Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Shri Jinprabhusuri Ane Sultan Mahmmad

Gandhi, Lalchand Bhagwan · 2010/07

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पुस्तक-प्राप्तिस्थान- व्य. श्रीजिनहरिसागरसूरि-ज्ञानभंडार, लि. जाटावासमें, मु. लोहावट (मारवाड) भावनगर-'आनंद' प्रि. प्रेसमां शेठ देवचंदभाई दामजीए प्रकाशक माटे छाप्यु. ता. १-९-३९ लेखरूप प्रथम आवृत्तिना प्रकाशकनुं वक्तव्य. nayia- महान् सम्राट्सत्ता उपर अपूर्व प्रभा पाडीने तीर्थो अने शासनसमृद्धिर्नु संरक्षण करनारा धुरंधराचार्य जैन- ज्योतिर्धर श्रीहीरविजयसूरिना प्रसिद्ध इतिहासथी पण लगभग २५० वर्ष पहेला एटले विक्रमनी चौदमी सदीना उत्तरार्धमां मुस्लीम आक्रमणना विषम युगमा परम प्रभावक श्रीजिनप्रभसूरिए सुलतान महम्मद उपर पाडेली अजब प्रभानो अप्रगट इतिहास आलेखमां बहु जीणवटथी अने विस्तारपूर्ण टिप्पण-टीका साथे प्रगट करवामां आव्यो छे. जो के आ लेख छेक असूरे मळवाथी तेनो केटलोक भाग छोडी देवो पड्यो छे; छतां लेख- कना संस्कृत-प्राकृत अभ्यास अने वडोदराना ओरी- एन्टल खाता द्वारा संशोधनना मेळवेल झंडा अनुभवनो लाभ समाजने आ लेखथी मळ्शे-तेम खात्री छे." -संपादक 'जैन' _'जैन रौप्य महोत्सव अंक वि. सं. १९८६ [पृ. २१९] प्रास्ताविक आनंद-प्रमोदनो प्रसंग छे के-लगभग एक दसका पहेलां संक्षिप्त लेखरूपे प्रकाशित थयेल अम्हारो शुभ प्रयास, विशेष समृद्ध थइ विस्तृत स्वरूपमा आजे ग्रंथरूपे प्रकाशमां आवे छे. एना अन्वेषणमां--प्रामाणिक ऐतिहासिक संशोधनमा केटलो परिश्रम उठाव्यो हशे ? वर्षांना केटला प्रयत्नथी केवी केवी मुश्केलीओ बच्चे आ गवेषणा थइ हशे ? ' श्रेयांसि बहुविनानि ' सूक्तने यथार्थ प्रामाणिक करतां केवां केवां विघ्नोमांथी पसार थइ आनी संकलना थइ हशे ? अने वर्षों पछी आवा स्वरूपमां आजे आ प्रसिद्धिमां आवे छे, ते दरम्यान पण लेखकने केवा केवा प्रतिकूल संयोगो पसार करवा पड्या हशे ? ते लेखके स्वयं उच्चारवु अप्रस्तुत लेखाय. इतिहासप्रेमी परिश्रमविज्ञ सजनो कदाच ए समजी शके. आ परिश्रम, आवा संशोधित-वर्धित नवीन स्वरूपमा प्रका- शमां आवी शक्यो छे, तेनो वास्तविक सुयश, इतिहासप्रेमी गुणज्ञ जैनाचार्य श्रीजिनहरिसागरसूरिजी महाराजने घटे छे, जेमना प्रेरणा-प्रोत्साहन विना आ निबंध-ग्रंथर्नु प्रकाशन कार्य प्रायः अशक्य थयुं होत. शासन-प्रभावक माननीय पूज्य पूर्वज आचार्योना इतिहास-संशोधनमा अने तेना प्रकाशनमा असाधारण उत्कंठा धरावनार उपर्युक्त आचार्यना आदर्शने कृतज्ञ अन्य महा- नुभावो पण अनुसरे-एम इच्छीशु.

श्रीजिनप्रभसूरि-मूर्तिः
AAKAL
m
--
श्रीशत्रुञ्जयतीर्थ खरतरवसतौ प्रतिष्ठिता।
आनंद प्रेम-भावनगर.

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, श्रीशत्रुजय तीर्थ पर (खरतर-वसहीमां) रहेली मूर्ति परथी तैयार करावेल प्रस्तुत जिनप्रभसरिनो फोटो अहिं समुचित लागशे. प्रबल इच्छा होवा छतां पण योग्य प्रतिकृति प्राप्त न थवाथी सुलतान महम्मद (तुगलक)नो फोटो अहिं न मूकातां न्यूनता लागशे, परंतु ते माटे निरुपाय छं. जिनचंद्रसूरि अने सम्राट अकबरना नामे प्रख्याति पामेलं चित्र, चरित्र-प्रसंग विचारतो म्हने तो जिनप्रभ- सूरि अने सुलतान महम्मद(तुगलक)नु होय, तेम लागे छे. विशेष वक्तव्य न करतां जिज्ञासुओने सूचवीए के विषयानुक्रम, ऐतिहासिक नामोनी अनुक्रमणिका, ऐतिहासिक घटना-निर्देशक संवत्सर-सूची विगेरे योजनाओ साथे आ निबंध, इतिहास-प्रेमीओने विशेष उपयोगी थशे-एवी आशा छे. आ ग्रंथ-रचनामा उपयुक्त थयेला ग्रंथोनुं सूचन, ते ते स्थळे करवामां आव्युं छे. श्रीयुत अगरचंदजी नाहटा जेवा जे इति- हासप्रेमीओए आ प्रकाशनमा प्रत्यक्ष के परोक्ष प्रेरणा, सहायता के सहानुभूति दर्शावी छे, ते सर्वनो हुं आभार मानुं छु. संकलनामां अने संशोधन-प्रकाशनमां बनी शकी तेटली सावधानी राखी छे, छतां आमां कोइ स्खलना दृष्टि-गोचर थाय, तो ते साक्षरो मने जरूर सूचवें, पुनः प्रसंगे ते सुधारी शकाशे. सज्जन विद्वानो आनुं निप्पक्षपात दृष्टिथी साद्यन्त अवलोकन करो, अने ग्रन्थ-रचना- प्रकाशन-परिश्रम सफल थाओ-एम इच्छं छं. वि. सं. १९९५ विद्वदनुचर- अक्षयतृतीया वडोदरा. लालचंद्ग भगवान् गांधी. } विषयानुक्रम विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ ३२ उपक्रम १-३ जिनप्रभसूरिने पातशाह परिचय आमंत्रण ३१ अन्य ग्रंथकारने साहाय्य ४-५ पातशाहे जिनप्रभसूरिनो विद्वत्ता अने विहारस्थळो ५-७ करेल सत्कार ग्रन्थ-रचना ७-९ जैन श्वेतांबर-समाज-रक्षा ७०० स्तोत्रोनी रचना ९-१८ अने तोर्थ-रक्षा-फरमान ३४ कल्प-प्रदीप तोर्थ-कल्प १८-२१ वंदी-मोचन राज-प्रसाद् शत्रुजय- महावीर-प्रतिमानुं समर्पण- कल्प २१-२२ सन्मान ३५ दिल्लीश्वर हम्मीर महम्मदनी सूरि-विहार प्रसन्नता २२-२५ देवगिरि(दोलतावाद)मा कन्नाणयनयर-कल्पमा प्रतिष्ठान(पेठण)पुर-यात्रा जणावेल ऐतिहासिक वृत्तांत २५ दिल्लीमा सुलताने समर्पल महावीरनी प्राचीन मनोहर सराई, चैत्य, उपाश्रय विगेरे ३७ प्रतिमा २७ कन्नाणय-वीर-कल्प-परिशेष ३८ शहाबुद्दीन घोरीना अमलमा दोलतावादमा प्रभावना ४२ पातशाहे करेल स्मरण महावीर-प्रतिमा, पुनः अने फरी आमंत्रण ४५ प्रकट थर्बु २९ प्रयाण, अल्लावपुरमा उपद्रव- उपद्रवना वखतमा ३० निवारण ४७ तुगलकाबादमा शाही- सिरोहमां सरकार खजानामा ३० दिल्लीमा सूरिनुं स्वागत गुप्त २८ - ४७ । सत्कर्तव्यो ६१ ६९ ७६ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ पर्युषणामा प्रभावना- विजययंत्र-महिमा ४९ वडनु चालवू विगेरे सुलताननी माताना शत्रुजयमां रायणथी दूध सन्मानमा ५० वरसावर्बु ६७ दीक्षा विगेरे कर्तव्यो गिरनारमा - जैनर्विव-प्रतिष्ठा अन्य प्रसंगो गोष्ठी-विनोद ७० सुलताने समर्पल भट्टारक समकालीन इतिहास सराईमा प्रवेशोत्सव ५१ पेथडशाहे देवगिरि( दोल- मथुरा तीर्थनो उद्धार विगेरे ५२ तावाद)मां राजा रामदेव हस्तिनापुर-यात्रा-फरमान ५२ अने मंत्री हेमादिना सम- संघ साथे हस्तिनापुरमा यमां जिनदेव-मंदिर केवी प्रतिष्ठा-महोत्सव ५३ रीते कराव्यु ? जेनी रक्षा महावीरना विवनी पुनः जिनप्रभसूरिए करी हती...७८ स्थापना ५५ पेथडशाह ७९ पातशाही फरमानथी जैन- पेथडशाहे करावेला समाज अने जैन तीर्थोमां ८४ जिन-प्रासादो ८२ निर्भयता ५५ पेथडशाहनां सुकृतो ८६ देवगिरिमां जिन-प्रासाद प्रभावक जिनप्रभसूरिना केवी रीते कराव्यो? ८९ प्रभावथी प्रवर्तेला धार्मिक देवगिरिमा रामदेव राजाना महोत्सवो ५६ राज्यमां शाह देसल अने सुलताननी सभामां सूरिजीनो सहजाशाहे करावेल जिन- वचन-प्रभाव ५७ मंदिर, जेनी रक्षा जिनप्रभ- कल्प-परिशेषनो उपसंहार ५७ . सूरिए करी हती १०१ जिनप्रभसूरिनां चमत्कारी भयानक अल्लाउद्दीन-युग १०३ वृत्तान्तो, पीरोज सुलतान-- कनाणपुरना जैन शिल्प- पर प्रभाव ५९ शास्त्री ठक्कुर फेरु १०७ है ८ विषय विपय पृष्ठ दिल्लीश्वर पातशाहोथी व्यंतरनोवळगाड दूर करवो १३९ सम्मानित समकालीन राघवचैतन्यने हराबवा १४१ अन्य जैनाचार्यो १०९ ६४जोगणीओने वश करवी १४३ शाहि मुहम्मद अने पेरो कलंदरनो गर्व हरवो १४५ जथी गौरवित गुणभद्र- अद्भुत निमित्त-कथन १४६ सूरि अने मुनिभद्रसरि ११० वडने साथे चलायची १४८ महम्मदशाहथी प्रशंसित महावीरनी प्रतिमाने बोलती महेन्द्रसूरि १११ करवी १४८ पेरोज पातशाहना मान्य महावीरनुं सन्मान-पूजन करावयु १५० गणितज्ञ महेन्द्रसूरि ११३ अन्य चमत्कारो १५० पेरोज पातशाहथी सत्कृत खंडेलवालोने जैनो कर्या १५० रत्नशेखरसूरि ११४ जिनप्रभसूरिनी अप्रकट सुलतान-सन्मानित शाह जगसिंह अने महणसिंह कृतियो १५४ जेना देवगिरिना जिन- जिनप्रभसूरिनी पट्ट-परंपरा १५४ मंदिरनी प्रशंसा जिनप्रभ जिनदेवलूरि १५४ सूरिए करी हती ११५ जिनमेरुसूरि १५७ जिनप्रभसूरिनो विशेष जिनहितसूरि १५८ परिचय १३४ चारित्रवर्धन वाचनाचार्य १५९ श्रोमालसंघना गुरु जिन अन्य अनुयायीओ सिंहसूरि १३४ उपसंहार १६४ जिनप्रभसूरिना जम्म, ऐतिहासिक नामोनी अनु- दीक्षा, सूरिपदादि १३६ क्रमणिका १६६ पद्मावतीना प्रभावी ऐतिहासिक घटना-निर्दे- चमत्कारो १३७ शक संवत्सर-सूची १८८ महम्मदशाहनी मुलाकात १३८ शुद्धि- १९२ 20229 -पत्रक जिनप्रभसूरि अने सुलतान महम्मद. ( ले. पं. लालचंद्र भ. गांधी. प्राच्यविद्यामंदिर, वडोदरा ) पोतानी विद्वत्ता अने सच्चारित्रताथी जन-समाज पर उपकार करनारा, जैन-शासननी कीर्ति-पताका फरकावनारा, जैन-शासनना. उज्ज्वल गौरवने प्रकाशित करनारा, जन- समाजमां अने राजा-महाराजाओमां हिंदु राजाओ अने मुसल्मान पातशाहो पर अपूर्व प्रभाव पाडनारा प्रभावशाली जे जे प्रभावक महापुरुषो थई गया छे तेमां जिनप्रभसूरिनु विशिष्ट स्थान छे. विक्रमनी चौदमी सदीना उत्तरार्धमां-मुसल्मानी आक्र- मणना भयानक विषम युगमां, दिल्लीश्वर सम्राट् महम्मद तुघलक पर अनुपम प्रभाव पाडी जैनसमाजने निरुपद्रव बनावनार, जैन-तीर्थो-मंदिरोने तुरकोना दुःखद विप्लवोमांथी बचावी निर्भय करनार, तुरकोना कब्जामां गयेल. शासन-नायक महावीरना बिबने सत्कारपूर्वक पार्छ वाळी प्रतिष्ठित करनार, जन-समाजने सुरक्षित करनार, सुलतान महम्मद तघलकथी सन्मानित थयेला आ सत्पुरुपने आपणे कमभाग्ये हजु यथार्थ रूपमा ओळखी शक्या नथी; एथी आ लेखद्वारा ए आचा- .

२] [ जिनप्रभसूरि अने यनो ऐतिहासिक प्रामाणिक परिचय कराववा कईक यत्न करूं छु. आ प्रयत्नथी, महम्मद तघलक संबंधी अन्यत्र जाणवामां न आवेली-प्रकाशित अतिहासिक पुस्तकोमा वांचवामां नहि आवेली; छतां तेना समकालीन परिचित विद्वान् जैन लेखकोए प्राकृतभाषामां लखी राखेली ऐतिहासिक घटना प्रकाशमा आवशे के जे पुरातत्त्वप्रेमी इतिहास-सिक जिज्ञासु पाठकोने आनन्दप्रद थशे तेम धारूं छु. जैनाचार्य हीरविजयसूरि तथा जिनचंद्रसूरि (सपरिवार) अने सम्राट अकबरनी इतिहासप्रसिद्ध विशिष्ट समागमवाळी संतोपकारक सफळ घटना पहेलां लगभग अढीसो वर्ष पर थयेल चिरस्मरणीय आ ऐतिहासिक वृत्तान्त हालमां प्रकाशमां आवे छे एमां पण कुदरतनो कंइक संकेत हशे. जैन ज्योतिर्घरोना झळहळता तेजने न सहन करी शक- नारा, ए महाविभूतियोने यथार्थ रूपमा न ओळखी शकनारा, अथवा ओळखवा छतां गमे ते अव्यक्त तुच्छ कारणे ए सत्पु- रुषोने विकृत रूपमा आलेखनारा, ए विशिष्ट उच्च ज्योतिर्धरो सामे जाण्ये-अजाण्ये रज उडाडी तेमने झांखा पाडवानी उपहासयोग्य स्वभाव-सुलभ व्यर्थ चेष्टा करे ए स्वाभाविक- वनवा योग्य छे, परंतु आपणे तो एमांथी पण प्रेरणानो बोध- पाठ मेळवी. प्रमादनो परित्याग करी,आपणी तन-मन-धनादिक शक्तियोनो क्षुद्र कलहादिमां दुर्व्यय न करतां, जीवननी अमूल्य सुलतान महम्मदं.] [३ annnnnn mnini क्षणोनो सदुपयोग करी एवा ज्योतिर्धरोने प्रकाशमा लाववा जोईए अने तेमना सद्गुणो तथा सत्कर्तव्योथी परिचित थई, तेमांथी शुभ प्रेरणा प्राप्त करी, प्रगतिने पंथे प्रयाण करतां एवा ज्योतिर्धरो प्रकटाववा प्रयत्नशील थवं जोईए. जेनी सफळतामां स्व-परर्नु श्रेयः समायेलुं छे. प्रस्तुत प्रयत्न पण ए विचारनुं परिणाम छे. प्रस्तुत जिनप्रभसूरिनो सांसारिक परिचय, माता-पितादि, ज्ञाति-गोत्र, पूर्वनाम, जन्म-समय, परिचय जन्म-स्थल, दीक्षा-समय, दीक्षास्थान ए विगेरे संबंधमां खास कई जाणवामां आव्यु नैथी; तेम छतां तेओ विक्रमनी चौदमी १. आ ज नामना अने आ आचार्य पहेलां पच्चीशेक वर्ष पूर्व थई गयेला लगभग समकालीन बीजा एक जिनप्रभसूरि आगमिकगच्छना इता. तेओए विक्रमनी तेरमी सदीना अन्तमा तथा चौदमी सदीना पूर्वार्धमां शत्रुजयमा रही प्राकृत-अपभ्रंशादि भाषामां नाना-म्होटा अनेक ग्रंथो रच्या छे, जे पाटण विगेरेना जैन भंडारोमा मळी आवे छे.[ जुओ पाटण भं. सूची भा. १ गा, ओ, सिरीझ ]. पोताने शत्रुजय-सेवक तरीके ओळखावनारा आगमिकगच्छना ए जिनप्रभसूरिथी खरतरगच्छना आ जिनप्रभ- सूरिने जुदा समजवा जोइये. : २. विक्रमनी १७ मी सदीना अंतमां रचायेली जणाती एक , ४] [ जिनप्रभसूरि अने सदीना वीजा चरण( वि. सं. १३२५ पछी )थी चोथा चरणना अंत (वि. सं. १३९० ) सुधी विद्यमान हता, तथा तेओ खरतरगच्छमां थयेला जिनसिंहसरिना पट्टधर हता, एम तेमना पोताना उल्लेखो परथी जणाय छे. जिनप्रभसूरि नामनो प्रथम उल्लख, नागेन्द्रगच्छना उदयप्रभसरिना पट्टधर मल्लिषेणसरिए अन्य ग्रंथकारने शकाब्द १२१४-वि. सं. १३४९ मां साहाय्य रचेली सुप्रसिद्ध स्याद्वादमंजरी (हेम- चंद्राचार्यरचित अन्ययोगव्यवच्छेद द्वात्रिंशिकानी विस्तृत विवृति)मां कयों छे. ए स्थळे विशेष ख. ग. पट्टावलीमा मळता उल्लेख प्रमाणे प्रस्तुत जिनप्रभसू रि, वागड देशना झूझणू (वडोद्रा) नगरना तांबी श्रीमालगोत्र (? ज्ञाति) वणिक्ना पांच पुत्रोमांथी मध्यम(बीजा उल्लेख प्रमाणे अने दशमां लघु)पुत्र हता. १. आ जिनसिंहसूरिथी वि. सं. १३३१ लगभगमां खरतर- गच्छमाथी एक शाखा प्रकट थई हती, जे लघु खरतरगण नामथीं प्रसिद्धिमा आवी हती-एम खरतरगच्छनी पट्टावलीओमांथी सूचन मळे छे. ए शाखा-भेदने कारणे मूलगच्छ, जे वृहत्खरतरगच्छ नामथी ओळखावा लाग्यो, तेनी पट्टावलीओमां आ आचार्योनो विशेष परिचय कराव्यो जणातो नथी. " श्रीजिनप्रभसूरीणां साहाय्योदभिन्नसौरभा । श्रुतावुत्तंसतु सतां वृत्तिः स्याद्वादमचरी ।। -स्याद्वादमंजरी [प्रशस्ति श्लो०८] २.

सुलतान महम्मद.]
[५
स्पष्टता न होवाथी निश्चितरूपमां कही शकाय तेम नथी के-ए
मंजरीमां सौरभ प्रकट करवामां प्रस्तुत जिनप्रभसूरिनी ज
सहायता होय, मात्र समान समयने तथा नाम-साम्यने लईने
तेमनी संभावना करवामां आवे छे.
आ जिनप्रभसूरिए रचेली कृतियोमा प्रथम जणाती
कातंत्रविभ्रम ग्रंथनी टीका छे. तेमां
विद्वत्ता अने सूचव्या प्रमाणे ए रचना वि. सं.
विहार-स्यको १३५२ मां योगिनीपुर( दिल्ली )मां
माथुरवंशीय ठक्कुरकुलीन कायस्थ
खेतलनी अभ्यर्थनाथी थई हती. व्याकरणविषयक २६१
श्लोकप्रमाण आ वृत्तिनी प्रति, जेसलमेरना जैन भंडारमा 'छे.
आ टीकाना अंतमा पोताने ' अग्रौढधीः, विशेषण आप्यु
छे. ए पोतानी वयविषयक लघुता सूचबवा वापर्यु होय एवी
कल्पना करीए तो पण ते वखते तेमनु वय वीशेक वर्षतुं कल्पी
शकाय; कारण के एज टीकाना अंतमा 'सूरि पद साथे पोताना
नामनो निर्देश कर्यो छे. विभ्रम उपजावनार व्याकरणविषयक
१. गायकवाड ऑरिएन्टल सिरीझ् नं. २१ मा प्रकाशित
थयेल 'जेसलमेर भाण्डागारीय ग्रन्थसूची' [पृ. ४८-४९] मां
तथा तेना — अप्रसिद्धग्रन्थ-ग्रन्थकृत्परिचय' [पृ. ५८ ] मां
अम्हे आ ग्रन्थ साथे ग्रन्थकारनो संस्कृतमां संक्षेपमा परिचय
कराव्यो छे.
,

६] [ जिनप्रभसूरि अने प्रयोगो संबंधमां सूक्ष्म ज्ञान थq अने ए प्रयोगोने व्याख्यानद्वारा समजाववानी शक्ति प्राप्त थवी, सूरिपद-प्राप्ति थवी ए सर्वनो समय लक्ष्यमा लई विचार करतां जिनप्रभसूरिनो जन्म वि. सं. १३२५ लगभगमां थयो हशे एम संभावना करी शकाय. वि. सं. १५०३ मां सोमधर्मगणिए रचेली उपदेश-सप्ततिमां थयेला एक उल्लेखने तेमना जन्मसमय संबंधमां घटावीए तो वि. सं. १३३२ मां तेमनो जन्म कल्पी शकाय. तरुण वयमां ज तेमनी दीक्षा थई जणाय छे अने हरिपद पण वि. सं. १३५२ पहेलां थयु हो जोइये एम विचारी शकाय छे. वि. सं. १३९० सुधीनी तेमनी कृतियो जाणवामां आवी छे. वृद्धावस्थाने लीधे छेल्लो दशेक वर्ष तेमने निवृत्ति स्वीकारवानी जरूर पडी होय अने विक्रमनी चौदमी सदीना अंतमां तेमनुं अवसान थयुं होय एम विचारतां तेमनी आयुष्य-मर्यादा लगभग ७५ पोणोसो वर्षनी संभवे छे. तेमनी देह-विलयनी भूमि निश्चितरूपमां जाणवामां आवी नथी, तेम छतां तेमना विहार अने चास-स्थानमा तथा ग्रन्थ-रचनामां दिल्ली, देवगिरि ( दोलतावाद ) अने अयोध्याने प्राधान्य मळ्युं होय तेम १. “ देन्त -विश्वमिते वर्षे श्रीजिनप्रभसूरयः ।। अभूवन् भूभृतां मान्याः प्राप्तपद्मावतीवराः ।। -उपदेशसप्तति (जैन आत्मानंद सभा-भावनगर- द्वारा प्रकाशित पृ. ५८) - सुलतान महम्मद. ] [७ जणाय छे. विशेषतः ते तरफनो प्रदेश, तेमना स्मरणीय प्रभावो, उपदेशो, स्मारको अने उपकारोथी पावन थयो हतो. जिनप्रभसरिए रचेली कृतियोमा संवतूना निर्देशवाळी ग्रंथ-रचना कृतियो आप्रमाणे जाणवामां आवी छे:- वि. सं. १३५२ मां योगिनीपुर कातंत्रविभ्रम-टीका (दिल्ली)मां ग्रं.२६१ वि. सं. १३५६ मा श्रेणिकचरित्र (दूधा- श्रयकाव्य) तपोटमतकुट्टनशतक वि. सं. १३६३ मां कोसलानयर · . विधिप्रपा (प्रा. श्राव- विजयादशमी (अयोध्या)मां कोनी अने मुनिओनां प्रथमादर्श ले. वाच- कृत्योनी सामाचारी) नाचार्य उदयाकरगणि ग्रं. ३५७४ वि. सं. १३६४ मां कल्पसूत्र-वृत्ति(पंजिका संदेहविपौषधि) ग्रं..२२६८ वि. सं. १३६५ मां दाशरथिपुर अजितशांतिस्तव-वृत्ति १. जिनप्रभसूरिए पर्युषणा-कल्पनां दुर्गम पदो पर विवरण- रूप पंजिका रची छे, जेनुं अपरनाम सन्देहविषौषधि छे. जामनगर- निवासी पं. ही. हं, द्वारा आ ग्रंथ प्रकट थयो छे, परंतु तेमां .

८] [ जिनप्रभसूरि अने " पोप व. ९ - पोपमां (अयोध्या)मां (बोधदीपिका)ग्रं.७४० साकेतपुर उपसर्गहरस्तोत्र-वृत्ति (अयोध्या)मां (अर्थकल्पलता) साकेतपुर भयहरस्तोत्र-वृत्ति पोप शु. ९ (अयोध्या)मां (अभिप्रायचन्द्रिका) वि. सं. १३६९ मां फलोधीमां फलवधिपार्श्व स्तोत्र वि. सं. १३८० मां पादलिप्तकृतवीरस्तोत्र- वृत्ति रचना-समयवाळो उल्लेख जोवामां आवतो नथी, अन्य प्रति परथी तेनी रचना वि. सं १३६४ मां थयेली जणाय छे- " सुरीन्द्रस्यान्वये जातो नवाङ्गोवृत्तिवेधसः । श्रीजिनेश्वरसूरीणां पौत्रः पात्रमनेधसः ॥ पुत्रः श्रीमज्जिनसिंहसूरीणां रीणरेफसाम् । जग्रन्थ ग्रन्थमेतं श्रीजिनप्रभमुनिप्रभुः ।। वैक्रमे स्वीकला-विश्वदेवसङ्गव्ये तु वत्सरे x x" ही. र. कापडियाए चतुर्विशतिजिनानन्दस्तुतिनी भूमिका [पृ. ४४ ] मां 'विश्व' शब्दनी तेर संख्यावाचकतानुं समर्थन करवामां 'विश्वदेव ' शब्दवाळा उपर्युक्त पाठने दर्शावतां 'खीकला' ने बदले 'ऽस्ति कला पाठ दर्शाव्यो छे, ते असंगत लागे छे. हालमा प्रचलित कल्प-किरणावली, कल्पलता, कल्पसुबो- धिका, कल्प-कलिका, कल्प-दीपिका विगेरे कल्पसूत्रनी वृत्तियो, ,

सुलतान महम्मद. ]
वि. सं. १३८१ मां राजादि-रुचादिगण-वृत्ति
साधुप्रतिक्रमणसूत्र-वृत्ति
सरिमंत्राम्नाय(सरिविद्या-कल्प)
वि. सं. १३८५ मां [दिल्लीमां] शत्रुजयकल्प(राजप्रसाद)
वि. सं. १३८६ (शकव.१२५१)मां टीपुरी-तीर्थस्तोत्र
वि.सं.१३८७ मां देवगिरि(दोल- पावापुरी-कल्प
ताबाद )मां (दीपालिका-कल्प)
वि. सं. १३८९ मां योगिनीपुर तीर्थकल्पनी पूर्णता
(दिल्ली) मां
वि. सं. १३९० मां हस्तिनापुरमा हस्तिनापुरतीर्थ-स्तोत्र
जिनप्रभसूरि पछी लगभग सो वर्षे थयेला तपागच्छीय
पं. सोमधर्मगणिए वि. सं. १५०३
७०० स्तोत्रानी मां संस्कृतमां रचेली उपदेशसप्ततिमां
रचना सूचव्युं छे के- जेणे विविध प्रका-
रनी श्रेष्ठ प्रभावनाओवडे सुलतानने
उपर्युक्त जिनप्रभसूरिनी संदेहविषौषधि पछी लगभग अढीसो वर्षे
रचायेली छे. पाछळना वृत्तिकारोए जिनप्रभसूरिनी उपर्युक्त पंजिकानो
थोडेघणे अंशे आधार लीधो हशे, एम.मानवू अयुक्त नहि गणाय.
१. केटलाक लेखकोए आनो रचना-समय वि. सं. १३२७
जणाव्यो छे, ते समजफेरथी कर्यो जणाय छे.
२. " इत्यादि नानाप्रवरप्रभावनाभरैः सुरत्राणमपि व्यबूबुधत् ।

१.] [ जिनप्रभसूरि अने पण विशिष्ट बोध पमाड्यो हतो, जेणे सातसें स्तोत्रो अने बहु उपकारी ग्रंथो गुंथ्या हता, समस्त अज्ञान-अंधकारने दूर करनारा, शासन-प्रभावक ते जिनप्रभसरि संघर्नु भद्र- कल्याण करो.. जिनप्रभसूरिना रचेला सिद्धान्त-स्तव पर विवरण-अव- चूरि रचनार आदिगुप्त-शिष्य (तपागच्छीय ? विशालराज- गणि शिष्य ?) उपर्युक्त रचना-संवैधमां विशेषमा जणावे छे के- 'पहेला, प्रतिदिन नवीन स्तवन निर्माण कर्या पछी निदोष आहार ग्रहण करवाना अभिग्रहवाळा जिनप्रभसरिए ... " स्तोत्राणि यःसप्तशतीमितानि च ग्रन्थांश्च जग्रन्थ बहूपकारिणः ॥ स श्रीजिनप्रभसूरि१रिताशेषतामसः । भद्रं करोतु सवाय शासनस्य प्रभावकः ॥ -उपदेशसप्तति (भावनगर आ. सभा प्र.पृ. ५८-५९) १. " पुरा श्रीजिनप्रभसूरिभिः प्रतिदिनं नवस्तवनिर्माणपुर- स्सरं निरवद्याहारग्रहणाभिग्रहवद्भिः प्रत्यक्षपद्मावतीदेवीवचसाम(s). भ्युदयिनं श्रीतपागच्छं विभाव्य भगवतां श्रीसोमतिलकसूरीणां स्वशैक्ष-शिष्यादिपठन-विलोकनाद्यर्थ यमक-शेष-चित्र-च्छन्दो- विशेषादि-नवनवभङ्गीसुभगाः सप्तशतीमिताः स्तवा उपदीकृता निजनामाकिताः। -सिद्धान्तस्तवावचूरि [नि. सा. काव्यमाला गुच्छक ७,पृ.८६) " सुलतान महम्मद. ] [ ११ प्रत्यक्ष पद्मावती-देवीना वचनथी तपागच्छने अभ्युदयवाळो जाणी, पूज्य सोमतिलकसरिने पोताना शिष्य-शिष्याओ , १. वृद्धक्षेत्रसमास, सप्ततिशतस्थान ( रचना सं. १३८७ ) विगेरेना कर्ता आ. सोमतिलकसूरिनो जन्म वि. सं. १३५५ मां, दीक्षा वि. सं. १३६९ मां, सूरिपद वि. सं. १३७३ मां जंघ- रालनगरमां वीरमंदिरमा संघपति गजे करेला २५००० टकोना व्यय- पूर्वक, अने स्वर्गवास वि. सं. १४२४ मां थयेल होवानुं सूचन मुनिसुंदरसूरिए वि. सं. १४६६ मां रचेली गुर्वावली ( यशोवि- जय जैन ग्रन्थमालाप्रकाशित पृ. २८-३१ )मां कयुं छे. जिनप्रभसूरिए रचेलां पुष्कल स्तोत्रोमांथी हालमा उपलब्ध स्तवन-स्तोत्र नीचे सूचववामां आवे छे:- स्तोत्रनाम. भाषा, विशेष. प्रारंभ. पद्यसंख्या. प्रकाशन-स्थळ.. १ ऋषभदेवस्तव (सं. दशदिक्पाल- ११ [प्रकरणरत्नाकर स्तुतिगर्भ । अस्तु भा.४, पृ. २४, श्रीनाभिभूर्देवो) जैनस्तोत्रसमुच्चय पृ. २६ ] (अष्टभाषामय । निर [प्र. २. भा. २, वधिरुचिरज्ञानं). पृ. २६३] (पारसीभाषामय । ० पृ.२४७ अल्लालाहि) * आ स्तोत्र पर अवचूरि छ. २ ११ [जैन० १२] [ जिनप्रभसूरि अने ४ " विगेरेने भणवा, जोवा विगेरे माटे यमक, श्लेष, चित्र-छन्दो- (प्रा. आज्ञाप्राधान्य ११ [जैनस्तोत्रसंदोह नय-गम-भंगपहाणा) पृ. २२७] ५ अजितनाथस्तवन (सं. यमकमय । वि- २१ [प्र. २८-३२] श्वेश्वरं मथितमन्मथ) ६ चंद्रप्रभस्तवन ( षड्भाषामय । नमो १३ [प्र. र. भा. २ महासेननरेन्द्रतनूज) पृ. २६९] स्तुति (सं. देवैर्यस्तुष्टुवे तुष्टे:) ४ [, २६२ ] ८ शांतिजिनस्तवन (सं. श्रीशान्ति- २० [प्र. र. भा. ४, नाथो भगवान्) पृ. २६] ९ मुनिसुव्रतस्तोत्र (सं. निर्माय नि- ३० यगुणद्धि) १० नंमिस्तव (सं. क्रियागुप्त । २० [प्र. र. भा. २, श्रीहरिकुलहीराकर) पृ. २४४] ११ पार्श्वस्तव (सं. का मे वामेय ! १७ [प्र. २. भा. ४, पृ. ३०, का. मा. ७ गुच्छ पृ. १०७] १२ (सं. अधियदुपनमन्तो) १२ [, पृ. ११७] (सं. पार्श्वप्रभु श. ८ [प्र. र. भा. २ श्वदकोपमान) पू. २५१] (सं.श्रीपार्श्व! पादान्त ८ [ ,, पृ. २५२] नागराज !). शक्तिः) ४ -- सुलतान महम्मद. ] [१३ विशेप विगेरे नवा नवा प्रकारोथी सुन्दर, पोताना नामांकित १५ (सं. प्रातिहार्य । त्वां १० [प्र.र. भा. २, विनुत्य महिमश्रि पृ. २५९] श्रियामह) १६* , (प्रा. नवग्रहात्मक। १० [जैनस्तोत्रसंदोह दोसावहारदक्खो) पृ. २२८] १७ (सं. श्रीपार्श्व भा- ९ [भ. र. भा. ४, वतः स्तौमि ) पृ. २३ ] १८ (सं. श्रीपार्श्वः ४४ [, पृ. २६] श्रेयसे भूयात् ) " १९ (सं. पार्श्वनाथमनघ) ९ २० (सं.जीरापल्ली। जी- १५ [प्र. र. भा. २, रिकापुरपति सदैव तं) २६८ ] २१ (प्रा. फलवधि। १२ [, २६९] सयलाहि-वाहिजलहर !) २२ वीरस्तव (सं. कंसारिक्रम- २५ [प्र. र. भा. २, . निर्यदापगा-) पृ. २४५, का.७ गुच्छ पृ. ११२] २३ (सं. निर्वाणकल्या.. १९ [ पृ. ११९] णक । श्रीसिद्धार्थनरेन्द्रवंश-) * आ स्तोत्र पर टिप्पनक छे. " १४ ] [जिनप्रभसूरि अने " " ७०० सातसो स्तोत्रो भेट कर्या हतां.' २४ वीरस्तव (सं. चित्रस्तव । २७ [ जैनस्तोत्रसं. चित्रः स्तोष्ये जिनं वीरं ) पृ. ९२] २५ (सं. पंचवर्गपरि- २६ [प्र. र. भा. २, हार | स्वःश्रेयससरसीरुह ) पृ. २४२] २६ (सं. पंचकल्याणमय । ३६ [., पृ. २४९] पराक्रमेणेव पराजितोऽयं) २७ (सं. श्रीवर्द्धमानः ९ [, पृ. २५१] सुखवृद्धयेऽस्तु) (सं. लक्षणप्रयोगमय। १७ [, पृ. २६०] निस्तीर्ण विस्तीर्णभवार्णवं झै-) २९ (सं.विविधछंदोजातिरुचिर।२५[प्र.२.भा.४, असमशमनिवास) पृ. २८] ३० (सं. श्रीवर्द्धमान १३ [प्र. र. भा. २, परिपूरित) पृ. २६७ ] ३१ (प्रा. सिरिवीयराय ! ३५ देवाहिदेव !) ३२ चतुर्विशति- (सं.कनककान्तिधनुः) २९ [प्र. र. भा. २, जिनस्तव पृ. २४७, का. ७ गुच्छ पृ.११५] २८ -- ४ ३ सुलतान महम्मद. ] [ १५ तीर्थकरो, गणधरो, तीर्थो, तीर्थरक्षको, शारदादेवी, ३३ चतुर्विशति- (सं. ऋषभ ! २९ [प्र. र. भा. ४ जिनस्तवन नम्रसुरासुरशेखर ! पृ. ३१; जैनस्तो. सं. पृ. १४९] (सं. आनन्दसुन्दर- २९ [, पृ. १५१] पुरन्दरनम्र !) ३५ (सं. पात्वादिदेवो २९ [प्र. र. भा. २, दश कल्पवृक्षाः) पृ. १७५ ३६ (सं. प्रणम्यादि- २८ [प्र. र. भा. २, जिन प्राणी) पृ. २५८ ] (सं. जिनषभ ! ७ [प्र. र. भा. ४, प्रीणितभव्यसाथ) पृ. २२] ३८ (सं.आनम्रनाक्रि- २५ [प्र. र. भा. ४, पति) पृ.३०२] (सं. यमकमय । त- २८ [प्र. र. भा. ४, त्वानि तत्त्वानिभूतेषु सिद्धं) पृ. ३०३ ] (सं. श्लेषमय ।यं ३० [जैनस्तोत्रसंदोह सततमक्षमालो) पृ. २१६] (सं. ऋषभदेवम- ३० अप्रसिद्ध नन्तमहोदयं) * आ स्तवनी अवरि जयचन्द्रसरिए रची छे. ७ 20 १६ ] [ जिनप्रभसूरि अने स्तव पोताना गुरु (जिनसिंहसरि ) ए विगेरेने उद्देशीने संस्कृत, ४२ नंदीश्वरकल्प- (सं. आराध्य श्री ४८ [प्र. र. भा. २, जिनाधीशान) पृ. २५२] ४३ वीतरागस्तवन (सं, जयन्ति पादा १६ [प्र. र. भा. २, जिननायकस्य) पृ. २६१] ४४ मंत्रस्तव (सं. स्वःश्रियं ५ [प्र. र. भा. २, श्रीमदहन्तः) पृ. २५१ ] ४५ अर्हदादिस्तवन (सं. मानेनोर्वी ८ [प्र. र. भा. ४, व्यहृत परितो) पृ. २२] ४६ पंचपरमेष्टिमहा- (प्रा. किं कप्प. १३ [प्रा. जैनस्तो.सं.] मंत्रस्तव तरु रे !) ४७ पंचनमस्कृति- (सं. प्रतिष्ठित ३३ [प्र. र. भा. २, तमःपारे ) पृ. २५६] ४८ कल्याणकपंचक- (सं. निलिम्प- ८ [प्र. र. भा. २, स्तवन , लोकायितभूतलं पृ. ५६०] ४९ मंगलाष्टक (. सं. नतसुरेन्द्र ९ [प्रा. जैनस्तोत्रसं.] जिनेन्द्र !) ५० गौतमस्तोत्र (सं. श्रीमन्तं २१ [प्र. र. भा. २, मगधेषु ) पृ.२४३ का.७ गुच्छ पृ.११०] (प्रा. जम्म पवि- २५ [जैनस्तोत्रसंदोह त्तिय सिरि) पृ. २३९] स्तवन ५१ " सुलतान महम्मद.] [ १७ प्राकृत, अपभ्रंश विगेरे विविध भाषामां, विविध छंदोमां, विविध अलंकारोमां, विविध चातुर्यथी रचायेलां चित्रमय मंत्रादिगर्भित ए मनोहर स्तोत्रोमांथी लगभग ७० सीतेर जेटलां स्तोत्रो आजे पण उपलब्ध थई शके छे. एमांनां केट- लांक निर्णयसागरनी काव्यमाला( गु. ७)मां, प्रकरण- रत्नाकर (भा. २-४) मां, जैनस्तोत्र-संग्रहोमां, जैनस्तोत्रसमु- चय, जैनस्तोत्रसंदोह विगेरेमा प्रकाशित थयेलां जोवाय छे.बीजां ५२ (सं. महामंत्रमय । ९ [, पृ. २३७] ॐ नमखिजगन्नेतुः) ५३ जिनसिंहमूरि- (सं. प्रभुः प्रदद्या- १३ [प्र. र. भा. २, स्तवन न्मुनि-पक्षिपक्के-) पृ. २५५ ] १४ जिनागमस्तवन (सं. नत्वा गुरुभ्यः) ४६ [प्र. र. भा. ४, पृ.३००, का.७ गुच्छ पृ.८६] ५५ शारदास्तवन (सं. वाग्देवते ! १३ [प्र. र. भा. २, भक्तिमतां स्वशक्ति- पृ. २६४] (सं. अष्टक | ॐ ९ अप्रसिद्ध नमखिजगद्वन्दित) ६७ पद्मावती (जिनशासन चतुष्पदिका अवधारि) ५५ वर्धमानविद्या (प्रा. इय वद्धमाम विन्ना) १७ ५६ ." २ १८] [ जिनप्रभसूरि अने केटलांक पाटण, खंभात, लीवडी, बीकानेर विगेरेना जैन भंडा- रोमां जडी आवे छे. तेओए पारसी भाषामां रचेलु ऋषभजिन स्तोत्र (जैनसाहित्य-संशोधक खं. ३, अं. १ मां तथा नि. सा. प्रकाशित 'जैनस्तोत्रसमुच्चय ' मां प्रकाशित ) पाठकोनुं खास ध्यान खेंचे तेवु छे. तेमने ते विदेशी-विजातियोनी भाषा पर पण काबु हतो, जे भाषादिना अभ्यास तरफ केट- लाक डाया (1) घृणा धरावे छे. जिनप्रभरिए तो आ भापा- ज्ञानथी अने बीजा केटलाक व्यवहारज्ञान-चातुर्यादि सद्गु- णोथी विदेशी पातशाहीमां-दिल्लीश्वरना राज-दरवारमा पण सन्मान मेळव्यु हतुं अने तेओ समाजने उपयोगी अनेक सत्कर्तव्यो करवा भाग्यशाळी थई शक्या हता. शहेनशाह अकवरना दरवारमा सन्मान मेळवनार तपागच्छना उ. भानु- चंद्र अने सिद्धिचंद्र वाचक विगेरेए ए विदेशी भाषा पर काबू मेळव्यो हतो-जेओ आ आचार्य पछी लगभग बसो वर्षे थां. ए उपर सूचवेलां स्तोत्रो, वृत्ति-टीकाओ अने वीजा ग्रंथोमां कल्प-प्रदीप तेमनो कल्प-प्रदीप नामनो तीर्थकल्प १ 'कविवर समयसुंदरना प्रशिष्यरानसोमे करेल ऋषभनिन- स्तवन पारसी भाषामां मळे छे, तथा संभवत: जिनप्रभसूरिनीकृत शांतिनाथ-स्तवन पण पारसी भाषामां उपलब्ध थाय छे' एम अगरचंद वाहटा जणावे छे.

