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Ganitlilavati

Bhaskaracharya · 2012/08

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श्री। प्रस्तावना. " -- . समस्तभूतलनिवासी लेखनयाचनज्ञानसंपन्न विविधविद्यानुरागी महाशयोंको उत्साहपूर्वक निवेदन कियाजाताहै कि,- १ इस अनादि अनंतसंसारमें भगवत्की इच्छासें ऐसे ऐसे पदार्य निर्माण कियेगयेहै कि, 'जिन्होका विचार करनेमें अल्पज्ञ जीपोंकी बुद्धि शांत होती है, और क्या निर्णय करना होता नहीं. यह सर्व मनुष्यमात्रको स्थानुमवसें निश्चित है. कारण, उ. सीपदार्यको कोई तो कुछ कहताहै, और कोई कुछही कहता है; परंतु बुद्धिगत भेद होनेसें ज्ञानभी अनेक भेद भिन्न हो- कर व्यक्तिमानको उसउल पदार्यका निश्चय करदेता है. येही एफ ईश्वरका अचिन्त्य सामथ्र्यका मन्नाव है. यह बात तो सर्व शास्वसिद्धांतसम्मत है. ऐसे इस संसारकी स्थितिका विचार करकै अनेक लोक तत्त्ववेत्ता होकर मुक्त हुयेहैं. इसवास्ते समस्त महाशयहो । विचार कारकै देखियकि, इस संसारकी स्थितिका विचार करना होयतो क्या उपाय करना चाहिये? मेरे विचारमें तों आता है कि, यदि संसारस्थितिकी जिज्ञासा होय; तो यावत् मनुष्यमात्र निर्मत्सर बुद्धिसें ज्ञानउपार्जन क रना चाहिये. ज्ञानके मिलानेमें अनंत उपाय दर्शक शास्त्र हैं. प्रत्येक शात्ममें पृथक् पृथक् रीनिसें पस्तुतत्त्वका खुलासा कर रकै ज्ञानमाप्त होने के उपाय बतायेहैं. और ज्ञानमाप्त होनेंसें मुक्ति मिलना यह फल कहा है. इससे मुक्ति साधन ज्ञानही है.

गणपति
सरस्वती
भास्कराचार्यजी
भातराचार्यकाफल्या
लीलावती

श्री। प्रस्तावना. 4 समस्तभूतलनिवासी लेखनवाचनज्ञानसंपन्न विविधविद्यानुरागी महाशयोंको उत्साहपूर्वक निवेदन कियाजाताहै कि,-- 1 इस अनादि अनंतसंसारमें भगवत्की इच्छासें ऐसे ऐसे पदार्य निर्माण कियेगये हैं कि, जिन्होका विचार करने में अल्पज्ञ जीवोंकी बुद्धि प्रांत होती है. और यथार्थ निर्णय करना होता नहीं. यह सर्व मनुष्यमानको त्यानुसबसें निश्चित है. कारण, उ- सीपदार्थको कोई तो कुछ कहता है और कोई कुछड़ी कहता है; परंतु युहिगत मेद होने से ज्ञानमी अनेक भेद भिन्न हो- कर व्यक्तिमात्रको उसलस पदार्थका मिन्वय करदेताहै येही एक ईश्वरका अचिन्त्य सामर्थ्यका प्रभाव है. यह वात ती सर्व शाल्मसिद्धांतसम्मत है. ऐसे इस संसारकी स्थितिका विचार करकै अनेक लोक तत्त्ववेत्ता होकर मुक्त हुयेहैं, इसपास्ते समस्त महाशयहो। विचार करिकै देखियेकि इस संसारको स्थितिका विचार करना होय; तो क्या उपाय करना चाहिये? मेरे विचारमें तौं आता है कि, पदि संसारस्थितिकी जिज्ञासा होय; तौं यावत् मनुष्यमात्र निर्मत्सर बुद्धिसें ज्ञानउपार्जनक रना चाहिये. ज्ञानके मिलानेमें अनंत उपाय दर्शक शास्त्रहैं. प्रत्येक शाल्ममे पृथक् पृथक् रीतिसें वस्तुतत्वका खुलासा क- रकै ज्ञानमाप्त होने के उपाय यत्ताये हैं. और ज्ञानमाप्त होनेसें मुक्ति मिलना यह फल कहाहै. इसमें सुक्ति साधन ज्ञानही है. है प्रस्तावना बहोतसा शास्त्रीय ग्रहगणितादि तथा लौकिक व्यावहारिकगणितका लाभ लेने को उत्साह रचते है और इस पुस्तकफी यथार्थ भाषा- टीका बनायकर मिले तो हमें बहोत इच्छाहै. ऐसीसवोर रयोजक रतेहैं.यह देखकर सकलकलानिधान श्रीमान्पंडित श्रीधर शिव लालजीके "ज्ञानसागर"छापरयानाके कार्याध्यक्ष पण्डित श्रीराम वल्लभजीने इस अमोलग्रंयकी सरल सुबोध और यथार्थ भापाटीका बनवाने की प्रेरणा की,उन्के प्रेरणाके अनुसार मैने अपने अल्पबुदितें अतिप्राचीन श्रीहर्पतनय पडित परशुरामकृत लीलावतीविवरण नामक संस्कृतीकाके अनुसार यह भाघाटीका बनाई है.इसभापाटीकाके बनाने में मुजळू पंडित जीयारामजी ने बहोतही साह्य फिया, इसपास्तै मै उन्होका बहोत उपकार मानताहूं. अस्तु. ६ ऐसा यह भाघाटीका समेत ग्रंथ मुम्बई में पंडित श्रीधर शिवलालजीके “ज्ञानसागर" छापरयानाके अध्यक्ष, स्वकीय "ज्ञानसागर" छापरवानामें उपवायके प्रसिद्ध कियाहै. ५ मै समस्त विद्वज्जनोंको विनयपूर्वक प्रार्थना करताहूं कि, 'सर्वज्ञःपरमेश्वरः' इस वचनका स्मरण रखकै यदि यहां अ- शुद्ध रहगया हो, तौं क्षमा करकै सुधार देंगे. शमस्तु सर्वजगत मितीग्राषाढ शु०११ सकलविहज्जनरूपासिलाघुक- शके १८५५ स.१९५० ( गोविंदपरशुरामशारूनी रावेरका लिका अनुक्रमणिका. अथ लीलावतीस्थविषयानुक्रमणिका प्रारभ्यते. पृष्ठ विषय विषय १ " " ४ मंगलाचरण ४४ घनमूल परिभापामकरण. भिन्नपरिकर्माष्टक. द्रव्यसंख्यापरिमाण तहां जाति चतुष्टय. तुला (वजन) परिमाण भागजाति ३ मार्गपरिमाण. ५४ मभागजाति, धान्यादिकोंका परिमाण. ५५ | भागानुबंध- और भागापवाह कालपरिमाण, ६० ( भिन्नसकलित औरष्यवकलित संज्ञाप्रकरण ५२/भिन्न गुणाकार. तहां गणेशका नमस्कार. ६३ / भिन्न भागाकार. ६ सरव्यास्थान सज्ञा कोष्टक ६४ भिन्नवर्ग,धन, वर्गमूल तया ७ परिकर्माष्टक. घनमूल. जोड और वजाबाकी. ६५/ शून्यपरिकर्माष्टक. गुणाकार ६८ व्यत्तविधि. मागाहार ७१ / इष्टकर्म. एन. ७६/ पिपमकर्म, १७९ वर्गमूल. वर्गकर्म, गुएराकम. " " १८.धनः अनुक्रमणिका. पृष्ठ विषय विषय " १०२ १०७ ९. त्रैराशिक. १३२/ क्षेत्रव्यवहार ९३ / व्यस्तत्रैराशिक भुजकोटि, कर्णज्ञान पंचराशिक, सप्तराशिका |१३४ / अन्य प्रकार नवराशिकादिक १३५ आसन्नमूल जाननेकाउपाय १०१ / भाडप्रतिक्षाडक १३६/ व्यस्रजाति मिश्रपकरण. |१३८ | इधकर्णसे कोटिलानेकामकार १०५ | मिांतरप्रकार | १३९/प्रकारातर १०६ वापीपूरणप्रकार १४. ( इष्टसे भुजकोरिकर्णानयन कयविक्रयप्रकार १४११ कर्णकोटिमे भुजज्ञान १०९/ रत्नमिप्रकरणमकार १५२) भुजकर्णयोग और कोटिज्ञान १११/ सवर्णगणितप्रकार १४३, भुजसे कोटिकर्णको जूदा ११२ | सुपर्णवर्णज्ञानप्रकार ११३) सुवर्णज्ञानप्रकार १४५, कोट्येकदेशयुत कर्णमुजसे ११४ / अन्यमकारसे सुवर्णज्ञान कोटिकर्णको जानना ११५/ तहा अन्य विशेय १४६/ भुजकोटियोग और कर्णको 110 छश्रित्यादिप्रकरण पृथक करनेका प्रकार १२१ | श्रेढीव्यवहार. ११७ | लबावबाधाज्ञान १२३ कृत्पादियोग १४९ अक्षेत्रका लक्षण १२४ उत्तरचयज्ञानप्रकार १५०/ ग्रावाधाज्ञान १२५/ मुखज्ञान १५२/ चतुर्भुज और विभुनक्षेत्रमे १२० चयफलज्ञान अस्पष्ट तथा स्पट फलका १३०) समवृत्तज्ञान करनेका प्रकार ज्यानयन अनुक्रमणिका. विपय. प्रष्ट विषय. वोंका आनयन. ६. मलिष्ट | १५३ स्थूलपनाका निरूपण. १८२/ प्रकारांतर. १५४ / तहां विशेष वर्णन. १८३/ शर और जीयाकाानचन. १५५ समानचतुर्भुजक्षेत्र और १८४ वृत्तके भीतर समत्रिकोणादि प्रायत्त क्षेत्रमें फलानयन. नवकोणपर्वत क्षेत्रोंके भुजा १५९ | फललंब और कर्णज्ञान. लंवज्ञान. १८८ स्थूल जीवामें लघुकिया. धनुश्का जारयत १६. कर्णज्ञानका प्रकारांतर. रचातव्यवहार. | १६२/ कर्णमें इष्टकल्पनाका निशे-" रवातमें लंचाईचौडाईकाज्ञान पवचन. १९३ / अन्यपकारसें खातफाप्रकार १६५ विषमचतुर्भुजफलानयनः १९५ चितिव्यवहार. सम्मनलंबक्षेत्रकी आवा चिनाईका क्षेत्रफल निकाला धाका ज्ञान. नेका प्रकार १७१ समानलंयक्षेत्रमें लघुप्रक्रिया १९७ क्रकच्व्यवहार. १७३ / सूचीक्षेत्र. लकडीके चीरनेका प्रकार. १७४ संधियादिका आनयन १९८ अन्यप्रकार १७५/ कणके योगमे अपोलंएका १९९ राशिव्यवहार. सान. १७६) सूचीके वाचालंरऔर प्रकार भुज इन्होंका ज्ञान २.१ भीतके अंदर और बाहर लगे हुये धान्पराशिके आनयन- १८० रत्तदोगोलोकंफरकान्यानयन " धान्यराशियोके व्यवहारका | १७९) गोलक्षेत्र का प्रकार.

স্পনুমত্রিকা पृष्ठ विषय पृष्ठ विषय २०४ " छायाव्यवहार. २२१/ रिथरकुदृक दो छायोका अत्तर आनयन २२२ कुट्टफका उपयोग २०५ डायातर लानेकादूसरा प्रकार २५३ सश्लिष्टकुट्टक २०६] दीपककी उचाईका आनयन | २२५) अंकपाशप्रकार. २०७ शकु और भूमिके अदरकी अकोले सस्थानेदका भूमिका ज्ञान यानयन २०८ | छाया और दीपककी भूमि, २१५/ अकपाशी विशेषविधि दीपककीउचाईका ज्ञान २३०/ अनियत और अतुल्य २०९ सबही भेदत्रैराशिकसे आते अकोमे भेदका आनयन है ऐसा कयन अन्यप्रकारसे अकपाश २१० कुक व्यवहार विधि २१३ कुट्टकम अन्य प्रकार २३२ अकपाशमे त्वानुभव २१६ हनीयमकारसे कुट्टकविधि २३३ ग्रन्थकार श्रीभास्कराचा- २१७) अन्यप्रकारसे कुट्टकविधि २१९] अन्यप्रफार २३४ लीलावती समाप्त २२१, कुट्टकमे गुपलब्धि इतिलीलापत्याअनुक्रमणिका र्यजीकी प्रशसा इतिलीलावतीस्थविषयानुक्रमणिका समाप्ता.

मगलाचरणम्। श्रीगणेशायनमः अथ लीलावतीप्रारभ्यते. लक्ष्मीनृसिंहपादाजरोलम्बीकतविग्रहः गोविंदशर्माकुरुते लीलावत्याःप्रकाशिकाम् ॥१॥ श्रीमान सकल ज्योतिःशास्त्रपारंगत सर्व विहज्जनोके शिरोम- पि श्रीभास्कराचार्यजीने सर्चलोकोके उपफारार्थ सिद्धांतशिरोम- णि नामक ज्योतिर्मय निर्माण किया.उस सिद्धांत शिरोमणिके प्रथम संडकी लीलावती यह संज्ञा है.ऐसा यह लीलावती ग्रंथ निर्माणका स्नेके प्रथम अनिदिन शिष्टाचारसे प्राप्त इष्टदेवता नमस्काररूप मंग लावरण करके चिकीर्पित अपकी प्रतिक्षा करते हैं. पीतिभक्तजनस्पयोजनयते विमं विनिमन्स्मृतस्तं . दारकदवंदित्तपदं नत्वा मतंगाननम् । पार्टी सद्ग- णित्तस्य वाम चतुरप्रीतिप्रदां प्रस्फुदा संक्षिप्त क्षरकोमलामलपदैलालित्यलीलावतीम् ॥ १(एक अर्य-जिसका स्मरण करनेसे अपने भक्तजनोके विनोकानाशा करता है, और जो भक्तोंके ऊपर प्रीति करता है. देवताओं के समू हजिसके चरणोंकू नमस्कार करते हैं उस गजाननजी भगरानकों मैं नमस्कार करके चतुरगणितशास्त्रमे कुदाल पुरुषोंकू आनंद देनेवा- नी,मनोहरतासे शोभनेवाली ऐसी सदाणितशास्त्रकी परिपाटीकों वक्षिप्त अक्षरोंकरके और मधुर३ शब्दों करके सुदोष करके कहताई लीलावती. । परिमाणकोष्टक २. कचडिया ५ काकिणी पण इम्म १६द्रम्म निक - काकिणी . अथपरिभाषाप्रकरणम् ॥१॥ अथपथमगणितशास्त्र के उपयोगी ऐसा परिभाषाप्रकरण कहतेहैं. तहां संरयापरिमाणकहते हैं- -वराटकानांदशकद्वयं २०स्यात्साकाकिणी ताच पणश्वतत्रः ॥ ते पोडशद्रम्म इहावगम्यो द्रम्मै- तथा पोडशभिश्व निकः ॥२॥ अर्थ-दीस कवतियोंको एक काकिएी कहतेहैं, चारकाकिणियोका एक पदा, सोलह पएोका एक ब्रम्म जानना औरसोलहद- म्मों कारकै एक निष्क होताहै ॥२॥ अब तुलाखजना परिमाण कहतेहैं. •तुल्या युवाभ्यां कथितारगुंजा वल्लालगंजो धूर- णचते हो। गद्याणकस्तयमितुल्येल्लैस्तथै. को धटकापदिष्टः॥३॥ अर्थ-दो यवोकेतोलवरावर एक गुंजा २ सय इस गणितशास्त्रमैं कहीहै.लीनगुंजोका अाठवल्लोका एकधरण, दोधर-वल यो कुझगयाणक-पूर्व कहेहुये चौदह यल्लोका एक पटक होताहै।॥३॥ दशार्धगुंजं प्रवदनिमा माघाहय षोडशभित्रकर्ष कश्वििभपलंतुलासाः कर्ष सुवर्णस्यसुवर्णसंज्ञ॥४॥ अर्थ-पांचगुजोकाएकनाप सोलहमाषों करिके एक कर्मचारकोकरके एकपल होताहै. ऐसातोलकापरिमाए जाननेवाले कहतेहै. यह साधारण सववस्तुमात्रका तोलम्हा। तोलकारकम ३ गुजा २ धरण धरण गपाणका घटक तो कारक ५ गुजा- माय रूष १५माष परिभाषाप्रकरणः | २४ अगुल-1 हस्त दण्ड और सोनेके एक कर्ष कहिये सोलहभागोंके तौलको सुवर्ण ऐसा क हते हैं. ॥४॥ अब मार्गकेपरिमाणकी परिभाषा कहते हैं- यवोदरैरंगुलमष्टसंरव्यैर्हस्तोंयुलै षडणितैश्चतुर्भिः हस्तैश्चतुर्मिभवत्तीहदंडाकोश सहस्रहितयेनतेषां ॥५॥ अर्थ- पाठ जोन्सोडूं याडे लगाकर रखके मार्ग परिमाणकोटमा जितनामदेशनापाजाता है उसको एक अंबुल कयियोदर - गुल हते हैं. चौवीस अंगुलोंका एक हाथ, पहातोंका हत २. हजारदंड-कोरा एकदंडा इस धनुष्य ऐसाशी कहते हैं. दोहना । कोषा-- योजन. रदंडोंका एक कोश होताहै.५ •स्यायोजनकोशचतुष्टयेन तयाफराणांदशकेनवंशः निवर्तनविंशतिवंशसरण्या क्षेत्रचतुविभुजैर्निबई॥६॥ अर्थ- भार कोशोंसें एक योजनहोताहै. अब दूसरा प्रमाण यह है कि दशहायोंका एक/- हल वंश होताहै बीस वंशोंसें एक निवर्तन होताहै. क्षेन. और चारों तरफ एक एक हाय मिलके पार हा- पहन खाइन थोंका एक क्षेत्र होताहै.चारों और एकएक हाथका क्षेत्र चौकोना होता है. यह क्षेत्रलंबाई और चौडाईमैं एक थ होताहै.उस एक हायके लंबेचौडे क्षेत्रका मान ५७६ अंगुलहोत्ताही यह तो केवल उदाहरण मात्रकेही लियेहैं. परंतु वर्तुल त्रिकोणादिक भी क्षेत्रोंका मान होता है. ॥६॥ अब धान्यादिकोंकापरिमाए। कहते हैं- - हस्तोन्मितैर्विस्मृतिदैर्घ्यपिंडैर्यहादशालंघनहस्ससंज्ञ. धान्यादिकेयहनहस्तमानशास्त्रोदितामागधरवारिकासा संत्रपरिमाणको - २.बंरा निवर्तन - हित.

लीलावती 1आउक आरक- ----- रबारी (६ द्रोण- अर्थ-जो काठका लोहाका अथवा ताशका एक हाय ऊंचा और एक एक हाथ भीतर चारों ओर विस्तीर्ण कहिये चोड़ा भांड(मापा है, उसको धन हल ऐसा करने. यह घन हस्त माप धान्य यादिक चीजेंमा पनेके लिये शास्त्रमें कहाहै इसघनहस्तपरिमाणकू मागधपरिमाणमें सा. री ऐसा कहते हैं ॥७॥ -द्रोणस्तुखायापलुषोडशांशस्यादाढकोद्रोणचतुर्यभागः प्रस्थऋतुओंधियाटकस्ययस्याधिराद्यैःकुडवादिष्टः॥८ अर्थ-रखारीके सोलहवे भाभकू द्रोणऐसा । पान्यारिपरिमाणकोष्टक कहने हैं.द्रोपाके चोये भाग आठककहतेहैं | कुडय आटकके चौथे भागभस्य कहते हैं और प्र- 'द्रोण स्पके चोये भागळू प्राचीन लोगोंने कुडवऐसा महाहै, ॥८॥ अब कालपरिमाणकी परिभाषा कहते हैं- पद्धिःप्राणैर्विनाडीस्यात्तत्पध्यानाडिकास्मृता नाडीपट्यातनाक्षत्रमहोरात्रप्रकीर्तितम् ॥९॥ अर्य-नासिफाके हारा प्राणवायूके छ.बार श्वासोच्छास लेनेसे जितनाकाल व्यतीत होता है उतनेकालकू कालपारमाण कोटकर इमाह दिगडी ऐसा कहते हैं विनाडीयोंसें एक माण- दिनाडी परिक-1 नाडी कहिये घटिका होतीहै ६० नाडियोंसें ५०विनाडी-1 नाडी पास-तु ऋतु-अप एक नाक्षन रात्रदिन होता है इसके आगे ५० नाडी---नासम्म राइदिवस पक्ष,मास मत अपनावर्षआदिकर रिमाणमन्पशास्त्रोंसें और लोकों के प्रसिद्धीसें जानलेना. यहां उन्होंका कोष्टक मात्र दिखायाहै.॥९॥ इतिपरिभापाप्रकरणं ।। टिप्पणी-सा किसी अन्य स्तरुमे इसश्लोकके न्यागे एरोभाक सेपक है- अयन-- ॥

परिभाषामकरणं. अथ सज्ञापकरणमा ग्रंथनिर्माणमादिक शाकार्यो मे बहोत विन होते हैं. इसशंकासे उन विघ्नोंकी शांति करनेके लिये पुनः श्रीगणेशजीकू नमस्कार करते हैं. लीलागललुलल्लोलकालव्यालविलासिने ॥ गणेशायनमोनीलकमलामलकान्तये॥ १० ॥ अर्थ-लीलाके समयमै गलेके ऊपर इधरउधर फिरनेवाले काले स. पोकेसाय क्रीडा करनेका जिसका समाबहै. नीले कमलकीसी स्वच्छ है। कांति जिसकी. ऐसे गणेश भगवान्कू नमस्कार है. ॥१०॥ अवसंकलित और व्यरकलित कहिये जोडऔर बाकी निकालना »पादोनगवाणकतुल्यकाईसमतुल्पे कथितोऽबसेरः मणाभिधानःरययुगेश्वरैर्धान्यादितौल्येषुतुरुप्कसंसार अर्थ-गपाएक जो इस परितापामकरणके तीसरे सोफमैं कहेहै। उनके चोयेमाग• टंक ऐसा कहतेहै. उन ७२ यहत्तररंकोका एक सेर होताहै औरचालीससेरोंका एकमरा होताहै,यह परिमाण धान्य पादिक चीजेोके तौलमै लियाजाताहै. यह रंक,सेर और मण ऐसी तुरुष्क (तुर्कस्थानके निवासि) यवनोने कीहुई तौलकी संज्ञा है. ॥१॥ होकेन्दुसंख्यैर्धटकैन्यसेरस्ते.पंचतिस्थाष्टि- काच तामिः॥ मणोऽष्टभिस्त्वालमगीरशाहहता त्रसंज्ञा निजराज्यपूर्षु ॥ २॥ अर्थ- घटकजो इस परिमापामकरणके तीसरे श्लोकमैं कहाहै. उन एकसौ न्यानव१२ धटकोंका एकसेररुपांच सेरोंकी एक घटिका कहि ये घडी और भाउ धटिकाओंका एकमण होताहै. ऐसी तोलके परि- माएकी संज्ञा पालमगीर शाहबाझाहने इस हिंदुस्तान में अपनेराज्य शहरोंमें प्रसिद्ध करीहे. .

लीलापती. पादिकोंमें उपयोग करनेके लिये संख्याके स्थानोंकी संज्ञा कहते हैं. .एकंदशशतसहस्त्रायुत लक्षप्रयुतकोटया क्रमश: अर्बुदमन्नंस्वचानिरवर्षमहापयशंफवस्तस्मात् ११ अर्थ- एक दश शत हजार, दशहजार, लक्षादशलक्ष, कोटि; अर्बुद, अन्ज, सर्व निखर्व महापमा शंकु. ॥११॥ जलधिश्वात्यंमध्यपरार्धमितिदशगुणोत्तरंसंज्ञाः संख्याया स्थानानांच्यवहारार्यकताःपूर्वः ॥ १२॥ अर्थ-जलधि, अंत्यामध्य,औरपरार्ध.इस मकारसें एकएकसें दश दशगुणा अधिक अधिक कारकै पूर्वान्चार्योने संरब्याके स्थानोंकी संज्ञा न्यवहारके वाले करीई. जैसा- एक इससंपन्याळू दसगुणाभरिकै दश यह संज्ञा हुई.दशा इससंज्ञाकुंदशगुणाकरिकै दसेदसे सौ .. यह सी ज्ञाहुई शतं १०. सोंको दशगुणाकरके सहल १०. यहसंज्ञाहुई. इसी कारसेएकएकसंख्याकू दशगुणाकरनेसें१०. दशसहलादिसें परान धी.... पर्वतसंन्यास्थानोंकी संज्ञाहोतीहै।।१२॥ सरन्यास्थान संज्ञाकोष्टकमिदम्। रश सहर दशसहस्स(अयुत लत नियुका दाराक्ष मयुत) कोटि दाकोटि दर भज "मिरवर महापथ अपि. अत्म मध्य • • . ::::::

परिकाष्टकम् अव संकलितज्यवकलितमें अंकररवनेका प्रकार अर्धश्लोकसें कहते हैं- कार्यक्रमादुत्क्रमतोऽथवांकयोगोयथास्थानकमंतरंवा अर्थ- जद अकोकी जोडकरनेकी होय, तव उनमकोंकी जितनी सं. ख्याहोवे उससंख्याके एक दशा बात इत्यादिक क्रमसें जितनेस्थानक गिनेजांय,उसनेस्थानोकेक्रमसेर एकएकके चाईतरफ) उसउससरख्या अंकोकू लगाते जाय. जैसे-एक संरण्यास मिलाप करते समयआयाहु आ अक एक संख्याकेस्थानमे, दशसंख्याका अंक दशसंख्याके स्था। नमें रररवाजाय, इस क्रमसेही परार्ध संख्याका अंक परार्धसंख्याक स्थानमें रखाजाय.और जिसमकारसें संकलित कहिये जोड लगाने में एक दशशतं ऐसेक्रमसें संरच्यास्थानकोमै अंकलगायेआते हैं। उससे उलटेक्रमसें व्यवलित कहिचे वजाबाकी करनेमें अंक लगाये आतेहै जैसे कि-ऊपरऊपर अधिक संख्या के अंक नीचे नीचे न्यून सं. ख्याके अंक लगायेजाते हैं. जैसेवातंसंरब्याचा अंकमयम तिसकेनी दशसंख्याका तिसके नीचे एकंसरन्याका अंक लगाया जाता है। इस सकलित औरव्यवकलित विषयमें मंदबुद्धि लोगोंकू अच्छीरी तिसें चोध होनेकेवारते श्रीभास्कराचार्य अपनेलीलावतीनामक कन्या के साथ प्रश्नके द्वारा उदाहरण कहते हैं- उदा-अयेवाले लीलावति मतिमतिब्रूहि सहिता- द्विपञ्चहाविंशत्रिणवतिशताशादश दश । शतोपेतानेतानयुत्तवियुतांश्चापि वद में यदिव्यक्ते युक्तिव्यवकलनमार्गेऽसि कुशला॥१॥ अर्य-हे बुद्धिमतिबाले लीलापति जोयदिअंकोंडूं मिलादेनके औरकम करने के मार्गमेअर्यान् गणितशास्त्रमें चतुर है तौ २।५।३२ लीलापती. . . ५ १९३।१८।१०।१०० इन अकोंकू सकलिन जोड) करिकै फिर अयुतक हिये१०... दस हजारसे कमकरिकै कितने अक होतेहैं सो तूं मुझकू कहदे॥१॥ अब उदाहरणका स्पष्टीकरणइसप्रकारसे है:- यहां अंकोंका स्थापः न २।५।३२।१९३।१८।१०।१०० इसप्रकारकाहै. इन्होका जोड मिलानेसे १३६ होतेहै. अब यहा एकं इससंख्यास्थानमें रहनेवा सकलितोदाहरण ले २।५।२।३।८ इन्होके जोडसे २०यह संरच्या हुई उसा शत दश एक संरख्याका एक संख्याके स्थानऊपर शून्य रस्त्या गया. और दशसंख्यास्थानीय र दोरहे वेदो और २ दशसंरख्या स्थानीय यक दूसरेपंक्तिमें रखरवेगयेहैं, ३१९११११ एसब उनश्दो सरख्याके साथ मिलाक।६ यह संख्या हुई उनादमेसे५धरेगये,पहिला और पीछेका ६ छ मिलके ६०यह सख्याहुई. अबशनंस्था नका उनके पीछेका का रहा वह और उदाहरणकेन्यासमै शतं स्थानके १।१ एसब उस एकके साथ मिलाकै ३ तीनहुए ये३ के उ नसाठ के पीछे शतं स्थानमैं लगाये गये एतापनासब मिलके२६. तीनसौ साठ हुए यह संकलित हुन्मा, अब १३६ अंक संख्या १०० से कमवजाबाकी करनेके है. व्यवकलितनाम कमकरनेमें उलटेक्रमसें मरकलितोदाहरण भी अक रररपेजाते हैं. अब व्यवफालित करने में - कोकास्थापन ३।५।३३।१९३१८11.11.. इन्होंकू अयुत १०... से कम करकै ९६४ हुए. अब यहांस टीकरपा ऐसाहै- एकं इस संरल्याके स्थानमें रहने- वाले २।५।२॥३॥ ८ एमिडकेर हुए.वे वीस एक ९५४० एकस्थानीयसंरन्यासें कमारनेसै १९८० रहे. अब . 4- गुणनप्रकार .. दशस्थानीय सख्याके स्थानमें रहनेवाले २।९।१।१ ए मिलके १४ हुए ए १५ सरच्याफ १९८० के दशम स्थानीय सरच्या ८ से कमकरनेसे - १८४ हुए. उम्मे एक ९८४° स्थानीय आगे धरनेसे ९८५. हुए. अब शतं इस संरब्याके स्थान में रहनेवाले १।११८ मिलके २हुए. वे २ स ख्यांक के शतं स्थानीय संरच्या सें कम करनेसे ९६ हुए उन में एक और दशमस्थानीय संरच्या १० मागे धरनेसें सब संरच्या मिला ९६४० हुए. ॥१॥ ॥ इतिसंकलिनव्यवकरितमकारः॥ अब गुणाकार का प्रकार अढाईलोकसे कहते हैं:- गुण्यात्यमझुगुणकेनहन्यादुत्सारितेनैवमुपाति मादीन् ॥ १३ ॥ गुण्यस्वधोऽयोगुणवण्डत्तु- ल्यस्तैःखड्कै संगुणितोयुतीया । भक्तोगुणः शड्यतियेनतेन लब्ध्याचगुण्यो गुणितः फलंया ॥१४॥ द्विधाभवेद्पषिक्षागवंस्थानः पुचवा . णितः समेतः । इष्टीनयुक्तेनगुणेननिनोऽभीष्ट भरण्यान्वितयर्जितोवा ॥१५॥ अर्थ-जिस संख्याकू गुणा करनेका होवे,उससंरब्याळू गुएय ऐस्ग कहते हैं. और जिस संख्यासेंगपा कियाजाय, उत्त संख्याळू गुएक ऐसा कहते है. गुपयसरन्याके समूहळू रखके प्रथम उसके अंतके न्या र्थात् सबके पीछे अंककू गुराक अकसें गुणाकरे और नीचे एक, एक गुपितांक रस्वजाय उस अंत्य अंकके गुणा करनेके पीछे उस के पूर्व अंककू गुणा करे. फिर उसके पूर्व अंककू गुणा करे. यह गुणा. कार करनेफा एक प्रकार है ॥ १३॥ अथवा गुपएक संख्या के संडरस ड करना. और उस गुणकके जितने खंड होय, उतने उत्तने रखंडों के नीच गुएपसरल्याका समूह धरे. फिर उसप्रत्येक गुराक खंड करिके गुएयस लीलावती " रख्या समूहकू गुपणा करे. उस प्रत्येक गुणनासें जो संरच्या आईहों, उनसब संख्या समूहोंको जोड दें, ऐसा जोडने से जो सामुदायिक संख्या होती है, वह एक गुणाकार होताहै. यह गुणाकार करनेका दू- सरा प्रकारहै. अथवा जितनी संख्यासें गणक अंकको भाग देनेसें अंक आये, और जो लब्ध अंक रहे, उस भानक अंकसे और लब्ध अंकसें गुण्यसंन्याळू पृथक् २ गुणा करकै भी सब अंक जोड देनेसें जो सामुदायिक संख्या होती है, यह एक गुणाकार होताहै. यह गुणा कार करनेका तीसरा प्रकार है. ॥१४॥ इन दूसरे और तीसरे म- कारकी रूपविभाग ऐसी संज्ञा है- अथवा गुणक संरख्याके एकंद श, शत' इत्यादिक स्थानोंके अंकोकू पृथप करिके गुण्यसंख्यासमा हकू गुणा करना. फिरउसगुणाकार जोडदेना नौमी एक गुणाकार होताहै. यह गुणाकार करनेका चोथा प्रकार है.इस चोये प्रकारकी स्थान विभाग ऐसासनाहै.- अथवा गुएक अंक जो हो, उसमें सम अथवा विपम चाहियेउतने कमकरके गुपा करे, और फिर बाकीरहे व्यंकोंसें भी गुणा करे-तौंधीएक गुणाकार होताहै यहाणाकार करनेकापांच या प्रकार है:- अथवा गुणक यंफ जो है उसमें अपने मनमाने उत्तम अंक मिलादें। और सब गुणाकार हुए पीछे उस गुएक अंकमें जिन तने ज्यादा अंक अपने मिलापे होंगे, उनकोसें मूलके गुण्यसंख्या गुणकै जो मुणित मापाहो, वह गणित संख्या उस पूर्व किमाए गुणाकारसे कमकरके जो गाकी निकलती है, वही वोही एक राणा- कार होताहे-यहरणाकार करने उता प्रकार है. इस पकारसें गुणा कार करनेके छ:प्रकार हैं. ॥१५॥ पर इस गुणाकारके प्रकारकू सुरोधरीतिसें जाननेके लिये उदाहरण कहते हैं- .

गुणनमकारसा (१) उदा-२ बालेबालकुरंगलोलनयनेलीलापतिमोच्य. तापंचत्र्येकमितादिवाकरगुणा अंकाः कतिस्यु यदि ॥ रूपस्थानविभागरवंडगुणने कल्याउसि कल्याणिनिश्छिन्नास्तेनगुणेनतेचगुणिताजा. ताः कतिस्युर्वद ॥२॥ अर्थ-हेचाल हरिणके नेत्रसमान चंचलनेवाली हे चाले सर्व सद्गुणोंसें अलंकने लीलावति जो तूं रूपस्थान विभाग, और स्वं उइनपकारोंके समझनेमें चतुर होगी, तो १३५ एकौ पैंतीस १३ बार) हसंख्यासें गुणाकरके कितने अंक होते हैं। और उन्ही एकसो पै तीस संख्याकों के गुणाकार करके जो अंक आवै, उन नंकों कू१२|| बारहसे भागकरके कित्तने अंक हुए, सोकह. अब इसउदाहरणका स्पष्टीकरण कहते हैं:- गुण्य ३५ गुणक २ अब यहां गुण्य अंक नीचे ररपना और गुणक अंक ऊपर रखना ३५ अप यहां गुण्य ३५का अंत्पअंक १· गुणक १२ करके गुण नेसें बाराएक धारा ११ हुए. फिर उस गुणक 1३५ के उपांत्यक हिये अंत्य अंकके समीप अंक ३ के ऊपर रखना. और उलकूर वा रहसें गुणके बारह बीके छत्तीस ३६५ हुए, फिर उस गुणकसें प्रथम अंक ५ के ऊपर रखना, और उस ५कू बारहसें गुणना तो चारापंचे ६० साठ १३६ हुए. अनंतर १२६० इनका मिलाप करनेसें १६२. सो- लहसों वीस हुए. यह एक प्रकारका उदाहरण हुआ. अथवा गुणर पविभागका उदाहरण ऐसा की गुणक १२के रथंड इनदोनो खंडों. से गुएयसंख्या १३५ कूश्यक प्रयक् गुणना. तहां एक धार ४ संरव्यास, १३५कू गुणनेसें । पांचसो चालीसडये. औरदूसरीचार ८ संरच्या २५ गणनेसें दसती अशी १०८० यह संरच्याहुई.

. 'लीलावती. इन ५४. और १०८० संरच्या पोका जोड़ करने से ५४०. सोलहसें चीस) हुए. यह दूसरे प्रकारका उदाहरण हुन्या.- अथवा गुणक सल्या। कू ३सें भाग देकर ४ मिला उससे गुण्यसंख्या १३५ कू चार बार यु एना, अथवा लब्ध जो चार आये है उन्होसें तीनचार गुणना. प्रथमबार गुणनेसें ३. ऐसे १.५ सरव्या हुई दूसरीवार गुणनेसे ४०५ हुई.लीस रीवार-से गुणनेसे ४.५ हुई. चोथीपार गुणनेसें ५.५ हुई इतनी संख्या-पोप मोका मिलाप करनेसे ४.२ सब संरख्या वोही १६१ हु। ई अथवा लघसरल्या सेंप्रथमचार४.५ गुपानेसे ३५ ऐसे ५४. संरव्या हुई.दूसरीवार गुणानेले ५४० हुई. तीसरीवार १२ गुणनेसें.४० इई. इन संरव्यानोका मिलाप करनेसें : बोकी योही १६३० सरव्या हुई. यहत्तीसरे प्रकारका उदाहरणहुआई. अथवा गुणक संरल्यार इसका स्थान विभाग करना. अर्थात् १२में २ यह संख्या एक स्थानकी है.सो पृथक् रखना, और १ यह संरच्या दश स्थानकी है सोपथक् १० कसे रचना, और इन पृथक् सबीहुई ३०१३ संख्याओंसे गुएप १३: अलग अलग गुणा करना. तहां प्रथम : इस गुणक सरव्यासें ॥५ स गुण्य सरख्याकू गुणा करनेसे १५ यह।३५ संख्या हुई.पोराफि र २ इस गुणक संख्या ३५ इतप गुण्य सख्याक गुणा करनेसे १५. यह २७० सल्या हुई. अब इन दोनो संरच्याओका मिलापकर नसें १५. चोही १६३. संच्याबुई. पह चोये प्रकारका उदाहरण अयपा गुण्यसंख्या २ इसमें इस अंक जोदो २२ अंकसे कम करना. बाकीरहे। इसक्स संरख्यासें गुण्यसंरन्याम 11 गुणनेसें पूर्वकी तरह १३५० हुए. और फिर उस २ अंकसें भी प ३९ अंकू गुपानेस पूर्ववत् हुए इस१३५० और२. संग्या आंग मिलाप करने से बड़ी १५२. संख्या हुई. यह पार प्रसारका उ- २६. ७.

भागहार प्रकास। (१३) दाहरण हुन्मा.- अथवा गुणक अंक १२में मिलानेसें २० हुए.उ. स२० अंकसें गुण्यसंख्या १३५ कू गुणा करनेसें ३९ यह २७०० सं- ख्या हुई.अबसें गुण्य१३५ कू गुणनेसें जोसं-२६. रव्या १०४. हुई। है उस१०८० संरब्याळू पूर्वकी गुणित २७०० संन्यास कम करनेसें । वोही १६३० संरव्या हुई. यह छठे प्रकारकाउदाहरण हुन्या.॥१५॥ इतिगुणनप्रकारः। अथासागहारमकारः। अवतागहारका प्रकार एक श्लोफसें कहते हैं:- भाज्याधरःशुझ्यातियद्गुण स्यादन्त्यात्फलंततू खलुभागहारे । समेन कनाष्यपवर्त्यहारभाज्यौ भजहासनिसम्भवेत्तु ॥१६॥ अर्थ- जिससंख्या समूहसे भाग किया जावे,उससंरच्यासमूहवं भाजक कहते हैं और जिससंख्या समूहसें भाग लिया जावे, उसकुंभा- ज्य ऐसा कहते हैं उसभाज्यसंरच्यांक समूहके अंत्य अर्थात् सबके रिपणी 1-10ओ कोई गुणाकार कियाहै, वह बराबर है या नहीं सो देखनेकी टीकाकारने कही हुई रीति.अर्याद गुणाकारका परिचायक:- गुण्ये गुणेन विहतेशेषघाताशेषके । गुणितस्थाडूशेषेण समे गणितशादता ॥ १ ॥ मर्य- गुण्यसंख्याळू गुणफलें गुणनेसेंजोसंख्या होती है उससंरख्या उसीगुणकसंख्यासे भागदेना.औरउसमें सोनीचे शेषरहे ,वह फिरउसीभैरव कर फिरफिरभागते जाना जयणितके अंक भागहारहोफरमाप्त होगे औरशेपन कुछ नहीं रहकर समानभाग डूटे, नयजानना की किया या गुणाकार बराबर शद्धहै इसकाउदाहरण भागहारमे दियाहै.सोयहांसें जानिऐनाः ।।

(१४) लीलावती. पीछे वाईतरफके पहले अंककू भाजककी संख्या एक ओर रख- कर उसका जिस एक, दोन, तीन आदिक संख्यांफसे गुणनेसें भाग पडताहै,उस अंकसें भाग लेना. जो कभी उस अंत्यअंकसे भागहार पून रा नहीं पडे तो उसके प्रथम अंकसे अर्थात् अंत्यके पासके अंकसें साधा मिले हुए उन अंत्यतथा उपांत्य दोनो अंकोंसें भागलेना. और जो कभी उनमेत्य तथा उपांत्य इनदोनों पर अंकोंसे भाजकसंख्यांकका गुणने- सें भाग नहीं पडलाहो अर्थात् यह मंत्य तथा उपांत्य संज्या मिलक रनी भाजक संरच्याके समान या अधिक नहीं हों, तो उसउपांत्यके- भी पहले संरण्याळू उन दो संरच्याके साथ कारकै उन मिलेहुए तीनो अं- कोसें भाग लेना. ऐसा कहने का तात्पर्य यह है कि जहां तक भाजकस स्या के समान या उसे अधिक भाज्य संख्या पूरी होने नहीं नहीं तकके भाग्य अंकोंका भाजक अंकों से भाग लेना-और जब यह भा गपडे नव उस भाजक संख्यासे भाज्य संख्या में भाग पडनेके लिये | जितनेसें गुना करना पडाहो, उसगुणक का नाम भागहारकहै. उसभा- गहारकका अंक दूसरी ओर पन्चे, और उसभाजक संख्याकाउ स गुणकसंरल्यासें गुणाकार करके जो अंक आयाहो, उसकंकडू भाज्यसंख्यासें शोधलेना. शोधनेसें नीचे जो बाकीवचे उसके ऊपर उसी भाज्यसंरख्या समूहका अंक लेवे. और इसीहीरीतिसें उसभा- ज्यसंरव्यांफोके समूहळू जबतक गुणाकारसें भाग छूटा करे तबतक भाग कराकरे, मोर भागहारक गुणक अंकको दूसरी और इकट्ठा करे ऐसा करनेसें उनगुणक अंकोंकाजो संख्या समूह इकबाहोता है वहाँ भाजकका गुणकसंख्यासमूह उसभाज्य संख्या समूहका भागहा रहोताहै. अर्थात् भाज्यसंरच्या सरन्यांकोंसें भाजकसंख्यांकों के जितने भागजातेहों, सरसागसंख्याके अंक उस भाज्यसंख्या के - भागहार प्रकारः। भागहार होते है. यह भागहारका एक प्रकार है:- अथवा जिस संख्यांकसें भाज्य और भाजकांकडूं भागनेसें भाज्यांककी और भाजकांककी संरच्या घरावर टूटतीहो, अर्थात् नीचे कोई शेष बचे नहीं, तो उस अंत्यसंख्याके अंकसें भाज्यांकडूं भागना. ऐसा क रनेसे जो भागहार पायाहो उस भागहारके अंकसमूहळू एक ठिकानेपर रवछोड़ना.फिर जो उस अल्प संरज्याके अंकसैं उस बडे भाजक संरव्यांकफू भागनेके समयजो भागहारका संक्षिप्त लब्ध अंक माया हो, उससंक्षिप्त अंकसें उस पहिले आये हुए भा गहारके संरच्यांकडूं भागदेना. इस रीलिसें भाग हार करनेसें भी जो मूल भाजकसें भागहार आता है, वही भागहार आता है. परंतु इसभागहारकी रीतिमें भाज्यक्षाजक दोनों संख्यांकोंका समान पना होकरनीचे जो शेष क्चे नहीं तच मात्र भागहार होता है. जो कमी नीचे शेष बच जाय तौं पूर्वकै सरीरखा इसरीतिसें भागहा रखनसकत्ता नहीं. अब इस भागहारके रीतिका उदाहाणजो प्रथम गुणाकारके 7 दाहरणमें दियाई.कि,"छिन्नास्तेनगुणेनतेचगुणिताजा- ताः कतिस्युर्वद" इसउाहरणका विस्तार इसरीतिसें है. प्रथममकारसेंभागझस्काउ० भाजक १२ यहां भाज्यसंरन्या भाज्य भागहारप्राप्त. का अंत्यामेसेंभाजक संख्या १६२० (१३५ १२ का भाग जाता नहीं इस अंकोंका न्पास-भाज्या६३० भाजक १२) वास्ते भाज्यके अंत्या प्र- थम सहित हुए. इनमेंभाग जक संरच्या २ काभागासे शेष भागहारपकारः। भागहार होते है. यह भागहारका एक प्रकार है-- अथया जिस संख्यांकसें भाज्य और भाजकांकडूं भागनेसें भाज्यांककी और भाजकांककी संख्या बराचर टूटतीहो, अति नीचे कोई शेष बचें नहीं सौं उस अंत्यसंस्ब्याके अंकसें भाज्यांकडूं भागना. ऐसा क स्ने जो भागहार आया हो उसभागहारके अंकसमूहळू एक ठिकानेपर रखखोडना. फिर जो उस अल्प संरण्याके अंकसें उस बडे भाजक संरच्यांककू भागनेके समयजो भागहारका संक्षिप्त लब्ध अंक माया हो, उस संक्षिप्त अंकसें उस पहिले पाये हुए था गहारके संरख्यांकडूं भाग देना इसरीतिसें भाग हार करनेसेंपी जो मूल भाजफसें भागहार आता है, वही भागहार याताहै. परंतु इसभागहारकी रीतिमें भाज्यभाजक दोनों संख्यांकोंका समान पना होकर नीचे जो शेष बचे नहीं, तब मात्र भागहार होता है. जो कमीनीचे शेष बच जायौं पूर्वकै सरीखा इसरीतिसें भागहा रनसकता नहीं.

