Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Keshvijatak Bhasha Tika Sahit
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भूमिका। ज्योतिपं नयनं स्मृतम् । प्रिय पाठकगण ! आप सब महाशयोंको विदितही होगा कि, चारों वर्णाको शिक्षा प्रणाली बतलानेवाला दिव्यपुस्तक वेद है और उसके शिक्षा कल्प व्याकरण निरुक्त छंद और ज्योतिष यह छ: अंग हैं और पडंग वेद पढ़ना ब्राह्मणोंसे लेकर वैश्यों पर्यंत तीनों वर्गोका धर्म है सही हमारे शिरोधार्य्य वेदका एक अंग ज्योतिष है उसके दो भाग हैं एक व्यक्त कहिये प्रत्यक्ष दृष्टफल ग्रहण अस्तोदयादि दूसरा अव्यक्त कहिये अदृष्ट भविष्यफल जातक और वर्ष- फलादिक. अब यहां अपनेको जातक के विषे विचार कर्तव्य है कि, प्राणीके यावनन्ममें जो शुभ किंवा अशुभ फल होता है कहिये कौन २ समयमै निसको लाभ किंवा हानि जय किंवा परानय किससे सुखोत्पत्ति किंवा पीहा और कौन समयमें रोगादिकों से मरण प्रायः संकट और शरीरसुख, कुटुम्बसुख, भ्रातृसुख, मित्रसुख, पुत्रसुख, कलत्रसुख, पितृमातृसुख, इत्यादि बातोंका ज्ञान निस ग्रंथसे होताहै कहिये ज्योतिपोलोग जिस ग्रंथके आधारसे जन्मप- त्रिका लिखते हैं उसको जातक ऐसा कहते हैं संस्कृतमें जातक पर बहुत ग्रंयह परंतु सबमें प्रसिद्ध और विद्वन्मान्य ऐसा ग्रंथ केशवाचार्यकृत जातकपद्धति निसको "केशवीजातक" कहते हैं सो यह ग्रंथ संस्कृतभाषामें है इस वास्ते उसका उपयोग मनुष्योंको वहुत होता नहीं इसवास्ते उसका सान्वय भाषाटीका निर्माण किया कारण इसकी सहायतासे फेशबीनातकका यथार्थ ज्ञानहोके पत्रिकाका गणित कैसे करना सो खुलासे मालूम होगा, इसमें केशवीजातकके मूल श्लोक लिखके वह सब श्लोकोंका अन्वय और खडी भाषामें अर्थ लिखाहै और ग्रह और पट्बल इत्यादि गणित अल्पायाससे करने में आवें इस वास्ते सारणीको योजनाकरके उस सार- णीका कैसा उपयोग करना यह स्पष्ट रीतिसे लिखके उनके पृथक् पृथक् उदाहरण .लिखेहैं . और जन्मपत्रिकाका गणित कैसे करना यह समझनेके वास्ते उत्तम उदाहरण लिसाहै इसमें वर्गमूल निकालनेको रीति और उच्चवल तीन प्रकारसे करनेकी रीति लिसोहै और ग्रहोपरि तथा भावोपरी दृष्टि करनेको तीन प्रकारसे लिखा है और अष्टोत्तरीदशा और विंशोत्तरीदशा और योगिनी यह तीनों दशाओंकी नक्षत्रोंसे उत्पत्ति और उनके पति और वर्षादि दशा मन्त- दशी कोष्ठक प्रत्यंतरदशा लिसके जन्मपत्रिका लिखनेका क्रम बनाया है। यह ग्रंथ लोकमें उपयुक्त होने वास्ते जो परिश्रमकियाहै सो देखनेसे मालूम होगा अत्र आशाहै कि गुणग्राहक सनन पुरुष इसको अवलोकन कर मेरे परिश्रमको सफल करेंगे। आशा है कि सनन पुरुष मत्सरताको छोडकर मुझसे मनुष्यधर्मानुसार जो भूल हुई हे उसको क्षमा करें और मेरेको सूचना दें कि निससे वह भूल पुनरावृत्तिमें दुरुस्त की नायगी। श्लोक-विद्वानेव हि नानाति विद्वन्ननपरिश्रमम् ॥ न हि वंच्या विनानाति गुर्वी प्रसववेदनाम् ॥ १॥ करोमि केशवीग्रंयोदाहति लोककाम्यया | यारानां सुखयोधाय न तु पांडित्यगर्वितः ॥ २ ॥ इत्यलम् ॥ पं०नगदीशप्रसाद. .
अथ केशवीजातकस्य सूचिपत्रम् । SORIES- पृष्ठ. .... ... " ... ... ... ... ... .... ... ५८ .... ... ... ७७ ... ... ८० ८१ " ... ८२ ... मकरण. पष्ठ. प्रकरण. मंगलाचरण १) पंचताराचक्रम् अहर्गणादिसाधन. २ भौमशीघ्रफलसारणी अहर्गणोदाहरण | भौममंदफलसारणी मध्यमग्रहसारणीमवेश ३. बुधशीघ्रफलसारणी रविमध्यमसारणी... ५ बुधमंदफलसारणी चन्द्रमध्यमसारणी ७ गुरुशीघ्रफलसारणी चन्द्रोच्चमध्यमसारणी ९ गुरुमंदफल सारणी... राहुमध्यमसारणी... ११ शुकशीघ्रफलसारणी भौममध्यमसारणी १३ शुक्रमंदफलसारणी बुधकेन्द्रमध्यमसारणी १५ शनिशीघ्रफल सारणी गुरुमध्यमसारणी... १७ | शनिमन्दकलसारणी शुक्रकेन्द्रमध्यमसारणी १९. प्रथमशीघ्रफल शनिमध्यमसारणी २१ मंदफल... मध्यमसूर्य्यसाधनोदाहरण.. २३ अंतिमशीघ्रफल तात्कालिकमध्यमग्रहगतिसहित " गत्युदाहरण मध्यमग्रहसे स्पष्ट ग्रह वक्रमार्ग अस्त उदय स्पष्टसूर्यसारणामवेश २५ सूर्यादिस्सष्टग्रहगतिसहित ... अयनांशसाधन उदाहरण "लंकोदयसे स्वदेशका उदय ल्यावना चरखंडसाधन उदाहरण २५/ लमबनावनेकी रीति सूर्यकी स्पष्टगति... लमसे अभीष्ट काल करनेकी रीति... दिनमान रात्रिमान नतोन्नतपूर्वकदशमचतुर्थभाव सूर्यस्पष्टसारणीचक २६ शेप आठभाव साधन संधि स्पष्टरविसाधनका उदाहरण २७ और क्षयचय फलसाधन निफलचन्द्रसंस्कार " संधिसहित द्वादशभावचन. स्पष्टचन्द्रसारणीमवेश २८ जन्मलमभावोद्धारचक चन्द्रको स्पष्टगति... ग्रहभावफलचक चन्द्रस्पष्टसारणी २९ ग्रहदृष्टिसाधन स्पष्टचन्द्र साधनेका उदाहरण ३० दृष्टिफलसारणीप्रवेश मंगलादिस्पष्टसारणीमवेश. ३० रविचन्द्रयुधशुक्रदृष्टिसारणी शुक्र मंगल इनको विशेष स. ३१ भीमदृष्टिसारणी भीमादि ग्रहोंगी स्पष्टगति... गुरुदृष्टिसारणी... भीम बुध शुभ इनकी गतिमें विशेष "शनिादृष्टसारणी ... ... .... ८३ ८४ (८६ " ८८ " ... ग ... " ... ... ... ९२ .... ... ... ... ...1 केशवीजातकस्य सूचिपरम् । पृष्ठ. ... ... ... ... ... ... ... .... ... ... ... 1 " ... .... ... " " ... " .... ... ... ... " . प्रकरण. पृष्ठ. प्रकरण. दृष्टिका उदाहरण. १०१ केन्द्रादिवलोदाहरण १२४ गद्ददृष्टिचक केन्द्रादिवलचक्र भावदृष्टिचक १०२ द्रेष्काणवलोदाहरण बलसाधन द्रेष्काणवलचक १२५ ग्रहोंका उच्चादिकोष्ठक १०३ स्थानबलयोगचक्र.... ग्रहोंकी तात्कालिक मैत्रीकरण दिग्वलकालपल ग्रहोंकी पंचधाऽधिमैत्री... दिग्बलसारणीप्रवेश १२६ निसर्ग मैत्री तात्कालिकपंचधामैत्री च १०६ दिग्बलसारणी पडुर्गचक्रम् दिग्यलोदाहरण उच्चवलसारणी मवेश १०७] दिग्बलचकनतोन्नतबलोदाहरणचक्रसहित " । उच्चवलसारणीराशिफल अंशकला... १०८ वर्षपतिमासपति दिनपति ... १२८ । उच्चबलोदाहरण द्वितीयमकार १०९ होरापतिबनानेकी रीति, १२९ ० उच्चवलचक | पक्षवलसारणीमवेश १ मेपराशिसप्तवर्गपतिचक्र ११० पक्षवलसारणी वृषराशिसमवर्गपतिचक १११ पक्षवलोदाहरण ,... १ मिथुन राशिस्व०... ११२/ पक्षवलचक्र "। कर्कराशिसप्त० ११३ दिनरावित्रिभागवलोदाहरण सिंहराशिसप्त ११.४] दिनराभित्रिभागवलचक्र कन्याराशिसप्त ११५] वर्षपतिवलोदाहरण तुलाराशिसप्तः ... ११६ मासपतिवलोदाहरण वृश्चिकराशिसप्तः ११७ दिनपविवलोदाहरण ८. धनराशिसप्त ११८ होरापंतिवलोदाहरण ... मकरराशिसप्त ११९ वर्षमासदिनहोरापतिबलचक्र कुंभरागिसप्त १२० कालवलयोगचक्र.. मीनराशिसम० १२१ चेष्टायलनिसर्गवल... ग्रहसतवर्गलतिचक १२२ / क्रांतिवनावनेकी रीति १३२ भावसमवर्गपतिचक कायंकचक्र १२ सप्तवर्गवलोदाहरण क्रांतिसारणीप्रवेश.. ग्रहसप्तवर्गवलचक... १२३ क्रांतिसारणी युग्मायुग्मबलोदाहरण १२४ क्रांत्युदाहरण ग्मायुग्मवलचक... क्रांतिचक .... १२ ... ... ... / " ... ३ ... ... 11 ... " , ... " ... ... ... ... ११ .... ... ... 7 " .... .... ... २३ ... .... ९५ " " ... ... ०९ केशवीजातकस्य मूचिपनम् । प्रकरण. ... " .. ... .... ... " ... ... " ... .... ... १५३ । ... ... .... " ... " ... ... ... मकरण. पृष्ठ अयनवलसारणीमवेश १३८ / सूक्ष्मरीतिसे कलाफलवनावन अयनबलसारणी १३९ सावयवर्भककामूलनिकालने की अयनबलोदाहरण सबसे अच्छोरीतिह अपनबलचक्र रदम्युदाहरण ..: १५२ भौमादिकोका शाम्रोचवनावना चेष्टावलउच्चवलचेष्टार उच्चर०च० चेष्टाकेन्दचक १४१ (इष्टोदाहरण इष्टचक्र चेष्टावलसारणीप्रवेश कष्टोदाहरण चेष्टाबलसारणी १४२ कएचक चेष्टावलोदाहरण | इष्टकष्टबलोदाहरण चेष्टाबलचक १४३ इएकटबलचक्र अयनचेष्टाबलयोगचक नैसर्गिकवलोदाहरण | इष्टकष्टदृष्टयुदाहरण | इष्टकाराष्टिचक नैसर्गिकबलचक | सप्तवर्गशुभाशुभसाधन १५४ भौमादिकोंका शीघ्रांकादिकोष्टक १४५ शरकरनेकेवास्ते शोधकर्णलगताहै उच्चमूलत्रिकोणस्वगृहका निर्णय उसकी रीति उदाहरण... भौमादिकोंका शरबनानेकी रीति , वर्गशसंहितसप्तवर्गशुभ दृखलोदाहरण | वर्गेशसहितसप्तवर्गाऽशुभ च० हरबलचक्र उदाहरण... १५८ पट्वैलेक्यचक १४७ शुभाशुभपंक्तिचक. भावबलसाधन उदाहरण.... भावबलोदाहरण ... मध्यमशुभाशुभचक्र १५९ भावबलचक इटकष्टबलगुणनचक रविचन्द्रका चेष्टायलफेन्द्र १४९ इष्टकष्टबलगुणनपदचक चेटायलोदाहरण स्पष्टशुभाशुभचक.. रश्मीएकष्टसाधन. अंशायुसाधनार्थचेष्टागुणकउच्चगुणक वर्गमूलनिकालनेकी रीति १५० स्फुटगुणक इति केशवीजातकस्य मूचिपत्रम् । ... ... .... ... ... " " ... " ... १ " .... ... .... ... " ... ... " ... ... ...
मी अथकेशवीजातकम् भाषाउदाहरणसहितं प्रारभ्यते. मूल श्लोक. मंगलाचरणादिश्लोकः स्रग्धरादत्तम्. हेरम्बोम्बायवेधोहरिपशुपतयो भास्कराद्याग्रहाचे पचैतैलोकपालाअथदशगदितादिक्प्रपा महान्तः ।। मेपाचाराशयथ्याश्चिमुरवनुरव वरायोश्वनक्षत्रतारा योगाविष्कंभकायाः सकलसुरवराः पातुमामत्ररुयै॥१॥ नृगिराकेशवंनत्साकशवीजातकफुटम्. जंगदीशःप्रकुरुतेजगदीशानुकम्पया ॥२॥ नत्वाविघ्नपशारदाच्युताशिव ब्रह्मार्क मुख्यगृहान् कुर्वजानकपद्धति स्फुटतरांज्योतिर्विदांप्रीतये ॥ यत्र स्पष्टतरोऽत्रजन्मसमयो वेद्योऽबरवेटाःस्कुटा यत्पक्षेहि घटतउद्मइहास्तर्वासपङ्गःसच ।। १॥ अन्वयः- अह केशवाचार्य जातक पद्धति कुर्वे करीमीत्यर्थः किं क. ला विघ्नपशारदाच्युत शिवब्रह्मार्क मुरव्य ग्रहान्नला किं विशिष्टांजातक पद्धति स्फुटतां अतिशयेन स्फुटेति स्फुटतरातां स्फुटतरी । किमर्थज्यो तिर्विदां प्रीतये ज्योतिषं विदनिजानंति तेज्योतिर्विदस्तेषां प्रीतये अत्र ज्योतिराब्देन विस्कंधयः गणितमहिना जातक इत्यर्थी होराविदामित्स ये ज्योतिर्विदस्ते एतदोरा शास्त्रविदो भवत्येवेतिशम् ।। अर्थक्षायाः- गणपती-सरस्वती-विष्णु-शिव-ब्रह्मा और सूर्यादिनवन- ह. इनको नमस्कार करिके ज्योतिर्विदके संतोपार्य यह स्पष्ट जातक पद्धति नामक ग्रंथ करते है. इसमें जन्मकाल घटी शंकुचक्र फलक इत्यादि यं- बांसे सूक्ष्म रीतिसेजानना औरस्पष्टग्रह जिस पतके प्रत्सत होय उस पक्ष- कि यह लाघवरीत्या लेना.जन्मकालीन लग्न स्वदेशी उदयसेवनावना उदाहरणम्.. वारक्रमचक्रम् शके १८०८ में १४४२ कमकिया तो शेष १२३४५६ शिप ३६६ इस्को ११ से भाग दिया तो लब्धिचं मं बु. शु श सूचारः ३३ यह चक्रशेष ३ रहा इस्को १२ से गुणानो ३६ हुवा इसमें गतमास. शून्य युक्त कियातो ३६ नया यह नध्यम मास गणया इस्को दोस्थान में स्थापित किया एक जगै चक्र ३३ इस्को दूना कियातो ६६ भया इ. मैं १० युक्त कियातो ७६ भया इस्को दूसरे अंकमें युक्त कियातो ११२ इ. स्को २३से भागदियानो लब्धिः अधिमासायासो इस्को दूसरामै युक्त किया तो ३९ हुवा इस्को ३० गुणाफिया ११७० दुवा इसमें गतिथि २.१ यु- क्तकरीतो ११९१ हुदा इस्मै चक्र ३३ का पष्ठांश ५युक्त कियातो दुवा ११९६ इस्को दोजगै रखके एकमैं ६४ का भाग दिया लव्धी १८ ऊना- ह इस्को दूसरीजग ११९६ में हीन किया तो ११७८ यह अहर्गणा- याजन्मकावार जानने के लिये इस्मै चक्र २ को से गुणातो १६५ यासो अहर्गणमें युक्त क्रियातो १३४३ पाया. इस्को से भाग दिया. तो शेष ६ रहा. इसलिये रविवार आया तव.यह ११७८ अर्गण शुद्ध भया इटको वार अर्गणसे नामिले नो? कम करना अथवायुक्त करना टीप:-विशेष जिसवर्ष में अधिक मास आवता उस वर्ष में अधिमा सके पूर्ववा परमें अहर्गणबनाना होयतो जो महिना अधिक हो उसमन हिनाके पूर्वग्रहण करना होयतो पूर्ववर्ष के अपेक्षा अधिमास अधिक वितो लेना नहीं व्यर्थात् अधिमास में एक घटाय देनाजो अधिमासके आगे अहर्गण साधन करना. होयतो यूर्व वर्यके अपेक्षा अधिक मास आवे तो लेना नहीं अर्थात् एक युक्त करके अधिमासमें अर्गण साधन करना. मध्यमग्रहदारणी प्रवेश. सहर्गणको ६० से भागनातो लब्धी और शेय ऐसेर अंक व्यावते हैं। सोयांश मध्यम ग्रह सारणीमें दादियोंका ? से ६७ तक शेष ल. ब्धी कोष्टक है उस्के नीचे वह कौएक राश्यादिक अंक लिखे हैं वह शेपकोटेक ही लधी कोष्टक है. बरंत उत्का फल लेनेकी रीतिजुः दी है वह प्रकार ऐना है जो लब्धीका-अंक होयसी शेप कीटकन देखना नंतर दह कोष्टक के नीचे राशी सहित जोयंक है तिस्मै राशीका लाग करके ग्रंकलेना. अनंतर पहिला अंकजो होय उस्को ६ से भाग देके जो शेपरहै विस्को दूनाकरना तो लव्धी कोटकका राशी अंक होता है. अनंनर उस्के नीचेका अंक अंशस्थानमें न्याना है इस वास्ने २० से अधिक होयतो ३० से भागदेके जो अंक यावे उस्को राशि स्थानमें जोडदेना तो लब्धिकोष्टक फल तैयार होता है. सारणीमेंका अभीष्ट शेषकोएकके नीचेका अंक होयसो और अभीष्ट लब्धी कोष्टकका जो अंक होयसो दोनोंका योग करना अनंत- र उस अंकको चक्र निन्न ध्रुवोन क्षेपक तैयार सारणीमें ऊपरके बा- जू चक्रके नीचे अंक है सो अभीष्ट चक्रके नीचेके व्यंकमैं युक्त कर ना तो प्रातः कालका मध्यम ग्रह होते है. इष्ट कालका मध्यम ग्रह करना होयतो सूर्योदयके अनंतर जोइ- एघटी और पल होय उस्का कोष्टक ग्रह सारणीके पीछे राश्यादि लि. रखा है. उस्मेंसे अपनाजो इष्ट घटी पल होय उस्के नीचेके अंकको प्रान तःकालका जो ग्रह उस्मैं युक्त करना तो इष्ट कालका मध्यम ग्रह होता है. मध्यम राहु बनानेकी रीत कुछ भिन्न है. सो ऐसी है के शेषल. व्धी कोटकका योगको १२ में कम करके जो बचे उस्को चक्र निघ्न ध्रुवोनक्षेपक मिलाना तो प्रातः कालका राहु होताहै इष्ट कालका राहु वनाना होयतो जो अभीष्ट घटी कोष्टकके और पल कोष्टकके नीचेके अंकको लब्धी शेष कोष्टकका जो फल सो युक्त कर करके जो अंक पावै उस्को १२ में कम करना अनंतर चक्र निन ध्रुवो नक्षेत्र पक मिलाना तो इष्ट कालका राहु होता है. इति मध्याधिकारः D रविचक्रनिघ्न ध्रुवोनक्षेपक. ર૪રરર રરરરરર રરરરરર ? ૨ ક ક 3 3 છે વિ છે ૦, ૦ 9 * આ છે છે છે. * 6 ~ 4 ) ૦૦ * * ૦ ? ૦ 6 છે. e * Y ૨. o રે 3 કરૂ ૨ ૨૭ ક ૦ ર ૦ ક ક ૪૨૬૨૬૩૬૪ો 3ીકાદશી ૦ રે ૨ ? ૧ ૬ ૦ S :] WIS 8 o છે ૦ છે रविशेषलब्धिकोष्ठक. ૬ ૧૦૮૨૦ રરરર ૦૦૦ ૦૦°°°, દાદા હરિદિ૨/ ૧૧૧૧૧૧૨૦૨૧ દીકાલરૂબિકબક કરી દદદર/૧/૪ રિટી વર્ગ-ર૩ર૩૮૨ ૧૮રરૂપs છે. છે. 8 છે. છે ૦ ક ૧ ૬ 6 છે. 2 ૨ ર કે ૨ કે જ * 1 tbs/૦૮ ક વિક ઉછ38ાદ દર૦Iકરી દ રિકરૂભbe રરરરબ રવિરાધેશww. રરરરર રરરર રરૂeeee રક ક ર છે. ૧ € € / છે ૨ ક ૦ ? ર ૨ ૨ ૧ 9 ફર Nિ Y ૨ ૨ જ છે 3 રૂ ૨ રર છે ૨ જોર I૧૦૯૬૬૨૨lી છે. જ v ૨ = o ૨ છે . આ s' છે એ જ 6. છે ૨ * * * છે છે. ૨ ક૨ાશીરિક રૂરિક? ર ર૭ रविशेपलब्धि ge. 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1. मध्यम रवि साधनका उदाहरण. माइहां अहर्गण ११७८ आया है. इन्कोस जाग देनेते लब्धीशेप .. तो यह शेष कोएक इस्के नीचका अंक १७।२७११०३० इम्कीलब्धी अंक तालब्धी व्यंक के नीचे ग्रंकराशी छोडके यह १८३।२५।१५:२५ अंक है. 'इन्के ऊपरका अंक १८के से भाग दिया तो शेप शून्य राहादूना कियातो. न्य रहा यहाराशीअंक जवा. व्यव भागस्थानमें आया ये ३० सत्य- अधिक हैं इसवार इस्के ३०का भागदिया तो लब्धी यह राशीम युक्तकिन यानी ?|१३०३०.१५२५ बहकाया इको शेप३८ कोटककापलयुक्त किया तो।२९।२।२५१५५ यह अंक या. इस्कोचक ३२ सारणीमें इस्कनीचका यंक १९४३७५७ यह युक्त कियातो ।१०।१०।२१ यह प्रातः काल- का मध्यन सूर्य दुधशुक्र भया. अब इको इष्टकालका मध्यम करनाहै. इसबान्त इए घटी २२ वह इस्के मारणीमेंका पल।३।१३औरपल १ इस्का पल पल सारणीका ८1०००१ यह दोनूफल प्रातः कालक म- ध्यम ग्रहमें युक्त कियानो०११।१९५६ यह सूर्य इष्टकालका मध्यम ग्रन हाया. इसीरीतीस प्रातःकालका इटकालका मध्यम सब यह करना. प्रातः कालिकसूर्यादिमध्यनग्रह. व्यथ तात्कालिक मध्यमाग्रहाःर म चच-ग-मंदुका चालाशचजरा-मं बुकार शुक्राश. ०८/२९/२/७१२|१३|१६ १०/२६५०१/५०२३ १५२२१३०१२८१४०७/२.१७/१२/३८ २३/२८/१०/५०/२०१५१११ २८/३३५६/20235२१११५१ श्लोक- जगदीशनरचत करावधारणा मध्याधिकारपूर्गायतद्वापार्यप्रकाशक:-०३५/४/११/२६/२४ अथ स्पष्टाधिकारः लोकः मंदोच्चंत्रहवर्जितंनिगदितंकेन्द्रंतदाख्यंबुधैः केन्द्रस्यात्स्व- मृणंफलंक्रियतुलाद्य इति. दोस्त्रिभौनंत्रिमोडीविशेष्यरसै- श्चक्रतोंकाधिकःस्याद्रजीनं त्रिनकोटिरेकैक विनिफीस्या- सदंसूर्यमंदोच्चमष्टादियोंशाभवेत् ॥ टी०- मंदोच्चमें यह कम करनेने मन्दकेन्द्र होता है. वहकेन्द्र मेप राशीसे १२ राशीतक होयतोफलधन और तुलादिवाशीहायतो फल ऋणजानना. 2 . ५ ७ २ ८ ८ . c 6 0 २५/- . .
C केन्द्र अथवा ग्रह ३ राशीसे कम होयतो वही भुज जानना.और नीनसे १३ अधिक होयतो ६ राशीमें कम करनाती भुजहीय. ६ सैयधिक होय तो राशी घटाय देतोसुज होयर से अधिक होयतो १२मैं कमकरना तो शुज होय इस प्रकारसे केन्द्रका वा ग्रहका भुज करना. स्परसारणीप्रवेश. २ राशी १८ अंश कला विकला यह सूर्यका मंदोच्च है. इस्मै मध्यम सूर्यकम करना तो सूर्यकानंद केन्द्र होता है. वह केन्द्रका सुजकरके उस्का अंश करनाअनंतरजीअंशावतो अंश कोष्टकके नीचे स्पष्ट ग्रहा सारणीमें लिखा है सौदेवके भागादि फल लैना. अनंतर भुजनागके नीचेजोकला पिकला होय उस्को इष्ट सुजांश कोटकके नीचे गुण लिखा है. उस्से गुणके वही कोष्टकके नीचे जो हरलिखा है. उस्से भागदेकेजा फल अविसो भुजलागफलके विकलामें जोडदेनातो सूर्यका मंदफलहो ताहै .वहफल धन होय तो मध्यम सूर्य में युक्त करना.औरऋणहोयतो मध्यमसूर्यमे कम करना. तो सूर्य मंद स्पष्ट होता है. अयनांशाः लोकः- वेदाध्यब्यून-खरसंहितः दा कोयनांशाः ।। टीका:-इशालिवाहन शक से४४४ लाब्धयहकमकरनाजोवाकीरहै. उस्कोकाक्षागदेनाजोभागाकार लब्धियावे वह अयन-अंश होता. उदाहरणम्:- शके १८०८ इस्मेसे४४४यह कमकियातो१३६४यह वचा- लोकलाजानना. इस्को से भागदियानौलब्धिअंशश्कला४४ विकला०० अब महिनाप्रति ५ विकलायुक्त करे तो यहअयनांश आया. २२।१४।। चरखण्ड. श्लोक. मेपादिगेसायनभागमूर्य दिनाईजानापल मानवेत्सा। त्रिष्ठाहतास्युर्दशनि जगैर्दिग्निवराधीनिगुणोधृतात्यात्॥१॥ टीका:- मैपकासायनसूयशून्यराशि० अंशः कला विकला इतना सूर्य जिसदिन होय उसदिन मध्याहमें सम भूमिपर अंगुलका शंकू रखन के जोछाया आवे सीपलक्षाजानना त्यागजो पलक्षात्यावे उस्को जंगररपके कमसे १०८१० यह व्यंकसे गुणदेजोगुणाकार व्यावै उस्को क्रमसे १०१।३ यह अंकते भागना जो भागाकार आवैसी क्रमसे पहनी ला दूसरा तीसरा चरखण्ड होताहे.
करखायनग्रह तुलादि६ राशीमें होयतद दक्षिण गोलमें जानना जोचरच्या सपहा ३० मैं कम करना तो रात्र्याई होना है अनंतर दिनाई और राज्य उदाहरणम्. पलमा ७ अंगुल इस्को १० से गुणातौ ७० भया?से भागनेसे यह पहन ला चरखंड-पलभायंगुल इस्को से गुणातो ५६सया से भाग दिया. तो५६यह दूसरा चरखंड-पलमा अंगुल इस्को १० से गुणातो७०भया ३ से भागनेसे २३ यह तीसरा चरखंड इस प्रकारस क्रम करकेचर रखंड ७०५६.१३ यह हुवा. टीका. मंद स्पष्ट सूर्यमें नयनांश युक्त करनेसे सायन सूर्य होता है. उस्कानुन जकरना अनंतर भुजकाजो०।१।२ इसमेंसे राश्यक होच उस्कै समान चर खण्डकायोगकरनाअनंतरभुज राशीक नीचे व्यंशादिकजो होयउन स्कोचररवण्डसे गुणके जो गुणाकार आवै उस्के घटयादिकमें ६-का भागदे अंशमें ३०का भागदेनाजो लब्धीपावै उस्को पहले कियाजी योगतिस्में युक्त करनाती चरस्पष्ट होता है. वह सायन सूर्य नेपादि ६ राशिमें होयतो फल ऋण तुलादि६ राशिमें होय तो फल धनजाननासा यंकालका ग्रह करना होयतो चर विपरीत देनासो ऐसासायनसूर्य मे पादिपटकमें होयतो धन तुलादिपट्कमें होयतोऋणजानना चहन्या- या जोचर उस्को मंद स्पष्ट सूर्यके विकलामें धन होयतो युक्तकर ना ऋण होयतो कम करना तो स्पष्ट सूर्य होता है. सूर्याकीस्पष्टगती. केन्द्र भुजभाग कोष्ठकके नीचे गतिफल लिया है.वह केन्द्र कादि राशि तक होयतो धन इसवास्ते पहिली रवीकीजो मध्यम गतिउस्में युक्तकरना और केन्द्र मकरादिक ६ राशितक ऋणजानना इसवास्ते मध्यम गतिमें कम करना तो सूर्य्यकी स्पष्टगती होती है. दिनमान-रात्रिमान. दीका. १॥ नव सायन ग्रह मेषादि६ राशिमें होयतव उन्तर गोलमें जानना. और होय उस्कोपलजानके उत्तर गोलमें होयतो १५ घडी में युक्त करना स्कोगेर दक्षिण गोलमें कम करना. ती दिनार्द होता है. वह दिनाई- 'इस्को दूना करनातो दिनमान रात्रिमान होता है. चा जानन तना ३ सूयं स्पष्ट सारणी. ||૨||૪|૧| | | | | | |૨૨૩૬૪૨૬] ક જે ૦ જ | 3 | 3 ૩ ૨૦ ૨૦ ૨૨૨૩૨૬ ૬ 1.૨ ૨ ૨ ૨ કિ રિટર૦૧ર/૨૨.૨૩રરર૬ v w v જ કે છે ૦ છે 6. ૦ ૨ ૪૦૪૨કિષ્ટિ' છા રૂ ૧૧ ફિરદારી 1३६३५/३२ રૂ.૨૨ ૨૨૨૩૨૨૨૭૨ ૨ ૨ ૨ રિટરદી ||૬||||ી ૨૦ T૧ ૧ ૧ ૧ ૦ ૧ | ૧ ૧૨ + $ $ ૧ • 8િ28 - હે દે. દે/ કબ્ર|િઋala jaaj t" ૧ ૧ 3 ૧ ૧ જ કિરિટ ૨૦ ૨૨ દિકર ૨ ૨૨૨ * |-|-- નાદ - = = = - R * ૨ ૨ ૨R : 8, 3 રિર્થs રદ ૪૨૨ જે જ છે જે જ 9 રે જ દર રરરર રરર રર૪ર૯ ૨ ૨ ૨૨ LL LIST मुमा फ 1 ts ' ? 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स्पटचंद्र साधनेका उदाहरण. चंद्रोच्चा२८१४४ इसमें त्रिफलचंद्र ३११५४३८ कमकरकेवाकी २६१४६१०६ यह केन्द्र इस्का भुजभाग कियातो२४१४६०६ इसपारनेर हां सारणीकोष्ठक २४ इस्के नीचे शादिफल २०२१५. इस्कोगुण हिर फल २१९ विकलायुक्त कियातो२०६२८ यह चंद्रकला यह केन्द्र मेषका है इसवास्ते फल धन यह त्रिफल चंद्रा०१५।३८ इस युक्त कियातोटा५।२२।७यहस्पष्ट चंद्रभया अब इहां केन्द्र शुजभाग काष्टक २४ इस्कागतिफल कलादि ५८१६ इन गति फलकनीक गुण २१ इस्से शुज भागके नीचेकी कला १६.०६ विकला इस्कोगुः णके यह १४२६।१८६ इस्को ६० से भाग दिया तो फल २४ यह विक लामें कम किया बाकी५८४५२ यह केन्द्र मेपका है इसवास्ते मध्य निगति ७८०१३५ में कम कियानो ७३११४३ यह स्पष्ट चन्द्र गति पाई. मंगल बुध गुरु शुक्र शनि स्पष्ट सारिणीप्रवेश. मध्यम सूर्य में मध्यम ग्रह भीम गुरु शनि कम करना तो भीम गुरु शनि इनका प्रथम शीघ्र केन्द्र होता है. मध्यम बुध और शुक्र इन- का केन्द्र पूर्व में मध्यम ग्रहके बराबर लिरवाहै. अभीष्ट ग्रहका के- न्द्र राशिसैअधिक होयतो १२.मैं कम करना मनंतर सेल्स जो केन्द्र उस्का अंश करना जो अंशावेसो आगेलिरवाशीमा फल ग्रह सारिणीकायंशकोष्ठक तैयार होता है. अनंतर अभीष्ट को, छकके नीचेका अंशादि फललेना अनंतर अंश फलके नीचे ६ कल विकला कोठक लिया है उससे अंशके नीचे जोकला विकलाहोया तत्सरिमित कोष्ठकके नीचैका कलाका फल कुलादि वैसा विकलादिए फिमकरके या किंवाभरण सारणीमें लिया है उस्क प्रमाण लिया जोशफलयुक्त करना किंवा कम करना तो ग्रहोंका प्रथमशीघ्र फ. लहोता है. शीघ्रफलका अर्घकरके केन्द्र के प्रमाण मध्यम अहमें युक्त करना किंवा कमकरना ती दल संस्कृत ग्रह होता है. बीमादि ग्रहोंका राश्यादि मंदोच्च सौमका वुधका ७ गुरु.६ शुक्रका ३ शनिकाः अपयशीए ग्रहका मंदोच्च लेकरके दल संस्कन ग्रहमें कम करना तमन्द्रफेन्द्र होताहै. वह केन्द्रका पूर्याक्त रीति करके भुज,करना. शुजका भाग करना जोयशव्या सोन्यागेलिरचा मंदफल सारि पीका अंशकोष्ठक तयार हैं अनंतर अभीष्ट कोष्ठकके नीचेका शादि फललेना. अनंतर फेलकेनीचे ६०कला विकला कोष्ठक लिखे। हैं उस्मेंसे अंशके नीचेजो कलाविकलाहोर तत्प्रमित कलाकाकलान दि और विकलाका विकलादि फलको एकत्र करिके उस्को पूर्व फलमें उच्च करना तो उन ग्रहोंका मन्दुफल होता है. ऋणधन मन्दकेन्द्र परसेजानिक उसफलको मध्यम ग्रहोंमें धनवा ऋणकरना तीमंद स्पष्ट ग्रह होगा और उसीमन्द फलको प्रथम शीघ्र केन्द्र में विलोम अयति धन होयतोऋण और ऋण होयतो धन करना तो हितीय शीघ्र केंन्द्र होता है.उसशीन प्रकिन्द्र परते प्रथमशीघ्र फलके रीतिते फल मानिकरमन्दस्पष्ट में ऋणधन करना तो वह स्पष्ट होता है.यही रीति भौमादिकोंकीहै ।। ।। मिंगल शुक्रका विशेष ॥ ॥ शुक्रारयोश्चलभवोन्त्वगतोयदाङ्कमा इति॥ टीका:-जब भीम और शुक्रका अंतिम शीघ्र केन्द्रका पड़ भासकरिके अंश करते हैं तोवह अंशयदि १६५ ते१८० तक होयतो से- स्कार करनेका पृथक् पृथक् सारिणी लिरदी है उत्कानाम् अन्त्याङ्कफल सारिणी है. उस्मेंसे शीघ्रफलके सहशफल लेना और उस फैलको केन्द्रकेशकरिके ऋण धनकरना तो स्पष्ट शुक्र० सौममें तो वहीक २.स्पष्ट होते हैं । सीमादिग्रहोंकी गति स्पष्ट करनेका प्रकार ।। मन्दफल सारिणीने दह्नी तरफ गतिफल लिखाहै पन्द्रह २ कोषका उस्को कीदि मकरादि केन्द्र बसकर धनऋणजानना और शीघ्रसा रिणी में दाहिनी तरफ १५ कोटका गतिफल धनवाऋणलिवाहै उनदोन नोंगति फलोको एकत्र करना अति दोनों धनहोय वा कण होय तोयोन गकरना और एक धन एक ऋण होयतो अन्तर करना तो उस फलके सहश ग्रहगति स्पष्ट होती है जवयोग वा अन्तर ऋणवचे तो वक्र- गनिजानना यह स्पष्ट गतिको मध्यम गतिका कारण लगता नहीं. भीमबुधशुक्रइनकी गतिमें विशेष. भीमबुधशुक्र इनका षडाल्य अतिम शीय केन्द्रका अंश१६५से१८० तक अंशयावे तो यह संस्कार करनेके वास्ते वह ग्रहोंका शीघ्र फलसा- रणीके व्यत्यमें पृथक अंत्यांक गतिफल सारणी लिरबी है अनंतरयह सारणीमें जोअतीष्ट अंशयादे तत्सरिमित कोष्ठकके नीचेका कलादि ऋण फलालिरचाहे वह लेकरके अंश फलके नीचे ६० कोठकलिखाहै इस्मेंसे अंशके नीचे जो कलादिकला होय तत्तसरिमित कोष्ठकके नीचेका कलाका फल कलादि वही कलादि फल विकलाकाविलादि फल एकत्र करके वह सर्व काल ऋणहै इसवास्ते लिपाजोशफल उस्में युक्तकरना तो शीघ्र गति फल तैयार होता है. अनंतर यह पलका पहिले प्रमाण मंदस्पष्ट गति फलको संस्कार करनाती भीम बुध इनकी स्पष्ट गति होती है. प्रथमशीघ्र केन्द्रम्. आशुफलं भोमादिः मं बु शु श ग्राम बु. द. शुश. ग्र. १७ ६ ४५ ७ ૨૨. ५५ १ ० ७ ३२ आशुफलाईम्. याशुफलाई संस्कृताभोमादि मं बुरशु. श. म. म. बुबाशु श.प्र. TETv . ३. २ २ । ४ Por ३० . २० २४ २७३६ ४ मन्दकेन्द्रम्. मन्दाफलम्. मंबु. शु. श.प्र.मं. बुबशुना.म. १ १ ३० २१ ७ ઉર १४ २० ५८३९ . ३२ ३ २६ ३६ १५ मन्दस्पष्टसोमादि, दि०-शीघ्रकेन्द्रम् दि० शीघ्रफलम्. मंबुन शु. श. म. बुरशु.श.न.म. बुशुश . |२३|१७५४५५ ५०५४४५९.४५५ ५५३५२२४, १९१४|१२|१८ १२.५/२६/१२/२२ ५९१२१४४ ५५|१४|१२१४१/२७ ४६/१७/२६/१३४७ ३८८ .३८२४ ध.ध.ध.ध.
3 स्पष्टग्रह भीमशीघ्र फल सारिणी. १ ८ ७ १११२१३१४ग-ध. " . ८ ० b ५ १ २ ३1३ २३.८६३२५६.१४२/५/२८५२१५२१ |२४४३ १२ २४३६४८ १२२४३६१८२ १ २ ८ १० ८ ० क. ८ क ८ ។ प. २. २ ३ ३ ५ ३ ૨૯ રટ કરાવક ૧ર૮ १६/१22८/१२/२०/२१ २२ २३ २४ २५ २६/२४२८/२०१२ ११/३४/५७/२१/४९ ३०/५३/१०/१०/२०/२६/१२/१३/२६/८/२२. 133/२४३५२६२५/०१/४/४४४५/४६/४७/fee ८ ८ 6 0 o ८ . क यिका५ १६ १८१८/२०/२१/२२/२३/२४२५२६६/20/0८/२गन्ध, ७ १० १.१०/१९ फ.४८ ११३५.५८/२२४६२५६/२०४४७ /२१/५४१८४३ २६१२४८२११० ३६/१२/६८१ '. 13६/१२ ४८२९१४ २ ६. ८ ८ १२/१३/१४/१५ १ २ ३ ३ २६/४७/१९३४/५/२१/५३/५/१८३/७ १६ १७१२०/२५/२२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ २० २१ २२ २. प . ७ V ४/२८/५५/१५३८/३/२६/५.१३३७१ २४८१११/३५ 1३3३४ २५/२६-३८/३/४०४१/४२/१२/४४४५४६/४७४०४१ १२/१२/१३/१४|१४|१४/१५/१५/१६/१६/१६/१७/१७/१८१८१८ १ ३३५७ ५२ ७ . د دا داوا . . C C . ८ १८120 २०२१२१/२२२२२२ २३.२२ १०.३२७५९1१२.३८13 २५/२/३६ O ( भीमशीघ्रफलसारिणी. . अंको३०/३१/३२/३३,३४/३५६२०३८/३८४०४१/१२/१३/१४ गया ११ |१२|१२|१२|१३|१३|१३|१५१४|१५|१५१५१६]१६/१७ फ०४३४९७५०/१३/१६/५८२१४६७२०५२१५/३८११२ ४८/३६/२४/१२ ४८३६२४/१२ ४८/२६/२४१२१५. १ ३ १० ११ १२ १३ १४ १५ २३ ध. ३ ५ २४ २३४६८२१५४ १७/४०२२५४८१०३४/६/१९४२ . . . १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२५/२७/२८२२.२१/३२ १.११११११/१२ २८१५०१३/२६५८२२४४ ७३०५२/१६/२८/१२४४७/१० (३३/३४/३५२६/३७/३८३८४०१११२१४३४४४५/४६४७ecee |२२५५२८४२४२६/४८/१२/३५/५८/२०४३,६२९५२/१४/३६ व १९११९२.१२.२०/२१२१/२२)२२/२२ २३४६१८२१५४|१७४०२ . . . को ४५/४६/४७/४८४८/५०/५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५९/६० १७/१७/१८१८ १८ १८ १९९९/२०२० २१/२१/२१/२२२२ २४४५१७/२८५०१२|१३|५५१६/३८ २१४३१४२६४२ [३६१२५०/२४ (३६/१२/४८२४|१४ क. १ ३ ४ ६ ७ ८ १ २ २ घ ५ ૨૨ ૨૩ ૨૪૮૨૦ ર કિશકશ ફિર ફિટ કરિ ૨૪ દદ 13 e૨૦ ૨૧ ૨૨ ૨૨ રરકાર ૨૭ ૨૮ ૨૯/૦૨/૨ . ४६७२.०५.१२२४/५५/१७३८ २२|४३५ २८/१०/२१] २३/२४२५२६२७३४०४१४२/४३४४६५४६/४७/५८ (११ १२ १२ १२/१३/१३/१४|१४|१४|१५|१५/१५ १६ १६/१६/१७/१७ ५३४२६५९८४१२२४४६/७२८५०|१२|३४|५५१७३ १० १८१८ १९१८ १९ २० २०२०/२१२१ २२/१३५२५१८१.३१५२१४/२६. ० . . . .
भीमशीघ्रफलसारिणी. अ६०/११/१२/६३/६४/६५/६६६७६८/६९/७०/७१७२७३गपः २२ २३ २३२३/२४२४/२४ २५/२५/२५/२६६/२६/२६/२७/२७ फ०४८ ८२८४२०५०/१०/२१/५१ /१२/१२/५३/१३/३३/४१ २४|४८१२/३६. २४|४८/१२/२६/३८ क० २ ३ ५ ८१०/११/१२/१३/१४/१५ . o ७ ० . २ ३ २०१५१/१ २२ २/२ २३/४३/४ २४४४५२५४६६ १९/२० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७२८२८/३०/३१३२ ८ १० २६/४७/७२८४८८.२८/४/१०/२०/५०/११/३१ ५२/१२/२२ २३/३४३५३६/३७३८२२४०४१/१२/४३४४४५/४६/४७४०४९ . ० . ० . . . . १७/१७/१७१८१०१८/१८/१०/१०/२०१२० २०११/१२२१४२/२ २३.४३/१२४ को७५/७६/७७७ewelco/०१/८२३/४/५/०६/७/८/र/गया २७२८२८२८२/२०/३०/३०/३०/११/३१/३१ ३२ ७२६४४२२१/३८/५८१६/३४/५३/११/२० २४८१२३५ २४४८/१२/३५ . G १ २ ३ '६५ . . . . १ १ २ ३ ३ घ. १८३७५५१६३२५० २७/४६.४२२/४१/५/१८/३६ १६/१७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ ३०/११/३२ ६ २६.४५३ २२/५.५८.१७३५५४५२३०५ २३ २४ २५/२६/३७/३०/३०/४०४१४२/४३४४५/४६/४७/lee १३/१४१८१४१५ ७ २६४४२२१३९५८१६२५/५३११३०४८७ ૧/૨ 365 કર્ણદદદદર્કિ १५/१५/१६/१६/१६/१०/१५/१७/१८१८ - ૨૪૬૬૨૮૨૧ ૨૮ ૨૯ . 16/.. क . ३६ भोमशीघ्र फलसारिणी. प्रकार १२३४५६७१००१०१/१०२/१६०४ मध। ३०1४६२१८३४५० ८ . . व . . . ८ . . फ ० २ ३ ६ ८.१० . . १ २ २ २ २ ४ ३३ घ० २१/२२ २३ २४ २५/२६/२७/२.०२९/३०/२१/२२ 2 C ८ २५५०/५६१२० ८ ४८४२०३६/५२/८२४४०१५६/१२/२०१४/० . . D अफी १०५/१०६ १०७/१०८१०८११० १११ ११२/११३/११४ ११५ ११६ ११७११८११९ गध ३५/३६/३.६३०३.७२७३७३७२५३०३० ३०३८/३०३४ 4 १२.२४२८१८ क १ २ ३ १ ५ १ ध. १ २ २ १८३०१४११५२ २११४१२६१२७४८ १५/१७११८४२० २१ २२ २३ २४ २५/२६ २७ २८ २९/३०/११/२२/ २ २ ५ 3]= ર૦ દિશહરીદર ૪૪ ६ ૨૦ ૨૧ ૨૨ ૨૬ ૨૭ ૨૮ ૨૫૬ ૨ ૩ ૪ ૫ ૬s ५ C ५. १०१०१०१०१०१११११. :११२५४५११६/२७१२८५०/११२ ७ क ० ८ भीमशीघ्रफलसारिणी. यको १२०/१२१/१२२ १२३/१२४ १२५/१२६ १२७/१२८/१२९/१३०/१३१ १२२/१३३/१३४ गन्धन २९/३/३९३९३३४३९३३९/३३८३/३/३० फ०१८ २०२३२६/२८/३२३४३७४०४३/४६/४८५९५४ ५७३२ ४८/३६/२४/१२ ४८३६/२४/१२/५. . क १ ૨ ३ ७ १२ १३ १४ १५ . . ० ० . २ C . . 3 ध० ६ ११|१४|१७२०/२२/२५२८|२१|३४३६/३४२ १६/१७/१८१२ २०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८२/३०/३१/३२ १ १ १ १ १ १ १ ४५४८५०/५२५६५२ ८ ७/१०/१३/१६/१०/२१/२४/२७/३० २३/३१३५/३६६/२७२८३८|४०४१/१२/४३/५४४५४६/४७/४०४९ १ १ १ १ १ १ २ २ ૨ ૧ २ |१२|१४|१७ ० २ २ २ २ २ २ २०.२२/२६/२८/३१३४७/४०२४५/४८ . . . . a . . क. , . मको १३५/३६१७३८३९४०४१४२४३/४४४५४६/४७/४८४गन्ध ४०/३८/३८३८/३८/२८/३८/२८/३३८३७/३७३७३७३७ फ०२४७/३६२१ १२२१/३६१८ १२/२४२६.४८२ १ ३ ६ १०/११/१२/१३/१४/१५ १ ? १ १ २ २ २ २ २/३ १३/२६/३८५११७/२०४२५५ २१ ३४४६/५/१२ १६ १७ १८ १२/२०१२१२२२२४२५/२६.२७/२८/२८/३०/३१ ३२ A ५ १६२४२५४७ २०३२११६५८११/२०३७/५. ३३ /२८ ३५/३६/३७२८/०६९/१२/४३/४४४५/४६९७४८१४९ . . . | २२ ८८ २ २५२८४२५४६१८३२.४५/५१०/२३/२६४२१४२७ ५.५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५८६०/६१६२/६३/६४/६५/६६ ११/११/११/११/११/१२/१२/१२/१२ ९८०५३६ १८३११४४५७.१.२२२५४८ . . . . ० ( ३८ , भौमशीघ्रफल सारिणी. १५.५१/५२/५३/५४५५५६/५७/५८/५९/६.६१/६२/६३ १६४गया ३६/३०/३५/३४२३२२/३२३१/३०/२९२८२८१२७२६१२५ १२२५३३५० २ १४.२७/३२५२ ४१६२८४१७ २४४८११२१२६ २४४०१२३६३९ फ०४ क. . १ २ ३ ६ १२|१३/१४/१५ ८ 0 ७ ७ ६ ४८/३५/२३/१०/५८४६३३/२१ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २०२१३२ १२/१३/१४१५९५११६/१७/१८१२१४२० २१ २२ २३/२३/२४ २५ १८२२४१७१४५२११०२७/१५/२५०१२८१२५ १३० કંટાદાર? २६/२६.२७/१८२४/३.२०३१२२/२३/२४२४/२५/२६/२७/२८३९ ११५८३६२४१२९५६४४३२१९९७५४१४२३०१७३५१५२ ५०/५१५२५३/५४५५/५६५७/५८५९/६०६१ . . . ४०२८१५३५०२८२६/१३/१ . . . यं. १६५/६६/६७/६८/६९/७०/७१/७२.७३/७४७५/७६७७७८ १७ गध (२४२३२१९१८.१६१४१२१११ २ फ.५४ १४२४५५१५३६/५६/१६३७५७/१०/३८५८१९३८. २४४८१२३६. २४१८१२३६ २४४८१२२६० क०० १० ११ १२ १३/१४१५ . १ २ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ ३० २१ २२ २६/१८२८२१२३/२४३६/२८२८९/१३/४४४६४८५१/५३ १८२८७ ३२/२४२५३६/२७३८२०४१४२/४३४४४५/४६५jee ५४/६५८५६३५५६६६६६७३७८७६/७४ve ६४६/२५५४४२८१२६२ ५.141/५१२/४/५५/५६/५७/५८५.५० ४५७/celet२८४६७ट्ट ५.५८८५४२७१७५५२६८ . . . . . . . ० .
(.३८ अंत्यांकफलसारिणी अंको१६५/६६/६७/६८/६९/७०/७१/७२/७३/७४/७५ ७३७0/08/१८० . ० . ८ ० . . ० । २ ८ ० ० १ १ १२२४६६४८ १२।२०२४|१२ ४८३६/२४ (१२ ध.घ.प.ध.घ.ध.घ.ध.ऋ....ऋऋऋऋ. क. ३ ५ ७ १०/११/१२/१३/१४१५ १ १ १ २ २ २ २ ३ १२/२४३६.४८ ०/१२/२४३६/४० १२.२४३६६ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४/२५/२६ २७ २८/२/२०११ /२२ ३ २ ५ १२.२४/२६१८ १२/२४३६/४८० १२ २४३६/४०० રિરીક २३/२४२५२६.७२८२१०४१४२४३४४५४६/४७४ . G . १२/२८/३६४८ १२/२८३६४८ C १२२४३६१८ o . er १० ११०१०१०१०११|११|११|१२|११ १२ अंत्यांकगतिफल सारिणी १२२४13६८ १२/२४६/४०० विको१६५/६६/६७/६८६-७०/७१/७२/७३/७४/०५/०६/७७७८ १०/१२/१३/१५/१६/१७/१८/२०/२२/२३/० २५/५११७४३.८३८ ३८1० ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ. फ. १ ६ ८।१० ११ १२ १३ १४ १५/१६ . ७ C ८ . . . ८ ६ ११.१३/१४/१६/१७/१८/२०/२१/२२ all १०।१८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७/२८/२९/३०२१/२२/३३ FRI. ० . 6 . . . . ८ . . . . . २४२६२७२८/३०३१/३३ २४ २५ २०३४.४१४३४४४६/२७ ३४/३५/३६२७/३/२८/20/४६/४२/४३/४४/४५/४६/४७/४८/४/५. १ १ १ ४५.५१५३/५४५५५७/५८ १ ३ કરી કિક ક૬િ૮ १ १ १ १ १ १ १२|१४|१६|१७|१२/२०१२ २२२४२६ ७ 0 0 . . . . . . ० . ० . .
