Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Mratu Bhay

Nishant · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

मृत्यु-भय (कहानी सग्रह)

No text on this page.

मृत्यु-भय
লিথাতন
स्वस्ति साहित्य सदन
रानी बाजार, बीकानेर-334001

निशात
-
प्रकाशक स्वस्ति साहित्य सदन रानी बाजार बोरानेर 334001
नवप्रभात प्रिटिंग प्रेस पाहारा बिस्सी-110032 / सस्मरण
पिरतीम 1990 / मूल्य
12500 रुपये मात्र।
IRATU-BHAY (Short Stories) NISHANT
Price 25.

क्रम
लगडी क्राति / 7
साजिश | 13
श्रद्धा / 18
क्लेिबदी / 21
आदोलन | 24
छोटी स्कूल / 29
जुडे रहन की विवशता / 33
हथियार / 37
इसान और इन्सान / 41
मत्यु भय 146
छलित / 54
गिरी हुई छत / 64
क वग / 70
एक बार फिर /73
अथतत्र / 78
चौधरी साहब / 83
वाड नम्बर नौ / 86
बराबरी 190
आखिरवार/94

No text on this page.

लगडीक्राति । रामकृष्ण को दस साल बाद चौधरी भागीरथ ने खेत छोड देने को कहा तो गम के घूट पीत हुए रामकृष्ण ने जवाब दिया-छोड देंगे भाई । तेरा धन तुझे मुबारक । हम तो किसी के पराये धन को आश नही रखते। तुझे तो पता हो है तेरी ज़मीन जोतने से पहले मैं गिरधारी का खेत बीस सालो से जोतता चला आ रहा था। गिरधारी ने कहा, खेत छोड दो तो मैंने कितनी देर लगाई थी? उस वक्त भी एक-दो लोगो ने मुझे भडकाया था- भूमि पर तुम्हारा कब्जा है, क्यो छोडत हो? सरकार तुम्हारा साथ देगी। लेकिन भाई अपनी तो ऐसा करने के लिए मात्मा ही नहीं मानती। फिर प्यार मे खार झ्यो माये ? तेरी मेरो इतने दिन कितनी मित्रता रही है। इसी प्रेम के कारण ही तो मुझे तेरा खेत मिला था। अब अगर में विश्वास- घात करू तो क्या मेरा परलोक नही बिगडेगा कई 'कोमनिस्ट' तो यहां तक कहते हैं कि भूमि वाले क्या भूमि अपने साथ लाये थे। परतु हम तो कहते हैं-धन तो धन वालो का ही रहेगा। रामकृष्ण ने भागीरप के आगे हृदय तो ऐसा रखा जसे उसे खेत छोडन का कोई गम न हो। लेकिन बाद में वह बेहद चिन्तित हो गया। उमे पता था खेत छोड़ने के माद वह, उसका बेटा, वैलो की एक जोडी, हल-पजाली और गाली सब बेकार हो जायेगे । चलोबलो की जोडी, हल-पजाली और गारी तो बिक जायगी लेकिन उनका क्या होगा। उन्हें रोटी कैसे मिलेगी। अब गाव का अन्य कोई चौधरी भी भूमि हिस्से पर नहीं देता । सब कम्ना कर लिए जाने से डरते हैं। बीता हुमा जमाना अच्छा था। पौधरी लोग भूमि देने के लिए हमारी मिन्नतें किया करते थे, अब उन्हें भूमि हिस्से पर 8 / मृत्यु भय देने की जरूरत ही क्या है ? एक ट्रेक्टर एक-दो दिन मे संकहो बीघे जमीन जोत बो देता है और कम्बाईन हार्वेस्टर एक दिन में काटकर निकाल देती है । गाव की पचायती भूमि माये साल ठेके पर चढ़ती है। लेकिन बोली देने वाले इतनी ऊची बोलिया देते है कि खेती करके कोई लाभ ही नहीं बचता। बोली केवल भूमिहीनो के बीच ही लगती तो रेट इतना उचान होता लेकिन भूमिहीनो के साथ-साथ भूमि वाले भी बोलिया देते हैं । और रेट बढा देत हैं । वेचारे भूमिहीनो का भूमि छुडधान का ही हौसला नहीं होता। गरीब आदमी ज्यादा रिस्क भी तो नहीं ले सकता। कभी फसल को पाला या ओला मार जाये तो गरीब आदमी तो उमर भर बोली देने के काबिल न रहे। खेत छुड़वाने के बारे मे भागीरथ और रामकृष्ण के बीच हुई वार्ता सारे गाव म फैल गयी। तभी एक शाम रामकृष्ण का बेटा गाव मे घूमकर आया और घर आकर अपने बाप से बोला-बापू आज मैं गिरधारी के दरवाजे के आगे से गुजर रहा था तो उसने बुला लिया । हाल चाल पूछे तो मैंन कहा-हम गरीबो के क्या हाल हैं ? सारी बात तो उसे पहले ही मालूम थी। कहने लगा-तुम भागीरथ का खेत क्यो छोडते हो? आजकल ममि उसी की है जो उसे जोतता है। खेत का कब्जा मत छोडो। तुम आगे बढोगे तो तुम्हारे पीछे मैं भी जान को बाजी लगा दूगा । तो बापू, मेरे तो जी मे है कि हम सेत नही छोडेंगे । चौधरी गिरधारी अपनी मदद करेगा। अपने बेटे का दिल और गिरधारी से मदद की उम्मीद नजर आने पर रामकृष्ण का दिल भी थोडा कसमसाया, सोचा-यात तो ठीक है और फिर दोनो तरफ आखिर मौत ही तो है अगर खेत छोडेंगे तो भी भूखे मरेंगे और भागीरथ के साप लगे तो भी मरेंगे। अगर लड़ाई में मरेंगे तो भागीरथ को कैद तो होगी । मूख से मरना तो फोकट मे मरना है। गिरधारी से मदद मिलने की उम्मीद होने पर रामकृष्ण की राशिल गयो । वसने चारपाई मे पड़े शरीर में उत्तेजना आ गयी। और यह उठ खहा हमागिरधारी के घर की तरफ जाते हुए यह मोच रहा था--गांव मे दो पार्टिया होने का भो क्तिना साम है । अगर एक पार्टी किसी पर ज्यादती करती है तो दूसरी फौरन उसका पक्ष लेने पहुच जाती है। आज से - संगीभात 19. दस साल पहले जब गाव में पार्टीबाजी नहीं पी तो इसी गिरधारी ने अपना खेत मुमसे छुड़वा लिया था । अपन ही तबके के एक-दो आदमी पाहते थे कि मैं खेत न छोड़ सेक्नि बहे आदमियो में से रिसी ने पक्ष नही निया या। तब तो ये सबथ भी एक । किसी भी गरीष को दबाने का सवान माता था तो सब एम हो जाया करते थे। उसे याद आया-कई साल पहने जब चाननराम ने मोती चमार के सहने पर चोरी काठा इल्जाम लगा पर पुलिस से गाव ही में बुरी तरह पिटवाया था तो कोई भी उसे छुड़वाने के लिए नही आया था। अब तो गरीब-से-गरीब आदमी का पक्ष लेन को भी कोई-न-कोई तो तयार हो जाता है, किसी को एक पार्टा पाने म पटवाती है तो दूसरी फौरन छुड़वा लाती है। सारा गाव दो पार्टिया मे वटा है। एक घडे का मालिक है गिरधारी और दूसरे का भागीरथ । एक-दो बातो को लेकर दोना धडो में लारी दूक का सप हो घुवा है । वोटो की लड़ाई तो होती ही रहती है। गिरधारी के घर की ओर जाते हुए रामकृष्ण ने यह भी सोचा- मेरै अदर वास्तव मे प्रेम और धम कुछ नही था। मैं तो डरपोक या। डर के मारे ही अब भागीरथ का सेत छोड देने की हामी भर ली थी। गिरधारी ने जो बातें रामकृष्ण के बेटे से कही यही बातें उससे भी कहीं । सुनकर गिरधारी उसे कोई देवपुरुष-सा लगने लगा। उसने रामकृष्ण को बताया कि वह सदा से ही गरीबो का पक्षपाती रहा है। लेकिन उसने उमसे भूमि इसलिए छुडवा ली थी कि उनके पाठ लडके थे। आठ लडकों में बाटने के बाद भूमि बहुत थोडी-थोड़ी रह गयी थी। मैं नो छोटा मानिक था। तुम मेरी भूमि पर कब्जा कर ही नहीं सकते थे। भागीरथ तो बहुत बडा सरमाएदार है । वह तो दिनो दिन अपनी जायदाद वढा रहा है। उसने एक अ य गाव मे दो मुरम्बे जमीन खरीद ली है। शहर में एक मकान भी खरीद लिया है। उसके कई फक्टरियो मे शेयर हैं। ऐसे आदमी को भूमि पर कब्जा करने पर तो स्वग के देव लोग भी खुश होगे। पहासी है- बांट-बाट कर खाना और परमलोक मे जाना। सरकार का तो कहता ही क्या है ? वह तो खुद चाहती है कि लोगो म स्वय क्राति आये। अब रामकृष्ण रोज ही सुबह शाम गिरधारी के पास जाने लगा। उसका 10/मुत्यु भम बेटा भी जाता । उसका बेटा गिरधारी का हुक्का भी भर दिया करता था। रामकृष्ण ने किसी के द्वारा भागीरप के पास भी सदेश पहुंचा दिया कि खेत नहीं छोडगा। भागीरथ भी सब समझ गया कि यह सब दुश्मनो की कगल लगाई हुई है। उसने सोचा कि लडाई मरी और रामकृष्ण को ही नहीं, मेरो और गिरधारी की भी है। ऐसा ही गिरधारी ने सोचा। और यही सब पाव वालो ने समझा। भागीरथ ने घोषणा कर दी कि मैं फला दिन खेत मे हल जोह गा और रामकृष्ण का वेदखल करूगा । भागीरथ को तो करोडो रुपये की भूमि थी। फिर गाव वाले तो भूमि और औरत के पीछे जान गवाने को भी नही समझता भागीरप के पक्ष के लोग उसके इतने दीवाने थे कि उन्हाने रामकृष्ण को खेत से बाहर निकालने की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपरले उसका क्षेत्र में राजनतिक दबाव इतना था कि सब लोग उसकी नजरो में ऊपर उठना चाहते थे। सोचते थे, माज इसके काम आयेंगे तो कल यह भी हमारी ओर देखगा। दो चार भूमिहर किसान थे जिनकी आत्मा तो रामकृष्ण की ओर थी लेकिन शरीर पार्टी की वजह से भागीरथ का ही साथ दे रहा था। भागीरथ किसी भी कीमत पर खेत जाने देना नहीं चाहता था। उसने सोचा अगर गिरधारी ने आज उसे हरा दिया तो फिर कभी उसे ऊपर नहीं आने देगा। इसलिए उसने जी जान से राजी लगा दी थी। इलाके के चार-पाच नामी गरामी गुडे जिहै उसने चोरी तथा तस्करी में मामले में कई बार पुलिस के हाथो से छुड़वाया था । कह रहे थे-चौधरी साहब आप घर बैठे तमाशा देखते जाना । अपने खेत मे अपना ट्रैक्टर मलेगा और जो रोरेगा उसे हम देख लेंगे। भागीग्य ने सिफ नामी गृहो पर ही विश्वास नहीं किया । उसन अपने एक-दो खास रिश्तेदारो को भी बुलाया जो पूरे दिसावर गे सपा निशाना बांधने में माहिर थे। फिर किराये के गुड़ों को एक पत्तटन खरीदी पी तादिविरोधी पार्टी देखकर ही डर जाय और स्तपात की नौबत भी न आये।

वैसा ही हमा। भागीरय के आदमियो से भरी हुई ट्रेक्टर को दो ट्रालियां और दो जो खेत मे पहुच चुकी थी। सभी शराब में मस्त थे. तथा 'हल्ला हू।" कर रह थे। बगल मे वदूकें लिये तथा नालियो को भाड लेते हुए वे आगे बढ रहे थे। सभी ने अपने-अपने मोर्चे सम्भाल लिये । एक ट्रेक्टर रामकृष्ण की फसल उखाडने के लिए खेत की छाती पर जा चढा। लेकिन गिरधारी के आदमी खेत मे न पहुचे । रामकृष्ण उसकी घर- वाली और उसका बेटा तो था ही खेत मे। साथ मे था एक बुडढा अमली। उसने जिन्दगी भर चौधरियो की 'बॉडी गार्डी' की थी और जिदगी भर जायदाद के नाम पर सिफ एक एकनाली बदूक बना पाया था। अमली ने एक-दो फायर किये । लेक्नि भागीरथ के चालाक और चुस्त रिश्तेदार ने पीछे से आकर उस दबोच लिया। उसकी बदूक छीन ली। एक जीप मे चढ़कर गिरधारी के आदमी भी थोडी दूर गये थे। लेकिन आगे बहुत सारे आदमी देखकर डरकर लौट आये। गिरधारी की पार्टी के लोग इतने बधे हुए नही थे कि मरलो और मारलो के इरादे पर उतर आते। खेत म भागीरथ का ट्रेक्टर चलने लगा तो रामकृष्ण के हार खाए मस्तिष्क न एक बार फिर जोर मारा। उसने अपनी घर वाली से पहा कि 'ट्रेक्टर के आगे पड जाओ। रामकृष्ण की परवाली ट्रैवटा er पड गयी। उसकी टाग कुचली गयी। रामकृष्ण न अपने पहले ir पर भी चाकू से कई घाव कर दिये । बाद मे उन दोनो को बैलगाडी में डालकर गावा.y गिरधारी को जीप में बठकर शहर के अस्पताल मे ग्य, forg.in कृष्ण को शाबासी दी तथा कहा-अब मैं देख मृगा, ITaur- भर के लिए अदर न करवाया तो मेरा नाम नही। लेकिन चार-पाच माह बीत गये हैं। mergy मी बिगहा । एक दिन के लिए भी उसकी गिरफ्तार आदमी एक-दो दिन के लिए गिरफ्तार Pirytm गय। अब तारीखे पडती हैं जिन पर र नहीं। H 12/मृत्यु भय खेती चली गयी, कोट-कचहरी में आने-जाने के लिए तया पर वाली का इलाज करवाने के लिए रामकृष्ण ने बैलो की जोड़ी तथा बैलगाडी बेध दी। अब वे पैसे भी खत्म हो गये हैं । कोर्ट-कचहरी कैस जाये? गिरधारी कन्नी काटने लगा है। पास जाने पर झुझला उठता है--तुम्हारे कारण मेरी नान कट गयी। अपनी लगडी हुई पनी के साथ भूख से झगडा करता रामकृष्ण सोचता है-मागीरथ के साथ मेरी लहाई, इस औरत की तरह लगडी थी। क्तिना अच्छा होता अगर वह अपने ही ढग से लहता। फिर जो उसके साथ होते पूरे मन से होते । उसके विरोध मे माने वाले थोडे होते फिर हार भी होती तो इतनी जबरदस्त न होती।

No text on this page.

14 / मृत्यु भय और हडिडया। मह निकलवर चिडी-सा रह गया है। बिना खुराक घेतली की जवानी छ माह मवीत गयी थी। बस ब्याह कर आयी थी और बीमार रहने लगी थी। चेनली की जवानो तो पानी के बुलबुले सी झगभगुर साबित हुई। यह सब खुराक कोषमी से हुआ। नही तो चौधरी गगाधर की बहू चालीस वष की होकर भी सोलह साल की छोकरी-सी लगती है । होठ अभी भी इतने मुख हैं कि जैस गुलाब के फूल को पाखुडी हो। उसके सातवा आठवा बच्चा भी सूरज की किरण जैसा जमा है। जबकि हमारा पहला भी बीमार पैदा हुआ । दस वप का हो गया है कालिया और लगता है जैसे पाच साल का हो। भैस घर पर ब्याई होगी तो सबकी काया सुघरेगी। कानिए वो खूब घी पिलाना है। उसे पहलवान बनाना भीखू का दस वप का कालिया जो गलिया में प्रकार घूमता फिरता था, कटिटया के पीछे हो गया । पराय खेतो मे इधर उधर लिय फिरता। कोई एक आधा रहमदिल जमीदार उसे अपने खेतो के गले पर कटिटया खडी कर लेने देता। पटिटया हरी दूध में टुस्से खाती रहती। निष्ठुर दिल का जमीदार कालिये की कटिटया अपन नाले पर खड़ी देखकर भटक जाता। पालिये को मा-बहन की गाली देने के साथ साथ दो पप्पड भी रसीद कर देता। ऊपर से कहता-~-खेत न क्यार चले हैं भस पालने । सालो, लोगो के खेतों में कमाओ ताकि टुकडे मिलत रह। सुबकिया खाता कालिया अपनी कटिटया मागे हावकर किसी सून खेत की नाली बूढने लग जाता। कालिपे की मा चेतली छाछ-पानी पाकलेवा करके हाप मे खुरपी आर फटी-पुरानी चादर लेकर घेता म निकलती। खाली पड़े मदान ट्रेक्टरो द्वारा जुते हुए होते । उनम पास को तिनका भी न होता। फसलो के बीच भी हल चले हुए होते या पार्वहा से पास नष्ट की हुई होती। थोड़ी बहुत धाम सिप नालिया पर नसीब होती। नालिया म स घास खोदती हुई चेतली मन ही मन डरती रहती-दही कोई आरटादन ८ ? वह पाधी बीच मन जाती तो भी खेतो मे मालक'उस पर अवमर आरोप लगा देते-घेत म कहाँ पास है ? क्या बेकार धूम वर पौधे तोर रही है।

'साजिश' 1 unre । कई तो यह भी कह देनेनू घास के साथ-साथ पौधे भी उपाइ सेती है। निश्ल खेत से बाहर। मुफ्त में कोई पास भी न सादने देता था जबनि शरीरका सौदा करने पर कई उसे ज्वार फा गट्ठर बाध कर दने को भी तैयार रहते थे। लेकिन यह सौता करने के लिए चेतली के शरीर मे जान भी यहा थी और ऐसे सस्कार भी कहा थे? वह ऐस लोगा को थोडा भला-बुरा कहती, मन मे बददुआए रेती आर क्सिी मूने खत की नाली की खोज मे निकल पडती। दोपहर होते हात घर-उधर सैकहा जगह हाथ मारने पर एक गठरी धाम जुद्ध पाता जिसे लेकर वह घर आ जाती। भोवू शाम को घर पाता। कटिटपा देखता। उनके शरीर पर हाप फेरता । रात को उसको चारपाई कटिटयो के पास ह होती थी । जब तक नींद न आती भीखू पटिटया को देख देखकर सपने लेता रहता दो-चार साल म कट्टिया व्यास जाएगों। भर म रोज एक मन दूध होगा। एक मन दूध | अपने घर मे इतना बडा कोई बतन भी नहीं ! दो बड़ी-बड़ी बाल्टिया लानी हागी, दूध निकालने के लिए। दूध गम करने के लिए बड़ी-सारी हाडी लानी होगी। विलौन के लिए वहा-सारा घडा होगा। इतना दूध हा बिलोया जाएगा? आधा तो साइमित वालो को बेच दियां करूगा। रोज नगद पमे ता आयेंगे ? पसे तो आयेंगे लेकिन भसो पर खच भी करना होगा । तूडी मोल लेनी होगी कपासिया (बिनौले) और बल भी लानी होगी। चलो दूध होगा तो सब कुछ हो जायेगा। फिकर किस बात की है ? मैं मजदूरी करनी छोड दूगा। सुबह शाम भसें चराया मरूगा । भसे चराना कितना मुखद लगेगा। भीखू को लगा कि फिर तो उसका बचपन ही लौट आएगा। पशु चराने का काम तो अक्मर बचपन मे ही नसीब होता है। उमे बचपन के वे दिन याद आ गये जब वह पशु चराया करता था। नद लोग जमीन को इतना जोतते नहीं थे। चौमामे में खूब घास फैल जाती थी। वे पशुओ को खुला छोड़कर बादलो की छाव मे रेत पर कबड्डी खेला करते थ । वैमे उ फिकर भी रहती थी। मुबह -गेती थी और प्रश्न उठता या--आज पशु किधर ले जाए 7 . 16/ मृत्यु भय अब वो गाव म ट्रेक्टरा की बाढ आ गयी है। लोग जमीनो को इतना जोतते हैं कि घास का तिनवा भी नहीं उगता । अव तो सिप पानी का नालिया पर ही घास उगती है। वस भीखू इतना आश्वस्त ता जरूर था कि जिन मालिका के खेतों मे उसने कमाया है वे अपने खेता को नालियो पर उसे भस चरान से तो मना नहीं करेंगे। कटिटयो को भसा दिखा दिया तो भीखू और चेतली के सपना को रग लग गया। लेकिन उनके सपनों को रग लगे अभी एक माह ही हुआ था कि भीखू न अपने चौधरी से खबर सुनी कि सारे गाव के खेता की नालिया 'पक्की हो रही हैं । सुनते ही भीखू पर गाज गिर पड़ी। उसे चिन्ता हुई--- जव नालिया ईट और मीमट की हो जायेगी तब उसकी भसें क्या खायेंगी। वह भागा भागा चौधरी के पास गया-मालिक मुझे अपन खेत मे दो वयारी ज्वार बीज लेने दो। मेरी भसें व्याअ रही है। गाव की नालिया पक्की हा गयो तो हरा कहा स नसीव हागा? बिना हरा खाये बैचारिमा के दूध कैसे उतरगा? नेविन चौधरी ने दूध-सा चिट्टा जवाब दे दिया- इतने दुधी क्यो होते ही भमें बेच दो। चौधरी सब जानता था अगर यह भमो वाला हो गया तो अपने छत क्यार के काम से चला जायेगा। खबर सच निक्ली। भीखू को भमें व्यान तक गाव के घेता की सारी नालिया पकको हो गयीं। गाय को राही म कोई ऐसी जगह नहीं बची जहा से चेतली पास के तिनके खोद लाती या भीषू जहा अपनी भसें चराने ल जाता। भीखू ने खेताम नौकरी करनी छोडदी लेकिन पार पहना कठिन हा गया । बिना हरा याय भमें दिना दिन कमजार होती चली गयौं । यत गिनीले पर घबरन पर ज्यादा न वचता। खल विनोल पर खप या होता फिर भी ममें यावर इतना यश न होती। इतना दूध न देती जितना पास्तव म देना चाहिए था। व तोहरी पाम माग रही थी। ही पास पहास आती? भोपू ने जमीन वाला स कहा-धार मुझ मोस ही है साजिश | 17 दो। लेकिन सबने कहा-हमने तुम्हारे लिए ज्वार थोडी ही बोई है हमारे तो अपने भी इतने ज्यादा पशु हैं कि पार ही नही पड रहा। विना हरा खाय भी की भैसें सूखनी गयी । भोवू चेतली और कालिये के घी दूध खाने के सपने धरे-के धरे रह गये। जो थोडा बहुत आता उमे बेचने की कोशिश करते ताकि घर मे भैसा के लिए तूडी, खल, दिनौला आये और उनके लिए गेहू लून, मिच गुड, चाय । चेतली दावा करती-मरजानी, नालिया पक्की न होती तो भंसो को खूब खिला खिला मैं दूध एक मन तक चढा देती। लेकिन नालिया पक्की करन वालो ने भीखू और चेतली के दुख को नहीं देखा। सवाल राष्ट्र की प्रगति का था। इस हालत में भीखू को भैसें दूध से टल भी जल्दी गयी। विना दूध के खाली भैमो को सम्भालना भी बू के लिए मुश्किल हो गया। कमजोर हुए खोली को दुवारा आस भी न लगी । खाली खडे खोलो को भीखू दाना कहा से डालता? सूखी तूडी वे खाती न थी। फलस्वरूप दिनो दिन कमजोर होती चली गयौ। दो चार माह मे सूखकर पाटा हो गयी। ऐसी हालत मे आस लगन की तो उम्मीद हो कहा बची थी। एक दिन गाव मे कटाई के लिए बुडढे कमजोर मरियल खोले और भैसो के कटटे खरीदने वाले व्यापारी आये। भीखू ने अपने सपनो की दुल्हनों को उनके हाथ सौ सौ रुपये में बेच दिया और आप जाकर गगाधर चौधरी के चौदह सौ रुपय मे साल भर के लिए नौकर रह गया ।

