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The Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana

Pandit. Rama Deva

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THE JAIMINIYA OR TALAVAKARA
UPANISHAD BRAHMANA.
.
DEVANAGARI TEXT WITH INDEXES.
PREPARED FROM THE EDITION, IN ROMAN SCRIPT
OF
SHRI HANNS OERTEL PH. D.
BY
PANDIT RAMA DEVA, B. A.
WITH
AN INTRODUCTION ON THE HISTORY OF SAMALEDA LITERATURE.
BY
BHAGAVAD DATTA.
,
}
SERIES
ANASA)
OFFICE
#EBRUARY 1921..
FIRST EDITION,
Price /11
1,000 Copies.

प्रोम
दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत-ग्रन्थमाल
अनेक विद्वानों की सहायता से ।
भगवद्दत्त
संस्कृताध्यापक वा अध्यक्ष अनुसन्धान-विभाग
दयानन्द महाविद्यालय, लाहौर द्वारा
सम्पादित ।
ग्रन्थाङ्क ३ ।
.
S.VO College
Libri
Acc. No
Date
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श्रीमद्दयानन्द महाविद्यालय संस्कृतग्रन्थमाला सं०३
BUDDDDDDDDDDDDDDDDRE
ओ३म्
जैमिनीय उपनिषद्राह्मणम्
अथवा
तलवकार-उपनिषद्राह्मणाम्।
पं० रामदेव बी० ए०
द्वारा
श्रीमान् हन्नस अर्टेल, पी० एच०डी०
महाशयस्य
रोमनलिपि-संस्करणात् देवनागयाम् लिपिकृतम् ।
भगवद्दत्त
संस्कृताध्यापक दयानन्दकालेज, लाहौर,
लिखित
भूमिका-सहितम् ।
आर्य सम्वत् १६६०८५३०२० ।
विक्रम स० १६७७।
सन् १९२१ ई०।
दयानन्दाब्द३८।
प्रथमावृत्ति १००० प्रति
मूल्य सी०
HEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEECIGHEERENCE
पं. भैरवप्रसाद के प्रबन्धसे विद्याप्रकाश प्रेसचाइमला लाहौर में छपा।
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WWW Wii U WWW Printed by Bhairo Prasada, MANAGER. VIDYA PRAKASHA PRESS, LAHORE. · AND PUBLISHED BY THE RESEARCH DEPARTMENT. D. A.V.COLLEGE. LAHORE AMMAMMA TANAMA . The Publications of this series can also be had of- 1. MĘSSRS. LUZAC & Co., 46 Great Russell Street, London W: C Lala Moti Lal Banarsi Dass, The Punjab Sanskrit Book Depot, Said Mittha Bazar, Lahore, 3. Lala Mehr Chand Lachhman Dss, Sanskrit Booksellers, Said Mittha Bazar, Lahore. 4. Pt. Wazir Chand, Vedic Book Depot, Moha Lal Road, Lahore. S.V.O.Dallege Library, TIRUM Acc. Na Date मो३॥ भूमिका । सामवेदीय वाङ्मय का इतिहास । परमात्मा से सावेद का प्रादुर्भाव । तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सायानि जज्ञिरे । छन्दांसि जहिरे तस्माघजुस्तस्मादजायत । १०१०१०सायजुः ३२७॥ ते० प्रा० १२॥४॥ उस व्यापक सर्वपूज्य परब्रहसे अग्वेद, सामवेद प्रादुर्भूत होते । अथर्ववेद प्रसिद्ध होता है उस से, यजुबैद उस से प्रकट हुमा। (पूर्वपच) 'च' शादि पद बहुवचनान्त है, अतः इनका प्रर्य अग्वेद प्रादि केसे दुमा इसका अर्थ तो यही है कि वा साममन्त्र और छन्द उत्पन्न हुए। (उचरपच) यह सत्य है, कि सचः, सामानि और 'बन्दॉखि' पद बहुवचनान्स हैं, पर साथ ही यजुः' पद एकवचन, भी है। यदि तुम्हारी बात मानी आवे तो 'यजुः' पद से तुम क्या अभिप्राय नोगे? (पूर्वपक्ष) 'यजुः' पद यहां जात्यर्थ में एकववान होता. हुभा भी यजुर्मन्त्रों का बोधक है, यजुर्वेद का नहीं। (उत्तरपक्ष) यह बात यहां न घटेगीक्योंकि'छन्दांसि पद पर पूर्ण विचार किसी और परिणाम पर खेजाता है। देखो ! बन्दॉसि पद यहां किन्हीं मन्त्र-विशेषों का बोधक नहीं है। दयान्द सरस्वती

( २ )
ने इसी पर विचार करते हुए लिखा है-'वेदानां गायत्र्यादिच्छन्द
ऽन्वितत्वात्पुनश्छन्दाँसीतिपदं चतुर्थस्याथर्ववेदस्योत्पत्तिं शापयती
त्ववधेयम्। (ऋ०भाष्यभू० वेदोत्पत्तिवि०) अर्थात् 'वेदों में सब मन
गायत्र्यादि छन्दों से युक्त ही हैं, फिर (छन्दांसि ) इस पद के कह
से चौथा जो अथर्ववेद है उस की उत्पत्ति का प्रकाश होता हैं
अन्यथा 'छन्दांसि का यहां कोई प्रयोजन नहीं । इस अर्थ में अन
प्रमाण भी देखो।
(१) "ऋचाम्....
यजुषां.
सान्नाम्.
अथर्वणां.
गायत्रं च्छन्द:।
त्रैष्टुभं छन्दः।
.जागतं च्छन्दः।
सर्वाणि छन्दांसि ।।
गो० ब्रा० १११।२६
..
वैदिक विचार में यह सुप्रसिद्ध है कि ऋग्वेद गायत्री छ
सम्बन्धी है [यद्यपि यह अनुसन्धेय है कि ऋग्वेद में गायत्री(२४५
की अपेक्षा त्रिष्टुप (४२५३) क्यों अधिक है ? ] यजुर्वेद त्रिष्टुप् छ
सम्बन्धी और सामवेद जगती छन्द सम्बन्धी है । अब रहा अथर्ववे
सो वह पूर्वोक्त गोपथब्राह्मण के प्रमाणानुसार सर्व-छन्द-सम्बन
उसका किसी एक छन्द से सम्बन्ध-विशेष नहीं। यही कारण
कि उपस्थित मन्त्र में 'छन्दांसि पद से अथर्ववेद का ग्रहण होता
(२) प्रस्तुत मन्त्र-सम्बन्धी एक अन्य बात भी ध्यान देने ये
। अथर्ववेद में यह मन्त्र निम्नलिखित प्रकार से प्राया है-
तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दो ह जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ।
अथर्व १८६१

( ३ ) यहां 'छन्दांसि' के स्थान में 'छन्दो ह' पाठ है। इस प्रकार पाठ में भेद कर देने से परमात्मा ने मन्त्रों द्वारा ही अन्य मन्त्रों का व्याख्यान कर दिया है । यह मन्त्र उन्नीसवें काण्ड का है, और यद्यपि पञ्चपटखिका की भूमिका में लिखे अनुसार हम अभी तक इस काण्ड के सिंहितान्तर्गत होने के विषय में कुछ नहीं कह सकते, फिर भी यह तो सब को स्वीकार करना पड़ेगा कि बहुवचनान्त 'छन्दांसि पद का अर्थ एकवचन 'छन्द' अर्थात् (पूर्व प्रमाणों की रष्टि से) अथर्ववेद ही है । रहा क्रियापद 'जज्ञिरें। सो वह व्यत्यय समझना चाहिये; यद्यपि ऐसे व्यत्ययों के उदाहरण सम्प्राप्त वैदिक अन्यों में अत्यल्प मिले हैं। पूर्वोवृत अथर्ववेद के मन्त्रों से निश्चय होता है कि 'छन्दांसि' प्रादि पदों का अर्थ एक वचन में ही है। ऐसी अवस्था में यजुः पद भी यजुः मन्त्रों का जाति-वाचक न रहेगा। इस विषय में अन्य प्रमाण देखो- (३) यस्मादृचो अपातक्षन यजुर्यस्मादपाक्षन् । सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेवसः ॥ अथर्व.१०॥७॥२०॥ इस प्रमाण में यजुः' पद एक वचन में है, और अथर्वाङ्गिरस स्पष्ट ही ब्रह्मवेद का घोतक है । अतएव 'ऋचः' और 'सामानि' पदों का अर्थ भी ऋग्वेद और सामवेद ही होना चाहिये। विचारान्तर्गत "तस्माद्यज्ञात्" मुं० १०१६016 : मन्त्र की व्याख्या में सलवत सामाश्रमी त्रयीपरिचय तथा निरुक्ताबोचन लिखते हैं कि 'सामवेद छन्द और गान दो भागों वाला है । सो छन्द भाग.का ग्रहण छन्दांसि पद से और गान भाग का ग्रहण सामानि पद से करना चाहिये।' इसका कुछ खण्डन तो हरिप्रसाद ( ४ ) जीने वेदसर्वस्व के उपोद्धात पृ०१५पर किया है । यद्यपि हम उनके विचारलकम से सहमत नहीं, तथापि उन के इस परिणाम के कि गान माग तो मूखसंहिता का गेय-रूपान्तर ही है, अनुकूल सम्मति रखते है। इस गान माग के लिये कहीं अन्यत्र मन्त्रों में 'सामानि' वा साम' पद प्रयुक्त हुमा होता तो सत्यवत जी का पंच कुछ ठहर सकता, पर ऐसा है नहीं, अतः उनकापच निराधार होने से सम्मान योग्य नहीं। सत्यवत जी के पच को एक बात कुछ प्राश्रय दे सकती है, बचपि यह उन्हों ने स्वयं नहीं खिखी प्रथर्ववेदीय पिप्पलाद शाखामें 'सामानि यस्य खोमानि' के स्थान में 'छन्दांसि यस्य लोमानि' पाठ माया है। ऐसी दशा में सत्यवत कह सकता था कि 'छन्दांसि' पद 'सामानि का पर्यायवाची है, और सामवेद के बन्द भाग का द्योतक है। यह बात भी सत्य नहीं ठहरती क्योंकि 'सामानिमादि पद जैसा मागे चल कर और भी विदित हो जायगा सामवेद पाचक हैं। वैसा कोई छन्द वेद है नहीं, और 'छन्द' पद अथर्ववेद पाची सिब हो चुका है, अतः पिप्पनाद का पाठ जब तक कि उस शामा के मन्य खिखित अन्य न मिल (जो कि बहुत कम सम्भव है) प्राब ही कहा जायगा। विदेशीय (पारसीक) भाषा में छन्द का अर्थ । भाषा-विज्ञानी जानते हैं कि छन्द शन्द ही पारसीक भाषा में जन्द बना है। यही अन्द पारसीकों का धर्मग्रन्थ है। इस में प्रयर्वन पुरोहित का नाम भी कई बार पाया है। हाग के मता- मुसार सो इस में भाया हुमा एक मन्त्र भी अथर्ववेद का प्रथम सयस प्रकारप्रतीत होता है किज़न्द का अचवेद से सम्बन्ध- मतपय छन्द शब्द का अर्थ पूर्वोक्त मन्त्र में प्रथर्ववेद ही युक्तियुक है। ऐसी दशा में 'सामानि' प्रादि पद भी सामवेद बादि के वाचक हैं।

(५) ब्राह्मणग्रन्थों में सामानि पद का अर्थ । (१) सामवेद प्रादित्यात (ऐ० २५७). (२) मादित्यात्सामानि (कोपी० १९.) (३) सूर्यात् सामवेदः (श० ११॥१८) (१) सामान्यादित्यात् (छा० उ० ॥१७१२) (५) सामवेद मादित्यात (जै० उ० प्रा० २१७) (६) सामवेदोऽभुमात (पवि० ४११) (७) मादित्यात सामवेदम् (गो० शह) ... इन सात प्रमाणों में से दूसरे और चौथे प्रमाण में 'सामानि' पद पाया है, अन्य पांच प्रमाणों में सामवेद । ये ब्राह्मणवाक्य एक प्रकार से पूर्वोक्त वेद मन्त्रों की व्याख्या में ही कहे गये हैं। इन में अधिकांश स्थलों में सामवेद का प्रयोग बता रहा है कि प्राचीन प्रामादिषियों की रष्टि में भी इन स्थलों में 'सामानि' पद से सामवेद का ही अभिप्राय होता था। प्रतएव तस्माद्यक्षात" मन्त्र का १. इसबेख के प्रारम्भ में फियाहुमा अर्थ ही सत्य है, और दूसरा नहीं। इस मन्त्र का यही प्रर्थ अषि श्यानन्द सरस्वती ने अपने अनेक प्रन्यों में किया है। हम ने तो उसी का उदरणमात्र दिया है। इस कल्पारम्भ में सामवेद सब से प्रथम किस को प्राप्त हुश्रा? पूर्व क्षेत्र से यह स्पष्ट होगया होगा कि सामवेदादि यह अमी.. पाकम्भ-परणम से प्राप्त हुए। यहां यह विवाद नहीं जाना. जायगा कि वेद-पान क्यों परमात्मा का है। इसे किसी-नम्ब अवसर पर लंगा। यहां प्रब यही निर्णय करना है कि इस कल्पा- रूम में सामवेद किसी एक व्यक्तिको परमात्मा से प्राप्त दुधाचा अनेकों को।

(६) अनेकों को प्राप्त हुआ, ऐसा मानने वाले बहुत थोड़े हैं। उन के पक्ष में कोई प्रमाण भी नहीं है । जो यह मानते हैं कि सामवेद किसी एक व्यक्ति को परमात्मा से प्राप्त हुआ, वे दो भागों में विभक्त हो जाते हैं । एक भाग वालों का मत है कि सामवेद अग्नि के अधिशता देव को प्राप्त हुआ। उसी से मन्त्र-द्रष्टा ऋषियों को प्राप्त हुमा । दूसरे भाग वालों का मत है कि मनुष्य-देह-धारी अग्नि ऋषि को प्राप्त हुआ जो इस कल्पारम्भ में अमैथुनि सृष्टि का एक सभासद था। इस पर विचार- (१) पनि प्रादि द्रव्यों का कोई चेतन जीव अधिष्ठाता है अर्थात् इनको स्व-शरीरवत् बनाये है,, ऐसा वेद में कहीं नहीं पाया। हां, अग्नि ईश्वरदेव का नाम तो सर्वत्र प्रसिद्ध है। इस का विशेष व्याख्यान भगवान् दयानन्द सरस्वती की ऋग्वेदादिभाष्य- भूमिका में मिल सकता है। इसी पक्ष, के खण्डन में 'जड़ाग्नि से ऋग्वेद का प्रकाश हुमा' इस का खण्डन हो जाता है। कारण कि को ज्ञान होना असम्भव है। भन (२) दूसरे मत में भी एक भारी आपत्ति प्राति है। पूर्वोक्त बामणग्रन्थों के सात प्रमाणों में सूर्यात प्रादित्यात अमुष्मात् पद माये हैं। इस पर- (पूर्वपक्ष) यदि सूर्यादि मनुष्य देहधारियों के नाम होते तो उन के पर्याव प्रादित्य आदि और 'वायु का पर्याय “योऽयं पवते" चत०११।।।८।२ न पाते । ब्राह्मणग्रन्थो में "अमुष्मात्" प्रयोग स्पर इसी सूर्य के लिये पाया है । और वायु यदि कोई मानव समाज का सदस्य था तो क्या वह “योऽयं पवते” अर्थात “जो यह बहता है" ऐसा ही था ? क्या मनुष्य भी पवन समान बहते हैं? EN... खिये आया है।

--- ti ( ७. ) (उत्तर पक्ष) प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के न जानने का ही कारण है कि ऐसे पूर्वपत्त खड़े होते हैं । देखो महाभारत को- (क) वहां कर्ण के समीप उस के पिता सूर्य का प्राना लिखा है। यह सूर्य कोई देवता न था, प्रत्युत मनुष्य देहधारी व्यक्ति ही था। उस के निम्नलिखित नाम महाभारत वनपर्व अध्याय ३०१ में माये हैं। अभिप्रायमयी ज्ञात्वा महेन्द्रस्य विभावसुः। कुण्डलार्थे महाराज सूर्यः कर्णमुपागतः ॥६॥ स्वमान्ते निशि राजेन्द्र दर्शयामास रश्मिवान् । कृपया परयाऽऽविष्टः पुत्रस्नेहाच भारत ॥८॥ ब्राह्मणो वेदविद्भूत्वा सूर्यो योगद्धिरूपवान् ॥६॥ अहं तात सहस्रांशुः सौहृदात्त्वां निर्दशये ॥२२॥ इस का संक्षिप्त अभिप्राय यह है कि योगसिदि-समन्वित सूर्य महात्मा ब्राह्मण वेष में रात्रि के अन्तिम प्रहर में कर्ण के जागने पर उसके समीप आया। उस सूर्य के यहां कई नाम प्राये हैं जो सूर्य शब्द के पर्याय हैं,यथाविभावसु-रश्मिवान-सहस्रांशु । अब रामायण पर किञ्चित ध्यान दो... (ख) वाल्मीकिरामायण में वानरं जाति का सुविख्यात वर्णन है। वहां भी मुनि वाल्मीकि वानर शब्द के अनेक पर्याय उस जाति के लिये प्रयोग में लाते हैं। ध्यान रहे कि मिथ्या-कथा युक्त विवरण को छोड़ कर वानर जाति मानवेतर जाति सिद्ध नहीं हो सकती । और सत्य तो यह है कि (क) और (ख) स्थलों में सूर्य और वानर के क्रमशः 'पर्याय प्रयोग को देख कर ही मध्यम कालीन लोगों ने इन्हें देवता वा पशु मान लिया था । अन्त में ब्राह्मए प्रन्यों के वाक्य-प्रयोग पर भी ध्यान देना चाहिये- 4 (८) (ग) तैत्तिरीयब्राह्मण ३१श में नचिकेता की कया है। वहां उस का जिस भूषि से प्रश्नोत्तर हुमा, उस का नाम ही कहा है। कठोपनिषद् में भी यही कथा बड़े विस्तार से प्रा यहां भूल ऐतिहासिक कथा के साथ २ कुछ अजगर भाग मि करके प्रोपनिषद-भाव अधिक खोला गया है । परसव से श्री विचारणीय यह है कि यहां मृत्यु अषि के कई दूसरे भी नाम गरे हैं। ये सब नाम मृत्यु शब्द के पाययवाची हैं या "यम अन्तक श६"। (घ) घेद के ऋषियों के तो कई ऐसे नाम सर्वानुक्रमणी माये हैं जैसे "अग्निः पावकः" भर १०।१४०॥ अग्निस्तपसः । १०११५१॥ यहां विशेष्य विशेषण भाव से ये समानार्थक प्रयुक हुए हैं। इन पूर्वोक्त प्रमाणों से यही निश्चित होता है गत प्राचीन काल में व्यक्ति विशेषों के नामों के यदि कोई पय हो तो ये भी उसी के नाम के लिये प्रयुक्त हो जाते थे। और है महाभारत में 'सूर्य' को 'रहिमवान्' प्रादि कहा है वैसे ही पता मामय में वायु'को 'योऽयं पवते'..कह दिया गया है । प्रता मामय मादि प्रन्यों के पूर्वोक्त सात प्रमाणों में "प्रादिल्य" मनु देहधारी ऋषिदेव है, कोई जड़ वा जड़ सूर्य का अधिष्ठाता नहीं । इसी प्रादित्य-सूर्य-रवि के मन में इस कल्पारम्भ समय सब से पहले परमात्मा ने सामवेद का प्रकाश किया रखी ने ब्रह्मा मादि को पढ़ाया और फिर यह बेद सर्वत्र फैलर गया। पर्खियब्राह्मण में जो "अमुष्मात्" प्रयोग पाया है उसय यही अभिप्राय है कि मनुष्य शरीर में शिर स्थान प्रादित्य वास सम्बन्धी है। सूर्य अषि को समाधिस्थ दशा में शिर की नाड़िय में मन के जाने से इस वेद का शान होता था, अतः यह प्रयोग प्र गया है।

(# ) । " सामवेद की शाखाएं। नार्यावर्त में सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर दीर्घ कालपर्यन्त लौकिक और वैदिक भाषा का बहुत प्रचार रहा । उस समय वेदादि शास्त्र आज कल की अपेक्षा अल्पपरिश्चम से ही समझे जाते थे। तब प्रव- चनकर्ता प्राचार्य वा ऋषि अपने शिष्यों के लाभार्थ कठिन चैदिक शब्दों के स्थान में अन्य सरल वैदिक शब्द प्रयुक्त करके अथवा कुछ २ व्याख्या करके पढ़ाया करते थें । उत्तने से ही शिष्य यथार्थ अभिप्राय समझ लेते थे। तब किन्हीं विस्तृत भाष्यों की आवश्यकता न थी। यही ऋषि-प्रवचन था जो पीछे शाखा आदि नाम से प्रसिद्ध हुना। इसी प्रवचन के सम्बन्ध में भाष्यकार पतञ्जलि मुनि ने लिखा है- न हि छन्दांसि क्रियन्ते । निसानि च्छन्दांसीति । यद्यप्यर्थो निसो या त्वसौ वर्णानुपूर्वी सानिया । तद्भेदाचैतद्भवति काठकं कालापकं मौदकं पैप्पलादकमिति । "४।३।१०१॥ अर्थात् वेदं तो क्या, साधारण ग्रन्थों के समान शाखाएं भी बनाई नहीं गई। इनका शब्दार्थ निस्य है । हाँ,अर्थ के नित्य होते हुए भी वर्णानुपूर्वी अनित्य है । इसी के भेद से ऋषियों ने नित्य वेदार्थ खोला है । और इसी भेद से काठक प्रादि अनेक शास्त्राएं हुई हैं। (प्रश्न) मूल सामवेद जिस की आगे शाखाएं बनीं अब कहां है ? उस में ऋग्वेदीय ऋचाएं न होनी चाहिये । अब तो जितने अन्य सामवेद के नाम से मिलते हैं उन सब में ऋग् भाग सम्मिलित है। ( उत्तर ) मूल सामवेद था तो अवश्य क्योंकि बिना इस के साम-शाखाएं बनतीं कैसे, और प्रवचन किस का होता ? उसी मूल . का वर्णन ऋग्वेदादि वेदों और ऐतरेय प्रावि ब्राह्मणों में पाया है। वह भूल भी प्रतीत होता है, प्रवचन के बल से पीछे ऋषि-विशेष के नाम से प्रसिद्ध हो गया । ऋग्वेदीय ऋचाएं सामवेद में नहीं .. । ) । ( ८ ) (ग) तैत्तिरीयब्राह्मण ३२१०८ में नचिकेता की कथा भा है। वहां उस का जिस भूषि से प्रश्नोत्तर हुमा, उस का नाम भूत ही कहा है । कठोपनिषद् में भी यही कथा बड़े विस्तार से प्राई वहां भूख ऐतिहासिक कथा के साथ २ कुछ अलङ्कार भाग मिश्रिी करके प्रोपनिषद-भाव अधिक खोला गया है । परसब से अधिक विचारणीय यह है कि यहां मृत्यु भूषि के कई दूसरे भी नाम दि गरे हैं। ये सब नाम मृत्यु शब्द के पाययवाची हैं वैया "यम अन्तक १।२६। (घ)घेल के ऋषियों के तो कई ऐसे नाम सर्वानुक्रमणी में माये हैं जैसे “अग्निः पावकः" भ. १०।१४०॥ अप्रिस्तपसः भु १०१५९॥ यहां विशेष्य विशेषण भाव से ये समानार्थक शब्द मयुक्त हुए हैं। इन पूर्वोक्त प्रमाणों से यही निश्चित होता है कि गुत प्राचीन काल में ग्यकि-विशेषों के नामों के यदि कोई पर्याय हो तो ये भी उसी के नाम के लिये प्रयुक्त हो जाते थे । और जैसे महाभारत में 'सूर्य' को 'रधिमवान्' प्रादि कहा है वैसे ही शतपथ मामय में 'वायु' को 'योऽयं पवते'..कह दिया गया है । प्रतमक माया नादि अन्यों के पूर्वोक्त सात प्रमाणों में "प्रादित्य' मनुष्य देहधारी ऋषिदेव है, कोई जड़ वा जड़ सूर्य का अधिष्ठाता देव नहीं । इसी प्रादित्य-सूर्य-रवि के मन में इस कल्पारम्भ के समय सब से पहले परमात्मा ने सामवेद का प्रकाश किया । इसी ने ब्रह्मा प्रादि को पढ़ाया और फिर यह बेद सर्वत्र फैलता गया। पड्वियब्राह्मण में जो "अमुमात्" प्रयोग पाया है उसका यही अभिप्राय है कि मनुष्य शरीर में शिर स्थान प्रादित्य वा सूर्य सम्बन्धी है। सूर्य अषि को समाधिस्थ दशा में शिर की नाड़ियों में मन के जाने से इस वेद का ज्ञान होता था, अतः यह प्रयोग प्रा L:- शाखा-विभाग। अबं रहा शाखा-विभाग पर विचार । इस पर प्रकाश डालने वाला कोई अति प्राचीन ग्रन्थ हमारे पास विद्यमान नहीं । एक चरण-व्यूह ग्रन्थ ही रह गया है। यह विक्रम से पांच, छ: सौ वर्ष पूर्व का ही प्रतीत होता है । इस में पाठभेद का बाहुल्य है । नीचे उसी की साक्षी उपस्थित की जाती है। चरणव्यूह की साक्षी। . -- शौनकीय परिशिष्ट । अथर्व-परिशिष्ट। सामवेदस्य किल सहस्रभेदा भवन्ति। तत्र सामवेदस्य शाखासहस्रमासीत् । एष्वनध्यायेष्वधीयानारते शतक्रतुवने- | अनध्यायेष्वधीयानाः सर्वे ते शक्रेण माभिहताः। विनिहतः [प्रविलीनाः] तत्र केचिदवा- शिष्टाः प्रचरन्ति । तद्यथा । शेषान्व्याख्यास्यामः । तत्र राणायनीया (१) राणायनीयाः (२) साद्य- नां सप्तभेदा भवन्ति । (१) राणाय- | मुग्राः * (३) कालापाः (४) महा नीयाः (२) शाट्यमुप्राः*(३) का कालापाः (५) कौथुमाः(६) लाङ्ग- लोपा (४) महाकाहोपा(५) लाङ्ग- लिकाश्चेति । लायनाः (६) शार्दूलाः (७) कौथु- माश्चेति । महिदास-प्रदर्शित प्रकारान्तर । तत्र कौथुमानां षड्भेदा भवन्ति । कौथुमानां षड्भेदा भवन्ति । तथथा। (१) कौथुमाः। (२) प्रासुरायणाः (१) सारायणीयाः (२) वातराय- (३) वातायनाः (४) प्राञ्चलिद्वैन- णीयाः (३) वैतधृताः(४) प्राचीनाः मृतः (५) प्राचीनयोग्याः (१) (५) तेजसाः (६) अनिष्टकाश्चेति । मैगमीयाः। * सात्यमुना नाम अधिक युक्त है । महाभाष्य १।१।४॥ १।१।४८ ॥ पर ऐसा ही पाठ है।

। जहां सैकड़ों साम-शास्त्राओं के नाम विलुप्त हो गये हैं यहा विद्यमान नामों में भी पाठ भेद के कारण एक बड़ा अन्तर पड़ गया है। पूर्वोक्त शाखानामों के पढ़ने से यह बात सुस्पष्ट हो जाती है। चाणब्यूह के टीकाकार महिदास ने निज व्याख्या में कुछ अन्य नाम भी दिये हैं। उन्हीं का पाठभेद स्वामी हरिप्रसाद जी के वेदरूवस्व के पृष्ठ १७२ पर मिलता है । पता नहीं उन्हों ने स्व-बुद्धि से पाठ संशोधन किया है अथवा किसी लिखित ग्रन्थ के आधार पर ये नाम दिये हैं । तथापि हम उनके पाठभेदों को कोष्ठों में रख कर महिदास के पाठ जो संवत् १६५६ के काशी-संस्करण में छपे हैं, नीचे देते हैं। (१) प्रासुरायणीया (२) वासुरायणीया (३) वार्तान्तरया [वार्तान्तवेयाः] (४) प्राञ्जल [प्राञ्जलाः] (५) ऋग्वैविधाः [ ऋग्वर्ण- भेदाः ] () प्राचीनयोग्याः [७ ज्ञानयोग्याः] (७) राणायनीयाश्चेति । तत्र राणायनीयानां नव मेदा भवन्ति । (१) राणायनीयाः (२)शाट्या- पनीयाः (३) शाट्यमुत्राः [सात्वला:] (४) खल्वला: (५) महाखल्वला: (४) लाङ्गलाः (७) कौथुमाः (5) गौतमाः (6) जैमिनीयाश्चेति । . पतञ्जलि मुनि कहते हैं “सहस्रवमा सामवेदः" (महाभाष्य कीलहान सं० भाग १, पृ०९) अर्थात् 'सहस्र शाखा वाला साम बेद है।' उन्हीं सहस्र शाखाओं में से कुछेक का उल्लेख पूर्वोद्धत चरणम्यूह के पाठों में है । चरणव्यूह के शाखा-नाश-इति- हास में तथ्य की किस अल्पमात्रा का होना सम्भव है। तदनु- सार वर्षा वा किसी विद्युत्-प्रकोप वाले दिन किसी सामशाखीय अध्यापक ने अपनी शाखा का पाठ किया होगा। वह इन्द्र-सूर्य के वनन्तड़ित की धारा से अपने प्राण नष्ट कर बैठा होगा। साथ ही १-काशी-संस्करण में किसी भ्रष्ट-पाठ को देखकर कौथुमी, गौतमी छपा हैं ।

( १३ ) । उस के अन्य विनष्ट हो गये होंगे* । परन्तु यह सब दूर की कल्पना प्रतीत होती है । वस्तुतः कालक्रम से ही ये सब शाखाएं लुप्त होती गई होंगी। सम्माप्त तीन शाखाएं। सम्प्रति सामवेद की तीन शाखाएं ही प्रसिद्ध हैं । चरणव्यूह में भी इन्हीं का उल्लेख है । "गुर्जरदेशे कौथुमी प्रसिद्धा। कार्णाटके जैमिनी प्रसिद्धा । महाराष्ट्रदेशे राणायनीया प्रसिद्धेति।” अर्थात् गुजरात में कौथमी, कार्णाटक में जैमिनी और महाराष्ट्र में राणाय- नीय शाखा प्रसिद्ध हैं। पूर्वोक्त तीन शाखाओं में से कौथुमी शाखा ही सम्प्रति मूल सामवेद माना जाता है । इस का एक कारण तो इस का समस्त भारत में अत्यन्त प्रसिद्ध होना है। अन्य प्रबल कारणों की प्रागे. खोज होनी चाहिये। इस सामवेद के पाठ ब्राह्मण हम तक पहुंचे हैं। (१) ताण्ड्य महा- ब्राह्मण अथवा पञ्चविंशब्राह्मण अथवा प्रौढ ब्राह्मण अथवा छान्दोग्य ब्राह्मण (बिबलियोथीका इण्डिका संस्करण संवत् १९२७-३०)। (२) षड्विंशब्राह्मण (जीवानन्द सं० १८८१ संन् तथा "विज्ञापनभाष्य- सहितम्,” एच० एफ० ईलसिंह सम्पादित, लीडन १६०८.)। (३) सामविधानब्राह्मण (ए०सी० बर्नेल सम्पादित १८८० सन्, लण्डन, तथा सत्यव्रत सामा० सम्पा० सं०. १९५१) । (४) आर्षेय ब्राह्मणः (ए० सी०बर्नेल सम्पा०१८७८ सन्, लण्डन,तथा सत्यवतमा सम्पा० * अलबरूनी लिखता है कि 'उस के काल से कुछ पूर्व ही कश्मीर वसुक्र नामक ब्राह्मण ने वेदों को लिपिबद्ध करने की प्रथा चलाई थी।' (अलबरूनी का भारत।भाग दूसरा । श्रीसंतरामकृत अनुवाद । सन् १९२० ०३). हमें इस बात पर विश्वास नहीं।

( १४ ) सं० १६४८)। () देवताध्याय वा दैवत ब्राह्मण (५० सी० बर्नेल सम्पा० सन् १८७३ तथा जीवानन्द सन् १८८१) । (६) उपनिषद् ब्राह्मण-(क) मन्त्रब्राह्मण ( सत्यव्रतसा० सम्पा० सं० १९४७ तथा प्रथम प्रपाठकमात्र के० स्टोनर सम्पा० १६०१) (ख) छान्दोग्योप- निषद् (अनेक संस्करण निकल चुके हैं ) । (७) संहितोपनिषद् ए० सी० बर्नेल सन् १८७१) । (८) वंशब्राह्मण (ए० सी. बर्नेल. सम्पा. १८७३ तथा सत्यव्रत सा० सं०.१६४९)। कई विद्वानों का मत है कि वस्तुतःसामब्राह्मण एक ही है। वह सम्प्रति चार भागों में विभक्त हो गया है । (१) पञ्चीस अध्या- यात्मक पञ्चविंशब्राह्मण (२) पञ्च अध्यायात्मक षड्विंशब्राह्मण (३) भ्रष्ट अध्यायात्मक छान्दोग्योपनिषद् (४) दो अध्यात्मक गृह्य- कर्म-प्रधान मन्त्रब्राह्मण । सारा ब्राह्मण चालीस अध्याय युक्त था। अन्य पांच ब्राह्मण अनुब्राह्मणमात्र हैं। जब तक सामवेद सम्बन्धी अनेक ग्रन्थों के शुद्ध वैज्ञानिक संस्करण न छप जावें, तब तक इस विषय पर कुछ कहना हमारे लिये प्रयुक्त है । इस का विचार तभी होसकता है जब इन ब्राह्मण-ग्रन्थों का काल-निरूपण हो जावे। । ताण्ड्यब्राह्मण की प्राचीनता । Hin अष्टाध्यायी ४।२।१३८॥ पर एक बार्तिक है "चरण सम्बन्धेन निवास खक्षणोऽए। इस पर लिखते हुए पतञ्जलिमुनि चरणसम्बन्धी नौ (4) ऋषियों को निवास-विचार से तीन भागों में बांटते हैं। अयः प्राच्या। त्रय उदीच्या: । त्रयो माध्यमाः ।" काशिकाकार इसी वाक्य को ध्यान में रखकर अष्टा०४।३।१०४॥ पर लिखता है- वैशम्पायनान्तेवासिनो नव । " मागे चलकर वह कुछ प्राचीन कारिकाएं उद्धृत करता है। उन में से एक का अर्ध भाग यह है- ..

( १५ ) ऋचाभारुणिताण्ड्याश्च मध्यमीयास्त्रयोऽपरे ।। अर्थात् भूचाभ, पारुणि और ताण्ड्य तीनों वैशम्पायन-शिष्य माध्यम-मध्यम भूमि निवासी थे। इन तीनों के अपने २ चरण थे। इन में से तागज्यों की शाखा प्रारम्भ से कौथुमी ही चली आ रही है। इस का कुछ पता पाणिनीय गणपाठ से लगता है। वहां हाश३७ पर यह तीन गण भी दिये हैं। "कठकालापाः। कठकौथुमाः।कौथुमलौकाक्षाः।" हम कह चुके हैं कि कठ और ताण्ड्य आदि सतीर्थ्य-एक गुरु के शिष्य थे। उन में से कठों की अपनी. शाखा थी, परन्तु ताण्ड्यों का अपना चरण ही था। इस लिये गण में कठ और ताण्ड्य दोनों की शाखाओं का परिचय देने के लिये “कठकौथुमाः” कहा है । इस कथन में एक बात ध्यान देने योग्य है । सामविधान ब्राह्मण के अन्त में जो ऋषि-परम्पग दी है वहां ताण्ड्य का गुरु प्राजापत्यविधि से बादरायण कहा है । यथा- सोऽयं प्राजापत्यो विधिस्तमिमं प्रजापतिवृहस्पतये प्रोवाच । बृहस्पति रदाय । नारदो विष्वक्सेनाय । विष्वक्सेनो व्यासाय पाराशर्याय । व्यासः पाराशर्यो जैमिनये। जैमिनिः पौष्पिण्ड्याय । पौष्पिण्ड्यः पाराशायणाय । पाराशर्यायणो बादरायणाय । बादरायणस्ताण्डिशाट्यायनिभ्याम्। ताण्डिशाध्यायनिनौबहुभ्यः।। एक ताण्ड्य का वर्णन शतपथब्राह्मण ६।१।२।२५ में आया है- “अथ ह स्माह ताण्ड्यः । अतः इतना निश्चित है कि चाहे ताण्ड्य कोई भी हो, है वह अतिप्राचीन । तब उस की संहिता क्यों कौथुम हुई और मूल सामवेद क्यों कौथुम कहलाया? इस के विचार के लिए बड़े परिश्रम की आवश्यकता है। सूत्रों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है। (१) मशककल्पसूत्र ( १६ ) अथवा भाषेयकल्प ( डबल्यू० कालेण्ड सम्पा० सन् १९०८)। (२) सुद्रसूत्र मायकल्प का परिशिष्ट ही है ( उसी के उत्तर भाग में छपा है ) । (३) वाट्यायन श्रौतसूत्र ( बिव० इण्डि० सं० १६२८)। (४) गोभिलीय गृह्यसूत्र (क्काएर सम्पा० १८५४ सन् तथा बिब इण्डि०, द्वि० सं०, सन् १९०८) । (५) श्राद्धकल्प, परिशिष्ट, गोभिल अथवा वसिष्ठकृत (विब० इगिड. द्वि० सं० सन् १९०६) । (६) कर्मप्रदीप अथवा छन्दोगगृह्यपरिशिष्ट (धर्मशास्त्रसंग्रह, सन् १८७८,जीवानन्द संस्करण के पूर्वार्ध पृ०६०३-६४४ तक,कात्यायन- स्मृति वा कात्यायनविरचित कर्मप्रदीप के नाम से छपा है । तथा प्रथम प्रपाठक फ० श्रेडर सम्पा०,हले १८८६ सन् तथा बिब० इण्डि में सन् १९०६और द्वि० प्रपाठक १० होलस्टाईन सम्पा०हले सन् १८६०)। (७) गृह्यासंग्रह, गोभिलपुत्रकृत (दलूमफील्ड द्वास Z.D. M. G. Vol ३५ में सम्पा० तथा बिब० इण्डि० द्वि० सन् १९१०) । (८) पञ्च- विधसूत्र ( सत्यव्रतसा० सम्पा० तथा रि० जीमन सम्पादित १६१३ ब्रेसला)। शिक्षामन्धों में तीन शिक्षा प्रसिद्ध हैं। (१) नारदीय शिक्षा ( सत्यव्रतसा० सं०, दत्तात्रेय सम्पा० लाहौर सन् १९०६ तथा शिक्षासंग्रह काशी में, सन् १८६३) । (२) लोमशीय शिक्षा (शिक्षा संग्रह सं०) (३) गौतमीयशिक्षा (शिक्षा संग्रह सं०)। प्रातिशाख्यों में निम्नलिखित ग्रन्थ हैं। (१) ऋक्तन्त्र (ए०सी० बर्नेल सम्पा. १८७६)। (२) सामतन्त्र (दयानन्द महाविद्यालय के लालचन्द पुस्तकालय में इस की एक प्रतिलिपि है जो मद्रास गवर्नमेण्ट के संग्रह के एक ग्रन्थ से कराई गई थी)। (३) पुष्पसूत्र वा फुल्लसूत्र (रि० जीमन सम्पादित)। कुल चौदह (१४) ग्रन्थों का हम ने ऊपर उल्लेख किया है। इन के अतिरिक्त अठतीस (३८) और ग्रन्थ हैं। उन सब के नामादि ( १७ ) जमिनीय संहिता (von Dr. W. Caland, Breslau, 1917 ) पृ० १३-१५पर देखो। २. राणायनीय शाखा। ११४४. इस शाखा की संहिता अभी तक नहीं छपी । इस के सूत्र • ग्रन्थ निम्नलिखित हैं। (९) द्राशायण श्रौतसूत्र (कुछ भाग रियूटर सम्पादित लण्डन १९०४ सन्)। (२) खादिरगृह्यसूत्र अथवा द्राह्यायण गृह्यसूत्र (मैसूर राज्य संस्कृत ग्रन्थमाला १९१३सन् तथा आनन्दाश्रम पूना सन्१९१४)। (३) गौतमपितृमेधसूत्र (कालेण्ड सम्पा० लाईपज़िग १८८६ सन्)। (४) गौतमस्मृति ( स्मृतिसमुश्चय, पूना )। राणायनीय-शाखा सम्बन्धी इतने प्रन्यों का वर्णन करके डाक्टर कालेगड महाशय एक विचार उपस्थित करते हैं। वह इतना मावश्यक है कि हम उस का अनुवाद दिये विना नहीं रह सकते- परन्तु इन सब ग्रन्थों का राणायनीय-शाखा सम्बन्धी होना अनिश्चित ही है। कर्मप्रदीप पर पाशार्क का भाष्य है । उस में वह बताता है कि गोभिलसूत्र कौथों का ही गृह्यसूत्र नहीं प्रत्युत राणाय- नीयों का भी है। हेमाद्रिभी अपने श्राद्धकल्प में तीन बार (पृ०१४२४, १४६०,१४६८) गोभिल को राणायनीय-सूत्रकृत् कहता है। यदि यह बात मानली जावे तो खादिरगृह्यसूत्र राणायनीयों का सूत्र नहीं रह सकता। अस्तु, दक्षिण भारत में शारदूलों के एक खादिर गृह्यसूत्र की विद्यमानता कही जाती है । ( देखो Report on a search for Sanskrit mss. in the Bombay Presidency 1892-95, by A. V. Kathavate Bombay, 1901, No. 79 ) । शारदूल भी सामवेद की एक शाखा है। अब यही खादिर गृह्यसूत्र शारदूल सामगों के खादिर सूत्र से कुछ पाठभेदों को छोड़ के प्रायः मिलता . ..