भीममंदफल सारिणी. ० २ ३ ६ . ० ८ १ १ १ १ १ २ २. फ . 4/04. . |२६|१२४८२४ ३६/१२ ४८/२४ २६१२४८२४५ . १ १.११/१२/१३/१४० 10 १ १ २ २ ૨ ८ . २१.३३४१५६ ८ |१५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७/२८२८३० ३ २.३३ ४ ५ ८ ५ ५४.६१७/२८१०५२४ १५/२७३८५० २१३/२५/३६० ३१/३२/३३/३४.३५/२६३७३३९४० ४१४२४३४ ६ ६ ७/७।७ ४८ . ८ . ८ . " ० ८ १०१०१०१०१०११११११११ १३२४३६ अं. (१५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ गफ ३३३ ४ ४ ४१६/२0१३५०१ १२२४३६४८ १२२९४३६६३६ २ २ ३ ८ . . १ फ.. १ १ २ १०३०1११५२१२ १४२६२७ ५ . . १५/१६/१७/१८/20/२०/२१/२२/२३/२४/२५२६/२७/२८/२/० २ ३]३ ३ ४८५१०/२२/३३/४४५५ ६/२८/२८४.५१.२ १४२५ २०३१२३४/३५/२६३७२८२१.११ ४२४३४४० ६७७ ७ २५४७.८९०२१२२/१३/५४६१७२८२८५०२५३ ४५/१६४७१८४५०५१५२/५३/५४५५/५६/५७५८५६ . ट १. १०|१०|१०१०११११ १४१५६५६२७/२१४२५५५१६२७८५५१ १ भोममंद फल सारिणी. पिंकी १/१२/१३/१४/१५/२६७३०/३८४.४१४२/४७/४ . म ६ ७ . ७ ७ ४२५३४ १५/२६/३०४९ ११ २२/३४४५/०६/७ १२ |२४|३६० १२२४२६४८ २ २ ४ ८ १./११/१२/१३/१४ . . . . 0 . ० ० 0 . १ . ८ . १ १ १ २ २ २ फि० २. ११/२२ |२४|४५५६/७ १०/३०४१/५२/३ २५३७ फ. १५/१६/१०/१०/१९/२० २१ २२/२३/२४ २५ २६/२७२०२९ २ ३ ३ ३ ५ १२/३३ ४४५५६१८२८/४०/५१/२ १४२५ ३०/२:३२/३३२४/२५६/७/२८/३८/४०४१/४३/४३/४४४५४६ o ५ ८ ८ ८ २६/५७५०/१०/२१/३२४५४५१६२८३८५० १३२४२६ C . . . . ४७/४८४८५०५१/५२५३४५४५५/५६/५७५८५८६.१६२१ ट . .१.१.११.१० १०११११ ४६५८१०२० ३०४२५४ ६१६/२०१५. को ५५४६७४८४.५१/५३/५४५५/५६/५७५०/- ८ १.१०१. |फ.२.रटा४५८ રદ રફ કદા १५/२५/३४४४४ ३५१२४८२४ ३५१२/५२४ २६१२४८२४४८ क. १ ४ ६ १ ११ १२ १३ १४ १ २२ १०२.२८३८४८५८/६२५५४६५५/५४ क. १५:५/१७/१८/१२/२०/२१/२/०३/२४ २५ २६ २७ २८ २९ २ २ ३ ३ ३ ३ २३ ४ २४४४३५१ १२/२२२४१५. १. १८२८३८ ३. ३१/३२ २३४५६७८८१/४२१४३४४५/. ४ . - १७२५६५६५५५ १४४३४४४५२२ १२ Half५५५,५२/५३/५४/५५/५६/५७५८.१२/ . . . . . . ८ ८ ८ १.२.२३४५ . ११ ४.५.
( भौममंदफल सारिणी. श्रको ६७६२६६६८६९७०७१७२७फ. फ०५४ . ६ १२ ११८२४३०३६४२४८५४ १२|१८३ 25.10 . . . . ० . 4 क० . . १ २ ३ ४ ६ o . a . . . . or . . . o १ १ १ फ. ६१२१८२४३०३६४२४८५४ ५॥१२ १८२४ क.१५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ १ १ १ २ २ २ २ २ २ ૨ २ ૨ २ ५९२१८२४२०१६/ २६ ५३११२२३ २४ २५ २६ २७ २८ २९४०४१/४२/४३४४६५ ३३३३३३३४ ६१२१८२४|३०/३६/४२/४०५४ ६१२ [१८ २४/३० ० ५ . ४ ४ ३५४२४८५४ . ६१२१०२४३०३६४२४८५४. संन्फो.५७६/०७/७८७elco/८१/८२R/४/५/६ulce (१२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ Fal. . २४१४०।१२।३५० २४|४|१२|३६. ८ १०११।१२।१३११४ फ. १ २ ० . . . . . C . o . . . . . १ १० १२१४१७१८२३ २४ २५ २०३९३४ क.१९६१७१०१८२० २१ २२ २३ २४ २५.२६ २७ २८ २९ ३. १ फ. १६/२८/४/३/४५/४०५०५३,५५५८ क.|२१|२२/१२/२४३५/२६३७३८०/४०४१४२४३४४४५/४६ १ ? १ १ १ १ ।१ २ ५ ७ २ . . २ २ २ २ २ १.१२११४१७११९२२४ १२ o ४३ ) बुधशीघ्रफल सारिणी. यिका १ २ ३ ४ ६ ट ११ १२ १३ १४ माघ X . फ- . . १ १ १ २ २ २ ३ ૧૨ ક २२/२८/५८/११/२७४४ १६१३३/४९०८ |२४|४८|१२|१६|. २४ ८८|१२|२६ २४४८१२२६/२० . . क० २ ७ १.|११ १२ १३ १४ . 0 .. o . . . . ६५ . . १ १ २ २ ३ ३/३/३ ध. १६/२१४४६२२३८५५/११/२०१८४ १७२३१५. क- १५ १६ १७ १८ १८/२०/२१/२२ २३ २४ २५ २६/२७/२८२ ४ ६ २२/१४/५५/१२/२८/४ १ १७/३४/५० ६२३२टा५६ क./२०/२१/१२/२३/२४३५/३६/२७/२८/२८४०४१/५२/४३/४. ८ १०1१०1१०/१०/११/११/११/१२ ध. १२।२८४५१ १८३९५० ७२३/४०/५५१२२८४५१ क.४५८६९७४८९५०५१५२५३/५४५५/५६/५७. घ. १२ १२ १२ १३/१२/१३/१३ ७२३४५६१२५/२ ८२४ लको १५१५१७२८/१०/२० २१ २२ २३/२४/२५/२६२७२८ गधा ८ २२/२८/५८/२०२६/४२/५८१४३०८६/२. २८५-१० द a . . २ २. ८ ६.७ ८ १० ११ १२ १३/१४/० . . . . २ २ २ २ २६133१५८४२०३५५२८४५०५५१२२८८५ A . २१/२२२३/२४२५२६२७८ २ ७ . 1221 कि./३.११ १२३/२४/२५/२६ २७el.४१४२३. ध. १.१०१०१० १६१.६८ 4 . १० १२ ...२८.५२ २४१३.५/१२/२0-10 बुधशीघ्रफल सारिणी. १०३१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २०२८/४०४१/४२/१३/४ गन्ध ८८ ए १.१.१.१.१.१११ फ.१२.२४८३१८२२४३१५/३.४४५८९३ २७/१०२ १४४८१२२६ २४४८१२३६. २४|४|१२३६/२. १ २ २ ८१० ११ १२ १३/१४ . . D क V . . . . . ध . २३ १४.३५-१२१५४१५५/१०२४/२८/५३/७ २२ क.१५१६१७११८९८२०२१ २२ २३ २४ २५ २५/२७२८२ . १३ ४ . घ. ४ ९ ८४४८ ५ २ . क-२०२१/२२३२/३.२५ २६ २७ २८ २९४०४१४२४२४४. द . १२/१५४१५५/१०२४ २८1५३।७२३३५५० ५ १२३४। ११११२१२१२/१२/१२ (३.३१३१३१४१४ भ. ४८२ अं.४५४६/४७/९/५.५१५२/५३/५४५५ ५६ ५७५०५ ग. फ-१११ १२ १२ १२ १२ १२११३३१३९३९३ १४ ११४९९४९ ४२५५ २४|४|११४२७/४.५.७२. [३३/४६/०८ १२/२४/२५/४० :३४१६४८. |१२२४३५४४४ १ ३ ५ १० . . . ૧ . ५. ૨ २ २ १३२६४.५२५ १५१२४६५५१२२५२८५२७ फ.१५५१७२१९२४२५/१६/२0२८८. क...२३/10५/१५:08/२८४.४.०३४ . ८ ट . ८११५४८ १५२४ १.१.१.१९३१२१२१२३ १२ ५७ . स्पष्टग्रहधशीघ्रफल सारिणी. ६.६१/६२/६३/६४/६५/६५/६७-७१/७२/७३/७४-न-धः १५/१५/१५/१५.५.५१६/१५/१५१६१६१६१७१७१७१७ ૨ फ.११ २२ २३८४५५७ १८२४०/५२/३१४२५३५ ४४ १२२४३५/४० १२२४|१६/५० . ૨૨ ૨૪ ૨૬ જ૮ १ ३ १२ १३ १४ क. फ. . . ४ ८ . . . 0 १ १ २ २ ११।२२/३४ ४५५६ घ. १०३.४१५२/३ १.२५७ १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७/२८/२/का. २ २ ३ ३३.२ ४ ५ ४८५१० २२/१३/०४/५५६११०२८४. ५११२ elena ३.३१२२३२२०२५/२५/३७३-८/११/१२/५३/५४ क. ७ 9 ध. २१/१२/५३५४५१७/२८३८५. २ १३ ४५.५/४७४०४९/५.५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७६५०० ८ २८३५५६/५८] २.१२/५४५१२२७३८५० ८ ट - गधनं . " . . . . . C ७५७६.८७८०१८२०४८५८६00cc १७१७१८१८१८११८१८१८/१९८१९१८/१९८४ le:५६४ १३ /२१/३०३-५५५/३/१२/२० २. २४४८९२३६/. २४४८1१२२६. १ २ ३ ६ १.११ १२ १३ १४ कर १ १ १७२५३४४२५.५८७ १६२४३१४११८८५८ १५ १६०१ २.२१ २२ २३/२४/२५/२६/२७/२८el.. २२ २ ૧ २ २ ३1३, ३ ३ ३ ३ प०० १४२३३१ ૪૪૮ ૬ १३/२२३.३८४३५५ ४ २.१ २०२४५/२५/०८/४.४१४२५ कर ४ ४ ४ ५ २८२७४५५४३. १३.१५/८४१५२१ CH ५ ७ ७ . C द ८ ७१५० .
स्पष्टग्रहवुधशीघ्र फल सारिणी. मरार१८२/८३२४८५८६९ ७१.०१.२ ३१०४गिधा (१२।१९ २० २०२०/२.२०२०२०/२०[२०२०२०२१२१ फ.५४५८२४ ६ १२ 1२४ ३६४८८ १२ २४३६/१८. १२ २४३६४८४४ . क० . २ ४ ट १० . ० . . . . 0 . १ ध. १३ क. १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८२ २. .0 ध. १ १ १ १ १ १८२३२८३४३८९४५४ २ २ २ २ २ ५।१०।१५२०२६१ ० . . ध. २ २ २ २६/११९४६५२५७२ ७ १२८ २२/२८३३३८१४४ ३ ३ ४ ४ ५ ९०१५/२.२५२०२६४१५६५९५६२ ७१२ ११] १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ ग-ध २१|२१|२१|२१/२१२१/२:०१/०१/२१/२१/०१/२१.२१/२१५ द . . . . क . . . १ २ ३ ट ५ द ७ . . . . ८ . . ८ ८ . . ८ . . . ०.५ क.१५१९६१७१८१८२.२१ २२/२३/२४२५/२.६/२७/२८/20 प २ . ० . . . . . . . . .. - O . . . . . . . ... .. . . का-५/४६/४७eel.१५२/५३/५४५५/५६/५७ . ८ D बुघशीघ्र फल सारिणी કાર?|૨ ૨૨૨૪ર૬ર રર રર ? ૨. રિકપિ ૨૪ ૨૫ ૨૬ ૨૦ ૨૧ ૨૨૬૨૦૨૦ ૨૦ ૨૦ કિટ ૨ ફિર | જીલ? 2િ9] ]૨૧ર/૧૭/૧૦ દ ૯િ૭ ૧૦ દદર- કરિંદાજ છે દિ૨]રદાદ. ૦ ક ૨.! J૧૨ જરૂર છે 20 asta elos છે ૦ છે. છે. છે. કે ૨ e ફિ૨૦ ર | દિલ ? - ૧૯ ૨૨૬ ૦૨૬૨૬૭ ૬૮ ||૨૦૨૨ ૨૩ ૨૪ ૨૫ ૨૬ ૨૭ ૨૮ ૨૯, 3 ૨ ૨. ૨૨ ૨. ||૨૦૧૨ ૨૮/ડ૨ દારૂ૦િ૧૨૬ કરો - 3 ૨ ૨ ૨ 3, ક ર રિતિક છે. દાદ દકિ°|| ૨૨ કિલો દાઉદ ક | ૨૨૦૬૨૦૦૭ રરર રરર ર દ દદરૂદિક દદદ કપ ડિટ કાર|ફાર કદ ફિ||||||||| કર૦ ફિલિટિક દરદ ૨૬]૨ - ૦ છે છે છે છે ૪૦/- છે ૧ છે છે ૨. || રિફર દ) ૨.૨ [૨ ૨ { રે ૨. દ ૨૨ દિદ ૨૦૨૬૯૨ - રદિક દીક૨ ૨૮ દદ દાઉદ ૨.ર૨૧ ૨૨ ૨૩ર૪રર ર૦૦/- છે ૦ હ રાકર. ૨.૦ ૨ ૨ દિક રરર રર રરરર રહ્યું. કદર કરૂ? ९९९ ફિર દર ૨૨ - ૨૦૧૬ ૨૦ દિ? દાદા દાઝ ૨૪૨૬૬૬૬૬૭ ૧૬ છે. 0 a : ક ત્ર 2 કાઢ| | રઘુ 2 | | | बुधशीघ्रफल सारिणी. કાજ કર ૨૪, ૨૦] ૨૨ વર્ષ ૧. ૨૭૨૦ કિક ૧૮ રવદર ૬ રૂદદ ૨૦૨૦ દરર૪ ૨૨૨ ૪૮ ટક ? છે. ૦ હ * છે ૬ ૭ છે ? | ૦ ૨૧ ૨૨/૩ ૪ રિદ્ધિ ૨.૨૬૦ ૯.૨૦૧૦]?? ??? 19૨]૧૨ ધ ૨. ૨૧/૬/૨૨૪૮૬૪૪ ૦ ૦૯/૨૧ ૨૨ ૨૨ ૨૪ ૨૫ ૨૬ ૨૭૨ ૨૪૦ ૪૧ ૪૨ કરૂદક °. છે. ૨૬ ૨૦ ૨૦ ૨૧ ૨૨ ૨૨૨૨૩૨૨ ૨૨૨૩૨૯ ૨૬૨૧ દિકરી દૂધ, છઠ્ઠ1993 193s ૧૦ c છે. ર૪ કરિ૨૨૮ છે. હિં ? ૪ = : ? ૧ ૬ છે p છે છે २ ૪ દર રરરર P = ૬૨૨૯૨ ૨૨.૨ ૨૨૨.૦ ૨૨ ૦ છે = • = = 333/ 313-3 દિકરદારે કઇ દિ દર ૧૧૨ બિલિદ કાદ | ૧૮ ક. ૨૨-૦૧-૨૨૨૧૨૨/૧૨૨૪]] 12 રંદ ग्रंत्यांकगतिफलमारिणी. यंका ६/६६/६७/६८/६९/७०/७१७२(७३/७४०५ ७६७७०८७९/६८० फ/२७३८४.४२/५३४५/४६४७ ५५२/५२/५५/५६/५५/५६ ०५२११८४३ १ /२६/५२/१८४३३५१ २६/५२/१८ . १ २ ३ ७ १० ११।१२।१३१५ . 0 . . . ० क . o ० be ० ४६ ७ C१० ९१|१३|१४|१६/१०/१२/२० २१ |२२/२०/२८/२५/२६/२७/२८ (१५ १६ १७ १८ १८/२० . . . २१ /२३/२४२६/२७२८/२०/२१/२२२४२६२७/२८/०४१ २०/३१/३२ ३३/३४२५/३६/३०/३०/४०४१/१२/१३/७४ . ८ . 0 . . १ ४३८४४६८७५. ५११५२/५४५६/५७/५८० ora ० 0 C १ ० ५५४६७४८५०/५१५२५३/५४५५/५६५७/५८५/६. १ १ १ १ १ १ १ १ १ १./११/१३/१४/१६/१७/१२/२०/२२/२३/२५/२६ दुधमंद फलसारिणी. १ २ ६ १० ११ १२ १३ १४ गफन १ १४|१८२४/२०/२३१९०४३/४८1५२१५७/२ ७ દિ] દર૬િ૨ ४८३६२४/१२/० ४८३६२४१२ ३४॥ . २ R ४ ५ ८ . . c ० . . १ २ ४ . ११ १२/१३ ० ० C ० 0 ८ ० ० ८ २ ८ ध. १ १.१२४१८२४२०३४/३०४३४६/२/५८२ १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८२. १ १ 7 १ १ १ १ १ २ २ २ १२.२७/२२२६/२१२६४१६५०५५ १८१८ ३०/२१/२२/२३३५/३६/३७/०२/१०/११/१२/२/४ २ २४/२८३३३८८३२०५२/५८२ १२.१७/२२२५२१ 'દાદાજદીક રદ ३ 3 ४ ele १.१६/१८/२४/२८/२४३ २ . ७ . ३ ४ ६ ४ ४ - ( बुध मंद फल सारिणी. श्रिको १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६/२७/२८ गमन १ १ १ १ १ फ.१२।९५१२२२२६/३०३३७४०४४४८५११५५५८२ ३ २६/१२४८२४ २६/१२४८२४० . क. . ० १ २ ३ . . . . . . ० . . . ० ७ ध.. ११ ९४/१०/२२२५/२८/३२२६/४०४३/४७/५० १५/१६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ १ १ १ . o . . १ . ० . 6 . . . . २०३१ २२ २३ २४ २५ २६३७३८३८४०११४२०३४४ १ १ १ १ २ २ २२ २ |२ २ २ ૨ | ૨ २ ४८५२/५५/५९२ ५.१०.१३/१७/२०२४२८३१३५/३८ १५४६/४७८४५०/५१५२/५३/५४५५/५६/५७/५८५२/६० २ २ २ ३ ७/१११४१८२२२५२१२३६ यको २०३१ २२ २३ २४ २५ २६ २७/२८/४००१/२/४३/४४ गफ २ २ २ फ०६ ११.१४|१७/२०२२/२५२८३१/३४२६३१२४५/२ ४८३६/२४/१२ ४८३६/२४|१२. १८३६२४|१२४८ . . क०० १ ६६ १०1११ १२ १३ १४ ० . . 0 . घ. . . . o . - . १४१७२०/२२२५२८३१/२४३६ १५/१६/१७१८९८/२०/२१ २२२२/२४/२५/२६२७२८२ १ १ १ १ १०/११/१६/१०/२१ २०२१३२३/२४२५३६३७३७/१०/११४२/१३/१४ ११ १ १ १ १ १ १ २ २ २७१७३.१२/३५/३८४१४४|४६४५२/५५/५०. ४५५६४५४९५०५१/५२५२५४५५५५/५७/५८/५८ २ २ २.२२ २२२] २२ २२२ २ ३ १२१४१७/२.२६/२६२८१२१/३४७/२०१२/४६ . . . ELL ८ बुधमंद फलसारिणी. यिको ४५/४६७/ ee/५०/५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५८५गफिन २ २ २ ८ ८१.१२९४१६२ . . 0 . . . . 6 क. . १ १५ ६ १०/११/१२/१३१४ 406 0 . ८ . ० ८ ० . . ० . ध. ० ८१०१२/९४१६/१८/२०/२२/२४/२६/२८ १५ १६/१७/१८/१९/२०/२१/२२/२२२४/२५/२६/२७/२८२ . . . ० . ० 0 . . . ૨૦ ૨૨૪૨-૪૦ દર જ કાર બદલીને ३०/३१३२ २३ २४ २५ २६ २७२००१२२/५३२४ १ १ १ १ १ १ ८1१०1१२/११/१६/१०/२०/२२२४२६ ० . ६ ० 0 ० १ १ १ १ १ २०२२३१/३६/३८/१०/१२४६४८५०/५२/५४५६/५८ प्रका६०/६१/६२/६३६४६५/०६७/६६/७०/७१७२/७३/७४गफन . ३/३/३३३३३३ फ.१८१८/१२०२१/२२२२ २३ २४ २५ २६/२६/२७२८२९ १८३६२९१२ ९८R६/२८/१२ દરિટીદ૨ . . १ २ ४ 19 ८ . . . .. द . 0 . घ. . १ २ २ ५ ६ १५/१६/७१८१/२० २१ २२/२३/२४२५/२६२७/२८२८ . . . . . . . . . ० ८ . १२/१३१४|१४|१५/१६/१७/१८:०१८/२०१२२२२२३ ३० २१ २२ २३ २४ २५३६/ ०८/३९/४०८१/८२/०३/६४ . ८ . . . . . 6 ८ . २४/२५६२६/२७/२८/२०/३०/३०/१२/२३ २४ २४/२५ १५४६/४७/४०/५०/५१५२/५३५४५५/५६/५७५४ IS 6 . . . . o . . . . . २८२१०४१४२४२४३२४४६४६४७९ ३७ ( बुधमंद फल सारिणी. '३ अको७५/७६/७७७८७८०८१/८२८३/ ८५८६Jevel ३ ३ (फ०२०/३०३०/२१/२२२२२२/१२/३३/२३/२४/३४३४३५/२५ २४४८१२३६/२४ ८ o . १ २ . . . . . . . ० GIN. १ २ २ २ ३३ ० ८ १५/१६१७१८२/२०२९/२२२३/२४/२५२६/२७/२८२ ० . . N द द . . १२/१२/१३१३९४१४१४१५/१५/१६१६१६१७/१७/१० १० . २८ २२२२ अथयरुशीघ्र फल सारिणी. रको २ o . " १ १०१११ १२ १३ १४ गधा १ १ २ २ १०१२.३.४०५० १०२.२० ० १०२.२.२०५० . ० . द . क. . १ २ ३ ६ C . . . घ. . ८ . . ० १ २ १०/२.२०४०५० १०२. १५/१६/१७/१८/१९/२.२१/२२/२२/२४२५/२६२७१२८२ ६ १०२०.४८ २०/२१/२२४२५३६/३७३०९४०१२/१३५४. 30/08/30: ० ८ 0 . . 4 . . १०२० . ५५४६४७५१२५.५१५२/५३/५४४५५५५५७५८५ ८ ८ . टा १.२.२.४०/५. १.२. ३.
. गुरुशीघ्रफलसारिणी. को१५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६/२७/२० गन्धः फ. २ २ २. ३ ०३८८७१५५५ ११२२२१४.५०/६१५२४३३/१२ १८३६२४१२ ४८३६२४१२ ४०३५२४९२/२. ० . क. . ८ . . ध. C . ३ ट १०/११/१२/१३/१४ 3 १ १ २ २०३७४६५४३ १५/१६/१७/१८/११/२२/२३/२४२५२६२७२८२ २ २ २ २ २ |३ ३ ३३३ १२२.७५६५११२२/३१ ३.२१/३२/३२/३४/३५२६२७३२९ १०४१४२/४३/४८० ० ० . a ८ . २४३३/१२/५०५४८९ ७१८२/५२१११०१-१२७ १५/२६/४७४४५०/५१५२/५३/५४/५५/६/७५-६६. ७ ७ C . यिका २०२१३२/३३३४/२०/२६२२02/201८१/१२/१३/गधा फ.२२/५.५०/७१.२४२३४०/९६५१६.१४२२/१३५१२. २१८८१२२६/० २१८१२३६. क. . ३ . : ध० . ० . ३ . . a १ १ १ १ - દકિટ દિર - ર૪૨ દિદ १५१६/१७/१८/९/२०/२११२/२२/२०१५/२६.२/२०२८. २ २. २ ३/३ ३ ३३३३ ४ १४२२/०६५/३/२२.20१७५५४ २०/२२२४२५६०/२८/३/en/ २२४३८५ ८ १८५ १२ २०/२८२७५६५४२११६७२६८२ ४५४६/२७/ १५.५१०२५२५५५/५६७५५४६. a ५ ८ . ६ १८६५५५२ १०/२५२५४२१५. ६/२५ गुरुशीघ्रफल सारणी. लको ४५४६१७४८१४९५०५१/५२५३/५४५५/५६/५७५५ne. ट 802. फ०४८५४१ १५.२२२०२५/४२१४५६/२ १६/२३.१० ४८६२४|१२ ४८३६/२४|१२ ४०/३६/२४/१२/४० क. . १ २ ७ ११ १२ १३ १४ . . . 6 . घ. . ७ १४२० १५/२२२८३५ . १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२६२७२८/२० १ १ १ २ २२. २ २ ४३1४५६।२ २०३१२२३३/३४/३५/३६ ३७३०/३०/४०४१४२४३४४ . . . . ર૪૨૨૨ ૪૮૬ ४५४६/४७/४५०/५१५२/५३/५४५५/५६/५७५५८६. ५ ६ ९३/२०१६/२२४०४७५४. ७१९२१२८३४९०४८ को ६०/६१/६२५३६४६५/६६६७/६८/६९/७०/७१७२|७३/७४-ध ० ८ ८ ८ 0 १६/२२ २७३२२७४२ र १२/२/३६५८ . १२/२०६४८ . . १ २ ३.६ C ० . . . . . . . १ १ १५.१०.१५/२१२६/११३७१४२/४७/५३/५७/२ १५८१७१८२/२०/२१/२२/१२/२४२५२५/२७२८e 1 . २ २ २२ २ २ १८२२0१९८४४५४ ५.१५/२०२६३१ २२२२२४२५२६२५४११४२/४३/tre. १ २२३ ६४१४२२७२. १२१२६२८३२(३८४४४ ४५/४६/४७४८१.५१/५२/५:४५५/५६/५७/५०५२ 3 ४ १४ ४५ ५ 4 10५८५१०१५२२५/२६/६/५/५६/२ • .
< A गुरुशीघ्र फल सारिणी. ૧૬=૩૦.૧૨.૨૪ ૯૮e-cers, १०१०१०१०१०१.१०/१०१०१०१० फ०१८५१/५६५७ ७/१०/१३/१६/२०२३२६२८३२७ (१२२४३६४८. |१२/२४३६९ १२२४ . . - क. . २ ५ ट १०/११/१२/१३/१४ ० ० . a . . ० o . o o . . . . . ७ . ० ध. ६/१०/१३/१६१९/२२२६/२९२२५३८२४५ १५/१६/१७/१०/१२/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७ २० १ १ १ १ १ १ ४०५१५४५०१ १०|१४|१७ २०२३१७/३०/२३ २०२२/२३/२४५२६७/३०/३९४०४१४२ ४३४४.. १ १ १ १ १ २ હકકદરિ ૨ કિલો ५ ११११६/१०/२२ ४५/४६/४७/५८५५०/५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५/५/६. २ २ ૨ २२ २२ २ २३ २४२७/२०३४३७४०४३४६/५०/५४६.५२ कोर.९२/९३९४२५६षecee.२ ३१ गया १०1१०1१०/१०/१.१०/१०1१०1१०१०१०१०१० फ०२६२६२७२२४०४०/११/१२/४२/४४leafe५/४६/४७/२ १०/२६.२४/१२ ४८३६/२४१२ ४०३६/२४/१२/४० ० . ? ४ ६ . . . . . . . . . . 6 . ० २ C १ १५१६/१७/२८१२२०/२१/२२/२३/२४२५२६/20eke . . . . ० . ० . क . . . १२/१२/१४/१४/१५१६/१७/१०/१०/ १२.२१२२/२२२३ ३२२२/२४२५६/३५२२४०४१२२४३/८१. . . ० . . . . . . . . २४/२५२६१६/२७/२८२/२.२.३१२३४३४/२५/. १५४६४७/५.२५३/५४५५६/५७ .. ० . ० . . . . . ० ० २०२७।८/२०/२८/०२/२/४३४४५५६७५८ गुरुशीघ्र फलसारिणी. श्रको १०५६ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ ११९ गन्ध १०1१०1१०1१०1१०1१०1१०१० |फ०४८१५/३/१०/२०२६/२३३१२८२६/२४२११९१५/११/२ २६/१२/४०२४/०३६/१२/४०२४/०३६/१२/४०२४. ० . १ २ ६ ९० ११ १२ १३ १४ . ८ . ० . . ० . . . . १०१२९४१७/१२/२२२४२६/२८/३१/३४ ९५९६/१७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७/२८/२८ १ २६/२२१४३४५४८४५०५२/५५/५८ २०२१३२ २३ २४ २५ २६ २७३८/३९/४०४१/१२/४३४४ १ १ १ १ १ १ १ २२.१४/१०/१२/२२२४२६/२८/३१/३४३६/३०/११/४/४५ १५४६/४७/४८४९.५१/५२५३/५४५५/५६/५७५४१५९/६० १ १ १ १ २ २. २२१२ २ २२ ।२ ८८५.५३५५५८० १.१२/९४१७१९२४ १ ० १ १ . ८ . त्रिका:२० २१ २२ २३ २४ २५/२६२७२८२९/३०/२१ २२ २३१३४ गन्ध फ०/१२/५/१५६/५१ ८६४.३५/३.२५/२०१४ १८३६२४११२ ०1८३६/२४|१२|. ४८३६२४/१२/४० ८ ४ १.११११२१३/१४० A ० . ८ ० . C . १ १ ८ १३ १५१५/१७१८०२१२२/२२/२४/२५/२६/२७/२८/२९ १ १ । २ २ २ २ २ १२८४४१८५४ . . + . . ७ १२१०२३२-२२८५४ १५४५७५४५.५.५२५२५४५५५६/५७५८५६ क ३ . १ १४ ५६२.७१२३ છે D છે તિ स्पथग्नहगुरुशीघ्रफल सारिणी. વરિટ રદ દિઃ દર ૩ દિક દવાક દરદ કરી દ {s T5 19. 9 IS •ીદ દિ૯ ર૯૬૬૬ ફોટા ||૨| !િ કિરીટફિર દિBe] ટ૮ દકિ. ૪૦ | |3|2 ૧ ૬ - ઉદાર દિલ દે દરિ૧૨૬૬૯ ફકદીકc}૨૯ર? રરરરર રરર રર ર २ છે 3 3 13.13 21313 || ક ફિદ |રદરદ દ રિદિ૨ દિ/ફ દોઢ BC RU [૨૦ ૨૧ ૨૨ 32 કિરણ ઉર રર ફિકિર દિક છે. છે. 0 છે ૦ રિદ ]e ? રર ૬ || | દ ક દિકરી ૪િ૬ દિકિછટ૮ કિલ્લા ૨૨૪], દીક્ટિ૬િ૦ છે. ke ૨ ફિ૨ રર રર . ઉ%3||૧ ર ર૦રાક૨૨ ||૬ છકટકા દરદ v | | * ૦ ૩ s છે ર૬ જાફર દરિદાર ૬૨૬/૨૮ ૨૨ ૨૪ o છે s છે છે. છે. ક જ છે. 3 s હ २ ૨ ૨ ૨ . ૨૨૨૪ દાદો ૨૨૪ કિદાર ૯ ૨ ૨૮ વિદાર Is : ૬૭ ૨૮ ૨૯ ૩૦ ૨૧ ૨૨ ૨૩ ૨૪ રાધેરીટ છે. ૦ છે ૨ ૨૪ ૨૬૪ ૨૨ કર રાત્રિ ૨૦/૧૨/૨૨/૧૯૯૬ ૯૮૨૦૨૪૨૬૦૦ છે ૮ ૧૨૪ • I૦ િરિષિી ક૬/દદ કરીશ ક૨/૨૪ કબીદડ 18 શિકાર ?? ?? ???? ૨ દિર ૯૮૯૮) : દિ૨ ૧૪૪૮ કિ8 કરો કિ ५८ , . . 4 . . . O . . ० . ५ . गुरुशीघ्र फल सारिणीचक्रम्. अकोर६५/६६/६७६९/७०७१/७२|७३/७४/७५/७६/७000१७गक २ २ २ १ फ०३६/२१ ७५२/२८/२४५५/४०२६/१२/५७/४३२८१४/७ ३६.९२२८२४ ३६.१२४०२४. २६/१२/४८४ क० १ २ ८ ११ | १२|१३/१४/० १ २ ૨ २२ ९४२४४३५१२१६४१५५/१०२४ |३०५२/७२२ क-१५/१६/१७/१८९/२० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७/२८/२ ४ [२६५०५ १८३४४८२१७३१४६६. १४२४३ क०२०/२१३२ २३ २४ २५ २६ २७ २८३८४०४१/४२१३४४ १०१०१० १२ २६/११५५/२० २३/२७/५२/६/२६/२८/५०५ क०५५/५६४७८४८/५०/५१/५२/५३/५४५५/५६/५०५८/५९/६० १०।११ ११/११/११/१२ १२ १२ १२ १२ १७३१५६/० १२२६६४१५५१०२४ गुरु मद फल सारिणी. अंको १ २३ १० ११ १२ १३ १४ गफ: १ १ फ १११६/२२ २८३३ ३४१५०५६६/१ २६/१२४८२१ २६/१२२-२४ २६/१२४-२४/२८ ७ ८७ ट . . . o . a . . ७ . . . ८ व . . . १ ०. ध. १ १ ? ६/१९१७२३२-३४३८५/५०५६/२ ७1१३११८ क१५ १६ १७ १८१२०/२१९२२३/१४२५२६/२७८ १ १ ? १ २ २ २।२ २४३०३५४१६६५२५८३९४./२०१६३१७४२ २०२१३२२२/२४ २५ २६ २७/३८३८४०११२८३४४० २. १२३1३३३३ ५८५६५५१.१६/२२२७३३/३०४४५०५५१ 1५५४६/४७.५०/५११५२/५३/५४ ५६/५७५५ ० . ८ १७१२२/२८/२४४०४६ १५११२५ .
. - स्पष्ट ग्रहगुरुमंदफलसारिणी. का१८१६२७११९२० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८.२ गफन २. ૨ २ ५१०१६/२१२६/२१२६ १२२४२६४८६ १ . . क [10 ८ . a .. . ० o . . . . १ १ १ ध० १३ १५ १६/१७/१०/१/२०/२१/२२/२३/२४ २५ २६/२७/२८२८ १ १ १ १ २२ २ (१८/२३/२८/३६/३४४/५४/० ५ २०३१/३२ २३ २४ २५ २६ २७ २८३८४०४५/१२/६३/४४ २ २ २ ३ ३३३ ३/३/३ ७१२/१०/२२२८३२२८४४४९ . . 0 . . . . o . . ४ ५४५८ १०१५/२०/२५/२०१६/४१४६५१/५६/२ १२ गुरु मद फल सारिणी. अं.३० २१ २२ २३ २४ २५ २६३७३८३.०४१ १२ १३४६ गफ २ ३ ३ १३३३ ६१.१५२०२५/३०/३४३८५४४ ४८३६/२४|१२ ४८३६२४१२० ४०/३६२४/१२/२४ का १ ૨ ६ १०/११/१२/१३/१४/१५ घ. १ १ १०/१९१८२४/२८/३४/३०४३४८५३/५/२ १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४५२६२७/२८२९ १ १ १ १ १ १ २ २ २२ १२ /१७२२२६६/३१,२६/४१४६/५०५५ २०२१ २२ २३ २४ २५ २६३५३८२८४०४१४२५३६ २२ २।२२।३।३ ३/३/३/३/३ २४२३३/२०४२/४०५३/५४२५ १२ १७२२२६/२१ ४५/४६/४७/४८४/५०/५१५२/५३/५४५५/५६/५७१५८ ४४ ४४ ६/१० [४ २६/२३४३८ . ० ० . . . . . २ ० १ .
O गुरुमदफलसारिणी. को ५६७५०/५१/५२५५५/५६७५९५ ति. २१ ४११६ फ.५४५७१ २६/१२२५ ३६/१२८०/२८/० ६/१२८११८ क. २ ३ ४५६ ७ . . ट . ८ . ० . . . . 6 ध. . ११|१४|१०|२२/२६२८/२२ २६/४०४३४७५. १५६१७/१८/१०/२० २१ २२ २३ २४ २५/२६२७/२८ १ १ १ १ १ 4.५८१ १२ १६.१९२३२६३०/३४३७८१४४ १ ८ C . . . - . ८ ३ १ २ २ २२२ २ २ २ २ ६११०१३/१७/२.२८/२८१/२५/३८ ४५/४६७९८४५०५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५८५० २ ૨ २ ३ ३/३/३/३ ३३३ १२६६५३५६. ७११११८२२२६२८ गुरुमंद फलसारिणी ६१/६२/६३/६४/६५/६६/६७/६८/०७१/७२/७३७ नफा ५ १०/१३१६१०र१२४.२७ १८३६२४१२ ४८३६/२८/१२ क. १ २ ३ 2 ६ १० ११ १२ १३ १४ . . ० . . . . . . ध. ८ . . ८ . . क ५११११११७२०२२२५/२६३१३४१३६३ १५/१६७११९२०/२१ २२ २३ २४ २५/२६२७२०२८ १ ११ १ १ १ १०१३१६.९८२१ २०२१ २२/२३/२४/२५२६/३७/३/२०४०४१/१२/१३४ १ १ १ . ११ १ २ २.८७P.२२२५३८५.४४५६४८५११५५ ५८ १५leone/५०/५१/५२/५३/५४ ..|५६५७/५८/५ २ २ १/२ १ २. ३. R १७. . - २ २ स्पष्ग्रहगुरुमंद फलसारिणी. को७५०६/00/100/ ૧૨ કલાદ્ર-૮ee ५५५ फ०/३०/३०/३१ ३२२३/२४/३४३५३६/३७३८२८३८०४१२० ४८३६२४१२ ४८३६२४१२ १८/२६/२४/१२.४ क. १ ૨ ३१४५ ६ १.११/१२/१३:४ . . . ८ G ० . . . . . . . . . ८ १ २ २ ३ ४ १५१६/१७/१०/१२/२०/२१/२२/२३/२४/२५२६२७/२०२० . . . ० . . ८ . १२ १३ १४ २०१५ १६/१७१८१८१९२०२२२२ २३. ३०/३१/३२३३/३०/३५/३६/२७/३०३९/४०४१/४२/०३/४/. ० . a ० o ० २४/२५२६२६२७/२८२२३०/३०/३१/३२/३३/३०२४/३५/. ४५/४६/४७/४८४५०५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५२ . . . . . . . १७/१८ 4 . . 4 . ८ . . द . २८३८३४०४१२२८३/४४१५ स्पष्ट शुक्रशीघ्रफलतारिणी. यंत १ २३.१ ८ |१०११/१२/१३/१४ गधा १ १ २ २२३३/४ फ. રબાદ હરિ, ઉદારદિલ |૨ ૨૭ કિ8 १२२४३६४८. १२९४३६/६८ રિરર૪ર૦૧૩ क० २ १०/११/१२/१३/१४ १ ९ २ २ २३३ १४ २५/५०१६/६३१५६/२१/४७/१२३७/२८/५३ જીરા ર૦ ૨૨૨૩૨૨૯ ૨ || १०1१०1१० ११ ११/१२ १८४३८ | | | | | | ३.५६२१६११ P३१३२२३/२४ २५ २६ २७ २८२/20/१/१२/८३/४४. १२/१३/१३/१३/११/१४२५/१५/१५/१६१६१७१७/१८/१० ३५१ २६.५२१०२]७३२७२३९०११३८५२८ કાકર-૨ ૨૨૮ કાછિIL १-१९८०/२०/११/२१२१/२२/२२२३/२३/१२/२४२४/२५ ५४१६४१.३५० २५/५.६१६३१५६२२/४७/१२ . ट ० . ८ . .
शुक्रशीघ्रफल सारिणी को १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ मध ८८ फ०१८४३३३/५-२४४९/१४३८/१३०/५५२७४५/१००४ १२.२४३६४८ १२२४३६४८० १२/२४३५/४८ क०.. . १ २ २ ध० . १५ १६ १७११८१२०२१/२२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ ७ ७ ० . . . १८४३८ ३४५२१२४४८१५/४०/५/३०५५/२१/४६/१२ २०३१ ३२२३३१३५२६३७२८३८४०४१/३२४३४४ १२१३/१२ १३ १४ १५ १५/१५/१६/१६ १६ १७ १७ १८ १८ કેવી ર૬ ક૨ ૬૭૪૨ ૨૨૧૧૪૨૩૪ રહી કિલોદલોકલ ક૬ ૭ નકટી १८१२०२०/२१२१/१२/रराशशरारा२४२५१ ५४१८४४११०३५० २५/५०१६/४१६३१1५६.२२/४७/१२ । शुक्रशीघ्रफल सारिणी. म/३० ३१/३२/३३/३४/२५/२६/३७३०३८४०४१४२/४३/४४ नमः १२/१३/१३ १३/१६/१४/१५/१५/१५/१६/१६/१७/१८/१७/१८ फ.६० २४४९२/३६ .२४४८१२३६ २५४८/१२/७४ . ० ० . . O . . . क ८ . . . . १ २ २ १०११/१२/१३/१४ १ १ २ २ २४४८९२२५० २४] ४८१२१५ २५४८९२२५ १५१६७८२०२१ २२ २३ २४ २५ २.५२७/२०/२२ 1१०1१०1१०1१११११ २४४१२६. Relat२२६. २०३१ २२ २३ २४ २५२६२७८३०४१२/१४: . ॥ २४४८Rahs २४५८१२३६ २४४९१२१५ ४५vede/4.1५१५२/५३/५४/५'५५५५/५८५८६. ११ २.12.2012.३/२२ २३२५ ht२ १५ ||१३| રીપ્રસારિ. દિકરછકરી ૦૧૬૨ 31 જાળીદાદા પણ રિટરઃ ૨૦ ૨૦ ૨૧ ૨૨ ૨૨ ૨૨૨૩૨૨ ૨૨૨૩૨૨૨૪ રજદારો ૦ ૨૪ ૬૨ કિ કાજકJરફ s ક ક છે જ ક ૬ ३ છું ક ક ૯:૨૦ ૨૧ ૨૨ ૨૨૧ ૧ ૨ ૨ ૨૪ ૦ ૨૨થી ૨ હિંદ દર , ૨૪૬૮૬ હ છે. ૦ ધ૬/ક દિ ! ૨૦૨૬ ૨૨૨ ૪ ૨૫% રરરરસ્ટ છે. છે છે. s ૨૪ દદ3૨ ૦ ૨ દર૬િ૨ 3, ૨૨૨૩૨૪૬૭૨-- કદર કાદ - ૬૨ ૨ ૨.૩ ૨.૪ ૬૪ ૨૬૬ ૧૯૬૭ રાષ્ટ૮૨૬ દિ૨.૮ ૦.૪ ૪િ૮૨૨, ૦ છે છે છે છે ૦ જ દર ૧૮ દિ ર ૦૨.૦ ૨૨ ૨૨ ૨૨૦ ૨.૨ ૨૨ રક ક- ૨૨ - ૨૪ કિ. शुक्रशीघ्र फल सारिणी. | દર દર ૬૬ ૯૮૨ ૨૨ ૪ ૨૪ ર રરરરર રરરરરર૮ર - 3 | ૨૦૧૯૨૯ ૪૨ ૪ ૨૪૦૦૨ ૪૮૨૬ ૨૪ દ૬૨ ૨૪ રિલ 2 3 ૧ છે. ? ૨ ૨ ૧૮ T ૧ 3. લક ૨ ૧ ૪ વ ? || -૬૯ ર૧૨૧૨૨૨૨૪૯.૨૮ ૨૦૦ છે ક બક ૨૬ક ૨૬૦૬૨૨૬૯૨-૨ કિ જ રદ ક૨૬૨૨ ૦ છે. રરર ]]ટર તરીકે ૧૯૬૪ ૨ રિલ ૧ કિકદ કરી ? કks 18 Jકદ ૧૮ ક૩૨૦ ૨.૧]૨૦૨૨ ૨૨ ૨. દરદ ૨૦ ૨.૭ ૨૭/૧ ર * . . . . ० २ . ० १ . . शुक्रशीघ्रफलसारिणी. श्रफी, ७५/७६७७/०८०१२/०३/४५.६/0/cocciगध) ३०२०/३०/३१/३१३१/१२/३२/३२/३३/३३/१४३४३४/३५ (फ० १२ १२२५३/१४३६४६१६३७५-१९४०. ७२ જ૮૨/૨૪/૪૨. ४८३६२४१२. क. १ ३ ८९० ११ १२ १३ १४ २ ध. २|२|३|३|३४ २१४२२२२|४४५२६४६७ २८४१० २०५१ १५/१५/१७/१८ १९ २० २१/२२/२३/२४/२५२६२७२८/262 द १० ३३/१२/५४|१४|१५|५६/१७३८५०१८४०१ ૨૧૨ ૨ २०३१ २२ २३ २४३५/३६/३७३८/ ३४०४१/४२/४३९४४|" १०१० ६।११/११/१२/१२/१२/१३/१३/१३१४१४|१४११५ २४४५/११/२६४ २८५०/१.३१५२१३/३४५४१५ ४५४६४७ec५०५१५२/५३/५४/५५/५६/५७/५५५० |१५|१५|१६१६१६१७१७१०/१०९८१९१९१२/२०/२०२० (૧૮૨૮૨૦ ૨ ૨ ૨૨૪૨ રિકકિદી દારકિદ} शुक्रशीघ्रफल सारिणी. 6 ७ . . . . . . . क. . .. . घ. ८ . ० હરિ ૨હરૂરલ હિદારીee ૨ ૨ - २५/२५/३५२६६२७२७३७३५/३६३८३८३२टे १९२५७१६/३६/५५९४२३२/७१ १२/२४२६४८. १२२४|१६४८. |१२२३६४८८ १ २ ३ ६ ७ १०/११/१२/१३/१४/ १ ૨ ३३३ ४४ १८३०५७/१७३६/५५/१४/१३५२१२३१/५०१० १५/१६/१७ १८ १९ २० २१ २२/२३/२४२५/२६/२७/२०१२ ४ ६८ ७२५४५४२४४३२२२/४० १८३८५७/१७ २०३१३३४३५९६७३३४०४१४३८३/१४. १./20/10/११/११/११/१२/१२/१२/१३/१३/१३/९१० ५५५१४३४५२|१२|३१|५०/११८४८७२६४६/५ ४५/४६/४७/५८४५०५१५२/५३/५४५४५६/५७५६५८६. ५५५५१५१५१५/१६/१७१७१७११८१८ ४३/२/११/११/१८३४/९७६५५४३४५३ . ० . .
शुक्रशीघ्रफलसारिणी. ० . D ० धन ० . . ८ . . દર ૨૨ ७ . मिका १०५/६७ ९ १० ११/१२/१३/१४/१५/१६/१७/१०/२१ गधा ४.४०/४०/४०४१४१४१४१४२४२१४२४२१४३४३/४३ फ०१२ २७/४२५७/१२/२८४३/५०१३/२८४४५९/१४/२४४४६२ १२/२४/३६/४०० १२/२४३६४ १२/२४३६/४०२८ | २ ३ ४ ८१०/११/१२/१३/१४/१५ १ २ २ २ २ १६/३१/४६/२१७/३२४७२१८/२३/४८ ९६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७२८२९३० ५ ३/२८/३४|४|४|१९|३४|५० ५२०/२५/५०६/२१/३६ ३१/१२/२३/२४/३५/३६/२७१३८/२९४०४१४२४३४४४५० |१०|१०|१०|१०|११|११ ५१/६/२२/३७५२/७/२२/३८१५२/८/२२/२८५४/८२४ ४६४७४८४५०५१/५२/५३/५४५५/५६/५७५८५६५. १११११२|१२|१२|१२/१३/१३/१३/१३/१४१४१४१४१५ २५८२०२४४०५५/१०/२६/११/५६/११२६/४२/५७१२ शुक्रशीघ्रफल सारिणी. का १२०/२१ २२ २३ २४ २५ २६१७१८२२३०/३१ २२ २३ १३४/गन्ध ४४४४४४४४४४|४४४४४४४५/४५४५४५१५४५४५ १६/२५/१३/१२/५०/५८७१५२४२२१०४५७ २४४१२३५ २४|४१२३६ २४४१२१३६ क २ ३ ६ १० ११ १२ १३ १४ ? १ १ ध. ८/१०/२५/३६/१२/५०५२/७१६२४/१२/४१४६५८ १५ १६ १७ १८१८/२०२३२२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २४ '२ २ ३/३/३/३३४ १५/२३/२१४०४८५६/५/१३/२२/३०/३४७५५४ २०/२१/२२/२३/२४१५६२७३७३/०२/१३४४/- . फ . O . . १ . . ० ० ૨ २ . ० . १२ २०२८/२७४६/५४ २१११८२८/३५४४५३१ ४५४६/४७/५८स्ट५.५१/५२/५३/५४५५६५७५६८. ७ ८ १८२६३५/४२५२ ८१७२५|२४|४२५.५१७१५२८ ६. १ . a . . . . . . ० १ . . शुक्रशीघ्रफलसारिणी. श्रको १३५/२६ २७ २८ २९४०४१/४२४३/१४१५६/४७ नगध ४६४५४५/४५४५४५४५४५४५/४५१४४/४५४४४४१४५ फ. ५८५१ [४४/३७३.२२/१५८ ५४४६३९३२.२५/५४ ४०२६/२४११२. ४८२६/२४१२ ४८३६/२४/१२१३८ क. १ २ ३ १०११/१२/१३/१४ १ १ ७.१४/२२ २८३६५३५०५५१२१८२६३४२ १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३/२४२५२५/२७२८२ १ १ २२२२२२२२ ३ ४८५५ [१०१७२४/२१/३४६५२/० ७१४/२२२ २० २१ २२ ३३ ३४३५२६२७३९३४०४१४२४३४४ ३/३/३/३४ ३६ ४३५० ८.५१३:४२८३४४१४८५५/२/१०/१५ ४५४६/४७४८१४८i.i७१/५२/५३४५४५६/५७५०/५९६० र ६६६६८/६/६/७ २४ २५ २८१७६/५२00४२२२८ ३६ ४३५०५८ ५ १२ शुकशीघ्रफल सारिणी. . ० o क. ० . १८२१२४१५७|१०४२७/५०/३/१६/२०४०५६/१२/२८ १२.२४/२६४८ ०.१२२४६४० १२/२४३६४८५३ ७१.११/१२/१३१४ १ ५४४११२८१४१ ४८३५२२.८५५ (१५१५९७१८१८२०१२१/२२/२३/२४१२५/२६/२७२८२ . ११|१२|१३|१४१४|१५|१६/१७/१७१८१/२०/२१/२११२२ |४२/२/१५/२४५३६/२३/१०५६/१३/२०१७४५०२७ 2017/१२/२३/२४३५/३६/३७३०३८४०४१४२/४३/४४ २३/२४/२४ २५ २६२७/२०/२२५३०/२१/११/१२/२३/३४ |२४|११५४४४३११८५/५२/३०२५/१२/५८/५८/१२/१९ 11५/14/01/५.५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५०५८) ४०/१/४२/४२१४२४४४५/४६४६|| ४७१४ ४८ ६७ ) ३२६, . ६. IP a शुक्रशीघ्रफलसारिणी. अपरि६५/६६६७/ ६८७०/०१/७२/७३/७४/०५/०६/७०७गका फ०१२/२०/२८२५/२२/२१/१/१०/१५/१२/१० ६४२ २६/२५/१५४५४४४२३२३/१२/२१५२/४१/३१/२०१० દર૯િ.૪ २६/१२/४८२४. २६/१२/४/२४ १ ३ ४ १०/११/१२/१३/१४. १.१३/१५१७१२१/२३/२६/२/२० १०/२१/३१/१२/५२/२१३/२३/२४१४४५४५१५/२६ १५/१६/१७१८१/२०२१ २२ २२२४२५२६/२७/२८ २. (२२/३४/२६/२६/११४३४५४७४८५२/५४/५६/५०६०/६३ १८२८३८५१०२०३०/४०५१/२ 1३० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७/२८३८४०४१४२/४३/४४ ५.७६९७१७३/७६/७१०२४६८१/२३/८५ १२/२२/३३४३/५४४१४२५/२५५५/५६ ६१७/२७/२८ १५४६/४७/elec५०/५१/५२/३/५४५५/५६/५७/५:५८/६. ફિલ્ટર-૮૦૪૪૩ દરબૂ????????? |४८५८८२२०४०/५. १/११/२२:/२२४२५२/२१४/२१ 0 ० . . अंत्यांकफलसारिणी. कारवादजाना ७०/७१७५७६०८१०६गफ १ १ २ १ फ. २०२० १०/2010 घ.ध.ध.ध.प.ध.प.ध.ऋऋऋऋऋऋऋ. १ २ ३ ६ १०|१९|१२|१३|१६ १ १ २ २ २ ३ २ ट ४ २०४० २०४.1. २.६. . . MOVI क . घ १:१६/१७१०/१२/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२०/२२. ८ . २० ० ० " . २०४०1. २०६. २०/२१/२२/२२/३४२५/२६/२७/३/२०१५२/२/४४ |१०|१०|११/११/११/१२.१२/१२/१३/१३/१३/१४|१४|१४ २०४. २०६० २०१० १५६रस्टाप ५१५२/५३५५६/५७/५न५. (१५/१५/१५/१६/१६/१६/१७१७१७/१०/१८१९८१-८२. . २० . है .