श्रद्धा कस्बे मे आवारा गाए बहुत थी। व सड़क के किनारे वठे सब्जी वालो को पहुत तग क्यिा करती थी। मम्जी वाला का थोडा सा भी ध्यान चूकता और कोई न कोई गाय आधा किलो या पावभर मनी मुह म डाल बैठती। सब्जी वाले अपने हाथा मे लम्बी लाठिया लिये बैठे रहते थे। ज्योही कोई गाय मन्त्री के पास आतो वे गाय के मुह पर लाठी मारते । गायो को मुह मारने के लिए सुनहरी मौका तव मिलता था, जब सब्जी वाला ग्राहक से पसे लकर गल्ले में डाल रहा होता पा या बकाया पसे लौटाने के लिए अपना सारा ध्यान गल्ले मे केंद्रित कर देता था । पास में खडा ग्राहक गाय को दुत्कारता नहीं था, क्यानि धम का तकाजा है कि पराए खेत मे से गाय को हटाना तो क्या खेत मालिक पूछे तो बताना भी नही चाहिए। लेकिन पूरे कस्बे मे कोई ऐसा नही था जो इन गाया मे से एक गाय को भी अपने घर ले जाकर बाध ले सेवा करे आर दूध पीए । हा । कई पुण्य कमाने वाले ऐसे जरूर थे जो खास खास वारो तिथिया पर इह 'टाल' से खरीदकर हरा खिलाते थे। इस प्रकार आधी भूखी य गाए सम्जी वाला को तग करती रहती थी। कभी-कभी ज्यादा नुकसान हो जाता तो सब्जी वाला गुस्स मे गडा होकर दूर तर गाय का मारला जाता था। ऐस म कभी कभी कोई गाय सो बचबूढ़े पर मढ जाती थी। उनके हाथो सो का भरा पला गिर जाता या ची विखर जाती यो । आस-पास के लोग उ मम्भालत ये। लोग वास कर जिनका नुक्सान होता था सब्जी वाल के साथ झगड़ा करते थे, "यह भी कोई उग है। गऊ को जाई पो क्यों मारते हो? फिर देखो तो मही आगे कौन आ रहा है, मौन जा रहा है। इस प्रकार तो सुमरिसी को मरवामोगे।" सचमुच ही एक दिन बहुत बडा बावेला खड़ा हो गया। तनाव के दिन तो वैस हो । एक सब्जी वाले ने एक गाय वे लटठ मारा तो वह एक्दम पलटी। उधर से एक जीप मा रही थी। जीप वाला श्या बचाता, क्या न बचाता। गाय मब्जी वाले के लटठ वे वाव म आ ही गई। जीप स्वे के एक सरदार गजनसिंह की थी। उसे सब जानते थे। बात धीरे धीरे सारे वस्वे मे फल गई-- 'गजर्नासह न गाय मार दी। एव सिख ने गाय मार दी।" थोडी ही घर में अच्छा खासा जुलूस बन गया। सब मिलकर किराए पर चलने वाली जोपा के अडडे की ओर चल पडे । गजनसिंह किराए की जीप चलाया करता था। लेकिन जुलूस जब अड्डे पर पहुचा तो गजनसिंह वहा नहीं था। मौके की गम्भीरता ताडकर वह पुलिस के सरक्षण मे चला गया था । इक्टठ हुए लोग अपने आक्रोश को जाया नही जाने देना चाहते थे। निणय लिया गया कि समूचा बाजार बद करवाया जाए । शीघ्र ही बाजार की दुकाना के 'शटर" गिरने लगे। लोग भाग- भाग कर अपने दहबा म घुमने लगे। जुलम तोड फोड की कायवाही करता, दगा फसाद होता, इससे पहले हो गजनसिंह पुलिस के सरक्षण म जुलूस ये मागे आ खडा हुआ। उसने हाथ जोडकर पुलिस के अगुआमओ में विनती की-'भाइयो हालाकि गाय के मारन म सारा दोष मेरा नहीं है, गाय सब्जी वाले के लटठ से डरकर जीप के आगे आ गयी थी फिर भी मैं प्रायश्चित करने में निए तैयार हू क्योकि गऊ तो किसी की भूल से भी मर जाए तो भी उसे प्रायश्चित करना पड़ता है।' उसके इतना कहने के बाद थानेदार ने कहा--"भाइयो यह तो थी इमकी ओर से अपनी सफाई । अव मैं आपको यह बता दना चाहता हूँ कि तेज गति से जीप चलाने के जुम मे मने इसपी जीपका चालान कर दिया है। मजिस्ट्रेट इसे जो भी दण्ड देंगे, वह इस भुगतना पडेगा। और आप कहें

20/ मृत्यु भय
तो मैं गाय पी मौत पी जाप पिगी भी उम्प भवितरीसारखा साता
किसी भय अधिकारी सक्या? सम्मी चौम जापर आप इसी
वक्त फैसला गर सीजिए' जुलूराम एष अगुभा ने महा।
सब सम्मी पौरम, जहाँ गाय मरी पडी पो, पहच गए।
पानेदार ने सम्जी पासो से पूछा- 'जब यह गाय जोप र आगे आई
तर इसे लटठ से कोन मार रहा या
एसजी याल ने बताया-- रामसात था, साहा।'
रामलाल यहा हावर सहपहाती आवाज मे बोला-"हर, या
करें गाए हम सारा दिन बहुत तग करती हैं।"
"तो फिर गाय के मरने म तुम्हारा दोप है।
हमारा दोप बसे हुआ साहब ? गरीब आदमी राजी न लगाए और
गऊआ को नहाए तो पाए क्या?
'तो क्या सारा दोष गजनसिंह का है।
"ऐसा कहना भी बेइ साफ होगा साहब । दोष तो उनका है जिहान
थनो मे दूध रहा, जब तर इन गायो को दूहा और फिर भूख जाने पर
इहे पुला छोड दिया । कुछ ऊपरवाले की मर्जी यो । इधर स मैंन गाय को
मारा, उधर से जीप मा गई।'
यानेदार जुलूस की ओर मुखातिब हुए। उहोंने देया-सवकी नजरें
झुकी हुई हैं और सब पाव के अगूठे से सडक परोच रहे हैं।
.

किलेबदी वह पाम न मिलने वे कारण घर पर ही था। उसकी घरवाली रोटिया बनाकर छावडे में रख कर पशुआ के लिए घास खोदने चली गई थी। बच्चे भी पडोस में खेलने निकल गए थे। उसने आगन मे चूल्हे के आस-पास कोयलो को ढूढा । एक हडिया मे थोडे से कोयले उसे मिल गए । जिहे उसने चूल्हे की बेवणी मे सुलगने के लिए डाल दिया। फिर वह कोठे की पडछत्ती पर चढकर एक गिट्ठ भर का सरिया ढूढ लाया । कोयले अब तक सुलग चुके थे । उसने वह लोहा उन अगारो म तपने के लिए डाल दिया। एक बार वह फिर भीतर गया और एक पुरानी 'दूसेरी' और घोडी निकाल लाया। 'सरिया' यू लाल नहीं होगा, सोचकर वह कायलो को पखी से हवा करने लगा। जब लोहा पूरा गम हो गया तो उसने सडासी से उसे पकडकर दूसरी पर जमाया और लगा हथोडी से धडा घड मारने । सरिया जब एक तरफ से पूरा तीखा और दो-तीन उगल चौडा हो गया तो उसने उसे एक बार फिर अगारो मे छोड़ दिया। हाडी मे बचे-खुचे कोयले डाले और हवा मलने लगा। जब लोहा फिर से लाल हो गया तो उसने दूसरी तरफ से उसे इस तरह से तीखा किया कि उसकी गुलाई भी बनी रहे और तीखा भी हो जाए। कुछ चोटें उसने सिरिये के बीच मे भी दे मारी। गम लोहे को वह पलीने तक ले गया और वहा गारे में छोड़ दिया। छन करती भाप उठने लगी। लोहा जब पूर्णतया ठडा हो गया तो उसने उसे लाठी के एक सिरे 22 / मृत्यु भय पर ठोक लिया । लोहा लाठी म से निकले नही और मजबूत रहे इसलिए उसने लाठी के उस सिरे पर एक पुराने फावडे का बहा निकाल पर चढ़ा दिया । भाला तयार था । उसने ताना और दोना हाथा से कस कर आगन की दीवार पर दे मारा । सारा का सारा सरिया गारे की दीवार मे घुस गया था। बस ठीक है । लोलू कह रहा था-लुहार तुम्ह भाता बना कर नहीं देगा । बनाकर भी देगा तो वात गाव भर म उडा दमा । वात उडने से पुलिस में शिकायत हो जाएगी। पुलिस आएगी और तुम्ह भाले सहित दबोच ले जाएगी। लेकिन अब अबल तो कोई इसकी शिकायत करेगा नही और करेगा भी तो वह दगा-यह तो मैंने स्टै खोदने के लिए बनाया है । कोई मेरा क्या बिगाड लेगा? तभी उसे आगन के एक कोने में पडी कुछ पक्की इटें दिखाई दीं। जसकी घर वाली पतनाले के नीचे पक्का चौक्यिा बनाने के लिए दूर-दराज से उहे उठा कर लाई थी। बरसात के दिनो म पतनाले की सीध म आगन मे गडढा हो जाता है उसे रोकने के लिए। उसने सोचा-ये पक्की इंटें भी हथियार का काम दे सक्ती है । लेकिन थोडी हैं। अगर एक इट की दो कर दी जाए तो एक तो उठा कर फेंक्ने म सरल रहेगी दूर तक जा सकेगी। दूसरा, दुगनी भी हो जाएगी। उसने दूसरी उठाई और ईटो के बीच में मार मार कर, सबने दो दो, तीन तीन टुकडे कर दिए। थोडा काम करने से और शरीर मे सन्तोप पैदा होने से उसे भूख लग आई। उसने बच्चों को भी आवाज लगा ली।लाल मिच की चटनी का कुडी और रोटियो का छाबडा पास मे रख लिया। पहले थोडी-थोडी घटनी लगाकर रोटिया बच्चों को दी। फिर दो रोटियो के बीच काफी सारी मिच लेकर, एक तरफ हटकर खान बह गया। रोटी घात हुए वह खुश था कि वह एक चोर की मौत मरेगा। सुसरी मोत से क्या डरना बुढ़े और बीमार हाकर चारपाई म १४ पर मौत की इन्तजार करते-करते माना कितना कठिन है। घरवालों से गू मूत साफ परवाना पड़ता है। सेवा-बाडी करते-करते घरवाले भी तग । आ जाते हैं । झुझलाहट मे भला-बुरा भी निकल जाताहत खतमासानी से समाप्त हो जाये, उसके लिए पुन्ल-व्रत करते हैं भगवान से दुआ करते हैं। हे भगवान । इस बुडढे को उठा ले। और जब बुड्ढा मरता है तो लोग कहते हैं-बुडढा मरा नही । बेचारा जी गया । बडा दुखी था। रोटी खाकर कुडी और छाबडा भीतर रखने गया तो उसकी नजर खटिया के नीचे पडी कुल्हाड़ी पर गयी। उसने कुल्हाडी उठा ली और सोचा-यह भी अच्छा हथियार है । दरवाजे की ओट मे खडे होकर, अदर आने वाले बन्दुकधारी आदमी पर भी इससे वार किया जा सकता है । उसने कुल्हाडी को सम्भाल कर एक कोने में खड़ा कर दिया। उसका विवार या कि वह अपनी परवाली को भी इन हथियारो को चलाने की तरकीब बताएगा और लडते हुए मरने की बात समझाएगा। दोपहर हो गयी उसकी घरवाली घास की गठरी लेकर आ गयी। आगन मे गठरी गिराते हुए उसकी नजर ईंटा के खोरो पर पडी। ओ। ईट्या गो सित्यानाश क्यामी कर्यो है " तेरे घर स्वण टोले का कोई आदमी पक्की इट लगी देख लेता तो क्या खफा न हो जाता? और चोरी करने के जुम मे हमे । तुम्नै पता नही कल खारीयावास के हरिजन टोले पर क्या गुजरी है ? सारे टोले मे कत्ले-आम मचा दिया। बलात्कार और आगजनी । क्या-क्या नहीं हुआ वहा । सुसरे, हरिजन भी गए-गुजरे निक्ले । नहीं तो कुल्हाडी तो हर घर में होती है। दीवारो की ओट ले-लेकर मुकाबला करते हुए मरते तो कुछ तो पाच दस जरूर मारत । भी नही कहा । मदर रोटियो की तरफ चल दी। वह भी गडासा उठाकर पास का कुतरा करने बैठ गया। उसे एक बार फिर लगा कि हमारे घरा मे हथियारो की कमी नहीं है। औरत न घुछ आदोलन पटी मसी पोरट रजाई म दुबरे अपने मद से उसने कहा-मनिये को सुशार है पर पर छोडे जा रही है। प्यान रखना। नरयू ने सोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की तो उसने मामरा उटी गि पता नहीं यह माीये का स्यास रय पायगा या नहीं। इसलिए उसन पहासन से भी वह दिया-भट्टी पर जा रही है। मनिया गौमार है। वह रोप या बाहर निकले तो ध्याल पर सेना। इसने बाद उसने मनिय से छोटी माती कायम दवाया । सिर पर अनाज छानने वाली भारती रयो और घम पही। यह मन-ही-मन सोप रही थी कि आज की कमाई स यह मनिये के लिए दवाई से आयगी। आटा दास, नमक, मिच और लमही तो दो चार दिन सायक उसने पास पडे ही हैं । आने वाले दो दिनो की कमाई स वह रजाई मे रूई भी हलवा लेंगी। मनिया तथा छोटो जिस रजाईये नीचे सोते थे, यह कई जगह से पट चुनी थी । वास्तव मे मनिये के बीमार होने की वजह भी यही पो। भागार मे आयी तो दूर से ही उसे भटटी के इद गिद पडे पपास रे ढेर नजर आये । उसका दिल मापा-हाय राम । यह क्या हो गया? उसकी भटटी के तो ऊपर तक पास पड़ी है। अब यह कसे मटटी जलायगी ? असे भट्टी उलान भी कौन देगा? पास तो बास्द है। मारूद । झट सभाग पकडती है पिछले ही साल बिजली के तारो के आपस मे टकराने से एक ढेरी में पोडी-सी आग लगी थी और देखते-देखते सारे बाजार में फल गयी यो। वह तो हवा का रुख बदल गया था नही तो आग बस्ती तक में फैल बाती।

आंदालन। 25 वह भटटी तक आयो। भट्टी के चार पाच जमीदार चारपाई पर बठे ताश पीट रहे थे। वह उनसे कहने लगी-मेरी भटटी के ऊपर तक यह पपास किसने गिरायी है ? -हमने गिरायी है। पास विक जायगी तो यह जगह खाली हो जायेगी। -इतने दिन तक हम क्या खायेंगे मो वोमार बच्चे के लिए दवाई आज कैसे आयेगी? उनको ऊचा बोलते देखकर सेठ आ गया। किसाना वा आढतिया । वह उसे डाटते हुए बोला-ज्यादा करोगी नो कमटी वाला को पहपर तरी भट्टी पर किराया लगवा देगे । तेरे कौन से बाप की जगह है यह ? सठ की वात से वह डर गयो । वह जानती थी कि सरकारी जगह पर भटटी बनाना लोगा की नज़रो मे गर-कानूनी है। इसलिए तो वह कभी- कभार कमेटी वाले वाबुआ को चने मुफ्त मे भून देती थी। वह घर आ गयी। उसे उधार मा मुफ्त दवाई मिलन की आशा नही थी। शाम रोटिया बनात वक्त उसने चूल्हे मे पक्की ईंट का खीरा गम करने के लिए डाल दिया । रोटिया खा कर उसने गम खीरे को एक गोले 'खाइये में बाधा, भाप निकलने लगी। उसने मनिये को एक पटे पुराने कबल से ढापा तथा धीरे धीरे सेंक करने लगी। उसवे ख्याल म मनिय को सर्दी लगी थी तया सेंक देने से सर्दी टूट सकती थी। यह तरीका उसने अपने बाप स सीखा था और उसके बाप ने एक नीम- हकीम से। लेकिन मनिये को मिफ सर्दी ही नहीं थी, उसे कमजोरी भी था। बीमारी ने धीरे धीरे उसके शरीर म गहरे तक जड़ें जमा ली थी। उस कई राता मे बुखार आ रहा था । अब दो दिन से लगातार ताप चढ रहा था। इसलिए सेंक से मनिये का बुखार नही उतरा। हा एव बार थोडा-सा चन पड गया और वह सो गया। मनिय को सुलाकर वह पडोस म मे सूखी पराली माग लायी। इतने दिन तो वह फ्टी रजाई पर पराली डालर सान की बात टालती आयी थी। सोचती थी नयी रूई ही डलवा लेगी लेक्नि आज उसकी उम्मीद टूट चुकी यो 26/ मत्यु भय । । - छोटके को लेकर, रजाई पर पराली डालकर यह मनिय के साथ सोपी लेकिन उसे लगा कि जो निवास' रूई से होता है, वह इस पराली से। नहीं हुआ है। दूसरे दिन वह फिर भटटी सभातने गयो । सोचा-- शायद कपास उठ गयी हो लेकिन कपास नहीं उठी थी। वह घर मा गयी और मनिय तथा नत्थू को टहल मे लग गयी। शाम को थोडी-सी फुसत मिलने पर वह मनिये को लेकर अस्पताल चली गयी । अस्पताल स उसे कोई ज्यादा उम्मीद नहीं थी। मनिये के माप के लिए अस्पताल से मुफ्त दवाइया लेकर वह गयी थी। कोई फायदा नहीं हुआ था। एक बार उसने डाक्टर गुप्ता से एक दवाई लिखवायी थी। उस दवाई ने कुछ फायदा किया लेकिन यह दवा बहुत महणी थी। कभी-कभार अच्छी कमाई होने पर ही वह दवाइ खरीद पाती थी। महीने मे एक-आध बार । वह उस दवाई की एक शीशी को सहेज कर रखती थी। पसे जुड़ने पर परिशी लेकर दवाइयो पाली दुकान पर जाती थी । शीशी दिखाकर दवा ल भाती थी। अब नत्यू के लिए दवाई खरीदे महीने से ज्यादा हो गया था। ऊपर से मनिया और बीमार हो गया। अस्पताल के डाक्टर ने मनिये को देखकर लबी चौडी पर्ची के साथ एक छोटी-सी चिट भी उसे पक्डा दी। वह जानती थी कि जो कुछ इस छोटे कागज के टुक्डे पर लिखा है वही अस्पताल से मिलेगा। यह दवाइया मिलन वाली जगह चली गयी वहा उस चार गोलिया मिली। बडी पर्ची पर लिखी दवाइया खरीदने की उसकी पहच महा थी, इसलिए वह पर चली आयी। रात से मनिय को वे चारो गोलिया खिला दी लेकिन आराम नहीं आया। अगले दिन दोपहर तक मनिये तथा नत्यू मी देखभाल करती रही। दोपहर बाद भटटी देखन बाजार गयी। बाजार मे उसने देखा कि बहुत से लोग इक्ट्ठा होकर नारे लगा रहे हैं--पास के भाव बढ़ायो । विमान बचाओ । इन भावो पर पास नहीं देगे । सब कुछ देख-सुनकर उसकी सांसें टूटन लगी। न जाने अब उस कितने दिन यू ही इतजार करना पडेगा? मौसम भी तोक्तिना खराब है। बादल पा रहे हैं। प्रयकर पाला है। इस पाले में वह यहीं से इट-गारा आदोलन /27 लाये और कैस दूसरी जगह भटटी बनायें ? ऊपर से मनिया और नत्यू बीमार हैं । इस गीले और ठडे मौसम मे नयी बनायी भट्टी सूखेगी भी नही, फिर दूसरी जगह दाने भुनाने आयगा भी कौन ? दाने भुनाने वाले तो यही आयेंगे। इस जगह कपास देखवर लोट जायेंगे। उनको उसकी नयी भट्टी की जानकारी से मिलेगी। नयी जगह भटटी बनाने को लेकर मन में जहा ऐसी शकाए और मुश्विले थी वही उसके मन म यह भी था कि चलो आज नहीं तो कल कपास बिकेगी ही। लेकिन नहीं । कपास विकी नहीं। किसानो का आदोलन लबा हो गया । पूर दस दिन गुजर गये । अब उसे भनिये और नत्थू की दवाई की ही फिकर नहीं थी। रोटियो की भी चिंता लग गयी थी। जोडकर रखा उसका मल धन सारा समाप्त हो गया। वह पडास से उधार भी भाग बैठी थी और उधार की अब उसे उम्मीद नहीं थी। अब वह पछता रही थी कि अच्छा होता वह पहले दिन ही कही और भटटी बना लेती। इतने दिना मे तो उसको भटटी सूप भी जाती और इक्का दुक्का ग्राहम भी आन लग जाता । साथ ही वह अपने दिल का इस बात स भी तसल्ली दे रही थी कि पहल किसे पता था-कपास इतने दिनो नही उठेगी। पहले भी तो दो चार बार ऐसा हुआ था। उसकी भटटी दो तीन दिन से ज्यादा बद नही हुई थी। लोग जल्दी-से-जल्दी कपास वेचकर घर चले जाते थे। ऐसे पद्रह दिन हो गये। भटटी वाली उसकी जगह खाली नहीं हुई। वह रोटिया का कोई वसीला न कर सकी। घर मे चूल्हा जलना वद हो गया। बीमारी से मनिय का बुरा हाल था। मनिये पर यह कई देशी नुस्खे आजमा चुकी थी। पौर मौलवी के धागे भी बांध चुकी थी। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ । एक दिन सूरज उगने के साथ मनिये के प्राण पखेरू । उह गये। मनिये के निर्जीव शरीर को माटो देकर पडोस के दो आदमी घर आये तो वह नये सिरे मे विलाप कर लगी। उसी वक्त नत्यू ऐसा बेहोश हुआ कि बाद मे उसे होश ही नहीं आया। उसका कमजोर शरीर इतने बडे दुख 28 / मृत्यु भय को बर्दाश्त नहीं कर पाया। मनिये को एक पुरानी चादर मे लपट बर माटी दे दी गयी थी लेकिन मनिये के बाप के लिए कफन का सवाल उठा ! उसके पास वपन के पैसे नहीं थे। ऐसे वक्त पर पहोसिया ने उससे मागे भी नहीं। दो-चार जने मिलकर पफन तथा सीढी का सामान लाने बाजार गये । सारा सामान लेकर जब वे लौट रहे थे तो बातें कर रहे थे--चीजो के भाव बहुत बढ गम हैं। साला कफन का कपडा भी इतना महंगा हो गया है। कफन के लिए जो सस्ता कपडा माता था, वह मिलता ही नहीं । सब दुकानदार कहते हैं--कफन और क्या होता है ? सफेद कपडा ही तो होता है। ज्यादा करो तो माड वाला ले लो। लेकिन माड वाला कपडा शरीर को आग नही पकडने देता । उधर बाजार में किसान अब भी नारे लगा रहे थे-पास के भाव बढायो। क्सिान बचाओ। - छोटी स्कूल जुलाई का महीना है । सात बजन मे अभी थोडी देर है। एक मास्टर जी स्कूल मे आ गये है। हैडमास्टर साब अभी नही आये हैं। सारे स्कूल की चाबिया उनके पास हैं । बेचारे मास्टरजी पहली घटी बजवायें तो कैसे? घटी लगाने का हयोडा तो कमरे मे बद है । खर उन्होंने एक पक्की ईंट के टुक्डे से ही घटी बजवा दी है और देश-समाज और हैडमास्टर के प्रति पूरी वफादारी दिखा दी है। पूरे सात बज गये हैं । बडे गुरुजी अभी भी नहीं आये हैं। हा, चाबिया जरूर आ गयी है। एक लडके के हाथ। दफ्तर खुल गया है। कुसिया चबूतरे पर निकल गयी हैं । लडके हथोडी भी निकाल लाये हैं और मास्टरजी ने दूसरी घटी बजवा दी है। दो मास्टर और भी आ गये हैं। प्रायना शुरू हो गयी है। दो अव्यापक चबूतरे पर कुसिया पर बठे गप्पे लगा रहे हैं । एक मास्टर प्राथना करते लडको के बीच घूम रहा है। प्राथना खत्म हो गयी है। लडके अपनी क्लासो मे चले गये हैं। इतने मे द्वितीय नम्बर के मास्टरजी भी आ गये हैं। मास्टर नम्बर एक यानी हैडमास्टर जो अभी भी नहीं पहुचे । सारे मास्टर जी अपनी-अपनी क्लासो की हाजिरी लगा चुके हैं। दो नम्बर ने हैडमास्टर की क्लास की हाजिरी लगा दी है। सारे सोग बाहर चबूतर पर खडे हैं । यहा हवा नापी लग रही है। क्लासो मे दम तो नहीं घुटता लेकिन वहा शोर है । शिकायतें हैं । वे कौन सुने? बडे मास्टर जी आध-पौन घटा लेट आय हैं। उसे देखकर दो अध्यापक अपनी अपनी कक्षामा की तरफ रवाना हो गये हैं। दो वही खडे हैं। हाय 1 50/ मृत्यु भय जोडे हुए । दो सहका ने भागकर हमास्टर को साइकिल सम्भाल भी है। ठीक वसे ही जैसे पिसी मत्री की कार का दरवाजा ड्राइवर आगे बढ़कर खोल देता है। . वह तो हैडमास्टर जी उन दो मास्टर सहित दफ्तर में चल गये हैं। तहमा भेजकर बाहर वाले होटल स चाय मगवा ली गयी है। आधा घटा गप्पयाजी और चाय म गीत गया है। दपतर में हवा कम लगती है इसलिए वे फिर बाहर चबूतरे पर आ गये हैं । लो। दो अभि- भावक बच्चो को दाखिल करवाने आ गय । हैडमास्टर जी न पास बैठे दोना अध्यापको को एक एक पाम भरने के लिए परहा दिया है। वे पाम भर रहे है। फाम भर कर वे हैडमास्टर साब को पबहा देते हैं। ये उनकी दो-तीन तहे करके जेब म घुसेड लेते हैं । अभिभावक रटते हुए पूछते हैं--पीस' 'पाच पाच रपये दे जाओ। बहुत है । ज्यादा तुमसे क्या लेने हैं।' "हा ' साब गरीब आदमी हैं।" हम भी जानते हैं । यहा सरकारी स्कूल में गरीब ही आते अभिभाव पाच-पाच स्पय दे जाते हैं। बलासो म खडे दो दिलजले अध्यापर देखते हैं । उनके दिल और भी ज्यादा जल उटत हैं। हैडमास्टर खडे होकर पहली कक्षा में जाते हैं । उन्हें पता है किसी क्लास की वजह से या सर्टीफ्लैिट कटा परले जाने वाले बच्चा स ही उनका कुछ बनता है । यही पहली क्लास सबसे ज्यादा कमजोर रहती है । अध्या पर महा आवर बिल्कुल ही नही पढाते। हैडमास्टर ने क्लास ले ली है। लेकिन वे दो अध्यापन जो अभी उनके साय थे, दफ्तर में जा बठे हैं। उन्होने अपनी-अपनी क्लास नहीं ली हैं । हैडमास्टर जी देख रहे हैं कि जो दो अध्यापर पलासा मे है वे भी पढ़ा नही रहे हैं । उहें लगता है कि मास्टर जानबूझ कर उसे जलान के लिए पलासी मे खाली बठे हैं। उनका इसी तनाव के कारण सिरदद होने लगता वे एव लडने के हाथ एनासिन की गोलिया का एक पत्ता मगग लेते हैं । साय मे चाय भी हैडमास्टर जी ने चाय के साथ गोली ले ली है। क्लास से थोडा दूर ।

