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Vaidhak Paribhasha Pradip

Sen,krishanvallabh · 2012/08

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-COV-पग्परोंकेअवलोकनार्थ--
श्रीः।
वैद्यकपरिभाषाप्रदीप
कृष्णवल्लभसेनतनयश्रीमगोविंदसेनसंगृहीत
जिसको
मुरादाबादनिवासी पं० ललिताप्रसादजीमे
भापानुवादकराय
खेमराज श्रीकृष्णदासने
मुम्बई,
निज "श्रीवेङ्कटेश्वर"छापाखानामें
छापकर प्रगट किया।
506
संवद् १९५३, शके १८२८
हक रजिस्टरी यंत्रालयाधीशने स्वाधीन रक्खा है ।

-- प्रस्तावना। ग्रहण करके समस्त वैद्यजनोंको सविनय निवेदन किया जाताहै कि,-आजकल प्राचीन वैद्यकशास्त्रका प्रचार शास्त्रोक्तीतके अनुसार जैसा आवश्यक है बहुधा कम है, कई एक वैद्युमन्य आधुनिक वैध कुछ १ । २ छोटोर्स पोथी पटे न पढे इतनेमें धन्वंतरीके गुरु ही बैठते हैं और मनमानी औषध विना मान तौल्य योग समझेही बिचारे लाचार रोगियोंको देकर उनके शारीर में स्वास्थ्य होवे तौभी टसको विगाह देतेहैं यह बात सैकडों जगह अनुभव में आती है. इसका कारण यह है कि, वैद्यकशास्त्र अत्यंत उपौ कारक है परंतु उसमें जिस रोगपर जो औषधं कहाहै उस रोगपर वह औषध कितना देना कौनसे औषर्धाके बदले में कौनसे औषध की योजना करना यह बात वे लोक समझते नहीं . इससे ऊपरोक्त अनर्थ होताहै.- यह जान कर परमदयाल विट्दर श्रीगोविन्दसेन पण्डित श्रेष्ठजनि-पूर्व कालके आयु र्वेदाचार्य मुनियोंके ग्रंथों में जो • परिभाषा लिखीथी, उन सबका सारमम " वैद्यकपरिभापाप्रदीपक " नामक ग्रंथ संग्रह करके निर्माण कियाहै. यह ग्रंय उन्होंने निर्माण किया और संस्कृतके अनभिज्ञ वैद्य लोगोंके हितार्थ मुरादाबाद निवासी पं० ललिताप्रसाद ने सरल हिंदीभाषाटीका बनाकर मेरे समीप भेजा। सौ यह "वैद्यकपरिभाषाप्रदाकि " ग्रंथ श्रविकटेश्वर" छापाखानामें छापके प्रसिद्ध किया है । इस थका संग्रह करके कुशल वैद्यजन इसके कहे हुए मान, औषधी योग, चूर्ण, कल्पना, औषध ग्रहण काल, अनुपान, औषधी तैयार करनेकी विधि आदि सब विषयोंको जान के रोगपर टपचार कर अपार यशको प्राप्त होकर इस मनुष्य जन्मको सार्थक करेंगे । आपका- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना मुंबई. मैंने स्वकीय " - वैद्यकपरिभाषाप्रदीपका सूचीपत्र। DGopa .... .... .... " .... " .... .... .... .... " .... .... विषयाः पृष्ठाड्राः विषयाः पृष्टाद्वान प्रथम खण्ड ॥ दूसराखण्ड ॥ वन्दना १. पंचविषकपाय ग्रंथकारका परिचय "स्वरसके लक्षण ग्रंथकारका अभिप्राय "स्वरसके पानकरनकीमात्रा ग्रंथके प्रकाशकी भावश्यकता " स्वरसभेदसे पुटपाक विधि कालिङ्गमान २. फल्क मागधमान ८ कल्कभेद चूर्ण आद्रव्यको दूना करनेकी काय.... विधि.... १० शीत.... द्रव्यकी योग्यता व अयो तन्दुलोदक ग्यता ... १४ फाण्ट स्नेहादिका गुणागुण १५ उष्णोदक श्रेष्देशनद्रव्य १७ अवलेहादि.. द्रव्यकी अग्रेष्टता. १८ द्रव्यकी मात्राविधि भैपजोद्धारणा और भूतोप. पाचनादिके जलका परिमाण ४७ सारणमंत्र पाचनके द्रव्यका परिमाण उद्धारणमंत्र | यवागूमादिके साधन जल व्यका मंगग्रहण करना च औषधिका परिमाण भोपधपरीक्षा ११ औषधिके पहचानेका उपाय विषयभेदसे ऋतुद्रव्यग्रहण ऋनुभेदसे द्रव्याद्रग्रहण.... | यवागूसाधनमें तन्दुलकी साधारणकारक ट्रव्यग्रहण भनय द्देश्योंका ग्रहणकरना २५ परिभाषा एक ट्रम्पके न होनमें दूसरे अनादिसिद्धकरनेमें जल- द्रध्ययो प्रदणकरनेकी विधि २६ का परिमाण मण्दादिया लक्षण.... प्रथमपासमार पवाराभादिका गुण .... .... .... ४८ .... .... " .... पड़गजल बनानेकी विधि कल्वका पेया "यवागू बनानेकी विधि .APA ..... . .... , ....

.... ९० .... .... .... .... " " " " " पांचकाल .... " .... " .... ५८ चौया काल.... पांचवा काल .... .... .... .... पका विधान .... .... ९६ .... १०० वैद्यकपरिभाषाप्रदीपका सूचीपत्र । विषयाः पृष्टाहाः विषयाः यूष, पेया, विलेपीबनाने- तीनप्रकारके वालक की विधि ५४ औषधी भक्षणकरनेके आठ मांसरससाधन कार लाखके रसकापकाना "दाकाल प्रदापकी विधि प्रथम काल.... चूर्णादिके भक्षणकरनेका नियम दूसरा काल तीसरा काल द्रव्यविशेष मतान्तर दोषभेदसे मधुशर्करा प्रक्षे. क्रियाकालव्यवस्था दूधादिके पाककी विधि.... चतुरम्ल और पंचाम्ल दूसरा खप्ट समाप्त। मूत्रवर्ग तीसरा खण्ड ॥ चतुर्विधन्नेह चातुर्जात स्नेहको सिद्धकरनेमेंकाथ्य बिसुगन्धि वा विजातक.... द्रव्य और जलका परिमाण ६० सर्वगन्ध स्नेहपाकके लक्षण ७१/महती त्रिफला और स्वल्प गुड़पाकके लक्षण.... विफला गूगळपाकके लक्षण ७६ भूषण व विमद लोहशोधनादि परिभाषा क्षीरिवृक्ष दौदपाकके लक्षण भावनाविधि। ८१पंचकोस वा पंचोषण दारोदक ८२ पडूषण द्विरुक्तद्रव्यका ग्रहणकरना महत् पंचमूल, स्वल्पपंच- चूर्णका पाकनिषेध मूल, दशमूल अनुपानविधि ८३ वल्लीज पंचमूल भनुपानकी मात्रा ८६ कंटकाख्य पंचमूल.... लोहेका अनुपान ८७ अष्टवग विशेषअनुपान ८८ जीवनीयगण चालककी औषधीका प श्रतमारच रिणाम ८९/ज्येष्टाम्नु और सुखोदक. औषधी सेवन करने में अयो- गुड़ाम्बु ग्य बालककी विधि ९० वेसवार "- " .... .... " .... .... " .... .... .... .... ७९ पंचपल्लव .... १०१ " .... .... .... " .... .... .... .... ... .... १०२ .... .... .... " .... .... " " .... .... .... .... ....

६ वैद्यकपरिभाषाप्रदीपका सूचीपय । विषयाः पृशङ्काः विषयाः .... " .... .... ... .... 1 ... .... .... .... .... 7 .... ... ... .... জুহা বা নিবার " . ... .... ... ७ .... १०६ योंकी मात्रा " ... .... ... अम्लमूलक.... चतुर्थ खण्ड । कटर... तक्र, उदन्धित् और मथित "पंचकर्म दधिचिंका और तक पंचकर्मविधि कृचिका.... धमन.... सुक्त, सीधु और आसव १०४ वमनका योग्यकाल मरय और भारताल 7 श्रेष्ठ वमनके लक्षण ११२ वटक.... अश्रेष्ठ वमनके दोष ११३ १०५ / अतिवमनके दोष वमनऔषधिकमात्रा ११४ आसव और आरष्ठ " वमननिषेध सोधु और मसना.... , (वमनके योग्य और अयोग्य वमनके रसकी मात्रा ११ कादम्बरी जगल और चमनके लिये और औषधि- मेदक मध युद्धस और किल्लक वारुणी वा ताड़ी ॥ इति वमनअधिकार विरेचन राड़सुक्त धिरेचनके गुण मुक्त.... विरेचन निषेध १२० विरचनके योग्य पुरुष कांजी विरेचनकी मात्रा दूसरी भांतिकीकांजी और तुपोदया..... "मृद्ध, मध्य और करकोष्ठ- बनानके रक्षण "भेदसे विचक औषधिको मात्रा शिण्डाकी मधुसुक्ता | वमनविरेचनकी चारप्रकार १०८ पड्यूप और काम्बलिषयूर १२२ श्रेष्ठ विरेचतके लक्षण तपण.... अष्टविरेचनके लक्षण.... मंप अधिक विरेचनको रक्षण.... १३४ टोदक विविध भाषधिय गुण इति विरेचनअधिकार तीसरासमात । पंचविध नस्य .... .... " .... .... 4 .... 1 .... A. तुपाम्बु और सौवीर .... ... .... .... .... 17 " t .... .... १०९ विरेचन निषेध ... ... .... ....

७ .... .... .... .... .... ... .... " .... .... .... " " .... " .... .... नेका लक्षण .... " वैद्यकपरिभाषाप्रदीपका सूचीपत्र ! विषयाः पृठाङ्क: विषयाः पृष्ठाङ्काः प्रतिम १२७, उत्तरवस्ति .. द्विविध अवपीड़ "नलबनाने की विधि १४६ प्रधमन १२८| उत्तरबस्ति के प्रयोग कर- शिरोविरेचन नेकी विधि नासके प्रयोगकी विधि १२९ स्त्रियोंपर वस्तिके प्रयोगको नासका निषेध विधि अनुवासन । १३० त्रियोंकी उत्तरवस्तिका मात्रा १४७ वस्तिकेनल बनाने की विधि कम या अधिक क्रियाके दोष १४८ निरूहबस्ति १३२) वस्तिके गुण अनुवासन और आस्थापन- इति उत्तरबस्ति ।। निषेध धूमके गुण बस्तिक्रिया नलका माण १३४ धूमपानके गुण ब्रणबस्तिका विधान अकाल में या अधिक धूम- वस्तिके अच्छीतरहसे हो पान के दोष १५१ "पांच प्रकारका धूम अनुवासन और पस्तिप्रयोगका धूमपानकी विधि काल १३५ प्रायोगिक, स्पैहिक, धैरेचन, कमऔर अधिकमात्राले ब कासहर और वामनधूमपा- स्तिप्रयोगकरनेके दोष नकी विधि अनुवासन औरनिरूपणकी धूमनिषेध १५२ मात्रा इविधूमपानअधिकार ॥ सदास्नेह वस्ति और निरूह- कवल और गण्डूपधारण के सेवन करने का दोष ....१३६ चतुर्विध गण्डूष अनुवासन और आस्थापनके अयोग्य वातादि दोषभेदसे कवल इतिअनुवासनअधिकारः और गण्डपकी विधि.... निरूह , कंवल और गण्डूषका परि- माण वातादि दोपभेदसे निरूह द्रव्य की मात्रा गण्डूषधारणकरने का समय निरूहको मात्रा १४० गण्डूपके हीनयोग और अ- आस्थापन प्रयोगके अयोग्य वियोगके दोष ११ निरूहमयोगके योग्य " गण्डूप धारण करने की शु- श्रेष्ठ निरूहके लक्षग १४२ / दिके लक्षण भश्रेष्ट निरूह के लक्षण १४५ कवल और गण्डूपकी माश इतिनिरुदस्ति अधिकारः इतिकवलगडूप अधिकार .... .... .... .... .... .... .... १ " १ 1 .... " .... .... .... ... .... .... .... " .... .... " .... .... वैद्यकपरिभाषाप्रदीपका सूचीपत्र । विषयाः पृटाडाः विश्याः पृष्टाङ्काः, रक्तमोक्षणविधि १५४ अरण्डिके तेलकी मृच्छा.... १५७ 'ग्वेशुद रधिरके लक्षण .... १५५ तिल के तेटकीमूर्छा नसके वेधनेकी विधि "तेलकी मूर्छा विधि १५८ गन्धपाक फस्त सुलानेके भयोग्य व गन्धद्रव्य योग्य दूसरे गन्धद्रव्य इंति रक्तमोक्षणअधिकार दूसरे मतसे गन्धद्रव्य.. धृतमूछाविधि इति सूचीपत्र सम्पूर्ण ॥ बड़वे तेलकी मून्छी " .... .... .... ... .... .... " 17 पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीपंकटेश्वर" छापाखाना-मुंबई.

श्रीः। .
वैद्यकपरिभाषाप्रदीप।
भाषाटीकासमेत ।
नमोस्तुनीरदस्वच्छवपुषेपीतवाससे ।
यस्यास्येन्दुसुधांवंशीपपौशब्दस्वरूपिणी ॥१॥
दोहा।
राधावर जलधरवरण, सुन्दर श्याम शरीर ।
मुखप्रफुल्ल मोहन मयन, हरैदासकी पीर ॥ १॥
शब्दस्वरूपिणी वंशीनै जिनके मुखचंद्रको माधुरीको पान
कियाहै, उन नवीन घनकी समान शरीर वाले, निर्मल तन-
युक्त, और पीताम्बर धारणकिये हुए श्रीकृष्णको नमस्का.
रहै ॥ १॥
कृष्णवल्लभसेनस्यतनुजेनवितन्यते ।
श्रीमद्गोविन्दसेनेनपरिभाषाप्रदीपकः ॥२॥
कृष्णवल्लभसनके पुत्र श्रीमद्गोविन्दसेन करके
यह
"परिभापाप्रदीप " नामक ग्रन्थ संगृहीत हुआहै ॥ २ ॥
पूर्वमुनिभिरादिष्टास्वेस्वतन्त्रेक्वचित्तक्वचित् ।
परिभापामयासासासमाहृत्यविलिख्यते ॥३॥
पूर्वकालके आयुर्वेदाचार्य मुनियों ने अपने २ बनाए ग्रंथों में
कही २ जोपरिभापाएँ लिखिहैं, उन सबका सारमर्म ग्रहण
करके मेरे द्वारा यह ग्रन्य संग्रहीत होताहै ॥ ३ ॥
ध्वान्तेपथिचरिष्णूनायथादीप प्रदर्शकः ।
नानाशास्त्रज्ञभिपजांसंग्रहोऽयंतथाभवेत् ॥४॥

वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। जिसमकार अन्धकारमें भ्रमण करने के समय पथिकका मार्ग दीखताहै, वैसेही अनेक शास्त्रजानने वाले वैद्योंके लिये यह " परिभाषाप्रदीप " नामक ग्रंथ आयुर्वेद शास्त्रमें प्रवेश करने का मार्ग दिखाने वालाहै ॥ ४ ॥ खण्डैश्चतुर्भिरादिष्ट संग्रहोनातिविस्तरः। वैद्याःकुर्वन्त्वत्रयत्नव्यवहारार्थमुद्यताः॥५॥ यह परिभापाप्रदीप " ग्रंथ वहुत न बढ़ाकर चार ख- ण्ड में इसकीप्रस्तावनाका विषय वर्णन किया गया । व्यवहार करने वाले वैद्योंको इस ग्रंथके प्रति यत्न प्रकट करना चाहिये ॥५॥ अव्यक्तानुक्तलेशोक्तसन्दिग्धार्थप्रकाशिकाः। परिभाषाःप्रकथ्यतेदीपीभूताःसुनिश्चिताः ॥ ६॥ आयुर्वेदशास्त्रके विषय परिभापाके सम्बन्धमें कोई २ स्थल अव्यक्त अर्थात् स्पष्ट नहीं लिखागया । किसी २ स्थानमें अनुक्त अर्थात् कुछभी नहीं कहागया और किसी स्थलमें कु- उही लिखा है, उन सब स्थलोंका संशय दूर करने के लिये अन्धकारका नाश करने वाले दीपककी समान यह " परि- भापामदीप " नामक ग्रंथ लिखानाताहै । आयुर्वेदके सीसने बाल वैद्यलोगोंफा निश्चपही इस पुस्तफसे बड़ा उपफार होगा ॥६॥ भयप्रपमतोमानसूमंति तस्माचद्विविधमानंकालिङ्गंमागधंतथा। कालिगामागधंश्रेष्टमेवंमानविदोविदुः ॥७॥ फारिदमान और मागधमान यह दोपफारफे मानहैं, ति- ममें कटिंग मानपी पनिसयत मागधमानही अष्ठहै । पलहे पलिंगमान लिया जाताहे ॥ ७ ॥ - भाषाटीकासमेत । परिमाणविनाकापिनौपधाजायतेफलम् । तस्मात्सर्वेयतन्तेऽत्रपरिमाणविधौसदा ॥ ८॥ पहले मानसूत्र लिखते हैं। विनापरिमाणके औषधिसे क- भीभी आरोग्यरूप उत्पन्न हुआ फल प्राप्त नहीं होता। इसका- रण वैद्योंको यलके सहित इस परिमाणके अनुसार औष- धिका समस्त कार्यनिर्वाह करना चाहिये ॥ ८ ॥ शार्ङ्गधरस्वाह। नमानेनविनायुक्तिर्द्रव्याणांजायतेक्वचित् । अतःप्रयोगकार्यार्थमानमत्रोच्यतेमया॥९॥ शार्ङ्गधरनें कहाहै कि, विनापरिमाणके किसी द्रव्यके प्रयो- गसे फलप्राप्त नहीं होता । तिसके लिये प्रयोगका सुभीता करनेंको मुझकरके यह मानसूत्र लिखा जाताहै ॥९॥ अन्यच्च। मानापेक्षितमाचार्याभेपजानांप्रकल्पनम् । मेनिरेयत्ततोमानमुच्यतेपारिभापिकमिति॥१०॥ दूसरे ग्रंथमें कहाँहै, और आयुर्वेदाचार्य भी कहा करतेहैं कि औपधिक प्रयोग करनेकी कल्पनाके सम्बन्धमें परिमाणके विना किसीफलके प्राप्त होनेकी सम्भावना नहीं; इसकारण पारिभापिक मानसंज्ञा कहीजातीहै ॥ १०॥ तत्तमतभेदान्नानाविधंभवति । जालान्तरगतै सूर्यकरैवसीविलोक्यते । पवंसीभिर्मरीचिःस्यात्ताभिःशइभिश्चराजिका॥११ तिसूभीराजिकाभिश्वसर्पप-प्रोच्यतेबुधैः । यवोऽष्टसर्पपैःप्रोक्तोगुंजास्यात्तचतुष्टयम् ॥ १२॥ पभिश्चरत्तिकाभिःस्यान्मापकोहेमधामको।

(४) वैद्यकपरिभाषांप्रदीप । मापेश्चतुर्भिर्मानःस्याहरणंतन्निगद्यते ॥ १३ ॥ टंकःसएवकथितस्तद्दयंकोलउच्यते। क्षुद्रमोटरकश्चापिद्रंक्षणंसनिगयते ॥१४॥ कोलद्वयंचकर्पःस्यात्सप्रोक्तंपाणिमानिकः। अक्षापिचुःपाणितलंकिंचित्पाणिश्चतिन्दुकम् १५॥ पिडालपदकंचैवतथापोडशिकामिता । करमध्योहंसपदंसुवर्णकवडग्रहः ॥ १६ ॥ उडुम्बरञ्चपर्यायःकर्पएवनिगद्यते । स्यात्काभ्यामर्द्धपलंशक्तिरप्टमिकातथा ॥ १७॥ शुक्तिभ्याञ्चपलंज्ञेयंसुटिमात्रञ्चतुर्थिकाः । प्रकुञ्चपोडशीविल्वपलमेवानकीर्त्यते ॥ १८॥ पलाभ्यांप्रसूतिज्ञेयाप्रसृतञ्चनिगद्यते। प्रसृतिभ्यामञ्जलि स्यातकुडवोर्द्धशरावकः ॥१९॥ अष्टमानञ्चसज्ञेय कुडवाभ्याञ्चमानिका । शरावोऽटपलंतज्ज्ञेयमत्रविचक्षणः ॥ २०॥ शरावाभ्यांभवेत्मस्थचतुःप्रस्थैस्तथाठकम् । भाजनकंसपात्रेचचतुःपटिपलञ्चतत् ॥२१॥ चतुर्भिराटकद्रोण कलशोलल्वणोर्मणः । उन्मानञ्चपटोराशिद्रोणपर्यायसंज्ञितः ॥ २२ ॥ द्रोणाभ्यांशूर्पकुम्भौचचतुःपटिशराषकः। शुपाभ्याचभवेद्रोणीवृहद्रोणीचसास्मृता ॥२३॥ द्रोणीचतुष्टयंसारीकथितासूक्ष्मबुद्धिभिः।

भाषाटीकासमेत । चतुःसहस्रपलिकापण्णवत्यधिकाचसा ॥२४॥ पलानांदेसहस्रञ्चभारएक प्रकीर्तितः। तुलापलशतंज्ञेयःसर्वत्रैपविनिश्चयः॥२५॥ मापटङ्काक्षविल्वानिकुडवःप्रस्थआढकः । राशिणीखारीचेतियथोत्तरंचतुर्गुणाः ॥ २६ ॥ मतभेदसे परिमाण अनेक प्रकारका है; पहलेका लिङ्ग मान कहा जाताहै, जालीके द्वारा गृहमें जो सूर्यकी किरण आनकर गिरतीहै, इस किरणके मध्यमें जो बडे छोटे २ परमाणु दिखाई देते हैं तिनको ध्वंसी कहते हैं । उन छै ध्वंसीकी एक मरीचि, छः मरीचिकी एक राजिका ॥११॥ तीन राजिकाकी एक सरसों, आठ सरसोंका एक जौ, चार जौकी एक गुंजा ( रत्ति छः रत्तीका एक मासा। हेम और धामक यह दो नाम भी मासेके हैं । चार मासेकी एक शान (आधा तोला); इसके दूसरे नाम धरण और टंकभीहै । दो शानका एक कोल (१ तोला), क्षुद, मोरटक और क्षण उसके दूसरे नामहैं । दो कोलका एक कर्प ( २ तोला ) पाणि माणिक, अक्ष, पिचु, पाणितल, किंचित, पाणि, तिन्दुक, बिडाल, पदक, पोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवड- यह और उडम्बर यह कर्ष शब्दके दूसरे नाम हैं। दो कर्षका एक अर्द्धपल (४ तीला); शुक्ति और अष्टमिका इसके दूसरे नामहैं। दो अर्द्धपल या दो शुक्तिका एकपल (८ तोला); मुष्टिमात्र, चतुर्थिका, प्रकुश्च, पोडशी और बिल्व; एकपलके यह सब दूसरे नाम हैं । दो पलकी एक प्रति प्रसृत इसका दूसरा नामहै । दो प्रसूतिकी एक अंजलि; कुडव, अर्द्धशराव और अष्टमान, यह इसके दूसरे नाम हैं । ( चक्रदत्तके टीका- कारने "कुडवोऽष्टपलो" अर्थात् कुडव शब्दसे ८ पल अर्थात्

वैद्यकपरिभाषाप्रदीप।
६४ तोला इस प्रकारकी व्याख्याकीहै।)दो कुडवकी एक
मानिका; शराव और अष्टपल इसके दूसरे नामहैं। दो शरा-
वकी एक प्रस्थ । चार प्रस्थका एक आड़क; भाजन, कंस
और पात्र इसके दूसरे नाम , (६४ पलका १ आढक होताहै)
चार आढकका एक द्रोण (३२ सेर ) कलस लल्पना
अर्मन, उन्मान, घट और राशि यह सब द्रोणके दूसरे नाम
हैं।
दो द्रोणका एक सूर्प, (६४ सेर ) कुम्भ इसका दूसरा नामहै
(६४ शरावका एक सूर्प होताहै ) दोसूर्पकी . एकदोर्णा
(१२८ सेर); इसका दूसरा नाम बृहत् द्रोणी है। चार
द्राणीको १ खारी ( ४००० छयानवे पल अर्थात् ५५२ सेरकी
एक सारी होतीहै ) दो हजार पल अर्थात् २५० सेरका एक
भार होताहै और एक शतपल अर्थात् १२॥ सेरकी एक
तुला होतीहै॥
मापा, टंक, (शान ) अक्ष( कर्प) बिल्व (१ पल, ८ तोला,
कुडव ( ३२ तोला) प्रस्थ ( २ सेर ) आइक ( ८ सेर) राशि
(अर्थात् द्रोण ३२ सेर ) दोणी ( १२८ सेर) और खारी
(५१२ सेर) यह क्रमानुसार चतुर्गुण, अर्थात् मासेसे टंक
चतुर्गुण, टंकसे अक्ष चतुर्गुण, अक्षसे विल्य चतुर्गुण और कुडपसे
प्रस्थ चतुर्गुणहोताहै । इत्यादि ॥ १२ ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥
॥ १६ ॥ १७॥ १८॥ १९ ॥ २०॥ २१॥ २२ ॥२३॥
॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥
गुजादिमानमारभ्ययावत्स्यात्कुडवस्थितिः ।
द्रव्याशुष्कद्रव्याणांतावन्मानसमं मतम् ॥२७॥
प्रस्थादिमानमारभ्यद्विगुणञ्चद्रवायोः ।
मानन्तथातुलायाश्चद्रिगुणनकचित्स्मृतम् ॥२८॥

भाषाटीकासमेत। एक रतिसे लेकर कुडवतक दव (गला, पतला, पानीसा) गीले और सुखे द्रव्यकी समान परिमाण अर्थात् औषधिका द्रव्यग्रहण करनेके समय द्रव (तरल) आई (भीजा हुआ) और सूखे द्रव्यका जैसा परिमाण ( १ रतिसे लेकर कुड़वतक ) लिखाहो सौ तितनाही ग्रहणकरे । प्रस्थसे लेकर ऊपरको चाहे जितना परिमाण हो, द्रव, आई और सूखे द्रव्यके असली परिमाणसे दूना द्रव्य ग्रहणकरे ॥ २७॥२८॥ मृदृक्षवेणुलौहादेर्भाण्डंयचतुरङ्गलम् । विस्तीर्णश्चतथोर्ध्वञ्चतन्मानंकुडवं वदेत् ॥ २९ ॥ मिट्टी, वृक्ष, वांश और लोहेका बना हुआ पात्र, चार अं. गुल लम्बा, चार अंगुल चोंड़ा और चार अंगुल ऊंचा हो इतने पात्रमें जितना जल अथवा तरल द्रव्य आसकताहै तिसको कुडव (मई सेर ) परिमाण कहतेहैं ॥ २९ ॥ यदौपधस्तुप्रथमयत्ययोगस्यकथ्यते । तन्नामवसयोगोहिकथ्यतेतत्रनिश्चयः॥३०॥ औपधिकायोग (नाम) कहनेंके समय इस योगके पहले जिस औपधिका वर्णनहो, उस व्यकं नामानुसार इस योग- का नाम निश्चय होगा । जैसे " दाादि पाचन " के प- हिले दावी ( दारुहलदी ) कलिंग ( इन्द्रजी) मजीठ, बृहती, दास, गुडूची, इस प्रकार लिखा रहनेसे उक्त दा. कि प्रयम रहनसे इसका नाम दाादि पाचन हुआहै ॥३०॥ इति पारिद्रपरिमाराः।

(८)
वैद्यकपरिभाषाप्रदीप।
अथ मागधपरिभाषाः।
त्रसरेणुस्तुविज्ञेयःनिशद्भिःपरमाणुभिः ।
त्रसरेणोस्तुपर्यायनामध्वंसीनिगद्यते ॥ ३१ ॥
पड्ध्वंसीभिर्मरीचिःस्यातपण्मरीच्यस्तुसर्पपः।
पट्सप्पैर्यवस्त्वेकोगुञ्जकाचयवैत्रिभिः ॥३२॥
गुंजाभिर्दशभिप्रोक्तोमापकोब्रह्मणापुरा ।
डेमश्चधामकश्चैवपर्यायस्तस्यकीर्तितः॥३३॥
चतुभिर्मापकै शाणासनिकाष्ठकमेवच ।
धरणशब्दोत्रयोध्यःअन्यत्रशाणपर्यायलिखितत्वात्
शाणोद्वौद्रंक्षणविद्यात्कोलंबटकमेवच ॥३४॥
काद्विगुणंकपसुवर्णञ्चाक्षमेवच ।
किञ्चिद्रिडालपदकंपिचुःपाणितलंतथा ॥ ३५॥
उडुम्बरंतिन्दुकञ्चकवडग्रहमेवच ।
देसुवर्णेपलाद्वैस्याच्छुक्तिरप्टमिकातथा ॥३६॥
द्वेपलाईपलंमुष्टिःप्रकुञ्चश्वचतुर्थिका ।
बिल्वंपोडशिकाम्रञ्चद्वेपलेप्रसृतविदुः ॥३७॥
कुड़वाप्रमृताभ्यांस्यादञ्जलिःसनिगद्यते ।
अष्टमानंशरावाईतस्यपर्यायमेवच ॥३८॥
कुड़वाभ्यांमानिकास्याच्छरावोऽएपलंतथा।
माणिकाभ्यांभवत्प्रस्थोज्ञेयःपोडशभिःपले॥३९॥

भापाटीकासमेत । चतुःप्रस्थैराड़कास्यात्पात्रंकंसश्चभाजनम् ॥ अयंभिपरिभराख्यातश्चतुष्पटिपलैरिह ॥ १० ॥ चतुर्भिराडकैन्द्रोणाकथितःपूर्वसूरिभिः। घट कलशउन्मानोलल्वणोर्मणएवच ॥११॥ द्रोणपर्यायनामानिकीर्तितानिभिपग्वरैः। अयञ्चपलसंख्यातःपटपंचाशच्छतद्वयम् ॥४२॥ द्रोणाभ्यांशूर्पकुम्भौचचतुःपष्टिशरावकः । शूर्पाभ्याञ्चभवेद्रोणीबृहद्रोणीचसास्मृता ।। ४३ ॥ द्रोणीचतुष्टयंसारीकथितासूक्ष्मबुद्धिभिः । चतुःसहस्रपलिकापण्णवत्यधिकाचसा ॥४४॥ तुलापलशतंप्रोक्तंभारःस्यादिशतिस्तुला। पलानांद्विसहस्राणिभार परिमितोबुधैः॥ १५ ॥ मागधमानकहा जाताहै । तीसपरमाणुका एक सरेणु, ध्वंसी इसका दूसरा नामहै । उय ध्वंसीकी एक मरीचि, उय मरीचिकी एफ सरसों, उय सरसोंका एक जौ, तीन जौ- की एक गुंजा या रत्ति, दश रत्तीका एक मासा, इसके दूसरे नाम हेम और धामक है । ४ मासेकी एक शान, इसका दूसरा नाम निकाष्ठकहै (धरणशब्दभी किसी ग्रंथमें शानका पर्याय दिखाई देताहै )। दो शानका एक इंक्षण कोल बटक और कोई इसके दूसरे नामहै । २ इंक्षणका एक कप सुवर्ण, असा किञ्चित, विडालपदक, पिचु, पाणितल, उदु म्बर, तिन्दुक और करड ग्रह इसके दूसरे नामह । दो कर्पका एक पलाई शुक्ति और अष्टमिका इसके दूसरे नामहैं । दो मुक्तिका एक पल (८ तोला ) मुष्टि प्रकुञ्च, चतुर्थिका (१०) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । बिल्व और पोड़शिकाम्र इसके दूसरे नाम हैं । दो पलका एक मस्त, दो प्रसृतका एक कुडव अंजलि अष्टमान और शरावार्द्ध इसके दूसरे नामहैं । दो कुड़वकी एक माणिका, शराब और अष्टपल इसके दूसरे नामहैं । दो माणिका (१६ पल) का एक प्रस्थ, चारमस्थ ( ६४ पल) का एक आढ़कपात्र, कंस और भाजन इसके दूसरे नामहैं। चार आइफ या २५६ पलका एकद्रोण, घट, कलस, उन्मान, लल्वन और अर्मण इसके दूसरे नामहैं । दो द्रोण या ६४ शरावका एक सूर्प, इसका दूसरा नाम कुम्भहै । दो सूर्पकी एक द्रोणी, इसका दूसरा नाम बृहत् द्रोणी है. चारद्रोणी या चार हजार छियानवे पलका एक खारी होताहै, ऐसाचतुरवैद्योंने कहाहै । एक शतपलको एक तुला, वीसतुला या दो हजार पलका एक भार होताहै ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ ३६॥ ३७॥ ३८॥ ३९॥ ४० ॥४१॥ ४२ ॥४३॥४४॥४५॥ मापक शानतिन्दूकेपलंकुडवप्रस्थकः। राशिणीखारीचेतियथोत्तरंचतुर्गुणाः॥ ४६॥ मापक, शान, तिन्दुक, ( कर्प) पल, कुडव, प्रस्थ, राशि, दोणी और खारी, यह उत्तरोत्तर क्रमानुसार चतुर्गुण हैं अर्थात् मापासे शान चतुर्गुण है, शानसे तिन्दुक चतुर्गुणहै। तिलसे पल चतुर्गुण इत्यादि ।। ४६ ॥ . . शुष्कद्रव्येप्विदमानद्विगुणश्चद्रवायोः। ज्ञातव्यंकुडवादूद्धप्रस्थादिश्चतिमानतः ॥ १७॥ औपधादिफा परिमाण जिस प्रकारसे लिखागया, सो फेवल शुक्फ द्रव्यफे परिमाण सम्पन्धहै । परंतु कुडव ऊर्ध्वपरि भाषाटीकासमेत । (११) माणसे द्रव और गीले द्रव्यको परिणामको अपेक्षा दूना ग्रहण करें ॥१७॥ शुष्कद्रव्येतुयामात्राचास्यद्विगुणाहिसा । शुष्कस्यगुरुतीक्ष्णत्वात्तस्मादप्रकीर्तितम् ॥४८॥ शुष्क द्रव्यके ग्रहण करनेका जैसा परिमाण है, यदि सूखे द्रव्यकी जगह गीला द्रव्य करना हो तो कहे हुए परिमाणसे दूना ग्रहण करे । और जहां पर गीले द्रव्यके ग्रहण करनेकी विधिहै जो उस जगह सूखा द्रव्य ग्रहण करनाहो तो भारी और तीक्ष्णादि द्रव्यके गुण विचारकर सूखे हुए द्रव्यका आधा वजन ग्रहण करे ॥४८॥ १ कुडवमक्यांवगुण्यं नेत्यत भाह । कुडवादूर्ध्वमिति । अर्थात् यहांपर यह प्रश्न हो सकताहै कि मूलमें “ कुडवार्य यह लिखाद वहांपर कुडपसे द्रव और भाई द्रव्यका दूना ग्रहण करना उचित है या नहीं इसके उत्तरमें कोई ३ कहते हैं कि- अयमभिसन्धिः कुडवादल्यग्लोपेपंचमीकुडवंव्याप्येत्यर्थः । केचिदत्रच्याचक्षतेतन्मतेकडवस्यापिद्वैगुण्यम् ।। अर्थात् कोई २ कहते हैं कि कुडव शब्दमें ल्पवलोपकरके पंचमी विभक्ति मिलीहै अतएव कुडवते भी दूना ग्रहण करना चाहिये । और कोई कोई इस मतके विरोधीहैं यथाः-कुडवादिति दिग्योगलक्षणां पंचमीये वदन्ति, तन्मते लडवे बैगुण्य नास्तीति । अर्थात् कोई कोई कहते हैं कि “कुडव" मे दिग्योगलक्षणा पंचमी- के विद्यमान होनेसे कुडयका दूना ग्रहण करना ठीक नहीं है यथा:-- गुनादिमानमारभ्ययावत्स्याकुडवस्थितिः। द्रव्याशुष्कद्रव्येपुतुल्यंमानप्रकीर्तितमितिवचनात् । अस्याः। रक्तिकादिमारभ्य कुडवार्वाक तुल्यं मानम् । अर्थात् ऊपर कहे हुए मतका यह प्रमाणहै, यथा-रत्तीसे कुडव- तक तुल्य परिमाणमें औषधि ग्रहण करनेकी विधि ज्ञानी वैद्य लोगों- करके कहा गयाहै, यही युक्ति संगत है। विशेषकरके इस प्रकारकी विधि इसमें पहले भी कहीहै। " वैद्यकपरिभाषामदीप। अस्यापषादमाह। वासानिम्बपटोलकेतकिवलाकूष्माण्डकेन्दीवरी। वर्षाभूकुटजाश्वगन्धसहितास्तापूतिगन्धामृता ॥ निश्चलकरने इसमकारसे व्याख्याकीहै। यथा:- कुडवमारभ्यद्वैगुण्यमेतेनकुडवस्यापि दैगुण्यनिश्चलकरेणैवव्याख्यातम् । निश्चलकर कहताहै किद्रव और भाई द्रव्यके फुडवकी भी दूना ग्रहण करे। अतएवोक्तम्- सपिःखण्डजलक्षातलक्षीरासवादिषु । अष्टोपलानिकुडवोनारिकेलेचशस्यते ॥ ऊपर कहे हुए मतके प्रमाणमें निश्चलकरने आयुर्वेदके आचार्योंका बचन दिखायाहै । यथा-धी खांड ( इक्षुजात ) जल, शहत, तेल दूध और आसव (मद्यविशेष) आदिके फुडवकी जगह ८ पल अर्थात् १ सेर ग्रहण करे । यह मतभी सब जगह नहीं माना जाता । यथा:-- अनित्यापरिभापेययथादर्शनमुच्यते । दन्तीकृतेकुगुमायेतैलेसावुपयूज्यते । ननारिकेलेखण्डेचनलेपलमुच्यते ॥ ऊपर कही हुई विधि केवल दन्तीपत और कुकुमाद्य तैलमेंही व्यव- हारकीजातीहै । इसके सिवाय नारियल, खांड और साधारणतेलके पाकमें चार पलसे एक कुडव ग्रहण करै । (आधसेर) इसका ममाण यथाः- कुडयेकदाचिद्वित्वंयवादन्तीपृतैस्मृतामिति । भात कुडवकोभी कहीं। दूना ग्रहण करना चाहिये । यथादन्ती घृतम फुडवका दूना होनेसे द्विगुण (८ पर ) ग्रहण करना ठीकहै । अनेनापिनिःसन्देहोनप्रतिपाद्यतेइति । यतोदन्तीपृतमात्रेद्वैगुण्यमस्ति, न सर्वत्र । कण्ठोत्या:कचिदितिपाठात् ॥ परंतु इस ममाणसे भी निःसन्देह होकर कुछभी ठीक नहीं किया - भापाटीकासमेत । (१३) मासंनागवलांसहाचरपुरोहिंग्याकेनित्यशः । ग्राह्यास्तत्क्षणमेवनद्विगुणितायवेक्षुजातागणाः ४९ "धनाइतिवापाठः।" वासक (विसोंटा) नीम, पटोल (परवल) केतकी, खरें- टी, पेठा, शतावरी सांठ, कुडा, असगंध, पसरन, गिलोय, मांस, गंगेरन, कटसरैया, गुग्गुलु, हींग, अदरख, और गन्ने- से उत्पन्न हुए द्रव्य ( खांड, गुड, चिनी और मिश्री आदि) सदां गीलेही, ग्रहण करे । इनका दुगना ग्रहण न करे. ॥१९॥ अन्यच्च। गुडूचीकुटजोवासाकूष्माण्डश्चशतावरी । जासकता । क्योंकि केवल दन्तीघृतमें कुडवसे दूना ग्रहण करनेकी विधि दिखाई देतीहै और कहीं नहीं । और " कुडवे कदाचिद्वित्वम् इत्यादिक पाठसे यही समझाजाताहै कि कहीं २ फुड़वसे दूना ग्रहण करना चाहिये। अत्रीच्यते। कुडवे माणिकायां तुलायां पलमानेचद्वैगुण्यं नास्तीति इस श्लोकसेभी मालूम होताहै कि कुड़व, माणिक, तुला और- पल जहांपर कहा है तहांपर दूना ग्रहण करना ठीक नहीं। कुडवेमाणिकायांचतुलामानेतयैवच । पलोल्लखागतेमानेनदैगुण्यमिहेष्यतइति । इस वचनसे स्पष्ट जाना जाता है कि कुड़व,माणिक, तुला, और पल जहां २ पर लिखा है, तहांपर दूना ग्रहण न करे। अतएवकुडवस्यनद्वैगुण्यंकिन्तुनिश्चलकर व्याख्या-दन्तीतरव, नान्यत्रेतिसंक्षेपः। इस कारण सिद्धान्त यह हुआ कि कुड़व दूना ग्रहण करना किसी मतमं ठीक नहीं निश्चल करने जो व्याख्याकी है सो केवल दन्तीकृत के लिये, और किसी औषधिके सम्बन्ध नहीं है। "

(१४) वैद्यकपरिभाषामदीप।
अश्वगन्धासहचरीशतपुप्पाप्रसारणी॥५०॥
प्रयोक्तव्यासदेवाद्विगुणानचकारयेत् ।
शार्ङ्गधरमतमेतत् ॥
गिलोय, कुडा, विसोंटा, पेठा, शतमूली, असगन्ध, फटस-
रैया, सोया, पसरन यह सब द्रव्य नये ( ताजे) और गीले
ही औपधिमें प्रयोगकरे । इनको दूना ग्रहणकरना ठीक नहीं ।
शाधिरका यह मतहै ॥ ५० ॥
अन्यच्चा
वासाकुटजकूष्माण्डशतपुष्पासहामृता ।
प्रसारण्यऽश्वगन्धाचनागाख्यातिवलावला॥११॥
नित्यमाद्रःप्रयोक्तव्यानतासांद्विगुणोभवेत् ।
हस्तीकर्णपलाशवाट्यालकगोरक्षतण्डुलाश्चैतत५२
दूसरा प्रकार कहा जाताहै, तथा विसौंटा, कुडा, पेठा,सोया,
गिलोय,पसरन,असगन्ध,गंगेरन कंघी,हस्तीकर्ण पलाश, खरेंटी,
सहदेई, चवलाई और गोरखमुण्डी इन सब द्रव्योंको सदागीला
ग्रहण करोइनको दूना ग्रहण करने का नियम नहीं है ॥५१॥५२।।
अथद्रव्याणामुपयुक्तानुपयुक्तमाह ।
शुष्कनवीनद्रव्यंचयोज्यसकलकर्मसु ।
आईञ्चद्विगुणंविद्यादेपसर्वत्रनिश्चयः ॥५३ ॥
योग्य और अयोग्य द्रव्यके विपयमें कहा जाताहै । यथा:-
नया द्रव्य सुखाकर सब प्रकारकी औषधि प्रयोगकरे ।
यदि उसफा गीला मयोग करना बहुतही आवश्यकही तो
योग्य परिमाणको बनिस्वत दूना प्रयोग करै । इसमतको
सब मानते हैं ॥ ५३ ॥

भाषांटीकासमेत (१५) अन्यच्च। द्रव्याण्यभिनवान्येवप्रशस्तानिक्रियाविधौ । ऋतेघृतगुड़क्षौद्रधान्यकृष्णाविडङ्गकम् ॥५४ ॥ दूसरे मतमें कहाहै कि घी, गुड, सहद, धनियां, पीपल और वायविडङ्ग इनके सिवाय और समस्त औषधिही चिकित्सा कार्यमें नवीन श्रेष्ठहैं घृतादि कई द्रव्य जितने पुरा. ने हों उतनेही अधिक फलदायकहैं ।। ५४ ॥ प्रसङ्गात्स्नेहादेर्गुणागुणमाह । स्नेहसिद्धोगुडादिश्वगुणहीनोऽन्दतोभवेत् । स्नेहायाःपूर्णवीर्याःस्युराचतुर्मासतःपरम् ॥ ५५॥ अब्दादूर्वघृतंपकंहीनवीर्यतुतद्भवेत् । तैलेविपर्ययविद्यात्पक्केऽपक्केविशेषतः॥५६॥ "तैलमत्रतिलभवनसर्पपादिस्नेहसामान्यपरम्।" स्नेहादिके (घृत तैलादि ) गुणागुणका वर्णन कियाजाताहै। स्नेहादिमें पके हुऐ गुड़ादि एक वर्ष पीछे वर्यिहीन होजा- तैहैं । स्नेहादि ( पकाहुआ तेल ) चार मासके पीछे पूर्ण वीर्य- को प्राप्त होताहै । पकाहुआ घी एक वर्षके पीछे वीर्यरहित हो जाताहै । पका, वेपका दोनों प्रकारका तेलही जितना पुराना होगा, उतनाहीं अधिकफलदायक होगा ऐसा नियम केवल तिलके लिये है, सरसों आदिके साधारण तेलमें यह नियम उचितनहीं ॥ ५५ ॥ ५६ ॥ गुणहीनभवेद्वदूर्वतद्रूपमौषधम् । मासद्वयात्तथाचूर्णहीनवार्यत्वमाप्नुयात् ॥२७॥ अन्यच्च।

(१६) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । हीनत्वंगुटिकालेहौलभेतवत्सरात्परम् । होनाः स्युर्घततेलायाश्चतुर्मापाधिकास्तथा ॥५८॥ औपध्योलघुपाकाःस्युर्नवीर्यवत्सरात्परम् ॥ पुराणाःस्युर्गुणैर्युक्ता आसवं धातवोरसाः ॥ ५९॥ स्नेहादिका वर्णन दूसरी प्रकारसे किया जाताहै । एक वर्षके पीछे साधारणतः प्रायः किसी औपधि मेंही वीर्य हीन रहता । चूर्णकी हुई औपधि दो मासके पीछे वीर्यहीन होजातीहै । गोलियें, लड्डू और अवलेह एक वर्षके पीछे हीर्यरहित होजातीहैं। चार मासके पीछे घी और तैलादि वीर्यरहित होतेहैं । पाकेमें हलकी समस्त औपधियें भी एक वर्षके पीछे वीर्यरहित हो जाती हैं । आसव (मद्यविशेष) धातु द्रव्यादि और पारा यह जितने पुराने हों उतनेहीं अधिक गुणदायकहैं ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ ५९ ।। शाङ्गधरेणैवोक्तम् । व्याधेरयुक्तंयव्यंगणोक्तमपितत्त्यजेत् । अनुक्तमपियुक्तंयद्योजयेत्तत्रतद्बुधः॥६॥ १ हीनाःस्युर्घततैलाद्याइतितेलमत्रकटुतलकम् । तनिष्पादितदशमूलतैलादिचज्ञेयंनान्यत् ॥ इस श्लोकफी व्याख्याले यह निश्चय किया जाताहै कि ऊपरके लोकका तात्पर्य कि चार मासके पीछे घृत तैलादि हानवीर्य होजाते ई-केवल कटुतैल (सरसोंका तेल) से उत्पन्नहुए (दशमूलतैलादि) पके तेलके सम्बन्धी जानना । अब्दादूपृतपर्फहीनवीयत्वमामुयात् । तैलेविपर्ययविद्यापके पकेविशेषतः॥ इतिवचनात् ॥ अपरका मत टीक नहीं है । एकवर्षके पीछे घृत होनवीर्य होजाताहै, तेल इस्से विपरीत है। भर्थात तेल (सरसके पकेदुए तेलके सिवाय) एकपके पीछे अधिक गुणकारक होताहै।

