Adarsh Library, Jaipur
Parshoram Ki Aap Biti
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30 O मगर मा गोगते है कि बच्चों के साये मन्याग हिन्दी में नहीं है, तो निश्पप हो पापको हमारी रिपोरों के लिए उपयोगी पुस्तार पाने या देगने पा परगर नहीं मिला है। एक दो या पारदम नहीं, यलि ७५ मे भी ज्यास तिमोर-उपन्याग हम परागित कर पुर है. भागे पौर करने जा य विषय भी हमने पनेर पुने हैं। ऐतिहामिर नायर • नापिकाएं "परर की रात' के राजा-रानी, 'गान विमान का पनोगारन, रामापरापोर महामारत मे पान, राष्ट्र पौर विभिन्न पो में नायक, गिकारको रोमापारी पटनाएं, प्रस्थात माहित्यकारों पानीपत मौर मेरगपियर के नाटकों के सान्तर-कोई भी सो विषय ऐमा नहीं, जिगणी जानरारी निहायत दिमपरा उन्यासों के मानम से मदी गई हो। पाये तो परे, पम्पों पं. माता-पिता भी पगर न्हें में मेसोपो रह पाएं। फहने को तो ये फिशोर- उपन्यास है, किन्तु नवसाक्षरों सया महिन्दी-भापी पाठकों के लिए भी ये समान रूप से उपयोगी हैं। राष्ट्र के नए नागरिकों का निर्माण-पही है हमारा उद्देश्य ! प्रस्तुत उपन्यास परसुराम का जीवन गौरव पिमित करता है।
तात्या टोपे • किशोर-उपन्यास-माला [सचित्र, सरस तया स-उद्देश्य] वीर रस से पूर्ण श्रीकृष्ण अर्जुन हल्दी घाटी श्राचार्य द्रोण राजा सूरजमल वीर कुंवरसिंह महायली इन्द्र सम्राट् शिलादित्य सूब लड़ी मर्दानी महाराणा राजसिंह गुरु गोविन्द सिंह चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य चित्तौड़गढ़ की रानी महावली छत्रसाल वीरांगना चन्नम्माः चन्द्रशेखर याजाद गढ़मण्डल की रानी वानीराव पेशवा चक्रवर्ती दशरथ वीर कुणाल जय भवानी अभिमन्य दुर्गादास कर्णः उदयन सम्राट अशोक गए अन्य महापुरुषों की जीवनियों पर आधारित. परशुराम सीता विश्वामिन इन्द्र फी पराजय गौतम बुद्ध अंगद देव स्वामी दयानन्द नानक गुरु देवता देव हार गुवढ़ी का लाल लालबहादुर शान्ति दूत नेहए मदुरा की मीनाक्षी प्रश्वमेघ रेसात्रों का जादूगर प्रमरदात. प्राचार्य चाणक्य पिका शापा मीरा बावरी प्राचार्य द्रोण संत फवीर गुरु रवि वायू दोक्सपियर के नाटकों पर प्राधारित प्रधान हममेट निराग मस्येप पापतो भूत पर भूत दूलियस सीगर राजा तिपर रोमियो भूलिपट बंगा हुम पाहो राई पहा पेनिगमोहर शिफार, ज्ञान-विज्ञान एवं 'अरेवियन नाइट्स' पर आधारित वरयार पसी शिकार पूर प्रसोबारा: पालीसमोर स्पा और साली पापा मिसार मगरमागिर ऐतिर हायोतिर परमसतरे रिपायर दीप की शहजादी राने पोगो साहसिक कहानियां रंग सिंगो परियो পানি पहानिया हमारे रापार पहानिया बहादुर विव साहसिक गापाएं रेशाने ही परियां भारत मा क पाहणी पोरों री गापाएं कार की रोमांचकारी सायो पापाएं प्रारमतोर पापों पापी पापाएं मेका पौर सहारा के माहगी वीरों से गापाएं पाहतो पो पोरों से सम्पो पापाएं साहम-रोमांच परवी पहानिया हिमानी मोर.पाएं रामा.रानी मोर.पाएं कर.पार्वती को मोर.पाएं तोररोहार मोरनपाएं माहिररोसोनपाएं हमारे
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दरियावर द्वीप की शहजादी
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सूर्य पाकास के मध्य में दहफने सगा पा। परती पाग को
तरह तप रही पो परमनारम हया ए जातो तो मगता से
सारा सन मुलस गया हो।
इतनी भीषण गर्मी में भी दो पिपुत्र यन को पोर बड़े
जा रहे थे। मागे-मागे पलते ऋषि ने दाहिने हाप में मरलपाता
हमा विकराल पर पकड़ रखा पा । मुगमण्डल दमफ हा
पा-पता नहीं पुप के कारण पपपा उसके पमित सेन
फारणा
पोलीधे पलले ऋपिपुर के हाप में पक्षों को पाल गे मनी
मोटी-मोटो मजबूस रस्सियां थीं।
ये मय यन में प्रवेश कर गुफे थे।
पहले शाह-संसामों के बीच पती-गो पगडंटी पी। घोरे.
घोरे यह पसोप हो गई। मुरमुट पने होने मगे। फिर यह यो
वृक्ष पाने सगे। उनसे लिपटी हुई जंगली मताएं । केपी-पी
पारा पोर कहीं-नहीं फटीती माहियों के एक साप परावने
बुज । यन का यह भाग दुर्गम था।
BOAD... ? तू परशुधारी ऋपिपुत्र एक ही गति से चलता रहा। पीछे-पीछे चलते किशोर को छाया मिलते ही जैसे पालस्य लगने लगा। उसने माथे से पसीना पोंछा, फिर सम्भवतः विधाम के लिए किसी उचित स्थान की खोज में इधर-उधर भांख दौड़ाई। अकस्मात वह चिल्ला पड़ा, "राम.." प्रागे-मागे चलता राम ठमक गया। उसने घूमकर पीछे ताका और अचकचाकर साथी के निकट आ खड़ा हुआ । चकित स्वर में उसने पूछा, "क्या हुअा, सुव्रत चिल्लाया क्यों ?" सुव्रत कुछ बोल नहीं पाया । भय से कांपता हुया वह फटी फटी प्रांखों से सामने कंटीले झुरमुट की ओर ताकता रहा। राम ने शीघ्रता से परशु सम्हालकर सुवत की दृष्टि का अनुसरण किया। निकट ही कहीं सरसराहट-सी हुई। दूसरे ही क्षण अंगार के समान दहकते दो नेत्र दिखाई पड़े। राम उछल कर परे हट गया । सावधान करता हुआ वोला, "सुव्रत तू वृक्ष की पोट ले ले । सिंह आक्रमण करने को तत्पर है..." सतर्क होकर परशु के दण्ड की मुट्ठियां कसे राम वनराज की आंखों में झांकता अाक्रमण की प्रतीक्षा करने लगा। नेत्र-युद्ध में पराजित होकर वनराज क्रोध से दहाड़ उठा। लगा जैसे सारा वन-प्रान्त कांप उठा हो। दूसरे ही क्षण वह वेग से राम पर टूट पड़ा। राम जैसे पहले से ही जानता था। पलक झपकते वह एक मोर सरक गया। झटके से वृक्ष की उभरी हुई जड़ पर गिरते ही वनराज पीड़ा से कराह उठा । तिलमिलाकर उसने फिर अाक्रमण किया। लगा जैसे अवकी उसके विकराल नख राम को चीड़कर रख देंगे। राम सावधान था। वह एक बार फिर उछलकर वगल हट ।
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१० परशुराम गया । इस वार सिंह के धरती पर गिरते ही उसका दाहिना हाथ ऊपर उठा । सूर्य की किरणें परशु के तीक्ष्ण फल पर लप- लपा उठीं। सिंह फिर तड़प कर प्रहार करे, इसके पहले ही राम का परशु गिरा और वनराज का सिर कटकर धरती पर लोटने लगा। सिंह के विशालकाय घड़ से रक्त का फौवारा छूट पड़ा। वह एक वार उछला, फिर घरती पर गिरकर तड़पता रहा। कुछ देर बाद वह शान्त हो गया। राम शरीर पर से रक्त की बूंदें पोंछता हुआ सुव्रत के पास या गया, "वैठ। अव थोड़ा विश्राम करके ही चलेंगे। प्रा!" वृक्ष की छाया में पहुंचते ही राम चौंक पड़ा, सामने ही एक किशोर योद्धा खड़ा था-अपरिचित । उसने पूछा, "तू कौन है ?" यह वाण? किशोर दाहिने हाथ की चुटकी से घनुप की प्रत्यंचा थामे अवाक् खड़ा निर्जीव सिंह की ओर देखता रहा। राम ने मुस्करा कर धरती पर पड़े. सिंह की ओर देखा। अरे। किशोर की ओर देखकर राम हंस पड़ा, "अच्छा, तो यह तेरा आखेट था ?" "नहीं।" किशोर ने गहरी आंखों से राम की ओर ताका, "मैं तो उधर से जा रहा था, सहसा इसकी दहाड़ सुनकर पा गया। हां, तू न मारता तव अवश्य में इसका आखेट करता।" "वह तो अब भी किया है । देख, तेरा वाण सिंह की पस-. लियों को फाड़ता हुमा उसके हृदय में धंस गया है।" "किन्तु तुमने सिंह को काट डाला है। कौन जाने, मेरे वाण से..." "मैं न काटता तब भी वह मरता ही। तेरा लक्ष्य घातकः परमराम है। सू पोर है । जामदग्नेय राम तेरा अभिनन्दन करता है। यह ब्राह्मणान मुद्रत है। तू अपना परिचय दे, मित्र!" "मैं सिन्धु के मतिरपी मोसा दण्ड का पुन हूं-पायु।" "मतिरपी दण्ड का नाम मैंने सुना है, मित्र ।" राम ने सिर हिलाया, "पूज्य पिता ने माने इस योग्य शिष्य के बारे में फई बार बताया है। यह प्रसन्न तो है ?" "पिता प्रव नहीं रहे, माय-?" "मiss!" राम सिन्न हो गया। प्रसंग यदनता हमा बोला, "मा बैठ, मित्र! हां, भायं नहीं, तू मुझे राम ही कह । पाज से तू मेरा मिम हमा, मायु ।" "तेरी मंत्री मेरा गौरव है।" माप पास माफर बैठ गया। "ऐगा हो स्नेह मेरे पिता को भी महापि से मिला था, मित्र । उनकी बड़ी इच्छा पो कि स्वयं पापम में पाकर गुरदेव के चरणों में मुझे मर्पित करें, किन्तु"," राम ने इस भप्रिय प्रसंग से बचने के लिए फिर विपप को बदल दिया, "मव तक यहां शिक्षा पा रहा था, "कहीं नहीं।" "काहीं नहीं ? ययों" "रणक्षेत्र में वीरतापूर्वक यस परते हुए पिता के पराम से पातंकित होकर शत्रुपों ने उनको मुजहीन कर दिया। जब तक एक भो हाप रहा, यह सामों को मारते रहे। दोनों हाप पट जाने के बाद ही यह युद्ध से विरत हुए । यस्प होने के याद यह देशाटन पर निकल पड़े थे। यात्रा में हो मेरा जन्म एमा। मुषही दिन बाद मां भी चल बसी। पिता के साप मटरक्षा मिन?" "बड़ी रोमांचकारी है तेरो जीवन गापा!" राम ने पहा। "मुझे कहीं, एक जगह स्थिर होकर रहने का प्रयगर हो - परशुराम हीं मिला। इस वीच स्वयं पिता ने ही साधारण-सी शिक्षा ।। सोचा था, अवसर पाते ही इधर पाकर "किन्तु: गत वर्ष चानक ही एक दिन के ज्वर में वह मुझे अनाथ कर गए।" पायु ने सिर झुका लिया। "तू मन दुखी मत कर, मित्र ! पिता अतिरथी की इच्छा दूरी करेंगे।" "यही आशा लेकर मैं भी पाया हूं, मित्र । देखू, यदि पिता की अभिलाषा पूरी कर सका तो..." "तुझमें योद्धाओं के सभी गुण हैं, प्रायु । उनकी अभिलाषा अवश्य पूरी होगी।" आयु घरती में पड़े सिंह की ओर ताकने लगा। राम ने पूछा, "क्या सोच रहा है ?" "नां? हां। सोच रहा था यह सिंह"" "वह तो मर गया.."सुव्रत हंस पड़ा। "मैं क्षत्रिय का पुत्र हूं-वह जीवित भी होता तो कौन भय था।" प्रायु को सुव्रत की हंसी अच्छी नहीं लगी थी। "राम मुस्कराया । स्नेह से आयु का हाथ दवाता हुआ वोला, "रुष्ट मत हो, मित्र, सुव्रत ने तेरा अपमान करने के लिए नहीं कहा है । हां, तू क्या सोच रहा था ?" "मैं सोच रहा था, इतना भयानक सिंह पर तू ऋपिपुत्र होकर'.." सुव्रत फिर जोर से हंस पड़ा,"राम केवल जन्म से ही ऋषि पुत्र है, आयु, किन्तु कर्म से यह क्षत्रिय ही है।" आयु कुछ समझा नहीं। बुदबुदा कर बोला, "कर्म । क्षत्रिय ?" "हां । इसका भी एक इतिहास है।" "इतिहास ? कैसा इतिहास ?" . .
परशुराम "वह फिर फिसो दिन कहगा। मान सोमव..." माय का मुंह उतर गया। ये-दवे स्वर में बोला, "रहने हो दो । सम्भवतः मेरे सुनने योग्य नहीं है-" "मेरे मित्र को दुपी मत फर, सुरत । उसके मन में कोत. हल नगाफर उसी इच्छा मत द्वारा । गुना दे। इसी बहाने पोड़ा पौर विश्राम भी हो जाएगा।" "तुझे कामों में इतनी रचि है माय?" सुप्रत हम पड़ा। रचि तो होगी ही। पूर्वजों का इतिहास जो मासूम है।" "मच्या, गुन । जरा पहले से कहना पड़ेगा। यहत प्रागोन गया है। राम के पितामह महपि ऋचीक मुनि तय पुरक हो थे । बहुत छोटी यय में ही उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन कर लिया था। एप वार फान्यपुन्ज के राजा गापि पन में मनो. रंजन के लिए माए और काफी समय तक उन्हीं के माधम में रहे। एक दिन महर्षि चीफ पो दृष्टि राजा गाघि को पुनो देवी सत्यवती पर पढ़ गई। राजपुरो पपरूप मुन्दरी पी। विवाह के योग्य हो चली थीं। महर्षि ने राजा गापि के पास जाकर उनकी पुत्री के साय विवाह को इन्मा प्रकट फो।" राजपुत्री से वियाह की इच्छा ? मायु पकित रह गया । सुप्रत फो खते देखकर उसने उत्सुकता गे पाग्रह किया, तब गया हुआ? राजा ने सम्भवतः इन्कार कर दिया होगा?" "क्यों?" सुयत ने भौहे सिकोड़फर पूपा, "तूने ऐसी माया क्यों की?" "नही-नही।" मायु सज्जित होकर बोता, "मैंने सोगा, सम्भवतः एक पि के साथ राजपुत्रो"मायम में उन्हें गुण ही क्या मिल सकता था।" "मुरां है तू।" सुप्रत हंग पड़ा, "एक्दम मोप मार भी वो कितने ही मायं राजा पियों के साए मपनी कन्यामों का.
१४ परशुराम विवाह करके गौरव अनुभव करते हैं। राजा गाधि ने भी अस्वीकार नहीं किया। हां, देवीस त्यवती का वीर्यशुल्क मवश्य मांगा था।" "वीर्यशुल्क ?" "हां, यह परम्परा है। योग्य वर के तेज और पराक्रम की परीक्षा करने के लिए राजा अपनी कन्या की वीर्यशुल्क निश्चित करते हैं । जो उनका वचन पूरा करे, वह कन्या का वरण करे। राजा गाधि ने देवी सत्यवती का वीर्य शुल्क रखा था-वायुवेग से दौड़ने वाले पाण्डुर रंग के ऐसे अश्व जिनके कान एक ओर से काले रंग के हों।" "तव ? महर्षि ने वीर्यशुल्क दिया ? इस प्रकार के अश्व तो बहुत दुर्लभ हैं।" "दुर्लभ न होते तो वीर्य शुल्क में क्यों रखे जाते। महर्षि ऋचीक राजा को आश्वासन देकर अश्वों को प्राप्त करने चल पड़े।" "कहाँ ?" "उत्तर में अलकापुरी की ओर । वहां यक्षों के राजा कुवेर की अश्वशाला में ऐसे अनेक अरव थे।" "मिल गए?" "हां, देव वरुण की कृपा से महर्पि ऋचीक को इच्छा पूरी हो गई । यक्षों ने मुंह मांगे अश्व दिए।" प्रायु को प्रांखों में प्रशंसा झलक उठी, "महर्षि, का तेज प्रभुत था।" "था ही।" सुव्रत हंस पड़ा। "तव क्या हुमा ?" "होना क्या या! देवी सत्यवती का वीर्य गुल्क चुकाकर महर्षि ने उनसे विवाह कर लिया।"
परगुराम "किन्तु यह राम "तुम तो पाहार राम के निय-भाचरण फे विषय में पढ़ रहे थे।" "हां, क्या इसी क्रम में है। महपि प्रायोको विवाह पा समाचार मुनकर उनके पिता महषि नगु पुत्र और पुश्यपू को मागीर्वाद देने पाए । पुत्रवधु की सेवा में सन्तुष्ट होकर उन्होंने यहा, 'पुत्र, तू पानो इच्छा पह। मैं तुम पर प्रसन्न हूं। तेरा पया हित करू?' देवी सत्यवती ने पवसर पाकर महा, 'पूग्म, यदि पाप प्रसन्न हैं तो मेरी माता को पुत्रवती होने का मामी दें। महर्षि भृगु पक्ति हुए।" "माता को ?" पातु फिर यो पदा। "हो, यही मारच महपि मगु मो भी था। पर यह सब युध जान गए । देवी सत्यवती भरने माता-पिता की मौतो सन्तान पौंपन्या । उनके माता-पिता को बढ़ी सालमा पो कि एनके धमवाली राज्य के लिए यदि एक उत्तराधिकारी मिल जाता तो..." "तव क्या हमा?" "महपि ने पुत्र की नि:स्वार्थ भावना में प्रसन्न होकर दो प्रकार के घर तैयार किए-एक अपनी पुत्रययू लिए और दूसरी उनकी माता के लिए। मागीर्वाद देकर बोले, 'तुम दोनों अपने-अपने घर का सेवन करो, समय पारर दोनों को सुन के अनुरूर पुर प्राप्त होंगे।' फितु.." "किन्तु पा? पाहमा ?" "होना या पा! स्त्रियों के मन में कपट हो होता हो है।" मुरत ने राम की मार देगा। को जसे विराम हो नहीं मान होठों में हो युदबुदाया "देवो सत्यवती तो साधारण नारी नहीं थी। फिरपि पत्नी के मन में कपट "कपट?"