छोटो स्कूले / 31 T हटकर एक बीडी भी फूक दी है। अब व क्लास मे हैं। उन्होन कुछ लडका का बारी-बारी से कायदे का पाठ पढन को कहा है। लेकिन जो पाठ चे पन्ने को कहते हैं। वह उन बच्चा में पढ़ा ही नहीं जा रहा है। उन्होंने दफ्तर से अपनी बेंत मगवा ली है। और उन्हें मारना शुरू कर दिया है-हरामजादों, तुम्हे कितने साल हो गये स्कूल आते हुए। लडके रो रहे हैं । वे रोने पर और अधिक मारते हैं-रोता है । रोना है ले और रोल डडा पड़ रहा है लडका के सिर पर हाथो पर और टागो पर । हारकर लडके चुप होते है तभी उनका पिंड छूटता है । आधी छुट्टी हो गयी है। सभी अध्यापक अपने-अपने काम से निकल गय हैं । सिफ हैडमास्टर जी स्कूल मे है । रखवाली के लिए सारी जिम्मे- दारी उनकी है । बस इसी बात के लिए वे दूसरे मास्टरो से अपने को अलग समझते हैं और कुछ नाजायज़ अधिकारा का उपभोग करते हैं। आधी छुटटी खत्म हो गयी है। सारे मास्टर स्कूल में आ गये हैं तो हेडमास्टर जी चल पडे हैं। सूल मे करें भी क्या? आप से पढाया नही जाता। अध्याप। को पढान के लिए कह नहीं सकते। कहें भी किस मुह तो समय पर स्कूल नहीं आते। पूरा समय स्कूल म नही लगा पाते। बच्चो से नाजायज फीसे लेते हैं। वे अलग। अगर य अध्यापको पर सख्ती करेंगे तो वे बोलेंगे न? फिर प्राथमिक विद्यालय के हैडमास्टर की औरात ही क्या है ? यह भी मास्टरो जैसा मास्टर है। उसने, इचाज होने की, एकमात्र योग्यता तो है सब से मीनियर होना। दूसरे टाइम की हाजिरी लगाकर अध्यापर पुन दफ्तर में इक्टठे हो गये हैं। अब की बार दिलजले अध्यापक भी शामिल हैं। चाते काफी देर - चनती हैं । इक्का दुक्का अध्यापक कभी-कभार मालको की शिकायत पर बलास मे जाता है और क्लास को डरा धमका कर बिठा आता है। हा । तो बातें हो रही हैं। महगाई की, डी० ए० की, कटौतिया की, पिक्सेशन की। एक बार एक दिलजला अध्यापक यह भी कहता है कि अब को बार हैडमास्टर जी ने हम भी चाय नही पिलायो । नहीं तो दाखिले के दिनो मे वे सारे स्टाफ को रोज चाय पिलाया करते थे। दो नम्बर सफाई देता है भाई, चाय महगी बहुत हो गयी है। अब वे एक कप भगवाते हैं। स्कूल का -- - B r 327 मत्युममा पास खडे को आधी देते है तो देते है नही तो सारी सुडक जाते हैं। और तो सभी तरह की बातें इस स्टाफ में होती हैं, लकिन हैडमास्टर की नाजायज फीसो का विरोध करन की बातें कभी नहीं होती। शुरू शुरू मे उन दो अध्यापकान जिह हमन दिलजलो की सज्ञा दी है, यह बात उठायी थी। लेकिन दो और तीन नम्बर के साथ न टने के कारण वात शुरू मे ही दब गयो । परिणामस्वरूप य दोना हैडमास्टर की आखा म अभी भा रडर रहे है। उनकी बातो के बीच में एक अभिभावक एक बच्चे को दाखिल करवाने आ गया है। दूसरे नम्बर का अध्यापक फाम भर देता है । अगूठा लगवाका पाच रपये ले लता है। इस प्रकार समय काफी वीत गया है । छुटटी होने में अभी थोडी देर है। हैडमास्टर जी आ गये हैं। मास्टरा को क्लासा मन देखकर वे मन-ही मन में जल जात हैं कि दूसरे नम्बर वा अध्यापक उह पाच रुपये और फाम पक्डा देता है। पाच रुपये हाथ मे आने पर हैडमास्टर को पुछ राहत-मी महसूस होती है। तनाव धीरे धीरे ढलने लगता है । व मास्टरा स कहत हैं-सारा सामान स्टोर मे रखवा दो। क्लासो के ताले लगवा दो दो मिनट बाद ही छुटटी की घटी बज उठती है—टन । टन | ।

जुडे रहने की विवशता उसने ज्याही कॉलेज के प्रागण मे प्रवेश किया, उस देखकर चार-पाच छायो को टाली मे खडा एक छात्र खासने लगा । वह उन लडका का अच्छी तरह जानता है। ये वही लड़के है जो उसकी क्तास मे पीछे बैठे आपस म बातें करते है भार वह अक्सर उनकी अनुपस्थिति माक कर देता है । काई अन जान व्यक्ति उनके खामन को स्वाभाविक मान सकता लेकिन वह नही। वह अच्छी तरह जानता है कि य इस प्रकार की शरारत उसका अपमान करने के लिए ही करते है। उसे बहुत दुख होता है। थोडी देर पहले साफ दिन की उजली धूप ने उसके जिस हृदय को खिला दिया था, अब वह पुन मुरझा गया है। उसके सामने कई प्रश्न उठते हैं । लडके प्राध्यापको का इतना निरादर क्यो करत उनका पढने मे मन क्यो नही लगता? क्या उसका व्यक्तित्व प्रभाव शाली नहीं है ? आदि। कुछ प्रश्नो का उत्तर उसके पास है, लेकिन वह कर कुछ भी नही सकता। वह क्लास लेता है। उसका हृदय अशान्त है। अशान्त मन से कोई काय ठोक ढग से नहीं किया जा सकता। यह यह अच्छी तरह जानता है। उसने महसूस किया कि उसका भाषण प्रभावशाली नहीं है और बालको की समान में नहीं आ रहा है। परतु इस सवरे लिए छात्र स्वय ही जिम्मेदार हैं। साथ ही उसके आगे यह भी उजागर हो जाता है कि सभी छात्र एक समान नही हैं। अधिक छात्र ऐसे हैं जो उसका हर जगह मान करते हैं । चसक भाषण को ध्यान से सुनते हैं। बडे अच्छे अच्छे प्रश्न पूछते हैं। यह महम्म करता है कि ऐसे लड़को को ही नहीं होनी चाहिए, पर त यही 34 / मृत्यु भय । सभव है जब शरारती विद्यार्थियों से निपट लिया जावे । इहें पढाई या ज्ञान मे कोई मोह नहीं है। कॉलेज यो इहाने मनोरजन का स्थान ही समझ रखा है। तभी पीछे स कुछ लडके शोर मचाते हैं । वह सदको खडा करके सात मात अनुपस्थितिया लगा देता है और कास स बाहर निकाल देता है। उसे उन वालका पर क्रोध आता है । यह एसे छायो को देखना तक नहीं चाहता वह इनमे तग आ गया है कि वह एसो नौकरी ही छोड देना चाहता है। कभी कभी उसके जी म आता है कि वह सव वस्तुओ का मोह छोड दें। उसे तन के वस्त्रो की कोई सुध न रहे। सहक किनारे बैठकर भाग और धतूरा पीने लग जायें। या अफीम, गाजे चरस और अय मादक पदार्थों की तस्करी करनी शुरू कर दे। तभी उमे गाव के एक व्यक्ति का याद आती है जो पाकिस्तान से सोना ला लावर बेचता था और वरोडपति बन गया था। लेकिन ये सब भी उसके मन की कल्पनाए ही है। वह कुछ भी नही कर सकेगा। जो कुछ उसके लिए वरना सभव था वह भी उसन नही किया । वह जो कुछ कर सकता था-कहानियां लिखना, पावे म दिन काटना और खादी पहनना, अगर वह ऐसा करता तो अवश्य ही साहित्य मे ही उसका कुछ स्थान बन जाता और शायद रोटिया भी इसी के सहारे मिलने लग जाती, परन्तु उसने यह सब नही किया। आन द भोगने की लालसायें उस ऐसी जगह खीच लाइ जहा वह छात्रा को समस्या मे ही उलझा रहता है। कक्षाओ मे जाकर माथा पच्ची करता है। अपन गुट के प्राध्यापका से मिलता है । कैटोन म वठता है चाय पीता है गप्पे हाक्ता है शाम को पत्नी को साप लेकर सैर करता है। उसकी बहुत सी फरमाइशें पूरी करता है। थोड़ी वहुत गाव में रह रहे वुडरे माता पिता की सभार लेता है। छोटा भाई जो ला कर रहा है उसे जाय महीने उसकी माग स कुछ कम पम भेजता है । परन्तु वह महसूसता है कि जो कुछ वह बर रहा है वह उसके लिए नहीं है। स्टाफ-रूम में पठे-चठे इतनी माता का विश्लपण सरन पर भी उसे कोई हल नजर नी आया । उसे कोई दूमरी राह नहीं सूझती। वह निणय करता है कि वह उन छात्रो को ही मुधारेगा। वह खडा होवर प्रिंसिपल के जुड़े रहने को विवशता / 35 दफ्तर म चला जाता है । उन विद्याथियो के रोल नम्बर बताकर सिफारिश करता है कि ये लडके हमारा अपमान करते है, कक्षा का अनुशासन भग भारत हैं, इसलिए ये लडके कॉलज से निकाल दिये जाने चाहिए। प्रिसिपल एक फीकी हसी हसता है, शर्मा साहब, इस तरह हम अगर लडका को निकालते चलें तो यह कॉलेज एक दिन खाली हो जायेगा । हमे ता पौस चाहिए। फिर इन छापो के माता पिता तो शहर के माने हुए लोग हैं । इनको छोडकर हम नायेंगे भी कहा ? इन लोगो से तो हम साल मे जारा रुपये का चन्दा प्राप्त होता है। खैर, आप अपने मस्तिप्त पर इतना वोझ न रख ।मैं इन लडका के माता पिता से मिलकर इसे अच्छी प्रकार समझा दूगा।' स्टाफ रूम की ओर रास्ते में उसने एक क्लास रूम के अादर झाका । प्राध्यापक बाड पर कुछ लिख रह थे, लेकिन पीछे की बैचा पर वठे लडके उन पर कागजो की छोटी छोटी गेंद सी फेंक रहे थे। प्राध्यापक बेचारे जान- बूझकर उनकी इस शरारत से अनभिन हुए जा रहे थे। तभी उसे लगा कि अगर वह भी इसी तरह अपमान से आखें भूद ले और किसी बात को परवाह न करे तो उसका भी गुलर हो सकता है । शाम को जब वह अपनी पत्नी के साथ एक रेस्तरा में पहुचा तो यही चार-पाच लडके और दो उनके विरोधी गुट के प्राध्यापक बैठे थे। उहें देखार लडके एक साथ खिलखिला पडे। उनके साथ बैठे प्राध्यापक उहै राक नही सके । रोकते भी कैसे ? पत्नी ने पूछा, "ये कौन हैं।" 'पता नही कौन हैं इतना बड़ा शहर है । मैं किसी को क्या जानू ।" रात को सोय माये उसने अपनी समस्याआ पर एक बार फिर विचार किया। उमन महसूस किया नि वह नौकरी नहीं छोड़ सकता। नौकरी छोन पर वह अपनी पत्नी की नजरों में गिर जायेगा। यह भी हो सकता किनीनता की स्थिति में वह उसे छोडकर ही चली जाय । उसके भाई की पदाइ बीच म हो समाप्त हो जायेगी। गाव और शहर मे जो उसका प्राध्यापक होने के नाने मान है वह सब समाप्त हो जायगा। उसके इस वत मान अपमान की तो केवल दो चार यक्ति हो जानते हैं। सबसे अधिक तो । ।

36 / मृत्यु-भय उसे ही अनुभव होता है। लेकिन नौकरी छोड देन पर जो असीम अपमान होने लगेगा उसे वह सह नहीं सकेगा । कविता या कहानी उस बचा नही सकेगी। सबसे बड़ी बात यह है कि नौकरी छोडना भीरता है। अगर इसी प्रकार सभी नौकरी छोडने लग जाये तो फिर पढाएगा कान ? वह उन लडको को याद करने लगा जो उसे मान देते हैं, उसन निणय किया कि क्ल वह उन्ही लडको के लिए कालेज जायेगा। इसके पश्चात वसा ही जाना-पहचाना रोज का रोज आता रहा और वह कालेज जाता रहा, पढाता रहा।

हथियार यह उफ मेरा 'बॉस' मुझे नीम चढे करेले सा कडवा लगता था। कई बार तो वह एस अवसर तैयार कर बैठा कि में उसके प्राण तक लेने को तयार हो गया, परतु मन ही मन मे। एक बार तो मैंने मन ही मन म योजना बनाई वि क्यो न रात को छुरा लिये उसके घर म उतर पडू । बस एक ही बार मे मामला पार । परन्तु अगले ही क्षण मैं डर गया कि मेरे दीवार फादते ही वह जाग गया और सिरहाने रखी अपनी पिस्तौल मुझ पर प्रयोग कर ली तो। वह साफ बच जायेगा उसका कुछ नहीं विगडेगा, अदालत मे कह देगा मैंने तो अपने प्राण बचाय हैं । या मान लो, वह जागता नहीं है और मैं उसकी हत्या कर देता है तो फिर मुझको उसके भाई जिदा नहीं छोडेंगे हिंसा मे हिंसा तो बढती जायेगी। इसलिए मैंने समझ से काम लिया और एक अहिंसात्मक हथियार की खोज मे लग गया। मेरी और उसकी शत्रुता के कारण बताने की आवश्यक्ता मैं नहीं समझता क्याकि उन कारणो को सभी चमचागिरी न करने वाले मातहत बखूबी समझते हैं। वैस उनको बतान भी लग जाऊ तो वे अलग से कई कहानियां बन जायेंगी। अधिकतर मेरे माथी भी मेरे साथ थे और हम जहा कहीं मौका मिलता हम उसके विरुद्ध उलटिया करनी शुरू कर देते । क्या पतर का पिछवाडा क्या शहर की गलिया हमारा प्रमुख विषय यही रहता। एक मुझ एम साथी ने बताया कि उसके विरुद्ध एक अचूक हथियार प्रयोग में लाया जा सकता है जिससे उसके पजे तक उखड सकते हैं। और उसको कैद भी हो 38 / मृत्यु भय सकती है। जिस साथी ने बताया वह मरा पूरा विम्यासपात्र था और वाफी समझदार भी। उसने मुझे बताया कि अपने साहब न पचनसिंह की 'सीव विक्सी' पर जिस चपरासीका रखा पा उस वस पितर रुपये दिये थे और हस्ताक्षर दो सौ एक रुपये पर परवाये थे । अब अगर हम उसकी शिकायत कर दें और वह चपरासी सहा बयान दे दे तो उसकी छुटा हो सकती है। अब मैं उस चपरासी नाम सहीराम की पाज करन लगा । यह अकाल प्रस्त क्षत्र से भाया हुआ था, पूछताछ परन पर मुझे पता चला कि जब से उसे दपतर से निकाला गया है वह गाया म घर-उधर मजदूरी करता है। उसे खोजन की दुविधा म पई दिन बीत गय । एक अय मित्र न सुझाया कि तुम उस चपरासी को खोज लो और मजिस्ट्रेट या विसी भीष पामिशरस उसके ये हलपिया धयान तस्दीक करा लो । उस परचे को अपनी जेब मे रखो, जब कभी साहब आक्रमण कर जेब से निकालकर सामने रख दा, इस हथियार के आगे पिस्तौल भी पानी भरेगी। मेरे मन म भी यह बात गहरे तर बैठ गयी कि चलो इससे साहब की छुट्टी नहीं हो सकती, परन्तु चोर अपनी चोरी पक्ड ली जाने पर अवश्य ही घबरा जायेगा । जिस दिन उस यह दिखा दूगा वह मर आगे पानी भरेगा । कितना सरल उपाय है बास को नीचा दिखाने का। मैं मन ही मन में वाह ! वाह कर उठा। एक दिन मैंने छुट्टी ले रखी थी। कई धधे थे जिहें मैं सतोषपूवर करना चाहता था। सुबह सुबह ही पत्नी को, एक रजाई सिलन ने लिए मकान मालिक की सिलाई मशीन लाकर दी। अत मे जाते जाते पत्नी ने उसको सुई ही तोड दी । वडा दुख हुआ। भारी मन लिये बाजार में गया। सोचता था पचास पसे का नुक्सान हो गया। इससे तो अच्छा था रजाई बाजार मे ही सिला लेता। परन्तु जब दुकानदार ने पचास को बजाय पिचेत्तर माग लिय तो मेरा मुह और भी ज्यादा लटक गया। सिगरेट पीने कोजी करता था ताकि कुछ गम उड जाय । परन्तु पालतू पस तो पहले भी बहुत खच हो चुके थे इसलिए मन मार के रह गया। 1 MP १ परन्तु उस समय मुझे क्या पता था कि मेरा गर्म ओज दूसरी प्रकार हो । दूर होगा । जब मैं अपने चक्की वाले दोस्त के पास बतियार गम भुलाने के लिए चक्की पर पहुचा तो मेरे आश्चय का ठिकाना न रहा । सहीराम वही आटा खरीद रहा था । मैं देखते ही चहक पडा~'कहो सहीराम क्या हाल है, कभी मिलते ही नही कभी सेवा का कोई मौका नही दिया ।' मैं एक ही सास मे कह गया। वह वेचारा दात निकालता हुआ 'बस-बस' करता रहा। 'आओ अब घर चल वही रोटी खा लेना। मुझे भी तुझस थोडा- काम है।' मुझे डर था वि वही वह मुकर ही न जाये । "ता अभी कह दो क्या काम है ?" मैं उसे चक्की के पिछवाडे में ले गया और कहने लगा, 'वैसे तो तू जानता ही है अपना साहब बडा खराब आदमी है। मेरे साथ तो वह खास शत्रुता वाला रुख रखता है । हमने सुना है कि उसन तेरे को पिचेतर रुपये निये और हस्ताक्षर दो सौ एक रपये पर करवाये।" "हा, यह सच है।" "तुम यह सब मुझ लिखकर द दो तो यह मेरे लिए बड़ी काम की चीज होगी।' 'हा। मैं लिखकर दे सकता हूं। मुझे भी उम पर बहुत क्रोध है । मैं उसा विरुद्ध ये बयान जहा तुम कहोग वहा दे दूगा। मैं पचासा रुपये का किराया भर कर भी आ सकता हूँ। ‘नहीं अगर आवश्यक्ता पड़ी तो हम तेरा किराया नही लगने देंगे।" फिर मैं उसे तहसील में ले गया। उसके हलफ्यिा बयान गइप करवाये-फ्ला दफ्तर के फला अफसर ने अमुप दिनार को मुझे इतने रुपये दिये इतने पर हस्ताक्षर करवाये । नीचे उसके हस्ताक्षर हो गये। बयान 'ओष कमिश्नर' से तसदीक भी करवा लिय। मैंने दोस्ती के तौर पर उसे अपना स्थायी पता लिखकर दिया और कभी-न-कभी घर आने को कहा। अब मशीन की सुई टूटन का दुख में पूर्णतया भूल गया था। मेरी छाती फूलकर चार गज चौडी हो गयी। मैंने मन ही मन म नालायक बताने 40 / मत्यु भय वाले पिता को बताया कि देखा, मैं इतना बड़ा बूटनीतिज्ञ हूँ । अपने साहब से भी नहीं डरता उल्टा उस अपने दबाव म रखता तभी एक होटल म बैठकर दोस्त के साथ चाय पी। बिल का भुगतान दोस्त का न करन दिया। खुश तो जरूर था परन्तु घुशी का कारण किसी और को नहीं बताया कही उस पहले ही पता न चल जाय । घर आकर पत्नी को सुई का मूल्य ज्यादा लग जान पर डाट नहीं दी। उल्टा रसोई घर मे बठकर हस हसकर बातें करन लगा। पत्नी हैरान थी। पाज एव चीज लाया हूं।' 'क्या? मैंने वयान उसके आगे रख दिये- अब देखूगा उसे । बात-बात में रोव मारता है, तरह तरह की गलतिया निकालता है । अब तो सब बदलेल लूगा। तभी पत्नी ने कहा-'अगर वह यह देगा यह तो तुम दोनो न मिलकर मेरे विरुद्ध झूठा दोप लगाया है । क्यापि चपरासी को ता मैंन आग नौकरी नही दी तथा तुम वस ही मुझसे नाराज हो । ये सहीराम के बयान बिल्कुल झूठ है।' सुनकर मरा मुह कुछ उतर गया। परन्तु मुझे फिर भी विश्वास था कि चोर के पर नही होते । वह कोतवाल को कभी नहीं डाट सकता । परतु उल्टा चोर कोतवाल को डाटे वाली कहावत ने मुप मथना शरू कर दिया। दूसर दिन साहब अपने कमरे में दूसरे चपरासी को डाट रहा था। उसकी दहाड सुनकर मेरा जो डूबने लगा मुझे लगा कि वह वह रहा है- तुम क्या लिय फिरते हो। ये बयान बिल्कुल झूठ है मेरे पास प्रमाण है। तुम्हारे पास बयाना के अतिरिक्त और क्या सबूत ह ? तुम जो हथियार लिये फिरते हो वह कही चलने वा नहीं। हमने भी बच्ची गोलिया नही खेली हैं जो तुम जैसे छोकरे हो दबा जायें पहले अपनी प्रत्यक साइड सप करके ही मैंने पसा खाया है। मेरा काई क्छ नही विगाड सकता।

इन्सान और इन्सान हम दुनिया को योज-यवर से दूर पाकिस्तान में एक गांव मे बडे मजे से रह रहे थे। हमारे पूब जमीन थी । जुलाई सन् 1947 को एक शाम को हम पता चला कि हिन्दुस्तान और पारिस्तान बन चुका है। पाकिस्तान में कोई हिन्दू नही रह सकता और यह भी सुना कि मुसलमान हिन्दुओ की सरेआम हत्याए कर रहे हैं। हम तो पाकिस्तान मे रह भी असे सकते थे। गुलाम मुहम्मद जैसा गुहा हमारा जानी दुश्मन था। उसके साथ हमारे जमीन-जायदाद ये मामले पर समय समय पर दग-फसाद होते रहते थे। यह इलाके का एक तरह का डार या । अपने साथ बदू और चार-पाच 'लगवाई' रखता था । लेविन हमारे आगे उसकी पेश नही चलती थी। हम कानून के मुताबिक पलते थे। जिस समय हमने समाचार सुना । मेरी भाभिया सन्दूर मे रोटिया लमा रही थी। फिर क्या था? तन्दूर की रोटिया तन्दूर मे ही रह गयी। हम हडबडी करके घर से बाहर निक्ले । कोठे गेहू और सामान से भरे पड़े थे। साप क्या-क्या चलता? नाम मात्र का सोना और नगदी ले सके सो ले लिया । बस। हम शीघ्र ही सतलुज दरिया के किनारे पहुंच गये । दरिया हमारे गाव के पास से गुजरता था। दरिया के किनारे हमारी नाव बघी थी। सतलुज पार के खेतो मे जाने के लिए हमने खुद ने नाव खरीद रखी थी। हम सब नाव में सवार होकर दरिया पार हो गये। हम अभी थोडी ही दूर गये ये कि हमे पीछे से एक घुडसवार भागता हुआ नजर आया। हम सब ने सोचा-गुलाम मुहम्मद आ गया। हमारी 42 / मृत्यु भय मौत आ गयी । अब हमे यह जिंदा नहीं जाने देगा। जो भादमी हमें इतने दिन मात नहीं दे सका । आज अपना सारा बदला ले लेगा। बडे भाई ने राय दी कि औरतो को वह दुष्ट प्रष्ट करे इसस अच्छा है, हम सब खुद ही मर जाए। हमन सामूहिक हत्या का निणय लिया और पास ही पडे एक मूखी लकडियो के ढेर की ओर बढे । परतु धुडसवार हमारे इधन मे आग लगाकर कूदने से पहले ही पहुच गया । उसका पोहा तरते हुए बडी जल्दी दरिया पार कर गया था। यह गुलाम मुहम्मद का बडा भाई चाद मुहम्मद था। आते ही वह बोला-तुम यू भूखे-प्यासे गाव छोडकर क्यो जा रहे हो। दुश्मन तो तुम हमारे इतने दिन ही थे। अगर हम इतने दिन ही आप से बदला नही ले सके तो आपकी वेबसी का नाजायज फायदा अब भी नहीं उठायेंगे। तुम हमारे दोस्त हो। हिन्दुस्तान में जाकर तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा । वहा जाकर दर-दर की ठोकरें खाने से अच्छा है तुम यही रहो। हम सबने मिलकर राय की वि अब मरे तो पडे ही हैं । चलो इन पर एतबार करके ही देख लें फिर भी हमे डर लगता रहा। चाद पर विश्वास हो सकता था परतु गुलाम पर नहीं। पाद हमे गाव से बाहर खेतो मे अपनी ढाणी मे ले गया। चाद की घर- थाली ने हमारे लिए रोटिया बनाइ और खाने के लिए मिन्नतें की लेक्नेि भय और चिन्ताओ के मारे हमारे पेटो मे गाउँ बध गयी थी। हा I घोडा- बहुत बच्चा ने कुछ खा-पी लिया। आधी रात के वक्त गुलाम अपने चार पाच साथिया के साथ पाया। हम चिंता के कारण सो नहीं पाये थे । हमारे आगे एक बार फिर मौत नाचने लगी । परतु चाद ने गुलाम को कुछ कहा और वह मुस्कराता हुआ हमारे पास आया। हमारे साथ प्रेम से बातें की तथा अपने बड़े भाई की तरह हमे धीरज बधाया। दूसरे दिन गाव में हम अपने घर गये। घर के अदर झाक्कर देखा तो पाया कि रात रात में सारा सामान गायब हो चुका है। पाद ने लोगों के घरोसे ढकर कुछ सामान हमे वापिस दिलवाया । अपने ही घर का गेहू हमें लोगो से खरीदना पड़ा।

