Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Shripal Rajaka Raas
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श्रीसरतरगच्छगगनागणनभोमणि आचार्यवर्य श्रीजिनचद्रसूरीश्वराशावर्ती कविशेखर महोपाध्याय श्रीजिनहर्पजी गणिकृत श्रीपाल राजाका रास. (सचित्र) - सपादक व संशोधक- श्रीखरतरगन्छनायक कियोद्धारक शासनप्रभावक श्रीमोहनलालजी महाराजके प्रशिप्यरत ख०जनुयोगाचार्य पंन्यासमवर श्रीमत् केशरमुनिजी महाराज- प्रकाशक- क पन्यासजी महाराजकेही उपदेशद्वारा समाप्त अनेकगृहस्थोंकी द्रव्य सहायसे श्रीजिनदत्तसूरिजी शानभडार मुबईके कार्यवाहक झवेरी-मूलचंद हीराचद भगव - "निर्णयसागरयत्रणालय" कोलभाटलेन २६-२८ नवरमे रामचन्द्र येस शेडगेद्वारा मुद्रित कराके प्रकाशित किया ! वीरसपत् २४६३ कीमत १-०-० विक्रमसवद् १९९३ - द्रव्यस० शुभ नाम द्रव्यसहायकाके शुभ नाम- ४२५ मारापदजी सगात्री, चूहा, मारगर ५० पोट गूलचदजी लोमागमल जी पलोधीवाले, मुई 1 • होगमती नपानी, चूदा ४३० मोतीजी उदाजी, पादरली, भारयाद मरी केगरीपद कल्याणघद, सुरम ३. शा० सिमाजी छगनलाल, घूमा 1.जानी गुमानी, कपरारा, मारवाह २५० जेरूपजी लसाजी, चादाई 1. सिनरी सालारजी मारत, पाली, मारदार २५ शेठ फतेचदजी सीमाल, पाली, मारवाश ५. गणेमजी सोमाराम जी, मुबई २५ सा० शिवाजी पापाजी, सिवाणदी ५. भीमरावजी देवीथदनी, सीवरीवाले, मुख २५० मोणसीभाई वीरचद, करळन 41 दवा शिवजी, कररभुज २२ शा० मेसमलजी हसाजी, पादरली, मारवाद ५. भीमदजी नगरानी, चूदा, मारवाट "शा०पूनमचदती गुलावचदजी, दृक्षाणा, मारवाड ५. मा फोरमर जी परषद्बी, निया ५ मा० दलीचदजी नायागी, दूशाणा ५. सासरीमती रसींगनी, गुगलवरी ५शा० रतनचंदजी धूदाजी, गुगवारोतरा ५1० माग थावरमाइ (स्वपयु मोहनलाल यावरमाइरे स्मर ५० पोजमएजी केशाजी, सेपाटी पा), करमाची ४० प्रवापमलजी चुनीलारजी ५१ गाणी वापरबाई, काकता ३ शेर रिद्धिलारनी, मुउनवाला " ॥२॥ .
- श्रीपाल समर्पण. समर्पण- वादलब्धिसमलकृत विद्वशिरोमगि शमदमाद्यनल्पगुणगणरमभडार अनुयोगाचार्य पन्यासमवर परमपूज्य प्रातःसरणीय गुरुदेव श्रीमत् केशरमुनिजी महाराज ! आपने इस वालक्को आवालकालसे निरतर अपने पास रखकर ज्ञानादिक गुणोंमें स्थिर रहनेके लिये जो अनुपम प्रयास किया, हरएक वखत विविध प्रकारकी शिक्षाओं द्वारा उन्मार्ग प्रवृत्तिसे बचाया, और पापाणसम हृदयकोमी ज्ञानां- कुरोंसे पल्लवितकर साहित्यसेवाका अनुरागी बनाया, इत्यादि असीम उपकारोंकी स्मृतिमें आपकाही सपादित व सगो- धित और आपके ही अमृतमय उपदेशसे प्रकाशित होता हुआ यह प्रथरत्न "श्रीपाल राजाका रास" आपही के स्वर्गीय पुण्यात्माको विनय भक्ति श्रद्धापूर्वक निवभावसे सादर समर्पित है विनीत- आपका चरण सेवक बुद्धि f4 - श्रीपाल. रास + प्रस्तावना- प्रस्तावना esedpo- जगामें धर्मही एक ऐसी वस्तु है कि-तिसके आरावासे जीप ससारसमुद्रसे पार हो सकता है । धर्माराधनके विविधप्रकारोंमें नवपदाराधनभी एक है, तो सबमें प्रधानता पाया हुआ है, उस नवपदकी महिमागर्भित यह श्रीपाल राजाका रास आज पाठकोंके सामो रसा जाता है, जोकि-विक्रम मवत् १६४० वर्ष, पाटण शहरमे श्रीखरतरगच्छागनागणनभोमणि शत्रुजयमहात्म्यरास- उपमितिभवप्रपचाकथारास आदि विविधरासोरे रचयिता विचाचूटामणि महोपाध्याय श्रीजिनहर्पजी गणिवरका बनाया है। उद्देश-यद्यपि प्रस्तुत रास शिपाय इन्दि कविवरने एक दूमराभी श्रीपालरास बनाया है, जो अत्यत सक्षिप्त है, परतु प्रस्तुत 'रास'का बाह्य देह अतिपिस्तृत या अतिसक्षिप्त न होनेसे ओलीके दिनोंमे सुसपूर्वक समाप्त किया जा सफ्ता है, एव कृतिभी बहुत सरल और भावपाहि रोचक है, इसकी पहली आवृत्ति रायबहादूर वायू धनपतसिंहजी दूगड मुर्शिदाबाद निवासीने छपाइ थी, उसमें वहत अशुद्धिया थीं ओर टाइपभी कर कत्तेके थे, निमसे याचनेमे बडी असुविधा थी और यह प्रति अव मिलतीभी नहीं, इत्यादि कारणोंसे इसकी पुनरावृत्ति छपवानेकी भावना वर्गस्थ पूज्य गुरुदेवफे हदयमे जागृत हुई। तत्पश्चात् छपी हुई प्रति परसेही यथाशत्ति सशोधन करके प्रेसकॉपी तयार करवाई, चादमें एक प्रति हम्नलिसित बीकानेर निवासी इतिहासप्रेमी साहित्यसेवक सुश्रावक अगरचदजी नाहटा द्वारा मिली, जोकि ज्यादा अशुद्ध नहीं थी, उसके आधारपर कॉपीका सशोधन किया गया और पूज्य गुरुदेवकी देसरेसमेंही रास छपभी गया लिर्फ प्रसापना तथा ओलीकी विधि एव चिनादिका काम बाकी प्रस्तावना- श्रीपाल. रहाथा, इसके विचार में एवं अन्यान्य कार्यकी व्यग्रतामें कुछ टाइम निकल गया, इवनेमें "श्रेयासि बहुविवानि" इस नियमानु- सार सवत् १९९३ के कार्तिक शु० ६ के रोग परमपूज्य गुरुदेवका अकस्मात् स्वर्गनास होजानेसे इसके प्रकाशनमें अधिक विलय हुआ। पहले विचार यहधा कि-कठिन शन्दोंके अर्थ टिप्पनीमें देदिये जॉय और पहले फारममे क्रियाभी वैसाही, परंतु सयोगकी प्रतिकू- टताके पारण आगे से न करके केवल मूलही छपवाया है । स्थलसकोचक कारण कवियरका परिचय यहा नहीं दिया गया जाननेकी अनिलापावाले वाचक गण देवचद लालभाइ जैन पुलकोद्वार फट सुरत द्वारा प्रकाशित "आनदकाव्यमहोदधि" भौतिक चोथेकी प्रस्तावना आचार्य श्रीबुद्धिसागरसूरिजी लिखित, गधा मोहनलाल रलीचद देसाइ सोलीसिटर लिसित "गुर्जर कविओ" नामकी पुस्तक देसलें। इसके प्रकाशनमें पूज्यपा" प्रात स्मरणीय स्वर्गस्थ गुरदेवके अमृतमय उपदेशसे जिन जिन महानुभावोंने उदार चित्तसे द्रव्य सहा- यता देके अपनी न्यायोपार्जित लक्ष्मीको सफल करी है, जिनके नाम टाइटल्पेजके मुखपृष्ठपर दिये गये हैं, उन सबको यहा धन्यवाद दिया जाता है, अन्य धनवानारोभी ऐसे साहित्यसेवारे शुभकार्यमे इनका अनुकरण अवश्य करना योग्य है। अंतमें यद्यपि इसका मुद्रण व सशोधन कार्य स्वर्गस्य पूज्य गुरुदेवके करकमलोंसे बडी सावधानी के साथ हुआ है, तथापि छास्तिक स्वभावानुसार दृष्टिदोपसे या प्रेमके कर्मचारियोंकी गफलतसे जो कोई अशुद्धि दृष्टिगत हो तो सजनोंसे नम्र प्रार्थना है कि वे सुधारके पढ़ें। म्पर्गस्थ आयोगाचार्य विद्वशिरोमणि परमपूज्य गुरुदेव पन्यामजी-श्री १००८श्रीकेशरमुनिजी महाराज इस श्रीपालरासके सपादक व सशोधक हैं अत उचित है कि उनका कुछ जीवनपरिचय करादिया नाय, इस लिये उनका सक्षिप्त जीवनपरिचय यह आगे दिया जाना है- पाल. प जीवन- परिचय इस बफे सपादक विद्वत् शिरोममि अयोगाचार्य २० पन्यासमा श्रीमत्केशरमुनिजी महाराजका संक्षित जीवनपरिचय- मारवाड देशको राजधानी जोधपुरसे दक्षिण २० कोशके पासले पर चूडा नामका एक मुरमा गाम है, वहापर.वि० सं० १९३२ के माघ वदि अमावसको आधीरानके समय गुमलमम आपका म हुआया, पिता नाम शाह रतनाजी मानामा राम रभादेवी था, आपका सुदका नाम गृहस्थपरम केसरमलजी था, शल्य अवस्थाने ही शानाम्यास तथा धार्मिक यात्री तरफ गपि अच्छी थी। सवत १९८६ में आप मुंबई आकर व्यापारमें जुड़े और थोडेही दिनों अपने युलियाने ज्यापार निया शरता प्राप्त करके एक सराफी दुकान उपर, भागीदारीमें सतत्र व्यापार करने लगे निमसे आर्थिक राम अच्छा होने गाया, इधर मुंबई में सबसे पहले सविसाधुऑका विहारद्वार खोलनेशले शासम्पमापी जगन्पून्य शासनप्रभावक परतरगच्छगगनांगणदिनमणि क्रियोद्वारक श्री १००८ श्रीसोरनलालजी महाराजका पधारना मुंबईमें पहले प्रथम सपत् १९४७ में हुमा, व्याख्यानादिम भावे जाते केसरमरजीको महाराजमाईसा कुछ परिचय हुआ सोही कुछ वैराग्ययास सभी माटी, जवकि १९५२ फे वर्ष दूसरी बात महा- राजसाइयका पधारना मुंबई में हुआ वयसे महागाजीले परिचयमें केसरमलजी विशेष आने लगे, ग्यों ज्यों अधिक परिचय होला गया त्या त्या आपकी धार्मिक सपि पढने लगी, वह इतनेतक पदी कि जो इस असार समारो सर्वया त्यागकर दीक्षित होनानेकी भावना परिणत होगइ, परतु वह भापना मुंबइमें सररहोसी मुशिलथी, कारणकि सगे संबंधी माइ मधु आदि तमाम दुनियोंदी मौजूदगीमें मोहनीयकर्मीबरतासे अनेर पिन आने समावना थी, अच आपने अपनी भागीदारीमा मिला पहले फरलिया, बादमें परम- +ga ६ जीयन परिचय पश्री १००८ श्रीमोहनलालजी महाराजकीरजासे मालय जाफर रतलामकेनिकटवर्तियांगरोदे गाममें महाराजवे ही विद्वान श्रीपाल. for श्रीनागराजमुनिजी महाराज के शुभहस्तसे विक्रम स० गुजराती १९५२ तदनुसार हिंदी १९५३ फे आपा सुपचमीकै शुभ दिनको मागपती दीदा अंगीकार मरी और पूज्यपाद श्रीमारमोहनलालजी महाराजकी आशानुसार.श्रीहेममुनिजी महाराजके शिष्य बने । पहला पोमामा रतलाम, हुआ, पूज्य श्रीमान राजमुनिजी महाराजकी अध्यक्षतामें अध्ययन शुरु किया, क्रमशः प्रतिप्रमणाविकी पोइ पूरी कर दूसरेही वर्ष,जवकि आपका चौमासा दीक्षा गुर श्रीमान राजमुनिजी महायजके साथ सादडी (मारवाड)मैं था, व्याकरण पदना शुरू करदिया चौमासा उतरे बाद महाराजसाहेनकी आमासे आपने विहार किया और अहमदावाद पंधारकर पूज्य श्रींमोहनलालजी महारानके दर्शनासतसे अपने आत्माको पवित्र किया, यहापर स्वर्गस्थ पूज्य आचार्य श्रीजिनयर्श सूरिजी, उसवस्तके श्रीमान यशो मुनिजी महाराजके मास आपने यद्धी दीक्षा योगोदहन किये और पेयापुरमें उन्ही महाराजके शुमहतसे आपकी बडी दीक्षा हुई। " तीसरा चौमासा अहमदाबादमें पूज्य श्रीमान यशोमुनिजी महाराज आदिके साथ और चौथा पांचवा चौमासा जाम- नगरमें पूज्य श्रीदेवमुनिजी महाराज साथमें हुआ, इतनेतकमें व्याकरणादिका अभ्यास आपके ठीक होगयाथा, यहीपर आपने कल्पसूपी दीपा सुबोधिका व्याख्यानमै बांधनी शुरु करीथी, छट्ठा सातवा चौमासा सुरत-मुंबईमें महाराज साहेबके साथ हुआ, पुरसेही अभ्यासकी तरफे लक्ष्य अच्छाथा, अन्यके साथ फल पातचीत आदि प्रपचमें प्रवृत्ति फैभवी, अते दिनोंदिन अभ्यास Sri गया, थोडेही वर्षोंमें व्याकरणमें सारस्वत चद्रिका तथा सिद्धांतकौमुदी, न्यायमें तर्कसंग्रह मुक्तावली तथा लावादमंजरी ऑदि एक मान्य कोप तथा सिद्धातकोभी शान अच्छा सपादन, किया
श्रीपाल.
जीवन-
परिचय.
॥८॥
सवत् १९६९ को मुंबईका चोमासा पूरा हुए बाद महारानसाहेवकी आज्ञासे पन्यासजी श्रीमान् यशोमुनिजी महाराज आदि
साधुओंने मारवाडकी तरफ बिहार किया उनमें आपभी शामिल्थे, संवत् १९६० का चौमासा गुरुदेव श्रीमोहनलालजी
महाराजी आज्ञासे अन्य दो साधुओंके साथ आपने शिरोहीमें किया, यह सबसे पहला स्वतत्र चौमासा आपकाथा, ' इसके बाद
प्राय अधिकाश चौमासे आपके स्वतनही हुए।
आपकी व्याख्यान शैली बहुत प्रसनीयधी, हरक वस्तुका प्रतिपादा करतेहुए इसतरह भिन्न भिन करके समझातेथे कि मूर्ससे
मूर्सभी वस्तुस्वरूपो भलिप्रकार समझ सफ्ताथा । वादशक्तिमी ऐसीहीथी, प्रश्नकार चाहे जैसे जटिल प्रश्न क्यों न करले, परंतु आपकी
तरफ्से युक्ति र प्रमाण पूर्वक ऐसा उत्तर मिलताथामि-जिससे प्रश्नकारको आगे कुछ बोल्नेका अवपाशही नहीं रहता, लेखन काभी कुछ
पम नहीथी, इस वावकी सागीतिके लिये आपके बनाये मथ प्रश्नोतरविचार, प्रश्नोत्तरमंजरी, हर्पहृदयदर्पण आदि विद्यमान
है, तिनपा प्रत्युत्तर युति व प्रमाण पूर्वक आजतक किसीसे नहीं दिया गया, इसप्रकार आपकी योग्यता कारणही सरतर गच्छकी
वर्तमान सविज्ञशासाके प्रथम आचार्य श्रीमान् जिनयश सूरिजी उमवरतके पन्यासजी श्रीयशोमुनिजी महाराज कि, जिनका फोटु
इसी पुस्खयमे आपकी दहेनी तरफ दिया गया है,उहाँने सवत् १९६६के वर्ष लश्कर (गवालियर) में भगवती पर्यंत सूत्रोके योगोद्वहन कराके
आपको गणिपद तथा पंन्यास पदसे अरहत कियेथे, उन्हि पूज्य गुरुदेव साथमें आपने मम्मेत शिसरजी आदितीयोंकी याना करीथी।
आपने चालीस वपसे कुछ अधिक समयराक निर्मल चारित्र पारा, इस दीर्घकालीन ग्रामण्य पर्यायमें कच्छ दक्षिण और पजारके
शिराय प्राय सभी देशोंमें ज्यादा फम भापका विहार हुआ है, आगे लिखे जानेवाले स्थलोंमें आपके चौमासे इस प्रकार हुए हैं-
॥८॥
धीपाल. 'जीवन- परिचय यसे कप्पड़, रतलाम २, सादडी १, अहमदाबाद , जामनगर २, सुरत ५, मुबई ३, शिरोही १, जोधपुर २, पाली ३, बीकानेर १, लश्कर- (गवालियर) १, कलकत्ता २, बालुचर ( मक्सदाराट) १, विहार (पावापुरी) १, लसनो २, दिल्ली १, चूडा (स्वजन्मभूमि), अगवरी २, गुडापालोतरा १, आहोर १, परारा १, पादरली १, पालीताणे १, इससे स० १९५९ का और स० १९९२-९३ के अतिम २ चौमासे मिलके कुल ३ चौमासे आपके मुघइमें हुए । पिछले तीन वर्षांसे आपको लीवरका दर्द लागु पडाया, जिससे ज्यादा व्यारयादि आपसे नहीं बनताथा, तोभी इस गत चौमासे के अदर दूसरे भादवेमें ८० दिनसे पयुपण करनेवारों के आपसमे तव शनि-रविका झपडा उठा तव आपने तो कल्पसूनके "अंतरावि नो से कप्पइ त रयणि उवारणावित्त" इस वचनानुसार पचासके अदर ४९ दिने पहले भादवे यापि पर्युपण परलियेथे तथापि गोडिजीमदिरके भेनेजींग ट्रस्टि श्रीयुत मणिलाल मोहनलालभाइ आदि आगेवानोंके ३-४ वरत आफर अत्यत आग्रह फरनेसे सघमें शति रहने टिने मगलनिमित्त कल्पसून वाचकर मुनानेके वासे गोडिजीमें क्या सेंडहर्स्ट रोडके उपाश्रयमें अपने शिष्या- टिको भेनेकी एव समयपर अपने खर पधारनेकीनी जो उतारता वापरीथी उसीका यह तीजाया कि-सपर्म यत्किंचितभी शाति रहसकी। इस अंतिम चोमासेमें साधारणतया अापकी तबीयत ठीरही रही, सात पचमीका उपयास किया, दूसरे दिन पारणा मजेसे किया, दुपहरको आहारपानीभी हमेशाकी तरहही किया, किसीको स्वप्नमेंभी यह सयाल नहीं हुआया कि-आनही आप इस देहके सयधको सदाके लिये छोडदेगे, परतु माविमें जो होनेकोथा यह मि या कैसे होसके, वस उसी दिन याने सवत् १९९३ कार्तिक शुरु ६ गुरुवार के दिनको सवा दो बजे अकस्मात् हार्टफेल होजानेसे देखते देखतेही पायधुनी महावीर निनाल्यके पिल्ले मटोवर मरतरगच्छके उपा रयमें इस
श्रीपाल.
रास
॥१०॥
जीवन-
परिचय
विनश्वर शील औदारिक शरीरको खागकर आप स्वर्गको सिधारगये, बस फिर क्या कहनाथा, यह दुखद समाचार थोडीही देरमें
दिनलीके वेगसे आखी मुबईमें एय वारद्वारा अन्यनमी सब जगह फैरगये, उसी समयसे दर्शकोंकी जो भीड शुरु हुई वह रात्रिको
११ वजेतक ण्व दूसरे दिन सवेरे पाच वजेसे ९ वजेतक एकसरखी लगी रही।
सप्तमीके दिन जापके देहयो वालकेन्धर लेजानेके लिये ठीक ९ बजे हजारों मनुष्योंकी मेदिनीके साथ संस्कार यात्रा निकाली गयी,
रत्तेमे कई फोटु लिये गये, एक अमेरिकन तो गिरगामसे साथ हुआ सो वालकेश्वर सरकारभूमितक पैदल चला, रस्तेमें ५-६ फोटु उसने लिये,
अतमै फोटु लेनेमे किसी तरहकी रुकावट न करनेकी वायत सघका महान उपकार मानता हुआ १० रु० धर्मादमें देकर अपने स्थानको गया।
ठीक ११ वजे आप देहको लेकर सब लोक वालकेश्वर वाणगगाके पास समुद्रके किनारे हिंदुस्मशानभूमिमें पहुचे, यहा योग्य
स्थानपर हजारों मनुष्योंके समक्ष पेचल चदनसे आपका अग्निसस्तार किया गया, उस दिन मुंबई के बहुतसे बाजार बघ रहेये
आपहीने इस प्रथया सशोधादि फिया है अत पाठकोंकी जानकारीके लिये आपका कुछ जीवन परिचय देना उचित समझा गया,
तदनुसार जो कुछ वना यथा ज्ञात जीवनपरिचय यह उपर दिया गया है, स्थलसकोचके कारण हालतो इतनेसेही विराम लेताहु, इति शम् ।
सवत् १९९३, मौन एकादशी
महावीर जिन मदिर, मडोवर खरतर अनुयोगार्य-श्रीमत् केशर मुनिजी गणिवर धरणाज चचरीकातेवासि
उपाश्रय, पायधुनी, मुबई
बुद्धिसागर
नन मार्थी-
॥१०॥
कवित्वलब्धिसपन श्रीमल्लब्धिमुनिजी महाराज रचित समराधित पञ्चप्रस्थानमयसूरिमन श्रीखरतर गच्छको यत्तमान सविज्ञशाखाके आधाचार्य
स्तुत्यष्टक
श्रीपाल.