परशुराम "देवी सत्यवती के मन में नहीं, आयु, उनकी माता के मन कपट पा गया। उन्होंने सोचा सम्भवतः महर्षि भृगु ने अपनो वधू सत्यवती को स्नेहवश अच्छा चरु दिया होगा।" "तो क्या उन्होंने चरु वदल लिया?" "हां महर्षि भृगु को पता चला तो वह क्रुद्ध होकर सत्यवती । वोले, 'मैंने तेरे लिए ब्राह्मणोचित चरु तैयार किया था, क्योंकि अव तू ब्राह्मण ऋपि की पत्नी है। तेरी मां राजरानी है। उसके लिए मैंने ऐसा चरु दिया था, जिससे उसके गर्भ से राजपुत्र जन्म लेता। वह वीर पिता गाधि की भांति ही परा- क्रमी राजा होता। किन्तु तेरी मां ने लोभ में पड़कर सब उलट दिया। उसका पुत्र क्षत्रिय होकर ब्राह्मणों के कर्म करेगा। तेरा पुत्र भी जन्म से ब्राह्मण होगा, किन्तु उसके कर्म क्षत्रियों जैसे होंगे।' "अरे..." "किन्तु देवी सत्यवती के बहुत प्रार्थना करने पर उन्होंने द्रवित होकर कहा, "मेरी व्यवस्था व्यर्थ तो नहीं जाएगी। हां, इतना अवश्य कर सकता हूं कि तेरा पुत्र तो ब्राह्मणकर्मा ऋपि ही हो, किन्तु उसका पुत्र अर्थात् तेरा पौत्र अवश्य क्षत्रियों जैसा आचरण करेगा।' देवी सत्यवती ने इतने पर ही सन्तो कर लिया। समय पाकर उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया- वही पुत्र हैं हमारे गुरुदेव महर्षि जमदग्नि । क्रोध तो मान उन्हें छू ही नहीं गया है । वय प्राप्त होने पर पूज्य गुरु ने राम प्रसेनजित की पुत्री देवी रेणुका से विवाह किया और..." "पोह !" आयु ने कनखो से राम की ओर ताका, “सर गया। पितामह के वनाए चरु के कारण ही महर्षि जमदग्नि पुत्र राम क्षत्रियों के समान पराक्रमी है।" "वैसे तो गुरुदेव के पांच पुत्र है-पार्य रुमण्वान, स परपुराम यगु, विश्वावसु भोर तब महराम । किन्तु सबसे पराक्रमी महराम ही है। इसमें पदम्य साहम है।" सुत्रत प्रसंसा भरी दृष्टि से राम को पोर ताकने लगा। यनराज के निर्जीव परीर पर सिर टिकाकर विद्याम करता राम घोरे से मुस्करा पड़ा। मायु के जैसे कुछ याद मा गया। चोंकफर उसने पूधा, "पौर यह रामा गाषि."उनकी सन्तान..." "उनके भी पुर ही हुमा । महाक्रोयो ऋषि विश्वामित्र का नाम तूने अवश्य मुना होगा!" अपि विश्वामित्र ! उनकी चर्चा तो सारे पावित में है। पिता के साथ यात्रा करते समय कई बार उनका नाम मुना है। उन्होंने ही तो ब्रह्मपि वशिष्ठ..." "हो । पहले ग्रह्मपि वशिष्ठ से उनका सगड़ा पल रहापा, किन्तु प्रय दोनों एक दूसरे का पादर करते हैं। पार्य विश्वामित्र ने भो तप करके ब्रह्मपि का पद प्राप्त कर लिया है। प्राह्मणों में श्रेष्ठ ब्रह्मपियों के समान हो उनको भी पूजा की जाती है। यह जन्म से सत्रिय थे, किन्तु पर पूरे ग्राह्मण वन गए हैं।" "मदभुत !" राम उपताकर सड़ा हो गया। परशु नापता हुमा यौला, "पर बम भी फर गया। देग, गूयं पश्चिम की पोर गुरु गया। धन, मय फरकून मोर मारिया इकट्ठी करें। पोर प्र. पापु?" मायु ने उटते हुए कहा, "मैं मोम सेरे साप ही पाश्रम पर पलूगा, मित्र! सतत भोसड़ा हो गया। वमन को बनी रस्गिा उठा- कर पलते-पसते उसने एक बार मृत सिंह को पोर देसा, परशुराम इसका क्या होगा?" "उसे छोड़ !" सिंह को ठोकर मारकर राम आगे बढ़ या। सुव्रत ने जोर से निःश्वास लेकर कहा, "माज यदि तू साथ तो..." न होता राम, " राम घूमकर हंसता हुआ वोला, "तव भी तेरी प्राणरक्षा के लिए प्रायु पहुंच गया था। तू ही बच जाता। अव निश्चिन्त होकर प्रा। अभी लौटकर पिता की संध्या-उपासना की भी व्यवस्था करनी है।' परशु को कन्वे पर रखे राम मतवाले गजराज की भांति झूमता हुआ वढ़ चला।
२ 00 ပို मर्पि जमा ने एक बार फिर पाश्रम से बाहर पारर घर-उपर ताला । नहो, कोई भी दिखाई नहीं पड़ता। थोड़ा मागे पढ़ते ही यन घना हो गया था। कचे-ऊपे पतनार वृक्षों के कारण भूर्य का प्रकाश जी पासापों के कार ही पटककर रह जाता है। महषि जमदग्नि उस मोर पंपसके में दृष्टि गढ़ाकर देगते रहे । शादियों को काटकर माफी पोहा मार्ग संपार कर दिया गया है। भायम से नदी के तट तक पाते-जाते परती पर उगी 'पारा फट गई है पोर उसको जगह सर्प को यसतायो टेकोमेडी पगरयो पमरने सगी है। रेगुफा नहीं दिखाई पड़ी। निराश होकर महषि जमदग्नि फिर माश्रम में पारम पले पाए। सनी देर तक वो यह प्रतीक्षा करते रहे, पिन पर मापे पर पिता को रेखाएं उमर पाई। रेणुका को हो गया गया?
परशु ऋपि जमदग्नि व्यग्र होकर इधर-उधर टहलने लगे। यज्ञशाला में थोड़ी देर पहले ही रेणुका ने यज्ञ-सामग्री पस्थित करके रख दी थी। ऋषि स्नान कर चुके तो रेणुका ट्टी का कलश उठाकर पूजा के लिए नदी से पवित्र जल लाने ली गई थीं। रोज का यही नियम है । ऋषि जमदग्नि की पूजा के लिए दी का पवित्र जल रेणुका स्वयं लाती हैं। यज्ञशाला में व्यवस्था करके वह चली जाती हैं । नदी में स्नान करके मिट्टी का पात्र भरतो हैं, फिर गीले वस्त्रों में ही यहां तक आती हैं। इस बीच वह किसी शिष्य अथवा पुत्रों का भी स्पर्श नहीं. करतीं। किन्तु इतना विलम्व तो कभी नहीं हुआ था ! इस समय पाश्रम में कोई और था भी नहीं। आश्रम को असुरक्षित छोड़कर वह स्वयं जाएं भी तो कैसे ? प्रतीक्षा करते-करते ऋपि जमदग्नि अधीर हो उठे। नहीं इतनी दूर भी तो नहीं है ! तव? ... महर्षि जमदग्नि ने यज्ञशाला के वाहर गड़े दण्ड की ओर ताक कर समय का अनुमान लगाया। छाया तीन अंगुल और पूर्व की ओर सरक चुकी थी। शंका के कारण महर्षि जमदग्नि का मन कांप उठा। इतन देर? कहीं 'कहीं महर्षि जमदग्नि ने दांतों से कसकर होंठ दवा लिया। म नहीं माना। क्या पता ! विलम्ब होने का और कोई का भी तो नहीं है। असम्भव ही क्या है। रेणुका असहाय न ही तो है । हो सकता है मार्ग के किसो झुरमुट में घात लगा वैठा कोई हिंसक पशु अवसर पाकर उस पर टूट पड़ा हो।
थी। पगाराम मायेन के कारण पि जमदग्नि को मुरामुद्रा कठोर हो गई। यह नपककर याशाता में गए। दीवार पर गे पाने प्रचण्ड अनुप को उतारकर प्रत्यंगा पढ़ाई। पातफ बालो से भरा पीर मन्ये पर लटका लिया और बाहर निस्सफर से दो मे दग भरते हुए पगडण्टी पर बढ़ चले। मागंका गे कांपती दृष्टि गंगल गति से घर-उपर दौड़ने लगी। अधिक दूर नहीं जाना पड़ा। पुष्पा पागे यावे हो माहट पाकर यह टिटक गए। पिसी के चलने में धरती पर पहे मूसे पत्तों के परगराने को पनि निस्ट पाती जा रही महर्षि ने सावधानी के लिए खूपौर में एक बार निकालकर 'पनुप पर पड़ा निया प्रोर मतदष्टि में इधर-उपर सामने सगे। माहट सम्भवतः सामने की भोर से पा रही थी। उन्होंने उचफ फर बाका । प्रांतों में प्रसन्नता घमय उटी । पाहो-टेडी पगडण्डी पर भीगे वस्त्रों में लिपटी जल से भरा कलश उठाए रेगुफा पनी पा रही थी। गन्तोष को सांस लेकर महर्षि जमदग्नि ने विप से बुरे हुए याण यो सावधानीपूर्वक फिर पन्थ पर मटरते तूपोर में गोम दिया। परक्षित पदे पाश्रममा मान पाते ही पर जल्ली. जल्दी सोट पढ़ें। गुनही धनों में देवी रेणुका भीमा पदवी। पाश्रम में प्रात हो या गाना के बाहर गई महति को देग कर सहमा यह गौक पसी, "पार..." रेगुफा को प्रांगों में पन मर के लिये माना परो एस महर-मी गई। उन्होंने एक यार गिर घुमाकर पीछे को मोर देगा-जमे प्रांनो ही मांगों में नदी में पायम सर पं.ने पप को सम्बाई नार रही हो । जन में भरे फमम रे नहीं रहा गया तो..." परशुराम कर इतनी दूर तक पाने में मानों वह थक कर शिथिल गई थीं। प्रखर धूप के कारण चेहरा एकदम लाल हो उठा. "प्रतीक्षा करते-करते मैं तो व्यग्न हो उठा था। चिन्ता के - "आं?" रेणुका जैसे फिर चौंक पड़ी। महर्षि की ओर साका। नेत्रों में जाने कितना भय भर गया था। कांप कर उन्होंने जल्दी से सिर का लिया । गीले अांचल से मुंह पोंछती हुई वोलीं, "विलम्ब के लिए क्षमा चाहती हूं, आर्य- "हः !" महर्षि जमदग्नि ने हंसकर स्नेह से रेणुका की भोर ताका, "तू तो जरा-जरा सी बात में क्षमा मांगने लगती है । अरे, मैं तो वस ऐसे ही कह रहा हूं। तुझे इतनी देर हो रही थी, मुझे चिन्ता न होती ? अच्छा, तू जल ले पा, मैं यज्ञ- शाला में चलता हूं।" महर्षि जमदग्नि घूमकर यज्ञशाला में चले गए। रह-रहकर महर्षि जमदग्नि का मन उचट जाता। वह खिन्न हो उठे। उपासना के समय तो वह इतने असंयमित कर्म भी नहीं हुए। फिर आज क्या हुआ ? रेणुका को तनिक विलम्ब ही तो हो गया था। कुछ हो इस तपती दोपहरी में नदी तक जाकर जल से भरा कल उठाकर लाना, आखिर श्रम तो पड़ता ही है । कहीं छाया बैठकर रेणुका ने दो पल विश्राम कर लिया होगा। फिर इ चिन्ता की क्या बात है । अब तो वह या ही गई। किन्तु" महर्षि जमदग्नि का मन चंचल हो उठता है। अ तता भयभीत क्यों थी? वह तो ठीक से वाते 1 परगन नहीं कर पा रही थी। बार-बार रह रहार पन में पंकी पन- रहो की भोर तारने लगती । क्यों रेणुका दुध दिरा रही है पया? रोज ही तो वह नदी तट में मंध्या के लिए पवित्र न साने जाती है। मार्ग में पहीं विधान कर लिया हो"तव नो साना विलम्ब तो नहीं होना चाहिए था। फिर दृष्टि मिलते ही वह मद में कांच रनों जातो पो। बार-बार पन की पोर पचों तारती दी? उसकी इस घालवा के पीछे मयस्य कोई रहस्य है ! पया? महर्षि जमदग्नि कुछ समझ नहीं पाए । उपासना में मन नही मगा। जैसे-तैसे संध्या समाप्त करके महषि ने पप्यं पढ़ाया मोर बाहर मा गए । फुटिया के प्रभाग में मनमनी सो सड़ी रेगुसरा को से पता ही नहीं पता कि कर महपि जमदग्नि माफर निरट गर्ने हो गए । यह काष्ठमण्ड के सहारे टिको पपनक दृष्टि से वन की पोर ताकती हुई जाने पया सोच रही थीं। महपि मे मन में पुमहतो पासका और तोगी हो गई। यह प्यन होकर रेणुका के सामने मा गए। पोरे से 7 करके योले, "मार्या!" "हो पायं?" रेणुका जैसे सोते-सोते पोर फर नाग . उठी। "तुम माज बहुत सहिग्न हो, माया ?" "नहीं तो।" रहते-रहते रेणुका का स्वर मानों फिर पहरी सो गया। मोपन से मापे का पसीना पोधो हुए उन्होंने जोर से नि:पयारा घोग, फिर से ही मापम पर पड़ी रह गई। "परे, सुमने तो ममी वस्त्र भी नहीं यस?"
..." परशुराम उठाकर इतनी दूर तक पाने में मानों वह थक कर शिथिल पड़ गई थीं। प्रखर धूप के कारण चेहरा एकदम लाल हो उठा. था। "प्रतीक्षा करते-करते मैं तो व्यग्र हो उठा था। चिन्ता के मारे नहीं रहा गया तो..." "यां?" रेणुका जैसे फिर चौंक पड़ी। महर्षि की ओर ताका। तेत्रों में जाने कितना भय भर गया था। कांप कर उन्होंने जल्दी से सिर का लिया । गीले अांचल से मुंह पोंछती हुई वोली, "विलम्ब के लिए क्षमा चाहती हूँ, आर्य- "हः !" महर्षि जमदग्नि ने हंसकर स्नेह से रेणुका की ओर ताका, "तू तो जरा-जरा सी बात में क्षमा मांगने लगती है। अरे, मैं तो वस ऐसे ही कह रहा हूं। तुझे इतनी देर हो रही थी, मुझे चिन्ता न होती? अच्छा, तू जल ले श्रा, में शाला में चलता हूं।" महर्षि जमदग्नि घूमकर यज्ञशाला में चले गए। ? यज्ञ-- रह-रहकर महर्षि जमदग्नि का मन उचट जाता। वह खिन्न हो उठे। उपासना के समय तो वह इतने असंयमित कभी भी नहीं हुए। फिर आज क्या हुआ ? रेणुका को तनिक विलम्ब ही तो हो गया था। कुछ भी हो इस तपतो दोपहरी में नदो तक जाकर जल से भरा कलश उठाकर लाना, आखिर श्रम तो पड़ता ही है । कहीं छाया में बैठकर रेणुका ने दो पल विश्राम कर लिया होगा। फिर इसमें चिन्ता की क्या बात है । अव तो वह आ ही गई। किन्तु" जमदग्नि का मन चंचल हो उठता है। आखिर रेराम ना भयभीत क्यों थी ? वह तो ठीक से बातें भी "
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धूम पड़ों। २४ परशुराम "अभी बदलती हूं, प्राय ।" रेणुका का स्वर कांप गया । अपराधी की तरह सिर झुकाए वह जल्दी से "प्रार्या !" दो पग आगे बढ़ते ही रेणुका ठमक गई। महर्षि जमदग्नि बढ़कर फिर पास पाए। संशय भरे स्वर में बोले, "तुम अस्वस्थ तो नहीं हो पार्या ? आज क्या हो गया तुम्हें ?" रेणुका का चेहरा अकस्मात फक् पड़ गया। खिन्न स्वर में वोली, "नहीं तो । मैं स्वस्थ हूं, आर्य !" "आज तुम्हें जल लेकर लोटने में भी विलम्ब हो गया था।" "हां, वह तो "रेणुका वीच ही में चुप हो गईं। आंखों में एक विचित्र सी चमक उभरी । जैसे वह कोई सुखद स्वप्न देखने लगी हों। कपोल लाल हो उठे। होठों की कोरें तनिक खिच-सी गई। महर्षि जमदग्नि ने उत्सुकता से रेणुका को पीठ सहलाते हुए पूछा, “क्या हो गया था, प्रायें ? और दिन तो तुम बड़ी जल्दी या जाती थीं। फिर प्राज?" "याज जल भरने में विलम्ब हो गया, आर्य ।" "जल भरने में विलम्ब हो गया ?" "हां । नदी में गन्धर्व चित्ररथ अपनी रानियों के साथ जल- विहार कर रहा था।" "गन्धर्व चित्ररथ ?" महपि जमदग्नि का हाथ भूलकर रेणुका की पीठ से नीचे गिर पड़ा। चकित होकर उन्होंने पूछा, "तुम उसे जानती हो?" "नहीं, आर्य उसके एक दास से पूछकर ही उसका परिचय जान पाई। मैंने सोचा, वह जल विहार करके निकले तव में
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परशुराम पवित्र जल लेकर पाऊं। इसीलिए एक वृक्ष की छाया में खड़ो होकर प्रतीक्षा करने लगी !" लगा जैसे बताते-बताते रेणुका कहीं बहुत दूर चली गई हो । दीर्घ निःश्वास छोड़कर खोए-खोए स्वर में बोली,"अद्भुत था वह गन्धर्व, पार्य! मदमत्त गजराज के समान रूपसी रानियों के साथ जल-विहार करते हुए उसने नदी के जल को मथ डाला । मैं तो विस्मय से ताकतो ही रह गई। कितनी देर तक खड़ी-खड़ी उसको जल क्रीड़ा देखती रही, मुझे कुछ याद हो नहीं रह गया था! "रेणुका !" सहसा मानों मेघ गरज उठे हों। सहम कर रेणुका ने महर्षि जमदग्नि की ओर ताका और भय से कांपती हुई पीछे सरक गई। "ऋपि-पत्नी होकर भी तेरे मन से राजसी प्रवृत्ति नहीं गई। संध्या उपासना की सुधि भी भूलकर तू गन्धर्व का जल- विहार देखती रही, पापिनी !" "आर्य !" रेणुका कातर स्वर में चिल्ला पड़ी। महर्षि जमदग्नि के चरणों की ओर झुकती हुई दोन स्वर में बोलीं, "क्षमा करें, पार्य।" महर्षि जमदग्नि वेग से पीछे हट गए। घृणा से होंठ सिकोड़ कर बोले, "अव तू मेरा स्पर्श करने योग्य नहीं रही कुलटा मैं तुझे दण्ड दूंगा।" "प्रार्य ।" रेणुका धरती पर गिरकर विलखने लगी, "मुझे क्षमा करें, आर्य ! मैं.. मैं..." महर्षि जमदग्नि ने जैसे कुछ सुना हो नहीं। उन्होंने एक वार लाल-लाल दहकती प्रांखों से रेणुका की ओर देखा। फुफकार कर वोले, "तू भार्गवों का कलंक है। ऐसी कलुपित नारी को जोने का अधिकार नहीं है।' ।
२७ परशुराम "आर्य sss!" रेणुका जोर से कांपी, फिर भय से अचेत होकर घरती पर गिर पड़ी। महपि जमदग्नि क्रोध से पैर पटकते हुए यज्ञशाला में चले गए।
३ 00 8 00 6 का भी साहस वाड़ हटाकर भीतर घुसते ही आयु स्तब्ध रह गया। आंखों पर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। सीधा उस पोर देखते रहने साहस नहीं हो रहा। डरते-डरते उसने कनखी से यज्ञ- शाला की अोर ताका । वाहर ही खड़े महर्षि जमदग्नि के नेत्रों से जैसे ज्वाला निकल रही हो । इतने दिन इस पाश्रम पर पाए हो गए, किन्तु महर्षि का ऐसा प्रचण्ड रूप प्रायु ने आज तक कभी नहीं देखा था। सहम कर वह जहां का तहां खड़ा रह गया। महपि के ठीक सामने ही राम के अग्रज आर्य रूमवान, श्रायं सुपेण और यायं वसु और विश्वावसु खड़े थे । महर्षि के नेत्रों का क्रोध सम्भवतः वे भी नहीं सह पा रहे थे। उनके सिर थे। भय से थरथराते शरीर का कम्पन यहां से भे स्पष्ट दिखाई दे रहा था। आखिर हो क्या गया आयु कुछ समझ नहीं पाया। झुके हुए ?
