । पुनरपि । न प्ररोहति = न प्रादुर्भवति । भावार्थः] स्वविलासिनीप्रियचिकीर्षया तद्धारणोचितं तमयं कर्णाभरणं विधित्सुरयं रावणो विनायकस्यैक शं) दन्तमुद्धृतवान् । सोऽयं दन्तोऽद्यापि पुनर्न प्ररोहति । कदन्त इत्यद्यापि गणपतिर्गीयते । शः ] 'विषाणं पशुश्ङ्गे स्यात्क्रीडाद्विरददन्तयोः' इति विश्वः । जात' इत्यमरः । च्यप० ] मानी.... 'दन्तपत्रिकाविधिल्सया यद्विषाणमुद्धृतवान् यकेन विषाणेन अद्यापि न प्ररुह्यते । पाटीका 1 अपनी प्रियाओं को प्रसन्न करने के लिए उनके धारण यक हाथीदान्त का करणफूल(झूमका)बनाने की इच्छा से रावण ने जीमहाराज का दहिना दांत उखाड़ लिया था वह दांत अभी तक निकला और गणेशजी आज तक एकदन्त ही कहलाते हैं ॥६॥ निशान्तनारीपरिधानधूनन- स्फुटागसाऽप्यूरुषु लोलचक्षुषः । प्रियेण तस्यानपराधबाधिता: प्रकम्पनेनानचकम्पिरे सुराः ॥ ६१ ॥ विङ्कपा ] निशान्तेति । निशान्तं-गृहम् । 'निशान्तं गृह- ' इति विश्वः। तत्र या नार्यः। शुद्धान्तस्त्रिय इत्यर्थः। तासांपरि- -अन्तरीयाणि। अन्तरीयोपसंव्यानपरिधानान्यधोंऽशुके इत्यमरः। न-चालनम् । धूजो ण्यन्ताल्ल्युट । 'धुप्रीोर्नुग्वक्तव्यः' । तेन स्फुटागसा-व्यक्तापराधेनापि । अन्तःपुरद्रोहस्य महापरा- भावः । ऊरुपु-तासां सक्थिषु, लोलचक्षुषः-सतृष्णदृष्टेः । .
शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः ne 'सक्थि क्लीबे पुमानूरूः' इति, 'लोलश्चलसतृष्णयोः' इति चामरः । अतएव वस्य रावणस्य प्रियेण-प्रमोदास्पदभूतेन । अङ्गीकृतम्लानिन दोपायेति न्यायादिति भावः । प्रकम्पनेन-वायुना । अनपराधेऽपराधाभावेऽपि बाधिताः । 'राजपुरुषैरिति शेषः । सुरा अनुचकम्पिरे । स्वयमुपायेना- न्तःप्रविश्यानपराधनिवेदनेन मोचयता वायुनानुकम्पिता इत्यर्थः । एकस्य वैदग्ध्याबहवो जीवन्तीति भावः ॥ ६ ॥ [अन्वयः] निशान्तनारीपरिधानधूननस्फुटागसाऽपि ऊरुयु लोलचक्षुषः अस्य प्रियेण प्रकम्पनेन अनपराधबाधितोःसुरा अनु- चकम्पिरे। [विग्रहः] निशान्ते नार्यः निशान्तनार्यः, निशान्तनारीणां परिधानानि निशान्तनारीपरिधानानि, निशान्तनारीपरिधानानां धूननं निशान्तनारीपरि- धानधूननम् । तेन स्फुटम् आगो यस्याऽसौ निशान्तनारीपरिधानधूनन- स्फुटागाः, तेन--निशान्तनारीपरिधानधूननस्फुटागसा । लोले चक्षुषी यस्यासौ लोलचक्षुः, तस्य लोलचक्षुषः । अनपराधे बाधिता:- अनपराधबाधिताः। [अर्थः ] निशान्तनारोपरिधानधूननस्फुटागसाऽपि = अन्तः- पुरविलासिनीजनान्तरीयचालनव्यक्तापराधेनाऽपि । ऊरुपु = विलासिनीकमनीयसक्थिषु लोलचक्षुषः = सतृष्णलोच- नस्य । तस्य = रावणस्य । प्रियेण = कृपापात्रेण । प्रकम्पनेन प्रभञ्जनेन । वायुना । अनपराधेऽपि = अपराधाभावेऽपि । बाधि- ताः = कदाचिद्राजपुरुषैः पीडिताः । सुराः = देवाः । अनुच- कम्पिरे = प्रार्थनादिनाऽनुगृहीताः । [ भावार्थः] अन्तःपुरसुन्दरीवस्त्रपरिचालनप्रवणेन वायु नाऽस्य रावणस्य कृपापात्रभूतेन सुरास्तेषु तेष्ववसरेषु प्रचण्डै राजपुरवैर्बाध्यमानाः स्वयमुपायेनाऽन्तःप्रविश्याऽनपराधबाधा- निवेदनेन मोचयताऽनुकम्पिताः । - - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । १०७ . [ कोशः] 'निशान्तं गृहशान्तयोः' इति विश्वः । ' अन्तरीयोप- संव्यानपरिधानान्यधोंऽशुके' इत्यमरः । 'सक्थि क्लीबे पुमानूरुः' इत्यमरः । 'प्रकम्पनो महावातो झझावातः सबृष्टिकः । इति कोशः । [वाच्यप०] निशान्तनारीपरिधानधूननस्फुटागा उरुषु लोलचक्षुषोऽस्य प्रियः प्रकम्पन:--अनपराधबाधितान् सुरान् मोचयन् अनुचकम्पे । [भाषाटीका ] रावणके अन्तःपुर की स्त्रियों के (धोती आदि ) वस्त्रों को वायु उड़ाता था और इस प्रकार अर्धनग्नावस्था इस प्रकार अर्धनग्नावस्था में उन स्त्रियों के जांध आदि गुह्य अङ्गों को देखकर रावण प्रसन्न हुआ करता था। इस प्रकार रावण का वायु कृपापात्र था । और वह वायु देवताओं को जब २ सिपाही लोग विना अपराध के कष्ट देते थे तब २ रावण से कह सुनकर किसी तरह उनको छुड़ा दिया करता था। इस प्रकार वायु के कारण देवताओं का कभी २ छुटकारा हो जाता था। अर्थात्--सामान्यदेवताओं को रावण के सिपाही त्रास दिया करते थे ॥६१ ॥ तिरस्कृतस्तस्य जनाभिभाविना मुहुर्महिम्ना महसां महीयसाम् । बभार बाष्पैर्द्विगुणीकतं तनु- स्तनूनपाधूमवितानमाधिजैः ॥६२॥ [ सर्वकषा ] तिरस्कृत इति । किञ्च--तस्य--रावणस्य जना- भिभाविना--लोकतिरस्कारिणा। महीयसाम्--अतिमहता,--महसां तेजसां, महिम्ना-महत्त्वेन । 'पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा' : इतीमनिच् । मुहुस्तिरस्कृतः । अतएव-तनु:-कृशः, तनुं न पातयति जाठररूपेण शरीरं धारयतीति तनूनपात -अग्निरिति स्वामी । 'नभ्राट-' इत्यादि- सूत्रेण निपातनान्नजो नलोपाभावः । श्राधिजैः-दुःखोत्थैबोष्पैः-- निःश्वासोप्मभिः । 'बाष्पो नेत्रजलोप्मणोः' 'पुंस्याधिर्मानसी व्यथा' इति विश्वामरौ । द्वौ गुणावावृत्ती यस्य स द्विगुणः । ततश्च्विः । द्विगु- णीकृतं--द्विरावृत्तम् । 'गुणस्त्वावृत्तिशब्दादिज्येन्द्रियामुख्यतन्तुषु' १०८ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- Prava इति वैजयन्ती। धूम वितानं--धूममण्डलं-बभार । अग्निरपि तत्सन्निधौ निस्तेजस्को धूमायमान आस्त इत्यर्थः। धूमद्वैगुण्यासम्बन्धे सम्बन्धाभि- धानादतिशयोक्तिः ॥६२॥ [अन्वयः ] तस्य जनाभिभाविना महीयसां महसां महिम्ना मुहुस्तिरस्कृतः (अतएव-) तनुः तनूनपात् आधिजैः बाष्पैः द्विगुणीकृतम् धूमवितानं बभार । [विग्रहः ] जनमभिभवतीति जनाभिभावी, तेन जनाभिभाविना । तनूं न पातयति इति तनूनपात् । आधिभ्यो जातानि आधिजानि, तैः आधिजैः । धूमस्य वितानं धूसवितानं, तत्--धूमवितानम् । [अर्थः] तस्य = रावणस्य । जनाभिभाविना = लोकति. रस्कारिणा । महीयसाम् = अतिमहताम् । महसां = तेजसाम् । महिम्ना = महत्त्वेन । गौरवेण । मुहुः = भृशम् । तिरस्कृतः अभिभूतः। अतएव--तनुः = कृशतनुः । कृशश्च । तनूनपात - वैश्वानरः । अग्निः । आधिजैः = मानसव्यथोद्भूतैः । आन्तरदुःखो- स्थैः । बाष्पैः = निःश्वासोष्मभिः । द्विगुणीकृतं = द्विरावृत्ततां प्राप्त । द्विगुणतां नीतम् । प्रभूतीकृतम् । धूमवितानं = धूममण्ड. लम् । बभार = दलें। [ भावार्थः] सकललोकातिशायिना रावणस्य तेजोमण्डलेन मुहुःपराभूतोऽग्निरपि रावणस्य सविधेऽप्रज्वलन् आधि जैबाप्पै- धूमवितान प्रभूतं बभार। (रावणतेनोविजितोऽग्निस्तत्समीपे न प्रज्वलति, केवलं मानसेन दुःखेन निःश्वासं मुञ्चन्निव धूमायमान- स्तिष्ठतीति यावत् । [ कोशः ] 'बाष्पो नेत्रजलोप्मणोः' इत्यमरः। 'पुस्याधिर्मानसी व्यथा इत्यमरः । 'जातवेदास्तनूपात्' इत्यमरः । गुणस्त्वावृत्तिशब्दादिज्यन्द्रिया- ऽमुख्यतन्तुषु' इति वैजयन्ती। [वाच्यप०] तस्य महसां महिना तिरस्कृतेन तनुना तनूनपाता राष्पैर्द्विगुणीकृतं धूमवितान वभ्रे ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजिम् । , कर्तरि क्तः [भाषाटीका ] रावण के तेज से पराभूत हो अग्नि-प्रकाशित नहीं होता था, किन्तु दुःख के मारे निःश्वास छोड़ता हुआ मानों दूने धुएँ को धारण करता था । अर्थात्-अग्निका प्रकाश रावणके सामने नष्ट हो गया था और खाली धूवाँ ही धूवाँ अग्नि में रह गया था ॥ ६२ ॥ परस्य मर्माविधमज्झतां निजं द्विजितादोषमजिह्मगामिभिः । तमिद्धमाराधयितु सकर्णकः कुलैर्न भेजे फणिनां भुजङ्गता ॥६३॥ [ सर्वकषा ] परस्येति । किञ्च-इद्धं दीसम् । उग्रमित्यर्थः । 'इन्धी दीप्तो । तं-रावणमाराधयितु-सेवितुं, परस्य-स्वेतरस्य मर्माणि हृदयादिजीवस्थानानि, कुलाचारव्रतानि च, विध्यति-भिनत्तीति मर्मावित् । विध्यतेः किम् । 'अहिज्या-' इति सम्प्रसारणम् । 'नहिवृति- इत्यादिना पूर्वस्य दीर्घः । तं--मर्माविधं, निज-स्वीयं द्विजिह्वतायां सर्पत्वे यो दोषो-दृष्टिविषत्वादिस्तम् । अन्यत्र द्विजिह्वता-पिशुनता। 'द्विजिह्वौ सर्पसूचकौ' इत्यमरः । सैव दोषस्तमुज्झतां-त्यजतां, फणिनां संबन्धिभिः अजिह्मगामिभिः-करचरणादिमद्विग्रहधारित्वादृजुगतिभिः, अकपटचारिभिश्च । तथा कर्णाभ्यां सह वर्तन्त इति सकर्णकाः, तैः । चक्षुः- श्रवस्त्वं विहाय आविष्कृतकर्णैरित्यर्थः । 'तेन सहेति तुल्ययोगे' इति बहु- ब्रीहिः । 'शेषाद्विभाषा' इति कप्। अन्यत्र कर्णयति सर्वं शृणोतीति कर्णको- नियन्ता। कर्णयतेवुल् । ततः पूर्ववत्समासे-सकर्णकः। सनियामकैरित्यर्थः। फणिनां-सर्पाणां कुलैर्वर्ग:भुजङ्गता सर्पता, विटत्वं च । भुजङ्गो विटसर्पयोः' इति हलायुधः। न भेजे-त्यक्तः। भुजैर्गच्छन्तीति भुजङ्गाः । गमेः सुपि खच् सचडिद्वा वाच्यः । तस्मिन्नियन्तरि खलैः खलत्वमपि, सर्पः सर्पत्वमपि विहाय वेषभावक्रियाभिः सौम्यत्वं श्रितमित्यर्थः । अत्र प्रस्तुतसर्पविशेषण- साम्यादप्रस्तुतखलव्यवहारप्रतीतेः समासोक्तिः॥ ६३॥ [ अन्वयः ] इद्धं तम् आराधयितुम् परस्य मर्मावि, निज ११० शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः . m द्विजिह्ववादोषम् उज्झतां फणिनाम् अजिह्मगामिभिः सकर्णकः कुलैः भुजङ्गता न भेजे। [विग्रहः ] मर्माणि विध्यतीति मर्मावित्, तं मर्भाविधम् । द्वे जिह्वे स्तो येषान्ते द्विजिह्वाः, द्विजिह्वानां भावो द्विजिह्वता, द्विजिह्वतायां दोषः द्विजिह्वतादोषः, तं द्विजिह्वतादोषम् । जिह्मम् गच्छन्तीति जिह्मगामिनः, न जिह्मगामिनः अजिह्मगामिनः, तै: अजिह्मगामिभिः । कर्णेन सह वर्तन्ते इति सकर्ण झाः तैः सकर्णकः । (पक्षे-कर्णयन्तीति कर्णकाः तैः सहितैः सकर्णकैः।) [अर्थः ] इद्ध = दीप्तम् । उग्रमित्यर्थः । तं-रावणम् । आराधयितु = सेवितुम् । परस्य = जनान्तरस्य । मर्माविध सद्यःप्राणहरं हृदयादिमर्मस्थलपीडकम् । सूचकपक्षे-कुला- चारव्रतादिभेदकम् । दोषोद्धाटनेन परमर्मव्यथकम् । निजं स्वकीयम् । । द्विजिह्वतादोपं सर्पजातिसहजदृष्टिविषादि- दोषम् । सूचकपक्षे–पिशुनतारूपं दोषम् । उज्झता = परित्य- जताम् । फणिनां = सर्पाणाम् । अजिह्मगामिभिः = अकुटिल- गामिभिः । अकपटचारिमिः । ऋजुगामिभिः । सूचकपः- करचरणादिमद्विग्रहधारित या सरलगतिभिः सकर्णकैः प्रकटीकृतकर्णैः । चक्षुःश्रवतां विहाय प्रकटीकृतकर्ण विवरैः । सूचकपचे-सनियामकैः । कुलैः = समूहैः । वर्गः । भुज- गता-सर्पता। विटता च । न भेजे= न सिषे । त्यक्तवेत्यर्थः। [ भावार्थः ] रावणमाराधयितु सर्पाणां, खलानाञ्च अजिह्म- गामिभिः सकर्णकैः कुलैः-परस्य मर्माविधं सहजं द्विजिह्वता- दोषं परित्यजद्भिभुजङ्गता न भेजे। [ कोषः ] ' द्विजिह्वौ सर्पसूचको ' इत्यमरः । 'भुजङ्गो विटसर्पयोः इति हलायुधः। [ वाच्यप०] इद्धं तमाराधयितुं परस्य मर्माविधं द्विजिह्वतादोषमुज्झन्ति अजिह्मगासीनि सकर्णकानि फणिनां कुलानि भुजङ्गतां न भेजिरे। [ भाषाटीका ] रावण की सेवा करते हुए सी के वर्गों ने अपनी ..
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । कुटिलगति, दृष्टिविषता और चक्षुःश्रवता छोड़ दी और खलों (चुगलखोरों) ने भी कुटिलता मर्मपीडकता द्विजिह्वता आदि अपने सहज दोष छोड़ दिए॥३३॥ तदीयमातङ्गघटाविघट्टितैः कटस्थलमोषितदानवारिभिः । गृहीतदिरपुनर्निवर्तिभि- श्चिराय याथार्थ्यमलम्भि दिग्गजैः ॥६४॥ [ सर्वकषा] तदीयेति । तदीयमातङ्गानां घटाभिः--ब्यूहै। विघट्टितैरभिहतैः । 'गजानां घटना घटा' इत्यमरः । अतएव कटस्थलेभ्यः प्रोषितान्यपगतानि दानवारीणि येषां तैः । गृहीताः--पलाय्य संश्रिता दिशो यैस्तैहीतदिक्कः । 'शेषाद्विभाषा' इति कप् । अपुनर्निवतिः भिर्भयात्तत्रैव स्थितैर्दिग्गजैः, चिराय याथायं-दिक्षु स्थिता गजा दिग्गजा इत्यनुगतार्थनामकत्वम् । अलम्भि-लब्धम् । लभेय॑न्तात्कर्म- णि लुङ् । 'विभाषा चिण्णमुलोः' इति विकल्पान्नुमागमः ॥ ६४ ॥ [ अन्वयः ] तदीयमातङ्गघटाविघट्टितैः कटस्थलपोषितदान- वारिभिः गृहीतदिक्क अपुनर्निवर्तिभिः दिग्गजैः चिराय याथा- यम् अलम्भि। [विग्रहः ] तस्य इमे तदीयाः, तदीयाश्च ते मातङ्गाश्च तदीयमातङ्गाः, तदीयमातङ्गानां घटाः तदीयमातङ्गघटाः, ताभिः विघहिताः तदीयमातङ्गघटा- विवाहिताः तैः । कटस्थलेभ्यः प्रोषितानि दानवारीणि येषां ते कटस्थल- प्रोपितदानवारयः, तैः कटस्थलप्रोपितदानवारिभिः । गृहीता दिशो यैस्ते गृहीतदिकाः, तैः गृहीतदिः । न पुनर्निवर्तन्ते इति अपुनर्निवर्तिनः, तैः अपुनर्निवर्तिभिः । यथार्थस्य भावो याथार्थ्यम् । तत्तथाभूतम् । दिशां गजाः दिग्गजाः, तैः दिग्गजैः। [अर्थः] तदीयमातङ्गघटाविघट्टितैः-रावणसम्बन्धिगज- समूहव्यूहाभिहतैः कटस्थलप्रोषितदानवारिभिः गण्ड- स्थलापगतदानजलप्रवाहैः । गृहीतदिक्कः पलाय्य गृहीत- ।
११२ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः दिगन्तैः। भयात्प्रपलाय्य संश्रितदिक्प्रान्तः । अपुनर्निवर्तिभिः= पुनरागमनरहितः । भयादिक्प्रान्तेष्वेव स्थितिं कुर्वद्भिः । दिग्गजैः ऐरावतादिभिरष्टभिर्दिशागजैः । चिराय-चिररात्राय। याथार्थ्य-अनुगतार्थनामकत्वम् । अलम्भि-प्रापि । लब्धम् । अधिगतम् । [भवार्थः] मन्ये-रावणहस्तिघटाभिर्विघट्टिता दिशा- गजाः प्रपलाय्य सश्रित दिक्प्रान्ता अपुनर्निवर्तिनोऽन्वर्थदिग्ग- जतां प्रापुः। [कोशः] 'गजानां घटना घटा' इत्यमरः । 'गण्डः कटो मदो दानम्' इत्यमरः। [वाच्यप०] तदीयमातङ्गघटाविघट्टिताः घटस्थलमोपितदानवारयः गृहीतदिकाः अपुनर्निवर्तिनः दिग्गजाः चिराय' याथार्थ्यम् अलप्सत । [भाषाटीका ] रावण के हाथियों की घटाओं से (समूह से) परास्त हुए दिशाओं के हाथी डरके मारे दिशाओं के प्रान्त भागों में जाकर छिप गए और फिर लौटकर नहीं आए इसलिए उनका दिग्गज यह नाम अन्वर्थ होगया॥६॥ अभीक्ष्णमुष्णैरपि तस्य सोष्मणः सुरेन्द्रबन्दीश्वसितानिलैर्यथा । सचन्दनान्भः कणकोमलैस्तथा वपुर्जला पवनैन निर्ववौ ॥६५॥ [ सर्वकषा] अभीक्ष्णमिति । ऊष्मणा-स्मरज्वरेण सहितः सोष्मा तस्य सोष्मणस्तस्य-रावणस्य वपुरभीक्ष्णं-भृशमुष्णैरपि। शोका- दिति भावः । सुरेन्द्रस्य बन्धः-बन्दीकृताः स्त्रियः तासां श्वसिता- निलनिःश्वासमारुतैर्यथा निर्ववौ-निर्वृतम् । 'निर्वाणं निर्वृतौ मोक्षे इति वैजयन्ती। तथा सचन्दनाम्भःकणाः-चन्दनोदकबिन्दुसहिताः,ते च ते कोमला मृदुलाश्च तैर्जलाद्रोणां-जलोक्षिततालवृन्तानां पवनैर्न निर्ववौ। 'धुवित्रं तालवृन्तं स्यादुत्क्षेपन्यजनं च तत् । 'जलेनाद जला स्यात' इति सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ११३ . वैजयन्ती। अत्र सन्तप्तस्योप्योपचारान्नितिरिति कारणविरुद्धकार्योत्पत्तिरूपो विषमालङ्कारः ॥ ६५ ॥ [अन्वयः ] सोष्मणः तस्य वपुः अभीक्षणमुष्णैरपि सुरेन्द्र- वन्दीश्वसितानिलैः यथा निर्ववौ तथा सचन्दनाम्भःकणकोमलैः जलापवनैः न ( निर्ववौ)। [विग्रहः ] उष्मणा सह वर्तते इति सोष्मा, तस्य सोप्मणः। सुरे- न्द्राणां बन्धः सुरेन्द्रबन्धः, श्वसितस्यानिला:-श्वसितानिलाः। सुरेन्द्र- बन्दीनां श्वसितानिलाः, सुरेन्द्रबन्दीश्वसितानिलाः, तैः सुरेन्द्रबन्दी- श्वसितानिलः। चन्दनेन सहितानि सचन्दनानि, सचन्दनानि च तानि अम्भांसि च सचन्दनाम्भांसि, सचन्दनाम्भसां कणाः सचन्दनाम्भ:- कणाः, सचन्दनाम्भः कणाश्च ते कोमलाश्च सचन्दनाम्भःकणकोमलास्तैः- सचन्दनाम्भःकणकोमलैः जलार्द्रायाः पवनाः जलापवनास्तैः जलापवनैः। [अर्थः] सोष्मणः = कामज्वरपीडितस्य । स्मरदाहार्दि- तस्य । तस्य =रावणस्य । वपुः =शरीरम् । अभीक्ष्ण भृशम् । उष्णैरपि =सन्तप्तरपि । सुरेन्द्रबन्दीश्वसितानिलैः देवेन्द्रबन्दीकृतसुन्दरीनिःश्वासमारुतैः । यथा निर्ववौ =यथा शान्तिमाप । तथा =तादृशं । सचन्दनाम्भःकणकोमलैः =चन्दनो- दककणसहितैम दुलैः । चन्दनशीतलजलबिन्दुहृद्यः । जला- पवनैः =जलार्द्रतालवृन्तपवनैः । न निर्ववौ = न नितम् । न शान्तिमाप। [भावार्थः] स्मरार्दितस्य रावणस्य मनः सुरेन्द्रबन्दी- निःश्वासमारुतैर्यथा निवृति जगाम, तथा जलार्द्रतालवृन्तपवनै- रपि न शान्ति जगाम । [कोशः ] 'निर्वाणं निवृतौ मोक्षे इति वैजयन्ती । 'धुवित्रं तालवृन्तं स्यादुत्क्षेपव्यजनञ्च तत् । जलेनाई जलार्दा स्यात्' इति वैजयन्ती । 3- - ८ सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ११३ . वैजयन्ती। अत्र सन्तप्तस्योप्योपचारान्नितिरिति कारणविरुद्धकार्योत्पत्तिरूपो विषमालङ्कारः ॥ ६५ ॥ [अन्वयः ] सोष्मणः तस्य वपुः अभीक्षणमुष्णैरपि सुरेन्द्र- वन्दीश्वसितानिलैः यथा निर्ववौ तथा सचन्दनाम्भःकणकोमलैः जलापवनैः न ( निर्ववौ)। [विग्रहः ] उष्मणा सह वर्तते इति सोष्मा, तस्य सोप्मणः। सुरे- न्द्राणां बन्धः सुरेन्द्रबन्धः, श्वसितस्यानिला:-श्वसितानिलाः। सुरेन्द्र- बन्दीनां श्वसितानिलाः, सुरेन्द्रबन्दीश्वसितानिलाः, तैः सुरेन्द्रबन्दी- श्वसितानिलः। चन्दनेन सहितानि सचन्दनानि, सचन्दनानि च तानि अम्भांसि च सचन्दनाम्भांसि, सचन्दनाम्भसां कणाः सचन्दनाम्भ:- कणाः, सचन्दनाम्भः कणाश्च ते कोमलाश्च सचन्दनाम्भःकणकोमलास्तैः- सचन्दनाम्भःकणकोमलैः जलार्द्रायाः पवनाः जलापवनास्तैः जलापवनैः। [अर्थः] सोष्मणः = कामज्वरपीडितस्य । स्मरदाहार्दि- तस्य । तस्य =रावणस्य । वपुः =शरीरम् । अभीक्ष्ण भृशम् । उष्णैरपि =सन्तप्तरपि । सुरेन्द्रबन्दीश्वसितानिलैः देवेन्द्रबन्दीकृतसुन्दरीनिःश्वासमारुतैः । यथा निर्ववौ =यथा शान्तिमाप । तथा =तादृशं । सचन्दनाम्भःकणकोमलैः =चन्दनो- दककणसहितैम दुलैः । चन्दनशीतलजलबिन्दुहृद्यः । जला- पवनैः =जलार्द्रतालवृन्तपवनैः । न निर्ववौ = न नितम् । न शान्तिमाप। [भावार्थः] स्मरार्दितस्य रावणस्य मनः सुरेन्द्रबन्दी- निःश्वासमारुतैर्यथा निवृति जगाम, तथा जलार्द्रतालवृन्तपवनै- रपि न शान्ति जगाम । [कोशः ] 'निर्वाणं निवृतौ मोक्षे इति वैजयन्ती । 'धुवित्रं तालवृन्तं स्यादुत्क्षेपव्यजनञ्च तत् । जलेनाई जलार्दा स्यात्' इति वैजयन्ती । 3- - ८ सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ११५ लक्ष्म्या । वसन्तीति वास्तव्याः, वास्तव्याश्च ते कुटुम्बिनश्च, वास्तव्य- कुटुम्बिनः, तेषां भावः-वास्तव्य कुटुम्बिता । ताम् वास्तव्य कुटुम्बिताम् । [अर्थः] सदा = सर्वदा । नित्यम् । असमये समयेऽपि च । न तु यथाकालमेवेत्यर्थः । प्रसूनप्रक्लृप्ति = पुष्पसमृद्धिम् । कुसुमसम्पत्तिम् । दधतः धारयन्तः । बिभ्रतः । ऋतवः= वसन्तादिका ऋतवः । वर्षाः प्रावृतुः । तपेन = ग्रीष्मेण ऋतुनासह । किञ्च-हिमागमः हेमन्त ऋतुः। शरदा-शरह. तुना सह । (तथा-) शिशिरः = शिशिराख्य ऋतुः । वसन्त- लक्ष्म्या = वसन्तर्नु शोभया । तत्समृद्ध। च । समेत्य = मिथुनी- भावेन मिलित्वा । दम्पतिभावेन मिलित्वेव । (प्रावृट-शरद- वसन्तलक्ष्मीशब्दानां स्त्रीत्वात् तप-हिमागम -शिशिर शब्दानां पुस्त्वान्मिथुनीभावोत्प्रेक्षा)। अस्य = रावणस्य । पुरे नगरे । वास्तव्यकुम्बितां = पुरवासिगृहस्थभावम् । प्रतिवा. सिताम् । नागरिकताम् । ययुः = दधुः । प्रापुः । [ भावार्थः] वर्षाद्या ऋतवो ग्रीष्मादिभिऋतुभिमिथुनीभूच रावणपुर्या लङ्कायां स्वयमेव निवासं चक्रुरिव । कथमन्यथा तस्यां नगर्या सर्वर्नु सम्पदो नित्यमवस्थितिः । सर्वत्तुं शोभा- सम्पत्समृद्धं रावणपुरमित्याशयः । [कोशः ] 'प्रसूनं कुसुमं सुमम्' इत्यमरः । 'उष्ण ऊष्मागमस्तपः' इत्यमरः । 'स्त्रियां प्रावृट् स्त्रियां भून्नि वर्षा अथ शरस्त्रियाम्' इत्यमरः । [वाच्यप०] प्रसूनक्लप्तिं दधद्भिः ऋतुभिः-वर्षाभिः तपेन शरदा हिमागर्मन वसन्तलक्ष्या शिशिरेण समेत्य अस्य पुरे वास्तव्य कुटुम्बिता यये । [ भाषाटीका ] रावण की पुरी लङ्का में वर्षा ऋतु ( स्त्री ) ने ग्रीष्म- ऋतु (पुरुष) के साथ मिलकर (विवाह कर ) तथा शरहतु ( स्त्री) ने हेमन्तऋतु ( पुरुप ) के साथ मिलकर (विवाह कर), एवं वसन्तलक्ष्मी ( स्त्री ) ने शिशिर के साथ मिलकर (विवाह कर ) रहने के लिए [गृह- स्थजीवन बिताने के लिए ) घरही बान्ध लिया है। अर्थात् वे लङ्का के ११६ शिशुपालवधम्। [१ प्रथमः नागरिक व सद्गृहस्थ ही मानों बन गए हैं, अन्यथा सदा एक साथ छहों ऋतुओं की समृद्धि वहां कैसे देखने में आती ? ॥ ६६ ॥ स चायमासन्नविनाशस्तुभ्यमपि दुग्ध्वा पुनस्त्वयैव हत इति युग्मेनाह- अमानवं जातमजं कुले मनोः प्रभाविनं भाविनमन्तमात्मनः । मुमोच जाननषि जानकी न यः सदाऽभिमानकधना हि मानिनः ॥ ६७ ॥ [ सर्वकषा] अमानवमिति । मनोरयं मानवः । तस्येदम्' इत्य- एप्रत्यये पर्यवसानाजावावेकवचनम् । अन्यथा मनोर्जातमित्येव स्यात्। अमा- नवम्-अमानुषम् । न जायत इति-अजम् । 'अन्येप्वपि दृश्यते' इति डप्रत्ययः । तथापि मनोः कुले जातं-रामस्वरूपेणोत्पन्नमिति विरोधः । स चाभासत्वादलङ्कार इत्याह-प्रभाविन मिति । महानुभावे तस्मिन्न कश्चिद्विरोध इति भावः । 'आभीक्ष्ण्ये णिनिः' इति णिनिः । इनिर्वा मत्व- र्थीयः । 'भवन्तः मितिशेषः । आत्मनः-स्वस्य । अन्तम्-अन्तं करो- तीत्यन्तम् । अन्तशब्दात् 'तत्करोति- इति ण्यन्तात्पचाद्यच । भाविनं- भविष्यन्तम् । 'भविष्यति गम्यादयः । जानन्नपि यो-रावणः,. जनक- स्थापत्यं स्त्री जानकी-सीता, तां न मुमोच-नामुञ्चदित्यन्वयः । जानतोऽप्यमोचने कारणमाह-मानिनः सदा-प्राणात्ययेऽप्यभिमान एवैकं मुख्यधनं येषां ते । प्राणात्ययेऽपि न मानं मुञ्चन्तीत्यर्थः। कारणेन कार्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः ॥ ६७ ॥ [अन्वयः ] अमानवम् अजम् मनोः कुले जातम् प्रभाविनम् ( भवन्तम् ) आत्मनः अन्तम् भाविनम् जाननपि यः जानकी न मुमोच । हि मानिनः सदा अभिमानकधनाः भवन्ति । विग्रहः ] मनोरयं मानवः, न मानवः अमानवस्तम्-अमानवम् । न जायत इति-अजः, तमम्-अजम् । अन्तं करोति-अन्तयति, अन्त- यतीति अन्तस्तम् । अभिमानमेव एकं धनं येषान्ते--अभिमानकधनाः । - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । - .. [अर्थः ] अमानवम् = अमानुषम् । अर्ज = नित्यम् । मनोः कुले मनो राजर्षेः कुले । सूर्यवंशे । जातम् = उत्पन्नम् । रामचन्द्ररूपेणावतीर्णम् । प्रभाविनं = महाप्रभावम् , भवन्तम् । आत्मनः = स्वस्य । अन्तम् = अन्तकरम् । विनाशकं । भाविनं- भविष्यन्तम् जानन्नपि = तत्त्वतो जानन्नपि । विदन्नपि । यः = रावणः । जानकी = रामपत्नी जनकसुतां सीताम् । न मुमोच = न तत्याज । हि = यतः । मानिनः = मानवन्तः । अभिमानिनः। सदा = सर्वदा । प्राणात्ययेऽपि समुपस्थिते । अभिमानकधनाः = अभिमानमात्रसाराः। 'भवन्तीति शेषः । [ भावार्थः] स रावणो रामं स्वान्तकर विदन्नपि अभिमा- नात् सीतां न तत्याज। मानिनो हि अभिमानकधना भवन्ति । [ कोशः ] 'मानश्चित्तसमुन्नतिः' इत्यमरः । 'गर्वोऽभिमानोहङ्कारः' इत्यमरः। [ वाच्यप० ] अमानवम् अर्ज मनोः कुले जातं जानता येन जानकी न मुमुचे । मानिभिः सदा अभिमानकधनैर्भूयते । [भाषाटीका] वह रावण भगवान् रामचन्द्रजीको(आपको)जो मनु के वंश में विष्णु के अवतार थे अपने मारनेवाला जानता हुआ भी सीता को वापिस देने में तैयार नहीं हुआ, क्योंकि मानियों को प्राण से भी बढ़कर बात की आन का ही ध्यान रहता है। प्राण रहते वे अपनी बात नहीं छोड़ते हैं ॥ ६७ ॥ स्मरत्यदो दाशरथिर्भवन्भवा- नमुवनान्ताद्वनितापहारिणम् । पयोधिमाबद्धचलजलाविल विलवथ लङ्कां निकषा हनिष्यति ।। ६८॥ [सर्वङ्कषा] स्मरतीति । भातीति भवन् । भातेर्डवतुः। दशरथस्या- प्रत्यं पुमान्दाशरथिः । 'अत इञ्' इती-प्रत्ययः। भवन्। रामः सन्नित्यर्थः। भवतेर्लटः शत्रादेशः। वनान्तात्-दण्डकारण्यात् । वनितापहारिणं- ।
११८ शिशुपालवधम । WED [१ प्रथमः सीतापहर्तारममुं-रावणम् । आबद्धः-प्रक्षिप्तादिभिर्वद्धसेतुः, अतएव चलन्ति जलानि यस्य स च, अतएव आविलश्च तम्-आबद्धचलज्जला. विलं पयोधि विलङ्घय लङ्कां निकषा-लङ्कासमीपे । 'समयानिकषा- शब्दौ सामीप्ये त्वव्यये मतौ' इति हलायुधः। 'अभितः परितः समयानि- कषाहाप्रति-योगेऽपि इति द्वितीया।हनिष्यति-अवधीत्। 'अभिज्ञावचने लट् इति भूते लट् । अदो हननं भवान्स्मरतीति काकुः । प्रत्यभिजानासि किमित्यर्थः । शेषे प्रथमः ॥ ६८॥ [अन्वयः] भवान दाशरथिर्भवन् वनान्ताद्वनितापहारिणम् अमुम् आबद्धचलज्जलाविलम् पयोधिं विलय लङ्कां निकषा हनिष्यति-अदः ( भवान् ) स्मरति ? । [विग्रहः ]वनिताम् अपहरति तच्छील: वनितापहारी, तम्-वतितापहारि- णम्। चलन्ति--आविलानि च जलानि यस्थाऽसौ चलज्जलाविलः, आबद्धश्चासौ चलजलाविलश्च-आबद्धचलजलाविलः, तम्-आबद्धचलजलाविलम् । [अर्थः] भवान् = भासमानस्त्वम् । दाशरथिः = दशरथा- पत्यं रामभद्रः । भवन = सन् । वनान्तात् = दण्डकारण्य- प्रान्तात् । वनितापहारिणं = स्वदारापहारिणम् । सीतापह- तारम् । अमुं = रावणम् । आबद्धचलज्जलाविलं प्रस्तर- निबद्धसेतु, चञ्चलकलुषीभूतजलञ्च । पयोधि = सागरम् । विल- छन्य उल्लङ्घन्य। लङ्कां निकषा = लङ्कायाः समीपे । हनि- ष्यति - अवधीत् । अदः - रावणहननम् । (भवान्-) स्मरति- भवानिदानीमपि प्रत्यभिजानाति किम् ? ॥ [ भावार्थः] भवान् दाशरथ्यवतारेऽमुं रावण चलत्कलुषी- भवजले समुद्रे सेतु बद्ध वा लङ्कासमीपेऽवधीदित्येतन्कि संप्रति ( भवान् ) स्मरति ? । [कोशः] 'समयानिकषाशब्दो सामीप्ये त्वव्यये मतौ' इति हलायुधः । [वाच्यपरि० ] दाशरथिना भवता वनान्ताद्वनितापहारी असौ पयोधि विलय लङ्कां निकषा हनिप्यते अदः स्मर्यंते ? । - PM सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ११६ । [भाषाटीका ] आपने रामावतार में उस रावण को ( काले व चञ्चल जल वाले) समुद्र पर सेतु बनाकर लङ्का में जाकर मारा था यहआपको स्मरण है न ?॥ ६८ ॥ अथोपपत्ति छलनापरोऽपरा- मवाप्य शैलूष इवैष भूमिकाम् । तिरोहितात्मा शिशुपालसञ्ज्ञया प्रतीयते सम्प्रति सोऽप्यसः परैः ॥ ६ ॥ [सर्वकषा] अथेति । राक्षसदेहत्यागानन्तरं सम्प्रति छलनापरः- परप्रतारणापरः, एष-रावणः, शैलूषो- नटः, तस्य भूमिकां-रूपा- न्तरमिव । 'शैलूषो नटभिल्लयोः' । 'भूमिका रचनायां स्यान्मूर्त्यन्तरपरिग्रहे' इति च विश्वः । अपरामुपपत्तिम्-जन्मान्तरमित्यर्थः। अवाप्य शिशु पालसञ्ज्ञया तिरोहितात्मा-विरोहितस्वरूपः सन् । सोऽपि-रावण एव सन्नपि । परैरितरैः। स न भवतीत्यसः-तस्मादन्य एव । 'न इति नसमासः । अतएव 'एतत्तदोः सुलोपो-' इत्यादिना न सुलोपः । प्रतीयते ज्ञायत इति,-प्रतिपूर्वादिणः कर्मणि लट् । यथैक एव शैलूषो रूपान्तरमास्थाय तद्देशभाषादिभिरन्य इव प्रतीयते तद्वदयमपि मानुषदेहपरि- ग्रहादन्य इव भाति । दोर्जन्यं तु तदेवेत्यवश्यं संहार्य इति भावः ॥ ६९ ॥ [अन्वयः ] अथ सम्प्रति छलनापर एष शैलुषो भूमिका- मिव अपराम् उपपत्तिम् अवाप्य शिशुपालसञ्ज्ञया तिरोहितात्मा सोऽपि परैः असः प्रतीयते । [विग्रहः ] छलनायां परः छलनापरः । तिरोहित आत्मा येनासौ- तिरोहितात्मा। शिशुपाल इति सञ्ज्ञा शिशुपालसञ्जा, तया शिशुपाल- १ सज्ञया। न सः असः । [ अर्थः] अथ = रावणदेहत्यागानन्तरम् । सम्प्रति = इदा- नीम् । छलनापरः = परप्रतारणपरायणः । एषः = रावणः । शैलूषः = नटः। भूमिकामिव = रूपान्तरमिव । नानारूपपरि- - % 3D १२० शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः अहमिव । अपराम् = अन्याम् । उपपत्तिम् = रूपमिव । जन्मा- न्तरमित्यर्थः । अवाप्य = गृहीत्वा । लब्ध्वा । शिशुपाल- सञ्जया = शिशुपालनाम्ना । तिरोहितात्मा = तिरोहितस्वरूपः सन् । प्रच्छन्नस्वरूपः सन् । सोऽपि स एव । रावण एव सन्नपि । परैः = इतरैः । लोकैः । असः तदतिरिक्त एव । राव- गान्य एव । प्रतीयते ज्ञायते। [ भावार्थः ] स रावणो नटो रूपान्तरमिव नवीनं रूपमा. स्थाय शिशुपालनाम्ना सम्प्रति वर्तमानोऽपि - लोकैरन्योऽयं कश्चिन्त रावण इति तद्भिन्नतया प्रतीयते । वस्तुतः स एवायं खलो लोकं शिशुपालरूपेण पीडयतीति वध्योऽयं भवतेत्याशयः । [ कोशः ] 'शैलूषो नटभिल्लयोः' इति विश्वः । “भूमिका रचनायां स्यान्मूय॑न्तरपरिग्रहे' इति विश्वः । [ वाच्यप० ] अथ सम्प्रति छलनापरं शैलूष भूमिकामिव अपरामुपप- त्तिमवाप्य शिशुपालसज्ञया तिरोहितात्मानं तमपि परे अन्य प्रतियन्ति । [भाषाटीका आपसे मारा गया वह रावण अब नट की तरह एक रूप छोड़कर शिशुपाल नासक नया रूप ग्रहणकर लोक में अवतीर्ण होकर संसार को पीड़ित कर रहा है। लोग इसे पहिचानते नहीं हैं। और लोग जानते हैं कि यह कोई और ही है, पर वस्तुतः यह रावण ही है और संसार को पूर्ववत् क्लेश देरहा है ॥ ६६ ॥ अथैतद्दौर्जन्यं त्रिभिराविष्करोति- स बाल आसीदपुषा चतुर्भुजो मुखेन पूर्णेन्दुनिभस्त्रिलोचनः । युवा कराक्रान्तमहीभृदुच्चकै- रसंशयं सम्प्रति तेजसा रविः ॥ ७० ॥ [ सर्वकषा] स बाल इति । सः-शिशुपालो बालः सन् वपुषा चतुर्भुजो-भुजचतुष्टयवानासीत् । विष्णुरिति ध्वनिः। मुखेन पूर्णे- सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । १२१ . न्दुनिभस्तत्तल्यः, त्रिलोचनो लोचनत्रयवानासीत् । त्र्यम्बक इति ध्वनिः। बालविशेषणात्सम्प्रति तत्सर्वमन्तर्हितमिति भावः। सम्प्रति तु युवा सन्करेण बलिना आक्रान्तमहीभृत्-अधिष्ठितराजकः सन् । अन्यत्र-अंशु- ब्याप्तशैलः । 'बलिहस्तांशवः कराः' इत्यमरः । उच्चकैस्तेजसा रविर- संशयम्। संशयो नास्तीत्यर्थः। अर्थाभावेऽव्ययीभावः । वपुपा मुखेन चेति 'येनाङ्गविकारः' इति तृतीया । हानिवदाधिक्यस्यापि विकारत्वात् । तथाच वामनः--'हानिवदाधिक्यमप्यङ्गविकारः' इति । तेजसेति 'प्रकृत्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्' इति तृतीया । कराक्रान्तेत्यादिना श्लेषानुप्राणितेयमुप्रेक्षा रविरसंशयमिति । तस्य पूर्णेन्दुनिभ इत्युपमया संसृष्टिः । हरिहरादितुल्य- महिमत्वादतिदुर्धर्षः स इति भावः ॥ ७० ॥ [अन्वयः ] स बालः वपुषा चतुर्भुजः आसीत, मुखेन पूर्णेन्दुनिभः त्रिलोचनः ( आसीत् )। सम्प्रति युवा कराक्रान्त- महीभृत् उच्चकैः तेजसा असंशयं रविः । [विग्रहः ] चत्वारः भुजा यस्याऽसौ चतुर्भुजः । पूर्णश्चासौ इन्दुश्चेति पूर्णेन्दुः, पूर्णेन्दुना तुल्य:--पूर्णेन्दुनिमः । श्रीणि लोचनानि यस्यासौ त्रिलोचनः। करैः क्रान्ताः, कराक्रान्ताः, कराक्रान्ता महोभृतो येनासौ कराक्रान्तमहीभृत् । [अर्थः] सः = शिशुपालः। चालः = शिशुरेव । बाल्यावस्था- यामित्यर्थः । वपुषा = शरीरेण । चतुर्भुजः = बाहुचतुष्टयधारी। आसीत् = अभवत्। मुखेन = आस्येन । पूर्णेन्दुनिभः = पूर्ण- चन्द्रसदृशः। पूर्णचन्द्रोपम इत्यर्थः । [ासीदिति शेषः। त्रिलो- चनः = त्र्यम्बकः । त्रिनेत्रः । आसीदिति शेषः । सम्प्रति इदानीन्तु । युवा = तरुणः सन् । सः = शिशुपालः । कराकान्त. महीभृत् = करदीकृतभूपोलः । सूर्यपक्ष-किरणाक्रान्तभूधर इत्यर्थः । उच्चकैः = अतिमहता। तेजसा - प्रतापेन । असंशयं निःसंशयम् । ध्रुवम् । अवश्यमेव । रविः = सूर्य एव । "अस्ती'ति शेषः ।
१२२ शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- [भावार्थः ] सः शिशुपालो बाल एव चतुर्भुजश्चन्द्रमुख- स्त्र्यम्बक आसीत् , इदानीन्तु युवावस्थायां वर्तमानो विजित- राजमण्डलः कराक्रान्तमहीभृत्तेजसा साक्षात्सूर्य इव प्रकाशमानो विराजते । [कोशः] 'गानं वपुः संहननं शरीरं वर्म विग्रहः इत्यमरः । 'वयस्थस्तरुणो युवा' इत्यमरः । 'बलिहस्तांशवः कराः' इत्यमरः । [वाच्यप०] तेन बालेन वपुषा चतुर्भुजेन अभूवत । मुखेन पूर्णेन्दु- निभेन त्रिलोचनेन ( अभूयत)। सम्प्रति कराक्रान्तमहीभृता उच्चकैः तेजसा असंशयं रविणा ( भूयते)। [भाषाटीका] यह शिशुपाल बाल्यावस्था में ही चार भुजावाला और पूर्ण चन्द्रमा की तरह मुखमाला तथा त्रिलोचन था । अब युवावस्था में अपने प्रताप से सब राजाओं को वश में करके कर ग्रहण करता है और कराक्रान्तमहीभृत होनेके कारण तथा महातेजस्वी होने के कारण साक्षात् सूर्य की तरह मालम होता है। ( कराक्रान्तमहीभृत् = सब राजाओं से कर लेने वाला। सूर्य पक्ष में-सब पर्वतों पर जिसकी किरणें पड़ रही हो)॥७०॥ स्वयं विधाता सुरदैत्यरक्षसा- मनुग्रहावग्रहयोर्यदृच्छया । दशाननादीनभिराद्धदेवता- वितीर्णवीर्यातिशयान्हसत्य सौ ॥ ७१ ॥ [सर्वङ्कषा] स्वयमिति । यदृच्छया -स्वेच्छया, स्वयं-साम- । नतु देवताप्रसादबलादिति भावः । सुरदैत्यरक्षसां-देवदानवयातु धानानाम्-अनुग्रहावग्रहयोः-प्रसादनिग्रहयोर्विधाता का, असौ शिशुपालः अभिराद्धाभिः -- आराधिताभिर्देवताभिरीश्वरादिभिः, वितीणों दत्तो वीर्यातिशयः प्रभावातिशयो येषां तान्दशा- ननादीन्हसति । अनन्यप्रसादलब्धैश्वर्यं मयि कथं याचकैस्तुल्यतेति गर्वाद्धसतीत्यर्थः ॥ ७१ ॥ - Ram सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम्। १२३ [ अन्वयः ] यदृच्छया स्वयं सुरदैत्यरक्षसाम् अनुग्रहविग्रह- योर्विधाता असौ अभिराद्धदेवतावितीर्णवीर्यातिशयान् दशानना- दीन हसति । [विग्रहः ] सुराश्च दैत्याश्च रक्षांसि चेति सुरदैत्यरक्षांसि तेषाम् सुरदैत्यरक्षसाम् । अनुग्रहश्च अवग्रहश्च अनुग्रहावग्रहो, तयोः---अनुग्र- हावग्रहयोः । अभिराद्धाश्च ताः देवताश्चेति अभिराद्धदेवताः, अभिराद्धदेव. ताभिः वितीर्णो वीर्यातिशयो येषां ते-अभिराद्धदेवतावितीर्णवीर्यातिशयाः, तान् अभिराद्धदेवतावितीर्णवीर्यातिशयान् । दशाननः आदियेषां ते दशाननादयस्तान् दशाननादीन् । [अर्थः] यहच्छया = तपश्चरणादिलब्धवरदानादिकं वि. नैव । स्वेच्छयैव । स्वयम् = आत्मनैव । सुरदैत्यरक्षसां = देव- दैत्यराक्षसादीनाम् । अनुग्रहावग्रयोः = यथायथं निग्रहा- नुग्रहयोः । प्रसाददण्डयोः । विधाता = विधायकः । असौ= शिशुपालः । अभिराद्धदेवतावितीर्णवीर्यातिशयान् = समा- राद्धंदेवतादत्तपराक्रमविशेषान् । आराद्धब्रह्मशिवादिदेवताप्रदत्त- पराक्रमातिशयान् दशाननादीन् = रावणहिरण्यकशिप्वा- दीन् । हसति = उपहसति । [ भावार्थः] सहजनिग्रहानुग्रहसामो देवताप्रसादलब्ध. पराक्रमातिशयान रावणादीनसौ शिशुपालो हसति । [ कोशः] 'यदृच्छा स्वैरता' इत्यमरः । वाच्यप० ]-यदृच्छया स्वयं सुरदैत्यरक्षसां विधात्रा अमुना अभि- राद्धदेवतावितीर्णवीर्यातिशयाः दशाननादयो हस्यन्ते । [ भापाटीका ] जिसका स्वाभाविक ही विशेष पराक्रम है वह शिशु- पाल रावणादि वीरों की जिन्हों ने तप आदि से देवताओं को प्रसन्न कर वरदान द्वारा शक्ति विशेष प्राप्त की थी हंसी उड़ाता है कि दूसरे के सहारे बीर बने तो क्या बने ॥ ७१ ॥ . made १२४ शिशुपालवधम्। [प्रथमः - - बलावलेपादधुनापि पूर्वव- त्पबाध्यते तेन जगजिगीषुणा । सतीव योषित्प्रकृतिः सुनिश्चला पुमांसमभ्येति भवान्तरेष्वपि ॥ ७२ ॥ [ सर्वकषा ] बलेति । जिगीषुणा । नित्योत्साहवतेत्यर्थः। तेन- शिशुपालन, बलावलेपारलगर्वादधुनापि पूर्ववत्पूर्वजन्मनीव जगत्प्रबा- ध्यते । तथाहि सती पतिव्रता योषिदिव सुनिश्चलातिस्थिरा प्रकृतिः-स्वभावो, भवान्तरेषु-जन्मान्तरेष्वपि पुमांसमभ्येति । 'पति या नाभिचरति मनोवाकायसंयता । सा भर्तुर्लोकमाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते।' इति मनुः । उपमोपमेयपुरस्कृतोऽर्थान्तरन्यासः ॥ ७२ ॥ [अन्वयः] जिगीषुणा तेन बलावलेपादधुनापि पूर्ववत् जगत्प्रबाध्यते । सती योषिदिव सुनिश्चला प्रकृतिः भवान्तरेष्वपि पुमांसम् अभ्येति । [विग्रहः] बलस्य बलाद्वा अवलेपः बलावलेपः, तस्मात् बलावलेपात्। विजेतुमिच्छु:--विजिगीषुः, तेन विजिगीषुणा । सुष्टु निश्चला सुनिश्चला। अन्ये भवाः भघान्तराणि, तेषु भवान्तरेषु । [अथः ] जिगीषुणा = विजयेच्छुना । जगद्विजेतुमिच्छता। जयनशीलेन । तेन = शिशुपालेन । बलावलेपात् = बलदर्पात् । बलावष्टम्भात् । अधुनाऽपि-इदानीमपि । जगत् = भुवनम् । त्रैलोक्यम् । पूर्ववत् = पूर्ववदेव । प्रबाध्यते = प्रपीड्यते । (तथाहि-) सती = पतिव्रता । योषदिव = स्त्रीव । सुनि. 'चला = ध्रुवा । अविचालनीया । प्रकृतिः = स्वभावः । भवान्तरे- ध्वपि = जन्मान्तरेष्वपि । पुमांसं = पुरुषम् । अभ्येति प्राप्नोति । अनुगच्छति । - m सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १२५ . । [भावार्थः] विजिगीषुणा शिशुपालेनास्मिन्नपि जन्मनि रावणादि) पूर्वज मवज्जगत्पीड्यते । स्वभावो हि जन्मान्तरे- ध्वपि पुमांसमभ्येति । [कोशः] 'दर्पोऽवलेपोऽवष्टम्भः' इत्यमरः । 'एतहि सम्प्रतीदानीमधुना साम्प्रतं तथा' इत्यमरः । “त्रिष्वथो जगती लोको विष्टपं भुवनं जगत् इत्यमरः । 'स्त्री योषिदबला योषा' इत्यमरः । [वाच्यप०] जिगीषुः स बलावलेपादधुनाऽपि पूर्ववत् जगत्प्रबाधते। सत्या योपिता इव सुनिश्चलया प्रकृत्या भवान्तरेष्वपि पुमान् अभीयते । [भाषाठीका ] जैसे रायण जगत को दुःख देता था वैसे ही शिशुपाल भी जगत को पीडा पहुँचा रहा है । पूर्वजन्म में इस शिशुपाल का जो स्वभाव था वह इस जन्म में भी उसके साथ ही है । जैसे सती स्त्री पुरुष को जन्मान्तर में भी छोड़ती नहीं किन्तु उसके साथ ही जाती है वैसे ही प्रकृति (स्वभाव) भी जन्मान्तर में भी साथ ही जाती है, छोड़ती नहीं । अर्थात् शरीर बदलने पर भी प्रकृति नहीं बदलती है। [शिशुपाल पूर्व जन्म में रावण था] ॥७२॥ तदेनमुल्लचितशासनं विधे- विधेहि कीनाशनिकेतनातिथिम् । शुभेतराचारविपक्त्रिमापदो विपादनीया हि सतामसाधवः ॥ ७३ ॥ [ सर्वकषा-] तदेनमिति । तत्तस्माद्विधेर्विधातुरप्युल्लद्धितशास- नम् । स्वयं विधातेत्याधुक्तरीत्यातिक्रान्तदैवशासनमित्यर्थः । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात्समासः । एनं-शिशुपालं। कीनाशनिकेतनातिथिं-कीनाशो यमस्तस्य निकेतनं गृहं तत्रातिथि प्राधुणिकं, विधेहि-कुरु । यमगृहं प्रेषयेत्यर्थः । ‘कीनाशः कर्षके क्षुद्रे कृतान्तोपांशुघातिनोः' इति विश्वः । न चैतव्याधुणिकहस्तेन सर्पमारणं भवादृशामवश्यकर्तव्यत्वादित्याह-शुभेत. राचारेण-दुराचारेण, विपक्त्रिमाः--परिपाकेन निवृत्ताः कालपरिपाकेन प्राप्ता आपदो येषां ते तथोक्ताः। द्वितः त्रिः' इति पचेः वित्रप्रत्ययः । ..
शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- - स्त्रेन्नित्यम्' इति तद्धितो मम्प्रत्ययः। असाधवो-दुष्टाः, सतां भवा- दृशां जगन्नियन्तणां निपातनीयाः-वध्या हिं । नच नघण्यदोषः, स्वदो- घेणैव तेषां विनाशे निमित्तमात्रत्वादस्माकमित्याशयेन शुभेतराचारत्यादि- विशेषणोक्तिः । समान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः ॥ ७३ ॥ [ अन्वयः ] तत् विधेः उल्लचितशासनम् एनम् कीनाशनिके. तनातिथिं विधेहि। हि शुभेतराचारविपक्त्रिमापदः असाधवः सतां विपादनीयाः। [विग्रहः] उल्लचितं शासनं येनासौ उल्लचितशासनस्तम्-उल्लचित- शासनम् । कीनाशस्य निकेतनं कीनाशनिकेतनम् , कीनाशनिकेतनस्य अतिथिः- कीनाशनिकेतनातिथिः, तम् कीनाशनिकेतनातिथिम् । शुभआदितरः शुभेतरः, शुभेतरश्चासौ आचारश्च शुभेतराचारः, विपाकेन निर्वृत्ताः विप- स्त्रिमाः। शुभेतराचारेण विपक्त्रिमाः आपदो येषान्ते-शुभंतराचारविप- क्त्रिमापदः। [अर्थः ] तत्-तस्मात् । विधेः ब्रह्मणः । उल्लचितशासनम् = अतिक्रान्ताज्ञम् । उल्लचितानुशासनम् । एन-शिशुपालम् । कीना- शनिकेतनाऽतिथिं यमसदनप्राघुणिकम् । विधेहि = कुरु। हि- यतः। शुभेतराचारविपक्त्रिमापदः । अशुभाचारपरिप्राप्तविपत्तयः । स्वाशुभाचरणफलभूतविपदः। असाधवः दुर्जनाः। खलाः। सतां= साधूनाम् । विपादनीयाः मारणीयाः । हन्तव्याः । [भावार्थः ] तद्विधेविधानस्य जगतो मर्यादाया विनाशकम् एनं शिशुपालं विनाशय । दुष्टा हि स्वपापफलेनैव हतकल्पाः साधुभिर्विनाशनीया एव । [ कोशः ] 'विधाता विश्वसृड्विधिः' इत्यमरः । 'वेश्म समनिकेतनम्' इत्यमरः । 'कीनाशः कर्षके क्षुदे कृतान्तोपांशुधातिनोः' इति विश्वः । [वाच्यप.] तत् विधेः उल्लङ्घिवशासनः अयम् कीनाशनिकेतनातिथि- विधीयताम् । शुभेतराचारविपक्त्रिमापदोऽसाधून सन्तो विपादयेयुः। [ भाषाटीका ] अत एव जगत् की मर्यादाको भगकर संसार को केश सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विरजितम्। १२७ - देनेवाले इस शिशुपाल को आप शीघ्र ही यमराज के घर भेजिए । (मारिए)। दुष्टलोग अपने पाप के कारण ही मृत्यु के योग्य हैं। उनको मारने में साधुओं को कोई विचार करने की जरूरत नहीं है ॥ ७३ ॥ किञ्चैवं दुष्टनिग्रहे शिष्टानुग्रहः स्यादित्याह- हृदयमरिचधोदयाबुद्व- द्रढिम दधातु पुनः पुरन्दरस्य । धनपुलकपुलोमजाकुचाग्र- द्र तपरिरम्भनिपीडनक्षमत्वम् ।।७४॥ [सर्वकषा] हृदयमिति । अरिवधोदयात्-रिपुनाशलाभात् । उदू- ढद्रढिम-नैश्चिन्त्याद्धतदाढर्थम्। स्वस्थमिति यावत्। पृथ्वादित्वादृढशब्दादि- मनिच्प्रत्ययः। 'र तो हलादेलंघोः' इति ऋकारस्य रेफादेशः । पुरः-शत्रु- पुराणि दारयतीति पुरन्दर इन्द्रः । 'पूःसर्वयोर्दारिसहोः' इति खच्प्रत्ययः । 'खचि हस्वः' इत्युपधाहस्वः। 'वाचंयमपुरन्दरी च' इति निपातनाददन्तत्वं मुमागमश्च । तस्य हृदयं पुनर्भूयोऽपि । पूर्ववदेवेति भावः । धनपुलकयोः- सान्द्ररोमाञ्चयोः। पुलोम्नो जाता पुलोमजा-शची, तस्याः कुचाग्रयोई त- परिरम्भः-औत्सुक्याच्छीघ्रालिङ्गनं तत्र यत्पीडनं तस्य क्षमत्वं , सहत्वं दधातु । प्राक्वित्तविक्षेपात्यक्तभोगेन शक्रेण सम्प्रति त्वत्प्रसादान्निष्कण्टकं स्वकीयं राज्यं भुज्यतामित्यर्थः। अन्न दाढर्थपदार्थस्योदद्रढिमेति विशेषण- गत्या निपीडनक्षमत्वं प्रति हेतुत्वोक्त्या पदार्थहेतुकं काव्यलिङ्गम् । हृदयनि- पीडनक्षमत्वसम्बन्धेऽप्यसम्बन्धोक्त्या सम्बन्धेऽसम्बन्धरूपातिशयोक्तिरित्य- र्थालङ्कारी,वृत्त्यनुप्रासश्च । तैरन्योन्यं संसृज्यते । पुष्पितामा वृत्तम् । 'अयुजि नयुगरेफतो यकारो, युजि च नजौ जरगाश्च पुप्पिताग्रा' इति लक्षणात् ॥७॥ [अन्वयः ] अरिवधोदयात् उदूढद्रढिम पुरन्दरस्य हृदयम् पुनः घनपुलकपुलोमजाकुचाग्रदुतपरिरम्भनिपीडनक्षमत्वम्दधातु। [विग्रहः ] अरेर्वधः अरिवधः, अरिवध एव उदयः अरिवधोदयस्त- स्मात्-अरिवधोदयात् । उदूढः वढिमायेर तत् उदूढदादिम ।धनः पुलको
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शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः
ययोस्ती-घनपुलको, पुलोमजायाः कुचाग्रौ पुलोमजाकुचाग्रौ, घनपुलको
च तौ पुलोमजाकुचाग्रौ च घनपुलकपुलोमजाकुचाग्रौ, तयोः द्रुतं परिरम्भः
तेन निपीडनं-वनपुलकपुलोमजाकुचाग्रदुतपरिरम्भनिपीडनम्, तस्य क्षम-
त्वम्-धनपुलकपुलोमजाकुचाग्रद्रुतपरिरम्भनिपीडनक्षमत्वं, तत्तथा भूतम् ।
[अर्थः] अरिवधोदयात्-शत्रुविनाशसम्पत्या । शत्रुवि-
नाशरूपाभ्युदयाद्वा । रिपुविनाशलाभावा । उदूढद्रढिम :
धृतदायम् । पुरन्दरस्य = महेन्द्रस्य । हृदयं = वक्षःस्थलम् ।
पुनः = भूयोऽपि । धनपुलकपुलोमजाकुचाग्रद्रतपरिरम्भनिपी.