सुलतान महम्मद. ] [१९ noun wor तीर्थ-कल्प ग्रंथ ऐतिहासिक दृष्टिए अति महत्त्वनो छे. सौराष्ट्र, गुजरात, राजपूताना, मालवा, मध्यदेश, पूर्वदेश अने दक्षिणमां आवेलां जैन तीर्थोना विश्वसनीय प्राचीन इतिहासनो परिचय करावनार ए ग्रंथ तेओए देश-पर्य- टनादिद्वारा वहोळो अनुभव मेळव्या पछी वृद्धावस्थामां रच्यो जणाय छे. तेमना तीर्थ-कल्पनु अवलोकन करतां समजाय छे के-जिनप्रभसूरिए अनेक देशोमां पर्यटन कयु हतुं, अनेक तीर्थोनी यात्रा-प्रतिष्ठा करी हती, अनेक वार राज-सभाओमां प्रवेश को हतो, अनेक शास्त्रोर्नु अवलोकन कर्यु हतुं, अनेक भाषाओमां प्रवीणता मेळवी हती, काव्य-साहित्यकलामां कुशलता प्राप्त करी हती, अनेक पंडितो साथे चातुर्यगोष्टी करी हती, अनेक मुनियोने अध्ययन करावी विद्या-वृद्धि करी हती. तेमना तीर्थ-कल्पमां मुख्यताए नीचे जणावेल तीर्थों अने तीर्थ-भक्तो संबंधी संक्षेप अने विस्तारथी परिचय आपवामां आव्यो छे- तीर्थो १ शत्रुजय ५ अर्बुद (आबू) २ उज्जयंत (गिरनार) ६ मथुरा ३ पार्श्व (स्तंभन-खंभात) ७ अश्वावबोध (भरुच) ४ अहिच्छचा ८ चैभारगिरि (राजगृह) १५ अष्टापद २०] [ जिनप्रभरि अने ९ कौशांबी २५ हरिकंखी-पाई १० अयोध्या २६ शुद्धदंती ११ पावापुरी २७ अभिनंदन १२ कलिकुंड २८ चंपापुरी १३ हस्तिनापुर २९ पाटलिपुत्र(पटना) १४ सत्यपुर (साचोर ) ३० श्रावस्ती ३१ वाराणसी १६ मिथिला ३२ कोका-पार्थ (पाटण) ३३ कोटिशिला १८ कन्नाणयनयर(कन्नानूर, ३४ चेल्लण पार्श्व (दिपुरी) दक्षिण) वीर ३५ कुडंगेश्वर (उज्जयिनी) १९ प्रतिष्ठान(पेठण)पत्तन ३६ माणिक्यदेव(कुल्पाक,दक्षिण) २० नंदीश्वर ३७ अंतरिक्ष पार्श्व २१ कांपिल्यपुर ३८ फलवर्द्धि (फलोधी) पार्श्व २२ अरिष्टनेमि(शौरीपुर). ३९ समवसरण-रचना २३ शंखपुर ४० महावीर-गणघर २४ नासिकपुर ४१ तीर्थ-नामसंग्रह तीर्थ-भक्तो १ कपर्दियक्ष २ कोहंडिय देवी १७ रत्नपुर सुलतान महम्मद.] [ ૨૨ ३ अंबिका देवी ४ आरामकुंड- पद्मावती देवी ५ व्याघ्री (शत्रुजय पर अनशन करनारी वाघण) ६ मंत्रीश्वरः वस्तुपाल तेजपाल जिनप्रभसूरिए संस्कृतमां अने प्राकृतमां गयमां अने पद्यमां छटादार शैलीथी रचेला ग्रं. ३५०३ (६०) श्लोक प्रमाणवाळा आ तीर्थकल्प ग्रंथमां उपर्युक्त तीर्थों अने तीर्थ-भक्तो साथे संबंध धरावती पोताना समय सुधीनी अनेक घटनाओर्नु विश्वसनीय वर्णन कर्यु छे. जेमांथी ते ते देशो, नगरो अने राज्योनी स्थितिनो पण सारो ख्याल थई शके छे, बीजो पण घणो उप- योगी जाणवा लायक इतिहास एमांथी मळी आवे छे. ए सर्व तीर्थोना कल्पो संबंधी विशेष परिचय करावतां आ लेख- निवन्ध एक ग्रन्थरूप बनी जायएथी अहिं मात्र प्रासंगिक सूचवीशु. आ तीर्थ-कल्पमा सौथी प्रथम शत्रुजयनो कल्प छे. तेना अंतमां तेनो रचना-समय वि. सं. राज-प्रसाद १३८५ माघ व.७ शुक्रवार सूचवेल छे शत्रुजयकल्प ते साथे एक खास विशेषता तेमां सूचवी छ के- आ(शत्रुजय-कल्प)नो प्रारंभ करतांज राजाधिराज, संघ पर प्रसन्न थया; आथी आ २२] [ जिनप्रभसूरि अने -- कल्प 'राज-प्रसाद ' नामे लांबा वखत सुधी जयवंत रहो.' उपर्युक्त उल्लेख परथी विचारने अवकाश मळे अने जिज्ञासा थाय ए स्वाभाविक छे के-आमां सूचवेल दल्लीश्वर हम्मीर राजाओनो अधिराज-महान सम्राट् कोण ? महम्मदनी अने ए संघ पर केवी रीते प्रसन्न थयो ? प्रसन्नता. कोना प्रभावथी प्रसन्न थयो ? प्रसन्न थईने तेणे शुं कर्यु ? आ जैनाचार्य साथे एने शो संबंध-परिचय ? के जेथी आ ग्रंथकारने एना स्मरण माटे पोतानी एक कृतिनु-शत्रुजय-तीर्थना कल्पनुं 'राज- प्रसाद ' एबुं नाम राखवार्नु उचित समजायु. आ संबंधी अन्यत्र तपास करतां पहेलां आ ग्रंथ परथी शुं जणाय छे. ते तपासीए. उपर्युक्त तीर्थकल्पना अंतिम भागमां जिनप्रभसूरिए. ग्रंथकार तरीके पोताना नामनो निर्देश चातुर्यथी सूचवी कल्पप्रदीप ' अपरनामवाळा आ ग्रन्थने वि. सं. १३८९ प्रारम्भेऽप्यस्य राजाधिराजः सङ्के प्रसन्नवान् । अतो राजप्रसादाख्यः कल्पोऽयं जयताञ्चिरम् ।। श्रीविक्रमाब्दे बाणाष्ट-विश्वदेवमिते शितो सप्तम्यां तपसः काव्यदिवसेऽयं समर्थितः ।। " -तीर्थकल्प (शत्रुजयकप ) .

सुलतान महम्मद. ]
[ २३
मां भाद्रपद व० १० ने दिवसे पृथ्वीन्द्र ( पातशाह ) हम्मीर
महम्मदना प्रतापी राज्य अमलमां योगिनीपत्तन(दिल्ली)मां
परिपूर्ण कर्यो हतो-एम सूचव्युं छे. ए उपरथी विचारी
शकाय छे के-शत्रुजय-कल्पना अंतमां सूचवायेल राजाधि-
राज ए अन्य कोइ नहि, परंतु दिल्लीश्वर सुलतान हम्मीर
महम्मद होवो जोइये, के जेने इतिहासमां महम्मद तघलक'
नामथी ओळखवामां आवे छे अने जे वि. सं. १३८१
( ईस्वी सन् १३२५ ) थी वि. सं. १४०७ (ईस्वी सन्
१३५१ ) सुधी-आजथी लगभग छसो वर्ष पर दिल्लीना
--
" को(का)ऽर्थ भ( सृ )जेत् ? किं प्रतिषेधवाचि ?
पदं ब्रवीति प्रथमोपसर्गः ।
कीदृग् निशा ? प्राणभृतां प्रियः कः ?
के प्रन्थमेत रचयांप्रचक्रुः ? ॥”
-श्रीजि न प्रभसूरयः ।
नन्दानेकप-शक्ति-शीतगुमिते श्रीविक्रमोर्वीपते-
वर्षे भाद्रपदस्य मास्यवग्जे सौम्ये दशम्यां तिथौ ।
श्रीहम्मीरमहम्मदे प्रतपति क्ष्मामण्डलाखण्डले
ग्रन्थोऽयं परिपूर्णतामभजत श्रीयोगिनीपत्तने ।
तीर्थानां तीर्थभक्तानां कीर्तनेन पवित्रितः ।
कल्पप्रदीपनामाऽयं ग्रन्थो विजयतां चिरम् ॥"
. तीर्थकल्प [, का, प.. ६४]

२४ ] [ जिनप्रभसूरि अने तख्त पर आरूढ रही प्रतापी सार्वभौम तरीके राज्यअमल करतो हतो. जेना संबंधमां इंग्लीश ऐतिहासिक पुस्तकोमां केटलुक जाणवालायक सचित्र वृत्तान्त मळी आवे छे. आराजाधिराज हम्मीर महम्मद तवलकक्यारे? कई रीते संघपर प्रसन्न थयो? जिनप्रभसूरिए शत्रुजय तीर्थकल्पमा एनुं स्मरण शामाटे कयु ? एनी पाछळ रहेला गूढ इतिहासनो भेद समजवा तत्कालीन अथवा तेना निकटना प्रामाणिक विश्वसनीय उल्लेखो तपासवा जोइये. सौथी पहेलां स्वयं ए ग्रन्थकारे ए संबंधी क्याय सविस्तर स्पष्टताथी सूचव्यु छे के केम ? ए शोध, जोइये. ए शोध करतां तेमना तीर्थकल्प तरफ दृष्टि करीए. आ तीर्थ- १ प्राचीन बृट्टिपनिकामा सूचवायेला अने मर्हम प्रो. पिटर्सनना रि. ४ था [पृ. ९१ थी १०० ] मां स्वल्प अंशो साथे निर्दिष्ट करायेला आ 'तीर्थकल्प' तुं प्रकाशन कार्य, एशियाटिक सोसायटी ऑफ बेंगाले हाथ धर्यु हतु; परंतु इ. स. १९२३ मा प्रकट थयेल एक भाग[पृ. ९६ ] पछोनो भाग हजु अम्हाग जोवामां आवेल नथी. आ लेखनी बीजी आवृत्ति प्रकाशमां आवे छे त्यारे आ 'विविध तीर्थकल्प ' प्रसिद्ध साक्षर जिनविजयजीद्वारा संपादित थइ, सिंघी जैन-ग्रन्थमालामा विश्वभारती सिंघी जैन-ज्ञानपीठ शान्तिनिकेतनद्वारा प्रकाशित थाय छे, ए खुशी थवा जेवू छे.

सुलतान महम्मद. ] [२५ + कल्पनी नवीन लखावेली प्रति प्रवर्तकेजी श्रीकान्तिविजयजी महाराजना संग्रहमा वडोदराना आत्मारामजी जैन-ज्ञानम- न्दिरमा छे, ते प. ४१ थी ४४ मां तथा सं. १९७१ मा प्रकाशित थयेल ' अभिधानराजेन्द्र ' नामना प्राकृतमहाकोष [ भा. ३, पृ. २१२ थी २१५ ] मां जोवामां आवता अशुद्धियोनी बहुलतावाळा प्राकृतभाषामय ' कन्नाणय- पुर-बीरकप्प ' मां प्रस्तुत विषय साथे संबंध धरावतो इतिहास मळी आवे छे. कन्नाणयनयर-कल्पमा जणावेल ऐतिहासिक वृत्तान्त. " अगणित गुणगणवाळा, मेरुपर्वत जेवा धीर महावीर- जिनने प्रणाम करीने कमाणयपुर( कानानूर, दक्षिण )मां रहेली ते( महावीर जिन )नी प्रतिमानो कंइक कल्प ( आम्नाय-प्राचीन अर्वाचीन इतिहास ) हुँ कहीश:- चोलदेशना अवतंस( आभूषण-तिलक )रूप कनाणय- १ जिनप्रभसूरि तथा तेमना अनुयायी विद्यातिलक मुनिना उल्लेखोमां आ नगर कन्नाणयपुर, कण्णाणयनयर, कना, य, कन्यानयनीय विगेरे नामोथी सूचवायेल छे. प्रो. पिटर्सनना रिपोट ४ [पृ. ९५, ९९ ] मां एने बदले कल्याण, कात्याय- नीय वगेरे नाम पण प्रकट थयेल छे. एने अनुसरीने पं. ही. हं. .

२६ ] [ जिनप्रभरि अने .... .." नयर( कानानूर, दक्षिण )मां विक्रम- कर जैनधर्मना प्राचीन इतिहास' [भा. १, पृ. ३६] मां, 'जैनग्रंथावली' [ पृ. ३३ ] मां, · जैनसाहित्यमें इतिहास के साधन ' [जैनसाहित्य-संमेलन रि. ले. पृ. १० ] विगेरेमां पण तेवू नाम दर्शावेलुं जोवामां आवे छे; परंतु ए संबंधमां वधारे विचार अने तपास कर्या पछी जणाय छे के-दक्षिणमा चोलदेशमा श्रीरंगम टापू( पट्टन )नी उत्तरे पांच माइल पर आवेलु, हालमां कन्नानूर( कानानूर ) नामथी ओळखातुं ते ज आ नगर होवू जोइये. जे नगर एक वखते होयसाल राजाओनी गजधानी तरीके उन्नत थई प्रसिद्धिमां हतुं. होयसाल वीर सोमेश्वरे तेने किल्लाथी सुरक्षित कर्यु हतुं. विशेष माटे जुओ केन्त्रीज हीस्ट्री ऑफ इन्डिया [वॉ. ३, पृ. ४८१, ४८४, ४८८ ] आ नाम निश्चित करवामां बरोडा कॉलेजना इतिहासना प्रोफेसर म्हारा स्नेही श्रीयुत केशव- लालभाई हिं. कामदारनो हुँ खास आभारी छै. विक्रमनी तेग्मी सदीना पूर्वार्धमां त्यां महावीर-प्रतिमानी प्रतिष्ठा थयेली होई श्रीमान् जैनोनुं ए वास स्थान बन्यु होवू जोइए अने ते समये ते व्यापार विगेरेथी सुसमृद्ध स्थितिमा होवू जोइये. १ अहिं सूचवेल विक्रमपुर पण उपर्युक्त पुस्तकमा सूचवेल दक्षिणमांनुं उपर्युक्त कन्नानूरनी समीपर्नु जणाय छे, जिनपतिसूरि-रासमां-' अत्थि मरुमंडले नयरविक्कमपुरे जसोवद्धणु जग जाणिए ए' जणावेल होइ विक्रमपुर जेसलमेर-निकटवर्ती स्थान होवु जोइए' एम अगरचंदजी नाहटा जणावे छे, ते विचारणीय छे.

सुलतान महम्मद. ] [२७ . महावीरनी पुरवासी, जिनपतिसूरिना काका शाह प्राचीन मनोहर मानदेवे करावेली अने वि. सं. १२३३ प्रतिमा मां आषाढ शु. १० गुरुवारे अम्हारा ज पूर्वाचार्य श्रीजिनपतिसरिए प्रतिष्ठित १ आ जिनपतिसूरिनो संस्कृतमा संक्षेपमा परिचय अम्हे 'जेसलमेर-भांडागारीय-ग्रंथसूची' ना अप्रसिद्ध प्रन्थ-ग्रन्थकृत्प- रिचय [ पृ. २८ ] मां तथा 'अपभ्रंशकाव्यत्रयी' नी भूमिका [पृ. ६५-६८ ] मां आप्यो छे. ते परथी समजाशे के-संघपट्टक- टीका, पंचलिंगीविवरण, प्रबोधोदय वादस्थल विगेरे ग्रंथो रचनारा आ प्रौढ विद्वान् वि. सं. १२१० थी १२७७ सुधी विद्यमान हता. तेमना पट्टधर जिनेश्वरसूरिए अने जिनपाल उपाध्याय, सूरप्रभ उपाध्याय, पूर्णभद्रगणि, सुमतिगणि विगेरे विद्वान् शिष्योए पण ग्रन्थ-रचनादिद्वारा जन-समाज पर घणो उपकार कयों छे. आ जिनपतिसूरिए गुजरातनी भूमिमां आशापल्ली(आसावळ )मां अने पृथ्वीराजनी सभामा प्रतिवादियोने परास्त करी वादमा जय मेळव्यो हतो अने विधिमार्गने विस्तार्यो हतो-एवा अनेक उल्लेखो मळी आवे छे, जे अम्हे त्यां दर्शाव्या होवाथी अहिं आ लेखने विस्तारीशुं नहि. २ आ शाह मानदेव, ऊकेश( ओसवाल ) वंशना हता, तेमना वंशवें विस्तृत वर्णन, जिनपतिसूरिना प्रशिष्यः अने जिने- श्वरसूरिना शिष्य कुमारगणि कविए चंद्रतिलक उपाध्यायना अभय- २८ ] [ जिनप्रभसूरि आने करेली, स्वप्नना आदेश प्रमाणे मम्माणशैल( खाण )मां प्रकट थयेल जोई( ज्योती )रस उपल( रत्न )नी पडेली, अनक- बाल (?) नामनी पृथ्वी-धातुविशेपना स्पर्शवडे नखमात्र लागतां पण घंटानी जेम ध्वनि करती, २३ त्रेवीश पर्व ( आंगळ ) परिमाणवाळी, संनिहितप्रातिहार्यवाळी (चमत्कारी) महावीर-प्रतिमा श्रावकसंघवडे लांचा बखत सुधी पूजाती हती. वि. सं. १२४८ मां चाहुयाण( चौहाण )कुळना प्रदीप पृथ्वीराज नरेन्द्र, सुलतान साहबदीन शहाबुद्दीन घोरी (शहाबुद्दीन चोरी )वडे मरण पामतां, ना अमलमां गुप्त राज्य-प्रधान परमश्रावक शेठ रामदेवे कुमारचरित( पं. ही. हं. प्रकाशित )नी प्रांत प्रशस्तिमा ४८ श्लोकोथी कर्यु छे. ए परथी समजाय छे के-जिनपतिसुरिना पिता यशोवर्धन, आ शाह मानदेवना लघुवंधु हता. तेमना वंशना विशेष परिचय माटे जुओ पूर्वोक्त प्रशस्ति तथा गुजरातीमां अम्हे सूचवेल सार [वीजापुर-बृहद्वृत्तांत वुद्धिसागरजी ग्रंथमाळा, प्र. अध्यात्मज्ञान प्र. मंडळ आवृत्ति २ जी पृ. १३६-१४८ थी १५०] १ जैनोना प्रज्ञापना( पन्नवणा )सूत्रमा तथा वराहमिहिरनी बृहत्संहिता[ पृ. ४०६ ]मां उपलरत्नोनी विविध जातिमां 'ज्योतीरस' नामनी पण एक जाति सूचवी छे. जावडशाहे वि. सं. १०८ मां शचुंजय पर प्रतिष्ठित करेली श्रीआदीश्वरनी मूर्ति पण आ ज जातिनी हती-एम अन्यान्य ग्रंथो परथी जणाय छे. स सुलतान महम्मद. ] [ २९ श्रावक-संघने लेख मोकल्यो के-'तुरकोनुं राज्य थयु छे. श्रीमहावीरनी प्रतिमा अत्यंत छानी रीते धारण करी राखवी.' त्यारपछी श्रावकोए दाहिमकुलना मंडनरूप कयंवास मांडलिकना नामथी अंकित थ्येला कयंबास स्थळमां विपुल वेलुना पूरमां ते प्रतिमा स्थापी हती. वि. सं. १३११ मां अतिदारुण दुर्भिक्ष थतां निर्वाह न थवाथी जाजओ नासनो सूत्रधार जीविका महावीर- निमित्ते कुटुंब साथे कन्नाणय(कन्नानूर) प्रतिमानुं पुनः थी सुभिक्षदेश तरफ चाल्यो हतो. 'पहेलं. प्रकट यर्बु प्रयाण थोडं करवु जोइए । एम विचारी कर्यवास स्थळमां ( ते मूर्तिवाळा प्रदेशमां) ज ते राते वास को हतो. अर्धी राते देवताए तेने स्वप्न आप्यु के-'अहिं ज्यां तुं सूतो छे, तेनी हेठे आटला हाथ पर भगवंत महावीरनी प्रतिमा छे. तारे पण देशांतर जर्बु नहि पडे, अहिं ज तारो निर्वाह थशे. संभ्रमपूर्वक जागीने तेणे ते स्थानने पुत्रादिद्वारा खणाव्युं एटले ते प्रतिमा दीठी. तेथी हृष्ट तुष्ट थयेला तेणे नगरमा जइ श्रावकसंघने निवेदन कयु. श्रावकोए महोत्सवपूर्वक परमेश्वरने प्रवेश करावी चैत्यगृह-मंदिरमा स्थाप्या. त्रिकाळ पूजावा लाग्या. अनेक वार तुरकोना उपद्रवथी मुक्त रह्या. श्रावकोए ते सूत्रधारने वृत्ति-निर्वाह करी आप्यो. प्रतिमानो परिकर शोधाववा छतां ३० ] [ जिनप्रभसूरि अने Nnn... - पण तेओने प्राप्त थयो नहि. कोइपण स्थळ-परिसरमां ते रह्यो होवो जोइए. प्रशस्ति वर्ष विगैरे तेना पर ज लखेलुं संभवे छे. एक वखते न्हवण थया पछी भगवंतना शरीर पर परसेवो पसरतो दीठो, लूवा छतां पण ते अटक्यो उपद्रवना नहिं; तेथी विदग्ध श्रावकोए जाण्यु के- वखतमा ' कोइपण उपद्रव अवश्य अहिं थशे.' एवामां प्रभातमा जट्टय(जेठवा) राजपूतो (? यवनो )नी धाड आवी. नगरने चौतरफथी विध्वस्त- विनष्ट कयु. एवी रीते प्रकट प्रभाववाळा स्वामी वि. सं. १३८५ सुधी पूजाया. वि. सं. १३८५ मां आवेला आसीनगरना बिय (?) वंशमां धयेला घोर परिणामवाळाए (? तुगलकाबादमां घोरीए) श्रावकोने अने साधुओने बंदी शाहीखजानामां (केदी) करीने विडंब्या. पार्श्वनाथनुं शैलमय विव भांग्युं अने महावीरनी ते प्रतिमाने अखंडित ज गाडामां चडावीने दिल्लीपुरमां १ इ. सन्, १३२८ [वि. सं. १३८५ ]मां दक्षिणमा मुसलमानी हुमलो थयो इतो, अने ते वखते मदुरा अने तेनी वहारतुं मुख्य कनानूर, महम्मद तघलके कब्जे फर्यु हतुं, एवो इतिहास मळी आवे छे (जुओ केस्त्रीज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया चॉ. ३, पृ. ४८८). संभव छ के-उपर्युक्त खेदजनक घटना ते वखते बनी हशे. .

सुलतान महम्मद ] [३१ , आणीने तुंगुलकाबादमा रहेला सुलतानना भंडारमा स्थापी. ते एवा आशयथी के-'सुलतान अहिं आव्या पछी जेम फरमावशे तेम करशु. एथी ते प्रतिमा १५ मास सुधी तुरकोना कब्जामां रही. कालक्रमे महम्मद सुलतान देवगिरि ( दोलताबाद) नगरथी योगिनीपुर(दिल्ली)मां आव्यो. जिनप्रभसूरिने अन्यदा खरतरगच्छना अलंकाररूप, पातशाहनुं जिनसिंहसूरिना पट्ट पर प्रतिष्ठित थयेला आमंत्रण जिनप्रभसूरि, विविध देशोमां विहार करता दिल्लीनासाहपुर(शाखापुर-परा)मांआव्या. क्रम प्रमाणे महाराज-सभा(पातशाही दरवार)मां पंडितोनी गोष्ठी थतां महाराजाए( पातशाहे) पूछ्यु के-' अतिशय विशिष्ट पंडित कोण छे ?' जोषी धाराधरे तेमना (जिनप्रभ- सूरिना) गुणोनी स्तुति करी. त्यारपछी महाराजे ते १ आ तुघलकाबाद, दिल्हीथी पूर्वमा ६ माइल पर ग्यास्- उद्-दीन तघलके ( महम्मद तघलकना पिताए ) इ. सन् १३२१ (वि. सं. १३७७) लगभगमा वसाव्यु हतुं, तेम अन्यत्र इतिहा- समां वांचवामां आवे छे. एनुं चित्र पण मळी आवे छे. २ वि. सं. १३३१ लगभगमां खरतरगच्छनी लघुशाखा आ आचार्यथी प्रवर्ती हती, ए पहेलां कहेवाइ गयुं छे.

३२ ]
[ जिनप्रभसूरि अने
~
..
( पं. धाराधर )ने ज मोकली जिनप्रभसरिने बहुमानपूर्वक
आमंत्रण करी बोलाव्या.
[वि. सं. १३८५] पोप शु. २ नी सांझे मूरिजी महा-
राज महाराजाधिराज(महम्मद)ने भेट्या.
पातशाहे सुलताने मूरिजीने अत्यंत पासे बेसारी
जिनप्रभसूरिनो कुशलादि वृत्तान्त पूछयो. सरिजीए नवीन
करेल सत्कार काव्य रची आशीर्वाद आप्यो, ते तेणे
सांभळ्यो. लगभग अर्धी रात सुधी एकां-
तमां गोष्ठी करी. राते त्यां( पातशाही महेलमां) ज वास
करावीने प्रभाते सरिजीने फरी वोलाव्या. संतुष्ट थयेला महा-
नरेंद्रे १००० गायो, द्रव्यसमूह, श्रेष्ठ बाग, १०० वस्त्रो, १००
कांवल अने अगर, चंदन, कपूर विगेरे सुगंधी द्रव्यो देवा
मांड्यां; परंतु साधुओने ए न कल्पे एम महाराजाने समजावी,
गुरुजीए ते सर्व वस्तुओनो प्रतिषेध कयों. तेम छतां 'राजाधिरा-
जने अप्रीति न थाओ' एम विचारी राजाभियोगवडे गुरुजीए
तेमांथी कंवल, वस्त्र, अगर विगेरे कंइक अंगीकार कर्यु, ते
पछी विविध देशांतरमांथी आवेला पंडितो साथे वाद-गोष्ठी
करावी सुलताने मदकल(श्रेष्ठ) वे हाथीओ अणाव्या. तेमांना
एक पर गुरुजी (जिनप्रभसूरि )ने अने वीजा पर जिनदेव
, १ अहिं सूचवेल जिनदेवसूरि, जिनप्रभसूरिना पट्टधर
जणाय छे. जैनप्रन्थावली[.पृ. ३२, ७९ मां जिनदेवसूरिने
•"

सुलतान महम्मद. ] [३३ आचार्यने चडावी, सुलताननी आठ मदन भेरीओ वागतां, यमल शंखो फूंकाता, मृदंग, मर्दल, कंसाल, ढोल विगेरेना शब्दो घुमघुम थतां, भट्ट-चट्टो पाठ करते छते, चारे वर्णो साथे अने चारे प्रकारना संघ साथे मूरिजीने पोसहशा- लाए( उपाश्रये) पाठव्या. श्रावकोए प्रवेश-महोत्सव कयों. महादानो आप्यां. कन्नाणय-कल्प-परिशेष रचनारा आगळ जणावेला विद्यातिलक अपरनाम सोमतिलकसूरिना शिष्य सचव्या छे; परंतु ते. विद्या- तिलकमुनिना ज जणावेला, उल्लेख प्रमाणे प्रस्तुत जिनप्रभसूरिना शिष्य सिद्ध थाय छे. वि. सं. १३८३ (?)मां हैमनाममालानो शिलोन्छ( नि. सा. ना अभिधानसंग्रहमा प्रकाशित) रचनार जिनदेवसूरि पण एज होवानुं अनुमान छे. १ आ प्रमाणे जैन आचार्ये हाथी पर चडवू, ए मुनिधर्म- विरुद्ध विचारणीय विचित्र घटना छे; छतां उपर्युक्त उल्लेग्व परथी एवो आशय समजाय छे. राजाभियोग आदिनु अवलंबन लइ भवि- व्यना लाभालाभनी तरतमता विचारी समय-धर्मने मान आपी, अपवादथी एम कर्यु हशे. वि. सं. १३३४ मां प्रभाचंद्रसूरिए रचेला प्रभावकचरित्र(पृ. २५१ थी २६०)मां जणाव्या प्रमाणे-सूराचार्य नामना विद्वर्य जैनाचार्य भोजराजानी सन्मुख जतां हाथी पर आरूढ थया हता अने भीमदेवे तेमनो पाटणमा प्रवेशोत्सव को ३

३४ ]
[ जिनप्रभरि अने
विशेषमां पातशाहे सकळ श्वेतांवर दर्शनने उपद्रवथी
रक्षण करवामां समर्थ फरमान समर्पण कर्य.
जैनश्चे.तीर्थ-रक्षा गुरुजीए तेनी नकलो चारे दिशाओमां
फरमान मोकलावी. शासननी उन्नति थइ, अन्यदा
सरिजीए शत्रुजय, गिरनार, फलोधी
विगेरे तीर्थोना रक्षण माटे फरमान माग्यु, सार्वभौमे ते ते ज
क्षणे आप्यु. तेने तीर्थोमां मोकलाव्यु.
वंदी-मोचन गुरुजीनुं वचन थतां ज राजाधिराजे
अनेक बंदी( केदी तरीके पकडेला )ओने मुक्त कर्या हता.
फरी सोमवारना दिवसे गुरुजी राज-कुलमो पहोंच्या.
...
त्यारे पण तेओ हाथी पर आरूढ थया हता. चैत्यवासीओना
प्राबल्यकालमा अने मुसलमानी आक्रमणना युगमां शिथिलाचार न
गणातां शासन-प्रभावना अथवा दर्शन-गौरवना रूपमा ए गणायु
जणाय छे.
: १ आ परथी स्पष्ट समजी शकाय तेम छे के-पहेलां नणा-
व्या प्रमाणे वि. सं. १३८५ मां माघ व.
७ शुक्रवारे रचायेल
शत्रुनय-कल्प, दिल्लीमां रचायो होवो जोइए अने राजाधिराजे
(महम्मद तघलके) ए ज समयमां जिनप्रभ सूरिना परिचयथी
तेमना वचनने मान आपी संघ-रक्षानां तथा शत्रुजय विगेरे तीर्थोनां
फरमानो आप्यां जणाय छे.

सुलतान महम्मद. ]
[३५
वरसता वरसादमां सुलतानने भेट्या.
महावीर प्रतिमान गुरुजीना कादवथी खरडायेला पगने
समर्पण-सन्मान महाराजाए मलिक कापू( फू )र पासे
श्रेष्ठ वस्त्र-खंडवडे लूहाव्या. त्यारपछी
आशीर्वाद आपतां अने वर्णना-काव्यनुं व्याख्यान करतां महा-
नरेन्द्र चित्तमां अत्यंत चमत्कार पाम्या. अवसर जाणीने सर्व
स्वरूप कहेवापूर्वक भगवंत महावीरनी ते प्रतिमा मागी.
एकछत्र वसुधाना अधिपतिए( महम्मद सुलताने ) सुकुमार
गोष्ठीओ करतां ते आपी. तुगुलकाबादना खजानामांथी
असूअग( असूया करनार!) मलिकोनी खांधे स्थापन करावी,
सकल सभा समक्ष पोतानी आगळ अणावी, दर्शन करी, गुरु-
जीने ते समर्पण करी. त्यारपछी सकल संघे महोत्सव प्रभा-
वनापूर्वक सुखासन( पालखी )मां स्थापी ते प्रतिमाने मलिक
ताजदीन-सराईमां चैत्यमा स्थापी. गुरुजीए वासक्षेप करतां
महापूजाओथी पूजाय छे.
त्यारपछी महाराजना' आदेशवडे जिनदेवसूरिने बीजा
चौद साधुओ साथे. (पोताना प्रति-
सूरि-विहार निधि तरीके) दिल्ली-मंडलमां
गुरुजीए अनुक्रमे महाराष्ट्र-मंडल (दक्षिण)
तरफ प्रस्थान कर्यु. श्रावकोना संघ साथे जता गुरुजीने राजा-
धिराजे वळद, ऊंट, घोडा, गुलयिणी(तंबू), सुखासन(पालखी)
विगेरे सहायक सामग्री आपी हती.

३६ ] [ जिनप्रभसूरि अने बच्चे आवेलां नगरोमां प्रभावना करता, पगले पगले संघोवडे सन्मान कराता अने अपूर्व देवगिरि तीर्थोंने नमता सूरिजी अनुक्रमे देवगिरि (दोलताबाद)मां (दोलताबाद ) नगरे पहोंच्या. संधे प्रवेश- महोत्सव को. संघ-पूजा थइ. संघपति जगसीह, साहण, मल्लदेव विगेरे संघ साथे पइटाग( प्रतिष्ठान-पेठण )पुरमा जीवंत- प्रतिष्ठान(पैठण) स्वामी मुनिसुव्रतनी प्रतिमानी यात्रा पुर-यात्रा करी. पछी आ तरफ दिल्लीमां विजयकटकमां जिनदेवसरिए १ देवगिरि(दोलताबाद)मा सं. १३८३ का. शु. १३ ने दिवसे राजसीहना सुत शाह तिहुणसिंहे उपदेशमाला-लघुवृत्ति लखावी हती (जुओ पिटर्सन रि. ३, पृ. १३१). ए विगेरे जोतां विक्रमनी चौदमी सदीना उत्तगर्धमां आ नगरमा श्रीमान् जैनो वसता होई आ नगर व्यापारादिद्वाग सुसमृद्ध अने उन्नत स्थितिमा हतु-तेमं जणाय छे. अन्यत्र मळता इतिहास परथी जणाय छे के-आ महम्मद तघलक पातशाहे आ देवगिरिने पोतानी राजधानी बनाक्वा दौलतथी आबाद (दोलताबाद) बनाव्युं हतुं. २ जिनप्रभसूरिना तीर्थकल्पमा प्रतिष्ठानपत्तननो पण कल्प छे, ए उपर सूचित थइ गयुं छे.

सुलतान महम्मद. ] [ ३७ महाराजने दीठा (सुलताननी मुलाकात दिल्लीमा सुलताने करी.) महाराजे(सुलताने) बहु मान आप्यु. समल सराई, एक सराई आपी, तेनुं नाम 'सुलतान- चैत्य,उपाश्रय वि. सराई' स्थाप्यु.त्यां ४०० चारसो श्राव- कोनां कुलो(कुटुंबो)ने वास माटे आदेश को. कलिकाल-चक्रवर्तीए (सुलतान महम्मदे) त्यां पोसहशाला ( उपाश्रय ) अने चैत्य कराव्यु, ते चैत्यमा ते ज(कन्नानूरना) देव महावीरने स्थाप्या. भगवंतने परतीथिको( अन्यधर्मीओ) तथा श्वेताम्बर अने दिगंवर भक्त श्रावको त्रिकाळ महामूल्य पूजा-प्रकारोथी पूजे छे. एवी रीते महम्मदशाहे करेली शासननी उन्नति जोई लोको पंचम काळने पण चोथा काळ( आरा) तरीके ज अनुभवे छे. क्लेश दूर करनारा वीरजिनेशनु, मन अने नयनोने आनंद आपनार्थी, विघ्नादिने प्रतिहत करनारुं आ विच यावच्चंद्र- दिवाकरौ जयवंत रहो. कनाणयपुर( कन्नानूर )मां रहेल देव महावीरनी प्रति- मानो आ कल्प, जिनसिंहमुनींद्रना शिष्य मुनीश्वरे (जिनप्रमे) लख्यो छे." १ जिनपभसूरिए ३५०३ साडात्रण हजार *लोकप्रमाण रचेला आ तीर्थकल्पना अन्तमा पोताना नामनो निर्देश कर्यो छे, .

३८ ] [ जिनप्रभसूरि अने . [२] 'हवे संघतिलकसरिजीना आदेशथी विद्यातिलकमुनि. तेम तेमां आवेला जुदा जुदा कल्पोना अन्तमां पण प्रायशः पोतार्नु नाम सूचित क्युं छे; तेम छतां तेमां ज आवेला आ कनाणयनयर ( कन्नानूर )-बीरना कल्पना अंतमा पोतानुं नाम स्पष्ट रीते न सूचवता प्रकारान्तरे सूचव्यु छे. तेम करवानो हेतु एवो समजाय छे के-आ कल्पमा सूचवेली महत्त्वनी घटना साथे ए कल्पकारनो निकट संबंध होइ पोताना महत्त्वने प्रकाशित करनारी छे. जैन- शासनना गौरवने सूचवती, जैनसमाजने आनन्दजनक ए घटना वास्तविक इतिहास-प्रतिपादननी दृष्टिए एमने वर्णववी पडी छे तेम छतां कोई एने आत्मश्लाघा -दोषरूप न समजे एवा आश- यथी पोतानी लघुता सूचववा अने ए महत्त्वनां कार्यो थवामां गुरु. प्रभाव ध्वनित करवा 'जिनसिंहमुनीन्द्रना शिष्य मुनीश्वरे आ कल्प लख्यो छे.' एवं जणाव्यु छे. जिनसिंहसूरिना शिष्य सूरि तरीके 'जिनप्रभसूरि' नामनुं सूचन, आज तीर्थकल्प ग्रंथमा पहेलां आवी गयेल होवाथी अहिं स्पष्ट नामनिर्देश न करवा छतां आ कन्नाणयनयर( कन्नानूर )-वीर-कल्पना कर्ता तरीके ए जिनप्रभ- सूरि ज समजवा जोईए. १ आ संघतिलकसूरि, रुद्रपल्लीय गच्छना गुणशेखरसूरिना शिष्य हना. तेओए विद्याभ्यास आ जिनप्रभसूरि पासे को हतो. तेमणे वि. सं. १४२२ मां सारस्वत पत्तन(पाटण )मां 'सम्य- , -- सुलतान महम्मद.] .܀ - कन्नाणय-वीरकल्पनो परिशेष लेश कहे हे- कृत्वसप्तति' ग्रंथ पर गद्य पद्य संस्कृत प्राकृत कथाओनी छटावाळी ७७११ श्लोकप्रमाण विस्तृत विवृति रची हती. तेना. प्रारंभमां पोताना विद्यागुरु तरीके, शाह महम्मदने मुदित करनारा आ जिनप्रभसूरिनु स्मरण कयु छे:- “दि(दिल्ल्यां साहिमहम्मदं शककुलमापालचूडामणि येन ज्ञानकलाकलापमुदितं निर्माय षडदर्शनी प्राकाश्यं गमिता निजेन यशसा साकं स सर्वागम- ग्रन्थज्ञो जयतात् जिनप्रभगुरुर्विद्यागुरुनः सदा ॥" -सम्यक्त्वसप्ततिवृत्ति (दे.ला. पु. फंड प्रकाशित श्लो०८) भावार्थः-जेणे दिल्लीमां शककुलना गजाओमां चूडामणि जेवा शाह महम्मदने ज्ञानकलाना समूहथी इर्षित करी पोताना यश साथे छ दर्शनोने प्रकाशमा आण्यां; सर्व आगम-प्रन्थोना जाण अने अम्हारा विद्यागुरु ते जिनप्रभसूरि सदा जयवंत रहो. प्रो. पिटर्सनना रि. ४ थामां आ ग्रंथनो उल्लेख थयेलो छे, परंतु त्यां आ श्लोकनो आशय समजवामां फेरफार थवाथी आ एक ज जिनप्रभसूरिने जुदा जुदा ओळखावी बीजा जिनप्रभसूरिने रुद्रपल्लीयगच्छना अने षड्दर्शनी ग्रंथ बनावनार तरीके सूचव्या छे. एनो अनुवाद अन्यत्र ‘जैनधर्मना प्राचीन इतिहास ' (पं. ही. हं. भा. १, पृ. ३७) मां, 'गच्छमत-प्रबंध' (अध्यात्म ज्ञान प्र. मंडळ प्र. पृ. ४७) मां तथा बीजा ग्रंथोमां पण गतानुगतिकताथी ४० ] [ जिनप्रभसूरि अने . भट्टारक श्रीजिनप्रभसरिए ते वखते [वि. सं. १३८५ उतरी आवेल छे. खरी रीते जोतां खरतरगच्छना आ जिनप्रभसूरिथी अन्य रुद्रपल्लीयगच्छना जिनप्रभसूरि थयानुं त्यां सूचन नथी, तेम तेओए षड्दर्शनी ग्रन्थ रच्यानो आशय, उपरना श्लोकमांथी नीळतो नथी. संघतिलकसूरि, रुद्रपल्लीयगच्छना गुणशेखरसूरिना शिष्य होवा छतां तेमणे उपरनी कृतिमा विद्यागुरु तरीके जिनप्रभसूरिनुं स्मरण फयु छे अने पोताना एक शिष्य विद्यातिलक मुनिद्वारा कन्नाणय वीर-कल्पनो परिशेष रचावी, पोताना विद्यागुरु तरफ कृतज्ञता दर्शावी छे. २ आ विद्यातिलकमुनि, उपर जणावेला संघतिलकसूरिना शिष्य इता अने तेमनुं वीजु नाम सोमतिलकसूरि जणाय छे. वि. सं. १३९७ मां लघुस्तबनी वृत्ति रचनारा आ विद्वाने वि. सं. १३९४ (१) मां शीलोपदेशमाला ग्रंथ पर ७००० श्लोक प्रमाण शीलतरंगिणी नामनी विस्तृत विवृति रची छे. तेमां पोताना गुरु संघतिलकसूरिनो परिचय करावतां, शकराजाने प्रतिबोध करनारा प्रस्तुत जिनप्रभसूरिद्वारा तेमने प्राप्त थयेल सूरिपद प्रमुख तत्वविद्यानुं सूचन कयु छे. पं. ही. हं.द्वारा प्रकट थयेली आवृत्तिमां . अन्तिम प्रशस्तिनो भाग जोवामां आवतो नथी, परंतु अहिं प्राच्यविद्या- मन्दिरनी प्रतिमां छेः- " तदीयचरणद्वयीसरसिजैकपुष्पन्धयः .

सुलतान महम्मद.] [४१ -१३८७ मां] दोलतावादनगरमां शाह स सङ्घतिलकप्रभुर्जयति साम्प्रतं गच्छराट् । शकक्षितिपबोधकृत्प्रभुजिनप्रभानुप(य)हा- न्ववाप्तगु(ग)णभृत्पदप्रमुखतत्त्वविद्यागमः ॥" -प. १२५, ग्लो०९ आ वृत्तिना अंतमां तेना कर्ता तरीके विद्यातिलक अने सोमतिलक ए बने नामो वांचवामां आवे छे-- ' इति श्रीशीलोपदेशमालावृत्तो स्वभावशीलपालनलीलायत. श्रीरुद्रप० भट्टा० संघ० सूरिशिष्यविद्यातिल[क] सू० विरचि०'- तत्पादपद्महंसोऽधिवृत्तिं शीलोपदेशमालायाः । श्रीसोमतिलकसूरिः कृतवान् श्रीशीलतरङ्गिणीम् ।। लालासाधोस्तनुजः प्रगुणनिधिः साधुसेढानुमया(?) छाजूः शीलोपदेशस्रजममलधिया सूत्रतोऽधीत्य सम्यग् । अर्थ विज्ञातमस्या युग-'निधि-मुरवो वत्सरे विक्रमांके वृत्तिं नव्यां स विद्यातिलकमुनिवरात् कारयामास साधुः ।। -प्रा. वि. प्रति प.१२४-१२५ श्लो०१०-११ उपर्युक्त संघतिलकसरिना वीजा शिष्य अने पूर्वोक्त सोमति- लकमरिना लघुगुरुबन्धु देवेन्द्रसूरिए प्रभोत्तररत्नमालानी वृत्ति वि. सं. १४२९ मां रचेली छे. तेनी प्रांत प्रशस्तिमां पोताना चडिल गुरुबन्धुनुं नाम सोमतिलकसूरि सूचवी, तेने शीलोपदेश- -वृत्तिकार तरीके ओळखाव्या छे. माला- ४२] [ जिनप्रभसूरि अने दोलतावादमां पेथड, सहजा अने ठ. अचलनां करावेलां प्रभावना चैत्योनो तुरको द्वारा करातो भंग, फर- ए उल्लेखो जोतां सामान्य( मुनि ) अवस्थामां विद्यातिलक नामथी विख्यात थयेल, पाछळथी सूरिपद पछी 'सोमतिलक नामथी प्रसिद्धिमां आव्या होय ए संभावित छे. उपर उद्धृत करवामां आवेल कन्नाणय-वीरकल्पनो परिशेष, विद्यातिलकमुनि नामथी सूचव्यो होवाथी सूरिपद मळ्या पहेलां अने संभवत: जिनप्रभसूरिनी अने महम्मद तघलकनी विद्यमानतामां -विक्रमनी चौदमी सदीना अंतमा ज ते रच्यो होवो जोइए, एम आ परिशेषना अन्तिम उल्लेखथी पण विचारी शकाय छे. १ अहिं सूचवेल सहजा, वि.सं. १३७१ मां शत्रुजय-तीर्थना उद्धारक संघपति समरसिंहना ज्येष्ठ बन्धु जणाय छे. जेणे दक्षिण मंडलना देवगिरि( दोलताबाद )मां चोवीश जिनवाळु मंदिर रचावी, तेमां मूलनायक तरीके पार्श्वनाथने स्थाप्या हता, तेम उपर्युक्त शत्रुजय तीर्थंना उद्धार-प्रतिष्ठा प्रसंगे त्यांथी संघ लइ शत्रुजयमां उपस्थित थया इता; एबुं तेमना समकालीन अने परिचित निवृत्ति. आम्र( अंब )देवसूरिए वि.सं.१३७१( ? )मा रचेला संघपति समरसिंहरास (गा. ऑ. सिरीझना प्राचीन गर्नर काव्य-संग्रहमा तथा आत्मानंद सभाना जैन ऐतिहासिक गुर्जर काव्य-संचयमा प्रकाशित )मां तथा उपकेशगच्छना कक. सूरिए वि. सं. १३९३ मां कंजरोटपुग्मा रचेला नाभिनंदनोद्धार- प्रबंधमां वर्णव्यु छे. गच्छना - सुलतान महम्मद. ] [ ४३ मान दर्शावीने निवार्यों हतो. तेवी रीते जिनशासननी अतिशय प्रभावना करता, प्रातीच्छको( ग्रहण करवा इच्छता शिष्यो )ने सिद्धांतनी वाचना आपता, तप- स्वीओने अंगप्रविष्ट अने अनंगप्रविष्ट आगमोनां तप करावता, शिष्योने तथा अपरंगच्छना मुनियोने पण प्रमाण, व्याकरण, १ रुद्रपल्लीयगच्छना संघतिलकसरिए जिनप्रभसूरिने पोताना विद्यागुरु तरीके जणाव्या छे, ए उपर दर्शावाइ गयुं छे, ते सिवाय हर्षपुरीयगच्छना मलधारी राजशेखरसूरि, के जेणे वि. सं. १३८७ मां प्राकृत द्वचाश्रयवृत्ति तथा चतुरशीतिप्रबंध( विनोद कथा-संग्रह ), षड्दर्शनसमुच्चय, नेमिनाथ-फाग विगेरे रचेल छे. तथा पूर्णिमागच्छना पं. ज्ञानचंद्रे रचेल रलाकरावतारिका- टिप्पनने, वि. सं. १४०१ मा मेरुतुंगसूरिना स्तंभनेन्द्र-प्रवन्ध (महा पुरुष-चरित )ने अने वि. सं. १४१० मा मुनिभद्रसूरिए रचेला शांतिनाथचरित महाकाव्यने जेणे शुद्ध क्र्यु हतुं. दुर्भिक्ष-दुःखने दलनारा तथा महम्मदशाह( तघलक )थी गौरवित थयेला श्रीमान् जगत्सिंहना षड्दर्शनपोषक सुपुत्र महणसिंहे दिल्लीमां पोते आपेली वसतिमा जेमनी पासे वि. सं. १४०५ मां जेठ शु. ७. प्रबंधकोश( चतुर्विशति-प्रबंध ) ग्रंथ कराव्यो हतो-- तत्सूनुः सामन्तस्तत्कुलतिलकोऽभवजगत्सिंहः । दुर्भिक्षदुःखदलनः श्रीमहम्मदसाहिगौरवितः ॥ तज्जो जयति सिरिभवः षड्दर्शनपोषणो महणसिंहः । हि( दि)ल्ल्यां स्वदत्तवसतौ प्रन्थमिमं कारयामास ॥

४४] [ जिनप्रभसूरि अने काव्य, नाटक, अलंकार विगेरे शास्त्रोने भणावता, उद्भट वाद करनारा वादि-बूंदोना अतिदर्पने अपहरता सूरिजीए त्यां लगभग त्रण वर्ष व्यतीत कर्या. शेर-गगन-मनुमिताब्दे ज्येष्ठामूलीयधवलसप्तम्याम् । निष्पन्नमिदं शास्त्रं श्रोत्रध्येत्रोः सुखं तन्यात् ।। ए ज राजशेखरसूरिए, श्रीधरनी न्यायकन्दली पर संक्षिप्त विवरण रचता, कृतज्ञताथी पोताना अध्यापक तरीके जिनप्रभसूरिनुं स्मरण कर्यु छ- " श्रीमजिनप्रभविभोरधिगत्य न्यायकन्दली किञ्चित् । तस्यां विवृतिलवमहं करवै स्व-परोपकाराय ॥ [ पिटर्सन रि. ३, पृ. २७३ ] मूळ आधार न तपासतां नकलीया गतानुगतिकताथी जैन- धर्मनो प्राचीन इतिहास (ही. ई. भाग १, पृ. ३६) तथा अभि. धानगजेन्द्र( भा. ४, पृ. १५०० )मां अने अन्य केटलेक स्थळे केटलाक लेखकोए राजशेखर नामने बदले रत्नशेखर नाम प्रकट कर्यु छे, ते पि.रि.नी परंपराथी उतरी आबेली भूल जणाय छे. वर्तमान साधु-समाज, आवी रीते विद्वान् आचार्यो अने मुनियो पासेश्री विद्याभ्यास करतो होय,तो केटलो बधो लाम थई शके? १ देवगिरिनगर( दोलताबाद )मा रहेनां जिनप्रभसूरिए वि. सं. १३८७ मां भादरवा व. १२ ने दिवसे दीवाळी पर्वनी उत्पत्तिना कथनथी रमणीय पावापुरी-कल्प रच्यो हतो- सुलतान महम्मद. ] [४५ आ तरफ योगिनीपुर( दिल्ली )मां शकाधिराज महम्मदशाहे कोइ अवसरे सभामांपंडितोना पातशाहे करेल गोष्ठी-प्रसंगे शास्त्र-विचारमा संशय स्मरण अने फरी थतां गुरु( जिनप्रभसूरि )ना गुणोने आमंत्रण संभारी का के-'जो ते भट्टारक आसमये म्हारी सभाने अलंकृत करता होत, तो म्हारा मनमा रहेला संशय-शल्यने सहजमां उद्धरत. खरेखर, बृहस्पति पण तेमनी बुद्धिथी पराजित थई भूमिने तजी शून्य " इय पावापुरि-कप्पो दीवमहुप्पत्तिभणणरमणिज्जो। जिणपहसूरीहिं कओ ठिएहिं सिरिदेवगिरिनयरे ।। तेरहसत्तासीए विक्कमवरिसंमि भदवयबहुले । पूसकवारसीए समस्थिश्रो ससस्थिकरो ॥ 'जैनसाहित्यमें इतिहासके साधन' (जैनसाहित्य-संमेलन रि. पृ. १०) मां अने अन्यत्र बीजा लेखकोए आनो रचना-समय सं. १३२७ सूचव्यो छे, ए पण परंपराथी उतरी आवेल भूल जणाय छे. चतुर्विंशति जिनानन्द-स्तुति ( आ. समिति प्र. ) नी भूमिका(पृ. ४०)मां ही. र. कापडियाए वि. सं. १३३७ जणाव्यो छे; परंतु छपायेल अने लखेल पुस्तकनो उपर्युक्त आधार- पाठ विचारतां ते योग्य लागतो नथी. वि. सं. १३८७ बराबर संभवे छे. जे प्रकट थइ गयेल छे. तपागच्छीय जिनसुंदरसूरिनो सं. दीपालि-कल्प, वि.सं. १४२३ मां रचायेल होइ आ पछीनो छे.