.. परशुराम प्रातः तो महर्षि प्रसन्न थे। निस्य को मांति पाज भी उन्होंने बड़े स्नेह से प्राथमवासियों को उपदेश दिया था। शस्त्रों का अभ्यास कराया था। उसके बाद सभी पाश्रमवासी वन में फल-फूल और सूखी लकड़ियां लाने पले गए थे। पार्य रुमण्वान, सुपेण वसु और विश्यावसु मौषधि के लिए वनस्पतियां खोजने जा रहे थे। महर्षि का मादेश पाकर गायु भी उन्हीं में साथ चला गया था। आयु ने उचककर माहट ली-लगता , सभी तफ गौर कोई नही लौटा है। वे भी तो अभी-अभी घले ही मा रहे है। देर ही कितनी हुई है ! माधम के बाहर पुलाचे गरो मृगशायक को देखकर प्रार्य रुमण्यान ने कहा था, "राया पर पभी विस्कूल टीक नही हुमा है, दोह-दौड़कर फिर ग तो बेटे। उसे गहकर प्रव बाड़े में फर दे, पायु !" आयु मृगशायक को पयाइने लगा पा पोर पार्य मावान अपने तोनों अनुजों के साथ गीतर पटे पाए थे। लतामोंगे चुनी जाली में बंधी प्रौपपियां अभी तक उनके पायो गे लटका रही थी। लगता है पहुंचते ही महपि म पागने पड़ गए । पर, अकस्मात उनमे ऐमा पया अपराध हो गया होगा कि" मुठ तो कहता पा, "महर्षि की त्रोप नहीं करते..." "समवान !" महपि का धन-गम्भीर स्वर गुनते ही प्राय पी माग घटक गई। वह सरकार पूलों पदी समा क गाई दिए गया, पर, रह नहीं सका, पर्ती के बीच में वह यमाया पौर.रने कार्य समवान दारी नहीं । महपिकावर मनपर वह एक दार निभाई लिए सटव दिन छान वा प्राभाग ३० परशुराम मिला, और वह फिर मूर्ति की भांति निश्चल हो गए। "रुमण्वान !" महर्षि ने उसी तरह घरघराते हुए स्वर में कहा, "तुम लोग स्तब्ध क्यों हो गए हो? तुम्हारे शरीर में प्राण नहीं हैं क्या?" "पूज्य !" आर्य रुमण्वान पल भर थमकर जैसे साहस वटोरते रहे, फिर बोले, "हमसे अनजान में कोई अपराध तो नहीं हो गया, तात ?" "नहीं । अपराधिनी तुम्हारी मां है।" गुरुपत्नी ने अपराध किया है ? आयु चकित हो गया। आशंका से मुक्ति मिलते ही प्रार्य रुमण्वान का जकड़ा हुमा शरीर जैसे कुछ ढीला पड़ गया। आर्य सुपेण, वसु और विश्वावसु भी अपने स्थान पर खड़े- खड़े ही हिल उठे। अग्रज के साथ वे भी पिता के संकेत पर कुटिया के अग्रभाग में धरती पर अचेत पड़ी मां की भोर ताकने लगे। रुमण्वान ने आकुल स्वर में याचना की, "पिता मां को क्षमा..." "नहीं।" महर्षि जमदग्नि गरज उठे, "मैं उसे दण्ड दूंगा।" . दण्ड ? प्रायु का खून जम गया। महर्षि जमदग्नि अपनो पत्नी को दण्ड देंगे ? भगवतो रेणुका को ? कलंकिनी रेणुका भार्गवों की मर्यादा से विचलित हो गई है। उसने भगवान भृगु और महर्षि मचीक जैसे तपस्वियों की व्यवस्था भंग की है। उसने जीने का अधिकार खो दिया है। मैंने उसके लिए प्राणदण्ड की व्यवस्था की है।" "प्रायं !"नायं रुमण्वान फटी-फटी प्रांखों से पिता को मोर ताकते ही रह गए।
परशुराम "तात!" प्रायं मुपेण सिहर कर पीछे हट गए। "पिता!" वसु और विश्वावसु माकुल होकर अचेत पड़ो मां की ओर लपके। "रुको !" महपि के एक प्रादेश पर जैसे वमु और 'विश्वावसु के पांव तले की धरती में जहां के तहां चिपक गए । "हमण्वान !" महपि पल भर पुत्र की मांखों में प्रांखें डाल कर देखते रहे, फिर सहसा विचिन स्वर में बोल पड़े, "मेरा प्रादेश है, तुम जाकर अपनी माता का वध कर दो।" मायु सिर थामकर घम् से धरती पर बैठ गया। "रुमण्वान !" मादेश की अवहेलना होते देखकर महर्षि को प्रांखें भा से जल उठी। "क्षमा करें, पिता!" रुमण्वान कांपकर बोले। "कायर !" महपि ने क्रोध से तिलमिला कर सुपेण की ओर देखा, "पुत्र, तू मेरे प्रादेश की पूर्ति कर । इसी क्षण।" "नहीं तात"""नहीं..." प्रार्य सुपेण दोनों हाथों से मुंह दिपाकर कई पग पीछे हट गए।" "वसु ।" प्रार्य वसु काठ को तरह स्तब्ध खड़े रहे । "और तू, विश्वावमु ?" महर्षि ने क्रोध से गरजकर पूछा, "तू क्या कहता है ?" प्रायं विश्वावसु ने सम्भवतः सुना ही नहीं। वह मूछिन होकर धरती पर गिर पड़े। "मैं तुम चारों का त्याग करता हूं। तुम्हें इस पाश्रम में रहने का अधिकार नही है ! जल्दी से जल्दो अपनी अपवित्र छाया यहां से दूर कर लो।" महर्षि जमदग्नि उद्विग्न होकर यज्ञशाला के भीतर चले गए।
परशुराम आयु त्रस्त वैठा धरती पर अचेत पड़ी गुरुपत्नी रेणुका की पोर ताकता रहा। राजा प्रसेनजित की सुकुमार पुत्री महर्षि की पत्नी वनकर, सारे राजसुखों से वंचित होकर, इस प्रकार वन के आश्रम में जीवन व्यतीत करेगी-यह किसने सोचा होगा! और आज भगवती रेणुका को इस प्रकार दण्डित होते देखकर ही कोन विश्वास करेगा कि इन्हीं की सुकुमारता पर द्रवित होकर महर्षि जमदग्नि ने एक दिन आश्रमों के लिए एक नई व्यवस्था दी थी... पिता कहते थे, "तुझे मैं अनायास ही थोड़े महर्षि जमदिग्न की सेवा में भेजना चाहता हूं अायु । मेरा एक ही स्वप्न है तू महान धर्नुघर वने । मुझे भार्गव जमदग्नि की कृपा प्राप्त है, मेरी प्रार्थना वह टालेंगे नहीं। मेरा स्वप्न पूरा होगा ही। उनकी कृपा का प्रसाद भर मिल जाए, वस । उनका अपरिमित तेज और पराक्रम तू जानता है." यात्रा के समय पिता ने जाने कितनो वार वह कया सुनाई - । मुड़कर घरती महर्षि जमदग्नि धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे । विशाल घनुप पर वाण चढ़ाकर कान तक प्रत्यंचा खोंचकर छोड़ते ही तीर आकाश में उड़ जाता । जब तक वह फिर पर गिरे-गिरे, तब तक महपि सैकड़ों वाण और छोड़ चुके होते। महपि के कौशल पर मुग्ध देवी रेणुका भाग-भागकर वाण बटोरती और महर्षि के खाली होते तूणीर में भरती जा रही थीं। सहसा महर्षि के हाय रुक गए। कन्धे पर लटकते तूणीर में एक भी वाण नहीं शेष बचा था। खिन्न होकर उन्होंने देवी की अोर ताका, फिर मुस्कराते हुए घनुष की प्रत्यंचा उतारकर लपेटने लगे।
परशुराम थोड़ी देर में पसीने से लथपथ देवी रेणुका वाण लेकर यकी- थकी-सी लौटीं तो चौंक पड़ी, "क्या हुया पार्य, वस?" देवी रेणुका के स्वर में छिपा सन्तोप महर्षि से नहीं छिप सका। हंसकर बोले, "यक गई थीं तो तुमने पहले क्यों नहीं बताया, शुभे? मैं तो अभ्यास में इतना खो गया कि चेत ही नहीं रहा । पाओ, अब पाश्रम में चलते हैं।" प्राकाश में तपते सूर्य के प्रखर तेज की ओर देखकर देवी रेणुका वृक्ष की छाया में बैठकर पांवों का तलुमा सहलाने लगीं। उनके तलुषों में पड़े छालों की ओर देखते ही चौंक पड़े, "यह क्या हुना, रेणुका ? इतने छाले ?" देवी रेणुका ने लज्जित स्वर में कहा, "क्षमा करें, पाय ! अभी तक अभ्यास नहीं कर पाई हूं।" "अभ्यास ? कैसा अभ्यास "धरती तप रही है, पायं । उसी की जलन से..." "हूं।" महर्षि जमदग्नि ने क्रुद्ध होकर प्राकाश की ओर देखा। गम्भीर स्वर में बोले, "तुम पाश्रम में चलकर प्रौषधि लगानो, शुभे, मैं कल इसका भी उपाय करूंगा। उसके बाद सूर्य का ताप तुम्हें कष्ट नहीं देगा।" देवी रेणुका विस्मित हो गई, "कैसे, प्रायं?" "मैं मैं..." महपि जमदग्नि मौहें सिकोड़कर सोचने लगे। सहसा ही उन्हें उपाय सूझ गया। प्रसन्न होकर वोले, "मैं तुम्हारे पथ पर वाणों से पूरी छत वना दूंगा। सूर्य की किरणें धरती तक माने ही नही पाएंगी।" "किन्तु..." "किन्तु क्या ?" महर्पि उत्तेजित हो गए, तुम्हें मेरे कौशल पर विश्वास नहीं हो रहा है ?" - ३४ परशुराम "पाप सब कुछ करने में समर्थ हैं, आर्य ।" "तव?" "इससे तो सूर्य की मर्यादा नष्ट होगी, देव । "किन्तु सूर्य ने तुम्हें पीड़ा जो पहुंचाई है..." "मैं उसके आगे वहुत तुच्छ हूं, आर्य । यदि ऋपि-मुनि ही देवों द्वारा स्थापित परम्पराएं तोड़ने लगेंगे तो...' "तुम महान हो, रेणुका ! यशस्विनी होलो।" महर्षि जमदग्नि प्रसन्न हो उठे, "अच्छा मैं कोई और उपाय सोचूंगा। प्रायो।" दूसरे दिन महर्षि जमदग्नि ने देवी रेणुका को मृगचर्म से वनी पदुकाएं और वांस की खपच्चियों और कुश से बना एक छन भेंट किया तो वह चकित रह गई। विस्मय के साथ वोलीं, तपस्वियों के लिए तो ये सुख वर्जित हैं, श्रार्य !" "वर्जित थे, किन्तु मैं उन्हें आवश्यक समझता हूं। इससे शक्ति और समय का ह्रास होने से बचेगा आज से मैं सारे आश्रमवासियों के लिए पादुका और छत्र धारण करने की व्यवस्था करता हूं। इसका यश तुम्हें मिले, देवि !" उन्हीं देवी रेणुका के लिए आज महर्पि ने प्राणदण्ड की व्यवस्था की है और देवी रेणुका प्राणभय से त्रस्त धरती पर अचेत लोट रही हैं। उनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है। कोई नहीं?" प्रायु का माथा ठनकने लगा। पता नहीं कितनी देर बीत गई। "अग्रज !" आयु उछल कर खड़ा हो गया। परे राम? हां, राम ही तो है !