( १८ ) बताया जाता है । हेमाद्रि के काल में शार्दूल शाखा की ऐतिहा शृङ्खला अटूट थी, यह भी श्राद्धकल्प से ज्ञात होता है। उस में (पृ० १०७८) पर, यह वेद के उन भागों का उल्लेख करता है जो ब्राह्मणों के भोजन-समय शार्दूल-शाखा वालों को गाने चाहिये। प्रतएव यह स्पष्ट है कि कम से कम खादिरगृह्यसूत्र में मूलतः शार्दूलों सम्बन्धी गृह्यकर्म थे। परन्तु एक और ऐतिह्य भी स्त्रादिर- सूत्र सम्बन्धी है। मैसूर में १८८१ सन् में कण्ठभूषण भाज्य सहित जो गृह्यरत्न छपा है उस में अनेक वार गौतमगृह्यसूत्र का उल्लेख है । उस में जितने भी वाक्य गौतम के नाम से दिये गये हैं, वे सब हमारे खादिरगृह्यसूत्र में मिलते हैं । इस के अतिरिक्त जैसा हम पूर्व कह चुके हैं, हमारे पास एक गौतम पितृमेधसूत्र है, एक गौतम धर्मसूत्र ( स्टैनज़लर सम्पा० लण्डन १८७६ ) * और पक स्मृति भी है। ये सब गौतमों के ग्रन्थ भी हो सकते हैं कि जो सामवेद का गौण भाग है। हम ने विद्वान् पाठकों के विचारार्थ श्री कालेण्ड-प्रदर्शित ये सब पक्ष उद्धृत कर दिये हैं । अपनी सम्मति किसी और समय पर प्रकाशित करेंगे। जैमिनीय शाखा। इस शाखा के निम्नलिखित ग्रन्थ अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। (१) जैमिनीय संहिता (Dr. W. Caland's edition, Breslau, 1907.) । (२) जैमिनीय-ब्राह्मण (इस के अनेक खण्ड हन्नस अर्टल ने पाश्चात्य अनुसन्धान पत्रों में प्रकाशित किये हैं। अन्य उपयोगी खण्डों का अधिकांश भाग ग्रन्थरूप में छप गया है-Das Taiminiya Brahmana in Austahal, Amsterdam, 1919) stafafara सामग्री के अपर्याप्त होने से यह बृहब्राह्मण अभी पूरा नहीं छप सका)। (३) जैमिनीय-उपनिषद्ब्राह्मण (अर्थात गायत्र्युपनिषद्, इसके दो भारतीय संस्करण निकल चुके हैं (१) मैसूर (२) मद्रास । " ( १६ ) पूर्वोक्त ब्राह्मण का उत्तर भाग है । हन्नस अर्टेल सम्पा०१८२४ सन्) (४) भाषेय-ब्राह्मण (ए० सी० बर्नेल सम्पा० मंगलोर १८७८)। (५) जैमिनीय श्रौतसूत्र अग्निष्टोम-प्रकरण (डीः गॅस्ट्रा सम्पा खाईडन सन् १९०६)* । (६) जैमिनीय-गृह्यसूत्र (edited by Dr. W. Caland, Amsterdam, 1905.)! जैमिनीय-ब्राह्मण । " शौनकादिभ्यश्छन्दसि।" ४।३।१०६ के गण में पाणिनि "तलवकार" शब्द पढ़ते हैं। इसी तलवकार मृषि के नाम पर सलवकार शाखा प्रसिद्ध थी। उसी का अब जैमिनि-शाखा नाम हो गया है । इसका कारण अभी पूर्णतया ज्ञात नहीं । संहिता के समान प्राधण को भी अब जैमिनीय ब्राह्मण कहते हैं। श्री शङ्कराचार्य केनोपनिषद् भाष्य के प्रारम्भ में लिखते है- केनेषितम्" इत्याद्योपनिषत्परब्रह्मविषया वक्तव्येति. नवमस्या- ध्यायस्यारम्भः । प्रागेतस्मात्कर्माण्यशेषतः परिसमापितानि समस्त- कर्माश्रयभूतस्य च प्राणस्योपासनान्युक्तानि कर्माङ्गसामविषयाणि च । अनन्तरं च गायत्रसामविषयं दर्शनं वंशान्तमुक्तम् ।" (अर्थ) “केनेषिसम्” से प्रारम्भ होने वाली, परब्रह्मविषय के कहने वाली उपनिषद् कही जानी चाहिये । यह नवम् अध्याय का प्रारम्भ है । इस से पूर्व (पाठ) अध्यायों में यज्ञ कर्म पूरे कहे गये हैं। प्राणोपासना भी कही गई है। तत्पश्चात् गायत्रसाम और वंश कहा गया है।" तलवकार ब्राह्मण का यह वर्णन शङ्कर ने किया है। जैमिनीयब्राह्मण जो सम्प्रति मिलता है उसका अध्यायक्रम - * जैमिनीय श्रौतसूत्र समग्र सभाष्य बड़ोदा राजकीय प्रन्थसाला में श्रीघ्र ही छपेगा। + जैमिनीय गृह्यसूत्र का कोलेएड सम्पादित भारतीय संस्करण ला. मोतीलाल बनारसीदास सैदमिठा बाज़ार लाहौर द्वारा शीव्र प्रकाशित किया जायगा।

( २० ). शङ्कर-प्रदर्शित अध्यायक्रम से विभिन्न है । प्रथम तीन अध्याय हैं। पश्चात् उपनिषद् ब्राह्मण प्रारम्भ होता है। उस में चार अध्याय हैं। केन उपनिषद् चतुर्थाध्याय के अठारहवें खण्ड से प्रारम्भ होता है, और इकीसवें पर समाप्त हो जाता है । वंश इस से पूर्व ही समाप्त हो जाता है। सात खण्ड इस से भागे और हैं। सो सारे मिस के ब्राह्मण के सात अध्याय होते हैं। यदि प्राय- ब्राह्मण भी मिला लिया जावे तो सारे आठ अध्याय होते हैं । सम्भव है और ग्रन्थ मिलने पर इस बात का निर्णय हो जाये। उपनिषद् ब्राह्मण । उपनिषद् ब्राह्मण को हन्नस अर्टेल महाशय ने अमेरेकन भोरिएण्टल सोसायटी के जर्नल सं० १५ में रोमन-लिपि मे सम्पादित किया था। मेरे कहने पर पण्डित रामदेव जी ने उसी से इस का देवनागरी संस्करण तय्यार किया था। वही अब यहां छापा गया है। हस्तलिखित सामग्री। जिस हस्तलिखित सामग्री से अर्टेल ने अपना संस्करण तय्यार किया था उस का उल्लेख उस ने अपनी भूमिका में इस प्रकार दिया है- A. बर्नेल के नोटानुसार जो लपेटने वाले काग़ज़ पर है, यह हस्तलेख "मलाबार हस्तलेख से नकल किया गया," १८७८ सन् में। अन्त में वह लिखता है "मूल की तिथि, कुल्लम १०४०%१८६४ सन्। पनघट के हस्तलेख से। B. तालपत्रों पर लिखे ग्रन्थ से, लंगभग ३०० वर्षपूर्व लिखा गया, विश्वली से प्राप्त, परन्तु पहले अलेप्पी से लाया गया था।" इस के पाठभेद ही दिये गये हैं। C. बर्नेख के हाथ की रोमनखिपि में किया हुभा अन्य । यह १५ पर समाप्त हो जाता है। मन्त में वह . - कापी प्रो० ( २१ ) A. ग्रन्थ का पाठ और B. के पाठभेद ग्रन्थाक्षरों में हरिवर्षीय कागज पर हैं। वे प्रो० जानवेरे द्वारा रोमन में लिखे गये थे, और भी दे दिये थे। इसी कापी से यह संस्करण तय्यार किया गया है। : मूल प्रब इण्डिया ग्राफ़िस लण्डन के पुस्तकालय में है। हस्तलेखों में ऐसा शीर्षक है तलवकारब्राह्मणे उपनिषद्रामणम् । अनुवाक, खण्ड और कण्डिकादि के विभाग विषय में श्रीअर्टेल ने यह लिखा है । "वाक्यों (कण्डिकाओं) के अङ्क देने में हस्तलेख असावधान और असङ्गत हैं | A. अनुवाक और खण्डविभाग नहीं देता, परन्तु प्रत्येक अध्याय की कण्डिकाओं पर क्रमशः अङ्क देता है। मैंने अनुवाक और खण्ड विभागों में B. और C.की अथवा कण्डिकाओं के अड्डों में तीनों हस्तलेखों की साधारण अशुद्धियों और विलोपों का लिखना उपयोगी नहीं समझा। अध्याय २१ से A. और B. अडूने का नया प्रकार (कण्डिकाओं की समाप्ति पर) प्रारम्भ करते हैं । तथापि तीन पहली कण्डिकाएं (२।१-३) छोड़ते हैं, और २।४ को २ लिखते हैं । पर इस के पश्चात् नियमपूर्वक अर्थात् २।५-५ इत्यादि, लिखकर तृतीय अध्याय के अन्त तक जाते हैं, २४५७ । में अङ्क देने के एक और क्रम के भी अवशेष हैं। यहां तीसरे अध्याय की प्रथम तीन कण्डिकाओं पर और अङ्कों के साथ क्रमशः . ५६,५७ और५८ लिखा है। B. में ३११८ पर ७०,३।२२ पर ७३, ३३३२ पर ७६ के अधिक हैं । इन अन्तिम तीन अनुवाकों की गणना स्पष्ट ही इस अध्याय के प्रथम तीन से विभिन्न है। साथ ही मूल की कण्डिकाओं के क्रम से भी भिन्न है। "तीनों हस्तलेख एकही सदोष मूल से आए हैं। तीनों, में बहुत सामान्य भ्रष्टपाठ है । विराम, अक्षर-विन्यास और सन्धि-सम्बन्धी B.

( २२ ) बातों में भी वे असावधानी से लिखे गए हैं। मैंने इन बातों के ठीक करने में स्वतन्त्रता वर्ती है । सब स्थलों में, जो केवल अक्षर-विन्यास सम्बन्धी नहीं हैं, मैंने हस्तलेखों के पाठ-भेद पृष्ठ के नीचे दिये हैं। निर्देशों की सरलता के लिये मैंने प्रत्येक अध्याय में निरर्थक अनुवाक विभाग का ध्यान न करते हुए क्रमशः खण्डाङ्क देदिया है। हस्त लेखों में कण्डिकाओं पर कोई अङ्क नहीं तथापि मैंने यह दे दिया है। ch अमेरेकन संस्करण के अन्त में अर्टेल महाशय ने चार सूचियां दी हैं। [१] आवश्यक शब्दों और ऋषि नामों आदि की सूची। [२] निर्वचनों की सूची । [३] व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनीय स्थल । [१] उद्धरणों की सूची । हमने प्रथम सूची में से ऋषि नाम पृथक करके उनकी सूची देदी है । अन्य शब्दों को इस लिए नहीं दिया कि दयानन्द महाविद्यालय के अनुसन्धान विभाग की ओर से उपलब्ध ब्राह्मणों आदि की एक विस्तृत सूची तय्यार हो रही है। उसमें ये शब्द और अन्य शब्द भी आवेंगे, अतः उनको यहां छापना आवश्यक नहीं समझा । सूचियां (२) और (४) भी हमने देदी हैं। तीसरी को हम भार्यावर्तीय पण्डितों के लिए अनावश्यक समझते हैं। पं० रामदेव ने पाठभेदों को देने के लिये A,B.C. के हवाले नहीं दिये। सो प्रावश्यक होने पर भी यह रह गये हैं। पहले फार्मों में उन्हों ने Omitted के स्थान में "प्रोम" दिया था। मैंने आगे चल कर उस के स्थान में संस्कृत शब्द "नास्ति" कर दिया है। यह संस्कृत शब्द होने से एतद्देशीय जनों के लिये अधिक उपयोगी है। अटेल प्रत्येक खर सन्धि पर 'कामे का चिह्न दिया हुआ था । रामदेव जी ने उस के स्थान में चिह्न दे दिया था । संस्कृत में यह अनावश्यक है, अतः दूसरे फार्म से मैंने इसे भी हटा दिया है।

८ ganv M - April । । २३ ) जैमिनीय उपनिषदब्राह्मण के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य । जैसा पूर्व लिखा जा चुका है, यह ब्राह्मण, बृहद् जैमिनीय ब्राह्मण का एक भागमात्र है। इस का मूल नाम "गायत्र उपनिषद् है । जै० उ० ब्रा० ४.७ के अन्त में यही नाम आया है। यह नाम है भी सार्थक, क्योंकि इन सारे अध्यायों में गायत्र साम का ही १० उ० ब्रा० श४० के प्रारम्भ में यही कहा गया है- तदेतदमृत गायत्रम् । एतेन वै प्रजापतिरमृतत्वमगच्छदेतेन देवा एतेनर्षयः ॥२॥ अर्थात् वह यही अमृत गायत्र (साम) है। इसी से प्रजापति मुक्त हुआ, इसी से (अन्य) विद्वान्, इसी से मन्त्रार्थ द्रष्टा (ऋषि)। इस ब्राह्मण में दो स्थलों पर अर्थात् ३२४०-४२॥ और ४।१६,१७॥ पर दो वंश परम्पराएं आई हैं । अन्तिम वंश परम्परा पहली से कुछ ही अन्य नाम रखती है। यह है भी छोटी। पहली का प्रारम्भ "ब्रह्म” से होता है । (१) ब्रह्म ने (२. प्रजापति के लिये । उसने (३) परमेष्ठी के लिये । उसने (४) देवसविता के लिये इत्यादि । शतपथब्राह्मण (माध्यन्दिन) में भी दशम कागड की समाप्ति पर और चौदहवें काण्ड के अन्त से कुछ पहले दो ऋषि वंशा- वलियां आई हैं। पूर्वली में बताया गया है कि स्वयम्भु ब्रह्म ने प्रजा- पति को विद्या पढ़ाई, और उत्तरली में कहा है कि परमेष्ठी को । जै० उ० ब्रा० में एक रूप से इन दोनों का मेल है। अर्थात् प्रथा, प्रजापति, और परमेष्ठी यद्यपि समकालीन थे, तथापि गायत्र साम का रहस्य ब्रह्म ने स्वयं परमेष्ठी को नहीं बताया, प्रव्युत यह उस तक प्रजापति द्वारा प्राया। tra, , - ( २४ ) जैमिनीय ब्राह्मण कोई नया ब्राह्मण नहीं। शतपथ ब्रा० के द्वि० वंश में ब्रह्म से लेकर अपने आप (वयं) तक १८ नाम है। जै० उ० न्ना के प्रथम वंश में ब्रह्म से लेकर वैपश्चित दा० गुप्त लौहित्य तक ५० नाम हैं । प्रत्येक ब्राह्मण के सब वंशों को मिला कर और यदि कुछ नाम छूट गये हैं तो उनका स्थान छोड़ कर भी ब्रह्म से ऋषियों की एक जैसी संख्या होजायगी। इस से प्रतीत होता है कि आर्यावर्त के इतिहास में ब्राह्मणों के संकलन का समय प्रायः एक ही था । ब्रह्मा से जो अनेक विद्यायें अनेको कुलों में चली आई थीं, वही इतिहासयुक्त करके प्रायः एक काल में एकत्र कर गई। जैमिनीय ब्राह्मण भी उसी समय संकलित हुआ। जब यह ग्रन्थ छप रहा था, तब श्रीमान् कालेण्ड महाशय ने मुझे पत्र लिखा कि वे अर्टल के कई पाठ शुद्ध कर देंगे। तब मैंने उन्हें मुद्रित७२ पृष्ठ भेज दिये थे। उन्होंने उनके हाशिये पर संशोधन कर दिया है । वह भूमिका के अन्त में छाप दिया गया है । अगले पृष्ठों का संशोधन फिर कभी छापा जायगा । इस परिश्रम के लिए जो उन्होंने स्वयं मेरा ध्यान उधर बैंच कर किया है, मैं उन का अत्यन्त अनुगृहीत हूं। इस ग्रन्थ के प्रूफ पं० विश्वबन्धु एम० ए० शास्त्री, तथा पं० हंसराज पुस्तकाध्यक्ष लालचन्द पुस्तकालय ने देखे हैं । इन दोनों महाशयों का भी मैं कृतज्ञ हूं। परमदयामय भगवान् अपनी कृपा से इने हृदय-पावक ग्रन्थों के प्रचार में मेरी सहायता करें। इत्योम् दयानन्द महाविद्यालय लालचन्द पुस्तकालय लाहौर माघ, संक्रान्ति सं० १९७७ भगवद्दत्त १ مي عو عي عمر ८, ह ६ श्री कालेण्ड-प्रदर्शित सटिप्पण पाठ संशोधन । पृ० पंक्ति प्रकाशित पाठ संशोधित पाठ ३ १२ लिच्यादेवमे सिच्येतैवमे० हैऽषा खला हैषाखला ५ उतैषों खला उतैषाखला प्रति यस्य प्रत्यस्य हस्त ले पाठ शुद्ध है। देखो पाठ भेद। स्लोष्ठी लोष्टो ळयित्वा पनि ळयित्वापनि ववर्ज ववृजे* बहुर्भू बहोर्भू ११, वै वेद वावेद यदमृते यदनृचे देवा देवाः कस्मादु कस्माउ ०सप्ताहोरात्राः सप्त होत्राः अभिपयुक्त अभिपर्यस्त ३७, ३ उचा [उच्चा] ३७, ह चै० तद्यद्वै यद्यद्वै प्रजापतिर्वा वेद अन प्रजापतिर्वावेदमन १२ सुनोति सनोति सर्क सर्क ५३, आयतन गयतना ५८, पुनीध्वं न पूता वै •पुनीध्वमपूतावै १५ ययाच पपाच or पपर्च * The mss. (Grantha) have ववृज or वव्रज which nearly is the same in Grantha. If the Sandhi is effaced we ought to return ववृजे । + इदमायतना is a bahuvrihi compound. पाठभेद जो नीचे दिया है, वह ठीक है। + Must be corrupt. . UU3Mud or ह [स्म चै० २ ४६, २ ४ ३ शुद्धिपत्रम् । भू०४ पं० अशुद्ध ५ सिंहिक ४, ६,६,११ अग्नि शुद्ध संहि सूर्य ०सा ०सा- . २४ १ यत्पर तद यत्परतद ३ शामूल प० १३ श्रेय ल शामूलप० श्रेयस २ एवं वि० एवंवि० भ्य वाङ पाणौ वाङ् ० पानी ११ ११३ १३६ युष्यासु रतो सपृणाति युष्मासु रेतो स्पृणाति स्वर्गस्य च्दुल स्वगस्य

MilanmitrivinwiriwwiththiwnitiMilintrismilinwwnwithintifinitithiMiwiMivilitwwinwww
hMarshehealhe
IMMARWAVIMAalamMMAMMAAMINARDANA

ओ३म् . जैमिनीय-उपनिषद्-ब्राह्मणम् प्रजापतिर्वा इदं त्रयेण वेदेनाऽजयद् यदस्येऽदं जितं तत् ॥ १ ॥ स ऐक्षतेऽत्थं चेद्वाअन्ये देवा अनेन वेदेन यक्ष्यन्त इमां वाव ते जितिं जेष्यन्ति येऽयम्मम । हन्त त्रयस्य वेदस्य रस- माददा इति ॥ २॥ स भूरित्येवर्वेदस्य रसमादत्त । सेऽयम्पृ- थिव्यभवत् । तस्य यो रसः प्राणेद सोऽग्निरभवद्रसस्य रस: ॥३॥ भुव इत्येव यजुर्वेदस्य रसमादत्त । तदिदमन्तरिक्षम- भवत् । तस्य यो रसः प्राणेदन स वायुरभवद्रसस्य रसः॥४॥ स्वरित्यत्र सामवेदस्य रसमादत्त । सोऽसौ द्यौरभवत् । तस्य यो रसः प्राणेद स आदित्योऽभवद्रसस्य रसः॥५॥अथै कस्यै- ऽवाऽक्षरस्य रस नाऽशनोदादातुम् ओमित्येतस्यैऽव ॥६॥ सेऽयं वागभवत् । ओमेव नामेऽषा । तस्या उ प्राण एव रसः॥७॥ तान्येतान्यष्टौ । अष्टाक्षरा गायत्री। गायत्रं साम। ब्रह्म उ गायत्री । तद्ब्रह्माऽभिसंपद्यते।अष्टाशफाः पशवस्तेनो पशव्यम् ॥८॥१,१ प्रथमेऽनुषाके प्रथमः खण्डः । १.१ बेदेन । २ वाजयदू ।३ पदेन । ४ हन्ता। ५'द' अधिका६ सा।

४ ( २ ) स यद् अोमिति सोऽग्निर्वागिति पृथिव्योमिति वायु- गित्यन्तरिक्षमोमित्यादित्यो वागिति धौरोमिति प्राणो वागित्येव वाक् ॥ १ ॥ स य एवं विद्वानुद्गायत्योमित्येवाऽग्निमादाय पृथि- व्याम्प्रतिष्ठापयत्वोमित्येव वानुमादायाऽन्तरिक्षे प्रतिष्ठापयत्यो- मित्येवाऽऽदित्यमादाय दिवि प्रतिष्ठापयत्योमित्येव प्राणमादाय वाचि प्रतिष्ठापयति ॥२॥ तदैऽतच्छेलना गायत्रं गायन्त्यो- वा ३ च् ओवा३च् ओवा३च् हुम्मा ओवा इति ॥ ३ ॥ तदु ह तत्पराङ् इवाऽनायुष्यम् इव। तदायोश्चाऽपांचानुवलं गेयम् ॥४॥ यद्वे वायुः पराङ् एव पषेत तीयेत (स)। स पुरस्ताद्वाति स दक्षिणतस्स पश्चात्सः उत्तरतस्स उपरिष्टात्स सर्वा दिशोऽनुसं- वाति ॥ ५॥ तदेतदाहुरिदानी वा अयमिलोऽवासीदथेऽस्थाहाती ऽति । स यद्रेष्माणं जनमानो निवेष्टमानो वाति क्षयादेव बिभ्यत् ॥६॥ यदु ह वा आपः पराचीरेव प्रस्बास्स्यन्दरन् क्षीयस्ताः। यदडांसि कुर्वाणा निवेष्टमाना मावर्तान् सृजमाना यन्ति क्षयादेव विभ्यताः। तदेतद्वायोश्चैऽवाऽपां चाऽनु वर्त्म गेयम् ॥७॥१,२॥ प्रथमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। १० १२ १ अन्तरीक्ष० । २ प्रापा । ३. वाची। छेल्०, कीन् । ५ च । परांदू, पुराद् । ७ रिष्ठात् । ८ सीत् । ६ यजमानो, जमानो। १० वम १५ श्यद, यदू १२ अङ्कासि । .

( ३ ). १ . ६ प्रोवा ओवा ओवा हुम्भा प्रोवा इति कुरोत्येव । एताभ्यां सर्वमापुरेति ॥ १ ॥ स यथा वृक्षमाक्रमणराक्रममाण इयादे- वमेवैऽते इ-द्वे देवते संधायेऽमां लोकान् रोहन्नति ॥२॥ एक उ एव मृत्युरन्वेत्यशनयैऽव ॥ ३ ॥ अथ हिङ्करोति । चन्द्रमा वै हिङ्कारोऽनमु वै चन्द्रमाः । अन्नेनाऽशनयां नन्ति ॥ ४ ॥ तां- ताशनयामनेन हत्वोऽमित्येतमेवाऽऽदित्यं समयाऽति मुच्यते । एतदेव दिवश्छिद्रम् ॥५॥ यथा खं वाऽनस स्स्याद्रथस्य वैऽवमे- बहिवाश्छद्रम् । तद्रश्मिभिस्संछन्नं दृश्यते ॥ ६॥ यदायत्रस्योऽऽ-- ध्वं हिङ्कारात्तदमृतम् तदात्मानं दध्यादथो यजमानम् । अथ अदितरात सामोऽऽधं तस्य प्रतिहारात् ॥७॥ स यथाऽद्भिरा- अस्संमृज्येरन् यथा निनाऽग्निस्संसृज्येत यथा क्षीरे क्षीरमा- सिच्यादेवमेव ऽत्तदक्षरमेताभिर्देवताभिस्संसृज्यते ॥८॥१, ३॥ प्रथमेऽनुवांके तृतीयः खण्डः । तं वा एतं हिङ्कार हिम्भा इति हिङ्कुर्वन्ति । श्रीधै भाः। असो वा आदित्यो भा इति ॥३॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमन गर्भ १ , ३.१ प्रोव २ ऐव.३ अक्रम ४ इति ५ त्यां, स्य ६ नस ७ रसस्य प त्वदू, तद् (?) १० रान् । ४.१ प्रोम् २ गंभ।

( ४ ) ३ ६ क इदि । यद् इति स्त्रीणाम् प्रजननं निगच्छति तस्मात्ततो ब्राह्मण ऋषिकल्पो जायतेऽतिव्याधी राजन्यश्शूरः ॥ २॥ एतं हवा एतं न्यगमनु दृषभ इति । यद् इति निगच्छति तस्मात्ततः पुण्यो बलीवर्दो दुहाना धेनुरुक्षा दशवाजी जायन्ते ॥ ३ ॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमनु गर्दभ इति । यद् इति निगच्छति तस्मात्स पापीया- ज्छ्रेयसीषु चरति तस्मादस्य पापीयसश्रेयो जायतेऽश्चतरो वा- ऽश्वतरी वा ॥ ४ ॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमनु कुभ्र इति । यद् इति निगच्छति तस्मात् सोनार्यस्सन्नपिराज्ञः पामोति ॥ ५॥ तं है- ऽतमेके हिङ्कारं हिम्भा ओवा इति बहिर्धेऽव हिङ्कुर्वन्ति । बहिर्धे व वै श्रीः। श्री साम्नो हिडार इति ॥ ६॥ स य एनं तत्र ब्रूयादहिओन्वा अयं श्रियमधित पापीयान् भविष्यति । स यदा वै म्रियतेऽथाऽग्नौ प्रास्तो भवति । क्षिबत मरिष्यत्यग्नोवनम्पासिष्यन्ति" इति तथा हैऽव स्यात् ॥ ७ ॥ तस्माद् है-तं. हिङ्कार हिं वो इत्यन्तरिवैज्वाऽऽत्मन्न- जयेत् । तथा ह न बहिर्धा श्रियं कुरुते सर्वमायुरेति॥८॥१,४ प्रथमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। ९ .:' ४.३ त्रिण ४ जायत इतिव्य ५ यषत् य ७ 'ति' अधिक ८ नाक्थ्यरस, नायस ६ ओम् बहिऽव......तत्र ब्रयाद् १० बहिर्द्धवे, प्रोम् । व ११ यतीति .

२ ३ ४ सा हैऽषा खला देवताऽपसेधन्तीऽतिष्ठति । इदं वै वमत्र पापमकर्णेऽहैऽऽष्यसि । यो वै पुण्यकृत् स्यात् स इहेऽयादिति ॥१॥ स ब्रूयादपश्यो वै त्वं तद्यदहं तदकरवं तद्वै मा त्वं नाऽका- रयिष्यस्त्वं वै तस्य कर्ताऽसीति ॥२॥ सा ह वेदसत्यम्माऽऽहै- ति । सत्यं हैऽषा देवता । सा ह तस्य नेऽऽशे यदेनमपसेधेत सत्यमुपैऽवह्वयते ॥ ३ ॥ अथ होवाचैऽऽक्ष्वाको वा वाष्णो- ऽनुवक्ता वा सात्यकीर्त उतैषा खला देवताऽपसेदधुमेव ध्रियतेऽ- स्यै दिशः ॥ ४ ॥ [ तद् ] दिवोऽन्तः । तदिमे द्यावापृथिवी संश्लिष्यतः । यावती वै वेदिस्तावतीऽयम्पृथिवी । तयत्रैऽतचा खालं खातं तत्सम्पति स दिव आकाशः॥ ५॥तद्वहिष्पवमाने स्तूयमाने मनसोऽद्गृह्णीयात् ॥ ६ ॥ स यथोऽच्छायम्प्रति यस्य अपयेतेऽवमेवैतया देवतयेदममृतमभिपर्येति यत्राऽयमिदं तपती ति ॥ ७ ॥ अथ होवाच-॥८, १, ४ ॥ प्रथमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । गोबलो वार्णः क एतमादित्यमहति समयेऽतुम् । दूराद्वा ए एतत् तपति न्यङ् । तेन वा एतम्पूर्वेण सामपथस्तदेव मनस १२ 4 ५. १ 'ऽति' अधिक २ त्यद् ३ अर्क ४ स ५ सत्यम्महे . मक ७क्षको ८ सत्यकीर्त ६ अ १० धृय ११ प्रत्यस्य १२ ऽततय ।

१ २ ३ ११ हृत्योऽपरिष्टा देतस्यैऽतस्मिन्नमृते निदध्यादिति ॥ १ ॥ तद् स होवाच शाट्यायनिस्समयै वाऽतदेनं कस्तद्वेद । यद्येता आपो वा अभितो यद्वायु वा एष उपह्वयते रश्मीन्वा एष तदेतस्मै व्यूह- तीति ॥२॥ अथ होऽवाचोऽलुक्यो जानश्रुतेयो यत्र वा एष एतत् तपत्येतदेवामृतम् । एतच्चेदै प्रामोति ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्तते ॥३॥ कस्तद्वेद यत्परेणाऽऽदित्यमन्तरिक्षमिदमना- वयनमवरेण ॥ ४॥ अथैऽतदेवाऽमृतम् । एतदेव मां यूयम्प्राप- येष्यथ । एतदेवाहं नातिमन्य इति ॥५॥ तान्येतान्यष्टौ । ष्टिाक्षरा गायत्री। गायत्रं साम । ब्रह्म उ गायत्री । तदु ब्रह्मा- सम्पद्यते अष्टाशफाः पशवस्तेनो पशव्यम् ॥।॥ १, ६ ॥ प्रथमेऽनुवाके षष्ठः खण्डः । ता एता अष्टौ देवताः । एतावदिदं सर्वम् । ते [......] ति ॥ १॥ स नैषु लोकेषु पाप्मने भ्रातृव्यायावकाशं त् ि। मनसैनं निर्भजेत् ॥ २॥ तदेतटचाऽभ्यनूच्यते । "चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । -- १वाऽयं २ तछ, त ३ स्यै अथो ५ोम हावाचा (!)उलुक्यो, यो ७ बत् ८परोण मन्विलय १० त, प्रापिए ११ यत ।

६ (७) गुहा त्रीणि निहिता नेऽङ्ग्यानि तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति" इति ॥३॥ तद् यानि तानि गुहात्रीणि निहिता नेऽङ्गयन्ती (ऽती)sम एव ते लोकाः॥४॥ तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्तीति । चतुर्भाग हवै तुरीयं वाचः । सर्वयास्य वाचा सर्वैरेभिलॊकैस्सर्वणास्य कृतम्भ- वति य एवं वेद ॥ ५॥ स यथाश्मानमाखणमृत्वा लोष्ठो विध्वं- सत एवमेव स विध्वंसते य एवं विद्वाँसमुपवदति ॥ ६ ॥ प्रथमेऽनुवाके सप्तमः खण्डः । प्रथमोऽनुवाकस्समाप्तः॥ प्रजापतिर्वा इदं त्रयेण वेदेनाऽजयद्यदस्येदं जितं तत् ॥१॥ स ऐक्षतेत्थं चेदा अन्ये देवा अनेन बेदेन यक्ष्यन्त इमां वाव जितिं जेष्यन्ति येऽयम्मम ॥१॥ हन्तेऽमं त्रयं वेदम्पीळयानीति ॥ ३ ॥ स इमं त्रयं वेदमपीळयत् । तस्य पीळयन्नेकमेवाक्षरं ना- शक्नोत् पीनायितुमोमिति यदेतत् ॥ ४॥ एष उ ह वाव सरसः । सरसा ह वा एवंविदस्त्रयीविद्या भवति ॥५॥ स इमं रसम्पी- ७.१ तानि २ मो, प्रोम ३ गयन्ति ४ तानि ५ प्रोम् ६ कृत्या ७ लोष्टो ८ प्रोम् एषम विध्वंसते ६ स एषो...उपवदन्ति । १. ने रवा, द ३,-को ४. द्रव । ते .

९ १२ ५. खेते ६.श्रोम् ७ लेनं ८ अ, ऐच तेभ्यप १० श्यस्त-११ ( ८ ) यित्वा पनिधायोऽऽोऽद्रवत् ॥६॥तं द्रवन्तं चत्वारो देवाना- मन्वपश्यन्निन्द्रश्चन्द्रो रुद्रस्समुद्रः। तस्मादेते श्रेष्ठादेवानाम एते ह्ये- नमन्वपश्यन् ॥७॥ सयोऽयं रस आसीत्तदेव तपोऽभवत् ॥८॥ त इमं रसं देवा अन्वक्षन्त । तेऽभ्यपष्यन्त स तपो वा अभूदिति ॥६॥ इममु वै अयं वेदम्मरीमृशित्वा तस्मिन्नेतदेवाक्षरमपीळित- मविन्दन्नोमिति यदेतत् ॥ १० ॥ एष उ ह वाव सरसः । तेनै- नम्मायुवन् । यथा मधुना लाजान् प्रयुयादेवम् ॥ ११॥ सेऽभ्य- तप्यन्त । तेषां तप्यमानानामाप्यायत वेदः। तेऽनेन चतपसाऽपानेन च वेदेन तामु एव जितिमजयन् याम्प्रजापतिरजयत् । त एते सर्व एव प्रजापतिमात्रा प्रयाम् अयम् इति ॥१२॥ तस्मात्तप्यमा- नस्य भूयसी कीविर्भवति भूयो यशः । स य एतदेवं वेदैवमेषा- ऽपीनेन वेदेन यजते। यदो याजयत्येवमेवाऽपानेन वेदेन याजयति ॥ १३ ॥ तस्य हैतस्य नैव काचनाऽतिरस्ति य एवं वेद । स य एवैनमुपवदति सार्तिपृच्छति ॥१४॥ द्वितीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। पीळितं, ता १२ चा १३ प्राय १४ ययाद १५. सेन, ते एन, तेनेन १६. यत् १७- चन् १८ अायाम १८ ओम् यजते यदो-देन २० एव अषि ६१ असि २२ उपदमि उबदति २३ मछति, कार- ૨ ૦ A . ( १ ) . ६ तदाहुर्यदोवा ओवा इति गीयते काभवति.क सामेति ॥१॥ोम शति वै साम वागित्यृक् । प्रोमिति मनो वागिति वाक् । प्रोमिति प्राणो वामित्येव बाक् । प्रोमितीन्द्रो वागिति सर्वे देवाः । तदें- तदिन्द्रमेव सर्वे देवा अनुयन्ति ॥२॥ ओमित्येतदेवाक्षरम् । एतेन वै संसवे परस्येन्द्रं वृन्जीत । एतेन ह वै तद्रको दाल्भ्य प्राजके- शिनामिन्द्रं ववर्ज । ओमित्येतेनैवाऽऽनिनाय ॥३॥ तान्येतान्यष्टौ । अष्टाक्षरा गायत्री। गायत्रं साग। ब्रह्म उ गायत्री। तदु ब्रह्माभिसम्प- यते । अष्टाशफाः पशवस्तेनो पशव्यम् ॥४॥तस्यैतानि नामानीन्द्रः कर्माक्षितिरमृतं व्योमान्तो वाचः । बहुर्भूयस्सर्वं सर्वस्मा- दुत्तरं ज्योतिः । ऋतं सत्यं विज्ञानं विवाचनमप्रतिवाच्यम् । पूर्व सर्व सर्वा वा । सर्वमिदमपि धेनुः पिन्वते परागर्वा ॥५॥१॥६॥ १ द्वितीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । सा पृथक्सलिलं कामदुधाक्षिति प्राणसहित चक्षुश्श्रोत्रं वाक्मभूतम्मनसा व्याप्तं हृदयाय म्ब्राह्मणभक्त मनशुभं वर्षपवित्रं ३ १. एबा । २. ओबात (= ओमा ?) ३. अमृग। ४. अज्-१५-शीन्-शीम-1६. बब्रज । ७. वनिनाय ८-३; क्षीति । -हिर ।१०.विजिज्ञा-११-अः । १ सा । २-तुश्रो-३-दयो-18. भ्रकत्रम्, भ्रत्रमा भूत्रम् ।

( १० ) ६ ७ गोभग म्पृथिव्युपरं तपस्तनु वरुणपरियतनमिन्द्रश्रेष्ठं सहस्राक्षर- मयुतधारममृतं दुहाना सान् इमाँलोकानभिविक्षरतीऽति ॥१॥ तदेतत् सत्य मक्षरं यदोम् इति । तस्मिन्नापः प्रतिष्ठिता अप्सु पृथिवी पृथिव्यामिमे लोकाः ॥२॥ यथा सूच्या पलाशानि सन्तृण्णानि स्युरेवमेतेनाक्षरेणेमे लोकास्संतृगणाः ॥३॥ तदिदमिमान प्रतिविध्य दशधा क्षरात शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रयुतधा (नियुतधा ) ऽर्बुदधा न्यर्बुदधा निखर्वधा पद्ममक्षिति- योमान्तः ॥४॥ यथौघो विष्यन्दमानः परः-परोवरीयान् भव- त्येवमेवैतदक्षरम्पर:-परोवरीयो भवति ॥५॥ ते हैते लोका रजा एव श्रिताः। इम एवं त्रयोदशमासाः ॥६॥ स य एवं विद्वानुदायति स एवमेवैताँलोकानतिवहति । ओमित्येतेनाक्षरेणा- ૧ ૨ मुमादित्यम्मुख आधत्ते । एष ह वा एतदक्षरम् ॥७॥ तस्य सर्वमाप्तम्भवति सर्व जितं न हाऽस्य कश्चन कामोऽनाप्तो भवति य एवं वेद ॥८॥ तद्ध पृथुर्वैन्यो दिव्यान् व्रात्यान् पप्रच्छ । १७ ५. पर्यतू-1 ६-७ अोमिति । ८-सुः । ६ पाम्, 'इदं' और दशधा के मध्य स्थान रिक्त है । १० निर्बु-११ निखर्वाच,निखर्वदाच् । १२-नान् । १३ प्रोम् । परः परो ।१४ ते । १५ तसि।११ कण्व १७ वै।

१९ ( ११ ) स्थूणां दिवस्तम्भनी सूर्य माहुरन्तरिक्षे सूर्यः पृथिवीप्रतिष्ठः । अप्सु भूमीश्शिश्यिरे भूरिभाराः किं स्विन्महीरधितिष्ठन्त्याप इति ॥ ६॥ ते ह प्रत्यूचुम् स्थूणामेव दिवस्तम्भनी सूर्य माहुरन्तरिते सूर्यः पृथिवीप्रतिष्ठः । अप्सु भूमीशिश्यिरे भूरि- भारास्सत्यम्महीरधितिष्ठन्त्याप इति ॥ १० ॥ ओमित्येतदेवाक्षरं सत्यम् । तदेतदापोऽधितिष्ठन्ति॥११॥१॥१०॥ द्वितीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । द्वितीयोऽनुवाकरसमाप्तः । ६८ १. प्रजापतिः प्रजा अस्जत । ता एनं सृष्टा अन्नकाशिनीरभित- स्समन्तम्पर्यविशन् ॥२॥ ता अब्रवीत् किंकामास्स्थेति । अन्नाद्य- कामा इत्यब्रुवन्॥२॥सोऽब्रवीदेकं वै वेदमन्नाद्यमति सामैव । तद्वः प्रयच्छानीति । तन्नः प्रयच्छेत्यब्रुवन् ॥३॥ सोऽब्रवीदिमान्दै पशून् भूयिष्ठमुपजीवामः । एभ्यः प्रथमम्प्रदास्यामीति ॥४॥ तेभ्यो हिङ्कारम्पायच्छत् । तस्मात्पशवो हिडरिक्रतो किजिज्ञास- १८-मिश् । १६ शिशिरे। २० अथित् । १. वा । २. षाम्-३ पृय-१४ -कृतो।

( १२ ) माना इव चरन्ति ॥५॥ प्रस्तावम्मनुष्येभ्यः । तस्मादु ते रतुक्त इबेदम्मे भविष्यत्वदो मे भविष्यतीति ॥६॥ आदि वयोभ्यः । तस्मात् तान्याददानान्युपापपातमिव चरन्ति ॥७॥ उद्गीथं देवेभ्यो ऽमृतम् । तस्मात्तेऽमृताः॥८॥ प्रतिहारमारण्येभ्यः पशुभ्यः । ६ तस्मात्ते प्रतिहृतास्तन्तस्यमाना इव चरन्ति ॥६॥ १॥ १५॥ तृतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १ २ ३ उपद्रवं गन्धर्वाप्सरोभ्यः । तस्मात्त उपद्रवं गृह्णन्त इव चरन्ति ॥१॥ निधनम्पितृभ्यः । तस्मादु ते निधनसंस्थाः ॥२॥ तद्यदेभ्यस्तत् साम प्रायच्छदेतमेवैभ्यस्तदादित्यम्प्रायच्छत् ॥३॥ स यदनुदितस्सहिङ्कारोऽर्थोदितः प्रस्ताव प्रासंगवमादिर्माध्यन्दिन उद्गीथोऽपराहणः प्रतिहारो यदुपास्तमयं लोहितायति स उपद्रवो ऽस्तमित एव निधनम् ॥४॥ स एष सबै.कैस्समः । तद्यदेष सर्वैर्लोकैस्समस्तस्मादेष एव साम । स ह वै सामवित् स साम चेद य एवं वेद ॥५॥ ते ऽब्रुवन् दूरे वा इदमस्मत् । तत्रेदं कुरु १. स्तुवतेच । ६. प्रतिहतास । ७. तातृ (?)स (!) यमाना; तातास्यमाना। १-आपसरेभ्यः। अर्थोदित्-३ अादित्यः। ४ द्विवार'स सामवेद' देता है।

७ यत्रोपजीवामेति ॥६॥ तहतूनभ्यत्यनयत् । स बसन्तमेव हिङ्कार- मकरोद्ग्रीष्मम्प्रस्तावं वर्षामुद्गीथं शरदम्पतिहारं हेमन्त निधनम् । मासार्धमासावेव सप्तामावकरोत् ॥७॥ तेऽब्रुवन्नेदीयो न्वावतहि । तत्रैव यत्रोपजीवामेति ॥८॥ तत् पर्जन्यमभ्यत्यनयत् । स पुरोवातमेव हिवारंमकरोत् ॥६।। १ । १२॥ तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । जीमूतान प्रस्ताव स्तनयित्नुमुद्गीथं विद्युतम्प्रतिहारं दृष्टि निधनम् । यष्टात्मजावौषधयश्च जायन्ते ते सप्तम्यांवकरोद ॥१॥ तेऽब्रुवदीयोन्याहि । तत्रैव कुरु यत्रोपजीवामेति ॥२॥ तयज्ञमभ्यत्यनयत् । स यजूंष्येव हिङ्कारमकरोडचः प्रस्ताव सामान्युद्गीथं स्तोमम्प्रतिहारं छन्दो निधनम् । स्वाहाकारवषद- कारावेव सप्तमावकरोत् ॥३॥ तेऽब्रुवन् नेदीयो न्वावैतर्हि । तत्रैव कुरु यत्रोपजीवामेति ॥४॥ तत्पुरुषमभ्यत्यनयत् । स मन एव हिङ्कारमकरोद्वाचम्प्रस्तावम्प्राणमुद्गीथं चतुःप्रतिहार श्रोत्रंनिधनम् रेवश्चैव प्रजा च सप्तमावकरोत् ॥५॥ तेऽब्रुवन्नत्र वा एनत्तद- ५-म इति । ६ कर-1 ७ प्रस्तावः । वर्षा उद्गीथः, शरत्प्रतिहारः, ओम् शरदम्प्रतिहारम् । १. प्रस्तात्रैषम् -तिर् । ३सपतम्-४म इति । ५ अभ्यत्यत्यन- ( १४ ) १ 2 कर्यत्रोपजीविष्याम इति ॥६॥ स विद्यादहमेव सामास्मि मय्येता देवता इति ॥७॥ १ ॥ १३॥ तृतीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । न ह दूरे देवतस्स्यात् । यावद्ध वा प्रात्मना देवानुपास्ते तावदस्मै देवा भवन्ति ॥ १॥ अथ य एतदेवं वेदाऽहमेव सामाऽस्मि मय्यतास्सर्वा देवता इत्येवं हाऽस्मिन्नेतास्सर्वा देवता भवन्ति ।।२।। तदेतद्देवश्रुत्साम । सर्वा ह वै देवताइशृण्वन्त्येवं- विदम्पुण्याय साधवे । ता एनम्पुण्यमेव साधु कारयन्ति ॥३॥ स ह स्माऽऽह सुचिंत्तश्शैलनो यो यज्ञकामो मामेव स वृणीताम् । तत एवैऽनं यज्ञ उपनस्यति । एवंविदं झुगायन्तं सर्वा देवता अनुसंतृप्यन्ति । ता अस्मै तृप्तास्तथा करिष्यन्ति यथैऽनं यज्ञ उपनस्यतीति ॥४॥ १।१४॥ तृतीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः । देवा वै स्वर्ग लोकमैप्सन् । तं न शयाना नाऽऽसीना न तिष्ठन्तो न धावन्तो नैव केनचन कर्मणाऽऽप्नुवन् ॥ १॥ ते देवाः प्रजापतिमुपाधावन स्वर्ग बै लोक मैप्सिष्म । तं न शयाना १ देवत । २ ओम् । ३ एस्म । ४ देवश्रेत् । देवश्रूत । एवश्रूतू । ५-नं । १-ऽऽशीना । २-त्यो । ३ उपाय- ६ ( १५ ) नाऽऽसीना न तिष्ठन्तो न धावन्तो नैव केनचन कर्मणाऽऽपाम। तथा नोऽनुशाधि यथा स्वर्ग लोकमाप्नुयामेऽति ॥२॥ तानबवीत् सान्नाऽनृचेन स्वर्ग लोकम्प्रयातेऽति । ते सान्नाऽनृचेन स्वर्ग लोकम्पायन् ॥ ३॥ प्र वा इमे साम्नाऽगुरिति । तस्मात्मसाम तस्मादु प्रसाम्यन्नमत्ति ॥४॥ देवा वै स्वर्ग लोकमायन् । त एता- न्यूक्पदानि शरीराणि धून्वन्त प्रायन् । तेस्वर्गलोकमजयन्॥५॥ तान्या दिवः प्रकीर्णान्यशेरन् । अथेऽमानि प्रजापतिक्पदानि शरीराणि सञ्चित्याऽभ्यचत् । यदभ्यर्चत्ता एव!ऽभवन् ॥६॥ १ । १५॥ चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । सैऽवर्गभवदियमेव श्रीः । अतो देवा अभवन् ॥१॥ ॥ अथैऽषामिमाममुराश्श्रियमविन्दन्न । तदेवाऽऽसुरमभवत् ॥२॥ ते देवा अब्रुवन् या वै नश्श्रीरभूदविदन्त तामसुरः । कथं न्वेषा- मिमांश्रियम्पुनरेव ज्येमेऽति ॥३॥तेऽब्रुवन्नृच्येव साम गायामेति । २ ४ प्रयामे । ५ प्रयाते, प्रधामे, प्रयामे । ६ लोकंमप्रावत् । ७ इसके बाद कुछ गड़ बड़ हैं। ५ के पूर्व यह सब में लिखा है 'तएतान्य॒क्पदानि शरीराणि धून्वन्त आयन (र्थयन् )। ते वर्गलोकमजयम् (-अत्)। प्रथेऽमानि प्रजापतिर् ...ताएवर्थोऽभवन् । ८ यत् । श्रोम् । ते स्वर्ग अजयन् , यहां अधिक है। १० प्रोम् । यदू...... । ११ ओम् । ता एव। १ पासू- २ तदू । ३ एवा । ४ बिन्दन्त । ५ अव।

( १६ ) ६ १२. ते पुनः प्रत्याद्रुत्यार्च सामाऽगायन् । तेनाऽस्माल्लोकाद- सुराननुदन्त ॥४॥ तद्वै माध्यन्दिने च सबने तृतीयसबने च न!ऽपराधोऽस्ति । स यत्ते ऋचि गायति तेनाऽस्माश्लोकाद द्विषन्तम्भ्रातृव्यं नुदते । अथ यदयते देवतास्तु प्रातस्सक्नं गायति वेन स्वर्ग लोकमेति ॥५॥ प्रजापति_सान्नेऽमांजितिमजयद्याऽस्ये ऽयं जितिस्ताम् । स स्वर्ग लोकमारोहत् ॥६॥ ते देवाः प्रजापति- मुपेत्याऽब्रुवमस्मभ्यमपीऽदं साम प्रयच्छति । तथेति । तदेभ्य- स्साम प्रायच्छत् ॥७॥ तदेनानिदं साम स्वर्ग लोकं नाकामयत वोढुम् ॥८॥ ते देवाः प्रजापति मुपेत्याऽब्रुवन् यद्वै नस्साम प्रादा इदं वै नस्तत्स्वर्ग लोकं न कामयते वोडमिति ॥६॥ तद्वै पाप्मना समजतेति । कोऽस्य पाप्मेति । ऋगिति । तदृचा समसृजन ॥१०॥ तदिदम्प्रजापतर्गर्हयमाणमतिष्ठदिदं वै मा तत्पाप्मना सम- स्वाक्षुरिति । सोऽब्रवीद्यस्त्वैतेन ब्यावर्तयायेव स पाप्मनावर्ताता झी ॥११॥ स य एतदृचा प्रातस्सवने व्यावर्तयति व्येवं स पाप्मना वर्तते ॥१२॥१॥१६॥ चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ६-दुच्यत्य । ७ त्रीत्-द-परायो।-चि। १०-वृते । ११ तम्। १२ अर् - १३ न कामायते, न कामयते । १४ कामाय-, सामय्, । १५संस्र १६ एव । १६ -1 , ET .