अंत्यांकगतिफल सारिणी. व्यको १६६१६६१६७९७४७५/७६७७७८१७०९८० १० १३/२७/२०/२२/२७/३०/३३/३५/४०४३ ४०३२/१२/१२/३२५२/१२२२५२१२३२५२१२३२/५२ घ.क्र.ऋ...ऋऋऋऋऋऋऋऋ.. क. १ २ ३ ५ . . a . . . . . ० ० - १०१३ १७२०२३२७/३०/३३३७/४०४३४७ १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६/२७/२८ २९ १ ? १ १ १ १ १ (१.१३१७/२०२३/२७/२०२२२७ २०/२१/३२/३३३४३५२६/३७३८३४१४२४३/४४ १ १ २०२२ २ ૨ ૨ २ २ २ १० १३१७/२०/२३/२७ ४५/४६/४७/४८४५०५१/५२/५५४५५/५६५७५५८६१ २ २ २ २ २०२२ २ २ . शुक्रमंद फल सारिणी. S|१० ११ १२ १३ १४ गफ- १ ૨ ३ ६ ७ . . ० . . . . . . ...... . २ ४ ७ १२.१४१६/ १२१२४२६/२२१/१२/२ २५४८९२३६.. २४|४१२/२६ २४|१०|१२५/२५ ३ ५६७ १०/११/१२/१३१४१. .. क. ० २ ७ . १० १२ १४/१७/१८/२२ २४ २६/२८/२९ ३४ ૪૬ ૧૯૨૨-૨૩૨૨૨૪૨૨૨૭૦ રડી . ८ . १ કાકા ૧/૪૦ કિલો २ २०२७/२२२२२४५५२७२८२४४०४१४२४३४४: १ १ १ १ १ |१२|१२|७||२२|२४|२८|२८|२४|२६/११/१३५ 11५/५६/५/५०/४०/५/५२/५३/५४५५/५६/५७/५८/५/६॥ २ १७१८२/२६ २ C६९) शुक्रमदफल सारिणी प्रका१५/१६/१७१०१०/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२ गस्त . . . . १ १ फ. २६२८४०४२४४४६४८५०१५२/५४/५६५८ २. ५ ४२ . . ० . . 0010100 १ ३ १०/११/१२/१२/१४ . 0 ० . . 0 . धन . २. १०/१२/१४/१६/१८/२०२२/२४.२६/२८ १५/१६/१७/१८ १९ २० २१ २२/२३/२४२५२६/२७R ० . . . . . ८ ८ ५ ८ ३०/३२/३४/२६/२०४०४२/४४/२६/४८/०५२/५/५६५० २०३१२२/१२/२४२५/३६२५/३०/२०८१/८२/४३४४. १ १ २ १०/१२/१४|१६/१०/२०/२२/२४/२६/२८ ४५/४६/४७४४८५०/५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५८/५८६. १ १ १ १ १ ? १ १ १ १ २ |३०३२/३४/३६/३८४०१२८४४६१८५०/५२/५४१५६५० शुक्रमदफल सारिणी यिका३३१२ ३२४५२६ २७३८३८४०११४२४३फत १ १ १ १ (१०/१०/११/१२/१३/१४/१४/१५/१६/११० ४३५२४१२ ४०२६/२४/१२ ८.६/२४/१२/20 क. १ २ ८ १.११/१२/१३/१४ १ ६ ट 0 . ہم وإما با می O . . ० ८ . . . 10. १ २ ८ ८१.१.११ . १५/१६/१७/१०/१२/२०/२१ २२ २३/२४२५/२६/२७/२८२८. . . . . . . . . G . . . . १२/१३/१४/१४/१५/१६/१७/१८/२८/१२/२०/२१/२२/२२२२/० २०२७/२२३४ २५ २६ २७३८२४४०४१४२८२९६ . ०० . . ० . . . २४/२५/२६६/२७/२८/२/३.३.३१२३३/३४/३२५ દિદાજિ૮ જા.) 12/૨ કાઉદીકિ . ० 0 . . २५/२७/२८/३३५.४१.२२/१२/५३४४४५८६६५८ Raja शुक्रमदफल सारिणी ८ सिका ४५४६/४७४८४५०५९५२/५३५४५५५६५७५६ र १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ फ. १८११८१८१२१९२०२०/२०/२१/२१२२२२२२२२२३ २४४८१२३६. २४ ४८१२/३६ . २४४८११२३६२४ कि. १ ३ ४५ ६७ ९. ११/१२/१३/१४० ८ . . P . ७ ० . ध० o ० १ १ ६ १५/१६/१७ १८ १९ २० २१/२२ २३ २४/२५६२७/२८२ . . ० ० . ट ८ १०/१०/१०/११/११/१२/० २०३१३२/३३/३४३५२६२७३० ३४०४१४२/४३४४ . प . ० १२ १२ १३/१३/१४|१४१५/१५/१५/१६/१६/१६/१७/१७१८० ४५४६/४७/४८४५०५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/५८५२६६ . . o . a . शुक्रमदफल सारिणी. सको ६/६२/६३६४/६५/६६/६७७०७१/७२|७३/७४गफ १ १ १ १ १ १ ? ? १ १ १ १ १ फि०२४२४१२४१२५/२५/२६/१६२५२७१७२-२८२८२९. २४.४८११२३६. २४४८१२३६२४ कि. १ २ ३ ४ ८१.१११२१३१४. . O . . . . 0 . . १ २२ २०३२ ४ १५ १६ १७१८४/२०/२१२२/२३/२४२५२६/२७/२८२ . . . . . ० . ८ : C ८ ७ एटा१०१०१०११ ११.१२.. १० २१/२२२३/२४२५२६२७ ८३४०४१४२४३४४ . 0 B ० . . . ८ १२१२११३१२११५११४१४११५:५/१६१६/१७१७ ० ८ . . ८ . . ८ . . १८१८१८२८२.12.12.२६१२१.०२२२२/२ २३/२४/२५ ( ७१ ) शुक्रमदफलसारिणी. यिका-७५/७६/७७७८७८०१८२-३४८५-६७टग. १ १ १ १ २०३०/२०.३०/३०/३०|३०|३०|२०|३०1३०३०२०/३०३. ० क . Smoo. . . ||vo . ० ० . . १ २ ८ १० ११ १२ १३ १४ . . ० . . a . . . ध० ० ० a . o 0 . १५/१६/१७/१८ १९ २० २१ २२ २३/२४ २५/२६/२७२८२८ . . . 0 ० ० .. .. ..| ० ० ५०० ००० ० O . . c ० ० २०/२१/३२/३३/२४/२५ २६ २७३८३९/४०४१४२४२४४. 0 . . Poo . ० . . ० ०० .. 0 ० . . . . ० ० . . १५/४६४७४८४५०/५१/५२/५३/५४५५/५६/५७५८५८६. 0 ० ० . . . . 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मी श . . . . औमादिमंदोच्चम् मंदफल. भौमफा मंदोच्च राशी ४००० इ- स्मेसे दल संस्कृत भौम:८३१२४ २ कमकिया तोबाकी १०।२१॥५६॥३६ यह भीमका मंदकेन्द्रभया इस्का जा३१२४ इस्के अंश ३८।३।२४ हैं. इसवास्ते इहा भीम मन्दा लसारिणी कोष्ठक ३८ इस्के नीचेका अंक ७।१११३६ अबअंशके नीचे कला है इसवास्तै ३कला विकला कोष्ठकके नीचेका फल कलादि। अब अंशकलाके नीचे विकला२४ है इसपास्तै २४ कला विकला कोष्टकके नीचका फल विकलादि१२८ एकत्र करके पूर्व फलमैं युक्त कियातोयह ७।१२।१४ सौमका मंद फल भया.यह मंदकेन्द्र तुलादि क है इसवास्तै ऋणतोयह मध्यम भीम ५।२२।७।२४ इमैं कम किया। तो ५१४॥५५॥१० महमंदस्पष्ट भीमपया इसीरीतिसे युधादिक यहा करना+अब यहि मंदफल १२॥१४ विपरीत कहियें धन इसवास्तै । प्रथमशीप्र केन्द्रो१२।४।३२ इस्मै सुक्त कियातोहा२६।१६।४६ य- ह कौनका अंतिम शीघ्र केन्द्र भया. अंतिमशीघ्रफल. यह केन्द्र षडाधिक है इसवास्तै १२मैं पतित किया५।३।४३।१४ यह हु- वा अब इस्के अंश१५३१४३।१४ इसका पूर्वोक्त शीघ्र फल सारिणी कोष्ट- क १५३ का नीचेका अंशादिफल ३४॥२५॥१२ वह अब अंशके नीचे कला ४३ है इसवारी ४३कलाविकला कोष्ठकके नीचेका फलकलादि ३४१७ यह अंशकलाके नीचे विकला१४ है इतवास्तै १४कला विकला कोष्ठक मेंका विकलादि फल यह सबफल ऋणसारिणी में लिरवाहै इ. सवास्तै प्रथमजोफल ३४।२५।१२ इलेकमकिचातो ३३।५०५४ यह अंतिम शीध्रफल भया यह केन्द्र तुलका है इसबास्सैऋण मंदस्पष्ट भीम ५।१४ १५५६१० इस्मैकम कियातो ४।११।४।१६ यह स्पष्ट भौम भया. सौम शुक्र अंतिमशीन केन्द्रकानंश१६८२८० सकारने हँजद उस्काशीग्रफल लेनेके खातर और उदाहरणकहते हैं मंगल का अंतिमशीघ्र केन्द्रका अंश१७०।२०।२९ कल्पनाकरके अब मंगलशी प्रकेन्द्र सारणीमें अंत्यांक सारिणी १७० अंशके नीचे प्रशाद फल १०. यह अव अंशके नीचे कला. इस्काफल ४०१० पीर क- लाके नीचे विकला २१ इस्काफल २४ एकत्र करके ११४ इस्कोपू विमें लियोजो फलसोसारणी धनालिरयाहै इसवास्ते कला विकला फल युक्त करके ११४१४ यह फलकेन्द्रकाबससे ऋण धन प्रहमें करना गत्युदाहरणम्. भीमका अंतिमशीपकेन्द्रका अश१५३ न्यायाहै इसवास्ते१५३ को एफकागतिफल ७.३८ कलादिधनयह औरमंदफ़ल सारिणीकोष्टका २८ इस्कागतिफल ५।३६ कलादि यहमंदकेन्द्र मकरादिक है इसवा तो अगसो पूर्व गनि फलमें घायातो बाकी २२ यह घनफलआयाया ही मंगलकी स्पष्टगनिभई इस्फे प्रमाण ऊपरके सारिणीपरसे स्पष्ट इधरान शुक्र शनि इनकी स्पष्टगतिवनावना. राहूजी मध्यमहै वही निसर्पदास्पष्ट समझना विशेषयह उस्में ६ राशीयुक्त करनातो केनू होताहै। श्लोक. जगदीशनरचिते केशवीग्रंयटिप्पणे।। स्पधाधिकारपूर्णग्निद्रापार्यप्रकाशकः ।। इतिस्पष्टाधिकारः भोमादिकोंका द्वितीय शीघकेन्द्रांशपरसेअस्तादि जाननकाप्रकार त्रिनपारजिष्णुशिशरार्नगपतिवैक्रमातु-जाद्याः॥ चलकेन्द्रलवैःप्रयांतिवकंगणात पतितेजतिमार्गम् ॥ क्षिपिनीष्टयमेरुदेतिपूर्वगुरुरिन्द्ररविजस्तुसप्तचन्द्रेः ॥ खस्योदय मागसंविहानागाशैरपरद्रयांतिचास्तम् ।। खारेग्यजिन परज्ञातृवारूदपोस्तीग्दादिनेगाद्रिभूमिः ।। उदयोदानग्यहीन्दुजि मागस्तीदिग्दहनैश्चपटमुरैस्यात् ॥ तीसाः- यनिगशीघ्र केन्द्र के अंगकमरोशोगका : वुधका गुरु शुक्रामा १६ गनिका ?१३ इतने यंदा होयतो कमसेवफ्रीमदती निगराने सोम घर.५ गुम१३५ शुक्र शनि ४७ इन निगशी केन्द्र गंगडीयनोकगनवग्रह मार्गी होने अंतिमशीघ्रकेन्द्रकेअंशक्रमसे भीमका२८ गुरुका१४औरशनिका१७ होय तो भीमगुरुरानि इनकाउदयपूर्व में होताहै: और अंतिमशीन केन्द्रके शअनुक्रमसे १३२/३४६॥३४३ इन्ने होयतोभीमगुरुशनिइनका अस्त पर थिममें होताहै.और अंतिमशीघ्रकेन्द्र के अंशयुर्घका५० शुक्रकार४ महहोयतो दुघशुक्रइनका पश्चिममें उदयहोताहै.और अंतिमशीघ्रकेन्द्र के अंशक्रमस ||१५५४१७७यहहोयतोबुघशुक्रइनका अस्त पश्चिममें होताहै.और अंतिमशीमा केन्द्र के अंशक्रमसे२०५।१८३ यह होयतोबुघशुक्रइनका पूर्व में उदय होता है। और अंतिमशीघ्र केन्द्रकै अंशक्रमसे२१०१३२६ यह होयतीबुघशुकइनन कापूर्वमें अस्त होता है. वक्रोदयादिगदितांशकतोऽधिकाल्साकेन्द्राशकाःक्षि. श्लोक तिसुताविरुणास्त्रिशक्ताःसांकांशकादशहतांगहताःकु- टीकाः-ग्रहोंकावंक्र- उदय-अस्त-मार्ग इन्होंके जो अंतिमशीन केद्रांशका है हैवह उक्तशीघ्र केंद्रांशऔरअपीट शीघ्र केन्द्रांश इनका अंतर करके अंतरांशक्रमसे भीमकादूनाकरला और बुधको३सेभागदेना गुरुको १० से गुणके से भाग देना और शुक्रको१ से गुणकैसेभागदेना औरशन निको से भागनातोभागाकार आवै सो वह दिनक्षया अनंतरउक्तशीघ्र किन्द्रसेअभीष्ट शीघ्र केन्द्रोश अधिक होयतोवक्रउदय अस्त और मार्ग यह होयक उतने दिनभये ऐसाजानना.औरजोउक्तशीघ्र केन्द्रसेअभीष्ट केन्द्रों शकमती होयनो वक्र-उदय- अस्त औरमार्ग पह होनेका इतने दिन आगे होगा ऐसा समझना. रदगारस्पष्टाःतजवाः हाचं बुरशु: शराके. लकोयल १० २६९३ ५६|33 ४५ ५८७३१ १४.५.ब.५४ ४४२६२/३८ १९ लग्नबनानेकेलिए लंकोदयसे स्वदेशोदयल्पादने कि रीति ।। लङ्कोदयानागतुरङ्ग-दना२७८ गोङ्कापश्चिनो श्लोका र रामरदा ३२३ विनाडयः ॥क्रमाक्रमस्थाश्चर खण्डकै स्वैःक्रमाक्रमस्थाश्वविहीनयुक्ताः ॥ लंकामें मेष राशीकाउदय२७८ पलवषारोशीका उदयटर पल.मिथुन c २ ४ .४ ११ ११ २१ २४ १० ३१ 2 २t ए १६ ८ ट ३ ३२३ २८८ २ ११ ( ४ ) राशीका उदय ३२३ पल- कर्क राशीकाउदय ३२३पल सिंह राशीकाउन दय २९९ पल कन्याराशीका उदय २७८ पल रहता है और लंका तुला राशीसे मीनराशीतंक उदयके पल कन्या राशीसे उलटा भेषराशीतक. लिखाहै सोजानना.जीस देशका उदयकरना होय उसदेशकाचरखन डालेके क्रमसेमेषरष मिथुन इनका पलात्मक जोउदयउस्में कम करना और वहीचरवंडा उलटा कर्क सिंह कन्या इनकाजी पलात्मक उदय उस्में युक्त करना तो स्वदेशकाउदय मेघसैकन्यातक होता है. और वहीउदयउन लटा तुलासे मीननक होता है.. स्वदेशोदय वनानेका उदाहरण कहते हैं. दी-मेपका पलात्मक उदय २७८ इस्मेसे प्रथमचरखण्ड७० यह कम किया तो०८ यह पलात्मक स्वदेशका मेषकाउदय रातका पलात्मक | उदय२८९ इस्मैद्वितीयचरखण्ड५६यहकमकियातो२४३यहस्वदेशकाटषका उदय मिथुनकाउदय २२३ इस्मेतृतीय चरखंड २३ यह कमकियातो३००यह भियुनकास्वदेशीउदयकर्ककाउदय ३२३ सिंहकाउदय कन्याकाउन दय २७८ इनसमैं क्रमसै २३॥५६॥७० यह युक्त कियातोक्रगसे कर्क- का३५६सिंहका ३५५ कन्याका ३४८ यह पलात्मक स्वदेशकालग्न नाअब यहउलटे रीतिसे तुलाका ३४८ रश्चिकका३५५ धनका३४६म- करका २०० कुंभका२९३ मीनका२०८ यह पलासकस्वदेशफाउदय भया लग्नबनानेका प्रकार कासका भाजाबमा तात्कालाक सायनास्वोदयना १-४३०२/२०० भोग्यांशाः खन्युट्टता होग्यकालः बजझिएवंयातांशैवेद्यानकालो न्या ठयोध्यो सीएनाडीपलेयः । तदनुनहीहिग्रहोदयांश्योपंगगनगुणनमशुद्दढल्लवाचम् ।। महितमजादिग्गृहरशुद्धपूर्ववतिविलनमदोयनांशहीनम्।। नौग्यतोल्पेष्टकालात्वरामाहूतात्स्योदयाप्तांशयुग्मास्कर स्त्याननु निशिनुसपनाकत्स्यिान्तनूरिष्टकाल: ॥ दिसा-जिमकालका लग्न करना होय उसकालका स्पष्ट सूर्य करंकार स्मै अपनांशा युक्त करनाजोयंक यापैउस्मेसेरामाकासांग करके अंगादिक फल रहिसोत होताहोरो भुक्त है गो३. यंशमें किमनरलेसे शादिनोग्यफल होताहै.अनंनर पूर्व में जिस राशिकारया स्वदेशकाल:
गकियाहै उस्मै १ युक्त करके नपरिमित राशीके उदयसे भुक्तऔर भोग्य गुणदेनाजोगुणाकारआवैउस्को३०से भागदैना जो भागाकार यावै सो क्रमसे शुक्तकाल और भाग्य इनकापल होताहै अवअभीष्ट घटिकाजों होय उस्कापल करके उस्में भोग्य कालका पल कम करनाजी शेष रहै उस्मेसे जिस उदयसे गुणन किया होय उस्के आगेके जितने पलात्मक उदयकम होय उतने कम करना औरजो पलात्मक शेपरहै उस्को ३० से युणकेजोगुणाकार आवैउस्कोजोउदयकमन भयाहो- य वह उद्यसे भागढेको फल अंशादि.आवेगा उस्में मेष रशीसे जिर वनाराशीकाउँदयकम भयाहोय उतनीराशी युक्तकरना-जोफल आवे उस्मैसेअयनांशाकमती करनातो अमीष्टकालका राइयादिलाहोताहै।- भुक्तकालसेलग्न करना होयतो अभीष्टकाल रखतेबरवतजोइष्ट घडी पलहोयउस्को मैंघटायकरजोशेषरहै उस्कोअप्तीष्टकालरखना भुक्ता घटायकरजबलग्न घटावै उसवखत उलटालग्नघटावैजैसेमेषकाउदय से गुणैतोमीनकुंमादिककमतीकरै और सब क्रियाशोग्यवत् करै.. रात्रीकालग्न करना होयती स्पष्टसूर्यमैं राशीयुक्त करना अनंतर पूर्वरीति प्रमाण लग्नबनावना परंतु अभीष्टकाल रखने बखतजोइष्टकाल होय उस्में दिनमानकम करकेजोशेषरहै सौ अनिष्ट रखना. जन्मकालोदयसे ३२ घटिकापल उसवखतका लग्नसाधनक रतात्कालिक स्पष्ट सूर्य००।१३।१०।४२इस्मैअयनांशा२२।४४।०३यह युक्त करके ।।५४१४५यहसायनसूर्य्य इस्की राशीसागकरके ५५४ यह भुक्तभयावह ३० अंशमैकमकरके अंशदि २४।०५।१५ यह भोग्य भयाइस्कोट्यागकियाजोराशीउस्मैं१युक्त करके रपके उदय२४३ सेगुण- कि अंशादिफल ५८५३ कला१५ विकला४५ इस्को३० से भागदे२१८५।३ ॥१५॥१५यहपलासकोग्यकालभया इसही प्रकार भक्तकाल साधनका रना अझैसूर्योदय से अजीए घटी २२ पल०१ इस्कापल कियानो१९२१) इस्मे भोग्यकाल १२५।३।१५।४५ यहकमकरके शेष १७२५।२६।४४।१५यह इस्में मियुनोदय २०० कर्योदय ३४६ सिंहोदय ३९५ कन्योदय ३४८ तुलोदय २४८ यह कमकरके शेषर-पल इसमेंरश्चिकोदय कमहोतानहीं इसवास्तै शेषपल इस्को ३० गुणके नीचेका अंकर युक्तकरके०६६यह इस्को रनिकोदय ३५५ सभागदेके अंशश्लब्धभयाशेष१५६इस्को से गुणा जोर३६ इस्मैकलायुक्तकरीतोयहर४०४ इस्को३५५ सैभागदनेसे.
कला२६ शेष १७४ इस्को ६०सैगुणानो१०४४० इस्में विकला१५युक्तकि
याती १०४५५ यह इस्कोरश्चिकौदया ३५५ सेभागदेनसर पिकलाप्राप्त
भई अब पूर्व में प्राप्तभया अंशादि ०२।२६।२८ यह इस्मै भेपादिशुद्ध पर्य
नराशी युक्तकियातो७।२।२६।२९ इस्मैं अयनांशा२२।१४।३ कमकिन
यातो राश्यादिक लग्नस्पष्ट भया. ६।४।२६ इस्मैघाशीयुक्त करी.
तो यह ००१९४२१२६ सप्तम भाव भया.
अभीष्टकालमें भोग्यकालकमनीनहोयतो लग्नबना
.वनेकी रीति...
पलात्मक अभीष्टकाल ३० सेमुणके उस्को सांयन ग्रहकीजोराशी हो-
ययहराशीके उदयसे भागदेके अंशादि फल आवैगा वह स्पष्ट सूर्पमें
युक्त करना तो इएकालका लग्न होताहै.
लग्नसेअभीष्टकालकरनेकीरीति
अर्कोग्यस्तनोर्मुक्तकालान्वितोयुक्तमध्योदयोडभीष्टका:
श्लोकः लोपवेत् ।यदितनुदिननाथावेकराशीतदंशान्तरहतउदय:
स्यात्वानिहत्विष्टकाल इनतउदयऊनश्चेत्सशोध्योधुरात्रात् ।।
टीका-लग्नमैं अयनांशायुक्तकरके जो अंक आवै उस्से भुक्तकाल करना.
और स्पष्टसूर्यसे भोग्य काल करना अनंतर सायनलग्न और सायनसूर्यो
इनके मध्यकेजोउदय होयउनका अंकलेके उस्में भुक्तकाल और भोग्य
काल इस्का अंक युक्त करनातो पलासक अभीष्टकाल होताहै.
सायनलम और सायनस्र्याएकराशीमें होयतोलग्नसेअप्नाटकाल
साधने.सायनलग्न औरसायनसूर्य इनकाअंतरेकरके उस्कोसायनसूर्यके
उदयसेगुणके ३० से भागदेनाजो भागाकार यावे सोपलात्मक अभीष्टका
लपलात्मक होता है .जोसायन सूर्यके अपेक्षासायनलग्नकमतीहोयतो
पूर्व प्रमाण साधन किपाज़ोकलासो६० मेसेकमकरनानो इष्टकाल होताहै.ऊ
परक हावैसाप्रमाणजन्मकालका लग्नाला ४२।२६ यह इस्मैं राशी
युक्त कियाती यहसप्तम भाव हुवा ०८।४।२५
नतोन्ननपूर्वकदशमचतुर्थ भावसाधन.
राने शेषमितंयुतंदिनदलेनान्होगशेयकं विश्ले.
श्लोकः
ध्यं खलुपूर्वपश्चिमनतंत्रिशच्युतंचोन्नत्तम्॥पसूर्यो-
नतपयुक्तरवितःपश्चान्नतादित्यतोयल्लंकोदयकै.
श्यलग्नमिवतन्माध्यंसपडूसुखम् ॥२॥
( ८७ अन्वयः-रात्रे शेपंवागतं दिनान युतं अन्ही दिनस्यगतवाशेष दिनदले नविश्लेण्यंखल्लितिनिथ्ययेन क्रमेण पूर्व पश्चिमन स्यात् तन्नतंत्रिंशतंचा पुनउन्ननस्यात् ॥ पूर्वोन्नतषड्युक्त रायिनः कोदयैर्लन्नमिवयलंग्नतामा यंदशमस्यान् एवं पश्यान्नतादित्यतः केवलाल्लिंकोट्यकर्लग्नामिवयल्लम तद्दशमस्यातसचापड्रागीयुक्तं सुखंचतुर्यस्यात् . भापा-दिनमें पूर्वनन दिनमें पत्रिमनत रावीमपूर्वनतरात्रीमें पश्चिमनत ऐ। साचार प्रकारका नत होताहै.मध्यरात्रि के अनंतरजोशेपरात्रहोयउस्में दिनार्द्ध युक्त करना तोरात्रीका पूर्वनत होता है. और मध्यरात्रके पूर्वमेंजो गतगत्रहो उस्में दिनाई युक्तकरना तोरात्रीका पचिमनतहोताहै औरम ध्यान्हके पूर्वजो दिनगत घटिका दीयवह दिनार्ध घडीमेंसे कमकरना तोदिनका पूर्वनत होताहै.और मध्यान्हके अनंतरजो दिनशेषहोयवन ह दिनाई मेंसे कम करना नो दिनमेंफा पश्चिमनत होता है.यहनत मे कम करनेसे उन्नत होनाहि यहंपूर्वनतकमकरैतो पून्निनहोता है और पश्चिमनतकमर तो पश्चिमोलन होना है.येनिनव्यायाहोपतोउन्नन को इष्टकाल कसना करके नात्कालिक य॑में ६ राशीयुक्तफ़रके लंको दयसे पूर्वरीति प्रमाणलग्नसाधनके ऐसालग्नताधनकर और पश्चिम नन माया होयतोनतको इष्टकाल कल्पनाकरकेत्तात्कालिक सूर्यमे लग्नके प्रमाणलंकोदयसे लग्नसाधन को तो दशम भाव होता है. दशम भावमें राशीयुक्त करेती चतुर्थ भाव होता है. टिप्पण:- बरोबर मध्यान्हमें जन्न होयतो तात्कालिकसूर्यदशम भाव होता है. अयवा बरोबरमध्यरानी में जन्म होयती तात्कालिक सूर्य चतुर्थ भाव होनाहि. उदाहरणम. मध्यान्हके अननरोप दिनइस्को दिनाई १६:२१इस्मेंकमकरके १५.४० यह पश्चिमनाया.इस्को मेकमकियातोपश्चिमोन्नन१४२० याः अवनत१५६४० कोइष्टमानकरतात्कालिमूर्य०।१३।१०।४२इस्नेय पनांशा२२॥५४०३ युक्तकरके ०१॥५॥५४६४५ यह भुक्तांशभयाइस्को ३. में कमकिया तो२४५६५ यह तोग्यांश भयाइस्कोलंकोदयदृषका मानबर सैगुणानो७२०२।९।४५ इस्को३०से नागदियानो २४०२ाट ॥४५ यह शोग्यकाल पलात्मक भयाइस्कोनन ९५५४० इस्कीपलर४० मकमाकियानो ॥२७॥५८४१५ इस्मै निथुनोदय ३२३कौदय ३२३ यहकमकरके शेष५३।२७।५०१५ इस्मै सिंहोदयरर कम नहीं होता इसवास्तै शेष५३को ३०से गुणातो १५९० इस्मैं नीचेकाअंश२७ युक्ता कियातो १६।१७ इस्को सिंहोदय२८८ सेभाग दियानोप्रशादि ५।२४ ||३८ इस्मैं मेषादिशुद्ध पर्य्यतराशी युक्तकरीतोपा२४।३८ इस्में अयनांशा २२/४४१३ हीन कियातो यह ३।१२।४०।३४ दशमायाइस्मै ६ राशी युक्त करीतोरा१२॥४०॥३४ यह चतुर्थ पाव भयाः शेषाभावसाधनसंघीऔरक्षयचयफल साधनम् . श्लोक अंशोव्यस्तखमस्ययमहतोयोज्यस्तनौद्दिच्युतोबंधी लेपिचसांगतास्तनुमुरवाः संधिर्दियोगोईितः॥शून्यसंधि- खुपनावगेखिलफलंस्याद्धावसंध्यंतरेणाप्तसंधिवगांतरंक्ष यचयं भावाधिकल्पेरवगे ॥३॥ अन्वयः- व्यस्तरवस्यव्यंशोभूय महता नो योज्यस्तदा द्वितीयू तृतीय भावौ भवतः विगतमस्तं यस्मात्यभात्तव्यस्तखतस्येत्यर्थः स एवयंशोहिच्युतोहाप्त्यांञ्युतो.भूय महतश्यतुर्थ भावे योज्यस्त- दापंचषष्ठ भावी भवतः एक गुणित युक्त पंचमभावः द्विगुणितयुक्तेपन तावास्यादित्यर्थः तेऽनंतरानीताश्चत्वारोजावा सांगताः षड्राशिसहि तास्तदाऽयमनवमैकादशहादशावास्युअपिचशब्दावनुक्त वोध- कोचवारीमावा प्रथमंसाधितास्तबोधमित्यर्थः अथ संधिः संधिर्दि योगोऽहिता हूयोर्योगो वियोगोऽस्तिो दयामः सनसंधिः स्याप्रथम भावस्याविरामसंघिहितीयस्यारामसंधिर्भवतीति। संघिसमेग्रहे| शून्यंफलं स्यातनावगेभावांशादिसमें अखिलं संपूर्णरूपफल ः पावाधिके ग्रहेसनिसंधि खगयो रंतरं जावसंध्यंतरेण भक्तक्षयान रख्यं फलंस्यात्तापाले सगेसंधि खगांतरं भाव संध्यंतरेणाप्त पाक्त सञ्चयाख्यं स्यात् नयोरवरोहारोह संज्ञाचस्यात् । अर्थभाषा. दशमफावमेंसे सप्तम भावकम करकेजीशेपरहेउस्का तृतीयांशलग्न नियुक्त करनाती दितीय भाव होताहे.वहीनृतीयांशदूनाकरके लग्नगेंयुक्त कर लो तृतीय भाव होता है और वहीतृतीयांश राशीमें फमकरकेजोशेष रहे सोचतुर्थ भावसे युक्तकरना.तीपंचम भाव होताहै.वहीशेपदूना करके चतुर्थ भावमेयुक्तकरनातोयष्ट भाव होता है अब यह भाव द्वितीयतृतीय पंचम यर राशीयुक्त करे तोक्रमसे अष्टम नव एकादश द्वादश और पूर्वोक्त प्रथम चतुर्थसप्तमदशम यह तन्वादि द्वादश भाव होते हैं। दीशायकोयुक्त करके उस्काईकरैती संधि होती है सो ऐसीग्रथम हि- तीयभावको चौगाई करतो प्रथम भावकी विराम संधिवीर द्वितीय साद. की पारंप संधिहोती है. इसी प्रमाण द्वादश भावकी संधि होती विशेष. यह संधिकरनेके वरवत भावोगरसेअधिक आदेतो उस्मेसे १२कम नहीं करना अथवा नाव होयतो योगकरनेके बखत के बन दलेमै १२ लेना नहीं संधितुल्प ग्रह होय तोच फलवा भावतुल्य ग्रह होय ती पूर्णफलबह भाबसेकमती होयता वह ग्रह से आरंशतधिकम- करनावाग्रह भाव अधिक होयतो वह ग्रहने से विरान संधि कराकर नाअनंतरजो अंतरव्यादेउस्को भाय मंधी अंतरसे भागदनातीग्रह भाव फल होताहै वहग्रहशाबसे अधिक होमतो क्षयअवरोह रफलम धवा यह भावसे कमती होयतो चय मारोहफल जानना. टीप-?- ग्रह यारंभ संधिसेकमती होयतो पीछेको भावका फल देता हैं और विराम संधिसे त्यधिक होवतो आगेके भावका फल देता है. टीप-२- चतुर्थ भावमेसे प्रघम भाव कम करके जोशेपरहै उस्का प. टांश प्रथम भावयुक्त करना तो प्रथम भावकी विराम संधि और दिन तीय भावकीयामा संधि होती है. और यह संधिमे यही पक्षांशयु- क्त करेती धन भाव होता है. इसी प्रमाण षष्टांश युक्त करने से संधि सह चतुर्य भावतक भाव होते हैं अनंतर यहि षांश १ में कमकरके जो शेयर है सोचतुर्थ भावमै अन्त करतो चतुर्थ शावक विरामतंधितक भाव होने है. अनंतर यह ६ पापको और संधिको ६+६ राशीक्रमसे युक्त करेतीपागेके सर्वजावसंधि सुगमरीतिसे होते हैं. उदाहरणम्. यह दशम भाव ॥१२॥४०॥३४ इस्मेसे सप्तम भाव०।९।१२।२६ कमकरके २।२।५८८ यह इस्कातृतीयांश १०१५९।२२१४० इस्मेलग्ना वाला१२॥२६५० युक्त करके ११४१ १४८१४० यह द्वितीय भाव या तृतीयांशकोदूना २०११५८०४५/२० इस्मेंलग्न हाल ४२.६२६१ युक्तक रके८११११२. यह तृतीयभाव भया यह तृतीयांश ११०५२। इस्की २ राशीमें सेकम करके शेष००।२८।।३७।२० यहइ. १२.४० स्में चतुर्थ भाव।१२।४०३४० युक्त करके १०१११५४९।११।२० यहपंचन |मभाव भया वहीशेप दूना ११२८।१।१४।४० इस्को चतुर्थ भावरा१२ ४०।३४।० युक्त करके ११।११४१।४८।४० यहषष्ठ भावप्नया अबदि तीय तृतीय पंचम षष्ठयह भावों में ६ राशी क्रमसे युक्त करतो अष्ट म नवमैकादशहादशयह स्पष्ट भाव होते हैं. लग्न ६ाटा४२।२६१० दितीय भाव ७।१०॥४१॥४८॥४० इनका योग १३।२०।२४।१४१४० इसका पई ६२५६१२.१०७१२० यह प्रथम भावकी विराम संधि और द्वितीयभावकी आरंमा संघि होती है इसी प्रमाणसर्वभावकी संधि करना. अथवा चतुर्थभाव १२१६०३४ इस्लग्नाला४२.२६० कम कियानो ३२२५८१८ यह इस्काषषां श०१५।२९।११।२० इस्सेलग्न वारा१२।२६। युक्त कियातो६।२५ || १२००७।२७ यही रीतिसेक्रमसे मुक्त करनांतो संधिकरंकर सहित चतुर्थ भाव होता पुनः षष्ठांशको मे हीन करना चतुर्थ भावसे युक्ती करना तो सप्तम भावतक संघिसहित होता है आगे पूर्वोक्तवत् . २ ३ ६ मा. ७ ७ ve २७ ११ ११ ૧૨ ५२/३४ ५२ ११ ४८ Tv9005 द . . . १२ १ २५।१० १ २ ३ ३ १२ २७ ११ २० २० ६ र क्षयचयउदाहरणम् जन्मलग्नमिदम्. सूर्य।१३।१०।४२यह निकट भाव सप्तम २६ इस्सेअधिक है इसवास्तैसूर्या यहाावकी विरामसंधि०।२५।१२।०७ समें कम करके १२१०१।२५ इस्की विन कला४३२८५ यह अंतर इस्को सप्तम ११, . काला४२११६पीर बिरामसंधिवांशु. चं.
८ १० १५।१२।०७ इस्काअंतर १५१२८१४१ इस्की भागीदारचक्रमिदम् विकला५५७१ इस्से भागदेके ०० १४६३३३ यह सूर्य भावफल भयायहफल सूर्य निकट. भांबसे अधिक है इसवास्तै क्षयजानना इसी प्रमाण सर्व ग्रहोंका भाव फैल करना इ. ग्रहशावफलचक्रम् मा २. श ६८ फ० क्षय चय क्षय चय चय क्षय जगदीशनरचिते केशवीग्रंथ टिप्पणे श्लोकः भावाधिकारः पूर्णोयंतद्भाषार्थप्रकाशकः।। इति भावाऽध्यायः टिप्पण- भावोनकः रवग: पूर्व संधिनारहित स्तदा ।। अधिकश्चेदिरा मारव्य संधे शोध्यस्तदंतरम् ॥ भावसंध्यंतरेणाप्तं तद्भावफलमुच्या ने क्षयंचैवतदाज्ञेयमेधिके ल्येचयं भवेत् ॥ १॥ अथदृष्टीसाधनाध्यायः रैवैकाग्निहिरववेदरामयमभूरवानानमेकादि- भेद्रष्टावर्जितश्यकस्यगुरुणाचेदुष्ठवेदेकता: श्लोकः । मनांकयमैसजानगगुणकामादिजाः संस्कृता- भागनक्षयरदिरखानललवेनाव्युद्धताहणावेत् ॥शा अन्वयः पश्यतीतिद्रष्टा दर्शन यौग्यो दृश्यः द्रष्ट्रावर्जितं दृश्य कस्यैकादि एकादिराशिपुशेषेपुरतेकान्नित्यादयोंकाः ॥३.२४३२.1१1०1००स्युत्त त्रिकोशेषेरवैन्य हित्तदिशेयेएक इत्यादि हादशोऽर्थातशून्यशेषेनं- शून्यकिस्ताएतेअंकामादिजाराश्यादिजा गुरुशनिप्तीमानाविशेषत्र्येन दिनिचेगुरुणादृष्टावर्जिनश्यकस्याष्टवेदेशेपेरुताश्चत्वारोंकास्युत्तदा पूर्वोन्नत्यर्थी मंदेनांकयमेरुवाश्यलारोंकाः अमृजानौमेन द्रावर्जिन हेश्यकस्यनगगुणेनेचत्वारोंकास्युः पूर्वकिानेतिकाव एंदराश्यादायकामुक्ता . राशामा६९१०१११२ राशाकानीकाअंकलेके अंतर करैजोत्यंतरावै उस्सेनीचे शामा मंन्याशा ६.६.६० जोभागादिकहोयतो गुणदेना फैर से भाग दिनापानो फलांक संस्कार करनामो ऐसाकागेकायंकजादाहोयत्तीयुक्ता करना पिछलामागाकोकमतीहोयतो पिछलायमें चटायटेना नौ दृष्टी हो- तीहै. बदूसराप्रकारहोगा. दृशाश्वमेकमकरकेजी गशीरहेंतीव्यंशादिकमाधाकरतोदृष्टीहोयऔर२ राशीवतोशाम ५ जुतफोतो हरिहीयोरनीन राशीरहेतोअंशांकिकन्याधा रिअंशानेश्चमेघवायदेतोदृष्टीहोचौरचारराशीरहतीमंशादिकानैमैं घयवै| दृष्टिहीय. रविचंद्रबुध शुक्र दृष्टी सारिणी. गिशिगंगा १२/१३ मिष १ २. C १० 4 6 ८ c . o 0 . . ४ ८ 20 30 o मियुर २ 0000000000000000sis २६/२०१२ का कर्क | ३० ४. . ३० ३. a [30 ८ ८ २३17 २० ८ . . . . १० . १ ८ 30 . ४३ टा " ३३८ ३. D कर ३६२५९२६ ३. 130 a धन २0७ २३ 3 30 . 130 30 3. 130 ब 0 او ووايه ده او 16 द . " . . . योर गशिरटेनोग्रंशादिकगारीहोयत्रीर६७.८ र रामावताराव्यादि कमशोधनांशकर पीछेमाधाकीतीही हायकोर १८-१...गशीवचैतीदृशीनहीं। हाय चौरमंगलकीरेजव३:७ रागीवचैतोयंशान घायदे जबष्टी हो और राशीवचेतोयंशादिकन्याधाकर फेर उनीमयाधाजोडेगर१५ जाई दृष्टी हो.और नीऊपर होयतो१०. दृष्टी होवलौर एकीकरेजवः, राशीवचनोन्यंशादिकन्याधाकर शामें१५ जोडदेती हीडीयौरचार राशीऊपर होयती शादिकंदणाकरे पीछे नै घावती दृष्टी होय.
और राशीऊपर होयतो अंशादिक प्राधाकरकरसहितकरैफेर मैं घटायदेतोदृष्टीहोयशनिश्वरकीदृष्टीकरीजबश्राशीऊपरहोयतोअंशादिक दूणाकरैदृष्टीहोयराशीट होयतोशामें ३०जोडैतो दृष्टी होय और २ राशी होयतो अंशादिक आधाकरै६०मै घटायदेतो दृष्टीहोय और राशी रविचन्द्र बुधशुक्र दृष्टि सारिणी. १५/१६/१७ १८ १९/२०२१/२२ २४ २५/२६२७/२०१२ . . . 0 a . . .. : ०००० • 000 ..... ...10 ... ... .. ० . ..of .. be गु ४ 00000 20 घ. . . . . . . . . . . . २ २३ ३ ४. ४ 3. ४ . . . २४ ........... १६३५ ३५३४ ३ ३३ ३३ ३३३२३१३१ २०/०/३०/०२.०३. . . . o . . . a २७ १५ २ ३ ३ ३ o ३ . AA PROv0/05 ob. 09 .1010 .. o १ . . . . . . . |...रशु ३४/२६/२०४०४२/४४/६/१०/५०५२/५४५६ ध. ॥ . . . . 010 ०/० la 10 . (५२/५२/५.५१५.५०४ास .10 2 U. ४७ १६ १५ 9. . . . ... ... I : . . . . . ३ २५ . २४२४२३/१२/१२/२/३१/३१/३. M W . . . २ " . .19 .. ८ . २० ८ . क १ AL .." ० १७/१५/१६/१५ 1.12..मा १ . . . ५ २ . .ro ... ३. ... ... ... .. . . . . .. .. .. ... ... परनामादिक दणाफराघदापना रहिहाय इतिहटान नामंग मिलकी भीम दृष्ठिः राशी अंशा. ३ ५ ट/१०/११/१२/१३/१४ M . . . . ० ० . . . 0 मिष. ० ० . . ८ . . 6 . . . ० . 0 . . . . . . ... . ० . . ० . हिष [१ ... ७ ३३४ ३०. ३० ० ० . . ० . . ० . . मि. ૨૫૬૪૮ રિરીક એ૨૮ ૨૨૧ ३३३४/३६ ० ३० . ३० ० . ३० . ० . . . . . o . के ५८५८५०/५५/५५/५४५३/५२/५१/५० . ० ० . . . . . . o 6 . . . सिंह ४ ૨૯ર૪૨૭૨૬૪૨ ૨૧ ૨૦.૨૯ १८/१७ १६ •/.../000000000000000000 . . . . ० . . . 0 ० . o . क . ० 2 ४/६/८।१० १२/१४/१५ १०/२०/२२२४/२५२८ .....09.1.200000.. 03002108/2013/0. 100000... ० . . . 0 . का १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ तुला o . . . . o ० .... . 0 ० . 0 ० ० . . 9 . . ० ० . . . ० . राश्य ७ ગુજs:૪૯૩ ५.४४४७४ 0 . . . ० . . . . . . ० . ० . . . ... 00 ० . . :10. . . . घन ८ २०/२८/२२८२८२२७२५२६/२७/०५/२४४२३/२२ ३० २. 3. ३० . 6 . 6 . . . . मक १५१४/१४/१३/१३ १२/१२/11/११० 110 ३. . . . ३० ३० . . . . . ८ .../ . . ८ क मीन " . . . 6 BE . . .
( सोमदृष्टी. १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६/२७/२०२८ . . . . . ८ ८ . . . . 6 . '० . ८ . . . क ८ . ८ ८ . . . . ८ ८ ८ . ८ . . . ७ ० क . ८ ० १० १० ११ ११ १२ १२ १३ १३/१४११४ घ. ३० 3. हान्या ३० . . . ८ . ८ Ca . ८ ० व. |२७२१०४२/३४५/४६४८४९५१५२/५४/५५/५७/५८ 130 ८.३० ३० २० २ . ३० 0 . ० ८ ८ ८ ३ ४५/४४४३४२४१४०३९३८२७३६३५/३४/३३/३२/३१ 1-001-2008- 0 . ० . . 0 . ८ . . ० . ८. . . ० १५/१४/१२/१२/११/१० •82.000000200.. ०० ० ० •ic.in क. ७ C ८ . C . . ० 0 . ० . ० O . २२ २२३४३५३८५१०४२४४४६४८१५०५२/५४ ५६/५८ घ. . ८ C 0 . C. . ० . १ १ १ १ . 6 १ १ १ १ १ . . . ० . . ८ . 2 ८ ८ ८ . . ८ Ca . c. . . . . ८ ८ 0 . . ० ८ ०२१ ४५/१४/३/१२/११/१०/२८/३८३७२६/२५/३२/३३२२/३१ पा . ८ ० U ० . ० 0 . 6 ८ . ८ G . ३. २० ० नाश . . ८ २४/२१/२०(२०११/१८/१०/२०१६/१५ (१५ ३. ३ .गु.१ ३ २ २१ १ (सा. ८ ० ० ८ ७ . - ६ ३९ ८ २० . ० .. so ८ . . . . . . 4 . . 0 . . . . ८ का . ८ . ८ . . . ८ . ८ , . . ८ ८ ८ . . . 4 .. . . ८ ८ . . . ... . , . क . . . . .
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नीचोनोक्षगणाच्यतःषडधिकश्वत्पड़हृदीचंबलं श्लोक-स्वक्षेईसमप्लेष्टमॉस्त्रचरणामूलत्रिकोणेवलं ।। मित्रधिरघीष्टक्षेत्रयइप्नांशावरिष्टयंशको- दंशांशीध्यरि भेट्रहादिपवसातवेदस्यसप्तक्यज ।।५।। सप्तवर्गविलमिदम्. स्वक्षेत्राऽमित्रं मित्रासमा शत्रु शत्रु मूलबिन अन्वया- नीचोनोग्रहश्वेसडधिको हादशराशिय शुद्धषंडूहतूउ चंबलंस्थान उच्चसंबंधीवलामित्यर्थः अत्रेदध्येयं उच्चोनग्रहशेषषरे राशिस्तदाषेडागेरूपवलंपूर्णवलमितिचेषड्भाल्पस्तदारूपस्थानेशून्य स्थाप्यं पुनः शेषराश्यादिकंपष्टथासंगुण्योपरिपडक्ता संल्लब्धंकलास्था निस्थाप्यः पुनः शेपंपटयासंगुणापड्रसिगिविकला स्थानेस्थाप्याए वंशाचमुच्चवलंस्थातु+ स्वःई मित्यस्यार्थः स्वःस्वगृहेनहेसति चईरूपावलंलेख्यमसमराशिस्थेऽष्टमांशोवलम् मूलत्रिकोणत्रय वरणाः मित्रचतुर्थाशोवलंअधिमित्रत्रयोऽयमांशाः शनुराशिस्थेषो इशांशवलं अधिशत्रुराशिस्थेदात्रिंशदंशोवलंस्यादितिसर्वत्रक्रियापदंस- वित्ररूपस्यैवा दिकग्राह्यं व्यत्रस्वामित्युपलक्षणंकिंतु स्वराश्यादि स्थितेउप्याई वलंग्राह्यकुतः इत्यतः याहग्रहादिपवसादिति यादिश ब्दाहोराट्रेप्काणादयोगाया यहादीनयांतियेतेहादिया ग्रहादि सप्तवर्गस्वामिनीयेसन्ति नहशाल्वःईमित्यादीनिखेटस्पसप्तवर्गी यलानि ग्राह्याणिसप्तानॉमेक्याज्जायत इतिसप्तैक्यजम् . मर्थ: जिस प्रहका अञ्चपलाना हाउसह उती उभी ग्रहकानीच घटायदेनाशेपको सेक्षागदेनातीउच्चसंबंधी यलहोताहै. कदाचित् शेष राशीसे अधिक होयतो१२ शाम टापर्क गपको ६से कागदेनापदिशेपठीक वती६ ताग पूर्णवलन्यनिरूपवल होगा जब राशीसे कम रहेगानबरा गीसेंसेशाग देनेसे वंशस्थानमें शून्य फल पावेगा पुनः रानीपोप से गुण देना यंशवूना करके पुक्त करना फिर से सागर्दना.जो पाविमो कलास्थान में ररवना. शेपको ६.
--- देना विकला दूनायुक्त करनासेभाग देना लब्धि विकला होगी अथवा नीच ग्रहांतरका कला करना १९० सेमागदेना नो कलादि सुगम रीतिसे उच्चबल होगा. अथवा नीच ग्रहांतरजो होय उस्को राशीको १०से गुणना अंशकला विकलाको २.से गुणनातोउन चबल होता है.. जाग्रह स्वगृहमें होय उस्का अई.३०० बल समके हमें • होयतो अष्टमांश।३० मूल त्रिकोणका होयतो चतुशिं त्रिगुणि तिला४५० मित्रग्रहकाहोयतो चतुर्थाश०।१५।० अधिमित्रका होयतो अष्टमांश त्रिगुणित।२२।३० शत्रुशहमें होयतोषोडशांश।३।४५ अधि- 1 शत्रुका होयतोवत्तीसावांअंश-११५२यहबलग्रह होरादि सप्तवर्गके स्वान मी के अनुरोधसे कहिये स्वामी अपने गृहमें होयतो अवलोर स्वामीसमग्रहों होयतो अएमाश बल इत्यादिजानना यह सप्तवर्ग- जबल एकत्र करनेसे ग्रहोंका सप्त योगजबल होताहै. टीप:- मेष वष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला राश्चिक घनमकर कुंभ मीन यह १२ राशीहैं. इस्मेसे मेष मिथुन सिंह तुलाधनकुंभ यह विपना राशी और दृषककन्याराश्चिक मकर मीनयह ६ राशीसमहोती 1. हैं:यह सप्तर्गग्रह होराद्रेष्काणसप्तमांश नवमांशहादशांश और त्रिंशांश होने हैं. १ यह राशीकहिये ३० अंश इस्के स्वामी पूर्वमें कहे हैं होरा कहिये राश्यई १५ अंश) विषमराशीमें प्रथम होराकान स्वामी सूर्य और द्वितीय होराका स्वामीचंद्र और समराशी प्रथमहोन राकास्वामी चन्द्र दितीय होराका स्वामीसूर्य द्रेष्काणकहियेरा शीकातृतीयांश अंश इसवास्तै यह तीन है.प्रथमदेष्काणकास्वा. मी ग्रहाधिप दिनीय द्रेष्काणका स्वामी ग्रहसे पंचमराश्य धिपत्तृतीय द्रेष्काणका स्वयहसें नवमराय धिप. ४ सप्तमांश कहिये राशीन कासममांश ४ अंश१७कला विषमराशी में अपने गृहसेरा शिके स्वामी क्रमसे सप्तमांशपती होते है. और समराशी में अपने रहके सप्तमराशीसे सात राशीके स्वामी क्रमसे सप्तमांशपती होने हैं. ५ नवमांश कहिये राशीका नवमांश अंश२० कला मेष सिंह धन यह यह होयतो मेषसेर राशीके स्वामी क्रमसे नव- मांशाधिपती होते हैं रष कन्या मकर यह यह होय. तो मकर राशीसैर राशीका स्वामी क्रमसे नवमांशाधिपती होते हैं. । ८ (१०६) मिथुन तुला कुंभयह राशी होयतो तुला राशीसेट राशीके स्वामी क्रमसे नवमांशाधिपती होते हैं.कर्क राश्विक मीन यह राशी होयतोका के राशीतर राशीका स्वामी नवांशाधिपती होते है. इहादशांशकहिये राशीका द्वादश भाग २ यश ३० कलासवरा- शीमेंस्वस्वरहसे १२ राशीके स्वामी क्रमसे हादशांशपती होते हैं। १५ बिशाशकेहिये राशीका त्रिंशद्भाग १ अंश विषमराशीमं प्रथम ५ अंशकास्वामी भौम मागे५ अंशकास्वामीशनित्यागेश- कास्वामीगुरु आगे ७ अंशका स्वामी बुध आगे५ अंशकास्पा शुक्र समराशीमें उलटे रीतिसे ५ काशुक्र का बुध कागुरु आगे काशनि-आगे का सौम यही रीतिसेजानना. होरालन्नम् द्रेष्काणलमय सप्तमांशक. ८ ७ शशु ८ १२ श . ॥ ३ . २ नवमांशकल. दादशशिकल. निशांशक ल. १०बु १२. ६ 3 ५ २ ४ उच्चनीचचराह मजरपामृगांगनाकुलीराझपवणिजौच दिवाकरादि सुंगाः ददाशिखिमनुयुक्तिथींद्रियांशोधिनवकविंशनितिच्यतेस्तनीचाः निसर्ग मैत्रीचक्रम्. . 3. विजय सू. बुचरमसुख वचम यु-शशु-बु मित्र चूत पशाणशु शमन्ट डा. मादा | युः । नंः ।.शुरनूचं सूचन्म शत्रु गार इ.समा ० and (१०७) जन्मलमम्. तात्काल मैत्रीचक्रम् मयुन शु. शग्रह! म मि . त्र र६ मं ४ १ १सू. ३श 44-4. शुश यात्रु शु बु१२ भूः ग्रहः 4-CA म.. मंत्र . . 0 चन पंचधा मैत्रीचकम्, चं. मं बुः ह. शुः ..गु. श. श . मित्रः च: सू.बु. दसू. शु. मं. दु. बुधिमित्र शु सू-बुः सुचाचं सू च सूच-शासू-शु-मन सम रम-श- शु. शत्रु बुः धशत्रुः वलाध्याय-उच्चबलसारिणी प्रवेश. सूर्यादि ग्रहोंका१२ राशीकोएकलिखके वहवह ग्रहके सामनराशीकोठा ककेनीचेरूपकलादिवललिखा है उत्से ग्रहकाजोइष्ट राशीकोष्ठक होयरस्के नीचेका फललेके राशीकोष्टककेनीचे ३० अंशकोष्ठकन्योर ६ कला कोष्ठक लिखाहै उम्मेसे ग्रहोंके जोइराश और कलाहोय उस्के नीचेकाअंशका कर लादिऔरकलाका विकलादि फलएकनकरके वहधन किंवाऋणराशीफलमें लिखाहै उस्केप्रमाणालियाजोराशीफलउस्मेयुक्तकरना किंवाकमकरनातोउन चवल हात्ताहै परंतुजव महोकी उच्चनीच राशीआदतीहैतवफल लेनेकीजुदीरी, तिहै सोऐसीकिपृयकू पृयग्रहोंका उच्च राशीफलमै उत्तोच्चांशलिखे हैं उतने शनकमात्रवह फलअंशादिधनन्यागजोअंशादिअधिकत्यावे उतनाअंशादिकोंका सारिणीमेंकाफललेकेदहऊपरकहनेकेप्रमाणउच्चराशीफलमेनयुक्तकररूप १)वलमें कमकरनाना उच्चबल होताहै.तैसेहीनीचराशीफलमै उक्तनीदांश लिखे हैं उनने अंशतकमात्रवह फलऋणयागेजोगादिअधिक आवेटनना अंगादिकोंका सारणी मेंका फल लेके वह ऊपर कहने के प्रमाणनीचरान शी फलमें कमन करते जो फल पावे वही उच्चवलं जानना.