४६ । [ जिनप्रभसूरि अने आकाशमां छपाई गयो जणाय छे., आवी रीते राजावडे गुरु( जिनप्रभसूरि )ना गुणोनी वर्णना( प्रशंसा) कराइ रही हती, तेज वखते दोलताबादथी आवेला अबसरना जाण ताजलमलिक्के भूमितल पर. भालपट्ट लगाडी विज्ञप्ति करी के-" महाराज ! ते महात्माजी (जिनप्रभसूरि) त्यां (दोलता- वादमा) छे, परंतु ते नगरना नीरने सहन न करी शकवाथी अत्यंत कुश शरीरवाळा थइ गया छे.' त्यार पछी गुरुना गुणोने संभारता भूमिनाथे एज मीरने आदेश आप्यो के 'मलिक्क! जल्दी जइने दुवीरखाने फरमान लखाव अने त्यां तेत्री सामग्री साथे मोकलाव के भट्टारक फरी अहिं आवे. ' त्यार पछी तेणे ( मलिक्के ) तेवीज रीते करीने फरमान मोकल्यु. अनुक्रमे दोलताबाद दीवान पासे पहोंच्यु. नगर-नायक कुतूहलंखाने भट्टारकने विनयपूर्वक दिल्लीपुर प्रति प्रस्थान करवानुं पात- शाहनु आवेलं फरमान जणाव्यु. त्यारपछी ७ (१०) दिवसमां सज्ज थइ जेठ शु. १२ ना राजयोगमा संघ-सार्थिकोनी परिपथी १ इतिहासनां पुस्तकोमा जेने क्युत्लघखान मलिक क्यवा- मुद्दीन नामथी ओळखाव्यो छे, ते न आ जणाय छे. (विशेष परिचय माटे जूओ--केम्श्रीज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया वा.३ पृ.१३०, १५४, १५६, १६५)

सुलतान महम्मद ]
[४७
अल्लावपुरमां,
प्रयाण अनुगमन कराता गुरुजी (जिनप्रभसूरि)
मोटा आडंबरपूर्वक चाल्या. अनुक्रमे
उपद्रव-निवारण स्थान स्थानमां सेंकडो महोत्सवो प्रकट
करावता, विषम दुःषम काळना दर्पने
दळता, वच्चे आवता सकळ देशोना मनुष्योनां नयनोने कुतू-
हल उपजावता, धर्मस्थानोनो उद्धार करता, द्वरथी उत्कंठित
थईने सामे आवता आचार्य-वर्गवडे वन्दन कराता गुरुजी
राजानी भूमिना भूषणरूप अल्लावपुर दुर्ग (अलीगढ १) पहोंच्या.
तेवा प्रभावनाना प्रकर्षने न सही शकता असहिष्णु म्लेच्छोए
विप्रतिपत्ति करी हती, ते जाणीने तेज गुरुना
उत्तम शिष्य, गुरु-गुणोथी अलंकृत अने राज-सभाने शोभा-
वनार जिनदेवसरिए सुलतानने विज्ञप्ति करी; सुलताने बहु-
मानपूर्वक सामे फरमान मोकली मलिक मार्फत सार्थिको
( साथेनां माणसो )नी सघळी वस्तुओ पाछी अपावी हती.
एवी रीते विशेषताथी जिन-शासननी प्रभावना करता सूरिजीए
दोढ़ मास रहीने अल्लावपुरथी प्रस्थान कर्यु हतुं.
धरणीनाथे( पातशाहे ) फरी पाछा सिरोह नामना
महानगरमांसामे मोकलावेलां अति कोमळ
सिरोहमा अने कुमाशवाळां देवदृष्यप्राय दुस
सत्कार वस्त्रोवडे मूरिजी सत्कृत थया हता.
अनुक्रमे सूरिजी हम्मीरवीर( महम्मद तघलक )नी

४८ ] [ जिनप्रभसूरि अने राजधानीना परिसर-प्रदेशमां पहोंच्या. दिल्लीमा आ तरफ लांबा बखतथी पुष्ट थयेला सूरिनुं स्वागत भक्ति-रागवडे सामे आवेला अने मात्र दर्शनथी पण जाणे अमृतकुंडमां न्हाया होय तेम पोताना आत्माने धन्य मानता आचार्य, यति-संघ अने श्रावकोना समूहथी परवरेला युगप्रधाने भादरवा शु. २ ने दिवसे राज-सभाने शोभावी. ते वखते अतिशय आनन्दित थयेली आंखोबडे अभ्युत्थान आचरता होय तेवी रीते धरणि- राज महम्मद पातशाहे कोमल वाणीथी कुशलप्रवृत्ति पूछी. स्नेहपूर्वक गुरुजीना हाथने चुंब्यो. अने अत्यंत आदरपूर्वक पोताना हृदय पर धर्यो. गुरुजीए तत्क्षण नवीन रचेल काव्य- वडे आशीर्वाद आप्यो. एथी नरेश्वरनुं मन चमत्कार पाम्यु अने महोत्सवपूर्वक विशाल पोसहशालाए मोकल्या. महीनाथे गुरुजीनी साथे जना माटे प्रधान पुरुषोने, हिंदु राजाओने अने दीनार विगेरे मोटा मलिकोने आज्ञा करी. लांवा वखतथी उत्कंठित थयेला सेंकडो, हजारो श्रावक लोको प्रणाम करता हता. लांबा वखतथी दर्शनातुर थयेला नगरना लोको आवी मळ्या. प्रकृति( राज्यना प्रधान अधिकारीओ.) अने देशना मनुष्यो कुतूहळथी एकठा थया. त्यारपछी बंदीना समूहवडे विरुदावलीथी स्तवाता अने राजाए प्रसादित करेल भेरी, वेणु, वीणा, मर्दल, मृदंग, पटु पटह, यमल, शंख, भूगल विगेरे घणा प्रकारनां विपुल वाद्योना. ध्वनिवडे दिशाओना अन्तरालने सुलतान महम्मद.] [४९ वाचाळ बनावता, विप्रवर्गवडे वेदध्वनिद्वारा स्तवाता तथा गंधर्वोवडे अने सुभग-सधवाओथी मंगल-गीतवडे गवाता सूरिजी 'सुलतान-सराई । पोसहशालाए. पहोंच्या. संघना पुरुषोए वर्धापन-महोत्सवो कर्या. भादरवा शु. ३ ने दिवसे सकळ संघे श्रेष्ठ महोत्सव करीने श्रीपर्युषणा-कल्प वैचाव्यो. आगमन- पर्युषणामां प्रभावनाना लेखो स्थाने स्थानमा पहोंच्या. प्रभावना सकळ देशना संघो रंजित थया. राजाना सत्कर्तव्यो बंदी तरीके बंधायेला अनेक श्रावकोने लाखोना राजदेय(दंड, कर)थी मुक कराव्या. अने इतर लोकोने करुणावडे केदखानामांथी मुक्त. कराव्या. अप्रतिष्ठित थयेलाओने प्रतिष्ठा आपी-अपावी. अनेक प्रकारे जैनधर्मनी प्रभाचना करी-करावी. एवी रीते नित्य राज-सभामां जवाथी तथा पंडितो अने वादीओना बंद पर विजय मेळववार्थी प्रभावना प्रवर्ततां अनुक्रमे वर्षारात्र-चोमासु वीत्यु. अन्यदा फागण मासमा दोलतावादथी आवती मगदूमई- १ सुलताननी मातानुं नाम आ सिवाय अन्यत्रं वांचवामां आवतुं नथी, परंतु तेणी घणी दयालु, दानेश्वरी, उदार अने विवे- किनी हती. तेणीनुं मरण थयुं त्यारे फक्त सुलतानने ज नहि, प्रजा- जनोने पण घणुं दुःख थयुं हतुं; कारण के ए सद्गुणी राज-माताना ४ ५० ] [ जिनप्रभसूरि अने जहां नामनी पोतानी जननी सामे चतुरंग सुलताननी मा- चमू साथे सज्ज थई जतां सुलताने अभ्य- ताना सन्मानमा र्थना करी गुरुजीने पोतानी साथे चला- व्या. वडथूण(?) स्थानमां महाराजे जननीने भेटी सर्वने महादान आप्यु. प्रधान विगेरे सर्वने वस्त्रोनी पहेरामणी करी. अनुक्रमे महोत्सवमयी (ध्वजा-पताकाथी शणगारेली) राजधानीमां पहोंच्या. वस्त्रो, कपूर विगेरेवडे गुरुजीनुं सन्मान कयु. चैत्र शु. १२ ने दिवसे राजयोगमां महाराजानी अनुम- तिथी( रजा लइ ) पातशाहे आपेल दीक्षा विगेरे साइबाणनी छायामां नंदी करी, त्यां पांच कर्तव्यो शिष्योने दीक्षित कर्या. मालारोपण, सम्यक्त्वारोपण विगेरे धर्मकत्यो कया. थिरदेवना नंदन ठ. मदने (बभदत्ते) वित्त वावर्यु. आषाढ शु. १० ने दिवसे नवां करावेलां १३ विबोने महोत्सवपूर्वक प्रतिष्ठित को. तेमां जैनर्विय बिंब करावनाराओए अने खास करीने प्रतिष्ठा साह म(स)हराजना पुत्र अजयदेवे बहु वित्त वापर्यु हतुं. प्रमावे अनेक लोको गज-प्रकोपथी वची गया हता [जूओ केम्ब्रीज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया वॉ. ३, पृ. १६० ].

सुलतान महम्मद.]
[ ५१
wonin
अन्यदा 'गुरुजीने दूरथी हमेशां पासे आववामां कष्ट
छे. एम विचारी सुलताने खुद पोते ज
सुलताने समर्पल पोताना प्रासाद( महेल ) पासे शोभतां
भधारकसराईमां भवनोवाळी अभिनव(नवी) सराई आपी.
प्रवेशोत्सव श्रावक संघने त्यां वसवा माटे फरमाव्यु.
खुद सुलताने तेनु'भद्दारक-सराई एवं
नाम कयु. पातशाहे त्यां ज वीर-विहार अने पोसह-शाला
करावी. त्यारपछी वि. सं. १३८९ वर्षे आषाढ वदि ७ ने
दिवसे सुमुहूर्ते महीपतिए फरमावेल गीत, नृत्य, वाद्य विगेरे
विभूतिद्वारा प्रकट कराता असाधारण महान उत्सवपूर्वक, खुद
सुलतानवडे अपाता महादानपूर्वक, मंगल-गीत गातां भट्टा-
रके( जिनप्रभसूरिजीए) पोसहशालामा प्रवेश को प्रीति-
दानवडे विद्वानोने संतुष्ट कर्या हता. दानद्वारा दीन, अनाथ
आदि लोकोनो उद्धार को हतो.
ते पछी [वि. सं. १३९० मां ] मागशिर मासमां पूर्व
दिशा तरफ जय-यात्रा माटे प्रस्थान
१ ईस्वी सन् १३३३ [वि. सं. १३९०]मां महम्मद तघलके
पूर्वदेशमा विजय-यात्रा माटे प्रयाण कर्यु हतुं, एम अन्यत्र उल्लेख
मळे. छे [जूओ केम्ब्रीज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया वॉ. ३, पृ.
१४७-१४८].

५२ ]
[ जिनप्रभसूरि अने
मथुरा तीर्थनो करता महाराजाए( पातशाहे ) सूरिजीने
उडार वि.
प्रार्थना करी पोतानी साथे चलाव्या
हता. सूरिजीए ठेकाणे ठेकाणे बंदी-
मोचन विगेरे द्वारा जिनधर्मनी प्रभावना करावी हती. मथुरा
तीर्थनो उद्धार कयों हतो; तथा दानादिवडे ब्राह्मणो, गरीयो
विगेरेने संतुष्ट कर्या हता.
'नित्य प्रवासी गुरुजीने स्कंधावार(लश्करी कूच )मां
कष्ट थाय छे. ' एम मानता महीनाथे
हस्तिनापुर- (महम्मदे) खोजेजहां मलिक साथे सत्य
यात्रा-फरमान प्रतिज्ञावाळा गुरुजीने आगरानगरथी
राजधानी(दिल्ली) तरफ पाछा मोकल्या
हता. हस्तिनापुरनी यात्रा, फरमान लइ मुनिपति पोताना
स्थानमां आव्या हता.
१ जिनप्रभसूरिए विविध तीर्थोना कल्पोमां मथुरा-कल्प पण
रच्यो छे [ जूओ ए. सो. बेंगाल प्रकाशित तीर्थ-कल्प पृ.
५५-६४ ].
२ महम्मद तघलकना मान्य एक प्रधान पुरुष तरीके
ख्वाजाजहान ' तुं नाम इतिहासमां बहु प्रसिद्ध छे . [ जूओ
केन्द्रीन हिस्ट्री ऑफ इन्डिया वॉ. ३, पृ. १३४, १४०, १४३,
१४८, १५२, १५८, १७२ ].

सुलतान महम्मद.] [ ५३ mmmmm त्यारपछी चतुर्विध संघ मेळवी शाह बोहित्यने वाहड पुत्र साथे संघपतिनुं तिलक करी, आचार्य संघसाथे हस्ति- विगेरे परिवार साथे गुरुजीए शुभ मुहूर्त नापुरमा प्रतिष्ठा हस्तिनापुरनी यात्रा माटे प्रस्थान कर्यु महोत्सव हतुं. संघपति बोहित्थे ठेकाणे ठेकाणे महोत्सवो कर्या हता. तीर्थभूमिए पहोंच्या, बद्धावणुं कयु. नशं करावेलां शांति, कुंथु अने अरजिननां १ जिनप्रभसूरिए संघ साथे आ यात्रा, शकाब्द १२९५ (वि. सं. १३९० ) मां वैशाख शु. ६ ने दिवसे करी हती, ते वखते तेओए गज( इस्तिना )पुरतुं स्तोत्र रच्यु हतुं तेना अन्तमा ए स्पष्ट सूचन कर्यु छे. इत्थं पृषत्क-विषयोकमिते शकाब्दे वैशाखमासि शितिपक्षगषष्ठतिथ्याम् । यात्रोत्सवोपनतः संघयुतो मुनीन्द्रः स्तोत्रं व्यधाद् गजपुरस्य जिनप्रभाख्यः ।। -तीर्थकल्प [ का. प. ६४-६५ ] पिटर्सन रि. ४ था [ पृ. ९९ ] मां उपर दर्शावेल श्लोक टोक्यो छे, पण त्यां बाणवाची पृषक शब्द न समजायाथी पृथंक [ थत्त्व ] एवो अशुद्ध पाठ छपाव्यो जणाय छे. उपकेशगच्छोय ककसूरिए वि. सं. १३९३ मां कंजरोट- ५४] [ जिनप्रभसूरि अने विवोने गुरुजीए त्यां प्रतिष्ठित. काँ अने अंबिकानी प्रतिमा स्थापी. संघपतिए चैत्य-स्थानोमां संघ-वात्सल्य विगेरे महो- त्सवो कर्या हता अने संघे वस्त्र, भोजन, तांबूल विगेरे द्वारा याचकोना समूहने संतुष्ट को हतो. पुरमां रचेला नाभिनंदनोद्धार-प्रबंधमा जणाव्युं छे के-वि. सं. १३७१ मां शत्रुजयतीर्थनो उद्धार करनारा सुप्रसिद्ध समरसिंहे पातशाह (ग्यासुदीन)ना फरमानथी संघपति थइ घणा संघ-पुरुषो अने जिनप्रभसूरि साथे मथुरा अने हस्तिनापुरमा तीर्थ यात्रा करी हती. जे समरने पातशाह ग्यासुदीने( तघलके ) पोताना पुत्र तरीके अने तेना पुत्र उल्ल[ग]खाने विश्वासपान पोताना भाइ तरीके स्वीकारी तिलंगदेशनो स्वामी( सूबो ) बनाव्यो हतो; अने जे समराशाहे सुलतान( ग्यासुदीन तघलक )ना बंदी बनेला पांडु( पांड्य ) देशना स्वामी वीरवल्ल ( वीर बल्लाल ) राजाने पातशाह पासेथी मुक्त करावी, पुनः तेने तेना देशमा स्थपावी राज-संस्थापनाचार्यता उपार्जी इती. जेणे तुर्कोथी बंदी तरीके पक- डायेल लाखो मनुष्योने मुक्त कराव्या हता, अनेक राजा-राणा- ओ अने व्यवहारियो पर पण अनेक वार उपकार कर्या हता, जेणे सर्व देशोमांथी बोलावी श्रावकोना कुटुंबाने तिलंगदेशमा स्थापी, उरंगलपुरमा जिनालयो करावी जैनशासनतुं महत्व वधार्यु हतुं. आमां सूचवेल उल्लगखान, ए प्रस्तुत लेख साथे संबंध धरा- सुलतान महम्मद ] [ ५५ यात्राथी आवतां ज गुरुजी(जिनप्रभसरिजी)ए वैशाख शु. १० ना दिवसे सकळ दुरित अने महावीर-बिंबनी विघ्नो दूर करनार ते ज श्रीमहावीरना पुनः स्थापना विवने साहिराजे(पातशाहे) करावेला विहार. (जैनमंदिर)मां श्रेष्ठ महोत्सवपूर्वक स्थाप्यु हतुं, त्यारथी ते संघद्वारा विशेष प्रकारे पूजाय छे. दिग्विजय यात्राथी महाराज(पातशाह) पाछा आवतां चैत्योमां अने वसतिमां उत्सवो प्रवर्ते छे. सार्वभौम उत्तरो- त्तर मान आपीने गुरुजीर्नु सन्मान करे छे. दरेक दिशामां सूरि अने सार्वभौमना प्रभावक श्रेष्ठ यशः-पटहो वागे छे. शक-सैन्यबडे दिक्-चक्र पराभव पामवा छतां पण खरतरगच्छना अलंकाररूप गुरु(जिनप्रभ- पातशाही फर- सूरि)ना प्रसादथी राजाधिराजे आपेल मानथी जैन फरमान हाथमां राखनारा श्वेतांवरो अने समाज अने दिगंवरो सर्व देशोमां उपसर्ग विना विचरे जैन तीर्थोमां छे. गुरुजीए फरमान ग्रहण करीने श्री निर्भयता शत्रुजय, गिरनार तथा फलोधी विगेरे तीर्थोने अकुतोभय-निर्भय कर्या छे. वनार महम्मद तघलक जणाय छे. जूओ केम्ब्रीज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया [ वॉ. ३, पृ. १२९-१३४ ] हस्तिनापुरमा पोते करेली आ प्रतिष्ठा वि. सं. १३९० मां ५६ ] [ जिनप्रभसूरि अने ए विगेरे कृत्योबडे पालित्तरि, मल्लवादी, सिद्ध- सेन दिवाकर, हरिभद्रसूरि, हेमचंद्रसरि प्रभावक जिन- प्रमुख पूर्वपुरुषोने उद्योतित कर्या-दीपा- प्रभसूरिना प्रभा- व्या छे. बहु कहेवाथी शुं ? सूरि-चक्र- वथी प्रवर्तेला वर्ति(जिनप्रभसूरि)ना गुणोथी सुलतान धार्मिक महो- आवर्जित(अनुकूळ-अनुरागी) थतां सकळं त्सवो धर्म-कार्योना आरंभो प्रकट रीते प्रवर्ते छे. प्रतिप्रभाते चैत्यो अने वसति(उपाश्रयो)मा यमल-शंखो वागे छे. वीर-विहारमा धार्मिकोवडे मर्दल, मृदंग, भूगल, ताल विगेरे वाद्योनी गंभीर ध्वनि साथे प्रेक्षणकोथी सारभूत महा- पूजाओ कराय छे. श्रीमहावीरली आगळ भव्यलोकोवडे उद्ग्रहण करावातो(उखेवातो) कपूर अने अगरना परिमलनो उद्गार(सुवास), दिक्चक्रने सुवासित करे छे हिंदुओनां राज्यमां जेम होय तेम, दूपम-सुषमकाळ- (चोथा आरा)जी जेम; अनार्यराज्यमां पण अने दूपमकाळमां पण जिन-शासननी प्रभावनामां परायण जैन मुनिओ स्वेच्छाए संचरे छे; एटलं ज नहि, इतर पांचे दर्शनवाळा, परिवार साथे थयेली होइ, ते पहेलां वि. सं. १३८२ मां पूर्ण करेल तीर्थकल्पमा सूचवेला हस्तिनापुर-तीर्थकल्पमा ए वर्णन न आपी शके ए समजी शकाय तेम छे. - सुलतान महम्मद.] [ ५७ minnan vinom गुरुजीना पादपीठमां किंकरोनी जेम आळोटे छे. प्रातीच्छकोनी जेम गुरुजीना वचनने स्वीकारे छे. आ लोक अने परलोकना कार्यना अभिलापी परतीथिको(अन्यधर्मीओ) गुरुजीना दर्शन माटे उत्सुक थइने निरंतर वसतिना द्वारदेशने सेवे छे. राजानी अभ्यर्थनाथी गुरुजी हमेशां राज-सभामां जाय छे. बंदि-बर्गने मुक्त करावे छे. महा- सुलताननीलभा- पुरुषोना चरितने आचरता, सुचारित्रने मां सूरिजीनो पाळनारा सूरिजी, जिनवचनने अनुसरतां वचन-प्रभाव युक्तियुक्त वचनोरडे . निरंतर राजा (सुलतान)ना मनमां मोटुं कुतूहल उपजावे छे. पगले पगले प्रभावना प्रवर्ते छे. गंगा-जळ जेवा स्वच्छ चित्तवाळा सुरिजी पोतानी यश-चंद्रिकावडे दिशाओना अंतराल(मध्यभाग)ने धक्ल-उज्ज्वल करे छे. पोतानां वचना- मृतोवडे जीवलोकने उज्जीवित करे छे. स्त्रदर्शनी अने परदर्शनीओ समग्र व्यापारोमा गुरुजीनी आज्ञाने शिर पर स्थापी वहन करे छे. युग-प्रधान आचार्य(जिनप्रभसरि) अनन्यसाधारण शैलीवडे स्व-पर-सिद्धान्तनुं व्याख्यान करे छे. आवा प्रकारना प्रकट रीते अनुभवाता, नित्य प्रवर्तता प्रभावनाना प्रकों, अल्पमतियोवडे केट- उपसंहार लाक कही शकाय ? मात्र आ सूरिवर करोडो वर्ष जीवता रहो अने' लांबा वखत ५८ ] [ जिनप्रभसूरि अने सुधी श्रीजिन-शासननी प्रभावना करो.', श्रीजिनप्रभसूरिना गुणोली आ लेश स्तुति, प्रभाव- नाना अंगरूप छे-एम विचारी कनाणय-वीरकल्पना परि- शेषमां कहेवामां आवी छे." १ आ कथन, जिनप्रभसूरिजीना जीवितकालमा उच्चरायु होय, एम विचारतां जणाय छे. तपागच्छना पं. शुभशीलगणिए वि. सं. १५२९(१)मां रचेला पंचशतीप्रबंध-कथाकोश(ह. प्रति)मां जणाव्यु छ के-" एक वखते सुलताने कान्हड गाम भांग्यु. त्यांनी वीरनी प्रतिमाने लावीने यवनोए दिल्लीमा मसीतने बारणे पाथियाने ठेकाणे राखी हती. त्यारपछी एक वखते सुलतान, सूरिना खभा पर हाथ राखता जेटलामां मसीतमा प्रवेश करे छे; तेवामां मूरि, वीरनी प्रतिमाने जोइने एक तरफ ऊभा रह्या. त्यारे सुलतान बोल्या के- ' एम केम कयु ?' जिनप्रभसूरिए कयु के-'प्रभु ! देव छे. सुलतान बोल्या के-'आ भूत शुं जाणे ?, कंइ नहि.' सूरिए कह्यु के-' आ देव सत्यवादी ज्ञानी छे.' राजा वोल्या-'तो बोलावो. सूरिए कह्यु के-' स्वामिन् ! ज्यारे भूतनुं स्थानक उपदेश माटे करावाय, त्यां मंडावाय, पूजाय, त्यारपछी पूछाय, त्यारे पूछेलु कहे.' त्यारपछी स्वामिए(पातशाहे) देवगृह(मंदिर) कराव्यु. ज्यारे प्रतिमा न उपडी त्यारे सूरिए कह्यु के- तमे हाथ लगाडो, थी उठे.' त्यारपछी तेवी रीते कार्य करता ते प्रतिमाने देवालयमां सुलतान महम्मद. ] [३] जिनप्रभसूरिनां चमत्कारी वृत्तान्तो. पीरोज सुलतान पर प्रभाव. जिनप्रभसूरि पछी लगभग पोणोसो वर्ष पछी थयेला, तपा-. गच्छना पं. सोमधर्मगणिए वि. सं. १५०३ मां रचेली सं. उपदेशसप्ततिमां जिनप्रभसरिना केटलांक चमत्कारी वृत्तान्तोनुं सूचन कयु छे; त्यां महम्मद सुलतानने 'बदले पीरोज सुलता- ननुं नाम जणाव्यु छे- " कलियुगमा केटलाक सरिओ, जिन-शासनरूपी भवनमां दीवा जेवा थइ गया; आ विषयमां, म्लेच्छपतिने प्रबोध करनार जिनप्रभसूरिनु निदर्शन(दृष्टांत) कहेवाय हे-- पद्मावतीथी वरदान प्राप्त करनारा, राज-मान्य जिन- प्रभसूरिजी [वि. सं. ]१३३२ वर्षमा थइ गया. एक वखत स्थापी, श्रेष्ठ भोगवडे पूजावीने वच्चे वस्त्र बंधावतां राजा जे जे संबंधी पूछे तेना तेना उत्तर आपती हती. २१ प्रिय कह्यां. सुलतान हर्षित थयो, शंकाथी वस्त्र दूर करतां पण ते ज प्रमाणे कडं; तेथी विशेष करीने वीर ए प्रमाणे ख्याति थइ. ए प्रमाणे कान्हडा महावीरने स्थापन करवामां जिनप्रभा- चार्यनो संबंध दर्शाव्यो.

६० [ जिनप्रभसूरि अने तेओ योगिनीपुर( दिल्ली )मां चोमासु रह्या हता; के ज्यां राजा पीरोज सुलतान विराजे छे. ते लगरमां एक वखते उपद्रव करतारा म्लेच्छोने, तेओए (जिनप्रभमूरिए ) डोक मरडीने तेने साजी करवी विगेरे प्रकारोथी शिक्षा करी हती. विश्वने विस्मय करतारा ते वृत्ता- न्तथी ते आचार्य, राजाथी लड़ गोपाळपर्यन्त जगतमां विख्यात कीर्तिवाळा थया. राजावडे बोलावायेला ते आचार्य, प्रतिदिन धर्म-कथनपूर्वक अवसरोचित वाक्योवडे ते राजाने प्रसन्न करता हता. ते राजाए विजययंत्रलो आम्नाय पूछ्यो. सरिए तेने कडं के-ते तेवाओनो विषय लथी. 'हे विजययंत्र- राजन् ! जेनी समीपमां आ यंत्र होय महिमा तेने देवताइ अन्न पण लागे नहि अने रोपवडे रातो थयेलो पण वेरी तेने पीडा करी शके नहि. ए प्रमाणे सांभळ्या पछी राजाए ते यंत्र करावीने परीक्षा माटे एक चकराना कंठ पर बंधाव्यो. तेणे १ महम्मद नघलक पछी दिल्लीनी गादीए आवनार पीरोज- शाहनो राज्य-समय वि. सं. १४०७ थी १४४४ मनाय छे. जिनप्रभसूरिजी तेना राज्यअमलमा विद्यमान होवानुं शंकित छे, एथी आ वर्णवेल घटना महम्मद तघलकना राज्यकालमां-पीरोज तघलकता युवराज-कालमां संभवे छे.

सुलतान महम्मद. ] [६१ nama मूकावेला तरवार विगेरे अस्त्रोना प्रहारो, बख्तर धारण करेल होय तेम तेना शरीरे लागता न हता. ए विजययंत्रने. छत्रदंड पर बांधीने, तेनी नीचे उंदर राखीने कौतुकी ते राजाए बिला- डीने प्रेरी-हकारी हती. ते उंदरने जोवा मात्रथी वैर उत्पन्न थवाथी तेना तरफ दोडी, पासे रहेलाओए तेने प्रेरी, तो पण ते (विलाडी) ते विजययंत्रवाळा छत्रनी छायामां आवी नहि. ए बंने अद्भुत जोइने ते राजाए ताम्रमय( तांबालां) बे यंत्रो करावीने तेमांथी एक यंत्र पोतानी पासे रखाव्यु, अने एक पूज्य गुरुजीने भेट कयुः केमके सज्जनो उपकार कदापि भूलता नथी. त्यारपछी आ राजा, स्थान, यान, घर, गाम, सभा, विजन ( एकांत ) के वनमां क्यांय गुरुजीने मूकतो नहि ( साथे ज राखतो हतो.) एक वखते सुलताने, गुजरातमा जवानी इच्छाथी गाम- नी बहार एक वडनी नीचे प्रस्थान को वडनुं चालवू हां. शीतळ, लीली छायावाळा विशाळ ही. र. कापडियाए मेरु० चतु० स्तुतिनी भूमिका[ पृ. ..४५ ]मां जणाव्यु छ के-' तेमणे म्लेच्छोना आक्रमणथी पीरोज सुलतान( पीरोजशाह ? )नुं केवी रीते विजययन्त्रद्वारा रक्षण कर्यु xx चोरेली साधुनी सिक्किका(?)नी पुनः प्राप्ति Xx' आवो आशय उपदेशसप्ततिमाथी केवी रीते काढथो, ते समजी शकातुं नथी. १ ही. -

annon
,
६२ ]
[ जिनप्रभसूरि अने
ते वडने वारंवार जोतां सुलताने गुरुजीने हृदयमां
रहेढं पूज्यु के-'सूरि ! आ वड सारो छे., तेना
मनना भावने जाणनारा सरिजी पण बोल्या के- जो तमारी
चाहना होय तो आ वडने साथे चलावीए. राजाए ते स्त्री-
कारतां राजा चाल्यो त्यारे ते वड पण सूरिना प्रभावथी
सेवकनी जेम चालवा लाग्यो. ते वडने चालतो जोइ लोको
प्रफुल्लित आंखोवाळा थइ पगले पगले सूरीन्द्रनी अने नरेन्द्रनी
प्रशंसा करता हता. केटलोक मार्ग ओळग्या पछी राजाए
गुरुजीने कयु के-'आ वडने विसर्जन करो. आने बहु फेरो
थयो.. सूरिजीए बडने कह्यु के-'राजाने नमीने तुं स्व-स्था-
नमा जा. १ वडे पण सुशिष्यनी जेम तेवी ज रीते कयु.
राजा ज्यारे मरुस्थली( मारवाड )मां आव्यो, त्यारे
१ तपागच्छना पं. शुभशीलगणिए वि. सं. १५२९ (१)
मां रचेला पंचशतीप्रवंध-कथाकोश[ह. लि. प. १ मां सूचव्यु
छे के-" एक वखते सुलतान गरमीनी ऋतुमां नगर वहार वडलाना
झाड नीचे रहा हता. छायावाळा ते वृक्षने जोइ जिनप्रभ आगळ
बोल्या के-'जो आवा प्रकारनी शीतळ छाया साथे आवे तो
अत्यन्त सुख थाय.' त्यारपछी सूरिए कह्यु के-' वृक्ष साथे
आवशे.' त्यारपछी सुलतान चालतां ते झाड पण सांझ सुधी
चाल्यु. पाछळ स्थान जोयुं, त्यां न जणायु. पछी वृक्ष (वड)ने
विसर्जित कर्यो, पोताने ठेकाणे गयो. राजा चमत्कार पाम्यो.

सुलतान महम्मद. ] [६३ त्यांना नगरजनो भेटणां हाथमां लइने ठेकाणे ठेकाणे सामे आवता हता; तेमने सामान्य वेपवाळा जोइने राजाए ते गुरुजी (जिनप्रभसूरि )ने पूछy के- आ लोको लुटायेलानी जेम आवा प्रकारना केम जोवामां आवे छे ? [ सूरिजीए जणाव्यु के-] राजन् ! देशना आचारथी अने घणा द्रव्यना अभा- चथी अहिं प्राये आवा प्रकारना लोको होय छे बीजु कंड कारण नथी. त्यारपछी प्रत्येक नर दीठ दिव्य पांच पांच वस्त्रो अपाव्यां अने प्रत्येक स्त्री दीठ सोनाना बब्बे टंका (चलणी नाणु) अने साडी अपांवी. ए प्रमाणे मेघनी जेम लोकनी आशाने पूर्ण करता [जिनप्रभसरि ] अनुक्रमे पत्तन (पाटण) पासे जंघराल नामना मोटा नगरे पहोंच्या. त्यां पहेलेथी तपापक्षना सोम- १ . त. शुभशीलगणिए कथाकोश[ ह. लि. प. २ मा जणाव्युं छे के-" एक वखते सुलतान, मरुस्थली( मारवाड )मां आव्यो इतो. ज्यारे गामडानी नारीओ अक्षत( चोखा ) आणी वधावा लागी, त्यारे सुलताने धन आपीने कह्यु के-'स्त्रीओं आभरणथी रहित केम जोवामां आवे छे ? कोइवडे लुटाइ छ ? अथवा दंडाइ छे के शुं !' सूरिए कह्यु के-'आ मरुस्थली रक्ष अने धनहीन छे.' त्यारपछी सुलताने प्रत्येक खो दीठ सो सो दीनार (सोनामहोर ) आपी जुहार को."

६४ ] [ जिनप्रभसूरि अने प्रभसूरि हता, तेमने मळवा माटे सूरिजी( जिनप्रभ ) नगरमां गया. त्यां सोमप्रभमूरिजीथी अभ्युत्थान, आसन विगेरे द्वारा बहु मानित थयेला जिनप्रभसूरि तेमना प्रत्ये बोल्या के-'तमे आराध्य छो, के जेमनी आबा प्रकारली क्रिया छे. तेओ (सोमप्रभसूरि ) पण प्रत्युत्तररूपे बोल्या के-' प्रभो! अमारी प्रशंसा शी करवानी होय ?, तमे धन्य छो, के जेना आधारे जिन-शासन जागे छे.. ए प्रमाणे प्रीतिपूर्वक ते वंने आचार्यों ज्यारे परस्पर वात करता हता, तेवामां शालामां जे कौतुक थयुं ते कहेवामां आवे छे-' एक साधुनी सिक्किका( सीकली )ने उंदरे विनष्ट करी हती, ते मुनिए गुरुजीनी आगळ आवीने राव करी. ते वखते जिनप्रभसरिजीए विद्याओवडे आकला, शालानी अंदरना सर्व उंदरो उपस्थित थया. म्हों ऊंचेथी नमावी, बे हाथ (आग- ळना बे पग) जोडी भय-भीर ते उंदरो विनीत शिष्योनी जेम गुरुजीनी आगळ ऊमा रह्या. [जिनप्रभसरिजीए कह्यु के-] 'हे उंदरो ! सांभळो, जे कोइ अपराधी( गुन्हेगार ) होय, ते रहो अने वीजा बधा जाव, स्वेच्छापूर्वक हरो-फरो. ए प्रमाणे आचार्य(जिनप्रभसूरि )ना वचनने सांभळी सघळा उंदरो त्वराथी पग उपाडता कूदीने गया अने एक तो चोरनी जेम आगळ रह्यो. सूरीन्द्रे तेने पण का के-डर नहि, धीरता. चारण कर. अमे साधुओ छीए, कोइने पण पीडा करता.नथी.

सुलतान महम्मद.] [६५ एम कहीने तेने पण शालामांथी बहार काढ्यो.. ए विगेरे कौतुकोवडे तेओए (जिनप्रभसरिजीए ) साधु-वर्गने घणा वखत सुधी प्रसन्न कयों हतो. १ १ जिनप्रभसूरि-प्रबंध( व. का. )मां जणाव्युं छे के "गामनी सीममा श्रेष्ठ शोभावाळा आंबाना झाड नीचे गया पछी सुलताने सूरिजीने कथु के-' आ वृक्षनी छाया केवी सारी छे ?' त्यार पछी ते वृक्ष साथे चाल्यो हतो. वीजा प्रयाणमां राजाए सूरिने कयु के-'आ आगळथी साथे शा माटे आवे छे. १ ! सूरि- तुम्हारी मया हुइ तो पाछळ वधावणुं करे' जि. प्र. (व.का.)-मार्गमा सुल.-' आस्त्रीओ आभरणो, श्रेष्ठ वेष, पट्टकूल वि.थी रहित केम जोवामां आवे छे १ शु कोइए लूटी दंडी छे के शुं ? ' मं.-' आ देश निद्रव्य छे, तेथी एवा वेषवाळी छे. ' त्यार पछी सुलताने प्रत्येक स्त्री दीठ पांच पांच सोनाना टंको भाजनमां नाखी सर्वने जोहार कर्या. पाटण सुधी सघळा य मार्गमां एवी रीते कयु. जि. प्र. (व. का. ) मा जणाव्युं छे के-" सैन्य जंघरा- लमा बहार उतयुं. जिनप्रभसूरि गाममा तपापक्षना पूज्य सोमप्रभ- सूरिजीनी पोसहशालामां उतर्या. सोमप्रभमूरिए जिनप्रभसूरिनी प्रशंसा करी के- भगवन् ! तम्हारा प्रसादे करीने जिनधर्म जयवंत वर्ने छे.' त्यार पछी जिनप्रभसरिए कह्यु के- अम्हे अत्यंत - ५ .

६६] [ जिनप्रभसूरि अने , अविरती छीए. सुलतानना सैन्य साथे प्रतिदिन परवश तरीके जवाय छे. अम्हे तम्हारा पगनी रज सरखा पण नथी. हालमां चारित्र तम्हारा आधारे छे.' तेवामा साधुओए प्रतिलेखन करवा माटे सिक्किका (झोळी) उतारी. पक साधुनी सिक्किाने उंदरे करडेली जोई जिनप्रभसूरिए रजोहरण भमाडीने कर्दा के-सघळा उंदरो अहिं आवो. तम्हारा- मांथी जेणे सिक्किका करडी होय ते रहो, वीजा जाओ. एक रह्यो, बीजा गया. तेने देश-त्याग कराव्यो. ते प्रतोली( पोळ) मूकी बीजे गयो." अहिं सूचवायेल जंघराल स्थान, ऐ. दृष्टिए महत्त्ववाळु जणाय छे. अणहिलवाड पाटणमां भीमदेवर्नु राज्य हतुं, ते समयमां-वि. सं. १२९५ मां दीशापाल आम्नाय(डीसावाल ज्ञाति )ना बीर नामना सुश्रावके जगचंद्रसूरि( तपागच्छाधार )ना वचन- अवणथी ज्ञातासूत्र विगेरे अंगोनी ताडपत्रीय प्रति लखावी. हती; जेनुं आ जंघराल स्थानना युगादिजिन-मंदिरमा देवेन्द्रसूरिए वि. सं. १२९७ मां संघ आगळ व्याख्यान कयु हतुं (जे ताड प्रति खंभातमां प्राचीन शांतिनाथजी जैन भंडारमा विद्यमान छ ). उपर्युक्त सोमप्रभसूरिजीनो जन्म वि. सं. १३१० मां, दीक्षा वि. सं. १३२१ मां, सूरिपदप्रतिष्ठा वि. सं. १३३२मा अने वर्गगमन वि. सं. १३७३मा थयुं हतु, आ सोमप्रभसूरिना पट्टने शोभावनार सोमतिलकसूरिने आचार्यपद वि. सं. १३७३मां .