( १७ ) तदाहुर्यदोवा ओवा इति गीयते कात्रभवति क सामेति॥२॥ प्रस्तुवन्नेवाष्टाभिरक्षरैः प्रस्तौति । अष्टाक्षरा गायत्री। अक्षरमक्षरं ध्यक्षरम् । तच्चतुर्विंशतिस्सम्पद्यन्ते। चतुर्विंशसक्षरा गायत्री ॥२॥ तामेताम्प्रस्तावेनचमाप्त्वा या श्रीर्याऽपचितिर्यस्वर्गोलोको यद्यशो यदन्नाचं तान्यागायमान प्रास्ते ॥३॥ १।१७।। चतुर्थेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । १ ३ प्रजापतिर्देवानसजत । तान् मृत्युः पाप्मान्वसृज्यत ॥१॥ ते देवा प्रजापतिमुपेसाब्रुवन् कस्मादु नोऽपृष्ठा मृत्युचेन्नः पाप्मा- नमन्ववस्रक्ष्यन्नासिथेति ॥२॥ तानब्रवीच्छन्दसि सम्भरत । तानि यथायतनम्प्रविशत ततो मृत्युना पाप्मना व्यावस्थेति ॥३॥ वसवो गायत्रीं समभरन् । तां ते प्राविशन् । तान् साऽच्छादयत् ६ ॥४॥ रुद्रास्त्रिष्टुभं समभरन् । तां ते प्राविशन् । तान् साऽच्छाद- यत् ॥।॥ आदिसा जगती समभरन् । तां ते पाविशन् । तान् साऽच्छादयत् ॥६॥ विश्वेदेवा अनुष्टुभं समभरन्। तांते माविशन् । तान् साऽच्छादयत् ॥७॥ तान् अस्यामृच्यवरायाम्मृत्युनिरजा- १. प्रस्तावेप्रस्तवेन । ३-ग। १. ता, ताः । २ कस्मा । ३-टा । ४-सूक्षन्न् । ५-शद ६-वक्स्य, वत्स्य-७च्छादू, याम् । ७ ( १८ ) नांद्यथा मणौ मणिसूत्रम्परिपश्येदेवम् ॥८॥ ते स्वरम्पाविशन् । तान् स्वरे सतो न निरजानात् । स्वरस्य तु घोषेणाऽन्वैत् ॥३॥ ९ त प्रोमिसेतदेवाक्षरं समारोहन् । एतदेवाक्षरं त्रयीविद्या । यददो ऽमृतं तपति तत्प्रपद्य ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्तन्त ॥१०॥ एवमेवैवं विद्वान् ओमियेतदेवाक्षरं समारुह्य यददोऽमृतं तपति तत्यपद्य ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्ततेऽथो यस्यैवं विद्वानुगा- ૧ ૨ यति ॥११॥ १८॥ चतुर्थेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः । ०: अथैतदेकविंशं साम ॥२॥ तस्य त्रय्येव विद्या हिङ्कारः । अग्निर्वायुरसावादिस एष प्रस्तावः । इम एव लोका आदिः । तेषु हीदं लोकेषु. सर्वमाहितम् । श्रद्धा यज्ञो दक्षिणा एष उद्गीथः। दिशोऽवान्तरदिश आकाश एष प्रतिहारः। प्रापः प्रजा ओषधय एष उपद्रवः । चन्द्रमा नक्षत्राणि पितर एतनिधनम् ॥२॥ तदेतदेकविंशं साम । स य एवमेतदेकविंशं साम वेदैतेन हास्य -वैद् । नास्ति । १० भो । ११-पेद् । १२ एदो, प्रो । ११ ।२ वावायुर् । ३ येषु । ४-सा ।

( १६ ) सर्वेणोद्गीतम्भवसेतस्मादेव सर्वस्मादारश्च्यते य एवं विद्वांसमुप- वदति ॥३॥ ११॥ पंश्चमोऽनुवाकरसमाप्तः । १ ३ १ वै इदमेवेदमग्रेऽन्तरिक्षमासीत् । तद्वेवाप्येतर्हि ॥१॥ तद्यदेतदन्तरितं य एवाऽयम्पवत एतदेवान्तरिक्षम्। एष ह वा अन्तरिक्षनाम् ॥२॥ एष उ एवैष क्तितः तद्यथा काष्ठेन पलाशे विष्कन्धे स्यातामक्षेण वा चक्रावेवमतेनेमो लोको विष्कब्धौ ॥३॥ तस्मिन्निदं सर्वमन्त्रः। तद्यदस्मिन्निदं सर्वमन्तस्तस्मादन्तर्यक्षम् । अन्तर्यक्ष ह वै नामैतत् । तदन्तरिक्षमिति परोक्षमाचक्षते॥४॥तद्यथा मूताःप्रबद्धाः प्रलम्बे- रन्नेव हैतस्मिन्सर्वे लोकाः प्रबद्धाः प्रलम्बन्ते ॥॥ तस्यैतस्य साम्नस्तिस्त्र प्रागात्रीण्यागीतानि पडिभूतयश्चतम्रः प्रतिष्ठा दश प्रगास्सप्त संस्था द्वौ स्तोभावेक रूपम् ॥६॥ तद्यास्तिस्र आगा इम एव ते लोकाः ॥७॥ अथ यानि (त्रीएय) आगीतान्यग्निर्वायुरसा १ ५-अस् । ६ आवृच्योते । १-रीक्ष-२ अधिक है 'एष ह वा अन्तरीक्षम् । ३ एवम् । ४ नास्ति । ५-क्षोना-६ नवम् । ७ एतेन । नास्ति । तद् अन्तस् । नास्ति । १०-बन्द-1 ११-नंम्...१२ अगमा । .१३ एक- रैपम्, एकरूपम् । १४ तो।

( २० ) वादिस एतान्यागीतानि । न ह वै कांचनश्रियमपराधोति य वेद ॥८॥ १॥२०॥ 10 १ ૨ Hity षष्ठेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । अथ याष्षड्विभूतय ऋतवस्ते ॥१॥ अथ याश्चतस्रः प्रति इमा एव ताश्चतस्रोदिशः ॥२॥ अथ ये दश प्रगा इम एव ते द प्राणाः ॥३॥ अथ यास्सप्त संस्था या एवैतास्सप्ताहोरात्राः पार्च षट्कुर्वन्ति ता एव ताः ॥४॥ अथ यौ द्वौ स्तोभावहोरात्रे ए. ते ॥॥ अथ यदेकरूपं कर्मैव तत् । कर्मणा हीदं सर्वं विक्रिय ॥६॥ तस्यैतस्य सानोदेवा आजिमायन् । स प्रजापतिहरर हिङ्कारमुदजयदग्निस्तेजसा प्रस्ताव रूपेण बृहस्पतिरुद्गीथं स्वधय पितरः प्रतिहारं वीर्येणेन्द्रोनिधनम् ||७॥ अथेतरे देवा अन्तरित इवासन् । त इन्द्रमब्रुवन् तव वै वयं स्मोऽनुन एतस्मिन् सामना भजेति॥८॥तेभ्यस्वरम्पायच्छत् । तम्प्रजापतिरब्रवीत्कथेस्थमक: सर्व वा एभ्यस्साम पादाः। एतावद्वाव साम यावान् स्वरः ऋग्व एषते खराद्भवतीति ॥६सोऽब्रवीत् पुनर्वाग्रहमेषामेंतरसमादा स्य इति । तानब्रवीऽदुप मा गायत । अभि मा खरतेंति । तथेति नास्ति । सप्तः ......."एतास । २-मा। ३ वर्ष-1 ४ वद ६-सं। ७ तावव ।८-रम । सवर- १० एषो, एषोम् । ।

( २१ ) - . ३ ॥१०॥ तमुपागायन् । तमभ्यस्वरन् । तेषाम्पुनारसमादत्त ॥११॥ १॥२२॥ षष्ठेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । स यथा मधुधाने मधुनाळीभिर्मध्वासिञ्चादेवमेव तत्सामन् पुना रसमासिञ्चत् ॥१॥ तस्मादु ह नोऽपगायेत् । इन्द्र एष यदुद्गाता । स यथा सावमीषां रसमादत्त एवमेष तेषां रसमादत्ते ॥२॥ कामं ह तु यजमान उपगायेद्यजमानस्य हि तद्भवसथो ब्रह्म- चार्याचार्योक्तः ॥३॥ तदु वा आहुरुपैव गायेत् । दिशो ह्युपागा- यन् दिशामेवं सलोकतां जयतीति ॥४॥ ते य एवेमे मुख्याः प्राणा एत एवोगातारश्चोऽपगातारश्च । इमे ह त्रय उद्गातार इम उ चत्वार उपगातारः ॥५॥ तस्मादु चतुर एवोऽपगातून कुर्वीत। तस्मादुहोऽपगातॄन् प्रसभिमशेद्दिशस्स्थश्रोत्रं मे माहिसिष्टेति ॥६॥ स यस्स रस आसीद्य एवायम्पवत एष एव स रसः ॥७॥स यथा मध्वालोपमद्यादिति ह स्माह सुचित्तशैलन एवमेतस्य रसस्यात्मान- म्पूरयेतोस एवोद्गातात्मानंच यजमानंचामृतत्वं गमयतीति।।८।२२ षष्ठेनुवाके तृतीयः खण्डः । षष्ठोऽनुवाकस्समाप्तः । ११-त्ता। १-धुवने। २ 'स' अधिक पढ़ो। ३-यत् ॥ ४-शम् । ५ पवै। ६।७ऽद्रा--तृन् । ८-तृन् ।

( २२ ) अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् । स उ एवाप्येतहि ॥१॥ २. १ in ४ स यस्स आकाशो वागैव सा । तस्मादाकाशाद्वारबदति ॥२॥ तामेतां वाचम्प्रजापतिरभ्यपीळयत् । तस्या अभिपीळितायै रसः प्राणदत्। त एवेमे लोका अभवन ॥३॥ स इमाँ लोकानभ्यपीळयत् । तेषामभिपीळितानां रसः प्राणेदत् । ता एवैता देवता अभवन्नाग्नि- युरसावादिस इति ॥४॥ स एता देवता अभ्यपीळयत् । तासामभिपीळितानां रसः प्राणेदत् । सा त्रयीविद्याभवत् ॥।॥ स त्रयीं विद्यामभ्यपीळयत्। तस्या अभिपीळितायै रसःप्राणेदन। ना एवैता व्याहृतयो ऽभवन् भूर्भुवस्स्वरिति ।।६।। स एता व्या- तीरभ्यपीळयत् । तासामभिपीळितानां रसः माणेदत् । तदेतद- ६ चरमभवदोमिति यदेतद् ॥७॥ स एतदक्षरमभ्यपीळयत् । तस्या- भिपील्तिस्य रसः प्राणेदत् ॥८॥ ॥२३॥ सप्तमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । बदतरदेव । यदक्षरदेच तस्मादक्षरम् ॥२॥ यद्वेवाक्षरं ना- यित तस्मादक्षयम् । अक्षयं ह वै नामैतत् । तदक्षरमिति १. पता था। २. रसम् । ३. 'स त्रयीम्' 'रसम् (!) दत' अधिक है । ४. नास्ति । ५-श्रा। नास्ति । स त्रयीम् "प्राजेदत । ७-या।

५. ९. ( २३ ) परोक्षमाचक्षते ॥२॥ तद्वैतदेक प्रोमिति गायन्ति । तत्तथा न गायेत । ईश्वरो हैनदेतेन रसेनान्तर्धातोः । अथो द्वे इवैवम्भवत ओमिति । ओं इत्यु हैके गायन्ति । तदु ह तन्न गीतम् । नैव तथा गायेत् । ओं इयेव गायेत्। तदेनदेतेन रसेन सन्दधाति ॥३॥ तेदेतं रसं तर्पयति । रसस्तृप्तोऽक्षरं तर्पयति । अक्षरं तृप्त व्याहृती स्तर्पयति । व्याहृतयस्तृप्तावेदास्तर्पयन्ति । वेदास्तृप्ता देवतास्तर्प- यन्ति । देवतास्तृप्तालोकाँस्तर्पयन्ति। लोकास्तृप्ता अक्षरं तर्पयन्ति। अक्षरं तृप्तं वाचं तपर्यति । वाक् तृप्ताकाशं तर्पयति । आकाशस्तृप्तः प्रजास्तर्पयति । तृप्यति प्रजया पशुभिर्य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुदायति ॥४॥ १॥२४॥ सप्तमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । सप्तमोऽनुवाकस्समाप्तः । ११ १ अयमेवेदमग्र आकाश पासीत् स उ एवाप्येतहि ॥शा स यस्स आकाश आदिस एव स । एतस्मिन् (हा.) उदिते सर्व- मिदमाकाशते ॥२॥ तस्य मामृतयोर्वै तीराणि समुद्र एव । २'या-|३-थे। ४ टै, द्वै । ५ नास्ति । नि-1 ने एव । ८ भो। अक्षर "वाचं सर्पयति यह पाठ-नहीं। १०-यन्ति । ११ वार्फस् । १२ गायति । १ हुन् । २ सुदिते । ३ वैध । ४ तरणी ।

( २४ .) १२.. तयत्समुद्रेणं परिगृहीतं तन्मृत्योराप्तमथ यत्परं तदमृतम् ॥३॥ स यो ह स समुद्रो य एवायम्पवत एष एव स समुद्रः । एतं हि सट्रवन्तं सर्वाणि भूतान्यनुसंद्रवन्ति ॥४॥ तस्य द्यावापृथिवी एव रोधसी । अथ यथा नद्यां कंसानि वा पहीणानि स्युस्सरॉसि वै- व मस्यायम्पार्थिवस्समुद्रः ॥५॥ स एष पार एव समुद्रस्योदेति । स उद्यन्नेव वायोः पृष्ठ आक्रमते । सोऽमृतादेवोदौति । अमृतमनु- संचरति । अमृते प्रतिष्ठितः ॥६॥ तस्यैतत् त्रिदूपम्मृसोरनाप्तं शुक्लं कृष्णम्पुरुषः ॥७॥ तद्यच्छुक्लं तद्वाचोरूपमृचोऽग्नेर्पयोः । सा या सा-वायक सा । अथ योऽग्निमत्युस्सः ॥८॥ अथ यत्कृष्णं तदपां १७ रूपमनस्य मनसोयजुषः । तद्यास्ता प्रापोऽनं तत् । अथ यन्मनो यजुष्टत् ॥६॥ अथ यः पुरुषस्स माणस्तत्साम तद्ब्रह्म तदमृतम् । स या प्राणस्तस्साम । अथ यद्ब्रह्म तदमृतम् ॥१०॥ १॥२५॥ अष्टमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। प्रथाध्यात्मम् । इदमेव चतुस्त्रिकृच्छुक्ल कृष्णम्पुरुषः ॥१॥ तयच्छुल्लं तद्वाचो रूपमृचोऽनेमसोः । साया सा वाक् सा। ५-गृगह-|-द्रे-७ अनुद्-1 ८-या। स्याम् । १० कसा- नि । ११ प्रहीणहीनि । १२ अधिक है 'सस्'. स । १३ प्रतितिष्ठतः । १४ वाक्य, वाग्म् । १५ऋत् । १६ अन्नमस्य । १७. नास्ति, तद्याः-यः १.मृत । २ अधिक असा ।

( २५. ) अथ योऽमित्युस्सः ॥२॥ अथ यत्कृष्णं तदयां रूपमन्नस्य मनसो यजुषः । तथास्ता प्रापोऽमं तत् । अथ यन्मनो यजुष्टत् ॥३॥ . अथ यः पुरुषस्स प्राणस्तत्साम तद्ब्रह्म तदमृतम् । स यः प्राण- स्तत्साम । अथ यद्ब्रह्म तदमृतम् ॥४॥ सैऽपोऽत्क्रान्तिब्रह्मणः । अथातः पराक्रान्तिः ॥॥ सा या साऽऽक्रान्तिर्विद्युदेव सा । स यदेव विद्युतो विद्योतमानायै श्येतं रूपम्भवति तद्वाचो रूपमृचो- ऽग्नेर्मुसोः ॥६॥ यदेव विद्युतस्संद्रवन्यै नीलं रूपम्भवति तदा रूपमन्नस्य मनसों यजुषः ॥७॥ य एवैष विद्युति पुरुषस्स प्राणor स्तत्साम तहह्म तदमृतम् । स यः प्राणस्तत्साम । अथ यहह्म तदमृतम् ॥८॥ १॥२६॥ १ अष्टमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । स हैषोऽमृतेन परिवृढो मृत्युमध्यास्तेऽनं कृत्वा ॥१॥ अथै- ऽष एव पुरुषो योऽयं चतुषि । य आदिसे सोऽतिपुरुषः । यो विद्युति स परमपुरुषः॥२।। एते ह वाव त्रयः पुरुषामा हास्यैते जायन्ते ॥३॥ स योऽयं चतुष्येषोऽनुरूपो नाम । अन्वङ् होष ३ ३-पो । स (!)। ४-त । ५ नास्ति । १ चैत । ७---थे। १-सी । २-यो। ३-थो, पा,-ष । ४-वज । ५ ड्।

( २६ ) सर्वाणि रूपाणि । तपनुरूप इत्युपासीत । अन्वचि हैनं सर्वाणि रूपाणि भवन्ति ॥४॥ य आदिसे स प्रतिरूपः । प्रत्यङ् होष सर्वाणि रूपाणि । तम्प्रतिरूप इत्युपासीत । प्रसञ्चि हैनं सर्वाणि रूपाणि भवन्ति ॥५॥ यो विद्युति स सर्वरूपः। सर्वाणि ह्येतस्मिन् रूपाणि । तं सर्वरूप इत्युपासीत । सर्वाणि हाऽस्मिन् रूपाणि भवन्ति ॥६॥ एते ह वाव त्रयः पुरुषाः । आ हाऽस्यैते जायन्ते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥७॥ १।२७|| अष्टमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । अष्टमोऽनुवाकरसमाप्तः। १० :०:- अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् । स उ एवाप्येतहि ॥१॥स यस्स प्राकाश इन्द्र एव सः । स यस्स इन्द्र एष एव स य एष एवं तपति । स एष सप्तरश्मिदृषभस्तुविष्मान्॥२॥तस्य वाङ्मयो रश्मिः प्राङ् प्रतिष्ठितः । सा या सा वागग्निस्संः। स दशधा भवति शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रयुतधा नियुतधार्बुदधा न्यर्बुदधा निखर्वधा पद्ममक्षितियोमान्तः ॥ ३॥ स एष एतस्य रश्मिा- ह-वची, पक्षी,। ७ झेनम् । ८ प्रत्यं । अधिक है 'नास्ति-तं रूपाणि । १ नास्ति । २ अर-1 ३ निखर्वाचं । ४-ति । ५-त, स्लोम्- ( २७ ) ६ भूत्वा सर्वास्वासु पजामु प्रत्यवस्थितः । स यः कश्च बदसतस्यैव रश्मिना वदति ॥४॥ अथ मनोगयो दक्षिणा प्रतिष्ठितः । तद्य- त्तन्मनश्चन्द्रमास्सः । स दशधा भवति॥।॥ स एष एतस्य रश्मिर्मनो भूत्वा सर्वास्तासु प्रजासु प्रसवस्थितः । स यः कश्चमनुत एतस्यैव १२. रश्मिना मनुते ॥६॥ अथ चतुर्मयः प्रसङ् प्रतिष्ठितः। तद्यत्तश्चतु- रादिसस्सः । स दशधा भवति ॥७॥ स एप एतस्य रश्मिञ्चक्षु- भूत्वा सर्वस्वासु प्रजासु प्रसवस्थितः।स यः कश्च पश्यसेतस्यैव रश्मिना पश्यति ॥५॥अथ श्रोत्रमय उदङ्मतिष्ठितः। तद्यत्तच्छ्रोत्रं दिशस्ताः । स दशधा भवति ॥६॥ स एष एतस्य रश्मिश्श्रोत्र- म्भूत्वा सर्वास्वामु प्रजासु प्रसवस्थितः। स यः कश्च शृणोपेतस्यैव रश्मिना ऋणोति ॥१०॥ २८॥ नवमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १ अथ प्राणमय ऊर्वः प्रतिष्ठितः । स यस्स प्राणो वायुस्सः । स दशधाभवति ।।१॥ स एष एतस्य रश्मिः प्राणोभूत्वासखासु प्रजासु प्रयवस्थितः । स यः कश्च प्राणिस्तस्यैव रश्मिना प्राणिति ६ पश्यति । ७ पश्यति । ८ नास्ति । दक्षणा । १० मन्धश् । ११ चतुम- १२-य। १३ वस्थितः । १४ त, नास्ति । १५प्रत्यवस्थितः॥ इ-स्थ्-१२नास्ति।

(२८ ) ३ ९ ॥२॥ अथाऽमुमयस्तिर्यङ् प्रतिष्ठितः । स ह स ईशानो नाम । स दशधा भवति ॥३॥स एष एतस्य रश्मिरमुर्भूत्वा सर्वाखासु मजाम प्रसवस्थितः । स यः कश्चाऽसुमानेतस्यैऽव रश्मिनाऽसुमान् ॥४॥ अथाऽनमयोऽर्वाङ् प्रतिष्ठितः । तद्यत्तदन्नमापस्ताः । स दशधा भवति शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रयुतधा नियुतधाऽर्बुदधान्यर्बुदधा निखर्वधा पनमक्षितियोमान्तः ॥॥सएष एतस्य रश्मिरमम्भूत्वा सर्वास्वास प्रजामु प्रसवस्थितः । स यः कश्चाश्नासेतस्यैव रश्मिना- नाति॥६॥स एष सप्तरश्मिदृषभस्तुविष्मान् । तदेतदृचाऽभ्यनूच्यते यस्सप्तरश्मिर्वृषभस्तुविष्मानवासृजत्सतवे सप्तसिन्धून्। योरौहिणमस्फुरद्वबाहु_मारोहन्तं सजनास इंद्र इति ||७|| यस्मप्तरश्मिरित । सप्त होत आदिसस्य रश्मयः । वृषभ इति । एष ह्येवाऽऽसाम्प्रजानामृषभः। तुविष्मानिति । महीयैऽवा स्यैषा ॥८॥ अवासजत् सर्तवे सप्तसिन्धृनिति । सप्तधेतेसिन्धवः । १२ १३ ३ स्थान खाली हैं 'स 'ई' । ४-वन्ति । ५ 'यत्' के पश्चात् 'तत्युदं नाम' पाठ है, तदन्नम्" 'स' नहीं है। ६ अंदनम् । ७ तेदा, स्त | ८ निखर्वाचम, निखर्वधाच ! ६ वे म-1 १० सामाख ११ नास्ति तदेतद् 'वृषभस्तुविष्मान् । .१२ रोह- १३-हु । १५-त । १५.महये ।

-- ३ (..२६. ) तैरिदं सर्व सितम् । तद्यदेतैरिदं सर्व सितं तरमात्सिन्धवः ॥६॥ यो रौहिणमस्फुरद्वज्रबाहुरिति । एष (हि) रौहिणमस्फुरद्वज्रबाहुः ॥१०॥द्यामारोहन्तं स जनास इन्द्र इति । एष हीन्द्रः॥१२॥१२॥ नवमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। तद्यथा गिरिम्पन्थानस्समुदियुरिति हस्माऽऽह शाव्यायनि- रेवमेत आदिसस्य रश्मय एतमादिसं सर्वतोऽपियन्ति । स हैवं विद्वानोमिसाददान एतैरेतस्यरश्मिभिरेतमादिसंसर्वतोऽप्यति।।२॥ तदेतत् सर्वतो द्वारमनिषेधं साम । अन्यतोद्वारं हैऽनदेक एवा- ऽभ्रङ्गमुपासते । अतोऽन्यथा विद्युः ॥२॥ अथ य एतदेवं वेद स एवैतत् सर्वतो द्वारमनिषेधं सामवेद ॥३॥सा एषा विद्युत् । (यद्) एतन्मण्डलं समन्तम्परिपतति तरसाम । अथ यत्परमतिभाति स पुण्यकृयायै रसः । तमभ्यतिमुच्यते ॥४॥ तदेतदभ्रातृव्य साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते । स यथेन्द्रो न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥५॥ १॥३०॥ नवमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। नवमोऽनुवाकस्समाप्तः । १६ स्थान खाली है-हन वाला, हत्तं । १ एवम् । २ तिप्रतिषियन्ति । ३. अनुष्-- । ४ नास्ति । ५ नत, त। ६नास्ति । ७ एताव, एता । ८ गम् । एतो। १० विदुः। ११-तृवि ॥

१ ३ यहां चोधा श्लोक (मन्त्र) अधिक है और साथ ही प्रतिहारण ( ३० ) अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् । स उ एवाऽप्येतहि । स यस्स आकाश इन्द्र एव सः । स यस्स इन्द्रस्सामैवतत्॥१॥ तस्यै- तस्य साम्न इयमेव प्राचीदिग्धिकार इयम्प्रस्ताव इयमादिरियमुद्री- थोऽसौ प्रतिहारोऽन्तरिक्षमुपद्रव इयमेवनिधनम् ||२॥ तदेतत्सप्त- विधं साम । स य एवमेतत्सप्तविध साम वेद यत्किञ्चमाच्यांदिशि या देवता ये मनुष्या ये पशवो यदनाचं तत्सर्वं हिङ्कारेणामोति ॥शा अथ यदक्षिणायां दिशि तत्सर्वं प्रस्तावेनामोति॥४॥ अथ यत्पतीच्या दिशि तत्सर्वमादिनामोति ॥५॥ अथ यदुदीच्यांदिशि तत्सर्वमुद्गीथेनामोति ॥६॥ अथ यदमुष्यां दिशितत्सर्वम्प्रतिहारेणा- मोति ॥७॥ अथ यदन्तरिक्षे तत्सर्वमुपद्रवेणामोति ॥ अथ यदस्यां दिशि या देवता ये मनुष्या ये पशवो यदन्नाद्यं तत्सर्व निधनेनामोति ॥शा सर्व हैवाऽस्याऽऽप्तम्भवति सर्व जित न हा- ऽस्य कश्चन कामोनातो भवति य एवं वेद ॥१०॥ स यद्धकिञ्च किचत्र विद्वानेषु लोकेषु कुरुते स्वस्य हैव तत्स्वतः कुरुते । तदे. नहचाऽभ्यनृच्यते ॥११॥ १॥३१॥ दशमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १ दीर् । २-त्- ३ एत् । ४ 'मनुष्या' अधिक है ! ५-या । 'प्रस्तावेन के स्थान में १७ अव्यात्' अधिक है। दक्षिणायांदिशि ॥

१ ३ यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतम्भूमीरुत स्युः। नत्या वज्रिन्सहस्र सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी इति ॥१॥ यद् धाव इन्द्र ते शतं शतम्भूमीरुतस्युरिति । यच्छतंद्यावरस्युश्शत- म्भूम्यस्ताभ्य एप एवाऽऽकाशो ज्यायान् ॥२॥नत्वा वजिन्सहस्रं सूर्या अन्विति । न ह्येतं सहस्रं चन सूर्या अनु ॥३॥ न जातमष्ट रोदसी इति । न ह्येतं जातं रोदन्ति । इमे इ वाव रोदसीताभ्या- मेष एवाकाशो ज्यायान् । एतस्मिन् होचते अन्तः॥४॥स यस्स आकाश इन्द्र एव सः । स यस्स इन्द्र एष एव स य एषतपति ॥५॥ स एषोऽभ्राण्यतिमुच्यमान एति । तद्यथैषोऽभ्राण्यतिमुच्यमान एसेवमेव स सवैस्मात्पाप्मनोऽतिमुच्यमान एति य एवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥६॥ १॥३२॥ दशमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । दशमोऽनुवाकस्समाप्तः । ५ ६ १ त्रित्साम चतुष्पात् । ब्रह्म तृतीयमिन्द्रस्तृतीयम्प्रजापति- स्तृतीयमममेव चतुर्थः पादः ॥२॥ तद्वै ब्रह्मस प्राणोऽथ य इन्द्र- १ १ नास्ति । २-यां। ३ नास्ति । ४-यन् । ५ नास्ति, स-स। १ स्थान खाली 'य' तक। ७-मानय, यमानय ।।.. शत्रित- ( ३३ ) ३ ४.. स्सा बागथ यः प्रजापतिस्तन्मनोऽनमेव चतुर्थः पादः ॥२॥ मन एव हिङ्कारो वाक्प्रस्ताव प्राण उद्गीथोऽन्नमेव चतुर्थः पादः ॥३॥ करोखेव वाचा नयति प्राणेन गमयति मनसा। तदेतन्निरुद्धं यन्मनः। तेन यत्र कामयते तदात्मानं च यजमानं च दधाति ॥४॥ अथाधि- दैवतम् । चन्द्रमा एव हिङ्कारोऽग्निः प्रस्ताव आदिस उद्गीथ आप एव चतुर्थः पादः । तद्धि प्रसक्षमन्नम् ॥५॥ ता वा एता देवता अमावास्यां रात्रि संयन्ति । चन्द्रमा अमावास्यां रात्रिमादिसम्भ- विशस्यादित्योऽग्निम् ॥ ६॥ तद्यत्संयन्ति तस्मात्साम । स ह वै सामवित्स साम वेद य एवं वेद ॥७॥ तासां वा एतासां देवतानामे- कैकैव देवता साम भवति.॥८॥ एष एवादित्यस्त्रिच्चतुष्पादश्मयो मण्डलम्पुरुषः । रश्मय एव हिङ्कारः । तस्मात्ते प्रथमत एवोधत- स्तायन्ते । मण्डलम्प्रस्तावः पुरुष उद्गीथो या एता प्रापोऽन्तस्स एव चतुर्थः पादः ॥॥ एवमेव चन्द्रमसो रश्मयो मण्डलम्पुरुषः । रश्मय एव हिङ्कारो मण्डलम्प्रस्तावः पुरुष उद्गीथो या एता आपोऽन्त स्सएव चतुर्थः पादः॥१०॥ चत्वार्यन्यानि चत्वार्यन्यानि। तान्यष्टौ। अष्टाक्षरा गायत्री गायत्रं साम ब्रह्म उ गायत्री । तदु ब्रह्माऽभि- सम्पद्यते । अष्टाशफाः पशवस्तनोपशव्यम् ॥११॥ २॥३३ ।। एकादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । २-देवत-1३-अम्। ४-मा। ५ सय्-11-७ नास्तिा उदार-त्री,॥

२ ३. (३३) अथाऽध्यात्मम्। इदमेव चतुस्त्रिच्चतुष्पाच्छुक्लं कृष्णम्पुरुषः। शुक्लमेव हिङ्कारः कृष्णम्प्रस्तावः पुरुष उद्गीथो. या इमा प्रापोऽन्तस्स एव चतुर्थः पादः॥१॥इदमादित्यस्यायनमिदं चन्द्रमस। चत्वारीमानि, चत्वारीमानि । तान्यष्टौ । अष्टाक्षरा गायत्री। गायत्रं साम ब्रह्म उगा- यत्री । तदु ब्रह्माभिसम्पद्यते । अष्टाशफाः पशवस्तनोपशव्यम्॥२॥ स यो ऽयम्पवते स एप. एव प्रजापतिः । तदेव साम। तस्यायं देवो योऽयं चतुषि पुरुषः । स एष आहुतिमतिमसोत्क्रान्तः॥३॥ प्रथ यावेतौ चन्द्रमाश्चादिसश्च यावेतावप्सु दृश्येते एतावेतयोर्देवौ ॥४॥ गद वा इदमाहुर्देवानां देवा इसते हो। त एत पाहुतिमतिमयो- त्क्रान्ताः ॥५॥ तद्ध पृथुन्यो दिव्यान्त्रासान्पभच्छ येभिर्वात इषितः प्रवाति ये ददन्ते पञ्च दिशस्समीची । पा आहुतीरत्यमन्यन्त देवा अपां नेतारः कतमे त श्रा सन्निति॥६॥ ते हे प्रत्यूचु रिमामेषाम्पृथिवीं वस्तएको- ऽन्तरिक्षम्पर्येको बभूव । दिवमेको ददते यो विधर्ता विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्त्यन्य इति ॥७॥ इमामेषाम्पृथिवीं १-पादू- २ नास्ति । ३-यते । ४ पता उ । ५ तान् । ६ एभिर् । ७. दशम, दश । ई। इसम-११० पराङ् । ११-ईच-१२-घसा।

( ३४ ) बस्तु एक इसग्निहसः ।।८||अन्तरिक्षम्पर्येकोबभूवेतिवायुह सः।। दिवमेको ददते यो विधर्तेऽसादियो ह सः ॥१०॥ विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्वन्य इति । एता ह वै देवता विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्ति चन्द्रमा नक्षत्राणीति । ता एतास्सामैव ससोव्यूटोऽनाधाय ॥११॥ एकादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । एकादशोऽनुवाकस्समाप्तः । अर्थतत्साम । तदाहुस्संवत्सर एव सामेति ॥१॥ तस्य वसन्त एव हिङ्कारः। तस्मात्पशवो वसन्ता हितरिक्रतस्समुदायन्ति ॥२॥ ग्रीष्मः प्रस्तावः । अनिरुक्तो वै प्रस्तावोऽनिरुक्त ऋतूनां ग्रीष्मः ॥शा वर्षा उद्गीथः । उदिव वै वर्षगायति ॥४॥ शरत्प्रतिहारः। शरदि ह खलु वै भूयिष्ठाओषधयः पच्यन्ते ॥शाहेमन्तो निधनम् । निधनकृता इव वै हेमन्मजा भवन्ति ॥६॥ तावतावन्तौ संधत्तः । एतदन्नन्तस्संवत्सरः। तस्यैतावन्तौ यद्धेमन्तश्चवसन्तश्च । एतदनु ग्रामस्थान्तौ समेतः । एतदनु निष्कस्यान्तौ समेतः।एतदन्यहि - गात्सर्यालयशये ॥सावधथा हवै निष्कस्समन्तं ग्रीवा अभिपर्यक्त Paikikaaryav taithi शिव, विधये । १५ अन्न-, 'न्न-'-याया। -करिडुतम्,-करिकृतस् । २ नास्ति । ३-तत् । ४ सवत्। । श्री--यत्तः।

॥दा
अथ
दम्रााण सम्प्लावयति स प्रस्तावः अथ यत् स्तनयति स उद्गीथः
( ३५ )
एमनन्तं साम । स य एवमेतदनन्तं साम वेदानन्ततामेव जर
११३५॥
द्वादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः ।
अथैतत्पर्जन्ये साम । तस्य पुरोकात एवं हिङ्कारः । अथ
यद्विद्योतते स प्रतिहारः। अथ यद्वर्षति तन्निधनम् ॥१
तदेतत्पर्जन्ये साम । स य एवमेतत्पर्जन्ये साम वेद वर्षको हार
पर्जन्यो भवति ॥२॥ अथैतत् पुरुषे साम । तस्यायमेव हिङ्कारे
ऽयम्प्रस्तावोऽयमुद्गीथोऽयम्प्रतिहार इदं निधनम् ॥३॥ तदेतत्पुरु
। स य एवमेतत्पुरुषे साम वेदोऽऽव एवं प्रजया पशुभिरा
रोहन्नेति ॥४॥ य उ एनत्यखग्वेद ये प्रसञ्चो लोकास्ताअयति
तस्यायमेव हिङ्कारोऽयम्प्रस्तावोऽयमुद्गीथोऽयम्प्रतिहार इदं निधनम्
ये प्रत्यञ्चो लोकास्ताञ्जयति ॥ य उ एनत्तिर्यग्वेद ये तिर्यञ्च
लोकास्ताअयति।तस्यलोमैव हिङ्कारस्त्वमस्तावो मांसमुद्गीथोऽसिस
प्रतिहारो मज्जानिधनम्॥६॥ तस्य त्रीण्याविर्गापति प्रस्ताव प्रतिहार
३
७ऽनन्ताम्।
१-पक्-२-षो । ३ प्रजा । ४ नं। ५ नास्ति । ६ एन, एनं
७-धुंच्-, 'म' अधिक है । ८ लाक्-१९ हिंकारं ॥

( ३६ ) निधनम् । तस्मात्पुरुषस्य श्रीण्यस्थीन्याविर्दन्ताश्च द्वयाश्चनखाः। ये तिर्यञ्चो लोकास्ताअयति ॥७॥ य उ एनत्संयग्वेद ये सम्यञ्चो सोकास्ताभयति । तस्य मन एव हिङ्कारोवाक्प्रस्तावः प्राण उद्गीथ. वस्तु प्रतिहार श्रोत्रं निधनम् । ये सम्यञ्चो लोकास्ताति॥५॥ अथतद्देवतासु साम । तस्य वायुरेव हिड्कारोऽग्निः प्रस्ताव आदिस उगीयश्चन्द्रमा प्रतिहारो दिश एव निधनम्॥सातदेतद्देवतासु साम । स य एतमेतद्देवतामुसाम वेद देवतानामेव सलोकतो जयति ॥१०॥ ६ द्वादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । वस्यैतास्तिस्रागा आग्नेय्येकैन्द्रयेका वैश्वदेव्येका॥१॥साया मन्द्रा साऽऽनयी । तया प्रातस्सवनस्योद्नेयम् । आग्नेयं वै प्रातस्स- चनमानेयोऽयं लोकः। स्वयाऽऽगया मातस्सवनस्योऽद्गायत्युनोतीम लोकम् ॥२॥ अथ या घोषिण्युपब्दिमती सैऽऽन्द्री । तया माध्य- न्दनस्य सवनस्योद्नेयम् । ऐन्द्रं वै माध्यन्दिनं सवन मैन्द्रोऽसौ नोकः । स्वयाऽऽगया माध्यन्दिनस्यसवनस्योद्गायत्यूनोसमुंलोकम् ।३।। अथ यो वीडयन्निव प्रथयन्निव गायति सा वैश्वदेवी । तया १ ऐक-२ऽऽन्न् । ३ नास्ति, सा" 'दू । ४ मनधी। 'लोकम् । ६-ब्दी के लिये स्थान खाली है। -एदिन। तिनं । स्या, घोषिणयु', भी लिखा है। नास्ति अथ १२ (३७) तृतीयसवनस्योद्नेयम् । वैश्वदेवं वै तृतीयसवनं वैश्वदेवोऽयमन्तस- लोकः । स्वयाऽऽगया तृतीयसवनस्योद्गायत्युनोतीममन्तरालोकम् ॥४॥ अथो उच्चा खल्लाहु रेकयैवाऽऽगयोद्नेयं यदेवास्य मध्यं वाच इति । तद्यया वैवाचा व्यायच्छमान उद्गायति तदेवास्यमध्यं वाचः। तया वा एतथा वाचा सर्वा वाच उपगच्छति। अव्यासिक्तामेकस्था श्रियमुनोति य एवं वेद ॥५॥ अथ या क्रौञ्चा सा बार्हस्पसा । स यो ब्रह्मवर्चसकामस्स्यात्स तयोगायेत् । तद्ब्रह्म वै बृहस्पतिः । तदै ब्रह्मवर्चसमृनोति तथा ह ब्रह्मवर्चसीभवति ॥६॥अथ ह चैकिता- नेय एकस्यैव साम्न आगां गायति गायत्रस्यैव । तदनवानं गेयम् । तत् सान्न एवा प्रतिहारादनवानं गेयम् । तत्माणो वै गायत्रम् । तद्वै प्राणमनोति । तथा ह सर्वमायुरोति ॥७॥ १॥३७॥ द्वादशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । अथ ह ब्रह्मदत्तं चैकितानेयमुद्गायन्तं कुरव उपोदुरुज्जहिहि साम दालभ्येऽति ॥१॥ स होऽपोद्यमानो नितरां जगौ । तं होचुः किमुपोद्यमानो नितरामगासीरिति ॥२॥ स होवाचेदं वै लोमेऽसे- -- -१०-यन्ति । ११ ताया । १२ सू, नास्ति । १३ 'वै गायत्रम् नीचे से ले के अधिक लिखा है। १४ 'साम' अधिक है। १ तश् । २ उजिहि । ३ सोमे ।

( ३८ ) ४ ६ देवैतत्पत्युपश्टरमः । तस्मादु ये नएतदुपावादिषुर्लोमशानीऽव तेषां स्मशानानि मवितारः । अथ वयमुदेव गातारस्स्म इति ॥३॥अथ ह राजा जैवलिर्गलूनसमाओकायणं शामूल पर्णाभ्यामस्थितम्पन- छर्चाऽऽगाता शालावसा३ साम्ना३ इति ॥४॥ नैव राजन्नृचेति होवाच न साम्नेति । तद्यूयं तर्हि सर्व एव पणाय्या भविष्यथ य ९ एवं विद्वाँसोगायतेति॥॥अथयद्धाऽवक्ष्यहचा च सान्नाचाऽऽगामे- ति धीतेन वैतद्यातवान्नाऽमलाकाण्डेनाऽऽगातेऽति हैनाँस्तदवक्ष्यत्। तद्ध तदुवाच स्वरेण चैव हिङ्कारेण चाऽऽगामेति ॥६।। १॥३८॥ द्वादशेऽनुवाकेचतुर्थः खण्डः। अथहसयाधिवाकश्चैत्ररथिस्सययज्ञम्पौलुषितमुवाच प्राचीन- योगेति मम चेद्वै त्वं साम विद्वान् साम्नाऽऽविज्यं करिष्यसि नैव तर्हि पुनर्दीतामभिध्यातासीति । मुहुर्दीक्षी ह्यास ॥१॥ स होवाच यो वै साम्नश्श्रियं विद्वान्सान्नाऽऽविज्यं करोति श्रीमानेव भवति । मनो वाव साम्नश्श्रीरिति ॥२॥यो वै साम्नः प्रतिष्ठां विद्वान्साम्ना- विज्यं करोति प्रसेव तिष्ठति । वाग्वाव साम्नः प्रतिष्ठेति ॥३॥ or ३ ४-उपाश्- ५-पुल् । ६-तार । ७ गळूनसम, गुळिनसम् । -त। पणाऱ्या । १.च प्रागमे ॥ १मच । २-क्षी । ३ मा।