उच्चफल सारिणीराशीफल. रा- १ ३ ५ ११ रा. १. Poscil UP o 6 . ० क ध.२०२०/२०/२०-२००ऋ४०१.१०.४.ध-०७४.! . .. 0 . . पं . ० १ १५ . . . . २९/३चं ..................ध.. म. 1३८ २२१.०० १० २० ४० ५.७५ ४. २०-२०२०-२००४०४०५४.४.१.२० कास्क ५ ....ध.....-.-.-.--.क. . ० • . 0 २५ ०१..पा 0 0 . २८ . शुः |५९ o . . शर D . |२८ ४८,५० २१ २१ १८ २०५.२०७-०५/२०-४०-४०००-१०-२०३.२०५. . ४२८३ १ ३१ ४१ शु. ऋ.०३.०ऋ----मह..ध....ध..ध.ध. . २३ ३३ ०५.२.२.२.२०-२.५.२०५४.ऋ...न/-४० मशफल. १ २ ६ १०/११ [१२१३ १ १ १ २. २ ३/३ ३ ४ १. ४ ४ ५ २. ४० ४० २०६० २० २५९७१८ १९२० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७४२८२८ ३० ८ . , ९२१५ . ० . २० कलाफल. १ ૨ ३ ट . . १ ។ २. २. ३ . २. ५० . २० १० ३ २०४० . 0 ४० १५/१५/१५१८२० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ ५ . ० . 70 . २० २० २० १० २१२१/२२२४५२६३५३६१६४०२४२१४३ ११३।१२/१२/१३/१३/१३ १४।१४ १. ४०० २० ४६/४७/ ४८५.५१/५२/५३/५४/५५/५६/५७/५१५ 1५1५/१५ १६:५१ १०९७१७ १९८११. २. . . . . . 4 ३ ० . . फ- 0 . उदाहरणम् इहांसूर्य ०।१३।१०।४२ है इसवास्तै राशीकोष्ठककेनीकार र्यकाल०५६।४० यहलेके अनंतर १३ अंशकोष्ठकके नीवेकाकलादि फल ४।२० और कला कोष्ठकके नीचेका फल ३यह विकलामेयुक्तकर के यहाशीफलमै धन लिखाहै इसवास्लैब५६६४ यहाशीफलमें यु क्तकरके ०१।०१।३ अबइहा रविउच्च राशीका है इसवस्तैउपरश्नुयुक्त करके १३यह इस्कोरूप मेंकमकरके०१५८१५७यहसूर्यकाउच्च बल इसी प्रमाण चंद्रादि दितीय सारिगी प्रवेश जिसका उच्चव- लवनावनाहोय उसग्रहमें उसीग्रहकानीचंकन करनाजीराशीसे ज्यादाहीयनो १२ राशीमेंकमा करकेजोशेषराश्यक हीयउ-नार उदराशीफल. स्केनीचेकाअंशादिफलले उस्केनीचेजोशकलाहोय उस्काफल लेकर एकत्रकर के युक्तकरना तो ग्रहोंका उचल होता है. अंशकला पिकलाका फल पूर्वोक्त सारिणीमेंसे ना. उदाहरणम् सूर्य।१३।१०।४सह इस्मै इस्कानीचा १००० कम कियातो ६२ यह समधिक है इसवाले मैकमकरके ५२६४ १८ है.इसवाल दाशी कोष्टकके नीचेका फल ०।५०० पहलेके अनंतर२६ अंशटक पूर्वक्तिके नीचेका कलादि फल और कला का नीचे विकलादिफल १६।२० यह एकत्र करके ५६ यहाशीफल ५०० इस्मे युक्त कियानोग५८०५६ यहसूर्यका उज्जवल भयासीरीतीसे चंद्रादिकोंका करनात्तो स्पष्टबल होताहै राशी फलमेशकला फल सदायुक्त करना. उच्चबल चकम्. सूच खु. . मं. . . . . .. २. ६७ ४७ 1 ال [ 4 * داد. رم متولد 1-2-4 13 - A4 لم مرد و : قال مد: م:1 م تم گاو و : ه ولد تم ماه 4 الله ما له دل م1 ، ماشاگ سل و . م الله ولي که نه و لر - ف دهه ههه و علا ما ام ' تا 1 विदोष नीलोतंदुमहाधिक ار "E و ( 4. لہ و t मेषराशीसहवर्गपति می | کی فيد 6 4 من هم . و ا * 4. او همدمم ی مد و : ف ܢܐ ولد * ت ا ا م : ۱۱ وال م ته مه نده قه له کمه اگر تا به ام اس » .د هT ماه لا لم : ه الله ولم 5 لم أ جت من 1 م ده ن [ ها .ه ه ه ه ثم مانده ی 1 الا انه کرد و مواد مع ) L به سر و ان کی د) 16 پر 1 ) سر به همه امام تر کی به 6 ہند ۸۴ م م [ ا ه ها راه سمه ها 104 ه : هدي ا ا ا ا ته پن ملی ما تما لي ده كه ل سه ساله و ہیم و اس :I:1 م : في حالة م ه ه ه ه ه ه ابن الله م ه م م ا مه ش ده مواد د له سده های داده الف ودة هشة ( T1ه لم ه | له س قه له [ 4 * الدق آله و الله ] [ ع . هه تا همه : فلم م.ف ف اس 8 في لك ولا له . هه عه م [4) [الم { 1 ۹[ به لا اله 14 م این ماه : 4) 6 •|.د هلي مار کم به تمام و کم :د فله هداة العه، د ملا اور یا ، ف م م م هن نماد ه م م م ة م | نما هم د ، ه ه ه م م ة و .1 م .ه ه ته وه ت و لو مهم کم ام ماه ها و مدل A A ه ا ا ا ا ت • و 10 ه م ما کنترا ه هل هي مما a a | ة و و الله کا علم و ان د ه ه ه ه ه ه ه ه م م ه شده به 11 ) 16 تا 11 شانه :د . کم کم و هه م ها ماه ها 6 : له هه زه ورته ، و به لکه ها به فه ره 1 فعلا قه 8 تن ش 14 دن 11 کی در ها ماء به * هم که هم مع 1 : ه ه ته .. وان ) { ت ت . مد في Rat?! له و * | 4 | به 6 د ا ا و و a هم 1 k} ه : د ام(۴*ه * کو | ا م ا كي ( و و اkr | F و و تم م ه ه : مه لات دم کی R الر کی الش و R m م و ۱۴۳ ( و ۰۳م ا S و پدر مهماند که در 1 نہ ہی ہم ام وی به کا باد 4 و1 م ته له 2، دو اید ، به 4 که واکر (h کی | ا * بل و تا این لا الف) م : مها يف ام د مهم ۵ و اهم . د v * * کی I مه E من 61H لر کی و ه# الم تم م h tء المهم هم من التم ول و و ته k 4 هم له کد او لم A اک to و مر د تا مم R410 ل و لم '1 بد • مم Er کیم کی اور ی سم ) سم لی لی ELF ا » R داد ههه اه مه بهم و ا م ا کر rr و 5 نام ها F) 1 ع ( ) لا اله که و 172173 वृषराशीसप्तवर्गपति चक्रम्. ۲ فی مي کہ و بل انواع کل F1 مه E و ۱۳ د : 51 م د ۱۲( F 1 5 ل له کم کم نہ کیا سید E TH ار k & F داع عم وقت امر به به عمل قلم لم الم لم ير په هل سم ه م ه و اشر) يا به د| لمه ؟ دو تا لندن ة 1-له » الى لمه * ৪ শ্ৰী ৫ সেলে علم الله س 41) ۹) به ة و I r F TE ) در هم (1 مه * ) ه " 1 . mil * اد ومم مه و " له سه : 11 منع سهما ل ام سي ل 8(ع) سم و ان (fi اور | FIFO TE كي | امام جم | و لم اكبر نما ا : ہم تم کو ر با [ » کو لو لم کی ت) به که م ماه 5 مه عام يصعد ر م 8 دان د 32 ( ل { .ا.ه .د اق م سیم ميم ا م ا ل م د م 142 141 ذوب IRAT دل ہو الد عاد * * * الم 4 دہ ہم ه و a 16 و تم و | ٹو کی मिथुनराशी 0 ما 1 د م ه ه ه ه ه ه و لی من است که ان سره سره به ماده تم و ا ا 4 مدانا 1 ال کی L سم می دهد که ) سه ه د تا به ماه نکا 1 نہ بر اقب ام الد کا به سم ة مربع) و به م . م م في قاله م هتل مهمة ) 1 اعي له اه من قه له سته سه مه الف) [ » ته هم ا لم له له شه ) مه سه لا هم فى ايه ؟ سو ها در هر ف) قد و واد ع الفم لفم كه مم [ ست که في سمةIه 3 قد هه هه تا 6 که وی سی ) س في سم ف) سه، 1 : مد هل سالم علي به ند وود وه د م. * * بار 4.1 * کی م تم سلوم ه ه ه ه ه ه ه ده اعر :4 * لا 6 که تو س الم لي انه| A4 نمر الى . 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F الي h] A V و م ماماماما . به Y اله मीनराशीसप्तवर्गपतिचक्रम्. مي و و ) سر الدي اف 0 ): {ت) ا ہ F ال م ت م م که 2 انا ا ا * پیاز F . 4 hha في * zu15 مر و r ہ ht) | IN سر ما S 1 مه 1 و الم تم تولد هف) لة ده نة :اله ه ه ها) مالی » د) به کانال مالك * ) قل اللي ما لقي الله د.هم - اFr F F مه و FR EN :EIR RFIA FRE ARE AV (१२२. ) हारा स्त्रग्वा हारा. यहचक्रों में सप्तवर्गपति मेषादिर राशीकाजुदाजुदाअंझोंकातीस तीसक लाके अंतरसे६. कोष्ठक लिखके उस्के नीचे सप्तवर्गके सामने उनके स्वामी लिरवके उनके स्वरहके स्पष्टताके वास्ते महके पास स्वरहका राश्यक लिखा है इस परसे सुलभरीतिसे सप्तवर्गपति मालूम होते हैं. उदाहरणम् इहां सूर्य००।१३।१०।४२ है इसवास्ते मेष राशीका १३.अंश कला कोठकको नीचेके सप्त वर्ग पति पाये. गृप. होप. दे.प. स.प. नप दाप- निंप इसी प्रमाण चंद्रादिकोंका मंसू सू चं चं बु. स. राश्यादिकसे चक्र परसे सः सवर्ग पति होते हैं. इसी रीतिसे भाव सप्तवर्ग पतिजानना. अहसप्तवर्गपतिचक्रम्. आश्रय गुणार्थ.... सूर्यचन्द्रः सोमः | बुधः | गुरुः गुः | शनिः ४पहा स्वटह ग स शशसूस श बुश शास बामा स्वक्षेत्र. स्वासुससूमि चं सच ससूस तुकासू व शनि मं शाबाश शुरच शुसा द्रष्काण शश मि म मिासूस शाम सप्तमाशा नवमाचामा च स शमिरल बुमि शव नवमांश. द्वादः युमिाहशामिमा शसस्वरशामास हादशाशः त्रिंशाः रासमितिमाशामावाशाच स्वस्तिम विशाशः भाव सप्तवर्गपतिचक्र. १.१९९२ स्वरमा चा सूपुः नाखुनाचा सूचस्तूर चा सूचना म.शु..च. सन गुमाए. श समारनामा मल शासू शु राज शः शुचाम समसः । पुः गुर सप्तवर्गवलोदाहरणम्. "सूर्यकारहपनि भीमसमके क्षेत्रमे है इसबास्सैगृहबल मष्टमांशन ३. होगपनिमूर्ष समय क्षेत्रमे है इसपास्ते होरावलन्मएमांशनधार दे फाणपनि तर्प समफे क्षेत्रमें है इसवाले ट्रैप्पाणवलन्मएमांश ३. मममाशपनि चन्दशनुशेनगे है इसपास्ने सामांशपलसोडशांश । सप्त भाया १ २ ३ ४ ५ e ५ का ग शुः सः ए म. नप म. गा यहाग पाश पत्र ए ए.
(१२३) ० २२ २२ 209 . ३१४५ नवमांशपतिचन्द्रशत्रु क्षेत्रमें हैं इसवास्तै नवमांशबल पोडशांश-३) १४५ हादशांशपति बुध शत्रुक्षेत्रमें हैं इसवास्तै हादशांशवल षोडशांशा ३।४५ त्रिंशांशपति गुरु अधिशत्रुक्षेत्रमे है इसवास्तै त्रिंशांशवलं.१। ५२।। सूर्यके सप्त वर्गका बलका योग ॥३५॥३७॥ इंसी प्रमाण चन्द्रादि कोंका सप्तवर्गबल होता है.. अथ- ग्रहसप्तवर्गबलचक्रम्. बु. ए शु. महः ड M ३०श ५॥श स मि ३श ३रह सू ४५स, ३./स होरा श ४५/श ४५ स ३० बु शु द्रकाण ऽमि श ५२स ३० श यु ७/श बु ४५ स ३० स. ३० मि ३० श. ३०/स ३०/श ४५ शि शि नवमा श ४५ मि ३०श ४५/ऽमि ३श ५॥श डा. १र ब म हाददा ४५श ५२श ५२॥स श ५२॥श ५२॥ स ब म इश ५॥१६श ५ मि.श ४५स ऐक्या ० ३ ० ३ و هه م له وه ره سه ७ ३०स ३० 레의 예석 여째 과제여 ० न २२ सप्तमा . . . २२ ४५ मि ૨૨ २० ० १ ३० ० . ३. ३./त्रिंशांश . . २२॥ ५२॥ ३१ ५२॥ ५ २२॥ . शुक्रसमभांशकेहिविषमेन्येदयुरप्रिंवलम् श्लोक केन्द्रायेषुचरूपकाईचरणान्यच्छनिरपेटाःक्रमान् । वीरपेटीचरमेनराम्प्रथमकेकीबीचमध्येनया ट्रेष्काणेवितरतिपादमदितंस्थानारव्यवीय॑लिदम्॥६ अन्वयर- सम नाशके स्थिती झुक्रेन्दू हीति निश्श्येनाधिचतुशिवलं योतांअन्येरवि भौग दुपयरुशनयो विषमजांशेस्थितास्तदाविलंदपुःन ज्वाशश्चमांशम् विषमा रारायः १।३३५१७१९११ शेषा:समा इनि केन्द्राये केन्द्रपणफरापोक्किमपुस्मितारखेटाः कमाद्रूपकाईचरणान्वलानियच्छति दन्ति एतदुक्तं भवनि केन्दे ग्रहे रातिसं १ पलंपणफरेअई ॥३॥ वलं आपोक्लिमेचतुर्याशंगा५ । बलंयच्छंतिस्त्रीखेटी शशिशुझौनृतीय नेप्का- ( १२४) णि वर्तमानी पादंबलं दत्तः नराःसूर्य मंगल गुरवः प्रथम देकाणेपादंबली वितरंतिक्लीवौधशनि मध्ये द्रेष्काणे स्थिती पादं बलंदना इयत्पंचधा वलमुदितंतत्स्थानाव्यंवीर्य पंचांना योगे स्थानवलंस्सादित्यर्थः । नार्थः-शुक्र चंद्र यह समराशीमें किंवा समांशमें होयतो और सूर्य मं. गल बुध गुरु शनि यह विषम राशीमें वं विषमांशमें होयतोचरण१५० बल देते हैं यह केन्द्र में कहिये लग्न चतुर्थ सप्तम दशमस्थानमें होयतो रूप बल देते हैं. यह पणफरमें कहिये हित्तीय पंचम अष्टम एकादशस्थान मि होयतों अर्ध-३०० बल देते हैं ग्रह आपोक्लिममें कहिये तृतीयप/नवम द्वादशस्थानमें होयतोचरण-१५० बल देते हैं. पुरुष ग्रह प्रथम द्रेष्काणमें होय और नपुंसक ग्रह दितीय टेष्काणमें होय औरस्त्रीग्रह तृतीपद्रेष्का णि होयतो चरणबले ०।१५।० देते हैं यह ५ स्थान वलोंके योगकोपीस्था नवल ऐसा कहते हैं. युग्मापुग्मबलोदाहरणम्... इहार्य भीम और शनि यह विपम राशीमें हैं इसवास्तै इनका चरणवलचन्द्र समराशीमें हैं इसवास्तै चन्द्रका चरण १५० बलशुक्र समराशीम किंचा समनापांशमें नहीं इसवास्लै इस्काबल००० बुध गुरुविषमराशीमें किंवा विशमांशमे नहीं. इनका बल 100 युग्मायुग्मबलम्ता अथकन्द्रादिबलोदाहरण सन मं बु र शु श य सूर्यचन्द्र केन्द्र में है इसवास्तै इनका रुपयुल भीमशुक्रपणफरनेहैं इसवास्तै इनकामई॥३॥ युधगुरुशनियहत्या पाक्लिामें है इसंवारनै इनकाचरणवला इहागुरुप्रथम देष्काणमेहै इसवाल काणवलोदाहरणम्. चरणवलशुक्रतृतीयद्रेष्काणमेहे इस केन्द्रादिवलम्. वास्सैचरणवलशनि दितीपदेष्काणम है इसवारले चरणयल सूममयम EMISE काणमें नहीं न्योर बुध हनीय देसा गमें नहीं और चंद्र तृतीय देफाणमें 1010/0/607 नहीं इसवारले इनका वल शून्य- . . ब ९५९५/१५ . . n क . . . . ३०/१५/ल 101.1. . .
१२५ द्रेष्काणवलचक्रमः चुधः गुजाविजा सूख्य चन्द्र . . ग्रहा चल.. १५ . ० स्थानवल योगचक्रम् सूया चन्द्रानगळ बुधः दहा एक शनिः ૬ ८ ८ ग्रहाः उच्चचंल? ४ ८७ ८ २५ १ १ सप्तवर्ग ८ ३७॥ २२॥ ५२.॥ १५ २२॥ ७ C द . १५ १५ . J युग्मायुग्म३ 6 C . . C . 20 १५ ३० १५ केन्द्रादि-2 . 0 ८ . . ८ ८ ट्रेप्काण५ . ०.०० २ .२ २१ योग. २॥ २९॥ २०. १॥ १७॥ दिग्बल मन्दाल्लग्नमिनाकुजाञ्चहियुकंशोध्यंविधोर्गिवान् कालदल माध्यज्ञाद्गुरुतोस्तमबरसात्पुरत्यजेचक्रतः। श्लोक- दिग्वीयरसढवयोसमयजलसंसदास्याहिदः त्रिंशद्भक्तननोन्नतेशशिकुजार्कीणांपरेपावलं ॥७ अन्वयः-शनः सकाशाल्लग्नं सूर्याद्रीमान्चाहनुकंचतुर्थ वियोः मार्गवास माध्यदशमंबुधाद्गुरोस्सकाशादतं समसंशोध्यमिति सर्वत्रध्येयंशेषडाइपयि कंचेत्स्यालदाहादशराशियः शोध्यततः पढत्पङ्गक्तः सन्दीग्वीर्यस्यात तुशब्दादुच्चवलनागमकारोडनापियोध्यइति अयत्यनंतरं समयजंकान लजंवलमुच्यने विदोबुधस्यसदादिनरात्रीरूपवलंस्थात् त्रिंशद्भक्त नतोन्नतेशशिकुजार्कीणांपरेयांवलं भवतः ननंत्रिंशतामनंगलव्धनचन न्द्रमीमशनीनांवलंजवेत् उन्नतत्रिंशद्धतं रविगुरुशुक्राणांवलंख्यात्. अर्थभाषा:- शनिमेंसे लग्नासूर्य भीमसे चतुर्थ भाव चन्द्रमैसेशु- कमेंसेवामानावबुधमेंसेगुरुसेसप्तमजावयहकमसे कमकरके शेषरा शीके अपेक्षा अधिक होयतो वह १२ राशीमेंकमकरके अनंतरजोशेषरहै। उस्कोउच्चवलमें पूक्तिरीति प्रमाणसे भागदेनातोयहोंका दिग्बल होताहै. दिग्बल सारणी प्रवेश. ग्रहमेंसेलग्नादि कथित भाव कम करके जो शेष रहै उस्को६से कम करना.अर्थात् षडताल्प करना अब इहांसारणीमें राशी कोष्ठकलियको वह कोशकके नीचे रूपादिफल उस्मेंसे अतीष्ट ग्रहकाजोद राशिमेंसेराइयंत कहोय उस्के नीचेकाफललना राशीकोष्ठकके नीचे ३० अंश कोष्ठक और उस्के नीचे ६० कला कोष्ठक लिवाहै उस्मेंसे अमीर ग्रहकाजोअंशऔर कला आवे तत्परिमित कोष्ठकके नीचेका अंशका कलादिऔर कलाका विकलादि फल एकत्र करके पूर्व में लियाजो राशीफल निस्में युक्त कर नाती ग्रहोंका दिग्बल होताहै. दिग्बलराशीफल. अंशफल. . . . . ० .०० ० १२३ ४५६ रा|१|२|श४५६७९/१०/११/१२/१३/१४/१५ अपरा२२|शशशश.४५ फ ०१०/२.२०४०५०/. २०४० ०२०४०.०४.२०४010२०४०. १६९/२०१२३४५६७२२९३० फलफलचक्रम्. lel/१० R-160[.०४० ०/२०४०/R0/2010/२०/४०. ५६७ ९/१०/११/१२/१३/१४/१५/१६/१७/१०/१९३५ २२१२२२३४४ ४।५।५५ २.१०.२०४०/०२०४०० २०१४०/. २०४०. 201४० २२२२२२०२५२६२७२२५२४२५२६७३३ ७७दाट गगराणाशशरा१३/१२ २.12... २.४०. २०१० ०२. | દરદ દફાદક-૧ રાજકાજલદી १३/१४/११:४५/५/१५/१६६१९७रणरणत्वरनरयावर २.१.२.80.२०१० .२.२.२.४. . . ६६६ . उदाहरणम्. इहां मूर्य१३९.६३यह इस्मेमचनुर्यभान २०१२।१०।२४ का करके ोष३०८ व्यापायहरका राप्रपंक है इसवास्तेर राशीफल नीरयंश है इसपास्ते अंशकोएकको फला औरफला है यमनास्ले: कला कोष्ठकका पल १० पह पिफलामेंपुक्त कियानो ( १२७ ॥ . ८ . ० - . . . . २८/३१|३१| १३०।१०यह सूर्यकादिग्वल भयाइसीप्रमाणचन्द्रादिकोंकासारणी परसे दि खिल करना.अर्थकालवलकाकहते सू चं मं बु सशुश- बुधकासर्वदा दिनमें किंवा रात्रीमे रूप दिग्बन १बल नतमें३०से भागदेनेसे चन्द्र भौमा २०३४ ३२७ २०१४४७ ३०/१४/१०/६० लचक्र और शनि इनका औरउन्नतमें३०से भागदेतो सूर्यगुरु और शुक्र इनका नतोन्नत बल होताहै अथवा नतहिगुणित करतो चंद्रभौमशनि इनकामीन र उन्नत दिगुणी करतो. सूर्य्यगुरु शुक्र इनका सुगम रीतिसे कलादिबला होताहै. उदाहरणम्. नत१५/४० इस्को३०से भागदेके०।३१।२० यहचन्द्र सीम शनि इनका बला भया उन्नत १४.२० इस्को३०से भागदेके ०।२८१४० यहसूर्य्यगुरु शुक्र इन कावल भया.और बुधका रूपश्बल ऐसाजानना. श्लोक पक्षवलंत्र्यंशवलंवपनासदिनहरावलं. शुक्लेन्तेतिथिहद्तैष्यतिथयो सू. चं. मं- बु-छः शु. श. नतोन्न तवला वीर्यसतांनूच्युतं पापानांहिगु २८/२८/३१ चक्रमा णंविधोरिदमयान्हरूयंशकेषु ४०२० २०.४०४०२० क्रमात् ॥ सौम्यार्काकै सुवांनिशःशशिसिताराणांचरूपम् . संदेज्यस्यायांनिचयाहलीकिलसमामासद्यहोरेश्वराः।।। अन्वया- शुक्ले-ऽन्तकृष्णगतेष्वतिययस्तिथिमि पंचदशः १५निर्मा ज्याः फलंसतांशुभग्रहाणांचन्द्रबुध गुरु शुक्राणांबलंस्यात् तदेवबलं मूच्युतं रूपाच्यतं पापानां रवि सोम,शनीनां पापयुत बुधस्यचवीव्यवन लस्यात् इदं चन्द्रबलं दिगुणकार्य अथपक्षवलकयनानंतरं त्र्यंशबला नुच्यते अन्ही दिवसस्य त्र्यंशकेषुक्रमात् बुध सूर्य शनीनांरूपवलं स्यात् निशोरात्रेयंशकेषुक्रमेण चन्द्र शुक्र भीमानां रूपंश्चलं भवति नद्यो यदि दिनेजन्मतदादिनमानस्यनिजागंकाऱ्याचेलयमेंशेजन्मा नदाबुपस्यरूपबलंअन्येषांशून्यं यदि द्वितीयेंशेजन्मतदासूर्य्यस्यरू पबलं अन्येषां शून्यंतृतीयंशेशने रूपबलं अन्येषांशून्यं स्यात् एवंरा त्रावपि + ईज्यस्यगुरोः सदा दिवा रात्रीवा जन्मस्यात् तदारूपवलं भवति. अधेत्यनंतरं अंघ्रिचयाच्चरण रड्यासमामासाहोरेश्वरो- बलीस्यात् एतदुक्तं वर्षशस्यबलं पादं १५० मासेशस्य०।३०० दिनेशस्य ४५.० होरेशस्य १०० बलम् अर्थभाषा शुक्लपक्षमें गत तियीको १५से भागदेना औररुण (१२८ पक्ष में ऐष्य तिथीको १५से भाग देनातो शुषचन्द्र बुधगुरु शुक्रइ। नग्रहोंका और यही? मैं कम करके पापग्रहोंकारविभौमशनि इन को पक्षबल होताहै. उस्मेंसेमायाजो चन्द्र बलसोदूनाकरना बता कालिक सूर्य और चंद्र इनका अंतर ६ राशीकी अपेक्षाज्यादाहोयतो १२ में कम करना जो शेपरहै उस्कोउच्च बलमें पूर्वोक्त रीनिके प्रमाण ६से भागदैनातो शुभग्रहोंका और वही ६० मेसे कम करके पापग्र- होका पक्षबल होताहै संशबल दिनके प्रथम नितांगमें जन्महीयन तो बुधकारूप बल द्वितीय श्रीनागमें सूर्यका तृतीय त्रिप्तागमैं श. निका ऐसा रात्री में प्रथम त्रिभागमें चन्द्रको द्वितीय विभागम शुक्र का तृतीय त्रितागमें नीमकालौर सर्व कालमें-गुरुकारूप १०१० जानना वर्ष पतिका चरणवल मास पतिका अईबल दिन पती चरणत्रया बल होरापतीका रूप बल यह वर्षमास दिन होरापनी इनकाबल जा. नना इन चारोंचलके योगको कालबल ऐसा कहते हैं। :: वर्षपतीवनावनेकी रीतिः.. दिष्टोऽयंग्रहलाघवद्युनिचयश्चकाहतैःषट्शरैः श्लोक-पट्दलैश्चयुतःसाणतपनसेपुश्यरखागानिभिः । (खान्यांशेविहांफलेगुणयमचकनिम्नाक्षरोपे- नैसत्रियुगनगोर्वरितकऽस्तोसिमामासपी। अर्थः- मातीर चक्रको ५६सेगुणके उस्में अहर्गण युक्त करना त्यनंतर उसीमें १२५ युक्त करना ३६० से भाग देनाजो भागाकारा व्याचे उस्कोसे गुणके गुणाकारको चक्र ५से गुणके उस्में ३युक्त करके सब अंक एकत्र करके से भागदेके जो शेषांक रहै सो कमसे सूर्यादि वर्तमान वर्षाधिप होता है. मासपतिवनावनेकीरीति. अतीष्टचक्रको २६ से राणके उम्में अहर्गणयुक्त करना अना तर उनीने ५ सुन करना ३०से पागदनाजाभागाकार पाने उस्को दूना करी उमर युनकरके से भागदके जोशेषांक रहे साक्रमसे पूर्खादि वनमान मास पनि होना है. दिनपनिवनावनेकीरीनि. अपने देशसेरक्षिणीनरमध्यराका जो योजन होय उस्मैउसकाच ... . .. • ( १२९ तुर्थाश कम करके तन्मित फल पूर्वमध्यरेषा होयतो १५ घडीमें कम करना अथवा पश्चिम रेखा होयतो१५ घडीमें युक्त करना अनंतर यह संस्कार युक्त घडी दिनासि जिनना पल कमती होय उतना पलसूर्योदयके नंतरवार प्रत्ति होती है. अयवास्रुित घडी दीनार्धते जितना पल धिक होय उतना पलते सूर्योदयके पूर्ववार प्रति होतीहै यह प्रकार सेजन्म कालमें जो वार होयत्तों वार पनि जानना. होरापति बनावनेकी रीतिः बार प्रवृत्तिते लेकर इष्टकालतक जी.घटी पल होय-उस्कोदूनाक- रना उस्कोर स्थानमें रखना प्रथम स्थानमं५से भागना शेषको हि- तीयस्थानमें घटाय देना और युक्त करना तो वारपतीके कमसेअ. यीत् ? वचे तो सूर्य्यर में शुक्र में बुधं मैं चन्द्र में शनिद में गुरु ७ मैं भीम यह क्रमसे इष्टवारपतीसे गणनासे जौवार आवे उस्की वन हगत होरा जानना. अनंतर वर्तमान होराका स्वामी होरा पनि जानना. पक्षवलंसारणिप्रवेश. तात्कालिक सूर्य और चन्द्र इनका अंतर पझाल्प करनाअब सार- णीमेंट्राशि कोष्ठक लिखके वह कोष्टकके नीचे रूपादि फल लिया है उन स्मेसे अंतरका जोराश्यक होय उस्के नीचेका फल लेना राशि कोष्ठकको नीचे ३० अंश कोटक और कला कोष्ठक लिरवाहै उस्से अंतरका जो इष्ट अंश और कला यावे उस्के नीचेकायंका कलादिऔरक लाका विकलादि फल एकत्र करके पूर्व में लियाजो राशिफल उस्में युक्तक स्नातो गुप्तग्रहोंका पक्षबल होताहै और यहरूप में कमकरेतो पान पग्रहोंका पक्षबल होताहै. इन्मेंसैचन्द्रकावलद्विगुणित करना. राशीफल. अंशफल. १/२/३/४/५/६/१२/३/४/५/६/७८/९/१०/११/१२/१३/१४/१५ -- द . . . . . .१०/२०/३०/४०५० . १.११/२/२/२-३/३/३.४४४५ २०/४०/०२०४०/०२०४018010/२०४०० द ० C उदाहरणम्. દર૮િ૬૬૨૨૭રરરરર રરરરર सूर्य्य०।१३।१०।१२५ चन्द्ररा५॥२२॥३५ इ.२०/४००२०/८०/२०/३०/१०२०/१०/० स्पष्ठी ( १३०) . 26Timur sohuhoom २०४०० રક ૦૨૬૨૨૪૦૦ मातानिफनी. आKालिमा नकाअंतर २२।११ कलाकोष्ठक. ५३ यहुसेज्यादाहै ? बाळ स९१११/१२३५ इसवास्तै १२मेसेकम १११२२२३/३/३/४|४४१५ करके ३१७४८७ यह २०४०१० २०४०/० २०४०/०२०/४०० २०. इसवाजेराशिकोप्टक १६/१७/१८/१९/२०/२१/२२ २३ २४ २५ २६२०/२०२९३. ३ इस्काफल।३०/ ०५/५/६/६/६/७७७-८० इस्कोअंशकोष्टक७ २०४०००००००० २०४०. इस्कार्फल २०२० और १३२२३३४३५३६२७२४१४२४३९ कलाकोष्ठक ४८इस्का १०/१०/११/११/११/१२/१२/१२/१३/१३/१३४१४/१४/१५ फल१६एकत्र करके २०/८०/०२०/४०२०५:/०२०४०1०/२०४०° २०३६युक्त करके ૪િ૮૪૬૦૨૬૨૪|૧૬ છક થk, ३२॥३६यह शुभग्रहों- ५१५/१६/१६/११०९७/१७/१८/१८:१९/१९/१०/२० कोपक्षवल यहीरूपमें २०१०००.०० कमकरके०।२७२४यहपापग्रहांकापक्षक्लोरचंद्रकाहिराणितश५१२जानना पक्षवलचक्रम् दिनरात्रित्रिनागवलोदाहरणम्. सूचना में बुन र शु श ऋ इहां दिनमान ३२।०१ इस्कात्रिमा २०३२ २२ २३ २४ २०४० इसवास्तै दिनक तृतीय ૨૪ ||૨૪૩૯૨૪ त्रिभागर्मजन्म इसवास्तै शनिका रूपवलमोर गुरुकारूपवलजानना. और यहाँका शून्यबलजानना वर्षपनिवलादाहरणम् दिनरावित्रिमागवल चकर इस्फोसेराणके १८४८ या मायामाबुरशुशम. ह इस्में ग्रहण ११७८ मुक्त करके : १व : यद इस्ले १२५मुक्तफरके ३१५१ इस्का३६.मभाग के ८ यह इस्का ३से गुणके २४ इस्को पक २६"यह ५ से एणके १६५ इस्मैश्युक्तकर कि.६८ पूक्ति अंक २४ पुर्ण करके १९३ इस्को से नागदेके शेषा क ३ इनयास्ने वर्षपति सोम इस्काबल०१५ जानना. मासपतिवलोदाहरणम्। चफ इस्की २६से गुणक-५- यह इसमें ग्रहण११७८युः नाकर २.२६यहाइमपुक्तकरके २००१ इको३.से भागदेके द ro.
इस्को दूना करके १३६ यह इस्मे ४युक्त करके १४० इस्को७सै भाग देके शेयौक इसवास्तै मासपति शनि इस्का बल १२०० दिनपतिवलो दाहरणम्. देशांतर योजन५ इस्मै इसीका चतुशिश१५ कम करके २४५पं. ल यह पश्चिमदेशांतर है इसवास्तै १५ घडीमें युक्त करके १५।३।४५ यह दिनार्घ १६:२१ इस्सैघडी १८ पलकमती है इसवास्तै सूर्योदया के अनंतरघडी१८ पलसेवारप्रत्तिभईजन्मकाल रविवारको घडी १पलपरहै इसवास्तै.रवियही दिनपति इस्लाचल।४५० जानना. होरापदिवलोदाहरणम्. वार प्रतिसेलेकर इछकालंतक ३०४२ इस्कोरसे गुणके ६१ घडी २६पल इस्को से भागदेके १२आयेइहां इष्टवारपतीरविइस्से गणनामेंगन होरपतिशनिपोरवर्तमानहोरापतीगुरु इस्कालरूप (१) जानना. वर्षमासदिनहोरापतिवलचक्र कालबलयोगचक्र. सूदि चं मं बु शुश ग्रासून चम- बुरशुशग्र. दिन वर्ष होरा बा११/३६/१३/३२१ २८ व. ४३२/४४|३६/१६/१६/४४ इदानींक्रमप्राप्तचेष्टावलं विवक्षुरादावयनबलमाहः- सदाक्रांतिभागैर्युताज्ञस्यसिद्धाशनीन्होयुतीनाः श्लोक-क्रमाद्याम्यसौम्यः । विलोभ परेषांगजाम्माधि ४८ मताभदायनवीय्यमर्कस्यहग्धं ॥९॥ न्यन्वयः-ज्ञस्य बुधस्य दक्षिणैर्वोचरे क्रांतिमांगेः सिद्धाश्चतुर्विशत्र शायुताः शनींहोर्युताना क्रमानुयाम्यैसौम्यैर्युताः सौम्यैरूना परेपो रपि मोम गुरुशुक्राणाविलोमंसौम्यैर्युता याम्यैरूनाः सिद्धाः२४गजाम्पोन घि पताःसंतत्र्यायवीयं भवेत् इदमायनवलं अकस्पद्दिगुणित सद्भवेत् . अर्थः- सर्वकाल २४ अंशमें बुधका दक्षिण किंवा उत्तर क्रांति भागयुन त करना २४ अंशमें शनिन्और चन्द्र इनके दक्षिणक्रांति भागयुक्तका रना और उत्तर क्रांति नांगर४ अंशमैसे कम करना२४ अंशमतेरवि. भीमगुरु और शुक्र इनका दक्षिण क्रांति भागकम करना और उत्तर . ० . १ १ ૨ . . . ० १ . . o .( १३२ क्रांति भाग२४ अंशमें युक्त करना. अनंतरवह सब ४८ से भागदेना ती ग्रहोंका अयन बल होता है. परंतु यह बल सूर्यकामात्र दिराणि न करना अथवा क्रांनि भागसंस्कारित २४ अंशमै उसीका चतुर्थी शयुक्त करना तो कलादि अयनवल हो. क्रांतिबनावनेका श्लोक./ स्यु:खंडानिरववाईयोम्वरक्रताशैलाग्नयोध्व्यग्नयः निशतत्वधतीनवारिनिधयस्तैःसायनांशग्रहात् ।। बाव्हंशावक१. मागसंरख्यकचुतिःशेपैष्यधोताद्दशा- साढयादिग्निहलालवादिरपमस्ताईकस्वगोलाप्पवेत्॥१॥ अन्वयः- अयनांशयुक्तारखेटात् प्रहात् बाव्हंशा भुजतागा- स्तेषांदिग्लवोदशमांशः तन्मितरखपडैक्य कार्यम् ॥ तच्छेयेण धाताद्गुणिताद्यत् एष्यं सोग्य खंड तस्ययोदिग्लवीदशमांश नैन युत्तं खण्डेक्यं कार्यन् तनोदिग्नितोदशक्तः लवाद्यः अंशा द्यः स्वदिक् सायनगोलदिक अपमः क्रांति स्यात्. पर्यभाषा. अहमें अयनांशा युक्त करके उस्ता पूर्वक्ति रीति करके भुजन करना और उस्के अंश करना१० से भाग देनाजो भागाकारन्यावे तसारिमित नीचे लिरवैअंकमें मिलान करना और भागाकारमैं एक युक्त करके तत्परिमितकलेके उस्के ऊपरके अंशादि शेपको गुणकैवहां गुणाकारको से भाग देके जोभागाकार न्यावे उस्मे पीछेके व्यंका की मिलानयुक्त करना औरजो मिलान आवे तिस्को १०से भागदेना जोशागाकार श्राप सो अंशादि क्रांनिजानना जो सायन मह उत्त र गोलमेंहीयतीउत्तरकांति और दक्षिण गोल होयतो दक्षिण क्रांनिजानना. गोल ऐसाकि मेपसे ६ राशीतक सायन ग्रह होयतो उत्तर गोठ तुलसे धराशीतकमायन ग्रह होयतो दक्षिण गोलजानना क्रांत्यंकचक्रम्. " ३४ 2. २५ उदाहरण.-7 क्रांतिसारिणीप्रदेश. प्रथम सायन यह करके उस्का सुजकरके उस्लाजागकरना अ. नंतर सारणिमें अंशकोठकलिरचक उस्के नीचे शादिफल लिन खाहोर दश दश अंशक यंतरत्तै अलग अलग-कला चिकन ला कोष्टकलिरवा है. अब यत्तीष्ट भुज भाग कोष्ठकके नीचेका अंगादि फल लेकै उस्को शुज भागके नीचेजी कला विकला न- तत्परिमित कला विकलां कोटकके नीचेका कलाकाकलादि और विकलाका विकलादि फल एकत्र करके युक्त करना तो ग्रहोंकी अं. शादिक्रानि होती है. सूर्य००।१३।१०।१२ इत्को अपनांशा२।४।०३युक्त करके । यह सायन सूर्य इस्का भुजकियातो वहीरहा०।५।५४४४५ इस्तै अंश३५१५९४५ यह है इसवास्ते भुजभाग कोटक ३५ के नीचेका अंशादिफल१३।२४१०० कला५४का कला विकला कोटक निका कलादि फल १८२२ विकला४५का कला विकला कोष्टकका विकलादि फल १५.११ यह कला विकला कोष्ठक फल एकत्र करके १८ ||३७ वह पूर्वोक्त अंशफल १३।२४।०० इस्मै चुक्त कियातो १३।४।३५ यह सूर्यकीक्रानिभाई इसीप्रमाणं तव ग्रहोंकी क्रांति वनावना. अब सायनसूर्य उत्तर गोलमें है इसीवाले उत्तर कोनिजानना. क्रांतिचक्रम्. ग्रहाः १. . दक्षिण शुक्रा बल. उत्तर शनि २७२४३१ १० उत्तर | उत्तर उत्तर दक्षिण - क्रांतिसारिणी. . . . ० . ० . क . . . 0 . . . २ . १ . . ० . ० ० . सुधका . ३ १ अं. २ ૨ २ ३ ૨૪ ૧૨. २६ २४ १२ . . कलाविकला फल ।। को १ २. ३ ६ ४|१०|११|१२|१३|१४ क १ २ २ ३ ३ ४ ५ ५ ध. २४|४८१२३६० २४|४|१२|३६ २४|४८/१२/३४ को-१५ १६ १७ १८ १९ २० २१/२२/२३/२४/२५ २६/२७/२०/२१ ९१ ९१० १०।१०।११११ २४४८१२३६॥ २४]४८१२३६० २४४८१२/३६ को-३० ३१ ३२ ३३/३४३५/३६३७३०३९/४०४१४२४३४४ क. १२/१२.१२१३१३ १४ १४१४ १५ १५/१६/१६/१६/१७/१५ २४४६१२३६० R२४|४८१२/३६ को ४५/०६/१७४८४९/५०/५१/५२/५३/५४५५/५६/५७५६५९ क. १८।१८।१८।१९।१९।२० २०२०२११२११२२२२२२२२ ध. २४४८१२/३६ २४४८१२३६ २४४८१२।३६ क्रांति सारिणी. भु-अं|१० १८१९ ७ ४८ २४ ४८ १२ /२६ फ. . ० . . ० . . . ० . . . क ० . . . . . . . 0 ० ० . . . ० . ० . 0 ७ कला विकला फल. को. १ ३ ५ २ १२.१३/१४ ठा २ २ ४ ०२४४८१३३६ २४४८१२/३६ फो|१५/१६/१७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६/२७२८२ ५ द १०।१०।१०।११।११ २५४८९२२५ २४४८९२३६ २४४८१२.२६ का-201३१/३२३३२४३५१६३७३३३१/३/४४ क. १२/१२/१२/१३/१३|१४|१४१४|१५|१५/१६/१६१६१०/१५ धि. २.४४८१२६ २४|४|१२|३६.. २.४|४|१२/२६, को पाए७४८५०२५२५४५५५५५७५९ ११८११८१६२०२०२०२१२१२२२२२२२२२३ .४४८२२६ ०/२४|४२१२/३५. २४|४|१२| ० . . .
क्रांतिसारिणी २४ २५ २६ २७ २९ २२ २३ ९. २८ १० अं. २२ १२ ३५ २४ १९ फ. ४८ . . १२ २४३६ ४८ कलाविकला फल. को 0 १ D . ... ६ ९ . N १ १ १ २ ૨ ૨. ३ ३ २२/४४५२६५११३३५५७/१९/४२/४/२६/४८/१० को १५१६/१५/१०/१९/२०/२१/२२-२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९ क.५ ९.१०/१० ध.१३/५५१७३९१ २४|४६८३९५२/१५/३७/५९/२१/४३ को ३०/३१३२/३३२४३५/३६/३७३८२९ ४०४१४२/१३/४४ क.|११/११/११/१२/१२/१२/१३/१३/१४|१४|१४/१५/१५/१५/१६ ध .५२८५०१२३४५७१९४१ ३ २५४८९०३२/५४ १६ को ४५४६४९५०५१५२/५३/५४५५/५६/५७२०५९ कारा१७१७११११९/११/१९/२० २०२१/२१/२१ ध.३९/१२३४५ ७.३०५२/१५३६/५०२९५३५ क्रांति सारिणी ३२/३३३६/३५/३६/३७/३०३९ अं १२ १२ १२।१३ १३ १३१४ २२ ३ २४ [४४ ४ फ. ३६ २४.४८ १२ ३५ कला विकला फल. को. ३ ९१० ११ १२ १३ १४ ३ २०४०९।२१ ४२२ २२४३१३२४४४ ४२५/४५ को५ १६/१७ १८२०/२१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९ सार घ .६२६४६/७२७४८८ २०४९/९.३०/५०/११/३१/५१ को ३०/३.३२ ३३ ३४२५/३६/३७३३/४०३१४२ ४३ ४४ क.१०१०१० २१|१||१२१२१२|१३/१३/१३ १४ १५ घ.१२/३२५२१४/३४५५/१६/२६/५६/१६/३७५७१७३५८ को-४५९६९७४४४९५०/५१५२/५३/५४५५/५६/५७५०५९ कारा१५/१६ारधाराश्यशा९/२० ३९५९/२०/५०१ २१४१२.२२४१/३/२३४४४ २ २४ . or २ . . १ १ २. ૨ २ २ ३ . ८८ ( क्रातिसारिणी. १५ ४२४३ ४४ १६ १८२५ अं. फ १७ ५.०० 300 ३० ४८फ. . . ५ . २ ० कलाविकला फल. को १ २. ३ १ ११/१२/१३/१४ १ २ २ ३ ३३४ ए. १८६१५४१२ की १५/१५/१७ १८ १९ २० २१ २२ ૨૨ ૨ ૨ ૨૨૨૬ ४ घ. २०४६२४१४२ को. २०२१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८३३४४ क ९१० १०१०१११११११२१२१२/१२/१३. घ. १८३६/५४|१२ ३०४०६/२४४२ १८२६५४.१२ को ४५/४६/४७/४८४९/५०/५१/५२/५३/५४५५/५६/५७५८५१ क. |१३|शाापार५१५/१५५१६ारधा१६/१७/१७/१७ 4.३० ४८६२४४२. ४०६.२४४२ क्रांतिसारिणी.. . . १९ . . २१ कलाविकला फल. १ ५ . ९|१०|११/१२/१३/१४ २ २ २ . १ २. . पर १५१५९७११२० २१ २२ २३ २४२५२६२७२८२५ ८.४ १५ का-२०१२/२२४२६२७/२८२२४०४१४२/२३४५ २।१०१. १.१०.१०.११ 44 का-1८५४७१८.५.५२५२१५५५/५६/५७५८५ १२.१२.१३ शारशाश्थ १५ १५.४५ . .
( १३७.) क्रांतिसारिणी. २ ८ ३० २० २१२९ २१ २१ २१ રિર •८१२ फ. ३६४६५७ १३, फ. ४८३५ ૨૦ १२ ४८३५२४ १२ कला विकलाफल. १ ९/१०/११/१२/१३/१४ काम 641 १ २.१.२ घet:२१२३४१५/७/४८/५९/१०/२१/२२ का १६/१४२१९/२०/२१/२२ २३ २४ २५ २६/२७/ २२.९ ३.३ ३ ३१/३२ ३३३४३५/३६/३०/३८/३९४०४१४२/४३/४४ को ३० ट २. घ. ६ ७९ २३ . ध.२४३५६/५७८१८९४०/५१/२ १२/२३/३४४५/५६ को-५/४६७५०५१/५२/५३/५४५५/५६/१०५०५९ २. ९।१०।१८1१० १७/२८३२५०० १५/२२/२३/४४/५५/५ १६२०२० क्रांति-सारिणी शुअं७० ७१/७२/७३/७४/७५/०६/७७७८ ग्रं.२२ ૨૩ ૨૨. २२/२२ २३ २१ २८ फ- १२ १२. २४ ३६ ४८ कलाविकला फल. को- ३ १ ५ ९/१०/११/१२/१३/१४ १ १ १ घ. છે ? રર જરૂર કોઈ १२१९२६६२३ को.१५ श्छाचार १/२० २१ २२ २३/२४२कारवार०२८/२९ शाश ३ ध. १८५५२ १६.२४/३१/३८४५/५२ ९४२.९१२८ को-३.२३३/३४५६२०३८३/०१/२ १३ १४ ३ टाटा ५/२६/१३/५०/५०४१२१९/२६/३३/४०/४०५५ २ ७ . . . १ २ २ २३ a ३ 90 |१.२४३१/३८४५/५२ ७.१४/२९/२९ १८ ( १३८ । क्रातिसारिणीन की . . । . 0 . . . मु.अ. ८१/८२ [८३ ८५८५७ ८८८९ २२ २३/२३ ।२३ २३।२३ २३।२३।२३ २३ २४ ४३४५४८ ૨૪.૪૧૨ ઉધો २४४८१२ कलाविकलाफल. को.. २३ ६७ राशि फ. घ. ९१११४/१५/१०/२१/२२२५२३/१२ को १५ारा ११९/०१/२//२२५२६२७२२५ . १ १ १ (ध.३६३८४०८३५५४७५.५२५४५७५९१ को ३०1३१/३२ २३३४३५२६३७३४२४३४४ क-19 १ १ १ १ १ १ १ घ. १२१४१६/१९२१ २३ २६१८३.३३३५३७४०/१२/४४ कोहयाछा रहा५५१५२५४५५/५६/५७/५०५९ .१ १ १ २२ २ २ २ २ ध.४५०५२/५५/५७५९/२ ९११/१३|१६/१८२.० २ ४ . . कि. . २. अयनबलसारिणीप्रवेश./ ग्रहोंके दक्षिणोत्तर क्रांति संबंधसे अयन बल सारिणी में शून्य से २४ तक २५क्रांति भागकोष्ठके दो ठिकाने लिखा है. जबसूर्य्य | मंगल गुरु पृगु इनकीउत्तरकांति और शनि चन्द्र इनकी दक्षिणक्रांति बुधकी दक्षिणकिंवा उत्तर क्रांति है तबप्रथम क्रांतिसागकोषकमैसे अन जीष्टक्रांनिशागकोष्टकके नीचेकारूपादिफलकेले उस्कोअंशकोष्टका के आगे ६० कलाविकलाकोष्ठक.लिखा है उस्मैसेक्रांतिभागकेनीचेजो कलाविकला होयक्तसरिमित कलाविकला कोष्ठकके नीचेकाको ष्ठकतक कलाकादिकलादिविकलाकाप्रतिकलादिऔर ५८ -कोष्ठकसे कलाकाकलादिसाविकलाका विकलादिफल एकत्रकरकेयुक्तकरना तो भिन्नभिन्न ग्रहोंकाव्ययनवलहोताहै.जवसूर्य भौम गुरु शुक्र इनकी दक्षिण क्रांति और शनिचन्द्रइनकी उत्तर क्रांति होयतव द्वितीय कानिप्तांगकोएकमेसेव्यप्तीष्टक्रांतिक्षागकोष्ठकके नीचेकारूपान दि फल लेना अनंतर मागे६० कला विकला कोष्ठक लिरवाहै उस्मेसे यातीएकांनिसागके नीचेजो कला विकला होय तत्त्परिमितकलावित कलाकोष्ठकके नीचेका कलाकाकलादिन्योर विकलाका विकलादिफ ल एकत्रकरके लियाजी अंशफलंउस्मेसे कूमकरना नो ग्रहोंका अय- नबल तयार होताहै.यह अयनवल सूर्यका मात्र दूना करना.. प्रथमक्रांति सागचक्र अंशफल-वनबल सारिणी. . --- ५ ७ १० १. २. ८ ११ १२ ३४३२१३|२५|२६३७३८४०.४१ १५ ३० |१३.१४ १५ १६ १७ १८ २१:] २२ २३ २४ 1.2010.... ३० ० ३० -दितीयक्रांतिभागशफल. १ २ ३ २ 0 फ- घ. २८ २० ० २७ २३ ३० १५/१६/१७११८ २२ २१ ३० १९/२० ३०1१५ २२ २३ २४ . Ca . ८ . ० २. ११ . ३० कलाफल. . . १ ३ . . . ६ ९1१०1११/१२/१३/१४ ८१.११/१२/१३/१५/१६/१७ १५/३०/४५ “૧/૬/૧૨/૨૦૧૨૨૨ રરરરરર का१०/२०१२साधारचरन३०३२ २३ २५/२६ . . फ.४५ का३:३४२२२३३/३५/३६/३७२८.२३/४४ क. ३०/३रनास्पिटवारवटचकनारा|५५ o . कोषाघस्रशाशन १ , ५ फ.१५.१५ १ १ 3 ३.१५ उदाहरणम् सूर्यकीउत्तरक्रांति१३।१२।३७ इस्का अंश१३ है. इसवास्ते इहा.
