Adarsh Library, Jaipur

Yuge Yuge Kranti

Prabhakar Visnu · 2011/03

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युगे-युगे क्रान्ति एक मौलिक नाटक

सूत्रधार
देवीप्रसाद
रामकली
कल्याणसिंह
प्यारेलाल
पंडितजी
कलावती
वाहर का व्यक्ति
भीतर का व्यक्ति
शारदा
सार्जेण्ट
पात्र
एक व्यक्ति
दूसरा व्यक्ति
विमल
चन्द्रकिशोर
प्रदीप
जैनेट
सुरेखा
अनिरुद्ध
रिता
अन्विता
स्त्री
इसके अतिरिक्त पुरुपों और स्त्रियों की भीड़
नोट-शुरू में जो चार पुरुष और दो नारियां आती हैं, वे वही पात्र
हैं जो बाद में नाटक में अलग-अलग नामों से भाग लेते हैं।

(सुविधानुसार प्रतीकात्मक मंच तैयार किया जा
सकता है । पृष्ठभूमि में एक गलियारा है । उसीके साथ
वाई और के प्राधे मंच को घेरता हुमा एक विशाल द्वार
बना हुआ है। उसके ऊपर एक चक्र है। उस द्वार से
होकर अन्दर से पाने-जाने का मार्ग है। दाहिनी पोर
बाहर जाने के लिए मार्ग बना हुआ है। पीछे का प्राधा
मच कुछ उठा हुमा है। शेप भाग नीचा है। इसके
दाहिनी भोर वाला मार्ग भी बाहर जाता है । जव परदा
उठता है तो एक व्यक्ति मप्र भाग में घूमता हुमा नज़र
माता है । वह बहुत व्यग्र हो रहा है । एक-दो बार ऊपर
जाकर द्वार से भीतर की पोर झांकता है। फिर पड़ी
देखता है और सहसा दर्गकों की मोर मुह करके बोल
उठता है।)
देख लीजिए प्राधा घंटा होने को है, अभी तक
कोई नहीं आया। ये आजकल के लोग ! अपना
:
सूयधार:

६
युगे-युगे क्रान्ति
।
दायित्व तो जैसे कोई समझता ही नहीं। ये
लोग जीवन को क्या समझेगे । क्या बदलेंगे
मूल्यों को । अगर पूर्वाभ्यास ठीक नहीं होगातो
नाटक क्या खाक सफल होगा।
(फिर व्यग्रता से घूमने लगता है । एक क्षण वाद दाहिनी
ओर से एक अधेड़ व्यक्ति मंच पर प्रवेश करता है ।
ढीली-ढाली कोट-पतलून पहने किसी चिन्ता में ग्रस्त
थका-थका-सा लेकिन बाहर से यही दिखाने का प्रयत्न
करता है कि वह पूर्णरूप से चेतन है। उसे देखते ही
सूत्रधार तेज़ी से उसके पास पाता है।)
सूत्रधार : जनाव अव तशरीफ लाए हैं। इतनी देर कहां
रहे।
देवीप्रसाद : (एक क्षण हतप्रभ रहकर) इतनी देर कहां
रहा ? समझा नहीं आप क्या कह रहे हैं ? मैं
तो आपको जानता ही नहीं
। आप कैसे जानते
हैं कि मैं इधर पानेवाला था ? मैं तो अचानक
ही आ निकला। आप शायद किसी और का
इन्तज़ार कर रहे थे। देखिए, मैं वह नहीं हूं।
मेरा नाम देवीप्रसाद है। मेरी लड़की का नाम
ज्योत्स्ना है। उसने प्रथम श्रेणी में एम० ए०
पास किया है।
सूत्रधार : (तेज़ी से) मैं यह सब नहीं सुनना चाहता।
तुम कोई भी हो सकते हो। तुम्हारी बेटी का

युगे युगे प्रान्ति ७ नाम कुछ भी हो सकता है। मैं तो केवल इतना ही जानना चाहता हूं कि क्या तुम मेरे नाटक के पात्र नहीं हो? देवीप्रसाद : (ठठाकर हंसता है) नाटक ? क्या यहां कोई नाटक होने वाला है ? प्राप शायद मूमधार हैं। लेकिन आप अपने पायों को भी नहीं पहचानते। सूत्रधार : श्रीमानजी, यह नाटक साधारण नाटक नहीं है। इसके पात्र भी निश्चित नहीं है। आप भी इस नाटक के पात्र हो सकते हैं। देवीप्रसाद : (चकित होकर) में भी इस नाटक का पात्र हो सकता हूं ? क्या कहते हैं प्राप? मैंने तो कभी नाटक में काम ही नहीं किया। सूधार : तो अब कर सकते है। मेरा नाटक जीवन से सम्बन्ध रसता है । जोव्यक्ति भी जीता है.वही इमका पात्र हो सकता है । म प्रापको भी इसमें शामिल होने की दावत देता है। देवीप्रसाद : वाह ! यह सूब रही, मान न मान में देरा मेह- मान । जी नही, में प्रापको कोई भी सहायता नहीं कर सकता। सूत्रधार . आप सब कुछ कर सकते हैं। और मैं कहता हूं श्राप कर भी रहे हैं। जरा यही ठहरिए । शायद मेरे पात्र माने सुरू हो गए हैं। बात यह है कि

.
युगे युगे कान्ति
का,
मैं क्रान्ति की खोज में निकला हूं और उसे मैं
अपने नाटक के पात्रों के माध्यम से खोजना
चाहता हूं, (हंसकर) उन सबका दावा है कि
उनमें से प्रत्येक क्रान्तिकारी है लेकिन 'लो, वे
आ गए।
(इसी समय बड़े द्वार पर प्रकाश तेज होता है और
उससे होकर पांच व्यक्ति यंत्रवत् एक पंक्ति में पाकर
मंच पर खड़े हो जाते हैं। वे सभी युवा हैं। उनकी
पोशाक अलग-अलग है। पहला व्यक्ति सन् १८७५ के
आसपास के युग का प्रतिनिधित्व करता है, दूसरा १६०१
तीसरा १९२०-२१ का, चौथा १९४२ और पांचवां
अति प्राधुनिक युग का प्रतिनिधि है।)
देवीप्रसाद : अरे, यह क्या? ये व्यक्ति इस प्रकार लाइन में
आकर क्यों खड़े हो गए ? पोशाक अलग-अलग
क्यों है ? और ये इतने उत्तेजित क्यों हो रहे
हैं ?
सूत्रधार : (उंगली से चुप रहने का इशारा करते हुए)
श-श-श, आइए, हम दर्शक-दीर्धा में चलें और
सुनें कि ये क्या कहते हैं।
(कहते-कहते सूत्रधार उस व्यक्ति को पीछे खींचकर ले
जाता है। एक क्षण वाद लाइन में खड़ा पहला व्यक्ति
उत्तेजित भाव से बोलने लगता है।)
पहला पुरुष : मैं कहता हूं, तुम लोग जानते तक नहीं। मैं
.

पुगे-यगे प्रान्ति
जानता हूं, क्रान्ति क्या होती है। क्रान्ति मेंने
की थी।
दूसरा पुरष : (युद्ध होकर) तुमने क्रान्ति की थी? नहीं,
तुम तो प्रतिक्रियावादी थे । कान्ति तो मैंने की
थी।
पहली नारी. (महसा वीच में टोककर) टहरो, तुम भी प्रति-
क्रियावादी थे । वह में ही थी जिसने पहली बार
फ्रान्ति का अर्थ समझा और घर की चारदीवारी
तोड़कर उसका स्वर-घोप किया।
तीसरा पुरप: (मुस्कराकर) जी नहीं, तुम भी उनसे अलग
नहीं हो। तुमने क्रान्ति का गलत अर्थ किया।
उसे सही रूप में केवल में ही समझ सका । मैंने
ही उमे मही अयं दिए । केवल मैंने।
दूसरी नारी
चौथा पुरप) : (एक माथ लाकर हंमते हैं) तुमने क्रान्ति को
सही अर्थ दिए? नहीं-नहीं, यह तुम्हारा मिथ्या
दम्भ है । असल में तुममें से कोई भी प्रान्ति-
कारी नहीं था। जब हमें होश आया तब भी
तुम हमारे कों पर सवार थे। लेकिन हमने
तुम्हें उतार फेंका। क्योंकि बिना परम्परा से
मुक्ति पाए क्रान्ति का सही अर्थ नहीं समझा जा
सकता। हमने इतिहास को नया मोड़ दिया

१० युगे युगे क्रान्ति क्योंकि इतिहास को लीक से निकाले विना क्रान्ति अर्थहीन है। क्रान्ति हमने की है। हम वास्तव में पहले क्रान्तिकारी हैं। (पृष्ठभूमि में प्रारोही संगीत उभरता है। स्वर एक- दूसरे में उलझ जाते हैं । हरेक पात्र एक-दूसरे की ओर इंगित करता हुया अत्यन्त उत्तेजित स्वर में वोलता पहला पुरुष : नहीं, क्रान्तिकारी मैं हूं। तुम सव संस्कृति के शत्रु हो। दूसरा पुरुष : नहीं, तुम प्रतिक्रियावादी हो। क्रान्तिकारी मैं हूं, (दिशा वदलकर) संस्कृति के शत्रु हैं मेरे वाद पाने वाले ये लोग। पहली नारी : नहीं-नहीं, हम संस्कृति के शत्रु नहीं हैं। न तुम क्रान्तिकारी हो। तुम विशुद्ध प्रतिक्रियावादी हो। क्रान्तिकारी मैं हूं, (दिशा-परिवर्तन) संस्कृति की शत्रु है मेरी संतान । तीसरा पुरुष : नहीं-नहीं-नहीं, तुम्हारा स्वर भी प्रतिक्रियावादी स्वर है । मैं संस्कृति का शत्रु नहीं हो सकता। मैं उसे नया रूप देने वाला क्रान्तिकारी हूं, (दिशा बदलकर) और दिशा-भ्रष्ट हैं ये लोग जो मेरे वाद पाए हैं। दूसरी नारी) चौथा पुरुष) : (एक साथ व्यंग्य से) आपस में संघर्ष करने यगे-युगे प्रान्ति वालो, तुम सभी प्रतिनियावादी हो। पर- म्परागों के गुलाम, चुके हुए व्यक्ति । तुम क्रांति कर ही नहीं सकते। यह अधिकार केवल हमारी पीढी को मिला है। (ममा सब उत्तेजित हो उठते हैं। समी स्वर एक- दूसरे में उलझ जाते है । सगोत तीव्र होता है। प्रकाश धीरे-धीरे उस पोर से हटकर मंच के दाहिनी मोर मा जाता है । स्वरों के शान्त होते-होते सूत्रधार और देवी- प्रसाद धीरे-धीरे मंच पर पाते हैं।) देवीप्रसाद : (चकित स्वर) यह सब क्या है। यह कंसानाटक है और यह लोग कौन है। सूत्रधार : (हंसकर) श्रीमानजी, अभी तो नाटक प्रारम्भ ही नहीं हुआ। यह तो मात्र प्रवेशक का पूर्वा- भ्यास है। और ये सब है नाटक के पात्र । मैंने कहा था न कि मैं क्रान्ति की तलाश में हूं। देवीप्रसाद : शान्ति की तलाश? फ्रान्ति भी क्या कोई जिन्स है जिसे कही छिपाकर रखा जा सकता है ? सूत्रधार : श्रीमानजी! जैसे युद्ध मनुप्य के मन में पैदा होते हैं, वैसे ही क्रान्ति भी मनुष्य के अन्तर में उपजती है। मैं इन पात्रों के माध्यम से उसीकी सोज करना चाहता हूं। तुमने सुनी इनकी बातें। ये सब अपने को क्रान्तिकारी कहते है । लेकिन अपने पुरसों की दृष्टि में ये संस्कृति और सभ्यता ।

१२
युगे-युगे का
-
के शत्रु हैं और दिशा-भ्रष्ट हैं। उनकी सन्त
उन्हें प्रतिक्रियावादी और चुके हुए व्यक्ति सः
झती है । (देवीप्रसाद कुछ कहने की चेप
करता है। सूत्रधार उसे हाथ से रुकने का इशा
करता है) ना-ना, अभी नहीं। मैं तुम्हें इन
कहानी सुनाता हूं। पहले ही पात्र को लो
जानते हो उसने क्या क्रान्ति को ? लगभग ए:
सदी पूर्व सन् १८७५ के आसपास की बात है
तव इसने अपनी पत्नी का दिन में मुंह देखा था
देवीप्रसाद : (पहले हतप्रभ, फिर ज़ोर से ठहाका लगाकर
क्यों मज़ाक करते हो सूत्रधारजी। क्या कर
अपनी पत्नी का मुंह देखना भी पाप समझ
जाता रहा है?
सूत्रधार : जी हां। मैं आपको उसी युग में ले चलता हूं
अभी मंच पर उसी युग का दृश्य दिखार
जाएगा। आइए हम लोग दर्शक-दीर्घा में चलें
(दोनों बाहर चले जाते हैं । प्रकाश वहां से हटकर पृ
भाग में चला जाता है। तभी बड़े द्वार से होकर ।
युवक और एक युवती प्रवेश करते हैं। दोनों १८५
के ग्रासपास की वेशभूषा में हैं । स्त्री लहंगा और प्रोद
पहेन हुए है। उसने चूंघट निकाल रखा है। पुरुष धो
कुर्ता और दुपल्ली टोपी पहने हुए है। उनके पाते.
प्रकाश इतना धीमा पड़ जाता है कि दर्शक किसी

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युगे-युगे क्रान्ति
-
..
?
का मुंह नहीं देखा करते। दिन में उनके पास
नहीं पाते । यह वेशर्मी और वेनदवी है।
कल्याणसिंह : इसमें वेशर्मी और बेअदवी की क्या बात है ?
क्या तुम मेरी घरवाली नहीं हो ? क्या दस
प्रादमियों के सामने अग्नि-देवता को साक्षी
करके तुमने मेरे साथ फेरे नहीं लिए? क्या तुम
मुझे प्यार नहीं करतीं ?
रामकली : छी-छी, कैसी बातें करते हो। यह सव हुआ था
तभी तो तुम्हारे घर आई हूं। रही प्यार की
सो वह भी क्या जताने की चीज़ है ?
प्यार जताने का काम तो कोठेवालियां किया
करती हैं। इसीलिए मर्द उनका मुंह देखते हैं,
अपनी घरवाली का नहीं।
कल्याणसिंह : (क्रुद्ध होकर) लेकिन मैं इस बात को नहीं
वात,
मानता।
रामकली : (शरारत से) न मानो..
कल्याणसिंह : (और भी तेज़ होकर) हां, मैं नहीं मानूंगा।
मैं तुम्हारा मुंह देखूगा । भला कोई वात है !
रामकली : हाय दैया, कैसी बातें करते हो। ज़रा धीरे-धीरे
वोलो। दीवारों के भी कान होते हैं ।
कल्याणसिंह : ज़रूर होते हैं। मैं तो यही चाहता हूं कि कोई
सुने तो। तुम्हें मालूम नहीं कि पुराने ज़माने में

-युगे कानि : । मर्द और औरत दोनों जवान होकर अपनी बुगी से शादी किया करते थे। रामकली : हाय-हाय, यह फिरगियों वाली बातें आपने कहा से सीख ली। कही आप उस नगे साधू के पास तो नहीं जाने लगे जो जोर-जोर से वोलकर कोलाहल करता है और मूर्ति की पूजा करने को पाप बताता है। कहता है-औरतों और भगी- चमारों को पढ़ाना चाहिए कल्याणसिंह : वह बहुत पहुचा हुअायोगी है। मैंने उसके दर्शन किए हैं। उसके चेहरे पर तेज है और उसकी ग्राखो में ऐसी रोगनी है कि देखनेवाले की आंखें उसपर से हटती ही नहीं। निडर तो वह इतना है कि लाट साहब तक से नही घबराता। लोगों ने उसपर पत्थर बरसाए, नदी मे फेका, जहर दिया लेकिन उसका वाल भी वाका नही हुना। ऐसा जादूगर है वह । हा, उसकी बहुत- सी बातें मेरी समझ में भी नहीं पाती। पर एक वात में बहुत अच्छी तरह समझ गया हूं। रामकली: कौन-सी बात? सत्यापसिंह : यही कि पति-पत्नी का रिश्ता क्या है और वह दोनों एक दूमरे के लिए क्या कर सकते हैं। किसी हद तक मैं उसकी यह बात भी मानता .