इन्सान और इन्सान 143 -- । । गुलाम मुहम्मद और चाद मुहम्मद तो हमारे मित्र बन गये थे। लेकिन शेष गाव वालो को हमारा वहा बना रहना रास नहीं आया। उन्होने हमे चेतावनी दी कि तुम यहा मुसलमान बन कर ही रह सकस हो। इन लोगो मे अधिकतर वे ही लोग थे जो इतने दिन हमारे खूब सज्जन बने हुए थे। इन सबके साथ भाई भाई का रिश्ता था। सारे गाव के युवा मुसलमान हमारे बुजुर्गों को चाचा-ताया कहकर बुलाते थे। हम भी उनके बुजुर्गों को अब्बा या अम्मी कहकर पुकारते थे। बुजुग-बुजुग आपस मे भाई साहब या भाई जान कहकर पुकारते थे। कई मुसलमान तो ऐसे थे जो प्रेम प्रेम मे हमसे कहा करते थे-जहा तुम्हारा पसीना बहेगा वहा हम अपना खून बहा देंगे। लेकिन अब वे कसमे न जाने कहा चली गयी थी। वे लोग गुलाम मुहम्मद और चाद मुहम्मद के बस में भी न रहे और हम चेतावनी दी कि इस्लाम धम कबूल कर लो, नही तो तुम्हे कत्ल कर दिया जायेगा । उस गाव मे हमारे ही खानदान के दो चार घर थे। और कोई हिदुओ का घर नही था। उनकी बातें सुनकर पाकिस्तान मे रहने के प्रति हमारा मोह भग हो गया । अब समस्या थी हिन्दुस्तान पहुचने की हमने पता लगाया तो पता चला कि हिन्दुमलकोट को एक स्पेशल गाडी सात दिन बाद जायेगी। हमे सात दिन वही काटने पडे । इस बीच एक शाम को मुसलमानो ने ऐलान किया कि हम गाय का मास बना रहे हैं और वो तुम्हे खाना पडेगा। गाव वालो ने हमारे हिदू नाम बदलकर मुसलमानी नाम भी रख दिय थे। मास और वह भी गाय का, हमारे गले से कैसे उतरता? आखिर हम लोगा ने साहस दिखाया । हम भाई-भाई चार-पाच एक जसे जवान थे। दो मेरे चाचे के बेटे भाई और तीन ताए के बेटे भाई भी जवान थे। पिताजी ने कहा-"लाठिया निकाल लो और मास खाने के लिए बुलाने आने वालो पर टूट पडो!" वैसा ही किया गया। एक-दो के लटठ लग गये तो सारे भडक उठे। सब मिल हमारे पास आये । पिताजी ने उन्हे समझाया-"कोई धर्म किसी पर लादा नहीं जा सकता। धम तो दिल से स्वीकारने की चीज है । असली मुसलमान हम तभी बनेंगे जब इसे दिल से स्वीकार लेंगे। मास खाने-न- ।

44 / मृत्यु भय खाने से क्या फरक पडता है ? अगर हम दिल से इस्लाम न चाहें और हर के मारे मास खा भी लें तो क्या हम मुसलमान हो जायेंगे।" "तो पलो हमारे साथ चलकर नमाज़ पढो।" उनके एक नेता ने कहा। 'हा ! यह बात हम भी पसद है किसी धमप्रय को पढ़ने मे रिसी को क्या एतराज हो सकता है " हम उनके साथ नमाज पढने चले गये। आखिर गाडी चलने का दिन आ गया और हम आधी रात को चुप चाप गाव छोडकर स्टेशन की तरफ चल पडे । रास्त म हमारी महायता के लिए गाय का एक व्यक्ति इनायत अली भी हमारे साथ हम स्टेशन तक छोडने आया। वह बडे भाई का धम भाई था। • गाव घर छोडते वक्त पिताजी ने अती से पहा-"एक सेर सोना है। इसे रख लो। हमसे कोई दूसरा रास्ते मे छीन लेगा। साथ म धन रहेगा तो जान को भी जोखिम रहेगा। तुम तो हमारे अपने हो। तुम्हारे पाम साना रह भी गया तो भी दिल को तसल्ली रहेगी।" नही भाई, नही । मैं नहीं रखता । तुम्हे सोना ले जाते हुए डर लगता है तो मेरे पास छोड जाओ। जब दो दिन बाद हालत सुधर जायेगी तो मैं तुम्हार पास पहुंचा दूगा । तुम यहा से जाकर कहा रहोगे। यह बता दो।' 'नही तुम इतनी तकलीफ मत करना।" 'नकलीफ की इसमे क्या बात है, अगर तुम्हारे कुछ काम ही नहीं आया तो धम भाई कसा हूँ हार कर हमे जगह बतानी पडी। हमने उससे कहा-'हम तो जाते ही फाजिल्का के पास एक गाव है-रूपाणा। उसमे रहेंगे।" हमने अपना ठिकाना बता तो दिया लेकिन मन मे सोचा-कौन माता- जाता है फिर लेकिन उसने पूरे उत्साह से उत्तर दिया-"उसी गाव के पास ही तो हिन्दुस्तान और पाक्स्तिान की हद बनी है। मैं हद पर आकर किसी से वह दूगा । तुम्ह समाचार मिले तो आ जाना। वही अली ठीक अपने वादे के अनुसार सीमा पर दोनो ओर लगे सेना के पहरे को पार करके भी रूपाणे गांव मे पहचा और सारा सोना हमारे हवाले कर दिया। तब पिताजी को हमारे मकान में एक कोने में गाहा हुआ । " इन्सान और इन्सान | 45 योडा सा धन और याद आ गया जिसे वे हडबडी मे भूल गये थे। पिताजी ने अली से कहा कि उस धन को कोई और नही खोज पाया होगा। तुम जाकर निकाल लेना। सुनकर अली ने कहा-"चाचा, अगर धन मिल गया तो तुम्हे यही पहुचा जाऊगा।" हमने उसकी बहुत मिन्नतें की कि अब की बगर तू हमारे लिए इतना जोखिम मत उठाना । लेकिन वह नहीं माना। शेर की तरह दहाडता हुमा कह गमा-अगर मुझे धन मिल गया तो पहुचा कर ही जाऊगा। वही अली दस दिन बाद उक्त धन हमे पहुचाने के लिए हमारे पास आ रहा था। रास्ते मे किसी ने धन के लालच मे उसकी हत्या कर दी। यह बात पद्रह दिन बाद हमे अली के बड़े भाई के खत से मालूम हुई।

मृत्यु-भय अबकी बार वह अपने राजस्थान मे रह रहे भाई के पास जाना बिल्कुल ही नहीं चाहता था। उसके मन मे यह भय बडे जोरा से समा गया था कि वह यहा से बचकर नहीं आ सकेगा। उसे वहा कोई साप काट लेगा और उसकी मृत्यु वही हो जाएगी। पहले भी वह राजस्थान मे अपने भाई के पास कई बार गया था। लेकिन सापो के भय ने कभी इतना नही डराया था । अव की बार जब उसका भाई रहे मिलने आया था तो उसने ही उन्हें वहा के सापो की भय करता बताई थी। उसने कहा था कि अबकी साल साप कुछ ज्यादा ही हो गए हैं । उसके भाई के साथ खेत मे काम करते मोधू चमार को साप ने काट लिया था और उसकी मृत्यु हो गयी थी। उसका भाई भी सापो के डर से परेशान था लेकिन उसे तो सापो के देवता देसरा जी' पर पूरा विश्वास था। वह सुबह शाम 'केसरा जी के पान के आगे धूप जलाकर पूजा करता उसके घर केसरा जी के 'यान' पर कचे से लटर के सहारे आधी भगवी और आधी घोली ध्वजा लहराती रहती थी। पर 'देवरे के समान दिखाई पड़ता था। उसका भाई हर वक्त ही केसरा जी का स्मरण करता रहता था। उसे विश्वास या कि देसरा जी सापों को उसके पास नही फटक्ने देंगे। सेकिन उसे तोहार-फक और देवी-देवताओं पर विश्वास नहीं था। उसे तो प्रति-सपविष (एटीवेनोम) दवाइयो पर ही विश्वास था जो कि बडे-यहे अस्पतालो मे हा उपसन्ध यी । ऐसा अस्पताल गगानगर मे पहा से डेढ सौ मील दूर था।

एक बात अबकी बार और भी हुई थी जिसने से ज्यादा डरा दिया, था और वह यह कि कुछ ही दिन पहले विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तके जगह मापो के अध्याय में उसने पढ़ा था कि अपने देश । प्रतिदिन सौर मनुष्यो की मृत्यु सापो के काट लेने से हो जाती है। उसके मन म बार-बार यह प्रश्न कौंध जाता था-तुम वहा जाकर क्यो मौत खरीद रहे हो ? परन्तु उसका जाना जरूरी हो गया था। उसके भाई का विशेष आग्रह था। उसके नि सन्तान चाचा चाची भी वही रहते थे। उनसे मिलकर आना था। चाची ने कई बार उल्हान दिये थे कि तुम तो आते ही नहीं। उसके मा-चाप भी यही चाहते थे कि वह जाए और सारे समाचार-बाडी लाए। उसके भाई के गाव मे डाक्-व्यवस्था न होने के कारण सिफ आने-जाने से ही एक-दूसरे का पता चल सकता था। अब भला वह घरवालो को कसे कहता कि मैं तो सापो के डर के मारे नही जाता' आखिरकार उसने मन-ही-मन मे गाव घर और पीहर गई पत्नी को अन्तिम अलविदा कही और चल दिया। रास्ते मे टीलो की रेत उड उडकर सडक के ऊपर तक चढ आई थी। जगह-जगह कई मजदूर उसे हटाने मे लगे थे। फिर भी कई बार उसको बस रेत मे फसती फसती बची। एक जगह एक बस और एक ट्रक क्रास करते समय रेत मे धस गए थे और रात भर मे उस मडक का ट्रैफिक जाम था। उन दोनो के पीछे वाहनो की लम्बी लाईने लगी थी। यह तो अच्छा हुआ कि उहे ज्यादा देर इन्तजार नही करना पडा। रास्ता शीघ्र ही साफ हो गया। कोई भी वाहन अपना एक टायर सडक से थोडा सा नीचे उतारता था तब तक बचाव रहता था लेकिन थोडा मा ही ज्यादा हटते फस जाता था। इसलिए उनके ड्राइवर की कई ट्रक वालो के साथ तकरार हुई । ट्रको वाले डाइवर साईड न देकर इजन ब- अडकर खड़े हो जाते थे। उसने योचा-मान लो उसे साप काट लेता है । वह और उसका भाई इलाज करवाने गगानगर आते हैं और रास्ते मे उनका वाहन यू ही रेत मे रुक जाता है। फिर तो उसे अस्पताल में भी नही पहुचाया जा सकेगा। वह तीन बजे रावतसर पहुचा। वहा बस बाफी देर रुकी। वही का 48 / मृत्यु-भय - । ग्रामीण लोग बस में चढे । मले पुराने कपडे । शरीर मास विहीन लम्बा चौडा चाखटा। पिचके हुए गाल और गले की हड्डी का 'मीणिया एक इच बाहर निकला हुआ। यही लकडबुग्गे से लोग उसके भाई के गाव के आसपास के लोग थे। रावतसर तक तो नहरें हैं। जगतप्रसिद्ध राजस्थान कैनाल रावतसर के पास से गुजरती है। आधी से ज्यादा भूमि की सिंचाई होती है। लेकिन आगे उसके भाई के गाव की तरफ धोरे हैं। ऊचे ऊचे पहाडो जैसे धोरे। इन धोरो पर खेती करने वालो का भविष्य सिफ वर्षा पर ही निभर करता है। अधिकतर अकाल पडता है। रावतसर से आगे घोरे जितने-ऊचे थे, सडक पर रेत उतनी ही कम थी। धोरो की मोटी रेत उडती कम है। अब की बार वहा खेती-पाती ठीक थी। डेहरिया गवार, बाजरे म्ग मोठ और तिल की फसला से भरी थी। घोरियों की ढलाना पर मतीरे और ककडियो की लम्बी लम्बी बेलें फैली थी। उनसे बहे-बडे मतीरे और लम्बी लम्बी क्कडिया लगी थी। खाली भूमि पर लम्बी-लम्बी पास थी। वहा पशुमा के झुड घर रहे थे । झाडिया छोटे छोटे लाल-लाल वेरा से लदी थी। दूर-नजदीक के ऊचे-नीचे धोरो पर हरी भरी फौग उगी थी और हरियाली - इस आवरण के कारण चे पहाडियो के समान दिखाई पड रह थे। लेकिन यह धोरे और हरे भरे खेत अबकी बार उसे जरा भी नहीं भा रहे थे। उस लग रहा था कि से ही किसी खेत मे उसकी मौत बैठी है। उसके भाई का गाव गगानगर से सरदारशहर राजमाग पर परत पल्लू अड्डे से पश्चिम की ओर दो कोस दूर था । बस एक एक हरी को पार करती जा रही थी। सभी नीचे जाती थी भी उपर । लगभग पाच-पाच मील बाद एक स्टापेज आता था। वका-दुक्का ही सवारिया चढती उतरती थीं । कमताली की ऋतु म सब गाव वाले सेता म काम पर जुटे थे। कोई दोन्चार ही शहर या इधर-उधर जाते थे। रास्ते म यह गाव भी आया जहां केसरा जी' का मेला लगता था। कई देहातियो न देसरा जी के पान की तरफहाप जोडे- जय हो देसरा जी महाराज की जय हो । उसके मन में यह भी आया कि हो सकता है चाचा जी तथा भाई साप काट लेने की अवस्था मे उसे भी इसी जगह जिद पर ल पाए।

वह पल्लू अड्डे पर घस से उतर गया। अटो योगड़ियों मे दो ढाबे थे। उसने एक मे चाय पी और जूठा कप नाही मिति ऐसी उधर परिपाटी थी। चाय पीने के बाद उसे शचि फिरने का तलब हुई । पास ही एक बाजरे का खेत था। वह पानी की एक बोतल भर कर बाजरे के खेत मे उतर गया । बाजरे के खेत मे घुसते हुए वह बडा चौक ना था कि कही कोई साप न हो। ढाबे वालो मे उसन अड्डे पर बसो के टाइम भी पूछ लिये ताकि साप काट लेने की अवस्था मे गगानगर जाया जा सके । फिर भी मन ही मन में डर रहा था कि अगर शाम के समय किसी साप ने काट लिया तो मुश्किल होगी। वह अकेला ही गाव की ओर चल पडा। रास्ता कुछ परिचित था। रास्ता क्या था बस एक पगडडी थी। आगे चलकर पगडडी काफी चौडी हो गयी और उसका इधर-उधर भटक जाने का भय जाता रहा । पगडडी के दोनो तरफ फोग और झाडिया थी । कही-कही बाड भी आ जाती थी। दोनो ओर चूहा के बिल और घास भी खूब थी । उसे रह रहकर डर लग रहा था कि कही इनमे से कोई साप न निकल आए? रास्ते मे कई डह- रिया आइ नई घोर आए और कई खेत आए। उसे थोडी सी प्यास महसूस हुई। वह एक म्वेत म उतर गया और एक मतीरा तोड लाया। मतीरे से उसी प्यास बुद गयी। आखिरकार एक टिब्बे पर चलते ही उसे गाव नजर आ गया। गाव के बाहर चारो ओर पानी के कई कुण्ड थे। घाघरा और चुनरी ओढे औरतें उनमे से पानी भर रही थी। गाव का कुआ नही चल रहा था। जितने दिन तालाब मे वर्षा का पानी रहता है, कुआ नही चलता। ज्योही तालाब का पानी खत्म होता है कुआ चलने लगता है। जब वह गाव म पहुचा तो शाम वा धुघलका फैल रहा था। तालाब पर भेड-बकरियो के रेवड और गायो भैसो के झुण्ड पानी पीने आ रहे थे। इक्का-दुक्का ऊट भी उनके साथ थे। उन सब के पावो से माकाश मे धूल उड रही थी। उनके गले मे पडी घटियो की आवाज बडी ऊची थी। गाव के अधिकतर धरा की चारदीवारी बाड से की गई थी। उसे लगा कि यह 50/ मृत्यु भय नही पो। बाड तो सापो का घर है। उनके अपने घर के चारो ओर भी माह यो। उसे लगा कि यहा तो घर के भीतर भी हो सकते हैं। भाई, भाई के बच्चे और चाचा चाची उसे देखकर बहुत खुश हुए। परन्तु वह खुश नही था। उसके मन मे तो यही बात आ रही थी इन लोगों का यहा रहना ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। पोडी देर बाद उसने भाई से पूछा-यहा कोई डाक्टर अभी आया या नहीं? कभी-कभार एक आता तो है, लेकिन है वह नीम हकीम ही। पोडी देर मे वच्च आपस मे बतियाने लगे कि मा के आगे आज फिर एक साप आ गया था। लेकिन बच्चो के सिवाय अय विसी ने भी इस घटना की कोई चर्चा नही की। पता नहीं यातो उन्होने सापो को नियति के रूप मे स्वीकार कर लिया था या वे केसरा जी' की वजह से बेफिकर थे। वैसे 'केसरा जी' के भरोसे बेफिकर होने वाली बात क्योकि आए साल ही उनकी आखो के आगे ही केसरा जी के थान पर ले जाने के बावजद भी सपदश वाले एक-दो व्यक्ति तो मर ही जाते थे। वह डर रहा था और डर के अदर एक कल्पना उपजी-उसे साप ने काट लिया है । भाई से उसने पाव को कटे हुए स्थान के ऊपर से बधवा लिया है। दाती से घाव को छीलकर बहुत साग रक्त निकाल दिया है । घाव साफ किया है। फिर भी खून बह रहा है। अच्छा है खून के साथ-साप जहर भी निकल जायगा। वह भाई को गाव ने डाक्टर से लाल दवाई लाने के लिए भेजता है । परन्तु मन म डरता है-पता नही डाक्टर के पास लाल दवाई मिलेगी या नहीं। फिर किसी ट्रक पर गगानगर जाने की कल्पना । अस्पताल पी कल्पना । कल्पना ही कल्पना । जीवन की कल्पना। मृत्यु की कल्पना। दूसरे दिन सुबह जब वह शौच फिरने गया तब भी उसे सप भय पूरी तेरह सता रहा था। थोडा-सा दिन घढ वह ऊट पर चढकर भाई के साथ सेत गया। खेत मे मोठो के पौधो का जाल बिछा हुआ था। चाचा, भाई और भाभी मोट उखाडने सगे। वह भी लगा परन्तु शीघ्र ही उसरे मन में माया कि न जाने पिस मोठ के नीचे साप बैठा हो, वैसे थकावट तो पो हो। ।

मृत्यु भय 151 । साप के भय ने और भी थका दिया। वह बैठ गया और एक मतीरा तोड- कर खाने लगा। वूडढे चाचाजी टसक्-टसक कर मोठ उखाड रहे थे। यू लगता था मानो उहें एक मोठ का पौधा उखाडन मे अपने बल से दुगुना बल लगाना पह रहा हो। फिर भी वे उखाड रहे थे। उसे अपने आप पर शम मान लगी । अरे तू जवान होकर भी बैठा है, वह डरता-डरता खडा हुआ और सम्भल पम्भल कर मोठ उखाडने लगा। भाई काम को देखकर घबराया हुआ था । अबकी बार फसल अच्छी थी और मजदूर नहीं मिल रहे थे । भूमि की अधिकता के कारण भूमिहीन लोग बहुत कम थे । लगभग सभी लोगो के पास भूमि थी। मजूरी पर काम वही गरोध लोग करते थे जिहोंने अपना सोम पहले सम्भाल लिया था। मोठ उखाडने से उसके हायो में पीड होने लगी थी। इसलिए भाई ने उसे मतीरे-कावडिये इक्टठे करने का काम सौंप दिया। वह मतीरे-काकडिये ढूढने के लिए खेत मे निकल पडा। खेत की सी' वाले टिब्बे पर जाने पर उसे पडोसी श्योलाल दिखाई पड गया। वह घास इकट्ठा कर रहा था। उसे देखकर श्योलाल वोला-अरे । ये कौन - मैं हू मिया। श्योलाल उसका परिचित था। श्योलाल उस वक्त ढाणी मे ही रहता था। वह हाल चाल पूछने उसके पास चला गया। बातचीत हुई। अभी वे बातें कर ही रहे थे कि श्योलाल की बच्ची ने शोर मचाया-साप साप श्योलाल जई लिये उधर दौडा । वह भी । लेकिन उनके वहा पहुचने तक साप घास म छुप चुका था। उसने उसे घास मे आग लगा देने की सलाह दी, लेकिन श्योलाल एक साप के पीछे पास बर्बाद करने को तयारनही था। उसने घास को उठा-उठाकर अलग रखना शुरू किया। उसने कहा- श्योलाल घास को मत छेडो । क्रुद्ध हुआ साप तुम्हें डस लेगा। यू सापो से डरें तो हमारी पार कसे पडे । उसने सारा घास छान मारा लेक्नि साप कही भी दिखाई नहीं दिया। आखिर मे कहा-चलो गया कही । केसरा जी' महाराज फिर भी उसे दिखायी नहीं देने देंगे।

52/ मृत्यु मग वह वापस अपने खत म आ गया। भाई तथा चाचा को स्योलाम के चेत वाले साप की घटना बतायी लेकिन उन्होंने उसकी कोई विशेष चर्चा नहीं की। एक बार दोनो ने केसरा जी' को याद कर लिया। उस रात वह रह-रहकर श्योलाल के बारे मे सोचता रहा-जिस खत में श्योलाल ने साप देखा है । उमी खेत मे श्योलाल को नीद कसे आयेगी? वह रोज भाई के साथ येत जाता था । सुबह जब खेत जाता था तो सोचता कि आज शाम को वह बचकर घर नही आयेगा। परन्तु शाम हो जाती । उसे कोई साप न काटता । इस प्रकार उसकी मत्यु एक दिन आगे सरक जाती। वह खेत में पाव वडे सम्भल-सम्भल कर रखता था। वह अपनी तरफ स बडा चौक ना रहता था। खेत मे भाई के पास काम बहुत था। वह सुबह और दोपहर अम्मल खाता था ताकि थकावट न हा, काम अधिक हो । दिल से तो वह भी चाहता था कि खूब काम करू लेकिन सापो का भय उसे खुलकर काम करने ही नही देता था। इसी भय के कारण ही तो उसन घर वालो को तीन छटिटया कम बतायी थी। काम की अधिकता देखकर एक-दो बार भीतर ही भीतर उसने चाहा था कि सब सच सच बता दू और तीन दिन थोडा बहुत काम करवा जाऊ लेकिन सापो के भय ने उसे ऐसा नहीं करने दिया । सातवें दिन जब वह खेत से घर आया तो भी उसे विश्वास नहीं हुआ कि अब वह बच जायेगा। उसे अभी बस के अडड तक का रास्ता पदल ही तय करना था। रास्ते में भी साप के काट लेने की पूरी सम्भावना थी। काम की अधिकता के कारण भाई उसे ऊट पर अडडे तक छोड आने में असमथ था। रात को वह भाई भाभी और चाचा चाची से देर तक बातें करता रहा । इधर उधर को प्रेम भरी छोटी-छोटी बातें। उसे उनके सान्निध्य में बहुत सुख मिल रहा था। उसन तव भी एक बार सोचा कि अभी तीन दिन और रह जाऊ। लाल-लाल गिरी वाले मीठे मतीरे खट्टे मीठे स्वाद वाली काकडिया फोफलियो-खलरियो का साग और घी से चुपडी बाजरे को रोटिया उसका मन मोह रही थी। उसकी चारपाई के नीचे बडे-बडे मतीरे रखे हुए थ। ।