डनक्षमत्वं
निबिडतमरोमाञ्चशचीकुचकलसाग्रसरभसहढा-
लिङ्गननिपीडनशक्ततां । दधातु = धारयतु । वहतु ।
[ भावार्थः] शत्रुविनाशलाभाज्जाताश्वासस्य महेन्द्रस्य
वक्षःस्थलं निश्चिन्ततया धृतदाढ्यं भूयोऽपि सान्द्ररोमाञ्चा-
वलिललितशचीकुचाग्रसरभसाश्लेषनिष्पेषसहतां दधातु
तत्प्रभो ! शिशुपालं शीघ्र जहि, समाश्वासय महेन्द्रम् ।
[ कोशः ] 'वृद्धश्रवाः शुनाशीरः पुरुहूतः पुरन्दरः ' इत्यमरः ।
[ वाच्यप० ] अरिवधोदयात् उदृढढिम्ना पुरन्दरस्य हृदयेन परि-
रम्भनिपीडनक्षमत्वम् धीयताम् ।
[ भाषाटीका ] आपके हाथ से शिशुपाल के मारे जाने से निश्चिन्त हुए
महेन्द्र का वक्षस्थल पुनः इन्द्राणी के रोमाञ्चित कुचमण्डल के (अग्रभाग से जो
दृढ़तर) आलिङ्गन उसके सहन करने की क्षमता को प्राप्तकरे। अर्थात्-इन्द्राणी
के साथ इन्द्र पुनः सुख का उपभोग करे-अतः इसे जल्दी मारिए ॥७॥
ओमित्युक्तवतोथ शाङ्गिण इति व्याहृत्य वाचं नभ-
स्तस्मिन्नुत्पतिते पुरःसुरमुनाविन्दोः श्रियं विभ्रति ।
शत्रूणामनिशं विनाशपिशुनः क्रुद्धस्य चैयं प्रति
व्योन्नीव भ्रकुटिच्छलेन वदने केतुश्चकारास्पदम् ॥
इति श्रीमाघकृतौ शिशुपालवधे महाकाव्ये श्रीकृष्णनारदसम्भाषणं
नाम प्रथमः सर्गः ॥१॥
र्गः] अभिनवराजलक्ष्मो-सर्वकषा-विराजितम् । १२६ .4 [ सर्वकषा] ओमिति । तस्मिन्सुरमुनौ-नारदे, इति-इत्थंभूतां [चं व्याहृत्य-उक्त्वा नभ उत्पतिते-समुद्गते पुरोऽने इन्दोः श्रिय भ्रति सति । अथ-मुनिवाक्यानन्तरमोमित्युक्तवतस्तथास्त्वित्वङ्गीकृत- । 'ओं प्रश्नेऽङ्गीकृतौ रोषे इति विश्वः । चेदीनां जनपदानामयं चैद्यः- शुपालः । वृद्धकोसलाजादाळ्यङ्' इति ज्यङ्प्रत्ययः । तं प्रति ऋदस्य ङ्गिणो वदने व्योम्नीवानिशं सर्वदा । अव्यभिचारेणेत्यर्थः । शत्रूणां नाशस्य पिशुनः-सूचकः। 'चन्द्रमभ्युस्थितः केतुः क्षितीशानां विनाशकृत्' ने शास्त्रादिति भावः । केतुरुपातविशेषः । 'केतुश्रुतौ पताकायां ग्रहोत्पा- रेलक्ष्मसु' इत्यमरः । भ्रुकुटिच्छलेन भ्रूभङ्गव्याजेनास्पद-प्रतिष्टां, स्थिति कार । 'आस्पदं प्रतिष्ठाया इति निपातनात्सुडारामः । अनेन वाक्यार्थ- स्य वीररससहकारिणो रौद्रस्य स्थायी क्रोधःस्वानुभावेन भृकुट्या कार- पूतोऽनुर्नेय इत्युक्तम् । तथा तदविनाभूतस्याङ्गिनो वीरस्य स्थायी प्रथ- नेिय उत्साहोऽप्युत्पन्न एवेत्यनुसन्धेयम् । इन्दोः श्रियं बिभ्रतीत्यत्र मुने. दुश्रियोऽयोगात्तत्सदृशीमिति सादृश्याक्षेपादसम्भवद्वस्तुसम्बन्धरूपो निद- नालङ्कारः। वदने व्योम्नीवेत्युपमा। भुकुटिच्छलेन केतुरिति छलादिशब्देना- पत्वप्रतिपादनरूपोऽपह्नवः । तत्र शत्रुविनाशसूचके त्वपेक्षितेन्दुसान्निध्य- मभावस्थानसम्पादकत्वे निदर्शनोपमयोरपह्नवोपकारसत्वादङ्गाङ्गिभावेन रः। चमत्कारकारितया मङ्गलाचरणरूपतया च सर्गान्त्यश्लोके बु श्रीशब्द- गः । यथाह भगवान्भाष्यकार:-'मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गला- नि शास्त्राणि प्रथन्ते, वीरपुरुषाण्यायुष्मरपुरुषाणि च भवन्ति, अध्येतारश्च कारो भवन्ति' इति । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् । 'सूर्याश्वमसजस्तताः रवः शार्दूलविक्रीडितम्' इति लक्षणात् । सर्गान्तत्वावृत्तभेदः । यथाह ही-'सगैस्नतिविस्तीणः श्राव्यवृतैः सुगन्धिभिः। सर्वत्र भिन्नसर्गान्तैरु- लोकरञ्जकम् ॥ इति ॥ ७५ ॥ अथ कविः कविकाव्यवर्णनीयाख्यानपूर्वकसर्गसमाप्तिं कथयति-इतीति ।। शब्दः समाप्तौ । माघकृताविति कविनामकथनम् । महाकाव्ये इनि उछब्देन लक्षणसम्पत्तिः सूचिता । शिशुपालवध इति काव्यनामकथ- - १ १३० शिशुपालवधम् । [१ प्रथमः- (नम् । प्रथमः सर्ग इति । 'समाप्त' इति शेषः । एवमुत्तरत्रापि द्रष्टव्यम् ॥ इति श्रीमहोपाध्यायकोलाचलमल्लिनाथसूरिविरचिते शिशुपालवध- काव्यव्याख्याने सर्वकषाख्ये प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥ [अन्वयः ] तस्मिन् सुरमुनौ इति वाचं व्याहृत्य नमः उत्प- तिते पुरः इन्दोः श्रियम् बिभ्रति (सति), अथ ओम् इत्युक्तवत: चैद्यम्प्रति ऋद्धस्य शाङ्गिणः वदने व्योम्नि इव अनिशं शत्रणां विनाशपिशुनः केतुः भ्रुकुटिच्छलेन प्रास्पदं चकार । [विग्रहः ] सुराणां मुनिः सुरमुनिः, तस्मिन् सुरमुनौ। विमाशस्य पिशुनः विनाशपिशुनः, भृकुटेः छलम् भ्रुकुटिछलम् , तेन भ्रुकुटिच्छलेन । [अर्थः ] तस्मिन् सुरमुनौ = नारदे । इति = इत्थम्भूतां । वाचम् =इन्द्रसन्देशगिरम् । व्याहृत्य =अभिधाय । उक्त्वा । नमः =गगनम् । उत्पतिते-समुद्गते । अभ्युद्गते। पुरः =अग्रे। इन्दोः =चन्द्रमसः । श्रियं = शोभाम् । लक्ष्मीम् । बिभ्रति =दधाने सति । अथ =इन्द्रसन्देशश्रवणानन्तरम् । 'ओम्' इत्युक्तवतः = अस्त्वेवमित्येवमङ्गीकृतवतः । चैद्य प्रति =चेदिदेशाधिपतिं शिशु- पालं प्रति । क्रुद्धस्य =रुष्टस्य । धृतक्रोधस्य । शाङ्गिणः -शाङ्गपा- भगवतः श्रीकृष्णस्य । वदने =मुखे। व्योम्नीव =नागने इव । अनिशं सर्वदा । नित्यम् । अव्यभिचारेण । शत्रणां =रिपूणाम् । विनाशस्य =उच्छेदस्य । पिशुनः सूचकः । केतुः =केतुनामोत्पात- विशेषः। भ्रुकुटिच्छ लेन भ्रमङ्गव्याजेन । आस्पदं =स्थितिम् । प्रतिष्ठाम् । चकार =विदधे । [ भावार्थः ] इत्थमिन्द्रसन्देश श्रावयित्वा मुनी नारदे नभ उत्पत्याऽग्रे चन्द्रशोभां दधाने सति-नारदोक्तमङ्गीकृतवतः शिशु. पालं प्रति क्रु द्धस्य भगवतो वदने भ्रुकुटिच्छलेन शत्रुविनाशसूचकः केतुनामा उत्पातविशेषः स्थितिं चकार । चन्द्रबिम्बमभ्युत्थितश्च केतुर्नरेन्द्राणां विनाशक इति आगमविदः शाकुनिकाः । ।
सर्गः]
अभिनवराजलक्ष्मो-सर्वकषा-विराजितम् ।
१३१
.
,
[ कोशः ] 'ओम् प्रश्नेऽङ्गीकृतौ रोपे' इति विश्वः । 'केतुर्यु तो पताकायां
महोत्पातारिलक्ष्मसु' इत्यमरः । 'पिशुनौ खलसूचकौ' इत्यमरः ।
[वाच्यप०] तस्मिन् .........विनाशपिशुनेन केतुना आस्पदं चक्रे ।
[ भाषाटीका ] इन्द्र का सन्देश सुनाकर नारदजी जब आकाश की
ओर उड़े और आकाश में वे जब चन्द्रमा की तरह मालूम पड़ने लगे तब
शिशुपाल को मारने की स्वीकृति देने के बाद भगवान् का मुख क्रोध ले
लाल हो गया और भृकुटि चढ़ गई मानों शत्रुओं के विनाश का सूचन
करनेवाला धूमकेतु नामक • उत्पात ही भ्रुकुटि के बहाने भगवान् के मुख
पर उदय हुआ । नारद मुनि चन्द्रमा को तरह थे, और भगवान का मुख
आकाश की तरह था, और भ्रुकुटि धूमकेतु की तरह थी । चन्द्रमा के पास
जब धूमकेतु उदय होता है तो राजाओं का नाश होता है, अत: शिशु-
पाल का शीन नाश होगा-यह सूचित हुआ ॥ ७५ ॥
अथ द्वितीयः सर्गः
अस्मिन्सर्गे मन्त्रवर्णनाय बीजं वपति-
यियक्षमाणेनाहूतः पार्थेनाऽथ द्विषन्मुरम् ।
अभिचैद्य प्रतिष्ठासुरासीत्कार्यद्वयाकुलः ॥ १ ॥
[ सर्वकषा] यियक्षमाणेनेति । अथेन्द्रसन्देशश्रवणानन्तरं । यिय-
क्षमाणेन-यष्टुमिच्छता । यजतेः सन्नन्ताल्लटः शानच् । पार्थेन-पृथापुत्रेण
युधिष्ठिरेण । 'तस्येदम्' इत्यण् । अन्यथा स्त्रीभ्यो ढक्' स्यात् । ततः पार्थेय
इति स्यात्। आहूतः-आकारितः। ह्वयतेः कर्मणि क्ते सम्प्रसारणदी? । तथा
अभिचैद्य-शिशुपालं प्रति। 'लक्ष गेनाभिप्रती आभिमुख्ये' इत्यव्ययीभावः।
'अभिरभागे' इति कर्मप्रवचनीयत्वे तद्योगे द्वितीया वा। प्रतिष्ठासुः-प्रस्थातु-
मिच्छुः । तिष्ठतेः सन्नन्तादुप्रत्ययः । मुरं द्विषन्मुरारिः । 'द्विषोऽ मित्रे'
इति शतृप्रत्यये 'न लोका' इत्यत्र 'द्विषः शतुर्वा' इति वैकल्पिकः षष्ठीमति-
वेधः । कार्यद्वयेन-सुरकार्यसुहृत्कार्यरूपेण-आकुलो विप्रतिषेधादावश्यक-
स्वाञ्च द्वयोः सन्दिहान आसीत् । अतो मन्त्रस्यायमवसर इति भावः ॥१॥
%3D शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [अन्वयः ] अथ यियक्षमाणेन पार्थेन आहूतः अभिचैद्य प्रतिष्ठासुः मुरं द्विषन् कार्यद्वयाकुलः आसीत् । [विग्रहः ] यष्टुमिच्छति यियक्षति, यियक्षतीति यियक्षमाणः, तेन थियक्षमाणेन । पृथाया अयम् (अपत्यं पुमान्) पार्थः, तेन पार्थेन । (अर्थः) अथ = इन्द्रसन्देशश्रवणानन्तरम् । यियक्षमाणेन यष्टुमिच्छता। पार्थेन = पृथायाः कुन्त्याः पुत्रेण युधिष्ठिरेण आहूतः = आकारितः। तथा-अभिचैद्य = शिशुपालं प्रति । प्रति- ष्ठासुः प्रस्थातुमिच्छुः । मुरं द्विषन् = मुरारि:--श्रीकृष्णः। कार्य- द्वयाकुलः = देवकार्यमित्रकार्यद्वयव्याकुलः। आदौ देवकार्य कार्य, सुहदो युधिष्टिरस्य वा कार्य करणीयमिति कार्यद्वयविषये सन्दि- हान । आसीत् =अभूत् । (भावार्थः) इन्द्रसन्दिष्टमावश्यक देवकायें चैद्याभियान- मिदानी कर्त्तव्य, मित्रस्य युधिष्ठिरस्य यज्ञे वाऽऽहूतेन मया तत्र गन्तव्यमिति कार्यद्वयव्याकुलो मुरारिरासीत् । [ कोगः] 'विहस्तव्याकुली समौ' इत्यमरः । [वाच्यप० ] यियक्षम्माणेन पार्थेन आहूतेन अभिचैद्यम्प्रतिष्ठासुना मुरं द्विषता कार्यद्वयाकुलेन अभूयत । [भाषाटीका ] राजसूययज्ञ करने में प्रवृत्त महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को दूत द्वारा आह्वान भेजा था और इन्द्र की आज्ञानुसार शिशुपाल पर चढ़ाई करना भी आवश्यक था इस प्रकार दो आवश्यक विरुद्ध कार्य के उपस्थित हो जानेसे भगवान् को बड़ी व्याकुलता (चिन्ता वा सन्देह) हुई ॥१॥ एवं मन्त्रबीजं सन्देहमुपन्यस्य मन्त्रोचितं देशमाह- सामुद्धवसीरिभ्यामथासावासदत्सदः । गुरुकाव्यानगां विभ्रच्चान्द्रीमभिनमः श्रियम् ॥२॥ [सर्वकषा] सार्धमिति । अथ-सन्देहानन्तरमसौहरिः । अभिनमः पूर्ववदव्ययीभावः, कर्मप्रवचनीयत्वे वा द्वितीया । गुरुकाव्यौ-बृहस्पति- शुक्रावनुगावनुयायिनौ यस्यां ताम् । 'गीष्पतिर्धिषणो गुरुः' इति, 'शुक्रो -
सर्गः]
अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा--विराजितम् ।
.
१३३
३
।
-
दैत्यगुरुः काव्यः' इति चामरः । चन्द्रस्येमां चान्द्रीं श्रियं बिभ्रत् । अत्र
श्रीतुल्यां श्रियमिति निदर्शनाभेदः । उद्धवसीरिभ्यां सार्धमुद्धवरामाभ्यां
सह । सदः-सभामासददगमत् । राजसदसः प्रासादत्वादिति भावः ।
सदेलुङि 'पुषादि इति च्लेरङादेशः । अत्र मनुः-'गिरिपृष्टं समारुझ प्रासाई
वा रहोगतः । अरण्ये निःशलाके वा सन्त्रयेद्भावभाविनौ ॥ इति ॥ २ ॥
[अन्वयः ] अथ असौ अभिनभः गुरुकाव्यानुगां चान्द्री
श्रियम् बिभ्रत उद्धवसीरिभ्याम् सार्द्ध सद आसदत् ।
[विग्रहः ] नभसि इति अभिनमः । गुरुश्च काव्यश्च गुरुकाव्यो,
गुरुकाव्यो अनुगौ यस्याः सा-गुरुकाव्यनुगा, ताम् गुरुकाव्यानुगाम् । चन्द्रस्ये-
यम् चान्द्री, ताम् चान्द्रीम् । उद्धवश्च सीरी च उद्धवसीरिणी, ताभ्याम्-
उद्धवसीरिभ्याम् ।
[अर्थः] अथ = सन्देहानन्तरम् । असौ = हरिः । अभि-
गगने गुरुकाव्यानुगा = बृहस्पतिशुक्रानुयाताम् ।
चान्द्री = चन्द्रसम्बन्धिनीम् । श्रिय =शाभाम् । विभ्रत् =
दधत् । उद्धवसीरिभ्याम् = उद्धवबलदेवाभ्याम् । साध = सह ।
उद्धवबलभद्रसहितः । सदः = सभाम् । आसदत-अगमत् ।प्राप ।
[ भावार्थः ] उद्धवमुसलिभ्यां सहितो बृहस्पतिशुक्रानुयातां
चन्द्रस्य शोभां दधत् कृष्णचन्द्रो मन्त्रणाय सभामयासीत् ।
[ कोसः ] 'नीलाम्बरो रोहिणेयस्तालाङ्को मुसली हली' इत्यमरः ।
'नभोऽन्तरिक्ष गगनम्' इत्यमरः । गुरुस्तु गीप्यतो श्रेष्ठे गुरौ पितरि दुर्भरे'
इति विश्वः । 'शुक्रो दैत्यगुरुः काव्य उशना भार्गवः कविः' इत्यमरः ।
[वाच्यप० ] अथ अमुना गुरुकाव्यानुगां चान्द्रीं श्रियं बिभ्रता सद
नभः-
आसद्यत ।
[ भाषाटीका ] इस प्रकार विरुद्ध दो कार्यों के उपस्थित हो जाने से
श्रीकृष्ण परामर्श करने के लिए उद्धव और बलदेवजी के साथ मन्त्रणाभवन
में पधारे। उस समय भगवान् की ऐसी शोभा मालूम होती थी जैसे
आकाश में गुरु और शुक्र से सहित चन्द्रमा की शोभा होती है ॥२॥
१३४
शिशुपालवधम् ।
[२ द्वितीयः-
,
जाज्वल्यमाना जगतः शान्तये समुपेयुषी ।
व्यद्योतिष्ट सभावेद्यामसौ नरशिखित्रयी ॥३॥
[ सर्वकषा ] जाज्वल्यमानेति । जगतः शान्तयेऽनुपद्रवाय समु-
पेयुषी-मिलिता, जाज्वल्यमाना-भृशं ज्वलन्ती । 'धातोरेकाचो हलादेः
क्रियासमभिहारे यङ् । ततो लटः शानजादेशे टाप् । असौ-नराः पुरुपा
एव शिखिनोऽग्नयस्तेषां त्रयी। 'द्वित्रिभ्याम्-' इत्यादिना तयस्यायजा--
देशे कृते 'टिड्ढाणञ्-' इत्यादिना ङीप् । सभा-आस्थानी, सैव वेदिः।
'वेदिः परिष्कृता भूमिः' इत्यमरः । तस्यां व्यद्योतिष्ट-दीप्यते स्म ।
'धुभयो लुङि इति वा तङ् । रूपकालङ्कारः ॥ ३॥
[अन्वयः ] जगतः शा तये समुपेयुषी जाज्वल्यमाना असो
नरशिखित्रयी सभावेद्या व्यद्योतिष्ट ।
[विग्रहः] नराः शिखिन इव नरशिखिनः, तेषां त्रयी नरशिखित्रयी।
सभैव वेदिः-सभावेदिस्तस्यां सभावेद्याम् ।
[अर्थः ] जगतः = लोकस्य । शान्तये = अनुपद्रवाय ।
समुपेयुषी = मिलिता जाज्वल्यमाना% भृशं ज्वलन्ती।
असौ = इयं नरशिखित्रयी = कृष्णोद्धवबलदेवपुरुषपावक
त्रयी । सभावेद्यां परिषवद्याम् । सभामण्डपे । व्यद्योतिष्ट
दिदीपे। शुशुभे । अशोभिष्ट ।
[ भावार्थः] जगतः शान्तये निलिताऽसौ नररूपगाईपत्याद्य-
ग्नित्रयी सभावेद्यामवस्थिता सती शुशुभे।
[ कोशः] 'वेदिः परिष्कृता भूमिः' इत्यमरः । “शिग्वावानाशुशु-
क्षणिः । इत्यमरः।
वाच्यप० ] जगतः शान्तये समुपेयुष्या जाल्वल्यमानयाऽमुया नर-
शिखित्रय्या सभावेद्यां व्यद्योति ।
[ भापाटीका ] जगत् की शान्ति के लिए एकत्रित हुए (कृष्ण उद्धव
बलदेव रूप ) वे तीनों महापुरुष तीन अग्नि (आहवनीयाग्नि दक्षिणाग्नि
गार्हपत्याग्नि ) की तरह प्रकाशमान हो सभावेदि पर शोभित हुए ॥३॥
सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । रत्नस्तम्मेषु सङ्क्रान्तप्रतिमास्ते चकाशिरे । एकाकिनोऽपि परितः पौरुषेयवृता इव ॥ ४ ॥ [ सर्वङ्कषा ] रत्नेति । रत्नानां स्तम्भा इति षष्ठीसमासविशेषे पर्यव- सानाद्विकारार्थत्वम् । तंषु सङ्कान्तप्रतिमाः-संक्रान्तप्रतिबिम्बाः । 'प्रतिमानं प्रतिबिम्ब प्रतिमा-' इत्यमरः । ते त्रयः-एकाकिनोऽसहाया अपि । 'एकादाकिनिच्चासहाय' इत्याकिनिच्प्रत्ययः । परितोऽभितः सर्वतः । 'पर्यभिभ्यां च' इति तसिल्प्रत्ययः । स च सर्वोभयार्थाभ्यात्रिष्यते । पौरुषेयेण-प्रतिबिम्बभूयस्त्वात्पुरुषसमूहेनावृता इवेत्युप्रेक्षा। चकाशिरे। 'सर्वपुरुषाभ्यां गढी', 'पुरुपाद्वधविकारसमूहतेन कृतेविति वक्तव्यम्' इति समूहे ढप्रत्ययः । एतेन विजनत्यमुक्तम् । यद्यपि-'निस्तम्भ निर्गवाक्षे च निर्भित्त्यन्तरसंश्रये । प्रासादाने त्वरण्ये वा मन्त्रयेद्भावभाविनी । -इति कामन्दकीये मन्त्रभूमेः स्तम्भप्राचुर्यनिषेधो गम्यते, तथापि तस्यापि विजनोपलक्षणत्वाददोष इति भावः ॥ ४ ॥ [ अन्वयः ] रत्नस्तम्भेषु सङ्कान्तप्रतिमास्ते एकाकिनः अपि परितः पौरुषेयवृता इव चकाशिरे । [विग्रहः ] रत्नानां स्तम्भाः रत्नस्तम्भाः, तेषु रत्नस्तम्भेषु । सङ्क्रान्ताः प्रतिमा येषां ते सङ्क्रान्तप्रतिमाः । पुरुषाणां समूहः पौरुषेयः । पौरुषेयेण वृताः पौरुषेयवृताः। [ अर्थः ] रत्नस्तम्भेषु-रत्नमयस्तम्भेषु । सङ्कान्तप्रतिमाः प्रतिफलितप्रतिबिम्बाः। ते = कृष्णोद्धवादयः। एकाकिनोऽपि असहाया अपि । स्वशरीरमात्रमहाया अपि । परितः अभितः । सर्वतः। पौरुषेयवृता इव-(प्रतिबिम्बभूयस्त्वात्-) पुरुषसङ्घ नावृता इव । चकाशिरे प्रचकाशिरे । शुशुभिरे। [भावार्थः ] एकाकिनोऽपि कृष्णवलभद्रोद्धवाः सभामण्डप- रत्नस्तम्भसङ्क्रान्तप्रतिबिम्बाः सन्तः पुरुषसङ्घावृता इव शुशुभिरे । .
शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [ कोशः ] 'प्रतिमानं प्रतिबिम्ब प्रतिमा' इत्यमरः । [वाच्यप० ] रतस्तम्भेष सान्तप्रतिमः एकाकिभिरपि तैः परितः पौरुषेयवृतैरिव चकाशे। [ भाषाटीका ] श्रीकृष्णचन्द्र उद्धपजी और बलदेवजी यद्यपि वहाँ इकल्ले ही थे पर सभामण्डप के रनमय खम्भों में उनकी परछांही पड़ने से वे मनुष्यों के समूह से विरे हुए से मालूम होते थे ॥ ४ ॥ अध्यासामागुरुत्तङ्गहेमपीठानि यान्यमी । तैरूहे केस रिक्रान्तत्रिकूटशिखरोपमा ।। ५ ॥ [ सर्वङ्कपा ] अध्यासामासुरिति । अमी-यो यान्युत्तुङ्ग- हेमपीठान्यासनानि अध्यासामासुरधितष्टुः । येषूपविष्टा इत्यर्थः । अधिशीङ्स्थासां कर्म' इति कर्मत्वम् । 'आस उपवेशने लिट् । 'दयापासश्च' इत्याम्प्रत्ययः । 'कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि' इत्यस्तैरनुप्रयोगः । 'आम्ग्रन्थ- यवत्कृतोऽनुप्रयोगस्य' इति कृज एवेति नियमादस्त त्मनेपदम् । त:-- पीठः, केसरिभिः-सिंहः, क्रान्तानां त्रिकूटस्य-त्रिकूटाद्रेः शिखाराणा- मुपमा–सादृश्यमूहे-ऊढा। वहः कर्मणि लिट् । मप्रसारणम् । श्रीगि कूटान्यस्येत्यन्वर्थसज्ञा। 'कूटोऽस्त्री शिवरं शृङ्गम्' इत्यमरः। उपमालङ्कारः ॥५॥ [अन्वयः] अमी यानि उत्तुङ्गहेमपीठानि अध्यासामासुः तैः केशरिक्रान्तत्रिकूटशिखरोपमा उहे । [विग्रहः ] हेम्नः पीठानि हेमपीठानि, उत्तुङ्गानि च तानि हेमपीठानि च उत्तुङ्गहेसपीठानि । केसरिभिः क्रान्तानि केसरिक्रान्तानि, त्रिकूटस्य शिस्त्र- राणि त्रिकूटशिखराणि, केसरिक्रान्तनि च तानि त्रिकूटशिखराणि च केसरि- क्रान्तत्रिकूटशिखराणि, तेषाम् उपमा केसरिक्रान्तत्रिकूटशिखरोपमा । [अर्थः ] अमी = कृष्णोद्धवबलभद्राः । यानि उत्तुङ्गहेमपी- ठानि यानि प्रोन्नतहिरण्मयासनानि । अध्यासामासुः% अधितष्ठुः । येषु स्वर्णनिमितेष्वासनेषूपविष्टा इत्यर्थः । इत्यर्थः । तैः- सर्गः] - .. अभिनवराजलक्ष्मा-सर्वऋषा-विराजितम् । १३७ हैमासनैः । केसरिक्रान्तत्रिकूटशिखरोपमा सिंहाधिष्ठित- त्रिकूटशृङ्गोपमा । अहे = ऊढा । [ भावार्थः] श्रीकृष्णोद्धवबलभद्रा यानि समुन्नतानि हेममयान्यासनान्यध्यारुरुहुस्तानि सिंहाधिष्ठितत्रिकूटाद्रि- शृङ्गसादृश्यमूहुः। [ कोशः ] 'पीठमासनम्' इत्यमरः । 'सिंहो मृगेन्द्रः पञ्चास्यो हर्यक्षः केसरी हरिः' इत्यमरः । 'कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गम्' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] अमीभिर्यानि उत्तुङ्गहेभपीठानि अध्यासाञ्चक्रिरे तानि केसरिक्रान्तढिकूटशिखरोपमामू हुः । [ भाषाटीका ] श्रीकृष्ण उद्धव बलराप्तजी सोने के ऊंचे सिंहासनों ( कुर्सियों ) पर बैठे हुए ऐसे मालूम होते थे जैसे त्रिकूटपर्वत के तीन शिखरों ( चोटियों) पर तीन सिंह बैठे हों॥ ५ ॥ गुरुद्वयाय गुरुणोरुभयोरथ कार्ययोः । हरिवि प्रतिषेधं तमाचचाक्षे विचक्षणः ॥६॥ [ सर्वकषा] गुर्विति । अथोपवेशनानन्तरं । बिचष्टे इति विच- क्षणो-वक्ता। कर्तरि ल्युडिति न्यासकारः । 'असनयोश्च प्रतिषेधो वक्तव्यः' इति चक्षिङः ख्याजादेशाभावः । हरिः-गुवोंरुद्ध बरामयोः पितृव्यज्येष्ठनात्रोदयाय । द्वाभ्याभित्यर्थः । गुरुणोर्महतोरुभयोः। कार्ययोः-पूर्वोक्तयोः तं विप्रतिषेधं-विरोधमाचचक्षे-आख्यातवान् । तुल्यबलविरोधो विप्रतिषेधः ॥ ६ ॥ [ अन्वयः ] अथ विचक्षणः हरिः गुरुद्वयाय गुरुणोः उभयोः कार्ययोस्त विप्रतिपेधम् आचचक्षे । [विग्रहः] गुर्वोःद्वयं गुरुद्वयं, तस्मै गुरुद्धयाय । विचष्टे इति विचक्षणः। [अर्थः ] अथ = उपवेशनानन्तरम् । विचक्षणः -वक्ता। व्याख्यानकुशलः । हरिः = श्री कृष्णः । गुर्वोः= उद्धवबलरामयोः पितृव्यज्येष्ठभ्रात्रोः । द्वयाय = द्वितयाय । द्वभ्यां गुरुभ्यामिति MAR . १३८ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- यावत् । गुरुणोः = महतोः । कार्ययोः = शिशुपालवधयुधिष्ठिर- यज्ञगमनयोः। तम् = अप्रतिविधेयम् । विप्रतिषेधं = विरोधम् । आचचक्षे = आख्यातवान् । [ भावार्थः ] श्रीकृष्णन समुपस्थितं विरुद्ध कार्यद्वय- मुपन्यस्तम् । [ कोशः ] 'गुरुर्महत्याङ्गिरसे पित्रादौ धर्मदेशके । अलधौ दुर्जरे चाऽपि इति हैमः। [वाच्यप० ] विचक्षणेन हरिणा गुरुदयाय गुरुणोः कार्ययोः म विप्रतिषेधः आचचक्षे । [ भाषाटीका ] भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने अपने गुरु ( बड़े भाई और चाचा) बलरामजी और उद्धवजी से परस्परविरुद्ध ( एक साथ नहीं हो सकनेवाले ) दोनों कार्यों ( शिशुपालवध व युधिष्ठिरयज्ञगमन ) का वर्णन किया ॥६॥ योतितान्तःसभैः कुन्दकुड्मलाग्रदतः स्मितैः । स्नपितेवाऽभवत्तस्य शुद्धवर्णा सरस्वती ॥ ७॥ [ सर्वकषा ] द्योतितेति । कुन्दः-माघभवः पुप्पविशेषः । 'माध्य कुन्दम्' इत्यमरः । कुन्दकुमलाग्राणीव दन्ता यस्य तस्य कुन्द्रकुड्मला- ग्रदतः। अग्रान्तशुद्धशुभ्रवृषवराहेभ्यश्च । इत्यग्रान्तपूर्वपदबहुव्रीहे: समासान्ते वैभाषिको दतादेशः । तम्य-हरेः । सरस्वती-अन्त:- प्रधाना सभा अन्तःसभा। सभाभ्यन्तरमित्यर्थः । सा द्योतिता प्रकाशिता यैस्तैः स्मितैः स्नपितेव-क्षालितेव । स्नातेय॑न्तात् कः । 'अतिही- इत्यादिना पुगागमः। 'मिता ह्रस्वः । शुद्धवर्णा-स्फुटाक्षरत्वात्स्वच्छ- कान्तिरभवत् । अत्र स्वाभाविकवर्णशुद्धः स्नानहेतुकत्वमुत्प्रेक्ष्यते । स्मित- पूर्वाभिभाषी हरिरिति भावः ॥ ७ ॥ [अन्वयः ] कुन्दकुड्मलाग्रदतः तस्य सरस्वती द्योतितान्तः- सभैः स्मितैः स्नपिता इव शुद्धवर्णा अभवत् । [विग्रहः ] कुन्दस्य कुड्मलानि कुन्दकुड्मलानि, कुन्दकुड्मलाना- - . .
सर्गः ] .. अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । १३६ मग्राणि कुन्दकु ड्मलाग्राणि, कुन्दकुड्मलाग्राणीव दन्ता यस्या ऽसौ कुन्द- कुड्मलाग्रदन, तस्य कुन्दकुड्मलाग्रदतः । अन्तःप्रधाना सभा अन्तःसभा, द्योतिता अन्तःसभा यस्तानि-द्योतितान्तःसभानि, तैः-योतितान्त:- सभैः । शुद्धाः वर्णाः यस्यां सा शुद्धवर्णा । [ अर्थः] कुन्दकुड्मलाग्रदतः माध्यकुसुममुलाग्रभागस. हशसूक्ष्मदन्तस्य। तस्य = श्रीकृष्णस्य । सरस्वती = वाणी। द्योतितान्तःसभैः = प्रकाशितसभाभ्यन्तरैः। स्मितैः = ईषद्धास्यैः । स्नपितेव = क्षालितेव । शुद्धवर्णा = स्फुटाक्षरत्वात्स्वच्छकान्तिः । अभवत् = बभूव । [ भावार्थः ] कुन्दप्रभदन्तस्य हरेर्वाणी दन्तप्रभाविद्योतित- सभामध्यः स्मितैः स्नपितेव शद्धवर्णा (स्पष्टाक्षरा, निर्मला च) । । .. बभूव । [ कोशः ] 'माध्यं कुन्दम्' इत्यमरः। 'कुड्मलो मुकुलोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । 'सभासमितिसंसदः' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] कुन्दकुड्मलाग्रदतः स्मितैः स्नपितया इव सरस्वत्या ऋद्धवर्णया अभूयत । [ भाषाटीका ] कुन्द ( कुन्न ) पुष्पके अग्रभाग की तरह सफेद चम- कीले व सुन्दर दांतवाले श्रीकृष्ण की वाणी मुसकानरूपी जल से नहलाई हुई सी होने के कारण स्पष्टवर्णवाली (साफ शुद्ध अक्षरों वाली, तथा निर्दोष व निर्मल ) थी। अर्थात् श्रीकृष्णचन्द्र ने मीठे व स्पष्ट शब्दों में हंसते हुए इस प्रकार कहा कि-॥ ७॥ कार्यविप्रतिषेधं निवेद्य तत्र स्वमतमावेदयिष्यन्पण्डितमानित्वं ताव. त्परिहरति- भवगिरामवसरप्रदानाय वचांसि नः । पूर्वरङ्गः प्रसङ्गाय नाटकीयस्य वस्तुनः ॥ ८॥ [ सर्वकषा ] भवगिरामिति । भवगिरां-युष्मद्वाचाम् । अव- सरप्रदानाय । प्रसंजनायेत्यर्थः।नोऽस्माकं वचांसि । सिद्धान्तोन्नयनार्थ- - शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- मुच्यन्ते न तु सिद्धान्तत्वेनेत्यर्थः। तथाहि-पूर्व रज्यतेऽस्मिन्निति पूर्वरङ्गः नाटयशाला, तस्थं कर्मापि पूर्वरङ्ग इति दशरूपके । अतः पूर्वरङ्गो नाम रङ्गप्रधानाख्यो रङ्गविघ्नशान्तिकारी नान्दीपाठगीतवादिब्रायनेकाइविशेषो नाट्यादौ कर्तव्यः कर्मविशेषः । तदुक्त वसन्तराजीये-यन्नाट्यवस्तुनः पूर्व रङ्गविघ्नोपशान्तये । कुशीलवाः प्रकुर्वन्ति पूर्वरङ्गः प्रकीर्तितः ।। इति । स पूर्वरङ्गः, नाटके भवं नाटकीयम् । तत्र वर्पमित्यर्थः । वृहाच्छः।' सस्य 'आयने-'इतीयादेशः । तस्य वस्तुनः प्रवृत्तस्त्र, प्रमगाय-प्रसञ्ज- नाय । प्रवर्तनायेति यावत् । अतः प्रथमवादो न दीपायेति भावः । पूर्वरशः प्रस्तावने ति रङ्गराजः । नञ्चिन्त्यम् । पूर्वरङ्ग विधायादौ सूत्रधारे विनिर्गते । प्रविश्य तद्वदपरः काव्यमास्थापयन्नटः । प्रथम पूवर- ङ्गश्च ततः प्रस्तावनेति च । आरम्भे सर्वनाट्यानामेतत्सामान्यमि- ज्यते ॥ इति दशरूपकाद्यक्तभेदविरोधादिति । अत्र हरिबाक्यापूर्वराः प्रसञ्जकत्वस्वरूपसामान्यस्य वाक्यद्वय शब्दान्तरं पृथनिर्देशान्प्रनिव- स्तूपमालकारः । तल्लक्षणं तूक्तम् ॥ ८ ॥ [अन्वयः ] भवगिराम् अवसरप्रदानाय नः वचांसि । ( तथाहि ) पूवरङ्गः नाटकीयस्य वस्तुनः प्रसङ्गाय ( भवति) [विग्रहः ] अवसरस्य प्रदानम् अवसरमदान, नम्मै अवसरमदानाय । नाटके भवं नाटकीयं, तस्थ-नाटकीयस्य । [ अर्थः ] भवगिरां = भवद्वाचाम् । श्रीमदुक्तीनाम् । अव- सरप्रदानाय = अवकाशदानायैव । प्रसजनायैव । न:-अस्माक। मम श्रीकृष्णम्येति यावत् । वचांसि = वचनानि । सन्तीति शषः । तथाहि-पूर्वरङ्गः = रङ्गविघ्नोपशान्तिफलकं नटकत्त कं मङ्गलवा- दिनादिकम् । नाटकीयस्य = अभिनेयस्य । वस्तुनः = कथायाः । प्रसङ्गाय = अवतारायैव । अवस्थापनायैव । भवतीति शेपः। [भावार्थः ] मदुक्तिरियं भवदुक्तसिद्धान्तश्रवणायव । नाट- कीयेतिवृत्तप्रसङ्गायैव हि पूर्वरङ्गोऽवतार्यते। [ कोशः] 'गीर्वाग्वाणी सरस्वती इत्यमरः । .
सर्गः] . अभिनवराजलक्ष्मी--सर्वकषा-विराजितम् । - .. [वाच्यप० ] भवगिराम् अवसरमदानाय नः वचोभिः भूयते पूर्व- रङ्गेण नाटकीयस्य वस्तुनः प्रसङ्गाय ( भूयते )। [ भाषाटीका] जैसे पूर्वरङ्ग (प्रारम्भिक मङ्गलाचरण) नाटकीय कथा के अवतारण के लिए होता है वैसे ही आप लोगों की उक्तियों का प्रसङ्ग उपस्थित करने के लिए ही मेरा यह पहिले भाषण है ॥ ८ ॥ सम्प्रति स्वमतमाह- करदीकृतभूपालो भ्रातृमिर्जित्वरैर्दिशाम् । विनाऽप्यस्मदलम्भूष्णुरिज्यायै तपसः सुतः ॥६॥ [ सर्वकषा ] करदीकृतेति । दिशां जित्वरैः-जयनशीलैः । 'इण्नशजिसर्तिभ्यः क्वरप्' । कृद्योगात्कर्मणि षष्ठी। भ्रातृभिः-सीमादिभिहें- तुभिः । करदाः-षष्ठभागप्रदाः। 'भागधेयः करो बलिः' इत्यमरः । तत- शिवः । 'ऊर्यादिविडाचश्व इति गतिसज्ञायां 'कुगतिप्रादयः' इति नित्य- समासः । अकरदाः करदाः सम्पद्यमानाः कृताः करदीकृता भूपालाः यस्य सः-वशीकृतराजमण्डलः । तपसः सुतो-धर्मपुत्रः । 'तपश्चान्द्रायणादो स्याद्धमें लोकान्तरेऽपिच' इति विश्वः। अस्मद्विना। अस्माभिविनापीत्यर्थः। 'पृथग्विनानाना' इत्यादिना तृतीयाविकल्पात्पञ्चमी । इज्याय-यागाय। यजेर्भावेऽपि क्यप् । 'वचिस्वपि-'इत्यादिना सम्प्रसारणम् । 'नमः स्वस्तिः इत्यादिना चतुर्थी।अलं-समर्थो, भूष्णुः-भवनशीलः। भूप्णु विष्णुर्भविता' इत्यमरः । 'ग्लाजिस्थश्च पस्नुः' इतिग्स्नुप्रत्ययः। 'बिङति च' इत्यत्र गका- रप्रश्लेपाद्गुणाभावः । तथा च जयादित्यः-'तत्रैव गकारोऽपि च कत्व- भूतो निर्दिश्यते । अतो जैत्रयात्रैक कायर्या न यज्ञयात्रेति भावः ॥९॥ [अन्वयः] दिशां जित्वरीः भ्रातृभिः करदीकृतभूपालः तपसः सुतः अस्मद्विनापि इज्यायै अलम्भूष्णुः । [विग्रहः ] करं ददतीति करदाः, न करदाः अकरदाः। अकरदाः करदाः सम्पद्यमानाः कृताः करदीकृताः। करदीकृताः भूपाला येनाऽसौ करदीकृतभूपालः । जेतुं शीला:-जित्वराः, तैः जित्वरैः । .. . ..
.१४२ - शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- तपस: 3 T [अर्थः] दिशाम् = आशानाम् । पूर्वादीनां चतुण्णी दिशाम् । जित्वरः = विजयनशोलैः । भ्रातृभिः = स्वानुजीम- सेनाजु नादिभिः । करदीकृतभूपालः = करदीकृतराजमण्डलः । धर्मस्य । सुतः = पुत्रः । धर्मपुत्रो युधिष्ठिर इति यावत् । अस्मद्विमा = अस्मान् विहायाऽपि। इज्यायै = यज्ञाय । यज्ञं कर्तुम् । अल = समर्थः । पर्याप्तः । भूष्णुः = भविता । [ भावार्थः ] भ्रातृसाहाय्येन करदाकृतराजमण्डलो धर्मरा- जोऽस्मद्विनाऽपि राजसूय यज्ञ कत्तु समर्थः । अतस्तत्साहाय्य- दानाय यज्ञगमनस्यावश्यकता न प्रतीयते । शिशुपाल एव तु मारणीय इत्याशयः । [ कोशः ] 'भागधेयः करो बलिः' इत्यमरः । 'जेता जिष्णुश्च जित्वरः' इत्यमरः । 'तपश्चान्द्रायणादौ स्याद्धर्मे लोकान्तरेऽपि च' इति विश्वः । [वाच्यप०] दिशां जित्वरैः भ्रातृभिः करदीकृतभूपालेन तपसः सुतेन अस्मद्विनापि इज्यायै अलम्भूप्णुना भूयते । [भाषाटीका ] धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों की सहायता से सम्पूर्ण राजाओं को अपने वश में कर ही लिया है और सब राजा उसे कर ( ' लगान ' ' चौथ : ] देते ही हैं। अतः हमारी सहायता के विना भी वह अच्छी तरह राजसूय यज्ञ कर सकता है । ( अतः इस समय पहले शिशुपाल को मारना ही आवश्यक है)॥ ९॥ ननु यज्ञान्ते जैत्रयात्रायामुभयानुसरणं स्यात्तत्राह- उत्तिष्ठमानस्तु परो नोपेक्ष्यः पथ्यमिच्छता । समौ हि शिष्टौराम्नातौ वत्स्यन्तावामयः स च ॥१०॥ [ सर्वकषा] उत्तिष्ठमान इति ।.उत्तिष्ठमानो-वर्धमानः । 'उदोऽनू- वकर्मणि' इत्यात्मनेपदम् । परः शत्रुः । पथोऽनपेत- पथ्यं हितमारोग्यं चेच्छता । पुसेति शेषः । नोपेक्ष्यो-नौदासीन्येन द्रष्टव्यः । कुतः ? हि- • यस्माद्वय॑न्तौ-वर्धिष्यमाणौ । 'लुटः सद्वा' इति सदादशे 'वृद्धयः स्यसनो' ।
.१४२ - शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- तपस: 3 T [अर्थः] दिशाम् = आशानाम् । पूर्वादीनां चतुण्णी दिशाम् । जित्वरः = विजयनशोलैः । भ्रातृभिः = स्वानुजीम- सेनाजु नादिभिः । करदीकृतभूपालः = करदीकृतराजमण्डलः । धर्मस्य । सुतः = पुत्रः । धर्मपुत्रो युधिष्ठिर इति यावत् । अस्मद्विमा = अस्मान् विहायाऽपि। इज्यायै = यज्ञाय । यज्ञं कर्तुम् । अल = समर्थः । पर्याप्तः । भूष्णुः = भविता । [ भावार्थः ] भ्रातृसाहाय्येन करदाकृतराजमण्डलो धर्मरा- जोऽस्मद्विनाऽपि राजसूय यज्ञ कत्तु समर्थः । अतस्तत्साहाय्य- दानाय यज्ञगमनस्यावश्यकता न प्रतीयते । शिशुपाल एव तु मारणीय इत्याशयः । [ कोशः ] 'भागधेयः करो बलिः' इत्यमरः । 'जेता जिष्णुश्च जित्वरः' इत्यमरः । 'तपश्चान्द्रायणादौ स्याद्धर्मे लोकान्तरेऽपि च' इति विश्वः । [वाच्यप०] दिशां जित्वरैः भ्रातृभिः करदीकृतभूपालेन तपसः सुतेन अस्मद्विनापि इज्यायै अलम्भूप्णुना भूयते । [भाषाटीका ] धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों की सहायता से सम्पूर्ण राजाओं को अपने वश में कर ही लिया है और सब राजा उसे कर ( ' लगान ' ' चौथ : ] देते ही हैं। अतः हमारी सहायता के विना भी वह अच्छी तरह राजसूय यज्ञ कर सकता है । ( अतः इस समय पहले शिशुपाल को मारना ही आवश्यक है)॥ ९॥ ननु यज्ञान्ते जैत्रयात्रायामुभयानुसरणं स्यात्तत्राह- उत्तिष्ठमानस्तु परो नोपेक्ष्यः पथ्यमिच्छता । समौ हि शिष्टौराम्नातौ वत्स्यन्तावामयः स च ॥१०॥ [ सर्वकषा] उत्तिष्ठमान इति ।.उत्तिष्ठमानो-वर्धमानः । 'उदोऽनू- वकर्मणि' इत्यात्मनेपदम् । परः शत्रुः । पथोऽनपेत- पथ्यं हितमारोग्यं चेच्छता । पुसेति शेषः । नोपेक्ष्यो-नौदासीन्येन द्रष्टव्यः । कुतः ? हि- • यस्माद्वय॑न्तौ-वर्धिष्यमाणौ । 'लुटः सद्वा' इति सदादशे 'वृद्धयः स्यसनो' ।
१४४ शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- , त्ययः । न दूये सात्वतीसूनुर्यन्मह्यमपराध्यति । यत्त दन्दह्य ते लोकमदो दुःखाकरोति माम् ॥११॥ [ सर्वङ्कषा] नेति । सत्वतोऽपत्यं स्त्री सात्वती नाम हरेः पितृप्वसा! 'उत्सादिभ्यऽ । तस्याः सूनुश्चैद्यः । बन्धुरपि खलो न मृष्यत इति भावः । यन्मह्यमपराध्यति-द्रुह्यतीति यावत् । 'बुधद्रुह-' इत्यादिना चतुर्थी । 'तत' इति शेषः। यत्तदोनित्यलम्बन्धात् । न दूये-न परितप्ये । दृको देवा- दिकाकर्तरि लट् । उत्तमपुरुषेकवचनम् । किन्न लोकं दन्दह्यते गहिनं यथा स्यादेवं दहतीति यावत् । 'लुपसदचरजप' इत्यादिना गर्गयां यङ। 'जपजभदहदशभञ्जपशां च' इत्यभ्यासस्य नुमागमः । अदो-लोकदहनं, मां दुःखाकरोति । दुखमनुभावयतीत्यर्थः । 'दुःखात्प्रातिलोम्बे' इति डाच्य- अतश्चैद्य एवाभियातव्यः, पार्थस्तु प्रार्थनयापि पश्चात्समाधेय इत्यर्थः ॥ ११ ॥ [अन्वयः] सात्वतीसूनुः यन्मह्यम् अपराध्यति (ततः) न दूये, यत्तु लोक दन्दह्यते अदः मां [विग्रहः ] सत्वतोऽपत्यं, स्त्री सात्वती । सात्वत्याः सूनुः सात्वती- सूनुः । गर्हितं दहति-दन्दह्यते । [अर्थः] सात्वतीसूनुः सात्वतीपुत्रः शिशुपालः। यन्मह्यम- पराध्यति-यता मह्य द्रुह्यति । 'तत' इति शेषः । न दूये-ततोऽहं न परितप्ये । ( किन्तु-) यत्तु यतो हि । लोकं जगतीं। प्रजाजनं च । दन्दह्यते वृथैव कुत्सितं दहति । पीडयति । अद: लोकदह- नम् । मां दुःखाकरोति-मां दुःखमनुभावयति। [ भावार्थः ] चैद्यो मह्यद्र ह्यतीत्यतो नाहं दूये । यत्त्वसौ जगह जति तदेव मां दुःखाकरोति । अतश्चैद्याभियानमेवेदानी कर्त्तव्यं, युधिष्ठिरस्तु पश्चात्प्रार्थनयाऽपि समाधेयः । [कोशः ] आत्मजस्तनयः सूनुः सुतः पुत्रः स्त्रियां त्वमी । आहुई- हितरं सर्वेऽपत्यं तोकं तयोः समे।' इत्यमरः। 'त्रिप्वथो जगती लोको विष्टपं भुवनं जगत्' इत्यमरः । दुःखाकरोति।
सर्ग:] प्रभिनवराजलक्ष्मी-सवकषा-विराजितम् । [ वाच्य५० ] सात्वतीसूनुना यन्मह्यमपराध्यते ( ततो मया) न दूयते । यत्तु लोको दन्दह्यतेऽमुनाऽहं दुःखाक्रिये । [ भाषाटीका ] शिशुपाल मेरे से द्वेष रखता है इस का मुझे दुःख नहीं है, किन्तु वह जगत् को वृथा पीडा देता है यही मुझे बड़ा दुःख है। अतः उसको दण्ड देना ही सर्वप्रथम उचित है ॥ ११ ॥ स्वमतं निगमयन्परमतं মুম্ভ पृच्छति- मम तावन्मतमिदं, श्रूयतामङ्ग ! वामपि । ज्ञातसारोऽपि खल्वेकः सन्दिग्धे कार्यवस्तुनि ॥१२॥ [सर्वकषा ] ममेति । तावत् । भवन्मतश्रवणपर्यन्तमित्यर्थः । मम मतमिदम् । अङ्गत्यामन्त्रणेऽव्ययम् । 'अथ सम्बोधनार्थकाः, स्युः प्याट् पाडङ्ग है हे भोः' इत्यमरः । वां-युवयोः । 'युष्मदस्मदोः षष्टीचतुर्थी- इत्यादिना वामादेशः। मतं श्रयताम् । विधौ लोट् । तदिदं मया श्रोत- व्यम् । अन्यथा सन्देहानिवृत्तेरिति भावः । विदुषस्ते कुतः सन्देहस्तत्राह- ज्ञातसारः-ज्ञाततत्त्वार्थोऽप्येकः-एकाकी। कार्यवस्तुनि-कर्तव्यार्थे । सन्दिग्धे-संशेते । खलु-निश्चये । अतो मयापि सन्दिह्यत इत्यर्थः । 'दिह उपचये' कर्तरि लट् । धत्वधत्वे । सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽ- र्थान्तरन्यासः ॥ १२॥ [अन्वयः] तावत् मम मतम् इदम् । अङ्ग !, वामपि श्रू यताम् । ज्ञातसारोऽपि एकः कार्यवस्तुनि सन्दिग्धे खलु । [विग्रहः ] ज्ञातः सारो येनाऽसौ ज्ञातसारः । कार्यं च तद्वस्तु च कार्यवस्तु, तस्मिन् कार्यवस्तुनि । [अर्थः] तावत् = तावत्कालपर्यन्तम् । भवन्मतश्रवण- 'पर्यन्तमित्यर्थः । मम= श्रीकृष्णस्य । मतमिदम् = इदं मतमस्ति । अङ्ग ! = अयि मान्यौ ! । वां = युवयोः । श्रीमतोर्भवतोः । मतम् = अभिमतमपि । श्रूयतां = मया श्रोतव्यम् । ( यतः-) ज्ञातसारोऽपि, = विदिततत्वार्थोऽपि, ज्ञाततत्त्वार्थोऽपि । एकः = संशेते। १४६ शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- एकाकी पुमान् । कार्यवस्तुनि = कर्तव्येऽर्थे । सन्दिग्धे संशयमापद्यते । सन्देहाकुलो भवति । खलु-निश्चितमेतत् । निश्चये-खलः। [भावार्थः] तदेवं 'चैद्य एवेदानीमभियातव्य' इत्येवं मम मतं भवदुक्तश्रवणपर्यन्तमस्ति । मान्याः ! भवद्भिरपि स्वाभिमत- मुच्यतां, तद्धि मयाऽवश्यं श्रोतव्यम् । ज्ञाततत्त्वार्थोऽपि एकाकी मन्त्रं निर्धारयितु नालम् । अतो भवदुक्तमाकण्येव मया नीति- निर्धारणीया। [ कोशः ] ‘यावत्तावच्च साकल्येऽवधौ मानेऽवधारणे' इत्यमरः। 'अथ सम्बोधनार्थकाः-'स्युः प्याट् पाडङ्ग है हे भोः' इत्यमरः । [वाच्यप०] ममानेन मतेन भूयते । वामपि शृणवानि । ज्ञातसारे- 'णाप्यकेन कार्यवस्तुनि सन्दिह्यते । [ भाषाटीका ] मान्यवरो ! मैंने अपना मत संक्षेप में आपलोगों को सुना दिया है, अब आपलोग भी अपना अभिमत प्रकट करने की कृपा करें। उसे सुनकर ही मैं कर्तव्य का निश्चय करूंगा । बड़े से बड़ा विद्वान् भी इकल्ला मन्त्र का ठीक २ निर्णय नहीं कर सकता, कुछ न कुछ सन्देह बनाही रहता है॥ १२॥ यावदर्थपदां वाचमेवमादाय माधवः । विरराम महीयांसः प्रकृत्या मितभाषिणः ॥ १३ ॥ [ सर्वकषा ] यावदिति । माधवो हरिर्यावानर्थो-यावदर्थम् । 'यावदवधारणे' इत्यव्ययीभावः।यावदर्थ पदानि यस्यास्ताम् । अभिधेय- संमिताक्षरामित्यर्थः । एवमुक्तप्रकारेण । वाचमादाय-गृहीत्वा । उक्त्वे- त्यर्थः । विरराम-तूप्णीमास । 'व्यापरिभ्यो रमः' इति परस्मैपदम् । तथाहि-मही यांसः-उत्तमाः, प्रकृत्या-स्वभावेन, मितभाषिणः । 'भवन्तीति शेषः । वृथालापनिषेधादिति भावः । पूर्ववदलकारः ॥ १३ ॥ [अन्वयः ] माधवः यावदर्थपदा एवम् वाचम् श्रादाय सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । । . 'विरराम । (हि) महीयांसः प्रकृत्या मितभाषिणः ।। [विग्रहः ] यावन्तोऽर्थाः यावदर्थम् । यावदर्थम् पदानि यस्यां सा- यावदर्थपदा, ताम् यावदर्थपदाम्। मितं भाषन्ते तच्छीलाः मितभाषिणः । [ अर्थः ] माधवः = श्रीकृष्णः। यावदर्थपदाम् = अभिधेय. सम्मिताक्षराम्। परिमिताक्षराम्। एवम् = इत्थम् । अमुना प्रकारेण । वाचं = गिरम् । आदाय = गृहीत्वा । उक्त्वा । विर- राम = तूष्णीं बभूव । ( तथा हि-) महीयांसः = महात्मानः। उत्तमाः । प्रकृत्या = स्वभावेनैव। मितभाषिणः = परिमितभा- षिणः । स्वल्पभाषिणः । 'भवन्ती' ति शेषः । [भावार्थः] इत्थं परिमिताक्षरां वाचमुक्त्वा हरिस्तूष्णी बभूव । महान्तो हि प्रकृत्यैव मितभाषिणो भवन्ति । [ कोशः ] 'दामोदरो हृषीकेशः केशवो माधवः स्वभूः' इत्यमरः । “प्रकृतिर्गुणसाम्ये स्यादमात्यादिस्वभावयोः । योनौ लिङ्गे पौरवर्ग' इति विश्वः। [वाच्यप०] माधवेन यावदर्थपदां वाचमेवमादाय विरेमे। महीयोभिः अकृत्या मितभाषिभिर्भूयते । [ भाषाटीका ] श्रीकृष्ण भगवान् इस प्रकार कहकर चुप हो गए। क्योंकि बड़े लोग स्वभाव से ही थोड़ा बोलते हैं ॥ १३ ॥ अथाष्टभिः (१४-२१) कुलकेन रामं वर्णयंस्तद्वाक्यमवतारयति- ततः सपत्नीपनयस्मरणानुशयस्फुरा। ओष्ठन रामो रामोष्ठबिम्बचुम्बनचुञ्चुना ॥ १४ ॥ [ सर्वकषा] तत इति। ततो रामो जगादेत्युत्तरेणान्वयः । सपत्नो-रिपुः। 'रिपौ वैरिसपत्नारि-' इत्यमरः। तस्यापनयोऽप- कारः, तस्य स्मरणेन योऽनुशयः-पश्चात्तापः । 'भवेदशनुयो द्वेषे पश्चात्ता- पानुबन्धयोः' इति विश्वः । तेन स्कुरतीत्यनुशयस्फूः, बिम्बमिवेत्युपमितसमासः । रामाया ओष्ठबिम्बस्य चुम्बनेन वित्तो रामोष्ट- १ स्फुरा । ओष्ठो :- सपत्नस्य-अपनयः सपत्नापनयस्य १४८ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- बिम्बचुम्बनचुञ्चः । तेन वित्तश्चु उपचणपौ' इति चुचुप्प्रत्ययः । 'ओत्वोष्टयोः समासे वा पररूपं वक्तव्यम् । तेनौष्ठेनोपलक्षितः । समर- सुरतयोः समरस इति भावः । उपमानुप्रासयोः संसृष्टिः॥ १४ ॥ [अन्वयः ] ततः सपत्नापन यस्मरणानुशयस्फुरा रामोष्टबिम्ब- चुम्बनचुचुना ओष्ठेन (-उपलक्षितः) रामः (-जगाद)। [ विग्रहः ] सपनापनयः, स्मरणं सपनापनयस्मरणम् , सपनापनयस्मरणेन अनुशय:-सपनापनय- स्मरणानुशयः, तेन स्फुरतीति-सपत्नापनयस्मरणानुशयस्फूः, तेन- सपत्नापनयस्मरणानुशयस्फुरा । ओष्टौँ बिम्बमिव-ओष्टबिम्बम् । रामाया ओष्टबिम्ब-रामोष्ठबिम्बम् । तस्य चुम्बनम् , तेन वित्त:--- तेन वित्त:--रामोष्ठबिम्ब- चुम्बनचुचुः, तेन-रामोष्ठबिम्बचुम्बनचुचुना। [अर्थः] ततः = तदन तरम् । श्रीकृष्णवाक्यसमाप्त्यनन्त- रम् । सपत्नापनयस्मरणानुशयस्फुरा = शत्रुकृतापकारस्मरणोद्भू- तपश्चात्तापप्रस्फुरता। रिपुकृतापकारस्मृत्युद्भूतद्वंषकम्पमानेन । रामोष्ठबिम्बचुम्बनचुश्चना = कान्तोष्ठबिम्बचुम्बनवित्तेन । वामा- धरोष्ठदशनकुशलेन । ओष्ठेन = ओष्ठयुगलेन । (-उपलक्षितः)। रामः = बलरामः। 'जगादेति वक्ष्यमाण-(२१) श्लोकस्थेन सहाऽस्यान्वयः। [भावार्थः] श्रीकृष्णोक्तं श्रुत्वा . शिशुपालकृतापकार- स्मरणोद्भुतामर्षकम्पमानाधरोष्ठः कान्ताधरोष्ठचुम्बनचुचुर्बल- भद्रो जगाद । [कोशः ] 'रिपौ वैरिसपत्रारिद्विषवेषणदुहृदः' इत्यमरः । 'भवे- दनुशयो द्वेषे पश्चात्तापानुबन्धयोः' इति विश्वः । 'ओष्ठाधरौ तु रदनच्छदौ दशनवाससी' इत्यमरः। [वाच्यप०] .........ओष्ठेन रामेणा जगदे । [भाषाटीका] श्रीकृष्ण की बात सुनकर शिशुपाल के अपराधों की याद आजाने से कांपते हुए ओष्ठ हैं जिनके, एवं जिनके ओठ कान्ताओं के . ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । १४६ . अधरोष्ठ के पान में प्रसिद्ध हैं ऐसे बलदेवजी-बड़े क्रोध से यों बोले ॥१४॥ विवक्षितामर्थविदस्तत्क्षणपतिसंहृताम् । प्रापयन्पवनव्याधेरिमुत्तरपक्षताम् ॥ १ ॥ [ सर्वकषा] विवक्षितामिति । विवक्षितां-वृद्धत्वाभिमानादग्ने वक्तुमिष्टाम् । वचेबॅजो वा सन्नन्ताकर्मणि क्तः । तत्क्षणे-विवक्षाक्षगे एवेत्यविलम्बोक्तिः। प्रतिसंहृता-रामानुरोधानुरुद्धाम् । अर्थविदः- कार्यज्ञस्य, अतएव-पवनव्याधेरुद्धवस्य । गिरमुत्तरपक्षतां-सिद्धान्त- यक्षतां, प्रापयन् । स्वयमसत्पक्षावलम्बित्वादिति भावः । अनेन रामस्य व्यग्रतोक्ता ॥१५॥ [अन्वयः] विवक्षितां तत्क्षणप्रतिसंहृताम् अर्थविदः पव- नव्याधेः गिरं उत्तरपक्षतां प्रापयन् (-रामो जगाद )। [विग्रहः ] तस्याः क्षणः-तत्क्षणः । तत्क्षणे प्रतिसंहृता तत्क्षणप्रति- सहृता, ताम्-तत्क्षणप्रतिसंहृताम् । अर्थ वेत्तीति अर्थवित्, तस्य अर्थविदः। पवनस्य पवनेन वा व्याधिर्यस्यासौ स पवनव्याधिः, तस्य पवनव्याधेः। उत्तर- श्वासी पक्षश्च उत्तरपक्षः, तस्य भावः उत्तरपक्षता, ताम्-उत्तरपक्षताम् । [अर्थः] विवक्षितां = वृद्धत्वादन एव वक्तुमिष्टामपि । तत्क्षणप्रतिसंहृतां = विवक्षाक्षण बलरामानुरोधादुपरु- द्धाम् । अर्थविदः = मन्त्रतत्त्वज्ञस्य । पवनव्याधेः = उद्धवस्य । गिरं = वाचम् । उत्तरपक्षता = सिद्धान्तपक्षताम् । सिद्धान्त्यु- क्तिताम् । प्रापयननयन् । लम्भयन् । गमयन्। (-रामो जगाद)। [भावार्थः ] ज्येष्ठतयोद्धवस्याऽऽदावेव वक्तुमिष्टां गिरमु. त्तरपक्षतां नयन बलभद्रो जगाद । [कोशः] ' अर्थोऽभिधेयरैवस्तुप्रयोजननिवृत्तिषु ' इत्यमरः । 'पवन- व्याधिरुद्धवः' इति कोशः । [ वाच्यप०] पवनव्याधेर्गिरम् उत्तरपक्षता प्रापयता जगदे । एव b शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- [ भाषाटीका ] कहने के लिए तैयार-अपने से बड़े-उद्धवजी को बीच ही में रोक कर बलरामजी पहले स्वयं ही बोलने लगे। मानों अपनी उक्ति को पूर्वपक्षकोटि में स्थापित करके उद्धवजी की उक्ति को ही उत्तर. पक्ष ( सिद्धान्त पक्ष ) उन्होंने सूचित किया ॥ १५॥ घूर्णयन्मदिरास्वादमदपाटलितद्युती । रेवतीवदनोच्छिष्ट परिपूतपुटे दृशौ ॥ १६ ॥ [ सर्वकषा] घूर्णयन्निति । पुनःमदिरास्वादेन-मद्यपानेन यो मदस्तेन पाटलिता-ईषद्रतीकृता द्युतिर्ययोस्ने। रेवत्या देव्याः वदने यदुच्छिष्ट-मद्यलेपताम्बूलादि । अक्षिचुम्बनसान्तमिति भावः । तेन परिपूते-शुद्धे पुटे ययोस्ते । दृशौ घूर्णयन्-भ्रामयन्निति मद्यविका- रोक्तिः । उच्छिष्टपरिपूतेत्यत्र ‘रतिकाले मुखं स्त्रीणां शुद्धमाखेटके शुनाम् इति स्मरणात् । उच्छिष्टस्य पावित्र्यजनकत्वविरोधस्याभासत्वाद्विरोधाभासो- ऽलङ्कारः। 'आभासत्वे विरोधस्य विरोधाभास उच्यते' इति लक्षणात् ॥१६॥ [अन्वयः ] मदिरास्वादमदपाटलिता ती रेवतीवदनोच्छिष्ट- परिपूतपुटे दृशौ घूर्णयन् ( रामो जगाद)। [विग्रहः ] आस्वादनम्-आस्वादः, मदिरायाःआस्वादः मदिरास्वादः, मदिरास्वादेन मदः-मदिरास्वादमदः, तेन पाटलिता द्युनिर्ययोस्ते मदिरा- स्वादमदपाटलितद्युती, ते तथाभूते। रेवत्या वदनं रेवतीवदनम्, रेवतीवदने, उच्छिष्टम् रेवतीवदनोच्छिष्टम्, तेन परिपूते पुटे ययोस्ते-रेवतीवदनो- च्छिष्टपरितधुपुटे । ते तथाभूते । [अर्थः ] किश्च-मदिरास्वादमदपाटलित युती = मद्यपान- मदाऽऽरक्तप्रभे। सुरासेवनप्रभवमदेषद्रक्तक्रान्ती। रेवतीवदनो- च्छिष्टपरिपूतपुटे = रेवत्याख्यस्वकान्तामुखोच्छिष्टचर्वितताम्बू- लादिसम्पर्कपवित्रितपुटे । रमणीमुखोद्गीर्णताम्बूलादिसम्पर्क- शबलितसम्पुटे । दशौ = लोचने । घूर्णयन् = भ्रामयन् । (-रामो जगाद)।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १५१ [ भावार्थः] मदिरापानाऽऽरक्तकान्ती रेवतीचुम्बनसंसक्त- ताम्बूललेशशवलितोर्ध्वपुटे लोचने भ्रमयन् रामो जगाद । [ कोशः ] 'श्वेतरक्तस्तु पाटलः' इत्यमरः । 'वक्रास्ये वदनंतुण्डमाननं लपनं मुखम्' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] दृशौ घूर्णयता (-जगदे ) [भाषाटीका ] मदिरा के पीने से लाल २ नेत्रों को-[ जिनके उपरी भाग-रेवती ( बलरामजी की स्त्री) के मुखके उच्छिष्ट पानकी सीठी के कण लगने से पवित्र मनोहर हो रहे है ] घुमाते हुए (निकालते हुए) बलदेवजी यों बोले ॥ १६ ॥ आश्लेपलोलुपवधूस्तनकार्कश्यसाक्षिणीम् । म्लापयन्नभिमानोष्णैर्वनमाला मुखानिलैः ॥ १७ ॥ [ सर्वकषा] आश्लेषेति। पुनः-आश्लेषे लोलुपायाः-आलिङ्गन- लुब्धाया वध्वाः स्तनयोः कार्कश्यस्य--काठिन्यस्य साक्षिणीमुप- द्रष्ट्रीम् । नित्यं पीड्यमानामिति भावः । 'साक्षाद्दष्टरि सज्ञायाम्' इति साक्षाच्छब्दादिनिप्रत्ययः। वनमालामभिमानोष्णैरहङ्कारतप्तै मुंखा निलैः निःश्वासमारुतैम्लोपयन्-ग्लपयन् । म्लायतेय॑न्ताल्लटः शत्रादेशः। आदेच इत्यात्वे पुगागमः । अम्लाने म्लानसम्बन्धादतिशयोक्तिः ॥ १७॥ [ अन्वयः ] आश्लेषलोलुपवधूस्तनकार्कश्यसाक्षिणीम् वनमा- लाम् अभिमानोष्णैःमुखानिलैः म्लापयन् (-रामो जगाद)। [विग्रहः ] आश्लेषे लोलुपा आश्लेषलोलुपा, आश्लेपलोलुपा चासौ वधूश्च आश्लेषलोलुपवधूः, तस्याःस्तनौ आश्लेषलोलुपवधूस्तनौ । तयोःकार्कश्यं तस्य साक्षिणी आश्लेषलोलुपवधूस्तनकार्कश्यसाक्षिणी । ताम् । वनस्य माला वनमाला, वां वनमालाम् । अभिमानेन उप्णाः अभिमानोष्णाः, तैः अभिमानोष्णैः । मुखस्य अनिलाः मुखानिलास्तैः मुखानिलैः । [अर्थः] आश्लेषलोलुपवधूस्तनकार्कश्यसाक्षिणीम् = आलि- गनलुब्धरमणीकुचकुड्मलकाठिन्यसाक्षिणीम् । आलिङ्गनोत्सुक- यावत् । १५२ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- प्रमदास्तनमण्डलकाठिन्यस्य सूचयित्रीम् । यौवनोन्मदगाढा- लिङ्गनप्रवणप्रमदाजनस्तनैनिर्दयं पीडितामिति वनमालाम् - आपादविलम्बिनी पत्रपुष्पादिनिर्मितां मालाम् । अभिमानोष्णैः = अहङ्कारोष्मसन्तप्तैः । मुखानिलैः = निःश्वास- मास्तैः। उच्छवासानिलैः । म्लापयन् = ग्लपयन् । मालिन्यं प्रापयन । मलिनीकुर्वन् । (-रामो जगाद)। [ भावार्थः] सुरतसमयगाढालिङ्गनप्रवणप्रमदाकर्कशस्तनो- पमर्दितां वनमालां मुहुरभिमानसन्तप्तैनिःश्वासमारुतैर्मलिनी- कुर्वन् रामो जगाद। [ कोशः ] 'सुन्दरी रमणी रामा नारी सीमन्तिनी बधूः' इत्यमरः । 'आपादलम्बिनी माला वनमालेति कथ्यते' इति पुरुषोत्तमः । वाया स्नुषा स्त्री चे इत्यमरः । [वाच्यप०] वनमालां म्लापयता जगदे। [भाषाटीका ] आलिङ्गनोत्सुक प्रिया के स्तनों की कठिनता को अनु- मान करानेवाली वनमाला को अहङ्कार के कारण गर्म हुई निःश्वास वायु से और भी मलिन करते हुए-(बलरामजी यों बोले ) ॥ १७ ॥ दधत्सन्ध्यारुणब्योमस्फुरत्तारानुकारिणीः । द्विषद्द्वषोपरक्ताङ्गसङ्गिनीः स्वेदविषः ॥ १८ ॥ [ सर्वकषा ] दधदिति । पुनः सन्ध्यायामरुणे व्योम्नि स्फुरन्ती- स्तारा अनुफुर्वन्तीति तथोक्ताः । कुतः ? द्विषतः-शत्रो द्वेषेण-क्रोधेनो- परक्तेऽङ्ग वपुषि सङ्गिनीः-सक्ताः, स्वेदविषः-स्वेदबिन्दून् । 'पृषन्ति बिन्दुपृषताः पुमांसी विपुषः स्त्रियाम्' इत्यमरः । दधत्-दधानः । "नाभ्यस्ताच्छतुः' इति नुमभावः । उपमालङ्कारः ॥ १८ ॥ [अन्वयः ] सन्ध्यारुणव्योमस्फुरत्तारानुकारिणीः द्विषद्वेषो- परवाइसङ्गिनीः स्वेदविपुषः दधत् (-रामो जगाद)। [विग्रहः ] सन्ध्यायाम् अरुणं सन्ध्यारुणम्. सन्ध्यारुणञ्चतद्वयोम च- यावत् । १५२ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- प्रमदास्तनमण्डलकाठिन्यस्य सूचयित्रीम् । यौवनोन्मदगाढा- लिङ्गनप्रवणप्रमदाजनस्तनैनिर्दयं पीडितामिति वनमालाम् - आपादविलम्बिनी पत्रपुष्पादिनिर्मितां मालाम् । अभिमानोष्णैः = अहङ्कारोष्मसन्तप्तैः । मुखानिलैः = निःश्वास- मास्तैः। उच्छवासानिलैः । म्लापयन् = ग्लपयन् । मालिन्यं प्रापयन । मलिनीकुर्वन् । (-रामो जगाद)। [ भावार्थः] सुरतसमयगाढालिङ्गनप्रवणप्रमदाकर्कशस्तनो- पमर्दितां वनमालां मुहुरभिमानसन्तप्तैनिःश्वासमारुतैर्मलिनी- कुर्वन् रामो जगाद। [ कोशः ] 'सुन्दरी रमणी रामा नारी सीमन्तिनी बधूः' इत्यमरः । 'आपादलम्बिनी माला वनमालेति कथ्यते' इति पुरुषोत्तमः । वाया स्नुषा स्त्री चे इत्यमरः । [वाच्यप०] वनमालां म्लापयता जगदे। [भाषाटीका ] आलिङ्गनोत्सुक प्रिया के स्तनों की कठिनता को अनु- मान करानेवाली वनमाला को अहङ्कार के कारण गर्म हुई निःश्वास वायु से और भी मलिन करते हुए-(बलरामजी यों बोले ) ॥ १७ ॥ दधत्सन्ध्यारुणब्योमस्फुरत्तारानुकारिणीः । द्विषद्द्वषोपरक्ताङ्गसङ्गिनीः स्वेदविषः ॥ १८ ॥ [ सर्वकषा ] दधदिति । पुनः सन्ध्यायामरुणे व्योम्नि स्फुरन्ती- स्तारा अनुफुर्वन्तीति तथोक्ताः । कुतः ? द्विषतः-शत्रो द्वेषेण-क्रोधेनो- परक्तेऽङ्ग वपुषि सङ्गिनीः-सक्ताः, स्वेदविषः-स्वेदबिन्दून् । 'पृषन्ति बिन्दुपृषताः पुमांसी विपुषः स्त्रियाम्' इत्यमरः । दधत्-दधानः । "नाभ्यस्ताच्छतुः' इति नुमभावः । उपमालङ्कारः ॥ १८ ॥ [अन्वयः ] सन्ध्यारुणव्योमस्फुरत्तारानुकारिणीः द्विषद्वेषो- परवाइसङ्गिनीः स्वेदविपुषः दधत् (-रामो जगाद)। [विग्रहः ] सन्ध्यायाम् अरुणं सन्ध्यारुणम्. सन्ध्यारुणञ्चतद्वयोम च- , १५४ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- इत्यमरवचनात् । अत्रान्यरुचोऽन्यदीयत्वायोगात्सादृश्याक्षेपानि- दर्शनालङ्कारः ॥ १९॥ [अन्वयः] प्रोल्लसत्कुण्डलप्रोतपद्मरागदलत्विषा कृष्णोत्तरा- सङ्गरुचं चौतपल्लवीम् विदधत् (-रामो जगाद)। [विग्रहः ] कुण्डलयोः प्रोतानि कुण्डलमोवानि, पद्मरागस्य दलानि पद्मरागदलानि । कुण्डलप्रोतानि च तानि पद्मरागदलानि च कुण्डलपोतपद्म- रागदलानि, प्रोल्लसन्ति च तानि कुण्डलपोतपद्मरागदलानि चोहटन्सन्कुण्डल- प्रोतपद्मरागदलानि, तेषां त्विट् , तया-प्रोल्लसन्कुण्डलपोतपद्मरागदलन्धिपा। कृष्णं च तदुत्तरासङ्गं च कृष्णोत्तरासङ्गं, तस्य रुक, तां, कृष्णोत्तरासङ्ग- रुचम् । चूतपल्लवस्य इयम् चौतपल्लवी, ताम् चौतपल्लवीम् । [अर्थः] प्रोल्लसत्कुण्डलप्रोतपद्मरागदल त्विषा-प्रस्फुरत्कुण्ड- लस्यूतमाणिक्यखण्डकान्त्या। कृष्णोत्तरासङ्गरुचं-नीलोत्तरीयच्छ- विम् । उत्तरीयनीलाम्बरप्रभाम् । चौतपल्लवीम्-आम्रपल्लववद्ध- म्राम् । विदधत् कुर्वन् । कृष्णलोहिवर्णमम्पर्केण धूम्रवर्णात्पत्तः । (-रामो जगाढ)। [ भावार्थः] स्फुरत्कुण्डलयुगलपोत पद्मरागखण्डरक्तप्रभा- भिर्नीलोत्तरीयाम्बरप्रभां धूम्रां कुर्वन जगाद। कृष्णलोहितवर्ण- सम्मेलने धूम्रवर्णोत्पत्तिर्भवतीति लोकविदः । [कोशः ] 'द्वौ प्रावारोत्तरासङ्गो समौ वृहतिका तथा, संव्यानमुत्त- रीयञ्च' इत्यमरः । 'धूम्रधूमलौ कृष्लोहिते' इत्यमरः । [वाच्यप०] .चौतपल्लवीं विदधता ( रामेण जगदे)। [भाषाटीका ] कान के कुण्डलों में जडित चमकीले पचराग ( मानिक ) के खण्डों की ( लाल ) आभा से अपने नीले रंग के दुपट्टे की कान्ति को धूमिल वर्ण करते हुए (-बलरामजी बोले) ॥१९॥ ककुद्मिकन्यावक्त्रान्तर्वासलब्धाधिवासया । मस्खामोदं मदिरया कृतानुव्याधमुद्वमन् ।। २० ॥ [ सर्वकषा ] ककुद्मिति । पुनः ककुद्मिकन्याया रेवल्या वक्त्रस्य- सर्गः] , .. mma अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजिम्। अन्तरभ्यन्तरे वासेन-स्थित्या लब्धोऽधिवासो वासना यया तया । तन्मुखसौरभवासितयेत्यर्थः। 'संस्कारो गन्धमाल्याद्यैरधिवासनमुच्यते । मदिरया कृतानुव्याध-कृतसंसर्गम् । प्रियागण्डूषगन्धिनमित्यर्थः । 'व्यध- जपोरनुपसर्गे' इत्यनुपसृष्टादप्प्रत्ययविधानादुपसृष्टाद्वयधेप्रत्ययः । मुखामोदं-स्वमुखगन्धविशेषम् । 'आमोदः सोऽतिनिहारी' इत्यमरः । उद्वमन्नुगिरन् । अत्र मदिराराममुखगन्धयोः स्वगन्धतिरोधानेन रामा- मुखतद्गण्डूषमद्यगन्धस्वीकारात्तद्गुणयोस्तत्रोत्तरस्यात्मविशेषकत्वेन पूर्वसा- पेक्षत्वादङ्गाङ्गिभावेन सङ्करः । 'तद्गुणः स्वगुणत्यागादन्योत्कृष्टगुणाहृतिः' इति लक्षणात् ॥ २०॥ [अन्वयः] ककुद्मिकन्यावक्त्रान्तर्वासलब्धाधिवासया मदि- रया कृतानुव्याधम् मुखामोदम् उद्वमन् -(रामो जगाद )। [विग्रहः ] ककुझिनः कन्या ककुझिकन्या, ककुद्मिकन्याया वक्त्रं- ककुझिकन्यावक्त्रं, ककुझिकन्यावक्त्रस्य अन्त:-ककुझिकन्यावक्त्रान्तः, तत्र वासेन लब्धोऽधिवासो यया सा-ककुद्मिकन्यावक्त्रान्तर्वासलब्धा- धिवासा, तया । कृतोऽनुव्याधो येनाऽसौ कृतानुव्याधः, तम् कृतानुव्याधम् । मुखस्य आमोदः मुखामोदस्तम् मुखामोदम् । [अर्थः ] ककुद्मिकन्यावक्त्रान्तर्वासलब्धाधिवासया-रेवती- मुखान्तर्निवासलब्धवासनया रेवतीमुखपङ्कजान्तनिवासा- धिगतातिशयसौरभयोगया । मदिरया-सुरया । कृतानुव्याध%3 कृतससर्गम् । मुखामोदं = स्वमुखगन्धम् । उद्वमन्-उगिरन् । ('-रामो जगाद)। [ भावार्थः] रेवनीमुनगन्धाधिवासितया मदिरया कृत- संसर्ग स्वमुखामोदमुगिरन् रामो बभाषे। स्वप्रियागण्डूष- गन्धिनं मुखामोदमुद्रुमन्नुवाचेति यावत् । [ कोशः ] 'संस्कारो गन्धमाल्याद्यैरधिवासनमुच्यते' इत्यभिधानम् । 'आमोदः सोऽतिनिहर्हारी' इत्यमरः। [ वाच्यपरि०].........मुखामोदम् उद्वमता रामेण जगदे । भापाटीका ] रेवती के मुख में निवास करने से सुगन्धित हुई , m शिशुपालवधम् । [ २ दिनीय:- मदिरा की सुगन्ध से मिली हुई अपने मुख की सुगन्ध को फैलाते हुए ( बलरामजी यों बोले ) ॥ २० ॥ जगाद वदनच्छद्मपद्मपर्यन्तपातिनः । नयन्मधुलिहः श्वैत्यमुदग्रदशनांशुभिः ॥ २१ ॥ [ ८ कुलकम् ] [ सर्वङ्कपा] जगादेति । वदनमेव छद्म-कपटं यम्य तत्वाम् । वदनमेव पद्ममित्यर्थः । छद्मशब्देनासत्यत्वप्रतिपादनरूपोऽपह्नवः । तस्य 'पर्यन्तपातिनः-प्रान्तसञ्चारिणः । मधु लिहन्तीति मधुलिहस्तान्मथुपान् । क्विप् । उदग्रैरुच्छितैः दशनांशुभिः श्वैत्यं धावल्यं नयन्नेवं जगाद । तद्गुणालङ्कारः । तस्य सधुपसन्निधापकवदनापह्नवसापेक्षत्वात्तन सकारः ॥२१॥ [अन्वयः] वदनच्छद्मपद्मपर्यन्तपातिनः मधुलिहः उदन- दशनांशुभिः श्वैत्यं नयन ( -रामो जगाद)। [विग्रहः ] वदनमेव च्छद्म यस्य तत् वदनच्छद्म, बदनच्छम च तत् पद्मं च वदनच्छद्मपद्म, तस्य पर्यन्ते पतन्ति तच्छीला:-बदनच्छा पद्मपर्यन्तपातिनः, तांस्तथाभूतान् । मधु लिहन्ति मधुलिहः, तान् मधुलिहः। दशनानाम् अंशवः दशनांशवः, उदग्राश्च ते दशनांशवश्च उदग्रदशनांशवः, तैः-उदग्रदशनांशुभिः । [अर्थः] वदनच्छद्मपद्मपर्यन्तवासिनः = वदनव्याजपा- प्रान्तचारिणः। मुखकमलप्रान्तवर्तिनः। मधुलिहः-भ्रमरान् । उदग्रदशनांशुभिः-उच्छ्तिदन्तकिरणैः । श्वैत्यं धावल्यम् । नयन प्रापयन् रामः । जगाद-उवाच । [ भावार्थः] मुखपद्मामोदलुब्धमधुपान् उदप्रदत्तकिरणैः चैत्यं लम्भयन् रामो जगाद। [ कोशः ] 'कपटोऽस्त्री व्याजदम्भोपधयश्छमकैतवे इत्यमरः। वक्त्रास्ये वदनं तुण्डमाननं लपनं मुखम्' इत्यमरः । 'वा पुंसि पचं नलिनमरविन्द महोत्पलम्' इत्यमरः । 'मधुव्रतो मधुकरो मधुलिण्मधुपाऽलिनः' इत्यमरः ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १५७. [ वाच्यप० ]......... श्वैत्यं नयता रामेण जगदे। [भाषाटीका ] मुखकमल के पास घूमनेवाले काले भ्रमरों को अपनी दन्तकिरणों से श्वेत करते हुए बलरामजी यों बोले ॥ २१ ॥ रामो जगादेत्युक्तम् । किं तदित्याकाङ्क्षायामाह- यद्वासुदेवेनाऽदीनमनादीमवमीरितम् । वचसस्तस्य सपदि क्रिया केवलमुत्तरम् ॥ २२ ॥ [ सर्वकषा ] यदिति । वासुदेवेन-न दीनमित्यदीनमकातरं, नादी- नवोऽस्येत्यनादीनवं-निर्दोषम् । 'दोप आदीनवो मतः 'इत्यमरः ।। यद्वच ईरितम् । 'उत्तिष्ठमानस्तु परः' इत्यादिपक्षमाश्रित्य यदुक्तमित्यर्थः। तस्य वचसः सपदि क्रिया केवलं-सद्योऽनुष्ठानमेवोत्तरम् । सिद्धान्तस्यैवोक्तत्वादिति भावः ॥ २२ ॥ [अन्वयः] वासुदेवेन अदीनम् ।अनादीनवं यद् ईरितम् तस्य वचसः सपदि क्रिया केवलम् उत्तरम् । [विग्रहः ] न दीनम् अदीनम् । नास्ति आदीनवो यस्य तत्- अनादीनवम् । [अर्थः] वासुदेवेन-अच्युतेन । कृष्णोन अदीनम् अकातरम् । अनादीनवं = निर्दोषम् । यत='उत्तिष्ठमानस्त्वि' त्यादि यद्वचः । ईरितम् उक्तम् । तस्य वचसः = तस्य वाक्यस्य । सपदि = सद्यः । क्रिया= अनुष्ठानमेव । केवलम् = एकम् । उत्तरम् = उत्तरकालकर्त्तव्यम् , नान्यदित्यर्थः । [ भावार्थः] हरिणा यदुक्तं तत्सद्योऽनुष्ठे यं, नात्र विचारः कार्यः । शत्रुनोंपेक्ष्यः । अतो द्राक्चैद्याभियानमनुष्ठयम् । [ कोशः ] ' वाच्यवदुर्गते भीते दीनम् ' इति मेदिनी । 'दोष आदीनवो मतः ' इत्यमरः । [वाच्यप० ]... वासुदेव ईरितवान् । केवलम् क्रियया उत्तरेण (भूयते) ।
शिशुपालवधम् । [२ द्वितीय.- १५८ .. - [ भाषाटीका ] श्रीकृष्णने जो कहा है वह सर्वथा युक्त और उचित है उसके बाद तो केवल उसका अनुष्ठान (करना) ही है, और दृसर विचार की आवश्यकता ही नहीं है॥ २२ ॥ अथ तदेव प्रतिपादयिष्यन्ननन्यातिशयतयोपस्करोति- नैतल्लध्वपि भूयस्या वचो वाचाऽतिशय्यते । इन्धनौषधगप्यग्निस्त्विषा नात्येति पूषणम् ॥ २३ ।। [ सर्वकषा] नैतदिति । लघु-सङ्क्षिप्तमप्येतद्वचो भूयस्या- बहुतरया । विस्तृतयापीत्यर्थः । — द्विवचनविभज्य--' इत्यदिना ईयमुनि 'बहलोपो भू च बहोः' इतीकारलोपो, बहोश्च भूरादेशः । वाचा नाति- शय्यते-नातिरिच्यते । गुर्वर्थत्वादिति भावः । शीडः कर्मणि लटि यक् । 'अयङ् यि क्ङिति' इत्ययङादेशः। तथाहि-इन्धनौघान्दहतीतीन्धनौषधक्- काष्ठराशिदाहकः । भूयानपीत्यर्थः । विपि घत्वधवभभावाः। अग्नि- स्त्विषा-प्रभया, पूषणं-सूर्यम् । अल्पीयांसमपीति भावः । नात्येति- नातिकामति । तेजसः प्रभावत्वमिव वचसोऽर्थवत्त्वमलङ्घ-यन्वहंतुरित्यर्थः । अत्र समानधर्मबिम्वबिम्बिततया दृष्टान्तालङ्कारः ॥ २३ ॥ [अन्वयः ] लघु अपि एतद्वचः भूयस्या वाचा नातिशय पते इन्धनौषधक अपि अग्निः विषा पूषणं न अत्येति । [विग्रहः ] इन्धनानामोधः इन्धनोधः, तं दहतीति इनौषधक । [अर्थः ] लघु अपि स्वल्पमपि । सक्षिपश्च । एतद्वचः श्रीकृष्णोक्त वचः। भूयस्या = विस्तृतयाऽपि । विपुलयाऽपि । वाचा = अस्मदादिगिरा । नातिशय्यते नोल्लयितु शक्यते। न तिरस्कत्तुं शक्यते । तथाहि ---इन्धनौषधगपि = काष्ठराशि- दाहकोऽपि । भूयानपि । अग्निः = पावकः । विषा - स्वप्रभया • पूषणं = भास्करम् । सल्पमपि सूर्यम् । नात्येति नातिकामति । न पराभवितु शक्नोति । भावार्थः] सङ्क्षिप्रमपि युक्तियुक्त निर्दुष्ट वासुदेवस्य वचोड . m सर्गः] - अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १५६ तिगम्भीरार्थ विस्तृतयाऽप्यस्मदादिवाचा तिरस्कर्तुं न शक्यते । न महानपि पावको भास्करं भासा तिरस्कर्तुं प्रभवति । तदलं विचारणया, श्रीकृष्णोक्तमेव सपद्यनुष्ठेयम् । [ कोशः ] 'स्युः प्रभारुधिविड़भाभाश्छविद्युतिदीप्तयः' इत्यमरः । 'काष्ठं दाविन्धनं त्वेधः' इत्यमरः । 'मिहिरारुणपूषणः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] लघु अपि एतद्वचः भूयसी वाग नातिशेते। इन्धनौघ- दहाऽप्यग्निना विषा पूषणो नातीयते । [ भाषाटीका ] श्रीकृष्ण ने संक्षिप्त पर युक्तियुक्त जो बातें कही हैं, वे लंबी चौड़ी दूसरे लोगों की बातों से भी काटी नहीं जासकती हैं । क्या अग्नि भी अपने तेज से सूर्य को दबा सकता है ? नहीं ॥ २३ ॥ यदि हरिवचो नातिशय्यते, अलं तर्हि तवापि वागारम्भैरत आह- सङक्षिप्तस्याप्यतोऽस्यैव वाक्यस्यार्थगरीयसः । सुविस्तरतरा वाचो भाष्यभूता भवन्तु मे ॥ २४ ॥ [सर्वकषा] सक्षिप्तस्येति । अतो हरिवचसोऽनतिशयनीयत्वादेव, सुविस्तरतरा:-प्रपञ्चतराः । 'प्रथने वावशब्दे' इति घनः प्रतिषेधे 'ऋदोरप्' इत्यप् । मे वाचः सक्षिप्तस्याल्पाक्षरस्याप्यर्थेन गरीयसः। सूत्रकल्पस्येत्यर्थः । 'अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम् । अस्तोभमनवचं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥ इति लक्षणात् । अस्यैव वाक्यस्य नान्यस्य । भाष्यभूता--भाष्यैः समाः । नित्यसमासः । 'क्ष्मादी जन्तौ भूतं क्लीबं समेऽतीते चिरे त्रिषु' इति वैजन्ती। व्याख्यानरूपा भवन्त्वित्यर्थः। सूत्रव्या- ख्यानविशेषो भाष्यम् । “सूत्रस्थं पदमादाय वाक्यैः सूत्रानुसा. रिभिः । स्वपदानि च वय॑न्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ।। इति । मया तु तदेव विशेषप्रकाशनाय व्याख्यायते, नत्वतिशयाय प्रत्या- ख्यायत इत्यदोष इत्यर्थः । उपमालङ्कारः ॥ २४ ॥ [अन्वयः ] अतः सुविस्तरतरा मे वाचः सङ्क्षिप्तस्यापि अर्थगरीयसः अस्यैव वाक्यस्य भाष्यभूता भवन्तु शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः- [विग्रहः ] अर्थेन गरीयः अर्थगरीयः, तस्य अर्थगरीयसः । भाप्येण तुल्याः भाष्यभूताः। [ अर्थः] अतः = वासुदेवगिरोऽनतिशयनीयतयैव । हरि- वचसो युक्तियुक्ततया, औचित्येन च । सुविस्तरतराः = विपुल- तराः । नितरां विस्तृताः । मे = मम । वाचः = वक्ष्यमाणा गिरः। सङ्क्षिप्तस्यापि = अल्पाक्षरस्यापि । लवुतरस्यापि । अर्थगरी. यसः = अभिधेयगरिष्ठम्य । अर्थगौरवशालिनः । अस्यैव वासुदेवोक्तस्य । वाक्यस्य = वचसः । भाप्यभूताः = व्याख्यान- स्थानीयाः । भाष्यरूपाः। भवन्तु = सन्तु । श्रीकृष्णोक्तस्यैवाह समर्थनं करिष्यामीत्यर्थः । [ भावार्थः] तद्यक्तिसङ्गतानां निर्दुष्टानामर्थगरीयसीनां श्रीकृष्णोक्तीनामेव समर्थनाय किञ्चिदहं वच्मि । [ कोशः] 'विस्तारो विग्रहो व्यासः स तु शब्दस्य विस्तरः' इत्यमरः । [ वाच्यपरि० ] सङ्क्षिप्तस्याप्यतोऽस्यैव वाक्यस्य सुविस्तरतराभिः में वाग्भिाष्यभूताभिर्भूयताम् । [ भाषाटीका ] अतः श्रीकृष्ण को संक्षिप्त पर अर्थगुर्वी उक्तियों की व्याख्या करने के लिए ही मैं कुछ विस्तारपूर्वक कहता हूँ। अर्थात् अपनी युक्तियों से श्रीकृष्ण के पक्ष का उपपादन ही करना चाहता हूँ ॥ २४ ॥ इत्थं यानं सिद्धान्तयित्वा तत्रोद्धवप्रतिरोधं हृदि निधाय त्रिभिःप्रन्याचष्टे- विरोधिवचसो मुकान्वागीशानपि कुर्वते । जडानप्यनुलोमार्थान्प्रवाचा कृतिनां गिरः ॥ २५ ॥ [ सर्वकषा ] विरोधीते । कृतिनां--कुशलानां, गिरः कत्र्यः । विरोधिवचसः-प्रतिकूलवादिनो, वागीशान्वाक्पतीनपि । 'वागीशो वाक्पतिः समौ' इत्यमरः । मूकानिर्वाचः कुर्वते । जडयन्तीत्यर्थः । अनुलोमोऽनुकूलोऽर्थोऽभिधेयं येषां तेऽनुकूलार्थाः--अनुकूलवादिनः । ताञ्जडान्मन्दानपि, प्रवाचः-प्रगल्भवाचः कुर्वते। अतोऽस्मगिरः प्रवाच्या सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विरजितम् । १६१ द्दति भावः । अत्र वागीशानां मूकीकरणाजडानां प्रवाक्त्वकरणाच अशक्य- वस्तुकरणरूपो विशेषोऽलङ्कारः, असम्बन्धे सम्बन्धातिशयोक्तिप्रतिभोत्था- पित इति सङ्करः ॥ २५ ॥ [अन्वयः] कृतिनां गिरः ( कर्यः- ) विरोधिवचसः वागी- शानपि मूकान् कुर्वते । अनुलोमार्थान् जडान अपि प्रवाचः कुर्वते। [विग्रहः ] विरोधि वचो येषां ते विरोधिवचसः, तान् । अनुलोमोऽर्थो येषां ते अनुलोमार्थास्तान् अनुलोमार्थान् । प्रकृष्टा वाचो येषान्ते प्रवाचः, तान् । [अर्थः ] कृतिनां = कुशलानाम् । वाक्पटूनाम् । गिरः वाचः-( कर्यः)। विरोधिवचसः = प्रतिकूलभाषिणः । विरुद्ध- वाक्यान्। वागीशान् = वाक्पतीनपि । बृहस्पतिसमानपि। मूकान् = निर्वाचः। जडान् । कुर्वते = विद्धति । अनुलोमा- र्थान् = अनुकूलवादिनः। स्वानुयायिनस्तु । जडानपि-मन्दमती- नपि । मन्दवाचोऽपि । प्रवाचः = प्रगल्भवाचः । पटुवाक्यान् । कुर्वते = विदधति । तदेव मद्वाचो विरोधिनो विदुषो मूकान् करिष्यन्ति,अनुकूलान्मन्दमतीनपि प्रगल्भतां प्रापयिष्यन्तीत्यर्थः। [भावाथः] प्रगल्भानि मदचांसि विरोधिनां वाक्यजालानि जडयिष्यन्ति, अनुकूलवादिनश्चोत्साहयिष्यन्ति । [कोशः ] 'अवाचिमूकः' इत्यमरः । 'वागीशो वाक्पतिः समौ' इत्य- मरः । 'कृती कुशल इत्यपि' इत्यमरः । [वाच्यप० ] कृतिनां गीर्भिः-विरोधिवचसः वागीशा अपि मूकाः क्रियन्ते, अनुलोमार्था जडा अपि-प्रवाचः क्रियन्ते । [ भाषाटीका ] कुशल वक्ता-अपनी वाणी से विरोधी बड़े २ वक्ताओं को भी चुप कर देता है, तथा अपने पक्षपाती जडमतियों को भी प्रगल्भ बना देता है ॥ २५॥ नन्वात्मनीनेन स्वामिना 'बुद्धः फलमनाग्रहः' इति न्यायेन शास्त्रज्ञ- वचनं प्रतिकूलमपि ग्राह्यमेवेत्याशङ्कयाह- ११ ..
। १६२ शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः- पड़ गुणाः शक्तयस्तिस्रः सिद्धयश्चोदयास्त्रयः। ग्रन्थानधीत्य व्याकर्तुमिति दुर्मेधसोऽप्यलम् ॥२६॥ [ सर्वकषा ] षडिति । दुष्टा मेधा येषां ते दुर्मेधसः-मन्दबुद्धयोऽपि। 'नित्यमसिच्अजामेधयोः इति समासान्तोऽसिच्प्रत्ययः। ग्रन्थानौशनसादी- नधीत्य-पठित्वा । गुणाः-सन्धिविग्रहयानासनद्वैधीभावसमाश्रयाख्याः षट् । शक्तयः-प्रभुत्वमन्त्रोत्साहाख्यास्तिस्रः। सिद्धयः-पूर्वोक्तशक्ति- त्रयसाध्याः पुरुषार्थलाभात्मिकाः, ताश्च तिस्त्रः-प्रभुसिद्धिमन्त्रसिद्धिरुन्साह- सिद्धिश्चेति । उदयाः-वृद्धिक्षयस्थानानि छविन्यायनोदया उच्यन्ते । तत्र-वृद्धिक्षयो स्वशक्तिसिद्धयोः, पूर्वावस्थानाडुपचयापचयो स्थानं ते च त्रय इति व्याकर्तु-व्याख्यातुमलं-समर्थाः । 'पर्याप्तिवचनेबलम- थेषु' इति तुमुन् । पञ्चाङ्गनिर्णयशक्तिविकलानां सन्ध्यादिरूपसङ्ख्यामा- त्रपाठकानामशास्त्रज्ञत्वादुद्धनादयोन ग्राह्यवचना इत्यभिसन्धिः।अत्रामरः-स- न्धिर्ना विग्रहो यानमासनं द्वैधमाश्रयः।पड् गुणाः शक्तयस्तिस्रः प्रभावोन्साह- मन्त्रजाः । क्षयः स्थानं च वृद्धिश्च त्रिवर्गो नीतिवेदिनाम् ॥ इनि नत्रारिबि- जिगीष्वोर्व्यवस्थाकरणमैक्यं सन्धिः। विरोधी विग्रहः । विजिगीपाररि प्रति यात्रा यानम् । तयोमिथः प्रतिवद्धशक्तयोः कालप्रतिक्षया तूपणीमव- स्थानमासनम् । दुर्बलप्रबलयोर्वाचिकमात्मसमर्पणं द्वैधीभावः । अरिणा पीड्यमानस्य बलवदाश्रयणं-संश्रयः। कोशदण्डोत्थं तेजः--प्रभावः । कर्तव्यार्थेषु स्थेयान्प्रयत्न-उत्साहः । षड्गुणचिन्तनं मन्त्रः । गतमन्यदिति सङ्क्षपः ॥ २६॥ [ अन्वयः] दुर्मेधसः अपि-ग्रन्थान् अधोत्य-गुणाः पट, शक्तयः तिस्रः, सिद्धयः तिस्रः, उदयाः त्रयः इति व्याकर्तुम् अलम् । [विग्रहः ] दुष्टा मेधा येपान्ते दुर्मेधसः । [अर्थः ] दुर्मेधसोऽपि = मन्दबुद्धयोऽपि । जडमतयोऽपि । अध्ययनमात्रपरायणा अपि प्रतिभाशून्याः । ग्रन्थान = नीति. अन्यान् । औशनसबार्हस्पत्यादिनीतिशास्त्राणि । अधीत्य = पठित्वा । गुणाः सन्धिविग्रहयानासनद्वैधीभावसमाश्रया = इत्थं । व्याकत्तु सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । गुणशब्दवाच्याः । षट् = षडेव । शक्तयः प्रभुत्वमन्त्रो- साहाख्याः शक्तिपदवाच्याः। तिस्रः = तिस्त्र एव । सिद्धयः= प्रभावमन्त्रोत्साहशक्तित्रयसाध्याः पुरुषार्थलाभात्मिकाः प्रभु- त्वसिद्धिमन्त्रसिद्धयुत्साहसिद्धिरूपाः । तिस्रः = तिस्र एव है उदयाः = स्वशक्तिसिद्धयोः वृद्धिः क्षयोऽन्येषामवस्थानचेत्ये- वरूपाः । त्रयः = त्रय एव । इति नीतिमार्ग व्याख्यातुम् । अलं = समर्थाः । [ भावार्थः] नीतितत्त्वज्ञानशून्या अपि स्वाधीतग्रन्थमात्र- सारा मूढा नीतेः स्थूलान् विषयान्परिगणयितु वक्तुच समर्थाः। परं नीतितत्वविदस्त्वतितरां दुर्लभा एव । [कोशः ] ' सन्धिर्ना विग्रहो यानमानसनं द्वैधमाश्रयः । षडगुणा इत्यमरः । 'शक्तयस्तिस्रः प्रभावोत्साहमन्त्रजाः' इत्यमरः । 'क्षयः स्थानञ्च बृद्धिश्च त्रिवर्गों नीतिवेदिनाम् ' इत्यमरः । [वाच्यप०] दुर्मेधोभिरपि ग्रन्थान् अधीत्य व्याकर्तुम् अलम् (भूयते) [ भाषाटीका जिनको नीति के तत्त्व का कुछ भी ज्ञान नहीं है ऐसे स्थूलबुद्धि लोग भी पढ़े हुए नीति ग्रन्थों के आधार से--सन्धि आदि ६ गुण होते हैं । प्रभावादिजनित तीन शक्तियाँ होती हैं। और सिद्धियाँ (शक्तियाँ से लाभ) तीन होती हैं । तीन ही उदय (शक्ति और सिद्धि की वृद्धि स्थिरता और हानि ) होते हैं । इस प्रकार मोटी २ बातें कह सकते हैं। पर नीति के गूढ़ तत्त्व को समझना और कहना बड़ा कठिन है ॥२६॥ ननु शास्त्रोक्तार्थव्याख्यातैव शास्त्रज्ञः, स एव ग्राह्यवचनश्चेत्याशङ्कयाह- अनिलोडितकार्यस्य वारजालं वाग्मिनो वृथा । निमित्तादपराद्ध षोधानुष्कस्येव वलिगतम् ॥ २७ ॥. [सङ्कषा ] अनिर्लोडितेति । अनिर्लोडितं नालोकितं कार्य येन तस्य । कार्याकार्यमजानत इत्यर्थः। वाचोऽस्य सन्तीति वाग्मी वाक्दूकः । 'वाचो युक्तिपटुग्मिी वावदकोऽतिवक्तरिः इत्यमरः । 'वाचो ग्मिनिः' इति ग्मिनिप्रत्ययः । तस्य वाग्जालं-वागाडम्बरो, निमित्ताल्लक्ष्यात् । 'वेध्यं शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- - .. लक्ष्यं निमित्तं चशरव्यं च समं विदुः' इति वैजयन्ती। अपराद्धषोः स्खलितबाणस्य । धनुः प्रहरणमस्येति धानुष्को-धन्वी । 'प्रहरणम्' इति ठक् । 'इसुसुक्तान्तात्कः'। 'अपराद्धपृषकोऽसौ लक्ष्याद्यश्युतसायकः । 'धन्वी धनुष्मान्धानुष्कः' इत्यमरः । तस्य वल्गितमिव वृथा-निष्फलम् । कार्यज्ञस्य वचो ग्राह्यं न तु वाचालस्येति भावः ॥२७॥ [अन्वयः] अनिलोडितकार्यस्य वाग्मिनः वाग्जालम्-निमि- त्तादपराद्धेषोः धानुष्कस्य वल्पितमिव-वृथा । [विग्रहः ] न निर्लोडितम् अनिर्लोडितम्, अनिर्लोडितं कार्य यनामी अनिलोडितकार्यः, तस्य । अपराद्धः इपुर्यस्यासौ अपराद्धेपुः, तस्य अपरा- देषोः । धनुः प्रहरणमस्य धानुष्कः, तस्य-धानुष्कस्य । [अर्थः ] अनिर्लोडितकार्यस्य अनवलोकितकार्यस्य । अविवारितकार्यस्य । कार्याकार्यमजानतः। वाग्मिनः = वावदृ- कस्य केवलं । भापणपरस्य । वाग्जालं = वागाडम्बरः । वाक्प्र- बन्धः। निमित्तात् = लक्ष्यात् । अपराद्धेपोः = स्खलिनशरस्य । च्युतबाणस्य । धानुकस्य = धन्विनः । बल्गितमिव = जल्पित- मिव । आत्मश्लाघेव । वृथा-मुधैव । निष्फलमेव । निरर्थकमेव । [ भावार्थः ] अविचारितका कार्यस्य केवलं वावदूकस्य- वल्गितं लक्ष्याच्च्युतसायकस्य धन्विनो वल्गितमिव--वृथव । अतो विचारमेवादौ कृत्वा कार्य करणीयं, कार्य विनाशित हेतुप्रदर्शनादिकं वृथैवेत्याशयः । [कोशः ] 'वेध्यं लक्ष्य निमित्तञ्च शरव्यञ्च समं विदुः' इति यादवः । 'अपराद्धपृषत्कोऽसौ लक्ष्यायश्च्युतसायकः' इत्यमरः । “धन्वी धनुष्मान् धानुका इत्यमरः। [वाच्यप० ] अनिलोडितकार्यस्य वाग्मिनो वाग्जालेन निमित्तान अपराद्धषोर्धानुष्कस्य वलिगतेनैव वृथा भूयते । [ भाषाटीका] बिना विचारे काम करनेवाला व्यनि---कार्य के बिमड़ जाने पर कितनी भी युक्तियाँ दिया करे पर उसका कहना वैसे ही - सर्गः अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १६५ निष्फल है जैसे लक्ष्य पर बाण नहीं लगने पर धानुष्क का अपने पक्ष के समर्थन में गाल बजाना ॥ २७ ॥ इत्थं 'पाड्गुण्यादिपाठमात्रं न मन्त्र' इति सिद्ध सम्प्रति स्वयं मन्त्रस्वरूपमाह- सर्वकार्यशरीरेषु रक्त्वाऽङ्गस्कन्धपञ्चकम् । सौगतानामिवात्मान्यो नास्ति मन्त्रो महीभृताम् ॥ २८ ।। [सर्वकषा] सर्वेति । सर्वाणि कार्याणि सन्ध्यादीनि तानि शरीराणी- वेत्युपमितसमासः । व्यासे सौगतानामिवेति लिङ्गात् । तेषु सर्वकार्यशरीरेषु। सर्वेषु शरीरेग्विव सर्वकार्येवित्यर्थः।अगानिस्कन्धा इवेत्युपमितसमासः। तेषां पञ्चक मुक्त्वा स्कन्धपञ्चकमिवाङ्गपञ् कहिलेत्यर्थः पञ्चपरिमाणमस्येति पञ्चकम् । 'सङ्ख्यायाः सज्ञासङ्घसूत्राध्ययनेषु इति कप्रत्ययः। सुगतो भक्ति- र्भजनीय एषां सौगता बौद्धाः । 'भक्तिः' इत्यणप्रत्ययः। तेषामन्य आत्मेव महीभृतामन्यो मन्त्रो नास्ति । कर्मणामारम्भोपायः, पुरुषद्रव्यसम्पत्, देशकालविभागः, विपत्तिप्रतीकारः, कार्यसिद्धिश्चेति पञ्चाङ्गानि । यथाह कामन्दकः-'सहायाः साधनोपाया विभागो देशकालयोःविपत्तेश्च प्रतीकारः सिद्धिः पञ्चाङ्गमिष्यते ॥” इति । रूपवेदनाविज्ञानसञ्जासंस्काराः पञ्च स्कन्धाः । तत्र विषयप्रपञ्चो रूपस्कन्धः, तज्ज्ञानप्रपञ्चो वेदनास्कन्धः, आलयाविज्ञानसन्तानो विज्ञानस्कन्धः, नामप्रपञ्चः संज्ञास्कन्धः, वासना- प्रपञ्चः संस्कारस्कन्धः। एवं पञ्चधा परिवर्तमानो ज्ञानसन्तान एवात्मा इति बौद्धाः । एवं यथा बौद्धानां सर्वेषु शरीरेषु स्कन्धपञ्चकातिरिक्त आत्मा नास्ति, तथा राज्ञामङ्गपञ्चकातिरिक्तो मन्त्रो नास्तीत्युपमाऽलङ्कारः । तच्चा- स्माकं समग्रमेवेत्ययमेव यात्राकाल इति भावः ॥ २८ ॥ [अन्वयः ] सर्वकार्यशरीरेपु अङ्गस्कन्धपञ्चकं मुक्त्वा सौग- तानाम् अन्यः आत्मा इव महीभृताम् अन्यः मन्त्रो नास्ति । [विग्रहः ] (नीतिपक्षे-) सर्वाणि च तानि कार्याणि च सर्वकार्याणि, सर्वकार्याणि शरीराणीव सर्वकार्यशरीराणि। तेषु । (अन्यत्र-) सर्वकार्याणीव शरीराणि, तेपु इति विग्रहः । अङ्गानि स्कन्धा इव अङ्गस्कन्धाः । (अन्यत्र- शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- - । अङ्गानीव स्कन्धाः, अङ्गस्कन्धाः । तेषां पञ्चकम् अङ्गस्कन्धपञ्चकम् । सुगतो भक्तियेषां ते सौगताः। [अथः] सर्वकार्यशरीरेषु सर्वेषु शरीरेष्विव सर्वेपु सन्धि- विग्रहादिषु कार्येषु कार्येषु । अङ्गस्कन्धपञ्चकं = अगस्कन्धपञ्चकं = रुपवेदनाविज्ञान- संज्ञासंस्काराख्यस्कन्धपञ्चकमिव कारम्भोपाय-पुरुषद्रव्य- सम्पत् – देशकालविभाग विपत्प्रतीकार कार्यसिद्धिरूप- मङ्गपञ्चकम् । मुत्त्वा = हित्वा । परित्यज्य । सौगतानां बौद्धानाम् । अन्यः = स्कन्धपञ्च कातिरिक्तः । आत्मेव = आत्म- पदवाच्य इव । (यथा तेषामन्य आत्मा नास्ति तथा--) महीभृतां = राज्ञाम् अन्यः = उक्ताऽङ्गपञ्चकातिरिक्तः । मन्त्रः = मन्त्रपदवाच्यः । नास्ति = नैवास्ति । न विद्यते । सौग. तानां यथा स्कन्धपञ्चकमेवात्मा तथा राज्ञामङ्गपञ्चकमेव मन्त्र इत्यर्थः। [भावार्थः ] सौगतानामङ्गस्कन्धपञ्चकमेव यथाऽत्मा तथा राज्ञां कर्मारम्भोपायाद्यङ्गपञ्चकमेव मन्त्रः। [ कोशः ] 'शरीरं वर्म विग्रहः' इत्यमरः । 'सहायाः साधनोपाया विभागो देशकालयोः । विपत्तेश्च प्रतीकारः सिद्धिः पञ्चाङ्गमिप्यते' इति कामन्दकः । [बाच्यप०] सर्वकार्यशरीरेपु अङ्गस्कन्धपञ्चकं मुक्त्वा अन्येन आन्मना इव महीभृताम् अन्येन मन्त्रेण न भूयते । [ भाषाटीका ] जैसे बौद्धों के मत में रूप आदि पांच स्कन्धों से अलग आत्मा कोई वस्तु नहीं है (किन्तु रूपादि पांच स्कन्ध ही आग्मा है ) वैसे ही राजाओं का भी पांच अङ्गों अलग मन्त्र कोई वस्तु नहीं है. ( किन्तु कर्भारम्भोपाय आदि पांच अङ्ग ही मन्त्र है। ) ॥ २८ ॥ अथ मन्त्रितार्थक्रियाविलम्बे दोषमाह- मन्त्रो योध इवाऽधीरः सर्वाङ्गः संवृतैरपि । चिरं न सहते स्थातु परेभ्यो भेदशङ्कया ॥ २६ ॥ - सर्गः ] १६७ अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [ सर्वकषा] मन्त्र इति । संवृतैर्गुप्तैः सर्वाङ्ग:-पूर्वोक्तैरुपायादि- भिरुरःस्थलादिभिश्वोपलक्षितोऽपि । सर्वाङ्गसंवृतोऽपीत्यर्थः । मन्त्रो- विचारः । अधीरो--भीरः । युध्यत इति योधो-भट इव । पचाद्यच् । परेभ्योऽन्येभ्योऽरिभ्यश्च । 'परं दूरान्यमुख्येषु परोऽरिपरमात्मनोः' इति वैजयन्ती। भेदो--विदारणं, तृतीयगामित्वं च, तस्य शङ्कया चिरं स्थातुम् । विलम्बिनुमित्यर्थः । न सहते--न क्षमः । 'शकटप-' इत्यादिना तुमुन्प्रत्ययः । अतो न विलम्बितव्यम् , अन्यथा मन्त्रभेदे कार्यहानिः स्यादिति भावः ॥ २९॥ [ अन्वयः] संवृतैः सर्वाङ्गः (-उपलक्षितोऽपि ) मन्त्रः अधीरः योध इव परेभ्यो भेदशङ्कया चिरं स्थातुं न सहते । [विग्रहः ] युद्धयते इति योधः । न धीरः अधीरः । [ अर्थः] संवृतः सुगुप्तः । सुरक्षितैः । सर्वाङ्ग : उपायादिभिः सर्वाङ्गः। उरोवक्षस्थलादिभिश्च सकलैरङ्गः। उपलक्षितोऽपीति शेषः । सर्वाङ्गसंवृतोऽपीत्यर्थः । मन्त्रः विचारः । अधीरः भीरुः । कातरः । योष इव-भट इव । सैनिक इव । परेभ्यः अन्येभ्यः। शत्रुभ्यश्च । भेदशङ्कया विदोरणशङ्कया। तृतीयलोककर्णगामित्व- भीत्या, अन्यावगमनाशङ्कया च । चिरंबहुकालं यावत् । स्थातुम्- अवस्थातुम् । विलम्बितुम् । न सहतेन क्षमते। न समर्थः। [ भावार्थः] सर्वतः सुरक्षितोऽपि मन्त्रः-कवचादिना सुरक्षितोऽप्यधीरो भट इव-परेभ्यो भेदशङ्कया चिरं स्थातु न शक्तः । अतस्त्वरया चैद्योऽभियातव्यो नात्र विलम्बो विधेयः । [कोशः] 'मन्त्रां वेदविशेपे स्यादेवादीनाञ्च साधने । गुह्यवादेऽपि च पुमान्' इति मेदिनी । 'भटा योधाश्च योद्धारः' इत्यमरः। 'अधीरे कातरः इत्यमरः । ‘परं दूरान्यमुखेषु परोऽरिपरमात्मनोः' इति वैजयन्ती। [ वाच्यप० ] संवृतैः सर्वाङ्गः (-उपलक्षितेन) अपि मन्त्रेण अधीरेण योधेनेव परेभ्यो भेदशङ्कया चिरं स्थातुं न सह्यते ।
१६८ शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः- - [ भाषाटीका ] यदि मन्त्र (गुप्तसलाह) के सभी अङ्ग (उपाय आदि पाँचो अङ्ग) गुप्त रखे जायँ तोभी वह ज्यादा देर तक गुप्त नहीं रह सकता, जैसे कवच आदि से सन्नद्ध भी कायर सिपाही ज्यादा समय तक युद्ध में शत्रुओं के बीच नहीं ठहर सकता ॥ २९ ॥ किञ्च नीतिसर्वस्वपर्यालाचनयापि न विलम्बः कार्य इत्यभिप्रेत्याह- आत्मोदयः परज्यानिर्द्धयं नीतिरितीयती। तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्य प्रतायते ॥ ३० ।। [ सर्वकषा] आत्मोदय इति । श्रात्मन उदयो-वृद्धिः, परस्य-शत्रोः, यानिः-हानिः । 'वीज्याहाज्वरिभ्यो निः' इत्योणादिको निः प्रत्ययः । इति द्वयम् । इदं परिमाणमस्या इति इयती-एतावनी । 'किमिदम्भ्यां वो धः' इति चतुपो वस्थ घश्च । 'उगितश्च' इति कीपू । नीतिः-नीतिसङ्ग्रहः। एतद्वयातिरिक्तो न कश्चिन्नीतिपदार्थोऽस्तीत्यर्थः । यदन्यत्षाड्गुण्यादिवर्णनं तत्सर्वमस्यैव प्रपञ्च इन्याह-तदिति । तद्वय- मूरीकृत्य-अङ्गीकृत्य । 'उरीकृतमुररीकृतमङ्गीकृतम्' इत्यमरः । 'ऊर्यादि- विडाचश्च' इति गतिसज्ञायां 'कुगति - दयः' इति समासे क्त्वो ल्यप् । कृतिभिः-कुशलः, वाचस्पत्यं वाग्मित्वम् । कस्कादिन्वादलुक्सन्वे । “षष्ट्याः पतिपुत्र-' इत्यादिना सत्वमिति स्वामी; तन । तस्य छन्दो- विषयत्वात् । ब्राह्मणादित्वाद्भावे प्यन्प्रत्ययः। प्रतायत-विस्तार्यते । कर्मणि लट् । 'तनोतेर्यकि' इत्यात्वम् । तस्मादात्मोदयार्थिभिरविलम्बाच्छ- शुरुच्छेत्तव्यः । तत्रान्तरायत्वात्तस्येति भावः ॥ ३० ॥ [अन्वयः] आत्मोदयः परज्यानिः इति द्वयम् इयती नीतिः । तदरीकृत्य कृतिभिः वाचस्पत्यं प्रतायते । [विग्रहः ] आत्मन उदयः आत्मोदयः । परस्य ज्यानिः परज्यानिः । वाचस्पतेर्भावः कर्म वा वाचस्पत्यम् । [अर्थः] आत्मोदयः स्वस्याभ्युदयः । स्ववृद्धिः । आत्मना लाभः । परज्यानिः शत्रूणां च हानिः । शत्रूणां विनाशः । .. .
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १६६ D । : .. . इति द्वयम् = इदं द्वयमेव । इयती एतावती। नीतिः = नीति- सारः। स्वलाभः परहानिरित्येतदेव नीतितत्त्वमित्यर्थः। तत् = स्वोदयः, परहानिश्चेत्येतद् द्वयम् । ऊरीकृत्य = स्वीकृत्य । अङ्गी- कृत्य । कृतिभिः = कुशलैः । नीतिनिपुणैः। वाचस्पत्यं = वाग्मिता। प्रतायते = विस्तार्यते । षाड्गुण्यादिविचारः सर्वोऽपि नीतिवेदि- नामेतावनीतिसारमूलक इत्यर्थः । एवञ्च स्वलाभाय शत्रुरुच्छे- त्तव्य एवेति तत्त्वम् । [ भावार्थः] आत्मलाभो विपक्षहानिश्चेत्येतद्वयमेव नीते- मूलम् । एतदनुरोधेनैव नीतिविदो नीति निर्धारयन्ति । तत्स्वला- भान्तरायभूता रिपुरविलम्बमुच्छेत्तव्यः । [ कोशः ] 'ऊरीकृतभुररीकृतसङ्गीकृतम्' इत्यमरः। 'उदयः पर्वतो- नत्योः इति हैमः। [वाच्यप० ] आत्मोदयः परग्लानिः इति इयत्या नीत्या भूयते । तदूरीकृत्य कृतिनः वाचस्पत्यं प्रतन्वन्ति । [भापाटीका] अपना लाभ और शत्रु की हानि-पही नीति का सार है । अतः ये दोनों जिस तरह हों वही मन्त्र (उपाय) और नीति उपादेय है। इसीके आधार पर ही राजनीतिपटु विद्वान् लोग नीतिविस्तार-पाड्गुण्य कल्पना किया करते है। और शत्रु पर चढ़ाई करने से उक्त कार्य सिद्ध होते हैं अत: अविलम्ब शत्र पर चढ़ाई करनी चाहिए ॥ ३० ॥ ननु लब्धोदयस्य किं पैरोच्छित्त्यत्यत्राह- तृप्तियोगः परेणापि महिम्ना न महात्मनाम् । पूर्णश्चन्द्रोदयाकाङ्क्षी दृष्टान्तोऽत्र महार्णवः ॥ ३१ ॥ [ सर्वकषा ] तृप्तियोग इति । महीयसां-महात्मनां । परेणापि- प्रभूतेनापि, महिम्ना-ऐश्वर्येण, तृप्तियोगः-सन्तोषलाभो न । अत्र- तृप्त्यभावे, पूर्णः सन् चन्द्रोदयाकाङ्क्षी । वृध्द्यर्थमिति भावः । महा- र्णवो दृष्टान्तः-दृष्टः अन्तो निश्चयो यस्मिन् । दृष्टान्तो-निदर्शनम् । उपमानमिति यावत् । राज्ञावृद्धावलम्बुद्धिर्न कार्या । 'असन्तुष्टा द्विजा नष्टाः
[२ द्वितीयः
शिशुपालवधम् ।
-
सन्तुष्टाश्च महीभुजः । सलजा गणिका नष्टा, निर्लजा च कुलाङ्गना ॥ इति
न्यायादिति भावः । नायं दृष्टान्तालङ्कारः, बिम्बप्रतिबिम्बभावेनौपम्यस्य
गम्यत्वे तस्योत्थानात् । किन्तु दृष्टान्तशब्देन तस्याभिधानादुपमालकारः ।
अतएव दृष्टान्तोदाहरणनिदर्शनरूपाः शब्दा न प्रयोक्तव्याः पौनरुतया-
पत्तेरित्येकावल्यलङ्कारः ॥ ३१ ॥
[अन्वयः] महात्मनाम् परेणापि महिम्ना तृप्तियोगो न ।
पूर्णः चन्द्रोदयाकाङ्क्षी महार्णवः अत्र दृष्टान्तः ।
[विग्रहः ] तृप्तयोगः-तृप्तियोगः । महान् आत्मा येषां ते महात्मा नः,
तेषां महात्मनाम्। चन्द्रस्य उदयः चन्द्रोदयः, चन्द्रोदयम् आकाङ्क्षते
तच्छीलः चन्द्रोदयाकाङ्क्षी ।
[अर्थः] महीयसां महात्मनाम् । परेणापि = उत्कृष्टेनापि।
विपुलेनापि । अतिमहताऽपि । प्रभूततमेनापि । महिम्ना = ऐश्व-
र्येण । तृप्तियोगः = सन्तोपलाभः। न = नैव भवति । अत्र
तृप्तियोगाऽभावे। पूर्णः परिपूर्णः सन्नपि। ममृद्धतमश्च भवन्नपि ।
चन्द्रोदयाकाक्षी = स्वाभिवृद्ध-यर्थ शशाङ्कोदयमपेक्षमाणः । महा-
र्णवः
: सागरः। दृष्टान्तः = उदाहरणम् । अपमानम् । अस्ती नि
-
..