लीलावती चा ॥१८॥ अर्थ- समान दो संख्याभोंका जो गुणाकार होता है वह वर्गक रण कहाताहै कोनसे भी संख्यामा वर्ग करनेका हो तो उसी संख्या सेंउससख्याको गुननेसें जो सख्या होती है यह संख्या का वर्ग इस नामसे कहाती है यह वर्ग करनेका एक प्रकार है. अथया कोनसेमी सख्या राशिके अंत्य अंकका वर्ग करकै वह वर्ग एक तरफ रस्वदेना. फिर व्यत्यअंक द्विगुणित करके और उपांत्य अंकसे गुणा करके जो सव्या आवे यह उस पहले वर्गके नीचे एक अधिक स्थानसें (अर्थात जिसका एक अंक उपरके संख्याके शहर भावे ऐसा ! रखके उनदो- नो सख्यानोका मिलाप करना. ऐसा करनेसे सो संस्था आई- दो, उस सरन्याके नीचे उपांत्य अंकका वर्ग एक अधिक स्थानसेंर- रखकर उन्होंका मिलाप करना. फिर उस अंत्यतथा उपांत्य संख्या- का जो राशि है वह अंत्यहै ऐसा समझकर उसको विगुणित करके उसके उपांत्य अर्थात् पहले अंकसें गुणाकरकै जो सख्या यावे, उससंरख्याको उस पहले मिलापसे आयेहुये हुए संख्या राशिक नीचे एकाधिक स्थानसें रखकर उनदेगी संख्याओं का मिलापक रना. इसरीतिसें जितनी कोई सख्याका राशि होवे उसके च्यादि अंकतक वर्ग- हिगुणित-मिलाप करनेसें अंत्यमें सर्व संरव्याराशि का वर्ग होता है. यह वर्ग करनेका दूसरा प्रकार है ।। १७॥ अथवा जिससंख्याका वर्ग करनेका हो, उस सरख्यामें अपने मनमाने ऐसे दो खंड (भाग करलेवें,उन दोनो खंडोंका गुणाकार करे,जोसंरख्या यावे उसको द्विगुणित करे. उसमें उन दोनो खंडोंके पृथक् पृथक् वर्ग करिके मिलादेवै. ऐसा करनेसेनी नीचे जो संख्या मातीहै वह स संख्याका वर्ग होता है. यह वर्ग करनेका तीसरा प्रकार हैअथवा पर्गकरणप्रफार। (१९) उसमे उस जिससंख्याराशिका वर्ग करनेका होये, उस संरख्या राशिके अंक- समूहमे इष्ट अक कम करके जो सरव्यासमूह रहेगा उसका और वह इस अक उसी सरल्यामे मिलानेसे जो सरन्यासमूह होता है। उसकागुणाकार करना फिर गुणाकार करकै जो सरच्या हुई है अकका वर्ग करकै मिलावै, ऐसा करनेसे जो नीचे संख्या पाती है यह उस सख्याका वर्ग होता है यह वर्ग क. रनेका चोया प्रकार है इस रीतिसें चार प्रकारके वर्गकिये जातेहै. सब प्रकारों से भी वर्गसंख्या ती योकी चोही माती है ॥१८॥ अब इस वर्गकरणका स्पष्ट बोध होनेके अर्थ उदाहरण बताते हैं: उदा:- सरवेनवानांचचतुर्दशानां ब्रूहिविहीनस्यशत यस्य ॥ पंचोत्तरस्याप्ययुत्तस्य वर्ग जानासि नेहर्गविधानमार्गम् ॥ ३॥ अर्थ- हे मित्र! जोनू वर्ग करनेके मार्ग जानताहों नौ ९।१४ २९०११०००५। इन्होका वर्ग क्या होता है सो तू कह ॥३॥ पहलेभकारसे उदाहरणका स्पष्टीकरण | इसउदाहरणका स्पष्टीकरण इस प्रकारका है यास९॥४॥ २९७ ११०००५ अब इन्होका मथप रीनिसे वर्ग इसीनिसे होताहै कि- सरख्या राशि९ इसके समान दूसरी सख्याका राशिए इस संच्यासे मरण्याकू गुणा किया ई नवेनवेश हुये. यह सख्या सारख्याका वर्ग हुआ ऐसा ही१५ का वर्ग १५ को १५ गुना करनेसे चौदहचौदह उन्नवासें।९६४ ए.ओरइसीहोरीतिसें २१७ कावर्ग-९५ ८८२०९ हुए. और १०००९का वर्ग १.०१... २५ हुए. F राणा म. १९3८ त २९७४२९७-८८२०९ 71...५x1...५-१.०१.०२५ लीलावती. करना १८ पात्य४४४ १ अत्य उपात्य ५० दूसरे प्रकारसेंउदाहरणकास्पष्टीकरण अबदूसरी रीति- उदाहरणका स्प अपमसः ९४९ - ८१ पूर्ववत् टीकरण ऐसा है फि-संरव्याराशि दिसल्या ३४ काचर्म करनेका दैवाइसरातिसे- ९कावर्ग ती पूर्ववत् ही होता है कारण अत्यगुणा 1 9 बह संरब्या' अकेली है उसमें यं- १+२८५४- त्यया उपांत्यकी कल्पना नहीं है.दू सरी संख्याका अंकराशि १५ इस वर्गहुवा राशीके अंत्य अर्थात चांई तरफका अबरतीयसरख्याका वर्ग- अंका है. उसका वर्ग एकळू एक गुना करनेसे एकी एकी १ आया. मिलाप ज्द उपात्य९४९ - मिलाप सो उसी एकके ऊपरकी तरफ रस्व फिरभी अपराशि२९५२="SEE /दिया. और फिर उसी नीचेके पळू दिगुणित करिके २हुए. उन २ळू उपा त्य संरच्या सें गुना किया तो वे यह उपरके संरख्या उसी के आगे रखी गई.मिलापसें हुए. अब नीचेके अंत्य अंक कू छेकदिया. तब उपांत्य अंक यही अंस हुआ. इस कू से गुना करनेसें चार चौक १६ऐसी संख्या ६ हुई. वह १६ संख्या पह लीटसंख्या के अस्याकू छोडके दूसरे अंकके नीचे अनुक्रमसें र- गए, १६ इन्होंका मिलाप करनेसे के ६ और और के नया १का ऐसा मिलाप करनेसें १९६ हुए. ए.१६संख्यांक १५ संरच्याका पर्ग हुआ- तीसरी संरच्याका अंकसशि २९७ है. इसमें अत्य अंक २ समान संरच्यार सें गुना करनेसें वेवे याये, वे उस २ के उपर रखे, और नीचे २ळू द्विगुणित करिकै हुए. उस४ संरल्याळू उपांत्य अंक ९ सें गुना किया तौ नौक ३६हुए वे ३६ पहले के नीचे धर- २१७ सरल्याका वर्ग हुआ. | चौक ८ आठ संख्या हुई. वह १ वर्गकरण प्रकारः। १ ६और अत्यर दिये तो३६ हुए. इन्होंके मिलापसे के ६ और ४ तथा ३ मिलके के ७ ऐसा मिलाप करनेसें हुए. वे एक तरफ रख देना. और नीचे के अंत्य अंक २ • छेक देना. तब उपांत्य अक है वे अंत्य हुये.फिर उसा साव्या का वर्ग नवें नवें ८१ हुए. ये ८१ऊपरके ७६ संरच्याके नीचे एकाधिक स्थानसे ररवेगए. ७५ फिर इन्होंका मिलाप करनेसे १ कप ६ और मिलके के ४ हाय आया १ वह १ और ऊपरके ७मिलकै ८के ८ सख्या ८४१हुई फिर वह नीचेकाअंत्य अंक २९उसकू हिगु. णित करके ५८ हुए. उन५५ कू उपांत्यसंरच्या ७सें गुना करनेसें १४ रख्या १०६ हुए.वे५०६ संख्या उपरके ८५१ संख्याके नीचे वापिक स्थानसें रखकर ४१ दोनो संख्या अपचतुर्थसख्या१०००५कावर्ग- ओंका मिलाप करनेसे १का चार और मिलके के मिलाप और केट मिलके ८८०६ हुए. नहुया फिर उस २९ अत्यअंकका उपां- फिरभी-अत्यराशि१.४२ % २०४० - 0 त्यग्रंक ७ कारणेसाते साते मिलाप उपास.. मिलाप यहा का वर्गहुआ. फिरभी अत्य राशि ०४२२०४•= . मिलाप. उपास.४.3 यह ! कावर्ग बुन्या. "फिरभी अत्य...x2-=२.४५ मिलापं १०.१०... उपास ५५५ T...२५,पहउपर रहे हुए ...५ सरख्याका वर्ग हुन्या. चे। पूर्वकी संख्या ८८१५ के नीचे एकाधिक स्थानसें रखकर ८८१५ दोनो संरच्याओंका मिलाप करनेसेंरके २के ९१६और मिलके१० का • हाथ उपाय.xo- यह कार १००० ..... . मिलाप २५ (२२) लीलावती आया १ वह १ और उपरका १ मिलकै २ हुए २३ २॥ केकेद मिलके सप ८८२०९ हुए. यह ८८२०९ संरच्यांक समूह २९७ सं- रख्याका वर्ग हुआ. चौथी संख्याका अंकराशि १०००५ है इसमे अं त्य अक १ का वर्ग एकीएकी एक हुआ, वह एक तरफ रखदिया फिरउसनीचेके १ को दिशुणित करनेसे २ हुए. इस संरख्याको उ पांत्य अक से गुणा किया गुणाकार • आया वह उस पहले या येहुए के नीचे एकाधिक स्थानसें रत्यनेसें । और मिलाप करनेसें २० हुए अनंतर उपात्य संख्या कोउसी । सन्यसे गुणा कर नसे वर्ग अंक आया वह उस पूर्व संख्या १ के नीचे एकाधिक स्थानसें. और मिलाप करनेसें हुए ... संरच्या सं- रब्याका वर्ग हुआ. फिर वह अंत्य संख्या १ है ऐसा समझ कर उस संख्याको द्विगुणित करकै उपांत्यसंख्या से गुणकर कै आया हुआ गुणाकार यह पहले १०० संरज्याके नीचे एकाधि- क स्थानसें सपफर मिलापकर ... संरव्या १... हुई. अनं- तर उपांत्यसंरया • कू से गुपक मायाहुया गुणाकार • पह उपरकीसंख्या १० के नीचे एकाधिक स्थानसें रखकर ... मिलाप करनेसें १.... संख्या हुई. वह ५०००० संख्या १०. इससंध्याका वर्गहुया. फिर अंपसरल्या राशि है ऐसा समऊकर उसा..संख्याळू दिगुणित करके उपांत्य संख्या सेंगु णा करकै न्यायाहुया गुणाकार यह पूर्वकी संख्या १०... के नीचे एकाधिक स्थानसें रखकर मिलाप करनेसें... सरन्या ५.....हुई, अनंतर उपांत्य अंक कू से गुणाकन, रके आया हुआ गुणाकार • पहपहले आईहुई। के नीले एकाधिक स्थानसं रखकर निसार करनेसे संन्या:- . १०....

वर्गकरणमकार हुई. यह १००० ००० संरच्या १००० संरब्याका वर्ग हु या फिरभी अंत्य संख्यांक १०.. है ऐसा समझकर उस अंत्य संरच्या १००० • दिगुणित करकै २००० हुए. इन २००० – उपांत्य अंक ५७ गुणा किया. २००० तौ० का०० का दूणा १० का १० सब संरच्या १००.. वह १००.० पूर्वकी संख्या १०..... के नीचे एकाधिक स्थानसें १०००००० रखकर मिलानेसें००१००.. संख्या हुई अनंतर उपांत्य सख्या ५ कावर्ग ५ कू ५सें गुणनेसें २५ हुए. वे२५उस पूर्वकी संख्या १०० १०.०० के नीचे ए- काधिक स्थानसे १०० १०.... रखकर मिलाप करनेसें००१०००२५ यह संख्याहुई. ००२ यह १००१००० २५ संरख्यांकसमूह १०.. ५ का वर्गहुआ. सोजानना. इसरीतिसें दूसरे प्रकारका उदाह रण हुमा. अव तीसरे प्रकारसे उदाहरणका रसपीकरण इसरीतिसें है. तृतीय प्रकारले उदाहरणकास्पष्टीकरण प्रथम संरच्या ९ इसके दो पिना प्र. के विभाग १.५ मे गफिए एक का और दूसरा का, तिन्में और ५ इन्होंका गु. णाकार २०उस२० संख्याळू दुगु मिलाप यहफावर्गका णा किया हुए. इस ४० संरच्या (दि. १४ के विभाग ५.८ मे- गुणाx८४८४२८९५ में उनदोनो विभागमेसें पहला संडप इसका वर्ग चारचोक सो निगम यह का सह मिलाना, औरपीछे दूसरा (इसरीतिस वागे २९० और १०००५ | खंड ५ इसका वर्ग पाचेपाचे नीय, चतुर्थ दोनो सरल्या कोकाभी | मिलाना. और फिर उनको जो- दकिरिलेना डदेनेसें६और५ मिलके का १४ गुणा ५% २०४3% ४० ४४ ४-१५ ५४५:२५ ५ <x<= वर्ग हुआ ' और ९ . (२२ लीलावती १ हाथ आया वह और ४.५ और डै. और मिलकै केटर खदिए, ऐसा मिलानेसें सब संख्या ८१ हुई.वह १ संख्या ९ संख्या का वर्गहुमा- अब दूसरी संख्या १४ इसके विभागकिये, एक ६का और दूसराद का. तिन्में और ८ इन्होंका गुणाकार ४८ संरण्यापू दुगुणा किया हुए. इस ९६संरख्यामें उनदोनो विभागोंमेसें पहला खंड ६ काचर्ग छै छत्रीस ३६ पिलाना. और पीछे दूसराखंड ८ इसका वर्गाठे आटे चोस? ६४ मिलाना, फिरउनको जोड देनेसें ६और ६.बारा और ४ मिलके १६ के ६ हाथ आया। वह दस और ३ तेरह और मिलके १९१ ररपदिये. ऐसा मिलानेसें सब संख्या १६ हुई. यह १९६ संख्या १७ संरख्याका वर्ग हुआ-इस रीतिसें आगे सूतीय संख्या २१७ और चतुर्थ सरन्या १००० ५ इन दोनो संरख्याओंका अपनी इच्छानुसार विभाग करिकै उनविभोगों का गुणाकार करके दुगुणा करे और उसमें प्रत्येक विभाग खंडरखंड का वर्ग करकै मिलाये और फिरजोड देनेसें नीचे वही संख्या यावे गी, तहां २९७ के नीचे ८४५०९ संख्या यावेगी, और १०००५ केनी चे १००१०००२५ यह संरच्या आवेगी सोजानिलेना. ग्रंथविस्तर भीतिसें यहां उनदोनो संरच्याओं का स्पष्टीकरण लिखानहीं.यह दि- शादिरलाई दीगई है.-इसरीतिसे तीसरे प्रकारका उदाहरण हुआ. अवचोयेप्रकारकाउदाहरणका स्पष्टीकरण इसरी निसें है- चतुर्थभकारसेंउदाहरणस्पष्टीकरण तहां २१७ कावर्ग ऐसा होता है कि सासरच्यांक १५३इशक कहिये २४ संरख्या२९७ इसमें इट३ एकवार कमकिए, और दूसरी बार मिला दिये. संरख्या दोहुई एक२१४. दूस मिलाप २.१ यह २९७कावर्ग हमा. री ३० हुई.लव २६५ और ३० - . इनका गुणाकार. ३.. र८२० कारगर वर्गमूल करणपकारः ३ इन दोनो संख्याओंका गुणाकार किया तो संख्या ८८२०० हुई इसमें इष्ट अंक ३ इन्होंका वर्ग तीनधिके नौ ९हुए मिलाये ८८२०३ तबके, ९, का०, २के २, ८ के के हुए.' ऐसा करनेसें दर संख्या८८२०९ हुई. यह ८८२०९ संख्या २९७ का वर्ग हुआ. इसी रीतिसें सर्वत्र जानना. यह चोये प्रकारका उदाहरण हुआ.॥३॥ इति वर्गकरण प्रकारः .. अथवर्गमूलकरण प्रकारः। Sur * अच वर्गमूल करने का प्रकार एक श्लोफसे कहते हैं, त्यक्त्वान्त्याविषमात्कृतिदिगुणयेन्मूलं समैत- इते त्यक्त्वालब्धकृतितदाद्यविषमाल्लब्धंहिनिघ्नं न्यसेत् ॥ पंन्यांपंक्ति हते समेऽन्यविषमात्त्य- क्त्वाप्तवर्गफलं पंक्त्यांतद्विगुणंन्यसेदितिमुहुः पंक्तेदलं स्यात्पदम् ॥१९॥ अर्थ- जिस संरच्यांक समूहका वर्गमूल निकालनेकाहो, उससे ख्या समूहके जितने अंक हों, उन अंकों में आदिसें लेकर एक- • पिपम, दूसरेको सम, तीसरेको विषम ऐसा जानना. उनधि षमसम अंक समूहमें जितने विषम अंक आवेंगे उत्तनेस्था- नोंके (एक दश इत्यादिक स्थानोंके मूल अंक आते हैं यह बा त ध्यान में रखना.- तहां जिससंख्यांकका वर्गमूल निकालनेका हो, उस संरल्यांकका अंत्य जो पिपम अंक हो, उस अंत्यविष , जो कभी फोई संख्या विषमसम, विषमसम ऐसी व्यवस्था उगाए पीछेअंत्य(सवतें चांई तरफका) काविषम नहीं हो, नौहा उस अत्यअंक के काजोषिमन्य हो, उसविषमयंकको अस्प अंकके सायलेकर फिर वे दोनों अक एक साथही विषम और अंत्यऐसें कहे जाते हैं.

( २६ लीलावती. मअंकमेसे जिससरख्याफफा वर्ग शद्ध होसके उससंरच्यांकका वर्ग करिकै यह वर्गाक शाह करे फिर जिसका चर्ग किया हो, उस मूल नकळू द्विगुणित करके एक और धरदेव और पहले विप. मअत्य अकमेंसें वर्गाफ शद्ध करनेसे नीचे जो शेष रहाहो, उ स शेष अंकके ऊपर उपांत्य समसंज्ञक अंक चढावे, ऐसा कर- नेसे जो संरच्या होवे, उसकुँ उन पहले हिगुणित करकै रस्येहुए कसे भागदेचे बह भागदेकर जो लब्ध आये, उस लब्धप्रकका वर्ग करिके उस वर्गाकडूं जो संरव्या शेष रहै उसके ऊपर विषम सरल्याका अक नदानेते जो संरच्या होवे, उस संरच्यासे शाह करे फिर जिन अंकोंका भाग देकर वर्ग किया होगा, उनमूल अकोंको द्विगुणित करकै वह द्विगुणित अंक पहले दिगु- णित करकै एक मोर ररपेहुए अंकले पक्तिमैं एफाधिक स्थानसें मिलाकर रवदेवे फिर उसपक्ति में जो अंक आयेहों, उनसें पूर्वकी शेषमें समसंख्या बढाकर उससंख्याकू भागदेनेसें जो लव्य सावे उसका वर्ग करकै आई हुई संरख्याळू उसशेषके आगेकी विषमसरख्या चढ़ाकर हुई सरव्यासे झाड करे, जो भाग आउ सको हिगुणित करकै एक और पंक्ति में एकाधिकस्थानसें रखकर मिलादेव ऐसा वारंवार जहातक सरप्याराशिके दहनी ओर पह ले अंकतक संस्कार करे, और एक ओर पक्तिमे अंक मिलाते जांय. ऐसा करनेसें जो पंक्ति मारे उसको आधा करनेसें जो अब बचे वह वर्गमूल होता है ॥ १९ ॥ . - १ इस वर्गमूलमे १. सरव्याके अदर अदर ९सरख्यातकही भागलगता है इसकाउपयोग अागके पाचमे उदाहरणम्, है सो जानना वर्गमूलकरणप्रकारः यह वर्गमूलकी रीति बहोत कठिनहै इसवास्तै ध्यानमें रहने के कारण इसवर्गमूलका उदाहरण कहते हैं- मूलंचतुचितथानपानांपूर्वकृत्तानांचसखे कृतीनाम् ॥ पृथक्पृथग्यर्गपदाभिपिडिबुद्दे विद्धियदित्तत्रजाता ॥४॥ अर्थ- हे मित्रा जोतेरी बुद्धि गणितशास्त्र में बढगईहों तों ४।९ और पूर्व उदाहरणमें कियेहुए वर्ग ८१६१९६१८८२०९ ॥ १००१००० २५ इन वर्गोंका मूल यांक क्या होताहै सो तूं पृथ- क्पृथक जान. अर्थात् जानिके कहदे. ॥४॥ अब इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इस निसें हैं:- नहां ४ इस संख्यामेर संरख्याका वर्ग बराबर शद्ध होता है. इसवात्तै ४का वर्गमूल २ हुए. ९इस संख्या ३ संख्याका चर्ग वरावर शद्ध होता है. इसवास्ते ९ का वर्गमूल २हुए ८१इस ससंख्यामें | ली सरन्या । यह विषम है और दूसरी संख्या है सो अंतकी होनेसें विषमही है, इसी कारणसें २१ ,यह संरच्या भी विषम ही समऊना. इस ८१ संख्यामें संख्याका वर्ग शाह होता है, इसमें ८१ का वर्गमूल ९हुए. - अब इसके अनंतरकी संख्या- राशिके वर्गमूल निकालनेका उदाहरण इसरीति में हैं:- तही संख्याराशि १९६ यहां पहला अंक ६ यह विषम, दूस रा अंक ९यह सम, तीसरा अंत्य अंक १ यह विधमहै सो समझना. पह- १ पत्र १५ की टिप्पणी देखो. २ इस उदहरणकी समझनेमें वर्गमूल पूर्व कह आएरीती. की याद परार रखो.३ यहां ।।३।५।७।९इन अंकोंकू विषम और रा०६॥

२६) लीलावती. मअंकमेसे जिससरख्याकका वर्गाद होसके उससंरच्यांकका वर्ग करिक यह वर्गाक शह करे फिर जिसका वर्ग किया हो, उस नूल अकळू द्विगुणित करके एक और धरदेथै और पहले दिप- मअत्य अकमेंसें वर्गाक शद्द करनेसे नीचे जो शेष रहाहो, उ सशेष अंकके ऊपर उपांत्य समसंज्ञक अंक चढाचे, ऐसा कर- नेसेजो संख्या होवे, उसकू उन पहले द्विगुणित करकै ररखेहुए श्री कसे भागदेवै वह भाग देकर जो खब्ध याये, उसलब्धअंकका वर्ग करिके उस वर्गाकडूं जो संख्या शेयरहै उसके ऊपर विषम सरव्याका अक चढानेसें जो संरल्या होवे, उस संरच्यासे शब्द करे फिर जिन अंकोंका भाग देकर वर्ग किया होगा, उनमूल अंकोंको द्विगुणित करकै वह हिराणित अंक पहले दिरा- णिन करके एक न्योर रत्वेहुए अंकके पंक्तिमैं एकाधिक स्थानसे मिलाकर रवदेये. फिर उत्तपक्ति में जो अंक आयेहों, उनसे पूर्वको शेपमें समसंरच्या पदाकर उस संख्याफू भागदेनेसें जो लव्य न्यावे उसका वर्ग करकै भाई हुई संख्याळू उसशेषके आगेकी विषमसरन्या चढाकर हुई संख्यास शाह करे, जो भाग यावेउ सको द्विगुणित करकै एफ और पंक्ति में एकाधिकस्थानसें रखकर मिलादेवं ऐसा वारंवार जहांतक सरन्याराशिके दहनी ओर पह ले अंकतक मत्कार कर, और एक योरपक्तिम अंक मिलाते जांय ऐसा करलेले जो पंक्ति माये उसको प्राधा करनेसें जो अक बचे वह वर्गमूल होता है ॥१९॥ १ इसवर्गमूलमे १. सरख्याक अदर अदर ९सन्च्यानकही भागलगता हे इतकाउपयोग यागफ पाचमे उदाहरगम के सो जानना.

(२७ वर्गमूलकरणमकारः .यह वर्गमूलकी रीति बहोत कठिनहै इसवास्तै ध्यानमे रहने के कारण इसवर्गमूलका उदाहरणा कहते है- मूलं चतुचितथानपानांपूर्वलतानांचसखे कृतीनाम् ॥ पृथक् पृथग्वर्गपदानिविहिबुद्दे विडियैदितत्रजोता ॥४॥ अर्थ-हे मित्रा जोतेरी बुद्धि गणितशास्त्र में बढगईहों तों १९ और पूर्व उदाहरणमें कियेहुए वर्ग ८१६१९६१८८२०९ । १००१००० २५ इन वर्गाका मूल यांक क्या होताहै सो तूं पृथ- पृथक् जान अर्थात् जानिके कहदे ॥४॥ अब इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीनिसें हैं:- नहां ४ इस संरख्यामे २ सरव्याका वर्ग परावर शह होताहै. इसवास्तै ४का वर्गमूल २ हुए. ९इस संख्या ३ संख्याका वर्ग वरावर शद होता है. इसवास्ते ९ का वर्गमूल ३ हुए ८१ इस संख्यामें पह- ली संरच्या १ यह विषम है और दूसरी संख्या है सो अंतकी होनेसें विषमहीं है, इसी कारणसें ८१ यह सरन्या भी विषम ही समझना. इस ८१ संख्या ९संरल्याका वर्ग शाह होता है, इसमें ८१ का वर्गमूल १ हुए. - अब इसके अनंतरकी संख्या- राशिके वर्गमूल निकालनेका उदाहरण इसरीति से है:- तही संख्याराशि १९६ यहां पहला अंक ६ यह विषम, दूस रा अंक ९यह सम, तीसरा अंत्य अंक। यह विधमहै सो सपना. १ पत्र १५१ की टिप्पणी देखो. १ इस उदाहरणकी समझनेमें वर्गमूलके पूर्व कह आए रीती. की याद वराहर रखो.३ यहां १।३।५।७।९ इन अकोंकू विषम और २००५ (२८) लीलावती ~ वाई तरफका अत्यविपम् अफ है उसमे १ काही वर्ग शह होस कताहै इसवारले उसासरव्याशा वर्ग एकीएकी हुन्या यह अका उस सरख्याराशिके अत्यधिषम अक १ से शकिया, तबभागल- व्य अकभी १ आया शेष शून्य नीचेवचा फिर जिस १ का वर्ग कियाथा उस वर्गके मूल । अककू "द्विगुणित करकै एक न्योरध- रदिये और उससव्याराशिके नीचे शेष जो० शून्य बचा है उ- सके ऊपर उस सरच्या राशिका उपात्य समसलक अक ९ च- ढाये उस९ सख्यामेसे पहले द्विगुणित करकै एक ओर रखे हुए अक २ से भागदेकर बेचौक पाठ सरव्या कह करे. भागल मिलोदाहरणका साष्टीकरण बसरच्या आई नीचे चाचीसरच्यारागि शेषप रहा फिरउस लब्ध अक ४ का वर्ग चार चौको सोलह १६हुए उन१६व २२ ककू सरन्या राशि नीचे पचा के ऊपर विषम १९६का हुअ१४ सरख्याक वर्गमूल हुन्या बनीहुई सरख्या१६मेसे रुड़ करे तब मे ६ शद किये तो शेपरहा • और मेएक शद्ध किया तो नीचेशेषरहा का एतावताशेप.. रहा वर्ग १) (११४२-२ (भाग १५२%3D वर्ग) (१ मिलाप २८ 'यह वर्गल चढानेसे पह ८ इन्होकू समऐसा तात्पर्य नहीं है कितु केवल सरच्याराशिमे एक, दो इत्या दिक जो स्थानहै उन्हाके अनुसार समविषय समझनेम तात्पर्य है अत्य और आदि ता सदा विषमही समझ जाते है २८ वर्गमूलक रणभकारः (२९ । अव इन१६ संरख्याको ४ इनसंख्याका भाग देकर चाका वर्ग१६कियाहै. इसवात्तै वर्गीक १६का मूल अंक ४है संरख्या- • द्विगुणित करकै पहले हिगुणित करके एक ओरकी पंक्ति मेंर- स्वेहुए अंक २ के नीचे एकाधिक स्थानसें १, ररवकर मिलानेसें सं रख्या २८ हुई. उस२८ संख्यापक्तिको आधा आधा करै अर्थात् उसको २ से भाग दिया १४ तौं लध अंक १४ हुए. को संख्या १९५ इस सरख्याराशि काचर्गमूल हुआ. अब इसके पीछेकी पांचमी संरब्याराशि ८८ २०९ के वर्गमूल नि- कालनेका उदाहरण इसरीति से है। संरच्याराशि८८२०९ यहां पहला व्यंक ९ यह विषम, दूसरा० यह सम, तीसरा यह पिषम, चोधाद यह सम, पांचमाद यहाधिपमहै. |एतावता तीन अंक विषम है इसधास्तै इन्होंका मूल कोई तीन यं- कोंका अर्थात् शर्तसंख्यास्थानतकल्ली यावेगासो सम्झना.-- नहा वाईतरफका अंत्य विपम अंक रहै उस अंकमें २ इस संख्याका वर्ग रद्द होसकता है, इसवासै वेवे चार ४ यह संख्या का बर्ग हुया ये संख्या - पाचमीसंख्याराशि ९८२०९ संख्याके अंत्यविषमा वर्ग)८८२०९९ आउ संख्यामेंसें शहकिए. ९४२-15 Vइस वर्गका मूल ३यह संरख्या दिगुणित करकै ४ संरव्याहुई व. पित्तपंप (भाग एक ह४ संरच्या एक ओरकी पंक्ति वापर में धरदी. फिर संरच्याराशिक नीचे शेप रहेथे, उनके ऊपर समसंख्या जो उस अंत्यप- ५० एट ३६ (९भाग २९३-४ ८१ ४२ लीलापती वेशद्ध किये .. हली है यह बढानेसें समसंख्या ४८ हुई उस १८सरख्याको पूर्यमे द्विगुणित करके एक ओर रखेहुए ४ संरख्यासें भाग देकर चारनमें उन्तीस सरन्या हुईसो १८ रुड़ करे. भाग लब्ध ९ आये नीपेशे प१२ रहे उसशेष संख्या १२ के ऊपर संख्याराशीका तीसरा विषम अंक २ चटाये, तो विषमसंख्या १२२ हुई उस१२२ संख्या मेंसें पहले भागलब्ध संरब्याका वर्ग नमेनमे एकासी ८१ हुए। १२२ तौं भागलप अंक ९आये. नीचे शेष ४१ रहे. जिस ९ सख्या-श का भागदेकर वर्ग कियाथा, उस ८१ वर्गकी मूल संख्या ९ फू द्विगुणित करके १८ हुए. उन१८ कू, पहले द्विगु- |णित करकै एक मोरकी पंक्ति में घरेहुए ४ संरख्याके नीचे एका धिक स्थानसें ४ रखकर मिला तबसंरच्या ५८ हुई सो एक यो रपंक्ति में धरदी. अब इधर संरख्याराशिके नीचे शेषरहेहुए ४१के ऊपर संरन्या राशिका चतुर्थ सम अक • शून्य है.सो चढा- करसमसंख्या ४१० हुई. उस ४१. समसंरब्याको उन एक ओर पक्तिने धरदिये हुए ५८ सरख्याका भाग लगाया. तो भाग का लगा और ४०६ संरच्या ४१० इस सरन्यामेसें शुद्ध की गई.५१: तष भाग लब्ध हुए नीचे शेष रहे नशेष अंक के कपर संरच्याराशिका पाचमा विषम अक ९ जोकि सबसे पहला है. उस- को चढाया तब विषम संख्या ४९ हुई उस४९संरल्यानेसें पहले भाग लब्ध ७ सख्याका वर्ग सात्तेसाते गुनपचास ४९हुए. वे २०- किये, तौं रमेशद्द हुए शेषरहा • और ४ में ४३इ हुए.शेष रहा- एतावता शेष०० रहा. अब इन ४९ सरव्याको जिन सरन्या- " पिनस की टिप्पणी देखो.

इन उदाहरणो मे 'वर्ग' इस अक्षरके यागेकी नरच्या उपरफे क्रमसे दूसरा २ समहे तीसरा विषम, चोचा समापाचमा विषमा माई . गर उर्गमूलकरणमकार. का भाग देकर ७ संख्याका वर्ग ४९ किया है. उनभागलव्य सं- ख्याको हिगुणित १४ करकै पहले एक मोरकी पंक्तिमैं ररये हुए ५८ अंक के नीचे एकाधिक स्थानसें ररयकर मिलानेसें ५६. सं रख्या ५९४ हुए. इन ५९४ संरच्या पंक्ति को अाधा आधा परको भाग किया अर्थात् उसको २से माग दिये। ९९४ (२९७ तौं उ- अंक २९७ आये.चे २९० संख्या- ८८२.१ इस संख्याराशिका वर्गमूल हुमा. अव इसके पीछे की छठी संरव्या राशि ००१००१०.०२५ के वर्गमूल निकालनेका उदाहरण इस प्रकारका है. संरब्याराशि १००१... २५ यहां पहला अंक ५ यह विषम है. छठीसरण्याराशि वर्ग) १०.१०.०२५७ २०:१० भाग वर्ग) में भाग .५२ कभाग वर्ग) प.भाग२० (तांग 1.५यहवर्गमूस वर्ग) १००० हुया. पंतपंक २०००१०००२ १५भाग वर्ग) १ वर्ग १४२-२ १४२-मिलाप रु.॥ 1.४२० . . । "५५२ २०० . मांग २५५ २५ ... मिलानेसे वर्गमूल संख्या होती है सोभी मानना. .

(३२) लीलावती . १ १ समा सातमा० विषम, आठमा० सम और नवमा १ पिपम है. 'विषम अक पाच है इसयास्ते वर्गमूल पाच अयोका अर्थात् दशसहस्त्रस रख्या स्थानका होगा- तहा पाईतरफका अत्यवियर्म अक है.उसी अकमे । इस सरव्याका वर्ग शाह होसकताहै. इसपास्ने एकी एकी एक १ यह १ सपाका वर्ग हुन्मा वह १ सरख्या १००१.००२५ सरल्याके अत्य विषम संख्यासे श किया इस वर्गका मूल अका को हिगु णित करके २ सख्या हुई. म.सरव्याकोएक ओर घरदी फिर स- रव्याराशिके नीचे शेष है कुछ नही उस के ऊपर उपात्य समसंभ झक • चढालिया सरन्या हुई उस को उनहिगुणित करके एक ओर रवीहुई २ सरव्यासे भागदिया तो भाग लब्ध सरच्या . आई शेष रहा फिर उसके ऊपर विषमसरख्या चढाई तो सख्या येहुई उस सरव्याकू पहले भागलब्ध सरव्या का वर्ग करिकै उस विषम सरव्या से शोधन करी तौ शेष रहा, इस वर्गका मूल अक इसको द्विगुणित किया तौ• ही हुआ उस कू एक ओरकी पक्तिमे एकाधिक स्थानसे रखकर मिलाप करनेसे २, सरल्या २० हु। ई फिर सरल्या राशिके नीचे शेष कुछ नहीं है उसके ऊपर सख्याराशिका अतसे चोथा समसजा । अक घटाया, उस पक्तिस्थ अक २० से भाग दिया तव भाग लब्ध • आया (अर्थात् भागटूटा नहीं और एकमेसे. सरल्याकू शोधनेसे नीचे शेष का . १ शयकू किसी सख्यास याभून्य से भाग दिया जाय, तो भागलम साच्या शून्पहीभातीहै नीचे शोध्य के ऊपर जो कोई अक हो तो पोका पोही अक शेष समझा जाताहै यदि से हीशोधाजाय तो नीचे ही शेषरहे लीलावती - का वर्ग करकै उस वर्गको आद्य अंकसें गुणाकर तिगुणा करके उस एक ओर रवीहुई संरख्याके नीचे एकन्यूनस्थानसैं ररये. फिरन्यं त्यत्रकका घन करकै उन एक और रखेहुए अंकके नीचे एक न्यून स्थानसैं रखकर मिलावै. ऐसा करनेसें जितनी भिन्नभिन्न संरख्या राशि होये, उन सबका मिलाप करते जाय. तौं सबके नीचेकी सं- ख्या घन होती है. यह पन आय अंकसे होता है. यह धनकर- नेका तीसरा प्रकार है । अथवा जिससंन्या राशिका पा नकरनेका हो, उस संरच्यारांशिम दोरखंड करे अर्थात उस संरख्या के दोनावलाग करे, फिरउन दोनों रवंडोंका गुणाकार करके उस गु- णाफारसें संरपाराशिक गुणा करे जो गुणाकार आये उसको ति गुणाकरकै रखे. अनंतरउनदोनों विभागोंका भिन्नाभिन्न घन कर नेसें भिन्न भिन्न आई हुई सरन्याका एकत्र मिलाप करे, और ज- ससंरन्यामें उस विभाग और संरव्याराशिका गुणाकार औरति गुणा करकै ररवरी हुई संख्याका मिलाप करै तौ नीचे जो संरब्या यातीहै वह संरच्याराशिकापन होता है. यह धन करनेका चौथा मका रिलै:- अथवा कोई एक संरख्या किसीएक संरख्याका वर्ग होसके ती तहां उसवर्गसंरब्याकूबर्गरांशिऐसा कहते हैं, ऐसे जगहपर उस वर्ग- राशिकामूल निकालना, औरउस वर्गराशिके मूलका घन करना फिर उस घनकी जो संख्या आवे उसको उसी घनसंख्यासें गुणा करना. . पहभी धन दो अंकोंका अर्थात् आदिऔर अंत्य इन अंकों का कहा.परंतु जहां संख्याराशिके अंक बहोतं होवे, तहां गिनने आदि और अंत्यअंकोंकापनहो चुका हो, उनउन प्रत्येक आदि और अंत्यअंकको एक आदिही समझकर उन न्होके अंत्यकाधन करतेजानपूर्वरीतिसेंयहरीतिउलटेक्रमसेह.अर्थात् पह- देशतिमें नीचे नीचे एकाधिक स्थानसेंरखे जाते हैं और इस्मे नीचे एकन्यूनस्पान सरस जालसाजानना घनमकारः - - चेनीचे रसके १३५ पहले ऊपरकी सासरेनीचेकी ऐसा करनेसें भी वर्गराशिका घन होताहै. यह घन करनेका पांच माप्रकार है. ॥२२॥ अब घनका उदाहरण कहते हैं :- उन्नवधनंत्रिघनस्यनंतथाकथयपंचघनस्यूधनं 17 चमे ॥ घनपदंचततोऽपिघनात्सरवेयदिघनेड तिघना भवतोमतिः ॥ ५॥ अर्थ- हे मित्र! जो तेरी बुद्धि घन करनेमें दृढभषीण होगई हो, तौं तूं मुझकूकाघन, तीनके घन २० का घन, पांचके घन १२५ का घन, इन घनोंकी क्या क्या संख्या आती है। सो कह,औ र इन्होंका धन करनेसें जो संरच्या आये, उससंरब्याका मूलभी क्या होताहै सो कह॥ अब उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसें हैं:- तहां प्रथम प्रकारसे उदाहरणाका स्पष्टीकरण ऐसा है कि-प्र- थम संख्याराशिहै. इस र संरच्याको तीनचार नीचे नीचे रस्सर पहले ऊपरकी संरण्यासें ९ दूसरे नीचेकी संख्या ९ को गुणा किया तब ८१ हुए. और उस गुणा करकै आई हुई ८१ संरव्यासें उसके नीचेकी तीसरी संरच्या ९को गुणा करनेसे ७२९ हुए. ए७२९ संख्या ९ संख्याका घन हुआ.-द्वितीय संख्याराशि है. इस ३५सं ख्याकू तीनचार नीचेर ररपकै २ पहले ऊपरकी संख्या २० से दूसरे नीचे की संरच्या२७ फू गुणा किया तब ७२१ संरव्या हुई.ौ रउसगुणाक रकै आई हुई ०२९सें उसके नीचेकी तीसरी संख्या २७ कोगुणा करनेसें १९६८३ हुए.ए१९६८३ संरव्या २७ संख्याका धन हुन्या:- तृतीयसंरच्याराशि २५ है. इससंरव्याकोश्यार नी. -- पनमकारः -- गुणा किया तब २९४ संख्या हुई. उस २९४ संरच्याळू एक मोर रवीहुई संख्याके नीचे एकाधिकस्थानसें ६५. ऐसी रवदी. उस- के अनंतर उस आद्य अंक ७ का घन ३४३ हुऐ उस ३४३ संरच्या यूँ एक ओर रवीहुई संख्याके नीचे एकाधिक स्थान- ६५ ऐ सी रखदी. इसरीतिसें सव-चारोंही संख्याराशिओंळू एक ३४३ एकके नीचे एकाधिक स्थानसें एफंदश इत्यादिक स्थानानुसार | रखकर मिलाप किया तव ६.संख्या १९५८३ आगई.यह .. १९६८३ संख्या २७इस २४३ संरब्याका घन हुआ.- अब तृतीयसंख्याराशि २९ है.९६८७ इसमें १ यह अंत्यहै, २ यह आदिहै, फिर मिलकर अंत्यहै, और ५यह आदिहै.सो समज मा. तहां प्रथमतः यत्य अंक १ का घना ही हुआ, उसाईं एक ओर धरदिया. उसके अनंतर उसी अंत्या अंकका वर्ग किया उसवर्गसंख्या १ फू अंत्यसें पहला जो आद्य अंक २ है उससें गु णा किया, तब संख्या २ हुई. उस र संरव्याकू तिगुणी करने से ६हुए. उन ६· पहले एक ओर रवीहुई संख्या के नीचे एका- धिक स्थानसें ऐसा रस्वदिया. पश्चात् उस अंत्ययंक से पहला व्यायांक २ का वर्ग ४ हुआ, उस ४ अंकफू अंत्य अंक : से गुणा किया तव संरच्या ५ हुई. उस संख्या कूतिगुणा कि- या, तब संख्या हुई. उस १२ संख्याकू एक अोर रस्सी हुई सं सारख्या के नीचे एकाधिक स्थानसें ऐसीरखदी. उसके पोटो उस आय अंक २ का घन हुआ. उसे ८संख्याकू एक ओरर. रखी हुईसंरच्या के नीचे एकाधिक स्थानसें ऐसा रख दिया. और सर संरच्याओंका मिलाप किया, तब.. १०२८ संख्या आई. यह:०२८ संख्या १२ संख्याका धन हुआ.अब फिर संरच्या- , १

लीलावती
राशि१२५ के अंत्या और आदि २ इन्होको एक अंत्यही समझा
तब अंत्य अंक १२ हुए. और याद्य-अंक ५ हुए. उन १२ का धन
१७२८ हुआ. उस१७२कू एक भोर रखदिया. फिर उसी अंत्य अं-
क १२ का वर्ग किया.वर्ग १४४ हुआ. उत्तवर्गसंरख्या १४४ आद्य
अंक ५ सें गुणा किया तब ७२० संख्या हुई. उस०२० सरच्याकू
तिगुणा करनेसें २१६० संख्या हुई. इस २१६० संख्याकू उन एक
ओर रखेहुए अंकोंके नीचे एकाधिक स्थानसें १७३६. ऐसा रख
दिया. उसके अनंतर उस अंत्य अंक १२ के पहले पाच अंक ५
का वर्ग २५ हुआ, उसवर्ग २५ संख्याकू अंत्ययंका सेंगुणा किया
तब ३०० हुए. इस ३. संख्याकू तिगुणा किया तब संख्या ९००
हुई. यह ९० संख्या एक ओर ररवीहुई संरख्याके नीचे एकाधिकस्या
नसें १७२८ ऐसीरखदी. फिरउस आय अक ५ का घन १२५ हु
संरच्या एक ओर रखी हुई सरख्याके नी
एकाधिक स्थानसें रखकर सब संरच्या ओंका मिलाप करनेस
सब संख्या १९५३१३५ हुई. यह १९५३१२५ संरच्या
१२५ इससंरख्याका घन हुआ. इसरीतिसें
अन्य संख्याओंका सीकरना. यह धन कर
नेका दूसरा प्रकार हुआ
अब तीसरे मकारसें उदारणकास्पटीकरण कहताहूं--
प्रथमसरन्याका घन पूर्ववत् . दूसरी संरख्या २७ है. इसमें द.
हनेहाथका श्राद्य अंक है और अंस्य अंक है. तहां पथमतः
आद्यअंक ७ काधम ३४३ हुए. इन३४३ संख्याळू एक ओरर.
रिपदिया. फिरउसी आप७ अंकका वर्ग५९ करकै उस४९कू उस
आद्यअंक केपीछेके अंत्य अंक रसें गुणा किया, तबसरख्या ९८
२१६०
आ. वह
१२५