रास
श्रीजिनयशासूरीश्वर स्तुत्यष्टक-
खरतरामलशिष्टगणार्चित, खरतरारयगण सुतपखिन । सुविहिताप्तजिनेश्वरमार्गग, प्ररसरियामगुरु स्तुवे ॥ १ ॥ मरुधरस्थितयो-
धपुरोपण, ततवरौशकाशविभूपण । फरकुंनन्दकुंवत्सरजन्मक, प्ररसरियशामुगुरु स्तुरे ॥ २ ॥ वजनकार्पित जेठमलामिध, स
चढेर कुनसरदीक्षित । खगुरुदत्तयशोमुनिनामक, प्ररमरियश सुगुरु स्तुरे ॥ ३ ॥ सुमुनिमोहनमोहनशिष्यक, प्रवचनाष्टकमातृविशोमित ।
विमलपञ्चमहानतधारक, प्रारमरियशःसुगुरु स्तुवे ॥ ४ ॥ समययोगसुयोगविधायक, गजैशरो कुवत्सर प० पद । सकलमूत्रविदं मुनिसतम,
प्रनरसरियशम्सुगुरु स्तुरे ॥ ५॥ बंगरसाकेकरिपद गत, प्राररिगुणौवविशोभित । प्रशमशान्तदमय जितेन्द्रिय, प्ररसूरिपशामुगुरु स्तु
॥ ६॥ गतरूपायमदाश्रवगारव, सकलजीवनिकायतिपालक । खरतर दशधा यतिधर्मप, प्रवरमरियशामुगुरु स्तुते ॥ ७॥ खमुनिवेदविधी
चरमाईत , शिवपरित्रितभूमितले वरे । अनशन प्रविधाय दिन गत, प्रवरसरियश:सुगुरु स्तुवे ॥ ८॥ पठति य सुगुरोरिदमष्टक, प्रतिदिन
शुभभावनया मत्री । खमनइच्छितमत्र परत्र च, स लमते परकीर्तियश सुखम् ॥ ९॥
श्रीपाल रास स्तुत्यष्टक ॥१२॥ करिवधिमपन श्रीमल्लब्धिमुनिजी महाराज रचित वादिगजकेसरी पिहितमकागमयोगानुष्टान अनुयोगाचार्य एन्यासप्रार श्रीकेशरमुनिजी गणिवर स्तुत्यष्टक- यस्याभर मरुधरस्ससुरम्यचूण्डा-ग्रामे मुने कर-गुणा-इंशशाङ्क वर्ष । जाम प्रशान्तपदनस्य जितेन्द्रियस्य, पन्याम केशरमुनिः सुगुरु स जीयात् ॥ १ ॥ यो मालवस्थितजनाकुट्याङ्गरोद-मामेऽग्नि-वाण-खंग-भूमिगृहीतदीक्ष । वैराग्यरङ्गसुततिभानतोऽभूत्, पन्यास केगरमुनि सुगुरु स जीयात् ॥ २ ॥ योऽभूट सत्खरतरामटशिष्टिस्तो विद्वद्वर मुविहितोऽगमक्रियावान् । श्रीआर्य मोहनमुनिप्रवरप्रशिष्य , पन्यास केशरमुनि सुगुरु स जीयात् ।। ३ ॥ पत्त्यासयुग्गणिपद प्रराय गोप-द्रो शरीर-रस-नन्द-शशोक वर्षे । यस्मै प्रदायि गुरुणा प्रविधाप्य योगान्, पन्यास केशरमुनि मुगुरु स जीयात् ॥ ४ ॥ येनार्हतीयसमये कथित यथार्थ-सत्यस्वरूपममल मुनिना प्रदर्य । स्पष्टीकन प्रवलसाग- रिकरपञ्च , पन्यास केगरमुनि. सुगुरु स जीयात् ॥ ५॥ विद्वत्तयोजित उपक्षगणानिरस्पी-हलिटिकसरतरीयगणोऽखिलोऽपि । वाचयमेन च जर्जागरितो योन, पन्यास केशरमुनि सुगुरु स जीयात् ॥ ६ ॥ प्रश्नोचरादिवहयो रनिता वरिष्ठा, प्रया शिवामिविवोधकरण येन । सत्पबदुधरमहानतधारकेण, पन्यास केशरमुनि मुगुर म जीयात् ॥ ७ ॥ मगद्गुणाईगर्गभूनिसने च मुन्या-पुयां मुरालयमगात्सुसमाविप्न । ध्यायश्च पञ्चपरमेष्ठिनमस्कृति य , पन्यास केशरमुनि सुगुरु स जीयात् ॥ ८ ॥ सद्बुद्धिद गुरुगुणायपविनित य, श्रद्धालरएर मिद प्रपठेत्सदैव । उत्पद्यते झटिति सुव्रतरतलन्धि- श्रीवुद्धिसागरतरङ्गगणश्च तस्य ॥ ९ ॥ * आज्ञा । (१) हन । (२) पुरै। प्रीहर । (३) प्रयल। (6) निराहल। (५) सावधानीकृत । (6) रश्मी।
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चूडा श्रीखरतरगच्छगगनांगणदिवाकर-जगत्पूज्य थीमोहनलालजी महारानके मुख्यशिष्य घोरतपस्वी वत्तमानखरतरसंविज्ञशाखाके प्रथम आचार्य- श्रीजिनयशासूरीश्वरजी महाराज. दीक्षा गणि-प. पद रिपद वर्ग १९१२ १९४० जोधपुर जोधपुर अहमदावाद मक्षदाबाद पावापुरी जनेतरोंमें जैनम जो, मान्य थे निजपुण्यसे सबके मदा गुरराज थे, उपदेशके नैपुण्यसे । एस महामुनिरान मोहन-लालजी जो हो गये, क्या शिष्य थे या भूमिपर उनके, यश का पुत्र ये॥१ सब मुनिवरोंमें आप रारतरके प्रथम सूरीश थे, सचमुच कह तो आप, हम सब सरतरोंके ईश थे। पावापुरीमें घोर तपार, करगये स्वर्गमन हे, से मनोहर जिनयश -सूरीश मेरी शरण हे ॥२॥ (माम्नर-विनयचद मोहनलाल) श्रीसिद्धचक या नवपद मण्डल. (झरी-जीवणचद साफरचदके सौजन्यसे सम्प्राप्त कुष्ठादिरोगशमक भवसिन्धुपोतम्, दुष्पाष्टरमतृणवन्हिमचिन्त्यशक्तिम् । सम्पत्कर परमयोगिनत नमामि, श्रीसिद्धचक्रपदमक्षयधामदात् ॥ १॥ सर्वश-सिद्ध-गणि-पाठक-साधु-सम्य क्त्व-शान-सद्रत-तपोऽङ्कपदानि सन्तु । मे श्वेत-लोहित-सुपीत-हरित्-सुनील श्वेतादिवर्णविराणि लसत्सुखाय ॥२॥ (कविवय श्रीरब्धिमुनिजी महारान) श्रीखरतरगच्छगगनांगणनभोमणि-जगद्वद्य-श्रीमोहनलालजी महाराज के प्रशिप्यरत-चादरन्धिसपन-अनुयोगाचार्य- पन्यासमवर श्रीफेरारमुनिजी महाराज. दीक्षा गणि-पं० पद १९३२ १९९३ वागरोद रकर (गवालियर) जो विश्वम बहुमान्य मोहन-लालजी मुनिराज थे, उन पूज्यके विद्वान मुन्दर, शिप्यके भी शिप्य थे। निजधमक निन्दक न क्यों, हो वे भले सरसे , उन धादिगजके सामने ये, केसरी रहकर सड़े ॥१॥ फिर धमके साक्षेपको, करते सदव सुदूर ये, मी पियाके थे तथा गुभ, शान्तरस भरपूर थे। एसे महा मुनिराज हमको, छोहार जाते रहे, पन्याग श्रीकेशरमुने ', मुथ नमन वारवार हे ॥ २ ॥ (माता-विजयचद मोहनराठ) नि मा प्रेम
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ॐ श्रीसिद्धचक्राय नमः
श्रीखरतरगच्छनभोमणि आचार्य श्रीजिनचंद्रसूरीश्वर वाचक श्रीसोमगणि.
शिष्य महोपाध्याय श्रीशातिहर्प गणि शिष्य कविवर महोपाध्याय
श्रीजिनहर्ष गणिकृत श्रीनवपद महात्म्य गर्भित
श्रीपाल राजाका रास.
। ग्रयोलमा
वोकानेर।
दूहा-श्रीअरिहंत अनंतगुण, धरीये हीयडे ध्यान । केवल ज्ञान प्रकाश कर, दूर
हरण अज्ञान ॥ १॥ चउद राज ऊपर रहे, सिद्ध अनंत समृद्धि । मुगति युवति सुख
भोगवे, दायक अविचल सिदि ॥२॥ आचारिज पय युग नमू, पाले पंचाचार ।
गुण छत्रीस विराजता, आगम अरथ भंडार ॥ ३॥ कर जोडी नित प्रति नमू, चोथे
भीपाए.
रास श्रीपाल पद उवज्झाय । द्वादशांग मुख उपदिसे, भवियण जण सुखदाय ॥४॥ अढी द्वीपमाहे नमू, साधु सकल गुणवंत । सुमति गुपति सुधी धरे, राखे जगना जंत ॥५॥ पंच परमेष्ठि नमी करी, आणी भाव विसाल । श्रीश्रीपाल नरिंदनो, रचसुं रास रसाल ॥६॥ मंत्र यंत्र जडि ओषधी, आछे अवर अनेक । पिण नवकार समो न को, जोवो आणि विवेक ॥७॥ सिद्धचक्र आराधीये, गुणीये श्रीनवकार । भवसायर तरीये सुगम, जईये मुगति मझार ॥ ८॥ नवपदनो महिमा कहूं, सांभलजो नर नार । साभलतां सुख पामसो, सफल हुसे अवतार ॥९॥ ढाल १ ली चोपईनी-जंवू नामे द्वीप विसाल, दक्षिण भरत छे तास विचाल । देस कह्या वत्रीस हजार, मगधदेस रिद्धिवंत अपार ॥ १ ॥ वीर जिणेसर आव्या घj, सकल देशमें उत्तम भणुं । राजगृही नगरी गुणभरी, जाणे रची श्रीपाल. महियल सुरपुरी॥२॥ कूआ वावि सरोवर घणा, विवहारीयानी नहीं कांई मणा। तिण नयरी श्रेणिक नरनाहै, जिणवर आण धरे उच्छाह ॥ ३ ॥ न्याये पाले नरवर राज, सारे सहुना वाछित काज । मंत्रीसर छे अभयकुमार, च्यारे बुद्धिनो धारणहार ॥४॥ किणिहिक अवसर त्रिभुवनस्वामि, राजगृहीने पासे गामि । समवसर्या तिहां आवी करी, सहु हरख्या मन आणंद धरी ॥५॥ गौतमने दीधो आदेस, जाओ राजगृही सुविसेस । तव गौतम आव्या तिहां वही, लोक सहु हरख्या गहगही ॥६॥ वांदण आव्या श्रेणिक राय, नगर लोक पिण वांदण जाय।आपे प्रभु गणधर उपदेस, सजल जलद अनुहार विसेस ॥ ७॥ अहो भव्य प्राणी तुम्हे सुणो, ए मानव भव दुर्लभ गिणो । आर्य क्षेत्र उत्तम कुल जाणि, ते पिण दुर्लभ छे मन आणि ॥८॥ १जमीन उपर। २ देव नगरी। ३ कमी। ४ राजा । ५ तीनलोकके स्वामी वीरप्रभु।६ पाणी सहित । ७ मेधक १८ समान!
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श्रीपाल
धरम तणी सामग्री लही, श्रीजिनधर्म करो उमही । इण भव पामे रिदि समृदि, परभव
पामे अविचल सिदि ॥९॥ इम गौतम दीधो उपदेस, सांभलियो नर नारि नरेस ।
पहिली ढाल एही अटकलो, कहे 'जिनहर्प' हिवे सांभलो ॥ १०॥ सर्व गाथा १९॥
दूहा-दान सील तप भावना, भेद धरमना च्यार । इह भव परभव एहथी, लहीये
सुख श्रीकार ॥ १ ॥ दान सील तप माहि जो, चोथो भाव भिलंत । तो कारज सीझे
सहू, वंछित सकल मिलंत ॥२॥ निश्चल मन राखी करी, परिहरि मननो ताप ।
भाव विशुद्ध हीयडे धरी, जपीये नवपद जाप॥३॥अरिहंत १ सिद्ध २ मूरीस वर ३,
उवज्झाया ४ मुनिपति ५। दंसण ६ नाण७ चरित्त ८ तप९, इणसुं धरीये चित्ति ॥४॥
ढाल २ जी. अलबेलानी- ए नवपद आराधीये रे लाल, आणी निरमल भाव
महाराजा रे । एहथी सहु सुख संपजे रे लाल, भवसायरनी नाव महा०, ए० ॥१॥
रास. श्रीपाल नवपद संघाते जपे रे लाल, सिद्धचक्र (सड्ढ) चउ साल महा० । ते लहे मंगल मालिकारे लाल, जिम लह्यां नृप श्रीपाल महा०, ए० ॥२॥श्रेणिक कहे भगवन कहो रे लाल, कुण ते नृप श्रीपाल महा० । किम पामी सुख संपदा रे लाल, किम लह्यां भोग रसाल महा०, ए० ॥३॥ गौतम कहे मगधेसने रे लाल, आराध्यो सिद्धचक्र महा० । रोग गयां वंछित लह्यां रे लाल, जाणे अभिनव शक महा०, ए. ॥४॥ श्रीगौतम । मुझने कहो रे लाल, एहनो सहु अधिकार महा० । सांभलवा मन ऊमह्यो रे लाल, सुणसे सहु नर नार महा०, ए० ॥५॥ दक्षिण भरते दीपतो रे लाल, मालव देस विख्यात महा० । दुंरभिक्ष न पडे जिहां कदी रे लाल, केही कहीये वात महा०, ए०॥६॥ तिणे देसे नयरी भली रे लाल, उज्जेणी अभिराम महा० । धण १ साढे चार वर्ष । २ राजा । ३ मगधदेशके खामी श्रेणिक । ४ नवा उत्पन्न हुआ इद्र । ५ दुकाल। ६क्या।७ कहें। ८ मनोहर।
" on 2 श्रीपाल कण कंचणसुं भरी रे लाल, जाणे अलका नाम महा०, ए०॥७॥ लोक तिहां सहु को सुखी रे लाल, साधे त्रिणे वर्ग महा० । पाले जिनवर आगन्या (आज्ञा)रे लाल, जेथी पामे स्वर्ग महा०, ए०॥ ८॥राजा राजे तिणे पुरी रे लाल, प्रजापाल इणे नाम महा० । न्याय निपुण पुहवी तिलो रे लाल, रूपे जाणे काम महा०, ए०॥९॥ तास घणी अंतेउरी रे लाल, तेहमें दोइ अत्यंत महा० । रूप अधिक रलियामणी रे लाल, सोभागिणी गुणवंत महा०, ए० ॥१०॥ पहिली सोहर्ग सुंदरी रे लाल, सोहँग तणो निधान महा० । बीजी पिण अधिकी वली रे लाल, रूपसुंदरी अभिधान महा०, ए०॥११॥ रूपे रंभा हरावती रे लाल, सुख विलसे सुकमाल महा। वीजी 'जिन हरखे' कही रे लाल, अलबेलानी ढाल महा०, ए०॥१२॥ सर्व गाथा ३५॥ १ अलकापुरी नामकी दवनगरी । पृथ्वीके तिलक तुल्य । ३ कामदेव । ४ सौभाग्य । ५ नाम की । ६ नामकी अप्सरा देवी ।
श्रीपाल दूहा-पहिली मिथ्यात्वी कुले, अवर जैन कुल जाणि । जैन शास्त्र रूपसुंदरी, भणी सुधारसवाणी ॥१॥ समकित गुण निर्मल धरे, जाणे अरथ विचार । धरम थकी चूके नहीं, जो हुवे लाख प्रकार ॥२॥ शिवशासन विद्या भणी, सोहगसुंदरी नार। मिथ्या मति राती रहे, चाले निज आचार ॥ ३॥ सोकि पणे वे सुंदरी, पिण अत्यंत सनेह । आप आपणा धर्मसुं, रंगे राती जेह ॥४॥ प्रीति परस्पर अतिघणी, एक जीव तनु दोइ । पिण निज निज मतने विषे, विसंवाद नित होइ ॥ ५॥ ढाल ३ जी. "धन धन संप्रति राजा साचो” एहनी अथवा “सेर्जेजे साधु अनंता सीधा” एहनी- जोवो दृष्टिरोग अति गिरुओ, छूटे दोहिलो एह रे । दृष्टिराग राता नर नारी, किमहि न समझे तेह रे, जोवो० ॥१॥ दृष्टिराग करी सोहगसुंदरी, उत्थापे १ वीजी । २ अमृत । ३ एकही पतिकी दो स्त्रियां जिसको शोक कहते हैं। ४ शरीर । ५ स्वमतका राग-प्रेमवधन ।
रूपसुंदरी
कहे
सांभलि
वहिनी
।
,
कसिये
कंचण
जेम
रे
।कीले
HAN
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श्रीपाल
जिनधर्म रे। मलिन कुचेल नहीं पवित्राई, स्युं ते बोडे कर्म रे, जोवो० ॥२॥
आले न जपीये एम रे, जोवो० ॥३॥ धरम धरम सहु कोई भाषे, पिण अंतर
असमान रे । साकर लूण सरीखा दीसे, काच पाँच समवान रे, जोवो० ॥४॥ सूरज
खजूये जिवडो अंतर, अंतर राजा रंक रे।अरके दूध गोदूधे अंतर, अंतर सुख आतंक
रे, जोवो० ॥५॥ चंदन आक धत्तूरे अंतर, अंतर विष पीयूष रे । जैन धर्म
(समो नहीं कोई) मोटो जगमाहे, जेहथी जाये दूष रे, जोवो० ॥६॥ धरम अनेक
अछे जगमांहे, पिण ते हिसा मूल रे, धरम जैन अधिको जोवंतां, जीवदया अनुकूल
रे, जोवो० ॥७॥ एक धरमथी शिव सुख लहीये, दहीये कर्म कठोर रे । एक थकी
१ सराव ( मलिन ) वस्त्र । २ झूटा कलक । ३ नोलना । ४ मणि । ५ आफका दूध । ६ कष्ट दुःस । ७ अमृत । ८ मोक्ष
॥८॥
स रास. श्रीपाल. पिंड पापे भराये, लहीये नरक अघोर रे, जोवो० ॥ ८॥ धरमतणी चरचा माहोमांहे, अहोनिसि एम रे। प्रीति रीतिसुं वे वे सुंदरी, पाले पूरो प्रेम रे, जोवो० ॥९॥ सुखे समाधे इणपरि रहती, धरती पिउसु रंग रे । विषयतणा सुख विलसे वहुपरि, दिनदिन अति उठेरंग रे, जोवो० ॥ १०॥ काल न जाणे किमही जातो, पिउ प्रिया इक राग रे । कहे 'जिनहर्ष' ढाल ए त्रीजी, गावो आस्या राग रे, जोवो० ॥११॥ दूहा-सुख विलसंती बे जणी, जनमी पुत्री दोइ । राय करे उच्छव घणो, हीयडे हर- षित होइ ॥१॥ राणी सोहगसुंदरी, दरीभरी गुणप्रेम । तासु सुता सुरसुंदरी, नाम बुलावी तेम ॥२॥ रूपसुंदरी वीजी प्रिया, तेहनी पुत्री जेह । मयणासुंदरी तेहनो, नाम ठव्यो गुणगेह ॥३॥ पांच धाइ पालीजतां, करतां ख्याल विनोद। १ भरीरमें रहा आत्मा।२ रात दिन । ३ पतिसे । ४ भोगरते है ।५ उल्लसित मनसे । ६ स्त्रीमार | ७ गुणगुफा । ८ प्रेमपोपक ।
4
श्रीपाल
भ
वरस पांचनी ते थई, दीठां परम प्रमोद ॥४॥ भणिवा सारिखी थई, बुद्धितणो
भंडार । मातपिता देखी करी, इणपरि करे विचार ॥५॥
ढाल ४ थी "हरीया! मन लागो" एहनी, कन्या दोइ भणाचीये, भणिवा अवसर एह
रे, दोइ कन्या (भणावीये) भणे। वालपणे सहुआवडे, नाण विन्नाण अछेह रे, दो० ॥३॥
सुभदिन सुभ मुहूरत घडी, भणिवा ठवी वे वाल रे, दो० । सुरसुंदरी सिवभूतिने, मयणा
सुबुद्धि नीसाल रे, दो० ॥२॥ प्रथम सुता पंडित कन्हे, भणे सदा चित लाइ रे,
दो । गणित लिखित लक्षण कला, तर्क साहिलै सहाइ रे, दो० ॥ ३॥ ज्योति(प)
क वैद्यक सह भण्या, भरहें संगीत पुराण रे, दो० । मंत्र जंत्र जडी ओपधी, थई
सिवसास्वनी जाण रे, दो० ॥४॥ रागरंगे सहु रीझवे, गावे वीण बजाइ रे, दो।
१ शरीरमें रहे चक आदि । २ न्यायगाव । ३ काव्यशास। ४ मरत नामका नाटक ग्रथ । ५ अढारे पुराण शाख।