( ३६ ) यो वै साम्नस्सुवर्ण विद्वान् साम्नाऽऽविज्यं करोयध्यस्य गृहे. सुचणी गम्यते । पालो बाब. साम्नस्सुवर्णमिति ॥४॥ यो वै साम्नो उपचितिं विद्वान्साम्नाऽऽविज्यं करोयपचितिमानेष भवति । चतु- वि साम्नोऽपचितिरिति ।। यो वै साम्नश्श्रुति. विद्वान्साम्ना- ऽऽविज्यं करोति श्रुतिमानेव भवति । श्रोत्रं वाव साम्नश्श्रुतिरिति ॥६॥ १३॥ द्वादशेऽनुघाके पञ्चमः खण्डः । द्वादशोऽनुवाकस्समाप्तः । १ चत्वारिवाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेऽङ्गन्यन्ति तुरीयं. वाचो मनुष्या. वदन्तीति ॥१॥ वागेव साम । वाचा हि साम गायति । वागेवोऽक्थम् । वाचा शुक्थं शंसति । वागेव यजुः । वाचा हि- यजुरनुवर्तते ॥२॥ तद्य- किंचाऽर्वाचीनम्ब्रह्मणस्तद्वागेव सर्वम्।अथयदन्यत्रब्रह्मोपदिश्यते। नैव हि तेनाऽऽविज्यं करोति । परोक्षणैव तु कृतम्भवति ॥३॥ ७ ४-हो। १-हानि । २-हितानी । ३ नास्ति । ४-क्त-५ वाचं । ने। ७ नास्ति ।

(४०) तस्या एतस्यै वाचो मनः पादश्चक्षुः पादश्रोत्रम्पादोवागेव चतुर्थः पादः ॥४॥ तद्यद्वैमनसा ध्यायति तद्वाचा वदति।यचतुषा पश्यति तद्वाचा वदति । यच्छ्रोत्रेण शृणोति तद्वाचा वदति ॥५॥ तद्यदे- तत्सर्व वाचमेवाऽभिसमयति तस्माद्वागेव साम । स ह वै सामवित्स साम वेद य एवं वेद ॥६॥ तस्या एतस्यै वाचः माणा एवाऽमुः। एषु हीदं सर्वमसूतोत ॥७॥ १४०॥ ११ 3 ૨ 2010 प्रयोदशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। तेन हैतेनाऽमुना देवा जीवन्ति पितरो जीवन्ति मनुष्या जी- वन्ति पशवो जीवन्ति गन्धर्वाप्सरसो जीवन्ति सर्वमिदं जीवति ॥१॥ तदाहुर्यदमुनेदं सर्वं जीवति कस्साम्नोऽसुरिति ।प्राण इति ब्रूयात्। प्राणो ह वाब साम्नोऽसः ॥२॥ स एष प्राणो वाचि प्रतिष्ठितो वागु माणे प्रतिष्ठिता। तावतावेवमन्योऽन्यस्मिन्प्रतिष्ठितौ । प्रतितिष्ठति य एवं वेदः ॥३॥ तदेतदचाऽभ्यनूच्यते- Haon.in चतुर्थः अधिक है। स्वादं । १० श्रुणोति । ११ऽहिंसम् । १२-- । १३ :असूले" के परे पषुः हीऽद सर्वे सूतेऽति' सब में लिखा है (नास्ति' ति)॥ १-न्तीति । र यदा । ३ येने। इदं अधिक है। -ये। मन्यस-७ प्रतिष्ठितः।

(४१ ) ८ अदितिौरदितिरन्तरिक्षमदितिमाता स पिता . स पुत्रः। विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदिति- जीतमदितिर्जनित्वम् ॥ इति ॥४॥ अदितिौरदितिरन्तरिक्षमिति । एषा वै घोरेपाऽन्तरिक्षम् ॥५॥ अदितिर्माता स पिता स पुत्र इति । एषा वै मातैषा पितैषा पुत्रः ॥६॥ विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना इति ।येदेवा असुरेभ्यः पूर्वे पञ्चजना श्रासन य एवासावादिये पुरुषो यश्चन्द्रमसि यो विद्युति योऽप्सु योऽयमक्षमन्तरेष एव ते । तदेषैव ॥७॥ अदिति- तिमदितिर्जनित्वमिति। एषा ह्येव जातमेषा अनित्वम् ॥८॥१॥४॥ त्रयोदशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। प्रयोदशोऽनुवाकस्समाप्तः। भारुणिर्ह वासिष्ठं चैकिलानेयम्ब्रह्मचर्यमुपेयाय । तं होवाचा- ऽऽजानासि सौम्य गौतम यदिदं वयं चैकितानयास्सामैवोपास्महे । का त्वं देवतामुपास्स इति । सामैव भगवन्त इति होवाच ॥१॥ ते ह पप्रच्छ यदग्नौ तद्वेत्या३ इति । ज्योतिर्वाएतत्तस्य सान्नीयद्वयं -रीक्स-1 ६ नास्ति, अदितिर्माता"अदितिरन्तरिक्षम । १०-च । ११-षो । १२-वैर् । १३-पम् । १४ इतिर्, इति ॥ १ (वाचा) आज । २।३-माह-इति । ४-सनहीं।५-वत। ता ।

सामोऽपास्मह इति ॥२॥ यत्पृथिव्यां तद्वेस्था३ इति । प्रतिष्ठा या एषा तस्य सानो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥३॥ यदप्सु तदस्था३ इति । शान्तिर्वा एषा तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥४॥ यदन्तरिक्षे तद्वेस्था३ इति । आत्मा वा एष तस्य सानो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥॥ यद्वायौ तद्रेत्याइति । श्रीर्वाएषा तस्य साम्रो यद्वयं सामोऽपास्मह इति ॥६॥ यदिक्षु तद्वेस्था३ इति । व्याप्तिर्वा एषा तस्य सानो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥७॥यदिवि तदेया३ इति । विभूतिर्वा एषा तस्य साम्नो यद वयं सामोपा- स्मह इति ॥॥ ॥४२॥ ११ ૧૨ चतुर्दशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। यदादिसे तद्वत्याः इति । तेजो वा एतत्तस्य साम्नी यद्वयं सामोपास्मह इति ॥१॥ यश्चन्द्रमसि तद्वेस्था३ इति । भा वा एषा तस्य साम्नो यद्यं ममोपास्मह इति ॥२॥ यन्नक्षत्रेषु तद्वेस्था३ इति । प्रज्ञा वा एषा तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥शा यद तद्वेस्थाश् इति । रेतो. पा एतत्तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह १ 'इति। ७ हाशिया पर लिखा है। एतस्य । ६ नास्ति यद् १.नास्ति सानो 'ऽप । ११-हा । १२ नास्ति ष":"स्मह ।। १ नास्ति । २ प्रजा । ३ नास्ति, एतत्' में 'तत्'।

( ४३ ) १० १.१ १२.१३ इति ।।४॥ यत्पशुषु तद्वेस्था३ इति । यशो वा एतत्तस्य साम्मों यद्वयं सामोपास्मह इति ।।शा यदृचि तद्वेस्था३ इति। स्तोमो वा ए' तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ।।६।। यद्यपि तद्वेस्था३ इति । कर्म वा एतत्तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥७॥ अथ कि उपास्स इति । अक्षरमितिकतमत्तदतरंमिति। यत्क्षरनाऽतीयते- ति । कतमत्तत् क्षरनाक्षीयतेति । इन्द्र इति ॥कतमस्स इन्द्र इति । योऽक्षत्रमत इति । कतमस्स योऽक्षबमत इति । इयं देवतेति होऽवाच ॥६॥ योऽयं चतुषि पुरुष एष इन्द्र एष प्रजापतिः । (स) समः पृथिव्या सम आकाशन समोदिवा समस्सर्वेणं भूतेन । एष रो दिवो दीप्यते । एष एवेदं सर्वमित्युपासितव्यः ॥१०॥ सय इत्तदेवं वेद ज्योतिष्मान प्रतिष्ठावाञ्छान्तिमानात्मवाञ्छीमान् याप्तिमान विभूतिमस्तेिजस्वी भावान् प्रज्ञावानेतस्वी यशस्वी सोमवान कर्मवानक्षरवानिन्द्रियवान सामन्वीभवति ॥१.शा हचाऽभ्यतूच्यते ॥१२॥ ॥४३॥ __ चतुर्दशमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ४ नास्ति । ५ वो। ६ स्ते- ७....."स्स' के लिये स्थान छोड़ा है । द् । अक्षर । १० च । ११ इन्द्रमत् ! १२ सो। १३ नास्ति। ५।१५ दिव्य-| १४-सीतव्यं । १७-ची । १८ स्तोमान् । १७ १ ३ २ ६ • . " ८ ( ४४ ) रूप-रूपम्प्रति रूपोबभूव तदस्य रूपम्प्रतिचक्षणाय। इन्दोमायाभिःपुरुरूप ईयते युक्ताह्यस्य हरयश्शतादश।। इति ॥२॥रूप-रूपम्मतिरूपो बभूवति । रूपं-रूपं ह्येषप्रतिरूपोबमूव ॥२॥ तदस्य रूपम्प्रतिचक्षणायेति । प्रतिचक्षणाय हाऽस्यैतद्रूपम् ॥२॥ इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयत इति । मायाभिषे एतत्पुरु रूप ईयते ॥४॥ युक्ता ह्यस्य हरयश्शता दशेति । सहस्रं हैत आदि- सस्य रश्मयः । तेऽस्य युक्तास्तैरिदं सर्वं हरति । तद्यदेतैरिदं सर्व हरति तस्माद्धरयः ॥५॥रूपं रूपम्मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानः परितन्वं स्वाम् । त्रिर्यदिवः परि मुहूर्तमागात् स्वैर्मन्त्रैरन्तुपा तावेति ॥६॥ रूपं-रूपम्मघवा बोभवीतीति । रूप-रूपं ह्येष मघवा बोभवीति ॥७॥ मायाः कृण्वानः परि तन्वं स्वामिति । मायाभिषेषएतत्स्वां त, गोपायति ॥८॥ त्रिर्यदिवः परिमुहूर्तमागादिति । त्रिह वा - एष एतस्य मुहूर्तस्येमाम्पृथिवीं समन्त: पर्येतीमा: प्रजास्संचक्षाण: शास्वैर्मन्त्रैरनृतुपाऋतावति। अनृतुपा ह्येष एततावा॥१०॥११४४ चतुर्दशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । १ पुरुर इप, पुरुरूपंार रम्यते।३-णा।४-पम्।५-पम्। रमीयते। ७ नास्ति, हरयशुः: "तेऽस्य । ६. म अधिक है। मुई-१० नास्ति, इति । ११ पुनः लिखा है, 'रूपरूपं वीत्तीति (1) ॥ १२ कश्वा। १३-मि । १४ शा१५ नास्ति ।१९ अति। १७ नृत्-। १८ भूता॥ १२ १ ३ ६ (. ४५ ) तद्ध. पृथुर्वैन्यो दिव्यान्वासान्पप्रच्छ-- इन्द्रमुक्थमृचमुद्गीथमाहुर्ब्रह्म सामं प्राणं व्यानम् । मनोवाचतुरपानमाहुश्श्रोत्रं श्रोत्रिया बहुधावदन्ती- ति ॥१॥ ते प्रत्यूचु:- ऋषय एते मन्त्रकृतः पुराजाः पुनराजायन्ते वेदानां गुप्त्यैकम् । ते वै विद्वांसो वैन्य तद्वदन्ति समानम्पुरुषम्बहुधा निविष्टम्, इति ॥२॥ इमां ह वा तद्देवतां त्रय्यां विद्यायामिमां समानामभ्येक पाप- यन्ति नैके । यो ह वावैतदेवं वेद स एवैतां देवतां सम्प्रति वेद ॥३॥ स एष इन्द्र उद्गीथः । स यदैष इन्द्र उद्गीथ आगच्छति. नैवोद्गातुश्चोपगातॄणां च विज्ञायते । इत एवोऽऽव॑स्स्वरुदेति । स उपरि मूों लेलायति ॥४॥ स विद्यादगमदिन्द्रो नेह कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशेक्ष्यत इति । तस्मिन् ह न कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशिष्यते ॥५॥ तदेतदभ्रातृव्यं साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते।सयथेन्द्रोन कंचन भ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव नकंचन भ्रातृव्यम्पश्यते यएतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति॥६॥१॥४॥ चतुर्दशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । चतुर्दशोऽनुवाकस्समाप्तः । १-इदम् । १ नो। ३ त्रा, तृा।४ ईमा। ५-ना। न्य् । ७ हये। ८य वैर-तृन्-१०'ति' अधिक करो। ११ ा १२ स्वर । १३ परिष-1 ( ४६ ) प्रजापतिर्वा वेद अग्र आसीत् । सोऽकामयत बहुस्स्याम्प्रजोयेय नूमानं गच्छेयमिति ॥१॥ स लोडशधाऽऽत्मानं व्यकुरुत भद्रं च. माप्तिश्चाऽऽभूतिश्च सम्भूतिश्च भूतं च सर्वं च रूपं चाऽपरिमितं | श्रीश्च यशश्च नाम चाऽग्रं च सजाताश्च पयश्चमहीयाच रसश्च १ ૨ २॥ तद्यद्भद्रं हृदयमस्य तत् । ततस्संवत्सरमसृजतः । तदस्यः वत्सरोऽनूपतिष्ठते ॥३॥ समाप्तिः कर्मास्य तत् । कर्मणा हि पामोति । तत ऋतूनसृजत । तदस्यतवोऽनूपतिष्ठन्ते ॥४॥ प्रा... तेरनमस्य तत् । ( तच् ) चतुर्धा भवति । ततो. मासानर्धमा- नहोरात्राण्युषसोऽसृजत। तदस्य मासा अधमासा अहोरात्रारायु- ऽनूपतिष्ठन्ते ॥५॥ सम्भूती रेतोऽस्य तद्। रेतसो हि सम्भव-:- ६ ॥६॥ ४६॥ पञ्चदशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । ततश्चन्द्रमसमसजत । तदस्य चन्द्रमा अनूपतिष्ठते । तस्मात्स प्रतिरूपः ॥१॥ भूतम्माणोऽस्य सः । ततो वायुमसृजत । य वायुरनूपतिष्ठते॥२॥ सर्वमपानोऽस्य सः। ततः पशूनराजत प पशवोऽनूपतिष्ठन्ते ॥३॥रूपं व्यानोऽस्य सः। ततः प्रजा १चे । २-याँ । ३-अन्ते । ४ 'त' अधिक है । ५ तद् । अंचर्धा, अर्धा । ७-ति, ता, त। १-त । २-ण । ३ रूपशवो।

( ४७ ) असजततदस्य प्रजा अनूपतिष्ठन्ते । तस्मादासु प्रजासु रूपाण्य- धिगम्यन्ते ।।४।। अपरिमितम्मनोऽस्य तत् । ततो दिशोऽसृजत । तदस्य दिशोऽनूपतिष्ठन्ते । तस्मात्ता अपरिमिताः।अपरिमितमिव हि मनःशा श्रीर्वागस्य सा । ततस्समुद्रमस्टजत । तदस्य समुद्रो- ऽनूपतिष्ठते ।।६। यशस्तपोऽस्य तत् । ततोऽग्निमसृजत । तदस्या- ऽग्निरनूपतिष्ठते । तस्मात्स मथितादिव सन्तप्तादिव जायते ॥७॥ १ ३ नाम चतुरस्य तत् ॥८॥४७॥ पञ्चदशेऽनुवाके द्वित्तीयः खण्डः । तत आदिसमजत । तदस्यादिखोऽनूपतिष्ठते ॥१॥ अग्र- म्मूर्धास्य सः। ततो दिवमस्जत । तदस्य द्यौरनूपतिष्ठते ॥२॥ सजाता भङ्गान्यस्य तानि । अङ्गैहि सह जायते । ततो वनस्पती- नसृजत । तदस्य वनस्पतयोऽनूपतिष्ठन्ते ॥३॥ पयो लोमान्यस्य तानि।तत ओषधीरसजतातदस्यौषधयोऽनूपतिष्ठन्ते ॥४॥ महीया माँसान्यस्य तानि । माँसहि सह महीयते । ततो. वयाँस्यसृजत । ... सदस्य वयाँस्यनूपतिष्ठन्ते । तस्मात्तानि प्रपतिष्णूनि प्रपतिष्णूनी- ४-यते । ५ नास्ति, ततो 'तस्मात् । नाति।७ सस्था। ८ मथितामिद, मथितिताद् ॥ १अंगान्य, अंगहान्य, अङ्गहा । २ ता । ३ गैर । ४ मास्ति, पयो" "अनूपतिष्ठन्ते । ५ मभिया, महिया। ६ ।

( ४६ ) १५ ។ व महामाँसानि ॥॥ रसो यज्जाऽस्य सः। ततः पृथिवीमस्जत। तदस्य पृथिव्यनूपतिष्ठते ॥६॥ स हैवं षोड़शधाऽऽत्मानं विकस साध समैत् । तद्यत्सार्धं समैतत् तत्साम्नस्सामत्वम् ॥७॥स एवैष हिरण्मयः पुरुष उदतिष्ठत्मजानां जनिता ॥८॥ ॥४८॥ पञ्चदशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। .. देवामुरा अस्पर्धन्त । ते देवाःमजापतिमुपाधावाअयामाऽसु- रानिति ॥२॥ सोऽब्रवीन वै मां यूयं विस्थ नाऽसुराः । यदै मां यूयं. विद्यात ततो वै यूयमेव स्यात पराऽसुराभवेयुरिति ॥२॥ तद्वै ब्रूहीऽसबुधन । सोऽब्रवीत्पुरुषः प्रजापतिस्सामेति मोऽपाद्धवम् । ततो 2 यूयमेव भविष्यथ पराऽसुरा भविष्यन्तीति ॥३॥ तम्पुरुषः प्रजापतिस्सामेऽत्युपासत । ततो वै देवा अभवन् पराऽसुराः । स यो हैक विद्वान्पुरुषः प्रजापतिस्सामेऽत्युपास्ते भवयात्मना पराऽस्य दिवम् भ्रातृन्यो भवति ॥४॥ १॥४६॥ पशवशेग्नुषाके चतुर्थः खण्डः । पञ्चदशोऽनुवाकस्समाप्तः ૨ ६-७महीम-मज्ज्या । सन्ते । १० समैत; तत्पश्चात, 'तद्यत्साधं समैतत् (1) पुनः है। ११ जयिता ॥ १पखार-पॅत । ३-हि ॥

-नि, नी ।।५५ पुनः । लिखा है। तेन । १०. शतनी । ( ४ ) देवा वै विजिग्याना अब्रुवन्द्रितीयं करवामहै । माऽद्वितीया भूमेति । तेऽब्रुवन सामैव द्वितीयं करवामहै । सामैव नो द्वितीय- मस्त्विति ॥१॥ त इमे द्यावापृथिवी अब्रुवन् समेतं साम मजनयत- मिति ॥२॥ सोऽसावस्या अबीभत्सत । सोऽब्रवीदहु वा एतस्यां किं च किं च कुर्वन्यधिष्ठीवन्सधिचरन्यध्यासते। पुनीतन्वेनामपूता वा इति ॥३॥ ते गाथामब्रुन्त्वया पुनामति । किं ततस्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते गाथयाऽपुनन् । तस्मादुत गाथया शते सुनोति ॥४॥ ते कुम्ब्यामब्रुवन् त्वया पुनामेति । किं तत- स्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते कुम्म्यया- ऽपुनन् । तस्मादुत कुम्ब्यया शतं मुनोति ॥शाते नारासँसीमब्रु- बन त्वया पुनामेति । किं ततस्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते नाराशस्याऽपुनन् । तस्मादुत नाराशस्या शतं सुनोति ॥६ते रैभीमब्रुवन् त्वया पुनामेति । किं ततस्स्यादिति । शतस- निस्स्या इति । तथेति । ते रैभ्याऽपुनन् । तस्मादुत रैभ्या शतं & विजिशाना । २ वाः । ३ सा । अधीहत- ५-विर- ११ - - ११-भिम् । १२ ता॥

( ५० ) मुनोति ॥७॥ सेयम्पूता । अथाऽमुमब्रवीबहु वै किं च किं च पुमांश्चरति । त्वमनुपुनीवेति ॥८॥ १॥५०॥ षोडशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । स ऐलबेनाऽपुनीत । पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि यजूंषि पूतमनूक्तम्पूतं सर्वम् भवति य एवं वेद ॥१॥ ते समेस साम प्राजनयताम् । तद्यत्समेस साम प्राजनयतां तत्सा- नस्सामत्वम् ॥२॥ तदिदं साम सृष्टमद उत्क्रम्य लेलायदतिष्ठत् । तस्य सर्वे देवा ममत्विन आसन्मम ममेति ॥३॥ तेऽब्रुवन्धीद- म्भजामहा इति । तस्य विभागे न समपादयन् । तान्प्रजापतिर- प्रवीदपेत । मम वा एतत् । अहमेव वो विभक्ष्यामीति ॥४॥ सोऽग्निमब्रवीत्त्वं वै मे ज्येष्ठः पुत्राणामसि । त्वम्प्रथमो वृणीष्वेति शा सोऽब्रवीन्मन्द्रं साम्नो णेऽन्नाद्यमिति । स य एतद्गायाद नाद एव सोऽसन्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्त- पवदादिति ॥६॥ अथेन्द्रमब्रवीत्त्वमनुवृणीष्वेति ॥७॥ सोऽब्र- ९ ११ १२ १३ तम्। -१-ल-1, ऐलवैनां । २-वाम् । ३ ग्रॅज्- ४-मत् । ५ मे । 'पीऽदम्' के लिये स्थान खाली. है, वीदां । ७ भविष्य्-८ श्रियम् । गायत्राच् । १० श्रीमान् । ११ अथ । १२ सोमम् ।

( ५१ ) चीदुर्ग सान्नो दृणे श्रियमिति । स य एतद्गायाच्क्रीमानेव सोऽस- न्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिति ॥८॥ अथ सोममब्रवीत्वमनुवृणीश्वति ॥६॥ सोऽब्रवीद्वल्गु सानो वृणे प्रियमिति । स य एतद्गायाप्रिय एव स कीर्तेः प्रियश्चतुषः प्रिय- स्सर्वेषामसन मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुप- वदादिति ॥१०॥ अथ बृहस्पतिमब्रवीत्वमनुसृणीष्वेति ॥११॥ सोऽब्रवीत्क्रौञ्चं साम्नो वृणे ब्रह्मवर्चसमिति । स य एतद्गायाब्रह्म- वर्चस्येव सोऽसन्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुप- चदादिति ॥१२॥ १५॥ षोडशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । अथ विश्वानदेवानबवीयूयमनुवृणीध्वमिति॥१॥तेऽब्रुवन्वैश्व- देवं सानो वृणीमहे प्रजननमिति । स य एतद्गायात्मजावानेव सोऽस- दस्मानु देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिति ॥२॥ अथ पशूनब्रवीद्यूयमनुवृणीध्वमितिः॥३॥ तेऽब्रुवन्वायुर्वा अस्माक- मीशे।सएवनो वरिष्यत इति। ते वायुश्च पशवश्चाब्रुवन्निरुक्तं साम्नो १३ वल्गु। १४ प्रियम् । १५ नास्ति, स य... "सोऽनचीद में। ११ गायत्रच् । १७ नास्ति । १८ नु- १ 'म' अधिक है । २ नीचे से 'च स वायु' अधिक लेता है। ३ वरिष्ठ । ४ अनिर- १ ३ ९. • ( ५२ ) वृणीमहे पशव्यमिति। स य एतद्गायात्पशुमानेव सोऽसदस्मानु च स वायुं च देवानापच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिति॥४॥ प्रय प्रजापतिरब्रवीदहमनुवरिष्य इति ॥५॥ सोऽब्रवीदनिरुक्तं सानो वृणे स्वय॑मिति । स य एतद्गायात्स्वर्गलोक एव सोऽसन्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिति ॥६॥ अथ वरुणमब्रवीत्वमनुवृणीष्वेति ॥७॥ सोऽब्रवीद्यद्वो न कश्चना- ऽटत तदुहम्परिहरिष्य इति। किमिति । अपध्वान्तं सानोहणेऽपश- सानो व्यमिति । स य एतद्गायादपथुरेव सोऽसन्मामुस देवानामृच्छाद्य एतद्गायादिति ॥८॥ तानि वा एतान्यष्टौ गीतागीतानि सान्नः । इमान्यु ह वै सप्तगीतानि । प्रथेयमेव वारुण्यागाऽगीता ॥६॥ स यां इ को चैवं विद्वानेतासां सप्तानामागानां गायति गीतमेवास्य भवत्येतानु कामाबाध्नोति य एतासु कामाः। अथेमामेव वारुणी- मागां न गायेत् ॥१०॥ २५२|| षोडशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । षोडशोऽनुवाकस्समाप्तः। ५-युथ् । इति' तक शेष नहीं दिखा । ७ ति । ८ स्वर्गम् । समुत्। १०-इप्य्-क-,यत। ११ अपडमातम, अपभ्मालम्। १२ पक्ष- १३ ऋद्धाद् । १४-थ, स्थ। १५-श् । १९ कामा । १७ नीरुन- निमोति।

( ५३ ) द्वयं वावेदमग्र आसीत्सच्चैवासच ॥३॥ तयोर्यत् सत् तत्साम तन्मनस्स प्राणः। अथ यदसत्सर्क सा वाक् सोऽपानः॥२॥ तधन्मनश्चपाणश्च तत्समानम् । अथयावाकूचापानश्चतत्समानम् । इदमायतनम्मनश्च प्राणश्चेदमायतनं वाक् चापानश्च । तस्मात्पुमा- दक्षिणतो योषामुपशेते ॥३॥ सेयमृगस्मिन् सामन् मिथुनमै- छत । तामपृच्छत् का त्वमसीति । साहमस्मीत्यब्रवीत् । अथ वा अहममोऽस्मीति ॥४॥ तद्यत्सा चाऽमश्चतत् सामाऽभवत तत्साम्नस्सामत्वम् ॥५॥ तौ वै सम्भवावेति । नेत्यब्रवीत्स्वसा वै मम त्वमस्यन्यत्र मिथुनमिच्छस्वोतिहासाऽब्रवीन वैतं विन्दा- मि येन सम्भवेयम् । त्वयैव सम्भवानीति। सा वै पुनीष्वत्यब्रवीत्। अपूतावा असीति ॥७॥ साऽपुनीत यदिदं विषा वदन्ति तेन । साऽब्रवीत्क्वेदम्भविष्यतीति। प्रत्यूहेत्यब्रवीत्। धीर्वा एषा।प्रजानां जीवनं वा एतद्भविष्यतीति । तथेति । तत्प्रत्यौहत। तस्मादेषाधीरेव प्रजानां जीवनमेव ॥८॥ पुनीष्वेत्यब्रवीत् । साऽपुनीत गाथया साऽपुनीत कुम्ब्यया साऽपुनीत नाराशस्या साऽपुनीत पुराणेति- १ म्यक-मस्यदद्य भवितेऽति, (अस्त्य) भवितेति। -ना। ३ उपवशेते । ४-म । सम्भवेत् । यम्। 'या' अधिक है। प्रा, रिमा । पत्वे । त्यन् । १०-म्भ-, 'वा' अधिक है।

(५४ ) ११ १२ १ हासेम साऽपुनीत यदिदमादाय नाऽऽगायन्ति तेन ॥१॥ साऽन- वीकेदम्भविष्यतीति । प्रत्यूहेत्यब्रवीत् । धीवी एषा । प्रजानां जीवनं वा एतद्भविष्यतीति । तथेति । तत्पत्यौहत् । तस्मादेषा धीव प्रजानां जीवनम्वेव ॥१०॥ पुनीष्ववेत्यब्रवीत्॥११॥१॥५३।। सप्तदशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । सा मधुनाऽपुनीत । तस्मादुत ब्रह्मचारी मधु नाऽश्नीयाद्वेदस्य पसाव इति । काम ह त्याचार्यदत्तमश्नीयात् ॥१॥ अथर्क सामा- ब्रवीबहु वै किं च किं च पुमाँश्चरति । त्वमनुपुनीष्वेति । स भरण्डकेष्णेनाऽपुनीत । पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि यजूंषि पूतमनूक्तम्पूतं सर्वम्भवति य एवं वेद ॥२॥ ताभ्यां सदो मिथुनाय पर्यश्रयन् । तस्मादुपवसथीयां रात्रि सदसि न शयीत । अत्र घेताहक्सामे उपवसथीयां रात्रिं सदसि सम्भवतः। स यथा श्रेय स उपद्रष्टैवं हि शश्वदीश्वरोऽनुलब्धः पराभवितोः ॥३॥ अथो आहुरुद्गातुर्मुखे सम्भवतः । उद्गातुरेव मुखं नेक्षे- ६ ११ इमम् । १२ मादायना, प्रादायना ॥ १. सारे पद का पुनर्लेख है । २ स 'कामम् के स्थान में। मा सर्वत्र है । ३ हरुण्डकेषणेना, भरण्ड, भरुण्डकोक्ष्णेना । ४-धन् । ५-धीयान-शीयाम । -ई । ७ यीत, येत । ८-- ७ -६ चद् । १० सुनुजय, अनुनुलुव- (५६) वेति ॥४॥ तदु वा आहुः काममेवोद्गातुर्मुखमीक्षेत । उपवसथीयामे- वैतां रात्रि सदसि न शयीत । अत्र होताहक्सामे उपवस्थीयां रात्रिं सदसि सम्भवत इति ॥॥ वां सम्भविष्यन्नाहाऽमोऽहम- स्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहम् । सा मामनुव्रता भूत्वा प्रजाः प्रज- नयावहै । एहि सम्भवावहा इति ॥६॥ तां सम्भवनत्यरिच्यत सोऽब्रवीन वै त्वाऽनुभवामि । विराड् भूत्वा प्रजनयालेति । तथेति ॥७॥ तौ विराड्भूत्वा प्राजनयताम् । हिङ्कारश्चाऽऽहावश्च प्रस्तावश्च प्रथमा चोद्गीथश्च मध्यमा च प्रतिहारश्चोत्तमा च निधन च षषदकारश्चैवं घिराद् भूत्वा प्राजनयताम् । ते अमुमजनयतां योऽसौ तपति । ते व्यद्रवताम् ॥८॥ १॥५४॥ सप्तदशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । मदध्यभू३न्मदध्यभू३दिति । तस्मादाडुमधुपुत्र इति ॥१॥ तस्मादुतस्त्रियो मधु नाऽश्नन्ति पुत्राणामिदं व्रतं चराम इति वदन्तीः ॥२॥ तदयं तृचोऽनूदश्रयत । इयमेव गायत्र्यन्तरिक्षं त्रिष्टुबसौ जगती । तस्यैतत्तृचः ॥३॥ स उपरिष्टात्सामाऽध्याहितं तपति । १९ १ ११ न । १२-थी-1१३ 'रण' अधिक है। १४-- १५ संभक्त । १६ प्रात्यरिच्यते । १७ हे..। १८ च । एवम् । १६ जून २० व्यहप्ताम, भ्यहवताम, व्यहपताम् (१)॥ १-या । २ इदम् । ३-ई- ६ C सोऽध्रुव इवासीदलेलायदिव । स नोर्बोइतपत् ॥४॥ स देवा- मब्रवीदुन्मा गायतति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं वा प्रयच्छेयम् । मामिह रहेतेति ॥५॥ तथेति । तमुदगायन् । तमेतदवाऽहन् । तेभ्यरिश्रयम्मायच्छत् । सैषा देवानां श्रीः॥६॥तत एतदूर्ध्वस्तपति। स नार्वाङतपत् ॥७॥ स ऋषीनब्रवीदनु मां गायतति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं वः प्रयच्छेयम् । मामिहहहेतोत॥चातथेवि। तमन्वगायन्। तमेतदत्रादहन। तेभ्यरिश्रयम्पायच्छत् । सैषा ऋषीणां श्रीः॥६॥ तत एतदर्वाङ् तपति । स न तिर्यङ् अतपत् ॥१०॥ स गन्धर्वाप्सरसोऽब्रवीदामा गायतति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं वः प्रयच्छेयम् । मामिहदहेतोते ॥११॥ तथेति।तमागायन। तमेतदत्राऽहिन् । तेभ्यश्श्रियम्मायच्छत् । सैषा गन्धर्वाप्सरसा श्रीः ॥१२॥ तत एतत् तिर्यङ् तपति ॥१३॥ लानि वा एतानि त्रीणि साम्न उद्गीतमनुगीतमागीतम् । तद्यथेदं वयमागायोगायाम एतदुद्गीतम् । अथ यद्यथागीतं तदनुगीतम् । अथ यत्किंचेति सा- म्नस्तदामीतम् । एतानि ह्येव-त्रीणि साम्नः ॥१४॥१॥५॥ सप्तदशेऽनुवाफे तृतीयः खगः । सप्तदशोऽनुवाकस्समासः । १ ४ -- ५ दुहेते।६ उदगात् । ७-हत्। ८ तप्रतिय्यंदू। १० । ११ ११ तियद । १२ प्रागयो, प्रागेयो-१३-थम् ।।

(.५७. ) ६ ७ आपो वा इदमग्रे महत्सलिलमासीत् । स ऊर्मिरूमिमस्कन्दत् । सतो हिरण्मयौ कुत्या समभवतां ते एवसामे ॥१॥ सेयमृगिंदै सामाऽभ्यप्लवत । तामपृच्छत का त्वमसीति । साहमस्मीयब्रवीत् । अथ वा अहममोऽस्मीति। तद्यत्सा चाऽमश्च तत्सास्नस्सामत्वम् ।।२।। तो वै सम्भवावेति । नेसब्रवीत्स्वसा वै मम त्वमसि । अन्यत्र मिथुनमिच्छस्वोति ॥३॥ सा पराप्लवत्त मिथुनमिच्छमाना । सा . समास्सहस्र सप्तती पर्यप्लवत ॥४॥ तदेष श्लोकः- स्त्री स्मैवाइग्रे संचरतीच्छन्ती सलिले पतिम् । समास्सहस्र, सप्तती स्ततोऽजायत पश्यत, इति ॥५॥ असौ वा आदियः पश्यतः । एष एव तदजायत । एतेन हि पश्यति ॥६॥ साऽवित्त्वान्यप्लवत । साऽब्रवीन वैतविन्दामि येन सम्भवेयम् । त्वयैव सम्भवानीति ॥७॥सा वै द्वितीयामिच्छ- १६. वसनवीन वै मैकोऽयस्यसीति । सा द्वितीयाँ वित्त्वा न्यप्लवत ॥८॥ (तृतीयाम् ) इच्छस्वैवेसनवीनो वाव मा २, उद्यस्यथ इति । सा तृतीयां वित्त्वा न्यलवत । सोऽब्रवीदत्र वै मोऽद्यस्यथेति १० ૧૨ १.१ १४. १५ १६ १७ १७ १८ १-द् । २ कुश्यौ । ३ येप । ४ कैसा-1 ५ ह्यप्ल-1 ६ पपरा- ७ सस्ती । -ति। ६ पश्यः । १० तम् । ११ पित्वा । १२ नास्ति न्यप्लवत । १३-यम् । १६ वै । १५ वा । १६ स्थान छोड़ा हुधा,है, ध्वे । १७ अब्-१८-स्यसी ।

( ५८ ) १९ १ २ ॥६॥ स यदेकयाऽग्रे समवदत तस्मादेकर्चे साम । अथ यद्वे अपा- सेपत्तस्माद्वयोर्न कुन्ति । अथ यत् तिसभिस्समपादयत् तस्माद तृचेसाम॥१०॥ता अब्रवीत्पुनीध्वंन पूतावै स्थेति ॥११॥ ११५६।। अष्टादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । सा गायत्री गाथयाऽपुनीत नाराशस्यात्रिष्टुब्रैभ्या जगती । भीमम्बत मलमपावधिषतेति । तस्माद्भगीमलाधियो वा एताः। धियो वा इमा मलमपावधिषति । तस्मादु भीमलाः । तस्मादु गायतां नाऽश्नीयात् । मलेन होते जीवन्ति ॥१॥ अथर्क सामाऽब्रवीद्रहु वै किं च किं च पुमाँश्चरति । वमनुपुनीष्वेति । स ऊर्ध्वगणेना- पुनीत ॥२॥ पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि यजृषि पूतमनूक्तम्पूतं सर्वम्भवति य एवं वेद ॥३॥ ताभ्यां दिशो मिथुनाय पर्योइन् । तां सम्भविष्यन्नह्वयताऽमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहमिति ॥४॥ तामेतदुभयतो वाचाऽखरिच्यत हिडारण पुरस्तातस्तोभेन मध्यतो निधनेनोपरिष्टात् । अतितिस्रो ब्राह्मणायनीस्सहशी रिच्यते य एवं वेद ॥शा तयोर्यस्सम्भवतो- १८-पद- २० तिन-1 २१ सम्प्-॥ १-स्योत् । २ ब । ३-थे । ४-ता । ५ऽग्नी-|| ७-तानी । ८-ता। भूक- १०-प्यन्य् । ११ श्रवचयत, प्रह्वयन्त । १२ साम १३-च । १४ त्याच्यते।

( 6 ) १९ २० रूवश्शूषोऽद्भवत् (माणास्) ते । ते पाणा एवो; अद्रवन ॥६॥ सोऽसावादिसस्स एष एव उदग्निरेव गी चन्द्रमा एव थम् । सामान्येव उदृच एव गी यजूंष्येव थमिसधिदेवतम् ॥७॥ अथा- ऽध्यात्मम् । प्राण एव उदागेव गी मन एव थम् । स एषोऽधिदेवत चाऽध्यात्मं चोद्गीथः । स य एवमेतदधिदेवतं चाऽध्यात्म चोद्गीथं वेदैतेन हास्य सर्वेणोद्गीतम्भवसेतस्मादु एवं सर्वस्मादा- वृश्च्यते य एवं विद्राँसमुपवदति ॥६॥ १॥५७॥ अष्टादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तद्यदिदमाहुः क उदगासीरिति क एतमादिसमगासीरिति ह वा एतत्पृच्छन्ति ॥२॥ एतं ह वा एतं त्रय्या विद्यया गायन्ति। यथा वीणागाथिनो गापयेयुरेबम् ।।२।। स एष हृदः कामानाम्पूर्णो यन्मनः । तस्यैषा कुल्या यद्वाक् ॥३॥ तथा वा अपो हृदात्कु- ल्ययोऽपरामुपनयन्येवमेवैतन्मनसोऽधि वाचोद्गाता यजमानम् यस्य कामान् प्रयच्छति ॥४॥ स य उद्गातारं दक्षिणाभिराराधयति १ ३ ६ ९ १५ चु-। १६ द्र-। १७ ऽद्धा- १८ गीथ्-। १६गी- २० भवत्येति, भवन्ति । १-सी । २ प्रच्छन्य । ३ नृय्या । ४-गायिनो, गायथ्-१५ हृदू- ६ कूल-1 ७ यत् । ८ वात् । -त्र । १० अदो । ११-यन्य,-यन्ते, -यन्त्य । १२-ना । १३ दक्षिणोभि । १४ राध्- १५ १६ १७ ૨ ૨ ६० ) तं सा कुल्योऽपधावति । य उ एन नाऽराधयति स उ तामापि- हन्ति ॥५॥ अथ वा अतः पत्तिश्चैव प्रतिग्रहश्च । तद्भूममिति वै मदीयते । तद्वाचा यजमानाय प्रदेयम्मनसाऽऽत्मने । तथा ह सर्वे ३० न प्रयच्छति ॥६॥ तद्यदिदं सम्भवतो रेतोऽसिच्यत तदशयत् । यथा हिरण्यमविकृतं लेलायदेवम् ॥७॥ तस्य सर्वे देवा ममात्विन अासन्मम ममेति । तेऽब्रुवन्वीदं करवामहा इति । तेऽब्रुवन् यो चा इदमस्मत् । आत्मभिरेवैनाद्विकरवामहा इति ॥८॥ तदात्मभिरेव व्यकुर्वत । तेषां वायुरेव हिङ्कार आसाऽग्निः प्रस्ताव इन्द्र आदि- स्सोमवृहस्पती उदगीयोऽश्विनौ प्रतिहारो विश्वे देवा उपद्रवः अजापतिरेव निधनम् ॥३॥ एता वै सर्वा देवता एता हिरण्यम् । अस्य सर्वाभिर्देवताभिस्स्तुतम्भवति य एवं वेद । एताभ्य उ एवस सर्वाभ्योदेवताभ्याच्यतेय एवं विद्वाँसमुपवदति॥१०॥११५८॥ अष्टादशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । अथ ह ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयः कुरुंजगामाऽभिप्रतारिणं काक्ष- सनिम् । स हाऽस्मै मधुपर्क ययाच ॥१॥ अथ हास्य वैप्रपद्य पुरो- १५ अधः । ११ प्रतिश् । १७ घु-1 १८ प्रात्- १६ सिध्य्- २० दश् । २१ अपि-अपितृतं । २२ या ।२३ सोमावृ-द।२४हिरण्य ।। १.कू, भारैन् । २ एफ में यहां हि समाप्ति है । ३-य । -- ६ हितोऽन्ते निषसाद शौनकः। तं हाऽनामन्त्र्य मधुपर्कम्पपौ ॥२|| से होवाच किं विद्वानो दाल्भ्याऽनामन्त्र्य मधुपर्कम्पिबसीति । सामवैर्यम्प्रपद्येति होवाच ॥३॥ तं हे तत्रैव पप्रच्छ यद्वा यौ तदेयाश्इति । हिजारो वा अस्य स इति ॥४॥ यदग्नौ तद्वत्था३- इति । प्रस्तावो वा अस्य स इति ॥५॥ यदिन्द्रे तद्वेस्था ३इति । आदिर्वा अस्य स इति ॥६।। यत्सोमबृहस्पयोस्तद्वेस्थाइति । उद- गीथो वा अस्य स इति ॥७॥ यदश्विनोस्तद्वेस्था ३इति । प्रतिहारो चा अस्य स इति ॥६॥ यद्विश्वेषु देवेषु तद्वेस्थाइति । उपद्रवों घा अस्य स इति ॥६॥ यत्मजापतौ तदेयाइति । निधनं वा अस्य तदिति होवाच । आर्षेय वा अस्य तद्वन्धुता वा अस्य सेति ॥१०॥ स होवाच नमस्तेऽस्तु भगवो विद्वानपा मधुपर्कमिति ॥१२॥ अथ हेतरः पप्रच्छ कि देवसं सामवैयम्प्रपद्योत। यद्देवसा- म् स्तुवत इति होवाचं तद्देवसमिति ॥१२॥ तदेतत् साध्वे प्रत्युक्तम् । व्याप्तिर्वा अस्यैषति होवाच ब्रह्मवेति । मेदं ते नमो- ऽकर्मेति होवाच । मैव नोऽतिमाक्षीरिति॥१३॥ स होवाचाऽप्रक्ष्य ११ १२ ४-मन्त्रः । ५ सामवर्या, 'र' रहित । ६ तत । ७ सोमाय- ८'द' का पुनर्लेख । ९ नास्ति । १० अव्य । ११-वत्या । १२सामवैय्या । १३-उत्तम् ।

३ वै। । ( ६२ ) बाव वा देवतामप्रक्ष्यं वाव त्या देवतायै देवताः । वाग्देवसं साम पाचो मनो देवता मनसः पशवः पशूनामोषधय ओषधीनामापः। तदेतदभ्यो जातं सामाऽप्मु प्रतिष्ठितमिति ॥१४॥ १॥५॥ अष्टादशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । देवामुरा अस्पर्धन्त । ते देवा मनसोदगायन् । तदेषामसुरा अभिद्रुस पाप्मना समसृजन । तस्माद्बहु किं च किं च मनसा ध्यायति । पुण्यं चैनेन ध्यायति पापं च ॥१॥ ते वाचोदगायन। तां तथैवाऽकुर्वन् । तस्मादहु किं च किं च वाचा वदति । सत्य चैनया वदसनृतं च ॥२॥ ते चतुषादगायन् । तत्तथैवाऽकुर्वन तस्माद्रहु किं च किं च चक्षुषा पश्यति । दर्शनीयं चैनेन पश्यस दर्शनीयं च ॥३॥ ते श्रोत्रेणोदगायन्।तत्तथैवाऽकुर्वन् । तस्माद्बहु के च किं च श्रोत्रेण शृणोति ।श्रवणीयं चैनेन शृणोत्यश्रवणीय । ॥४॥ तेऽपानेनोदगायन् । तं तथैवाऽकुर्वन् । तस्मादहु किं च चाऽपानेन जिघति । सुरभि चैनेन जिघ्रति दुर्गन्धि च ॥५॥ 'माणेनोदगायन् । अथामुरा आद्रवस्तथा करिष्याम इति न्यमामाः ॥६॥ स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवमेवाऽसुरा १४ भ्यो। गाय-1 २-द्रक्ष्य अथवा-द्रत्य । ३-सज्-४ व । ५ कूर- ९ ( ६३ ) व्यबसन्त । स एषोऽइमाऽऽखणं यत्माणः ॥७॥ स यथाऽश्मान- पाखणमृत्वा लोष्टो विध्वसत एवमेव स विध्वंसते य एवं विद्वा- ૧ ર समुपवदति ॥८॥ १६॥ अष्टादशेऽनुवाके पश्चमः खण्डः । अष्टादशोऽनुवाकस्लमाप्तः। [ इति प्रथमोऽध्यायः।] १० सते, षन्ता । ११-णों । १२ ध्याणम् ।