शेषः।
[भावार्थः] सर्वसमृद्धिशालिना महीयसाऽपि राज्ञा वृद्धी
सन्तोषो न विधेयः । परिपूर्णोऽपि महार्णवः स्वसमृद्धये चन्द्रोदय-
मभिवाञ्छत्येव । तत्स्वाभिवृद्धये ऽस्माभिरभियानकार्यम् ।
[कोशः ] 'परः श्रेष्ठाऽरिदूरान्योत्तरे क्लोबन्तु केवले' इति मेदिनी ।
[वाच्यप०] तृप्तियोगेन न भूयते । महार्णवेन दृष्टान्तेन भूयते ।
भाषाटीका ] सब तरह समृद्धि सम्पन्न होने पर भी (राजाओं को)
-सन्तोष नहीं कर लेना चाहिए और अपनी उन्नति के लिए सतत चेष्टा
करते रहना चाहिए । देखो-पूर्ण होते हुए भी समुद्र अपनी वृद्धि के लिए
चन्द्रमा का उदय चाहता है। क्योंकि चन्द्रमा के उदय होने पर समुद्र
बढ़ता है ॥३१॥
: .. सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । तथापि सन्तोपे दोपमाह-- सम्पदा सुस्थिरम्मन्यो भवति स्वल्पयापि यः । कृतकलो विधिर्मन्ये न वर्धयति तस्य ताम् ॥ ३२ ॥ [ सर्वकषा] सम्पदेति । यः स्वल्पयापि सम्पदा सुस्थिरमात्मानं मन्यत इति सुस्थिरम्मन्यः-स्वस्थमानी भवति । 'आत्ममाने खश्च' इति वश्प्रत्यये मुमागमः। तस्याल्पसन्तुष्टस्य, तां-स्वल्पसम्पदं, कत- कृत्यस्तावतैव कृतार्थो विधिदैवमपि न वर्धयति अहमिति मन्ये । पौरुपहीनाद्देवमपि जुगुप्सते, तत्प्रवृत्तेः पारार्थ्यादिति भावः ॥ ३२ ॥ [ अन्वयः ] यः स्वल्पयापि सम्पदा सुस्थिरम्मन्यो भवति कृतकृत्यः विधिः तस्य ताम् न वर्धयतीति-मन्ये । [विग्रहः ] सुस्थिरं आत्मानं मन्यते सुस्थिरम्मन्यः। कृतं कृत्यं येनाऽसौ कृतकृत्यः। [अर्थः ] यः = यो जनः । स्वल्पया = अप्रभूतयाऽपि । स्तोकयाऽपि । सम्पदा = सम्पत्त्या। ऐश्वर्येण । सुस्थिरंमन्यः = सुस्थिरमानी । अलम्बुद्धिः । कृतकृत्यमानी । भवति = सम्पद्यते । तस्य = अल्पसन्तुष्टस्य सुस्थिरम्मन्यस्य पुसः । तां = स्वल्पां. सम्पत्तिम् । कृतकृत्यः = तावतैव कृतार्थः । विधिः = दैवम् । = न संवर्द्धयति । इत्येवमिति शेपः । मन्ये = अहं कल्पयामि । विचारयामि । [ भावार्थः] यः पुमानालम्योपहतः स्वल्पयाऽपि सम्पदा सुस्थिरमात्मानं मत्वा स्वसमृद्धये प्रयत्न न करोति मन्ये विधिरपि तावतैव कृतार्थस्तस्य तां स्वल्पां सम्पदं न वर्द्ध यति । अतः सम्पत्तावलम्बुद्धिर्न विधेया । किन्तु यत्नोऽभिवृद्धौ विधेयः। [ कोशः ] — देवं दिष्ट भागधेयं भाग्यं स्त्री नियतिर्विधिः ' इत्यमरः । [वाच्यप० ] येन स्वल्पयापि सम्पदा सुस्थिरम्मन्येन भूयते कृत- कृत्येन विधिना तस्य सा न वध्यते ( इति मया ) मन्यते । न वर्धयति शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः भाषाटीका ] जो मनुष्य थोड़ी सी सम्पत्ति को प्राप्त कर सन्तोष कर लेता है उसकी उस सम्पत्ति को दैव ( अदृष्ट ) भी कृतार्थ हो नहीं बढ़ाता ऐसा मैं समझता हूं । अतः अपनी सम्पत्ति को सदा बढ़ाते रहना चाहिए ॥ ३२॥ किञ्च पराक्रमलब्ध एवोदयो नान्यलब्ध इत्याह- समूलपातमघ्नन्तः परान्नोद्यन्ति मानिनः । प्रध्वंसितान्धतमसस्तोदाहरण रविः ॥ ३३ ॥ [ सर्वकषा] समूलेति । मानिनः-अभिमानिनः परान शत्र न समूलं हत्वा समूलघातमध्नन्तः। अनुन्मूलयन्त इत्यर्थः । समूलाकृतीवेणु हन्कृग्रहः' इति णमुल प्रत्ययः । कपादिशु यथाविध्यनुप्रयोगः' इति हन्तेर- नुप्रयोगः । नोद्यन्ति । किन्तु हत्वैवोद्यन्तीत्यर्थः । तत्र--हवै बादयं । अन्धयतीत्यन्धं--गाढं तमोऽन्धतमसम् । 'ध्वान्ते गाढेऽन्धनममम्' इन्य- मरः। 'अवसमन्धेभ्यस्तमसः' इत्यच्प्रत्ययः। प्रध्वंसितमन्धतममं येन सः । उदयात्यागिति भावः । रविरुदाहरणं-दृष्टान्तः। अनापि महार्णवः' इतिवदुपसालकारो न तु दृष्टान्त इति द्रष्टव्यम् ॥ ३३ ॥ [अन्वयः ] मानिनः परान् समूलघातमन्तः नोद्यन्ति । प्रध्वंसितान्धतमसः रविः तत्रोदाहरणम् । [विग्रहः ] अन्धं तमः -अन्धतमन्नम् । प्रध्वनितम् अन्धनम- येनासौ प्रध्वंसितान्धतमसः । [अर्थः ] मानिनः अभिमानिनः । परान्-शत्रून । वैरिगाः । रिपून । समूलघातमघ्नन्तः = समूलमनुत्सारयन्तः = सानुबन्ध- मविनाशयन्तः । नोद्यन्ति = नौद्गच्छन्ति । नोदय लभम्ते इति वा । किन्तु इत्वैवोद्यन्तीत्यर्थः । तत्र - हत्ववादये । प्रध्वंसितान्धतमसः = उदयापूर्वमेवोन्मूलितगाढान्धकारः रविः = सूर्यः । उदाहरणं = दृष्टान्तः । निदर्शनम् । उपमानम् । भावार्थः] शत्रूनविनाश्य कथमुदयो भवेन्मानिनाम् ? । अन्धकार विनाश्यैव हि रविरुदेति नान्यथा । भ । सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [ कोशः ] 'ध्वान्तेगाढेऽन्धतमसम्' इत्यमरः । [वाच्यप०] मानिभिः परान् समूलघातम् अध्नदिनोंदीयते । [ भापाटीका ] बड़े लोग शत्रुको जड़ से उखाड़े बिना अभ्युदय को प्राप्त नहीं करते । देखो-अन्धकार को दूर करके ही सूर्य भगवान् उदय होते हैं, अन्धकार के रहते नहीं ॥ ३३ ॥ किञ्चानुच्छिन्नशत्रोः प्रतिष्ठैव दुर्घटेत्याह- विपक्षमखिलीकृत्य प्रतिष्ठा खलु दुर्लभा । अनीत्वा पङ्कतां धूलिमुदकं नावतिष्ठते ॥ ३४ ॥ [ सर्वक्षपा] विपक्षमिति । विपक्षं-शत्रुमखिलीकृत्य । खिलमुत्सन्नमकृत्वा । अनुन्मूल्येत्यर्थः । प्रतिष्ठा दुर्लभा खलु । तथाहि- उदकं कर्तृ । धूलिम् । स्वपरिभाविनीमिति भावः। पङ्कतामनीत्वा । नाधः कृत्यत्यर्थः । नावतिष्ठते । किन्तु नीत्वैव तिष्ठतीत्यर्थः। 'समवप्र- विभ्यः स्थः' इत्यात्मनेपदम् । वाक्यभेदेन प्रतिबिम्बनापेक्षो दृष्टान्ता- लङ्कारः ॥ ३४॥ [अन्वयः ] विपक्षमखिलीकृत्य प्रतिष्ठा दुर्लभा खलु । उदकं ( कर्तृ ) धूलिं पङ्कताम् अनीत्वा न अवतिष्ठते । [विग्रहः ] दुःखेन लब्धुं योग्या दुर्लभा। पकस्य भावः पङ्कता, तां-पताम् । [अर्थ ] विपक्षं = शत्रम् । अखिलीकृत्य = अविनाश्य । अहत्वा। अनुन्मूल्य । प्रतिष्ठा = अवस्थितिः। यशश्च । दुर्लभा खलु = दुर्लभैव । तथा हि-उदकं = जलं कर्तुं । धूलि = रेणुम् । पङ्कता = कर्दमताम् । अनीत्वा = अगमयित्वा । अतिरस्कृत्य । अनधः कृत्वेति यावत् । नावतिष्ठते = न तिष्ठति । किन्तु पङ्कतां नीत्वैवोदकमवतिष्ठते इत्यर्थः । [भावार्थः] रिपूनधः कृत्वैव राज्ञाऽवस्थातुं शक्यते नान्यथा । उदकं हिम्वपरिभाविनी धूलि कर्दमतां नीत्वैवाऽवतिष्ठते नान्यथा।
१७४ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- munde [ कोशः ] 'रेणुई योः, स्त्रियां धूलिः, पासुर्ना, न दुबो रक्षः' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] धूलिं पङ्कतामनीत्वा उदकन न अवस्थीयते । [ भाषाटीका ] शत्रुको अच्छी तरह विनष्ट किए बिना टिकना (गहना) असम्भव है । देखो जल जब तक मिट्टीको कीचड़ नहीं बना लेता (परान्त कर नीचे नहीं दबा लेता) तब तक ठहर नहीं सकता । (जल नत्र न. मिट्टी के ऊपर नहीं उठ सकता है जब तक मिट्टीको गीली नहीं कर लेना ॥३४॥ नन्वयं शिशुपाल एकाकी, नः किं करित्यतीन्याश:याह- ध्रियते यावदेकोऽपि रिपुस्तावत्कुतः मुखम् । पुरः क्लिश्नाति सोमं हि सँहिकेयोऽसुरद्रहाम् ॥३५॥ [ सर्वकषा] ध्रियत इति । एकोऽपि रिपुर्यावध्रियते अनिन । 'घङ अवस्थाने' इति धातोस्तौदादिकारि लद । 'रिशयग्निनि रिङादेशः । तावत्-तदवधि । सुखं कुतः ? ! 'याव लायम मा व्यवधी इत्यमरः । तथाहि-सिंहिकाया अपत्यं पुमान् हिकेयोरा.: । नमन राहुः स्वर्भानुः सैंहिकेयो विधुन्तुदः' इत्यमरः । 'स्त्रीभ्यो | अनुर. द्रुहां-देवानां पुरोऽग्रे सोमं क्लिश्नाति-धावते । प्राचुयायोमम् । सूर्यञ्चेति भावः। तस्मादेकोऽपि शत्रुरुच्छेनव्य इनि भारः । “भग्न:- शेषमृणाच्छेषं शत्रोः शेषं न शेपयेत्' इति तात्पर्यम् । विशेष ग सामान्य- समर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः ॥ ३५ ॥ [अन्वयः] एकोपि रिपुः यावत् ध्रियते तावत मुग्वम् कुनः ? । सैहिकेयः असुरद्रहां पुरः सोमं क्लिश्नाति हि [विग्रहः ] असुरेभ्यो ब्रह्मन्तीति असुरह हस्तंपाम् अमुहम् । [अर्थः ] एकोऽपि = एकाकी खल्वपि । रिपुः = शत्रुः । यावद्भियते = यादववतिष्ठते। यावजीवति । नावन = ताव- कालं। तावत्पर्यन्तम् । तदवधि । सुखं = शिवं । कुतः = कस्माल्लभ्यते। नैव लभ्यते इत्यर्थः । हि = यतः । संहिकेयः राहुः । असुरगृहां = देवानाम् । पुरः = अग्रेऽपि । सोम - चन्द्र .
सर्गः ] । अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । १७५ मसम् । सूर्याचन्द्रमसाविति यावत् । क्लिश्नाति = पीडयति । [भावार्थः ] शत्रुर्यावदेकोऽप्यवतिष्ठते तावद्भयं भवत्येव । एकोऽपि पर्वणि राहुः सूर्याचन्द्रमसौ पीडयत्येव । तस्माच्छत्रुर्ना- वशेष्यः, किन्तु प्रयत्नेनोच्छेत्तव्य एव । [ कोशः ] 'तमस्तु राहुः स्वर्भानुः सैंहिकेयो विधुन्तुदः' इत्यमरः । 'यावत्तावञ्च साकल्ये ऽवधौ मानेऽवधारणे इत्यमरः । [वाच्यप० ] यावत् एकेनापि रिपुणा ध्रियते तावत्कुतः सुखम् ? । सैंहिकेयेन असुरदहां पुरः सोमः क्लिश्यते हि । [ भाषाटीका ] शत्रु जब तक एक भी जीता रहेगा कष्ट देगा। देखो देवताओं के रहते हुए भी सूर्य चन्द्रमा को राहु समय २ पर कष्ट पहुंचाया ही करता है ॥ ३५॥ ननु क्षुद्रोऽयं च द्यः किं न करिष्यतीत्याशङ्कय तस्य बलवत्तां वक्तुं मित्राऽमित्रबलाबलविवेकं तावत्करोति- सखा गरीयान् शत्रुश्च कृत्रिमस्तौ हि कार्यतः । स्याताममित्रौ मित्रे च सहजप्राकृतावपि ॥ ३६ ॥ [ सर्वकषा] सखेति। क्रियया उपकारापकारान्यतररूपया। निवृत्तः कृत्रिमः । 'ड्वितः क्रिः' 'क्रेर्मन्नित्यम्' । सखा-सुहृत् शत्रुश्च कृत्रिमो गरीयान । कुत:-हि यस्मात्तौ कृत्रिममित्रशत्रू । कार्यतः-उपकाराप- काररूपकार्यवशात् । 'निर्वृत्तौ विति शेषः। उक्तकार्योपाधेर्यावजीवमनपाया- दनयोमित्राभित्रभावोऽप्यनपायीति गरीयस्त्वमिति भावः । सहजप्राकृती नैवमित्याह-स्यातामिति । सह जातः सहजः । एकशरीरावयवत्वात् । तत्र सहजं मित्रं-मातृत्वसेयपितृप्वसेयादि । सहजशत्रुस्तु-पितृव्य- तत्पुत्रादिः।प्रकृत्या सिद्धः-प्राकृतः। पूर्वोक्तसहजकृत्रिमलक्षणरहित इत्यर्थः। तत्र विषयान्तरः प्राकृतः शत्रः । तदनन्तरः प्राकृतं मित्रम् । अपि त्वर्थे । तो सहजप्राकृतौ-शत्रुमित्रो च स्यातां तावात्मकार्यवशादनियमेनोभयरू- पतामापयेते न कृत्रिमशत्रु मित्र। कृत्रिमः शत्रुः शत्रुरेव। मित्रञ्च मित्रमेवेति तु १७६ शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः कृत्रिमावेव मित्रामित्रौ गरीयांसौ न तु सहजौ, नापि प्राकृतावित्यर्थः । अनेन कृत्रिमत्वं सर्वापवादीति सिद्धम् ॥ ३६ ॥ [अन्वयः] कृत्रिमः सखा शत्रु श्च गरीयान । हि तो कार्यतः। सहजप्राकृतौ- मित्रौ मित्र च स्याताम् । [विग्रहः ] सह जातः सहजः । प्रकृत्या जातः प्राकृतः । [अर्थः] कृत्रिमः = यथायथम् उपकारेणापकारेण च निवृत्तः। सखा = सुहृत् । शत्रुश्च = रिपुश्च । 'कृत्रिम' इति शेषः । गरीयान् श्रेष्ठः । तयोमित्रामित्रभावस्यानपायित्वात्। उपकाराज्जातं मित्र बलवदपकाराज्जातो रिपुश्च सर्वतो बलवानित्यर्थः। हि = यतः । तौ = कृत्रिमः सखा, शत्रुश्च त्येतौ। कार्यतः उपकारापकाररूपका. र्यवशात्। निवृत्ताविति शेषः । सहजप्राकृतावपि = सहजात-प्रकृति. सिद्धौ तु । अमित्रौ = कदाचित्कार्यवशाच्छन्र । मित्र च = कदा- चित्कार्यवत्सखायौ, यथायथं चाऽनियमेन । स्याता = भवतः । (सहजप्राकृतौ शत्रु सुहृदावनियमेन कदाचित्कार्यवशाच्छत्रुतां कदाचिच्च मित्रतां भजत इति तयोर्न तथा गुरुस्वं यथा कृत्रिः मयोः शत्रुसुहृदोगुरुत्वमस्ति। कृत्रिमयोः सर्वदैकरूपत्वात् ।) [ भावार्थः ] सहजप्राकृतौ शत्रुसुहृदौ न तथा गौरवं भजतो यथा कृत्रिमावमित्रसुहृदौ भजतः। यतः सहजप्राकृतौ शत्रुसुहृदौ च कादाचित्कौ, कृत्रिमौ तौ तु नकदाचिदपि शत्रुतां, मित्रतां च त्यजत इति तौ गरीयांसौ। कृत्रिमश्वायं चैद्यः शत्रुरिति तस्यो- न्मूलनं नितरामावश्यकम् । [ कोशः] 'अथ मित्रं सखा सुहृत्' इत्यमरः । [वाच्यप० ] सहजप्राकृताभ्यां अमित्राभ्यां मित्राभ्यां च भूयेत । [ भाषाटीका ] शत्रु और मित्र तीन २ प्रकार के हैं-१ सहज शत्रु २ प्राकृत शत्रु ३ कृत्रिम शत्रु और ५ सहज मित्र २ प्राकृत मित्र ३ कृत्रिम सर्गः] मित्र-शत्रु आदि । प्राकृत - अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । मित्र। इन में कृत्रिम मित्र और कृत्रिमशत्रु सब से प्रधान हैं, क्योंकि सहज और प्राकृत शत्रु मित्र तो कभी अपना भाव ' छोड़ भी देते हैं, अर्थात् सहज मित्र कभी शत्रु भी हो सकता है, सहज शत्रु कभी मित्र भी होजाता है। परन्तु कृत्रिम मित्र व कृत्रिम शत्रु तो गर्यवशात् होते हैं, अतः वे अपना भाव कभी नहीं बदलते हैं। अतः वेही असली शत्रु व मित्र हैं । ( सहज शत्रु- चाचा, और उसके पुत्र । सहजमित्र-मौसी के लड़के, तथा फुवा के लड़के। प्राकृतशत्रु-सीमा के निकट का राजा की सीमाका राजा आदि। कृत्रिम शत्रु व मित्र-कार्यवशात् हुए शत्र व मित्र ) ॥ ३६ ॥ एवं चेदस्माकं पैतृष्वसेयः शिशुपालः सहजमित्रत्वात्सन्धातव्यो न तु यातव्य इत्यत आह- उपकारिणा सन्धिर्न मित्रणाऽपकारिणा । उपकारापकारौ हि लक्ष्यं लक्षणमेवयोः ॥ ३७ ॥ [ सर्वकषा ] उपकषेति । उपका-उपकारकारिणा, अरिणाऽपि- 'सहजेन, प्राकृतेन चे ति शेषः । सन्धिः-कार्यः । अरित्वापवादेन कृत्रिम- मित्रताया बलीयस्या यावजीवभाविन्यास्तत्रोत्पन्नत्वादिति भावः । एवम- पकारिणा-मिल्नेणापि । “सहजेन, प्राकृतेन वे ति शेषः । 'सन्धिन कार्यः । मित्रत्वापवादेन कृत्रिमशत्रुताया बलीयस्या यावजीवभावन्यास्त- त्रोत्पन्नत्वादिति मावः । ननु साक्षादरिणा सन्दध्यान्मित्रेण कथं विरुन्ध्या- दित्याशङ्कय क्रियया तयोर्वपरीत्याददोष इत्याह-हि यस्मादुपकारा- पकारावेव एतयोमित्रामिलयोर्लक्षणं स्वरूपं, लक्ष्यं-द्रष्टव्यम् । उपकतैव मित्रम् , अपकतैव शत्रुरित्यर्थः । तस्मात्सहजमित्रत्वेऽपि चैद्यः क्रियया शत्रुत्वाद्यातव्य एवेति भावः ॥ ३७ ॥ अन्वयः] उपक; अरिणा ( अपि) सन्धिः (कार्यः) अपकारिणा मित्रेण (अपि सन्धिः) न (कार्यः)। हि उपकारा- पकारौ एतयोः लक्षणं लक्ष्यम् । १२ १७८ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- । [विग्रहः ] उपकरोतीति उपकर्ता, तेन उपका । उपकारश्च अप- कारश्च उपकारापकारौ । लक्ष्यतेऽनेन तत् लक्षणम् । [अर्थः ] उपका-उपकारकारिणा । अरिणा-शत्रुणाऽपि । सहजेन प्राकृतेन वा रिपुणाऽपि । सन्धिः सन्धान कार्यम् । बल- वत्या कृत्रिममित्रतयाऽरित्वस्य तत्र बाधान्मैत्री युक्तेत्यर्थः । अपकारिणा-अपकारपरेण । मित्त्रेण-सुहृदाऽपि । सहजेन प्राकृ- तेन वा मित्प्रेणाऽपि । सन्धिः मैत्री। न-नैव कार्यः। कृत्रिम- शत्रुताया बलवत्त्वान्मैत्री तत्र नोचितेत्यर्थः। हि-यतः। उप- कारापकारौ= उपक्रियाऽपक्रिये एव । एतयोः मित्नामित्त्रयोः । लक्षणं-स्वरूपं । चिह्नम् । लक्ष्यं द्रष्टव्यम् । उपकतैव हि सुहृत्, अपकत्तैव हि शत्रुरित्यर्थः। [ भावार्थः] उपकारो मित्रलक्षणमपकारः शत्रोः। तदेवम- पकारकारितया चैद्योऽस्माकं रिपुः । [ कोशः ] 'रिपौ वैरिसपत्नारिद्विषवेषणदुहृदः' इत्यमरः। 'अथ मित्र सखा सुहृत्' इत्यमरः। [वाच्यप० ] उपका अरिणा सन्धि कुर्यात् । अपका मित्रेणापि सन्धि न कुर्यात् । उपकारापकाराभ्यां लक्षणेन लक्ष्येण भूयते । [भाषाटीका ] उपकार करनेवाले शत्र से भी सन्धि (मित्रता) करलेनी चाहिए पर अपकारी मित्र से भी सन्धि नहीं हो सकती। क्योंकि उपकार और अपकार ही मित्र और शत्र का लक्षण है॥३७॥ अथ चैद्यस्य कृत्रिमशत्र त्वं चतुर्भिराह- त्वया विप्रकतश्चैद्यो रुक्मिणी हरता हरे ! । बद्धमूलस्य मूलं हि महद्वैरतरोः स्त्रियः ॥ ३८॥ [ सर्वकषा] त्वयेति । हे हरे, रुक्मिणी हरता । बन्धुभिस्तस्मै प्रदत्तां राक्षसधर्मेणोद्वहतेत्यर्थः। 'राक्षसो युद्धहरणात्' इति याज्ञवल्क्यः । 'गान्धर्वो राक्षसश्चैव धम्यौं क्षत्रस्य तौ स्मृतौ' इति मनुः । त्वया चैद्यो विप्रकृतः-विप्रियं प्रापितः। तथाहि-बद्धमूलस्य-रूढमूलस्य । - सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । १७६ वैरतरोः स्त्रियो महत्-प्रधानं मूलम् । हि निश्चये। रूपकसंसृष्टोऽयं सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः ॥ ३८॥ [ अन्वयः ] हरे ! रुक्मिणी हरता चैद्यः त्वया विप्रकृतः। (तथाहि-) बद्धमूलस्य वैरतरोः स्त्रियः महत मूलं हि । [विग्रहः ] बद्धमूलं यस्य येन वाऽसौ बद्धमूलः, तस्य-बद्धमूलस्य । वैरमेव तरुः वैरतरुः, तस्य-वैरतरोः । [अर्थः ] हरे = हे कृष्ण। रुक्मिणी = तन्नाम्नी रुक्मिभगि- नीम् । हरता = कुण्डिननगरादपहरता । राक्षसधर्मेणोद्वहता च । त्वया = भवता। चैद्यः = चेदिदेशाधिपः स शिशुपालः। विप्रकृतः = अपकृतः । विप्रियं प्रापितः । ( तथा हि-) बद्धमूलस्य = रूढमूलस्य । प्रवृद्धस्य । वैरतरोः = विरोधवृक्षस्य । स्त्रियः = कामिन्यः । महत् = प्रधानम् । मूलं हि = निश्चित कारणम् । मूलञ्च [भावार्थः ] रुक्मिणीहरणाच्चैद्यस्स्वया विप्रकृतः। स्त्रियो हि विरोधतरुमूलभूताः । स्त्रीनिमित्तं वै विरोधः। [ कोशः ] ' वैरं विरोधो विद्वेषः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] हरे ! रुक्मिणी हरन् त्वं चैद्यं विप्रकृतवान् । भाषाटीका ] हे कृष्ण ! रुक्मिणी का हरण कर आपने ही शिशुपाल से वैर ठाना है। क्योंकि वैर की जड़ स्त्रियाँ ही होती है ॥ ३८ ॥ अथ तेनापि त्वं विप्रकृत इत्याहः त्वयि भौमङ्गते जेतुमरौत्सोस पुरीमिमाम् । प्रोषितार्यमणं मेरोरन्धकारस्तटीमिव ॥ ३६॥ [ सर्वङ्कपा ] त्वयीति । त्वयि-भूमेरपत्यं पुमांसं भौम-नरकासुरं, जेतु गते सति । सः-चैध इमां पुरी-द्वारकाम् । प्रोषितोऽर्यमा सूर्यो यस्यास्तां मेरोस्तटी-सानुमन्धकार इवारौत्सीत्-रुद्धवान् । रुधेरनिटो लुङि सिचि वृद्धिः । उपमालङ्कारः ॥ ३९ ॥ .. । - शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- , [अन्वयः] त्वयि भौम जेतु गते (सति) स इमाम् पुरीम्-प्रोषितार्यमणम् मेरोः तटीम् अन्धकार इव-अरौत्सीत् [विग्रहः ] प्रोपितः अर्थमा यस्याः सा प्रोषितार्यमा, ताम्-प्रोषिता- यमणम् । [अर्थः] त्वयि भवति श्रीकृष्ण । भौम = भौमासुरम् । नर- कासुरम् । जेतु = विजेतुम् । गते इतःप्रयाते सति । सः = शिशु- पालः । इमां पुरी = द्वारकाम् । प्रोषितार्यमणं = गतभास्कराम् । अपेत दिवाकराम् । मेरोः = सुमेरोः। तटीं = प्रस्थम् । सानुम् । अन्धकार इव = ध्वान्तमिव । अरौत्सीत् = अवरुद्धवान् । रुरोध । [भावार्थः] सूर्यगमनानन्तरं सुमेरोस्तटीं यथाऽन्धकारो- रुणद्धि तथैव त्बदहितामिमां पुरी स चैद्योऽवरुरोध । [ कोशः ] 'पू: स्त्री पुरीनगयौँ वा' इत्यमरः । 'सूरसूर्यमादित्यद्वादशा- त्मदिवाकराः ' इत्यमरः । [वाच्यप०] त्वयि जेतुं गते तेन इयम् पुरी-प्रोषितार्यमा मेरोस्ती अन्धकारेणेव-अरोधि। [भाषाटीका ] सूर्य भगवान् के आगे बढ़ जानेपर सुमेरु के शिखरों पर जैसे अन्धकार आक्रमण करता है (छा जाता है) वैसे ही नरकासुर को मारने जब आप कामरूप (आसाम) देशको गए थे उस समय शिशुपाल. ने इस द्वारकापुरी पर चढ़ाई की थी ॥ ३९॥ अपकारान्तरमाह- आलप्याडलमिदं बभ्रोर्यत्स दारानपाहरत् । कथापि खलु पापानामलमश्रेयसे यतः॥४०॥ [सर्वकषा] आलप्येति । स चैद्यो बभ्रोः-यादवभेदस्य दारान्-भार्या- म्। 'भार्याजायाथ 'भूम्नि दाराः स्यात्त कुटुम्बिनी' इत्यमरः । अपाहरदिति यदिदं-दारापहरणम् । आलप्य-उच्चार्य-अलम् । नालपनीयमि- त्यर्थः । 'अलङ्घल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्तवा' इति क्वाप्रत्यये समासे सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ल्यबादेशः । यतः-पापानां-पाप्मनां (कथा-) कथनमुच्चारणमपि । 'चिन्तिपूजिकुथिकुम्बि-' इत्यप्रत्ययः। अश्रेयसे-अनर्थाय, अलं-समर्थ खलु । 'नमः स्वस्ति-' इत्यादिना चतुर्थी । अत्र निषिध्यमानालपननिषेधन- समर्थनात्कार्येण कारणसमर्थकोऽर्थान्तरन्यासः ॥ ४०॥ [अन्वयः ] स बभ्रोरान अपाहरत् (इति) इदम् आलप्य अलम् । यतः पापानाम् कथापि अश्रेयसे अलम् खलु (भवति)। [विग्रहः ] न श्रेयः अश्रेयः, तस्मै अश्रेयसे । [अर्थः । सः = चैद्यः । बभ्रोः = बभ्रुनामकस्य यादवस्य । दारान् = भार्याम् । अपाहरत् = जहार । बलात्कारेणाऽहार्षीत् । इदम् = इतीदं दारापहरणम् । आलप्य = उच्चार्य । अलम् = कृतम् । न किञ्चित्फलम् । तदुच्चारणं व्यर्थमेवेत्यर्थः । यतः-यस्मा- कारणात् । पापानां = पाप्मनाम् । पापिनाम् । कथाऽपि3 कथनमपि । तन्नामोच्चारणमपि अश्रेयसे = अमङ्गलाय। पापाय । अलं खलु = समर्थं खलु । [भावार्थः] “स चैद्यो द्वारकावासिनो बभ्रोर्यादवस्य भार्या जहारे' त्यादि तत्पापकथयाऽप्यालं, गतः पाप्मनां कथा- ऽप्यमङ्गलाय पापाय च प्रभवति ।। [कोशः] 'भार्या जायाऽथ पुंभूम्नि दाराः स्यात्तु कुटुम्बिनी' इत्यमरः । 'निषेधवाक्यालङ्कारे जिज्ञासाऽनुनये खलु' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] तेन बनोः दारा अपाहियन्त । कथयाऽपि अश्रेयसे अलं (भूयते)। भाषाटीका ] उस शिशुपाल ने यहाँ बभ्र (यादवविशेष) की स्त्री को जबरदस्ती हरण कर लिया इत्यादि उसके पाप की बातें भी नहीं कहनी चाहिए, क्योंकि पापियों के पाप की चर्चा से भी पाप लगता है ॥४०॥ फलितमाह- विराद्ध एवं भवता, विराद्धा बहुधा च नः । निर्वत्यतेऽरिः क्रियया स श्रुतश्रवसः सुतः ॥ ४१ ॥ :
१८२ शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- : सर्वकषा] विराद्ध इति । एवं भवता विराद्धः-विप्रकृतः । राधेरनिटः कर्मणि क्तः । बहुधा नो ऽस्माकं च विराद्धा-विप्रकर्ता । श्रुतश्रवाः-नाम हरेः पितृष्वसा, तस्याः सुतः। पैतृष्वसेयत्वात्सहजमिन- मपीति भावः। स-चैद्यः । क्रियया-पूर्वोक्तान्योन्यापक्रियया। अरिनिर्व- य॑ते-कृत्रिमः शत्रुः क्रियते । अतो बलीयस्त्वादनुपेक्ष्य इति भावः ॥४१॥ [अन्वयः] एवं भवता विराद्धः, बहुधा नः विराद्धा स श्रुतश्रवसः सुतः क्रियया अरिः निर्वयते । [विग्रहः ] विराध्यते स्म इति विराद्धः । विराध्यतीति विराद्धा । [अर्थः] एवम् = इत्थम् । भवता = त्वया । विराद्धः विप्रकृतः । बहुधा = बहुप्रकारेण । नः = अस्माकञ्च । विराद्धा विप्रकर्ता । श्रुतश्रवसः सुतः = श्रुतश्रवोनामिकाया अस्मत्पि- तृष्वसुः पुत्रः शिशुपालः। 'सह जमित्रमपी' ति शेषः । सः चैद्यः । क्रियया=परस्परापकारेण । अरिः कृत्रिमः शत्रुः । निर्वय॑ते क्रियते । [ भावार्थः] सहजमित्रमपि स सम्प्रति चैद्योऽपकारकारितया कृत्त्रमः शत्रुर्जात इति नोपेक्ष्यः । [कोशः ] 'रिपौ वैरिसपत्नारिद्विषवेषण दुहृदः' इत्यमरः । [वाच्यप०] एयं भवता विराद्धं, नः बहुधा विराद्धारम् श्रुतश्रवसः सुतम् क्रिया अरिं निर्वर्तयति । [भाषाटीका ] इस प्रकार तुमारे द्वारा अपकृत हुआ वह शिशुपाल वारंवार हमारा अपकार करने से अब हमारा कृत्रिम शत्रु होगया है। अतः उसकी उपेक्षा करना ठीक नहीं है ॥ ४१ ॥ अत्राप्युपेक्षायां दोषमाह- विधाय वैरं सामर्षे नरोशै य उदासते । प्रक्षिष्योदर्चिषकक्षे शेरते तेऽभिमारुतम् ॥ ४२ ॥ [ सर्वकषा] विधायेति । ये नरः-पुमांसः। 'स्युः पुमांसःपञ्चजनाः सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी--सर्वकषा-विराजितम् । पुरुषाः पूरुषा नरः' इत्यमरः । सामर्षे-प्रागेव सरोपेऽरौ वैरं विधाय । स्वयं चापकृत्येत्यर्थः । उदासते-उपेक्षन्ते । ते- -उपेक्षन्ते । ते नरः । कन-गुल्मे । 'कक्षस्तु गुल्मे दोर्मूले पापे जीर्णवने तृणे' इति वैजयन्ती। उदर्चिषम्- अधिकज्वालम्। अग्नि प्रक्षिप्य,अभिमारुतम् । आभिमुख्येऽव्ययीभावः। शेरते-स्वपन्ति । तद्वन्नाशहेतुरित्यर्थः । 'शीको रुट्' इति रुडागमः। अत्र ये उदासते ते शेरते इति विशिष्टौदासीन्यशयनयोर्वाक्यार्थयोनिर्दिष्टे- कत्वासम्भवात्सादृश्यलक्षयामसम्भवद्वस्तुसम्बन्धे वाक्यार्थनिर्वृत्तिरिति निदर्शनाभेदः । न चायं दृष्टान्तः, वाक्यभेदेन प्रतिबिम्बकारणाक्षेपे तस्यो- त्थानात् । अब नु वाक्यार्थे वाक्यार्थसमारोपाद्वाक्यैकवाक्यतायां तदभाव इत्यलङ्कारसर्वस्वकारः ॥ ४२ ॥ [अन्वयः ] ये नरः सामर्षे अरौ वैरं विधाय उदासते ते कक्षे उदर्चिषम् प्रक्षिप्य अभिमारुतम् शेरते। [विग्रहः ] अमर्षेण सहितः सामर्षः, तस्मिन्-सामर्षे । उद्तानि अर्ची षि यस्यासौ उदर्चिः,तम्-उदर्चिषम्। मारुतमभिलक्ष्य अभिमारुतम् । [अर्थः] ये नरः = पुमांसः। सामर्षे = प्रागेव सरोषे। कुपिते । अरौ = शत्रौ । वैरं = विरोधं । विधाय = कृत्वा । तस्य स्वयमपकार कृत्वेत्यर्थः। उदासते = उपेक्षन्ते । ते = नरः । कक्षे = गुल्मे । उदर्चिष-उद्गतज्वालं वह्निम् । निक्षिप्य = निधाय। अभिमारुतं = मारुताभिमुखम् । शेरते = स्वपन्ति । [ भावार्थः ] सरोषे शत्रौ वैरं विधाय ये पुरुषा उदासीना- स्तिष्ठन्ति ते तृणपुजे उद्गतशिखं वह्नि निक्षिप्य मारुताभिमुख स्वपन्ति । नूनं ते विनश्यन्तीत्याशयः । [कोशः] 'कोपक्रोधामर्षरोषप्रतिघा रुट्क्रुधौ स्त्रियौ इत्यमरः। 'कक्षस्तु गुल्मे दोर्मूले पापे जीर्णवने तृणे' इति वैजयन्ती । 'स्युः पुमांसः पञ्चजनाः पुरुषाः पूषा नरः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] यैर्नृभिः सामर्षेऽरौ वैरं विधाय उदास्यते तैः कक्षे उद- चिषम् प्रक्षिप्य अभिमारुतं शय्यते ।
- । १८४ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [ भाषाटीका ] जो मनुष्य क्रोधी शत्रु से वैर बान्धकर भी चुपचाप बैठते हैं वे सूखी घास की ढेरी में जलती हुई अग्नि को फेंककर हवा की ओर सोते हैं । अर्थात् वे शीघ्र ही नाश को प्राप्त होते हैं ॥ ४२ ॥ तथापि बान्धवत्वात्सोढव्य इत्याशङ्कयाह- मनागनभ्यावृत्त्या वा कामं क्षाम्यतु यः क्षी। क्रियासमभिहारेण विराध्यन्तं क्षमेत कः ॥४३॥ [ सर्वकषा] मनागिति । यः क्षमी-सहनः । 'शमित्यष्टाभ्यो धिनुण्' इति धिनुण्प्रत्ययः । स सोढा-मनागल्पम् । अभ्यावृत्तावपीति भावः । अनभ्यावृत्त्या-सकृद्वा । अनल्पत्वेऽपीति भावः। विराध्य- न्तम्-अपकुर्वाणं, कामं-भृशं । क्षाम्यतु-क्षमताम् । सम्भवनायां लोट् । 'शमामष्टानां दीर्घः श्यनिः । क्रियासमभिहारेण-भृशम् , पौन:- पुन्येन चेत्यर्थः । न च पुवाक्येष्वनेकार्थत्वं दोषाय । विराध्यन्तं कः क्षमेत सहेत, सोढुं शक्नुयात् । न कोऽपीत्यर्थः । 'शकि लिङ्- इति वाक्याथै लिङ्। 'क्षमू प्रसहने देवादिको, भौवादिकश्च ॥ ४३ ॥ [अन्ववः] यः क्षमी (सः) मनाक् अनभ्यावृत्त्या वा (विराध्यन्तम् ) कामम् क्षाम्यतु, क्रियासमभिहारेण विराध्यन्तं तु) कः क्षमेत? । [ विग्रहः ] न अभ्यावृत्तिः अनभ्यावृत्तिः, तया अनभ्यावृत्या । क्षमते तच्छीलः क्षमी। [अर्थः ] यः क्षमी = सहनः । क्षमापरः। सोढा । (सः) मनाक् = अल्पम् । अनभ्यावृत्त्या वा = सकृद्वा । एकवारं वा। (विराध्यन्तम् = अपकुर्वाणम्-) कामं = भृशम् । यथेच्छम्। क्षाम्यतु = क्षमताम् । सहतां नाम । क्रियासमभिहारेण = पौन:- पुन्येन, भृशञ्च । वारंवारम् , अतितराञ्च । विराध्यन्तम् = अपकुर्वाणन्तु । कः = कः पुमान् । क्षमेत = सहेत ?। सोढु शक्नुयात् ? । न कोऽपीत्यर्थः ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १८५ .. [भावार्थः] स्वल्पमेकवारं वाऽपराध्यन्तं कोऽपि क्षमी सहतां नाम, भृशं मुहुमुहुर्वाऽपराध्यन्तं तु कः खलु सहेत ?। :: न कोऽपि । तदयं चैद्यो वध्य एव नोपेक्ष्यः । [ कोशः ] 'किश्चिदीषन्मनामल्पे' इत्यमरः । 'सहिष्णुः: सहनः क्षन्ता तितिक्षुः क्षमिता क्षमी' इत्यमरः । [वाच्यप० ] क्षमिणा मनाक् अनभ्यावृत्त्या वा (विराध्यन्) कामम् शम्यताम् !, क्रियासमभिहारेण विराध्यन् केन क्षम्येत ? । [ भाषाटीका ] कोई सहनशील व्यक्ति थोड़े अपराध को या एक वार किए गए भारी अपराध को भी क्षमा कर सकता है, पर वारंवार विपुल अपराध करनेवाले को कौन क्षमा कर सकता है ? ॥४३॥ ननु सर्वदा क्षमैव पुंसो भूषणम्, अतोऽपराधेऽपि क्षन्तव्यमत आह- अन्यदा भूषणं पुसः क्षमा लज्जेव योषितः । पराक्रमः परिभवे वैयात्यं सुरतेष्विव ॥ ४४ ॥ [ सर्वकषा] अन्यदेति । अन्यदा -सुरतव्यतिरिक्त काले। योषितो लज्जेव पुसोऽन्यदा-अपरिभवे, क्षमा-शमो, भूषणम् । परिभवे तु योषितः सुरतेषु वैयात्यंधाष्टयमिव । 'सृष्टे प्णुर्वियातच इत्यमरः । पराक्रमः-पौरुष, भूप्यतेऽनेनेति भूषणमाभरणम् । एवं चाऽक्रियावचनत्वानियतलिङ्गत्वाद्विरोध इति वल्लभोक्तं प्रत्युक्तम् ॥ ४४ ॥ [अन्वयः ] अन्यदा योषितः लज्जा इव पुसः (अन्यदा) क्षमा भूषणम् । (परिभवे तु योषितः-) सुरतेषु वैयात्यम् इव (पुसः-) पराक्रमः भूषणम् । [विग्रहः ] भूष्यतेऽनेन तत् भूषणम् । [अर्थः] अन्यदा = सुरतातिरिक्त काले । योषितः= नार्याः । लज्जेव = पेव । पुंसः = पुरुषस्य । अन्यदा = परि- भवातिरिक्त काले । क्षमा = क्षान्तिः । शान्तिः । भूषणं = शोभा- धायकम् । (परिभवे-तिरस्कारे तु। योषितः = अबलायाः।) D १८६ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- सुरतेषु = रतिसमयेषु । मैथुनेषु । वैयात्यमिव = धाष्टर्थमिव । पराक्रमः = पौरुषमेव । भूषणम् = आभरणम् । शोभाधायकम् । [ भावार्थः ] योषितो लज्जेव शान्तिरेव सर्वदा पुसो भूप- णम् । अपमानावसरे तु परं सुरतेषु योषितां धाष्टर्थमिव पुसः पुंस पौरुषमेव भूषणम् । [ कोशः] 'स्त्री योषिदबला योषा नारो सीमन्तिनी वधूः' इत्यमरः । 'सृष्टे कृष्णुर्वियातश्व' इत्यमरः । 'मन्दाक्षं हीस्वपा ब्रीडा लज्जा' इत्यमरः । [वाच्यप० ] अन्यदा पुंसः क्षमया भूषणेन भूयते । परिभवे परा- क्रमेण भूषणेन भूयते। [ भाषाटीका ] स्त्रियों का भूषण जसे लजा है उसी तरह पुरुष का भूषण शान्ति है, पर अपमान के समय में तो पुरुष को पराक्रम ही शोभा देता है, जैसे सुरतकाल में स्त्री को धृष्टता शोभा देती है ॥ ४४ ॥ अथ परिभवेऽप्यपराक्रमे विभिनिन्दामाह- माजीवन्यः परावज्ञादुःखदग्धोऽपि जीवति । तस्याऽजननिरेवास्तु जननीक्लेशकारिणः ॥ ४५ ॥ [ सर्वङ्कषा] मा जीवन्निति । यः परस्यापकर्तुरवज्ञया अवमानेन यदुःखं तेन दग्धस्तप्तोऽत एव माजीवन्-गर्हितजीवी सन् । 'माङ्या- क्रोशे' इति लटः शत्रादेशः । जीवति-प्राणान्धारयति । जनन्याः क्लेशकारिणो-गर्भधारणप्रसवादिवेदनाकारिणः । तद्यतिरिक्तार्थक्रिया- हीनस्येत्यर्थः । तस्य-अजननमजननिरनुत्पत्तिरेवास्तु । जननीक्लेश निवृत्त्यर्थमिति भावः । 'आक्रोशे नन्यनिः' इति न पूर्वाजनिधातोरनि- प्रत्ययः॥ ४५ ॥ [अन्वयः ] यः परावज्ञादुःखदग्धोऽपि माजीवन (सन् ) जीवति, जननीक्लेशकारिणः तम्य अजननिः एव अस्तु । [विग्रहः] परस्य अवज्ञा परावज्ञा, परावज्ञया दुःखं, परावज्ञा दुःखं, तेन दग्धः-परावज्ञादुःखदग्धः । अजननम्-अजननिः । जनन्याः क्लेशः सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । . जननीक्लेशः, जननीक्लेशं करोतीति जननीक्लेशकारी, तस्य-जननीक्लेशकारिणः। [अर्थः ] यः = पुमान् । परावज्ञादुःखदग्धोऽपि = परावमा नदुःखप्रदग्धोऽपि । माजीवन् = गर्हितजीवी सन् । जीवति = प्राणान्धारयति । जननीक्लेशकारिणः = मातृप्रसवादिवेदनाका- रिणः। पुरुषार्थशून्यस्य । तस्य = तस्य पुसः। अजननिरेव = अनुत्पत्तिरेव । मातृक्लेशाभावायाऽप्रादुर्भाव एव । अस्तु = भवतु । वृथैव तस्य जन्मत्यर्थः । [भावार्थः] परापमानदुःखदग्धस्य गर्हितजीवनस्य मातुः प्रसवादिपीडाकारिणोऽजन्मैव शोभनम् । [ कोशः ] 'जनयित्री प्रसूर्माता' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] येन परावज्ञादुःखदग्धेनापि माजीवता (सता) जीव्यते जननीक्लेशकारिणस्तस्य अजनन्या एव भूयताम् । [भाषाटीका ] जो मनुष्य अपमानित होकर भी जीता है उसका तो जन्म भी वृथा ही है । और उसने अपनी माता को वृथा ही प्रसव की पीड़ा पहुंचाई वह न जन्मता तो ही अच्छा था माता को पीडा तो न होती ॥४५॥ पादाहतं यदुत्थाय मूर्धानमधिरोहति । स्वस्थादेवापमानेऽपि देहिनस्तद्वरं रजः ॥४६॥ [ सर्वकषा] पादेति । यद्रजो धूलिः पादेनाहतं सदुत्थायोड्डीय मूर्धानमाहन्तुरेव शिरोऽधिरोहत्याक्रमति । तद्रजः। अचेतनमपीति भावः । अवमाने सत्यपि स्वस्थात्सन्तुष्टाद्देहिनश्चेतनाद्वरं श्रेष्ठम् । व्यति- रेकालङ्कारः ॥ ४६॥ [अन्वयः] यत् (रजः)पादाहतम् (सत्) उत्थाय (आहन्तुः), मूर्धानमधिरोहति तद्रजः अपमानेऽपि स्वस्थादेहिनः वरम् । [विग्रहः ] पादेन आहतम् पादाहतम् । देहोऽस्यास्तीति देही, तस्य देहिनः। [अर्थः] यत् = रजः । पादाहतं = चरणताडितं सत् । ।
अप.
१८८
शिशुपालवधम् ।
[२ द्वितीयः
उत्थाय = उड्डीय । उत्प्लुत्य । मूर्धानम् = आहन्तुः शिरः । अधि-
ति = आक्रामति । तद्रजः = अचेतनाऽपि सा धूलिः ।
मानेऽपि = तिरस्कारे जातेऽपि । स्वस्थात् = सन्तुष्टात् । शान्तात् ।
देहिनः = चेतनात्पुरुषात् । वरं = श्रेष्ठम् ।
[ भावार्थः ] पादाहता धूलिराहन्तुः शिरोऽधिरोहति । परं
यश्च पुमान् अपमाने सत्यपि स्वस्थस्ततस्तद्रज एव वरम् । तदव-
मानेऽवश्यं पराक्रमितव्यम् ।
[कोशः ] 'रेणुर्द्वयोः स्त्रियां धूलिः पांसुर्ना न द्वयो रजः' इत्यमरः ।
'देवावृते वरः श्रेष्ठे त्रिपु क्लीबं मनाविप्रये' इत्यमरः ।
[वाच्यप०] पादाहतेन येन उत्थाय मूर्धा अधिरुह्यते देहिनः तेन रजसा
वरेण ( भूयते)।
[ भाषाटीका] धूलि भी पैर से आहत होने पर उड़कर शिर पर चड़ती
है। जो मनुष्य अपमान होने पर भी चुपचाप सहन करता है उससे तो
धूल भी अच्छी है ॥ ४६॥
असम्पादयतः कश्चिदर्थ जातिक्रियागुणैः ।
यदृच्छाशब्दवत्पुसः सञ्ज्ञाय जन्म केवलम् ४७
[सर्वकषा] असम्पादयत इति । किञ्च-जातिः-ब्राह्मणत्वादिः,
क्रिया-इज्याध्ययनादिः, गुणः-शौर्यादिः, तैः साधनैः। करणे तृतीया।
कश्चिदर्थं-सुकृत्तकीर्त्यादिपौरुषार्थम्-अन्यत्र गोत्वपाचकत्वशौक्या-
दिभिःस्वाभिधेयभूतैः करणैः । कश्चिदर्थ-व्यवहाररूपं प्रयोजनम् । अस-
म्पादयतः । उभयत्र तादृग्जात्याद्यसम्भवादिति भाव । पुसो जन्म-
सत्तालामः । यदृच्छाशब्दवत-इच्छाप्रकल्पितस्य जात्यादिप्रवृत्तिनिमित्त-
शून्यस्य डित्यादिशब्दस्येव । 'तत्र तस्येव' इति वतिप्रत्ययः । स्वेच्छा
यदृच्छा स्वच्छन्दः स्वैरता चेति ते समा: इति केशवः । संज्ञाय केवलं-
सज्ञार्थमेव । एकत्र पारिभाषिकं किञ्चिन्नाममात्रमनुभवितुम् , अन्यत्र
-तादृक्तामनुभवितुमित्यर्थः ॥ ४७ ॥
~ O सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [अन्वयः ] जातिक्रियागुणैः कञ्चिदर्थं असम्पादयतः पुसः यदृच्छाशब्दवत् केवलम् सञ्ज्ञायै जन्म (विज्ञेयम् )। [विग्रहः]जातिश्व क्रिया च गुणाश्च जातिक्रियागुणाः,तैः-जातिक्रियागुणैः। यदृच्छया शब्दः, यदृच्छाशब्दः, यदृच्छाशब्देन तुल्यं यदृच्छाशब्दवत् । [अर्थः] (किञ्च-) जातिक्रियागुणः = जात्यादिभिरनु. कूलैः साधनैः । क्षत्रियत्वादिजातिभिः, यज्ञाध्ययनसन्धिविग्रहा- दिक्रियाभिः, शौर्यादिभिर्गुणैश्च । अन्यत्र-गोत्व-पाचकत्व- शौक्लयादिभिः स्वाभिधेयैः करणभूतैः । कञ्चिदर्थ = किमपि प्रयोजनम् । पुण्यसञ्चयकीर्तिविजयादिपुरुषार्थम् । अन्यत्र- व्यवहाररूपं प्रयोजनम् । असम्पादयतः अकुर्वतः । अविदधतः। पुंसः = पुरुषस्य । जन्म = जननम् । सत्तालाभः । उद्भवः । यहच्छाशव्दवत् = इच्छाकल्पितस्य जात्यादिप्रवृत्तिनिमित्त- शून्यस्य डिस्थादिशब्दस्येव । यहच्छाकल्पितडित्थडवित्थादि- शब्दवत् । सञ्ज्ञायै केवलं = सज्ञार्थमेव केवलम् । [भावार्थः] जातिगुणादिसाधनैः कञ्चन स्वार्थमसम्पा- दयतः पुंसो जन्म डित्थादियहच्छाशब्दद्वन्निरर्थकमेव । [कोशः] 'स्वेच्छा यदृच्छा स्वछन्दः स्वैरता चेति ते समाः इति केशवः । [ वाच्यप० ] जन्मना संज्ञायै केवलेन भूयते । [भाषाटीका ] जो मनुष्या-अपनें जाति गुण क्रिया आदि साधनों से कीर्ति धर्म धन राज्य आदि किसी पुरुषार्थ की सिद्धि नहीं करता है उसका जन्मडित्थ डवित्थ (कतवारू पनारू चिथरू) आदि यदृच्छाशब्दों ( बुलाने- समझने भर के लिए स्वेच्छा से रखे गए शब्दों) की तरह नाममात्र के लिए है । अर्थात् व्यर्थ है ॥ ४७ ॥ एवमपौरुषं दूषयित्वा पौरुषं भूषयति- तुङ्गत्वमितरा नाद्रौ, नेदं सिन्धावगाधता । अलङ्घनीयताहेतुरुभयं तन्मनस्विनि ॥४८ ॥ .