का घन ३४३ घनप्रकार द्वितीय प्रकारसे उदाहरणका स्पष्टीकरण सवसरव्याओकू एकाधि प्रथम सरन्या ९ का घन पूर्ववत् स्थानसे नीचे नीचे रखा द्वितीयसरच्या २७ २॥ ४४ आदि गुणा२८ प्रतिगुणाः रंट ७ कावर्ग४९४ अत्य३ गुणा९८ तिगु० २९४ यह २७ का घन हुआ २काधन अत्य आय १ " तृतीयसरव्या १२५ सबसल्या काघन अत्य .१ वर्ग १४ आदि २ गुणा२४ तिगुणा २ का वर्ग ४ x अत्य गुणा ४ *" आदि २" धन८ यहाकापन अत्य १.१३ , वर्ग१४४x आदि५ गुणा७२०४ निगुणा२५६० और५ इसकू आदि फिर १२इसकू व्यत्य ५ कापर्ग२५४ अत्य १२ गुणा ३०० १७२८ १२ काधन १७२८ M ९.. समऊना ५काधन १२५ सवसरच्या १७२८ १९५३१२५ हुई उस९८ सरच्या तिगुणा किया लब २९४हुए. इन २९४ कू उन ओर रखेहुए ३५३ यह २५ काधन हुआ अंकके नीचे एक न्यूनस्थानसे, ३४३ ऐसार खदिया. फिर अत्य अक २ का वर्ग को आय अंक ७ से गुणा करकै २८ हुए इन २८कू निगुणा किया, तब ८४ हुए. इस ८५ सं- ज्याकू उत्स एक योर ररवीहुई सरल्याके नीचे एकन्यूनस्थानसे ३४३ ऐसारचदिया. अनतर अत्यअंक २ का घन८ हुआ. उस आठकू उम एक ओर रवीहुई सरल्याके नीचे एक न्यूनस्थानसे ऐसा खदिया. फिर उनसब सरन्याओका मिलाप किया, (४२) लीलावती . २७ ३४३ तव संख्या १९५८३ हुई. इसरीनिसें दूसरी सर्व संख्या ओंका धनजानना. परददर अथ चौथे प्रकारका उदाहरणकास्पष्टीकरण कहताडूं:- तृतीयप्रकारमें उदाहरणका स्पीकरण. द्वितीयसंख्याराशि आय. suxxxv=३४३ घन. tv-९ वर्गको अंत्य र कारकै गुणा ९८४३- २९४ अंत्यः । २४२-४ वर्गकोआप करिकै गुणा २८४३, २४२-४४२८ घन. सवसंख्या संरच्या • खंड २१७ २०४७ - १४.४२५४३७४०४३-२४० यह स-1९६८३ रन्याकाधनहुआ.न. २०४२०३४००४ २००८ ७४७-४९४७% ३४३ माधमकारसे उदाहरणका स्पष्टीकरण. संरव्या रखड गुणा ४ गुणा ५% २०x१८०४ ३८५४० पूर्वसंरख्या ११३४० ४४४-१५४४ % ६४ २० कापन पटा हुआ ५.४५-२५४५ - १२५ एवंसत्रज्ञेयं. इसमिलापळू उपरकी संख्या में जोडदिया. संन्याकापन जबरहुया. ३४३ ३४३, मिलापः गुणा ११. इसमें द. प्रथमसंख्या राशि हे. इसमे ४ और ५ ऐसे दो तहां मयमतः धमग्नदोनोंरचंडोंफा गुणाकार फिया, सब संरच्या २० (एक ओरर. कारसें संन्याराशि र गुणा किया, तब संख्या १८०सरकू उस उसा८. गुणाकारकू तिराणा किया तय संख्या ५०हुईब संख्या ९० धनमकार ख्याकू एफ और घरदिया. अनंतर उन और ५ संडोंका भिन्नाभि नघन किया तहां ४ का घन ५५ और ५ का घन १२५ ऐसे भिन्नभि नपन करनेसें आई हुईसंख्याको ६५ एकत्र मिलाप किया, तब १८९ संख्या हुई. उस १८ में पूर्वक-टेरे रकै एक ओर रखीहुई सं ख्या ५४० मिलाई. १६ तव संख्या ७२९ हुई. यह ०२९ संरख्याका धनहुआ:-' दूसरी संख्या २ है इसमें २० और ऐसे दोखंड किये, नहां प्रथम उनदोनों खंडोंका गुणाकार किया तयार हुए. उस१४० गुणाकारसें संख्याराशि २० कूगुणा किया तय३७८० गुणाकार आया, उस ३७८० कुंनिगुणा किया, तब ११३४० संरच्या हुई. इस१३४० संख्याकू एक ओर धरदिया. अनंतर उन२० और ७ इनरखंडोंका भिन्न भिन्न धन किया, तहां २० का घन ८०... औ र का घन ३४३ ऐसे भिन्न भिन्न घन करनेसें आईहुई संख्या- का मिलाप किया, तब संरच्या ८३५३ हुई. उस ८३४३सं- नरव्यामें पूर्व एक ओर रवीहुई ।।३४० मिलाई. तब १३४. सरच्या ११६८३ हुई.यहा९६८३ संरव्या२७ संरव्याफा धनहुआ. इसरीतिसें सर्वत्र जानना. अब पांचमें प्रकारसें उदाहरणका स्पष्टीकरण कहनाहूं:- संन्याराशि ९यह संख्या३ संख्याका पर्ग होसकता है इसवासी लीलावती. arket. इन ९ संरख्याकू वर्गराशि कहते हैं इसबर्गराशि९ का वर्गमूल ३ निकाले, इस ३ सरच्याका घन तीन त्रिके नौ और नौंत्रिके २७स) लाईस हुए उस३७सख्याकू उस २७ संरब्यासे ही गुणा किया तब ७२९ संख्या हुई यह ७२९ संख्या ९ संख्याका धन हुआ.- वर्ग मूलसें घनका स्पष्ट उदाहरण समझने के वास्ते टीकाकार वर्गमूलका उदाहरण दिरयाते है - थर्ग इसका मूल है. इसयास्ते " संख्या कू वर्गराशि कहते है . इस पर्गराशि ४ का मूल २ निकले, इस२ सं रख्याका घन ८ हुए उस८ सख्याकू ८ सख्यासे ही गुणा किया, तब आठे आठे चौसठ ६५ हुए. यह ६४ सरच्या, ४ सरन्याका घन हुन्या.- इसरीतिसे सर्वत्र वर्गराशिमें धन निकालना ।। इतिघनप्रकारः प्रथघनमूल प्रकारः। अब दो श्लोकोंसे घनमूल निकालनेका प्रकार कहते हैं:- आग्रंघनस्थानम थाधने हे पुनस्तथा-त्या हुनतो विशोध्यम् ।। घनंपृथक्स्थं पद्मस्यकृत्याविघ्या तदायविभजेत्फलंतु ॥ २३ ॥ पंक्तयान्यसेत्तरक- तिमत्यनिधी त्रिनीत्यजेत्तस्मथमात्रफलस्य ॥ घनंतदाद्यावनमूलमेवंपक्तिभवेदेवमत्तःपुनव२४ अर्थ-जिस सरन्या राशिका घनमूल निकालनेका हो, उससे ख्या में प्रथम कितने स्थान है सोदेखना. नहा आद्याक (संख्यारा शिकेदहिनी ओरका पहला अक) धनस्थानका होता है. उसके पीछेके दोय अक घनस्थानके नहीं होते हैं. फिर चोथा अंक धन- स्थानका होता है. इसरीतिसे आगेभी संध्या राशिके अफ देखनेसें यहवर्गमूल "मूल चतुर्णाचलथानपाना" इस श्लोकमे लियाहे पृष्ठ.२७ देखो १ - घनमूलपकासा | उससंरव्या राशिमें जितने घन स्थानके अंक मिलसकेंगे उतने अंकोंकी स्थानसंख्यासें ही घनमूलमें भी अंक स्थान रहेंने,ऐसा जानना और जहां घनस्थानका' अंक एक हो गयाहो, उसके पीछे दोअंकअघनस्थानके हो और सिसके पीछे घनस्थानका अंक न- ही हो, तौं तीनों मिलके एकही पनस्थान होगा यह समझना. और जहां एक स्थानका अंक है. और दूसरा अघन स्थानका अंक हैं,तौं तहां एकही घनस्थान होगा. यह समझना. और जहां केचा |ल एकही संरब्याराशि होगा वहां तौं घनस्यान एक ही रहेगा. यह सिद्ध ही है. फिरजिलसंरब्धाराशिका घनमूल निकालने- का हो, उस संरव्या राशिके अस्य (बांई तरफके) घनस्थान अंक मेंसें जिससंरख्याका चनक शोधन किया जाय उस संरन्या- का घन करिके उस घनांकफू शोधन करे, जो शेष रहे उसके ऊपर आद्य अंक चढाये.और उस घनके मूल अंक एक योर रखदे दे. फिर उसघनके मूल अंक (अर्धात् जिसका घन किया हो, उस अंकका)वर्ग करके वर्गीक संरख्या तिगुणी करै, और उत्त विगुणित वर्गाकसंख्यासें संरव्याराशिको भागदेवै. जितनेका भाग बैठे उसलब्ध कळू ॥२३॥ पहले घनमूलके अंकक पं क्ति ऊपर पर देवें. नीचे जो शेष बचे उसके ऊपर आद्य अंक चढाये, फिरउसी लब्धभागांकफा वर्ग करे, उस वककू उसल- ब्यक्षागांकके पंक्तिस्थित अंत्य अंकसें गुणा करे, जो अंक आये उसको तिगुणा करकै संरच्याराशिसें घरादै, जो शेष रहे उसके ऊपर पाद्य अंक चढावे. फिर उसी भागलब्ध अंकका घ. नकरके संरच्याराशिसें घटावे. ऐसा संस्कार संरख्याराशिके सर्व अंकोंतक वारंवार करते जांय ऐसा करनेसे एक ओरकी पंक्तिमें " लीलावती ९ जो (भागलब्ध ) अंक आवे, वह घनमूल होताहै॥ २४ ॥ अब इस घनमूलका उदाहरण कहनेका है. सोती प्रथम घनप्रकरणमें ही “धनपदंचततोऽपि घनात्सरवे." इस चरणमें सूचित कियाही है. अब उन पूर्व श्लोकोक्त उदाहरणो के घनमूलका स्पष्टीकरणमात्र यहां करताहूं. तहां पहले उदा- हरणमे घन २९, १९६८३, १९५३१२५, इन्होका पनमूल नि- कालनेकाहे. सो इसरीतिलें- प्रथम संरख्या राशि है. इसमे याद्यसंख्या ९ है. सो सं. ख्या घनस्थान हुआ. उसके पीछेकी दोसंख्या' ७२ है. ७२ घनस्थान नहीं है और उस०२ 'प्रथमसख्याराशि ७२९ मै पनघटसक्ताह संख्याके पीछे चौथी कोई भी सं ख्या नहीं है. इसवास्तै धनस्थान इसकाघनमूल हुए २९ भी नही है इसमें ७२९ इस सं- द्वितीपसरल्याराशि स्याराशिमें एनस्थानसंरच्याक एकही होनेसें इस०२९ संरच्या २० व४२३८१२४ राशिका घनमूल अंकभी कोई एकही आयेगा सो समारख- गुपा९८४३ तिगुणा-०३४३ ना.औरयह धनस्थान ७२९ इन तीन अंकोंका एकहीहै. अब यहां०२९ संख्या राशिका घनमूल निकालनेका है. तसं रख्याराशिका बाईत्तरपका अंत्यनस्थान अंक ७२९ है. इस ७२९ अंकमेंसें ९ संख्याका घन.३९ अंक शोधन किया जाता है, इसवासैंका घन ७२९ फरकै उस०२९ संख्या ५२९ ससंरच्याराशिसें घटाया. तब शोधन बराबर होगया शेष ००० ९ साधन कानगु. कावर्ग:९ अत्यरसे ३२८ २९४ किया २९४ ३४३ . कापन ३२३ पनमूलप्रकारः रहा. घन ७२९का मूल अंक ९है.यह कारही उस७२९ राशि. का घनमूलहुआ: यहां एक अंकके घनमूलमें दूसरा कुछभी संस्कार करने पड़ता नहीं. अब द्वितीयसंरच्याराशि १९६८३ का उदाहरणस्पष्टीकरण- संख्याराशि९६८३ में आद्य अंक ३ यह धनस्थान है.इस ३ के पीछेकेदोयअंक ये पनस्याननहींहै. तिसके पीछेका अंक ९ यह घनत्थान है तिसके पीछेका अंक १।। यह घनस्थान नहीं है. एतावता उक्त संख्या राशि १९६८३ मेंघ नस्थान अंक दोय हैं इसवास्तै इससंरज्याराशिका घनमूल को- ईभी दो अंकोंका होगा सो समझ रस्यना. और इस संरव्याराशि १९६८३ के अंत्य घनस्यानसंख्या ९ है.और उसके पीछे जो संख्या है वहघनस्थान नहीं है. इसवास्तै वह संख्यामी ९ संरण्याके साथही लीगई. तब अंत्यघन स्थान अंक१९ हुए. इस १९ संरख्यासें २ संख्याका घन पदसकताहै इसवात्तै उस संख्याका घम८ करकै उससंरब्याकू अंलधनस्थानके अंक १९ सें घटाया. तब नीचे शेषरहे । के उपर उस संरच्याराशिक १९ सें पहला अंक इलिये. संरच्या ११६हुई. और उसघन के मू ल अंककू एक ओर रवदिया फिरउस धन के मूल अंक २ का वर्ग कियातौं वर्गीक ४ हुए. उस ४ वर्गीक संरब्याळू तिगुणा कि यातच १२ हुए. उस १२ सरव्यासें संरपाराशि ११६ १२ का भाग दिया.(औ इस १२ का ८ या काभाग देखें, तो आगेका कुलकर्तव्य । वह कर्तव्य ऐसाईकि- उसका भाग होजाने पीछे शेषसंख्याके ऊपर आद्य अकको चटाके जो सरल्या आयेउसमेसें उसभागलब्ध अकका वर्ग करिकै अंत्यपक्तिस्थसें गुणाकरिक और अनतर निगुणा करिकै बजानेगा (४८) लीलावती | शेपरहाहै सो नहोगा इसपास्ते काही भाग दिया.) तो संरच्यान हुएवे८४ संरख्या :१६संख्यासें घटाये, तौं शेष ३२ रहे. लब्ध आये. वे एक ओर पंक्तिमे रखेहुए २ के ऊपर ररपदिये. फिर ३२ के ऊपर इससे आद्य अंक ८ लिए तो संरच्या ३२८ हुई. अपउन एक और पक्तिमें रखे हुए लच्यभागांक ७ का वर्ग ४९ करकै उन ५९ कू उस लब्धभागांकके पक्तिमे स्थित अंत्य अंक २ सें गुणा किया, तब ९८ हुये इन कू तिगुणाकरनेसें संरख्या २९५ हुई. इस२९ संरव्याकू उस ३२८ संरव्यासें घाई तव शेप संख्या ३४ आई इस ३४ के ऊपर आद्य पनस्थानका अंक ३ बदायातय संरच्या३४३ हुई. तहां फिर उसी भागलब्ध अंक ७ का घन ३५३ हुआ. इस ३४३ सरल्या संरव्याराशि ३४३ सें पाया, तब शोधन वरावर हु आ शेष... रहे और ऐसा संस्कार करनेसें एक योरकी प- क्तिमें भागलब्ध अक आये, यह २७ अंक उसा९६८३ संरख्या राधिका घनमूल हुआ- अब हत्तीय सरन्याराशि१९५३१२५ है. तहां आयअंक ५ घनस्थान. दूसरा अक २ अपनस्थान, तीसरा अक १ अपनस्थान, चोथा३ घनस्थान, पांचमा५ अधनस्थान, उटा९अघनस्थान और सातमा घनस्थान है. ऐसे इसा९५३१२५ ली सरच्या घराने योन्य अपात कम होना चाहिये इसवास्ले उक्तउदाहर णमे ७ काही भाग दिया यार काभान देनेत अन्यकार्य होसक्ता नहीं जिताकिफाचर्ग ६४ को अन्परसे गुणा किया तर २८ हुए, उन१२८ को तिगुणा करनेसे ३८४ हुये.ये ३८. अक नीचंकी ३२८ सरन्याराशिसे घट सक्ता नहीं. इसवात प्रथमडी भागदसे कमसत्या कादिया तब सम्मा हए २१४ सरच्या मंग्व्यासं पदमपतर इमरीनिस सयजानना

घनमूलप्रकार
१
.
संरख्याराशिमे पनस्थानके तीन तिस्तेइससंख्याका घर
नमूलभी कोई तीन अंकोंकाही आयेगा. सो समझना. अब यहां
सरव्याराशि १९५३ १२५ का घनमूल निकालनेका है, तो सरव्या
राशि १९५३१२५ के अंत्य (सबके पीछे वांईतरफका ) धनस्था
नक है.तिसमेसें १ संरख्याकाही धन शड होसक्ता-॥
है, इसवास्ते सरख्याका घन करकै शह फिया, नीचे शेष
रहा. उसके ऊपर आय९ चढ़ाये संख्याराशि हुई. और उसप,
न के मूल १कू एक ओर रवदिया. फिर उस धन के मूल अं
की का वर्ग १ किया, तब वौक १ हुआ, उसवर्गाक संरच्या ति
गुणा किया, तब तीन हुए. उस ३ संरच्यांकसें संन्याराशि
भाग २ को दिया. सौ संरचया ५हुई. यह ६ संरख्या उस ९ संख्या
राशिसे घटाई, तबशेष३ रहे. उनके ऊपर आय ५ चढाये,
संरख्या ३५ हुई. भागलब्ध आये, वे २ एक ओर रवीहुई सं
ख्याके उपर चढादी तब संरख्या १२हुई. अनंतर उसीलब्धभा
गाक सरन्या२ का वर्ग ४ किया, उसफू पक्तिमें स्थित अंत्य
अफीमें गुणा किया तब हुए. इस५ संख्याको तिगुणा कि-
या तब १२ संख्या हुई. इस५२ सरख्याकू उस ३५ संख्याराशि
सें घाई तवशेष २३ रहे इस २३ के उपर आद्य धनस्थानका
अंक ३ चढाया, तब संख्याराशि २३३ हुए. तहां फिर उसीभाग
लब्बर संख्याका घन करकै घटाया, तब शेष २२५ रहे इस
| २२५ सरन्याके ऊपर आघु अंक लिया तब संरच्याराशि
हुई. फिर भागलब्ध पक्तिस्थित १२ संख्याका वर्ग १४४ किया,
१ टिप्पणी पहली (४८) देखो

लीलायती.. उन १४४ • तिगुणा किया तब संख्या ४३२. हुई. उस४३२ संख्या से उस२२५१ संरब्याराशिको ५ सें भाग दिया तौ २१५. हुए. उ. न२१६०• संख्याराशि २२५१ मेसें घटाये, तब शेष रहे. उन के ऊपर आय अंक २ चदाये नप संख्याराशि ९१२ हुई. उसभा गलव्य अंक.९को एक ओर रखेहुए,१२ अंकोंके ऊपर चढानेसें सं ख्या २५हुई. फिरउसीभागलध५ अंकका पर्ग:२५ किया, उस २संख्या५ अंस अंक १२ सें. गुणा किया तब ३०० हुए. इन३०० कू तिगुणा किया'९०० हुए, इन९०० फू उससंरव्याराशि ९१२ सें घटाया, तव शेष रहे, उन १२ के ऊपर संरच्याराशिकाआद्य घन स्थानांक ५ चढाया तब २५-यह संरव्याराशि हुई. फिर उसीभान गंलब्ध५ अंकका घन किया तौं १२५ हुए. इस घना२५ संरच्या- • उस१२५ संरल्याराशिसें घटाया तब शोधन घरावर हुआ शेष ... रहा. और ऐसा संस्कार करनेसें एक और पंक्ति में भागलब्ध अंक १२५ आयेहैं वे १२५ अंक १९५३१२५ इस सं- रम्याराशिका घनमूल हुआ. एवं सर्वत्र. AL हत्तीय संरपाराशि- १९५३१२५ (१२५ पंक्ति यह घनमूल. साधन गु पन वर्ग. १४१-४३०३. २४२४४३-१२ ३५२-१२-८ १२४१२-१४.४३%3D४३२ ५४५-२५५-३..x३-९०. ५४५-२५४५% १२५ पन. १२९ पनमूलहुया. २२५१ इतिघनमूलपकारः। इतिपरिकर्माष्टकं संपूर्ण..

भारजातिप्रकार अथभिन्नपरिकर्माष्टकम् नहांप्रयमअंशसवर्णनमें भागजानिप्रकार. अवभिन्नपरिकाप्टक कहनेका इच्छा करनेवाले श्रीभास्कराचा प्रयम मिलाप (जोडा के उपयोगमे आनेके वास्ते चारजातिकाअंशा सवर्णन फहिये भागोंकी समान जानि निकाउना कहते हैं. तहां प्रथम भागजातीफा प्रकार एक सोकसे कहतेहै. अन्योऽन्यहाराभिहतोहरांशी राश्योः समच्छेद विधानमेवम् ॥ मिथोहराभ्यामपन्तिाभ्यांयहां हरांशी सधियात्रगुण्यौ ॥ २५ ॥ अर्थ- उपर अंशसंख्या राशि ररचना और नीचे इरसंरख्या राशि रखना, फिर एक अंशसंख्याको और उसके छेकू दूसरे संख्या के छेदसें गुणा करना. अनंतर दूसरी अंशसंख्याकू औरउ सके छेदळू पहले अंशसंख्या के छेदसें गुणा करना. ऐसा संस्कार करतेजाय, अंशसंख्याराशि दोसे अधिक होय, लौं तहां पहले पहले अंशसंख्याको और छेदसंख्याको पीछे पीछेके छेदसें और पीछे पीछेके अंशसंख्याको और छेद संरख्याको पहले पहले छेद संन्यासें गुणा करते जाय तौं सब संख्याका छेद समआता है. यह समच्छेद निकालनेका एक प्रकार हुआ- अथवा रखी हुई संख्यामें जितने छेद पृथक् पृथक् आयै उस सब वेदसंख्या ओंकू कोई एक समान अंकसें भाग देकर जो भागाकार आये, उन पृथक्पृथक् भागाकार संख्यामें पहले छेदसंरण्याके भागसें दूसरे अश और छेदकों गुणाकरे, और दूसरे छेदसंख्याके पहले अंश और छेदकोगुणाकरे तो समच्छेद होताहै. और फिर अंशस्थान "एक इति पाठ पुस्तकान्तरे -- लीलावती १ के जो अंक आवे उन्होंमें बाकीनिकाले, तभी भागजातीका व्यवकलित सिद्ध होता है. फिर अपवर्तन करकै संक्षेप करलेना. यह भागजातीका दूसरा प्रकार है. ॥ २५॥ अप इस भागजातीका उदाहरण कहते हैं:- 5. रूपनयंपंचलवस्त्रिभागोयोगार्थमेतान्वदतु. त्यहारान् ।। त्रिषष्टिभागश्च चतुर्दशांशः सम- च्छिदौ मित्रवियोजनार्थम् ॥ ६॥ अर्थ- हे मित्र!३, और इनसंख्याराशि अपूर्णफिोंका जोड करनेके वास्ते समच्छेदरूप क्या होताहै, सो कहा और इनसंरन्याराशिअपूर्णाकोंकीनाकी निकालनेके वास्तै समच्छर रूप क्या होताहै सो कह. उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीनिसें है। संरव्याराशिअपूर्णाक १, ३३ है.इन्मे पहली संख्या ३ है। उस के अंशसंख्या ३ळू दूसरेराशि देकी छेदसंरख्या ५ से गुणा करनेसें१५ हुए. और पहले छेदसंरच्या १• दूसरे राशिकी दसंरख्या ५ से गुणा करनेसे ५ हुए ऐसे प्रथमराशि हुए. चूने सरी संरया है उसके अंशा पहली राशि के छेदास गुणा किया तब हुआ. और छेद ५• गुणा करने से पहुए. ऐसे दूसरीसंख्याका राशि हुआ.- अब नीसरी संख्यासशि है उसका छेद ३ है. उस मथमउदाहरणकासष्टीकरण. कारिक पहली राशि किरन पहुए छेदणा के मंरा गुणाकर- गुणाकरनेसे १५ हुए. ऐसे प्रयमराशि हुए दूसराराशिद भागजातिप्रकार। , उसकी अंशसंरच्या १४ • ३ से गुणा करनेसे ३ हुए. और दसरख्या ५ कू गुणा करनेसें १५ हुए. ऐसी दूसरी राशि हुए. अब दूसरी संरब्याराशि जोई थी उसके छेदसंरख्या ५से ती- सरी सरन्या राशि के अंश १ गुणा करनेसें ५ हुए. औरछेद ३कू गुणा करनेसे हुए. ऐसी तीसरी राशि में हुए. इन५ ।। और ५ संरख्याऔका मिलाप करनेमे ५३ अश ५३ हुए, ती समान तीनों के भी सही हुए. इसयास्तै ३. यह संरच्या ३. इस संख्याका समच्छेद मिलाप हुआ. अंव दूसरी व्यपकलितकी रीतिसें भागजातीका उदाहरण ऐ साहे- सरच्या अशहै. निन्में छेद ५३, और १४ है. नहां इन ६३ और सरस्पामै ७ इस संरच्या समान भाग दि या. तब सातनम्में ६३ और दूने १४ होकर भाग ९ और २ आये. इन भागाकार ९ और २ संरख्यासें । इन अश तथा छेदसं- ख्या' परस्पर गुणनेसे २ के गुणाकारके और ९के गुणा- कारके हुए. यहां १२५ यह समच्छेद आया. फिर अंश- स्थानके अंक ३ और हैं, इन्होमे बाकी निकालनेसे पहल संरच्या उ- हितीयउदाहरणकास्पष्टीकरण सर इससं- | ल्याका समच्छेद हु २ पर यहअपवर्तन होकर सक्षेप हुआ. २६ अश हुए. बहव्ययकलितकी रीतिसे भागजातीफा उदाहरण हुआ. ॥६॥ इतिभागजातिप्रकारः १ . हुए ७का भाग का राण २५२२० समच्छेद. आ अब इस अपवर्तन करनेसे पहसंक्षिप्त हुआ.

लीलावती. अथमतागजातिप्रकारः अब प्रभाग जातीका प्रकार अर्धश्लोकसे कहते हैं: लवालयमाश्चहराहरघ्नाभागमभागेपुसवर्णनस्यात् अर्थ- भागका जो भागहै उसको प्रभाग कहते हैं. इसवास्तै भ पूर्णाकके अंतर्गत जो अपूर्णाक होता है उसको पागजाति ऐसा कहते हैं इस प्रभागजातीमें अंशसंरच्याळू अंशसंन्यासें गुणमा, और छेद संरव्याकं छेदसंख्यासें गुणना, फिर अंशों का गुणाकार अंशके स्थानपर अर्थात् उपर ररवना. और छेदका गुणाकार छेदके स्थानपर (अर्थात् नीचे) रस्वना.(फिर छेदसंख्याके गुणाकारको शसंख्याके गुणाकारका भाग देवै तो दोनोंका समच्छेद रूपहोताहै। अब इस प्रभागजातीका उदाहरण कहते हैं:- द्रम्मात्रिलवद्वयस्य सुमते पादत्रययद्भवेत् तत्पंचांशकषोडशांशचरणः संपार्धितेनार्थिना।। दत्तायेनवराटिकाः कतिकदर्येणार्पितास्तेनमे बहि व्यदिवेत्सिवत्सगणितेजातिप्रभागाभिधाम्॥७॥ अर्थ- हे पुत्रा जो तूं गणित शरमांतर्गत प्रभागजाति जान ताहो तौं- कोई एक पिसारीने एक कंजूस आदमी के पास जाकर उ- सको याचना करी. तब उस कंजूस आदमीनें उसभिखारीको एक द्रम्मका के केके के के है इतनाद्रव्य दान किया. नव फित्तनी कवडियादीहोगी, सो दीहुई करडीकी संख्या कह. उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीनिसें है- वहां न्यास काईके के भाई का काई = इन्होंका गुणाकार तहा अंशसं- ख्याका गुणाकार।१२३112 इन्होंका हुआ. और छेदसं- ख्याका गुणाकार २९१६ इन्होंका७५८० हुए: --

प्रभागजाति-भागानुबंध-भागापवाहप्रकार:
तौं १२००
संख्या हुई. फिर७६८० संख्या ६ काभाग देनेसेहीका समच्छे
हुआ. अर्थात् एक दम्मका १२८० या भागभिरवारी
अव द्रम्मकी कवाडिया करनेसें- २० करदिपांकी का भागानुबंधका
किणीका पण, १६पणका एक द्रम्महुआ. २०४४ासंख्या २कू
= १२८० कवडियां द्रम्पकी हुई.- अब उदाहरणमें हुए छेद् पहु
= एक कपड़ी भिखारीषं दियी, यह है इसमें छेद
प्रभागजात्युदाहरणका स्पष्टीकरण,
नमेंअंशसं-
संख्या
१ हुए रोदर
३का के ३ के काई काका का गुण
का भाग दिया. तब या भागाधया
१६८०
उदाहरण क.
१२८०
३को गुणा
(१२८०
|རྣཉིས་

लीलावती. नेस पूर्णाक के भाग अधिक करनेके होय, तौं तहां अब माता पूर्णाकळू गुणा करना.और अंशसंरव्या तिनमें लवालयनौर जिसपूर्णाकके भाग कम करनेके होंय, तौं तहां अर्थ- भा पूर्णाककू गुणा करना. और उससें अंशसंरच्या पूर्णाकके अंएक प्रकारका भागानुबंध और भागापवाह होताहै. कहतेहें. इस पा जब मूल संरच्या राशि अंशसे अधिक कियाजाता और छेदसंरखांशानुबंध, और कमकिया जाता है. तब स्वांशापवाह अंशके स्थानमूलराशिके भागानु वंधमें यदिअंश अधिक करना स्थानपर (अम्परके छेदसंरव्याळू नीचेके छेदसंरच्यासें गुणा क- शसंख्याके गोचेके छेदसंरख्याके ऊपरकी अंशसंख्याको छेदसं अब इसाकर जोसंरच्या होये, उससे ऊपरकी अंशसंख्या द्रम्माधरना. और मूलराशिके भागापवाहमें यदि अंशकमक तत्पंचौं उपरके छेदसंख्याको नीचेके छेदसंरच्या गु दत्ताये और नीचेकी छेदसंरच्याके ऊपरफी अंशसंरब्याको खंयदिने घटाकर जोसंरया हो, उससें उपरकी अंश- अर्थ-हे गुणा करना. ।। २७॥ ताहो तौं- कागानुबंध तथा भागापवाह के प्रथमरीतिसें उ- सको याचनाइतेहै- द्रम्मका के हुयंत्रयव्यंभिकीग्हिसवर्णितम् । कितनी कायंशानुबंधचेत्तथानागापवाहनम्॥ ८ ॥ उदाहरण मित्र!जोतू भागानुपंध जानताहोगा तो एकचतु. के कान दो, इन्होंका अंशसवर्णन कैसा होताहै? और भा. ख्याका गुणान्ता होगा तो एक चतुर्थाशकारकै रहित तीनइन्डोंका स्याका गुणा कैसा होता है ? अर्थात् पूर्णाक अधिक उन्होंका।

१ भागानुबंध भागापवाहप्रकास। सम-छेदरूप क्या होताहै ? तथा ३ पूर्णाक कम इन्होंका सपच्छे दरूप क्या होता है सो कह. अब उदाहरणका स्पष्टीकरण ऐसा है - तहां प्रथम भागानुषधका उदाहरण- संख्या २३ है, इसमें छेदसंख्या ४ सें अंशसंख्या २३ गुपानेसें ८ हुए. तिसमें अंशसंख्या१ मिलाया तय हुए छेद हु ए.-भागापवाहका प्रथमरीतिसें उदाहरण-संरख्या है इसमें छेद संरच्या सें पूर्णांक ३ को गुणा भागानुबंधका उदाहरणकास्पष्टीकरण. करनेसें १२हुए. तिनमें अंशसं- २६ संख्याहै. तहां२४५८+: ख्या घरायास हुए. छेद है ॥८॥ भागापवाह उदाहरणका स्पष्टीकरण. अब भागानुबंध तथा भागापया ३६.सल्याहै. तहाँ ३४-१२-17 के दूसरीरीतिसें उदाहरण क- गुणा अधिक म गुणा पराया 3- अंधिः स्वत्र्यंशयुक्तः सनिजदलयुत्तः कीदृशः कीह- शैौव्यशौस्वाष्टांशहीनौ तदनुचरहितीस्वत्रिभिः : सतत गैः॥अर्धस्वाष्टोशहीनं नवभिरथयुतंसप्त मांशः स्वकोयैः कीदृस्या द्रूहित्सित्वमिह यदि सरखेंऽशानुवन्धापवाही ॥१॥ अर्थ-हे मित्रा यदि तूं भागानुबंध तथा भागापवाह जानताहो, तौं-१ में उसकाही मिलाकर जोसंख्या होवे उसमें उसीका मि लाप करनेसें क्या संख्या आवेगी.? तथा मेंसें उसीका काक- रकै जो संख्याहोदै,उसमेंसें उसी संख्या कमकरनेसें क्या सं ख्या होती है ? और मेंसें उसीका ४ कम करनेसे जोसंख्या होवे, लीलावती ऐसे ६हुए.अ. ऊपरकी अशसरख्या १ • नीचे के छेदसरल्या दमे घटाया तब हु ए इस सरख्यासे उपरकी अशसरव्याकूगुणाकिया तब हुए |भागानुबंध तथाभागापवाहकादूसरीरीतिसे तीसरा उदाहरणका स्पष्टीकरण वइस सरल्याने सरल्याराशि सख्या अधिन करनेकी हैन- हानीचेकी छेदस अपवर्तनसे ससिप्तरूप-रच्या से उपरकी छेदसरल्या १६ अधिक कू गुणा करनेसे ११२हुए फिर "" ११२कारसेभाग यह १२का/ सक्षिप्तरूपहुआ नीचेकी उद सरव्याके ऊपरके अशसख्या ९ को नीचेकी छेदसरख्यामे मिला- नेसे १६हुए. इन १६से ऊपरकी अशसरव्या कू गुणा किया तब १२ हुए. ऐसे १३ हुए. अब इन्होका अपवर्तन करनेते संक्षि- तरूप ११२ एके १ एक सौ बारह और ११२ एके १ एकसौ बारह ऐसा करनेसे हुआ ॥९॥ इतिजातिचतुष्टयम्॥ अथभिन्नसंकलितव्ययकलित. अब दूसरी रीतिसे संकलित और व्यवकलित अर्धश्लोक से कहते हैं: योगोऽततुल्यहरांशकानां कल्प्योहरो रूप- महारराशः॥ अर्थ-जिस पूर्णाक राशिको छेद नहीं हो, उस ५ ॥

भिन्नसंकलितव्ययकलित. छेद कल्पना करिकै फिर उसके समच्छेद निकालकर जोड करने का होय, ती जोड करना, और वाकी निकालनेकी होय तौं बाकी नि कालना. फिरजोड़करकै तथा बाकी निकाल करकै जोसंरख्या आवे, उसमें अंशस्थानकी संख्या अपर अंशस्थानमें रस्खे, और छेद- स्थानकी संख्या नीचे छेदस्थानमें रखवे. अब इस भिन्न जानिक संफलित तथा व्ययकलितकाउदाहरण कहतेहै: 3- पंचापादत्रिलयार्धपुष्ठानेकीकृतांन्त्रूहि सरचे ममतान् ॥ एभिश्चापागैरपवर्जितानां किस्यात्र- याणां कथयाश शेषम् ॥ १० ॥ अर्थ- हे मित्र! एक और है इन्होंका जोड करनेसे क्या संरख्या होतीहै सो कह. और इन पूर्वोक्त अंकोंके जोड दे- नेसें जो संरच्या आचे,वह संख्या ३ पूर्णाकसे कम करनेसे शेप संख्या क्या होती है सोजलदी फहदे. अप उदाहरणका स्पष्टीकरण ऐसा है.-- तहां संरख्याराशि ++++है. इन्होंमें " अन्योन्य हाराभिहती." इसरी- निकारक संस्कार किया- १८० २० १० १७४४ इन्होंका अपवर्तन संक्षिप्तरूप३६१७४४९२६ यहअंश और ३६)५३० (२५ यह छेद मिलकै ३६ हुये.पह से जोडका उदा- हरण ।

--- "(६) लीलावती. " अब इस ६ संख्याळू अंश ३ सें कम करनेका है. तहां पूर्ण अंक ३ है. उसको छे अंक कोई भी नहीं है.इसवास्तै रीतीके अनुसारसे यहां यह संख्या छेदके स्थानमें ररपी, तब संख्याहुई. तब इस संख्यामेंसें पूर्व संख्याका मिलाप २९ कम किया. तहां " अन्योन्य हाराभिहतोः" इसरीतिसें ३- कम ३६ = ३६- हुए. अंब' मेंसें ३. कमकिपे तौ के रहे.यह संख्या मेंसे कम करनेसें आईहै सो जाननाः ॥ १० ॥' इतिमिनसंकलिनव्यवक प्रकारः। 'अधाभिन्नगुंणनपकारः अब भिन्न गुणेन प्रकार अर्धश्लोकसें कहते हैं: अंशाहति छेवधेन भक्तालब्धविभिन्ने गुणने फलं स्यात् ।। २८ ॥ अर्थ- अंशोंके गुणाकारहू छेदोंके गुणाकारसें भाग देना.जो लब्ध भागाकार आवे, वह अपूर्णाकोंका गुणाकार होताहै. ॥२८ ।। अब अपूर्णांकोंके गुणाकारका उदाहरण कहते हैं. सत्र्यंशरूपहित्येन निघ्नं ससप्तमांशहितयं भ- वैत्किम् ॥ अविभागेण हत्तंच विद्धि दक्षोऽसि सिन्ने गुणनाविधी चेत् ॥ १० ॥ अर्थ-२१२३ कू गुणा किया. और कू से गुणा किया, तौं गुणाकार क्या होता है ? सो यदि अपूर्णांकोंका गुणाकार करनेमें चतुर होगा तो कह यो उदाहरणका स्पष्टीकरण ऐसाई कि:- २६४२३-७ १.५ = अपवर्तन । यहां छेद २१ सें अंश १०५ कू भागलिया- तो पूर्णक आया. .

अपूर्णाक भागाकारः। उदाहरणदूसरा-३६ गुणाकार हुआ ॥१०॥ इति भिन्नगुएन प्रकारः। अब अपूर्णाकका भागाकार कहते हैं- छेदं लवंच परिवर्त्य हरस्यशेषः कार्योऽथभाग- हरणे गुणनाविधिश्च ॥ अर्थ- भागाकार करनेका लोय तौं भाजकसंख्याके अशस्थान में छेद रखेऔर छैदस्थानमें अशरखे फिर उस भाजक संख्यासे भाज्यसंख्याफू गुणा करे तौं अपूर्णाकका भागाकार होता है. अपूर्णकिके भागाकारका उदाहरण कहते हैं- 3०- सत्र्यंशरूपक्तियेनपच यंशेनषष्ठं वदविभ- ज्य ॥ दुर्भायगीयसतीक्ष्णबुद्धिवेदस्लिले भिन्नहतो समर्धा ॥११॥ अर्थ- हे मित्र! जो डाके अयसरीखी नेज ऐसी ते. री बुद्धि अपूर्णाकोके भागाकारमें समर्थ होयती • २६ से भागनेसे भागाकार क्याहोताहै ? तथा ई से भागनेसें भागाकार क्या होता है. सो मेरेकू कह. उदाहरणका स्पष्टीकरण ऐसाहै.--- भाग २३ है. तिसमें भाजक २ ३ का विषमपूर्णाक रूप किया. फिर भाजकसं. रच्या है. इसमें अंश के स्थानमे छैद३ संरव्या ररची, और छेद३ के स्थान में अंश सरच्या ररची तौ हुए अब इस भाजक संज्यासें भाज्यसंरव्या गुणा किया तौं यह भागाकार आया. गुणा दूसरा उदाहरण-६ - भाग -६४-६ इसकाभ- पवर्तनसें हुए. यह भागाकार हुआ ॥ ११ ॥ - लीलावती. अप अपूर्णाकोंका वर्ग, पना वर्गमूल तथा घनमूल करनेकाम- कार अर्धश्लोकसे कहते हैं:- वर्गे कृती धनविधी तु पनी विधेयौ हारांशयो- रथ पदेच पदप्रसिद्ध्यै ॥ २९ ॥ अर्थ- अपूर्णकि संख्याका वर्ग करनेका होय तौहर (छेद) संरख्याका वर्ग कारकै छेदसंरन्याके स्थानमें रखना. और अंश- संख्याका वर्ग करिकै अंशसंख्याके स्थानमें रखना.सो वर्ग होताहै. और वर्गमूल करनेका होय, तो हरसंरच्याके स्थानमें हर- संरख्याका वर्गमूल ररपना. और अंशसंरब्याके स्थानमें अंश- संरख्याका वर्गमूल रस्पना. वह वर्गमूल होता है. और अपूर्णांक संरच्याफा घन करनेका होय तो हरसंन्याका पन करकै हरसंज्याके स्थानमें रखना. और अंशसंरख्याका पन करित अंश संख्या के स्थानमें ररपना. वह घन होताई. और घनमूल निकालनेका होय तौ हरसंख्याका घनमूल नि. कालकर हरसरण्याफे स्थानमें रखना. और अंशसंरख्याका प. नमूड अंशसंज्याके स्थानमें रखना. यह घनमूल होताहै.॥२९ अपवर्ग आदिकोंके क्रमसे उदाहरण कहते हैं:- 3. सार्धत्रयाणां कथयाश वर्ग वर्गात्ततो वर्गपदंच मित्र ।। धनंचमूलंच घनात्ततोऽपिजाना सिचे दुर्गपनी विभिन्ने ॥१२॥ अर्थ- हे मिश्रा जो तूं अपूर्णांकों के वर्ग, वर्गमूल्.. नमूड जानताहो, तो संरयार र्ग, और जोसामाजिक आरंगी उसका पनिल, और इसी संरख्याका घनता यह ३४३ सरच्या घनमूल- ३४३ २ - २ २ शून्यपरिकर्ममकार सरच्या आवेगी उसका धनमूल क्या होता है सो जलदीसे कह उदाहरणका स्पष्टीकरण - सरव्या है 'निसको "उदमरूपे पु" इसरीतिले सकार देकर हुए नहा वर्गकरण-१४५३ १९ ये सरख्या ३ का वर्ग हुआ वर्गमूल-४५-५८१ये सरख्या : सरन्याका वर्ग- मूल हुआ घनकरण-२४२८४४२ ७४७८४९५५ सल्याका घन हुआ यह सरल्या १३ सरव्याका घनमूल हुआ ॥१२॥ इति भिन्नपरिकर्माष्टकं समाप्तम् । अथ शून्यपरिकर्माष्टकं प्रारभ्यते अब शून्यपरिकर्माष्टकके आठो प्रकार दो आर्यावृत्तोस कहते है - योगे खं क्षेपसम, वर्गादी व स्वभाजितो राशिः॥ रवहर: स्यात्वगुण व रघुगुणश्चिन्त्यश्च शेपविधी ३० शून्येगुणके जाते संहारश्चेसुनस्तदा राशिः॥ अविकृतएवज्ञेयस्तथैव रखेनोनितश्चयुतः ॥ ३१ ॥ अर्थ- शून्यमे शून्यका मिलाप करनेसे भून्यही सख्या आती है और शून्यमे कौनसीभी सख्याका मिलाप किया होय, तो उस सरव्याका जोड वह सख्याही होतीहै और शून्यका वर्ग, मूल, घन, घनमूल किया जायतौ शून्यही होताहै और भून्य किसी सरय्याकू भाादिया जायती भागाकार शून्यही आताहै। । - लीलावती और शून्यसंरख्यासें किसी संस्च्या गुणा किया जायतौं गुणा- कार भून्य होताहै. और शून्यसंरब्यासें गुणाकार करनेमें समय- के अनुसार विचार करना चाहिये. ॥ ३॥ कौनसीभी संख्याराशि कू शून्य गुणक होनेने और भून्य भाजक होनेसें, वह संरच्यारा, शि बैसाकि वैसाही अधिकृत रहताहै, तितीरीतिसें किसी सं- ख्याशिमें शून्य मिलाया हो, अषयाशून्य कम किया होय। तो भी वह संरव्या राशि वैसाकी वैसाही अविरत रहताहैः॥३१॥ अब इस शून्पपरिकारकके क्रमसें उदाहरण कहते हैं- उ० रवपंचयुग्भवति किं वद् खस्य वर्ग मूलंघन घन- पदं खगुणावपंच ॥ रवेनोइता दशचकः खगु- णोनिजाधयुक्तस्त्रिभिश्वगुणितः वस्तस्त्रिष- धिः ॥ १३ ॥ अर्थ- शून्यमें ५ मिलाये तो क्या होताहै? सो कह.और शून्यका वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल क्या होता है ? तया भून्यसे ५ कू गुणां किये लौं गुणाकार क्या होलाहै ? और भून्यसें १० · भाग दियाती भागाकार क्या होता है ? और कोई एक संख्याळू शून्यसे गुणा करफे उस गुणाकारमें उस मूल संरख्याका अर्ध मि लापकर ३ सें गुणा करकै भून्यसें भाग देनेसें ६३ संख्या होतीही तौं ऐसी मूर संरच्या कोनसी है ? सो कह. अब इन उदाहरणोंका स्पीकरण ऐसा है- •+५= ५ यह जोड हुआ. यह वर्ग हुआ... • यह वर्गमूल हुआ. ०४०४०% यह घन हुआ... •. यह घनमूल हुआ.५५० - 0 यह गुणाकार आया और 10 • • यह भागाकार हुआ. - शून्यपरिकर्मप्रकारः। अब कोई अज्ञात संरख्याकू • शून्यसें गुणा किया तौं गुणा कार चोका वोही आया. उसमें उस अज्ञात मूलही संख्याका ३ मिलाकर जो संरख्या हुई उसकुँ ३ इस संख्यासें गुणाकरफै जो संख्या आतीहै उस संख्या में भाग देकर ६३ संरच्या आ. तीहै. तौं यहां गुणक है, मूल अज्ञात जो संख्या है उसका यहधन (अधिक ) है. ३ यह संख्या गुणक है और २० यह भाजक है. और ६३ यह संरच्या इतना संस्कार करके दीरवनेमैं आ नेसें रश्य है. ऐसी यह स्थिति है-- तहां अज्ञात संरच्या कौनसी होना चाहिये. इसका विचार करनेंका है:-तौं अज्ञात संरच्या निकालनेके वास्तै इसके आने व्यस्तविधि "उद्गुणगुणछेद" इत्यादि रीतिसें कहा जायगा. उसके अनुसार अज्ञातसंरख्या ला ना. उस व्यस्तविधि (उलटाक्रम) के अनुसार संस्कार इसरीतिसें। करना कि- उलटे क्रमसें प्रथम दृश्य ६३४०५ ६३ ३- २१ हारे इन २१ संख्यामें कोई अज्ञात्तसंख्याका १ मिलकर ये, संरख्या हुई है. इस २१ संख्यामें। मूल संख्याका और ३ मिला- या हुया है. इसवासैं “अथस्वांशाधिकोनेतु०" इस आगेके रीति- से छेदों में अंशोंका मिलाप करनेसें हुआ. सो २१ संरख्यामें। = ७ कम करनेसें २१-७ = १४ हुए. यह १४ संख्या अज्ञात है. तव पूर्वोक्त संस्कार करनेसें जिस संख्याका दृश्य ६३ होताथा, व ह मूलसंरख्या १५ है यह उदाहरणके अन्भका एकरीतिलें अर्याय स्तविधीसें उत्तरहुन्मा. अब इसी उदाहरणका इष्टकर्मकी रीतिसें स्पष्टीकरण इसरी- तिसें है.- तहां पथम “उद्देशकालापवदिष्टराशिः०" यह इष्टकर्मका - इति शून्यपरिकाष्टक प्रकारः। (६६) लीलावती. प्रकार आगे कहेंगे. सो ध्यानमें रखकर इस उदाहरणको करना चाहिये. इसरीतिसें- मनमें कोई भी संरख्या आवेवह इष्टराशि समझना जैसे कि - अब यहां इएराशि ४ यह संरन्या मनमै ला ई. इस इष्टसंरच्या राशि से गुणा किया तब ४४० - "हु- ए. इस ४ संरब्याका ३ = २ है ये मिलायेत्तव ६हुए इस ६ संख्याकू ३ सें गुणा किया तौं ६४३-१८ हुए. इस१८ संरच्या सें भाग दिया तब १८ - ० = १८ हुए हैं. अब दृश्यसंरव्या ६३ है. उस ६३ दृश्य संख्याळू इष्टसंरब्याट से गुणा किया ६३ ४ ४- २५२ हुए. इन २५२ फू उसइष्ट संस्कारसें आई हुई १८ संख्या से भाग दिया तौ २५२ २ १८ = १४ हुए. यह १४ संरच्या अज्ञातसं ख्याराशिहै. इसरीनिसें सर्वत्र जानना. ॥१३॥ । अथव्यस्तविधिमकारः । अब दोश्लोकोसे व्यस्तविधि (कहिये उलटाक्रम) कहते हैं :- छेदंगुणं गुणं छेदं वर्गमूलं पद्कृतिन् । ऋणस्वं स्वमृणं कुर्यादृश्येराशिप्रसिद्धये ॥ ३२ ॥ अथ स्वांशाधिकोनेतुलवादयोनोहरो इरः ॥ अंशस्व- विकृतस्तत्र पिलोमे शेषमुक्तवत् ॥३३ ॥ अर्थ-किसीने संख्याविषयमें कियेहए प्रश्नका उत्तर निकालने के रोप- १ इन दोनोभी रीतिसे किये हुये उदाहरणो का यहा केवल शून्यसे गुणाकार और भागाकार करके दिखाने के ही वास्ते उल्लेख कियाहै रीति तो आगेके श्लोकोमे कहीजायगी- और इसप्रकारके गणितका ग्रहगणितमे बहोतउपयोग होताहै.