. क ३४ ४२ ३७ १२ प्रथम क्रांति भाग कोएक १३ इस्का फल ०४एघटी१५ इस्को क्रांतिमान गके नीचेकी कला १२ विकला ३७ इस्का कलाका विकलादि और विकलाका प्रतिकलादि फल एकत्र करके ५३२९६ यह विकलामें युक्त करके ४७८ यहदूनाकरके १।३४ा यह सूर्यकाअयनुबला- याइसी प्रमाण सारणीसे चन्द्रादिकोंका अयन बलं होती हा अयन बलचक्रम्. सूर्य चंद्ः मगलः बुधःबह शुक्र शनि ग्रहाः २९ २१ इदानी भीमादीनांचेष्टाबलमाह. मध्यस्पष्टयुतेर्दलोनितचलंचेष्टारव्यकेद्रकुजात् श्लोक स्यात्तवेद्धगणाच्युतंषधिकंषडदचवेशबलं ।। स्यादेकोन्तररूपमेद्रिवित्तं सोगस्पाइलं मंदारज्ञसुरेज्यशुक्रशशत्तीक्ष्णद्युतीनाक्रमात अन्वय मध्यस्पष्टयोहयोयोगार्धनोनितंचलंनामशीग्रोचंतदातो. मादीनांचेष्टासंज्ञक केन्द्रस्यावतकेन्द्रेचेषडधिकंतदादादाराशिय शुन्दंततः पद्दष्टावलं नवनिचकारादुचवलसाधन वडागविधिर नापिज्ञेय अत्रेदध्येयंयदिमध्यस्पष्ट युती दादशापितदादादशनि रनरनकार्यमिति नैसर्गिकवलनस्यादित्यस्य पूर्वान संबंधएको नररूपमदिविहतंतदाक्रमाच्छनि सोमबुप गुरुशुक्रचन्द्रसूर्या- गानेसर्गिकं बलस्मान्तयथा एकस्मिन् सप्तमक्तेशने नैसर्गिक वलंयोत्सतपक्तगौमस्य. अर्थापाः मध्यम और स्पष्ट बहका चोगाई उसी महके शीणी किमारनानोमोमादि पहाकाचेवाकेन्द्र होता है यह केन्द्र साशीसें ज्यादाोयंकार राशीमें कम करना अनंतर उच्चवलग मंनिगाणा सेनादेना.तो टायल होतामअचवान्पडभाल्पकेन्द्र शा. पककर इनोसे तागंदना नोतुगमतीसेन्चैदीबल होताहै। यसपा और चावल इनके योगको चटावल कहने में अनुर नगरसे तक मंकको नागदेनातो कमरी शनिशीम-बु. परारा गुरु चन्द्र-मर्प इनका नैसर्गिक बल होता है अथवा +4 १३४.९७ इनको क्रमले १से तक अंकसे उणनातोशनिझीम इ. त्यादि ग्रहोंका कला नेसर्गिक वल होता है. अक्सा सरिक वलको दू. नातिगुना चौगुना करतेजावो तो वही ऋमसेबल होजायगा. सोमादिग्रहोंकाशाप्रोजवनावनेतिविधिः- बुध और शुक्रइनके शीघ्रकेन्द्रने मध्यमस्र्ययुक्त करनेसे ध शुक्रका शीघ्रोच्च होता है. और मंगल वृहस्पति शनि इनकासी घोन मध्यन सूर्य है। प मध्यमग्रह. स्पष्टटाह. मं| चुमशु.. मं| कु.शुशिय. ५ २ १२२ ।११ ११ ! २१ २६/१३ १७११ १२/५६२१ ४५ ८ म. स्पष्ट मध्यस्पष्टयोगः मध्यस्पष्टयोगदलचक्रम्. ससुशमान गुमश. २० १० २० १४ १५ यो-द. ८ योन २२ शीघ्रोच्चचक्र चिन्द्रिचकन् अशुशग्राम-नाश- शिी प. २ २५ ?? . ५६ शबलसारिणीप्रवेश किषनासकरके सारणीमें दराशी कोष्टकं लिख उनके नीने कोष्टक में सादिलालिखाई. उसनेसे पझल्मक्षिकाजो इश्यिक होय उस्कैनीला कळलेना अनंतर राशिकोडकके नारअंश कोष्टक और ६४ कलाको लिया है उससे पडाल्पक- मंकजोइशोरकला आवदतरिमिति कोकके नीलेकाश बालादि और कला विकलादि फलाएकत्र करक पूर्वनेलियाजोर- शीफल उस्ने युक्त करना तो ग्रहोंकाचेमाचलहोता है. यहसार णीप्रवेशसे इष्टकष्टाध्यायमेकासूर्यचंद्रकाचेष्टावलकरनेकेवास्तेकामपड़ ताहै. ।। चैशावलसारिणीराशिफलः।। . . . .३ . अंशफल. - २० १ २. ३ २ १ १ २ २ ३ 3 ० २० .०.२० २० १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६/२७.२८/२९-२.. ट ९. २० २०४० २०४० २०६० २०४० . . ० टीप:- यारामरेज्यसोरीणांशीघ्रोच्चस्यादिवाकरः ॥ कला विकलाफल. ८ . ३ ९ १.११.१२/१३/१४/१५ १ २-२ ५ २०० २०४० १६/१७/१८१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९/३ ५ ९ ९ २० 11211 9. sd169. ८ . . . २० २.४ . |२१/२२/२३/३०/३५/३६/३७ २९/१०/११/१२/१३/१४/.. 11.12.१९/११ ११ १२/१२/१२/१३/१३/१३/१४/१४९४५ ५६.00010. ५. ../५२/५३/५४५.५५७५२५५० 12 १५/१५ १५/१७१७/१७१२०१९ २. |२ ... |३०|| :/३//२ उदाहरणम्। सोनकाचेष्टाकेन्द्र ७५९।२६।६यहपसे अधिक है इसवास्ते १२मसे फम करके ४।२०।२३।५१ यह इसका राश्यंकर इसवारने राशिकोष्ठकका फल 101 स्का यंश २० इसवारी२० कोषका . . . का फलं ६४० औरकला३ इसवास्ते२३कलाकोटकका फल एकत्रकरके ४८यह राशीफलं युक्तकरके ०।४।४८ यह नामंका चेष्टावल भया. इसही प्रकार बुधादिौंका करना. चेष्ठावलचक्र.. अयनचेष्टावलयोगचक्रः म.गु.श. वाचनमः खुमशुझ. १ ३१५१/१९२११९४५२१ १६/१०/१०/११/१२४६२४ 4 नैसर्गिकवलोदाहरण. एकको से भागदेके ०11३४ यह शनिका. दोको सेप्नागदे. कि.१७८ यह भीमका. ३को सेनागदेके०।२५१४३ यहबुधका चारको७से भागदेके ०३४१७ यह गुरुका-पांचकोसे भागर्दैके ०१४२२५१ यह शुक्रका-छक्को से भागके ०५१।२५ यहचन्द्रका को भागदेके व्यह सूर्यका. इसीप्रमाणग्रहोंकासंवका ल एकही नैसर्गिक बल होता है. यहवल सिद्ध है। नैसर्गिक बल. चं. मं. शु. श.! ब. ४२ २६ ३६ युदेवाणवियोगहत्त्वंचरचोवीयैक्यचौरंतरम् स्वसौम्यस्थवलेतयंचयमदिकुसंस्थस्यकुर्यादले। श्लोक-सदृष्टयंघ्रियुगुग्नहरिचरणोनरपेटवीर्यमवेत सावानां वलंमीशचनृचतुष्पादारख्यकीटांधुजा ॥१॥ जायांबाद्यवनोनिताः खलुनतोदिग्बीर्यक्त्तद्युतं सदृश्यंघ्रियुगुग्रहटिचरणोनशेज्यदृग्युकपुनः ।। अन्वया- खचरयोस्ताराप्रहयोः सीमादिग्रहयोरित्यर्थी युन्सानि नीक्योर्नस्ययोरंतरंवादियोगहन्द्रारांतरण'जक्तासन्यलयंना सौम्योत्तस्यस्यग्रहस्सरलेसंधनकुर्यात्यमदिवनस्यस्यपले क्षय- ग्रहः सू. दुः स. C २५. द मृणं कुर्यात् ग्रहस्य दक्षिणोत्तरस्यज्ञानंतुशरवशेन भवतितधी थायस्य नहस्योत्तर शरः स उत्तरस्य यस्य दक्षिणः सदक्षिणा स्था यदियौरुत्तरस्टारस्तदायत्याधिकंशरं सऊजरत्योऽन्योदक्षिण स्यः यहियोदक्षिणशरस्तदायस्याधिकारसोदक्षिणस्थोऽन्यउत्तर स्थ इत्यर्थी इदानींदृग्बल-ग्रहाणांप्रागानीतंबलंसतां शुभग्रहाणां दृष्टि चतुर्थंशेिनयुत उत्राणां पापानादृष्टीचतु शिनासहित कार्य तदा ग्रहाणां वीर्य जिवे भावबलम्सावानामेकंबलस्वामिबली मिवन्यपुनहितीयंबलंनृचतुष्पादारव्य कीटाम्बुज़ाजावाः नृरचतुष्पाद कीटजलचरणशयों लावा क्रमेणजायांबाद्यवसोनिताः सप्तम चतुन थं प्रथम दशम भावरूनायदिपडताधिकास्तदा दाशराशिफ्यान दि पवाल्माययास्थितएवतत्तः पेडुक्ता फलं दिग्बलं भवेतु अनयो योगः कार्य सतुशुभग्रह दृष्टि चतुर्थाश पापग्रह दृष्टि चतुर्याशयो। रन्तरंधनणे पवेक्ति वकार्ये वुधउचर्दिष्टयोरेक्यं नृत्तीयबलं बया णां योगे स्पष्ट भावबलं स्यात् . अर्थ:- जवजन्मकालमें २ ग्रहोकायुद्ध होताहै कहिये वह महराः शिक्षाग कलाले समूहोने हैं तववह नहींका कलात्मक शर करना अनी तर वही ग्रहोंका पूर्वोक्त वलेकाजी ऐक्य उस्का अंतर करके उस्कोशर के अंतरसे नागदेनाज़ो फल पावसो उत्तर दिशामें रहनेवालाजो बहुउस्के वलमें युक्त करना और दक्षिण दिशा में रहने वालाजो ग्रह उरके वलमेसे कम करना यह संस्कार चेष्टावलका भेद है. टीप:- मर्यसे चंद्रादिकोंका जोसमागमउस्को अस्तकहना और मोनादि ग्रहोंका परस्परजोसमागम उस्को युद्ध कहना द्वारकायानगनुग्रह लाधब में कहा है सो ऐसा. उस्मं प्रथम पानांशादि कहने हैं. वाम्बुधयः वयमाःवजुजंगाःचांगमिताः रवदशक ममाम्यः। पातलयाः कसुताइधग्योर्मध्यमचंचल श्लोक फैन्द्रविहीना कुदिन्यार्थियगो विमादलचयम्लेषड्नपुर एंगलंकेन्द्रंचविशुदमस्यसमिताईक्यंलवमागतात् दिब्धयनंकजात्कयमलाब्धीन्द्रद्रिाक्तंक्रमान तहीनानिरिकलागुणवोगोन्जाइनादाक्युति।।१।।
(१४५) १ ७ मंबुरशः प्रहा शरकेलियेशोघ्रकर- ६०१० पातांशाः णकाप्रकार- ३ ४४ शीघ्रांशाः भौमादि जिसग्रहका क १ १ ताज्यांकाः साधना होयउस्का अंति| १८१५/१२/१९/१२ शीघ्रकणांकः मशीअकेन्द्रलेके वह रान शीके अपेक्षा अधिक होया तो१२.राशीमें कम करना और वह षड्भास केन्द्र के राशि परिमित कोष्टेक मिलिरवाजोशीघ्रांक उस्की मिलानलेना.और एकाधिकराशि परिमित शीघ्रांकमेकेन्द्रकी राशीत्यागकरके अंशादिकको गुणना और वह गुणाकारको ३० सेलागदैना तो फल अंशादिआवेगा उस्मैशीघ्रांक की मिलानयुक्त करनाजोयोगावे उस्को क्रमसे कोष्ठ कमेकामा- ज्यांकसे भागदेनाजो फलावेसीअंशादिजानना. वहक्रमसे कोष्ठ कमेकाशीप्रकणंकिमैंसे कमकरनाजोशेष रहै सो यहाँका अंशादि। शीघ्रकर्ण होताहै.औरजो बुध युक्रका पातांशक हे हैं उस्में अहून गोसन्नजो बुध और शुक्रजो शीघ्र केन्द्रहोयसोऊपर कहा जो पातांश उस्मेंसैकमकरके जो शेष अंश रहै सो बुध और शुक्रके भौमादिशरवनानेकाप्रकार मंदस्पष्टरवगात्स्वपातरहितात्कांत्वंशकात्केवला- श्लोक- कर्णासास्त्रियमाहताअथगुरोपेल्लोचनाप्साम्पुनः । स्वां यूनामसृजौडडुलादिकशः पातोनदिकस्या- दसी विघ्नःस्यात्कलिकादिकः ।। अर्थभाषा. जिस ग्रहकाशर बनाना होय उस ग्रहका पातांश मंदस्पष्ट ग्रह मेंसे कम करके जो शेष रहै सो पातोन ग्रह या अनंतर पातोना ग्रहको अपनांशा दनविना उस्सैक्रांतिल्यावना और वह क्रांविको २२ से गुणके वह गुणाकारको शीघ्र कर्णसे भागदैनाती अनीष्टय हका अंशुलादिशर होताहै सो पातोनत्रह उत्तर गोलमैं होयतो उत्तरशर दक्षिणगोलमें होयनो दक्षिणशरऐसाजानना वैसाही पातांश होते हैं. १९ (१४६ गुरुका शर करना होयतो ऊपरकीरीतिसेले आयेजोशर उस्को.२ से भागदेना तो गुरुका अंगुलादिशर होताहै.और भीमका शरक- रना होयतोऊपरकी रीनिसेले आयेजोशर उस्मेंसे उसीका चतुर्थी शकन करना तो भौमका अंगुलादि.शर होता है. अनंतर बनाया। जोशर उस्को इसे गुणदैनातो कलात्मक शर होताहै.. दृग्बल भाषा ग्रहपर जिस ग्रहकी दृष्टि रहती है उस्के बीच में शुभग्रहकी टीका ऐक्य करके उस्का चतुर्थाश लेना नोवहधन दृग्वल होताहै और पापग्रहके दृष्टीका ऐक्य करके उस्का चतुर्थाशलेनातो वह ऋण ग्बल होताहै. अनंतर धन हम्बल और ऋणदृग्वल इनका अंतर करना तो स्पष्ट दृम्बल होताहै. टिप:- चन्द्र बुध गुरु शुक्र यह शुभ ग्रह और रवि सोम शनि यह पापग्रह हैं बुध पापग्रह युक्त होयतो पोपशुप्तग्रह युक्त होय तो शुभमिश्रग्रह युक्त होयतो मिश्रफल जानना. उदाहरणम्. सूर्यके ऊपर शुभग्रहकी दृष्टीका ऐक्या३६।४२ इसका चतुः शा२४।१० ग्रहधन हम्बल और सूर्यके असर पाप ग्रहकीह टिका ऐक्य ०।२९।२१ इसका चतुर्थशि०।७।२०यहरुण ग्बल इनका अंतर १६६५० यहधंन दृग्वल सूर्यका भयो इसी प्रमाण चंद्रादिकों का करना ट्रिप्यण:- शुभ ग्रहकी दृष्टीका चतुर्याशपापग्रहकी दृष्टिका चतुः शिमें घट जायतो ऋण रग्बल अन्यथा धन हबल जानना. दृग्वल चक्र मिदम्. सूयर चन्दः | सोमः | खुधः | गुरुः | पृगुः | शनिः यहाँ: -- ८ . .. . १ १ १३ हबल.. २ ४५ धन ऋण ऋर्ण नाण धन ऋण धन MAN षडबलेक्यचक्रमिदम् ।।. सूर्य चन्द्रः मंगबुधः रह शुक्रः शनिः २४. ग्रहाः स्थानवल १ २ ३३॥ १३॥ ५९॥ १० २०॥ 4 6 0.1A ३८ दिग्बल २ १० ३० १ ४१ MP १६ कालबल ३. चेष्टावल ४ १ 5103303 ५ २९ ३४ ट ४३ ३४ १७ ७ ३४ 'निसर्गवल५ पाचोंका योग: १३ ३५ ३॥ ४६॥ .२७॥ १६धन ऋण कणाकण ५ धन ३ऋणा धन दृबल. ९० २० षड्बलयोगः ४॥ ३७॥ ५१६:२६॥ २॥ आदबल- अर्थभाषाः लग्नादिभावोंके स्वामीका जोबलसोलग्नादिभावबला होता है. गनुष्यराशी मिथुन कन्या तुलाधनका पूर्वाई और कुंज इ. स्मेिंसे सप्तम भाव कम करना चतुष्यद राशीमेषदषम सिंहंधनकाउन चराई और मकरका पूर्वाईइस्मैसेचतुर्थ भाव कम करना. कौट राशी कर्क रश्चिक इस्मसे तनुजाव कम करना.जलचर राशी मीन और मिकरका पश्चिमाई इससे दशमन्नाव कम करना अनंतर शेषधा- शीके अपेक्षा अधिक होचतो तशी ते कमकरके षड्यात्म शैषसे दिग्बलमै पूर्वोक्त रीतिप्रमाणाबलंसाधन करनातो भाव दिग्वल हो नाहैअनंतर यह दिग्बलक्षावबलमें युक्त करना भावपर जीन ग्रहो- की दृष्टी होय उस्मैंसे शुप्पग्रहोंके दृष्टीका ऐक्य करना उसीकाचा तुशिलेना नौवहधन हग्वल होताहै और पापग्रहोंके दृष्टीका ऐक्या करनाउसीकाचतुशिलनातो वह ऋणग्वल होताहै अनंतरधन णहरबलकाअंतरकरनातो स्पष्ट दृग्बल होता है. यह दिग्वल संस्कृत भाव बलको धनहोयतो युक्तकरना ऋण होयतो कम करना फेरउस्को भावके अरकी बुधगुरुको दृष्टीयुक्तकरनाती स्पष्ट भाव वलहोताहै।
(१४८) भाववलोदाहरणं:- तनुभावस्वामिशुक्र इस्का षड्वलैक्य५।३१।३७ १३० यहतनुभावबलयहीरीतिसेघनादिझावोंकाबलजानना+ तनुभावा ६९४२२२६यहलग्नराशीमनुष्यराशीहै. इसवास्ते इस्मैसे सप्तमन्नाव ९।१२।२६कमकरके ६००० यहसेज्यादानहींइसवास्तैइस्काफल पूर्वोक्त दिक्बलसारणीपरसे १०० यहतनुभाव दिग्बलऔरयहतनुभाव बल५।३१।३७।३० इस्मेयुक्तकरके ६।३१।३७।३० यहदिग्बल संस्कृततन भावबल-तनुभावपरशुभग्रहदृष्टियोग१४३।२ इस्काचतुर्थाश०।२५ ॥१५ यह धनग्बल औरपापग्रह दृष्टि ॥३९।१श्योगयह इस्काचतुर्था- शा२४॥४८यहऋणदृम्बल इस्काअंतर००५७ यहधनस्पष्ट हम्बल यहदिग्बल संस्कृततनुनावबलमें युक्तकरके घा३२।३४ा यह इस्को तनुभावपरबुधदृष्टि५०५० गुरु हॉष्टि।४४युक्त करके ७२४i ३०यहस्पष्टननुभावषड्बलभया यहीरीनिसेधनादिक्षावोंकास्पष्टबल करना भाव बलचक्रम्. तपास सुपु रिजा-मृधःकाच्या भावा भावस्वामी बलम्. छ भावदिग्बलचक्रम् योग Emore.maARASDal SAEROEoIRATRIOTRAro भावग्बल. EDSep.oot • SAParirik2NBIPI FDMRobbing.00PM ProboMENTA. 60.HT FormeroraemedialoKRISA Parbasairat EpremendouserformSFads Bidoysavi IAS MARA योगः बुधहरिः गुरुटिस ५४ . مردم स्पष्ट माववलचक्रम् 4॥ श्लोक} } बलाधिकार 1॥५॥ न ॥अथइष्टकष्टाऽध्यायः॥४॥ इष्टकष्टसाधनार्थरविचंदचेष्टावल केन्द्रसाधनं. श्लोक- कष्टविधीवलेकुरुततःप्राग्वन्नवी-यते॥१२॥ व्युन्दुस्त्रिमयुक्तसायनरविश्वेष्टारख्यकेन्द्रतयो- अन्वयः- विगतोऽर्कीयस्मादिन्दोः सचासीव्यर्कन्दुः त्रितयुक्तसायनरवि अक्रमेणतपोश्चेष्टारख्यकेन्द्रे सवतः तद्यथा अर्कोनयन्द्रस्यचेष्टाके- न्द्रराशित्रयेणायनांशैश्वयुतोरविः सूर्य्यस्य चेष्टाकेन्द्र्स्यान्ततस्ता भ्यां केन्द्राण्यांप्राग्व द्रौमादिचेपावलसाधनवत् षडधिकं चक्राच्युतं पहृदित्यादिनारवीन्दोवलं कुरुभोगणकेत्यध्याहार कास्मविधी |गिोकेष्टेष्ट विधौगावोरश्मयः कष्टञ्चेष्टंचकष्टेष्टे कष्टेष्टयोर्विधि कटेष्ट विधिस्तास्मिनुकष्टेप विधी अयनोचेष्टाबलयोः कष्टेष्टसाधने उपयोग गोडस्तीत्यर्थः नवीव्यतितावः यतः विसंगुणेचायनपक्षवीर्येचे टावले तिग्मकराजयोस्त इति ।। अर्थशापाः चन्द्रमेंसे सूर्य कम करनातो चन्द्रका चेष्टा केन्द्र होता है. और सायन सूर्यमें राशियुक्त करना तो सूर्यकाचेष्टाके दू होताहै. अनंतर यह केन्द्रसे राश्मिकष्टेष्ट साधनार्थ उच्चबलमेंपू क्तिरीति प्रमाण चेष्टाबलवनावना-यहचेटाबल-पूर्व के ऐसा षड्व- लार्थ ऐसासमझना.नहीं कारण सूर्यकाजोअयनवल वही चेष्टाच- लहैं इसवास्ते दूना करना और चन्द्रकाजो-पक्षबल वहीवेष्टाबल है इसवास्तै दूना करना. उदाहरणम्. चन्द्र।५।२२।३५ यह इस्मैसे सूर्य।१३।१०।४२ यह कमकरके १२२।११।५३ यहचन्द्रकाचेप्टाकेन्द्रलया और ०१३।१०।४२ यहइको अयनांशा२।४४३युक्तकरके १५५४४५चहसायन सूर्यस्को३ राशियुक्त करके आपायहसूर्यका चेष्टाकेन्द्र अनंतर यहचेष्टा केन्द्रसे पूर्वक्ति रीतिसे पूर्व में लिखीजो चेष्टावलं सारणी ऊपरेते ब- नायासो यह चंदचेष्टावलेला ३६ सुर्यका चेप्टाबल०।४९१५८ रश्मीष्टकष्ट साधन-श्लोकः- येचेष्टोचवलैरसैधिनिहनेसैकेनिजारमयष्टातुंगवला हने पदमिहेष्टस्याइलोनैकयोः ॥घातान्मूलमिदंहिकष्टमय- तद्रूपंदशायाः फलवीयदृक्पृथगिष्टकष्टगुणितेदेचे एकष्टाव्हये ।।१३।। अन्वयः सूर्यादीनांमागानीतेयेचेष्टोच्चबलेतेषभिमुणिते सैके रुते सतिनित जा समयश्चेष्टाबलाच्चेष्टारश्मयः उच्चबलादुच्चरश्मयो भवति इत्यर्थः चेष्टाबलेनोच्चबलं रणनीयं गौमूत्रिका गुणनरीत्या तस्यमूलामिष्ट संज्ञस्यात् + चेष्टचलतुंगबलोनैकयोCत्तान्मूलंकष्ट संज्ञस्यात् दशाफलं तद्रूपंत्यात् अर्थादिष्टकष्ट तुल्य फल मिति इटेऽधिकेसति शुभमधिकंकष्टेऽधिके शुज मधिकं साम्येमिफलं दशायाः स्यात् ग्रहस्यबलं अर्थात्पवलैक्पंस्थानद्दये स्थाप्यं तथामहोपरियादृष्टया स्तायपिस्थानड्यग्रहस्पेष्टकरेनगुण्यास्तदाक्रमेणेष्टबलंकष्टबल इष्टदृष्टयः कष्टदृष्टयश्च-वंतीति. मथः-ग्रहोंका जो चेष्टाबल और उच्चबल इस्कोसे गुणके गुणा कारमें एक चुक्त करना तो ग्रहोंका उच्चरश्मी और चेष्टारश्मी होनी है। ग्रहोंका चेष्टावल औरउच्चबले इनके गुणाकारका वर्गमूल निकालना तोग्रहोंका इष्ट होता है. एक से ग्रहोंकाउच्चबल और चेष्टावल पृत या पृथक् कम करके शेपजोगुणाकार उस्कावर्गमूल निकालना तो यहांका करदोताहै.यह इष्टु कष्टके प्रमाण नहोंको शुभाशुभशा फलजानना यहाँका पलैक्य और ग्रहोपरिदृष्टी इस्को पृथक्पृधः क्नहोंके इरसेन्दारकरसे गुणदेनातो ग्रहोंका इष्टवल और कष्ट बेट और नहीं की इष्ट दूरी पार फेप दृष्टि होती है. वर्गमूल निकालनेका प्रकार अंत्ययावदिहाच्छाकायतिर्यस्थरेरवया संज्ञास्था नांककानाचचिपमारव्यसमेकमात्त्यत्त्वान्यादिपः लोक- गाररुपिदिगुणयेन्मूलंसमेतन्हते त्यक्त्वालब्धतात. नदायविपमालम्पदिनिघ्नंन्यसेत् पंक्तयापंक्तिहतं: सन्त्यविषमात्यत्काप्तवर्गफलं पड्यांतहिगुणं न्यसेदिनिहात्तिर्दलंस्यासदम् ॥१०॥ यन्वय गणकयंसारिगान रुनिग्यारसा ग्लादिगणपेन् सगे तोगतिगापा पिरमादन्यरुतिस्पतालमंदिनि पंपांन्यगेन्समे पनिलेगणरानियमानासर्गिमत्यफ्लानफलंदिगुणनिया (१५१ ) न्यसेत् इति मुहुः कुर्यात् नदापंक्तेः लंपदंस्यात् . अर्थभाषा: जिस संख्याका मूल निकालना होय उस्के दहने नरफन से विषम समका चिन्ह करनाजव तक अंककी समाप्ती न होय नवतंक करना अनंतर सवसेवांई तरफजोअंत्य विषम होयउस्में जिससंख्या का वर्गपटै सो घटाय देना और जिस्कावर्ग घटै उस संख्याको मूल कह ते हैं उस्कोदूना करनाउस्का नाम पंक्ति है उस करके भाग देनाजोदि पमके पास समं होय उस्मेंलब्धिऐसीलेनाकि जिस्कावर्गागेके दिन षममें घटिजायतो उसलब्धिका वर्गाके विषममें घायदेनाउस्को दूना करके प्रथमजो पंक्ति संज्ञाहै उस्में आगे एक स्थानमेवढायके रख- नोकदाचित और सीअंक होयतोउसी पंक्तिसे पुनः पूर्वरीतिसे भार गदेना लाब्धकावर्गागेको विषममें घटानालब्धि दूनी पंक्तिमैरवन ना ऐसा अंक समासीतक करतेजाना फिर उस पंक्तिकाआधा करना तो मूल होताहै सावयवककामूलनिकालनेकीरीति. मूलावशेषकंसैकषष्टिविकलान्वितं ।। हियुक्तेन हिनिघ्नेनमूलेनाप्तस्फुटं भवेत् ।। अर्थ:: जब मूलनिःशेषन होयतो शेषमें१युक्त करिके से गुणदे. ना उस्तो आया जो मूल उस्में रयुक्त करके दूना करिके भागदैनाती मू. लका अवयव होताहै यह स्थूल रीति है। सूक्ष्मरीतियह है. सैके नहि मूलेन भक्तंमूलावशेषकम् ।। लब्धन्तुत- धः स्थाप्यंमूलंसूक्ष्मतरम्भवेत् ॥ अर्थः- मूलायाजोउस्को दूना करके युक्त करिके मूल शेष भागा देनालब्धिको उस मूलके नीचे रखना तो सून मूलके आसन्न होगा. औरयह सबसेअच्छीरीति है. जिस्का मूल लेना होय उस्को से गणिदेना कलायुक्त करना फिर सेगणनास्का मूल लेना उस्को ६ से नागदेनानो ठीक मूल होगायदि ऊपरका अंश शून्य होयतो नीचेके अंकको ६० से गुणिक विकला युक्त करके नूल लेना उस्को से जाग देनातो मूल होता .
( १५२) . रइम्युदाहरणम्॥ सूर्यका चेष्टावल ०४११५८ इस्कोसे गुणके १।११।४८ यह इस्को एक युक्त करके ५।११।४८ यह सूर्य्यकी चेष्टा रश्मि सूर्यकाउन चवल ०५८।५६ इस्कोपसे गुणके ५१५३।३६यह इस्कोपयुक्तक रके ६।५३/३६ यह सूर्यकि उच्चरश्मि यहीरीतिसेचंद्रादिकीका चेष्टा रश्मि और उच्च राश्मि बनावना. चेष्टाबला उच्च बल. सूचं. म-शुश रसू .. मंबु-बशुश ० . . . . . . . २० १९१७ ५५/५८४७ . ७ . ११/३२/४६/४४.४२१/२१ २ ३८ ५८२६/४८/२०४१/५५/१५ ५५/४७/२१/७ चेष्टारश्मेिन उच्च राइम स्तूचं मं] बु. शु.श. सू.मं. बु. शुश २ ६ ३ १ १ २ ११ |१५|४०२६/५८।११ ५३ १/२६/१२/५३/५/४६ ४८३६.४८ ૪૨ ४२१३०४८४२ इष्टोदाहरणम् सूर्य्यकाचेष्टावल ०1४१५८ यह इस्को सूर्यकाउच्चवल०५८ ५६ यह इस्से गुणफे ॥१३. इस्का वर्ग मूल ०४९।४३ सहसूर्य- का इष्टया इसी प्रकारे चन्द्रादिकोंका इष्ट बनावना. चोचवलगुणनचक्र. इष्टचक्रम् सूचमं यु.गु.शि. सूद चं- मं| यु.एशश J क . . . . . . . . ४३. ३१७४२५८७२६ ४१/११/३१ ३२/१०/५ |१३|१०|२४|३४|१४|१६|१९ कटोदाहरणम् सूर्यका चेष्टावल ०४१।५८ यह एकमें कमकरके १८३२ इस्को सूर्यका उच्चवला५८०५६यह इस्को एफफम करके ०१४ यहइस्से एणके ।०।१९ यह इस्का पर्गमूल ४२० यह सूर्यका कराया इसी प्रमाण चन्दादिकोंका कष्ट साधना.
. . . . 6 . . . ७ एकोनचोचवलगुणन कष्टचक्रम्. सूचं मं बु गु शादःचं मं बु व शु. श.प्र. १७१२१५/३/६/२७ ३२/२७/३०१/१९४० ३८|२२१५ २०४७ ४५/३३/२५ इष्टकष्टवलोदाहरण- सूर्यका षड्वलेक्य ७।५११५३१३० इस्को सूर्यका इर०४१४३ यह इस्से गुणके ६।३११००५३ यही काइष्टबल अथवा सूर्यका कष्ट ०।४।२० यह इस्से सूर्यका षड्लै। क्यको गुणके ०२४०४५यह सूर्यकाकएबल यही रीतिसैचंद्रादिकाका इष्टबल और कष्टबल करना. इटबलचक्र. कहबलचक्र. सू.मं बु शु श सूचं मंः युशु. श. . ४२७२९ -४९ ८ २.६ १६ उदाहरण-चंद्रके ऊपरसूर्यकी दृष्टीनसा५४ इस्को चन्द्रके इष्ट २६.३यः ह इस्तै गुणकेला१२ यहचन्द्र के ऊपरसूर्य्यकी इदृष्टी और चन्द्रकाकष्ट ०१२२६४७ यह इस्सेसूर्यदृष्टि ८१५४ गुणके ०१०१९यहकष्टदृष्टी भई यही रीतिसे सर्वग्रहीपरकी इष्टदृष्टी और कष्ट दृष्टी करना. इष्टदृष्टीचक कष्टष्टाचक. सूः च म बुः शुशनसूनच नंबु शु . a . . o १ १३ ११ ३ ३८ ૧૨૫૨૪ . . २ ११ . . . . . 6 १० ३. ५.२ ५८ १९१५ ३२ . २ . 10.000UN... ० ० . .00012900.00 45 :२४ 33 . . . . . ० २४ ४ २२/३९ . . १७ . २७ . . o . . . १३ १२।२२ . ३९ ३६ १ . . 9 . . . . १५ ४५ २२ . ५५ C... . . २५/२६ २२ 21 .52 १० (९५४ ) सप्तवर्गशुभाशुभसाधन. स्वोन्चेस्पंभिकोणेचूरणविरहितस्वर्भगेईनयोटां शाश्याधीटर्सइष्टतयुजिचचरणास्यासमष्टिमांशः। पांशोवेरिगेहेडघ्यरितयुजिरदांशश्चनीचेवमीशा दिलंगेहेतदुनैकमसदयदलंष्टुसुकार्येतदैस्थे॥१४॥ श्लोक- पंक्त्योसीसुकोटयो प्रथमयोरिष्यासदेश्यकता स्थाप्येशदलादिषसुचतदर्पदपानांपृथक् ॥ कृत्वोचत्यासदसझुतीनिजनितन्निनइशाशुओ वर्गदतस्थरवगोगसौ सदसतीर्घातात्पद स्फुटे॥१५॥ प्रन्यया- स्वोच्चे मूल त्रिकोणेत्त्वादिगदेपहे रूपंपावेन रूपाई मित्या दिगेहे गृहस्थाने ईशान्स्वामिन इष्टस्यात् विद्यया होयस्मिन् रहे वर्तते तत्स्वामीयादस्वतदारूपाईबलं यद्यधिभिवगृहेनदायो शांशाः मित्रगृहे चतुर्थशात्तमरहेऽष्टमांशशत्रुगृहे पाशः अपिशबु रहे इंतांश नीचले शून्यं एतदूनरूपात्कएंगेह रहस्थानस्थयारिष्टक एयोरर्द होरादिप सुस्थाप्य ॥ एतदुक्तम् ॥ सप्तमस्थानस्थिताना शुजानामेक्यंशुजम् अशुभानाक्यम शुञ्जस्यात् ॥ १४ ॥ पंत्योरिति । इटातदक्ये चतुर्भन्ते पंपन्योः स्थाप्ये एतदुक्तंभवः ति ॥ प्रागानीतनिटैक्यं चतुर्मक्तं शुभपंक्त्योःस्थाप्यंकटक्यंचतुर्थाश मानं पंक्तौस्याप्यं प्रथमयाग्रहकोष्टयोरित्यर्थः पदलादिपट्नुहोरा- दिपद्मुताईटहस्थापितफलस्यास्याप्यंवर्गपानांटहादिसतपशा नां पृथक् प्रत्येकं निजनिजेस्वस्वेसदसद्युतीशुभाशुभयोरैक्ये उत्सद्येन नित्यनेनस्योच्चेरूसमित्यादिनास्यापिनपोरेवशुनागुभयोरैयत्येकापना चांनरंस्थापिनयोरितिरुत्वातन्निनइष्टाशुपताश्यानिनेकार्येश्य युगे पंत्यो तप्तमुकोटयोस्थापितफलै अनयारीत्यायनीतेदृष्टाशुन भने वर्गदतत्स्थरयगोजसो सदसतोपतात् पद स्फुटेस्याताम् ।। वर्गद्यर्ग स्वामी तत्स्यरवगोवर्गस्वग्रह ओजसोः यलयो गयोर्धा त पदेन पूर्वफले गुणिते सतिस्फुटेन्तः ॥ १५ ॥ पर्थशापा हेश परनोचने हीयतो रूपवल त्रिकोणमें होयतो तीन चनुशिाा स्वहमें होयतो मई 150 अपिमित्रके यहमें होयतो तीन अष्टमांश०।२२।३० मित्ररहमें चतुर्याश०।१५।। समके गृहमें अष्टमांश०७।३० शनुरहमें पोडशांश ३.४५ अधि शत्रु गृहमंदत्ताश०१०५२/३. परननीचौहायतोशून्य यह गृह स्थानमें शुपाजानना यह शुभएकश्में हीन करनेसे अशुभ होता है। गृहस्थानमें यह शुभाशुभ होरादि घड्वर्ग स्वामी परसे गृहस्वान के फल प्रमाणसे जो फल आ उस्का अईजानना अनंतर सप्तर- गेसिनशुपका और अशुपका ऐक्यता करना. टिप्पण. ग्रह परम उच्चमें किंवा परमनीचे मेवामूल त्रिकोणमें प्राप्त होय. तो मित्रादिज फलनलेनाते उच्च किंवा नीचवा मूल त्रिकोणइसीका फा ललेना. उच्चमूलत्रिकोणवास्वगृहइस्मेसेतीन- कावादोकासंपवहोताहैउस्कानिर्णय. सिंह २० अंशतक सूर्यका त्रिकोण अननर स्वगृह-वृषा३- शतक चन्द्रका उच्च अनंतर मूल त्रिकोण-भेष१२ अंशतक भीमका त्रिकोण अनंतर स्वगृह-कन्या अंशतक बुधकाउच्चआगे५ अंश- तक मूल त्रिकोणागैस्वगृह- धनु १० अंशतक गुरुका त्रिकोण- नंतर स्वग्रह-तुला१५ अंशतक शुक्रका त्रिकोण अनंतर स्वगृह- कुंभ२० अंशतक शनिका त्रिकोण अनंतर स्वगृहजानना-जवन उच्च किंवा नीच राशीका उक्तांशमें रहता है तवग्रहका परमोच्च किंवा परमनीच जानना. अर्थशापा. दोसात सात कोष्ठककी गुप्ताशुभ पंक्ति लिवना अनंतर शुभ पंक्तिका प्रथम कहिये यह कोठकमै यहाँक सप्तदत्पिन्न शुक्य का चतुर्थाश लिखना और होरादि६ कोष्ठकमें यह चनुशिकाय- पलिरवना, और अशुप्त पंक्तिकै प्रयम कोष्टको ग्रहकासप्तवर्गी सन्नअशुञ्जक्यका चतुशि लिखना और होरादिषटे कोष्ठक में यह चतुर्याशअर्धलिखना अनंतरह होरादिसप्तवर्ग स्वामीका जुदाजुदा कियाजोसप्तवर्गात्पन शुक्र उस्कोक्रमसे यह शुजपंक्ति में लिखाजो गृह होरादिसप्तवर्गफलसे अलगअलग गुणदेना तो मध्य मशुभहोताहै और यह होरादि तमवर्गस्वामीका पृथक पृथक् किया जोसप्तवोपन्नाशुक्यउस्को क्रमसे यह अशुभ पंक्ति में लिखा जोरहहो रादिसप्तवर्गफलसे पृथक् पृषक गुणदेनातो मध्यम अशुफ्त होता है। अनंतर जिसग्रहका स्पष्टयुजसाधन करना होयतो उसग्रहके इन ष्टबलकोउसीग्रहकेगृह होरादि ससवर्गस्वामीके इष्टवलसे पृथकूप यक गुणके उनके वर्गनूलसे खसवर्गस्थमध्यम शुषको गुणदेना तो यहाँका स्पष्टशुभहोताहै और जिसबहका स्पष्ट अशुभसाधन करना होयतोवहग्रहके कष्ट बलकोउसीग्रहके गृह होरादिसतवर्गस्वामीके का एबलसे पृथक् पृथक गुणके उनके वर्गमूलसे स्वस्व वर्गस्थ मध्यगन्ध- शुभको गुण देनात्तोत्रहोंका स्पष्ट अशुभ होता है. टिप्पण:-"विंशतिरंशासिंहेत्रिकोणपरेत्त्वाचनमकस्य ।। उतागत्रितयंद पइन्दौस्याधिकोणमपरंशाः हादशालागामेपेत्रिकोणमपरेवाप्पोमरसाउन- मोकन्यायांवपस्यांशकै सदाचिल्लभापत्ताभिकोणजातनतिरंशैरवरा शिजंपरतः,दशशि गर्जविस्वत्रिकोणपितत्परंवग्रह शुक्रत्यचतिवियोशा स्विकोणमपरंवतुलायांतु,कुंभिकोणस्वगृहेररिजल्यवर्गवासिंह उदाहरण:- सूर्य्य मंगल के गृहमहे इसवास्तै गृहस्वामीजीम-सोसा मिक रहम है इसवास्लैसूर्यके रहस्थान ०७।३० शुभयह एकमें कमकर किला५२०३०यह अशुप्तहोरास्वामीसूर्यायहसमके गृहमें है इसवारीसूर्या कि होरास्थानमैंणा३० शुभ यह एकमेंकमकरके०५२।३० अशुाइनके अहोरास्थानमें३।४५ शुमार ०।२६।१५च्याप्त काणस्वामीसूर्य यहसमके गृहमें है इसवास्तै सूर्यकेद्रेष्काणस्थानमें ७।३० शुभ यहएकमे कमकरके ॥५२॥३० अशुजइनकेाद्रिष्काणस्थानमें०४५शुप्मऔरर १५ अशुजसप्तमांशस्वामीचन्द्रयहशत्रुराहमें है. इसवारतैसूर्यके सममांशस्था निर्मा३६१५शुजयहएकमेकमकरके०५६।१५ अशुाइनकोअर्द्धसप्तमांश- स्थानमें०१॥५२॥ शुनीर२०१७॥ अशुभनवमांशम्वामीचन्द्रयहशत्रु रहमेंहै इसबास्सैसूर्यकेनवमांशस्थानमें३।४५ शुभायहएकमेकमकर कि ०५६।१५ अशुप्त इनकाअनवमांशस्थानमें१३५२।। शुजऔर०।२८ १७॥ यशुमहादशांशस्वामीवुधगत्यहमें है इसवारने सूर्य के हादशांक स्थानमेंदा३३४५शुमयह एकमेंकमकरके ०५६।१५ अशुम इनकाअर्धदान दशांशस्थानमेंगशाशुजन्यौ॥२८॥७॥ अशुप्तत्रिंशांशस्वामीगुरुऽधि गनुके एहमें है इसवास्तै सूर्य्यक त्रिशांशस्थानमें१४५२॥ शुञ्जयह कमेंकगकरफ०५॥७॥शुभ इनका अर्धविशाशस्थानमें०५६।
(१५७) . ७ ३ १ होरा शन १ मा 0 शुभऔर०।२९।३।।अफसूर्यके सप्तवर्ग शुप्तकाऐक्या२१।३३।।। और सूर्यके सप्तवर्गअशुप्नका ऐक्य ३।३८।२६यप्रमाणतेचन्द्रादि कग्रहोंका शुभाशुभ करके उनका ऐक्य करना. वर्गशसहित सप्तवर्गशुभचक्रम् . ग्रह सूर्य चंद्रा मंगः | बुधः बह- शुक्रः शनिः ग्रहः रह शश मिशन स. २०मि. ३०स. ३.श. ५२॥ श. ४५ मि.३०.४५ यह होरा च स.४५श शास. १५स. १५ श. ५॥ श. ५२॥ स ४५ मिाह शु शुद्रेष्का- स.४५ मि.१५ श.५६स. ४५श. ५शास. यास.४५ सत. ४५ सिमि-पास ४१४२ दश ५ नवमा चि ह ११नव. म दादर बुन दाद श. ५२-५६ श.५६ स.श.५६.५६ सा ४५ विशांकुर श. शु ममिंशा श.५६ SEPT५६ मियाश.५२॥ श.४५सः ४५ ऐक्य १६ ऐक्य. २६॥ सप्तवर्गअशुप्तचकमिदम्. सु. क. शु. श. ग्रह टह ५८ यह ७) हारा २६ २. २५ २६ होरा देष्का-६ द्रेष्का सप्त २ २९ १९ १८ नव दाद २९ हाद त्रिंशा. ॐ त्रिंशः ऐक्य शा ११ . ० १९ 8 ५२॥ . ५२।। ग्रहः सू. मं. ० . ५२ ३७ २६ Parda ७॥ DI . २६. २६ २८ २11 २५ १५ . सप्त २८ १८ . D नदः २८ ७॥ ५५ ३ क . २८ २६ ३॥ ३॥ २९ ३॥ ० २६ १८ २५ २८ ॥ २ २ ऐक्य .
(१५८) उदाहरण- सूय्यका शुसैक्य ०।२१।३३।। इस्को से भागदेके ।५।२. यह सूर्यके शुभपंक्तिके सह कोष्ठक में लिखना और इस्का अर्ध०३!! यह शुमपंक्तिके होरादिकोष्ठकमें लिखना. सूर्यका अशुपक्य३।३।२६ इस्कोप से भागदेके०५४॥३५५६५ र्यकेशुप्त पक्तिके ग्रहकोष्ठक में लिखना औरइस्का अर्धल।२७११८ पहल सपंक्तिके होरादिकोष्ठकमेलिरवना.इसी प्रमाण चन्द्रादिकोंकाभीजानना. शुभपंक्तिचक्रम्. | अशुभपंक्तिचक्रम्. निरु-चं मं बु शु श सूचन-ब-र-शुश.'; ॥ . o क ० ० . o . १३ ७ ४५३ ४ १७/१५/२४ . . . . ૨૨૨૨.૨૪રિક રિકાર ४११४०/२.७१५११५२८८५९ ० . ० 0 दे ४४०२७/५१५२/४८५२ ૨૨૨૨૭ ૨૪/૨૪ ૨૫ १८ १९ ३२ . 0 . o १/३/स.२७/२३/२७/२४/२-२५/२६ १८१९/३२८ ७/१२/१ ० न.२ ६२ ३ न./२७/२३/२४२४२०/२५/२५ ४१४०/२.७१५१५२/४६५९ (१८१९/३२.८ ७/१२ Ms.romptomsons.org. Road 09/0001009002/09o0 C . . . . . . . o ० . ० . . . ० 0 . ० . . ० . . . ६ २ ३ हा २७/२३/२४२४२८२५/२६ ५११४.२.७१५१५२१४८५९ १८१९३२८ ७१२१ |ि२६|२ બિરૂ ૨૭ ૨૭ ૨૮ ૨૩૨ ४१४.२७१५१/५२४८१५९) १८ १९२३ उदाहरणम् सूर्य मेषकाहे इसपास्ते रहेश मंगलहे. इस्का शुक्प०१९४१ इखोसूर्य शुजपक्तिमका यहफलं०५।२३ इस्तैगुणफे। यहस्त र्यका महमध्यमशुज-गृहेशमंगलइका-अशुभेस्प ३४०११८॥इस्कोर पके अशुपंक्तिकारहफल ०५४०३५ इरसेगुणके ३१२००२ यहसू पंफेद गाममा यहगनिरी हीरादिकोंका मध्यभशुप' सुम करना और चन्द्रादिकांकाशीरहादि गध्यम शुभाशुभ करना.
. मध्यमशुमचक्रम् मध्यमग्रशुभचक्रम्. प्रसून चंमाबुरशसूचं. मशः . ३ O ० ९ o . १ ३३1३७५५/२७ بل لا १ ५ ४६.५६५६५ २३ २८२२२७४ ४५८/२८ १ ४ १२४०२७२७१८३४ ४०१६ ६.१५२२६३३.४३ 1१ १ २४४२२८३०२४/२५ ४११०२७/३.१९/२३ १ १ १. स.२४/२५ ४३३.११.२ २३२४१२४ ४४७ ४२११५४४४४ १ १ १ १ १ १ २ २०३५।२३४५२१13. ११/६/२८४५७ ५३५२/३६४२.६१४ १ १ १ १ १ १ ४०३७१५५/२८१२१८ ३. दा.२७/२७४३/२६४५/३४/३४ ५२२६१५३७२५.5013१ . . ० २.५ . 0 १ ना४ . १ १३/30 २७. नि सूर्यकास्परशुभसाधन करनाइसवास्तमूर्यकाइटवल ६।३३।०143 इस्को सूर्य मेपकाहै इसवान्ले गृहेश जोम इस्काइटवल ।।१४।० इस्ते गुणकेदा२।१६ इन्कावर्गमूल २०५०।६ इकोनूर्यका मध्यम गृह शुभ? १४६ इस्से गुगकै का वहसूर्यका स्पष्टयह शुमभयायही रीनिसेतूं यह होगदिकोंका स्पष्ट शुज और सूर्पका महादिपर अंशुम और चिंदादिकोकास शुभ और अशुभ करना. विशिटहाइष्टरलगुणनचक्रम्, गंशमशकष्टवलगुणनचक्र चन बुश सूचना बु. यशश ४५६ हो SI मायामासासा ६. चका क १.. ४ ५३ १८१८६. छ १७ ९ दे १. २. . १४३३७१ १. ३० १३ ५२५२१५ हरा ४ ए । .२२ २०१२ ९९२ ६०५ 18 । ४५७६९ .. एक ५२२ २४४९न ५५ ३० ३५५२५९ ५३ यदि २०११ २६/महा ३३६/१ १२ ५५१८ ह ९ ४ 2 ३८ ३७५२४ ४१ १८२४ ૨૨૨ २१४. ३६. ४१४-13 . 2 Makal वगैशगृहेशइटबलगुणनपदचक्र- वगैशटहिशकष्टवलगुणनपदच प्रसू. चं मं- बु. शुशग्र सूचनमबुबशु. श. 2 ३ ० . ممممممممممی همه A. २ २ २ २ १ २ २९ १/२६/१६ २ है १२ १३४२/१५ ४२ ५०५०३१५८ ११/१२/११/३१/३१२१ ४० ४ ३ २०|१२|७ ३४ |३१|२८|१ ९ ५.२७/११ २ २ २.. 3 २ २ २. ३७ २ ५ |२८१२४०४२ ४२ e १२/२५/२७/३१२१/२१ ४ २ ४ ३३ १६/३७२७१६ स-३०३० १२।२२ ०५ट ३ १ २ |२९५-१६३३ ७/न.३० २ ३ १५ ३७|१२|४८४०५७ ११ २ डा. ३११२८ २ १० ५२५७५७५९ २ २ ३८३७१६ ९५८५० نمود -ชะ-*::*urry Sass त्रिं. Homsexi Jas स्पष्टशुमचक्र. स्पष्टअशुभचक्रम् अ. सू. चं मं बु शु श अस्तूचं मं बु र शुश ए. ७ . 6 . ३ ६ ६१२ २१२१२७/५८ ३९/ ४८ ३१५५१ १८ a ७ O स.१.१० स. ७२३२४ ३४५७ ६ રહી છે વિશે 3 ४३ १३२/३३३२ १२५४५७४९ ४ ३ १८ २२ ३२१ १२१६९३र ५८३७४४ . ० o ना ४९१९५८३६१ १ १ . दा २५ . ३७ ३ ३५३२ १२ ४९५७५१३४३ शिरछ दर २४ ऐ. ४८ २७ २७ त्रिं- | ऐं. जगदीशेनरचिते केशवीग्रंथ टिप्पणे ॥ इटकष्टाधिकारोयंपूर्णक्षिापाप्रकाशकः॥४॥ श्लोकः } अथायुयाध्यायः ग्रहोंकासर्वशुभाशुप्न फल दशामें ही होता हैं.और दावि जागायुर्दान विज्ञान विना मालूम होतॉनहीं इस्कैवास्तैआयुयोध्यायआरंजकारह अब आपुर्दाय दो प्रकारका है ग्रहयोगज और गणितागत उस्में प्रयोगजनियता युयि परमायुढिऔर अमितायुय ऐसातीन प्रकारका है. गणितागन नअंशोन्दव पिण्डजनेसर्गिक औरजीवंशोदित ऐसा चार प्रकारका है। उस्में प्रथमयोगजायुयनेसे अमित्तायुर्दायका उदाहरणकहने श्लोक- कर्कीदीज्ययुतोदयेबुधसितोकेन्द्रेन्चरीशेतरैरायु- वियमितंहियोगजमिवान्यत्रीच्यतेयोन्मितम् अन्दयः- चन्द्रेन्ययुक्ते कर्किल ने यदिघशुक्रोकेन एकत्र वापृथफ स्याताम् इतर सूर्यप्तीममन्दरूपरीशस्यानेषु तृतीय पडैकादशस्थान विहास्मिन् योगेऽमितमायुर्विद्धिजानीहि अन्यत्रये पोगजनायुर्दिन्दि । श्रथास्मिनग्रंथेगणितागतीमितमायुरुच्यने. अर्थभाषा:- कर्क लग्नमें जन्म होय उसमें चन्द्रगुरु युक्त होयबुधशु क केन्द्रमें होय और इतरत्रह (रवि मंगल शनि) ३।६।११ यहस्याना में होय इसप्रमाण सात ग्रहोका योग होयतो अमित आयुष्य जानना योगजायुयके दूसरेने जैऔरजोतक शास्त्रमें कहें है यहजात क पद्धतीने गणित्तोपुर्दा मात्र कहा है. अंशायु:साधनार्यशगुणकउच्चगुणकन्फुटगुणकसाघन. त्र्यसाकिरणाःसरूपकिरणांप्रिक्षेत्रयोवि- भूगोईचटिक्नुंगसंजवगुणीत हातमूलस्फुरेः। अन्वयः- यदि पूर्वोक्ताः शारश्मयः उच्चरश्मयस्यल्लालदासेकचतु शः कार्यः चैत्रयोहस्तिदावि एकरहिवाईकार्यन्नदादेष्टातुन शको गुणको भवन नहातस्य मूलं फुदो गुणास्यात् अर्थापाः- पूर्वोकरामिनीनस कम होयनोस्ने एकयुक्तकरके उस्का चतुर्थाशलेनातो गुणक होता है. यदि नीनतेज्यादा होपतो उस्मेंसे एककम करके उत्का अई लेनातो गुणफ होनहें इसीरीति .air... चेष्टा गुणक और उच्च राभिने उच्च गुणक होता श्लोक (१६२) अनंतर चेष्टागुणक वाउच्च गुणक इनके गुणाकारका वर्गमूल निका लना तो स्फुट गुणक होता है। उदाहरणम्. रविका चेष्टारश्मि ५।११।४. यहतीनसे अधिक है इसवास्तै . स्मेंसे एक कम करके ४।०९।४८ इस्काअर्घ २०५५४ यहरवीकाचे सागुणकं रवीका उच्च रश्मिा५३१३६ यह तीनसे अधिक है इसवा स्लै इसमें से एक कम करके ५।५३।३६ इस्का अर्ध२॥५६॥४८ यह रवीको उच्चगुणक भया + भीमकी उच्च राश्मि ११२६६ यहत्तीनसेक महै इसवास्तै इस्मै एक युक्त करके २१२६१६ इस्काचतुर्थाश २६।३१ यह भीमका उच्च गुणक भया इसी प्रकार अन्य ग्रहोंकाचे ष्टा गुणक और उच्च गुणक बनावना रवीका चेष्टा गुणक। ५।५४ इस्को रवीका उच्च गुणक २०५६।४८ इस्से गुण- कि ६।१०।५९ इस्का चर्गमूल २२२९।१२ यह रवीका स्फुट गुणक भया. इसीप्रमाण चंद्रादिकोंका स्फुटगुणक करना. चेष्टागुणकचक्रम् उच्च गुणकचक्रम्. सूनाम- बुन शु. शव चमचाबु शु श. २ २ २ १ २ . ५४|४८२४ . ४८४८ ४८|२१|२२|१.४५५४|४१ स्फुटगुणक चक्रम्. मा पः श २ hor १२ माश्रयगुणाकूसाधन यास्वाधीष्टसुहृत्समाधिरिपोर्गधतिवेष्विला विश्चांकेपुगुणागृहेहिगुणितायोगाकमान्तं हरेत्। श्लोक नतेपङ्गसुगोंशुमतिजिनैःपश्चवन्तिमः स्वाशयशगतेसदारसगुणैःस्पादान्याख्योगुणः१७ 4. योग्रहःस्वाधिमित्रमित्र समरिष्वधिरिपूणांवगैरहादिसं: मवर्गस्पान्तस्यक्रमेण १८।१५।१३।९।५।एतेकाग्राह्या ॥ एतः (. १६३ ) से भवति ॥ यद्यधिमित्र रहे होरायांद्रेष्काणे वा सप्तमांशेन नवा माशे हादशांशे वा त्रिंशांशे स्थितः तदा १८ अंको ग्रायः परंयदिशः हेनदातादिगुणंरुलास्याप्यः एवं होरादिषङ्गहेपुयथागतं स्याप्यं निषांसप्तसुस्थानेषुस्थापितानामंकानांचोग कार्ययोगं नन्हे- स्वाघिमित्रादिप्राशीग्रहसतिक्रमातूछा।१२।१८१२४ एतै रिकै परैर्भजेत् वर्गोत्तमखांशत्र्यंशगने ग्रहे सनि सदापटू त्रिंशद्धि जेतु एवं मक्ते यल्लप्यतेसः याश्रय संज्ञको गुणस्यात् । अर्थशापा. ग्रहं स्वकीय वर्गमें होयतो अधि मित्रके वर्गमे होयतो१५ मित्रके वर्गमें होयतो१३ समके वर्ग में होयतोर शत्रूके वर्गमें होन यतो ३ यह प्रमाण होरादि वर्गमें अंकलेना परंतु गृह स्थानमें यह रीनिसे जो आवै उस्को दूना करके लेना अनंतरगृहादिसप्तवर्गाके अंकका योगकरके उस्को ग्रह स्वगृहमें होयतो ३६ से अधि मित्र- कि गृह में होयतो से मित्रके गृहमें होयतो ५४ समके गृहमें हो यतों ७२ से शत्रुके गृहमें होयतो १०८ से अधिशत्रुके रहने हो- यतो १४४ सेप्नाग देना परंतु ग्रहवर्गोनम कहिये राशीके स्व न्यू- मांशमें होयत्नो वास्वनवांश में किंवा स्वद्रेष्काणमें होयतो-पूर्वो क अंक नलेना सर्वकाल ३६से भाग देना जोशागाकार विसो श्राश्रय-गुणक होताहै. उदाहरणम्. रवि समके गृहमें है इसवास्लै ९अंक यह गृहस्थान में द्विगु- णित १८ रवि स्वहोरामै है. इसवास्तै होरास्थानमें १८ रविपदे- काणमें है. इसवास्तै देष्काणस्थानमें रवि अधि मित्रके सप्तमांशमें है. इसवात्तै सप्तमांश स्थानमे १५ सूर्य अघि मि- के नयमांशमें है. इसवाले नवांशस्थानमें १५ सूर्य्य मित्रके हादशांशकमें है. इसवात्तै हादशांश स्थानमें १३ सूर्यसमके त्रिंशांशमें है. इसवास्तै त्रिंशांशस्यान में यह सप्तवर्गाककायो- १०६ इस्को समके गृहनें है इनवाते ७२ से नागके १।२०।१९ वह सूर्यका आश्रय गुणक.यही रीनिसेचंद्रादिकोका याययगुणक करना.