भाषाटीकासमेत।
(१७).
रोगके लिये जो द्रव्य अयोग्यहै वह द्रव्य यदि गणम
कहाहो तो उसको ग्रहण न करे।और रोगके लिये द्रव्य योग्य
है, वह यदि गणमें न लिखाहो, तो बुद्धिमानको विचारके
साथ उसका प्रयोगकरना चाहिये ॥ ६० ॥
अथ प्रशस्तदेशजद्रव्यमाह।
आग्नेयाविन्ध्यशैलाया सौम्यो हिमगिरिम॑तः ।
ततस्तान्यौपधानिस्युःप्रशस्तानिक्रियाविधौ ६१॥
विन्ध्यादि पर्वत आमेय गुणवालहैं और हिमालयादि
पर्वत सोमगुणवाले हैं । इन दोनों स्थानों में उपजी हुई
औषधियों में भी तैसेही गुणहोंगे । अत एन आमेय गुण
बढ़ानेके लिये विन्ध्यादि पर्वतकी और 'सोमगुण बढ़ाने के
लिये हिमालयादि पर्वतकी उत्पन्न औषधिही चिकित्सामें
श्रेष्ठहै ॥ ६१॥
अन्येप्वपिप्ररोहन्तिवनेपूपवनेषुच ।
गृह्णीयात्तान्यपिभिपग्वनेशैलेविशेपतः॥१२॥
इन पर्वतोंके सिवाय वन उपवनके और पवित्रस्थानों में
जो औपधादि उत्पन्न होतीहैं, तिनकोभी चिकित्सक ग्रहणकरे।
परन्तु पर्वती औपिधि सबसे श्रेष्ठहै ॥ ६२ ।।
अन्येप्याहुः।
धन्वसाधारणेवापिहीयादुत्तराश्रितम् ।
पूर्वाश्रितवामतिमानौपचंतद्विचक्षणः ॥ ६३ ॥
धन्वदेश (मरुभूमि और जांगलदेश) और साधारण
देशोंमें जो औपधादि उत्पन्नहोतीहै, चतुर वैद्यको उचितहै,
कि उत्तर दिशा या पूर्वदिशासे तिनको ग्रहणकरे ॥ ६३ ॥

(१८) वैद्यकपरिभापाप्रदीप । अन्यच्चा धन्वसाधारणेदेशेमुदावृत्तरतःशचौ । अवैकृतमनाकान्तंसवीर्यग्राह्यमौषधम् ॥ ६ ॥ धन्वदेश और साधारणदेशोंके पवित्र स्थानों में जो औपधि- यां उत्पन्नहोतीहैं सो अविकृत ( स्वाभाविक) और कीडे आदि- की खाई हुई न हो, ऐसा देखकर, वीर्यवाली औपपि महण फरै ॥ ६४ ॥ अत्र निषेधमाह। देवतालयवल्मीककूपराख्याःश्मशानजाः । अकालतरुमूलोत्थान्यूनाधिकविचिन्तना॥ जलागिकिमिसंक्षुण्णाओपध्यस्तुनसिद्धिदाः॥६५ जिन स्थानोंसे औपधि ग्रहण करनेका निषेध है सो कहा जाताहै यथा-देवालय और मईके ऊपर जमीहुई, कूरमेंजमी हुई मार्गके निकट जमीहुई, मसानमें उत्पन्न हुई और वृक्षकी जडमें जमीहुई औपधियोंको ग्रहण न करे।अकालमें उत्पन्नहुए वृक्ष ( उत्पन्न होने के समयको छोडकर और समय उत्पन्न हो) अपने आकारसे कहीं छोटे वृक्ष, वडे अथवा बहुत समयमें उत्पन्न हुई और जल अमि व कीटादि करके दूसरी अव- स्थाको प्राप्त हुई औपधियोंकी चतुर वैद्य ग्रहण न करे क्योंकि यह फलदायक नहीं होती ॥ ६५ ॥ पल्मीककृत्सितानूपश्मशानोपरमार्गजाः। जन्तुवह्निहिमव्याप्तानोपध्याकार्यसाधिकाः ॥६६॥ "धन्यः देशविशेषः" मपभूमिजाइलयोः संसृष्टलक्षणोदेश इमियात् धन्यदेश शन्दसे मरभूमि और जांगलंदश यह दोनोंदी समाजाते। अन्यच्च।

: भाषाटीकासमेत। (१९) वंमईके ऊपर, कुत्सितस्थानमें, जलजदेशमें, श्मशानमें खारीस्थानमें या मार्गके निकट जो औषधियां उत्पन्न होती हैं, और जो कीडे, आग और शिशिर ( शीत) से सताई गई हैं सो औषधिय फलदायक नहीं होती । इस कारण ऐसे स्थानोंकी औषधियोंका ग्रहण करना ठीक नहीं ॥६५॥ अथभेपजोद्धारणमंत्रभूतापसारणश्च । ॐनिवसन्तिहिभूतांनियान्यस्मिन्कानिचद्रुमे । अपकामन्त्वतस्तानिप्रजार्थपाट्यतेद्रुमः ॥ ६७॥ ॐवेतालाश्चपिशाचाश्चराक्षसाश्चसरीसृपाः। येभूतास्तेऽपसर्पन्तुवृक्षादस्माच्छिवाज्ञया ॥६८॥ औषधि उखाडनेके पहले ऊपर कहाहुआ "ऑनिवस. न्तिहि" इत्यादि मंत्र पढे । उस मंत्रका अर्थ:-इस वृक्ष पर वेताल, पिशाच, राक्षस, सादि जिस प्रकारके प्राणी रहतेहैं वह शिवकी आज्ञाके अनुसार इस वृक्षसे, अलग हों क्योंकि यह वृक्ष जीवोंका रोग दूर करने के लिये उखाडताहूं॥६॥६८॥ अथोद्धारणमंत्र । ॐयेनत्वांखनतेब्रह्मायेनेंद्रोयेनकेशवः । तेनाहत्वांखनिष्यामिमंत्रपूतेनपाणिना ॥ ६९ ॥. औषधि तोडनेके समय ऊपर कहाहुआ मंत्र पढे इस मंत्रका अर्थ यह है कि:-जिस निमित्त तुमको ब्रह्मा, इन्द्र और केशवादिने जो पवित्र हस्तसे मंत्रपढकर उखाडाहै, मैं भी उसी हायसे तुमको मंत्र पढकर उखाडताहूं ॥ ६९ ॥ भूतादिमुक्तयेभ्यर्च्यसायंप्रातश्चसम्मुखे । श्राद्धरुपोपितरंभेपकर्मकृद्भवत् ॥७॥ 1

(२०) वैद्यकपरिभापानदीप ।
जो वैद्य उपवासी रहकर सन्ध्या अथवा प्रातःकालमें शि.
वकी पूजाकरकं पितृगणोंका पार्वणादि श्राद्धकार्य करने के
पीछे औपधि लावै तो वह औपधविशेप फलदायक
होती है ॥७॥
अथोपधद्व्याङ्ग्रहणमाह ।
सारस्यात्खदिरादीनांनिम्बादीनांचवल्कलम्
फलन्तुदाडिमादीनांपटोलादेश्छदस्तथा ॥७१॥
खयरादिका (लालचन्दन, श्वेतचंदन, देवदारू आदिका)
सार, नीम आदिकी (वेल,श्योनाक, गम्भारी आदिकी) छाल
दाडमादिक फल, और परवल आदिके पत्र ग्रहण करने
चाहिये ॥ ७१ ॥
शार्ङ्गधरस्त्वाह ।
न्यग्रोधादेस्त्वचोग्राह्याःसार स्याद्रीजकादितः।
तालीसादेश्वपत्राणिफलंस्यात्रिफलादितः॥७२॥
"न्यग्रोधः वट:
वट, पीपल आदि वृक्षोंकी छाल, विजय सारादि वृक्षका
( खैर, चंदनादिक) सार,ताडादिक पत्र और त्रिफला आदिके
फल ग्रहण करे । शार्ङ्गधरका यह मत है ॥ ७२ ॥
-
11
अन्यञ्च ।
महान्तियानिमूलानिकाप्टग नियानिच ।
तेपान्तुवल्कलंग्राह्यह्रस्वमूलानिकृत्स्नशः ॥७३॥
जिन वृक्षोंकी मूल, स्थूल, (मोटी ) है और जिनके भीतर
सारवान फाष्ठ है तिनका वफल ग्रहण करे । छोटे वृक्षफी
जडफ भीतर सार नहीं है वह सबही, अर्थात् मूल, पत्र
और पादे सहित ग्रहण करले ॥ ७३ ॥

{ भाषाटीकासमेत। (२१) अन्यञ्च। अतिस्थूलजटायाश्चतासांग्राह्यास्त्वचोध्रुवम् । गृह्णीयात्सूक्ष्ममूलानिसकलान्यपिबुद्धिमान्॥७४॥ जो वडे वृक्ष बडी जडवाले हैं, तिनकी छाल और जो वृक्ष छोटे हैं तिनको सम्ल ग्रहण करले ॥ ७ ॥ निर्देशःश्रूयतेतन्नद्रव्याणांयत्रयादृशः। तादृशःसंविधातव्याशास्त्राभावप्रसिद्धतः ॥ ७५ ।। औषधि ग्रहण करनेके विषयमें शास्त्रने जिस स्थानमें जैसा अंग ग्रहण करनेकी विधि लिखी है, वहांपर उसको ही ग्रहण करे ॥ ७५ ॥ व्याधिप्रशमनेपूर्वज्ञापितानिपृथग्जने । विस्फारितान्यौपधानिपश्चाद्राजनियोजयेत् ॥७६॥ रोगको दूर करनेवाली औषधि नवीन तैयारहो, तो पहला उसका व्यवहार साधारण लोगोंको कराकर परीक्षासे गुण औ- गुण जान तिसके उपरान्त राजाओंको व्यवहार करावे ॥१६॥ १ अस्याः यत्र यव द्रव्येषु अद्भानामवयवानां यादृशो निर्देशः श्रूयते तादृश एव ग्राह्यः । यथा अमृतादिपाचने- " अमृताविषपटोलनिम्ब- पत्रमिति" भत्र पत्रमेव ग्राह्यम्।न वल्कलम्।पत्रस्य कण्ठोक्तत्वात् । अंग- सामान्योक्तौ मूलस्य वल्कलेनैव व्यवहार इति गुरवः । अंगेप्यनुक्ते विहितन्तु मूलमिति वचनात् । अर्थात् शास्त्रमें जिसस्थानपर जैसी विधि कहींहै, वहांपर वही ग्रहणकरना । पहले कहे हुए वचनके अनुसार समस्त कार्य सिद्ध नहीं होता । जैसे अमृतादि पाचनमें नीमके पत्ते लिखेहैं, यहांपर निश्चय छालको ग्रहण नकरके पत्रही ग्रहण करे। औषधि ग्रहण करने में यदि किसी स्थानमें भंग छालमूलादि) नकहे हो तिसस्थानमें गुरु उप- देशके अनुसार कार्य करे । २" पृथग्जने " इति जनान्तरे । ३"विस्फारितानि" विशेषग स्फूतानि । .

(२२) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। तद्यथा- " गोपालतापसव्याधमालाकारवनेचरान् । पृष्ट्वानामानिजानीयाद्भपजानांचशास्त्रतः ।। ७७ । औपधिका नाम नजाना हुआहो तो गोपाल, त५५ व्याध ( शिकारी ), माली, कुली लोगोंसे पूछ कर" औषधिका नामजाने ।। ७७ ।। विषयभेदेऋतुद्रव्यग्रहणम् । शरद्यखिलकम्मर्थिग्राउंसरसमौपधम् । विरेकवमनाथचवसन्तान्तसमाहरेत् ॥ ७८ ॥ सब प्रकारको औपधिके लिये सरस औषध शरत्कालमें, और यमन, विरेचनके लिये प्राप्मकालमें ग्रहण फरे ॥ ७८ ॥ अय ऋतुभेदे द्रव्यागग्रहणमाद । मूलानिशिशिरेग्रीप्मेपनवर्यावसन्तयोः । त्वकन्दोशरदिशारंयथर्तकुसुमंफला:

भोपाटीकासमेत। (२३) अय सामान्योक्तीद्रव्यग्रहणमाह । पात्रोक्तौचापिमृत्पात्रमुत्पलेनीलमुत्पलम् । शकृद्रसेगोमयरसंचन्दनरक्तचन्दनम् ।। ८० ॥ सिद्धार्थःसर्पपेग्राह्योलवणेसैन्धवंमतम् । मूत्रेगोमूत्रमादेयंविशेषोयत्रनरितः ॥ ८३ ॥ पयःसार्प प्रयोगेपुगव्यमेवप्रशस्यते । स्त्रियश्चतुष्पदेग्राह्या पुमांसोविहगेपुच ॥ ८२ ॥ जाङ्गलानांवयस्थानांचर्मरोमनखादिकम् । हित्वाग्राह्यंपूतमासंसास्थिकखण्डशकृतम् ॥८॥ पक्तव्यमाजमांसंचविधिनाधृततैलयोः। हित्वास्त्रीपुरुपंचापिक्कीवंतत्रापिदापयेत् ॥ ८ ॥ वलिनञ्चवयस्थञ्चसुवीर्यञ्चसुदेहिनम् ।। नवृद्धञ्चनवालञ्चअवीर्यस्रावशोणितम् ॥ ८५ ॥ भलीभांतिसे पात्र नकहागयाहो तो मिट्टीका वनाहुआ पात्र ग्रहणकरे । उत्पल शब्दसे नीलोत्पल ले जहांपर शकृत्रस ( मलकारस) वहांपर गोवरका रस, और जहांपर चन्दन लिखाहै वहांपर लालचन्दन ग्रहणकरे । सर्पप शब्दसे सफेद सरसों, लवण शब्दसे सेंधानोन, जहां पर मूत्र लिखाहो वहां- पर गोमूत्र ( सप्रसवा स्त्रीजातिका ) ग्रहणकरे। दूध और घी बहुत जड़े होतीहैं अयवा जड़कास्थान गोलाकार और बड़ा होताहै तिसको कन्द कहते हैं, जैसे चिता शतावरी आदि बहुत जड़वाली और जिमीकंद व विदारीकंद भादि गोलाकार युक्त बड़े होतेहैं। १ परन्तु चूर्ण, लेह, आसव और स्नेह बनानाहो तो तिसके स्थानमें खेत चन्दन ग्रहण करना चाहिये। काढ़े और लेपके विधानमें लालचं- न्दनको ग्रहणकरे यथा- (२२) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। तद्यथा- लोगोंसे पूछ गोपालतापसव्याधमालाकारवनेचरान् । पृष्ट्वानामानिजानीयाद्भपजानांचशास्त्रतः॥७७ ॥ औपधिका नाम नजाना हुआहो तो गोपाल, तपस्वी, व्याध (शिकारी ), माली, कुली औपधिका नामजाने ॥ ७७ ॥ विषयभेदेऋतुद्रव्यग्रहणम् । शरद्यसिलकम्मर्थिग्राउंसरसमौपधम् । विरेकवमनार्थचवसन्तान्तसमाहरेत् ।। ७८ ॥ सब प्रकारकी औपधिके लिये सरस औषध शरत्कालमें, और वमन, विरेचनके लिये ग्रीष्मकालमें ग्रहण करे ॥ ७८ ॥ अय ऋतुभेदे द्रव्यागग्रहणमाह । मूलानिशिशिरेग्रीष्मेपत्रंपर्यावसन्तयोः। त्वकन्दोशरदिक्षीरंयथर्तुकुसुमंफलम् ॥ हेमन्तेसारमापध्याग्रहीयात्कुशलोभिपक्॥७९॥ अस्याः। यति यस्मिन् कती पद्यत् पुप्पं फलश्च भवति तस्मिनेय तत्राग्राह्यमित्यर्थः॥ चतुर पैयफो चाहिये फि शीतकालम मूल, ग्रीष्मकालमें पत्र, वाफालमें बमल, पसन्तफाली फन्द ( मूलविशेष) शरवकालमें निवास (गोंद) और हेमन्त कालमें सार ग्रहण करे। मिस वृक्षका फल पल जिस में उत्पन्न होये, उसको टसी मनु महणरे ॥ ७९ ।। गट र पदम भेद पर है फि भिर शमं एक गट होतीद विसमा गए परत पथा-राएना भारंगी आदि। भौर मिन शाम भोपाटीकासमेत। (२३) अथ सामान्योक्तौद्रव्यग्रहणमाह । पात्रोक्तौचापिमृत्पात्रमुत्पलेनीलमुत्पलम् । शकृद्रसेगोमयरसंचन्दनरक्तचन्दनम् ॥ ८० ॥ सिद्धार्थःसर्पपेग्राह्योलवणेसैन्धवंमतम् । मूत्रेगोमूत्रमादेयंविशेपोयत्रनरितः ॥ ८३ ।। पयःसार्पःप्रयोगेपुगव्यमेवप्रशस्यते । स्त्रियश्चतुष्पदेग्राह्याम्पुमांसोविहगेपुच ॥ ८२ ॥ जाङ्गलानांवयस्थानांचर्मरोमनखादिकम् । हित्वाग्राह्यंपूतमासंसास्थिकखण्डशःकृतम् ॥८३॥ पक्तव्यमाजमांसंचविधिनाघृततैलयोः। हित्वास्त्रीपुरुपंचापिक्कीवंतत्रापिदापयेत् ॥ ८४ ॥ पलिनञ्चवयस्थञ्चसुवीर्यञ्चसुदेहिनम् ॥ नवृद्धञ्चनवालञ्चअवीर्यस्रावशोणितम् ॥ ८५ ॥ भलीभांतिसे पात्र नकहागयाहो तो मिट्टीका वनाहुआ पात्र ग्रहणकरे । उत्पल शब्दसे नीलोत्पल ले जहांपर शकृत्रस ( मलकारस) वहां पर गोवरका रस, और जहांपर चन्दन लिखाहै वहांपर लालचन्दन ग्रहणकरे । सर्पप शब्दसे सफेद सरसों, लवण शब्दसे सेंधानोन, जहां पर मूत्र लिखाहो वहां- पर गौमूत्र (सप्रसवा स्त्रीजातिका ) ग्रहणकरे । दूध और धी चहुत जड़े होती अथवा जड़कास्थान गोलाकार और बड़ा होताहै तिसको कन्द कहते हैं, जैसे चिता शतावरी आदि पहुँत जड़वाली भौर जिमीकंद व विदारीकंद आदि गोलाकार युक्त बड़े होतेहैं। १ परन्तु चूर्ण, लेह, भासव और स्नेह यनानाहो तो तिसके स्थानमें खेत चन्दन ग्रहण करना चाहिये। काढ़े भार लपके विधानमें लालचं- न्दनको ग्रहणकरे यथा:- (२४) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । लिखाहै तो वहांपर गायका दूध और गायका घी ग्रहणकरे । चौपाये पशुओम मादा, और पक्षीजातिमें नरको ग्रहणकरे । जंगली पशुओंमें मध्यम उमरवालोंको ग्रहणकरे । और चर्म रोम व नखादि व्यवहार न करने योग्य द्रव्यादिको छोड़कर हड्डीके सहित मासके टुकडे २ करले । घृत और तेलके पाक सम्बंधमें विधिपूर्वक छागका मांस ग्रहण करनाहो तो नरव मादा जातिको छोडकर बलवान, मध्यम उमरवाला, वीर्य- पान और श्रेष्ठशरीरवाला क्लीव (नपुंसक-सस्सी) जाति ग्रह- णकरे। वृद्ध, कम उमरका , वीर्यहीन. यारक्तस्रावका, या जिसमें किसीमकारका दोपही तिसको ग्रहण करे ॥ ८५ ॥ काशीराजमतेनैवछागमेवनपुंसकम् । अभावादप्रतिज्ञाद्वावृद्धवैद्योपदेशतः ॥ चन्ध्याछागीविपक्तव्यानतुशास्त्रमतंचरेत् ॥ ८६ ॥ चूर्णलहासवस्नेहाःसाध्याधवलचन्दनः । फपायलेपयोःप्रायोयुज्यतेरक्तचन्दनम् ॥ भावमकाशे ॥ एतबेतुगर्भ विशेषणम् । असन्धिस्तु छान्दसः। अथवा न वीर्यम् अवीर्यम् अल्पायनम् तेनाल्पशुकम् । अतएव काशीराजाभिप्रायेण नपुंसकस्य विधिना सूचितमेव, दशरोरारम्भकारवादल्पवीर्यत्वं वीर्यम- सयेर इत्यर्थः । अतः सावशोणितायारछाग्यास्वनुपयोगित्वम् । अर्थादनावशोणिताया ग्राह्या इत्यर्थः । स्त्री प्रकाया बन्ध्या छाया भ- खावशोणितात्वमस्त्येव तस्माद्वन्ध्या छाग्यपि योज्या इति नपुंसक- भाषादनुशासनात् ॥ २ अभावादिति नपुंसकस्य अलाभात् । अथवा नपुंसकस्य वीर्याभा- यात् यमस्ति न घेति काकदन्तयत् । अप्रतिज्ञाद्राशास्त्रमिति शास- नम् भाडा । काशीराजमतेनैवेत्यादिरूपेण ॥ केचित्तु कृत्रिमनपुंसक- मपि ददति । तदसत्तनु प्रकृतिश्च पुरुषएव । ननु बन्ध्याया नपुंसकस्य च छागस्प अपापजनकारयं नास्ति, तत्काथमपत्यकामिनः प्रवर्तन्ते छा- .

भापाटीकासमेत। काशिराजका मतहै कि छाग. जातिका नपुंसक ग्रहणक- रना चाहिये । नपुंसक छाग नहो अथवा प्रतीक्षा (विलम्ब) करनेंका समय नहीं तो वृद्ध वैद्यके टपदेशके अनुसार वांझ- झागी करके पाकका कार्य पूराकरे । परन्तु आयुर्वेद शास्त्र इससे सम्मत नहीं है । नहोतमही ऐसा करना चाहिये ॥८६॥ शृगालबहिणोःपाकेपुमांसंतत्रदापयेत् । मयूरीजम्बूकीछागीवीर्यहीनास्वभावतः॥ ८७ ।। शृगाल और मोरके मांससे पृतं तेलादि पाक करनाहो तो नरजातिका मांस ग्रहण करना चाहिये। क्यों कि मोरनी, गाली, और भेट यह स्वभावसही वीर्यहीन होतीहै । ८७ ॥ स्त्रीणांमूत्रंगवांतीक्ष्णंनतुपुंसांविधीयते । पित्तात्मिकाःस्त्रीयोयस्मात्सौम्यास्तुपुरुपामताः ॥ क्षीरसूत्रपुरीपाणिजीर्णाहारेतुसंहरेत् ॥ ८८॥ गायका गोमूत्र ग्रहण करना चाहिये । परन्तु अनयानी गायका मूत्र महण करना ठीक नहीं । वैलका मूत्र ग्रहण नकरे क्योंकि स्त्रीजातिका मूत्र आमेयत्वके हेतु करके तोरण और नरजातिका मूत्र सोमगुणयुक्त होताहै । दूध, मूत्र और पुरीप (मल) आहार पचनेंके अन्त में ग्रहणकरे ॥ ८८॥ भयानुक्तद्रम्पग्रहणन् । कालेनुक्तेप्रभातस्यादनेनुक्तेजटाभवेत् ।। ८९ ॥ गलादिप्तादिषु पदाचित् क्रिपासिद्धरभावः स्पाइवभिन्यम् ।। भपाद कानारानका उपर कहा हुआ मत केवल भभावक पदी है। कोई फाई कृत्रिम नपुंसकके द्वारा पृतवेदादिका पाक बनाया करते, परल्नु पद यत्तिसिद्ध नहीं है। क्योंकि यह प्रतिसे पुरपनातीपद वैद्यकपरिभापाप्रदीप। भागेऽनुक्तेनुसाम्यस्यात्पात्रेऽनुक्तेतुमृन्मयम् ॥ द्रवेऽनुक्तेजलंविद्यात्सर्वचैपविनिश्चयः ॥९॥ काल न कहाहो तो प्रातःकाल,औपधिका अंग न कहाहो तो मूल, भाग न कहाहो तो समभाग, पात्र न कहाहो तो मिट्टी- का बनाइआ पात्र और द्रव द्रव्य न बतलायाहो तो तिसके स्थानमें सब जगह जल ग्रहणफरे ॥ ८९ ॥९॥ अथाभावेदव्यग्रहणम् । मधुयबनविद्येततत्रजी|गुडोमतः। पुरातनगुडाभावेरौद्रेयामचतुष्टयम् ॥ ९ ॥ संशुप्यनूतनंग्राह्यपुरातनगुडैविना। क्षीराभावभवेन्मौगोरसोमासूरएक्वा ।। ९२ ॥ मधुके अभावमें पुराना गुड ग्रहणकरे । पुराना गुड नहो तो नया गुड चार प्रहर तक धूप में सुखाकर प्रयोग करे । दूध न होतो मूंग अथवा मसूरके जूसको ग्रहण करे ॥ ९१ ॥१२॥ सिताभाषेचखण्डःस्याच्छाल्यभावेचपष्टिकः। असम्भवेचद्राक्षायागम्भारीफलमिप्यते ॥ १३ ॥ नभवेदांडिमोयत्रवृक्षाम्लंतत्रदापयेत् । सौराष्ट्रमृदभावेचग्राह्यापङ्कस्यपर्पटी ॥१४॥ नतंतगरमूलंस्यादभावेशीहलीजटा । प्रयोगेयबलौहास्यादभावेतन्मलंविदुः ।। ९५॥ सर्पपाशुकवर्णीय सहिसिद्धार्थउच्यते । तनसिद्धार्थकाभावे सामान्यःसर्पपोमतः॥९६॥ बुरा न होती खांड,शालिधान्य नही तो सही धान्य,दाखके भापाटीकासमेत। (२७) अभावमें गम्भारी फल, दाडिमके अभाव में विपामिल, सौरा- ट्रकी मिट्टीके अभावमें पंकपपडी ग्रहण करे, तगरकी जडके अभाव में शोहलीजटा और लोहके अभावमें लौहमल ग्रहण करे । श्वेत सरसोंको सिद्धार्थ करते हैं, इस सिद्धार्थका अभावहो तो इसके बदले में साधारण सरसों ग्रहण करे ॥ ९३ ॥१४॥९५॥ ९६॥ चविकागजपिप्पल्यो पिप्पलीमूलमेवच । अभावपिप्पलीमूलंहस्तिपिप्पलिचव्ययोः ॥९॥ अभावपृश्निपाश्चसिंहपुच्छीविधीयते । नित्यमुझंतिकाभावेतालमस्तकमिष्यते ॥ ९८॥ चव और गजपपिलके अभावमें पीपलामूल ग्रहण करे पीपलामूलके अभावमें गजपीपल, पिठवनके अभावमें शाल- पर्णी (सरिवनः) और मुंजतिका (मूंज ) के अभावमें ताल- मस्तक ग्रहण करे ।। ९७ ।। ९८ ॥ कमस्याप्यभावेऽपिनिशाग्राह्याभिपग्वरैः। मुक्ताभावेशङ्खचूर्णवजाभावेवराटिका ॥ ९९ ॥ कर्कटशृङ्गकाभावमायाम्बुचेष्यतेबुधैः । धान्यकाभावतोदद्याच्छतपुष्पांभिपग्वरः॥१०॥ वाराहीकन्दकाभावचर्मकारालुकोमतः । मूर्वाभावत्वचोग्राह्यार्जिगिन्यात्रुवतेसदा॥ १०१॥ (१)पाठान्तरमेतद, न पुनरक्तदोषः । (२)"सिंहपुच्छी"शालपणी । (३)मजुफलमिति केचित् । (४) तालसदृशवृक्षः स्पाद, सच देशान्तरे ख्यातः ॥ (५) कपंङ्गिकाभाचे मायाम्बुजामिप्यते इतिपाठान्तरम् । .

(२८) वैद्यकपरिभापाप्रदीप। कुडुमके अभाव में कच्चीहलदी, मुक्ताके अभावमें शंखचूर्ण, होरेके अभावमें वैक्रान्त ( मणिविशेप चुम्बक) कांक- डा,गीके अभावमें मायाम्बुवीज (माजूफल केबीज) धनिये- के अभावमें सोया, वाराहीकन्दके अभावमें चमारआलु, और मुरहरीके अभावमें भिङ्गीनी वृक्षका वक्कल ग्रहण करे ॥ ९९ ॥ १०॥ १०१॥ अभावात्पौष्करमूलेकुष्ठसर्वत्रगृह्यते । सामुद्रसैन्धवाभावेविडम्बागृह्यतेबुधैः ॥ १०२ ॥ : कुस्तुम्बुरुनविद्येतयत्रतत्रचधान्यकम् । पुष्पाभावेफलंचामविड्भेदेविल्वतःफलम्॥१०३॥ यथ्याह्वाभावतोविद्याच्चव्यंतस्याप्यभावतः । मूलंमोपलिकंदेयमभावेकुटजस्यच ॥ १०४॥ रानाभावेचवन्दाकंजीराभावेचधान्यकम् । तुम्बुरूणामभावेऽपिशालिधान्यंप्रकीर्तितम्॥१०५ पुष्करमूलफे अभावमें सब जगह कूट महणकरे, सेंधानो- नफे अभावमें समन्दरनोन, कुस्तुम्बरु ( गीलाधनियां कच्चा धनियां )के अभावमें धनिया, पुष्पके अभावमें कच्चाफल और मलका भेद होनेपर चिल्वफल ग्रहण करे । मूलहठीके अभावमें कुडाके अभावमें मुसलीकी जड़, रानाके अभावमें चन्दा (वृक्षके ऊपर वृक्ष) जीराके अभावमें धनिया और तुम्बरुके अभावमें शालिधान्य ग्रहण करे ॥ १०२॥१०३॥१०४॥१०५॥ भल्लातकासहत्त्वेतुरक्तचन्दनमिप्यते । भल्लाताभावतश्चियनलश्चेशोरभावतः। मद्याभावेचशिण्डाकीशुत्त्यभावेचकाभिकम्१०॥ भिलाफ अभावमें चित्रफ, या लालचन्दन, गनेके अभा- चव मापाटीकासमेत। (२९) वमे नल, मद्यके अभावमें शिण्डाकी (सन्धान-भेद) और तेज- शरावके अभाव में कांजी ग्रहण करे ॥ १०६ ।। चित्रकाभावतोदन्तीक्षार शिखरिजोऽथवा ।। अभावेधन्वयासत्यप्रक्षेप्यातुदुरालभा॥ १०७ ॥ अहिंस्रायाअभावेतुमानकन्द प्रकीर्तितः॥ लक्षणायाअभावेतुनीलकण्ठशिखामतां ।।३०८॥ विताके अभावमें दन्तीमूल अथवा चिरचिटेका क्षार, जवासके अभावमें दुरालभा(जवासा), अहिंसा (कण्टकपाली) फे अभावमें मानकन्द ( मालकन्द ), श्वेतकटेरीक अभावमें मयूरपुच्छ ग्रहणकरे ।। १०७ ॥ १०८॥ वकुलाभावतोदेयंकल्लारोत्पलपंकजम् । नीलोत्पलत्याभावेतुकुमुदंदेयमिप्यते ॥ १०९॥ जातीपुष्पंनयत्रास्तिलवङ्गंतत्रदीयते । अर्कपर्णादिपयसोह्यभावेतद्रसोमतः ॥ १०॥ पौष्कराभावतःकुष्टतथालाङ्गल्यभावतः। स्थाणेयकस्याभावेतुभिपग्भिीयतेगदः॥ ११॥ वकुलके अभावमें कल्हार, उत्पल और पद्म ग्रहण करे । नीलोत्पलके अभाव में बबूला, चमेली फूलके अभावमें लोंग, आगादिका दूध नहो तो तिनके पत्रोंका रस ग्रहण करले । पुष्करमूलके अभावमें कूद, वाकुचीके अभावमें ककरोदाका फल, लाङ्गली (कारहारीकाविष) और गंठीलेके अभावभी वैद्यलोग कूटका व्यवहार फरा करते हैं ॥ १०९॥११०॥१११॥ (१) "भिरारी" अपामार्गः । चिरचिटा (२)नीलकंट शिसा 'मोरकी पंछ ।

(३०) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । कुंकुमाभावतोदयात्कुसुम्भकुसुमनवम्। (द्विपाठः) श्रीखण्डचन्दनाभावे कर्पूरंदेयमिप्येत ।। ११२ ।। अभाववतयौवैद्य प्रक्षिपेद्रक्तचन्दनम् । रक्तचन्दनकाभावेनवोझीरंविदुर्बुधाः ॥ ११३ ॥ मुस्ताचातिविषाभावेशिवाभावेशिवामता । अभावनागपुष्पस्यपद्मकेशरमिष्यते ॥११४ ॥ मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्देऽपिवासति । . वरीविदार्यश्वगंधावाराहीच क्रमावक्षिपेत् (११५) कुंकुमके अभावमें कसूमके नये फूल और श्रीखण्डचन्दनके अभावमें कपूरके देनेका विधान है। यह दोनों नहीं तो वैद्य लालचन्दनका प्रयोगकरे । लालचन्दननहो तो वैयोंको चाहिये कि खसको ग्रहण करे । अतीसके अभावमें नागरमोथा, हरके अभावमें आमला, और नागकेशरके अभावमें पद्मकेशरका व्यवहार करना चाहिये. मेदा, जीवक, काफोली, ऋद्धि और वृद्धि इनके अभावमें क्रमानुसार शतावरी, विदारीकंद, अस- गंध, और वाराहीकन्दका प्रयोगकरे । अर्थात् मेदके अभावमें शतावरी, जीव अभावमें विदारीकन्द, काकोलीके अभावमें असगंध और ऋद्धि वृद्धिके अभावमें वाराहीफन्द (चमार- आलू) ग्रहणकरे ॥ ११२ ॥ ११३ ॥ ११४ ॥ ११५ ॥ १ वाराहीफन्दसंज्ञन्तुपश्चिमेगृष्टिसंज्ञफः। वाराहीकन्दएवान्यैश्चमकारालफोमतः ॥ अनूपसम्भवेदेशेवराहइवलोमवान् ॥ भावप्रकाशे । अयात् पधिमदेश चाराहीकान्दको गंठी कहते हैं, पूर्वकी ओर चमारमालूक नामले प्रसिद्ध है। यह भानुप (जलीप ) देशमें जन्म- ताह शुकरवसे रोम इसपर होते ह।

भापाटीकासमेत! सुवर्णाभावतःवर्णमाक्षिकंप्रक्षिपेधः। श्वेतंतुमाक्षिकंज्ञेयंबुधैरजतवद्धवम् ॥ ११६॥ माक्षिकस्याप्यभावेतप्रदद्यात्स्वर्णगरिकम् । सुवर्णमथवारौप्यमृतंयत्रनलभ्यते ॥ १७ ॥ तत्रकान्तेनकाणिभिपकुर्याद्विचक्षणः । कान्ताभावेतीक्ष्णलौहंयोजयेद्वैद्यसत्तमः ॥ ११८॥ मत्स्यण्डाभावतोदार्भिपनःसितशर्कराम् । असम्भवेसित्तायास्तुबुधैःखण्डप्रयुज्यते ॥ ११९ ॥ सुवर्णके अभावमें सोनामक्खी, चांदीके अभावकें रूपा- माक्खी-स्वर्णमाक्खीके अभावमें पीलागेरू प्रयोगकरे । भस्म किये सुवर्ण, अथवा बांदीके अभावमें चतुर वैद्यको चाहिये कि कान्तिसार लोहेसे कार्य पूराकरे । कान्त लौह न मिले तो इस्पातकी भस्मका प्रयोग करना ठीकहै । मिट्टीके अभावमें श्वेत शर्करा और चीन के अभावमें सांडका प्रयोग करना ठीक है ॥ ११६ ॥ ११७ ॥ ११८ ॥ ११९ ॥ ग्रन्यान्तरे। सुवर्णमथवारौप्यंयोगेयत्रनलभ्यते । तत्रलोहेनकाणिभिपकर्याद्विचक्षणः ॥ १२० ॥ भस्म किये हुए सुवर्ण या भस्मकी हुई चांदीका अभावही, तो चतुर वैद्यको चाहियेकि वहांपर जारित लौहका प्रयोगकरे १२० रसाधनस्याभावतुसम्यग्दावप्रियुज्यते । सौराष्ट्यभावतो देयास्फटिका तद्दणाजनैः॥१२१ ? 'सौरादी ' सोरटी मादी इतिलोके । 'स्फटिका' फटकिरी।

(३२) वैद्यकपरिभापामदीप। तालीशपत्रकाभावस्वर्णतालीप्रशस्यते । भार्यभावेतुतालीशंकण्टकारीजटाथवा ॥ १२२॥ रुचकाभावतोदद्याल्लवणंपांशुपूर्वकम् ॥ अभावमधुयष्ट्यास्तुधातकीञ्चप्रयोजयेत् ॥१२॥ रसौत नमिले तो तहाँ दारूकाथ (दारुहलदीका काथ ) प्रयोगकरे। गोपीचंदन न मिले तो तिसके गुणसे युक्त फट- किरी ग्रहणकरे। तालीशपत्रके अभावमें स्वर्णताली श्रेष्टहै। भारंगीके अभावमें तालीशपत्र अथवा कटेरीको जड़ ग्रहणकरे चौहारकै अभावमें पांमानोन और मुलहटीका अभाव होने- से धातकीपुप्प (धायफूल ) का प्रयोग करना चाहिये ॥ १२१ ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ अम्लवेतसकाभावेचुकंदातव्यामष्यते । द्राक्षायदिनलभ्येतप्रदेयंकाश्मरीफलम् ॥ १२४ ॥ तयोरभावकुसुभबन्धूकस्यमतंयुधैः। लवङ्गकुसुमंदेयंनखस्याभावतःपुनः ॥ १२५ ॥ कस्तूर्य्यभावेककोलंक्षेपणीयविदु धाः । ककोलस्याप्यमातुजातीपुष्पंप्रदीयते ॥१२६॥ सुगन्धिमुस्तकेदेयंकर्पूराभावतोयुधैः। कर्पूराभावतोदेयंग्रन्थिपणविशेषतः ॥ १२७॥ अमलवेतके अभावमें चूफा, दाखके अभावमें गाम्भारी- (१)"चक "चौहार .(२)"पांशुलवण" खारी अथवा 'रेद' इति लोके । (३) कस्तूरीणामभावतु ग्राह्यागन्धशाठी बुधैः । इतिपाठान्तरम् । अपीत् कस्तूरीके अभाव में दिया इरादीले ॥

भापाटीकासमेत। फल, गाम्भारीफलक अभावमें दुपहरियाका फूल पंडितलोग व्यवहार करतेहैं । नस्त्रीके अभावमें लोंगके फूल, कस्तुरीके (३)अभावमें कॉकोली और तिसके अभाव, चमेली के फूल दिये जाते हैं ! कपूरके अभावमें गठीवन अच्छाहै । परन्तु कभी २ पंडितलोग सुगन्धित नागरमोयेकाभी व्यवहार करतेहैं ॥ १२ ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ १२७ ॥ यदिनस्याहारुनिशातदादेयानिशाबुधैः । अभावेकोकिलाक्षस्यगोक्षुरंवीजमिप्यते ॥ १२८॥ अन्तःसम्मार्जनेनेयाजमोदायमानिका। पहि-संमार्जनेसैवविज्ञातव्याजमोदिका ॥ १२९ ॥ दारुहलदीके अभावमें पंडितलोग हलदीका व्यवहार कर- तेहैं । तालमखानेकै अभावमें गोखरूके वीजाको ग्रहण करतेहैं खानेकी औपंधिक विधानमें अजमोद शब्दके स्थलमें यवानी (अजवायन )और बाहर लेपादिमें अजमोद शब्दसे टपगन्धा (वच)को ग्रहणकरे ॥ १२८॥ १३९ ॥ यत्रयद्रव्यमप्राप्तंभेपजेपरपूर्वतः। ग्राजुतद्गुणसाम्यातुनतत्रकापिदूपणम् ॥ १३० ॥ किसी औषधिमें तेल या वृतादिमें यदि किसी व्यका अभावही तो इस न प्राप्तहुए व्यक( गणक)पहलेकी, या पी. छली औपधि ग्रहणकरे । चतुर वैद्य इस न प्रातहुये व्यकी समानगुणवाली औपाधिका प्रयोगकरे ॥ १३० ॥ अन्यानियानीहरसायनादौयोगेचवस्तृनिचकीर्तितानि तेपामलाभेनचवृद्धवैद्यप्रसिद्धितस्तानिहरन्तिवैद्याः ॥ परन्तु रसायनादिमें जिन औषधियोंका वर्णन है, टन औ., वैद्यकपरिभाषाप्रदीप . पधियोंके अभावमें वृद्ध वैद्योंके उपदेशानुसारजैसा प्रचलित है, वैसा ग्रहणकरे ।। १३१॥ अत्रप्रोक्तानिवस्तूनियानितेषुच तेपुच। योज्यमेकतराभावेऽपरंवैद्यनजानता ।। १३२॥ रसवीर्यविपाकायै समंद्रव्यंविचिन्त्यच । युञ्जात्तद्विधमन्यच्चद्रव्यणांतुरसादिवित् ॥ १३३ ॥ योगेयदप्रधानस्यात्तस्यप्रतिनिधिम॑तः । यत्तुप्रधानंतस्यापिसदृशनैवगृह्यते ॥ १३४ ॥ व्याधेरयुक्तंयव्यंगणोक्तमपितत्त्यजेत् । अनुक्तमपियुक्तंयद्योजयेत्तद्रसादिवित् ॥ १३५॥ यहां पर जिस २ वस्तुफे बदले जिस २ वस्तुके प्रयोग करनेका वर्णन हुआ, उन २ वस्तुओंकाभी अभाव होतो उनकी समान और वस्तुओंकाभी व्यवहार होसकताहै । रस- वीर्य, विपकादिमें ज्ञानी वैद्य विचारके साथ द्रव्यका रस, वीर्य विपाकादिमें समता निरूपण करके तुल्यरसादि गुण युक्त और द्रव्यभी प्रयोगकरे । परन्तु औषधिके गणमें अनेक औषधि योंकी समाप्टिकरनेसे जो कोई द्रव्य मुख्यहो, उसके बदले में घरावर गुगवाली औपधि न ग्रहणकरके, जो दव्य प्रधान (मुख्य ) नहीं है उसकी समान गुणवाला द्रव्य ग्रहण करे । रस वीर्यादिक जाननेवाले चिकित्सकको चाहिये कि, रोगके अयोग्य औषधिगणमें कहीहो तोभी उसका त्यागकरे और रोगफे योग्य औषधिगणमें न कही हो तोभी विचार करके दसफो, प्रयोगकरे ॥ १३२ ॥ १३३ ॥ १३४ ॥ १३५ ॥ इति वैद्यकपरिभाषामदीपका प्रथम समाप्त !