सुलतान महम्मद् ] [७ inni सूरिजी( जिनप्रभसूरि )ना उपदेशवडे . त्यार- शत्रुजयमा पछी सुलतान, सैन्य अने संघ साधे रायणथी दूध . शत्रुजय पर्वत पर गयो हतो. त्यां ते वरसावq. वखते संघपति तरीकेनां कृत्यो करनारा . जंघरालनगरमां चीर-जिनालयमां, त्यांना संघपति गजे २५००० टकोना व्ययद्वारा करेला महोत्सवपूर्वक प्राप्त थयुं हतुं-एम मुनि- सुंदरसूरिनी वि. सं. १४६६ मा रचायेली गुर्वावली [ य. वि. पं. श्लो० २६६, २७२-२८४] विगेरे परथी जणाय छे. तपोटमतकुट्टनशतक (वडोदरामां प्राच्यविद्यामंदिरमा तथा आत्मारामजी जैन ज्ञानमन्दिरमा इ. लि. प्रति ) जेवी कृति रची तपागच्छना तत्कालीन साधुओ प्रत्ये गमे ते कारणे वैमनस्य दर्शावनार जिनप्रभसूरि, तपागच्छना उपर्युक्त आचार्य सोमप्रभसूरिने प्रीतिपूर्वक मळ्या होय तो खुशी थवा जेवू छे; परन्तु बीजी रीते विचारतां ए घटना शंकास्पद लागे छे. वि. सं. १३३२ मां सूरिपद प्राप्त करनार सोमप्रभसूरिनो स्वर्गवास वि. सं. १३७३ मां थयेल होवार्नु तपागच्छ-पट्टावली विगेरे साधनोथी जणाय छे. महम्मद तघलक वि. सं. १३८१ मां दिल्लीना तख्त पर आरूढ थयानु, तथा जिनप्रभसूरिए तेनी प्रथम मुलाकात वि. सं. १३८५ मां कर्यानुं विश्वस्त साधनो द्वारा पहेलां (पृ. २३, ३२) सचवाई गयुं छे. अन्य साधनो द्वारा सुलतान महम्मद तघलकनुं तथा ६८ ] [जिनप्रभसूरि अने राजा पर सूरिए रायण झाडथी दृध वरसाव्यु हतुं. गुजरातमां आगमन वि. सं. १३९० पहेलां थयुं होय तेम जणातुं नथी. ए सर्वनो विचार करता सोमप्रभसूरिना पट्टयर सोमतिलकसूरि साथे जिनप्रभसूरिनो समागम संभवे छे. १ त. शुभशीलगणिए वि. सं. १५२१ मां रचेला पंच- शतीप्रबंध कथाकोश[ह. लि. कथा ९]मां अणाव्यु छ के- एक वखते सुलतान बोल्या-'जेवी रीते चमत्कारी तीर्थ कान्ह महावीर छे, तेवी रीते वीj पण कोइ छ १' त्यारपछी सूरिए शत्रुजयतीर्थनुं व्याख्यान कर्यु. त्यारपछी संघ अने जिनप्रभ- सूरि साथे सुलतान शत्रुजय गयो, त्यां तीर्थ जोइने ते ज्यारे चमत्कार पाम्यो, त्यारे सूरिए कडु के-'आ रायणने जो मोतीओ.. वडे वधावत्रामां आवे तो क्षीर( दूध ) झरे छ,' स्यारपछी तेम करवामां आवतां (रायणने मोतीओथी वधावतां ) रायण दूध झरी. राजाने संघपतिनो आचार कराव्यो, त्यो लखाव्यु के-'जे आ तीर्थनी अवज्ञा करशे, ते पातशाहनी अवज्ञा करे छे.' त्यार- पछी त्यां पाषाणोवडे ७ रेखामो करावी. त्यारपछी नीचे उतरीने. सर्व लोको प्रत्ये कह्यु के-' पोतपोताना देवने लावो.' त्यारपछी लोको महादेव, विष्णु, ब्रह्मा, जिन विगेरे पोतपोताना देवने लाव्या. राजाए सर्व देवो मंडावीने पूछथु के'आ बधा देवोमा वृद्ध( बडा )देव कया छे ? ' क्यारे लोको न बोल्या त्यारे जिन- प्रतिमाने मुख्य स्थानमा बेसारीने हरि, ब्रह्मा विगेरेनी प्रतिमायोने सुलतान महम्मद.] [६९ गिरनारमां. रैवतक(गिरनार)मां पण एवी रीते गुरुजी साथे यात्रा करी सुलतान श्रेष्ठ उत्सवपूर्वक योगिनीपुर- (दिल्ली)मां पहोंच्या हता. .. -चोतरफ आसपास राखी अने पोते आसन पर बेसीने चोत- -रफ हथियार सहित सेवकोने स्थापीने सुलतान बोल्या के- कोण वृद्ध( बडो) कहेवाय ?' लोको बोल्या के-' स्वामी ज वृद्ध (बडा ) छे.' सुलताने कह्यु के-' जो एम ज छे, तो जिन, शस्रोथी रहित होवाथी वृद्ध( बडा ) छे अने हथियारवाळा सर्व सेवको छे.' त्यारपछी लोकोए का के-'प्रभु( पातशाह )तुं वचन प्रमाण छे. जि. प्र. (व. का.)-" सुलताने सूरिजीने पूछयु के-' सर्व पर्वतोमा मोटो पर्वत कयो १' सूरिजीए शत्रुजय कहो. त्यां गया. सु०-'आनो शो प्रभाव छे?' मूरि-'जे कोई संघपतिनो आचार करे तेना उपर दूधवडे झरे छे.' सुलतान तेम करी रायगना झाड नीचे रह्यो. सर्व तुरको अने वणिकोना उपर कंकू, केसर अने दूध वि. थी वृष्टि करी हती. सुलताने रंजित थइ सोनाना टंकाओथी थाळ भरावी रायणने वधावी हती. १ त. शुभशीलगणिए कथाकोश[ह. लि. कथा१०]मा जणा- न्यु छ के-" त्यारपछी सुलतान गिरनारगिरि पर गया हता. त्यां नेमिनाथनी अच्छेद्य अभेद्य प्रतिमा जाणीने घा-प्रहारो कर-

७० ]
[ जिनप्रभसूरि अने
एक वखते सुलतान, सभामां बेसीने सूरिजी साथे इष्ट
अर्थने साधनारी प्रीति-गोष्टी करता हता,
अन्य प्रसङ्गो ते वखते त्यां तेनो कोइ गुरु आव्यो, तेणे
गोष्ठी-विनोद माथा पर रहेली टोपीने आकाशमां निराधार
राखी. सरिए लकुट जेवा पोताना रजोहरण
(ओघा)वडे ते टोपीने प्रहार करी पाडी नाखी अने ते(रजोहरण)ने
न्या राख्यु. आचार्ये तेने( सुलतानना गुस्ने) कडं
के जो तारी कंइ पण शक्ति होय तो आ( रजोहरण)ने
पृथ्वी पर पाड, नहि तो मौन रहे. ' घणो वखत जवा छतां
ते तेने पाडवामां समर्थ थइ शक्यो नहि. त्यारपछी गुरुजीए
योते ते ग्रहण कयु. ते( सुलताननो गुरु ) लज्जित थयो,
लोकोथी हसायो.
चीजे दिवसे पण एणे( सुलतानना गुरुए) पाणीथी.
मरेला घडाने आकाशमा राख्यो अने ते बहु ज गर्व करवा
लाग्यो. ते ज सूरिए (जिनप्रभसरिए ) घडाने पण प्रहार करी
खंड खंड कों, छतां पाणीने तो पोतानी विद्यावडे त्यां ज.
धंभाव्यु. ते चमत्कार जोइने मात्र तेना एक गुरुने मूकी कया
वाथी स्फुलिंग( अग्निना तणखा ) नीसरवाथी सुलताने प्रभुने
प्रणाम करीने, खमावीने सोनाना [ १००] टंकाओवढे
वुधाव्या हता.

सुलतान महम्मद.] [ ७१ माणसोने विस्मय थयो न हतो ? त्यारपछी सौ पोतपोताने घरे गया. - १ शुभशीलगणिए कथाकोश[इ. लि. कथा २]मा जणाम्यु ले के-" एक वखते जिनभप्रसूरिजी पीरोज सुलतान साथे गोष्ठी करता वेठा हता त्यारे त्यां मलाणको(मलाणा-मौलाना-मुल्ल्लांओ) आव्या. एक मुलाणके( मौलानाए) पोतानी टोपी आकाशमां उछाळी, ते त्यां निराधार रही. सुलताने जिनप्रभसूरिनी सामे जोइ कह्यु के-अहो! मोटुं आश्चर्य ! सूरि बोल्या सारं. त्यारपछी सूरिए ते टोपीने त्यां ज थंभावीत्यारपछी सुलतान बोल्या-' टोपी आणो' त्यारपछी तेणे( मौलानाए) आकर्षण मन्त्रनो प्रयोग कयों, पण टोपी आवी नहि. त्यारपछी सुलताने कह्यु के-जिन- प्रभसूरि ! तमे आणो. त्यारपछी सूरिए रजोहरण(ओघो) फेंक्यु. तेणे त्यां जइ टोपी आणी, तेथी सुलतान चमत्कार पाम्या, जि. प्र. ( व. का.)-" योगिनीपुर( दिल्ली )मां पातसाह पीरोजसुलतानना राज्यमां जिनशासनना प्रभावक जिनप्रभसूरि थया, तेना केटलाक चमत्कारो लखवामां आवे छे.- पातसाहनी सभामां एक मुल्लाणके टोपीने आकाशमां निरा- घार राखी. सुलताने जिनप्रभसूरिजीना सामुंजोयु, सूरिए रजोहरण (ओघा )वडे टोपीने प्रहार करी नीचे पाडी अने रजोहरणने त्यां( अद्धर ) राख्यु. मुल्लाणके बहु करवा छतां पण न पडयु.

७२] [ जिनप्रभसूरि अने ए विगेरे विविध श्रेष्ठ' प्रभावनाओवडे जेणे सुलतानने - पछी सूरिजीए हाथ ऊंचो करी ते लइ लीधुं. [आ प्रसंगने सूचवतुं एक चित्र पण प्राप्त थाय छे ]. शुभशीलगणिए कथाकोष कथा २]मां जणाच्यु छ के- "बीजे दिवसे माथा पर रहेल, पाणीथी भरेल घडावाळो पनिहारी ज्यारे राजा आगळ चाली त्यारे मौलानाए तेवू फ्र्यु के नेथी वंने घडाओ आकाशमां निराधार रह्या, खी तो आगळ गइ. माथे घहाने न जोता अने त्यां निराधार जोई राजा चित्तमा चमत्कार पाम्यो, तेथी राजाए ज्यारे तेनी प्रशंसा करी त्यारे गुरुए कछु के-'जो पाणी निराधार रहे तो श्रेष्ठ कला. त्यारपछी राजाए ते मौलानाने का, परंतु ते ते कला न जाणतो होवाथी मौन रह्यो, त्यारपछी गुरुए कांकरावडे बने घडा फोडी पाणीने निराधार राख्यु, राजा चमत्कार पाम्यो." जि. प्र. ( व. का.)-" वीजे दिवसे पाणीथी भरेलो घडो आकाशमा राख्यो. सुलताने सामे जोयु. सूरिए पाषाणथी प्रहार करी कपालो( घडानां ठीकरां) पृथ्वी पर पाड्यां. पाणी निराधार [लाहवाना आंकारे ] ज रघु. शासननी महाप्रभावना थइ. १. शुभशीलगणिए कथाकोश[इ. लि. कथा ४] मां जणाव्यु छे के-" एक वखते सुलताने कj-'जिनप्रभसूरि ! तमे विज्ञ छो. कहो, आजे हुं नगरना कया वारणाथी नीकलीश ! ' त्यार- सुलतान महम्मद. ] [७३ पण विशेष प्रकारे बोध पमाड्यो हतो. xx" -उपदेशसप्तति [अघि. ३, उप. ५, आ. सभा पृ. ५७-५९] . पछी जिनप्रभसूरिए पत्रमा लखीने बंध करीने सुलतानने ते लेख -आप्यो भने कयु के–'नगरथी बहार गया पछी लेख वाचवो.' त्यार- पछी सुलताने [काकर नामना] किल्लाना २१मा लंगक पासेनी(३१ थरोनी) इंटो दूर करावी, बहार नीकल्या. पछी लेख वांच्यो. जेवी रीते नीकल्यो हतो तेवी रीते ज लखेलुं हतुं. राजा हर्षित थयो." [कथा ५ मां] एक वखते सुलतान बोल्या के-" आजे हुं शु खाइश ?' त्यारपछी सूरिए लेख लखीने बंध करीने आप्यो अने कह्यु के-'जम्या पछी बांचवो.' त्यारपछी सुलताने खोळ खाधो. त्यार- "पछी लेख जोतां खोळ खावानुं लखेलुं जोयु. राजा हर्षित थयो." [कथा ६ मा] एक वखते सुलतान बोल्या के-'सूरि ! कहो, साकर शेमां नाखतां मीठी लागे ? ' मंत्रीओने अने पंडितोने पूछथु. अने ज्यारे कोइए पण न कर्तुं त्यारे सूरि बोल्या के-' म्हों मां नाखतां [कथा ७ मां] एक वखते सुलतान बहार बागमां गया हता. पाणीथी भरेलु मोटुं सरोवर जोइ सघळानी आगळ कमु के-"आ सरोवर धूळ पूर्या विना नानु केम थाय ?' एम पूछतां ज्यारे कोइए पण उत्तर न आप्यो त्यारे सूरिए( जिनप्रभे ) कह्यु. के-' आ सरोवरनी पासे वीजु मोटुं सरोवर करावाय तो आ नानुं थाय.' राजा हर्षित थयो.

७४] [ जिनप्रभसूरि अने १ [कथा ११ मां ] " एक वखते सुलताने जिनप्रभसूरिने फूछ्यु के-' पृथ्वी पर फयु फूल मोटुं ?' सूरिए कह्यु-'जगत्ने ढांकतुं होवाथी वउणि(वण-कपास).' शुभशीलगणिए कथाकोश[ कथा १६ ]मां सूचव्यु छे के-" एक नगरमां श्रावकोमा रोग उत्पन्न थयो हतो, ते कोइ रीते निवर्ततो न हतो. त्यांथी बे श्रावकोने जिनप्रभसूरि पासे मोकल- वामां आव्या हता. ते बंने श्रावको ज्यारे ध्यान करता जिनप्रभ- सूरिजीनी पासे आव्या, त्यारे तेओए गुरुजीनी पासे वे युवतीओ नोइ, तेथी ते बंने विचारवा लाग्या के-" गुरुजीने स्त्रीओनो. परिग्रह विद्यमान छे' ते बंने ज्यारे पाछा फर्या के स्तंभित थइ गया. ध्यान पछी ते बंने देवीओए पूछयु के–' अम्हने बनेने अहिं केम आणी छे ? ' गुरुजीए कह्यु के-' तमो बने द्वारा श्रीसंघने उपद्रव करवामां आवे छे, आ कारणथी शिक्षा आपवामां आवशे.' त्यार पछी ते देवीओ बोली के-' आजथी (हवे पछी ) श्रीसंघने उपद्रव नहि करवामां आवे.' स्यारे ते बनेने विसर्जित करी हती. बंने श्रावको मुक्त थया. गुरुजीने नभ्या. स्त्री-संबंध पूछतां गुरुजीए का के-आपना नगरमां श्रावकोने उपद्रव सांभळ्यो हतो, ते हालमां निवार्यो छे. आप. बनेए जोयु. त्यार पछी ते बने श्रावकोए पोताना नगरमां नइ गुरुए करेलुं. मणाच्यु हतुं. जिनप्रभसूरिना प्रबन्धनी जूदी जूदी प्रतियोमां पण थोडा , द सुलतान महम्मद. ] [ ७५ फेरफार साथे उपर जणावेलो, तथा वींटी विगेरेनो बीमो पण केटलोक वृत्तांत मले छे. एक ह. लि. पोथी[ १७ श. प. जय. भ. ]मां प्राचीन गुजराती भाषामां एवा आशयनो उल्लेख मले छे के-" वि. सं. १३३१ मां लघुखरतर जिनसिंहसूरिना पट्ट पर जिनप्रभसूरि महान् थया. तेमना गुरुजीए छ मास सुधी आयंबिल करतां पद्मावतीदेवीने आराधी हती. पद्मावतीए प्रत्यक्ष थइ कयुं हतुं के- भगवन् ! तम्हारं आयुष्य थोडं छे, तम्हारा शिष्य जिनप्रभ. सुरिने फलदायिनी थइश. वागड देशमां वडोद्रा(द) गाममा अमुकने त्यां नानो बेटो पगे घाइ ( खोडवालो ?) छे, तेने दीक्षा आपो.' एम कही पद्मावती अदृश्य थई हती. गुरुजीए त्यां जइ दीक्षा दीधी. शिष्यने पाट आपी गुरुजी परलोक पहोंच्या. जिनप्रभसूरिने ११ मे वर्षे पद दीg. ते जिनप्रभसूरिए ढिल्ली( दिल्ली) नगरमां महम्मद पात- साइने प्रतिबोध्यो हतो. अलावदीव [ थी ? ] पण मोटो पातशाह प्रतिबोध्यो. महावीरनी पाषाणमयी प्रतिमा बोलावी. पातशाह पासे प्रासाद कराव्यो. श्रीशत्रुजयनी यात्रा करावी. पद दीघां. रायण दूधे वरसावी. बार गाऊ वड चलाव्यो. ( मौलाना )ओ साथे वाद कर्या. राघवचैतन्य साथे वाद कर्यो. पातशाइनी हर्म राणी बालादेने क्षेत्र( खेतर )पाल लाग्यो इतो, ते छंडाव्यो. जाते. पीपलनी शाखा भांगी बेठो मल्लाणा- ७६ ] [ जिनप्रभसूरि अने समकालीन इतिहास. जावालिपुर( जालोर )मा रहेला जिनेश्वरसरिए पोतानो अंतसमय जाणी पोताना पट्ट पर पोताना हाथे वाचनाचार्य प्रबोधमूर्ति गणिने स्थापित कर्या हता, सकळ संघ आगळ बोलाव्यो. पातशाहना चित्तना अनेक चमत्कारो पूरा कर्या, मंत्रगर्भित ७०० स्तोत्रो का x x मोटा अवदातवाला (अतिशयवाला प्रभावक ) पुरुष थई गया. वी. ज्ञानभंडारनी ७ पत्रवाली वीजी पट्टावलीमा सूचव्युं छे के-" लघुखरतर श्रीजिनप्रभसूरि थया. जेणे महावीरनी मूर्तिने चोलावी, अमावास्यामांथी पूनम करी, अल्लावदीन (1) पातशाहने शत्रुजयनो संघवी कर्यो, रायणथी दूध वरसाव्यु, संघ साथे वड चलाव्यो, कलावंत शेखनी कुलह ( टोपी )ने मुहपत्तिथी मारी आकाशथी माथे आणी, ब्राह्मणनी पाणी भरेली गागर, आकाश- मांथी ओघावडे भांगी ठीकरांने हेठल नांख्या. पाणी पिण्डरूप थयु, पातशाहे हाथ धर्यो, ऊपरथी पाणी अर्यु. शीतज्वरने झोलीमां बांध्यो, लघुखरतरगच्छमां एवा चमत्कारी थया. ख. ग. नी एक पट्टावली [ साक्षर जिनविजयजी द्वारा संगृहीत अने स्व० बाबू पूरनचंदजी नाहर प्र. पृ. ५४ ]मां आ प्रभावक जिनप्रभसूरिना घणा अवदातो होबार्नु जणावी अन्य 'ग्रंथमांथी पद्य उध्धृत करी मूक्युं छे, ते पाठान्तर साथे सूचq छु. - सुलतान महम्मद. ] [७७ तेर्नु नाम जिनप्रबोधसूरि आप्यु हतु-एम तेमना शिष्य कवि सोममूर्तिगणिए रचेला जिनेश्वरसूरि-चीवाह-रास (ऐ. जैन गू. काव्य-संचय पृ. २२६-२२७ पद्य २९ थी ३१ मां सूचित कर्यु छे. वि. सं. १३३१ ना आश्विन व. ५ जिन-- प्रबोधसूरिनी पद-स्थापना अने ते पछी बीजे दिवसे (व. ६) जिनेश्वरसूरिनो स्वर्गवास थ्यो हतो, एम रास, ख. ग. पट्टावली. वि. परथी जणाय छे. आ जिनप्रबोधसरिए वि. सं. १३२८ मा (सूरि-गच्छ- पति थया पहेलां) कातंत्रदुर्गपद-प्रबोध रच्यो हतो, तथा रिपद थया पछी वि. सं. १३३३ मां प्रतिमा-प्रतिष्ठा करी हती. ए विगेरे अम्हे जेसलमेर मां. सूची (अप्रसिद्धग्रन्थ- ग्रन्थकृत्परिचय )मां जणाव्यु छे, तथा ए जिनप्रबोधसूरिए वि. सं. १३३४ मा प्रतिष्ठित करेल जिनदत्तसूरि-मूर्तिनो फोटो अम्हे अपभ्रंशकाव्यत्रयीमां प्रकट कराव्यो.छे. "गयणथकी जिनि(णि) कुलह नांषि(आणि) ओघइ उत्सारी, किद्ध महिष(य) मुष(ख)वाद नयर पिक्खइ नव वारी; दिली(दिल्ली)पति सुरताण पूठि तमु (वह)वृक्ष चलाविय, []यणि सेत्तुंजि सिहरि दुद्ध जलहर वरसाविय; दोरडइ मुद्र कीधी(किय) प्रकट, जिन-प्रतिमा बुल्लि वयणि, जिनप्रभसूरि सम कवण ?, भरतखंड-मंडिण रयणि.

७८] [ जिनप्रभसूरि अने जिनेश्वरसूरिना पट्ट पर उपर्युक्त जिनप्रबोधसूरि नियुक्त थया ए अवसरे वि. सं. १३३१ मां जिनेश्वरमरिना अन्य शिष्य जिनसिंहमरि (श्रीमालवंशी)द्वारा खरतरगच्छमाथी एक शाखा-मेद प्रकट थयो, जे लघु खरतरगच्छ( गण) तरीके ओळखायो. ख. ग.नी केटलीक पट्टावली तथा जिनप्रभसूरि- प्रबंध( व. का. )मां जणाव्युं छे के-" आ जिनसिंहमूरिए ६ मासना आयंबिल द्वारा पद्मावती देवीनुं आराधन कयु हतुं: देवीए तेमनुं अल्प आयुष्य सूचवी तेमना योग्य पट्टधर राज- प्रतिवोधक अने प्रभावक जिनप्रभसूरि थशे, तेनो परिचय आपी तेमना पर प्रसन्न थवा वचन आप्यु हतुं." पेथडशाहे देवगिरि( दोलताबाद )मां राजा रामदेव अने मंत्री हेमाद्रिना समयमां जिनदेव- मंदिर केवी रीते कराव्यु ? जेनी रक्षा जिनप्रभसूरिए करी हती. मुनिसुंदरमरिए वि. सं. १४६६ मा रचेली गुर्वावलीमा सूचव्युं छे के-" वि. सं. १३२७. मां देवेन्द्रसूरि अने तेना प्रथम पट्टधर विद्यानन्दसूरि १३ दिवसना अन्तरे स्वर्गवासी 'थतां तेमना वीजा पट्टधर विद्यानन्द-बंधु धर्मकीर्ति गणी ( गणनायक ) थया हता, जे धर्मघोपसूरि नामे प्रसिद्ध थया १. जुओ पृ. ४१-४२ नो उल्लेख, सुलतान महम्मद. ] [ ७९ हता. उदार बुद्धिवाळा ते गुरुए माळवा मंडळनी भूमिना विभू- यणरूप मंडपदुर्ग( मांडवगढ ) नामना नगरमां शाह पृथ्वीधर( पेथड )ने आहेत धर्मनो प्रबोध को हतो. त्रिकालज्ञानी ते भगवाने सम्यक्त्व साथे बारव्रत अंगीकार करता ते(अनाढ्य)ने पण पांचमा व्रत( परिग्रह-परिमाण )मां लाख द्रव्य(रू.)नी छूट रखावी हती. अनुक्रमे ते( पृथ्वीधर ) मालव- मंडलना राजानुं प्रजाओथी पूजातुं सचिवत्व प्राप्त करी शक्यो हतो. ऋद्धि वडे कुबेर जेवो थयो हतो. ते पृथ्वीधरे (पेथडशाहे) चैत्योद्वारा पृथ्वीने व्याप्त करी हती, सद्गुणोद्वारा मनीषी- ( सज्जनो )नां हृदयोने व्याप्त कर्यो हतां, कीर्तिओद्वारा दिशाओने व्याप्त करी हती. धनद्वारा भंडारोने व्याप्त कर्या हता, अने षड्गुणना जाणकार एवा तेणे पृथ्वीना प्रभुओ ( राजाओ) पर पण प्रकृष्ट शासन कयु हतुं. पोताना गुरु धर्मघोष ज्यारे ते नगर( मांडवगढ )मां पधार्या, त्यारे ते पृथ्वीधरे हर्षथी ३ अयुत अने ६ हजार ( ३६०००) जूना टंकाओना व्ययवडे तेमनो प्रवेशोत्सव को हतो. प्रसन्न थयेला गुरुए आपेल क्रम(अनुष्ठानादि आम्नाय)वाळा १. प्रभावक चमत्कारी आ योगी सूरिनो स्वर्गवास वि. सं. १३५७ मां थयो होवानुं गुर्वावली, तपागच्छ-पट्टावली विगेरे साधनोथी जणाय छे.

८० ]. [जिनप्रभसूरि भने अने क्रमथी द्रव्यव्ययनां स्थानो जाणनारा आ पृथ्वीधरे उज्ज्वल ८४ चैत्यो कराव्यां हता. श्रेष्ठ उदार धीर अचिन्त्य चरितोबडे तेणे लांचा काळ पर थइ गयेला, हरिषेण चक्रवर्ती, संप्रति अने कुमारपाळ राजार्नु स्मरण कराव्युं हतुं. मुक्तिलक्ष्मीथी संयुक्त जिन-नायकोथी विभूषित थयेला ते विहारो (जिनमंदिरो), भूमिरूपी भामिनीना हृदय पर रहेला मोतीना हारो जेवा शोभे छे. 'कोटाकोटि । एवा नामथी प्रसिद्ध महिमावाळो अने शांतिनो शत्रुजय पर, तथा 'पृथ्वीधर । एवी संज्ञावहे सुरगिरि(देवगिरि-दोलताबाद)मां अने मंडपाद्रि(मांडवगढ़) मां अने पृथ्वी. पर नगरो, गामो विगेरेमा रहेला तेना बीजा पण घणा ऊंचा प्रासादो मुक्तिरूपी वलभी पर चडयाने नीसर- शीना दंड जेवा शोभे छे. पृथ्वीधरशाहे करावेला प्रासादोना स्थानोनी संख्या अने मूलनायक जिनोनां नामो विगेरे वक्तव्य, पूज्य गुरु सोमतिलकसरिजीए करेलुं स्तोत्र, अहिं उतारीने पठन कर जोइए; ते आ प्रमाणे छे- "दीन विगेरेने सुविधिपूर्वक उत्कृष्ट दान आपनार, जयसिंह राजा प्रत्ये भक्तिवाळा, पोतार्नु औचित्य साचवनार, अर्हन्तोनी भक्तिथी पुष्ट, गुरुना चरण सेवनार, मिथ्यामतिने , -- सुलतान महम्मद् ] पेथडशाह [८१ परिहरनार, सत्शील विगेरेथी पोताना जन्मने पवित्र करनार, प्राये रोषनो नाश करनार, सारी रीते विशाल अनेक पौषध- शालाओ करावनार, मंत्रमय स्तोत्रद्वारा विदीर्ण थयेला लिंगथी विवृत(प्रकट)थयेल श्रीपार्श्वनी पूजा करनार, विद्यमालिदेवे करेल, देवाधिदेव नामथी प्रख्यात महावीरनी देदीप्यमान प्रतिकृति( मूर्ति )नी आडवरथी पूजा करनार, नित्य त्रिकाल जिनराजनी पूजन विधि तथा बे वखत आवश्यक( प्रतिक्रमणः) करनार, धार्मिक मात्र साधु पर पण मोटी भक्ति करनार, संसार पर विरक्ति करनार, सारां पर्वोमां पौषध करनार, साधर्मिकोर्नु सदा चैयावृत्त्य अने उच्च प्रकारे हर्षथी वात्सल्य करनार, पुण्य-सागर श्रीमत् संप्रतिराजाना, कुमारपाल भूपालना अने सचिवाधीश वस्तुपालना चरितने संभारी संभारीने उदार हर्षरूपी सुधा-सागरनी. ऊर्मियोमा उन्मजन करता, श्रेयरूपी उद्यानने सिंचित करवामां वर्षाकालना श्रेष्ठ मेघ जेवा सज्जन पृथ्वीधर( पेथड )शाहे . सम्यग् न्यायथी सारी रीते उपार्जित करेला बहोळा धनने सारा स्थानोमां स्थापतां वि. सं. १३२० वीत्या पछी नेत्रोने प्रसाद-जनक, सुख आपनारा जे जे प्रासादो, जे जे गिरि (पर्वत) पर, श्रेष्ठ नगरमां: अथवा गाममां कराव्या, ते प्रासादोने तेमां रहेला. जिननायकोना : नाम साथे श्रद्धापूर्वक हुं स्तवं छ- ६ ८२ ] पेथडशाहे करावेला [जिनप्रभसूरि अने मूलनायक जिन नाम वि. सं. १३२० लगभगमां पेथडशाहे करावेला सोनाना दंड-कलशवाळा ८४ जिन-प्रासादोनां मुख्य स्थानो. नग-नगरादि-नाम. १ मंडपगिरि( मांडवगढ-माळवा )मां आदिजिन २ *निवस्थूर पर्वत पर (गिरनार-स्मारक) नेमिजिन , नीचे भूमि पर पार्श्वनाथ ४ *उज्जयिनीपुर(उजेणी-माळवा)मां ५ विक्रमपुरमा नेमिजिन ६-७ मुकुटिका(मकुडी)पुरीमा पार्श्वजिन अने आदिजिन विन्धनपुरमा मल्लिनाथ आशापुरमा पार्श्वनाथ १० घोषकीपुरमां आदिजिन ११ अर्यापुरमा शांतिजिन १२ *धारा नगरमां नेमिनाथ ३ * ८ ९ १. रत्नमंडनगणिए रचेला सुकृतसागर काव्यमां शत्रुजयावतार (शत्रुजय-स्मारक) नामना आ चैत्यने ७२ जिनालयोवाळु, सोनाना दंड-कलशवाळु १८००००० अढार लाख द्रम्मोवडे करावेलु अणाव्यु छे.

सुलतान महम्मद.] जिन-प्रासादो [८३ १३ वर्धनपुरमा नेमिनाथ १४ चंद्रकपुरीमा आदिजिन १५ जीरापुरमा २६ जलपद्रमां पार्श्वनाथ दाहडपुरमा १८ हंसलपुरमा वीरजिन १९ *मान्धाताना मूलमां अजितनाथ धनमातृकापुर( धणियावी? )मां आदिजिन २१ *मंगलपुरमां अभिनंदन जिन २२ चिक्खलपुरमा पार्श्वनाथ २३ जयसिंहपुरमा वीरजिन २४ सिंहानकमा नेमिजिन २५ . सलक्षणपुरमां पार्श्वनाथ २६ . *औन्द्रीपुर(इंदोर ?)मा २७ ताहणपुरमा शांतिजिन २८ प्रहस्तिनापुरमा अरजिन २९ करहेटक(करहेडा)मां पार्श्वनाथ ३० नलपुरमा नेमीश्वर दुर्गमां १-२. सु. सा. मां चंद्रावती तथा ज्यापुर जणावेल छे. ३.. आगळ पृ. ८६ नी टिप्पणी जुओ, ३१ ८४ ] पेथडशाहे करावेला [ जिनप्रभसूरि अने वीरजिन कुंथुनाथ आदिजिन ३२ विहारक(विहार ? व्यारा ?)मां ३३ लंबकर्णीपुरमा ३४ खंडोह( खंडवा )मा ३५ चित्रकूटाचल( चित्तोडगढ )पर ३६ पर्णविहारपुरमा ३७ चंद्रानकमां ३८ *चं(वां)कीमां ३९ नीलकपुरमा ४० नागपुरमा ४१ मध्यकपुरमा ४२ अंदर्भावतिकापुर( डभोइ )मां ४३ *नागहूद (नागदा )मां ४४ *धवलक्क (धोळका ) नगरमां ४५ जीर्णदुर्ग( जूनागढ )मां ४६ सोमेश्वरपत्तन( प्रभासपाटण )मां ४७ शंखपुरमा ४८ सौवर्तकमां ४९ *वामनस्थली(वणथली)मां ..५० नासिक्य(नाशिक)पुरमां ५१ सोपारपुरमा ५२ रूणनगरमा पार्श्वनाथ आदिजिन अजितनाथ. आदिजिन पार्श्वनाथ चंद्रप्रभजिन नमिनाथ मल्लिनाथ पार्श्वनाथ मुनिसुव्रत जिन महावीर जिन नेमिजिन चंद्रप्रभ जिनः पार्थजिन " सुलतान महम्मदः 1 जिन-प्रासादो. [८५ उरुंगल( वरंगल )मां पार्श्वजिन ५४ प्रतिष्ठान( पैठण मां ५५ सेतुबंधमां नेमिजिन ५६ वटपद्र(वडोदरा ?)मां वीरजिन ५७ नागलपुरमा ५८ टक्कारिकामा ५९ *जालंधरमां ६० " *देवपाल( देपाल )पुरमां ६१ *देवगिरि( दोलतावाद मां ६२. चारूपमा शांतिजिन द्रोणतमां नेमिजिन ६४ रत्नपुरमां ६५ अवुकपुरमां अजितनाथ ६६ अकोरंटकमां मल्लिनाथ ६७ *ढो(द्वारसमुद्र (पशुसागर.) देशमा पार्श्वनाथ ६८ *सरस्वती पत्तन( पाटण )मां ६९ शत्रुजय पर कोटाकोटि' जिनेन्द्रमंडप साथे शान्तिनाथ ७०. *तारापुरमा आदिजिन ७१ *वर्धमानपुर(वढवाण १ वडवाणी? )मां मुनिसुव्रतजिन १ सु.सा. मां आने ( भार-प्रमाण सोनाना ७२ दंड-कलशवाळो प्रासाद सूचव्यो छे. भार-प्रमाण माटे पृ. ८७ नी टिप्पणी वांचो. :

८६] पेथडशाहनां [ जिनप्रभसूरि अने ७७ ७८ ७२ वटपद् ( बडोद ?) मां आदिजिन ७३ गोगपुरमा ७४ पिच्छनमां चंद्रप्रभजिन ७५ *ओंकारपुरमा अद्भुत(उत्कृष्ट) तोरणवालं जिनमंदिर ७६ *मांधातृ(ता)पुरमा त्रिक्षण विक्कनपुरमा नेमिनाथ चेलकपुरमा आदिजिन एवी रीते पृथ्वीधरे प्रत्येक पर्वत, नगर, गाम अने सीममां सर्वत्र ( चोतरफ ) हिमालयनां शिखरो साथे स्पर्धा करनारां उंचां चैत्योमां, पृथ्वीरूपी युवतिना माथाना मुकुट जेवां, जिनोनां जे विवोने स्थाप्यां तेने तथा देवोए अने नरवरोए * आवी निशानीवाळां नगर, गाम विगेरेनां नामो सु. सा. मां पण सूचवेल छे. १. पुरण-प्रख्यात 'ओंकार-मान्धाता ' संबंधी एक परि- चयलेख 'वाणी' हिन्दी पत्रिकाना वि. सं. १९९१ना 'नीमाड" २ अंकमां छे. ओंकारपुरमा पेथडशाहे हेमाद्रिना नामे चलावेल सन्न भोजन- दानशाला माटे आगल वांचो, अनेक राज्य-परिवर्तन उथलपाथल अने अन्य आस्मानी-सुलतानी पछी हालमा अहिं ते श्वे० जैन मन्दिरोनां दर्शन थतां नथी, परंतु ओंकारजीमां अर्वाचीन दि. जैनमन्दिर 'सिद्धवरकूट' सिद्धक्षेत्र नामथी ओळखावाय छे. -

सुलतान महम्मद.] सुकृतो.
[ ८७
ma
करावेलां अने न करावेला( अकृत्रिम-शाश्वत) अन्य
जिन-विवोने पण हुं वंदन करुं छु." पृथ्वीधरशाहे करावेलां
चैत्योर्नु (श्लो. १८६ थी २०१) १६ काव्योवालं स्तोत्र,
पूज्य सोमतिलकसरिए करेलुं छे.
फरकता ध्वजरूपी हंसोथी शोभती आकाशगंगाने चन्द्रकांत
रत्नना पाणीवडे स्रवतो, स्फटिकरत्नमय कलशरूपी चंद्रने
मस्तकपर धारण करतो, मरकतमणिद्वारा नीलकंठवाळो तेनो
उज्ज्वल चैत्योनो समूह, ज्योत्स्नावाळा हर( महादेव )ना
विलासनो आश्रय करे छे. (महादेवना विलासनी जेवो शोभे छे).
आ( पृथ्वीधर-पेथडशाह )नु वारंवार वर्णन शुं कराय ?
जेणे हर्षथी २१ धडी प्रमाण सोनाना व्ययद्वारा, शत्रुजय पर
सुमेरुपर्वतना शिखर जेवू आदीश्वरनुं सुवर्णमय मंदिर कराव्युं
हतुं. तेना पुत्रः झंझणदेवने उत्तम जनो उदार कहो अथवा
कृपण कहो; आश्चर्य छ के-जेणे शत्रुजयमां अने रैवतक
(गिरनार )माँ पण सोना-रूपानो एक ज ध्वज आप्यो हतो.
केटलाक कहे छ के-'सोनानी ५६ घडीनो व्यय करी तेणे
लीलामात्रथी हर्षपूर्वक इंद्रमाला पहेरी हती.' पृथ्वीने त्रण
१. गणितसार विगेरे प्राचीन गणित ग्रंथोमां, सोनाना तोल
संबंधमां सूचव्यु छे के-५ गुंजा (चणोठी)-१ मासो. १६ मासा
कर्ष. ४ कर्ष=१ पल. ६ पल=पा मण १२ पल-अधमण,
२४ पल=१ मण. आवा १० दश मणनी १ घडी अने १.
घडी-१ भार गणाय छे.
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८८] पेथडशाहे देवगिरिमा [जिनप्रभसूरि अने दिशामा धारण करता कूर्म ( कच्छप.), वराह भने शेष घj कष्ट पामता हता; तेओ ते पृथ्वीने चोथी दिशामां धारण करनार पृथ्वीधरने प्राप्त करीने हर्पित थया. मोक्ष आपवामां जामीन जेवां, जिनोए कथन करेला समग्र शास्त्रो लखावीने तेणे उच्च प्रकारनां सरस्वती-क्रीडागृहो जेवा ७ श्रेष्ठ कोशो ( भंडारो) भराव्या हता. स्तंभतीर्थ( खंभात )मां निवास करता प्रभावक संघ- पति भीमे शील (ब्रह्मचर्य) स्वीकारतां, समस्त साधर्मिकोनो सत्कार करतां पृथ्वीधरने पण उचित वेप मोकलान्यो हतो. प्रथमिनी नामनी सुपत्नी साथे, तेवी रीते (ब्रह्मचारी थइने)ज साधर्मिकपणानो विचार करतां ३२ वर्पनो भट (शक्ति- संपन्न युवक ) होवा छतां पण, कामने जीती, शील (ब्रह्मचर्य) स्वीकारीने पृथ्वीधरे ते वेष पहेर्यो हतो. आ( पृथ्वीधर )नी प्रिया प्रथमिनी पण सतीओमां प्रथम तरीके प्रख्यात थइ हती; गुरु-देव-भक्त एवी जे पण कोइ चार पण, क्यांय पण पुण्य कृत्योद्वारा पृथ्वीधरथी हीन थइ न हती. राजाए अर्पण करेल मालवा(देश)नी रक्षानी महाचिंता- चाळो होवा छतां पण गुरुना उपदेशने वश रहेनार, वंने वार प्रतिक्रमण करनार, नित्य ३ चार जिन-पूजन, गुरु-नमन, साधर्मिकोर्नु अभ्यर्चन('सन्मान ), दीन विगेरेनो उद्धार सशास्त्रोनुं पठन, पर्वदिवसोमां पौषध, ए प्रमाणे कृत्योने ते सुलतान महम्मद.] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो? [ ८९ आश्चर्यकारक रीते करतो हतो. श्रेष्ठ उदार समग्र सद्गुणोवाळी, सदा ६ आवश्यकोमा तत्पर, अर्हद्-गुरु-भक्त, मत-प्रभावक ते ( पृथ्वीधर=पेथड ) पृथ्वीना अलंकाररूप थइ गयो." [ मुनिसुंदरसूरिनी सं. गुर्वावली श्लो० २०२ थी २१२] देवगिरिमां जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो? पं. रत्नमंडनगणिए विक्रमनी १६ मी सदीमां रचेला पेथडशाहना ऐतिहासिक प्रबंधरूप सुकृतसागर नामना मंडनांक सं. काव्य( चतुर्थ तरंग )मां सूचव्यु छ के- " ते प्रासादोमां, देवगिरिपुरमा एक दिव्य प्रासाद, जे रीते बन्यो, ते प्रबंध जाणवा योग्य छे- " हाथीओनी मद-वृष्टिनी सुगंधथी बहेकता मुख्य द्वार- चाळ, घणा सुवर्णथी सार्थक नाम धरावतुं देवगिरि( देवोनो पर्वत स्वर्णगिरि मेरु)पुर छे. प्राकार( किल्लो), परिखा (खाइ) अने आराम(उद्यानो)नी पंक्तिओथी परिवेष्टित थयेला श्रीबीज जेवा जे नगरने शत्रुओ एकतानवाळा थइ संभारे (ध्यानमां धरे) छे. ते नगरमां ध्वनि करतां बार हजार वाघोद्वारा शत्रुओने त्रास पमाडनार, संग्रामनी शोभानाप्रयोजनरूप थयेल शस्त्रो विगेरेनी सामग्रीवाळो, तथा १ मोतीनी जोड, २ चित्तने चोरनार स्त्री, ३ कष्टभंजन घोडो अने ४ बावनाचंदन ए चार रत्नोवाळो, ५६ करोड सोनैयावाळो, ८०००० एंशी ९० 1 पेयडशाहे देवगिरिमा [जिनप्रभसूरि अने हजार घोडाओवाळो तथा १२००० बार हजार हाथीओवाळो राम नामनो राजा हतो. तेनो धी-सख ( मंत्री) हेमादि हतो, जेनी पासे घj हेम विगेरे हतुं. आश्चर्य छे के जेणे कृपणताथी पोतार्नु पाप पण याचकोने आप्यु न हतुं. ते वखते त्यां ब्राह्मणोनुं एकछत्र १ उपर सूचवायेल हेमादि ए देवगिरि-राज्यमां दक्षिणना इतिहासमां सुप्रसिद्ध हेमाद्रि एक नामांकित अधिकारी थइ गयेल छे. तेनो परिचय करतां पहेलां आपणे गुजरात अने दक्षिणनो तत्कालीन पूर्व इतिहास लक्ष्यमा लेवो जोइए. विक्रमनी १३मी सदीना उत्तरार्धमां देवगिरिना राजा सिंहणे मोटुं सैन्य मोकली गुजरात पर चडाइ करवानी एक तक साधी हती, परंतु गूर्जरेश्वर-महामात्य मंत्रीश्वर वस्तुपालनी-वीरता- भरी समयसूचकताथी तथा महामंडलेश्वर वाघेला लावण्यप्रसाद अने महाराणा वीरधवलनी वीरताथी तेमां तेने सफलता मळी जणाती नथी.भरुचनी सरहदमां-नर्मदा अने तापी नदीना तट पर बने पक्षनां सैन्योए भयानक परिस्थिति उपस्थित करवा छतां अंते संधि थयार्नु सूचन मळे छे. गूर्नरेश्वर-पुरोहितकवि सोमेश्वरे रचेली कीर्ति- कौमुदी ( सर्ग ४, श्लो० ४३-४७), जयसिंहसूरिए रचेल हम्मी- रमदमर्दन नाटक, तथा मं. वस्तुपालनो ऐ. परिचय कगवतां केटलांक अन्य साधनो परथी ए जणाय छे. गा. ओ. सि. तर- फथीं प्रकाशित. थयेली लेखपद्धतिमां यमलपत्रना उदाहरण तरीके - सुलतान महम्मद.] जिन-प्रासाद केवीरीते कराव्यो? [९१ साम्राज्य हाँ; जैन चैत्य करावनाराओने तेओ बलवडे अटकावता हता. ए वात सांभळीने देदना नंदन पेथडशाहे विचार्यु के-'जो कोइ पण रीते आ नगरमां विहार(जिनमंदिर) करावायतो घणो लाभ थाय अने जैनदर्शननी प्रभावना थाय. फरी विचार कयों के 'तो हेमादि साथे हुँ प्रेम धारण करूं, जेथी तेनी प्रेरणाद्वारा म्हारं आ प्रयोजन राजाथकी सिद्ध थाय. सर्वांग-पूर्ण लक्ष्मीवाळो आ राजा तो घणा सोनावडे, माणेकोवडे, घोडाओवडे के हाथीओवडे तुष्ट करी शकाय तेम नथी. 'प्रधानने संतुष्ट कर्या विना राजाने तुष्ट करवा'-ए न्याययुक्त नथी. 'बारणाना विबने वि. सं. १२८८ वै. शु. १५ना निर्देश साथे ए संधिनी शरतो सूचवी छे के-" सिंहणदेवे अने महामंडलेश्वर राणा लावण्यप्रसादे पूर्व रूढि प्रमाणे पोतपोताना देशमा रहे, कोइए पण कोइनी भूमि पर आक्रमण करवू नहि-दबाववी नहि; शत्रुथी हल्लो थाय तो एक- बीजाए सैन्यनी सहायता करवी." सिंहणनी बिरुदावलीमां तेने 'गूर्जरराज-हस्त्यंकुश' तरीके तथा गूर्जरेश्वर वीसलदेवने 'सिंघण- सैन्य-समुद्र-संशोषणवडवानल ' तरीके ओळखावेल छे. उपर्युक्त चंद्रवंशी सिंहण पछी, जैत्रपाल पछी, राजधानी देवगिरि( दक्षिण )नी गादी पर आवेल महादेव राजाना अने तेना उत्तराधिकारी रामदेव राजाना राज्यमां (विक्रमनी १४ मी सदीना पूर्वार्धा) श्रीकरणाध्यक्ष हेमाद्रि नामनो अतिबुद्धिशाली राज्याधिकारी थई गयो. पुराणो, स्मृतियो विगेरेमाथी उधृत करी .