हादशांश . हर . २ २ ३ प्राश्रयगुणकसाधनचक्रम्. प्रह सूः। चमं बुरशु.श: प्रह रटह ९०११० ११८१०६ १८३० रह होरा १८१८ ९ होरा.. द्रेष्काण १८५ ३ १८९ ट्रेष्काण सप्तमांश/१५ १५ सप्तमांश नवमांश १५ ९.[१३] १८१५१८ नवमांश हादशांश १३ त्रिंशांश ९ १५ त्रिंशांश योग १०६/७३७६/७४७२ योग. ३५२०८१७२१०८३६/३६/३६ ग्राश्रय १ माश्रयगुणका गुणक. ४० ३३|४०१७ ग्राश्रयगुणक विशेष संस्कार कर्मयोगगुणक- औरजायुतगिसाधन. चेहर्गोत्तमपूर्वगोध्यरिसुहन्देतद्गृहांफात्रिपद श्लोक:- लब्धोनीयुगरीष्टब्धिनवकात्यानैसमेकेवलः। कार्यस्त्वा प्रयकासतत्स्फूटहतेर्मूलंसयोग्योगुणः खेवानांचतनोर्लचाःरवयुगहेछपाइहार्युलवा।।२८ यन्वया चैद्यदिग्रहीवत्तिम पूर्वगः वर्गात्तमा नवमांशेवा पनवमांश खद्रेष्काणेस्थितः सन् अधिशत्रु रहेवा अधिमिन रहे तदाता गृहांकाद्वर्गस्यापितांका त्रिपडलब्ध्यावास फलेनसमाप्रपा के ऊनोयुकार्यः यदिवत्तिमादि वर्तमानोग्रहः शत्रुटहेपामित्र रहे दिन नदातगृहांकात अधिनयफास्पा फलेनसच्याप्रयको गुणीहीन पुकार्य मित्रादिमित्रगृहयुक्तः अधिशनुशत्रुटहेहीन. इत्यर्थ:- गनः यावयाग्व्यगुणकफुटगुणकयोर्घातान्मुलेसयोगगोगमा नमेटानांग्रहाणांननोलग्नस्यांशाः पर nuरापारमा रति अर्थभाषा. जो ग्रह वर्गोत्तममें स्वनवमांशमें वा स्व द्रेष्काणमें होयके अधिश- त्रुगृहमें वा अधिमित्र गृहमें होयतो उस्के गृहाकको३ से भागके: जो भागाकार आवेसो क्रमसे पूर्वानीत आत्रयगुणकमें कम करना वार युक्तकरना और ग्रह शत्रुटहमै वा मित्र गृहमें होयतो उस्के यहां कको १४ से भागदैकेजी भागाकार आवेसा क्रमसे पूर्वानीत आश्रय गुणकमें कम करना चायुक्त करनातो याश्रय गुणक होता है. परंतु ग्रह वत्तिमादि स्थानमें होके स्वगृहमे वा समे गृह में होयतो संस्कार नहीं अनंतर आश्रय गुणक वास्फुट गुणक इ स्के गुणाकारका वर्गमूल निकालना तो कर्म योग्य गुणकू होता है. ग्रह वालग्न इस्के अंशकरके ४० से भागदेना जो शेष रहै सोया सुभगि होते हैं ॥१८॥ उदाहरणम्. वर्गचिमादिश्स्थानमें गुरुशनिवनवमांशमें है इसवास्ते गुरुशनिका आश्रय गुणक संस्कार योग्यहै सोऐसा गुरु अधिशत्रूके गृहने है इस वास्तै रारुकी यहांक ६ इस्को से भागक०।५।४रयह गुरुका मात्र य गुणक २००० इस्में कम करके १।५४।१८ यह गुरुका आश्रय गुण- क भया और शनि अधिमित्रके गृहमे है इसवास्तै शनिकायहांक ३. इस्कोरसे भागके ०।२८३४ यहानिका आश्रय गुणक २।४५ - इस्मैयुक्तकरके ३।१३३४ यहशनिकान्मात्रयगुणकभया औरवत्तिमा दिइस्थानमें सूर्यशुक्रवद्रेष्काणने है तयापिसमके गृहम है इत्तयास्ते इस्को आभय गुणकको सस्कार नहीं. आश्रयगुणकचका चा. श ए. मं. . ४० कर्मयोग्यगुणकोदाहरणम्. सूर्यका आश्रय गुणकाचा फुटे गणक २।१९।१२ इस्तारणाकार र दन्कातर्गल २:च. का " पाग्य गुणक प्रया. यही रीतिने चन्द्राविकों को क. म योग्य गुणक करना- (१६७ जीग्रह वलि होयउस्का मात्र गुणकरना अनंतर यहणकसे खिकीय आयुगि इस्को गुणना कहिये रविके गुणकसे रविके व्यायु- गिगुणनायहप्रमाण इहांगुणकरके चक्राई हानिकथित किया है उदाहरणम्-इहां रवि भीम गुरु शनि इन्होंका चक्राहानि संभव इसवास्तेलेग्न।४।२६ यह इस्मै सूर्य।१३।१०।४रकम का रिके ५।२६।३११४४ इस्की पल' ६३५५०४ इस्मै ३० अंशकी१००००० इस्मै भागदियातो०।१०।११ यह एकमेंकमकरके ०४९।४९यहसूर्य का गुणक इस्से सूर्यका आयुगि १३।१०।४२ यह गुणके १०॥ १६।३० यह सूर्यकाहानि संस्कृतव्यागुप्तांग तया. इसी प्रमाणसे सोमकागुणक।२९।१९ गुरुका ०३२।२६ शानिका४४।३२ इन गुणकोंसे इनोंका आयुगिगुणातो भौमका५।२४।३४ गुरूका २० १५ शनिका२४॥४५॥४४ यह हानि संत्रुत इनोंका यायुप्तांगभया इसीप्रमाण जिस्का संभव होय उस्का आयुर्नाग करना इहांजो३० अंशकीपल १०८००० के भाग दिया है यहपल सिद्ध है. वर्षादिअंशायुदयिानयनमाह. दायांशोत्यकलाःस्वयोग्यगुणूक नारयात्रनेत्रोद्धृता अशायुसदांसमादितुतनोदयांशकारूयाहताः। दिग्भक्ताहिसमादिचेतुबलवल्लनंतदालग्न- स्तुल्याब्दैःसहितंद्दिनिशरहन्दागादिनीमातयुक् २० अन्वयः- चक्रार्ध हानिरुतानांदायांगनांकलाः कार्याःत्वयोग्यगुण कैर्गुण्यादिशत्याभक्ताः फलंवर्षाद्यमंशायुभवति । एतदुक्तं भवति ॥ दायांशकलाशवयनमक्तेफलंवर्षे शेयमंशाचं हादशतिः संगुण्य लेनैद हरेण भक्तफलं मास एवं त्रिंशता गुणिते नक्ते दिनानिपश्या गणिते भक्त घटयः पुनषष्टयागुणितेहरेणभक्त फलं पलानि ॥ लग्नस्सदायांशास्त्रिनिण्याक्तिरीत्यादशक्तेि वर्षादिलमा युभवेत् यदिवलवल्लग्नं पडधिक बलंतदालानराशितुल्यैवपर्युक्तंका- अपितुलग्नसमागायं हिगुणतसंच मक्ते सनिनासायं तिपतिनालं तदानामुःस्पष्टस्या अधिकवलज्ञान्तु असेहीनवल इत्यादिना. अर्थ सापाः पूर्वानीत केवल और हाँनिसंस्क आयुर्मागकीकला करके उस्कोतकर्मयोग्यगुणकसे गुणके जोगुणाकार यावे उत्कोन रा. २०० से भागके जो भागाकारयविसो ग्रहोकी वर्षादि अंशायु होताहै उनके आयुभगिको इसे गुणके गुणाकारको १०से भागदेके जोमागा कार आये सोलनका वर्षादि अंशायु होताहै. औरजोलग्नक्लवक हियेप अपेक्षा अधिक होयतो लग्नराशितुल्यवर्ष पूर्वानीत लग्नायूमें युक्तकरके उस्लग्नके भागादिकोंको रसे गुणके से नागके मासादि फल युक्त करना. तोलग्नायु होता है. दीप अंशायु फल निकालनेके वखन२० से भागके प्रथमफल| वर्षमावेबाकी रहै उस्को १२ से गुणके २०० से भागके फल मास आवताहै बाकी रहै उस्को ३० सै गुणके २००सेभागके फलदि नापता है बाकीरहै उस्को ६०सेगुणके २००६ से भागकेपलघींपावती हथाकीरहै उस्को इसे गुणके २००से भागके फल पल आवताहै यही, रीतिसेल्मायुमें भी ऐसे मासादि फल लेना. उदाहरणम् आयुभगिकलाचक्रम्. सूर्यका आयुर्भागकला चं मंझुःशुः ६५६६३ सूर्यकाकर्मयो ६५६२१२२ ३२४रिददिष्टिय ग्यगुणक २१४२१२१इस्से ४४ गुणके १७७६।२३यहीरी कर्मयोग्यगुणगुणित यायुभागकलाच. तिसेचन्दादिकोंकीकला. म बुः | सु श. गुणना: १७७६९९९०३८७१६४१२४५८४६७१ उदाहरणमू २३ २.१ |२४|४|१३|२१|२६सूर्य्यकी कर्मयोग्य गुणि तआयुभांग कला १७७६४२३ इस्को २०० से नागके लब्ध वन पशेष १७६।२३ इस्को १२ से गुणके २११६ । ३६ इस्को २०० से भागके लष्यमास शेष ११६।३६ इस्को ३० से गुणकै ३४९८ इ. स्को २००सेभागके लन्धदिन शेष ९८ इस्को से गुणके५८८ इस्को २००से भागके उब्ध २९पटी शेष.इस्को ६ से एणके ४८०० इस्को २..सैमागके लब्घ २४पल यह सूर्यकावर्षादि शायु १२९२९ इसीप्रमाण चन्द्रादिकोका अंशायु लग्नका आयुर्माग २९।१२।२६ इस्को ३सेर णिके ९८१७५१८ इस्कोरसे भागफे लब्ध पर्व शेप९।७।१८ स्की १२से गुणके १०९।२७।३६ इस्को से भागकेलय१० ३० मास शेष ९२३६.इस्कोसेगुणके २०३४८ इस्कोर से भागक लाँध दिन शेषश४८ इस्को सेगुणके २२८ इस्कोरसे भागकेल- ब्ध१२ घटि शेष- इस्को ६० से गुणके ४८० इस्को १०से भागके लब्ध ४८ पल यह लग्नका वर्षादि।१०।२८ ॥२२१४८ अंशायुप्लया इस्को लग्नबल ७।२४।४।२० यह६रूपसे अधिक है.इसपास्तेलग्नराशिनुन ल्यवर्षयुक्तकरके १४।१०।२८।२२। इस्कोलग्नकाभागादि। ४२।२, इस्कोरसे गुणके १९।२४।५२ इस्को५ सेभागकेलब्ध मासशेष।२५।५२ इस्को३० सेगुणके १२२ १२.६ इस्को सेभागके लब्ध२६ दिनशेपर।२६ इस्को'६.सेगुणके१४६ इस्कोपसेमागके लब्धर९ घटीशेष१इस्को ६ से गुणके ६ इस्कोप से भागकेलब्ध१२. पलयह मासादि.२६।२९।१२ युक्त करके १५४२०३४ १५२।० वर्षादिशायुचक्रम् बु र. लग्न योग चं. शा C १३ २ २ १३ ៥ ४८ १२ श्लोक पिण्ड निसर्गौरजीवशर्मायुर्दाय इनके न्यायुर्भाग: स्वोच्चोनोयुचरोंगमात्समधिकोग्राह्योल्मकोनार्क तन्दागाधुचरोरियादिगुणांशोनाविनावक्रगम् ॥ याप्ताअस्तमितविनाशनिसितोहानियेत्राधिका काम-पिण्डनिसर्गजीवगदिताचक्राईहानिर्भवेत् २१ अन्वयः- स्वकीयेनोच्चेनहीनोग्रहोयदिपडधिकःपड़राशिन्योन्यधि कस्तदास्यांशाकाव्यदापडाल्पस्तदान डादश राशियो विशेध्य शेषस्यांशाःकार्या वक्रगविनावक्रीग्रहानायदिशत्रुगृहगस्तदात- स्यांशानिजअंशेनहीना कार्याः यद्यस्त इनेमानेयतदातत्याशा नामर्धकार्यम् शनिशुक्राज्यांविनाअनहानिये पाप्तेअधिक काहानि रिवयायानहानियम गईहानिरपेयाला अनैसर्गिक शत्रुरेनया साधूचानीत स्वकीयचक्राहानिमुणेनदायोशागुणनीयाइपिण्ड नि. १२ .
( १७०) । सर्गजीवगदिताचकाईहानिर्मवेत् ॥ अर्थभाषा: ग्रहमें उच्चकम करके शेष राशीसेकमहोयतोव- हर राशिकमकरके उस्के सागकरनातोपिण्ड निसर्गजीवायुगिहो. तेहै. परंनुजोमहवक्रगतिनहोयके शत्रुटहमें होयतो पूर्वक्तिभागों कानृतीयांशवह भागमेंकमकरना. नीरजोशनिशुक्रविनाग्रहम- स्तंगत होयतो पूर्वक्ति भागोंका अर्थकरना. मौरजो ग्रह शराहत में होयके अस्तंगतभी है तो पूर्वोक्त भागका अर्धमान करना यहपिंडनिसर्गजीवायुयभागको पूर्व कथित चक्राहानिसंस्का रसीकरनातो१९के श्लोकसेलेआयेजोगुणक उस्सेयहआयु गगुण नाइहांनैसर्गिक शत्रुखसमझना तात्कालिकशत्रुत्वलेनॉनहीं. उदाहरणम्- रवि०१३।१०।४२ इस्मेसे रपिकाउच०१००। मकरके ०।३।११६२ यह ६ राशीले कम है इसवास्ते १२ राशीमें सेकम करके ११।२६।४९१८ इस्के लोश३५६०४९।१८ अहस्सूर्यका पिंडादिमायुगिया. इसी प्रकार चन्द्रादिकोंका करना सूर्यादिग्रहाः उच्चचक्रः सूच मं बु | शुश... चामशः १० १०।२२ ४ ૪૨.૨૫/313.૨૬ उचकमकरके. पड्डाल्प१२ राशी मेंकमकरके सूच मंजुर.शु. श.प्र.चिं. मंबु.गु. शु.श- 0 ૨ ૨૨/૧૨ २२ २०४७५६।२४ ४२२५१५५२२७ |१८ पिंडाटिपायुगिचक्रम्. वार्धहानिसररुतपिंडादिआर माशु शमन माबुरशु-श १५१२४२ शिवाशररिरिस्चिा५५च २०४७५६/२१ ५/१११०/२०/२९/५५/१२ २५१६५१३२४४५ सा-५.१५/१२५२/५ ४ . २ १ ५ ३ . . . ८ . 0 ८ ६ ६ २ . १ ३ . . ४ ४५२२ १८ ૧૦ इहांकोईग्रह अस्तादिनहीं है और शत्रुराशीकाभीनहींइसवास्लेस- स्कारनहीं भयाकेवलचक्राईहानिकासंस्कारहे. उस्काउदाहरणकहते हे. सूर्यकाचक्राईहानिगुणकला।९।४९ इस्सेसूर्यकेन्यायुरंशः ३५५।१९।१८ इस्को गुणके १९६४१५।१०यहसूर्य्यकास्पष्टयापुतगिरणा भीमका चक्राईहानि गुणक०।२९।१९ इस्से मोमकेमायुरंशः१९३ ४।१६ इस्कोगुणके ९४२०१२ यहभीमकायायुरंशजया. गुरुकाचक्राईहानि गुणक ०२१।२६ इस्से गुरुके आयुरेश२९६॥ १७।२३ इस्को गुणको १५५।२९।५चहगुरुकास्पटायुभगिनया. शनिकाचकाई हानि गुणक०४४१३२ इस्सेशनिकेमापुरंश२२३ ।२१६४५ इस्को गुणके १७३.१२.१२४ यहानिकास्पर आयुगिन या. बाकी ग्रहोंका पूर्वक्ति ही न्यायुर्भाग लेनाः लग्नमें पापग्रह होयतो उस्काविशेषसंस्कार कहते है। दायांशाधुसदापृथक्तनुलवादिघ्राःवषयुद्दता लोक आयोनास्तनुरोखलेचचदिसदृष्टर्घयायोपर। निभ्योग्रोदयजावजेनननुगोग्नीचदलिएस्थतन् । साम्येपुष्टफलेनननितनुपस्मिन्नांशजेऽसोक्रिया २२ अन्वयः- लमेपासनिचक्रार्धहानिर्गुणिताग्रहाणांदायांशाःपृथक्स्या- प्याः लग्नस्यराशिविहायअंशादिनिर्गुण्यांपश्यधिकशतत्रवेणताज्या: यात्यालब्धफलेनांशादिनापृथकस्याहीना कार्याः पापग्रहास्तुर विभी मशनयः सौम्येक्षिदेवर्धयाशुभग्रहहहेलनस्यङ्कररखगंतदालब्ध फल स्थाई पातयेदापुः पिंडादीत्यर्थः प्रयापरेशांमतम् निनोग्रोदय मा. बिजेनेदिकेचिदैनंनुवंनि लग्नगरेतदापृथस्स्याःआयुर्मागा उग्रो रयभावजेतगुण्या पूर्वहरेणाप्याऊना कार्याः शुभहरे या उपोद मनापजंतुउग्रपापयत्ययोजावसस्थावरोहारोह फलेनेत्यर्थः यदि लमेदिवाःकूरास्तदावलिष्टस्यमावजेनगुण्या तसाम्येवलसाम्मे परफलेन पिकावरोहारोह फलेनफलसाम्पेयादिगुण कार्यः वितिसादातदसन् एकदेवादान् अस्मिलनेरेसनाधीशेलनगे सनि असोहानि कार्यान्यंगजेलरलग्नगे लौन कार्याः । अर्थभापा. जोतप्रमेपापग्रह होयतो बहका पिंडापायुग पृथक.
१७२ रखना उस्कोलग्नकाराश्यंकछोडके भागादिकसे गुणके गुणाका- रको ३६० से भागदेके जोलाब्धयावेसो पृथक् ररवाजोलागउस्मा सकमकरना परंतुजोपापग्रह शुभग्रह करके दृष्ट होयतो लब्धिका अर्घ पूर्वोक्त मागमें कमकरनातो पिंडायुगि होता है। दूसरेआचाकिामन यह है के पृथक् ररवाजो आयुर्भागउ- स्को लग्नस्थ पापग्रहकोजोसाव उस्का जो फल उस्से गुणदेनाऔर २६० से भागनालाब्धपूर्वस्थापित भागादिमें हीनकरनातोपिण्डा द्यायुभगिहोनाहै. शुभग्रह देवता होयतो लब्धिका आधाघटाना औरलग्नमेंदोया तीन पापग्रह होयतोजो बलीहोय उसीकाभावफ ललेना-पापग्रहलग्नपती होकरलग्नमें होयतो यह क्रियानकरना. उदाहरणम् इहांलग्नमें पापग्रहकोई नहीं. इसवास्ते विशेषसंस्कार नहींया पूर्वोक्तहानिसंस्कृतपिंडाद्यायुर्भागचा इदानीं पिण्ड निसर्ग मामाबुबाशुशाल जीवशर्मायुया २९६२४२१९४८६१५५/३२९/७३ नयनमाह. २. २५/१२ ४ २४ गोजातत्वतिथिप्रभाकरतिथिस्वर्गानरवा पैण्डजे नैसर्गेनवाहिगोधतिनरवापञ्चाशदर्कागुणाः ।। मूलं:- दायांशास्वगुणेहताहिजगणांशाप्ता:समायायुपी स्वर्गाप्ताश्चसमादिजैवमिमहत्वांशैर्घटीष्वन्वितम् २३ मन्वयः. गोन्जनि न्यादिनि व्यकमारपय पिण्डाद्यायुीये गोब्जा इ- पारज्यनरया इत्यन्तांका गुणकाः नैसर्गेनरल भूरित्पादयो एणकाः दापांशाः स्वगुणगुणा गणांशै ३६० मज्यिाः फलानिवर्याचा घुर्दायासवन्नि । गोन्नाइत्यादिभिरंकै मुणिते पिंडायुः नरवरित्या विनितान्यान् दायां।। ५. फलानियादिजीवरामीयु स्यात् पु. भनायोयलब्धं घटपादिकं नधुरा र अर्थमाया। RIN है --- - २ १ सान्ग्रहों के पिंडायुयके गुणक और २०११।२।९।२८.२०१५व्यह क्रमसे ख्यादिसान.ग्रहों के निसर्गायुर्दायके गुणकजाननाग्रहोंका आयुर्भागवन्यपनागुणकसे गुणके गुणाकारको३६ से भागदेनातो वर्षादिपिंड निसर्गायुहोताहै पूर्वोक्तव्यायुर्मागको २१सेनागदेना जोवर्षादिफलावेगाउस्मे पूर्वक्तिमायुर्मागकोत्से भागदेकेजो फल आवेसो घंटीमें युक्त करतो जीवशर्माक्त आयु होताहै इहां मासादिफल अंशायुयमे कथित प्रमाण लेना. पिण्डायूकेगुणका निसीयूकेगुणका सूरचं मं बुर.. शु. शास्तूचं मं बुशुः श. १९/२५ १५/१२/१५ २१/२०२:13 पिंडायुरुदाहरणम्. सूर्यका आयुर्माग२९६१५४० इस्को सूर्यका गुणक१९ इस्से गुणके ५६२८५७।४० इस्को ३६० से भागके लब्धि१५वर्षशेष२२८ ॥५७१४० इस्कोररसेगुणके२७१७।३१ इस्को३६० से भागदेकेल. ब्धिमास शेय२२७।३२ इस्को३०से गुणके ६८२६ इस्को३६०ते. भागके लब्धि दिनर-शेय३४६ इस्कोप से गुणके २०७६० इरको २६० से भागके लब्धिघटी५७ शेष२४. इस्का से गुणके१४४०० इस्को ३६०से भागके लब्धिपल इसी प्रकारसे सूर्य के वर्षादिपिः डायूभयेर५७।१८५७ यहीप्रमाण चन्द्रादिकोंका करना. निसर्गायुरुदाहरण सूर्यका अायुर्माग२९६।१४. इस्को सूर्यकागुणकार इस्से गुणके ५९२५११३०२० इस्को३६ सेनागकेलाधवपशेपा६५।१२ १२० इस्कोररसेगुणके १९८२५० इस्को२६ से भागफेलाब्धिमासपशेन प९८२५० इस्कोर से गुणके५४८० इस्को२६० भागकेलब्धि दिन १५शेष इस्को से गुणके ४८०० इस्को३६० ते नागके लब्धियः १३शेष१२० इस्को से गुणके ७२०० इस्को २६. से सागकेल. चिपल २० पहरीनिसेसूर्यकावर्षादि निसर्गायुजया१६।५।१५ १३१२० यही रीनिसे चन्द्रादिकोंका करना. जीवायुरुदाहरण:- सूर्यका प्रायुर्मागर९६।१५।५. इस्को२१.
(१७४ ) से 'नागके लब्धि वर्ष१४ शेष।१५।४० इस्कोर से गुणके २७। इस स्कोर से भागके लब्धिमासर शेषधार इस्को ३०से गुणके १८४- इस्का२१से भागके लब्धिदिन-शेष?इस्को सेगुणके९६० इ. स्कोर१से भागके लब्धिघटी४५शेष१५इस्को.से गुणकेर० इस्को २१से भागके लब्धिपल ४२ यहरीतिसे सूर्यका वर्षादिजीवायुर्भया १८.१८११५६४२ इस्के घामे सूर्यके आयुर्माग२९६।१५।१०इस्को -सेभागके लब्धि शेष०।१५।४० इरकोसे गुणके १५४० इस्को -से मागके लब्धिर यह युक्तकरके सूर्यका वर्षादिस्पष्टजीवायु भया१४।१।९।२२।४४यहीतिसेचंद्रादिकोंका करना. पिण्डायुचक्र. निसर्गायुचक्र. सूरचं मं बु शु श लालूच मंबुरशु.श. ३ ५ ३ २ १८२९५१९२३/२०१४/२०१५२ १०।१५/२७ २२/१३|२२|४० ४०३५ २५१८।२४ १८।२४ ३ . २८२० . जीवायुचक्रम्. मं. ल. १४ २. २. १६ २२ २२ ४७ ३९ १२ पिण्डादिनीनोंपायुदायलग्नामुदाय बनावनेकाक्रमः सस्याल्लिप्तारपनरोएताविमतनोवविउपिके लग्नायुनिस्साकसमकामिनन्दतुल्पस्मृनं ।। भलोक यस्येशोपियलरतदेवहिपरेसेनाढपमन्यैर्यदम् झापुर्वत्लचचांगनुल्यमाखिलोक्तंग्राह्यमेवादिन २४ न्यन्वय:- विजगनोलिसारागिविलापलानस्यकला फाा दिदा. -- (१७५ ) त्या भाज्याः फलंवर्यादिपेंडनिसर्गजीवशायुर्दायेषुस्यान्सर्वेराचार्य स्नदंशकसमनवमांशसमंउकंलग्नततुल्यंकैभिदायुरुक्तं लग्नेशनवमां श्योर्मध्येयोवलीतदेवग्राह्यमित्यन्येतनाढयमितिस्यालिप्सारवनरयो. दृताइत्यादिनानीतंतत्रतेनादधराशीशोवलीनदाराशितुल्यवर्यनवमाशे वलवतितदानवमांशतुल्यंवर्षाढकुत्रंअंशायुवत्यानीलग्नायुर्षि- इत्यपरमतम् अथनिरिवलोक्तंशसममादिममेवमाद्यमिचियावत् . अर्थमाषा- राशिकोछोडके नागादिलग्नकी कलाकरके उस्को २००से मागदेनानोपिंडनिसर्ग पीरजीदशर्मायुंदीयौलग्नायुहोती है। यहअंशतुल्य अन्लिन्नमुक्तननमांशनुन्यमायुसर्वाचार्यसंमतहै काईमाचार्यलग्नकेराशिनुल्यकहनेहे-लग्नपनियंशपतिमेजोबलिहीय ततुल्यत्र्यात लग्नपतिवलि होयतोलग्नक राशीतुल्यमायुश पतिवली होयतो अंगनुल्य न्यायुग्रहकोई आचार्यका मत है ॥ यायुः यमें कथितरीनिसे जो आयु यावे उसे अंशपनिवलीहोयतो अंत गनुरुपलग्नपविबली होचतोलग्नतुल्यवर्पयुक्तकरनायहपरमव है। ऐसापृथक् पृथक्सबन्याचानि कहातथापि प्रथम प्रकार जो है सोई सबकामत है. इसलिये उसीको मानना. ॥ इति।। उदाहरण- राशिरहित मागादिलग्न ९।२२।२६ इस्कीकला५८॥ २६ इस्को२०० से भागके२।१०।२८।२२।५८ यपिण्डनिसर्गजीवामु- दायक विशेलग्नायुप्जानना. यह अंशादिचारन्यायुयमेसेकोन आयुय कबलेना इस्केविषेप्रमाण. चतुर्णानामुपांव्यवस्थामा अंशायुश्यतनाविनेऽधिकवले वैयनिसर्गविधी. स्याचेतुल्पवलंहयोयुतिदलंतज्जायुयोश्वया ।। व्यायूंषिविरलै निहलचतिवाक्यहानिजा सुर्घत्यात्रिलदोयजैवमुदितंचन्दीनवीयस्त्रियः ।। अन्वया. अधिकबलायांतनावंशायुः इनेसूर्यऽपिकवलेपिंडायुः विधानधिकत्रले निर्गयामाध्यम् वटासवलोनदानन्दायुपोमोग रलमिआयुःस्यादिविगोणा नुरललगत्तदायुन्तनदलेनसगुण्यन पेगिनपोलक्येन जेन्नदामियायुःस्मादित्यः परिलमार्कचन्दा लोक (१७५३ ख्ययोऽपितुल्यवलास्तदालग्नवलेनदिनादिकमंशायुःसंगण्यासूर्यब लेनपिंडायु संगुण्यचन्द्रवलेन निसर्गायुःसंगुण्यसापायोगंलग्नार्कच. न्द्रबलयोगेन तजेफलंमिश्रायुःस्फुटंस्यात् ।। अथवाजयाणामायुपां योगस्यतृतीयांशोमिम्मायु:स्यात् चेलग्नार्कचन्द्रास्त्रयोऽपिहीनचला- स्तदाजीवशर्मायुः स्यादिति ।। अर्थमाषा:- लग्नबली होयतो.अंशायु सूर्य वली होयतो पिंडा युचन्द्रबली होयतोनिसर्गायुलेनाजोदोसमबल कहियेपटूरूपाधिन कबल होयतो उसीसे उत्पन्न आयुष्यकायोगार्ध आयुहोताहै. लग्न. औरसूर्यसमवल होयतो अंशायु औरपिंडायुका योगार्थकरना. लग्नोरचन्द्रसमवल अंशायु और निसंगायु इस्कायोगार्धकरना- सूर्य और चन्द्र समबल होय तो पिंडायु और निसर्गायु इस्कायो. गार्धकरना. तो लग्नसूर्य और चन्द्र यह समवल होयतोतीनों आयु- ष्यनीनोकेबलसे गुणके ऐक्यकरके उस्कोतीनोंके वलैक्यसेप्सागके जो सागाकार आवेसो अथवातीनोंके आयुष्यके योगकातृतीयां- शायुष्यलेनावह मिश्रायु होताहै.जोलग्नसूर्य और चन्द्र यह तीनोंही हीनबल होयके रूपत्रयाल्यबल होयतोजीवशक्तिमा युलेना. उदाहरण. सूर्यकाअंशायु-१०।१०।२९।२४ यह दिनादि करके ३१९५१ २९२४ इस्कोलग्नबल ७।२४।८।३० इस्से गुणके २३६६८०५८i ३२ इसीप्रमाण चन्द्रादिकोंका न्शायु गुणना. रविका पिंडायु१५।७।१८।५७१४० यह दिनादिकरके ५६२८ ॥५७१४० इस्कोरविबल ७५१६५३।३० इस्सेगुणके ४४२७०।५९४५० इसीप्रका रचन्द्रादिकोंकावसूर्यका निसर्गायु१६।५।१५।१३।२० यहदिनादिक रके ५९२५।१३।२० इस्कोचन्द्रवल ७।२४।३० इस्सेयणके ४३। ४५९४२११० इसीप्रकार चन्द्रादिकोंका निसर्गायु करना. रविका यह गुणिनतीनों व्यायुर्दायका योगदिनादि१११३९९।। ३२.इस्केपल४०१०३६४३२ इस्कोलग्नबल ७२४।८।३० रविवल ५१३५३६३० चन्द्रबल ७२०१४।३० इनकायोग २२१३।६।६ इस्कीविकला १३६६ इस्के भागकेलब्धिदिनादि४९२८१६७४६यहवर्षादिकरके१२८८ 1४७४६ायहसूर्यकामियायुयायहीरीनिसेचन्द्रादिकोंका मित्रायु साधनकरना अथवारविका अंशायु।१०।१७।२९।२४ पिण्डायु- (१७७) २५/७१८१५७१४. निसर्गायु१६॥५।१५।१३।२० यहतीनोंआयुक्किम योग५०११।२१०।२४ इस्कातृतीयांश १३।७।२७।१३।२८यहरविका वर्षादि मिश्रायु भया यही रीनिसे चन्द्रादिकोंका करना. अंशायु चक्रम्. म. यु व शुशन ७२ वर्ष ११ १३ २ मास २ २ १९ ५२ १२ पट २४ १८ १२ १२ पिण्डायुचक्रम् यो चं . मं. य शुश १९ ९. ३ १० ९ १४ १८ २२ १६ २१ २४ निसर्गायुश्चक्रम्. सू. चं. र. शुश. लायो ५ २७ २४ अंशपिंडनिसर्गायुयोग चक्रम् श ल. यो चन २२९. वर्ष मास दिन २. ९. . २ ર ४४ २ १६ घोटे १४ ૪૨, ५९ पल १३ ३६.४५ योगतृतीयांश मिश्रायु. यो चं. मं. बु ७ ४ २ ६ २० ५३ मास दिन घटि १७ २. २५ २२ ५१ ख्ख्ययोऽपितुल्यवलास्तदालग्नवलेनदिनादिकमंशायु-संगुण्यासूर्य्यब लेनपिंडायुः संगुण्यचन्द्रबलेन निसर्गायुःसंयुण्यसर्वपायोगंलग्नार्कचन द्रवलयोगेननजेफलंमिश्रायुःस्फुटस्यात् ।। अथवात्रयाणामायुयां योगस्यतृतीयांशोमिश्रायुःस्यात्।चेलग्नार्कचन्द्रास्त्रयोऽपिहीनवला: स्तदाजीवशर्मायुः स्यादिति ॥ अर्थशाषा:- लग्नबली होयतो अंशायु सूर्यवली होयतो पिंडा युचन्द्रबलीहोयतोनिसर्गायुलेनाजोदोसमबल कहिये पटूरूपाधि- कबल होयतो उसीसे उत्पन्न आयुष्यकायोगार्थ आयु होताहै. लग्न- और सूर्य समवल होयतो अंशायुऔरपिंडायुका चौगार्धकरना. लग्नऔरचन्द्र समबलअंशायु और निसंगयुि इस्कायोगार्धकरना सूर्य और चन्द्र समबल होयतो पिंडायु और निसर्गायु इस्कायो- गार्धकरना. तोलग्नसूर्य और चन्द्रयह समबल होयतोतीनों आयु- ष्यनीनोकेबलसे गुणके ऐक्यकरके उस्कोतीनोंके वलैक्यसेप्तांगके जो सागाकार आवेसो अथवातीनोंके मायुष्यके योगकातृतीयां शआयुष्यलेनावह मिश्रायु होताहै.जोलग्नसूर्य और चन्द्र यह तीनोंही हीनबल होयके पत्रयाल्यवल होयतोजीव शक्ति युलेना. उदाहरण. सूर्यकाअंशायु-१०।१७।२९।२४ यह दिनादि करके ३१९७। २९।२४ इस्कोलग्नबल ७२४१८३० इस्से गुणके २३६६८।५८ । ३२ इसीप्रमाण चन्द्रादिकोंका ग्रंशायुगणना. रविका पिंडायु१५।७।१८।५७१४० यह दिनादि करके ५६९८ ॥ ५७।१० इस्कोरविबल ७५११५३।३० इस्सेगुणके ४४२७०।५९१५० इसीप्रका रचन्द्रादिकोंकावसूर्यका निसर्गायु१६।५।१५।१३।२० यहदिनादिक रके ५९९५।१३।२० इस्कोचन्द्रवल २०१४।३० इस्सेयणके ४३। ४५९४२।१० इसीप्रकार चन्द्रादिकोंका निसर्गायु करना. . . रविका यह गुणिननीनों आयुर्दायका योगदिनादि१११३९९।०। ३२ इस्केपल४०१०२६४३२ इस्कोलग्नवल २४३०रविवला ५११५३५३० चन्द्रबल ७२०१४।३० इनकायोग २२।३।६।६ इस्कीविकला १३६६ इस्के'मागकेलब्धिदिनादि५९२८७४६यहवर्षादिकरके१२८ार ४४ायहसूर्यकामियायुयायहीरीतिसेचन्द्रादिकोंकामिश्रायु माधनकरना अथवारविका यंशायु१०।१७।२९।२४ पिण्डायु- १९९१५७११. निसर्गायु१६५।१५।१३।२० यहतीनों आयुषिका यो१५०।११।२१।१०।२९ इस्कानृतीयांश १३७।२७।१३२२८यहरविका वर्षादि मिश्रायुया यही रीनिसे चन्द्रादिकोंका करना. अंशायुश्चक्रम्. मायुः शुश ७२ वर्ष यो . १३ २ २ २४ मास १९. दिन १२ ३४ ४४ १२, . पट १२ पिण्डायुश्चक्रम्. ए मं. शल..यो. १९ २ Onera १० ५ ૨૨ २८ दिन २ १६ १० १. ૨. ३७ . ३५ २४ निसर्गायुश्चक्रम् चं. म. शु./श लायो ०५ . ९० २८ १९ मास दिन घाद २७ ४३ अंशपिडनिसर्गायुयोग चक्रम् म. र. श ल. यो च २.२९. 24 ५ मास दिन २ ૨૨ २ २१ २७ १३ २ ११ ४८ १६ घोटे पल ३६ योगतृतीयांश मिश्रायु. शु. चं. श वर्ष D ०८ १५ २ १३ ११ १ २४ ९. २० दिन घटि पल २५ २० १२ ३२ . २८ १९ ३२ १३ (१७९. इदानींबलाबलज्ञानंतथेदमायुः केषांघटतइति वदति ॥ व्यत्सहीनबलोवलीषडधिकेवीर्यग्रहश्योदयो 'मिन्नस्चस्वमतेस्मृतायुरिति तत्प्रायिवस्थापितम् ॥ मूल अंशायुर्वहसमनभवतितत्सत्संचसत्योदितं. स्याहोमसुशीलपथ्यसुभुजांनस्यादिदपापिनां २६ अन्वयाग्रह उदयोलग्नवात्र्यसेसविहीनवला न्यधिकेषडमासेंम- ध्यपला पाधिकेबलीस्यादितिप्राज्ञैः श्रीपत्यादिमिर्व्यवस्थापित व्यव- स्थाकतानिएति मितियावत् ॥ अंशायुश्चतनाविनेत्यादिनाभिन्नमि- तिस्वस्य मतेचतुर्विघमायुः स्मृनंउक्तम् अंशायुर्बहुसंमतं बहेनामाचा याणांसंमतंभवतिसत्यं च तदेवसत्योदितस्यात् बहुसाम्यं समुपैतिसत्य वाक्यम् । इदमायुर्धमिष्ठानां सुशीलवत्ता पथ्य सुभुजां पथ्यहितं या जोजनंतत्सेवनंम् येषां भवति तेषांस्यात् गणितागनमायुम्नपापिनास्यान् अर्थक्षाषा: ग्रहया लग्नका षड्बलैक्यसेकमहोयतोहीनवली होने हैं से अधिक होयतोमध्यरले और से अधिक होयतो बली होता है सब प्राचार्याने पृथक् आयुकहाहैलग्नबली होयतो अंशा युसूर्यबली होयतो पिण्डायु इत्यादि कहाहै ऐसाहै तथापिसत्याचार्य कामते अंशायुपर है बहुत आचार्याकानीमतहै औरजो धर्मिष्ठसुशी लपथ्यभोजी है उन्हीकी आयुमिलनी है पापियोंकी नहीं और पथ्यापथ्यसे रहितजो हैं वह अकालमे भीमरते हैं: शिष्यसंदेहनिवारणमाह:- हानिर्यास्तमिते रिमेऽप्यनुमतांशोत्थेल्पेबुध्यानतत् यस्माञ्चैष्टिकन्याश्रयेऽस्तिनिखिलैः पण्डादिषूक्तात्तत मूल आयु:सौरमितम्यतोऽदगणनासौरान्ततः सूरिमित प्रोसत्यमुसय्यदल्पकथितनाक्षत्रकंसावनम्, २७ ।। अन्वयः- या अस्तमितेऽई हानिः शत्रुभ्यंशहानिः सानुपण्डादिविष्वान युये उताके नपिराचार्येणांशायु ये कतासात्वत्स युड्याहेतु भूनया असाचासौ बुदिश्वासबुद्धिस्तयाल्पबुड्या दुसन्यस्मात्कारणा दसंइतेहानियेटिकेचेष्टागुणकेयतोऽस्संगतस्यचेष्टागुणके रूपाईमेयहानिः परिरहेव्यंशहानिरुक्तास्तीतिमायः मायुः सौरमिनमेय ग्राहयतोब्द गणनासौरान उक्तंच॥ चर्पायन युगपूर्वकमत्रसोरात् मासास्तथाचनि
(१७९)
थयस्तुहिनांशुमानात् ।। यत्रूलसूतकचिकित्सितवासरावंतत्सावनाचघटिर
कादिकमार्तमानातानःसूरितिसत्प्रोक्तंगत्सकषितंनाक्षत्रकंसावा
नमितिकेचिदसझेननाशनसावनेनायुः कथितंतदसदिनिशम्..
अर्थशापा:-पिण्डादिआयुयिमें अस्तंगत यह होयतोअर्ध हानि-
औरशत्रुगृहमें होयचो त्र्यंश हानिजोसव आचार्योने कहा है उस्को
नुमान कोई असदुद्दीसे अंशयुर्दायमें करेंगे तोवह करना नहीं कारण
अर्घहानिचेष्ठा गुणक और त्र्यंश हानिअाश्रय गुणकमें है वर्ष गणना
सौरसे है इसवास्तै विद्वानने यह आयुर्दाय सौर मानसे कथित है औ
रवही सत्यहै नाक्षत्रकिंवासावनमानुलेनाऐसाजोकोई कहते हैं सोय
सत्सजानना क्योंकिबहुमतसे विरोधहै सोठीक नहीं है.
इसनीमनुष्यपरमायुरन्यप्राणिनांपरमायु
पंचाहनवसमानुकरिणांव्याघ्रायजादेपाः
श्लोकः-
गोकाल्योश्वजिनालयोष्ट्रखरयोस्तत्वानिसू-शुनाम् ।।
अश्चायुःपरमरदानुवदिहानीयायुरेणापरायुनिप्रिं-
नृपरायुषाचविहतेषांस्फुटायु वित् ।।१८।।
अन्वयः- पंचदिनाधिक नववर्षाणि १२००५ नृकरिणापरमायुःस्य
तव्याघ्रायजादेनृपाः१६ गोकाल्योगेमिहिष्योर्जिनाश्चतुर्विशति२४ मितापर
मोयुम्हीतिनिम्नयार्थबोधकः नियोष्टरवरयोस्तत्वानि पंचविंशति २५वर्षा
पिपरमायुःशुनांकुङ्कुराणांदादशवर्षाणिपरमायु:स्थात् अश्वानारदाहात्रि
शित् २२ एयांनृवत्मनुष्यबदायुरानीयवस्वपरमायुयवः संगुण्यनृपरा-
युपाशाजेन्नदातेषांकुरायुवित् । इसिआयुन्याध्यायः पंचमः ।।
अर्थक्षायाः- मनुष्य और हाथीइनकोपरमायु१२व्यर्ष दिनव्यागादियो
रव्यजादि इनला १६वर्ष गौ भैस इनकार४ वर्ष उट और गर्दनइनका२५
वर्ष कुलेकाचर्प.घोडेका ३२ वर्षहमाणीकामनुष्यके प्रमाणध्यायुर्दाय
वनायके उस्कोत्वस्वपरमायूसेसुणके गुणाकारको मनुष्य के परमायु१२०य
पिदिनदेशागदेनातो वह २ प्राणीकासमायु होना है. ॥इति ।
श्लोकः-
जगदीशेनरचिते केशवीग्रंथ टिप्पणे ।।
पूयिमायुरध्यायोप्लाषावस्यप्रकाशकः ॥५॥
अथदशाऽध्यायः
यस्यायुर्यदूसौदशास्यचशुभेटोच्चस्वशांशेतथा..
श्लोक
रोहानीचपरिच्युतस्ययदिसाकष्टारिनीचांशले ।
त्पत्तोचेलवरोहिणीभवतिसामध्योच्चमित्रस्वशां--
शैसदृष्टयुक्तःस्फुरत्करवलिष्टाधिकस्याच्छुमा२९
अन्वयः- यस्य ग्रहस्य लग्नस्यवायदायुरसावस्यग्रहस्पदशास्यात्
इष्टोच्चस्वशांशे वर्तमानस्य शुभाइष्टस्य मित्रस्यशैवाउच्चगृहेउच्चा
शवास्वोस्यांशेवास्थितस्यग्रहस्यदशाशुप्मास्यात् ।। तथानीच परिच्युत
स्य ग्रहस्पदशाडरोहाशुभास्यात् यदिनीचपरिच्युतयहोरिमाशेअरेः
शत्रोनीचस्यवाशितदातस्य देशाकष्टदानेष्टफलदा त्यक्तोऽग्रहेन
तद्दशाऽवरोहिणीअशुपमाअशुभफलदायदित्यक्तोवग्रह उच्चमित्रस्वफी
शस्थिस्तदातस्यदशाऽशुभापिमध्यास्यात् ।सदृष्टयुतस्फुरत्करबलिष्टे
ष्टाधिके ग्रहेसतितस्पदशाशुप्मास्यात शुभग्रहैदृष्टोयुतश्वस्फुरत्कररश्मा
यीयस्यसस्फुरत्करः बलिष्ठेऽधिकूबलै इष्टाधिके इष्टं इष्टबलमधिकं
यस्यस इष्टवला
अर्थभाषा
ग्रहकाजो न्यायुदय वही उस्की दशा होती है.गृह मित्रगृहमेंउन
चमेंचा स्वगृहमें अथवा मित्रांशमेंउच्चांशमैदावाशमे होयतोवहग्रह
कीदंशा शुभहोतीहै. ऐसाहियदि ग्रह परमनीचको छोड़कर पागै
जायनोदशा आरोहायुमहोतीहै. परंतुजीवह ग्रह शत्रुराहमेंवानीचमे
किंवाशके अंशवानीचांशमें होयतो आरोहादशायह अशुभ होती
है.और यह परमउच्चछोडके आगेजायतो दशाबरोहिणी अशुभ
होती है.परंतु ग्रहउच्चमें मित्ररहमेवास्वगृहमे अथवा उच्चांशमे मित्रां
शिवास्यांशमें होयतो अवरोहिणीदशा यह मध्यम होती है ग्रहशुमा
दृष्टगुमयुक्त उदिन बलिष्ट और इष्ट्राधिक कहिये पूर्वमेंलेआयेजो.
इष्ट अधिक होयती दशाशुमहोती है.
इदानींदशाक्रममाहु.
स्यादाहथाहिदशाधिकौजसइहान्दूद्यानांततः .
तत्केन्द्रादियुजामथहिवहवावीर्यकमेणैवहि ।।
चेदोजस्समतायुषोधिकतेयायुस्तुल्यनाचेद्दशाभी.