- ११० शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [ सर्मषा ] तुङ्गत्वमिति। अद्रौ--पर्वते, तुङ्गत्वम्-औन्नत्यम् । 'अस्तीति शेषः । 'अस्तिर्भवन्तीपरोऽप्रयुज्यमानोऽप्यस्ती' त्यादिभाष्यात् । भवन्तीति पूर्वाचार्याणां लटः सज्ञा। इतरा-अगाधता ।नास्ति । सिन्धौ समुद्रेऽगाधता-गम्भीरतास्ति । इदं-तुङ्गत्वं, नास्ति । मनस्विनि- वीरे त्वलङ्घनीयताहेतुः-अलङ्घयत्वकारणं । तदुभयं तुङ्गत्वमगाधता च । तस्मादद्विसिन्धुभ्यामधिको मगस्वीति व्यतिरेकालङ्कारः ॥४८॥ [अन्वयः] अद्रौ तुङ्गत्वम् (अस्ति) इतरा न (अस्ति)। सिन्धौ अगाधता (अस्ति) इदं न (अस्ति)। मनस्विनि अल- अनीयता हेतुः तत् उभयम् (अस्ति)। [विग्रहः ] न लङ्घनीयता अलङ्घनीयता, अलङ्घनीयतायाः हेतुः अलङ्घनीयताहेतुः । [अर्थः] अद्रौ = पर्वते । ( अलङ्घनीयताहेतुः-) तुङ्गत्वम् औन्नत्यम् । अस्तीति शेषः । (परन्तु अलङ्घनीयताहेतुः-) इतरा = अगाधता। न = नास्ति । सिन्धौ = समुद्रे तु । अगा- धता = गम्भीरता। अतलस्पर्शित्वम् । गाम्भीर्यम् । अस्ती- तिशेषः । (परन्तु--) इदं = तुङ्गत्वम् । न = नास्ति । मन- स्विनि = वीरे तु । धीरे तु । अलङ्घनीयताहेतुः = अलमयत्व- कारणम् । तदुभयं = तुङ्गत्वाऽगाधते । तुङ्गत्वागाधत्वोभयम् । अस्तीति शेषः । [ भावार्थः] अद्रिरुन्नतोऽपि नागाधः, सिन्धुरगाधोऽपि नोन्नतः, मनस्वी तु उन्नतोऽगाधश्चेति गिरिसागराभ्याम- प्यधिकः सः। .. , [ कोशः] 'अद्विगोत्रगिरिग्रावाऽचलशैलशिलोच्चयाः" इत्यमरः। 'उदन्वानुदधिः सिन्धुः सरस्वान्सागरोऽर्णवः' इत्यमरः । [वाच्यप०] तुङ्गत्वेन भूयते । इतरया न भूयते। उभयेन भूयते । [ भाषाटीका] पर्वत ऊँचा है पर अगाध [गहरा) नहीं है समुद्र सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मो-सर्वङ्कषा-विराजितम् । १६१ गहरा है पर ऊँचा नहीं है । परन्तु मनस्वी (वीर) तो ऊँचा (उन्नत) और गहरा दोनों होने के कारण दुर्लङ्घनीय है ॥ ४८ ॥ सम्प्रति शत्रौ मार्दवमनायेत्याह- तुल्ये पराधे स्वनिर्भानुमन्तं चिरेण यत् । हिमांशुमाशु ग्रसते तन्मदिम्नः स्फुटं फलम् ॥४६॥ [ सर्वकषा ] तुल्य इति । स्वर्भानुः-राहुः, अपराधे तुल्येऽपि । भानुमन्तं-सूर्य । चिरेण असते । हिमांशु-चन्द्रमाशु शीघ्र असते । गिलतीति यत् । 'ग्रसिते गिलितं गीर्णम्' इत्यभिधानात् । तन्म्रदिन्न:- मार्दवस्य । फलं स्फुटम् । 'पृथ्वादिभ्य इमनिच्' इतीमनिच्प्रत्ययः । तस्माद्विपक्षे तीब्रेण भवितव्यम् । अन्यथा मृदुः सर्वत्र इति भावः। एतच्च प्रस्तुतमप्रस्तुताकेंन्दुकथनेन सारूप्यात्प्रतीयते इत्यप्रस्तुतप्रशंसाभेदोऽयम् । 'अप्रस्तुतस्य' कथनात्मस्तुतं यत्र गम्यते । अप्रस्तुतप्रशंसेयं सारूप्याद्विनिय- न्त्रिता ॥' इति लक्षणात् ॥ ४९ ॥ [अन्वयः ] स्वर्भानुः अपराधे तुल्ये (अपि) भानुमन्तं चिरेण असते, हिमाशुम् आशु (ग्रसते)। तत् म्रदिम्नः फलं स्फुटम् । [विग्रहः ] भानवोऽस्य सन्तीति भानुमान् , तं-भानुमन्तम् । हिमा अंशवो स्याऽसौ हिमांशुस्तम् हिमांशुम् । [अर्थः] स्वर्भानुः = राहुः । अपराधे = दोषे। अपकारे। तुल्ये = समानेऽपि । भानुमन्तं = सूर्यम् । चिरेण = महता कालेन । असते = गिलति । आक्रमते । हिमाशु = चन्द्रमसन्तु। आशु = शीघ्रमेव । (असते = निगिलति ।) तत् = तदेतत् । म्रदिन्नः मार्दवस्य । फल = परिणामः । स्फुट = स्पष्टम् । [ भावार्थः ] राहुः सूर्य तेजस्विनं कालान्तरेण असते, मृदु चन्द्रन्तु आशु असते । तद्रिपौ मार्दवं न युक्तम् । [ कोशः] 'ग्रसिते गिलितं गीर्णम्' इत्यभिधानम् । 'सस्ये हेतुकृते फलम्' इत्यमरः । .. - :- १६२ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [वाच्यप० ] स्वर्भानुना हिमांशुराशु अस्यते । तन्म्रदिन्नः फलेन स्फुटेन भूयते । [ भाषाटीका ] मृदुता का फल देखो कि-अपराध बराबर होने पर भी राहु सूर्य को जल्दी नहीं ग्रसता, पर चन्द्रमा को मृदु होने के कारण जल्दी २ ग्रसता है। अतः मनुष्य को ज्यादा मृदु होना अच्छा नहीं है॥४९॥ एतदेव भङ्ग यन्तरेणाह- स्वयं प्रणमतेऽल्पेऽपि परवायावुपेयुषि । निदर्शनमसाराणां लघुर्बहुतृणं नरः ॥ ५० ॥ [ सर्वकषा] स्वयमिति । असाराणां-दुर्बलानां, निदर्शनं- दृष्टान्तः । अतः एव ईषदसमाप्तं तृणं बहुतृणम् । तृणकल्पमित्यर्थः । 'विभाषा सुपो बहुच्पुरस्तात्-' इति बहुप्रत्ययः प्रकृतेः पूर्वं च भवति । 'स्थादीषदसमाप्तौ तु बहुच्प्रकृतिलिङ्गके इति वचनात्प्रकृतिलिङ्गता । लघुः- निप्पौरुषो नरोऽल्पेऽपि । परो वायुरिवेत्युपमितसमासः, बहुतृणमिति स्पष्टोपमासाहचर्यात् । 'कल्पब्देश्यदेशीयदेश्यादीति दण्डिना कल्पवादीना- मौपम्यवाचकेवभिधानात् । तस्मिन्नुपेयुषि प्राप्ते सति, स्वयं प्रणमते- स्वयमेव प्रह्वीभवति । 'कर्मवत्कर्मणा तुल्यक्रिया' इति कर्मवद्भावात् 'भाव- कर्मणोः' इत्यात्मनेपदम् । 'न दुहस्नुनमा यक्चिणौ' इति यक्प्रतिषेधः । वायुना तृणमिवाल्पीयसापि रिपुणा लघुरक्लेशेन परिभूयत इत्यर्थः। उप- मालङ्कारः॥ ५० ॥ [अन्वयः] असाराणां निदर्शनम् बहुतृणम् लघुः नरः अल्पे- ऽपि परवायौ उपेयुषि स्वयं प्रणमते । [विग्रहः ] ( लघुपक्षे-) परो वायुरिव परवायुः, तृणपक्षे-पर इव वायुः परवायुः, तस्मिन् । नास्ति सारो येषां तेअसाराः, तेषाम् असाराणाम् । ईषदसमास तृणं बहुतृणम् । [अर्थः] असाराणां = दुर्बलानाम् । तुच्छानाञ्च । निदर्शनं दृष्टान्तः। नितरां तुच्छः। (अत एव-) बहुतृणं = तृणकल्पं । तृणतुल्यः। लघुः = निष्पौरुषः। नरः पुमान् । अल्पेऽपि - । सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १६३ स्वल्पेऽपि । परवायौ = शत्रुमारुते । वायुतुल्ये वैरिणि । उपे- युषि = सम्प्राप्त सति । स्वयम् = आत्मनैव । प्रणमते = प्रह्ली- भवति । वायुना तृणमिव साधारणेनाऽपि शत्रु णा निर्बलोऽना- यासेन परिभूयत इत्यर्थः। [भावार्थः] यो हि निर्बलः स तृणवद्रिपुभिरनायासेन परि. भूयते । अतो बलमास्थेयम् । [ कोशः ] 'सारो बले स्थिरांशे च न्याय्ये क्लीबं वरे त्रिपुर इत्यमरः । [वाच्यप० ] अल्पे ऽपि परवायावुपेयुषि स्वयं लघुना प्रणम्यते । [ भाषाटीका ] निर्बलों का सबसे बड़ा उदाहरण, तृणतुल्य, कमजोर मनुष्य सामान्य शत्रुरूपी वायु से भी (तृण की तरह) अनायास ही दबा दिया जाता है। (हलकी सी हवा से भी घास फूस झुक ही जाते हैं) ॥५०॥ पुनः पौरुषे गुणमाह- तेजस्विमध्ये तेजस्वी दवीयानपि गण्यते । पञ्चमः पञ्चतपसस्तपनो जातवेदसाम् ॥ ५१ ॥ [ सर्वकषा] तेजस्वीति । दवीयानपि-दूरस्थोऽपि । 'स्थूल- दूर-' इत्यादिना पूर्वगुणयणादिपरलोपौ। तेजस्वी तेजस्विनां मध्ये गण्यते-सङ्ख्यायते । तथाहि --- पञ्चाग्निसाध्यं तपो यस्य स तथा तस्य-पञ्चतपसः-पञ्चाग्निमध्ये तपस्यतः । तपनोऽकों जातवेदसाम- मीनां पञ्चमः-पञ्चानां पूरणः । पञ्चमो जातवेदा भवतीत्यर्थः। विशे- षेण सामान्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः ॥ ५१ ॥ [अन्वयः] दवीयान् अपि तेजस्वी तेजस्विमध्ये गण्यते। पश्चतपसः जातवेदसाम् पञ्चमः तपनः (भवति) [विग्रहः ] प्रशस्तं तेजः अस्ति येषान्ते तेजस्विनः, तेजस्विनां मध्यं तेजस्विमध्यम्, तस्मिन् तेजस्विमध्ये । पञ्चभिः ( पञ्चाग्निसाध्यं वा) तपो यस्यासौ पञ्चतपाः, तस्य पञ्चतपसः । पञ्चानां पूरणः-पञ्चमः । [ अर्थः ] दवीयानपि = अतिदूरस्थोऽपि । विप्रकृष्टोऽपि । । - १३ १६४ शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः- तेजस्वी = प्रभावशाली । तेजोराशिविराजितश्च । तेजस्विमध्ये: तेजस्विनां मध्ये। प्रतापवतां मध्ये। गण्यते = सङ्घयायते । (तथाहि-) पञ्चतपसः = पञ्चाग्निमध्ये तपस्यतः पुंसः । तपनः = सूर्यः । जातवेदसां वह्नीनाम् । पञ्चमः = पञ्चानां पूरणः । भवतीति शेषः । [ भावार्थः] दूरस्थोऽपि तेजस्वी तेजस्विमध्ये गण्यते । पश्चस्वग्निषु सूर्यो दूरस्थोऽपि गण्यते एव । [ कोशः ] 'कृपीटयोनिवलनो जातवेदास्तनूनपात्' इत्यमरः । [वाच्यप० ] दवीयांसमपि तेजस्विनं तेजस्विमध्ये गणयन्ति । [भाषाटीका ] तेजस्वी दूर भी रहे तो भी तेजस्वियों में उसकी गिनती होती ही है। पञ्चाग्नि तापनेवालों के लिए सूर्य भी पाँचवाँ अग्नि गिना जाता है ॥५१ ॥ गुणान्तरं च व्यतिरेकेणाह- पादमुच्चैमूर्धसु विद्विषाम् । कथङ्कारमनालम्बा कीर्तिर्यामधिरोहति ॥५२॥ [सर्वकषा] अकृत्वेति । उच्च रुन्नतेषु विद्विषां मूर्धसु हेलया पादमकृत्वा-अनिधाय । 'अनपूर्वः' इति निषेधात्समासेऽपि न ल्यबा- देशः । कीर्तिः कथङ्कारम् ? । कथमित्यर्थः। 'अन्यथैवंकथमित्थंसु सिद्धा- प्रयोगश्चेत्' इत्यनर्थकादेव करोतेः कथम्पूर्वाण्णमुल् । अनालम्बा-निरा- धारा कीर्तिर्या-दिवमधिरोहति । न कथञ्चिदित्यर्थः । किञ्चिनिः- श्रेण्यादिकमनाक्रम्य उच्चसौधस्य दुरारोहत्वादिति भावः। तस्मात्कीर्तिमि- च्छता पौरुषमेवाश्रयणीयमिति श्लोकतात्पर्यम् । कीर्तितद्वतोरभेदोपचारा- समानकर्तृतानिर्वाहः । अत्र प्रस्तुतायाः कीर्तेविषयमहिना अप्रस्तुतप्रासा- दारोहणस्त्रीव्यवहारप्रतीतेः समासोक्तिः ॥ ५२ ॥ [अन्वयः ] उच्चः विद्विषां मूर्धसु हेलया पादम् अकृत्वा अनालम्बा कीर्तिः कथङ्कारम् द्याम् अधिरोहति ? । - अकृत्वा हेलया P- सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [विग्रहः ] नास्ति आलम्बो यस्याः सा अनालम्बा । [अर्थः ] उच्चैः = उन्नतेषु। विद्विषां = शत्रूणाम् । मूर्धसु शिरःसु । हेलया = अनादरेण । बलात्कारेण । हठात् । पादं चरणम् । अकृत्वा = अनिधाय । कीर्तिः = यशः। कथङ्कारं कथं नाम । अनालम्बा = निरालम्बा सती। निराश्रया सती । द्याम् = दिवम् । स्वर्गम् । अधिरोहति = आरोहति । न कथच्चि- दित्यर्थः। [ भावार्थः] शत्रुशिरःसु पादमकृत्वा कीर्तिः कथं नाम दिवमधिरहति ? । न कथञ्चित् । अतः शित्रु शिरःशु पादोऽवश्यं विजिगीषुणा निधेयः। [ कोशः ] 'सुरलोको द्योदिवौ द्वे स्त्रियां क्लीबे त्रिविष्टपम्' इत्यमरः । 'हेला स्त्रियामवज्ञायां विलासे वारयोषिताम्' इति मेदिनी । [ वाच्यप० ] विद्विषामुच्चैः शिरःसु पादमकृत्वा अनालम्बया कीर्त्या कथङ्कारम् द्यौरधिरुह्यते । [ भाषाटीका ] शत्रु ओं के शिर पर पैर रखे बिना ( विना अवलम्ब के, विना सीढी के) कीर्ति आकाश में कैसे चढ़ सकती है ? । शत्र को जीतने से ही स्वर्ग तक कीर्ति फैलती है ॥ ५२ ॥ पौरुषमेवाश्रयणीयमित्यत्रान्वयव्यतिरेकदृष्टान्तावाचष्टे- अङ्काधिरोपितमृगश्चन्द्रमा मृगलाञ्छनः । केसरी निष्ठुरक्षिप्तमृगयूथो मृगाधिपः ॥५३॥ [ सर्वकषा ] अङ्कोति । अङ्कमुत्सङ्गमधिरोपितो मृगो येन स चन्द्रमाः मृगलाञ्छनः-मृगाङ्कः । तथा निष्ठुरं यथा तथा क्षिप्तो हतो मृगयूथो मृगसमूहो येन स केसरी-सिंहो मृगाधिपः। उभय- त्रापि 'ख्यात' इति शेपः। तस्माच्छत्री मार्दवं दुष्कीर्तये, पौरुषं तु कीर्तये इति भावः । अत्राऽप्रस्तुतकथनात्प्रस्तुतार्थप्रतीतेरप्रस्तुतप्रशंसा ॥ ५३॥ [ अन्वयः ] अङ्गाधिरोपितमृगः चन्द्रमा मृगलाञ्छनः
१६६
शिशुपालवधम् ।
[२ द्वितीय:-
('इत्येवं ख्यातः')। निष्ठुरक्षिप्तमृगयूथः केसरी (तु) मृगाधिपः
('इत्येवं ख्यातः')।
[विग्रहः ] अङ्के अधिरोपितो मृगो येनासौअङ्काधिरोपितमृगः । मृगः
लाञ्छनं यस्यासौ मृगलाञ्छनः। निष्ठुरं क्षिप्तः मृगयूथो येनासौ निष्ठुरक्षिप्त-
मृगयूथः । मृगाणाम् अधिपः-मृगाधिपः ।
[ अर्थः ] अङ्काधिरोपितमृगः = उत्सङ्गस्थापितहरिणः ।
चन्द्रमाः = इन्दुः। मृगलाञ्छन:-मृगाङ्कः । इत्येवं लोके ख्यातः
इति शेषः । किञ्च-निष्ठुरक्षिप्तमृगयूथः = निर्दयहतहरिणसमूहः।
केसरी = सिंहस्तु । मृगाधिपः = मृगराजः। 'इत्येवं लोके ख्यात'
इति शेषः।
[भावार्थः] उत्सङ्गस्थापितहरिणश्चन्द्रो मृगाङ्क इत्युच्यते,
हतहरिणो हरिभृगराज इत्युच्यते, तच्छत्रौ मार्दवमकीतये, पौरु-
..
?
पन्तु यशसे ।
[ कोशः] 'उत्सङ्गचियोरङ्कः' इत्यमरः। 'कलङ्काङ्कौ लाञ्छनञ्च
इत्यमरः।
[वाच्यप० ] चन्द्रमसा मृगलान्छनेन ख्यातेन भूयते। केसरिणा
मृगाधिपेन ख्यातेन भूयते ।
[भाषाटीका ] हरिण को गोद में बैठानेवाले चन्द्रमा को तो लोग मृग-
लान्छन ( मृगकलङ्कवाला) कहते हैं । पर निर्दयता से हरिणों को मारने
वाले सिंह को तो लोग मृगाधिप ( हरिणों का राजा ) कहते हैं। अतः
शत्रु पर निर्दयता दिखाना ही उचित है ॥ ५३ ॥
नमु सामादिसुकरोपायमपेक्ष्य किं पाक्षिकसिद्धिना दण्डेन ? । यथाह
मनुः-'साम्ना भेदेन दानेन समस्तैरुत वा पृथक् । विजेतुं प्रयतेतारीन
युद्धन कदाचन ॥' इति । तस्मात्सान्त्वमेव युक्तमित्याशङ्कय द्वाभ्यां
निराचष्टे-
चतुर्थोपायसाध्ये तु रिपौ सान्त्वमपक्रिया ।
स्वेघमामज्वरं प्राज्ञः कोऽम्भसा परिषिञ्चति ॥५४॥
- सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १६७ [ सर्वकषा] चतुर्थोपायेति । चतुर्थोपायसाध्ये-दण्डसाध्ये । रिपौ, सान्त्वं-साम । 'साम सान्त्वमुभे समे' इत्यसरः । अपक्रिया अपकारः । तथा हि-स्वेचं -स्वेदाहम् । स्वेदन (प्रती) कार्यमित्यर्थः । 'स्वेदस्तु स्वेदने धर्मे' इति विश्वः । आमज्वरम्-अपक्क ज्वरं प्राप्य । 'आमो रोगे रोगभेदे आमोऽपक्के तु वाच्यवत्' इति विश्वः । कः प्राज्ञः- पण्डितोऽम्भसा-जलेन परिषिञ्चति । न कोऽपीत्यर्थः । ज्वरितस्या- म्भस्सेकवत् क्रुद्धस्य सान्त्वमुद्दीपकर स्यात् । अतो दण्डय एवेति भावः । वाक्यभेदेन प्रतिबिम्बकरणापेक्षो दृष्टान्तालङ्कारः ॥ ५४ ॥ [अन्वयः ] चतुर्थोपायसाध्ये रिपौ सान्त्वमपक्रिया (भवति)। स्वेद्यम् आमज्वरम् (प्राप्य) कः प्राज्ञः अम्भसा परिषिञ्चति । [विग्रहः ] चतुर्णाम् पूरणः चतुर्थः । चतुर्थश्चाऽसौ उपायश्च चतुर्थोपायः, चतुर्थोपायेन साध्यः चतुर्थोपायसाध्यः, तस्मिन् चतुर्थोपायसाध्ये । आमश्चासौ ज्वरश्च आमज्वरः, तम् आमज्वरम् । [ अर्थः] चतुर्थोपायसाध्ये = दण्डसाध्ये । रिपौ = शत्रौ । सान्त्वं । अपक्रिया - अपकार: । (तथाहि-) स्वेद्य = स्वेदाहम् । स्वेदोचितम् । आमज्वरम् = अपक्कज्वरं । (प्राप्य = आसाद्य ।) कः प्राज्ञः = को विद्वान् । भिषक् । अम्भसा = जलेन । परिषिञ्चति = अभिषिञ्चति । उपचरति । न कोऽपीत्यर्थः। [ भावार्थः] दण्डाहे रिपौ सान्त्वप्रयोगोऽपकार एव स्वेद्य ज्वरे जलाभिषेको हि अपकारायैव भवति । [ कोशः] 'साम सान्त्वमुभे समे' इत्यमरः । 'स्वेदस्तु स्वेदने धर्मे' इति विश्वः । 'आमो रोगे रोगभेदे आमोऽपक्के तु वाच्यवत्' इति विश्वः । [वाच्यप० ] सान्त्वेन अपक्रियया भूयते । केन प्राज्ञ न स्वेद्यः आम- ज्वरः अम्भसा परिषिच्यते । [ भाषाटीका ] दण्ड ( बलप्रयोग) से माननेवाले शत्रु पर सामवाद शान्ति ) का प्रयोग हानिकारक होता है। आम ( कच्चे) ज्वर में - साम . ..
।
१६८
शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः-
जहाँ स्वेद (पसीना) कराना चाहिए वहाँ कौन समझदार वैद्य रोगी को
उण्डे जल से नहलाता है ? ॥ ५४ ॥
सामवादाः सकोपस्य तस्य प्रत्युत दीपकाः ।
प्रतप्तस्येव सहसा सर्पिषस्तोयबिन्दवः॥४४॥
[ सर्वकषा ] सामेति । सकोपस्य-रूढवरस्य । तस्य-चैद्यस्य ।
सामवादाः-प्रियोक्तयः। सहसा प्रतप्तस्य-वथितस्य । सर्पिषो
घृतस्य । तोयबिन्दव इव । प्रत्युत-वैपरीत्येन । दीपका:-प्रज्वलन-
कारिणः । न तु शान्तिकरा इत्यर्थः । तस्माद्दण्ड्य एव सः। मनुवचनं
वारूढवैरविषयमिति भावः ॥ ५५ ॥
[अन्वयः] सकोपस्य तस्य सामवादाः सहसा प्रतप्तस्य
सर्पिषः तोयबिन्दवः प्रत्युत दीपकाः।
[विग्रहः ] साम्नो वादाः सामवादाः। कोपेन सहितः सकोपः, तस्य
सकोपस्य । तोयस्य बिन्दवः तोयबिन्दवः ।
[अर्थः] सकोपस्य = सक्रोधस्य । रूढवैरस्य । तस्य =
चैद्यस्य । सामवादाः = प्रियोक्तयः ।
सहसा%3 अकस्मात् ।
प्रतप्तस्य = कथितस्य । सर्पिषः घृतस्य । तोयबिन्दव इव =
जलबिन्दव इव । प्रत्युत = वैपरीत्येन । दीपकाः = उत्तेजका
एव । न तु शान्तिकारकाः।
[भावार्थः] रूढवैरस्य सामर्षस्य शत्रोः शिशुपालस्य
भवत्प्रयुक्ताः सान्त्ववादाः प्रदीप्तस्य घृतस्य तोयबिन्दव इव
दीपका एव न शान्तिप्रदाः, अतस्तत्र दण्ड एव प्रयोक्तव्यः।
[ कोशः ] 'कोपक्रोधामर्षरोषप्रतिधा रुटक्रुद्धौ स्त्रियौ'इत्यमरः ।
[वाच्यप० ] सामवादैस्तस्य दीपकैर्भूयते ।
[ भाषाटीका ] क्रोधाविष्ट शिशुपाल के प्रति आपके सान्त्ववचन
(मीठे २ शान्ति के वाक्य ) उलटे उत्तेजक ही होंगे, जैसे गर्म घी पर
जल के छीटे उत्तेजक ही होते हैं ॥ ५५ ॥
सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । १६६ एवं स्थिते यदि केचिदुद्धवादयः प्रत्याचक्षीरंस्तान्प्रत्याह- गुणानामायथातथ्यादर्थ विप्लावयन्ति ये । अमात्यव्यजना राज्ञां दूष्यास्ते शत्रुसज्ञिताः ॥ ५६ ॥ [ सर्वकषा] गुणानामिति । सन्ध्यादीनां गुणानामायथा- तथ्यात् । यथात्वमनतिक्रम्य यथातथ्यम् । यथायोग्यमिति यावत् ।'यथार्थे तु यथातथम्' इत्यमरः । यथार्थेऽव्ययीभावः । ‘स नपुंसकम्' इति नपुंसक- त्वम् । ह्रस्वो नपुंसके-- इति ह्रस्वत्वम् । ततो नसमासे-अयथातथं, तस्य भाव आयथातथ्यम् । ब्राह्मणादित्वात्प्यन्प्रत्ययः । 'यथातथयथापुरयोः पर्यायेण' इति विकल्पान्नपूर्वपदवृद्धिः । तस्मादायथातथ्यात्-अयथा- योग्यत्वात् । अन्यकालेऽन्यप्रयोगादित्यर्थः। अर्थ-प्रयोजनं । ये विप्लाव- यन्ति-निन्नन्ति । कार्यहानि कुर्वन्तीत्यर्थः । अमात्यानां व्यञ्जनं चिह्न येषां ते तथोक्ताः । तद्वेषधारिण इत्ययः। 'अवयो बहुव्रीहिय॑धिकरणो जन्मायुत्तरपदः' इति वामनः । वस्तुतस्तु शत्रुरिति संज्ञा एषां सञ्जाता- शत्रुसंज्ञिताः-शत्रव एव, ते-कूटमन्त्रिणो राशं दूषयितुमर्हाः दूष्या- गाः । त्याज्या इति यावत् । 'कृत्यानां कर्तरि वा' इति कर्तरि पष्ठी । अतः स्वोक्तं न प्रतिरोद्धव्यमिति भावः ॥५६॥ [ अन्वयः ] गुणानाम् आयथातथ्यात् अर्थं ये विप्लावयन्ति अमात्यव्यञ्जनाः (वस्तुतस्तु) शत्रुसंज्ञिताः-ते राज्ञां दूष्याः। [विग्रहः ] अमात्यानां व्यञ्जनं येषां ते अमात्यव्यञ्जनाः । दूषयितु- मर्हा:-दूष्याः। शत्रु रिति संज्ञा सञ्जाता येषान्ते शत्रु संज्ञिताः । [अर्थः] गुणानां सन्धिविग्रहादिगुणानाम् । आयथात- थ्यात् -अयथायोग्यत्वात् । अन्यका कालेऽन्यस्य प्रयोगात् । यथार्थ- ज्ञानाभावात् । अयथायोग्यं प्रयोगात् । अर्थ = प्रयोजनम् । राजकार्यम् । ये = अमात्यादयः। विप्लावयन्ति = विनिघ्नन्ति । विनाशयन्ति । अमात्यव्यञ्जनाः= मन्त्रिचिह्नाः । मन्त्रिवेषधा- रिणः । शत्रुसंज्ञिताः = शत्रवः । ते = कूटमन्त्रिणः । दुर्मन्त्रिणः । ।
२०० হায়, शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः राज्ञां = महीपतीनाम् । दूष्याः = गाः। त्याज्या इति यावत् । [भावार्थः] सन्ध्यादीनामयथायोग्यं प्रयोगाचे राजकार्य- हन्तारस्ते कूटमन्त्रिणो (वस्तुतस्तु) शत्रुरूपा राज्ञा दूरतः परित्याज्याः। [कोशः ] 'मन्त्री धीसचिवोऽमात्यः' इत्यमरः । 'व्यञ्जनं लाञ्छन- श्मश्रुनिष्टानावयवेष्वपि' इति मेदिनी। [ वाच्यप० ] यैः गुणानाम् आयथातथ्यात् अर्थः विप्लाव्यते तान् अमात्यव्यञ्जनान् शत्रु संज्ञितान् राजानो दूषयेयुः । [भाषाटीका ] जो मन्त्री सन्धि-विग्रह आदि गुणों का यथार्थ प्रयोग नहीं करने से राजा का कार्य बिगाड़ते हैं, वे मन्त्री के वेष में उन्हें राजा तुरन्त निकाल दे॥५६॥ ननु यातव्योऽपि काले यातव्य इत्याशङ्कयाऽयमेव काल इत्याह- स्वशक्त्यु पचये केचित्परस्य व्यसनेऽपरे यानमाहुस्तदासीनं त्वामुत्थापयति द्रयम् ॥ ५७ ॥ [ सर्वकषा ] स्वेति । केचिबृद्धाः स्वस्य शक्त्युपचये-सामर्थ्या- तिरेके । यानं-यात्रामाहुः । यथाह कामन्दक:--'प्रायेण , सन्तो व्यसने रिपूणां यातव्यमित्येव समादिशन्ति । तथा विपक्षेव्यसनानपेक्षीक्षमोद्विषन्तं मुदितः प्रतीयात् ॥” इति । अपरे-वृद्धाः । परस्य-शत्रोचूसने- विपदि । 'व्यसनं विपदि भ्रंशे' इत्यमरः । यानमाहुः। अत्र मनु:--'तदा यायाद्विगृह्मैव व्यसने चोत्थिते रिपोः' इति । तद्वयमुक्तपक्षद्वयं कर्तृ । आसीनमनुद्युञ्जानम् । 'ईदासः' इति शानजाकारस्येकारादेशः । त्वामुत्था- पयति-प्रेरयति । तदुभयलाभादीदृक्कालो न कदापि लक्ष्यत इत्यर्थः ॥५७॥ [अन्वयः ] केचित् स्वशक्तयुपचये यानमाहुः । अपरे परस्य व्यसने (यानमाहुः) । तवयम् आसीनं त्वाम् उत्थापयति । [विग्रहः ] स्वस्थ शक्तिः स्वशक्तिः, स्वशक्तरुपचयः स्वशक्त्युपचयः, तस्मिन्-स्वशक्त्युपचये। ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजिम् । २०१ [अर्थः] केचित् = केचिन्नीतिविदः । स्वशक्त्युपचये स्वसामर्थ्यवृद्धौ । स्वशक्त्यतिरेके । यानं युद्धयात्राम् । आहुः कथयन्ति । अपरे = अन्ये नीतिविशारदाः। परस्य = शत्रोः । व्यसने = विपदि । [यानमाहुः-यात्रां कथयन्ति ]। तवयम् = उक्तपक्षद्वयं कर्तृ । आसीनम् = अनुद्युञ्जानम् । अलस- वदवस्थितम् । त्वां = भवन्तम् । उत्थापयति = युद्धयात्रायै त्वरयति । [ भावार्थः] स्वशक्तिवृद्धौ, परव्यसने वा युद्धयात्रा नीति- तत्वविदों वृद्धानामभिमता । तदेतदुभयमपीदानीमुपस्थित- न्तदुत्तिष्ठ, इदानीं शत्रुरभिषेणयितव्यः । [ कोशः ] ' व्यसनं विपदि भ्रंशे ' इत्यमरः । [वाच्यप ] कैश्चित् स्वशक्तउपचये अपरैश्च परस्य व्यसने यान मुच्यते, तेन द्वयेन आसीनस्त्वम् उत्थाप्यसे । [ भाषाटीका ] अपने बल की वृद्धि में या शत्रुके विपत्तिकाल में चढ़ाई करनी चाहिए--यह नीतिज्ञ कहा करते हैं। सो दोनों ही बातें ( शत्रु की विपत्ति और अपनी वृद्धि ) तुम को युद्ध के लिए उत्साहित कर रही हैं । अच्छा अवसर है, उठो ॥ ५७ ॥ तत्र स्वशक्त्युपचयं तावल्लक्षयति- लिलचयिषतो लोकानलवयानलवीयसः । यादवाम्भोनिधीन्रुन्धे वेलेव भवतः क्षमा । ५८॥ [ सर्वकषा ] लिलंघयिषत इति । लोकॉल्लङ्घयितुमिच्छतो लेिलंघ- यिषतः। लङ्घयतेः सन्नन्ताल्लटः शतरि शस् । अलङ्घयान्-स्वयं दुर्ल- छयान् । कुतः ? । अलघीयसोऽतिगुरून् । अत एव यादवा अम्भोनिधय इवेत्युपमितसमासः, वेलेवेति लिङ्गात् । तान्-यावदाम्भोनिधीन्भवतः क्षमा-तितिक्षा । वेलेव-कूलमिव । 'वेलाकूलेऽपि वारिधेः' इति विश्वः । रुन्धे-प्रतिबध्नाति । अन्यथा प्रागेव सर्वं संहरेयुरिति भावः ॥ ५८ ॥ ] - २०२ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [अन्वयः ] लोकान् लिलंघयिषतः अलंध्यान अलघीयसः यादवाम्भोनिधीन भवतः क्षमा वेला इव रुन्धे । [विग्रहः ] लवयितुमिच्छतः-लिलङ्घ यिषतः, तान् । लचितुम्, योग्याः लङ्घयाः, न लयाः अलङ्घयास्तान् अलङ्घयान् । न लघीयांसः अलवीयांसः, तान्-अलधीयसः । यादवा अम्भोनिधय इव, यादवा- म्भोनिधयः, तान्-यादवाम्भोनिधीन् । [अर्थः ] लोकान् = भुवनानि । जनांश्च । लिलङ्घयिषतः लङ्घयितुमिच्छतः । अलञ्चयान् = स्वयंपरैर्दुर्लक्क्यान् । अलघी- यसः = अतिगुरून् । अतिमहतः। यादवाम्भोनिधीत् = यादव- सागरान् । समुद्रतुल्यान् यादवान् । भवतः = श्रीकृष्णस्य तव । क्षमा = तितिक्षा । वेलेव = कूलमिव । रुन्धे = प्रति- बध्नाति । अवरुणद्धि । [भावार्थः] जगल्लिलंघयिषतो दुर्लकथान् यादवाम्भो. निधीन् वेलेव भवतः क्षमा रुणद्धि । अतः क्षमा त्यज, शत्रु मुन्मूलयामः। [ कोशः] 'वेला कूलेऽपि वारिधेः' इति विश्वः । भुवने जने ' इत्यमरः। [वाच्यप०] लोकान् लिलवयिषन्तः अलङ्घयाः अलधीयांसः यादवा- म्भो निधयः भवतः क्षमया वेलया इव रुध्यन्ते । [भाषाटीका ] जगत् भी को अतिक्रमण करने की इच्छा रखनेवाले यादवरूपी समुद्रों को केवल आपकी क्षमा ही वेला (किनारा, सीमा) की तरह रोकती है॥ ५८ ॥ अभ्युच्चयश्चायमपरो यदक्लेशेनैव ते विजयलाभ इत्याह- विजयस्त्वयि सेनायाः साक्षिमात्रेऽपदिश्यताम् । फलभाजि समीक्ष्योक्ते बुद्ध भोंग इवात्मनि ॥ ५६ ।। [ सर्वकषा] विजय इति । सेनायाः का विजयः साक्षिमात्र 'लोकस्तु सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । २०३. - उदासीने एव फलभाजि त्वयि समीक्ष्योक्ते-साङ्ख्योक्ते । 'साङ्ख्यं समीक्ष्यम्' इति त्रिकाण्डः । आत्मनि बुद्धेः-महत्तत्त्वस्य, मूलप्रकृतेः प्रथमविकारस्य काः । भोगः-सुखदुःखानुभव इवापदिश्यतां- व्यवहियताम् । भृत्यजयपराजययोः स्वामिगम्यत्वादिति भावः । साङ्ख्या अप्याहुः–'कतैव भवत्युदासीन' इति, 'सर्व प्रत्युपभोगं यस्मात्पुरुषस्य साधयति बुद्धिः' इति च ॥ ५९ ॥ [अन्वयः] सेनायाः विजयः साक्षिमात्रे फलभाजि त्वयि समीक्ष्योक्ते आत्मनि बुद्धेः भोग इव अपदिश्यताम् । [विग्रहः ] फलं भजते इति फलभाक् , तस्मिन् फलभाजि। समीक्ष्येन उक्तः समीक्ष्योक्तः, तस्मिन् समीक्ष्योक्ते । साक्ष्येव साक्षिमात्रं, तस्मिन्-साक्षिमात्रे । [अर्थः ] सेनायाः- सैन्यस्य । बलस्य-कर्तृभूतस्य । विजयः= जयः । साक्षिमाने = उदासीने एव । फलभाजि = फलभोक्तरि । त्वयि = भवति । समीक्ष्योक्ते = साङ्खयशास्त्रोक्ते । आत्मनि पुरुषे। बुद्धेः = महत्तत्त्वस्य । भोग इव = सुखदुःखानुभव इव । बुद्धिकत्तकः सुखाद्यनुभव इव । अपदिश्यतां = व्यवह्रियताम् । भृत्यजयपराजययोः स्वामिगम्यत्वादिति भावः । [ भावार्थः] अस्मत्सैन्यमेव शत्रून्विनाशयिष्यति, त्वं केवलं साक्षिभूतस्तिष्ठ। साङ्खयशास्त्रे बुद्धिकृतो भोगो यथा पुरुषे व्यवह्रियते तथा सेनाविजयंत्व द्विजयतया लोका व्यवहरिष्यन्ती. त्यात्मनः सेनासमृद्धिर्दर्शिता। कोशः ] 'साङ्खयं समीक्ष्यम्' इति त्रिकाण्डशेषः । [वाच्यप० ] त्वयि सेनायाः विजयम् आत्मनि भोगमिव अपदिशन्तु । [ भाषाटीका ] जैसे बुद्धि (महत्तत्त्व ) कृत सुख आदि का अनुभव पुरुष में समझा जाता है-'मैं सुखी हूँ' इत्यादि; वैसे ही सेना का विजय तुमारा ही विजय लोग कहेंगे । ( अर्थात् हमारी सेनासम्पत्ति प्रचण्ड है ) ॥ ५९॥ .
२०४ - शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- - अथ परस्य व्यसनमाह- हते हिडिम्बरिपुणा राज्ञि द्वैमातुरे युधि । चिरस्य मित्रव्यसनी सुदमो दमघोषजः ॥ ६० ॥ [ सर्वकषा] हत इति । हिडिम्बरिपुणा-भीमेन । द्वयोर्मात्रोरपत्यं पुमान्द्वैमातुरः। 'मातुरुत्सङ्घथासम्भद्रपूर्वायाः' इत्यण्प्रत्ययः । उकारश्चान्ता- देशो रेफपरः । तस्मिन्राज्ञि--जरासन्धे । स हि द्वाभ्यां पत्नीभ्यामर्धश: प्रसूतो जरया नाम पिशाच्या सन्धितश्चेति कथयन्ति । युधि हते सति । चिरस्य-चिरकालेन। 'चिराय चिररात्राय चिरस्याद्याश्चिरार्थकाः' इत्यमरः । मित्रव्यसनी-मित्रव्यसनवान् । मित्रभ्रंशवानिति यावत् । 'व्यसनं विपदि अंशे' इत्यमरः । दमघोषजश्चैद्यः । सुखेन दम्यत इति सुदमः। एकाकित्वात्सुसाध्य इत्यर्थः ॥ ६० ॥ [अन्वयः ] हिडिम्बरिपुणा द्वैमातुरे राज्ञि युधि हते (सति) चिरस्य मित्रव्यसनी दमघोषजः सुदमः । [विग्रहः ] हिडिम्बस्य रिपुः-हिडिम्बरिपुः, तेन हिडम्बरिपुणा । द्वयोर्मात्रोरपत्यं द्वैमातुरस्तस्मिन् द्वैमातुरे । दमघोषाजातः-दमघोषजः । [अर्थः ] हिडिम्बरिपुणा = भीमसेनेन । द्वैमातुरे द्वयोर्मा- त्रोरपत्ये । राज्ञि = राजनि जरासन्धे । युधि = युद्धे । हते = विनाशिते सति । चिरस्थ = चिरकालेन । मित्रव्यसनी = मित्र- व्यसनवान् । मित्रविकलः । हतमित्रः । दमघोषजः = शिशु: पालः । सुदमः = अनायासेन जेतु शक्यः । [ भावार्थः] जरासन्धवधासम्प्रति मित्रव्यसनी चैद्यो- ऽस्माभिरनायासेन जेतु शक्यः । [कोशः] 'समित्याजिसमिधुधः' इत्यमरः । [वाच्यप०] हिडिम्बरिपुणा द्वैमातुरे राज्ञि हते सति चिरस्य मित्रव्य- सनिना दमघोषजेन सुदमेन भूयते । [ भाषाटीका ] भीमसेन ने जरासन्ध को मार ही दिया है, अब सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सनकषा-विराजिताम् । मित्र के मारे जाने से उस शिशुपाल का जीतना सुलभ होगया है॥१०॥ कष्टश्चायं पक्षोऽभ्युपेत्यावदेनोक्तः, वस्तुतस्तु शूराणामग्रिमपक्ष एवेष्टः शास्त्रसंवादी । यथाह कामन्दक:--'यदा समर्थः प्रसभं निहन्तुं पराक्रमा- दूर्जितमप्यमित्रम् । तदाऽभियायादहितानि कुर्वन्नुपान्ततः कर्षणपीडनानि ।' इतीत्यभिप्रेत्याह- नीतिरापदि यद्गम्यः परस्तन्मानिनो हिये । विधुर्विधुन्तुदस्येव पूर्णस्तस्योत्सवाय सः ॥ ६१ ॥ [ सर्वकषा ] नीतिरिति । परः-शत्रुरापदि गम्योगमनाहः नीतिरिति यत्तदापदि गमनं मानिनः शौर्याभिमानिनो हिये । लजाकर- मित्यर्थः । किन्तु-पूर्णः-उपचितगात्रः, सः-शत्रुस्तस्य मानिनः । विधुश्चन्द्रः । विधु तुदति हिनस्तीति विधुन्तुदो राहुः । 'विध्वरुषोस्तुदः' इति खश्प्रत्यये मुमागंमः । तस्येवोत्सवाय । अत एव बलिना बलवानेव यातव्यः, बलिनश्च वयमिति भावः ॥६१ ॥ [अन्वयः] परः आपदि गम्य इति नीतिः यत्तन्मानिनः हिये । पूर्णः स-विधुन्तुदस्य विधुरिव-तस्योत्सवाय । [विग्रहः ] विधुं तुदतीति विधुन्तुदस्य । [अर्थः] परः = शत्रु । आपदि = विपत्तिसमये । गम्यः = गमनाहः। अभियातव्यः । नीतिः - इति नीतिः। यत्-तत् = आपदि गमनम् । मानिनः = शौर्याभिमानिनः। धीरस्य । हिये लज्जायै भवति । (किन्तु-) पूर्णः = समृद्धः, उपचितवपुश्च । सः = शत्रुः । तस्य = मानिनः। विधुः = पूर्णचन्द्रः । विधुन्तुद- स्येव = राहोरिव । उत्सवाय = हर्षायैव भवति । बलिना हि बल- वानेवाभियातव्य इत्यर्थः । [भावार्थः ] राहुः पूर्ण चद्रमिव बली समृद्धमुपचितबलमेव रिपुमभियाति, न क्षीणबलं कृशतनुम् । तद्रिपुरभियातव्यः सम्प्रति । ..
:- .4 - । २०६ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [ कोशः ] 'तमस्तु राहुः स्वर्भानुः सैंहिकेयो विधुन्तुदः' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] परेण आपदि गम्येन भूयते । [ भाषाटीका ] 'कमजोर शत्रु पर चढ़ाई करना' यह नीति वीर मानी पुरुष के लिए लज्जा देनेवाली है । समृद्ध शत्रु पर चढ़ाई करना ही मानी को अच्छा लगता है। देखो, राहु भी पूर्ण चन्द्रमा पर ही आक्रमण करता है॥ ६१॥ तर्हि पूर्वोदाहृतमन्वादिशास्त्रविरोधः स्यादित्याशङ्कयाह- अन्यदुच्छृङ्खलं सत्त्वमन्यच्छास्त्रनियन्त्रितम् । सामानाधिकरण्यं हि तेजस्तिमिरयोः कुतः ॥ ६२ ॥ [सर्वकषा] अन्यदिति । अन्यदुच्छृङ्खलमनर्मलं । प्रसह्य पीडनक्षम- मिति भावः। सत्वं बलम् अन्यत्। शास्त्रेण-मन्वादिशास्त्रेण नियन्त्रित- मुदाहृतं । परव्यसनकालनिमित्तं सत्त्वमन्यत् । उत्कटानुत्कटलक्षणवैलक्षण्य- मन्यशब्दार्थः। तयोः सापेक्षत्वनिरपेक्षत्वाभ्यां मिथो विरोधान्नकशास्त्रत्वं सम्भवतीत्यर्थः । अत्र दृष्टान्तमाह-तेजस्तिमिरयोः-समानमधिकरणं ययोस्तयोर्भावः सामानाधिकरण्यमेकाश्रयत्वं कुतः ? । न कुतश्चित् । तयोः सहावस्थानविरोधादिति भावः । तस्मादुभयोरुदितानुदितहोमवद्भिन्न- विषयत्वादितरेतरशास्त्रविरोधो न बाधक इति भावः ॥६२ ॥ [अन्वयः ] अन्यत् उच्छृङ्खलं सत्त्वम् । अन्यत् शास्त्रनिय- न्त्रितम् (सत्त्वम्)। हि तेजस्तिमिरयोः सामानाधिकरण्यं कुतः ?। [विग्रहः ] उद्गता शृङ्खला यस्य तत् उच्छृङ्खलम् । शास्त्रेण नियन्त्रितं शास्त्रनियन्त्रितम् । तेजश्च तिमिरं च तेजस्तिसिरे, तयोः तेजस्तिमिरयोः । समानम् अधिकरणं ययोस्ते समानाधिकरणे,तयोर्भावः-सामानाधिकरण्यम्। [अर्थः ] अन्यत् = अन्यादृशम् ।. उच्छृङ्खलं = निरर्गलम् । प्रसह्य पीडनक्षमम् । सत्त्वं = बलम् ॥ अन्यत् = भिन्नम् । उत्कटानुत्कटभेदभिन्नम् । शास्त्रनियन्त्रितं = शास्त्रानुसारि । मन्वादिनीतिशास्त्रानुसारि । सत्त्वं = बलम् परव्यसन- सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । :२०७ बलशा 'लब्धम्। हि = यतः। तेजस्तिमिरयोः आलोकान्धकारयोः। प्रकाशध्वान्तयोः । सामानाधिकरण्यं = समानाधिकरणता। कुतः = कथं भवितुमर्हति ? । नैव भवितुमर्हतीत्यर्थः । [भावार्थः] अनियन्त्रितं बलमन्यत, नीत्यनुसारि बलम- न्यत् । कथमनयोः सामानाधिकरण्यं सम्भवति । तदेवं निरर्गल- आलितयाऽस्माभिः पदेपदे शास्त्रचिन्ता न कार्या, शत्रुह- न्तव्य एव। [ कोशः ] 'अन्धकारोऽस्त्रियां ध्वान्तं तमित्रं तिमिरं तमः' इत्यमरः । 'द्रव्यासुव्यवसायेषु सत्त्वमस्त्री तु जन्तुषु' इत्यमरः । [वाच्यप०] सत्त्वेन अन्येन भूयते । [ भाषाटीका] अनियन्त्रित असीम ) बल कुछ और है, श.स्त्रानु- सारी बल कुछ और है,प्रकाश और अन्धकार की तरह ये दोनों एक जगह कैसे रह सकते हैं ? । हमलोग असीम बलवाले हैं अतः शास्त्रविचार की क्या आवश्यकता है, शत्रु पर चढ़ाई कर देनी चाहिए ॥ ६२ ॥ तर्हि नः किमिदानी कार्यमत आह- इन्द्रप्रस्थगमस्तावत्कारि मा, सन्तु चेदयः । आस्माकदन्तिसान्निध्यावामनीभूतभूरुहः ॥६३॥ [ सर्वकषा ] इन्द्रप्रस्थेति । इन्द्रप्रस्थस्य-पार्थनगरस्य । गमो- गमनम् । 'ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च' इत्यप्रत्ययः। तावदिदानीम् मा कारि- तावत् न क्रियतामेवेत्यर्थः । 'यावत्तावत्परिच्छेदे कात्स्न्ये माने ऽवधारणे' इति विश्वः । कृजः कर्मणि लुङ् । 'माङि लुङ्' इत्याशीरर्थे । 'न माड्योगे' इत्यप्रतिषेधः । किन्तु चेदयः-चेदिदेशाः । अस्माकमिमे आस्माकाः 'युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च' इति विकल्पादण्प्रत्ययः। 'तस्मिन्नणि च थुप्माकास्माकौ' इत्यस्माकादेशः । सन्निधिरेव-सान्निध्यम् । स्वार्थे प्यन्प्र- त्ययः । आस्माकानां दन्तिनां सान्निध्याद्वामनीभूताः-शाखाभ- झाल्खीभूता भूरुहो वृक्षा येषां ते तथोक्ताः सन्तु। चेदियात्रव क्रियता- मित्यर्थः । सा च प्रस्तुता प्रस्तुतेनैव स्वकार्येण गम्यत इति पर्यायोक्ता- - - २०८ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः :- . लङ्कारः। 'कारणं गम्यते यत्र प्रस्तुतात्कार्यवर्णनात् । प्रस्तुतत्वेन सम्बन्धात्पर्या- योक्तः स उच्यते ॥ इति लक्षणात् ॥ ६३ ॥ [अन्वयः] इन्द्रप्रस्थगमः तावत् मा कारि । चेदयः आस्मा- कदन्तिसान्निध्यात् वामनीभूत रुहः सन्तु । [विग्रहः ] इन्द्रप्रस्य' गमः इन्द्रप्रस्थगमः। अस्माकम् इमे आस्माकाः, आस्माकाश्च ते दन्तिनश्च आस्माकदन्तिनः, तेषां सान्निध्यम्-आस्माकदन्ति- सान्निध्यं, तस्मात्-आस्माकदन्तिलानिध्यात् । वामनीभूता भूरुहा येपु ते वामनीभूतभूरुहः। [अर्थः] इन्द्रप्रस्थगमः = हस्तिनापुरगमनम् । युधिष्ठिरयज्ञ- स्थलगमनम् । तावत् = इदानीम् । माकारि = न कार्यम् । किन्तु- चेदयः = चेदिदेशाः । आस्माकदन्तिसान्निध्यात् = अस्मद्गजसा- मीप्यात् । वामनीभूतभूव्हः = शाखाभङ्गात्खर्वीभूतपादपाः । विध्वस्तपादपाः । सन्तु = भवन्तु ।। [ भावार्थः] युधिष्ठिरयज्ञगमनमिदानीं न कार्य, शत्रु राष्ट्र समुन्नतपादपगहनमपि अस्मद्गजसन्निधानाद्वामनीभूतभूरुहं, विश्वस्तवृक्षसमूह वा भवतु । (तदिदानीं शत्रुरेवाभियातव्यः)। [कोशः ] 'वृक्षो महीरुहः शाखी विंटपी पादपस्तरुः' इत्यमरः। 'खों हस्वश्च वामनः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] इन्द्रप्रस्थगमं तावत् मा कार्षीः । चेदिभिः आस्माकद- न्तिसान्निध्यात् वामनीभूतभूरुभिर्भूयताम् । [भाषाटीका ] अतः अभी हस्तिनापुर मत जाइए, पहिले शत्रु के दुर्गम देश (चेदि-चन्देरी-झांसी जिला ) के बड़े २ वृक्ष हमारे हाथियों के पहुंचने से छोटे २ हो जावें । तोड़-मोड़ दिये जावें ( अर्थात् हाथियों द्वारा शत्र का देश व जङ्गल-दुर्ग नष्ट कर दिया जाए ) ॥ ६३ ॥ निरुद्धवीवधासारप्रसारा गा इव ब्रजम् । उपरुन्धन्तु दाशार्हाः पुरी माहिष्मती द्विषः ॥४॥ H सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [ सर्वकषा] निरुद्धेति । किञ्च-दाशार्हाः-यादवाः । वीवयो- धान्यादिप्राप्तिः, आसारः-सुहृद्धलम्, प्रसारस्तृणकाष्ठादेः प्रवेशः । 'धान्या. देविधः प्राप्तिरासारस्तु सुहृद्धलम् । प्रसारस्तृणकाष्ठादेःप्रवेशः' इति वैज- यन्ती। ते निरुद्धा यैस्ते तथाक्ताः । अन्यत्र-निरुद्धो वीवधानां-पर्याहारा. परनाम्नां स्कन्धवाह्यक्षीराद्याहरणसाधनभारविशेषाणाम्-आसारप्रसारौ प्रवेशनिर्गमौ यैस्ते तथोक्ताः । 'विवधो वीवधो भारे पर्याहाराध्वनोरपि' इति हेमचन्द्रः। ब्रज-गोष्ठम् । 'ब्रजः स्यागोकुलं गोष्ठम्। इति वैजयन्ती । गा इव माहिष्मती पुरीं द्विषोऽरीनुपरुन्धन्तु। ब्रजे गा इव माहिष्मत्या- मरीनावृण्वन्त्वित्यर्थः । 'दुहियाचिरुधि-' इति द्विकर्मकत्वम् । तत्र पुरी- बजावकथितं कर्म, अन्यदीप्सित कर्म ॥ ६४ ॥ [अ.वयः ] दाशार्हाः निरुद्धवीवधासारप्रसारा ब्रजम् गा इव माहिष्मतीम् पुरीम् द्विषः उपरुन्धन्नु । [विग्रह :] वीवधश्च आसारश्च प्रसारश्च ते वीवधासारप्रसाराः, निरुद्धाः वीवधासारप्रसारा यैस्ते निरुद्धवीवधासारप्रसाराः । अन्यत्र-आसा- रश्च प्रसारश्च आसारप्रसारी, वीवधानाम् आसारप्रसारौ वीवधासारप्रसारी, निरुद्धौ वीधधासारप्रसारौ यैस्ते निरुद्धवीवधासारप्रसाराः । [अर्थः] (किञ्च--) दाशाह यादवाः । निरुद्धवीवधा- सारप्रसाराः = अवरुद्धधान्यादिप्राप्ति-सुहृद्वलसाहाय्य-तृणका- ष्ठादिप्रवेशाः । ब्रजपक्षे-अवरुद्धदुग्धादिभारवहनसाधनशिक्य- भेदप्रवेशनिर्गमनाः । ब्रज-गोष्ठम् । गा इव = धेनूरिव । माहिष्मती = तन्नाम्नीम् । पुरी = नगरीम् । द्विषः शत्रून् उपरुन्धन्तु = आवृण्वन्तु । निरन्धन्तु । [भावार्थः ] निरुद्ध यातायातमार्गा यादवा ब्रजे गा इव माहिष्मत्यां शत्र नुपरुधन्तु। [कोशः ] 'धान्यादेविधः प्राप्तिरासारस्तु सुहृद्धलम् । प्रसारतृण- काष्ठादेः प्रवेशः' इति वैजयन्ती । 'विवधो वीवघो भारे पर्याहाराध्वनोरपि इति हैमः । 'बजः स्याद्गोकुलं गोष्ठम्' इति वैजयन्ती। 9 RAM २१० शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः- [ वाच्यप०] दाशाहः निरुद्धवीवधासारप्रसारैः ब्रजेगा इव माहि- धमती पुरी द्विषः उपरुध्यताम् । [भाषाटीका ] जैसे गोकुल में दूध दही की बहँगियों का आना जाना रोककर गौवों को चोर घेर लेते हैं, वैसे ही धान्यप्रवेश व मित्रों की पल- टनों की सहायता और तृण काष्ट आदि का प्रवेश रोकती हुए यादवों की सेना माहिष्मती ('महेश्वर'-इन्दौर) पुरी में शत्रुओं को तुरन्त घेर ले॥६॥ तर्हि पार्थप्रार्थनायाः का गतिरित्याशङ्कय उपेक्षैव गतिरित्याह- यजतां पाण्डवः स्वर्गमवविन्द्रस्तपत्विनः । वयं हनाम द्विषतः सर्वः स्वाथ समीहते ॥ ६५ ॥ [ सर्वङ्कषा] यजतामिति । पाण्डवो युधिष्ठिरो यजतां-यागंकरोतु । इन्द्रः स्वर्गमवतु-रक्षतु । इनोऽर्कः । 'इन : पत्यो नृपार्कयोः, इति मेदिनी । तपतु-प्रकाशताम् । वयं द्विषो हनाम मारथाम । 'आहुत्तमस्य पिका' इत्याडागमः । सर्वत्र प्रातकाले लोट् । तथाहि-सो जनः स्वार्थ- स्वप्रयोजनं, समीहतेऽनुसन्धत्ते । इन्द्रादिसमानयोगक्षेमो नः पार्थ इत्यर्थः । अर्थान्तरन्यासः ॥ ६५ ॥ [अन्वयः ] पाण्डवः यजताम्, इन्द्रः स्वर्गम् अवतु, इनः तपतु, वयं द्विषतः हनाम, सर्वः स्वार्थ समीहते । [विग्रहः ] पाण्डोरपत्यं पाण्डवः । स्वस्थ अर्थः स्वार्थः, तम् । [अर्थः] पाण्डवः = युधिष्ठिरः । यजतां = यागं करोतु नाम । इन्द्रः = महेन्द्रः । स्वर्ग-मुरलोकम् । अवतु-रक्षतु । इनः सूर्यः । तपतु = प्रकाशताम् । वयं = यादवाः । द्विषः = शत्रून् । हनाम मारयाम । ( तथा हि-)। सर्वः सर्वोऽपि लोकः । स्वार्थ स्वप्रयो जनम् । समीहते अनुसन्धत्त । अभिवाञ्छति । कुरुते । [भावार्थः] युधिष्ठिरादयः स्वार्थं यज्ञादिना साधयन्तु वयमपि स्वार्थ शत्रुविनाशरूपं साधयामः । [ कोशः ] ' इनः पत्यौ नृपार्कयोः' इति मेदिनी । , - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । .. , [वाच्यप० ] पाण्डवैः इज्यताम् । इन्द्रेण स्वर्गः अव्यताम् । इनेन तष्यताम् । अस्माभिः द्विषन्तो हन्यन्ते । सर्वैः स्वार्थः समीयते । [ भाषाटीका ] युधिष्ठिर यज्ञ करें, इन्द्र स्वर्ग की रक्षा करें, सूर्य तपते रहें। हम भी अपना काम करें-शत्रु को मारें। क्योंकि सभी लोग अपना अपना स्वार्थ ही साधन करते हैं ॥६५॥ प्राप्यतां विद्युतां सम्पत्सम्पर्कादकरोचिषाम् । शस्त्रषिच्छिरछेदनोच्छलच्छोणितीक्षितैः ॥६६॥ [ सर्वकषा] प्राप्यतामिति । किञ्च-द्विषतां शिरश्छेदेन प्रोच्छलताउद्गच्छता शोणितेनोक्षितैः--सिक्तैः, शस्त्रौरर्करोचिषां सम्पर्कात्सम्बन्धाद्विद्युतां, सम्पतूलक्ष्मीः, प्राप्यतामिति । निदर्शना- लङ्कारः॥६६॥ [अन्वयः ] द्विषच्छिरश्छेदप्रोच्छलच्छोणितैः शस्त्रैः अर्क- रोचिषां सम्पर्कात् विद्य तां सम्पत् प्राप्यताम् । [विग्रहः ] द्विषतां शिरांसि द्विषच्छिरांसि, तेषां छेदः द्विषच्छिरश्छेदः तेन प्रोच्छलन्ति च तानि शोणितानि च द्विषच्छिरश्छेदनोच्छलच्छोणि- तानि, तैः उक्षितानि द्विषच्छिरश्छेदप्रोच्छलच्छोणितोक्षितानि, तैः । अर्कस्य रोचींषि अर्करोची षि, तेषाम्---अर्करोचिषाम् । [ अर्थः ] (किञ्च-) द्विषच्छिरश्छेदप्रोच्छलच्छोणितोक्षितैः शत्रु शिरश्छेदोद्गच्छद्रुधिरसंसिक्तः । शस्त्रैः = खड्गाद्यायुधैः । अकरोचिपा = सूर्यकिरणानाम् । सम्पर्कात् = सम्बन्धात् । विद्युता = तडिताम्। सम्पत् = लक्ष्मीः । शोभा। प्राप्यतां = लभ्यताम् । [ भावार्थः] युधि द्विषन्मूर्यकर्तनोद्गतरुधिरारुणितैरायुधः । सूर्यकिरणसम्पर्काद्विद्य लक्ष्मीराप्यतां नाम । [ कोषः ] 'रिपो वैरिसपत्नारिद्विषवेषणदुहृदः' इत्यमरः । 'रोचिः शोचिरुमे क्लीबे' इत्यमरः । - 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२१२ शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः- [ वाच्यप०] द्विषच्छिरश्च्छेदप्रोच्छलच्छोणितीक्षितानि शस्त्राणि अर्क- रोचिषाम् सम्पर्कात् विद्युतां सम्पदम् प्राप्नुवन्तु । [ भाषाटीका ] युद्ध में शत्रुओं के शिर काटने से निकले हुए रुधिर खड्ग आदि से रंगे हुए शस्त्रों को सूर्य की किरणों के सम्पर्क से बिजली की सी शोभा प्राप्त हो । (युद्ध में हम शत्रुओं के शिर काटें)॥ ६६ ॥ इति संरम्भिणो वाणीबलस्यालेख्य देवताः । सभाभित्तिप्रतिध्वानर्भयादन्ववदन्निव ।। ६७ ॥ [ सर्वकषा] इतीति । इतीत्थं संरम्भिण:-क्षुभितस्य, बलभद्रस्य वाणीरालेख्यदेवताचित्रलिखितदेवताः । सभायाः-सदोगृहस्य भित्तीनां प्रतिध्वानः-प्रतिध्वनिव्याजेनेत्यर्थः । भयादन्ववदन-अन्वमोद- यन्निवेत्युत्प्रेक्षा ॥ ७ ॥ [अन्वयः ] इति संरम्भिणः बलस्य वाणीः आलेख्यदेवताः सभाभित्तिप्रतिध्वानै भयात् अन्ववदन्निव । [विग्रहः] आलेख्यानाम्, आलेख्य वा देवताः आलेख्यदेवताः। सभायाः भित्तयः सभाभित्तयः, तासां प्रतिध्वानानि, तैः-सभाभित्तिप्रतिध्वानैः । [ अर्थः ] इति = इत्थम् । संरम्भिणः = क्रुद्धस्य । क्षुभितस्य । बलस्य = बलभद्रस्य । वाणीः = गिरः । आलेख्यदेवताः = चित्र- लिखिता देवताः । स्तम्भपुत्तलिकाः । सभाभित्तिप्रतिध्वानः समितिभवनकुड्यप्रतिध्वनिच्छलेन । भयात् = भीतेः। अन्वव- दन्निव = अन्वमोदयन्निव । अनुवदन्ति स्म [भावार्थः] इत्थं संरम्भिणो बलस्य वाणीनां सभायां प्रति- ध्वनिरभूत् । एवमुक्त्वा बलो विररामेति यावत् । [कोश: ] 'सङ्कर्षणः सीरपाणिः कालिन्दीभेदनो बलः' इत्यमरः । 'स्त्री प्रतिश्रुत्प्रतिध्वानम्' इत्यमरः । 'सभासमितिसंसदः' इत्यमरः । [वाच्यप०] इति बलस्य वाण्यः आलेख्यदेवताभिर्भयात् अन्वौद्यन्त इव। [भाषाटीका ] इस प्रकार बड़े आवेश से बलभद्रजी ने कहा। और सर्गः 1 अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम । २१३ - सभा में उसकी प्रतिध्वनि गूंज उठी । मानों भय से सभा की भित्ति में चित्र- लिखित देवताओं ने (पुतलियों ने) भी इनकी बात का समर्थन किया॥६७॥ निशम्य ताः शेषगवीरभिधातुमधोक्षजः । शिष्याय वृहतां पत्युः प्रस्तावमदिशद्दशा ॥६८॥ [सर्वकषा] निशम्येति । अधः कृतमक्षजमिन्द्रियजं ज्ञानं येन सः- अधोक्षजो हरिः । ताः शेषस्य-शेषावतारस्य बलभद्स्य । गाः-वाचः शेषगवीः । 'गोरतद्वितलुकि' इति टच । टित्त्वान्डीप् । निशम्य-अत्वा। 'निशाम्यतीति श्रवणे तथा निशमयत्यपि इति भट्टमल्लः । तत्र शाम्यतेरिदं रूपम् । अन्यथा निशमय्येति स्यात् । अतएव वामनः-'निशम्यनिशमय्य- शब्दो प्रकृतिभेदान्' इति । बृहतां वाचां पत्युर्वृहस्पतेस्तस्य शिष्यायोद्ध वायाभिर्धातु-वक्तु, दशा-हक्सज्ञया । प्रस्तावमवसरमदिश- दतिसृष्टवान् । 'प्रस्तावः स्यादवसरः' इत्यमरः ॥ ६८ ॥ [अन्वयः ] अधोक्षजः ताः शेषगवीः निशम्य बृहतां पत्युः शिष्याय अभिधातुं हशा प्रस्तावम् अदिशत् । [विग्रहः ] अधःकृतम् अक्षजं येनासौ अधोक्षजः। शेषस्य गावः शेषगव्यः, ताः शेषगवीः । [अर्थः] अधोक्षजः हरिः । ताः पूर्वोक्ताः । शेषगवीः= बलदेवगिरः । निशम्य-श्रुत्वा । बृहतांवाचाम् । पत्युः= स्वामिनः । बृहस्पतेः । शिष्याय = अन्तेवासिने उद्धवाय । अभिधातुं वक्तुम् । हशा-हक्सज्ञया नेत्रभङ्गया । प्रस्तावम् अवसरम् । अदिशत् ददौ । अतिसृष्टवान् । [ भावार्थः] तदनन्तरं श्रीकृष्णेनोद्धवाय हक्सङ्ख्या वक्तुमवसरो दत्तः। [ कोश:] 'वनमाली बलिध्वंसी कंसारातिरधोक्षजः' इत्यमरः । 'प्रस्तावः स्यादसवरः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] अधोक्षजेन बृहतां पत्युः शिष्याय प्रस्तावः अदिश्यत । . १ ७ ११४ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [ भाषाटीका ] बलदेवजी की बातें सुनकर भगवान् कृष्ण ने उद्धवजी से भी कुछ कहने को ( आंख के इशारे से ) कहा ॥ ६८ ॥ भारतीमाहितभरामथाऽनुद्धतमुद्धवः । तथ्यामुतथ्यानुजबज्जगादाने गदाग्रजम् ।। ६६ ।। [ सर्वकषा ] भारतीमिति । अथ कृष्णानुज्ञानन्तरमुद्धवः आहितो भरोऽर्थगौरवं यस्यां सा, तां। तथ्यां यथार्थां, भारती वाचम् । अनुद्धत- मगर्वितं यथा तथा। गदस्याग्रज कृष्णम् । अग्रे पुरत इति प्रागलभ्योक्तिः। उतथ्यस्य महर्षेरनुजो वृहस्पतिः । ' उतथ्यावरजो जीवः । इति विश्वः । तद्वत्तेन तुल्यं जगाद । 'तेन-तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' इतिवतिः । तद्धित- गेयमुपमा ॥ ६९ ॥ [अन्वयः] अथ उद्धवः आहितभरां तथ्यां भारतीम् अनु- द्धतम् (यथा स्यात्तथा) गदाग्रजम् अग्रे उतथ्यानुजवत् जगाद । विग्रहः ] आहितः भरो यस्यां सा आहितभरा, ताम्-आहित- भराम् । गदस्य' अग्रजो गदाग्रजः। उतथ्यस्य अनुजः उतथ्यानुजः, तेन तुल्यम् उतथ्यानुजवत् । [अर्थः] अथ श्रीकृष्णसङ्कतानन्तरम् । उद्धवः-पवन- व्याधिः । आहितभराम्=निहितार्थगौरवाम् । अर्थगुर्वीम् । तथ्यां यथार्थाम् । शास्त्रानुमोदिताम् । भारतीं वाचम् । अनुद्धतम् अगर्वितं यथा स्यात्तथा । गदाग्रज = श्रीहरिम् प्रति । अग्रे-पुरतः । उतथ्यानुजवत्-सुरगुरुवत् । जगाद-उवाच । [ भावार्थः] तत उद्धवः सुरगुरुवद्गम्भीरया वाचा वक्तुमारेभे। [ कोशः] 'उतथ्यावरजो जीवः' इति विश्वः। 'सत्यं तथ्यमृतं सम्यगमूनि त्रिषु तद्वति' इत्यमरः । ब्राह्मी तु भारती भाषा गीर्वाग्वाणी सरस्वती' इत्यमरः। [वाच्यप० ] अथ उद्धवेन आहितभरा भारती उतथ्यानुजवजगदे ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । २१५ [भाषाटीका] तब अर्थपूर्ण यथार्थ व गम्भीर वाणी से बृहस्पति के तुल्य उद्धवजी श्रीकृष्णजी के आगे यों कहने लगे ॥ ६९ ॥ किं जगादेत्याह- सम्प्रत्य साम्प्रतं वक्तमुक्ते मुसलपाणिना । निर्धारितेऽर्थे लेख्येन खलूक्त्वा खलु वाचिकम् ॥७॥ [सर्वकषा] सम्प्रतीति । सम्प्रति मुसलपाणिना-बलभद्रेण । केवलं शूरेणेति ध्वनिः । उक्ते सति वक्तुमसाम्प्रतमयुक्तम् । साधूक्तत्वा- दभ्याससमानयोगक्षेमप्रसङ्गादिति ध्वनिः । साम्प्रतशब्दस्यार्थित्वात्तद्योगे 'शकशष-' इत्यादिना तुमुन् । तथाहि-लेख्येन-पत्रेणाऽर्थ-वाच्ये निर्धारित निर्णीते सति वाचिक-व्याहृतार्था वाचम् सन्देशवचनमित्यर्थः । 'सन्देशवाग्वाचिकं स्यात्' इत्यमरः । 'वाचो व्याहृतार्थायाम्' इति ठक् । खलु उक्त्वा खलु । न वाच्यं खल्वित्यर्थः। खलुराद्यः प्रतिषेधे, अन्यो वाक्यालङ्कारे । 'निषेधवाक्यालङ्कारे जिज्ञासानुनये खलु' इत्युभयत्राप्यमरः । 'अलङ्खल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा' इति क्त्वाप्रत्ययः। इह 'न पादादौ खल्वादय' इति निषेधस्योद्वेजकाभिप्रायत्वान्नमर्थखलुशब्दस्यानुद्वेजकत्वान्न- ज्वदेव पादादी प्रयोगो न दुप्यतीत्यनुसन्धेयम्। लिखितार्थे वाचिकमिव बलोक्त मदुक्तिरनवकाशेति वाक्यार्थप्रतिबिम्बकरणात्स्पष्टस्तावद्दृष्टान्तः । स्तुतिव्याजेन निन्दावगमाद्वथाजस्तुतिश्च । लक्षणं चाग्रे वक्ष्यते ॥ ७० ॥ [अन्वयः ] सम्प्रति मुसलपाणिना उक्ते (सति) वक्तुम् असा. म्प्रतम् । लेख्येन अर्थे निर्धारिते (सति) वाचिकम् खलूक्त्वा खलु । [विग्रहः ] मुसलं पाणौ यस्यासौ मुसलपाणिस्तेन मुसलपाणिना । [अर्थः ] सम्प्रति = इदानीम् । मुसलपाणिना = सीरिणा। हलमुसलायुधेन बलेन । उक्त = कथिते सति । वक्तुं निगदितुम् । अभिधातुम् । असाम्प्रतम् = अयुक्तम् । (तथाहि-) लेख्येन लिखितेन पत्रादिना । अर्थे अभिधेये । वाच्ये । निर्धारिते निर्णीते (सति)। वाचिकं = सन्देशवचनम् । खलूक्त्वा खलु= नैव वाच्यं खलु । नितरां व्यर्थमेवेत्यर्थः ।
- हो २१६ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [ भावार्थः ] लेखादिना निर्णी तेऽर्थ वाचिकमिव बलभद्रेण निर्धारितायां युद्धयात्रायां मदुक्तिरनवकाशैव । [ कोशः] 'सन्देशवाग्वाचिकं स्यात्' इत्यमरः । 'निषेधवाक्यालङ्कारे जिज्ञासानुनये खलु ' इत्यमरः । युक्तं द्वे साम्प्रतं स्थाने' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] असाम्प्रतं भूयते । [ भाषाटीका ] बलदेवजी ने जब एक सिद्धान्त स्थापित कर दिया तब मेरे कहने का अवसर ही क्या है ? । लिखित पत्र आदि से अब निर्णय चुका हो तो सन्देशा ( जबानी-जमाखर्च ) व्यर्थ ही है ॥ ७७ ॥ तहि किं तूष्णीभूतेन भाव्यं ?, नेत्याह- तथापि यन्मय्यपि ते गुरुरित्यस्ति गौरवम् । तत्प्रयोजककर्तृत्वमुपैति मम जल्पतः ॥७१॥ [ सर्वकषा ] तथापीति । तथापि बलेन निर्णीतेऽपि ते तव मय्यपि । बलभद्र इवेत्यपिशब्दार्थः । गुरुरित्येव यद्गौरवमादरः तद्गौरवं जल्पतः जल्पने प्रयोज्यकर्मणो मे प्रयोजककर्तृत्व प्रेरकत्वमुपैति । अतो वश्यामी- त्यर्थः। नहि पण्डितैः सादरं पृष्टस्य विशेषज्ञस्याऽज्ञवत्तप्णींभावोयुक्तइतिभावः। [अन्वयः ] तथापि ते मय्यपि गुरुरिति यद्गौरवमस्ति तत् जल्पतः मम प्रयोजकर्तृत्वमुपैति । [विग्रहः ] प्रयोजयतीति प्रयोजकः, प्रयोजकश्चासौ कर्ता च प्रयोज- ककर्ता, प्रयोजककर्तुर्भावः प्रयोजककर्तृत्वम् , तत् । [अर्थः] तथापि = बलभद्रेण निर्णीतेऽपि । ते कृष्णस्य तव । मय्यपि = बलभद्र इव मय्युद्धवेऽपि । गुरुरिति = गुरुरयमिति । यत्-गौरवम् = आदरः। अस्ति = वत्तते। तत् = तदेव गौर- वम् । जल्पतः = भाषमाणस्य । भाषणे प्रयोज्यकर्मणो मे । प्रयो. जककत्वं = प्रेरकत्वम् । उपैति = गच्छति । [भावार्थः] हे कृष्ण तथापि मयि तव य आदरोऽस्ति तेन ग्रेरितोऽहं किश्चिद्वच्मि । , सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् २१७ .. -- [ कोश: ] 'गुरुस्तु गीष्पतौ श्रेष्ठे गुरौ पितरि दुर्भरे' इति विश्वः । [ वाच्यप० ] तथापि मय्यपि ते गुरुरिति येन गौरवेण भूयते तेन जल्पतो मम प्रयोजकर्तृत्वमुपेयते । [भाषाटीका] तो भी हे कृष्ण आपकी मेरे में जो श्रद्धा और आस्था है इससे प्रेरित हो मैं भी कुछ कहता हूँ ॥ ७१ ॥ ननु रामेणैव सर्वं प्रपञ्चेनोक्तम्, सम्प्रति किं ते वाच्यमस्तीत्याशङ्कय वृथा प्रपञ्चोऽयमिति हृदि निधाय स्तुवन्नाह' -वर्णरित्यादित्रयेण- वर्णैः कतिपयैरेव ग्रथितस्य स्वरैरिव । अनन्ता वाङ्मयस्याहो गेयस्येव विचित्रता ॥ ७२ ॥ [ सर्वकषा] कतिपयैः परिमितैर्वणः पञ्चाशतैव मातृकाक्षरैः, कति- पयैः सप्तभिरेव स्वरैर्निपादादिभिग्रंथितस्य गुम्फितस्य । वाङ्मयस्य- शब्दजालस्य । 'एकाचोऽपि नित्यं मयटमिच्छन्ति' इति स्वार्थे मयट् । गीयत इति गेयं, तस्य, गानस्येव विचित्रता-रचनाभेदा- दनन्ता-अपरिमिता भवतीत्यर्थः । अहो । अतस्तेन साधूनेऽपि विशेषानन्त्यान्ममापि वक्तव्यमस्तीत्येको भावः । तस्य दुरुक्तत्वान्ममैवा- स्तीत्यन्यः । प्रत्यवयवमिवोपादानादनेकैवेयमुपमा ॥ ७२ ॥ [अन्वयः] कतिपयैरेव वणः ( कतिपयैरेव-) स्वरैः इव प्रथितस्य वाङ्मयस्य-गेयस्येव विचित्रता अनन्ता(भवति) अहो! [विग्रहः ] वागेव वाङ्मयं, तस्य वाङ्मयस्य । गीयते इति गेयं, तस्य गेयस्य । [अर्थः ] कतिपयैरेव = परिमितैरेव । पञ्चाशत्सङ्ख्यकैरेव । वणः = अकारादिभिरक्षरैः । (कतिपयरेव = सप्तभिरेव)। स्वरै रिव = निषादर्षभादिभिः स्वरैरिव । प्रथितस्य = गुम्फितस्य । निर्मितस्य । वाङमयस्य = शब्दजालस्य । गेयस्येव-गानस्येव । विचित्रता = वैचित्र्यम् । रचनाभेदेनापरिमिता भवति । अहो इत्याश्चर्ये । अनन्ता- २१८ शिशुपालवधम्। [ २ द्वितीयः-- [भावार्थः] अक्षराणां परिमितत्वेऽप्यर्थस्य गेयस्येव वाङ्मयस्य वाऽऽनन्त्यान्मद्भाषणेऽपि ततो वैशिष्टयं सम्भवतीति मयाऽपि किञ्चिदुच्यते । [ कोशः ] 'निषादर्षभगान्धारषड्जमध्यमधैवताः । पञ्चमश्चेत्यमी सप्त तन्त्रीकण्ठोत्थिताः स्वराः' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] विचित्रतया अनन्तया भूयते । [ भाषाटीका ] यद्यपि अक्षर तो गिनती के (५०-या ५१) ही हैं, और स्वर भी सात ही हैं, परन्तु जैसे सात स्वरों के और उक्त अक्षरों के योग से बने हुए गानों में परस्पर बड़ा भेद होता है वैसे ही उन अक्षरों से बने हुए वाक्यों में भी बहुत ( आश्चर्यप्रद ) अन्तर होता है। अतः मैं भी कुछ कहता हूँ ॥७२॥ बह्वपि स्वेच्छया कामं प्रकीर्णमभिधीयते । अनुज्झितार्थसम्बन्धः प्रबन्धो दुरुदाहरः ॥ ७३ ॥ [ सर्वकषा ] बह्वपीति । स्वेच्छया-स्व प्रतिभानुसारेण, प्रकीर्णम- सङ्गतं बह्वपि कामं यथेष्टमभिधीयते । किन्तु अनुमितोऽर्थसम्बन्धः पदार्थसङ्गतिर्यस्मिन्स प्रबन्धः-सन्दर्भः दुरुदाहरो दुर्वचः । हरतेः खलप्रत्ययः । रामेण तु सङ्गतमेवीक्तमिति स्तुतिः, असङ्गतमेवोक्तमिति निन्दा च गम्यते ॥ ७३ ॥ [अन्वयः ] स्वेच्छया प्रकीर्णम् बहु अपि कामम् अभिधीयते, अनुभितार्थसम्बन्धः प्रबन्धः (तु) दुरुदाहरः (एव)। [विग्रहः ] अर्थस्य सम्बन्धः अर्थसम्बन्धः, न उज्झितः अनुज्झितः, अनुज्झितः अर्थसम्बन्धो यस्मिन्नसौ अनुज्झितार्थसम्बन्धः । [अर्थः] स्वेच्छया = स्वप्रतिभानुसारेण । स्वबुद्ध्यनुसा- रेण। प्रकीर्णम् = असङ्गतम् । परस्परमसम्बद्धम् । बह्वपि विपुलमपि । कामं = यथेष्टम् । अभिधीयते = कैश्चिदुच्यते । प्रस्तू. यते । किन्तु-अनुज्झितार्थसम्बन्धः = अपरित्यक्तपदार्थसङ्गतिः । परस्परं सङ्गतः। प्रबन्धः = सन्दर्भः । दुरुदाहरः = दुर्वच एव । -- १० ११६ सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [ भावार्थः] असङ्गतं बहु यथेष्टं वक्तुं शक्यते सर्वैरपि सङ्गतिमानर्थबहुलः प्रबन्धस्तु न सर्वैरुदाहर्तुं शक्यः। अतो मया किञ्चिदुच्यते । [ कोशः] 'स्वेच्छा यदृच्छा स्वच्छन्दः स्वैरिता चेति ते समाः' इति . केशवः । [वाच्यप० ] स्वेच्छया प्रकीर्णम् बहु अपि प्रकामम् अभिदधति । प्रबन्धेन दुरुदाहरेण भूयते । [भाषाटीका ] अनर्गल इधर उधर की अटपट बातें तो जो चाहे बना सकता है पर सङ्गतिमान् विषय का प्रतिपादन करना बहुत कठिन है ॥७३॥ प्रदीयसीमपि घनामनल्पगुणकल्पिताम् । प्रसारयन्ति कुशलाश्चि वाचं पटीमिव ।। ७४ ॥ [ सर्ववषा ] म्रदीयसीमिति । कुशला वक्तारो म्रदीयसीमति. सुकुमाराक्षरां, श्लक्षणतरां च । तथापि धनामर्थगुर्वीम् , अन्यत्र सान्द्राम् । कदलीदलकल्पामित्यर्थः। अनल्पैर्बहुभिःगुणैःश्लेषादिभिः तंतुभिश्चाकल्पिता रचितां, निर्मितां च | चित्रां शब्दादिविचित्रां, विचित्ररूपां च ।वाचं पटीं. शाटीमिव । प्रसारयन्ति । रामवागप्येवंविधेति स्तुतिः, रामवाक्त नैवंविधेति निन्दा च गम्यते । अत्र श्लेषस्य शुद्धविषयासम्भवेन सर्वालङ्कारबाधकत्वादुपमा- अतिभोत्थापितः प्रकृताप्रकृतश्लेषोऽयमित्यलङ्कारसर्वस्वकारः । एवञ्च पूर्णोप- माया निर्विषयत्वप्रसङ्गाच्छ्षप्रतिभोत्थापितेयमुपमैवेत्यन्ये ॥ ७४ ॥ [ अन्वयः] कुशलाः म्रदीयसीमपि धनोम् अनल्पगुण- कल्पिताम् चित्राम् वाचम् पटीमिव प्रसारयन्ति । [विग्रहः ] अनल्पाश्च ते गुणाश्च अनल्पगुणाः, अनल्पगुणैः कल्पिता अनल्पगुणकल्पिता, ताम् । [अर्थः] कुशलाः वाक्पटवः । प्रवीणाः । निर्माण- पटवः । कलाकुशलाः ।. म्रदीयसीम्-सुकुमाराक्षराम् । मृदु. तमाम् । श्लक्ष्णतमाम् । अतिकोमलाञ्च । घनांप्रमेयबहुलाम्,
-
१२०
शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः-
अर्थगुर्वीम् । श्लिष्टाम् । (पटीपक्षे-) सान्द्राम्। निबिड-
सूत्राञ्च । अनल्पगुणकल्पिताम्-श्लेषप्रसादमाधुयोजःसौकु-
मार्यादिविपुलगुणगणगुम्फिमाम् । (पटीपचे-) आयतश्लक्ष्ण-
सूत्ररचिताम् ।
चित्रां-चित्रबन्धहृद्याम् । विचित्राम् ।
अनन्यसाधारणीम् । (पटीपक्षे-) चित्रवणी, चित्रकिर्मीरि-
ताच । वाचं वाणीम् । पटीमिव-शाटीमिव । प्रसारयन्ति
प्रकटयन्ति । उद्गिरन्ति । विस्तारयन्ति च ।
[ भावार्थः] कुशला वक्तारो हि--चित्रां हृद्यां बहुगुणां
विशदां वाचं पटीमिव विस्तारयन्ति ।
[ कोशः ] 'गुणो मौामप्रधाने रूपादौ सूद इन्द्रिये। त्यागशौर्यादि-
सत्त्वादिसन्ध्याघवृत्तिरज्जुषु । शुक्लादावपि बुद्धयाञ्च' इति मेदिनी ।
[वाच्यप०] कुशलैः नदीयसी धना अनल्पगुणा कल्पिता चित्रा
वाक पटीव प्रसार्यते ।
[ भाषाटीका] चतुर वक्ता-मृदु अर्थबहुल अनेक गुणों से मनोहर
विचित्र वाणी को साड़ी तरह फैलाते हैं। ( साड़ी भी कोमल व घनी
बिनी हुई, बढिया सूत की, नाना प्रकार के चित्रों से चित्रित व नाना
रंगों से रंगी हुई मनोहर बनी हुई होती है । ॥ ७४ ॥
अथोद्धवः स्वसिद्धान्तं वर्णयिष्यन्स्तुत्या गर्व परिहरन्हरिमभिमुखीकरोति-
विशेषविदुषः शास्त्रं यत्तवोद्गाह्यते पुर।
हेतुः परिचयस्थैर्य वक्तुगुणनिकैव सा ॥७५ ॥
[सर्वकषा] विशेषेति। विशेषानवान्तरभेदान्वेत्ति विशेषविद्वान् , तस्य
विशेषविदुषो-विशेषज्ञस्य । गतिगम्यादिपाठाद्वितीयासमासः। तव
पुरोऽशास्त्रंनीतिशास्त्रमुद्गाह्यते उपन्यस्यत इति यत् । 'उग्राहितमु-
पन्यस्तम्' इति वैजयन्ती। सा तदुद्ग्रहणमित्यर्थः। विधेयप्राधान्यास्त्रीलिङ्ग-
त्वम्। वक्तुरुग्राहयितुः परिचयम्थैर्येऽभ्यासदाये हेतुर्गुणनिका । आने.