परशुराम अग्निशाला के सामने पत्यर की प्रतिमा-से स्तब्ध खड़े वसु की कलाई थामकर राम पल भर चकित-सा इधर-उघर ताकता रहा। लगा जैसे कुछ समझ न पाने के कारण वह खिन्न हो गया हो । रूखे स्वर में बोला, "अग्रज, आप लोग वोल क्यों नहीं रहे हैं ? पूज्य पिता कहां हैं ? अग्रज विश्वावसु अचेत क्यों हैं ? आश्रम में इतनी स्तब्धता क्यों छाई हुई है ? मैं मैं..." राम प्रावेश में हांफता हुआ आर्य रुमण्वान के आगे जा खड़ा हुना। प्रायु का मन अकुला उठा। अभी-अभी उसने जो कुछ देखा-सुना है"क्या पता, महर्षि जमदग्नि सम्भवतः राम को भी वही प्रादेश दें और "और". कुछ होने के पहले ही राम को इस काण्ड के बारे में वता देना चाहिए । कहों महर्षि को दृष्टि इस पर पड़ गई तो" आयु लपककर लता को प्रोट से वाहर पा गया, पर.. "राम !" आयु दांत पीसकर रह गया। अर्थात् महर्षि ने राम को पाहट पा ली थी। अव ? "तात !" राम स्वयं घूमकर महर्पि के सामने जा खड़ा हुमा । संशय भरे स्वर में वोला, "मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं, आर्य । आप भी खिन्न दिखाई पड़ रहे हैं । अग्रज भी कुछ नहीं बोल रहे हैं । प्राय विश्वावसु तो अचेत ही हो गए हैं पौर खोजते-खोजते राम की दृष्टि कुटिया के अग्रभाग में वेसुध पड़ी देवी रेणुका की देह पर टिक गई। माशंका भरे स्वर में उसने पूछा, "मां ? "भायं, मां को क्या हुमा?" वह दौड़ कर रेणका के निकट जा पहुंचा। ."उसके विषय में बात मतकर, राम!" महर्षि - तात ?" परशुराम एक अक्षर जैसे विप से डूवा हुआ था। घृणा से होंठ जोड़कर उन्होंने मुंह दूसरी ओर फेर लिया। "राम ठिठक गया । उसने अचकचाकर पूछा, "मां से कोई. ट हो गई क्या, "त्रुटि ?" महर्पि जमदग्नि हुंकार उठे, "इसे त्रुटि कहते ? मैं यज्ञशाला में बैठकर प्रतीक्षा करते-करते चिन्तित हो या और यह नदी तट पर खड़ी हुई गन्धर्वो की पत्नियों के थ जल विहार करता देखती रही। इसे संध्या-उपासना की मी सुधि नहीं पाई। "यह क्या भार्गवों की भगवती को शोभा देता है, राम ?" "नहीं, आर्य !" राम विकल हो उठा । वुझे मन से बोला, "मां ने अपराध किया है। "अपराध नहीं महापाप किया है। ऋषि पत्नी होकर एकान्त में पर पुरुष को जल विहार करते देखना, धूः । तू क्याः सोचता है, राम?" "पिता की इच्छा ही मेरा विचार है, तात । "तो मैं आदेश देता हूं, तू इसका वध कर।" राम चौंक पड़ा। लता के पास खड़े आयु की मुट्ठियां कस उठीं। बस, एक पल और ''और महर्षि जमदग्नि कोप कर राम को भी पाश्रम छोड़कर चले जाने की आज्ञा दे देंगे। प्रायु की प्रांखों में आंसू आ गए। प्रथम परिचय में राम ने उसे मित्र वना लिया था। और इतने दिन तक साम रहते-रहते अव तो लगता है, मानों वे दोनों केवल शरीर से है, किन्तु उनका मन एक ही है । यदि महर्षि ने राम को भ प्राधम से निकाल दिया तो? तव वह भी प्राधम से चला जाएगा। अतिरथी पिता
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परशुराम गए ही। उनके साथ ही उनका स्वप्न भी जाए। आयु श्रेष्ठ धनुर्धर न बनेगा तो न सही, किन्तु राम के विना इस पाश्रम में वह एक पल भी नहीं टिक सकता । मित्र के साथ ही वह भी चला जाएगा। सहसा महपि जमदग्नि क्रोध से गरज पड़े, "क्या सोच रहा है, राम ? इस तुच्छ स्त्री का मन कलुपित हो गया है। जव तक यह जीवित है, भार्गवों के शुभ्र मस्तक पर कलंक के टीके के समान है। मेरी प्राज्ञा है, तू इसका वध कर दे।" आयु के मुंह से चीख निकलते-निकलते वच गई। वह आंखें फाड़े राम के दहकते हुए नेत्रों की ओर ताकने लगा। राम पल भर खड़ा जैसे परशु तौलता रहा, फिर लम्बे-लम्बे डग भरता हुमा कुटिया के अग्रभाग की ओर बढ़ा, जहां देवी रेणुका वेसुध पड़ी थीं। "राम !" इतनी देर से हतप्रभ से खड़े प्रार्य रुमण्वान सहसा चीख पड़े। तू मां को हत्या करेगा?" आर्य सुपेण को मानों अपनी दृष्टि पर विश्वास ही न हो रहा हो। राम ने देवी रेणुका के पास ठमककर विचित्र-सी दृष्टि से पीछे देखा। उसकी अांखों में पता नहीं कैसी चमक कौंध रही थी। लगा जैसे वह विक्षिप्त हो उठा हो । मानों बड़ी दूर से उसने उत्तर दिया, "पिता की-पाश्रम के कुलपति को... ऋचीक पुत्र जमदग्नि भार्गव को। यही व्यवस्था है, अग्रज । वह कह रहे हैं, मां कुल के लिए कलंक हैं ! यही सत्य होगा!" "राम !" वसु भय से कांपने लगे। राम एक बार फिर कावती-सी दृष्टि प्राय वसु की ओर डाली और दूसरे ही क्षण उसका लपलपाता हुया परशु सिर से "राम, . ने ३६ *- परसुराम भी ऊपर तक गया। • ; जैसे विजली चमक उठो हो"वस,एक प्राघात और "पौर खून की फुहार"तड़पता हुमा रुण्ड "राम !" सहसा महपि जमदग्नि चीख पड़े राम का उठा हुआ हाय ऊपर हो टंगा रह गया । उसने घूमकर महर्षि जमदग्नि की अोर ताकते हुए रूक्षस्वर में कहा, "प्राज्ञा दीजिए, तात।" "रहने दे, राम रहने दे।" महर्षि जमदग्नि ने पाकुल स्वर में कहा और लपककर राम को छाती से लगा लिया, तू महान है, पुत्र ! तेरी पितृभक्ति से मैं प्रसन्न हूँ। वोल, तू क्या चाहता है ? "मां को क्षमा कर दीजिए, तात, त्रुटि तो मानवमाम का स्वभाव है। फिर मां तो नारी ठहरी -अवला!" "क्रोध में पाकर में प्रसंयमित हो उठा था. राम, मैंने रेणुका को क्षमा कर दिया है। तू अपनी कोई और इच्छा वता" "तो इतनी अनुकम्पा हो, पूज्य कि मां इस विषय में कुछ भी न जाने कि कि राम उन्हें प्राणदण्ड दे रहा था" "मैं वचन देता हूं, वत्स । रेणुका को इस सम्बन्ध में कुछ मी नहीं ज्ञात होगा। सारा आश्रम मेरे इस वचन का पालन करेगा । तू धर्म जानता है । कुछ पोर मांग, वत्स !" "तात"."गम कुछ सोचता-सा चुप हो गया। "कह पुन, निःशंक होकर कह । मैं तुझ पर प्रसन्न हूं।" "मेरे चारों अग्रज "उन चारों ने मेरी प्राज्ञा का उल्लंघन किया है । मैंने उन्हें आश्रम से निष्कासन का दण्ड दिया है !" "तो उन्हें फिर आपका स्नेह प्राप्त हो, तात ।" राम ने परशुराम वीच ही में महर्षि को टोक दिया, "जननी की ममता के कारण ही उनसे पिता के प्रति यह अपराध हुआ है। उन्हें भी क्षमा करें पूज्य, यही मेरी इच्छा है। राम के वाक्चातुर्य पर प्रायु मुग्ध हो गया। महर्षि जमदग्नि स्नेह से हंस पड़े, तेरी यह इच्छा भी पूरी हो । रुमण्वान, सुपेण, वसु और विश्वावसु, अपनी भगवती अम्बा का उपचार करो! और, राम वत्स, तू कोई और इच्छा व्यक्त कर । तू पितृभक्त है, स्वार्थहीन है । मर्यादा का पालन करने वाला है । साहसी है-वोल तू क्या चाहता है ? कुछ अपने लिए मांग, राम।" "तात की यही इच्छा है तो मुझे पराक्रमी होने का प्राशी र्वाद दें। मुझे धनुर्विद्या का ज्ञान दें।" "मैं तेरी इच्छा जानता था, वत्स । पितामह की वा व्यर्थ नहीं जाएगी । तेरे हर आचरण से क्षत्रियत्व झलकता है मैं तुझे योद्धा वनाऊंगा । प्रचण्ड योद्धा । कल से ही तुझे घ विद्या का अभ्यास करवा दूंगा । तू अजेय वन । प्रसन्न हो ।
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परशुराम . फेरता हुआ मि ने प्रत्यंचा उतारकर धनुप वृक्ष से टिका दिया। से बंधन खोलकर तूणीर भी उतार लिया। कुंज की छाया उता हुआ वोला, "कल वह सूखा हुमा वृक्ष देखा था, न, मैं उसे पूरा ही अपने वाणों से काटकर गिरा दूंगा।" "वाणों से ?" "वैसे ज्ञान का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। फिर लक- यां काटने में थोड़ा सा शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है । "भी वृक्ष काटने के बहाने अभ्यास भी करेंगे। तू बैठ।" पायु भी निकट ही बैठ गया । धनुप पर हाथ ला, "आज मेरा भी कोई लक्ष्य नहीं चूका न मित्र ।" "तू बड़ी तीव्र गति से सीख रहा है। स्वर्ग में बैठे तेरे प्रतिथि पिता अवश्य प्रसन्न हो रहे होंगे । उनका स्वप्न पूरा हो रहा है । तू विकट धनुर्धर वनेगा।" पिता का प्रसंग आते हो आयु जैसे चौंक पड़ा । लगा, मानों कोई भूली हुई वात याद आ गई हो। वह अचकचाकर राम की ओर ताकने लगा। राम बहुत दिनों से देख रहा है। कभी-कभी बात करते- करते श्रायु अचानक ही चौंककर उसकी ओर ताकने लगता है। पता नहीं कैसी दृष्टि होती है। कुछ विचिन-सी अनचीन्ही चमक । लगता है जैसे वह राम को पहचान ही न रहा हो। अाज फिर आयु वैसा हो हो गया। इसके होंठ थरथराने लगे । पता नहीं क्या कहना चाहता है, पर कह नहीं पाता । राम हंस पड़ा, "क्या सोचने लगा पायु ?" "Hisss?" श्रायु चौंक पड़ा जल्दी से सम्हलता हुग्रा वोला "कुछ नहीं। वस, ऐसे ही । चलें क्या?" राम जान गया। प्रायु संकोचवश ही नहीं बता रहा है उसने खिन्न होकर कहा,"तू मित्र से भी छिपाव रखता है, अ परशुराम बताता क्यों नहीं। जव-तच तू सहसा ही पता नहीं क्यों अन्यमनस्क हो उठता है । क्या कारण है ? वता।" आयु होंठ काटकर दूसरी ओर ताकने लगा। "यदि न बताना चाहता हो तो रहने ही दे। मैं तेरा भेद नहीं लेना चाहता" "नहीं-नही । भेद कैसा..." "तब बताता क्यों नहीं। मिय इसीलिए तो होते हैं कि उनसे कहकर मन का बोझ हलका कर लिया जाए।" "नहीं, वोझ भी नहीं पर..." "पर क्या? बता।" "प्रायु पल भर चुप रहकर न जाने किस धर्म संकट में पड़ा रहा । सिर झटक कर बोला, "रहने ही दे, मित्र तू रुष्ट हो जाएगा।" ... "पायु।" राम का स्वर रूखा हो गया, अब मैं सचमुच रुष्ट हो जाऊंगा। मित्र पर तेरा यही विश्वास है ?" "नहीं, मित्र, पर"अच्छा, पूछ ही लूं । रुष्ट मत होना, मिन । वस कौतूहल भर है। वैसे तो मैं तुझे जानता हूँ।" 'अव कह भी।" "हां, अच्छा""मैं उस दिन की बात कर रहा हूं."वह' गुरुदेव ने तुझे माता का वध करने का आदेश दिया था न ! राम उचक कर बैठ गया, "तू कैसे जानता है, प्रायु ? "मैं "मैं "मुझे क्षमाकर, मित्र । म प्रार्य रुमण्वान आदि के साथ ही लौटा था, किन्तु गुरुदेव का क्रोध न सहपाने के कारण सता को प्रोट में ही खड़ा रह गया था। म निरपराध हू मित्र।" "मोह !" एक ठण्डी सांस लेकर राम फिर पसर गया। प्रायु चुप होकर दूसरी ओर ताकने लगा। "तब ? क्या पूछ रहा है ?"
फेरता हुआ परशुराम राम ने प्रत्यंचा उतारकर घनुप वृक्ष से टिका दिया। से बंधन खोलकर तूणीर भी उतार लिया। कुंज की छाया ठता हुआ वोला, "कल वह सूखा हुआ वृक्ष देखा था, न, ज मैं उसे पूरा ही अपने वाणों से काटकर गिरा दूंगा।" "वाणों से?" "वैसे जान का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। फिर लक- ड़यां काटने में थोड़ा सा शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है । व"भी वृक्ष काटने के बहाने अभ्यास भी करेंगे। तू बैठ।" प्राय भी निकट ही वैठ गया । घनुप पर हाथ वोला, "अाज मेरा भी कोई लक्ष्य नहीं चूका न मित्र ।" "तू बड़ी तीव्र गति से सीख रहा है। स्वर्ग में बैठे तेरे अतिथि पिता अवश्य प्रसन्न हो रहे होंगे । उनका स्वप्न पूरा हो रहा है । तू विकट धनुर्धर वनेगा।' पिता का प्रसंग आते हो आयु जैसे चौंक पड़ा । लगा, मानों कोई भूली हुई वात याद आ गई हो। वह अचकचाकर राम की अोर ताकने लगा। राम बहुत दिनों से देख रहा है। कभी-कभी वात करते- करते श्रायु अचानक ही चीककर उसकी ओर ताकने लगता है। पता नहीं कैसी दृष्टि होती है। कुछ विचित्र-सी अनचीन्ही चमक । लगता है जैसे वह राम को पहचान ही न रहा हो। फिर पायु वैसा हो हो गया। इसके होंठ थरथरा लगे । पता नहीं क्या कहना चाहता है, पर कह नहीं पाता। राम हंस पड़ा, "क्या सोचने लगा प्रायु ?" "प्रांsss?" प्रायु चौंक पड़ा जल्दी से सम्हलता हुया "कुछ नहीं । वस, ऐसे ही । चलें क्या?" राम जान गया। प्रायु संकोचवश ही नहीं बता रहा उसने खिन्न होकर कहा,"तू मित्र से भी छिपाव रखता है, भाज वोल " दताता क्यों नहीं । जब-तब तू ना हो पता नहीं करों अन्यमनस्क हो उठता है। क्या कारण है? वता।" आयु होंठ काटकर दूसरी मोर ताक्ने लगा। "यदि न बताना चाहता हो तो रहने हो दे । मैं तेरा भेर नहीं लेना चाहता "नहीं-नहीं । भेद कैसा "तब वताता क्यों नहीं। मिम इसीलिए तो होते हैं कि उनसे कहकर मन का वोझ हलका कर लिया जाए।" "नहीं, वोझ भी नहीं पर." "पर क्या? बता।" "प्रायु पल भर चुप रहकर न जाने किस धर्म संकट में पड़ा रहा । सिर झटक कर बोला, "रहने ही दे, मित्र तू रप्ट हो जाएगा।" "अायु।" राम का स्वर रूखा हो गया, अब मैं सगाए रुष्ट हो जाऊंगा। मित्र पर तेरा यही विश्वास है ?" “नहीं, मित्र, पर अच्छा, पूछ ही लूं । रुष्ट मरा होना, मित्र । वस कौतूहल भर है । वैसे तो मैं तुझे जानता हूं।" "अव कह भी।" "हां, अच्छा""मैं उस दिन की बात कर रहा हूँ"यह गुरुदेव ने तुझे माता का वध करने का प्रादेश दिया था न !" राम उचक कर बैठ गया, "तू कैसे जानता है, पायु? "मैं..'मैं "मुझे क्षमाकर, मित्र । मैं मार्य समयान मादि मे साथ ही लोटा था, किन्तु गुरुदेव या क्रोध न सहपाने के कारण लता को प्रोट में ही खड़ा रह गया था। मैं निरपराध हूं मित्र।" "प्रोह !" एक ठण्डी सांस लेकर राम फिर पसर गया। प्रायु चुप होकर दूसरो और ताकने लगा। "सव ? क्या पूछ रहा है ?" 4 ४४ A- परशुराम "प्रां? न हो तो, जाने दे यह प्रसंग !" "कह, तू कह प्रायु ।” पल भर चुप रहकर आयु बोला, "मैं तेरी ही बात सोच रहा था, मित्र । पता नहीं क्यों मन में संशय उठ पाया।' "क्या ?" "तू माता का वध करने जा रहा था।" "नहीं । वह पिता की इच्छा थी। मैं तो उनके पादेश को पूर्ति भर कर रहा था "वही सही। "तव?" "तेरे मन में जननो के लिए मोह नहीं जागा, मित्र? उनका अपराध ऐसा भयानक तो नहीं था।" "यदि अपराध भयानक होता, तव तो पिता का आदेश न होने पर भी मैं माता का वध कर डालता "अर्थात् तू भी मानता है कि अपराध उतना भारी नहीं " या?" "नहीं था।" "तव भी तू उनका वध करने जा रहा था ?" "पिता की प्राज्ञा मानकर । "किन्तु तू जानता तो था राम कि भगवती क्षम्य थों !" "मैं पिता को भी तो जानता हूं, आयु । वह इतने कठोर नहीं हो सकते।" "प्राणदण्ड देने के लिए और कितना कठोर होना पड़ता है, राम? वह भी साधारण प्राणदण्ड नहीं, पुत्र को माता के वध का आदेश !" "वाद में क्षमा का आदेश भी उन्होंने हो दिया प्रायु राम ने मुस्करा कर कहा। -- ४५ परशुराम "वह वाद की बात है किन्तु यदि एक क्षण और न रोक देते तो..." "मैं उनके कोमल मन को पहचानता हूं।" "तुझे प्राशा थी कि अन्तिम समय में वह अवश्य रोक. देंगे?" "मुझे विश्वास था, मायु !" "तेरा यह विश्वास टूट भी तो सकता था। क्या पता यदि महर्षि ने अन्तिम क्षणों में भगवती को नहीं हो क्षमा किया होता तो? तब क्या होता राम ?" "वाचाल है तू ।" राम हंस पड़ा, "पिता का मन मैं तुझसे अधिक जानता हूं।" मायु जैसे हार गया । सन्तोप भरी सांस लेकर बोला, "तेरा विश्वास वड़ा प्रवल है, मित्र ? तू वाकपटु भी तो है। मैं जान गया, यदि गुरुदेव न क्षमा करते, तव भी तू किसी प्रकार उन्हें प्रसन्न करके मना ही लेता। तुझ पर महर्षि का अपार स्नेह "अच्छा-अच्छा, बहुत हुा । अव उठ।" राम खड़ा होकर घनुप और तूणीर उठाता हुमा वोला, "तेरा प्रलाप सुनकर व्यर्थ ही समय गंवाने से अच्छा है, लक्ष्यवेय का भम्यास हो किया जाए। चल अब लकड़ियां काटते हैं। राम ने पहले एकदम जड़ के पास लक्ष्य साधे। फिर उससे एक हाथ ऊपर, फिर उसमे भी एक हाथ पर, फिर "फिर.. सूखे तने पर एक-एक हाथ का अन्तर देकर राम वेग से तीर चलाता रहा। कव, कहां कितने तीर मारे-पायु को गिनने का अवसर ही नहीं मिला । लगता है जैसे एक साथ कई व्यक्ति वाण चला रहे हों।