युगे-युगे क्रान्ति हूं कि परदा करना पाप है। भला कोई बात है, औरत है कि गुड़िया । वाहर जाते समय परदा करे तो कुछ समझ में भी आता है। घर में रह- कर घरवाली घरवाले से परदा करे, यह मैं कभी नहीं मान सकता । मैं यह भी नहीं मान सकता कि अगर मैं तुम्हारा मुंह देख लूंगा तोपाप होगा। (प्यार से) सच कहता हूं, जब-जब मैं तुम्हें छूता हूं तो ऐसा लगता है जेसे तुम बहुत खूब- सूरत हो । मैं उस खूबसूरती को अपनी आंखों से सूरज की रोशनी में अच्छी तरह देखना चाहता हूं। रामकली : (घबराकर) ना-ना, ऐसी बात मत कहो, मुझे डर लगता है। मैं हाथ जोड़ती हूं, उस साधू के पास मत जाया करो। भला कोई बात है कि मुझे छूने से तुम जान जाते हो कि मैं खूबसूरत । क्या उस योगो ने तुम्हें कोई मंतर सिखा दिया है ? कल्यासंह : वह कोई मन्तर नहीं सिखाता । वह तो जादू- टोने और मन्तर का पक्का विरोधी है। रामकली : फिर तुम कैसे जान जाते हो कि मैं खूबसूरत हूं। कल्याणसिंह : यह तो खुद मुझे भी पता नहीं। शायद मन की भी अांखें होती हैं । अच्छा, एक बात बताओ। हूं १७ - गे-युगे प्रान्ति रामकली · पूछो। फल्याणसिंह : सच-गच बताना, तुम्हारा मन नहीं करता कि तुम मुझे देसो? बोलो ना। जवाब क्यों नहीं देती। इसका मतलब है कि तुम्हारा मन भी करता है। करना भी चाहिए। रामकली : (झिझकते हुए) करता तो है लेकिन मन तो बहुत-सी ऐसी-वसी यातों को करता रहता है। वे क्या मभी माननी चाहिए । हमारे बड़े कहते हैं कि मन के बस में नहीं होना चाहिए। उमकी प्रावाज नही मुननी चाहिए । उसे दवाना चाहिए। फिर भी यह सच है कि मेरा मन तुम्हें अच्छी तरह देखने को करता है। फल्याणसिंह . तो देखती क्यो नहीं। रामफली : डर जो लगता है। फल्याणसिंह : इसमें भला उरने को क्या बात है ? तुम मुझे प्यार करती हो, मैं तुम्हें प्यार करता हू मोर जो किसी को प्यार करता है वह उसे देखना भी चाहता है। इसलिए हम दोनो अगर एक-दूसरे को देसना चाहते हैं तो इसमें गुनाह कहां से मा गया। मुन लो, हम दोनों अच्छी तरह एक- दूसरे का मुह देम सके, इसका कोई न कोई रास्ता निकालना ही है।

१८
युगे-युगे क्रान्ति
रामकली : रहने दो-रहने दो, ऐसा न करना। लालाजी
को पता लग गया तो न जाने क्या हो जाएगा।
उन्हें वहुत गुस्सा आता है
कल्याणसिंह : (जोश के साथ) आता होगा। मैं किसीसे नहीं
डरता । तुम्हें कोई न कोई रास्ता निकालना ही
होगा। तुम दिनभर घर में रहती हो, (क्षणिक
मौन) वोलती क्यों नहीं ? क्या सोच रही हो ?
रामकली : (शरारत से) बड़े वो हो। मतलव तुम्हारा और
फंसाना मुझे चाहते हो।
कल्याणसिंह : अकेले मेरा ही मतलब है ? तुम्हारा नहीं?
कहो तो, अव कहतीं क्यों नहीं हो।
रामकली : (हंसकर) अच्छा-अच्छा, है 'सुनो, मुझे एक
रास्ता सूझता है, लेकिन
कल्याणसिंह : लेकिन-वेकिन छोड़ो, रास्ता बताओ।
रामकली : तुमने तो हद कर दी। इतने वेसने मत बनो।
कल्याणसिंह : सच कहता हूं, तुम्हारा मुंह देखने के लिए मैं
इतना बेताब हो गया हूं कि कुछ भी कह सकता
हूं, कुछ भी कर सकता हूं।
रामकली : सच
कल्याणसिंह : हां सच।
रामकली : अच्छा, तो सुनो। तुम दोपहर को खाना खाने
घर आते हो न ?
-
1
।
:
?
-

..
युगे-युगे वालि
१६
कल्याणसिंह : प्राता हूं। पर तव तो तुम ऊपर होती हो। मैं
चारो ओर देखता रहता हूं कि कही तुम्हारी
झलक दिखाई पड़ जाए लेकिन फिलेवन्दी इतनी
मजबूत होती है कि मैं तुम्हारी परछाई तक
नहीं देख सकता।
रामफली : जब में होती ही नही तो मेरी परछाई कहा से
देखोगे । साना माने के बाद तुम ऊपर जाते हो,
उसके बाद दुकान चले जाते हो, तव कही जाकर
मैं नीचे उतरती हूँ।
फल्याणसिंह : यही तो, क्या तुम एक दिन जल्दी ही नीचे नही
उतर सकती!
रामकली · मुझे ही बलिदान का बकरा बनाने पर तुले हुए
हो। बात सुनते ही नहीं। मुनो, कल तुम ज़रा
देर से ऊपर पाना। मैं तव तक नीचे चलने के
लिए उतर पडूगी और उस वक्त जीने में हम
दोनों एक दूसरे से टकरा जाएंगे।
कल्याणसिंह : (एकदम उछलकर) गावाग, क्या रास्ता
निकाला है ! मान गया तुम खूबसूरत होने के
साथ-साथ होशियार भी बहुत हो । कल मैं ऐसा
ही करूंगा।
रामफली : इतने ज़ोर से मत बोलो। नायन पास ही बैठी
रहती है । मुझे बड़ा डर लगता है। मगर हां,

२०
युगे युगे शान्ति
:
लालाजी उस वक्त घर में ही होते हैं, ध्यान
रखना।
कल्याणसिंह : अव होने दो। मुझे किसीकी चिन्ता नहीं। कोई
भी आ जाए।(तभी पीछे के द्वार पर खटखटाहट
होती है) लो, वह आ गई यमदूतनी नायन की
बच्ची । मुझे अव बाहर जाना ही होगा। बातों
ही बातों में वक्त किधर से पाकर किधर चला
गया, इसका पता ही नहीं चला। यह भी अजीब
मुसीबत है। पति अपनी पत्नी के पास भी नहीं
वैठ सकता। अोह, ये बूढ़े लोग..
(द्वार पर ग्राहट तेज़ होती है। कल्याणसिंह मुंभला-
कर बाहर चले जाते हैं। जब वहां प्रकाश उभरता है
तो कोई नहीं दिखाई देता । क्षणभर बाद सूत्रधार और
देवीप्रसाद मंच के अग्रभाग में प्रवेश करते हैं।)
देवीप्रसाद : कैसा अजीव दृश्य था । उन लोगों के दिमाग में
क्या भूसा भरा रहता था? भला यह भी कोई
वात है कि कोई अपनी घरवाली का मुंह न
देखे !
सूत्रधार : वही तो जनाव । वही तो मैं बताना चाहता हूं।
कल्याणसिंह ने मुंह देखने का साहस किया और
इसके लिए उसे अपने पिता के हाथों पिटना
पड़ा। उन्होंने कहा कि उस भ्रष्ट साधू के चक्कर

युग-युगे तान्ति में फंसकर वह देश और धर्म को बरबाद करने पर तुल गया है । वह नास्तिक हो गया है लेकिन वे ऐमा नहीं होने देंगे। मार-मारकर उसके दिमाग से यह सब खुराफात निकाल देंगे। उसने ममझा क्या है ?""और बहुत दिनों तक इसी यात को लेकर उनके घर में और पास-पड़ोस में हाहाकार मचा रहा। लेकिन युवक कल्याण- सिंह इन धमकियों से तनिक भी विचलित नहीं हुमा। देवीप्रसाद : राचमुच वह साहसी था। उसने समाज को सोसला करनेवाले एक पापण्ड का पर्दाफाश किया। लेकिन मैं नहीं समझता कि किसी भी तरह उसके इस काम को क्रान्ति कहा जा सकता है। सूत्रधार : ठहरिए-ठहरिए। अभी किसी निर्णय पर पहुंचने या प्रयत्न न कीजिए । प्रागे की कहानी मुनिए। इसी घर में पच्चीस वर्ष बाद इन्ही कल्याणसिंह का युवक पुत्र प्यारेलाल इन्हीं को तरह तत्का- लोन मुधारकों से जा मिला और उसने प्रतिज्ञा की" (चक्र तेजी से घूम रहा है) वह देखो, वह पर कितनी तेजी से घूम रहा है। अब हम १६०१ में पहुंच गए हैं। ग्रामो-प्रायो, इससे

२२
युगे-युगे क्रान्ति
पहले नया दृश्य प्रारम्भ हो, हम दर्शक-दीर्घा में
लौट चलें।
(दोनों पीछे लौटते हैं। पृष्ठभाग में द्वार के पास
प्रकाश उभरता है । गृहस्थी की दो-चार साधारण चीजें
वहां रखी हैं और एक प्रौढ़ा बैठी हुई कोई भी काम कर
रही होती है। वह प्रथम दृश्य की रामकली ही है। उसके
पास पीढ़े पर उसका जवान वेटा प्यारेलाल बैठा
हुआ
ज़ोर-ज़ोर से कुछ कह रहा है। उसने पाजामा और
कमीज़ पहन रखी है । सिर पर गोल टोपी है। आवेश के
कारण उसका मुख लाल हो रहा है।)
प्यारेलाल : मैं कहता हूं मां, पुरुष को जव एक से अधिक
शादी करने का अधिकार है तो नारी ने ही
कौन-सा अपराध किया है। पुरुष एक स्त्री के
जीते-जी दूसरी स्त्री ला सकता है लेकिन नारी
भरी जवानी में और जवानी में ही क्यों, बचपन
में ही पति के मर जाने पर दूसरी शादी नहीं
कर सकती। उसने अपने पति को आंख उठाकर
देखा तक नहीं। छोटी-सी नादान उम्र में ही वह
विधवा हो गई है । वह यह भी नहीं जानती कि
ज़िन्दगी किस चिड़िया का नाम है। विवाह
होता क्या है ? लेकिन यह वर्वर समाज उसे
दूसरा विवाह करने का अधिकार नहीं देता।
हां, तड़फने का अधिकार देता है। यौवन को

युगेन्युगे शान्ति
वरवाद करने का अधिकार देता है। चोरी-चोरी
पाप करने का अधिकार देता है । लेकिन दूसरी
वार अग्नि को साक्षी करके विवाह करने का
अधिकार नहीं देता। विधमियों और विदेशियों
ने हमारी इन्ही कुरीतियों से लाभ उठाया है।
वे ताकतवर हुए हैं और हम कमजोर। उनकी
मख्या बढ़ी है, हमारी घटी है । हमारी जाति
में दुराचार फैला है। हमारी नारियां घर छोड़-
कर भाग जाने को मजबूर की जाती हैं । लेकिन
प्रय हम यह अत्याचार नहीं होने देंगे। हमने
निश्चय कर लिया है।
(पत्यासह या प्रवेश । धोती-जमीज और साफा
पहने है । पेहरे पर क्रोध है । प्यारेलाल या हो जाता
है । मा सिर का पल्ला टीक करती है।)
फल्याणसिंह : क्या निश्चय कर लिया है ? किमको भाषण
दिया जा रहा है ? अपनी माताजी को? लेकिन
उमको मुनाने मे क्या होगा? प्रये, मुभमे बात
कर । मुझे मालूम है कि सेग दिमाग गराय हो
गया है। मैंने तुझे मार्गममाज में जाने की
इजाजत दनलिए दी थी कि तू कुल को कलापित
करे, मेरी नाक काटे, मेरे उदार होने का यह
फन मुझे दे? पेशर्म, गैरत, मुझे मव युए

२४
युगे-युगे क्रान्ति
..
?
मालूम है, जो तूने किया है और जो तू करना
चाहता है।
प्यारेलाल : मालूम है तो बहुत अच्छा है पिताजी ! मैंने जो
किया है ठीक ही किया है
कल्याणसिंह : ठीक क्या है और क्या नहीं, यह मैं जानता हूं।
तेरे लिए क्या सही है और क्या गलत है, इसका
फैसला करने का हक मुझे है । इस खानदान की
इज़्ज़त किसमें है और किस बात में नहीं है
इसको तेरे मां-बाप तुझसे कहीं अच्छी तरह
जानते हैं । तू मेरा बेटा है। मेरी विना इजाजत
तुझे कुछ भी करने का हक नहीं। समझा ?
(पत्नी से) जानती है, तेरे इस लाडले ने क्या
किया है ?
रामकली : (घवराकर) वताओगे तभी तो जानूंगी। मुझे
तो इसकी बातें सुनकर लग रहा था कि ज़रूर
इसने कुछ ऐसा-वैसा किया है।
कल्याणसिंह : ऐसा-वैसा ? मैं कहता हूं प्यारे की मां, सुनेगी
तो शर्म से तेरा सिर झुक जाएगा। शायद सुन
भी न सके और वेहोश हो जाए। मैं नहीं जानता
मैंने कैसे यह सव सुन लिया।
रामकली : मेरे दिल में तो सचमुच हौल उठने लगी है। अब
तुम
जल्दी से वताओ भी कि उसने क्या किया।

२५ युगे-पुगे शान्ति कल्याणसिंह : लाला गुगनगन्द को जानती है ? रामफली : क्यों न जानूंगी। वहीं रामपुर पाले । वेगारों की बेटी पर ऐगी विपता पड़ी कि भगवान न करे किमी पर पडे । लड़की ऐमी है जमे साक्षात् देवी का रूप। जैसा रूप वैसा ही स्वभाव । वोलती है तो मोती भरते हैं। मजाल है कभी किमी की मोर मांग उठाकर देख ले। लेकिन गम ने उगपर कंगा जुल्म किया। हाप को मेहदी सूमने भी न पाई थी कि मांग का सिंदूर पुंछ गया। कल्याणसिंह : (दीर्घ निःश्याम लेकर) जो भाग्य में लिखा है, वह क्या मिट मकता है ? लेकिन प्यारे की मां, मचमुच उस दिन तो मैं भी रो पड़ा। हाय-हाय, बेचारी फूल-सी बच्ची ! विधाता ने उसे मसल- कर रमदिया। बेचारी विधवा हो गई,(क्षणिक मयकार)लेकिन जो होनाया मो हो गया। मय तो सारी जिन्दगी उसको सती बनकर जीना है। शास्त्र का विधान ही ऐगा है। विधया पर की देवी है, पूजनीय है, लेकिन (स्वर में तलसी) फैमा जमाना भा गया है। कुछ सिरफिरे लोग कहते हैं कि विधवा का विवाह होना चाहिए। पापी, लम्पट, गास्त्र की यात सांधना चाहते