भापाटीकासमेत । (३५) अथ द्वितीयखण्डः। पंचविधकपायमाह । स्वोरसःस्वरसम्प्रोक्तःकल्कोहपदिपोपतः। कथितस्तुशृतःशीत शर्वरीमुपितोमतः ॥१॥ क्षिप्तोष्णतोये मृदितःफाण्ट इत्यभिधीयते । पंचैताश्चसमुहिष्टा कपायाणांप्रकल्पनाः। गुरवःस्युर्यथापूर्वलघवास्युर्यथोत्तरम् ॥२॥ कपाय पांच प्रकारकी है यया,-स्वरस, कल्क, काय, शीत और फान्ट । तिनमें कच्चे द्रव्यको विना जलके कूटकर मलके रस ग्रहण करनेसे तिसको स्वरस कहते हैं, पत्यपर पीस लैनेसे तिसको पल्क कहतेहैं. द्रव्य कूटकर जलदारा पाक करलेनेसे तिसको काथ, और पहले दिन जलमें भिजोकर दूसरे दिन छान लेनेसे तिसको शीत, और कूटा हुआ द्रव्य गरम जलमें भिगोकर छान लैनेस तिसको फान्ट कहतेहैं । इन पांच प्रका- रकी कपायमें पूर्वानुक्रमसे भारी और क्रमानुसार उत्तर ये लघुहैं, अर्थात् कल्कसे स्वरसभारी हैं, स्वरससे कल्क लघुहै इत्यादि ॥ १ ॥२॥ विश्वामित्रेण शीतफान्टयोर्लक्षणमुक्तम् । तद्यया। पशि पलैश्चतुर्भिासलिलाच्छीतफाण्टयोः । आलुतंभेपजपलंरसाख्यायांपलद्धयम् ॥३॥ शीत और फान्ट बनाना हो तो उयपल (४८ तोला) अथवा ४ पल (३२) तोला जलमें । एक पल (८ तोला)

वैद्यकपरिभापानदीप।
औपधि भिगोरक्खै, परंतु स्वरसके बदले तिसका व्यवहार
करना हो तो इस जलमें २ पल ( १६ तोले) औषधि भि..
गोना ठीकहै ॥ ४ ॥
स्वरसमाह ।
सबक्षुण्णाद्रव्यस्यवस्त्रयन्वादिपीडनात् ।
योरसस्त्वभिनियोतिस्वरस संप्रकीर्तितः॥४॥
शुष्कद्रव्यमुपादायस्वरसानामसम्भवे ।
वारिण्यष्टगुणेसाध्यंग्राह्यपादावशेपितम् ॥५॥
सद्य आई ( ताजा रससे युक्त ) द्रव्य ग्रहण करके तत्काल
कूटकर वस्त्र या यंत्रादि करके मलने पर उसमेंसे जो रस
निकले, तिसको स्वरस करते हैं । यदि किसी इन्यका स्वरसको
अभावही अर्थात् गौला द्रव्य यदि न पाया जाय तो वही सुखा
व्य आठगुणे जलमें पकावै । जब चौथाई रहै तो उताकर
तिसको ग्रहण करे ॥ ४ ॥ ५॥
अन्यन्च।
आहृतात्तत्क्षणाकृष्टात्क्षुण्णाद्रव्यात्समुद्धरेत् ।
वस्त्रनिष्पीडितोयस्तुस्वरसोरसउच्यते ॥६॥
कुडवंचूर्णितंद्रव्यक्षिप्तदिगुणेजले ।
अहोरात्रंस्थितंतस्माद्भवेद्वारंसउत्तमः ॥७॥
द्रव्यको लाकर तत्काल तिसको कूटै और कपडेसे अमेठकर
तिसफे निचोडनेसे जो रस पाया जाताहै तिसको स्वरस फह-
तेहैं, अथवा सूखा हुआ आधसेर दव्य चूर्णफर एफसेर जलमें
एफ दिन एकराततक भिगोकर छानलियागाय,तो उसकाभी
व्यवहार स्वरसके बदले किया जाताहै ॥ ६ ॥७॥

भापाटीकासमेत। (३७) अन्यच्च। --- आदायशुप्कंद्रव्यवास्वरसानामसम्भवे । जलेटगुणितेसाध्यंपादशिष्टन्तुगृह्यते ॥ ८॥ सूखे द्रव्यका स्वरस नहीं पाया जाता, इसकारण सूखे द्रव्यको आठगुने जलमें पकाये, जब चौथाई रहे तब उतारकर स्वरसके बदले ग्रहण करे ॥ ८ ॥ अस्यपानमात्रामाह। स्वरसस्यगुरुत्वाचपलमर्द्धप्रयोजयेत् । निशेपितञ्चापिसिद्धपलमारसंपिवेत् ।। ९ ।। स्वरस पाकमें भारीहै, इसकारण अर्द्धपल (४ तोला) की मात्राकरके इसको पानकरे । पहली कहीहुई रीतिसे सूखे द्र- व्यको कुटकर जलमें पकानेसे जो रस पाया जाताहै, वह सबकी वनिस्वत पाकमें हलकाहै। वस वह १ पल (८) तोला- की मात्रासे इसका प्रयोग किया जासकताहै ॥ ९ ॥ स्वरसभेदारपुटपाक्रविधिमा । पुटेपकस्यद्रव्यस्यस्वरसोगृह्यतेयतः। अतोऽयंपुटपाकास्याद्विधानंतस्यकथ्यते ॥१०॥ द्रव्यमापोत्थितंजम्बुवटपत्रादिसम्पुटे । वेटयित्वाततोवद्धादृढंरज्ज्वादिनातथा ॥११॥ मृल्लेफेब्यङ्गुलकुर्यादथवाङ्गुलिमात्रकम् । दहेत्पुटान्तरादनौयावल्लेपस्यरक्तता ॥१२॥ पुटपाककरके किस २ व्यका स्वरस ग्रहण किया जाताद इमका अतएव पुटपाकका नियम फहते हैं। पडि- यामें जुटा हुआ द्रव्य जामन और पडके पत्ते आदिमे लपेट- (३८) वैद्यकपरिभापाप्रदीप। कर रस्सी से भली भांति बांधकर गोबर मिलीहुई मिट्टीसे दो अंगुल या एक अंगुलका मोटा लेपदेकर पुटकी आगमें दग्ध करताहै । जब यह लेप लाल रंगकाही जाय तय पाकको सिद्ध हुआ जानकर उतारले ॥ १० ॥ ११ ॥ १२ ॥ अन्यच्चा पुटपकस्यकल्कस्यस्वरसोगृह्यतेयतः। अतस्तुपुटपाकानांयुक्तिरत्रोच्यतेमया ।। १३ ॥ पुटपाकस्यमात्रेयंलेपस्यारुणवर्णता । लेपञ्चव्यङ्गुलंस्थूलंकुर्याद्वाङ्गुलिमात्रकम् ॥१४॥ पुटमें पके हुए कल्कका स्परस ग्रहण करना आवश्यक होताहै इससे पुटपाककी विधिका वर्णन करते हैं । घडियाके लेपका रंग वैसे ही लाल होजाय । वैसेही पुटपाकको सिद्ध हुआ जानकर तत्काल अपिसे निकालले । इस घडियामें मट्टीका लेप २ अंगुल या १ अंगुल मोटाहो ॥ १३ ॥ १४ ॥ कल्यमाह। द्रव्यमाशिलापिएंशुकंवाजलमिश्रितम् । तदेवसुरभिःपूर्वेःकल्कइत्यभिधीयते ।। आवापस्त्वथप्रक्षेपस्तस्यपर्यायउच्यते ॥ १५ ॥ सूखा या जलयुक्त द्रव्य शिलाएर पीस लिया जाय तो इसफो फल्क कहते हैं । ऐसा आयुर्वेदके आचार्य मुनियोंने पहा है । आपाप और प्रक्षेप कल्कके एक पर्यायक शब्द हैं१५॥ कस्करपेषगदाचर्णमाह। अत्यन्तशुप्ख्यद्रव्यं सुपिष्टवस्त्रगालितम् । चूर्णतचरजशोदस्तस्यपर्यायउच्यते ।। १६ ।।

भाषाटीकासमेत। (३९) सूखा हुआ द्रव्य, भली भांतिसे शिलापर पीसकर कपड- छान कियाजाय तो इसे चूर्ण कहते हैं । रज और क्षौद इसके पर्यायह ॥ १६ ॥ अन्य। द्रव्यमाशिलापिटशुप्कंवासजलंभवेत् । प्रक्षेपावापकल्कास्तेतन्मानकर्पसम्मितम् ॥१७॥ कल्केमधुवृततैलंदेयद्विगुणमात्रया। सितांगुडंसमंदद्यादवादेयाचतुर्गुणाः ॥१८॥ सुखा अथवा कच्चा द्रव्य शिलापर पोसलेनेसे तिसको प्रक्षेप, आवाप और कल्क कहतेहैं । इसका परिमाण एककर्प (२ तोला) है । कल्कमें शहरत, घी, और तेलका प्रक्षेप देना होती कल्कसे दुगनाले, चीनी और गुड़कल्ककी बराबरले और द्रव (तरलद्रव्य दूध जलादि) द्रव्य, कल्कसे चौगु- णाले ॥ १७॥ १८ ॥ अयनाथमाहशालंधरः। पानीयंपोडशगुणक्षुण्णेव्यपलक्षिपेत् । मृत्पात्रेकाययेग्राह्यमष्टमांशापशपितम् ॥ १९॥ तजलंपाययेद्धीमान्कोणं मृद्रग्निसाधित्तम् । शृतकायकपायश्चानियूहःसनिगद्यते ॥ २०॥ आहाररसपाकेचसनातद्विपलोन्मितम् । वृद्धवेद्योपदेशेनपिवेत्वार्थसुपाचितम् ॥ २१॥ कायक्षिपेसितामशैश्चतुरएकपोडशः । पातपित्तकफातडविपरीतंमधुस्मृतम् ॥ २२ ॥ एक पलभ्य (८ ला) को कृट १६ गुणे जलमें मिलाप :

(४०)
वैद्यकपरिभापाप्रदीप।
मिट्टी के पात्रमें औटावै, जब आठवां भाग जलते रहजाय तो
उतारकर छानले । इसको काथ कहते हैं।इस काथको थोडासा
गरम रहतेही पोजाय । शृत, काथ कपाय, और नियूह यह कई
एक इसके पर्यायहैं। जब खाया हुआ अन्न पचजाय तो दोपल
(१६तोला) इस काथको पानकरनेकी विधिहापायुसे उत्पन्न हुए
रोगमें कायसे चौथाई चीनी मिलाय इसको पानकर, पित्तसे
उत्पन्नहुए रोगमें आठवे अंशका एक अंश और कफसे उत्पन्न
हुये रोगमें १६ वा अंश चीनीका मिलाकर इसको सेवन करे ।
परन्तु काथमें मधुका प्रक्षेप देना हो तो उस्से विपरीत अर्थात्
वायुके कोपमें काथके सोल्हवे हिस्सेका एक हिस्सा, पित्तके
कोपमें आठ अंशका एक अंश, कफके कोषमें चार अंशका
एक अंश शहद डालकर पानकरे ॥ १९॥२०॥२१॥२२॥
अन्यच्च।
द्रव्यादापोत्थितात्तोयेवह्निनापरिपाधितात् ।
निःसृतोयोरसापूतःसगृतःसमुदाहृतः।।
काथाकपायोनियूहःपर्यायस्तस्यकीर्तितः ॥२३॥
कूटाहुआ द्रव्य जल मिलाय अमिमें पकायै फिर कपडे में
मसलकर उसको छानले , छान्नेसे जो रस निकलता है तिस-
कोशृत कहते हैं। काय,कपाय और निर्युह इसके पर्याय हैं२६॥
शीतमाह।
क्षुण्णद्रव्यपलंसम्यक्पभिर्जलपलै लुतम् ।
शर्वरीमुपितंसम्यग्ज्ञेयःशीतकपायकः॥२४॥
एकपल (८ तोला) ध्य कुटकर उयपल (१२ तोला)
नलमें एफराततक भिगोरक्खै, इसको शीत कहते हैं ॥ २४ ॥

भाषाटीकासमेत । (४१) फाण्टमाह। भवान्तरभेदात्तण्डलोदकमाह । तण्डुलान्कणश कृत्वापलंग्राउंहितण्डुलात् । चतुर्गुणंजल्देयंतण्डुलोदककमणि ॥ २६ ॥ एकपल (८ तोला) सूखेहुए चावल भलीभांतिसे कूटकर चौगुने जलमें एकदिन या एक राततक भिजो रक्खै फिर छा- नले, इसको तण्डुलोदक कहतेहैं ॥ २५ ॥ भन्येप्याहुः। शीतकपायमानेनतण्डुलोदककल्पना ॥२६॥ कोई २ कहतेहैं शीतकपाय जिस परिमाणसे प्रयोग किया जाताहै तण्डलोदकका प्रयोगभी इसी परिमाणसे करना चाहिये ॥ २६ ॥ क्षुण्णद्रव्यपलेसम्यरजलमुष्णविनिक्षिपेत् ॥ पात्रेचतुष्पलमितंततस्तुस्रापयेज्जलम् । सोऽयंपूतोद्वाफाण्टोभिपम्भिरभिधीयते ॥२७ एकपल द्रव्य कूटकर मिट्टीके पात्र में चौगुने गरम जलके साथ भिगोरक्खै, इसको फाण्ट कहतेहैं ॥ २७॥ प्रसंगादुणोदकमाह । अष्टमांशावशेपेणचतुर्थेनाईकनवा । अथपाकाथनेनैवसिद्धमुष्णोदकंवदेत् ॥२८॥ जल अभिके तापसे औटाफर अष्टमांश चतुर्थाश अथवा अझैश वचनेपर उतारले या थोडासाही सिद्ध करले, इसको उष्णोदक कहते हैं ।। २८॥ कायादेरवान्तरभेदाल्लेहादिकमाह ! काथादेर्यापुनःपाकादनत्वंसारसक्रिया।

.
(१२) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप ।
अवलेहश्चलेहश्चप्राशइत्युच्यतेबुधैः ॥ २९॥
मावास्यात्तत्पलोन्मिताइत्यापिपाठः
कायादिको दुवारा अनिके तापसे पाककर के घना किया
जाय तो इसको अवलेह कहते हैं । पंडित लोग इसको लेह
और प्राश कहा कहते हैं ॥ २९ ॥
बटकोमोदकापिण्डीगुडोवर्तिस्तथावटी।
पटिकागुटिकाचेतिसंज्ञावान्तरभेदतः॥३०॥
मानाच्छायातपच्छेदवासविश्लेपपेपणैः ।
मन्धपीडनसंयोगजलकालवलापलैः ॥३१॥
व्यंगुणान्तराधानविशिष्टंकियतेयतः।
तेनमोदकचूर्णादिवटकाश्चयथाश्रुतिः ॥ ३२॥
पड़ी, लङ्ग, पिण्टी, गुड, वत्ती, लम्बीगोली, गोलो और
गुटिका यह एक पर्यायफ शन्दहें । मात्रा, छाया भातप, छेदना
पास, दिलप, पेपण, मंधन, पीडन, संयोग, जल, काल और
बटावल विशेपसे द्रव्यका गुणभी विविधमत्तारका होना-
ताह । मादक, चूर्ण और पटिकादिया जिसका जैसा गुण
प्रसिदह, तिसका तैसा गुण गामना ।। ३० ॥ ३१ ॥ ३२ ॥

भापाटीकासमेत। (४३) द्रव्याण मात्राविधिलिहरते । स्थितिनास्त्येवमात्रायाःकालमनिपलंषयः प्रकृतिदेशदोपौचदृष्ट्वामात्रांप्रकल्पयेत् ३३॥ यतोमन्दानलोबस्वाहीनसत्वानराम्कलो। अतस्तुमात्रातयोग्याप्रोच्यतेशुद्धसम्मता ३४ औपधि देनकी मात्राका कोई नियम नियत नहींहै । काल, अग्नि, वल, उमर, स्वभाव, देश और वातादि दोपके देखनेसे चिकित्सक विचार करके औपधिकी मात्राको कल्पितकरे (निर्धारित नियमकी बनिसवत औपचीको मात्रा कम या ज्यादे हो तो रोग दूर नहीं होता,वरन् अनेक विनोंक होनेकी सम्भावनाह (क्योंकि कलिकालमें मनुष्य मन्दामियुक्त, क्षु. द्राकार, और सतोगुणहीन होंगे; अतएव तिसके अनुसार विचारकरके औपधिको मात्राका प्रयोग करना ठीक है ॥ ३३॥ ३१ ॥ अन्यायकार:। नाल्पहन्त्योप,व्याधियथाल्पाम्बुमहानलम् । दोपवच्चातिमात्रस्याच्छस्यमृत्युदकंयथा ॥ ३५॥ जिसप्रकार अत्यन्त प्रज्वलित अनिके सपर थोडासा जल डालनेसे वह अमिं नहीं बूझी; तैसेही बडे रोगमें अल्प मात्राफी औपधिका प्रयोग करने से रोग दूर नहीं होता और खेतमें अधिक जल वसनसे जैसे नाज नष्ट होता है; तसेही साधारण रोगमें औपधिकी अधिक मात्रा प्रयोग करने सभी रोगीका नाश होताहै ॥ ३५ ।। १ सर्वसम्मता इति पाटान्तरमा (१४) वैद्यकपरिभापाप्रदीप । अन्यच्चा मात्रयाहीनयाद्रव्यविकारंननिवर्तयेत् ॥ द्रव्याणामतिवाहुल्यान्यापत्संजायतेध्रुवम् ॥३६॥ मात्राहीन (मात्राके अनुसार मात्रा पूरी नहीं थोडीहो तो) द्रव्यसे रोगको आराम नहीं होता और मानाकी अधिकाई होनेसे निश्चय विपत्ति पडतीहै ॥ ३६ ॥ अन्यश्च । मात्रयानास्त्यवस्थानंदोपमानिवलंवयः। च्याधिद्रव्यञ्चकोष्ठञ्चवीक्ष्यमात्रांप्रयोजयेत् ॥३७॥ उत्तमस्यपलंमात्राविभिश्चाक्षेश्चमध्यमे । जपनस्यपलाईननेहवाथ्यौपधेपुच ॥ ३८॥ औपधिकी मात्राका कोई नियत नियम नहींहै । दोप, अमि, बल, उमर, रोग, औषध और कोष्ठ (कटन रहना ) देखकर विचारपूर्वक औषधिको मात्रामा प्रयोग करे। स्नेह और काथ्य औपथ प्रयलामियुक्त मनुष्योंके लिये ८ तोला, मध्यम अमिवालोंके लिये ६ तोला और हीनामिवालोंके लिये ४ तोलफा परिमाण प्रयोग करना उचितेहै॥३७॥३८॥ उत्तमरप प्रयलामिवलगुपपस्य, न पुनपुंगविशेपजातस्य पुरुपस्प शिती फलावेय शास्त्रप्रचारातासत्ययुगादी व्यापभावात । उत्तमादिश- दानां पुगादीनामनभिधानाच परमयसोचसमिति गुरयः। घरकार्ड पटोन्मानं घर: ददारक्तिफारति सौभुतपलं घरकाद्धं पदम् । विभि- समिति चरफाय विभिन्तालः। परदिनेति चरक पकन युगमभा. गाजपामा एप सर्व भतएव जपापामाया मंचषां दातम्या । किन्तु "शापूर्णाप पाय गुटिगानाभ सयंति पन्यमानामाशिप भासदतन गंदे लिपिरामिनि दिए । पायमिरपणा यत । पापमईसिपापीहपापापंधणु भयया पप्पोषधेपु धेप्ति धापमाप प. सीरमायासिभिः । भतानानि शीरादीनि भक्षणी- पतिमापति गुपः माए" भापाटीकासमेत । (४५) साईपलंपलञ्चाविदव्यागुडखण्डयोः । श्रेष्टमध्यमहीनेपुमात्रेयंमुनिभिःकृता ॥ ३९ ॥ प्रबलअमिवालोंके लिये १॥ पल (१२ तोला) मध्यम अमिवालोंके लिये एकपल ( ८ तोला)और हीनमिवालोंक लिये आधापल (४ तोला) औपधिकी मात्रा प्रयोग करना टचितहै ॥ ३९ ॥ भवस्यात्सौश्रुतंपञ्चरत्तिमासात्मकंपलम् । मोदकंवटकलेहकर्पमाप्रयोजयेत् ।। कर्पद्वयंपलंवापिदेयकोप्टाम्यपेक्षया ॥ ४० ॥ यहां सुश्रुतमें कहेवए पांच रत्तीका मापा, इसमानसे पलम- हण करे. मोदक, पटक और अवलेहादिकी मात्रां एक कप (२ तोला) रक्खै । परन्तु कोष्ठ और अमिका बलावल विचारकर दो कप अथवा १ पल (८ तोला)तककी मात्राभी प्रयोगकोजासकती है ॥१०॥ अर्थात् सरप, घेता और दापरयुगमं समस्तजीय रोगहीनथे। वैपक ग्रंथ और समस्त औपधियं रंग उत्पत्र होने के पीछे संग्रह हुईहै। इसका विस्तार चरयः, सुश्त भीर भावमकामादि ग्रंथाम देखो) इसकारण क- लिकारमें समस्तनीय तेजहीन और च्याधिग्रन्त हुप भतपय युगफे मभावसे भापधिकी दीनमात्राकाही प्रयोग करना चाहिये । ऊपर नि- सस्थानमें पल कदाई, सौ गुरुके उपदेगानुसारही मुश्रुतीन माग ग्रहकरना पॉफिचरक मतसे मासादारीकादे,सुश्रुत मतसे मासा पांच रनीकाहे परस. चरकके माधे पलमेनुश्रुतका एकपल होता है। चमदननभी भपने संग्रहग्रंथमं चर्णः कन्या मार गुहिकादि- प. सम्पन्धम सीदी जयन्यमाया (दीनमाया)प्रपोगकरनेकी विधि लिम्बाई । मतपय भोपधादिकी मात्रा गुरके टपगानुसार कसिन करण प्रयोगकरे।।

(४६) वैद्यकपरिभापाप्रदीप।
श्रेष्ठमध्यमहीनेषुद्वादशाटचतुष्टयः ।
मापकैगुग्गुलोर्मात्रांकोप्टवीक्ष्यावतारयेत् ॥४१॥
प्रबल अनिवालोंके लिये १२ मापा, मध्यम आमिवालोंके
लिये ८ माषा और हीन अग्निवालोंके लिये ४ मापा
गूगल कोष्टके अनुसार विचारकर देना चाहिये ॥ ११ ॥
गुआमा–रसंदविहेमजीर्णचभक्षयेत् ।
तारंत्रिगुनकंप्रोक्तविजीर्णद्विगुञ्जकम् ॥ ४२ ॥
लोहान नागवङ्गानांखपरस्यशिलाजतोः ।
पड्गुञाप्रतिमामात्रामलोपरसमापकम् ॥ १३ ॥
कांस्यपित्तलयोनिंभक्षयेत्ताम्रजीर्णवत् ।
यवमाविपैदेवियुनामात्रंतुकुष्टिने ॥४४॥
वज्रेयवद्वयमिततालकंयवसप्तकम् ।
ततोबुद्धाभिपग्दद्यात्प्रायोमात्रेतिकीर्तिता॥४५॥
महादेवजीने पार्वतीजीसे कहा कि, हे देवि ! पारा और
सुवर्ण एक रत्ती, चांदी ३ रत्ती, तांबा दो रत्ती, और लोहा,
अभ्रक, शीशा रोग, खपडिया, शिलाजीत, छय रत्ती मात्रासे
और लौह-भैल और उपरस, संयोजकरस यथा शिंगरफादि
एक माप परिमाणते प्रपोग करे । कांसी और पातल तांधे-
की सामान दो रत्ती परिमाणमें, विप एक जो (परंतु कुष्ठ
रोगवालको एक रत्ती विपदे) हीरा दो जौ और हरिताल
सात जो मात्रा बुद्धिमान् चिकित्सक गुण विचारकरके
प्रयोग करे।॥४२॥१३॥४२॥१५॥
कालिंङ्गसौश्रुतंमानपञ्चरक्तिकमानतः ।
दशरत्तिकमानंतुमागधंचरकरितम् ॥ ४६॥

भापाटीकासमेत। (१७) तयोर्मागधमानन्तुप्रशंसन्तिभिपग्वराः। कालिङ्गंशुद्धलौहादिद्रव्यस्यकल्पनेमतम् ॥४॥ कपायोऽनुवासनादिद्रव्यादानेतुमागधम् । कालिंगमान और सुश्रुतोक्त मानमें पांच रत्तीका मापहि । मागधमानमें दशरत्तीका मापा चरकमुनिनें कहाहै । कालिंग- मान और मागधमान, इन दोनों में मागधमानही चिकित्सकों- के निकट आदरेणायहैं । शुद्धलोहादिकी कल्पनाप्रयोगके सम्बन्धमें कालिंगमान और कपाय व अनुवासनादिके द्रव्य ग्रहण सम्बन्धमें मागधमान श्रेष्ठहै ॥ ४६॥ १७ ॥ पाचनादौजलपरिमाणमाह । कांदौतुपलंयावद्दद्यात्पोडशिकंजलम् । ततस्तुकुडययावत्तोयमष्टगुणंभवेत् ॥ ८॥ चतुर्गुणमतश्चोर्द्धयावत्प्रस्थादिकंभवेत् । क्वाथ्यद्रव्यपलेकुर्यात्प्रस्थाईपादशपितम् ॥१९॥ पाचनादि बनानेमें एक कर्पसे एक पलतक द्रव्यमें सोलह गुण जल डालकर औटावै । एक पलसे ऊपरको कुडव (आधा सेर तक द्रव्यका परिमाण हो तो आठगुणे जलसे पाककरे कुडक्के ऊपर प्रस्थ (२ दौसेर ) आदि पाचनके व्यका परि- माण जितनाहों तिस के चौगुने जलसे पाककरे ॥ ४८ ॥१९॥ १ बाध्यद्रव्यपलेइति । प्रवानिवलपुरुषापेक्षया छाप्पद्यस्य पर ग्राहम् । तसाधनार्थ प्रस्थाईजलं दत्वा पाढावशिष्टं कार्यम् । प्रस्थाद्धत्वात् जसमष्टगुणं शराबद्रयं पादोषेण पलचतुष्टयं ग्राह्य- मित्यर्थः । अर्थात् प्रयलाग्निवाले पुरुषके लिये एक पल ( ८ तोला) पाचन के द्रव्यका परिमाणहो तिसमें २ सेर जल डालकर भाटावै । जर चौयाई रहे, तर टवारले ।

. (४८) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । मृदौचतुर्गुणंदेयंकाठनेऽटगुणंभवेत् । कठिनात्कठिनंयच्चदद्यात्पोडशिकंजलम् ॥५०॥ मृदादिद्रव्यसंघातेमानानुक्तौचिकित्सका । मध्यस्योभयभागित्वादिच्छन्त्यष्टगुणंजलम् ५१॥ पाचनका द्रव्य मृदु और कुडवका अधिक परिमाणही तो चौगुणे जलसै पाककरे, कठिन होतो अष्टगुण और अत्यंत कठिन होतो १६ गुण जल डाले । जो पाचनमें मृदु कठिन और अत्यन्त कठिन द्रव्य मिलेहों तो आठ गुण जलसे पाक करे ॥ ५० ॥ ५१ ॥ जलपरिमाणप्रसङ्गतःपाचनानां द्रव्यपरिमाणमाह । दशरक्तिकमानेनगृहीत्वातोलकद्धये । दत्त्वाम्भ-पोडशगुणंग्राह्यपादावशेपितम् ॥१२॥ इमामात्रांप्रकुर्वन्तिभिपज पाचनेषुच । दशरत्तीका जो मापा होताहै उसमानमें पाचनका द्रव्य २ तोला ग्रहण करके १६ गुण ( ३२ तोला) जलमें पकाकर चतुर्थीश ( ८ तोला ) जब रह जाय तब उतारले । वैद्योंको पाचनमें ऐसी मावाका प्रयोग करना चाहिये ॥ ५६ ॥ यवाग्वादिसाधने जलभेषजयोः परिमाणमाह। काथ्य द्रव्यानलिक्षुण्णस्रावयित्वाजलाडके ॥३॥ १. मृदादि इति आर्द्रद्रव्यम् आदिशब्दात् कठिनातिकठिनयो ग्रहणम्। एतेषां मिलितानां द्रव्याणामनुक्तजटपरिमाणानां पाचनादिसाधन- पिधौ जलपरिमाणं मध्यस्य मध्यस्थितस्य मृद्रतिकठिनयोः कठिनस्य जलपरिमाणं ग्राफ यदुक्तम् अष्टगुणं तदेव दत्त्वा पक्तव्यम । उभय- भागित्वादिति उभपोदतिकाटिनस्य जलपरिमाणं भाग्यदुक्तम् । माप एप भागोत्तत्यादिति जलमष्टगुणमुचितमेय गुरवः।

भाषाटीकासमेत। (१९) पादावशेपेतेनाथयवाग्वाधुपकल्पयेत् ॥ यूपांश्चरसकांश्चैवकल्पेनानेनसाधयेत् ॥५॥ अर्थ-आधसेर कायके द्रव्य लेकर भलीभांतिसे कूटै और सोलहगुणे जलमें पकावै, जब वारसेर वाको रहजाय तो टतारले, फिर इसहीके साय यवागू पाक फरे । जूस और रसादिकी कल्पनामें भी ऐसाही नियम जानें ॥ ५३ ॥ ५४ ।। यदृप्सुकृतशीतासुपडङ्गादिप्रयुज्यते । कर्पमात्रंततोद्रव्यंसाधयेत्पास्थिकेऽम्भसि ॥ ५५॥ अर्द्धशृतंप्रयोक्तव्यपानपेयादिसंविधौ ॥५६॥ अर्थ-पडङ्ग जल बनानाहो, या कायसे मांड, पेया, यवागु, जूस और मांस-रस ( यखनी) आदि सिद्ध करनाही, टसमें जिन औपधियोंकी आवश्यकताहो, उन सबको बराबर भाग दोदो तोला ग्रहण करके चार सेर जलमें सिद्ध करे, जब (२ सेर) रहजाय तो उतार कर छानले, जब शीत- लहो जाय तो उस जलको पीनेके अर्थ या मंड, पेयादि पाक करनेमें व्यवहार करे ।। ५५ ॥ ५६ ॥ कल्यसाप्यां पेयामाह (केसरीटीकाकार)। का वाकणाशुण्यो कल्कद्रव्यस्यवापलम् । विनीयपाचयेद्युक्त्यावारिप्रस्थेनचापरान् ॥१७॥ अर्थ-कल्कसे पेया- वनानाही तो पीपल और सोंठ च- १ कपाद्धमिरपादि-कणा शुण्ठी । तयोमिलित्या कांई गृही- स्वा करकव्यस्य च तण्डलादेः पट विनीय, विनीयति पाठे नीत्वा इत्ययः । विलीयेति पाठे कल्कीकृत्यत्यर्थः । वारिमस्यनेति एक- त्वमविवशितं भन्यायपेक्षया अधिकनेति यावत् । तेन प्रस्यद्र- ये जल सापित्वादतन वारिमस्थेन युनया किश्चिन्यूनेन अधि- पेन चा प्रवाग्निपुरुषापेक्षया इत्यभापरान् कत्कसायां यवागू पाचयेद मुसिद्धां फुयादित्ययः । एवमन्यत्रापि पेयादिसाधने प्रबला. मिपुरुषादी युनपा प्रचुरतरं सलिलं करकद्रव्यं धा ग्राह्यम् ।

(५०) वैद्यकपरिभाषामदीप। रावर ले मिली हुई १ तोला और कल्क द्रव्य (चावला. दि) ८ तोला लेफर ४ सेर जलमें पकावै, जब आधा रह जाय तो उतार कर छानले (यहांपर यह जानना आव- श्यक है कि प्रबलामि, समामि और अल्पामिवालोंके भे- दानुसार फल्कके सिद्ध करनेके जलकी मावाभी अलग २ होती है। वस आवश्यकतानुसार जलकै लिखे हुए प- रिमाणकी अपेक्षा पेयादि साधनमें थोडा या बहुत (कम या ज्यादा) जलका परिमाण दिया जा सकताहै । चतुर वै. योंको विचार फर जलकी मात्राको कल्पित करना चाहिये )॥५७ ॥ साधनक्रममाह। कणाशुण्ठ्योः कर्पाद्ध गृहीत्वा काथ्यद्रव्यस्य पलञ्च प्रस्थदपेऽम्भासि अर्द्धशृतीकृत्य पारिप्रस्थ वस्त्रेण च्छानयित्वा नातिसान्दा नातिस्वच्छो यवागू साधयेत् ( कणा शुण्ठ्योः प्रत्येकं कपाई कृत्वा पृथग्योगोऽयमिति फश्चित् । ननु यद्येवं भैपनं फायः सामान्याधिक्ये पतति तत् किमर्थं कर्ष माचं "ततो द्रव्यं साधयेत् प्रास्थिकेम्भासि इति पडङ्गपारि- भाषा" अत आह, पडङ्गपरिभाषायां प्राय इति प्राचुर्येण प्रचुरस्थले पडङ्गपरिभापैव पेयादिसम्मता पेयादिपु फी- तिता पेयादिषु मन्यत इति यावत् । अयमर्थः प्रायेण पडङ्ग- परिभाषैव व्यवहार इति पडङ्गपरिभाषोक्ता । प्रबलामिपु. रूपे तु बटुभक्तरि स्तापतोयेन यवागून सिद्धयति युक्त्या फायमावल्पं फेशाकृष्टया पतितामिति सर्वमवदातम् । निश्चल कारण तु पलमत्र सौश्रुतमित्यवधेयमिति व्याख्यातम् । अब नारायणदासेन व्याख्यातम् । फणाशुट्योः फदि थे- ति तीक्ष्णदथ्योपलक्षणं फल्पद्य्यस्य या पसमिति, मृद्ध दप्योपलक्षणं मृहपाठिनयोयतया फपदयमिति अपरा.

भाषाटीकासमेत। निति ये यवाग्वादयः पडङ्गपरिभाषया सिद्धाः न तदय परिभाषा, किन्तु तदितरायमित्यर्थः । आकृतिपूर्वमत्र 'कर्षमा द्रव्यमुक्तम् । अत्र तु कधिकमपि पूर्वत्र तु प्रस्थमात्र जलमुक्तम् । अत्र प्रबलामिवलपुरुषार्थ बहुयवागूसाधने प्रस्थाधिकमपि गृह्यते, कचित् प्रस्थन्यूनेऽपि यूपः साध्यते पूर्व- मईशृतजलमुक्तम्, अत्र तु कचित् पादावशिष्टमपि मांस- रसे साध्यमाने पानयोग्यावशिष्ट इति युक्तिशब्दार्थः । तदेत! धुक्तं भवति । यवागू: पड्गुणे तोये प्रस्ये प्रस्थाधिकेपि वा रसेन पाके मांसस्य सुसियति हि यावता । अष्टशिष्टो भ. वैद्यूपः क्वचित्पादावशेपतः । अष्टादशगुणे तोये यूपः शार्ङ्गधरेरितः॥इति॥गरवस्त्वाः परिभाषेयं पानीयसाधनविप- यिणी चक्रपाणिदत्तेन पानीयसाधनप्रकरणे पडङ्गपानीय- व्यङ्गपानीयानन्तरं पिप्पलीपानीयं लिखितं कणाशुण्ठयोः कपाधै वारिप्रस्थेन साध्यम् । ननु अत्र कल्कद्रव्यस्य वापल- मिति कथमुक्तमत आह । नारायणान्तरङ्गः मृदुद्रव्य टप- लक्षणमिति । यद्यपि पिप्पलीये पानीये आनुपङ्गिक- त्यायुतया परान् यूपान् पेयादीन् वा धावपेक्षया साधयेत् । तदा तण्डुलादीनां पलं कल्कीकृत्य वारि- प्रस्येनाईशृतेन साध्यम्, अतः पडङ्गपरिभापैव प्रायः पेयादिसम्मतेत्युक्ता पश्चादेपा लिखिता, पेयादयस्तु पडङ्गपीरभापया सर्वत्र साधनीयाः, प्रायःशब्दात् प्रचु- रस्थले पडद्गपरिभाषा सम्मता तदितरार्थेयमिति । भा०-पीपल और सोंट बराबर मिली हुई १ तोला, और कायद्रव्य (चावलादि ) नाठ तोला लेकर चार- सर जलमें पकावै । जब दो सेर रहजाय टतारकर कपढ़ें- में छान यवागू (अति गाढा और अत्यन्त स्वच्छ न होवे) पाफ फरे ( किसीके भतसे १ तो० पीपल, १ तो सोंठ इन दोनोंको दो तोलाले)।

- (५२) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। यहां पर यह प्रश्न होसकता है कि, यदि औषधि और काथदव्यको इसप्रकारं साधारण अधिकाई हो, तो १ सेर जलमें दो तोला औषधिको औटानेकी जो पडङ्गपरिभाषा लिखीहै, तिसका तात्पर्य क्या है इसका उत्तर यहींहै कि, यदि बहुत पेयादि बनानाही तो पडङ्ग जल बनानेके विधानका तिस्से पेयादि बनावै । प्रवलामियुक्त, बहुत भोजन करने वालेके लिये जो यवागूका पाक करनाहो तो वह थोडे जलसे नहीं होता, घस चावलोंके परिमाणके अनुसार काथ और कायके परि- माणानुसार औपधिभी अधिक डाले । जैसे किसीके केश खेचनेसे तिसके साथ उसके समस्त अंगप्रत्यंग खींचते है, यहभी वैसेहीहै। निश्चलकारने व्याख्या करीहै कि, यहां पर सुश्रुतमें कहा हुआ पल ( पांच रत्तीका मान ) ग्रहण करना चाहिये नारायणदासने व्याख्या कोहे की पीपल और सोंठ फेवल उपलक्षण है, समस्त तीक्ष्ण द्रव्योंको अईकर्ष ( १ तोला) के परिमाणसे ग्रहणकरे । समस्त मृदु द्रव्य एकपल (८ तोला) और मृदु वं कठिन मिश्रित द्रव्य दो कर्प ? ताला ग्रहणकरे । पडङ्गकी परिभाषाफे अनुसार जो पवार आदि बनते हैं, तिन स्थानोंके लिये यह परिभापा नहीं है तिसफे सिवाय और सव स्थलोंमें इस परिभाषाफे अनुसार ययागूआदि तयार होते हैं ॥ चक्रपाणिदत्त और शाईधर फा मतभी यहीदै । पहले लिखेदुए मतसे प्रबलामि मध्य- मामि और होनापियालोको विचार फर, यवागू पेया, और नृपादिपी औपषि, जल और मात्राफा विधान परदे । यपार मंड, और पंपादिक सिद्ध करना, और तिनके रक्षण आगे लिये जाते हैं।

भाषाटीकासमेत। यवागूसाधने तण्डुलमकारमाह । यवागूमुचिताद्भक्ताचतुर्भागकृतांवदेत् ॥१८॥ अर्थ-यवागुकी मात्रा स्वभावसेही जितने चावल खानेका अभ्यासहो, तिस्से चौथाई ( कूटाहुआ चावल) चावलसे यवागू पाककरे। अन्नादिसाधने जलपरिमाणमाह । अन्नपंचगुणेसाध्यंविलेपीचचतुर्गुणे । मण्डश्चतुर्दशगुणेयवागूःपड्गुणेऽम्भसि ॥ २९ ॥ अर्थ-अन्नादिसाधना-जितने चावलहों उतनेसे पंच- गुंणे जलमें अन्न पकावै, ऐसही विलेपी चौगुणे जलमें, मांड १४ गुण जलमें और पेया छः गुणे जलमें पकावै ॥ ५९ ॥ . मण्डादिलक्षणमाह। सिक्थकैरहितोमण्ड पेयासिक्थसमन्विता । यवागूहुसिक्थास्याद्विलेपीविरलद्रवा ॥६॥ अर्थ-मंडादिके लक्षण-जिसमें जराभी कण नहो तिसको मंड कहतेहैं, जिसमें थोडा कणही तिसको पेया कहतेहैं, जिसमें कण अधिकही और तरलता थोडीहो, तिसको विलेपी कहतेहैं ।। ६०॥ यवागू पड्गुणेतोयेसिद्धास्यात्कृशरापना । तण्डुलेर्मुद्गमापैश्चतिलेांसाधिताहिसा ॥ ६॥ अयं-और प्रकार कहा जाता है, जैः गुणे जलसे य. वागू पाक कियानाय, तो वह खिचडीकी समान होजाताहै उचिततण्डलाचतुर्भागकभागमानं क्षुद्भिवतण्डलमा स्वैः कृता पवागू यदेदिपर्पः, जाऊ इति लोके । अन्यच्च।

वैद्यकपरिभाषामदीप। सो चावल, मूंग, उरद और तिल इनमेंसे चाहे जिस द्रव्यसे तैयार होसकताहै ।। ६१॥ यवागूग्राहिणविल्यातर्पणीवातनाशिनी। विलेपीचपनासिक्थैःसिद्धानीरेचतुर्गुणे । विलेपीतर्पणीयामधुरापित्तनाशिनी ॥६॥ अर्थ-यवागू-धारक, बलकारक, "तृप्तिकारक और वायुनाशक है। विलेपी चौगुणे जलमें पकावै । सो घना और कणदार रहै । विलेपी-तृप्तिकारी, हृदयकारी, मधुर- रससे युक्त और पित्तका नाश करनेवालीहै ।। ६२ ॥ द्रवाधिकाधनासिक्थाचतुर्दशगुणेजले । सिद्धापेयात्रुधे यायूपःकिंचिदनःस्मृतः॥६३॥ पेयालघुतराज्ञेयाग्राहिणीधातुपुष्टिदा । यूपोचल्यःस्मृतःकण्ठयोलघुपाकाकफापहः ६४॥ अर्थ-चौदहगुने जलमें पकाकर तरल और कणरहते हुए जिसको उतार लियाजाय उसको यूप कहते हैं। पेया-पाफमें हलफी, धारफ और धातुको पुष्ट करनेवाली है। जूस बल- फारी, फंठका साफ करनेवाला, पाफमें हलफा, और कफ- नाशक है ।। ६३ ॥ ६ ॥ जलेचतुर्दशगुणेतण्डुलानांचतुःपलम् । विपचेत्स्रावयेन्मण्डःसभक्तोमधुरोलघुः ॥ ६५ ॥ नीरेचतुर्दशगुणेसिद्धोमण्डस्त्वसिक्थकः ॥६६॥ अर्थ-पल (३२ ता० ) चायल फूटफर चौदह गुण जल. मटानामिप्ति । धुदित तानामिरपर्यः । प्रापर्यदिति यादिना चारपेद । मसिश्य इति खिश्परदित वर्षः मतादि. रहिवसिश्यपः पुहियो । .

भाषाटोकासमेत। (५५) से पाककरके कपडेसे छानले । साथ छोडदे । तिसको मांड- कहते हैं। मांड मधुररसयुक्त और पाकमें हलका है ॥६५॥६६ मांसरससाधनविधानमाह। द्रव्यतोद्विगुणंमांसंसर्वतोद्विगुणंपयः । पादस्यसंस्कृतोपःपडङ्गोयूपउच्यते ॥ ६७॥ अर्थ-मांसरसका साधन करनेमें और द्रव्य (दालादि) जितनेहों उनसे दूना मांस ग्रहण करे। सबका वजन जितनाही उस्से ८ गुण जलमें पकावै।चतुर्थाश रहै तब रतारकर छानले। इसको पडङ्ग जूस कहते हैं ।। ६७ ॥ पलानिद्वादशप्रस्थेपनेऽथतनुकेतुपटू । मांसस्यपटकंकुर्यात्पलमच्छतरेरसे ॥ ६८॥ अर्थ-धनमांसरस बनानाहो तो १२ पल (९६तो०)मांस सेर जलमें सिद्धकरे । मांसका पतलारस करना हो तो ६ पल (४८ तो०) मांस, ४ सेर पानीके साथ और अच्छतर मांस- रस वनानाहो तो १ पल (८ तो०) मांस चारसेर जलके साय सिद्धकरे । चौथाई रहै तब रतारले । अच्छतर मांस- का रस बनानाहो तो पहले एक पल मांसको पत्यरपर पीसे फिर गोलिये बनाय धीमें भूनलेना चाहिये । क्यों कि थोडा- सा मांस बहुतसे जल के साथ सिदकिया जाय तो उसका गल- जाना संभव है ॥ ६८॥ १ अस्याः। पने मांसरसे कर्तव्ये प्रस्ये जळे मांसस्य दादशपर्ट दत्त्वा पक्तव्यम् । वदनु तनुके रसे कर्तव्ये मांसस्य षट्पलं पानी प्रस्यमेव दातव्यम्। मात्तरे रसे कर्तव्ये प्रत्ये जले मांसस्य पलं दत्वा तन्मांसं पिष्ट्वा प्रस्थाधशेषस्थितनले पस्या अनुरूपं स्याप्यं वस्त्रेण छानयित्वा यूपः कार्यः । मांसस्य वटकं फुयादिति स्विनमांसम्प पर पिष्टवा वटकान् विधाय पृतादौ भजयित्वा मच्चतररसं साय- मित्यर्थः । मन्यया मांसपलस्याविद्रवपाके विलयनं स्यादित्य च्छतरे रसे घटक पुर्यादित्याद ।

(५६) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । लाक्षारसंसाधनमाह। पड्गुणेनाम्भसालाक्षादोलायंत्रेझुपस्थिता । त्रिसप्तधापरिस्राव्यालाक्षारसमिदंविदुः ॥ ६९ ॥ अर्थ-लाखका जितना वजनहो, उस्से ऊँगुण' जलके साथ दोलायंत्रमें पकाकर इक्कीसवार पसालेवै । पंडितलोग इसको ही लाक्षारस कहते हैं ।। ६९ ॥ प्रक्षेपविधिमाह । प्रक्षेपःपादिक क्वाथ्यात्स्नेहेकल्कसमोमतः॥ परिभापामिमामन्येप्रक्षेपेऽप्यूचिरेयथा ॥ ७० ॥ अर्थ-क्वाथमें जिस वस्तुका ( मधु चीनी आदिका) प्रक्षे. प देनाहो, तिसका परिमाण काथ्यका चौथा अंशहै और घी तैलादि स्रह दव्यमें जो प्रक्षेप देना होताहै, तिसका परिमाण फल्मकी समान है ॥ ७० ॥ चूर्णादीनांभक्षणप्रकारमाह। कर्पश्चूर्णस्यकल्कस्यगुडिकानाञ्चसर्वशः। द्रवशुत्त्यासलेढव्य पातव्यश्चचतुवः॥ ७१ ॥ मात्राक्षौद्रघृतादीनांस्नेहक्काथेपुचूर्णवत् । अर्थ-चूर्ण, फल्क, गुडिफा और वटिका आदि एफकर्ष (२ तोला ) के परिमाणसे प्रयोगकरे । लेहन फरक सेवन फरना हो तो औपधिसे दूने दव ( तरल) पदार्थके साथ और दे पातम्पपृतादिसाधने तैलादिसाधने या प्रक्षेपः पाल्पा एमो मतः सापतेस्म हापर्यः । शर्करामधुप्रभृतीनामिति फाप्यादिति पाचनादिद्रव्याद का प्रक्षेप: पादिकाशातुर्मापफो नेय इति चापा- णिदन सम्मतः। मन्पऽपि द्धादय इमा परिभाषा प्रक्षेपेऽपि उचिरे परि- भाषयांपवः भसएप चमादनोऽपि तरस्यौपाय स्वसंनद लिखितयान् । पर पादनफा मत है । पाचनदिने प्रक्षेपका परिमाण भल्ग .. भाषाटीकासमेत। (५७) पान करके सेवन करना हो, तो औषधिसे चौगुने द्रवपदार्थ- के साथ प्रयोग करना चाहिये । स्नेह कायमें शहद और पृतादिके प्रक्षेप देनेकी मात्रा चूर्णादिकी समान एककर्ष (२ तोला ) है ॥ ७१॥ काथेनचूर्णपानंयत्तत्रकाथप्रधानता । प्रवर्ततेनतेनात्रचूर्णापेक्षश्चतुवः ॥ २२ ॥ अर्थ-चूर्णफे साथ कायका प्रयोग करनाहो (वर्णकी १ चूर्ण कल्को गुड़िका, चकाराद वटिकाच यापयुज्यते च तर्हि सर्वत्र वक्ष्यमाणविशेपं विना तोलकद्रपमुपयुज्यते । स चूर्णादेः कर्पः यदि टेढव्यः ताई द्रवशुनया माक्षिकप्रभृतीनां बर्द्धपलेन तोटकचतु- प्टयनेति यावत् । चूर्णस्य तया लेढुंमुखत्वात् पावव्यश्चेतदा . चतुर्द्रय इति माक्षिकादीनां चतुरांगेन पलेनेवि शेषः । तया सति चूर्गस्य पातुं सुखरबादित्यस्य प्रधानार्यः सांप्रदायिकैश्चक्रदत्तादिभिर्मन्यते । अन्येतु प्रक्षेप्येनामन्यते । तया हि तेपामपमयीयत्र चूर्णस्य कल्कस्य राडिका- नाश्च भेषजानामुपयोगस्तब कर्षप्रक्षेपो दातव्यः। शेपार्थः सुगमः । मात्रामोद्रतादीनामिति क्षौद्रप्रभृतीनां मधुपुतगुढानां हे का- थे या प्रक्षेपश्चर्णवद । पूर्णस्य टक्तः तहि यत्र धृतादयः प्रक्षेपास्त- थेषां धृतशोदादीनां कर्ष इत्यर्थः । एतन्न रानादिकायस्य कस्य प्रक्षे प्यं मिलितो शर्करामधुनोः पादिकं मापचतुष्टयं प्रक्षेप्यमिति साम्प्रदा- पिकमतम् । यदुत्तमन्यत्र । प्रक्षेपः पादिक छाप्या नेहे कल्क- समोमवः' इति । अन्येनु शर्करामधुनोः प्रत्येक ट्रंक्षणं कृत्वा मिलि- स्वा दंशणदयं कर्प दातव्यमाहुः-शाणो दो इंक्षणं विद्याद तो दो कर्ष टदुम्बरः। परमध्याहतमनुमतमेवेति न्यायाद । चक्रदत्तानुमत- मेतत् । किन्तु सर्ववमेवम् । अपितु काचिद् किश्चिदोपवयोवद्यायपेक्ष- या इत्ययधेपम् । वस्तुतस्तु वावग्वरात राम्रादिकपाय शर्करामा- पकवयं मधुमाकं प्रक्षेप्नुमईति यया चैतत् । तया-'पोशाचतुभाग चाते पिने कममात् । क्षौद्रं कपाये दातम्यं विपरीता तु सार्वरा' इति संदितोपाये स्वयमेव चक्रेण व्याख्यातम् । इदं तु पादिकः प्रक्षेपात् क्रिपासिद्धिरिपभिप्रार्पण तत्राभिहित इयमन्यत् । किश्च चूर्णवदिति प्रक्षेप्यं सौदपृतादीनामपि चूर्ण इव चर्णस्य जरणादयथा भागः प्रक्षेपस्तया दौद्रघृतादीनामपि शागो देय इति गुरदः । प्रक्षेपपादिकः काप्यादिदि वाक्यस्य एकवाक्यत्वान्मनोहरम् । २पर गंपानं योगिकं सत्र चूर्णस्स प्राधान्यात् कर्षमानं द.