डितमेवेति यावत् । नतु वैदुष्यप्रकटनमिति भावः । 'गुण आनेडने चौरादिकात्
'ण्यासश्रन्थो युच्' इति युच् । ततः सज्ञायां कन् । कात्पूर्वस्येकारः॥५५॥
सा सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । २२१ [अन्वयः] विशेषविदुषः तव पुरः शास्त्रमुग्राह्यते यत् सा वक्तः परिचयस्थैर्ये हेतुः गुणनिका एव । [विग्रहः ] विशेषं वेत्तीति विशेषविद्वान् , तस्य विशेषविदुषः । परिचयस्य स्थैर्य परिचयस्थैर्य, तस्मिन्-परिचयस्थैयें । [अर्थः] विशेषविदुषः = विशेषज्ञस्य । विवेकिनः । तव पुरः = तवाग्रे । शास्त्र = नीतिशास्त्रम्। उग्राह्यते यत् = उपन्य- स्यते-इति यत । शास्त्रोपन्यासात्मिका । वक्त : = उग्रा- हयितुर्मम । परिचयस्थैर्ये = अभ्यासदाढ्ये । हेतुः = कारणम् । गुणनिकैव = आवृत्तिरेव । मुहुर्मुहुरुकमेव । उद्धरण्येव । [ भावार्थः ] सर्वज्ञस्य भवतोऽने मत्कृतं नीतिशास्त्रोपपाद- नमात्मनोऽभ्यासस्य दााय गुणनिकैव, नोपदेशाय न वा स्वर्व- दुष्यप्रकटनाय। [कोशः ] 'उग्राहितमुपन्यस्तम्' इति वैजयन्ती । 'संस्तवः स्यात्प- रिचयः' इत्यमरः। [वाच्यप०] विशेषविदुषः तव पुरो यत् शास्त्रमुग्राहयामि तया गुणनिकयैव भूयते । [भाषाटीका ] हे कृष्ण ! आप तो सर्वज्ञ हैं, आपके सामने नीतिशास्त्र की मेरी यह चर्चा अपने अभ्यास की दृढ़ता के लिए आवृत्तिमात्र ही है ॥७५॥ सम्प्रति स्वगतमुपन्यस्यति-- प्रज्ञोत्साहावतः स्वामी यतेताधातुमात्मनि । तौ हि मूलमुदेष्यन्त्या जिगीषोरात्मसम्पदः ॥७६॥ [ सर्वकषा] प्रक्षेति । अतोऽस्मात्कारणात् । स्वमस्यास्तीति स्वामी प्रभुः। 'स्वामिन्नैश्वर्ये' इति निपातः। प्रज्ञोत्साहौ-मन्त्रोत्साहशक्ती । आत्मनि-स्वस्मिन्नाधातुसम्पादयितुं यतेत । स्वयमुभयशक्तिमान्भवे- दित्यर्थः। कुतः? । हि यस्मात्तौ-प्रज्ञोत्साहौ। उदेष्यन्त्याः-वत्स्य॑न्त्याः । जिगीषोरात्मनः सम्पदः-प्रभुशक्तः । मूलं-निदानम् । अत्रोत्साह- ! - २२२ शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- तस्याः ग्रहणं दृष्टान्तार्थम् । यथोत्साहस्तथा मन्त्रोऽपि ग्राह्यो, न तु केवलोत्साह इति बलभद्रापवादः ॥ ७६ ॥ [ अन्वयः ] अतः स्वामी प्रज्ञोत्साहौ आत्मनि आधातु यतेत । हि तौ उदेष्यन्त्याः जिगीषोरात्मसम्पदः मूलम् । [विग्रहः ] प्रज्ञा च उत्साहश्च प्रज्ञोत्साहौ, तौ। आत्मनः सम्पत् आत्मसम्पत्, -आत्मसम्पदः । [अर्थः] अतः = अतो हेतोः । स्वामी = प्रभुः। राजा । प्रज्ञोत्साहौ = मन्त्रोत्साहशक्ती। विचारोत्साहौ। आत्मनि स्वस्मिन् । आधातु = सम्पादयितुम् । यतेत = प्रयतेत । स्वय. मुभयशक्तिमान् भवेत् । हि = यतः। तौ प्रज्ञोत्साहौ । उदे- 'प्यन्त्याः3 वत्स्य॑न्त्याः। जिगीषोः = विजिगीषोः । यात्मस- म्पदः = स्वसम्पत्तेः । प्रभुशक्तः । मूलम् = कारणम् । अस्तीति शेषः। [ भावार्थः ] राज्ञा मन्त्रोत्साहौ स्वस्मिन्सम्पादनीयौ, न केवलमुत्साहेनैव प्रवर्तितव्यं, किन्तु मन्त्रोऽप्यनुसत्तं व्यः । यतस्तौ हि प्रभुशक्त मूलम् । [ कोशः ] 'उत्साहोऽध्यवसायः स्यात्' इत्यमरः । 'स्वामी प्रभुवि- शाखयोः' इति विश्वः । [ वाच्यप० ] स्वामिना प्रज्ञौत्साही आत्मनि आधातुम् यत्येत । ताभ्यामात्मसम्पदो मूलेन भूयते । [ भाषाटीका ] राजा स्वयं मन्त्र (विचार ) और उत्साह इन दोनों को अपने में सम्पादन करे । क्योंकि ये ही दोनों भाविनी प्रभुशक्ति के कारण हैं ॥७६॥ उत्साहवत्प्रज्ञापि प्रा त्युक्तं तस्याः प्रयोजनमाह- सोपधानां धियं धीराः स्थेयसी खट्यन्ति ये । तत्रानिशं निषण्णास्ते जानते जातु न श्रमम् ।७७॥ - सर्गः ] - अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विरजितम् । २२३ [ सर्वकषा] सोपधानामिति । ये धीराः-धीमन्तः। सोपधानां सविशेषाम् । युक्तियुक्तामित्यर्थः । अन्यत्र-सगेन्दुकाम् । सोपबौमित्यर्थः। 'उपधानं विशेषे स्याद्गेन्दुके प्रणयेऽपि च' इति विश्वः।स्थेयसी-स्थिराम्अ- चपलां, दृढीयसीं च। स्थिरशब्दादीयसुनि 'प्रियस्थिर- इत्यादिना स्थादेशः। धियं खट्टयन्ति-खट्वां पर्यत कुर्वन्ति । आश्रयन्तीत्यर्थः । ‘शयनं मञ्चपर्यङ्कपल्यड्काः खट्वया समाः' इत्यमरः। 'तत्करोति तदाचष्टे' इति णिच् । ते धीरास्तत्र-धीखट्वायामनिशमश्रान्तं निषण्णा:- विश्रान्ताः सन्तो, जातु-कदाचिदपि, श्रम-खेदं, न जानते-न विदन्ति । श्रमः खेदो रत्यादेपलक्षणम् । धीपूर्वक एवोत्साहः सेव्यो न केवल इति सर्वथा धीराश्रयणीयेत्यर्थः । अत्र धिय आरोप्यमाणायाः प्रकृत- अमापनोदरूपोपकारपर्यन्ततया परिणामालङ्कारः । 'आरोप्यमाणस्य प्रकृतो- पयोगित्वे परिणामः' इति लक्षणात् ॥ ७७ ॥ [अन्वयः ] ये धीराः सोपधानाम् स्थेयसीम् धियम् खट्व- यन्ति ते तत्र अनिशं निषणाः सन्तः जातु श्रमम् न जानते । [विग्रहः ] उपधानेन सहिता सोपधाना, तां सोपधानाम् । खट्वा- मिवाचरन्ति खट्वयन्ति । [अर्थः] येधीराः = धीमन्तः । विद्वांसः। सोपधानां = सवि- शेषाम् । युक्तियुक्ताम् । नवनवोन्मेषशालिनीम् । खट्वापक्षे- सोपधानांसोपवऱ्याम् । गेन्दुकसहितामित्यर्थः । स्थेयसी स्थिरतराम् । व्यवसायात्मिकाम् । अचञ्चलाम् । अचपलाम् । खट्वापक्षे-द्रढीयसीञ्च । धिय = बुद्धिम् । खवयन्ति । पर्यङ्क- यन्ति । मञ्चकतां नयन्ति । आश्रयन्तीत्यर्थः । ते = धीराः। तत्र = बुद्धिखट्वायाम् । अनिशं = निरन्तरम् । अश्रान्तञ्च । निपण्णाः = विश्रान्ताः सन्तः । निविष्टाः सन्तः । जातु % कदाचिदपि । श्रमं = खेदम् । आयासञ्च । रत्यादिश्रमञ्च । = न विदन्ति । [ भावार्थः ] ये विद्वांसो धियं खट्वामिवाश्रयन्ति ते खेदं न जानते । अतो बुद्धिपुरस्सरमुत्साह आश्रयणीयो न केवलः । न जानते - २२४ शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः- [ कोशः] 'उपधानं विशेष स्याद्गेन्दुके प्रणयेऽपि च' इति विश्वः । 'शयनं मञ्चपर्यङ्कपल्यङ्काः खट्वया समाः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] यैः धीरैः सोपधाना स्थेयसी धीः खट्व्यते तैस्तत्रानिश निषण्णैर्जातु श्रमो न ज्ञायते । [ भाषाटीका ] जो विद्वान् सविशेष व स्थिर बुद्धि (मन्त्र) को खट्वा की तरह आश्रयण करते हैं, उन्हें श्रम (कष्ट) नहीं होता है, अतः विचार पूर्वक ही उत्साह ठीक है। परन्तु जैसा बलदेवजी ने कहा वैसा केवल उत्साह ठीक नहीं ॥ ७७ ॥ अथ प्रज्ञाऽप्रज्ञयोभ्यिां वैषम्बमाह- स्पृशन्ति शरवत्तीक्ष्णाः स्तोकमन्तर्विशन्ति च । बहुस्पृशापि स्थलेन स्थीयते बहिरश्मवत् ॥ ७८ ॥ [ सर्वकषा] स्पृशन्तीति । तीक्ष्णाः निशितप्रज्ञाः, शरवत्सरेण तुल्यं, स्तोकम्-अल्पमेव स्पृशन्ति । अन्तः-कार्यस्यचान्तरं, विशन्ति । अल्पायासेन बहुकार्य साधयन्तीत्यर्थः ।बहुस्पृशा व्यापिनास्थूलेन मन्देन, बृहता चाश्मना-उपलेन तुल्यमश्मवत्। 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः बहिरेव कार्यस्याकार्यस्य चेति भावः । स्थीयते--स्थितिः क्रियते । मूढो हि अल्पास्य हेतोबहु प्रयासं करोति । मूषकग्रहणाय शिखरिखननं परिहासास्पद भवतीति भावः। तद्धितगतेयमुपमा ॥ ७८ ॥ [अन्वयः] तीक्ष्णाः शरवत् स्तोकं स्पृशन्ति, अन्तर्विशन्ति च । स्थूलेन बहुस्पृशापि अश्मवत् बहिः स्थीयते । [विग्रहः ] बहु स्पृशतीति बहुस्मृक् , तेन-बहुस्पृशा। [अर्थः] तीक्ष्णाः = निशितप्रज्ञाः । तीक्ष्णबुद्धयः । शरवत् = बाणेन तुल्यम् । स्तोकं = स्वल्पमेव । स्पृशन्ति = लक्ष्यस्य स्पर्श कुर्वन्ति। अन्तः = कार्यस्य चान्तरम। विशन्ति = प्रविशन्ति । अल्पेनायासेन विपुलं कार्य साधयन्तीत्यर्थः । (किन्तु-) सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । २२५ बहस्पृशाऽपि-विपुलं प्रदेशं पृशताऽपि । ठयापिनाऽपि । स्थूलेन स्थूलबुद्धिना । मन्दमतिना। बृहता च । अश्मवत्- प्रस्तरवत् । बहिः कार्यस्याकार्यस्य च बहिरेव। बहिःप्रदेश एव च । स्थीयते अवस्थीयते । स्थितिः क्रियते । कार्यसिद्धिः कत्तुं न शक्यते। [ भावार्थः ] विद्वान् कुशलस्तीक्ष्णमतिरल्पायासेन बहुलंकार्य कुरुते, मन्दस्तु महताऽऽयासेनापि स्वल्पमपि कार्य साधयितुन शक्नोति । [ कोशः ] 'शरस्तु तेजने बाणे दध्यग्रे ना शरं जले' इति विश्वः । [ वाच्यप० ] तीक्ष्णैः शरवत् स्तोकं स्पृश्यते, अन्तर्विश्यते च । स्थूलः बहुस्पृगपि अश्मवद्वहिः तिष्ठति । [ भाषाटोका ] तेज आदमी बाण की तरह छूते ही-थोड़े ही आयास से-भीतर घुस जाता है। पर मन्दबुद्धि तो पत्थर की तरह बहुत जगह पर आघात कर के भी भीतर नहीं घुस सकता है । किन्तु-बाहर ही रह जाता है। अधिक श्रम से भी कार्य नहीं कर सकता ।। ७८ ॥ आरभन्तेऽल्पमेवाज्ञाः कामं व्यग्रा भवन्ति च । महारम्भाः कृतधियस्तिष्ठन्ति च निराकुलाः ॥ ७६ ॥ [ सर्वकषा] प्रारभन्त इति । किञ्च अज्ञाः अल्पं तुच्छमेवारभन्ते प्रक्रमन्ते । काममत्यन्तं व्यग्रा:-त्वरिताश्च भवति । न च पारं गच्छन्तीति भावः । कृतधियः-शिक्षितबुद्धयस्तु । महारम्भा महोद्योगा भवन्ति । निराकुला अव्यग्राश्च तिष्ठन्ति । पारं गच्छन्तीति भावः ॥ ७९ ॥ [अन्वयः] अज्ञाः अल्पमेव आरभ ते कामं व्यग्राश्च भवन्ति कृतधियः महारम्भाः (भवन्ति ) निराकुलाः च तिष्ठन्ति । [विग्रहः ] कृता धीर्येषां ते कृतधियः । महान् आरम्भो येषां ते महारम्भाः। [अर्थः] अज्ञाः = मूढाः । मन्दमतयः । अल्पमेव . - २२६ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- स्वल्पमेव । आरम्भन्ते = प्रक्रमन्ते । कामम् = अत्यन्तम् । व्यग्राश्च = व्याकुलाश्च । त्वरिताश्च । भवन्ति= जायते । कार्य- पारं न गच्छन्तीतिभावः। (किन्तु-) कृतधियः = शिक्षित. मतयः । महारम्भाः = महोद्योगा भवन्ति । निराकुलाश्च अव्यग्राश्च । तिष्ठन्तीति शेषः । कार्यञ्च साधयन्तीति भावः । [ भावार्थः ] मूढा अल्पेऽपि कार्ये व्याकुला भवन्ति, न च तत्साधयितुं शक्नुवन्ति । महान्तस्तु महारम्भा अपि निराकु- लास्तिष्ठन्ति । कार्याणि अनायासेन साधयन्ति च । [कोशः ] 'व्यग्रो व्यासक्त आकुलः' इत्यमरः। 'अज्ञे मूढयथाजात- मूर्खवैधेयबालिशाः' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] अझैः-अल्पमेवारभ्यते, कामं व्यग्रैश्च भूयते । कृतधी- भिर्महारम्भैर्भूयते, निराकुलश्च स्थीयते । [ भाषाटीका ] मूर्ख लोग थोड़े से काम में भी व्याकुल हो जाते हैं, पर बड़े लोग बहुत कार्य करने पर भी निराकुल भाव से रहते हैं ॥ ७९ ॥ अथ प्रज्ञावानपि न प्रमाद्यदित्याह- उपायमास्थितस्यापि नश्यन्त्यर्थाः प्रमाद्यतः । हन्ति नोपशयस्थोऽपि शयालुम गयुमृगान् ।।८०॥ [ सर्वषा ] उपायमिति । उपायमास्थितस्य-प्राप्तस्यापि । उपायेनैव कार्य साधयतोऽपीत्यर्थः। किमुत व्यग्रतयेति भावः।प्रमाद्यतः- अनवधानस्य । 'प्रमादोऽनवधानता' इत्यमरः । अर्थाः-प्रयोजनानि, नश्य- न्ति । तथाहि-शयालुनिद्रालुः। आलुचि शीडो वक्तव्यत्वादालुच् । मृगान्यातीति मृगयुः-व्याधः । 'मृगय्वादयश्च' इत्यौणादिकः कुप्रत्ययान्तो निपातः । 'व्याधो मृगवधाजीवो मृगयुर्लुब्धकश्च सः' इत्यमरः। उपशेरते- ऽस्मिन्नित्युपशयो मृगमार्गस्थायिनो व्याधस्यात्मगुप्तिस्थानं गर्तविशेषः । तत्र तिष्ठतीत्युपश्शयस्थोऽपि मृगान हन्ति । विशेपेण सामान्यसमर्थन- रूपोऽर्थान्तरन्यासः ॥ ८॥ [अन्वयः] उपायम् आस्थितस्यापि प्रमाद्यतः अर्था नश्यन्ति । ..
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । ( तथाहि-) उपशयस्थोऽपि शयालुमंगयुः मृगान् न हन्ति । [विग्रहः ] उपशेरतेऽस्मिन्-उपशयः । उपशये तिष्ठतीति उपशयस्थः । शेते तच्छीलः शयालुः । मृगान् यातीति मृगयुः । [अर्थः] उपायं-कार्यसिद्धयु पायम् । आस्थितस्यापि प्राप्तस्यापि । प्रमाद्यतः अनवधानस्य । श्रनवहितचेतसः। प्रमा- दिनः । अर्थाः प्रयोजनानि । कार्याणि । नश्यन्ति = विनश्यन्ति । न सिध्यन्ति । (तथाहि-) शयालुः=निद्रालुः । निद्रातुरः। मृगयुः व्याधः । उपशयस्थोऽपि मञ्चकस्थोपि। गर्तस्थोऽपि । मृगवञ्चनाय गरीमास्थितोऽपि । मृगान् = हरिणान् । न हन्ति = न हन्तु शक्नोति । [भावार्थः] उपायेन कार्य कुर्वतोऽपि प्रमत्तस्य कार्याणि न सिद्धयन्ति । मृगयामचकस्थोऽपि ·शयालुाधो मृगान्हन्तु न शक्नोति । [ कोशः ] 'अर्थोऽभिधेयरैवस्तुप्रयोजननिवृत्तिषु' इत्यमरः। 'प्रमादोऽ- नवधानता' इत्यमरः । 'व्याधो मृगवधाजीवो मृगयुर्लुब्धकश्चसः' इत्यमरः। [ वाच्यप०] उपायम् आस्थितस्यापि अर्थैः नश्यते | उपशयस्थेनापि शयालुना मृगयुणा मृगा न हन्यन्ते । [भाषाटीका] उपाय से काम करनेवाला भी कार्यकत्ती यदि प्रमादी- असावधान हो तो काम बिगड़ जाता है । देखो सोनेवाला व्याध (बहेलिया) उपशय (अचान या गडहा आदि छिपने के स्थान) में बैठकर भी हरिणों को मार नहीं सकता है ॥ ८० ॥ एवं प्रज्ञाया आवश्यकत्वमुक्तम्, तथोत्साहस्थाप्याह- उदेतुमत्यजन्नीहां राजसु द्वादशस्वपि । जिगीपुरेको दिनकृदादित्येष्विव कल्पते ॥ ८१ ॥ [ सर्वकषा ] उदेतुमिति । जेतुमिच्छजिगीषुरेक एव द्वादशस्वपि राजसु मध्ये द्वादशस्त्रादित्येषु दिनकृयो दिनकरणे व्याप्रियमाण शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- आदित्यः स इवेहामुत्साहमत्यजन्प्रयुञ्जान एव । न तु निरुद्योग इति भावः । उदेतु कल्पते-उदयाय प्रभवति । उत्साहशक्तिरेव प्रभुशक्तरपि मूल- मित्यर्थः । 'नानालिङ्गत्वाहतूनां नानासूर्यत्वम्' इति श्रुतेः । प्रतिमासमादित्य- भेदावादशत्वं, तच्चैकस्यैव द्वादशात्मकत्वम् । 'द्वादशात्मा दिवाकरः' इत्यभिधानात् । ते चार्यमादयः पुराणोक्ता द्रष्टव्याः। राजानस्तु- अरिमित्रमरेर्मित्रं मित्रमित्रमतः परम् । तथारिमित्रमित्रं च विजिगीषोः पुरस्सरा'॥ पञ्चेति शेषः । 'पाणिग्राहस्ततः पश्चादाक्रन्दस्तदनन्तरम् । आसारावनयोश्च व विजिगीषोस्तु पृष्ठतः ॥' पाणिग्राहासारः, आक्रन्दासारश्वेत्यर्थः । अत्र चत्वार इति शेषः । एवं नव भवन्ति । विजिगीषुर्दशमः । 'अरेश्च विजिगीषोश्च मध्यमो भूम्यनन्तरः। अनुग्रहे संहतयोः, समर्थो व्यस्तयोर्वधे । मण्डलाबहिरेतेषामुदासीनो बलाधिकः ॥' इति मध्यमोदासीनाभ्यां सह द्वादश वेदितव्याः। पूर्णोपमा ॥८१॥ [ अन्वय ] जिगीषुः एकः द्वादशसु अपि राजसु (मध्ये ) दिनकृत् आदित्येषु इव उदेतुम् ईहाम् अत्यजन् उहेतु कल्पते । [विग्रहः ] दिनं करोतीति दिनकृत् । [अर्थः ] जिगीषुः-विजयेच्छुः । एकः=एक एव । द्वादश- स्वपि द्वादशसङ्ख्यकेषु । राजसु-राजमु मध्ये । अर्यमादिद्वादश- सङ्ख्यकेषु सूर्येषु मध्ये । दिनदिव-दिनकरणे व्याप्रियमाण आदित्य इव । प्रभाकर इव। उत्साहम् उद्योगम् । अत्यजन् = प्रयुञ्जानः। आश्रयन्नेव । उदेतुम् = उदयाय । कल्पते = शक्तो भवति । [ भावार्थः ] यथा द्वादशस्वपि सूर्येषु मध्ये स एव सूर्य उदेति यो दिनं कर्तुमुत्सहते । एवं द्वादशसु राजसु मध्ये य उत्साह- माश्रयते स एव राजा-( विजिगीषुः )-अभ्युदयं लभते ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । २२६ पाता - [कोशः] 'इच्छा काङ्क्षा स्पृहेहा तृड्वाञ्छा लिप्सा मनोरथः' इत्यमरः। [वाच्यप०] जिगीषुणा एकेन द्वादशसु अपि राजसु उदेतुम् ईहाम- त्यजता आदित्येषु दिनकृता इव उदयाय कल्प्यते । [भाषाटीका ] जैसे बारह आदित्यों में से वही सूर्य उदय होता है जो दिन को करता है, वैसे ही १२ राजाओं में से वही ( विजिगीषु ) अभ्युदय को है जो उत्साह रखता है ॥ ८१ ॥ 'उपायमास्थितस्ये त्यत्र राजा न प्रमाद्ये दिव्युक्तम् । अप्रमादप्रकारमाह- बुद्धिशस्त्रः भकृत्यङ्गो धनसंवृतिकञ्चुकः । चारेक्षणो दूतमुखः पुरुषः कोऽपि पार्थिवः ॥ ८२ ॥ [ सर्वकषा] बुद्धिशस्त्र इति । बुद्धिरेव शस्त्रं यस्य स बुद्धिशस्त्रः । अमोघपातित्वात्तस्या इति भावः । प्रकृतयः-स्वाम्यादिराज्याङ्गानि । 'राज्याङ्गानि प्रकृतयः' इत्यमरः । ता एवाङ्गानि यस्य सः। तद्वैकल्ये राज्ञो वैकल्यं स्यादिति भावः । घना दुर्भेदा संवृतिमन्त्रगुप्तिरेव कचुकः कवचो यस्य स तथोक्तः । मन्त्रभेदे राज्यभेदादिति भावः । चरतीति चरः । पचाद्यच् । स एव चारो गूढपुरुषः। प्रज्ञादित्वात्स्वार्थिकोऽण्प्रत्ययः । 'चारश्च गूढपुरुषः' इत्यमरः । स एवेक्षणं चक्षुर्यस्य स चारेक्षणः। अन्यथा स्वपरमण्डलवृत्तान्ताऽदशनात् । 'अन्धस्येवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे इति भावः । दूतः-सन्देशहरः । 'स्यात्सन्देशहरो दूतः' इत्यसरः। स एव मुखं वाक्यस्यासौ दूतमुखः ।अन्यथा मूकस्येव वाग्व्यवहाराऽसिद्धौ तत्सा- ध्यासाध्यकार्यप्रतिबन्धः स्यादिति भावः। एवम्भूतः पार्थिवः कोऽपि पुरुषः। अन्य एवायं लोकविलक्षणः पुमानित्यर्थः । अतो राज्ञा बुद्धयादिस- म्पन्नेन भवितव्यम् । एतदेवाऽप्रमत्तत्वम् । अन्यथा स्वरूपहानिः स्यादिति भावः । अत्र कोऽपीति राज्ञो लोकसम्बन्धेऽपि तदसम्बन्धोक्त्या तद्रूपातिश- योक्तिः। सा च बुद्धिशस्त्रइत्यादिरूपकनियूंढेति तेन सहाङ्गाङ्गिभावेन सङ्करः । अन्वयः ] बुद्धिशस्त्रः प्रकृत्यङ्गः घनसंवृतिकचुकः चारेक्षणः दूतमुखः ( एवम्भूतः ) पार्थिवः कोऽपि पुरुपः (अस्ति)। .
२३० शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- - . .4 [विग्रहः ] बुद्धिरेव शस्त्रं यस्य सः बुद्धिशस्त्रः। प्रकृतयः अङ्गानि यस्य सः प्रकृत्यङ्गः । घना चासौ संवृतिश्च घनसंवृतिः, घनसंवृतिरेव कंचुकं यस्य सः धनसंवृतिकञ्चकः । चारा एव ईक्षणं यस्य सः चारेक्षणः। दूता एव मुखं यस्य सः दूतमुखः । [अर्थः ] बुद्धिशस्त्रः = बुद्धयायुधः । बुद्धिरूपाऽमोघायुधः । प्रकृत्यङ्गः = स्वाम्यमात्यसुत्कोशराष्ट्रादिप्रऋतिशरीरः। धनसं. वृतिकञ्चकः = दुर्भेदमन्त्रगुप्तिकवचः। चारेक्षणः = गूढपुरुषेक्षण:। गुप्तचरलोचनः । दूतमुखः = सन्देशहरवाक् । दूतास्यः । ( एव. म्भूतः = ईदृशः-) पार्थिवः = राजा । कोऽपि = अन्य एव लोक- विलक्षणः। पुरुषः = पुमान् । अस्तीति शेषः । [ भावार्थः ] राज्ञां बुद्धिरेव अमोघमायुधम् । प्रकृतय एव शरीरम् । मन्त्रगुप्तिरेव कवचम् । चारा एव लोचनम् । दूता एंव मुखम्। [ कोशः ] 'स्वाम्यमात्यसुहृत्कोशराष्ट्रदुर्गबलानि च । राज्याऽङ्गानि प्रकृतयः' इत्यमरः। 'चारश्च गूढपुरुषः' इत्यमरः । 'स्यात्सन्देशहरो दूतः' इत्यमरः । 'उरश्छदः कङ्कटको जगरः कवचोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । [वाच्यप.] पार्थिवेन केनापि पुरुषेण भूयते । [ भाषाटीका ] राजा एक लोकोत्तर पुरुष है जिसका बुद्धि ही शस्त्र है, प्रकृति (राजा मन्त्री मित्र खजाना राष्ट्र किला पलटन ये ७) ही अवयव हैं। मन्त्र की गुप्ति ही कवच है। गुप्तचर ( जासूस) ही आँख हैं। दूत है ॥८२॥ चतुर्थोपायसाध्य इत्यादिना यत्क्षालमेव कर्तव्यमुक्तं, तत्रोत्तरमाह- तेजः क्षमा वा नैकान्तं कालज्ञस्य महीपतेः । नैकमोजः प्रसादो वा रसभावविदः कवेः ॥ ८३ ॥ [ सर्वकषा] तेज इति। कालं जानातीति कालज्ञस्तस्य । 'अयं काल' इति विदुष इत्यर्थः। 'आतोऽनुपसर्गेकः । न तु 'इगुपध-' इत्यादिना कविधिः । समासे कर्मोपपदस्यैव बलवत्वभाषणात् । तस्य महीपतेस्तेजः ही मुख सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मो-सर्वषा-विराजितम् । १३१ क्षात्त्रमेवेति वा, क्षमेव वा एकान्तं नियमो न नास्ति, किन्तु यथाकालमुभ- यमप्याश्रयणीयमित्यर्थः ।तथा हि-रसाञ्शृङ्गारादीन्भावान्-निर्वेदादींश्च वेत्ति यस्तस्य रसभावविदः । भावग्रहणं सम्पातायातम् । कवेः कवितुरेक केवलमोजः प्रौढप्रबन्धत्वं वा । एकः प्रसादः-सुकुमारप्रबन्धत्वं वा न। किन्तु तत्र हि रसानुगुण्येन यथायोग्यमुभयमप्युपादेयम्। दृष्टान्तालङ्कारः॥८३॥ [अन्वयः] कालज्ञस्य महीपतेः तेजः क्षमा वा एकान्तम् न । (तथाहि-) रसभावविदः कवेः एकम् ओजः, एकः प्रसादो वान। [विग्रहः] कालं जानातीति कालज्ञः, तस्य कालज्ञस्य । रसाश्च भावाश्च रसभावाः, रसभावान् वेत्तीति रसभाववित् , तस्य-रसभावविदः । [अर्थः ] कालज्ञश्य = अवसरविदः । समयज्ञस्य । मही. पतेः = राज्ञः । तेजः = क्षात्रं तेजः । प्रतापः । अक्षमित्वम् । तीक्ष्णता । क्षमा वा = क्षमैव वा । क्षान्तिरेव । एकान्तं - निता- तम् । नियमेन न नैव । केवलं तेजःक्षमा वेति नियमोनास्ति। यथावसरमुभयोराश्रयणीयत्वादित्यर्थः । तथा हि-रसभाव- विदः शृङ्गारादिरसानिर्वेदादिभावांश्च विदुषः। कवेः कवितुः । एक = केवलम् । ओजः = प्रौढप्रबन्धत्वम् । एकः = केवलः । प्रसादो वा = सुकुमारप्रबन्धत्वं वा । न = नैव । किन्तु रसानुगु- ण्येन यथायोग्यमुभयमप्युपदेयमित्यर्थः । [भावार्थः] समयज्ञस्य महीपतेः क्षमा तेजो वा नैकान्तं, किन्तु यथावसरमुभयमप्याश्रयणीयं भवति । तथाहि रसविदो महाकवेः प्रसाद अोजो वा नैकान्तं भवति, किन्तु रसानुगुण्येन यथायोग्य मुभयमप्युपादेयं भवति । [कोशः ] 'तेजो दीप्तौ प्रभावे च स्यात्पराक्रमरेतसोः' इति मेदिनी। 'एके मुख्यान्यकेवलाः' इत्यमरः । [वाच्यप०] महीपतेः तेजसा क्षमया वान भूयते । ओजसा प्रसादेन वा नैकान्तं भूयते । ।
१३२ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- - [भाषाटीका ] अवसरको समझनेवाला राजा उग्रता व क्षमा को एक को ही आश्रयण नहीं करता है, किन्तु मौके २ से दोनों का आश्रय करता है। देखो-रस व भाव का तत्त्व जानने वाला कवि प्रौढबन्ध या सुकुमार बन्ध इन में से जिसे रस के अनुकूल समझता है उसको आश्रयण करता है, किसी एक पर ही निर्भर नहीं रहता ॥ ८३ ।। अदुक्तं 'क्रियासमभिहारेण विराध्यन्तं सहेत का इति, तत्रोत्तरमाह- कृतापचारोऽपि परैरनाविष्कृतविक्रियः। असाध्यः कुरुते को प्राप्ते काले गदो यथा ॥ ८४ ॥ [सर्वकषा] कृतापचार इति । परैः शत्रभिः कृतः अपचारोऽ- पकारः, अपथ्यं च यस्य सः । तथाप्यनाविष्कृतविक्रियः-अन्तYढविकारः। अतएवाऽसाध्योऽप्रतिसमाधेयःसन् । गदोयथारोग इव। 'इववद्वायथाशब्दः इति दण्डी । काले बलक्षयावसरे प्राप्ते सति । कोपं कुरुते प्रकुप्यतीत्यर्थः। तदुक्तम्-'वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्कालविपर्ययः । तमेव चागते काले भिन्द्याद्घटमिवाश्मना' ॥ इति ॥८४ ॥ [अन्वयः] परैः कृतापचारोऽपि अनाविष्कृतविक्रियः (अत एव ) असाध्यः ( सन् ) गदो यथा काले प्राप्त (सति) कोपं कुरुते । [विग्रहः ] कृतः अपचारो यस्याऽसौ--कृतापचारः। न आविष्कृता अनाविष्कृता, अनाविष्कृता विक्रिया येनासौ अनाविष्कृतविक्रियः । न . साध्यः असाध्यः । [अर्थः ] परैः = शत्रुभिः । कृतापचारोऽपि = विहिताप- कारोऽपि । गदपक्ष-विहितापथ्योऽपि । (तथापि-) अना. विष्कृतविक्रियः = अप्रकटितकोपः । अन्तगूढविकारः । (अत एव-) असाध्यः तदानीमप्रतिसमाधेयः सन् । अशक्य. 'निरासः सन् । अप्रतिविधेयः सन् । गदो यथा-रोग इव । काले = अवसरे। शत्रुबलक्षयावसरे । विपत्तिकाले च । गदपक्षे- सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । २३३ ] ] : . प्रकोपकाले । वलक्षये च प्राप्ते = समायाते सति । कोपं प्रकोपम् । आक्रमणम् । विकारम् । कुरुते = विधत्ते। [ भावार्थः] मनस्वी शत्रुभिस्तिरस्कृतोऽपि कोपं नियम्य समयं यापयन कोपकाले प्राप्त ऽसाध्यो रोग इव प्रकोपं करोति । [ कोशः ] 'रोगव्याधिगदामयाः' इत्यमरः । वाच्यप० ] परैः कृतापचारेणापि अनाविष्कृतविक्रियेण असाध्येन गदेन यथा-काले प्राप्ते कोपः क्रियते । [ भाषाटीका ] शत्रुओं से तिरस्कार किया गया भी मनस्वी अपने क्रोध को रोककर समय को बिताता है, और मौका आने पर असाध्य रोग की तरह प्रकोप करता है। रोग भी अपथ्य करनेवाले पर समय आने पर ही प्रकुपित होता है ॥ ८४ ॥ इतश्च क्षन्तव्यमिदानीमित्याह- मृदुव्यवहितं तेजी भोक्तुमर्थान्प्रकल्पते । प्रदीपः स्नेहमादत्ते दशयाभ्यन्तरस्थया ॥ ८ ॥ [सर्वकषा] मृद्विति । मृदुना मृदुवस्तुना व्यवहितमन्तर्हितं तेजः अर्थान्भोक्तु प्रकल्पते-प्रभवति । तथाहि-प्रदीपोऽभ्यन्तरस्थया मध्यस्थया दशया-वा । 'दशा वर्क्सववस्थायां स्नेहस्तैलादिके रसे इति विश्वः । स्नेह-तैलादिकमर्थमादत्ते । अन्यथा स्वयमेव निर्वापादिति। ततः शान्तिपूर्वमेव क्षानं फलतीति सर्वथा प्रथमं क्षन्तव्यामिति भावः। विशेषेण सामान्यसमर्थनादर्थान्तरन्यासः ॥८५॥ [अन्वयः ] मृदुव्यवहितं तेजः अर्थान् भोक्तम् प्रकल्पते । प्रदीपः अभ्यन्तरस्थया दशया (एव) स्नेहमादत्ते । [ विग्रहः ] मृदुना व्यवहितं मृदुव्यवहितम् । अभ्यन्तरे तिष्ठतीति अभ्यन्तरस्था, तया-अभ्यन्तरस्थया। [अर्थः ] मृदुव्यवहितं = मृदुत्वसहितम् । मृदुवस्वन्त-
शिशुपालवधम् ।
२३४
[२ द्वितीय
p
,
हितञ्च । तेजः = प्रतापः । ज्योतिश्च । अर्थान् = पदार्थान् ।
राज्यादिभोगान् । तैलादींश्च । भोक्तम् = अनुभवितुम् । उप-
भोक्तम् । दग्धुश्च । प्रकल्पते प्रभवति । समर्थो भवति ।
तेजःपक्षे = समर्थ भवति । (तथाहि-) प्रदीपः = दीपः ।
अभ्यन्तरस्थया = मध्यस्थया । दशया = वा एव । स्नेह
तैलादिकमर्थम् । आदत्ते = गृह्णाति । उपभुङ्क्त च ।
[ भावार्थः ] मृदुत्वोपहितं तैदण्यं भोगान्भोक्त प्रभवति,
यथा तेजस्व्यपि प्रदापो मृया वा तैलमादत्ते, नान्यथा ।
[ कोशः ] 'दशा वर्क्सववस्थायां स्नेहस्तैलादिके रसे' इति विश्वः ।
[वाच्यप० ] मृदुव्यवहितेन तेजसा अर्थान् भोक्तुम् प्रकल्प्यते ।
प्रदीपेन अभ्यन्तरस्थया दशयो स्नेह आदीयते ।
[भाषाटीका ] तेजस्वी भी मृदुता से ही राज्य आदि सम्पत्ति को
भोग सकता है। देखो दीया-बत्ती को बीच में रखकर ही तैल खींचता
है, बिना बत्ती के नहीं ॥ ८५ ॥
'तर्हि पौरुषं मा भून्नित्यं, क्षममाणस्य दैवमेव श्रेया विधास्यतीत्या-
शङ्कयाह-
नालम्बते दैष्टिकतां न निषीदति पौरुषे ।
शब्दार्थों सत्कविरिव द्वयं विद्वानपेक्षते ॥ ८६ ॥
[ सर्वकषा] नालम्बत इति । विद्वानभिज्ञः । दिष्टे मतिर्यस्येति
दैष्टिकः । दैवप्रमाणक इत्यर्थः । 'दैवं दिष्टं भागधेयम्' इत्यमरः । 'अस्ति-
नास्तिदिष्टं मतिः' इति ठक् । तनावं दैष्टिकतामेव नालम्बते । सर्वथा
यद्भविष्यस्य विनाशादिति मावः । तथा पौरुषे केवलपुरुषकारेऽपि । युवा-
दित्वादण्प्रत्ययः । न निषीदति न तिष्ठति । देवप्रातिकूल्ये तस्य वैफल्या-
दिति भावः । किन्तु सत्कविः सत्कवयिता, शब्दार्थाविव तयोः काव्य-
शरीरत्वादिति भावः। यथाह वामनः---'अदोषौ सगुणौ सालङ्कारौ शब्दार्थों
काव्यम्' इति । द्वयं-पौरुषं, देवं च । अपेक्षते। अतः पौरुषमप्यावश्य-
कम्, किन्तु काले कर्तव्यमिति विशेषः । पौरुषाऽदृष्टयोः परस्परसापेक्षत्वा-
दिति भावः ॥ ८६ ॥
सर्गः]
अभिनवराजलक्ष्मः-सर्वाषा-विराजितम्।
।
[अन्वयः ] विद्वान् दैष्टिकतां नालम्बते पौरुषे च न निषी-
दति । ( किन्तु-- ) सत्कविः शब्दाथौ इव द्वयम् अपेक्षते ।
[ विग्रहः ] दिष्टम् इति मतिर्यस्य स दैष्टिकः, तस्य भावः दैष्टिकता,
ताम्-दैष्टिकताम् । संश्चासौ कविश्व सत्कविः । शब्दश्च अर्थश्च शब्दाथों,
तो तथाभूतौ।
[अर्थः] विद्वान् = अभिज्ञः ।
कुशलः तत्त्वज्ञः ।
दैष्टिकता = दैवप्रमाणकताम् । भाग्यवादिताम् । नालम्बते=
नाश्रयते । (तथा-) पौरुषे केवले पुरुषकारेऽपि । केवले
पुरुषार्थेऽपि न । न निषीदति-न तिष्ठति । केवल मुद्योगमेव
नाश्रयते । दैवप्रतिकूल्ये पुरुषार्थस्य वैफल्यात् । (किन्तु-)
सत्कविः श्रेष्ठः कविः । [श्रेष्ठा कवितेति यावत् ] । शब्दार्था-
विव = शब्दतदभिधेयाविव । तयोः काव्यशरीरभूतत्वात् ।
द्वयं-दैवं पौरुषञ्चेति द्वयम् । अपेक्षते-आश्रयते ।
[भावार्थः] विद्वान् पौरुषमदृष्टञ्चेति द्वयमप्यपेक्षते ।
तेन पौरुषमनुकूले समये प्रतन्यते । पौरुषाऽदृष्टयोः परस्पर
सापेक्षत्वात् ।
[ कोशः ] 'दैवं दिष्टं भागधेयं भाग्यं स्त्री नियतिर्विधिः' इत्यमरः ।
[वाच्यप० ] विदुषा दैष्टिकता नालम्ब्यते, पौरुषे च न निषद्यते ।
सत्कविना शब्दाथौं इव द्वयम् अपेक्ष्यते ।
[भाषाटीका ] विद्वान् लोग खाली भाग्य के भरोसे पर नहीं बैठते हैं,
और न केवल उद्योग ही के ऊपर भरोसा करते हैं, किन्तु जैसे श्रेष्ठ कविता
में शब्द और अर्थ दोनों में चमत्कार रहता है वैसे ही वे भाग्य और
उद्योग इन दोनों का आश्रय करते हैं। क्योंकि अनुकूल समय में ही
पुरुषार्थ सफल होता है ॥ ८६ ॥
अथ क्षान्तेः फलमाह-
स्थायिनोऽर्थे प्रवर्तन्ते भावाः सञ्चारिणो यथा ।
रसस्यैकस्य भूयांसस्तथा नेतुर्महीभृतः ॥ ८ ॥
२३६ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [सर्वकषा ] स्थायिन इति । रस्यते स्वाद्यते इति रसः-शृङ्गारादिः। रसतेः स्वादनार्थत्वाद्स्यन्त इति ते रसा इति निर्वचनात् । तस्य रसस्य- रसीभवतः, स्थायिभागस्य-रत्यादेः । 'रतिहासश्च क्रोधश्च शोकोत्साह- भयानि च । जुगुप्साविस्मयशमाः स्थायिभावाः प्रकीर्तिता॥' इत्युक्तत्वात् । एकस्यैवार्थे-स्वादुभावरूपे प्रयोजने, भूयांसः सञ्चारिणो व्यभि- चारिणो भावाः-निदादयः। विभावादीनामुपलक्षणमेतत्।यथा प्रवर्तन्ते। तदुक्तम्-'विभावैरनुभावैश्वसात्त्विकैय॑भिचारिभिः । आनीयमानः स्वादुत्वं स्थायिभावो रसः स्मृतः ॥ इति । तथा-स्थायिनः-स्थिरस्य । क्षान्त्या कालं प्रतीक्षमाणस्येत्यर्थः । एकस्यैव नेतुर्विजिगीषो यकस्यार्थे प्रयोजने भूयांसो महीभृतो राजानः प्रवर्तन्ते।स्वयमेवास्य कार्य साधयन्तीत्यर्थः। ततः क्षन्तव्यमिति भावः केचितु भावपदस्थापिरसपरत्वमाश्रित्य-यथा संश्चारिणः प्रसङ्गादागन्तुका अन्ये रसाः स्थायिनः स्थिरस्यैकस्य मुख्यस्यार्थे प्रवर्तर्त्तन्ते, यथास्मिन्नेव काव्ये वीरस्य शृङ्गारादय इति व्याचक्षते। उपमालङ्कारः॥८७।। [अन्वयः ] रसस्य स्थायिनः एकस्य अर्थे भूयांसः सञ्चा- रिणः भावाः यथा प्रवर्तन्ते तथा (स्थायिन एकस्य ) नेतुः ( अर्थे भूयांसः) महीभृतः (प्रवर्त्तन्ते ।) [विग्रहः ] तिष्ठतीति स्थायी, तस्य स्थायिनः। रस्यते इति रसः, [अर्थ] रसस्य = रसीभवतः । स्थायिनः = स्थायिभा- वस्य रत्यादेः। एकस्यार्थे रसताङ्गच्छतो रत्यादेः स्थायीभावरूपे प्रयोजने । भूयांसः विपुलाः । सञ्चारिणः व्यभिचारिणः । भावा:-निर्वेदादयः । विभावानुभावसञ्चारिणः । प्रवर्तन्ते यथा चेष्टन्ते । यथा सहकारितां गच्छन्ति । तथा तथैव । (स्थायिनः स्थिरस्य । क्षमया योग्यं कालं प्रतीक्षमा- णस्य । एकस्य केवलस्य ।) नेतुः विजिगीषोः । (अर्थे- प्रयोजने । भूयांसः अनेके।) महीभृतः राजानः । । (प्रव. तन्ते चेष्टन्ते ।) तस्य कार्य स्वयं साधयन्तीत्यर्थः। तस्य रसस्य। यथा सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । २३७ . - [ भावार्थः] रसीभवतो रत्यादेः सञ्चारिभावा इव क्षमया समुचितं कालं प्रतीक्षमाणस्य विजिगीषोरन्ये भूयांसो राजानः सहायतां यान्ति। [ कोशः ] ' अर्थोऽभिधेयरैवस्तुप्रयोजननिवृत्तिपु' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] रसस्यार्थे तथा भूयोभिः सञ्चारिभिः भावैः प्रवय॑ते तथा स्थायिनो नेतुर्महीभृद्भिः प्रवर्त्यते । [ भाषाटीका ] जैसे रसता को प्राप्त होते हुए रति आदि स्थायीभावों के निर्वेद आदि सञ्चारीभाव सहायक होते हैं वैसे ही मौका देखकर परा- क्रम दिखानेवाले विजिगीपु राजा के -अन्य बहुत से आसपास के राजा सहायक हो जाते हैं ॥ ८७ ॥ क्षान्तिपक्ष एवं गुणान्तरमाह- तन्त्रावापविदा योगैमण्डलान्यधितिष्ठता। सुनिग्रहो नरेन्द्र ण फणीन्द्रा इव शत्रवः ॥ ८८ ॥ [ सर्वकषा ] तन्त्रेति । तत्रावापौ-स्वपरराष्ट्रचिन्तनम् । अन्यत्र- तन्त्रावापं शास्त्रौषधप्रयोगं च वेत्ति यस्तेन तन्त्रावापविदा । 'तन्त्रः स्वराष्ट्रचिन्तायामावापः परचिन्तने । शास्त्रौषधान्तमुख्येषु तन्त्रम् ' इति वैजयन्ती । योगैः-सामाधुपायैः । अन्यत्र-देवताध्यानैश्च । 'योगः सन्नह- नोपायध्यानसङ्गतियुक्तिषु' इत्यमरः । मण्डलानि-स्वपरराष्ट्राणि, माहेन्द्रा- दिदेवतायतनानि च । अधितिष्ठता-अतिक्रमता। नरेन्द्रण राज्ञा, विष- वैद्येन च । 'नरेन्द्रो वार्तिके राज्ञि विषवैद्ये च कथ्यते' इति विश्वः । शत्रवः फणीन्द्रा इव सुनिग्रहाः-सुखेन निग्राह्याः। एवं च प्रकृताऽप्रकृतविषयः श्लेषः । उपमैवेति केचित् ।। ८८ ॥ [अन्वयः ] तन्त्रावापविदा योगैः मण्डलानि अधितिष्ठता नरेन्द्रण शत्रवः फणीन्द्रा इव सुनिग्रहाः। [विग्रहः ] तन्त्रश्च आवापश्च तन्त्रावापौ, तन्त्रावापौ वेत्तीति तन्त्रा. वापवित्, तेन-तन्त्रावापविदा । फणिनामिन्द्रा:-फणीन्द्राः। ।