२
युग-युगे क्रान्ति
हैं। धर्म को भ्रष्ट करना चाहते हैं। अरे हमारे
धर्म का डंका तो सारी दुनिया में बज रहा है
और (धीमा पड़कर) और तुम्हारा यह लाडला
बेटा उसी धर्म को कलंकित करने पर तुल गया
है। वह उन्हीं पापियों के साथ जा मिला है।
कानों में रुई देकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता है कि
विधवा का विवाह न करने से हम मिट रहे हैं,
कमज़ोर हो रहे हैं, वरवाद हो रहे हैं । (गहरा
नि:श्वास) इतना ही होता तो भी मैं चुप रह
जाता, लेकिन आज तो इसने हद कर दी।
भरे समाज में सबके सामने मेरे मुंह पर कालिख
पोत दी, मेरे कुल पर कलंक लगा दिया।
रामकली : सच ? क्या किया इसने, जल्दी बतायो ना।
कल्याणसिंह : (कांपते हुए) इसने प्रतिज्ञा की है कि यह लाला
सुगनचन्द की विधवा बेटी कलावती से विवाह
करेगा।
रामकली : (कांपकर) क्या ? (जैसे बेहोश हो जाएगी)
नहीं-नहीं...
कल्याणसिंह : पूछ ले इससे । पूछ, नहीं की इसने प्रतिज्ञा ?
प्यारेलाल : पूछने की कोई जरूरत नहीं। मैंने प्रतिज्ञा की है
और मैं उसका पालन करूंगा।
रामकली : (व्यग्र भाव से) नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।
:

मुगे-युगे कान्ति
२७
:
-
तू ऐमा कर ही नहीं सकता। कभी नहीं कर
सकता। कह दे यह बात झूठी है। जोश में
माफर तूने ऐसा कह दिया था।
प्यारेलाल : नहीं मां, मैंने जोग में प्राकर नहीं होश में माकर
ही ऐसा किया है। मौर होग में रहते में पीछे
नहीं हटूगा।
कल्याणसिंह : (चीसकर) तूने होग में माकर किया या जोश
में पाकर लेकिन सुन ले, में एमा नहीं होने
दूंगा। मैं तेरे हाथ-पैर तोड दूगा।
प्यारेलाल : पाप मेरे हाय-पाय तोड़ सकते हैं लेकिन मेरी
प्रतिमा नहीं तोड़ सकते। मेरी जान ले सकते
हैं लेकिन मुझे उसमे विवाह करने से नहीं रोक
सकते। मैं अपनी प्रतिमा पूरी करके ही रहूंगा।
कल्याणसिंह ठहर प्रतिज्ञा के बच्चे, मैं तुझे बताता हूँ। लातों
के भूत बातों से नहीं माना करते (मागे बढ़कर
जोर से प्यारेलाल के गालों पर तमाचे मारना
गुरू कर देता है। मारता रहता है) ले पौर
मौर कर, मोर कर । में बनाता हूं
तुझे कि प्रतिमा क्या होती है।
रामकली : (तहपकर पति का हाथ पकड़ने की कोगिश
करती है) नहीं-नहीं, यह क्या कर रहे हो।
जवान बेटे को इस तरह नहीं मारा करने ।
प्रतिमा कर,

२८
युगे-युगे क्रान्ति
कल्याणसिंह : तू परे हट (धकेल देता है) जवतक बाप जिन्दा
है वेटा कभी जवान नहीं होता। मैं आज इसकी
जान निकाल दूंगा। (फिर मारता है) यह
ऐसा नहीं कर सकता। इसे अभी समाज मन्दिर
में जाकर ऐलान करना होगा कि इससे गलती
हो गई।
प्यारेलाल : (उसी दृढ़ता से) आप मुझे जान से मार सकते
हैं लेकिन जब तक मैं ज़िन्दा हूं मैं अपना वचन
वापस नहीं लूंगा। विवाह करूंगा तो उसी से
करूंगा, मर गया तो दूसरी वात है।
रामकली : (रोकर) यह सब क्या हो रहा है। मेरे बच्चे,
तू समझता क्यों नहीं । तुझे अपने खानदान की
वात सोचनी चाहिए। धर्म की बात सोचनी
चाहिए । जो बात हमारे पुरखे कह गए हैं, वह
गलत कैसे हो सकती है। शास्त्र में कोई गलत
कैसे लिख सकता है। (पति से) अजी, तुम इसे
अच्छी तरह समझानो । गुरुजी के पास भेजो।
मारो मत । देखो क्या बुरा हाल कर दिया
बेचारे का। तुम भी जब खून सवार होता है
तो वस".
: मैं इसका सचमुच ही खून कर दूंगा।
तुम यहां से चले जायो । जाओ अपनी दूकान

सुसं-पुकान्ति
पर जानी।
कल्यागसिंह : दुकान पर जाकर मैं क्या मह दिनाना। पर
तो में फमला करके ही जाना।
प्यारेलाल . में भी फैसला करके ही माया है
कल्याणसिंह - (दातपीकर) बदनात कनीने जवान मसाला
है। मैं अब भी कहना है कि त टोर गने पर
माजा।
रामकली (गिडगिडावर) हा बेटा ये नेक कोही
वात कहते हैं।
प्यारेलाल . मा, अब तक मैं इनके गले की ही दान र
प्राता है। पात्र पहली बार
करने का मौरामिला है। महीनगर
मामला है धर्मका मला है।
क्ल्यागसिंह : (ोध के दुवाग प्राग में गगन हा
जाता है। प्यालाल की ओर जाना।
ने या बाएगा) धर्म और ममात्र बने ।
पूछना र घमं और ममात्र के बारे में जाना
जानता है या में मात्र
तुलना मारमा
हो गया है कि मलहम नन्द बात को मिने
तुझे पैदा किया टमी काय निगाए। मिने
पाला-गोता, टमले मादा जानने का दाम
करे। ऐ ने यह हिम्मत गनीति

युगे-यु
कल्याणसिंह : तू परे हट (धकेल देता है) जवतक बाप
है बेटा कभी जवान नहीं होता। मैं आज
जान निकाल दूंगा। (फिर मारता
ऐसा नहीं कर सकता। इसे अभी समाज
में जाकर ऐलान करना होगा कि इससे
हो गई।
प्यारेलाल : (उसी दृढ़ता से) आप मुझे जान से मा
हैं लेकिन जब तक मैं ज़िन्दा हूं मैं अपन
वापस नहीं लूंगा। विवाह करूंगा तो
करूंगा, मर गया तो दूसरी बात है।
रामकली : (रोकर) यह सब क्या हो रहा है । मे
तू समझता क्यों नहीं । तुझे अपने खान
वात सोचनी चाहिए। धर्म की बात
चाहिए । जो बात हमारे पुरखे कह ग
गलत कैसे हो सकती है। शास्त्र में के
कैसे लिख सकता है। (पति से) अजी
अच्छी तरह समझायो । गुरुजी के पा
मारो मत। देखो क्या बुरा हाल
वेचारे का। तुम भी जब खून सवार
तो बस
कल्याणसिंह : मैं इसका सचमुच ही खून कर दूंगा।
रामकली : तुम यहां से चले जानो। जानो अप
।
..
।।

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३० युगे-युगे क्रान्ति भींचकर मारने को दौड़ता है) तो फिर सुन ले । अगर तूने यही फैसला किया है तो मेरा भी फैसला सुन ले। इस क्षण के बाद तू इस घर में पैर नहीं रख सकेगा। रामकली : नहीं-नहीं, यह क्या कहते हो? कल्याणसिंह : मैं ठीक कहता हूं। प्यारेलाल : और मैं भी ठीक कहता हूं। मैं अब इस घर में नहीं रहूंगा। (वाहर जाने को बढ़ता है) मैं अब तुम्हें अपना मुंह नहीं दिखाऊंगा । भीख मांगकर खा लूंगा लेकिन इस दरवाजे पर पैर नहीं रखूगा। (दाई ओर से जाता है) रामकली : (पीछे जाती हुई) बेटा-बेटा, सुन तो। (कल्याण- सिंह से) अजी तुम खड़े-खड़े क्या देख रहे हो, उसे बुलाते क्यों नहीं? वह कहीं गुस्से में कुछ कर बैठा तो? कल्याणसिंह : अव और इससे ज्यादा बुरा क्या करेगा। वह मेरे लिए मर गया। मैं समझंगा, मेरे एक बेटा नहीं था लेकिन मैं उसे वापस नहीं बुला सकता। मैं नहीं जानता था कि यह दिन देखने को जिंदा रहूंगा जव मेरा ही बेटा मेरे सामने खड़ा होकर मेरे मुंह पर मेरा विरोध करे, मेरी बात मानने से इन्कार कर दे, लेकिन यह खानदान की ?

युगे युगे शान्ति
इडत का सवाल है। उमेदवाने के लिए मैं
जो भी कर सांगा, कहंगा । म सपर ऐ
हजारों बेटों को कुरबान कर सकता हूं लेकिन
किसी के सामने का नहीं सकता। (यह कहते
हुए तेजी से बाहर चला जाता है। कातरभाव
हाय फैलाए पीछे-पीछे रामकली नी जाती है)
रामकली : (जाते-जाते) हे भगवान, यह सब क्या हो रहा
है।
(मत्र दाहर बने जाते है। एक साल के लिए मंच पर
अन्धकार हा जाता है। फिर में होने लगता है।
बहुत-से व्यक्ति मंच पर बैठे दिखाई देते है। बीच में
हरन-कुडरमा हुमा है, मंत्र-पार हो रहा है-
तक होता रहता है। फिर प्यारेलान और कलाती
दर-वधू के रूप में सामनों पर प्रा देते हैं। पति
बावते है)
पण्डितजी : अब कन्या को वर के सम्मुख लाएं और दोनों
वर-कन्या यह मंत्र बोलें:
ओ समजलविश्वे देवाः समापोहदयानि नौ ।
मं मातरिश्वा संघाता समुदेष्ट्री दयातुनी
प्यारेलाल)
कलावती) : (एक साय बोलते हैं)
प्रासमजनु विश्वेदेवाः समापोहृदयानि नौ।
सं मातरित्रा में धाता समुदेष्ट्री दधातु नौ ।।
"

३२ युगे-युगे क्रान्ति : पण्डितजी : अव वर दक्षिण हाथ से वधू का दक्षिण हाथ पकड़ के यह मंत्र पढ़े : ओं यदैषि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा। हिरण्यपर्णो वैकर्णः सत्वा मन्मनसां करोतु असौ।। प्यारेलाल) कलावती) : (एक साथ) नों यदैपि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा । हिरण्यपर्णो वैकर्णः स त्वा मन्मनसां करोतु असौ।। पंडितजी : अव वर और वधू अलग-अलग प्रतिज्ञाएं : करें। प्यारेलाल : हे वरानने, जैसे मैं ऐश्वर्य, सन्तान प्रादि सौभाग्य की बढ़ती के लिए तेरे हाथ को ग्रहण करता हूं, तू मुझ पति के साथ सुखपूर्वक जरावस्था को प्राप्त हो। कलावती : हे वीर ! मैं सौभाग्य की वृद्धि के लिए आपके इस हस्त को । आप मुझ पत्नी के साथ वृद्धावस्थापर्यन्त प्रसन्न और अनुकूल रहिए। आपको मैं और मुझको आप आज से पत्नी-पति भाव करके प्राप्त हुए हैं। (उपस्थित सज्जन हर्पध्वनि करते हैं। तभी बाहर से उठता हुआ शोर वहां छा जाता है। बहुत-से लोग मंच के द्वार पर पाकर वोलते हैं) ग्रहण करती हूं।

३
युग-युगे प्रान्ति
:
बाहर का)
व्यक्ति) : यह पाप है। विधवा का विवाह करना शास्त्र
और धर्म के विरुद्ध है। जो ऐसा करते हैं वे दुष्ट
हैं, शूद्र है, नीच और नराधम है । हम यह पाप
नहीं होने देंगे।
(इवर से भी लोग उठकर बोलने लगते हैं।)
भीतर का]
व्यक्ति) : यह पाप नही है। पाप तुम लोग करते हो।
तुम्हारे घरों में व्यभिचार होता है। तुम्हारी
लड़कियां विधर्मी भगा ले जाते है । पाप वह है।
पंडितजी: शान्त-शान्त ! आप लोग शान्त रहिए। उन
लोगों को शोर करने दीजिए। जब-जब भी
सुधार और क्रांति का स्वर उठता है, पाखण्डी
लोग इसी तरह वाधा देते हैं। लेकिन विश्वास
रखिए, वे हमारा कुछ नहीं विगाड़ सकते। शोर
मचाने वाले कायर होते है। उनमें क्रान्ति का
सामना करने का साहस नहीं होता। कायर
कभी सदाचारी नहीं हो सकता।
भीतर का)
व्यक्ति) : हां-हां, हम उनसे नहीं डरते । आज प्यारेलाल
ने क्रान्तिकारी कदम उठाया है। हम उसके
साय हैं । हम उसका बाल भी बांका नहीं होने

३४
युगे-युगे क्रान्ति
देंगे। (वाहर से भी शोर मचता है, अन्दर से
भी शोर मचता है और मंच पर अंधकार छा
जाता है । क्षण भर में सब कुछ शान्त हो जाता
है और अव प्रकाश मंच पर प्रवेश करते सूत्रधार
और देवीप्रसाद पर पड़ता है)
देवीप्रसाद : अोह ! यह सब देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
लेकिन अब सोचता हूं तो हंसी आती है। (हंस
पड़ता है) कैसे लोग थे उस ज़माने के।
सूत्रधार : यही तो मैं तुम्हें वताना चाहता हूं। इन्हीं के
बीच में मुझे क्रान्ति की खोज करनी है।
कल्याणसिंह ने अपने
युग साहस किया कि
वह दिन में पत्नी का मुंह देख सके । वही साहस
जब उसके बेटे ने दिखाया और विधवा-विवाह
किया तो उसी ने अपनी सन्तान का विरोध
किया। उसे पाप कहा । क्रान्ति रूढ़ि बन गई।
देवीप्रसाद : मेरी कुछ समझ में नहीं पाता। क्रान्ति, रूढ़ि ।
आखिर इन इन शब्दों का अर्थ क्या है ? इन
शब्दों के अर्थ क्या हम सचमुच जानते हैं ?
अरे लो, यह तुम्हारा चक्र फिर तेज़ी से घूमने
में
?
-
लगा।
सूत्रधार : यह चक्र कभी नहीं रुकता। जो आज क्रान्ति
करने का दावा करते हैं, कल वे ही प्रतिक्रिया-