(५८) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। प्रधानताके हेतु ) तो चूर्णसे चौगुना काय लेकर प्रयोग करे; परन्तु काथके साथ चूर्ण प्रयोगके सम्बन्धमें ऐसा नियम (चूर्णसे चौगुना) युक्तियुक्त नहीं है । यह विधि केवल चूर्ण औषध प्रयोगके सम्बन्धमें जानना । जहांपर फपायपानको विधि होगी और कपायकी प्रधानता दिखाई देगी, तहांपर उमर और बलावलका विचार करके चतुर वैद्य कपाय आरचूर्णकी मात्राको कल्पित करे ॥ ७२ ॥ मतान्तरमाह-द्रव्यविशेषस्य । मापिकहिंगुसिन्धूत्थंजरणाद्यास्तुशानिकाः । सितोपलागुणक्षौदसामान्यांशप्रकल्कनाः ॥७३॥ अर्थ-दूसरे मतमें कोई २ कहते हैं कि हींग और सेंधा (तीक्ष्ण होनेसे) एक मापा (परात ) जीरा आदि एकशान (२ तोला ) प्रक्षेपदेव और चीनीगुड, मधु आदिका प्रक्षेप देनाहो तो गुरुके उपदेश और साधारण वंचनके अनुसार प्रवलामि, मध्यमामि और क्षीणामियुक्त पुरुपको क्रमानुसार एफपल (८ तोले ) तीन कर्ष ( ६ तो० ) और अर्द्धपल (४ तो०)(सुश्रुतके मानसे) की मात्राका प्रयोग करे ॥७३॥ दोपभेदेमधुशर्फरयो प्रक्षेपमानमाह । पोडशाप्टचतुर्भागवातापित्तकफार्तिषु । स्मात् काम्यं चतुर्गणं तस्य काथस्य तत्र प्राधान्यं यत्र छान सह प्रक्षेप्यस्य चूर्णस्य पानं वत्र पाथस्य प्रधानत्वाचूर्णापेक्षी चतु. यः चतुर्गुणत्वं द्रवस्य न प्रवर्तत इति । १ हिसैन्धययोः प्रक्षेपयोस्तण्यान्मापिकं, जीरकायाः पुनः छाप्यात पादिका एव । सितोपलासिताशर्करादीनाच सामान्याना सामान्पषाक्पाना उत्तमस्य पलं मात्रा इत्यादीनामिव मंशांशकल्पनाः फार्या इति सामान्यांशम् । पत्रिकर्षार्द्ध पररूपं सोश्रुतमित्यर्थः । सामान्पमिति प्रक्षेपः पादिक छाप्यादिवि तेन पादिका इति गुरवः ।

भाषाटीकासमेत। क्षौद्रकपायेदातव्यविपरीतातुशर्करां ॥ ७४ ॥ अर्थ-काथमें मधुका प्रक्षेप देना हो, तो वायुकी अधिक- तामें वायके सोलहवें हिस्सेका एक हिस्सा, 'पित्तकी अधि- काईमें काथका आठवाँ भाग, कफकी अधिकतामें कायका चौथा भाग मधुमक्षेपदे । चीनीका प्रक्षेप इस्से विपरीत है। अर्थात वायुकी आधिकतामें काथसे चौथाई, पित्तकी अधितामें आठवां भाग और कफकी अधिकतामें कायका सोलहवां भाग चीनीका काथमें प्रक्षेपदे ।। ७४ ।। क्षीरादिपाकमाह। द्रव्यादरगुणंक्षीरंक्षीरातोयंचतुर्गुणम् । क्षीरावशेपकर्त्तव्यःक्षीरपाकेत्वयंविधिः॥ ७ ॥ क्षीरमस्त्वारनालानांपाकोनास्तिविनाम्भसा। सम्यक्पाकंनगच्छंतितस्मात्तोयंचतुर्गुणम् ॥७॥ अर्थ-जिस व्यके साथ दूध पकाना हो, तिस्से आठ गुण दृधसे चौगुना जल डालकर पकावै । जव देखे कि जलका अंश जल गया केवल दूध वाकी है, तब उतारले । दूध, दही मस्तु और कांजी इनका पाक, विना जलफे नहीं होता । इसकारण भली भांतिसे पाक करनेको चौगुणे १ पोडशाष्टचतुर्भागमिति पायो पितेच कफेच कपायपाने क्षौद्रं प्रक्षेप्यं । यायो पोटशांशं, पित्ते भष्टांश, कफे चतुपाशं । शर्करापास्तु यायो चतुशिपिने अष्टमांशं, कफ पोटशांशमिति विपरीतेति वचन- सामर्याद। २ पततु वचनं फेयलशीरपकपापनादौ क्षीरंपंचमस्यायामिरपपः। नान्यत्र तलपुतादिपाके तब ट्रान्तरमस्त्वेव फेवल तैलादिपाके चतुर्गुणं शीरमेयास्ति न द्रम्यान्तरमस्ति भर कण्डोक्तावाद परि- भाषा न प्रपनवे । यथा 'भव्यक्तायुक्तरशोक्तसन्दिग्धाप्रकाशिका' एपभिप्रोप मारपेपमिति गुरषः। -

(६०) वैद्यकपरिभाषामदीप।
जलके साथ पाक करे। परन्तु यह नियम केवल क्षीरमें पकेहुए
पाचनादि (क्षीरपंचमूल्यादिक्काथ) के लिये है । पृत-
तेल आदिके साय दुग्धपाक करना हो तो वहांपर यह नियम
ठीक नहीं है ।। ७५ ॥ ७६ ॥
परिभाषाप्रदीपसंग्रहका द्वितीयखण्ड समास हुआ,
अथ तृतीयः खण्डः।
अथस्नेहसाधनेवाथ्यज़लादेःपरिमाणमाद ।
काथ्याचतुर्गुणवारिपादस्य॑स्याचतुर्गुणात् ।
स्नेहास्नेहसमंक्षीरंकल्कस्तुस्नेहपादिकः॥.
चतुर्गुणन्त्वष्टगुणंद्रव्यद्वैगुण्यतोभवेत्॥१॥
अर्थ-काव्यको चौगुने जलके साथ पाक फरे,
चौथा
अंश बच रहने पर उतारकर छानले । फिर स्नेहके (घृत-
तेलादिफे ) परावर दूध और चतुर्थाश फल्कके साथ स्नेह-
पांफ करे। ऊपर फहे हुए को " चतुर्गुण " शब्दके स्थानमें
आठ गुण जलदान करे । क्यों कि द्रवद्रव्यको दूना
लेना चाहिये ॥ १ ॥
अपिच।
अत्रवान्तरानुक्तीशीरमेवचतुर्गुणम् ।
द्रव्यान्तरेणयोगेहिक्षीरस्नेहसमभवेत् ॥ २॥
अर्थ-स्नेहपाफ फरने में और फोई घ (जलादि) पदार्थ
न फराहो और फेपाल दूधसेही पाफ सिद्ध करना हो, तो
स्नेहसे चौगुना दूध देकर पाफ फरे। और जो फोई और
दपदय कहाही तो नहफे परावर दुग्धसे पाफ करे ॥२॥

भाषाटीकासमेत । अन्यच्च। अन्यच्च। जलमष्टगुणक्वाथ्यात्वाथश्चजलपादिकम् । काथाचपादिकंस्नेहनेहात्कल्कस्तुपादिकः॥३॥ अर्थ-आठ गुण जलमें क्वाथ्यद्रव्य पकायकर जब चौथाई अंश वच रहे तो उतार कर छानले। फिर कायसे चौथाई स्नेह और स्नेहसे चौथाई कल्कसे पाक सिद्ध करे॥३॥ पंचप्रभृतियत्रस्युड़ानिस्नेहसंविधौ । तत्रस्नेहसमान्याहुरक्चिस्याच्चतुर्गुणम् ॥४॥ अर्थ-यदि स्नेहको पांच या इस्से अधिक दवदव्योंके साथ पाक करनाहो, तो यह प्रत्येक द्रवदव्य स्नेहकी वरावर देना चाहिये । परन्तु यदि एकसे चार तक दवदव्यकरके पाक कर- नेकी विधिहो, तो प्रत्येक द्रव्य स्नेहसे चौगुना लेना चाहिये। एकद्वित्रिवद्रव्यैःकुर्यात्स्नेहाचतुर्गुणम् । क्षीरंहसमंदेयंचतुर्भिश्चचतुर्गुणम् ॥ ५ ॥ अर्थ-एक, दो या, तीन द्रवद्रव्यके साथ स्नेहपाक कर- १ भत्र स्नेहादेर्यव यशोधरटोकाव्याख्यामाह भत्रमिलित्वैव चातु- गुण्यं युक्तमेव एकादिचतुर्द्रवपर्यन्तम् अत्रानुपपतिरेषा । द्रव- चतुष्टयविपयेण चरितार्थमेव तद्वचनम् । तत्र द्रवचतुष्टयसम- वनेति नेवश्चक्षतिः तस्मादेकेनापि, चातुर्गुण्यमित्यादि चतुःसममि- त्यन्तयोः परिभाषया ट्रवचतुष्टयविपये तावद । यत्र स्नेहादेः पाक- विधी द्रवानि पश्चप्रभृतिषट्सप्ताधाधिकवराणि च देयानि स्युः । वत्र नेदसमानानि देयानि । अवांगिति पश्चान्दस्य अवाक पे- चमादित्यर्थःगतेन एकादि चतुःपर्यंत द्रवाणां च तुर्गुण्यं नेहभागोपक्षया इति । एक, द्वि, त्रि, द्रवयोगेपि मिलित्वा चातुर्गुण्यम् । चतुपुंदवेषु तु प्रत्येकं नेहस्य भागापेक्षया चातुर्गुण्यमित्येके वदन्ति । एतेन चतुर्णा चातुर्गुण्पम् । त्रयाणामपि द्वाभ्यामपि एकस्यापि चातुर्गण्यम् । पंचापेक्षया एषामकादिचतुर्णा प्रति चावाकवामित्यभिमायः।

वैद्यफपरिभापामदीप। नाही, तो प्रत्येक द्रव्यको स्नेहसे चौगुना लेना चाहिये, दूध स्नेहकी बराबरले. और चार द्रवदन्यसे पाक करनाहो तो उनके बराबर भागमें मिले हुए स्नेहसे चौगुना लेना योग्य है ॥५॥ कल्काचतुर्गुणस्नेह स्नेहात्तोयंचतुर्गुणम् । क्वाथ्याच्चतुर्गुणवारिकाथ्याक्वाथसमोभवेत् ॥ ६॥ अर्थ-कल्कसे चौगुना स्नेह, स्नेहसे चौगुना जल, काथ्यद्रव्यके वजनसे चौगुना जल और काथ्य द्रव्य काथकी (जितना काथ स्नेहमें डालनाहो) समान वजनसे देना ॥ ६ ॥ जलनेहोपधानाञ्चप्रमाणंयत्रनेरितम् । पादःस्यादौपधस्नेहास्नेहात्तोयंचतुर्गुणम् ॥७॥ अर्थ जल, स्नेह और औषधिका परिमाण नकहाहो तो स्नेहकी चौथाई औषध और स्नेहसे चौगुना जल प्रदानकरे॥७ वृपादिकुसुमात्कल्क केवल हसिद्धये । यत्रोक्त स्नेहपादानेहकार्यमनीपिभिः॥८॥ अर्थ-जो स्नेहमें केवल वासक आदिके फूलका कल्क दैन. की विधिहो तो यह फल्क स्नेहका आठवां भाग ग्रहण करे। स्नेहसिद्धयतिशुद्धाम्बुनिश्काथस्वरसैक्रमात् । कल्कस्ययोजयेदंशचतुर्थपष्ठमष्टमम् ॥ ९ ॥ अर्थ-जल अथवा काथ और स्वरससे स्नेहपाक करनेकी विधिहो, तो यहाँ पर फल्क क्रमानुसार चतुर्थाश, पष्ठांश और अष्टमांश रक्खै । अर्थात् फेवल जलसे स्नेहको सिद्ध करनाही ता स्नेहसे चौथाई फल्कदे । फापसे पाफ फरनाहो, तो छठा अन्यच्च।

भापाटीकासमेत। ((६३) अंश और स्वरससे स्नेहपाक करनाहो तो "स्नेहका आठवां हिस्सा कल्कप्रदान करे ॥९॥ स्वरसक्षीरमाङ्गल्यै पाकोयत्ररितश्वचित् । जलंचतुर्गुणंतत्रवीर्याधानार्थमावपेत् ॥ १०॥ नमुञ्चतिरसंद्रव्यंक्षीरादिभिरुपस्कृतम् । सम्यक्पाकोनजायेततस्मात्तोयंचतुर्गुणम् ॥ १॥ अर्थ- " स्वरसक्षीरमागल्यैरत्रीपलक्षणेतृतीया " माङ्गल्य दधि स्वरस,दूध और दहीसे किसी स्यलमें पाककरनेकी विधि हो तो वहांपर चौगुना जल डालै । कारण कि केवल दही दूध आदि करके स्नेहका पाक भलीभांतिसे नहीं हो सकता। इस कारण औपाधिके वीर्यवान होनेके लिये स्नेहमें चौगुना जल डॉले ॥ १० ॥ ११॥ १ विष्णुतेलपाके केवलं. दुग्धचतुर्गुणः पाकस्तत्र वीयांधानार्य जलं चतुर्गणं केचिदिच्छन्ति तदसत् । नायं क्षीरपाकः किन्तु क्षीर चतुरांणे तैलस्य पाकनिदलं द्रवप्रधानम्, एतदंगधरंतैलमिति ग्रन्या- न्तरे पाठात् अंगधरं फल्कं प्रधानमित्पर्यः । भयवा पाको द्विविधः क्षीरस्य क्षीरकरणकः क्षीरकर्मकः । भव पुनः क्षीरकरणकः पाकः। क्षीरकर्मकः क्षीरपाकः "द्रव्यादष्टगुणं क्षीरं क्षीरातोयं चतुर्गुणम्" इति वचनात् । अत्र चतुर्गुणं द्रव्यं विना सम्यक् पाको न स्यादित्यर्यः । यदि तु विष्णुतले जलं चतुर्गुणं ददाति तदा द्रववाहुल्य. दोषः स्यात् चनुरांणदुग्धे नैव फलसिद्धः। गुरवस्तवाहुः । परिभाषा तु कंठोक्तं विना विपः । अयाद विष्णुतेलको चौगुने दूधसे पाक करने की विधि है ।योप्यंयन्त करनेके लिये कोई टसमें चौगुना जल डालनेकी विधि कहते हैं। परन्तु यह विधि ठीक नहीं है। क्योंकि पद क्षीरपाक नहीं है, चोगुने दूध करके तेलपाककी विधिक भनुसार पार करना होगा । यद्यपि विपुल चौगुने जसे पाक विपा जाता है, तो भी वह उपकारी नहीं होता. घरन द्रव्य-बहुवा पतके दोषसे भपकारी होजाता है, अतएव गुरुटपदेशके अनुसार मेसा प्रचलित है, बसाही पाक सिद्ध करे।

(६४) वैद्यकपरिभापांप्रदीप ।। स्नेहपाकविधीयत्रक्षीरमकन्तुकथ्यते । तोयादीनामनिर्देशेक्षीरमेवचतुर्गुणम् ॥ १२ ॥ "एतदेवसमाधानमत्युचितम्"। अकल्कोऽपिभवेत्स्नेहोयःसाध्य केवलद्रवे ॥१३॥ अर्थ-जहाँपर स्नेह पाकमें जलादिका देना नहीं लिखा है और केवल दूधका देना लिखा है वहांपर चौगुने जलसे स्नेहा- दिका पाक सिद्ध करे । और जिन स्नेहोंकी विना कल्कफे केव- ल वदव्यसे पाफ करनेकी विधि है तिनकोभी चौगुने जलसे पाककरे ॥ १२ ॥ १३ ॥ स्नेहपाकविधीयत्रप्रमाणनेरितकचित् । स्नेहस्यकुडवंतत्रपचेत्कल्कपलेनतु ॥१४॥ अर्थ-स्नेहका परिमाण न लिखाहो तहां आधसेर स्नेह एक पल (८ तो०) कल्क ग्रहण करे । मानानुक्तौघृतेतैलेप्रस्थमाहुश्चिकित्सकाः॥१५॥ अर्थ-जो पृत तेल आदिका परिमाण न लिखाहो,तो चिकित्स- कलोग एकप्रस्थ (४ सेर ) ग्रहण करें ॥ १५॥ द्विगुणंत्रिगुणवापिबहुमात्राच्चपादिकम् । योगयदिपचेन्मूढोहीनवीयंभवेत्तदा ॥ १६ ॥ अर्थ-यदि अज्ञानता वश स्नेहके परिमाणसे, स्नेह दूना यां तिगुना ग्रहण किया जाय, अथवा अधिक मात्रा लिखी रहने पर तिसका चौथाईआदि अंश कमकरके स्नेहादिका पाफ किया जाय तो वह हीनवीर्य होताहै; अतएव पृत तेलका जितना वजन कहाहो, उतना पूर्ण मात्रासे तैयार करे ।। १६ ॥

भाषाटीकासमेत। (६५) तुलाद्रव्येजलेद्रोणोद्रोणेद्रव्यतुलामता। अनुक्तेद्रवकार्येतुसर्वत्रसलिलंमतम् ॥ १७॥ नर्य-द्रव्यका (औपधिका ) परिमाण एक तुला होनेपर यदि जलका परिमाण न कहाहो, तो एक द्रोण जल प्र. दान करे । जल एफ दोण (६४ सेर ) कहाहो और द्रव्यका परिमाण न हो तो द्रव्य ( नोपय ) एक तुला ग्रहण करे । जहां पर द्रव कहाँहै, परन्तु साफ यह नहीं लिखा कि क्या दव है, तो वहांपर सब जगह जलही प्रदान करे ॥ १७ ॥ मन्येप्याहुः। अङ्गेऽप्यनुक्तेविहितन्तुमूलंभागेऽप्यनुक्तेसमताविधेया॥ वेऽप्यनुक्तेजलमेवदेयंकालेऽप्यनुक्तेदिवसस्यपूर्वम् ॥ अयं-द्रव्यका अंग न कहा होतो मूल, भाग न फहाहो तो समानभाग, दवदव्य न कहाहो तो जल ग्रहणकरे और काल न कहाहो तो प्रातःकालको समझना चाहिये ॥ १८ ॥ प्रसारण्यादिनिर्दिष्टंशतमेकंपृथक्पृथक् । जलद्रोणेनर्चकैकंसाधयेकृष्णकुट्टितम् ॥ १९ ॥ काथ्यद्रव्यत्ययाहुल्यादुदकंस्वल्पमेवतु । सम्यक्पाकंनजायेतहीनवीर्य्यन्तुकेवलम् ॥२०॥ अर्थ-गन्ध प्रसारणी ( पसरन ) आदि काय्यदव्यांका परि- माण अधिकही तो उनको एक सापही न लेकर अलग रूप- से एक शतपल (१२॥ सेर)न्य प्रदण फर भली भांतिसे कूटै। और एक द्रोण ( ६४ सेर) जलसे पाक करे। क्योकिं काय्य.

वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। द्रव्य परिमाणमें अधिकहो तो बडे पात्रके न मिलनेसे तिसके योग्यजल एक. साथ ही नहीं दिया जाता। काथ्यदव्यमें बारम्बार जल देनेसे अथवा जलका परिमाण कम होनेसे भलीभांतिसे पाक सिद्ध न होनेपर औपधिका वीर्य निकला नहीं सकता, वस यह औपचं होनवीर्य हो जाती हैं।।। १९ ॥ २० ॥ कल्ककाथावनिर्दिष्टोगणात्तस्मात्समाहरेत् । समस्तवर्गमर्द्धवायथालाभमथापिवा ॥ प्रयुञ्जीतभिषक्प्राज्ञःकालसात्म्यविभागवित् ॥२१ अर्थ-कल्क और काथके द्रव्य न कहेहों तो वहांपर स्नेहमें कहे हुए गणके समस्त द्रव्य लाकर कल्क और काथके योग्य परिमाणसे ( पहले लिखा गया है ) ग्रहण करे गणमें कहे हुए समस्त द्रव्य, या आध अथवा तहातक मिले उनकोही, चतुर चिकित्सक काल और सात्म्यादिका विचार करके प्रयोग करे ॥ २१ ॥ यंत्राधिकरणेनोक्तिर्गणेस्यात्स्नेहसंविधौ। तत्रैवकल्कनियूहौविध्येतेस्नेहवेदिना ॥ २२ ॥ अर्थ-पहलेही कहा गया कि कल्क और काथका द्रव्य और भाग न कहाहो तो स्नेहमें कहे हुए द्रव्योंका कल्क और काथ ग्रहण करे, परन्तु यह सब जगह ग्रहण नहीं किया जासकता। नीचे टीके की व्याख्याका प्रमाण दिखाया जाता है ।॥ २२॥ १ यंत्यादि-अधिकारितया यत्र गणत्यमधिकृते दोभयकल्पना यत्र तन्नास्ति तत्र कल्लाकल्पेनैव । अतश्चक्रपाणिकृतसंग्रहे पिप्पल्यादि- पृत तेनव परिभाषा लिखिता । तत्र निश्चलकरण व्याव्यातम् । नचा यं पिप्पल्यादिगणोधिकरणेन उक्तइतिः । अतः पिप्पल्यादेः कल्क- . { भाषाटीकासमेत। (६५) गणोक्तमपियद्रव्यंभवेद्व्याधावयौगिकम् । तदुद्धरेद्यौगिकन्तुप्रक्षिपेद्यदकीर्तितम् ॥ २३ ॥ • अर्थ-जिस रोगमें जैसी औपधिके प्रयोग करने की विधि कही है; तिसमें जो कोई द्रव्य विशेष अवस्थाके कारण रोगके अयोग्य हो, तो उसको ग्रहण करे नहीं । योगमें न कहा द्रव्यभी यदि व्याधिके निवारण करने योग्य हो, तो बुद्धिमान् चिकित्सक विचार करके तिसको प्रयोग करे ॥ २३ ॥ साध्यज्ञेयाः न छायकल्कं कुर्यादिति । अत्र चोक्तम् । “ एतदाक्य चलादेव कल्कसाध्यं परं धृतमिति । यत्र स्नेहसाधने अधिकरणेन उक्तः स्यातत्र गणे कल्कनिर्दीही साध्यो । यत्र गणे अधिकरणेन उक्तिनास्ति तब कल्ककल्पेनैव न कायः कार्य इति । जहां पर संग्रहकारोंने गणांका वर्णन किया हो वहांपर कल्क और छाप दोनों ग्रहण करे और जहां न कहा हो वहां स्नेहमें कही हुई औषधियोंका कल्क ग्रहण करे । महात्मा चक्रपाणिदत्तनें अपने संगृही त ग्रंधमें ऐसीहि परिभाषा लिखी है। ऊपर कहे हुए " गण" शब्द- से "विदारीकन्दादिगण समझना चाहिये । पिप्पल्यादिगणके सम्बन्धम ऐसी युक्ति नहीं है। १ यत्र व्याधी ये गणाः सन्ति तत्रैव धावपेक्षया न विहितास्तत्र गणोक्ता अपि अयोगिकरवायाः धातुव्याध्यनुरूपं कीर्तितमपि यौगिक मक्षिपेत् । यया वायो सदाशैत्यादि, वीक्ष्णकदुकादिपिते, कफे निग्ध मधुरादि । एतत् सर्व गणोत्तममि न देयं वातादिषु यद्यदुक्तं तदेव देयं । यदुक्तं लोइशारे पातनळादयः " टचितमपि हेयमापधमनु- चितमुपादयमिति संक्षेपः" उचितमप्ययोगिकं हेयम् अनुचितं यौगिकमपि धारयनुरूपमुपादेयं ग्राह्यमित्यर्थः । भयांत् वायुरोग, रूखे और शीतल द्रव्यादि पित्तसे उत्पन्न हुए रोगमें तीक्ष्ण और कदु रसादि और कफ रोग, मधुर रसादि द्रव्य गणमें कहेभी हो तोभी प्रयोग न करावातादि रोगों जैसे द्रव्य प्रयोगकी विधि है भयाद वातरोगमें निग्ध और मधुरद्व्यादि पित्तरोग, कटु और मधुरदध्यादि भोर कफरोगमे तीखेदव्यादि योगमें न कहे हुए दो तोभी प्रयोग करे । चिकित्सिकको चाहिये कि धातुके अनुरूप औषधीयी फत्पना कररररी ॥ "

(६८) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप।
शाधरस्वाह।
कल्काचतुर्गुणीकृत्यघृतंवातैलमेववा ।
चतुर्गुणेवेसाध्यंतस्यमात्रापलोन्मिता ॥२४॥.
“पलोन्मितेतिपानादौमात्रादेयानिष्पन्नस्यघृतादे"
.
अर्थ-कल्कसे चौगुना घी वा तेल चौगुने (स्नेहकी अपेक्षा)
द्रवदव्यसे पाक कर ले । पानादिमें इसकी एक पल
मात्राका प्रयोग करे । शार्ङ्गधरका यही मत है ॥२४॥
निक्षिप्यकाथयेत्तोयंक्वाथद्रव्याच्चतुर्गुणम् ।
पादशेपंगृहीत्वातुनेहतेनैवसाधयेत् ॥२५॥
अर्थ-कायद्रव्यमें चौगुना जल डालकर पकावै । जब
चौथाई रहजाय तो उतारकर छान लिया जाय । फिर तिस्से
स्नेहादि पाक करे ॥ २५ ॥
क्षीरद्विरात्रस्वरसेत्रिरावं।
तक्रारनालादिषुपंचरात्रम् ॥
स्नेहंपचेद्वैद्यवर प्रयत्ना-
दित्याहुरेकेभिपज प्रवीणाः ॥ २६॥
अर्थ-वृद्धचिकित्सकलोग कहा करते हैं कि, दूधका पाक
दोरातमें, स्वरसफा पाक तीन रातमें, तक (घोल) और अर-
नाल (कांजी)आदिका पाक पांचरात्रिके मध्य में होता है।
अर्थात् स्नेहादि इन सब द्रव्योंसे पाक करनाहो तो ऊपर कहे
हुए नियमके अनुसार पाककार्य करे ॥ २६ ॥
द्वादशाहन्तुमूलानांवल्लीनांक्रममेवच ।
एकाहंव्रीहिमांसानांपाकंकुर्याद्विचक्षणः॥२७॥
अर्थ-चतुर वैद्यलोग मूल और लतादिका पाक १२ दिनमें
और मांसादिफा पाफ एकदिनमें तैय्यार करते हैं ॥ २७ ॥

भाषाटीकासमेत । चतुर्गुणेमृदुद्रव्येकठिनेऽटगुणंजलम् । तथाचमध्यमेद्रव्येदद्यादृष्टगुणंपयः॥ अत्यन्तकठिनद्रव्येनीरंपोडशिकंमतम् ॥२८॥ अर्थ-मृदुद्रव्य चौगुनेजलसे और कठिनद्रव्य आठगुने जल- से पाक करे । मृदु और कठिन इनदोनोंके वीचका द्रव्य अर्थात् जो द्रव्य अत्यन्त मृदु और अत्यन्त कठिन नहीं हैं, तिसमें भी आठगुणा जल देकर पाककरे । अत्यन्त कठिन द्रव्य १६ गुणे जलसे पाककरे ॥ २८ ॥ कदितःपलंयावक्षिपेत्पोडशिकंजलम् । तदूर्वकुडक्यावद्भवेदष्टगुणंपयः॥ प्रस्थादितःक्षिपेत्रीरंखारीयावच्चतुर्गुणम् ॥ २९ ॥ अर्थ-एककर्ष (२ तो० से १ पल ( ८ तो० ) तक औपधि १६ गुण जलमें और तिस्से ऊपर कुडव ( ६॥ सेर) तक औपधिमें आठ गुण जलसे पाककरे । प्रस्थ ( २ सेर ) से खारी (५१२ सेर ) तक औषधिमें चौगुना जल डालना चाहिये ॥ २९ ॥ अम्बुक्काथरसेर्यत्रपृथक्स्नेहस्यसाधनम् । कल्कस्यांशंतनदद्याच्चतुथैपष्टमष्टमम् ॥३०॥ अर्थ-भक्त, काय और स्वरससे अलग स्नेहका पाक फरना हो तो वहांपर फल्क अर्थात् जलसे, स्नेह पाफमें च. तुशिफा एक अंश कल्कदे, कायसे स्लेहपाक करनाही तो पष्ठांशका एक अंश फल्क और स्वरससे स्नेहपाक करनाही तो अष्टमांशका एक अंश फल्क प्रदान करे ॥ ३० ॥ १ केवटजरसिद्ध संहमारकत्कस्य घनुपाशं चहापेशयादेपम् एयंक्रमाद केयलन्नुफापसिद्ध करकस्याशंदेपम् । रसैििवस्वरसे: सिद्धेकत्कस्याष्टांशंदेसमिरपः।

(७०) वैद्यफपरिमापामदीप। दुग्धेदनिरसेतकल्कोदेयोऽष्टमांशिकः। कल्कस्यसम्यक्पाकार्थतोयमत्रचतुर्गुणम् ॥ ३१॥ अर्थ-दूध, दही, स्वरस और महा इनसे स्नेहपाक करनाहो तो आठ भागका एक भाग कल्फदे । और क- ल्कसे भली भांति पाक होनेके लिये चौगुना जल डाले। वृद्धवैद्योंका यह मतहै ॥ ३१ ॥ वानियत्रनेहेपुपंचादीनिभवन्तिहि । तत्रस्नेहसमान्याहुर्यथापूर्वचतुर्गुणम् ॥ ३२ ॥ अर्थ-स्नेहपाकमें यदि पांच या अधिक द्रवपदार्थसे पाक करनेकी विधि कहीहो तो प्रत्येक दवद्रव्यका प- रिमाण स्नेहकी समान यहणकरे और एकसे चारतक दव १ कपळदुग्धसिद्धे तैलादो नेहादष्टांशिकाकरकाकार्यः। एवंदभिरस इति स्वरूपे । तर इति पारिभाषिकतके । सर्वत्राशिकः कल्को देयः । एतेषां घनत्वेन कदाचित् सम्यक् पाकामावरवात् सस्मि- नपि चतुर्गुणं जलं दापयान्त वृद्धाः। २ पंचादीनीति पंचषट्सप्ताप्टकानि तदतिरिक्तान्यपि यत्रनेहे द्रवा- णि देयानि स्युसत्रेमानि स्नेहतुल्यानि भवन्ति । यथा पूर्वमिति प्रतिको मरीत्या पूर्व पूर्व चतुः प्रभृत्येकपर्यतं प्रत्येकं स्नेहाचतुर्गुणं द्रवदय- मिति केचिदादुअन्येतु एकादिचतुःपर्यन्तम मिलित्वा चतुर्गुणं दद- ते नकस्यापि चातुर्गुण्यं दाभ्यामपि त्रयाणामपि चतुर्णामपि चातु- गुण्यमिति। यथा महेश्वरचक्रशेपटीकायाम् । गुडूचीतले गुडूचीकाधं द्वादशशरावं दुग्धशरावं चतुष्टयं मिलि- स्वा पोडशशरावंटीकायां लिखति । एवं द्राक्षारसेपिषोडशशरावं ६. स्या एकस्य द्रव्यस्य चतुर्गुणं लिखति । एवं यष्टिमधुगाम्भारीफलयो- मिलिसयोश्चतुःपारशराव पानीये पनया शिष्टपोदशशरावं दावा तेल- त्रयं पचति । "यथा गुडूचीधापदुग्धाभ्यां तेलं छादारसेन वा सिद्धं मधुकफारमर्य रसेव पावरतानुर " इति ।

: भाषाटीकासमेत। (७१) पदार्थसे पाक करना कहाहो तो प्रत्येकका परिमाण स्नेहसे चौगुना ले ( कोई २ कहते हैं कि एकसे चारतक दवदव्यस पाक करना कहाहो तो उनके समभागमें मिलाहुआ चौ- गुना परिमाण ग्रहणकरे) ॥ ३२ ॥ द्रवेणकेवलेनैवस्नेहपाकोभवेद्यदि । तत्राम्बुपिष्ट्वाकल्कःस्याद्रवंचारचतुर्गुणम् ३३॥ अर्थ केवल द्रवद्व्यसे स्नेहपाक करना कहाहो तो इस स्नेहमें जलमें पिसा हुआ कल्कसे और चौगुने जलसे पाक तैयार करे ॥ ३३ ॥ काथेनकेवलेनैवपाकोयवरित क्वचित् । क्वाथ्यद्रव्यस्यकल्कोऽपितत्रस्नेहेप्रयुज्यते ॥३४॥ अर्थ केवल कायसे स्नेहपाक करना कहाहो, तो इस क्वाथ्य द्रव्यका कल्क यया परिमाणसे स्नेहमें डालै ॥ ३४॥ कल्कहीनस्तुयःस्नेहःससाध्य केवलेद्रवे ॥३५॥ अर्थ-कल्कके विना जिस स्नेहके पाक करनेकी विधि है, सो केवल द्रवद्रव्यसेही पाक करे ॥ ३५ ॥ पुष्पकल्कस्तुय स्नेहस्तत्रतोयंचतुर्गुणम् । स्नेहात्स्नेहाष्टमांशन्तुपुष्पकल्क प्रयुज्यते॥३६॥ अर्थ-यदि स्नेह पुप्पफल्कसे पाककी विधि कहीहो, तो स्नेहमें चौगुना जल डालै । स्नेहका आठवां भाग फल्कदे ।। ३६ ॥ स्नहनिप्पत्तिलक्षणमाह। स्नेहकल्कोयदांगुल्यावर्तितोवर्तिवद्भवेत् । वन्होशितेचनोशब्दस्तदासिद्धिविनिर्दिशेव ॥३७॥ अर्थ-स्नेहके वीचका फल्क ( कण).नंगुलिसे पकानेपर

(७२)
वैद्यकपरिभाषाप्रदीप ।
जब बत्तीकी समान.होजाय, जब यह फल्क आनिमें डालने
पर किसी प्रकारका शब्द न करे, तब जाने की स्नेहादिका
पाक पूरा हो गया ।। ३७ ॥
अन्यच्च।
८
क्षिप्तेकृशानौनकरोतिशब्दम्
नांगुष्ठलेपीविशदोपिनास्ति ॥
सम्वतितोवर्तिमुपैतिकल्कों
निष्पत्तिरेपाघृततैलयोस्तु ॥ ३८॥
अर्थ-स्नेहका कल्क आमिमें डालने पर जो शब्द न होवे
और कल्फ अंगुलीमें लेप करने पर जो उंगली में लगे अ-
र्थात् यदि बत्तीफी समान हो और अधिक कठिन कल्कका
पाक न हो, तो स्नेहका पाक सिद्ध न जाने ॥ ३८॥
शब्दस्योपरमेप्राप्तेफेनस्योपरमेतथा।
गन्धवर्णरसादीनांसम्पत्तौसिद्धिमादिशेत् ॥
फेनोऽतिमातैलस्यशेपंघृतवदादिशेत् ॥३९॥
अर्थ-स्नेह पाकके समय वो एक प्रकारका होता है और
भाग उठते हैं उन दोनोंके दूर होनेपर स्नेहमें जो जो वस्तु
दीजांती हैं, उन २ वस्तुओंका भलीभांतिसे गन्ध, वर्ण और
रसादि स्नेहमें ज्ञात होवै तब पृत और तैलादिक पाकको शेष
हुआ जानना । तैल और घृत पाकके सिद्ध होनेमें विशे-
पता यह है कि तैलका पाक तैयार होनेके समय तेलमें
अत्यन्त झाग उठते हैं परन्तु घृतका पाक पूर्ण होने के समय
फेन नहीं होते हैं ॥ ३९॥

भाषाकासमंत। (७३) आस्मिन्नवसरतोयज्ञारसाध्यंघृतादिपु ॥४०॥ फेनोदयस्यनिप्पत्ति दुग्धसमाकृतिः ।। सएक्तस्यपाकस्यकालोनेतरलक्षणम् ॥ ४॥ अर्य-जो क्षारसे वृतादिका पाक करना हो तो पाक तैयार होने के समय नष्ट दुधके झागकी समान झाग उठते हैं, अत: एव तभी पाकको तैयार दुआजानकर नीचेटतारले॥४०॥४॥ स्नेहपाकस्त्रिधारोक्तोमृदुर्मध्यःखरस्तथा । ईपत्स्वरसकल्कस्तुनेहपाकोमृदुर्भवेत् ॥४२॥ मध्यपाकस्यसिद्धिश्चकल्केनीरसकोमले । ईपत्कठिनकल्कस्यनेहपाकोभवेत्तरः ॥४३॥ तदूसरपाकास्यादाकृनिष्प्रयोजनः। आमपाकचनियोवह्निमान्यकरोगुरुः॥१४॥ अर्थ-मृदुपाक, मध्यपाक और सरपाक, यह तीन प्रकारका स्नेहका पाक है । जिस स्नेहका कल कुछेक रसयुक्त है तिसको मृटुपाक कहते हैं । जिसका फल नीरस और कोमल है तिसको मध्यपाक कहते हैं और जिसका कल्क कुछ एक कठिन है तिसको खरपाक कहते हैं । इस सरसाक- सेभी अधिक कहा पाकहो तो वह दाहजनक और निकम्मा होजाता है। आमपाक अर्याद स्नेहमें जलहो तो वह वीर्यहीन मन्दामिका करनेवाला और भारी होता है ॥१२॥१३॥४॥ नत्यायस्यान्मृदुःपाकोमध्यमःसर्वकर्मसु । अभ्यगायतर-प्रोक्तोयुज्यादेवंयथोचितम् ४५॥ . अर्थ-मृदुपाकका लेह नास टॅनग, मध्यपाकका लेह सब क्रिपाऑमें और सरपाकका लेह मदनके काममें भाता है ।।

(७४) वैद्यकपरिभाषामदीप। अन्यच्च। मृदुर्नस्येखरोऽभ्यङ्गेवस्तौपानेचमध्यमः॥४६॥ अर्थ-मृदुपाकका स्नेह . नास लैनेमें खरपाकका मलने में और मध्यपाकका स्नेह पिचकारी देने में और पीने में प्रयोग करे ॥ ४६॥ तुल्येकल्केचनिर्यासेभेपजानांमृदुःस्मृतः। संयावइवनिर्यासोमध्योदौविमुञ्चति । शीर्यमाणेतुनिसेवध्यमानेखरःस्मृतः॥४७॥ अर्थ-जो स्नेहका कल्क हत्तेमें चिपक जाय तो उसको मृदुपाक कहते हैं, जो कल्क पिट्ठीको समान मालूम होकर हत्तेसे अलग होजाय तो मध्यपाक और जो घातनादिसे कल्क कठिन जाना जाय,तब तिसको खरपाक कहा जाता है॥४७॥ सर्वेपामिहद्रव्याणांमध्यपाक-प्रशस्यते । परम्पाकोमृदुःकार्यस्तथापिनखरोमतः॥ किंचिद्रीय मृदुधत्तेतज्जहातिखरःपुनः॥४८॥ अर्थ-सब द्रव्योंका मध्य पाकही उत्तम है, मृदुपाकद्रव्य, अल्पवर्यियुक्त है, खरपाकयुक्त द्रव्य कोई फल नहीं देता। मृदुपाक तो किया जा सकता है, परन्तु खरपाक करना कभी उचित नहीं, क्योंकि वह वीर्यहीन होजाता है ॥ १८ ॥ अन्यत्पाकलक्षणमाह। वर्तिवत्स्नेहकल्कःस्यादंगुल्याचविवर्तितः। शब्दहीनोनिनिक्षिप्तःस्नेहसिद्धौभवेत्तदा ॥१९॥ अर्थ-स्नेहका फल्क ऊंगलीपर चिपकानेसे जब बत्तीकी समान होवे और अमिमें कल्कके डालनेसे जब किसी प्रकार फा शब्द न हो तबही स्नेहादिका पाक सिद्ध हुआ जान।।४९॥

" भापाटीकासमेत। (७५) यदाफेनोद्गमस्तैलेफेनहीनस्तुसपिपि । वर्णगन्धरसोत्पत्तौस्नेहसिद्धिस्तदाभवेत् ५०॥ अर्थ-जब तेलमें बहुतायतसे झाग उठने लगे और घृत फेन रहित होजाय और यथायोग्य रूपसे अर्थात् स्नेहमें जो वस्तु दीजाती हैं, तिनके रंग गन्ध और रसकी उत्पत्तिहो तब ही स्नेहका पाक सिद्ध हुआ जानें ॥ ५० ॥ घृततेलगुडादीश्वसाधयन्नैकवासरे। कुर्वन्तिव्युपितास्त्वेतेविशेपाद्गुणसंचयम् ॥ ५ ॥ अर्थ-धी, तेल और गुड़ादिका पाक एक दिन में पूर्ण नहीं करे । क्यों कि वासी करके पाक करना अत्यन्त फलदायक होता है ॥ ५१॥ घृततेलगुडादींश्चनैकाहादवतारयेत् । व्युपितास्तुप्रकुर्वन्तिविशेपेणगुणान्यतः ॥ केवलंबीहिजन्त्वङ्गक्वाथोव्युष्टस्तुदोपलः ॥ १२ ॥ अर्थ-एक दिनमेंही घी, तेल और गुड़ादिका पाक तैयार नहीं करे, क्योंकि वासी करके पार करनेसे अधिक फल होता है । फेवल धान्यादि और प्राणियोंका मांस-काप बासी फरनेसे दोपकारी हो जाता है ।। ५२ ॥ गुड़पाकोपलदाणमाह। यदादीप्रलेपःस्याद्यदावातन्तुलीभवेत् । तोयपूर्णेचपातक्षिप्तोनप्लवत्तेगुडः॥५३॥ क्षिप्तस्तुनिश्चलस्तिप्ठेत्पतितस्तुनीयति। एपपाकोगुड़ादीनांसर्वेपांपरिकीर्तितः॥५४॥ अन्यच्च।

(७६) वैद्यकपरिभापाप्रदीप। अर्थ-जब हतेसे चिपट जाय और सूतकी समान तार निकले (अर्थात हतके : द्वारा ऊपरको उठानेपर सूतकी समान तार निकले) और जलः भरे वर्तनमें डाल पर निश्चल रहै, फैल न जाय, तब गुडादिके पाफको सिद्ध हुआ जाने ।। ५३ ॥ ५४ ॥ सुखमर्दःसुखस्पोंगन्धवर्णरसान्वितः। पीडितोभजतेमुगांगुडपाकमुपागतः॥५५॥ अर्थ-मलने और धूनेसे चिकना मालूम हो और भली- भांति, गंध, वर्ण और रस गुड़में जाना जाय, हाथसे मलने- पर जब मुद्राकी समान हो जाय तब गुडका पाक सम्पन्न हुआ जाने ॥ ५५ ॥ गुडवगुग्गुलोःपाकोरसगन्धविशेपतः॥५६॥ अर्थ-गूगलका पाकभी गुडके पाकफी समान है, गुड और गूगलमें रस व गन्धकी अलगताके सिवाय और कुछभी भेद नहीं है ॥ ५६ ॥ श्रेष्टमध्यमहीनेपुद्वादशांगचतुष्टयैः। मापकैर्गुग्गुलोर्मात्रांच्याधिवीक्ष्यप्रयोजयेत् ॥२७॥ अर्थ-प्रवल अमिवालेके लिये गूगलकी मात्रा १२ माषा (शा तोला) मध्यम अमिवालेफे लिये ८ मापा (१ तो०) हीन अभिवालोंके लिये ४ मापेकी मात्रा गूगलकी बला- चल विचारके प्रयोग फरे ।। ५७ ॥ अथलोहशोधनादिपरिभाषामाह। (यदादुखिविक्रमपादालीद्दमदीपे) शुद्धयर्थविफलालोहात्कर्तव्याद्विगुणासदा ।

भाषाटीकासमेत
(७७)
चतुर्गुणफलात्तोयमीभागावशेपितम् ।।
एपएवविधिनित्यक्षालनेऽपिप्रशस्यते ॥२८॥
अर्थ-लोहेको शुद्ध करनेके लिये लोहेके वजनसे दूना
त्रिफला ग्रहण करके चौगुने जलमें पकाव, आधा रहनेपर
उतारले, तिस्से रोज लोहेको धोवै ॥ ५८॥
वधार्थत्रिफलाग्राह्यालोहान्नित्यंचतुर्गुणा।
तोयमष्टगुणंतत्रचतुर्भागावशेपितम् ॥१९॥
अर्थ-लोहको मारना हो तो लोहेसे चौगुना त्रिफला ग्रहण
करके आठ गुणे जलमें पकावै, जब चौथाई रह जाय तब
उतार ले ॥ ५९॥
भानुपाकाथमिच्छन्तित्रिफलामयसासमाम् ।
सलिलंद्विगुणंतत्रचतुर्भागावशेपितम् ॥६॥
अर्थ-भानुपाकके लिये लोहेकी वरावर त्रिफला 'ग्रहण
फरके तिसको दूने जलमें पकावै जब चौथाई रह जाय तब
उतार ले ॥६० ॥
पाच्यद्रव्यात्तुपाकाथैत्रिफलात्रिगुणरिता।
स्यात्पोडशगुणतोयमष्टभागावशोपितम् ॥ ६॥
अर्थ-लोहपाफ करना हो तो लोहेसे तिगुना त्रिफला
लेफर १६ गुण जलके साथ पकावै, जब आठवां अंश रह-
जाय तर उतार ले ॥ ६१ ॥
अन्यानियानिवस्तूनियोक्तव्यानिपुटादिए।
तानिलोहसमान्याहुर्जलंप्रागवेकीर्तितम् ॥ ६२ ॥
अर्थ-लोहके पुटादिमें और वस्तुएँ जो दीजाती हैं तिनको
लोहेके वजनकी वरावर ग्रहण करे; जलका परिमाण
पहले कहा गया ॥ १२ ॥