॥१०॥
श्रीपाल रसीयाना मन मोहती, दीठी आवे दाइ रे, दो० ॥५॥जोवन रूपे आगली, अणीयाला दोइ नैण रे, दो० । मुखडे जीयो चंद्रमा, श्रवे सुधारस वैण रे, दो० ॥६॥ रूप अधिक सोहे वली, चतुराई गुणमेलि रे, दो० । सोवन मुद्रा मणि जडी, दूधे साकर भेलि रे, दो० ॥७॥ भणी गुणी चोसठ कला, अपछरने अणुहार रे, दो। पहिले गुण- ठाणे थई, गुरु संगति सुविचार रे, दो० ॥८॥ मिथ्यात्वी सिरसेहरो, सिवभूति पंडित रे, दो० । शिष्यणी पिण सुरसुंदरी, तेहवी कीधी तेह रे, दो० ॥९॥ मिथ्यामत थापे घणुं, तत्त्वथकी विपरीत रे, दो० । काने पिण न गमे सुण्यो, जैनधर्म सुं प्रीत रे, दो० ॥१०॥ हवे बीजी कन्यातणो, सुणो पठन अधिकार रे, दो० । शास्त्र भण्या जिनमततणा, आगम अरथ विचार रे, दो० ॥ ११॥ चोसठ महिलानी कला, जाणे गुरु सुपसाय रे, दो० । अवसरे धर्म करे वली, प्रणमे जिनवर पाय रे, दो० ॥१२॥ ॥ ११ ।
I श्रीपाल ॥१२॥ । जैन भाव सघला लहे, निश्चयने विवहार रे, दो० । कहे 'जिनहर्ष' चोथी थई, ढाल इणे अधिकार रे, दो० ॥ १३॥ सर्व गाथा ६९॥ दूहा-जिनमत धर अध्यापके, कुमरी भणावी जेह । मिथ्यामत राचे नही, धरम रंगाणी देह ॥१॥ एकज सत्ता दुविध नय, काल त्रिण गति च्यार।अस्तिकाय पांचे छए, द्रव्य सात नय धार ॥२॥ आठ करम नव तत्त्व तिम, दसविध मुनिवर धर्म । पडिम इग्यारस बार व्रत, जाणे एहवा मर्म ॥३॥ मूलुत्तर कम्मपयडि, इगसो अट्ठावन्न । कर्म- बंधना हेतु पिण, जाणे सत्तावन्न ॥४॥बंध उदय उदीरणा, सत्ता जाणे तेह । सुहु विचार सवे लहे, प्रवचन भाख्या जेह ॥५॥ ढाल ५ मी. "इडर आंवा आंवली रे"एहनी-सुंदरि ए सुरसुंदरी रे, जोवन पहूंती जोर । भणी गुणी सगली कला रे, चतुरपणे चित्त चोर ॥ १ ॥ सुगुणनर ! जोवो ॥१२॥ -
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नभ्यतर सभाम वेठा हुआ
राजा प्रजापाल अपनी दोनों राज
पुत्रीयाक विद्याभ्यासी परीक्षा
ले रहा है।
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13
(पनाक १३)
श्रीपाल. रास. ग पुण्यविशेष, पुण्ये लहीये रिद्धि अशेप, पुण्ये लहीये प्रभुता पेखि, वारू पुण्यतणा फल देखी, सु० ॥ २॥ रूपवंत गुण लवणिमा रे, विद्या प्रभुता सार । मदना कारण छे सहू रे, पिण मद न करे लिगार, सु०॥३॥ इक दिन अभ्यंतर सभा रे, बेठो राय उल्लास । बोलावी वे निज सुता रे, साथे पाठक तास, सु० ॥४॥ विनयवती निज तातने रे, आवी कीधी सलाम । चकित थई सगली सभा रे, रूप निरखी अभिराम, सु०॥५॥ खोले बेसारी सुता रे, राजा धरिय विवेक । बुद्धि परीक्षा कारणे रे, दीधी समस्या एक, सु० ॥ ६ ॥ राइ कह्यो पद छेहलो रे, “पुण्ये लहीये एह" । गुणवंती सुरसुंदरी रे, बोली ततखिण तेह, सु०॥ ७ ॥ धन यौवन डाहापणो रे, रोगरहित निज देह । मनवल्लभ मेलावडो रे, “पुण्ये लहीये एह", सु० ॥ ८॥ रलियायत राजा थयो रे, सांभलि तास वचन । कुमरी अध्यापक भणी रे, लाख गमे दीधो धन, सु० ॥ १३ पीपा रा २ niramin श्रीपाल ॥१४॥ ॥९॥ लोक खुस्याल सहू थया रे, रंज्या राणी भूप। सहु को लोक कहे इसूं रे, एतो सरसति रूप, सु०॥ १० ॥ तुझे पिण मयणासुंदरी । रे, समस्या पूरो एह । अनुमति लहि निज तातनी रे, कहे कुमरी गुणगेह, सु० ॥ ११ ॥ विनय विवेक प्रसन्नता रे, सीलसुं निर्मल देह । शिवपटनो मेलावडो रे, “पुण्ये लहीये एह", सु०॥ १२॥ मात पिता हरपित थया रे, हरख्या लोक न जात । प्राये मिथ्यात्वी भणी रे, न गमे उत्तम वात, सु० ॥१३॥ उत्तमने उत्तम गमे रे, नीचने नीच सुहाइ । ढाल थई ए पांचमी रे, कहे 'जिनहर्ष' बनाइ, सु०॥१४॥ सर्व गाथा ॥८८॥ दहा-कुमरीनी इणपरि करी, बुद्धि परीक्षा राय। आगलि जे थाये हिवे, ते सुणज्यो चितलाय॥ १॥कुरुजंगल देसे अछे, संखपुरी इण नाम । नगरी तेहनो राजवी, दमि- तारि अभिराम ॥ २ ॥ उजेणी राजातणी, नितप्रति सारे सेव । निज बदले एकण रास. श्रीपाल, वरस, मुक्यो अंगज हेव ॥ ३ ॥ नाम तास छे अरिदमन, अरि दमि कीधा जेर । जाणे सूरति कामनी, नारि रहे नित घेर ॥ ४॥ भमरो केतकि गंधसुं, मांडि रहे जिम मोह । तिम सुख पामे नारियां, कुमर निहाली सोह ॥५॥ ढाल ६ ठी. "मुजरो मानो हे जालम जाटणी” ए जाटणीना गीतनी-मदन मनोहर कुमर कलानिलो, देखी जोवन वय सुकमाल, कुमरी मोही हो कुमर सुजाणसुं। सुरसुंदरी मुख पंकज भाल, नयणे जोवे हो फिर फिर कुमरने, पामे सुख मुख तास निहाल, कु० ॥१॥ दीठां हीयडो हेजे ऊलसे, दीठां पाखे अंदोह, कु० । एतो अणखाधे पाणी रसो, एहवो पापीरे मोह, कु० ॥२॥ ढाक्यो न रहे किम ही नेहलो, जो करे कोडि उपाय, कु० । आग छिपाई घास पलालमें, परगट ते खिणमांहे थाय, कु० ॥३॥ चोवा चंदन कुसुमनी वासना, छानी धरीये छिपाय, कु० ।तो हि खिणमाहे परगट हुवे, तिम ए नेह --- रास श्रीपाल दिखाय, कु० ॥४॥ वापे जाण्यो नेह सुतातणो, पुत्री! सांभल तूं सुविचार, कु० । जे मन माने जेहसुं प्रीतडी, ते परणावू भरतार, कु०॥५॥ हीयडे हरखी कुमरी इम कहे, लोक तणी तजि लाज, कु० । वांछयो वर पामुं तो एहने, परणावो महाराज!, कु० ॥६॥ अथवा तुझे मुझने परणावसो, माहरे तेह प्रमाण, कु० । वाप दीयो वर कन्या वरे, ते सुकुलीणी सुजाण, कु० ॥७॥ तुमथी लहीये वंछित वापजी', तुमथी सुख लहीये श्रीकार, कु० । पोतानी जाणी सुखिणी करो, तुझे माहरे किरतार, कु०॥८॥ इण वचने राजा तूठो कहे, जाणी अंतरभाव, कु०।ए अरिदमन कुमर पुत्री! वरो, जुगतो सरल सभाव, कु० ॥९॥ सहु कोने मन मानी वातडी, भलो कह्यो महाराय, कु० । सरीसा सरीसी ए जोडी मिली, आवी सहु कोने दाय, कु० ॥१०॥ लोक सहु को राजाने कहे, होस्ये इहां रंगरोल, कु०।एह जमाई सोभे तुझ घरे, जिम मुख सोभे रास. श्रीपाल ॥ २७॥ । तंवोल, कु०॥११॥राजा पिण रलीयायत थई करी, कीधो वचन प्रमाण, कु०। छट्ठी दाल सगाइ नृप करी, कहे 'जिनहर्ष' सुजाण, कु० ॥ १२॥ सर्व गाथा ॥ १०५॥ हा-हिवे मयणाने पूछीयो, पिण बोले नहीं तेह । नीची दृष्टि निहालती, मुखडे लाज करेह ॥ १॥ पुनरपि राजा पूछीयो, पुत्री । मुझने भाष । ताहरा मनमाहे हुवे, वरनी जे अभिलाष ॥२॥ वार वार इम पूछतां, कुमरी थई सलाज । मुख मुलकी कहे तातने, पूछणसुं स्यो काज ? ॥३॥ चतुर विचक्षण छो तुम्हे, जाणो छो सहु नीति । कुलकन्याने पूछीये, एह नहीं जुगती रीति ॥४॥ कुलवंती कहो किम कहे ?, मुझ परणावो एह । मात पिता जेहने दीये, तेहिज वरसुं नेह ॥५॥ निश्चयसुं जो जोईये, ते पिण बाह्य निमित्त । सुख दुख पामे प्राणीयो, निज निज पूरवक्रित्त ॥६॥ ढाल७ मी. "मया मोहि दिखणी आणि मिलाइ” एहनी-मयणा कहे सुणो तातली!
श्रीपाल
॥१८॥
रे, पूरख लिखित प्रमाण । ते सघलो आवी मिले, होजी केहो इहां विन्नाण? ॥१॥
पिताजी', कर्म सबल जगमाहि, कर्म करे तेहिज हुवे, होजी मुख दुख अरति उच्छाहि,
पि० ॥ २॥ जिण वेलाये जेहवा रे, जीवे कीधा कर्म ।उदय थया तिण अवसरे, होजी
लहीये फलनो मर्म, पि० ॥३॥क फेडी राजा करे रे, राजा फेडी रंक । एबो कुण?
फेडी सके, होजी कर्म लिख्या जे अंक, पि० ॥४॥ राय कहे पुत्री ! सुणो रे, तुं मुझ
प्राण आधार । वार वार तुझने कहूं, होजी मांगो वंछित भरतार ॥५॥ मुताजी !,
सवलो जगमाहि, मुझ तूठे सहु संपजे, होजी मुख दुख अरति उछाहि, मु० ॥६॥
माहरी आस्या सहु करे रे, निवलाने बलवंत । हूं तूठो दालिद्र गम, होजी रूठो जाणि
कृतंत, सु०॥७॥रंक प्रते राजा करूं रे, राय भणी करूं रंक । सबला ते पिण माहरी,
होजी माने मनमा संक, सु० ॥ ८॥ करण मते ते ९ करूं रे, सुख दुख माहरे हाथ ।
॥ १८॥
रास.
श्रीपाल
कारण
छे
रूठो जमघर मोकलं, होजी तूठो करुं नरनाथ, सु०॥ ९ ॥ वलतूं मयणा वीनवे रे,
तात | सुणो मुझ वत्त । तुमने पिण करमे किया, होजी राजन राज निमित्त, पि०
॥ १० ॥ जेहने पोते पुन्य छे रे, तेहने तूसे राय । पुन्य विना तूसे नहीं, होजी जो
करे लाख उपाय, पि० ॥ ११ ॥ छोरू पिण मोटा तणा रे, सुखीया दुखीया होइ।
सहु कर्मनो, होजी गरव म करज्यो कोइ, पि० ॥ १२॥ थाप्यो कुमरी कर्मने
रे, उत्थाप्यो नृप वेण । रीसवसे थयो आकरो, होजी कीधा राता नैण, पि० ॥ १३॥
गरव करे खोटो जिके रे, तेहमें किसो सवाद । दाल थई ए सातमी, होजी 'जिन हरप'
सुता नृप वाद, पि० ॥१४॥ सर्व गाथा ॥ १२५॥
दूहा-रीसाणो नृप इम कहे, रे रे मूढ गमार! । तूं लीला सुख भोगवे, ते सहू मुझ
उपगार ॥१॥ पहिरे कंचण आभरण, नव नव वेस बणाय । खाणा पीणा खेलणा,
॥१९॥
पाल
रास.
ते
सहू मुझ पसाय ॥२॥ मयणा कहे सुणो तातजी, हूं तुम्ह कुल उत्पन्न । में पामी
सुख साहिवी, ते मुझ पोते पुन्न ॥३॥ मयणा इणिपरि भाषतां, राजा थयो कृतंत ।
जिम पावक घृत सीचीयो, वाधे झाल अत्यंत ॥४॥ भाग्यहीण ए दीकरी, दीसे
छे परतक्ष । कह्यो न माने माहरो, लीयो न मेल्हे पक्ष ॥५॥ क्रोध वसे थयो रातडो,
धमधमीयो नरनाह । सगपण वेटी बापनो, भागो मन उच्छाह ॥६॥
ढाल ८ मी. नायकानी-मयणा कहे सुणो तातजी। रे, इवडी म करो रीस मोरा
तातजी रे, जाण तुझे सहु वातनारे लाल, तुझे मोटा अवनीस मो०, मयणा०॥१॥
फोगट गरव न कीजीये रे, गरवे सहु गुण जाइ मो० । इंद्र नरेंद्र पिण गर्वथीरे लाल,
लघुता पणो लहाइ मो०, म० ॥ २॥ तुझे कहो जे हूं करूं रे, सुखीया दुखीया लोक
मो० । करता हरता हूं सहीरे लाल, ते तो इमही फोक मो०, म० ॥३॥तुह्म सेवाथी
॥२०॥
7
श्रीपाल
जो हुवे रे, सुखीया सहु जगमांहि मो०।तुझ सेवा करता नथीरे लाल, ते तो सुखीया
काहि ? मो०, म० ॥४॥ राय कहे रूठो थको रे, तूं निरधन बर जोगरे दुहागिणि!।
ए मतिसारू नवि मिलेरे लाल, तुझने उत्तम भोगरे दु०॥ ५॥ मयणा' सुण मुझ
वातडी रे, ताहरे पोते पापरे दु० । तो सूझे तुझ एहवरे लाल, पामिस बहु संतापरे
दु०, म० ॥६॥ हठमाती पोतातणे रे, जाणे हूं बुद्धिवंतरे दु०समझावी समझे नहींरे
लाल, अवगुण एह महंतरे दु०, म० ॥७॥ राती निज गुण ज्ञानमें रे, मूरख निगुण
निटोलरे दु० । लेखवती केहने नथीरे लाल, मूढ न जाणे बोलरे दु०, म० ॥ ८॥ हूं
जाणूं सुखिणी करूं रे, परणावू वर साररे दु०। पिण माहरो न करे कह्योरे लाल, थाइस
दुःख भंडाररे दु०, म० ॥९॥ मयणा कहे तुझने रुचे रे, ते परणावो नाह मोरा तातजी!
रे। मुझ पोते पुन्य जो हुस्येरे लाल, तो मुझ होस्ये उच्छाह मो०, म० ॥१०॥ गाढेरो
॥ २१ ॥
23
सीपाल
२२॥
रीसावीयो रे, सांभल(संभलावी) एहवा वोलरे दु० । मोटा बोली दीकरीरे लाल, मुझ
लेखव्यो तृण तोलरे दु०, म०॥११॥मुझने इणे उत्थापीयो रे, थाप्यो वखत सहायरे दु०।
कहे 'जिनहरष' सहू सुणोरे लाल, आठमी ढाल कहायरे दु०, म०॥१२॥ सर्व गाथा १४३ ।
दूहा-रोपातुर नृप देखिने, मंत्री चिंते एम । ठारूं बयण सुधारसे, सीतल थाये जेम
॥१॥ महाराय! रयघाडीये, रमवानो छे लाग ।जईये रमवा आज प्रभु!, फूल रह्यो छे
बाग ॥२॥ अंतरगत दाझी रह्यो, क्रोधागनि विकराल। ऊठ्यो तुरत उतावलो, मानि
वचन भूपाल ॥३॥ चरवादार प्रते कहे, करो तुरंग तइयार। हुकम सुणी आण्यो तुरी,
सपलाणो तिणवार ॥ ४॥ चतुरंगसेना परिवर्यो, राय थयो असवार । हिवे आगलि जे
नीपजे, ते सुणज्यो अधिकार ॥५॥
ढाल ९ मी. “रे हमीरीयारे रहि वेरी नेण झकोलतो"एहनी-राय रयवाडी संचर्यो,
॥२२॥
श्रीपाल.
रास.
1२३॥
आगलि उडे खेह मंत्रीसर।राजा चकित थई कहे, आवे छे कुण एह मं०, रा० ॥१॥
आडंबर करता थका, न धरे किसि प्रवाह मं०। कोलाहल हलबोलसुं, मंत्री कहे सुणि नाह!
राजेसर !, रा०॥२॥ ए पेडो कोढी तणो, सात सयां परिवार राजेसर! । कोढी
सहु भेला थया, व्याप्यो रोग अपार रा०, रा०॥३॥ राजकुंवर एक नान्हडो, आवी
मिलीयो मा(य)हिरा० । ते पिण कोढी फरसथी, उंवर रोग लहाय रा०,रा०॥४॥उंबर
रोग थकी थयो, उंवर राणो नाम रा० । ते आवे छे ए चल्यो, ए असमाधिनो ठाम
रा०, रा०॥५॥असवारी वेसर तणी, परिवरीयो परिवार रा०। गतनासा चामर घरे,
गलित त्वचा छत्रधार रा०, रा० ॥६॥घंटा हाथे झालिने, मुहर चले गत कर्ण रा०।
लोकांने वीहावतो, मूंडो जेहनो वर्ण रा०, रा० ॥ ७ ॥ कोढ मंडल अंग ओलगू,
गलितांगुलि मंत्रीस रा०। सर्व गलित कोटवालछे, तेहमें उंवर ईस रा०, रा०॥८॥
॥२३॥
॥
१२॥
आव्या
ते
ऊतावला
,
नृप
साम्हा
तिणवार
रातब
राजा
एहबूं
कहे
,
सुण
मंत्री
।
श्रीपाल
॥ २४ ॥
द्रादमंडल कोढे गल्या, दीसंता विकराल रा०।सेवक तास दोहागीया, राध रुधिर परनाल
रा०, रा०।९। देसाधिप पासे लीये, मननो मान्यो माल राना कोई न कही सके,
एहवी एहनी चाल रा०, रा०॥१०॥ तेह भणी वीजी दिसे, चालो श्रीमहाराय! रा०॥
जावा द्यो ए कोढीया, जिम दरिसण नवि थाय रा०रा० ॥ ११ वीजी दिसि राजा
चल्यो, मारग छोडी जाम रा० । कोढीबुंदे निरखीयो, हूकल करता ताम रा०, रा०
सुविचार मं०, रा०॥ १३॥ परचावो पासे जई, मुह माग्यो द्यो माल मं० । पिण
रहाविज्यो, करिज्यो मुख लालमपाल मं०, रा० ॥ १४॥ हुकम दीयो. मुहुताभणी,
वीहंते भूपाल मं० । कहे 'जिनहरष' पूरी थई, नवमी ढाल रसाल मं०, रा० ॥१५॥
दूहा-गलितांगुलि ऊतावलो, उंबरनो परधान । ते पहिली आवी कहे, सांभल हो
॥२४॥
रासा श्रीपाल. राजान! ॥१॥ उंवरराणो अम्हतणो, साहिब छे सुपराण । माने सहु को तेहने, कोई न लोपे आण ॥२॥ मणि माणिक कंचण रयण, भोजन कूर कपूर। उंवर राणो हुकमसुं, मंगावे भरपूर ॥३॥ अम्हे सहू सेवक नफर, सुखीया तास पसाय । कमी नहीं किण वातनी, पिण साभल महाराय !॥४॥राणी नहीं राजातणे, ए छे मोटी खोड।इक कन्या द्यो अमभणी, जिम पहुंचे मन कोड ॥५॥ ढाल १० मी. “वात म काढो हो त्रततणी” एहनी-राय कहे किम दीजिये, निज कन्या गुणवंतो रे । रोगी नरने आपतां, जगमें अपजस लहंतो रे, रा० ॥१॥ वलतुं गलि- तांगुलि कहे, ताहरो जस जग गाजे रे। माग्यो ये मालव धणी, एह बिरुद तुझ छाजे रे, रा०॥२॥ के तो कीरति हारीये, के दीजे निज कन्या रे। जेहवी तेहवी अम्हभणी, मानीस्ये ते धन्या रे, रा०॥३॥ पड़ीयो राय विचारणा, अजुगति वात सुणाई रे। किमही दुरस पडे
श्रीपाल
रास.