" ९२] पेथडशाहे देवगिरिमा [जिनप्रभसूरि अने पूज्या विना मूलनायक पूजाय नहि. १ तेथी सत्र (सदावत- दानशाला-भोजनशाला ) मांडवामां आवे अने त्यां हेमादिनु नाम कहेवामां आवे; तो लोकमां पोतानो प्रासुक (पोते न करेल, न करावेल ) यश सांभळीने ते तुष्ट थाय. एवी रीते तेनुं तोपण अने दानथी उत्पन्न थतुं म्हारं पुण्य-'आंबाने पाणी सिंचाय अने पितृओने तृप्ति थाय । ए विगेरे नीतिनी जेम-ए वंने कार्यों थाय. उपर प्रमाणे विचार करीने पृथ्वीधरे (पेथडशाहे ) मुसा- फरोने आनंद आफ्नार विशाळ सत्रागार ( सदादान-भोजन- शाळा) ओंकारनगरमांमंडाव्यु. त्यां सज्जनोने उज्ज्वल पाणीवडे १ व्रत, २ दान, ३ तीर्थ अने ४ मोक्ष ( परिशिष्ट साथे ) विषय पर योजायेल 'चतुर्वर्ग चिंतामणि' नामनो विशाल संग्रह ग्रंथ ए हेमाद्रिनी कृति तरीके ओळखाय छे. तेमां देवगिरिना यादव ( जाधव ) राजाओ साथे हेमाद्रिनी पण प्रत्येक परिच्छेदमा प्रशंसा करवामां आवी छे. ए विचारतां वास्तविक रीते ते संग्रह कृति, हेमाद्रिना आश्रित कोई विद्वान्नी जणाय छे. आ हेमाद्रि संबंधमां मराठी भाषामा 'हेमाद्रि उर्फ हेमाडपंत ' नामर्नु विस्तृत माहिती- वाळू पुस्तक, केशव आप्पा पाध्ये, बी. ए. एल एल्. वी. (अॅडव्होकेट, मुंबई हाइकोर्ट ) द्वारा सन् १९३१मा प्रकाशमां आवेलुं छे, एटले अहिं तेनो विशेष परिचय कराववानी खास "अपेक्षा रहेती नथी. .

सुलतान महम्मद. ] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? [ ९३ . स्नान करावातां हता. प्राकृत (सामान्य) मनुष्यो माटे पग धोवा लायक पाणी तैयार रखातां हता. सत्रनी समीपमा विहार (जैन मंदिर)मा अर्हन्तोने प्रणाम करावी साधर्मिक थयेला सर्वने विवेकथी भोजन करावातां हतां. घणां पक्वान्नो, खांडथी भरपूर मंडो ( मालपूडा ), अखंड उज्ज्वल शालि ( चोखा ), पीळी गुणकारी दाळ, नाकथी पीवाय एवं घी, घणां शाको, पित्तने शांत करनारा करंभा, स्निग्ध (तर-चीकाशवाळ) दहीं, लवंगना संगथी सुगंधि पाणी मनुष्योवडे स्वेच्छापूर्वक आ- स्वादित करातुं हतुं. नागरवेलनां पानो, कपूर अने सोपारी साथे अपातां हतां. पछी निद्रा विगेरे माटे दिव्य खाटो ( पलंगो) अपाती. हती. त्यां आवेला प्रवासीओ स्वादु भोजन करता अने सुखे सूता छता पोतानी स्त्रीओना अने माताओना हाथोने तथा पोतानां घरोने संभारता नहि. पूछ- नाराओनी आगळ तो हेमादिनु ज नाम कहेवामां आवतुं हतुं.. एवी रीते पेथडशाहे त्यां ज्यारे ३ वर्षों सुधी सत्र चलाव्यु: त्यारे भोजनथी प्रसन्न थयेला, देवगिरिमां गयेला भाट विगेरे, ३ वर्ष सुधी हेमादिनी आदरथी एवी रीते स्तुति करताः हता के- . " ओंकारपुररूपी क्यारामां, पृथ्वीना जनोने अतिप्रिय एबुं सत्र, यतिओना समूहबडे परम ध्येय पवित्र वीज जेवु आ- चरण करे छे ते थकी उत्पन्न थयेली अने कवितारूपी आ -- ९४ ] पेथडशाहे देवगिरिमां [ जिनप्रभसूरि अने नीकोवडे विस्तरेली तमारी असाधारण कीर्तिरूपी लता आजे मांडवानी जेम ब्रह्मांड पर चडे छे. " ए विगेरे प्रकारर्नु प्रशंसावालं खोटुं वर्णन नित्य सांभळतां हेमादिए एक वखते चित्तमा विचार कयों के-" में जन्मथी मांडीने याचकोने पण काइ आप्युं नथी, तो आ लोको सत्र (दानशाला-भोजनशाला शुं कहे छे ? अने आ वळी जो कदाचित् कोइ एक कहे तो खोटुं होइ शके; परंतु आटला वधा लोको आटला वखत सुधी असत्य बोलनारा न होई शके." एवो विचार करीने ते जोवा माटे तेणे एक माणसने ओंकार- पुरमां मोकल्यो. त्यां जइ आवेला ते माणसे जाणेलो संबंध जणाव्यो के-" सर्व प्रकारना स्वाद रसवाळी ते भोजनशालामां जे भोजननो स्वाद ग्रहण करे, ते ज रसना( जीभ )ने हुँ रसज्ञा जाणुं छु, वीजी जीभने तो रसना कहो. त्यां आवेलो कोइ पण माणस असंतुष्ट थइने जतो नथी, तेम ज अन्य भोज- नोनी अवज्ञा कर्या विना जतो नथी, तथा तमारी प्रशंसा कर्या विना जतो नथी.तमने ते भोजनशालामां आटला वखतमां सवाकरोड द्रम्मनो व्यय थयो; परंतु तमारो यश अने पुण्य करोड कल्प पर्यन्त रहे तेवां थयां छे. कानरूपी नीकद्वारा आवेलां आ वचनरूपी पाणीवडे सिंचायेला हेमादिना शरीर पर रोमांचरूपी अंकुरा प्रकट थया. त्यार पछी ओंकारपुरमा जइ भोजनशालाना अधिकारीओने सारी रीते पूछीने ते भोजन- शाला चलावनार तरीके पृथ्वीधर( पेथडशाह )ने जाणीने .

सुलतान महम्मद. ] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? [ ९५ हेमादिए तेनी स्तुति करी के-" ते पुण्यवती स्त्रीनी कुक्षिना ओवारणा लडं, के जेणीए पृथ्वीधर नामथी प्रख्यात पुरुष-रत्न उत्पन्न कयु. ते पुत्रवती सती युवती भले गर्व धारण करो के जेणीने गुणोबडे अलौकिक पृथ्वीधर( पेथड ) जेवो पुत्र छे." "वीजाना द्रव्यवडे पोताना नामने प्रख्यात करे तेवा पुष्कळ मनुष्यो छे; परंतु पोताना द्रव्यवडे वीजानी ख्याति करावनार तो मात्र पृथ्वीधर( पेथड ) ज छे " ए प्रमाणे स्तुति करीने हेमादि, स्वर्गनगरीना गौरवने न्यून करनार दुर्ग (मांडवगढ )मां जइने पेथडशाहने मळ्यो. पेथडशाहे तेनों हर्षथी सत्कार कर्यो, हेमादिए तेने कह्यु के-तमोए आवी भोजनशाळा म्हारा नामे मांडी, तेनो जे हेतु होय ते खुशीथी मने कहो. जो के तमारा उपकारनो बदलो तो हुँ कोइ. रीते वाळी न शकुं, तो पण म्हारा योग्य कार्यनुं कथन करी मने आनंदित करो.' प्रधान(हेमादि) वडे आग्रहपूर्वक पूछातां पृथ्वीधरे( पेथडशाहे ) कह्यु के-'जो विलंब विना कार्य- सिद्धि थाय, तो कार्य कहेवामां आवे. ' हेमादिए का के-बहु शुं कहुं १, तमोए इच्छेलु कार्य, मारे द्रव्यवडे, बल- बडे अने शरीर द्वारा पण करवानुं छे. ' पेथडशाह बोल्या-'तो देवगिरि पुरनी मध्यमां विहार ( जिनमंदिर )ने योग्य एवी मोटी भूमि मने अपावो.' ब्राह्मणोनी उद्धताइथी दुःसाध्य एवं पण ते कार्य, प्रौढ - ९६ ] पेथडशाहे देवगिरिमा [जिनप्रभसूरि अने उपकारना भारथी दबायेला ते बुद्धिशाळी मंत्री हेमादिए तेज चखते स्वीकार्यु, त्यारपछी सपरिवार ते बंने देवगिरि पुरीमां गया. हेमादिए मंत्री पेथडने रमणीय हर्म्य( हवेली )मां उतार्या. 'चैत्यनी भूमि माटे हुं जाते राजाने विज्ञप्ति करीश, आ विषयमां तमारे कांइ पण चिंता न करवी.' एम कही हेमादि घरे आव्यो. हेमादि अवसर जोतो हतो; कारण के अवसर विना करातुं कार्य सारं थतुं नथी. एवामां एक सारो अवसर मळी गयो. घोडा वेचनारा त्यां आव्या. राजाए तेमांथी एक श्रेष्ठ घोडो लेवा प्रधानने का. अश्वलक्षणना विचक्षण परीक्षक हेमा- दिए एक जातिवंत घोडो दर्शाव्यो. समस्त लक्षणवाळो देवसत्त्वी ते घोडो राजाने पसंद पड्यो. गति विगेरेथी तेनी परीक्षा करी ६०००० साठ हजार टंका(रू.)वडे ते घोडो लइ राजा घरे गयो. अन्य प्रसंगे पाणी-पार उतरतां हेमादि मंत्रीनी प्रतिभाथी ते जातिवंत( कुलीन ) घोडानी उत्तमतानी प्रतीति थइ. राजाए तेनुं नाम ' कष्टभंजन ' प्रकट कर्यु, श्रेष्ठ सत्कार कों. हेमादिना विस्मयकारी ते विज्ञानथी तुष्ट थइ राजाए अभीष्ट मागवा कह्यु. ए अवसरे मंत्री हेमादिए माग्यु-' मारो एक बन्धु अहिं मनोहर विहार( जिन-मंदिर ) कराववा इच्छे छे ते माटे मनोऽभिलषित स्थानमां भूमि अर्पण करो. राजाए कयु के-' ब्राह्मणोनी अप्रीति होवा छतां पण में तमने भूमि

सुलतान महम्मद. ] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? [ ९७
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आपवी छे ज; परंतु कहो के-ते वन्धुनुं नाम शुं छे १. अने ते
क्यां वसे छे ? ' हेमादिए कह्यु के-' राजन् ! अवंती
(माळवा )नो अलंकार, धर्मकर्ममां कुशल पृथ्वीधर (पेथड)
नामनो जीभथी मानेलो म्हारो बंधु छे. माळवामां जयसिंह
नामना राजा बिबमात्र छे छत्र अने चामरोथी रहित होवा
छतां पण पृथ्वीधर( पेथड )ज पति( राजा ) छे, ते प्रात:-
काले प्रभु( आप महाराजा )ने प्रणाम करवा माटे
आवे त्यारे स्नेहथी घरे आवेल मालवराजने योग्य एवा सर्व
गौरवने योग्य छ।
राजाए( रामदेवे ) ए अवधारण करी हृदयमा निश्चय
कॉ. हेमादिए हर्षित थइ पेथडशाहने सूचित कयु. बीजे
दिवसे माळवाना मंत्री पेथडशाह, राजसभामां राजाने मळवा
आव्या त्यारे थाळमां सोनानी महोरो उपर श्रीफळ( नाळी-
एर )नी भेट धरी, समीप आवतां राजा( रामदेव ) जल्दीथी
ऊमा थइ हर्षथी तेने भेट्या.
राजाए पेथडशाहने योग्य आसन पर बेसारी, स्वागतादि
पूछी, नाळिएर ग्रहण करी भेटणुं पाछु आप्यु. प्रधानने पहेरामणी
करी राजा पृथ्वीना दान माटे घणा परिवार साथे घोडा पर
बेसीने नगरीमां गया. चौटानी अंदरनी पृथ्वीनी प्रार्थना
थतां राजाए ते आपी, ब्राह्मणो दून थवा छतां पण दोरी

९८] पेथडशाहे देवगिरिमा [जिनप्रभसूरि अने देवरावी. प्रधाने भेट माटे आणेला सोनैयाओ वडे, नगरीना जनोने संतोषित करी वाद्योना ध्वनिपूर्वक हर्पथी महोत्सव कर्यो. कच्छ-भंगनी उचितता विचारी महेभ्य-श्रीमानोनी ७ हवेलीओ थइ शके तेटली भूमिमां हाट, घर विगेरे सघलं पडावी नाख्यु. शुभ दिवसे ३ वांस प्रमाण पायो खोदावतां घj स्वादिष्ट अपूर्व पाणी प्रकट थयु. ते जाणीने मत्सरी भृदेवो- (ब्राह्मणो )ए उत्सुक थइ सांझे रामदेव राजाने विज्ञप्ति करी-'राजन् ! पहेला अहिं क्याय स्वादु पाणी न हतुं, ते हालमां तमारा भाग्यथी विहार( जिनमंदिर )नी भूमिमां प्रकट थयुं छे, तो त्यां वाव करावो. अहिं तरस्या अढारे वर्ण पाणी पीशे; तेमां तमने जे पुण्य थशे तेनो तो पार नथी. हे राजन् ! कूवा विगेरेमांथी निपान( अवेडो) कराववामां पुराणमां पण चोरना उदाहरणपूर्वक बहु पुण्य कहेवामां आव्यु छे, तो चैत्यने योग्य भूमि वीजे आपी आ स्थळमां घणा पुण्य माटे कृपा करी वाव करावो. ब्राह्मणोना वाक्यथी राजानुं चित्त दोलायमान थयु. ' सवारे त्यां आवी, पाणी पीने स्वादु जणातां विपुल वाव ज करावाशे एम कहीने राजाए तेओने विसर्जित कर्या. पेथडशाहे पोताने उतारे हमेशां आवता, राजाना एक नापित( नाइ-हजाम )ने तुष्ट करेलो हतो, तेणे पेथडशाहने ते जणाव्यु. अवसरज्ञ माळवानो अमात्य पेथडशाह राते लवण- सुलतान महम्मद. ] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? [ ९९ वालदि ( मीठाना अगर ) जाणी, द्वारपाळने द्रव्य आपी पोठ्योने नमरीमा दाखल करावी, मीठं नखावी, पाणी खारूं करी, तेमने खाना करी, घरे आधीने सुखे सूतो. सवारे त्यां आवेला राजाए माणसो द्वारा मंगावी ते पाणीनो जाते आस्वाद कयों. खारुं जणातां शृंकी नाख्यु. 'ब्राह्मणोए मत्सरथी खोटुं कयु ' एम विचारी ब्राह्मणोने ठपको आप्यो. पृथ्वीधर(पेथड )नु सन्मान कर्यु, एवी रीते बुद्धि- भंडार प्रधान पेथडने प्रासाद माटे पृथ्वी प्राप्त थइ. [कहे छे के-सिद्धराजे रुद्रमहालय कराव्या पछी ते कर- नार सूत्रधारने 'एना जेवू शिल्पकाम ए अन्यत्र न करे । ए हेतुथी अंध को हतो. सूत्रधारे एथी पण श्रेष्ठ जैनप्रासाद करवा प्रतिज्ञाथी इच्छा राखी हती. अपूर्णाश ते सूत्रधारनी पेढीनो पांचमो वंशज कला-रत्नाकर रत्नाकर भमतो भमतो ते अवसर पर मंत्री(पेथड)ने मळ्यो हतो.] बुद्धिशाळी मंत्री पेथडशाह, ते रत्नाकर सूत्रधारद्वारा कर्मस्थायनो आरंभ करावी त्यां वणिकपुत्रो( वाणोतरो)ने मूकी माळवा गया अने तेओए कर्मस्थाय माटे सोनाथी भरेली ३२ सांढणी मोकलावी आपी. ते माटे हजार हजार इंटो पकव- नारा १० नीभाडा थया हता. ३ वांस प्रमाण पायावाळी यापाणनी ३ संधियोमा अनुक्रमे ५ शेर, १० शेर अने १५ हे ज १०० ] पेथडशाहे देवगिरिमां [ जिनप्रभसूरि अने - शेर लोढानी पादुकाओ हती. १४४४ थरमां केटलीक पापा- गनी पट्टीओ (पाटो), १९ (३९) गजनी लांची हती. इंदु चडा- ववानी पाटने बच्चे रहेला किल्लाथी विघ्न थतुं सांभळी साहसिक पेथडशाहे त्यां आवी रात्रे तेटला भागमां किल्लाने पडावी नाख्यो हतो; पछी बने तरफना पद्या(पाज)ना खंडोने संयुक्त करावी, इंडं चडावी किल्लाने पाछो सन्ज करात्री दीधो हतो. आ चैत्यमां संपूर्ण घाट, सारोदार( सारूआर )थयो हतो, जेनाथी सामान्य चैत्यो ८४ थइ शके. ८४ हजार टंकोनां दोरडां तुल्यां हता, १ लाख टंकोना दीवा राते कर्म- स्थायमां बळ्या हता. ए प्रमाणे वणिकपुत्रो द्वारा चैत्य करा- वतां थयेलो धन-व्यय सांभळी उदार पेथडशाहे लेखांनी वहीने पाणीमां नखावतां लोकोए आ प्रासादने 'अमूल्य- विहार । नामथी प्रख्यात कों हतो. ते जिन-प्रासादमा स्थापन करवा माटे चंद्रनी ज्योति जेवा आरासण पापाणर्नु ८३ आंगळ-प्रमाण श्रीवीरनु विच कराव्यु हतुं. मनोहर पूतळीओ तथा निपुणताथी उत्कीर्ण करेल (उकेरेल) वस्तुओनी आकृतिवाळो घणो रमणीय प्रासाद तैयार थतां ते प्रासादनी, प्रतिमानी, सुवर्णकलशनी, दंडनी १. विक्रमनी १५ मी सदीमां रचायेला जणाता एक सं. स्तोत्रमा भिन्न भिन्न स्थानमा रहेला वीर ( जिन-बिंब )ना

सुलतान महम्मद् ] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? [ १०१
अने ध्वजनी प्रतिष्ठा-पूजा बहुलक्ष्मीना व्ययथी महोत्सवपूर्वक
करावी हती.माधव नामना मंगलपाठके लाखोश्रीमंतोनी पर्षद्मा
पेथडशाहनी साचा पृथ्वीधर तरीके प्रशंसा करी हती (विशेष
वृत्तान्त माटे सुकृतसागर काव्य वांचg ).
देवगिरिमां रामदेवराजाना राज्यमां शाह देसल
अने सहजाशाहे करावेल जिनदेव-मंदिर,
जेनी रक्षा जिनप्रभसूरिए करी हती.
उपकेशगच्छीय कक्कसरिए वि. सं. १३९३मां कंजरो-
ट (कंजरडा)पुरमां रचेला नाभिनंदन-जिनोद्धार प्रबंध (प्र.
२, श्लो. ९२२ थी ९५३ )मां जणाव्यु छ के-" वि. सं.
१३७१मां शत्रुजय पर उद्धार प्रतिष्ठा करावनार ओसवाल
संघपति देसलशाहे पोताना सद्गुणी मोटा पुत्र सहजने
देवगिरिपुरमा वास माटे मोकल्यो हतो. सहजे देवगिरिमां
उल्लेखोमां, पृथ्वीधरे( पेथडे ) देवगिरि ( दोलताबाद )मा करावेला
विहारमा रहेला तथा योगिनीपुर( दिल्ली )मां रहेला
कन्नाण नामना वीरदेवतुं पण संस्मरण मळे छे.
" श्रीपृथ्वीधरकारिते सुरगिरौ रम्ये विहारे स्थितं
कन्नाणाभिधयोगिनीपुरगतं देवं सदारासणे ।
श्रीजावालपुरेऽपि लेपचरि(सहि)तं पंचासरे वायडे
श्रीवीरं वरभीमपल्लीकमिति ख्यातं रवेष्टके ॥"

१०२ ] सहनाशाहे करावेल [जिनप्रभसूरि अने रामदेव राजाने गुणोपडे तेवो वश कयों हतो, के ते बीजानी कथा पण न करे. कर्पूरना पूरथी सुभग एवं तांबूल आपता जे( सहज )ने मंगल-पाठकोए । कर्पूरधाराप्रवाह ' विरुद आप्यु हतुं. जे( सहज )नी सांभळेली कीर्तिथी प्रेराइ तिलंगाधि- पतिए पोताना नगरमां देव-मंदिर माटे स्थान आप्यु हतुं. कर्णाट अने पांडुदेशमां सदा पसरता जेना जशे त्यांना राजा प्रमुख लोकोने तेना दर्शन माटे उत्कंठित कर्या हता. देसलशाहे देवगिरिमां नर्बु जैनमंदिर करावधानो मनो- रथ सिद्धमरिने जणाव्यो हतो. सरिए प्रोत्साहित करी मूल- नायक पार्श्वजिन कराववा सूचना करी हती. त्यार पछी जिन- मंदिर माटे देसलशाहे सहजने आदेश आप्यो हतो. सहज- शाहे एथी हर्पित थइ रामदेव राजाने भेटणांओथी संतोष पमाडी जिनमंदिर माटे भूमि लीधी हती. धणा धनदानवडे वैज्ञानिको( शिल्पीओ )ना उत्साहथी थोडा दिवसोमां संपूर्ण देवमंदिर तैयार थयुं हतुं. देसले चंद्र जेवा उज्ज्वल आरासण-शिलामय मूलनायक( पार्श्वनाथ ) कराव्या हता. तथा २४ जिनविवो अने २ मोटां विवो तथा सत्या ( सच्चिका ), अंबा, शारदायुगल तथा गुरुनी मूर्तियो करावी हती. अभ्यर्थनाथी सिद्धसरिने साथे लइ स्कंधवाहो सुलतान महम्मदः ] जिन-प्रासाद. [ १०३ ( मजूरो)ना खभा पर विवोने आपी. देसलशाह देवगिरि तरफ. चाल्या हता. सहजपाल, मूलनायक अने अन्य जिनबियोनी तथा गुरुनी सामे संघ साथे ४ प्रयाणो सुधी गया हता. देवगिरि पहोंचतां मंगल वाद्योना ध्वनिथी श्रेष्ठ प्रवेश-महो- त्सव कराव्यो हतो. घरेघर तोरणो अने पूर्णकळशोनी शोभा थइ हती. देसलशाहे देवगृहनी तथा पौपधालयनी प्रतिष्ठा सिद्धसरिद्वारा करावी हती. देसलशाहे श्रेष्ठ भोजनो अने वस्त्रो द्वारा चतुर्विध संघर्नु हर्षथी पूजन क्युं हतुं. प्रासाद आगळ विशाल मंडप, २४ देवकुलिकाओ साथे कराव्यो हतो. प्रासादनी चोतरफ रम्य हो सहित दुर्ग बनाव्यो हतो. प्रासाद उपर स्वर्णमय दंड साथे सुवर्णकलश स्थाप्यो हतो. त्यार पछी देसलशाह, गुरुजी साथे पाटण( गुजरात ) गया हता. भयानक अल्लाउद्दीन-युग. वि. सं. ८४५ मां गज्जणवइ हम्मीरना सैन्यद्वारा वल- भीनो भंग अने शिलादित्यर्नु मरण थया पछी लगभग सवा- बसो वर्षों पछी गुजरात मांगीने, वि. सं. १०८१मां चडी आवेला वीजा म्लेच्छराज गज्जणणवह(गजनवी)ए, ते पछी घणे काळे आवेला मालवी राजाए अने वि. सं. १३४८ मां आवेल काफ़रना प्रबल सैन्ये अन्यत्र आक्रमण उपद्रव कर्या छतां ज्यांना महावीरना प्रभावे साचोरनी सीम चंपाणी न हती १०४ ] अल्लाउद्दीन-युग. [ जिनप्रभसूरि अने ते संबंधमां सत्यपुरकल्पमा प्रस्तुत जिनप्रभसूरिए पोताना सम- यमां बनेली ऐ.दुःखद घटना सूचवीछे के-"वि. सं. १३५६ मां अल्लावदीन सुलताननो नानो भाइ उलूखान दि(दिल्लीपुरथी, मंत्री माधवथी प्रेराइने गुजरातनी धरा तरफ चाल्यो हतो. ते वखते चित्तकूड( चित्तोड )ना राजा समरसिंहे दंड आपीने मेवाडदेशनी रक्षा करी हती. त्यार पछी ते हम्मीर-युवराज वागडदेश अने मुहडासा (मोडासा) विगेरे नगरोने मांगीने आसावल्ली ( आसावळ, अमदावाद पासे ) पहोंच्यो हतो. कर्णदेव राजा नाठो.' सोमनाथने घणना घाथी भांगीने गाडामां चडावी दिल्ली( दिल्ली) मोकल्या हता. फरी वामणथली( वणथली) जइ मंडलीक राणाने दंडी सोरठमां पोतानी आण प्रवर्तावी आसावळमां पडाव नाख्यो हतो. मठो, मंदिरो, देवळो विगेरे बाळी देवामा १. उपकेशगच्छना ककसूरिए वि. सं. १३९३ मां कंजरोट• पुरमा पूर्ण करेला नाभिनंदन-निनोद्धार प्रबंध (३ जा प्रस्ताव)मां सूचव्युं छे के-उछळता घोडाओरूपी कल्लोलोवडे समुद्रनी जेम पृथ्वीने व्याप्त करनार अलावदीन सुलतान ते वखते त्यां( पाटण- मां ) राजा थयो हतो. जेणे देवगिरिमा जइ तेना राजाने बांधीने पोताना जयस्तंभनी जेम फरी त्यां ज स्थाप्यो हतो. सपादलक्ष( सेवालिक )ना रणथंभोरना स्वामी अभिमानी वीर हम्मीर राजाने हणी तेनुं सर्वस्व लइ लीधुं हतुं.

सुलतान महम्मद.] अल्लाउद्दीन युग. [ १०५. आव्यां हतां. अनुक्रमे सत्तसयदेशमां पहोंच्यो. साचोरमां ढक्का-नादथी म्लेच्छोनुं सैन्य पलायन करी. गयुं हतुं; परंतु त्यार पछी भवन, गोमांस अने लोहीथी छंटातां देवताओ दूर थतां, भवितव्यता अलंध्य होवाथी, दु:षमकाळना विलासथी अधिष्ठायक ब्रह्मशांति यक्ष प्रमादी थइ असंनिहित थतां .. अल्लावदीन राजाए वि. सं. १३६७मां ते ज भगवान् महा- चीर( विव )ने दिल्लीमा लावी आशातना-पात्र कर्या हता. ' ते कालांतरे फरीथी पाछा बीजी प्रतिमामां प्रकट प्रभाववाळा थइ पूजा-योग्य थशे. " कनाणयनयर( कानानूर )वाळी महावीर-प्रतिमाने दिल्लीमां सुलतान महम्मद तघलकद्वारा सन्मानित-प्रतिष्ठित करावी उपर्युक्त भविष्यवाणीने वि. सं. १३८५ थी १३९०मां जिनप्रभसरिए साची करी बतावी हती. चित्रकूटदुर्ग( चित्तोडगढ )ना राजाने बांधी तेनुं धन लइ तेने नगरे नगरमां वानरनी जेम भमाड्यो हतो. जेना प्रतापथी गुजरातनो राजा. कर्ण, जल्दी नाशी, विदे- शोमां भमीने रंकनी जेम मरण पाम्यो. माळवानो राजा पण पुरुषार्थ-रहित बनी किल्लामां केदीनी जेम घणा दिवसो वीतावी त्यां( किल्लामां ) ज मृत्यु पाम्यो हतो. जेणे कर्णाट, पांडु, तिलंग विगेरे देशोना समस्त राजाओने वश कर्या हता, ..

१०६ ] अल्लाउद्दीन युगमा [ जिनप्रभसूरि अने वि. सं. १३६९ मां शत्रुजय तीर्थना मूलनायक आ- दीश्वरना विंचने म्लेच्छोए भाग्यानुं तथा वि. सं. १३७१ मां समराशाहे तेनो उद्धार कर्यानुं सूचन जिनप्रभसरिए वि. सं. १३८५मां रचेला राज-प्रसाद नामना शत्रुजय-कल्पमा कर्यु जेणे समियानक (समियाणा ), जावालिपुर( जालोर ) जेवां केटलांय विषम स्थानोने ग्रहण का हतां, के जेनी संख्या करी शकाती न हती. जेणे खापरराजनां सैन्योने पोताना देशमां ममतां अट- काव्यां हतां." ए विषम समयमां पण शूरवीर राजपूतोए प्राणोनी परवा न करतां स्वदेश अने स्वमाननी रक्षार्थे पोतानां पाणी वताव्यां हतां- ते संबंधमां जयसिंहसूरि-शिष्य महाकवि मुनि नयचंद्रे रचेला वीरांक सं. हम्मीरमहाकाव्य तथा पद्मनाभ कविए वि. सं. १५१२मां रचेल प्रा. गू. कान्हडदे-प्रबंध विगेरे ग्रन्थो विशेष जिज्ञासुओए जोवा जोइये. " अलावदीन सुलताननो प्रसादपात्र प्रतापी प्रतिनिधि सेवक अलपखान, पत्तन( पाटण )मां नरनायक ( राजा-सूवो ) हतो. तेना राज्य अमलमां वि. सं. १३६६मां जिनशासन-प्रभावक ऊकेशवंशी ( ओसवाल ) सुश्रावक शाह जेसले स्तंभतीर्थ- (खंभात)मां, खरतरगच्छना जिनचंद्रसूरिना सदुपदेशथी कोहडिका स्थापनपूर्वक, श्रावक-पोषधशाला साथे, अजितस्वामि देवनो सुलतान महम्मदः ] कन्नाणपुरना जैन शिल्पशास्त्री. [ १०७ छे, जे शत्रुजय-तीर्थनायक(प्रतिमा)ना उद्धार-प्रतिष्ठा-प्रसंगर्नु संक्षेप-विस्तारथी वर्णन ते ज समयमा अंवदेवसरिए समरा- रास (गु.) द्वारा, तथा वि. सं. १३९३ मां उपकेशगच्छीय कक्कसूरिए ( उपर्युक्त प्रतिष्ठा करनार सिद्धसरिना पट्टधरे ) रचेला नाभिनंदन जिनोद्धार-प्रबंध (सं.) द्वारा कर्यु छे, जे अन्यत्र प्रसिद्धिमा आव्यु छे. विक्रमनी चौदमी सदीना उत्तरार्धमां-अलावदीनना राज्य-समयमां ठ. फेरु नामनों शिल्प-. कन्नाणपुरना जैन शास्त्री जैन विद्वान् ग्रन्थकार थइ गयो. शिल्पशास्त्री जेना पितामहनो तथा तेनो पोतानो वास पण पहेलां कन्नाणपुरमा अने पाछळथी दिल्लीमा हतो तेम तेणे सूचित कर्यु छे. ठक्कुर फेस विधिचैत्यालय कराव्यो हतो. ते त्यांना शिलालेख( नकल प्राचीन- गूर्जरकाव्यसंग्रह गा. ओ. नं. १३, परि. ८मां प्रकट थइ गयेल छे)थी विदित थाय छे. शाह देसलना सुपुत्र समरसिंह ते( अलपखान )नी सदा सेवा करता हता. राजा पण तेना गुणोथी प्रसन्न थइ बंधुनी जेम तेना पर प्रीति करता हता. राज-प्रसाद छतां पण समरशाह चंद्रकांतनी जेम शीतल हता. राज-प्रसाद प्राप्त करीने तेणे देश-स्वामी (राजाओ)नां . कार्यों पण काँ हतां.

१०८ ] दिल्लीश्वर पातशाहोथी [ जिनप्रभसूरि अने रत्न-परीक्षा नामना ग्रन्थना अंत( प्रा. सं.)मां तेणे सूचव्युं छे के-" धंधकुलमां कन्नाणपुरमां कालिय नामना शेठ हता. तेना पुत्र ठक्कुर चंद्रनो पुत्र फेरु थयो, तेणे ढिल्लिय(दिल्ली)पुरीमा वि. सं. १३७२मां अलावदीनना राज्यमा संक्षेपथी रत्न-परीक्षा रची हती. दि(दिल्लीनगरमां श्रेष्ठ बुद्धिशाली, जिनेन्द्रवचनना वि- चारकोमा अग्रणी फेरु नामनो वणिक्-शिरोमणि थयो. तेणे लोकोना हित माटे विद्वानोने चमत्कार करे तेवी, प्रासादोनी अने विवोनी क्रिया-रत्नोनी सारभूत परीक्षा स्फुट करी हता." वास्तुसार ग्रंथना अंतमां तेणे जणाव्यु छ के-" धंधक- लसकुलमा उत्पन्न थयेल चंद्रना पुत्र फेरुए कन्नाणपुरमां रहीने पूर्वशास्त्रोनुं निरीक्षण करीने वि. सं. १३७३मां सिरिधंधकुल आसी कन्नाणपुरम्मि सिट्टिकालियो । तस्स य ठक्कुरचंदो फेरु तस्सेव अंगहो । तेण य रयण-परिक्खा रइया संखेवि दिल्लियपुरीए । कर-मुणि-गुण-ससिवरिसे अलावदीणस्स रज्जम्मि ।। श्रीढिल्लीनगरे वरेण्यधीषणः फेरु इति व्यक्तधी- मूर्धन्यो वणिनां जिनेन्द्रवचने वैचारिकमामणीः । तेनेयं विहिता हिताय जगतां प्रासाद-बिम्ब-क्रिया- रत्नानां विदुषां चमत्कृतिकरी सारा परीक्षा स्फुटा। " सुलतान महम्मद.] सन्मानित जैनाचार्यो. [ १०९ " विजयदशमीने दिने स्व-परोपकार. माटे वास्तुसार( गृह- प्रतिमा-लक्षणादि ) शास्त्रने रच्युं हतुं." अम्हारा स्नेही पं. भगवानदासजी जनीए हिंदी अनु- वाद साथे जैन विविध ग्रंथमाळा, जयपुर सिटीथी हालमां प्रसिद्ध करेला आ ग्रन्थमां कन्नाणपुरने कल्याणपुर (करनाल, देहली ) सूचवेल छे, परन्तु अम्हारा धारवा प्रमाणे जिनप्रभ- सूरिना कन्नाणयनयर-कल्पमा सूचित ते चोलदेश(दक्षिण)नु कानानूर संभवे छे. संभव छे के ठ. फेरुए पितामहना प्रसंगथी पहेला कन्नाणपुरमा वसवाट अने शास्त्र-निरीक्षण कर्या पछी दिल्लीमां आवी उपर्युक्त ग्रन्थ-रचना करी होय. दिल्लीश्वर पातशाहोथी सन्मानित समकालीन अन्य जैनाचार्यो. वि. सं. १४१० मां ६२७२ श्लोकप्रमाण सं. शांति- १. " सिरिधंधकलसकुलसंभवेण चंदासुएण फेरेण । कन्नाणपुरठिएण य निरिक्खिउं पुवसत्थाई ।। स-परोवगारहेऊ वयण-मुणि-राम-चंदवरिसम्मि । विजयदसमीइ रइअं गिह-पडिमा-लक्खणाईणं ।। परमजैनचन्द्राङ्गजठक्कुरफेरुविरचिते वास्तुसारे प्रासाद- विधिप्रकरणं तृतीयम् ।

११० ] दिल्लीश्वर पातशाहोथी [ जिनप्रभसूरि अने नाथ-चरित महाकाव्य रचनार, पेरोज शाहि महम्मद पातशाहनी सभामा प्रतिष्ठोदय प्राप्त कर- अने पेरोजथी नार सुनिभद्रभूरिए पोताना गुरु गुण- गौरवित गुण- भद्रमूरिनो परिचय करावतां सूचव्युं छे भद्रसूरि अने के-"ते ( बृहद्गच्छना मानभद्रमूरि )ना मुनिभद्रसूरि पट्टने शोभावनार गुणभद्रसूरि सुगुरु थया, जेओ व्याकरण, छंद, नाटक, तर्क, साहित्य, अलंकार विगेरे सर्व शास्त्रोमां चातुर्य धरावता हता. जेना श्लोकोना व्याख्यानथी रंजित थइ अयुत( दस हजार ) सौवर्णटंको( सोनैया ) आपता क्ष्नापाल-चूडामणि शाहि मुहंमदनी आगळ ' तपस्वीओथी ए ग्रहण न ज कराय ' एम बोलतां जेणे चारित्रने स्थापित कर्यु हतुं. १ १. तस्य श्रीगुणभद्रसूरिसुगुरुः पट्टावतंसोऽभवद् यः श्रीशाहिमुहंमदस्य पुरतः क्षमापालचूडामणेः । श्लोकव्याकृतिरक्षितस्य ददतः सौवर्णटङ्कायुतं ग्राह्यं नैव तपस्विनामिति वदंश्चारित्रमस्थापयत् || x x तच्छिष्यो मुनिभद्रसूरिजनि स्याद्वादिसंमाननः श्रीपेरोजमहीमहेन्द्रसदसि प्राप्तप्रतिष्ठोदयः । तेनेदं निरमायि मन्दमतिना श्रीशान्तिवृत्तं नवं तत्तज्जन्मसहस्रसंचितमहादुष्कर्मविच्छित्तये ।। xx सुलतान महम्मद.] सन्मानित जैनाचार्यो. [१११ वि. सं. १४१२ ना राजगृहीना जैनमदिरना शिला- लेखमां सूचन छे के-सकल महीपालोथी नमन कराता सुल- तान शाह पेरोजना राज्यकालमां तेना हुकमथी मगधमां मलिकवयो (1) नामना मंडलेश्वरना समयमां, तेना सेवक सह- णासदुरदीननी सहायताथी उपर्युक्त पार्श्वनाथ जैनमंदिर रचायुं हतुं. जेनी प्रतिष्ठा, खरतरगच्छना जिनचंद्रसरिनी आज्ञाथी उपाध्याय भुवनहिते करी हती. वि. सं. १४२२ मां ६३०७ श्लोकप्रमाण सं. पद्य महम्मदशाहथी कुमारपाल-चरित महाकाव्य रचनार, प्रशंसित कृष्णर्षिगच्छीय जयसिंहसरिए पोताना महेन्द्रसूरि गुरु महेन्द्रसूरिनो परिचय करावतां सूचव्यु छ के- अन्तरिक्ष-रजनीहृदीश्वर-ब्रह्मवक्त्र-शशि-सरव्यवत्सरे । वैक्रमे शुचितपोजयातिथौ शान्तिनाथचरितं व्यरच्यत ॥ --मुनिभद्रसूरिना शांतिनाथचरित-महाकाव्यनी प्रशस्ति (श्लो. ७, ९, १७ य. वि. पं.) १. “ सकलमहीपालचक्रचूलामाणिक्यमरीचिमखरीपिचरित- चरणसरोजे सुरत्राणश्रीसाहिपेरोजे महीमनुशासति । तदीयनियोगान्मगधेषु मलिकवयोनाममंडलेश्वरसमये तदीय- सेवकसहणासदुरदीनसाहाय्येन xx ११२ ] दिल्लीश्वर पातशाहोथी [ जिनप्रभसूरि अने " प्रतिवर्ष दीन, दुःस्थो (खराब स्थितिवाळा दुःखी)ना उद्धार सुकृत माटे मानपूर्वक साक्षात् अपाती लाख दीनारो ( सोनामहोरो )ने जेणे निर्लोभभावथी तृणनी जेम तजतां आ ते एक ज महात्मा छे, बीजो नथी.' एवं स्तोत्र राजा महम्मदसाहि तरफथी प्राप्त कर्यु हतुं, ते भगवान् महेन्द्रमूरि अम्हारा ता(पा)पनो विनाश करो. श्रेष्ठ भृगुपुर( भरुच )मां गणकचक्र-चूडामणि (ग- - विशेष माटे जुओ स्व, बाबू पूरनचंदजी नाहरनो जैन लेखसंग्रह ( भा. १ लो), तथा जिनवि. प्रा. जैनलेखसंग्रह (भा. २, ले. ३८०). १. " प्रत्यहं दीन-दुःस्थोद्भुतिसुकृतकृते दीयमानं समान साक्षाद् दीनारलक्षं तृणमिव झटिति(कटरि!) प्रोज्ज्ञय निर्लोभभावात् । एकः सोऽयं महात्माऽनव ( न पर ) इति नृपश्रीमहम्मदसाहेः स्तोत्रं प्रापत् स ता(पा)पं झपयतु भगवान् श्रीमहेन्द्रप्रभुनः।। ७॥ तत्पट्टपूर्वाचलमण्डनैफचण्डद्युतिः श्रीजयसिंहमूरिः । कुमारपालक्षितिभृच्चरित्रमिदं व्यधत्त स्वगुरुप्रसादात् ॥ ८ ॥ xx " श्रीविक्रमनृपाद द्वि-द्वि-मन्वन्देऽयमजायत । अन्यः ससप्त-त्रिशती-षट्सहस्राण्यनुष्टुभाम् ।। -ही. हं. तरफथी वि. सं. १९७१ मां अने विजयदेवसूरि -संघ पेढी, मुंबई तरफथी वि.सं. १९८२ मांप्र.कुमारपाल-चरित प्र. .