(७८) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। लभ्यतेस्वरसोयेपांतपांकाथोऽननेष्यते। त्रिफलाव्यत्तिरेकेणमतमेतत्पतालः॥ ६३॥ अर्थ-पतंजलिका मत-जिन द्रव्योंका स्वरस मिलता है जिनका काथ ग्रहण नहीं करे; परन्तु त्रिफलाका स्वरस ग्रहण करना ठीक नहीं, इसका काथही ग्रहण करे ॥ ६३ ॥ एपएवविधिनित्यक्षालनेऽपिप्रशस्यते ।। ६४ ॥ अर्थ-लोहेके धोने में प्रतिदिन ऐसा नियमही श्रेष्ठ है ॥६॥ लोहवत्रिफलान्योनित्रिफलावत्पयोमतम् । प्राकीर्तितंजलञ्चारमृदुमध्यादिभेदतः ॥ ६ ॥ अर्थ-लोहेके वजनके अनुसार त्रिफला और त्रिफलाके वजनके अनुसार जल डाले । मृदु, मध्य और कठिनके भेदसे जलका परिमाण पहलेही कहागया है ॥ ६५ ।। मृदुमध्यकठोरत्वात्वाथ्यद्रव्यंत्रिधामतम् । काथ्यद्रव्यानुसारेणदेयंस्थाप्यंजलविधा ।। ६६ ।। अर्थ-मृदु, मध्य और कठिन भेदसे काथके द्रव्य तीन प्रकारके हैं । वस काथ्यद्रव्यके अनुसार जलका परिमाण भी तीनप्रकारका है ॥ ६६ ॥ पतअलिश्चाह। (सामान्यपरिभापाणांलोहपारमार्थ्यम्)। द्विगुणांत्रिफलांलोहात्पचेत्पोड़शिकेजले ॥ अष्टभागावशिष्टन्तुमारणेजलमिष्यते ॥६७ ॥ अर्थ-लोहेके वजनसे दूना त्रिफला ग्रहणं करके १६ गुण नलमें त्रिफलाको पकावै, जब आठवां हिस्सा बचजाय तब उतारफर लोहा मारनेके लिये उसका प्रयोगकरे ।। ६७ ॥

भाषाटीकासमेत।
(७९)
समाचत्रिफलाग्राह्याजलंचाष्टगुणंतथा ।
वधार्थस्थापयेत्तोयंतस्याईवस्त्रशोधितम् ॥ ६८॥
अर्थ-लोहेको मारनेके लिये लोहेके वजनकी बराबर त्रि-
फला ग्रहण करके आठगुणे जलमें पाक करे जब आधा रहै
तव टतारकर कपडेसे छानले ॥ ६८ ॥
वधार्थेनसमंग्राह्यंपाकार्थञ्चसमफलम् ।
अष्टभागावशिष्टंचपाकाजलमिप्यते ॥
एवंजलंफलंप्रोक्तंयथासंख्येनयोजयेत् ॥६९॥
अर्थ-लोहेको मारनेके लिये और लोहपाकके लिये लोहे-
की वरावर त्रिफला ले।पाककेलिये काय हो तो जब आठवां
भागरहे तब टतारले । इस प्रकारके विधानसे जल और त्रि-
फलाका क्रमानुसार प्रयोग करे ॥ ६९॥
अथ लोहपाकलक्षणमाह।
तदुक्तं पतंजलिना
तावल्लोहंपचेद्वैद्योयावरणगालितम् ।
समुद्रंजायतेव्यक्तंननिःसरतिसन्धिभिः ॥ ७० ॥
अर्थ-कपडेसे छाननेपर जो लोहा समस्त वनको ढककर
फपडे में लगा रहै । नीचे (वस्त्रके वाहर) न गिरे तो जाने कि
पाक सिद्ध नहीं हुआ अर्थात् जबतक यह समस्त लक्षण दूर
नहो जाय तबतक लोहपाक करे।
-
अन्यच्चा
अंगुलिभ्यांदृढंघृष्टयदाचूर्णत्वमागतम् ।
तदासिद्धविजानीयाल्लोहेलोहविदांवरः ।। ७१ ॥
अर्थ-जब अंगुलिकरके जोरसे मसलनेपर चूर्ण होजाय,
तब चतुरपैय लोहफे पाकको सिद्ध हुआ जानें ॥ ७१ ॥

(८०) वैद्यकपरिभाषामदीप । अन्यञ्च। अंजनाभवनस्निग्धंशक्षणभूतमलेपनम् । अक्किन्नमम्भसिक्षिप्तंसम्यक्पकस्यलक्षणम् ॥७२॥ अर्थ-अंजनकी समान कान्तिवाला, गाढ़ा, चिकना, वक्ष्ण (महीनचूर्ण ) और उंगलीमें कुछेक लगजाय, जलमें डाल- नेसे तत्काल कीचड़की समान न होवै, तो लोहफे पाफको सिद्धहुआ जानें ॥ ७२ ॥ मन्दमाहुरथोलोहमलब्धाखिललक्षणम् ॥७३॥ अर्थ-पहले कहे हुए सवलक्षण लोहेमें न हों तो उसको हीनपाक जानें ॥ ७३ ॥ अतिपाकेनतज्ज्ञेयंखरमुग्झितलक्षणम् ॥७४॥ अर्थ-अत्यन्तपाक होनेपर पहलेकहे हुए समस्त लक्षणों- को लोधकर लोहा खरभावको प्राप्त होजाता है। अमोघतन्त्रेचोक्तम्। पाकस्तुत्रिविध-प्रोक्तोमृदुमध्यमतीक्ष्णकः । विध्यात्सर्वधातूनांपित्तानिलकफात्मनाम् ॥७॥ अर्थ-अमोघतंत्र में कहाहै कि पित्त, वायु और कफात्मक भेदसे सवप्रकारकी धातुओंका पाक तीनप्रकारका है । यथाः- मृदुपाक, मध्यपाक और खरपाक ॥ ७५ ॥ दर्वीमाशिष्यतेयत्तत्स्वैरंस्खलतिवानवा । मृदुपाकविजानीयात्पित्तेतद्वीक्ष्ययोजयेत् ॥५६॥ अर्थ-जो लोहा हमें लगजाय, फभी खसके कभी नहीं खसकेतिसको मृदुपाफ कहते हैं।बुद्धिमान वैद्य विचारफे साथ 'इसको पित्तके कोपमें प्रयोगकरे ।। ७६ ॥ सिक्तापुंजोपमंयत्तुमुपिकेनसमन्वितम् । तदयःखरपाकास्याच्ष्मण्येवप्रकीर्तितः॥

भाषाटीकासमेत! (८१) एकैकगुणयोगित्वान्नतदिच्छन्तित्तद्विदः॥ ७७॥ सर्वप्रकृतिसेव्यत्वान्मध्यमंबहुपूजितम् । गुडादिप्रविशेद्यत्रतत्रपाकोऽस्यमुद्रया ।। ७८ ॥ अर्थ-पाकके वर्जनमें चिपटकर लोहा रेतीली भूमिकी समान कठिनभाव धारणकरे तो इसको खरपाक कहतेहैं। श्लेष्माके कोपमें इसका प्रयोग किया जा सकताहै । एक २ प्रकारके पाकमें एक २ गुणके दिखाई देनेसे चतुर वैद्यगण तिसको प्रशंसाके योग्य नहीं समझते । मध्य पाकके लोहे- को सर स्वभाववाले सेवन करसकते हैं, और यह अत्यन्त उपकारीहै । गुडके साय जिस लोहेका पाक किया जाय और वह मल से मुद्राकी समान हो तो पाकको तैयार हुआ जानें ।। ७७ ॥ ७८ ॥ अय भावनाविधिलिख्यते। द्रवेणयावताद्रव्यमेकीभूयार्द्रतांबजेत् । तावत्प्रमाणकर्तव्यभिपग्भिीवनाविधौ ॥७९॥ अर्थ-चिन्तनीय द्रव्य जवतक वदव्य (भावित व्य) के साय एक (मिश्रित ) नहो, और गोले नहों तबतकही भावित व्यसे मर्दनकरें ॥ ७९ ॥ दिवादिवातपेशुष्कंरात्रौरात्रोचवासयेत् । शक्षणंचूर्णीकृतद्रव्यंसप्ताहंभावनाविधिः ॥ ८० ॥ अर्थ-चिन्तनीय दव्य भावना देकर दिनको धूपमें सुसावे, रात्रिम वासीफरे, और तिसके दूसरे दिन सूक्ष्मचूर्ण फरके फिर भावना दाइस प्रकारसे एक सप्ताहतक भावनादेना उचित है ।। ८० ॥ १ मत्र जलं पाकामष्टगुणं देयं प्रन्यान्तरदर्शनाद । "भाव्यद्रव्पसमं छाप्यं छाप्यादष्टाणं जलम्" इति पश्चाल्लिखितमेव । कविनु भतुक्त. जरपरिमाणे चनुरांचं जलं दत्वा ध्यत्वादिविदस्त्वष्टांशशेषपदन्ति ।

- (८२) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप ग्रन्थान्तरेच। भावद्रव्यसमंकायंकाथ्यादरगुणंजलम् । अष्टांशशेपित काथोभाव्यानांतेनभावना ॥ ८ ॥ अर्थ-दूसरे ग्रंथमें कहाहै कि भावना देनेयोग्य द्रव्य- फी समान काथ्य द्रव्य ग्रहण करके, तिस्से आठ गुणे जलमें पकावै; आठवां अंश रहजाय तव उतार कर तिस्से भावनादे ।। ८१॥ क्षारोदकमाह। पानीयोयस्तुगुल्मादौतद्वारानेकविंशतिम् । स्रावयेत्पगुणेतोयेकेचिदाहुश्चतुर्गुणे' ॥ ८२ ॥ अर्थ-गुल्मादि रोगमें जो क्षार-जल दियाजाता है। इसको बनानाही तो ६ गुणे जलसे २१ वार चुआले ॥ ८२ ।। द्विरुक्तद्रव्यग्रहणम्। घृततैलादियोगेचयव्यंपुनरुच्यते । ज्ञातव्यंतदिहाचार्यैर्भागतोद्विगुणेनहि ॥ 'आदिशब्देनचूर्णवटिकादिलेहप्रभृतिषुज्ञेयमिति।"८३ अर्थ-धी, तेल, वटिका और चूर्णादिके योगमें जो द्रव्य दोवार कहाहै, उस द्रव्यके दो भागदेने चाहियें ॥८३॥ चूर्णस्य पाकनिषेधमाद । प्रायोनपाकचूर्णानांभूरिचूर्णस्यतेनहि । १क्षापदण्गुणं जलं दत्वा धखेण दोलायंत्र विधाय तदधः पात्र पातयित्वा क्षारोदकं ग्राह्यम् एवमेकविंशतिवारं पुनः २ स्रावयित्वा ग्राह्यम्भयवा फेचिदाहः क्षाराबतुर्गुणं जलं दत्वा चतुर्थावशिष्ट नाव- पित्वा तजलं नाह्यम् । क्षारजलो तेयार करनेके नियम । क्षार (खार) भौर जल (ऊपर फाहेदुए परिमाणके मनुसार) दोनोंको इकठाकर दोलायंत्रमै रखके नीचे पान में घुमाघ, ऐसेशार पारचुमाकर उस जटको प्रह णकरे कोई कहते हैं कि सारको चौगुने जसे पाकरे चोपाई बहरहनेपर हार कर चुमाने फिर उसजको प्रहण करे। - भापाटीकासमेत । (८३) आसन्नपाकेप्रक्षेपःस्वल्पस्यपाकमागते॥८॥ अर्थ-चूर्णका पाक करना कर्त्तव्य नहींहे लड़ आदि बनाने हों तो चीनी अथवा गुडका रसकरके पात्र अमिपरसे उत्तारे, उसको चूर्ण प्रक्षेप देकर भलीभांतिसे घोलकर लहू बनावै । चूर्ण अधिक होतो चीनी या गुडका रसपाक तैयार होनेके कुछ काल पहले देवै, चूर्ण अल्प ( थोडा) हो तो उतार कर कुछेक गरम रहते हुए प्रक्षेपदे ॥ २४ ॥ चूर्णेचूर्णसभोज्ञेयोमोदकेद्विगुणोयुडः॥ ८५ ॥ अर्थ-औपधिके चूर्णमें, चूर्णकी वरावर गुड, और मोद- को औषधिसे दूना गुड डालै ॥ ८५ ॥ संख्यापलानांशतशःपलंप्रश्रूयतेयतः। तदाचाकृतिमानेनतेपान्तुग्रहणंविदुः ॥८६॥ अर्थ-जहांपर एक शतपल और पल संख्या कही है, वहाँ पर जिस दपकी जैसी संख्या है, उस द्रव्यको उतनाही ग्रहण करे ॥८६॥ भयानुपानविधिमाह। स्थिरतांगतमकिनमन्नमद्रव्यपायिनः। १ प्रायः इति प्रचुर्यण प्राचुरार्थ इति भासनपाफ इति उपस्थित- पाके नतु पाकमापने तथा सति प्रचुरचूर्णानां प्रवेशो न स्यादित्यर्थः । स्वल्पस्य चूर्णस्य पाकान्वे कटुष्णदशायां मक्षेप इति दोपः। २ भाकृतिमानेनेति पदवरूपसंख्या येषां तथा रोषा द्रव्याणां ग्रहणं विदुः। एतेन मदादीनां द्वैगुण्यं मानुष्ठेपम् । “पलोल्लेबागवे माने न देगुष्पमिप्यते।" इति वचनाद । भर्पाद मृदु आदि कोई द्रव्य- ही दुना ग्रहण न फेरे । पपा,-" पलोल्लेखागते माने " इत्यादि पचनसे पहले भी कहा गया है पर मवाफर जहां मान कहाँ गया है उस स्थानमें दूना ग्रहण न करे। .

(८४) वैद्यकपरिभाषामदीप। भवेत्तुवाधाजनकमनुपानमतःपिवेत् ॥ ८७ ।। अर्थ-" आवाध्यमिति आसम्यक् प्रकारेण बाधक्यं पीडा जनकमित्यर्थः " आहारके संग द्रवद्रव्य (जलादि ) को न पान करनेसे पेटमेंका खायाहुआ द्रव्य सूखकर विविध प्रका- रके दोपवालाहो पीडादायक होता है। इस कारण अनुपानके साथ आहारादि करना चाहिये ॥ ८७ ॥ यथाजलागतंतैलक्षणेनैवप्रसर्पति। तथाभैषज्यमङ्गषुप्रसर्पत्यनुपानतः॥ ८८॥ अर्थ-जिस प्रकार जलमें तेल डालनेसे, एक क्षणभरमें ही तेल जलमें फैल जाता है, तैसेही औपध सेवन करनेके पीछे अनुपानका सेवन करनेसे अति थोडे कालमेंही औपधिका गुण सारे शरीरमें फैल जाताहै ॥ ८८ ॥ रोचनंबृंहणवृष्यंदोपनंवातभेदनम् । तर्पणमाईवकरंश्रमकमहरंपरम् ॥ ८९ ।। दीपनंदोपशमनंपिपासाच्छेदनं परम् । रसवर्णकरचापिअनुपानंसदोच्यते ॥ ९०॥ अर्थ-जो अनुष्ठान औपधिक योग्यहो वह रुचिदायक, स्थूलता फरनेवाला, शुक्रका पढानेवाला, दोपका नाशक- रनेवाला, वायुफा अनुलोमन फरनेवाला, तृप्तिफारी, दे- हको कमनीय फरनेवाला, श्रांति और कान्तिका नाशक, पातादिदोपनाशकारी, वासका नाश करनेवाला, रसव- दफ भीरं वर्णप्रसादप है ॥ १० ॥ पातापिक्षितोयेनअगस्त्येनद्विजोत्तम । अनुपानंकृततेनकाकथासर्वदेहिनाम् ।। ९१॥ अर्थ-बामणोंमें श्रेष्ठ अगस्पनी मुनिनें जिसमकार या.

भाषाटीकासमेत। (८५) तापि राक्षसको भक्षण करके पचा डाला था, वैसेही आहार अनुपानके साथ खानेसे जीर्ण हो जाताहै ॥ ९१॥ अनुपानंकरोत्यूजीतृप्तिव्याप्तिहढांगताम् । अन्नसंघातशैथिल्यविकित्तीरिणानिच ॥ ९२ ॥ अर्थ-व्याति " शरीरव्यापिनीम् । “ विकित्तिः " विक्लि- नता इत्यर्थः । अनुपान-तेजकारी, तृप्तिकारी, सर्वशरीर- व्यापक, शरीरको दृढ करनेवाला और भक्ष्यद्रव्यको शिथिल व क्लिन्न करके पचा देता है ।। ९२ ।। स्निग्धोष्णंमारुतेशस्तपित्तेमधुरशीतलम् । कफेनुपानरुक्षोणंक्षयमांसरसंपयः ।। ९३।। अर्थ-वायुके कोपमें चिकने और गरमद्रव्य, पित्तके कोपमें मधुर और शीतलद्रव्य और कफ कोपमें रूखे व गरम द्रव्यका अनुपान देना ठीक है । क्षयरोगमें मांसरस वा दूधका अनुपान दे ॥ ९३ ॥ उष्णोदकानुपानञ्चस्नेहानामथशस्यते । ऋतेभल्लातकस्नेहात्तत्रतोयसुशीतलम् ।।१४।। अर्थ-सव प्रकारके स्नेह (घृतादि ) पनिकी पीछे गरम जलका अनुपान देना ठीकहै, परन्तु भिलावेका स्नेह पीनेके पछि शीतल जलका अनुपानकरे ॥ ९४ ॥ भल्लाततौवरेस्नेहेशीतमेवजलांपवेत् । जलमुणंघृतेपेयंयूपलेहेनुशस्यते ।। वसामन्जानिमण्डःस्यात्सर्वेपूप्णमथांबुवा ॥९५ अर्थ-भिलावे और तोवरको स्नेह सेवनकरके शी- १ पत्रैस्तु केशराकारः कलायसदृशैः फलैः। वृक्षस्तुपरको नाम पधिमार्णवतीरजः॥ राजनि० मरहरका अर्य करता है। अन्पच्च।

(८६) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । तल जलपान करे, पीसेवनके पीछे गरम जलका पान और तेलपान करके जूपको पियै। चरबी, मज्जा और अन्नमांड भक्षण करनेके पीछे गरम जलपान करे, सब द्रव्य भक्षण करनेके अन्त मेंही गरमजल पीना ठीकहै ॥ ९५ ॥ अन्यच्च। अन्यच्च। शीतोष्णतोयासवमद्यमुद्ग- फलाम्बुधान्याम्लपयोरसानाम् ।। यस्यानुपानन्तुभवेद्वितंयत् । तस्मैप्रदेयंत्विहमात्रयातत् ॥ ९६।। अर्थ-शीतलजल, गरमजल, आसव ( मद्यविशेष ) मद्य और मंगांदिका जूस नींबू आदि, अम्लरस, कांजी, दूध और मांसरस, इनमेंसे जो अनुपान जिसके लिये हि- तकारीहो,तैसाही अनुपान योग्य मात्रासे तिसे पीनेको दे९६॥ यूपोमांसरसोवापिशालिमुद्दादिभोजनम् । मांसादीनांचानुपानधान्याम्लंदधिमस्तुवा ॥९॥ अर्थ-सट्ठीके चावल और मूंगादि खानेवालोंके लिये जूस और मांसरस हितकारी है। मांसादि भोजन करनेके पीछे फोजी और दहीके माथको पीना हितकारी है ॥ ९७ ॥ अधानुपानमाबामाद अनुपानंप्रयोक्तव्यंव्याघौश्वेप्मभवेपलम् । पलद्धयन्त्वनिलजेपित्तजेतुपलवयम् ।। गुडसोसित्तादीनांपलाईचाविशेषतः ॥ पलमत्रसौश्रुतम्" ।।९८॥ अप-शेप्मासे टत्पन्न हुए. रोग, एया पर (८ तो०) यायु.

भापाटीकासमेत ।
(८७)
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के रोगमें २ पल और पित्तमे उत्पन्न हुए रोगमें तीन पल अनु-
पान देना चाहिये, परन्तु गुड, शहद और चीनी इनका अनु-
पान देनाहो, तो पहले केहेकी अपेक्षा आधी मात्रादे ॥९८॥
दीप्तानयोमहाकायाःस्नेहसात्म्यंमहाबलाः।
विसर्पोन्मादगुल्मार्ताःसर्पदंष्ट्रविपार्दिताः।
ज्येष्ठांमात्रांपिवयुस्तेपलान्यष्टौविशेषतः॥९९॥
अर्थ-जिसकी अनि दीत है बडे शरीरवाला स्नेहसेमी
और अत्यन्त बलवान पुरुप और विसर्प (पाण्डुरोग) उन्माद
गुल्मरोगवाला, सांपसे फाटा हुआ, विप खानेसे अर्दित हुआ
पूर्णमात्रा (८ पल) का अनुपान सेवनकरे ॥ ९९ ॥
अप लौहानुपानमाह।
माहिपंगव्यमाजञ्चपयोग्राह्यविधायसि ।
माहिपंभस्मकेदेयमाजंक्षीरंपुनर्मतम् ॥१०॥
कोप्टदोपेकफेश्वासेकासेचापिनवज्वरे ।
गव्यमन्यत्रसर्वत्रसमवारिप्रसाधितम् ॥१०॥
अर्थ-भैंसका दूध, गायका दूध और छागदूध यह तीन
प्रकारके दूध लोहेके अनुपानमें प्रयोग करने चाहिये । ति-
समें भस्मफरोग (यह ऐसा रोग है कि चाहें जितना खायो
मगर भंस बनी रहै ) में लोहेका प्रयोग करनाही तो मैं-
सफे दूधका अनुपानदे । कोष्ठदोप, कफकोप, वास और
खांसीके रोग और नवन्यरमें छाग (बकरी) दूधका अनु-
पानदे । इसके सिवाय सब रोगाम गायके दूधका अनुपानदे ।
यह
तीनों प्रकारके दूध वरावर जलके साथ ओटा । जब
केवल दूध रह जाये तो उतारफे अनुपानमें प्रयोग
फरे १०० ॥ १०१॥

(८८) वैद्यकपरिभापाप्रदीप। सर्वत्रगव्यमवैतिमतमाहपतंजलिः। अनुपानंप्रयोक्तव्यंलोहात्पष्टिगुणपयः ॥१०२।। यदातुवदितंक्षीरंतदाईभोजनपिवेत् । दद्यात्संशमनेतस्ययोऽत्यर्थक्षीणपावकः१.३॥ अर्थ-पतञ्जलि कहते हैं कि सबही कहीं गायका दूध प्रयोग करे । लोहेके वजनसे ६० गुण दूधका अनुपान करे जब दूधकी मात्रा अधिक (लोहेकी मात्रा के अनुसार) होवै, तो पहले जितना दूधका वजन कहाहै, तिसके सिवाय औरभी दूध भोजनके साथ सेवन करे क्षीणानिवाला भोज- नकी बराबर व्यवहार करे ॥ १०३ ॥ अथानुपानविशेषमाह। अनुपान हिमवारियवगोधूमयोहितम् । दधिमन्तेविपेक्षौद्रेऽनुष्णपित्तामयेपिच।।१०।। उर्वजत्रुगदेश्वासकासोरक्षतपीनसे । गीतभाष्यप्रसाहेषुस्वरभेदेनतद्धितम् ॥१०५॥ नपिबेच्छासकासातोंरोगेचाप्यूर्ध्वजत्रुगे । क्षतोरस्काप्रसेकीचयस्यचोपहतःस्वरः॥ १०६॥ अर्थ-जौ और गेऊं भोजन करनेके अन्त में, विपदोपमें, शहद पीनेके पीछे और पित्तरोगमें शीतलजलका पीना हितकारी है; परन्तु हंसलीके ऊपरके रोग, श्वास व खो- सीके रोगमें, पेटपायके रोगमें, पीनसरोगमें, गीत और वाक्य कहकर थकेहुओंके लिये, स्वरभंगरोगमें शीतल जल हितकारी नहीं है। अतएव ऐसोंको शीतलजलका अनु- पान न दे ॥ १०४ । १०५ । १०६ ॥

भाषाटीकासमेत। (८९) अथशिशोभैषजपारंमाणमाह । प्रथमेमासिजातस्यशिशोर्भपजरत्तिका। अवलेह्यातुकर्तव्यामधुक्षीरसितावृतैः॥ एकैकांवर्द्धयेत्तावद्यावत्सम्वत्सरोभवेदे ॥ १०७॥ अर्थ-एक मासके बालकको एक रती औपच मधु, दूध, चीनी और घृत इनमेंसे चाहें जिसका अवलेह बनाकर सेवन करावै । फिर एक वर्षको उमरतक प्रतिमासमें एक २ रती करके औषधिको मात्रा बढावै । एक वर्ष पूर्ण हो- जानेंपर वारह रती औपाधिको मात्राका प्रयोग करना चाहिये ॥ १०७॥ तदूर्द्धमापवृद्धिःस्याद्यावदापोडशान्दिकः। तत्तस्तुसप्ततियावत्कर्पमात्रांप्रयोजयेत् ॥ एवमेवविभागोयंतदूर्द्धवालवत्कियो । १०८॥ अर्थ-एक वर्षसे लेकर १६ वर्पतक प्रत्येक वत्सरमें एक २ मापा करके औषधिको मात्रा वढावै । फिर सोलह व- पके पीछे सत्तरवर्पतक एक कप अर्थात् २ तो मात्रासे औपधिका प्रयोग करे । इसप्रकार विधिके अनुसार मा- त्राका विभाग करले । फिर सत्तरवर्षके उपर सारी जिन्द. गीतक वालककी समान औपधिकी मात्राका प्रयोग करे।१०८ १ जातस्प शिशोटिकस्य प्रयमे मासि भेषजस्य रक्तिकामात्रा म- ध्वादिभिलेंडे दातव्या, प्रथममासादारभ्य बादशमासपर्यंत मासं मासं प्रति रक्तिकैका वृद्धि कापी नात्र दशरतिकपरिमाणमापकं वि- भागम् । किन्तु सम्वत्सरपूर्यि द्वादशरक्तिका मात्रा देयेति भावः। २ तदूर्द्धमिति द्वादशमाषादूई तेन द्वितीयवप्रथममाखादा- रभ्य षोडशवर्षपर्यन्तम् माषकवृद्ध्या कर्षपूरणं कार्यम् । ततः पोदशवर्षात सप्तति यावत् तावदेव कपणेव व्यवहारः॥ वदूर्व सप्त- वेः परं यावजीवनपयंतं बालव मात्रा काविशेषः॥

(९०) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। " अन्येप्याहुः। रक्तिमारभ्यकर्पन्तुमानबालगदेमतम् । कर्पादौतुजलश्रुत्याकाथ्यस्यकार्पिकोमतः ॥१०९ "कदावितिप्रागुक्तंपरिभापया। कपादौतुपलंयावद्दद्यात्पोडशिकम् जलमित्याख्यायतिशेपः अर्थ-बालकको जो औषधि दीजाती है उसकी मात्रा एक रतीसे लेकर एककर्प (२ तो.) तकहै । काथका : योग करनाहो तो काथ्यद्रव्य एककप ग्रहण करके पहले कहे हुए वचनके अनुसार १६ गुण जलडाले और काय बना- कर प्रयोगकरे ।। १०९ ॥ यस्तुस्यात्क्षीरपोवाल कपायंपातुमक्षमः। तदाभिपक्कुमारस्यतस्यधात्रीञ्चपाययेत् ॥११०॥ अर्थ-जो दूधका पीनेवाला बालक काथको न पीसके तो जिसका दूध यह बालक पीताहो, उसको यह क्वाथ पान करावे ॥ ११०॥ येगदानांचयेयोगाप्रोक्तास्वेस्वेचिकित्सिते । तेपांकल्केनसंलिप्तीकुमारंपाययेत्स्तनौ ॥१११॥ अर्थ-चिफिरसास्थानमें जिस २ रोगका जो जो योग क- हाहै, वालकको रोगही तो उसी २ योगका फल्क छाई (पालक जिसका दूध पीताहै ) के दोनों स्तनी में लेपकरके वालफको स्तन पिलावै ॥ १११ ॥ विविधाःकथितावालाक्षीरानोभयवर्तिनः । स्वास्थ्यंताभ्यामदुष्टाभ्यांदुष्टाभ्यांच्याधिसम्भवः११२ भाषाटीकासमेत । "वालास्तु त्रिविधा भवन्ति, क्षीरवी, अन्नवी, उ. भयवर्ती च । उभयवर्तीति क्षीरानाभ्यां दाभ्यां वर्त्तनं ये. पामिति ॥" अर्थ-तीनप्रकारके वालकहैं, दूधपीनेवाला, अन्नखानेवाला, दूध और अन्न दोनोंका खानेवाला।शुद्ध दूध और अन्नसे बालक निरोग रहताहै, दूपित दूध व अन्नसे व्याधिग्रस्त होजाताहै ११२ भयभपज्यभक्षणकालमाह । भैपज्यकालोभक्तादौमध्येपश्चान्मुहुर्मुहुः। सामुद्भक्तसंयुक्तंग्रासेयासान्तरेऽष्टधा ॥ ११३ ॥ अर्थ-औपधि भक्षण करनेके काल आठ प्रकारके -भो- जनके पहिले, मध्यमें, अन्तमें और वारम्बार, सामुद्ग (भो. जनसे पहिले और पीछे ), भक्तसंयुक्त, ग्रासमें और दूसरे ग्रासमें यह आठ विधिहैं ।। ११३ ।। अपानेविगुणेपूर्वसमानेमध्यभोजने । व्यानेतुप्रातरशनमुदानेभोजनोत्तरम् ॥ ११ ॥ वायोप्राणप्रदुष्टेतुग्रासेग्रासान्तइप्यते । श्वासकासपिपासासुतत्तुकार्यमुहुर्मुहुः ॥ ११५॥ सामुद्गहिकिनेदेयंलघुनान्नेनसंयुतम् । संभुज्यत्वोपधंभर्विचित्रैररुचौहितम् ॥ ११६ ॥ " सामुद्गमिति" सामुद्भेपर्ज विद्यादन्नस्याद्यवसानयोरिति ॥ अर्थ-अपानवायु कुपितहो तो भोजनसे. पहले, समान- वायु कुपितही तो भोजन मध्यमें, व्यानवायु कुपितहो तो प्रात:कालमें, टदानवायु कुपितही तो.भौजनके पीछे, प्राण- (९) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। वायु कुपितही तो ग्रासमें और दूसरे ग्रासमें औपधिका प्रयोग करे । दमा, खांसी और तृष्णारोगबारम्बार हिचकीरोगमें लघुद्रव्यके साथ भोजनसे पहले और पीछे और अरुचिरोगमें विविधप्रकारके श्रेष्ठ खाद्यव्योंके साथ औपधिका प्रयोग करे ॥ ११४ ॥ ११५॥ ११६ ॥ अन्यत्वाहुः । अभक्तंपूर्वभक्तंचमध्यभक्तंसभक्तकम् । भक्तोपरिष्टात्सामुद्भक्तस्यैवान्तरेऽपिच ।।११७॥ ग्रासेग्रासान्तरेचैवमुहुर्मुहुरितिस्मृतः। कालादशैतेधीमद्भिरौपधस्यसमासतः॥ ११८॥ अर्थ-अभक्त, पूर्वभक्त, मध्यभक्त, सभक्तक, पश्चाद्भक्ती सामुद्ग, भतान्तर, ग्रासमें, ग्रासान्तरमें और वारंवार- संक्षेपसे ओषधि भक्षण करनेके यह दश काल बुद्धिमान लोगोंने कहहैं ॥ ११७ ॥ ११८॥ बलिनोमहतोव्याघरभुक्तभेपजहितम् । सर्वव्याधिहरंपथ्यंपूर्वभक्तंमहौषधम् ॥ ११९ ॥ मध्यकायगतावोगान्मध्यभक्तंनिहन्तिच । सभक्तंसुकुमाराणांबालानामौपचंद्विपाम् ॥ १२०॥ भक्तोपरिटासुस्थञ्चऊर्द्धजलविकारिणाम् । सम्बन्धोवर्चसांमुद्वंदीप्ताग्निवलिनांहितम् ॥२१॥ भक्तयोरन्तरेज्ञेयंभोजनद्वयमध्यतः । तचनित्यंप्रयुञ्जीतमध्यदेहविकारिणाम् ॥ २२ ॥ ग्रासेनासेकृतानीनारव्याशक्तिधियामपि ।

भाषाटीकासमेत । ग्रासान्तरेहितविद्यात्कुष्टमेहविकारिणाम् ॥ श्वासकासपिपासानांतत्तुकार्यमुहुर्मुहुः॥२३॥ अर्थ-बलवान् और अत्यन्त वडी व्याधिमें अभक्त औषधि हितकारी है पूर्वभक्त औपधि सर्व व्याधिनाशक, मध्यभक्त औषधि शरीरके भीतर घुसेहुए रोगका नाश करनेवाली सुकुमार वालक और दवासे विरोधकारियोंके लिये समस्त औषधि सुस्थ शरीरवाले और ऊर्द्धजनुगत रोगियोंके लिये पश्चाद्भक्त औषधि हितकारी है। कब्जवाले रोगीके, दीप्तअग्निवाले और बलवान पुरुषोंके लिये सामुद्ग (भोजनके आदि और अन्तमें) सेवित औषधि हितकारी है । भोजनके मध्यमें दोबार जो औपधि सेवनकीजाती है तिसको भक्तान्तर औपधि कहते हैं। शरीरमें घुसेहुए रोगकेलिये यह सदा प्रयोग करे । हीन अभिवालेके लिये ग्रास २ में औपधिका सेवन करना उप- कारी है। कोढ व प्रमेहके रोगियोंको ग्रासान्तरमें दमा, खांसी और तृष्णारोग, वारम्वार औषधिका सेवन करना हितकारि है ॥ १९ ॥ १२० ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ अन्यच्चा भैपज्यमभ्यवहरेत्प्रभातेप्रायशोवुधः। कपायास्तुविशेपेणतत्रभेदस्तुदर्शितः ॥२४॥ अर्थ-बहुधा प्रातःकालमें पंडितगण औपधिका प्रयोग करे, परन्तु व्याधिविशेपमें, धातुविशेपमें, स्वभावविशेषमें दूध और कपायादि औपधि विचारकें प्रातःकालमें मध्याह्नकालमें अयवा सायंकाल और रात्रि में प्रयोग करे ॥ २४ ॥ १ भेदः पुनः पायपानेन या पयस्तु प्रातः सायं मध्याने रात्री च व्याधिविशेषधानुविशेषप्रकृतिविशेषतारतम्यतया देयामित्यर्थः ।

(९४) वैद्यकपरिभापाप्रदीप। ज्ञेय पंचविधःकालाभैपज्यग्रहणेनृणाम् । किंचित्सूर्योदयेजातेतथादिवसभोजने ॥२५॥ सायन्तनेभोजनेचमुहुश्चापितथानिशि । प्रायःपित्तकफोद्रेकेविरेकवमनार्थयोः ॥ २६ ॥ लेखनार्थेचभैपज्यंप्रभातेऽनन्नमाहरेत् । एवंस्यात्प्रथमःकालोभैपज्यग्रहणेनृणाम्॥२७॥ इति प्रथमःकालः। अर्थ-औपधि भक्षण करने के पांच काल हैं यथा-सूर्योदय- कालमें, दिनके समय भोजन करनेके वख्त, सन्ध्यासमयके भोजनमें, वारम्वार और रात्रिकालमें, तिनमें पित्त और कफ- के रोगमें और विरेचन, वमन व कर्षणके निमित्त अन्नके अति- रिक्त औपधि प्रातःकालमें प्रयोग करे । औपधि ग्रहण करनेका यह प्रथम काल है ।। २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ भैपज्यविगुणेऽपानेभोजनायेप्रशस्यते । अरुचौचित्रभोज्यैश्चमिश्रंरुचिरमाहरेत् ॥२८॥ समानवातेविगुणेमन्देनावापिदीपनम् । दद्यादोजनमध्येतुभैपज्यकुशलोभिपक्॥२९॥ व्यानकोपेचभैपज्यंभोजनान्तेसमाहरेत् । हिकाक्षेपककम्पपुपूर्वमन्तेचभोजनात् ॥ एवंद्वितीयकालश्चप्रोक्तोभैपज्यकर्मणि ॥१३०॥ इति द्वितीयःकालः। अर्थ-अपानवायुफे फोपमें भोजन के पहले औषधिका प्रयोग फरे । अरुचिरोगमें विविधसुखाय और रुचिकारक भक्ष्य- भाषाटीकासमेत। द्रव्योंके माय औपाधिका प्रयोग करे । समानवायुके कोपमें और मन्दामिमें, चतुर वैद्य भोजनके बीच में अनिको उकसानेवाली औपधिका प्रयोग करे । व्यानवायुके कोपमें भोजनके वाद और हिचकी, आक्षेप और कंपादिरोगमें भोजनके पहले और पीछे औषधिको प्रयोग करना चाहिये । औपधिप्रयोगका यह दूसरा काल है ।। २८ ॥ २९ ॥ १३० ॥ उदानेकुीपेतवातेस्वरभङ्गादिकारिणि । ग्रासेयासान्तरेदेयंभैपज्यंसात्म्यभोजने ॥३॥ प्राणेप्रदुष्टेसात्म्यस्यभक्तस्यान्तेचदीयते । औप,प्रायशोधारैःकालोऽयंस्यात्तृतीयकः ॥३२॥ इति तृतीयाकालः। अर्थ-स्वरभंगादिरोगका करनेवाला उदानवायु कुपितहो तो रोगदूरकारी भक्ष्यद्रव्यके साय ग्रासमें और ग्रासान्तरमें औपधिका प्रयोगकरे, प्राणवायुके कोपमें हितकारी भक्ष्य- व्यकैसाथ और भोजनके अन्तमें औपधिका प्रयोग करे। बहुधा पंडितोंका यही मत है । औपाधि प्रयोगका यह तीसरा काल है ॥ ३१ ॥ ३२॥ मुहुर्मुहुश्चतृट्छदिहिकाश्वासगरेपुच । सानञ्चभेपजंदद्यादितिकालश्चतुर्थकः ॥३३॥ इति चतुर्थःकालः। अर्थ-प्यास, वमन, हिचकी, वास और गर (विप) दोपमें अन्नके साय वारम्बार औपधिका प्रयोगकरे । औपधिप्र- योगका यह चौथाकाल है ॥ ३३ ॥ अर्द्धजत्रुविकारेपुलेसनेबृहणेतथा।

(९६) वैद्यकपरिभापाप्रदीप । पाचनेशमनेदेयमनन्नंभेपजनिशि ॥ इत्ययंपंचमःकाल प्रोक्तोभैपज्यहेतवे ॥ ३४ ॥ हति पंचमःकालः। अर्थ-दर्द्धजत्रुगतरोगमें, लेखनमें (निरूह वस्ति) पुँह णमें,पाचनमें और शमनमें रात्रिके समय अनरहित औषधिका प्रयोग करे । औपधिपयोगके पांचमें कालका यह वर्णन हुआ ॥ ३४॥ अथ क्रियाकालव्यवस्थामाह। यातूदीर्णशमयतिनान्यव्याधिकरोतिच । साक्रियानतुयाव्याधिहरत्यन्यमुदीरयेत् ॥ ३५ ॥ अर्थ-जिस क्रियाकरके उत्पन्नडा रोग नाशको प्राप्त होवै और दूसरे रोगोंकी उत्पत्तिका कारण नाश होजाय, तिस- को चिकित्सा कहाजाता है; परन्तु जिस क्रियासे एक रोगका निवारण होकर दूसरे रोगकी उत्पत्ति हो तिसको चिकित्सा नहीं कहते ॥ ३५॥ तथाच चरकचिकित्साप्राकृतीयाध्याये। याभिःक्रियाभिर्जायन्तेशरीरेधातवःसमाः॥ साहिक्रियाविकाराणांकर्मतद्भिपजांमतम् ॥ ३६॥ "भिपजां" चिकित्सकानापित्यर्थः । अर्थ-जिस क्रियाकरके शरीरकी सब धातुएँ वरावर हैं, तिसको चिफिरसा कहतेहैं; ऐसी क्रिया कोही चिकित्सकोंकी सम्मति के अनुसार है ॥ ३६ । १ उत्पनहुए विपमदोषांका निवारण करना या घरायर करना। २मन्यमिति-स्वरादीनामन्यमतं न दीरयेदिति न घयत्न बनयेदिरपर्यः।

भापाटीकासमेत । (९७) अल्पेगदेमहत्त्कर्मक्रियालवीमहागदे। द्वयमेतदकौशल्यंकौशल्यंयुक्तिकर्मता ॥ ३७॥ अर्य-साधारण रोगमें महान चिकित्सा और महारोगमें अ- ल्प चिकित्सा यह दोनोंही अहितकारी हैं इस कारण यथायोग्य चिकित्साही हितकारी है ॥ ३७ ॥ क्रियायास्तुगुणालाभेक्रियामन्यांसमाचरेत् । पूर्वस्यांशांतवेगायांनक्रियासंकरोमतः ॥ ३८॥ अर्थ-एक क्रियासे रोगको शान्ति न हो तो दूसरी किया करे। परन्तु जबतक पहली क्रियाका पहली ओपधिको क्रियाका) वेग शान्त नही तबतक दूसरी क्रिया नहीं करनी चाहिये । क्योंकि मिश्र औषधिका प्रयोग परस्पर गुणविरोधी होकर अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न करसकता है ॥ ३८ ॥ वयापिसाङ्कस्यंमाह। क्रियाभिस्तुल्यरूपाभिःक्रियासाङ्कर्यमिप्यते । भिन्नरूपतयातास्तुतन्नकुर्वन्तिदूपणम् ॥ ३९ ॥ अर्थ-एकप्रकारकी दो किया सार्य (व्यामिश्र) दोपजनक परन्तु दूसरी प्रकारको क्रियासाडूर्य औरदोपावह नहीं हैं॥३९॥ १ संकरी पामिश्रता । अतो मुख्यप्रयोगानां मिश्रणमेकरिमन्नेच रोगिणि न कतव्य परस्परगुणाविरोधात् भैषज्यगुणवैकल्यादग्निमान्य- २ तल्परूपाभिः क्रियाभिःमियातायमिप्यते, नु पुनस्ताः क्रिया चेद्भिन्नरूपा न भवन्ति तदा न सांकय्यंमिति तुदराब्दैनतदुच्यते । मतो भिन्नरूपतया भनुल्परूमाभिः क्रियाभिनं क्रियासायं भवतीत्यर्थः । पदेनेव बोधपति पाचनघृतयोद्रियोगुंडयटकलेदारिकादीनाश्च पाचनयुक्तानामेकस्मिन्नेव रोगिण्यकदिने प्रयोगः कर्तव्यो यया व्याधे- रनुपानं पप पाचनविहिवमिति, किन्नु मित्ररणोपपद्येन दोप- प्रसङ्ग स्पादेिव, मतः परसरविरोधित्वेन मापदयकलना कार्या। थपा गुटिकाये रंहद्रयमधिकमिदि दिन। जननत्वाच ॥

(९८) वैद्यकपरिमापाप्रदीप।
पइभिः केचिदहोरात्रै केचित्सप्तभिरेवच ।
इच्छन्तिमुनय प्रायोरसस्यपरिवर्तनम् ।
कृत्वाकुर्य्यात्क्रियांप्राप्तांक्रियाकालंनहापयेत् १४०
अर्थ-किसीके मतसे इसका बदल छयदिन छपरातमें होताहै
और कोई कहतेहैं कि सातदिन सातरातमें भली भांतिसे रस-
का बदल होजाता है यथा समयमें अर्थात् रोगके आरम्भमें
चिकित्सा करना उचित है । चिकित्साका समय लंघन करना
कर्तव्य नहींहै ॥ १४० ॥
सर्वञ्चरोगेप्रशमायकर्म।
हीनातिरिक्तविपरीतकालम् ।।
मिथ्योपचारान्नहितद्विकारम् ।
शान्तिनयेत्पथ्यमपिप्रयुक्तम् ॥४१॥
अर्थ-रोगकी शान्ति के लिये अल्पचिकित्सा करन
अधिक क्रिया करना, या यथायोग्य कालको लांघ जाकर
चिकित्सा करना, मिथ्या उपचार ( वृथा औपधिका
प्रयोग करना) यह सबही न करने चाहिये । क्यों कि
उपरोक्त रीतिसे सुपथ्यभी दिया जाय तोभी उस्से रोगका
नाश नहीं होता ॥४१॥
भय पारिभाषिकी संज्ञामाह।
वृक्षाम्लमातुलुङ्गाम्लोबदराम्लाम्लवेतसौ ।
चतुरम्लमिदंतद्धिपंचाम्लञ्चसदाडिमम् ॥ ४२॥
अर्थ-वृक्षाम्ल, विजौरानीबू, बदरी, ( बडा आमला)
और अमलवेत इन चारफे संयोगको चतुरम्ल और
चतुरम्ल के साथ दाडिमका संयोग करनेसे तिसको पंचाम्ल
कहते हैं ॥ १४२ ॥