युगे-युगे क्रान्ति ३५. वादी हो जाते हैं । इतिहास चार-बार अपने को दोहराता है। वे समझते हैं उन्होने समय को पकड़ लिया है लेकिन जादूगर काल उन्हें फांकी देकर न जाने कब आगे बढ़ जाता है और उसके मंच पर या जाती है एक नई पीढ़ी जो उसके लिए अजनवी होती है। प्यारेलाल ने अपने माता-पिता के विरुद्ध विद्रोह किया, लेकिन जब उनकी अपनी लड़की ने समय का साथ देने का प्रयत्न किया तो वह आग-बबूला हो उठे। यह गांधीजी के असहयोग आन्दोलन का प्रारम्भिक युग है। चारों तरफ उत्तेजना फैली है । असंख्य युवक उस जादूगर के प्रभाव में आ चुके हैं। युवतियां भी पीछे नहीं हैं। प्यारेलाल की बेटी शारदा उन्हीं में है। घर को चारदीवारी लांघ- कर वह समाज में खुले मुह ही नही घूमती, बल्कि उसके सिर का पल्ला भी खिसककर कन्धे पर आ गया है । वह केवल पुरुषों की तरह भापण ही नही देती, रणचण्डी की तरह आग भी उगलती है । "अरे, तुम ऐसे पागलों की तरह क्या देख रहे हो? देवीप्रसाद : कुछ नहीं । मुझे याद आ रहा है जैसे यह कहानी मैंने कहीं मुनी हो। , युगे युगे क्रान्ति सूत्रधार : सुनी होगी, लेकिन इस समय इसे अपनी आंखों से देखो। नया दृश्य प्रारम्भ होने वाला है। आयो हम दर्शक-दीर्घा में चलें। (सूत्रधार उसे खींचकर पीछे ले जाता है। मंच के पृष्ठ- भाग में प्रकाश उभरने लगता है। वहां नारियों की एक छोटी-सी भीड़ लगी हुई है और एक ऊंचे स्थान पर खड़ी हुई एक युवती भापण दे रही है।) शारदा : प्यारी बहनो, मैं तुम्हें अपनी कहानी सुना रही थी। मैं पूरे विश्वास के साथ आपसे कहती हूं कि जिस दिन मेरे सुधारक पिता श्रीमान प्यारेलालजी ने भरे बाज़ार में मेरे गाल पर इसलिए थप्पड़ मारा था कि मेरी साड़ी का पल्ला सिर से उतर गया था, तो मैंने उसी दिन निश्चय कर लिया था, कि मैं इन पुराने दकिया- नूसी रीति-रिवाजों को अब और नहीं मानूंगी। रहा होगा कभी किसी युग में सिर ढकना अच्छी बात, रहा होगा कभी नारी का घर की चार- दीवारी में वन्द रहना अच्छा, लेकिन आज इन बातों की कोई जरूरत नहीं है। यह रूढ़ियां हमें कार बनाती हैं। हम इन्हें स्वीकार नहीं युग-युगे क्रान्ति १७ काढ़ना यह सब अच्छा ममझा जाता था। लेकिन ग्राज मुंह खोलना पाप नहीं समझा जाता। फिर सिर खोलना ही पाप क्यों ? भग- वान की कृपा से हमें अपने हौसले दिखाने का अच्छा अवसर मिल गया है। गांधीजी ने देश को आजादी के लिए असहयोग-प्रान्दोलन करने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि इस युद्ध में नारी को भी पुरुष के कंधे से कया भिडाकर भाग लेने का अधिकार है। किसी समय राज- पूत लोग लड़ने के लिए में जाते थे और उनकी नारियां उनके हार जाने पर सती होकर जल जाती थी। आखिर वे भी मरती ही तोथी। मैं कहती हूं कि घर के अन्दर बैठकर मरने से यह बेहतर है कि हम भी पुरुषों की तरह कष्टों का सामना करें और नव यदि मौत पाए तो हंसते-हंसते उसे गले में लगा लें। प्राचीन इतिहास में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब पत्नियां पतियों के साथ रय में बैठकर युद्ध करती थीं। वेशक ऐसे उदाहरण कम है लेकिन अब समय बदल गया है। नारी पुस्ख मे किमी भी वाद में पोछे नहीं है । उनके अधिकार ममान है, कर्तव्य भी ममान है। इसलिए मंग ।

युगे-युगे क्रान्ति । बहिनो, हमने निश्चय किया है कि पुरुषों के साथ-साथ हम भी पिकेटिंग करेंगी, विदेशी कपड़ों की होली जलाएंगी, विद्यार्थियों को सर- कारी स्कूलों में नहीं जाने देंगी। वकीलों को कचहरी जाने से रोकेंगी। आज हम थोड़ी दिखाई देती हैं लेकिन यदि मेरी आवाज़ घर की दीवारों को फांदकर अन्तःपुरचारिणी मेरी मांओं और बहनों तक पहुंचती है, तो मैं उनसे प्रार्थना करूंगी कि वे अपने को पहचानें। वे शक्ति हैं, और शक्ति के मार्ग में घर की चारदीवारी तो क्या, हिमालय जैसे नगाधिराज भी वाधा नहीं दे सकते। (ज़ोर से तालियां गूंजती हैं, और नारे उठते हैं) कई स्वर : शारदा रानी की जय ! नारी शक्ति है। हम शक्ति हैं। हम आपके साथ हैं। (सहसा बाहर से कोलाहल बढ़ता हुआ पास आता है।) शारदा : यह कोलाहल कैसा है ? यह भीड़ इधर कैसी आ रही है ? (देखकर हंसती है) ग्रोह ! पुलिस है। वह हमें गिरफ्तार करने आई है। बड़ी खुशी से कर ले। हम अपने पथ से विचलित नहीं होंगी।

युगे युगे यान्ति
कई स्वर : हा, हम अपने पय से विचलित नहीं होंगी। हम
गिरफ्तार होने को तैयार हैं।
(कई सिपाहियो के साय एक सार्जेण्ट मव पर पाता
सार्जेण्ट , यह मजमा गैर-कानूनी है । मैं हुक्म देता हूं कि
तुम लोग यहा से चली जामो
शारदा : हम यहां मे जाने के लिए नहीं पाई हैं। पिकेटिंग
करने के लिए आई हैं । हम पिकेटिंग करेंगी।
सार्जेण्ट , तव मुझे अफसोस है। मुझे आपको गिरफ्तार
करने का हुक्म है।
शारदा : आप बड़ी खुशी से उस हुक्म का पालन कर
सकते है।
सार्जेण्ट : लेकिन मैं फिर आपसे कहता हूं कि आप चली
जाए । आप स्त्रियां हैं। आपको घरों में रहना
चाहिए।
शारदा : आपकी सलाह के लिए धन्यवाद । लेकिन हम
अव समझ गई हैं कि यह सलाह गलत है । स्त्रियां
घरों में रहने के लिए नहीं होती। वे दिन अव
लद गए । क्या तुम नहीं जानते कि आदिशक्ति,
महाचण्डी, महामाया, महाकाली ये सभी
स्त्रियां थी । इन्होंने ही अनाचारी दानवों को
मारकर सृष्टि को रक्षा की थी। इसलिए हम

४०
युगे-युगे क्रान्ति
-
अव घर नहीं जाएंगी। विदेशी कपड़ों की होली
जलाकर दासता रूपी दानव का संहार करेंगी।
सार्जेण्ट : (खीझकर) सिपाहियो, ये नहीं मानतीं। तुम
इन्हें घेरे में ले लो और पुलिस-स्टेशन ले चलो।
(सिपाही आगे बढ़कर उनको घेरते हैं। शोर उभरता
है। इसी बीच में वाहर की ओर से कई व्यक्ति भागे हुए
पाते हैं।)
:
पहला व्यक्ति : अरे-अरे ! यहां तो पुलिस स्त्रियों को गिरफ्तार
कर रही है।
दूसरा व्यक्ति : अधर्म, घोर अधर्म ! स्त्रियां घर से बाहर निकलने
लगीं। प्रलय के दिन या गए। छिः छिः, जो
असूर्यपश्याएं थीं, परपुरुष
की छाया जिन्हें
भ्रष्ट कर देती थी, उन्हें पुलिस के ये शैतान
लोग जेल ले जाएंगे! ये जेल में रहेंगी! तब ये
पवित्र कैसे रह सकती हैं। हरे ! हरे ! कैसा
घोर अधर्म होने लगा है। जिस समाज में स्त्रियां
स्वेच्छाचारिणी हो जाती हैं, वह समाज नष्ट हो
जाता है।
पहला व्यक्ति : समाज के नष्ट हो जाने में अब क्या देर है। हमें
क्या-क्या नहीं देखना पड़ रहा है। लेकिन
पंडितजी, यह लड़की जो अभी भाषण दे रही
थी, इसको मैं पहचानता हूं। यह आर्यसमाज

युग-युगे शान्ति
के नेता श्री प्यारेलालजी की पुत्री है। इसका
नाम गारदा है। हरे ! हरे! कैसा कलजुग
आ गया। चलू उसके घर वालों को सूचना तो
दू। वैसे लडकी है साहसी।
दूसरा व्यक्ति : खाक साहसी है। नारी को ऐसा साहस गोमा
नहीं देता। राक्षस, दैत्य, दानव-क्या ये कम
साहसी होते हैं ? नारी की शोभा कोमलता
और मुन्दरता है। पौरुप और वाचालता नहीं
है। हरे ! हरे।
(इसी बीच में पुलिस स्त्रियों को लेकर बाहर चली
गई है। उनके पीछे-पीछे ये दोनों भी बातें करते हुए
वाहर चले जाते हैं। एक क्षण के लिए मच पर प्रकार
छा जाता है। फिर प्रकाग उभरने लगता है। तभी
देवीप्रसाद तेजी से मच पर प्रवेश करते हैं। लेकिन
उतनी ही तेजी से सूत्रधार उन्हें खीचकर दर्शक-दीर्घा
में ले जाने हैं।)
सूत्रधार . अभी नहीं, अभी यह अंक पूरा नहीं हुप्रा ।
(उनके वाहर जाने ही पृष्ठभाग में प्यारेलाल पदराए
हुए अन्दर पाते हैं।)
प्यारेलाल : (व्यग्र होकर) तुम कहां होगारदा की माता !
तुमने कुछ सुना?
(कलावती तेजी से अन्दर से पाती है।)
कलावती : क्या हुआ, क्या बात है ? आप ऐसे क्यों धवरा

४२ युगे-युगे क्रान्ति रहे हैं ? प्यारेलाल : पुलिस शारदा को पकड़कर ले गई। कलावती : (कांपकर) नहीं, नहीं ! (घबराकर दीवार थाम लेती है) प्यारेलाल : (तेज़ी से इधर-उधर घूमता हुआ) अव नहीं- नहीं करने से क्या होता है। वह इस समय जेल में है। उसने सिर से पल्ला क्या उतारा, कुल की लाज ही उतार दी। मैंने उसे कितना धम- काया, पीटा तक, पर वह नहीं मानी। उसने पिकेटिंग की, विदेशी कपड़ों की होली जलाई और पुलिस उसे पकड़कर ले गई। बेशर्म, निर्लज्ज! कलावती : हे भगवान! अव क्या होगा। जवान लड़की जेल में है। हम समाज में कैसे मुंह दिखाएंगे। अजी तुमने कुछ किया भी उसे छुड़ाने के लिए? अगर वह रात-भर वहां रह गई तो प्यारेलाल : तुम एक रात की बात करती हो । न जाने वह कव तक वहां रहेगी। देश-भर पागल हो रहा है। सब लोग स्कूल-कालेज छोड़ रहे हैं। वकीलों ने कचहरी जाना बन्द कर दिया है। भला यह कोई बुद्धिमानी के काम हैं ? शिक्षा का नाश करके लोग आज़ादी लेना चाहते हैं। अाजादी

पुगेन्युगे कान्ति
मैं भी चाहता हूँ 1 गुलानी बहुत बुरी है। पाप
है। लेकिन उसको मिटाने के रास्ते मोर हैं।
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारकर पाजादी नहीं
ली जा सकती। फिर स्त्रियां जेल गई तो धर्म
की रक्षा कैसे होगी? मेरी कुछ समझ में नहीं
पाता। मेरी कोई नहीं सुनता"
कलावती : लेकिन तुम तो किसीकी सुनो । मैं कहती हूं कि
भैया के पास जागो और किसी तरह उसे छुड़ा-
कर लायो।
प्यारेलाल (तेजी से) तुम छुड़ाने की बात कहती हो, अगर
वह छूट भी आए, तो मैं उसे इस घर में नही
पाने दूगा । लोग मुझ पर ताने कस रहे हैं कि
और भेजो लडकियों को स्कूल, और आजादी
दोघर की स्त्रियो को, और पढायो नारियों की।
कल को देख लेना किसी न किसी के माय भाग
जाएगी। भला यह कही औरतों के काम हैं।
अाजादी के लिए लड़ें तो हम पुरुष लड़ें। भगवान
ने स्त्री-पुरुषों के कर्तव्य मोच-ममनकर बांटे
हैं। स्वामी दयानन्दमे यादा कोई दवा को क्या
प्रेम करेगा। उन्होंने यूही नही लिवा"
कलावती : यह सब तो मुझे भी मालूम है । नुन उमरीवान
मोचोग्रासिर वह अपनीचेटी है। पहले जाकर
।
-

४४ युगे-युगे क्रान्ति भैया से सलाह करो। और बातें वाद में देखी जाएंगी। प्यारेलाल : तुम सोचती हो जैसे मैंने कुछ किया ही नहीं ? जव उसका बड़ा भैया सुभाष आज़ादी के दीवानों के साथ गोली-वन्दूक का खेल खेल रहा था तो उसे रास्ते पर लाने के लिए मैंने क्या नहीं किया लेकिन क्या वह माना ? वह सदा के लिए घर छोड़कर चला गया। यह सारे भाई- वहिन एक जैसे हैं। शारदा ने घर आने से इन्कार कर दिया है। कलावती : (हतप्रभ) इन्कार कर दिया है ? प्यारेलाल : उसने कहा कि अगर वह छूट भी गई तो वहीं आश्रम में रहेगी, घर नहीं पाएगी। कलावती: तो आप मुझे वहां ले चलिए। देखती हूं, वह कैसे नहीं आएगी। प्यारेलाल : नहीं, अब मैं वहां नहीं जाऊंगा। कलावती : तो मैं जाती हूं। (जाने को मुड़ती है) प्यारेलाल : (एकदम क्रुद्ध होकर) ठहरो, तुम कहीं नहीं जा सकतीं। क्रान्ति मैंने भी की है, लेकिन क्रान्ति का अर्थ यह नहीं है कि कुल, समाज और धर्म लाज को घोलकर पी लिया जाए। मैं स्वयं जाता हूं। देखता हूं, वह कैसे नहीं आती। उसे :