मत्यु-भय 153 उसके बहा रहने से उसके भाई का मन भी प्रसन था। एक-दो दिन पहले उसरे भाई ने कहा था हि तुम्हारे यहां माने और रहने से मेरा दिल काफी खिला था। चाची भी इसी टोन मे कह रही थी-पया खाक व्हरे हो सिफ दो दिन । उसे सात दिन भी दो दिन के बराबर लग रहे थे। लेकिन सापो का भय सारी कोमल भावनाओ को दबा रहा या। उसने विचार किया-मैंने कितनी मुश्किलो से सात दिन काटे हैं ? तीन दिन और भढा कर क्यो खामखा मुसीबत मोल ले रहा है ? अगले दिन वहा से चले जाने का पक्का निणय लेकर वह सो गया। लेकिन सुबह जब वह उठा तो उसका हृदय पूण बदला हुआ था। शौच फिरते हुए उसने सोचा-जब श्योलाल उस खेत मे रात दिन काम कर सकता है जिसमे उसने साप माखो से देखा है और उसकी भाभी भी, तो वह क्यो नही कर मकता ? इस धरती पर जहा इतने साप हैं, वहा उनके दुश्मन नेवने भी तो हैं। साप स्वय भी तो आदमी से डरता है । वह तो मादमी को तभी काटता है जब वह दब जाता है । आदमी का आभास पाते ही तो वह भागता है। सामने तो तभी होता है जब वह भाग नहीं सकता। सुबह-सुबह को ताजी हवा ने न जाने उसे कसी स्फूर्ति दी कि उसने अपने घर वालों को आश्चयजनक निणय सुनाया- अभी मैं तीन दिन और ठहरूगा और काम कराऊगा। तुम तो कह रहे थे न छुट्टिया इतनी ही हैं ? वह तो मैं जल्दी जाने के लिए बहाना बना रहा था। वह तीन दिन तक खेत म अपने भाई के बराबर काम करता रहा। पकावट ने भी उतना नहीं सताया । अध्यापक हो गया तो क्या था तो वह एक फिसान का ही बेटा। वह खुश था कि उसने सांपों का भय निकाल फेंका । दस-बीस वष बाद उसे भी तो खेती करनी थी। यही इन्ही खेतो मे क्योकि पजाब मे उनकी जमीन बहुत पोही थी। भाइयो मे बाट लेने के कारण उन्हें वहां बहुत पोडी-थोडी भूमि हिस्से मे आती थी।

छलित वह अगस्त मास की धूप मे पसीने से नहाता साइकिल पर उनके घर पहुंचा पा। वह उनके पडोसी की लडकी का घर वाला था। उसकी अप्रोच हर दफ्तर म है। उसने बहुत लोगो से सुन रखा था। उसने स्वय ने भी उसे एक दो बार क्षेत्र के एम० एल० ए० साथ कार में बैठे देखा था। एक दो बार उसे बाहर से आए मत्रियो का स्वागत करते भी देखा था। अबकी बार जब उसका लडका अपने ननिहाल आया या सो उससे मिला था। उसने जितनी यात्मीयता दिखाई पो उतनी आत्मीयता तो सगे भानजे भी क्या खाक दिखाएग? वह बोला-बडे दुख की बात है मामाजी, पिताजी के होते आप बेकार बैठे हो । अबकी बार कही कोई वेकेंसी निकले तो माना | आपको अगर न लगा सके तो मैं पिताजी से यह धधा ही छुडवा दूगा। वह ज्योही साइकिल से उतरा उसी भानजे ने उसकी साइकिल ठीक उसी प्रकार पकड ली जैसे अफसर की साइकिल चपरासी पकह सेता है। उससे छोटे ने उसे आगन मे बिठाया। इतने में बाहर से लडको की मा उफ उनके पडोसी की लरकी मा गई। उसने खड़े होकर 'राम राम' कही। वह खुश होते हुए बोली-आज तो पता नही सूरज किस दिशा मे फिर लडकी से गोली-अपन मामा को कुछ ठडा पिलाया या महीं? गर्मी में क्तिनी दूर से चलकर पाया है। पोरी ही देर मे छोटा लडका बफ ले आमा। यह शीशे के पग में डांस155 खुशबूदार शबत भर लाई । जब उसने दो-तीन शबत के गिलास पी लिये और एक सुशबूदार डकार ले ली तो उसे बडी तृप्ति मिली । वह मन-ही- मन कहने लगा-इतना प्रेम तो सगी बहनें भी नहीं करती। उसे उस पर सभी बहना से अधिक प्रेम आने लगा। इतने मे ही वह बोल पडी-मेरे लिए तो जैसा जोगिद्र सगा भाई है, वसा तू है । भला तेरे लिए वो कुछ न करेंगे तो किसके लिए करेंगे। दुनिया के तो हजारा काम करवाते फिरते हैं। हमे तो कभी-कभी उनका दिनो तक मुह देखन को भी नहीं मिलता । हमारे इस डाक्टर का तबादला इन्होंने अभी-अभी कॅसल करवाया है। यहा लाखो की ऊपरी कमाई है। हमारे स्कूल का हैडमास्टर यहा बडा तग या बेचारा', रोज घर आकर गिडगिडाता था। इन्होंने उसको भी उसके गाव मे ही ट्रासफर करवा दिया है। मास्टर और पटवारियो के दामफर करवा देना और नौकरियो पर लगवा देना तो इनके वाए हाथ का खेल है। इस साल इन्होंने दो लडको को पानेदार लगवा दिया है। इतने मे ही उसका घरवाला आ गया। 'नमस्ते वमा जी, उसने खडे होकर नमस्ते की। वर्मा जी ने मुस्कराते हुए उससे हाथ मिलाया और पास हो कुर्सी पर बैठ गए। सहको ने अपने पिता को भी शरबत पिलाया। वर्माजी ने अकेले नपीकर एक गिलास उसके लिए फिर से भरवा दिया। उसने मना किया परन्तु वर्माजी बोले-"यार,या मैं अकेला पीता अच्छा सगूगा । आज तो हम पहली बार इछ्रे बैठ रहे हैं।" सरबत पी के तो योडी देर घुप्पी छा गई, इस घुप्पी को वर्माजी ने सोग-कसे दर्शन दिए माज'" "अपने भिसे का डी० ई० ओ० कुछ अध्यापक अस्पाई तौर पर नियुक्त कर रहा है । सापियो के पास तो इन्टरप्पू कार या गया है, मेरे पास नहीं पापा योनि मने रोजगार दफ्तर मे रजिस्ट्रेशन कुछ लेटकरवाया था। यह कुछ मोर भी कहता सेरिन वर्माजी बीप मे ही बोस पर- पाहमा इन्टरपूमार भी निकल जाएगाबोर री०१० यो से समान भी रया दूगा।*०१० मो. तो अपने परमा मादमी है । उसका राम , 56 / मृत्यु-भय रोजगार दफ्तरवालो से भी पहतारहता है। उसी से हम काड भी निकलवा वह आफ्ठ गद्गद हो गया। फिर तो बहुत अच्छा । देखो, मैं अब बेकारी से बहुत तग आ गया है । और घर वाने मुझसे तग आ गये हैं।" 'भाई, बेकारी से तुम क्या, सभी तग आ जात हैं। यह साली बीज ही ऐसी है। परन्तु देखो जिले मे आने-जाने मे दफ्तरो के चक्कर लगाने में कुछ पच तो आपको उठाना ही पडेगा, किसी बाबू को कुछ देना भी पड सकता है।" 'क्तिने मे काम चल जाएगा?' 'कम-से-कम सौ तो दे ही जाओ। बाकी फिर देखा जाएगा। हमे तो कुछ खाना नहीं अपने तो भगवान की दया है। दो लडके हैं। छोटा-सा परिवार है । वैद्यारी करता हूँ । परन्तु कोई करने ही नहीं देता। मरीज शिकायत करते हैं।' सौ का नाम सुनकर एक बार तो उसका सास सूख गया । क्योकि उसे पता था पर वाले इतनी रकम उसे आसानी से नही देंगे परन्तु उसने मन ही मन में सोचा-यह अवसर हाय से नहीं जाना चाहिए । अगर नोकरी लग गयी तो भाए मास छ सो मिलेंगे। फिर तो सारे अभाव भर जाएगे । उसने निश्चय किया कि अगर घरवाले पसे नहीं देंगे तो मैं छात्रवत्ति के पैसों से खरीदी पढी ही बेच दूगा और पसे जुटा लूगा । अच्छा तो मैं कल दोपहर को पसे दे जाऊगा।" अपना निणय सुनाता हुआ वह उठ खड़ा हुआ। वह उनके ऋण से बहुत दब गया था। उसने सोचा-हल्का महसूस परने के लिए कुछ-न-कुछ तो किया ही जाना चाहिए। उसने अपनी जेब स दो रुपए निकाले और उस लडकी को पकडान लगा। उसन कुछ देर न न न', करने के पश्चात पंस ले लिय। परन्यु उसे फिर भी लगता रहा कि अभी तक तो उसने शरबत की कीमत भी नही वह सारे रास्ते उनके व्यवहार मोर स्वभाव की मन ही-मन प्रशसा करता रहा।

एलित 1,577 तीसरे दिन सप्तके पाम धर्माजी का बुलावा आया। यह बड़े उत्साह से • गया । वर्माजी देधते ही मुखराये और चहर पर योने--तुम्हारे तो भय ही अच्छे हैं। सारा काम हल हो गया। मैं हो० ई० ओ० को सुबह-सुबह घर पर ही मिला था। बहने लगा, 'आपरे उम्मीदवार को जरूर नियुक्त कर दूगा।' मेरा नाम लेकर रोजगार दफ्तर में पलक रामलाल से मिल लेना । वह भापका का भी निकाल देगा। मैं फिर उस क्लक से मिला तो वह भी अपनी जान गहचान सकिन आया। कहने लगी--परसो उम्मीदवार को भेज देना मैं उसे इंटरव्यू काड दे दूगा। अब तुम क्स ही जिले मे पहुच जाओ और अपना काड उस क्लक से मेरा नाम लेकर से लो। मैं परसो मुबह ही आऊगा और इन्टरव्यू के बाद डी० ई० श्रो० को कह दूगा। तुम्हारी नियुक्ति अवश्य हो जाएगी। पर आकर जब ये सारी बातें उसने घरवालो को बताई तो उहे भी काफी उम्मीद हो गई। मां पडोस मे जाकर पचास रुपए उधार माग लाई। बेटा जिले मे जायगा । बीसों रुपये किराये के लग जाएगे । फिर खाना-पीना अलग, व.गे तो वापस ले आयेगा । परदेश मै दस प्रद्रह रुपये ज्यादा ही दोपहर ग्यारह बजे वह रोजगार दफ्तर पर पहुघा, अग्रेजी में बडे-बडे अक्षरो मे लिखा था 'एम्पलायमेन्ट एक्सचेंज' । बाहर की ओर खुलने वाले सब दरवाजे बन्द थे। प्रवेश के लिए एक रास्ता था। एक-दो लोग आ-जा रहे थे। जाने वाले लोग बिना झिझक चिफ को एक तरफ हटाकर अन्दर घुस जाते थे। परन्तु उसका साहस न पडा। वह चक्कर लगाकर वापिस मुह पायाखाली और बेहद घबराया हुआ । उसने गेट पर चपरासी को खोजा परन्तु वह तो बाहर से पाय सा रहा था। उसने उसे रोक कर बुलाना चाहा परन्तु वह उस पर बिना ध्यान दिए अन्दर चला गया। उसकी घबराहट बेहद बढ़ गई, एक बजे दफ्तर बन्द हो जायेगा और उसका काम नहीं हो सकेगा। वह हाफता-सा होटल पर गया। होटल का बुडढा उसे काफी दया- पान लगा । उसने सोचा-इसकी मारफत ही इस दुग मे प्रवेश पाया जाए। उसने एक कप चाय पी और पैसे देते समय गिडगिडा कर कही ठीक रहते हैं।

58 / मृत्यु भय . लगा-"मुझे रामलाल क्सक से मिलना है।" "अभी दो मिनट मंठो चपरासी आता है, जब आयेगा तुम्हें साप भेज होटलवाले ने बकाया नहीं दिया और न ही उसने मागा चुपचाप दोनो के मध्य समझौता हो गया । थोड़ी देर बाद वह रामलाल क्लक के कमरे मे खडा था। क्लक ने फाइल से नजर उठाए बिना ही पूछा--"कहिये।" "आपसे सचदेव एम० एल० ए० के आदमी वर्माजी मिले होगे।" "मिले होगे । याद नहीं।" उसकी सास सूखने लगी। गले को तर करने के लिए योडी-सी यूक निगली-मुझे इटरव्यू काड निकलवाना है।' "साब से मिलिए।' वह साहब के कमरे के सामने ले गया। दरवाजे पर चिक लगी थी। ऊपर सफेद-सफेद अक्षरोम लिखा था, एम्पलायमट आफीसर'। उसने विक हटाकर देखा-अदर साहब के साथ दो आदमी बातें कर रहे थे। वह प्रतीक्षा करता रहा । जब वे दो आदमी चले गए तो एक क्लक आ गया । वह साहब के अकेले होने की प्रतीक्षा करता रहा । उसनेमन-ही मन निश्चय किया कि वह साहब की दराज मे बीस रुपये ठूस देगा और गिडगिडाते हुए उसके पाव पक्ड लेगा। साफ-साफ कह देगा-साहब, मैं बहुत गरीब आदमी हू । अबकी बार मैं नौकरी पर न लगा तो मर जाऊगा। परन्तु साहब अकेला न हुआ। उसके पास कोई न कोई आता ही रहा। अन्त मे दफ्तर का समय समाप्त हो गया। साहब खडे होकर बाहर आ गए और पदल ही अपने घर की ओर चल दिए। वह भी उसके पीछे चल दिया। उसे मह अवसर अनुकूल लगा। वह थोडी दूरी से साहब का पीछा करता रहा । काफी दूर आगे निकल जाने पर वह उसके बराबर हो गया और ज्योही साहब ने उसकी ओर देखा उसने कहा- 'जी, मुझे काह निकलवाना है।' मा कुत्ते । तुझे शरम नहीं आती दफ्तर से मेरा पीछा कर रहा है। मुमे तू अन्दर करवाएगा।' । - W वह दुतकारे हुए कुत्ते की तरह दूर हो गया। उसे बहुत दुख हुआ। समझदार होने के बाद मा की गाली आज उसने पहली बार खाई थी। उसे लगा वह व्यथ ही इतने दिन अपने को एक पढ़ा लिखा और विशिष्ट आदमी समझता रहा है। वह अपने ही अन्दर वेहद छोटा हो गया। उसने सोचा-मामला खटाई मे तो पड ही गया। इस साहब को तो मजा चखा दू और इसी उद्देश्य से वह साहब के पीछे बढा भी परन्तु वही एक थाना दिखाई पड गया। गेट पर एक बन्दूकधारी कद्दावर जवान खडा या। कई सिपाही हाया मे डडे लिये सडक पर निकल आये और इधर-उधर बिखर गए । उहे देखकर उसका उत्साह ठडा पड गया। "नौकरी न मिली तो न मिलो यहा अदर और होना पडेगा।" वह पराजित होकर फिर दफ्तर पर आ गया । वहा चपरासी ने बताया कि बड़ा साहब कल छुटटी पर रहेगा। उनकी जगह गिल साहब बठेगे। जितने अध्यापको के काड निकले हैं या निकाले जायेंगे उसकी लिस्ट क्ल दोपहर को डी० ई० ओ० के दफ्तर मे जायगी। कल दस बजे से पहले-पहले तुम अपना काड निकलवा लो। सुनकर उसकी जान मे जान आई । सबसे बड़ी खुशी तो यही थी कि क्ल बडा साहब इस दफ्तर मे नही आएगा। दूसरी यह कि कल तक वर्मा भी आ जायेगा। परन्तु उसे केवल वर्मा के भरोस ही नही रहना चाहिए, अपने आप भी यल करना चाहिए । कौन जाने वर्मा आए या न आए ? जिले मे आते समय एक फौजी दोस्त ने उसे वताया था कि मेरा एक दोस्त सन्तोपसिंह पजाव होम गाड स बटालियन फाईव मे मोटर मकेनिक है। उसकी कई दफ्तरो के बाबुआ के साथ ऊठ-बैठ है। कोई काम पड जाये तो मेरा नाम लेकर उसके पास चले जाना। वह होमगाह स म पहुचा। खाकी वर्दी पहने जवान बदूको की नाले साफ कर रहे थे। सन्तोषसिंह का पता करने पर उसे जवाब मिला कि वह बाहर गया है। थोडी देर मे आ जाएगा। होमगाड्स वाले काफी प्रेमी निकले । उसे ठंडा पानी पिलाया और पख के नीचे बिठाया । नाम-काम भी पूछा। सन्तोषसिंह चार बजे आया। वह दाढी मूछो वाला लम्बा चौडा जवान 60 / मृत्यु भय था। उसे देखकर एक बार तो उसके दिल म दहशत-सी पैदा हो गयी। परतु थोडी बात चीत करने पर और चाय पीने पर उसका जी कुछ जम गया। सन्तोपसिंह ने उसे बताया कि उस दफ्तर म उसको तो कोई जान- पहचान नहीं पर एक और आदमी को तुम्हारे साथ भेजता है । वह किसी को कुछ दिलवाकर तुम्हारा काम करवा देगा। दिलवाकर युछ करवा देने वाली बात से एक बार तो वह चौका लेकिन अब भागकर जाना भी कठिन हो गया था। इसलिए वह चुपचाप उस आदमी के साथ हो लिया । जब वे दफ्तर पहुचे पाच बज चुके थे। दो-तीन बाबू 'अपने-अपने विभागा मे काम कर रहे थे। उसका साथी मदर गया और एक चपरासी जैसा दिखाई देने वाले आदमी को अपने साथ ले आया। उसने उससे कहा कि इसको कुछ दे दो । यह तुम्हारा काम परवा देगा। उसने जेब मे दस रुपए निकाले तो वह वहने लगा-दस रुपए तो चपरासी भी नहीं लेते बोतल के भी पद्रह लगते हैं । उसे न चाहते हुए भी बीस रुपए देने पडे । सोचा-न दिए तो यह और गालिया दैगा। क्हेगा-पैसे जी से नहीं उतरते तो हमे क्यो परेशान परते हो। उसकी जेब लगभग खाली हो चुकी थी। उसने भूखे प्यासे घमशाला मे रात विताई। सारी रात मच्छर खाते रहे और पास के गन्दे नाले की बदबू आती रही। सुबह जब वह दफ्तर पहुंचा तो यहा वर्मा भी मिल गया। उसने सारी घटनाए उससे कह दी। वर्मा उस आदमी के पास गया जिसको उसने बीस रुपए दिये थे। वापिस आकर उससे कहने लगा—वह क्या खाक काड निकलवायेगा? उसको कौन पूछता है ? उसे लगा वर्मा भी अपनी ही धाव जमायेगा । आखिर वह उसके पीछे हो लिया और रात को दिए गए पैसो के लिए पछतावा करन लगा। वर्मा ने रामलाल क्लक को चाय मिठाई खिलाई तो उसने बताया कि गिल बसा अच्छा आदमी है वह आपको मात अवश्य मान लेगा। धर्मा छलित 161 . और बाबू के कहने पर वह गिल साहब के पास गया। उसने अपने रजिस्ट्रेशन नम्बर को स्लिप गिल को दी और कहा- 'साहब मेरा भी इटरव्यू कार्ड निकाल दो।" ' काड तो हम सभी के निकाल रहे है", गिल ने स्लिप ले ली और कह दिया -आपका नाम लिस्ट में चला जाएगा। बाहर आने पर वह अपने आपको कुछ हल्का महसूस करने लगा। वर्मा ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा-'बस अब तो काम बन हो जाएगा।" वर्मा बाद में उसे एफ० सी० आई० के दफ्तर मे ले गया। दोपहर का समय था। वमा अदर चला गया और उसे बरामदे मे बैठना पडा, बैठे- बैठे थकावट के मारे उसे नोद आने लगी। उसे बार-बार अहसास हो रहा था कि वर्मा उस काम के लिए न आकर अपने ही किसी काय से यहा आया है। उसके काम का तो बहाना मात्र है। जब वह वाहर निकलकर आया तो कहने लगा--"मुझे तो आज राज- धानी जाना है। चलो मैं डी० ई० ओ० को फिर से कह दू ।' जब एक बजे डो० ई० ओ० वे दपतर मे पहुचे तो पता चला कि इटरव्यू कल के लिए स्थगित कर दी गई है। वर्मा डी० ई० ओ० से दफ्तर मे जाकर मिल आया। आने पर कहा--जब कल इटरव्यू समाप्त हो जाए तो मेरा नाम लेकर साहब से मिल लेना। वे बाहर आ रहे थ । दोनो चुप थे । परन्तु उसके मन मे बहुत उथल- पुथल हो रही थी। उसने हिसाब लगाया कि वर्मा मेर लिए एक बार ही आया था। आने जाने का किराया पद्रह रुपए है। दस रपए खान-पीने के दस रुपए किसी श्राव को दिए होगे। पद्रह और कर लो इसकी मेहनत वे फिर भी पचास बनी हैं । मैंने दिए सौ थे । इसे पचास रुपए तो वापिस देने ही चाहिए। लेकिन बस स्टैण्ड तक उसका कुछ कहने का साहस न पडा। उसी समय उसे याद आया कि उसकी जेर अब लगभग बाली है। बिना पसे यहा परदश म रात वैसे काटेगा और कसे घरजाएगा। इस बात ने उसे थोडा प्रेरित किया और वह पसे माग ही बठा-' वर्माजी, मेर पैसे तो काफी बच गए होंगे।" सुनकर वर्मा का चेहरा तमतमा आया- कहा? या बनता है सौ - 62 / मृत्यु भय । रुपए का ? अफसरो से मिलने के लिए पता नहीं क्या-क्या करना पड़ता है। घर पर फल पहचाने पड़ते हैं। चपरामियों को देना पड़ता है। फिर मैं यहा दो बार आया हू । मैं भी तो खाली पेट नहीं रह सकता?" "फिर भी क्तिना खच या गया है ?" "मैंने ऐसा हिसाव कमी नहीं लगाया । लो तुम्हारे सौ के सौ वापिस ले लो," उसने सौ का नोट उसकी ओर बढाया। 'सो के सौ वापिस क्यो लेल ?' वह दूर हो गया। डी ई ओ के वर्मा की बात मान लेने का उसे कम ही विश्वास या । फिर भी वह डर गया-जाता जाता यह डी ई ओ को नियुक्त न करने को ही कह जाए? यह सोचकर वह कुछ ढीला हो गया। माफी माग्न को भाषा मे बोला-"माप तो नाराज हो गये मेरे पास पैसे नहीं थे। अपना समझकर ही मैंने हिसाब मागा या।" "तो यू बोलो-ज्यादा तो अब मेरे पास भी नहीं हैं । मैं तो राजधानी जा रहा हू । तो पद्रह रुपए ले लो।" उसने पन्द्रह रपए लिये और चुपचाप वहा स खिसक लिया। वह सोच रहा पा वर्मा पचासो रुपए तो पचा ही गया है। दूसरे दिन पचास रिक्त स्थानो के लिए दो सौ लड़के लडक्यिो ने इष्टरव्यू दिया ।जव इटरव्यू समाप्त हुआ तो वह शिक्षा अधिकारी से मिला। दफ्तर म जाते समय वह वेहद घबरा रहा था- -पही यह भी उल्टा गलेन पड जाए अफ्सर से मिलने जाते समय लोग होठो पर हसी लेकर जा रहे थे। उसने भी सोचा अफसर को हसता हुआ चेहरा लिये मिलना चाहिए। उसने कुछ देर अपने मुख पर हसी लाने का पूर्व अभ्यास किया । परतु सफल न हुआ। एक बार तो उसने मिलने का विचार ही छोड दिया । परन्तु थोडा बाहर आकर फिर वापिस चला गया। जब उसने चिक हटाकर अदर झाका तो उसके चेहरे पर मायूसी के सिंपाय और कुछ नहीं था । वह साब के सामने जा खडा हुआ । उसे देख कर साहब ने कहा--हा' । साहब उसे कोमल ही लगा जिससे उसका उत्साह बढ गया। उसने छसित/63 कहा-'जी, मापसे सचदेव एम एल ए के आदमी वमा जी मिले होंगे।" 'हा । देखेंगे, अगर तुम्हारी नियुक्ति हुई तो तुम्हे घर पर सूचना भेज दी जाएगी।" वह बेहद उदास गाडी मे घर जाने के लिए बठ गया । गाडी मे बैठा वह सोच रहा था कि प्राध्यापक उह आदर्शों से भरा साहित्य पढाते रहे । परन्तु यह कभी नही पढाया कि आपको ऐसे ऐसे ठग मिलेंगे । कभी यह नहीं बताया कि अगर नौकरी न मिले तो तुम रोटी इस प्रकार कमा लेना । नौकरी के बिना भी खुशी प्राप्त की जा सकती है। उसे नियुक्ति हो जाने का कम हो विश्वास था फिर भी उसने सोचा- चार पाच दिन तो प्रतीक्षा करूगा और फिर वर्मा को गले से पकड लूगा । इससे जबरदस्ती पसे वापिस छीन लूगा।