अथ द्वितीयोऽध्यायः ।] देवानां वै षडुद्गातार आसन् वाक् च मनश्च नतुश्च चाऽपानश्च प्राणश्च ॥१॥ तेऽध्रियन्त तेनोद्गात्रा दीक्षामहै पहत्य मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्गलोकमियामेति ॥२॥ तेऽब्रुवन् द्गात्रा दीक्षामहा इति । ते वाचोद्गात्राऽदीक्षन्त । सयदेव वदति तदात्मन आगायदथ व इतरे कामास्तान्देवेभ्यः॥३॥ प्माऽन्वसृज्यत । स यदेव वाचा पापं वदति स एव स ॥४॥ तेऽब्रुवन् न वै नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षी। द्गात्रा दीक्षामहा इति ॥५॥ ते मनसोद्गात्राऽदीक्षन्त । स मनसा ध्यायति तदात्मन आगायदथ यइतरेकामास्तान्देवे- ॥६॥ तत्पामाऽत्वसृज्यत । स यदेव मनसा पापे ध्यायति ६ स पाष्मा ॥७॥ तेऽब्रुवन् नो न्वाव नोऽयम् मृत्यु न नमत्यवाक्षीत् । चतुषोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥माते चतुषो. दीक्षन्त । स यदेव चक्षुषा पश्यति तदात्मन आगायदथ य कामास्तान्देवेभ्यः ॥६॥ तत्याप्माऽत्वसृज्यत । स यदेव पापम्पश्यति ( स एव स पाप्मा)॥१०॥तेऽब्रुवन्नोन्वाव २'य' अधिक है। ३-त्यु।४नवीन ।५न्वाभवत्यत्-७-मान्- ( ५ ) नोऽयम्मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । श्रोत्रेणोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१.१॥ ते अंत्रणोद्गात्राऽदीक्षन्त । स यदेव श्रोत्रेण शृणोति तदात्मन आगायदथ य इतरे कामारतान्देवेभ्यः॥१२॥तत्पाप्मा- ऽन्वरज्यत । स यदेव श्रोत्रेण पापं ऋणोति स एव स पाप्मा ॥१३॥ तेऽब्रुवन्नो न्वाव नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । अपानेनोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१४॥ तेऽपानेनोगात्राऽदीक्षन्त । स यदेवाऽपानेनाऽपानिति तदात्मन ागायदथ य इतरे कामा- स्तान्दवेभ्यः ॥१५॥ तम्पाप्मावरूज्यत । स यदेवाऽपानेन पाएं गन्धमपानिति स एव स पाप्मा ॥१६॥ तेऽब्रुवन् नो न्वाव नोऽय- मृत्युं न पाप्मानमसवातीत् । माणेनोद्गात्रा दीक्षामहा इति॥१७॥ ते प्राणेनोद्गात्राऽदीक्षन्त । स यदेव प्राणन माणिति तदात्मन आगायदय यइतरेकामास्तान्देवेभ्यासातम्पाप्माना.कन्यत। न ह्येतेन प्राणन पापं वदति न पापं ध्यायति न पापम्पदयात न पापं ऋणोति न पापं गन्यमपानिति ।।१६ातेनाऽपहस गृत्युमपहल पाप्मानं स्वर्ग लोकमायन् । अपहस हैव मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमति य एवं वेद ॥२०॥२॥१॥ प्रथमेतु के प्रथमः खण्डः । ८अपरीिति। -- ता या सा वागासीत्सोऽग्निरभवत् ॥२॥ अथ यत्तन्मन इ स चन्द्रमा अभवत् ॥२॥ अथ यत्तच्चतुरासीत् स योऽभवत् ॥३॥ अथ यत्तच्छ्रोत्रमासीत्ता इमा दिशोऽभवन् । व विश्वेदेवाः॥४॥अथयस्सोऽपान आसीत्सबृहस्पतिरभवत्। वाचो बृहसै पतिस्तस्माद्धृहस्पतिः ॥५॥ अथ यस्स प्राण स प्रजापतिरभवत् । स एष पुत्री प्रजावानुनीयो यः प्राणः। वर एव प्रजाः। प्रजावान्भवति य एवं वेद॥६॥ तं हैतमके वि गायन्ति प्राणाप्राणा३प्राणा३ हुम्भा ओवा इति॥७॥ वाच शाट्यायनिस्तत एतमर्हति प्रसक्षं गातुम् । यद्वाव १ ૨ करोति तदेतदेवाऽस्य कृतम्भवतीति ॥८॥ अथ वा अत म्नोरेव प्रजातिः । स यद्धिङ्करोखभ्येव तेन क्रन्दति । अथ सैव तेन प्लवते । अथ यदादिमादत्ते रेत एव तेन सिञ्चति। दुद्गायति रेत एव तेन सिक्तं सम्भावपति । अथ यत्पति- रेत एव तेन सम्भूतम्यवर्धयति । अथ यदुपद्रवति रेत एव द्धं विकरोति।अथ यन्निधनमुपैतिरेत एव तेन विकृतम्प्रज- १ यत् । २ अतम, अथ। ३ कुर्वति । ४ए । ५-मत्-, नास्ति स्थ प्रत्प्रतिहरति ।

( ६७ ) नयति । सैषसानो प्रजातिः ॥६॥ स य एवमेतामुक्सानोः प्रजाति वेद प्र हैनमृक्सामनी जनयतः ॥१०॥ २॥२॥ प्रथमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । प्रथमोऽनुवाकरूमाप्तः ॥ १ २ ६ एष एवेदमग्र आसीय एष तपति । स एष सर्वेषाम्भूतानां तेजो हर इन्द्रियं वीर्यमादायोय उदक्रामत् ॥२॥ सोऽकामयते- कमेवाऽक्षरं स्वादु मृदु देवानां बनामति ॥२॥ स तपोऽतप्यतं । स तपत्तप्वैकमेवाऽक्षरमभवत् ॥३॥ तं देवाश्चर्षयश्चोपसमैप्सन् । अथेषोऽसुरान्भूतहनोऽसृजततस्य पाप्मनोऽनन्यागमाय ॥४॥ तं वाचोपसमैप्सन् । ते वाचं समारोहन् । तेषां वाचम्पर्यादत्त । तस्मात्पर्यादत्ता वाकू। ससं च ह्येनया वदसनृतं च ॥१॥ तम्म- नसोपसमैप्सन् । ते मनस्समारोहन् । तेषाम्मनः पर्यादत्त । तस्मात्पर्यादत्तम्मन[:]स् । पुण्यं च ह्यनेन ध्यायति पापं च ॥६॥ ते चतुषोपसमैप्सन् । ते चतुस्समारोहन् । तेषां चतुः पर्यादत्त । तस्मात्पर्यात्तं चतुः। दर्शनीयं च ोनेन पश्यत्यदर्शनीयं च ॥७॥ ६ सानोः, सानोः। १स । २-षा । ३.मदु । ४ नास्ति । ५ पति । ६ ऐवा। ७ ' उदेवानाम् ' पूर्व से पुनः है। ८ पर्यतं ।

है ते श्रीत्रणोपसमैप्तन् । ते श्रोत्रं समारोहन । तेषां श्रोत्रम्प-दत्त । तस्मात्पर्यातं श्रोत्रम् । श्रवणीयं चनेन शृणोस श्रवणीयं च ॥८॥ रामपानेनोपसमैप्सन् । तेऽपान समारोहन् । तेषामपानम्पर्यादत्त । तस्मात्पर्यात्तोऽपानः । सुरभि च होनेन जिवाति दुर्गन्धि च ॥६॥ तम्बाणेने पसंमेप्सन् । तत्राणेनोपसमाप्नुवन् ॥१.०॥ अथाऽसुरा भूतहन पाद्रवन्मोहयिष्यामः इति मन्यमानाः ॥११॥ स यथा- इमान्मृत्वा लोष्टो विध्वंसतैवमेवाऽसुरा व्यध्वसन्त । स एषोऽरमा- खणो यत्पाणाः ॥१२॥ स यथाऽस्मानमारणमृत्ला लोष्टो विध्वंसत एवमेव स विध्वंसते य एवं विद्वांसमुपवदति।।१३।।२।३।। तीयेऽनुबाके प्रथमः खण्डः । स एष वशी दीप्तान उद्गीथो यत्पाणः । एष हीदं सर्व वशेकुरुते || वशी भवति वशे खान्कुरुते य एवं वेद । अस्य ह्यसावग्रे दीप्यते ३ अमुभ्य वासः ॥२॥ तं है।मुद्गीथं शाट्यायनिराचष्टे वशी दीवान इति । दीप्तामा ह वा अस्य कीर्तिवति य एवं वेद ॥३॥ आभूतिरिति कारीगदयः प्राणं वा अनुमजाः पशव भवन्ति । “सय एवमेतमाभूतिरित्युपास्त ऐवमाणेन प्रजया पशुभिर्भवति।।४॥ पयोत्त, पर्याप्त । १ एषाँ त हदं सर्व वशेकुरुते ऐसा पाठ देते हैं। २-शो । ३ऽमुष्-प्रतः। १ ३ ४ (६) ६ ७ सन्मतिरिति सात्ययज्ञयः । प्राणं वा अनुमजाः पशवरसम्भवन्ति। स य एवमेतं सम्भूतिरित्युपारते समे [व] प्राणेन प्रजया पशुभि- भाति ॥२॥ प्रभूतिरिते शैन । प्राण वा अनुसनाः पशयः प्रभवन्ति । स य एवमेतन्मभूतिरित्युपारते भैव प्राणेन प्रजया शुभिर्भवति ॥६॥ भूतिरिति भाल्लविनः । प्राणं वा अनुप्रजाः परातो भवन्ति । स य एपमेतन्भूतिरित्युपास्ते भात्येव प्राणेन प्रनमा पशुभिः ॥॥ अपरोधोऽनपरुद्ध इति पार्ण शैलनः । एष धन्यमपरुणद्धि नैतमन्यः। एष ह वाऽस्य द्विषन्तम्भ्रातृव्यम- परुणाद्ध य एवं वेद ॥८॥ द्वितीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । एकपोर इत्यारुणेयः । एको बवैव वीरो यत्माणः । प्रा हा ऽस्यको वीरोवार्यवाआयते य एवं वेद ॥१॥एकपुत्र इति चेकितानेयः। एको ह्यष पुत्रो यत्साणः ॥२॥ स उ एव द्विपुत्र इति । द्वौ हि माणापानौ ॥३॥ स उ एव त्रिपुत्र इति । त्रयो हि प्राणोऽपानो ११ १२ १ ४ ध्यानः ॥४॥ स उ एव चतुष्पुत्र इति । चत्वारो हि प्राणोऽपानो ५-भूर् । ६ शलि-1 ७ पजया अधिक है । र । ९ अरोद्धा। १०-णद्वि । ११ से । १२-त । १३-बन-1 १-रु । २ त्य। -एय, क. केरथान में सर्वत्र 'एका ४-२ । ५द्वि- ( .७० :) ७ न्यानस्समानः॥॥ स उ एव पञ्चपुत्र इति। पञ्च हि प्राणोऽपानो व्यानस्समानोऽवानः ॥६॥ स उ एव षट्पुत्र इति । षड्हि प्राणो- ऽपानो व्यानस्समानोऽवान उदानः ॥७) स उ एव सप्तपुत्र इति सप्त हीमे शीर्षण्याः प्राणाः ॥८॥ स उ एव नवपुत्र इति सप्त हि शीर्षण्याः प्राणा द्वायवाञ्चौ ॥६।। स उ एव दशपुत्र इति । सप्त- शीर्षण्याः प्राणा द्वाववाचौ नाभ्यां दशमः ॥५०॥ स उ एव बहुपुत्र इति । एतस्य हीयं सर्वाःमनाः॥११॥ एतं ह स्म वैतदुद्गीथं विद्सः पूर्वेब्राह्मणाः कामागायिन आहुः कति ते पुत्रानागास्याम इति ॥१२॥२१॥ द्वितीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । स याद ब्रूयादेकम्म आगायेति प्राण उद्गीथ हाते विद्वाने कम्मनसा ध्यायेत् । एको हि प्राणः । एकोहाऽस्याऽऽजायते ॥२१॥ स यदि ब्रूयाद्वौ म आगायेति प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वान्द्रौ मनसा ध्यायेत्। द्रौ हि प्राणापानौ द्वौ हेवाऽस्याऽऽजायते।।२।।स यदि छूयाबीन्म प्रा- गायेति पाणउद्गीथ इत्येव विद्वाँस्त्रीन्मनसा ध्यायेत् । त्रयो हि प्राणो १ । -ना । ७ अभि । ८-अ । ६ वसुपुत्र । १० यम, दयम् । ११-न । १ ऐक-। २ प्रयो । ३ 'व्यान' अधिक है । ४ ‘स हैवाऽस्याऽजा- पन्ते अधिक है। ५मन ।

( ७१ ) ६ ६ ऽपानोव्यानः। त्रयो हैवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥३॥स यदि ब्रूयाचतुरोम पागायेति प्राणा उद्गीथ इत्येव विद्वाँश्चतुरो मनसा ध्यायेत् । चत्वारो हि प्राणोऽपानो व्यानस्समानः । चत्वारो हैवास्याऽऽजायन्ते ॥४॥ स यदिब्रूयात्पञ्च म आगायेति प्राणउद्गीथइत्येव विद्वानपञ्चमनसा ध्यायेत् । पञ्चहिमाणोऽपानो व्यानस्समानोऽवानः। पञ्च हैवाऽस्या जायन्ते ॥॥ स यदि ब्रूयात् षण्म आगायेतिमाणउद्गीथ इत्येव विद्वान् षण्मनसा ध्यायेत् । पाढे पाणोऽपानोव्यानस्समानोऽवान उदानः।षड्ढेवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥६॥ स यदि ब्रूयात्सप्तमागा- येति पाणउद्गीथ इत्येव विद्वान् सप्तमनसा ध्यायेत् । सप्त हीमे शीर्षण्याः प्राणाः । सप्त हैवाऽस्याऽजायन्ते ॥७॥ स यदि बयानव म आगायेति प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वान्नव मनसा ध्यायेत् । सप्त शीर्षण्याः प्राणा द्वाववाचौ । नव हैवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥८॥स यदिब्रूयादश म आगायति प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वान्दश मनसा ध्यायेत् । सप्त शीर्षण्याः प्राणा द्वाक्वाञ्चौ नाभ्यां दशमः। दश हैवा ऽस्याऽऽजायन्ते ॥६॥स यदिब्रूयात्सहसम्म आगायोति प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वान् सहसम्मनसा ध्यायेत् । सहस्रं हैत आदित्यरश्मयः। तेऽस्य पुत्रः । सहस्रहवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥१०॥ एवं हैवैतमुद्गीथ नास्ति ।स यदि म्यानम्।७मि। दे। द्वा । १० । ११ ह । ९ ( २ ) १२ मर पाहणार कक्षीवाँस्वसदस्युरिति पूर्व महाराजाश्श्रोत्रियास्सह- सपुत्रगुपनिषेदुः । ते ह सर्व एव सहस्रपुत्रा आसुः॥१॥स य एवं पेद सहवं हैवाऽस्य पुत्रा भवन्ति ॥१२॥ २।६।। द्वितीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। द्वितीयोऽनुवाकरसमाप्तः । ૨ ३ ६ ९ ११ ૧ ૨ ૧૨ शर्यातो वै मानवः प्राच्यां स्थल्यामयजत । तस्मिन हमा- न्युद्गीयेऽपिवषिरे ॥१॥ तं देवा बृहस्पतिनोद्गात्रा दीक्षामहा इति पुरस्तादागच्छन्नयं त उद्गायविति । वम्बेनाऽऽजद्विषण पितरो दक्षिणतोऽयं त उद्गायत्वित्युशनसा काव्येनाऽसुराः पश्चादयं त उद्गायविसयास्येनाऽङ्गिरसेन मनुज्या उतरतो- ऽयं त उद्यविति ॥२॥ स हे ज्ञांच होना पृछानि ॥ कियतो वा एक ईशे कियत एकः कियत एक इति॥।॥स होवाच बृहस्पतिं यन्मेत्वमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥ ॥ स होवाच देवे- वेव श्रीस्स्याद्देवेष्वीशा स्वर्गमुत्वालोकं गमयेयमिति ॥॥ अय होवाच बम्बमाजद्विपम्पन्मेत्वमुद्गायः किं ततस्स्यादति ॥६॥स • १२ जेंश् । १३ यद् । १ शय्पा- २ स्थायाम् । ३ अजयत । ४ ऽपिसअम् । ५ऐशिरे । बिम्ब-१७ दक्षणनो। ८ कांस्पेना।-१०श्चातः । ११ अमांडस्पेन, अहिस्येना। १२ कियो । १३-तिः। १४ श्रियम्'अधिक है। १५ तारित, स होवाच 'ततस्स्यादित १ - २१ ( ७३ ) होवाच पितृष्वेव श्रीस्स्यापितृष्वीशा स्वर्गमु त्वालोकंगमयेयमिति ॥७॥अथ होवाचोशनसं काव्यं यन्मे त्वमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥८॥ स होवाचाऽसुरेष्वेव श्रीस्स्यादसुरेष्वीशा खर्गमु त्वां लोकं गमयेयमिति॥॥ अथ होवाचायास्यमाङ्गिरसं यन्मे त्वमुगायेः किं ततस्स्यादिति ॥१०॥ स होवाच देवानेव देवलोकेदध्याम्मनुष्या- न्मनुष्यलोके पितॄन पितृलोके नुदेयाऽस्माल्लोकादमुरान वर्गमु त्वा लोक गमयेयामिति ॥११॥२७॥ तृतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । स होवाच त्वं मे भगव उद्गाय य एतस्य सर्वस्य यशो[ऽसीति ॥१॥ तस्य हास्यास्य एवोजगौ । तस्मादुद्गाता व्रत उत्तरतो निवेशनं लिप्सेत । एतद्ध नाऽऽरुद्ध निवेशनं यदुत्तरतः ॥२॥ उत्तरत भागतो यास्य आङ्गिरसशर्यातस्य मानवस्योजगौ । स माणेन देवान्देवलोके दधादपानेन मनुष्यान्मनुष्यलोके व्यानेन पितॄन् पितृलोके हिङ्कारेण वज्रेणाऽस्माल्लोकादमुराननुदत ॥३॥ सान होवाच दूरं गच्छतेति । स दूरो ह नाम लोकः। तं ह जग्मुः। त एतेऽसुरा असम्भाव्यम्पराभूताः ॥४॥ छन्दोभिरेव पाचा १६ य । १७ जे । १८-शाः । १९ न्वं । २०-ध्यात् । २१-ॉन् । २२ 'उ' अधिक है। २३ है ॥ १-शस । २-तृन् । ३असंहोयम्- ( ७४ ) शर्यातम्मान स्वर्ग लोकं गमयांचकार ॥शा ते होचुरमुरा एततं वेदाम यो नोऽयामस्थमधत्चति । तत आगच्छन् । तमेसाऽपश्यन् ॥६॥ तेऽब्रुवनयं वा आस्य इति । यदब्रुवन्नयं वा प्रास्य इति तस्मादय- मास्यः । अयमास्यो ह वै नामैषः । तमयास्य इति परोक्षमाच- क्षते ॥७॥ स प्राणो वा अयास्यः। प्राणो ह वा एनान स नुनुदे ॥८॥ स य एवं विद्वानुद्गायति प्राणेनैव देवान्देवलोके दघासपानेन मनुष्यान्मनुष्यलोके व्यानेन पितॄन् पितृलोके हिङ्कारणेव वज्रेणाऽस्माल्लोकाविषन्तम्भ्रातृव्यं नुदते ॥धारा८॥ तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तं ह ब्रूयाद्दुरं गच्छति । स यमेव लोकममुरा अगच्छंस्तं हैव गच्छति ॥१॥छन्दोभिरेव वाचा यजमानं स्वर्ग लोकं गमयति ॥२॥ ता एता व्याहृतयः। प्रेसोति वा[इति] भूर्भुवस्तारित्य[उदिति]॥३॥ तद्यत्मेति तत्माणस्तदयं लोकस्तदिमलोकमस्मिलोक आभजति॥४॥ एयपानस्तदसौ लोकस्तदमुं लोकममुष्मिलोक आभजति ॥५॥ वागितिं तद्ब्रह्म तदिदमन्तरिक्षम् ॥६॥ भूर्भुवस्वरिति सा त्रयी- विद्या ॥७॥ उदिति सोऽसावादिसः । तद्यदुदित्युदिव श्लेष- ४ रॉय्या-1 ५ त ।-छस् । ७-असो।८ पान-1 पहिंक्- Pri १०-बान्॥ १-या।२स्या-३सतू ।

( ७५ ) ६ यति ॥८॥ तद्यदेकमेवाऽभिसम्पद्यते तस्मादेकवीरः । एको ह तु सन्वीरो वीर्यवान् भवति । आहाऽस्यैको वीरो वीर्यवान जायते य एवं वेद ॥८॥ तदु होवाच शाब्यायनिर्बहुपुत्र एष उद्गीथ इसे- वोपासितव्यम् । बहवो ह्येत आदिस रश्मयस्तेऽस्य पुत्राः । तस्मा- दहुपुत्र एष उद्गीथ इसेवोपासितव्यमिति ॥१०॥६॥ तृतीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः । ९ १ देवासुरास्समयतन्तेयाहुः । न ह वै तद्देवासुरास्सम्यतिरे । प्रजापतिश्च ह वै तन्मृत्युश्च सम्यताते ॥१॥ तस्य ह प्रजापतेर्देवाः प्रियाः पुत्रा अन्त मासुः । तेऽधियन्त तेनोगात्रा दीक्षामहै येना- ऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमियामेति ॥२॥ तेऽब्रुवन्वा- चोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥३॥ ते वाचोद्गात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं वागागायद्यदिदं वाचा वदति यदिदं वाचा मुअते ॥४॥ ताम्पाप्माऽन्वसृज्यत। स यदेव वाचा पापं वदति स एव सपाप्मा॥॥ तेऽब्रुवन् न वै नोऽयम्मृत्युं न पाप्मानमत्यवाक्षीत् । मनसोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥६॥ ते मनसोद्गात्रा दीक्षन्त । तेभ्य इदम्मन 114 iv... ४श्येष्-५-ए।६-यावान् । ७-ए (इत्य)। आदित्यस्य। त॥ १-याय । २'नोन्द्रामा दीक्षामहा इति' अधिक है पर 'से और 'भ्य' के बीच खाल रङ्ग से काटा गया है। ३ अवस्थ-।

( ७६ ) 1 आगायद्यदिदम्मनसा ध्यायति यदिदम्मनसा भुते ॥७॥ तत्पा- प्माऽन्वसृज्यत । सयदेव मनसा पापं ध्यायति स एव स पाप्मा ॥८॥ तेऽब्रुवन्नान्वाव नोऽयं मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । चक्षुषोगात्रा दीक्षामहा इति ॥६॥ ते चतुषोगात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं चतुरागायद्यदिदं चतुषा पश्यति यदिदं चतुषा मुअते ॥१०॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत। स यदेव चतुषा पापम्पश्यति स एव स पाप्मा ॥११॥ तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयम्मृत्युं न पाप्मा- नमसवाक्षीत् । श्रोत्रेणोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१२॥ ते श्रोत्रेणो- गात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं श्रोत्रमागायद्यदिदं श्रोत्रेण शृणोति यदिदं श्रोत्रेण भुञ्जते ॥१३॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव श्रोत्रेण पापं शृणोति स एव स पाप्मा ॥१४॥ तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयं मृत्यु न पाप्पानमसवाक्षीत् । पाणेनोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१॥ ते प्राणेनोद्गात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं प्राण भागाय- यदिदं प्राणन प्राणिति यदिदं प्राणेन भुञ्जते ॥१६॥ तम्पाप्मा- बसूज्यत । स यदेव प्राणेन[पापं प्राणिति स एव स पाप्मा॥१७॥तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयं मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । अनेन मुख्येन प्राणेनोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१८॥ तेऽनेन ५-त्यु । ५ 'स' अधिक है। हने । ६ ( ७७ ) पेन प्राणेनोद्गात्राऽदीक्षन्त ॥१६॥ सोऽब्रवीन्मृत्युरेष एषां स १ ता येन मृत्युमसेष्यन्तीति ॥२०॥ न ह्येतेन प्राणेन पार्ष ते न पापं ध्यायति न पापम्पश्यति न पापं शृणोति न पापं मपानिति ॥२१॥ तेनाऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं वर्ग मायन् । अपहस हैव मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमेति य वेद ॥२२॥२॥१०॥ चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। स यथा हत्वा प्रमृद्याऽतीयादेवमेवैतम्मृत्युमत्यायन् ॥१॥ चिम्प्रथमामत्यवहत् । ताम्परेण मृत्यु न्यदधात् । सोऽमिर- ॥२॥ अथ मनोऽत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यदधात् । स पाअभवत् ॥३॥अथ चक्षुरत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यदधात् । प्रादित्योऽभवत् ॥४॥ अथ श्रोत्रमत्यवहत् । तत्परेण न्यधात् । ता इमा दिशोऽभवन् । ता उ एव विश्वे देवाः अथ प्राणमत्यवहत । तम्परेण मृत्यु न्यदधात् । स वायुर- ॥६॥ अथाऽऽत्मने केवलमेवाऽन्नाद्यमागायत् ॥७॥ स एष ३ २ ४ ७-यम्।८गमयन् । १स अधिक है, 'प्रत्यायन्' के स्थान में यत् । २-यु। ३-न् ।

( ७८ ) ६ १०. १२. एवाऽयास्यः । पास्य धीयते । तस्मदयास्यः । यद्वेवा [ऽयम्] प्रास्य रमते तस्माद्वेवाऽयास्यः ॥८॥ स एष एवाऽऽङ्गिरसः। अतो हीमान्यङ्गानि रसं लभन्ते । तस्मादागिरसः । यद्वेवैषा- मङ्गाना रसस्तस्मा देवाऽऽङ्गिरसः ॥६॥ तं देवा अब्रुवन् केवलं वा प्रात्मनेऽनाघमागासी । अनु न एतास्मिभनाद्य प्राभज । एतदस्याऽनामयत्वमस्तीति ॥१०॥ तं वै प्रविशतेति । स वा आकाशान् कुरुष्वेति । स इमान् प्राणानाकाशानकुरुत ॥१२॥ तं वागेव भूत्वाऽमिः प्राविशन्मनो भूत्वा चन्द्रमाश्चतुर्भूत्वा ऽऽदित्यश्रोत्रम्भूत्वा दिशः प्राणो भूत्वा वायुः ॥१२॥ एषा वै दैवी परिषदैवी सभा दैवी संसत् ॥१३॥ गच्छति ह वा एतां दैवीम्परिषदं दैवीं सभा दैवी संसदं य एवं वेद ॥१४॥२॥१२॥ चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । यत्रो ह वैक चैता देवता निस्पृशन्ति न हैव तत्र 'कश्चन पाप्मान्यङ्गः परिशिष्यते ॥२॥ स विद्यान्नेह कश्चन पाप्मान्यङ्गः परिशेक्ष्यते सर्वमेवैता देवताः पाप्मानं निधक्ष्यन्तीति । तथा हैव १७ १७ m ५मासे । आध्यति । ७ एगें। ८ स्ये । -ऽयास्यः। १० अङ। ११ अः । १२ प्रामयत्वम् । १३ असी । १४ आकाशात् । १५ माशासनम् । १६ कूरुत । १७ - नास्ति । १८ प्रवी-॥ १चे। रचते। ३ एवम् । ४ एता।

(७) ६ " भवति ॥२॥ य उ ह वा एवंविदमृच्छति यथैता देवता ऋत्वा नीयादेवं न्येति । एतासु वेिनं देवतासु प्रपन्नमेतासु वसन्तमुप- वदति ॥३॥ तस्य हैतस्य नैव काचनाऽऽतिरस्ति य एवं वेद । य एवैनमुपवदति स आतिमाछति ॥४॥स य एनमृच्छादेव तादेवता ૨. उपसय ब्रूयादयम्माऽऽरत् स इमामाति न्येविति। तां हैवाऽऽति . न्येति ॥॥ यावदावासा उ हाऽस्येमे प्राणा अस्मिलोक एतावदा- -- १४ वासा उ हाऽस्यैता देवत्ता अमुष्मिलोके भवन्ति ॥६।। तस्मादु हैवं विद्वान्नवाऽग्रहतायै विभीयानाऽलोकतायै । एता मे देवता अस्मिलोके गृहान् करिष्यन्ति । एता अमुष्मिँलोके भवन्ति । तस्मादु लोकम्पदास्यन्तीति ॥७॥ तस्मादु हैवं विद्वानवाऽगृहतायै विभीयानाऽलोकतायै । एता मे देवता अस्मिलोके गृहेभ्यो गृहान करिष्यन्ति स्वेभ्य आयतनेभ्य इति हैव विद्याद् [एता] देवता अमुष्मिलोके लोकम्पदास्यन्तीति ॥८॥ तस्मादु हैवं ५-विदू वा विद।६ दुच्छति।७ नेति । ८-तीर् । ६ आच्छति । १० एम् । ११ रात् । १२ अत्ति।१३-दावशा। १४ ग्रह-१५अस्मिल् । १६ प्रवदा-१७'मायतनेभ्य' अधिक है । १८ एव ता॥.

( ८० ) विद्वात्रैवाऽगृहतायै विभीयानाऽलोकताय एता म एतदुभयं संनस्यन्तीति हैव विद्यात् । तथा हैव भवति ॥६॥२॥१२॥ चतुर्थेऽनुषाके तृतीयः खण्डः । चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः। १ ३ देवा वै ब्रह्मणो वत्सेन वाचमदुहुन् । अग्निई वै ब्रह्मणो वत्सः॥२॥सा या सावाग्ब्रह्मैव तत् । अथ योऽमिर्मत्युस्सः॥२॥ वामेतां वाचं यथा धेनुं वत्सेनोपसृज्य प्रत्तां दुहीतैवमेव देवा वाचं सर्वान्कामानदुहुन् ॥३॥ दुहे ह वै वाचं सर्वान्कामान्य एवं वेद । स हैषोऽनानृतो वाचं देवीमुदिन्धे वद वद वदेलि ॥४॥ तद्यदिह पुरुषस्य पापं कृतम्भवति तदाविष्करोति । यदिहैनदपि रहसीव कुर्वन्मन्यतेऽय हैनदाविरेव करोति । तस्माद्वाव पापं न कुर्याद ॥शा॥१३॥ पञ्चमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। एष उ ह वाव देवानां नेदिष्ठमुपचर्यो यदग्निः ॥शा तं साधूपचरेत् । य एनमस्मिँलोके साधूपचरति तमेषोऽमुष्मिलोके १ •१ पस्तेन, पत्सेन । २ वच-1३-२।४ जहे । ५ उदिग्धे । प्रमिह । ७-त। ८ अय्- ६ 'एष उ ह वा दूसरे अनुवाक का यहां अधिक है। १चरति।

૨ ( ८१ ) साधूपचरति । अथ य एनमस्मॅिलोके नाऽऽद्रियते तमेषोऽमुष्मि- लोके नाऽऽद्रियते । तस्माद्वा अग्निं साधूपचरेत् ॥२॥ तं नैव हस्ताभ्यां स्पृशेन्न पादाभ्यां न दण्डेन ॥३॥ हस्ताभ्यां स्पृशति यदस्याऽन्तिकमवनेनिक्ते । अथ यदभिप्रसारयति तत्पादा- भ्याम् ॥५॥ स एनमास्पृष्ट ईश्वरो दुर्धायां धातोः । तस्मादा अग्निं साधूपचरति । सुधायां हैवैनं दधाति ॥२॥१४॥ पञ्चमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । एष उ ह वाव देवानाम्महाशनतमो यदामिः ॥१॥ तन्न व्रत्यमददानोऽश्नीयात् । यो वै महाशनेऽनश्नत्यश्नातीवारो हैनम- भिषक्तोः। पूतिमिव हाऽश्नीयात् ॥२॥ अथो हपोक्तेऽशनेब्रूयात समिन्त्स्वाऽग्निमिति । स यथा मोक्तेऽशने श्रेयाँसम्परिवेष्टवै ब्रूयात्ताहक् तत् ॥३॥ एतदु ह वाव साम यद्वाक् । यो वै चतु-- स्साम श्रोत्रं सामेत्युपास्ते न ह तेन करोति ॥४॥ अथ यः आदित्यस्साम चन्द्रमास्सामेत्युपास्ते न हैव तेन करोति ॥शा अथ यो वाक् सामेत्युपास्ते स एवाऽनुष्ठया साम वेदं । वाचा हि २ तगडेनम्, तपनम् । १ प्र-। २ ददासीनो । ३ अभिष्( अ )साः । ४-इर् । ५ इवमिध । ६ ऽग्नी-1 ७ तम् । ८ ना । यद् । ६ ७ ( २ ) सान्नाऽऽविज्यं क्रियते ॥६॥ स यो वाचस्स्वरो जायते सोड निर्वाग्वेव वाक् । तत्रैकधा साम भवति ॥७॥ स य एवमेतदे- कधा साम भवद्वेदैवं हैतदेकधा साम भवतीत्येकव श्रेष्ठस्स्वा- नाम्भवति ॥८॥ तस्मादु हैवंविदमेव साम्नाऽऽत्विज्यं कारयेत । सह वाव साम वेद य एवं वेद ।।२।१५।। पञ्चमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्तः ॥

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[तृतीयोऽध्यायः।]
एका ह वाव कृत्ला देवताऽर्धदेवता एवाऽन्याः । अयमेव
योऽयम्पवते ॥१॥ एष एव सर्वेषां देवानां ग्रहाः ॥२॥ स हैषो-
ऽस्तं नाम । अस्तमिति हेह पश्चाहानाचक्षते॥३॥स यदादियो-
ऽस्तमगादिति ग्रहानगादिति हैतत् । तेन सोऽसर्वः । स एतमेवा-
ऽप्येति ॥४॥ अस्तं चन्द्रमा एति । तेन सोऽसर्वः। स एतमेवाऽप्ये-
ति ॥५॥ अस्तं नक्षत्राणि यन्ति । तेन तान्यसर्वाणि ।
तान्येतमेवाऽपियन्ति ॥६॥ अन्वग्निर्गच्छति । तेनं सोऽसर्वः । स
एतमेवाऽप्येति ॥७॥ एसहः। एति रात्रिः । तेन ते असर्वे । ते
एतमेवाऽपीतः ॥८॥ मुह्यन्ति दिशो न वै ता रात्रिम्प्रज्ञायन्ते ।
तेन ता असर्वाः । ता एतमेवाऽपियन्ति ॥६॥ वर्षति च पर्जन्य
उच्च गृह्णांति । तेन सोऽसर्वः । स एतमेवाऽप्यति ॥१०॥तीयन्त
आप एवमोषधय एवं वनस्पतयः । तेन तान्यसर्वाणि ।
तान्येतमेवाऽपियन्ति ॥११॥ तधदेतत्सर्वं वायुमेवाऽप्येति तस्माद्वा-
३
४
१पचा । २-२।३-ताः।४ तां।५'स साम वेद' अधिक है।
६ प-, पोषा-1

( ८४ ) युरेव साम ॥१२॥ स ह वै सामवित्स [कृत्स्नं] साम वेद य एवं वेद ॥१३॥ अथाऽध्यात्मम् । न वै स्वपन वाचा वदति। सेयमेव माणमप्यति ॥१४॥ न मनसा ध्यायति । तदिदमेव प्राणमप्ये- ति ॥१५॥ न चक्षुषा पश्यति । तदिदमेव प्राणमप्यति ॥१६॥ न श्रोत्रेण शृणोति । तदिदमेव प्राणमप्येति ॥१७॥ तदेतत्सर्व- माणमेवाऽभिसमेति तस्मात्माण एव साम ॥१८॥ स ह वै सामवित्स कृत्स्त्रं साम वेद य एवं वेद ॥१६॥ तद्यदिदमाहुन बताऽध वातीति[स] हैतत्पुरुषेऽन्तनिरमते स पूर्णस्वेदमान आस्ते ॥२०॥ तद्ध शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च[काक्षसेनिम्] ब्राह्मण परिवेविष्यमाणा उपावव्राज ॥२॥२१॥ प्रथमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । तौ ह बिभिक्षे । तं ह नाऽऽददाते को वा कोवेति मन्यमानौ ॥२॥ तौ होपजगौ। १३ ३ महात्मनश्चतुरो देव एकः कस्स जगार भुवनस्य गोपाः । ते कापेय न विजानन्त्यकेऽभिप्रतारिन् बहुधा निविष्टम् ॥ ७ ऽमम् । ८-यति । ६-मिते। १०-ण। ११-काश् १२ विष्या- - Marathi १३--प्राजा॥ १ दिम-१२ द्राते । ३ सो । ४ कालपेय । ५ निविन्दम् ।

( ८५ ) १२ १४१५ १६ १७ १८ १९ ૨૦ ૨૧ २३ २॥ स होवाचाऽभिप्रतारीमं वाव प्रपद्य प्रतिबूहीति । । अयम्प्रत्युच्य इति ॥३॥ त ह प्रत्युवाच- । पात्मा देवानामुत मानां हिरण्यदन्तो रपसो न सूनुः । हान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यददन्तमत्ति ॥ ॥ महात्मनश्चतुरो [देव] एक इति । वाग्वा प्रमिः। मा देवः । स यत्र स्वपिति तद्वाचम्प्राणो गिरति ॥५॥ मास्स महात्मा देवः । स यत्र स्वपिति तन्मनः प्राणो ॥६॥ चतुरादित्यस्स महात्मा देवः। स यत्र स्वपिति प्राणो गिरति ॥७॥ श्रोत्रं दिशस्ता महात्मानो देवा: स्वपिति तच्छ्रोत्रं प्राणो गिरति ॥८॥तयन्महात्मनश्चतुरो । इत्येतद्ध तत् ॥६॥ कस्स जगारेति । प्रजापतिर्वै कास र॥१०॥ भुवनस्य गोपा इति । स उवाव भुवनस्य गोपा: तंकापेय न विजानन्त्येक इति। न ह्येतमेके विजानन्ति॥१२॥ परिन् बहुधा निविष्टमिति । बहुधा होवैष निविष्टो यत्माणः आत्मा देवानामुत मानामिति । प्रात्मा ह्येष देवाना- )म, मा। ७ घय्या, यय्या । ८ अया। वाव । १०-युच्चे। । १२-याच । १३ मत्य १४ परसो । १५ नु । १६ मभि- । १८ दतम, दंतम् । १६ अति । २० पाथ, वा । २१ यो । तपिति । २३-न, इस के पश्चात् प्रा । २४-अर् । २५ महात्मा । २९ क । २७ सो । जगरनार पध।३०- ૨૬ ૨૭ ૨૬ ૨૬ ( ८९ ) ३१ १५ ३५ ૨. मुत मानाम् ॥१४॥ हिरण्यदन्तो रपसो न मनुरिति । न शेष सूनुः । सूनुरूपो ह्येष सन्न सूनुः ॥१५॥ महान्तमस्य महिमानमा- हुरिति । महान्तं ह्येतस्य महिमानमाहुः ॥१६॥ अनयमानो पददन्तमत्तीति । अनद्यमानो होषोऽदन्तमत्ति ॥१७॥३२॥ प्रथमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः ॥ तस्यैष श्रीरात्मा समुद्रूढो यदसावादियः । तस्माद्गायत्रस्य स्तोत्रे णाऽवान्यानेच्छिया अवछिया इति ॥१॥ स एष एवोक्थम् । यत्पुरस्तादवानिति तदेतदुक्थस्य शिरो यद्दक्षिण तरस दक्षिण पक्षो यदुत्तरतस्स उत्तरः पक्षो यत्पश्चात् तत् ]पुच्छम् ॥२॥ अयमेव माण उक्थत्याऽऽत्मा । स य एवमेतमुक्थस्याऽऽत्मानमात्मन्प्रतिष्ठित वेद स हाऽमुष्मि लोके साङ्गस्सतनुस्[ सर्वस्]सम्भवति ॥३॥ शश्वद्ध वा अमुष्मिलोके यदिदमुरुषस्याऽऽण्डौशिश्नं करें नासिके यत्किं चाऽनस्थिकं न सम्भवति ॥४॥ अथ य एवमेतमुक्थस्या- ऽऽत्मानमात्मन्मतिष्ठितं वेद स हैवाऽमुष्गिलोके साङ्गस्सतनुस्सर्व- स्सम्भवति॥॥ तदेतद्वैश्वामित्रमुक्थम् । तदन्नं वै विश्वम्प्राणो मित्रम् ३९-से । ३२ नस् । ३३ स् । ३४ प्राहुर् । और 'इति महान्त होतस्य महिमाहुः अधिक है । ३५ अन्तम् । ३६ सूनूर-॥ १ समाद्र २वच-1 ३वा इति। ४-रणः । ५ सद् । तद् । ७ सांगतम् । तद् र अक्थ्- ६ ९ igay (८७) ૧ ૨ १४ १६ ६॥ तद्ध विश्वामित्रश्श्रमेण तपसा व्रतचर्येणेन्द्रस्य प्रियं धामो- जगाम ॥७॥ तस्मा उ हैतत्मोवाच यदिदम्मनुष्यानागतम् ॥८॥ द्ध स उपनिषसाद ज्योतिरेतदुक्थमिति ॥६॥ ज्योतिरिति द्वे क्षिरे प्राण इति द्वे अनामिति द्वे। तदतेदन एवप्रतिष्ठितम् ।।१०।। थि हैन जमदग्निरुपनिषसादाऽऽयुरेतदुक्थमिति ॥११॥ आयुरिति अक्षरे प्राण इति द्वे अन्नमिति द्वे । तदेतदन्न एव प्रतिष्ठितं ॥१२॥ थि हैन वसिष्ठ उपनिषसाद गौरेतदुक्थमिति । तदेतदनमेव । मिं हि गौः ॥१३॥ तदाहुर्यदस्य प्राणस्य पुरुषश्शरीरमथ केना- न्य प्राणाशरीरवन्तो भवन्तीति ॥१४॥ स ब्रूयायद्वाचा वदति द्वाचश्शरीरं यन्मनसा ध्यायति तन्मनसश्शरीरं यच्चक्षुषा पश्यति चक्षुषश्शरीरं यच्छ्रोत्रेण शृणोति तच्छ्रोत्रस्य शरीरम् । एवमु Iऽन्ये प्राणाश्शरीरवन्तो भवन्तीति ॥१५॥२३॥ प्रथमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । सदेतदुक्थं सप्तविधम् । शस्यते स्तोत्रियोऽनुरूपो धाय्या गायमुक्तं निविपरिधानीया ॥१॥ इयमेव स्तोत्रियो १० -। ११ तद् । १२ उत्थ्-। १३ (-साद ) गौर, आयुगौर । ४-दू। १५ उपोदू । १६ ऽन्येन । १-ऽग्निर् अधिक है। २-नीयम् । ३ नास्ति। ३ A (८८) ६ ९ ऽग्निरनुरूपो वायुर्घाय्याऽन्तरिक्षम्मगायो चौरसूक्तमादित्यो निवित्। तस्माबवा उदिते निविदमधीयन्ते । आदित्यो हि निवित् । दिशः परिधानीयेत्यधिदेवतम् ॥२॥ अथाध्यात्मम् । आत्मैव स्तोत्रियः प्रजाऽनुरूपः प्राणो धाय्या मनः प्रगाथश्शिरस्सूक्तं चतुर्निविच्छोत्रम्परिधानीया ॥३॥ तद्वैतदेके त्रिष्टुभा परिदधत्य- तुष्टभैके । त्रिष्टुभात्वव परिदध्यात् ॥४॥ तद्धैतदेक एता व्याहृती- रभिव्याहृत्य शंसन्ति महान्मह्या समधत्त देवो देव्या समधत्त ब्रह्म ब्राह्मण्या समधत्त । तद्यत्समधत्त समधत्तेति ॥५॥ नस्मा- दिदानीम्पुरुषस्य शरीराणि प्रतिसंहितानि । पुरुषो ह्येतदुक्थम् ॥६॥ महान्मह्या समधत्तति । अग्नि महानियमेव मही ॥७॥ देवो देव्या समधत्तेति । वायुर्वै देवोऽन्तरिक्षं देवी ॥८॥ ब्रह्मा ब्राह्मण्या समधत्तेति । आदित्यो वै ब्रह्म द्यौब्राह्मणी ॥क्षा तासां वा एतासां देवतानां द्वयोर्द्वयोर्देवतयोर्नव-नवाऽक्षराणि सम्पद्यन्ते एतदिमे लोकास्त्रिणवा भवन्ति ॥१०॥ तद्ब्रह्म. वै त्रित् । तब्रह्माऽभिव्याहृत्य शंसन्ति । एष उ एव स्तोमस्सोऽनुचरः॥११॥ १२. ४ द्धास्या, द्धार्या । ५ प्राग्-- ६ धार्या । ७-धात्नी-1 ८ तदुक्थम् अधिक है (हाशिये में) १।९-यः। १०-मद्या । ११ इदाति। १५-या । १३-ौ । यो । १५-ौ । १६-कौ । १७ वा । १८ सा।