व्यस्तविधिमकार।
,
वास्तै प्रशने कहेहुए संस्कारके उलटसंस्कार करिकै गणितकर
मा. इसको व्यस्तविधि ऐसा कहते हैं - दृश्यसंख्या में मूलसरल्या
राशि निकालनेके वास्तै यह संस्कार करना चाहिये.कि,- प्राके प्रभा
में दृश्यसंख्याकू जो भाजक सरया होगी वह सरख्या गुणक कर-
मा. और जो गुणक संरच्या होगी उसको भाजक संख्या करना. व
होगातौं चर्गमूल करना. घर्गमूल होगा तो वर्ग होगा. जो संरच्या
कम करनेकी होय वह सरख्या अधिक करना. जो सरल्या अधिक
करनेकी कही होय, यह कम करना. ॥ ३२॥ और किसीभी सं-
रख्यामे उस सख्याका भाग मिलानेका कहा होय, अथवा कम कर
नेका कहा होय तो उस सख्याके छेदमें उसी सरब्याक अशामि
लाकर अथवा घराकर जो सख्या आवे, वह छेदसें कम या अ-
धिक करी हुई संरच्या अंश समझना. औरउसके नीचे पहलेही
छेद रखना. अनंतर उस अंशमे कुछ फेर बदल होता नहीं, इस-
रीतिले सस्कार करिकै जो भाग आवे, वह उस (भाग जोडने या
कम करनेको करीहुई) सख्याका भाग समझना. और बाकी र
हा हुआ संस्कार इसव्यस्तविधिमें तो इसके पूर्वश्लोकमें "डे-
दंगुण गुणं छेदं" इसरीतिले करना. ॥ ३३ ॥
अब अज्ञातसंरच्या निकालनेके वाले इस व्यस्तविधीका
दाहरण कहते हैं-
यलिनस्त्रिभिरन्वितः स्वचरणैक्तिस्ततःस-
प्तभिः स्वत्र्यंशेन विधर्जितः स्वगुणितोहीनो हि-
पञ्चाशता ॥ तन्मूलेउष्टयुतहतेउपिदशाधि-
जतिंदयंभूहितंराशिं वैत्सिहि चंचलाक्षि विमलां
वाले विलोमक्रियाम् ॥ १४ ॥

लीलावती । अर्थ- हे चलनेवाली बाले लीलावति । जो तू व्यत्तदि- घिसे गणित करनेका प्रकार जानती होगी तौ- जिस कोई एक संरल्याराशिकू ३ से गुणा किया, जो गुणाकार माया उसमे उस ही संख्याराशिके १ मिलाये, फिरजोसंरच्या हुई उसळू ७ सें भाग दिया जो भागाकार आया उसमेसे ३ कम किया, जो सं- स्या रहीउसको उसीसे गुणा किया अर्थात उसका वर्ग किया, उस वर्गमेसे ५२ कमकिये. चाकी जो सरच्या रही उसफा वर्गमूल निका- लकर उसमे पिलाये और १० से भाग दिया तो भागाकारकीस ख्या २आई. तो ऐसी सरच्या कौनसी है ? सो तूं कह अब इस उदाहरणका स्पष्टीकरया इसरीतिसे है कि, यहां अज्ञातसंरल्याका गुणक ३ है, मूलसरच्याकी संरच्या मिलाने- की होनेसे धन है, भाजक ७ सरख्या है, मूलसख्याकी सख्या कम करनेकी होनेसे ऋण है, फिर वर्ग करनेका है, उसके उपरात ५२ ऋण करनेके है, फिर वर्गमूल करनेका है. फिर ८ सरन्या धन क- रनेकी है और १० सरख्या भाजफ है और दृश्यसरख्या २ है- तब यहां व्यत्तविपि करके उलटे क्रमसे संरख्या रबके सस्कार करना जैसाकि - यहां "उद्गुणं " इसप्रकारके व्यस्तविपिस दृश्यसरन्यार है गुणक १० है अण(कम करनेकी सरन्याहै.कि स्वर्ग करना फिर धन (जोड) करनेकीसरल्या ५२ है. फिर वर्गमू. ल करना. फिर मूल सरख्याका धन करने का है. गुणक संख्या है मूलसंज्याकी ३ सरल्या गण करनेकी है बाकी सरच्याळू ३ यह भाजक है. ऐसा करनेसें अज्ञातसंरख्या आतीहै उसकाम- - कार ऐसा- रश्यसंख्या ३४१०२०-८-१२ कार्ग १२४१२-१५ - इष्टफर्मभकारः। +५२ = १९६ काचर्गमूल १४५ (१४का-७ ) = २१४७ = १४७ - ८ १४७ का ३८६३) = ८४+३-२८ यह अ- ज्ञातसंरल्या इष्ट उत्तर हुआ. यह उत्तर बराबर है या नहीं इसका खुलासा- अज्ञातसंख्या २८४३ = ८४ +(३६६३) मिलाये नौं १४७७ = २१ - (१७) = १४ का वर्ग १९६-५२= १४४ का वर्गमूल १२+८ = २०१० = २ आए २ दृश्यहै. इसमें कियाहुआ संस्कार बराबर है. ॥१४॥ अब इष्टकर्मका विधि एक श्लोकसें कहते हैं- उद्देशकालापदिष्टराशिः क्षुण्णो हतोऽशै रहि- तोयुत्तोवा ।। इष्ट्राइतं दृष्टमनेन भक्तं राशि- प्रोक्त मितीष्ट कर्म ।। ३४ ॥ अर्थ- मनमें कोई भी इष्टसंख्याकल्पना कारकै उस संरख्या छ,मभकर्तान उदाहरणमें जैसा संस्कार करनेको कहा होगा, उसीरीतिसें गुणने कहा होय तौं गुणना, भाग देनेज़ कहा होय तौं भाग देना. अंश घटाने; कहा होय तो अंशघराना, और अंश मिलानेकुं कहा होय तो अंश मिलाना. ऐसा करनेसें जो संख्या माये उसकुँ भाजक समझना. फिरउसी प्रथम लिए हुए दृष्ट संख्यासें दृश्य संरज्याळू गुणा करकै जो संख्या आवे उस- |संरख्याकू इस भाजक संख्यासें भाग देना. तौं जो भागाकार आयेगा यह मभकर्ताके उत्तरकी संख्या होती है. इस प्रकारका यह इष्टकर्म कहा है ॥३४॥ अब इस इष्टकर्मका उदाहरण कहते हैं:- उ. पंचनःस्वात्रिभागोनो दशभक्तः समन्वितः ॥ - लीलापती. D शेषपदैः सकल कमल संब्यां क्षिप्रमारल्याहि तस्य ॥ १७ ॥ अर्थ- निर्मल कमलोंका एक राशिथा. उसमें सें उसराशिका दे तथा है इतने कमलोंसे शकर, विष्णु और सूर्य इनदेवतान ओकी पूजाकी, फिर राशि में पार्वतीका पूजन किया, और शेष ६ कमल रहे उनकारकै गुरुके चरपकी पूजा की, ती सब मिलकर कमलोंकी संरख्या कितनी थी सो जलदीसे कह ॥ अब इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसें है - यहां इष्ट) और दष्ट संरच्या ६ है. कमर ३५६ = २१.१२.१.१.१५ इष्ट दृष्ट भाज्य भाजक = ६-६-३ १६ - अपवर्तनसें - यह 'उत्तर हुआ. अर्थात् कमलरोशीकी संख्या १२० थी. अब यह हिसाब बराबर है या नहीं सो देखनेका परिचायक इसरीतिसे है-- १२० काई - ४० । १२० का ३ = २४ । १२० का = २० । १२० का ३० इन्होका मिलाप करनेसें ४० + २४+ २०+ ३०+ और दृश्य ६ १२० यह वराबर होगया. इस- वास्तै १२० कमलसंख्या हुई. ॥ १७ ॥ अब दृष्टजातिका अन्य उदाहरण कहतेहैं:- उ.- हारस्तारस्तरुण्या निधुवनकलहे मौक्तिकानां विशीर्णो भूमौ यातस्त्रिभागःशयनतलगतः पंच- मांशोऽस्यदृष्टः ॥ प्राप्तः षष्ठः सुकेश्या गणफ- दशमकः संगृहीतःप्रियेण, दृष्टं षइंच सूत्रे कय- य कतिपयैौक्तिकैरेषहारः ॥ :

दृष्टजातिप्रकार अर्थ- कोई एक जवान स्नीका मोतियों का स्वच्छ हार मैथु- नके कलहमे टूटगया, उसका पृबीपर गिरपडा, ३ बिछौनाके ऊपर गिरपडा हुआ देवास्लीत दंढनेसें मिला, 2 पतीकूद टनेसें मिला, और ६ मोती सूतमें देखे. तौं कितने मोतियों से वह हार बनायागयाथा ? सो हे गणितशास्त्रज्ञ ! यूँ कह. अब इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीति से है: दृश्य इष्टर संरच्या २४. इष्टराशि.कम 10+ .५३ १ २५ दृश्य भाज्य m भाजक भाज्य ६ - %D १ ६. अपवर्तनसें ३. मौक्तिकोंका हार था. यह उत्तर हुआ. ॥१८ ।। मष शेष जातिका उदाहरण कहते हैं। उन्-स्वार्धमादात्प्रयागे नवलययुगलं योऽवशेषाच्च । काश्यां शेषाधिशुल्कहेतोः पथि दशमलवान्यच शेषाद्यायाम् ॥ शिष्टं निष्कधिपति निजगृहमन- या तीर्थपाथापयातस्तस्य द्रव्यप्रमाणं वदयदि भवता शेषजातिः श्रुताउति ॥ १८ ॥ अर्थ- हे मित्र! कोई तीर्थाटन करनेवाला पथिक अपने पास बहोतसा कुछ द्रव्यलेकर घरसें चला. और उसनें मयागमें जा- कर अपने द्रव्यमसे दान किया. और जो द्रव्य बाकीरहाउ- समेसें । द्रव्य काशीक्षेवमें दान किया. और जो द्रव्य वाकी रहा उसमेंस द्रव्य रास्तेमें जातेजाते किरायाके वाले दिया और जोद्रव्य शेष रहा, उसमेंसे द्रव्य गयाजीमें दान किया और

लीलावती.
बाकी ६३ निष्क रहा. वह लेकर वह पांथलौटकर अपने घर न्या
या. तौं उसके पास कितना द्रव्यथा. सो यदितूंने शेपजातिका
कार सुना होय तो कह.
अब इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसं है.
न्यास
कम-३
"-
.
दृश्य
६३४ १= ६३(३) ३. अप
वर्तनस संक्षिप्तरूप ५४. यह उत्तरहुआ.
अर्थात् ५४. निष्कउसके पास थे.
19k
संक्षिप्तपद पहलाजक
यह उदाहरण पिलामसूत्रकीरीतिसंभा होता है. जैसा कि-
अपवर्तनमें
न्यास ....
.
पलाम..
प. प. (1)३१६३ मा
३७८
.
F
+
२
1
का ३)=+का+५-२१
२१०+ (२१.का) 21. + ३१. का.
3+६=२.१२...+1=......)
उत्तर हुआ.अर्थात् ५४. निष्कद्रव्य उसके पास था. 1॥१८॥ .
अब शेप जातिका प्रकार एक श्लोकसे कहते हैं,
छिहातभक्तेनलवोनहारपानभाज्यःप्रकटारल्यराशिः।
राशिविच्छेपलवेतभेदविलोमसूत्रादपिसिद्धिमेति॥३५॥

शेषजातिप्रकारः (७७) - अर्थ- शेष रहे हुए संन्याके जो भाग होंगे, तिन्हों के छेदों- मेसें उन्होंके उन्होंके अंश कम करना. और जो याकी आये, उन- उनबाकी रहीहुई संरव्या ओंका परस्पर गुणाकार करकै उसगुन णाकारकू अंशोंके छेदोंके गुणाकारसें भाग देनेसें जो संख्या आवे उससे दृश्य संख्याळू भागदेना. तो मूलराशि होता है. यह रीति पिलोमसूत्र “छेदगुणं." तथा "अथस्वांशाधिकोने इससेंभी सिद्ध होती है ॥३५ ।। अब शेषजातिका उदाहरण कहते हैं:- उदा. पद्माक्ष्याप्रियकल्पिताइसुलया भूषाललाटीकृ- ता यच्छेषात्रिगणाद्रिभागरचितान्यस्ता स्तनांउत्त:- स्त्रजि॥ शेषा धुजनालयोमणिगणः शेषाधिक- ख्याहतः काव्यात्मा मणिराशिमाथु वद मेवे- ण्या हि यसोडा ॥ १९ ॥ अर्थ- कोई एक कमलसम नेत्रपाली स्त्रीने, अपने पतिने जो उसको अलंकार करनेके वास्तै कुछ रत्न दियेये. उनमेंसें रनों- का ललारभूपण किया, जो रत्न वाकी रहे, उनमेंसें रनोंसी अन पने स्तनों के बीचमें लंबायमान मालाधनाई. और जो रत्न बाकी रहे, उनमेसें। रस्त्रोंके वाजूचंद नामक बाहुरूषण बनाये. और जो बाकी रत्न रहे, उनमेंसें रत्नोंकी कटिमेखला बनाई.और वाकी १६ रन रहे उन्होंसे चेणी गुंफित किया तौं उसके पास कि- तने रन थे. उनरत्नौके समूहकी संख्या मुझकूजलदीसें कहा अब इसउदाहरणका स्पष्टीकरण इत्सरीतिसें है:- शेपरत्नोंके भाग औरदृश्य रत्नोंकी संख्या १६ है *** अपवर्तनसें । - .

लीलावती.
बाकी ६३ निष्क रहा.वह लेकर वह पांथ लौटकर अपने घर च्या
या. तो उसके पास कितना द्रव्यथा. सो यदिईने शेपजातिका म
कार सुना होय ती कह.
अब इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसें है:-
न्यास
।
दृश्य
1-
इट
६३४ १= ६३-१. (६३४६)= ३७८० अप-
पर्तनस सक्षिप्तरूप ४. यह उत्तरहुआ
अर्धात् ५४० निष्कउसके पास थे.
अपवर्तनसे
सक्षिप्तरूप यह प्राजक
यह उदाहरण दिलामसूत्रकारीनिसभा होताहे. जैसा कि-
-
न्पास र
श्य
વિરામ છે पध
२
२
र
६६ (क्षमा ६)६३+ ६३ = ७८
.
२७.
-
५. यह
३१५+ १ का ३) ५+
२१०+ (२१० का ?) = २५० + २. का
२.०१..२७.)
उत्तर हुआ.अर्थात् ५४. निष्कट्रव्य उसके पास था ॥१८॥
अब शेष जातिका मकार एक श्लोकसे कहते है:-
छिट्वात मक्तेनलयोनहापातेनभायःप्रकटाव्यराशिः ।
राशिविच्छेपलवेतथेदं विलोमसूत्रादपिसिद्धिमेति॥३५॥

शेषजातिप्रकारः अर्थ- शेष रहेहुए संन्याके जो भाग होंगे, तिन्हों के छेदों- मेसें उन्होंके उन्होके अंश कम करना. और जो वाकी आये, उन- उनचाकी रहीहुई संरच्याओंका परस्पर गुणाकार करकै उसगु- णाकार; अंशोंके छेदोंके गुणाकारसें भाग देनेसें जो संख्या आवे उससे दृश्य संख्याळू भागदेना. तो मूलराशि होताहै. यह रीति विलोमसूत्र "छेदंगुणं" तथा "अथस्वांशाधिकोने" इससेंभी सिद्ध होतीहै ।। ३५ ॥ अब शेषजातिका उदाहरण कहतेहैं:- उदा. पद्माक्ष्याप्रियकल्पिताहसुलवा भूषाललाटीकृ- ता यच्छेषात्रिगणाद्रिभागरचितान्यस्तास्तनांडतः- स्त्रजि॥ शेषार्ध वजनालयोर्मणिगणः शेषाधिक- ख्याहतः काव्यात्मा मणिराशिमाशु वद मे वे- ण्या हि यत्पोडश ॥ १९ ॥ अर्थ- कोईएक कमलसम नेत्रपाली स्त्रीनें, अपने पतिनैजो, उसको अलंकार करनेके वास्तै कुछ रत्न दियेये. उनमें सें। रत्नों- का ललारभूषण किया, जो रत्न धाकी रहे, उनमेंसें रत्नोफी अन पने स्तनों के बीचमें लंबायमान मालाबनाई. और जो रत्त वाकी रहे , उनमेसेंरनोंके वाजूचंद नामक बाहुरूषण बनाये. और जो चाकी रत्न रहे, उनमेंसें रत्नोंकी कटिमेखला चनाई.औरत वाकी १६रत्न रहे उन्होंसे चेणीकू गुफित किया तौं उसकेपास कि- तने रनथे उनरत्तोंके समूहकी संरल्यामुफकुंजलदीसें कह. अव इसउदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसें है: शेषरत्नोंके भान है और दृश्य रत्नोंकी संरच्या १६ ** अपवर्तनसें :- thor GIRL - लीलावती. ! दृश्य १५-६-१६४१६ - २१५ - २५६ रत्नथे. यह उत्तर हुया. यह उदाहरण व्यक्तीतिसेशी सिद्ध करलेनाः ॥१९॥ अब पिलेपजातिका उदाहरण कहते है। उ पंचांशोऽलिकुलात्कदंवमगमत्र्यंशशिलीं,तयो- । विश्लेषस्त्रिगुणोमृगाक्षिकुटजंदोलायमानोऽपरः॥ कांतेकेतकमालतीपरिमलप्राप्तककालमियादूता इतइतस्तत्तोचमतिरवेशंगोउलिसंरब्यांवद॥२०॥ अर्थ- हे हरिणलोचने मिये कन्ये लीलावती ! श्रमरोंका एक समुदायथा. उसमेसें उस घमर समुदायका एक पचमाश ३ कदी पक्षपर गया. एक तृतीयाश शिलीधनामकवृक्षपर गया. और उन ३ तथा ? इन्होकी वजाबाकी निकाउके जितनी सरच्या हो- तीहै उससें तिगुना भमर समुदायकूड़ाके वृक्षपर डूलता रहा श्री र केतकी तथा चमेली ये दोनो मानो कोई दो स्त्रियां इन्होनें एक- ही समयमें भेजे हुए सुगंधरूपी दूतके द्वारा बुलाया हुआप एक धमर (अब क्या इस केतकी स्त्री के पास जाऊं, अयवा चमेली स्त्रीके पास जाऊं ऐसा मनमे बडा अंदेशा पाकर) आकाशमे इ- धर उधर समताहै.-तों उन सब धमरोकी संख्या कितनी यो सो तूं कहः ।। अब इस उदाहरणफा स्पष्टीकरण इसरीतिसें हैं:-इष्टरार- ,(३-६) ४३८६१३+३+३३ ? इष्ट-१५%32 इष्ट१४ दृश्य: (ix) यह उत्तर हुआ. अर्यात् १५ करमर ये॥ २० ॥ इतीष्टकर्म प्रकारः।

- विषमकर्मप्रकार (७१) अथविषमकर्मप्रकारः। अब सक्रमा प्रकार अर्ध श्लोकसें कहते है - योगोड परेणो नयुत्तोउर्धितस्तौ राशीस्मतं संक्रमणीरव्यमेतत् ॥ अर्थ- अज्ञात नहीं जानीहुई । दोसख्यायोके जोडमे उन्ही वजाबाकी कर्मकरकै और मिलाके उन्होको आधा आधा करनेसे एककी छोटी और एककी बडी ऐसे छोटीबडी जो सं- स्या होती है उसको समसऐसा कहाहै ।। अब इस सक्रमण प्रकारका उदाहरण कहते हैं- उ. ययोर्योगः शतंसैकं वियोग:पंचविंशतिः ॥ तौ । राशीवदमेवत्से वेत्सिसंक्रमणंयदि ॥ २१ ॥ अर्य- हेकन्ये लीलावति । जो तू सक्रमणका प्रकार जानती होनी तौं-जिन दोसरच्याओका जोड १०१ होताहै. और वजाबाकी २५ होती है. ऐसी दो सख्या कौनसी है सोन्द्र उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिले है. योग वियोग २५ १०१ १५%७६-२३८ १०१ +२५ %D१२६-२% ६३ इन्होका योग ३८+ ६३% १०१ है. सो समफना ॥ २१ ।। रीप-१ कोई भी नही जानी सरख्याका जोड तथा बाकी कहनेही सेही वह सरव्या जिसमे कहीजाय उसको विषम कर्म कहते है इस्मे सक्रमए और वर्गसक्रमण ऐसे दो भेद है in- कम अधिक उत्तर३८+ ६३ हुमाः- -- लीलावती अब वर्गसंक्रमणका प्रकार अर्धश्लोक । कहते हैं- वर्गतिरंराशिवियोगभक्तंयोगस्तताकतवदेवराशी३६ अर्थ-दो संरच्याओंका और उन्होंके संख्याफा अतर (वजाबाकी) निकालकर फिर वह दोनों सरकारोंको शोधनक रके निकालना इसको वर्गसक्रमण ऐसा कहते है- दो सरव्या- ओंकी वजाबाकी निकालकर जो संख्या आवे, उस संरब्यासे उनदोनो संख्यालोके वर्गसरख्याळू भाग देना फिर" योगोत रेणोनयुतो" इस पूर्वोक्तमकारसे सस्कार करनेसे (अर्या द दोनो सरख्या'ओके जोडमे उन्होका अंतर कमकरके और मिलाकै उन्होंका अर्थ फरनेसे एक छोरी और एक बडी ऐसी दो सरख्या माती है. इस रीनिसें संस्कार करनेसें चेदोयराशिअलन अलम् आते हैं ऐसा यह वर्गसंक्रमण होताहै. ॥३६॥ अब वर्गसक्रमणका उदाहरण कहतेहै.- 3०- राश्योर्ययोपियोगोऽष्टौतत्कृत्योश्चचतुःशती॥ विवरंवदतौराशीशीघ्रगणितको षिद् ॥ २२ ॥ अर्थ- हे गणितशारूपमें कुशल। जिन दोसंरच्याओंका अत्तर खजाबाकी) निकालनेसे संरख्या होती है. और तिन दोनोका वर्ग करनेसें १०. यह वर्ग होता है.तो ऐसी वे कौनसी दोस- ख्या है उन्होंका क्या अतर हैरसो वशीघ्र कह ।। इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसे है:-न्यास-राश्यंतर कृत्यंतर १०० है. उत्तर२१/२११२१-४४१ *ण ५.+८:५८-२-२९ 1-२३२७(उत्तर २९,२९Xपहरा, इसरीतिसे वर्गसकर्मण जानना ॥२२॥ इतिरिषमकर्ममा

वर्गकर्मप्रकार
है
अथवर्गकर्मप्रकारः
अब दो यार्या वृत्तोंसें वर्गकर्मका प्रकारकहते हैं-
इएकतिरष्टगुणिता व्येकादलिता विभाजितेष्टेन .॥
एक स्यादस्यकतिर्दलितासैकापरो राशिः ॥३७ ॥'.
रूपंद्विगुणेष्टहस्तंसेप्टंप्रथमोऽथयापरोरूपम् ।।
कृतियुतिषियुतीच्येके चौस्यातां ययो राश्योः॥३८
अर्थ- कोई एक इष्ट अंककी कल्पना करिकै उसइष्टककेवर्ग
८ सेंगुणाकरकै जो संरच्या आवे उसमेंसें एक १ कम करना..और
बाकी रहीहुईसंख्या आधी करके उसअर्धसंख्याकू इष्ट अंकसें भा
गदेना. ऐसा करनेसें पहलारांशि होता है. और जो वह राशि प्राता
उसका वर्ग करकै आधा करना और उसमें एक पमिलाना,ऐसा
करनेसें दूसरा राशि होता है. ॥३७॥ अथवा एक ' इससंख्याळून
शांक संख्याको हिगुणित कारकै भागदेना: जो भागाकार यावे उसमें इ
टांक मिलाना, ऐसा करनेसें पहला राशि आताहै और दूसरी संरव्या
राशि १ यह ही.आती है. इसरातिसें आई हुई दोनो संरच्या इस
कारसें समफना किं, जिन दोनों संख्याराशिओंके वर्गसंरच्याकाजोड
औरत्यंतर इन मत्येकके बीचमेसे.१ कम करनेसें जोचाकी रहतीहै वहाँ
चाकी रही हुई संख्या दूसरीदो संरच्या नोंके वर्ग होते हैं. ऐसायह वर्ग
अब इस वर्गकर्मका उदाहरण कहतेहैं:-
उ राश्योर्ययोः कृतिवियोगयुती निरेके मूलपदेप्रवद
तो मम मित्रयत्र ॥ विश्चन्तिबीजगणितेपटवोड
पिमूढाः पोढोक्तबीजगणितंपरिक्षावयन्तः ॥ २३॥ .
अर्थ- हे मित्र ! जिन दोसंख्याओं के वर्गों की जोड और अंतर
.
कर्म होताहै ॥३८॥

(८२) लीलावती इनप्रत्येकमसें । यह संख्या कम करनेसें जो संख्या बाकी रहती है. उनके वर्गमूल करनेसें बराबर संख्या होती है. ऐसीदो संरख्या कौनसी हैं. सोतुं मुकुं अच्छी रीतिसैं कह- इस गणितमें छपकारके बी जगणितका विचार करनेवाले पंडितलोग भी मूढ होकर केश पाते हैं ऐसा कठिनहै. इस उदाहरणाका स्पष्टीकरण इसरीतिसें है - कल्पितइष्ट है. इट! कति %3D सक्षिप्तरूप मथम प्रकार सें- - कम = दलिता ३(३४३ थमरशिइट रुति दलिताई+१-२ पररांशि. 13 १४२% भाजक हितीयमकारतें 121)---पयमराशि.अपरराशि उत्तर प्रयमराशि और दितीयराशिहै ॥२३॥ अपाराशिवियोग प्रथमराशि वर्ग निरेफ- इसकाभूल । अपरराशि नि है. 'अपरा-पो. मिरेक पुनाराशि ३ वर्ग - इसका मूल है. व्यथवा इस वर्गकर्मका अन्य सूत्र कहते हैं- । इष्टस्यवर्गवर्गो घनश्चतावष्टसंगुपौ प्रघमः ॥ सैको राशीस्यातामेव्यक्तेश्यवाऽव्यक्ते ॥३९॥ । अर्ध-इष्ट अंकमरयाका वर्ग करिकै उस वर्गसंरख्याकाचर्ग कर. और इष्ट सरन्याका घन करें. ऐसी इन दोनों संरयात्रा 'करे, और पहले गुणाकारमं मिखाचे, ऐसा करने में जो सरन्याहू .

॥ गुणकर्मप्रकारः (३) ईही वह एक संरच्या, ब्यौर दूसरा गुणाकार मिलकै दो संरच्या होती है. यह प्रकार अंकगणितमें अथवा बीजगणितमें होता है ।। ३९ ।। इसप्रकारका उदाहरण ऐसाहै कि :- इष्ट ३ ३ वर्ग पुनः वर्ग५६ संक्षिप्तरूप । सैक- यह प्रथम राशि हुआ. इष्ट पन - संक्षितरूप यह दूसरा राशि हुना.३९ इतिवर्गकर्म प्रकारः ॥ अथबुद्धिमत्तशंसा. पाटीसूत्रोपबीजंगूदामित्यवभासते॥ नास्ति- ढममूढानां नैवपोढेत्यनेकधा ॥१०॥ अस्तित्रैरा- शिकंपाटी बीनंचविमलामतिः।। किमज्ञातंसुबु- वीनामतोमंदार्थमुच्यते ॥४१॥ अर्थ- बीजगणित अगणित सरीखा होकरभी मूरहूं कठिन सालगता है. परंतु जो मूर्ख नहीं है उन्होंकू वह चीजगणिन कठिन नहीं यह वीजगणित छः प्रकारकाहीहऐसाभी नहीं तौं अनेक प्रकारका हैं meanजिनलोग में त्रैराशिक गणित अंकगणित और चीजगणित था निर्मल बुद्धि रहतीहै उनविद्वान् लोगों नहीं जानाहुआ ऐसाच्या है? इसवात्तयह सर्वगणित अल्प बुद्धिलोगोंके वास्ते कहाभाताहै। अथगुणकर्म प्रकारः अब कोईभी इष्टसंख्याका मूल और दृश्य संरख्या इन्होंसें तथाइ ष्टसंरब्याका मूल, भाग, और दृश्यसंख्या इन्होसें इष्टसंख्या निकाल |नेका प्रकार दो लोकांसें कहते हैं:- लीलावती - यदालवैश्चोनयुतःसरशिरेकेनभागोनयुत्तेनभत्ता दृश्यंतदामूलगुणंचत्ताश्यांसाध्यस्ततःप्रोक्तयदेवराशि:४३ अर्थ- इष्टसरच्या राशि उसके पर्गमूलकी अपेक्षा कुछच्यंशमें कम होय, अथवा अधिक होच तों, उसइष्टसंरच्याराशिक दृश्य सं ख्याराशिमै मूलके गुणकका अर्ध करके उस अर्थका वर्ग मिलाना,ऐ साकरके जो सरख्या याचे,उसका जोड करकै वर्गमूल निकालना.पी छेउसने गुणकका अर्ध मिलावे,याघटाचे,(जैसा कहाड़ो- ऐसा करनेसेंजोसरच्या आये, उसका वर्ग करना कि मभकर्ताका इष्टसं- रख्याराशिमाताहै॥४२॥जब वह इस सरच्याराशि उसके भागसेंक म होवे, तब वह भागा मेसे कमकरकै बाकीरहीसंरब्यासै अथवा जब वह इएसंरव्या राशि उसके भागसें अधिक होय, तब वह भाग उसमे मिलायकर जो सरच्या आये उस संख्याले दृश्यसंरच्याळू औ र मूलके गुणका भागदेकर फिर उन दोनोंसे “गुणनमूलोन." इस पूर्वोक्त प्रकारके अनुसारही इष्ट संरम्याराशि साधना ॥१३॥ अब मूलोन दृष्टका उदाहरण कहते है 33 बालेमरालकुलमूलदलानि सप्त तीरेविलासभरम- धरगाण्यपश्यम् ॥ कुर्वञ्चकेलिकलहकलहंसयु- ग्मंशेपंजले वदमरालकुलप्रमाणम् ।। २४ ॥ अर्ध- हे चाले लीलावति! फितनेक हंसपक्षियोंका समूह था. उसमें से उससमूहके वर्गमूलके ७ अर्धक होय.इसने हंस मैने स रोवरके लीरपर पिलासके भारसें भरनेसें मंदमंद गमन करते थे, ऐसा देरया और वाकी दो हंस शेपरहे वेजलमें श्रीडासें कलह करते थे, ऐसादेखाती चेसब ईस कितने थे ? सो तूं कह। इसउदाहरणकास्पष्टीकरणइसरीतिसे है सरव्या हरल्याहु - गुणकर्मप्रकारः (८५) मूलगुणक ५ अर्थ श्रुति ६ दृश्य समच्छेद योगकरके ६ मूल +४= गुणार्थ.समच्छेद है वास्ते योग करदेना संक्षिप्तरूप : हुआ. वर्ग १६ यह उत्तर हुआ. उसका ताला पिलानेफा होयतों ऐसा मिलाना- पन्म ऐसा है कि, जिसकोई संख्याका मूलका अर्थ सातवार योग करनेसेंजो संरख्या आवे, और २ यह दृश्य है तो ऐसी सरन्या कौनसी है ? इसका उत्तर १६ यह है:- १६ का मूल ४ उसका अर्ध २कू xvगुणा= १५इसमें और दृश्य २मिलाया= १६ इसरीतिसें देरपेनेसें १६ यह संरच्या सत्यहा२४॥ अब मूलयुतका उदाहरण कहतेहै- ऊ स्पपदैवभिर्युक्तं स्याञ्चत्वारिंशताधिकम् ॥ शतहादशकं विहन्त:सराशिगिद्यताम्॥२५॥ अर्थ- हे पिछन्। जिस सरच्या में उसके वर्गमूलकी संरच्याळू ९गु णाकरकै मिलानेसे १२४. यह संख्या होती है. तो ऐसीसंख्या कौनसी है सो कहेना. इस उदाहरणका स्पष्टीकरण ऐसा है. संख्या मूलगुणक दृश्यह मूलगुणक ९ अर्ध कति + १२४. समच्छेद करके योग करना. 21+ १९६० = इसका मूल ५ – कमई = २ संक्षि- सकिया: .३१ रहा. उसका वर्ग९६१ यह उत्तर हुन्मा. इसका ताला मिलानेका होयतों ऐसा मिलाना- प्रभऐसा है कि, कोई संख्याके मूलङ ९ सब्यासें गुणाकरके उससंख्या में मिलानेसें १२४० आते हैं तो ऐसी सरन्या कौनसी? इसकाउत्तर ९५॥ यह दि गहै. उत्तर ९६१ का मूल ३१ कूरसेंगुणा किया तौ २७९ हुए वे२९ सं २४. - (८६ लीलावती ५ रच्या उत्तर सरख्या ९६१ मे मिलाये ९६१ + २७९% १२४० हुए तो कि या हुआ हिसाब बराबर है ॥२५॥ अब भाग मूलोनका उदाहरण कहतेहे - यातं हंसकुलस्यमूलदशक मेघागमेमानस मोडीय स्थलपमिनीवनमगादष्टाशको अस्तटात् ॥ बाले! बालमृणालशालिनिजलेकेलिक्रियालालसदृष्टइंस युगप्रयचसकलायूथस्यसरख्यां वद ॥ २६ ॥ अर्थ-डे सीलाचनिकन्ये। कितनेक हसीका एक समुदाय था उ समेसे उस हससमुदाय सरच्या के वर्गमूलसरच्या दस गुनी होवे इ- तनेहस भतुमे चादल मानेसे मानस सरोवरकू उडके चलेगी ये और उस समुदायके आउमे भाग इतने हस पानीके किनारेसे स्थ लकमलिनियोके जगलमे चले गये तथा वाकी ६ इस कोमलकमल नालीसे सुशोभित जलमे कीडा करने लने हुन्मे देखे लौउसहस समुदायकी सर्व सरख्या स्याची सो तू कह। इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसे हे- सरच्या मूलगुराक ओ पाश दृश्य राशि मेसे गये है इसपास्ते । -कम में बाकी है। है उसमे मूलगुणक योर दृश्य भाग लेनाहे- मूलगुणक %D मूलगुणक अर्ध- सक्षिप्तरूप कृति = १६ समच्छद करिके १६००४.३३५ “मिथोहराभ्यामपवर्ति- ताभ्यां." इसरीतिसे जोड करनेसे १९३६ मूल + * गुणाधी योगफिया सक्षिप्त रूप इसका वर्ग १२२१२-१४ यह तर आ अर्थात् १४४ हसोका वह समुदायथा इस उदाहरणका ताला ऐसा हे कि, एक इसकुलकी सरव्या है

गुणकर्मप्रकार
उसके मूउर्दू १० गुणा करनेसें जो संख्या आवे, उसमें सबसंरच्याका
मिलाया. और दृश्य ६संरव्याका उसमें मिलाप करनेसें १४४ हुये.ऐ
साउदाहरण हुआहै. अब यह शब्द है या नहीं सो देखने का है तहां-
संरख्या १४४ इसका मूल १२ इमळू १० सें गुणा किया तब १२० हुये.और
१४४ संख्याका अष्टमांश १२० में मिलानेसें १३८ हुये. और ६ यह -
श्य संख्या १३८ में मिलानेसें १५५ संख्या हुई. हिसाव वरावर है २५
अब दूसरा भागमूलोनका उदाहरण कहते हैं-
३. पार्थः कर्णवधायमार्गणगणक्रुद्धोरणेसंदधेत.
स्यार्धनानिवार्यतच्छरगणमूलै चतुभिर्हयान् ॥
शल्यपडिरयेषुभिल्लिनिरपिच्छत्रध्वजकार्मुकं
चिच्छेदास्यशिरःशरेपाकत्तिते?यानर्जुनःसंदधे २७
अर्थ- अर्जुनने कर्णका वध करनेके वास्तै क्रोधित होफर युद्दमें
चाणोंका समूह धनुष्यको लगायकर छोडा.उसमें उसघाणसमूहके
अईसें उसकर्णके चाणसमूहकू दूरकरकै सब याषासमूह संख्या
के मूलसंरच्याके चौगुनी संरच्या होवे इतने वाणोंसें कर्णरथके घो-
डों छिन्न किया. बाकी ६ बाणोंसें शल्पनामफ कर्णसारथीजि
न किया. और ३ बापोंसें इस कर्णके छत्र, ध्वजा, और धनुष्य इ
न्होंकू तोड डाला. और । बाणसे कर्णफा शिरम्छेद किचा. तो
अर्जुननें जितने चाण छोडेये,चे कितने बाण चे ?
इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसें है.- संरच्या भाग
मूलगुणक दृश्य
राशि में कम किया - मूल गुणकळू आई हुईस
ख्यासें भाग लिया. (१३) यसरन्याहू आई
हुई संरपासें भाग लिया. २-३(3x+7=}} मूलगुणक
Fir

लीलावती. अर्ध४ का वर्ग में दृश्यका योग+ २०-३६ का मूल ६ गुणा से युत किया.- १. हुये. १० का वर्ग १०४ १० = १०० यह उत्तर हुआ. अर्थात् अर्जुनने १०० बाण छोडे थे. इस उदाहरणका तालामिलानेका होय तौं ऐसामिलाना- उत्तर १०० है. १०० का अर्थ ५० बाणोंसे कर्ण के बाणसमूहळू दूर किया. पीछे उत्तर १० का मूल १ है उसकू ४ से गुणा किया ४० हुए और दृश्य १० हैं.सवकाजोड करनेसें३: संरच्या १०० हुई. यहहि साब बराबर हुआ. ॥२०॥ अन्य उदाहरण कहते हैं- अलिकुलदलमूलं मालतींयातमष्टौ निरिवल- नवमशागाश्चालिनी शृंगमेकम् ॥ निशिपरिम. ललुसंपामध्ये निरुई मतिरणतिरणतं ब्रूहि कान्तेऽलिसंख्याम् ॥२८॥ अर्थ-हेलीलावति। कितनेक मरोंका एक समूह था. उस के अर्थका वर्गमूल और सब समुदाय ६ इतने धमर मालतीके ज्य उपर गये.और एक चमरी, अपनापति सुगंधसें सुब्ध होकर क मलकोशमें रात्रिके समय रोकागयाधा, और शब्दकरताथा,उ सर्व प्रतिशब्द देतीधी. नौं उन चमरोंकी संरच्या क्या थी?सोका इसउदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसे है-न्याससंरख्या भाग ईश्य पूर्ववत् । “यदालवैः" इसरीतिसें - दृश्य १८)= ? मूलक मरगुणक स्पयोग 'अर्थप ६-2+Key = २३६ उसका मूलगुगाई दे बराबर है वास्तै योग कर दिया (९२) लीलावती। निष्क निष्क द्रम्म पण काफिनीरदमडी) वराहका ३ १ यह उत्तर १८० कर निक द्रम्म x१५ ८० पण रपण अर्थात् १२, कहिये ४९ पलभार कपूर देनेसे ३० निष्का३ द्रम्म, - पण, ३ काकिनी, ११- चराटका इतनी कीमत मिलेगी. यहंउत्तर॥ ५ ५ काकिनी काकिनी ० परारका कचरादका पुन उदाहरण कहते है उ०- द्रम्मयेन साष्टांशा शालितंदुलखारिका । लण्याचेत्पणसप्तत्या ततिं सपाद कथ्यतां ॥३२॥ अर्थ-दौसम्मोस शालि त्दुलोकी रचारी मिलती हे ती, पणोके चावल कितने मिलते है । सो जलदी कना ।। इस उदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीतिसे है-न्यास सरव्या- द्रम्म पारिका पण यहा ट्रम्महै उन्होके पण करना तो १६पणोंका ट्रम्म, ऐसे दो ट्रम्मोके ३२ पण हुये फल खारिका पण है प्रमाण पण ३२ ३२ न ५६ इसका पूर्णाक करदिया तव रचारिका. द्रोण आठक प्रस्थ १ व्यस्तत्रैराशिकप्रकार। उत्तरभया ३२॥ रचारिका द्रोण आढक प्रस्था २५६) ६३० (२ -७ १ २ ५१३ १८८८ ~ ३८४ ५१२ १३ इतित्रैराशिकप्रकार। अथव्यस्त त्रैराशिकपकारः। अब व्यस्त त्रैराशिकका प्रकार एक श्लोकसे कहते है- इच्छावृद्धी फले हासो हासे दद्धिः फलस्यतु॥ व्यक्तं त्रैराशिकं तत्रज्ञेयं गणितकोविदः ॥ ४५ ॥ अर्थ-जिस राशिकमे इच्छासे फल कम आनेका होय, उसको व्यस्त नैराशिक ऐसा कहतेहे - इच्छाकी राहि और फलमे कमा | नेका होय और कम फलमे फलकी रहि होच, तो इसरीतिके हि सायमे गणितशास्त्रज्ञलोगोने व्यस्तत्रैराशिकनामक गणितका प्र कार होता है ऐसा समझना ॥ ४५ ॥ जीवानावयसो मौल्ये तौल्ये वर्णस्य हेमनि ॥ भागहारेच राशीनां व्यस्त त्रैराशिकं भवेत्॥१६॥ अर्ध-जीबोके ऊमरकी कीमत करनेमे, (अर्थातजीबोकी ऊमर अधिक होय, ती कीमत बहोत होत्तीहे, ओर ऊमर कम होयतौ की मत बढती है। सोनेको शह करनेसे उसका रंग बदत्ताहै,परतु उस लीलावती. का वजन कम होजाता है. तहा उस सोनेके तौलसे भाव करने में और धान्य आदिके राशीमे माप कारकै भाग करनेमें अथवा किसी भी पदार्थके कमज्यादा परिमाणसें भागहार गिनती करनेमें व्य- स्त त्रैराशिक [का उपयोग] होलाहै.॥ ४६॥ अवजीवके उमरसें मूल्य निकालनेकेवास्तै व्यस्तत्रैराशिकका उदाहरण कहते हैं- उ. पामोतिचे पोडशवत्सरास्त्रीद्वात्रिंशतविंशतिवत्सराकिम् ? दिधूर्वहोनिष्कचतुष्क मुक्षाप्राप्नोतिधूःषट्कवहस्तदाकि१३३ अर्थ-जो१६ वर्षकी मी ३२ निष्कामे मिलती है.तौं पीस२० वर्ष- की स्त्री कितने निष्कोने मिलेगी, तथा जिस चैलनेश वपत्तककीदो] धुरा । गाडीओंका जोत ] वहाहै वह बैल ४ निष्कोंमें मिलताहै, ौं जिसवेलने छ. वर्षतककी छ.] धुरा (गाडीओकाजोत) चही है, वहदैल कितने कीमतमे लेना? इसउदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीनिसे है.-इसउदाहरणमें वि- चार करना कि, सोलह वर्षकी रूपी घरमें आई सो जुबान है. इसयाले तुरत काममे त्र्याजायगी, और बीसवर्षकी स्त्री उसके अपेक्षासे बूढी है तिस्सें धोडा काम देगी. स्त्रियोंकी कीमन तो जुवानीकी रहतीहै. इस कारणसें १६ वर्षचाली स्पीके अपेक्षासे २० वर्षवाली स्पीकी की मत कम यावेगी ऐसा समझकर उदाहरणका हिसाव करना. जैसा- प्रमाण फल इच्छा न्यास संख्या ३२ प्रमाणा५४३२% (२x२) इसका पूर्णाक २५ ३३ संक्षिप्तरूप २५३ -- २० २५३ यह उत्तर भवा. अब दो धुरा बहनेवालाबैल जवान है, और उः धुरा पहनेवालावैल्य - व्यलत्रैराशिकप्रकारः। (१५) प्रमाण फुल इच्छा फ४४२ प्रमाणinܩ १ बूढाहै. जवान बैल ज्यादा कामदेगा. इसंचालै उसकी कीमत अधिक, और बूटे चैलकी कीमत कम होना चाहिये ऐसा समझकरिकै उदाहर- |णका हिसाव करना. जैसा- न्यास सख्या २ फल४४२प्रमाण- (६x६)-६ पूर्णांक है इसका संक्षिप्तरूपं यहउत्तर हुआ अब कसदार सोनेके तौलका उदाहरण कहते हैं:- उऊ दशवर्ण सुवर्णचेद्द्याणकमवाप्यते । .. निष्केण तिधिवर्णतु तदा बद कियन्मितम् ॥३४॥ अर्थ-जो१निष्कको १० कसके सुवर्णका १ गद्याणक मिलताहै,तो १ निष्कका १५ कसी सुवर्ण कितना तौलका मिलेगा. सो५ कहः॥ इसउदाहरणका स्पष्टीकरण इसरी विसेंहे.- प्रमाण फल. इच्छा प्रमाण.फ. न्यास सरख्या १० १६ सक्षिप्तरूप यह उत्तर हुआ. अर्थात् १मिष्कका १५कसी सुपर्ण गद्याणक मिलताहै ॥३४॥ अब धान्यराशिको मापसे मापनेका उदाहरण कहते है- उदा० सप्ताहकेन मानेन राशौ सस्यस्य मापिते । यदि मानशतं जातं तदा पंचाढकेन किम्? ॥३५॥ अर्थ-धान्यकी एक राशिहै उसको ७ आढकका एक माप इत नेप्रमाणके मापकारकै मापनेसे जो१०. सौ मायभर वह धान्यराशि होताहै तौ ५ व्यादकका एक माप इतने प्रमाणके मापकरिकै मापनेसे । फलसे प्रमाणको और प्रमाणसें फलको गुणा करनेस गुणाकार सरख्या एक सरीत आती है. -- १५ (९६० लीलावती. वह धान्य राशि फितने मापार होगा प्रमाण फाइ इसउदाहरणका स्पष्टीकरण ऐसाहै. न्याससंरख्या ४००१-२(४६)="" पूर्णाक किया १४. यह उत्तर हुन्या अर्थात् ५ आठकका १ माप ऐसे मापसें गिन नेसें वह धान्यराशि १४० मापथा ॥३५॥ इतित्रैराशिकप्रकार ।। अय पचराशिकादिप्रकारस अव पचराशिक, सप्तराशिक, नवराशिकादिकों का प्रकार एक श्लोकसे कहते है। पंचसप्तनवराशिमादिकेऽन्योन्यपक्षनयनंफलच्छिदां । संविधायबहुराशिजेवधेस्वल्पराशिवधभाजित्तेफलं ॥४॥ अर्थ- पचराशिक, सप्तराशिक, नवराशिक आदिकीमें फलस- रख्याको इच्छासरव्यामें लेजाना, और इच्छासंख्याको फलसंरण्यामे ले जाना ऐसा करनेसे, जो बडा राशि होता है, उस वडे राशिक गुणा कारको स्वल्पराशिके गुणाकारसे भागदेना जो भाग यायेगा, वहफ ल होताहै. ॥१७॥ अब पचराशिककाउदाहरण कहते हैं- १ उ मासे शतस्य यदिपंच कलांतरंस्याइपेंगते भवतिकि 16 वद षोडशानाम् ।। कालं तथा कथय मूलकलांतराभ्यां मूलं धनं गणक कालफले विदित्वा ॥ ३६॥ अर्थ- हे गणक। एक महिनामें १०० सौ रुपैयों को जो ५ रुपैया व्याज होता है. तो १ वर्ष मे १६ रुपैयोका क्या व्याज होता है ? तू कह तथा मूलधन (सुद्दल धन) और व्यानका धन इन दोनोके जाननेसे काल (मुदत) कह और काल तथा तिसका व्याज समऊ नेसे मूलधन (मुद्दल) कितना था, सो तूं कह ।। - प्रमाण मास व्या. पचराशिकादिप्रकारः। इसउदाहरणका स्पष्टीकरण इसरीनिसेंहै: तहां प्रथम ब्याज कादर, मूल धन और काल (मुदन इन्होंसें ब्याज निकालनेके उ दाहरणका स्पष्टीकरण ऐसा है:- न्यास फल इच्छा इसउदाहरणमें फलसंख्या ५ मास१२ को इच्छासंरख्या में लैजानेसैं इ- छासंख्या १२,१६, ५हुई. इच्छा रुपैया१००:५व्या. रु.१५ संख्याके तीन राशि हुए. और यह ले प्रमाणपक्षमें 3, १०० इसमें दो राशिहै. इसमें दूसरे पक्षमें अधिक राशिहैं.और पहले पक्षमें कमराशि हैं. इसवास्तै अधिकरारािओं का गुणाकार कारकै उसको कमराशीके गुणाकारसें भाग दियाजैसा, १२-१५-१९२४५-९६० यह अधिक राशिका गुणाका रतथा १५१०० १०० यह कमराशिका गुणाकार हुआ.फिर ९६०-१०० = ९३ यह भागदेकर संरच्या आई.इससे ।६ रुपै- योंका चारह महीनोका ९३ व्याज हुआ. यह उत्तरहै. अब काठज्ञान जाननेके वास्तै दूसरा न्यास है- ६ इन्हों का आपसमें पक्षनयना किया तो; ऐसाखरूपहुआ.फि रबहुतराशियोंके घात ४८००में अल्परोशियोंके घातप.. का भागदेनेसें उन्ध १२ महिने हुए. अब मूलधनके लिये तीसरा न्यास पक्षनयन किया तो ३ ऐसाहुवा. फिर . | मास रु.