युगे युगे क्रान्ति
पाना ही होगा। (उसी तेजी से जाता है)
कलायती : (पीछे जाती है) रुको, रुको। मैं कहती हूं, गान्ति
से काम लो। जवान लड़की है। ठहरो, मैं भी
साथ चलती हूं । भैया से जाकर पूछती हूं.
(दोनो बाहर चले जाते हैं। मच पर फिर क्षणिक
अन्धकार छा जाता है। उसके बाद अग्रभाग में प्रकाश
होने लगता है और उसके साथ ही एक युवक और एक
युवती मुक्त भाव से बातें करते हुए मच पर प्रवेश करते
विमल : मैं तुम्हारे साहस की प्रशंसा करता हू शारदा ।
तुम जैसी नारियों पर ही इस देश की स्वतंत्रता
निर्भर करती है। गांधीजी ने भी यही कहा है
कि धर्म नारियों के हाथ में है। (मुस्कराकर)मेरे
पिताजी गांधीजी के परम भक्त हैं। मेरे उस
प्रस्ताव पर उन्होंने तनिक भी आपत्ति नही
की।
:
शारदा : सच? क्या तुमने उनको सब कुछ बता दिया?
विमल : बताने की आवश्यकता तो तव थी जब वे कुछ
न जानते होते । वे तो तुम्हारे बारे में मुझमे भी
ज्यादा जानते हैं। जब मैंने उनके सामने तुम्हारा
नाम लिया तो वह गद्गद हो उठे। वोले, "तुम
शारदा की बात कहते हो। वह तो वीरागना
।

४६
युगे-युगे क्रान्ति
?
:
है। साक्षात् लक्ष्मीवाई। अव देश निश्चय ही
स्वतंत्र हो जाएगा। काश, मेरी भी ऐसी ही कोई
पुत्री होती।" तव मैंने कहा
शारदा : (विमुग्ध-सी) क्या कहा
विमल : मैंने कहा, "पिताजी, आप उसे अपने घर की बहू
बना सकते हैं?" सुनकर वे मेरी ओर देखने लगे।
बोले, "क्या तुमने उससे बातें की हैं ?
शारदा : (पूर्ववत्) तव तुमने क्या कहा?
विमल : वही, जो मुझे कहना चाहिए था। उसी घड़ी की
तो मैं इन्तज़ार में था। मैंने कहा, "हां, हां,
पिताजी, मैंने बातें की हैं। वह
तैयार है।" इस
पर पिताजी वोले, "क्या उसके माता-पिता भी
तैयार होंगे?" तव मैंने कहा, "उन्हें तैयार करना
आपका काम है।" इस पर पिताजी बड़े जोर से
हंसे । वोले, "मुसीवत का काम तो तूने मेरे लिए
ही छोड़ दिया। खैर, यह काम मैं करूंगा।" और
मैं समझता हूं कि जब लड़के का पिता राज़ी है
तो लड़की के पिता को कोई ऐतराज़ नहीं होना
चाहिए। इसलिए शारदा ! जल्दी ही मेरे
पिताजी तुम्हारे पिताजी से मिलेंगे और शादी
का प्रस्ताव रखेंगे।
शारदा : अोह, विमल, तुम्हारे पिताजी कितने अच्छे हैं !
~

४७ युगे युगे कान्ति उन्हें जात-पात, प्रान्त, किसी बात को चिन्ता नहीं। मैं संयुक्त प्रान्त की अग्रवाल, तुम पंजाव के खत्री। विमल : तुम भी कैसी बातें करती हो। ये बातें तो तुम्हारे पिताजी भी नहीं मानते। वे तो कट्टर प्रार्य- समाजी हैं । मेरे पिताजी का प्रस्ताव सुनकर वे बहुत प्रसन्न होंगे। उनको तो यही डर है ना कि तुमसे कौन शादी करेगा। तुम जेल में रह पाई हो। जो नारी जेल में रह चुकी होती है, तुम्हारा दकियानूसी समाज उसे दुराचारिणी समझता है। लेकिन मैं उस दुराचारिणी को अपने दिल में स्थान दूगा। जव में तैयार हूं तो तुम्हारे परिवार वालों को क्या आपत्ति हो सकती है। शारदा : होनी तो नहीं चाहिए लेकिन मैं अपने पिताजी को जानती हूं, वे बड़े कट्टर है। अपने दायरे से बाहर नहीं निकल सकते। इसलिए वे निश्चय ही मनाकर देंगे। लेकिन मैं उनकी चिन्ता नही करती। मैं अपने पथ से पीछे नहीं हटूगी । मैं बालिग हूं। अपना भविष्य बनाने का मुझे अधिकार है। विमल : शाबाश । मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि कोई हिन्दू लड़की इस तरह वाते कर सकती है।

४८ युगे युगे कान्ति तुम्हारे मुंह से ये बातें सुनकर क्या बताऊं कैसा- कैसा लगता है । अोह, तुम कितनी साहसी हो । शारदा। . शारदा : (हंसकर) कहो झांसी की रानी हूं, कहो ना। विमल : (भावावेश) मेरी झांसी की रानी, (दोनों खिल- खिलाकर हंस पड़ते हैं) अब तुम जान गईं, मैं क्यों तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूं, इसी कारण। शारदा : (शरारत से) केवल इसी कारण? विमल : नहीं-नहीं, एक और भी कारण है। शारदा : वह क्या है ? विमल : ऊं हुं, वह नहीं बताऊंगा। अच्छा किसी से कहोगी तो नहीं। शारदा : नहीं कहूंगी, वतायो। विमल : तुम्हारी अांखें बड़ी सुन्दर हैं, क्या नहीं हैं ? शारदा : (लजाकर) तो उससे क्या ? विमल : अांखें दिल का दर्पण होती हैं । तुम्हारा दिल भी सुन्दर है। इसीलिए मैं तुम्हें प्यार करता हूं शारदा : (पूर्ववत् ) हटो, यह भी क्या कहने या बताने की वात थी? विमल : तुमने ही तो पूछा था। इसलिए मैं विना कहे

मुंगेयुग कानि
नहीं रह सका। अब नाराज क्यों होती हो?
शारदा : नहीं, मैं नाराज कहां हूं। लेकिन मुनो, मैंने फिर
जेल जाने का निश्चय कर लिया है। पर वे लोग
स्त्री-पुरुपों में अन्तर करते हैं। हमें अबला मानते
हैं और ज्यादा दिन नही रसते।
विमल : अभी तो प्रारम्भ है। जल्दी ही तुम लोगों के
साथ भी वे लोग वही व्यवहार करेंगे जो हम
लोगों के साथ करते हैं। उस व्यवहार की
कल्पना करके ही मेरे रोगटे बडे हो जाते हैं ।
शारदा : और मैं उस व्यवहार की कल्पना करके शक्ति
पाती हूं। यह सारी स्त्री-जाति के लिए चुनौती
है। मैं निश्चय ही जेल जाऊगी। इसमें सफलता
नहीं मिली तो अात्महत्या कर लूगी। लेकिन
उस दमघोटू वातावरण में फिर नही लोटूगी।
विमल . वह तो ठीक है, लेकिन अपना घर छोड़कर
रहोगी कहा?
शारदा : कही भी रह लूगी। तुम जरा अपने-माप को
मेरे स्थान पर रखकर सोचो। क्या मेरा वहां
जाना माताजी के साथ ज्यादती न होगी मैं
अपना पय छोडूगी नहीं। और पिताजी उसे
सह नहीं सकते। मां विचारी परेशान हो उठेगी।
नहीं-नहीं, मैं उस दमघोंटू वातावरण में नहीं

५० युगे-युगे क्रान्ति : } लौटूंगी। (एक वयोवृद्ध सज्जन का प्रवेश) चन्द्रकिशोर : उस दमघोंटू वातावरण में वापस लौटने का अव कोई प्रश्न ही नहीं है। विमल : (चकित होकर) पिताजी, आप ? शारदा : पिताजी, मैं नमस्कार करती हूं। चन्द्रकिशोर : जीती रहो बेटी। मेरे देश की दूसरी झांसी की रानी बनो। (विमल से) विमल वेटा, शारदा के पिताजी ने मेरी बात नहीं मानी। उन्होंने कहा, "मैं उसे अब घर में नहीं आने दूंगा। वह कहीं भी जाए, कुछ भी करे।" भी करे।" इस पर मैंने उनसे कह दिया, "अच्छा, यदि आपको कोई मतलव नहीं तो ग्राज से वह मेरे घर की बहू हुई। मैं अभी उसके विवाह का प्रवन्ध करता हूं।" पायो मेरे बच्चो, इससे पहले कि तुम फिर आजादी की लड़ाई में भाग लो, तुम दोनों को एक सूत्र में बांध देना चाहता हूं। मेरे साथ प्रायो। विमल : (विमुग्ध-सा) पिताजी ! शारदा : आज से आप मेरे पिता हुए और मैं आपकी मैं वेटी। (चन्द्रकिशोर दोनों के कन्धों पर हाथ रखकर उन्हें मंच से वाहर ले जाते हैं। एक क्षण वाद प्यारेलाल

युगे-युगे प्रान्ति
1
यौखलाए हुए वहा माते हैं।)
प्यारेलाल : कहां गए वे लोग । मैं यह नहीं होने दूंगा। वह
मेरी बेटी है । मैं उसका पिता हूं। मेरी बिना
याना वह कुछ नहीं कर सकती। उसे वापस
लौटना होगा। नहीं तो, नहीं तो मैं उमका गला
घोट दूगा या फिर मैं जिन्दा नहीं रहूंगा।
(तेजी से उमी मोर चला जाता है। मंच पर फिर
अन्धकार छा जाता है। दो क्षण बाद अग्रभाग में
प्रकास उभरने लगता है। तभी सूत्रधार और देवीग्रगाद
दोनो मंच पर प्रवेश करते है।)
सूत्रधार : देसा तुमने। ये लोग भी क्रान्तिकारी थे। (हसकर)
समझ में नहीं पाता क्रान्ति का कौन-सा रूप
सही है । अब देसिए न, (देवीप्रसाद जैसे नहीं
मुनता) अरे ग्राप किस सोच में पड़ गए?
देवीप्रसाद : (चौंककर) ऐं, (मुस्कराता है) में इस लड़की
से बहुत प्रभावित हुआ हूं लेकिन
सूत्रधार : लेकिन क्या?
देवीप्रसाद : लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इसे अपने पिता
को साथ लेकर चलना चाहिए ।
मूत्रधार : जो साथ न पाए तो उसे कैसे साथ लिया जा
सकता है?
देवीप्रसाद : इसमें साथ न आने को क्या बात थी? वह उन्हे

५२
युगे-युगे क्रान्ति
समझाती। जितने विश्वास से वह जनता से
बातें करती थी, उतने ही विश्वास से यदि पिता
से कहती तो शायद वे मान जाते। कम से कम मैं
उनकी जगह होता तो बहुत खुश होता । आखिर
मुझे लड़की के विवाह की परेशानियों से मुक्ति
तो मिलती। तुम नहीं जानते, मैं अपनी लड़की
के विवाह को लेकर कितना परेशान हूं। लेकिन
मैं यह कभी नहीं स्वीकार कर सकता, कि मेरी
आज्ञा के बिना वह कुछ करे। आखिर मैं पिता
हूं। मेरे कुछ कर्तव्य हैं, अधिकार हैं। वे कर्तव्य
और अधिकार मुझे इसीलिए तो प्राप्त हुए हैं
कि मैं अधिक अनुभवी हूं। हर वुजुर्ग अनुभवी
होता है।
: जी हां, हर बुजुर्ग अनुभवी होता है। लेकिन
मुसीवत यह है कि अनुभव और क्रान्ति की सदा
अनबन रहती है। दोनों एक-दूसरे को फूटी
आंखों नहीं सुहाते। अनुभव स्थापित सत्यों
की रक्षा करता है लेकिन क्रान्ति नये सत्यों की
खोज करती है। आपने देखा, किस तरह शारदा
और विमल ने एक-दूसरे का होने की प्रतिज्ञा
की। और वे सचमुच एक हो गए। उन्होंने सारा
जीवन गांधीजी के आदेशानुसार देश को अर्पित
सूत्रधार

युग-युगे त्रान्ति
कर दिया। लेकिन एक समय पाया जब उन्होंने
भी अपने अनुभव का उपयोग स्थापित सत्यों
की रक्षा करने में किया। नई पीढी के शब्दों में
कहूं तो उन्होंने क्रान्ति के विरुद्ध संघर्ष किया।
वह देसो चक्र कितनी तेजी से घूम रहा है।
हम अय सन् ४२ में पहुंच गए हैं। वह देखो मंच
पर विमल कैसे घबराए हुए पा रहे हैं। यह वही
विमल है, जिन्होंने जातीयता और प्रान्तीयता
की दीवार तोड़कर स्वतंत्रता के लिए घर से
वाहर पाने वाली लड़की शारदा से आगे बढ़कर
विवाह किया। वहीं ग्राज कितना परेशान है।
प्रायो, पानी, हम दर्शक-दीर्घा में अपने स्थान
पर लौट चलें।
(वे दोनों बाहर चले जाते हैं, प्रकाश पृष्ठभाग में
उभरता है, विमल और शारदा द्वार से मय पर प्रवेश
फरते हैं। मुद्ध खद्दर का परिधान है। दोनो बहुत
परेशान हैं।)
शारदा : आखिर कहो भी हुमा क्या?
विमल : होने को रह क्या गया है । मेरो तो कुछ समझ
में नहीं आता कि क्या करूं । तुम सुनोगी तो."
शारदा : सुनूगी तो तव जब तुम कुछ बतानोगे। तुम
प्रदीप के बारे में तो कुछ नही कहना चाहते ?

युगे-युगे कान्ति कहीं उसने कुछ कर तो नहीं डाला? विमल : करने को अब और क्या रह गया है। शारदा : परक्या किया उसने? क्या वह अब भी जैनेट से शादी करने को वज़िद है। विमल : वज़िद होने का अब कोई सवाल ही नहीं रहा । कल उसने कोर्ट में जाकर जैनेट से शादी कर ली। शारदाः (हठात् कांपकर चौकी पर बैठ जाती है) क्या कहा, प्रदीप ने शादी कर ली है ! विमल : जी हां, जैनेट से शादी कर ली कोर्ट में जाकर, विना हमको कोई सूचना दिए हुए । सुना तुमने -विना हमको कोई सूचना दिए हुए (तेजी से इधर-उधर घूमता है। शारदा एक क्षण हत- प्रभ-सी शून्य में ताकती है) शारदा : विना हमको कोई सूचना दिए हुए प्रदीप ने कोर्ट में जाकर जैनेट से शादी कर ली! विमल : हां, बिना हमको सूचना दिए हुए । उसने मुझसे कहा था कि मैं संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहता। मैंने उसकी बात मान ली थी। उसने मुझसे कहा था कि मैं अपनी इच्छा से शादी करूंगा। तुम जानती हो, मैंने उसका यह अधि- कार भी स्वीकार कर लिया था। फिर उसने

युगे युगे कान्ति
५५
।
।
कहा कि वह जनेट से शादी करेगा। तुमने तो
एक वार विरोध भी किया था, लेकिन मैंने
उसकी इस बात को भी स्वीकार कर लिया
था। मैंने धर्म और जाति की चिन्ता नही की
थी। मैं उनमें विश्वास ही नहीं करता। मैं देश
को सबसे ऊपर मानता हू । जनेट इसी देश की
लड़को है। बस मैंने उससे केवल इतना ही कहा
था कि अपने परिवार और समाज की जो
स्थिति है, उसको देखते हुए यह अच्छा होगा
कि जैनेट को शुद्ध करके जाह्नवी बना लिया
जाए। मुझे ये बातें अच्छी नहीं लगती। परन्तु
जिस समाज मे हम रहते हैं, उसका भी तोध्यान
रमना होता है । उसे धीरे-धीरे हृदय-परिवर्तन
के द्वारा हो तो वदलना होगा। हृदय-परिवर्तन
के लिए मैं हजार वर्ष तक रुक सकता है लेकिन
गोर-जबर्दस्ती नहीं कर सकता। लेकिन उसने
मेरी यह जरा-सी बात भी नहीं मानी।
शारदा : (रुंघा स्वर) मेरी तो बुद्धि काम नहीं कर रही
है। क्या उसे कोई और लड़की नहीं मिलती
थी। पासिर जैनेट छोटी जाति को लड़की हो
तो है। उनके वावा कोली थे। वह ईसाई बन
गए । वह अब एक दफ्तर में काम करती है।