२३८ शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- - %3D [अर्थः] तन्त्रावापविदा = स्वराष्ट्रपरराष्ट्रचिन्ताकुशलेन । (विषवैद्यपक्ष-) विषघ्नमणिमन्त्रौषधादिप्रयोगविदा । विषहरशास्त्रीयसाम्प्रदायिकमन्त्रतन्त्रादिरहस्याभिज्ञेन । योगैः मामदानाद्य पायैः । (विषवैद्य क्षे-) देवताध्यानादिभिः । मण्डलानि = स्वपरराष्ट्राणि । (विषवैद्यपक्षे-) माहेन्द्रगा. रुडादिदेवतायतनानि । अधितिष्ठना = अध्यारूढेन । अतिक्रमता- च । नरेन्द्र ण = विजिगीषुणा राज्ञा। विषवैद्य न च। शत्रवः= रिपवः । फणीन्द्रा इव = भोगिन इव । सो इव । सुनिग्रहाः= सुखेन निग्रहीतु शक्याः । वशीकत्तु शक्याः । [ भावार्थः] मणिमन्त्रादिकुशलेन मण्डलान्तर्वर्तिना जाङ्ग - लिकेन सर्पा इव स्वपरराष्ट्रचिन्तनचतुरेण चारेः स्वपरराष्ट्रमधि- तिष्ठता राज्ञा सुखेन शत्रवो निग्रहीतु शक्याः । [ कोशः ] 'तन्त्रः स्वराष्ट्रचिन्तायामावापः परचिन्तने । शास्त्रौपधान्त- मुख्येषु तन्त्रम्' इति वैजयन्ती । 'योगः सहननोपायध्यानसन्नतियुक्तिपुर इत्यमरः । 'नरेन्द्रो वार्तिके राज्ञि विषवैद्ये च कथ्यते' इति विश्वः । [वाच्यप० ] तन्त्रावापवित् योगैमण्डलानि अधितिष्ठन् नरेन्द्रः फणी- न्द्रान् इव शत्रून निगृह्णीयात् । [भाषाटीका] जैसा तन्त्र-मन्त्र जडी-बूटी जाननेवाला गारुडी सँपेरा अपने रक्षार्थ बनाए हुए मण्डल में बैठकर बड़े २ सांपों को पकड़ लेता है, वैसे ही अपने और पराए राज्यों की पूरी देखरेख खोज-खबर रखने वाला राजा-शत्रुओं को अनायास ही वश में कर लेता है ॥ ७८ ॥ 'प्रज्ञोत्साहावतः स्वामी' इत्यत्रैव 'तावेव प्रभुशक्तर्मूलमित्युक्तं तदेव व्यनक्ति- करप्रचेयामत्त ङ्गः प्रभुशक्ति प्रथीयसीम् । प्रज्ञावलबृहन्मलः फलत्युत्साहपादपः ॥ ८६ ॥ [सर्वकषा] करेति । उत्तुङ्गो-महोन्नतः । प्रज्ञाबलं-मन्त्रशक्तिरेव बृहत्प्रधानं मूलं यस्य सः । उत्साह एव पादयः,-करेण-बलिना, - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । २३६ M प्रचेयां-वर्धनीयां, हस्तग्राह्यां च । 'बलिहस्तांशवः कराः' इत्यमरः । प्रथीयसी-पृथुतराम् । ‘र ऋतो हलादेः-इति रेफादेशः । प्रभुशक्तिं-तेजो- विशेषम् । ‘स प्रतापः प्रभावश्च यत्तेजः कोशदण्डजम्' इत्यमरः । फलति । प्रसूते इत्यर्थः । ‘फल निप्पत्तो' । मन्त्रपूर्वक एवोत्लाहः फलति । विपरी- तस्तु छिन्नमूलो वृक्ष इव शुप्यतीति भावः । रूपकालङ्कारः ॥ ८९ ।। [अन्वयः] उत्तुङ्गः प्रज्ञाबलबृहन्मूलः उत्साहपादपः कर- प्रचेयाम् प्रथीयसीम् प्रभुशक्ति फलति । [विग्रहः ] प्रज्ञाया बलं ( प्रज्ञैव बलमिति वा) प्रज्ञाबलं, प्रज्ञाबलं एव बृहत् मूलं यस्यासौ प्रज्ञावलबृहन्मूलः । अन्यत्र प्रज्ञाबले इव बृहत् मूलं यस्य सः । उत्साहः पादप इव उत्साहपादपः । अन्यत्र-उत्साह इव पादपः उत्साहपादपः। करण प्रचेया करप्रचेया, ताम् । प्रभोः शक्तिः,-प्रभुशक्ति- स्ताम् प्रभुशक्तिम् । अतिशयेन पृथ्वी प्रथीयसी, ताम् प्रथीयसीम् । [अर्थः] उत्तु नः = महोन्नतः । प्रज्ञाबलबृहन्मूलः = मन्त्रश- क्तिदृढप्रधानमूलः : । मन्त्रशक्तिबद्धमूलः । उत्साहपादपः = उत्साह- वृक्षः । करप्रचेयाम् = राजमाह्यभागवर्द्धनीयाम् । बलिवर्द्ध- नीयाम्। हस्तग्राह्याञ्च । प्रथीयसी = विपुलाम् । पृथुतराम् । ग्रभु- शक्तिं = प्रभावम् । फलति = प्रसूते । [ भावार्थः] मन्त्रमूलो (विचारपूर्वकः ) विक्रमपादपः- (उत्साहरूपो वृक्षः) प्रभुत्वं फलति विपरीतस्तु छिन्नमूलो वृक्ष इव शुष्यति । अतो विचार्योत्साहो विधेयो न सहसा । [कोशः ] 'बलिहस्तांशवः कराः' इत्यमरः। 'स प्रतापः प्रभावश्च यत्तेजः कोशदण्डजम्' इत्यमरः । 'मूलं बुध्नोऽध्रिनामकः' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] उत्तुङ्गेन प्रज्ञाबलबृहन्मूलेन उत्साहपादपेन करप्रचेया प्रथीयसी प्रभुशक्तिः फल्यते । [ भाषाटीका ] मन्त्र ( विचार ) रूपी जड जिसकी मजबूत है ऐसा उत्साह रूपी बढ़ा हुआ वृक्ष ही प्रभुता ( सम्पत्ति ) रूपी फल को देता है ( सफल होता है ) ॥ ८९ ॥ - २४० शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- - - विमृश्यकारिणस्तु विश्वमपि विधेयं स्यादिति त्रयेणाह- अनल्पत्वात्प्रधानत्वादशस्येवेतरे स्वराः । विजिगीषोर्नृपतयः प्रयान्ति परिवारताम् ॥१०॥ [सर्वकषा] अनल्पत्वादिति । अनल्पत्वात्-प्रज्ञोत्साहाधिकत्वात्। अतएव प्रधानत्वात-मण्डलाभिज्ञत्वात् । अन्यत्रानल्पत्वादुच्चैस्तरत्वात् प्रधानत्वान्नायकस्वरत्वाच्च। वंशस्य-वंशवाद्यस्वरस्य । इतरे स्वरा:-बीणः- गानादिशब्दा इव । अथवा आश्रयत्वादश इव वंशः-तत्कालविहितः स्वर उच्यते । तस्य स्वरस्येतराः षड्जादयः विजिगीषोनृपत योऽन्ये मण्ड. लपरिवर्तिनो राजानः । परिवारतां पोष्यतां प्रयान्ति । तत्कार्यमेव साध- यन्तीत्यर्थः । तस्माद्विमृश्य कर्तव्यमित्यर्थः ॥ ९० ॥ [ अन्वयः] अनल्पत्वात् प्रधानत्वात् वंशस्य इतरे स्वरा इव विजिगीषोः नृपतयः परिवारताम् प्रयान्ति । [ विग्रहः ] न अल्पः अनल्पः, अनल्पस्य भावः-अनल्पत्व, तस्मात्- [अर्थः] अनरूपत्वात् = प्रज्ञोत्साहाधिकत्वात् । मन्त्रशक्त्यु- त्साहशक्त्युपचितत्वात् । (स्वरपक्षे-) उच्चस्तरत्वात् । तारतर- स्वाच्च । (किञ्च-) प्रधानत्वात् = मण्डलाधिष्ठातृत्वात् । राजमण्ड- लमुख्यत्वात् । (स्वरपक्षे-) नायकस्वरत्वाच्च । वंशस्य = वंशवा. द्यस्वरस्य । इतरे स्वरा इव = वीणागानादिशब्दा इव । वीणा- मृदङ्गादिशब्दा इव। (यद्वा-वशस्य = तत्कालविहितस्वरस्य । इतरे स्वराः = षड्जमध्यमधैवतादयः स्वरा इत्यर्थः। ) निजि- गीषोः = नेतुर्नृपतेः । नृपतयः = अन्ये माण्डलिका राजानः । परिवारतां = पोष्यताम् । अनुचरताम् | प्रयान्ति = गच्छन्ति । तत्कार्यमेव साधयन्तीत्यर्थः । [ भावार्थः] प्रज्ञोत्साहवलोपचितस्य प्रधानस्य विजिगीपो- स्ये राजानः सहायका एव भवन्ति । प्रधानस्य हि स्वरस्यान्ये स्वराः परिवारतामेव यान्ति ।
सर्गः ] .. अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजिम् । [ कोशः ] 'प्रधानं स्यान्महामात्ये प्रकृती परमात्मनि । प्रज्ञायामपि च क्लीबमेकत्वे तूत्तमे सदा' इति मेदिनी । [ वाच्यप० ] अनल्पत्वात् प्रधानत्वादशस्य इतरैः स्वरैरिव विजिगीषोः इतरैर्नृपतिभिः -परिवारता प्रयायते । [ भाषाटीका ] जो विजय चाहने वाला राजा उत्साह और मन्त्र (विचार) बल से बढ़ा हुआ तथा प्रधान होता है उसकी निकटवर्ती राजालोग सहायता करते हैं । और उसके अनुगत हो जाते हैं। जैसे तेज और ऊँचे वंशी के स्वर के वीणा आदि के स्वर अनुगत और सहायक होजाते हैं ॥९॥ अप्यनारममाणस्य विभोरुत्पादिताः परैः। वजन्ति गुणतामाः शब्दा इव विहायसः ॥ ११ ॥ [ सर्वङ्कपा ] अपीति । किञ्च-अनारममाणस्य-स्वयमकिञ्चि-कुर्वा- णस्यापि । विभोः-प्रमोः, व्यापकस्य च । परैरन्यैर्नृपतिभिः, शङ्खभेर्या- दिभिश्च । उत्पादिताः-सम्पादिताः, जनिताश्च । अर्थाः-प्रयोजनानि । विहायसः-आकाशस्य -शब्दा इव, गुणतां-विशेषणतां । कारणत्वाद्गु- णत्वं ब्रजन्ति । शक्तो हि राजा स्वयमुदासीन एवाकाशवत्स्वमहिम्नैव कार्यदेशं व्याप्नुवन्शब्दानिव सर्वार्थानपि स्वकीयतां नयतीत्यर्थः। 'गुण- स्त्वावृत्तिशब्दादिज्यन्द्रियाऽमुख्यतन्तुपुः इति वैजयन्ती ॥ ९१ ॥ [अन्वयः ] किञ्च-अनारभमाणस्यापि विभोः परैः उत्पादिताः अर्थाः-विहायसः शब्दा इव-गुणतां ब्रजन्ति । [विग्रहः ] आरभते इति आरभमाणः, न आरभसाणः---अनारम- माणः, तस्य अनारममाणस्य । [ अर्थः] (किञ्च-) अनारभमाणस्यापि = स्वयमकिश्चि- कुर्वाणस्या ऽपि । उदासीनवदवस्थितस्यापि । विभोः प्रभोः। राज्ञः । गगनपक्षे-व्यापकस्य च । परैः -व्यापकस्य च । परैः = अन्यैर्नृपतिभिः। अन्यै राजभिः। गगनपक्षे-शङ्खमृदङ्गभेर्यादिभिश्च । उत्पा- दिताः = सम्पादिताः । गगनपक्षे-जनिताः, अभिव्यक्ताश्च । . १६ २४२ शिशुपालवधम् । - [२ द्वितीयः- ...... अर्थाः = प्रयोजनानि । विहायसः = गगनस्य । शब्दा इव = ध्वनय इव । गुणतां = स्वताम् । विशेषणताम् । गुणभावम् । ब्रजन्ति = गच्छन्ति । [भावार्थः] स्वयमकिञ्चित्कुर्वाणस्यापि विभोः परैरुत्पा- दिता अर्था गुणतां ब्रजन्ति । यथाऽऽकाशस्य विभोरन्यैरुत्पा- दिताः शब्दा गुणा इत्युच्यन्ते । 'शब्दगुणकमाकाशम्' इति हि प्रसिद्धमेव। [ कोशः ] 'वियद्विष्णुपदं वा तु पुंस्याकाशविहायसी' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] अनारभमाणस्य विभोः परैः उत्पादितैः अर्थः ।। शब्दैरिव गुणता बज्यते । । [ भाषाटीका ] स्वयं कुछ कार्य किए बिना भी दूसरों के किए हुए कार्य भी विभु (राजा) के कार्य कहलाते हैं । जैसे शङ्खभेरी आदि बाजों से उत्पन्न भी शब्द विभु (व्यापक) होने से आकाश के ही गुण कहलाते हैं ॥९॥ यातव्यपाणिग्राहादिमालायामधिकद्युतिः । एकार्थतन्तुप्रोतायां नायको नायकायते ॥ १२ ॥ [ सर्वकषा] यातव्येति । किञ्च-एकार्थः- एकप्रयोजनः, स एव तन्तुः-सूत्रं, तत्र प्रोतायाम् । एकाभीष्टाभिलाषिण्यामित्यर्थः । प्रपूर्वाद्वेनः कर्मणि क्तः । 'वचिस्वपि--' इत्यादिना सम्प्रसारणम् । यातव्योऽभिषेण- यितव्योऽरिः । पाणिं गृह्णातीति पाणिग्राहः -पृष्ठानुधावी । कर्मण्यण् । तावादी येषां ते पूर्वोक्ताः पङ्क्तिशः स्थितास्त एव माला रत्नमालिका तस्यामधिका तिर्महातेजा नायकः शक्तिसम्पन्नो जिगीपुर्नायकायते मध्यमणिरिवाचरति । स्वयमेव सर्वोत्कर्षेण वर्तत इत्यर्थः। तस्माद्विमृश्य कर्तव्यमिति भावः । 'नायको नेतरि श्रेष्ठे हारमध्यमणावपि' इति विश्वः । 'उपमानादाचारे' इति क्यङ् । अकृत्सार्वधातुक-' इति दीर्घः । नायकायते इत्युपमा । अन्यथानुशासनविरोधात् । एकार्थतन्त्वित्यत्र तुरूपक- मधिष्टानतिरोधानेनारोप्यमाणतन्तुत्वर स्यैवोद्भटत्वात्प्रोतत्वसिद्धेस्तदेव युक्तम् । ।
सर्गः]
अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् ।
२४३
तबलात्पाणिग्राहादिमालायामित्यत्रापि रूपकमेव । तदनुप्राणिता चेय-
मुपमेत्यङ्गाङ्गिभावेन तयोः सङ्करः ॥ ९२ ॥
[अन्वयः ] एकार्थतन्तुप्रोतायाम् यातव्यपाणिग्राहादिमाला-
याम् अधिकद्य तिः नायकः नायकायते ।
[विग्रहः ] एकश्चासौ अर्थश्च एकार्थः, एकार्थ एव तन्तुः एकार्थतन्तुः ।
अन्यत्र एकार्थ इव तन्तुः एकार्थतन्तुः ।) एकार्थतन्तौ प्रोता एकार्थ-
तन्तुप्रोता, तस्यां । यातव्यश्च पाणिग्राहश्च यातव्यपाणिग्राहो, तो आदी
येषाम् ते यातव्यपाणिग्राहादयः, ते एव मालायातव्यपाणिग्राहादिमाला,
तस्याम् । अधिका द्युतिर्यस्यासौ अधिकातिः ।
[ अर्थः ] एकार्थतन्तुप्रोतायाम् एकप्रयोजनरूपसूत्रग्रथिता-
याम् । एकप्रयोजनाभिलाषिएयाम् । यातव्यपाणिग्राहादिमा-
लायां शत्रुपृष्ठमाहादिद्वादशराजरत्नमालायाम् । सपत्नादिराज-
पङ्क्त्याम् । शवादिद्वादशराजमण्डले । अधिकाति-महातेजाः।
अजितेजस्वी। नायकः शक्तिसम्पन्नो विजिगीषुः । नायकायते
मध्यमणिरिवाचरति । सर्वोत्कर्षण वत्तते । मालापक्षे-तरला-
यते । हारमध्यमणिरिवाचरति ।
[ भावार्थः] यातव्यपाणिग्राहादिराजमालायामेकार्थत्रग्र-
थितायामतितेजस्वी नायको (विजिगीषुः) नितरां विराजते।
यथा हारादिषु मध्यस्थो मणिरधिकप्रकाशो विराजते तथा नायक
इत्याशयः॥
[ कोषः] 'नायको नेतरि श्रेष्ठे हारमध्यमणावपि' इति विश्वः ।
[ वाच्यप० ] अधिकातिना नायकेन नायकाय्यते ।
[ भाषाटीका ] यातव्य (जिस पर चढ़ाई की जाए-शत्रु)
और
पाणिग्राह-(पृष्ट रक्षक) आदि १२ राजाओं की माला (पंक्ति) में नायक
(विजिगीषु) राजा ही अति तेजस्वी होने के कारण अधिक शोभित होता है।
माला में बीच के मणि को भी नायक कहते हैं, हार में वह सभी मणियों
से अधिक मूल्य का और प्रकाशमान होता है ॥ ९२ ॥
२४४ शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः . . . .. अथ विमृश्यकरणप्रकारमाह- पाड्गुण्यमुपयुजीत शक्यपेक्षो रसायनम् । भवन्त्यस्यैवमङ्गानि स्थास्नूनि बलवन्ति च ॥१३॥ [ सर्वकषा ] षाड्गुण्य मिति ॥ शक्तिं प्रभावादित्रयं, बलं चापेक्षते इति शक्त्यपेक्षः सन् । पचाधच् । 'शक्तिले प्रभावादौइति विश्वः । षड्गुणा एव षाड्गुण्यं-सन्धिविग्रहादिषट्कम् । चातुर्वर्यादित्वात्स्वार्थे प्यन्प्रत्ययः । तदेव रसायनमौषधविशेषमुपयुजीत-सेवेत । 'रसायनं विहङ्गेऽपि जराव्याधिभिदौषधे इति विश्वः। एवं सति-अस्य प्रयोक्तुरङ्गानि स्वाम्यादीनि । 'स्वामी जनपदोऽमात्यः कोशो दुर्गबलं सुहृत् । राज्यं सक्ष- प्रकृत्यङ्गं नीतिज्ञाः सम्प्रचक्षते ॥' इति । गात्राणि च स्थास्नूनि-स्थिराणि । कालान्तरक्षमाणीत्यर्थः । 'ग्लाजिस्थश्च--इति ग्स्नुः । बलवन्ति च परपीडाक्षमाणि च भवन्ति । श्लिष्टपरस्परितरूपकम् ॥ ९३ ।। [अन्वयः ] शक्त्यपेक्षः षाड्गुण्यं रसायनमुपयुञ्जीत । एवम् अस्य अङ्गानि स्थास्नूनि बलवन्ति च भवन्ति । [विग्रहः ] षड् च ते गुणाश्च षड्गुणाः, षाडगुणा एव पाड्गुण्यम्, तत् । अन्यत्र षड् गुणाः यस्मिन् तत् षड्गुणम् , तदेव पाड्गुण्यम् , तत् । प्रशस्तं बलमस्त्येषां तानि बलवन्ति । स्थातुं शीलं येषां तानि- [अर्थः] शक्त्यपेक्षः = प्रभावोत्साहमन्त्ररूपशक्तित्रयमपेक्ष- माणः सन् । रसायनपने-बलमिच्छन् सन् । षाड्गुण्यं= सन्धिविग्रहादिगुणषट्कम् । रसायनपक्षे -षडगुणबलिजारि- तम् । षड्गुणगन्धकजारितम् । रसायनं-रसायनवदुपका- रकम् । पक्षे चन्द्रोदयादिरसायनौषधम् । उपयुञ्जीत-सेवेत । एवम्-एवं सति । अस्य-प्रयोक्तुर्विजिगीषोः । बलाभिला. षिणश्च । अङ्गानि प्रकृत्याद्यङ्गानि । स्वाम्यमात्यादीन्यङ्गानि । शरीरावयवाश्च । स्थास्नूनि-स्थिराणि । कालान्तरक्षमाणि सर्गः ] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । २४५ . आयाससहानि च । बलवन्ति च = सामर्थ्यवन्ति । परपीडाक्ष. माणि । दृढानि च । भवन्ति = जायन्ते । [ भावार्थः ] बलमिच्छन् राजा सन्ध्यादिषड्गुणानुपसेवेत । पाङ्ग एयोपसेवनाच रसायनोपयोगवतः पुस इव राज्ञः स्थिराणि बलवन्ति च राष्ट्राद्यङ्गानि भवन्ति । [ कोशः ] 'शक्तिबले प्रभावादौ इति विश्वः । 'रसायनं विहङ्गेऽपि जराव्याधिभिदौषधे' इति विश्वः । [वाच्यप० ] शक्तयपेक्षेण षाड्गुण्यम् रसायनम् उपयुज्येत । एवम- स्याङ्गैः स्थास्नुभिः बलवद्भिश्च भूयते । [ भाषाटीका ] जो व्यक्ति शक्ति (प्रभाव आदि शक्ति या बल पौरुष) चाहे तो षड्गुण ( सन्धि विग्रह आदि, ) रूपी रसायन (या षड्गुणग- न्धकजारित चन्द्रोदय आदि) का सेवन करे। इस प्रकार सेवन करनेवाले के अङ्ग दृढ़ और बलिष्ट हो जाते हैं ॥ ९३ ॥ स्थाने शमवतां शक्त्या व्यायामे वृद्धिरङ्गिनाम् । अयथावलमारम्भो निदानं क्षयसंपदः ॥ ६४ ॥ [ सर्वकषा] स्थाने इति । किञ्च-स्थाने-शक्यविषये, शमवतां- क्षमावतामङ्गिनां सप्ताङ्गिनां राज्ञां, शरीरिणां च । शक्त्या प्रभावाद्यनुसा- रेण, बलेन च । व्यायामे-व्यापारे, पाडगुण्यप्रयोगे, गमनादौ च सती- त्यर्थः । वृद्धिरुपचयः । राज्यस्य, शरीरस्थ चेति भावः । विपक्षे बाधकमाह- अयथाबलं-शत्यतिक्रमेण । 'यथासादृश्ये' इत्यव्ययीभावे नसमासः । आरम्भो-व्यायामः । क्षयसम्पदोऽत्यन्तहानेनिंदानमादिकारणम् । अङ्गानामिति भावः । तस्मादस्माकमकस्माच्चद्यास्कन्दनमश्रेयस्करमिति भावः । अत्र विशेषणस्यापि श्लिष्टत्वाच्छब्दशक्तिमूलो वस्तुना वस्तुध्वनिः । अतो द्वयानामङ्गिनामौपम्यं च गम्यते इति सक्षेपः॥ ९४ ॥ [अन्वयः ] स्थाने शमवतां अङ्गिनाम् शक्तथा व्यायाम वृद्धिः अयथाबलम् आरम्भः क्षयसम्पदः निदानम् ( भवति)।
२४६ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [विग्रहः ] अङ्गानि सन्त्येषान्ते अङ्गिनः, तेपाम् अङ्गिनाम् बलमन- तिक्रम्य यथाबलम्, न यथाबलम् --अयथाबलम् । क्षयस्य सम्पत् क्षय. सम्पत् , तस्याः क्षयसम्पदः। [अर्थः ] (किञ्च-) स्थाने = शक्यविषये । स्वशक्तिसाध्ये। (स्थाने इत्यव्ययं युक्तेऽर्थे इतिपक्षे -स्थाने युक्तमित्यर्थः । ) शम- वता = क्षमावताम् । अङ्गिनाम् = स्वाम्यमात्यसुहृत्कोशराष्ट्रदु गंबलाख्यसप्तराज्याङ्गवतां राज्ञाम् । शरीरिणाश्च । शक्त्या - स्वप्रभावाद्यनुसारेण । स्वबलाद्यनुसारेण च । व्यायाम = व्यापारे। पाड्गुण्यप्रयोगे, शरीरयासे च सति ।वृद्धि = राज्यवृद्धिः । शरीरो- पचयश्च-। भवतीति शेषः । अयथाबलम् = शक्त्यतिक्रमेण । आरम्भः = व्यायामः, कार्यारम्भश्च । क्षयसम्पदः = अङ्गानामा. त्यन्तहानेः । क्षयरोगस्य । राज्याङ्गानां विनाशस्य च । निदा. नम् = आदिकारणम् । मुख्यकारणम् । तस्मात्सहसा चैद्याभियानं नोचिताम्। [ भावार्थः ] स्वशक्तिमनतिक्रम्य सहसा कार्यारम्भो, व्यव- सायश्च क्षयस्य निदानम् । तदविचार्य सहसा चैद्याभियानं नोचितम्। [ कोशः ] 'स्वाम्यमात्यसुहृत्कोशराष्ट्रदुर्गबलानि च। राज्याङ्गानि' इत्य- मरः । 'निदानं त्वादिकारणम्' इत्यमरः । 'युक्त द्वे साम्प्रतं स्थाने' इत्यमरः। [वाच्यप० ] वृद्धया भूयते । निदानेन भूयते । [ भाषाटीका ] जो राजा या मनुष्य अपने बल के अनुसार कार्य व व्यायाम करता है, उसका बल तो बढ़ता है। पर अपनी शक्ति के बाहर साहस का कार्य करने से उलटा क्षय (क्षयरोग या हानि ) ही होता है ॥९॥ फलितमाह- तदीशितारं चेदीनां भवांस्तमवमस्त मा । निहन्त्यरीनेकपदे य उदात्तः स्वरानिव ॥ १५ ॥ - सर्गः ] . अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । २४७ [ सर्वकषा] तदिति । तत्तस्मादशक्यार्थस्याकार्यत्वान्तं चेदीनामी- शितारं शिशुपालं भवान्मावमस्त-नावमन्यस्व । मन्यतेर्माङि लुङ् । अनुदात्तत्वान्नेडागमः । कुतो-यश्चैद्यः । उदात्तः स्वराननुदात्तानिवारीने- कपदे एकस्मिन्पदन्यासे, सुप्तिङन्तलक्षणे च । निहन्ति-हिनस्ति । नीचैः करोति च । अतिशूरत्वात् । 'अनुदात्तं पदमेकवर्जम्' इति परिभाषाबला- च्चेति भावः ॥ ९५॥ [अन्वयः] तत् चेदीनामीशितारम् तम् भवान् मावमंस्त, य उदात्तः स्वरान इव अरीन एकपदे निहन्ति । विग्रहः ] एकञ्च तत् पदञ्च एकपदं, तस्मिन्-एकपदे । अर्थः ] तत् = तस्मात् । सहसाऽशक्यार्थस्य कत्तु मयो- ग्यत्वात् । तं = प्रसिद्धम् । चंदीनां = चेदिदेशानाम् । ईशि- तारं = राजानम् । चैद्यम् । शिशुपालम् । भवान् = त्वम् । मावमस्त = नैवमवमन्यस्व । यः = चैद्यः । उदात्तः = उदात्ताच्या स्वरः । स्वरानिव = अनुदात्तादिस्वरानिव । अरीन् = शत्रून् । एकपदे = एकस्मिन्नेव पदन्यासे । एकस्मिन्नेवाक्रमणे । सुप्तिङ- न्तलक्षणे एकस्मिन् पदे च । निहन्ति = हिनस्ति । नीचैः करोति च । 'अनुदात्तं पदमेकवर्ज' मित्यनेन सूत्रेण यस्मिन्पदे उदात्तः स्वरितो वा विधीयते तमेकमचं वर्जयित्वा शेषं तत्पदमनुदात्ताच्कं स्यादित्यर्थ केन एकपदे उदात्तेन सर्वेषां निघातो भवतीति वैयाकरणनिकायप्रसिद्धम् । [भावार्थः] महाबली खलु स चैद्यो य एकपदे एव (झटिति ) शत्रन्हिनस्ति । [कोशः ] 'रिपौ वैरिसपत्नारिद्विषवेषणदुहृदः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] तत् चेदीनामीशिता भवता मावमानि, येन उदात्तेन स्वरा इव एकपदेऽरयो निहन्यन्ते । [भाषाटीका ] वह चैद्य बड़ा बली है, उसे आप छोटा न समझें, क्योंकि वह एक ही आक्रमण में शत्रुओं को वैसे ही नष्ट कर देता है जैसे २४८ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- उदात्तस्वर एकपद में दूसरे स्वरों को नष्ट कर देता है ॥ ९५ ॥ न चायमेकाकी किं नः करिष्यतीति मन्तव्यमित्याह- मा वेदि यदसावेको जेतव्यश्चेदिराडिति । राजयक्ष्मेव रोगाणां समूहः स महीभृताम् ॥ ६६ ॥ [ सर्वकषा] मा वेदीति । असौ चेदिराट् एकः एकाकी, अतो जेतव्यः-सुजय इति मावेदि-मा ज्ञायि । वेत्तेः कर्मणि माङि लुङ्ग। यद्यस्मात्स चेदिराट् । राज्ञश्च न्द्रस्य यक्ष्मा, राजा चासो यक्ष्मेति वा राज- यक्ष्मा क्षयरोगो, रोगाणामिव महीभृतां समूहः-समष्टिरूपः । यथाह वाग्भटः-'अनेकरोगानुमतो बहुरोगपुरःसरः । राजयक्ष्मा क्षयः शोषो रोगराडिति च स्मृतः ॥ नक्षत्राणां द्विजानां च राज्ञोऽभूद्यदयं पुरा । यच्च राजा च यक्ष्मा च, राजयक्ष्मा ततो मतः ॥ इति । अतो दुर्जेय इति भावः। एतेन 'चिरस्य मित्रव्यसनी सुदमो दमघोषजः' इति निरस्तम् ॥१६॥ [अन्वयः ] असौ चेदिराट् एकः (अतो) जेतव्य इति मा वेदि । यत्स राजयक्ष्मा रोगाणाम् इव महीभृतां समूहः । [विग्रहः ] राज्ञो यक्ष्मा, [ राजा चासौ यक्ष्मा चेतिवा ] राजयक्ष्मा । [अर्थः] असौ चेदिराट् = असौ शिशुपालः । एकाकी खल्वस्ति । (अत:-).जेतव्यः-अस्माभिः सुजयः । सुखेन जेतु शक्यः। इति = इत्थम् । मावेदि = माज्ञायि । यत् = यस्मात् । स्: चेदिराट् । राजयक्ष्मा = क्षयरोगः। रोगाणा- मिव = आमयानामिव । महीभृतां = राज्ञाम् समूहः 3 समष्टिरूपः । सङ्घरूप एव । [ भावार्थः ] राजयक्ष्मा रोगाणामिव महीभृतां स चैद्यः समूहरूपोऽतो नासौ सुखेन जेतु शक्यः । [ कोशः] ' रोगव्याधिगदामयाः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] अमुना चेदिराजा एकेन ( अतो) जेतव्येन भूयते इति भवान्मा वेदीत् ।...'समूहेन भूयते ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी--सर्वकषा-विराजितम् । - [भाषाटीका ] जैसे राजयक्ष्मा रोगों का समूह ही होता है वैसे ही वह शिशुपाल भी राजाओं का समूह ही है, अतः उसे अनयास ही जीत लेना संभव नहीं है ॥ ९६ ॥ अथास्य सर्वराजसमष्टितामेव द्वाभ्यां ब्याचष्टे- सम्पादितफलस्तेन सपक्षः परभेदनः । कार्मुकेणेव गुणिना बाणः सन्धानमेष्यति ॥ १७ ॥ [ सर्वकषा] सम्पादितेति । सम्पादितं फलं लाभो, बाणाग्रं च यस्य सः। 'फलं लामशरानयोः' इति शाश्वतः । सपक्षः-ससुहृत् कङ्कादि- पत्त्रयुतश्च । परेषां भेदक:-शत्रुविदाहरणः । बागो-बाणासुरः, शरश्च । गुणिना-शौर्यादिगुणवता, अधिज्येन च । तेन-चैद्येन । कर्मणे प्रभवति कार्मुकम् । 'कर्मण उकञ्' । तेनैव सन्धान-सन्धिमेप्यति । अतो नैकाकीति भावः । अत्राप्युपमा श्लेषो वा, मतभेदात् ॥ ९७ ॥ [अन्वयः ] सम्पादितफलः सपक्षः परभेदनः बाणः गुणि- ना तेन कार्मुकेण इव सन्धानम् एष्यति । [विग्रहः ] सम्पादितं फलं येन सः सम्पादितफलः । पक्षण सहितः सपक्षः । परेषां भेदनः परभेदनः । गुणोऽस्त्यस्य' गुणी, तेन-गुणिना। [अर्थः] सम्पादितफलः = लब्धलाभः । कृतकृत्यः। प्राप्तबा- णाग्रभागश्च । सपक्षः = ससुहृत् । कङ्कादिपत्रयुतश्च । परभेदन:- परेषां = शत्रूणां-भेदनः = विदारणः । हन्ता । वाणः = बाणा- सुरः। शरश्च । गुणिना = शौर्यादिगुणशालिना । समौर्वीकेन च । तेन = चैद्यन । कार्मुकेणेव = धनुषेव । 'सन्धानं = सन्धिम् । प्रयोगश्च । एष्यति = लप्स्यते । गमिष्यति । अतो नासौ चैद्य एकाकीति भावः। [ भावार्थः ] बाणो नामासुरः ससुहृद्वान्धवोऽस्य सहायो- स्त्यतोऽसौ चैद्यो नितरां बलवान् । .4 २५० शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [ कोशः ] 'फलं लाभशराप्रयोः' इति शाश्वतः । 'मौर्वी ज्या शिञ्जिनी गुणः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] सम्पादितफलेन सपक्षेण परभेदनेन बाणेन गुणिना तेन कार्मुकेणेव सन्धानम् एष्यते । [ भाषाटीका ] जैसे फल (बाण की नोक ) से युक्त बाण गुणी (प्रत्यञ्चावाले ) धनुष के साथ सन्धान को प्राप्त होता है, वैसे ही शिशुपाल द्वारा जिसको नाना रूपका लाभ हुआ है ऐसा वह बाणासुर गुणी शिशुपाल के साथ सन्धि कर लेगा । अर्थात् उसका सहायक हो जाएगा ॥ ९७ ॥ ये चान्ये कालयवनशाल्वरुक्मिहमादयः । तमःस्वभावास्तेऽप्येनं प्रदोषमनुयायिनः ॥ ६८ ।। [ सर्वकषा] ये चेति । ये चा-ये कालयवनशाल्वरुक्मिद्रुमादयो राजानस्तमःस्वभावास्तमोगुणात्मका, अतएव तेऽपि प्रदोषं-प्रकृष्टदोषम् । 'प्रदोषौ दुष्टराज्यंशो' इति वैजयन्ती । तामसमेवैनं चैद्यमनुयायिनोऽनुया- स्यन्ति । सादृश्यादिति भावः। 'भविष्यति गम्यादयः' इति णिनिर्भविष्यदर्थे । 'अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः' इति षष्ठीप्रतिषेधाद्वितीया। यथा ध्वान्तं रजनीमुखमनुयाति तद्वदिति वस्तुनाऽलङ्कारध्वनिः ॥ ९८ ॥ [अन्वयः ] ये च अन्ये कालयवनशाल्वरुक्मिद्रुमादयः तमःस्वभावाः तेऽपि प्रदोषम् एनम् अनुयायिनः । [विग्रहः ] कालयवनश्चशाल्वश्च रुक्मीच द्रुमश्च कालयवनशाल्वरुक्मि- द्रुमाः, ते आदिर्येषाम् ते-कालयवनशाल्वरुक्मिद्रुमादयः । तमः स्वभावो येषां ते तमःस्वभावाः । प्रकृष्टो दोषो यस्ययत्र वा स प्रदोषः, तम् प्रदोषम् । [अर्थः] ये चान्ये = इतो भिन्नाः। कालयवनशाल्वरुक्मिद्रु- मादयः = कालयवनादयो राजानः। तमःस्वभावाः = तमोगुणा- त्मकाः । रोषाविष्टाः । ईयाद्वेषक्रोधकलुषितस्वान्ताः । श्रन्धकार- स्वभावाश्च । सन्तीति शेषः । तेऽपि-प्रदोषं-प्रकृष्टदोषम् । दुष्टः स्वभावम् । तामसप्रकृतिश्च । प्रदोषकालं च । एनं = शिशुपालम् । अनुयायिनः=अनुगन्तारः । अनुयास्यन्ति । सादृश्यादेवेति भावः ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मो-सर्वकषा-विराजितम् । २५१ , RED [ भावार्थः] बाणासुरातिरिक्ताः कालयवनादयोऽपि दुष्टा. स्तमःप्रकृतयोऽन्धकारः प्रदोषमिव तम प्रकृतिं दुष्ट चैद्यमेवानुग- मिष्यन्ति । [ कोशः ] 'प्रदोषौ दुष्टरान्य शौ' इति वैजयन्ती । [वाच्यप०] यैश्च ......तैरपि प्रदोषः अयम् अनुयास्यते । [ भाषाटीका ] जैसे अन्धकार प्रदोष का अनुसरण करता है, वैसे ही तमः स्वभाववाले कालयवन आदि राजागण भी दुष्टस्वभाव इस शिशु- पाल की ही सहायता करेंगे॥९८ ॥ ननु बाणादयोऽस्माभिः कृतसन्धाना इदानी न विराध्यन्तीत्यत आह्व- उपजापः कृतस्तेन तानाकोपवतस्त्वयि । आशु दीपयिताल्पोऽपि सानी नेधानिवानिलः ॥९॥ [ सर्वकषा ] उपेति । तेन चैयेन कृतोऽल्पोप्युपजापो भेदः । 'भेदो- पजापौ' इत्यमरः । त्वय्याकोपवतस्तान्बाणादीन् । अनिलः साग्नीने- धानिन्धनानीव । 'काष्ठं दार्विन्धनं त्वेध इध्ममेधः समिस्त्रियाम्' इत्यमरः। आशु दीपयिता-सद्यः प्रज्वलयिष्यति । दीपेय॑न्ताल्लट् । अन्तर्वैराः संहिता आपदि सति रन्ध्र सद्यो विश्लिष्यन्तीति भावः॥ ९९ ॥ [अन्वयः] तेन कृतः अल्पोऽपि उपजापः त्वयि आकोपवतः तान्-अनिलः साग्नीन एधान इव-आशु दीपयिता। [विग्रहः ] आसमन्तात् कोपः आकोपः, आकोपोऽस्त्येषामिति आको- पवन्तः, तान् आकोपवतः । अग्निना सहिता साग्नयः, तान् सानीन् । [अर्थः ] तेन = चैद्य न । कृतः = विहितः। प्रयुक्तः । अल्पोऽ- पि = स्वल्पोऽपि । उपजापः = भेदप्रयोगः। त्वयि = भवति । आकोपवतः = ईषत्क्रुद्धान् । तान = बाणकालयवनादीन् । अनिलः = मारुतः । साग्नीन् = वह्रियुक्तान् । एधानिव = काष्ठा- नीव । आशु = सत्वरम् । सद्यः। दीपयिता = प्रदीपयिष्यति । प्रज्वलयिष्यति ।
- ३५२ शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- [भावार्थः ] अन्तर्वैरेपु बाणादिषु स्वल्पोऽप्युपजापस्तत्कृतः साग्नीनेधानिव द्रागेन तानुद्दीपयिष्यति । [ कोशः ] 'समौ भेदोपजापौ' इत्यमरः । 'काष्टं दार्विन्धनत्वेध इध्म- मेधः समिस्त्रियाम् इत्यमरः । [वाच्यप०] तेन कृतेन अल्पेनापि उपजायेन त्वयि आकोपवन्तस्ते साग्नयः एधाः अनिलेनेव आशु दीपियितारः । [भाषाटीका ] जैसे अग्नियुक्त काठ को हवा प्रज्वलित कर देती है वैसे ही आपके प्रति जिनके मनों में पहिले से ही द्वेष है ऐसे इन बाणा- सुर आदि राजाओं को थोड़े से प्रयत्न से ही शिशुपाल आपके विरुद्ध उभाड़ सकेगा ॥ ९९ ॥ ततः किमत आह- बृहत्सहायः कार्यान्तं क्षोदीयानपि गच्छति । संभूयाम्भोधिमभ्येति महानद्यो नगापगा ॥१०॥ [ सर्वकषा] बृहदिति। बृहत्सहायो महासहायवान्क्षोदीयान्क्षु- द्वतरोऽपि । 'स्थूलदूर-' इत्यादिना यणादिपरलोपः, पूर्वगुणश्च । कार्य: स्यान्तं पारं गच्छति । तथाहि-अपां समूह आपम् । 'तस्य समूहः' इत्यण् । तेन गच्छतीत्यापगा, नगापगा-गिरिनदी। महानद्या- गङ्गादिकया। संभूय-मिलित्वाम्भोधिमभ्येति । क्षुद्रोऽप्येवं तादृक् , महावीरश्चैवस्तु किमु वक्तव्य इत्यपिशब्दार्थः। विशेषेण सामान्यसमर्थन- रूपोऽर्थान्तरन्यासः ॥१०॥ [अन्वयः] बृहत्सहायः क्षोदीयानपि कार्यान्तं गच्छति । नगापगाः महानद्या सम्भूय अम्भोधिम् अभ्येति । [विग्रहः ] बृहत्सहायो यस्य स बृहत्सहायः। कार्यस्य अन्तः कार्या- न्तः, तम् कार्यान्तम् । अतिशयेन क्षुद्रः क्षोदीयान् । अपां समूहः आपम् , आपेन गच्छति इति आपगा, नगस्य आपगा-नगापगा। [अर्थः] बृहत्सहायः = महासहायनान् । सहायबलोपेतः।
सर्गः ] - नगापगा- . अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । २५३ क्षोदीयानपि = क्षुद्रतरोऽपि । कार्यान्तं = कार्यस्य कर्मणः। पारम्- अन्तम्-सिद्धिम् । गच्छति = प्रयाति । लभते । (तथाहि-) गिरिनदी । महानद्या = सागरगामिन्या बृहत्या सवन्त्या गङ्गादिकया । सम्भूय = मिलित्वा । अम्भोधि सागरम् । अभ्येति = गच्छति । [ भावार्थः ] निर्बलोऽपि सहायबलोपेतः कार्यसिद्धिं गच्छति । गङ्गादिभिर्नदीभिर्मिलित्वा मुद्रा गिरिनद्यपि सागरमभ्येति । क्षुद्रोऽप्येवं कार्य साधयति तर्हि बलिनों युद्धदुर्मदस्य चैद्यत्य बलवत्वं तु किमु वक्तव्यम् [ कोशः ] 'शैलवृक्षौ नगावगौ' इत्यमरः । [वाच्यप० ] बृहस्सहायन क्षोदीयसापि कार्यान्तः गम्यते। नगापगया महानद्या सम्भूय अम्भोधिः अभीयते । [ भाषाटीका ] निर्बल व क्षुद्र लोग भी बड़ों की सहायता से अपना कार्य साध लेते हैं । देखो पहाड़ी छोटी नदी भी बड़ी २ नदियों से मिलकर समुद्र तक पहुँच जाती है। वह चैध तो स्वयं बली है, फिर मित्रों की सहायता पाने पर तो उसका कहना ही क्या है ? ॥ १० ॥ किञ्च न केवलं शत्रोरसाध्यत्वं, मित्रविरोधश्चाधिकोऽनर्थकर इत्याह- तस्य मित्राएयमित्रास्ते ये च ये चोभये नृपाः। अभियुक्तं त्वयैनं ते गन्तोरस्त्वामतः परे ॥ १०१ ॥ [ सर्वकषा ] तस्येत्यादिद्वयेन ॥ ये च तस्य चैद्यस्य मित्राणि नृपाः, ये च ते तवामित्रा नृपास्त उभये त्वयाभियुक्तमभियातमेनं चैद्यं गन्तारो गमिष्यन्ति । गमेः कर्तरि लुट् । अतः परे-उक्तोभयव्यति- तव मित्राणि तस्याऽमित्राश्चेत्यर्थः त्वां गन्तारः॥ १०१ ॥ [अन्वयः] ये च तस्य मित्राणि नृपाः ये च ते अमित्राः ( नृपाः), ते उभये (नृपाः) त्वया अभियुक्तम एनम् गन्तारः। परे त्वाम् (गन्तारः।) रिक्ताः, अतः - २५४ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [विग्रहः ] न मित्राणि अमित्राः । [अर्थः ] ये च = ये वै । तस्य = चैद्यस्य । मित्राणि नृपाः सुहृदो राजानः । ये च = ये वै । ते = तव । अमित्राः नृपाः =शत्र- यो राजानः। उभये = द्वये । ते = राजानः । त्वया = भवता । अभियुक्तम् = अभियातम् । एनं = चैद्यम् । गन्तारः = अनुग- मिष्यन्ति । अतः = एभ्यः । परे = भिन्नाः । उक्तोभयविधनृप- भिन्नाः । तव मित्राणि तस्यामित्राश्च । त्वाम् = भव-तम् । (गन्तारः = अनुगमिष्यन्ति ।) [भावार्थः ] ततश्च त्वच्छत्रवश्चैद्यसुहृदश्च चैद्यमनुगमि- ष्यन्ति, चैद्यशत्रवस्त्वत्सुहृदश्च त्वत्पक्षमेष्यन्ति । [ कोशः ] द्विड्विपक्षाऽहिताऽमित्रदस्युशात्रवशत्रवः' इत्यमरः । 'अथ मित्रं सखा सुहृत्' इत्यमरः । [वाच्यप० ] ये च......तैः उभयैः नृपैः त्वया अभियुक्तः अयम् गन्ता । अतः परैः त्वम् गन्तासे । [भाषाटीका ] जो शिशुपाल के मित्र हैं और जो तुमारे शत्रु हैं वे सब शिशुपाल की सहायता करेंगे। और जो शिशुपाल के शत्रु या तुम्हारे मित्र हैं वे तुमारी सहायता करेंगे ॥ १०१ ॥ ततः किमत आह- मखविघ्नाय सकलमित्थमुत्थाप्य राजकम् । हन्त ! जातमजातारेः प्रथमेन त्वयारिणा ॥ १७२ ।। [ सर्वकषा] मखेति । इत्थमनेन प्रकारेण । 'इदमस्थमुः' इति थमु- 'प्रत्ययः । मखविघ्नाय-मखविधाताय । सकलं राजक-राजसमूहम् । 'गोत्रोक्ष-' इत्यादिना वुन् । उत्थाप्य-क्षोभयित्वा । हन्त इति खेदे । अजातारे:-अजातशत्रोयुधिष्ठिरस्य । त्वया प्रथमेनारिणा जात- मजनि । 'नपुंसके भावे क्तः । ॥ १०२॥ [अन्वयः] इत्थं मखविघ्नाय सकलं राजकम् उत्थाप्य - सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कषा-विराजितम् । २५५ हन्त ! अजातारेः प्रथमेन त्वया अरिणा जातम् । [विग्रहः ] मखस्य विघ्नः, मखविघ्नः, तस्मै मखविध्नाय । राज्ञां समूहो राजकम्, तत् । न जातः अरिर्यस्य स अजातारिः, तस्य अजातारे। [अर्थः] इत्थम् अनेन प्रकारेण मखविघ्नाय यज्ञ- विघ्नाय ! क्रतुप्रत्यूहाय । यज्ञविधाताय । सकल-सम्पूर्णम् । राजकं = राजसमूहम् । उत्थाप्य = क्षोभयित्वा । हन्त-इति खेदे । अजातारेः = अजातशत्रोयुधिष्ठिरस्य । त्वया = भवतैव । प्रथमेन = एकेन । मुख्येन । अरिणा = शत्रुणा । जातम् = अजनि। [ भावार्थः] इत्थं यज्ञसमये युद्धमुपस्थापयन् यज्ञं विनिघ्नन् सकलं राजमण्डलं क्षोभयंश्च त्वमेव सम्प्रति तस्य युधिष्ठिरस्य शत्रुर्जातः [ कोशः ] 'हन्त हर्षेऽनुकम्पायां वाक्यारम्भविषादयोः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] मखविघ्नाया 'सकलं राजकमुत्थाप्य प्रथमः त्वम् अरिः अजनि। [ भाषाटीका ] इस प्रकार यज्ञ के समय सब राजाओं में क्षोभ ( हल- चल ) पैदा कर यज्ञ को बिगाड़ने वाले आप ही एक युधिष्ठिर के सब से बड़े शत्रु कहलावेंगे ॥ १०२ ॥ शत्रुः, को दोषस्तत्राह- सम्भाव्य त्वामतिभरक्षमस्कस बान्धवः । सहायमध्वरधुरां धर्मराजो विवक्षते ॥ १०३ ॥ [ सर्वकषा ] सभाव्येति। बन्धुरेव बान्धवः । स-धर्मराजः। अति- भरस्य क्षमः स्कन्धो यस्य स तम् । समानस्कन्धमित्यर्थः । त्वां सहायं सम्भाव्य-अभिसन्धाय । अध्वरस्य धुरमध्वरधुराम् । 'ऋक्पूर--' इत्या- दिना समासान्तोऽप्रत्ययः । समासान्तानां प्रकृतिलिङ्गत्वात्तत्पुरुषे परवल्लि- ङ्गत्वे टाप् । विवक्षते-वोढुमिच्छति । वहतेः स्वरितेतः सन्नन्ताल्लट् । तथाहि- अस्तु सोऽपि - २५६ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- विरोधे विश्वासघातो, बन्धुद्रोहश्च स्यातामिति भावः। विशेषणसाम्या- प्रस्तुतयागधर्मप्रतीतेः समासोक्तिः ॥ १०३ ।। [अन्वयः] बान्धवः स धर्मराजः अतिभरक्षमस्कन्धं त्वाम् सहायम् सम्भाव्य अध्वरधुराम विवक्षते । [विग्रहः ] अतिशयितो भरः, अतिभरः, तस्य क्षमः स्कन्धो यस्य स अतिभरक्षमस्कन्धः, तम् । अध्वरस्य धूः-अध्वरधुरा, ताम् अध्वर- धुराम् । वोढुमिच्छति विवक्षते । [अर्थः ] बान्धवः = सुहृत् । बन्धुः सः = लोकविदितः । धर्मराजः = युधिष्ठिरः । अतिभरक्षमस्कन्धं = महाभारवहेन- क्षमस्कन्धप्रदेशम् । स्वसमानस्कन्धम् । त्वां = भवन्तम् । सहायं = सहकारिणम् । रक्षकम् । साहाय्यक्षमम् । सम्भाव्य = अभिसन्धाय । विचार्य । अध्वरधुरां = यज्ञधुराम् । यज्ञभारम् । विवक्षते वोटुमिच्छति । [ भावार्थः ] धर्मराजत्त्वां सहायकमभिसन्धायैव यज्ञभारं वोढुमिच्छति । भवांश्च तस्य यज्ञे विघ्नमाचरितु युद्धाय सन्न- ह्यति, तन्न युक्तम् । कोषः ] 'यज्ञः सवोऽध्वरो योगः सप्ततन्तुर्मखः क्रतुः' इत्यमरः । [वाच्यप० ] बान्धवेन धर्मराजेन 'अध्वरधुरा विवक्ष्यते । [ भाषाटीका ] वह युष्ठिर आपको सब तरह समर्थ सहायक समझ कर ही इस यज्ञ के भार को उठाना चाहता है। और आप उसके यज्ञ में विघ्न करना चाहते हैं-यह ठीक नहीं है ॥ १०३ ॥ ननु प्रतिश्रुत्याऽकरणे दोषः प्रागेव, परिहारे तु को दोष इत्यत आह- महात्मानोऽनुगृह्णन्ति भजमानान्रिपूनपि । सपत्नीः प्रापयन्त्यब्धि सिन्धवो नगनिम्नगा ॥१०४॥ [ सर्वकषा] महात्मान इति । महात्मानो निग्रहानुग्रहसमर्थाः, भजमानाशरणागतान् । रिपूनप्यनुगृह्णन्ति । किमुत बन्धूनिति भावः। ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । अर्थान्तरं न्यस्यति-सिन्धवो महानद्यः। समान एकः पतिर्थासां ताः सपत्नीः। 'नित्यं सपत्न्यादिपु' इति ङीप नकारश्च । नगनिम्नगाः। गिरि- निर्झरिणीरब्धिप्रापयन्ति । स्वसौभाग्यं ताभ्यः प्रयच्छन्तीति भावः । अतः परिहारोऽप्यनर्थ इति भावः ॥ १०४ ॥ [अन्वयः] महात्मानः भजमानान रिपून् अपि अनु- गृह्णन्ति । सिन्धवः-सपत्नीः नगनिम्नगाः अब्धि प्रापयन्ति । [विग्रहः ] महान् आत्मा येषाम् ते महात्मानः । निम्नं गच्छन्ति इति निम्नगाः । नगानां निम्नगाः नगनिम्नगाः, ता:-नगनिम्नगाः। समानः पतिर्यासां ताः सपत्न्यः, ताः सपतीः । [अर्थः] महात्मानः = सज्जनाः । निग्रहानुग्रहसमर्थाः । प्रभवः । भजमानान् = शरणागतान् । रिएनपि = शत्रूनपि । अनुगृह्णन्ति = उपकुर्वन्ति । तेषु दयां कुर्वन्ति । किमुत बन्धनिति भावः । तथाहि-सिन्धवः = महानद्यः । सपनोः = एकपत्नीः । नगनिम्नगाः = गिरिनदीः। अब्धि = सागरम् । नदीपतिम् । स्वभारमपि । प्रापयन्ति = गमयन्ति । स्वसौभाग्यमपि स्वसपत्नीभ्यः शरणागताभ्यः प्रयच्छन्तीत्यर्थः । [ भावार्थः ] महात्मानः शत्रूनपि शरणागताननुगृह्णन्ति किंपुनर्बन्धून् । तथा हि सिन्धवः-तुद्राः पर्वतनदीरपि शरणागताः सागरेण स्वभ; सह योजयन्ति, स्वसौभाग्यंच ताभ्यो यच्छन्ति । [ कोशः] 'सिन्धुर्वमथुदेशाधिनदीशे सरिति स्त्रियाम्' इति विश्वः । [वाच्यप० ] महात्ममिः भजनाना रिपवोपि अनुगृह्यन्ते । सिन्धुभिः सपल्यः नगनिम्नगाः अब्धिम्प्राप्यन्ते । [ भाषाटीका ] बड़े लोग शरण में आए हुए शत्रु पर भी दया करते हैं । देखो गङ्गा आदि बड़ी नदियाँ अपनी सपत्नी पहाड़ी नदियों को भी समुद्र तक पहुँचा देती हैं। समुद्र-पति, नदियाँ-समुद्रपत्नी। अतः सभी नदियां परस्पर में सपत्नी-सौत-हुई।)॥ १०४ ॥ .. ..