ढयात्स्यादुदितमात्मविधीवीयेहिननोच्यते॥३०॥
(.१८१.) अन्वयः- अर्कदू दयानांसूर्यचन्द्रलग्नानांमध्ये योधिक बलस्त- न स्यायां दंशाकल्प्याततस्तकेन्द्रादियुर्जातद्यथाअर्कबलाधिके प्रथमदन शार्कस्यततस्तस्यकेन्द्रस्थितानांअर्थात दितीयादशा रविस्थानस्थितस्या तृतीयाचतुर्थस्थितस्यचतुर्थी सप्तमस्थस्य पंचमीदशमास्थितस्य एवं चन्द्रेवालग्ने बलवति सति ॥ ततः पणफरस्थस्य।५।८।११ततापोन किमस्थाश६।९।१२नामययेकस्थाहिबहवः संतितदावक्ष्यमाणवला धिकस्याद्यादशाततोन्यूनस्य द्वितीया एवं तृतीयाद्या-बलसाम्येयस्या धिकायुः तत्रापिन्यूनाधिक्यंयोज्यतस्यापिसाम्येयो ग्रहोऽस्तात्प्रथमो |दितस्तस्याधादशाज्ञेयेति ॥ ३०॥ अर्थभाषा:-सूर्यचन्द्र और लग्न इस्मेंजो बली होय उस्की दशा प्रथमजानना और उस्के बादकेन्द्रा४७१० स्थकी दशाअनंतर पण फर।५।८।११स्थकीदशाअनंतर आपोक्लिमस्थ ग्रहकी दशाऐसा- कमजानना केन्द्रौपण फरमेंऔर आयोक्लिमस्थानमें एकसेज्या दाग्रह होयत्तो प्रयमदशाकिसकी है तब उस्में जो अधिकबल होय उस्की प्रथमदशा अनंतरन्यूनबलहोच उस्की दशा कदाचित्बल. कीसीसमता होयतोजिस्की आयुअधिक होय उस्की प्रथम देशा आयुकाप्नीसमता होयतोजो अस्तसे प्रथम उदय हुवा होयउस्की प्रथम दशा होती है. ॥३०॥ इदानीलग्नायदशा प्राप्तबलमाह. चेल्लग्नाद्यदशास्वभावजफलनीजांसिपाकक्रमे प्रलोक- उन्होश्वप्रथमारवगोदयबलांघ्रिङ्केडन्यवगैडईितः।। स्वैर्वगैशबलैहत्तोबलमिहैक्यंमूलतैक्यंपरे थैव- रिष्टदातृजेधिकबलेमतात्तदा रिष्टहृत् ॥३१॥ अन्वयः-चेदाद्यालग्नदशातदा भावफलमौजासिकाऱ्यांणिोजां सिस्वस्वषड्बलैक्यानिग्रहाणां भावजफलैगुण्यानिदशाक्रमेतानिदशा बलानिस्फुटानि भवतिचेदकॆन्दोः प्रथमादशाअर्कस्य चंद्रस्यवाप्रथन मा दशानदा ग्रहाणां लग्नस्यचयत्षड्लैक्यं तस्यांनिश्चतुर्थाशोग- हस्थानेस्थाप्योडन्यवर्ग होरादिपुचतुर्थीशस्याईस्थाप्यः ससवर्ग स्थितांकास्वैर्वर्गेशवलैनिहत्यगुणायत्वानेपामैक्यंबलं स्यात् अपरा मनंतुऽपरेएवंनुवंति ॥ तेषांगुणनफलं प्रथमंमूलानि गृहीत्या तेषा- (९८२) मैक्यं बलं स्यात् दसदेक.देशत्वान् खगोदयबलांघीत्यादिप्रकारेणा नीतबलेरिष्टदर्शक्तजग्रयोर्यदिरिष्ट तारिरदग्रहापेक्षयाधिक बलस्तदारिष्टहृत्स्यात् ।। ३१ ।। अर्थनापा. यदि लग्नकी प्रथम दा होयतो भावफलूसे ग्रहके षड्लैक्यको गुणदेना तोदशाकमसेबल होता है यदिसूर्य यांचन्द्रमाकी प्रथमदशा होयतो ग्रह और लग्नइनके बलको चतुषंशिसप्तवर्गवलके गृहस्थाना में रखनाऔरउस्काआधाहोरादिधस्थानमें रखना और उनको अपने आप निवर्गस्वामीके बलसे गुणदेना और सबकायोगकरना लोबलहोताहेऔर कोईआचार्योकायहमत है कि गुणनफलका मूल लेकर योगकरना तोब लहोताहै.यहीकनहीं है। पूर्वरीनिमायाजोवल वहयदि रिष्टकर्नाग्रहक अपेक्षारिष्टांगकांग्रहको बलअधिक होयतोरिटकोनाशकरेगा.. दशाक्रमोदाहरणम्. इहांचूर्य चन्द्रौरलग्न इस्में सूर्य अधिक बलहै इसवास्ते पिंडायुमें सूर्य दशाप्रथमलेके उदाहरण क्रम लिखना.तथापि ग्रंथक मानुरोधसेलग्न बलाधिक कल्पना करके अंशायुमें प्रथमलग्नदशालेके दशाकमालिखते हैं प्रथमलग्नदशा.अनंतरलनसे केन्द्र स्थानमें सूर्यचंद्र हैं और पणफरमें शुक्रमंगल है और आपोक्लिममें गुरुबुध शनि है इन मैसे प्रथम दशाकिस्कीहै यह संगझनेके वास्ते दशाक्रमबल करने हैं. दशाकमबलचक्रम्. जन्मलग्नम् तू चं महशु-श-ग्र ६ ० ५ बा ३१५२/५७/२२/१७११६/२३ ३६/४५/२०१५८ १६/५७ रविका पडूबलेस्य ७५१५३ इस्का रवि भावफला४६।३३ इरसेगुणकेश३६यह रविकादशाक्रमवल भयायहीरीतिसे चंद्रादिकों कावलकरना इहकिन्द्रमेंजोसूर्यचन्दहैं इस्में सूर्यअधिकवल है इ: स्कीहितीयदशाचन्द्रकीतृनीयदेशाअनतरपणफर में शुक्रमंगलइस्मैम गलत्यधिकवल है इस्की चतुर्यदशाअननरशुक्रकी आपोक्लिममें गुरु ५५ ६ २ १३ २ १०११1११ २ ८१३०१९ २४|४८/१२/४८. ૬૮૨૨૩૨. ( १८३२ . अशायुचक्रम्... बुधशनि है. इस्मै गुरुआ लावत चाम शुरश-चुन योनधिक.वेल है. इसकी दर शा अनंतस्शनिकी दशा अनंतर बुधकी दशा इस २४|१०/१२/७२३११ ५२२९१५१९२११२३४५४ प्रकार अंशायु करना. उदाहर॑णार्थ सूर्य अधिक बल कल्पना करके पिंडायुमें दशाक्रम लिरचते हैं प्रथमसू र्यदशानंतर सूर्यसे केन्द्रस्थानमेंलग्नचंद्रह इस्मैप्रथम द. शाकिस्की है यह समझनेके वास्ते दशाक्रम वल करते हैं. चन्द्रको षड्लैक्य ७।२०१४ इस्का चतुर्थाश १।५।यह गृहस्थानमें बल इस्काअर्धा५५० यह होरादि६ स्थानमें चल अवचन्द्रका रहेश शनि इस्का षड्वलैक्य धारा११ इस्सै चंद्रका यह बलं १।५०११ इस्को गुणके १९४यह चन्द्रका होरेशचन्द्रइस्का षड्लैक्य ७२० इस्से चन्द्रका होराबल ०५५। इस्को गुणके. E४३२४ यही रीतिसे द्रेष्कोणादिकोंका गुणाकार करके सप्तवर्गमें कि गुणाकारका ऐक्य करना तो दशाक्रमवल होता है. नहऔरलग्नइनकांवलचतुर्थाशगृहऔर तदर्धहोरादि६स्थान में.. च. ६. शल. ग्रह १५ होरा ३१ द्रेष्का- म. १ ५ १ २२ وكيله ३० .३३ ५२ २ o o . •M २७ ९६ . o 6 لی مین هو ३१ 2005010200501 ५९ ५. fudi १६ o सप्त ३८ ६ २७ ० . नव ५८ ५५ do . . २७ . ४१ २७ ५५ OM दाद. त्रिंशां. ५ १६ 0 . IA India वगैशबलसे गुणके. चा मं. खु शु श ९ ८ ग्रह ९१ ५२ १३ Plevis ५६ २५ ५ ४ होरा ४३ ५३ द्रेष्का ४३ ३४ ४ २२ १९ مو کو २८ ७ :/rrestant ७ ३ सप्त १२ ५५ ३७ २५ ३ नव. ३२ ४४ ૨૨ ३७ ५५ १२ १० . १५ २५ ६ ३ ५ हाद. ७ ८ २२ ३९ ३१ . 2 त्रिंशान २७ ४ ४६ २८ ५ ७ गुणाकारकाऐक्यदशाक्रमबलचक्रम् . सूर्य चन्द्रः मंग- बुधगुरु- शुक्र शनि लग्न योग ४७ ४७ २ २. ४२ १२. इहांसूर्यसेकेन्द्रस्थानमेंलग्न चन्द्रहै इस्मैलग्न अधिकवल हैं। उस्कोदितीयदशा अनंतर चन्द्रकी पणफरमें मंगलशुक्रइस्मै मंगल यधिकवलहैं उस्की दशान्यनंतर शुक्रकीदशामापोक्लिमबुधगुरु शनिहै इसमै गुरुत्यधिक यलहै उस्कीदशानंतर शनिदशा अनंतर चुपकी देशा इहां मियायुमें सूर्य अधिक वल हैं इसवास्तै यही गि कमजानना यहवलपिंडायुमैं और निसर्गायूमें लेनाअंशयूमें १८५, पहलेजो वलकिया है उस्का-प्रमाणसे दशारखना. पिण्डायुर्दशाक्रमचक्रम् . चमं. यु १५ २ ल यान १६ ३. १९ १८ ५७ ૨૯ २२ ४८ २४ २८ ३७ २४ १६ १० १८ . उदाहरणार्य चन्द्रका अधिक वल कल्पना करके निसर्गायूमेंदन शाक्रमलिखते हैं. प्रथमचन्द्रदशाअनंतर चन्द्रसेकेन्द्रस्थानमलग्नी और सूर्य हैं इस्मैसूर्यअधिकबल है इस्की दितीय दशाअनंतर लग्नकीदशाचन्द्रसेयणफरमें शुक्र-मंगल है इस्लै मंगल अधिकवला हे उस्की दशमनंतर शुक्रकी दशा चन्द्रसे आपोक्लिमस्थानमें बुन धगुरुशनि हैं इस्मैगुरु अधिक वलहै इस्कीदशानंतर शनिकी दशाअनंतर बुधकी दशा पिंडायूमें जोवले किया है उसी वलका प्रमाणसे निसंगयूिमें भीलेना. श्रीरजीवायूमें भी लेना. निसर्गायुचक्रम्. ल. मंशु शबुयो. चं. सू. ७५ • arva ३ २८ Mus/ 2029 ૨૨ ४३ ४८ जीवायुदायमें सूर्यचन्द्र लग्नमें हीनबल होचतथापिजोङ स्मेंन्यधिक वलहोय उरकी प्रथम दशा कल्पना करके अनंतरउस्से जो केन्द्रादि स्थानमें होय उनकीदशा इत्यादिक्रमजानना ॥ रिष्ट संग विचारांवर औरदशाक्रमबलदाढर्थ और मतांतर निराकरण. संतुरिष्टकतीहिताहितूशुप्तासत्वंचनीचोचना श्लोक- स्ताद्यस्याययतां विचा!मतिमारिष्ट्रस्यगंवदेद श्रेष्टरिएहतोदशाक्रमइहौजाश्रीधरायोदितम् कष्टेष्टमवलांनरात्कचरुतंतयुक्तिसन्यत्वसत् ॥३२|| (१८६) अन्वयः पंक्तुरितिरिक्तुःरिष्टकृतोरिष्टकारकस्य ग्रहस्यहिताहितं. शुभाशुप्नं विचार्यरि भगवदेन हितं इथंग्रहित करंशुप्तासखं शुभग्रह पापग्रहंच उच्चस्थितोनीचा स्थितीवालास्तोदितोषामित्रगृहे। शबुहेवास्या दित्यादि सर्व विचार्य रिष्टस्य भंगंवदेत् मतिनान न् । इहास्मिन्स्यले दशाक्रमे श्रीधरायोदितंयोजो बलं श्रेष्ठंइष्ट वलेन गुण्योदशाविधौबलंस्यात् । नथपरमतं ।। कटेष्टनेति करकेचनाचार्या कष्टेष्टाश्यां गुणितेबलेतचोरंतरात्ताधितं वीर्य्य। हपृथगिष्टकष्टगुणित मित्यादिनाइष्टकष्ट युणितं पडलंयोरंतरी कायं तस्यचतुशिोरहेहोरादावधितः ततः स्वस्ववर्गेशवलैहतस्ते पामैन्यं स्पष्ट चलं स्यातदसत् युक्तिवान्यत्वान् . अर्थभाषा. अरिष्टफर्ताग्रहमीरपरिष्ट अंगकर्ताग्रह इनके इधकष्टवहशुन भहैं किंवा पापहैं यह और वहनीचमें उच्च मिन ग्रहमें शत्रुहो र अस्तंगत उदित है इत्यादि इनका आश्रयत्वका विचार करके बुद्धि मान् गणकने अरिष्ट तंग कहना यह ग्रंथमेरिष्ट भंगके विषेऔर दर शाक्रमके विपे श्रीधरादिक आचार्योनेकहे प्रमाण बलल्यावनेकी रीनि कहाहैवही श्रेष्ठहै श्रीपति इत्यादि ग्रंथकारने इष्ट सेवा कष्ट से पड़बल गुणके उस्के अंतरसेजोवल साधनकथित कियावहाँ अयुक्त है इसवास्ते असत है. । अंतर्दशाकरना.।। अर्धस्यैकसगस्त्रिकोणगृहाख्यंशस्यचास्तेनूगां श्लोक शस्याश्चतुरस्त्रगानिजगुणैः पक्कनेस्याइली। अंगादौकुरुरुपमत्रसमनांकृत्वाचनाशंछिदा मंशनाःस्वदशाः पृथकवलुलवैक्याप्तास्युरंतर्दशाः३३ अन्वयः मूल दशेगगृहस्योग्रहोनिजगुणैरर्धपक्ता याचकोपातिनिज गुणैरित्यस्यार्थयारोहावीह उच्चनीच कष्टादितिरित्यर्थः त्रिको णगानवमपंचमस्थानगरुयंगस्य बस्ते सप्तमस्थेनगांशस्स्सप्तमान शस्य चतुरस्त्रयाप्टमस्थानगोंग्रेव्यतुशिस्यपक्तायाचको सवति ( १८७) दिशाः स्युः लग्नस्याप्येवं एकदिवहुपुसत्तुवलीएकएवग्रहःयाचयतिनसर्वत्र वापिदशाकमवलंज्ञेयम् अंशादीरूपंखातनः प्रथममेक हास्थित तस्यततस्त्रिकोणस्थग्रहस्यततो अस्तगतत्यनतश्चतुरस्त्र गतस्य ग्रहस्य मागास्याप्याःततासमाच्छिदीकत्यछेट गर्मचरुत्वापृथक्तेषा मंशानांयोगः कार्य्यत्रहदशापृथावलैगुण्याअंशयोगेनमाज्या अंत अर्थलाषा मूल दशापति अर्थात् महादशापनि जिस राशीमें होय उसीराशीमें जोग्रहहोयवह शापतिकै संवंधते दशापतिके अर्धफलका पाचक होता है दशापतिसे५।९यहस्थानमें रहनेवालाग्रहदशापतिके. तृतीयांश कालका-पाचक होता है. और दशापतिसै सप्तमस्थान नका ग्रहदशापतिके सप्तमांशकापाचक होताहै और दशापतिसेशाच यहस्थानमैका ग्रहदशापतिकचतुर्थाशकालकापाचकहोताहै सर्वत्र हआरोहावरोहउच्चनीचादिपूर्वोक्त स्वगुणसेशुनाशुभफलकोवाचक होताहै.कहिये अन्य दशामंत्री अपनेपाककालमेशुनाशुलफलदेता है। एकराशीमें एकसेज्यादायह होयतोउस्मैजोवलियग्रहहोयउसीको लना इहांशस्थानमें श्लेकै उस्के नीचे छेदलिखना अनेतर समच्छे। दकरके छेदांक त्यागकरना अंशांकसे स्वकीय स्वकीय वर्षादिदशा लगअलग गुणके गुणाकारको अंशांकके मिलानेसे जुदाजुदा भाग दिनानोअंतर्दशा होतीहै. अंतर्दशाक्रमः- प्रथम दंशापतीकोध्यंतर्दशात्यनंतर दशापतीके राशीमें रहनेवाले महका अंतर फिरदशापतिसे१५ यहस्थानमें रहनेवालोंका अंतरफि रसप्तमस्थानके ग्रहकाअंतर अनंतरा यह स्थानके ग्रहकाअंतर कदाचितूपूर्वक्तिस्थानों में दातीन ग्रह हायतोवलकावशसेक्रेमजाना नाजोदशाक्रमकेविषेवलहै वही अंतर्दशाभी वलजानना. समच्छेद करनेकीरीति. -जिनसंख्याओंकासमच्छेद करना होय उनकोबराबरते रसकर एककेहरसेदूसरेके हरगंशको गुणदेना औरदूसरेके हरसे औरसबके हरअंशकोगुणना ऐसा परस्पर गुणनेसे समानच्छेदहोताहै. उदाहरण+जैसे लंग्नदशाने अंतर करनाहै. ल-शुशई सूचं इनकोसमच्छेदकरके २५२ १८४८४॥३६॥६३ २५२१२५२।२५२ १२५२।२५२ ह.
(१८८ इनअंशोकि मिलान ५१९ इस्कोरसे भागके १७३ अंशांमें ३ से भागदेनेसेसार।२८।१२।२१ इसीप्रकारजहां अधिक अंक होयउस्के अपवर्तनदेके सूक्ष्म अंक करलेनाज़ोकाम उस कसे होताथा वो काम इस अंकसे होजायगा. उदाहरणमः इहांसूर्यबलअधिक इसवास्तैमिश्रायुमेप्रथमसूर्य्यदशा१३ १२६७।१३।२८ अबसूर्यदशामैं अंतर्दशादिचारइहाकुंडलीमेसूर्यके साथ कोईग्रहनहींसूर्यसेविकोणमें मंगल हैसोई पाचकहै औरसूर्यसेसूप्त ममेलेनहेसो पाचकनवर्यदशा में मंगलेऔरलग्नपाचक है सूर्य मिला यहसमच्छेदकरके सूमशैल इस्के छेदत्यागकरके खू२१ मं.७८-३यह अंशांकनया यहां सूर्यकीमूलदशा १३।७।२५ ॥१३२९ इस्कोसूर्यके अंश इस्से गुणक २८६।१०।१।४।४८ इस्को अंशांककी मिलान ३१ इस्सै भागके ९।३।११।२२ यह सूर्य्यमेतू र्यकीदशासूर्यकी मूलदशा १३।७।२७।१३:२८ इस्को मंगलके अंश | इस्सेगुणके ९५।७।१०।३४४१६ इस्को अंशांककी मिलान ३१से जागके ३।१०।१०।२८ यहसूर्यदशामें मंगलकीअंतर्दशासूर्य्यकी मूलदशा १३।७।२७।१३।२८ इस्कोलग्नके अंश इस्सेगुणके ४०। २३।२१।१०।२४ इस्को अंशांककी मिलान३१सेक्षागके १९३५२५१५१ ३त्यहमूर्य्यदशामलग्नकी अंतर्दशायहतीनों अंतर्दशाकायोग१३॥ २७।१३।२८ यह सूर्यकीमूलदशा यहीरीतिसेलग्नादिदशामें अंत र्दशा.करना... अंशच्छेदचक्रम् सामालशुशासूचाचानसून मामसूता शु. १ लगम बरचं बुशल शुचिरलाल श. 12/२/३/७४/१/३/७/११/३/3/018 १/७४ | ( १८९ समच्छेद चक्रमू. सूबामालगलगशु-शरसून चंचं सासून मा मंसू शुः बु. २१/७३४/२८/२०१२/२१ १२४ ३३४२८१२/२१ २१२१शन्यायाच्या १२१२१शन्शन्सन्टार शुलनयमान्चसुसूतशालचंदवावलनश. ૪ર૦ ર રિરિરિરિસ્ટોફર ફોરદાર સિદ્ધaj-e૪ ૯૮૯૮)રરર૮ર सूर्यदशामालपदशामअन्तरदशा चंद्रदशामअंतर्दशा तोमर्मअंतरदशा न्तरदेशा च मंगलमयोलन शुश चंयोनसमा मंसशु बुनयो ७ 02 . ३018/१/१.५/१०/११/७/२/२/१/२/१/२/३ રરરકાબદાર૭ર૬/રરર૪ર૪ર૩ કિર્ણ २०१५११३/५/११०४६/१२/१३/४/१०/५४/२०/६/२०१५ २२ રિરિરિક કબીરરક રદ રદ शुक्रदशामवंतरदशा उन्दशामअंत शनिदशामेअंतरदशा बुधशामा तरदशा- शुलश-मंरयो र बुख योशिशुचर यो बुल-शयो. IMAR ३/३/११/११/१.७ ५११७८५२०३९/१२/२१ २११०१३/१३ २५/१२/१९ ५७/५/५१५१/५९५४१९/६/२०१९३३६/३२/३२/३०/९२०९१३/२०२० ૨૨-૨૦૨૨૨૬૪દિર દરરોજ ०२५२५४२२२ 330 इदानीसूक्ष्मफलज्ञानार्थविदादिसाधन - माह. इत्याभ्योविदशास्ततोप्युपदशाताभ्यवसूक्ष्मफलं- श्लोक पंचांशोनदिनयंतुकलयेत्पायुम्लतंदृश्यते । पक्षः खेटलवांतरेणचणवेन्मासांनरंचायुषः प्रोक्तंयैस्तु- दशादिलंग्नेनफलंतेश्योतिभ्यो नमः॥ ३४॥ अन्वयः- इत्सनयारीत्याअायो अंतर्दशायोबिदशा साध्या परंखत्रदशा स्थानेऽन्तर्दशास्थाप्याःननउपदशासाध्याविदशादशाप्रकल्प्यताप्योदशा तर्दशाविदशोपदशाभ्योऽतिसूक्ष्म फलं वदेत् गणक इति. अनयारीत्यारुतमंशायुः कलयाएककल्यापंचांशोनदिनयमान सुदृश्यते । एक कलातुल्येनग्रहांतरेरौवंभवति यदिनवांशकलाति२०० रिकवनदैककलयाकिमित्पनेनायुषएकदिनमष्टचत्वारिंशद्दटिकाचांतर पननिब्रह्मसौरार्य्यभदादिपग्रहाणामंशाद्यमंतरं भवतितेनायुपामासा धमतरतवति। अपिजन्मकालस्यपलमानांतरेलमुस्यकलापकस्यांत स्यात्तनदशाविभागेमायुये प्यन्तरंस्थात् एवं यैराचाय्यैर्दशादिल नफलंदशाप्रवेशेलग्नफल मुक्तंतेश्योउनिहायोनम इतिवक्रोक्तिः ।। अर्थशाषा. जिस प्रकार दशासे अंतर्दशाकिया है उसीरीतिसेअंतर्दशासे दिन दशा करना इहां अंतर्दशाको दशा कल्पना करना और अंतर्दशा पतिकोदशापनि कसना करना अनंतर पूर्वश्लोकमें कथितरीन नि प्रमाण पाचकांशको समच्छेदादि विधि करके विदशाल्यावन नातैसेही विदशाको दशाकल्पना करना और विदशा पतिको दशा पनि कल्पना करके विदशामें उपशाल्यावना यही रीतिसे दुशा में अंतर्दशापनि अपने गुण प्रमाण फल देते हैं और अंतर्दशान में विदशापती अपनेगुण प्रमाण फल देते है और विदशामें उपद शापती अपणे गुण प्रमाण फल देते हैं ऐसे उपदशासूक्ष्मकालि कफल जानना. इहां १ कलाका अंशायुदायल्पावनेकी रीतिप्रमाणायुदी याकियातो दिन ४८ घडी आया ऐसा देरखाता है ब्रह्म सोराय भट्टादि पक्षसे मूहका भागादि अंतर आवता है इसवारले आ युदाय मासादि अंतर त्यांचंगा जवजन्मकालमें पलमात्र अंतर आवताहै.तवलग्नमेंक- लाका अंतर मावताहै और ६ कलासेमायुर्दायमें दिनकाअंन तर त्यावेगा ऐसा अंतर देवकर यह दशा प्रदेशादिलग्न फल कथिन किया है वह दूरदर्शीको दण्डवत् है.
२ . . ० ० . . ५ २ २ . ० 6 o . . . C (१९१ सूर्यमहादशा सूर्यमहादशांतर्गत सूर्य महादशांतर्गतलनी तर्गतसूर्योत मंगलांतर्दशामध्ये तर्दशामध्ये विदशाच- दिशामध्यविदशा विदेशा. क्रम्. तू मला यो मसूत शबुयोगलनशुशन स्तूचनायो. १ २ १ २ २२ १३४ २११७१७ २७/२५ २.९९२११ १३२४५३१४८/२० १ ५७/५९२६/२२/५६/३८/२५/२९२८/१४४ ४२८१४८१३८ लन्नमहादशांतर्गत लग्नमहादशांतर्गत लग्नमहादशांतर्गत लग्नांतर्दशामध्येवि शुक्रांतर्दशामध्ये शनेरंनर्देशामध्ये दशा चक्रम्. विदशाचक्रम्. विदशा चक्रम् . लशस्तूचं. यो-शुलश. मं. इसगान शाल-शु ... यो- |१६|२/२१ ઉsc २८१९१९.६ १९ ३६/३६६५७५३६/१२ /१२/२२/३२/3 २५/१२/१२/५६/२/४/११.४.४१९/३४१५५/२९/३९/४४/४४ ४१ लग्नमहादशातगलग्नमहादशांतगत चन्द्रमहादशातगत तसूर्यो- मध्ये विचंद्रांतर्दशामध्ये वि. चन्द्रातर्दशामध्ये वि. शाचक्रम्. दशा चक्रम् दशा चक्रम्, सूमाल योचाबासूरामायोचिगानमा यो. ३१ ५ १० २८.९/१६/२५/१७२५/११ ११ २०/२६ ४४/३५/५७१७१९४६४९४९४६१०१६ १३. ५२/५१४६३७५६५६१५ |३२/३२ चन्द्रमहादशांतर्गत चन्द्रमहादशा चन्द्रमहादशांतर्गत जीवातर्दशा मध्ये नर्गत सूर्यो-म मंगलांतर्दशा मध्ये विदशीचक्रम्ध्ये विचनम् विदशा चक्रम् . बचंबुसू.यो.सू. मंगल यो मामू शुबुनायो. १ ७/६/६२/६३ २७१८ . O a . ८ . २ १ १ २७ o . ० . . . Ge a २ २ ११ ३ १ २ १७/२५/१९२६२९ २ १० ३ १ १११३२९ २० २६७ २२.२७२८ ५२२५२ १४४४ . ० . क . . ( १९२ ) भीममहादशांतर्गत भीममूहादशांतर्गत सोममहादशांतर्गत मंगलांतर्दशामध्ये सूर्यामध्ये विदा शुक्रांतर्दशामध्ये विदशाचक्रम्. शाचक्रम् विदज्ञाचक्रम् मसूत शुबु यो स्मल यो शुलशन मंगर. ३ १४२ ७ २०२६/२०६४९/१६११६/२४४२ ४८१६ २५/२५१२/१९ भोममहादशातर्ग|शुक्रमहादशांतर्गत शुक्रमहादशातर्गत तबुधानर्दशाम-शुक्रांतर्देशामध्ये लग्नांतर्दशामध्ये वि. ध्यविदशाचक्रम् विदशाचक्रम्. दशाचक्रम्. बुरलाशयो. शुलशनगरयोल शुश स्तचायो. ८ २ 1१७।२५।६ २४ ४८४६/२१ १२० ३७.३/२३ २२ . . India Siwana . . ३९५४९ ३४/१५ . . . ८ . ० शक्रमहादशांतर्गत शुक्रमहादशातर्ग- शुक्र महादशांतर्गत शनरंतर्दशामध्ये तमंगलीतर्देशाम गुरुयंतर्दशामध्ये विशाचा ध्येविदशाचेक्रम् विदशांचक्रम्. शाल शुचयो मसूर शु बु यो बचनबु. सूत यो २ ૨૦ Iિોર૭/૨૦૧૬] ५५/५५३१११ ९९२५/११/४७/२३ ५९४७/२५२३ ११५ १५/२०/२७१.४०५६/५९५७३९/२०१४३/५७५४.२२ गुरुमहादशांतर्गत गुरुमहादशांनी गुरुमहादशांतर्गत गुरु. मेध्ये विद-तचन्द्रांतर्दशाम बुधांतर्देशामध्ये वि. शाचक्रम्. ध्ये विदशाचक्रम् दशाचक्रम्. याचं सुस् यो चरसूल मंयोवुन लश.यो. ६ २१ ७ २८ ८ ८ . १.९८३ ० ५. २.६१५२७२११७.२.१९९२२१ द १२ ६५५७१९ .१.६ १० ४.५७२५/२५ १९४५२३७ २५/२५.१५/१२/१२ 部食年 ० ० ६ २ २७ او مدنيه Rs100 هلدر مه ० १ ઉર गुरुमहादशां शनिमहादशांतर्गत शनिमहादशांतर्गत तर्गतमूमेनरंतर्दशामध्ये विनलंग्नांतर्दशामध्येविन विदशाचक्रम् दशाचक्रम् दशाचक्रम्. सूर मंगलयो-श-लशुचंब-योलन शुश-सू. चंयो: ३११ २१.१० २९८१२/२१ ११६/१६/१० [१८४६/४५/४९५३/३७३७१३१३३६/३४/५०/५० ५५५५/२७/२७ शनिमहादशांतर्गत शनिमहादशांतर्ग शनिम-दःगुरुओं क्रांतर्दशोमध्ये विदतचंद्रातर्दशाविद तर्दशामध्ये विद- शाचक्रम्. शाचक्रम्. शाचक्रम् शुगलनशमनारयानचं-बासू मायोबाचं सूत यो. २ ६ २ २३/२७/२७ २०१३/३/११ /२३/२३ ३४५०५०/२२/५३२२३३ /१९ २३२३३०५४९. १३ १४|४|१९ ५६/५७/१२ बुधमहादशांतर्गबुधमहादशागुरु बुध महादशांतर्गत तिबुधातर्दशादि-व्यतर्दशामध्ये विलग्नातर्दशामध्ये दशा चक्रम्. दशाचक्रम् विदशाचकम्. बुलशयोबच बुस् यो/लन शु श सूचियो. 1818 १३२५/१६/२० १९२६/२६२४९१२१८ १८२६/२०४९ ૨૨૧ ઉ ૨૦ १३/१४/२३ ४२/४२/४४११५ बुधमहादशातर्गतशनिअंतर्दशामध्ये विदशा. शु. चं. अयो. इतिविदशासंपूर्णः जिस प्रकारसे विद्- १ ૨૨. १८ शाकरिकहै उसी प्रकार पदशाकरना. किंचिदु. २६.१२ -शामसेवक्ष्यामि २०२० ० . 0 . 6 o a ५ २ سرو سمند ATI ७ . . १ . . . . ० . . ८ उपदशा चक्रम्. मन्द-सू-सू-म-दुःसूति सूर मन्दशा लग्नात्तव चतिविद मंगल विद उपद मध्ये विदशामें उपदा शामें उपदशाशा चक्रन्। शाचक्रम्. स्तू मला यो मसूत शु..योल शु. श. चंयो. १ ४ ३ ૨૦૧૬ (३५/२१/२२/२९/४४|१४|१४|५६ ४६.५५/१६५७१६/४५/५४|४.५९१३.४२४१२४/३६८९/२६ इसी प्रकारसे उपदशासबकरना इहांथकाबढणके मयसेतीनहीं लिख्या. श्लोक जगदीशनरचितेकेशवी ग्रंथटिप्पणे।। दशाधिकारः पूर्णयिनन्दापार्यप्रकाशकः ॥ ८ . ૨ २ २ مم لهم ५ २२/२२.१२२ ३१/१०१० २१ ७-२१ दशाप्रवेशकाल मेंसावनाहरणसाधनः शाकोब्दाजनिमध्यमार्कमयुतंमासादिताग्दशा व्दाद्यतत्रशकेसफादितरणीमध्योदशाट अवेत घंस्त्रीभुतदशापृथकत्रिकहतारवाकोटहत्तयतो सास्यात्सायनिकादशाब्दपलयुक्तद्युग्जनियुव्रजः३५ अन्वयः- शाकोऽब्दाजनिशाकएवाब्दावत्सराकल्प्याजनिमध्यमा कितमुखमासादिजन्मकालिकमध्यमार्कस्यराश्यादिकंमासादिकल्य्यः जन्मशएवंप्रथमदशाप्रवेशोज्ञेया दितीयस्तुतेनवर्षादिनायुक्तंददशा: वायंकाठमशाब्दाशाकेषुयोज्याअथमासाद्येदशामामाचंयोज्यंएवं तत्रशकधस्तमासाद्युसमासादित रणिमध्यमादशादी भवेतुएवंनतीयादि दशादीमध्यमोरविज्ञेयः । तात्कालिकमासाद्यानयनंधस्त्री मृतदशेति दिनीनदयापृथरस्थाप्याएकनत्रयोदशमिण्यारवांकाए८९० निर्मक्तालव्धन दिशायेनपृथक्स्थायुक्ताकार्यातदासाचनादशास्या तुकदादशाब्दपलयुक्तातदातागजनिडुब्रजइतित्तयादशमायुक्.
( १९५) जिनिधुव्रजोजन्मकालिकाहर्गणःसावत्र-सूर्योदय कालिकोऽहर्गणत मध्यदियादिष्टेनघटीपलेनयुक्तस्तदासावयवः स्यादितिजावः ।।सए: वदशाऽहर्गणः पूर्वोक्तप्रकारणयुतोवर्पा दौद्दितीयादिशाप्रवेशका- लिकोऽहणोमवति । एवंतृतीयादिज्ञेया ।। ३ ।। मर्थभापा. जन्मकालीन शकको प्रथमदशादर्पयुक्त करना और जन्मकालि नमध्यमराश्यादि सूर्यको प्रथमदशाका मासादिराश्यादि मानकेयुक्त करनातोवहदशावर्षयुक्त किया तयाशक दिनीयदशारंपामध्यम ये होताहै. प्रथमदशादिवसादिकरके पृय के एक ठिकानउन सको१३ से गुणके ८९० से जागकेजो दिवसादिफल आवेगासोऔर दशावर्षतुल्यफूल पृयकुरवरवे व्यंकयुक्त करना तोचहप्रवासा वनदशाहाती है. अनंतेर वह जन्मकालीन सावयव अहर्गणमें। युक्त करा. तो द्वितीयदशारंजका अहर्गण होना है. शककोदशावर्षयुक्त करनेक कालमें सर्वदशा वर्षादिरखनाप्रथम दशाकेनीचेशकरखना औरशकके नीचजन्मकालीनमध्यमसी रखनाअनंतरसूर्यकोयमदशामासादियुक्तकरके वर्षशकनेयुच करना.. उदाहरणम्. प्रथमसूर्यदशावदिशा२७।१३।२८ इक्केनीचेजन्मका- लीनशक १८०८ यहवर्षममध्यमसूर्य्या ११।११।५६इस्कोप्रथमदन शामासादियुक्त करकै ८८।२५।२४ औरशकवर्पयुक्त करके१८२१ यहशकर्मेटाटा२५।२४ मध्यमसूर्य रहतेसूर्यदशापूर्ण होयके लग्न दशाप्रवेश भयी यहीरीतिसे सर्वदशाप्रवेशकरना और इसीप्रकार से विदशायीरउपदशाप्रवेश करना.अयवास्पष्टसूर्य और संवत् आयुक्तकरना. दशाप्रवेशचक्रः चं. यो. मं. . श यो WEGM १७ ५२ १८०८९८२१/१८२१८३७१८३९/१८५३१९८६२/१८७८१८८४ ४ H1 Case २७ ०७ २२.
.(१९६) ग्रहण करनेकी रीति प्रथमसूर्य्यदशाशेष।२७।१३।२८ यह दिवसादिकरके४९। ॥७।१३।२८यह पृथक् १३से गुणके ६३९२३१५५६४ इस्को८९. से भागके लब्धि दिवस ७१शेष ७३१५५१४ इस्को६०से गुणके४४ ०३५१४ इस्को८९० से भागके लब्धघटिका ४९शेष ४२५। इस्को ६० सेगुणके २५५०४ इस्को८९० से भागकै लब्धि पल २८ और दशावर्षतल्यपल १३युक्तकरके लब्धादिवसादि७११४९४१ यह पू. थक् रक्यो.जो दिवसादि दशा ४९१७।१३।२८ इस्मेंयुक्तकरके. ४९८९३।र यहप्रथम सावन दशा भईजन्मकालिक अहणजन्मा कालीन इष्ट परि सहित ११७८।३२१ यहसावयव महणि इस्को सावनदशा १९८९:२९युक्त करके ६१६७४३५६१० यहवुध दशा रिंश समयमें सावयव अहर्गण भया । परंतुजब यह अहर्गण- ४०१६सेज्यादात्यावेतब४०१६से भागके शेवर है सोअहणिजा- नना औरलब्धियावेसो पूर्व में आयाजोचक्र उस्मैयुक्त करना अब इहां अहर्गण ६१६७।३५१० यह १०१६ से अधिक है इसको१०१६ से पागकैलब्ध शेष२१५१।३५।१० यह अहर्गणभया पूर्वोक्तचक्र ३३ मैलब्ध युक्त करके:३४ चक्र भया. यहअहर्गणकाप्रयोजनमाह. तस्मात्सावयवांगुणात्स्वकरणात्साध्यादेशादौरयगाः क्षेपाजन्मरवगान्त्रकलायदिवासाध्यादेशासावनातु ।। तेस्पशातिथिश्वसंक्रमवसान्मासोदशांदोतनुः पूर्वो तंजडकर्मचातुमयातल्लाघवंदर्शितम् ॥३६॥ अन्वयः तस्मात्सावपवादहर्गणाइशादीस्व करणाज्जन्मकालेयस्मा करणाद्रहाः सामिनास्लेन करणेन दशा प्रवेश हर्गणागृहाः साध्याः यदिजन्मरवगान्क्षेपाप्रकल्पदशादौसानयवात्सायनाइहणात्साधि ताग्रहाजन्मकालजनितमहक्षेप्यास्तदाते शादौरवगासवतिएवंरुते सावनाद्दशासूतिअस्माददगादानीतोऽकः प्राजानेनदशाप्रवे | शमध्य सूर्येण समस्लदाहेर्गण- गुद्दोज्ञेयोनान्यथा ॥ ततोदशा दोसाधिनाचन्द्राभ्यिां पाताच्या विभोर्लया इत्यादिना तिथिः सार ध्या मंक्रमपशान्मासोज्ञेयः शुक्लादि मासेषु यास्मन्मासे मैप (१९७) संक्रांतिवितिसचैत्रोमासोज्ञेय इत्यादि रपमायोज्ञेयाः दशामा विशेलनमपिसाध्यंखेष्टे पूर्वैः पूर्वाचार्य श्रीधराद्यैः सावनीदशानयो नेजडकर्म महतायासेनकृत पित्यूर्य अतोमयालाघवं दर्शितम् . अर्थशाषा. पूर्व कथित सावयव अहर्गणसे जन्मकालमें जिसपक्षकेत्रह किया होय उसी पक्षसे दशारफनमें ग्रह करना अथवा सावन दशा तुल्य अहर्गणसेग्रहकरके उस्में जन्मकालीन ग्रहक्षेपक कल्पनाका रिना युक्त करना तो वह दशारंसमें ग्रह होते हैं अनंतर वह स्पष्टका रना और सूर्य चन्द्रसे तिथील्यावना यह केवल पांडित्य यह सांव नीकरण पूर्वाचार्यने महानु प्रयाससे किया इसवास्ते वहजड कर्म है हमने नो उस्का इहालाधवता कथन कियाहै. उदाहरणम. लग्नदशारंभमें १८२१ शकमै सावयव अहर्गण२१५१॥३५॥१० इस्सेजो मध्यम सूर्य्यावेतो पूर्व सिद्दशा प्रदेशमध्यमसूर्यदा २५.२४ इस्के बराबर होयतो यह महर्गणशुद्धहै अन्यथा पशु दग्रह समजनेके वास्ते पूर्वोक्त रीति प्रमाण सारणीपरसे मध्यम सूर्य करते हैं. अहण २१५१ इस्कोप से भागके लब्धि ३५ और शेष ५१ यह शेष कोटक इस्के नीचेका सारणीमेका अंक १।२०११५:५७ इस्को लब्ध्यंक ३५ इस्तेनीचेका राशी छोडके भागादिग्रंक २९।४६इससे प्रथमांकको ६ से भागकेचा - की ४ इस्का दना- यह राश्यक इसवास्तेदा२९४६। यहलब्धि कोष्ठक फेल और चक्र ३६ इस्के नीचेका तारणीमका अंक ११७१४८१४६ और घटी कोष्ठक ३५ और पल कोष्टक १० इ. स्के नीचेका अंक ०1०1३४१३० और १०० ११० ययुक्त करके २५६२३ यह मध्यम सूर्य पूर्व मध्यमसूर्यके बराबर है. अथवादशासावना हर्गण१९८९३९ इस्तै चक्रांक फले मिला येविना मध्यमसूर्य ७२७११३१२७ इस्कोजन्मकालीन मध्यमः चूंटर्से ११११११:५६ युक्त करके बाद।२५।२३ .यह वही मध्यम सूर्य प्राया यहीरीति से चन्द्रादि मध्यम करना. दगा सावना हर्गणसे मध्यमग्रह करनेवखत उरको सारणीमेके चकके नीचेके अंक युन्न करना नहीं कारण उस्को चक्र मंकत.
"" तजन्मकालीन ग्रहयुक्त करना होता है सूर्य मीन राशीकोहोयका जोसूर्यचन्द्रसे चैत्रमासांतकी नियी यावेतोशकमें एक युक्तकर नातो अहंर्गण बराबर आदेगा. दुशारं नसमये स्पष्ट सूर्यादिः इहांपूर्वकथित प्रमाणसारणी परसेदेशारंपादिवसमें प्रातः कालीन स्पेष्ट सूर्यदा।२७।२८ गति६१।१७ चन्द्रु॥१०१२गन ति ७३१।४३ इस्से पाई गततिथि०४ इसवास्तेधनका सूरहते पोषकृष्ण पक्ष या. अबदशारंभसमयलिखते हैं। संवत् १९५६शके १८२१ पोप रुष्ण पंचमी शुक्रवार १५ इहां हर्गण२१५१इसदिन सूर्योदयके अनंतर घटी३५ पल १०.इसस मियमें स्पष्टसूर्या८०२।०८ चन्द्र ११५३।२२ लग्न ३:२६:२२ ||११२ कहिये कर्क लग्नमें रविदशानिन्ति समाप्ति और लग्न दशामा दत्तिप्रारजाईयहीरीनिसेसर्वग्रहोंकी दशाअंतर्दशा विदशाउप दशाप्रन्ति समयमें स्पएसर्वग्रह औरलग्नकरके दशापतिसे फलका विचार करना. सूर्यचन्द्रसेतिधिकरणनक्षत्र औरयोगल्यावने काप्रकार स्पर चन्द्रमसे स्पष्ट रविकमकरघाकीरहै उस्का अंशकरके उस्को १२से भागके जो भागाकार यावे वह गततिथिजानना. योरजीअंशादिकबाकीरहेगावह तुक्त तिथिहोगीवह १२ अंश मिसेकमकरके जीवाकीरहैसो जान्य नियोजानना अनैतर मुक्त निधियोर पोग्यतिथि इनकी विकला करके उस्को क्रमसे ६ से गुणकजोगुणाकार आवैउरको कमसे रविचन्द्रस्पष्टगतीके अंतरके विकलासे सागुकै जो भागाकार घटिकादि आवैगा वही क्रमसे जुतनिधि और जोग्य तिथी इनकी घटी जानना. गतिचीजो होय उस्को रसै गुणके से भागदेनाओवाकीमान निलेनाइहदवकरणसे निधीक पूर्वार्ध में करण होते हैं उस्मैश्युक्त करेनी नियिके उनराधमकरणहोते हैं अनंतर तिघीकी सुन्तपो. ग्यकीघटीकायोगकरके उस्कोअर्धकरना.न्योरउस्मेंसे मुक्तधा टीकमझनाता करणफी घटिका होती है जो तिथीकीमुक्तपटि सुमार से घटिकाऊपर होचतो निधीको तुक्त सोग्य घरीमेंसे हक्त घटीकमकरनाता करणकी घटिकाहोती हे कृष्णपक्षकीचन तुर्दशीके उत्तरार्धमें शकुनीकरण और कृष्णपक्षकीयमावस्याको पूर्वाई में चतुष्पद करण और स्त्रार्धमेनागकरण औरशुद्धप्रति पदाको पूर्वार्ध में किस्नुनकरणयह स्थिरकरणहै.करणोके नाम:- बंद बालव २ कौलव नैनले गर५ वणिज नद्रा अय वाविष्टी अथवा कल्याणीनामहै. स्पट चन्द्रकी कलाकरके उस्कोटा सेतागकेजीतागाकारा विसोगतनवजानना.ओरजोबाकी कलादिरहेगावहगत नक्षत्र कागेका मुक्त नक्षत्र होना है. वहद सेकलामसेकमकरकेजोवान कीरहेगावहमोग्य नक्षत्रजाननायनंतर क्षुक्त नक्षत्र औरोग्यनना इनकी विकला करके उस्को मेक्रमसे गुणनाउस्को क्रमसेचन्द्रस्प- प्रगतीके विकलासेवागदेना जोक्रमसभागाकारयावसाघटिकादि यावेगीवहक्रमसेवक्तनक्षत्र और माग्यनक्षत्रइनकी घटिकाजानना ४स्पष्टसूर्यचन्द्रके योगकीकला करके उस्कोट..ने नागके जाप्तागाकार आवेसोगतयोगजानना श्रीरजोबांकीकलादिरहेगा सोशुक्तयोगजयासोट०० कलाम कमकरके जाबाकीरहेगा सोन लन योगकेयागेका भाग्ययोगजानना. व्यनंतर शुक्तयोग और फोन ग्य योग इनकी विकला करके उनकोकमलेगुणनाऔरजोन- क्रमसेगुणोकार यावेउस्कोसूर्यचन्द्रकेसरगतीके व्यंक विकलात. नागदेनाजोअनुक्रमसे नागाकारआवै वह पटिकादित्यावेगेवहक मसे मुक्तयोग और भाग्ययोगइनकी घटिकाजानना. उदाहरणम्. जन्मकालीन स्पपचन्द्र १५४२३१३५ इस्मैसेल्पपरपिता? 1१०1४२.कमकरके १२११५३ इन्क अंश२६२।१११५३इसमें अंशको१२से भाग गतिथिप १०।११।५३ यह त तिरि ७ शेषको १२ मेलेकमकरके ! योग्यनिधिसममीव शुक्तनिधीकी विकला२६७१३ इस्को सगुणक२२०२७० इ. स्किीचन्द्रगति ३११२३ रविननि५१४ इस्कानर६०३२९ इस्की विकला४०४०९ इस्से नाग ४ घी ३० पल हसन ममीकांचन घटिका नई.अनंनर नोग्य निरिकी विकला- ( २०० ) ६४८७ इस्कोसेगुणके ३८९२२० इस्को स्पष्ट रविचंद्रगति- के अंतरकी विकला ४०४०९ इस्सै भागके ९धदी ३८ पल यह सप्तमीकी भोग्य घटिका भई . गतिथि६ इस्कीर से गुणके १२ इस्कोसेशागके शेष५ इसवास्ते सप्तमीकै पूर्वाई में गरकरण और उत्तरार्धमें वणिजकस ण अवतिथिकी भुक्तघंटी ५४०३० और भोग्य घटी ९।३८ युक्त कर कि ६४।८ इस्में भुक्तघटी ५४।३० कमकरके ९।३८ यह गरकरण की घटिका भई चन्द्र ९।५।२२।३५ इस्कीकला १६५२२ विकला ३५ इस्को८०० सेक्षागके २० गत नक्षत्रवाकी५२२४३५ यह भुक्तनक्षत्र उत्तराषाढ वाकीकाअंकको०० से कलामेंसे कम करके शेष२७७।२५यहा भोग्य नक्षत्र उत्तराषाढ भया. अवमुक्त नक्षत्रकी विकला ३१३५९ इस्को सेगुणफे १८८१- २०० इस्को चन्द्रगति विकला ४३९०३ इस्से भागके ४२ घटी ५१ पलयह उत्तरापाढे नक्षत्रकी शुक्त घटिका भई अनंतर भोग्य नक्षत्र की विकला१६६४५ इस्को ६०से गुणके ९९८७०० इस्कोचन्द्रगति की विकला ४३९०३ से भागके २२ घटि४५ पल यह उत्तराषाढकी मोग्य घटिका भई. स्पएसूर्य।१३।१०।४२. चन्द्र ९५।२२।३५ इनकायोग१८॥ ३३६९७ इस्कीकला१७३१३११७ इस्कोर से भागकै २१ गतयोग बाकी५१३१७ साध्य भुक्तयोगशेष.०० सेमेंसे कमकरके २८६। ४३ यह साध्ययोग भोग्य अव धुक्त योगकी विकला ३०७९७ स्कोप से गुणके १८१७१२० इस्कोरविगनि५८१४ चन्द गति ०३१४३ इनकायोग७८९५७ इस्की विकला१७३९७ इस्से भागके ३८ घटिपर पलयहं साध्ययोगकी शुक्न घटिका भई. अनंतर भोग्य योगकी विकला१७२० इस्कोस गुणके २०३७८० इत्कोरविचन्द्रकीस्पष्टगतिकी विकला४७३९७इस्सेशान के सघदीपलयहसाध्ययोगकी सोग्य घटिकाभई इसप्रकार से निपिनक्षत्रयोगकरणकी भक्त योग्य घटी करना. इयंजन्मदिनमें लोग्यनियि नक्षत्र योगइनकी पटिका औरजन मकालीक मुक्त नक्षत्रयोग इनकी घटिफा युक्त करके जन्म समय ३२ घटिकाबराबर मिलते. ग्रहदशामें प्रति दिनकाचन्द्रफल: चन्द प्राप्तदशेश्वरस्यसुहृदुच्चस्वक्षसंस्थोदशाना- श्लोक- थाधीनवसप्तमोपचयगीदद्याच्छुभानीनिच।। य. स्मिन्क्षेत्रविधुःसजन्मनितनुस्वायाँदिलावोयदात- त्तदृद्धिकरोयतत्क्षयकरःप्रोक्तेतरस्यानगः।।३७ ।। अन्वयः प्राप्तदशेश्वरस्यसुहन्छेतदुच्चैनत्स्वांशेजवतिचन्द्रस्तदाचपुनर्दशेशासं चमनवमसप्तमतृतीयपष्टदशैकादशस्यानस्थचन्द्रोफावति । तदाच- न्दःशुभानिदद्यात् एवं शुप्नफलप्रदुश्चन्द्रोदशायांयस्मिन भावेवर्तते। सराशिजन्मकालेयस्मिन् जावेवर्ततेनन्दावं शुभं करोति यदिचन्द्र राशिस्तनुप्तावस्यान् तदाननुत्तौख्यकरः त्यादेवं धनादि भविपि या दिकयिततरस्थानगस्तदा क्षयकरोहानिकररस्यातू प्रोक्तं तरस्थान- स्यायमर्थः चन्द्रः प्राप्तदशेश्वरस्य सुहृदादि स्थानादि नरस्थानग: वैरिनीचादिस्थित इति. अर्थभाया. जिस ग्रहकी दशाहोयउस ग्रहके मित्र रहमें उच्च गृहमें वावग्रहों होकर दशापनिसे५९।७।३।६।१०१११ यहस्थोनमें चन्द्र होयतो शुभ फल देता हैं. सो ऐसी दशा में जिस राशीको चन्द्रहोय वह राशिजन्म कालमें तनुजाव हीयतो शरीर दहि कारक वह राशीधनभाव होय नधनरादिकारक व्यायजाव होचतोलाकारक और यादिशब्द से सहजभाव होयतोत्रातृसुख सुहन्द्राव होयतो मित्रसुरवसुत नाव होयगो पुत्रसुरव रिपुभाब होयतो वैरिनाशकारकजाया भाव होयतोस्त्रीसुख मृत्युत्तावहोयतो मृत्यु नाशकाक धर्मभाव होयतो घ. मिशाग्यकारक दशम भाव होयतो कर्म फल कारक व्ययभाव हीयत व्यय नाशकारक सहजादि भावांका भातृसुवादि फल कयन किया ह.तैसाहि पराक्रमादि सुरवीजानना इहां शुजन्नूचन कवित है. इसवास्ते परिमृत्युव्यह यह भावों के फल विपरीतंजानना पूर्वकविता स्थानते इनर स्थानमें कहि दशेश्वरके शत्रुग्रहमें किंवा नौचमेंच- न्द्र होयके दशापत्तीसेससा यद्न्यानमैं होयतो भाव क्षय फल कारक होनाहै. कहिये दशाम जिस राशिका ऐसाचन्द्र है.
(२०२)
बहराशिजन्मकालमेंतनुताव होयतो शरीरक्लेशकारक धनभाव
होयनोधन हानि कारक यह प्रमाण सहजादिभावफल योजना क-
रना इहा विपरीत शत्रुमित्र व्ययभाव होयती वनावशत्रु मृत्यु
व्यय कारक ही होता है.
दशाफलदशारिष्ट और दशारिष्टसंगः
यहव्यस्वचरस्वलावरहहग्योगादिसर्वफलंयो-
लोक-
ज्यंत्तिकतिर्वलादिहदायांचाययोपैरियुक्॥पापर
पापदर्शविशेसचविपत्कथितन्दंगदस्तकालेवल-
वानरवगः शुमसुदृष्टेष्टसहगः ।। ३८॥
त्र्यन्वयः
यस्वग्रहम्बयद्दव्यंनाभ्रस्थादित्यादि सावफलंराशिफलंदृष्टिफलं
योगफलंपादिशब्दातुंचनीचमूलात्रिकोण रतिकतिर्जीविका इति
सर्वतस्स ग्रहस्पदशायांबाच्यंवलादितिसबले- यथोक्तंपूर्ण फलं
भगतिमध्ये भध्यं दीनवले हीनं फलदः अयोयो ग्रहो वैरियुक्शत्रु
मुनिपपापग्रहः पापदायां विशतिंअर्थासापदशांयांपापस्यांतरे
माप्ते सपायोपिपत्कर्नाहानिकर्तास्यात् यदिकविग्रहोबलवान् शुभमिन
विणाहटे पवामित्रपडुर्गगोचाइष्टाधिकः सतन्दंगदास्यात् ॥३॥
पर्थभापा.
जिसग्रहकाजीनानादिदव्य और भाव फल राशिफल शत्रुनीच
मूल त्रिकोणाविजीविकाकर्म इत्यादि सबफल दशाम वह ग्रहदेता है व
कसदृश व्यधिक चली हीयती पूर्णफल मध्यममें मध्यफलहीन बलमें
न्यूनफलहोनाह.पापग्रहोंके दशामें शत्रुयुक्त पापग्रहका अंतरया-
वितो विपत्का भरण जानना. परंतु यदि उस समय कोई जनहब
मीयके देवता होपया भित्रबह देखता होयबा गुभामित्रों के यहा.
दियों मे रहने वाला ग्रहदेयता होय नोभंगकर्ता होता है.
यथाएकवर्गफलमाह.
पेटस्वरययदृष्टवर्गजफूलंपूर्णशुभंजन्मतन्विन्दो.
पृद्धिपुचवमोचसमुन्द्दन्देस्वत्रिकोणेडास्तियः ।।
मध्यफलंविपर्ययगतस्यानिटमप्युत्कट डाम्न
यत्पनरगस्यचपदासत्वावलंतत्वतः ॥३९॥
अन्वयः जन्मनितन्विन्होलानचन्द्राज्यामित्यर्थः डिपुउपत्रयस्थानेषु३६ ।१०१११ स्वभेस्वोर्चसुह रेखमूल त्रिकोणस्तियो ग्रहस्तस्वयदृष्टकवर्ग जफलं शुभंतपूर्ण उक्तस्थानान्दिनरहस्यः शत्रुनीचादिम्बस्नस्य शुभफलं मध्यम अथवा उपचय स्थानरहितः स्वोच्चादिस्यः तस्या शुभफलं मध्यमं दुष्टं एवमनुपचयस्यानप्रोग्रह शत्रुनाचादिगस्तस्या शुभ अप्युत्कटम शुभस्यादित्यादि मई ग्रहस्यषड़वर्गबलं ज्ञाः त्या तत्वतः फलंवदेन् यथा पूर्ण बल ग्रह पूर्ण शुभाशुभफलं मध्येमा ध्यंहीने हीन मित्यर्थः ॥ ३०॥ अर्थभापा. जोग्रहजन्मलग्न और जन्मके चन्द्रसे ३।६।१०।११ इसस्थानोंमेंही कर स्वगृहमें स्वोच्चमेवा स्वम्ल त्रिकोण में होताहै उस्का अष्टवर्गज फ ल शुभ जानना अशुभफल स्वत्य जानना और पूर्वस्थनसे भिन्न स्थानोमें अर्थात् ११२।६।५।७।८ १९१२. इनस्थानो मे होकर शत्रु सहमे वानीच राशीमें रहता है. उस्का अष्ट वर्गजफल अशुभ फल पूर्णजानना. और शुभफल स्वल्पजानना जन्मलग्नसे और जन्म राशीमे उपचय स्थानमें और शत्रुगृहमें वा नीच जो ग्रह रहताहै उस्का अष्टवर्गज गुजफलं मध्यम और अशुभ फल किंचिन्यूनजानना अधया इतर स्वानमें होयके स्वगृहीचादि स्थित रहते अशुभफल मध्यम लौर शुभफल किंचिन्न्यून जानना बह यह वर्गजकल ग्रहोंके पड़ा वल प्रमाण जानना ग्रहपूर्णवल होयनो यथोक फल न्यून वल होय नो न्यून फल और अस्तंगत होयतो फल नहीं ऐसाजानना. अथक्कचिज्जातकफलव्यभिचारे कर्तव्बना माह. "जीवत्कापिविसंगरिएजशिरिष्टविनान्त्रीयते चा. श्लोक द्योब्दाशिशुदुस्तरोपिचपरोकायुनावत्रिका का निभनिमित्त पूर्वशकुनैरक्षन्स्वमानंधिया होराई नसुमुदिनाहिवहुचोदयकालोबली ॥ ४०॥ ग्यन्वय कापिकचिल्यले पिज़मजोरिनरहित इत्यर्थः जीवैद्कापिरिएं
विनाम्रीयते इतिव्यभिचार चाद्योब्दः प्रयमोच्दा शिशोर्दुस्तरस्म
सवज्वरादि भवादित्यर्थः नयाऽपरौ द्वितीय तृतीयादी दुस्तरीदत्त
जनयावन् अतएषु त्रिषु वर्षेषु पत्रिकानो कार्यागादिकविंचा
रयित्वावर्षय मध्येपि पत्रिका कार्याकैः प्रमानिमित्त पूर्वशकुनैःप्र-
निमित्त पूर्वंलग्नैर्वलोपत्रुताद्यैस्तथाशकुनैः शुभशकुनै शुभवस्तु
यदिश्रुति दर्शनगंइत्यादिभिः शुशंज्ञात्वा पत्रिका कार्या ।
किंकुर्वन्स्वमान रक्षन् गणकनेत्यध्याहारः किं विशष्टेनहोरा विज्ञेन
पुनःसुबुदिनाहि यस्मात् उदर्को पावोकालोवलीस्यात्
भाषाअर्थ.
कभीकभी अरिष्ट भंगरहते विनावालकजीताहै और कप्तीका
जी अरिष्ट योगनरहते भीमरण पावताहै ऐसाजातंक फलव्यनि-
चारदेखते हैं. साहि प्रथमवर्षबालकको दुस्तर हैं और आगेकादीन
वर्ष यहवालकका दुस्तरहै. इसवास्ते ३वर्षतक पत्रिकाकरनानहीं
कारण भावीफल बहुन प्रकारकाहै और कालपी दुर्विज्ञेय है.बु.
दिवान गणकने तात्कालिक लग्नबलोपश्रुत्यादि शकुन से शुभफल
जानके धुद्धिके योगते अपनी प्रतिष्ठारवके सर्वदा यहतीन वर्षमें
लिपोर पागेभीजन्म पत्रिका करना.
ग्रंथोपसंहारः
नंदिग्रामकेशवोविनवर्यो योमूहोराशास्त्रसंधं.
श्लोक-विलोक्य ।। तेनोक्तेयपद्धतिर्जातकीया चत्वारिं
शदृत्तवडासुबोधा ॥४१॥
अन्वय.
पाकेशयो विमवर्योनंदिग्रामआसीत् तेनहोराशास्त्रसंघविलोक्या
होगाएव शास्त्रहोराशास्त्रहोराशास्त्रसमूह विलोक्यजातकीयापनि
रिक्ताकि विशिष्टाचत्वारिंशन्तवहा पुनः कथंभूतासुबोधा।।११॥
अर्थभाषा.
दक्षिणदेग प्रसिद्ध नंदिनाममें केशवयह नामकरके ब्राह्मण श्रे.
दरहता रहाउसने जानकशास्त्र समूह दरपकर उसमें सदुक्त असदुक्त
श्रांत्युक्त बहुमत अल्पमत क्याहै इस्का विचार करके चालीस श्लोककी
सुगम ऐसी यह जातक पद्दति रचना किया. ॥४१॥
ग्रंथप्रशंसामाह श्लोक येसुबोधांपठंतीमामय्यांजातकपद्दतिम् ॥ होरावित्पदवीयांतिलोकेमानंयशश्चते॥४२॥ अन्वय युगणका इमांसुवोधांजातक पद्धति पनि किंभूतामय्यांतेलोके होरावित्पदवीं यांतिमानंयशश्चलते ।।१२।। अर्थभाषा. जोज्योतिषी इसजातक पद्दतीको अध्ययन करेंगेवहलोकमें दैव- ज्ञपदवी और गौरव कीर्ति यशको प्राप्त होवेंगे ॥४२॥ इति ।। इतिकेशवीजातकसमाप्तं. चरसारणी प्रवेश पला. मंद स्पष्ट सूर्यको अयनांशयुक्तं करके उन्का भुजकरके शु. जकाभागकरनाइहांसारणी में ३० अंशक अंतरते ३ ठिकाणे९० अंशकोप्तक लिखके वह कोष्ठकके नीचे प्रत्येक अंशका फल विकलादि लियाहै. उस्मेंसे प्राप्तीष्ट अंशहोय उस्के नीचेका फल लेके इशांशके नीचेजोकला विकलाहीय उस्को अंश कोटकके सा मने दहने तरफजो गुणलिवाहे उस्से गुणके जो गुणाकार यावे उस्को गुणके नीचजोहरलिरवाह उस्से भागके जो फल प्रतिकला लक आये वहलेके पूर्व फलंमें युक्त करना तो होता है. वह चर सायन तूर्य नेपादिदै राशिको होमतो ऋण औरेनुलोदिशा- शिको होयतो धन,जानना.