युगे-युगे क्रान्ति
4
विमल : लेकिन मैंने तो यह बात भी स्वीकार कर ली
कि दफ्तर में काम करने वाली छोटी जाति की
एक ईसाई लड़की मेरी बहू बने, पर उसने मेरी
कोई वात स्वीकार नहीं की। करता कैसे । वह
मां-बाप को दकियानूसी जो समझता है।
शारदा : दकियानूसी, प्रतिक्रियावादी, पुरातन-पंथी, न
जाने उसने क्या-क्या कहा। मैंने सब कुछ सुना।
वह मेरा बेटा है। उसे मैं कितना प्यार करती
हूं।
विमल : (तेज़ होकर) यही तो। तुम्हारे प्यार ने ही तो
उसे बिगाड़ दिया। अगर तुमने समझाया
होता."
शारदा : तुम समझते हो, मेरे समझाने पर वह मान
जाता ? हरगिज़ नहीं। वह समझता है कि मैं
एक खूसट बुढ़िया होती जा रही हूं। जितनी
जल्दी चिता में भस्म हो जाऊं उतना ही अच्छा
है।
विमल : लेकिन सुन लो, मैं इस तरह से नहीं मानूंगा ।
मैं कहे देता हूं कि मैं उसे इस घर में नहीं आने
दूंगा। तुम कहोगी, तव भी नहीं आने दूंगा।
वाहर लोग मेरा कितना आदर करते हैं। मेरी
वात मानते हैं । मुझसे सलाह लेने के लिए आते
-

:
युग-युगे प्रान्ति
हैं। लेकिन मेरे घर में मेरा बेटा ही मेरी ज़रा-
सी बात नहीं मानता।
शारदा : लेकिन वह है कहाँ ?
विमल : होता कहां । इसी शहर में है। अपने एक मित्र
के घर ठहरा हुआ है। संदेशा पाया है कि मिलने
पा रहा हूं । उसका साहस तो देखो। मैं तुमसे
यही कहने पाया हूं कि अब उसकी मीठी-मीठी
बातें मुनकर पिघल न जाना।
शारदा: लेकिन...
विमल : मैं अब लेकिन वेकिन कुछ नही मुनूगा । (वाहर
को ओर देखकर) शायद वह पा रहा है । हां,
पही है।
(प्रदीप और जैनेट दोनो मन पर प्रवेश करते हैं। दोनो
भाधुनिक देश-भूषा मे है।)
प्रदीप : नमस्कार पिताजी। नमस्कार माताजी ।
जनेट. नमस्ते पिताजी। नमस्ते माताजी।
(कोई जवाब नहीं देता । वातावरण मे तनाव उभरता
है। विमल घूमने रहते है। शारदा वैठी रहती है।
प्रदीप और जनेट वभी उनको, कभी एक-दूसरे को
देसने हैं। फिर सहसा शारदा बोलती है)
शारदाः प्रदीप, मेरे बेटे तुमने यह क्या किया?
प्रदीप . शादी की है। मभी करते हैं। ग्राप गायन
।

युग-युगे क्रान्ति
नाराज हो गई हैं। इसका कारण मैं जानता हूं
लेकिन विश्वास रखिए हम यहां रहने के लिए
नहीं पाए हैं । वस आपसे मिलने आए हैं। जैनेट
की बड़ी इच्छा थी
जैनेट : हां पिताजी, प्रदीप तो बड़े डर रहे थे। मैंने ही
उनसे कहा, पिताजी कितने बड़े सुधारक हैं। वे
निश्चय ही इनको क्षमा कर देंगे।
शारदा : (रुंधे कंठ से) हमें कोई ऐतराज़ थोड़े ही है
हम क्या दकियानूसी हैं ? हमने तो सदा नये
युग का स्वागत किया है। बल्कि हमने नये युग
को लाने के लिए वरावर जी तोड़ कोशिश की
है लेकिन तुम जानो, हर बात की सीमा होती
है। फिर परिवार और समाज की बात है।
उनको साथ लेकर चलने से ही वदला जा सकता
है । जव तक उनके भीतर से हृदय-परिवर्तन की
वात न उठे, तब तक हमें सावधानी से चलना
चाहिए। इसलिए प्रदीप बेटा, तुम्हें अपने
पिताजी की बात मान लेनी चाहिए। इसमें
बिगड़ता ही क्या है । जैनेट तो जैनेट ही रहेगी।
प्रदीप : वही तो मैं कहता हूं। जैनेट को यदि शुद्ध करके
जाह्नवी नाम दे दिया जाएगा तो क्या इसका
कुछ बदल जाएगा? नाम बदल जाने से गुण

युग-युगे यान्ति और दोप नहीं बदल जाते। बदल सकते तो ग्राज हर बुरी चीज के अच्छे नाम रख दिए जाते। नहीं माताजी, में इस ढोंग में विश्वास नहीं करता। इस या उस धर्म में जाने में किसी- का स्वभाव नहीं बदल जाता। मेरा निश्चय है, जैनेट धर्म-परिवर्तन नहीं करेगी। विमल तो मेरा भी फैसला सुन लो। अगर वह धर्म- परिवर्तन नहीं करती, तो इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है। कहा यह एक छोटी जाति की स्त्री और कहां हम सपियों में भी शोपंस्थ। दूसरा कोई होता तो जान से मार डालता या खुद मर जाता। यह मेरी उदारता है कि उसे अपने कुल में लेने को तैयार हो गया और तू ज़रा-सी बात भी नहीं मान सकता। मेरा-तेरा प्रब कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रदीप : सम्बन्ध रखना जितना आपके अधिकार में है, उतना ही मेरे में भी है। पर मैं इस बात को लेकर झगड़ा नहीं करूंगा। हा, यह अवश्य पूडूंगा कि आप किस बात मे ऊचे हैं । जनेट मां से अधिक पढ़ी-लिपी है, मुन्दर है, साहसी है। विमल : कुल का सम्बन्ध केवल शिक्षा और रूप से नहीं है । वह प्रात्मा का सम्बन्ध है ।

६० युगे-युगे क्रान्ति .. प्रदीप : शुद्ध हो जाने से क्या प्रात्मा ऊंची हो जाएगी ? विमल : (तिलमिलाकर) हां, हो जाएगी। प्रदीप : अगर इसी तरह आत्मा ऊंची होती है, तो जेलों का ठेका क्यों नहीं ले लेते। वहां के सभी अप- राधियों को शुद्ध करके श्राप उनकी आत्माओं को पवित्र बना सकते हैं। विमल : (चीखकर) दुष्ट, तू मेरा मज़ाक उड़ाता है ! मेरा ही बेटा होकर मेरे साथ परिहास करता है। बेशर्म ! आज से तू मेरे लिए मर गया। मैं अपनी जायदाद में से तुझे कोई हिस्सा नहीं दूंगा। प्रदीप : मैं जायदाद में से हिस्सा मांगने नहीं आया। मुझे उसकी ज़रूरत नहीं है । और ज़रूरत भी होगी तो मांगूंगा नहीं । अधिकार से लूंगा। मैं समझौता करना नहीं चाहता। आप यदि हमसे वात करना नहीं चाहते तो मैं चला जाता हूं। प्रानो जैनेट, मैं अब यहां एक क्षण भी नहीं रुक सकता। जैनेट : जरा रुको, इतने उतावले मत बनो। शारदा : (प्रार्थना के स्वर में) जैनेट बेटी, तुम्हीं इसे समझाओ। तुम तो इस बात को समझती हो। : -

युगे युगे प्रान्ति
जैनेट : मैं सब समझती हूं माताजी। लेकिन यदि प्राप
जैसी में हूं वैसी ही को स्वीकार नहीं करती तो
मैं भी इनको यहां रहने के लिए कमे कह सकती
..
(सहमा मुरेमा का प्रवेश)
सुरेसा : (पुकारती हुई अाती है) माताजी, माताजी,
अापने मुना'"अरे ये तो प्रदीप भैया हैं। प्राप
तो यहा पहले से ही मौजूद हैं और यह कौन
है"ग्रोह ! पाप हैं जैनेट भाभी। बड़े बुरे हो
भैया, हमसे पूछा भी नहीं। चुपचाप विवाह
करके ले आए।
विमल : (तेज होकर) मुरेसा, तुम अन्दर जायो।
सुरेखा : आप नाराज हैं गायद पिताजी? लेकिन भैया
ने कुछ बुरा तो नहीं किया। प्राप शुद्धि ही तो
चाहते थे । उससे क्या होता है। हम तो यह
अच्छा नहीं लगता।
शारदा : तुझे क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं लगता,
इसको हमें चिन्ता नहीं। अाजकल मभी बढ़-
वढ़कर बोलने लगे हैं और आदर्य वधारने लगे
हैं। लेकिन जब पडता है, नव पता लगता
1
।
सुरेसा विना सहे क्या कुछ होता है, माताजी और

युगे-युगे क्रान्ति प्रदीप : शुद्ध हो जाने से क्या प्रात्मा ऊंची हो जाएगी? विमल : (तिलमिलाकर) हां, हो जाएगी। प्रदीप : अगर इसी तरह प्रात्मा ऊंची होती है, तो जेलों का ठेका क्यों नहीं ले लेते । वहां के सभी अप- राधियों को शुद्ध करके आप उनकी आत्मानों को पवित्र बना सकते हैं। विमल : (चीखकर) दुष्ट, तू मेरा मजाक उड़ाता है ! मेरा ही वेटा होकर मेरे साथ परिहास करता है । वेशर्म ! आज से तू मेरे लिए मर गया। मैं अपनी जायदाद में से तुझे कोई हिस्सा नहीं दूंगा। प्रदीप : मैं जायदाद में से हिस्सा मांगने नहीं आया। मुझे उसकी ज़रूरत नहीं है । और ज़रूरत भी होगी तो मांगूंगा नहीं । अधिकार से लूंगा। मैं समझौता करना नहीं चाहता। आप यदि हमसे बात करना नहीं चाहते तो मैं चला जाता हूं। आयो जैनेट, मैं अब यहां एक क्षण भी नहीं रुक सकता। जैनेट : जरा रुको, इतने उतावले मत बनो। शारदा : (प्रार्थना के स्वर में) जैनेट बेटी, तुम्हीं इसे समझायो। तुम तो इस बात को समझती हो।

युगे युगे शान्ति
जैनेट : मैं सब समझती हूं माताजी। लेकिन यदि आप
जैसी मैं हूं वैसी ही को स्वीकार नहीं करती तो
मैं भी इनको यहां रहने के लिए कैसे कह सकती
(सहसा सुरेखा का प्रवेश)
सुरेखा : (पुकारती हुई पाती है) माताजी, माताजी,
आपने सुना"अरे ये तो प्रदीप भैया हैं। प्राप
तो यहां पहले से ही मौजूद हैं और यह कौन
है ग्रोह ! पाप है जैनेट भाभी। बड़े बुरे हो
भैया, हमसे पूछा भी नहीं। चुपचाप विवाह
करके ले पाए।
विमल : (तेज होकर) सुरेसा, तुम अन्दर जाओ।
सुरेखा : पाप नाराज हैं शायद पिताजी? लेकिन मैया
ने कुछ बुरा तो नहीं किया। आप शुदि हो तो
चाहते थे। उससे क्या होता है। हमें तो यह
अच्छा नहीं लगता।
शारदा : तुझे क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं लगता,
इनको हमें चिन्ता नहीं। आजकल मनी बड़-
वड़कर बोलने लगे हैं और आदर्श वधारने
हैं। लेकिन जब सहना पड़ता है. नव पता
।
सुरेसा : बिना महे क्या कुछ होता है, माताजी

६४
युगे युगे शान्ति
(लपकाकर उसे गले लगा लेती है। फिर दोनों बाहर
चले जाते हैं। एक क्षण वहां सन्नाटा छाया रहता है।
उसके बाद शारदा बोलती है
शारदा : गए। प्रोह ! यह सब क्या हो गया? मुझे ऐसा
लग रहा है जैसे मैं सपना देख रही थी। जैसे
यह सुरेखा नहीं थी, मैं ही थी। मैंने भी तो एक
दिन इसी स्वर में...
विमल : यह सुनते-सुनते मैं परेशान हो गया। इस स्वर
का प्रयोग जब तुमने किया था तो उसकी
जरूरत थी । आज नारी स्वतंत्र है लेकिन इस
स्वतंत्रता का यह अर्थ तो नहीं है कि वह हरजाई
हो जाए।
शारदा : मेरा यह मतलब नहीं, लेकिन फिर भी वह मेरे
वेटे की बहू है। तुम उसे एक बार बुलायो तो।
मैं बहू को कुछ
विमल : (चीखकर) नहीं, मैं किसीको नहीं बुलाऊंगा।
तुम्हें जाना है तो जा सकती हो। तुम उसे अपना
घर सौंपना चाहती हो तो सौंप सकती हो।
(तेजी से अन्दर की ओर चला जाता है)
शारदा : (पीछे जाती है) मैं तुम्हारे बिना कहीं नहीं जा
सकती, कुछ नहीं कर सकती। शायद मेरी बेटी
सुरेखा यह साहस कर सके । पता नहीं...

सुग-युगे शान्ति
(चली जाती है । मंच पर केवल मुरेमा रह जाती है।
यह जैसे किसी स्वप्न मे जागती है।)
सुरेखा : मां सब कुछ समझती है। समझते पिताजी भी
हैं । लेकिन परिवार मे रहने का भय और अपने
अन्तर का अहम् उन्हें गुमराह किए हुए है।
प्रादमी अपने अहम् से कब मुक्ति पाएगा।
(वह भी पीछे-पीछे चली जाती है। उस भाग पर
फिर अन्धकार छा जाता है मौर अग्रभाग में प्रकाश
उमरता है। गूत्रधार और देवीप्रसाद दोनों मंच पर
माते हैं।)
सूत्रधार : देया तुमने। प्रदीप और जैनेट कितने प्रावेग में
थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे घर नहीं लौटेंगे और
पिता ने प्रतिज्ञा की थी कि वह उन्हें घर में नहीं
पाने देगा। लेकिन यह देखो, समय का चक्र
कितनी तेजी से घूम रहा है।
देवीप्रसाद : (सोया-सोया-सा) ऐं! तुम क्या कह रहे हो?
सूत्रधार : मैं कह रहा हूं श्रीमान्, कि सगय का चम वडी
तेजी से घूम रहा है । पच्चीम वर्ष बीत चुके हैं।
प्रदीप और जनेट फिर इसी घर मे लोट पाए
है । कब और कैसे लौटे, कुछ पता है
देयोप्रसाद : (सोया-सोया-सा) जोहा, मुझे मालूम है, वह
कब और कैसे लौट । मैं यह भी जानता कि
।
?