गिरी हुई छत उसके मकान की छत गिर गई थी। कगाली मे आटा गीला होता ही आया है। होता भी क्या न ? उसने छत को कडिया बडी पतली और सस्ती डाली थी। थोडे से पैसा से काम चल जाएगा। वह सोच गया था। ऐसी सोच के पीछे गरीबी तो थी ही, एक कारण यह भी था कि उसका मकान धक्का बस्ती मे था धक्का बस्तीका क्या एतबार । न जान सरकार कब गिरा द? और सब कुछ व्यथ ही चला जाए । पटटेवाली जगह पर पक्का मकान बनान की उसकी सामथ्य नहीं थी। दस साल की अध्यापकी म वह धक्का बस्ती म कच्चा मकान बनाने लायक पसे भी नही जोड पाया था। जिन पसा से मकान बना, वे मित्र दोस्तो और पत्नी से पकडे गए थे। खर किसी तरह मकान बना । एक कमरे वाला। सिफ चार महीन बाद बरसात आई और छत चू गई। दूसरी दोपहरी मे छत पर थोडी-सी मिट्टी और बिछा देन के कारण जरडा कर नीचे गिर गई। गनीतम यही हुइ कि उस वक्त वह तथा उसका पाच-वर्षीय बेटा वाहर खडे थे । पत्नी भाग कर बाहर निकल गई। दो वर्षीय बच्ची पर तो कुछ छत ऊपर ही गिर गई थी। लेकिन किसी तरह बच गई। काफी सामान टूट फूट गया था। उसने इस हादसे को जीवट से झेला था। दीवार के साथ चारपाई खडी परके छाव कर ली थी। छत मे स दो टूटे फूट सरकण्डे निकले थे उनसे एक अस्थाई छप्पर-सा बना लिया था। अबकी बार वह चाहता था कि छत का सामान मजबूत होना चाहिए । सस्ता रोवे बार-बार और महगा रोवे एक बार। उसका विचार बना कि "गिरी हुई छत / 65 । हो न हो किसी प्रकार छत मे लोहे के गाडर' डाले जाए, लेकिन सवाल पैसे का या। उसे पत्नी स अब भी कुछ उम्मीद थी बेचारी अडोस-पडोस के कपडे सिलकर किसी तरह कुछ जोड पाती थी। लेकिन उसे अपन एक दोस्त से बिल्कुल ही उम्मीद नहीं रही थी। वह खास दोस्त जो उसका टयूशन न करन और फीस के साथ दो-दो रुपए अधिक न लेने के लिए प्रशसक था सुबह-सुबह उसने साथ सैर को जाता था। हर रविवार को दोनो खेतो मे दूर तक निकल जाते थे। दया घम, भ्रष्टाचार,नैतिकता, अनैतिकता, जीवन-मृत्यु, जसे विषयो पर वे घटा बातें करते थे, मित्र उसे बताया करता था कि उसका 'पाट नर किस प्रकार किसानो का अधिक से अधिक शोषण करने की कोशिश करता है। और वह बीच मे टाग अडाता है। इसलिए दोना के बीच हर वक्त तनाव बना रहता है। वह भी उसे अपने स्कल की बातें बताया करता था कि किस प्रकार अध्यापक टयूशन के लिए मरते हैं । बच्चा को पीटते हैं । टयूशन रख लने पर पढाते भी कुछ नही और यू ही पास कर दते हैं सरकारी स्कूल में कितते गरीब घरा के बच्चे आते हैं उनसे भी मुख्याध्यापक पाच पाच रुपए फीस के नाम पर 'झाड' लेता है उसके विरोध का भी कोई असर नहीं होता। क्यूकि वह अकला है और दूसरे अध्यापक तीन है तोना ही उसस वरिष्ठ हैं । अध्यापक स्कल मे ढग से पढाते नहीं । क्लासें खाली पडी रहती हैं। वे बच्चा से अपन घर का काम भी करवाते हैं। मसलन लकडिया उठवाना, घर पर 'उसारी' के वक्त पर इंटे इधर-उधर रखवाना इत्यादि । आगे यह मित्र उसकी सौ पचास की मदद करने के लिए हर वक्त तत्पर रहता था। जब यह मकान उसने बनवाया था तो उसने तीन सौ रुपए दिए थे। उन पैसा को उसने तीन चार माह मे लौटा दिया था। मकान किराये से पिण्ड छूटने पर इतनी कुछ तो बचत होने ही लगी थी। लेकिन अब उससे उम्मीद नहीं रही थी। उस मित्र ने एक अय धनी मित्र से मिलकर एक नई 'फम' खोल ली थी और उसमे आठ डूब गया था। उसने उसके साथ सुबह की सैर छोड दी थी। रविवार को बाहर निकलना वद कर दिया था। उसकी छत गिर जाने का उसे पता चल गया था फिर 66 / मृत्यु भय भी वह देखने तक नही आया था। नई 'फम म पैमा चाहिए ऐमा आभास उसका मित्र उस दे चुका था। अब वह उससे पसा मागे भी क्सि मुह से? ले देकर उसे अपने पोस्ट आफिस में चल रहे पचवर्षीय आवर्ती जमा खाते की यात जायी । इमरजेंसी मे कुछ आदेश ऐसे आए थे। मुख्याध्यापक ने उसे पे तभी दी थी जब उसने अपने नाम से खाता खोलकर पास बुक उसे दिखाई थी। इम खात मे वह आए महीने दम रपए जमा करवाता था। इस खात म उमरे लगभग चार मौ रुपए जमा हो गए थे। उस उमम से आधे वापस ब्याज पर मिल सकते थे। वह पोस्ट आफ्सि गया तो बाबू ने बताया कि आपन पिछले दो माह से किस्तें जमा नही करवाई है। पले वे जमा करवाओ तब जाकर आपको आधे पैसे मिलगे। एमा नियम है। तब उसे याद आया कि बीम म्पए उसके बैंक के बचत खात मे पडे हैं बैंक म यह खाता उसन इसलिए खुलवा रखा था कि कभी-कभार विभागीय पत्रिका म उसका कोई न कोई नालेख पत्र छपता था तथा वे उसे चक भेजते थे । चक को भुनान के लिए वैव मे खाता होना जरूरी था। पिछले ही दिनों उसी विभागीय पत्रिका मे उसकी एक रचना छपी थी अर उसके नाम बीम स्पए का वक चैक आया था। नेक्नि सिप बीम रपए बक मे निक नवाते हुए उस शम आती थी। एक बार जाग उमे वैक के इमी खातम में बीरा पर निकलवान पडे थे। लोग जिस खिडकी मे लाखो पये निगलवा रहे थे वहा मे उमा मिफ बीस स्पए निकलवाए थे। बाबू उस वस्शा भी नहीं था। कह दिया था- मास्टर जी सिफ बीस रुपए ही निक्लवा रह हो? क्या इतनी तगी न रही है । पास य एक अय सम्जन न भी टोक दिया-इतनी मी रखमा क्या पराग गुरुजी भई रकम है ही इतनी तो ज्यादा वहा में निवाए।' इमीशम से वचन के लिए उमन अबकी बार एक रास्ता ढढा- पनी म अस्मी गए निय और वैन म जाकर जमा करवा आया । ? 7 .

गिरो हुई छत 167 दो-तीन दिन बाद जाकर सौ रुपए निकलवा लाया। दो सौ रुपए पोस्ट- आफ्सि वाले खात मे से मिल गए। थाम को एक साथी अध्यापक के साथ जाकर वह 'गाडर' खरीद लाया। साथी अध्यापक न ही राय दी कि दो रुपए रेहडी का किराया काहे को भरत हो, सुबह दो-दो लडके उठा कर तुम्हारे घर फेंक आएगे इद्द । पसा की तगी कह लो या फिर एक खास मौके की वजह कह लो। वह भी लालच म आ ही गया। परीक्षा हो चुकी थी और छात्र बिल्कुल खाली थे। वे एक बार स्कूल म हाजिरी दन आत थ। स्कूल की सफाई करते थे और चले जाते थे। अध्यापक कापिया जाचत थे तथा परिणाम तयार करते थे। उसने सोचा लडका की पढाई का नुकसान तो इन दिनो में है नहीं। इस प्रकार दो रूपए बच जायेग। घर के लिए एक दिन की सब्जी ही हो जाएगी। दूमरे दिन उसने लडका की हाजिरी लगाई तथा सात-आठ लडको को साथ लेकर हैडमास्टर से पूछकर दूकान पर चला गया। उसने गाडर बच्चा के क्धा पर रखवा दिए । कोई ज्यादा बोय नही था। लेकिन लड़के शरारती तो होत ही है। फिर भी इन दिना मे जाकर तो और भी अधिक नितर' जाते है । वह साथ ही साथ चल रहा था। फिर भी दो लडके एक गाडर' को लिये हुए काफी दूर निकल गए । आगे निकलकर उहोने न जान क्या शरारत की कि उनमे से एक न तो पाव अगूठे पर चोट खा ली और दूसरे ने हथेली म । दोनो के खून निकल आया । अगूठे का नाखून उतर गया । सरकारी अस्पताल पास ही था । लेकिन यह वहा जान बूझ कर नहीं गया । सोचा, चोट का कारण बताने पर डॉक्टर उस पर बिगडेगा। निक्ट ही उसके पाम पढा एक लडका एक प्राईवेट डाक्टर के यहा कम्पाउडर था । अच्छा हुआ तब डाक्टर दूकान म नहीं था और चेला अकेला था। उसन गुरु भक्ति दिखाई और चुपचाप पट्टी बाधन लगा। जिस लडके के हथेली में चोट लगी थी उसकी उसने पट्टी नही करने दी। यू ही टिचर लगवा दी । सोचा-चाट तो मामूली है। खामख्वाह घरवाले पट्टी देखकर घबरा जायेंगे। और उस पर बिगडेगे। पट्टी तो । - 68 / मत्यु भय उसके शिष्य ने मुफ्त मे ही कर दी लेकिन दोना के 'टटिनस' का टीका लगवान में उसके दोस्पय खच जरूर हो गए। 'गाडर' उमे फिर भी रेहडी में ही भेजने पठे । वह सोच रहा था कि ठीक है, उसके साथ यही होना चाहिए था। उसने क्यू किया दो रुपये का लालच ? दो रुपये के लिए क्यू बच्चा से गाडेर उठवाए। क्या लोग बच्चो को स्कूल म मास्टरो का काम करन के लिए भेजते हैं ? जिस बच्चे के अगूठ पर चोट लगी थी । उसका पर दूर था और पोडा ये कारण उससे चला नहीं जा रहा था। इसलिए वह किसी का साईकिल मागर खुद उसे घर छोड़ने गया। साथ म उसन यह भी सोचा वि लगे हाथ लडने के घरवाला से माफी भी माग आऊगा । नहीं तो उसके घर वाल अभी स्कूल म आ धमकगे । और उस सबके सामन जलील करगे। रास्ते म वह उस लड़के के परिवार की बदहाली में भी परिचित हो गया । उस पता चला कि उसका बाप ऊट गाडा विराय पर चलाया करता था लेकिन कट मर जान म उसका वह काम ठप्प हो गया है । उस लगा कि छन गित स उसका तीन गर सौ का नुक्सान हुआ है। और इन बेचारावा सीन हजार पाऊट मर गया है। आज वेचारा के लरके में चोट लग गयी। उसन निणय लिया कि इस बच्च के ठीक होन का सारा पच स्वय ही वहन करेगा। उम बच्चे को घर छोडकर यह स्कूल आया ता दली म चोट पाया बच्चा राया उसका बाप सार मास्टरारबीच बैठा था।नीची नजरें शिा हुए जर वर उन सब के पास जाकर 4ठा तोएन उस अध्यापना छोटकर जिसन उस बच्ना द्वारा गाडर उठवान की गय दी थी यावी गव उग गवालिया जिस घूर रह थ। वाम धाप ने कहा- मास्टर जी इसा पट्टा ता परवान' मैन दया मामूनी मी नाट।। पट्टी गार परवान धामगा परग जापग। वम गाटोकाजर गवा लिया या जार चिर गधो भी पिया था। पपनि उम पारा सनात मोगाननहाय सविन उसरा अनम गिरी हुई छत 169 उसे बेहद धिक्कार रहा था। उसका स्कूल के काम में मन नही लगा। मुख्याध्यापक से छुट्टी माग कर वह घर आ गया। रास्ते मे वह सोच रहा था- इतना दुखी तो मैं जिस दिन छत गिरी ।। उस दिन भी नही था । उल्टा उस दिन तो खुश था कि चलो, अच्छा हुआ, सब जी बच गए। छत न तो टूट कर एक न एक दिन गिरना ही था । कमजोर जो थी। घर पर उसको मुरझाई सूरत देखकर पत्नी चौंकी, क्यो क्या बात है। चेहरा इतना उदास क्यू है ? उसे सारा हादसा बताया। सुनकर पत्नी ने ढाढस दी-कोई बात नही, मकान की छत गिरने की वजह से ही तुम्हारे भीतर की छत गिरी है। जब मकान की छत मजबूत हो जाएगी.तो तुम्हारी आत्मिक छत भी मजबूत हो जाएगी। फिर तुम्हें यू थोडे-थोडे पंसा के लिए जलील नही होना पडेगा। 'सच' पत्नी के बताये मूत्र को सुनकर उसकी बाछे खिल गइ। और यह लोहे के गाडर चढाने के लिए दीवारा पर चढ गया।

क वर्ग एक सस्पा म व पाचथे-4,ख, ग, घ ड, स्पष्ट है वरिष्ठना के अनुसार "क' उस वग का मुखिया था। स, क के जितना निक्ट पडता था उतना ही अधिक क का पिछलग्गू था । अगर दिन के बारह बजे भी के कहता कि अब रात है तो पीछे ख भी कह तता हा । रात है । क सार वग के लिए सस्त आदेश निकालता लेकिन ख इसस जरा भी विचलित न हाता । वह सोचता कुछ भी हो अपने लिए तो काई न-काई चार रास्ता निकल ही आयेगा। क और ख सता मे थ, तो "ड' सत्ता के बिल्कुल बाहर था। लेकिन जिस प्रकार विपक्ष के नेता का कुछ-न कुछ महत्व होता है वही महत्त्व ड का उस सस्था में था। वह क का खुलकर विरोध किया करता था। क को अवेले ही या ख के साथ मिलकर खाने की आदत थी लेकिन ड विरोध स्वरूप वे पूरा नहीं खा पाते थे। पूरा खाने लिए आवश्यव था कि ग घ और ड को भी शामिल किया जाता। एसा करने पर प्रत्यय के हिस्से मे बहुत थोडा आन को आशमा यो । यद्यपि व लोगो का पूरा शोषण नहीं कर पाते थे फिर भी यह अकेले अकेले खाने का ढर्रा ठीक है। क की ऐसी सोच थी। ह" को उनकी इस भ्रष्ट प्रवत्ति पर बडा क्रोध आता था। वह सोचता कि क' द्वारा लोगो को ठगने नहीं देना चाहिए। वह क को एसा न करने को कहता और बाज न आने पर कार शिकायत करने की धमक्रिया देता रहता । फलस्वरूप व को नीद भी हराम हो जाती थी। तक्नि सस्कारवश न तो खाने की प्रवृत्ति छोड सक्ता था और न ही अवश ड को अपने साथ मिला सकता था । ड, 4" की इन घिनौनी प्रवत्तिया का जिक्र अपने मित्र ।

दोस्तो मे भी किया करता था। उसके मित्र उसे महान सुधारक समझते थे। ग अजीब प्रवत्तिया का आदमी था। सामन होने परध के विरुद्ध एक शब्द भी न बोलता, कभी कभी प्रशसा करदिया करता था। लेकिन इ कर साथ होने पर ड की पीठ ठोकता रहता था। वरिष्ठता क्रम में उसका तीसरा नबर पडता था। कभी उस पाचा के नाम पर लिखने पड़ते तो वरिष्ठता क्रम का बड़ा खयाल रहता था। घ कुछ कुछ स्पष्ट था । वह न तो क की प्रशसा करता था और न ही घोर विरोध । वह ड का साथ तो देता, लेकिन हमशा आगेड को ही रखता। ड का विरोध का मजा चखाने और सीधे रास्त पर लाने के लिए पिछले साल क ने सस्था मे एमरजेसी लगा दी थी। ख कहता ही क्या, शेप भी कुछ न कह सके थे । एमरजेंसी म मुह जो बद हो जाता है सवका? फिर जो कुछ किया था, वह राष्ट्रहित में था। एमरजेमी के नियम बडे कठोर थ। और सब तो किसी तरह खीच ले गये, लकिन ड बेचारा भला इतना कठोर नियमा को क्स मह पाता? ख चोर रास्ता से नियमा की कठोरता म बच जाता इसलिए ड ने ख के चोर रास्तो को लेकर क की आलोचना शुरू कर दी। क, 'ख' के घोर रास्त ब द नही कर सकता था। दुनिया मे केवल यह एक ही तो उसका अधभक्त था। फिर इतनी सस्ती प्रयोग करते-करते क तंग आ गया । कुछ इसे इन्सानो के मौलिक अधिकारो की याद भी आ गई। इसलिए उसने एमरजेंसी मे कुछ ढील दे दी। के ने एमरजेंसी लगाकरडवो डरा तो जरूर दिया लेकिन फिर भी वह कोई बहुत बडी मनमानी नही कर सकता था, इसका उसे बहुत अफसोस या। तभी घ ने एक योजना की खोज की। इस योजना में सभी के सहयोग की आवश्यता थी। अत उसम सबको मिलकर बरावर खाने की व्यवस्था थी। यह किसी अकेले के बस की बात नही थी। इसीलिए तो घ ने अपने इस व्यक्तिगत आविष्कार को सबके सामने रख दिया था। क न भी इस योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी उस इस बात का सतोप था कि जितना 72 / मत्यु भय वह पहल बरेला अवेला पा रहा है उतना तो अवेला खायगा ही यह तो एक्सदा है। उमो सोचा-यह तो घ द्वारा आविष्कृत नयी राह है । इस राह का मुझे तो ज्ञान ही नहीं था। मुझे तो दुहरा लाभ होगा। य लोग भी अपनी ही पाल स मरी विरादरी म शामिल हो जायेंगे। पिर मरा बाई विरोध नहीं कर सकेगा । योजना मे सबको शामिल कर लेन से क्या पक पडता है? इससे छह लगगा कि मैं उनकी बात भी मान लेता हूँ। ख और ग को तो विरोध करना ही नही था। 3 ने भी नहीं किया। इस याजना का प्रस्ताव उसके ही आदमी न रखा था। और फिर खाने को दखपर उसके मुह स भी लार टपकन लगी। चूकि यह योजना घ की ओर से प्रस्तावित थी और घ का क, ख विपक्ष मा आदमी मानते थे इसलिए हा करके भी उन्हाने इसम पूरा सह योग नही दिया । यह बात ड को अखरती तो जम्र थी लेकिन थोडा-बहुत कहने के सिवाय उसने कुछ नही किया । मसलन योजना बंद करने लिए उसने कोई जिद नही की जबकि वह कर सकता था। पहल अगर ड की तरफ त हो जाती तो इसे शायद बद भी कर देता। लेकिन नहीं । वह य ख के साथ हाथ मिलाता और खुश रहता मानो कुछ हो ही न रहा हो। वह सोचता-चाहे कुछ भी है, हीग लग रही न फिटकरी, फिर भी रग चोखा आ रहा है। कुछ-न-कुछ खाने को भी मिल रहा है और प्रत्येक बात का विरोध करने वाली बुराई स भी पिंड छूटा है। कभी-कभी ह सोचता है कि वह एक वग विशेष का हिस्सा बन गया है उसका अव अलग से कोई अस्तित्व नही रहा ।