नहीं, दोतड पडीयो भाई रे, रा०॥४॥ नृपने मयणा सांभरी, कन्या ए वर जोगी रे।
अविनयनो फल जिम लहे, थाये दुखिणी रोगी रे, रा०॥५॥ कीरति कहो किम हारीये,
दोहिली जे जगमाहे रे। कन्या देतां जस रहे, तो जस गमीये काहे रे, रा०॥६॥ मुझ
मंदिर तुम्हे आवज्यो, इम कही पाछो वलीयो रे। राय गृहांगण आवीयो, सासीनो हलफ-
लीयो रे, रा०॥७॥ तेडी मयणा सुंदरी, राय कहे सुण बेटी । रे । हूं तुझने सुख चिंतवू,
तूं अवगुणनी पेटी रे, रा० ॥८॥वाप सुकरमी जो हुवे, वंछित वर परणावू रे । हठ परि-
हर सठ बालिका , दोहग दूरे गमावू रे, रा०॥९॥जो आपकरमी तूं हुवे. तो वर उंवर
राणो रे । तुझ करमे ए आणीयो, परणेवानो टाणो रे, रा०॥१०॥ मयणा मुलकीने कहे,
वखत लिख्यो वरराजो रे। ते मुझ सिरनो सेहरो, माहरे तेहसुं काजो रे, रा० ॥११॥
राये ते तेडावीयो, सपरिवारसु आयो रे । करमसंयोगे नृप कहे, तूं वर मयणा पायो रे,
॥ २६॥
- श्रीपाल. २७॥ रा० ॥१२॥ उंवर कहे ए राजवी , वात न जुगती दीसे रे। दसमी ढाल पूरी थई, कहे 'जिनहरप' जगीसे रे, रा०॥ १३॥ सर्व गाथा ॥ १८१॥ दहा-बायस कंठे कनकनी, जिम सोभे नहीं माल। जोडी नहीं बग हंसली, तिम मुझने ए बाल ॥१॥राय कहे ए दीकरी, कह्यो न माने मुझ। आप करम माने सही, तिण आपूंछं तुझ ॥२॥ मुझ दीधो वर आदरे, तो परणावू जोय। करम मांहि तूंहिज लिख्यो, मुझने दोस न कोय ॥३॥ दया न आणी चित्तमें, नाण्यो नेह लिगार । लोक कहे ए स्यूं थयो, करे अधम आचार ॥ ४॥ उत्तम कोप करे नहीं, करे ते मान प्रमाण । पिण ए जुगतूं नवि करे, कोपे चढ्यो अयाण ॥५॥ दाल ११मी. वांगरीयानी-उंवर कहे सुण राजवी! रे,माहरी ए नहीं जोडिरे गुणवंता!। कोढी रोगे भर्यो रे, रतन लगाई खोडिरे गु०॥१॥ मुझ सोभे नहीं ए कांता, में पातक Thes
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श्रीपाल.
॥२८॥
कीया अनंता गु० । मुझ देखी सहू बीहंता, तिण एहनो नहीं मुझ कोडरे गु० ॥२॥जो
मुझने देवा करे रे, तो कोई मुझ जोगरे गु० जेहवी तेहवी आपीये रे, हसे नहीं जिम
लोगरे गु०॥३॥ एकन्या ने हूं किहां रे, ए हंसी हूं कागरे गु०। सरिखे सरिखो जो मिले रे,
तो सोभे महाभाग । रे गु०॥४॥ अविचार्यु जो कीजिये रे, लोक हसे घर हाणि
गु० । तुमने एहवू नवि घटे रे, अपजसनी ए खाणि रे गु० ॥ ५॥ तूं ये पिण हूं ल्यू
नहीं रे, थाओ तुझ कल्याण रे गु०।बीजी ठामे मांगस्यूं रे, उंबरनी ए वाण रे गु० ॥६॥
राय कहे हूं स्यूं करूं रे, एहनो एहवो भाग रे गु० । वाक न को तुझ मुझ तणो रे, ए
कन्या तुझ लाग रे गु० ॥७॥ मयणा निसुणी एहबू रे, ऊठी तुरत तिवार रे गु० ।
ए वर लिखीयो भागमें रे, तो हिवे किसो विचार रे गु०॥८॥ उंबर कर निज कर ग्रह्यो
रे, मयणा धरीय विवेक रेगु०कोटी वर पिण आदर्यो रे, छोडी नहीं निज टेक रे गु०॥९॥
श्रीपाल.
॥२९॥
ऊमराउ सामंत जे रे, मंत्रीसर परधान रे गु०। अंतेउर वारे सहू रे, वले नहीं राजान रे
गु० ॥ १०॥ लोक सहू जोइ रह्या रे, दुखभर रोवे सेण रे गु० । मुखमें घाली आंगुली
इण परि भाषे वेण रे गु० ॥११॥ एह अजुगतूं नृप करे रे, कीडी ऊपरि घाव रे गु० ।
पिण कोई न कही सके रे, राजा वदे सो न्याव रे गु० ॥१२।। ए थई ढाल इग्यारमी रे,
कोप्यो राय अपार रेगु०।कहे 'जिनहरष' हिवे सुणो रे, आगलि जे अधिकार रेगु०॥१३॥
दूहा-रोवंतां इणपरि सहू, कहे अधम एभूपारयण अमूलक कन्यका, किम नांखेछे कूप
॥१॥छोरू कुछोरू जो हुवे, तोही पहिडे नहीं मावीत। भोलपणे एहवो कह्यो, तो ही राजा
चाले नीत॥२॥ छोरू वेचे बाप जो, तो कुण आडोथाय।जोर नचाले रायसुं, सहू करेहाय
हाय ॥३॥दुर्लभ दरसण देखतां, मयणा मोहन वेलि।आंबा एरंड पाखति, रोपे छे गुणगेलि
॥४॥ सगले कीधी वीनती, सहू कह्यो समझाय। कहणा मांहे केहनी, वाकीनरही काय॥५॥
श्रीपाल. । ढाल १२ मी. “सुगुण सनेही मेरे लाला" एहनी-मयणा निजमन काठो कीधो, जो मुझ वखते ए वर दीधो। तो माहरे ए उंवर राणो, इण भव एहिज प्रीतम जाणो ॥१॥ इहा कोईनो नहीं छे चारो, वांक न कोई इहां (अछे) पितारो।दाय उपाय अनेक विचारो, करम सवल जगमांहि अ(व)तारो॥२॥ मन दृढ देखी कुमरी केरो, राय चल्यो मनमांहि घणेरो। सती शिरोमणि सत्त्व न चूके, लीधो पख सापुरस न मूंके ॥३॥सायर मरजादा जो लोपे, क्षमावंत मुनिवर जो कोपे। शेषनाग मुख जो विप उलटे, तो पिण उत्तम बयण न पलटे ॥४॥ पवन डुलायो मेरु न डोले, मोटा दीन वचन नवि बोले। आपद संपद माहि सरीखा, ते नर वावन वीर सरीखा ॥५॥ करमायत्त सहू ए दीसे, कुमरी निजमन माहे हीसे। एहवू देखी राय परणावी, उंबर राणाने मन भावी ॥ ६॥ उंवर कुमरी वेसर चडीया, निज डेराने पंथे ख(प)डीया। नगर लोक सहू ऊभा जोवे, करे कोलाहल डसके श्रीपाल रास. रोवे॥७॥ एक कहे धिग धिग ए राजा, एहना खोटा थया दिवाजा। कोई कहे ए कुमरी अयाण, राय वचन न कियो परमाण ॥८॥ कोई कहे मा भुंडी कीधी, निजकन्याने सीख न दीधी । केई पाठक अवगुण काढे, जिनमतने केई दूषण चाढे ॥९॥ मयणा चाली उंवर संगे, हीयडे हरख धरी उछरंगे । जैन धरम मीजी भेदाणी, किम पलटे तेहनी कहो वाणी ॥ १०॥वारमी ढाल थई ए जाणो, कुमरी परण्यो उंवर राणो । करमतणी 'जिनहरप!' कहाणी, ज्ञानी विण नवि जाये जाणी॥११॥ सर्व गाथा ॥२१५॥ दूहा-हिवे वीजी कन्या तणो,जोडेवा वीवाह। तेडावी सिवभूतिने, इम भाषे नरनाह॥१॥ लगन अनोपम जोइवो, निरदूषण श्रीकार । सुरसुंदरी परणावीये, करी महोच्छव सार ॥२॥ लगन शुद्ध छे अमुकदिन,एहवो लगन न कोइ।ज्योतिष शास्त्र निहालतां, एहवू कदीक होइ ॥३॥जोसी वचन प्रमाण करी, मांड्यो राय वीवाह। परणावू सुरसुंदरी, अधिको करीउच्छाह४
१
~~
श्रीपाल
रास.
ढाल १३ मी. "करडो तिहां कोटवाल" एहनी-प्रीति धरी मनमाहि, राय तेडाव्या हो
साजन आपणा । सगा सणीजा लोक, प्रीति वधारण हो आव्या अतिघणा॥१॥राज-
वीयांने साथि, आल्या हो राजकुमर रलीयामणा । अमरपुरी अवतार, नगर विराजे हो
मनुष्य सुहामणा ॥२॥डेरावू ताणी, मंडप रचीया हो नव नव भांतिनारंगमंडपरंगावि,
कारण कीधा हो सगला खातिना ॥३॥लौकिक विधि सहु कीध, तेहनो स्यूं कहीये हो
लोक जाणे सहू । आव्यो लगन सुदीस, आरिम कारिम कीधा तिहां बहू ॥४॥ हिवे
अरिदमणकुमार, सुंदरवागा हो अग वणावीयो। पुरुषतणा सिणगार, कीधा हो सहुकोने
मन भावीयो॥५॥ चंचल चपल तुरंग, सोवन साकत (पलाण) हो चढीयो नचावतो।
जाणे देवकुमार, मुखडे तंबोल सुरंगा चावतो ॥६॥ चवरी मंडपमाहि, कुमर आवीने हो वेठो
तिण समे।वेठा सहू भूपाल, वेह वणावी कंचन कलसमे ॥७॥ सोले ही सिणगार, कुमरी
॥३२॥
श्रीपाल. रास. वणाया हो सुंदर मनरली। आवी चवरीमांहि, वादलमांहे हो जाणे चमकी वीजली ॥८॥ वेठी वरने पास, सोहे जाणे करि श्रीपति रुकमणी । सोभा अधिक सुहाय, जाणे इंद्राणी इंद्र कन्हे वणी॥९॥फिरीया फेरा च्यारि, च्यारे चवरीमा मंगल वरतीया। कन्या वर कंसार, मांहो माहे मिली आरोगीया॥१०॥वर कन्या वीवाह, करि परणाव्या हो ढोल घुरावीया। ग्डि धुं धुंधु घुर्यारे निसाण, भेरि भुंगल वाजा वजडावीया॥११॥थयो सुरंग वीवाह, रंग सुरंग रह्यो वेवाहीयां। ऊभा चारणभाट, विरुदभणे मनडे ऊमाहीयां ॥१२॥ हथलेवो तिण- वार,जोसी जोडाव्यो रूडी जुगतसुं।एथई तेरमीढाल, कहे जिनहरष'जाणज्यो विगतसुं१३ दूहा-कर मेल्हावे नृप दीया, सोवन रयण भंडार । सुंदर घोडा हाथीया, दासी दास अपार ॥ १॥ बहु मौलिक वागा दीया, रतन जडित सिणगार । सोवन पाए ढोलीया, सउडि(सोडि) तलाई सार ॥२॥ दीधो सवलो दायजो, कहतां नावे पार। प्रीती तिहां देतां wta -
रास.
श्रीपाल.
दहा-मातपिता पाय लागिने, कुमरी चली पिउ साथ। हय गय पायकसं हिवे, चोलावे
नरनाथ॥१॥ए मंदिर ए मालीया, एनगरी आहीठाण।मुझने वीसरिस्ये नहीं, रात दिवस
सुप्रमाण ॥२॥ सीख करी सहु लोकसुं, नयणे नीर प्रवाह । हीयडो फाटे मायनो, उलट्यो
विरह अथाह ॥३॥ गले लागी पुत्रीतणे, माइ करे आक्रंद । प्रेम तणे परवस थई, है है।
मोह नरिंद॥४॥ आंसू कुमरी लोयणे, जलधर जिम संजोई। हत्थालि छाला पड्या,
निचोइ निचोइ ॥५॥रोतां मृग रोवरावीया, वाट वटाऊ लोक । जातां जीव वहे नहीं
वीछडवानो सोक ॥६॥ कुमरी चाली सासरे, हिलिमिलि सीख करेह । फिरि फिरि जोवे
पाछले, डव डब नयण भरेह ॥७॥ हिवे (मयणा) उंवर राणा तणो, सांभलज्यो अधिकार ।
मनमा निश्चय राखीयो, न धरे दुख्ख लिगार ॥८॥
ढाल १६मी."बिंदली तो नणद गमाई, म्हारे ल्हौड्ये देवर पाई हे नणदल बिंदली ल्ये"
॥३८॥
रास.
भीपाल.
एहनी-उंवर कहे सुण कुमरी, तूं तो रूपे जाणे अमरी हे सुंदर वयण सुणो । राय अजु-
गति कीधी, मुझ कोढीने तूं दीधी हे सु० ॥ १॥ वयण सुणो मृगनयणी, मृगराजकटी
ससिवयणी हे सुं० । विधिना रूप नीपायो, देखी पोते सुख पायो हे सुं० । ए जोवन तुझ
नीको, सहु नारि तणे सिर टीको हे सुं० ॥२॥ मुझ आणा सिर धारी, कोई पुरुष अवर
सुविचारी हे सुं० । भोगवि तिणसुं भोगा, मन गमता सरस संयोगा हे सुं०॥३॥ हुकम
धणीनो होई, इम करतां दोप न कोई हे सुं० । नारि स्यण तूं हीरा, हूं नरमें काच कथीरा
हे सु०॥४॥ तूं तो उत्तम हंसी, हूं वायस जाणि कुवंसी हे सुं०। मुझ हीयडे दुख झाझं,
राय करणी देखी दाझं हे सुं० ॥५॥ ते माटे हठ छोडी, मुझ हुकमे करि कांइ जोडी हे
सुं० । मुझ पासे ते रहिये, तुझसुं सुखफल भोगविस्ये हे सुं० ॥६॥ उंबरनी ए वाणी,
सुणि भयणा दुखभराणी हो प्रीतम वयण सुणो । नयणे नीर प्रवाहा, कर जोडी कहे
॥३९॥
श्रीपाल. सुणो नाहा । हो प्री० ॥७॥ चरणे सीस लगावी, कहे सी ए वात सुणावी हो प्री० । मनमां जाणी रहिन्यो, फिरि वीजी वार म कहिज्यो हो प्री० ॥८॥अधम जनम नारीनो, मेलो जाणे कुंडगारीनो हो प्रीतजीये सील अमोलो, तो कांजी कोही तूलो हो प्री०॥९॥ सीयल विभूपा कहीये, सीले जस महीयल लहीये हो प्री० । इणि भव प्रिय तूं मोरे, हूं चेडी सरणे तोरे हो प्री० ॥१०॥ काम न कोई बीजे, तुझने देखी मन रीझे हो प्री- वाल्हेसर तूं मन माहरे, बलिहारी प्रीतम ! ताहरे हो प्री० ॥११॥ए निश्चय मुझ जोवो, होणहार हुवे तेहोवो होप्री०सोलमी ढालसुहावे, 'जिनहरष सह सुख पावे हो प्री०॥१२॥ दूहा-सती सिरोमणि मन सुदृढ, निरमल सील सुहाय । इकतारी इम राखतां, अनुक्रमे रयणि विहाय ॥ १॥ प्रहविहसी पूरव दिसे, उदय थयो आदीत । मार्नु मयणा सुंदरी, देखवा सुपवीत ॥२॥ चिहुं दिसि चिडीयां चह चही, बोल्या पंखीचंद । मार्नु मयणाने श्रीपाल कहे, चिरंजीव चिरनंद ॥ ३ ॥ मयणा वयण कहे हिवे, सुण प्रीतम ! सुसनेह । जईये उलट भावसुं, श्रीरिसहेसर गेह ॥४॥ मयणा उंवर आवीया, वांद्या रिषभ जिणंद।मयणा स्तुति इणपरि करे, हीयडे धरि आणंद ॥५॥ ढाल १७ मी."आदर जीव!क्षमा गुण आदर" एहनी-जय जय रिषभ जिणेसर साहिब, शिव संपत्ति दातार जी। नाम थकी नवनिधि सिद्धि लहिये, त्रिभुवनजन आधार जी, जय० ॥१॥ तूं करुणा सागर गुण आगर, महीयल महिमावंत जी । सुर नर नायक पाय नमे नित, दसण नाण अनंत जी,जय०॥२॥अजर अमर अविचल अविनासी, नलहे कोई सरूपजी। ज्योतीरूप अरूपी अरिहंत, त्रिभुवन नाथ अनूप जी, जय० ॥३॥ संयंभूरमण विंदु जल- केरी, संख्या कहे कोई तास जी। तुझ गुण संख्या न लहे कोई, जो सारद मुखवास जी, जय० ॥ ४॥ तूं परतिख सुरतरु अवतारी, बलिहारी तुझ नाम जी । तूं सहु जंतु तप ॥४१॥ .
रास.
श्रीपाल , मल ध्यान, त०॥२॥ अरिहंतादिक नवपद आगले, ठावे श्रीफल गोल। गौघृत उज्जल
खंड मिश्रित करी, जेथी होइ रंगरोल, त० ॥३॥अरिहंतपदे धवलो गोलो ठवे, कर्के-
तन अठ रयण । चोत्रीस हीरारे वली माहे ठवे, वंछित संपत्ति लयण, त०॥४॥
सिद्धपदे इकत्रीस प्रवालडा, राता माणिक अष्टारक्त चंदन लेपित गोलक धरे,टले उप-
द्रव कष्ट, त०॥५॥ पंच मणी गोमेद छत्रीसनो, सूरिपदे ठवे गोलापंचवीस ठावे पाठक-
पदे, नील रतननीरे ओल, त०॥६॥रिष्ट रतन सगवीसे मुनिपदे, सतसठि एकावन्न ।
सित्तरने पंचास उलाससुं, मुगता सेस सुमन्न, त०॥७॥ निज निज वरणे रे वस्त्रादिक
ठवे, नवपद तणे समेलि। खाजा दोठारे नुकती लाडुआ, झाझी साकर भेलि, त०॥८॥
खारिक खुरमारे द्राख सोपारीयां, निमजाने नालेर। इत्यादिक नव नव आगलि घरे, पामे
मोटिम मेर, त०॥९॥इम ऊजम[रे मनरंगे करे, आणी भावविसाला कहे 'जिनहरप'
---
॥४८॥
श्रीपाल. ॥४९॥ लहे सिवसंपदा, ए थइ वीसमी ढाल, त ॥१०॥ सर्व गाथा ॥ ३४६ ॥ दूहा-इणपरिजेएतप करे, दुष्ट कुष्ट क्षय खासारोग सोग दालिद्र दुख,थाये सहुनो नास ॥॥दोहागिण वंध्यापणु, विसकन्यादिक दोष। स्त्रीने एथाये नहीं, पुन्य तणुंहोइ पोष ॥२॥ संघमणीगुरु उपदिस्युं,ए नर लक्षणवंत। जिनशासन दीपावस्ये, भगति करो मनखंत ॥३॥ सात क्षेत्र जिनवर कह्या, श्रावक पुन्य पवित्र।साते सचवाये सही, साहमी भगति विचित्र इम निसुणी सहु को करे, उंबर भगति अपार।रहिवा मंदिर आपीया, धन कण कंचन सार ५ ' ढाल २१ मी. “सोझितरो सिकदार" एहनी-हिवे उंबर निज नारि वयण मनमां धरी हो लाल व०, सदगुरु हितउपदेस हीयामें अनुसरी हो लाल ही० । सिद्धचक्रनी पूजा सीखी गुरुसांनिधे हो लाल सी०, जाणे वुद्धिप्रमाण सुजाण भली विधे हो लाल सु० ॥१॥ आव्यो आसू मास महूरत सुभ दिने हो लाल म०, सिद्धचक्रनो तप आरंभ्यो ॥४९॥ भोपारा ५
॥५०॥
रास.