( ८६ ) यदिममाहुरेकस्तोम इत्ययमेव योऽयम्पवते । एषोऽधिदेवतम् । प्राणोऽध्यात्मम् । तस्य शरीरमनुचरः ॥१२॥ तद्यथा ह वै मणौ मणिसूत्रं सम्मोतं स्याद्-॥१३॥३॥४॥ प्रथमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । -एवं हैतस्मिन्सर्वमिदं सम्मोतं गन्धर्वाप्सरसः पशवो मनुष्याः॥२॥तद्ध मुअस्सामश्रवसः प्रययौ । तस्मै ह. श्वाजनि- श्यः प्रेयाय ॥२॥ तस्य हाऽन्तरिक्षात्पतित्वा नवनीतपिण्ड उरास निपपात। तं हाऽऽदायाऽनुदधौ॥३॥ ततो हैव स्तोमं ददर्शाऽन्तरिक्ष विततम्बहुशोभमानम् । तस्यो ह युक्तिं ददर्श ॥४॥ बहिष्पवमान- मासय टोत्र वियि प्राण्य इति कुर्यात् टीत्र गृहित्र अपान्य इति वाचा । दिदृक्षौवाऽक्षिभ्यं शुश्रूषतैय कर्णाभ्याम् । स्वयामिदम्म- नोयुक्तम् ॥॥ तद्यत्र वा इषुरत्ययो भवति न वै स ततो हिनस्ति तदु वा एतं नोपाप्नुयात् । प इत्येवाऽपान्यात् । तद्यथा बिम्धन वृनमानयदेवमेनमेतया देवतयाऽऽनयति । स युक्तः ९ १४ करोति । एष एवापि युक्तः॥६॥३॥ प्रथमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । प्रथमोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ १६-रन्तम्॥ १ एषम् (एवा) के पहले पञ्चम कं० का द्वि० वाक्य । २ मौज-३ साहश-४ तमस्मै । ५ प्रोयाय । ६ तेतो ७-८-३।६टील, पहला अक्षर ळ भी हो।१ गृहित्व। ११मस्ति । हनस्ति । १२यद्। १३न्यो।१४-ति।

( ९० ) ३ ११ १२ । योऽसौ सान्नः प्रतिवेदन हास्मै दीयते ॥१॥ ददा इति ह वा अयमानिर्दीप्यते तथेति वायुः पवते हन्तेति चन्द्रमा ओमित्या- दित्यः ॥२॥ एषा ह वै साम्नः प्रत्तिः । एतां ह वै साम्नः प्रति मुदक्षिणः मिविदां चकार ॥३॥ तां हैंतां होतुर्वाऽज्ये गायेन्म- प्रावरुणस्य वा तां ददा३ तथा३ हन्ता३ हिम्भा ओवा इति। मह वा अस्मै दीयते ॥४॥ [सो] ऽप्यन्यान् बहुनुपर्युपरि य एवमेता साम्नः प्रतिं वेद ॥५॥ य उ ह वा प्रबन्धुर्वन्धुमत्साम वेद यत्र हाऽप्येने न विदुर्यत्र रोषन्ति यत्र परीवचक्षते तद्धाऽपि अष्ठधमाधिपत्यमन्नायम्पुरोधाम्पर्येति ॥६॥ अग्निर्ह वा प्रबन्धुर्वन्धुमत्साम । कस्माद्वा ह्येनं दार्योः कस्याद्वा पर्यावत्य पन्थन्ति स श्रेष्ठयायाऽऽधिपत्यायाऽनाधाय पुरोधाय जायते ॥७॥ स यत्र ह वा अप्येवंविदं न विदुर्यत्र रोषन्ति यत्र परीव- चक्षते तद्धाऽपि श्रेष्ठचमाधिपत्यमन्नाद्यम्पुरोधाम्पयति ।।८॥२६॥ द्वितीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । स्वयम् तत्र यत्रैनं विदुः॥१॥सुदाक्षिणो ह वै क्षैमिः प्राचीनशा- लिर्जाबालौ त ह सब्रह्मचारिण पासुः॥२॥ते हैमे बहु जप्यस्य १ प्रतिं । २ तदान, ददान् । ३ प्रक्तिः, प्रवृक्तिः । ५ तौं । 'इन्साइ' अधिक है । ७ नास्ति । ८ अप्य् । हून्य । १०-उप । ११-धु । १२-धा। १३ श्रेष्ठ- १४-माये । १५ परि ॥ १-शाःखिर् । २ है। १५ wami ।

१ ) स्य चाऽनूचिरे प्राचीनशालिश्च जाबालों च ॥शा अय ह दक्षिणः क्षैमियदेव यज्ञस्याजो यत्सुविदितं तद स्मैव । ॥४॥ त उ ह वा अपोदिता व्याक्रोशमानाश्चेरुशूद्रो न इति ह स्म सुदक्षिणं मिमाक्रोशन्ति प्राचीनशालिश्च । च ॥५॥ स ह स्माऽह सुदक्षिणः तैमियंत्र. भूयिष्ठाः लास्स्मागता भवितारस्तम एष संवादो नाऽनुपदृष्टे शूद्रा दिष्यामह इति॥६॥ता उ ह वै जाबालौ दिदीक्षाते शुक्रश्च तयोर्ह प्राचीनशालिस्त उद्गाता ॥७॥स तद्ध मुदक्षिणो जाबालौ हाऽदीक्षिषातामिति । स ह संग्रहीतारमुवाचा- रे जाबालौ हाऽदीक्षिषातां तद्गमिष्याव इति ॥७॥ द्वितीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। य ह ज्ञातिका अश्रुमुखा इवाऽऽसुरन्यतरां वा गादिति ॥११॥ अथ है स्म वै यः पुराब्रह्मवायं वदत्यन्य- पादिति ह स्मेनम्मन्यन्ते । अथो ह स्मैनम्मृत्मिवैवोपासते ह संग्रहीतोवाचाऽथ यद्भगवस्ते ताभ्यां न कुशलं । ३ ऽसच-1४-शाला।५-ण ।६ प्य-1-प्रा।७चोरुश् । अकोश् । १० लीश् । ११-पतिष्य-। १३ ६दी-1 १३-रुर १५ संसं-1 १६ दिदीच-। १७ यास्वा । -मू।

( २ ) C कथेत्थमात्थेति ॥३॥ प्रोमिति होवाच गन्तव्यम्स आचार्यस्मुय- मानमन्यतेति ॥४॥ स ह रथमास्थाय प्रधावयांचकार । तं ह स्म प्रतीक्षन्ते ॥५॥ जानीतेति । सुदक्षिण इति । न वै नूनं स इदमभ्यवेयादिति । स एवेति ॥६॥ स ह सोपानादेवाऽन्तर्वेद्यव- स्थायोवाचाऽङ्गन्वित्थं गृहपता३ इति । ते ह नाऽनूदतिष्ठा- सत् । स होवाचाऽनूत्थाता म एधि । कृष्णाजिनोऽसी ति] । तदिमे कुरुपश्चाला अविदुरनूत्थातैव त इति होचुः ॥७॥ तं ह कनीयान्भ्रातीवाचाऽनुत्तिष्ठ । भगव उद्गातारमिति । तं हा ऽनूत्तस्यौ ॥८॥ स होवाच त्रिर्वै गृहपते पुरुषो जायते । पितुरेवाग्रेधि जायतेऽथ मातुरथ यज्ञात् ॥६॥ त्रिव म्रियत इति। सयद्ध वा एनमेतत्पिता योन्या रेतो भूतं सिञ्चति-॥१०॥ द्वितीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । तत्पथमम्म्रियते ॥१॥ अन्धमिव वै तमो योनिः । लोहि- तस्तोको वा वै स तदाभवत्यपां वा स्तोकः । किं हि स तदा- भवति ॥२॥ स यस्तां देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या १५. १ ३ -. २ तू-1३. प्राचर-1 ४ सूय- ५-ठेस-1 -ऊद्धा-1 ७.स.। ८ 'इति अधिक है । ६ ग्रातो। १० वा । ११ अनुतिष्ठ । १२ त्रिव । १३ अ, ऊ। १४ नास्ति । १५ त्रियतं ॥ १अन्य-२ वो । ३ म्।

६ ११ चैनं तम्मृत्युमतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥३॥ अथ य, एनमेतद्दीतयन्ति ताहितीयम्म्रियते । वपन्ति केशश्मभूणि । निकृन्तम्ति नखान् । प्रत्यअन्त्यङ्गानि । प्रत्यचत्यङ्गुलीः । अपहतोऽपवेष्टित आस्ते । न जुहोति । न यजते । न योषित चरति । अमानुषी वाचं वदति । मृतस्य यावषं तदा रूपम्भवति ॥४॥ स यस्तां देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या चैनं तम्मृत्युमतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥॥ अथ य एनमेतदस्माल्लोकात्प्रेतंचित्यामादधाति तद् तृतीयम्ब्रियते ॥६॥ स यस्तां देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या चैनं तम्मृत्यु- मतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥७॥ एतावदैवोक्त्वा रथमास्थाय प्रधावयांचकार ॥८॥ तं ह जाबालम्प्रत्येत कनीयान् भ्रातोवाच काम्भवाञ्छूद्रको वाचमवादीति । हस्तिना गाधमैषी- रितिक्षाप्र हैवैनं तच्छशंस यः कथयवोचद्गगव इति । यस्त्रयाणा- म्मृत्यूनांसानाऽतिवाहं वेद स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥१०॥शक्षा द्वितीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । ૧ ૨ १३ चे। ५ दि-६-अजत्य् । ७ यज्- ८ अव-1 ६ यौष्-१.स। ११ का' अधिक है । १२ यन्तम । १३-तीति । १४ वा । १५वहतीति, अंधिक है। १६-वच् ॥

( ४ ) ३ ६ त वाव भगवस्ते पितोद्गातारममन्यतेति होवाच । तदु है प्राचीनशाला विदुर्य एषामयं वृत उद्गाताऽऽस । तस्मिन् ह ना- ऽनुविदुः ॥१॥ ते होचुरनुधावत काण्डवियमिति । तं हाऽनु- सस्नुः । ते इ कारड्वियमुद्गातारं चक्रिरे ब्रह्माणम्प्राचीन- शालिम् ॥२॥ तं हाऽभ्यवेक्ष्योवाचवमेष ब्राह्मणो मोघाय वादाय नाऽग्लायत् । स नाऽणु सान्नोऽन्विच्छतीति । अति हैवैनं तच्चक्रे ॥३॥ स यद्ध वा एनमेतत्पिता योन्यां रेतो भूतं सिञ्च- स्यादित्यो हैन तद्योन्यां रेतो भूतं सिञ्चति । स हाऽस्य तत्र मृत्योरीश ॥४॥ अथो यदेवैनमेतत्पिता योन्यां रेतो भूतं सिञ्चति तद्ध वाव स ततोऽनुसम्भवति प्राणं च । यदा ह्येव रेतस्सिक्त माण माविशत्यथ तत्सम्भवति ॥॥ अथो यदेवैनमेतद्दीक्षयन्त्य- मिह वैनं तद्योन्या रेतो. भूतं सिञ्चति । स हैवाऽस्य तत्र मृत्योरीशे ॥६॥ अथो यामेवैतां वैसर्जनीयामाहुतिमध्वयुजुहोति समिव स ततोऽनुसम्भवति छन्दांसि चैव ॥७॥ अथ ये एनमे- ११ १५ १-ए । २ विधुर । ३ सः । ४ कान्त्यावयम् । ५-स्रः । र ब्राह्मणम् । ७-पेक्ष्या । ८न्वीच-16 रणम् । १० नास्ति ।११रत- १५ो । १६ 'ग्रंथोषाचं' अधिक है । १४ "प्रयो य एनमेतद्दी- "तत्रमृत्योरीशे' अधिक है । १५ 'प्रयो यदेवेनमें- सहीचयन्ति' अधिक है। १९ प्रासि ।

(१५) १७ १७ तदस्माल्लोकात्मेतं चित्यामादधति चन्द्रमा हैवैनं तद्योन्या रेतो भूतं सिञ्चति । स उ हैवाऽस्य तत्र मृत्योरीशे॥८॥अथो यदेवैन- मतदस्माल्लोकात प्रेतं चित्यामादधत्यथो या एवैता अवोनणी- या पापस्ता एव स ततोऽनुसम्भवति पाणम्वेव । प्राणो ह्यापः ॥६॥ तं ह वा एवंविदुद्गाता यजमानमोमित्येतेनाक्षरेणाऽऽदित्यम्मृत्यु- मतिवहति वागित्यग्नि हुमिति वायुम्भा इति चन्द्रमसम् ॥१०॥ तान् वा एतान्मृत्यून् सानोदाताऽऽत्मानं च यजमानं चाऽति- वहत्योमित्येतेनाक्षरेण प्राणेनाऽमुनाऽऽदित्येन ॥१.२॥ तस्यैष श्लोकः- -- २० उतैषां ज्येष्ठ उत वा किनष्ठ उतैषाम्पुत्र उत वा पितेषाम् । एको ह देवो मनसि प्रविष्टः पूर्वो ह जज्ञे स उ गर्भेऽन्तः- २१ इति ॥१२॥ तद्यदेशोऽभ्युक्त इममेव पुरुषं योऽयमाछनो ऽन्तरोमित्येतेनैवाक्षरेण प्राणेनैवाऽमुनवाऽऽदित्येन[...]॥१३॥२१० द्वितीयेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । द्वितीयोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ त्रिह वै पुरुषो म्रियते त्रिर्जायते ॥१॥ स हैतदेव प्रथमम्म्रियते यद्रेतस्सिक्तं सम्भूतम्भवति । स प्राणमेवाऽभिसम्भवति। पाशाम- ३ १७-यान् । १८-वन्तीति । १६ ता । २० जेष्ठ । २१ ता- २२प्रकान् ॥ १ हे । २'स हैतदेव प्रथमस्म्रियते त्रिर्जायते' अधिक है। इसभ्- (६६ ) 1७ १०. भिजायते ॥२॥ अथैतद्वितीयम्म्रियते यदीक्षते । स छन्दांस्येवा- ऽभिसम्भवति । दक्षिणामभिजायते ॥३।। अथैतत् तृतीयम्ब्रियते यप्रियते । स श्रद्धामेवाऽभिसम्भवति । लोकमभिजायते ॥४॥ तदेतत् ध्याद्वायत्रं गायति । तस्य प्रथमयाऽऽतेममेव लोकं जयति यदु चाऽस्मिँलोके । तदेतेन चैनम्प्राणेन समर्धयति यमभिसम्भवसेतां चाऽस्मा आशाम् प्रयच्छति यामभिजायते॥५॥ अथ द्वितीययाऽटते- दमेवाऽन्तरिक्षं जयति यदु चान्तरिक्षे । तदेतैश्चैनं छन्दोभिस्स- मर्थयति यान्यभिसम्भवति । एतां चास्मै दक्षिणाम्प्रयच्छति याम- भिजायते ॥६॥ अथ तृतीययाऽऽकृताऽमुमेव लोकम् जयति यदु चाऽमुष्मिलोके । तदेतया चैनं श्रद्धया समर्थयति ययैवैनमेतच्छ्रद्ध- याऽमारभ्यादधति समयमितो भविष्यतीति । एतं चास्मै लो- कम्प्रयच्छाले यमभिजायते ॥७॥३।११।। तृतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । एतदै तिमभिराद्भिरिमाँश्च लोकाअयसतैश्चनम्भूतैस्समय- ति यान्यभिसम्भवति ।।१।। अथ वा अतो हिङ्कारस्यैव। तं ह स्वर्गे लोके सन्तम्मृत्युरन्बेखशनया ॥२॥ श्रीर्वा एषा प्रजापतिस्सानो.. ४ोव । ५-६ त्रिय-1७-प्रन्ति । ८ इम्-(!)। ६-मृध्- २० 'न्यभिसम्भवति' अधिक है लाल रंग से कटा हुआ । ११ च । १२ ऽभाव । १३-प्रा । १ घोक्-। २-मृध्-1 ३ नास्ति ।४ सितम् । ५ अनेति । श्री। ९ १२. ३ ६ ( ७.). ए . ११ १२ यद्धिकारः । तमिदाता श्रिया प्रजापतिना हिङ्कारेण मृत्युमपसेध- तिः ।।३।। हुम्भेसिाह मात्र नु. गा यत्रतयजमान, इति. हैतत् ॥४॥ स यथा श्रेयसा सिद्धः पापीयान् प्रतिविजत एवं हैवाऽस्मान्मृत्युः पामा प्रतिविजते ॥१॥ यन्मत्याह चन्द्रमा,वै मा मासः । एष, ह वै मा मासः। तस्मान्मेयाह । भा इति हैतत्परोक्षणेव । यस्माद्वेव मेसाह यदेव. मेसाहैतानि त्रीणि । तस्मान्मेति ब्रूयात् ॥६॥३॥१२॥ तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। हुम्भा इति ब्रह्मवर्चसकामस्य। भातींव हि ब्रह्मवर्चसम् ॥२॥ हुम्बो इति पशुकामस्य । बो इति ह पशवो वाश्यन्ते ॥२॥ हुम् बगिति श्रीकामस्य । बगिति ह श्रियम्पणायन्तिः ॥३॥ हुम् भा ओवा इसेतदेवोपगीतम् ॥४॥ महदिवाऽभिपरिवर्तयन् गाये- दिति ह स्माऽऽह नाको महाग्रामो महानिवेशो भवतीति । स यथा: स्थाणुमर्पयिचेतरेण वेतरेण वा परियायात् तात्तत् ॥।॥ तदु होवाच शाब्यायनिः कस्मै कामाय स्थाणुमर्पयेत् । अथोपगीतमे- वैतत् । नैवैतदाद्रियेतेति ॥६॥ [इति] नु हिङ्काराणाम् । अथ वा ७ पद्। '.इति ' अधिक है। -विच-१० ए एवम् । ११ भाग । १२ ऐव॥ १ वो । २ क्-ि,-सु । ३-वा, प्रयित्वा । ४-रेप, । ५.पा-1 ६ सदू । ७ माँ-1 हिङ्कनक- ( ) प्रत्तो निधनमेव । श्रोचा इति द्वे अक्षरे । अन्तो वै सानो निधन- मन्तस्खों लोकानामन्तो बनस्य विष्टपम् ॥७॥ तमेतदुगाता यजमानमोमियतेनाक्षरणान्ते स्वर्ग लोके दधाति । य ऊँ ह वा अपत्तो वृक्षाग्रं गच्छखव वै स ततः पद्यते । अथ यदै पक्षी हत्ताने यदसिंधारायां यत्तुरंधारयामास्तै न वै स ततोऽवपद्यते । पक्षाभ्यां हि संयत. प्रास्ते ॥॥ तमेतदुद्गाता यजमा- नमोमियतेनाक्षरेण खरपतं कृत्वाऽन्ते स्वर्गे लोके दधाति । स यया पक्ष्यविभ्यदासीतैवमेव स्वर्गे लोकेऽबिभ्यदास्तेऽथाचरति ॥१०॥ ते ह वा एते अक्षरे देवलोकश्चैव मनुष्यलोकश्च । आदि- सच ह वा एते अक्षरे चन्द्रमाश्च ॥११॥ आदिस एव देवलोक- चन्द्रमा मनुष्यलोकः । ओमिसादिसो वागिति चन्द्रमाः ॥१२॥ तमेतदुद्गाता. यजमानमोमियतेनाक्षरेणाऽऽदिसं देवलोकं गमय- M तृतीयेऽनुयाके तृतीयः खण्डः । तहाऽऽगतम्पृच्छति कस्त्वमसीति । स यो ह मान्ना वा गो- बेण वा प्रबूते तं हाऽह यस्तेऽयम्मय्यात्माऽभूदेष ते स इति ॥२॥ हिंसयत । १०-स्त्रो।११-६॥

th ) ५ तस्मिन् हाऽऽत्मन् प्रतिपत् । तमृतवस्सम्पदार्यपद्गृहीतमपकर्षन्ति । तस्य हाऽहोरात्रे लोकमाप्नुतः ॥२॥ तस्मा उ हैतेन प्रब्रुवीत को- ऽहमस्मि सुवस्त्वम् । स त्वां स्खग्य खरगामिति ॥३॥ को ह बै प्रजापतिरथ हैवंविदेव सुवर्गः । स हि सुवर्गच्छति ॥४॥ ते हा- ऽऽह यस्त्वमसि सोऽहमस्मि योऽहमस्मि स त्वमस्येहीति || स एतमेव सुकृतरसम्प्रविशति । यदु ह वा अस्मिल्लोके मनुष्या यजन्ते यत्साधु कुर्वन्ति तदेषामूर्ध्वमन्नाद्यमुत्सीदति । तदमुं चन्द्रमसम्मनुष्यलोकम्पविशति ॥६॥ तस्येदम्मानुपनिकाशन- मण्डमुदरेऽन्तस्सम्भवति । तस्योर्ध्वमन्नाधमुत्सीदति स्तनावाभि । स यदाजायतेऽथाऽस्मै माता स्तनमन्नाद्यम्प्रयच्छति ॥७॥ अजातो वै तावत्पुरुषो यावन्न यजते स यज्ञेनैव जायते । स यथाऽण्ड म्प्रथमनिभिएणमेवमेव ॥८॥ तदा ते ह वा एवंचिदुद्गाता यज- मानमोमित्येतेनाऽतरेणाऽऽदित्यं देवलोकं गमयति । वागि- त्यस्मा उत्तरेणाऽक्षरेण चन्द्रमसमन्नाद्यमक्षितिम्प्रयच्छति ॥६॥ अथ यस्यैतदविद्वानुद्गायति न हैवैनं देवलोकं गमयति .नो 74 १४ दी २.त । ३ तेन । ४-७-,-वीत् । ५-गम् । ६ सुस्वर्-, -म् । ७जायन्ते।८स-11-2।१०-ब-नि-इसके पश्चात् इदम् । ११ अदेरे। १२ इय-1 १३-नाच् । १४ जायते।१५-स. । १६-यचिति । १७ ना।

( १०० ) १८ १९ एनमनायेन समर्धयति ॥१०॥ स यथाऽण्ड विदिग्धं शयीता- ऽन्नाद्यमलभमानमेवमेव विदिग्धश्शेतेऽन्नाधमलभमानः ॥२॥ तस्मादु हैवंविदमेवोद्गापयेत । एवंविदिहैवोद्गातरिति हूतः प्रतिशृणुयात् ॥१२॥१४॥ तृतीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः । ૨ ३ यागिति हेन्द्रो विश्वामित्रायोक्थमुवाच । तदेतद्विश्वामित्रा उपासते वाचमेव ॥१॥ मनुई वसिष्ठाय ब्रह्मत्वमुवाच । तस्मादा- हुर्वासिष्ठमेव ब्रह्मति ॥२॥ तदु वा आहुरेवेविदेव ब्रह्मा । क उ एवंविदं वासिष्ठमईतीति ॥३॥ प्रजापतिः प्राजिजनिषत । स तपोऽतप्यत । स ऐक्षत हन्त नु प्रतिष्ठां जनय ततो याः प्रजास्स्रक्ष्ये ता एतदेव प्रतिष्ठास्यन्ति नाऽप्रतिष्ठाश्चरन्तीः प्रदघिष्यन्त इति ॥४॥ स इमं लोकमजनयदन्तरिक्षलोकममुं लोकमिति । तानिमाँस्त्री- लोकाअनयित्वाऽभ्यश्राम्यत् ॥।॥ तान् समतपत् । तेभ्यस्तो- भ्यस्त्रीणि शुक्राण्युदायनामिः पृथिव्या वायुरन्तरिक्षादादियो दिवः॥६॥ स एतानि शुक्राणि पुनरभ्येवाऽतपत् । तेभ्यस्संतप्तेभ्य -मृध-१६-प्रा । २०-प्राः। २१-श्रुणु-॥ है.।२ उत्य-1३ जाये, जनये । ४ ऋक्-५ ताम् । -मु। ७सममवम् ।स्सा-न्।

( १०१ ) स्वीरयेव शुक्राण्युदायन्नृग्वेद एवाऽग्नेयजुर्वेदो वायोस्सामवेद आदिसात् ॥७॥ स एतानि शुक्राणि पुनरभ्येवाऽतपत् । तेभ्य- संतप्तेभ्यस्त्रीण्येव शुक्राण्युदायन्भूरिसेवग्वेदाद्भुव इति यजुर्वेदा- त्वरिति सामवेदात्तदेव ॥८॥ तद्ध वै त्रय्यै विद्यायै शुक्रम् । एतावदिदं सर्वम् । स यो वै त्रयीं विद्या विदुषो लोकस्सोऽस्य लोको भवति य एवं वेद ॥६॥३॥१५॥ चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । अयं वाव यज्ञो योऽयम्पवते । तस्य वाक् च मनश्च वर्तन्यौ। वाचा च ोष एतन्मनसा च वर्तते ॥१॥ तस्य होताऽध्वर्युरुगाते- सन्यतरां वाचा वर्तनि संस्कुर्वन्ति । तस्मात्ने वाचा कुर्वन्ति । ब्रह्मैव मनसाऽन्यतराम् । तस्मात्स तूष्णीमास्ते ॥२॥ स यद्ध सो- ऽपि स्तूयमाने वा शस्यमाने वा वावद्यमान आसीताऽन्यतरामेवा- ऽस्यापि तहि स वाचा वर्तनि संस्कुर्यात् ॥३।। स यथा पुरुष एकपाद्यन् भ्रपति रथो वैकचक्रो वर्तमान एवमेव तहिं यज्ञो भ्रषन्नेति ॥४॥ एतद्ध तद्विद्वान् ब्राह्मण उवाच ब्रह्माणम्प्रातरनु- १ १-मान् । २५-३-मां । ४ त।

( १.०२ ) ९ १५.५२ पाक उपाकृते वा वद्यमानमासीनमध वा इमे तहिं यज्ञस्याऽन्तर- गरिति । अध हि ते तहि यज्ञस्याऽन्तरीयुः ॥॥ तस्माद्ब्रह्मा प्रातस्नुवाक उपाकृते वाचंयम आसीताऽऽपरिधानीयाया था वषट् कारादितरेषां स्तुतशस्त्राणामेवाऽऽसंस्थायै पवमानानाम् ॥६॥ स यथा पुरुष उभया पायन भ्रषं न न्योत रथो वोभयानक्रो- वर्तमान एवमेतहि यशो श्रेयं न न्येति ॥७॥३॥१६॥ चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । स यदि यज्ञ ऋक्तो भ्रषनियाब्रह्मणे प्रब्रूतेसाहुः । अथ यदि यजुष्टो ब्रह्मणे प्रब्रूतेसाहुः । अथ यदि सामतो ब्रह्मणे प्रब्रूतेयाहुः। अथ यधनुपस्मृतात कुत इदमजनीति ब्रह्मणे प्रबूतसेवाऽऽहुः ॥१॥ स ब्रह्मा पाङ् उदेस स्रवेणाऽऽग्नीध्र प्राज्यं जुहुयाभूर्भुवस्वरिसे- ताभिव्याहृतिभिः ॥२॥ एता वैव्याहृतयस्सर्वप्रायश्चित्तयः। तद्यथा लवणेन सुवर्ण संदध्या सुवर्णेन रजतं रजतेन त्रपु त्रपुणा लोहांयस लोहायसेन काणायसं काष्णायसेन दारु दारु च चर्म y. ५-मो।' आसु द्विवार पढ़ा गया है । ७-- 1.5-गु- ऽन्तयुः । १०-३ । ११-पाद् ।१२ यदू । १३ न॥ १६-२-षो । ३ रथ । ४ अन्दू, प्रा ।५ विद -यु च श्लेष्मणैवमेवैवं विद्वाँस्तत्सर्वं भिषज्यति ॥३॥ तदाहुर्यदहौषीन्मे १ ग्रहान्मेऽग्रहीदिसंध्वर्यवे दक्षिणानयन्यशंसीन्मे वषई प्रकम होत्र उँदगासीन्म इत्युद्गात्रेऽथ किं चक्रुषे ब्रह्मणे तूष्णीमासीनाथ समावतीरेवेतरैऋत्विग्भिदक्षिणा नयन्तीति ॥४॥ स ब्रूयादन भाग्य वै स यज्ञस्याध ह्येष यज्ञस्य वहतीति । अ( हे स्म वै पुरा ब्रह्मणे दक्षिणा नयन्तीति । अर्धा इतरेभ्य ऋत्विभ्यः॥शा तेस्यैष श्लोको- मयीदम्मन्ये भुवनादि सर्वम्, मयि लोका मयि दिशश्वतखः । मयोदम्मन्ये निमिषयदेजति, मय्याप ओषधयश्च सर्वा; इति ॥६॥ मयीदम्मन्ये भुवनादि सर्वमिसेवंविदं ह वावेदं सर्वम्भुवनमन्वा- यत्तम् ॥७i मयि लोका मयि दिशश्चतस्र इलेवंविदि हवावलोका एवंविदि दिशश्चतस्रः ॥६॥ मयीदम्मन्ये निमिषद्यदेजति मय्याप, भोषधयश्च सर्वा इसेवविदि हवावेदं सर्वम्भुवनम्प्रतिष्ठितम् ।। तस्मादु हैवविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत । स ह वाव ब्रह्मा य एवं बेद ॥१०॥३॥१७॥ चतुर्थेऽनुवाके स॒तीयः खण्डः । पश्येम (संदध्यात्) ण कोष्ठ लाल रंग में कटा हुमा। -षष् । १०अंकण । ११ मय् । २० एवं नास्ति । २१ माशांसीन् । १२-रेर् १३-माघ । १४ नास्ति ।१५ यै । १६ ष । १७मतिही । १८-६ । १९ एव ।

( .१०४ ) अय-वा प्रतस्स्तोमभागानामेवाऽनुमन्त्राः ॥२॥ तदैतदेके स्तोमभौगरेवानुमन्त्रयन्ते । तत्तथा न कुर्यात् ॥२॥देवेन सवित्रा प्रस्तः प्रस्तोतर्देवेभ्यो वाचमिष्येत्यु हैकेऽनुमन्त्रयन्ते सविता वै देवानाम्मसविता सवित्रा प्रसूता इदमनु मन्त्रयामह इति वदन्तः। नदु तथा न कुर्यात् ॥३॥ भूर्भुवस्स्वरित्यु हैकेऽनुमन्त्रयन्त एषाः वै यीविद्या त्रय्य वेद विद्ययाऽनुमन्त्रयामह इति वदन्तः । तदु तथा नो एव कुर्यात् ॥४॥ ओमिसेवानुमन्त्रयेत. ॥२॥ अथैष. वसिष्ठस्यैकस्तोमभागानुमन्त्रः । तेन हैतेन वसिष्ठः प्रजातिकामो- ऽनुमन्त्रयां चक्रे देवेन सपिका प्रस्तः प्रस्तोतर्देवेभ्यो वाचमिष्य मूर्भुवस्वरोमिति । ततो वैस बहुः प्रजया पशुभिः पाजायत॥६ स एव तेन वसिष्ठस्यै कस्तोम भागानुमन्त्रेणाऽनुमन्त्रयेत बहुरेव' प्रजया पशुभिः प्रजायते । इयं त्वेवस्थितिरोमिसेवाऽनुमन्त्रयेत ॥७॥१८॥ १५ चतुर्थेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । १ स्तोमा- २ नु । ३ कुर्वाद् । ४।५ ने 'ए' लाल में कटा, -। ७ त्रैय्ये | ८व । -याया । १०-हु । ११-जाया। १२ प्रांज-1 १३ तस्तोम-1 १४-येते । १५ इयं । १६ पञ्चमः।

( १०५ ) अथैष वाचा मनमुद्गृह्णाति। यदाह सोमः पवत इति वोपावर्त- ध्वमिति का बाचैव तद्वाचो वन विगृहले बाचस्सत्येनातिमुच्यते । तस्मादोमित्येवाऽनुमन्त्रयेत ॥१॥ देवा वा अनया अय्या [विद्यया ] सरसयोर्धास्स्वर्ग लोकमुदक्रामन् । ते मनुष्या- सामन्वागमादिभ्यतस्त्रयं बेदमपीलयन् ॥२॥ तस्य पीलयन्त एकमेवाक्षरं नाऽशक्नुवन्पीलायितुमोमिति यदेतत् ॥३॥ एष उ इ वाव सरसः । सरसा ह वा एवंविदस्त्रयी विद्या भवति ॥४॥ स यां ह वै त्रय्या विद्यया सरसया जिति जयति यामृद्धिमनोति जयति तां जितिमश्नोति तामृद्धिं य एवं वेद ॥॥ एतद्ध वा अक्षरं त्रय्यै विद्यायै प्रतिष्ठा । ओमिति वै होता प्रतिष्ठित मोमिल्य- ध्वयुरोमित्युद्गाता ॥६॥ एतद्ध वा अक्षरं वेदानां त्रिविष्टपम् । एतस्मिन्वा अक्षर ऋत्विजो यजमानमाधाय स्वर्गे लोके समुहुन्ति तस्मादोमित्येवानुमन्त्रयेत् ॥७॥३॥१६॥ चतुर्थेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः। ६ २ ४ गुहासि देवोऽस्युपवास्युप तं वायस्व योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं -द्विष्मः॥१॥माहेनासि बहुलासि बृहत्यसि रोहिण्यस्यपन्नाऽसि ॥२॥ १ य । २-अ। ३ विभ-1 ४ त्रैय्-1 प्रतिष्ठं ।६-ए। १ देवास्मि । २ प्य् । ३ वयस्वि।४महिका ।

( १०९ ) ६ १४ सम्मुर्देवोऽसि समहम्भूयासम् । पाभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥शा यास्ते मजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्योम । उपते ता दिशामि ॥४॥ नाम मे शरीरम्मे प्रतिष्ठा मे । तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहथा इतीमाम्पृथिवीमवोचत् ॥५॥ तमियमागतम्पृथिवी पतिनन्दत्ययं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥६॥ यद्वाव मे त्वयीत्याह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥७॥ किं नु ते मयीति । नाम मे शरीरम्मे प्रतिष्ठा मे । तन्मे त्वयि तन्मे पुनर्देहीति । सदस्मा इयम्पृथिवी पुनर्ददाति ॥८॥ तामाह प्र मा वहेति । किमभीति । अग्निमिति तमग्निमभिप्रवहति ॥६॥ सोऽग्निमाहा- भिजिदस्यभिजय्यासम् । लोकजिदसि लोकं जय्यासम् । प्रत्तिरस्यन्नमयासम् । अन्नादो भवति यस्त्वैवं वेद ॥१०॥ सम्भूर्देवोऽसि समहम्भूयासम् । माभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥११।। यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्येमि । उप तेता दिशामि ॥१२॥ तपो मे तेजो मेऽनम्मे वाङ मे । तन्मे त्वयि । तन्मे मोऽपहया इत्यग्निमवोचत् ॥१३॥ तं तथैवाऽऽगत- ५ माभूरितिर् । ६ स । ७ मधी । ८ म । -हन्ति । १० प्रमिजिदस्य दो बार आया है । ११ जयं-। १२-पार । १३क्मा। १४ भस्माय । ॥

(१०७ ). मामिः प्रतिनन्दत्ययं ते भगवो लोकस्सह नावयं लोक शति ॥१४॥ ૧૨ यद्वाव मे स्वयीत्याहु तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥१॥ किं नु ते मयीति । तपो मे तेजो मेऽन्नम्मे वाङ् मे । तन्मे त्वाये । तन्मे पुनर्देहीति । तद] अस्मा अग्निप्नर्ददाति ॥१६॥ तमाह म मा वहेति ॥१७॥३॥२०॥ पञ्चमऽनुवाके प्रथमः खण्डः। किमभीति । वायुमिति । तं वायुमभिप्रवहति ॥१॥ स वायु- माह यत्पुरस्ताद्वासीन्द्रो राजा भुतो वासि।यदक्षिणतो वासीशानो भूतो वासि । यत्पश्चाद्वासि वरुणो राजा भूतो वासि । यदुत्तरतो वासि सोमो राजा भूतो वासि।यदुपरिष्टादववासि प्रजापतिर्भूतो- ऽववासि ॥२॥वासोऽस्येकवासोऽनवसृष्टो देवानाम्बिलमप्यथा ॥३॥ तव प्रजास्तवौषधयस्तवाऽपो विचलितमनुविचलन्ति ॥४॥ सम्भू- देवोऽसि समहम्भूयासम् । भाभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥शा यास्ते प्रजा उपदिष्टानाऽहं तव ताः पर्येमि । उप ते ता दिशामि ॥६॥ प्राणापाणौ मे श्रुतम्मे । तन्मे त्वयि । तन्मे मोऽपहथा इति वायुमवोचत् ॥७॥ तं तथैवागतं वायुः प्रतिनन्दमयं ते भगवो लोकः । स.ह.नावयं लोक इतिः॥७॥ यद्वाव में त्वयी- १५-२५-३-काश।(म)वधिः।५सर्भर।प्राखानौ।७यी। १ - -- ( १०८ ) साह नवाच मे धुनर्देहीति ॥सा किं तु ते मयीति । प्राणापानौ मे श्रुतम्मे । तन्मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मै वायुः पुन- र्ददाति ॥२०॥ तमाह प्रमा वहेति । किमभीति । अन्तरिक्षलोक- मिति । तमन्तरिक्षलोकमभिमवहति ॥१॥ तं तथैवाऽऽगतमन्तरिक्ष लोकः प्रति नन्दसंयं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥१२॥ यद्वाव मे त्वयीसाह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥१३॥ किं नु ते मयीति । अयम्म आकाशः स मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति। समस्मा अाकाशमन्तरिक्ष लोक पुर्नर्ददाति ॥१४॥ तमाह प्रमा पहति वारशाश२२॥ पञ्चमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। किमभीति । दिश इति । तं दिशोऽभिप्रवहति ॥२॥ तं तथै- चागतं दिशा प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यहाच मे युष्मास्विसाह वद्वाव मे पुनर्दत्तेति ॥३॥किं नु तेऽस्मास्थिति।श्रोत्रमिति । तदस्मै श्रोत्रं दिशः पुनर्ददति ॥४॥ सा माह में या बहतेति । किंमभीति । अहोरात्रयोलॊकमिति । असहोरात्रयोर्लोकमभिप्रवहन्ति ॥५॥ तं तथैवागतमहोराने प्रति- नन्दबोध्य ते भमयो लोकसह मोऽयं लोक इति ॥६॥ बहाव १-दू ।२-दति ॥

( १०६ ) मे युवयोरिसाह तद्वाव मे पुनर्दत्तमिति॥७॥ किं नु त आवयोरिति । अक्षितिरिति । तामस्मा अक्षितिमहोरात्रे पुनर्दत्तः ॥८॥ ते आह प्र मा वहतमिति ॥६॥२२॥ पञ्चमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । किमभीति । अर्धमासानिति । तमर्धमासानभिप्रवहतः ॥१॥ P २ तं तथैवागतमर्धमासाः प्रतिनन्दन्सयं ते. भगवो लोकः । स ह. नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्माखिसाह तद्वाव मे पुनर्दत्ते- ति ॥३॥ किं नु तेऽस्माखिति । इमानि तुद्राणि पवाणि । तानि मे युष्मासु । तानि मे प्रति संधत्तेति । तान्यस्यार्धमासाः पुनः पति संदधति ॥४॥ तानाह प्र मा वहतेति । किमभीति । मासा- निति । तम्मासानभिप्रवहन्ति ॥॥ तं तथैवागतम्मासाः २ प्रतिनन्दन्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥६॥ यद्वाव मे युष्मास्त्रियाह तद्भाव मे पुनर्दत्तति ॥७॥ किं नु तेऽस्मा- स्थिति । इमानि स्थूलानि पर्वाणि । तानि मे युष्मासु । तानि मे प्रति संधत्तेति । तान्यस्य मासाः पुनः प्रति संधति ॥८॥ तानाह मा बहतेति ॥॥३॥२३॥ पञ्चमेऽभुचाके चतुर्थः खण्डः। १ नास्ति । २-दति । ३-धाति, लाल रंग से शोधा हुआ है।

( ११० ) विमभीति । ऋतूनिति । तमृतूनभिप्रवहन्ति ॥२॥ ते तयैवाऽऽगतमृतवः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं सोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्मास्वित्याह तद्वाव मे पुनर्दत्तेति २0 किं नु तेऽस्मास्विति । इमानि ज्यायांसि पर्वाणि । तानि मे पुष्पास तानि मे प्रतिसंधत्तेति । तान्यस्यर्तवः पुनः प्रतिसंदधति ॥४॥ तानाह ममा वहतेति । किमभीति । संवत्सरमिति । तं संवत्सरमभिप्रवहन्ति ॥॥ तं तथैवाऽऽगतं संवत्सरः प्रतिनन्द- त्ययं ते भगवो लोकः । स ह नाक्यं लोक इति ॥६।। यद्वाव में स्वयीत्याह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥७॥ किं नु ते मयीति । अयम्म प्रात्मा । स मे त्वाय तन्मे पुनर्देहीति । तमस्मा आत्मानं संवत्सरः पुनर्ददाति ॥८॥ तमाह प्रमा वहेति ॥६॥२४॥ पञ्चमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । किमभीति । दिव्यान् गन्धर्वानिति तं दिव्यान् गन्धर्वानभि- प्रवहति ॥१॥ ते तथैवाऽऽगतं दिव्या गन्धर्वाः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो सोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्मा- स्वित्याह तद्वाव मे पुनर्दत्तेति ॥३॥ किं नु तेऽस्मास्विति । bokarne १।२ स्वधी ३षइते ॥ .