एक बार फिर उहें गोरमिन्ट बड़ी अच्छी लगती थी। गोरमिटी आश्वासना को सिर माथे रसे वे अडीक करते रहे । उन्हें पूरा भरोसा था कि एक न एक दिन तो यह बात सच होगी कि जमीन उसी की है जो उसे बीजता है। फिर वे मुजारा से मालिक बन जायेंगे। गोरमिट जब कहती है कि किसी के पास अठारह एकड से अधिक भूमि नही रहेगी तो फिर वह सेठ हजारो क्लिो का मालिक कैसे बना रहेगा? आखिरकार एक न-एक दिन तो गोरमिट इसकी मल्कियत तोड देगी और उहे मालिक बना देगी। फिर उन्हें सेठ की हवेली मे दाने नही डालने होंगे। जितने भी दाने और कपास खेत में पैदा होगी सब उनके अपने घर आयेगी। फिर उनके बच्चे भूखे और नगे नही रहेंगे। फिर सेठ की हवेली मे हमारी कपास का गलत हिसाब रखने वाले मुनीमा का फावा ही मुक जायेगा। फिर उहें सेठ की हवेली और खेतो मे वेगार भी नहीं देगी होगी। - लेकिन नहीं । ऐसा नही हुआ । इन्तजार करते-करते बुहढे चल बसे, जवान बुड्ढे हो गये और बच्चे जवान हो गये । न ही तो सरकार ने सेठ से जमीन छीनी और न ही उन्हें मालिक बनाया। राज्य सरकार के कानूनो के दायरे, जिनमे आकर कोई मुजारा मालिक बन सकता था बडे सकडे थे। जिस किसी मुजारे थे नाम छ साल से खेत को गिरदावरी होती थी वही मुक्दमा लहकर मालिक बन सकता था। तभी तो इस प्रकार का मुकदमा छ साला कहलाता था। सेठ बहा चालाक था। आए साल हर मुजारे की भूमि का टुकड़ा बदल देता। पहले मान किसी मुजारे का सेत गाव के अगूण मे होता था तो अगले 74 / मृत्यु भय साल आथूण मे कर देता था। आए साल खेत बदल जाने के कारण किसी भी बटाईदार के नाम गिरदावरी छ साल तक नहीं हो पाती थी। इस प्रकार सेठ प्रत्येक मुजारे को अपने मानहत रखता था। खूब बेगार लेता था और बटाई का हिम्सा भी थोडा देता था। मुजारो को आधी रात तक सठ की हवली में काम करना होता । उसके पशुआ को चराना होता नहलाना पिलाना होता । सेठ के खेता मे वेगार देनी पडती थी। अपने घर चाहे कितना ही जरुरी काम होता या घर पर कोई रिश्तेदार मिलने आया होता तो भी सठ के बुनाव पर उह हाजिर होना पडता था। इस प्रकार अपने घर के पशु बिना चारा-पानी के खडे रह जाते थे। और कई मिलन आय उनके रिश्तेदार बिना बात किय ही चले जाते थे। गेहू इत्यादि की फसल के दाने तो मुनीम जाकर खला मे ही वटा लाते लेकिन कपास ज्या-ज्यो योडी-थोडी चुगी जाती थी, उह सेठ की हवेली मे तुला तुला कर गेरनी होती थी। रोज को हवेली मे आने वाली कपास का हिसाब किताब मुनीम रखते थे। सेठ पास बहुत लेट बेचता था । जब तक सारी कपास चुग न ली जाती तब तक उसका हिसाव न करता था। गरीब आदमी पैस के बिना तग होते रहते थ। आखिरकार मुजारे तग आ गय उनका सबर टूट गया । कब तक और इन्तजार करत वे? जब वे शहर जात तो पढे लिखे लोग उह समझात कब तक यू गुलामो की जिंदगी जीत रहोगे? अब तो राजा महाराजा के दिन भी लद गय। फिर भी तुम सेठ के इतने अत्याचार क्यो सह रहे हो अबकी बार अपने खेत का कब्जा मत छोडो। सेठ को खेत न बदलन दो। जो कोई खेत मुजारा अबकी बार जोत रहा है, वही अगले साल जोत और इसी प्रकार आगे जोतता चला जाय । इस प्रकार छह साल तक अपने नाम गिरदावरी रात चले जाओ। फिर तुम छ -साता करने के काबिल हो जाओगे। धीरे धीरे कुछ मुजारो के दिमाग मे यह बात आयो। उहाने अयो को भी अपन पीछे लगाया और सठ के विरुद्ध बगावत का महा गाड़ दिया। गाव मे सरेआम घोषणा कर दी कि अबकी बार ये अपने खेत छोटकर दूसरे नही लेग । पुराने सेत पर ही कम्जा रखेग । पास भी हम अपने घरो 7 एक बार फिर / 75 1 में ही इकट्ठी करेंगे और अन्त मे बटाई करवा लेंग। हमारे हिस्से को पास हम खुद बेचेंगे। सेठ ने उनकी मागा को ठुक्गते हुए उनकी चुनौती स्वीकार कर ली और कह दिया कि मैं सभी मुजारो को खेतो से निकाल दूगा। चत का महीना था। कपास बोजने के लिए भूमि जोतने सवारने का समय । मुजारे खेत म नहर का पानी लगा-लगाकर जमीन तैयार कर रहे थे। गाव मे ग्ववर फली कि आज सेठ मुजारो के खेता मे अपना ट्रैक्टर चलायेगा और उह बेदखल करेगा। यह खबर सुनकर सब बटाईदार लाठिया लिय गाव के गुवाड मे इकटठे हुए । एक लोटे पानी म थोडा-सा लूण घोला और उसे सबने पीया। सबने आखरी सास तक मठ के विरुद्ध लड़ने का प्रत लिया। सेठ तथा सेठ के आदमी टू कटरा और जीपा में चढे हुए, हवा मे गोलिया छोडत हुए, उनके पास से निकले । लेकिन वे मुजारोको डरा न सके । आखिरकार वे धास की रोटिया खाते हुए भी सम्राट अकबर का मुकाबला करने वाले महाराणा प्रताप की धरती के लोग थे । उन्हे पता था कि गोलियो और लाठियो का क्या मुकाबला लेकिन वे ता अपने अधिकारो के दीवाने थे। शोषण की पीडा न उहे मृत्यु भय से मुक्त कर दिया था। 'जय बजरग बली की' आकाशभेदा हुकार लगाते हुए उनकी बाढ गोलिया का मुकाबला करने, आगे बढ गयो । गोलियो को बौछार स वे रुके नही । एक दो लाठियो वाले ट्रेक्टर तक पहुच गये । लाठिया वालो से वे मार तो कैस खाते ? लेकिन उन्हे भागना पडा । मार तो लाठिया वालो ने हा खाई । बीस आदमी घायल हो गये। पाच गम्भीर रूप से भायल थे। घटनास्थल पर पुलिस आयी थी । वहा के फोटू लिए थे। इधर-उधर बिखरे पडे कारतूसो के खोखे इकटठे क्येि जिनकी एक बोरी भर गयी। मुजारो ने रपट में सेठ तथा अय पाच आदमिया का नाम लिखवाया था। इस अत्याचारपूण घटना का समाचार प्रात के प्रमुख पत्र में आया था। मुजारे साचने लग अब सेठ जल्दी ही सीखचो मे बद हो जायेगा । लकिन नहो । ऐसा नहीं हुआ। सेठ ने नीचे से लेकर कार तक सारी सरकारी मशीनरी को नोटा की गड्डियो से ढाप दिया। वह प्रात के मत्रियो - 76/ मृत्यु-भय और मुख्यमत्री से मिल आया परिणामस्वरूप धायल मुजारो के शरीरा मे से, शहर के सरकारी अस्पताल में गोलियो के छरें तीन दिन बाद निकाले गये । सेठ तथा सेठ के आदमिया की गिरपतारिया नही हुइ । बात तफ्तीश इत्यादि में उलझ कर रह गयी। फिर भी मुजारे सोचते रहे कि आखिरकार यह जाच-पडताल पूरी होगी और सेठ को बंद होगी। उनके दो चार नुमाइदे पाने-कचहरी में चक्कर काटते रहे । तारीखें भुगतते रहे । तभी हाडी को फ्सल खेतो म तैयार हो गयी। मुजारा ने बडे हौसले से फसल काटनी शुरू कर दी। वे दूसरे पडोसी गावो से मजदूरिये भी लाए साकि फसल जल्दी से जल्दी काटकर घर ले आयें लेकिन नहीं ज्यों ही उन्होने फसल काटकर मण्डिलिया बनाइ सेठ पुलिस लेकर खेतो मे पहुच गया। पुलिस ने उनको खेतो से बाहर निकाल दिया। सेठको घडधडाती हुई ड्रमी चलने लगी। कनक निकल निकलकर सेठ की हवेली में आने लगी। सेठ की हिफाजत के लिए खेतो तथा गाव की गलियो मे पुलिस-ही पुलिस हो गयी। शराबी कबाबी पुलिस वालो के कारण मुजारो की बहू-बेटियो को घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया । सेठ दूसरे गावा से दिहाडिये ले भाया और उनकी सहायता से खेती करने मगा। मुजारे अपने खेत हथियाने के लिए सेठ के साथ स. नहीं इसलिए गाव मे एक स्थाई पुलिस चौकी तैनात कर दी गयी । उनका माया-कजाया गेहू जब सरकारी सहायता से सेठ की हवेली में पहुंच गया और आगे जोतने के लिए जमीन मिसने की कोई आस न रही तो जो गोरमिट रहें अच्छी लगती थी वह बुरी लगने लगी। तब वे बह बहाते--साली, गोरमिन्ट हो निकम्मी है। इससे नाम की कोई चीज ही न हो। अगर यह गोरमिट न होती तो क्या सेठ म्हारी कनक यू अपने घर ले जाता? इतने आदमियो पर यू अधाधुध गोलियां बरसा कर क्या वह जीवित रह जाता ? साले को एक दिन में काट देते। तभी देश म माम धुनाव हुए। पुरानी रूलिंग पार्टी को अपना मत न देकर उन्होंने उसके प्रति अपना क्षोभ प्रकट किया। सारे देश म वह पार्टी हार गमी मानो उनकी तरह उस पार्टी से सारा देश ही खार खाये अच्छा हो गोरमिट एक बार फिर / 77 बैठा था। देश मे नये लोगो का, नयी पार्टी का राज आया। इस पार्टी मे वही लोग थे जो पुरानी व्यवस्था को विकास की धीमी गति के लिए, भ्रष्टाचार भाई भतीजावाद और कमजोर वर्ग के शोषण के लिए, कोसते रहते थ । मुजारो को इन नये लोगो से काफी कुछ कर गुजरने की उम्मीदें थी। लेकिन हुआ कुछ भी नही । चार माह तो मुजारे सबर किये बैठे रहे। सोचते थे-नये-नये लोग हैं । तजुरबा होने पर सब कुछ होगा। लेकिन जब एक साल गुजर गया वे आपस मे ही लडने-झगडने लगे तो मुजारो का इन लोगो के प्रति भी माह भग हो गया। उनके नुमाइदे थाने कचहरी के चक्कर लगाते रहे। न तो सेठ की कैद हुई और न ही उहे जोतने के लिए भूमि मिली। उन्होंने अपने राय के मुख्यमत्री से फरियाद की लेकिन सब बकार। हारकर उन्होने इस नई व्यवस्था को भी निकम्मी घोषित कर दिया और सेठ के प्रति अपने दिला मे नये सिरे से आग सुलगानी आरम्भ कर दी। उन लोगो को बहुत रज था । केवल उहे ही नहीं उस इलाके के प्रत्येक सवेदनशील यक्ति के दिल मे सेठ के प्रति नफरत धधक रही थी। उसने मानवा पर गोलिया चलाइ और धन के जोर पर दो दिन के लिए भी गिरफ्तार नहीं हुआ। लोग सोचत थे न जाने किस दिन किसी का मौका लग जाये और वह सेठ को । उस दिन वाली घटना को देखकर उम्मीद भी बघती थी, जिस दिन वे निहत्थे लोग, गोलिया के मुकाबले मे उठ खड़े हुए थे। लेकिन जहा यह सम्भावना थी वहा यह भी सच था कि सेठ किसी एक व्यक्ति का दुश्मन नही था। अगर उसने एक परिवार पर इतने अत्याचार किये होत तो उसका कत्ल हो चुका होता। मुश्किल तो यह थी कि वह किसी एक का दुश्मन न होकर चालीसो का था। मारना तो सभी चाहते यलपिन पहल कोई नहीं कर रहा था। सब सोचते थे-यह काम कोई दूसरा ही कर दे तो ठीक है। मैं क्या खामखा तोहमत मोल लू । सारी उमर कद काटनी होगी। या फासी लगेगी। घर मेठ को तो उनम से अब तक कोई नही मार सका है। लेकिन दूसरो आजादी के क्णधार अपने कायक्लापो के कारण मर गये हैं। और इस प्रकार अप्रयाशित पसे एक बार सता फिर उन्ही लोगो के हापम मा गयो है जिनगे शुरू शुरू म वे खार खाए हुए थे। मे लोग सेठ के हकों पर कुठाराघात करके, उनके हका की बहाली कर सकेंगे मुश्किल लगता है। एर बार फिर उनका भविष्य अधर में लटक गया लगता है।

अथ-तत्र आज से चार माह पूर्व उसे पिता का पत्र मिला था -तुम्हारी बह्न सुनीता के विवाह पर तुम्हे कम-से-कम एक हजार रुपये तो देन ही चाहिए। वह तभी से चिन्तित हो गया था। उसे लगा था कि अबकी बार मेरे और पर वालो के बीच जो मुलायम ततु खिचे हैं वे भी टूट जायेंगे । पहले भी घर वालो ने इसी प्रकार उससे पैसे मांगे थे। वह दे न सका या परिणामस्वरूप घर वाले तने तने रहने लगे। लेकिन फिर भी उसने प्रयास किया था कि किसी प्रकार सुख दुख के अवसर पर घर आने-जाने वाली बात बनी रहे। उसने बहुत यत्न किया कि किसी प्रकार एक हजार नहीं तो पाच सौ स्पये तो जोड ही लें जिसस पिता कुछ ठडा पह जाये और उसे भी दो दिन बहन के विवाह में शामिल हो जाने दे। पर पसे कहा से जुड़ जाते ? दो कोठरियो का किराया तो हर हालत में देना ही पड़ता था। रोटी भी खानी ही पड़ती थी। मतलब उसका कोई खच ऐसा न था जिसे वह छोड सरे । आखिरकारहार कर उसन छोटे बच्चे का दूध बदरिया और अपनी चाय बन्द को तब वही तीस-पंतीस रपये महीना बचत होने लगी। इस प्रकार भी चार मास म वह डेढ सौ रुपय ही बचा पाया। उसने उधार भी मागा परतु कौन देता उसे पाच सौ रपय उधार ? पा तो वह एक मामूली-सी पहेगी दूकान में आग बैटने वाला मामूली-सा दो ही।ह भी अपरिचित कस्बे मे । भाखिर उसकी बहन का विवाह भा गया । पत्नी ने मुनापा नि बितन भी पैसे हैं उनकी, बहन के लिए घही ले आओ पोर एक सूट जो मैं मायने से अथ-तत्र/ 79 लायी थी वह ले जाओ। उसने न चाहते हुए भी पत्नी स कहा- 'तुम भी सब चलो।" तुम्ही एक को वे घर मे घुस जाने दें तो भी गनीमत समझो।" उम पत्नी की बात मोलह आने सच लगी। वह बाजार से घडी खरीद लाया और पत्नी का नया सूट थैले में डालकर मस मे जा बैठा। फिर भी वह वेहद डरा हुआ था। उनासी के मारे उसका दिल डूबा जा रहा था। क्या कुछ लाये हो ? बहन के दहेज मे क्या हिस्सा डाल रहे हो", बस मे बटे भी पिता का चेहरा उसकी आखो के आगे छा गया । क्या ला सकता हू मैं। मेरे पास कुछ बचता ही नहीं। मैं तो मेरा पेट भी मुश्किल मे भरता हूं। मेरे खुद के तीन बच्चे है।" वह अपनी + सफाई पेश करता है। 'फिर यहा क्या मुह दिखाने आये हो? तुम्हारा मुह देखकर तो सबधी सनोप नही कर लेंगे। उ ह तो नोट चाहिए। साले पहले से भाग लेते हैं।' फिर वह पिता से कुछ नहीं कहता, अदर जाता है। मा के पाव छूता है। शायद मा उसको वस्तुआ को स्वीकार कर ले। इसलिए मा को घडी और मूट दिखाता है-मैं ता ये दो वस्तुए भी बडी कठिनता से बना सवाहू। . । तभी बाहर से गजता हुआ पिता अन्दर आकर पूछता है--"क्या लाया तेरा बडा लाल? 'य हैं, एक तो घडी है, एक सूट है।" नही चाहिए हमे कुछ भी इसका" पिता घडी और कपडे बाहर फेंक देता है। निकल जाओ। सोच लेंगे हमारे बडा बेटा था ही नहीं।" वह आसू बहाता हुआ घर से बाहर निकल पड़ता है । अन्तिम बार घर के अन्दर शाक्ता है। मा और बहन उदास नजरो से उसे ताती हैं परन्तु उसे रोकती नही । वह वापस आ जाता है। नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता।' वह बस मे बडबडाया। अय सवारिया चौक पडी --'क्या हो गया भाई' 'कुछ नही । कुछ नही । यू ही जग आख लग गयी थी और कोई बुरा विप्न आ गया था। उसन जित होत हुए भी सफाई पेश की।

80 / मृत्यु भय बस चली जा रही थी। गावा ये मड्डे आ रह थे। रास्ते के चित्र उसे बरबस अतीत मे ले गये। कभी वह इसी रास्ते से पर जाते हुएमिना युश हुआ करता था। परिवार के सदस्य भी उसके घर पहुचन पर कितने खुश होते थे। मा खीर और हलवा बनाती थी। साथ म घर का घी भेजती थी। माह के अन्त में जाता था तो सौ-सौ के दो-तीन नोट पिता की पकडाता था। तब उसका विवाह भी न हुआ था। वेतन में से बहुत कुछ बच जाता या। परन्तु वह नौकरी ज्यादा दिन न रही। तभी से उसका दुर्भाग्य जाग पड़ा । वह नया-नया ही सरकारी कमचारी था परन्तु हडताली क्मचारियो ने उसे भी अपने साथ मिला लिया या। सघ के नेता चिल्लाते थे-भाइयो, सगठन को मजबूत करने के लिए अबकी बार नय और पुराने सभी कमचारी हडताल मे भाग लें। जब एक भी कमचारी काम पर नहीं जायेगा तो सरकार एक दिन मे ही घुटने टेक देगी। चाहे नया हो चाहे पुराना किसी भी क्मचारी का शोषण नहीं होने दिया जायगा । अबकी बार हमारी पहली माग यही होगी कि आन्दोलन मे भाग लेने वाले किसी कमचारी का शोषण न हो अर्थात किसी को बरखास्त न किया जाये। तब कौन जानता था। जोश जोश मे वह भी शामिल हो गया था। बडे-बडे नेता मरणवत पर बठ थे और उसे लगता था कि अगर वह हडताल नही करेगा तो उनके मरने की जिम्मेदारी उसके नाम होगी। परन्तु सभी ने ऐसा नही मोचा। हडताल मे पचास प्रतिशत कमचारी ही शामिल हुए । शेप काम पर चले गये। फिर भी आदोलनकारी पीछे नहीं हटे। वे दिल्ली गय । अय सपा से सहयोग की कामना की। सबने खब आश्वासन दिये कि तुम डटे रहोग तो हम भी तुम्हारे साथ मिल जायगे। कई ससद सदस्यो ने ससद में मामला उठाने और सरकार का ध्यान उनकी जायज मागो की ओर दिलाने का वायदा किया। परतु हुआ कुछ भी नही। उनकी स्वय की कमजोरी को देखते हुए अय सघ उनमे नही मिले। परन्तु हिम्मत उन्होने भी नही छोडी। व जेल गये। वहा की सही हुई रोटिया और पत्थर-कक्रो वाली दाल खाई पर लाभ न हुआ । आखिरकार सरकार के योड से जवानी आश्वासनो पर सघ के नेताओं अथ-सत्र / 81. । ने अपनी हडताल वापिस ले ली। बेचारे नेता भी क्या करते ? अय सपो ने सहयोग नहीं दिया और अपने संघ के कमचारी भी धोखा दे गमे । उन्होने पवार आश्वासनो को ही जाते चोर को लगोटी समझ लिया। परिणाम यह निकला कि उस जसे हजारो नये भर्ती किये गये हडताली कमचारियो को बरखास्त कर दिया। सघ वाले चुप बठे रहे। बाद मे घर वाला ने उसका विवाह कर दिया। विवाह पर खच हो गया था भार उसे कोई अय नौकरी नहीं मिली थी। धीरे धीरे वह घर वालो को कडवा लगने लगा। वे उसे छोटे नाम से दुलाने लगे जबकि विवाह के बाद किसी को छोटे नाम से नहीं बुलाया जाता । जब वे उसे छोटे नाम से बुलाते थे तो उसका स्वाभिमान जाग उठता था। एक बार उसने कहा भी-"आप मुझे छोटे नाम से क्यो बुलाते हो।" "कही जाकर अफसर लग जाओ वहा तुम्हें कोई भी छोटे नाम से नहीं बुलायगा । सब साहव साहब कहेगे।" ऐसे कई स्वर पिता ने उसे सुनाये। कोई नौकरी प्राप्त करने के लिए दौड धूप करने में भी तो उसे पर वालों को ही सहायता लेनी पडती थी। आखिरकार वह सब कुछ करते- करत हार गया। कई नौकरियो के लिए ओवर एज' हो गया। उसने सिफ पेट भरने का सीधा सा रास्ता पकड लिया। एक दोस्त से सिलाई का काम सीखा। उसी से एक पुरानी सी मशीन मोल ले ली। और एक अय कस्बे में जाकर काम करन लगा। अय अच्छे-अच्छे 'टेलरो' की प्रतियोगिता मे पड़ने की उसकी हिम्मत न हुई। जब वह अपने मुहल्ले मे पहुचा तो उसे लगा कि यहा की एक-एक इट उससे पूछ रही है-यहा क्या लेने आये हो? उसने घर मे कदम इस प्रकार रखे मानो वह घर किसी दुश्मन का घर हो। सवप्रथम उसका सामना पिता से ही हआ। पिता को देखकर उसके प्राण और भी ज्यादा सूख गये । औपचारिकता निभाने के लिए पाव हुए। पाव छूते हुए मुह से राम राम' मरियल आवाज मे बहुत धीमे से निकली, जीभ तालू से चिपक गयो । पिताजी ने तो शायद सुनी ही मही। पिता ने जब कुछ भी न कहा तो उसे कुछ राहत मिली। अन्दर गया तो मा बोली- 'अकेला ही आया है क्या ? बहू बच्चों को नहीं लाया' 82 / मत्यु भय "उसकी तबीयत खराब है', उसके मुह से बिना प्रयास ही निकल गया।" "क्या हो गया? तू भी बडा थक गया है । कुछ खाने-पीने को मिलता है या नहीं।" उससे छाटे जवान बहन भाई इधर उधर घूमते रहे । उसे पहले नहीं बुलाया। किसी ने नमस्ते' नही की। परन्तु उसने बारी बारी सबसे हाल पूछा जिसका उमे रुखाई से जवाब मिला । उसे लगा कि सब समझते हैं । इस निखटटू' के पास कुछ नही। मा को अकेले में उसने घडी और सूट पक्डा दिया। बचनी बढने में कारण वह घर स बाहर हो गया। एक-दो पुराने दोस्तो से मिलकर जब घर पहुचा तो पिता छोटे भाइयो से कह रहा था-लडकी की घडी तो बडा ले भाया है । अच्छा ही है। हमने तो ली ही नही थी। उसे लगा कि पिता ने उसे उस रूप में भी स्वीकार कर लिया है । फिर भी वह घर वालो से इतना घुलमिल नहीं पाया जितना कि चाहिए था। घर वालो ने भी उसे मौका नहीं दिया। पिता विवाह के काय छोर्ट भाइया से पूछ पूछ कर ही करता था मानो वह कोई पराया व्यक्ति हो और घर वालो ने उसे विवाह पर काम करने के लिए बुला लिया हो। उससे छोटे अय दो भाई जो बैंक मे बाबू थे विवाह पर छाय रहे । घर वाले उनसे बेहद खुश थे और जो कुछ वे चाहते थे वहीं हो रहा था। उसे लगा कि यह इ जत उनकी नहीं उनके जुडे पसे की है। उसने पसे में लिए ठडी आह भरी और भीतर ही भीतर बेहद बीना और छोटा हो गया। ।

चौधरी साहब चुनाव के वक्त जब चौधरी साहब को अपना पलडा कमजोर पडता दिखाई दिया तो वे बडे चिन्तित हुए । पिछल पाच मालो मे एम० एल० ए० रहते हुए उन्होंने काफी कुछ कमा लिया था। नगद कमाई के साथ-साथ आमदनी के स्थायी स्रोत भी बढा लिये थे। गाव मे ईटो का एक भट्टा लगा लिया था और शहर में अपने भतीजे को ट्रैक्टरा की एजेन्सी दिला दी थी। अबकी बार तो मत्री पद तक के चान्स थे। सबसे बड़ी बात उल्हे यह लगी कि अगर चुनाव हार गए तो गाव में पडे पडे यू ही सड जाएगे। कहा तो राजधानी में और शहर मे जाकर एम० एल० ए० के रतबे का लाभ उठाना और कहा गाव की सीमा में कद हो जाना ? राजधानी मे जाकर क्या-क्या नही कर सकते वे ? गाव मे नो बदनामी के डर से ही जी मसोस कर रह जाना पड़ता है। वहा होती है खुली छूट । नक्षत्रसिंह, जिसे उहोन राजधानी मे बैंक मे नौकर लगवा दिया था, वही उनके साथ रहता था। नयी-नयो लडकिया लाना उसी के जुम्मे या। एम० एल० ए० फ्लट मे लडकिया लाने मे कुछ कठिनाइया आती थी। इसलिए उन्होने राजधानी के भीतरी भाग मे एक कोठी किराये पर ले ली थी। इसी कोठी म उनकी प्रेयसी 'कम' रखल गाव के स्कूल की शहरी मास्टरनी, 1, कुछ दिन रह आयी थी। उसके छ वर्ष के लड़के को जिसे वे अपना ही खून समझते थे, एक होस्टल वाले स्कूल मे डाल दिया था। चौधरी साहब को एम० एल० ए० शिप के कई और मजे भी याद आ रहे थे। उन्होंने कई पार्टिया अटेण्ड को थी। पाटियो म शराब की नदिया 84 / मत्यु भय बहती थी। लोग अपनी सुदर-सुन्दर पलियो को साथ रखते थे। एक पार्टी को याद तो उन्हें भुलाए भी नही भूलती थी। एक मिनिस्टर की लडकी का व्याह था। मिनिस्टर ने बारात को खान से पहले शराब की पार्टी दी थी। बारात मे कई जवान लडक्यिा भी आई थी। लड़की वालो की औरतें और लडकिया भी उस पार्टी में शामिल हुई थी। उन्हें भी बुलाया गया था। उनको बाख बारात मे आयो एक लड़की पर शुरू से ही अटक गयो थी। उस रात शराब का ऐसा दौर चला कि सब पागल हो गए। शराब लाकर देने वाले बेयरे भी लोट-पोट हो गए। चौधरी साहब को पूरा होश था। जब उन्होंने देखा की सब आखें चढाए कुसियो पर लोट पोट हो रहे हैं और कोई भी दूसरे को नही देख रहा है और न ही दूसरे के बारे मे सोच रहा है तो उन्होंने उस लडकी को बाहो में उठा लिया- गयो है, आओ मैं तुम्हे सुला दू।" 'तुम्हे बहुत चढ "कहा" "यही पास ही धमशाला मे जहा तुम्हारे ठहरने का प्रबंध रिमा गया है।" वह उनके साथ धमशाला म चली गयी। धमशाला बरात के लिए 'रिजव' यो। उन पर शक भला कौन करता? वे उसे एक कमरे में ले गये । योडी देर कमरा बद रहा । फिर वे अपनी कोठी पर चल आय । और भी कितनी ही सुखद स्मतिया थी। क्तिने ही भवना का उन्होंने शिलायास किया था। स्तिने ही उदघाटन किये थे। क्तिन ही स्कूल कॉलेजा के सास्कृतिक कायक्रमो की अध्यक्षता की थी। पद्रह-पद्रह बीस बीस वष की जवान छात्राओ क नत्य गीत मे मितना मजा आता था। अहा कही भी जाते थे। मुदरिया के सान्निध्य का सुख मिलता था। उहे लगता था कि वे परिया के देश म रह रहे है। एम० एल० ए० काफी लोग होते हैं । लेकिन वे एक श्रेष्ठ विधायक थे। मिनिस्टरी तोह इसीलिए नही मिली थी क्योकि वे पहली बार विधायर बने थे। उनकी 'पाक' मिनिस्टरो से कम न थी। उनकी सेहत अच्छी पो और वाकपातुप भी उनम खूब था। इसलिए अबकी बार तो मत्री-पद मिल जाने का पूरा चान्स था। मिनिस्टरी मिलने का अप पा चौधरी साहब / 85 मौज मेले मे बढोतरी होना । उहोंने देखा था-मिनिस्टरो पर तो लोग नोटो और सुरियो की वर्षा कर देते है। इसलिए वे सोच रहे थे विसी भी प्रकार यह चुनाव अवश्य ही जीता जाना चाहिए। उन्होने अपनी बुद्धि के घोड़े चारो ओर दौडाए । उनके ध्यान में आया कि अपने हल्के में बटाईदारो और भूमिहीन लोगो की वोटें अधिक हैं, अगर इस वग को किसी प्रकार खुश कर दिया जावे तो जीत निश्चित है। उन्होने अपने मुनीम और वकील को आदेश दिया कि मेरे सभी 'मुजारो को कह दो कि उहे मामूली सी रकम अदा करने पर मालिक बना दिया जावेगा। मेरी सो बीघा जमीन दस भूमिहीनो को जोतने के लिए और दे दो। फिर क्या था। सब ओर चौधरी साहब के यश की हवा फैल गयी। जो आदमी स्वय अपने बटाईदारो को मालिक बनाता है और अपनी भूमि भूमिहीनों को देता है, वह तो देवता है । उनके विधान सभा क्षेत्र के सब बटाईदार और भूमिहीन कह उठे-- हमें ऐसा आदमी और कौन मिलेगा? अगर ऐसा आदमी जीत गया तो सारे राज्य के 'मुजारे मालिक बनेंगे और सभी भूमिहीन भूमि वाले हो जाएगे। लेकिन निम्न वग जहा चौधरी साहब के इस कदम से खुश था, वहीं उच्च वग निराश भी था। इस वग के कई लोग जो चौधरी साहब के विश्वासपात्र थे, चौंक गए। वे सब मिलकर चौधरी साहब के पास गए- "क्यो चौधरी, आप तो लोगो मे भूमिबाट कर मिनिस्टर बन जाओगे लेक्नि हमारी भूमि और अधिकार चले गए तो हम क्या करेंगे?" तुम्हारे हक छीनेगा?" प्यारे दोस्तो और रिश्तेदारो, यह सब तो लोगो की आखो मे धूल झोकने के लिए किया है। चुनाव जीत लेने के बाद आप देखना कि मैं इन लोगो को कैसे ठेंगा "कोन मादर दिखाता हूं।" चौधरी साहब को जाति के लोग, चौधरी साहब, जिन्दावाद' के नारे लगाते हुए चले गए। चौधरी साहब को पूरा विश्वास था कि वे धुनाव जीत जाएगे।