शिशुपालवधम्। [२ द्वितीयः- - शत्रु- तर्हि सम्प्रत्युपेक्षायामपि पश्चात्प्रार्थनयापार्थमार्जवयेयमित्यत आह- चिरादपि बलात्कारो बलिनः सिद्धयेऽरिपु । छन्दानुवृत्तिदुःसाध्याः सुहृदो विमनीकृताः ॥ १०५ ॥ [ सर्वकषा] चिरादिति । बलिनः स्वयं बलवतोऽप्यरिषु विषये । बलात्कारो दण्डश्चिराच्चिरकालेनापि । सद्यो मा भूदिति भावः। सिद्धये वशंवदत्वसिद्धये । 'भवतीति शेषः । अविमनसो विमनसः सम्पद्यमानाः कृता विमनीकृताः। वैमनस्यं प्रापिता इत्यर्थः। 'अमनश्चक्षुश्चेतोरहोरजसां लोपश्च' इति विप्रत्यय (स) लोपौ । 'अस्य च्ची' इतीकारः। शोभनं हृदयं येषां ते सुहृदो मित्राणि तु । 'सुहृदुहृदो मित्रामित्रयोः' इति निपातः । छन्दस्य-अभिप्रायस्यानुवृत्या-चित्तानुरोधेनापि । दुःसाध्याः । आज- चयितुमशक्या इत्यर्थः । 'अभिप्रायश्छन्द आशयः' इत्यमरः। शनैः दण्डेनापि वशो भवति, मित्रं वैमनस्ये न साम्नाऽपीति भावः ॥ १०५ ॥ [अन्वयः] बलिनः अरिषु बलात्कारः चिरादपि सिद्धये (भवति) ( किन्तु ) विमनीकृताः सुहृदः छन्दानुवृत्तिदुःसाध्याः। [विग्रहः ] न विमनसः अविमनसः, अविमनसः विमनसः सम्पद्य- मानाः कृताः विमनीकृताः । छन्दस्य अनुवृत्तिः छन्दानुवृत्तिः, छन्दानुवृत्त्या- दुःसाध्याः-छन्दानुवृत्तिदुःसाध्याः । [अर्थः ] बलिनः = स्वयं बलवतोऽपि । बलिष्ठस्यापि । अरिषु - शत्रुषु विषये । बलात्कारः = बलप्रयोगः । दण्डः । दण्ड- प्रयोगः । चिरादपि = चिरेणापि । विलम्बेनापि कृतः । सिद्धये= वशवदत्वसिद्धये । अनुगतत्वसिद्धये । विजयाय च । 'भवती'- ति शेषः। विमनीकृताः = वैमनस्यं प्रापिताः। विरोधिताः। विरोधं प्रापिताः । सुहृदः = मित्राणि तु । छन्दानुवृत्तिदुःसाध्याः = अभि- प्रायानुवृत्त्याऽपि दुःसाध्याः । मुहुःप्रार्थनादिनाऽपि प्रसाद- यितुमशक्याः । 'भवन्ती' ति शेषः । [भावार्थः] शत्रुस्तु पश्चादपि युद्धेन जेतुं शक्यः, परं - सर्गः] - अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विरजितम् । २५६ सुहृदो विमनीकृताः पुनः केनाप्युपायेन प्रसादयितु न शक्याः। [ कोशः ] 'अभिप्रायश्छन्द आशयः' इत्यमरः । [ वाच्यप० ] बलात्कारेण सिद्धये भूयते । सुहृद्भिः...दुःसाध्यैर्भूयते । [ भाषाटीका ] शत्रु पर तो जब चाहे तभी (विलम्ब से भी ) चढ़ाई करने में भी हमारी विजय ही है, पर यदि मित्र नाराज हो जायँगे (स्ष्ट जायँगे) तो हजार उपाय से ( खुशामद से) भी प्रसन्न नहीं हो सकते ॥ १०५॥ ननु सुहृत्कार्यात्सुरकार्य बलीय इत्यत्राह- मन्यसेऽविधः श्रेयान्प्रीतये नाकिनामिति । पुरोडाशभुजामिष्टमिष्टं कर्तुमलन्तराम् ॥ १०६ ॥ [ सर्वङ्कषा ] मन्यस इति । नाकिनां देवानां प्रीतयेऽरिवधः श्रेयान्प्रशस्ततरः । 'प्रशस्यस्य श्र: ' इति श्रादेशः । इति मन्यसे चेत्तर्हि पुरोडाशभुजां-हविर्भोजिनाम् । अतएव नाकिनामिष्टमभीप्सितं कर्तुम् । इषेः कर्मणि क्तः । इष्टं-इष्टिः। याग इति यावत् । यजेर्भावे कः । 'वचिस्वपि' इत्यादिना सम्प्रसारणम् । अलन्तराम्-अतिपर्याप्तम् । अव्ययादामुप्रत्ययः । शत्रुवधादतिप्रियकरो याग एव नाकिनाम् । भुक्त्वापि शत्रुवधस्य सुकरत्वादिति भावः ॥ ११६ ॥ [अन्वयः] नाकिनाम्प्रीतये अरिवधः श्रयान् इति मन्यसे चेत पुरोडाशभुजाम् इष्टं कर्तुम् अलन्तराम् । [विग्रहः ] पुरोडाशान् भुञ्जते इति पुरोडाशभुजस्तेषाम् पुरोडाश- भुजाम् । अरीणां वधः अरिवधः । [अर्थः ] नाकिनां = देवानाम्। प्रीतये = हर्षाय । प्रसत्तये। अरिवधः = शत्रुवधः । श्रेयान = प्रशस्ततरः। इति = इत्येवम्। मन्यसे चेत् = अवगच्छसि चेत् । (तर्हि-) पुरोडाशभुजां हविर्भुजाम् । (अतएव-) इष्टं = नाकिनामभिमतम् । देवाना- मिष्टम् । कत्तु = विधातुम्। इष्टं = यज्ञम् । यजनम् । अल- तन्राम् = अतिपर्याप्तम् । नितरामुचितम् । शत्रुवधापेक्षयाऽपि - शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- देवानां यज्ञेनैवातिप्रीतिभुक्त्वापि शत्रुवधस्य कतु शक्यत्वा- दिति भावः। [ भावार्थः ] देवानां प्रीतये शत्रुवधं चिकीर्षसीति चेत्ततो- ऽप्यधिका देवानां प्रीतियोगेनैवभवतीति युधिष्ठिरस्य यज्ञे एव साहाय्यं कर्तुमर्हसि । [ कोशः] 'इष्टं यागादिकर्म यत्' इत्यमरः । 'अलं भूषणपर्याप्तिशक्ति- वारणवाचकम्' इत्यमरः । 'पुरोडाशो हविर्भदे चमस्यां पिष्टकस्य च । रसे सोमलतायाश्च हुतशेषे च कीर्तितः' इति विश्वः । [वाच्यप० ] नाकिनाम् प्रीतये अरिवधः श्रेयान् इति त्वया मन्यते चेत् इष्टेन-इष्टेन अलन्तरां भूयते । [भाषाटीका ] यदि शत्रुओं के मारने से (पृथ्वी के भार के हटने से ) देवता प्रसन्न होंगे, यह आप समझते हैं तो देवताओं को शत्रुवधापेक्षया यज्ञ और भी अधिक प्रिय है, अतः यज्ञ में ही सहायता कीजिए ॥ १०६ ॥ तथाप्यमृताशिनां तेषां देवानां किमेभिः पिष्टभक्षणप्रलोभनैरत आह- अमतं नाम यत्सन्तो मन्त्रजिह्वेषु जुह्वति । शोभैव मन्दरक्षुब्धक्षुभिताम्भोधिवर्णना ॥१८७ ॥ [ सर्वकषा] अमृतमिति । अमृतं नाम सन्तो विद्वांसः। मन्त्रा एव जिह्वा येषां तेषु मन्त्रजिह्वष्वग्निषु । 'मन्त्रजिह्वः सप्तजिह्वः सुजिह्वो हव्य- वाहनः' इति वैजयन्ती। यत्पुरोडाशादिकं जुह्वति । तदेवेति शेषः । यत्तदोनित्यसंबन्धात् । मन्दर एव क्षुब्धो-मन्थनदण्डः । 'क्षुब्धध्वान्त-' इत्यादिनास्मिन्नर्थे निपातनात् सिद्धम् । तेन क्षुभितस्य-मथितस्याम्भो- धेर्वर्णना शोभैवालङ्कार एव । अब्धिमन्थनेनामृतमुत्पादितमिति यतः कीर्तिमानमतो हुतमेवामृतमिति भावः । वाक्यार्थयोर्हेतुहेतुमद्भावाद्वाक्यार्थ- काव्यलिङ्गमलङ्कार ॥ १०७ ॥ अन्वयः ] अमृतं नास सन्तः मन्त्रजिह्वषु यत् जुह्वति (तत्) । मन्दरक्षुब्धक्षुभिताम्भोधिवर्णना शोभैव । o ..
सर्गः] . अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [विग्रहः ] मन्त्रा एव जिह्वा येषां ते मन्त्रजिह्वाः, तेषु मन्त्रजिह्वेषु । मन्दर एव क्षुब्धः मन्दरक्षुब्धः, तेन क्षुभितश्चासौ अम्भोधिश्च मन्दरक्षुब्ध- अभिताम्भोधिः, तस्य वर्णना-मन्दरक्षुब्धक्षुभिताम्भोधिवर्णना [अर्थः] अमृतं नाम = पीयूषं हि । सन्तः = विद्वांसः । मन्त्रजिह्वेषु अग्निषु । यत् = पुरोडाशादिकम् । जुह्वति प्रक्षिपन्ति । तदेवेति शेषः । मन्दरक्षुब्धक्षुभिताम्भोधिवर्णना मन्दराद्रिरूपमन्थनदण्डमथितसमुद्रवर्णनम् । मन्दरमथिता- समुदादमृतोत्पत्तिरिति पौराणिककथनन्तु।शोभैव-अलङ्कार एव। कीर्तिमात्रमेव । अर्थवाद एव । [ भावार्थः ] मन्त्रैरग्निषु वेदबोधितविधिना प्रक्षिप्त पुरोडा. शादिक हविरेव अमृतं, तदेव च देवानां भोजनम् । पुराणादौ मन्दरमथितसमुद्रादमृतोत्पत्तिप्रतिपादनन्तु प्ररोचनामात्रम् । [ कोशः] 'पीयूषममृतं सुधा' इत्यमरः । 'मन्त्रजिह्वः सप्तजिह्वः सुजिह्वो हव्यवाहनः' इति वैजयन्ती । [वाच्यप०] सद्भिः मन्त्रजिह्वेषु यत् हूयते तदमृतं नाम । शोभया भूयते । [ भाषाटीका ] विद्वान् लोग विधिपूर्वक जो हवि ( पुरोडाश आदि) अग्नि में हवन करते हैं वही अमृत है। 'मन्दराचलरूपी दण्ड से मथित समुद्र से अमृत निकला है। यह पुराणों में जो लिखा है वह तो केवल प्रशंसा (कयां ) मात्र है ॥ १०७ ॥ यात्रायाः प्रतिबन्धः कश्चिद्दुस्तरस्तवास्तीत्याह- 'सहिष्ये शतमागांसि सूनोस्त' इति यत्त्वया । प्रतीक्ष्यं तत्प्रतीक्ष्यायै पितृष्वस्र प्रतिश्रुतम् ॥१०८॥ [ सर्वकषा] सहिष्य इति । प्रतीक्ष्यायै-पूज्यायै । प्रतीक्ष्यः' इत्यमरः । पितृष्वस्र-पितृभगिन्यै । 'विभाषा स्वसृपत्योः इति विकल्पादलुगभावः। 'मातृपितृभ्यां स्वसा' इति षत्वम् । ते तव सूनोः शतमागांसि-अपराधान् । 'आगोऽपराधो सन्तुश्चः इत्यमरः।। --
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शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः-
सहिष्ये-सोढाहे । इति यत्त्वया प्रतिश्रुतं-प्रतिज्ञातं । तत्प्रतीक्ष्यं-
प्रतिपालनीयम् । अन्यथा महादोषस्मरणादिति भावः ॥ १०८ ॥
[ अन्वयः ] प्रतीक्ष्याय पितृष्वस्र 'ते सूनोः शतं आगांसि
सहिष्ये' इति अत्त्वया प्रतिश्रुतम् तत् प्रतीक्ष्यम् ।
[विग्रहः ] प्रतीक्ष्यते इति प्रतीक्ष्या, तस्यै ।
[ अर्थः ] प्रतीक्ष्याय = पूज्यायै । मान्याय। पितृष्वस्र-
पितृभगिन्यै । शिशुपालजनन्यै। सात्वत्यै 'ते-तव । सूनोः सुतस्य ।
चैद्यस्य । शतमागांसि = शतसङ्खथकानपराधान् । सहिष्ये-
सोढाहे। क्षमिष्ये'। इति = इत्थं । यत् = यद्धि वरदानम् ।
प्रतिश्रुतं = त्वया दत्तम् । प्रतिज्ञातम् । तत् = वरदानम् ।
प्रतीक्ष्यं प्रतिपालनीयम् । रक्षणीयम् ।
भावार्थः] भवता पूज्यतमायै शिशुपालजनन्यै सात्वत्यै 'तव
पुत्रस्य शतमपराधान् सहिष्ये' इति यत्प्रतिज्ञातन्तदपि भवता
परिपालनीयमेव सर्वथा । तन्नायमभियानस्यावसरः। अपरा-
धानां शतस्याऽद्याप्यपूरणात् ।
[ कोशः ] 'आगोऽपराधो मन्तुश्च' इत्यमरः ।
पूज्यः प्रतीक्ष्यः,
इत्यमरः।
[ वाच्यप० ] 'ते सूनोः शतमागांसि सहिष्ये' इति त्वम् प्रतिश्रुतवान्
तदपि प्रतीक्षेथाः।
[ भाषाटीका ] अपनी पूज्य पितृष्वसा ( 'फूवा' 'भूवा' ) को आपने
जो यह वचन दिया था कि-'तेरे पुत्र शिशुपाल के सौ १०० अपराध मैं
सहन करूंगा-माफ कर दूंगा। ज्यादा नहीं। वह वचन ( वरदान )
भी तो आपको पालना चाहिए ॥ १०८ ॥
सत्यमस्ति प्रतिश्रुतं, किंत्वस्योन्मत्तत्वादौद्धत्यात्तदपि जिहासितमत आह-
तीक्ष्णा नारुन्तुदा बुद्धिः कर्म शान्तं प्रतापवत् ।
नोपतापि मन सोष्म वागेका वाग्मिनः सतः ॥१०॥
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । G [ सर्वकषा ] तीक्ष्णेति । सतः-सत्पुरुषस्य । बुद्धिस्तीक्ष्णा-नि- शिता । 'स्यादिति विद्धी त्यध्याहारः । एवमुत्तरत्रापि । तथाप्यरुस्तुदती- त्यरुन्तुदा शस्त्रवन्मर्मच्छेदिनी न भवेत् । अहिंसयैव परं पीडयेदित्यर्थः । कर्म-व्यापारः । प्रतापवतेजस्वि भयदं स्यात्, तथापि शान्तं स्यात् । न तु सिंहादिवद्धिंखं भवेदित्यर्थः । मनश्चित्तं । सोम-अभिमानोष्णं स्यात्त- थापि उपतापयतीत्युपतापि । अग्न्यादिवत्परसन्तापि न स्यात् । वाग्मिनो वक्तुर्वागेका-एकरूपा स्यात् । वाग्मी सत्यमेव बदेदित्यर्थः । अतः सत्य- सन्धस्य प्रतिश्रुतार्थहानिरनहेति भावः । अत्र प्रकृताया वाचोऽप्रकृतानां बुद्धिकर्ममनसां च तुल्यधर्मादौपम्यावगमाद्दीपकालङ्कारः । 'प्रकृताप्रकृतानां च साम्ये तु तुल्यधर्मतः । औपम्यं गम्यते यत्र दीपकं तन्निगद्यते ॥' इति लक्षणात् । बुद्धियादीनां शस्त्रादिव्यतिरेको व्यजते ॥ १०९॥ [अन्वयः ] सतः बुद्धिस्तीक्ष्णा (तथापि ) अरुन्तुदा न ( स्यात् )। कर्म प्रतापवत् ( भवेत्तथापि-~) शान्तं (स्यात् )। मनः सोम (तथापि) उपतापि न । वाग्मिनः वाग् एका। [विग्रहः ] अरुः तुदतीति अरुन्तुदा । उष्मणा सहितं सोप्म । उपतापयतीति उपतापि । [अर्थः ] सतः = सत्पुरुषत्य । बुद्धिः = मतिः। तीक्ष्णा कुशाग्रवन्निशिता । ' स्यादिति विद्धि'। (तथापि-) अरुन्तुदा शस्त्रवन्मर्मच्छेदिनी। न = नैव भवेत् । कर्म = व्यापारः । प्रतापवत् = तेजस्वि । प्रभाववत् । (परन्तु-) शान्तम = अपरो- पतापकम् । भवेत् । नतु सिंहादिवत्रं स्यादित्यर्थः। मनः = चित्तम् । सोम = अभिमानोष्णं । साभिमानं स्यात् । (तथापि-) उपतापि-अग्न्यादिवत्परसन्तापि । परदाहकम् । परक्लेशदम् । न = नैव भवेत् । वाग्मिनः = वक्तुः । वाक् = वाणी। एका = एकैव। एकरूपैव । सत्यैव । स्यादिति शेषः । [भावार्थः ] सतां बुद्धिस्तीक्षणापि न मर्मच्छेदिनी भवेत्, कर्म प्रतापवंदपि शान्तम् भवेत, मनः सोमानि नोपतापि । - २६४ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- - वाक्प्रस्ताऽपि एकरूपैव भवेत् । तद्भवता स्ववचनं पालनीयमेव । [ कोशः ] 'वाचोयुक्तिपटुर्वाग्मी' इत्यमरः । 'स्वान्तं हृन्मानसं मनः इत्यमरः । [वांच्यप०] बुद्धया तीक्ष्णया भूयते । कर्मणा शान्तेन भूयते । मनसा नोपतापिना भूयते । एकया वाचा भूयते । [भाषाटीका ] सजनों की बुद्धि तीखी पर दूसरे के मर्म को छेद (हानि) करनेवाली नहीं होती है, उनका काम प्रतापी पर शान्त होता है, मन उन्नत अभिमानी पर दूसरे को सन्तप्त करने वाला नहीं होता है। और (सज्जनों की वाणी-एक ही होती है। वे कहे हुए से हटते नहीं ॥ १०९ ॥ अशक्यश्च ( अ ) काले चैववध इत्याह- स्वयङ्कृतप्रसादस्य तस्याऽहो भानुमानिव । समयावधिमप्राप्य नान्तायालं भवानपि ॥११०॥ [ सर्वकषा ] स्वयमिति । किञ्च अहो भानुमानिव स्वयं कृतः प्रसादोऽनुग्रहः, प्रकाशश्च यस्य तस्य चैद्यस्यान्ताय समयावधि नियत- कालावसानमप्राप्य भवानपि नालं-शक्तो न । तथा च वृथापकीर्तिरेव अन्यन्न किञ्चित्फलं स्यादिति भावः ॥ ११ ॥ [अन्वयः] (किञ्च-) अह्नः किञ्च-) अह्नः भानुमान् इव स्वयङ्कत- प्रसादस्य तस्य अन्ताय समयावधिम् अप्राप्य भवानपि न अलम् । [विग्रहः ] स्वयकृतः प्रसादो यस्य स स्वयकृतप्रसादः, तस्य- स्वयकृतप्रसादस्य । समयस्य अवधिः समयावधिः, तम्-समयावधिम् । [ अर्थः] ( किञ्च-अह्नः = दिवसस्य । भानुमानिव = सूर्य इव । स्वयङ्कतप्रकाशस्य । तस्य = चैद्यस्य । अन्ताय = विनाशाय। अवसानाय च । समयावधि = नियतकालावसानम् । निश्चितसम- यसमाप्तिम् । अप्राप्य = अनासाद्य । अलब्ध्वा । भवानपि त्वमपि । नालं = न समर्थः । न शक्तः । - ।
सर्गः ] - .. अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । २६५ [ भावार्थः ] यथा सूर्योऽसमये स्वयङ्कतप्रकाशस्यापि दिव. सस्याऽन्तं कर्तुं न शक्तस्तथा भवानपि समयं कृत्वा तत्समाप्ति विना तं चैद्य हन्तु न समर्थः । तथाचे दानी याने वृथाऽपकीर्तिः स्यात् , फलश्च किमपि न स्यात् । कोशः ] 'समयाः शपथाचारकालसिद्धान्तसंविदः' इत्यमरः । वाच्यप०] भवताऽपि नालं भूयते । [ भाषाटीका ] जैसे दिन को स्वयं प्रकाशित करने वाला सूर्य भी उस दिन का अवसान विना अवधि आये नहीं कर सकता है, वैसे ही कथित अवधि की समाप्ति हुए विना उस चैद्य को आप स्वयं भी मार नहीं सकते। अतः इस समय चढ़ाई करना व्यर्थ है ॥ ११० ॥ तर्हि किमयमुर्पक्ष्य एव, नेत्याह- कृत्वा कृत्यविदस्तीर्थेष्वन्तः प्रणिधयः पदम् । विदाकुर्वन्तु महतस्तलं विद्विषदम्भसः ॥ १११ ॥ [ सर्वकषा ] कृत्वेति । किन्तु-कृत्यविदः-कार्यज्ञाः, विधिज्ञाश्च । प्रणिधीयन्त इति प्रणिधयो-गूढचारिणः। 'प्रणिधिगूढपुरुषः' इति हलायुधः। तरन्त्येभिरिति तीर्थानि-मन्त्राद्यष्टादश स्थानानि, जलावताराश्च । 'योनी जलावतारेच मन्त्राद्यष्टादशस्वपि। पुण्यक्षेत्र तथा पात्र तीर्थ स्यात् इति हला- युधः। तेष्वन्तः पदं-स्थानं, पादप्रक्षेपं च, कृत्वा महतो-दुरवगाहस्य, पूज्यस्य च। विद्विषन् शत्रुरेवाम्भस्तस्य तलं-स्वरूपम् । प्रमाणमिति यावत् । 'अधःस्वरूपयोरस्त्री तलम्' इत्यमरः । विदाकुर्वन्तु-विदन्तु । 'विद ज्ञाने' लोट् । 'विदाकुर्वन्त्वित्यन्यतरस्याम्' इति विकल्पादाम्प्रत्यय- निपातः । अम्भस इव शत्रोः कृततीर्थस्य सुप्रवेशत्वात्प्रागन्तः प्रविश्य परीक्ष्यइत्यर्थः । श्लिष्टपरम्परितरूपकम् ॥ १११ ॥ [अन्वयः ] कृत्यविदः प्रणिधयः तीर्थेषु अन्तः पदं कृत्वा महतः विद्विपदम्भलः तलं विदाङ्कर्वन्तु । [विग्रहः ] कृत्यं विदन्तीति कृत्याविदः । प्रणिधीयन्ते इति प्रणिधयः । विद्विषन् एव अम्भः विद्विषदम्भः, तस्य विहिपदम्भसः । ।
२६६ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [अर्थः] (किन्तु सम्प्रति-) कृत्यविदः = कार्यविदः । कार्यकुशलाः। विधिज्ञाश्च । प्रणिधयः गूढचारिणः । तीर्थेषु= राज्ञां मन्त्राधष्टादशस्थानेषु । ( जलपक्षे-) जलावतारेषु च । अन्तःपदं स्थानम् । प्रवेशम् । जलपक्षे-पादप्रक्षेपञ्च । कृत्वा विधाय । महतः दुरवगाहस्य । पवित्रस्य च । पूज्यस्य च । विद्विषदम्भसः शत्रुरूपस्य । जलस्य । शत्रु पस्य जलाशयस्येति यावत् । तलं स्वरूपम् । प्रमाणमिति यावत् । विदाङ्क र्वन्तु= विदन्तु । जानन्तु। [ भावार्थः ] अम्भस इव कृततीर्थस्य शत्रुपक्षस्य सुप्रवेश- तया पूर्वमन्तः प्रविश्य गूढपुरुषाः शत्रोस्तत्त्वं विदन्तु नाम । [ कोषः ] 'प्रणिधिYढपुरुषः' इत्यमरः। 'योनौ जलावतारे च मन्त्रा- द्यष्टादशस्वपि । पुण्यक्षेत्रे तथा पात्र तीर्थ स्यात्' इति हलायुधः । 'अधः- स्वरूपयोरस्त्री तलम्' इत्यमरः । [ वाच्यप०] कृत्यविद्भिः प्रणिधिभिः......तलं विदाक्रियताम् । [ भाषाटीका ] जैसे चतुर लोग ( तीर्थ ) सीढ़ी आदि के द्वारा गंभीर- जलाशय में प्रवेश करके जलका थाह लेते हैं वैसे ही शत्रु के तीर्थों-(मन्त्र आदि १८ स्थानों में) प्रवेश करके अभी हमारे गुप्तचर शत्र का पूरा-पूरा हाल-चाल जाने फिर आगे देखा जाएगा ॥१११॥ आवश्यकं चैतदित्याह- अनुत्सूत्रपदन्यासा सद्वृत्तिः सन्निवन्धना । शब्दविद्य व नो भाति राजनीतिरपस्पशा ॥ ११२ ॥ [ सर्वकषा] अनुदिति । उत्सूत्रः-उच्छास्त्रः। नीतिशास्त्रविरुद्धः पद. न्यासः-एकपदप्रक्षेपोऽपि । स्वल्पव्यवहारोऽपीति यावत्। स नास्ति यस्यांसा अनुत्सूत्रपदन्यासा। नीतिपूर्वकसर्वव्यवहारेत्यर्थः । अन्यत्रानुत्सूत्रपद- न्यासा। अनुत्सृष्टसूत्राक्षरःइष्टयुपसङ्ख्याननैरपेक्ष्येण सूत्राक्षरैरेव सर्वार्थप्रति- सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वतपा-विराजितम् । २६७ पादको न्यासो वृत्तिव्याख्यानग्रन्थविशेषो यस्यां सा तथोक्ता । तथा- सती यथार्थ कल्पनया शोभना, वृत्तिभृत्यामात्यादीनामाजीविका यस्यां सा सद्वृत्तिः। अन्यत्र सती वृत्तिः--काशिकाख्यसूत्रव्याख्यानग्रन्थविशेषो यस्यां सा। 'वृत्तिग्नन्थजीवनयोः' इति वैजयन्ती । सन्ति निबन्धनान्य. नुजीव्यादीनां क्रियावसानेषु दत्तानि गोहिरण्यादिशाश्वतपारितोषिकदानानि यस्यां सा । एतच 'दत्त्वा भूमिनिबन्धं चेत्येतद्वचनव्याख्याने मिताक्षरायां द्रष्टव्यम् । अन्यत्र-सन्निबन्धन-माप्यग्रन्थो यस्यां सा । एवम्भूतापि राजनीतिः-राजवृत्तिः । अपगतः स्पशः चारो यस्याः साऽपस्पशा चेत् । 'यथार्थवर्णो मर्मज्ञः स्पशो हरक उच्यते' इति हलायुधः । अन्यत्र--अविद्यमानः पस्पशः शास्त्रारम्भसमर्थक उपोद्धातसन्दर्भग्रन्थो यस्याः सा अपस्पशा। शब्दविद्या-व्याकरणविद्येव। नो भाति-नशोभते । तस्माञ्चरप्रेषणमाव- श्यकम्, तदहितस्य राज्ञोऽन्धप्रायत्वादिति भावः । अत्रापस्पशेत्यत्र जतुकाष्ठ- वच्छब्दयोरेव श्लिष्टत्वाच्छब्दश्लेषः । सद्वृत्तिः सन्निबन्धनेत्यत्रैकवृन्ता- वलम्बिफलद्वयवदर्थश्लेषः । अनुत्सूत्रपदन्यासेत्यत्र तूभयसम्भवादुभयश्लेषः । शब्दविद्येवेति पूर्णोपमा व्यक्तैव । तयोः सापेक्षत्वात्सङ्करः ॥ ११२ ॥ [अन्वयः] अनुत्सूत्रपदन्यासा सद्वत्तिः सन्निबन्धना राज- नीतिः अपस्पशा शब्दविद्या इव नो भाति । [विग्रहः ] सूत्राण्युत्क्रान्तः उत्सूत्रः, न उत्सूत्र अनुत्सूत्रः, अनुत्सूत्रः पदानां न्यासो यस्यां सा अनुत्सूत्रपदन्यासा । अन्यत्र-सूत्राण्युत्क्रान्तानि उत्सूत्राणि, न उत्सूत्राणि अनुत्सूत्राणि, वानि पदानि यस्मिन् स अनुत्सूत्रपदः, अनुत्सूत्रपदोन्यासो यस्यां सा-इति विग्रहः । सती वृत्तिर्यस्यां सा सदत्तिः। सत् निबन्धनं यस्यां सा सन्निबन्धना । राज्ञो नीतिः राजनीतिः । अपगतः स्पशो यस्यां सा अप-स्पशा। अन्यत्र अविद्यमानः पस्पशो यस्यां सा अ-पस्पशा। [अर्थः] अनुत्सूत्रपदन्यासा = नीतिशास्त्रविरुद्धस्वल्पतम- व्यवहारशून्या । नीतिसूत्रविरुद्धपादप्रक्षेपरहिता । नीति- पूर्वकसकलव्यवहारशोभिता । (शब्दविद्यापक्षे-) अनुत्सूत्र- पदन्यासा = अनुत्सृष्टसूत्राक्षर न्यासाख्य-व्याख्यानविशेषो- - २ - २६६ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [अर्थः ] (किन्तु सम्प्रति-) कृत्यविदः = कार्यविदः । कार्यकुशलाः। विधिज्ञाश्च । प्रणिधयः-गूढचारिणः । तीर्थेषु= राज्ञां मन्त्राधष्टादशस्थानेषु । ( जलपक्षे-) जलावतारेषु च । अन्तःपद-स्थानम् । प्रवेशम् । जलपक्षे-पादप्रक्षेपञ्च । कृत्वा विधाय । महतः दुरवगाहस्य । पवित्रस्य च । पूज्यस्य च । विद्विषदम्भसः शत्रुरूपस्य । जलस्य । शत्रु अपस्य जलाशयस्येति यावत् । तलं स्वरूपम् । प्रमाणमिति यावत् । विदाङ्क वन्तु= विदन्तु । जानन्तु। [ भावार्थः ] अम्भस इव कृततीर्थस्य शत्रुपक्षस्य सुप्रवेश- तया पूर्वमन्तः प्रविश्य गूढपुरुषाः शत्रोस्तत्वं विदन्तु नाम । [ कोषः ] 'प्रणिधिगूढपुरुषः' इत्यमरः । 'योनौ जलावतारे च मन्त्रा- घष्टादशस्वपि । पुण्यक्षेत्रे तथा पाने तीर्थ स्यात्' इति हलायुधः । 'अधः- स्वरूपयोरस्त्री तलम्' इत्यमरः । [वाच्यप० ] कृत्यविद्भिः प्रणिधिभिः... ...तलं विदाक्रियताम् । [ भाषाटीका ] जैसे चतुर लोग ( तीर्थ ) सीढ़ी आदि के द्वारा गंभीर- जलाशय में प्रवेश करके जलका थाह लेते हैं वैसे ही शत्रु के तीर्थों-(मन्त्र आदि १८ स्थानों में) प्रवेश करके अभी हमारे गुप्तचर शत्र का पूरा-पूरा हाल-चाल जानें फिर आगे देखा जाएगा ॥ १११॥ आवश्यकं चैतदित्याह- अनुत्सूत्रपदन्यासा सवृत्तिः सन्निबन्धना । शब्दविद्य व नो भाति राजनीतिरपस्पशा ॥ ११२ ॥ [सर्वकषा ] अनुदिति । उत्सूत्रः-उच्छास्त्रः। नीतिशास्त्रविरुद्धः पद- न्यास:-एकपदप्रक्षेपोऽपि । स्वल्पव्यवहारोऽपीति यावत्। स नास्ति यस्यांसा अनुत्सूत्रपदन्यासा। नीतिपूर्वकसर्वव्यवहारेत्यर्थः । अन्यत्रानुत्सुत्रपद- न्यासा। अनुत्सृष्टसूत्राक्षरः इष्टयुपसङ्ख्याननैरपेक्ष्येण सूत्राक्षरेव सर्वार्थप्रति- -- अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । २६७ न्यासो वृत्तिव्याख्यानग्रन्थविशेषो यस्यां सा तथोक्ता । तथा-- यथार्थं कल्पनया शोभना, वृत्तिभृत्यामात्यादीनामाजीविका यस्यां सा तेः। अन्यत्र सती वृत्तिः-काशिकाख्यसूत्रव्याख्यानग्रन्थविशेषो सा। 'वृत्तिग्रन्थजीवनयोः' इति वैजयन्ती । सन्ति निबन्धनान्य- यादीनां क्रियावसानेपु दत्तानि गोहिरण्यादिशाश्वतपारितोषिकदानानि सा । एतच्च 'दत्त्वा भूमिनिबन्धं चेत्येतद्वचनव्याख्याने मिताक्षरायां म् । अन्यत्र-सन्निबन्धनं-भाष्यग्रन्थो यस्यां सा । एवम्भूतापि नीति:--राजवृत्तिः । अपगतः स्पशः चारो यस्याः साऽपस्पशा चेत् । र्थवर्णो मर्मज्ञः स्पशो हरक उच्यते' इति हलायुधः । अन्यत्र-अविद्यमानः शः शास्त्रारम्भसमर्थक उपोद्धातसन्दर्भग्रन्थो यस्याः सा अपस्पशा । विद्या-व्याकरणविद्येव।नो भाति-न शोभते । तस्माचरप्रेषणमाव- म्, तदहितस्य राज्ञोऽन्धप्रायत्वादिति भावः । अत्रापस्पशेत्यत्र जतुकाष्ठ- ब्दयोरेव श्लिष्टत्वाच्छब्दश्लेषः । सवृत्तिः सन्निबन्धनेत्यत्रैकवृन्ता. बफलद्वयवदर्थश्लेषः । अनुत्सूत्रपदन्यासेत्यत्र तूभयसम्भवादुभयश्लेषः । विद्येवेति पूर्णोपमा व्यक्तव । तयोः सापेक्षत्वात्सङ्करः ॥ ११२॥ [ अन्वयः] अनुत्सूत्रपदन्यासा सात्तिः सन्निबन्धना राज- : अपस्पशा शब्दविद्या इव नो भाति । [विग्रहः ] सूत्राण्युत्क्रान्तः उत्सूत्रः, न उत्सूत्र अनुत्सूत्रः, अनुत्सूत्रः मां न्यासो यस्यां सा अनुत्सूत्रपदन्यासा । अन्यत्र-सूत्राण्युकान्तानि त्राणि, न उत्सूत्राणि अनुत्सूत्राणि, तानि पदानि यस्मिन् स अनुत्सूत्रपदः, सूत्रपदोन्यासोयस्यां सा-इति विग्रहः । सती वृत्तिर्यस्यांसा सवत्तिः। सत् धनं यस्यां सा सन्निबन्धना। राज्ञो नीतिः राजनीतिः। अपगतः स्पशो iसा अप-स्पशा । अन्यत्र अविद्यमानः पस्पशो यस्यां सा अ-पस्पशा। [अर्थः ] अनुत्सूत्रपदन्यासा नीतिशास्त्रविरुद्धस्वल्पतम- [हारशून्या । नीतिसूत्रविरुद्धपादप्रक्षेपरहिता । नीति- कसकलव्यवहारशोभिता । (शब्दविद्यापते-) अनुत्सूत्र- ग्यासा - अनुतस्मृष्टसूत्राक्षर न्यासाख्य-व्याख्यानविशेषो- । । - २६८ शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- - पबृहिता। सूत्रार्थप्रतिपादनपरवृत्तिव्याख्यान भूतन्यासालङ्कृता । सद्वृत्तिः = यथोचितव्यवहारा। भृत्यादेर्यथायोग्यविशिष्टजीविको. पेता। (शब्दविद्यापक्षे)-सद्वृत्तिः = शोभनवृत्तिग्रन्थपरिमण्डिता । काशिकादिशोभनवृत्तिसहिता । कुण्यादिरचितप्राचीनवृत्त्याख्यव्या- ख्यानोपेता वा। सन्निबन्धना-भृत्यदेव शोभनस्थिरहिरण्यभूम्यादि- पारितोषिकमनोहरा । अन्यत्र शोभन (निबन्ध') महाभाष्यप्रका- शिता। (एवं भूतापि) राजनीतिः नृपनीतिः । राजवृत्तिः । राजव्यव हारः। अपस्पशा-चाररहिता। गूढपुरुषविकला। (शब्दविद्यापक्षे)- अपस्पशा = अविद्यमानपस्पशा । पस्पशालिकरहिता । (शास्त्रा- रम्भसमर्थक उपोद्धातसन्दर्भग्रन्थः प्रथमाध्यायीयप्रथमाह्निकरूपः 'पस्पश' इति' 'पस्पशाह्निक' इति चोच्यते ।) नो भाति शोभते । अतो गुप्तदूतप्रेषणमावश्यकमन्यथा राज्ञोऽन्धप्रायः स्वादित्याशयः। [ भावार्थः] तत्सम्प्रति चारप्रेषणेन शत्रूणां सर्वोऽपि वृत्तान्त आदौ ज्ञातव्यः, चारप्रेषणं विना च राज्ञोऽन्धप्रायत्व- मित्याशयः। [ कोशः] 'वृत्तिर्ग्रन्थजीवनयोः' इति वैजयन्ती । 'यथार्थवर्णो मर्मज्ञः स्पशो हरक उच्यते इति हलायुधः । [वाच्यप०] अनुत्सूत्रपदन्यासया सवृत्त्या सन्निबन्धयाऽपि राज- नीत्या अपस्पशया शब्दविद्यया इव नो भायते । [ भाषाटीका ] नीतिशास्त्रानुसारी मार्ग से बाहर एक पैर भी जिसमें नहीं रखा जाता हो, और भृत्यों के लिए जिसमें अच्छीरनौकरी व जीविका का प्रबन्ध हो, एव कामके करने पर नौकरों के लिए अच्छे इनाम का जिसमें प्रबन्ध हो-ऐसी भी राजनीति बिना गुप्तदूत (खुफिया पुलिस) के उसी तरह शोभित व फलित नहीं होती है,जैसे सूत्रार्थप्रदिपादक न्यास ग्रन्थ, सुन्दर वृत्ति ग्रन्थ,एवं,उत्तम निबन्ध व महाभाष्य से शोभित भी व्याकरणशास्त्र पस्पशाहिक (महाभाष्य के प्रथमाध्याय १ आह्निक) के बिना शोभित नहीं होता ॥११२॥ ] ।
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सनकषा-विराजितम्। . २६६ - न केवलं चारमुखेन वृत्तान्तज्ञानम्, अपि तूपजापश्च कर्तव्य इत्याह- अज्ञातदोषैदोषहरुद्दृष्योभयवेतनैः । भेद्याःशत्रोरभिव्यक्तिशासन सामवायिकाः ॥ ११३ ॥ [ सर्वकषा ] अज्ञातेति । किञ्चाज्ञातदोषैः परैरज्ञातस्वकर्मभिर्दोषज्ञैः स्वयं परमर्मज्ञैः। अभिव्यक्तानि भेद्यस्याग्रेप्रकटितानि शासनानि तदमा- त्याद्यविश्वासकराणि कूटलिखितानि येषां तैः । उभयवेतनैरुभयत्र भेद्ये स्वामिनि च वेतनं भृतिर्येषां तैरुभयजीविकाग्राहिभिः। भेद्यनगरवास्तव्यैश्वरै- रित्यर्थः । 'भृतयो भर्म वेतनम्' इत्यमरः । शत्रोः-सम्बन्धिनः । समवाय समवयन्तीति सामवायिकाः-सङ्घमुख्याः सचिवादयः । 'समवायान्सम- वैति' इति ठक् ।उद्देष्य-द्विषामेते दत्तहस्ता अस्माभिरेषा लिखितान्येव गृहीतानी'त्युच्चैर्दूषयित्वा । भेद्याः-विवहनीयाः ॥ ११३ ॥ [अन्वयः ] अज्ञातदोषैः दोषः अभिव्यक्तशासनः उभय. वेतनैः शत्रोः सामवायिकाः उद्ष्य भेद्याः । [विग्रहः ] न ज्ञातः अज्ञातः, अज्ञातो दोषो येषां ते अज्ञातदोषास्तैः- अज्ञातदोषैः । दोपं जानन्तीति दोषज्ञास्तैः । उभयत्र वेतनं येषान्ते उभय- वेतनाः, तैः--उभयवेतनैः । अभिव्यक्तानि शासनानि यैस्ते-अभिव्यक्त- शासना, तैः-अभिव्यक्तशासनः। [अर्थः ] (किश्च-)अज्ञातदोषैः = परैरज्ञातस्वदोषैः । बहिः- प्रकटितस्वशुद्धव्यवहारैः। (स्वयन्तु) दोषज्ञैः = परदोषविद्भिः । परमर्मज्ञः । अभिव्यक्तशासनैः = प्रकटितभेद्यराजामात्याद्यवि. श्वाससूचकतत्कूटलेखादिभिः । उभयवेतनैः = शत्रुपक्षात्मपक्षो. भयपक्षवेतनमाहिभिः भेद्यराजनगरवास्तव्यैश्चरैरित्यर्थः । शत्रोः = शत्रुसंम्बन्धिनः । सामवायिकाः = सङ्घमुख्याः । श्रेष्ठा भृत्या अमात्यादयः। उदृष्य = उच्चैदूषयित्वा । 'शत्रुपक्षमिलिता इमे सचिवाः' इत्येवं कूट (मिथ्या) लेखादिभिर्दूषयित्वा । भेद्याः = शत्रुपक्षाद्विघटनीयाः। पृथक्करणीयाः ।
:- शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- [ भावार्थः ] भेवराजपुरीवास्तव्यैर्गुप्तपुरुषैः परमर्मविद्भि- भैद्यराजाऽमात्यादिषु दोषान्कल्पयित्वा परस्परं तेषु भेदः कार्यः । [ कोश: ] 'भृतयो भर्म वेतनम्' इत्यमरः । [वाच्यप.] अज्ञातदोषा दोषज्ञाः उभयवेतनाः अभिव्यक्तशासनाः शत्रोः सामवायिकान् उद्प्य भेदयेयुः । [भाषाटीका ] जिनके दोषों को कोई नहीं जानता हो, पर वे सबके दोषों को जानते हों ऐसे शत्र के नगर में रहनेवाले दोनों ओर मिले अपने गुप्तचरों के द्वारा झूठी चिट्ठी-पत्री आदि बनाकर राजा और उसके मन्त्रियों में अविश्वास पैदा कराके शत्रु पक्ष में फूट डाल देनी चाहिए ॥११३॥ उपेयिवांसि कर्तारः पुरीमाजातशात्रवीम् । राजन्यकान्युपायज्ञ रेकार्थानि चरैस्तव ॥ ११४ ॥ [ सर्वकषा] उपेयिवांसीति । किञ्च-उपायः-कार्यसाधन- कुशलैः । तव चरन्तीति चरैYढचारिभिः । पचाद्यच । एकार्थानि -- त्वया सहकप्रयोजनानि । राजन्यानां समूहा राजन्यकानि । 'गोत्रोक्षो- इत्यादिना वुज् । अजातशत्रोरिमाम्-आजातशात्रवी पुरीमिन्द्रप्रस्थ- मुपेयिवांसि प्राप्नुवन्ति । 'उपेयिवान्-' इत्यादिना वसुप्रत्ययान्तो निपातः । कर्तारः करिष्यन्ते । कृजः कर्मणि लुट्। । 'इन्द्रप्रस्थेऽस्माकं महत्कार्य भविष्यति, तदध्वरयात्राव्याजेन सन्नद्धरागन्तव्यमिति गूढं सन्दिश्य तत्र सर्वे मेलयितव्या इत्यर्थः ॥ ११४ ॥ [अन्वयः] उपायज्ञैः तव चरैः एकार्थानि राजन्यकानि आजातशात्रवीं पुरीम् उपेयिवांसि कारः। [ विग्रहः ] उपायं जानन्तीति उपायज्ञाः, नैः-उपायज्ञैः । एकः अर्थों येषां तानि । अजातशत्रोरियम् आजातशात्रवी, ताम्-आजातशात्रवीम् । [अर्थः] (किञ्च-) उपायज्ञ: 3 कार्यसाधनकुशलैः । तव = भवतः । चरैः = गूढचारिभिः । एकार्थानि = त्वया सहक- प्रयोजनानि । अस्मत्पक्ष्याणि । राजन्यकानि = राजन्यसमूहाः । ..
सर्गः] अभिनवराजलक्ष्मी-सवङ्कपा-विराजितम् । २७१ क्षत्रियसमूदाः आजातशात्रवी = युधिष्ठिरसम्बन्धिनीम् । पुरी = नगरीम् । हस्तिनापुरम् । इन्द्रप्रस्थम् । उपेयिवासि प्राप्नुवन्ति । कर्तारः = करिष्यन्ते । [ भावार्थः] एवं शत्रु पक्षे भेई कारयित्वा अस्मद्गूढपुरुषा अस्मत्पक्षवर्तिनां राज्ञां क्षत्रियाणाञ्च समूहानिन्द्रप्रस्थे प्राप- यिष्यन्ति । अस्मदूतप्रेरिता अस्मत्यक्षवर्तिनः सर्वे राजान इन्द्रप्रस्थे (दिल्ली नगरे) समेष्यन्तीति यावत् । [ कोशः] 'मूर्धाभिषिक्तो राजन्यो बाहुजः क्षत्रियो विराट्' इत्यमरः । 'यथार्हवर्णः प्रणिधिरपसर्पश्वरः स्पशः' इत्यमरः । [वाच्यप०] उपायज्ञाः तव चराः 'राजन्यजानि पुरीन् उपे- निवांसि कारः। [ भाषाटोका ] उपाय जानने वाले कुशल दूतों द्वारा सभी अपने पक्षपाती राजाओं को गुप्त रीति से इन्द्रप्रस्थ (युधिष्ठिर के नगर वर्तमान दिल्ली) में इकट्ठा कराना चाहिए ॥ ११४ ॥ ननु 'तत्रावरकर्मणि को युद्धावकाश' इत्याशङ्कय तत्रैव महत्कलह- बीजं सम्पादयति- सविशेष सुते पाण्डोभक्तिं भवति तन्वति । वैरायितारस्तरलाः स्वयं मत्सरिणः परे ॥ ११५ ॥ [ सर्वकषा ] सविशेषमिति । पाण्डोः सुते युधिष्ठिरे भवति पूज्ये त्वयि सविशेष यथा तथा भक्तिं तन्वति सति तरलाश्चपला मत्सरिणो द्वेषवन्तः परे स्वयमेव वैरायितारो-वैरं कर्तारः । 'शब्दवैरकलह- इत्यादिना क्यङ् । ततः कर्तरि लुट् ॥ ११५॥ [ अन्वयः ] पाण्डोः सुते भवति सविशेष भक्तिं तन्वति (सति) तरलाः मत्सरिणः परे स्वयं वैरायितारः । [विग्रहः ] वैरं कर्तारः --वैरायितारः । [अर्थः] पाण्डोः सुते = युधिष्ठिरे । भवति = श्रीमति । .
२७२ शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- पूज्ये त्वयि । सविशेष = समधिकं यथा स्यात्तथा । भक्तिं श्रद्धां, सत्कारमनुरागञ्च । तन्वति = विस्तारयति सति । तरला:- चपलाः। चञ्चलवृत्तयः। मत्सरिणः = द्वषवन्तः। परोत्कर्षाs- सहिष्णवः। परे = चैधप्रमुखाः शत्रवः । स्वयं = स्वयमेव । आत्मनैव । वैरायितारः = वैरं कत्तारः । उपद्रवं करिष्यन्ति । [ भावार्थः] भवतां सत्कारमसहमानश्चैद्यश्च तत्रोपद्रव- मवश्यं करिष्यति । [ कोशः ] 'मत्सरोऽन्यशूभद्वेषे' इत्यमरः । 'वैरं विरोधो विद्वेषः' इत्य- मरः। 'चञ्चलं तरलं चैव पारिप्लवपरिप्लवे' इत्यमरः । [वाच्यप०] पाण्डोः सुते भक्तिं तन्वति सति तरलैः मत्सरिभिः परैः स्वय वैरायितारैर्भूयेत। [भाषाटीका] इन्द्रप्रस्थ-दिल्ली में यज्ञमें युधिष्टिर जब आप की विशेष पूजा करेगा तब शिशुपाल आदि आपके वैरी लोग अवश्य उपद्रव करेंगे ॥१५॥ किं तेऽपि सर्वे वैरायिष्यन्ते ?, नेत्याह- य इहात्मविदो विपक्षमध्ये सह संवृद्धियुजोऽपि भूभुजः स्युः । बलिपुष्टकुलादिवान्यपुष्टैः पृथगस्मादचिरेण भाविता तैः ॥ ११६।। [ सर्वकषा] य इति । इह विपक्षमध्ये शत्रुमध्ये सह संवृद्धि- युजोऽपि चैद्येन सहैश्वयं गता अपि । 'सत्सूद्विष' इत्यादिना विप् । ये भूभुजो राजान आत्मविदः स्वाभिजनवेदिनः स्युः। यद्वा स्वात्मरूपवेदिनः स्युस्तै भुग्भिः बलिपुष्टकुलात्काककुलात् । 'काके तु करटारिष्टबलिपुष्ट- सकृत्प्रजाः' इत्यमरः । अन्यपुष्टः-परभृतैरिवाचिरेण सद्योऽस्माद्विपक्ष: मध्यात् । अन्यारात्-' इत्यत्रान्यशब्दस्यार्थपरत्वात्पृथगादिप्रयोगेऽपि पृथग्भाविता-पृथग्भविष्यते । भावे लुट् । चिण्वदिटि वृद्धिः । तेष्वपि केचिदस्माभिः सङ्गच्छन्त इत्यर्थः । औपच्छन्दसिकं वृत्तम् ॥५१६॥ NA .
सर्गः ]
अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् ।
२७३
-
[अन्वयः ] इह विपक्षमध्ये सहसंवृद्धियुजः अपि ये भूभुजः
आत्मविदः स्युः तैः बलिपुष्टकुलादन्यपुष्टैरिव अस्मात् अचिरेण
पृथग्भाविता।
विग्रहः ] आत्मानं विदन्तीति आत्मविदः । विपक्षाणां मध्यं
विपक्षमध्यं, तस्मिन्-विपक्षमध्ये । बलिपुष्टानां कुलं बलिपुष्ट कुलं,
तस्मात्- । सह संवृद्धथा युज्यन्ते इति सहसंवृद्धियुजः ।
[अर्थः] ये-ये वै । इह-अस्मिन् । विपक्षमध्ये शत्रुमध्ये ।
सहसवृद्धियुजोऽपि चैद्येन सहैव प्रवृद्धा अपि । श्रादित एव
चैद्यानुगता अपि। सम्प्रति-स्वात्मविदः = स्वाभिजनवेदिनः ।
स्वपक्षवेदिनः। स्वस्वरूपवेदिनश्च । भूभुजः राजानः । स्युः=
भवेयुः। तैः भूभुग्भिः। नृपैः। बलिपुष्टकुलात-काककुलात्। अन्यपुष्ट-
रिव - परभृतैरिव । कोकिलैरिव । अचिरेण सद्यः । अस्मात्
विपक्षमध्यात् । पृथग्भाविता-पृथग्भविष्यते ।
[भावार्थः ] तदैवं प्रवृत्ते व्यतिकरे चैद्य न सह प्रवृद्धा अपि
केचन भूभुजः स्वस्वरूपं विदित्वा ( काककुले पुष्टा अपि
परभृताः काककुलादिव ) शत्रुमध्यात्पृथग्भूत्वाऽस्मत्पश्मेवाश्र.
यिष्यन्ति।
[कोशः] 'काके तु करटारिष्टबलिपुष्टसकृत्प्रजाः' इत्यमरः । 'वनप्रियः
परभृतः कोकिलः पिक इत्यपि' इत्यमरः ।
[वाच्यप० ] यैः इह सह संवृद्धियुग्भिरपि भूभुग्भिः भूयेत । ते
बलिपुष्टकुलात् अन्यपुष्टा इव अस्मात् अचिरेण पृथग्भवितारः ।
[भापाटीका ] जो राजा अपने सच्चे रूप और कुल को नहीं समझने से
अभी तक शत्रुका (चैद्यका ) साथ देते आए हैं वे भी अपने स्वरूप को
जानकर हमारे पक्ष में उसी प्रकार आजायंगे जैसे कौवों के साथ रहकर
प्रतिपालित भी कोकिल ( कोयल) ज्ञान होते ही कौवों को छोड़कर अपने
बन्धुओं में मिल जाता है ॥ ११६ ॥
शिशुपालवधम् । [२ द्वितीयः- mate- अथ फलितं निगमयन्नाशिषं प्रयुक्त- सहजचापलदोषसमुद्धतश्चलितदुर्वलपक्षपरिग्रहः । तव दुरासदवीर्यविभावसौ शलभतां लभतामसुहृद्गणः॥ [ सर्वकषा] सहजेति । सहज स्वाभाविकं चापलं दुर्विनीतत्वम् . अनवस्थितत्वं च । 'चपल: पारदे शीघ्र दुर्विनीतेऽनवस्थिते' इति वैजयन्ती। तेनैव दोषेण समुद्धतो दृक्षः। पक्षः-सहायो, गरुञ्च । 'पक्षः पार्श्वगरुत्साध्य- सहायवलभित्तिषु' इति वैजयन्ती। चलितोऽस्थिरो दुर्बलपक्षपरिग्रह यस्य सः। असुहृद्गणः शत्रुवर्गस्तव दुरासदवीर्यविभावसौ-दुःसह- तेजोवह्नौ । 'वीर्य शुक्र प्रभावे च तेजःसामर्थ्ययोरपिः 'सूर्यवह्नी विभावसू इति विश्वामरौ । शलभतां-पतङ्गत्वम्। 'समौ पतङ्गशलभौ' इत्यमरः । भाटे तल् । लभतां-गच्छतु । रूपकालङ्कारः । द्रुतविलम्बितं वृत्तम् ॥ ११७ ॥ [ अन्वयः ] सहजचापलदोषसमुद्धतः चलितदुर्बलपक्ष- परिग्रहः असुहृद्गणः तव दुरासदवीर्यविभावसौं शलभताम् लभताम्। [विग्रहः] चपलस्य भावः चापलम् , सहजं चापलं सहजचापलं, रदेव दोषः, तेन समुद्धतः-सहजचापलदोषसमुद्धतः । दुर्बलश्चासो पक्षश्च दुर्बलपक्षः, तस्य परिग्रहः दुर्बलपक्षपरिग्रहः, चलितः दुर्बलपक्षपरिग्रहो यस्य सःचलितदुर्बलपक्षपरिग्रहः । दुरासदं च तद्वीर्यञ्च दुरासदवीय,स एव विभा- वसुः तस्मिन्-दुरासदवीर्यविभावसौ । शलभस्य भावः, शलभता, ताम् । [ अर्थः ] सहजचापलदोषसमुद्धतः = सहजदुर्विनीतत्वदोष- हप्तः । स्वाभाविकचाञ्चल्यदोषदृप्तः। (शलभपक्षे-) नैसर्गिका- नवस्थितत्वदोषप्रेरितः । चलितदुर्बलपक्षपरिग्रहः = विशीर्ण- दुर्बलसहायकवर्गः । अस्थिरभिन्नसहायकराजलोकः । (शल- भपचे-) विशीर्णदुर्बलगरुद्भागः । त्रुटितपक्षवलः । असुट्ट द्गणः = शत्रु वर्गः । तव = भवतः। दुरासदवीर्यविभावसौ सर्गः] १ , अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वङ्कपा-विराजितम् । दुःसहतेजोवह्नौ । प्रचण्डप्रतापाग्नौ । शलभतां = पतङ्गताम् । लभतां प्राप्नोतु । गच्छतु । [ भावार्थः ] विशीर्णपक्षवलो वैरिवर्गः स्वचाञ्चल्यदोषसमु. द्धतो भवत्प्रतापाग्नौ पतङ्ग इव प्रदह्यताम् । [ कोशः ] 'चपलः पारदे शीघ्र दुर्विनीतेऽनवस्थिते' इति वैजयन्ती। 'पक्षः पार्श्वगरुत्साध्यसहायबलभित्तिपु' इति वैजयन्ती। 'वीय शुक्र प्रभावे च तेजःसामर्थ्ययोरपि' इति विश्वः । 'सूर्यवह्नी विभावसू' इत्यमरः । 'समौ पतङ्गशलभौ' इत्यमरः । [वाच्यप० ] सहजचापलदोषसमुद्धतेन चलितदुर्बलपक्षपरिग्रहेण तव असुहृद्गणेन ( तव ) दुरासदवीर्यविभावसौ शलभता लभ्यताम् । [भाषाटीका ] अपने स्वभाविक चञ्चलता से उन्मत्त, कमजोर व टूटे हुए पक्ष ( सहायकवर्ग या पांख ) वाला आपका शत्रवर्ग आपके प्रतापरूपी अग्नि में पतङ्गों ( फतीङ्गों) की तरह जल जाये ॥ १७ ॥ इति विशकलितार्थामौद्धवी वाचमेना- मनुगतनयमार्गामर्गला दुर्नयस्य । जनितमुदमुदस्थादुच्चकैरुच्छ्रितोर:- स्थलनियतनिषण्णश्रीश्रुतां शुश्रुवान्सः ॥११॥ इति श्रीमाघकृतौ शिशुपालवधे महाकाव्ये श्यङ्के द्वितीयः सर्गः ॥२॥ [ सर्वकषा ] इतीति । स हरिरित्थं विशकलितार्थी विवेचिता- र्थामनुगतनयमार्गी नीतिमार्गानुसारिणीं । दुर्नयस्या बलभद्रायुक्तस्येत्यर्थः। अर्गलां-निवारयित्रीमिति वैधयेण रूपकालङ्कारः। तद्विष्कम्भोऽर्गलं न ना' यमरः । अतएव जनितमुदं हरेः कृतानन्दाम् । उच्छ्रिते उन्नते उरः- स्थले निषण्णया श्रिया-अविश्रान्तमाश्रितया श्रिया-श्रुतां। नान्ययेति मन्त्रगुप्तिः । उद्धवस्येमामौद्धवीमेनां पूर्वोक्तां वाचं शुश्रुवान्श्रुतवान् । 'भाषायां सदवसभ्रवः' इति वसुः । उच्चैरेवोच्चकैरुन्नतः सन् । 'अव्ययसर्व- नाम्नामकच्प्राक्टेः' इत्यकच्प्रत्ययः । उदस्थादासनादुस्थितवान् । 'उदोऽ- . २७६ शिशुपालवधम् । [ २ द्वितीयः- नूर्ध्वकर्मणि' इत्यस्य प्रत्युदाहरणमेतत् । रूपकानुप्रासालङ्कारी। मालिनी वृत्तम् ।। ११८॥ इति श्रीमहामहोपाध्यायकोलाचलमल्लिनाथसूरिविरचिते शिशु- पालवधकाव्यव्याख्याने सर्वऋषाख्ये द्वितीयः सर्गः ॥२॥ [अन्वयः ] स इति विशकलितार्थाम् अनुर्गतनयमार्गाम् दुर्नयस्य अर्गलाम् अतएव जनितमुदम् उच्चकैः उच्छ्रितोरःस्थल- नियतनिषण्णश्रीश्रु ताम् औद्धवीम् वाचं शुश्रु वान् उदस्थात् । [विग्रहः ] विशकलितः अर्थों यस्याः सा विशकलितार्था, ताम् । नयस्य मार्गः नयमार्गः, अनुगतः नयमार्गो यया सा अनुगतनयमार्गा, ताम्- अनुगतनयमाम्। जनिता मुद् यया साजनितमुत्, ताम्-जनितमुदम् । उछितं च तत् उसस्थलं च उच्छितोरःस्थलम् , तत्र नियतं निषण्णा चासौ श्रीश्चेति उच्छितोरःस्थलनियतनिषण्णश्रीः, तया श्रुता, ताम् । उद्धवस्येयम् औद्धवी, ताम्-औद्धवीम् । [अर्थः] सः = हरिः । इत्थम् अमुना प्रकारेण । विशकलि- तार्थाम् = विवेचितार्थाम् । प्रकटिताभिधेयाम् । विशदार्थाम् । अनुगतनयमार्गा = नीतिमार्गानुसारिणीम् दुर्नयस्य = दुर्नी ते वलभद्रोक्ताऽसत्पक्षस्य । अर्गलाम्-निवारयित्रीम् । (अत एव-) जनितमुदं-हर्षप्रदाम् । कृतानन्दाम् । उच्छितोरःस्थलनियत- निषण्णश्रीश्रु ता = = समुन्नतवक्षःस्थलाऽनवरतनिषण्णलक्ष्मीश्र ता- म् । स्ववक्षःस्थलाऽनवरतनिवासिश्रीमात्रभु ताम् । औद्धवीम् उद्धवोक्ताम्। एनाम् = पूर्वोक्ताम् । वाचं-वाणीम् । शुश्रुवान् = श्रुतवान् । उच्चकैः समुन्नात् । (समुन्नतः स निति वा ) उदस्थात्-सिंहासनादुत्थितवान् । [भावार्थः ] इत्थं वस्तुतत्त्वप्रकाशिकामौद्धवीं गिरं श्रुत्वा हर्षोत्फुल्लनयनो हरिरासनादुत्थितवान् । [ कोशः ] 'तद्विष्कम्भोऽर्गलं न ना' इत्यमरः । 'लक्ष्मीः पनालया पद्मा कमला श्रीहरिप्रिया' इत्यमरः ।
सर्गः] २७७ अभिनवराजलक्ष्मी-सर्वकषा-विराजितम् । [वाच्यप० ] तेन इति औद्धवीं वाचम् शुश्रूषा उदस्थायि । [ भाषाटीका इस प्रकार सच्चे नीतिक मार्गको बतानेवाली, दुनीति को हठानेवाली उद्धवजी की बातें सुनकर भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और विचार सभा को स्थगित करते हुए उन्नत सोने के सिंहासन पर से उठ खड़े हुए। और अपने महलों को सिधारे ॥११॥ * इति पण्डितराज-मरुमण्डलकेसरि-श्रीस्नेहिरामशास्त्रिणां पौत्रेण, पण्डितवरन्यायाचार्य श्रीश्रीश्रीश्रीश्रीशिवनारायणशास्त्रियां पुत्रेण, श्रीराजलक्ष्मीगर्भसम्भवेन, श्रीगुरुप्रसाद- शास्त्रिणा विरचितायां शिशुपालवधमहाकाव्या- भिनवराजलक्ष्म्यां द्वितीयः सर्गः। ॥ श्री ॥ शुभम् ॥ श्रीः ॥ शुभम् ॥ श्रीः ॥ (प्रथम सं० वैशाखशुक्लनवमी सं० १९९५ वै०) ।। शुभमूना १ - - १॥5) " में सस्ती लघुशब्देन्दुशेखर-(अव्ययीभावान्त) परीक्षोपयोगी ६ टीका ५६) वैयाकरणभूषणसार–काशिका' और 'दर्पण' टीका १७ स्वप्नवासवदत्तानाटक-'अभिनवराजलक्ष्मी' भा. टी. २) पञ्चतन्त्र--(सम्पूर्ण) 'अभिनवराजलक्ष्मी' टीका व प्रश्नपत्र सहित ३) तर्कसंग्रह-'अभिनवराजलक्ष्मी' 'परिमलदीपिका टीका ) तर्कसंग्रह--(प्रथमपरीक्षा) 'बालमनोरमा' 'परीक्षाः ४ टीका १) छन्दोमन्दाकिनी--( परीक्षोपयोगी ) १६ छन्दों का m हितोपदेश-(मित्रलाभ) संस्कृत टीका परीक्षोपयोगी अष्टाध्यायीसूत्रपाठ-अत्युत्तम 'सरला' टीका वेणीसंहारनाटक--(सचित्र) २) अमरकोश-अभिनवराजलक्ष्मी तोनों काण्ड (३२ पेजी) १४) अमरकोश प्रथम कांड (१६ पेजी) 15) टिप्पणी ३२ अमरकोश--प्रथम कांड ३२ पेजी मूलमात्र ) द्वितीय कांड 15 सोत्तरा तद्धित प्रयोगसूची--अत्युत्तम ॥ अभिज्ञानशाकुन्तल--'अभिनवराजलक्ष्मी टीका हितोपदेश--अभिनवराजलक्ष्मी एवं भाषाटीकासहित संपूर्ण मध्य सिद्धान्तकौमुदी-अद्भुत सरला टीका २रा सं० २ किरातार्जुनीय-- अभिनवराजलक्ष्मी ' टीका ( १-२-३ ) २) रघुवंशमहाकाव्य--'अभिनवराजलक्ष्मी टीका ( २-३-४ ) (२-३) १) २-३-४-५ सर्ग पञ्चतन्त्र-(प्रथमपरीक्षोप०) अपरीक्षितकारक 'अभिनवराजलक्ष्मी' टी० ॥ पञ्चतन्त्र--प्रथम तन्त्र मूल्य 17jm मूलरामायण--नागेशभट्टी एवं 'अभिनवराजलक्ष्मी' टीका विदुरनीति--(सचित्र) ॥) नीतिशतक ( सचित्र) 05) लघुसिद्धान्त कौमुदी-सरल टीका तथा संस्करण २॥) पता-भार्गव पुस्तकालय, गायघाट, वनारस सिटी। २॥ २॥ १) " १ २) "
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