( १११ ) गन्धो मे मोदो मे प्रमोदो मे । तन्मे युष्मासु । तन्मे पुनर्देनेति सदस्मै दिव्या गन्धर्वाः पुनर्ददसि ॥४॥ तानाह म मा बहतेति । किमभीति । अप्सरस इति । तमपसरसोभिमवहन्ति ॥५॥ से तथैवाऽऽगतमप्सरसः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः। सहनोऽयं लोक इति ॥६॥ यद्वाव मे युष्मास्वित्याह तद्वाव मे पुनर्दति ॥७॥ किं नु तेऽस्मास्विति । हसो मे क्रीला मे मिथुनम्मे । तन्मे युष्यामु । तन्मे पुनर्दत्चति । तदस्मा अप्सरसः पुनर्ददति ॥८॥ वा अाह प्रमा वहतेति ॥२॥२॥ पञ्चमेऽनुवाके षष्ठः खयड। किमभीति । दिवामिति । तं दिवमभिप्रवहन्ति ॥ तं तथैवागतं द्यौः प्रतिनन्दमयं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव में त्वयीसाह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥२॥ किं नु ते मयीति । तृप्तिरिति । सकृत्तसेव श्रेषा । तामस्मै तृप्ति यौः पुनर्ददाति ॥४॥ तमाह प्र मा बहेति । किमभीति । देवानिति। तं देवानभिप्रवहति ॥५॥ तं तथैवाऽऽगतं देवाः प्रतिनन्दन्सयं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ।।६। यहाण मे युषाखि- २ गन्धर्यो । ३ युयदू॥

។ ( ११२ ) साह तद्वाव मे पुनर्दत्तेति ॥७॥ किं नु तेऽस्माविति । अमृतमिति। • तदस्मा अमृतं देवाः पुनर्ददति ॥८॥तानाह प्रमावहतेति॥६॥३॥२६॥ पञ्चमेऽनुवाके सप्तमः खण्डः । किमभीति । आदिसमिति । तमादिसमभिप्रवहन्ति ।।१|| स आदित्यमाह विभूः पुरस्तात्सम्पत् पश्चात् । सम्यङ् त्वमसि । समीचो मनुष्यानरोपी रुषतस्त ऋषिः पाप्मानं हन्ति । अपहत- पाप्मा भवति यस्त्वैवं वेद ॥२॥ सम्भूर्देवोऽसि ससहम्भूयासम् । आभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥३॥ यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पमि । उप ते ता दिशामि॥४॥ोजो मे बलम्मे चतुर्मे । तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहृथा इसादिसमवोचत्र॥॥ सं तथैवाऽऽगतमादियः प्रतिनन्दलयं ते भगवो लोकः । स र नावयं लोक इति ॥६॥ यद्वाब मे त्वयीसाह तद्वाब मे पुनर्देही ति ॥७॥ किं नु ते मयीति । ओजो में बलम्मे चतुर्मे । नन् त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मा आदिसः पुनर्ददति ॥८ तमाह प्रमा बहेति । किमभीति । चन्द्रमसमिति। तं चन्द्रमसमभि २-दाति ॥ १-वत्। २-सम्यद । ३ अरोतिषि 'ति' लाल से कटा हुआ । ४ त्व् । ५ एवम् । ह-भूतिर् । ७ भृतिर् । ८ ऽऽगता । नास्ति १० त्वीयी, त्वी यीति । ११ चन्- ( ११३ ) १२ १३ प्रवहति ॥६॥ स चन्द्रमसमाह ससस्य पन्था न त्वा जहाति। अमृतस्य पन्था न त्वा जहाति ॥१०॥ नवो नवो भवसि जाय- मानो भरो नाम ब्राह्मण उपास्से। तस्मात्ते ससा उभये देवमनुष्या अन्नाद्यम्भरन्ति । अन्नादो भवति यस्त्ववं वेद ॥११॥ सम्भूर्देवो- ऽसि समहम्भूयासम् । आभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥१२॥ यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्येमि । उप ते ता दिशामि ॥१३॥ मनो मे रेतो मे मजा मे पुनस्सम्भू- तिर्मे तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहृथा इति चन्द्रमसमवोचत् ॥१४॥ तं तथैवाऽऽमतं चन्द्रमाः प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । सह नावयं लोक इति॥१शायद्वाव मे त्वयीसाह तद्वाव मे पुनर्देहीति॥१६।। किं नु वे मयीति । मनो मे रतो मे प्रजा मे पुनस्सम्भूतिम । तन्मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मै चन्द्रमाः पुनर्ददति ॥१७॥ तमाह प्र मा वहेति ॥१८॥३॥२७॥ पञ्चमेऽनुवाके ऽष्टमः खण्डः । किमभीति । ब्रह्मणो लोकमिति । तमादिसमाभिप्रवहति ॥१॥ स आदियमाह प्र मा वहति । किमभीति । ब्रह्मणो लोकमिति । ११ चन्-1 १२ वा । १३-पास । १४ नास्ति, अमृतस्य पराध ..देवोऽसि समहम् । १५-ति । १६ मे, म । १७किं नु ।। १ प्रथमो । २ ब्राह १७ ( ११४ ) ६ तं चन्द्रमसमभिमवहति । स एवमेते देवतें अनुसंचरति ॥२॥ एषोऽन्तोऽतः परः प्रवाहो नास्ति । यानु काँश्चाऽतः पाचो लोको- नभ्यकादिष्म ते सर्व प्राप्ता भवन्ति ते जितास्तेष्वस्य सर्वेषु काम- चारो भवति य एवं वेद ॥३॥ स यदि कामयेत पुनरिहाऽऽजाये- यति यस्मिन् कुलेऽभिध्यायेद्यदि ब्राह्मणकुले यदि राजकुले तस्मिन्नाजायते । स एतमेव लोकम्पुनः प्रजाननभ्यारोहनेति ॥४॥ तदु होवाच शाख्यायनिर्बहुव्याहितो वा अयम्बहुशो लोकः । एतस्य कामाय नु अवते [वा] श्राम्यन्ति वा क एतत्प्रास्य पुनरिहेया- दत्रैव स्यादिति ॥॥॥२८॥ पञ्चमेऽनुवाके नवमः खण्डः । पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्तः । वै १ उच्चैश्श्रवा ह कौपयेयः कौरव्यो राजाऽऽस । तस्य ह केशी दायः पाञ्चालो राजा स्वस्त्रीय प्रास । तौ हाऽन्योन्यस्य प्रिया- वासतुः ॥१॥ स होश्चश्श्रवाः कौपयेयोऽस्माल्लोकात् प्रेयाय । तस्मिन् ह प्रेते केशी दाभ्योऽरण्ये मृगयां चचाराऽप्रियं विनिनी- ३-अन्ति, । ४ 'एषोत्यमभिप्रवहति । प्रमावहेऽति । किमभीऽति। ब्रह्मण्त लोकमिति... देवते अनु संचरति अधिक है।५ऽस्मि । ६-दिष्ठ । ७ तेषु । ८'वा' अधिक है। श्रूवते। १० 'चा' अधिक है। १-ऐ-२कौव-केश्शी,केश। ४ खस्त्री- ५'गा' लाल रङ्ग में कटा हुआ अधिक है।

( ११५ ) पमाणः ॥२॥ स ह तथैव पल्ययमानो मृगान् प्रसरन्नन्तरेणै- वोचैश्श्रवसं कौपययमधिजगाम ॥३॥ तं होवाच दृप्यामि स्वी जानामीति । न दृप्यसीति होवाच जानासि । स एवास्मि यम्मा मन्यस इति ॥४॥ अथ यद्गव आहुरिति होवाच य आविर्भव- त्यन्येऽस्य लोकमुपयन्तीत्यथ कथमशको म आविर्भवितुमिति॥१॥ ओमिति होवाच यदा वै तस्य लोकस्य गोप्तारमविदेऽतस्त आवि- रभूवमप्रियं चास्य विनेष्याम्यनु चैनं शासिष्यामीति ॥६॥ तथा भगव इति होवाच । तं वै नुत्वा परिष्वजा इति । तं ह स्म परिष्वजमानो यथा धूमं वापीयाद्वायु वाकाशं वाग्न्यचि वाऽपोवैवं ह स्मैनं व्येति । न ह स्मैनम्परिष्वगायोपलभते ॥७॥३।२६।। षष्ठेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। स होवाच यदै ते पुरा रूपमासीत्तत्ते रूपम् । न तु त्वा परि- ध्वगायोपलभ इति ॥१॥ ओमिति होवाच ब्राह्मणो वै मे साम विद्वान् सानोद्गायत् । स मेऽशरीरेण साम्ना शरीराण्यधूनोत् । तद्यस्य वैकिल साम विद्वान् सान्नोद्गायति देवतानामेव सलोकतां गमयतीति ।।२।। पतङ्गा प्राजापत्य इति होवाच प्रजापतेः प्रियः प्रस्सर-1 ७ उच्चैश्र-च्चि-1८य । अत । १० वा। ११ हे। १२ ॥ १ऽच । २ ने। ३-गोयो । ४.ऽप लभते । ५-रारण्य । २ - .49 ६ १ पुत्र आस । स तस्मा एतत् सामाप्रवीत् । तेन स ऋषीणामुद- गायत् । त एत ऋषयो धूतशरीरा इति ॥३॥ एतेनो एव साम्नति होवाच प्रजापतिर्देवानामुदगायत । त एत उपरि देवा धूतशरीरा इति । ४॥ तस्मिन् हैनमनुशशास । तं हानुशिष्यो- वाच यस्स्मैवैतत् साम विद्यात स स्मैव त उद्गायत्विति ॥५॥ स हानुशिष्ट आजगाम । स ह स्म कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणानुपपृ- ऋमानश्चरति ॥६॥३॥३०॥ - पष्ठेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । व्यूढच्छन्दसा वै द्वादशाहेन यक्ष्यमाणोऽस्मि । स यो वस्तत्साम वेद यदहं वेद स एव म उद्गास्यति । मीमांसध्वमिति ॥१॥ तस्मै ह मीमांसमानानामेकश्चन [ न ] सम्प्रत्यभिदधाति ॥२॥ स ह तथैव पल्ययमानश्श्मशाने वा वने वाऽऽकृतीशया- नमुपाधावांचकार । तं ह चायमानः प्रजही ॥३॥ तं हो- पात्र कोऽसीति । ब्राह्मणोऽस्मि प्रातृदो भाल्ल इति ॥४॥ स किं बेत्यति । सामेति ॥५॥ ओमिति होवाच । व्यूढच्छन्दसा बै द्वादशाहेन यक्ष्यमाणोऽस्मि ।स याद तत्साम वेस्थ यदहं वेद त्व- २ श्रा।७।८वेटा । १०-पाओ- -क्ष-२ यदि । इत्त्वम्।४वेस्थामथनाम् । वाव:साध।७म। ८ उब,उपारच्छायान,जायान।१० समू। ११ 'यदहं घरेथ अधिक है। .

( ११७ ) १६ मेव म उद्गास्यति । मीमांसस्वति ॥६।। तस्मै हमीमांसमानस्त- देव सम्प्रत्यभिदधौ ॥७॥ तं होवाचाऽयम्म उद्गास्यतीति ।।८।। तस्मै ह कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणा असूयन्त श्राहुरेषु ह वा अयं कुल्येषु सत्सूदास्यति । कस्मा अयमल मिति ।। ६॥ अलम् वै मामिति हस्माऽह । सैवाऽलम्मस्याऽलम् मतायद्तस्य हाऽल- मेवोज्जगौ । तस्मादालम्यैलाजोद्गातेत्याख्यापयन्ति॥१०॥३॥३१॥ षष्टेऽनुषाके तृतीयः खण्डः । तद्ध सात्यकीर्ता प्राहुयाँ वयं देवतामुपास्मह एकमेव वयं तस्यै देवतायै रूपं गव्यादिशाम एक वाहन एकं हस्तिन्येकम्पुरुष एकं सर्वेषु भूतेषु। लस्या एवेदं देवतायै सर्व रूपमिति॥१॥ तदेतदेकमेव रूपम्प्राण एव । यावद्धयेव प्राणेन प्राणिति तावद्रूपम्भवति तद्रू- पम्भवति ॥२॥ तदथ यदा प्राण उत्क्रामति दावेव भूतोऽनर्थ्यः परिशिष्यते न किंचन रूपम् ॥३॥ तस्यान्तरात्मा तपः। तस्मा- तप्यमानस्योष्णतरः प्राणो भवति ॥४॥ तपसोऽन्तरात्माग्निः। स निरुक्तः । तत्मात्स दहति ॥।॥ अथाधिदेवतम् । इयमेवैषा १२-ति से ठीक किया हुआ' १३ ''अधिक है। १४ नास्ति इति। १५-पान्च- १४ासू- १७ कुलेषु । १८ ऽगास-1 १६ अर्णम्।२० न्यै इसके आगे 'म' लाल रंग में कटा हुआ है । २१ 'म' अधिक है। २२ एवौ॥ १यव । २ एयो। ३-८।४-यः । ५ दति । -दैव---- १ २ ( ११८ ) ७ गोऽयम्पवते । तस्मिन्नेतस्मिन्नापोऽन्तः । तदन्नम् । सो- पासितव्यः । यदस्मिन्नापोऽन्तस्तेनाऽरूक्षः ॥६॥ तस्या- तपस् । तस्मादेष प्रातपत्युष्णतरः पवते ॥७॥ तपसो- । विद्युत्। स निरुक्तः। तस्मात्सोऽपि दहति ॥८॥ तानि ने चत्वारि साम प्राणो वाङ्मनस्स्वरः । स एष प्राणी रोति मनो नेत्रः। तस्य स्वर एव प्रजाः । प्रजावान् है एवं वेदः ॥६॥३॥३२॥ षष्ठेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । हो वायुः प्राण एव सः। योऽग्निर्वागेव सा । यश्चन्द्रमा, द् । य आदित्यस्स्वर एव सः । तस्मादेतमादित्यमाहु-.. नि ॥१॥ स यो ह वा अमूर्देवता उपास्ते या अमूरधि- I वा एता दुरनुसम्माप्या इव । कस्तवैद्यद्येता अनु . नुयान वा ॥२॥ अथ य एना अध्यात्ममुपास्ते स हा- पवति । निर्जीयन्तीव वा इत एता। [ ] अस्य वा स्य सह प्राणेन निर्जीयन्ति । क उ. एव तद्वेद यद्येता प्राप्नुयान वा ॥२॥ अथ य एंना उभयीरेकधा भत्र- ने वासितव्यो (1) यदस्मिन्नापोऽस्तस्-तस्मात्सोऽपि रामाया है। ।।२-रू। ३-मापा । ४ चा। ५। ६ उभेधीर।

१५ (११६ ) न्तीर्वेद स एवानुष्ठया साम वेदं स आत्मानं वेद स ब्रह्मवेद ॥४॥ तदाहुः प्रादेशमात्राद्वा इत.एता एकम्भवन्ति । अतो . ह्ययम्प्राण- स्वैर्य उपर्युपरि वर्तन इति ॥५॥ अथ हैक प्राहुश्चतुरंगुलादा इन एता एकम्भवन्तीति । अतो ह्येवायम्माणस्वयं उपर्युपरि । वर्तत इति ॥६।। स एष ब्राह्मण आवर्तः । स य एवमेतम्ब्रह्मण आवर्त वेदाऽभ्येनम्बजाः पशव आवर्तन्ते सर्वमायुरेति ॥७॥ स यो हैवं विद्वान्प्राणेन प्राण्याऽपानेनाऽपान्य मनसैता उभयोA- वता आत्मन्येत्य मुख आपत्ते तस्य सर्वमाप्तम्भवति सबै जितम्। न हास्य कश्चन कामोऽनाप्लो भवति य एवं वेदमाश३॥ षष्ठेऽनुवाके पश्चमः खण्डः । तदेतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च । मिथुनमुक्सामे । प्राचतुरं वाव मिथुनम्प्रजननम् ॥१॥ तद्यत्राऽद आह सोमः पवत इति वोपावर्तध्वमिति वा तत्सहैव वाचा मनसा माणेन स्वरेण हिड्- कुर्वन्ति । तद् हिङ्कारेण मिथुनं क्रियते ॥२॥ सहैव वाचा मनसा प्राणेन स्वरेण निधनमुपयन्ति । तनिधनेन मिथुनं क्रियते ॥३॥ तत्सप्तविधं साम्नः । सप्तकृत्व उद्गाताऽऽत्मानं च यजमानं च शरीरात्मजनयति ॥४॥ यादृशस्यो ह वै रेतो भवति तादृशं ७-८ खय्य । -रि (!) । १०-ल इद् । ११ ब्रह्मन ।। १पाप । २-कार।३-या।

१ ( १२० ) सम्भवति यदि वै पुरुषस्य पुरुष एव यदि गोर्गौरेव यद्यश्वस्याश्व एव यदि मृगस्य मृगएवं । यस्यैव रेतो भवति तदेव सम्भवति ॥५॥ तद्यथा ह वै सुवर्णं हिरण्यमग्नौ मास्यमान कल्याणतरं कल्याण- तरम्भवति एवमेव कल्याणतरेण कल्याणतरेणात्मना सम्भवति य एवं वेद ॥६॥ तदेतहचाभ्यनूच्यते ॥७॥३॥३४॥ षष्ठेऽनुबाके षष्ठः खण्डः। पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः । समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षते मरीची- नाम्पदमिच्छन्ति वेधस इति ।।१।। पतङ्गमक्तमिति । पाणो चै पतङ्गः । पतन्निव ह्येष्वङ्गेष्वति रथमुदीक्षते । पतङ्ग इयाचक्षते ॥२॥ अनुरस्य माययेति । मनो वा अमुरम् । तद्धन्यसुषु रमते । तस्यैष माययाक्तः ॥३॥ हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चित इति । हृदैव होते पश्यन्त्रि यन्मनसा विपश्चितः ॥४॥ समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षत इति । पुरुषो वै समुद्र एवंविद उ कवयः । त इमाम्पु- रुषेऽन्तर्वाचं विचक्षते ॥शा मरीचीनाम्पदमिच्छन्ति वेधस इति । मरीच्य इव वा एता देवता यदाग्निर्वायुरादियश्चन्द्रमाः ॥६॥ न ह ३ ४च्या। ५-ध्या-॥ १मत्तम् । २-ताः। ३-ए। ४ त । ५ हदू । ६ एवं । ७स।

( १२१ ) वा एतासां देवतानाम्पदमस्ति । पदेनो ह वै पुनर्मुत्युरन्येति ॥७॥ तदेतदनन्वितं साम पुनर्मृत्युना । अति पुनर्मत्युं तरति य एवं वेद ॥८॥३॥३५॥ षष्ठेनूवाके सप्तमः खण्डः। पतङ्गो वाचम्मनसा बिभर्ति तांगन्धर्वोऽवदद्गर्भ अन्तः। तांद्योतमानां स्वर्यम्मनीषामृतस्य पदे कवयो निपान्ति इति ॥२॥ पतङ्गो वाचम्मनसा बिभर्तीति । प्राणो वै पतङ्गः ।स इमां वाचम्मनसा बिभर्ति ॥२॥ तां गन्धर्वोऽवदद्गर्भे अन्तरिति । प्राणौ वै गन्धर्वः पुरुष उ गर्भः। स इमाम्पुरुषेऽन्तर्वाचं वदति।।३।। तां द्योतमानां स्वर्यम्मनीषामिति । स्वर्या ह्येषा मनीषा यद्वाक् ॥४॥ ऋतस्य पदे कवयो निपान्तीति । मनो वा ऋतमेवंविद उ कवयः। भोमियेतदेवाक्षरमृतम् । तेन यदृचम्मीमाँसन्ते यद्यजुर्यत्साम ६ तदेनां निपान्ति ॥॥३॥३६॥ षष्ठेऽनुवाकेष्टमः खण्डः। ८। १-यो । २-या । ३ वदति । ४ अम्तू- ५-म । ६ 'यत्साम' के मागे 'नोमित्ये-ऋतम्' है ॥

( १२२ ) अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तरम् । स सध्रीचीस्स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तर् इति ॥१॥ अपश्यं गोपामनिपद्यमानमिति । प्राणो वै गोपाः । स हीदं सर्व निपद्यमानो गोपायति ॥२॥ आ च परा च पथिभिश्चरन्तमिति तधे च ह वा इमे प्राणा अमी च रश्मय एतैर्ह वा एष एतदा परा च पथिभिश्चरति ॥३॥ स सध्रीचीस्स विषूचीर्वसान इस संधीचीश्च ह्येष एतद्विषूचीश्च प्रजा वस्ते ॥४॥ आ वरीवर्जि भुव श्वन्तरिति । एष होवैषु भुवनेश्वन्तरावरीवति ॥५॥ स एष : उद्गीथः । स यदैष इन्द्र उद्गीथ आगच्छति नैवोद्गातुश्चोपगातृ च विज्ञायते। इत एवोर्ध्वस्स्वरुदेति । स उपरिमूर्हो लेलायति॥ स विद्यादागमदिन्द्रो नेह कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशेक्ष्यत हा तस्मिन् ह न कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशिष्यते ॥७॥ तदे भ्रातृव्यं साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते यथेन्द्रो न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव [न] कंचन भ्रातृ म्पश्यते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥८॥२३७ षष्ठेऽनुवाके नवमः खण्डः । षष्ठोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ १-रीच्-इस पाद के प्रारम्भ में 'अति' ऐसाअधिक है। २१ ३-तृण-। ४-ध्व । ५ भागाद् । ६ परिषे-1 ७ एत । भ्र-॥;

( १२३ ) .६ ६ प्रजापतिम्ब्रह्माऽसृजत । तमपश्यममुखमरजत ॥२॥ तमप्र- पश्यममुख शयानम्ब्रमाऽऽविशत् । पुरुष्यं तत्। प्राणौ वै ब्रह्म । पाखो वावैनं तदाविशत् ॥२॥ स उदतिष्ठत् प्रजानां जनयिता । तं रक्षास्यन्वसचन्त ॥३॥ तमेतदेव साम गायनत्रायत। यद्गायन- त्रायत तद्गायत्रस्य गायत्रत्वम् ॥४॥ त्रायत एनं सर्वस्मारपाप्मनी मुच्यते य एवं वेद ॥५॥ तमुपाऽस्मै गायता नर इत्यूचाऽऽश्रक- णीयेनोपागायन् ॥६॥ यदुपाऽस्मै गायता नरं इति तेन गायत्रम- भवत् । तस्मादेषैव प्रतिपत्कार्या ॥७॥ पवमानायेन्दाचा अभि देवमिया-हुम्-भाक्षाता इति षोडशाक्षराण्यभ्यगायन्त। षोडशकलं वै ब्रह्म । कलाश एवैनं तद्ब्रह्माऽऽविशत् ॥८॥ तदेतच्चतुर्विंशयक्षरं गायत्रम् । अष्टाक्षरः प्रस्तावः । षोडशाक्षरं गीतं तच्चतुर्विंशतिस्स- पद्यन्ते । चतुर्विंशयधमासस्संवत्सरः । संवत्सरस्साम ॥६॥ ता चश्शरीरेण मृत्युरन्वैतत् । तद्यच्छरीरवत्तन्मृसोराप्तम् । अथ यद- शरीरं तदमृतम् । तस्याऽशरीरेण सान्ना शरीराण्यधूनोत ॥१०॥ १३ १४ ३॥३८॥ सप्तमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १ मुख्-। २ अप्रत्-। ३-५ । ४-आस्य । ५ अनुसच्- ६ गा- यन । श्रवसीय-1 ८ऽपगा-1१०-लाम् । ११ प्रास्त-1 १२ तम् । १३-यत । १४-सास।।

( १२४ ) प्रोवा३चोवाश्चोवा३च् हुम्भा भोवा इति षोडशाक्षरा- ण्यभ्यगायत । षोडशकलो वै पुरुषः । कलाश एवास्य तच्छरी- राण्यधूनोत् ॥२॥ स एपोऽपहतपाप्मा धूतशरीरः । तदेविक्रया- वृतियुदासंगायसो इत्युदास । आ इति आवद्यात् । वागिति तद्ब्रह्म । तदिदन्तरिक्षं सोऽयं वायुः पवते । हुमिति चन्द्रमाः। भा इत्यादिसः ॥२॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य तोर्भातीसाच- क्षते ॥३॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतोरभ्रमियाचक्षते ॥४॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतोः कुभ्रमिसाचक्षते ॥५॥ एतस्य ६ वा इदमक्षरस्य क्रतोश्शुभ्रभित्याचक्षते ॥६॥ एतस्य हवा इदमक्षरस्य क्रतोषभ इसाचक्षते ॥७॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य क्रतोदर्भ इसाचक्षते ॥८॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतोर्यों भातीयाचक्षते ॥६॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य क्रतोसम्भवती- याचक्षते ॥१०॥ तद्यरिक च भा३ इति च भा३ इति च तदेत- मिथुनं गायत्रम् । मिथुनेन जायते य एवं वेद ॥११॥ ३१३॥ सप्तमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। new KA १-या।२ कृत-३ सर्वत्र पेसा पाठ ।।५वृष: s- ( १२५ ) तदेतदमृतं गायत्रम् । एतेन वै प्रजापतिरमृतत्वमगच्छदेतेन देवा एतेनर्षयः ॥१॥ तदेतद्ब्रह्म प्रजापतयेऽब्रवीत् प्रजापतिः परमेष्ठिने प्राजापसाय परमेष्ठी प्राजापसो देवाय सवित्रे देवस्सविता- ऽनयेऽग्निरिन्द्रायेन्द्रः काश्यपाय काश्यप ऋश्यशृङ्गाय काश्यपाय ऋश्यशृङ्गाकाश्यपो देवतरसेश्यावसायनाय काश्यपाय देवतराश्या- वसायनः काश्यपश्श्रुषाय वाह्नेयाय काश्यपाय श्रुषो वाहेयः का- श्यप इन्द्रोताय दैवापाय शौनकायेन्द्रोतो दैवापश्शौनको दृतय ऐन्द्रोतये शौनकाय दृतिरैन्द्रोतिश्शौनकः पुलुषाय प्राचीनयोग्याय, पुलुषः प्राचीनयोग्यस्ससयज्ञाय पौलुषये प्राचीनयौग्याय सख- यज्ञः पौलुषिः प्राचीनयोग्यस्सोमशुष्माय सासयज्ञाय प्राचीन- योग्याय सोमशुष्मस्सासयज्ञिः प्राचीनयोग्यो हृत्स्वाशयायाऽल्ल- केयाय माहारषाय राज्ञे हृत्स्वाशय पालकेयो माहापो. राजा जनश्रुताय काण्ड्वियाय जनश्रुतः काण्ड्वियस्सायकाय जानश्रुते- याय काण्ड्वियाय सायको जानश्रुतेयः काण्ड्वियो नगरिणे जानश्रुतेयाय काण्ड्वियाय नगरी जानश्रुतेयः कारिडवयश्शक्राय १. काश्पयो' अधिक है । २ श्यावसाय । ३ भूषो,शूषो। ४, वाख्ने । ५ इन्द्रातू- ६-पिश् । ७ लोक्-। ८ सू सात्यायधिः प्राचीनयग्यो हत्खा अधिक है "६ जानुथ्र-- जानश्न- . १०शिंग्-- ( १२६ ) ११ शाळ्यायनय आत्रेयाय शङ्गश्शाट्यायनिरात्रेयो रामाय कातुजाते- याय वैयाघ्रपद्याय रामः कातुजातेयो धैयाघ्रपद्यः-॥२॥३॥४०॥ सप्तमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । २ ३ -शवाय बाभ्रव्याय शङ्खो बाभ्रव्यो दक्षाय कासायनय पात्रेयाय दक्षः कासायनिरात्रेयः कँसाय वारकये कँसो वारकिर पोष्ठपादाय वारक्याय प्रोष्ठपादो वारक्यः कँसाय वारक्याय कँसो वारक्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यः कुबेराय वारक्याय कुबेरो वारक्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यो जनश्रुताय वारक्याय जनश्रुतो वारक्यस्मुदत्ताय पाराशर्याय मुदत्तः पाराशर्योऽपाढायोचराय पाराशर्यायाऽषाढ उत्तरः पारा- शयों विपश्चिते शकुनिमित्राय पाराशयाय विपश्चिच्छकुनिमित्र: पाराशर्यों जयन्ताय पाराशर्याय जयन्तः पाराशर्य:-॥१॥३४॥ सप्तमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । -श्यामजयन्ताय लौहिसाय श्यामजयन्तो लौहिसः पल्लि- गुमाय बहिसाय पल्लिगुप्तो लोहियस्ससश्रवसे लौहिसाय सख- १ ११-नाब। १-नाय, कात्याजय-1श्वर-1 ३-४ सुदत्ता, सुदत्तताय। प्रष् (), प्राष्-॥ १ लोह- HERE ( १२७) वा लौहिसः कृष्णधृतये सासकये कृष्णधृतिस्सासकिश्श्याम- जयन्ताय लौहिसाय श्यामसुजयन्तो लौहित्यः कृष्णदत्ताय हिसाय कृष्णदत्तो लौहियो मित्रभूतये लौहिसाय मित्रभूति हित्यश्श्यामजयन्ताय लौहियाय श्यामजयन्तो लौहियस्त्रि- दाय कृष्णराताय लोहियाय त्रिवेदः कृष्णरातो लौहित्यो शस्विने जयन्ताय लौहित्याय यशस्वीजयन्तो लौहित्यो जयकायः हित्याय जयको लौहित्यः कृष्णराताय लौहित्याय कृष्णसतो हित्यो दक्षजयन्ताय लौहित्याय दक्षजयन्तो लौहित्यो पश्चिंते दृढजयन्ताय लौहित्याय विपश्चिदृढजयन्तो लौहित्यो |श्चिताय दाढजयन्तये दृढजयन्ताय लौहित्याय पंश्चितो दाई- पन्ति ढजयन्तो लौहित्यो वैपश्चिताय दाजयन्तये गुप्ताय हित्याय ॥१॥ तदेतदमृतं गायत्रमश यान्यन्यानि गीतानि ४ म्यान्येव तानि काम्यान्येव तानि ॥२॥३॥४२॥ सप्तमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । सप्तमोऽनुवाकस्समाप्तः॥ २-ति । ३ 'श्यामजयन्तो लौहित्या अधिक है। ४ वैविप्-1. HA (१२८ ) [चतुर्थोऽध्यायः] २ स्वताचो दर्शतो हरिनीलोऽसि हरितस्पृशस्समानबुद्धो मा हिंसीः । न मां त्वं वेथ प्रद्रव ॥१॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वपन्तम्पुरुषमकोविदमश्ममयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा॥२॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वपन्तम्पुरुषमको विदमयस्मयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥३॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वपन्तम्पु- रुषमकोविदं लोहमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥४॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वपन्तम्पुरुषमकोविदं रजतमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥५॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वपन्तम्पुरु- षमकोविदं सुवर्णमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ।।६।। आयुर्माता मतिः पिता नमस्त श्राविशोषण । ग्रहो नामाऽसि विश्वायुस्तस्मै ते विश्वाहा नमो नमस्ताम्राय नमो वरुणाय नमो जिघांसते ॥७॥ यक्ष्म राजन्मा मां हिंसीः । राजन् यक्ष्म मा हिंसीः । तयोस्संविदानयोस्सर्वमायुर- यान्यहम् ॥८॥४॥ प्रथमोऽनुवाकस्समाप्तः । १-णा । २. इति मन्ममयेन 1३ अयारय । ४ संक्षेप है ५मातन । ६-वाहाय । ७ रुणाय |८ अं॥

( १२६ ) पुरुषो वै यज्ञः ॥१॥ तस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाणि तत्मात- संवनम् । चतुर्विशत्यक्षरा गायत्री । गायत्रम्मातस्सवनम् ॥२॥ तद्वसूनाम् । प्राणा वै वसवः । पाणा हीदं सर्व वखाददते ॥३॥ स ययेनमेतस्मिन् काल उपतपदुपद्रवेत्स झूयात्वाणा वसव इदम्मे मातस्सवनं माध्यन्दिनेन सवनेनानुसंतनुतेति । अगदो हैव भवति ॥४॥ अथ यानि चतुश्चत्वारिंशतं वर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवनम् । चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् । त्रैष्टुभं माध्यन्दिनं सवनम् ॥५।। तदुद्राणाम् । प्राणा वै रुद्राः। प्राणा हीदं सर्व रोदयन्ति ॥६॥ स यद्येनमेतस्मिन् काल उपतपदुपद्रवेत् स यात्माणा रुद्रा इदम्मे माध्यन्दिनं सवनं तृतीयसवनेनानुसंत- नुतेति । अगदो हैव भवति ॥७॥ अथ यान्यष्टाचत्वारिंशतं वर्षाणि तत् तृतीयसवनम् । अष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती । जागतं तृतीयसवनम् ॥७॥ तदादियानाम् । प्राणा वा आदित्याः। प्राणा हीदं सर्वमाददते ॥६॥ स यद्येनमेतस्मिन् काल उपतपदु- पद्रवेत्स ब्रूयात्माणा आदित्या इदम्मे तृतीयसवनमायुषानु- संतनुतेति । अगदो हैव भवति ॥१०॥ एतद्ध तद्विद्वान् ब्राह्मण १-ति । २-ण । ३ वै अधिक है। ४ वांथि।

१ ३ ६ *( १३० ) उवाच महिदास ऐतरेय उपतपति किमिदमुपतपसि योऽहमनेनो- पतपता न प्रेष्यामीति । स ह षोडशशतं वर्षाणि जिजीव । प्रह षोडशशतं वर्षाणि जीवति नैनम्माणस्साम्यायुषो जहाति य एवं वेद ॥१॥४॥२॥ द्वितीयोऽनुवाकस्समाप्तः। व्यायुष कश्यपस्य जमदमेस्त्र्यायुषम्। त्रीण्यमृतस्य पुष्पाणि त्रीण्यायूंषि मेऽकृणोः॥१॥ स नो मयोभूः पितवाविशस्व शान्तिको यस्तनुवे स्योनः ॥२॥ येऽग्नयः पुरीष्याः प्रिविष्टाः पृथिवीमनु । तेषां त्वमस्युत्तमः प्र णो जीवातवे सुव ॥३४॥३॥ तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः । अरण्यस्य वत्सोऽसि विश्वनामा विश्वाभिरक्षणोऽपाम्पक्वो- ऽसि वरुणस्य दृतोऽन्तर्धिनाम ॥१॥यथा त्वममृतोमर्येभ्योऽन्तहितो- ऽस्येवं त्वमस्मानघायुभ्योऽन्तर्धेहि ।अन्तधिरंसि स्तेनेभ्यः॥२॥४॥४॥ चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः। ५ सम्य् ॥ १ त्रियाय्-। २त्रीण् । ३ आयुक्षि। ४-तो। ५ चतोका य।७-ओं। प्रा। १ विश्वोन-बें । २-क्षमा । ३'दूधनाम । ४ त।५ मतभ्यो १ ....... Wories 1 ( १३१ ) व्युषि सविता भवस्युदेष्यन् विष्णुरुद्यन्पुरुष उदितोबृहस्पति- प्रयन्मघवेन्द्रो वैकुण्ठो माध्यन्दिने भगोऽपराह्न उग्रो देवो लो- गायनस्तमिते यमो भवसि ॥२॥ अश्नसु सोमो राजा निशाया- तराजस्वमे मनुष्यान्पविशसि पयसा पशून् ॥२॥ विरात्रे । भवस्यपररात्रेऽङ्गिरा अग्निहोत्रवेलायाम्भृगुः ॥३॥ तस्य तदे- व मण्डलमूधः । तस्यैतौ स्तनौ यद्वार च प्राणश्च । ताभ्या- धुक्ष्वाऽध्यायम्ब्रह्मचर्यम्प्रजाम्पशून् स्वर्ग लोकं सजातवन- म् ॥४॥ एता आशिष आशासे । भूर्भुवस्वः। उदिते शुक्रमा- । तदात्मन्दधे ॥४॥ पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्तः । भगेरथो हैवाको राजा कामप्रेण यज्ञेन यक्ष्यमाण स॥२॥ ह कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणा ऊचुर्भगेरथो ह वा अयमैक्ष्वाको कामप्रेण यज्ञेन यक्ष्यमाणः । एतेन कथांवदिष्याम इति॥२॥ हाऽभ्येयुः । तेभ्यो हाऽभ्यागतेभ्योऽपचितीश्वकार ॥३॥ अथ स भाग आवबाजोप्त्वा केशश्मश्रूणि नखानिकृत्याऽऽज्ये- १-यो। २पराहेण । ३-ज । ४त । ५-य । ६ मासिष। दिषः। १-पाञ्च-२ यक्षम्- ३ एततेन । ४ 'सा.' अधिक है। पत्था ( १३२ ) नाऽभ्यज्य दण्डोपानहम्बिभ्रत् ॥४॥ तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तः कतमो वस्तद्वेद यथाऽऽश्रावितप्रत्याश्राविते देवान गच्छत इति ॥५॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यद्विदुषस्सद्गाता मुहोता वध्वर्युस्सुमानुषविदाजायत इति ॥६॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यच्छन्दांसि प्रयुज्यन्ते यत्तानि सर्वाणि संस्तुतान्यभि- सम्पद्यन्त इति ॥७॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यथा गायत्र्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति ॥६॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यथा दक्षिणाः प्रतिगृहीता न हिंसन्तीति ॥२॥४॥ षष्ठेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । एतान् हैनान् पञ्च प्रश्नान् पप्रच्छ ॥१॥ तेषां ह कुरुपञ्चा- लानाम्बको दालभ्योऽनूचान पास ॥२॥ स होवाच यथाऽऽश्रा- वितप्रसाश्राविते देवान् गच्छत इति प्राच्यां वै राजन् दिश्या- श्रावितप्रसाश्राविते देवान् गच्छतः । तस्मात्मातिष्ठनाश्रावयति पाइ विष्ठन्मत्याश्रावयतीति ॥३॥ अथ होवाच यद्विदुषस्मृदाता मुहोता स्वध्वर्युस्सुमानुषविदाजायत इति यो वै मनुष्यस्य सम्भूति वेदेति होवाच तस्य सद्गाता मुहोता स्वध्वर्युस्सुमानुषवि- ६ ૨ (ज्या॥ १-पाच-1 २ प्रस्म-1 ३ सम्-१६ चु-।

( १३३ ) ४ दाजायत इति प्राणा उ ह वाव राजन् मनुष्यस्य सम्भूतिरेवेति ॥४॥ अथ होवाच यच्छन्दांसि प्रयुज्यन्ते यत्तानि सर्वाणि संस्तुतान्यभिसम्पधन्त इति. गायत्रीमु ह वाव राजन् सर्वाणि छन्दांसि संस्तुतान्यभिसम्पद्यन्त इति ॥५॥ अथ होवाच यथा गायच्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति वषट्कारेणो ह वाव राजन गायच्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति ॥६॥ अथ होवाच यथा दक्षिणाः प्रतिगृहीता न हिंसन्तीति-॥७॥४॥७॥ षष्ठेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । -यो वै गायत्र्यै मुखं वेदेति होवाच तं दक्षिणा पतिगृहीता न हिंसन्तीति ॥२॥ अग्निई वाव राजन गायत्रीमुखम् । तस्माघदमावभ्यादधाति भूयानेब स तेन भवति वर्धते । एष- मेवैवं विद्वान्ब्राह्मणः प्रतिगृह्णन्भूयानेव भवति वर्धत उ एवेति॥२॥ स होवाचाऽनूचानो वै किलाऽयम्ब्राह्मण पास । त्वामहमनेन यज्ञेनैमीति ॥३॥ तस्य वै ते. तथोद्गास्यामीति होवाच यथै- कराडेव भूत्वा स्वर्ग लोकमेष्यसीति ॥४॥ तस्मा एतेन गाय- प्रेणोदीथेनोजगौ । स हैकराडेव भूत्वा स्वर्ग लोकमियाय । ४ सम्भूतिधुर, सम्भूतिर्सर। ५ है। १प्रश्न-र-यन् । ३गायत्र सों। १ ( १३४ ) तेन हैतनैकराडेव भूत्वा स्वर्ग लोकमेति [य एवं वेद] ॥५॥ ओं वा इति द्वे अक्षरे । ओं वा इति चतुर्थे । ओं वा इति षष्ठे। हुम्भा ओं वागियष्टमे ॥६।। तेन हैतेन प्रतीदर्शोऽस्य भवदस्या- समात्यस्योजगौ ॥७॥ तं होवाच किं त आगास्यामीति । स होवाच हरीमे देवाश्वा वागायेति । तथेति । तौ हास्मा आजगौ। तौ हैनमाजग्मतुः ॥८॥ स वा एष उद्गीथः कामानां सम्पदों वाश्चों वाश्चों वाश्च् हुम् भा ओं वागिति। साङ्गो हैव स ततुर- मृतस्सम्भवति य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥६॥८॥ ६ षष्ठेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । षष्ठोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ १ पुरुषो वै यज्ञः पुरुषो होगीथः । अथैत एव मृत्यवो यद- निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमाः ॥१॥ ते ह पुरुषं जायमानमेव मृत्युपाशैर- भिदधति । तस्य वाचमेवाग्निरभिदधाति प्राणं वायुश्चतुरादित्यइ- श्रोत्रं चन्द्रमाः ॥२॥ तदाहुस्स. वा उद्गाता यो यजमानस्य प्राणे- भ्योऽधि मृत्युपाशानुन्मुञ्चतीति ॥३॥ तद्यस्यैवं विद्वान् प्रस्तौति य एवास्य वाचि मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥४॥ अथः यस्यैवं ४ तोन ।५-शे । इसवद्॥ १प्रया । २ यजा-- उमुन्- ३ ... १३५ ) ६ विद्वानुद्गायति य एवास्य पाणे मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चा अथ यस्यैवं विद्वान् प्रतिहरति य एवास्य चतुषि मृत्युपा वास्योन्मुञ्चति ॥६॥ अथ यस्यैवं विद्वान्निधनमुपैति य श्रोत्रे मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥७॥ एवं वा एवंति यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुञ्चति ॥८॥ त : वा उद्गाता यो यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्म ., साङ्गं सतनुं सर्वमृत्योस्स्पृणातीति ॥६॥४॥६॥ सप्तमेऽनुवाकै प्रथमः खण्डः । तद्यस्यैवं विद्वानहिङ्करोति य एवास्य लोममु मृत्युप समादेवैनं स्पृणाति ॥२॥ अथ यस्यैवं विद्वान् प्रस्तौति य त्वाचे मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥२॥अथ यस्यैव । दिमादत्ते य एवास्य मासेषु मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति अथा यस्यैवं विद्वानुद्रायति य एवास्य स्नावसु मृत्युपाश देवनं स्पृणाति ॥४॥ अथ यस्यैव विद्वान्मतिहरति य एवार मृत्यपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥५॥अथ यस्यैवं विद्वानुपद - एवास्यास्थिषु मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥६॥ अथ ४-द्वा । ५ उद्गायति । ६ प्राणे । ७ नास्ति । ८ प्रतिहरा १क्व्-१.२ या।

( १३६ ) विद्वान् निधनमुपैति य एवास्य मज्जसु मृत्युपाशस्स तस्मादेवैन स्पृणाति ॥७॥ एवं वा एवंविदुद्गाता यजमानस्य प्राणेभ्येऽधि- मृत्युपाशानुन्मुच्याथैनं साङ्गं सतनुं सर्वमृत्योस्सपृणाति ।।दा- हुस्स वा उद्गाता यो यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुच्याथैनं साङ्गं सतनुं सर्वपसोस्स्मृत्वा स्वर्गे लोके सप्तधा दधातीति ॥६॥ स या एष इन्द्र वैध उद्यन् भवति सवितोदितो मित्रस्संगवकाल इन्द्रो वैकुण्ठो मध्यन्दिने समावर्तमानश्शर्व उग्रो देवो लोहितायन प्रजापतिरेव संवेशेऽस्तमितः ॥१०॥ तद्यस्यैवं विद्वान् हिङ्करोति य एबास्योद्यतस्स्वर्गों लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥११॥ अथ यस्यैव विद्वान् प्रस्तौति य एवास्योदिते स्वर्गो लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१२॥ अथ यस्यैवं विद्वानादिमादत्ते य एवास्य संगवकाले स्खों लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१३॥ अथ यस्यैवं विद्वानुद्रायति य एवास्य मध्यन्दिने स्वर्गों लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१४॥ प्रथ यस्यैवं विद्वान् प्रतिहरति य एवास्यापराहे स्वर्गों लोकस्तस्मिने- वैनं दधाति ॥२५॥ अथ यस्यैवं विद्वानुपद्रवति य एवास्यास्त- यतस्खों लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥२६॥ अथ यस्यैवं विद्वाभि- 6. ३ सम्भव ४-ए, भोजनायां गमा। ५-६ माध्-७ साऐवा।

( १३७ ) धनमुपैति य एवास्यास्तमिते स्वर्गो लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१७॥ एवं वा एवंविदुद्गाता यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मु- च्याथैनं, साङ्गं सतनुं सर्वमृत्योस्स्मृत्वा स्वर्गे लोके सप्तधा दधाति ॥१८॥१०॥ सप्तमेऽनुघाके द्वितीयः खण्डः । सप्तमोऽसुधाशास्समाप्तः ॥ ६ षड् ढ वै देवतास्वयम्भुषोऽनिर्मापुरसापादित्यः माणोऽनं वाक् ॥१॥ तात्रैष्ठ्ये व्यवदन्ताऽहं श्रेष्ठाऽस्म्यहं श्रेष्ठाऽस्म्य' [स्मि] मां श्रियमुपाध्वामिति ॥२॥ ता भन्योन्यस्यै श्रेष्ठताय नाऽतिष्ठन्त । ता अब्रुवन वा अन्योन्यस्यै श्रेष्ठतायै सिष्ठामह एता सम्पप्रवामहै यथा श्रेष्ठास्सम इति ॥२॥ ता अग्निमब्रुवन्कथं त्वं श्रेष्ठोऽसीति॥४॥ सोऽब्रवीदहं देवानाम्मुखमस्म्यहमन्यासामजानाम् । मयाऽऽहुतयो हूयन्ते । अहं देवानाम धिकरोम्यहम्मनुष्याणाम् ॥५॥ स यन स्याममुखा एव देवासुरमुखा अन्याः प्रजाः।नाऽऽहुतयो हूयेरन् । न देवानामन्नं विक्रियेत न मनुष्याणाम् ॥६॥ तत इदं सर्वम्परा- ११ १२ सप्त॥ १ षड्ढ । २ ड । ३-श्रा । ४-ठे । ५ ववद्-1 ६ श्रेष्- ७ अान्या- ८-है । ६ एत । १० त्वा । ११-कार- १२ म । १३ हूयन्ते (1) लिख कर हुयरन (1) किया गया । १४-ए ।