सुभमने हो लाल आ० । तन मन वचन पवित्र करी जिनमंदिरे हो लाल क०, पूजा
श्रीजिनराय अपाय दूरे करे हो लाल अ० ॥२॥ सिद्धचक्रनी पूजा कि आठ प्रकारनी
हो लाल कि०, मयणा उंवर दोइ करे विस्तारनी हो लाल क० । आंविलनो पचखाण
करे मन ऊमही हो लाल क०, सुगुरु वचन सुप्रमाण हीयामे गहगही हो लाल ही
॥३॥ दिन दिन ओछो रोग हुवे इण जापथी हो लाल हु०, तूटे करम कठोर विछूटे
पापथी हो लाल विनवमे दिवस विसेस न्हवण पंचामृते हो लाल न्ह०, सिद्धचक्रनी
पूजा रचे सुभमन हिते हो लाल र०॥४॥ मात्र करी मन रंग न्हवण जल छाटीयो
हो लाल न्ह०, रोग गयो ततकाल नीरोगी तनु थयो हो लाल नी । जाणे रतिपति रूप
अनूप विराजीयो हो लाल अ०, नवपद महिमा अधिक जगतमां गाजीयो हो लाल ज०
॥ ५॥ सिद्धचक्रने न्हवणे अवर सहु रोगीया हो लाल अ०, कंचण वरणी देह थया
॥ ५० ॥
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श्रीपाल. रास. नीरोगीया हो लाल थ। मयणा पतिनो रूप निहाली इम कहे हो लाल नि०, गुरुनो ए उपगार सुजस महीयल लहे हो लाल सु०॥६॥उंवर देवकुमार सरूपे आगलो हो लाल स०, सहुना टलीया रोग धरम थयो ऊजलो हो लाल ध० । फलीय मनोरथ माल कुमर मयणा तणी हो लाल कु०, कीरति वाधी लोक मझार घणुंघणी हो लाल म०॥७॥ महिमा श्रीजिनधर्म सुगुरुनो निरखीयो हो लाल सु०, देव धरम गुरु भक्ति कुमर करे हरखीयो होलालकु० । जिनगृहथी इक दिवस नीसर्या दंपती हो लाल नी०, साझी आवि नारि ओलखी सुभमती हो लाल ओ०॥८॥पाये लागे तास कुमर हरखेकरी हो लाल कु०, हीयडे हेज अपार सजल आंख्यां भरी हो लाल स० । मायडी पुत्र वियोगसुं वेदन उपसमी हो लालवे०, ढाल थई 'जिनहरप' कहे इकवींसमी हो लाल क०॥९॥सर्व गाथा॥ ३६०॥ दूहा-कुमर कहे सुण मातजी!, बहु दिवसे मिलीयाह । ऊमाहो सफलो थयो, दुख-
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श्रीपाल. रास. नीरोगीया हो लाल थ०मयणा पतिनो रूप निहाली इम कहे हो लाल नि०, गुरुनो ए उपगार सुजस महीयल लहे हो लाल सु०॥६॥उंवर देवकुमार सरूपे आगलो हो लाल स०, सहुना टलीया रोग धरम थयो ऊजलो हो लाल ध०। फलीय मनोरथ माल कुमर मयणा तणी हो लाल कु०, कीरति वाधी लोक मझार घणुंघणी हो लालम०॥७॥ महिमा श्रीजिनधर्म सुगुरुनो निरखीयो हो लाल सु०, देव धरम गुरु भक्ति कुमर करे हरखीयो हो लाल कु० । जिनगृहथी इक दिवस नीसर्या दंपती हो लाल नी०, साझी आवि नारि ओलखी सुभमती हो लाल ओ०॥८॥पाये लागे तास कुमर हरक्षेकरी हो लाल कु०, हीयडे हेज अपार सजल आंख्यां भरी हो लाल स० । मायडी पुत्र वियोगसुं वेदन उपसमी हो लाल वे०, ढाल थई 'जिनहरप' कहे इकवीसमी हो लाल क०॥९॥सर्वगाथा॥ ३६०॥ दूहा-कुमर कहे सुण मातजी, बहु दिवसे मिलीयाह । ऊमाहो सफलो थयो, दुख- ॥ ५२॥ रास. श्रीपाल. 2 दोहग टलीयाह ॥१॥ मयणा सासू जाणिने, पायपडी तिणवार। माता! तुझ वहुअर थकी, हू नीरोग विचार ॥२॥ माय कहे वहुअर सहित, जीवे कोडिवरीस । अविचल जोडी तुम्हतणी, इम दीधी आसीस ॥ ३॥ आलिंगन देई करी, पूछे कुसल सरीर।माता! तुझ परसादथी, हूं थयो आज सधीर ॥४॥ इतला दिवस किहां हुता?, मात! कहो मुझ वात । जणणी कहे सुत आगले, पूरवला अवदात ॥५॥ ढाल २२ मी."झारीलाल पीयेरंग छोतरा"एहनी-तुझने पूछी पुत्र!हूंचली, उज्जेणीथी कोसंबी पहूंती रे।मुनिवर दीठो एक देहरे, वांदीमनमा गहगहती रे, तु०॥१॥में दाख्यु मुनिने एहवं, इण नगरी वैद्यनो वासो रे । आवी पुत्र रोग पडींगणो, पूछवा तेहने पासो तु० ॥२॥ भगवन कहो पुत्र कहीये हुस्ये?, निरावाध मुनि तव भाँखेरे।तुझ सुत कोढी टोले भल्यो, निजनाथ करीने राखेरे, तु०॥३॥उंवर राणा नामे कर्यो, परण्यो मालवपति श्रीपाल. । रास. बेटी रे। मयणासुंदरी नामे भली, सीलवंती गुणमणि पेटी रे, तु०॥४॥ सदगुरु वचने दंपति, भावे सिद्धचक्र आराधे रे। कंचणवरणी काया थई, निज (जिन) धर्म भली परि साधे रे, तु०॥५॥ उजेणीमें सुखसुं रहे, इम सुणि थई हरष सनाथो रे। इहां आवी मिलवा भणी, तुझने दीठो वहू साथो रे, तु०॥६॥सासू बहू पुत्र सुखे रहे, करता जिनधर्म उमेदे रे । इक दिन जिनवर पूजा करी, अंग अग्र मली विहुं भेदे रे, तु०॥७॥ एहवे अवसर हिवे सांभलो, मयणासुंदरीनी माता रे। राणी रूपसुंदरी गुणभरी, नृपसुं रीसावी जाता रे, तु०॥८॥जई वेठी निजभाई घरे, पुन्यपाल कृपाल कहावे रे । दुख सोक घणो मनमां करे, मयणा विण खिण न सुहावे रे, तु०॥९॥ कितलेक दिवसे दुखतजी, जिन- धर्म करे मनरंगे रे। आवी जिनवर दरसण भणी, तव देखे कुमरसुंरंगे रे, तु०॥१०॥ एतो अमर कुमर रूपे भलो, फिरि फिरि ते साह्मो जोवे रे। जोतां जोतां तिण ओलखी, - -- श्रीपाल रास. । कारणे, करे मंत्रणा करिवा छेद रे, वे०॥७॥ मंत्री जाणी ते वातडी, संभलावी मुझने तेह रे, वे० । मंत्रीसर कहे राणी सुणो, जतने राखो सुत एह रे, वे०॥८॥ जीवस्ये तो राज्य हुस्ये वली, सुत एकज ए दही दूध रे, वे० । तिण कारणि ए लेई करी, जाओ तुम्हे आत्या लूध रे, वे० ॥९॥ केडेथी अम्हे पिण जाइस्यूं, नाठां विण कुसल न होइ रे वे०। मंत्रीना वयण सुणी इसा, नाठा हूं ने सुत दोइ रे, वे॥१०॥ एकलडी हूं राते चली, छानी नवि जाणी केण रे, वे। नंदन कडीए पंथ चालवू, कांटा भागे पाएण रे वे०॥११॥ धरती ऊंची नीची घj, अथडाउं तनु सुकमाल रे, वे० । दुख एक हतो पति मरणनो, राज्यभ्रष्टथया सुत वालरे, वे० ॥१२॥ वयरीनो भय मनमा घणो, इम चलतारात विहाइ रे, वेगएतले थई ढाल चोवीसमी, 'जिनहरप' कही चितलाइ रे, वे०॥१३॥सर्व गाथा ४०९॥ दूहा-दुखभर इणपरिचालतांनीठथयो परमाताकोढीनोटोलोसवल,आगलिएकदिखात
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म
अजितसेनकी तरफसे होहार
भय के कारण पाच वर्ष के राजपुत्र
श्रीपारको यर राणी कमलप्रभा
म या राजमहलय निकली, गत
भर जगलम फिग्नीद मोरे रस्ते
पर गइ में मामी १०० सोडीये
मि उ होने प्रेमपूरक हनीपत
पुर आश्यामा दिया एव अजि-
तसना भयम रमनक लिये माता
और पुनको अपने समुदाय में मिला
रिय और पिही पर भोडारे
पय गचर पर चढ़ा दिये, पीडसे
पप राजपुस्पासो पोडिय
(पत्राक..)
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रास. श्रीपाल. ॥ ५९॥ कमला ते देखी करी, मनमां थइ भयभ्रांत। कडीए बालक एकली, नलहे चित्त निरांत ॥रारोवे जोवे दह दिसे, कोढी करुणावंत । दुखिणी देखी मुझभणी, पूछे सहुवृतंत ॥३॥ ए बंधव सहु ताहरा, तूं अम्ह वहिन सरीख । पूछी बात कही सहू, आपी रूडी सीख ४ ढाल २५ मी. देशी मांनां दरजणरी-देइ इम आसासनारे, निरभय कीधी जाम । वर वेसर वेसारिने,ओढाडी चादर तामरे॥१॥सांभलज्यो आगे वातरे,जिम मीठीलागे, भागेरे भागे मनना दुख, दोहग भागे, ए आंकणी, इण अवसर केडे थकी रे, आव्या अरि असवार। रोस भर्या आयुध धर्या रे, मुख बोलंता मार मार रे, सांभल०॥२॥पेडाने आवी कहे रे, तुम्हे दीठी इक नार।पासे सुंदर दीकरो, रूपे रतिपति अवतार रे, सांभल०॥३॥पेडो तुम्हे सांभलोरे, अम्ह पासे छेपामा ते तुम्हने आपुंअम्हे, आवेजो कोई कामरे, सांभल० ॥ ४॥ सुभटे जाण्युं रोगीया रे, कोई न दीसे पास। इहां ऊभां जुगतो नहीं, रोग भये .
रास. श्रीपाल. दुरे गया नास रे, सांभल० ॥५॥ उंबर रोगे पीडीयो रे, अंग थयो बिदरंग। पुत्रपडींगणो पूछती, हूं गई कोसंबी द्रंगरे,सांभल० ॥६॥ तिहां जईने लोकने रे, पूछ्यो वैद्यनो गेह । लोक मुखे में सांभल्यो, तीरथ भणी पहुंतो तेह रे, सांभल० ॥७॥९रही तिहां वासर घणा जोती वैद्यनी वाटासाधु थकी सुध लही सहू, मननो मिटीयो उचाट रे, सांभल०॥८॥ आवी इहां पूछती रे, अंगज मिलिवा काजीहूं कमलाएमाहरो, सुत जाणज्यो सिरताज रे, सांभल०॥९॥ कमलाने वचने करी रे, राणी थई निसंक। पुत्री गुणवंती सती, एहने किम लागे ? कलंक रे, सांभल० ॥१०॥ निरखि जमाई सामुहो रे, तृपति न पामें लेस। मुझ पुत्रीनोजोईज्यो, फलीयो काइ भाग्य विसेस रे, सांभल०॥११॥रूपसुंदरी सुख पामीयो रे, उलसीया सहु अंगदाल थई पचवीसमी, 'जिनहरष थया उछरंग रे, सांभल०॥१२॥ दूहा-पुन्यपालने सहु कह्यो,रूपसुंदरीजई गेह।मामे तेडी निज घरे,आण्या घणे सनेहा
श्रीपाल.
AP
सुंदर मंदिर आपीया, आपी धननी कोडि।पंच विषय सुख भोगवे,वेजण प्रेम सजोडि॥२॥
एक दिनराजानीसयों,पासे कुमर आवासादीठी मयणा कुमरसुं,करती विविध विलास ॥३॥
मयणा कोई बीजो कर्यो, सुंदर पुरुप सरूप । कोढी परिहरियो परो, इम मनचिंते भूप॥४॥
पहिलो क्रोधवसेण में,काम अजुगतो कीधावीजो मयणा मयणवसि,लंछण मुझकुलदीध ५
ढाल २६ मी. "पीछोलारी पाले आंबा दोइ मोरीया म्हारा लाल आंवा०" एहनी-पुन्य-
पाल ततकाल जणावे रायने म्हारा लाल ज०, भाणेजीनी वात सहू समझायने म्हारा लाल
स०आव्यो नृप आवास कुमरने ऊमही म्हारा लाल कु०, प्रणमे मयणा कुमर चरण मन
गहगही म्हारा लाल च० ॥१॥ लजावंत नरिंद कहे वाई। सुणो म्हारा लाल क०,
में
तुझने मतिहीण दीयो छे दुख घणो म्हारा लाल दी० । मुझ अविनय अपराध असाध्य
विसारजे म्हारा लाल अ०, उत्तम गुण गुणवंत हीयामें धारजे म्हारा लाल ही० ॥२॥
गीपार रास. - मयणा विनय महंत मधुर वयणे कहे म्हारा लाल म०, दोसन को तुम्ह तात! करम फल सहू लहे म्हारा लाल क०।सुख दुख करम संयोग सहू आवी मिले म्हारा लाल स०, करम महा वलवंत न टाल्यो ही टले म्हारा लाल न० ॥३॥इम जाणी तुम्हे तात! जिणेसर धर्मसुं म्हारा लाल जि०, नव तत्त्वराचो राय! म राचोभर्मसुंम्हारा लाल माइम निसुणी नरनाथ धरम अंगीको म्हारा लाल ध०, अपकारे उपकार सुता ते आचर्यो म्हारा लाल सु०॥४॥ वाल्हीने वलि विनय वहे गुण संग्रहे म्हारा लाल वहे०, धर्म पमाडे जेह जगतमें जस लहे. म्हारा लाल ज० । कुमरी सम श्रीपाल जमाई निरखीयो म्हारा लाल ज०, ऊलट अंग न माइ हीयामें हरखीयो म्हारा लाल ही०॥५॥ कीधो वांको राय कहे थयो पाधरो म्हारा लाल क०, मूंग माहे जाणे घीय ढुल्योथयो ए खरोम्हारा लाल दुपुत्रीए पुन्यवंत फल्यो पुन्य एहने म्हारा लाल फ०, श्री जिनधर्म पसाय थया सुख जेहने म्हारा लाल थ०
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श्री
पा
गोपालजीको पीपर
धामणममे प्रनापाल गजा अपने
না পারে।
स
मक
१८: Matau,
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रास. श्रीपाल ॥६॥ गज ऊपरि आरोपि जमाई पुत्रिका म्हारा लाल ज०, लेई गयो निज गेह करी आरात्रिका म्हारा लाल क० । गोरी गावे गीत नगारा वाजीया म्हारा लाल न०, आडंबर उच्छाह गुणीजन गाजीया म्हारा लाल गु०॥७॥धण कणकंचण माल महेल नृप आपीया म्हारा लाल म०, सारी नगरी माहि सुजस थिर थापीया म्हारा लाल सु० । कुमर चड्यो रयवाडी रमवा किणि समे म्हारा लाल र०, देखे लोक अपार सहुने मन गमे म्हारा लाल स०॥८॥पूछे मांहो मांहि कुमर ए कुण अछे म्हारा लाल कु०, एक कहे नृप धूअ धणी बीजो न छे म्हारा लाल ध०। वचन सुण्यो श्रीपाल विच्छाय थयो घणूं म्हारा लाल वि०, छावीसमी 'जिनहरप' ढाल इण परि भणूं म्हारा लाल ढा०॥९॥ सर्व गाथा ४३९ ॥ दहा-रयवाडीजई आवीयो, पिणमनमें दिलगीर।जननी पूछे आजतुं, एहवो किम ? कहे वीर! १ चिंता मनमाहे किसी,पुत्र! कहो मुझ तेह। चिंता कारण मायने,कुमर कहे ससनेह २ mhd श्रीपाल, रास. ॥६४॥ माहरे गुणे न ओलखे, तात गुणे नवि कोइ।मात गुणे न पिछाणीये, तिण मुझ चिंता होइ ३ सुसरा नामे ओलखे, सुसराथी परसिद्ध । तिहां रहिवो जुगतो नहीं, शास्त्रे कह्यो निसिद्ध४ माय कहे मुझने गम्युं, सैन्य सजी ल्ये राज । अरिदल जीपो आपणा, वंस वधारो लाज ५ कुमर कहे माता सुणो, सुसराने वल राजा लेवू मुझने नवि घटे, करसुं निजवल काज ६ ढाल २७मी."मनमधुकर मोही रह्यो"एहनी-परदेसेजाई करी,लाऊंलच्छि कमाय रे। भुजबललेस्युवापनो,राज्य अरि समझाय रे,पर०॥१॥माता कुमर भणीकहे,तूंवच्छ! नान्हो बाल रे। बाट विषम परदेसनी, अटवी नदीयां नाल रे, पर०॥२॥ कुमर कहे कायर भणी, दोहिलोछे परदेस रे।मनमा सापुरसां तणे, भय नावे लवलेस रे, पर०॥३॥मयणासुंदरी वीनवे, काया छाया जेम रे । हूं तुम्ह साथै आवसुं, तुम्ह पाखे रहुं केम रे, पर० ॥४॥ तूं पगवंधन कामिनी !, भम, मुझ निसदीस रे। कामकरू के जालवू, दुक्कर विसवा वीस
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भरच नाते हुए रम्नमें पहाडके
नन्दीय श्रीपालजीको विद्याधरमे
मिगर हुआ, इनके उत्तरमाधम
होनेसे उमसी विधा मिद्धमा
शिवधरने प्रसन्न होरे दो और
धिया श्रीपालनीको दी, दोनों जने
भाग चले पदाडफे उपर धातुचांदी
(मुरर्णम मिद करनेवाले) मिले,
यहाभी श्रीपालजीके उत्तरमाधक
होनेम सुवर्णरम मिद होगया
नयार हुआ सुपर्ण लेनेरे लिये
धानुनादी लोकाय जो श्रीपा-
लजी प्रार्थना कर रहे है।
११
( पयाग ६ )
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१ 74 रास. श्रीपाल. 1६५॥ पर०॥५॥जाया जणणी वे भणी, समझावी श्रीपाल रे। नवपद ध्यान धरी करी, चाल्यो लेइ करवाल रे, पर० ॥६॥ गामागर पुर पेखतो, पहुंतो इक वन मांय रे। दीठो वेठो पुरुषने, तरु तले वदन विच्छाय रे, पर०॥७॥ कुमर कहे तूं कुण अछे ?, किम वेठो दिलगीर रे। विद्याधर छु ते कहे, सांभल साहस धीर! रे, पर० ॥८॥ गुरुदत्त विद्या मुझ कन्हे, विधे जपी बहु वार रे । उत्तरसाधक बाहिरो, सिद्ध न थाये विचार रे, पर० ॥ ९॥ तूं उत्तरसाधक हुवे, तो सीझे मुझ काज रे। कुमर सहाये तेहने, विद्या सीधी साज रे, पर० ॥ १०॥ विद्याधर दोइ ओषधी, कुमर भणी तव दीध रे। उपगारे उपगारडो, सिद्ध पुरुष पिण कीध रे, पर०॥११॥गुण सांभल जल तारणी, एक जडी छे एह'रे।वीजी शस्त्रनिवा- रणी,महिमा तास कहेह रे, पर० ॥१२॥ आदर करि तेडी गयो,विद्याधर निजगेह रे।सोवन सिदि रस कूपिका, कुमर सहाय्य करेह रे, पर० ॥१३॥ ढाल कही सत्तावीसमी, वखतावर सीपाल रास. ॥६६॥ नर जेह रे। कहे 'जिनहरप' जिहां तिहां, सुखीया थायेतेह रे, पर०॥१४॥सर्व गाथा४५९ दूहा-कुमरभणी क्रितधनकीयो,चाल्यो सीखकरेह । भरुअच्छ नयरे आवीयो, सुखसुतिहां रहेह १ इण अवसर हिवे तिण नगर,धवलसेठधनवंता पूरे प्रवहण पांचसे,खरीधरीमनखंत २सुभट सहस दस राखीया,चोकी पहोरा काजानृपआदेस लेई करी, सुभ महूरत दिन साज ॥३॥वलिबाकुल देई करी, वाहण पूर्या जाम।ठाम थकी नवि चालते, धवल चिंतातुर ताम४ ढाल २८ मी. "चरण करणधर मुनिवर वंदीये" एहनी-सेठे जई पूछी सीकोतरी, ते कहे नर बलवंतो जी। वलि आपे तो तुझ वाहण चले, बत्तीस लक्षण (गुण)वंतो जी, से०॥3॥ सांभलि सेठ खुसी मनमां थयो, वीनवीयो जई रायो जी। स्वामी! एक पुरुष मुझ दीजिये, बलि काजे सुख थायो जी, से०॥२॥राय कहे जे परदेसी हुवे, नर एकलडोअनाथो जी। ते लेजे माहरी छे आगन्या, अवर म लाए हाथो जी, से० ॥३॥ सुभट धवलना
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तरफ भकरके गजनित
और दूसरी तरफ घर मोठी
नुभट गरे । यीनमें गई हुए
भीपालनी चीरताफ माय दानामे
सा
रा
म
(पत्रांक ६७)
AN
---
AP BOA
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श्रीपाल । ७०॥ रास. दूहा-तव धणु तूण धरी करी, केडे धस्यो कुमार।बोलाव्यो महाकालने, जाइस किहां? गमार १कायरजीपी गरजीयो,पिण माहरोबल जोइ।नासिमजाइस रांकज्यूं,जोर॑क्षत्री होइ २ वयण सुणी पाछो वल्यो, मनमां नाण्यो बीह। वापूकार्या किम रहे ?, साहसीक नरसीह ३ कहे वयण इम कुमरने, रे रे भोला वाल| मुझसुंजो कांकल करिस, पामिस मरण अकाल कांइ मरे रे वालुया, परकजे वेकाम। कुमर कहे मांटी अछे, तो कर मुझसुं संग्राम ५ ढाल ३० मी. "चढ्यो रणझूझवा चंडप्रद्योतनृप” एहनी-आवीयो ताम करि जोर बल फोरतो, बब्बराधीस मन रीस आणी। सुभट थट विकट साथे करी आपणा, रोस चढीयो वदे असुभ वाणी, आ०॥१॥आवरे मूढ जोरूढ मेल्हे नहीं, आज मृगराजसूतो जगाड्यो। धरणि धूजावतो सांमुहो आवतो, छोह धरि लोह सुहडे उडाड्यो, आ०॥२॥ धरणि धड- धडीय गडगडिय दम्माम धुनि, दहदिसे परिवर्या सवल सूरा । तुरंग भल पाखर्या शस्त्र
श्रीपाल.
रास.
हाथे धर्या, नाचता माचता रण सनूरा, आ० ॥३॥ वाण वरसे घणा सुहड हाथां तणा,
गयण रवि रयणि अंधार कीधो। भाट भड ऊछली सयल खांडां तणी, कुमरने जे प्रथम
घाव दीधो, आ०॥४॥ झुझतो सत्रु दल सूड करतो प्रवल, गाजतो गाज आवाज करतो।
केवि केवी हण्या सीस दूरे लुण्या, अंग उछरंग धरि जंग फिरतो, आ० ॥५॥ अधिक
वाचाल मछराल श्रीपाल इम, घाव घमसाण हेराण कीधा। घाव ठामे रुहिर विंव धारा पडे,
अरितणाजीव कण काढि लीधा, आ०॥६॥इम लड्यो आथड्यो कुमर अरि सैन्यसुं, बबरा-
धीश ततकाल वांध्यो।वंदि करी आपणा साथमें आणीयो, सांमुहो किणही नवि तीर सांध्यो,
आ०॥७॥ धवल छोडावीयो कुमर बंधण थकी, कोप करी खडग धरी राय केडे । मारवा
संचों सेठ वार्यो कुमर, वांधीयो मारतां सुजस फेडे, आ०॥८॥राय महाकालने अभय देई
करी, सहस दस धवलना सुहड सूरा । जेह नाठा हुता कुजस आवीखता, वृत्ति छेदी कीया
॥७१॥
चितामकरिसकाईजी
सुख
०१२
इहां
दूषण
तुझ
नविकोईजीसुख
०
,
आसातनातुझथीनवि
।
रिपाल.