...- परशुराम प्रायु ने प्रशंसा भरी आंखों से राम की ओर ताका । उसका वायां हाय घनुप पर जमा हुया था। दाहिने हाथ से वह पीठ पर बंधे तूणीर से वाण निकालता। आयु की दृष्टि उस हाथ को अन्य क्रियाएं देखने के लिए फैले, तब तक वही हाथ फिर वाण निकालने लगता। "अद्भुत ! । राम ने धनुप को धरती पर टिका दिया। प्रायु की ओर देखकर हंसता हुमा वोला, "क्या ?" "तेरे हाथों को गति, मित्र । मैं तो देख ही नहीं पाया कि तू कव तीर निकालता है, कव धनुप पर रखता है, कब लक्ष्य साधता है और कव प्रत्यंचा खींचकर वाण छोड़ भी देता है। दृष्टि कुछ पकड़ हो नहीं पाती। यह अद्भुत ही है।" राम हंसता हुआ खड़ा रहा। प्रायु ने उच्छ्वसित स्वर में कहा, "तेरा यह वेग बड़े-बड़े योद्धानों को भी गति रोक देगा । तू महा धनुर्घर है।" "तुझे ईर्ष्या हो रही है ?" "नहीं, पार्य। धरती के पराक्रमी धनुर्धर योद्धा राम का मित्र होने का गर्व हो रहा है । "मित्र की झूठी प्रशंसा करने से मित्रघात का दोप लगता है, मूर्ख!' आयु तिलमिला उठा। उसने रूक्षस्वर में कहा, "मैं झूठ नहीं वोलता, राम।" "मित्र को प्रसन्न करने के लिए भी झूठ नहीं बोलना चाहिए।" राम उसे रुष्ट होता देखकर हंस पड़ा, "पूज्यपिता के कौशल के नागे मेरा पराक्रम कुछ भी नहीं है। वह महान "मैं गुरुदेव को वात नहीं कर रहा हूं, राम । किन्तु शेण
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--- परशुराम धरती पर सम्भवतः कोई भी ऐसा कुशल धनुर्धर नहीं होगा! "मेरे जैसे अनेकों योद्धा होंगे।" "अनेक नहीं हैं, राम । श्रायु सिर हिलाकर दृढ़ स्वर में बोला, "तू तो जानता है, जन्म से लेकर यहां आने तक मैं पिता के साथ देश-देश का पर्यटन ही करता रहा हूं। बहुत से युद्ध देखे हैं । बहुत से योद्धा देखे हैं, पर तेरे समान वस, एक ही है।" सहसा राम को भौहें सिकुड़ गई। गम्भीर स्वर में उसने पूछा, "कौन है वह ?" "अर्जुन।" "अर्जुन ।" राम होठों-ही-होठों में वुदवुदाया। "हैहयवंशी राजा कार्तवोयं का पुत्र-अर्जुन । नर्मदा के तट पर महिष्मती नगरी का राजा कार्तवार्य अर्जुन ।" "राम फिर वुदबुदाया, महिष्मतो का राजा कार्तवीर्य अर्जन ।" उसने तीक्ष्ण दृष्टि से सुव्रत की ओर देखते हुए पूछा, "तूने उसमें ऐसा क्या देखा मायु ?" "वह पराक्रमी है, राम । उसे स्वयं अपि दतात्रेय ने शस्त्र शिक्षा दी है। प्रापि ने उस पर प्रसन्न होकर अपना सारा ज्ञान उसमें भर दिया है। जब अर्जुन वाण वर्षा करने लगता है तो ऐसा जान पड़ता है, मानो एक नहीं, एक साथ एक सहस्र अर्जुन वाण चला रहे हों। इसीलिए तो उसे सहस्रार्जुन कहा जाता है। एक राहन योद्धानों को वह अकेला ही युद्ध में रोक सकता है। जैसा वह पराक्रमी है, वैसा ही प्रवल उसका वेग है।" "यदि यह सत्य है तो उसका हस्त-लाघव प्रशंसनीय है, राय।" पायु हंस पड़ा, "इस प्रशंसा का अधिकारी अब वह अकेला नहीं रहा, राम । वाण चलाने को तेरी गति तो मन की गति ४३ परशुराम से भी बढ़कर लगती है।" "प्रसंशा का अधिकारी तो तू भी है। वाचालता में तेरे जैसा कोई नहीं होगा, प्राय ! अच्छा, चल अव लकड़ियां वटोर।" "लकड़ियां ?" प्रायु चौंक पड़ा। खेद भरे स्वर में बोला, "अरे संघ्या होने वाली है। मैं सचमुच वाचाल हूं मित्र! तू वृक्ष काट रहा था, किन्तु मैंने ही तुझे वातों में उलझा लिया। वृक्ष काटना वीच ही में छूट गया।" "नहीं प्राय ! वृक्ष तो कट चुका है।" प्राय ने कनखी से निकट ही खड़े वृक्ष की और ताका और हंस पड़ा, "तू परिहास प्रिय मो है, मित्र!" "परिहास ? 'पोह !" राम के होठों पर रहस्यपूर्ण हंसी फैल गई, "समझ गया। किन्तु मैं परिहास में भी भूठ नहीं बोलता, प्राय । ले, देख।" घनुप पर वाण रखकर राम ने जोर से प्रत्यंचा खींचकर छोड़ दी । दूसरे ही क्षण जड के पास से एक हाथ तने का टुकड़ा सरक कर वगल गिर पड़ा। शेप तना अब भी सीधा हो खड़ा था। बस, पूरा वृक्ष एक हाय छोटा हो गया था। राम ने हंसकर प्राय की प्रोर देखते हुए पूछा, "अव तो तुझे विश्वास प्राया?" प्राय सहप्ता कुछ बोल नहीं सका। लगा जैसे वह कुछ समझ ही न पा रहा हो । पल भर सड़ा-खड़ा जाने क्या सोचता रहा, फिर वृक्ष के निकट चला गया। जड़ के पाम से कटकर निकले हुए तने के टुकड़े के मध्य भाग में प्रमो तक राम का वाण घंसा हुमा कांप रहा था । प्राय विना कुछ बोले ही मोटे से वृक्ष के चारों ओर घूम-घूमकर तने पर दृष्टि गहाए हुए जैसे कुछ खोजने लगा।
! परशुराम "पायु सहसा राम तेजी से झपटा और प्रायु को खींचता हुअा उस वृक्ष से काफी आगे तक दौड़ता चला गया। हवा का एक तेज झोंका आया और पूरा वृक्ष हरहरा कर नीचे गिर पड़ा। मोटे से तने के एक-एक हाथ के कई टुकड़े लुढ़कते हुए दूर तक छितरा गए। "राम !" प्रायु अाश्चर्य से फुसफुसा उठा, "अर्थात् 'तेरे वाण से इतने-छोटे टुकड़ों में कट जाने पर भी वृक्ष अभी तक सीधा खड़ा था? नीचे से तूने कौशल पूर्वक एक टुकड़ा निकाल दिया, तव भी..." "अरे, तो इतनी देर से तू यही देख रहा था ? हंः !" राम हंस पड़ा, "चल अव लकड़ियां ले चल !" घनुप को वाएं कंधे पर लटका कर राम आगे बढ़ा और हुमस कर तने का एक टुकड़ा उठा लिया। घूमकर प्रायु को ओर संकेत करता हुआ वोला, "तू भी एक उठा ले ।"
५ ०0 00 ००० 6 कोलाहल मुनकर महर्षि जमदग्नि यज्ञशाला से बाहर निकल 'पाए । पलनर ग्राहट लेकर उन्होंने पूर्व की प्रोर देखा। थोड़ी ही दूर पर धूल के बादल उठते दिखाई पड़ रहे थे। थोड़ी ही देर में धूल को घटा वृक्षों से मो कार उठकर छा गई यो । लगता है जैसे बहुत से लोग एक साथ दल बनाकर इघर हो चले प्रा रहे हों। कोन? "वैसे तो इधर से पाने-जाने वाले व्यापारियों के साथ ऋपियों का दर्शन करने आते ही रहते हैं । राजा भी पाया करते हैं। किन्तुः"माज तो किसी के पाने का सम्वाद नहीं मिला था। तव कौन होगा? महर्षि जमदग्नि के माये पर को रेखाएं गहरी हो उठौं। जल्दी से अध्ययन शाला की मोर बढ़कर उन्होंने कंचे स्वर में पुकारा, "रुमण्वान "सुपेण'"वनु.." पल भर में हो तोनों पुत्रों के माय-माप कई ऋपिपुत्र भी १२ परशुराम उत्सुकतावश बाहर निकल पाए। महर्षि जमदग्नि ने उन्हें संकेत से अपने निकट बुलाया। पूर्व दिशा में निरन्तर बढ़ रही धूल का वादल दिखाकर चिन्तातुर स्वर में बोले, कुछ समझ रहे हो, "यह क्या है ?" सभी घबड़ा उठे। दवे स्वर में उन्होंने पूछा, "क्या है तात?" "मैं भी कुछ समझ नहीं पा रहा हूं। उठते हुए स्वर सुनो, लगता है जैसे लोगों का बड़ा भारी समूह कोलाहल करता हुप्रा इधर ही पा रहा है । राम कहां है ?" "वह और प्रायु-दोनों दोपहर से ही वन में गए हैं। कुछ देर लक्ष्यवेध का अभ्यास करेंगे। पाते समय लकड़ियां ले पाएंगे।" "हूं।" महर्षि जमदग्नि पल भर रुककर बोले, "अच्छा छोड़ो। हां रुमण्वान, तुम कुछ पिपुत्रों के साथ आगे बढ़कर देखो क्या बात है । शेप लोग भी अस्त्र-शस्त्र सम्हालकर पाश्रम की रक्षा के लिए सावधान हो जाएं।" पल भर में ही प्राश्रम के सारे पुरुप इकट्ठे हो गए। वेद पकड़ने वाले कोमल हाथ दृढ़ता के साथ घाताय शस्त्रों पर यस उठे। रुमण्वान तीन अन्य पिपुत्रों को साथ लेकर शस्त्र सम्हाले हुए दूसरे मार्ग से वन में धंस गए । शेप लोग पाश्रम से बाहर निकलकर व्यूह-रचना करने लगे। दक्षिण की ओर ऊबड़-खाबड़ चढ़ाई है । बड़ी-बड़ी शिलाएं यू ही साड़ी-टेडी टिकी पड़ी है। उधर से न तो ऊपर रो उतरा जा सकता है, न चढ़ाई ही चढ़ी जा सकती है। क्या पता कब कौन सी शिला स्पर्श होते ही लुढ़क जाए और चढ़ने या उतरने वाला व्यक्ति भी उसी के नीचे कुचल-पिसकर मृत्यु परशुराम के मुंह में समा जाए। पश्चिम और उत्तर को पोर फैला हुमा भाग पाश्रम को गौमों और अन्य यमुनों के लिए सुरक्षित है । सावधानो के लिए दूर-दूर तक कंटोले- झाड़-झंखाडो के पौधे उगा दिए गए हैं। उनमें से कई तो इतने विपले हैं कि यदि गरोर में एक कांटा भी चुभ जाए तो बड़े-बड़े गजराज तक छटपटाकर मर जाएं। यह सावधानी वन के हिंस्र पशुप्रों से गोशाला को रक्षा के लिए की गई है। कोई व्यक्ति उघर से तो जोवित पा ही नहीं सकता। बच रहता है, पूर्व का भाग । कुछ युवा ऋषिपुत्र धनुपों पर बाण चढाकर पाश्रम की रक्षा के लिए एकदम सामने खड़े हो गए । कुछ उनको रक्षा के लिए निकट हो इधर-उपर छिपकर बैठ गए और शेप दाए-बाएं पोर पोछे मे शत्रु पर अाक्रमण करने के लिए वन मे चले गए। लेकिन संकट सहसा हो टल भी गया । दो ऋषिपुत्रों ने दौड़ते हुए पाकर सूचना दी, "शुभ संवाद है ! महिष्मतो का राजा सहस्रार्जुन महर्षि का दर्शन करने के लिए पा रहा है। उसका स्वर्णयान उठाकर वेग से दौड़ने वाले सैनिको के पैरों को घमा अब और निकट मा गई है।" महर्षि को चढो हुई भौहें सहन हो गई। उन्होंने पेड़ों पर बढ़े पियुषो को नीचे उतर पाने का आदेश देकर कहा, "संकेत करके वन में गए लोगों को भी वापस बुला लो।" थोड़ी ही देर में राजा को सवारीमा गई । विशाल भवन जैसे स्वर्णयान को होने वाले साह मनिको ने मायम के द्वार पर ही पहुंचकर यान नीचे रस दिया। महर्षि जमदग्नि चकित से सड़े रह गए। भाज तक तो ऐसा कभी नहीं हुमा । छोटे-से-छोटे ऋषि-मुनि के माश्रम पर परशुराम -- भी जाते समय बड़े-बड़े राजा तक अस्त्र-शस्त्र त्याग देते हैं । पैदल ही दर्शन करने जाते हैं। फिर भृगुवंशी जमदग्नि के आश्रम परराजा अर्जुन ने उनकी उपेक्षा करने का दुस्साहस कैसे किया ? भार्गव तो हैहयों के पुरोहित भी हैं ! "महर्षि कुछ चिन्तित हैं।" राजा अर्जुन ने यान से नीचे उतरकर पास आते हुए कहा.। महर्षि जमदग्नि सतर्क हो गए, "नहीं तो। कल्याण हो, राजा । विना किसी तरह की सूचना दिए"अरे, वत्स रुमण्वान, आश्रम में चलकर राजा के स्वागत की व्यवस्था कर।" राजा अर्जुन ने वीच ही में टोक दिया, "यह क्या, ऋपि- वर! दिन भर तपस्वियों को शस्त्र-शिक्षा ही देते रहते हैं क्या ? लगता है सवको योद्धा ही वनाएंगे।" "नहीं तो।" महर्षि जमदग्नि हंस पड़े, “यह तो शिष्यों की रुचि पर होता है। हां, आश्रम की रक्षा के लिए प्रारम्भिक शिक्षा अवश्य सबको दी जाती है। वैसे इस समय" ..." राजा अर्जुन खिलखिलाकर उच्छं खलता पूर्वक हंस पड़ा। महर्षि जमदग्नि तिलमिला उठे। भगवान दत्तात्रेय जैसे महर्पि का शिष्य अर्जुन इतना उद्दण्ड क्यों है ? अरुचि-सी हुई । पर होंठ काटकर महर्षि जमदग्नि क्रोध पी गए । छिः, आश्रम पर पाए अतिथि के साथ कठोर व्यवहार करने की बात उन्होंने सोची ही क्यों। फिर अर्जुन राजा है । थोड़ा प्रमादो स्वभाव का होना उसका अधिकार है। "महर्षि फिर चिन्तातुर हो गए।" महर्षि जमदग्नि ने सम्हलकर कहा, "ना । जव राजा स्वयं आगे खड़ा हो तो हम ऋपि-मुनियों को किस वात की चिन्ता।" फिर सोने से मढ़े हुए रत्नजटित यान की ओर देखते हुए. हंसकर वोले, "तेरा यान सचमुच दर्शनीय है, राजा । यह तो
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(६ परशराम सुना था कि भगवान दत्तात्रेय ने प्रसन्न होकर तुझे एक आश्चर्य- जनक यान उपहार में दिया है । आज उसे देख भी लिया। अद्भुत है।" “यह तो अद्भुत है ही, किन्तु सुना है ऐसी ही अद्भुत एक चीज आपके पास भी है। वही देखने के लिए मुझे मार्ग छोडकर इस वन में आना पड़ा है, महर्पि ! सोचा, देखू तो" "क्या ?" महर्षि जमदग्नि चकित हो गए। "पापकी होमधेनु।" महर्षि जमदग्नि पल भर में ही सारी बात समझ गए । होमधेनु सचमुच ही आश्चर्यजनक है। आश्रम में और भी कितनी ही गाएं हैं, किन्तु होमधेनु के समान एक भी नहीं है । आठ गायों के बरावर वह अकेले ही दूध देती है। और गाएं प्रसव के कुछ दिन बाद धीरे-धीरे दूध देना कम करती जाती हैं, फिर एक दिन एकदम वन्द कर देती हैं, किन्तु होमधेनु सदैव दुही जाती है। प्रतिदिन तीनों वेला आर्या रेणुका स्वयं उसे दुहती हैं । अाज तक उसने कभी एक बूंद भी कम दूध नहीं दिया । वह जैसे प्रकृति के नियमों से कुछ परे हो। अर्थात राजमद से उन्मत्त इस अर्जुन की लोभी दृष्टि होम- धेनु पर भी पड़ गई ? महर्षि जमदग्नि ने स्नेह से उसे समझाने की चेष्टा की, "मेरी कहां, राजा ! होमधेनु तो इन पाश्रमवासियों को है ।... आयो, भीतर प्रायो।" महर्षि जमदग्नि प्रसंग वदलने के लिए मुड़े, किन्तु राजा अर्जुन ने फिर रोक लिया, "नहीं । बैठने का समय नहीं है। उघर नदी पर अंगरक्षक सैनिक मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। "उन्हें वहीं क्यों छोड़ दिया। किसी को भेजकर उन्हें बुला लेते हैं।'
परशुराम "नहीं। मुझे रुकना नहीं है। वस होमधेनु के कारण ही यहां तक खिंचा चला पाया । जब तक मैं लौटूंगा, तब तक वे कुछ प्राग्वेट ही कर लेंगे।" "पाखेट ?" महर्षि चौंक पड़े, "तपोवन में सैनिकों का आखेट करना तो अनुचित है, राजा!" "होगा।" राजा अर्जुन ने हुँझलाकर कहा, "वह होमधेनु कहां है ? दिखाइए, प्राय।" हतप्रम में महर्षि जमदग्नि पगुणों के वादे को पोर मुड़ गए । चलते-चलते रुककर बोले, "पहले चलकर तनिक जल- 'पान कर लेते। पाश्रमवासो प्रतीक्षा करते रहेंगे। देख लेना होमधेनु !" "पहले होमधेनु ।" रुक्ष स्वर में राजा बोला। होमधेनु को देखकर राजा अर्जुन मुग्ध हो गया। दर्प से सिर झटक कर बोला, "यह गाय तो राजा को गोगाला में ही गोमा पाएगी, महपि !" महर्षि जमदग्नि का मन धक से रह गया। उन्होंने विरोध करते हुए कहा, "किन्तु यह तो माथम को है, राजा।" "पाश्रम धरती पर है और घरती राजा की है, पि! होमधेनु मुझे चाहिए ही।" राजा अर्जुन ने दो सैनिकों को गाय खोलने का संकेत दिया संनिकों को आगे बढ़ता देखकर महर्षि जमदग्नि की मां भक से जल उठो । वह तीक्ष्ण स्वर में पुकार उठे, "राजा..." "ऋपो! राजा अर्जुन ने गरज कर कहा, "तुम्हारा शाप मुनने के लिए मेरे पास समय नहीं है । सावधान !" दूसरे ही क्षण राजा अर्जुन के घनुप से एक वाण उड़ा मौर महर्षि जमदग्नि अचेत होकर गिर पड़े। ।