लीलावती. छैःफलमुच्यतां किम् ? ॥३७॥ छेदारूपेष्यितिरुने न्यातः न्यास Prer ها پای अन्योन्यपक्षनयनेन्यासः १२५ तत्र बहुराशिवधः१५६००४ स्वल्पराशिवधः २०... चेद- २६ भक्तेलब्ध.६ छेदभरू पेरुते जातं कलांतरं ३ कालादि ज्ञानार्थ पूर्ववत् यहा प्रका रांतरेणास्योदाहरणं- न्यासः १३५६२६ ५२३ अब स- वैषी छेदनरूपेषु लवाधनर्णमित्यादिना संवर्ग कृतेजातं ४ २६ १५ १२५ अन्योन्यपक्षनयने वहूनां राशीनां ५ ३ ५५ वधः ५२००० अल्पराश्योः दधः भागार्थविपर्ययेण न्यासः ५२... शहनिः १५६०० छेदवधः २०... भक्ते जातं७३ वेदप्रपेकते जातं कलांतरमिदं ३६ एपंधीमता सर्वत्रज्ञेयम् अर्थ- इसी तरह सब जगह जानना. अब दूसराउदाहरणऐसा है. अपने तीसरे अंशकरके सहित एक महिने में १०० रुपयेऊ पर अपने पांचमें अंश करके सहित ५ च्याजामिलताहै. तो क हो कि अपना पंचमांश करके सहित ३ महिनेमें साडेबासठ रुपयों का कितना ब्याज मिलेगा? ज्यासाइन्होका भागानुरंघकी रीनितें सवर्णन कियातो. ५ ऐसा स्वरूप हुआ. फिररन्होंकापक्षनपनकिये तो ऐसास्वरूप हुआ.फिर बहुतराज सम पात ५६..में अल्सराशिय + AAPr هما १२५ (१००) लीलावती. .- वाला ऐसा १ वस्त्र कितेनेमें मिलेगा ? हे यणिग्वर ! जो तुम बात गिज्यकोजानते होतो कहो. न्यास-है। उन्होको पहलीकीनाई फल और हरोंको उलटकेरकरखा १०० तो ऐसा हुआ फिर बहुत राशि योंके घात ७०० में अल्पराशि- "योंके घात ७६८ काभा गदियातो निष्क मिला-फिर शेष७०० सोलह १६ गुणाका२००६ इस ०६८ का भागदेनेसें । द्रम्मामिले फिर शेष १५८ सोल हगुणाकर ७१६८ इसमें ७६८ का भाग देनेॐ ९ पण मिले.फिर शेष २५६ को ४ गुणा १०२४ कर इसमेंट को २० गुणा५४२० कर इसमें७६८ काक्षाग दिया तो कोडी ६३ मिली।॥३८॥ अब नवराशिक उदाहरण कहते है-- पिंडे येऽमितांगुलाः किलचतुर्व गुलाविस्वती पट्टादीर्घतयाचतुर्दशकरास्त्रिंशलभतेजातम् ॥ एताविततिपिंडदैयमितयो येपांचतुर्जिताः पट्टास्तेवदमेचतुर्दशासरचे मूल्यलमतेक्वचित् ३९ लव्य मौल्यनिष्काः १६३. अर्थ- बारह अंगुल मोटे, सोलह अंगुल चौडे और चौदह हाथ लंबे ऐसे तीस पटैले १०० निष्कोंके मिलते है तो पाठ अंगुल मोटे, बारह अंगुल चौड़े औरदश हाथ लंबे ऐ- से चौदह कितनेमें मिलेंगे येत्तुम कहो. न्यास-१२ यहां फलको पलटकर रकरवा तो ऐसा- -स्वरूपहुआ.फिर बहुतराशि|| ११३४४... में . १५ १२ न्यास १४ १०० - ८ ट १५ १४ योंके घात. १०० १० पंचराशिकादिप्रकारः घात ८० ६१० का भाग देने से ऐसा १६हुन्या फिरशेष-१३ मेदोसें अपवर्तन दिया तो ऐसा२०६८८ हुआ. फिर इसका शेष ५३५६ में अपवर्तन देनेसें १५३ इच्छाफल मिला ।। ३९ ।। अथैकादशराशिकोदाहरण कहते हैं- पट्टायेप्रथमोदितप्रमितयोगब्यूतिमात्रे स्थिता- स्तेषामानयनायचेच्छकटिनांद्रम्माष्टकं भाटकम्। 'अन्येयेतदनंतरनिगदितामानेचतुर्वजिता स्तेपो का भवतीति भाटकमितिर्गव्यूविषदू वद ॥ १० ॥ लब्धाभाटके द्रम्मा. ८ न्यास. में . अर्थ- पहले कहेहुये पटैलोके ल्यावनेके अर्य गाडिौंको २ कोशका भाडा निष्क लगता है तोउसके चारकरकै वर्जित अन्यजो कहैहै इन्होंका १२ वारहकोशपे क्या भाडा लगेगा ? यह तुम कहो. न्यास १६ यहलेकीनाई फलको पलटकर बहुतराशियोके घातमे अल्पराशियोंका भागदेनेसे द्रम्म इच्छाफल मिला. ॥१०॥ अब भाड प्रतिभाडमें करणसूत्रको आधा छंदकरके कहतेहैं। तथैवभाण्डप्रतिभाण्डके विधिविपर्ययत्तत्रसदा हि मूल्ये ॥ अर्थ- भाह और प्रतिभांडकमें उलटी क्रिया करनी। उदाहरणं- द्रुम्मेण लभ्यत्त इहाम्नशतत्रयंचेत्रि. शत्पणेनविपणौ वरदाडिमानि ॥ आपैदाशदशभिः कतिदाडिमानि लभ्यानितहिनिमयेन भवतिमित्र! ११ (१२) लीलावती। न्यास.१६ लब्धानिदाडिमानि १६ ३.. १० ३० . अर्थ- हे मित्र जो एक द्रम्मके ३०० आम मिलते है और बजारमें १एक पएरके ३० सुंदर अनार मिलते हैं तो क- हो कि दश ग्रामोके कितने अनार मिलेंगे? यहां पराकिवाड याद्रम्मका न्यास १५ आपसमे मोलका विपरीत करके न्यास ३० ३५ बहुत राशियोके घात ४८०० मे अल्पराशियों- के घात ३०० का भाग देनेसे १६ अनार मिले . यहउत्तरभया ॥४१॥ इतिप्रकीर्णकप्रकरणम् ॥1283 ॥ अथामिश्रकप्रकरण । अब मिश्रातरमे कर्णसूत्रको देउछदसे कहते है:- अथमिश्रक व्यवहारेकरणसूत्रसार्धटत्तम्- प्रमाणकालेनहतं प्रमाणंपिमिश्रकालेनहतफलंच स्वयोगभन्तेचपृथकस्थितेते मिश्राहतेमूलकलांतरे स्तः ॥ यद्देष्टकरिव्यविधेस्तु मूल मिश्राच्युतं तच्चकलान्तरं स्यात् ॥४॥ अर्थ- प्रमाणके काल करके प्रमाएके धनकोरगुपौ ।।४८ ।। फिर उन्होको जूदाजूदा रहने और उन्होंको मिनसें गुणाकर उसमे अपनेयोगका भाग देनेसे मूलकलातर होते है ॥४९॥ उद्देशकः ॥ पचकेनशतेनाय्दे मूलं स्वंसकलांतरम् सहसंचेत्पृथक्तत्रयद मूलकलान्तरे ॥४२॥ न्यासः । १२ लब्धक्रमणमूलकलांतरे ५२५४३७५ "अयवेष्टकर्मणाकलितमिष्टरूपम् । १०० .

पंचराशिकादिमकारः। (१.३) उद्देशकालापवदिष्टराशीत्यादि करणेनरूपस्य वर्षेकलातरं ३ एतद्युतेनरूपेण ६ दृष्टे (१०००) रूपगणेभक्ते लब्धं मूलधनं ६२५ एतमिश्रात् (१०००) व्युतं कलांतरं ॥ ३७५ ।। अर्थ- अब उदाहरण कहतेहै:- १०० पै १माहनेमैं पांचच्या जमिलता है. और एक वर्षमें मूल धन और ब्याजसहित ह- जार होते है. कहो कि - उन्होंमें कितना च्याजसहित हजार हो. नेहैं और उन्होंमें कितना ध्याज और कितना मूल धन है न्यासहै-.. १२. यहां प्रमाणके काल से प्रमाणके धन १०० को गुगादिया तो १०. ऐसाई रहा. फिरविमिश्रकेका ल' १२ करके फल ५ को गुएनेसे ६० हुवे.फिर उन्होंको एक स्थानमें योग करके १६० रक्रया और एक स्थानमे अलग १०० ॥ ६० रक्ये फिर मिश्र १००० से गुपानेसें ऐसे१००... ६०... हुवे. फिर इन्होंमें अपने योग १६० का भाग लेनेसें मू- लधन ६२५ और कलांतर अर्यात व्याज ३७५ मिला. यहां इष्ट १ कल्प नाकर इष्ट कर्मकी रीनिसें रूपको एक वर्षमें व्याज ३ मि- ला फिर रूप १ को उसमे समच्छेद करके जोडालो हुवे फिर इसका मिश्रभागकी रीतिसें १ से सुपा हुआ दृश्य१०० में भाग देनें सें मूल धन ६२५ मिला फिरइसको मिन्मा... में घटानेसें व्याज ३७५ मिले ॥४२॥ अब मिआंतरमें करणसूत्रको एक उंदसें कहतेहें:- मिश्रांतरेकरणसूत्रं अयप्रमाणैर्गुणिता सका- लाव्यतीतकालनफलोदृतास्ते ।। स्वयोगभक्ता भानिमिअनिभाःप्रयुक्तखंडानिएयग्भवंति ॥५०॥ अब दूसरा प्रकारः-न्यांस 1०० จ (१०४७ लीलावती. . १ १०१०. अर्थ- अपने कालोको प्रमाणाधनोंसें गुणाकर पित्ताहुन्या कालले गुणा हुया फलका भाग देवै. फिर उन्होंको अलग २र- स्दै और उन्होके योगको अलग रस्त्वैः और उन्होंको मिश्र से गुणाकर अपने योगका भागदेनेसें प्रयुक्त खंड अलगहो जाते है ॥५०॥ अब उदाहरण कहते हैं:- उद्देशकः ॥ यत्संचत्रिकचतुष्कशतेनदत्तंरचंडै- लिभिर्मणकनिष्कशतंपडूनम् ॥ मासेपुसप्तदश पंचसुतुल्यमाप्तं खंडनयापिहिफलं वद खण्ड संख्याम् ।। ४३ ॥ न्यासः .. ७.. मिन्धन र लब्धानि यथाक्रमेण संडानि २४।२८।४३ पंचराशिवकरणेन समकालांतरम् । अर्थ- हे गणक! कोई पुरुपने ९४ निष्कके तीन पंडकर के दिया. उन्होंमेंसें प्रयमरखंड पांच रुपयेसेंकडेसैं दिया तो यह ७ महिने रहा. दूसरा खड तीन रुपये सेकडेसें दिया. यह | १० महिने रहा. और तीसरा संड चार रुपये सेकडसें दिया वह ५ महिने रहा. तो तीनो रवंडों में समान फल मिलताई तो उन्होंकी संख्या अलग, अलग कहो। न्यात है-201.11.1५ यहां अपने अपने का लांको अपने अपने प्रमाणोंसें गुणा करनेसें ऐसाही1011 11. रहा. फिर पितहुये कालोंको १५ को फलों ५।३।४ से गुणा३५॥३०॥२कर भाग देव.फिर इन्हों ५।१.३० इन्होंका अपवर्तनादिया तो पहुये. फिर इन्होंकासमच्छेद २१ ६ मियांतरप्रकार. (१०५), कर योग-३५ करै फिर जिन्होंकासमच्छेद करके योग किया है उ- होको १४ से गुएरा किया तो ऐसे १८८० . . इन्हों- में यह लेकर हुआ योग २३ का मिश्र भागको रीतिसें भाग देनेसें २४१३८ ॥४२, मिले. यही समान व्याज है ॥१३॥ अब मिश्रांतरमें करण सूत्रको आधा छंदकरके कहते हैं- प्रक्षेपका मिश्रहता वितक्ताः प्रक्षेपयोगेनपृथक फलानि ॥४०॥ अर्थ- प्रक्षेपक अर्थात् मूलधनको मिन्प्रसें गुणाकर इसमें क्षेपोके योगका भाग देनेसें जुदे जुदे फल होते हैं. अनोद्देशक।। पंचाशदेक सहिता ५१ गुणकाष्टप. टिः६८ पंचोनितानपति ८५ रादिधुनानि येषां॥ प्राप्ताविमिश्रित धनस्त्रिशतीविमिर्याणिज्यतो वद विभज्य धनानितेषाम् ॥ ४४ ॥ प्रक्षेपक न्यासः ५१-६८-८५ मिश्रधनं ३०० जातानि७५- १००-१२५ - एतान्यादिधनैरूनानि लाभा: २४-३२-४० अथवा मिश्रधनम् ३.. आदिधनैक्येन २०४ -उन सर्चलाभयोग: ९६अ- स्मिन् प्रक्षेपगणिते सलेपयोग २०४ भक्ते लाभा: २४-३२-१० अर्थ- अवउदाहरण कहते हैं:- हेगणक ! जिन्होंका ५७-५८ ८५इनन यादि घनथा. उनको व्यापारमें संपूर्ण मिलाहुआ धन तीन सौ. तो उन्होंके धनको वाणिज्यसें विभाग कर कहो. न्यास प्रक्षेपकाधन ५-५-२५ और मिश्रधन ३०० प्रक्षेपः कधनोंको मिश्रधन ३०० सें अलग अलग गुणा १५३०० -२०१.. |- २५५०० कर इन्होंमें प्रक्षेपकोंके योग २०४ का भाग देने से धन ७५.१० -१२५ मिले. पेसोंके लाभसमेत धन है इन्हों को या - (१०६० लीलावती। दि धनोकरके ऊन करनेसे लाभ धन२४-३२-१० मिले. अथवा मिश्रधन ३.. को न्यादिधनोंका योग २०४५ करकै उन करनेसें संपूर्ण लाभका योग ९६ होता है.इरसें प्रक्षेपधनोंको अलग अलगगुणा १८९६- ६५२८-८१६० कर इन्होंमें जुदे जुदे प्र. क्षेपधनोके योग २०४फा भागदेनेसे लाभपन २४-३२-४० है। अप वापी अर्थात् यावड़ी आदिको पूरणमें करणसूत्रको साधा छंदतें कहते हैं- वाप्यादिपूरणेकरणसूर्ववृत्ताईम् ।। पजेच्छि- दोशैरयतैषिमिश्ररूपं भजेत्स्यात्परिपूर्तिका- उ. 1 अर्थ- अंशो करकै छेदोमें भागदेवै.फिर उन्होका योग करके रूपमे भाग देनेसें परिपूर्ति काल अर्थात् पूर्णकाल होता है।५७ अब उदाहरण कहते हैं- येनिर्झरादिनदिनार्धत्तीयषष्ठैः संपूर्यतिहिप- थक्पृथगेवमुक्ताः ॥ वापीयदायुगपदेव सरवैवि. मुक्तास्तेकेनवासरलवेनतदा वदाश।। ४५॥ न्यासः समोचापीपूरणकालो दिनांश। अर्य- अलग अलग छोडे हुये झिरने एक दिनका आधा काल एक दिनका तीसरा अश और एक दिनका छग अंश इ. न्होसें चावडीको पूरण करते हैं. तौ हे सखे। एक काल सपरिरने डोडे जावै तो कितना कालमें चावडीको पूरण करेंगे यह तुमकहो।। न्यास ३३ यहां अशोंमें होका भाग दियाती। ऐसासरूपहुआ. फिर इन्होके योग १२ का रूपामेसे भागदेने से। मिले. फिर एक दिनके दंड कर इसमें हर का भाग दिया तो क्रयविक्रयप्रकार. (१०७) दंड मिले. यह पूरणकाल है॥४५॥ क्रय अर्थात् खरीदना विक्रय अर्थात् वेचनामें करणसूत्र- को एक छंदसे कहते हैं:- अथक्रयविक्रयेकरणसूत्रंवृत्तम् - पण्यैः स्वमू- ल्यानि भवेत्स्वमागैर्हत्वातदैक्येन भजेच्चतनि । भागांश्चमिन्प्रेणधनेनहलामौल्यानिपपयानिय. थाक्रमात्स्युः ।। ५२॥ अर्थ- अपनँ मूल्योंको अपने भागो करकै गुणाकर प- एय अर्थात् जोचीजचीजाती है उसके तोलका भाग देवै फिर उसको दो जगह रवै.उसका एकस्थानमें योग करै.एक स्थानमें रहने देवै. फिर भागोंको मिश्र धनसें गुणाकर उन्होके योगका भाग देनेसें मकरकै मोल और पएर मिलते है।५२ उद्देशकः ॥ साई तंडुलमानकत्रयमहोद्रम्मेणमा 괴 नाष्टकंमुहानांचयदित्रयोदशमिता एतावणिक्काकि- णीः ॥ आदायाप्य तंडुलांशयुगलं मुद्रेकभा गान्वितं क्षिप्रंक्षिप्रभुजौ बजेमहियतः सार्योऽय तो यास्यति ॥४६॥ न्यासः पण्ये १६ मौल्ये। स्वप्नागौ। मिअधनं अत्रस्वमूल्पे स्वभागगुणिते पण्याभ्यांभक्ते जातेभा गौच मिश्रधनेन संगुण्यभक्ते जाते तंडुलमुद्गमूल्ये। तया तंडुलमुद्रमानैभागी अत्र तंदुलमूल्येपो २ काकिण्पो २ वराटकाः ३६ मुद्गमूल्ये काकिण्यौ २ वराटका६३ अरउदाहरण कहते है:- एकद्रम्मके सादेतीन चावल मिलते हैं. और मान मंग मिलते है। ती हे वणिक् । तेरह काकि लीलावती णियोको ग्रहणकर एक भाग मूग करके सहित दोभाग चावल कितने २ तोलमे आते है और इन्होका मोल क्याहै यह तुमले कर हमको जलदीदेयो हमजाते हे कारण हमारे साथीदार आगे निकल जायंगे। न्यास- चावल मोल भाग मोल ! भाग मिश्रधनमा म" मान यहां अपने भागों३३ करके अपने अपने मोल ११को गुणा किया तो पहुये फिर इन्होमे अपने अपने पएप अर्थात तोल काभाग देनेसे ऐसा स्वरूप हुआ मि रउन्होको दोजगह लिया. एक जगह योगविना लिखा, और एक जगह समच्छेदकर योग किया तो हुये जिन्होकायोग नहीं किया है उन्होको मिश्रधन करकै गुणनेसे पाहुचे. इन्होमे पहले योग का भाग देनेसें मोलके भाग २ २४ मिले यहा चावलोके मीलमे पण२ काकिएी २ कौडी१३३ ऐसे है। गोंके मोलमे काकिणी कौडी ६३ ऐसे है ॥१६॥ उदाहरणम् - कर्पूरस्यवरस्यनिष्कयुगलेनैकं उ.- पलं प्राप्यते वैश्यानंदैनचंदनस्यचपल द्रम्माष्ट; भागेनचेत् ॥ अष्टांशेनतथाऽ गुरोःपलदलं निष्के णमे देहितान् भागैरेकका पोडशाटक:५-८ मितैयूंपत्रिकीर्पोम्यहम् ॥४७॥ न्यासा - पण्यानि। मौल्यानि भागा। मिश्रधन द्रम्मा. १६ लब्धानि करादीना मूल्यानि १४३ तथैव तेषापण्यानि अब उदाहरण कहते है- अर्थ-- दो निष्कका सुदरकपूर १ पल मिलता है. हे ॥

(११६ लीलावती. २।५।८।३ सर्वेषामेकै कैयमितिरतोजातानि स्वर्णमानानि ॥५ ।४।३ ॥ अन्यउदाहरणम् ॥ केयूरकर्णाभरणांगुलीयकांगदायजै पीहरि- णायदांगमे । वेणीकृतेशांकनगेंद्रवर्ष भानानि तेषांरविवर्णहम्ना ॥ ५४॥ न्यास. १११९11१४ वर्णाः युतिजातर १२ पत्रधन मानार्य १४।१५ अनयोर्मिती-१1३१४१समाजयोर्मिती२५२ तया १११७ अनयोर्मिती ७.२ अब चतुर्वतयुवर्णमितयः १३ १७ सर्वासायोगः ११ जाता मिति: एकस्वर्णमानानि २।२।२।१य- हा ९।११ भास्करोक्त्या अनयोमिति साधनेनववर्णसुवर्णस्यामिति १साधनासुनः १।१४ अनपोर्मिति साधनेतस्पैर सवर्णस्यामिति २ साधनांउत्तरे कृतेजातातस्पस्वर्णमितिः एचसषांमानानि ११॥२॥ ११ एवं कुर्वता बहुधाषिचार्यमिति अव उदाहरण कहते हैं- जिनसुवर्णके वर्ण अठारह सो लह ग्यारह और नौ येहै. और उन्होका योग तेरह है तो उ. 'न्होंके पोफाशीघ्र मान कहोः -- ॥५४॥ ... सुवर्णगणितप्रकार चौदह इन वर्णो फरके वेपी अर्थात् पटियों विषै करनेमे उन्हों। के बारह योग करके मान कहो. न्यास ११1111१४ योग१२ यहां धनजाननेके अर्थ १४१११ इन्होंको समविलोमसें घटादिया तो 19मिले. ऐ- सीही १४१५ इन्होंका मान ३।२ मिले.ऐसेही १४१७ इन्होका ना ना मिले ये चौदह सुवर्णके मान १।३।७ है.इन्होका योग ११ है. ऐसे करनेसें सुबके मान २१२०५।११ मिले. यहा ९1११ इन्होंकी मित्ती भास्करकी युक्तिसें मिलती है यहां सान धनेमें सुवर्णकी मिती २ मिलती है धनोंका अंतर करातो सुन वर्णकी मिती १ऐसे सबोंके मान५।११२।११ हुवे.ऐसे बहुत जानने उदाहर्णम् ॥ हाटकगुटिकेपोडशदशवर्णेता. तौसरखेजातम् ॥ द्वादशवर्णसुवर्ण हितयाँ स्वर्णमानेमे ॥ ५५ ॥ न्यासः १७. साध्यो वर्ण: १२ कल्पित मिट १ लब्धेत- वर्ण माने अथवा हिकैप्टेन अईयुणितेनचा १५ एवं चहुधा अर्च- अबउदाहरण कहते हैं- एक सोना सोलहके वर्ण का है. दूसरा सोना दश वर्णका है इन्होंका तौल नहीं जानते प रंतु हे सरखे! इन्होका योग करनेसें बारह वर्गका सोना होता है. तो कहो कि उन्होंका तौलका मान क्या होगा? न्यास १६ १० वडे वर्ग १६ में युनिजात वर्षको प टा दिया तो ४ रहे फिर युति जातवर्ण १२ में छोटे वर्ण को घटा दिया तो २ रहे. शेष १२ इन्होंगे इष्टा एकसें गुणदि- (११८) लीलावती. int ॥ या तो सोलहके वर्णका तोल २ और दशके वर्णका तौल मिले. १६ १७ और दो२ इष्ट मानातो २५ मिले ऐसे ब- हुत प्रकार होते हैं ॥ ५५ ॥ अब छदके चिति आदिमे करणसूत्रको तीन लोकों से कहते हैं। अथ दुनित्यादौ करपासूत्रलोकत्रयेण एकाद्येकोत्तरायंका व्यस्ताभाज्याः क्रमस्थितैः परः पूर्वणसंगुण्यस्तत्परतेनतेनच ॥ ६ ॥ एफहिन्यादिभेदाः स्युरिदंसाधारणस्मृतम् ।। छंदनित्युत्तरे छंदस्युपयोगोऽस्यतदिदाम् ॥ ५॥ मुलावहनभेदादौ पेड़मेरौच शिल्पके ॥ वैद्यके रसभेदीवेतन्नोतविस्तृतेर्भयात् ।। ६२॥ अर्थ- एकसे लेकर जहांतक भेद करना हो वहांतक उल हे अंक लिदै.फिर उन्होके नीचे एक अंकसें गुपाकर अपने हरका भागदेनेसें एक दो आदि भेद मिलते है॥ १०॥ ऐसेउ त्तरोत्तर क्रिया करै यहां यह साधारण वात लिखी है उदाशा- स्त्रमें जहां रत्त कहेहैं। वहां इसका उपयोग इसके जानने वालों को है ॥६१॥ हार आदिमेसु मेरूका खड़मे शिल्पशास्ममे वैध कमें और रसभेदमें ये किया होती है मैने विस्तारके भयसेन ही कही ।। ६२॥ यहा उदश्चितिके उत्तरमे कछुक उदाहरण कहते हैं तछंदाप्रत्युत्तरे किंचिदुदाहरणं ।। पस्तारेमि- अगायन्याः स्युत्पादेव्यक्तयःकति । एकादिशुख भाशु कतिकत्युच्यतां पृथक् ।। ५६ ।। - उंदश्चितिगणितम (११९) इहहि पडक्षरोगायत्रीचरणः अतः षडताना एकाधकोत्तरी कानां व्यस्तानां कमस्थानांचः न्यासः ५३११३१ यथोक्त करणेन लब्धा एकसुरु व्यक्तया ६ दिएखः १५ त्रिगुप. २० चतुर्मुखः १५पंचगुरवः ६ पटी गुरयः १ अथैकः सर्वलपुः १ एवमासामैक्यंपादच्यक्तिमिति एवं चतुचरणाक्षरसंरब्यकान्ययोक्तं विन्यस्यएफादिगुरुभेदानां नियतान सैकानेकीरुत्यजातागायत्रीरत्तव्यक्ति संरच्याः १६७७७ २१३ एपमुक्तायुरुतिपर्यंतं छंदसांव्यक्तिमितितिच्या । अर्थ- हे मित्र गायत्रीगंदके पादमें कितनी व्यक्ति है, और एक यादि गुरुभेद कितने है. सोजुदा जुदा करके कहो.? यहां छह अक्षरोवाला गायत्रीका चरण है. इसवात्तै छह आदिमें एक पर्यंत विपरीत क्रमसें स्थित हुये अंकोंको क्रमसें. लिदै न्यास ६५३ यहां पहले छह अंक है. इसमेंह एकका भाग दिया तो मिले. इस अंकसे अगले अंक को गा कर हर२ का भाग देनेसें १५सिद्ध अंक मिला. फिर इस आगले अंक को गुणा ६ कर हर३ का भाग देनेंसें २० अंक मिले. फिरइस अंकसें आंगले अरु गुणा ६ कर हर ५ काभा गदेनेसें १५ मिले. फिर इससे अगले अंक को गुपाकर हर ५ का भागदेनेसें छमिले. फिर इससे अगले अंकको गुणा कर हर ६ का भाग देनेसें । एक मिला . ऐसेएक आ- दिगुरुके भेद ६ १५ २० १५ ५१ मिले. इन्होंका योग किया तो ६३ फिरइन्हो में एक लघुका भेदजोड दिया तो ६४ हुये- अब दूसरा प्रकार कहते हैं- न्यास, ३२३१६ यहां दोनों पंक्तियों में अगले, (१२) १५० श्रेढीव्यवहारः। एकका भाग दिया तो मिले. इस अकसे अगले अंकको उपाकर हर २ का भाग देनेसें २८ मिले. फिर इससे अगले अंकको गुणा कर हर ३ का भाग देनेसें ५६ मिले.फिर इस से अगले अंक को गुएज ६ कर हर ५ का भाग देनेसें ५५ मिले. फिर इससे अगले अंक को गुणा ६ करहर काभा ग देनेसें २८ मिले. इससे अगले अंक को गुपा ५५ कर ह. ७ का भाग देनेसें मिले. इससे अगले अंक को गुएगा कर हर ८ का भाग देनेसे १ मिला. ऐसे एक आदिहारोंके में द ८१२८१५६१७०१५।५ । २८११.मिले. और सबभेदोका योग किया तो २२५ हुवे. अब रसोंके भेदका उदाहरण है। न्यास- ६५१३ २१ यहां दोनों पंक्तियों के पिछले अंकोंसें अग से अगले अंकोको गुणादिया तो ऐसा स्वरूप हुआ:- ६२. १२. ७३. इन्होंमें क्रमसें. पने अपने हरका भाग दिया तौर ०५ २० १५६१ मिले. इन्होका योग किया तो ६३ मिले ॥५॥ यहां मिश्रक व्यवहार समाप्त हुआ. अथश्रेढीव्यवहारः । अव श्रेढी व्यवहार कहते हैं: तत्र संकलितैक्येकरणसूत्रवृत्तम् ॥ सैकपद- भपदार्शमथैकाद्यंकयुतिः किलसंकलितारव्या॥ साहियुतैनपदेन विनिनोस्यात्रिहतारखलु संक- लितैक्यम् ।। ६२ ॥ अर्थ:- एककरके सहित पदसें पदके श्राधेको गुणा करै.फिर २४ २० goll

लीलावती.
अंकोंका योग करनेसें एकसें पद पर्यन्त योग होता है. पदमे
दो जोडकर उसयोगसें गुणा करे फिर सानका भाग देने से
कातित अर्थात् जोहनेका योग होता है ॥६२ ॥
अपउदाहरण कहते हैं-
एकादीनां नवान्तानां पृथक्तंकलितानिमे ॥
तेपासंकलितैक्यानि प्रचक्ष्व गणक । द्रतं॥५८॥
न्यासः १२३४५६७८५ संकलितानि-११५.१५
२१ २८३६ १५ एपामैक्यानि ४१.२० ३५ ५६ ८४०
अर्थ- हे गएक! एक है यादि, जिन्होंके ऐसे नोका
योग और उन्होंके संकलितका ऐक्य शीम कहो.
व्यास १३१४५५५८: पह पद: यह एफसें नवपर्यंत
योग एकतै युन किया तो । हुपे. इस्तै पदकं आधे कोउन
पादिया । हुपं. इसमें हर का भाग दिया तो ४५ रहे.यह
एकलें लगाय नवपर्यतका योग है. यही संकलित काना-
ताई. योगसहित न्यास
-11030. २०३५४
ऐसहीतरीका योग होता है. अब सोका योग करनकी एम
रातिई.- पहापद ९ नं २ युतकिये तोहप. इसे योग५
की गुहादिया तो ४९५ रहे. इसमें एसडासका योग जानना
सयामा एक टिकानेडिसना है-
-
,
4-
१
गंग
योनाका एम्प-१४३१५ ५५ ५. १५५
पद होता है. ॥ ५॥

श्रेढींव्यपहार। (१२३) अब वर्ग आदिके योगसे करणसूत्रको एक छदसे कहते हैं- कृत्यादियोगेकरणसूत्रम् ॥ विमपदंकुयुतंत्रिवि- भक्तं संकलितेनहतकृतियोगः ॥ संकलितत्य रुतेःसममेकायुकधनैक्यमुदीरितमायः ॥ ६॥ अर्थ- दुगुनें पदमें एकजोडकर तीनका भागदेवै फिर इ. सको संकलित के साथ गुणा करनेसे वर्गका योग होता है. प. दके संकलितका वर्ग प्राचार्योन एकसें लगाय, पदपर्यन्त धनका योग कहा है. ॥६॥ अब उदाहरण कहते हैं- एतेषामेव वगैक्यंधनैक्यंचपदगुतम् ॥ रुतिसंकलनामार्गे कुशला यदिते मतिः॥ ५९॥ न्यासः- १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ वगैक्यम् १५ १४३० ५५ ८१ १४० २०४ २८५ धनैक्यम् १ ९ ३६ १०० २२५ ४४१ ५८४ १२९६ २०२५ अर्थ- जो तुम्हारी बुद्धि वर्गके सकलनमार्गमे कुशल हो; तो मेरेको इन्होंके वर्गाका योग, और इन्होके धनोंका योग ज- दीसे कहो न्यास १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ यहां पद को दूना किया तो १८ हुवा फिरइसमें १ युत १९ कर ३ का भाग दिया तो ऐ- सासरूप हुवा फिर इसको योग ४५ से चुणा ८५५ कर हरकाभाग देनेसे वर्गका योग २८५ मिला. ऐसे सबोका जा नना. वर्गसहित न्यास-१५४३०५५८४१४०३०४ १४५. अव धनके योगकी रीतिसें यहा पद ९ के योग १५ का वर्गकि- या तो २०२५ एकसें लगाय ९पर्यंत धनोंका योग हुआ. ऐसेही

लीलावती.
२
३
४
१
१००
२२५
1
-
सब पदोंके योगोंका वर्ग करनेसें धनोंका चोग मिलताहै. पेस-
बोके वर्गों के और धनोके योग है.॥५६॥
५
५
१४० २०४२८५
३६ १०
४४ १७८४१२९५ २०२४
अब ययोत्तरचयमें अंत्य आदि धनके जानने के लिये कर-
णसूत्रको एक छंदकरके कहते हैं-
अथोत्तरच त्यादिधनज्ञानायकरण सूत्रंशत्तम्
ध्येकपदभचयोमुरवयुकस्यादन्त्यधनमुखयुग्द-
-लितंतत् ॥ मध्यधनंपदेसंगुणितंतत्सर्वधनंग
णितंच तदुक्तम् ॥ ६५॥
अर्थ- एक करके हीन पदको चय अर्थात् निस्स बढनेवाले
धनसें गुणाकर आदि धनयुक्त करनेसें अंत्यके दिनका धन
होता है. उस अत्यघनमें आदिधनजोडकर आधा करनेसें मः
ध्यके दिनका धन होता है. और मध्यके दिनके धनके पदसे ऊ
पाकर तो सर्व घन होता है. सोई मैने गणित कहाहै ।। ६५॥
अबउदाहरए। कहते हैं-
उ: आये दिनेद्रम्मचतुष्टयं यो दत्वा द्विजेभ्यो नुदि-
नं परत्तः । दातुं सरये पंचचयेनपक्षेद्रम्मावद
द्राक्कति तेन दत्ताः ॥ ६ ॥
न्यासः पा.४ च.५ ग.१५ मध्यधनं अंत्ययन
७१ सर्वधनं ५८५ उदाहरणम् .
उ. यादिसप्तचयःपंचगच्छेौयत्रतत्रमे ।।
मध्यांत्यधनसंरव्येके वदसर्वधनंच किम्॥३॥

श्रेटीव्यवहारः
(१२५)
न्यासः प्रा. च.५ ग.८ मध्यधनम्
अंत्यधनम् ४२
सर्व धनम् १९६
.
समदिनेगच्छेमध्यादिनातावान्मध्यात्प्रागपरदिनधनयोः
योगाईमध्यदिनधनं भवितुमर्हत्तीतिमत्तीतिरुत्साद्या ।।
अर्थ- हे सरपे जो पुरुष आदिदिनमें ब्राह्मणोके अर्थ धार
द्रम्म देकर प्रति दिन पांच पाच द्रम्म देनेको प्ररत्न होताभवा.
उसने एक पक्ष अर्थात पंद्रह दिनमें कितने द्रम्म दिये.सोकह.
न्यास- यादिधन ४ नित्य बढनेवाला धन ५ गच्छ १५ पद१५
में 1 हीन किया.तो १४ हुवे इसको चप ५ से गुपादियातो.
हुवे.इसमें आदिधन ४ जोडनेते अन्सकाधन ५४ मिला फिर
अंत्यधन ७४मे आदिधन को जोडा तो७८ हुवे. इसको आ-
धा करनेसें मध्यके दिनका धन ३९ मिला- फिर मध्यधनको
पद १५ से गुपनेसें सब दिनोंका धन ५८५ मिला. अब अन्य
उदाहरण कहते हैं-
जहां आदिधन छ है. चप ५ है. और गच्छद है तहां म.
ध्यधन, अंत्यधन और सर्वधन कितना हुआ सो कह.
न्यास- आ. च.५ ग ८-में । ऊन किपातो ७ हुये. इ.
सकाचय ५ सेंगुरानेसें ३५ हुये. इसमे आदिधन " युत करने.
से अंत्यधन १२ की संरच्या मिठी फिर अंत्य धन १२ में आदि
धन को युती कर आधा करनेसें मध्यदिनके धनकी सं-
रव्या १९ ३९३ कर हर२ का भाग देनेसें सर्वधनकी संख्या
अब मुव जाननेके अर्थ करणसूत्रको आधा छंदकरकेकर
तेहैं:
मिली ॥ ५॥

- (१२६ लीलावती. मुरवज्ञानायकर्णसूत्रहत्ताई । गच्छहतेगणि- तेवदनं स्याघेकपदनचयाईविहीने । अर्थ:- गणित अर्थात् सर्वधनमें गच्छका भाग देनेसें जो फन लमिलै उसमें एक करके हीन पदसे चयके आधेको गुपाकर हीन करनेसे सुख होता है. उदाहरणं ।। पंचाधिकंशतंश्रेढीफलंसप्तपदं किल॥ चयंत्रयंवयंवियोवदनंवदनन्दन ॥ ६१ ।। ! न्यासः-या.. .३ ग. ७ धन १०५ आदिधनम् ६ अत्यन म् २१ मध्यधनम् १५ अर्थ- व्यच उदाहरण कहते हैं- हे नंदन। जहां सर्वपनए- कसो पांच १०५ है, गच्छ है, और चय३ वहां मुरखका क्या प्रमाण है. सो कहो. न्यास- पा च३ ग.७ ध.१०५ सर्वधना०५ में गच्छा का भाग दिया तो १५ मिले. इसमें एक करके ऊनपद ६सेचया ३के आधे ३ को सुपा कर ऊना किया तो ६ चयका मान मिला. ।। ६१॥ अब चयके जानने के अर्थ करणसूत्रको आधा छंदकरके कहतेहै:- चयज्ञानायकरणसूत्रंवृत्तार्धम् ॥ गच्छहृतं धनमादिविहीनं व्येकपदाईहतंचचयःस्यात् ६५ अर्थ- सर्वधनमें गच्छका भाग देनेसें जो अंक मिलै,उस मे आदिको ऊनकर एक करके हीन पदके आधेका भाग देनेसें चय होताहै ॥ ६॥ उदाहरणं- प्रथममगमदन्हायोजनेयोजनेशस्तदनु :- ।

" श्रेढीव्यवहारः (१२७ ननुकयासौ बेहियातोऽध्वरक्ष्या ॥ अरिकरिहरिणा थै योजनानामशीत्या ८० रिपुनगरमवाप्सः सप्तरावे. ण धीमन् ॥ ६ ॥ न्यास-पा. १ चयः • ग. ७ घ. ८० लब्धमुत्तरं यंत्यध नं ४५ मध्यधनम् . अर्य- अघउदाहरण है- कोई राजा अपने शत्रुपोंके हाधि- योंको हरनेके अर्य पहले दिन दोन योजन जाताभया. और वह | साता सातराविमें अशी ८० योजन वैरीके नगरमें पहुंचा तो हे बुद्धिमन्!कहो यह कितने मार्गकी वठतीसे गया? न्यात २ च.. ग ०७५ ८. सर्पधन ८० है इसमें गच्छ का भाग दिया तो मिले. फिर इसमें समच्छेद करके न्यादि धन र घटादिया तो ६६ रहै.इसमें एक करके हीन पद ६ के आधे ३ का भाग देनेसें चयका प्रमाए। ३ मिला. ।। ६२ ।। "अव गच्छको जाननेके अर्य करणसूत्रको एक छंदकरके कहतेहै:- गच्छज्ञानायकरणसूत्रंवृत्तम्।। श्रेढीफलादुत्तर लोचनभाच्चयाईवक्रांतवर्गयुक्तात् ॥ मूलं मुखोनंचयरवंडयुक्तंचयोहतंगच्छमुदाहरति ॥६७ अर्थ सर्वधनको दोगुनेचयसें गुणै. फिर उसमें चयका आ धा और सुरख इन्होंके अतरका वर्ग युत करै. फिर इसका मूलमैं -यादिधनको हीन कर चयका रचंड युत करे. फिर उस अंकमैच यका भाग देनेसें गच्छ मिलता है॥ ६७ ।। - अबउदाहरण कहते हैं:- द्रम्मत्रयंयः प्रथमेक्लिदस्यादातुंमहत्तोहिचयेन -- १.४ (१२८० लीलावती. तेन ॥ शत्तत्रयंषष्टयधिकद्विजेभ्योदतंकियदि विसैर्वदा ।। ६३ ।। न्यास- प्रा. ३.२ ग० घ.३६० अंत्यधन धनम् २० लब्यो गच्छ:१८ अर्थ- जो पुरुष पहले दिन तीन द्रम्म ब्राह्मणोके अर्यदे कर प्रति दिन दो चयकी बढतीसे देनेको प्रवृत्त होता भया. वह कितने दिनमें ब्राह्मणों के अर्थ तीनसौ साठ द्रम्म देताभ- या सो कहो. न्यास ३ न. २ ग०५ ३६० यहां सर्वधन ३६० को २ गुने चय ४ गुपादिया तो १४४७हुवे. फिरउसमे चयका आधा : और र मुख ३ इन्होके अंतर २ का वर्ग ४ युक्त किया तो१५५४ हुवे फिर इसका मूल ३८ में आदिधन ३ को उन किया तो ३५. डदे इसमें चयका आधा युत३६ करै फिर उसमें चय २ का भाग देनेसे गच्छका प्रमाण १८ मिला.॥६३ ।। अव चयका दोनो यादिले फलके लानेमें करणसूत्रको डेटछंद करके कहते हैं:- अथहिगुणोन्तरादिफलानयने करणसूत्रसाई।। विषमेगच्छेच्येके गुणकास्थाप्य समेईितवर्ग: गच्छायांत्यमत्याड्यात्तं युगयर्गजंफलंयत्तत् ६८ व्येफव्येकगुणोद्धृतमादिगुणस्या गुणोत्तरेणित अर्थ:- जहां विषमगच्छ हो वहा एक ऊनकरके गएको स्था ...२. यदि समहतो साधेका वर्ग स्थापन कर.ऐसे गच्छमू- न्य होजाय वहांतक करे ऐसे चल्ली अर्थात् ऊपरसे नीचे का रस्वे.फिर पीउका जो गुपक है उसको अपने ऊपर ॥ श्रेढीव्यवहार। समीप रवै फिर उसीके अगाडी गुरा होतो गुणकरके गु- पाकर लिये और वर्ग होतो वर्ग करके लिखे ॥६७ ।। ऊप. रके अंको १ उनकरनेसें जो संक हो उसमें एक करके ऊना गएका भाग देवै. फिर उसको आदिसें गुरानेसें सर्वधन हो, ताहै अब उदाहरण कहते हैं- विराटकयुगं येनहिगुणोत्तरं प्रतिज्ञातम् ॥ सहमर्थिजनाय समासे निष्कान्ददातिकति ६४ स-या. २. २३ लब्धावराटकाः २१४७१८३६- कभ्यराटकाभिर्भताजाता निष्काः १०४८५७ द्रम्माः कर काकिण्यौ २ वरारकाः ६ आदिदिकंसवेद्धिः प्रत्यहंत्रिगुणोत्तरा॥ग- छासप्तदिनंयत्र गणितंतत्रकिंवद ॥ ६५ ॥ न्यास- आ.२ च.३ ग.७ लब्धगणितम्. अर्थ- किसी मनुष्यने पहले दिन दो कोडी देकर प्रतिदिन दूना दूना धन देनेकी प्रतिज्ञा की. वह मनुष्य एक महिनामें या- चककेयर्थ कितने निष्क देता भया. सो कहो।। न्यास- आदि ३ चयर गच्छ३० यहां गच्छ समहै. इस आधा१५करके वर्ग स्यामन किया. फिर शेष १५पिषम है.ह.न्यास उन १४ करके गुण स्थापन किया. फिर इसका प्राधा का अंका वर्ग स्थापन किया. फिर इसमें एक ऊन ६ करके गएरास्थापन या. फिर इसका आधार करके वर्ग स्थापन किया. फिर इसपर १ऊनर करके गुणस्थापन किया. फिर इसका आधा पार करके वर्गस्थापन किया. जैसे- यहां जहां गुपा है वह ।। गुएना योग्य है. अब गुए और चौका स्वरूप लिर । (१३५० लीलावती. ०.०० १६ कर २ का अपवर्तन देनेलें ऐसा स्वरूप १६ हुन्मा.- इसका मूल मिलता नहीं: इसबात इसका प्रकट मूल जानने के लिये उपाय लिखते हैं। हर व्यौर: अंश इन्होंके घालसें बडा इष्टके वर्गको गुगाकर उसका मूल लेवैः फिर इष्टको हरसें गुपाकर अयुतसें गुणाहुआ अंकमें भागने- से उस मूलके समीपका अंक मिलता है। उदाहरण कहते हैं:- "कर्णवर्ग-यहां अंश और हर इन्होंका घात किया तो ऐ. सा स्वरूप १३५२ हुआः फिर इसको इष्ट १०० के वर्ग:।। करके गुपा दिया तो ऐंसा १३५३.० ० ० ० हुआ. फिर इसका मूल लिया तो ऐसा३६७७ हुवा, बढाइएको हर में गुणा ८०० कर इसका मूल ३६७७ में भाग देनेसें यह कर्ण के समी- पका अंक है. इसरीतिसें सारै जानना ॥ १८ ॥ अब व्यस्रजातिमें करणसूत्रको दो छंदकरफै कहते हैं- त्यस्रजात्येकरणसूत्रहत्तद्वयम्- इष्टोभुजी : स्माद्विगुणेष्ट्रनिभादिष्टस्यकत्यैकलियुक्तयाप्तम् ॥ कोटि पृथक्सेष्टगुणाभुजोनाको भवेच्चस्त्रमिद तुजात्यम् ।। ५६॥ इष्टोभुजस्तकृतिरिष्टभक्ता. विस्थापितेप्टोनयुत्ताड़िताचा ॥ तोकोटिकर्णाचि- तिकोटितोचा बाहश्रुतीचाऽकरणीगतेस्तः॥४॥ अर्थ:- इटको मुँजपमाएकर इसको दोकरके गुपाहुआ इससे गुणा करै. फिर उसमें एक करके ऊनाइष्टके वर्गका भाग देनेॐ कोटि होतीहै. फिरउसकोटिको अलग रवले. फिर कोटिको इएसें.गुणाकर जो अंक हो उसमें भुजकोऊनकरनेसे । UV क्षेत्रव्यवहार का होताहै. ऐसे व्यस्त्रजाति होताहै ॥७६॥ अब दूसरा प्रकार कहते हैं:- इष्टको भुजप्रमाणकर भुजके वर्गमे इष्टका माग देवै उसको दोजगह लिरदे. एक जगह इष्टमे छीनकरै.दू सरीजगह इष्टसें युत करैः फिर उन्होंको मापा २ करनेसें कोटि और कर्ण ये होते हैं. कोटिसें भी अकरणी में गयेहुवे भुज और की हो तेहैं ॥७॥ अब उदाहरणकहते है। भुजेहादशकेयोयोकोटिकवनेकधा ॥ प्रकारा- भ्यां वदक्षिम तौतावकरणीगतो ॥६६॥ न्यास.-- इटोमुजः १२ इष्टम् (२) अनेन दिगुणेन राशि तो भुजः ४८ इष्ट ) कृत्या (४) एकोनयार३) भक्तो लब्धा कोटि १५ इयमिष्टगुएरा भुजीना' (१२) जातकर्णः २० विकेणेप्टेनचा कोटि र कर्ण: १५ पंचकेनया कोटिर कर्णः इत्यादि. अर्थ- चारइ भुजहोने जोजो कोरि और कर्ण अनेक पकार करके आकरपीमें गयेही उन्होंको दोप्रकार करके तुम जल्दी कहो न्यास:- इष्ट २ को २सें गुणा किया तो ४ हुये. इस्से इष्टके भुज २ को गुणा करनेसें ४८ हुवे. फिर इसमेइ- हर वर्ग में एकको हीन करातो ३ हुवे. इसका भा. नदेनेसे १६ कोटि हुई. फिर कोरि६को इष्ट २ रयत्वे गुणा किया तो ३२ हुवे इसमें भुज२ को हीन करनेसे २. कर्ण इया. १५ न्यास-तीन इष्ट मानकर यहां भी उसीरीतिसें को, दिर और क५ि मिले. . १२ the

लीलावती.
उसीरीतिसे ५ इष्टमानो तो कोटि ५ का १३ मिलते है.
१३
इस न्यादि मोरभी जानलेनें ॥
अथहितीयमकारेणन्पास:- इप्सो भुजः । अस्यरुतिः १४४ इटे-
नरभक्तालब्धं १ इप्टेन २ऊन युता ४ वर्धितीजाली कोटिको
३५ १३७ चतुष्टयेनचाकोटिः १६ कर्णः २० पकेनया - कोटित कर
अर्थ- अवदूसरा प्रकार करके न्यासहै.- भुजारके वर्ग में
इरादोफा भाग देनेसें ५२ मिले. फिर इसको एक जगइ इष्ट २ से ही-
न किया. और एक जगह इष्टरसेंयुत सकि-
चाफिर इन्होंका आधा करनेसें कोटि ३५ कपि,
हुवे॥
न्यास- ऐतेहा रार इप्टमाना तो कोटि १६ कर्ण २०
मिले.
न्यास ५ इएसें भी कोटीर का ५मिले ॥५६॥
अब इष्ट काके लानेमें करणसूत्रको एक छंद करके
१.
अथेटकर्णारकोटिभुजानयनेकरणसूत्ररतं.
इटेननिमाहिगुणाञ्चकर्णादिष्टस्यकृत्यैकयुता
यदाप्तम् ॥ कोटिमवेरसापृथगिष्टनिधीतकर्ण-
योरन्तरमत्रवाहः ॥७॥