मन लाईजी सुख० । नृप कन्या पूजा वणावेजी सुख०, सहु देखीने मुख पावेजी सुख०
॥ ८॥ इक दिन नृप पूजा दीठीजी सुख०, राजाने लागे मीठीजी सुख० । ए सरिखो वर
कोई जोऊजी सुख०, तेहने ए कन्या ढोऊजी सुख० ॥ ९॥ इक दिन जिन पूजी कुमरीजी
सुख०, गंभाराथी नीसरी कुमरीजी सुखाततखिण ते वार जडाणाजी सुख०,सहु लोक थया
हैराणाजी सुख० ॥ १०॥ कुमरी करे आतम निदाजी सुख०, धिग धिग हूं पापिणी मंदाजी
सुख० मुझमें कोई दूपण दीसेजी सुख०, आसातना विसवावीसेजी सुख० ११ इम दुख करि
कन्यारोवेजी सुख०, नृप कुमरी सनमुख जोवेजी सुखाराजा कहे सांभल वाईजीसुख०,तूं
होईजी सुख०।एकत्रीसमी ढाल थई पूरीजीमुख०, 'जिनहरप!' कथाछे अधूरीजी सुख०१३
दूहा- रायकहे सामल सुता, इहां दूपणछे मुज्झ। जिनगृहमा मनमांधरी, चिंता वरनी
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॥
পাষান্তনী নাথ পা নুর
नटार TT लिया, निनटाधारी
গা। মা শার্মা মা গলা
প্রাদি যা যুগ যুগাল
? মা সি খান।
প্রান খাখালা খায়
পান্তা গগে বিনা খা ।
মা ‘ ােনা শিল্প মন
থাই ধুমাল লিমিঃ
কত যে মমি পর পস, স্বা
বাঙ্গীণ মালা । স্বল্যধন
মন ? পাশা , বা
এমৃনিমা নাস।
{শয়া ,
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रास श्रीपाल. तुज्झ१ सावद्य ए आसातना, तेह तणा फल जाणि।वार जडाणा एसही, तेतले थई सुरवाणि र दोस न कोई कुमरीयह, नरवर दोस न कोइ । जिण कारण जिणहर जडिउ, तं निसुणो सहु कोइ३जसु नर दिहि होइस्ये,जिणहरु मुक्कदुवार।सोइज मयणमंजूसियह,होएसी भरतार४ सिरि रिसहेसर ओलगणि, हूं चक्केसरी देवी।मासऽम्भितरे तसु नरह,आणेसु निश्चय लेवी ५ राजलोक सहु हरखीया, गया सह कोई गेह । दिन दिन आवी देहरे, लोग राय निरखेह६ ढाल ३२ मी. “मोरोमन मोह्यो इण इंगरे" एहनी-आज दिनमासनोछेहलो, जो हिवे की वार रे। ऊघडे तो मिले देवनी, वाणी साची निरधार रे, आ०॥9॥कुमर असवार यो, साथे परिवार अपार रे।आवीया लोक नृप सुता, हरख धरि मनह मझार आवतां तुरत जिनगृह तणा, ऊघड्या झटकि किमाड रे । कुमर जिनराय ते बहु भांति दिखाड रे, आ०॥३॥राय मन लाइ देखी रह्यो, नृप सुत्ता थई *
श्रीपाल
॥८४॥
विन्नाण ॥१२॥ चाल-हिवे नाण विन्नाण न सूजे,छाती धडहड इम धूजे।अम्हथी दादुर गुण
जाण, पाणी सरिसा जसु प्राण ॥ १३॥ पीहर तो परतटे रहीया, प्रीतम विरहागनि दहीया।
प्रमदा इणिपरि विलवंती, दुख रोई राति गलंती॥१४॥हा-राति गलंती तिमरडी, पाहण
फट्टइ जेण। पिण हीयडो फाटो नहीं,थयो कठिन विरहेण १५चाल-प्रिय विरह वियोगे पीडी,
वलि सेठे कुद्रिष्टे भीडी। पामे नहीं किमही थाग, निज प्रीतमसुं बहु राग १६ सतीयां निज
सील सखाई, तेहने तोचिंतन कांई। जिनहरख!' देवी वरदाई,पेत्रीसमीढाल सुहाई १७
दूहा-इम विलवंती सुंदरी, रोवंती न रहाय।धवल अधरमी तिण समे, भासे पासे आय
॥१॥हे सुंदरी तुम्हे सांभलो,मकरोमनमें खेद।हूंतुम्हने सारीपरे,राखिसघणे उमेद ॥२॥
विधिविलसित अहिलो नहीं, नहीं केहनोजोर। पिणमुझवयणमलोपसो, तुमने करूं निहोर
३वयण सुणीमयणा विन्हे,जाण्युंएहना कामासायरमां पिउ नांखीयो, रही अबोली ताम४
+
॥८४॥
जाणे चंचल पीपल पान दे ० ॥२ ॥ वीज झलामल झलहले रे , वीहावती बाल गोपाल । रास. श्रीपाल, ॥८५॥ ढाल ३६मी.देशी वाणिणि वाउली रे, जसोदा फौजां पाछी वालि"एहनी-इण अवसर गयणंगणे रे, मिलीयो घनघोर अंधार, देवी चक्केसरी रे।मयणानी वाहरे आई,धाई वाहर आई धाइने, लागी नहीं कांई वार दे० । पवन चिहुंदिसि ऊपड्या, सायर कल्लोल अपार दे० ॥१॥जलनिधिना जल ऊछल्या रे, ऊधाण चढ्या असमान दे०।वाहण लागा डोलिवा, दे। घोर घटा करि ॐनम्यो, जलधर वरसे असराल दे० ॥३॥लोल कल्लोल हिलोलतो वाजे दधि गाजे पूर दे।लोक सोक भय ऊपनो, कायर थयां सूर विनूर दे०॥४॥खाडा हत्थउ भैरवो रे, कर डमरूने डाक देतिण अवसर प्रगट्यो तिहां, आव्यो मारतो हाक दे०॥५॥ माणिभद्र वीजो वली रे, पूरणभद्र कपिल सरीर दे०पिंगल चोथो दाखीयो, सिद्ध- चक्रना च्यारे वीर दे०॥६॥मोगर हाथे साहिया रे, अन्याई करे चकचूर दे०। सेवक श्रीजिन- ॥८५
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५ 印mmmm T Meri श्रीपालजीगरी दोनों बीयों ध्यान दलसे समुद्र में परदम नोफान ऊठता हे चकेवरी आदि देवगण नाके प्रगट होत ६, दुद्रि मिश्रको क्षेत्रपाल शिक्षा नेता है, लशेठ श्रीपालजीसी बोनों गायोंका शरण देता है, जिसन चकेश्वरी देवी उमको जीरता छोडती है, दोनों ग्गीय अपने शील रक्षण के लिये चक्रेथरीम प्रार्थना कर रही है। (पत्राक ८६) REFR + 4. -- ARUT SAGAR'S BOUDHA
श्रीपाल
1८८॥
राय जमाई जोहणे, धन यूं सवा कोडि । डूंब भणे एसोहिलं, काम करसुंदोडि, हि० ॥६॥
रावले च्वजई करी, गाया भला गीतावली विशेपे ते दिने, रीझाव्यो राय चीत, हि० ॥७॥
नृप तूठो पीडा दीये, गायननलीयंत।राय जमाई सेहत्थे, लीउं जो दीयंत, हि० ॥८॥हुकम
दीयो श्रीपालने, वसुपाल नरिंद।वीडा देवाने गयो, नवि जाणे फंद, हि० ॥९॥गायन सहु
ऊठी करी,सीपा कंठ विलग्ग। एक भणे पुत्र! ओलख्यो,इम रोवालग्ग,हि०॥१०॥एक कहे
भाइ मिल्यो, बहु दिवसे आज। नारि थई इक डूंबणी, बेठी करीलाज,हि०॥११॥माय थई
माया करे, रहे रहे हिवे पूत झाली बांह वेसारीयो, वलीयो घर सूत, हि०॥१२॥ राजा
अचरिज पामीयो, जोवो दैव सरूप । ढाल थई सेंत्रीसमी, 'जिनहरष' अनूप, हि० ॥१३॥
दूहा-कोप चढ्यो राजा कहे,वांभणडाभुं आज।एकन्या वर दाखव्यो, गमीसहू,लाज १
वली नृप पूछे कुमरने, दाखवीये निज वंस। निज जीभे सीपो कहे, कुल कीजे न प्रसंस॥२॥
॥८८॥
रास- चतुरंगी सेना सजो, मंडावो भारत्थ। तिण वेला तुम्हे जाणिज्यो, कुल लहिस्ये मुझ हत्थ १२॥अथवा प्रवहण मांहि छे, दोइ नारी गुणवंति। कुल कहिस्ये ते माहरो, मिटस्ये मननी witun भूपति तेडी नारि के, मूंकी पुरुषप्रधान। आवी हीयडे ऊसही, पूछे तव राजान ५ १०मी. देशी "कोइलो परवत धुंधलो रे लो” एहनी- वोलीतव विद्याधरी रे लो, पारे राजेसरसिंहरथ राय कमला तणो रे लो, एनंदन श्रीपाल रे नरेसर!, पूरसह सही रे लो, एहनी छं वे अम्हे नार रे रानृप सुणि अचरिज पामी- रेलो. पायो पितरमारे न० बो० ॥२॥ ततखिण वांध्यां डूंबडा रे लो, दीधी मार सर रेरा कम कीरोहणवा तणो रे लो, गायन बोल्या तिण वार रे न०, बो०॥३॥ अम्हारो कोनोरेलो. सगपण पिण नहीं कोइ रेरा०ाधवल अछे एक वाणीयो रेलो, पीमा धूरि होइन, यो ॥५॥धन आपी अम्हने घणो रे लो एह कराव्यो काजरे P , श्रीपाल. रात. रा० । खोटो बोलीजे किसुरेलो, तुम्ह आगले महाराज!रेन०,वो०॥५॥राय भर्यो रीसे घणूं रे लो, पाठवीया निज दूत रे रा०॥ धवल भणी बांधी करी रे लो, लेवा तुरत पहूत रे न०, वो० ॥६॥ बांह अपूठी वांधिने रे लो, लाया वेग तलाररै रा०। वाहो (मारो) बार मलाविसोरेलो, धवल तणो सिरधार रेन०, वो० ॥७॥मारंतो छोडावीयो रेलो, करुणा करी श्रीपाल रे रा०वछीयायत ए वाणीयोरेलो, हणीये किम? भूपाल!रेन०, वो० ॥८॥ बंधनथी छोडावीयो रे लो, दिवराव्यो सनमान रेरासापुरुस रीस धरे नहीं रेलो, वलि न करे अभिमान रे न०, वो० ॥९॥ त्रिहुं मयणासुंभोगवे रे लो, सुख गमतां निसदीस रे रा०। कुमर प्रताप निहालिने रेलो, सेठधरेमनरीसरेन०,बो०॥१०॥ कुमर सूतो भूमि सातमी रेलो,वलीमांड्यो मन द्रोहरेरा० । निसिभर वांधी डोरडी रेलो, मूंकी चंदन गोह रेन०,वो० ॥११॥हणवा कुमरभणीचट्यो रे लो, पालीकर संवाहि रे रा०पाली सहित
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-- ww SSC LI..- जा का टाणा गर्गम गपने महलपी तसारी मनार श्रीपालजी भोले सो रहे थे, घर धरलयंट मौका पाके महलसी पूढमें गया और चदनगोहा पगमें रम्मी (बोरी) गाधरर उसको उपर चढाा, नरपि वह चदनगोह माती मनरपर जाके स्थिर हो गद तय कमरमें नरवार पाधकर श्रीपाली को मारनेके रिये ग्युद् धनलगेठ रमपी বন্ধ কী ব্যাঙ্গা যুৱ जानेर कारण आधे भाग गरी इट गर, नीचे पहने हुए हदयमें नल्यार घुस जानेमे मर पर नरपमें गया, मोरे नगरके लोक एकत्र होकर विविध गर्ने फरने लगे, श्रीपालनीभी हकीकत मुनक मजनता कारण आके उदास हुए पासम रे । (पाय .." E- Fachar MAKES WAKOTA
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श्रीपाल पाछो पड्यो रे लो, खूती हीयडा मांहि रेन०, बो० ॥ १२॥ ततखिण प्राण तज्या तिहां रेलो, धवल गयो जम लोक रे रा० देखी सहु कहे एहवो रेलो, पातिक न हुवे फोक रे न०, बो० ॥१३॥ माठी करणीथी इणे रेलो, फल पाम्या ततकाल रे रा० । कहे 'जिनहरप' भलो रे लो, कह्यो अडनीसमी ढाल रे न०, वो ॥१४॥ सर्व गाथा ६५८॥ दूहा-क्रोध लोभ श्रीपालना, मनमां नहीं लिगार प्रेतकार्य करि धवलनो, कीधो इम उपगार ॥१॥ तेडीने आसासना, सेठपुत्रने दीधा पिता तणो धन आपीयो, लोकांमें जसलीध ॥२॥ कोसंबी संप्रेडीयो, उत्तमनी एरीति। खीरनीर जिम सापुरुस, पाले पूरी प्रीति ॥३॥ ढाल ३९मी.देशी "नणदल हे नणदल',चूडले जोवन झिल रहियो” एहनी-साजन! होसाजन, इक दिनरयवाडी गयो, सीपो मनमें रंग।साजन ! सेवक साथिलेई करी, वेसी चपल तुरंग ॥१॥ सा० पुन्य कथा तुम्हे सांभली, पुन्य कीयां आणंद । सा० कट टले 1 mar रास. गोपाल ।९४ ।। ॥१॥ चीणामांगी बामणे, आपे कुमरी अचंभाआरंभ कीधो नादनो,थंभ्या सहु जिम थंभ ॥२॥सह को देखेवामणो, नृपकन्या श्रीपाल। कुमरीवर वरवा भणी, कंठ ठवी वरमाल ॥३॥ रूप अनूप कीयोप्रगट, चंपापति तिणवार ।मकरकेतुमनहरखसुं, परणावीयो कुमार॥४॥ आप्याकंचण मणिरयण, आप्यावर आवास।कुमर तिहांसुख भोगवे, वारूलीलविलास ५ ढाल ४०मी. देशी "प्यारोप्यारोकरती" एहनी-एक दिनरमवानीकलीयो,वाटे एकपंथी मिलीयो। कुमरे परदेसी कलीयो, पूछे अचरिज अटकलीयो होलाल॥१॥कहो पंथी! किहां जासो', किहांधी आया मुझ भासो। दीठो कोई तुम्हे अवल तमासो, मुझ आगलि तेह प्रकासो होलाल,क०॥रापंथी कहे चतुर सुजाण, कुंडनपुरनयरमंडाण आव्यो तिहाथी सुप्रमाण, जाइस हूं पुर पैठाण हो लाल, क० ॥३॥ कणयापुरमा आयो, राजा विजयसेन कहायो।राणी कनकमालामन भायो, जिणे पुन्य थकी सुख पायो होलाल,क०॥४॥ त्रैलोक्य-
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Namas म पा का रा म उडलपुर नगरमें वीणानादके चादमें जीतजानेपर गुणसुदरी राज- पुनीके साथ होता हुआ श्रीपालजी का विवाह दृश्य। (पनार ९४)
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श्रीपाल NVAR सुंदरी तसु बेटी, जाणे रूप कला गुण पेटी। पासे रहे सुंदर चेटी, मननी आरति जिणे मेटी हो लाल, क० ॥५॥ कन्या थई जोवनवंती, दीठी वापे मलपंती। वर जोग्य थई गुणवंती, सरिखे पूगे मन खंती हो लाल, क०॥६॥सयंवर मंडप मंडाउं, सहू देसाधिप तेडाउं। इण सरिखो जो वर पाउं, तो वेटीने परणाउं हो लाल, कजाइम चिंतवि चित्त मझारा, मंडप रचीया विस्तारा।जगमाहे नर सिरदारा,आव्या लेई परिवाराहो लाल,कलाबत्रीस जोयण इहाथी थाये, काल्हे वरिस्ये मनभाये।सीपोसांभलि तिहां जाये, पंखी जिम गयण पुलाये होलाल,क०॥९॥ कणयापुर माहे आयो,खुंधानो(कुज)रूप बणायो।अचरिज देखण ऊमाह्यो, देखी मंडप सुखपायो होलाल, क० ॥१०॥प्रतिहार न ये पेसेवा, हथसंकलो दीयो देखेवा आयो जिनहरख' वरेवा, चालीसमी ढाल कहेवा होलाल, क० ॥११॥सर्व ६९३ दहा-पूठभागऊंचो घणो, ऊर सांकडोप्रदेस। ऊंची नीची नासिका, माथे कपिला केस कायचय, ग्रासद बोसानिर। श्रीपाल ॥१॥ पूठे दबड कूबडो, मोटो माथो जास।दांत गदहडा सारिखा, तेहवा दांतऊजास॥२॥ कोटगली वांकी नली, पिंजर नयन विसात । लाल पडे होठ लडवडे, इसो बणायो गात ॥३॥राजहंस सम राजवी, बेठा करे कलोल। काग सरीखो कूबडो, आवी उभो लोल॥४॥ ढाल ४१ मी.देशी"श्रीचंद्रप्रभुप्राहुणोरे" एहनी-कहोखूधा नरपति कहे रे,किम ऊभा? इहां आज रेजिणे कारणे वेठा तुम्हे रे, ऊभो छु तिणे काजरे, क०॥१॥ हड हड हसीया राजवी रे, रूप बण्यो वाह वाह रे ! तुझ सरिखो वर किहां मिले रे, एहवां राजवीयां माह रे, क० ॥२॥ कन्या नरवाहन चढी रे, स्वयंवर कीधो प्रवेस रे। ढोल दमामा बाजीया रे, सखर वणाव्या वेस रे, क० ॥३॥श्रीपाल रूप मूलगो रे, देखे कन्या तेह रे।प्रमुदित चित्त थयो घणो रे, लागो निविड सनेह रे, क.॥४॥तीखे नयणे ताडिने रे, जोवे वारंवार रे। चुंबक लोह तणी परे रे, मन मिलीयो तिणवार रे. क०॥५॥ प्रतीहारी आवी हिवे रे, श्रीपाल रास. ॥ लाल छडी ले हाथ रे । स्वयंवर विचमें माल्हती रे, राजकुमरी करि साथ रे, क० ॥६॥ राजवीयाने ओलखे रे, जाणे देस विटेस रे।वंस तणी विरुदावली रे,संभलावे सुविसेस रे, क०॥७॥ छोडि चलीसहु राजवी रे, जिम भाद्रवडे (भाद्रवे)छाण रे।थांभा पूतलीने मुखे रे, देवतणी थई वाण रे, क० ॥८॥तथाहि-"यदि धन्यासि विज्ञासि, जानासि च गुणांतरं। तदैनं कुब्जकाकार,वृणु वत्से नरोत्तमं॥१॥" देव तणीवाणी सुणी रे, कुब्जगले वरमाल रे। घाली कन्याये वर्यो रे, मूंकी सहु भूपाल रे, क० ॥९॥धडहडीया कोपे करी रे, मानी नर मूंछाल रे।कहता रेरे। कूवडा!रे, मेल्हे परि वरमाल रे, क०॥१०॥मुक्यां मूंकां जीवतोरे, नहीं तोमूंकांजमलोकरे।राजसुताने कारणे रे, काइ मरेतूं फोकरे,क०॥११॥काइ अदेखा राजवी। रे, कांइ बडो करो रोस रे । रूप न पाम्यो जो तुम्हे रे, तो केहनो कहो दोस रे, क० ॥१२॥ नाक तणा मलनी परे रे, तुम्हने तज्या इणे वाल रे। आदरमान देई घणो रे, म श्रीपाल मुझ कंठे ठवी वरमाल रे, क०॥१३॥ भाग्य विना नवि पामीये रे, रायसुता सुकुमाल रे। कहे 'जिनहरप' मपी (लखी) जिस्योरे, इकतालीसमी ढाल रे, क०॥१४॥सर्वगाया७११॥ दूहा-एहवा वयण सुणी करी, भडभडीया भूपालामारोमारो कूबडो, पाडील्यो वरमाल १ इम कही ऊख्या मारवा, खूधे देखाड्या हाथा कायर थई नासी गया, मांडे कुण भारथ २ खूध पराक्रम देखिने, विजयसेन राजाना तव वोल्यो वछ! आपणो, प्रगटो रूप बलवान ३ रूप कीयो निज मूलगो, जाणे अभिनव काम।राजा रलीयायत थयो, कुमरी सम वर पाम ४ परणावी नृप अंगजा, उच्छव करी अपार सुंदर मंदिर आपीया,रयण कणय सिणगार ५ सीपो वर सुंदर प्रवर, त्रैलोक्यसुंदरी नार । जोडी जोडी सारिखी, हूंस हुइ किरतार ॥६॥ दाल ४२ मी. देशी "वालूरे सवायो वयर हूं माहरो रे" एहनी-रायसभाये आल्यो चर एकदा रे, कहे निसुणो श्रीपाल देवक पट्टण घण कंचण भर्यो रे, राय तिहां धरापाल. रा० ।
श्रीपाल
९९॥
॥ १॥गुणमाला गुणमाला रागिणी रे, तेहने पुत्री रे एक । शृंगारसुंदरी जाणे सुरसुंदरी
रे, जाणे विनय विवेक, रा०॥२॥श्रीजिन सासनना प्रवचन तणो रे, जाणे सयल विचार।
पंचसखी छे ते पिण तेहवी रे, मांहो माहे प्यार, रा०॥३॥ प्रथम पंडिता १वीजी नाम
विचक्षणा २ रे, प्रगुणा ३ निपुणा ४ छेक। तिम दक्षा५जाणो सखी पांचमी रे, तन जूआ
मन एक, रा० ॥४॥ पांच सखी आगल कहे कुमरी रे, जे नर जिनमत जाण । ते वर
वरवो आपणने सखी। रे,श्रीजिन आण प्रमाण, रा०॥५॥ जेह समस्या रे मननी पुरिस्ये
रे, ते आपण भरतार । पाचे सहाए रे समस्या पद कर्या रे, जिनमत जाणणहार, रा०
॥६॥ एहवी वाणी रे सांभलि राजवी रे, आव्या पंडित जाण।अवर समस्या रे पूरके ते
रे, पिण मन भाव अयाण, रा० ॥७॥ इम ते कुमरी रे रहे छे परखती रे, पिण न
मिले संकेत।कुमर सुणीने रे मनमाहे धर्यु रे, कुमरी वरिवा हेत,रा०॥८॥ हार प्रभावे रे
॥ ९९॥
thak
रास.