भाषाटीकासमेत । '(९९)
सौवर्चलसैन्वयंचविडमौद्भिदमेवच ।
सामुद्रेणसहैतानिपञ्चस्युलवणानिच ॥
एकद्वित्रिचतुःपञ्चलवणानिक्रमाद्विदुः॥४३॥
अर्थ-विरियासंचर, सेंधा, विड, उद्भिद और समन्दर-
नोन, इनपांचके मेलको पंचलवण कहतेहैं । क्रमानुसार
इनमेंसे एकको एकलवण, दोको दिलवण, तीनको त्रिलवण
इत्यादि कहा जाता है ॥ ४३ ॥
अविमूत्रमजामूत्रंगोमूत्रंमाहिपञ्चयत् ।
हस्तिसूत्रमथोष्टूस्यहयस्यचखरस्यच ॥
इतिप्रोक्तानिमूत्राणियथासामर्थ्य योगतः ॥४४॥
अर्थ-मेपमूत्र, छागमूत्र, गोमूत्र, महिपमूत्र, हस्तिमूत्र,
उष्ट्रसूत्र, अश्वमूत्र, और गर्दभमूब, इन आठको भूत्रवर्ग कह-
तेहैं. इनमें जिसका मूत्र संग्रह कियाजाय, तिसकोही
प्रयोगकरे ॥ १४ ॥
सर्पिस्तैलंवसामजानेहोप्युक्तश्चतुर्विधः।
पानाभ्यंजनवस्त्यर्थनस्यार्थञ्चैवयोगतः॥१५॥
अर्थ-धी, तेल, वसा और मजा यह चार प्रकारके स्ने-
ह हैं, यह पान अभ्यङ्ग (मर्दन ) पिचकारी और नस्यकर्ममें
प्रयोगकरे ।। १४५॥
अविक्षीरमजाक्षीरंगोक्षीरंमाहिपञ्चयत् ।
उष्ट्रीणांहस्तिनीनाञ्चवडवाया स्त्रियस्तथा ॥ ४६॥
अर्थ-मेपटुग्ध, छागदुग्ध, गोदुग्ध, माहिपदुग्ध, उष्ट्रीदुग्ध,
हस्तिनीदुग्ध और गधयाका दूध, इन सबको दुग्धवर्ग
फहते हैं ॥ १४६ ॥

- (१००) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। चातुर्जातसमाख्यातंत्वगेलापत्रकेशरैः॥ १७ ॥ अर्थ-दालचीनी, इलायची, तेजपात और नागकेशर इन चारको चातुर्जात कहते हैं ॥ १४७ ॥ तदेवत्रिसुगन्धिस्यात्रिजातकमकेशरम् ॥ १८ ॥ अर्थ--नागकेशरके सिवाय और तीन अर्थात् दालची- नी, इलायची और तेजपात इनके संयोगको भिजातक कहते हैं ॥ १४८॥ चातुर्जातककर्पूरककोलागुरुसिह्नकम् । लवङ्गसहितञ्चैवसर्वगन्धविनिर्दिशेत् ॥ १४९ ॥ अर्थ-चातुर्जातक, कपूर, काकोली, अगुरु, शिलारस (लोबान)और लोंग इनफे मेलको सर्वगन्ध कहतेहैं ।। १४९ ॥ पथ्याविभीतकंधात्रीमहतीत्रिफलामता। स्वल्पाकाश्मर्यखजूरःपरूपकफलैर्भवेत् ॥१५॥ अर्थ-हरड, आमला और बहेडा इनको महती त्रिफला कह- तेहैं और गाम्भारोफल, खजूर, फालसा इनतीनको स्वल्प त्रिफला कहते हैं ।। १५० ॥ पिप्पलीशृङ्गवेरञ्चमरिचंत्र्यूपणंविदुः। विडङ्गमुस्तचित्रैश्चत्रिमदःसमुदाहृतः ॥ १५१॥ अर्थ-पीपल, सोंठ और मिर्च इनतीनको यूपण और वायविडङ्ग मोथा और चीता इन तीनको त्रिमद कहते हैं ॥ १५१ ॥ उदुम्बरोक्टोऽश्वत्थोपेतस प्लक्षएवच ॥ पंचतेक्षीरिणोवृक्षाःसंज्ञयासमुदाहृताः ।। १५२ ॥ पतसोध गन्धिनः इति रुपातः । गन्धमुस्त इत्युत्तरदशे यरूप मसिद्धिःशक्ष इति वटा अथवा पटीत्यश्वत्यभेदः॥

भापाटीकासमेत । (१०१) अर्थ-गूलर, वट, पीपल, वेतस और पिलखन इन पांचको क्षीरिवृक्ष कहतेहैं ।। १५२ ॥ आम्रजम्बूकपित्थानांधीजपूरकविल्वयोः ॥ गन्धकमणिसर्वत्रपत्राणिपंचपल्लवम् ॥ १५३ ॥ अर्थ-आम, जामुन, कैथ, विजौरानीबूं और वेल, इन पांचोंको पंचपल्लव कहतेहैं । इनका प्रयोग सर्वत्र गन्धकर्ममें होताहै ।। १५३ ॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलंचव्यचित्रकनागरम् ॥ पंचकोलमिदंप्राहुःपंचोपणमथापरे ॥ १५४ ॥ अर्थ-पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतामूल और सोंठ इन पांचको पंचकोल या पंचोपण कहते हैं ॥ १५ ॥ पंचकोलंसमरिचंपडूपणमुदाहृतम् ॥ १५५ ।। अर्थ-पंचकोलके साथ मिर्चका संयोग करनेसे तिसको पडूपण कहते हैं ।। १५५ ॥ विल्वश्योनाकगाम्भारीपाटलागणिकारिका। एतन्महत्पंचमूलंसंज्ञयासमुदाहृतम् ॥ १५६॥ अर्थ-वेल, श्योनाक, गाम्भारी, पादल, अरणी, इन पां. चको महत् पंचमूल कहते हैं ॥ १५६ ॥ शालपपृिश्निपीवृहतीद्वयगोक्षुरम् । कनीयःपंचमूलंत्यादुभयंदशमूलकम् ।। १५७ ।। अर्थ-शालपणी (शरिवन) पिठयन, बृहती, कटेरी, और गोखरू, इन पांचको स्वल्प पंचमूल कहते हैं। इन दोनों पंच- सुलको इकट्ठा करनेसे दशमूल कहा जाताहै ॥ १५७ ।। - (१२) वैद्यकपरिभापाप्रदीप। कुश-काशशरोदर्भइक्षुश्चैवतृणोद्भवम् । पंचतृणमिदंख्यातंतृणजपंचमूलकम् ॥ १९८॥ अर्थ-कुश, कांस, शर, दर्भ और गन्ना, इन पांचको पंचतृण अथवा पंचमूल कहते हैं ।। १५८ ॥ विदारीचाजशृङ्गीचरजनीसारिवामृतम् । वल्लीजपंचमूलंचकथितंमुनिपुंगवैः॥१५९॥ अर्थ-विदारीकंद मेढाशृङ्गी, हलदी, अनन्तमूल और गिलोय इन पांचको मुनियोंने वल्लीज पंचमूल कहाहै ॥१५९॥ करमईःश्वदंष्ट्राचहिंस्राझिंटीशतावरी। कण्टकाख्यपंचमूलंनिर्दिष्टंसूक्ष्मवुद्धिभिः॥१६०॥ अर्थ-करंज, गोखरू, तालमखाना, पियावासा, शतावरी इन पांचको कण्टकाख्यमूल पंडितलोगोंने कहा है ॥ १६० ॥ . ऋद्भिवृद्धिश्चमेदेद्वैतथापभकजीवको । काकोलीक्षीरकाकोलीत्यष्टवर्ग:प्रकीर्तितः॥१६॥ अर्थ-ऋद्धि, वृद्धि, मेद, महामेद, ऋपभक, जीवक,काकोली और क्षीरकाकोली इन आठके मेलको अष्टवर्ग कहते हैं॥१६॥ अपवर्गश्वपणिन्यौजीवन्तीमधुकंतथा। जीवनीयगण प्रोक्तोजीवनश्चपुनस्ततः॥१६२॥ अर्थ-अष्टवर्गके साथ मसवन, मुगवन, जीवन्ती और मुलह. ठीका संयोग किया जाय तो इसको जीवनीयगण फहते हैं ॥ १६२॥ १" धरमर्द" करंजा । " श्वदंया " गोक्षुरकः। "हिंस्रा" फुडयकाली-त " -तालमसाना स्पिष्टमन्यत् ।

भाषाटीकासमेत। (१०३) शोभांजनस्ययद्वीजंतच्छ्तमरिचस्मृतम् ।।१६३॥ अर्थ-संजने बीजका श्वेतमरिच कहते हैं ॥ १६३ ।। ज्येष्टाम्बुतण्डुलाम्बुस्यादुप्णाम्बुचसुखोदकम्१६४ वर्ष-चावलके पानीको ज्येष्टाम्बु और गरमजलको सुखोदक कहते हैं॥ १६ ॥ गुडयोगाद्गुडाम्बुस्याद्गुडवर्णरसान्वितम् ॥ १६५॥ नयं-गुड़की समान रस, गन्ध और रंगवाले गुयुक्त जलको गुडाम्बु कहते हैं ।। १६५॥ निरस्थिपिशितंपिष्टंस्विन्नंगुडसमन्वितम् । कृष्णामरिचसंयुक्तंवेसवारइतिस्मृतः ॥ १६६॥ अर्य-अस्थिहीन मांसको पीसकर गुड़, घी, पीपल और मिर्चके संयोगसे पाक किया जाय, तो इसे वेशवार कहते हैं ॥ १६६ ॥ कानिकंव्युपितंपकंमूलकत्वम्लमूलकम् ।।१६७॥ अर्थ-मूली, कांजीमें भिजोरखकर बासी करके पकाली जापतो इसको अम्लमूलक कहते हैं ॥ १७॥ दन्नःससारकस्यात्रतक्रकवरमिप्यते ।।१६८।। अर्थ-मक्खनयुक्त दहीके तकको कट्टर कहते हैं ॥ १६८ ।। तक्रादश्विन्मथितंपादाम्बाम्बुनिर्जलम् १६९।। अर्थ-दहीमें चौथाई जल मिलाकर तिसको मयै, इसका नाम तक है जाये,भाग जल मिले दहीको मयनसे तिसको उद- श्चित् कहते हैं और निर्जल दही मयाजाय तो तिसको मथित कहते हैं ॥ १६९ ॥ दनासहपयःपकंसाभवेदविकूर्चिका ।

(१०४) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । तक्रणयत्पयःपक्कंसाभवेत्तककूचिका ॥१७॥ अर्थ-दहीके साथ दुग्धपाक करनेसे तिसको दधिचिका और तक ( मट्ठा) के साथ दुग्धपाक करनेसे तिसको तक- कूञ्चिका कहते हैं ।। १७० ॥ कन्दमूलफलादीनिसस्नेहलवणानिच । यत्रद्रव्येऽभियुज्यन्तेतच्छुक्तमभिधीयते॥१७१ अर्थ-तरलद्रव्यमें कन्द, मूल, फल, तेल और लवणादि भिजोरक्खे तो उस तरल द्रव्यको शुक्त कहते हैं ॥ १७१ ।। सीधुरिक्षुरसे पक्कैरपक्वैरासवोभवेत् ॥ १७२ ॥ अर्थ-गनेका रस पकाकर जो मद्य तैयार किया जाता है तिसको सीधु और कच्चे रससे जो मद्य तैयार होताहै, तिसको आसव कहते हैं ॥ १७२ ॥ मैरेयधातकीपुष्पगुडधान्याम्लसहितम् ।। १७३ ।। अर्थ-धायफूल, गुड और धान्याम्लके मेलसे जो मय तैयार होताहे तिसका मैरेय कहतेहैं ॥ १७३ ॥ आरनालन्तुगोधूमैरामै स्यानिस्तुपीकृतैः ॥ पर्वासन्धितैस्तत्तुसौवीरसदृशंगुणैः ॥१४॥ अर्थ-पके या कच्चे भुस्सीरहित गेहूंका सन्धान करके जो पदार्थ तयार होताहै, तिसको आरनाल कहते हैं, इस- फागुण सौवीरकी समानहै ॥ ५७४ ॥ मन्थनीनूतनाधार्याकटुतैलेनलेपिता ॥ निम्मलेनाम्बुनापूर्यातस्यांचूर्णविनिक्षिपेत् १७५॥ राजिकाजीरलवणहिंगुशुण्ठीनिशाकृतम् ॥

भापाटीकासमेत। (१०५) निक्षिपेवटकांस्तवभाण्डस्यास्यंचमुद्रयेत् ।। ततोदिनत्रयादूर्द्धमम्ला स्युर्वटकाध्रुवम् ॥१७६।। अर्थ-मथनेके नये पात्रमें कडवे तेलका लप करके ट- समें निर्मल जलभरे, श्वेतसरसों, जीरा, संघा, हींग, सांड और कच्ची हलदीका चूर्ण यह सब एकसाथ डालकर गोलिये बनाय इसपात्रमें धरे; फिर पात्रका मुख वन्दकरदे । वादको दूसरे दिन रस खट्टा होतेही जानलेकि वटक तैयार होगये ।। १७५ ॥ १७६ ।। तिलतण्डुलमापैश्चकृशरात्रिशरेतिसा ॥ १७७ ॥ अर्थ-तिल, चावल और रईसे तैयार हुए यवागूको कृशरा (खिचडी) वा त्रिशरा कहते हैं ।। १७७ ।। यन्मस्त्वादिशुचौभाण्डेसगुडक्षौद्रकांजिकम् । धान्यराशौत्रिरावस्थंशुक्तंचुकंतदुच्यते ॥ १७८ ॥ अर्थ-निर्मल पात्रमें गुड, शहद और कांजीके मेलसे मस्तु- आदि धान्यराशिमें तीन रात धरके ग्रहण किया जाय तिसको शुक्त चुक्र कहते हैं ।। १७८ ।। यदपक्वौपधाम्बुभ्यांसिद्धंमद्यसआसवः ॥ १७९ ॥ मर्थ-कची औपधि और जलसे तैयार हुए मद्यको आसव कहते हैं ।। १७९ ॥ अरिष्टाक्वाथसिद्धास्यात्सम्पक्कोमधुरवैः ॥१८॥ अर्थ-पके हुए क्वाथ और मधुररसयुक्त द्रन्य (तरल) पदार्थ- से सिद्धहुए मयको अरिष्ट कहते हैं ।। १८० ॥ आश्रितश्चापिसीधुःस्यादित्याहुस्तद्विदोजनाः३८१ "आश्रितइतिसम्यक्पकः”

वैद्यकपरिभापाप्रदीप।
अर्थ-भलीभांतिसे पकेहुए मद्यको सीधु कहते हैं ॥ १८१ ।।
सुरामण्डःप्रसन्नास्यात्तत्रकादम्बरीधना ॥
तदधोजगलोज्ञेयोभेदकोऽजगलोचनः ॥ १८२॥
अर्थ-सुराके ऊपरवाले स्वच्छ भागको प्रसन्ना कहते हैं।
प्रसन्नाकी वनिस्वत कादम्बरीनामक मद्य घना होताहै,
कादंबरीके निचले मद्यको जगल कहतेहैं । भेदकमद्य
जगलमद्यकी वनिसवत गाढाहै ।। १८२ ॥
पक्कासाहृतसाराचसुराबीजंचकिल्लकम् ।। १८३॥
अर्थ-सारहीन सुराको वक्कस और सुराबीजको कि.
ल्लक कहतेहैं ।। १८३ ॥
यत्तालखर्जूररसैरावृतासैववारुणी ।। १८४ ।।
अर्थ-ताल और खजूरके रस करके अलग २ सन्धान
करके जो मद्य तैयार होताहै तिसको धारणी मद्य (ताडी (
कहते हैं ॥ १८४ ॥
गुडाम्बुनासतैलेनकन्दशाकफलैस्तथा।
आसुतंचाम्लतायातंगुडशुक्तंतदुच्यते॥१८५॥
अर्थ-गुडका जल, तेल और विविध कन्दशाक और
फल यह सब इकट्ठे संधान करके जब अम्लरसयुक्तहो जाय
तब इसको गुडशुक्त कहा जाताहै ॥ १८५ ॥
एवमेवेक्षुशुक्र्तस्यान्मृद्वीकासम्भवंतथा॥१८६॥
अर्थ-ऊपर फही रीतिसे गन्ने के रस और दासका सन्धा.
न होतो उसे शुक्त कहते हैं । १८६ ।।
तुपाम्बुचासुतंज्ञेयमापैविदलितैर्यवैः ।
सुनिस्तुपैश्वपक्कैश्चसौवीरंचासुतंभवेत् ॥ १८७ ॥

भाषाटीकासमेत। (१०७) अर्थ-उर्द और जौको दलकर संधान करनेसे तिसको तुपाम्नु कहते हैं, और भुस्सीहीन पक्के जौके सन्धानसे कियाजाय, तिसको सौवीर कहते हैं ॥ १८७ ॥ कुल्मापोधान्यमण्डेनचासुतंकॉजिकंभवेत्॥१८८॥ अर्थ-धान्यमांडके साथ अर्द्रसिद्ध गोधुमादिका संधान होनेसे कांजी तैयार होती है ॥ १८८ ॥ अन्यत्यदाहचर:। भृष्टान्मापतुपानसिद्धान्यवचूर्णसमन्वितान् ॥ आश्रितानम्भसातद्वज्जातंतचतुपोदकम् ।।१८९॥ अर्थ-चरकमुनिनें कहाहै-उर्दको भुस्सी भुनाकर पकावै । फिर उसमें जौका आटा मिलाकर कांजी तैयार करनेकी वि- धिके अनुसार जल डालकर भिगोरक्खै । जब खट्टा होजाय तब तुपोदकको तैयार हुआ जानें ॥ १८९ ॥ आशुधान्यक्षोदितञ्चवालमूलन्तुखण्डशः। कृतंप्रस्थमितंपाजलंतत्राढकंक्षिपेत् ॥ १९०॥ तावत्सन्धीयसंरक्षेद्यावदम्लत्वमागतम् । काधिकंतत्तुविज्ञेयमेतत्सर्वत्रपूजितम् ॥ १९१॥ अर्थ-कूटेहुए आशुधान्य ८ सेर, कच्चीमूलीके टुकडे २ सेर और जल १६ सेर, इन सबको इकट्ठा साफ बर्तन में सन्धान करके रक्खे, फिर खट्टा होतेही कांजीको तैयार हुआ जाने और सब कामों में उसका व्यवहार करे १९०।१९१ शिण्डाकीचासुताज्ञेयामूलकै सर्पपादिभिः ॥१९२ अर्थ-मूली और सरसों आदिके सन्धानसे बनेहए म- यको शिण्डाकी कहतेहैं ॥ १९२ (१०८) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । जम्बीरस्वरसप्रस्थंमधुन कुडवन्तथा । तावपिप्पलीमूलादेकीकृत्यवटेक्षिपेत् ॥ धान्यराशास्थितंमासमधुशुक्तंतदुच्यते ॥ १९३॥ अर्थ-जंबोरीनीवूका रस एक प्रस्थ (२ सेर ) शहद ॥ सैर पीपला मूलऽ॥ यह सब एक घडेमें रखके एक मा- सतक नाजके टेरमें रक्खै, तो मधुशुक्त तैयार होलाहै १९२ १९३ तक्रकपित्थचांगेरीमरिचाजाजिचित्रकैः। सुपकंपडयूपोऽयमयंकाम्बलिकोऽपरः॥ १९४ ।। दध्यम्ललवणस्नेहतिलमापसमन्वितः। संज्ञाप्रमथ्याविहितायोगेदीपनपाचने ॥ १९५ ॥ अर्थ-मट्ठा, कैथ, आमडा, मिर्च, जीरा और चीता यह सब इक? पकाकर जूप पनावै, इसको पडयूप कहतेहैं और इन सब चीजोंके साथ दही, खट्टे पदार्थ, सेंधा घृतादि स्नेह, तिल और उर्दका संभोग करके पाक करनेसे तिसको का. म्बलिक जूप कहते हैं। इसका दूसरा नाम प्रमथ्याहै । अ- मिक उकसाने और हाजमेके योगमें यह विशेष फ- लदापी है ॥ १९१ ॥ १९५ ॥ द्रवेणातोभृतास्तेपुस्तर्पणलाजसक्तवः ॥ १९६॥ अर्थ-सोलाके सचू द्रव (तरल ) द्रव्यसे मिला लिये जॉप तो इनफा यह मैल तर्पण कहा जाताहै ॥ १९६ ॥ सक्तवःसर्पिपायुक्ताःशीतवारिपरिप्लुताः। अनत्यच्छातिसान्द्राश्चमन्यइत्यभिधीयते ॥१९७॥ अर्थ-पीमें मलेंदुए सरा, शीतल जलमें दुबाफर अ- धिक स्वच्छ या अधिपः पन नहीं इसप्रकारसे मिलगान. पर मन्प पर जाते हैं । १९७ ॥

भापाटीकासमेत । (१०९) क्वाथ्यमानन्तुयत्तोयनिष्फेननिर्मलीकृतम् । भवत्यद्धावशिष्टन्तुतदुप्णोदकमिष्यते ॥ १९८ ॥ अर्थ-निर्मलीफल और गोमेदक ( मणिविशेष ) आ- दिसे निर्मलकिये आधे रहे सिद्ध जलको उष्णोदक कहते हैं ।। १९८ ॥ चिकित्सितंव्याधिहरंपथ्यंसाधनमौपधम् । प्रायश्चित्तंप्रशमनंप्रकृतिस्थापनहितम् ॥ १९९ ॥ विद्याद्रेपजनामानितच्चापिद्विविधस्मृतम् । सुस्थस्योजस्करंकिंचित्किञ्चिदार्तस्यरोगनुत्२०० अर्थ-चिकित्सित, व्याधिहर, पथ्य, साधन औषध, प्रा- यश्चित्त, प्रशमन, प्रकृति, स्थापन और हित, यह सब औ- पधियों के नामहैं । यह औपयेंभी दो प्रकारकी हैं; जैसे- कोई २ औपधि निरोगीको बलकारकहै और कोई औपधि रोगीके रोगका नाश करनेवालीहै ॥ १९९ ॥ २० ॥ परिभाषाप्रदीपसंग्रहकान्तीयखंटसमाप्त । अथ पंचकर्माण्याह। दोपाःकदाचित्कुप्यन्तिजिताःकालेनपांचनैः। येतुसंशोधनैःशुद्धानतेपांपुनरुद्भवः ॥ १ ॥ अर्थ-वायु, पित्त और कफ इन तीनोंके कुपित होनेसे यथा समयमें दोपका नाश करनेवाले लंघन और पाचनादिसे कु- पित दोप दब जाताहै । जिन दोपहरनेवाली औपधियोंसे दोप शुद्ध होताहै, वह फिर उत्पन्न नहीं होता ॥ १॥ १ पाचनैरिति लंघनपावनादिभिदोषहारिमिरित्ययः।

(११०) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । वमनरेचनंनस्यनिरूहश्चानुवासनम् । ज्ञेयंपंचविधकर्ममात्रातस्यप्रयुज्यते ॥ यदावहेदहिर्दोपान्पंचधाशोधनहितत् ॥२॥ अर्थ-वमन, विरेचन, ( दस्त-भुलाब ) नस्य, निरूह और अनुवासन, इन पांच क्रियाओंको योग्य मात्रासे प्रयोग क- के शरीरके दोपको शुद्ध करले ॥ २ ॥ ननस्यंन्यूनसप्तादे नातीताशीतिवत्सरे । नचोनद्वादशेधूमःकवलोनोनपंचमे ॥३॥ नशुद्धिरूनदशमेनचातिक्रान्तसप्ततौ । नन्यूनपोडशाशीतेसप्ततौरक्तमोक्षणम् ॥ आजन्ममरणाच्छस्त-प्रतिमर्पस्तुसर्वदा।। ४ ।। अर्थ-सातवर्षसे नीचे और असी वर्षसे अधिक उमर वा. लेपर नस्यका प्रयोग न करें । १२ वर्षकी उमरसे,कमवालकको धूम,पांचवर्षसे कम उमरके बालकको वमन और विरेचनन फरावे सत्तर वर्पसे अधिक उमरवालेकोभी यहप्रयोग न करावै॥१६चर्पस फम अथवा७०वर्षसे अधिक उमरवालेका रक्तमोक्षण (फस्ता. दि) फराना ठीक नहीं, प्रतिमर्पका, जन्मसे लेकर जीवित. फालतफ सदाही व्यवहार होसकता है ॥ ३ ॥४॥ बादीयमनमाह। पूर्वापाययेत्पीतंजानुतुल्यासनेस्थितः। तन्मनाजातहल्लासप्रसेकश्छदयेत्ततः ॥५॥ अप-चमनफी पिपि फही जातीहै । प्रातःपालही औप. धिका सपन फरफै रुई आसनपर जापॉफ पल धैठ एकामचिरस यमनकी चिन्ता परे, इसमें पहले हहास अन्यच्च। भाषाटीकासमेत। (१११) ( वमनवेग ) फिर प्रसेक (मुखस्राव.) और फिर वमन होताहै ।। ५॥ चरकररवाह। माधवप्रथमेमासिनभस्यप्रथमेपुनः। सहस्यप्रथमेचैववाहयेद्दोपसंचयम् ॥६॥ अर्थ-चरकमुनि कहते हैं कि, वैशाख, भाद और चैत्र मासके प्रथममैं देहमें इकट्ठे हुए दोपोंको निकाले ॥ ६ ॥ मधीसहेननभसिमासिदोपांस्तुवाहयेत् ॥७॥ " मधौ " "चैत्रेमासि" "सहे" अग्रहायणे, नभसि श्रावणे दोपान् चाहयेदित्यर्थः। अर्थ-चैत्र, अग्रहायण और श्रावणमासमें एकत्र हुए दोपोंको निकाले ॥ ७॥ प्रत्युष्णवर्पशीताहिग्रीष्मवाहिमागमाः। औपधस्यशरीरस्यतेभवन्तिविकल्पकाः॥ विकल्पकाइतिविरुद्धकार्यजनकाः” ॥ ८॥ अर्थ-ग्रीष्म, वर्षा, और शीतकालमें यदि क्रमानु- सार अत्यन्त टप्ण, अत्यन्त वर्षा और अत्यन्त शीत अर्थात् ग्रीष्मकालमें अधिक गरमी, वर्षाकालमें अत्यन्त वर्षा इत्यादि होतो औपधिके और शरीरके लिये विरुद्धकार्य- कारक होतीहै ।॥ ९॥ उपयुककारमाह। प्रावृट्शुलन भौज्ञेयौशरदूर्जसहौपुनः । १ माधवप्रयमे मासीति वैशाखप्रथमे भागे, भाद्रस्य प्रथमें, पौषस्य प्रयमे व दोषसंचयं दोषाणां संचयमुपचयं महयेत सारयेदित्पर्यः।

( ११२) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। फाल्गुनश्चमधुश्चैववसन्तःशोधनप्रति ॥ ९ ॥ अर्थ-संशोधनकी क्रिया आपाठ और श्रावण माटुकालमें, कार्तिक और अग्रहायण शरत्कालमें, फागन और चैत वस- न्तकालमें प्रयोग करे ॥ ९ ॥ क्रमात्कफ-पित्तमथानिलश्च यस्यतिसम्यग्वमितःसइष्टः॥ हत्पार्श्वमूर्बेन्द्रियमार्गशुद्धौ तनोलघुत्वेऽपिचलक्ष्यमाणे ॥ आमाशयस्थाकफस्तस्मात् कफश्रुत्या तस्यप्रथ- मोल्लेखः । ततस्तदधःपित्ताशयस्तस्मात्पत्तम् । पक्काशयस्तद्धस्ततोऽनिलः । एतिगच्छति । क्रमादि- त्यनुक्रमात् ॥१०॥ अर्थ-कफ,पित्त और वायु भली भांतिसे धीरगामीही और हृदय, बगल, मस्तक, इन्द्रिय और समस्त घोत शुद्ध हो- जाय, शरीरमें हलकापन आजाय, तो जानले कि, वमनक्रिया ठीक हुई ॥१०॥ कफप्रसेकास्वरभेदतन्द्रा निद्रास्यदौर्गन्ध्यविपोपसर्गाः ॥ गुरुत्वकासग्रहणीप्रदोपा- नसन्तिजन्तोर्वमितःकदाचित् ॥ ११॥ अर्थ-भलीभांतिसे घमनक्रिया करानेपर फफफा निक- लना, स्परभेद, तन्दा, निदा, मुखफी दुर्गन्ध, विपके उपद्रयः - भाषाटीकासमेत । (११३) शरीरका भारीपन,खाँसी और ग्रहणीआदिसमस्त रोग कभी नहीं होते ॥ ११ ॥ असमितदोपमाह । दुछदितेस्फोटककोठकंडूः॥ हृत्साविशुद्धिगुरुगात्रताच । समिन्द्रियमतःसर्वेन्द्रियस्याविशुद्धित्वसामान्यात् हृद्धृदयम्एतयोरविशुद्धिरित्यर्थः ॥ १२ ॥ अर्थ-असम्यक् (अनियमित ) वमनसे फोडा, कन्न, और दाह उत्पन्न होतेहैं हृदय, सोते, और इन्द्रियोंके शुद्ध न होनेसे देहमें भारीपन होता है ॥ १२ ॥ अतिवमिवेदोपमाह। तृण्मोहमूछानिलकोपनिद्रा। पलातिहानिवमितेतिविद्यात् ॥ १३॥ अर्थ-अधिक वमनसे प्यास, मोह, मूर्छा, वायुका कोप, नींदका नाश और बलहानि इत्यादि लक्षण उत्पन्न होतेहैं ॥ १३ ॥ सुस्थवृत्तिमभिप्रेत्यव्याधौव्याधिवशेनतु । कृत्वाशीतोप्णवृष्टीनांप्रतीकारंयथायथम् ॥ प्रयोजयत्क्रियांप्राप्तांक्रियाकालंनहापयेत् ॥१४॥ अर्थ-देहकी सुस्थतापर दृष्टि रखके व्याधिक अनुसार शीत ग्रीष्म और वर्षाका प्रतीकार करके योग्य समयमें रोगको दूर करनेकी चेष्टाकरे, चिकित्साके कालको उल्लघनाटचित नहीं१४ भय वमनभेषजमात्रामाह । काथ्यद्रव्यस्यकुडवंनापयित्वाजलाठके।

(११४) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप।
चतुर्भागावशिष्टन्तुवमनेष्ववतारयेत् ॥ १५ ॥
अर्थ-काथ्य द्रव्य आधसेर लेकर सोलहसेर जलमें पकावै ।
जब चौथाई भाग रहजाय तो उतारकर यह जल वमनके
लिये प्रयोगकरे ॥ १५॥
काथ्यद्रव्यपलेवारिप्रस्थाद्वैपादशपितम् ।
कप्रदायकल्कस्यमधुसैन्धवयोस्तथा ॥१६॥
सुखोणंवितरेद्वांतीमधूष्णस्यानदोपकृत् ।
प्रच्छईनेनिरूहेचमधूष्णंनविरुद्धते ॥ १७ ॥
अपकपाकमास्वेवतयोर्यस्मानिवर्तयेत् ।
जात्यधोदोपमादायपच्यमानंविरेचनम् ॥१८॥
गुणोत्कोत्तुजातूर्द्धमपकंवमनपुनः ।
"तयोरितिवमनविरेकयो पक्कापक्कयोरित्यन्वयः"१९
अर्थ-आठौला काथ्य द्रव्य ग्रहण करके २ सेर जलमें
सिद्धकरे, जय चौथा अंश रहजाय तब उतारले, तिसमें १
तो शहत और १ तो० सैंधानोंन प्रक्षेपदेकर कुछ एक
गरमरहते हुँए वमनके लिये प्रयोगकरें ॥ १ ॥ शहत, उष्ण-
तादीपवाला नहीं होता, क्योंकि यमनमें और निरूहमें उप्ण-
मधु विरुद्ध नहीं है । क्योंकि वह परिपाक नहीं होसकता ।
यमन और विरेचफ औपधि प्रयोगकरने पर थोडेही समय में
निकल जाती है तिनमें विरेचक औपधि प्रयोजित होने पर
परिपाफ दो दोपको ग्रहण करके तिसफे साथ नीचे जाने
पछि मलदारसे होकर बाहर निकलनाती है। यमनकारक
औपध प्रपांग करने पर अपने गुणफी श्रेष्ठतास ऊपरफो जाय
पिनापही पादर होगाती है ॥ १६ ॥ १७ ॥ १८॥ १५ ॥

भाषाटीकासमेत ! (११५) . . वमननिषेधमाह। नवामयेत्तेमिरिकनगुल्मिनं. नचापिपाण्डूदररोगपीडितान् । स्थूलक्षतक्षीणकृशातिवृद्धा- नशोऽदिताक्षेपकपीडितांश्च ॥२०॥ रुक्षेप्रमेहेतरुणेचगर्भ गच्छत्यथो रुधिरेचती। दुष्टेचकोप्टेक्रिमिभिर्मनुष्य नवामयेइर्चसिचातिवृद्धः॥२३॥ एतेप्यजीर्णव्यथितावम्यायेचविपातुराः। अत्युल्वणकफायेचतेचस्युमधुकाम्बुना॥२२॥ "तैमिरिकादयोपिएताहशावस्थायांवम्याइतिशेषः।। अर्थ-रतोंधा या धुंध, गुल्म, पाण्डु और उदररोगसे पीडित, स्थूल, क्षत्तीण, दुबला, अतिवृद्ध, बवासीररोगी, अर्दित, आक्षेप, रूक्ष और प्रमेह रोगवालेको,बालक, गर्भवती, ऊर्द्धगामी तीवरक्तपित्तरोगी, क्रिमिकरके जिसका कोठा बिगडगया है और कन्न है, इनको वमनकारक औषधि नदे। परन्तु जो यह अजीर्णरोगसे पीडित,विपरोगाकान्त या अत्यन्त बढे हुए कफसे पीडित हों तो मुरहठीकायके साथ उचित यमनकारक औपधिप्रयोग कराके वमन करावै ॥२०॥२२॥२२ मन्दाग्निवेदनामन्दागुरुस्तिमितकोष्टता। सोल्लेशाचारुचिर्यस्यसगुल्मीवमनोपगः॥२३॥ अर्थ-गुल्मरोगवालेको अभिकी मन्दता, पीडा, शरीरका भारीपन, कोठेका बंध जाना, शरीरका झनझनाना और वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। अरुचि दिखाई दे तो तिसको वमनकारक औपधिका प्रयोग करावै ॥ २३ ॥ शरत्कालेवसन्तेचप्रावृट्कालेचदेहिनाम् । वमनरेचनंचैवकारयेत्कुशलोभिषक् ।। तथावमनसात्म्यञ्चधारचित्तंचवामयेत् ॥२४॥ अर्थ-शर, वसन्त और वर्षा इन तीन ऋतुओंमें वमन और विरेचन कराना उचित है। जिनको वमनका अभ्यास है और जो धीर चित्तवाले हैं तिनको वमन करावै ॥ २४ ॥ विपदोपेस्तन्यरोगेमन्देऽनौश्लीपदेऽव॒दे । विसर्पकुष्टहृद्रोगमहाजर्णिभ्रमेषुच ॥ २५ ॥ विदारिकाऽपचीकासश्वासपीनसवृदिपु । अपस्मारज्वरोन्मादेतथारक्तातिसारपु ॥२६॥ नासाताल्लोष्टपाकेपुकर्णस्रावेऽधिजिह्वके । गलगण्डेऽतिसारेचपित्तेश्लेप्मगदेतथा ॥ मेदोगदेऽरुचौचैववमनंकारयेद्भिपक् ॥ २७ ॥ अर्थ-विपदोप,विसर्परोग,स्तन्यरोग, अमिकी मंदतासीपद (पांच जादिका सुजना अर्बुदरोगमें कुष्ठरोग हृदयफेरोग प्रमे होगमें, अजीर्ण गमें, भ्रमरोगमें, विदारिफामें, यद्धदानमैमें, खांसीमें, दमाम, पीनसम, पृदिरोगमें, अपस्माररोग, ज्वर में, उन्मादमें, रजातिसारमें,नासा, तालू और ओठ पाफमें यानः पदम, अधिनिदफरोगमें, फंठमालामें, अतिसारमें। पित्तष्मा राग, मेदय रोग और अरनिरोगमे यमनफा प्रयोग फियागाय ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ नवामनीयस्तिमिरीनगुल्मीनोदरीशः। - -- भापाटीकासमेत । (१७) नातिवृद्धोगर्भिणीचनस्थूलोनक्षतातुरः॥२८॥ मदात्ततॊगालकोरूशक्षुधितश्वनिरूहितः। उदावत्तौ रक्तीचदुश्छद्दय केवलानिली ॥ २९ ॥ पाण्डुरोगीक्रिमिव्याप्तःपठनात्स्वरघातकः । एतेप्यजीर्णव्यथितावम्यायेविपपीडिताः। कफव्याप्ताश्चतेवम्यामधुकाथस्यपानतः ॥३०॥ अर्थ-तिमिररोग, गुल्मरोग और उदररोगवालको, दुर्बल, अतिवृद्ध, गर्भिणी, मोटे शरीरसे युक्त, क्षतरोगी, मदात, वालक, रूखीदेहवाला, भूखा और जिसको निरूहणक्रिया कराईगई है, उदावर्त्तमें, ऊर्द्धगतरक्तपित्तमें, वमन जिसको सहन न होसके, जिसकी वायु कुपित हुई है, पांडुरोगमें,किमि- रोगमें, अधिक पढनेसे जिनका स्वरभंग हुआहै तिनको वमन- कारक औपधि न दे।जिनको यह रोग, यदि उनको अजीर्णरोग विपरोग और प्रवल कफरोग होतो मुलहठीका क्वाथ पिलाकर वमन करावे ॥ २८ ॥ २९ ॥ ३० ॥ ग्रन्थान्तरस्यान्यांरसमात्रामाह । क्वाथपानेनवप्रस्थाज्येष्टामात्राप्रकीर्तिता। मध्यमापण्मिताप्रोक्तात्रिप्रस्थाचकनीयसी ॥३१॥ अर्थ-वमनप्रयोगकेलिये मुलहठीका काथके जलपानकी प्रधानमात्रा नौ प्रस्थ, मध्यममात्रा छैः प्रस्थ और हीनमात्रा तीन प्रस्थ है (यहांपर १ प्रस्थसे साढेछय पल समझना चाहिये) ॥ ३१॥ प्रसद्भादन्यौपधानाश्चमात्रामाहं । कल्कचूर्णावलेहानांत्रिपलं श्रेष्टमात्रया। मध्यमहिपलंदद्यात्कनीयस्कंपलंभवेत् ।। ३२॥

( ११८) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। अर्थ-वमनप्रयोगके लिये औषधिका कल्क, चूर्ण और अव- लेहकी श्रेष्ठमात्रा तीनपल, मध्यममात्रा दोपल और हीनमा- त्रा एकपल है ॥ ३२॥ वमनेचापिवेगाःस्युरटौपित्तान्तउत्तमाः। पड्डेगामध्यमावेगाश्चत्वारोऽप्यवरामताः ॥ ३३ ॥ वमनेचविरेकेचतथाशोणितमोक्षणे । सार्द्धत्रयोदशपलंप्रस्थमाहुर्मनीपिणः ॥ ३४ ॥ अर्थ-आठवार वमनका वेगहो तो वह श्रेष्ठचेग कहा जाया- करता है इसके पिछले वेगमें पित्त निकलता है । छ'वार वेगही तो उसे मध्यमवेग और चारबार होतो उसे हीनवेग कहते हैं; वमन, विरेचन और रक्तमोक्षणमें साढेछैः पलका (५२ तो०) एक प्रस्थ पंडितोनें कहा है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ कफंकटुकतीक्ष्णोष्णैःपित्तस्वादुहिमैर्जयेत् । सुस्वादुलवणोप्णश्वसंसृष्टवायुनाकफम् ॥ ३५ ॥ इतिवमनम् । अर्थ-कह, तीक्ष्ण और उष्णद्रध्यकरके कफ, मधुर और शीतल द्रव्यसे पित्त, और मधुर, लवण गरमद्रव्यसे वायुसंयुक्त फफ दव जाता है ॥ ३५ ॥ अथविरेचनमाह। (भारंधरः) स्निग्धस्विनस्यवान्तस्यदद्यात्सम्यग्विरेचनम् ॥३६॥ अर्थ-शा पर कहता है फि स्निग्ध, स्पैद और यमनक्रिया- फपाले पिरचन फरावै ॥ ३६॥ भएपगुणमाहसुश्रुतः। बुद्धप्रसादवलमिन्द्रियाणां

-
।
भाषाटीकासमेत '('११९)
धातुस्थिरत्वंज्वलनातिदीप्तिम् ।
चिराचपावपुपाकरोति । ।
विरेचनसम्यगुपास्यमानम् ॥ ३७॥
अर्थ-सुश्रुत कहता है कि भलीभांतिसे विरेचन होनेपर
बुद्धिबल और इन्द्रियों की प्रसन्नता,धातुओंकी स्थिरता होतीहै।
अनि अत्यन्त दीप्त होती है और बहुतकालतक-शरीरमें पकता
उत्पन्न होती रहती है, ।। ३७ ॥
अवान्तस्यत्वधःस्रस्तोग्रहणींछादयेत्कफ
मन्दाग्निगौरवंकु-जनयद्वाप्रवाहिकाम्।
अथवापाचनरामंवलासंचविपाचयेत्।
"ग्रहणीअग्निवहधमनीतात्स्थ्यादग्निमाहुः
तंछादयेदितिशेपः ।। ३८॥
अर्थ-विनावमन फराये विरेचक औषधिका प्रयोग करनेसे
फफनीचको जाय ग्रहणीनामक नाडीको ढकके मन्दानि देहमें
भारीपन और प्रवाहिकारोगको उत्पन्न करता है। इसकारण
पहले वमन करावे या पाचक औपपिसे आम कफको पकाकर
फिर विरेचक औषधिका प्रयोगकरे ॥ ३८ ॥
स्निग्धस्यास्नेहन कार्यस्वेदैःस्विनस्यरेचनम्॥३९॥
अर्थ-स्नेहवालेको रूखे व्यसे और प्रस्वेदयुक्तको स्वेद-
कारी द्रव्यसे विरेचन करावै ॥ ३९ ॥
शरहतीवसन्तेचदेहशुद्धोविशेपतः ॥ ४०॥
अर्थ-शरद और वसन्तऋनुमें शरीरको शुद्ध करने के लिये
विरचनका प्रयोग अवश्य करना चाहिये ॥ १० ॥

(१२०) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप ।
बिरेकनिषेधमाह।
वालवृद्धावतिस्निग्धाक्षतक्षीणभयादितः ।
श्रान्तस्तृपातःस्थूलश्चभिणीचनवज्वरी ॥४१॥
नवप्रसूतानारीचमन्दाग्निश्चमदात्ययी।
शल्यादितश्चरूक्षश्चनविरेच्योभिपग्वरैः॥४२॥
अर्थ-चालक, वृद्ध, अतिस्निग्ध, क्षत, क्षीण, भययुक्त-
थकित, प्याससे आर्त, स्थूल, गर्भिणी, नवज्वरी, नई प्रसूती,
स्त्री, मन्दामियुक्त, मदात्ययान्वित, शल्यपीडित और रूखे
पुरुपको विरेचन न करावै ॥ ११ ॥ ४२ ॥
विरेच्यमाह ।
जीर्णज्वरीगरव्याप्तोवातरक्तीभगन्दरी ।
अर्श पाण्डूदरग्रन्थिहृद्रोगारुचिपीडिताः॥ ४३ ॥
योनिरोगप्रमेहार्तगुल्मप्लीहवणार्दिताः।
विद्रधिच्छदिविस्फोटतिपूचीकुष्ठसंयुताः ॥ ४४ ॥
कर्णनासाशिरोवक्रगुदमेद्रामयादिताः ।
प्लीहशोथाक्षिरोगातःक्रिमिरोगानिलार्दिताः॥
शूलिनोमूत्रपाताविरेकाहनिरामताः॥४५॥
अर्थ-पुराने ज्यरसे घिरा, विपके दोपोंसे व्यास, वातरक्त,
भगन्दर, बवासीर, पाण्ड, उदर, ग्रन्थि, हृदोग, अरुचि,
योनिरोग, प्रमेह, गुल्म, तिल्ली, अण, वद, चमि, विस्फोट,
विपचिका, कुछ, फर्णरोग, नासारोग, शिरीरोग, मुखरोग,
गुह्यरोग, मेट्रफे रोग, शोथ, नेत्ररोग, निमिरोग, पायुसे उत्पन्न
दई पीडा, शल और महापात इन रोगियों को विरेचन-
दना रचित ६॥ ४३ ॥ १४ ॥ ४५ ॥

भाषांटीकासमेत । (१२१) बहुपित्तोमृदुःप्रोक्तोबहुश्लेष्माचमध्यमः। वहुवातःक्रूरकोप्टोदुर्विरच्यासकथ्यते ॥४६॥ अर्थ- बहुतसे पित्तवालेको मुटुकोष्ठ, बहुतसे श्लेप्मावालेको मध्यकोष्ठ और बहुतसे वातथालेको क्रूरकोष्ठ या दुविरेच्य कहानाता है ॥ १६ ॥ वस्यमात्रामाहा मात्रोत्तमाविरेकस्यत्रिंशद्वेगै कफात्मकम् ।. वैगविंशतिभिर्मध्याहीनोक्तादशवगकैः॥ १७ ॥ द्विपलंश्रेष्ठमाख्यातंमध्यमञ्चपलंभवेत् । पलाईचकपायाणांकनीयस्कंविरेचनम् ॥१८॥ अर्थ-जितनी औपधिका सेवन करनेसे तीस दस्त हो ति- सको श्रेष्ठमात्रा कहते हैं, विरेचक औपधिकि जितनी मात्रा से २० दस्तहों तिसको मध्यम मात्रा और जिस विरेचक औषधिकि मात्राका सेवन करनेसे १० दस्तही तिसको हीन मात्रा कहते हैं । विरेचक औषधिकी श्रेष्ठमात्रा दो पल, मध्यममात्रा एक पल और हीनमात्रामें अर्द्ध पल देनेका विधान है ॥ १७॥ १८ ॥ । मानन्दसेनम्याह। पित्तेनल्यान्मृदुःकोप्टरोवातकफाश्रयात् । मध्यमासमदोपास्यान्मात्रायोज्यानुरूपंतः॥४९॥ पलन्तुष्ठमाख्यातंमध्यन्तप्टपलंभवेत् । कर्पमानंकनीयास्याज्ञेयंश्रेष्टायपेक्षया ॥५०॥ अर्थ-आनंदसेन कहता है कि, पित्तको अधिकाई होनेसे मृदुकोट, कफमिली वायूकी अधिकाईसे ऋएकोष्ट और दोप- अतएव श्रेष्ठ और (१२२) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । की समताके हेतु मध्यकोष्ठ होता है । इस कारण कोष्ठभेदसे विरेचक औषधिकी मात्रा योग्यतासे प्रयोग करें विरेचक औषधीकी प्रधानमात्रा १ पल, मध्यममात्रा अईपल और हीनमात्रा एक कर्ष (२ तो०) है मध्यमादिका विचारकरके विरेचक औपधिकी मात्रा प्रयोगकरै ।। ४९ ॥ ५० ॥ वमनविरेकयोश्चतुषिशुद्धिमाद । वैनिकीमाणिकाचापिअम्भकोनलिकीतथा। चतुर्विधाशुद्धिरुक्तावमनेचविरेचने ॥५१॥ अर्थ-वमन और विरेचनकी विशुद्धि चार मकारकी है, यया, वैनिकी, माणिक्य, अम्भकी और नलिकी ॥ ५१ ॥ जन्यमध्यप्रवरेतुवेगाश्चत्वारइटावमनेपडप्टौ । दर्शवतद्वित्रिगुणाविरेकेप्रस्थस्तथाद्वित्रिचतुर्गुणाश्च५२ अर्थ-चार वार वमन होनेको जघन्यवेग कहते हैं, छयवार यमन होनेको मध्यवेग और आठवार वमन होनेको श्रेष्ठ वेग कहते हैं । विरेचक औपधिसे दशवार विरेचन हो तो उसे हीनवेग, वीसदस्तहों तो मध्यवेग और ३० दस्तहों तो उसे श्रेष्ठ पेग कहते हैं । हीनपेगमें दिगुण प्रस्थ, मध्यरगमें त्रिगुण प्रस्प और श्रेष्ठवेगमें चतुर्गुणमस्थका प्रयोग फरना चाहिये ।। ५२ ॥ १जपम्पमिति जपाये यमने पायारो धेगाःमाप पायेगाः मयोऽधेगा: पाच जपम्पचिर दश पेगा: मायमे घिरयो दशदिगुणाः विशति- प्रिय प्रबर श्रेष्ठ पिरफे दशत्रिगुणारिशदेगााया पिर दोपमान- नापि मायादिश्यमाहुः । माय इत्यादि।दिगुणमम्मी जयन्ये, द्विगुण मापम, चतुर्गणः प्रवर दरपर्यः पिसान्तमितिमापन्तिमा शुक्षिपिएका भजमापा फारम, रिफ परसम्पादिना जपन्यायमुर नई परिमाणन नपापदिश्यमपरं चमने यम् । फफानत मितिमतिर.ना. पन्तिी शुद्धिना।

भाषाटीकासमेत। (१२३) पित्तान्तमिएंवमनंकफान्तञ्चविरेचनम् ॥ ५३ ॥ मर्य-जो वमनके पिछले वेगमें पित्त निकले और विरे- चनक पिछले दस्तमें जो कफ निकले, तो वमन नौर विरेचनको क्रियाको भलीभांतिसे सिद्ध हुआ जानें ॥ ५३ ॥ विरेकमाह। दिवान्सविट्कानपनीयवेगान् मेयंविरेकेवमनेतुपीतम् ॥ क्रमात्कफ-पित्तमथानिलश्च यस्येतिसम्यग्वमितःसइप्टः॥५४॥ अर्थ-विरेचनके दो या तीन बैग छोडकर (अर्थात् पहले दिनके आहारके मलका परिमाण दो या तीन वार है गिनें । और वमनके लिये भौपषिकी जितनी मात्रा दी जातीहै, सो वमनके पहले वेगमें ही गिर जातीहै, बस टसको छोडकर गिनें ॥ ५४॥ हत्पार्श्वमूर्द्धन्द्रियमार्गशुद्धौ तनोर्लघुत्वेऽपिचलक्ष्यमाणे ॥ ५५ ॥ अर्थ-जो वमन करनेवालेके क्रमानुसार फफ, पित्त और वायु निकले और, हृदय, वगल, मस्तक और इन्द्रियों- १रिक दिवान् सचिटकान् वेगान् मपनीय त्यनश मेयं गणनीयं परिमार्ग काय, विरकसंख्या तंम्पापः । वया वमने पीतमापध- मपनीय मान कर्तव्यम् । वेगानामिपः। विरेट इतिापूर्वदिनादारमल- विका प्रथमतः गढ़ मयं वा परिहत्य संख्या नव्या इति । यमनेपि पीतमोप, प्रपनन पहिनिःसरति, अतस्तन्न गगनीय- मतीनन्तरं संख्या कापति दिए ।

L (१२४) वैद्यकपरिभाषामदीप के सौतें शुद्ध हो जाय, शरीर हलका जाय, तो वमन- क्रियाको भलीभांतिसे हुआ जानें ॥ ५५ ॥ स्रोतोविशुद्धन्द्रियसम्प्रसादौ; लघुत्वमूजोऽग्निरनामयत्वम् ॥ प्राप्तिञ्चविपित्तकफानिलानां। सम्यग्विरिक्तस्यभवेत्कमेण ।। ५६।। " प्राप्तिरितिप्रवृत्तिरित्यर्थः" अर्थ-जिसका जुलाब ठीक हो जाताहै उसके सोते शुद्ध, इन्द्रिय निर्मल, देहमें हलकापन, अमिका उकसना, शरीरका स्वस्थपन होताहै । और मल, वायु, पित्त और कफकी उचि- त प्रवृत्ति होती है ॥ ५६ ॥ स्याच्लेष्मपित्तानिलसंप्रकोपः सादस्तथानेगुरुताप्रतिश्या ।। तन्द्रातथाछदिररोचकश्च। वातानुलोम्यंचनचैर्विरक्तेः (१) ॥१७॥ अर्थ-मलीभांतिसे विरेचन न हो, तो कफ, पित्त और वायुका कोप, मन्दामि, शरीरका भारीपन, जुकाम, तन्द्रा, वमन, अरुचि होकर वायु, कुपित हो जाती है ॥ ५७॥ कफास्त्रपित्तक्षयजाऽनिलोत्थाः। सुत्यङ्गमर्दकमवेपनायाः॥ निद्रावलाभावतमःप्रवेशाः। सोन्मादहिकाश्चविरोचितेऽति ॥ ५८ ॥ अर्थ-अधिक विरेचन होनेसे फफ, रक्त, पित्त, क्षय और पायुसे उत्पन्न हुए रोगमें अंगका अवसाद, शरीरमें .