( १३८ ) भवेत्ततो न किंचन परिशिष्येतेति ॥७॥ एवमेवेति होचुनैवेह किंचन परिशिष्येत यत् त्वं न स्या इति ॥८॥ अथ वायुमब्रुव- न्कथमु त्वं श्रेष्ठोऽसीति ॥६॥ सोऽब्रवीदहं देवानाम्प्राणोऽस्म्यह- मन्यासाम्भजानाम् । यस्मादहमुत्क्रामामि ततस्स अप्लवते ॥१०॥ स यदहं न स्यां तत इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्येते- ति ॥११॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥१२॥११॥ १६ अष्टमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । अथादित्यमब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठोऽसीति ॥ ११॥ सोऽब्रवीद- इमेवोद्यन्नहर्भवाम्यहमस्तंयन्रात्रिः । मया चतुषाकर्माणि क्रियन्ते। स यदहं न स्यां नैवाहस्स्यान रात्रिः। न कर्माणि क्रियेरन् ॥२॥ तत इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्यतेति ॥३॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥४॥ अथ प्राणमब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठोऽसीति ॥१॥ सोऽब्रवीत्पाणो भूत्वाऽग्निर्दीप्यते । माणो भूत्वा वायुराकाशमनुभवति । प्राणो भूत्वाऽदिस उदेति। प्राणादन्नम्माणाद्वाक् ॥६॥ स यदहं न स्यां तत ४ १९ य ६१७ ग्रहहम् । १८-ऽवह ॥ -१३ उक् । ४-५ तत् (1)।

बी ( १३८ ) ३ इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्येतति ॥७॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥८॥ अथान- मब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठमसीति ॥१॥ तदब्रवीन्मयि प्रतिष्ठायाग्निर्दी- प्यते । मयि प्रतिष्ठाय वायुराकाशमनुविभवति । मयि प्रतिष्ठाया- दिस उदेति । मदेव प्राणो मद्वाक् ॥१०॥ स यदहं न स्यां तत इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्यतेति ॥११॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥१२॥ अथ वाचमब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठासीति॥१३।। साब्रवीन्मयैवेदं विज्ञायते मयाऽदः । स यदहं न स्यां नैवेदं विज्ञायेत नादः ॥१४॥ तत इदं सर्वम्पराभवेन् नैवेह किंचन परिशिष्यतेति ॥१॥ एवमेवे- ति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति॥१६॥४॥१२॥ अष्टमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ता अब्रुवन्नेता – किल सर्वा देवताः । एकैकामेवानुस्मः । स यन्नु नस्सर्वासां देवतानामेकाचन न स्यात्तत इदं सर्वम्परा- भवेत्ततो न किंचन परिशिष्येत । हन्त सार्धं समेस यच्छष्टं संक्षेप करते हैं । 'स (!न के स्थान में )स्या इति' यहां तक छोड़ दिया है । ७ इ-,त्य (!) संक्षिप्त दिया है । ८-शिष्या तुर् ॥ १-म।२सामू- ( १४० ) ४ ३ ६ तदसामेति ॥१॥ ता एतस्मिन् प्राण ओकारे वाच्यकारे समायन् । तद्यत्समायन् तत्साम्नस्सामत्वम् ॥२॥ ता अब्रुवन् यानि नो मर्यान्यनपहतपाप्मान्यक्षराणि तान्युझ्यामृतेष्वपहतपाप्मनु शुद्ध- वतरेषु गायत्रं गायामाऽग्नौ वायावादिसे प्राणेऽने वाचि । तेनापहस मृत्युमपहत्य पाप्मानं स्वर्ग लोकमियामेति॥३॥ एसग्नेर- मृतमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् । निरियस्य मर्त्यमनपहतपाप्मा- ऽक्षरम् ॥४॥ वेति वायोरमृतमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् । युरित्यस्य मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥॥ एत्यादित्यस्याऽमृतमपहत्पाप्म शुद्धमतरम् । त्येत्यस्य मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥६॥ प्रेति माणस्थास्तमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् । त्यस्य मर्त्यमनपहत पाप्माक्षरम् ॥७॥एत्यनस्यामृतमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् (नमित्यस्य मर्त्यमनपहनपाप्माक्षरम् ॥८॥ वेति वाचोऽमृतमपहतपाप्म शुद्ध- मतरम् । गित्यस्यै मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥६॥ ता एतानि मत्यान्यनपश्तपाप्मान्यवराययुद्धृत्याऽमृतेष्वपहतपाप्मम शुद्धेष्व- क्षरेकु गायत्रमागायनमौ वायावादित्ये प्राणेऽने वाचि । तेनाप- ११ १२ ३-हे। ४ वाच्च । ५-त्य । ६ अमू-(!)। ७ येन । ८-त । + १० व इन्य । ११. वेदिवाचो मृत' अधिक है पर लाल रङ्ग काला गया है । १२ए इत्य् । १३-मासु ॥

( १४१ ) १ हत्य मेत्युमपहत्य पाप्मा स्वर्ग लोकमायन् ॥१०॥ अपहत्य मृत्यु मपहत्य पाप्मानं स्वर्ग लोकमेति य एवं वेद ॥११॥४॥१३॥ अष्टमेऽनुबाके तृतीयः खण्डः । ता ब्रह्माऽब्रुवन्त्वयि प्रतिष्ठायैतमुद्यच्छामेति । ता ब्रह्माऽब्रवी- दास्येन प्राणेन युष्मानास्येन प्राणेन मामुपामवाथेति ॥१॥ ता एतेन प्राणेनौकारेण वाच्यकारमभिनिमेष्यन्त्यो हिङ्कारागका- रमोकारेण वाचमनुस्खरन्त्य उभाभ्याम्प्राणाभ्यां गायत्रमगायमो- वा३चोवा३चोवाश्च् हुम् भा वो वा इति ॥२॥ स यथोभया- पदी प्रतितिष्ठत्येवमेव स्वर्गे लोके प्रत्यतिष्ठन् । प्रति स्वर्गे लोके तिष्ठति य एवं वेद ॥३॥ य उ ह वा एवं विदस्माल्लोकात्नौति स पाण एव भूत्वा वायुमप्येति वायोरध्यभ्राण्यभ्रेभ्योऽधि दृष्टि वृष्ट्यैवेमं लोकमनुविभवति ॥४॥ ऋषयो ह सचमासां चक्रिरे । ते पुनः पुनर्बहीभिर्बहीभिः प्रतिपाद्भस्स्वर्गस्य लोकस्य द्वार नानुचन बुधुधिरे ॥५॥ स उ श्रमेण तपसा व्रतचर्येणेन्द्रमवरुरु- धिरे ॥६॥ सं होचुस्स्वर्ग बै लोकमैप्सिष्म । ते पुनः पुनर्बह्वीभि- बहीभिः प्रतिपद्भिस्वर्गस्य लोकस्य द्वारं नानुचनाऽभुत्स्महि । १प्रास्येनेन।२-पा,-प्राँन् । ३-अत् । ४ प्-। ५--१६ ऐप्सिष्टु । ७ 'बह्वीभिर' अधिक है। ८ऽभूतू-१० मेषन्त- ܩ तथा नोऽनुशाधि यथा स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुप्रज्ञायाऽनातीस्वस्ति संवत्सरस्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमियामेति ॥७॥ तान होवाच को वस्स्थविरतम इति ॥८॥४॥१४॥ अष्टमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । अहमियगस्त्यः ॥२॥ स वा एहीति होवाच तस्मै वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यद्विद्वाँसस्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुप्रज्ञायाऽनास्स्विस्ति संवत्सरस्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमेष्यथेति ॥२॥ तस्मा एतं गायत्रस्योद्गीथमुपनिषदममृतमुवाचाऽग्नौ वायावादित्ये प्राणेऽन्ने वाचि ॥३॥ ततो वै ते स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुमज्ञायाऽनार्ता- स्स्वस्ति संवत्सरस्योडचं गत्वा स्वर्ग लोकमायन् ॥४॥ एवमेवैवं विद्वान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुप्रज्ञायाऽनार्तस्स्वस्ति संवत्सर- स्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमति ॥॥॥४१॥ ४ अष्टमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । अष्टमोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ एवं वा एतं गायत्रस्योद्गीथमुपनिषदममृतमिन्द्रोऽगस्त्यायो- वाचाऽगस्त्य इषाय श्यावाश्वय इषश्श्याकाश्विौषूक्तये गौक्ति- E'अहमित्य्' () अधिक है। १ नास्ति । २-शामि ।३'द्वारमधैव' अधिक है । ५ वाय् ॥ १-गीत-१२-प्रावो।

( १४३ ) चालायनाय ज्वालायनश्शाट्यायनये शाब्यायनी रामाय फ्रातु- जातेयायवैयाघ्रपद्यायरामः कातुजातेयोवैयाघ्रपद्य-॥३॥॥॥१६॥ नवमेऽनुवा के प्रथमः खण्डः । २ -शङ्खाय बाभ्रव्याय शङ्खो बाभ्रव्यो दक्षाय कात्यायनय आत्रेयाय दक्षः कात्यायनिरात्रेयः कँसाय वारक्याय कॅसो वार- क्यस्सुयज्ञाय शाण्डिल्याय मुयज्ञश्शाण्डिल्योऽग्निदत्ताय शाण्डि- ल्यायाऽग्निदत्तशाण्डिल्यस्सुयज्ञाय शाण्डिल्याय मुयज्ञशाण्डि- ल्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यो जनश्रुताय वारक्याय जनश्रुतो वारक्यस्मुदत्ताय पाराशर्याय ॥१॥ सैषा शाट्यायनी गायत्रस्योपनिषदेवमुपासितव्या ॥२॥४॥१७॥ नवमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । नवमोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ ३ ४ केनेषितम्पतति प्रेषितम्मनः केन प्राणः प्रथमः मैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चतुश्श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥ श्रोत्रस्य श्रोत्रम्मनसो मनो यद् वाचो हवाचं स उ प्राणस्य प्राणः । चतुषश्चतुरतिमुच्य धीराः प्रेसाऽस्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥२॥ ३ ब्वा-४-आये । ५ वाय्या-॥ १-पाय । २-1 ३-ओ, और • जनश्रुताय वारक्याय जनश्रुते (1) वारक्यसू' अधिक है । ४-यो । Pinterestartup:20. THISRORE ( १४४ ) १ न तत्र चतुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः । न विद्म न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥३॥ अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि । इति शुश्रुम पूर्वेषां ये मस्तव्याचचक्षिरे ॥४॥ यद् वाचाऽनभ्युदितं बेन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥१॥ यन्मनसा न मनुते येनाऽऽहुंमनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि मेदं यदिदमुपासते ॥६।। यच्चक्षुषा न पश्यति येम घषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥७॥ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥८॥ यत् प्राणेन न पाणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥६॥४॥१८॥ दशमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । यदि मन्यसे सुवेदेति दहमेवाऽपि नूनं त्वं वेस्थ ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेषु । अथ नु मीमांस्यमेव ते मन्येऽविदितम् ॥ १॥ १ विदु । २-अ.। ३ ऽवै अधिक है । ४-शिष्- ५-धू-। ६ मन्यो । ७ मतेम । ८ नश् । ६ उत्तानुक्त है। १०-णीति ॥

( १६५ ) ६ नाऽहम्मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद् वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥२॥ यस्याऽमतं तस्य मतम्मतं यस्य न वेद सः। अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥३॥ प्रतिबोधविदितम्मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्य विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥४॥ इह चेदवेदीदथ ससमस्ति । न चेदिहाऽवेदीन्महतीविनष्टिः । भूतेषु-भूतेषु विविध्यधीराः प्रेयाऽस्माल्लोकादमृता भवन्ति।।।।४।१६ दशमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये। तस्य ह. ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्ताऽस्माकमेवाऽयं विजयः।अस्माकमेवाऽयं महिमेति ॥२॥ तद्धैषां विजज्ञौ । तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव । तन्न व्यजानन्त किमिदं यक्षमिति ॥२॥ तेऽग्निमब्रुवनातवेद एतद् विजानीहि किमेतद् १ यत्तमिति । तथेति ॥३॥ तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीति । ३ अग्निर्वा अहमस्मीसब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥४॥ तस्मिँ- १ अम्-१२-वितू-॥ १-प्रत । २-मू । ३ऽहम् ।

३ ( १४६ ) स्त्वयि किं वीर्यमिति । अपीदं सर्वं दहेयम् यदिदम्पृथिव्यामिति ॥॥ तस्मै तृणं निदधावेतदहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजबेन।तन्न शशाकदग्धुम्। स तत एव निववृते नैनदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥६॥ अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति॥७॥ तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीसब्रवी- न्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥८॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति । अपीदं सर्वमाददीय यदिदम्पृथिव्यामिति ॥६॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाका- दातुम्।सतत एव निवटते नैनदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति॥१०॥ अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति। तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोऽदधे ॥११॥ स तस्मिन्नेवाऽऽकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमा हैमवतीम् । ता होवाच किमेतद् यत्तमिति ॥१२॥४॥२०॥ दशमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद् विजये महीयध्व इति । ततो हैव विदांचकार ब्रह्मेति ॥१॥ तस्माद्वा एते देवा अतितरामि- Fulr. ४-म । ५ निवत ६ म (1)।

( १४७ ) १ ૨ ६ ७ बान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रः । ते ह्येननेदिष्टम्पस्पृशुस्स ह्येन प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति ॥२॥ तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवा- ऽन्यान् देवान् । स ह्येननेदिष्ठम्पस्पर्श स धेनत् प्रथमो विदांचकार ब्रह्मति ॥३॥ तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युलो व्यातदार शति । न्यामिषदा३ । इसधिदेवतम् ॥४॥ अथाऽध्यात्मम् । यदेनद् गच्छतीव च मनोऽनेन चैनदुपस्मरसभीक्ष्णं संकल्पः ॥५॥ तद्ध तद्वनं नाम । तद्वनमित्युपासितव्यम् । स य एतदेपं घेदाऽभिहैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥६॥ उपनिषदम्भो ब्रूहीति । उक्ता त उपनिषत् । ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥७॥ तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदास्सर्वाङ्गाणि ससमायतनम् ॥८॥ यो वा एतामेवं वेदाऽपहस पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोकेऽज्येये २ १० प्रतितिष्ठति ॥६॥२१॥ दशमेऽनुवाके चतुर्थःखण्डः । दशमोऽनुवाकस्समाप्तः॥ - १ नेदिष्मा,नेदिषुम् । २ते । ३ अन् । ४ विद्यु। ५ इती३।६ मी । - ७ सुक् ।८ सम्वक्षन्ति । ९ो। १०-ए।

( १४८ ) ६ आशा वा इदमग्र आसीद्भविष्यदेव । बदभवत् । ता आपो- ऽभवन ॥१॥ तास्तपोऽतप्यन्त । तास्तपस्तेपाना हुस्सिसेव प्राची प्राश्वसनू । स वाव प्राणोऽभवत् ॥२॥ ताः पाण्याऽपानन् । स वा अपानोऽभवत् ॥३॥ ता अपान्य व्यानम् । स वाव व्यानो- ऽभवत् ॥४॥ ता व्यान्य समानन् । स वाव समानोऽभवत् ॥५॥ तास्समान्योदानन् । स वा उदानोऽभवत् ॥६॥ तदिदमेकमेव सधमाधमासीदविविक्तम् ॥७॥ स नामरूपमकुरुत । तेनैनद्वय- विनम् । वि ह पाप्मनो विच्यते य एवं वेद ॥८॥ सदसौ वा आदिखः प्राणोऽग्निरपान आपो व्यानो दिशस्समानश्चन्द्रमा उदानः॥६॥ तद्वा एतदेकमभवरमाण एव । स य एवमेतदेकम्भ- बढेदैवं हैतदेकधा भवतीसेकधैव श्रेष्ठस्खानाम्भवति ॥१०॥ तदग्नि प्राणो वागिति पृथिवी वायुर्वं प्राणो वागित्यन्तरिक्षमा- दित्यो वै प्राणो वागिति द्यौर्दिको वै पासो वागिति श्रोत्रं चन्द्रमा वै प्राणो वागिति मनः पुमान्दै प्राणो वागिति स्त्री॥१२॥ तस्येदं -सृष्ट, शिथिलम्भुवनमासीदपर्याप्तम् ॥१२॥ स मनोरूपमकुरुत । १० १'आशा वा' का पुनः पाठ है । २ येद् । ३ अपान । ४ प्-५-मादम् । ६-पम् । ७-विनोत् । ८-इम् । ¢ उपा-१० स्व-।।

( १४६ ) तेन तत्पर्यामोत् । दृढ़ ह वा अस्येदं स्पृष्टमशिथिलम्भुवनम्पर्या- सम्भवति य एवं वेद ॥१३॥४॥२२॥ एकादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। १ ६ सैषा चतुर्धा विहिता श्रीरुद्गीथस्सामाक्य ज्येष्ठब्राह्मणम्॥१॥ प्राणो वावोद्वाग्गी स उद्गीथः ॥२॥ प्राणो वावामो वाक् सा तत्साम ॥३॥ प्राणो वाव को वाक् तदर्यम् ॥४॥ प्राणो वाव ज्येष्ठो वाग्ब्राह्मणं तज्ज्येष्ठब्राह्मणम् ॥५॥ उपनिषदम्भो जूहीति । उक्ता त उपनिषद्यस्य ते धातव उक्ताः । त्रिधातु विषु वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥६॥ एतच्कुलं कृष्णं तानं सामवर्ण इति ह स्माह यदैव शुक्लकृष्णे ताम्रो वर्णोऽभ्यवैति स वै ते दृड्ले दशम मानुषमिति विधातु । स ऐक्षत क र्नु म उत्तानाय शयानायेमा देवता बलि हरेयुरिति ॥७॥४॥२३॥ एकादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः ॥ स पुरुषमेव प्रपदनायाऽटणीत ॥१॥ तम्पुरस्तात्मसञ्चम्पा- १ऽसाश् । २ विहीता । ३ अगीः, गीः । ४।५-६-षद् । ७-दा । ८ वे । -त । १० दश्श्; श् के पूर्व एक अक्षर पढ़ा नहीं जासा, कदाचित् कदा है। १९ उक्तानाथ ॥

( १५० ) १ २ विशत् । तस्मा उरुरभवत् । तदुरस उरस्त्वम् ॥२॥ तस्मा अत्रसद एता देवता बलिं हरन्ति ॥३॥ वाचमनुहरन्तीमग्निरस्मै बलिं हरति ॥४॥ मनोऽनुहरच्चन्द्रमा अस्मै बलिं हरति ॥५॥ चतुरनु- हरदादियोऽस्मै बलिं हरति ॥६॥ श्रोत्रमनुहरादिशोऽस्मै बलिं हरन्ति ॥७॥ प्राणमनुहरन्तं वायुरस्मै बलिं हरति ॥८॥ तस्यैते निष्खाताः पन्था बलिवाहना इमे प्राणाः । एवं हैतं निष्खाता: पन्था बलिवाहनास्सर्वतोऽपियन्ति प्राणा य एवं वेद ॥६॥ सा हैषा ब्रह्मासन्दीमारूढा । आ हास्म ब्रह्मासन्दी हरन्यधि ह ब्रह्मासन्दी रोहति य एवं वेद ॥१०॥ तदेतद् ब्रह्मयशश् श्रिया परिदृढम् । ब्रह्म ह तु सन् यशसा श्रिया परिढो भवति य एवं वेद ॥११॥ तस्यैष प्रादेशो योऽयं दक्षिणेऽक्षनन्तः । तस्य यच्छुक्लं तदृचां रूपं यत्कृष्णं तत्सान्नां यदेव ताम्रामिव बभ्रुरिव तद्यजुषाम् ॥१२॥ य एवायं चतुषि पुरुष एष इन्द्र एष प्रजा- पतिस्समः पृथिव्या सम आकाशेन समो दिवा समस्सर्वेण भूवेन । एष परो दिवो दीप्यते । एष एवेदं सर्वमित्युपासि- ६ ७ 3. तव्यम् ॥१३॥४॥२४॥ एकादशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । १ अदिशा२मा।३बलिं वाह।४ ऽपय।५हर ति।६-श।७।-ऊर॥

सञ्चाऽसच्चाऽसच्च सच वाक् च मनश्च [ मनश्च] वाक् च ។ चतुश्च श्रोत्रं च श्रोत्रं च चतुश्च श्रद्धा च तपश्च तपश्च श्रद्धा च तानि षोडश॥२॥षोडशकलम्ब्रह्मोस य एवमेतत् षोडशकलम्ब्रह्म वेद तमेवैतत् षोडशकलम्ब्रह्माऽप्येति ॥२॥ वेदो ब्रह्म तस्य ससमायतनं शमः प्रतिष्ठा दमश्च ॥३॥ तद्यथा श्वः प्रैष्यन् पापात्कर्मणो जुगुप्सेतैवमेवाऽहरहः पापात्कर्मणो जुगुप्सेताss कालात् ॥४॥ अथैषां दशपदी विराट् ॥॥ दश पुरुषे स्वर्ग- नरकाणि । तान्येनं वगै गतानि स्वर्ग गमयन्ति नरकं गतानि नरकं गमयन्ति ॥६॥४॥२५॥ एकादशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । मनो नरको वाङ् नरकः प्राणो नरकश्च चतुर्नरकश्श्रोत्रं नरकस्त्वङ् नरको हस्तौ नरको गुदं नरकशिश्नं नरकः पादौ नरकः ॥१॥मनसा परीक्ष्याणि वेदेति वेद ॥२॥ वाचा रसान्वेदेति वेद ॥३॥ प्राणेन गन्धान्वेदेति वेद ॥४॥ चक्षुषा रूपाणि वेदेति वेद ॥॥ श्रोत्रेण शब्दान्वेदेति वेद ॥६॥ त्वचा संस्पर्शान्वे- देति वेद ॥७॥ हस्ताभ्यां कर्माणि वेदेति वेद ॥८॥ उदरेणा- १--अश्॥

( १५२ ) ऽशनयां वेदेति चेद ॥६॥ शिश्न रामान्वेदेति वेद ॥१०॥ पादाभ्यामध्वनो वेदेति वेद ॥११॥ प्लक्षस्य प्रास्त्रवणस्य प्रादेशमात्रादुदक् तत्पृथिव्यै मध्यम् । अथ यत्रैते सप्तर्षयस्तदिवो मध्यम् ॥१२॥ अथ यत्रैत ऊषास्तत्पृथिव्यै हृदयम् । अथ यदे- तत्कृष्णं चन्द्रमासे तदिवो हृदयम् ॥१३॥ स य एवमेते धावा- पृथिव्योर्मध्ये च हृदये च वेद नाऽकामोऽस्माल्लोकात्मेति ॥१४॥ नमोऽतिसामायऽतुरेताय धृतराष्ट्राय पाथुश्रवसाय ये च प्राणं रक्षन्ति ते मा रक्षन्तु । स्वस्ति । कर्मेति गाईपसरशम इसाह- वनीयोदम इसन्बाहार्यपचनः ॥१।४।२६॥ एकादशेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः। एकादशोऽनुवाकस्समाप्तः । ६ कस्सविता | का सावित्री । अग्निरेव सविता । पृथिवी सावित्री ॥१॥ स यत्राऽग्निस्तत्पृथिवी यत्र वा पृथिवी तदग्निः । ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥२॥ कस्सविता । का सावित्री । वरुण एव सविता । आपस्सावित्री ॥३॥ स यत्र वरुणस्तदापो o यत्र वरऽऽपस्तद्वरुणः । ते द्वेयोनी।। तदेकम्मिथुनम् ] ॥४॥ ५ पतुर । २-वद् । ३-कोमो । ४-सामय-सामाय । ६ पार्जु-से ठीक किया हुआ है । ७-मम् ॥

(१५३ ) ३ ૨ '- कस्सविता । का सावित्री । वायुरेव सविता । आकाशस्सावित्री ॥५॥ स यत्र वायुस्तदाकाशो यत्र वाऽऽकाशस्तद्रायुः । ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥६॥ कस्सविता । का सावित्री। यज्ञ एव सविता । छन्दांसि सावित्री ॥७॥ स यत्र यज्ञस्तच्छन्दांसि यत्र वा छन्दांसि तद्यज्ञः । ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥८॥ कस्सविता। का सावित्री स्तनयित्नुरेव सविता । विद्युत् सावित्री । ६॥ स यत्र स्तनायित्नुस्तद्विशुद्यत्र वा विद्युत् तत्स्तनयित्नुः । ते दे योनी । तदेकाम्मथुनम् ॥१०॥ कस्सविता । का सावित्री आदिस एव सविता। द्यौस्सावित्री॥११॥स यत्राऽऽदिसस्तदद्यौर्यत्र का द्यौस्तदादियः । ..ते २ योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१२॥ कस्सविता।का सावित्री । चन्द्र एव सविता । नक्षत्राणि सावित्री ॥१३॥ स यत्र चन्द्रस्त नक्षत्राणि यत्र वा नक्षत्राणि तच्चन्द्रः । ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१४॥ कस्सविता । का सावित्री। मन एव सविता । वाक् सावित्री ॥१५॥ स यत्र मनस्तद्वाग्यत्र [वा] वाक् तन्मनः । ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥६६॥ कस्स- विता । का सावित्री । पुरुष [एव] सविता । स्त्री सावित्री। स यत्र पुरुषस्तत् स्त्री यत्र वा स्त्री तत्पुरुषः ते द्वे योनी। तदेकम्मि- थुनम् ॥१७४॥२७॥ द्वादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । ११-१२ संक्षेप किया गया है । ३-इन् । ४-ई: (1) ૧ . ૨ ४ 4 ( १५४ ) तस्या एष प्रथमः पादो भूस्तत्सवितुर्वरेण्यमिति । अग्नि बरेण्यम् । आपो वै वरेण्यम् । चन्द्रमा वै वरेण्यम् ॥१।। तस्या एष द्वितीयः पादो भर्गमयो भुवो भगो देवस्य धीमहीति । अग्निः भर्गः आदियो वै भर्गः । चन्द्रमा वै भर्गः॥२॥ तस्या एष तृतीयः पादस्वधियो यो नः प्रचोदयादति । यज्ञो वै प्रचोदयति । स्त्री च वै पुरुषश्च प्रजनयतः॥३॥ भूर्भुवस्तत्सवितुर्वरेण्यम्भर्गो देवस्य धीमहीति । अग्निर्वे भर्गः । आदिसो वै भर्गः । चन्द्रमा वै भर्गः ॥४॥ स्वर्धियो यो नः प्रचोदयादिति । यज्ञो वै प्रचोदयति । स्त्री च वै पुरुषश्च प्रजनयतः ॥५॥ भूर्भुवस्स्वस्तत् सवितुर्वरेण्यम्भर्गों देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयादित ।यो वा एतां सावित्री- मेवं वेदाऽप पुनर्मृत्युं तरति सावित्र्या एव सलोकतां जयति साविश्या एव सलोकतां जयति ॥६॥४॥२५॥ द्वादशेऽनुवाफे द्वितीयः खण्डः । द्वादशोऽनुवाकस्समाप्तः । इत्युपनिषदब्राह्मण समाप्तम् ॥ २ १-सं। २ 'यो वै प्रचोदयति । स्त्री च वै पुरुषश्च प्रजनयतः' ' अधिक 'करो।

१-ऋषि-नामों की सूची। ६० से वंश का अभिप्राय है। अगस्त्य, ४॥१५॥१॥१६॥१॥ वं। अतिसाम एतुरेत, ४।२६।१५॥ अनुवक्ता सात्यकीर्त, १४॥ अभयद प्रासमात्य, ४८७॥ अमिप्रतारी, ३१२१॥२२२,३,१३॥ अभिप्रतारी काक्षसेनि १।५।१॥३॥२१॥ प्रयास्य, २८७,८॥११॥८॥ प्रयास्य आङ्गिरस, २७।२,६८३|| अषाढ उत्तर पाराशर्य ३।४११॥ धं० प्राङ्गिरस, २२२१॥ देखो प्रयास्म प्रां। आजकेशी, २३॥ प्राजद्विश, देखो बम्ब प्रा। पाटणार, देखो पार पा। प्रात्नेय, देखो दक्ष कात्यायनि प्रा०, शनशास्वायमि भा। पारुणि, १।४।१॥ प्रारुणेय, २२५॥१॥ माकायण, देखो गळूनस प्रा । भालकेय, देखो कृत्स्वाशय प्रा० । आसमात्य, देखो अभयद प्रा० । इन्द्रोत देवाप शौनक, ३।४०1१॥ बं० इष श्यावाश्वि, ४१६१॥ वं अभयस कौपयेव, ३।२९।१,२,३॥ , .

. उत्तर, देखो प्राषाढ उ० पाराशर्य । उमा हैमवती, ४।२०१॥ उलुक्य (?) जानश्रुतेय, श६३॥ उशन: काव्य, २/७/२,६॥ ऋषयटग काश्यप, ३।४।। एतुरेत (?), देखो अतिसाम ए। पक्ष्वाक, देखो भगेरथ ऐ०। पक्ष्याक वार्ण, ११५१०॥ एतरेय, देखो महिदास । ऐन्द्रोति, देखो ति प.. शौनक । कंस वारकी, ३।४।१॥ वं। कंस बारक्य, ३२४१२॥ पं० १४:१७११॥६० । कक्षीवन्त, २५११॥ कश्यप, ४॥३॥१॥ काक्षसेनि, देखा अभिप्रतारी का० । काराधिय, ३।१०।२॥ देखो जनश्रुत का।नगरी जानथुज्ञेय का । सायक जानथुतेय का। कात्यायनि, देखो दक्ष का आत्रेय । कापेय, ३२२,१२॥ देखो शौनक का। कारीरादि, शा॥ फाव्य, देखो उशनः का० । काश्यप, ३४१२॥ वं०। देखो मृष्यङ्ग का देवतरः श्यावसायन का । श्रुष वालेय का। कुबेर वारक्य, ३।४११॥ वं। कुरु, (एकव०) १.५६।१(बहुब०)२॥३८॥१॥ देखो कौरव । कुरुपश्चाला:, ३२७६॥७॥३०॥६॥४२॥७२॥ कृपादत्त लौहित्य, २४२२१॥ वं० । देखो त्रिवेद का लौहित्य ।

(३) कृष्णधृति सायाक, ३४२११॥ वं। कृष्ण राताहित्य, ३।४।१॥ २० । देखो वियद ई० लौहत्य। केशी दर्ग्य, ३९६१,२॥ कोपयेय, देखो उच्चश्श्रवः । कातुजातेय, देखो राम का वैयाघ्रपद्य । क्षमि, देखो सुदक्षिण क्ष। गालूनस पाकायण, १।३४॥ गन्धर्वाप्सरसः, ११४११॥५५॥१०,१२॥३॥५॥१॥ गुप्त, देखो पश्चित दाढजयन्ति गु० लौहित्य । गोबल वार्ण, शा॥ गोश्रु (जाबाल), ३७७॥ गौतम (प्रारणि) ११४२॥१॥ गौषुक्ति, ४।१६१॥ वं०। चैकितानेय, १३७७॥२२॥ (बहुव०) ११४१॥१॥ देखो ब्रह्मदत्त च । वासिष्ठ चै। चैत्ररथि, देखो सत्याधिवाक चै०। जनश्रुत कागविय, ३।४।२॥ ०। जनश्रुत वारक्य, ३.४१।१॥ वं०।४।१७॥१॥२०॥ जमदग्नि, ३।३।११॥४॥३१॥ जयक लौहित्य, ३१४।१॥ वं। जयन्त, देखो यशस्वी ज. लौहित्य। जयन्त पाराशर्य, ३।४११॥ वं। जयन्त वारक्य, ३३१॥ ३० । (इस नाम के दो व्यक्ति)४१७१।। जानश्रुत, देखो नगरी जा० काण्डूविय । जानश्नुतेय, देखो उलुक्य जा० । सायक जा० काण्ड्विय । जाबाल, ३६॥ (द्विव०) ३७२,३,५,७,८॥ देखो गोश्नु शुक।

( ४ ) यलि, ११३८४॥ . श ज्वालायन, ४।१६।१॥ वकी लसदस्यु, २२॥११॥ त्रिवेद कृष्णारात लौहित्य, ३।४।१॥५०। दक्ष कात्यायनि अालेय, ३।४११॥५० । दक्षजयन्त लौहित्य, ३।४।३॥ वं। दाढजयन्ति, देखो बैपश्चित दा० गुप्त लौहित्य, धैपश्चित दा. हढजयन्त लौहित्य। दाj, देखो केशी दा०। दाल्भ्य (ब्रह्मदत्त चैकितानेय), ११३८१॥५६॥३॥ दालभ्य, देखो बन दा। हृढजयन्त, देखो विपश्चित दा० लौहित्य, वैपश्चित दाजयन्त हा लौहित्य । इति पेन्द्रोति शौनक, ३२४०।२॥ वं० । देवतरस श्यावसायन काश्यप, ३२४०।२॥ वं। दैवाप, देखो इन्द्रोत दै. शौनक । धृतराष्ट्र, ४२६१५॥ नगरी जानश्रुतेय काराविय, ३१४०६॥ बं० . नाक,३११३॥५॥ -- पतङ्ग प्राजापत्य,३०॥३॥ परमेष्ठी प्राजापत्य, २४०॥२॥ पलिगुप्त लौहित्य, ३।४।१॥ वं०। पाराशय, देखो अषाढ उत्तर पा० । जयन्त पा०। बैपश्चित शकुनि- मित्र पा० । सुदत्त पा । पार्जुश्रवस , ४२६॥१५॥ पार्ण शैलन, शा॥

. ( ५ ) पुलुष प्राचीनयोग्य, ३।४।२॥ ५० पृथु वैन्य, श१०॥३४॥६॥४॥१॥ पौलुषि, देखो सत्ययश पौ० प्राचीनयोग्य । पौलुषित, देखो सत्ययक्ष पौ० । प्रतीदर्श, ४८७॥ प्राचीनयोग्य, १३१॥ देखो पुलुष प्रा० । सत्ययश पौलुषि प्रा०। सोमशुष्म सात्ययशिप्रा०। प्राचीनशाल (बहुव०), ३।१०।१॥ प्राचीनशालि, ३७२,३,५,७॥१०।१।। प्राजापत्य, देखो परमेष्ठी प्रा। प्रातृद भाल्ल, ३२३४॥ प्रास्रवण, देखो प्लक्ष प्रा०। प्रोष्ठपाद वारक्य, २४१॥ ०। प्लक्ष प्रास्त्रवण, ४।२६।१२।। बक दाल्भ्य, सा७२॥ बम्ब आजद्विष, २७२,६॥ बाभ्रव्य, देखो शङ्ख बा। ब्रह्मदत्त चैकितानेय, ११३८॥१॥५॥१॥ भगेरथ ऐक्ष्वाक, ४।६।१,२॥ भाल्ल, देखो प्रातृद भा०। भाल्लबिन (बहुव०), २।४।७॥ मनु, ३३१२॥ महिदास ऐतरेय, ४ा२।११॥ मातरिश्चन्, ४/२०१८॥ मानय, देखो शर्यात मा भित्रभूति लोहित्य, ३।४।१॥ थी।

( १ ) , मुज सामश्रवस, शश॥ यशस्वी जयन्त लौहित्य, २४२॥१॥ वं० । राम कातुजातेय वैयाघ्रपद्य, ३१४०।२॥ वं० । ४।१६।३॥ वं रोहिण, शर६७,१०॥ बौहित्य, देखो कृष्णदत्त लौ०, कृष्णरात लौ०, जयक लौ०, त्रिवेद कृष्णरात लौ०, दक्ष जयन्त लौर, पल्लि गुप्त लौ, मित्रभूति लौ०, यशस्वी जयन्त लौर, विपश्चित् दृढजयन्त लौर, वैपश्चित दाढजयन्ति गुप्त लौ०, वैपश्चित दादजयन्ति दृढ जयन्त लौर, श्यामजयन्त लौर, श्यामसुजयन्त लौर, सत्यश्रवस् लौ। पसिष्ठ, २२॥१३॥१२॥१८६,७॥ तुल० वासिष्ठ । पारकि, देखो कंस वा। बारक्य, देखो फंस वा, कुवेर वा, जनश्रुत वा०, जयन्त वा०, प्रोष्ठपाद वा। पाणं, देखो ऐक्ष्वाक वा०, गोवल बा। वासिष्ठ चैकिताने य, ११४२२६॥ चाह्नेय, देखो श्रुष वा काश्यप । विपश्चित् दृढजयन्त लौहित्य, ३६४१२॥ वं० । विपश्चित् शकुनिमित्र पाराशर्य, २४१।१॥ वं० । विश्वामित्र, ३।३।७॥११॥ (बहुव०) ३३१५१॥ तुल० वैश्वामित्र । वैकुण्ठ (इन्द्र), ४२१॥१०॥१०॥ घेन्य, १४॥२॥ देखो पृथु वै । वपश्चित दार्दजयन्ति गुप्त लौहित्य, ॥४२॥१॥ वं० । वैपश्चित दादजयन्ति दृढ जन्त लौहित्य, ३।४।३॥ वं। वैमृध (इन्द्र), ४।१०।१०॥ वैयाघ्रपद्य, देखो राम कातुजातेय वै०। .1 .

। Cam म (७ ) शकुनिमित्र, देखो विपश्चितू श० पाराशर्य । शङ्ख बाभ्रव्य, ३१४१।१॥ व० १.५।१७।१॥ ५० शङ्ग शाट्यायनि प्रात्रेय, ३१४०१॥ वै०। शर्थ, ४।१०१०॥ शर्यात मानव, २१७१॥८॥३॥ शाट्यायनि, १६॥२॥३०॥१॥रारा॥४॥३॥१०॥३॥१३॥६॥२८॥ ४।१६।१॥० । १७१॥ वं०। देखो शङ्ग शा. मात्रेय । शाण्डिल्य, देखो सुयज्ञ शा० । शालावत्य, १॥३८॥ शुक (जाबाल), शाखा शैलन (बहुव०),१२॥३॥२४॥ देखो पाणं शै. सुचित्त शैक। शौनक, १॥५॥२॥ देखो इन्द्रोत द्वैवाप शौ०, इति एन्द्रोति शौ०। शौनक कापेय, ३१५॥२१॥ श्यामजयन्त लौहित्य (इस नाम के दो व्यक्ति), ३.४२।१।।। श्यामसुजयन्त लौहित्य, ३४२॥१॥०।' श्यावसायन, देखी देवतरस श्या० काश्यए। श्यावाश्वि, देखो इश श्या। श्रुष बाह्नेय काश्यप, ३४०।१॥३०॥ श्याजनि (एक वैश्य), ३।५।२॥ सत्ययश पौलुषित, १॥३८॥१॥ सत्ययश पौलुषि प्राचीनयोग्य, २४०१॥५० सत्यश्रवस लौहित्य, ३६४१॥ ०। सत्याधिवाफ चैत्ररथि, ३१॥ सात्यकि, देखो कृष्णधृति सा० । सात्यकीर्त (बहुव०), ३२३२॥१॥ देखो अनुवक्ता सा० । सात्ययशि (बहुव०), २४॥५॥ देखो सोमशुम सा० प्राचीनयोग्य ।

( ८ ) सामश्रवस, देखो मुञ्ज सा० । सायक जानश्रुतेय कापड्विय, ३१४०।२॥ वं० । सुचित्त शैलन, १११४॥४॥ सुदक्षिण, ३७८॥८। (देखो सुदक्षिण तैमि) सुदक्षिण मि, ३६॥३॥७॥१,४,५,६॥ (देखो सुदक्षिण । सुदत्त पाराशर्य, ३४१॥६॥ वं०।४।१७।१॥ वं० । सुयज्ञ शाण्डिल्य, ४।१७१॥ सोमवृहस्पति (द्विव०), ११५८॥ सोमशुष्म सात्ययज्ञि प्राचीनयोग्य, ३।४।२॥ वं० । कृत्स्वाशय पालकेय, ३।४०२॥ वं हैमवती, देखो उमा है। २-निर्वचनादि सूची। अक्षर, २२४॥१॥४३।८।१।२४।२॥ | देवश्रुत् , १।१४।३।। ४३॥८॥ पतङ्ग, ३३शा अन्तरिक्ष, २०१४॥ पश्यत, ११५६/६॥ प्रयास्य, २२८७॥१॥८॥ प्रतिहार, १.११॥ प्रयं, ४॥२३॥४॥ प्रसाम, प्रसामि, १२१५॥ असु, १४०७॥ प्रस्ताव, १।११॥६॥ असुर,३॥३५॥३॥ बृहस्पति, २२।५॥ प्राङ्गिरस, २।११।२॥ भीमल, ११५७॥ प्रादि, १।११।७॥१६॥२॥ मधुपुत्र, १॥५५॥२॥ प्रादित्य, अशा महीया, १॥४८॥ प्रावर्त, ३३३॥७॥ रुद्र, १२॥ उरस, ४२४॥२॥ रोदसी, १॥३२॥४॥ ऋच, १११॥६॥ वसु, ४।२।३॥ गायत्र, ३२३८४॥ वैश्वामित्र, ३/३६॥

ॐ
( ६ )
शतसनि, १॥५०॥४॥
सजात, १॥४८॥३॥
समुद्र, ११२॥२॥
सामन्, १॥३३॥७॥४०॥६॥४८/७॥५॥२॥४॥१३॥२॥ १२॥५॥ १॥५३॥५॥
५६॥२॥४॥२३॥३॥
सिन्धु, ११२२॥
सुवर्ग, ॥२४॥४॥
हरि, १२४४ा॥
३-(क) चादिसूची।
अदितिौरदितिः, १॥४१॥४॥ ऋ० १८॥१०॥
अपश्यं गोपामनिपद्यमानाम्, ३१३७१॥ मृ०१२१६४॥३१॥
मात्मा देवानामुत मानाम, ३।२।४॥ तु छो० उ० ४॥३॥७॥
आयुर्माता मतिः पिता, ४।१७॥
इन्द्रमुक्थमृचम, रा४॥१॥
इमामेषाम्पृथिवीम, १२३४॥७॥ अथ०१०॥३६॥
उतैषां ज्येष्ठः, ३।१०।१२॥ अथ० १०२८॥
उपाऽस्मै गायत, २३८६,८॥ ऋ० १११॥
ऋषय एते मन्त्रकृतः, १४॥२॥ .
चत्वारि वाक् परिमिता, ११३॥४०॥१॥ ऋ० श१६४४५॥
तत्सवितुर्वरेण्यम, २०१॥ ऋ० ३२६२।१०॥
व्यायुष कश्यपस्य, ४।३।१॥ तुल०, अ०२२८७॥
नवो नवो भवसि, ३।२७।११॥ तुल०, ऋ० १०१८४०१८॥
पतङ्गमक्तम, ३।३।१॥ ऋ० १०॥१७७१॥
पतङ्गो वाचम्मनसा, ३॥३६॥२॥ ऋ० १०.१७७॥२॥
मयीदं मन्ये भुवनादि, ३२१७६॥
महात्मनश्चतुरो देवः, शशा तुल० छां०३०४॥३६॥

(. १० ) पणवा इन्द्र ते शतम्, १३२१॥ ऋ० १०॥ पम्सप्तरश्मिवृषभः, १४२७॥ ऋ० २।१।१२॥ येऽग्नयः पुरीष्याः, ४॥३॥३॥ य० १८०६७।। येभिर्वात इषितः, १॥३४॥ अथ० १०८॥३५॥ कर्प-रूपम्प्रतिरूपः, ११४४॥०६४७१८॥ रूप-रूपम्मघवा, १४४६॥ ० ३१५३८॥ स नो मयोभूः, ४।३।२॥ . सयदा वै म्रियते, १४७॥ श्री स्मैवाने, १॥५६॥५॥ स्थूणां दिवस्तम्भनीम, १२१०१८॥ अभिजिदस्यभिजय्यासम्, ३।२०।१०॥ प्रमोऽहमस्मि, (दीर्घपाठ), ११५४६॥ (संक्षिप्त), ५७।४॥ भरण्यस्य वत्सोऽसि, ४१॥ उपावर्तध्वम्, ३।१६।१॥३४॥२॥ गुहासि देवोऽसि, ३।३०।१॥ दिशरथा श्रोत्रम्, १।२२।। देवेन संवित्रा, ३॥१८॥३,६॥ पुरुषः प्रजापतिः, २४६३,४॥ प्राणा३ प्राणा३ प्राणा, ससा महान्मह्या समधत, ३४॥ यत्पुरस्तावासीन्द्रः, ३२२११॥ विभूः पुरस्तात्सम्पत्, ३३२७१॥ म्युषि सविता भवसि, ४॥॥॥ ॥ श्वेताश्वो दर्शतो, अशा सत्यस्य पन्या, २२७१०॥ सोमः पवते, शरसाशासाशा

The Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana

Author
Pandit. Rama Deva
Title
The Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana
File name
The Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana
Text
OCR done
Citation
1921
Publisher
Samsrukatadhyapak Jnanananda College, Lahore
Language
Sanskrit
Pages
195
Classification
Upanishad
DLI number
368538
Barcode
5010010008027.00
Scanning centre
RMSC, IIIT-H
Digital publisher
UDL TTD TIRUPATI
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