६८
युगे-युगे क्रान्ति
है। ना-ना, यह कोई और अन्विता होगी।
प्रदीप : (फीकी हंसी) तुमको अव भी शक है ?
जैनेट : मगर उसने तो दीपक से शादी करने का निश्चय
किया था और इस निमंत्रण-पत्र में नेलसन का
नाम लिखा है । यह कहां से आ गया ? नो-नो
डियर! आपको गलतफहमी हुई है। यह कोई
और अन्विता है।
प्रदीप : अपने को धोखा मत दो जैनेट ।
जैनेट : लेकिन मैं मान भी कैसे लूं। पिछले हफ्ते ही तो
वह यहां पाई थी। उसने मुझसे कुछ भी तो नहीं
कहा था।
प्रदीप : लेकिन मुझसे कहा था। तब मैं नहीं जानता था
कि वह इतना आगे बढ़ गई है। मैंने उससे कह
दिया था कि वह उसका अपना मामला है । हमें
दखल देने का कोई अधिकार नहीं। लेकिन एक
वार जो वचन दिया जा चुका है, उसे विना
किसी कारण तोड़ देना भी उचित नहीं।
जैनेट : (वेचैन होकर) पर प्रदीप ! तुमने मुझसे तो
कुछ भी नहीं कहा । क्यों नहीं कहा ? मैं अभी
उसके पास जाऊंगी।
प्रदीप : तुम कहीं नहीं जानोगी। जाने से कोई लाभ नहीं
होगा । ज़रूरत भी नहीं है। मैं तो केवल
।

।
1
दोन कोमात नोचता हूं। मैंने उससे कहा कि
लबोरोरते लोट पाने दो। वह बोली,
मन उसे निख दिया है।" मैने उससे कहा कि
ऐसे कामों में जल्दी करना अच्छा नहो। वह
बोली, "इन्मान को इतना कमजोर
नहीं होना चाहिए। जो सोचा
बने: ककिर भी कुछ दिनमा
प्रोत: है कोई कोज कि
पोरोर ज.
जैनेट : (पोको
नाम
काम करना है :
प्रदीर : मुल्यको ।
जनेट : नन्गाई समान
इंदन होगा
(दमकमाननिय युवक)
होईना, पार फिर
मान वाटर है।दुलकर मुगे, पदन
दुर्गमदारलोनों को गागा दास
मारा दाहित ! (कला) किन यह
काजोले नगन और मान गई?

७०
युगे-युगे क्रान्ति
और ममी, आप भी चुप हैं । क्या आप पिताजी
के शासक दल में लौट आने से खुश नहीं ?
जैनेट : (अनसुना करके) तूने सुना अनिरुद्ध, अन्विता
किसी स्वीड चित्रकार से शादी कर रही है ।
अनिरुद्ध : हां, सुना तो है।
जैनेट : लेकिन वह तो दीपक से बेहद प्यार करती थी।
अनिरुद्ध : तो क्या हुआ? कल दीपक से प्यार करती थी,
आज नेलसन से करती है। असल बात प्यार
करने की है, सो वह करती है। व्यक्ति कोई भी
हो सकता है। इस बात को लेकर आप इतने
परेशान क्यों हैं ? आपकी तो कोई ज़िम्मेदारी
नहीं है।
प्रदीप : (क्रुद्ध होकर)मैं ज़िम्मेदारी की बात नहीं कहता।
लेकिन आदमी की कुछ मान्यताएं होती हैं, कुछ
मूल्य होते हैं।
अनिरुद्ध : सब कुछ होता है। लेकिन वह स्थिर नहीं होता,
बदलता रहता है।
जैनेट : बेटे ! अगर मूल्य इसी तरह बदलते रहे तो
समाज कैसे चलेगा?
अनिरुद्ध : जैसे आज चल रहा है । उसे चलने से कौन रोक
सकता है। आप लोग व्यर्थ ही उसकी गति
रुकने की कल्पना करते रहते हैं।

मगे-युगे शान्ति
जैनेट : हां, हम किसीको चलने से कम रोक सकते हैं।
हम तो केवल तुम्हारी भलाई के लिए कहते हैं।
अनिरुद्ध : जिसे तुम भलाई काहती हो, वही तुम्हारा स्वायं
है। तुम सब कुछ अपनी हो दृष्टि से देखना,
मुनना और करना चाहती हो । तुम चाहती हो
कि वही मूल्य समाज में मान्य हो जिनको तुमने
जिया है।
(दूर से रिता की प्रावाज माती है।)
रिता : अनि डालिंग, तुम कहां हो?
अनिरुद्ध : (बाहर की ओर देखकर) रिता हियर, मैं यहां
हूं। चली ग्रामो।
रिता : (मंच पर प्राकर) गंतान कही के, मुझे पोछे
ही छोड़ पाए। यू नाटी योय ! यू भार
अनिरुद्ध : आई एम सो सॉरी डियर । हां, देसो डियर,
मोट माई डंडी ऐण्ड ममी। डंडी, यह रिता
है। मेरी नई संगिनी। इसके पिता वगाली
ब्राह्मण हैं और मां च । पोर ममी, यह बड़ी
ही प्रतिभाशालिनी चित्रकार है। नेलसन को
इसीने तो अन्यिता से 'इण्ट्रोड्यूस' कराया था।
इसके चित्रों को प्रदर्शनी तो आपने देखी होगी?
जैनेट : चित्रों की वात प्रभो रहने दो। पहले मुझे यह
चतामो कि श्यामला का क्या हुअा। पिछले
।

७२ युगे युगे क्रान्ति हफ्ते तक तो तुम उसीके साथ रहते थे। प्रदीप : (व्यंग्य से) और उससे पहले सुमेधा थी। अनिरुद्ध : (मूक हंसी) और उससे पहले सविता थी। सविता से पहले नंदिता थी। और उससे पहले ''जाने दीजिए, नाम गिनवाने से क्या होगा। मुझे आश्चर्य इसी बात का है कि आपको मेरी इस बात से आश्चर्य हुया । देखिए न डैडी, पाप पहले गणतन्त्र दल में थे, फिर जनतन्त्र में आए, उसके बाद जन-क्रान्ति में गए। अब फिर दक्षिण-पंथी गणतन्त्र में जा मिले। पिताजी सिद्धान्त के नाम पर दल बदलते हैं। वेटा प्रेम के नाम पर संगिनी वदलता है प्रदीप : (तीव्र स्वर) वकवास वन्द करो। यह राज- नीति की वात है। अनिरुद्ध : और यह प्रेम की । प्रेम हर हालत में राजनीति से बेहतर है आपका क्रोध बढ़ रहा है। देखिए डैडी, इसमें क्रुद्ध होने की कोई बात नहीं। सुमेधा से मैंने विवाह किया था, लेकिन नहीं निभ सकी। उसके बाल वेशक काले और घुटनों के नीचे तक आते थे, परन्तु उसकी वुद्धि बौनी ही रह गई थी। और डैडी, सच बात तो यह है, मैं विवाह में विश्वास ही नहीं करता। । •.

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७४
युग-युगे क्रान्ति
•.
कीजिएगा, मैं बीच में बोल रही हूं। हर स्त्री
की वात आप कैसे कह सकती हैं ? आप अपनी
पीढ़ी की वात कहिए।
जैनेट : स्त्री सदा स्त्री है। पीढ़ियां उसके स्वभाव में
परिवर्तन नहीं कर सकतीं। हमारे पुरखे मूर्ख
नहीं थे। लाखों वर्षों के अनुभवों के बाद उन्होंने
विवाह-संस्कार को स्वीकार किया था। संगिनी
रखना तो ऐसे ही हुआ जैसे कोई रखेल रख ले।
रिता : (कानों पर हाथ रखकर) ओह गॉड! आपके
विचार कितने दकियानूसी हैं। मैं कहती हूं, मुझे
अनिरुद्ध अच्छे लगते हैं। मेरा मन उनके साथ
रहने को करता है। मैं रहती हूं। जब तक हम
एक दूसरे को प्रेम कर सकेंगे, रहेंगे। नहीं क
सकेंगे तो अलग हो जाएंगे।
अनिरुद्ध : हां ममी। रिता ठीक कहती है । विवाह के मंत्र
या मजिस्ट्रेट के सर्टिफिकेट से स्त्री-पुरुषों के
सम्बन्धों में कोई अन्तर नहीं पड़ता। और यदि
यह आवश्यक भी हो, तो यह काम बुढ़ापे में हो
सकता है। क्योंकि तव साथी वदलना सम्भव
नहीं है। लेकिन जब तक हम युवा हैं, हमें प्रेम
चाहिए। प्रेम करने के लिए सर्टिफिकेट की
आवश्यकता नहीं होती। प्रेम मुक्ति में है, बंधन

में नहीं । विवाह स्त्री को गुलामी का पट्टा है,
इसलिए बन्धन है।
प्रदीप · (तीय स्वर) बन्द करो यह बकवास । तुम्हें
ऐमा कहते गर्म नहीं पाती! तुम्हारी प्रात्मा
तुम्हें जरा भी नही धिक्कारती।
रिता • हम लोग प्रात्मा को मानते ही नहीं। फिर
उगके धिक्कारने का प्रश्न कहा उठना है।
(चीसकर) तुम किसी को मानो या न मानो,
लेकिन भगवान के लिए मुझे प्रब और भाषण
प्रदीप:
मत दो
अनिरुद्ध . पाप सचमुच नाराज हो गए डंडी। पाप जो
चाहे माने, मैं आपत्ति करने वाला कोन है।
में
तो केवल रिता को इण्ट्रोड्यूम कराने पाया
था। आप नहीं चाहते तो न सही। चलो रिता
डियर, चलें।
जंनेट : जाने से मैं तुमको कभी नहीं रोक सकती।
प्राज तो एक ही बात कह सकती है कि जब
तुम्हारे सन्तान होगी, तव तुममे पृङ्गी
रिता : (दोनो कानो पर हाथ रखकर) मोह माई
गॉड । अापको भविष्य की बड़ी निन्ना है।
लेकिन हमे नहीं है। हम स्वर उसके निर्माता
हैं। हम नहीं चाहेगे तो मन्नान से होजएको'

युगे-युगे क्रान्ति
और जब चाहेंगे तो उसके वर्तमान पर अपने
अतीत को नहीं लादेंगे।
जैनेट : देगी।
प्रदीप : प्रोह जैनेट ! इन लोगों को जाने दो। नहीं तो
मेरा दिमाग खराब हो जाएगा। और अनिरुद्ध !
सुनते जाओ, मुझे अब और किसी रोमा, रूबी,
जुवेदा या जूडी से 'इण्ट्रोड्यूस' होने की ज़रूरत
नहीं।
अनिरुद्ध : मुझे भी नहीं है । चलो रिता ।
रिता : चलो।
(दोनों दाहिनी ओर से बाहर जाने को मुड़ते हैं, तभी
द्वार पर अन्विता दिखाई देती है)
अन्विता : हलो भैया ! और तुम भी हो रिता? लेकिन
तुम दोनों जा कहां रहे हो? क्या डैडी से फिर
वाक्-युद्ध हो गया?
अनिरुद्ध : और उनके साथ हो ही क्या सकता है।
अन्विता : (हंसकर) यह तो इस युग की सबसे बड़ी देन
है। इसके विना गति भी तो नहीं है । अच्छा
तुम हमारी शादी में प्रायोगे। तुम्हें भी पाना
रिता डियर।
रिता : हां-हां, हम
लोग अवश्य पाएंगे। टा. टा.
अन्विता : टा."
टारिता डियर, टाटा भैया।

1 কালি
(दोनों वाहर चले जाते हैं। परिधता पागे बार परी
मा जाती है जहा प्रदीप मोर जनेट गई बातें कर रहे
अन्विता : हलो डंडी, हलो ममी।
जैनेट : अरे तुम आ गई अन्विता, मैं तुम्हारी याद ही
कर रही थी।
अन्विता · देख लो ममी, तुमने याद किया मौर में प्रा
गई। फिर न कहना कि मैं तुमसे प्यार नहीं
करती। (हंमती है, लेकिन मैंने तो मुना
ग्राप मुझमे बहुत नाराज हैं। हमारे विवाह में
भी शामिल नहीं हो रहे । (नाटकीय निश्याम
सीचकर) प्रापको इच्छा है। नेलसन तो यही
चाहता है कि
प्रदीप चाहने की वात विलकुल व्यर्य है। तुम लोग
हमारी चिन्ता क्यों करते हो? हम पुराने जमाने
के लोग है । दकियानूमी, पुरातन-पयो।
अन्विता . पुरानी पीढी के लोग पुरातन-पयो ही तो हो
सकते है। लेकिन मैं प्रारमे झगड़ा करने नहीं
पाई। आप अपने रास्ते पर चलने के लिए
स्वनत्र है। परन्तु डंडी, दुनिया बहुत तेजी गे
प्रागे बढ़ रही है। हम अगर ममय के माय नहीं
चलेंगे, तो पिछड़ जाएगे । वीना हुमा हर क्षण

युगे-युगे शान्ति ! मर जाता है। और जो उसके पीछे भागते रहते हैं वे भी फॉसिल बनकर रह जाते हैं." प्रदीप : (एकदम) श्रोह ! भापण-भापण! तुमने अभी इस जग को देखा कितना है ? अभी तक पढ़ा ही पढ़ा है । भाषण सुने हैं, नारे लगाए हैं, बाप की आमदनी पर पाराम की ज़िन्दगी गुजारी है। जब इस जग की भूल-भुलैयां में फंसकर जहर- भरे छुट पियोगी, कड़वे-मीठे अनुभव पायोगी, तब कहीं मुझे चुनौती देने लायक होगी। अन्विता : चुनौती बुढ़ापा नहीं, जवानी देती है । बुढ़ापा समझोता करता है या हठ करता है। प्रदीप : हठ तो जवानी भी करती है। अन्विता : पर समझौते के लिए नहीं, स्थिर मूल्यों की रक्षा के लिए भी नहीं । खोज के लिए, नये मूल्यों की स्थापना के लिए। जिस क्षण जवानी नये मूल्यों की खोज से गुरेज करेगी, उस क्षण क्रान्ति रुक जाएगी। (सुरेखा का प्रवेश) सुरेखा : यह कौन भाषण दे रहा है। श्रोह ! अन्विता है। देखती हूं बड़ी बुद्धिमान हो गई है। अन्विता : हलो पाण्टी, आप कैसी हैं ? सुरेखा : जैसे पुरानी पीढ़ी के लोग हुआ करते हैं। बीते

यो-युगे कान्ति
हुए क्षण के पीछे भाग रही हूं। पिछड़ गई हूं।
लेकिन बेटी? इस समय तो युग बहुत तेजी से
दौड़ रहा है । मुझे पिछड़ने में २०-२५ वर्ष लग
गए थे। लेकिन तुम तो दो वर्ष में ही पिछड़
गई हो।
अन्यिता : (चकित होकर) में पिछड़ गई हूं? (हंसकर)
यह कैसे चुनाजी?
सुरेखा : (हसती है) पहले तुमने मुझे पाण्टी कहा और
अब बुधाजी। क्या यह पिछड़ापन नही है । (सब
हंस पड़ते हैं) लेकिन और बताती हूं। तुम्हारी
आयु क्या है ?
प्रन्विता : २६ वर्ष।
सुरेखा : और अनिरुद्ध को ?
अन्विता : २४ वर्ष।
सुरेखा : तुम विवाह में विश्वास करती हो, क्योंकि
विवाह करने जा रही हो।
अन्विता : निश्चय ही करती है । लेकिन इससे क्या?
सुरेसा : अभी बताती हूं। तुम्हारा भाई अनिरुद्ध तुमसे
दो वर्ष छोटा है। उसने दो वर्ष में तीन संगिनियां
बदली। केवल स्त्री और पुरुष की सत्ता में
विश्वास करता है यानी नर-मादा की सत्ता में।
(जोर से हंसती है) कहो तुम पिछड़ गई न ।