भापाटीकासमेत। (१२५) पीडा, क्लान्ति, कम्प, नींद, बलकी हानि, अन्धकार दीखना और दन्मादको देखना व हिचकीरोग उत्पन्न होता है ।।५८॥ विरेकनिषेधमाह। क्षीणःक्षतोर क्षतवालवृद्धा- दीनोऽथशोपोभयशोकतप्तः॥ श्रान्तस्तृपात्तापरिजीणभोक्ता गर्भिण्यधोगच्छतियस्यचासृक् ॥ ५९ ॥ नवप्रतिश्यायपरीतदेहो नवज्वरीयाचनवप्रसूता॥ कपायनिष्टानविरेचनीयाः स्नेहादिभिर्येत्वनुपस्कृताश्च ॥ ६ ॥ अर्थ-सीण, क्षत, उरक्षत, वालक, बूढा, दीन, शोथ, भीत, शोकयुक्त, थके हुए और प्यासेकी और जिसको आहार नहीं पचता, अधोगामी, रक्तपित्तरोगी,नये जुकामवालेको, शराक्ष- खोर, नवज्वरी,थोडे दिनकी जञ्चास्त्री,सदा कपायका सेवी और स्नेहादि करके अनुपकारी रोगी विरेचनके योग्य नहीं है। बस इनपर विरेचनका प्रयो न करे ॥ ५९॥ ६० ॥ विरेचनैर्यान्तिनराविनाश- मज्ञप्रयुक्तैरविरेचनीयाः॥ एतेनपित्तेनपरीतदेहान् । विरेचयेत्तानपिमन्दमन्दम् ॥६॥ अर्थ-अज्ञान करके जो विरेचनके योग्यहो और उसे विरेचन कराया जापतो. प्राणका नाश होजाता है, परन्तु ( १२६) वैद्यकपरिभाषामदीप । अत्यन्त बढ़े हुए पित्तसे आक्रान्त हुएको मृदुविरेचक सोप- घिसे विरच न करावे ॥ ६१ ॥ अथनस्यमाह। नस्यभेदोद्विधाप्रोक्तोरेच स्नेहणंतथा । रेचनंकपणप्रोक्तंनेहनंबृहणंमतम् ॥६२॥ नस्यतत्कथ्यतेधीरैर्नासाग्राायदौपधम् । नावणनस्तकम्मतितस्यनामदयंमतम् । "रचनंकफादीनामित्यर्थः ॥ ६३॥ अर्थ-नास दो मकारके हैं यथा रेचन और स्नेहन । ति- नमें रेचन नस्य कर्षणकारक और स्नेहन नस्य बृंहण- कारकहै । नासिकासे धीरे २ जो औपधि ग्रहण कीजातीहै तिसको नस्य कहते हैं । उसके दो नामहैं, नावण और नस्यकर्म ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ कफपित्तानिलध्वंसेपूर्वेमध्येऽपराह्निके । दिनस्यगृह्यतेनस्यरात्रावप्युत्कटेगदे ॥ ६४॥ अर्थ-फफफी शान्तिकेलिये प्रातःकालमें, पित्तकी शान्तिके लिये मध्याह्नकालमें और वायुकी शान्तिके लिये अप- राहमें नस्यका प्रयोग करे; परन्तु कठोर रोग होनेंपररा- निमेंभी नस्यका प्रयोग किया जासकताहै ॥ ६ ॥ अन्यच्च। प्रतिमोऽवपीडश्चनस्यंप्रधमनंतथा । शिरोविरेचनञ्चैवनस्तकमतुपंचधा ॥ ६ ॥ ईपदुच्छिचनात्नेहोयापकंप्रपद्यते । १ "पापद्त्तम्" इविपाटान्तरम् ॥

भापाटीकासमेत। (१२७)
सस्तोनिषिक्तस्तविद्यात्प्रतिमपंप्रमाणतः॥
प्रतिमर्पचनस्यार्थकरोतिनचदोपभाक् ॥६६॥
अर्थ-पांच प्रकारके नस्यकर्म, यथा-प्रतिमर्प, भव-
पीड, नस्य, प्रधमन और शिरोविरेचन । स्नेहवस्तु
(तैलादि ) नासिकाके छेदमें घुसाके उपरको सांस खेंच-
कर मुखसे निकाले तिसको प्रतियर्प कहतेहैं । योग्यमा-
त्रास प्रतिमर्पका प्रयोग करना चाहिये । स्नेहन और
शोधन दोनों प्रकारके प्रयोजन दोपमूल न होवें। इस प्रकारसे
प्रतिमर्पका प्रयोग होना चाहिये ॥ ६५ ।। ६६ ।।
शोधनस्तम्भनंतस्मादवपीडोद्विधामतः ।
आपीज्यदीयतेयस्मादवपीडस्ततःस्मृतः॥६७॥
अर्थ-अवपीड दो प्रकारकहैं, यथा-शोधन और स्तम्भन ।
पत्रादिके निकाले हुए रससे जो नस्य प्रयोग किया जाता है,
तिसको अवपीड कहतेहैं ॥ ६७ ॥
स्नेहाथशून्यशिरसांग्रीवास्कन्धोरसांतथा।
वलार्थदीयतेनेहोनस्तःसर्वत्रवर्त्तते ॥ ६८॥
भर्य-स्नेहरहित मस्तकमें स्नेह करनेके अर्थ और गर-
दन स्कंधा व छातीका वल वढाने के लिये जो स्नेहमयोग
किया जाता है तिसको नस्य कहतेहैं ।। ६८ ॥
अवपीड प्रधमनंदौभेदावपरोस्मृतौ ।
शिरोविरेचनस्यार्थेतीतुदेयौयथायथम् ॥ ६९॥
कल्कीकृतादौपधायापीडितोनिप्णुतोरसः ।
सोऽअपीड समुद्दिष्टस्तीक्ष्णद्रव्यसमुद्भवः ॥ ७० ॥

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(१२८.) घेद्यकपीरभाषामदीप।
अर्थ-नस्यके और दो प्रकारके भेदह, यथा-अवपीड
और प्रधमन शिरके विरेचनको यथायोग्य मात्रासे इ-
नका प्रयोग करे। तीक्ष्ण औषधि कूटकर रस निकाले,
फिर यह रस नस्यके लिये प्रयोग करे, तिसको अवपीड
कहतेहैं ॥ ६९॥ ७० ॥
पडंगुलाद्विवक्रायानाडीचूर्णयथाधमेत् ।
तीक्ष्णंकोलमितंवत्रंवातैःप्रधमनस्मृतम् ॥ ७१॥
अर्थ-छै अंगुल लंबे दो मुखवाले खाली नलमें तीक्ष्ण
औपधिका चूर्ण एकतोला भरकर फूंकसे नाकमें घुसावे,
इसफो प्रधमन कहतेहैं ॥ ७१ ॥
ऊर्द्धजगतेरोगेकफजेचस्वरक्षये।
अरोचकेप्रतिश्यायोशिरःशूलेचपीनसे ॥
शोथापस्मारकुष्टेपुनस्यवैरेचनहितम् ॥७२॥
अर्थ-ऊद्धजहगतरोग, कफसे उत्पन्न हुए स्वरभंगमें, अह-
चीरागमें, जुकाममें, शिरके दर्दमें, पीनस, शोथ, मिरगी और
कुष्ठ इन सबरोगोंमें रेचन नस्यका प्रयोगकरे ॥ ७२ ॥
भीरुस्त्रीकृशवालानांनस्यनेहेनशस्यते ॥७३॥
अर्थ-डराहुआ, स्त्री, दुर्वल और वालक इनके लिये स्नेहन'
नस्यप्रयोग करना चाहिये ॥ ७३ ॥
गलरोगेसन्निपातनिद्रायांसविपेज्वरे।
मनोविकारेकृमिपुयुज्यतेचावपीडनम् ॥७॥
अर्थ-गलेफे रोगमें, सत्रिपातमें, नींदकी अवस्थामें, विषम
ज्यरमें, उन्मादादि मनफे विकारमें और कृमिरोगमें, अयपीड.
नस्य देना चाहिये ॥ ७ ॥

भापाटीकासमेत । ( १२९) अत्यन्तोत्कटदोपेविसंज्ञेषुचदीयते । चूर्णप्रधमनंधीरैस्तद्वितीक्ष्णतरंयतः ॥ ७ ॥ अर्थ-अत्यन्त प्रवल दोष और अचेतनअवस्थामें चूर्ण औषधी नस्यमें धीरे २ से प्रयोगकरे; क्योंकि वह अत्यन्त तीक्ष्ण है । टस्से शीग्रही टपकार दिखाई देता है ॥ ७५ ॥ नस्यस्यनैहिकस्यात्रदेयास्त्वष्टौचविन्दवः। प्रत्येकशोनस्तकर्मनृणामितिविनिश्चयः ॥ ७६ ॥ अर्थ-स्नेहननस्यकी मात्रा आठ बूंद है, इसप्रकारसे मनुष्योंका प्रत्येक नस्यकर्म वर्णन किया गया ।। ७६ ॥ . अष्टवर्पस्यवालस्यनस्तकमसमाचरेत् । अशीतिवादूर्द्धञ्चनावणनैवदीयते ॥ ७७ ॥ अर्थ-आठ वर्षसे कम उमरके वालकको और ८० वर्षसे अधिक उमरवालेको नस्य न दे ।। ७७ ॥ निषेधमाह। तथानवप्रतिश्यायोगर्भिणीगरदूषितः । अजीर्णीदत्तवस्तिश्चपीतनेहोदकासवः ।। ७८ ॥ कुदःशोकाभितप्तश्चतृपात्ततॊवृद्धवालको । वेगावरोधानातश्चश्रान्तकामश्चवर्जयेत् ।। ७९ ॥ इति नस्यम् । अर्थ-जिसको नया जुकाम हुवा हो,गर्भिणी, विपदोपसे युक्त, अजीर्णरोगी, जिसने पिचकारीका कर्म कियाहो, स्नेह, जल, या आसवादिका पीनेवाला, क्रोधयुक्त, शोकाकुल, तृष्णासे आर्त, वृद्ध, वालक और वेगका (मलमूत्रके वेगका ) रोकने- - 1 ( १३०) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। वाला, नहायाहुआ, थकाहुआ, जिसको कामका उदय हुआहो, ऐसोंको नस्य नहीं देना चाहिये ॥ ७८ ॥ ७९ ॥ अथानुवासनमाह। भवेत्सुखोष्णश्चतथानिरतिसहसासुखम् । विरिक्तस्त्वनुवास्यात्ससप्तरात्रात्परंतदा ॥८०॥ अर्थ-कुछेक गरम अवस्थामें अनुवासनका प्रयोग करनेसे सहसा निकल जाता है, विरेचन प्रयोगके सातदिन पीछे अनुवासनका प्रयोगकरै । ८० ॥ अन्यत्रचोक्तम् । विरेचनात्सप्तरात्रेगतेजातवलायवै । कृताहारायसायाह्नवस्तिज्ञेयोऽनुवासनः॥८॥ "अनुदिनंदीयतेइत्यनुवासनः। अर्थ-विरेचनके वाद ७ रात्रि बीत जानेपर जव शरी- रमें वल आजाय तव भोजन कराके सायंकालमें अनुवा- सन बस्तिप्रयोग करे । अनुदिन (प्रतीदिन) इसका प्रयोग करना होताहै, इससे इसको अनुवासन कहते हैं ।। ८१ ॥ सुवर्णरौप्यपुताम्ररीति- कांस्यायसास्थिद्रुमवेणुदन्तैः॥ नविपाणमणिभिस्ततस्तैः कार्याणिनेवाणिसुकर्णिकानि ॥ ८२ ॥ पद्वादशांगुलसम्मितानि पड्विंशतिद्वादशवर्पजानाम् ॥ स्युर्मुद्दकर्कन्धुसतीलवाहि छिद्रानिवस्तैपिहितानिचापि ।। ८३ ॥

भापाटीकासमेत। ( १३१) यथावयोऽगुष्टकनिष्ठिकाभ्यां मूलाग्रयो स्युःपरिनावहन्ति ।। ऋजूनिगोपुच्छसमाकृतीनि शुक्ष्णानिचस्युडिकामुखानि ।। ८४ ॥ स्यात्कर्णिकैकाग्रचतुर्थभागे मूलाश्रितेबस्तिनिवन्धनद्वे ॥ ८५॥ अर्थ-सोना, चांदी,सीसा, तांबा,पीतल, कांसी, लोहा, हड्डी, काठ, वांश, दांत नल, सींग अयवा मणिशादिसे श्रेष्ठ कर्णिका है आगे जिसको ऐसा नलबनावैविपकी टमर वालेके लिये : अंगुलका, वीसवर्षकी टमरवालेके लिये१२जंगुलका और वारहवर्षकी टमर वालेके लिये आठ अंगुलका लम्बा नल वनावै । छैःअंगुलके नलमें मूंगकी समान, १२ अंगुलके नलमें वैरकी समान और आउभंगुलके नलमें मटरके दानकी समान छैद करके बत्तीसे तिसका मुंह ढकै । इसका पारमाण रोगकि नाफारफी अनुसार उसके अंगूठेकी समान व्यासमुलभागमें स्थिर रसके कनऊंगलीकी समान नोफ बना टसनोकको सीधा गावदुम करे । मुख अत्यन्त चिकना गोलीकी समान गोलहो। इसके भागफै चौथाई अंशमें एक फर्णिका और मूलाश्रित वस्ति चांपने भागमें दो फार्णकाओको बनाना चाहिये ॥ ८२ ॥ ८३ ।। ८१ ॥ ८५॥ भारद्वोमादिपहारिणोत्रा स्यादशोकरोवस्तिरजस्यवापि ॥ दृढस्तनु एशिरोविगन्धः कपायरक्तश्चमृदुःसुशुद्धः॥

अन्यच। (१३२) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। नृणांवयोवीक्ष्ययथानुरूपं नेत्रेषुयोज्यस्तुसुवद्धसूत्रः ।। ८६॥ अर्थ-बूढाबैल, भंसा, हरिण, शुकर, अथवा छागलके अंड- कोषका दृढचर्म पतलो करे और शिरा (नस) आदिछोड- कर गन्ध हीनकरे। फिर कपायद्रव्यसे रंगकर मृदु और शुद्धकरे। रोगीकी उमरके अनुसार वृपादिका बस्तिचर्म योग्यतासे ग्रहण करके नलीमें सूतसे बांधे ॥ ८६ ॥ वस्तिस्तुक्षीरतैलेयोनिरूहःसनिगद्यते । वस्तिभिर्दीयतेयस्मात्तस्मादस्तिरितिस्मृतः॥८॥ अर्थ-दूध और तेलसे जिस वस्तुका प्रयोग किया जाता है, तिसको निरूह कहते हैं, वस्तिसे प्रयोग किया जाताहै इस कारण उसको बस्ति कहा जाताहै ॥ ८७ ॥ तत्रानुवासनाख्योहिनस्तियःसोऽत्रकथ्यते । पूर्वमेवत्ततोपस्तिनिरूहास्योभविष्यति ।। ८८ ॥ निरूहादुत्तरश्चैववस्तिःस्यादुत्तराभिधः। अनुवासनभेदश्चमात्रावत्तिरुदीरितः॥ ८९ ।। पलद्वयंतस्यमात्रातस्मादोऽपिवाभवेत् । अनुवास्यस्तुरूक्षःस्यात्तीक्ष्णामि केवलानिली ९० अर्थ-अनुवासननामक बस्ति कही जातीहै । पहले पूर्व बस्तिफे पीछे निरूह वस्ति, और फिर उत्तरवस्तिका प्र. योग करे । अनुवासनका भेद मात्रांबस्ति है, इसकी मानार पलहै । या इस्से आधी, मात्रा प्रयोग करे । रूखा, अभियाला और जिनके फेवल वायु प्रबल है, ये अनुवास- नफे योग्य हैं । ८८ ॥ ८९ ॥ ९० ॥ ।

भापाटीकासमेत। (१३३)
नानुवास्यस्तुकुष्ठीस्यान्महीस्थूलस्तथोदरी ।
नास्थाप्यानानुवास्यास्युरजीर्णोन्मादतृड्युताः॥
शोथमूछीरुचिभयश्वासकासक्षयातुराः॥ ९१ ॥
अर्थ-कोट, प्रमेह, मेद और उदररोगवाले अनुवासन-
क्रियाके अयोग्य हैं । अजीर्ण, उन्माद, प्यास, शोथ, मूर्छा,
अरुचि, भय, दमा, खांसी और क्षयरोगवालोंकोभी अ"
नुवासन और आस्थापन मने है ॥ ९१ ॥
नेकार्यसुवर्णादिधातुभिवृक्षवेणुभिः ।
नलैर्दन्तैविपाणामणिभिर्वाविधीयते ॥ ९२ ॥
अर्थ-सुवर्णादि धातु, वृक्ष, वांश, नल, दांत, सींगका अग्र-
भाग और मणि आदिका नल बनावै ॥ १२ ॥
एकवर्षात्तुपड्वपैयावन्मात्रापडंगुलम् ।
ततोद्वादशकंयावन्मानस्यादष्टसम्मितम् ।।
ततःपरंद्वादशभिरगुंलनेत्रदीर्वता ॥ ९३ ।।
मुद्गच्छिद्रंकलायाभंछिद्रकोलास्थिरन्धकम् ॥
यथासंख्यभवेन्नेत्रश्चक्ष्णंगोपुच्छसन्निभम् ।। ९४॥
अर्थ-बस्तिक्रियाके लिये एकसे लेकर छैःवर्षतक छैः
अंगुलका, बारह वर्षतक ८ अंगुलका और तिस्से आगे १२
अंगुलका लम्बा नल बनावै । छय अंगुलके नलका छेद मू-
गकी समान, आठ अंगुलके नलका मटरकी समान और
तिस्से ऊपर बेरकी गुठलीके समान करे । नल योग्यतानु-
सार मनोहर और गावदुमकरे ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
आतुरांगुष्ठमानेनमूलेस्थूलंविधीयते ।
कनिष्ठिकापरीणाहममेचगुडिकामुखम् ॥ ९५ ॥

(१३४) वैद्यकपरिभाषामदीप। तन्मूलेकर्णिकेद्वेचकार्येभागाचतुर्थकात् । योजयेत्तत्रबस्तितुबन्धद्वयविधानतः ॥ ९६ ॥ अर्थ-वस्तिक्रियाका नल आतुरपुरुपके अंगूठे की समान व्यास नलीके मूलमें स्थूल रखकर, कनउंगलीके समान व्यासवाला अमभाग ( नोक) बनावै और मुख अत्यन्त चिकना, गोलीकी समान गोल करके नलीके चौथे भागमें ऐसी कणिका बनाव जिस्से वस्तीके जोर करके नलका अ. प्रमाण अंश भीतरेकी और न घुस आवै । और मूलकी और चौथे भागमें बस्तिबांधने के लिये दो कर्णिका वनावै॥९५।९६॥ मृगाजशूकरगवांमहिपस्यापिवाभवेत् । मूत्रकोपस्यवस्तिस्तुतदलाभेनचर्मजः॥ कपायरक्तःसमृदुर्बस्तिःस्निग्धोदृढोहितः ।। ९७॥ अर्थ-हरिण, छाग, शूकर, बैल, अथवा भैसेका मूत्रकोप वस्तिक्रियामें श्रेष्ठ है, यह न हो, तो चमडेकी बनी बस्ति- से कार्य करे । बस्तिको कपायादिसे रंगले । इसका मुला- यम चिकना और मजबूत होना जरूरी है ॥ ९७ ॥ वणवस्तेस्तुनेत्रस्याच्छूक्ष्णमष्टाङ्गुलोन्मितम् । मृदुच्छिद्रंगृध्रपक्षिनलिकापरिणाहिच ॥ १८ ॥ अर्थ-प्रण (पाव-या फोडा) में वस्तिका प्रयोग करनाही तो उसफा नल मनोहर, आठ अंगुलफे व्यासफा गीधपक्षीकी नलीके समान और मृदुछेदयाला बनाये ॥ ९८॥ शरीरोपचयंवर्णवलमारोग्यमायुपः कुरुतेपरिवृद्धिचवस्तिःसम्यगुपासितः॥ ९९ ॥ अर्थ-नप भलीभांतिसे पस्तीका प्रयोग होजाय तो - भापाटीकासमेत । (१३५) शरीरकी वृद्धि, बलवृद्धि रंगकी प्रसन्नता, आरोग्य और परमायुंकी वृद्धि होती है ।। ९९ ।। दिवाशीतवसन्तेचस्नेहबस्तिःप्रदीयते । ग्रोप्मवशरत्कालेरात्रौस्यादनुवासनम् ॥१०॥ अर्थ-शीत और वसन्तकालमें दिनके समय स्नेह वस्ति और ग्रीष्म, वर्षा और शरत्कालके समय रात्रिमें अनु- वासनका प्रयोग करे ॥ १० ॥ नचातिस्निग्धशमनंभोजयित्वानुवासयेत् । मदमूञ्चिजनयेद्दिधास्नेहप्रयोजितः।।१०।। अर्थ-अत्यन्त स्निग्धद्रव्य भोजनकराके अनुवासनका प्रयोग न करे । दोपकारके स्नेहसे वस्तिका प्रयोग करनेपर मतता और मूछीरोग उत्पन्न होता है ॥ १०१॥ हीनमात्रावुभौवस्तीनातिकार्यकरौस्मृतौ । अतिमात्रौतथानाहकमातीसारकारको ॥१०२॥ अर्थ-दोनों प्रकारकी बस्तिकी हीन मात्रा अच्छी नहीं, तिस्से कार्य नहीं होता, अतिमात्रामा प्रयोग करनेसे उप- कार नहीं होता और आनाह (अफारा)क्कान्ति व अतिसारका रोग उत्पन्न होता है ॥ १०२ ॥ उत्तमस्यपलैम्पभिर्मध्यमस्यपलैस्त्रिभिः। पलद्वयेनहीनास्यादुक्तामानानुवासने ।।१०३॥ अर्थ-अनुवासनकी श्रेष्ठमात्रा ६ पल, मध्यम मात्रा तीन पलं और हीन मात्रा २ पल है ।। १०३ ॥ भन्यवा निरूहमात्राप्रथमेप्रकुञ्चोवत्सरेपरम् ।

(१३६) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । प्रकुञ्चवृद्धिःप्रत्यवंयावत्पत्प्रसृतास्ततः॥ प्रमृतंवर्द्धयेदूर्द्धद्वादशाटादशस्यतु । आसप्तरिदमानंदशेवंप्रमृतापरम् ॥ १०४ ॥ अर्थ-प्रथम वर्ष में निरूहकी मात्रा एकपल, फिर प्रत्येक वर्षमें एक २ पल मात्रा बढाकर १२ वर्षमें १२ पलतक मात्रा बढावै । १२ वर्षके पीछे १८ वर्पतक प्रतिवर्ष में २ पल मात्रा बढावै । फिर सत्तरवर्पतक इतनी ही मात्राका प्रयोग करे । फिर क्रमानुसार २० पल मात्रा घटादे ॥ १०४॥ यथायथनिरूहस्यपादोमानानुवासने । सानिल सपुरीपश्चस्नेहःप्रामोतियस्यवै ॥ १०५॥ विनापीडांत्रियामस्थाससम्यगनुवासितः । विष्टब्धानिलविण्मूत्रःस्नेहोहीनेऽनुवासने ॥ दाहकमपिपासार्तिकरश्चात्यनुवासने ॥१०६॥ अर्थ-ययायोग्यसे निसहकी मात्राका चौथाई अंश अनु' पासन में प्रयोग करे । भलीभांतिसे अनुवासनक्रिया सिद्ध होगाय तो तीन पहरके बीच में वायु और मलके साथ स्नेह निकल जाता है । जो अनुपासनक्रियामें भलीभांतिसे स्नेह न होतो पायु, मूत्र और मलफी रोक होती है । ठीफ अनुवासन नही दाद, श्रम और प्यास उत्पन्न होती है ॥ १०५॥ १०६ ॥ स्नेहात्पित्तकफोत्केदोनिरूहात्पवनाद्भयम् । स्नेहवास्तिनिरूईवानेकमेवातिशीलयेत् ॥१०७ अर्थ-स्नेह पस्ति या निरुदणफिया इनमेंसे सदा फिसीका अभ्यास न करे । क्योंकि सदा स्नेहयस्तिका प्रयोग पित्त और भाषाटीकासमेत। (१३७) , - कफका उत्केदकारी है । मदा निरूहणक्रियाका अभ्यास करना वायुको बढानेवाला है ॥ १०७ ॥ अनास्थाप्यायेऽभिधेयानानुवास्याश्वतेमताः। विशेपतस्तमीपाण्डुकामलामेहपीनसाः ॥ निरन्नप्लीहविड्भेदीगुरुकोप्टकफोदराः॥१०८॥ अभिष्यन्दभृशस्थूलकृमिकोष्टाढर्थमारुतः॥ पीतेविपेगरेऽपच्यांश्लीपदीगलगण्डवान् १०९॥ अर्थ-आस्थापनमें असमर्थ पुरुप अनुवासनक्रियाकभी अयोग्य है।पाण्ड, कामला, मेह पीनस, निराहारी,तिल्ली, मल- भेद, गुरुकोष्ठ, कफोदर और अभिष्यन्द (आस्राव ) रोगमें घिरा, आतिस्थूल,जिसके कोष्ठ में कीडेही ऊरुस्तम्भ: विषभोजी गरदोष, अपची, पावसूजना और कंठमालाके रोगियोंपर अनुवासनका प्रयोग न करे ॥ १०८॥ १०९ ॥ अनास्थाप्यास्त्वतिस्निग्धःक्षतोरस्कोभृशंकृशः। आमातिसारीवमिवान्संशुद्धौदत्तनावनः ॥१०॥ श्वासकासप्रसेकाहॊहिकाध्मानाल्पवह्नयः। पायुशूल कृताहारोवद्धच्छिद्रोदकोदरी॥ कुष्टीचमधुमेहीचमासान्सप्तचगर्मिणी ॥ ११॥ अर्थ-अतिस्निग्ध, क्षतोरस्क, अत्यन्त दुर्बल, आमातिसारी, वमिरोगवाला, संशुद्ध, नस्यप्रयोगित और दमा, खांसी, प्रसेक बवासीर, हिचकी, अफारा, मन्दामि, गुह्यशूल, भोजनकारी बद्धोदर, छिद्रोदर, जलोदर, कोढ़, मधुमेहरोगवाला मासकी गर्भिणीपर आस्थापनप्रयोग न करे ॥ ११० ॥ १११ ॥ और सात , (१३८) घेद्यकपरिभापामदीप । नचैकान्तेननिर्दिष्टेप्यत्राभिनिविशेदुधः। भवेत्कदाचित्कार्यापिविरुद्धाऽभिमताक्रिया११२ छर्दिद्रोगगुल्मात्तोवमनस्वेचिकित्सिते । अवस्थाप्राप्यनिर्दिष्टंवस्तिकर्मचयोजयेत् ॥११३ इत्यनुवासनम् । अर्थ-पहले कही हुई रीतीसे अयोग्य क्रिया निपिद्ध होने पर भी कभी २ किसी खासरोग और खास अवस्थामें निपिद्ध क्रियाकाभी प्रयोजन होताहै । जैसे वमि, हृद्रोग और गुल्म- रोगमें वमन और कुष्टरोगमें बस्तिकर्म साधारण करके निपेधित होने परभी अपने २ चिकित्साके स्थानमें तिनको प्रयोगविधि उचित रूपसे है ॥ ११२ ॥ ११३ ॥ अथनिरूहमाह। अनुवास्यस्निग्धतरंतृतीयेऽह्निनिरूहयेत् । मध्याह्नकिचिदावृत्तेप्रयुक्तेवलिमंगले ॥ ११४॥ अभ्यक्तस्वेदितोत्सृष्टमलंनातिवुभुक्षितम् । तृतीयेऽह्निप्रायोवादात्पंचमेप्यतिक्रियते ॥११॥ "निरूहयदितिदोपनिहरोदित्यर्थः" अर्थ-अनुवासनके पीछे अधिक स्निग्ध शरीरमें तीसरे दिन निरहणकी क्रिया करे । मध्याह्नसमयके कुछ काल पीछे मांगलिक बलि देकर, जो बहुत भूखा न हो ऐसा मनुष्य मल त्याग करके शरीरमें स्नेह मर्दन और स्वेदमदान करे । अनु- वासनफै पीछे निरूहणक्रिया तीसरे अथवा पांचवे दिनभी फीमा सफती है ॥ १११ ॥ ११५ ।। पंचमेऽयतृतीयेवादिवसेसाधकेशुभे ॥ ११६ ॥ यदाहवाग्भट।

भापाटीकासमेत। अर्थ-वाग्भटने कहाहै कि अनुवासनके पीछे पांचवे अथवा तीसरे दिन शुभ क्षणमें निरूहण करावै ॥ ११६ ॥ अतएवाहसुश्रुतः।, सदोपहरणाच्छरीररोगहरणाद्वानिरूहइति । अस्यास्थापनमित्यपिनाम । वयःस्थापनादायु- स्थापनाद्वाआस्थापनमितिसुश्रुतएव ॥११७॥ अर्थ-सुश्रुत कहता है कि शरीरके दोप और रोगक नाशक होनेसे इसको निरूह कहते हैं, इसका दूसरा नाम आ- स्थापन है; वयस्थापन और आयुस्थापन करनेसे इसका नाम आस्थापन है ॥ ११७ ॥ पक्षाद्विरेकोवान्तस्यततश्चापिनिरूहणम् । सद्योनिरूढ़ोऽनुवास्य-सप्तरात्राद्विरेचितः ११८ अर्थ-विरेचन और वमन कियेको पंद्रह दिनके पीछे निरूण करावै जिसने निरूह और अनुवासन फियाहो, उसपर सात रात्रिके पीछे विरेचनका प्रयोग करे ।। ११८ ॥ मधुस्नेहेनकल्काख्याकपायावापतःक्रमात् । त्रीणिपड्वेदशत्रीणिपलान्यनिलरोगिषु ॥ ११९॥ पित्तेचत्वारिचत्वारिद्धेद्वेपंचचतुष्टयम् । पटनीणिद्वेदशत्रीणिकफेचापिनिरूहणम् ।।१२०॥ अर्थ-जिन रोगों में वायु प्रबलहो उनमें मधु ३ पल, स्नेह ६ १ स्नेहनं पक्कनेहः मामस्य निपिद्धत्वात् " नचामं प्रणयेत् स्नेह सहते नहयेत् गुदमिति दृढवलत्वात्"। पकनेहश्च वातव्याधी वक्ष्य- माणो नारायणप्रसारणासैन्धवादितलादिकः । एवमनुवासनेऽपि ॥ कल्को मदनफलादीनाम्।कषायो दशमलादीनाम् । मावापः काञ्जिक- जम्बीररसमांसरवादीनाम् । त्रीणि इत्यादि वातरोगे क्रमाद्यथाक्रमः (१४०) वैद्यकपरिभाषामदीप। पल, कल्क २ पल, काढ़ा १० पल और कांजी आदिकी मात्रा २ पल प्रयोग करे । पित्तकी प्रबलतामें मधु १. पल, स्नेह ४ पल, कल्क २ पल, काथ १० पल, दूध व कांजी आदि ४ पल । कफके कोपमें मधु ६ पल, स्नेह ३ पल, कल्क दोपल, काढ़ा १० पल और दूध व कांजीआदि तीनसे निरूहण करे ॥ ११९ ॥ १२० ॥ शाद्भधरमतमाहा निरूहवस्तिर्बहुधाभिद्यतेकारणान्तरैः। तैरेवतस्यनामानिकृतानिमुनिपुंगवैः ॥ १२१॥ अर्थ-निरूहबस्ति दूसरे कारणोंके भेदसे अनेक प्रकारमें विभक्त है । इस कारण मुनिलोगोंकरके उसका कारण अनुयायीनाम नियत हुआ है ॥ १२१ ॥ निरूहस्यापरनामप्रोक्तमास्थापनबुधैः । स्वस्थानस्थापनादोपधातूनांस्थापनमतम् १२२॥ अर्थ-निरूहका दूसरा नाम आस्थापन है। दोप और धातु- को शुद्ध करती है और यथास्थानमें स्थापन करती है, इस कारण पंडितोंने इसका नाम आस्थापन रक्खा है ॥ १२२ ॥ निरूहस्यप्रमाणञ्चप्रस्थंपादोत्तरंपरम् । मध्यमप्रस्थमुद्दिष्टहीनञ्चकुडवास्त्रयः ॥ १२३॥ अर्थ-निरूहकी प्रधानमात्रा २॥ ढाई सेर है । मध्यममात्रा दो सेर और हीनमात्रा डेढ़सेर है ॥ १२३ ॥ मधुनखीणि पलानि, स्नेहस्य पट्, फल्कस्य है, कपायस्य दश, बि- निच भावापस्य । एवं पित्त मधुनश्चत्वारि, नेहस्य च चत्वारि, क- स्यस्य दे, सपायरष दिपंचेति दशेत्यर्थः । मावास्यस्य च चतुष्टयमिति एपं प.फे मधुनः पट्पटानीति योग्यम् ॥

-
भाषाटीकासमैत। (१४१)
अतिस्निग्धोत्कृिष्टदोपक्षतोरस्काकृशस्तथा ।
आध्मानच्छर्दिहिकार्श कासश्वासप्रपीडितः १२४॥
गुदशोथातिसाराक्तोविपूचीकुष्ठसंयुतः।
गर्भिणीमधुमेहीचनास्थाप्यञ्चजलोदरी ॥ १२५ ॥
अर्थ-अतिस्निग्ध, उक्लिष्टदोपवाला, जिसके उरमें क्षत
हो, दुर्बल, पेटका अफारा, वमि, हिचकी, बवासीर, खांसी,
दमा, गुदामें दर्द, शोथ, अतिसार, विपूचिका, कोट, मधुमेह
और जलोदरादि रोगवालोंको और गर्भिणीको आस्थापन
प्रयोग न करावै ॥ १२४ ॥ १२५ ॥
वातव्याधाबुदावर्तेवातासृग्विषमज्वरे ।
मूर्छातृष्णोदरानाहमूत्रकृच्छाश्मरीपुच ॥१२६॥
वृद्धयासृग्दरमन्दाग्निप्रमेहेपुनिरूहणम् ।
शूलेऽम्लपित्तेहृद्रोगेयोजयेद्विधिवदुधः ॥ १२७ ॥
अर्थ-वातव्याधि, उदावर्त्त, वातरक्त, विषमज्वर, मूछा,
तृष्णा, उदर, अफारा, सुजाक, पथरी, वृद्धि, प्रदर, मन्दामि,
प्रमेह, शूल, अम्लपित्त और हृदोगनादिरोगसे घिरेहुओंपर
यथा योग्यसे चतुर वैद्य निरूहण वा प्रयोग करे।।१२६॥१२७॥
उत्सृष्टानिलविण्मूत्रस्निग्धस्विन्नमभोजितम् ।
मध्याह्नगृहमध्येतुयथायोग्यनिरूहयेत् ॥ १२८॥
अर्थ-वायु (अधोवायु ) मलमूत्रादित्याग कराकर स्नि-
ग्ध, शरीर में पसेवदे । और भूख लगनेके समय आहार
न कराकर मध्याह्नकालके समय गृहमें रखकर योग्यता-
सार निरहणकी क्रियाको करे ॥ १२८ ॥

. (१४०) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । पल, कल्क २ पल, काला १० पल और कांजी आदिको मात्रा २ पल मयोग करे । पित्तकी प्रबलतामें मधु ४. पल, स्नेह ४ पल, कल्क २ पल, काथ १० पल, दूध व कांजी आदि ४ पल । कफके कोपमें मधु ६ पल, स्नेह ३ पल, कल्क दोपल, काढ़ा १० पल और दूध व कांजीआदि तीनसे निरूहण करे ॥ ११९ ॥ १२० ॥ शार्ङ्गधरमतमाह। निरूहवस्तिर्वहुधाभिद्यतेकारणान्तरैः। तैरेवतस्यनामानिकृतानिमुनिपुंगवैः॥ १२॥ अर्थ-निरूहबस्ति दूसरे कारणोंके भेदसे अनेक प्रकारमें विभक्त है । इस कारण मुनिलोगोंकरके उसका कारण अनुयायीनाम नियत हुआ है ।। १२१ ।। निरूहस्यापरंनामप्रोक्तमास्थापनंबुधैः। स्वस्थानस्थापनादोपधातूनांस्थापनमतम् १२२॥ अर्थ-निरूहका दूसरा नाम आस्थापन है। दोप और धातु- को शुद्ध करती है और यथास्थानमें स्थापन करती है, इस कारण पंडितोंने इसका नाम आस्थापन रक्खा है ।। १२२ ॥ निरूहस्यप्रमाणञ्चप्रस्थंपादोत्तरंपरम् । मध्यमप्रस्थमुदिष्टहीनञ्चकुडवास्त्रयः ॥ १२३ ।। अर्थ-निरूहकी प्रधानमात्रा २॥ ढाई सेर है । मध्यममात्रा दो सेर और हीनमात्रा डेढ़सेर है ।। १२३ ।। मधुप्रीणि पलानि, स्नेहस्प पढ्न, फल्कस्प ढ, कपायस्य दश नि, मापापस्य । परं पिन मधुनश्वरवारि, स्नेहस्य च चावा स्यास्पद, प.पायस्थ दिपंचेति दशेत्यर्थः। भावाप्यस्य च एपं पापं. मधुनः पट्पटानीति योग्यम् ॥

भाषाटीकासमेत। (१४१) अतिस्निग्धोत्विष्टदोपःक्षतोरस्क कृशस्तथा । आध्मानच्छर्दिहिकाशकासश्वासप्रपीडितः १२४॥ गुदशोथातिसाराक्तोविपूचीकुष्टसंयुतः । गर्भिणीमधुमेहींचनास्थाप्यश्चजलोदरी ॥ १२५॥ अर्थ-अतिस्निग्ध, उक्लिष्टदोपवाला, जिसके टरमें क्षत हो, दुर्बल, पेटका अफारा, वमि, हिचकी, बवासीर, खांसी, दमा, गुदामें दर्द, शोय, अतिसार, विपूचिका, कोट, मधुमेह और जलोदरादि रोगवालोंको और गर्भिणीको आस्थापन प्रयोग न करावे ।। १२४ ॥ १२५ ॥ वातव्याधाबुदावर्तेवातासृग्विपमज्वरे । सू तृप्णोदरानाहमूत्रकृच्छ्राइमरीपुच ॥१२६॥ वृद्धयासृग्दरमन्दाग्निप्रमेहेपुनिरूहणम् । शूलेऽम्लपित्तेहृद्रोगयोजयेद्विधिवदुधः ॥ १२७॥ अर्थ-वातव्याधि, उदावर्त, वातरक्त, विषमज्वर, मूछी, तृष्णा, उदर, अफारा, सुजाक, पथरी, वृद्धि, प्रदर, मन्दामि, प्रमेह, शूल, अम्लपित्त और दोगआदिरोगसे घिरहुओंपर यथा योग्यसे चतुर वैद्य निरहण वा प्रयोग करे।। १२६॥१२॥ उत्सृष्टानिलविण्मूत्रस्निग्धस्विनमभोजितम् । मध्यागृहमध्येतुयथायोग्यनिरूहयेत् ॥ १२८॥ अर्थ वायु (अपोवायु ) मलमूत्रादित्याग कराकर स्नि- ग्ध, शरीरमें पसेवदे । और भूख लगनेके समय आहार न कराकर मध्याह्नकालके समय गृहमें रखकर योग्यतानु- सार निरहणकी क्रियाको करे ।। १२८॥

(१४०) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। पल, कल्क २ पल, काला १० पल और कांजी आदिकी मात्रा २ पल प्रयोग करे । पित्तकी प्रबलतामें मधु ४ पल, स्नेह ४ पल, कल्क २ पल, काथ १० पल, दूध व फांजी आदि ४ पल । कफके कोपमें मधु ६ पल, स्नेह ३ पल, कल्क दोपल, काढ़ा १० पल और दूध व कांजीआदि तीनसे निरूहण करे ॥ ११९ ॥ १२० ॥ शार्ङ्गधरमतमाह। निरूहबस्तिर्वहुधाभिद्यतेकारणान्तरैः। तैरेवतस्यनामानिकृतानिमुनिपुंगवैः ॥ १२॥ अर्थ-निरूहवस्ति दूसरे कारणों के भेदसे अनेक प्रकारमें विभक्त है । इस कारण मुनिलोगोंकरके उसका कारण अनुयायीनाम नियत हुआ है ॥ १२१॥ निरूहस्यापरंनामप्रोक्तमास्थापनंयुधैः । स्वस्थानस्थापनादोपधातूनांस्थापनमतम् १२२॥ अर्थ-निरूहका दूसरा नाम आस्थापन है । दोप और धातु. को शुद्ध करती है और यथास्थान में स्थापन करती है, इस कारण पंडितोंने इसका नाम आस्थापन रक्खा है ।। १२२ ॥ निरूहस्यप्रमाणञ्चप्रस्थपादोत्तरंपरम् । मध्यमंप्रस्थमुदिष्टहीनञ्चकुडवास्त्रयः॥ १२३॥ अर्थ-निरूहकी मधानमात्रा २॥ ढाई सेर है । मध्यममात्रा दो सेर और हीनमात्रा डेढसेर है ।। १२३ ॥ मधुनपीणि पलानि, स्नेहस्य पट्, फल्कस्य दे, कायस्य दश, बि- जिचं मायापस्प । एवं पित्त मधुनश्चत्वारि, हस्य च चत्वारि, क- स्वस्पद, कपापस्य दिपंचेति दशेत्यर्थः । भावाप्यस्य चतु एवं फर्फ मधुनः षट्पलानीति योग्यम् ॥