व्यो पाटणे रे, पहूंतो कन्या आवास । सुंदर सहजे रे रूप सुहामणो रे, निरखी हरखी
स, रा०॥९॥ कुमरे पूछ्यो रे चित्त समस्या कहोरे, निज मन धारी जेह।कुमरी केरी
पंडिता रे, तव बोलीगुण गेह, रा०॥१०॥समस्या पदं “मन वांछित फल होइ ॥१॥"
खे ते रे एणे जो कही रे, तो सेमुख (स्वमुखे) कुण काम। हार ठवीने रे कंठे पूतली
स बोलावे ताम, रा०॥११॥ए किम वोले रे पत्थर पूतली रे, अचरिज लहे नृपवाल।
ल थई.ए वेतालीसमी रे, कहे 'जिनहरप' रसाल, रा०॥१२॥ पुत्तली वचनं यथा-
-अरिहंताइ सुनवह पद, निय मन धरे जे कोइ। निश्चय ते नर नारियह, मनवां-
फल होइ ॥ १॥ अथ विचक्षणा पठति-"अवर म झंखो आल॥२॥” पुत्तलिका
कथयति-अरिहंत देव सुसाहू गुरु, धम्म तु दया विसाल। मंतुत्तम नवकार पर, अवर
म झंखो आल ॥२॥प्रगुणा पठति-"करहु सफल अप्पाण ॥३॥" पुत्तलिका भणति-
॥१०॥
श्रीपाल. १॥ आराहो धुरि देवगुरु, द्यो सुपत्ते दाण । तव संयम उवयारडो, करहु सफल अप्पाण ॥३॥ निपुणा पठति-"जित्तो लिख्यो निलाडि॥४॥" पुत्तलिका वदति-रे मन अप्पा खंच करि, चिंत्ता जाल म पाडि । फल तित्तो ही पामीये, जित्तो लिख्यो निलाडि ॥ ४॥ ततो दक्षा पठति-“तसु तिहुअण जण दास ॥५॥” पुत्तलिका जल्पति-अत्थि भवंतर संचियो, पुन्न समग्गल जास । तसु बल तसु मइ तसु सिरि य, तसु तिहुअण जण दास ॥५॥ कुमर समस्या पूरवी, हरखी कुमरी चित्त । ए वर मुझ पुन्ये मिल्यो, पूरव भवनो मित्त ॥६॥ ढाल ४३ मी.देशी "मोती द्योने हमारो, राजिंदा!मोती द्योने" एहनी-राजा सुणि रीझ्यो चतुराई, एवर सरिखो मिलीयो वाई । जोइज्यो पुन्याई तणा फल, जोइज्यो पुन्याई, एआंकणी॥१॥पुन्याईए आवी मिलीयो,जाणे अकाले आंवो फलीयो जो०,पंच सखी साथे नृपवाला, सीपा कंठे ठवी वरमाला जो० ॥२॥राजा परणावी निज कन्या, लोक सहू ॥१०॥ सहू भाषे ए
प
श्रीपाल.
रास.
आव्यो पाटणे रे, पहूंतो कन्या आवास । सुंदर सहजे रे रूप सुहामणो रे, निरखी हरखी
उलास, रा०॥९॥ कुमरे पूछ्यो रे चित्त समस्या कहो रे, निज मन धारी जेह।कुमरी केरी
रे प्रेरी पंडितारे, तव वोली गुण गेह, रा०॥१०॥समस्या पदं “मन वांछित फल होइ ॥१॥"
सखीमुखे ते रे एणे जो कही रे, तो सेमुख (स्वमुखे) कुण काम। हार ठवीने रे कंठे पूतली
रे, मुख बोलावे ताम, रा०॥११॥ए किम बोले रे पत्थर पूतली रे, अचरिज लहे नृपवाल।
ढाल थई ए बेतालीसमी रे, कहे 'जिनहरप' रसाल, रा०॥१२॥ पुत्तली वचनं यथा-
दूहा-अरिहंताइ सुनवह पद, निय मन धरे जे कोइ । निश्चय ते नर नारियह, मनवां-
छित फल होइ ॥ १॥ अथ विचक्षणा पठति-"अवर म झंखो आल॥२॥” पुत्तलिका
कथयति-अरिहंत देव सुसाहू गुरु, धम्म तु दया विसाल। मंतुत्तम नवकार पर, अवर
म झंखो आल ॥२॥ प्रगुणा पठति-“करहु सफल अप्पाण ॥३॥" पुत्तलिका भणति-
॥१०॥
रास. श्रीपाल. १०॥ आराहो धुरि देवगुरु, द्यो सुपत्ते दाण । तव संयम उवयारडो, करहु सफल अप्पाण ॥३॥ निपुणा पठति-"जित्तो लिख्यो निलाडि॥४॥" पुत्तलिका वदति-रेमन! अप्पा खंच करि, चिंत्ता जाल म पाडि। फल तित्तो ही पामीये, जित्तो लिख्यो निलाडि ॥४॥ ततो दक्षा पठति-"तसु तिहुअण जण दास ॥५॥” पुत्तलिका जल्पति-अत्थि भवंतर संचियो, पुन्न समग्गल जास । तसु वल तसु मइ तसु सिरि य, तसु तिहुअण जण दास ॥५॥ कुमर समस्या पूरवी, हरखी कुमरी चित्त । ए वर मुझ पुन्ये मिल्यो, पूरव भवनो मित्त ॥६॥ ढाल ४३ मी. देशी "मोती धोने हमारो, राजिंदा! मोती द्योने” एहनी-राजा सुणि रीझ्यो चतुराई, ए वर सरिखो मिलीयो वाई । जोइज्यो पुन्याई तणा फल, जोइज्यो पुन्याई, एआंकणी॥१॥पुन्याईए आवी मिलीयो,जाणे अकाले आंवो फलीयो जो०,पंच सखी साथे नृपवाला, सीपा कंठे ठवी वरमाला जो०॥२॥ राजा परणावी निज कन्या, लोक सहू ॥१०॥ भाषे ए श्रीपाल ॥१०॥ चुम्मालीसमी ढाले थयो सुख्ख,कहे जिनहरपटल्यांसहु दुख्ख, उ०॥सासर्वगाया ७६५ दूहा-राति रही निय मंदिरे,जाया जणणी लेया आयो दिन अणऊगते, निय दलमां वलेय॥॥प्रात थयो ऊगो दिवस, भाट भणे कल्याणासेनानी तेडाविने,मासे इणपरिवाण ॥शदूत मोकली वेगसुं, राय करावो जाण। कंध कुहाडे आय मिले, जोराखे निजप्राण॥३॥ तो लसकर पाछो वले, रहेताहरी माम।आण न माने माहरी, तो कर मुझसुंसंग्राम॥४॥ सेनानी चर मोकल्यो, आव्यो जिहां भूपालाअम्ह स्वामी वलीयो हठी, परतिख वयरी काल ॥५॥कंध कुहाडो करि मिले,तोपालो बले कटक्कानहीं तोगढ टंढोलस्ये,लेस्येनगर झटका ढाल४५मी. देशी “वे वे मुनिवर विहरण पांगुर्या रे” एहनी-दूत ययण मुणि उजेणी धणी रे,मनमां कीधो एह विचार रे।सवलांसुं बलमांडीने वृथारे,कोण करावेलोक संहाररे, दु०॥१॥ कंध कुहाडो करि अवनीपती रे, सनमुख आवीने ततकालरे। चतुर समयनो
श्रीपाल
॥१०७॥
जाण प्रवीण ते रे, भेट्यो महाराजा श्रीपाल रे, दू० ॥२॥ चंपापति तव आवीयो सामुहो रे,
सुसराने दीधो सनमान रे।कंध कुहाडो दूर नखावीयो रे, बे वेठापासे राजान रे, दू०॥३॥
संतोप्यो सनमान्यो बहु परे रे, मालवपति चिंते मनमाइ रे।पार न दीसे एहनी रिदिनो
रे, एहसुं सरभर कहो किम थाइ रे, दु०॥४॥ तात! तुम्हे वर मुझ दीधो हुतो रे, ते पर-
तिख जोइज्यो ए आज रे। कंध कुहाडो जेणे नखावीयो रे, ओलखिज्यो उंबर महाराज रे,
दू०॥५॥मालवपति मनमा विस्मय थयो रे, वपुवपुजोइज्यो अचरिज एहरे।पुन्य सरिखो
जगों को नहीं रे, एहने फलीयो पुन्य अछेह रे, दू०॥६॥सीपो मयणा निरखी हरखीया
मिलवा आव्या लोक अपार रे।सोहगसुंदरीने रूपसुंदरी रे, मिलिवा आव्यो सहु परिवार
रे, दू०॥७॥श्री श्रीपाल नरेसर तिणि समे रे, दीधो नाटकनो आदेस रे। नाटक वृंद
बुलावो माहरोरे,जोवे सहु नर नारि नरेस रे,दू०॥८॥नाटक आव्यो तिहां मिलिनाचवारे,
॥१०॥
घोसहि- इन।
बोमानर ।
11.
श्रीपाल
म
-
॥११०॥
श्रीपालने। दीधा वली हो, नव नाटक वृंद कि, साथे मुझ निहालिने।हि० ॥३॥ में कीधा
हो. नाटक बहुवार कि, मयणा पति आगे खडी। इहां देखी हो. माय वाप कुटंब कि, लजा
दुख सायर पडी। हि॥४॥ परणावी हो. आडंवर भूर कि, मान घणो मुझावापनो।सुख
सघलां हो फीटी थया दुख्ख कि, फल पाम्यो में पापनो। हि०॥५॥मुझ वहिनी हो. मयणा
धन धन्न कि, ए सरिखी जग को नही। दुख मिटीया हो. सुख पाम्या एह कि, सील फल्यो
एहने सही। हि०॥६॥ कुल खंपणि हो. हूं थई कुलमांहि कि, सह पापिणिमाहि पापिणी।
में सेव्यो हो. बहु भाति कुसील कि, लही कमाई आपणी । हि०॥७॥सी दाखू हो. मुझ
कर्मनी वात कि, तुम्ह आगलि हिवे हूं कहु ।पातकना हो. पुन्यनामाइ वाप! कि, परतिख
फल देखो सह। हि० ॥८॥श्रीपाले हो अरिदमण कुमार कि, तेडाव्यो आदर करी।
धण कंचण हो. आपी भरपूर कि, आपी वली सुरसुंदरी। हि०॥९॥सुरसुंदरी हो. अरि-
॥११०॥
श्रीपाल.
॥११॥
दमण कुमार कि, समकित पाम्या निरमलो। पूरवली हो. परे थाप्यो राय कि, मतिसागर
मति ऊजलो। हि०॥१०॥जे हुंता हो. कोढी सय सात कि, रोग गमी ठाकुर कीया।मोटानो
हो. जोवो उपगार कि, निज सरिखा करि थापीया। हि०॥११॥ नव राणी हो. पटराणी
कीध कि, शृंगारसुंदरीनी सखी । पांचे वली हो. चवदे ए नारि कि, विलसे अपछर
सारिखी। हि०॥१२॥ नीसाणे हो. हिवे चलीयो राय कि, चंपा उपरि चालीयो। 'जिनहरपे'।
हो. एतलो अधिकार कि, ढाल छेतालीसमी कीयो । हि०॥ १३॥ सर्व गाथा ८०५॥
दूहा-कटक सुभटनाथट गरट,मिलीया एका एक।सुसरा सालामावला,रणवावला अनेक
रण रसीया कसीया जरद, पहिर्या टोप किरीटावगतर पहिर्या लोहमय, जाणे काला कीट॥२
पाखरीया हयवर प्रघल,मद झरतागजराज ।गयणंगण छायो गिरद, गोला नाल अवाज ३
इम चलतो चंपापुरी,आव्यो नृपश्रीपाल। भडयुद्धे नासंतांग्रह्यो, अजितसेन ततकाल ॥४॥
-
॥११॥
पाल रास. राज लीयो निज भुजवले, वेठो पिता तखत्त। पामी अनुपम संपदा, मोटो जास वखत्त॥५॥ लजाणो राजा घj, मन धरतो विखवाद।नासंतामाहरोथयो, लोकां विचे अपवाद ॥६॥ अजितसेन मन चिंतवे, हूंहुओ द्रोही अपार।राजलीयो भत्रीजनो, चितवीयो अपकार॥७॥ गोत्र द्रोहथी जस नहीं, नृपद्रोह नीति विणास । वाल द्रोहथी गति नहीं, त्रिण्हे करू अभ्यास॥८॥ हिवेदीक्षाजोआदरूं,पालुं संयम सुद्धातो छुटुंए पापथी,बेटे करम विरुद्ध॥९॥ इम सुभ भाव विचारता, चढतांमन परिणाम।ज्ञानावरणी कर्मनो, क्षयोपसम थयो ताम१० ढाल ४७मी.देशी हीडोलणानी-सुभभावना मने भावतां.जातीसमरणउतपन्न,दैव वसे लीयोसजम. विशुद्ध जाणी रतन्न।सुमति सूधी गुपति पाले.दोष टाले दुष्ट,क्षमा सागर नमत नागर. चतुर चारित्र करे पुष्ट॥१॥धन धन्नमाई। जे तजे इण परिक्रोध॥एआंकणी॥महा- ज्ञानी महाध्यानी. अभयदानी जेह, भविकने उपगार करता. चरण करण गुण गेह ॥११२॥ । विच-
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पाल रास. ॥११८॥ सहुयेनरसुरभवकरी,भोगविअनुपमसुख्खानवमेभववलतांसही,लहिस्योअविचलसुख्ख३ ढाल४९मी.देशी"इम धन्नोधणने परचावे"एहनी-इण परे सुगुरुतणीसुणिवाणी,हरख्या राजा राणी रे।आराधे उलट मन आणी, सिद्धचक गुण खाणी रे, इ०॥१॥श्रीनवकारगुणे सुभ भावे, जिनवर पूजा रचाये रे। जैन धरमसुं निजचित्त लावे, जीर्णोद्धार करावे रे, इ० ॥२॥सामायिक पोषध व्रत पाले, कुमति कदाग्रह टाले रे। श्रीजिनवर मारग उजवाले, पापथकी मन वाले रे, इ०॥३॥ इण परि सिद्धचक्र आराधी, चढती सुरगति वांधी रे। इण भव पिण एहवी रिदिलाधी, कीरति त्रिभुवन वाधीरे,इ०॥४॥राजाराणीमाइसंजुत्ता, समकित गुण सुभ चित्ता रे।आयु पूरण करि सुरगति पत्ता, पाम्या भोग समत्तारे, इ०॥५॥ तिहां थकी चविनर भव पामी, होस्ये सुर सुख कामी रे।च्यार वार इमसुर नर नामी, नवमे सहु सिद्धिगामी रे,इ०॥६॥धन धन जगमें श्रीपाल नरिंदा,मयणासुंदरीसुख कंदा रे।पाली ॥११८
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शपाल
॥१२॥
• यानया
चिरनंदो रे, भ० श्री०॥७॥ज्ञान पद सातमे दाख्यो, चारित्र पद आठमें भाख्यो रे, भ०
श्री०॥८॥तप पद नवमे साख्यो,जेम वीरजीने वचने राख्यो रे, भ० श्री०॥९॥श्रीपालने
मयणालीधो, नवमे भवे कारजसीधोरे,भ० श्री०॥१०॥ नवपढ़ महिमाजाणी, 'जिनचंद्र'
हीये मन आणी रे, भ० श्री०॥११॥” इम जाणी नवपदसुंराता, सिद्धचक्रजेध्याता रे।नृप
श्रीपाल तणी परे माता, रहे सदासुख साता रे, इ०॥९॥संवत सतरेसे चालीसे, चैत्रादिक
सुजगीसे रे। सातम सोमवार सुभ दिवसे, पाटण विसवा वीसे रे, इ०॥१०॥श्रीखरतर-
गच्छ महिमा धारी, जिनचंदसूरि जय कारी रे । शातिहरप वाचक सुखकारी, तास सीस
सुविचारी रे, इ० ॥ ११॥ कहे 'जिनहरप' भविक नर सुणिज्यो, नवपद महिमा थुणि-
ज्यो रे। उगुणपचासे ढाले गुणिज्यो, निज पातक वन लुणिज्यो रे, इ०१२सर्व गाथा ८६१
॥ इति श्रीसिद्धचक्र महिमोपरि श्री श्रीपाल महाराजाका रास समाप्त मंगलं भवतु ॥
॥१२०॥
श्रीपाल नवपद० विधि * ॥१२॥ २०-८ ८ नवपद ओली करण विधि यन- नवपद ओलिकी विधि- नवपद ओलीकी तपस्या शुभ मुहूर्त्तम विधिपूर्वक गुरुमुखसे दिन नवकर का०४ चणे आहार पदोके नाम गुणणा वाली उचरे, वाद आसोज तथा चैत्रकी सुदि से, जो कोइ तिथि तूटी १ॐ हीं नमो अरिहताण २०-१२१ १२ श्वेत । चावल होय तो ६ से ओर जो गधी होय तो ८ से पूनमतक ९ आविल 0 ॐ ही नमो सिद्धाण गहु | पूरे करने, वर्षमे दो वखत करते साढेच्यार वर्षमे ९ ओली पूरी ३ ॐ हीं नमो आयरियाण २०-३६, ३६ पीले चणा करनी, ओलीके दिनोंमे हमेशा नीचे लिखे मुजब कार्य करने- ॐ हीं नमो उवज्झायाण २०-२५, २५ / नीरो मूग १ साझ सपेर दोनों बसत राइदेवसी प्रतिक्रमण, तथा पडिलेहण, एव राइ आलोयणा पूर्वक द्वादशावर्तविधिसे गुरु- ॐ ह्रीं नमो रोए सबसाहूण २०-२७/ २७ कालो उडद वदन करके गुरुमुससे पचक्याण करे । ॐही नमो दसणस्स २०-५/६७ / श्वेत | चावल २ नव मदिरोंमें या नव प्रतिमाओंके आगे रोज नवपदके ॐ हीं नमो नागरस २०-५ ५५ नव चैत्यवंदन करे। ८ ॐ ह्रीं नमो पारित्तस्स २०-१० ३ त्रिकाल देवपूजा तथा दुपहरको आठ युइसे देयवदन करे। ॐ ह्रीं नमो तवस्स १ यद्यपिरमसागरमें दोप्रतिक्रमणोंके शिवाय ती वयत युइसे देववदन करना * काउस्सगके लोगस्सकी २, समासमणोंकी ३,प्रदक्षिणाकी तथा ४ साथियोंकी संख्या । लिसाहै, परतु ऐसे करनेसे पाच वखत देववदन हो जाव है, शाम्बाम पांच देवक्दन इस हिसाबसे तरह हजार गुणणा होता है। नहीं लिसे, राइ देवसी प्रतिक्रमणके दो और एक दुपहरका ऐसे तिन ही लिखे हैं। ७० " ॥१२॥ २०-२ ५० " धीपा रा११ .TT
सीपाल.
रास
॥१२४॥
नपद
विधि.
पहले दिन अरिहंत पद आराधन विधि-वरे राइ प्रतिक्रमण, अरिहंत पद आराधन काउस्मग १२ लोगन्सका तथा
गुणणा माला २० या १२, सवेरकी पडिलेहण, गुरुवंदन, पचक्याण, वामक्षेपपूना, नर मंदिरादिमें नरपदके ना चैत्यवंदन करे।
अरिहत पद चैत्यवदन-जय जय श्रीअरिहन भानु, भवि कमल विकाशी। लोकालोक जलपि रूपि, समस्त वस्तु प्रकाशीश
समुद्घात शुभ केले, क्षय कृत मल राशी । शुद्ध चरम भुचि पादसे, मयो वर अविनाशी । २। अतरग रिपु गण इपीए, हुए
अप्पा अरिहत । तसु पद पंकजमे रहत, 'हीरधर्म' नित सत। ३।
स्तवन-"पूजो मनरली, हा दादा अशलसूरिंद पू०" ए देशी-श्रीतेरम गुण पसिके कत, कर्मकुं भने श्रीअरिहंत, मन!