वार्ड नम्बर नौ - नगरपालिका के चुनाव म नौ नम्बर के रिजव घोषित होने से यहा के आम मतदाता नाखुश है । यह उन सवादा से स्पष्ट हो रहा था जो घरो और गलियो म यहा वहा सुनने को मिल रह थे। "एक नम्बर वाड मे तो एक एक वोट के हजार-हजार मिल रहे हैं। 'अरे यहा तो कोई सौ मी देने वाला भी नहीं।' "सौ-सौ तो क्या यहा तो कोई पाच-पाच दन वाला नहीं। कई नासमझदार अभी भी जिद कर रहे थे, 'हम तो वोट उस ही देंगे, जो हमे कुछ न कुछ देगा।' 'चलो नोट न सही पोएगे तो जरूर।" इस वाड म अधिकाश तेरहवे महीन के मारे हुए लोग हैं । तेरहवा महीना यानी बेकारी और तगी का महीना । यह महीना साल में दो बार आता है। एक बार तो आसोज मे, जब सावणी की बुआई हुए काफी अर्सा हो जाता है और अभी कटाई म काफी दिन बाकी होते हैं। दूसरी बार फाल्गुन म, जब हाडी की बुआई हुए काफी अर्सा हो जाता है और कटाई मे कुछ दिन शेष हाते हैं । यद्यपि यह एक कस्बे का वाड है फिर भी इसम अधिकाश लोग सेतीहर मजदूर है। मजदूरो को काम और बाजीगरो, दाढियो ढोलिया को इनाम कठाई और बुमाई के वक्त ही मिलता है। यू होने को तो कस्बे म कई कारखाने भी हैं लेकिन वे सव इस मुहल्ले से काफी दूर हैं। उनमे काम करने वाले मजदूर अलग हैं। उनकी वस्ती अलग है। इनम से तो दो चार को कभी-कभार कमी पहने पर ही बुलाया जाता है। फिर इस वाड के कुछ लोग नये भी हैं। उनकी जान-पहचान । भी इतनी नहीं कि उहे ऐसे-वैसे कामा म लगा लिया जाए.. भाट और सीगोकाट तो हैं भी मुफ्तखोरग इनपी लुगाइयां और तो अब कही सिफ एक काम पास चुगने का न लगे हैं। वह भी किसानों को खुशामद करन पर । इस इलाके के किसाना को पास चुगने की जल्दी हुआ करती है । क्यारि वे कपाम वाली जगह पर गेहू वीजते हैं । इसलिए वे ट्रैक्टर ट्रालिया लेकर इनके 'वास' मे आ जाते है और इहे चढा कर खेतो म ले जात हैं। शाम को घर छोड भी जाते हैं । पसा भी अच्छा वनता है। इसलिए व चले जात हैं । नही तो सारा साल ये कस्व की गलियो मे भीख मागते हैं या कूड़ा-कचरा बटोरत फिरते है । हां । इस वाड के भगियो की स्थिति अच्छी है। वे सब नगरपालिका १ सफाई क्मचारी है आदमी भी आर लुगाइया भी। सब महीन की महीने तनख्वाह पात है। आम मतदाता जहा इतने मायूम थे वहा विभिन जातिया के मुखिया खुश थे कि वे अपनी बिरादरी के बल पर मेम्बर बन जाएगे और जो चयर मन बनगा उससे अपना खचा पानी वसूत कर लेंगे। सोगीकाटिया ने अपनी एक मीटिंग बुलाई और अपना एक नेता चुन- कर उसे उम्मीदवार खडा कर दिया। इसी प्रकार ढोलियो, माटो, भगिया, नायका मघवालो और बाजीगरोन विया। शेष धानक, रायसिख कम्पो, मजहबी आदि के एक एक, दो दो घर थे। इसलिए वे बेचारे मन मसोसकर रह गए। इस वाड के चार पाच धर भाग्यशाली भी थे। भाग्यशाली इस दृष्टि से कि उनके वोट अय वाडी म बन गए थे। और इसी बदौलत उनके घर दोनो वक्त टेम से चूल्हा जलने लगा था । ठड के दिनो मै काया पर कपडा या गया था। पोलिंग वाले दिन उहे चढाकर ले जाने के लिए कार और जो उनके बुहो' के आग आ खडी हुई। लालूडे धान की घरवाली कार म चढकर वोट डालने गयी जबकि उसके पहोसी जेले भजहबी की घरवाली बुखार म भी सात-आठ जगह बठती-उपती किसी प्रकार मतदान केद्र तक पहुंची। जेला मजहबी खेत मजदूर था। कई दिना से कार । उसकी परवाली भाटा, 88 / मृत्यु भय को ठड लग कर बुखार हो गया था। शायद साथ मलेरिया भी था और उसके पास दवाई-पानी के लिए पैसा नही था। उसे उम्मीद थी कि कोई-न कोई उम्मीदवार उसकी घरवाली दवाई के पसे दे देगा। हर वोट मागने आने वाले के पास वह अपनी घरवाली के बीमार होने का जिक्र करता था। और फिर अन्त मे यहा तक बह जाता था कि अगर यह ठीक न हुई तो मत डालने कसे जाएगी? सार उम्मीदवार जेले की बात का अय समझते थे। लेकिन उनके पास पैसे कहा थे? फिर वे सब यह भी जानते थे कि लोग वोट न देंगे तो और उसका करेंगे क्या? जेले की घरवाली मतदान केद्र से थोडी दूर जमीन पर पसर गई। पास ही वह बठ गया। उसने देखा, ढोलिया, बाजीगरो, भगियो और मेघवालो ने अपने-अपने सेमे अलग-अलग बना रखे हैं। हर जाति के लोग अपने-अपने खेमे मे जाते हैं । वहा से पर्ची लेते हैं और मतदान केद्र के अदर चले जाते है। उसने देखा कि उम्मीदवारो के नजदीकी लोगो मे काफी उत्साह है । वे मतदान के लिए जाने वालो को समझा रहे हैं। अपने निशान इत्यादि के बारे मे बता रहे हैं। एक खास बात उसन और देखी कि बाजी गरा के उम्मीदवार की सपोट बाजीगर ही कर रहे है । ढोलियो की ढोली, नायको की नायक लेकिन मेघवालो की सपोट ऊची जात वाले चौधरी भी कर रहे हैं। उहोंने सीगीकाटियो के उम्मीदवार को मघवाला के हक मे बठा भी दिया था। प्रत्येक खेमे के लोगा ने जेलासिंह और उसकी पत्नी को उस हाल में बैठे-पसरे देखा । वे सब बारी-बारी उनसे मतदान अपने हक मे करने के लिए कहने गए। यहा भी जेले ने अपनी पत्नी के बीमार और मत डालने मे असमय होने की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि इसे एक टीका लग जाता और गोली मिल जाती तो यह खडी होकर वोट डाल आती। प्रत्येक उम्मीदवार जेलासिंह की बातो का अथ पहले से हो समझता था। इसलिए सब चुप्पी लगाकर रह गए। तीन-साद तीन बज गए । जेलासिंह की पत्नी को किसी न एक गोली भी लाकर नहीं दी। तभी वहा एक हल्ला-सा मच गया । मतदान केंद्र मे मेघवालो के पोलिंग एजेन्ट के सिवाय सब ऐजेट बाहर निकल आए। ।

वाड नम्बर नौ / 89
लोग झगडते हुए से कहने लगे-'यह तो सरासर अन्याय है। दूसरे
गावो वाले यहा वोटेंपो डाल रहे हैं?"
"यह काम चौधरी जी का है।"
चौधरी जी के आदमी और मेघवाल कह रहे थे-जिनका नाम लिस्ट
मे है । वे तो वोट डालेंग ही।
एक व्यक्ति ने कहा-"यह होने को तो रिजव वाड है, लेकिन यहा से
जीतेगा तो चौधरी जी का पिटठू।'
जेलासिंह ने यह सब सुना और खडे होकर अपनी फटी-पुरानी मलेशिये
की चादर फटकार कर झाडते हुए जोर से कहा-~~-"साले का दे चुनाव है।
सोगानू खराब करदे फिरदे ने।"
सुनने वाले हैरान थे कि जेलासिंह ने यह किस वजह से कहा है। पता
नहीं तो एक रिजव वाड से भी चौधरी के पिटठू के जीत जाने की वजह से
या फिर उसे कुछ मिला नहीं इस वजह से।

बराबरी हरफूल की औकात सरपच के मुकाबले मे कुछ नही थी। सरपच के पास कार, कोठी और दो मुरब्बे थे । बेचारे हरफूल के पास थे मात्र तीन बीघे । वो भी पैतक नही थे। हरफूल का बाप सरपच की बिरादरी के ही एक बडे मालिक का मुजारा था। कई सालो से वह उस मालिक तीस बीघे भूमि जोत रहा था। भूमि सुधार के कानून बनने लगे और भूमि की सीलिंग होने लगी तो हरफूल के बाप ने कोट मे मुक्दमा ठोक दिया। मालिक बराबर झगडता रहा। जीत तो हरफूल के बाप की ही होती लेकिन मालिक के पिछले सालो की बटाई न देने का झूठा आरोप लगाकर उसे बेदखल करने की कोशिश की। फलस्वरूप मामला लम्बा होता गया। आखिर स्थानीय विधायक के कहे सुने दोनो ने आपस मे सुलह कर ली। हरफूल के बाप ने आधी भूमि छोड दी और आधी का किस्ता म मूल्य चुका दिया । हरफूल वगैरह पाच भाई थे।पाचा न जमीन जब आपस मे बाटी तो तीन-तीन बीघे हिस्से मे आयी। फिर भी हरफूल अव की बार सरपच के मुकाबले में चुनाव लड़ना चाहता था। यह बात नही थी कि हरफूल सरपची प्राप्त करके अपनी अकड दिखाना चाहता था। वह तो सरपची इसलिए चाहता था कि ग्राम और ग्रामवासिया का कुछ भला हो सके। गाव मे कोई काम हो । वतमान सर पच दिन रात शराब पीय पड़ा रहा था। बेचारे गाव वाले अपनी कोई समस्या लेकर उसके पास आते थे और वह आगे शराब म 'धुत' पडा मिलता था। शुरू-शुरू मे जब यह सरपच बना था तो गाव मे कई काम हुए थे। गाव मे डिग्गी बनी पी। कई शोचालय और खेतो मे कई पुसे पनी थीं ।

बराबरी / 91 लेकिन लगातार कई बार सरपची का चुनाव जीत जाने पर सरपच गरूर मे बता चला गया। उसने गाव का ध्यान रखना छोड़ दिया था और अपना घ्यान रखने लगा था । गाव की पचायत की आमद अच्छी थी। मत्री लोगो के बीच पंठ भी यो । फलस्वरूप उसके खेत मे बाग और ताजमहल सी कोठी खड़ी हो गयी थी। उसके बीच जीप की जगह कार आ गयी थी। देशी ठरे की जगह विलायती शराब चलने लगी थी। इसी सरपच की वजह से ही गाव पार्टीवाजी मे माकठ डूब गया। होने को तो हरफूल और हरफूल के भाई भी सरपच की ही पार्टी के थे। लेकिन दिनो दिन हरफूल का मन सरपच से विद्रोह करने की सोच रहा था। यह ठीक है कि हरफूल का खानदान सदा से गरीब था । लेकिन दिल और ईमान का बडा धनी था उनका खानदान । अग्रेजो के जमाने मे भी हरफूल के बाप-दादे गाव के बडे-से-बडे चौधरी की भिया' करा देते थे। हरफूल का बाप और चाचे-ताये लाठी के पूरे खिलाडी थे । गाव भर मे माई का लाल कोई उनके सामने नहीं देख सकता था। वे चार-पाच सारे गाव को ललकार देते थे। यही खानदानी दिलो दिमाग की ताकत थी जो हरफूल को सरपच को ललकार देने के लिए उत्साहित कर रही थी। इतना ही नही हरफूल ने सोचा-यह तो वोटो की लडाई है। फिर वोटें तो हमारी ही हमारी हैं । मेरे खुद दादे की औलाद को ही पूरी सौ वोटें है। हरफूल का एक ताया सदा पचायत का मेम्बर बनता आया था और अबकी बार वह मेम्बरी उसे भी हासिल हो गयी थी। हरफूल यह भी जानत था कि सरपच की पार्टी के और भी काफी लाग खार खाये बैठे है । लेकिन वेचारो मे हिम्मत नही है विद्रोह करने की। अगर व उसे छोडकर सेताराम की पार्टी मे जाते हैं तो यहा उन पर विश्वास नहीं किया जाता । पुरानी रजिश भुलाकर जाना है भी कठिन । वह साचता- अगर वह आगे भाये तो लोग उसके पीछे लगने के लिए आसानी स तयार हो जायेंगे । खेताराम की पार्टी के कुछ लोग भी उसके पीछे हो जायेंगे। सिफ सरपच को ही बदलना होता तो हरफूल खेताराम को पार्टी मे 92/ मत्यु भय । आता था मिल जाता। लेकिन उसे खेताराम और खेताराम की पार्टी के बडे आदमियो का चरित्र भी सरपच से काई भिन दिखाई नहीं पड़ता था। हरफूल चाहता था कि बहुमत के आधार पर सरपच निचले तब से होना चाहिए। निचले तबके के कई लोग हरफूल को चुनाव मे खडा होने के लिए उत्साहित कर रहे थे। वह हर गरीब व्यक्ति के हारी-बीमारी मे काम आने वाला आदमी था। स्वभाव का शील। जो भी उसके सपक उसका होकर रह जाता था। अब तो सरपच की जगह गाव के लोगो के छोटे छोटे झगडे भी वही सुलझान लगाया । वह किसी से लाग-लपेट नही रखता था। दूध का दूध और पानी का पानी करके रख देता था। एक दो बार उसने अपने चाचे के बेटे भाइयो का भी पक्ष नही लिया । गलत काम करने पर उहें सरेआम बुरा-भला कहा। एक बार तो उन्होंने मुंह भी फुलाये। लेकिन फिर अपनी गलती का अहसास हुआ तो सीधे हो गये। हरफूल के पास सरपची करने के लिए कार या जीप नहीं थी। धन नहीं था। लेकिन सरपची परन के लिए जो पुसत चाहिए वह हरफूल के पास थी। दो लडके कमाते थे, उसी म किसी-न किसी तरह गुजर हो रही थी। हरफूल के अपने खेत मे तो कितना काम था? लडके कभी-कभार दिहाड़ी मजूरी भी कर लेते थे। और पचायती भूमि ठेने पर भी ले लेते थे। लडके भी देख रहे थे कि वाप दो आदमिया म उठता-बठता है और नेक काम करता है तो अपना क्या लेता है ? भला ही है। इसमे अपनी भी शान है। सारे गाव मे हरफूल वे हा मे हवा बन रही थी। लोग घर मावर बंठते थे। हुक्का-पानी पीत घे अपनी समस्या रखते थे और समाधान करवाने के लिए उसे साथ ले जाते थे। गाव म जैस-तैसे करते लोग उसकी बात को मानने लगे थे। हरफूल को अपन भविष्य के अच्छे मासार नजर आ रहे थे। लेकिन जब वह मरपच और सरपच की बिरादरी के मोगा ये धन की ओर देखता या तो उसका मन डूब जाता था। वह सोचता था--पहली यात तो यह है कि य धन से लोगा को खरीद लेंगे। नोग अगर न भी विरे और मैं सरपच बन भी गया तो ये मेरा और मेरे साथी लोगोगा जीना "भर करदेंगे। मेरे भाई-बधु या जो मेरे पीछे लगेंगे इन्हीं में सेत-पार में बरावरी 193 कमा क्जा कर खाते हैं । अगर ये कुपित हो गये तो गाव के सारे गरीब तबके को मनाही कर देंगे। कहीं से नये मजदूर ले आयेंगे। खेत मे नया चक बसा देंगे। फिर हमारा क्या होगा। कभी वह सोचता--यह सब तो मेरे कमजोर मन की बातें हैं। यह तो वोटा का राज है । यानि जिसके पास अधिक बोटे हो वही राज करे । फिर मेरी भी तो थाने-तहसीलो मे कुछ चलने लगेगी। गरीब लोगो के बिना इनका काम कैसे चलेगा? ये नय गरीब लोगो को लाकर चक बसायेंगे तो हम उसकी घेराबदी कर लेंगे । गाव मे दूसरे गाव का एक भी मजदूर नहीं घुसने देंगे। इन लोगो की ज्यादतियो की तरफ सरकार का ध्यान भी खींचा जा सकता है। इस प्रकार हरफूल कभी अपने दिल को जमाता था तो कभी खो बठता था । पचायती चुनाव होने की अफवाहें फैलने लगी थी। हरफूल का मन सरपची का चुनाव लड़ने के लिए दृढ होता जा रहा था। तभी एक घटना घटी। एक रात हरफूल के बेटे की बहू ऐसी बीमार हुई कि अब मरी । अब मरी | गाव के आर० एम० पी० को बुलाया। उसने हाल चाल देखकर जवाब दे दिया और कहा, शीघ्र ही शहर ले जाओ, नही तो बचना मुश्किल - - रात को शहर कैसे जाया जा सकता था ? फिर एक बीमार को लेकर? रात को सड़क पर बसें तो आती-जाती नहीं थी। गाव मे जीप कार के लिए दौड लगाई गयी। एक घर की जीप तो घर पर नही थी। दूसरे ने जवाव दे दिया क्याकि कभी हरफूल ने उसके विरुद्ध पचायत मे कुछ कह दिया था। ले-देकर सरपच ही बच गया । हरफूल का लडका कार मागने गया । सर- पच का ड्राईवर झट कार लेकर हाजिर हो गया। सरपच की कार में जब वे शहर के सरकारी अस्पताल में पहुच गये तो हरफूल सरपच के अहसान से दब गया। उसने सोचा--अपने जैसे लोग इससे दुश्मनी लेकर कसे जीयेंगे ? अगर यह आज ही न बचाता तो बहू घर पर मर जाती। चलो वोटो की गज से ही सही अपना मान-सम्मान तो रखता है। उसने निर्णय लिया कि यह सरपच के विरुद्ध चुनाव नहीं लडेगा और न ही उसकी पार्टी छोडेगा!

आखिरकार अन्य दिनो की भाति आज भी उसको नियुक्ति न हो सकी। दस स्थान खाली थे पर पहुचे सैकडो। इन स्थानो के लिए अनिवाय यूनतम योग्यता मैट्रिक थी । वह एम० ए० था। और भी बहुत से प्रत्याशी उच्च योग्यता प्राप्त थे। इसीलिए तो उसका क्रोध नियुक्ति विभाग पर नही गया। आज उसका धीरज पूर्णतया टूट गया । उसे लगा कि नौकरी उसे कही भी नहीं मिलेगी। अब वह सडक पर चल रहा था। उसने देखा सारे लोग अपने-अपने काम धधो मे लगे हुए हैं । दुकानदार जल्दी-जल्दी माल बेच रहे थे। होटलो मे चहल-पहल थी। किसी ने रडी लगा रखी थी। कोई कपड़े सी रहा था। वह बहुत निराशापूर्वक उनको देख रहा था। स्थापित लोगो का देखकर उसके मन मे ईर्ष्या उठने लगी। वह मन ही मन मे उन सबके लिए अशुभ की कामना करने लगा। तभी उसे विश्वास हुआ कि अवश्य ही कुछ-का कुछ हो जायेगा। दो साल पूर्व वह निर्दोष थाने म पकडा गया था तो उसने चाहा था कि इस शहर मे बम गिरन लग जायें। और सचमुच ही इसके दस दिन बाद इस शहर पर पाकिस्तानी जहाजा ने बम बरसा दिय थे । बहुत व्यक्ति मारे गये । शहर के बड़े लोग बाहर भाग गये । उसने चाहा कि काश । अब भी ऐसा कुछ हो जाये। साथ ही उसने यह हिसाव भी लगाया कि क्या उसका इस प्रकार सोचना ठीक है । कभी तो वह स्वय ही ईर्ष्या-द्वेष रखने वाले आदमियो से घणा करता था। वह समाज और देश के लिए बहुत कुछ कराा चाहता था। परन्तु जब समाज और देश ने उसे यह कह कर ठुकरा दिया कि हमे आपको कोई आवश्यकता नहीं तो वह कुछ भी करने के लिए स्वतत्र था।

आखिरकार / 95 उसे लगा कि उसका सोचना ठीक है। ये समाज वाले, ये राजनीतिज्ञ, ये सुखी लोग दुखी और निराश लोगो का ध्यान क्यों नहीं रखते ? थोडी-सी दूर जाने पर उसे सदीप मिल गया । वह बी० ए० तक उसके साथ पढा था। वह कालेज का सवश्रेष्ठ खिलाडी था। कालेज के लिए न जाने कितनी ही शील्डें जीतकर लाया था। पारितोषिक वितरण में आधे पारितोषिक उसी के हुआ करते थे। पर तु अब कुछ भी नही था । इतनी लोकप्रियता और सम्मान कोई काम नहीं आया। वह उसे कई दिनो से शराब पीये प्राईवेट बसा मे टिक्ट चक करते हुए देख रहा था । वह थक्कर पहले से आधा हो गया था। आग जाने पर उसने देखा-एक दुकान मे हवन हो रहा है । सुभाष आग के सामने बैठा भत्र बोल रहा था। वह उनकी कालेज पत्रिका सम्पादक हुआ करता था। उसके जी मे आया कि पूछ लू तुम्हारी साहि त्यिक गतिविधिया कैसी हैं ? पर पूछने से क्या लाभ। वह स्वय ही जानता है कि बचारे को कोई स्थानीय पत्र भी नही छापता। एक डॉक्टर की दुकान मे उनके कालेज के दो लडके शीशिया धो रहे थे। उसम रहा न गया और पूछ ही बैठा ‘भाई यही काम करना था तो कालेज म चार साल क्यो नष्ट किये ? यह माम तो तुम पहले भी कर सकते थे।' "यार क्या करें। पढने की भूल हो गयी सो हो गयी। अव तो सुधार कर ल।" वही उमने देखा-कालेज की बस लडक्यिों से भरी हुई पास से गुजर रही थी। स्कूल से छूटे लडक सडक पर समा नही रहे थे। उसने आश्चयपूर्वक सोचा-अभी भी लोग क्यो पढे जा रहे हैं? परतु उसे याद आया कि जब कोई पढता है तो उसे यह याद कहा रहता है कि पढाई व्यथ ही जाएगी। सब चे ऊचे सपने देखते हैं। उसने भी देखे थे। ज्या-ज्या उसका घर निकट आ रहा था त्योस्यो उसका हृदय और भी अधिक डूबा जा रहा था । वह सोचने लगा कि उसकी घर वाली को भाभी खरी-खोटी सुना रही होगी। मुन्ने को पीने के लिए दूध नहीं दिया होगा। वह किमी कोने में उस पर आस लगाये पडी होगी कि आज तो मैं जरूर 96/ मृत्यु भय - . खुशी का समाचार लिये घर आऊगा । विवाह होने से पूर्व बेचारी ने न जाने क्या-क्या सपने देखे होंगे? अभी दिन बहुत खडा था। उसे मुरु देर और प्रम में रखने के लिए वह लाइब्रेरी को ओर मुड गया । वह सोच रहा था कि भाजजब वह अपनी असफलता भाई से कहेगा तो वह भी उस पर बरस पहेंगा । वह भी तो सच्चा है । आखिरकार कोई किसी को कवतक सहारा द ? मैं तो बरावर का भाई हू । अफेला नही हम तीन हैं । उसका कोई दोष नहीं । दोषी तो मैं हूँ। जो कोई अय धधा नहीं अपनाता। मैं क्या फरू? कोई शान शोवत वाला काम चलाने के लिए पैसा चाहिए। पैसे कहा से आयेंगे ? तभी सामने उसे एक ताजमहल की तरह चमकती हुई कोठी दिखाई दी। उसे बडी जोरो की डाह हुई। साथ ही कोई उसे कहन लगा, "इम कोठी में बहुत पैसे हैं । साहम करो छुरा लेकर कूद पडो । सेठ मौत व डर से सब कुछ दे देगा।" इसे सुनकर उसके चेहरे पर रौनक आ गयी। उसने जोर से अपनी मुट्ठिया भोची। उसे अहसास हुआ कि उसमे बहुत शवित है। परन्तु अगले ही क्षण वह डर गया। पास से एक पुलिस की गाडी निकल रही थी। "नहीं, वह ऐसा नही कर सकता, ऐसा करने पर उसे कद मे जाना पडेगा।" "इस जीवन से तो कैद ही भली है।' पर बीवी-बच्चा का क्या होगा?' "उहे ससुराल मे छोड बाना चाहिए।" पुस्तकालय मे उसने एक स्थानीय पत्र उठाया। कोने में एक खबर थी कि शहर का बर्यास्त किया थानेदार तस्करी करने वालो के गिरोह में जा । . मिला। पढकर वह बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि वह अकेला नहीं रहेगा। इसके पश्चात वह रोज ही शहर के गुण्डो से दोस्ती बढाने लगा। ताकि जल्दी-से-जल्दी उस गिरोह का पता लगा सके। अब उसके मस्तिष्क में नौकरी ढूढने या कोई धधा चलाने का कोई विचार नही था। 00

No text on this page.

No text on this page.

Mratu Bhay

Author
Nishant
Title
Mratu Bhay
File name
Mratu Bhay
Text
OCR done
Citation
1958
Published
2011/03
Publisher
Svasti Sahitya Sadan Rani Bajar Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551096
Barcode
4990010031871.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
t36Uu5VHTYk
Download PDF

Mratu Bhay