भाषाटीकासमैत। (१४३ । तो चतुर वैद्य इसप्रकार यथायोग्यभावसे निरूहबस्तिका प्रयोग करे।इस्से योग्यफल पायाजाता है ।। १३१ ॥ १३२ ॥ १३३ ।। पूर्वोक्तेनविधानेनगुदेवस्तिनिधापयेत् । त्रिंशन्मानास्थितोवस्तिस्तत्रउत्कटुकोभवेत् १३४ यावत्पय्येतिहस्तानंदक्षिणंजानुमंडलम् । निमेपोन्मेपकालोवासामात्रापरिकीर्तिता॥१३५॥ "उत्कटुकोभवेदितिवस्तेरागमनायउत्कटुकइति । उद्गतइतिलोके । एतच्चमृदुकोप्टंप्रतिवोगनञ्च । अवेगिनंप्रतिकूरकोप्टंप्रतियथा" ॥ १३६॥ अर्थ-पहले कहे हुए अनुवासनकी विधिके अनुसार निरूह- णभी गुदामें प्रयोग करे । मृदुकोष्ठ में ३० मात्रा काल वंस्ति धारणकराकर फिर उत्कटाभावसे विठलावै । दा- हिनी जांधके हाय रसके पर्यायके क्रमसे फेवल एफपार हाय पुमानेमें जितना समय लगता है, तित- ना समय, अश्वा निमेषवा उन्मेष कालतक वस्ति धारण करनेका योग्य समय है ॥ १३४ ॥ १३५ ।। १३६ ॥ जानुमण्डलमावेटोदत्तंदक्षिणपाणिना। कृष्णनेत्रच्छटाशब्दशतंतिप्टेदवेगवान् ॥ "कृष्णनेत्रोवहिप्कृतनलिकः। छटातुरीतिख्याता" ॥१३७ ।। अर्थ-कदिन फोठा होतो दाहिने हापसे जानुमंडलको घेष्टन फरक नलको प्रवेश कराफर शततुरी(एक्शत अंगलकी एक तुरी होतीहै ) काल अपेक्षा करे ॥ १३७ ।। ऊपर (१४२) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप स्नेहवस्तिविधानेनबुधःकुर्यानिलहणम् । जातनिरूहेचततोभवेदुत्कटुकासनः ॥ १२९॥ तिष्ठेन्मुहूर्त्तमात्रन्तुनिरूहागमनेच्छया। अनायातंमुहूर्तान्तनिरूहंशोधनैर्हरेत् ।। १३० ॥ अर्थ-स्नेहवस्तीकी विधिके अनुसार निरूहण क्रिया करे। निरहणक्रिया की जाने पर उसके लौट आनेकी प्रतीक्षा- करके मुहूर्ततफ उत्कटासनपर (उत्कटपावसे ) बैठे । यदि एक मुहूर्तमेंभी निरूह न आये, तो निरूहके लौट आनकी क्रियाकरे ॥ १२९ ॥ १३० ॥ सम्पनिहस्पलक्षणमाह। नधावत्यौपधंपाणिनतिष्टत्यवलिप्यच । नकरोतिचसीमन्तंसनिरूह-सुयोजितः ॥ १३ ॥ "नधावतिनपृथग्भवति । सीमन्ततैलादिरेखाम् । एतेनमधुनेहादीनामपृथग्भविइत्युक्तंभवति"१३२ भतएवोक्तम्। कल्कस्नेहकपायाणामविवेकाद्भिपावरैः। वस्तिस्तुकल्कितःप्रोक्तस्तस्यादानंतथार्थकृत १३३ अर्थ-अछेनिस लक्षण । चिकित्सामृतमें कहा है कि भटोमांतिसं निरुदणभियाफ फरनेफो औपधी हायमें लगनेसे अलग होकर गिर नही और हाथमें लेप करनेपर गादी होफर छापहीम रहे या तैयादिफी रेसाभि दिखाई नहीं है, ऐसे सक्षम हो तो आपधि भला प्रयोग हुभा जाने । इसकारण पर, स्लेद और पपायादिकी पररपर अभिन्नता दिसाद भापाटीकासमेत। (१४३ तोचतुर वैद्य इसप्रकार यथायोग्यभावसे निरूहबस्तिका प्रयोग करे।इस्से योग्यफल पायाजाता है ॥ १३१ ॥ १३२ ॥ १३३ ॥ पूर्वोक्तनविधानेनगुदेवस्तिनिधापयेत् । त्रिंशन्मात्रास्थितोवस्तिस्तत्रउत्कटुकोभवेत् १३४ यावत्पर्येतिहस्तानंदक्षिणंजानुमंडलम् । निमेपोन्मेपकालोवासामात्रापरिकीर्तिता॥१३६॥ "उत्कटुकोभवेदितिरस्तेरागमनायउत्कटुकइति । उद्गतइतिलोके । एतच्चमृदुकोप्टंप्रतिवोगनञ्च । अवेगिनंप्रतिकूरकोप्टंप्रतियथा" ॥ १३६॥ अर्थ-पहले कहे हुए अनुवासनकी विधिके अनुसार निरूह- णभी गुदामें प्रयोग करे । मृदुकोष्ठ में ३० मात्रा काल वंस्ति धारणकराकर फिर उत्कटाभावसे विठलावै । दा. हिनी जांघके ऊपर हाथ रखके पर्यायके कमसे केवल एकवार हाथ घुमानमें जितना समय लगता है, तित- ना समय, अथवा निमेपया टन्मेप कालतक वस्ति धारण करनेका योग्य समय है ॥ १३४ ॥ १३५ ॥ १३६ ॥ जानुमण्डलमावेष्टोदत्तंदक्षिणपाणिना। कृप्णनेत्रच्छटाशब्दशतंतिप्टेदवेगवान् ॥ कृपणनेत्रोवहिप्कृतनलिकः। छटातुरीतिख्याता" ॥ १३७ ।। अर्थ-कठिन कोटा होतो दाहिने हाथसे जानुमंडलको घेष्टन करके नलको प्रवेश कराफर शततुरी( एकशत अंगलकी एक तुरी होती ) फाल अपेक्षा करे ॥ १३७ ।।

(१४४) वैद्यकपरिभाषामदीप ।
द्वितीयवातृतीयवाचतुर्थवायथार्हतः।
पुटंप्रदापयद्वैद्योबुद्धारोगवलावलम् ॥
सम्यनिरूढलिंगेतुप्राप्तेवस्तिनिवारयेत् ।। १३८ ॥
"यथार्हइति यो यावन्तं पुटमर्हति. तस्य तावन्तं पुटं
दापयेदित्यर्थः
अर्थ-रोगीका बलाबल विचारके दो तीन अथवा
चार वारतक, जो जितनी बस्तिके योग्य है तिसपर
तितनीही वार प्रयोगकरे, जब भलीभांतिसे निरूह के
लक्षण प्राप्त होजाय तब बस्तिका प्रयोग बन्द करे ॥ १३८ ॥
अन्यच्चा
नाभिप्रदेशञ्चकटिञ्चगत्वा
कुक्षिसमालोज्यपुनश्चसृष्टम् ॥
संस्नियकायंसपुरीपदोपः
सम्यक्सुखेनेतिचयःसवस्तिः ॥१३९॥
प्रसृष्टविण्मूत्रसमीरणत्वं
रुच्यनिवृद्धयाशयलाघवानि ॥
वेगोपशान्ति प्रकृतिस्थिताच
वलञ्चतत्स्यात्सुनिरूढलिङ्गम् ॥ १४ ॥
अर्थ-स्निग्ध शरीरमें भलीभांतिसे बस्तीका प्रयोगही,
फमर, नाभि और कोखको उथलपुथलकर मलके साथ
दापको बाहर निकाल देताहै; भलीभांतिसे निरूहण होंने
पर घायु, मूत्र और मलफी सरलता, आहारमें रुचि, अमिकी
यदि आशयकी लपुता, रोगका दूरहोंना और देहस्य होकर
घट टत्पन्न होताहै ॥ १३९ ॥ १४ ॥

भाषाटीकासमेत । (१४५) भसम्यनिरूहलक्षणमाह । स्याद्धच्छिरोरुग्गुदकुक्षिलिङ्गे शोथःप्रतिश्यापरिकातकाच । हल्लासिकामारुतमूत्रसंगः श्वासोनसम्यक्चनिरूहितेस्यात् ॥ १४३ ॥ अयोगश्चातियोगश्चनिरूहस्यविरेकवत् १४२॥ इतिनिरूहवास्तिविधिः। अर्थ-भलीभांति निरूह नहो, तो हृदय और शिरमें दर्द, गुदा, कोख, लिंगमें पीडा, और शोय , जुकाम हिचकी, वायु और मूत्रकी रुकावट, और श्वासरोग होताहै । विरेवनकी समान निरूहकाभी अयोग वा अति- योग होताहै ॥ १४१ ॥ १४२ ।। अयोत्तरवस्तिमाह। अतःपरंप्रवक्ष्यामिवस्तिमुत्तरसंज्ञितम् । द्वादशांगुलकंनेमध्येचकृतकर्णिकम् ।। मालतीपुष्पवृन्ताभंछिद्रसर्पपनिर्गमम् ॥१४॥ अर्थ-उत्तरवस्तिकी विधि कही जातीहै-उत्तरवस्ति- का नल १२ अंगुल लम्बाहो । उसके बीच में कर्णिका वनानी चाहिये । मालतीफूलके वृन्त (फल, पुप्प, पत्रादिका मूल ) की समान स्यूलहोतिसमें छेद ऐसा करे जिसमेंसे होकर सरसों निकल सके ॥ १४३ ॥ पंचविंशतिवाणांमध्येमात्राधिकार्पिकी । तदूर्ध्वपलमात्राचस्नेहस्योक्ताभिपग्वरैः ॥ १४४॥ अर्थ-पचीस वर्षसे कम उमरवाले के लिये स्नेहकी मात्रा २ फर्ष (श्तो है । तिस्से ऊपर एक पल मात्राका प्रयोगकरे१४४

.
(१४६) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप ।
अथास्थापनशुद्धस्यतृप्तस्यनानभोजनैः ।
स्थितस्यजानुमात्रेणपीठेऽन्विष्यशलाकया ॥१४५
स्निग्धयामद्रमार्गेणततोनेत्रनियोजयेत् ।
शनैःशनैघृताभ्यक्तमेट्ररन्ध्रांगुलानिपट् ॥ १४५॥
ततोऽवपीडयेद्वस्तिशनैर्नेत्रञ्चनिहरेत् ।
तत प्रत्यागतेस्नहेस्नेहवास्तिकमोहितः॥१४॥
अर्थ-पहले आस्थापनदारा रोगीका शरीर शुद्ध' करके
स्नान करावै । फिर भलीभांति भोजन करायं पठिीके
- ऊपर जांघोंके बल बैठावै, फिर स्नेह लगी शलाका (सलाई)
से सावधानताके साथ लिंगके छेदको अनुवेपण करके घी
लगाहुआ नल धीरे रलिंगमें घुसादे । छःअंगुलतक नल पुंसा-
कर बस्तिको पीडितकर फिर धीरे २ उस नलको लिंगमेसे
वाहर निकालले । जब स्नेह आने लगे तो क्रमानुसार
स्नेहवस्तिका प्रयोग करता रहै ॥ १४५॥ १४६ ॥ १४७ ॥
स्त्रीणांकनिष्ठिकास्थूलंनेकुादशांगुलम् ।
मुद्गप्रवेश्ययोज्यञ्चयोन्यन्तश्चतुरङ्गुलम् ॥१४८॥
बंगुलंमूत्रमार्गेचसूक्ष्मनेत्रनियोजयेत् ॥
मूत्रकृच्छविकारेपुवालानामेकमंगुलम् ॥ १४९॥
अर्थ-खियोंके लिये उत्तरपस्तिका नल दशअंगुल लम्बा हो
उसके अगले हिस्सेमें इतना छेदही फि जिसमेंको एक भंगका
दाना निफलसफै । अपत्यमार्गमें (योनिमें ) पस्तिका प्रयोग
करना होतो उसके ४ अंगुलफी परावर, जो सुजाकादिरोगमें,
मृत्ररन्धमें पस्तिका प्रयोग करनाहो तो अंगुल नल प्रवेश पर-
रायै ।परन्तु पालिफाफे मूत्ररत्नमें एक अंगुल नल प्रवेश करना
टीक दे।। १२८ ॥ ११९ ॥

भापाटीकासमेत। (१४७) . . यदाहवाग्भट। स्त्रीणामार्त्तवकालेतुयोनिगृह्णात्यपावृतः । विदधीततदातस्मादनृतावपिचात्यये । योनिविभ्रंशशूले योनिव्यापदसृग्दरे ॥ १५ ॥ अर्थ-ऋतुवाली स्त्रियोंका योनिद्वार खुलाहुआ रहताहै । अतएव इससमय बस्तिका प्रयोग करनेसे स्नेह योनिमें सह- जसे प्रवेशकर सकता है । इसकारण योनिकन्द ( योनिभ्रंश) योनिपीडा, योनिव्यापत और प्रदररोगमें रजस्वलावस्थामें स्त्रियोंकी योनिके मार्गमें उत्तरवस्तिका प्रयोग करना चाहिये। परन्तु किसीप्रकारका मारात्मकरोग होवै, तो ऋतुके सिवाय और कालमें भी उतरवस्तिका प्रयोग कियाजा सकता है१५० शनैर्निष्कम्पमाधेयंसूक्ष्मनेत्रविचक्षणः। योनिमार्गेपुनारीणांस्नेहमात्राद्विपालिकी।। १५१॥ अर्य-चतुर चिकित्सकको चाहिये कि धीरे २ स्त्रियोंकी यो- निमें सूक्ष्म नल प्रवेश करादे । गर्भाशय शुद्ध करनेके लिये स्नेहकी मात्रा दोपलतक प्रयोगकरे ॥ १५१ ॥ उत्तानायस्त्रियदद्यादूर्ध्वजान्वैविचक्षणः । अप्रत्यागच्छतिभिपग्रस्तावुत्तरसंज्ञिते ॥१५॥ भूयोवस्तिर्विधातव्यःसंयुक्तै शोधनैर्गणैः । फलपर्तिनिदध्याद्वायोनिमार्गेठांभिपक् ।। मूत्रविनिःसृतांस्निग्धांशोधनद्रव्यसंयुताम् ॥१५॥ अर्थ-स्त्रियोंपर टत्तरबस्तिका प्रयोग करनाहो तो टनको चित्तलिटाकर दोनोंठरूको झुकवादे और दोनोंजांघोंको ऊंचा करके चतुर चिकित्सक बस्तिका प्रयोग करे। जो उत्तरवस्ति समयानुसार नलौटे तो फिर संशोधकद्रव्ययुक्त बस्तिका प्रयो. ग करे, अयवा योनिमार्गमें, मूत्रनिकालनेवाला और स्निग्ध (१४८) वैद्यकपरिभापानदीप । संशोधकद्रव्ययुक्त मजबूत वत्ती चढावै ॥ १५२ ॥ १५३ ॥ दह्यमानेतथावस्तौदद्याद्वतिविशारदः। क्षीरवृक्षकपायेणपयसाशीतलेनच ॥ १५॥ अर्थ-वस्तिक्रियासे कोईस्थान दग्ध होजाय तो क्षीरवृक्षके कपाय और शीतल जलसे फिर वस्तिका प्रयोग करे ॥१५४॥ वस्तिःशुक्ररुजःपुंसांस्त्रीणामार्त्तवजांरुजः। हन्यादुत्तरवस्तिस्तुनोचितोमेहिनांकचित् ॥१५५ अर्थ-वस्तिके प्रयोगसे पुरुपका शुक्रदीप और स्त्रियोंका रजो- दोप नाश होजाता है। परन्तु प्रमेहरोगवालेपर कभी उत्तरव- स्तिका प्रयोग नकरै ।। १५५ ।। सम्यग्दत्तस्यलिङ्गानिव्यापद क्रमएवच । वस्तरुत्तरसंज्ञस्यसमानस्नेहवास्तिना।। १५६॥ अर्थ-उतरवस्तिकी भलीभांतिसे सिद्धि और उसको व्यापत्तिके लक्षण और चिकित्साविधि सब स्नेहवस्तिकी समान है। १५६ घृताभ्यक्तेगुदेक्षेप्याश्चक्ष्णास्वांगुष्टसनिभा। मलप्रवर्तिनीवर्तिःफलवर्तिश्चसास्मृता ।। १९७॥ अर्थ-गुदामें घी मलकर, रोगीअंगूठेकी बराबर और साफ जो मलकी लानेवाली बत्तीका प्रयोग किया जाता है तिसको फलपति कहते हैं । १५७ ॥ आनन्दसेनस्त्वाह। पस्विमात्रायया । अनुवासनभेदश्चमात्रावस्तिरुदीरितः। पलाईमुत्तरोवस्तमात्रावस्ते पलद्वयम् ॥ १५८॥ यापनास्नेहवस्तिश्चद्रावतीपट्पलान्विता। पिच्छावस्तिर्भवेत्प्रस्थासपाद कीर्तितोऽपरेः॥५९ यापनावस्तिरितिवातविकारयापनार्थयोरस्तिरित्यर्थः भाषाटीकासमेत। (१४९) अर्थ-उतरवस्तिकी पूर्णमात्रा अईपल (४ तो०) है। मात्रावस्तिकी दोपल है। और यापनावस्ति (वातविकारमें जिस वस्तिका प्रयोग किया जाताहै) और स्नेहवस्ति इनदोनों की मात्राछयपल है। पिच्छावस्तिकी मात्रा एकप्रस्थ कोईकोई सवासेर कहते हैं ॥ १५८ ॥ १५९ ॥ नचैकान्तेचनिर्दिष्टेप्यत्राभिनिविशेदुधः ॥१६॥ भवेत्कदाचित्कार्यापिविरुद्धाभिमताक्रिया१६३॥ "अभिनिविशेन्निश्चयंकुर्यादित्यर्थः । अभिमता, कियायद्यपिविरुद्धाभवेत्तथापिकायेतिशेपः। अर्थ-चिकित्सक लोगोंको केवल शास्त्रमें नियत हुई क्रियाके भरोसे रहकर तिसके अनुसार इलाज नहीं करना चाहिये । क्योंकि कहीं २ विरुद्ध क्रियाका प्रयोजनभी हो- ता है ॥ १६० ॥ १६१ ॥ दीयतेक्षारतैलोनिरूहासनिगद्यते । वस्तिभिर्दीयतेयस्मात्तस्मादस्तिरितिस्मृतः १६२ अर्थ-दूध और तैलादि स्नेह वस्तुओंसे जो वस्तुका प्रयोग किया जाता है तिसको निरूह कहते हैं । बस्ति ( मृगादिके दारा ) प्रयोग होती है इस्से उसे वस्ति कहते है ॥ १६२ ॥ अत्रानुवासनाख्योहिवस्तिर्य सोऽत्रकथ्यते । पूर्वमेवततोवस्तिनिरूहाख्योभविष्यति । निरूहादुत्तरश्चैववस्तिःस्यादुत्तराभिधः॥ १६३ ॥ अर्थ-अनुवासननामक वस्ति कही जाती है।पहले अनुवासनव- स्ति, फिर निरूहबस्ति और तदुपरान्त उत्तरवस्ति है।।१६३॥ अनुवास्यस्तुरूक्षःस्यात्तीक्ष्णानि केवलानिली। अन्यच्चा ( १५०) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप । वानुवास्यस्तुकुंष्टीस्यान्महीस्थूलस्तथोदरी।। १६४ नास्थाप्यानानुवांस्या ल्युरजीर्णोन्मादतृड्युताः। शोथमूरुिचिभयंधासकासक्षतातुराः ॥ १६५॥ अर्थ-रूखी देहवाला तीक्ष्णदेहवाला वायुरोगसे घिरे मनुष्य- गण अनुवासनके योग्य हैं। कोठ, प्रमेह, स्थूल उदर, अजीर्ण, उन्माद, प्यास, शोथ, मूर्छा अरुचि, भय, दमा, खोसी और क्षतवाले रोगी आस्थापन और अनुवासनके अयोग्य हैं ॥१६५ धूम-पित्तानिलौकुर्यादवश्यायाकफानिलौ ॥१६६॥ अर्थ-धुआं-पित्त और वायुफा बढानेवाला है । कुहरा-कफ मौर वायुवर्द्धक है ।। १६६ ॥ धूमपानगुणमाह। गौरवंशिरसःशूलंपीनसोविभेदकः। कर्णाक्षिशूलंकासश्चहिकावासोगलग्रहः १६७॥ दन्तदौर्बल्यमानावःश्रोत्रोणाक्षिदोपजः। पूतियाणास्यगन्धश्चदन्तशूलमरोचकम्॥१६८ हनुमन्याग्रह कण्डू:किमयोमुखपाण्डुता। श्लेष्मप्रसेकौवेस्वयंगलगण्डाधिजिह्वके १६९।। सालित्वंपिंजरत्वञ्चकेशानांपतनंतथा। क्षवथुश्वातितन्द्राचवुद्धेर्मोहोतिनिद्रता।।१७०॥ धूमपानात्प्रशाम्यन्तिपलम्भवतिचाधिकम् ७१ अर्थ-धूमपान (दुका) फरनेसे देहफा भारीपन, शिरदर्द, पीनस, अपभेदक, ओस फानफा दर्द, सांसी, हिचपी, दमा, गलग्रह, दांतॉफी कमजोरी, मुमसे पानीफा गिरना, पान, नाफ. और नत्रायो दोप, मासिफा और मुसफी . - भाषाटीकासमेत। दुर्गन्ध, दांतोंका दर्द, अरुचि, हनुग्रहे मन्याग्रह ( गरदना- दिक रहजाना) दाद, कोडे, मुखका श्वेत होजाना, श्लेष्माका कोप, स्वरभंग, कंठमाला, आधजिवक (जीभका घाव । खालित्य(वालोंका फिर नआना),केशोंका रंग बदलना, केशोंका गिरना, क्षत्थू (एकप्रकारको खांसी) तन्द्रा, बुद्धीकी ज- इता और अतिनिद्राका नाशहो जाताहै, बल बढताहै १७१॥ रक्तपित्तान्धवाधिर्य्यतृण्मूछीमदमोहकृत् । धूमोऽकालेऽतिपीतोवांतत्रशीतोविधिमतः॥१७२ अर्थ-अकालमें या अधिक धूमपान करनेसे रक्तपित्त, अ- न्धापन, बहरापन, प्यास, मत्तता और मोह उत्पन्न होताहै। ऐसी अवस्थामें शीतल क्रिया करे ॥ १७२॥ प्रायोगिक नैहिकश्चबैरेचनिकएवच । कासहारीवामनीयोधूम-पंचविधीमतः॥ १३ ॥ "प्रायोगिक प्रयोगःसुस्थस्यास्नेहकारीस्नैहिकः। दोपविरेचनाद्वैरेचनिकः। कण्टकार्यादिभिधूम- पानात्कासहरः । वमनकारीवामनीयः॥ अर्थ-प्रायौगिक, स्नैहिक, वैरेचनिक, कासहर और वामन, यह पांच धूमपान हैं ॥ १७३ ॥ वक्रेणैववमेझूमनस्तोवक्रेणवापिवन् ॥ १७४ ।। उरकण्ठगतेदोपेवकेणधूममापिवेत् ॥ नासयातुपिवेदोपेशिरोप्राणाक्षिसंश्रये ॥१७॥ अर्थ-नासिका और मुखमें धूमपान करके मुखसे छोडदे । छाती और कण्ठगत रोगमें मुखसे धूमपान । मस्तक, नासिका और नेत्रोंके रोगमें नासिकासे घूमपानकरे ॥ १७५॥ १ अश्वस्य वातव्याधी अन हनू संगृहीतो निश्चलो लालानावश्च । जयदत्तः ५५ अ०।

- (१५४ ) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप.. पूर्ण नहो, दोष दूर नहो, नेत्र और नासिकासे पानी न निकले तवतक गहूप धारण करे ॥ १८३ ॥ १८४ ॥ १८५ ।। यस्यौपधस्यगण्डूपस्तस्यैवप्रतिसारणम् । कवलश्चापितस्यैवज्ञेयोऽत्रकुशलैनरैः ॥ १८६ ॥ अर्थ-जिस २ औषधिसे गण्डूप धारण करनेकी विधि वर्ण- न कर आये है, अतिसारण और कवलभी उन्हें द्रव्योंसे प्रयोग करे ॥ १८६॥ व्याधेरपचयस्तुष्टिवैशावकलापवम् । इन्द्रियाणांप्रसादञ्चगण्डूपेशुद्धिलक्षणम् ॥१८७ ॥ हीनयोगात्कंफोत्क्लेशोरसाज्ञानारुचिस्तथा। अतियोगान्मुखपाक-शोपस्तृष्णाकुमोभवेत् १८८ अर्थ-जो भलीभांतीसे गण्डूपप्रयोग होजाय तो रोगनाश, मुखका निर्मलता, हलकापन और सव इन्द्रियोंकी प्रसनता, होती है। ऐसे रक्षण प्रकाशित होतो जानेकी गण्दूपका शुद्ध धारण हुआ। भलीभांति गण्डूपके धारण नहोंनेसे फफोलोश रसज्ञानकी अल्पता और अरुचि उत्पन्न होती है।आधिक क्रियासे मुखपाफाशोप,प्यास और कान्ति उत्पन्न होती है ॥१८॥१८॥ सुखसञ्चार्यतेयातुसामानाकवलेहिता। असञ्चार्यतुयामावागण्डूपेसाप्रकीर्तिता ।। १८९ ॥ अर्थ-जितनी मात्राफा द्रव्यद्रव्प मुखमें रखनेसे सहज ही चलायमान किया जासफे टसही परिमाणसे फवलफे योग्य मावा है । और द्रव्यफी जितनी मात्रा मुसमें धारण करनेसे चसापमान नहोस, यह गण्ट्रपफी पोग्य मात्रहि ॥ १८९ ॥ भप रतमोक्षणविधिः। अतियुताहिमृत्युःस्याहारुणावानिलामयाः॥१९०॥ अन्यन्य।

भाषाटीकासमेत । (१५५) अर्थ-अधिक रुधिर निकलने से मृत्यु अथवा दारुण वायुरोग उत्पन्न होताहै ।। १९० ॥ प्रसन्नवणेन्द्रियमिद्रियार्थानिच्छन्तमव्याहतशक्तिवेगम् सुखान्विंतंपुष्टिवलोपपन्नप्रसन्नरक्तंपुरुपंवदन्ति १९॥ अर्थ-रक्तकै शुद्ध रहनसे वर्ण और इन्द्रियोंकी प्रसन्नता, संध क्रियाऑके करने में इन्द्रियोंकी सामर्थ्य अरोकशाक्त, मल- मूत्रादिका ठीक २ उतरना, सुस्थता, शरीरमें पुष्टि और वल उत्पन्न होता है ।। १९१॥ नानपोडशातीतसप्तत्यक्युितासृजाम् ।। १९२॥ अर्थ-सोलह वर्षसे कम अथवा ७० वर्षसे अधिक मनुप्यका रक्तमोक्षण (फस्त) करना उचित नहीं है। १९२ ।। अस्निग्धास्वेदितात्यर्थस्वेदितानिलरोगिणाम् गर्भिणीसूतिकाजीर्णपित्तास्रश्वासकासिनाम् १९३ अतिसारोदरच्छर्दिपाण्डुसर्वाङ्गशपिणाम्। स्नेहपीतेप्रयुक्तेपुतथापंचसुकर्मसु ॥१९॥ नायन्त्रिताशिरांविध्येन्नतिर्यनातिचोत्थिताम् । नातिशीतोष्णवातातिष्वन्यत्रात्ययिकाकृता ९५ अर्थ-रूखे, जिसको पसीना न आताहो, जिसको बहुत पसीना आताहो, वातरोगयुक्त, गर्भिणी, सूतिका, अजीर्ण, रक्तपित्त, दमा, खाँसी अतिसार, उदर, वमन, पाण्डुसे घि- रेडुए, और अतिदुबले, स्नेहपीत, और पंचकर्मवाले पुरुपकी फस्त न खोले । जो शिरा वेगके योग्य है तो तिरछे भावसे उनकी शिराको नवेधै । अत्यन्त, शीत, अत्यन्त गरम, अत्यन्त वायु या अवरके दिन फस्त नहीं खोलना चाहिये । परन्तु मारात्मक व्याधि होतो निषिद्धकालमेंभी शिरावेध करे ॥ १९३॥१९४॥ ११५ ॥ (इति रक्तमोक्षणम् ) 1

(१५६) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप।
अथ घृततैलमूछ विधिः।
(घृतमछाविधिः)
पथ्याधात्रीविभीतैर्जलधररजनीमातुलङ्गवैश्च ।
द्रव्यैरतैःसमस्तैःपलकपरिमितैर्मन्दमन्दानलेन ॥
आज्यप्रस्थंविफेनंपरिचपलगतंमूर्छयेद्वैवराजः ।
तस्मादामोपदोपहरतिचसकलंवीर्यवत्सौख्यदायी१९६.
अर्थ-वृतमू विधि । हरड, बहेडा, आमला, मोथा, ह.
लदी, विजौरा, नींबूका रस, यही छय.घृतको मूछित कर-
नेके द्रव्य हैं । इनमेंसे प्रत्येकका परिमाण एकपल (८ तो०)
महण करके, ४ सेरपी चौगुने जलके साथ मन्दी आगके
तापसे पकावै । पहले धोको पकावै, जब फेनरहित हो
जाय, तब मू के समस्त द्रव्य धीमें डालै । मूछा क-
रनेसे घृतका आमदोप नाश होफर वह वीर्यवन्त और सुख-
दायी होजाताहै ॥ १९६ ॥
कटुतैलमूछाविधिः।
वयस्थारजनीमुस्तविल्वदाडिमकेशरैः।
कृष्णाजीरकहीवरनलिकैःसविभौतकः ॥ १९ ॥
एतैःसमांसैप्रस्थेचकर्षमाप्रयोजयेत् ।
कटुतैलंपचेत्तेनआमदोपहरंपरम् ॥ १९८ ॥
अर्थ-कडवे तेलको मूच्छित फरनेकी विधि । आमला,
हलदी, मोया, पेलफी छाल, दारपीफी छाल, नागकेशर,
फालाजीरा, पाला, यपारी बहेडा, और मनीठ यह ग्यारह
द्रम्प फहुपे तेलफो मूर्षित करते हैं। ४ सेर तेलमें दोदो तोला
पह ग्यारह चीजें डाले और ४ गुने गलसे सिद्धफरे, इसके
पाफपी विपि पहलेणी अनुसार है। मच्छसि फड़ये तेलका
आमदाप नष्ट होजाता है ।। १९७ ॥ १९८॥

भाषाटीकासमेत। (१५७) एरंडतेदमूच्छांविधिः। विकसामुस्तकंधान्यंत्रिफलावैजयन्तिका। हीवेरधनखजूरवटशृङ्गानिशायुगम् ॥ १९९॥ नलिकाभेपनंदेयकेतकीचसमंसमम् । प्रस्थेदेयंशाणमितमूर्च्छनेदधिकांजिकम् ॥२०॥ अर्थ-अण्डीके तेलको मूठित करने की विधि-मनीठ मोथा, धनिया, आमला, बहेडा जयंती; वाला, खजूर बढकी दाटी, हलदी, दारुहलदी यवारी, केतकी, दही और कांजी इनसे अण्डीका तेल मूच्छित होताहै । इनका परिमाण वरावर है । चारचार तोला इन सब चीजोंको लेकर 2 सेर तेल में पाक करे । विधि पहले की अनुसार है १९९॥२०० तिलतेलमृच्छविधिः । मलिष्टारात्रिलोधैर्जलधरनलिक साक्षपथ्यैःकुमार्या । सूचीपुष्पांमिनारैरुपहितमथितैर्गन्धयोगंजहाति ॥ तैलस्येन्दुकलांशिककविकसाभागोऽपिमूर्छाविधौ । येचान्येत्रिफलापयोदरजनीहीवेरलोभान्विता ॥ सूचीपुष्पवटावरोहनलिकास्तस्याश्चपादांशिकाः। दुर्गन्धविनिहन्तितैलमरुणंसौरभ्यमाकुर्वते ॥२०१॥ अर्थ-तिल के तेलको मूच्छित करने की विधि। मनीठ, हलदी, लोध, मोथा, यवारी, आमला, बहेडा, हरड, केडया- जटा, बडकी दाढी और वाला, इन सबका चूर्ण जलमें मिला- कर तेल में डाले । और उसमें तेलसे चौगुना जल मिलाकर पाककरे, जब कुछ जल रहनाय तो उतारकर थोडे दिनों- तक वैसही रक्खा रहनेदे । इन हलदी और मजीठादि द्र- ज्यको मूद्रव्य कहते हैं । इनके परिमाणका नियम यह है कि,जितना तेलहो,तेलके सोलहवाँ हिस्सा मजीठ,मनीठका (१५६) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। अथ घृततैलमूछ विधिः। (घृतमृविधिः) पथ्याधात्रीविभीतैलधररंजनीमातुलुङ्गवैश्च । द्रव्यैरतै समस्तै पलकपरिमितेर्मन्दमन्दानलेन ॥ आज्यप्रस्थविफेनंपरिचपलगतमूर्च्छयेद्वैद्यराजः। तस्मादामोपदोषहरतिसकलंवीर्यवत्सौख्यदायी१९६. अर्थ-घृतमू विधि । हरड, बहेडा, आमला, मोया ह. लदी, विजौरा, नींबू का रस, यही छय.घृतको मूञ्छित कर- नेके द्रव्य हैं। इनमेंसे प्रत्येकका परिमाण एकपल ( ८ तो०) महण करके, ४ सेरपी चौगुने जलके साथ मन्दी आगके तापसे पकावै । पहले घीको पकावै, जब फेनरहित हो जाय, तब मू के समस्त द्रव्य धीमें डालै । मूर्छा क- रनेसे घृतका आमदोष नाश होकर वह वीर्यवन्त और सुख- दायी होजाताहै ॥ १९६ ॥ कटुतैलमूोविधिः। वयस्थारजनीमुस्तविल्वदाडिमकेशरैः। कृष्णाजीरकहीवरनलिकासविभीतकैः ॥ १९७ ॥ एतैःसमांस प्रस्थेचकर्षमात्रंयोजयेत् । कढ़तलंपचेत्तेनआमदोपहरंपरम् ।। १९८॥ अर्थ-कडवे तेलको मूछित करनेकी विधि । आमला, हलदी, मोया, वेलकी छाल, दारवीकी छाला नागकेशर, फालाजीरा, बाला, यवारी बहेडा, और मजीठ यह ग्यारह द्रव्य कडवे तेलको मूञ्छित फरते हैं। ४ सेर तेलमें दोदो तोला यह ग्यारह चीजें डाले और ४ गुने जलसे सिद्धकरे, इसके पाकफी विधि पहलेकी अनुसार है । मू से कडवे तेलका आमदोप नष्ट होजाता है ।। १९७ ।। १९८ ॥

भाषाटीकासमेत।. (१५७) एरंडवैलमूच्छांविधिः। विकसामुस्तकंधान्यंत्रिफलार्वजयन्तिका। हीवरचनखजूरवटशृङ्गानिशायुगम् ।। १९९ ॥ नलिकाभेपजदेयकेतकीचसमसमम् । प्रस्थेदेयंशाणमितंमूर्च्छनेदधिकांजिकम् ॥२०॥ अर्थ-अण्डीके तेलको मूर्तित करने की विधि-मनीठ मोथा, धनिया, आमला, बहेडा जयंती; वाला, सनूर बटकी दादी, हलदी, दारुहलदी यवारी, केतकी, दही और कांजी इनसे अण्डीका तेल मूञ्छित होताहै । इनका परिमाण बराबर है। चारचार तोला इन सब चीजोंको लेकर र सर तेल में पाक करे। विधि पहलेको अनुसार है१९९।२०० तिलतलमृच्छाविधिः। मजिष्टारात्रिलोधैर्जलधरनलिकैसाक्षपथ्यै कुमार्या । सूचीपुष्पांविनाररुपहितमथितैर्गन्धयोगंजहाति ॥ तैलस्येन्दुकलांशिककविकसाभागोऽपिमूच्छविधौ । शान्येत्रिफलापयोदरजनीहीवेरलोधान्विता ॥ सूचीपुष्पवटावरोहनलिकास्तस्याश्चपादाशिकाः। दुर्गन्धविनिहन्तितैलमरुणंसौरभ्यमाकुर्वते ।।२०१॥ अर्थ-तिल के तेलको मूञ्छित करनेको विधि। मनीठ, हलदी, लोध, मोथा, यवारी, आमला, बहेडा, हरड, फेडया- जटा, वडकी दाटी और वाला, इन सबका चूर्ण जल्लमें मिला. कर तेल में डाल । और उसमें तेलसे चौगुना जल मिलाकर पाककरे, जब कुछ जल रहनाय तो उतारकर थोडे दिनों तक वैसही रक्खा रहनेदे । इन हलदी और मजीठादि द- क्यको मदिव्य कहते हैं। इनके परिमाणका नियम यह है कि,जितना तेलहो,तेलके सोलहवाँ हिस्सा मजीठ,मजीठका १० भाषाटीकासमेत। (१५९) 1 श्रीवासच्छदग्रन्थिपर्णशशभृत्लाणिवनोशारकम् ।। कस्तूरिनखपूतिशैलजशुभामेथीलवङ्गादिकम् । गन्धद्रव्यमिदंप्रदेयमखिलं श्रीविष्णुतैलादिषु २०६ अर्थ-गन्धदव्य ययाः-इलायची, लालचन्दन, कुंकुम, अगर, कपूरकचरी, वालछड, कचूर, सफेदचन्दन, गठिवन, कपूर, शिलारस (लोवान), खस, कस्तुरी, नखी, गन्ध- मार्जारवीर्य, गजपीपल, प्रियंगु, मेथी और लोंगादि यह समस्त गन्धद्रव्य विष्णुतेलादिमें डाले । २०५॥ २०६॥ अपरंगन्धद्रव्यम् । देवदारुसरलागुरुत्वचंतेजपत्रधनकुष्ठकुंकुमम् । ग्रन्थिपर्णिशठिकोयगन्धकमांसिकानवखोटिकुन्दुरु।१७ पूतिकमधुरिकैलरानखोचन्दनसमपरप्रियङ्गुकम् । मेथिकामदसुवास्यचंपकंदेवताडनलिकासपृकया। ककोलकंकल्कसमानितैलेदेयानिसर्वाणिसुगन्धिकानि। अन्यान्यशेपाणिहितानिवैद्यैर्वातापहारीणिसुयोजितानि अर्थ-और गन्धद्रव्य-देवदारु, धूपसरल, अगर, दाल- चीनी, तेजपात, मोथा, कुडा, कुङ्कम, गठिवन, गन्धपलाशी, वालछड कुंदरू, गन्धमार्जारवीर्य, सोया, इलायची, नखी, चन्दन, प्रियंगु, मेंथी, कस्त्री, सुगन्धितचंपा, देवदारु, यगरी, असवर्ग, और शीतलचीनी, यह समस्त गन्धद्रव्य कल्कको बराबर तेलमें डालै । चतुर वैद्य, औरभी वायु नाशक और हितकारी द्रव्य विचारपूर्वक तेलमें डालदे ॥२०७॥२०८॥२०९ तैलानन्धस्यपादाईदद्यात्तच्छानविद्भिपक् । केचिद्धंसमंमन्येसर्वत्रगन्धकमणि ।।२१०॥ इति ग्रन्थान्तरस्य।

(१५८) वैद्यकपरिभापामदीप। चौथा अंश जितना हो, उसकी वरावर और सब दव्य लेले अर्थात् देलका परिमाण १६ सेरहो, तो मनीठ एक सेर और हलदी लोधआदि जो और पदार्थ हैं इनमेंसे प्रत्येक पावपावभर ले। मूछित होनेसे तेल में दुर्गन्ध नहीं आती, उत्तम सुगन्ध आफर रंगमें लाली आ जाती है। तेलके साथ दूसरे कायादिका पाक करनेके समय समस्त मच्छित व्योंको छान लेना चाहिये ॥२०१॥ कृत्वातैलकटाहेदृढतरविमलेमन्दमन्दानलैस्त- तैलंनिष्फेनभावंगतमिहचयदाशैत्ययुक्तदैव। २०२ अर्थ- -पहले मजबूत कढ़ाईमें मन्दी २ आग देकर तेलको पकावै । जब झाग उठने बन्द होजाय, तब चूल्हेपरसे उतार ले । जब ठंढा होजाय तो पीसो ( जलमैं पीसी हुई ) हलदी पानीमें घोलकर क्रमानुसार तेल में डालै, फिर 'कूटकर जलयुक्त मजीठ धीरे २ तेलमें डाल, फिर मूर्छा- फे और द्रव्य क्रमानुसार तेल में डालै ॥२०२ ॥ तैलमूर्छा। पत्रपंचरसैर्युक्तंदधिलाक्षासमन्वितम् । मूच्र्छनंकारयेत्प्राज्ञोगन्धवर्णजहातिच ॥२०॥ अर्थ-पंचरसयुक्त पंचपल्लव और दही व लाखसे भू - पाक देना उचितहै । इस्से तेलका असलीरंग दूरहोजाता है; दुर्गंध नाश होतीहै । उत्तमरंग और उत्तम सुगन्ध होती है ॥ २०३ ॥ आम्रनम्बूकपित्थानांबीजपूरकविल्लयोः। गन्धकमणिसर्वत्रपत्राणिपंचपल्लवम् ॥२०॥ अर्थ-आम, जामन, फैथ, विजौरानीबू और बेल इन पंच- पनसे गन्धपाकदे ॥२०४ ॥ अथगन्धद्रव्यम् । एलाचन्दनकुंकुमाऽगुरुमुराककोलमांसीशी।

भापाटीकासमेत। (१५९) श्रीवासच्छदग्रन्थिपर्णशशभृत्याणिनोशारकम् ।। कस्तूरिनखपूतिशैलजशुभामथीलबङ्गादिकम् । गन्धद्रव्यमिदंप्रदेयमखिलं श्रीविष्णुतैलादिषु २०६ अर्य-गन्धदव्य ययाः-इलायची, लालचन्दन, कुंकुम, अगर, कपूरकचरी, बालछड, कचूर, सफेदचन्दन, गठिवन, कपूर, शिलारस (लोवान ), खस, कस्तुरी, नखी, गन्ध- मार्जारवीर्य, गजपीपल, प्रियंगु, मेथी और लोंगादि यह समस्त गन्धद्रव्य विष्णुतेलादिमें डाले। २०५ ।। २०६॥ अपरंगन्धद्रव्यम् । देवदारुसरलागुरुत्वचंतेजपत्रधनकुष्टकुंकुमम् । ग्रन्थिपर्णिशठिकोग्रगन्धकमांसिकानवखोटिकुन्दुरु।।७ पूतिकंमधुरिकैलरानखीचन्दनसमपरप्रियङ्गुकम् । मेथिकामदसुवास्यचंपकंदेवताडनलिकासपृकया॥८॥ ककोलकंकल्कसमानितैलेदेयानिसर्वाणिसुगन्धिकानि। अन्यान्यशेपाणिहितानिवैद्यैर्वातापहारीणिसुयोजितानि अर्थ-और गन्धद्रव्य-देवदारु, धूपसरल, अगर, दाल- चीनी, तेजपात, मोथा; कुडा, कुङ्कम, गठिवन, गन्धपलाशी, वालछड,कुंदरू, गन्धमार्जारवीर्य, सोया, इलायची, नखी, चन्दन, प्रियंगु, मेथी, कस्तूरी, सुगन्धितचंपा, देवदारु, यगरी, असवर्ग, और शीतलचीनी, यह समस्त गन्धद्रव्य कल्कको बरावर तेल में डालै । चतुर वैद्य, औरभी वायु नाशक और हितकारी द्रव्य विचारपूर्वक तेल में डालदे ॥२०७॥२०८॥२०९ तैलाद्गन्धस्यपादा दद्यात्तच्छास्त्रविद्भिपक् । केचिद्धसममन्येसर्वत्रगन्धकमणि ॥२१० ॥ इति ग्रन्थान्तरस्य।

(१६) वैद्यकपरिभाषाप्रदीप। अर्थ-शास्त्रके जाननेवाले वैद्यको चाहिये कि, तेलको आठवें 'हिस्सेकी बराबर सब जगह गन्धद्रव्य डालै । कोई २कल्ककी चरावर गन्धद्रव्य डालनेकी कहते हैं ।। २१० ॥ मतान्तरे। कुष्ठञ्चनालुकापूतिरुशीरंश्वेतचंदनम् । जटामांसीतेजपत्रनखीमृगमद फलम् ॥२११ ॥ ककोलंकुंकुमंचोचलताकस्तूरिकावचा । सूक्ष्मैलाऽगुरुमुस्तंचकर्पूरग्रन्थिपर्णकम् ॥२१२॥ श्रीवासःकुन्दुरुदेवकुसुमंगन्धमाका । सिलकमिपिकामेथीभद्रमुस्तंशठीतथा॥२१३॥ जातीफलेशैलजञ्चदेवदारुसजीरकम् । एतानिगन्धद्रव्याणितैलपाकेषुयुक्तितः ।। २१४ ॥ अर्थ-दूसरे मतसे गन्धद्रव्य-कुडा, यचोरी, गन्धमार्जार. वीर्य, खस, सफेदचन्दन, बालछड, तेजपात, नखी, कस्तुरी, शीतलचीनी कुकुम, दालचीनी, मुश्कदानाच, छोटी इला- यची, अगर, मोथा, कपूर, गठिवन, धूपसरल, कुन्दुरू, लोंग, गन्धमालती, शिलारस, सोया, मेथी, नागरमोथा, गजपीपल, जायफल, गन्धपलाशी, देवदारु और जीरा तेलके पाकमें यह समस्त गन्धद्रव्य डालै ॥२११ ॥ २१२॥२१३ ॥ २१ ॥ इति सानुरादधकारिभाषाप्रदीपप्र चतुर्थ खण्ड. ॥ ॥ समातोऽयं ग्रंथः ॥ शुभमस्तु । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीयेटेश्वर। आपाखाना-बंबई.

Vaidhak Paribhasha Pradip

Author
Sen,krishanvallabh
Title
Vaidhak Paribhasha Pradip
File name
Vaidhak Paribhasha Pradip
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2012/08
Publisher
Bombay.,venkteshwar Yantralaya
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
406216
Barcode
99999990293209.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
t46Za1WAhk8
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