मानले । अष्ट समयमै समय तीन, सर्व आहारथी होवे हीन, मन० ॥१॥ चादर काये मन वर भोग, तनु तनुसे फुन रड योग,
मन० । सक्षम कायते मन वच रोक, निनविय ताहुं कर फोक, मन० ॥ २॥ संञी मारके मन व्यापार, वेद्रीने यास्य प्रचार
मन० आदि समय रह्यो पनक सुजीय, सूक्षम लह्यो तिण जोग अतीर, मन० ॥३॥ एसा योगयी समय एफ, हीनासंख गुणो की
छेक, मन० । समयासखे जोग निरोध, कृत्वा जो लयो जोगी सोध, मन० ॥ ४॥ वेद समे अनाहारता पाय, 'कुशल' कहे ने
श्रीजिनराय, मन० । तेरमे गुणमे गुण समे देव, आपो सा जगकू नितमेव, मन० ॥५॥
धुइ-सकल द्रव्य पर्याय अरूपक, लोकालोक सरूपो जी; केवल जानकी ज्योति प्रकाशक, अनत गुणे करी पूरी जी । जीने
भव थानक आराधी, सोत्र तीर्थकर नूरो जी, वारे गुणा करी एहवा अरिहंत, आराधो गुण भूरो जी ॥१॥
सिद्ध पद चैत्यवंदन-श्रीशैलेशी पूर्वप्रात, तनु हीन तिमागी । धुप पओग पसंगरो, जरथ गति जागी ॥ १ ॥ समय एकमें
॥१२४॥
नवपद
विधि
श्रीपाल,
रास
॥१२५॥
लोक प्रांत, गये निगुण नीरागी । चेतन भूपे आतमरूप, सुदिशा लही सागी ॥२॥ केवल दसण नाणथी ए, रूपातीत समाव ।
सिद्ध भये तसु 'हीरधर्म', वंदे धरी शुममाव ॥३॥
स्तवन-“थारे महेलां ऊपर मेह झबूके वीजली, म्हारा लाल ! झबूके०” ए देशी-अष्ट वरस नग मास, हीना कोडी
पूर्वमे, म्हारालाल! हीना० । उत्कृष्टे करे वास, सयोगी धाममे, म्हारा० स०॥ अजोगीके अत, तजे भव भव्यता, म्हारा० त०।
शैलेशी लहे कष्ट, दले गुणश्रेणिता, म्हारा० द०॥१॥ इसाक्षर पंच काल, रहे ते योगमे, म्हारा० २० । तेरस प्रकृतिनो अत्त,
करीने अतमे; म्हारा० क० ॥ गमन करे नग रजसे, अक्रिय होयने, म्हारा० अ० । पुव पओग पसग, स्वभाव अपंधने म्हारा०
ख० ॥२॥ इषु गुण नव परिमाण, जोजन लक्षे कही, म्हारा० जो० । वर्तुल विशदाभास, नीरालवन सही, म्हारा० नी० ॥ मध्ये
जोजन अष्ट, धनाकति जतमे, म्हारा० घ०। मक्षी पक्षयी हीन, मणी सिद्धातम, म्हारा० भ० ॥३॥ तनुपन्भारा नाम, शिलासे
जोजने म्हारा०शि० ! लघु अगुल पत्तीस, प्रमाण अवगाहना, म्हारा०प्र०॥ वृद्ध धनु शत पच, गुणासे हीनता, म्हारा० गु० ।
मिलिया एकमेऽनत, आनाधा नालही, म्हारा० आ० ॥ ४॥ अष्ट प्राण धरि रम्य, सिरि ही जो सही, म्हारा० सि० पीजो पद
श्रीसिद्ध धरो मन गेहमे, म्हारा० ध० ॥ 'कुशल' भये जग जीव, मिलेगा तेहमे, म्हारा० मि० ॥५॥
थुइ-अष्ट करमकुं दमन करीने, गमन कियो शिववासी जी, अन्याराध सादि अनादि, चिदानद चिदरासी जी । परमातम पद
पूरण विलासी, अघ धन दाय विनासी जी, अनंत चतुष्टय शिवपद ध्यायो, केवलज्ञानी भासी जी ॥१॥
आचार्य पद चैत्यवंदन-जिनपद कुलमुस रस अनिल, मित रस गुण धारी । प्रवल घन मोहकी, जिण ते चमुहारी ॥१॥
॥१२५॥
नवपदक विधि. ॥१३॥ साभली ॥१॥ स्पर्द्धक कारण वर्गणा, कार्य कारण माव, सु० । कृत्वा जोग सुधामना, लब्धासख स्वमार, मु०॥२॥ पर्याप्ता लघु जोगमें, वृद्धि लहे जुगमान, सु० । मध्ये वसु ममये लहे, अते द्वौ ते जाण, सु० ॥३॥ सहकारी मानस मुता, कारण रम्य बलेण, मु० । प्राप्ता घर प्रकारता, सप्त प्राभृतका तेण, सु०॥४॥ तद्रोधन रूपी मलो, चेतन संयम धाम; मु० । पर धन मिल पद धर्ममें, 'कुशल' भरतु अमिराम, सु०॥५॥ थुइ-करम अपचय दुर खपावे, आवम ध्यान लगावे जी, नारे भावना सूधी भावे, सागर पार उतारे जी । पटपड राजदूर तजीने, चकी सजम धारे जी, एहवो चारित पद नित पदो, आतम गुण हितकारे जी ॥१॥ तप पदचैयपदन-श्रीम्पभादिक तीर्थनाथ, तद्भव शिव जाण । विहि अवैरपि नाझ मध्य, द्वादश परिमाण ॥१॥ नम कर मित आमोसही, आदिक लब्धि निदान । मेदे समता युत खिणे, दृग्धन कर्म विमान ॥ २॥नयमो श्रीतप पद भलोए, इच्छा. रोघ सरूप । यदनसे नित 'हीरधर्म ", दूर भवतु भवकूप ॥३॥ स्तवन-भारत भेद भण्या जिनराने, बाह्य मध्य तणा जग काने रे, शिरपद श्रेणि । तिण मय सिद्धि तणा वर मावा, जिनपर पिण तपना कर्ता रे शिवपद श्रेणि ॥१॥ समता सहिते जिन ते भारी, भली कर्म चमु पिण हारी रे शिव० । जीव कनकसे कर्म कचोरा, दहे तप पावसका जोरा रे, शिव० ॥२॥ तप तरुवरना कुसुम है ऋद्धि, देवनरना फल ते सिद्धी रे, शिव० ! पाप सकल है वमनी रासी, तप भानुसे जाये नासी रे, शिव० ॥३॥ जस्स पसाये लहिये वाल, लन्धि रागलीजगहित कारू रे; २
श्रीपाल.
नवपद
विधि,
॥१३॥
शिव० । अतिदुपर फुण साध्यता हीना, काम ताते चारू कीना रे, शिव०॥४॥ इच्छा रोधन रूपी कहिये, तप पदही चेतन
चाहिये रे शिव० । पाठक 'हीरधर्म कृपासे, नवपद 'कुशलाकु मासे रे, शिव० ॥५॥
युइ-इच्छा रोधन तपते माख्यो, आगम तेहनो साखी जी, द्रव्य भावसे द्वादश दाखी, जोग समाधि राखी जी । चेवन
निजगुण परिणति पेखे, तेहिज तप गुण दाखी जी, लब्धि सकलनो कारण देखी, 'ईश्वर'सेमुख भाँखी जी ॥१॥
बादमें अष्टद्रव्यसे जिनपूजा स्नानादि करके १२ साथिये करे, १२ प्रदक्षिणा तथा समासमणे देता हुआ आगे लिखे नमस्कार बोले.
अरिहंत पदके १२ गुणोंके स्त्रमासमपा- नमस्कार-
१ अशोमवृक्ष यातिहार्य संयुताय श्रीअरिहताय नमः । २ पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
३ दिव्यपनि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः। ४ चामर युग प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
५ स्वर्ण सिंहासन प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहताय नमः। ६ भामडल प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
७ दुदुमि प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहंताय नमः। ८ छत्र त्रय प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
ज्ञानातिशय सयुताय श्रीअरिहताय नमः। १० पूजातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः।
वचनातिशय सपुताय श्रीअरिहताय नमः । १२ अपायापगमातिशय सयुताय श्रीअरिहताय नमः।
मध्याहमें ८ थुइसे देसंदन, पञ्चक्खाण पारना, आविल करना, फिर चैत्यवदन, तीजे पहोरकी पडिलेहण, संध्याको देवदर्शन
आरति, देवसी प्रतिक्रमण करे नाद राइसथारा पोरिसी भगाके सोवे ।
॥१३॥
.
श्रीपाल,
नवपद०
विधि.
॥१३४॥
उपाध्याय पदके २५ गुणांके ग्वमासमण-नमस्कार--
१ श्रीमापारामा पाठन गुण सयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः१२ श्रीमुपगडाग सून पाठन गुण संपुवाय श्रीउपाध्यायाय नमः ।
३ श्रीटाणाग सूत्र पाठन गुण सयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः।४ श्रीसमपायाग सूत्र पाठन गुण मयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः ।
५ श्रीभगवती सूर पाठन गुण सपुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । ६श्रीज्ञाताधर्मकयांग सन पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः।
७ श्रीउपासकदशाग सूर पाउन गुण सयुताय श्रीउपाध्यायाप०८ श्रीअंतगडदमाग मन पाठन गुण सयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः
९ श्रीअणुरोमाइयदशाग सत्र पाठन गुण सयुताय श्रीउपा०१० श्रीप्रश्नव्याकरणाग सन पाठन गुण संयुताप श्रीउपाध्यायाय
११ श्रीविपाक सूत्र पाठन गुण सयुताय श्रीउपाध्यायाय नम 1१२ भीउत्पादपूर्व पाठन गुण सयुनाय श्रीउपाध्यायाय नमः ।
१३ श्रीअग्रायणीपूर्व पाठन गुण सयुताय श्रीउपाध्यायाय नम' ११४ श्रीवीर्यप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः
१५ अस्तिप्रमादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नम । १६ वानप्रसादपूर्व पाठन गुण संयुनाय श्रीउपाध्यायाय नमः
१७ सत्यप्रपादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्पापाय नम.११८ आत्मप्रमादपूर्व पाठन गुण सयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः।
१९ कर्मप्रवादपूर्व पाठन गुण संधुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । २० प्रत्याख्यानप्रपादपूर्व पाठन गुण सयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः
२१ विद्याप्रमादपूर्व पाठन गुण सयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । २२ अपिंप(कल्याण)प्रपादपूर्व पाउन गुण सयुताय श्रीउपाध्या०
२३ प्राणा(पाय)यामप्रवादपूर्व पाठन गुण सयुताय श्रीउपा० । २४ क्रियाविशालपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः ।
२५ लोकपिंदुसार पूर्व पाठन गुणा संयुत्ताय श्रीउपाध्यायाय नमः ।
॥१३४॥
श्रीपाल, नवपद विधि पदके २७ गुणोंके खमासमण-नमस्कार- १ प्राणातिपात विरमण व्रत सयुताय श्रीसाधवे नमः। २ मृपावाद विरमण नत सयुवाय श्रीसाधवे नमः। ३ अदत्तादान विरमण नव सयुताय श्रीसायवे नमः । ४ मैथुन विरमण प्रत सयुताय श्रीसाधये नमः । ५ परिग्रह विरमण नव सयुताय श्रीसाघवे नमः । ६ रात्रि भोजन विरमण नत संयुवाय श्रीसाधवे नमः । ७ पृथ्वीकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः । ८ अप्पकाप रक्षकाय श्रीसाधवे नमः। ९ वेउकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः। १० याउकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः। ११ वनस्पतिकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः। १२ सकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः। १३ एकेंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधये नमः। १४ वेइंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः। १५ तेइद्रिय जीप रक्षकाय श्रीसाधवे नमः। १६ चउरिंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः । १७ पचेंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाघवे नमः। १८ लोभ निग्रह कारकाय यीसायवे नमः १९ क्षमा गुण युक्ताप श्रीसाधवे नमः । २० शुभ भावना मावकाय श्रीसाधवे नमः। २१ प्रतिलेखनादि क्रिया शुद्धकारकाप श्रीसायवे नमः। २२ सयम योग युक्ताय श्रीसाधवे नमः। २३ मनोगुप्ति संयुक्ताय श्रीसाधये नमः। २४ वचन गप्ति सयुक्ताय श्रीसाधवे नमः। ॥१३५ 4 नवपद श्रीपाल. ~ -- २५ कायगुप्ति संयुक्ताय श्रीसाधवे नमः। २६ शीतादि शामिति परीपद सदन तत्पराय श्रीसाधये नमः। २७ मरणात उपसर्ग महन तत्पराय श्रीसाधने नमः। दर्शन पदके ३७ गुणकि गमाममण-नमस्कार- १ परमार्थ सस्तवरूप श्रीमदर्शनाय नमः । २ परमार्थ भाव सेग्नरूप श्रीमदर्शनाय नमः । ३ व्यापनदर्शन गर्ननरूप श्रीसदनाय नमः। ४ नुन पनरूप श्रीमहर्शनाय नमः। ५ शुश्रूपारूप श्रीसदर्शनाय नमः। ६ धर्मरागरूप श्रीमदर्शनाप नम.. ७ वैयावृत्यरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ८ अहंद्विनयरूप श्रीगदर्शनाय नमः । ९ सिद्ध विनयरूप श्रीसदनाय नमः। १० चैत्य विनयरूप श्रीमदर्शनाय नमः । ११ श्रुत विनयरूप श्रीसर्शनाय नमः। १२ धर्म नियाप श्रीमदर्शनाय नमः । १३ साधुनग विनयरूप श्रीमदर्शनाय नमः। १४ नाचार्य विनारूप श्रीरासनाय नमः । १५ उपाध्याय विनयम्प श्रीमदर्शनाप नमः । १६ प्रवचन यिम्प श्रीरादर्शनाय नमः । १७ दर्शन विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । १८ "ससारे निन, सार प्रति चिनरुप श्रीसर्सनाय नमः। १९ "ससारे जिनमत सार" इति चिंतनरूप श्रीसदर्शनाय नमः। २० ससारे जिनमतस्थित सापादिमारे इति रिवनरूप श्रीसदनाक २१ शका दूषण रहिताय श्रीसदर्शनाय नम । २२ फांक्षा दूषण रहिताप श्रीसएसनाय नमः। . "
श्रीपाल.
रास
नवपद
विधि.
३७॥
२३ विचिकित्मा पण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः। २४ कुदृष्टि प्रशंसा पण रहिताय श्रीसद्देर्शनाय नमः।
२५ तत्परिचय दूपण रहिताय श्रीमद्दर्शनाय नमः। २६ प्रवचन प्रभाषकरूप श्रीमदर्शनाय नमः।
२७ धर्मकथा प्रभासकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। २८ वादि प्रभावकल्प श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
२९ नैमित्तिक प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ३० तपसि प्रभारफरूप श्रीमदर्शनाय नमः।
३१ प्रज्ञाप्यादि विद्याभृत्प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ३२ चूर्णाजनादि सिद्ध प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३३ कवि प्रमावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
३४ जिनशासने कौशल्य भूपणरूप श्रीसदनाय नमः ।
३५ प्रभावना भूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ३६ तीर्यसेवा भूषणरूप श्रीमद्दर्शनाय नमः !
३७ धैर्य
भूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३८ जिनशासने भक्तिभूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३९ उपशम गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
४० सवेग गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४१ निर्भेद गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४२ अनुकंपा गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४३ आस्तिक्य गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४४ परतीथिकादि वंदन वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४५ परतीथिकादि नमस्कार वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ४६ परतीथिकादि आलाप वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
४७ परतीर्थिकादि सलाप वर्जनरूप श्रीमद्दर्शनाय नमः। ४८ परतीथिकादि आसनादि दान वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
४९ परतीथिकादि गधपुप्पादिप्रेषणवर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ५० राजाभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः |
॥१३७॥
-
m
1
पाल.
नवपद
विधि.
॥१३८॥
५१ गणाभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५२ बलाभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
५३ सुराभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५४ कावारवृत्त्याकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
५५ गुरुनिग्रहाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५६ सम्यक्त्व चारित धर्मस्य मूलमिति चिंतनरूप थीसदर्शनाय नमः।
५७ सम्यक्त्व चारित्र धर्मपुरख द्वारमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शना०५८ सम्पफ्त्वं चारित्रधर्मस प्रतिष्ठानमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय०
५९ सम्यक्त्वं चारिन धर्मस्वाधारमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय०६० सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्स भाजनमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनायक
६१ सम्यक्त्व चारित धर्मख निधिसन्निभमिति चिंतनरूप श्रीस०६२ अस्ति जीव इति श्रद्वानस्थान युक्ताप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
६३ स चजीवो नित्य इति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय०१६४ सचजीयः कर्माणि करोतीति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दन ।
६५ स च जीव कर्माणि वेदयतीति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीस०६६ जीवस्यास्ति निर्माणमिति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय०
६७ अस्ति पुनर्मोक्षोपायेति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
ज्ञान पदके ५१ गुणों (भेदी )के खमासमण-नमस्कार-
१ स्पर्शनंद्रिय व्यंजनारग्रहाय श्रीमतिबानाय नमः । २ रसनेंद्रिय व्यजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः।
३ प्राणेंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ४ श्रोत्रंद्रिय व्यजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः।
५सर्शनेंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ६ रसनेंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमविज्ञानाय नमः।
७ घ्राणेद्रिय अर्थाचग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ८ चक्षुरिद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।।
॥१३॥
६ श्रीपाल नवपद विधि ॥१३९॥ . ९ श्रोत्रंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः। ११ स्पर्शनद्रिय ईहा श्रीमतिज्ञानाय नमः । १३ घ्राणद्रिय ईहा श्रीमतिलानाय नमः। १५ श्रोत्रंद्रिय ईहा श्रीमतिज्ञानाय नमः। १७ सर्शनद्रिय अपाय धीमतिज्ञानाय नमः। १९ घाणेद्रिय अपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । २१ श्रोनेद्रिय अपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः। २३ स्पर्शनेद्रिय धारणा श्रीमतिञानाय नमः । २५ घाणेद्रिय धारणा श्रीमतिज्ञानाय नमः । २७ श्रोटेंद्रिय धारणा श्रीमतिबानाय नमः। २९ श्रीअक्षर श्रुतज्ञानाय नमः । १ श्रीसनी श्रुतसानाय नमः। ३ श्रीसम्परु श्रुतज्ञानाय नमः। ३५ श्रीसादि श्रुतज्ञानाय नमः। १० मनो अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः। १२ रसनेद्रिय ईहा श्रीमतिज्ञानाय नमः। १४ चक्षुरिद्रिय ईहा श्रीमतिज्ञानाय नमः । १६ मन ईहा श्रीमतियानाय नमः । १८ रसनेद्रिय अपाय श्रीमतितानाय नमः। २० चक्षुरिंद्रिय अपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः। २२ मन अपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । २४ रसनेंद्रिय धारणा श्रीमतिज्ञानाय नमः। २६ चक्षुरिंद्रिय धारणा श्रीमतिमानाय नमः । २८ मनो धारणा श्रीमतिनानाय नमः । ३० श्रीअनक्षर श्रुतज्ञानाय नमः । ३२ मीअसशी अवशानाय नमः। ३४ श्रीमिथ्या श्रुतलानाय नमः । ३६ श्रीअनादि श्रुतज्ञानाय नमः। -- ॥१३९॥ = श्रीपाल. नवपद ३९ श्रमणोपासक वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः। १० संघ चैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः । ४१ कुल पाहत्यरूप श्रीचारित्राय नमः। ४२ गण वैयाप्त्यरूप श्रीचारित्राय नमः। ४३ पशुपडगादिरहितवसतिवसनममगुतिरूप श्रीचारित्राय नमः। ४४ स्त्रीहास्यादि विकया वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः । ४५ सीआसन वर्जन प्राप्तिरूप श्रीचारिनाय नमः। ४६ स्त्रीअगोपाग निरीक्षण वर्जन ममगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः। ४७ कुट्यंतरस्थित स्त्रीहावभाव सुणन वर्जन बलगुप्तिरूप श्रीचारि०४८ पूर्वक्त सीसभोगविन वर्जन प्रमागुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः। ४९ अतिसरस आहार वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारिलाय नमः। ५० अतिआहार वर्जन अक्षगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः। ५१ अंगविभूषा वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः । ५२ अनशन तपोरूप श्रीचारिमाय नमः। ५३ ऊनोदरी पोरूप श्रीचारित्राय नमः। ५४ वृत्तिसंक्षेप तपोरूप भीचारिमाय नमः। ५५ रसत्याग तपोरूम श्रीचारित्राय नमः। ५६ कायकिलेस तपोरूप श्रीचारित्राय नमः ५७ सलेपणा वपोरूप श्रीचारित्राय नमः। ५८ प्रायश्चिच तपोरूप श्रीचारित्राय नमः। ५९ विनय तपोरूप श्रीचारिमाय नमः। ६० वेयावञ्च तपोरूप श्रीचारिवाय नमः । ६१ सज्झाम तपोरूप श्रीचारिनाय नमः। ६२ पान तपोरूप श्रीचारित्राय नमः। ६३ कायोत्सर्ग पोरूप श्रीचारित्राय नमः। ६४ अनत ज्ञान संयुक्त श्रीचारिताय नमः। ६५ अनत दर्शन सयुक्त श्रीचारित्राय नमः। ६६ अनत चारित्र संयुक्त श्रीचारित्राय नमः। ॥१४॥ . .
सीपाल.
नवपद.
विधि
मा१४॥
६७ क्रोधनिग्रह करणरूप श्रीचारिताय नमः।
६८ माननिग्रह करणरूप,श्रीचारित्राय नमः।
६९ माया निग्रह करणरूप श्रीचारित्राय नमः । ७० लोभनिग्रह करणरूप श्रीचारित्राय नमः
तप पदके ५० गुणों (भेदों)के खमासमण-नमस्कार-
१ यावत्कथिक तपसे नमः।
२ इत्परिक वपसे नमः।
३ चाह ऊनोदरी तपसे नमः।
४ अभ्यतर ऊनोदरी तपसे नमः।
५ द्रव्यतः पृत्तिसक्षेप तपसे नमः।
६ क्षेत्रतः पृत्तिसक्षेप वपसे नमः ।
७ कालतः पृचिसक्षेप तपसे नमः।
८ मावतः चिसक्षेप वपसे नम ।
९ कायकिलेस तपसे नमः।
१. रसत्याग तपसे नमः।
११ इंद्रिय कपाय योग विषयक सलीनता तपसे नमः। १२ श्री पशु पडकादि वर्जित स्थान अवस्थित संलीनता तपसे नमः।
१३ आलोयण प्रायश्चित्त तपसे नमः।
१४ पडिकमण प्रायश्चित्त तपसे नमः।
१५ मित्र प्रायश्चित्त तपसे नमः।
१६ विवेक प्रायश्चित्त तपसे नमः।
१७ उत्सर्ग प्रायश्चित्त वपसे नमः ।
१८ तप. प्रायश्चित्त तपसे नमः।
१९ छेद प्रायश्चित्त तपसे नमः।
२० मूल प्रायश्चिच तपसे नमः।
२१ अनवस्थित प्रायश्चित्त तपसे नमः।
२२ पारचिय प्रायथित तपसे नमः।
॥१४॥
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