-- ६६ क्षेत्रव्यवहार (१३९ 5. पंचाशीतिमितेकणेयौयावकरणीगतौ । स्यातां कोटिभुजीतीतोवदकोपिदसत्वरम् ॥ ७० ॥ न्यासः - कर्ण ८५ अयंहिगुणः १७. हिके टेनहत. ३४० |इट २ रुत्त्या ४ सैकया ५ भक्ते जाता कोटि. ६८ इयमिष्टगुणा १३६ को ८५ नित्ता जातोभुज ५१ चतुष्कोणेष्टेनवा कोटि. ४० भुज.७५ अर्थः पिचाशी प्रमाणवाला कर्ण होनेसे जो जो कोटी और भुज करणीमे गये हो उन्होको हे कोविद । शीघ्र कहो ८५ न्यास- यहा कर्पा ८५को दूना १७० कर इष्टश्से गुणा किवातो ३४० हुये फिर इष्टरके वर्ग ४ मे एकयुत ५कर इसका इससे मुणाहुआ ३४० मे भागदेनसे कोटि मिली. फिर इसको एक स्थानमे अलग ६८ रकरवा फिर दूसरे स्थानमे इसको इष्ट से गुः ८५ पा ३६ करके इसमे कर्ण ८५को घटानेसे अज५१ मिला और ४ इष्ट माननेसें कोटि १० और भुज७५ मिले॥७॥ अब फिरप्रकारातरकरके उन्होके करणसूत्रको एक छंदकरके पुनः प्रकारांतरेणतत्करणसूवृत्तम् ॥ इष्टवर्गणसैकेन हिमः कर्णोथवा हृतः फेलोनःश्रवणः कोटिफलमिष्टगुणभुजः॥७९॥ अर्थ-- एक करके सहित इष्टके वर्गसे दोसणा गर एमे भाग देनेसें जो फल आवै उसको कर्णभवः ॥ तीहै. और उसफलको इष्टकरके गुपनं तदनं । पूर्वोक्तोदाहरणेन्यासः - कर्णः भन्नः करेषु ॥२॥ ७५ कहतेहै - ॥

लीलावती. न्यास:- ज्ञायमूलांतर भूमिः १६ वंशः ३२ कोटिकणयुतिः ३१ भुजः।६ जाते ऊधिः रवंडे २०१२ अर्थ-है गएक! जो एकली पृथ्वीमें ३२ हाथका वंश परन- के वेगसें एकदेशमें टूा. और उसका अगला भाग १६ हाधपर न श्रीमें जाके लगाहै तो अंगमूलसें कितने हाथोंपर वांशटा यहड मजल्दी कहो. न्यास- भुजाप के वर्ग २५६ में वांशफी लंबाई ३२) का भागदेनेसे मिले, फिर इसकोवांशकी लंबा- |३२ ई ३२ में एक जगह घराया. और एकजगह बढा यातो २४४४० हुपै. फिर इन्होंका आधा करनेसें को दिर और कर्ण २० मिले ।। ७२ ॥ अबज और कर्णकायोग और कोटि जानकर करण सूत्र को एक छंदकरके कहते हैं:- बाहु करणयोगइष्टेकोटयांच ज्ञातायांपृथक्करणसूत्रं दत्तम् ।। स्तंभस्यवौहिविलांतरेण भक्त फलंब्या- लबिलांतरालात् ॥ शोध्यंतदईप्रमितैः करैः स्या- 'हिलायतो व्यालेकलापियोगः ॥ १२ ॥ अर्थ- स्तंभ अर्थात् थंभाफे वर्गमें सर्प और विल इन्होंके अंतरका भाग देनेसें जो फल मिलै उत्सें एक स्थानमें सर्प र बिलके अंतरसें घटा और एक स्थानमें युतफरै. फिरउस. का आधा करनेसें सर्प और मोरका योग होताहै ॥ २॥ अब उदाहरण कहते हैं- उ अस्ति स्तंभतले बिलं तदुपरि क्रीडाशिरवंडीस्थितः स्तंभेहस्तनवोच्छ्रितेविगुणिते स्तम्भप्रमाणान्तरे ॥ - ० 7 १५ क्षेत्रव्यवहारः (१४३१ दृष्टाहिं बिलमाव्रजन्तमपतत्तिर्यसतस्योपरि क्षिपंहितयोदिलात्कतिकरैःसाम्येनगत्योर्युतिः ७३ अर्थ- नव हाथ ऊंचा थंभाके नीचे एक बील था. उसके ऊपर क्रीडा करताहुमा एक मोर बेटाथा. वो दिलसें २७ हायपे आ- ताहुवा सांपको देखकर उसके ऊपर तिरछा पड़ा तो उनसमानंग निवालोंका बालसें कितने हाथपर योग हुआ? यह तुम शामक न्यास- यहां यंमार के वर्ग में साप और दिलके अंतर २७ का भाग देनेसें २ फल मिले. 'फिर इस्को' सांप और विलके अंतर २७ में एक जगह घराया और एक जगह बढाया. २७ तो ऐसा २४।३० हुआ. फिर इन्होंका आधा करनेसें १२१ १५ येक्रमकरके भुज और कर्णके मान हुये ॥ ३ ॥ कोटिकर्णका अंतर और भुजजानकर कोटि कर्णको दा, जूदा करनेके अर्ध करणसूत्रको एक छंदकरके कहते हैं:- कोटिकणान्तरेभुजेचदृष्टेपृथक्करणसूत्ररत्तम्। भुजाहुनितात्कोटिकर्णान्तराप्तं द्विधाकोटिक गन्तिरेणोनयुक्तम् ॥ तदूर्धेकमात्कोटिकरें भवेतामिदं धीमताद्यसर्वत्रयोज्यम् ॥ ८३ ॥ अर्थ:- भुजका धर्ग करै फिरउसका कोटिकर्णके अंतरमें भाग देनेसें जो फल मिले उसको दो स्थानमें स्क्रेचे फिर उसको एक स्थानमें कोटिकर्णके अंतर करके ऊन करे और एक स्थान नमें युत्त करैः फिर उन्होंका आधा करनेसें क्रमसे कोटि और पूर्ण होते हैं.ऐसे बुद्धिमानने जानकर सारै युत करना योग्य है. अब उदाहरण कहते हैं:

(१४६) लीलावती. रक्षबावडीका अंतर है. और बंदरोंका समान मार्ग है. इसवास्ते कर्ण और कोटि के एकदेश- कायोग ३०० हाथ है. यहां ज्ञात कोटिके रचंड १०० को भुज २०० सें गुणा तो २०००० हुये. २. इसमें ज्ञात दूने कोटिरचंड' २०० और भुनाइन्होंने योग ४०० का भाग देनेसें ५० मिले.इसको योग तीन३०० सोंमें हीन करनेसें कर्णका प्रमाण २५० मिला. ॥५६॥ • अब भुजकोटिका योग और कर्ण जानते है तो पृथक्के र्थ करणसूत्रको एकछंद करके कहते हैं- भुजकोटयोोंगेकर्णेचनातेपृथक्कर्णसूत्रंदत्तं कर्णस्यवर्गाष्टिगुणाहिशोध्योदोकोटियोगः स्व. गुणोऽस्त्वमूलम् ॥ योगोहिधामूलविहीनयुक्तः स्यातांतदई भुजकोटिमानै॥५॥ अर्थ- दोगुपोकर्णको वर्गसें भुजौर कोटिके योगको दो स्थानमें रपवै और एक स्थानमें मूलको हीन और स्थानमैं युत करै, फिर उसका आधा फरमेंसें भुज और कोटिके मान होतेहैं.॥ ८५॥ अब उदाहरण कहते हैं उदासताधिकः कर्णअधिकाविंशतिः सरपे ।। भुजकोटियुतिर्यत्रतत्रतेमेपृथक् वद् ।। ७७ ॥ न्यास- कर्णः १७ दो कोरियोग: २३ जाते भुजकोरी : १५ उदा०-दोः कोस्योरंतरंशैलाः कोयत्रत्रयोदश ॥ भुजकोटीपृथक्तत्रयदाशुगराकोत्तम ॥ ७० ॥ न्यास-कर्णः १३भुजकोट्यंतर लब्धे भुजकोटी ५२ !

(9) १ + क्षेत्रव्यवहारः अर्थ- हे सरखे। जिसक्षेत्रमें सतरा कर्ण है. और २३ भुज काका योग है. तहां मेरेको भुजौर कोटिजूदा जूदा करके कहो. न्यास- कर्ण १७के वर्गदूने ५७८ को भुजकोटिके योग२३ के वर्ग५२९ सेंहीन किया तो ४५ मिले. फिर इसका मूल लिया तो मिले फिर सुजकोटि- के योग २३को मूलसें हीन किया तो और एक स्थानमें युत किया तो १६।३० हुये. फिर इ- न्होंका आधा करनेसें भुज और कोटिके मान १५ मिले.७७ अब दूसराउदाहरण कहते हैं- हे गणकोत्तम! जिस क्षेत्रमे मुजकोटिका योग ७ है.और कर्ण १३ है तहा भुनकोटिको जूदा जूदा करके कहो. न्यास-कर्ण १३ के दोगुणें वर्ग ३३८ में मुजकोटि- का अंतर से एकस्थानमें हीन और एकस्था- नमें युत १०१२४ करके फिर उन्होंका आधा करने से भुज और कोरिक मान ५।१२ मिले ॥ ७८ ॥ अब लंबक रवंडोंको जाननेके अर्थ करण सूत्रको एक उंदा | करके कहते हैं- लंबाचवाधा ज्ञानायकरणसूत्रवृत्तम् ॥ अन्यो- न्यमूलायगुसूत्रयोगाद्देप्योर्यधैयोगहवलम्बः ॥ चंशीस्वयोगेनहतावभीष्टभूभौचलम्बो भवत: कुरवण्डे ॥ ८६॥ अर्थ- वंशोंकाआपसमें गुणाकर उन्हों के योगका भाग देनसे) लंब होता है. और वंशोंको यांछित भूमिसें गुणाकर उन्होंके यो १२ १३ (१४८) लीलावती अबउदाहरण कहते है 1104 गका भाग देनेसें अपनी अपनी ऊंचाईकी अववाधा मिलती पंचदशदशकरोच्छ्रायवेण्योरज्ञातमध्यभूमिक- योः । इतरेतरमूलागसूत्रयुतेलम्बमानमा- चक्ष्व ॥ ७॥ न्यासः- वशौ १५॥१० जातोलंब.६ वंशातरभूः ५ अतोजाते भूरवडे ३।२ अथवाभूः १० रवडे ६।४ चाभूः १५ रवंडे १६ बाभू: २० रखंडे १२१८ एम्ब सर्वत्र लंबः सएषयद्यनभूमितु-|| ल्ये भुजेवंशः कोटितदा भूखंडेनकिमितित्रैराशिकेनसर्वत्रपती- ति: ज्ञातव्या अर्थ- एक चाश१५ हाथलंबा और दूसरा दशहायलंबा इन्होके कछुक अंतरसें समानभूमिमें रखंड किये और उन्हों में एफकी मूलसें दूसरेके शिरतक सूतके बांधनेसें जहां दोनो स्- तोंका योग होता है वहां से भूमितक जो बहडा 'लाजाय उसका क्या प्रमाण है सो तुम कहो. वंशश१५॥१०कोआपसमें गुणा करदियातो १५० हुवे.फिरउसमें बांसोंके योग २५का भाग देनेसे ६लंय मिले. यहीसूत्रोसें भूमितक लंब- काममाए है. और पांशोको १५॥१० वांछित भूमि५ सें गुणा फर- नेसें ७५।५० हुवे फिरइन्होंमे योग २५का भाग दिया तो३ बड़े वांशकी अबाधा और २ छोटे वाशकी अबाधा मिली. और १० को भूमिमाननेंसें बडे चाशकी अबाधा हुई और छोटेबासकी अबाधा ४ मिली. और भूमि१५ माननेंसें क्रमकरके अबाधार और मिली. और भूमि २० माननेंसें अबाधा१२ और र मिली.

(४) जहै. और तीनभुजावालाक्षेत्रमें ३, ५ और मुजहै. ऐ- क्षेत्रव्यवहारः। ९ सारै लंबजानने. यहां त्रैराशिकसेंनी लम्बक निश्चवफरने लिपे लिखते है- जैसें भूमि पे चांचा१५ कोरितो अबाधार १५ा ऐसे त्रैराशिक करनेसें वही लम्ब मिलता है. ॥ ७९ ॥ अय अक्षेत्रके लक्षणमें करणसूत्रको कहते हैं. अथाक्षेत्रलक्षणसूत्रम्- पृष्ठोद्दिष्ट मृजुभुजं क्षेत्रंयन्नैकवाहुतः त्वल्या ॥ तदितरभुजचुतिर- थवा तुल्यासेच तदक्षेत्रम् ॥ ८७ ॥ अर्थ- जिस अक्षेत्रमें एक मुरव्य वाहुसें इतर भुजावांका योग अल्पहो अथवा समान होतो वहएष्ट अर्थात् मूर्वक रके पूछाहुबा सरल भुजापोंगला क्षेत्र बुद्धिमानोंने अक्षेत्र जानना यान्यहै ॥ ८७ ॥ अब उदाहरण कहते है-- चतुरस्त्रेविषयका भुजारूत्यत्तेविषण्णव ॥ उद्दिष्टायत्रष्टुन तदक्षेत्र विनिर्दिशेत् ॥ ८० ॥ न्यास:- एतेअनुपपन्ने क्षेत्रे भुजप्रमाणा ऋजुशलाका झु जस्थानेषु विन्यस्यानुपपत्ति दर्शनीया ॥ अर्थ- चार भुजाओंचालाक्षेत्रमें तीन छह दो और . सा क्षेत्रकिलीपष्टने पूछा तो यह यक्षेत्र कहना योन्य है, न्यास- ६।३।२ तीनोंका योग है. और स- ख्य भुजार है. और तीनो भुजावांका यान ।। ६ सें मुख्य भुज वडा है. इसवात्तै क्षेत्रक- हना योग्यहे. ६ र न्यास- यहां भी दोनों भुजापोंका योग को लीलावती. को समान होनेसे क्षेत्र कहना योग्य है. ॥ ८॥ अब अबाधा आदिजाननेके अर्ध दोकरण सूत्रको आर्या छदकरके कहते हैं- / आवाधादिज्ञानायकरणसूत्रमाव्यम् ॥ध्या त्रिभुजेभुजयोयोगस्तदैतगुणोभुवादतौलब्धा ।। हिस्थाभूरूनयुतादलिताबाधेतयोः स्यातां ॥८॥ स्वाबाधाभुजहत्योरंतरमूलं मजायतेलम्बः ॥ लम्बगुणंभूम्यईसष्टंत्रिभुजे फलं भवति ॥८॥ अर्थ-त्रिभुनक्षेत्रमें भुजायोके योगको उन्होके अतरसें गुणाकर भूमीका भागदेसे जो फल मिलै उसको एक ठिकाने युत करै फिर उन्होको आधा करने से जो मिलै वह आचाधा हो, तीहै।८॥ अपने अबाधाका वर्ग औरउसीतर्फके मुजका वर्ग इन्होका अतरकर उसका मूललेनेसें लम्ब मिलता है. और मुजक्षेत्रमें भूमिके अाधेको लम्ब करकै गुणा करनेसें स्पष्टफ- ल होताहै ।। ८६॥ अब उदाहरण कहते हैं:- क्षेत्रेमहीमनुमितात्रिभुजेभुजौतु यत्रत्रयोदश तिथिपमितीचयस्य ॥ तत्रावलम्बकमथोकथ- यावबाधे क्षिप्तयारसमकोष्टमिति फलारन्यां८१ न्यासः- भू.१५ भुजौ १३।१५ लब्धे अबाधे ५। लम्बश्र १२ क्षेत्रफलंच अर्थ- हेमित्रा जिस त्रिशुजक्षेत्रमें पृथ्वी चौदहहै एक- भुज तेरह है. और दूसरा भुना५ है यहां लंच अबाधा योर | IA १३ १५ क्षेत्रव्यवहारः समकोष्टके प्रमाण कहो.॥ भुज १३११५ के योग २८को इन्होंके अंतर से गुणा किया तो ५६हुये. इन्होंमें पृथ्वी११ का भाग दिया तो ४ मिले. इसको पृथिवी ४ में एक विकार्ने घटाया और दूसरे ठिकाने युत कि- या तौ १०-१० हुये. फिर इन्होंको आधा कर- नेसें५- यह बाधा हुई. अपने अयाधाके वर्ग २५ को अपने तर्फके भुजाके वर्ग १६५ में घटानेसें १४४ मिले. इन्होंका मूल लियातो १२ लंबा मिला. फिर लंच १२ को पृथ्वीके श्राधे से गु- ५. दिया तो क्षेत्रका फल ८४ मिला ॥८१॥ अब ऋएअबाधाको उदाहरण कहते हैं- आणावाधोदाहरणम् ॥ दशसप्तदशप्रमोभु- जोत्रिभुजेयत्रनया प्रमामही ॥ आषाधेवदलंबक तथा गणितंगागितिका शतत्रमे ॥२॥ न्यास.- भुजौ १०११७ भूमिः ९ अत्रात्रिभुजे भुजयोोग इ- त्पादिना लब्धम् २१ अनेन भूरूनानस्यात् । अस्मादेवभूत्पनी ता। शेषार्धमृणगताबश्या दिग्वैपरीत्येनेत्यर्थः । तथाजाते । बाधे ६१५ अतउभर चाउपिजातोलंबः फलम् . अर्थ- हे गणितमा कुशल! त्रिभुजक्षेत्रमें एक भुज १ है और दूसरा भुजी है. और पृथिवीर है.उस क्षेत्रमें मैरेको अवाधा-लंब और गणित कहो. न्यास- भुज ३० ०१७ के योग २७ को इन्होंके तर ७ सेंपादिया तो १८ हुदै इन्होंमें पृथि- चीर काभाग देनेनेंस मिले. इन्होंको पृथिवीये IY (१५६० लीलावती. कर दोका भागदेनेसें प्रकट फल होता हैसमानकों याले तु- ल्यचतुर्भुनक्षेत्रमें या आयत क्षेत्रमें भुज और कोटिका घातफ- लहोताहै चतुर्भुजक्षेत्रमें और समान लंबमें भूमि औरमु खइन्होंके योगके आधेको लंबकरके गुणा करनेसें फल हो- ताहै ॥९॥ अब उदाहरण कहते हैं- क्षेत्रस्यपंचकृतितुल्यचतुर्भुजस्य कौततश्चग- णितंगणकप्रचक्ष्व ।। तुल्यश्रुतेश्वरवलुतस्य तथायतस्ययहिस्तृतीरसमिताष्टमितस्वयम् ४ प्रथमोदाहरणेन्यासः- भुजाः २५।२५ १२५ १२५ अत्राशि- मिता ३० मेकांश्रुतिंप्रकल्प्य यथोक्त करणेनजाताऽन्यश्रुतिः । फलंच ६०० अथवर न्यासः चतुर्दशामित्तामेका १४ श्रुति प्रकल्प्यो क्तवत्करणेनजाताऽन्याश्रुनिः ५८ फलंच ३३६ द्वितीयोदाहरणे ।। न्यास:- तत्कृत्योर्योगपदंकर्णइतिजाताकरणीगता श्रुतिरुभ- यवतुल्यैव १२५० गपितंच ६१५ अयायतस्य न्यासः विस्त तिः ६ दैर्ध्वम् ८ अस्यगणितम् ॥ ४८॥ अर्थ:-हे गएक पांच वर्ग अर्यात् २५ के समान चारो || जावोंवाला क्षेत्रके कर्ण और गांगत अर्थात् फल कहो. जिस समान चतुर्भुजक्षेत्रके २५ पन्नास पचीस भुजहै और कर्ण स- मानहै. उसक्षेत्रका फल कहो. और जिस आयनक्षेत्रकी लंबा ई आठ और चोडाई छह है . और कर्ण समानहै,उसका फल कहो. ३० न्यास- यहां एक कर्ण३. माना. इसके वर्ग.. ४ो . ७ (१५७) क्षेत्रव्यवहार- वे भुल२५ के वर्ग २५००मे घटा दिया तो १६०० रहे इसका मूल लनेसें दूसरे कर्ण ४० का प्रमाण मिला. फिर अतुल्यको ३०/४० के घात १२० मेंका भागदेनेसें प्रगटफल ६०० मिला. अवदूसरान्यास- १४ कर्ण माना तो उसके व. १९६को, से गणित भुज २५ के वर्ग ३५० में घटानेसे २३०४ रहे.इसका मूल लिया तो दूर सरे कर्ण १८ का प्रमाण मिला. फिर अतुल्य को१४९८ के घात ६५२ में २ का भाग दिया तो स्पष्टफल ३३६ मिला. अबदूसरा न्यास-- यहां भुज १५ औरकोटीर इ. न्होके वर्गीका योग करनेसें १२५० मिले और दूसरे कर्णका भी वर्ग यही १२५० मिला इसका मूल नहीं मिलता है. इसवास्तै कर्णागत मूल है. इस चतुर्थभुजक्षेत्रमें तुल्यकर्ण २५।२५ है. इसचास्ते भुन ज २५/और कोटि २५ का घात ६३५ क्षेत्रफल मिला. अब आ यत क्षेत्रका यहां भी कर्ण दोनों १०।१० समान है. ३इसपा- स्तै भुजः और कोटि ६ का घात ४८ क्षेत्रफल मिला. ॥४॥ अव उदाहरण कहते हैं, न्यासः २५ ७५ (१६२० लीलावती. अर्थ:- दूसरा कर्ण लानेके अर्थ पहले कर्णको इष्ट मानै उ- सकर्णकरके त्रिभुज होते हैं. उन्हों मै कपको भूमि माने और भुजावोंको भुजकल्पना कर लंच और आपाधा साधन करे सर्व चतुर्भुजक्षेत्रोंके विषै एक दिशामें स्थितजो अयाधा उन न्होंके अत्तरका वर्ग में दोनो लंबीके वर्गको युत्तकर उस अंक- कामूल लेनेसें दूसरा कर्णका प्रमाणा होताहै.।। यहां चतुर्भुनक्षेत्रमें एकत्रिभुज क्षेत्रके भुज ६८।७५ और भूमि पूर्वकी तरह अबाधा ४५।३२ और रलंब६० मिले दूसरे त्रिभुज क्षेत्रके भुज ५११४० और पूर्वकी तरह भूमि ७७ अबाधा४५ १३२ और लंब ३४ मिले.लच अचाधासहित क्षेत्रका स्वरूप दिखलाते हैं. एक दिशावाली दोनों अवाधा ४५।३२चों के अं तर १३को वर्ग १६९ में दोनों लंबो २४।६० के योग ८४ के वर्ग ७०५६ को युतकिया तो ७२२५ मिले. इसका मूल लेनेसें दू) सरा कर्ण८५ का प्रमाण मिला. १९८॥ अब यहां कर्णको इष्टकल्पना करने में विशेषोक्ती सूत्र- को डेढ श्लोकसे कहते हैं:- अत्रेष्टकर्णकल्पने विशेषोक्तिसूत्रसाईहत्तम्, । कर्णाश्रितस्वल्पभुजैक्यमुची प्रकल्प्यत्तच्छेष- मितीचबाह॥ साध्योडवलंबो यतथाऽन्यक- र्णः स्वोयो कथंचिच्छवणोनदीर्घः ॥ ९९ ।। तदन्यलभ्यान्नलघुस्तयेदंज्ञालेष्टकः स- धियाप्रकल्प्यः।।

क्षेत्रव्यवहार (१६३० चतुर्भुजंहि एकांतरकोणा वाक्रम्यसंकोच्यमानं त्रिभुजवं याति. तत्रैककोणे लमलघुभुजयोरैक्यं भूमिरितरौ भुजौ प्रक ल्य साधितं सचलंबादूनः संकोच्यमानः कर्णः कथंचिदपिनस्यात् तदितरौ भूमेरधिकोनस्यादेवमुभयथापि एतदनुक्रमेपि युधिम ताज्ञायते॥ अर्थः- कर्णके श्राश्रय जो अल्पभुजहै इसके योगको भूमिमानकर उससे शेयदो भुजमानैं फिर उन्होंके लंब सा- धनकर अन्य कर्णको साधन करै. और अपनी भूमिसें कि सी काल में भी कर्णबडा होता है. ॥१९॥ वह कर्ण अन्यके ली बसें लघु नहीं होताहै. ऐसे जानकर पंडितोंने कर्ण इट मान- ना योग्य है. चतुर्भुज क्षेत्रमें एकतर्फकी कोणों को दबानेसें त्रिभुज क्षेत्र होता है. उसाविभुजके एककोपामें एक तर्फ के सयुभुजोंको भूमि मानें और अन्यों को दो भुजमानै. फिर उस विभुजमें पूर्वकी तरह अबाधा और लंब हुआ. भुज. के अंतरका वर्गमें लंबका वर्ग चुत करनेसें जो अंक मिले, उस्का मूल कर्ण होता है. ये मैनें नहीं कहा तोभी बुद्धिमान पूर्व कहा आक्षेत्र लिरवते है:- न्यासः - यहां जिस- कएको कल्पना करते है उसके एक तरहके भुजों ५८१७५ कायोग १४३ येहै.और दूसरे तर्फके भुन ४०५१ कायो- गयेहै.तो यहां लघुभुज ४०५१ का योग १ को भूमि माननेसें त्रिभुजका स्वरूपहुआ. जैसे- दूसरा त्रिभुजको दिरवातेहैं:- जो इष्ट वर्ण है उसके दो नो तरफ दोदो भुज है.उन्होंमें एक तर्फके भुजा६८माका ननें जानना योग्य है. --- ११६४ लीलापती. योग येहै. और दूसरेतर्फके भुजों ।।५।४० का योग ।।५ मेरे इन्हों में लघुयोग ११५ हे. इसको भूमिमाना फिर शेष भुजमानकर त्रिभुज क्षेत्रबनाथै यहां भुज ६८ है. इन्होंके योग को इन्होंने अंतर १७ सें गुपा दिया तो २०२३ हुवे इसमें भूमि १५का भाग दि. या तो २०३३ हुवे. फिरभूमीको दो टिकाने लिवकर समच्छंद कर, के इसमें हीनयुक्त करनेसे १५३१८, १३९२-मिले. इन्होंका आधा किया तो अबाधा १२ । ५५० मिली. बड़ी बडे भुजी और छोटी अबाधा छोटी अचाधा छोटे भुजकी मिली अबाधा ५४३४ के वर्ग ५८११५.३७५ में इसी अवाधाके भुज ५८ वर्ग ४५२४ को समच्छेद करके युत किया तो १९३२३५ हुचे इसका मूल नहीं मिलता इसवारने ये लंबका पहे. दूसरी तर्फ से भी इसी रीतिसें यही लंबका वर्ग मिलता है. एकतर्फकी अबाधा में ५१ इसी अवापाक तर्फका भूमिम गयाडुआ भुजा७५को सम- छेद करके पराया तो "ले. यह दोनों तरफसें समान मिलता है. इसके पर्गमें युक्त किया तो हुने. इसका पतकरणारा सवाल यहदूसरे कर्णका वर्ग हे आसन्नमूलती मिलसक्ताहै. इसवात्ने पूर्व कहीहुई रातको काम तह.- अंश ५.२६.३५ और हर १५२२५ इन्हांका घात कारसे ५३२८३९५५५२५ हुरे.फिर इसको इटा वर्ग... करकंजा पादिया तो ५३२८२८५५ ५३५....ईर इसका सूटनेस- . १२२२५ १३२२५ क्षेत्रव्यवहारः १२३०८३२९६ मिले. इसमें इष्ट और १३२२५ के धातका भाग लेनेसें। १०६.०७६६ मिले. यह कर्णके समीपका अंकहै. ऐसे दूस सकर्ण लाना योग्य है. इस कर्णको बढानेसें चतुर्भुजकाभी रूप हो. सकता है.॥९॥ विषमचतुर्भुजका फलके लिये करणसूत्रको आधा छंदसें क- विषमचतुर्भुजफलानयनायकरणसूत्रंवृत्ताईम्. व्यस्नेतुकोभियतः स्थितेचे तयोः फलैक्यंफले. मत्रनूनम् ॥१०॥ अनंतरौक्तक्षेत्रांतल्यस्त्रयोःफले २४ ६२३१० अनयोरैव्यं २२३४ तस्यफलम्। अर्थ-विघमचतुर्भुजक्षेत्रमें कोंके दोनों तर्फ दो भुज है. उन्होंके फलोंका योग वियम चतुर्भुजमें फल कहा है. जैसे-पहा ले 'कहाहुया विषम चतुर्भुज ७७ माना है. चह कर्ण के दोनों तर्फ भुजोंमें एक लव २४ दूसरा लंव ६० है. इन्होंको पृथ्वी ७७ के आ- " से गुहादियाती १८४८ ॥१६२० हुये. इसमें हर २ का भाग | देनेसें फल (२४ ॥ २३१० मिले. इन्होंका योग ३२४ संपूर्ण विषम चतुर्भुजका फल हुआ.॥ १०॥ अप समान लंच क्षेत्रके अबाधाआदिजानने के लिये करण सूत्रको दो उंदोंसें कहते हैं:- समानलंबाबाधादिज्ञानायकरणसूत्रहत्तयमाह। समानुलंवस्यचतुर्भुजस्य मुखोनभूमिपरिकल्प्यभूमि। भुजौभुजौत्र्यस्त्रवदेवसाध्येतस्वावलंयमितिस्ततभा आवाधयोनाचतुरस्त्रभूमिस्तल्लंबगैक्यपदंश्रुतिःस्पात्॥ -

(१६६०
लीलावती.
समानलंबेलघुदोः कुयोगान्मुखान्यदोः संयुतिर-
ल्पिकास्यात् ।।१०२॥
अर्थ- समानलेव चतुर्भुनक्षेत्रके मुखको पृथिवीमे ऊनक
र उसको पृथ्वीमें कल्पना करैः और भुजोंको भुजकल्पनाकर,
और त्रिभुजकी तरह दोनों अबाधा और कणके मानको साधन
करै ।। १०१ ॥ अबाधाकरकै उन जो चतुर्भुनक्षेत्रकी पृथ्वी है उ.
सको लंबसें शोधकर फिर उसको योगका मूललेनेसे कर्ण होता-
है और समानलंब चतुर्भुजक्षेत्रमें लघुभुज और पथिचीके यो
गसे भुख और दूसरा भुजका योग अल्प होता है. ॥१०३ ।।-
अब उदाहरण कहतेहै-
विपंचाशन्मित्तव्येकचत्वारिंशन्मित्तौभुजौ ॥
A) मुखंतुपंचविंशत्यातुल्यषष्ट्यामहीकिल ॥८॥
अतुल्यलंबकं क्षेत्रमिदपूरुदाहृतम् ।।
षट्पंचाशत्रिषष्टिश्चनियतेकर्णयोर्मिती ॥
कौतत्राउपरौबेहिसमलंबश्चतच्छृती॥८॥
न्यास:- अत्र सहकर्ण त्रिषष्टिमित्तं प्रकल्प्यज्ञातः प्राग्वदन
न्यः कर्णः ५६ अथषट्पंचाशत्स्थाने हात्रिंशमितकर्ण ३५ प्रन
कल्प्य प्राग्वत्साध्यमानेकर्णे जातंकरणी रण्डपम् ५२१-२७००
अनयोर्मूलयो २४ ३८. ५१ ३६ रैक्यं द्वितीयः कर्णः ५
५५
अर्थ- जिस क्षेत्रमे एकभुज ५२ है और दूसरा क्षेत्र है
और मुख २५ है और पृथिवी ६० है ।। ८७॥ उसमें एक कर्ण५६
दूसरा ५३ ऐसा अत्तुल्यलंदवालाक्षेत्र पहले आचार्योंने कहा।
और भास्कराचार्य इन्हकपोसें औरभी कर्ण बतायते हैं उसको
में अन्यदो कर्ण और समानलंरक हो ॥८८ ॥

क्षेत्रव्यवहारः (१६७) ५६ “यहां बडा कर्ण ६३ अन्य कर्ण५६/ दूसराकर्ण ६३ मानकर पहले की ५२ तरह इष्टलानेसें ५६ कर्ण मिला. अव५६के स्थानमें ३२ कर्ण क- ल्पित किया तो अवाधा आदि लानेकी रीति दोनो भुज २५-३६ का योग ६४ इन्होंके अंतर १४ सेंगुएरादिया तोर दे इस में पृथिवी३२का भाग दिया तो २८ मिले इसको पृथिवी ३२ में एक कस्थानविय घटाया और एक स्थानविषै जीडा ती ४।३० मुचे. इन्होंके आधा करनेसें एक अचाधा मौरदूसरी अबाधा ३० | मिली. ऐसेही दूसरीतर्फकी अबाधा लाये तो,२-३० मिली. अपने तर्फकी अबाधा के वर्ग को भुज२५ के वर्ग ६२५ में ऊन किया तो ६२१ हुवे. इसरीतिसें दूसरी तर्फका लायेतो लंदके वर्ग- का मान २७०० मिला. येदोनो अंक अकरणी है. अर्थात् इ न्होंका मूल नहीं मिलता इसवाले आसन्न मूल लेते है, जैसे | उंबके वर्ग २१ को कर्ण २५ के वर्ग ५२५ गुणदिया तो २००१ २५हु चे. इसका मूल लिया तो ६२ मिले इसमें इष्ट कर्ण २५ का भाग देनेसे २५ मिले. इसरीतिसें २७०० का आसन्नमूल लिया तो संबका मान मिला. इन्होंका योग करनेसें दूसरे कर्णका मान मिला. न्यास- अय नदेवक्षेषपेत्स मलयम्- तदा मुखोन भूमिं परिकल्प्यभूमि मितितानार्थेभ्यस्त्रं २५

(१
लीलावती.
कल्पितं अन्नावाधे जाते२ ५५ लंवश्वकरणीगतो जातः१५
आसन्नमूलकरणेनजातः ३८६३३ अयं तत्र चतुर्भुजे समलंग
लब्योराधोनितभूमेः समलंबस्य चवर्गयोग. ५०-४र अयंकर्णवर्ग
एयरहदापापाता दितीयकर्णवर्ग: २१७६ अनयोरासन्नमूलकर
नजातीको १३.१३ एपंचतुरस्त्रे तेष्वेवघाहुष्यन्यौको न
हुधाभवतः एपनियतत्तेपि निपतावकर्णाचानीतो ब्रह्मगुप्तये
स्तदानयनं यथा कर्णाश्रितभुजघातैक्यमुभयथा अन्योन्यभा-
जितं गएायेत् । योगेन भुनप्रतिभुजवधयोः कणों पदेविषमे ॥
कर्णाश्रितभुजपातेति एकवारमनयो २५१३ पतिः ९७५ तथा
५२१६० अनयोर्यातः ३१२० घातयोईयोरैक्यम् ४०८५ तथादि
तीयवार ३६॥६० अनयोर्घातेजातं १३०० तथाहितीयवार ३६-
६० अनयो_ते २३४० घातयो रैक्यं ३६४० एतदैक्यं भुजपति
भुजः ५२-३८ घातः २०२८ पश्चात् २५-६० अनयोर्वधः १५००
तयोरैक्यं ३५२८ अनेनैक्येन ३५४० गणितंजातं पू.क्यं १२८४
१९२० प्रथमकर्णाभितभुजघातैक्येन ४०६५ भक्तं लब्धं ३११५
अस्यमूलं ५५ एककर्णैस्तथा हित्तीयक प्रथमकर्णामितभु-
जधातैन्यं ४०४५ भुजमनिभुन ३५२८ वधयोगगुणितंजातं
१४४४५१६० अन्यकाश्रितधातल्येन ३६४० भक्तं लब्धं ३९ -
६१ अस्यमूलं ६३ द्वितीयः कर्णः अस्मिन्विषयेक्षेत्रकर्णसाधना
मस्यकर्णानयनस्पप्रक्रियागौरवम् ।
अर्थ:
-अब इसीक्षेत्रको समलब करके लिखते है:- मु.
व २५ को भूमि ६० में ऊन करनेसे ३५ रहे. इसको भूमि मान और
भुजोंको५३-३६ भुजमानै. ऐसे करनेसे विभुज होताहै.जैसे-
यहांभी पूर्वकी तरह अबाधा जैसे भुज ५२६३८ के योग

न्यास ५२ ३. ३ ॥ १७२३५ क्षेत्रव्यवहारः के अंतरसें गुएराकर दिया तो ११८३ हुये इसमें भूमि ३५ मा। दिया चाहतेहैं. इसवास्तै इन्होंमें ७ का अपवर्तन देनेसें १८३ १६ मिले. इन्होंको भूमि ३५ में एक स्थानमें समच्छेद करके जोडा और एक स्थानमें हीनकि यातो ३४५१ ६ मिले. फिरइन्होका आधा करनेसें अबाधा १५२ ३ मिली अपनी तर्फकी अवाधाई के वर्ग में ६२२ हीन किया तो ३८० १६हुचे इसका सू ६२५ लनहीं मिलता इसवास्ते इसका प्रयास न्नमूल लियातो.३६ मिले. यह समलन बकाप्रमाण' है. छोटी अबाधा को भूमि म समच्छेद करके ऊन करनेसें हुवे ३६ इसके वर्ग १९२० में लंवका वर्ग३,०१६ युत किया तो १२६२३५ हुवे. इसमें हर २५ का भाग दियातो५०४ |मिले. इसका मूल नहीं मिलता है. इसवात्ते आसन्नमूल लिया तो १३ मिले. यह एककका मान मिला. ऐसेही दूसरीतर्फ की अबाधा १५२ को समच्छेद करके भूमि ६० में लंबके वर्ग- | २०१५ को जोडनेसें ५४४०० हुने. इसमें हर२५का माग देनेसें २०६मिले. इसका भी मूल नहीं मिलता इसवात्तै आसन्नमूल लियातो ४६०३ मिले. यह दूसरेकर्णका मान है. उसका स्वरूप यहहै. इसीप्रकार पिपमचतुर्भुज क्षेत्रमें उन्ही भुजावोंके विषे और ४ भी कर्ण बहुतमकारके होते हैं.इ. सीमकार अनियत क्षेत्रमेंभी ब्रह्म १. गुप्तादि आचार्य जो नियतकर्ण ५२ ५० (१७०) लीलावती. ३० लावेहै. उसीरीतिको लिखते हैं:- विषम चतुर्भुजक्षेत्रमें कोंके आश्रयजो भुज हैं उन्होका योग कर और उन्होको आपसमें गुएाकरै. फिर भुज मतिभुज अर्थात् भुजके सन्मुख जो भुजहै उन दोनों के घातका योग करके भाग देवैः फिर भाग देने से जो अक मिले.उसका मूल लेनेसें कोंका मान मिलता है. यहां दो विभुजकल्पना किये एक त्रिभुजके भु जा २५।३६ का घात १७५ फिर दूसरे त्रिभुजके भुजो५३॥६०का धात ३१२ इन दोनों घातोंका योग किया तो ४०९५ हुवे. नैसेही दूसरीवार एक त्रिभुजके भुओं २५१५२ का घात १३०० तैसेही दूसरे त्रिभुजके भुजों- ३६ १६० का घात २३४. दोनों घातोंका योग कियात्तो ३६४ हवे. इन्होंको जूदा लिखा ४०९५१३६४० फिरभूमि ५० और मुख२५ 'इन्होंका पात करनेसें १५०० हुई. फिर दो- नों भुजों ५२॥३६ का घात करनेसें हुवे. फिर दोनों घातोका योग किया तो ३५२८ हुवे. इस योग करके पहले योग३६४० को गुणदिया तो १२८४१९२० हुये. इसमें पहले कर्ण के आश्रय जो सुआहै उन्होंके घातके योग ४०६५ का भाग देनेसें ३१३६ मिने इसका मूल लिया तो पहले कर्णका प्रमाण ५६ मिला. तैसेही दूसरेकर्णफै लानेके अर्थ यह पहले कर्णके आप्रयजो भुजु है उन्होके घातके योग ४०६५ को भुनके सम्मुरव जो मुजहै। उन्होंके घातके योग ३५२८ सें गुण दिया तो १४४४७१६०४ वे. इसमें अन्य कर्णके याश्रयजो भुज है उन्होंके घातके योग ३६५० का भान देने से ३६ ५६ मिले. इसका मूल लेनेसें दूसरे २०२८ क्षेत्रव्यवहार कर्णका प्रमाण ६३ मिला. इस क्रियाके करने में बडा गौरव है. ५२/५३-५६ इसवात्तै अब लघुप्रक्रियासें दोछंदों करिकै क- हते हैं- लघुपक्रियादनिहारेणाह ॥ अभीष्टजात्यहयपाहु- कोट्यापरस्परंकर्णहता भुजाइति ।। चतुर्भुजंयदि पमंकल्पित श्रुतीतुतत्रविभुजद्दयात्ततः ॥ १०३।। वासोर्वधः कोटिवर्धनयुक्त्यादेकाश्रुतिः कोटिभु- जावधैत्यम् ॥ अन्यालघौसत्यपिसाधनेऽस्मिन्पू. ३: कृतंयद्गुरुतत्रविद्मः ॥ १०४ ॥ जात्यक्षेत्रयम् । एतयोरित्तरेतरकर्ण हत्ताभुजाः कोटय: भुजाइतिरुतेजातं २५१६० १५२ । ३९ तेषांमहती भूलघुमुख मित बाहूइति प्रकल्प्य क्षेत्रदर्शनंइमौकर्णी महत्ताऽऽयासेनानी *६३१५६ अस्थैवजात्ययस्योत्तरोत्तरभुजकोट्योती जाती २६।२० अनयोरैक्यमेकाकर्णः ५६ ग्रहोः ३१५ कोट्योश्च घाती १५१४८ अनयोरैक्यमन्यः कर्णः ६३ एवं श्रुतीस्यानां ।ए वंसुरवेनजाते अथयदिपार्श्वभुजयोर्व्यत्ययंकृत्वान्यतं क्षेत्रम् न्यासः । तदाजात्ययकर्णयोर्वधः ६५ द्वितीयकर्णः॥ अर्थ:- जिस विषमचतुर्भुजमें कर्णलेना हो उसक्षेत्रसेंदो जात्याविभुज बनावै. फिर एक जात्यविभुनसे दूसरे जात्यात्रिभु- जके कर्णको गुणनेसें जो अंक मिले वह विषमचतुर्भुजका एक सुजहै. फिर दूसरे त्रिभुजके भुजसे पहले त्रिभुजके कर्णको गुणा कलेसेंजो अंक मिले वह विषमका दूसरा भुन है फिर लीलावती. अब संधि आदिके लानेके अर्थ करणसूत्रको एक छंदकर- के कहते हैं- अथसंध्याद्यानपनाकरणसूत्रंकृत्तइयम् ।। लंबतदाश्रितबाह्वोर्मध्यंसंध्याख्यमस्वलंबस्य ॥ संध्यूनाभूः पीठं सौंध्यंयस्याधरंरखंडम् ॥ १०५ ।। संधिस्थिःपरलम्बप्रचणहतः परस्यपीठेन ।। भक्तोलंदश्त्योर्योगात्स्यात्तामधः रवण्डे ॥१०६॥ लम्बः १८८ तदाश्रितमुजः १९५ अनयोर्मध्ये यल्लंबलंबा- श्रित बाहुवर्गेत्यादिनागताबाधासंधिसंज्ञा १८ तदूनितभूरिति द्वितीयाबाधासापीठसंज्ञा २५२ एवं हित्तीयलंबः २२४ तदाश्रित भुजः २६० पूर्ववत्संधि १३२ पीठम् १६८ अथायलंबस्याद्य खंडसाध्यं अस्यसंवित १४ स्थिः १८ परलवेन २२४ श्रवणे- नच २८० पृथगुणितः १०७५२ । १३४४० परस्यपीठेन १६८ भक्तो लब्ध लम्बाधा खंडम् ६४ श्रवणाधः वडंच एवं द्वितीयलंय- स्य २२४ संधिः १३२ परलंबन १८९ कर्णेनर ३१५ पृथगुणितः परस्यपीठेन २५२ भक्तोलब्धलम्बाधा खंडर श्रवणापाखंड च १६५. अर्थ-- लंब और उसके आश्रयभुज इन्होंके वर्ग का अंतर कर उसके मूल लंब और भुज इन्होंके मध्यको भूमिहै.यही स. घि होता है. भूमिमें संधिको ऊन करनेसें पीठ होता है ।। १०५ और संधिको दोस्थानमें कणसें गुणै फिर इसमें परके पीठका माग देनेसें नीचेके खडके कोटीक मिलते है।। १०६ ।। अब उदाहरण कहते हैं-लंब ८९ के वर्ग ३५७२१ को उ- सके आश्रय जो मुज१९५ उसके वर्ग ३८०२५ में घटाने से२३० क्षेत्रव्यवहारः (१७५) हुपं. फिर इसका मूल लिया तो ४८ संघिमिला भूमि ३०० में सं- पि ४८ को घटादिया तो २५२ पीठ मिला ऐसेही दूसरे तर्फ के लंब २२४ के वर्ग ५०१७६ को उसके आश्रयजो भुन २६. उसके वर्ग ६७६०० में घटानेसे १७४२४ हुवे. इसका मूल लेनेसें दूसरी तर- फकी १३२ संधि मिली. इसको भूमि ३००से घटानेसे १६८ यह दूसरी तर्फकी संधीकी पीठ मिली.आदिलबकी सधि४८ को दो स्थानमे रक्खा या एक स्थानमें सधि४८ को परके लंब२२४ कर के युएा तो १०७ ५२ हुवे . फिरदूसरे स्थानमे संधि४८को कर्ण २८० सें गुरादिया तो१३४४व्हुवै. इन्हो में क्रमसें परका पीठ १६८ का भाग दिया तो लबके नीचे के रखड ६४ और कर्ण के नी- के खंड ८० मिले. ऐसेही दूसरे तर्फके लुब २२४ की सधि |१३२ को दोस्थानमें रक्खा. एक स्थानमें साधि १३२ को ३३५ क णसे गुणदियातो ४१५८० हुवे. इन्होंमें क्रमसें परपीठ २५२ काभाग दियातो लवके नीचेके खड और कर्ण के नीचे संड मिले.. अब कोके योगसें नीचेका लवको जाननेके अर्थ सूत्रको एक छंद करके कहते है:- अथकर्णयोगिादधोलंबज्ञानार्यसूत्रवृत्तम्. लंदौभूमौ निजनिजपीठविभक्तीचवंशोस्तः ॥ । ताभ्यांपाग्यच्छ्रत्योगिाल्लम्बः कुरवंडेच॥ १०७॥ लंबीर-२२४ भू३०० भौजातौ ५६७०० १६७२०० स्वस्थपीठाच्या २५२१६८ भक्ती एकमत्रलब्धी वंशो २२५... आश्यामन्योऽन्यमूलाग्रगसूत्रयोगादित्यादिकरणेनलब्धः क- र्णयोगादधो लम्ब- १५४ भूखंडेच १०८ ॥ १६२ लीलावती. 1 अर्थ- भूमिसें लंबोंको जुदाजुदा गुणाकर अपने अपने पीठका भाग देनेसे वंश होते हैं. और पूर्वकी तरह अापसमें शोंके घातकर वंशोंके योगका भाग देनेसें नीधेका लंब और अ बाधा मिलतेहैं. १०७ ॥ जैसे- पहले लंच १२ को भूमि से गुणा तो ५६७०० हुवे. फिरदूसरे लंद २२४ को भूमि ३०० से गुपादियातो ६७ २०० हुवे. फिर इन्होंमें क्रमसें अपनी अपनी पीनों २५२।१६८ का भाग दिया तो दोनोवंशोंकी सरल्या २२५. १०. मिली. फिर इन्हों के घात .... में बंशोके योग ५२५ का भाग दिया तो लम्ब १४४ और अबाधा १०८ १६शमिली, अब सूचीके अवाधा लंब और भुज इन्हों को जानने के धे सूत्रको तीन छंदकरके कहते हैं:- अयसूयाचाधालम्पभुजज्ञानार्थ सूर्यवृत्तत्रयं लंबद्धतीनिजलब्धिः परलंवगुणःसमाद्धयोशेयः॥ समपरसंध्योरैक्यंहारत्तेनोद्धृतौ तौच ॥ १८॥ समपरसंधीभूनौसूच्यावापृथक्रयाताम् ॥ हारइतःपरलंबः सूचीलम्बोभवेद्भमः ॥ १०९ ।। सूचीलम्बभभुजोनिजनिजलंचीही ती जौसूयाः॥ एवंक्षेत्रक्षोदः पालेराशिकालिंयते ।। ११०॥ अत्राकिलाइयंलंकः २२५ अस्यसंधिः १३२ अयं परलंबेन १८९ गुणितो २२४ अनेन भक्तो जातः समाह्वयः ॥ अस्यपर. संघे १८ योगोहारः २५५ अनेन भूमः३. समः१५७३" परसंधिश्व ४५०० भक्तोजाने सूच्याबाधे २५६५, 11 एवं द्वितीय समायः ५१२ अर्थ:- अपनीसपीको अन्यके लबसें गुणाकर अपने

(१७)
क्षेत्रव्यवहार।
... भाग देनेसें सम कहाता है. ॥१०८॥ और अन्यकी संधि
., इन्होंका योग हार होता है. सम और अन्यकी संधि इन्होंको
भूमिसें गुणाकरै, उसमें अपने अपने हारका भाग देनेसें सूचीके जु
दाजुदा अबाधा होतेहै. अन्यके लंवको भूमिसें गुगाकर हारका
भाग देनेसें सूचीका लंब होता है. ॥१०९ ।। सूचीके लंबोंसें गुरो दुवे
जो मुजहै.उन्होंमें अपने अपने लंगोंका भाग देनेसें सूचीके भुज
'होते हैं. ऐसे क्षेत्रका २ क्षोद है यह त्रैराशिकसें पंडितोंने आनना
योग्यहै. ॥११० ॥ जैसे इस लंच २२४ की संधि १३२ को अन्यके लं.
व १८६ सें गुपादिया तो २४९१८ हुवे. इसमें अपने लंब २२४ का
भाग दियातो २४९४८ हुवे इसमें २८ का अपवर्तन देनेसें समका
प्रमाण मिला. इसमें अन्यकी संधि ४८ को समच्छेद करके यु
त किया तो हार १२७५-मिला. समय को भूमि ३०० से गु
एग किया तो २६७३०. हुवे इसमें अपने हार-२४५ का भाग
| देनेसें २६७३६० हुवै. इसमें ७५ का अपवर्तन दिया तो निधः
का सम था उधरकी अवाधा ३५४४ मिली. फिर दूसरीतर्फ
की संधि४८ को भूमि३०० सें गुणदिया तो १४४०. हुआ.
इसमें पहले हार २७५ का भाग दिया तो १५३५ हुवे.
इन्होंमें ७५ का अपवर्तन दियातो सूचीकी दूसरी अबाधा
१५३४ मिली. ऐसेही दूसरी संधिके सम और हार इन्हों से
अबाधा लावतो यही मिलेगा. जैसे इस १८९ लंबकी संधि
४८को अन्यका लंब २२४ सें गुण दिया तो १०७ ५२ हुवे. इसमें
अपने लंबका भाग दिया तो -हुचे. इन्होंमें का
अपवर्तन दियातो समका प्रमाण १३-मिला.
हित्तीयोहारः ४३. अनेनभूमः स्वीयः समः १५३६..