५० युगे-युगे क्रान्ति प्रतिक्रियावादी हुई न ? अनिरुद्ध तुमको दकिया- नूसी और पुरातनपंथी कह सकता है। अन्विता : (परेशान होकर) अपने-अपने विचार हैं। और मैं भी नेलसन से वंध नहीं गई हूं। जिस क्षण चाहूंगी, अलग हो जाऊंगी। सुरेखा : वही तो अनिरुद्ध कहता है । अलग ही होना है तो बंधे क्यों? अन्विता : ठीक है लेकिन सुरेखा : यही 'लेकिन' सव खुराफातों की जड़ है। यही मनुष्य का अहम् है और यही उसकी दुर्वलता। (हंसती है) अन्विता : (तेज़ होकर) मैं जाती हूं। सुरेखा : अरे, अरे, मैं भी आ रही हूं। मैं तुम्हारी शादी में शामिल होऊंगी। मैं तुम्हारे साथ हूं। (अन्विता नहीं रुकती। सुरेखा पीछे जाती है। प्रदीप मानो कहीं खो गया था. अब जैसे गहरी नींद से जागता •. । है) प्रदीप : प्रतिक्रियावादी, दकियानूसी, प्रगति, स्वतन्त्रता, मुक्ति-ये सव शब्द हैं। लेकिन' भी एक शब्द है। परन्तु यह उन सब बड़े-बड़े शब्दों को अर्थ- हीन कर देता है। (सहसा हंस पड़ता है) जैनेट : तुम इतने ज़ोर से क्यों हंसते हो? मेरा दिल पुग-युगे तानि घबराता है । याज बेटा और बेटी दोनों नाराज होकर चले गए। प्रदीप : लेकिन मैं तो नाराज नहीं हूं। तुम्हें मुझसे मत- लव है । (शरारत से)वसे एक दिन जब तुम्हारे भी प्रेमी थे, तब तुम भी घुमा-फिराकर कुछ ऐसी ही बातें किया करती थीं। जनेट : मुझे चिढाने की कोगिरा मत करो। तुम्हारी प्रेमिकानों को भी मैं जानती थी। प्रदीप : तुम्हारे प्रेमी और मेरी प्रेमिकाएं सब समाप्त हो गए। रह गए हम दोनों। इतना तो तुम मानोगी? जनेट : जवानी को उन बातों को जाने दो। हम दोनों हमेगा ही एक-दूसरे के होकर रहे हैं। प्रदीप : आज तो विशेष रूप से हैं। क्यो,क्यों है, जानती हो? अनिरुद्ध के दर्शनशास्त्र के अनुसार तुम स्त्री और मैं पुरुष, तुम मादा और मैं नर । जनेट : हम दोनों नर-मादा हो सकते हैं लेकिन काल और प्रायु के बन्धन से मुक्त नहीं हैं । हम बूढ़े हो रहे हैं। हमें एक-दूसरे की जरूरत है। प्रदीप : मैं ठीक यही कहने जा रहा था। यह 'लेकिन' गब्द युद्दापे को ही निगानी है। शका और दुर्वलता इमोके दूसरे नाम हैं । हम दुवंल ८२ युगे-युगे क्रान्ति । हो गए हैं। हमें सहारे की आवश्यकता है। नियम और वंधन उसी सहारे के दूसरे नाम हैं। सन्तान भी वही सहारा है। यह सहारा ही हमको प्रतिक्रियावादी और दकियानूसी बनाता है। लेकिन नहीं जैनेट, हम अव भी काल और आयु से लड़ेंगे। जैनेट : (सहसा गम्भीर होकर) तुम लड़ते रहो। मुझे अव काम पर जाना है। तैयार भी होना है। मैं जाती हूं।(तेज़ी से अन्दर चली जाती है) प्रदीप : सुनो जैनेट, सुनो ! मुझे ऐसा लगता है कि जैसे हम निरन्तर लड़ते आए हैं. 'अरे तुम तो सच- मुच चली गईं। जायो। लेकिन यह संघर्ष कभी नहीं रुका । रुकेगा भी नहीं । जैसे अन्विता और अनिरुद्ध हम ही हैं । जव मैं उससे विवाद कर रहा था, तो मुझे लग रहा था कि जैसे मैं स्वयं अपने आप को उत्तर दे रहा हूं। जैसे मेरे सामने अनिरुद्ध नहीं है, मैं ही अपने विरुद्ध खड़ा हूं। (वह भी अन्दर चला जाता है। मंच के उस भाग पर अंधकार उतरता है। अग्नभाग पर प्रकाश चमकता है। सूत्रधार और देवीप्रसाद दोनों मंच पर पाते हैं। देवी- प्रसाद जैसे एकदम कहीं खो गया है।) त्रधार : प्रदीप ने यह बात बिल्कुल ठीक कही है। जब

यगे-यगे प्रालि
८३
पुत्र पिता के विरुद्ध खड़ा होता है, तो वह स्वयं
पिता का ही नवीन संस्करण होता है। नहीं
होता?
देवीप्रसाद : (मोया-गोवा-ना) लेकिन मेरी कुछ समझ में
नहीं पाता। मुझे लगता है जैसे मैं स्वप्न देख
रहा हूं। जैसे यह सब मात्र एक नाटक था।
सच, नहीं था क्या ? क्या तुम विश्वास
करते हो कि आज की दुनिया में ऐसा होता है ?
सूत्रधार : होता है तभी तोतुम देख सके हो।
देवीप्रसाद : नहीं, नहीं, यह सब छल है । छलावा है। ऐसा
नहीं होता। जैसा कि मैंने कहा था मेरे भी एक
लड़की है ज्योत्स्ना। मैंने उसे ऊंची से ऊंची
शिक्षा दी। लेकिन मैं उसके लिए योग्य वर की
तलाग नहीं कर सका। जो हैं वे कीमत मांगते
है । सव कुछ व्यापार है।
सूत्रधार : (जोर से हंसता है) और मैंने भी कहा था न
कि तुम भी मेरे इस नाटक के एक पात्र हो
(मूत्रधार उसे सोचता हुमा पृष्ठभाग
में द्वार
के पास ले जाता है । वहा प्रकाग उभरता है)
यहां सड़े होकर अब तुम अपनी कहानी कहीं।
तुम्हारे एक लड़की है। तुमने उसे ऊंची से ऊंची
गिक्षा दी है। लेकिन तुम उसके लिए योग्य

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५
युग-युगै प्रान्ति
:
की जरूरत नहीं । अव तुम चैन की बंसी वजा
सकते हो।
देयोप्रसाद : क्यों, क्या हुआ? तुमने तलाश कर लिया?
स्त्री : मैं क्या कर सकती थी। जिसे जरूरत थी, उसने
कर लिया। ज्योत्स्ना ने विवाह कर लिया है।
देवीप्रसाद : (कापकर) विवाह कर लिया है ? किससे किया,
कब किया ? किससे पूछकर किया, मेरे रहते
यह सब कैसे हुआ ? वह कौन है जिसने उसे
फुसलाया?
स्त्री : वह एक युवक ही है। उसीके कालेज में पढ़ता
था। दोनो ने कल कोर्ट में जाकर विवाह किया
है। यह देखो पत्र।
देवीप्रसाद : देसू (पत्र लेकर पढ़ता है) "मेरा जाना प्रापको
बुरा लगेगा। मुझे भी अच्छा नहीं लगता।
लेकिन जाए बिना मुक्ति भी तो नहीं है। मुझे
जाना ही चाहिए। मेरा धर्म मुझे उधर खीच
रहा है। आप लोग अब तक मुझे यही समझाते
पा रहे थे कि मैं अपना भविष्य प्राप बनाने में
असमर्थ हूं, कि हर वेटा-बेटी असमर्थ होता है ।
कभी होता होगा। लेकिन अब तो मैं भी इन्सान
हूं। मेरी कामनाएं हैं, तमन्नाएं हैं, प्रारजूएं हैं।
उन्हें पूरी करने का मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार है।

५६
युगे युगे क्रान्ति
इस अधिकार को मैं किसी धर्म के नाम पर नहीं
छोड़ सकती। ऐसा करना अपने को धोखा देना
होगा। और अपने को धोखा देकर जीना नहीं
हो सकता। इसलिए मैं अब इस अन्धकार में
रहने का पाप क्यों करूं? लेकिन जाते-जाते यह
विश्वास दिलाती हूं कि मैं आपकी ही बेटी हूं।
मेरे इस कार्य से अाप भार-मुक्त होंगे। सोचिए
तो आप कब से तिल-तिल करके घुल रहे थे।
अव आप सुख की नींद सो सकते हैं।" (एक-क्षण
स्तब्ध-से दोनों एक-दूसरे को देखते हैं) सोचता
हूं, कुछ बुरा तो नहीं हुआ। (कहते-कहते सहसा
वहां पर पड़ी हुई चौकी पर लेट जाता है) यहां
बड़ी शान्ति है। सचमुच मुझे लगता है जैसे सर
पर से कोई बड़ा बोझ उतर गया है। बहुत अच्छा
लगता है मन को। जितना चाहूं उतनी दूर तक
उड़ सकता हूं। सोचता हूं अव कुछ देर सो लिया
जाए।
स्त्री : (हतप्रभ) तुम सोना चाहते हो । कुल की नाक
कट गई और तुम्हें नींद पा रही है। क्या तुम
उसके पास नहीं जाओगे?
देवीप्रसाद : जाऊंगा, लेकिन ग्राज नहीं। आज तो मुझे बड़े
ज़ोर की नींद आ रही है (नाक को छूकर) और
।

युग-युगे प्रालि
मेरी नाक भी अभी सही-सलामत है।
(मांसें मीच सेता है और तुरन्त सरटि भरने लगता
है। स्त्री पागल-गी उसे देखती है। सूत्रधार बड़े जोर रो
हंसता है।)
सूत्रधार : सूव! नाटक के इस अन्त की तो मैंने कल्पना
भी नहीं की थी। अब लगता है, सचमुच ही
प्रान्ति द्वार पटसटा रही है। (स्त्री से) इन्हें
सोने दीजिए। बेचारे जैसे वर्षों से न सोए हो।
प्राइए हम लोग चलें । (स्त्री मि.भ.कती है)
पाइएन, यहां इन्हें कोई परेशान नहीं करेगा।
(स्त्री चित्र-लिमिन सी पीछे-पीछे मच से बाहर पली
जाती है। तभी मन्दर से एक-एक करके सभी पात्र मच
परमा जाने हैं । वे मचरज से सोते हुए देवीप्रमाद को
देखते है।)
एक पात्र : यह कौन है?
दूसरा पात्र : यह भी शायद इस नाटक का कोई पात्र ही है।
पर हमारी इस स्त्रिप्ट तो इसमी कोई चर्चा
नहीं है । नाटक के मन्त के बारे में प्रभी लेगक
के साथ विचार करना है । (मूत्रधार का प्रवेग)
सूयधार , लेकिन अब उसकी कोई जरूरत नहीं। हमें
वास्तविक जीवन का एक पात्र मिल गया है।
तुम्हारा पपा ख्याल है ? इसमे बढ़िया मन्त हो

སེ, ལླཡེ इस शोरकार को किसी धर्म के नाम पर नहीं हो सकती। ऐसा करना पनेने शेखा देना होगा। औररने को होतादेकर सोना नहीं ो सकता ? तिलिए मैं इद इस कार में रहनेगा पाप जमकर निकाले-काले पर विशाल दिलाताई कि मैं मानती । मेरे इस कार्ड से मारनारमुक्त होंगेतोचिर तो कम से तिल-तिल करके दुल रहे । जाल को नर तो सकते हैं। एक- तब्ध से दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। सोपा हूँ, हुआ बुरासोनोला। (कहते-कहते सहसा पहा परपसी हुई चौकोपरले जाता यह को शान्ति है। सपमुद मुझे लगता ते तर परसे कोई दबोनस्तरमपरा रूप लगता है मन को जितना पाई जानी र इतकताई! लोनलाई दुर देर लिया स्वी : (हता हम सोनामारले हो। कुल को नाक कई और उन्हें नीरमा रही है। कर तुम उसके पास नहीं कालोगे? देवोऽताद : बाला लेकिन बाद नहीं । लादतो मुझे बड़े और को नौदला रही है (नाक को कूकर और

युग-युग प्रालि
मेरी नाक भी अभी सही-सलामत है।
(मार मीच लेता है और तुरन्त सर्राटे भरने लगता
है। स्त्री पागलमी उसे देखती है। मूत्रधार बड़े जोर से
हंसता है।)
सूत्रधार : खूब ! नाटक के इस अन्त की तो मैंने कल्पना
भी नहीं की थी। अब लगता है, सचमुच ही
फ्रान्ति द्वार पटसरा रही है। (स्त्री से) इन्हें
सोने दीजिए । वैचारे जैसे वर्षों से न सोए हों।
प्राइए हम लोग चलें। (स्त्री भिमकती है)
पाइएन, यहां इन्हें कोई परेशान नहीं करेगा।
(स्त्री चित्र-सिसित सो पीछे-पीछे मंच से बाहर चली
जाती है। तभी अन्दर से एक-एक करके सभी पात्र मच
पर पा जाते हैं। वे अचरज से सोते हुए देवीप्रसाद को
देखते हैं।)
एक पात्र : यह कौन है?
दूसरा पात्र : यह भी शायद इस नाटक का कोई पात्र ही है।
पर हमारो इस स्क्रिप्ट में तो इसकी कोई चर्चा
नहीं है। नाटक के अन्त के बारे में अभी लेखक
के साथ विचार करना है। (मूत्रधारका प्रवे)
सूत्रधार : लेकिन अब उसकी कोई जरूरत नहीं। ह
वास्तविक जीवन का एक पात्र सहै।
तुम्हारा क्या ख्याल है? इसने काम

८८
युगे-युगे कान्ति
सकता है किसी नाटक का ? परदा यहीं गिरा
दो।
(सब लोग हंसते हंसते सिर हिलाते हैं। परदा गिरने
को होता है । उसी क्षण देवीप्रसाद यंत्रवत् उठ बैठता
है।)
देवीप्रसाद : (नींद में है) नहीं-नहीं ! यह नहीं हो सकता।
मैं इसी क्षण उसके पास जाऊंगा। मैं उसका
पिता हूं। उसे मुझसे पूछे बिना विवाह करने
का अधिकार नहीं। यौवन तो अल्हड़ होता है
और प्रासानी से पथ-भ्रष्ट किया जा सकता है।
मैं यह कैसे देखता रह सकता हूं ! मैं उसे अभी
लेकर पाऊंगा। मुझे समाज में रहना है और
(यंत्रवत् बिना किसी ओर देखे नींद में ही बाहर की
ओर बढ़ता है । सब ग्राश्चर्य से उसे देखते हैं।)
एक पात्र : अन्त अब हुग्रा है। ऐसा अन्त जो कभी संघर्पको
समाप्त नहीं होने देगा।
(सब उसी तरह खड़े-खड़े चकित भाव से देखते रहते
हैं। परदा गिर जाता है।)

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Yuge Yuge Kranti

Author
Prabhakar Visnu
Title
Yuge Yuge Kranti
File name
Yuge Yuge Kranti
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2011/03
Publisher
Delhi,the Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
92
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
History
DLI number
552112
Barcode
4990010032837.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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Copyright permitted
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