सुलतान महम्मद. ] सन्मानित जैनाचार्यों [११३ णितज्ञ विद्वानोमां श्रेष्ठ ), राज-संस्तुत पेराज पातशा- (सन्मानित) मदनसरि नामना विद्वान हनामान्य गणि- गुरु थया; तेना पद(सूरिपद)थी शोभता तज्ञ महेन्द्रसूरि. महेन्द्रगुरुए परोपकार माटे शकान्द १२९२=वि. सं.१४२७ मांगहन गणित- शास्त्र सुयंत्रागम (यंत्रराज ) ग्रंथनी रचना करी हती. रोनी व्याख्या रचनार तेमना विद्वान् शिष्य मलयेन्दुसरिए उपर्युक्त गुरु महेन्द्रसूरिने पेरोज पातशाहना सर्व गणको(गणितज्ञ विद्वानो )मां अग्रेसर तरीके सूचव्या छे.' चंद्रकीर्तिमरिना शिष्य हपकीर्तिसरिए स्वोपज्ञ धातुपाठ- वृत्ति(धातुतरंगिणी )नी प्रशस्तिमा पोताना पूर्वजोनो परिचय कराव्यो छे के-- १ " अभूद् भृगुपुरे वरे गणकचकचूडामणिः कृती नृपतिसंस्तुतो मदनसूरिनामा गुरुः । तदीयपदशालिना विरचिते सुयन्त्रागमे महेन्द्रगुरुणोदिताऽजनि विचारणा यन्त्रजाः ॥ x x श्रीपेरोजमहेन्द्रसर्वगणकः पृष्टो(क-प्रष्ठो) महेन्द्रप्रभु- जतिः सूरिवरस्तदीयचरणाम्भोजैकभृङ्गद्युता(तिः) । सूरिश्रीमलयेन्दुना विरचितेऽस्मिन् यन्त्रराजागम- व्याख्याने प्रविचारणादिकथनाध्यायोऽगमत् पञ्चमः ।। विशेष माटे जुओ यंत्र राज ( सुधाकरद्विवेदीद्वारा संशोधित, सं. १९३९मां काशीमां प्र.) -. ८ ११४ ] दिल्लीश्वर पातशाहोथी [ जिनप्रभसूरि अने " अवनितलने पवित्र करनारा जे गच्छमां, हम्मीरदेवथी पूजायेला सद्गुणी जयशेखरसूरि सुचरित पेरोज पातशा- पुरुषोमां मुकुट जेवा थइ गया. रूणा- हथी लत्कृत पुरीमां सीहडना वचनथी अल्लापदीन] रत्नशेखरसूरि. राजावडे सद्बस्त्र साथे फरमान-दानपूर्वक पूजायेला वज्रसेन गुरु पछी विद्यानिधि रत्नशेखरसूरि गुरु थइ गया, जेने पातशाह पेरोज साहिए हर्षथी श्रेष्ठ वस्त्रोद्वारा सारी रीते पहेरामणी करी हती. अने नागपुरीय श्रेष्ठ पाठक हंसकीर्ति, दिल्लीमां साहि सिकंदर आगळ प्रतापथी अधिक थइ गया." १. " गच्छे यत्र पविनितावनितले हम्मीरदेवार्चित: सूरिः श्रीजयशेखरः सुचरितश्रीशेखरः सद्गुणः । रूणायां पुरि सीहडस्य वचनादलावदीभूभुजा सद्वासः-फुरमानदानमहितः श्रीवत्रसेनो गुरुः ॥ १ ॥ सूरिश्रीप्रभुरत्नशेखरगुरुर्विद्यानिधिर्य मुदा सत्क्षोमैः किल पर्यधापयदरं पेरोजसाहिप्रभुः। श्रीमतसाहिसिकंदरस्य पुरतो जातः प्रतापाधिको दिल्ल्यां नागपुरीयपाठकवर: श्रीहंसकीया॑ह्वयः ।।२।। -धातुतरंगिणी-प्रशस्ति (भां. रि. १८८२-८३) सुलतान महम्मद. ] सन्मानित जैनो [ ११५ . वृहद्गच्छमां थयेला रत्नशेखरमूरिए प्रा. सिरिवालकहा (श्रीपालकथा दे. ला. नं. ६३ ) रची हती. जेनी प्रथमादर्श प्रतिने वि. सं. १४२८मां तेमना शिष्य साधु हेमचंद्रे लखी हती. सिद्धचक्रयंत्रोद्धार, गुणस्थान-स्वरूप(क्रमारोह), गुरु- गुणपत्रिंशत्पट्विशिका, क्षेत्रसमास, संबोधसत्तरी, छंदाकोश विगेरे ग्रंथरत्नो रचनारा पण आ ज रत्नशेखरसूरि जणाय छे. वि. सं. १४२९मां का. शु. ४ रविवारे पत्तन (पाटण)म पूर्णिमापक्षना ज्ञानकलश मुनिद्वारा लखायेल नलायन महा- काव्य पुस्तकना अंतमा उल्लेख छे के-ते समये महाराजाधि- राज पीरोज पातसाहिथी नियुक्त खान दफरखान समस्त गूर्जर धरित्रीचें परिपालन करता हता. सुलतान-सन्मानित शाह जगसिंह अने महणसिंह जेना देवगिरिना जिन-मंदिरनी प्रशंसा जिनप्रभसरिए करी हती. तपागच्छनायक रत्नशेखरसूरिए वि. सं. १५०६ मां रचेली स्वोपज्ञ श्राद्धविधिनी ६७६१ श्लोकप्रमाणनी विधि- कौमुदी नामनी वृत्ति [पृ. १६३] मां सूचव्यु छ के-" देव- गिरिमा शाह जगसिहे पोतानी समान करेला ३६० चणिकपुत्रो (वाणोतर ) द्वारा ७२००० टंकाओना व्ययद्वारा प्रतिदिन एकैक साधर्मिकवात्सल्य कराव्यु हतुं. एवी रीते प्रति- वर्ष तेनां ३६० साधर्मिक-वात्सल्यो थतां हतां." । ३ ) ११६] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने , वि. सं. १५१७ मां भोज-प्रबंध विगेरे रचनार रत्नम- दिरगणिनी उपदेशतरंगिणी(य. वि. ग्रं. पृ. १६५)मां तथा जिनप्रभसूरि-प्रबंध(सं.)मां पण आने मळतो उल्लेख छे. वि. सं. १५२१ मां पं. शुभशीलगणिए रचेला कथा- कोश( कथा २२ मी)मा साधर्मिक-भक्ति पर जगसिंहनो संबंध सूचव्यो छे के-साधर्मिकोना वात्सल्यनुं फळ मुक्ति-सुख प्राप्त करावना छे, एम सांभळी जगसिंह शाहे देवगिरिमां धन-व्यवसाय विगेरेमा सांनिध्य कर विगेरे प्रकारोथी ३६० व्यवहारीओने पोतानी समान (समृद्ध ) साधर्मिको कर्या हता. त्यार पछी प्रतिदिन एकैकना घरे पक्वान्न विगेरे रसोई बनावाती हती. त्या सर्व श्रावको कुटुंब साथे जमता हता. त्यां प्रतिदिन ७२००० वोंतेर हजार द्रव्यनो व्यय थतो हतो. एवी रीते प्रत्येकना घरे जमतां वर्षने अंते वीजी वार वारो आवतो हतो. तेवी रीते धर्म-कृत्य करता जगतसिंह शाहे भरत, दंडवीर्य राजाओने याद कराव्या हता." तपागच्छाधिपति सोमतिलकसूरि, देवगिरिमां साह जगसिंहने घरे देयोने नमन करवा गया, त्यारे तेणे संघनी भक्ति कर्यानुं सूचन उपदेशतरंगिणी(पृ. १५९-१६०)मा मळे छे. पं. शुभशीलना कथाकोश( कथा २३)मां जणाव्युं छे के- " एक वखते जगसिंह शाहे सोमतिलकसरि पासे धर्मर्नु सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [ ११७ स्वरूप पूछयु हतुं. x x गुरुजीनो उपदेश सांभळी जगसिंह शाहे २९९ गाडां, हजारो घोडा, ५२ देवालयो विगेरे संघ तथा सोमतिलकसरिजी साथे शत्रुजय अने गिरनारली यात्रा करी हती." जिनप्रभसूरिना सं. प्रबन्धमा उल्लेख छ के-"जिनप्रभ- सूरिजी सर्वत्र चैत्य-परिपाटी करता [महम्मद सुलतान साथे देवगिरिमां पहोंच्या त्यारे ते सा. जगसिहे ३२००० बत्रीश हजार टंकाना व्ययथी प्रौढ प्रवेश-महोत्सव अने संघ-पूजन विगेरेथी तेमनो सत्कार को हतो. तेना देवतावसरमां, देवोने नमस्कार करवाना अवसरे माथु धूणावतां तेमने सा. जगसिंह कारण पूछयु; त्यारे जिनप्रभसूरिए जणाव्यु के-हालमां बे अपूर्व तीर्थों जोयां-एक तम्हारुं आ रत्नमय चिंत्र अने बीजें जंगम तीर्थ अणहिल्लपुरमा तपागच्छेन्द्र सोमतिलकसरिजी." ए सांभली तेना भक्त होवाथी सा. जगसिंहे विशेष प्रकारे भक्ति करी हती." 'जिमप्रभसूरिए देवगिरिमा शाह जगसिंहना अद्भुत गृह-चैत्यनां दर्शन कर्या हतां. ए प्रसंग-संबंधमां पं. शुभशी- लना कथाकोश( कथा २१)मां सूचव्यु छ के- " एक चखते जिनप्रभसूरिजी नगरे नगर अने गामे गाम देवोने नमन करवा चाल्या हता. अहम्मद (१) एवा अपर- ११८ ] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने नामवाळा परोिज सुलतान साथे देवगिरि पहोंच्या हता, त्यां तेमना पुर-प्रवेश-महोत्सवमा श्रावकोए घणा धननो व्यय कयों हतो. सर्व प्रासादो( जिनमंदिरो )मां देवोने नमस्कार करी, गृहचैत्योने वन्दन करता जिनप्रभसूरिजी शाह जगत्- सिंहने घरे गया हता. त्यां सूरिए श्रेष्ठ वैडूर्यरत्नमय, स्फटिक- रत्नमय, स्वर्णमय, रूप्यमय, पित्तलमय प्रतिमाओने वंदन कर्यु हतुं. ते घर-तीर्थ जोइ सूरिजीए माथु धूणाव्यु; तेथी जगसिंहे पूछयु के-' माथु केम धूणाव्यु ? 'गुरुजीए का के-अम्हे स्थाने स्थान, गामे गाम, नगरे नगरमां देवोने वांद्या, परंतु हालमा एक आ आपर्नु घर-चैत्य अने वीजें जंघरालपुरमा तपा श्री सोमतिलकसरिजी वांद्या. हमणां आ बने उत्कृष्ट तीथों मनमा आव्यां, आथी माथु धूणाव्युं. 'xx प्रासंगिक धर्मोपदेश सांभळीने अने धर्मिष्ठो प्रत्ये अनुराग जाणीने शाह जगसिंहे श्रेष्ठ वस्त्रना तथा अन्न-पानना दानथी जिनप्रभसरिजीनी विशेष प्रकारे भक्ति करी हती." वि.सं.१५०३मा पं. सोमधर्मगणिए रचेली उपदेशसप्तति- (पांचमा गृहस्थधर्माधिकारना उ० ६)मां जणाव्यु छे के- " पीरोज सुलताननी सभाने शोभावनार जगतसिंह नामनो शेठ योगिनीपुर( दिल्ली )मां थइ गयो. जे त्रण वखत जिन-पूजा अने वे वखत आवश्यक (प्रतिक्रमण) ए पांच वेळा साचवतो हतो. समस्त नगरमां अद्वितीय सत्यवादी तरीके सुलतान महम्मद. ] अने महणसिंह [ ११९ . प्रतिष्ठा-प्रसिद्धि पाम्यो हतो. तेनी तेवी ख्याति सांभळी, तेनी परीक्षा करवा इच्छता सुलताने तेना मर्म जाणनारा दुर्जनोने एकान्तमा पूछयु के-' आ शेठ पासे केटलं धन छे ?' तेना द्रोहीओए ७० लाख कह्या. केटलाक दिवसो पछी सुलताने जगतसिंहने पूछयु के- 'तमारे त्यां केटलुं धन छे ?' तेणे प्रत्युत्तरमांजणाव्यु के-'विचा- रीने कहेवाशे । पछी वीजे दिवसे घरना सरसामाननी संभाळ करी सूचव्यु के-'पातशाह! म्हारे त्यां चोराशी लाख द्रव्य छे.' 'वीजा लोकोए पहेला जणावेली संख्याथी अधिक कहे- वाथी आ साचो ज छे पोताना द्रव्यनी संख्याना कथनमा प्राये थोडा ज सत्यवादी होय छे.' एवो विचार करी तेना सत्य वचनथी संतुष्ट थयेला पातशाहे सोळ लाख आपीने ते शेठने कोटिध्वज( करोडपति ) को हतो. १ १. वि. सं. १९०६मां रत्नशेखरसूरिए रचेली श्राद्धविधि- वृत्ति[ पृ. ९६ मा जणान्यु छ के- " संभळाय छे के ढि(दिल्लीमां ' शाह महणसिंह सत्य- वादी छे । एवी ख्याति सांभळी परीक्षा माटे सुलताने तेने पूज्यु के-' तम्हारे त्यां केटलुं धन छे ? ' तेणे कयु के–' लेखं जोइने जणावीश.' पछी सघळु लेखं ठीक करी राजानी आगळ मयु के- म्हारे घरे अनुमानथी ८४००००० चोराशी लाख टंको - १२० ] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने संभवे छे.'' में थोडं सांभळयुं हतु, प्राणे घणुं का' एवी सत्य उक्तिथी हर्षित थयेला राजाए तेने कोशाध्यक्ष ( राम-भंडारी) वनाव्यो हतो. वि. सं. १५२१ मां पं. शुभशीलगणिए रचेला पंचशती- प्रबंध (इ. लि. कथाकोश कथा १२ )मा सूचव्यु छ के-' एक मनुष्ये सुलताननी आगळ कयु के-'जगसिंह शाह खौटुं चोलता नथी,' त्यार पछी सुलताने पूछयु के-'जगसिंह ! तम्हारा घरमा केटहुँ धन छे ?' तेणे कयु के-' काले कहेवाशे' त्यार पछी घरे जइ शाहे घरनी सर्व लक्ष्मीनी संख्या करी सुलताननी पासे जइ कह्यु के-'म्हारा घरमा चोराशी लाख सोनाना टंको छे.' ते पछी सुलताने 'सत्य जाणी सोळं लाख पोताना खजानामांथी अपाच्या अने तेने कोटिध्वज को इतो." वि. सं. १९५५मां इंद्रहंसगणिए रचेली उपदेशकल्पवल्ली- [पल्लव ७] मां सूचन मळे छे के- "सत्यवादी तरीके प्रसिद्ध महणसिंहने असत्यवादी करवानी इच्छाथी कोइ दुर्जने ६४ हजार सोनाना टंकावाळी तेनी लक्ष्मी प्रकाशित फरी.पातशाहे सभामां तेने पूछयु के-'तमारे त्यां केटलुं धन छ ? ' महणसिंहे कयु के-'तमे ७ दिन आपो, जेथी ते धन गणी शकुं.' त्यार पछी जोइने साचे साचं जणाव्यु के-'चोराशी (?) हजार लाख छे. ते सिवाय रू'विगेरे घरनो बीजो सार जुदो जाणवो. राना ( पातशाह ) आश्चर्य पाम्यो के-कोइ क्याय सर्वस्व

सुलतान महम्मद् ]
अने महणसिंह
[ १२१
पातशाहे एक वखते जगतसिंह शेठने पोताना खजाना-
मांथी मंगावीने सूर्य जेवू तेजस्त्रि रत्न दर्शाव्यु अने पूछयु के
'आ रत्न जेवू वीजुं रत्न पृथ्वीमां कयाय छे?' जगतसिंह
जवाव आप्यो के-'पृथ्वी पर शुं वे पातशाहो होय १ तेना
वचनथी रंजित थयेला पातशाहे ते उत्तम रत्न तेने स्थापन
करवा माटे ( थापणरूपे ) आप्युं हतुं. भेद विना बनेनी गाढ
प्रीति थइ हती.
१
.
कहेतुं नथी. जेने म्हारा तरफथी द्रव्यना अपहरणनी बीक पण
न लागी' सुलताने सत्यवादी मंत्रीनी गुण-प्रशंसा करी के-'आ
सचिव म्हारा गज्यमां पृथ्वी पर शिरोमणि छे.
तथा तेनो
सत्कार करी पहेरामणी आपी. तेनो यश पृथ्वी पर विस्तों हतो."
एक वखते सुलताननी आगळ कोइए ३. रत्नो वेचवा
आण्यां इतां. रत्न-परीक्षको( झवेरीओ )ने बोलाववामां आव्या.
सघळाए रत्नो वखाण्यां. त्यार पछी शाह जगसिंहने दर्शावतां
तेणे कयु के-'पहेलुं अमूल्य छे, बीजं लाख मूल्यनुं अने
त्रीजु कोडीना मूल्यनुं छे.' राजाए पूछयु के–'केम जणाय ?.'
पहेलुं धणना सो घावडे पण भांग्यु नहि, बीजं घणना दस घा
थतां सहज उच्छ्वसित थयु (उखडयु), अने त्रीजु घणनो घा थवाथी
वे ककडा थइ गयु. पहेलो घा यतां सूक्ष्म देडकी नीकळी. तेथी शाह
मानीता थया. ते वणिक( वेपारी )ने पहेला रत्नना ३ लाख
,
1

१२२ ] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने अपाव्या, वीजा रत्नना एक लाख अपाव्या अने त्रीजा रत्ननी कोडी अपावी हती. [ह. लि. कथाकोश कथा १५ ] एक वखते सुलताने पोताना हाथमा श्रेष्ठ रत्न लइ पूछयु के 'जगसिंह ! आ रत्नथी वीजु कोइ मोटुं श्रेष्ठ रत्न छे के नहि ?' शाहे कह्यु के ' आथी श्रेष्ठ रत्न आप छो.' सुलताने एथी रंजित थइ घणी लक्ष्मी आपी हती.” (कथाकोश कथा १३ " धर्मधुरंधर शाह जगसिंहे वचन-माधुर्यादि गुणोथी धरापीठमा प्रशस्त नाम धारण कयु हतुं. जेने सुलताने एक वखते राजसभामां पूछयु हतुं के-' शाह ! आ मणि ( रत्न ) सर बीजें छे ? कहो.' शाहे प्रत्युत्तर आप्यो हतो के-पातशाह ! पृथ्वीमां सुलतान एक ज होय, बीजो नहि. ते वचनथी रंजित थयेला राजाए तेने महाप्रसादपूर्वक पहेरामणी करी हती.” (उ. क.) वि. सं. ११५५ मां इंद्रहंसगणिए रचेली उपदेशकल्पवल्ली वृत्ति( ७मा पल्लव )मां प्रतिक्रमण करवाना विषयमा महण- सिंहनो प्रबंध सूचव्यो छे- "सुख संपदाओनुं स्थान, अनुपम गामो अने आरामोथी अलंकृत भूमिवाळो देवगिरि नामनो देश शोभतो हतो, त्यां ऊकेश- वंशमां शिरोमणि नगसिंह नामनो धनिक वसतो हतो. जे अनर्गल लक्ष्मीवाळो, महेभ्योनी मंडलीमा मणि जेवो, सौजन्यपात्र हतो. राज-सभाने शोभाववामां हीरा जेवा, गुण-लक्ष्मीना घरसमा धन्य श्रेष्ठीए अनर्गल धन-वृष्टिथी समस्त. याचकोने पोध्या हता.

सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [ १२३ शुभ कर्मोद्वारा जेणे रत्नाकरथी उत्पन्न धनराशि उपार्जन करी सुयश विस्तार्यो हतो. संसारनी असारता जोनार, मद मत्सरने तजनार, सदाचारी जे श्रीमान् चार प्रकारनी बुद्धिना सागर हता. जगत्ने आनंद पमाडनारा जे दानी, मननी आति दूर करी धनने सदा सात क्षेत्रोमां वावता हता. दुर्भिक्ष( दुष्काल )मा, क्षीण- संपत्तिना प्रसंगमां ज्यारे दुरवस्थाथी अने अक्षेमथी लाखो लोको खळभळी उठ्या हता त्यारे ते श्रीमान् सेवा करवा योग्य थया हता. प्राप्त थयेली बहोळी चंचळ लक्ष्मी, सुफल हुं लइश. एम विचारी जे श्रीमान् चडता उत्कृष्ट हर्षथी साधर्मिक लोकोने कुटुंब साथे सर्वदा जमाडे, परंतु ते साधर्मिको प्रतिदिन भोजन माटेतुं निमंत्रण मानता न हता; एथी तात्त्विक बुद्धिशाली जे श्रीमाने व्यवसाय( वेपार-उद्यम )ना वहानाथी पोतानुं द्रव्य आपी ३६० वणिकोने पोतानी समान कर्या हता, अने तेमनी द्वारा वर्षना ३६० दिवसोमां सदा नवीन नवीन प्रकारथी साधर्मिक-वात्सल्य कराव्युं हतुं. 'सारी अवस्थावाळा गृहस्थोना ते उत्सवो खरेखर, प्रशंसायोग्य गणाय के जेमां सस्क्रियावाळा तत्त्वज्ञ सज्जनोनो सत्कार करवामां आवे.' १ x x ए जगसिहनो पुत्र कामदेव जेवों रूपवंत, कपट रहित मनवाळो,. सर्व शाहोमां श्रेष्ठ, क्रियानिष्ठ,मंत्रिराज महणसिंह धर्मकृत्योमां द्रव्यव्यय करतो हतो. वंने वखत प्रतिक्रमण करतो जनोनी आपदा हरतां पुण्यनो भंडार भरतो अने संसाररूपी सागरथी हतो. अन्य. .

१२४ ] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने केटलोक काळ वीत्या पछी कोइ पण कारणथी पातशाह तेना पर रुष्ट थया!! तेथी पातशाहे तेने केदखानामां नखाव्या, तेनी रक्षा माटे पोताना एक सेवकनी योजना करी हती. तेवा वखते पण शेठने पातशाहे करेली परतंत्रताथी नही, परंतु पोताना पांच वेळाना धर्म-व्यतिक्रमथी खेद थतो हतो. तेथी ते सेवकने खानगीमा एकैक सोनानो टंको अपावी ए धर्मिष्ठ श्रीमान् पोतानी पुण्य-वेलाओने साधतो हतो. २१ दिवस सुधी २१ टंका अपावी तेणे पोतानां धर्मकायों कयाँ हतां. त्यार पछी सुलताने प्रसन्न थइ तेने पोतानां शरीर परनां पांच आभूषणो अने पांच पंचरंगी दुकूलो ( उत्तम वस्त्रो)नी पहेरामणी करी हती. त्यार पछी घणां वाद्यो अने घणा लोको साथे वाजते गाजते, याचकोने इच्छित दान आपता शेठ पोताने घरे आव्या हता. पातशाह विगेरेथी डरतो ते रक्षक, एकांत थतां आवीने ते लीधेला टंका पाछा आपवा लाग्यो. शेठे कयु के-'भद्र ! पोतानो उद्धार करतो हतो. सज्जनो पर उपकार करतो अने दुर्जनोनो तिरस्कार करतो ते जगत्मां शोभतो हतो. "चंचल अधिकारोने प्राप्त करीने जेणे शत्रुओ पर अप- कार को नहि, मित्रो पर उपकार कर्यो नहि, बंधु-वर्गोनो सत्कार कों नहि तेणे शुं कर्यु ? " सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [ १२५ , में आ टंका तने समर्पण कर्या छे, तेथी तुं एने जेम रुचे तेम दे, भोगव अने सुखी था; कारण के में तारा प्रसादथी धर्मनुं अनुष्ठान कयु. धर्म संबंधी एक क्षण, करोडथी पण दुर्लभ छे. तेवा पांच पांच क्षणोने में एकैक टंकाद्वारा कृतार्थ कर्या, तेथी तने एथी पण अधिक द्रव्य आपq जोइए; तेने बदले लेवाय केस ? ' एम कही फरीथी वधारे दान आपी तेने चिसर्जित कर्यो. [ उपदेश-तरंगिणी ( य. वि. ग्रं. पृ. २१३ )मा सा. जगसिंहने बदले भूलथी साजणसिंह नाम छपायुं छे; त्यां पीरोज पातशाह द्वारा बंदी करातां ५० हाटको (सोनया) द्वारा ५० प्रतिक्रमणो कर्यानो अने पाछळधी सुलताने तेनो सत्कार कर्यानो उल्लेख छे.] १ T " लोकने प्रसन्न करनार गुणवाळा, सुवर्ण-भूषणोथी भूषित थयेला, अमृत जेवू भाषित करनारा ए अमात्यरूपी, चंद्रमां वचन- छलथी सुलताने रोषथी लाल आंखवाळा थइ अधिकार-विषयक कंइक दूषण हृदयमा विचार्य, अने तेने निगडो(बेडी )थी लकडी केदमा नारख्यो. बंदिर केदी )स्थानमा रहेवा छतां पण नियममा तेनी दृढता हती. लांघण थवा छतां पण ते प्रतिक्रमण करतो हतो, प्रतिदिन बब्बे सोनाना टंका आपवाथी रक्षको तेने प्रति. क्रमणनी वेळाए बंधनथी छोडता हता. क्रियामां रुचिवाळा, तेणे ---

१२६ ]
शाह जगसिंह
[ जिनप्रभसूरि अने
सपादलक्ष (सेवालिक-अजमेर तरफनो देश)नो राजा
एक वखते सुलताननी सेवा माटे हजूरमां आव्यो हतो. तेणे
सुलतान आगळ वे वस्तु भेट धरी हती. (१) सूखडनो कटको
अने (२) निर्मल मोतीनी जोड. ते अल्प भेट जोइ पातशाह
क्षणवार रुट जेबो थइ गयो हतो. सर्व सभ्यो जोई रह्या हता,
परंतु कोइ परीक्षा करतो न हतो. सपादलक्षनो राजा, जनोनी
मूर्खतानो विचार करतो हतो. ए अवसरे जगतसिंहे पातशाहने
जणाव्यु के-"आ बने वस्तु अमूल्य छे. आ चंदनना खंडनु
माहात्म्य एवं छे के-'अग्निथी तपेढं सो मण प्रमाण तेल होय,
तेमां पण आ चंदननो खड नखातां ते तेल हिम जेवं शीतल
थई जाय. वीजें, कोइ छ महिनाना तावथी पण पीडातो होय,
प्रतिक्रमणो करतां एक महिनाना ६० सोनाना टंका आप्या हता.
भाग्ययोगे राजाए ( पातशाहे) तेनो क्रिया करवानो संबंध जाणी
तेने मुक्त कर्यो अने विशेष प्रकारे पहेरामणी करी, राजारूपी
अग्निनी परीक्षामाथी पसार थएल मंत्रिराजरूपी सोनुं विशेष
तेजस्वी अने यशस्वी थयुं हतुं. तेना गुणो गातां होय तेवां
वाद्यो वागतां ते आडंबरपूर्वक पोताना आवास पर आव्यो हतो.
प्रतिक्रमणादि समस्त पुण्य करनारा ते मंत्रीने जोइ अन्य भव्यो
क्रियाओमां सद्भाववाळा थया हता.
राजाना सन्मानने जोई डरतो केदखानानो अधिकारी लीघेलु
द्रव्य पाछु आपा माटे मंत्रीना मंदिरे पहोंच्यो अने बोल्यो-

सुलतान महम्मद ] अने महणसिंह [ १२७ ? ते आ चंदननो खंड घसीने पीए, तो ते पण रोगरहित थाय. पातशाह ! आ वंने मोतीनुं कौतुक पण अवधारो-'आ वेमांथी एक मोती वेचीने वीजुं गांठे वांधवामां आवे तो सांझे पार्छ उत्सुक मित्रनी जेम जरूर तेने मळे.' ए सांभळी पातशाह विस्मय पाम्यो अने ते बंने वस्तुनी परीक्षा करावी.' पातशाहे जगतसिंहने पूछयु के-'तमे केवी रीते जाणो छो ? । तेना प्रत्युत्तरमा जगतसिंहे जणाव्यु के-'बालपणथी अभ्यासथी वस्तु-परीक्षा हुं शीख्यो छु। तेना वचनथी प्रसन्न थइ पातशाहे सपादलक्षना राजा 'मंत्रीश्वर! प्रसन्न थाओ. राज-प्रसादने प्राप्त थयेला तमे म्हारा- वडे मेट कराता आ सोनाना टंकाओने स्वीकारो.' मंत्रीचंद्रे जणाव्यु के-'आपे म्हाराथी वीहवं नहि. म्हारो ते क्षण धर्म- कार्यथी सफल थयो. मनुष्यना आयुष्यनो जे क्षण, करोडो रत्नोद्वारा पण दुर्लभ छे, तेने में प्रतिक्रमणथी पवित्र कर्यो छे. मंत्रीश्वरे २४ सुवर्ण टंकाओथी तेनेा सत्कार कर्यो हतो.' (उ.क.) १. " महेभ्य जगसिंहनो पुत्र महणसिंह हतो, मां कलाओ वृद्धि पामी हती. गुरुना सदुपदेशथी कुमित्रोनो कुसंग तनी जे सुशील, निर्मल अंतःकरणवाळो, शीतल, प्रियभाषी अने विनयनम्र मस्तकथी शोभतो हतो. जोडले : उत्पन्न . थनारां अने बीजाना हाथमां जवा छतां , , -- १२८ ] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने पर तथा जगतसिंह पर घणो प्रसाद विस्तार्यो हतो. एची रीते जीवन पर्यंत पांच पुण्य वेळाने आराधतां अने सत्य भाषा बोलतां शेठ जगतसिहे जैनशासनने लांचा वखत सुधी जागतुं कर्यु हतुं." उपर्युक्त जगतसिंह शेठनो पुत्र मदनसिंह पण चतुर होइ लोकोमा तेवो ज प्रख्यात थयो हतो. पहेलां खुरासाणनिवासी धनद नामनो वस्तुपति तेना पितानो प्रीतिपात्र हतो. जगत्- सिंह स्वर्गवासी थया त्यारे ते योगिनीपुर(दिल्ली)मा व्यव- साय माटे आव्यो हतो, अने तेने घरे पण आव्यो हतो. कुटुंगतुं. कुशल तथा तेनो निर्वाह, व्यवसाय विगेरे पूछी जगतसिंहनी जेम तेना पुत्र साथे पण व्यवहार करवानी इच्छावाळो थयो हतो, परंतु तेनी परीक्षा माटे तेणे उपाय कों. मायावडे कृत्रिम आदर दर्शायी तेणे सदनसिंहने कछु के-'तारा पिता पासेनुं सारं जे लेणुं छे, ते तुं आप कारण के घणां वर्षों सुधी में तारा बाप साथे व्यवहार कयों, पण परस्पर मळी जनारां शिव-शवक्ति नामनां, मोतीओने लइ महणसिंह दिल्लीमां गयो हतो, अने त्यां पातशाहने नमीने गंगाजल जेवां निर्मल ए मोती भेट कर्या हता. ए मोतीओनो प्रभाव सांभळी सुलतान. चमत्कार पाम्या. पातशाहे महणसिंहने पोताना अंतःपुर(जनानखाना)नो रक्षाधिकारी बनाव्यो हतो. राजमान्य थइ ते सदा धन्य अने उदार बन्यो हतो. ( उ. क.)

सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [ १२९ - तेथी लेणदेण पण घणी थइ. पहेलां सो घोडा आपीने देवू वाळयु हतुं, अने उत्सुकताथी पोताना नगरमां पहोंची गया त्यारे वाकीतुं लेणुं अहिं रही गयु हतुं. 'केटलुं लेणुं छे ?' एम पूछातां तेणे का के-जूनां नाणां प्रमाणे ३२००० वत्रीश हजार लेणा थाय, जो बराबर होय तो आपो. मदनसिंहे पण कह्यु के-"पिताजीनुं देवू थोडं अथवा वधारे वहीमां में जे प्रमाणे जोयु ते नाम प्रमाणे में आपी दीधुं छे, परंतु तेमां आपनुं नाम में क्यांय जोयु नथी, तो लख्या पोल्या विना लेणु केवी रीते लेणुं थइ शके ?" चित्तमां हर्षित थवा छतां पण ते शेठ रुट जेवो थइ तेना प्रत्ये वोल्यो के-'अरे ! पितार्नु देवू पुत्र आपे तेमां विचार शो? ' मदनसिंह-'शेठ ! आप आ फोकट प्रयास शा माटे करो छो ? साक्षी विना अथवा लखाण विना लेणु लइ शकाशे नहि. ते शेठ सुलताननी सभामां गयो अने एकांत करावी सुलतानने विज्ञप्ति करी के-' परीक्षा माटे जगतसिंहना पुत्र साथे में बनावटी. कलह मांड्यो छे जे ते प्रलाप करवामां मने कोई दोष देवो नहि.' एवी रीते खानगीमां महणसिंह वंने वखत प्रतिक्रमण अने त्रिकाल देव-पूजा करतो हतो. साधुओने वहोराची( दान आपीने ) ज जमतो हतो, प्रतिवर्ष त्रण वार सावर्मिक-वात्सल्य अने त्रण वार संघ-पूजा करतो हतो. " ( उ. क. प. ७) आ ज मणसिंहे दिल्लीमां वि. सं. १९०५मां पोते आपेली वसतिमां वास करावी रानशेखर- ८ शाह जगसिंह - १३०] [ जिनप्रभसूरि अने कही सर्व समक्ष ते बोल्यो के-'पातशाह ! जगतसिंह पासे म्हारु पहेलानु लेणुं छे, ते आ तेनो पुत्र आपतो नथी; तो शुं करवामां आवे?ए आप फरमावो.' पातशाहना बोलाव्याथी सभामां आवेला जगतसिंहना पुत्रे पण पोतानुं स्वरूप का. तेणे पोतानुं कह्यु. बनेनो विवाद थयो. वस्तुपति बोल्यो के- 'जो तारा चाप पासे लेणुं न होय तो सौना देखतां तुं वापना सोगन कर. ' पुत्र(मदनसिंह) धीरजपूर्वक बोल्यो के- आप लहेणु ल्यो अथवा म्हारुं सर्वस्त्र ल्यो, परंतु हुँ पिताजीना सोगन नहि करे. करोडो उपकारोथी पण जेनो वदलो वाळी शकाय नहि तेवा पिताजीने शुं हुं ३२००० वत्रीश हजारमा वेचुं ?" महणसिंहनी एवा प्रकारनी उक्ति सांभळी सौ सभ्योए विस्मयपूर्वक तेनी प्रशंसा करी. ते वस्तुपति पण बोल्यो के-"वत्स ! तुं धन्य-शिरोमणि छो, के जेनुं आवा प्रकारर्नु साहस छे. में आ परीक्षा करी, म्हारूं लेणु कंइ ए नथी.' सिंहनो बच्चो सिंह जेवो होय, सूर्यथी अंधकारनी दृष्टि न होइ शके, चंद्रथी अंगाराओनी वृष्टि न होई शके. एवी रीते तेणे तेनी प्रशंसा करी तेने जगतसिंहना श्रेष्ठ स्थान पर स्थापी तेनी जेम महणसिंह साथे पण व्यवहार विस्तार्यों हतो. एवी सूरिद्वारा चतुर्विशति-प्रबन्ध ग्रन्थ कराव्यो हतो-ए पहेलां (पृ. ४३ मां) अम्हे जणाव्युं छे. १ " ऊकेश ( ओसवाळ ) ज्ञातिना आगेवान शाह जग- सुलतान महम्मदु.] अने महणसिंह [१३१ -- रीते मदनसिंह पण राजा विगेरेमां वल्लभ थयो हतो. ज्यां ज्यां गुणोनो आदर होय, त्यां त्यां प्रतिष्ठा संभवे छे.' " एक वखते मांदा थयेला सुलतानने मेवाडथी आवेला पोला नामना महावैद्य रोगरहित कर्या हता. विविध औषधो अने योगोनो जाणकार, रसांगवेदी शास्त्रज्ञ ते वैद्यराज त्यारथी राजा विगेरेनो पण मान्य थयो हतो. अत्यंत बलवान् ते वैद्य- राज एक साथे ९ नाळिएर भांगी नाखतो हतो, अने सोपारी- ने पोताना अंगुठावडे नाळिएरमां नाखी शकतो हतो. बेने ढींचणो पर, वेने काखमां, बेने कफोणि पर, बेने खभा पर अने एकने चिवुक पर राखीने ते नव नाळिएरने चूर्ण करी सिंहने घरे कोइ खरसाणी वणिक पांच लाख टंका थापण मूकी करीने गयो हतो. ७ वर्षो गया. त्यार पछी तेणे जगसिंहने मृत्यु पामेलो सांभळी विचार्यु के-'धन गयु.! फ़री विचार्यु के ' तेनो पुत्र मुहणसिंह छे, तेनी परीक्षा करीए.' त्यार पछी त्यां आवीने तेणे का के- ' मुहणसिंह ! तम्हारा पिता म्हारा मित्र हता. में तमारा पितानी पासे ४ ४ ते वंने सुलताननी पासे गया, बनेए पोतपोतानो संबंध करो. स्राणीए कह्यु के-' आप पिताना सम करो. ' महणसिंहे का के- पांच लाखवडे शु बापने वेचे ?' त्यार पछी तेने पांच लाख आप्या. खरसाणीए जगसिंहना अक्षरो दर्शावीने कयु के–' सिंहथी सिंह ज थाय छे.' ए साचु थयु. मुहणसिंहने एक लाखनी पहे- । - " १३२] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने नाखतो हतो. ते महावैद्य एक बखते महाजन साथे शाला ( उपाश्रय )मां आव्यो हतो. त्यां वेषधारीद्वारा कराता व्या- ख्यानमां बेठो हतो. त्यां कोइक अधिकारमा तपागच्छनी अव- हीलना अने पोतानी प्रशंसा करी त्यारे पोलाक बोल्या:-'अरे वोकडा! शुं बोले छे ? महाजनने जोतो नथी ? ' एम कही एकदम ऊठीने तेने लातथी प्रहार को हतो. वेपधारी रोपथी लालचोळ थइ सुलताननी सभामां गया अने वैद्य पण त्यां पहोंच्या. बनेए पोतपोतानो वृत्तांत कह्यो. वनेतुं मान्यपणुं होवाथी राजा बोल्या नहि, तेवामां मदनसिंह वोल्या-'पातशाह ! आमां विचारणा शी? एके जीभ वापरी अने वीजाए हाथ चलाव्यो. एकनो दंड थतां वीजानो पण दंड थवो जोइएः तेथी बनेनो. पण न करवो. ए सांभळी पातशाहे अंत:करणमां हसतां ते बनेने मृदु वचनोथी सान्त्वन पमाडी पोतपोताना स्थानमा विसर्जित कर्या हता." (उपदेशसप्तति अ. ५, उ.७, पृ. ८६) रामणी करी. मैत्री करीने ते गयो.” (शु. कथाकोश कथा१४) एक वखते मेवाडी वैद्य पाल्हाक, सुलताननी चिकित्सा माटे आव्यो हतो, ते कोमलसूरिनी शालामा गयो हतो, त्यां तेओए (कोमल यति-सूरिओए ) तपागच्छना सूरिवरोनी निंदा करी हती, तेथी तेणे कोमल यतियोने इकित कर्या, तेथी कलह थयो, केटलाकना हाथ भांग्या, केटलाकनां मोढां भांग्यां, त्यार पछी वाद करता सौ सुलताननी पासे गया हता. सुलताने सर्वनी चेष्टा जाणी कह्यु के-कोनो दंड कराय ? सर्वे न्यायी - सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [ १३३ अने सर्वे अन्यायी छो. हवे पछी कोइए पण कलह करवो नहि. ए प्रमाणे समता पर पीरोज सुलताननो संबंध" जिनप्रभसूरिना केटलाक अवदात संबंधोमां शुभशीलना कथाकोश [कथा १७ ]मां जणावेल छे. केटलाक दुर्जनोए असद् दूषणोनी घोषणा करी पवित्र एवा महणसिंहने पण दूषित कर्यो हतो, अंतःपुरना द्वार पर आवतां भूपाले ( पातशाहे ) ते स्थानमांथी नीकळता ते( महणसिंह )ने जोयो, प्रज्वलित कोपानिनी ज्वालाथी लालचोळ आंखोवाळा थइ पातशाहे तलवार खेंची; वस्रो उतरावी प्रहार करता ७ ताळांवाळो कच्छोटो जोयो. पातशाहे ताळांओ उघाडवा कह्यु. महणसिंहे जणाव्यु के- * कुंचीओ स्त्रीना हाथमा छे.' घरे गया पद्धी ताळांओ उघाडवानुं चनशे.' [ श्रीक राज्योमां श्रावी पद्धति होवार्नु जणाय छे ]- पातशाहे तेना शरीर-नियंत्रणनी अने उज्ज्वल शीलनी प्रशंसा करी. शीलना माहात्म्यथी महणसिंहनी कीर्ति आदन( एडन ) वंदर सुधी पहोंची हती. सर्व कलाओथी युक्त कामलता नामनी रूपवती वेश्या तेतुं नाम सांभळी खेंचाइने त्यां आवी. अद्भुत नृत्य करतां नर्तकीए सुलतानने रंजित को. दानना अवसरे तेणीनी याचना प्रमाणे महणसिंहने घरे नाटक( नृत्य ) प्रकट करवातुं पातशाहे फरमाव्युं. ते चतुर नर्तकीए त्यां आवी ७ वार नृत्य कर्यु छता आ महणसिंह छे' एम जाण्यु नहि. त्यार पछी गुणी महणसिंहे नाटक कराव्यु. तेने जोइ हृष्ट तुष्ट थयेली, पोताने धन्य मानती ते नर्तकीए नृत्य कर्यु. गुणवंत महणसिंहनी परीक्षा करी सुलतान आगळ प्रशंसा करी हती." ( उपदेशकल्पबल्ली प. ७.), - i - वा १३४ ] जिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रभसूरि अने [५] जिनप्रभसूरिनो विशेष परिचय (प्राचीन प्राकृत *प्रवंधना आधारे ) जिनपतिसरिना पट्ट पर जिनेश्वरसरि थया (जेमना पिता नेमिचंद्र भंडारी हता). तेमने वे श्रीमालसंघना गुरु शिष्यो हता. एक श्रीमाल जिनसिंह- जिनसिंहसूरि सूरि अने वीजा ओसवाल जिनप्रबो- धसूरि. एकवखते जिनेश्वरसूरि पल्हूपुर (पालणपुर) नगरमां पोसहशालामां बेठा हता, एवामां सूरिनो * आ प्राकृत गद्य प्रबंधनी प्राचीन प्रति जोवा मळी शकी नथी, परंतु ते उपरथी नवी लखावेली ९ पत्रवाळी अशुद्ध एक प्रति हालमां ज म्हने बीकानेर( मारवाड )थी जिनहरसा- गरसूरिजीए जोवा मोमलावी छे. तेनी रचना विक्रमनी पंदरमी सदीमां थइ हशे, तेम धारवामां आवे छे. तेमां कर्तार्नु नाम जणातुं नथी, तेम छतां जिनप्रभसूरिना नजीकना कोइ शिष्य-प्रशिष्ये तेनी रचना करी हशे-तेम तेना उल्लेखो पस्थी अने शैली परथी कल्पना करी शकाय. तेमां जिनप्रभसूरिना पूर्वजोर वर्धमानसूरि, जिनेश्वरसूरि, जिनचंद्रसूरि, अभयदेवसूरि, जिनबल्लभसूरि, जिन- दत्तरि, जिनचंद्रसूरि, जिनपतिसूरि, जिनेश्वरसूति )ना अने गुरु जिनसिंहसूरिना प्रबंधो जणाव्या पछी छल्ले जिनप्रभसूरिनो प्रबंध सुलतान महम्मद् ]] विशेष परिचय [ १३५ -- दंडो अकस्मात् 'तडतड' एवो शब्द करीने बे ककडा थइ गयो. सूरिए पूछयु के-'शिष्यो ! आ शब्द केम थयो ? ' शिष्योए जोइने कडं के स्वामी ! तम्हारो आखो दंडो वे ककडा थइ गयो. ते पछी आचार्य विचार कर्यो के-" म्हारी पाछळ वे गच्छो थशे, तो हुँ जाते ज गच्छने म्हारा हाथमां करीश." आ ज अवसरमा श्रीमाल संघोए मळीने विचार्यु के- आ देशमा कोइ गुरु आवता नथी. चालो गुरु पासे, गुरुने लावीए.' सकल संघ मळीने गुरु पासे गयो. आचार्यने वांदीने सकल संवे विज्ञप्ति करी के-' स्वामी ! अम्हारा देशमां कोई पण गुरु आवता नथी, तो अम्हे शुं करीए ? गुरु विना सामग्री (धर्म-साधना ) न थाय. ' गुरुए पूर्व निमित्त जाणीने श्रीमालवंशमा उत्पन्न थयेला जिनसिंहगणिने पोताना पट्ट पर स्थाप्या. 'जिनसिंहसूरि । एवं नाम कयु अने को के-' आ श्रावको में तमने सोंप्या, संघ साथे जाओ.' त्यारपछी गुरुने वांदी जिनसिंहमूरि श्रावको साथे आव्या. सर्व श्रीमाल संघोए कह्यु के- आजथी मांडीने आज अम्हारा धर्माचार्य छे.. छे. एमना पूर्वाचार्यों संबंधी वृत्तांत अन्यत्र प्रकाशित थयेल होवाथी अने केटलाकनो परिचय अम्हे अन्यत्र आपेल होवाथी, अहिं प्रस्तुत प्रबंधनो ज अनुवाद प्रकट करवामां आवे छे.. पहेलां सूचवेला उल्लेखो साथे तुलनात्मक दृष्टिए सरखाववाथी आ प्रबंधनी उपयोगिता सम- जाशे अने पुनरुक्ति जणाशे नहि. , जिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रभसूरि अने आथी वे गच्छो थया. वि. सं. १२८० संवत्सरे पल्हूपुर (पाल- णपुर) नगरमां जिनेश्वरसरिए जिनसिंहने सरि कर्या, पद्मावती- मंत्रनो उपदेश कर्यो. केटलांक वर्षों पछी जिनेश्वरसूरि देव- लोकमां गया. - जिनेश्वरमरिना पट्ट पर जिनसिंहमूरि थया, तेओ पद्मा- वतीना मंत्रनी साधनामां तत्पर थइ जिनप्रभसूरिनां नित्य ध्यान धरता हता. ध्यानना जन्म-दीक्षा- अंतमां पद्मावतीए का के ' तम्हारे सूरिपदादि आयुष्य छ मास (१) छे.' सरिए का के म्हारा शिष्योने प्रत्यक्ष थजो, म्हारा पट्ट पर कोण थशे ? ए कहो.' पद्मावतीए कह्यु के-" सो(?मो) हिलवाडी नगरीमां तांवी गोत्रने पवित्र करनार महाधर नामनो महर्द्धिक( श्रीमान् ) श्रावक छे. तेना पुत्र रत्नपालने खेतल्ल- देवी भार्याथी उत्पन्न थयेल सुभटपाल नामनो पुत्र सर्वलक्षण- संपन्न छे, ते तम्हारा पट्ट पर जिनप्रभसूरि नामना भट्टारक जिनशासनना प्रभावक थशे. " ए वचन सांभळी जिनसिंहसूरि त्यां गया. मोटा महोत्सव- पूर्वक श्रावके पुर-प्रवेश कराव्यो. पछी सूरि महाधर शेठने घरे गया. आचार्यने जोइ [शेठ] सात आठ पगलां सामे गया. बंदन करी आसन पर निमंत्रण कयु-' भगवन् ! म्हारा उपर मोटो प्रसाद कयों के-आप म्हारे घरे पधार्या, परंतु आगमननुं प्रयो- सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय [ १३७ - जन कहो, त्यारपछी गुरुए कह्यु-' महानुभाव ! तम्हारे घरे हुँ शिष्य-निमित्ते आव्यो छु, म्हने एक पुत्र आपो. ' तेणे 'तथा' कही ते स्वीकार्यु. अन्य पुत्रो साथे वस्त्र विगेरेथी संस्कार करीने ते पुत्र आण्यो, अने कह्यु के-'आमांथी तम्हने जे रुचे, तेने ग्रहण करो. ' गुरुए कह्यु के-'आ (अन्य ) पुत्रो दीर्घ आयुष्यवाळा थइ तम्हारे घरे रहो, परंतु जे सुभटपाल बाल छे, ते आपो. । तेमज कयु. वहोराव्यो( अर्पण कयों ). तेने सुमु- हूर्ते दीक्षित को. वि. सं. १३२(३)६ वर्षे दीक्षा, शिक्षा आपी, पद्मावती-मंत्र समर्पित कर्यो. अनुक्रमे ते गीतार्थ- चूडामणि थया. वि. सं. १३४१ वर्षे किढिवाणा नगरमां जिनसिंहरिए सुमुहूर्ते पोताना पट्ट पर जिनप्रभसूरिने स्थाप्या; जिनसिंह- सूरि देवलोकमां गया. जिनसिंहमूरिना पट्ट पर जिनप्रभसूरि थया. तेने पूर्व पुण्यना वशथी पद्मावती प्रत्यक्ष थई पद्मावतीना प्रभावी हती. सूरिजीए एक वखते पद्माव- चमत्कारो तीने पूछथु के-' भगवति ! कहो, कया नगरमां म्हारी उन्नति थशे?, वतीए जणाव्यु के-" तम्हारो विहार जोगिणी-पीठ ढीली( दिल्ली )नगरमां महोच्छ्रय( महोदय )वाळो थशे, त्यां तम्हे जाव." त्यार पछी गुरुए विहार कर्यो, अनुक्रमे योगि- नीपुरमां आव्या. वहार वाहा( शाखा)पुरमां उतर्या. , ।

१३८ ]
जिनप्रभसूरिनो
[ जिनप्रभसूरि अने
एक वखते सूरि, बहार शौचभूमि तरफ गया हता. त्यां
मिथ्यादृष्टि अनार्यो( मुस्लीमो) लेष्टु
महम्मदशाहनी ( ढेफां-ढेखाळा ) विगेरेथी परा-
मुलाकात भव करवा लाग्या. तेथी गुरुजी
वोल्या के- पद्मावति ! सारो महो-
च्छ्रय थयो ! ' त्यार पछी पद्मावतीए ते वध करनारनी ज ते
लेष्टु(ढेफां-ढेखाळा) विगेरेथी पूजा करी. तेथी अनार्यो
( मुस्लीमो ) पलायन करता महम्मदशाहनी पासे गया.
सूरिनो वृत्तांत कहो. तेथी चित्तमा चमत्कार पामेला शाहे
पूछयु के-' ते पुरुप कयां छे ? ' तेओए जणाव्यु के-" अम्हे
तेने वहारना प्रदेशमां जोयो हतो." पातशाहे प्रधान पुरुषोने
आदेश कयों-'जाओ, तम्हे तेने अहिं आणो, जेथी हुँ तेने
जोउं. ' तेओए जइने गुरु पासे निवेदन कर्यु के- स्वामी !
अमारा प्रभु( शाह ) पासे आवो, त्यार पछी तमे जजो.'
त्यार पछी आचार्य पोळ( राजमहेल )ना द्वारे जइने
रह्या. सेवकोए जइने निवेदित कयु. तेओ शाहने निवेदन
करे ते समयमा सूरिए शिष्योने कयु के-' हुँ कुंभकासन करूं
छु, ज्यारे शाह आवे, त्यारे तम्हारे कहेवु के-'आ अम्हारा
गुरु छे. त्यार पछी ते कहेशे के-- जेवा हता,
तेवा
करो. त्यार पछी ' तम्हे भीनुं वस्त्र धरी उठाडजो." ए
प्रमाणे कहीने गुरु ध्यानमां वेठा, कुंभ-समान थया. त्यार
..