६ 00 80 000 - भी राम क्रोध से तिलमिला गया। उफनते हुए स्वर में बोला, 'आपका अपमान करके भी अर्जुन जितने क्षण तक जीवित है, उतना क्षण मेरे लिए नरक के समान है, तात ! मुझे आज्ञा दें। "अर्जुन प्रचण्ड शक्तिशाली योद्धा है, पुत्र ! उसके समान पनुर्धर "जानता हूं, तात! यह सुना है कि उसके युद्ध-कौशल के कारण ही उसे सहस्रार्जुन कहा जाता है। किन्तु, आपका अपमान करके तो काल भी नहीं बच सकता, पिता ! मुझे प्रर्जुन से युद्ध करने योग्य उत्तम प्रायुध दें।" "आयुध ! महर्षि जमदग्नि की दृष्टि दीवार पर टंगे विशाल धनुष पर टंग गई । यह धनुप उन्हें अपने पिता महर्षि चीक से मिला था। उनको अपने पिता पूज्य भृगु से और उनको.. देवों के विलक्षण शिल्पो विश्वकर्मा ने प्राचीन काल में ड्डियों से इन्द्र के लिए वज्र और दो बहुत ही दृढ़ धनुष ५६ परशुराम बनाए थे। एक घनुप वाद मे किरात प्रादि मनायों के योद्धा नेता शिव के पास चला गया और दूसरा नागों और गरड़ों के नायक पराक्रमी विष्णु के पास । यही विष्णु का धनुप मागे चलकर किसी प्रकार मार्गयों के पास मा गया। कहते हैं, प्राचीन काल में विष्णु ने प्रसन्न होकर यह घनुप महर्षि भृगु को दे दिया था। यह प्रचण्ड एनुप जितना दृढ है उतना ही भारी भी। साधारण योद्धा तो उसे उठा भी नहीं पाएंगे। उसे मुका कर प्रत्यंचा चढ़ाना तो एकदम असम्भव ही है। स्वयं महर्षि जमदग्नि ने भी प्राज तक उसे नहीं चलाया। कभी कोई अवसर ही नहीं पड़ा। महर्षि जमदग्नि ने निकट जाकर स्नेह से धनुष पर हाथ फेरते हुए कहा, "इसे देख तो, राम । यह पूर्वजों को भगवान विष्णु से मिला हुमा प्रचण्ड धनुप है !" राम को पाखें खिल उठों। पूरो वात सुने बिना ही उसने लपक कर धनुप उतार लिया। लिपटी पड़ी तांत को डोरी दाहिने हाथ में लेकर उसने घनुप का एक छोर पैर के पास धरती पर टिकाया और दूसरे छोर को वांए हाय से हुमक कर झुकाया और डोरी चढा दो । फिर जोर से प्रत्यंचा टकार कर बोला, "तात् पाशीर्वाद दें।" महर्षि जमदग्नि टगे-से खड़े अपने पराक्रमी पुत्र का फौशल देख रहे थे। उसका स्वर सुनकर मानों वह नीद से जाग पड़े। प्रसन्नता से उमग कर उसे अचल मे समेटते हुए बोले, विजयी बन, राम । यशस्वी हो!' पिता के चरण छूकर राम तेजी से बाहर निकल माया । वृक्षों की छाया से बाहर निकलते ही सोने के यान का ॥ रंग दमक उठा। यान को उठाए हुए कुछ सैनिक वेग से हे जा रहे थे। पीछे-पीछे कई सैनिक रस्सियों का घेरा वना- र गौशाला से खोली हुई गौओं और दूसरे पशुओं को हांक थे। राम ने क्रोध से होंठ चवा लिया। धनुष पर वाण चढ़ाता या वोला, "सुव्रत अवसर पाते ही तू पशुओं को वन की ओर हाक दे । यदि अर्जुन उन्हें पकड़वाने को चेष्टा करेगा तो उसके सैनिक भी छितरा जाएंगे । उस समय तुम उन्हें आसानी से जीत लोगे। आयु राम को वगल में ही खड़ा होकर शरसन्धान करने लगा, किन्तु उसका वाण छूटता इसके पहले ही उसे वर्जित करके राम ने कहा, "तू कुछ लोगों को साथ वृक्षों को प्रोट लेता हुग्रा आगे बढ़कर पशुओं के पास पहुंच । सबसे पहले उन्हें मुक्त कराना है । वहीं रहकर तू ऋषिपुत्रों की रक्षा कर ।" सहसा जैसे वाणों की वाढ़ आ गई हो । यान लेकर दौड़ते सैनिकों के आगे एक दीवार-सी खड़ी हो गई। सैनिक अचकचा कर ठमक गए । ठीक तभी पीछे से राम ने ललकार कर कहा, "अरे चोर ठहर जा?" शक्ति के मद में मत्त अर्जुन हैहय उचक कर खड़ा हो गया उसने चकित दृष्टि से पोछे देखा। "चोरों की भांति पशुओं का अपहरण करके भाग मत राजा । मैं, महपिं जमदग्नि का पुत्र राम भार्गव, तुझे चुनौत देता हूं। यदि तुझमें साहस हो ता रुककर मुझसे युद्ध कर । "ब्राह्मण तो याचक और वेदवाठो होते हैं रे ऋपिपुत्र तू योद्धा कव से हो गया ! हाहाहाहा.." अर्जुन से अट्टहास "मैं तेरा काल हूं, राजा । वातें मत वना, शस्त्र लेकर कर उठा।
परशुराम करते हुए वीरतापूर्वक मृत्यु का वरण कर । सावधान !" राम के घनुप से छूटा वाण राजा के रत्नजटित मुकुट में घंस गया। "सावधान, ब्राह्मण!" अर्जुन मुकुट सम्हालते हुए गरज पड़ा । धनुप उठाकर सरसंधान करता हुमा कोष से बोला, "अव तू मरेगा." राम जल्दी से सरक कर अर्जुन के लक्ष्य से बच गया। अर्जुन ने दूसरा वाण साधते हुए अपने संनिकों को आदेश दिया, "पगुणों को सम्हालो, वे भागने न पाएं !" किसी सैनिक नै जोर से तुरही फूंको । सम्मवतः नदी तट पर टिके अंगरक्षक संनिकों को बुलाने के लिए संकेत किया गया था। राम ने चिल्लाकर प्रादेश दिया, "प्राय, अग्रज के साथ सवको लेकर तू सैनिकों को सम्हाल | इस पातकी के लिए में अकेला ही पर्याप्त हूं।" अर्जुन शरसन्धान कर चुका था। राम ने तत्काल ही उछल कर एक बड़े से पेड़ को प्रोट ले ली। एक पल का अवसर भी अर्जुन के लिए बहुत था। उसके कितने हो वाण राम के शरीर मे घंस गए। तने के कपर दो मोटो डालें फूटकर अलग हो गई थीं-राम ने जरा पीछे पड़ी चट्टान पर खड़े होकर अपना मोरचा बांध लिया। दोनों डालों के बीच से उसे अर्जुन सष्ट दिखाई दे रहा था। दांत पीसता हुप्रा वह वेग से वाण चलाने लगा। वड़ा प्रयत्न करके वह अर्जुन के वाणों को काट भर पा रहा है, फिर भी कोई-कोई वाण प्राघात कर हो जाते हैं। राम सून से नहा उठा। किन्तु. स्वयं राम एक भी प्राघात नहीं कर पाया। अर्जुन मयसर ही. नहीं दे रहा है। अप्रतिम योद्धा है वह !
परशुराम राम उच्छ वसित होकर बोल पड़ा, "तेरा सहस्रार्जुन नाम क ही है, राजा ! तू वलशाली है, किन्तु चोरी करके तूने गौरव पर कलंक लगा दिया। तूने शक्ति के मद में महर्षि अपमान किया है। आज तेरा प्राण नहीं बचेगा।' "मूर्ख, तू भी दुस्साहसी है ! तेरी प्रशंसा करता हूं। आज क इतनी देर तक युद्ध में किसी योद्धा ने मेरा सामना नहीं किया, किन्तु तू अव धरती पर नहीं रहेगा। तू उच्छं खल है। मैं तुझे छोड़गा नहीं।" सहसा एक तीखा वाण पाकर राम के दाहिने कंधे में धंस गया। पूरी बांह झनझना उठी। पीड़ा से सिसियाकर वह दुगुने वेग से वाण चलाने लगा। वाण चलाते-चलाते राम की वाहें भर आईं, किन्तु अर्जुन अब भी उसी वेग से वाण चलाता जा रहा है। प्रायु सच कहता था, अर्जुन अकेला ही सहस्र योद्धाओं के समान तीर चलाता है । जब तक इसके हाथ में धनुप और तूणीर में वाण हैं, उसे जीतना असम्भव है। राम ने चौड़े फालवाला तीखी धार का एक वाण चलाकर सहसा अर्जुन का धनुष वीच से काट डाला। खिन्न होकर अर्जुन ने दूसरा धनुष उठा लिया। राम ने शरसंधान अवसर दिए विना शीघ्रता से उसको भ काट दिया। .. तीसरा धनुष" राम पहले ही तत्पर था। फिर" फिर... अन्तिम घनुप भी कट गया। कोष से कांपते हुए कटे घनुप का टुकड़ा रा ... III" WWW III BIHIIHII AR Svar: # ६४ परशुराम ओर फेंक कर मारा और लम्वा-सा खड़ग उठाकर यान से नीचे कूद पड़ा। राम ने भी तत्काल धनुष फेंक कर परशु हाथ में ले लिया। दोनों योद्धा एक-दूसरे की ओर शार्दूल की भांति झपटे । निकट पहुंचते ही खड़ग से आक्रमण करता हुप्रा अर्जुन गरज उठा, "मैं तुझे ऋपिपुत्र समझकर छोड़ता जा रहा था, कन्तु तू तो विषधर है। ले, मर !" उसका खड़ग आकाश में चमक कर वज्र को भांति गिरा। राम तुरन्त वगल हटकर वच गया। परशु आकाश में तान कर राम वोला, "पा, मेरा प्रिय परशु तो बड़ी देर से तेरा रक्त पीने के लिए लपलपा रहा है ! झेल !" अर्जुन ने परशु का आघात खड़ग पर रोक कर उसे निष्फल करते हुए पूरे वेग से प्रहार किया। मृत्यु एकदम सिर पर लपलपा उठी... सहसा राम झुककर वचा या प्राघात करने के लिए उछला कुछ पता नहीं-उसका विकराल परशु एक वार सिर से भी ऊपर उठकर चमका और दूसरे ही क्षण अर्जन को दाहिनी भुजा कटकर खड्ग सहित धरतो पर गिर पड़ी। तड़प कर अर्जुन ने खड़ग वाएं हाथ में उठाकर प्रहार करना चाहा। राम का परशु एक वार फिर लपलपाया और अर्जुन को बाई भुजा भी कटकर नीचे गिर पड़ी। अर्जुन की लाल-लाल आंखों में मृत्यु की छाया तैर उठी। सरते हुए हाथो को तरह चिंघाड़ उठा । राम ने हुँकार कर परशु का प्राघात किया। काल की जह्वा की तरह परशु का फल लपका और दूसरे ही क्षण अप्रतिम मोद्धा सहस्रार्जुन का मुकुटधारी सिर कटकर धरती पर उछलने .......... -- परशुराम लगा । उसका खून से लयपय भयानक रुण्ड तड़पकर उठा, तेजी से लपककर राम को पोर झपटा, फिर टकराकर गिर पड़ा। तड़फड़ाता रहा। इतनी ही देर में अर्जुन के प्राधे से अधिक सैनिक मर चुके थे। शेप अपने राजा को मरते देख प्राण बचाने के लिए भाग कर वन में छिप गए। राम ने खून से भोगे केशों को पकड़कर अर्जुन का सिर उठा लिया और पाश्रम को प्रोर दौड़ पड़ा। "अर्जुन को प्रापका अपमान करने का दण्ड मिल गया, तात ! मैंने उसे अपने इसी परशु से काट डाला है।" राम ने अर्जुन का सिर महर्षि जमदग्नि के मागे रखते हुए कहा, "सहस्र- योद्धाओं के समान वलशालो राजा अर्जुन के मुजदण्ड धरतो पर कटे पड़े हैं और सिर मापके श्रीचरणों में "पिता प्रसन्न हों..." "प्रसन्न हुमा, पुर !" महर्षि जमदग्नि ने भागे बढ़कर राम को छाती से लगा लिया, "तू पराक्रमी है । परशुराम है।" निकट ही खड़ा प्रायु उमग कर चल पड़ा, "राम महा- पराक्रमी है ! राम परशुराम है ! अन्य ऋपिपुत्र भी होमन्त होकर उछलने लगे, "परशुराम महान है !" "परशुराम अजेय है !" " ७ ४० , सहसा मानों भूकम्प प्रा गया हो। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था। यज्ञशाला में बैठे महर्षि जमदग्नि कोलाहल सुनकर चौंक पड़े थे। उन्होंने ज्येष्ठ पुत्र रुमण्वान को आगे बढ़कर कारण जानने की आज्ञा दी और जल्दी-जल्दी आश्रम की रक्षा की व्यवस्था करने में तत्पर हो गए। किन्तु" यदि उससे दुगुनी व्यवस्था होती, तब भी क्या हो सकता 'था! राजा अर्जुन पशुओं को हांक ही ले गया था। वह तो कहो कि राम ने रक्षा कर ली। केवल पशुओं को ही नहीं छुड़ा कर लाया, राजा को उसकी उद्दण्डता का दण्ड भी दिया। अभी राम की प्रायु ही क्या है ! फिर भी अद्भुत पराक्रमी तो पल भर के लिए भी नहीं छोड़ता। उसके हाथ परशु हो तो वह एक वार काल से भो लड़ सकता है। फिर भी उसी दिन से देवो रेणुका को बड़ा डर लगने लगा । है। परशु में परशुराम है। हर क्षण मन में जाने कैसी ग्रामंका पटकती रहती है। तनिक-सी अपरिचित ग्राहट मिलते हो वह चौक पड़ती हैं, कहीं.. .धरती पर अब कितना अधर्म होने लगा है। क्षत्रिय राजा होते हैं रक्षा के लिए। वहीं तो ब्राह्मणों को दान देते है राजा अर्जुन तो स्वयं ब्राह्मग का धन छोनने पा गया था! जब इतने प्रतापी राजा ऐसा पाप कर्म करते हैं, तब और 'किसका भरोसा किया जाए। क्या पता कब किस राजा का मन पापो हो जाए." कोलाहल सुनते ही देवी रेणुका व्यग्र हो उठौं । महर्षि यनशाला में उपासना कर रहे हैं। इस समय और कोई है मी नहीं। यदि कोई प्रा हो गया तो उसका स्वागत-सत्कार करने भी उसे ही जाना पड़ेगा। तय भी .. मन से एक पल के लिए मो भय जाता नहीं। वह उठकर यशाला में प्रा सड़ी हुई। महर्पि संध्या में लीन थे। तय? पुलाएं? किन्तु कहीं क्रुद्ध हो गए तो? नहीं-नहीं। उससे तो अच्छा है, कुछ भी हो जाए-प्रलय ही सही, किन्तु महर्षि का क्रोध सहना तो उससे भी कठिन है ! देवी रेणुका काप कर दूसरो अोर ताकने लगीं। कोलाहल क्रमश: निकट ग्राता जा रहा था। रेणुका कुछ समझ नहीं पाई। हृदय घड़कने समा। प्राशक्ति दृष्टि मे वह एक बार वन को भार तार करता तार निकट प्राते कोलाहन को सुनने समझने को पेशागत फिर असफल होकर निजंन प्राथम की अोर ता.
परशुराम अन्त में उनकी दृष्टि समाधिमग्न महर्षि के गम्भीर चेहरे पर अटक जाती। महर्पि अभी तक उपासना कर रहे हैं। कोलाहल और निकट सुनाई पड़ने लगा। रेणुका त्रस्त हो उठीं। महर्षि की समाधि भंग करें तो उनका कोष"नहीं-नहीं... तव? कोलाहल ! गर्जन! उत्पात ! निकट. "और निकट "आर्य ! सहसा रेणुका चोख पड़ी। साधारण लोग नहीं। पूरी एक सेना । क्रोध से तमतमाए योद्धा पैर पटकते हुए आश्रम रौंदने लगे। उनके पीछे-पीछे शस्त्र चमकाते हुए असंख्य सैनिक विना अनुमति लिए ही आश्रम की बाड़ तोड़कर भीतर घुस आए। आगे-पागे चलता योद्धा गरज उठा "हत्यारा जमदग्नि कहां रेणुका स्तब्ध रह गई। समझ में तो नहीं पाया, किन्तुः कुछ अशुभ होने वाला है-यह रेणुका अच्छी तरह जान गई। उन्होंने लपक कर वेदो पर बैठे महर्षि जमदग्नि को झकझोर दिया, "आर्य 'आर्य'जल्दी उठिए। अनर्थ होने वाला है, प्रार्य"जल्दी""हे भगवान।" निष्फल होकर हांफती हुई रेणुका भाग कर बाहर निकलीं। सैनिक मानों विक्षिप्त हो उठे थे। क्रोध से चिल्लाते हुए वे कुटिया में लगी बांस की खपच्चियां और छप्पर से फूस नोचने लगे।
परशुराम रेणुका की प्रांखें डवडवा पाई। उसने एक बार फिर महर्षि को उठाने की चेष्टा की, "मार्य, अनर्थ हो रहा है। प्राण बचा- 'इए"हा देव ! मैं क्या करूं."आर्य"मार्य..." "वह नीच कहां छिपा है, उसे खोजो।" बाहर से फिसी की गरज सुनाई पड़ी, "आश्रम में जो भी मिले उसका वध कर दो-सवका । हमें पिता अर्जुन का प्रतिशोध लेना है । कोई न बचने पाए । खोजो'"सारा पाश्रम उजाड़ दो !" "ग्रायं.."ग्रार्य..." सहसा कई योद्धा यज्ञशाला में घुस पाए। रेणुका झपटकर बीच में सड़ी हो गई। मरने शरीर से महर्षि को प्रोट में करती हुई कातर स्वर में चिल्लाई, "क्षमा कर राजा, अभी वह समाधि में हैं, तू..." योद्धा को प्रासें भक् से जल उठी। रेणुका का हाथ पकड़ कर झटकता हुमा गरज पड़ा, "दूर हट !" रेणुका का सिर दीवार से जा टकराया । लगा जैसे मांसों के आगे अधेरा छा गया हो । यज्ञशाला मानों नाचने लगी हो । वह, हाथ में खड़ग उठाए योद्धा "समाधि में लीन महपि"यज्ञ कुण्ड सब कुछ नाच रहा है।" योद्धा के हाथ का खड़ग ऊपर उठा । रेणुका चौकार कर उठों, "राजा"रक्षा कर"तू राजा है. समाधि में लोन ऋपि को"ग्राह्मण को योद्धा का सड़ग लपलपा कर वाज की भांति तेजी से झपटा और "महपि जमदग्नि का सिर कट कर झटके से अग्नि कुण्ड में गिर पड़ा। रेणुका ने यह नृशंस काण्ड देस कर दोनों हाथों से मांसें मूंद लो प्रचेत-सी वह बाहर को भोर दौड़ी, "राम"राम" तू कहां है राम !"
योद्धा गरजता हुआ सैनिकों को आदेश दे रहा था, "पशुओं को खोल लो। आश्रम में आग लगा दो। कुछ भी बचने न पाए । स्वर्ग में बैठे मेरे पराक्रमी पिता कार्तवीर्य सहस्रार्जुन यह देखकर प्रसन्न हों। विनाश''महाविनाश !"