(1) . लीलावती. चक्ष्य ।। द्वाविंशति २२ यत्परिधिप्रमाणंतमास. संरच्यांच सरदेविचित्य ॥१॥ न्यांसः व्यासमानं ७ लब्ध परिधिमान २१ - १२ ३६ स्थूलो या परिधिलब्धः २२ अथवा परिधितोव्यासानयनाय-न्यासः गुणा- रविपर्ययेण व्यासमानंसूक्ष्मं ३ स्थूल उंबर अर्थ:-जिसगोलमें व्यासका मार है.उसगोलमें परिधीका मार कहो. हे सरये जिस गोलमें २२ परिधि है. उसमें व्यासका मा. नकहो ॥१॥ इष्टव्यास ७ को ३९२७ सें गुणा तो२७४८८ हुवे. इसमें १२५० का भाग दियातो २१ यह सूक्ष्मपरिधि ३३ मिला. अथवा उसी ब्यासको २२ से गुणा किया... १५४ हुये. इसमें का भागं दिया तो २२ स्थूल परिधि मिली. अब स्थूल और सक्ष्मा व्यासकी रीति स्थूल और सूक्ष्मजो परिधिकी रीति वह कहत्या येहै. उसी क्रियाको उलटा करनेसें स्थूलसून श्म फल मिलता है. जैसे परिधि २२ को १२५०/ में गुरादियान्तो २७५०० हुवे. इसमें ३६२७ का भाग देनेसें सूक्ष्मव्यासका मान २ मिला. अथवा परिधि २२ को सें गुएगा तो. २२ १५४ मिले. इसमें २२ का भागदैनेसें स्थूल - न्या. (AD व्यास मिला. अब रत्तदागीलों में फलको लानेके अर्थ करणसूत्रको एकछं द करके कहते हैं:- में वृत्तगोलयोःफलानयने करणसूत्रवृत्तम् ॥ उत्त- क्षेत्रेपरिधिरणितव्यासपादः फलंतत्क्षुपणंवेदै रुपरिपरितः कन्दुकस्यैवजालम् ।। गोलस्यैवं क्षेत्रव्यवहारः (61) तपिचफलंपृष्ठजंब्याहनिम्नं पद्धिर्मक्तंभ- वतिनियतंगोलगघनारव्यम् ।।११२ ॥ अर्थ- इतक्षेत्रमें व्यासकी चोथाई को परिधीसे गुणनेसें फल होताहै. उसको चार गुणा करनेसें गोलके ऊपरका गेदका जालके समानफल होताहै. फिर उसको व्याससे गुणाकर छहका भाग दे नेसे गोलके गर्भमै घननामवाला नियत फल होताहै ॥११२ ॥ अब उदाहरण कहतेहै.- यद्यासस्तुरगर्मितः फिलफलं क्षेत्रेसमेतत्रति ज्यासःसप्तमितश्ययस्य सुमतेगोलस्यत्तस्या पिकिम् ॥ पृष्ठेकंदुकजालसन्निभफलंगोलस्प तस्यापिकि मध्येबाहपनंफलंचविमलांचेदेसि लीलावतीम् ॥१२॥ वृत्तक्षेत्रफलदर्शनायन्यासः व्यासः ७ परिधि २१ ३३६ त्रफल ३८ ३४२३ गोलपृष्ठदर्शनायन्यासः व्यासः ७ गोलपृष्ठफल १५३ १२५ गोलांतर घनफलदर्शनाय न्यासः च्यासः ७ गोलस्थातर्गतधना क्षे लम् १७८ २५०० । अर्थ-जिसरतक्षेत्रमें व्यास है.उसमे फल क्या होगा? सो 'कहो. हे सुमने जिस गोलमें सात व्यासहै उसके ऊपर गेदके जा लकी तरह जो सूफतेहैं उसफलको कहो. जो तुम लीलावतीको जानते हो तो उसी रत्तके भीतरका घनफल कहो ॥२॥ अब समानचत्तक्षेत्रके फलको दिखानेके अर्थ इ सरत्तमे व्यासहै इसमे पहले की तरह परिधि २१ १३ई मिली. और इसके गुणित्त अक ५० न्यास (१८) लीलावती. न्या. DO न्या. को ध्यासकी चौथाई से गुएा फरनेसें १९३४.३३ हुये. इस में इर ५००० का भाग दिया तो समान स्त्तका क्षेत्रफल ३८ मिला. अब गोलके ऊपरका फल लाने के अर्थ न्यास-७ व्याससे जो पहली किया करनेसें जो वृत्त क्षेत्रका फल मिला है उसमें ४-गुणाकरनेसें गेंदके जालके समान गो- लके ऊपरका फल १५३ १६.३ मिला.म. बगोलके भीतरके घनफल लानेके अर्थ व्यास में पहली क्रिया करनेसें गेंदको जालके समान गोलके उपर जो फल है। सको ध्याससें गुणा करनेसें जो अंक मिले.उसमें ६ का भाग देनेसें गोलके भीतरका घनफल १७६१४६७ मिला, अब प्रकारांतर अर्थात् अन्य प्रकारसे उनरन्तक्षेत्रोंके फल को लानेके अर्य करणसूत्रको डेट छंद करकै कहते हैं: अयप्रकारांतरेणतत्फलानयने करणसूत्रसाई वृत्तं ।। व्यासस्यवर्गेभनवामिनि प्रेमदत्यफलंप- चसहत्रभक्ते ॥ रुद्राहतेशकहतेऽधवाल्या स्थूलंफलंत्तयवहारयोग्यम् ॥१३॥ धनीकृ- तन्योसदलंनिजैरुपिंशांशयुगोलघनफलस्यात् । अर्थ: व्यासके वर्गके ३९२७ से गुणा करनेसें जो अंक मिले उसमें पांचहजारका भाग देनेसें सूक्ष्मफल होता है. अथा वा व्यासके वर्गको म्यारहसें गुणाफरनेसें जो अंक मितै, उसमें चौदहका भाग नसें व्यवहारके योग्य स्थूल फल मिलता है.४३ घन कियाहुन्या भ्यासके अधिमं अपना दकीसमा भागयुता -- क्षेत्रव्यवहारः (१८३" करनेसें गोलमें घनफल होताहै. उदाहरण कहते है। व्यास के वर्ग ४१ को ३६२७ गुणातो १९२६, हुये इसमें५००० | का भाग देनेसें समानहत्तका सूक्ष्मफल ३८ २४३३ मिला. अथा वा व्यास ७ के वर्ग४६ को ११ सें गुणातो ५३९ हुपे. इसमें ४ का भाग देनेसें वृत्तक्षेत्रमें स्थूलफल ३८ ई मिला. व्यास के घन३४३ को आधा करनेसें३४३ हुये.इसमें अपना इसीसमा भाग ४३ युत किया तो "५४६ हुवे इसमें अपनें हरका ४२ भाग देने से इत्त गोलमें स्थूल घनफल १७८३ मिला, अब शर और जीयाके लाने के अर्थ करणसूत्रको डेढ छंदकर रके कहते हैं:- शरजीवानयनाय करणसूत्रसाई इन्तम् ॥ ज्याव्यासयोगान्तरपातमूलं व्यासस्तदूनौदलितः शर स्यात् ॥ ११४ ॥ व्यासाच्छरोनाच्छरसंग- णाच्च ॥ मूलंहिनिम्नंभवत्तीहजीवा ।। जीवाइर्गे शरभक्तयुक्ते व्यासममाणं वदनिहत्ते ॥११५॥ अर्थ: जीया और व्यासके योगको इन्होंके अंतरसें गुगाका रै. फिर इसका मूल लेनेसें जो अंक मिलै उसमें व्यासको जन करै. फिर उसका आधा करनेसें शर होताहै ॥११४ ।। इस वृत्ता गोलमें व्यासको शरसें ऊन करै. फिर उसको शरसें गुणा फरैफि र उसका मूल लेनेसें जो अंक मिले उसको दूना करनेसें जीवा होतीहै. जीयाके आधेके वर्ग में शरका भागदेवै फिर उसमें श. | रकोयुत करनेसें व्यास होता है. ।।११५ ।। दशविस्तृतिवृत्तांतर्यत्रज्यापण्मितासरखे। ॥ अब उदाहरण कहतेहै:- १८४० लीलावती. तत्रेषुवदबाणाज्यांज्याबाणाभ्यांचयिस्तुतिम् ९३ न्यास-व्यास- १० ज्या ६ योग १६ अंतर ४ पातः ६४मू २८ एतदूनोच्यास. २ दलित. १ जात. शरः १ च्यासात् १०श रोनात् शर। सगुणात् । मूल ३ हिनिम जाता जीवा ५ई। वर्गेर शरभक्त शरयुक्तोजातो ध्यास. १० अर्थ- जिसरत्तके भीतर १० व्यास है औरथ शर उसमें चाण कही. वापसे जीया कहो.और जीवा और पाएसे व्यासकामाना कहो ॥३॥ न्यास १ न्यास- जीवा ६ और व्यास १० इन्होके योग१६को इन्होके अना र ४ से गुणा तो ६४ हुवे इस का मूल-कोव्यास मे हीन किया तो २हुवे. इसको आधा करनेसे एक शरका मान मिल व्यासपको शरसें ऊन किया तो । हुवे इसकोशर से उणादि यातो र हुवे. इसका मूल ३ को दूना किया तो ५ छह जीवाकामा नामिला जीवा के आधे३ के वर्ग:मे शर का भाग दिया तो यही रहा. फिर इसमें शरीको पुत करनेसे वृत्तमें व्यासका मान १.मिला. अवरतके भीतर समात्रिकोशको आदिले नवकोणतक बोके भुजाबोको लानेके अर्थ करणसूत्रको तीन सदसे कहते है। अथरन्तांतस्यत्रादिनयास्त्रांतक्षेत्राणां भुजसमानयगाप करणसूत्रहत्तत्रयं ॥ नियंकामिनभश्चंद्रे- . क्षेत्रव्यवहारः (१८५) १०३९२३ स्त्रियाणाष्टयुगाष्टभिः ८४८५३ ॥ वेदाग्निबाणरवाश्चैश्च ७०५३४ वरयामाचरसैः ६०००० अमात् ॥११६ ॥ बाणेपुनरवबाणेश्व ५२०५५ हिदिनन्देपुसागरैः ४५९ २२ ॥ कुराम दशवेदैश्य४१०३१ वृत्तव्यासेसमाहते ॥११७।। | वरवरवाभार्क १२०००० संभक्तेलभ्यतेक्रमः शोभुजाः ॥ वृत्तान्तरूयस्त्रपूर्वाणांनपालान्तं पृथक्पृथक् ॥१८॥ अर्थ-व्यासको १०३९२३ सें गुणाकरनेसें जो अंक मिले उस- में १२०... का भाग देनेसें चतुष्कोणके भुजका मान होता है.फिर व्यासको ७०५३४ सें गुणाफर१२०.०० भाग देनेसें पंचकोणके भुजका मान होताहै. फिर व्यासको ६०... सें गुपाकर १२०००- का भाग देनेसें षट्कोण भुजोंका मान होता है. ॥११६॥ फिरच्या. सको ५२०५५ सें गुणाकर १२०००० का भाग देनेसें सात कोणके भुजोका मान होताहै. ॥ ११७ ।। फिरव्यासको ४५६२२ सें गुणाकर १२०... का भाग देनेसें अष्टकोणके भुजोंका मान होता है. 1e अब उदाहरण कहते है- सहस्रहितयव्यासंयहत्तंतस्यमध्यतः॥ स- मंत्र्यस्त्रादिकानांमे भुजान्वदपृथक्पृथक् ॥४ अर्थ- जिसस्त्तके भीतर २००० व्यास है तो विकोणसें नव- कोएपर्यंत जो क्षेत्र हैउन्होके भुजोंको जूदाजुदा कहो. ॥१५॥ अथ रत्तांतास्त्रिभुजे भुजमानानयनाय न्यासः- व्यासः २... विकामिनभश्चद्रै १० ३६३३ र्युणितः २०७८४६ ... स्वस्वाचा भक्तोलब्ध न्यस्त्रे भुजमानं १७३२४ . . २०...

(१९ लीलावती. भक्तोलब्धनवाने भुजमान ५८५.३० फिरव्यास २००० को ४१०३१ सें गुणा तो-२०६२ ० ०० दुवे.इसमें १२००० का भाग दिया तो५८३ नवकों के भुजका नवकोणाः मान मिला. अवस्थूल जीवाके जाननेके अर्थ लघुक्रियाको एक छंदसें कहन अथस्थूलजीवाज्ञानार्थलघुक्रियाकरण सूत्रदत्त चापोननिघ्नपरिधिःप्रथमाद्धयःस्थापंचाहताप- रिधिवर्गचतुर्थभागः ॥ आद्योनितेन खलुतेनभ- जेचतुर्मव्यासाहतंप्रथममाप्तमिहज्यकास्याताई अर्थ: व्यासकी परिधीको धनुषसें ऊन करनेसें जो अंक मि- लै उससे परिधि को गुरानेसें प्रथम नामवाला अंक होता है.परि धीके वर्गकी चोयाईको ५ से गुणाकर प्रथम अंकसें ऊन करने से भाजक होता है. गुने ग्यासको प्रथमसें गुणाकर भाजकका भा. गदेनेसें जीवा होतीहै . ५११९ ।। अर.उदाहरण कहतेहैं:- अष्टादशांशेनहतेः समानमेकादिनि न चय- लापम् ॥ पृथक्पृथत बवदाश्रुजीवांरखाकै मितव्यासदलंचयत्र दिया। न्यासा - ७.५४ व्यासः २४०. अ.१२००० सलाधवाय विंशते साटिर्कशतांशमिलितः सूक्ष्मपरिधिः मिला. - "यावादशांशः५५ अत्राव्यकलाघवाप दयोरष्टादशांशयुत्तोगृहपन्यासः व्यापयमेकादि गुणितेननुल्येधनुपिकल्पिते ज्याः साध्याः .... खालापरि - क्षेत्रव्यवहारः (१८) । ..शाशन परिधि धषि चापयत्यज्याः साध्याः तयापि ताएव, भयंति अपवर्तितन्यन्यासः परिधिः १८ चापानिच १।२।३।५ [६१७१६ ययोक्तकरणेन लव्याजीवाः ४२.८२ -१२०- १५४ -१८४-२०८ - २२६-२४० अर्थ: जिस गोलमें दोसो चालीस २४० प्यास है औरउसकी पी : अढारमा भागधनुप है. उसकी जीया औरटूने निगुने चौगुने पंचगुणे उगुरो, सात गुऐ आठगुएरो इन्होंकी अलग लग जीवा कहो ॥ १५॥ इसव्यास २४० में पहली क्रिया करके परिधि ५५४ मिला.प. रंतुइसपरिधिमें यह भाग ३५ कम रहता है. तथापि इस अंतरको अल्पजानकर परिधि७५४ लिया है. इसप- रिधीका अठारमा भाग ४२ धनुप है. परंतु इस धनुपमें यहभाग हीन रहता है तो गणितकी सुगमताके यास्ते पहले धनुप ४२ लिया. इस अकको दू- ना करनेसें दूसरा धनुष होताहै ऐसेही तीनसें लेके नवपर्यंत धनुन प होते हैं. पहले धनुष ५२ का सव धनुषोंमें अपवर्तन देनेसे येधा उप १।२।३।४।५।६८ हुवे. अब इन धनुषोंको जीपाला नेका प्रकार धनुषाको परिधि१८ मेंसें उन किया. तो१७ हुवे. इसको धनुष से गुणा करनेसें प्रथमनामवाला अंक १७ या फिर परि- घि १८ के वर्ग ३२४ की चोथाई १ को ५ गुणा करनेसें ४०५ हुपे. २४० AR.

(१२. लीलावती. इसमें प्रथम १७ उन करनेसें भाजकका अंक ३८८ हुआ. इसको चौगुणे व्यास २६० सेंगरोहुये प्रथम ५३२०में भागदेनेसें पहली जीवाका मान ५२ मिला. वहां २४ शेष रहे. परंतु थोडा अंतर है. इसवास्ते नहीं लिया. ऐसेही सब जीवा ४२१८१ ११२०१५४११८४॥ २०८२२६।२३६१२४० मिली. अब धनुषको लानेके अर्थ करणसूत्रको एक छंदसें कहतेहैं- अधचापानयनायकरणसुत्ररत्तम् । व्यासाब्धि- घातयुत्तमौर्विकयाविभक्तोजीवांप्रिपंचगुणितः परिधेस्तुवर्गः ॥लब्धोनितात्परिधिवर्ग चतुर्थ- भागादाप्तपदेवृतिदलात्पतितेधनुःस्यात् ॥ १२०।। अर्थ- जीवाके चतुर्थशिसें और पांच गुणेहदै परिधिके में चोगुणे च्याससें चुतजीवाका भार देने से जो अंक मिलै,उ- सको परिधिके चौथे भागमें ऊन करनेसें जो अंक हो, उसके मू. लको वृत्तिके आधेमें घटानेसें धनुप होताहै. ॥ १२० ॥ अब उदाहरण कहतेहै- विहिताइहयेगुणास्ततोयदतेषामधुना धनुर्मिति । यदिते स्लिधनुयाक्रियागणितेगाणितिकातिनैपुण९६ न्यासः ४२०८२.१२०-१५४ -१८४-२००-२२६-२३५, २४. सएपा पवर्तितपरिधिः -१८ च्यासाथिः २४० अब्धि घात ९६० युतमौर्पिकया १००१ नयाजीचाघ्रिणा पचभि५ श्वप- रिधी वर्गो३२४ गुणितः १७०१० भक्तो लब्यो १७७ बांकलाघवा यचतुर्विशतेयधिक सहस्रांशयुत्तोगृहीतोऽनेनोनितात् परिधि १८ वर्ग ३२४ चतुर्थतागात् ६४ पदे प्राप्ते- रति ८ दलात् र पतिते। जातो धनुः एवं जातानिधषि १३२।३।४।५।६७दा एतानि स्वातच्यवहारः (१९ परिध्यष्टादशांशेन गुणितानिस्युः ।। इनिभास्कराचार्यवि० लीलापत्यां क्षेत्रव्यवहार समाप्तः।। अर्थ-- हे गाणितिक ! अर्यात् गणितमें कुवाल!जो तुमारी, धनुषकी गणिनमें निपुणता हो, तो यहां जो जीवा कही है। उन्हों। के धनुपका मान कहो ॥६६॥ न्यास-पहले कही हुई जीचा५२ १९२।१२०११५४।१८४१२०८ १२२६।२३६ प्रथमजीया ४२ के चौथे माग' से अपवर्तितपरिधि१८ के वर्ग ३२४ को उपातो३४०२ हु। वे. फिर इसको ५सें गुणातो १७.१० हुचे इसमें चौगुणेन्यास ९६० | सें युत जीवा १००२ काभाग दियातो मिले. इसको अपवर्तित परिधि१८ के वर्ग ३२४ की शैथाई ८१ में घटाया तो ६४ रहे इसके मूल को रति के आधेई में ऊन करनेसेंही सब धनुष १।२।३॥ ४०५।६७ मिले. इन्द्रों को परिधिके अठारइमें अंश से गुपादिया तो धनुषोंके मान ४२।०४।१२५। १५८ ॥ २१०।२५१ १२९५ १३३५ १३७७ मिले. यहां श्रीभास्कराचार्यविरचित लीलावत्तीका भाषादीका क्षेत्र- व्यवहार समाप्तहुया. 1. अथरवातव्यवहारः। अब रसातव्यवहार अर्थात् त्योदनेकै व्यवहारमें करणसूत्रको देढ छंदकरके कहते हैं: अथरवातव्यवहारे करणसूत्रं साडिय गगचित्याधिस्तारंबहुषुस्थाने तद्युतिर्भाज्या ॥ स्थानकमित्यासमर्मितिरेचंदेयेच वैधेच ।। १२१॥ क्षेत्रफलंवेधगुणंरपातेघनहत्तसंरब्यास्यात् ॥

( १९२० लीलावती. अर्थ-जिसरवातमें अनेक प्रकारकी लगाई और अनेकम- कारकी चौडाई और अनेक प्रकारकी नीचाई हो चहा पृथक् पृथक स्थानोमें नापनेसें जो प्रमाण हो उन्होके चोगमे नापने के स्था नोंकी सरव्याका भाग देनेसें ओ अंक हो वही लंबाई है ऐसेही चौडाई और नीचाईका मान आनना योग्य है. ॥ १२१ ॥ क्षेत्रफल का वेधसें गुणा करनेसें रयुदायमे घनहस्तोकी सरल्या होती है. अब उदाहरण कहते है:- भुजवक्रतयादैर्घ्यदशेशार्क करैर्मितम् ॥ त्रिपुस्थानेषुषट्पञ्चसप्तहस्ताचविस्तृतिः ॥६७ यस्वरयातस्यवेधोपिहिचतुस्त्रिकरःससे ॥ तत्ररवाते फियंतःस्युर्घनहस्ताःप्रचक्ष्वमे।। ९८॥ अर्थ- एक योदाहुवा स्थानकी लगाई तीन ठिकाने मापी तो एक जगह १२ हाय हुई और दूसरे स्थानमें ग्यारह हाय और तीन सरे स्थानमे दश चौडापतीनो स्था नोमें बह पांच सात हाय और रहु- दारे.॥९॥ तीन स्थानोमें देरवा तो चार तीन दो उस स्वातमे पनहत कितने होगे? सो मुझकू कहो ॥६॥ अत्रसममिति करयोनरितारे हस्ताः ६ देय वेच३ तथा रुते क्षेत्रदर्शनम्. अर्थ- यहा तीनो लबाईयो १० १११।१२ का योग ३३ मे यह रन बाई तीनस्थानमे मापीहै इमवा- स्तै लवाइयोके योग३३मे मापीही इसवाले लबाइयोके योग ३३मेरका १२ वधा३ ११

खातव्यवहारः
(१९३)
भाग देनेसें लंबाई ११ मिली. ऐसेही चोडाई ६ और खुदाव ३ लंच ||
११ चौडाब६ के घात ६६ को खुदाब ३ सें गुएनेसें घनहस्त १९८
अब अन्य स्वातमें करणसूत्रको डेढ छंदकरके कहते हैं:
खातान्तरेकरणसूत्रसाईहत्तम् ॥ मुखजतल-
जतद्युतिजक्षेत्रफलैक्यहृतंबद्धिः ॥ १२१ ।।
क्षेत्रफलंसममेयंवेधहत्तंघनफुल स्पष्टम्
समरवातफलत्र्यंशः सूचीरयातेफलं भवति ।।१२२॥
'' अर्थ- सुरव के लंबाव और चौड़ायसें क्षेत्रफल लावै.
र पल लंपाय, चौडाबका क्षेत्रफल लावै. फिर तीनों
फलोंका योग करनेसें जो अंक मिलै, उसमें छहका भाग
देनेसें ।। १२१ ॥ जो हो उसको रवातके प्रमाणसें गुणा करै.
वहीं गुणित अंक उसरवातका क्षेत्रफल है. जहां समरवान
हो वहां मुरबके लंघाव और चौडाबके धानको खातसें गु-
पानेसे जोअंक मिले, वही रवातफल होता है. उसको समरखा
तबोलते हैं. और समरपातका तीसरा भाग सूची खातका फ-
अब उदाहरण कहते हैं-
सरवेदशद्वादशहस्ततुल्यंविस्तारदै_तुतले
तदर्धम् ॥ यस्याः सरसप्तकर श्ववेधःकाँ
रवातसंख्याबदतत्रबाप्याम्॥९८॥
न्यासः - मुखजंक्षेत्रफलं १२० तलज ३० तयुनिज२७०
एषामैक्यं ४ २० षड्रिप इतंजातं समफलं ७० वेध जा.
'तं स्वातफलं घनहरूलाः ४६०
उ है. ॥ १२२॥

(१९४) लीलावती. काघात २७० अर्थ- जहां मुखकालबाव बारह हाथ, चौड़ाव दश और तल में लयाय छह, चौडाव पांच हे सरये। जिसका सात हाय वेध है. ऐसी वायडीमें रवातकी संख्या क्याहोगी सो कहो. मुरवकी लंबाई १२ और चौडाई १० इन्होंका घात १२०नी- चेकी लंबाई और चौडाई ५ इन्हों। का घात ३० मुखके नीचेकील- वाई और चौडाईके योगों१८९५ तीनों घातो १२॥ ३०।२७० के योग ५२० में का भाग देनेसें७. हुवे . इसको खातकी संरच्या ७ से गुएनेसे उस बावडीका घनहस्तात्मक फल ४६० मिला अब दूसरा उदाहरण कहते हैं- खातेऽथ तिग्मकरतुल्यचतुर्भुजेचर्फिस्या- फलनवमितःफिलयत्रवेधः । इत्तेतयैव दशविस्तृतिपंचवेधेसूचीफलंवदत्तयोश्व पृथक्पृयड्-मे ॥ ९९ ॥ न्यासः- भुजः १२वैधः जातं ययोक्तकरणेन रवातफलं. धनहस्ताः १२९६ सूचीफलम् ४३३ . अर्थ:- जिस स्वातमें चारों भुजा बारह बारह हाथ और वैध नव है. उस स्वातमें फल क्या होगा? सोकहो. और निसरत्तमें व्यास १० और वैध ५ है. उसस समें सूचीफल जूदाजूदा कहो ॥ ९९ ॥ चतुर्भुजसे त्रका न्यास यहां समरयातहै. इसवास्तै भुजा०२।१२ कपात कोरवातकी संख्या सेंगुणनेसें समरणातका फल १२९६ मिला, चितिव्यवहार. उत्तरवात दर्शनाय न्यासः व्यासः १० वेधः५ अत्रसूक्ष्मपरिधिः ३६२० सूक्ष्मक्षेत्रफलं ३६२७ वैधाएंजातंरवातफलं ६३५ यहास्थूलरवातफलं ३७५ सूचीफलं स्थूलंबा इनिरवातव्यवहार समाप्त अर्थ:- अरस्तरयातको दिखाने के अर्थ न्यास व्याम० सें पह उकी तरह सूक्ष्मपरिधि ३६२७ मिली. और सूक्ष्मक्षेत्रफल ३९२६ मिला. इसको खात ५ से गुगनेसे समरवातका सूचीफल १२५ हुया. यह वातका स्थूलफल वेधः हुआ और सूची फल भी स्थूलही २७५० मिला. यहां रथात व्यपहार व्यास समाप्त हुआ. . २०५० 1 + रके कहते हैं। अथ चितिव्यवहार। अव चिति अर्थात् चिनाईके व्यवहारमे करणसूत्रको डेढ उंदा- चितीकरणसूत्रसाईहत्तम् । उच्छ्येणगुणितं चितेःफिलक्षेत्रसंभवफल धनंभवत् । इटिका घनहते घनचितेरिष्टिकापरिमितिश्चलभ्यते॥ ॥१२३॥ इष्टकोच्छ्यहदुच्छितिश्चितेस्युस्तरा- वहषदां चितेरपि। अर्थ:-चिनाईके क्षेत्रफलको चिनाईकी उचाईसें गुणनेसें धन- फलहोताहै. ऐसे इष्टके लंवाय चौड़ायके घातके इष्टकी उंचाई से गुएनेसें, घनफल होता है. और पिनाक । - (१९६ लीलावती. लका भागद्वेनेसें इटोंका प्रमाण मिलताहै. ॥१२३ ।। और चिनाई. की उंचाईमैं इष्टोंकी उंचाईका भाग देनेसें तरोंकी संख्या होतीहै. ऐ- सेही परस्परोंकी जाननी योग्यहै... अवउदाहरण कहते हैं। अष्टादशांगुलदैयविस्तारोहादशागुलः ।। उच्छितिरूयंयुलायस्यामिटिकास्ताश्चितौकिल। १०॥ यद्विवत्ति: पंचकराधहस्तं दैर्घ्यचयंस्यांत्रि- करोच्छितिश्च ॥ तस्यचितौफिलमिष्टिकानां संरख्याचेकाहि कतिस्तराम ॥ ११ ॥ न्यासः इष्टिकाचितिः इष्टिकायाः घनहतमान र चिते: क्षेत्रसमफलं १० उच्छ्रयेण गणितं चितेर्धनफल २० लब्धा२५६ इटिकासंख्यास्तरसंख्या: २४ एवं पाषाणचपैडपि. इतिचितिव्यक अर्थ:- जिस चिनाईमें इष्ट अठारह अंगुल लंची, बारहाय- गुल चौडी, और तीन अंगुसऊंची है. ऐसी चिनाई अर्थात् चौंतरेमें ३. ॥१०॥ लंचाईट हाथ, चौड़ाई ५ हाथ, और उंचाईहाथ है. तौउ- सच्चोंत्तरेमें डटोंकी संख्या कहो. और तरे कहोः॥११॥ यहांचौंतरेका घनफल ३०मि- ला.इसमें इशेके घनफल ३ का भाग वेनें सेंइयों का मानः१५६ मिला. और तरेकी उंचाई मैं इधोंकी उंचाई का भाग देनेसें तरों- की संरच्या २४ मिली. यहां-चिंतिव्यवहार समाप्त हुआ. - ककरचवहार अथककचव्यवहार अप ऋकच अर्थात् लकडीके चीरनेके व्यवहारमें करण- त्रको एक छंदकरके कहते हैं: अथक्रकचव्यवहारेकरणसूत्रवृत्तम्। पिंडयो- गदलमग्रमूलयोसंगुणिनमंगलात्मकम्॥ १२४ ॥ दारुदारणपथैः समाहृतंषट्स्रेषु विहृतंकरात्मकम् ॥ अर्थ: लकडीका अग्रभाग यौर मूलकी मुलाईका योग उसके आधेको लकडीकी लंबाई करके गुणा करनेसें अंगुला- त्सक अर्थात् अंगुलोंका प्रमाण होता है. ।।१३४ ॥ फिरइसी अंगुलात्मकको काठकी चिराईके भागोंसें गुएारै फिर इसमें ५७६का भाग देनेसें करात्मक अर्थात् हाथोंका मान मिलता है. यह चिरनेवालेको वेतन देने के लिये है। अब उदाहरण कहते हैं:- मूलेनखांगुलमित्तोऽथनृपांगुलोग्रेपिंडः शता- गुलमितकिलयस्यदैर्घ्यम् ॥ तारुदारणपये पुचतुर्पकिंस्याहस्तात्मकंवदसरे गणितं द्रुतं म।। १०२ ॥ ५ न्यासः- पिंडयोगलं १८ देर्येण १०० संगुणितं.. दारुदारणपथै ४ गुणितं ७३३ पट्वरेषु ५७६ पितंजातं क- रात्मकं गणितम् १५ अर्थ:- जिस लेकडीके मूल में वीस अंगुल्मुगई है. और लंचाचमें सो अंगुल है. उस लकडीके चीरनेके जो नार मार्ग उन्होंमें हस्सात्मक फल क्या होगा ? सो तुम जल्दी महो।१०२॥ - ई राशिव्यवहार. (C) 'मा ४६०८ घट्तरेषु ५७६ विहृतं जातंफलं हस्ताः ८ अर्थ:- जिसकामे चौडाई ३२ अंगुल है. और मुगाई. सोलह दोनो तर्फसें है. उसको तिरछा करके नो जगहसें चिरा तो उसका हस्तात्मक फल क्या होता है सो कहो. ॥१०३ ।। न्यास- यहां मुठाई १६को चौडा ई ३२से गुणा तो ५२ हुवे इसके चिराईकी सरख्या से गुपनेसें १५ ४६०८ इसमे ५७६ का भागदि यातो चीराईका हस्तात्मक फल मिला, इतिक्रकचव्यवहारः अथराशिव्यवहारः। अब राशियोके व्यवहारमे करणसूचको एक छंदकरके कहा- अयराशिव्यवहारे करण सूत्रवृत्तं ॥ अनणुपु दशमांशोऽणुस्तयैकादशांशः परिधि नवमभागः भूकधान्येषुवेधः ॥ भवतिपरिधिषष्ठेवर्गिवेध निधनगणितकराः स्युर्मागधास्तावखार्य:१२७ अर्थ- मोटे धान्यकी राशि परिधीका दशमा अंश वेध अर्थात् टेरीकी उंचाई होती है. छोटे धान्यकी राशिमे परिधि- का ग्यारहमा भाग वेध होता है और शूक अर्थात् यवके स- मान लंबे धान्यकी राशिमे परिधिका नश्मां भाग ध होताहै. परिधिका उठा अशके वर्गको वेधसें गुपादिया तो पनहस्ता- मक फल होताहो. उसीको मनधदेशमे चारी बोलते हैं ।।१२७ अब उदाहरण कहते हैं:- समभुविकिपराशियः स्थितः स्थूलधान्यः परिधि- - (२००) लीलापत्ती. परिमितिः स्याद्वस्तषष्टिर्यदीया ।। प्रवदगणक! रवार्य किंमिताःसंतितस्मिन्नथपृथगणुधान्य श्रूकधान्यैश्चशीघ्रम् ॥ १०४ ॥ अर्थ- हे गएक! जिससमानभूमिमें मोटे धान्यों की छोटे धान्योंकी राशि और भूकधान्योकी राशि इन सबोंकी प- रिधिका प्रमाण ६० है तो उनराशियों में कितनी स्वारियोंका मानहै सो तुम कहो ॥ १०४ ॥ अथ स्थूलधान्यराशिमानावबोधनाय न्यासः- परिधिः ६. वेधः ६ परिधेः षष्टांशः १० वर्गित १०० वेध ६ निभा लब्धाः खाये: ६.. अर्थ- मोटे धान्योंकी राशीके मान जाननेके अर्थ न्यास-मोटेधान्यकी परिधि ६. इसका दशमांश६ वेधहै.प. न्यास. रिधि६० कोमष्ठांश के वर्ग १ कोप- 'रिधि ६ सें गुपादिया तो ६०० रवारि- योंकी संख्या मिली. अथाऽणुधान्यराशिमानानयनाय न्यासः-परिधिः ५० वेधः ६. जातंफलं ५४५१. अर्थ:- अब छोरे धान्योंकी राशियोंका मान जाननेके अर्थ यहां छोटे धान्यकी राशि है. इसका सो परिधि को१मा भाग ३ वेधहै.परिधिके ६० पष्ठांश के वर्ग१०.को वेधसें गुपादियानो ६..हुचे. इसमें न्य अपने हर का भाग दिया तो पनहत्तात्मक फल ५४५ में मिला. 0 राशिव्यपहारः N । न्यास ६०. अथ शूकधान्यराशिमानानयनायन्यासः परिधिः ६ वेधः ३ अर्थ- अब भूकधान्यकी राशिके मानके अर्थ न्यासहै- यहां शूकधान्यकी राशिमें परिधि ६०का न- बमाभाग वेधहै. इन्होंमें ३ काभाग दियालो हुवे. इसमें परिधि ६० के घष्ठांशको गुपानेसें २१ हुवे. इसमें पने हरफा भाग देनेसे पनहस्तात्मक फ० ६६५३ मिला. अव जोराशिभीतसें लगा होगा, भीतरके कोमें होया वहीं फोसिला हो इन्होंका मान लानेके अर्थ करणसूत्रको एफ - उदकरके कहते हैं। अथभियंताधकोणसंलमराशिप्रमाणाऽऽन- । यनायकरणसूत्रचत्तं ॥ दिवेदसत्रिभागेकानिमा- तुपरिधेः फलम् ॥ भित्यंतर्वाद्यकोणस्य राशेः स्व- गुणभाजितम् ॥ १२८ ॥ अर्थ- भीतसें लगीहुई राशिफी: परिधीको दूना करै. कोणके राशिकी परिधीको तीसरे भाग करके युक्त एक से गु- • से जो अंक हो उसको परिधि मान.फिर इन्होंकाजुदाजुदा ७२ क्रियासें फल लावै. फिर अपने अपने फलोंमें अपने उपका भाग जुदाजुदा धनहस्तात्मक फल होता है।।१२८॥ अवउदाहरण कहतेहैं:- परिधिमितिलनस्थ राशेस्त्रिंशकरः सखे ! ॥ अंतःकोणस्थितस्याऽपितिथितुल्यःकरस सरय।।१०५ (२०४ लीलावती. हस्तात्मकफल जूदाजूदा ३३३ ३ १६६३ इतिराशिव्यवहारःस. ५०० मिला. अथ छायाव्यवहार अब छायाव्यवहारमेंकरणसूत्रको एक छदकरके कहते हैं- अयछायाव्यवहारेकरणसूत्रंचत्तं छाययोः कर्णयो रन्तरेयेतयोर्वर्गविश्लेषभक्तारसाद्रीपवः॥ सैकलव्यः पदभंतुकतिरं भान्तरेणोनयुक्तंदलेस्तःप्रभ।२९ अर्थ- दोनो छायोका जो अतर है उसके वर्ग और दोनो कौन का जो अंतर है। उसके पाइन्होके अंतरका पानसे छहत्तरमै भा गलेनेसें जो अक हो उसमें एक युतकरै. फिर उसके मूलसें कौन अंतर गुणाकर जो अंक हो उसको छायासें एकस्थानमें ऊन और एक स्थानमें युतकरैः फिर उसका आधा करनेसें दोनो छायाका प्रमाण होताहै ॥२९॥ अर उदाहरण कहते हैं- नंदुचन्द्रमितं छाययोरंतरंकर्णयोरंतरंविश्यतुल्यं ययोः ॥ तेप्रभेवत्तियोयुक्तिमान्येत्त्यसोव्यक्तम- व्यक्तयुक्तहिमन्येऽखिलम् ॥ १०७ ॥ न्यास:- छायांतर कर्णातर १३ अनयोर्चस्तरेण६३ भक्तारसाद्रीषवः ५७६लब्ध ३ सैकस्यास्प४ मूलं २ अनेन राणि तंकर्णान्तरं२५ हिस्थ२५ भान्तरेण १९उनयुते ७-४५ तदई लब्धेलाये ५५५ तत्रुत्योयोगपदामित्यादिनाजानीकर्णी ३५ ५. अर्थ- जिन छायायोके अतरका प्रमाण है. और निकों के अंतरका प्रमाण है.जो युक्तिवाला पुरुषउन- - - ३ २ (२०६० लीलावती. प्रभा स्यास्कियतीवदास ॥१०८॥ न्यासः- शंकुः । प्रदीपशंकुतलांतरं ३ अनयोर्यातः 'विनरदीपशिरयौमेन ३ भक्तो लब्धानि छायांगुलानि १२ अर्थः- जिस समभूमिमें शंकु और दीपकके अंतरकी भू मि ३ हाथ है. और दीपककी उचाई साढेतीन हाथहै. तौ१२ । अंगुलके शंकुकी छाया कितना होगी? सो तुमजल्दी कहो ॥ शंकु १०८ ॥ शंकु को दी५. तलेकी भूमि इन्होंके अंतर छाया३ सेंयपातोहवे. इसमें शंकु और दीपककी उंचाई ५ इन्होंके अंतर ३ का भाग देनेसें शंकु की छायाका मान मिला. अब दीपककी उंचाईके जानने के अर्य करणसूत्रको छन्द करकै कहते हैं:- व्यास (३.८) लीलावती. मिली. छाया और दीपक की भूमिमें दीपककी उंचाई जानने के र्थ करणसूत्रको डेढ छंदकरके कहते हैं- छायामदीपांतर दीपोच्मानयनायकरणसूत्रंसा- ईवृत्तम् ॥ छायांतयोरन्तरसंगुणा भाछायाप्रमा. णान्तरहृद्भवेद्भूः ॥ १३१॥ भूशंकुधानः प्रभया विभक्तः प्रजायते दीपशिरवौच्यमेवम् ॥ त्रैराशि- केनैवयदेतदुक्तं व्याप्तस्वमेदै हरिणेचविश्वम्।। १३२॥ अर्थ:- छायाको दोनोंछायोंके अग्रभागोंके अंतरसें गुगा; करे. उसमें दोनों छायोंके अंतरफा भाग देनेसेंजोहा यह मिका मानहै. ॥१३१ ॥ भूमि और शंकु इन्होंके घातमें छाया- का भाग देनेसें दीपककी उंचाई होती है. और जैसे विष्णुकरकै संपूर्ण जगत् व्याप्त है. तैसेही संपूर्ण जो कहाहै यह ना रके व्याप्त होता है. ॥ १३ ॥ अप उदाहरण कहते हैं- शंकोर्किमितांगुलस्य समतेदृष्टाकिलाउदांगुला छायायाभिमुरकरयामतेन्यत्तस्यदेशेपुनः । तस्यैवामितांगुलायदिनदाहायाग्दीपांतरं दीपोन्यंचकियइदव्यपहनिंछायाभिधांवेसिनेत्। न्यास- अनायायपोरंतरमंगुलालकं ५१ छायेद नपीसा इयमनेन गित्ता १६ छायाप्रमाणांतरेण भक्ताल संभूमानं इदं भयम सायानीपतलयोरंतरमित्यर्थः ॥ एवं हि. तीयसापामांतरभूमानं५५ भूसंकुपातः प्रभयापिभक्त इतिजात. भयतोऽपिपञ्चसममेव इस्लाः ६६ नि या | १२ के अंतर ४ काभाग देनेसे अपनी अपनी छायाओंके अथ छायाव्यपहारः (२९ राशिककल्पनया नयनं वर्नने तद्यथा प्रयमच्छायातो द्वितीया १२ यावत्ताधिका तावताछाचान्चयेन यदि छायागांतरतुल्या भूल- क्ष्यिते तदाछायया फिमिति एवं पृथक्पृथक् छायाप्रदीपतलांतरण 'गाणं लभ्यते. ततो द्वितीयं त्रैराशिकं यदिचायातुल्ये भुजेशंकु: कोटिला भूतुल्ये भुजे किमितिलब्धं दीपकौच्यमुभवतोऽपितु ल्यमेव एवंपंचराशिकादिकमरिचलं त्रैराशिककल्समयैव सिद्धं - | यथा भगवता श्रीनारायणेनजननमरणकैशापहारिणा निखिल जगज्जननैकवीजेन सकलभुवनभावनागिरिसरित्सुरनरसासुरा दिभिः स्वभेदेरिदंजगद्यात तधेदनरिवलं गणितजातं त्रैराशि- | केनव्याप्तं यद्येवंतहहुभिःकिमित्याशंक्याह -- यत्किंचिटुणभागहारविधिनाचीजेत्रवागण्यते तत्रैराशिकमेवनिर्मलधियामेवावगम्यंविदाम् ॥ एतयबहुधाऽस्मदादिजडधीधीवृद्धिबुद्ध्याबूधै- स्त दान्सगमान्विधायरचितंप्रोजै प्रकीर्णादिकं १ इति भास्कराचार्यविरचितायां लीलावत्यां जायाव्यवहारः समाप्तः अर्थ- उदाहरणकहतेहैं:- हे सुमते! अर्थात् सुदरबुद्धिवा ली ! वारह अंगुलके शंकूकी छाया मैने आठ अंगुल देवी. फिर |सी वारह अंगुलके शंकुकी छाया दो हाथके मानवालो न्यासके दे- शमें बारह अंगुस देरवी. जो तुमछायाको जानते हो दीपकका अं. तर और दीपककी उंचाईको कहो ॥११० ॥ दोनो छायायोके अग्रके अंतरकी भूमि ५२ सें दोनो डाया- ओ८११२ को गुणा तो ४१६ । ६३५ हुचे. इन्होंमें दोनो छायों। भागसें दीपक पर्यंत भूमिका मान १०५1१५६ मिला

(२१२)
लीलावती.
न्यासः- भाज्या २२१ हार. १६५ क्षेपः ६५ अत्रपरस्परभा
जितयोर्भाज्य २२१ भाजकयोः १९५ शेष १३ अमेन भाज्यहारशे-
पा: अपपर्तिताजातोभाज्य, १७
हारः १५ क्षेप: ५ अनयोद
भाज्यहारयो परस्परभन्तयो लब्धान्यधोऽधत्तदध शून्यं निवेश्य
मिति जातावल्ली ३ उपातिमेन स्पाइनेइत्यादिकरणेनजातं राशि |
इयं ५ एतौ उभाज्यहाराभ्यां तष्टौलब्धिगुणोजाती ६-५
इष्टाहत स्वस्वहरेणयुक्तइति वक्ष्यमाणविधिनैताविष्टगुणितस्वन
क्षणयुक्तौबालब्धिगुणौ २३ -२० दिकेनेप्टेनया ४०-४५ इत्यादिः
अर्थ:- दोसोझीसको किसी अंक करके गुणाकरै.फिर
उसमे ६५युत करनेसेंजो अंक हो वह एकसो पचासका भाग -
नेसें शुद्ध होतो उन २२१ का गुराक क्या होगा सो तुम कहो।।
न्यास-भाज्य २२१ हार१५ क्षेपक ६५ भाज्य२२१में भा
जक १६५ में भाग देनेसे शेष १३ रहे. उसका पहले शेष मेंभा||

(२१३) कुट्टकच्यवहार प्रभमे गुणही पूछाया. मसगसें लधिभी मिलती है तब्धीके निच- यके अर्थ न्यास भाज्य २२१ को ५ से गुणातो.१०५ हुवे. इसमें क्षेपक ६५को युत किया तो ११७० हये. इसमें हर१९५का भाग देनेसें लब्धि ६मिली. आगे जोरीत कहेंगे, उत्सरीतिसे अनेक प्रकारके लब्धि गुण मिलते हैं. जैसें । इट मानकर दृढभाज्य १७ और दृढ हर १५ इन्होंको एकसें गुणाफर भाज्यमें को और दृष्ट हरमें ५ कोयु- करनेसें लब्धीगुणा ३३।२० हुवे.दो इष्ट माना तो लब्धीगुण ४०३५ मिले. तीन माना तो ५७५० हुये. चार माना तो ७४६५ हुवे. ऐसे इष्ट के कारण बहुत होतेहैं. अन्यकुट्टक में करणसूत्रको एक छंदकरके कहते हैं:- कुट्टकांउत्तरेकरणसूत्रवृत्तम् ॥ भवतिक्कट्टवि- धेयुतिभाज्ययोः समपवर्तितयोरपिवागुणः । भवतियोयुतिभाजकयोःपुनः सचभवेदपवर्तन- संगुणः॥ १३८ ।। अर्थः- कुट्टककी विधिमें क्षेपक और भाज्यमें समान अंकका अपवर्तन देने से गुण होता है. फिर क्षेपक और हमे समानक- का अपवर्तन देकै जोगुणा मिलै. उसको अपवर्तन करकै गुणनेसें गुण होता है ।। १३८॥ अब उदाहरण कहते हैं:- शतंहतं येनयुतनवत्या विचर्जितंवाविहतंत्रिषष्ट्या ॥ निरयकं स्याइदमे गुणंतं स्पष्टंपटीयान्यदि कुट्टके ऽसि ॥ ११२ ॥ न्यास - भाज्य. १००हार. ३ क्षेप.