सुलतान महम्मद.]
विशेष परिचय
[१३९
पछी महम्मदशाहे आधीने शिष्यने पूछयु के-' तम्हारा गुरु
कयां छे १ तेणे का के- तम्हारी आगळ देखाय छे..
शाहे कयु के-' ते पहेलां जेवा हता, तेवा करो.' त्यार पछी
शिष्ये वस्त्र सरस करी संज्ज कर्या. ऊठीने सूरिए धर्म-लाभनी
आशिप आपी. त्यार पछी नेनो कथा-संलाप थयो.
शाहे कह्यु के- स्वामी ! अम्हारी प्राणप्रिया बालादे
राणी छे, तेने व्यंतर वळग्यो छे तेथी
व्यतरनो वळगाड तेणी पोताना देहपर वस्त्रोने ग्रहण करती
दूर
करवो (पहेरती) नथी, शुश्रूषा पण करती
नथी. तमे प्रसन्न थइने तेने साजी
करो. में मंत्र-जंत्रना जाणकारोने अने चिकित्सा करनाराओने
बोलाव्या हता; परंतु ते जेने जेने जुए तेने तेने लेष्टु ( ढेफां-
ढेखाळा ), लाठी विगेरेथी हणे छे. तमे प्रसाद करीने हमणां
तेने जुओ.' गुरुए कह्यु के-" तम्हे तेनी पासे जाओ अने
एवी रीते निवेदन करो के-जिनप्रभसूरि तम्हारी पासे आवे
छे. " शाहे जइने कह्यु. ते वचन सांभळी सहसा ऊठीने
तेणीए कह्यु- दासी ! वस्त्र लावो.' त्यार पछी दासीओए
लावीने वस्त्र पहेराव्यु. तेथी शाह चमत्कार पाम्या, आवीने
गुरुने का-'तेनी समीपमा आवो, तेने तम्हे जुओ.. सरि
त्यां गया अने तेने जोइने सूरिए कह्यु के-रे दुष्ट! तुं अहि कयां
आव्यो ? तुं आनी पासेथी जा. तेणे जणाव्यु के-'हुँ केम
.

१४० ]
जिनप्रभसरिनो
[ जिनप्रभसूरि अने
-
जाउं ? सारं घर मल्यु छे.' गुरुए कह्यु के-' बीजे घर.
नथी ? ' तेणे जणाव्यु के- आवा प्रकारचें नथी.' त्यार
पछी गुरुए मेघनाद क्षेत्रपालने बोलाव्यो अने कह्यु के-'आ
( व्यंतर )ने दूर कर.' त्यार पछी मेघनादे ते व्यंतरने खूब
पीडा करतां व्यंतरे जणाव्यु के-'. हुं क्षुधातुर छु-भूखथी
पीडा छु, म्हने कंडक भक्ष्य (खावानु) आपो. 'शुं आपुं?'
एम पूछतां तेणे कयु के-'मने पाडा विगेरे आपो. ' गुरुए
कह्यु के- म्हारी आगळ एबुं न बोलो, हुँ तमने मजबूत
बंधनथी बांधुं छु. ' त्यार पछी सूरिए मंत्रनो जाप को, ते
पछी व्यंतरे कयु के-' स्वामी ! तम्हे सर्व जीवो प्रत्ये दयाने
पाळनारा छो, म्हने केम पीडो छो ? । सूरिए का के-'तुं
आ स्थानमाथी जा. तेणे कधु के-' म्हने कइ पण आपो.'
'शुं आपु ?' एम पूछातां तेणे कर्दा के-'घी, गोळ साथे
लोट आपो.' शाहे कयु के-' ते आपुं छु.' गुरुजीए कह्यु
के-'हुँ केम जाणु के-तुं गयो छे ?' तेणे कयु के-म्हारा
जतां अमुक पीपळानी डाळ पडशे, तेथी जाणज्यो. त्यार
पछी रातना समये ते प्रमाणे ज थयु. प्रभातमां वालादे
राणीने सज्ज( साजी) थयेली जोइने शाहने महान् हर्ष
थयो. तेणे निवेदित कयु के-'प्रिया ! जो आ महानुभाग
( महाप्रभावक) न आल्या होत तो तुं कयां होत ? ' ए
सांभळीने तेणीए कयु के-" स्वामि ! आ ( पूज्य पुरुष )

सुलतान महम्मद. ] . विशेष परिचय [१४१ म्हारा पिता-सरखा छे. आ महात्मा ज्यारे तमारी पासे आवे त्यारे तमे एमनी आगता-स्वागता करज्यो, एमने अर्धा आसने बेसारज्यो." शाहे ते प्रमाणे स्वीकार्यु. राजा गुरु पासे जता हता, गुरुने पोताने घरे ( राज-महालमां) लावता हता, अर्धासन आपता हता. एवी रीते सुखे सुखे काल व्यतीत थतो हतो. त्यार पछी सर्व पाखंडो( दर्शनानुयायी-मतवाळा )नो प्रवेश थयो. आ प्रसंगमां वाणारसी राघवचैतन्यने (बनारस-काशी )थी चौदे विद्यानो हराववा पारगामी,मंत्र-तंत्रनो जाणकार,राघव- चैतन्य ब्राह्मण आव्यो. ते आवीने राजाने मळ्यो. शाहे तेने बहु मानीतो कों. ते हमेशां राजा पासे आवतो हतो. एक प्रसंगे सरि( जिनप्रभ ) सभामां बेठा १ एपिग्राफिआ इन्डिका (पृ. १९२-१९४ :) मां तथा निर्णयसागर प्रेसनी प्राचीन लेखमाला (भाग २, ले. १००) मां प्रकट थयेल यमकच्छटावाळा ज्वालामुखी-देवी-स्तोत्रना रच- नार राघवचैतन्य मुनि आ जणाय छे. ते स्तोत्र (शिलालेख)मां तेना नामनुं सूचन छे, कांगरा(डा) (पंजाबना) राजा संसारचंद्रनी प्रशस्ति पछी त्यां प्रस्तुत साहि महम्मदनी. कीर्तिरूप ते. परम योगिनी(ज्वालामुखी)ने सूचववामां आवी छे- ENGANA १४२ ] जिनप्रभसूरितो [ जिनप्रभसूरि अने ५ . हता, राघवचैतन्य विगेरे कथा-विनोद करता हता.राघवचैतन्ये दुष्ट स्वभावथी चिंतव्यु के-'आ जिनप्रभसरिने दोपवंत करीने आ स्थानमांथी अटकावु-कढा. एवो विचार करी तेणे विद्याना वलथी शाहना हाथमांथी मुद्रारत्न( वींटी )नुं अपहरण करीने सूरि न जाणे तेवी रीते जिनप्रभसूरिना रजोहरण( धर्मध्वज- ओषा )मां नाखी दीधुं. पद्मावतीए सूरिने निवेदित कर्यु के. ' तम्हने चोर वनावधानी इच्छाथी राघवचैतन्ये शाहनी पासे थी मुद्रारत्ननुं अपहरण करी तम्हारा रजोहरणमां नाखेल छे. तमो " श्रीमद्राघवचैतन्यमुनिना ब्रह्मवादिना । [स्तव रत्नावली सेयं ज्वालामुख्यै समर्पिता ||" ' श्रीमत्साहिमहम्मदस्य जयतात् कीर्तिः परा योगिनी ।' नि. सा. नी काव्यमालाना प्रथम गुच्छकना प्रारंभमां मूका. येल मंत्रमालागर्भित महागणपतिस्तोत्रना कर्ता पण आ कवि जणाय छे. तेनी व्याख्या-टिप्पणीमां तेने : परमहंस परिव्राजका- चार्य' विशेषणथी परिचित कराव्या छे. शार्ङ्गधरे शाधरपद्धति (सुभाषितावली)मा केटलांक पद्यो ' श्रीराघवचैतन्यश्रीचर- णानां ' उल्लेख साथे सूचवेलां छे, तथा शाकम्भरीश्वर हम्मीर चाहुवाण( चौहाण )नी राजसभाने शोभावनार द्विजाग्रणी राघवदेवता पौत्र तरीके पोतानो परिचय कराव्यो छे. एथी ए राघवदेव ज संन्यासी थया पछी राघव चैतन्य नामे प्रसिद्ध थया हशे-एम जणाय छे.

, सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय [१४३ m: सावधान थजो. ' त्यार पछी सूरिए ते मुद्रारत्न लइ, राघव- चैतन्य न जाणे तेवी रीते तेना माथा परना वस्त्रमा नाख्यु. महम्मदशाह जुए छे, तो मुद्रारत्न नथी. आगळ पाछळ जुए छे, परंतु मुद्रारत्न जोवामां आवतुं . नथी. शाहे पूछयु के-' अहिं म्हारुं मुद्रारत्न हतुं, कोणे लीधुं ? ' एम पूछातां राघवे कह्यु के-'शाह ! आ मूरि पासे छे.. शाह सूरि पासे मागवा लाग्या. सूरिए जणाव्यु के-' आ ( राघव )नी पासे छे. तेणे पोतानां वस्त्रो दर्शाव्या. सूरिए कयु के-शाह ! आ(राघव)ना माथा पर छे. माथा पर जुए छे, तो मुद्रा (चींटी) जोवामां आवी, शाहे ते लीधी अने राघवचतन्यने कयु के-'धन्य छे !, तुं खरो सत्यवादी छो, के पोते लइने जिनप्रभसूरिने दूषण आपे छे! तेथी राघवचैतन्य श्याममुखवाळो थइ पोताने घरे गयो. एक वखते ६४ जोगणीओ श्राविकाओनुं रूप करी छळवा माटे सूरि पासे आवी, सामायिक लइने ६४ जोगणीओने व्याख्यान सांभळती बेठी. पद्माव- वश करवी. तीए सूरिने जणाव्यु के-'तमने छ- ळवा माटे आ.६४. जोगणीओ आवी छे. मुरिए तेमने जोइ तो तेओ व्याख्यान-रसमां लुब्ध थइ अनिमेष दृष्टिए (आंखनो पलकारो कर्या: विना ) मुरि तरफ दृष्टि राखीने बेठी हती. मूरिए ते बधीने त्यां जखीली *- १४४] जिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रभसूरि अने दीधी-थंभावी दीधी. उपदेश थइ रह्या पछी सर्व श्रावको अने श्राविकाओ बांदीने पोताने घरे पहोंच्या. ते जोगणीओ आस- नथी उठवा जाय छे, तो आसनने साथे लागेलं ( चोंटेलु) जुए छे. ए जोइने फरीथी बेसी जाय छे. त्यारे सूरिजीए का के-श्राविकाओ! ऋषिओने विहारभूमिनी (भिक्षा माटे बहार जवानी ) वेळा थइ गइ छ, तमे वंदन करी ल्यो.” जोगणी- ओए जणाव्यु के-स्वामि! अम्हे तमने छळवा माटे आवी हती, परंतु तम्हे अमने छळी. प्रसाद करो, अम्हने मुक्त करो.' सुरिए कह्यु के-'जो तमे मने वचन आपो तो मुक्त करूं, नहि तो नहि. । तेओ वोली के-'बोलो शी वाचा छे ? । सुरिए का के-'जो म्हारा गच्छना सूरि(अधिपति)ओ तम्हारा जोगिणी-पीठ( १ उज्जेणी, २ दिल्ली, ३ अजयमेर दुर्ग अने ४ भरूच )मां जाय, तेने तमे उपद्रव न करो तो तमने मुक्त करूं.' जोगणीओए ते, ते प्रमाणे स्वीकार्यु. मुक्त करवामां आवतां ते पोतपोताना स्थानमा गइ. त्यारपछी आचार्यों सर्वत्र जाय छे, तेमने उपद्रव थतो नथी. त्यारथी ते जोगणीओ पोतानी वाचाथी बंधाइने रहे छे. १ आ योगिनीओ संबंधमां जैनाचार्योना पण केटलाक उल्लेखो तथा प्रसंगो छ.सुप्रसिद्ध हेमचन्द्राचार्य द्वन्याश्रय(चौलुक्यवंश) महाकाव्यना १४ मा सर्गमां सिद्धराज जयसिंहने अवन्ती(मालवा)- नी योगिनी साथे थयेला संलापनो उल्लेख कयों छे.

सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय [१४५ nini एक वखते सूरि सभामां बेठा हता, तेवामां खुरासाणथी विद्यावंत एक कलंदर (मुस्लीम फकीर) कलंदरनोगर्व हरवो आव्यो हतो. तेणे आवीने पोतानी कुल्लह( टोपी) उतारीने आकाशमा फेंकी महम्मदशाहने कई के-शाह ! तम्हारी सभामां तेवो , जिनदत्तसूरिए ६४ योगिनीओने वश कर्याना उल्लेखो म छे. योगिनीपीठ(दिल्ली)मा विहारनो निषेध कयों हतो, छतां दिल्लीना संघनी अभ्यर्थनार्थी जिनदत्तसूरिना पट्टधर जिनचंद्रसूरि या हता, तेथी प्रवेश-महोत्सवमा ज योगिनीओए तेमने छल्या हता अने तेओ मृत्यु पाम्या हता. पुरातन दिल्लीमां तेमनों थूम( स्तूप ) हतो, संघ तेनो यात्रा-महोत्सव करतो हतो-एवा प्राचीन उल्लेखो मळे छे. तपागच्छना धर्मघोषसूरिए उन्जेणीना. योगीना आक्रमण प्रभावनो प्रतीकार को हतो अने विद्यापुर( वीजापुर )नी छलवा आवेली शाकिनीओने स्तंभित करी हती, तथा योगि- नीओए करेला मरकीना उपद्रवने मुनिसुंदरसूरिए संतिकर स्तवन- द्वारा शांत कर्यो हतो-एवा उल्लेखो मळे छे. आचारदिनकर जेवा जैन ग्रंथमां तथा अन्यत्र कालिकापुराण विगेरेमा ६४ योगिनीओनां नामो तथा तंत्रसार विगेरे तांत्रिक प्रथोमां तेनी साधनानां प्रकरणो जणाय छे. १० १४६ ] जिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रभत्रि अने कोइ छे ? जे आ( टोपी )ने उतारे. ' शाहे सभा सामे जोयु, त्यार पछी सरि, महम्मदशाह प्रत्ये बोल्या के-'राजन् ! म्हारा बडे एनुं जे कराय ते तम्हे जुओ.' त्यार पछी रिए आकाशमा रजोहरण( ओघो) फेंक्युं, तेणे जहने ते कुल्लह( टोपी )ने माथे पाडी. त्यार पछी फरी. पाछा ते कलंदरे एक स्त्री द्वारा लइ जवाता माथे रहेला पाणीना घडाने आकाशमा अद्धर ज थंभाव्यो. [ पहेला प्रमाणे. ] फरी पाछा शाहने कयु, सूरिए ते घडाने भांगीने पाणीने घडाना. आकारवाल्लं कर्यु. शाहे का के-पाणीना कण-फुसिया ( छूटा) करो.' रिए से ज प्रमाणे कयु. कलंदरनो अहंकार गयो. फरी पाछा एक वरखते सभामां बेठेला अद्भुत: निमित्त शाहे कह्यु के- म्हारी सभामा बेठेला विज्ञो:! मने आजे कहो के-प्रभातमां: हुँ कया मार्गे थइने रयवाडी: ( राज- पाटी )ए जइश १ . त्यार पछी सर्वः विज्ञोए पोतपोतानी बुद्धि प्रमाणे विचारीने चिठ्ठीमा लखीने शाहने आप्यु: शाहे सूरिः (जिनप्रम )ने कह्य-' तमे पण आपो. । सरिए पण.पोतानी बुद्धिप्रमाणे-चिट्ठी आपी. ते सर्व चिट्टीओने. लइने पोताना: दुपट्टामां बांधी. शाहे विचार्यु के- आ. वधा. असत्यवादी (खोटु बोलनारा) बने वेम करं. एवो विचार करी शाह कथन. .

सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय [ १४७. बंदर बुरजो भांगीने नीकळ्यो. जइने बहार क्रीडा करी. एक स्थानमां बेठेला सूरि विगेरे सर्वने बोलाव्या, “ अने तेओने कह्यु के-' पोतपोतानु लखेलु पांचो.' ते बधाए पोतपोतार्नु लखेलु वांच्यु. मूरि( जिनप्रभ )ने कह्यु के- 'आफ्नो लेख वांचो. आचार्य लखेलु वांच्यु के-" बंदर बुरजो भांगीने क्रीडा करीने शाह वडना झाड नीचे वीसामो करशे." ए सांभळीने शाह चमत्कार पाम्या अने बोल्या के 'अहो ! आ आचार्य( जिनप्रभसूरि) परमेश्वर सरखा छे, के देवो पण एनी सेवा करे छे, . १ आने मळती एक प्राचीन घटना जाणवामां आवी छे के मालवाना सुप्रसिद्ध महाराजा भोजे, पोते करावेला सरस्वती- कंठाभरण नामना शिव-प्रासादमाथी त्रणद्वारवाळा मंडपमाथी पोते कया मार्गे थइने नीकलशे ? आवो प्रश्न परमाहत कवि धनपालने पूलयो हतो. पंडित धनपाले त्रिकालवी सर्व वस्तुओना ज्ञानवाळा केचलि-प्रणीत अहछी चूडामणि नामना प्रश्नमय अतिप्रशस्त ग्रन्थना आधारे प्रश्न विचारी, तेनुं फल पत्रमा लखी, ते पत्रने माटीना गोळानी अंदर नाखी स्थगीधरने आपी महाराजाने पधा- रवा कह्यु हतुं. जैन देव, गुरु अने आगम साथै तेने असत्यवादी ठराववानी इच्छाथी सूत्रधारोंने बोलावी, मंडपनी पद्मशिलाने दूर करावी राजा उपरना मार्गथी नीकल्यों हतो, पछी पत्र वांच्यु तो तेमां तेवी रीते नींकळवार्नु लख्यु हतु-

१४८]
जिनप्रभसूरिना
[ जिनप्रभसूरि अने
nim
त्यार पछी शाहे जिनप्रभसूरिने कयु के--- आ बड
शीतल छायावाळो मनोहर छे, तो ते
वडने साथ प्रमाणे करो के जेथी म्हारी साथे
चलाववो आवे. सूरिए ते प्रमाणे कयु. पांच
कोश पछी सूरिए कयु के-शाह !
आ झाडने विसर्जन करो-रजा आपो तो पोताने ठेकाणे जाय.
सूरिए ते प्रमाणे कर्यु के शाहे ते झाड(वड)ने रजा आपी
त्यारे ते गयो.
एक वखते कन्नाणपुरना महावीरने म्लेच्छोए लइ जइ
शाहनी पोळ( राजमहाल )ना
महावीरनी बारणा आगळ
पाडीने नीचु
प्रतिमाने मुख करावी नाखी मूक्या हता. लोको.
वोलती करवी तेना उपर थइने जता आवता हता.
जिनप्रभसूरि आव्या, त्यारे तेमणे
" सिरिभोयरायराया कवडेणुग्याडिऊण पउमसिलं ।
उपहेणं त(न)ह मंडवाउ सिद्ध व नीसरिही ॥"
तेना वचनने साचं जाणी राजा मनमां परितुष्ट थयो हतो
भने तेणे जिनशासननी प्रशंसा करी हती."
-वि. सं. १४२२मां पाटणमां संघतिलकाचार्ये रचेली.
सम्यक्त्वसप्तति-वृत्ति( दे. ला. पन ८२)मां आ उल्लेख कयों छे.

सुलतान महम्मद. ] विशेष परिचय [१४२
wid inne.
प्रतिमाने ते अवस्थामा जोइ. ते पछी मूरिजीए राजमहालमां
जइने शाहने जणाव्यु के-' शाह ! जो आपो तो तम्हारी
पासे एक प्रार्थना करुं,' शाहे कयु के-'मागो ते आपुं.
त्यार पछी पाउलि(राजमहाल)ना द्वार पर रहेला
महावीर माग्या. त्यार पछी शाहे महावीरने पोतानी समीपमा
मंगाव्या. चित्त हरनार मनोहर महावीरने जोया पछी शाह
सूरि प्रत्ये बोल्या के--.आ तमने हुँ नहि आपु., सूरिजीए
कधु के- अम्हारुं आगमन निरर्थक थयु. । शाहे कयु के--
'जो आ( महावीर--प्रतिमा )ने मुखथी बोलावो, तो हुँ
आपीश, मुरिजीए कह्यु के- जो ए( महावीर-मूर्ति )नो
पूजा-सत्कार करो, तो बोले. ' शाहे ते प्रमाणे (पूजा-
सत्कार )कयों, पूजानां उपकरण( सामग्री) करी बे हाथ
जोडीने शाह बोल्या के-'प्रसाद( महेरवानी) करीने आप
बोलो.' त्यार पछी महावीर जमणो हाथ पसारीने बोल्या के-
"विजयतां जिनशासनमुज्ज्वलं विजयतां भु(सु)ज[ना]धिपवल्लभः
विजयतां भुवि साहिमहम्मदो विजयतां गुरुसूरिजिनप्रभः॥"
भावार्थ:-उज्ज्वल जिन-शासन विजयी थाओ, सुजन
राजाओनो वल्लभ विजयी थाओ, भूमि पर शाह महम्मद
विजयी थाओ अने गुरु जिनप्रभसरि विजयी थाओ.
.
.
तेनो अर्थ गुरुना मुखथी सांभळीने शाह तुष्ट थया अने

१५० ] जिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रभसूरि अने वोल्या के- आ(महावीर देव )ने महावीरनुं सन्मान हुँ शुं आपु ?' सूरिजीए कयु के- पूजन कराव 'शाह ! आ देव सुगंधी द्रव्योथी तुष्ट थाय छे.' त्यारपछी शाहे (मह- म्मदे) खरह अने मातंड वे गाम आप्यां. श्रावको धूप लावीने सदा धूप-पूजा करवा लाग्या. सुलताने ते(महा- वीर )नो प्रासाद कराव्यो. राघवचैतन्य संन्यासीने जीत्यो, सुलतानना हाथर्नु मुद्रि- कारत्न राघवचैतन्यने माथे नाख्यु, अन्य चमत्कारो संक्रमण दर्शाव्यु. सुलतानने शत्रुजय पर लइ जइ संघपति को. रायणझा- डने दूधथी वरसाव्यु. अमावास्या तिथिने पूनम तिथि करी बतावी, खंडेलपुर नगरमां सं. १३४७( ७४ १)मां जंगलदेश ( राजपूताना.)ना शिव-भक्तोने खंडेलवालोने जिन-शासन-धर्ममां स्थाप्याः तेमनुं जैनो कर्या स्वरूप कहेवामां आवे छे-एक बखते खंडेलवाल गोत्रवाळा विष्णु(शिव)- भक्तो. द्रव्य समुपार्जन करवा.माटे गोळ, खांड विगेरे व्यवहार (वेपार) करता हता. वेपार करतां तेमने घणा.दिवसो थइ गया. " खंडेलपुरे नयरे तेरस्सए चउत्ताले । जंगलया सिवभत्ता ठविया निणसासणे धम्मे सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय [१५१ घणो गोळ एकठो थइ गयो. तेनुं मध करवा माटे सेव- कोने जणाव्यु. त्यारपछी मद्य( दारु) करावीने वेचाववा लाग्या. लोकमा मद्य करनारा तरीके विख्यात थया. तेमाथी केटलाके गुरुना उपदेशथी मद्यनो वेपार तज्यो अने केटलाक ते तजवामां अशक्त बनी ते ज वेपार करता रहा. त्यारपछी जिनप्रभसूरिए पद्मावतीना उपदेशथी जंगलगोत्रवाळाने प्रति- वोधित कर्या." जिनप्रभसूरिए कनाणयनयर( कन्नानूर )-कल्पमा अने विद्यातिलक मुनिए तेना परिशेषमा सूचवतां अवशिष्ट रखेल जिनप्रभसूरिना ऐतिहासिक परिचयनी पूर्ति, तेमना ज कोइ ( अज्ञात ) निकटना अनुयायीए रचेला जणाता आ प्राकृत प्रवन्धथी थएली जणाशे. पाछळना केटलाक लेखकोए जिन- प्रभसूरिनो संबंध, पीरोजशाह(फीरूज तुघलक) साथे जोल्यो छे, परंतु उपयुक्त कल्प, परिशेष अने आप्रवन्धना आधारे महम्मद तघलक साथे सम्बन्ध मानवो विशेष प्रामाणिक जणाय छे. विशे- पमां जिनप्रभसूरिनां तत्कालीन गुण-वर्णनात्मक स्वागत] गीतो वाकानेरना जैन पुस्तक-भंडारोमांथी उत्साही श्रीमान् अगर- चंदजी, भंवरलालजी अने शंकरदानजी नाहटा बंधुओना प्रयत्नथी हालमा प्रकट थयां छे*. तेमां. पण कमाणयनयर- * ऐतिहासिक जैनकाव्य-संग्रह (अभय जैन ग्रंथ-

१५२ ]
जिनप्रभसूरिनो
[ जिनप्रभसूरि अने
कल्पमा अने तेना परिशेषमां पूर्वे (पृ. ३१-३३ मां)
जणावेली महम्मदशाहवाळी घटनानो निर्देश छे.
माला पु. ८ पृ. १२-१३ )मां प्रकट थएल २ गीतो उचित
संशोधन करी अहिं दर्शावाय छे-
(१)
के सलहउ ढीली नयरु हे, के वरनस वखाणू ए;
जिनप्रभसूरि जग सलहीजइ, जिणि रंजिउ सुरताणू. १
चलु सखि ! वंदण जाह, गुण-गरुवउ जिनप्रभसूरि;
रलियइ ससु गुण गाहिं, राय-रंअणु पंडिय-तिल. (आंचली)
आगमु सिद्धांतु पुराणु वखाणिइ, पडिवोहइ सव्वलोइ ए;
निणप्रभसूरि गुरु-सारिखउ हो, विरला दीसउ(इ) कोइ ए. २
आठाही आठमिहि चउथी, तेडावइ सुरिताणु ए;
पुहसितु मुख जिणप्रभसूरि चलियत जिमि ससि इंदु विमाणि ए, ३
असपति कुतुवदीनु मनि रंजिउ, दीठलि जिणप्रभसूरि ए;
एकंतिष्ठि मन-सासर पूछइ, राय-मणोरह पूरी ए.
गाम भूरिय पटोला गजवल, तूठउ देइ सुरिताणू ए;
जिणप्रभसूरि गुरु कं पिन इच्छइ, तिहुअणि अमलियमाणू ए. ५
ढोल दमामा अरु नीसाणा, गहिरा वाजइ तूरा ए;
इणपरि जिणप्रभसूरि गुरु आवइ, संघ-मणोरह पूरा ए.

--
सुलतान महम्मद. ]
विशेष परिचय
[१५३
winine
.
६
(२)
उदयले खरतरगच्छ-गयणि, अभिनवष्ठ सहसकरो;
सिरिजिणप्रभुसूरि गणहरो, जंगम कल्पतरो.
वंदहु भविक जन ! जिणशासण-वण-नववसंतो;
छत्तीसगुणसंजुत्तो वाइय-मयगल-दलण-सीहो. (आंचली)
तेर पंचासियइ पोस सुदि आठमि सणिहि वारो;
भेटिउ असपते महमदो सुगुरि ढीलियनयरे.
आपुणु पास बइसार ए, नमिवि आदरि नरिंदो
अमिनव कवितु वखाणिवि, राय रंजइ मुर्णिहो.
हरषि तु देइ राय गय तुरय, धण कणय देस गामा;
भणइ अनेवि जे चाह हो, ते तुह दिउ इमा.
लेइ णहु किंपि जिणप्रभसूरि, मुणिवरो अतिनिरीहो;
श्रीमुखि सलहिउ पातसाहि, विविहपरि मुणि-सीहो. ५
पूजिवि सुगुरु वस्त्रादिकहि, करिवि सहिथि निसाणुः ।
देई फुरमाणु अनु कारवइ, नववसति राय सुजाणु.
पाटहथि चाडिवि जुग-पवरु, जिणदेवमूरि-समेतो;
मोकलइ राउ पोसालहं, बहुमलिक-परिकरीतो.
वाजहि पंचसबद गहिर सरि, नाचहि तरुण नारि;
इंदु जिम गइंद-सहितु, गुरु आवइ वसतिहिं मझारे. ८:
४

१५४ा जिनप्रभसूरिनी [ जिनप्रभसूरि अने
जिनप्रभसूरिनी अप्रकट कृतियो.
जिनप्रभसरिए 'पउमाम गाथानी अनुयोगचतुष्टयवाळी
व्याख्या (अनेकार्थ रत्नमंजूषा दे. ला. नं. ८१ मां प्र.) मां
सूचवेल रहस्यकल्पद्रुम तथा जिनप्रभसूरिनी अन्य अप्रकट
कृतियो जो उपलब्ध थाय, अने तेनो संग्रह प्रकाशमां मूकाय
तो नवीन जाणवानुं वनी शके.
जिनदत्तमूरि-चरित्र( अगरचंदजी नाहटाद्वारा प्रकाशित
उत्तरार्ध पृ.४३१-४३३ )मा प्रकाशित थयेल व्यवस्थापत्र(सं.
साधुसामाचारी) जिनप्रभसूरिकृत होवार्नु जणाय छे.
जिनप्रभसूरिनी पट्ट-परम्परा।
जिनप्रभसूरिनो शिष्यादि-परिवार विशाल हशे,तेम तेमनी
मळती केटलीक कृतियोथी अने अन्य
जिनदेवसूरि केटलाक उल्लेखो(पृ. ५०)थी जणाय
छे. ते सौमां जिनदेवसरि अग्रस्थाने
( पट्टधर ) होवार्नु जणाय छे. शाह मुहम्मद तुघलके वि. सं.
धम्म-धुर-धवल संघवइ सयल, जाचक जन दिति दानु
संघ-संजुत्त बहुभगति-भरि, नमहिं गुरु गुण-निधानु. ९
सानिधि पउमिणिदेवि इम, जगि जुग जयवंतो;
नंदष्ट जिणप्रभसूरि गुरु, संजमसिरि-तणउ कंतो, १०
AHai.

सुलतान महम्मद ] पट्ट-परस्परा [१५५ १३८५मां दिल्लीमां जिनप्रभसूरिनुं स्वागत-सन्मान कर्य, त्यारे बीजा हाथी पर एमने बिराजमान करवामां आव्या हता-ए पहेला( पृ. ३२-३३मां ) उल्लेख थइ गयो छे. तथा उपर्युक्त गीतमा पण कथन छे. जिनप्रभसूरिए दिल्लीथी महाराष्ट्र-मण्डल तरफ प्रयाण कर्यु, त्यारे पातशाहनाकथनथी पोताना प्रतिनिधि तरीके चौद साधुओ साथे जिनदेवसरिने दिल्लीमंडलमां पातशाह पासे मूकी गया हता-ए उल्लेख पण उपर (पृ.३५मां) दर्शाव्यो छे. तथा त्रण वर्ष पछी वि.सं.१३८९मा पातशाहना आमंत्रणथी जिनप्रभसरि देवगिरिथी पुनः दिल्ली तरफ आवता हता, त्यारे मार्गमा अल्लावपुर दुर्गमा तेमना साथिकोने असहिष्णु म्लेच्छो द्वारा सतामणी थइ, त्यारे समा- चार मलतां सुलतानने विज्ञप्ति करी ते उपद्रव दूर करावनार जिनदेवसरि हता-ए पहेलां (पृ.४७मां) कहेवाइ गयुं छे. ए विगेरे परथी मुहम्मद तुघलकना-दिल्लीश्वरना शाही दरवारमा जिनदेवसूरिनुं पण ऊंचुं गौरवभर्यु स्थान हतुं, ए विचारकोना लक्ष्यमा सहज आवी शके तेम छे. आ. जिनदेवमरिनी विशेष ग्रन्थ-रचना उपलब्ध थइ शकी नथी, तेम छतां जे मळी आवे छे, ते परथी पण तेमनी विद्वत्ता प्रतीत थाय छे. सचित्र कल्पसूत्रना परिशिष्टमां ९७ पद्योवाळी सं. कालकाचार्य-कथाना अंतमां तेओए पोताने जिनप्रभसूरि-स्वाङ्क-पर्यङ्क-लालितः , विशेषण- द्वारा ओळखाव्या छे. -- १५६ ] जिनप्रभसूरिनी [ जिनप्रभसूरि अने हेम नाममालाना शिलोञ्छ-(नि. सा. ना. अभि- धानसंग्रह खं.२,११५.) कार, आ जिनदेवसरि होवार्नु उपर (पू. ३३ मां) सूचवाइ गयु छे. जिनदेवसूरिनुं संक्षिप्त परिचयात्मक प्राचीन गीत ऐति- हासिक जैनकाव्यसंग्रह (अभयजन-ग्रन्थमाला पु. ८, पृ. १४) मां जोवामां आवे छे. * * योग्य संशोधन-संस्कार करी ते अहिं प्रकाशित करवामां आचे छ- निरुपम-गुणगण-मणि-निधानु संजमि-प्रधानु; सुगुरु जिणप्रभसूरि-पट-उदयगिरि उदयले नवल भाणु. वंदहु भविय हो ! सुगुरु जिणदेवसूरि दिलिय वरनयरि देसणउ; अमियरसि वरिसए मुणिवरु जणु घणु ऊनविउ. आंचली. जेहि कन्नाणापुर (-मंडणु सामिउ वीरजिणु; महम्मदराइ समप्पिड थापिउ सुभ लगनि सुभ दिवसि, २ नाणि विन्नाणि कला-कुसले विद्या-बलि श्रजेड; लक्खण छंद नाटक प्रमाण वखाणए आगमि गुण अमेउ. धनु कुलधरु जसु कुलि उपनु इहु मुणि-रयणु; 'घनु वीरिणि रमणि-चूडामणि जिणि गुरु उरि धरिउ. धनु जिणसिंघसूरि दिखियउ धनु चंद्रगछु; धनु जिणप्रभसूरि निज गुरु जिणि निज पाटिहि थापियउ, ३ ५

सुलतान महम्मद. ]
पट्ट-परस्परा
[ १५७
उपर्युक्त जिनदेवसरिए पोताना पट्ट पर जिनमेसरिने
स्थापित कर्या हता, एम जिनप्रभसूरि-
जिनमेरुसूरि गुरु-परंपराना एक गीत द्वारा
जणाय
छे.
*
हलि सखे ! घणउ(इ) सोहावणिय रलियावणिय;
देसण जिणदेवमूरि मुणिरायहं जाणउँ नितु सुणउ,
महि-मंडलि धरमु समुधरए जिण-सासणिहिं;
अणुविण प्रभावन करइ गणधरो अवयरिउ वयरसामि.
वादिय-मयगल-दलण-सीहो विमलसील-धरु;
छत्तीसगुणधर-गुण-कलिउ घिरु जयउ जिणदेवसूरि गुरु.
*x जिणचंदसूरि जिणपतिसूरि, जिणेसरु गुण-निधानु;
तणुक्रमि उपनले सुगुरु, जिणसिंघसूरि जुग-प्रधानु
तासु पाटि-उदयगिरि उदयले, जिणप्रभसूरि भाणु;
भविय-कमल-परिवोहणु,
मिच्छत्त-तिमिर-हरणु.
राउ, महंमदसाहि जिणि नियगुणि रंजियउ;
मेढमंडलि ढिल्लियपुरि जिण-धरमु प्रकटु किट
..
तसु गच्छ-धुर-धरणु भयलि जिणदेवसूरि सूरिराड;
तिणि थापिउ जिणमेरुसूरि नमहु जसु नमइ [नर]राउ.
गीतु - पवीतु जो
गायए सुगुरु-परंपरह;
सयल समीहि सिल्झहिं, पुहविहि. तसु नरह.
.

१५८ ] जिनप्रभसरिती [ जिनप्रभसूरि अने विक्रमनी सोळमी सदीमां उपर्युक्त जिनमेरुसरिना पट्ट पर जिनहितसूरि स्थापित थया हता, एम जिनप्रमसूरि सुगुरुनी जिनहितसूरि परंपराना उपलब्ध प्राकृत गाथाकुल- कना उल्लेखथी प्रकट थाय छे. * ऐतिहासिक जैन काव्य संग्रह( अभयजैनग्रन्थमाला पु. ८, पृ. ११)मां जिनप्रभसूरि-गीत तरीके जणावेल आ सुगुरु- परंपरा-गीत योग्य शुद्धि साथे अहिं दर्शाव्यु छे. *xx संजम सरसइ निरुयं(ह)सु(वमु) मुणीण तित्थभर-च(ध)रणं । सुगुरुं; गणहर-रयण वंदे जिणसिंहमूरिमहं ॥९॥ जिणपहसूरि मुर्णिदो पयडियनीसेसतिहुयणाणंदो । संपन जिणवरसिरिवद्धमाणतित्यं पभावे ॥ १०॥ सिरिजिणपहसूरीणं पट्टमि पइटिओ गुणगरिहों । जय जिणदेवसूरी नियपन्नाविजियसुरसूरी ॥ ११ ॥ जिणदेवसूरिपहो(ट्टो)दयगिरिचूडाविभूसणे माणू । जिणमेरुसूरि-सुगुरू जयल जए. सयलविननिही ॥ १२ ॥ जिणहितसूरिमुणिदो तप्पट्टे भविय-कुमुयवण-चंदो। मंयण करि-कुम-विहडण-दुद्धरपंचाणणो जय ।। १३ ॥

womai 4. --ऐतिहासि सुलतान महम्मद.] पट्ट-परम्परा जिनप्रभसूरिनी शिष्य-परंपरामां विक्रमनी पारमी संदीना अंतमा तथा सोलमी सदीना प्रारं- वाचनाचार्य भमा चारित्रवर्धन नामना विद्वान चारित्रवर्धन मुनि वाचनाचार्य थइ गया. तेओए पोताने तेमनी परंपराना जिन- हितमरिना शिष्य भूमीशवंदित कल्याणराज. उपाध्यायना शिष्य तरीके ओळखाव्या छे. तेओ बहुयुद्धिशाली वाद- विद्या-कुशल, साहित्य, नाटक, अलंकार शास्त्रोमां तथा न्याय, बौद्ध, वेदांत विगेरे दर्शनशास्त्रोमा निष्णात हता-तेवू सूचन करे छे. नरखेष वाणी (सरस्वती) गणाता हता. तेमनी रचेली कल्याणमंदिर-स्तोत्रनी ४२३ सोकप्रमाण टीका वडोदराना प्राच्यविद्यामंदिरमा छे. तेओए श्रीमालवंशी ठक्कर भीषणनी अभ्यर्थनाथी, वि. सं. १५०५ मां वैशाख शु. ८ गुरुवारे सोमप्रभाचार्यना सिन्दूरप्रकर नामना प्रसिद्ध काव्य पर दृष्टांतोथी सरस ४८०० श्लोकप्रमाण तात्पर्य टीका रची हती, एज वर्षमा पं. धर्मदासद्वारा लखाइ हती. तेनी से. सुगुरु-परंपर-गाहाकुलयमिणं जो पढः पच्चूसे । सो लहइ मणोवंछियसिद्धि. सव्वं पि भव्वजणो. ॥ १.४ ।। ४१-४२.)मांथी संशोधन करी उद्धृत. .

nHEKA
१६० ]
जिनप्रभसूरिनी
[ जिनप्रभसूरि अने
१९६६ मा लि. प्रति वडोदराना जैनज्ञानमंदिरमा प्र. कान्ति-
विजयजी मुनिराजना संग्रहमा छे.
आ ज वाचनाचार्य चारित्रवर्धने कवि कालिदासना सु-
प्रसिद्ध रघुवंश महाकाव्य पर पण श्रीमालवंशी शाह सालि-
गना पुत्र अरडकमल्लनी अभ्यर्थनाथी शिशुहितैषिणी नामनी
८००० श्लोकप्रमाण टीका रची हती, जेनी प्रति वडोदराना
प्राच्यविद्यामंदिरमा तथा खंभात वि. भंडारोमा मळे छे.
प्रो. पीटर्सनना रिपोर्ट(३, पृ. २१०)मा मानो आद्यन्त भाग
प्रकट थयो छे.
आ ज चारित्रवर्धन मुनिए वि. सं. १५११मा बै.. शु.
११ तिथिए सुप्रसिद्ध नैषधकाव्यनी टीका रची हती.
आज चारित्रवर्धनाचार्ये पाइभूमंडलाखंडल-स्थापनाचार्य,
कर्पूरचीरधाराप्रवाह विगेरे विरुदधारी उदार देसलना वंशमां,
चेवट(वेसट) गोत्रमा थयेला वरदेव-संतानीय शाह भरवना
पुत्र शाह सहस्रमल्लनी अभ्यर्थनाथी शिशुपालवध-महाकाव्यनी
टीका पण रची हती, जेनी त्रुटित (८ मा, ११ मा सगनी) प्रति
वडोदराना प्राच्यविद्यामंदिरमा छे.
ए टीकाओमां देवी पद्मावती तथा शारदा देवीनां मंगल
संस्मरणो दृष्टिगोचर थाय छे. तेओए १३ पधोनी प्रशस्तिथी
योतानी गुरु-परंपरानो परिचय कराव्यो छे, तेमा सूचव्यु के

सुलतान महम्मद. ]. पट्ट-परम्परा [:१६१ के-" जिनवल्लभ सुगुरुना -वंशमां सिद्धान्त-शास्त्रार्थना जाण, गर्विष्ठ प्रतिवादीरूपी हाथीओनी घटाने परास्त करवामां सिंह जेवा, विविध नव्य-रमणीय काव्योनी रचना करनार, विचारणीय विशुद्ध प्रज्ञावाळा, विज्ञोथी नमन करायेला प्रोट- प्रतापी मूरिराज जिनेश्वर थइ गया. तेमना शिष्य सूरीश्वर जिनसिंहसरि थया, जे प्राणि-समूहना हितार्थ-संपादनमा कल्पवृक्ष जेवा अने. विपक्ष-बादीरूपी हाथीओने प्रतिहत करवामां पंचानन जेवा हता. तेना पट्टरूपी पूर्वाचल पर सूर्य जेवा मूरि-पुरंदर जिनप्रभ थया, जेमनी जीभने बुधेन्द्रोए वाग्देवता( सरस्वती )ना आस्थानपट्ट तरीके वर्णवी हती. तेमनी पछी पोतानी बुद्धिवडे बृहस्पतिने तर्जना करनार, निरुपम समरसरूपी द्रव्यवाळा, जयशाली मूरिवर जिनदेवमूरि थया. " त्यारपछी थयेला जिनमेरुसूरि, जिनहितसूरि, जिनसर्वसरि, जिनचन्द्रमुरि, जिनसमुद्रहरि, जिनतिलकसरि १. " वंशे श्रीजिनवल्लभस्य सुगुरोः सिद्धान्तशास्त्रार्थविद् दर्पिष्टप्रतिवादिकुञ्जरघटा-फण्ठीग्वः सूरिराट् । नानानव्य-सुभव्यकाव्यरचनाकाव्यो विभाव्यामल- प्रज्ञो विज्ञनतो जिनेश्वर इति प्रौढप्रतापोऽभवत् ।।१।। शिष्यस्वदीयोऽजनि जन्तुजातहितार्थसम्पादनकल्पवृक्षः । विपक्षवादिटिप-पञ्चवक्त्रः सूरीश्वरश्रीजिनसिंहरिः ॥२॥ ११ - १६२ ] जिनप्रभसूरिनी [ जिनप्रभसूरि अने अने जिनहितमूरिना शिष्य कल्याणराज उपाध्याय(पोताना गुरु) नी परिचय कराव्यो छे. जिनप्रभसूरिना संतान-परिवारमांथयेला अनेक मुनिओ- ए परिशिष्टपर्व विगेरे अनेक पुस्तको लखाव्यां हतां, जेमांनां केटलांक हालमां पण दृष्टिगोचर थाय छे. वि. सं. १५८५ वै. शु. ५ गुरुवारे जिनप्रभसूरिना परिवारमा थयेला मुनिराजना उपदेशथी श्रीमालवंशी सत्पुत्र- वती श्राविका रूपाईए सचित्र कल्पसूत्र अने कालकाचार्य- कथानुं पुस्तक लखाव्यु हतुं. जिनप्रभसरिना संतानमां थयेला जिनचंद्रसरिना समयमां उ. सागरतिलकना शिष्य समयध्वजोपाध्यायने श्राविका पूरीए समर्पित करेलु उपर्युक्त इ. लि. पुस्तक बीकानेरना जयचंद्रजीना भंडारमा विद्यमान छे. विक्रमनी सत्तरमी सदीमा वि. सं. १६३१मां ज्ये. व. १२ बुधवारे जिनप्रभसूरिना तत्पट्टपूर्वाद्रिसहस्ररश्मिर्जिनप्रमः सूरिपुरन्दरोऽभूत् । वाग्देवताया रसनां यदीयामाच्छाद(स्थान)पट्ट जगदुर्बुधेन्द्राः।।२।। तदनु जिनदेवरिः स्वशेमुषीतर्जितत्रिदशसूरिः । निरुपमस(श)मरसभूरिः सूरिवरः समजनिष्ट जयी ॥ ४ ॥ -चारित्रवर्धनाचार्यनी सिन्दूरप्रकर-टीका, नैषधमहाकाव्य- टीका विगैरेनी प्रशस्तिमां.