00 600 ga ००० ဧဂို उठा, राम कटे पेड़ की तरह पछाड़ साकर पिता को निर्जीव देह पर गिर पड़ा। बिलस "पिता..." प्रायु ने जल्दी से मुस्कर राम को सम्हाला, "धर्य रस, मित्र ! तू वली है । योद्धा है । यदि तू ही इस प्रकार मधोर हो जाएगा तो हमे कौन ढाढस बघाएगा। अग्रज को देख"भगवती को देख"ऋषियो को देख "सभी तो व्याकुल हो रहे हैं । साहस फर, मित्र । मां को घेर्य दे..." "मां !" राम देवी रेणुका को गोद मे गिर कर रोने लगा। रेणुका इतनी देर से जैसे इस लोक में यों ही नहीं । राम का स्वर सुनकर वह सहसा जाग उठीं। सालो-सालो मातो से ताकती हुई विक्षिप्तो की तरह बोलो, "राम, तू मा गया !" "मा! यह क्या हुमा मा?" "तू नही देख रहा है, पुत्र!" देवो रेणुका अभी तक नहीं सहज हो पाई थीं। वह जैसे कहीं बड़ी दूर से वोल रही पो" परशुराम कुछ हो गया है, वह तेरे सामने ही तो है । प्राथम जल कर ख हो गया। महपि की हत्या कर दी गई "पनुनों का हरण । गया"वस मैं अकेली वची रह गई हूं ! यह महाविनाश मैंने रपनी अांखों से देखा है, फिर भी हृदय पर पत्थर रखकर जीवित रही कि तुझे बता सकू... "वतायो मांजल्दी वतामो किसने किया है यह ? किसको अपने जीवन से वैर हो गया है ? भार्गवों के आश्रम में इस प्रकार का अनाचार करने वाला पातकी कौन है ?" "सहस्रार्जुन का पुत्र !" जैसे श्मशान से कोई शव उठकर वोल पड़ा हो, "घड़ी भर हुआ, वह सेना लेकर आया था। पहले पूरे आश्रम को रौंदता रहा । छप्परों को गिरा दिया..." "और पिता चुप वैठे यह सब देखते रहे । उन्होंने उस दुरा- चारी को दण्ड नहीं दिया !" "आर्यपुत्र समाधि में मग्न थे राम । मैंने कितनी ही वार उनको उठाने का प्रयत्न किया, पर वह.." "हुँ !" राम फुफकार टठा, "तब ? वतारो मां; तव क्या किया उन दस्युगों ने ? सब कुछ बतायो, मैं मन कठोर करके सुन रहा हूं! प्रायु दोगुनी होती ज रही है। क्रोध उसके चौड़े वक्ष में समा नहीं रहा है। नर फैलती जा रही हैं। "महपि को खोजते हुए वे यज्ञशाला में घुस पाए !"रेणुः जैसे उस क्षण की कल्पना करके सिहर उठीं। कांपते स्वर बोली, "मैंने उस योद्धा से विनतो भो की, किन्तु उसने मे हाथ पकड़कर दूर फेंक दिया..." "पातकी।' पाय को लगा मानो राम की गुर्राहट सारे प्राकारा में को लगा जैसे राम की देह फूलकर " परशुराम उठी हो। "मेरे देखते ही देखते उसने अपने विकराल सड़ग से महर्षि को काट डाला।" "हत्यारा!" "मैं तुझे पुकारती हुई भाग चलो-वह कह रहा था, मायम को जलाकर राख कर दो, स्वर्ग में बैठे मेरे पिता अर्जुन प्रसन्न हों। राम- "मैं भी अपने पिता को प्रसन्न करूंगा!"राम ने एक क्षण के लिए निकट ही बैठे अंग्रेजों मोर दूसरे माश्रम वासियों को मोर देखा। सब एक स्वर मे चिल्ला पड़े, "तू महापराक्रमी है, राम । 'परशुराम है। तू हमारा नेतृत्व कर। हम ऋषियों की सेना संगठित करके अर्जुन के पुत्र से इसका वदला लेंगे।" राम को अंगुलियां परशु पर कस उठौं । उसने दाहिना हाय -माकाश की ओर उठाकर मोपण स्वर मे कहा, "मैं,जामदग्नेय पिता के शव को शपथ लेकर प्रतिज्ञा करता हूं-इसी पर से हैहयवसो क्षत्रियों का काटकर पिता का बदला लूगा। -देवता मेरो प्रतिमा के साक्षो हों-केवल महिप्मती का राज- कुल ही नहीं, समूची धरती से मैं हैहयवश का नाश कर दूंगा। उनके रक्त से हो में पिता का तर्पण करूंगा। उन्हें 'प्रसन्न करूंगा।" प्रायु को लगा जैसे राम का गरोर फूनकर प्रोर विराट हो गया है। उसके भयानक नेत्रों में ज्वाला घरकने लगी-प्रलय की ज्वला । यह वह ज्वाला है, जिसमें धरती के जाने कितने योद्धा भस्म हो जाएंगे। उसका वेग बटना हो जा रहा है । अस्त-सा मायु हांफता हुमा राम को मांस बचाकर पोधे सरक गया। राम, --- ---- ம - படி ९ 80 6 ००० ०0- - । युद्ध"युद"युद्ध क्षत्रियों का विनाम। भय । प्रातंक । पाम । हाहाकार । चीत्कार । स्दन । कोलाहल से जैसे सारा प्राकाम कांपने लगा। किन्तु राम कुछ नहीं सुन रहा है। वियवानों का रदन उसके कानों को नहीं पाता। पांदों के नीचे कुचले जाते शवों पर उसकी दृष्टि नहीं भटकती। यह वृध नहीं देख रहा है। बुध नहीं समझ रहा है। उसके कानों में बन मां का प्रारदन गूंज रहा है । प्रांसों के मागे अग्नि कुण्ड में, पिता का कटा हुमा सिर सुलग रहा है। राम ने प्राथमवासियों को प्रादेश दिया है-मय से धमिलों पो शिक्षा न दी जाए। प्रायम में उनका प्रवेग मी वजित है। क्षत्रियों से कुल एक ही नाता है जहाँ भी मिल, से काट दो। उसे मिटा दो ।
.. परशुराम प्रतिशोध ! भयंकर प्रतिशोध । घरती पर से क्षत्रियों का नाश । कोई नहीं बचेगा। कोई नहीं राम ने झपट कर माता के अंक में दुबके क्षत्रिय शिशु को बींचा और परशु के एक ही प्राघात से काटकर फेंक दिया। कोई नहीं बचेगा। यह शिशु भी बड़ा होकर विपघर बनेगा। राजा बनेगा। न बने राजा । क्षत्रिय का पुत्र तो है । इसलिए कोई नहीं बचेगा। कोई नहीं "वंश की एक वेल तक नहीं एक अंकुर भी नहीं राम जोर से अट्टहास कर उठा । "सावधान ! वालक की हत्या करने वाले अधम... आततायी, संभल ! राम झटके से घूम पड़ा। वेग से दौड़ता हुअा रथ एकदम निकट पाकर खड़ा हो गया। उसमें नवोढ़ा पत्नी के साथ खड़ा हृष्ट-पुष्ट युवक धनुष सम्हालता हुमा गरजा, नारकीय, तू नहीं जानता महिष्मती के परम प्रतापी राजा... राम की अांखें भक से जल उठीं। गुर्राकर उसने पूछा, "तू कौन है ?" "मैं महारथी दर्भ..." राम फिर वीच ही में गुर्रा उठा, "क्षत्रिय है न ?" "मैं हैहयवंशी प्रतापी..." "अव तू भी मर । एक भी क्षत्रिय नहीं छोड़ गा ले ! परशु के एक ही प्रहार में महारथी दर्भ दो टुकड़े हो गया। "पार्य !" दर्भ की नवोढ़ा पत्नी सहसा प्रार्तस्वर में चिल्ल " ७. परशुराम राम जोर से पट्टहास कर उठा। क्षत्राणी रय से नीचे कूद पड़ी। कातर स्वर में विलसतो हुई प्रलाप करने लगी। "ले पापी "दस्यु"मुझे भी मार डाल । रास..." "चुप !" राम गरज पड़ा। "मार"मार"तू मुझे भी मार "तू विक्षिप्त हो गया है। रक्त की प्यास है तुझे तो, मुझे भी मार डाल"मार""मेरा रक्त पीकर अपनी प्यास बुझा ले !" राम ने उपेक्षा से सिर झटक दिया। भारी स्वर में बोला, "हां, मै विक्षिप्त हो गया हूं। मैं रक्त काप्यासा हूं। ममी मोर खत वहाऊंगा'जब तक "तो ले, मेरा भी रक्त वहा"मुझे भी कार.." "चुप रह । तू नारी है, इसीलिए बोल रही है । यदि पुरुष होती तो मेरा परशु अव तक तेरा भी रक्त पो चुका होता। जानती है, यह परशु महिप्मती के राजवंश के मावाल वृद्ध- सवको मृत्यु को गोद में सुला चुका है। किन्तु तुझे "जा, भाग + पा.." "फायर ! तू भी नीति और धर्म की वातें करता है ? युः ! में ही तेरा प्राण लूंगी।" उसने मपट कर रय पर पड़ा विकरात खड़ग उठाते हुए कहा, "तुझ जैसे पातको को तो यूद्र भी मार सकता है । मैं महारयो दर्न की भार्या चित्रा तेरा वध करूंगी ! ले सम्हाल." राम उछलकर दूर हट गया। दांत पीसकर बोला, "भार्गववंशी महपि जमदग्नि का पुत्र राम हत्यारा दस्यु नहीं है। नारी के ऊपर शस्त्र नहीं उठाना चाहता, किन्नु"तू मेरा बोध नहीं जानती, मूर्या !" चित्रा के हाय से घटकर सड़ग नीचे गिर पड़ा।
। परशुराम वह कई पग पीछे सरक गई। फटी-फटी आंखों से राम की ओर देखती हुई फुसफुसाई, "जामदग्नेय राम....."राम भार्गव ! परशुराम"." भय से कांपती हुई चित्रा राम के चरणों में लोटने लगी, "महर्पि"अनजान में कहे गए अपमानजनक शब्दों के लिए क्षमा करें। दासी प्रणाम करती है..." "सौभाऽऽऽ..." सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद देते-देते राम अटक गया। खिन्न स्वर में वोला, "प्रसन्न हो, प्रार्या । तेरा क्या प्रिय करूं?" चित्रा अपने पति दर्भ की रक्त से सनी देह की अोर देखकर विलख उठी, "प्रसन्न होऊ 'मेरा प्रिय "अव क्या करेंगे, महपि मेरे लिए अव संसार में कौन सी प्रसन्नता वची है। मेरा प्रिय करके क्या होगा..." राम का मन पिघल गया। गीले स्वर में उसने कहा, "राजा अर्जुन के पुत्रों ने युद्ध से विरत रहने पर भी आततायी पिशाचों की भांति मेरे पिता की हत्या की थी, शुभे। उस समय वह समाधि में लोन थे तव भी पीड़ा से छटपटाती मां को सान्त्वना देने के लिए मैंने हैहयों का नाश करने की प्रतिज्ञा की है..." "मैंने सुना है, महपि ! किन्तु किन्तु राजा के अपराध का दण्ड सवको क्यों मिल रहा है, महपि ? अभी-अभी जिस शिशु को प्रापने काट डाला था, उस अवोध ने पापका क्या अपराध किया था, महर्पि..." "वह भी क्षत्रिय का पुत्र था !" राम ने वृणा से उस बालक की ओर देखकर कहा,“वड़ा होकर वह भी राजा वनता । सत्ता के मद में मस्त हाकर अनाचार करता। इसीलिए किसी को नहीं छोड़ गाएक भी क्षत्रिय फिर अनाचार करने के लिए वचेगा'"कोई नहीं..."
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परशुराम 'पापका मन पत्थर को भांति कठोर है। महषि!" कराह- कर चित्रा दर्भ की शीशरहित देह से चिपककर सिसकने लगी; "प्रार्यपुत्र'""आप"अभी तो मैंने ठीक से प्रापको देखा भी नहीं था""मैंने ऐसा क्या. पाप किया था कि मंगलसूत्र पहनते ही विधाता ने क्रूर होकर मेरा सुहाग छीन लिया""महपि: "तेरा पति मागे पड़ गया""""राम पल भर खड़ा कुछः सोचता रहा । बोला, "आर्या, तेरे कारण ही मैं. यह व्यवस्था करता हूं कि जो भी क्षत्रिय विवाह का कंगण वांघे होगा, उसे तीन दिन तक मेरा अभय मिलेगा। तीन दिन तक सामने पाकर भी में उसका वध नहीं करूंगा, किन्तु उसके बाद.." "मार्य"महर्षि"क्रोध शान्त हो"यदि यह नरमेघ चलता रहा तो..." एक दिन धरती क्षत्रियों से हीन हो जाएगी। सारी वसुन्धरा दम्भी क्षत्रियों के रक्त से भीग उठे । हो यही हो।" राम जोर से अट्टहास कर उठा। "महर्षि..." "हां, मैं यज्ञ कर रहा हूं। क्षत्रिय मेघ !" "महर्षि कृपा करें। प्रसन्न हों। यह नरमेघ कव तक चलेगा..." "कहा तो, जव तक धरती पर क्षत्रिय होंगे। मैं क्षत्रियों का नाश करूंगा। उनके रक्त से पिता का तर्पण करूंगा। शोक संतप्त माता का हृदय ठंडा करूंगा?" "भयानक "महर्षि को इन विधवाओं को रोते-कलपते देखकर दया नहीं आती ? मातानों की गोट से छीनकर उनके पुत्रों को काटते समय मन में करुणा नहीं उपजती ?" "नहीं।" राम का स्वर कठोर हो गया, "जब मेरी मां विधवा होकर कलप रही थी, तब किसके मन में दया प्राई " परशुराम थी । जव पिता को मृत्यु से दुखी होकर हम कलप रहे थे तब किसके मन में करणा उपजी थी? मरें। सब मरें। विह्वल होकर तड़पती मां को साक्षी बनाकर मैने प्रतिज्ञा को है..." "प्राय को माता विधवा हो गई, एक उन्ही के दुःख के कारण "सावधान !" राम गरज उठा, "तूने मां का दुख नहीं देखा है । यदि अनजान में भी उनके प्रति कुछ कह गई तो..." "कहूंगी। अवश्य कहूंगी । अब मुझे किसके लिए जीना है। किसलिए डरूं। मैं बार-बार कहूंगी। आर्य ने एक विधवा को पीड़ा मिटाने के लिए कितनी हो नारियों का सौभाग्य छीनकर विधवा बना दिया। पिता से वंचित होकर अकेले ही कितनी संतानों को पिता के स्नेह से वंचित कर दिया। यह कहा का न्याय है, पायं?" राम सहसा कुछ बोल नहीं सका। क्षमाणो चिना एक पग मागे बढ़ पाई, "वोलो, मार्य ! तुम तो पिपुर हो । विद्वान हो । राजा तो केवल रक्षक होता है।" ब्राह्मण ही राजा को धर्म का पथ दिखाता है। वही नियम बनाता है । समाज में व्यवस्था स्थापित करता है। मुझे बतायो क्या इसकी भी कोई व्यवस्था को है ? तुमने तो अपनी माता का दुख देसकर प्रतिमा करली, किन्तु इन कलपती हुई मातामों का दुख कोन दूर करेगा? इनको पीड़ा कोन देखेगा? तुम्हारी माता के तो पांच पुत्र हैं। जब उन्हें सन्तोप नहीं हुमा तो ये नारियां जिनके पति और पुत्र-सब तुम्हारे इस यन को वलि चढ़ गए"इनका क्या होगा, ये कैसे सन्तोप करेंगी? इनको कौन सान्त्वनादेगा? इनके लिए क्या व्यवस्था दी है तुमने ? इन्हें किस अपराध का दण्ड मिल रहा है ? तुम्हारा यह कैसा न्याय है भार्गव राम?"
८२ परशुराम "प्रार्या...!" राम को लगा जैसे चित्रा के मन की टीस उसके हृदय में चुभ गई हो। रोती हुई नारियों का कोलाहल उसका मन खरोचने लगा । नन्हें-नन्हें बच्चों का चीत्कार उसके हृदय में सुलग उठा । पीड़ा से सिसिया कर राम धीरे-धीरे एक ओर को घूम पड़ा। "कहां चल दिए, आर्य ?" चित्रा घूमकर फिर सामने आ खड़ी हुई, "आप चुप क्यों हो गए। वोलिए"कुछ तो कहिए. पति, पुत्र, पिता से वंचित इन स्त्रियों का क्रन्दन पाप नहीं सुन रहे हैं क्या? एक वार चलकर निकट से सुन लीजिए। आपने अपनी माता को तो छटपटाते देखा है न ! पिता के प्रभाव की पीड़ा भी झेली है । इनकी पीड़ा भी..." राम का मन अकुला उठा। वह रिक्त आंखों से इधर-उघर ताकता हुमा भर्राए स्वर में बोला, "मुझे जाने दे, प्रार्या, मुझे जाने दे..." राम तेजी से वन की पोर वढ़ चला। बस्तियों में उठते इर कातर क्रन्दन से, इन प्रात चीत्कारों से जितनी दूर जा सके। जितनी जल्दी जा सके ''यह क्रन्दन सुनते-सुनते वह विक्षिप हो जाएगा। पैर मानों रह-रहकर कटे हुए शवों पर पड़ जा हैं। राम लड़खड़ा उठता है फिर सम्हल कर वन की पोर चल लगता है। तेज । और तेज । और तेज...
१० 00 Dirl-.-.-.-.-.-.- ago 000 9 राम के मन में प्रथाह पीड़ा भर गई है। एक पल के लिए भी चित्त शान्त नहीं होता। उठते-बैठते, सोते-जागते हर क्षण कानों में करण कन्दन गूंजता रहता है। मांखों के प्रागे रक्त में सने पाव तड़फड़ाते रहते हैं। राम छटपटा उठता है । वन के एकान्त में भी लगता है जैसे यह युद्ध भूमि में पड़ा हो-रुपिर से सने लोयों की भीड़ उसे घेर लेती है। राम इस भयानक दृश्य से छुटकारा पाना चाहता है । क्या करे ? कहां जाए ? किससे मिले ? कभी-कभी मन होता है कि किसी ऋपि के तपोवन में जाकर रहने लगे। पर भीड़ को कल्पना करते हो वह शिथिल पड़ जाता है। किन्तु उस एकान्त में भी तो. तब? क्या फरे?