(२१४ । लीलावती. . उपातिमेस्वाईहते ऽन्त्येनयुत इत्यादिकरणेन जातं मातापूर्ववल्लधि) क्षेपाणांवल्ली राशियं ३४३० जातोपूर्वपल्लब्धि गुणौ ३०.६. अथवाभाज्यक्षेपो दशभिरपपरीभाज्य: १० क्षेपर परस्परभज माल्लब्धानिफलानिक्षेपं शून्यंचाधोऽ धो निवेश्य जाता- : पूर्ववल्लब्धो गुणः ४५ अत्रलब्धिर्न ग्राह्या य- वल्ली. तो लब्धयो विषमाजाताः अतो गुणे ४५ स्वतः क्षणादत्मा ६३ दिशाधिते जातोगुणः सएव १८ गुणानभाज्ये क्षेप ई. युते हर ६३ तष्टे लब्धिश्व३० अथवाहारक्षेपौ ६३- २० नवभिरप चर्तितौजाती हारोपौ - १० अत्रलब्धिः १४ लब्धो गुणः २ क्षेपहारापवर्तन र गुणितो क्षेपाणावल्ली जातः सएवं गुणः १८ भाज्य १०० भाज कक्षेपेभ्यो लब्धिश्य३० अथवाभाज्यक्षेपी पुनरिक्षेपोचापपति- तो आता भाज्यहारौ १० -७ अत्रपूर्ववज्जातार ३ गुणच २ हारक्षेपापवर्तनेन गुणितोजातः वल्ली : सएवगुणः १८ पूर्ववल्लब्धिश्व'३० इष्टाहत सस्वहरेगयुक्तइत्यादिनाऊ यथा गुणसन्धी ८५११३० अर्थ- किसी अंककरके सोको गुपदेते हैं. उसमें कोयुत या हीन करदेतेहैं. और उसमें ६३ का भाग देनेसें निःशेष होताहै. जो तुम कुट्टमें कुशल होतो उसगुणको कहो.॥१२॥ न्यास- भाज्य१०० हर ६३ क्षेपक ए. पहले कीनाई क्रियाकरने- में वल्ली हुई बल्ली, और यह समानवल्ली है. यहां उपांत्यके अंकसें ३ अंकको नुपा करैः फिरउसमें अपने नीचे के अंग फको युत करै. ऐसेई जहांतक अंक हो, वहांतक करै. यह क्रिया . क्षेपः १. 1 अपने उपरले (२१५) P | हो उन्होमें अपने अपने हरको युत करनेसें गुणलब्धि होते हैं। इस कुट्टक व्यवहारः। .' कह आयेहै. ऐसे करनेसे सबसे ऊपरके अंक ये ३५३: मिले. इन्होंको अपने अपने सक्षको १००।६३ सें नष्ट करनेसेंलब्धी और गुण ३०११८ मिले. अथवा भाज्या.. और क्षेपकर इन्होंमें १० काम पवर्तन देनेसें राशि हुई. भाज्य५० हर ६३ क्षेपक र यहां भी पइलेकी तरह बल्ली ई यह क्रिया करनेसें सबसे ऊपरके अंक मिले. इन्होंको अपने अपने तक्षको १०१ ५३ सें नष्ट करनेसेंटर है. ये विषमचल्ली है. इसवास्तै इन्होंको अपने अपनें तक्षको १० ६३ में हीन करनेसे २ रहे. इन्होंमें गुणतो शुद्ध है. लब्धी जानने- की रीति भाज्यको गुणसें गुणा करनेमें जो अंक हो, उसमे क्षेपका कोयुत्त कर हर करके तय करनेसें लब्धि मिलती है. ऐसा किया. तो लब्धि ३० मिली. अयवाहर ५३ और क्षेपक ६० इन्होमें का अपवर्तनदेनेंसें न्यास भाज्य १०० हार ७ क्षेपक १० पहलेकी तरह व. |ल्ली ३ हुई. पहली क्रिया करनेसें सबसे ऊपरके अंक-३० हुवे. इ. हों-को अपने अपने तक्षक ०.१७ सें तष्टात्तो लब्धी और गुण मिले. यहां हार और क्षेपकमेंका अपवर्तन दिया तो इस- वास्ते २ को अपवर्तन अंक से गुणनेसें धनक्षेपका गुण १८ मिला, अथवा भाज्य १०० और क्षेपक ६० इन्होंमें १० का अपवर्तन दि. या. फिर हार ६३ और क्षेपक । इन्ड्रोमें एका अपवर्तन दिया तो न्यास भाज्य १० हार७ क्षेपक १ इन्होंकी बल्ली पहली किया क. | रनेसे ऊपरके अंक ३ हुवे. यहां दो अंको से अपवर्तन दिया है. इसवास्तै ३ को अपवर्तन अंक १० सें गुणादिया तो लब्धि३० मिली | फिर को दूसरा अपवर्तन अंक 4 से गुणदियातो गुण१८ मिला. अथवा इससे लब्धि और गुण इन्होंको गुणा करनेसें जो अंक (२६६० लीलावती. त F टकी गुलाध्धि ८१ -१३० दो इष्टकी गुएलब्धि १४४ १२३० मि-) ले. ऐसे इष्टसें अनेक प्रकार की होती है । अन्य कुट्टकमें करणसूत्रको आधा छंदसें कहते हैं- कुट्टकांतरेकरणसूत्ररत्ताईम् । क्षेपणेतक्षणा- छुइ गुणाप्तीस्तो वियोगजे॥ अर्थः- धनक्षेपकी गुपालब्धीको अपने अपनें तक्षको घटा- | नेसें ऋपाक्षेपमें गुण और लधि होती है. अत्रपूर्वोदाहरणे- नयतिक्षेपजौ लब्धियणी जातौ ३०१८ एतौ स्वतक्षणाभ्यामाभ्यां १०० -६३शोधिती ये शेषके तमिती लब्धिगुणौ नतिशोधिले ज्ञातव्यो ७.१४५ एलयोरपि स्वतक्षणक्षेप- इतिया १७०११०८ अथवा २७०।१७१. अर्थः जो पहले उदाहरणमें धनक्षेपके लब्धि और गुण ३० १८ हुचे. इन्होको अपने अपनें तक्षको,१००.६३ में घटाया तो लन धि गुण ७०१४५ मिले इन्होको अपने अपने तक्षको १००। ६३ में युक्त किया तो १७.. १०८ हुवे. दो इष्ट मानातो २७०-२७१ हुये दूसराउदाहरण कहते हैं- यद्गुणागणक पष्टिन्नितारर्जिताचदशभिः षडु ५ तरैः ॥,स्यात्रयोदशहतानिअग्रका तद्गुणं कययमे पृथक्पृथक् ॥११३॥ न्यास:- भाज्यः ६० हारः३क्षेपः १६. ४ पाकळाले गुणाप्ती २-८ अगाऽपि प्राग्वज्जातावल्ली. लब्धयो विषमा अतो गुणाप्ती स्वतमन णाया३शोधितेजाते ११५१एवंपोड शोपेएताएवलब्धिगुणो५२- स्वहाराभ्यांशोधितौजातोपोडशविशुद्धौ३-८ (१७) * कुदकच्यवहार। अर्थ- हे गणक! जिस अंकको ६०से गुपादेते उसमें सो लहकोयुत या हीन करदेते हैं फिर उसमें १३ का भाग देनेसे वह अक निःशेप होता है. उस गुणकको मेरेसे अलग अलग करकै कर हो । ११३।। न्यास- भाज्य ६० हार १३ क्षेप १६ इन अकोंसे पहलेकी तरह वल्ली यहा पहली क्रिया करनेसे सबसे ऊपरका अंक ३६ मिला. इन्होंको अपने अपने लक्षको ६० -१३ से नष्ट किया तो २-८ हुवे. यह ऋणकी गुपालदी है. यहां भी सब्धि विषम है. इ- सवात्तै इन्होंको अपने अपने तनों३- ५०मैं शोधनेसे गुएल- धि ११-५२मिली. यह क्षेपककी गुणलाध है. अन्य कुट्टकमे करणसूत्रको डेढ छंदसे कहते हैं- कुट्टकांतरेकरणसूत्रसाईयत्तम् ॥ गुणलब्ध्योः समयाह्यं धीमतालक्षणे फलम् ॥ १३९॥ हर- तष्टेधनक्षेपेगुणलब्धीतुपूर्ववतू । क्षेपत्तक्षण लाभाट्या लब्धिःशुद्धौतुचर्जिता ॥ १४ ॥ अर्थ:- तक्षणमें बुष्ट्विाला मनुष्यने गुण और लब्धीका फ- ल समान ग्रहण करना योन्यहै ॥ १३६ ।। धन क्षेपकको हरफर- के लए करनेसे पहलेकी तरह गुणा और लब्धि होनी है. क्षेपक और तक्षणके लाभसे युत जो लब्धि गुण है वह क्षेपकसे उत्स- न होनेवाला है और शुहिमें हीन करनेसें दिसे उत्पन्न हो- नेवाली गुपलब्धि होती है. ॥ ११ ॥ | अब उदाहरण कहतेहैं- येन संगुणिताःपंच त्रयोविंशतिसंयुताः ॥ चर्जितायाधिभिर्भक्तानिरमाः स्थु सकोगुणः ॥ १४ ॥ 31 (२१८० लीलावती न्यासभाज्या ५ हारः ३ क्षेपः २३ अत्रवल्ली पूर्ववज्जातंराशिद्वयं एतौ भाज्यहारा- २३ भ्यांतोतंत्राधाराशी २३ विभिस्तष्टे सप्त लभ्यते उर्वराशौ४६ पंचभिस्तष्टे नपलभ्यते तत्र नव न ग्रायाः- पलब्ध्योः समंग्राह्यं धीमता तक्षणे फलमिति अतः सप्तैवं ग्राह्याः एवं जाते गुणाप्ती २।११ क्षेपजेतक्षणाच्छुड़े इतित्रयोविंशतिशुद्धौ जाता विपरीतशोधनांदवशिष्टालब्धि शुद्धौ जाने १-६ - इष्टाहत स्वसहरेणयुक्ते तेवो भवेतांबहुधागुणाप्ती धनर्णयोरंतरमेश्यो गः इतिथथाच ट्यालब्धी 'स्यालामिनिजाते गुणासी ७-४ इतिगुन णित्तों स्वस्वहारक्षेपोच यथाधनलपिःस्वादिनिजाते-४ एवं सर्वत्र अथवा हततष्टेपनक्षेपेइति न्यासः भाज्यः ५ हार ३क्षेपः२ पूर्व- चज्जातेगुएाप्ती २-४ एतेस्वहाराभ्यां विशोधिते सुईजाते .. एषालब्धिः क्षेपतक्षणलाभेन हीनाजाता पियोगजालब्धिः६ क्षेपत्तक्षणलाभाड्यालब्धिरितिक्षेपत्तक्षणलाभेन युक्तालब्धिका- जातीक्षेपजौ लब्धिगुणो १२-२ शुद्धौतुबर्जितेनिजाते शुदि- 0१-६ अत्रशुद्धोन भवति तस्मादिपरीतशोधनेन ऋणलब्धिः गुपाः १ धनलब्ध्यर्थे द्दिगुणवहार क्षेपैःक्षिसति जाते ७.४. अर्थ- जिस अंकको ५ सें गुपदेने है.२३ युत या हीन करदेते हैं। और उसमें तीनका भाग देनेसें निशेष होताहै. तो उस गुपकको का हो. ॥१४॥ : भाज्य ५ हर क्षेपक २३ पहलेकी तरह वल्ली हुई.? पहलेकी तरह किया करनेसें दो राशि हुई. इन्होंको भाज्य और हरसेतन टकरै. यहां नीचेकी राशिको ३ सें तर करनेसे ७ मिलने है और परकीराशिको ५ से तष्ट करनेसें र मिलते है. यहां नव ग्रहण नहीं, .

कुट्टकच्यवहारः (२१९) कर. यहां गुण और लब्धी समान ग्रहण करनीयोन्यहै.इसवास्तै य- RI HIT; सात गुणे अपने अपने तक्षको हीन करनेसें गुणा और अपि ॥११ हुई. परंतु येलधिधनक्षेपकफी है. इसवारने इन्होंको अपने तक्षकमें ऊन करनेसे ११६ गुणा और लब्धि हुई. यहां उलय शोधन किया है. इसवास्ते लब्धि ऋण है. इसको धनकरनेकेवासे इष्ट २ सें गुणेहुये अपने अपने तसफ, ६-१० को पहलेकी गुपाल- धि१६में युत्त करना योग्य है. धन और प्राणका अंतरही योग्य इ. इसलिये लब्धि ऋण है. इसमें १० युक्त किया तो ४ हवे.२से गुणा किये तक्षक ६ को गुणा में युत करनेसें । हुवे. ऐसा करने- सें गए और लमिया मिली. ऐसे सारे जाननी आहिये. अब बारइसे क्षेपकको तष्ट करकै न्यासभाज्य ५ हर ३ क्षेपक २ इस- कीवल्ली के यहां पड्लेकीनाई किया करनेसें गुण और लब्धि मिली इन्होंको अपने अपने हरमें घटा दिया तो विभुद्धिजऋणक्षेपक- की सुपालब्धी १।१ हुई. इन्होको क्षेपक और लक्षण इन्होका लाभकरके युत करने से क्षेपककी उपलब्धि २१११ हुई. ऋणमें ऊन करनेसें ऋणको गुणलब्धि होती है. परंतु यहा ऋण नहीं है इसवास्तै उलाशोधनेसें गुपलब्धि ॥६ मिली. धनकी लब्धीका वास्तै इन्होंको दो गुने अपने अपने हर ६।१० मे युत्त करनेसेंध. नक्षेपकी गुगलब्धि ७१४ मिली. अभ्याट कमेकरण सूत्रको एक छंदकरके कहते हैं- कुट्टकांतरे करणसूत्रवृत्तं ॥ क्षेपाभावोऽथवायत्र क्षेपः शुद्ध्येहरोतः ।। ज्ञेयः शून्यंगुणस्तव पोहारहतः फलम् ॥ १४१ ॥ अर्थः जिस कुट्टकमें क्षेपकका तो अभाव है और हरक- .

लीलाचती रके भाग दिया तो क्षेपक शुद्ध होता है उस कुट्टकमे गुण शून्य जानना और क्षेपकमे हारका भाग देनेसे फल होता है। अब उदाहरण कहते है- येन पंचगुणित्ताः खसंयुताःपचषष्टिसहिताश्न तेऽथवा ॥ स्युस्त्रयोदश १३ हत्तानिरसको स्तंगु- ण गएक कीलया मे ॥ ११५ न्यास भाज्यः ५ हार १३ क्षेप ज्ञेय शून्यगुणस्तरक्षे- पोहार फलमिति क्षेपाभावे गुणाप्ती । इष्टाहतइति अ- थवा १३ - ५ या २६-१० न्यास - भाज्य ५ हार १३ क्षेप ६५ क्षेप शुधेडोहत. ज्ञेयः शून्यगुणस्तत्रक्षेपो हारहत फलमितिजाते गुणाप्ती ०१५ वा १३.१० अथवा २६-१५ इत्यादि अर्थ- जिस अकको ५से गुपादेते है. और उसमे १३ का भाग देने से नि.शेष होता है, तो हेगणक ! उसगुणको शी- प्र मेरेकू कहो ॥१५॥ न्यास- भाज्य५ हर १३ क्षेप. यहा क्षेपकमे हर १३ का भाग देनेसें फल होताहै. यहा क्षेपकका अभाव है. इसपाल गुण और लब्धि ०० मिली. १ इष्ट मानकर गुणवधि १३१५ अथवा २ इष्ट मानकर गुणलब्धि २६११० मिली अथ- वान्यासभान्य ५ हर १३ क्षेपक ६५ क्षेपकमे हरका भाग दे- नेसें गुण ८ शून्य होता है. और क्षेपक ६५मे हर १३ काभाग। देनेसे ५ लब्धि मिली. ऐसा करनेसे गुण और लब्धि ५ मिली. इट १ मानकर गुएलब्धि १३॥ अथवा २ इष्टसें गुणलब्धि२५- मिली.ऐसे और भी सर्वत्र जाननी (२२१) कुट्टकव्यवहार अब सबकुट्टकोंमें अनेक प्रकारके गुपालब्धि दिखाने के अर्थ करणसूत्रको आधा छंद करके कहते हैं:- अथसर्वत्रकुद्धके गुणलब्योरनेकधादर्शनार्यकर- णसूत्रवृत्ताईम् ॥ इष्टाहनस्वस्वहरेणयुक्ततेचा भवेत्तां बहुधागुणाप्ती॥ अत्रोदाहरणानिदर्शितानि पूर्वमिति. अर्थः लब्धीयुएको इष्टसें गुणा कर. फिरउसमें अपनें अप- ने हरको युत करनेसें बहुत प्रकारकी गुपालब्धि होती है. इसके उदाहरण पहले दिखा चुके. अब स्थिरकुट्टकमैं करणसूत्रको एक छंदकरके कहते है. अयस्थिरकुट्टके करणसूत्रंदत्तम् । क्षेपेतुरूपे यदिवाविशुद्धेस्यातांकमायेगुणकारलब्धी ।। १४२ ।। अभीप्सितक्षेपविशखिनिसहास्तष्टे भवतस्तयोस्ते॥ अर्थ- जो क्षेपकको रूपमें शोधनेसे क्रमसें गुएलब्धि होती है. ॥१४२॥ उन्होको इष्ट क्षेपसे गुणा करै फिरउसः कोहरसे नष्ट करनेसे गुगलब्धी होती है. प्रथमोदाहरणे- दृढभाज्यहारयो रूपक्षेपयोन्यासः भाज्या १७ हारः१५ क्षेपः१५ अत्र गुणाप्ती ७-८ एतेविष्टक्षे- पेण पंचकेनगुणिते स्वहारतप्टेचजाते ५-६ अथरूपसद्धी गुणाती ४-७ तक्षणाच्छुद्धौ जातौलब्धिगुणी - एते पंच गणेस्वहारनष्टे चजाते १०-११ एवं षष्टिविरुद्धौ एवं सर्वत्र. अर्थ- पहले उदाहरणमे दृढभाज्यहार रूप क्षेपका न्यास भाज्य १७ हार १५ क्षेपक १ इनकी बल्ली से पहले कीनाई गुणा (२२३) लीलावती. लब्धि ७।८ इन्होंके इष्ट ५ दोयसें गुणदिया तो ३५ । ४ इन्होको अपने अपने हर १५:१७ से तष्टातो गुणलब्धि ५१६ मिली. धन- क्षेपकी ये है रूपमें शोधेहुये गुणलब्धि ८।७ इन्होंके अपनेअप ने तक्षो १७।१५में शोधनसें ऋणक्षेपकी गुणलब्धी ६ मिली, इन्होको ५ सें गुणा तो ४।५५ हुई. फिर इन्होंको अपने अपने त- क्षों१५।१५ सें तष्टातो गुणलब्धी १११११ मिली. इसरीति से सारै जाननी. अस्यग्रहगणितेउपयोगस्तदर्घ किंचिदुच्यते ॥ कल्प्याउथेशद्धिर्विकलावशेष पष्टिवभाज्यः कुदिनानिहारः ।। १४३॥ तज्जंफलं स्युर्विकला- गुणस्तुलिप्तायम स्माञ्चकलालबाग्रम् ॥ एवं नदुर्घच तथाधिमासाब मांगकाम्या दिवसारवी- न्होः ॥ १४४ ॥ इस कुट्टकका ग्रहगणितमें उपयोगहै उसीके अर्थ काय कहतेहैं- ग्रहकी विकलाके शेषसे ग्रह ऐसे जाननायोग्य है कि ६० को भाज्य और कल्पकु दिनोंको हर ।।१४३ ।। और विक- ला शेषको ऋणक्षेप मानकर कुट्टककी क्रिया करनेसेंजो लब्धी होवेयोविकला हुई. और गुण कला शेष फिरकलाशेष ऋणक्षे पभाज्य ६. हरकुदिन इन्होंसे जो लब्धि होवे सो कला है. गुणअंश शेष फिर अंशशेष ऋणक्षेप भाज्य ३० हरकुदिन इन्होंसें जो लब्धि होचे सोअंश हुवे ।। १४४ ॥ ग्रहस्यविकलावशेषेण ग्रहाम्हणयोरानयनं ॥ तद्यथा- नत्रषष्टि ज्यः कुदिनानिहारः। विकलावशेष श्रुद्धिरितिप्रक ल्प्य साध्ये गुणाप्ती तत्रलब्धिर्विकलाः स्युः गुणस्तु कलावशेष कुट्टकव्यवहार (२२३० एवं कलावशेषादिः तत्रपटिर्भाज्यः कुदिनानिहारः लब्धिः कला गुपोभागशेष भागशेषशादिः त्रिंश भाज्या कुदिनानिहार फलं भागाः गुणो राशिशेषम्. एवं राशिशेषशादिः हादशभाज्या कुदिनानिहारः फलं गतराशयः गुणोभशेपं. कल्पभगणोभा- ज्यः कुदिनानिहारः भगणशेष शद्धिः फलंगतभगणः गुणोड | इर्गणः स्यादिति. अस्योदाहरणानि धिप्रश्नाध्याये- एवंक- ल्याधिमासाः भाज्यः रविदिनानिहारः अधिमास शेपं शादिः फलंगताधिमासाः गुणो गत्तरविदिवसाः एवं युगायमानि भाज्यः चांद्रादिवसाहारः फलमशेष शादिः फलं गतापमानि गुणो गतचान्द्रदिवसाः इति ।। अर्थ- ग्रहके विकला दिशेषकरके ग्रह और अहर्गणका ग्रा. नयनहै. वह दिखाते हैं-तहां षष्टिभाव्यः, कुदिनानिहारः, वि- कलावशेषंशद्धिः ऐसी कल्पना करके साध्य रूपगुणाप्ती है. तहां लम्धि विकला है.- गणराशिशेष हुआ.ऐसे ही राशिशेष गुणक्षेप भाज्य- बारह हरकु दिन इन्होंसें जो लब्धि होवे सो गतराशि हुई. अन्य भगणशेष ऋणक्षेपमें कल्यभगण भा- ज्यहरकुदिन इन्होंसें जो लब्धि मिलै चे गतभगए. गुण अ. | इर्गा हुआ. ऐसेही कल्याधिमास भाज्य कल्य और दिन हर कल्य चांद्र दिन और भाज्य कल्यावयव इन्होंसें जो ल. ब्धि मिलै गत अवम और गुण गत चंद्र दिन हुचे. संश्लिष्ट अर्थात् मिलेहुये कुट्टकमें करणसूत्रको एक छंद करके कहने हैं संश्लिष्टकुट्टकेकरणसूत्रवृत्तम् । एकोहरश्चे- हुणको विभिन्मौतदागुणैस्पंपरिकल्पभाज्यम् । - (२२४) लीलावती. अत्रैक्यमयंकृतउक्त वद्यः संश्लिष्टसंशः स्फुर- कुट्टकोऽसौ ।। १४५ ॥ अर्थ:-जिस कुट्टकमें जो हर एक हो और गुण अनेक प्र- कारके हों, और गुपकके कारण शेष भी अनेक हों, तहांस पोंके योगको भाज्य कल्प करै. शेषोंके योगको ऋणक्षेप मानै फिर पहलेकी तरह क्रिया करै.यह सश्लिष्टनामवालाम कट कुट्टक कहा है ॥१४५॥ अव उदाहरण कहतेहैं: कापंचनिनोविहतस्विषष्ट्यासप्तावशेषोऽथसए- वराशिः ॥ द्वाहतः स्यादितत्रिषष्ट्याचतुर्दशा ग्रोचदाशिमेनम् ॥ ११६॥ अत्र गुरौक्यभाज्यः अवैक्यं शुदिर न्यासः भाज्या १५ हारः ६३ क्षेपः २१ पूर्ववज्जातोगुणः ७ फलं ५ एतीस्वतक्षणाभ्यां शो- धितो जातो वियोगजो लधिगुणौ ३-१४ इतिलीलापत्यांफुट्टका ध्यायः ॥ अर्य- किसी राशिको ५ सें 'गुण देते हैं. और ६३ का भागदेनेसे शेष रहतेहैं. और उसी राशिको १० सें गुपा देते हैं. सठका भाग देनेसे १४ शेषरहते हैं तो उसराशिको कहो ॥१५॥ यहां ५ -१० का योगा५ भाज्य है. और शेषों २१ क्षेपक है. न्यास भाज्य १५ हर ६३ क्षेपक २१ इन्होंमें ३ का अपवर्तन दिया तो दृढभाज्य'५ हार २१ क्षेपक हुवे. इन्होंकी प- इलेकी तरह किया करलेसें धनक्षेपकी गुणलब्धी १४-३ यहां लीलावती में कुट्टकाध्याय समाप्त हुआ. ७-४ का योग ४-३ मिली.

(२२५० अर्थः दो और आठको उलट पलटके रकूवा नो संरव्या- अंकपाशव्यवहार अब गणितपाशमें कहेहुये अंकोंकरकै संख्याक विभेदमें करणसूत्रको एक छंदकरके कहते हैं- अथ गणितपाशे निर्दिष्टांकःसंरव्यायाःविभेदे करणसूत्रंशत्तम् ॥ स्थानांतसेकादिचयांक- घातः संरच्याविभैदानियतैः स्युरकैः॥ भक्तोंड कमित्यांकसमासनिघ्नःस्थानेषुयुक्तो मितिसं- युतिः स्यात् ॥ १४६॥ अर्थ- स्थानोंका अंतपर्यन्त जितने अंक हों, उतनेही अं- कोंका एक आदिको वृद्धिसें अंतपर्वत जितने अंकोंका घात करनेसें नियत अंकोंके संरच्यावोंके भेद होते हैं. उन्होंके । कोके योग करके गुणा करनेसे जो अंक मिलै; उस अं- कके प्रमाएका भाग देवै फिर उसके एक एक स्थानवद्धिसें जित्तने अंकों के स्थान हो उत्तने स्थानीने युक्त करनेसे अंक- का योग होताहै. ॥१४६॥ अब उदाहरण कहते हैं। अत्रोद्देशकः :॥ हिकाष्टकाभ्यां विनवाष्टकै निरन्तर ह्यादि नवावसानैः ॥ संरब्याविभेदाः कति सम्भवन्ति तत्संरब्यकैक्यानि पृथग्वदाऽऽ शु ॥ ११७ ॥ न्यासः - २.८ अत्रस्थाने २ स्थानांतमेकादिचयाडौ १-२ चातः एवं जातौ संरब्याभेदौ २ अथवासएषघातकसमास १. निमः २० अंकमित्यानया ३ भक्तः १० स्थानइये युक्तो जातं संरव्यैक्यम् ११० m २ ( २२.६० लीलावती. वोंके भेद कितने होगे ? तीन, नव, आठ इन्होंको भी उलटपलरकै रक्खा तो सरण्यायोंके भेद कितने होगे? और दोसे आदिले नवपर्यतको उलटपलटकै रकरवातो कितने भेद होंगे और इन्हो- की सख्यावोका योग अलग अलग शीघ्र कहो ।। ११७ ॥ न्यास - २- ८ इसस्थानमें २ अंक है इसवास्तै अंक 1 आदि २ का घात करनेसें २ संरब्याके भेद हुये. फिर ही या न २ को अकोंके योग १० से गुण दियालो २. हुवे. इसमें अं क २ का भाग दियातो १० हुवे. इसको दोस्थानोमे स्थान- हिसे युत किया तो संख्याका योग ११. हुआ द्वितीयोदाहरणे यास. ३-६ - ८ अकादिचयांका: १-२० ३ घातः ६ एतावत सरख्या भेदा घात. ६ अकसमासा २० हतः १२० अकमित्या भक्त: १० स्थानत्रये युक्तो जात सरव्यै- क्यम् ४४४० तृतीयोदाहरणे न्यासः - २ - ३-४ -५-५ -८-६ एवमत्र संख्या भेदांश्वत्वारिशतसहस्त्राणिशतत्रयवि- शतिश ४०३२० संख्यै बन्थंच चतुर्विशतिनियणि त्रिषष्टिप- यानि नयनपत्तिकोटया नवनवतिलक्षाः पंचसप्ततिसहस्त्राणि शतत्रयपष्टिश्च २४५३६६९७५३६० अर्थ- दूसरा उदाहरपामें न्यास-३-६-८ एक आदिकी वद्धि १-२-३ इन्होका घात करनेसें संरख्याके भेद ६ हुवे इ- सको अंकके योग २० सें गुपातो १२. बुधे. इस अंकके प्र- माण ३ का भाग दिया तो ४० हुवे इन्होंको तीन स्थानों में जोङ नेसे संख्याका योग १४४. हुवा. तीसरा उदाहरणमें न्यास-३-३-४-५ -५-७-८-१ यहां स्थान ८ है. इसवात एकसे आदिले पाठपर्यन्न अंको- (२२७) अंकपाशव्यवहारः का घात करनेसें संरख्याके भेद ४.३२० हुवे. इन्होंकी पह- | लेकी तरह क्रियाकर योग करनेसें संख्याचौंका योग २४६३ १९९९७५३६० ऐसा हुआ. उदाहरणं ॥ पाशांकुशाहिडमरुककपालम्पूलैः रवद्धांगशक्तिशरचापयुतैर्भवति ॥ अन्योऽन्य- हस्तकलितैः कतिमूर्ति भेदाः शंभोहरेरिवगदा- रिसरोजशरवैः ।। ११८॥ न्यासः स्थानानि १० जातामूर्तिभेदा. ३६२ - ८०० एव हरेश्व. अर्थ- उदाहरण- महादेवके दशहाधोंमे पाश, अंकुश, सां- प, डमरु, कपाल, त्रिशूल, रवदांग , शक्ति, वाण, धनुप ये वि- राजमानहै इन्होंको उलटपलटकै हायोंमें लिया तो महादेव- की मूर्तिके कितने भेद होंगे? ऐसेही विष्णुके चार हाचोंमें | शंख, चक्र, गदा, पद्म ये पिराजमान हैं. इन्होंको उलटपलटके लिया तो विष्णूकी मूर्तिके कितने भेद होंगे यह कहो. ११८ न्यास- पहले उदाहरणमें दश स्थानोंको उलट पलट कियाई इसवास्तै एकसें आदिले दशपर्यंत अंकोंका १-२-३-४-५ -५-७-८ - ९-१० घात करनेसें महादेपकी मूर्तियों के मेद- ३६२८ ८००० हुचे. दूसराउदाहरणमें चारोस्थानोंको उलट पलट ११२१३१४ इन्होकर घात करनेसें विष्णुकी मूर्तियों के भेद २५ हवे. अप विशेषमें करणसूत्रको एकछंचसे कहते हैं: विशेषेकरणसूत्रंचत्तम् ॥ यावत्यानेयुतुल्यांक कास्त दैस्तु पृयकृतः ॥ प्राग्भेदाचिताभेदा (२२८ लीलावती. स्तत्संरव्यैक्यंच पूर्ववत् ।।१४७॥ अर्थ-जितने स्थानों में समान अक हों उनके भेदोको अलग स्क्वै फिर सब भेदों में समान स्थानोफे भेदोका भाग देनेसें जो अंक हो, वही भेदोंकी संरच्या है. और उनकी संत | रख्याका योग पहलेकी तरह करना ॥१४७ ॥ अत्रोद्देशकः - विट्येकभूपरिमितैः कतिसंन्य- काः स्युस्तासांयुक्तिश्चगणकाचहि प्रचक्ष्व ॥ अंभौधिकुंभिशरभूत शरैस्तयांकेनेदंकपाश- मितियुक्तिविशारदोऽसि ॥ ११९ ॥ न्यास -२-२-१-१ अत्र प्राग्य दा. २४ यावत्स्थानेन पुतुल्यांकाइति । अथैव प्रधम तावत्स्यानहये तुल्यौ प्राग्व- स्थानद्दयाज्जाती भेदो २ पुनरबाऽपि स्थानहये तुल्यौ त- आष्येव भेदौ २ भेदाभ्यां प्रायझेदाः २४ भक्ता जाता भेदा.६ तद्यथा- २२११ । २१२१ १ २११२ ॥१२१२ ॥१२२१ । ११२२ पूर्व वत् सरव्यैक्यंच ६ अर्थ:- यहां उदाहरण कहते हैं:-- हे गाक! २।२ । १11 ये अक चार जगह रत्वेहै. और इन्होको उलटपलटकै र- करवा तो कितने भेद होंगे? और इन्होका योग क्या होगा? और जो तुम अकपाशमें चतुर हो,तो ४ - ८ - इन्होको पाचस्यानोमे उलट पलटफे रकस्या तो कितने भेद हो- गे और क्या योग होगा? यह मुझकू कहो ॥ १६ ॥ न्यास २।२-११ यहा पहले की तरह भेद २४ हुवे. और | दो, दो स्थानोमें समान अंक है. उन दोदोहस्थानोंके भेदों २।२ का पहले भेदों २४ में भाग लेनेसें भेद मिले. जैसे- २२११ । !

अफपाशव्यवहार
(२२१
२१२१ । २११२ । १२१२ । १२२१ । ११२२ इन्होसे विशेष कोई
भेद नही होता. और इन्होंका योग किया तो 1-4-6-1 हुवे
भ्यासः- ४।८।५। ५ । ५ अत्राऽपि पूर्ववझेदाः १२०
स्थानत्रयोत्थभेदै भक्ता जाता: २० तद्यथा-
८४५५५ ५४८५५
५८४५५
५५४८५
४५८५५
४५५८५
८५४५५
५४५८५
५८ ५४५
५५८५४
एवाविंशतिः।
अथ सरव्यैक्यच १९८८
अर्थ- न्यास ४-४ - ५।५।५ यहा भी पहलेकी तरहभेद
| १२० हुवे. इनसमान तीन स्थानीके भेद ६ का भाग देनेसे भेदोकी
संरच्या २० हुई. जैसे यह प्रस्तार है. इन्होसें कोई विशेष
भेद नहीं है. इन्होंका योग कियातो ११९९९८८ हुये.
५५५
४५५
५८
५५

(२३०) लीलावती. अनियत और अतुल्य अंकों के भेदमें करणसूत्रको आधा छंदसें कहते है:- अनियतांकैरतुल्यैश्चविभेदेकरण सूत्रंबताई- स्थानान्तमेकापचितान्तिमांकघातः समाकैश्वामितिमभेदाः ॥ अर्थ- अमियतसंरख्यामें जितने अंकोंको उलटपलट करै उतनेही स्थानों में अनियत संख्याको ररवै. अगले स्थानोमे अनियत सरव्यामांहसें क्रमकरकै एक आदि अं. ककोहीनकर उन्होंका घात करनेसें जो अंक मिलै वही भेदोंकी संख्याहै. अब उदाहरण' कहते है। स्थानषट्कस्थितैरंकैरन्योन्यवनपर्जितैः। कतिसंख्योविभेदाःस्युर्यदिवेत्सिनिगद्यतां १२० अत्रान्तिनो नवल अत्रांत्यांको यावत्स्थानमेकापन्चि- तः न्यासः - ८-७-६-५ - १ एपा घाते जाताः सं- रख्याभेदाः ६० ४८० अर्ध- १०९ अंकपर्यंत जो अंकहै उनमें से दोदो अंकोंको उलटपलर करनेसें कितने भेद होंगे? और यह अंब समान नहीं हों. जो तुम जानतेहो तो कहो।।१२०॥ यहां अंतका अंक है. यहां अंतगत अंकसें एक, एक घटाकै न्यास ---६-५-४ इन्होंका धात करनेसें संरच्यावोंके भेद ६०४८० हुवे..

अंकपाशव्यवहारः अन्य करणसूत्रको दो उंदकरके कहते हैं- अन्यत्करणसूत्ररत्तहयेनाह. निरेकमकैक्यमिदं निरेक- स्थानान्तमेकापचितंविभक्तम् ॥१४८॥ रूपादिभिस्त निहतैः समास्स्युः संरच्याविभेदा नियतेंकयोगे॥ नयान्वितस्यानकसंरव्यकाया ऊनें कयोगे कथितंतु वेद्यम् ॥१४९॥ संक्षिसमुक्तं पृयुत्ताभयेन नांड तोऽत्तियस्माद्गणितार्णवस्य ॥१५०।। अर्य.- प्रश्नमें जितने स्यानोंफ अंकोंका जो योग हो, उसको एक एककी हीनतासें उत्तनेही उनस्थानोंमे रवै॥ ॥ ११८ ॥ और उनके नीचे क्रमसें एक आदिका हरफो लिन | स्वै. फिर उन्होंका घात करनेसें जो अंक मिलै वही भेदोंकी संरव्या है. नबसें युत्त हुये स्थानोकी संरच्या करके उन अं- कोके योगमें यह कहाहः ॥१४६॥ ग्रंथको बढजाने के भ- यसें यह संक्षेप मैने कहा है. क्यों कि समुद्ररूप गणितका अंत नहीं है ।। १५० ॥ उदाहरण कहते हैं: पंचस्थानस्थितैरंकै र्यायोगस्त्रयोदश ॥ कतिभेदाभवेत्सरन्यायदिवसिनिगद्यतां ॥१२१ अत्रांकैक्यम् १३ निरेकम् १२ एतभिरेकस्थानांतमेकापनि

(२३९)
लीलाचती.
1.
तमेकादिभिश्च भक्त जातम् १२
एषांघा-
तसमा जाता संरच्याभेदाः ४९५
इतिश्रीलीलावत्यामङ्कपाशः
अर्थ- जिन अंकोंके पांचस्थानोंमे ररपनेसें उन्होका
योग १३ होताहै. तो उन्होंकी संख्याके मेद कितने होगे
जो तुम जानते हो, तो कहो. ॥ १२१ ॥
यहां योग -१३ है इसको एक एफ न्यूनतासें एक न्यून
। स्थानकी संख्या प्रमित स्थानोमे क्रमसे लिखी. और इ-
न्होंमे एक आदिका भाग देनेसें २ ३.३. ई हुये
इन्होको भिन्न गगनकी तरह घात करनेसें ११८८०
इन्होंने अपने हर २४ का भाग देनेसे भेदोकी सरख्या ४६५
हुई.
यहा
लीलावतीमे अंकपाश समाप्त हुआ.
नगुणोनहरोनकृतिर्नघनःपृष्टस्तथापिदुष्टानां ॥
गर्वितगणकबहूनां स्यात्पातोऽवश्यमंकपाशेड
स्मिन् ॥ १५१ ॥
अर्थ- मैनें न गुण पूछा नहर पूछा. न वर्ग पूछा और
न घन पूजा. तोभी दुष्ट अफोंके इस दुष्टपाशमे अवश्य
पात होताहै ॥ १५१ ॥

कपाशव्यवहारः ।
(२३३)
येपां सुजातिगुणवर्गविभूषितांगी
शृद्धाऽखिलव्यवहृतिः खलुकण्ठसक्ता ॥
लीलावत्तीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती
तेषां सदैवसुरवसंपदुपैति वृद्धिम् ॥१५२॥
इतिश्रीभात्कराचार्यविरचिते सिद्धान्तशिरो-
मणौ लीलापतीसंज्ञः पाट्यध्यायः प्रथमः
सम्पूर्णः ॥ १॥
अर्थः जिन्होंको सुंदर भाग, प्रभाग, जाति , गुण और
वर्ग इन्हों करकै विभूपित हुन्या अंगोंवाली शुद्धरूप सम-
ग्रव्यवहार अर्यात क्षेत्रव्यवहार पाली, और कंठमें सक्ता
होनेवाली ऐसी लीलावती रसोंकी युक्तियें करफै उदाहन
करी है. उन्होंको सरव, संपत् और वृद्धि देती है।।१५२ ॥
यहां श्रीभास्कराचार्यविरचित सिद्धांतशिरोमणिमें लीला
वती संज्ञक पाट्यध्यायःप्रयमा समाप्त हुआ. ॥ ५ ॥
अटी व्याकरणानि पटच भिपजां
व्याचरताः संहिताः।
पट्तनि गणितानि पञ्चचतुरो
वेदानधीतेस्म यः ॥
रत्नानां त्रितयं हुयंच बुबुधे
मीमांसयोरन्तरं
सीकमगाधयोधमहिमा
सोऽस्याः कविर्भास्करः॥१॥

लीलावती. अर्थ- पाठों व्याकरण, वैद्यककी छहाँ संहिताकों जान- ताभया. और छहों न्याय, पांचों गणित और चारों वेद इ- न्होंकों जो पढता भया. तीन और दो रत्नोंको जो जानता' भया. और मीमांसाओंके सत्यहै ब्रह्म जिसमें ऐसे अंतर को जानता भया. और अगाध बोधरूप महिमाघाला ऐसा भास्कर पंडित इसलीलावतीग्रंथका स्थनेवाला है. ॥ १ ॥ रापेरयामयासी परम्पुधरतनूजन्मगोविन्दशास्त्री लीलावत्याप्रबंधंगणकजनमहानंदसंदोहदोहम् ।। बालानां बोधहेतोर्मनुजसुगमयर भाषयाव्यारव्यदेतं जीयारामारच्य विद्वत्तविपुलसुसायमरुष्टोद्यमेन ॥१॥ इति रवानदेशीय रावेरनामनिवासिपरभुरामभट्टतनयगोविंदशा- स्त्रिणा पिइज्जीयारामपंडितसाहाय्यं गृहीत्वा विरचित्तया भाषा- कया समलता लीलावती सम्पूर्णतामयासीत् ॥ शुभं ।। इतिलीलावतीग्रन्थः जाहिररववर. ९२२५२ विक्रयार्थ पुस्तक तयार. श्रीमत् वृहत्पाराशरीहोरा-ज्योतिषका ग्रंथर हिती यावृत्ति) अति उत्तम पूर्व भागसारांशउत्तर भागसंस्कृतदीका अरुभाषाटीका सहित छापकर तैयार है इस ग्रंथके पूर्वऔरउत्त ऐसे दोभागहै उसके अध्याय७१ है. यह ग्रंथ संग्रह करने योग्य है. यह ग्रंथ लेनेसें फिर दूसरा ज्योतिषका ग्रंथलेनेकी अपेक्षानहीं रहेगी इस ग्रंथकी सविस्तर जाहिर प्रथमावृत्ति में देदेचुके हैं ज्योति- विदोंको मालूमही होगा. किंमत रु.५८० ८ आना. ज्योतिषसार-हिंदी भाषाटीकासह उपके तैयारहै कि० १२ | आनाट.२ आना. संस्कृत प्रवेशिकाभाषा- यह पुस्तक मदर्सेमें पढनेवाले विद्या- थियोंको एक सहाय भूतहीहै इसमें वर्णभेद,प्रयत्नज्ञान,स्वरसं धि, व्यंजनसंधि, विसर्गसंधि पत्तणत्व, पकरण, विभक्तिकेरूप, अजंत पुंलिंग, स्वरान्त स्त्रीलिंग,स्वरान्तनपुंसकलिंग,व्यंजनांत नपुंसकलिंग, सर्वनामशब्द,संख्यावाचक शब्द,अव्यय तिडंत परस्मैपदीविभक्ति, आत्मनेपदीविभक्ति,वादिगण, दादिगण, जुहोत्यादिगण, दिवादिगण, तुदादि,रुधादि तनादि बियादि , चुरादि, भाववाच्या कर्मवाच्य पंतपकिया, सनतपत्रि यडन्तमकिया, यङ्लुक् प्रकिया,आत्मनेपदप्रक्रिया परस्मैपदप- किया,नामधातु ,लकारार्थ,अनिद्धातुसंग्रह ,रुदंत,तद्धित, [[कारक, स्त्रीप्रत्यय.समास प्रकरण,श्लोकान्नवक्रम, औरसंस्क - प्रकरण, 1

(२३६.
जाहेर स्वरर.
करलीजिये- की १२ आनाट.३ आना..
पद्मकोशभाषाटीकासहित-यह ग्रंथवर्षफल कहनेमेब
डाहीउपयोगीहै कीमत थोडीऔर करामतवडी.की. ४ आनाट
अर्धाआना.
शुक्रसागर-अर्थात् श्रीमद्भागवतके बारहोस्कंधका
तर्जुमा ) यहतर्जुमाहमनें घडे विद्वानोंक सहायतासेजगमान्य
श्रीधरीटीकाके अनुसार अत्यंत सरल हिंदी भाषामें वनवायाहैजो
कि, हरकोईके समझमें आवे,महाशय इसकी तारीफ कहांतकलिने
स्पूल अक्षरोंसे चिकने कागद पर उपदाना शुरू कियाहै.सोथोडेही
दिनों में ग्राहकगणोंके करकमलगत होगा.
श्रीमद्भागवत भापाटीकासह- शुद्धसरल हिंदी भाषास
हऔर लोकोका पदळे, टाईपचडो, कागजचिकना धपाई
उमदा, ऐसाउत्तमग्रंथ थोडेही दिनोमे तैयारहोकर सज्जनोंके क
र कमलाधिरूढ होगा.
सचित्रअवतारचरित्र-इसमंथमें ब्रम्हावतारसें लेकर
कलंकी अवतारपर्यंत चौविसोंअवतारोंकी कथा.अतिउत्तमचं
द,दोहा, कवित्त सवैपा इत्यादि कवितागोवर्णन कियीही
रजहा दृष्टांतकाविषय आयाहै वहांदृष्टांतभी लिखेह यह
ग्रंथहमारे यहां आगेंशिलामें उपायासोसव विकमया-अवकी
देर कईएक महाशयोकी सूचनासें,चित्रसहित टायपमेछापकर
तैयार कियाहैन्यहएकग्रयेपास रखनेसें भागवत,रामायणआ।
दिकविषय सहजहीमअवगतहोजावेंगेज्यादा कहांतकलिसें पुस्त
क देखनेसेखवर पडेगी. की-रु.५८ रु०१.
श्रीधरशिवलालजी. ज्ञानसागर छा. (मुंबई।

Ganitlilavati

Author
Bhaskaracharya
Title
Ganitlilavati
File name
Ganitlilavati
Text
OCR done
Citation
1933
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,gynsagar Mudranalaya
Language
Sanskrit
Pages
196
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313111
Barcode
99999990321832.00
Scanning centre
Banasthali University
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