... mia सुलतान महम्मद ] पट्ट-परम्परा [१६३ nominammin संतानमां थयेला वा. भारतीचंद्रना शिष्य भानुतिलके लिखित गुणस्थानप्रकरण-टीका चुनीभं. मां उपलब्ध थाय छे. वि. सं. १६३५मां का. व. ७ गुरुवारे जिनप्रभाचार्यना अन्वयमां थयेला देवतिलक मुमुक्षुए जिनप्रभसूरिनी पर्युषणा- कल्प-पंजिका(ग्रे. ३०४१)नी प्रतिने आगरा राजधानीमां लखी हंती. वि. सं. १६४१मां बीजा शुचिमास शु. ६ शुक्रवारे, कमला( पद्मा )देवीना वर-प्रसादपात्र जिनप्रभाचार्यना अन्व- यमा थयेला जिनहितसूरिना शिष्य आदिदेवमुनिए सिंघा- नकपुरमां जिनभानुसूरिना समयमा लिपीकृत समयसार नाटक वृत्तिनी प्रति बीकानेरमां जयचंद्रजीना भंडारमा विद्यमान छे. विक्रमनी अढारमी सदीमां. वि. सं. १७२६मां फा. शु. १० श्रीमाली स्वरतर- गच्छमां जिनप्रभसूरिना संतानमा थयेला उ. लब्धिरंगना शिष्य पं. नारायणदासनी प्रेरणाथी कवि हेमराजे रचेली सटीक नयचक्रनी वचनिका(भाषा) बीकानेरना. दानसागरजीना संग्रहमा उपलब्ध थाय छे. विशेष अन्वेषण करवामां आवे तो प्रभावक जिनप्रभसूरिनी शिष्य-परम्परानो बीजो इतिहास मळा संभव छे; परंतु अति विस्तारना भयथी अहि आठला संशोधनथी संतोष मानीशं.

१६४] उपसंहार [ जिनप्रभसूरि अने . आ निवन्धनी पुनरावृत्तिना प्रसङ्गे पूर्वोक्त कल्पो उपरान्त जिनप्रभसूरि-प्रबन्ध (सं.)नी लगभग उपसंहार मळती बे प्रतियो उपलब्ध थह हती [१] वडोदरा आ. जैन ज्ञानमंदिरनी प्र. कान्तिविजयजी मुनिराजना संग्रहनी, तथा [२] वि.सं. १८९५ मुंबईमां, अने वि. सं. १९२२मां अजीमगंजमां लखाएल परथी अगरचंदजी नाहटाए बीकानेरथी मोकलावेली नकल. तथा जिनहरिसागरसूरिजीए पाछलथी मोकलावेल प्राकृत प्रबन्धनी प्रति, जिनप्रभसूरिनी तथा तेमनी शिष्य-परंपरानी कृतिओ अने खरतरगच्छनी अन्य सं. गु. पट्टावलीओ, उपदेशसप्तति, श्राद्ध- विधि, शुभशीलगणिनो कथाकोष (छाणी जैन ज्ञानमंदिरनी है. लि. प्रति ), उपदेशकल्पवल्ली, उपदेशतरंगिणी विगेरे अनेक ऐतिहासिक साधनो साथे समन्वय करी लीधेला तेमांना उपयोगी अंशो आ निबंधमां योग्य स्थाने दृष्टिगोचर थशे अने "उपयोगी जणाशे-एवी आशा छे. आ प्रयत्नथी महम्मद तघलकना समकालीन परिचित इब्ने बतूता जेवा परदेशी' इतिहास-लेखके न जणावेली, 'मिराते मुहम्मदी (उर्दू), झीआउद्-दीन बरनीनी 'तारीख- इ-फीरोजशाही , तथा 'दी क्रॉनीकल्स ऑफ दि पठान किंग्ज ऑफ दिल्ही' 'सुलतानम् ऑफ देहली' 'दी ट्रॅव्हलर ऑफ. इस्लाम ' 'कॅम्त्रीज 'हिस्टरी ऑफ इण्डिया, ऑक्स- .. सुलतान महम्मद.] उपसंहार [ १६५ ~~~~....... फर्ड हिस्टरी ऑफ इण्डिया , जेवां ऐतिहासिक प्रमाणभूत मनातां इंग्लीश पुस्तकोमा न जोवामां आवती, छतां मुहम्मद तुघ(ग)लकना समकालीन अने गाढ परिचयमां आवेला आ देशना विश्वसनीय अन्य लेखकोए प्राचीन प्रा. सं. मां लखी राखेली.तेमनी साथे संबंध धरावती, जैनशासनने गौरव आपती, जिनप्रभसूरिनी प्रामाणिक ऐतिहासिक अनेक घटना प्रकाशमां आवे छे-ए इतिहासविज्ञो वांची-विचारी शकशे. पुरा- तत्त्व-प्रेमी इतिहासना अभ्यासीओने मध्यकालीन भारतना तथा दिल्लीश्वर पातशाहोना इतिहासना अभ्यासमां, जैन आचार्योनो अनें जैन गृहस्थोनो अप्रकट इतिहास उकेलवामां, हिन्दु- मुस्लीम-कलह निवारवामां, परस्पर सहानुभूतिभरी मैत्री वधार- वामां अने शुभप्रेरणाओ आपवामां आप्रयत्न यर्किचित उपकारक थशे; तो लेखक पोतानो वर्षोनो प्रयत्न सफल थयो समजशे. -ला. भ. गान्धी. समाप्त ८ , जिनप्रभसूरि अने सुलतान महम्मद आ निबंधमां आवेलां ऐतिहासिक नामोनी अनुक्रमणिका. Dese अ. नाम अ. नाम २५,४४ पृष्ठ. पृष्ठ अकबर २, १८ अन्ययोगव्यवच्छेद ४ अचल ४२ अपभ्रंशकाव्यत्रयी २७, ७७. अजमेर १२६, १४४ अभयकुमारचरित २८. अजयमेर-अजमेर अभयदेव सूरि १३४ अजितनाथ-मूर्ति ८३, ८९ अभिधानराजेन्द्र विधिचत्य १०६-१०७ अभिधान-संग्रह ३३,१५६ अजित-शांति-स्तव-वृत्ति ७ अभिनंदनजिन(मूर्ति) अजिमगंज १६४ कल्प अणहिलवाड-पाटण अमूल्यविहार १०० अणहिल्लपुर पाटण अंबदेव सूरि ४२,१०७ अनुयोगचतुष्टयव्याख्या १५४ अंबा-अविका अनेकार्थरत्नमंजूषा १५४ अंबिकादेवी(प्रतिमा) ५४,१०२ अंतरिक्षपार्श्व-कल्प कल्प २१ सुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [.१६७ ऐ. नाम जैनज्ञान-मंदिर २५,६७ २० अलपखान पृष्ठ ऐ. नाम पृष्ठ अयोध्या आचार-दिनकर तीर्थ-कल्प २० आत्मारामजी अरजिन-बिंब ५३,५४,८३ अरडकमल्ल १६० . आदन ( एडन) १३३ अरिष्टनेमि-कल्प आदिगुप्त-शिष्य अर्बुकपुर ८५ . आदिजिन-मूर्ति २८,८२- अर्बुदतीर्थ-कल्प १९ ८७,१०६ अर्यापुर ८२ आदिदेव मुनि १:६२ अर्हच्छीचूडामणि १४७ आम्रदेव अंबदेव सूरि १०६-१०७ आरामकुंड-पद्मावती-कल्प २१ अलावदीन (ण) ७५,७६, आशापल्ली-आसावल्ली १०३.१०८,११४ आशापुर (२ अलाउद्दीन=अलावदीनः आसावल २७,१०४ ४७,१.५५ आसावल्ली-आसावल अवंती-मालवा आसीनगर अश्वावबोध-कल्प १९ इंद्रहंस गणि १२०,१२२. अष्टापदतीर्थ-कल्प २० ३५ उन्नयंत=गिरनार अहम्मदावाद १०४ अहिच्छत्रा-कल्प १९ उज्जयिनी=उजणी ५२, १६२ उज्जेणी २०,८२,१४४,१४५ . अल्लावपुर दुर्ग इब्न बतूना. १६४ असूअग मलिक तीर्थ-कल्प १९ आगरा ऐतिहासिक नामोनी [ जिनप्रभसूरि अने: ऐ. नाम ४. उदयाकर गणि ८३. , , पृष्ठ ऐ. नाम पृष्ठ.. उदयप्रभ सूरि ऐ. जैन काव्य-संग्रह १५१, १५६,१९९ उपकेश गच्छ ४२,५३,१०१, ऐन्द्रीपुर १०.४,१०.७. ओंकारपुर(जी) ८६,९२-९४ उपदेश-कल्पवल्ली-१२०,१:२२, मांधाता ८६ १३३,१६४. ऑक्सफर्ड हिस्टरी- तरंगिणी-११६,१२५,१६४ ऑफ इंडिया १६४ माला-लघुवृत्ति ३६. ओसवाल ऊकेश सप्तति ६,९,५९,६१,७३, कक्क सूरि ४२,५३,१:०१, १.११३२,१६४. उपसर्गदरस्तोत्र-वृत्ति ८. कंजरोटपुर ४२, ५३, रंगलपुर ५४,८५. १०१, १०४ जिनालय ५४ कथाकोश-पंचशतीप्रबंध- उलूखान १०४६ कन्नागपुर उम[ग]खान १४८, १९६- ऊकेश वंश (ज्ञाति) २७,१०१, कन्नाणयनयर २५, २६, २९, १.०६,१२२,१३०,१३४ ३०, ५८, १०५, १.५१ ऋषभजिन-स्तवन वीर ३७, ३८, १९, एपिप्राफिआ इंडिका १४१ ६.८, १०१ ऐतिहासिक गूर्जर काव्य-संचय कल्प २०,२५,२६,१०९, ४२,७७ १५१ १०४, १०७ १०७, १०९, १८.

सुलतान महम्मद...] अनुक्रमणिका [१६९.. minn . कार ७३. करनाल ७७ ५, ऐ. नाम ऐ. नाम पृष्ठ: परिशेष ३३,३९,४०,५८, कल्याणपुर १०९: कन्यानयनीय कन्नाणय- कल्याणमंदिर-टीका १५९ कपर्दियक्ष-कल्प २०. कल्याणराज उ १६:१. कमलादेवी पद्मावती कष्टभंजन ९.६ कयबास स्थल २९ कांगरा (डा). १.०९ १४.१ कातंत्रदुर्गपदप्रबोध करहेटक करहेडा करहेटक कातंत्र-विभ्रम-टीका कर्णदेव १,०४, १०६ कानानूर-कन्नाणयनयर कर्णाट कान्हड़ कन्नाणयनयर १०२, १०५ कर्पूरचीरधाराप्रवाह १०२,१६० ., महावीर=, महावीर कान्हडदे-प्रबंध कलंदर १४५,१४६. कलिकुंड तीर्थ-कल्प ३१, १०३ कल्पप्रदीप-तीर्थकल्प कामलता. १३३ कांपिल्यपुर-कल्प कल्पसूत्र १५५, १.६२ २.० कलिका कालकाचार्य-कथा १५५,१६२ किरणावली कालिकापुराण कालिदास पंजिका ७, १६२ कालिय सुबोधिका ८. काव्यमाला. १३, १.६, १.४२. २० काफूर मलिक.. ८. कायस्थ ५. कल्पलता... ८ ८ दीपिका १७० ] ऐतिहासिक नामोनी [जिनप्रभसूरि अने ऐ. नाम ९० ऐ. नाम पृष्ठ. किदिवाणा १३७ कीर्तिकौमुदी कुडंगेश्वरतीर्थ-कल्प २० कुतुबदीन १४२ कुतूहलखान-क्युतलबखान कुंथुजिन-बिंब ५३,५४,८४ कुमारगणि कवि २७ कुमारपाल ८०,८१ चरित्र २११,११२ कुलधर १५६ कुल्पाक कृष्णर्षिगच्छ ११ केस्त्रीज हिस्टरी ऑफ इंडिया २६,३०,४६,१६४ कोका पार्श्वनाथ-कल्प २० कोटाकोटि कोमल सूरि १३२ कोसला अयोध्या कोहंडियदेवी-कल्प २० कोशांची तीर्थ-कल्प क्यूतलघखान पृष्ठ.. क्षेत्रसमास ११५. खंडवा-खंडोह खंडेलपुर १५०. खडेलवाल १४० खंडोह खंभात स्तंभतीर्थ शांतिनाथ जैनभंडार १८,६६ खरतरगच्छ (गण) ४,३१, ४०,५५,१०६,१११,१५३ पट्टावली ३,४,७६.७८, १६३,१६४ ,, (वृहत् ) (लघु) ३१,७५-७८, १६३ खरसाणी १३१ खरह १५० खाजेजहां मलिक-ख्वाजाजहान. ४ खापरराज खुरासाण खेतरपाल १२८,१४५ ७६ २० ४६. खेतल सुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [ १७१ ऐ. नाम - " पुरोहित 2 . गुजरात ऐ. नाम पृष्ठ.. पृष्ठ, खेतल्लदेवी १३६ गूर्जरेश्वर ९१ ख्वाजाजहान ५२ गच्छमतप्रबंध ३९ महामात्य ९० गज संघपति ११,६७ गोगपुर ८६ गज्जणवई ( वी ) .१०३ ग्यास्-उद्-दीन तघलक ·३१ गणितसार ८७ - घोषकीपुर (२. गिरनार तीर्थ ३४,६५,६९, चतुरशीतिप्रबंध ४३ ८२,८७,११७ चतुर्वर्गचिंतामणि ९२ १९,२७,६१,६८, नतुर्विशतिजिनानंदस्तुति ४५,६१ ९०,१०३-१०५,११५ चतुर्विशतिप्रबंध-प्रबंधकोश ११० चन्द्र (ठ.) १०८, १०९ गुणशेखरसूरि ३८,४० चंद्रकपुरी गुणस्थान-स्वरूप ( क्रमारोह) चंद्रकीर्ति ११३, चंद्रगच्छ ६६ टीका १६२.. चंद्रतिलक उ. गुरुगुणषट्त्रिंशत् चंद्रप्रभ जिन ( मूर्ति) ८४,८६ पट्त्रिंशिका ११६ चंद्रवंशी ९१ गुर्वावली ११,६७,७८,७९, चंद्रानक ८९ चंपापुरी तीर्थ-कल्प २० गूर्जरधरित्री-गुजरात चारित्रवर्धन १४९,१६०,१६२ राजहस्त्यंकुश ९१ चारूप ६. गुणभद्र सूरि २७.

१७२.] ऐतिहासिक नामोनी [ जिनप्रभसूरि अने ऐ. नाम चाहुयाण-चौहाण चिक्खल पुर ३० ४ ऐ. नाम पृष्ट. पृष्ठ.. ६७, ११८ वीरमंदिर चित्त-चित्तोड जठ्य (जेठवा) राजपूत चित्रकूटाचल=चित्तोड गढ जयचंद्रजी-मंडार १६२ चित्तोड (४, १०४, १०५ जयसिंह राजा ८०, ९७ चेलकपुर ८६. जयसिंह सुरि ९०,१०६, चेल्लणपार्श्व-कल्प २० ११.१, १.१२, चैत्य.. ४२. जयसिंहपुर (३ चैत्यवासी. जलपद्र ८३. चोल देश २४, २६, १०९ जसोवद्धण यशोवर्धन २८ जाजअ २९. छंदःकोश ११५ जाधव-यादव छाजू शाह ४१. जालंधर. ८५ जगचंद्र सूरि ६६. जालोर ७६, १०१,१ १०६ जगसीह-जगत्सिंह जावड़ शाह २८ जगतसिंह, ३६, ४३, जावालिपुर जालोर ११५-१३०. जिनचंद्र सूरि (१) जंगल गोत्र १४.१ (२) १०६ जंगल देश १४०. (३) १११ जंगलया १.४० जंघराल नगर ११, ६३.-.- (५) १.४५ चौहाण कुल . or ।

सुलतान महम्मद. ] अनुक्रमणिका [१७३ min ७७ जिनसर्व सूरि पे. नाम पृष्ठ. ऐ. नाम पृष्ठ. जिनचंद्र सुरि (६) १५७ १३४,१३६,१४२-१६४ (७) १६१ प्रबंध (प्रा. सं.) ६५,७२, (८) १६२ ७४, ७८,११६, ११७, जिनतिलक सूरिं १६१ १३३, १३४ जिनदत्त सूरि १३४, १४५ जिनभानु सूरि १६२ चरित्र १५४ जिनमेरु सूरि१५७,१५८,१६१ मूर्ति जिनवल्लभ सूरि १३४, १६१ जिनदेव सूरि ३२-३६, ४७, जिनसमुद्र सूरि १६१ १९३-१९८, १६१ १६१, १६२ - जिनसिंह सूरि ४,३१,३७,३८, जिनपति सरि २७, २८, १३४ ७५-७८,१३६, ११७, १५८ १३७,१५६-१५८, २६ १६१, १६२ जिनपाल उ. २७ १७. जिनप्रबोध सूरि ७७,७८,१३४ : जिनसुंदर सूरि ४५. जिनप्रभ सूरि (आगमिक) ३ जिनहित सूरिः १५८,१६९ जिनप्रभ सरि (खरतरगच्छीय)१, १६१,१६२ ३-१०, १८, १९, जिनेश्वर सूरि (१) २१-२४, ३१-४७, जिनेश्वर सूरि- (२) ८,२७,७६- ५१-७६,१०४-१०६, ७८,१३४,१.३६ १०६, १.१५, १.१७, १५७,१.६१ रास स्तवन : १.३४ ܝ - १७४ ] ऐतिहासिक नामोनी [ जिनप्रभसूरि अने ऐ. नाम ७७ १४४ ५ पृष्ट. जिनेश्वरसूरि-गस जीरापुर ८३ जीर्णदुर्ग-जूनागढ जूनागढ (४ जेसल १०६ जेसलमेर २६ जैनभंडार ग्रंथसूची ५,२७,७७ जैत्रपाल ९१ जैनग्रंथावली २६,३२ जैनतीर्थ-रक्षा फरमान दर्शन जैनधर्मनो प्राचीन इतिहास २६, ३९,४४ जैन साहित्यसंमेलन रिपोर्ट २६, ४५ जैनसाहित्यमें इतिहासके साधन २६,४५ जैनसाहित्य-संशोधक १८ जैनस्तोत्रसंग्रह १७ ऐ. नाम पृष्ट. जैनस्तोत्रसंदोह १२,१४, १५.१७ जैनस्तोत्रसमुच्चय ११,१७, १८ जोइरस ज्योतीरस जोग(नि)णी (६४) १४३ जोग(गिणी-पीठ ज्ञातासूत्र ज्ञानकलश मुनि ११५ ज्ञानचंद्र ४३ ज्योतीरस २८ ज्वालामुखी (योगिनी) - १४१ स्तोत्र १४१,१४२ झंझणदेव ८७ झीआउद-दीन वरनी १६४ टक्कारिका ८५ टी(ढी)पुरी तीर्थ स्तोत्र oC ६ ९ ५ ठक्कुर कुल डभोई डीसावाल ज्ञाति ढिल्ली (ढीली)=दिल्ली सुलतान महम्मदः] अनुक्रमणिका [ १७५ ऐ. नाम पट्टावली ऐ. नाम पृष्ठ. पृष्ठ. ढोरसमुद्र ८५ तुग(घ)लकाबाद ३१.३५ नघलक-तुगलक तुरक्क २,२९,३१,४२,५४,६९ तंत्रसार १४५ दक्षिण देश (मंडल) १९,२६, तपागच्छ (पक्ष) १०,११,१८, ३०,४२,९०,१०९ ४५,५८-६७,११५. दंडवीर्य ११६ ११८,१३२,१४५ दफरखान ११५ ६७,७९ दर्भावतिका=डभोइ तपोटमतकुट्टनशतक ७,६७ . दाशरथिपुर अयोध्या ताजदीन मलिंक-सराई .. ३५ दाहडपुर दि क्रोनिकल्स ऑफ तापी ९० दि पठाण किंग तांबी (श्रीमाल-गोत्र) ४,१३६ ऑफ दिल्ही तागपुर (५ दिल्ली ५,७,९,२३,३०-३६, तालणपुर ३९,४३,४५,९२,५८, तिलंग देश ५४ ६०,६९,७१,७५,१०१, तिलंगाधिपति ५४,१०२,१०५ १०१,१०९,११४,११८, तिहुणसिंह १२८,१२९,१३७,१४४, तीर्थकल्प ९,१८,२१,२५, १४५,१५२-१५६ ३६-३८,५३. दिल्लीश्वर २,१८,२२,२३, तीर्थनामसंग्रह २० :: ७७,१०९ तुग(घोलक दीनार मलिक ४८ ताजल मलिक ८३ १७६] ऐतिहासिक नामांनी [जिनप्रभसूरि अने पे नाम ऐ. नाम ९ ८३ धनमातृकापुर घणियावी धंधकलस (कुल) : पृष्ट. दीपालिका-कल्प (१) द्याश्रय महाकाव्य १४४ (२) ४२ धणियावी दीशापाल-डीसावाल धनपाल (पं.) १४७ दुर्ग दुवीरखान १०८ देव ९१ धर्मफोर्ति गणि ७८ देपालपुर धर्मघोष सूरि ७८७९,१४५ देवगिरि ६,९.३१,३६,४१- धर्मदास १९९. ४९,७८.८०,८५, 'धवलक घोळका ८९.९३,९५,१०१, धातुपाठ-वृत्ति ११३,११४ १०है,११५-१२२,१५५ धारा ८२ देवतिलक १६२ देवपालपुर देपालपुर धाराधर (पं. जोषी) ३१,३२ देवाधिदेव महावीर धी ट्रॅव्हलर ऑफ इस्लाम १६४ देवेन्द्रसूरि (१) धोळका ६६.७८ (२) नमिनाथ (मूर्ति) ४१ देसलवंश १६० नयचक्र-वचनिका १६३ देसल शाह १०१-१०३,१०७ नयचंद्र कवि १०६ देहली दिल्ली नर्मदा ९३ दोलताबाद देवगिरि नकपुर द्रोणत नलायन महाकाव्य १.१५. ८४ ८५ सुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [ १७७ ऐ. नाम १ नागदा=नागहृद नागपुर ८४. नागपुरीय ११४ नागलपुर नागहद नागेंद्र गच्छ नाभिनंदनजिनोद्वार प्रबंध ४२, ५४११०१,१०४,१०७ नारायणदास नासिकपुर-कल्प २०,८४ नासिक्य-नासिक(क) निबस्थूर पर्वत ८२ निर्वृति गच्छ ४२ नीमाड अंक नीलकपुर नेमिनाथ (मूर्ति) ६९,८२-८६ ४३ नैषधमहाकाव्य-टीका १६२ न्यायकंदली-विवरण १ पइट्ठाण पुर २०,३६,८५ . १२ ऐ. नाम पृष्ठ. करप २० पउमिणि देवी पद्मावती पंचलिंगी-विवरण २७ पंचशती-प्रबंध १८,६२,६८, ६९, ७२, ७४, १२०, १२२, १३२, १६४ पटणा पाटलिपुत्र पट्टावली ७६,१६१ पत्तनः-पाटण पद्मनाम कवि पद्मावती ६,१०,११,९९,७५, १३६-१३८,१५४, १६०,१६२ चतुष्पदिका १७ परिशिष्ट पर्व १६२ पर्णविहार पुर फाग पर्वृषणाकल्प-कल्पसूत्र ४९. पल्हूपुर-पालणपुर पाटण ३३, ६३, ६६, ८५, १०३, १०६, ११५, ११७,१४८ १७८ ] पेतिहासिक नामोनी [जिनप्रभसूरि अने पे. नाम १९ स्थापनाचार्य १६० ऐ. नाम पृष्ट.. पृष्टः जनभंडार-ग्रंथसूची ३, १८ पूर्णभद्र गणि पाटलिपुत्र-कल्प २०. पूर्णिमा गच्छ (पक्ष) ४३,११५ पांडु देश १०२, १०५ पूर्वदेश-तीर्थ पांडुभूमंडलाखंडल- पृथ्वीघर-पेथड पृथ्वीराज २७,२८ पांड्यदेश-राजा ५४ पेठण-पइट्ठाण पादलिप्त सूरि ८,५६ पेथड शाह ४२,७८,८२-. पार्श्वनाथ (बिंव, मंदिर ) ३०, ८६, १०१ ४२,८१-८५ पेरोज पीरोज पालणपुर १३४,१३६ पोल्हाक( पोला )=पाल्हाक पालित्त पादलिप्त सूरि प्रकरणरत्नाकर ११-१३, पाल्हाक १३१,१३२ १५,१६ पावापुरी तीर्थ-कल्प ९,२०, प्रतिष्ठानपइट्ठाण पत्तन ४४,४५. प्रबंधकोश ४३,१.३० प्रबोधमूर्ति गणि ७६. ३९,४४,१६० प्रबोधोदय वादस्थल २७ ५९-६२, प्रभाचंद्र सूरि ७१,११०-११५,. प्रभावक्रचरित्र ३३ ११८,१२१,१२५, १३३,१५१ प्रभासपाटण. पूरी प्रश्नोत्तररत्नमाला-वृचि,४१ पिटर्सन-रिपोर्ट २४,२५,३६, पीरोज पातशाह सुलतान महम्मद. ] अनुक्रमणिका [ १.७९ ऐ. नाम भरत २० पार्श्व-कल्प स्तोत्र पृष्ठ. ऐ. नाम पृष्ठः प्राचीन गूर्जरकाव्यसंग्रह .. ४२, भट्टारक=जिनप्रभ सूरि .... १०७ ,, सराइ ( पोसहशाला:) ५.१ प्राचीन जैनस्तोत्रसंग्रह १६. भयहरस्तोत्र-वृत्ति प्राचीन लेखमाला १४१ प्राच्यविद्यामंदिर ४०,६७ भरुच भृगुपुर 'फलवर्धी ८,३४,५५ भानुचंद्र उ. १८: भानुतिलक १६२ भारतीचंद्र १.६२ 'फलोधी-फलवर्धी भीम संघपति ८८ फीरूज-पीरोज भीमदेव (१) 'फुरमान १५३ (२) फेरु १०७-१०९ भीमपल्लीक १०१ 'बंदी-मोचन ३४,५४ भुवनहित उ. १११ बालादे राणी ७९,१३९ बीकानेर : १३१,१५१,१६२ भृगुपुर ९०, १.१.२, ज्ञानभंडार ७६,१६२, ११३, १.४४.. भैरव १६३ बृहट्टिपनिका २४ . भोज राजा ३३,१४७,१४८ बृहत्संहिता २८ प्रबंध १.१६. बृहद्गच्छ ११०,१:१५ मकुडी (२.. बोहित्थ शाह ५३. मगदूमई जहां ४९. ब्रह्मशांति यक्ष: १.०५. मगध १.१.१. " १.६...

१८० ] ऐतिहासिक नामोनी । जिनप्रमसरि अने - ४ कल्प पनाम पृष्ठ ऐ. नाम पृष्ठ मंगलपुर (३. मल्लिनाथ(मूर्ति) ८२,८४,८५ मंडप गिरि-मांडव गढ मल्लिषेण सूरि मंडप दुर्ग= महणसिंह ४३, ११५, मंडपादि ११९, १२०, मंडलीक १०४. १२३, १२७-१३३ मथुरातीर्थ-उद्धार ५२ महम्मद तघलक (सुलतान, ११ पातशाह)१,२,१८,२१-२४, यात्रा ५४ ३०-३९,४३-४८,५१, मद्दन सूरि ११३ ५२, ५५,६८,७६,१०५, मदनसिंह महणसिंह ११.-११२,११७,१३८- ३० १९७, १६.४ मध्यकपुर ८४. महागणपति-स्तोत्र ११२. मध्यदेश-तीर्थ १९. महाघर, १३.६ मम्माण शैल २९ ३५, १५५, मरुस्थली (मंडल) २६,६२ महावीर-गणघर-कल्प मलिक १५३. महावीर-मूर्ति ३५,९५,५६, वयो १११ ७६,७७,८१,८४,१०३, मलयेंदु सूरि ११३ १०५, १४८-१५० मल्लदेव १११.११३ मल्ल वादी माणिक्यदेव-कल्प २० मांडव गढ़ ७९,८०८२,९५ महाराष्ट्र मंडल २० .. महेन्द्र मूरि . ५६ मल्लाणा 1 सुलतान महम्मद ] अनुक्रमणिका [१८१ माथुर वंश .५ माधव "मंत्री मानदेव शाह ऐ. नाम पृष्ठ. पे, नाम पृष्ठ मातंड १.५० मेह मंडल १५७ मेरुतुंग सूरि ४३ १०१ मेवाड(डी) १०४, १३२ मौलाना मल्लाणा २६, २८ म्लेच्छुपति मानभद्र सूरि ११:० यंत्रराज ११३ मांधातृमूल यादव ९२ मालच देश (मंडल) १९,७८, युगादिजिन मंदिर ८२, ८८,९७, ९८ योगिनी (६४) १४४, १४५ १४४, १४७ पत्तन-दिल्ली माळवराज ९५, १०३ पीठ- मिथिला तीर्थ- २० मुकुटिका मकुडी रघुवंश-टीका ( शिशु- मुनिभद्र सूरि ४३,११०,१११ हितैषिणी) १६० मुनिसुन्दर सूरि११,६७,७८,८९ रणथंभोर १०४. मुनिसुव्रत (मूर्ति) ३६,८४,८५ रत्न-परीक्षा १०८. मुल्लाणक रत्नपाल १३६. मुह(मों)डासा १०४ रत्नपुर ८५ मुइणसिंह महणसिंह २.० मुहम्मद-महम्मद रत्नमंडन गणि ८२, ८९. रत्नमंदिर गणि -कल्प तीर्थ-कल्प मेघनाद, १८२] ऐतिहासिक नामोनी [ जिनप्रभसूरि अने ऐ. नाम १११ पृष्ठः ऐ. नाम पृष्ठ रत्नशेखर सूरि(१) ११४,११५ ल्णनगर ८४,११४ (२) ११५,११९ रूणापुरी-रूणनगर बत्नाकर ९९ रूपाइ १६२. रत्नाकरावतारिका-पंजिका ४३ रैवतक-गिरनार रविवाटक १०१ लब्धिरंग रहस्यकल्पद्रुम १५४ लंबकीपुर राघवचैतन्य ७५,१४१-१४३ लाला साधु (शाह) राघवदेव राघवचैतन्य लावण्यप्रसाद ९०,९१ राजगृही लींबडी-जैन ज्ञानभडार १८ राजपूताना १९ लेख-पद्धति राजप्रसाद-शत्रुजयतीर्थकल्प वकी ( वांकी) राजशेखर सूरि ४३,४४,१२९ वज्रसेन सूरि ११४ राजसीह ३६ वटपद्र४,७५,८५,८६,१९९, राजसोम १८ १६० राजादि-रुचादि-गण-वृत्ति ९ राजाधिगज-महम्मद वडोद(द्रा) वटपद्र वडोदरा: रामदेव (राजा) ७८,९०,९१, वढवाण ( ? वडवाणी )3 ९७,९८,१०१,१०२ रामदेव (शेठ) २८ वणथली-वामनस्थली रुद्रपल्लीय गच्छ ३८,४१,४३ वरंगल-उरंगल रुद्रमहालय ९९ वरदेव १६० वडथूण (?). ५० ... " वर्धमान पुरः अनुक्रमणिका ऐ, नाम वर्धमान पुर ८१ : ८२ सुलतान महम्मद.] [१८३ m पृष्ठ. ऐ. नाम पृष्ठ वर्धनपुर (३ विद्यानंद वर्धमान तीर्थ १५८ विद्यापुर-वीजापुर विद्युन्माली देव वलभी-भंग १०३ विधिप्रपा वस्तुपाल-तेजपाल-कल्प २१, विधिमार्ग २७ ८१,९० विनोदकथा-संग्रह वागड देश विन्धनपुर वाघेला ९० विविधतीर्थ-कल्प-तीर्थकल्प वाणारसी वाराणसी विशालराज गणि १० वाणी ८६ विहार(क)-जिनमंदिर ८४,९३ वामनस्थली ८४,१०४ वीजापुर वाराणसी १४१ , बृहद्वृत्तांत २० वीरजिन (बिंब, विहार ) ३७, वास्तुसार १०८,१०९ :५१,५६,५८,६७,८३-८५, वाहड विक्कन (म)पुर-विक्रमपुर स्तोत्र-वृत्ति विक्रमपुर २६,८२,८६ वीरधवल विजयकटक वीरवल्ल ( बल्लाल) विजययंत्र ६०,६१. वीरिणि १५६ विद्यातिलक मुनि ३३,३८,४०० वीसल देव ९१ ४२,१५१ वृद्ध( बृहत् क्षेत्रसमास ११ ४ २८ कल्प " ८ १८४] ऐतिहासिक नामोनी [जिनप्रभसूरि अने ऐ. नाम ऐ. नाम १९ व्याघ्री-कल्प ". " पृष्ठ वेसट गोत्र १६० वैभारगिरि तीर्थ-कल्प व्यवस्थापत्र १५४ २१ व्यारा-विहारक शक कुल ३९ राजा ३९-४१ सैन्य ५५ शकाधिराज महम्मद शंखपुर ८४ शंखपुर तीर्थ-कल्प शत्रुजय तीर्थ ३, २८, ३४, ५६, ६७,६८, ७५-७७, ८.०, ८५,८७, १०६,११७ उद्धार १२, १४, १०७ कल्प ९, १९, २१-२४, ३४, १०६ सेवक शत्रुजयावतार सहायुद्-दीन (पोरी) २८ पृष्ठ शाकंभरीश्वर १४२ शाकिनी शान्तिनाथ जिन (विव) ९३,५४, ८२, ८३, ८५ प्रासाद चरित (महाकाव्य) ४३, १०९, १.११ स्तवन शारदा (मूर्ति) १०२, १६० शाईधर १४.२ पद्धति शिलादित्य १०३ शिव-शक्ति (मोती-जोडी)१२८ शिशुपालवध महाकाव्य १६० शीलतरंगिणी ४०, ४१ शुद्धदंती तीर्थ- २० शुभशील गणि ५८, ६२, ६८- ७४, ११६, ११७, १२.०, १३३ शेख श्राविधि ११५, ११९ सुलतान महम्मद. ] अनुक्रमणिका [१८५ ऐ.. नाम पे. नाम रास पृष्ठ. श्रावस्ती-तीर्थकल्प २० समयसार नाटक-वृत्ति १६२ श्रीधर समयसुंदर श्रीपालकथा-सिरिवालकहा समरसिंह १२, ५४. १०४, श्रीमालवंश(शी) १३४, १३५, १०६,१०७ १५९-१६३ ४२, १०७ समवसरण-कल्प संघ १३४, १३५ समियानक भीरंगम् टापू (पट्टन). २.६ १०६ संप्रति श्रेणिकचरित्र (याश्रय) ८०,८१ संघतिलकाचार्य ३८, ४.० - संबोधसत्तरी सम्यक्त्वसप्तति-वृत्ति ३९,१४८ ४३, १४८ सरस्वती-कोश (७) संघपट्टक टीका २७ -सत्तसय देश १०५ सरस्वतीपत्तन-पाटण सत्यपुर-तीर्थकल्प २०,१०४ सलक्षणपुर ८३ सत्या(सच्चाइ-सच्चिकादेवी) संसारचंद्र १४१ १०२ सहजा शाह ४२, १०१,१०२ ९३, ९. सहणासदुरपीन(नासरुद्दीन)१११ संतिकर स्तवन १४५ सहस्रमल्ल १६. संदेहविषौषधि साइपुर ३१ सपादलक्ष १०४, १२६,१२७ साइवाण ६० सप्ततिशतस्थान ११ साकेतपुर-अयोध्या सागरतिलक सत्र . -समयध्वज १८६ ] ऐतिहासिक नामोनी [ जिनप्रभसूरि अने ऐ. नाम ९ ११४ २७. . पृष्ठ ऐ. नाम पृष्ठ साचोर १०३,१०५ सिंहा(घा)नक ८३, १६२ साधुप्रतिक्रमणसूत्र-वृत्ति सीहड सामंत सुकृतसागर काव्य ८२,८९,१०१ सारस्वतपत्तन-पाटण सुगुरु-परंपरा-गाथाकुलक १५९ सारूआर घाट प्रासाद १०० गीत १५९ सालिग १६० सुभटपाल १३६, १३७. साह्वदीन शहाब-उद्-दीन सुमति गणि साहण ३६ सिकंदर सुरगिरि देवगिरि ११४ सिद्धचक्र-यंत्रोद्धार सुरत्राण-सुलतान सिद्ध सूरि १०२,१०३,१०७ सुलतान महम्मद सिद्धराज ऑफ देहली १६४ :९९, १४४ सिद्धवरकूट ८६ सराइ सिद्धसेन दिवाकर ५६ सूरप्रभ उ. सिद्धांतस्तव सूराचार्य ३३ १० सूरिमंत्राम्नाय (विद्याकल्प) ९ १० सिद्धिचंद्र वाचक सेतुबंध (५. १८ सिंदूरप्रकर-टीका १५९,१६२ सेत्तुंज शत्रुजय सिरि ४३ सिरिवालकहा ११५ सोमतिलक सरि (१)१०,११, सिरोह ४७ ६६, ६८, ८०,८७, सिंहण देव ९१ ११६-११८ ३७,४९ २७. ३, अवचूरि ०.. सोपार पुर " (२) ५६ सोमेश्वर पत्तन ८३ : " राजा सुलतान महम्मद. ] अनुक्रमणिका [ १८७ ऐ. नाम ऐं, नाम पृष्ठ. ३३,४०-४२ हरिभद्र सूरि सोमधर्म गणि ६,९,५९,११८ हरिषेण सोमनाथ १०४ हर्षकीर्ति सरि ११३ सोमप्रभाचार्य ६३-६८,१५९ हर्षपुरीय गच्छ. सोममूर्ति गणि हंसकीति ११४ हंसलपुर २६ हस्तिनापुर १८,८३ सोरठ १०४ तीर्थ-कल्प. २०, ५६ सो(? मो)हिलवाडी १३६ प्रतिष्ठा ५५ सौराष्ट्र तीर्थ १८ ५४ सौवर्तक स्तोत्र १८. स्तंभतीर्थ ६६, ८८, १०६ हिंदूराजा ( राज्य ) ४७,९६ स्तंभनपार्श्व-तीर्थकल्प १९ हीरविजय सूरि स्तंभनेंद्र-प्रबंध स्याद्वादमंजरी हेमचंद्राचार्य १,५६,११४ हम्मीर १०३, १०४ हेमनाममाला-शिलोंछ ३३,१५६ चौहाण हेमाड पंत हेमाद्रि ११२ देव ११४ हेमाद्रि(दि) ७८,८६,९०-९५ " -महम्मद 'हेमाद्रि ऊर्फ हेमाड पंत'. हरिपंखी-पार्श्व-कल्प २० होयसाल राजा २६ यात्रा २ हेमचंद्र साधु " मद-मर्दन

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७७ २७ . १३३४ तिहासिक घटना-निर्देशक संवत्सर-सूची विक्रम संवत् पृष्ठ विक्रम संवत् पृष्ठ ८४५ १३२७ ९,७८ १३२८ १०८१ १०३ १३३१ ४,३१,७५,७७,७८ १३३२ १२१० १३३३ १२३३ २७ ३३,७७ १२४८ २८ १३३६ १३७ १२.७७ २७ १३३७ (अयुक्त) १२८० १३६ १३४१ १२८८ ९१ / १३४७ (?"७४) १५० १२९५ १३४८ १०३ १२९७ १३४९. १३५२ १३५५ ११ १३११ २९ १३५६ ७,१०४ १३२० <१,८२. १३५७ ७९ १३२१ ६६. १३६.३. १३२५ ४६। १३६.४.. ४५ १३७. '. ४: ५,६,७ .. ५८ १९०] ऐतिहासिक घटना-निर्देशक [जिनप्रभरि अने विक्रम संवत् पृष्ठ १३८९ १३९० . , १३७२ ७ पृष्ठ विक्रम संवत् १३६५ ७८ ९, २२, २३, १०६ ५१, ६६, १५.. १३६७ १०५ १३६९ ८, ११, १०६ ५३, ५५, ६८, १०५ १३७१ ४२, ५४, १३९३ ४२, ५३, १०१,.१०४,१०७ १०८ १३९४ ४० १३७३ ११,६६,६७ १३९७ १०८, १०९ १३७७ ३१ १४०१ ६.४३ १३८० १४०९ ४३, ४४, १.२९ १३८१ ९,२३, ६७, १४०७ २३, ६० १३८३ ३३, ३६ १४१० ४३, १०९ १३८५ ९, २१, ३०, ३२, ३४,४०, १११ ६७, १०५, १.०६, १४२२ ३८, १ ३८, १११,१४८ १५३, १५५. १४२४ १.३८६ ९ १४२७: ११३. १३८७ १४२८ ४३, ४४, ४५ १४२९ ४१, ११९ < १४१२ ९, ११,.१.१, सुलतान महम्मद.] संवत्सर-सूची [ १९१ .......... विक्रम संवत् पृष्ठ विक्रम संवत् पृष्ठ ६० १४४४ १४६६ १४८३ १६३१ १६३५ १.१, ६७,७८ ४५ १६२. १६३ १६३ १५०३ १७२६ १६३. ६, ९, ५९, ११८ १५ ११५, ११९ १६४ १५०५ १५० ०६ १९२२ १६४ १५१२. १५१७ १५२१ .... १०६ ११६ १६० । ५८, ६२, ६८, १९३९ ११३ १९६६ १९७१ २५, ११२ १९७९ (सन् १९२३) २४ . १९८२ ११२. १९८७ (सन् १९३१) ९२ १५५५ १५८५ ११६, १२० १२०, १२२ १६२ . " १ शुद्धि-पत्रक पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ८ ८ ४ ७ १ ३ -चीरस्तोत्र वीरस्तोत्र(स्वर्णसिद्धिर्मित). सरि- रिमंत्र-प्रदेशविवरण २२ इरयादि इत्यादि पंचकल्याणमय कल्याणकमय १७ अप्रसिद्ध प्रसिद्ध नमस्त्रिजगद्वन्दित- नमत्रिदशवन्दितक्रमे ११, १८३, १९, २० पारसी फारसी २०. (शौरीपुर) २१ आराम- आराम (आमर)- ४२ १७ निवृत्ति निर्वृति- २२ ५८, ६२ ८, ११ १५२९ (१) कथाकोश. कथाकोश (कथा २) -कोशः -कोश ( कथा ३ १४ -क्रोश -कोश (कथा ८) ८६ पुरण पुराण ९६ ૨૨ म्हारे १२८ शवक्ति शक्ति १३३ १२ पद्धी पछी १५१ १८ वाकानेर बीकानेर भरव भैरव सर्ग " "

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Shri Jinprabhusuri Ane Sultan Mahmmad

Author
Gandhi, Lalchand Bhagwan
Title
Shri Jinprabhusuri Ane Sultan Mahmmad
File name
Shri Jinprabhusuri Ane Sultan Mahmmad
Text
OCR done
Citation
1939
Published
2010/07
Publisher
Lohawat, (marwar)shri Jinharisagar Suri-gyanbhandar
Language
Sanskrit
Pages
202
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327725
Barcode
99999990003306.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
stgP2br8Qdq
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