उस दिन सहसा ही ऋषि परावसु पा गए । राम प्रसन्न हो य या, "क्या ऋपि परावसु विश्वामित्र के पौत्र ऋपि रैम्भ के पुत्र होने कारण सम्बन्धी भी हैं। विश्वामित्र पिता के मातुल थे परावसु अग्रज हैं। राम ने उचित आसन देकर ऋषि परावसु का आदर-सत्कार "आर्य आश्रम पर कुशल तो हैं ?" "कुशल !" ऋषि परावसु खिन्न होकर हंस पड़ें। राम चिन्तित हो उठा । अाग्रह भरे स्वर में बोला, हुआ, आर्य ? शुभ तो है ! आप क्लान्त क्यों दीख रहे हैं ?" "नहीं। क्लान्त नहीं हूं, भद्र ।' "कोई विशेष कारण ? चिन्तित तो हैं, आर्य।" "नहीं । जो है, वह तो होना ही था, राम । विशेष कारण तो तब होता है जव आकस्मिक रूप से कोई स्थिति सामने आ जाए । किन्तु जब कोई कार्य जान-बूझ कर किया जाता है और उसका परिणाम अवश्यम्भावी होता है तो उसे विशेष कारण नहीं कहा जाता।" "मैं कुछ समझा नहीं, आर्य !" "तू अव नहीं समझ सकेगा, राम, अव क्यों समझेगा!" राम कुछ पल अचकचाया-सा बैठा रहा, फिर मन्द स्वर में वोला, "अार्य मुझ पर अप्रसन्न हैं ?" "मैं क्यों अप्रसन्न होऊंगा।" "मैंने कुछ अनुचित किया ?" आर्य परावसु ने सिर झटक कर कहा, "मैं तेरा उचित-अन चित नहीं जानता, राम । हां, तूने जो कुछ किया, उसका पनि णाम अवश्य हम भुगत रहे हैं ! राम एक पल के लिए स्तब्ध रह गया । रुक्ष स्वर में वो परशुराम "प्रायं स्पष्ट कहें। यदि मैंने अपराध किया है तो उसका परि- मार्जन भी मैं ही करूंगा। मेरे किए का परिणाम प्रायं के लिए क्यों फप्टकर होने पाएगा..." "मेरे लिए ही पों, सबके लिए कप्टकर हो रहा है।" ऋपि परावसु ने भी तेज पड़कर कहा, "तुम तो इस एकान्त में बैठ कर प्रायश्चित कर रहे हो । किन्तु कभी तुमने हम महपियों के विषय में भी सोचा है, जिन्हें अपना कर्तव्य निभाने के लिए हर क्षण राजा पोर प्रजा से सम्पर्क बनाए रखना प्रावश्यक होता है । हमको तो तुमने संकट में डाल दिया राम !" "और स्पष्ट करें पायं ।" राम का स्वर तोसा हो गया, "मेरे एकान्तवास से माप लोगों के पर्तव्य पालन में कौन-सो वाघा पड़ रही है-यह मैं अभी तक नहीं समझ पाया। पाप बताइए, माना पाते ही मैं उस पापा को दूर कर दूंगा पाहिए तो-" "कह कर ही क्या कम्गा। जिन राजामों को तुमने काट डाला है, उन्हें फिर से जिला दोगे क्या? हः !" "उसको चर्चा क्यों, प्रार्य ? वह तो मैंने प्रतिज्ञा को थो "वही तो कह रहा हूं।" ऋपि परावसु रुष्ट होकर बोले, "तुम तो अपनी प्रतिमा पूरी कर रहे थे। कमो ब्राह्मगों को स्थिति पर भी ध्यान दिया है ? मूद्रों ने सेवा करनी छोड़ दी है । वैश्यो ने व्यापार करना बन्द कर दिया है। पहले कितने बड़े-बड़े साय चला करते थे। घरतो के इस छोर से उस छार तक निश्चिन्त होकर वे प्रय-विक्रय करते । अव जानते हो क्या होता है ? शूद्र निर्भय होकर दस्यु बन गए हैं । एकान्त की "कोन कहे, नगरों में भी लूट होने लगी है। ऐसे में कौन ओष्ठ व्यापार करेगा-? रक्षक के विना व्यापार चलता है ?" " - परशुराम "शूद्र उच्छखल हो गए हैं । मैं प्रतीक्षा करता हूं-' "रहने दो। रहने दो।" ऋषि परावसु ने उपेक्षा से सिर टक दिया, “एकवार तुमने क्षत्रियों को मारने की प्रतिज्ञा की, सका दण्ड तो हम भुगत ही रहे हैं --!" "दण्ड ? कैसा दण्ड ?" राम का चेहरा तमतमा उठा, आर्य ज्येष्ठ होने के कारण मेरा अपमान कर रहे हैं । जब तक परे स्कन्धों से जुड़ी ये भुजाएं हैं, जब तक इन भुजायों में वल है और जव तक मुट्ठी में यह परशु है, तब तक धरती पर किस क्षत्रिय में इतना साहस है जो जामदग्नेम राम को दण्ड दे और वह दण्ड ब्राह्मणों को झेलना पड़े। आज भी मेरे आतंक से सारी घरती कांपती हैं।" "यह तुम्हारा दम्भ है, राम- "यार्य !" राम का स्वर कठोर हो गया। ऋपि परावसु ने दृढ़ स्वर में कहा, "मैं सत्य कह रहा हूं, राम । तुमने झूठे दम्भ में प्राकर क्षत्रियों को मारने की प्रतिज्ञा की और अव कायरों की तरह मुंह छिपाकर वन में चले आए। क्यों ? अब कहां हो गया तुम्हारा पौरुष ? अव क्यों भूल गए प्रतिज्ञा, केवल क्षत्रियों को ब्राह्मणों का वैरी बनाने के लिए यह सव किया था ? क्षत्रियों ने रुष्ट होकर रक्षा करनी बन्द कर दी है। चारों ओर अराजकता फैल गई है। राजा अव ऋषियों को भी दान नहीं देते। आश्रमों को आश्रय नहीं देते। इन सबके कारण तुम्हीं तो हो। केवल तुम को घोर अपमान और दरिद्रता का जीवन विताने के लिए छोड़ दिया ! तुम्हींने हम । है !" "हां।" राम गुर्रा पड़ा, "मैंने ही प्रतिज्ञा की थी, इसीलि आप कह सकते हैं, किन्तु मैं न तो अपनी प्रतिज्ञाही भूला हूं न मैं कायर ही हूं।"
परसराम राम ने उठकर वाणों से भरा तूणीर कन्पे पर लटका लिया। बाएं हाथ में विश्वकर्मा का बनाया हुप्रा हट्टियों का मारो घनुपं और दाहिने हाथ में विकराल पर उठाकर बोला, "में फिर क्षत्रियों का नाश करूंगा। निवंश कर दूंगा। कोई नही बचेगा। कोई नहीं।" वह तेजी से झपटता हुमा गहन वन से बाहर की पोर बढ़ चला।
११ ooo ago विनाश! महाविनाश! राम के इस नरमेघ में युग अनजाने ही अपना सहयोग दे रहा था। सभी तो उसके साय थे ! ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच वैमनस्य की खाई बढ़ती ही जा रही थी। क्षत्रिय ब्राह्मणों से घृणा करने लगे। ब्राह्मणों ने भी रुष्ट होकर अपने को सीमित कर लिया। राज-काज में भाग लेना छोड़ दिया। जो शूद्र पहले क्षत्रियों के भय से उनके साथ थे, वे भी राम को भीषण प्रतिज्ञा सुनकर स्तब्ध रह गए। क्षत्रियों के साथ रहकर कोई भी राम के परशु से नहीं वच सकता । डरकर शूद्रों ने क्षत्रियों का शासन मानना छोड़ दिया। कई तो निश्शंक होकर दस्यु बन गये । सेवाकर्म को वे अपमान समझने लगे। चारों ओर अराजकता! लूट-पाट । रक्तपात । भय से कांपते वैश्यों ने बहुमूल्य रत्नों को सुरक्षित रखने के NO परशुराम धरती के नीचे गाड़ दिया। धन का अभाव होने लगा। वश्यकताएं हाहाकार करने लगीं। सुख मरीचिका बनकर गया। असन्तोप ही असन्तोष । कोई व्यवस्था नहीं। कोई शासन नहीं। राजानों को युद्ध से अवकाश ही नहीं मिलता। राम प्रचण्ड शक्तिशाली है। युद्ध। नरमेघ। क्षत्रियों का नाश । धरती लाशों से पट गई । कुरुक्षेत्र में तीन कुण्ड रक्त से भर गए। राम को तव भी शान्ति नहीं है । अभी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई । घरती पर जाने कितने क्षत्रियों की देह पर अभी भी सिर अटका हुअा है । वे भी कटेंगे । एक भी क्षत्रियं नहीं बचेगा। राम का क्रोध बढ़ता गया। केवल हैहयवंशी ही नहीं जो क्षत्रिय उनकी रक्षा करेगा, वह भी शत्रु है। जो शत्रु की सहा- यता करे, वह भी शत्रु है । धरती के सारे क्षत्रिय शत्रु हैं । राम सवको काट डालेगा। कहीं भी हो कोई भी हो। कश्मीर । दरद । कुन्ति । मालव । अंग । वंग। कलिंग विदेह । रक्षोवाह । वीतिहोत्र । त्रिगर्त । मातिकावत.. सहन योद्धाओं के समान वलशाली हैहयराजा अर्जुन विजेता जामदग्नि राम ने क्षत्रिय जति का काल बनकर घर के सारे खण्डों को रौंद डाला। हैहय अर्जुन के पुत्र गए। पौत्र गए। सम्बन्धी गए जो क्षत्रिय हैं वे सब गए । सव । पुरुवंशी वीर विदूरथ । देवत ।
६१ परशुराम के समान बली राजा सौदाम। परमपराक्रमी शिवि। . घाती राजा प्रतर्दन । महारयो दिविरय । युद्ध में काल की मांति प्रलय मचा देने वाला राजा मरत इनके वंशज भी राम के दुस्सह तेज के सामने नहीं पा सके। कौन बचेगा? कब तक बचेगा। कहां छिपेगा! राम सारी घरतो को रौंद रहा है सात द्वीप नौसड" कोई भी नहीं बचा। सब गए। कोई योद्धा नहीं शेप रहा। कुरक्षेत्र में रक्त से मरे तोनों कुण्डों के निकट ही एक पोर कुण्ड भर गया। चार कुण्ड किन्तु प्रमी भी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई है । क्षयाणियों के पेट में गर्भ मुरक्षित हैं । कौन जाने किसके किसके पुत्र हों। क्षत्रिय पिता के पुत्र । वे मी मरेंगे । क्षमाणियों के गर्भ से जन्म लेते ही उनके पुत्रों का भी वध करके राम अपने इस पत्र में पूर्णाहुति डालेगा। पिता का शव टूकर की गई प्रतिना को पूरी करेगा। कोई नहीं बचेगा। कोई नहीं। धरती क्षत्रियों से हीन हो जाएगी। उन गमों के जन्म लेने तक राम प्रतीक्षा करेगा। काल चक्र की गति कोई नहीं जानता। समय के साथ-साय कुरुक्षेत्र में एक भोर कुण्ड रसत से भर उठा। क्षत्रियों के रक्त से भरे पांच कुण्ड । राम ने सन्तुष्ट होकर उसी रमत से पिता तर्पण का किया। "जामदग्नेय । परशुराम ।" ब्रह्मर्षि कश्यप ने दाहिना हाप + :२ परशुराम उठाकर पाशीर्वाद दिया, "तू दृढव्रती है। तू परमपराक्रमी है। तू समग्र धरती का विजेता है। तूने सातों द्वीपों को अपने वश में कर लिया है । भार्गव, तू यज्ञ कर । तेरे यज्ञ का पुरोधा मैं स्वयं वनूंगा।" राम प्रसन्न हो उठा। यज्ञ हुमा। राम ने ब्राह्मण कश्यप को दुर्लभ रत्नों से जड़ी हुई चालीस हाथ लम्बो, चालीस हाथ चौड़ी और छत्तीस हाथ ऊंची सोने की विलक्षण वेदी समर्पित की। संकल्प करता हुमा वोला, "अपती जोती हुई यह सारी घरती मैंने ब्रह्मपि कश्यप को दक्षिणा में दी। ब्रह्मपि कश्यप ने निकट ही बैठे तेजस्वी ऋत्विजों की पोर देखा। राम ने ब्रह्मर्पि को चुप देखकर विनय पूर्वक कहा, "जहापि प्रसन्न हों। आशीर्वाद दें।" "जामदग्नेय, धरती तूने मुझे दान दी ?" "स्वीकार करें ब्रह्मपि ।' "यह धरतो मेरी हुई ?" "अापकी हुई, ब्रह्मपि ।" राम हंसा । "तो अब तू घरती से निकल जा।" "ब्रह्मपि !" राम चकित हुया । "कुछ पीर मत सोच, जामदग्नेय ! मैं तेरा स्वभाव जानता हूं, तू क्रोधी है, पराक्रमी है । किन्तु अव मेरी धरती पर विनाश मत कर, वत्स । अव मेरी प्रजा को और आतंकित मत कर। तु जाकर दक्षिण समुद्र के तट पर अपना आश्रम बना। वहीं रह !" राम पल भर सोचता रहा, फिर मलिन हंसी हंसकर । :
परशुराम वोला--"महापि, प्रसन्न हों ! ऐसा हो होगा।" ब्रह्मपि कश्यप ने विशाल सुवर्णवेदी को तोड़कर कई टुकड़े फर डाले । एक-एक सण्ड ऋविजों को देते हुए बोले, "यह तुम्हारा नाग है । पराक्रमी राम मागंव से मिली सारी परतो में सारे ब्राह्मणों को देता हूं। अपना-अरना भाग वांटकर निर्माण करो। जामदग्नेय राम के पोध से बचाने के लिए कुछ क्षमा- णियों ने जन्म लेते ही अपने पुत्रों को छिपा दिया था। वे सब शद्रों और वैश्यों के समान कर्म करते हुए किसी प्रकार जोषित हैं। उन्हें सोजो। धरती का शासन शानिय ही कर सकता है। उन्हें शिक्षा दो । राजा बनायो । व्यवस्था स्थापित करो।" धनुप मौर परशु उठाकर राम सड़ा हो गया, "तव ब्रह्मपि, मुझे माज्ञा दें।" ब्रह्मपि कश्यप भी उठ पढ़े। दाहिना हाथ उठाकर माशो- दि देते हुये बोले, "तू महान है, राम । जब तक घरती है, जब तक सूर्य मौर चन्द्र है; रक्त से भरे ये पाचौं कुण्ड तेरे यश की गाया कहेंगे । प्राज से इनका नाम 'रामहद' हुमा। यह स्थान समन्त पंचक तीर्थ बनेगा। तू यशस्वी हो। ज्ञानो हो । धर्माचरण कर।" राम धीरे-धीरे आगे बढ़ गया। लगा जैसे सहसा कोई वक्षों को प्रोट में घिर गया है । राम ठिठका, "कोन है ?" कोई उत्तर नहीं मिला। फिन्तु राम ने देखा तो है, कोई सहसा छिप गया । माकृति कुछ परिचित-सी लगी थी। एक वार झलक भर मिली थी। राम स्मरण करने की चेप्टा करने लगा। कौन है ?
परशुराम सहसा वह घूम कर वृक्ष के दूसरी ओर पा गया। हां। हचान लिया। !" "श्रायु सामने स्तव्ध खड़ा योद्धा कांप उठा। भर्राये स्वर में वोला, "मित्र " राम ने लपक कर प्रायु को वांहों में भर लिया, "तू कहां चला गया था, आयु ! जाते समय एक वार मिला भी नहीं। कहां था तू ?" आयु की अांखें चमक उठीं। गीले स्वर में वोला, "इधर से जा रहा था। सहसा तुझे देखकर ठमक गया।' "अच्छा किया। फिर पता नहीं भेंट होती भी कि नहीं। । तू प्रसन्न तो है ?" "तेरी कृपा है, मित्र ।" पल भर रुक कर प्रायु ने सहमते- सहमते पूछा, "और तू ? धार्य रुमण्वान, आर्य सुपेण"." "मैं तो अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने में लगा रहा। अग्रज रुमण्वान, अग्रज सुषेण, अग्रज वसु, अग्रज विश्वावसु, सुव्रत और सव''बहुत दिनों से किसी का कोई समाचार नहीं मिला इस वीच कब, कोन, कहां खो गया, कुछ ही पता नहीं चला फिर भी मैं हारा नहीं । तू जानता है, पिता की मृत्यु पर दुः से कातर होकर मां ने इक्कीस वार छाती पीटकर रुदन कि था। मैंने इस परशु से इक्कीस वार घरती पर से क्षत्रियों नाश किया। उनके रक्त से पांच कुण्ड भर दिए और 5 रक्त से मैंने पिता का तर्पण किया।" "तू परशुराम है, मित्र! परमपराक्रमी है।" "किन्तु तेरी प्रतिज्ञा''मैंने सुना है अभी भी धरती क्षत्रियों के कायर पुत्र" HTTदे, मित्र.."
परसुराम "उन्हें ब्रह्मपि कश्यप का भाशीर्वाद मिला है, मायु । वे सुरक्षित हैं। मैंने यज्ञ किया था प्रायु । सारी धरती ब्रह्मपि को दक्षिणा में दे दी है। मव कश्यपफिरक्षत्रियों को राजा बनाएंगे। उनके हाथों में शासन सौपेंगे। सौ। मैं तो धरती से मुक्त हुमा।" "तू महान है । वन्दनीय है। प्रतिरपी दण्ड का पुन मायु तुझे प्रणाम करता है।" "दोघंजीवी हो, मायु !" राम पोरे से हंस पड़ा। चलने को तत्पर होकर बोला, "मुझे ब्रह्मपि का प्रादेश है कि उनको घरती छोड़कर दक्षिण समुद्र के तट पर चला जाऊं। जा रहा हूं। अव शेप जीवन महेन्द्र पर्वत पर पाश्रम बनाकर विता दूंगा। अच्छा"" राम चल पड़ा। प्रायु स्तब्ध सड़ा उस विराटकाय पुरुष को प्रोर देखता रहा । एक दिन उसके पराक्रम से सारी धरती पर उथल-पुथल हो गई पो-प्राज वह अकेला हो चला जा रहा है। धरती पर उसका कुछ भी नहीं रहा । न मोह, न पधिकार प्रायु फी भांखें गोलो हो माई। पदचाप दूर होती जा रही थी.. दूर"ौर दूर.
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