" " ० ra २ ३ (२०६ चरसंस्कारसारणी. 1४५/६/७/९/१०/११/१२/१३/१४ ए०१० ७/९१११४१६/१०/२१/२३/२५/२०3०1३२) २०१४०० २०४० २०४० १५/१६/१७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९/३०/०१० |३५/३०३९४२४४४६/४९/५१/५३५५/५८६०/६२/६५/५७७० २०४०/०२०१४०.२०१४० (२०१४० २०४०० . . . . हर १५ (३१ ३२/३३३४३५/३६/३७३८/३९४०४११४२/४३/४४५ रण२८ ७२/७३/७५/७००९/८१८३८४६०९२/९४९६९८ Re૪ર.ર૮ર૦ર/ક ૦િ ૨૨૨૪૨૮ી દ ४६/४७/४०४९/५०/५१५२५३/५४५५/५६५७/५०५९/६० गुण ९९/२०११०३/१०५१०७१०९/१११।१२/१९४११६/११८१२०/१२२.१२४१२६ हर१५ ५२४४/२६/२८/२०१२०४५६४८४०३२।१६८ १६१/६२/६३ ६४/६५/६६/६७/६८/६९/७०/७१/०२/७३७४१०५ शुण२१ ११२६ १२७/१२८१२१/१२९/१३०/१३११३२१३५१२३१३४१३५१५५/२६/१३७ हर ३० (૭-૦૮૦૨૮૩૪૮૮ ૮ ૨૦ ૪૨૨ २८२३९१३२/१४०१४११४२१४२१४३१४४४१४४Enropse/१४९) उदाहरण. जन्मकालिक मन्दस्पष्ट रवि०१३।१२।३ इसे कायनांशा२२॥४४ यह युक्तंकरके ११५१५६१६ यह सावन रवि इस्का भुज ११५१५६०६ इक अंश ३५:५६१६ इहां ३५ अंश हैं इसयास्ने ३५ अंशकोष्ठक का नीचेका विकझादिफल ७१५२० इस्को अंशके नीचे कला५६ औ र विकला है इस्को अंशकाष्ठकके सामने गुण है,इस्से गु- णक १५७०१४ इस्को गुणके नीचे हर १५ इस्से भागेके १४ प्रतिकलायुक्त करके १६४ यह सायन सूर्य्य एष राशिको है इस बाम्ने क्रम जानना.
RE ४५ (२०७ बहुविध देशोंकीअक्षना. नगरनामनगरनामनगरनाम घननगरनामापी जिलाई नाशिक २] अमदावाद कोल्हापूर २२० जवनपुर नागपुर यमदनगर/५/ काराग्राम जंतर (नागौर अजमेद ५४५ कोकण जलालाबाद ५० नारनवल ६० अयोध्या ६७रुणगढ ६० जालंधर ६/५/नेपाल अमरकोट बंधाई ४जुनागढ ५ शनिमिषार ५५ अपसटीला ६५रवाधार सुनेर पटियाला अवरंगाबाद ४ खमार जोधपुर ५पंढरपुर अयपाटण गंगासागर झांसी 1५४ प्रयाग अजमेर २६ गडा १६/६/कारी मकासा अनिवंग ५९/गरार ६/टोका ५२प्रकाण यमृतसर २४ गहीरा यामा ६/७/गया ५ उगनपुर पावा आजमगड १२ गणशुक्ल ६४तजावरु २पाडव इंदोर ५ गाजीपुर नरेला ६.पुणे इटावा धाग्याल्हेर ग्वाल्हेर ताजपुर पुरुषोत्तम उज्जनी ५उपरापुर 1५दिलंग. ४ पुष्कर उचवानगद ५/१०/गुजरात दरभंगा पिटण 18 ५गोमानक २२७दारमल बडोदा गोपाल दामनपुर वलसाड उमरावती गोलकुंडा हारका वरदान यौनकमंदु गोलग्राम दिल्ली ६४बहाणपुर ३० ओछडा गोरखपुर ६देवगढ वा ब्रह्मपुरी गोकुल ५५देवग्राम ४०वजवाडा कलकत्ता धनदेवी दिलितावादावागपुर कपिला ६६/देली ५० धवलपुर ५.नाणगंगा विचाटसुपुरधालक ५/विनिया कामिक्षेत्र निनोड धामोनिगद ५-विजापुर २ पानिपत ४४० . ४५ कटक ४५२ 1७३० ४३९/ कानपुर चित्रकूट. नवसरी पिकानेर ६// काश्मिर ७४ उपरा नगरकोट बाबूदीकोटा बार काविल ८० जयपूर ६/४ नडीबाद ५/२/भरिपुर कांची २. जंबू ७० नरवर ५५भरनपुर ६.१९/ कान्यकुञ्ज ६ जबलपुर ५ नयनीनाला भृगुक्षेत्र कुरुक्षेत्र ६६जगन्नाय ५० नर्मदा भोजपुर भागलपुर ५३० म्हैसूर २२६/वधव मगर ५७/सिंहज मकसूदावादा भूपाल ५३०/बलप सिंधपुर मिंडी ७२ लागिरी ३१ वटीपुर सिंहनद २ रनथम ५० वटेश्वर सुरत मगधदेश ६९ रनद ६/६/वढाल सोलापुर २९ मथुरा रामेश्वर १ विजयनगर सोमनाथ ५३९ |महल ६६ रामनगर ५. बेलगांव ३२५/सोनपय ६४ माडा ४५.राजो ६२७/संगमनेर ૪/ર૦ माडजाचल राजापिल ४४४/शारंगपुर ४ ४६संभल मालपुर ५५राजपुर ५/३० स्यामगढ संगरपुर मांडवा ५१ रायपुर ४३९ शिरीज हस्तिनापुर ६३० मालवा ३.राजमहाल ५२५ शीतपुर माडीगढ रीवा |५|श्रीनगर मिथिल ४(खुसा १०३ दावादसिंधारा मिरज ३२७/रोदिन ६ मपाई ७१५/हैद्राबादनिना। ३४३१ मिरजापुर ५ राहिदाश समसाबाद का चिलायत मुंबई दारूरचनऊ ५४ससहरूलाद ५१७/श्रीरंगपट्टण २३९) मुलनान लदगपुर ५सातारा ३/५१ सेतबंघराम मुंगेरी ५ लत्यवती ५सागर ५/१८ हस्ती मुरेर ३० लक्ष्मनवास | "सावंतवाडी ३ पटण मरता लाहोर | सिरी ८.१८ . विराउ ६४६हरदा ६/- रेवा (१५/६ २६ १५ 1ि (२०९ लग्नसारणी प्रवेशपयनांशाः १२ सारणीमें दहनेतरफमेषादिनीननक१२ राशिलिरवी हैं औरअर कतरफ ३० अंशकोठक लिवाहै उस्मेंसेतत्काल स्पटसूर्यजिसरा शीको होयवहाराशीक सामनेसूर्यके इटांशकोष्ठकके नीचेअंक कला दिफल लेके उस्को इष्टद्यटिपले युक्त करनावह युक्त करनेकेऽनंतर घटीसेज्यादाहोयतो कमकरना.अनंतरजीघटीपलवाकीरहै। वह कलाविकला या अनंदरनम्मित कला विकला सारणीमें जिस शकोष्ठकके नीचे होंगे वह अंश और वह कला विकलाके दहनेतरफ 0 o . 6 काSA NE ar E:58 Monal Met MGINNI GAir . 40 Dm FDM 1909 40 - KTI FA ब्यावर MINSE . २.१३ ८० JD MC D ना श RIA Gram MIC न R . also २०३ M लग्नसारणी चक्र. |Mान्य वाजा १२ake 1१५/१६ब G १९ Clms ट ० . M WI 00 त dio 46 aler FAGAR KAबाद बनाना #444 (२१०) जोराशिहोयसोलग्नकाराशीजानना यहस्थूलमान है परंतु स्वर स्वदेशीय देशांतर रेवाधन ऋणादि दरवके सारणीसे लग्न करनाः उदाहरण:- तात्कालिक सूर्य्य।११।११।५६ इहांसूर्यमेपराशीको है. इसवास्ते मेषराशीके ?? अंशकोष्ठककाफल १३इस्कीइष्टघटी३२५-१ युक्तकरके३६४ इहांश्वाकला विकलायहतुलराशीके १० अंशकोष्ठक केनीचेलिरवाहै इसवास्नेलग्न६।१०।३६।१यहस्यूलमानकालग्नजानना. दशम भावसारणी प्रवेश. केशवीमेंकथितप्रमाणनतसाधन करके सारणीमेंवाये तरफ मेषादि K MS م س ه ه ه इहा JASTE U ५ s Palands W IFE& IRGAR हा दबाव . क . . . MIR DISEनाशाहबाज ब . Aal ह D . जान्न 018 दशम भावसारणीचक्र. هو في al S NIM हाम . स RE . १RE ५८०२१८ २७रसा२१२० शशशशशशा३ R बाय १२ राहीस मीननक १२ राशिलिखी है. औरऊपरके तरफ ३० अंशकोष्ठक लिवेहै उस्मेसे स्पष्ट सूर्य जिस राशिको होयवहंराशीके सामने सूर्य कि-इष्टांशकोषकके नीचेका कलादि फलले उस्को नतंघटी और पला पश्चिमहीयत्ती युक्त करना औरवहघटी ६० से.अधिक होयतो उस्में से कमेकरना औरमत घटी और पलपूर्व होयतो लियाजो अंश फल उस्मसे कमतीकरना और वह अंशफलसे अधिक होयतो अंश फलके कलामें ६० युक्त युक्तकरक उस्में पूर्वनतधीपलें कमती करना अनंतरजो घटी पल वाकीरहै वह कला और विकलाई अनंतर सन्मित्तकला विकलासारणीमें जिसअंशकोष्ठकके नीचे हो यवहअंशयोरकला विकलाके वाये नरफजोराशी होयवहदशम पावकीराशीजानना. यहसर्व देशोंका मध्यम मानहै. उदाहरणम् जन्मकालिकस्पष्टरवि०।१३।११४२ यहसूर्य मेषराशीको हैं इस वास्ते मेपराशिके १३ अंशकोष्ठककाफल २८ इस्में जन्मकालिकप चिमनन घटी १५ पल ४. युक्त करके २१॥ इहां कलाविकला२११३ यह कर्क राशीके १२ अंशके नीचे लिखा है. इसबारतेन्दशर्मयह २२१२।२१।८ पया इस्मैं ६ राशीयुक्त करीनो ९४२२१२१।८ यह चतुर्थ भाव भया.. अष्टोत्तरीमहादशा. आसे प्रारंभ करके मृगशिरनक २८ नक्षत्र और सूर्य चन्द्र मोम-बुध-शनि गुरु राहु शुक्र यह ग्रहोंकाकोष्ठक पृथक पृथक किया है उस्में महादशाकी वर्षसंख्या पापग्रह नक्षत्र और शु. भग्रह नक्षत्र जानना दशाकी वर्ष तख्या नक्षत्रों के विभागसेसार यह सूर्य नक्षत्रकों६ वर्ष इसवास्ते नक्षत्रको १वर्ष महिना यह प्रकारका जानना. औरजन्मकालिक जोदशा सो प्रथम मान- के जन्म नक्षत्रकी जन्मकालतकयुक्त घटिकाजो होय उस्को नक्षत्र के वर्षसे गुणके गुणाकारको जन्म नक्षत्रका भुक्तभोग्य युक्त करके सर्व घटीसे भागके जो भागाकार यावे सोवर्ष और शेष रहै सो १२सेगु णिके पूर्वववदागके भागाकार आवेसोमास और शेष रहै सो३ सेगुण के पूर्वप्रेमाणभागके भागाकार आयेसो दिवस और शेपरहै सो से गुणके पूर्ववत् भागके भागाकार आवेसो घटीजानना. अनं:
(२१२) नरमायाजो वर्षादि भुक्तफाल औरजन्म नक्षत्रके पूर्वके दशापती किगत नक्षत्र होयतो उस्काभी भुक्तकाल दशापनिके दशावर्षसे कमकरके शेषरहे सोवर्षादि भोग्यदशा है ऐसा जानना. अंतर्दशाबनावने काक्रमा जिस गृहके दशान्पन्य यंहकी अंतर्दशा करना है तोवहपरस्पर रोकादशावर्षीके गुणाकारको ९ से भागके जोभागाकार आवेसो नास जानना और शेष रहै उस्को पूर्वलिरवे प्रमाण उत्तरोत्तरगुणा के से भागदेवादिन धटीका आवती है. यह रीतिसे महादशा मेंकी अंतर्दशाजानना. और १० का भाग विंशोत्त रीिका लेना. अष्टोत्तरी महादशा चक्र. स्वयकी महादशा वर्ष ६ चन्द्रकी नहादशा वर्ष १५ अंतर्दशा. पा-पुनर्वसु लांतर्दशा मघा-पूर्वाफालगु पुष्य-मान्लेषा नी उत्तरा फाल्गुनी मन मयुश-रशु/योग मंबुश-र-रा-शुसूयो. . . १ . १ o . २ . १ स.. २१२ १ ७८११/१०० १०/१०/२.२० . १०/१०/२०२० . . ० . a 0 . ० . . b . भीमकी महादशा पर्प सुधकी महादशा वर्ष १७ संतर्दशा-हम्त-चित्रा-सा अंदर्दशा अनुरापा ज्येराः नि पिशारवा मूल युगाचा पोशारा-शुचियो. . ७३ ० २२६१.२०१० ० ११/१०१२.११४२ ३.०६२/२.० ५५०० 20 . ० .
शनिकी महादशावर्ष१०. रुकीमहादशा वर्ष १८ अंतर्दशा पूर्वीपादां- उत्तरापाअंतर्दशा घनिष्टा-शनंतारका ढा अधिजिन्- श्रवण. पूर्वानाद्रपदाः शरा-सूचना सुयोर राशसूचं मंबु शायो ११०२/२/३/१/२ ०१ २११९ ० 0 O ३/३/१०/१०/२०/२०/२६.२६/० २०२० ०४०४०० १०/१०/२०२०/२६/२६३ २० ४०४०/२० . . . राहुकीमहादशा वर्ष १२ अंतन शुक्रकी महादशा वर्ष २१ दिशा- उत्तराजाद्रपदा रेवती- अंतर्दशा कृत्तिका-रोहिणी अश्विनी-भरणी मृगशीर. रा.सूचिम-बु. शरयो शुसू नामाबुनशाबराया। १ . ४ ८ C २/१२४/२/१1३।१३ १०1१०१ १ १/२/११/६/३/११/८४ २०३०१०१० २०३०१०१० . . . . . . . . १ ० . 0 . ० १ . ० . . 0 o . . इतिअष्टोत्तरीदशांऽतर्दशाचक्र. । विशेत्तरीमहादशाकरण- जन्मनक्षत्र जो होयउरकी संख्यामेरकमकरके एसेमाग लेना शेष१२:३१४१५/६७1८० तकरहेगा नय क्रमसे सूर्य-चंद सोम-राह-गुरु-शनि-बुध-केतु-शुक-पड़ दशापतिजानना और उनकी ऊमसे ६-२०१७-१८१६-१९-१७.७.३० यह शाकीदन पसंख्या जानना जन्मनक्षत्रकी जन्म कालनक जो मुक्त परी हो. य उस्को न्योत्तरीमे कथित रीतिसे दशापनिक वर्ष संयासेगुन पक और नसूत्रका भुक्त भोग्य युक्त करके सर्व परीसे भागके नागाकार वर्षमासादिन घटिपल पायेगासो दशायतीके वपतस्या मसेकमकरके शेपरहैतोपर्णदिसंख्या नौग्य है. ऐनाजानना इस्में अंतर्दशदनाननेका प्रकार व्यष्टोत्तरीमे कहाने सोजानना.
(२१४ )
कात्तिकासेपारणीतंक २७ नक्षत्र और दशा अंतर्दशा और प्रत्यंत
दशाके अधिपति के नाम और उनकीवर्षादि संख्या इनके जुदे जुड़े
कोष्ठक आगेलिरखे हैं.
उदाहरणम्.
जन्मनक्षत्रइहांउत्तराषाढहै इस्की संख्या २१ इस्मेंरकमकरके
शेष१९ इस्मेंसे भागके शेष? इसवास्तेसूर्य्यकी दशापाई अब
विषिाढ नक्षत्रकी घटी ४७।३६ इस्को ६० मेकम करके १२।२४ यह
इस्में इष्टघटी ३२ पलयुक्तकरके ४४४३५ यह मुक्त घटीई और
गला नक्षत्र उत्तराषाढ नक्षत्रकी घटीपल ५३१३३ इस्में १२।२४
यह युक्तकरके ६.५७ यह शोग्य भया. अब तुक्त औरोग्य.
की पल क्रमसे २५६५ १२९५७ भुक्त पलको सूर्यकावर्ष ६ इस्से
गुणके १५९९० इस्में भोग्यकी पॅलसे भागके ल ४ वर्ष शेष १६२
इस्को १२ से गुणके १९४१ यह इस्में सोग्यकी पलसे मागकेल.
मास शेप१९४४ इस्को ३० से गुणके ५८३२० यह इस्में हो
ग्यकी पलो भागके ल-दिन १४ शेष-२८२१. इस्कोसेगुणके
१७५३२० इस्में जोग्य पलसे नागके ल. घटी ४४ शेष १२१२ इ.
स्को ६ से गुणके ७२७२० इस्में भोग्य पलसे भागके लपल१८
एवं वर्षादि रविदशा ४०१४।४४।१८ भुक्त भई अब इस्को
सूर्यकावर्षद मेकम किया तो १।११।१५।१५:४२ यह प्रोग्यदशा
नई इसीप्रकारसे दशा विंशोत्तरी करना.
टिप्पण.
जिस दिनजन्म होय उसदिन अथवा वर्ष प्रवेश होयउस दिन
नजो नक्षत्रकी घटीपल अभीष्ट घटी पलसेकमती होयतो
उती नक्षत्रकी धटीपलको ६०में कम करके दोजधेररवनाएक
स्थान में इस घरि पलयुक्त करना तो मुक्त घटी होजाय दूसरी
लघा व्यगला नक्षत्रकी घरीपलयुक्त करेतो भोग्य होता
।
दशाकाउदाहरणम्. प्रथमरविदशावर्षादि प्रोग्य श११।१५।१५६४२ इस्के नीचेजन्म कालीनसंवत्र १९४३ यह वर्षमें स्पष्टसूर्य १३।१०।१२ इस्को प्रयन म दशा मासादियुक्त करके ११।२८।२६।२४ और संवत्ने वर्ष युक्त करके १९५४ यह संवत ११।२८।२६।२४ यह स्पष्ट सूर्य रहने रवि- दशा पूर्ण होयके चन्द्र दशा प्रवेश भई.यही रीनिसे सबदशा प्रदे शकरना तथा अंतर्दशा प्रत्यंतर्दशा करना. विंशोत्तरी दशा चक्रम्. सू। चमारा बाश बु. के शुभग्र १६११९ १७ १ ७ २० व . ० . . . . ० . . . क . . . . ० . ८ . ૨૨. १४/१२/१९ २० २० २० २० १४ ३१ ० ११ २८ २८ ૨૮ ૨. २८ २८ ૬ ! ! % ૨૪ २१ २९ ११।११ |रा २२ २८/२८ अं. २६ २६/२६ २४ कि. १ २६ २४ टिप्पण. अथवा जन्मके दिनवावर्ष प्रवेशके दिनजो नक्षत्र घटीपल इष्टसे अधिक होयवो पिछला नक्षत्रकोप में कमकरके दोस्थान- में रखकर एक जर्षे इष्ट युक्त करनाती सुक्त घटिका होनी हैं. दूसरी जपें जन्मकावा वर्ष प्रवेशके दिनका नक्षत्रकी चटीपला युक्त करनाती भोग्य होना है।
'( २१६.), सूर्यमध्येअंतर्दशाचक्रम्. सूर्यमध्येसूर्य्यतन्मध्येदशाच- तूच मराशबु के शुसू. च म राबश-बुक शु. . ० 9 0 १ . . . 0 . ० ० . . १८ २४.१८१२६ . . १६.१६/१४/१७/१५ २४ १८१२/२४६१८ ० . . : 4.. . ० . ० o रविमध्येचन्द्रतन्मध्ये विदशाचारविमध्ये भौमतन्मध्येविदशाचर्क चं.मरा शबु के असूम राशबुन का शुसून चं. . . ० क ० ० ० . . . . . ० . . 0 . . . ० ० . C . 0 . . ० ० ० ० . . . ० 0 ० ० . क . . . ० . . १५/१०/२७/२४२८२५/१० ७१८१६/१९१७/७१२१६ ३०३०३० २१४५४४५७/५१ १८ रविमध्ये राहुतन्मध्यचिदशाचारविमध्ये गुरुनन्मध्यविदशाचक्र राश बु. के शुसूचि. मर-शबु का सूचनमा रा. ० १ १ १ १५/१८२४/१६/२७/१०/१५/१०१६/१०/१४२४१६ १२/० કાર|કી કરી છે २४ . रविमध्येशनितन्मध्यविदशाचर्क: रविमध्येवुधतन्मध्ये विदशा चक्रं. श .. कोशुस - म रा-र-के गुसूचिमारानश. 0 . . . a १ १ २८१३ ० . . . . ० ० . . . . १ . १ २४१८१२७/१७/२०१८२१ २७५० ६३०५७१० . કિજી૯૮૨૭ . . . रविमध्येकेतुनामध्यविदशाचक्र रविमध्येप्शगुनन्नध्यचिदशाचक्रं. के शुसाचं मराश बुना शुरूनच मगाशबुन के. ० ० ० . . . . . . ० . . . . . . o . १ १.७१८१५१९१ 7 १ १०.२१/२४/१०/२७/२१/२१ २१ . . . O . . . . . .
(२९७ ) चन्द्रमध्येअंतर्दशाचक्रम् चन्दमध्ये चन्द्रस्तन्मध्येदशाचक्र चं. मं राश. बु. के असूम. रा.शबु कसू. . १ 2 . . ० . . १६ . १ . orb० ० ० ० o . c (२५/१०/१०/१०१७/१२१७ ३० ३०/३०३० .... ० ०:०० ० O . . . 0 . ० o 9 . . क . ० चन्द्रमध्ये भौमस्तन्मध्येविच चन्द्रमध्येराहस्तन्मध्ये विदशाच म.रा.श.बु.के. शुसूच रा. ब.श.बु. केनशुसूच मं. 0 ० . ० ० ० . ० ट . . . २ १ २१२१ १२ १२८३/९/१२/५१०१७॥२१/२२.२५/१६१ ० २७ ore... . . ० 0 ० . o ० 0 ० . चन्द्रमध्ये गुरुस्तन्मध्यविन्चल चन्द्रमध्ये निस्तन्मध्यविच शबुकशुसूच मराश बु. के. शुसूनच म.रा. . . . . . C . . ० . ONW०० . २. १ २.१ २२०२४/१०/२०१८ ०२० १५४५/१५ ००० • 20 | mr.. २८ ३०/३०/१५ | Nrs. ० ० . o . चन्द्रमध्येबुधस्तन्मध्ये विच०चन्द्रमध्येकेतुस्तन्मध्येविदशाचः बुकशुसूच सनराशाकशुसूचिं. म.रा. श. . ० ० . 6 . ८ . . . . २ २. १ २ १ १ १२/२.९/२५/२५१२२९/१६/-२०१२/५०१०१७/१२ १५१५/०३.३०/१५३० २८ १ २९ १५४५ . o . . . . . a . . . चन्द्रमध्येगुस्तन्मध्ये विचःचन्द्रमध्येतर्यस्तन्म- विचक्र. चामंरा-श/के. सू च. मं. रा.शबुकशु . . . ० . . . .05 मा ० ० . . . . 1.1.00 २.५ . 00000 १५/१०२७२४२८२५/१० ३०.०० . . . 4.. . . . . . . .
सौममध्ये अंतर्दशा चक्रं. भोममध्येमीमन्मध्येदशाचक्र. मंसशक. शुसूचिमा रा.शबु. के शु.सू. . . ० . . १ १ ० . . . . १९४२ 28/१६६/२७/२७० ६०१२२/१२/२३/२०१८२४७१२ ०३४/३३६/१६/१८३४/३०/२१/९५ . क . क . . . o ० o भीममध्येसहस्तन्मध्यविदशावक सोममध्ये गुरुस्तन्मध्ये वि० चक्र राश-बुकशुमचं-भर श. खुन के शु-सूचना म. रा. a . . . . . . . १ २०२२ ४२/२७५९ . oDNNE . ११११ ०१ १/२२१४२३१७/१९२६/१६/२०१९/२० કરી २६५३६०० ३६२४ O नीममध्येशनिस्तमध्ये विदशाच भीममध्येबुधस्तन्मध्ये वि. चक्र शबुकशुसू. चामरा-बाबु. केशुसूच मारा.श. ० o . . . . a ० . क . १ २. २२६/२९/४१९/३/२३/२९/२३२०/२०२९/१७/२२/२०/२३/१०/२६ ० ४/३० ३० ३० ० o २० सोममध्येकेतुस्तन्मध्ये दिलचसोममध्ये गुस्तन्मध्ये विच कशुसूचिमरानशशु सूचना म. रा.शा. के. 10 °°FR.. . . . . ० ० . . . . . ०४७/१२/२२/१२/२३/२० |२.३०२९/१५/३४ २० ३०/३० .... २११५२४ . Harya ४.० ० ० सोममध्येरवितमध्ये विच. भीममध्येचन्द्रस्तन्मध्ये विचः सुमारारश.बु.के शु. म.रा.शबुकशुसू. . . . . . .. ० ० ० ० . . . . 4 ० . . . . . १६/१७/७/२११७१२|१|२०२२९/१२ ५०२१ ३.९५२. १५.९५१५. ० .
( २१९ ) राहुमध्ये राहुमध्येराहुस्तन्मध्ये विदशाच रारदा वु. के शु. चं.मरार-शबु के शु.सू./मं. अंतर्दशा चक्रम् ० . ० . ० ૨ २ २२.१३ १ . १०/६० १ १२२१६१८१८०२४/० १८२५ १७/२.६१२/१२१२६ ४०३६/५४४२/४२० . ० ० e . ० . ० राहुमध्येगुरुत्तन्मध्ये विदशाच राहुमध्येशनिस्तन्मध्ये विदशाच के शुसून मराशबुकेशु सच म. रा. रिश- बुन . . . . 6 ३६ ११/२१/३ ५.g २५/१६/२२०/२४१३/१२/२०१२२५/२८/२१/२१/२५२२/३१६६ (१२/१८२४/२४ (१२/०२४/३६/२७२१५१ ०९३०/२/५४४० ० 0 . . 0 0 . . ० . O ० . . हुमध्येबुधस्तन्मध्येविदा चा राहुमध्येकेत्तुस्तन्मध्ये विदशाच. सूचनमारा-शका शुभ चामा राहश बु. काश . 0 0 ० . 0 ० O . 2500k BAR ४ १५१३१७/२२१२२ ५४३०३२४२ १ २२/२६/२०/२४२३ ५४/३०/३/१२/२८/५९/२३ وولد مع و . . a ० ७ . ० राहुमध्ये गुस्तन्मध्यवि. चकारामध्यरस्तिन्मध्यविशाचा राशकाच/मारास १ किसु. ० . . 0 . ० . . . २५४ ५२ १ १ १ २१२२०/२१/३/३/१६/२७/१०/१८/१३/२१/१५/१०/२५ १२. ५४/२६/१२/१९१५४५४ 0 . . . . . a ० राहमध्येचन्द्रस्तनमध्यविशाच-रामध्यतीमस्तन्मध्ये विदशान्य मरारकादमराश कान्त्रिाचं. . 0 . . . 0 ० .. . . २.२२ १५१२१/१२/२५ ६०० १ १ १ २७१२/२६२०२९ ३४२२४५१३३ . .... २० . . . .
( २२० । गुरुमध्ये अंतर्दशा चकम्. गुरुमध्येगुरुस्तन्गध्ये विचक्र .श बुकशुसूतच मराश बु. के शु.सूचनमा रा. २२ १ ५३११८९४|११|४ १८१२६ ० १०० ५२.४/१२/१/१०/१४/ ४२४/२५ २४/३६/४० ०२४ ४०१२ . . 6 . . क . ० ००१ ००० ० ० . . क . . . ० 0 गुरुमध्येशनिस्तन्मध्ये विद-च. | गुरुमध्येबुधस्तन्मध्ये विद-च० शबुकेशुसू चमरा बुकशुतूच म. रा.श . . . ० . 0 . . १ २.४ . १ २ १।४।४ ३१ २१५/१३/२३/१६१२७१७१६९० १२ २६/१६/१६/० ११/२१० ૨૮ર૪ ૨ . ० . . ० ० ० . ० 0 गुरुमध्ये केतुस्तन्मध्ये वि० चक गुरुमध्येशुक्रस्त विच के तूच म. रा. शाबु-शुन सूचनराश बुके . 0 . e . . . क O . ० . . १ २१ ४।४।५ १९२६/१६/२०१९/२०१४/२३१७ ०१८२०२६२४ २२६२६ ०२६२४ ८९२३६ Falor.. ० nko 0 . ० ० . ० . 6 ० . . ० ० . . . 0 o 0 गुरुमध्ये रविस्तन्मध्येवि० चक्र स्तविशाचक्र सूचम-रा-रश बु. केशु./मराश बुकशु . . . . . ० . . . . . . . . . . ० . १ १ १ १ २२ २२. २ १४२४१६१३ १५/१०/१६१० १०२८।१२४ ८|२८|२०२४ ૪૬૨૨૭a કદિન ૦ . ० . . ० 10 . . . . . . 0 ० . . . गुरुमध्ये सौमस्तन्मध्येनिन्चक्र गुरुमध्येराहुस्तन्मध्येवि० चक्र मिरा र शएक शुरुचरायशबु के शुसू चं मं. . a . . १ . . . १ १ १.४०/२४/१२/१७१९/१६/१६/२८ २५/१०२०२०/२४|१०१०/२० ४००३६.१२४२४२४१. १२ २४ . . २६ . . . . . . ।
(२२१) शनिमध्ये अंतर्दशाचकम्. शनिमध्येशनिस्तन्मध्ये विदशाचा शबु के शुरचं म-रा.शबुका शुरच. म.रा. ० १/१२/२० 6 . Ot.. |ज.. Hamaroo १ 8 सा ० ६/१२/२१/३३ ३/१२/२४ २२५/१०/३०/१५.१०२७/२४ . . ० . ० ० शनिमध्येबुधस्तन्मध्यविनाशिनिम शनिमध्ये केतुस्तन्मध्ये वि०च० बुकशुमचं. मं. राशके शुसूचम राश/बु: o ० क क . ० 0 . भ क . ० ० १ १ |१ १७२६/११/१०/२०२६/२५/९/३/२३६ २४२३१३ १६/३१/३०/२७४५/३१/२१/१२/२५/१६/३०५७/१५/१६५१/१२/१० २०३० ३० ३०/३०० शनिमध्ये गुस्तमध्ये किचशनिमध्येरविस्त चिदशाचक. शुरूच मारा-शबु कैसूरचं मारा-बश-बु के शु. ० . ० . ० a . o ० 0 २०१५ ००० ००० 03200 १ १ २० १/६१७२.०१/२१/१५/२४|१०/१२/२७ ३०/३०/३०/६/३०/५५४१८/३६/२७/५७० ० ००० ० o ८ 0 O ० . 0 . शनिमध्येचन्द्ररतन्मध्ये विच/शनिमध्येभीमस्तन्मध्ये विच. मनराश बु. के शुरू म राबश-बुके शु.र.चं. . . ० . 0 . . o . 0 9 0 ००० २ २३२१ २७ १५.४५ . Mr.. . १ [२/१ २ २८२३/२४२३/३ २३ २०१६/११/१२/१०/३१/१६/२०५७ ३० ३०/३०३० . له . शनिमध्यराहुस्त विदशाचक्र शनिमध्ये उरुस्तन्मध्ये वि० चर्क. रा-रश बु. के सुसूच मश.सु.के. शुसूचं मरा. ० 0 . . . . . ० . . ० १ |३/१६/१२/२५/२९/२१२१२५/२१२४२३/२१४/१६/२३/१६ २४|४८२७/५१ २०/३०५१ २५/२४/१२/१२/. ३६. १२४८ ४०० . . . . O ० ( २२.२) . ० a . . 6 ० बुधमध्ये अंतर्दशाचक्रम्. बुधमध्येबुधस्तन्मध्येविदशाचा के शुस - भरा. शबु के शु.सू. चम. रान श. २.०२ ૨ ૨. ४।११ २७/२७ ६६ २७/१६२/२०/२४१३/१२/२०१०/२५/१७ .४९/३४३०२१/३५/२१३२६/१६ ३०/३० २० मध्ये केतुस्तन्मध्ये वि०चा बुधमध्ये गुस्त विदशाचक्र. र भस-शबु. शुक्ष चमेराश बु. IF/Mt. . . ० व . 0 ० 0 0 ० ० . . . के १ . . २ २५ १ १७२२०/२२६७२६२०२० ५५४९/३३३६३१३४ ३० . .. 0 . . . दुधमध्ये रविरतनमध्येविचका बुधमध्येचन्द्रस्तन्मध्येविच० मंगर शबुकशुचं मंरारा बु. के.सु.| र. .. 0 . . . . . . ० ० १ १ १ ११ २/२ | २ ૨ १५७१५/१०/९८११३/९७/२१/१२/२१६/२०/१२२२५/२६ 17.५१/५४४८१२७४२११५१ .३०४८/३० .२५/१५४२३० . ० . . a . a . ० . ० . ० गमध्य मौमस्तन्मध्येविच बुधमध्ये राहुस्तन्मध्ये वि० नशबु के शुर।रार शचुकि शुरचम . . 0 . . a . Dashio/2014 . . ८ १ ४ ७६२०२०/२२१०२९७ २६/३१२४२.५९४५४२ ४ ५४ ० . सुरुस्तन्मध्यविचषुधमध्ये स्तन्मध्यवि-चन शानु.किसून मराश-चुकेश सचामाराए . . . . . . . . . क . ४ २ १ ५१ २५१७१८/१.८ ३१७२६१११८२.२८२५ ३६]. ५८. २६१४२५/१६/१३.१७४५/११/२१ 30 . .
( २२३० केतुमध्येतर्दशा चक्रम्. केतुमध्येकेतुस्तन्मध्ये वि० चन के शुर-मि-रा-शकु. केशु सचमनराश ० . ० . ८ . २७ ० 00.. ००० १ ०।१११११ R? - વરર૪ ર : રરર રરરર ०३४/३०/२१११५ ३०० 0000 . 6 ० ० C 0 . . - केतुमध्येगुस्तन्मध्ये वि०चा केतुमध्ये विजन्मध्ये दि. शुसूचमारास शुकि चिं. मगर.श.इ.काय o क . . ० C . 0 ० . ० २१ २ ५२४/3 १६/६ 1१.७१०१६१९९७२१ १८३०/२११५४४५७५? ३० 046 . . चा फितुमध्येचन्द्रस्तन्मध्ये दिवचन कितुमध्यागलन्म चामाराशबुकशुसू. म. राशके शु. ० . ० 0 . 9 ० . . C . . 0 . . 0 ८ . १७/१२ 1501१५ o २८/३/२/१२/५११० ८२२१२३/२०/८२४७/१२. ३०३४/३/३६/१६४९/३४/३०/२१/१५ २०/३०३० . . . ८ . . ० . . केतुमध्ये राहुस्तन्मध्ये विचकतुमध्ये उरुरतन्मध्ये विच० राशबुकेशुस्माल शकुकशुसूचं मरा. . . ० ० क क ० . . o . . . १८१२२/१४ २६/२.२८२३१२२ ४२/२४/५१३३/३ OS १ ७९/२६/१६/२०१८२० ३६/२४ . . किनुमध्येशनिस्तन्मध्येवियाकलुमध्येबुधस्तन्मध्ये वि० चक- दाबुकशुचिन मारा.शुचिमारा-रदा. . c ० . ० . ० . ० . १ २२६२३ १३.०३२९ ३०५७१५६५१ १ १ २०/२०/२८१७२९/०२३१७/२६ २४ ५९५८३३२६३१ ३० 3. . 4 ( २२४ ) गुमध्येअंतर्दशा-चक्रम् भृगुमध्ये गुस्तन्मध्येविच सूर म रानशाह के शुरुचमिराशन बुके D MO o 10-०००० au.. .00a ०००/मा ००N 3800 010 • 1503800 1:0,० 000 . ० .. क . शुक्रमध्येरविस्तन्मध्ये वि० च० शुक्रमध्येचन्द्रस्तन्मध्ये चिदशा चनमा [15 रा Hock.. Poes. --06 00 8 in 0000014 . क ० .. ... ० . . 0 शुक्रमध्ये जोमस्नन्मध्ये विचः शुक्रमध्ये राहुलन्मध्या . श Falll च . . PIP 0 0 0 ०० . راه گم شده २४ १२/२४/२१ .No. . ०० : o शुक्रमध्येगुरुनन्मध्येवि०० शुक्रमध्येशनिस्तन्मध्येविन्चका शाः चनमाराशबुकशुसूचिमारास शु ५ 00 २ २१६/२६ ० .50 FO0 . .. ०० ०० .. .. . शुक्रमध्येसुधस्तन्मध्ये वि०च शुक्रम केतुस्तन्मध्ये दि.च. शु मन क रा र ISO.. . . . . . .. FOcto २ 4 .... . .. 120 ." . . . इतिअंतरप्रत्यंतर.
(२२५ योगिनीदशाक्रम. जन्मनक्षत्रजीहीय उस्में ३ क युक्त करके सेनागदेनाशेन पयंक १।२।३।४।५।६।७० तक रहेगातवक्रमले मंगला-पिंगला-धा न्या प्लामरी-मद्रिका-उल्का-सिदा-संकटापहयोगिनीकेनाम जानना और उनकी कमसे १२।३।०५/६७८ यहवर्षसंरव्याजानना.और जन्मनसत्रके भुक्तयोगघटीप्रमाणजन्मकालिक दशावर्षसंख्या से अष्टोत्तरीमें लिखेप्रमाण मुक्त भोग्य दशा वनावना. अंतर्दशाक्रमः दशावर्पसंख्याक दिनकरकेउस्को३६से मार्गक भागाकारआवेसो दिवससर्वदशामेमंगला चोगिनीकी अंतर्दशाहोनी है. अनंतरवहीं मान गाकारक्रमसे २६३।४५६७८ इस्सेरणेतो पिगलादियोगिनीइनकेयर तिर्दशादिवसहोते है.इहादशाधिपति और दशाअंतर्दशाकेनामउनकेव- दिसंख्याइस्कैजुदेजुटेकोष्ठकागेलिखे हैं. यहयोगिनीदशाक्रम ३६वर्षकासो भोगनेके न्यनंतरसुन यही लेना. मंगलामध्येच्यंतरम्। पिगलामध्येअंतर्दशाचक्रम्. मंपि-धास्वाभाउसि-संगपिताधा-नाउसिनमा २३/४ 2 ० look°° १ १० २ 07I 200000 २० ....sol २० ० २० 11008.0 . वान्यामध्ये अंतर्दशाचक्रम्.ात्रामरीदशामध्येअंतर्दशाच. घानात्ताउनसिसिंगमपिताम-सि-स-मंपियचा. माद्रिकामध्येतर्दशाचा उल्कामध्ये अंतर्दशाचक. साउसिसमापिघावा.उ.सिनसमापिाधाना जा aso.. 1000014 -1000 Jon'... 4000 .:... सिडादशामध्येअंतर्दशाचक्रासंकटामध्ये अंतर्दशा चक्रम् सिसं मंतिधान्या उ.सं.मं.प.धा-वाकासि क १० ००००० 00:00 (२२६ 'जन्मपत्रिका लिखनेका क्रम. प्रथम मंगलश्लोक आशिर्वादश्लोक रक्षार्थश्रीरामचन्द्रजन्म कुंडली नथारुष्णचन्द्र जन्मकुंडलीअनंतर संवन् शकत्ययनऋतु मासपक्षातिथिवारनक्षत्रयोगकरण दिनमान रात्रिमान इटकाल घटीपर इसप्रकारसेजन्मसमय लिखना.अनंतर मध्यमादिस्पष्टग्रह और ललिखना.अनंतरजन्मकुंडलींग्रहन्यासपूर्वक लिखके संवन सरादि फललिखना अनंतरचंन्द्रराशिकुंडली लिखकै फललिखना. नन्वादिदाशनावसंधिसहित लिखके ग्रहोंकाक्षयचय फललिरवनाः भाव कुंडली लिखके भावगतग्रहफल और भावस्वामीगतफलन्नौरभाव लग्नफलौरलग्नस्वामीफललिखना.सप्तवर्गचक्रफलसहित लिखना ग्रहोंकी परस्परदृष्टीऔर भावोपरग्रहदृष्टी लिखना अंनंतरपड़र्गक्कुंडली ग्रहसहितलिखना नैसर्गिक तात्कालिक पंचामैत्री लिखना औरंग्रह भावसप्तवर्गचक्र औरग्रहोंके स्थानदिक काल निसर्गचेष्टाम्बलत्यो र भावबलमीलिखना तन्वादिहादशमोव विचारफल औरग्रहदृष्टी फलऔररिष्टारिष्ट गराजयोग राजयोगसंगादिसुन फायनफादुरधरा के मद्रुमनाभसयोगादिसंप्तव्योगफल और सर्वतोभद्रचक्रसूर्यकाला- नल चन्द्रकालानल अष्टवर्गादिचक्र.औरयमदंशाचक. औरफलयौ ररामिफल और दीप्तादि औरबालादिजागृतादि ग्रहोंकीअवस्याफ लसहित औरइष्टकलादिौर इटकष्ट दृष्टीऔर इष्टकष्ट बलीरहा दिष्टकष्ट और आयुयिदशाविनागफल सहित औरदशामें अंतर्दशा औरविदशाौपदशा फलसहिनालिखना अनंतरविंशोत्तरीदशान फलसहितालिवके अंतर प्रत्यंतर फलसहितलिखनापोरयोगिनीदशा अंतर्दशालिरवके फललिखना अष्टोत्तरी देशालिरवना. समाप्तोयं ग्रंथा जगत्पूर्वेणईशेननारनौलनिवासिना । नृगिराकेशवीरुखा कशवायापिनामुदा ॥शा कविवंशप्रशंसास्त्रग्धराछन्दः आदीब्रह्मानतोदिग्विजनिकर भवाब्राह्मणागौडवा स्तब्दारद्वाजगोनेथित उणगणः सुन्दरोलालयुक्तः॥ मासीत्तस्यापिपुनीप्रकटसमुदयावासंतुलब्धकीर्ती: पच्छीशील्यादियुक्तं शुभगुणनिचयन रिलोकागृणन्तिा। अर्थशापा:-(अबकविके वंशकीप्रशंसाकहीजाती है लाग्धराउंदसे) (२२७ ) श्लोक पहिलेब्रह्माजीयेतिनसेदशप्रकारके ब्राह्मणायेतिनमेंगीडदिजनन यितिनकेशुभतारद्वाजंगोत्रमेविख्यातगुणगुणवान्सुंदरलालजी जयेन्योर तिनके सुत्रजी,प्रकटितप्ताग्योदयबाले ओरलब्धकीर्तिवान् जिनकेसुशी लपन व्यादिसे युक्त शुभगुणोंका बहुतसेलोग गान कर रहे हैं. १ शिवदयालुयुकाशवःसहायवान्सुतावुशोत्तदीय- पुत्रतांगतोसुयुग्मकौतुपंछितौ महद्रीयगौरनों कालवाचकावुप्पोसमापनुर्नरेन्द्रसिंहराज्यतोऽधिक यशः२ अर्थमाषा: ऐसे शिवदयालुजीशिसहायजी दोनोपुननिनके पुत्रयु. मकजोडीवाले पंडित प्रसिद्ध भये-जो महामारी गोरखवान् औरविका लक्क्ताज्योतिर्वित् जिन्होंने पवालयाधीशप्रीमन्नरेन्द्रसिंह महाराजके राज्यसेवहुत यशकीर्तिनया महान् आजीवनोदय पाया. २ दुप्रिंसाश्वत्थाभवानीसहायएतौमहदाप्तकामौ। श्लोक जैनाभिरामौनृपतिप्रधानोज्योतिर्विदावासतुराप्तमानो॥३॥ अर्थमापा-सो दुर्गा प्रसाद और भवानीसहाययेदानी परिपूर्णकामप्त येजोजनोंको अभिराम यानंददेनेवालेजोराज्यमें प्रधान मुख्यजोनिन पीप्राप्तमानसन्मान अर्थात् नारीप्रतिष्ठित नये. अथोशिवसहायस्यसुतावतीमहामती ॥ ...लक्ष्मीनारायणश्चाय ज्योतिर्विज्जगदीशकः ॥४॥ अर्थभाषा: फिरनिनशिवसहाजीके महान् बुद्धिवान् लक्ष्मीनारा- यण औरज्योतिर्वित् जगदीशशर्मा पुत्र हैं। श्लोक- ... ज्योतिर्विज्जूगदीशोसोजगदीशप्रतोषदम् ।। केशवायांर्पयत्कृत्वा केशवीजातकंस्फुटम् ॥५॥ अर्थशापा:- ज्योतिर्वित्जगदीशप्रसादशर्मानजगदीश नारायणको तुधिप्रसन्नता देनेवाले इसकेशवीजातकको स्फुट अर्थात् प्रकटमनुष्या भापासे विभूषित करके कैशवप्मगवानके अर्थसमर्पण किया अथवा केशवदेवज्ञवर्यकी पूजा अर्पण किया यहझीश्लेप है. त्रिपंचाकेन्दुवसदैक्रमीयेनास्सिते ॥ गिरोदाह निःपूर्णापूर्णिमायारवेर्दिन।६॥ अर्थमापा-संवत् १९५३ श्रावण शुक्ल पूर्णिमारविचारकोशुजभारत मि मण्डलांतर्गत प्रसिद्ध इन्द्र प्रस्थनगरसे पश्रिमकोणस्यमार्चिको लनलपति नन्दग्रामनिवासी मारहाजगोत्र उपाध्यायकुलोन्दवज्योतिपित जगदीशप्रसादका बनाया यहनव्यउदाहरणसोमनुष्य भापसि विपिन समाप्त भयाः सोसवको सदासदासुरवादि देवो. मंगलंलेवकानांचपाटकानांचमंगलं। मंगलंसईलो- लोक कानाभूयोमूयोस्तुमंगलं॥शामंगलं भगवान विष्णुमंगलं. गरुडध्यमिंगलपुण्डरीकाक्षीमंगलायतना हरिला श्लोक mod लोको २२८) अथसूर्यसेलग्नसेइष्टकालकरनेकीरीति अर्कोग्यस्तनोर्मुक्तकालन्वितो युक्त प्रलोक. मध्योदयोफीष्ट कालोपवेत् ॥१॥ अर्थभाषा स्परसूर्यमें अयनांशायुक्त करके उस्को राशिविनाशम कम करके जो राशीअरहोय उस्के प्रमाण स्वदेशीयलग्न मानसे गुण किभोग्यफ्लकरना औरलग्नमेंअयनांशायुक्त करके उस्के ऊपर जोराशी होय उस्के प्रमाणसे मुक्त पल करके फिर लग्नकीराशीसे सायनसूर्यकी राशीतक लग्नमान स्वदेशीयकाऐक्यकरके उस्में उक्त और माग्ययलयुक्त करके ६ से मागदेनांतो इसकालपटी पलस्पष्ट होताहै. टिप्पणी जोसायन सूर्यकी राशीसेसायन लग्नकी राशीतक स्वदेशीय लग्नका ऐक्य करे जब सूधालग्नलेना औरसायनलग्नकी राशी- से औरसायनसूर्य्यकीराशीतकलनकाऐक्यकरे जब उलटालग्न लेना. उदाहरण स्परसूर्य०१३।१०।४२ इस्मै अपनांशा२१४४।३ युक्त करके १५।५४॥४५ इस्को ३० अंशमें कमकरके १।२४।५।१५ स्से ऊपरके कहे प्रमाण भोग्य साधन कियातो१९५ अबलग्ना ६९४२१२६ इस्में अयनांशा२३१४४३ युक्त करके २।२६ १२९ इस्से भुक्तपल साधनाकियातो २.८ अबसायनसूर्य रष राशीका है इसवास्ते मिथुनकालग्न ३०० कर्कका ३४६ सिंह का ३५५ कन्याका ३४८ तुलका ३४० इनका ऐक्य १६८७ इस्में शुक्त भोग्य पल युक्त करीतो इस्के ६० का माग दियातो लब्ध३२ शेप यह पलपूर्वतुल्य इष्टभया इसीप्रमाणसे सूर्य लग्नसे इष्टकाल करना. जोसायनसूर्य्य औरसायनलग्नएकराशीमें होयतोइनकात्री तरकरके उस्कोसायनसूर्य के उदयसे गुणके ३० सैभागदेनाजो भागाकार पारेसो पलालक अभीष्ट काल होताहेजोसायनसूर्य कि अपक्षासापनलनकमती होयतो पूर्व प्रमाण साधन किया जो मेंसे कम करनातो इस काल होता है.
[En3 5 บ 3 وهو ميه | | | وه د باومان و و وکن F ۰۰۰۰ میلاد | | | و همه و کلام اون ته مه 1 با هدمه k| مدونه او د ل مه 8 مع ماكو It as وه هه مهكر | | در دره مه || وه وجه کالا# میوه ای ۲۵ مه लग्नस्याटवकाः४८ f शुक्रस्याष्ट वर्गाकाः ३२ | #3 5 0 % و و و و اج دارد که همه . اید بره .۹ میں بالاده و وده يمه ناكه || |kers6 svg و و ابی اصل سه ฟบ ۰۰۰۰ و یا همه و هم ده چه با و بدنه و تجواد ديده || د شمیم کیو ایم من دلم مه | | ، بچه ها بهمن ۷ تا ۲۵ مه دکمه ی و ورود به کان : کلام اور बुधस्याष्ट वर्गाकाः ५४ [40: - =r. 50g: = = = = 5. भीमस्याष्ट वर्गाकाः ३ و يوم 1 حمل وه ک | و من دا | بعدها كمي || ., ,चन्द्रस्याष्ट वर्गाका-४ ( 339 अथरवेरष्टवर्गाकाः४८ و هم | 23v; وه. ا و م مه || 3 k शनेरष्ट वगीकाः ३२ هو هو ته | | مع كي | هومة ومدم و میوه با وهمه k| .. k 8 गुरोरष्ट वर्गाकाः ५६ همه با و دم مه| جمع و ۲ مه و و و من معلم ظ 5 و { { و ks بل ๒๔๖๖ บ บ els kr هووووو ك م || همه با .9 ۲۵ مه هه و معلوم | | نه. به به ودمه اظ ا له . لمسه 1296 अथसर्वतोभद्रचक्र अथातः संप्रवक्ष्यामिचक्र त्रैलोक्यदीपकमविख्यातंसर्वतोभद्रंसद्यः प्रत्ययकारकम् ॥१॥ याम्योत्तराःप्रागपराश्यकोष्टानवात्रचक्रेसुधियाविधे. या स्वरविर्णादिकमत्रलेख्यंप्रसिद्धभावाचमयानिरुक्तम् ॥२॥ नमोन सन्देऽक्षरजेचहानिर्वाधिस्त्वरेनीतियोनिरुक्ता राशीचधेसतिविघ्नमे वजंतुकथंजीवतिपंचविदे॥३॥भयकारोरपसंचनंदां भद्रांतकारंश्रवण विशाखाम् तुलांचविदेदनलक्षसंस्थोग्रहोक्तचक्रेगदितस्वरः॥४॥वका रभौकारमुकारदास्तेस्वातीरकारमियुनंचकन्यामू तथाभिजित्संज्ञक चवूिडेब्रह्मसंस्थोहिन नायरेन्द्रः ॥५॥ कर्कककारंच हरिपकारचित्री चपौणंचूतथालकारंप्रकारकं वैभमत्रवि दुलंनभामंडलगोमृगस्थः ॥६॥ एवंवेधः सर्वतोभद्रचक्रेसर्वाभ्यः चिन्तनीयः सुधीतिः ॥ दद्यान दूधःसरूलं सौम्यजातोत्यंतंकष्टंदुष्टवेधः करोति ॥७॥यस्मिरलेसं: स्थितोवेधक पापरखेटासोऽत्ययातियास्मिन् ॥ काले तस्मिन्मंगल) पीडितानांप्रोक्तं सन्दिर्नान्यथास्यात्कदाचित् ॥८॥ सर्वतोभदचक्रम्. bullis १२ रव. ज. या मृत ग्रा मा व ह. ड. म. २ पू उपाने रिन प. ज. र. श. ग. तास्वा. य दि. इ. मू ज्या. अथसूर्यकालानलचक्र. सूर्यकालानलंचक्रस्वरशास्त्रोदिहियत् नहुँविशदंवक्ष्येचमत्कृतिकरपरंमा त्रिशलकामामलादतिला फिलोयरेवा परिकल्पनीयाारेरवात्रयी मध्यगतबहेदेच्कोणोपरिगे विधेये॥२॥ त्रिशूलकोणांतरगान्यरेखानदा प्रयरंगपुना विधेयम् ! मध्यत्रिशूलस्यंचदंडमूलात्सय्येन पर्फमतो तिजियः॥॥रचनामसंमगतंचतन्त्रप्रकल्पनीयसद्सत्फलंहि वितकमेणाचिन्तावषयमनिबंधनानि ॥१॥शंगड्यरुश्चने लेयुमूलंपरिकसनीयमू शेपेाधिष्णपुजयश्वलामोडमोटार्थसिद्धि पानराणाम ॥५॥श्रीसूर्पकॉलानलचकमैतदेचवादे चरणेप्रयोग गनपलपूर्वननुचिन्ननीय पूरातनानांवचन प्रमाणम् ॥६॥ इतिसूर्यकालानल चक्रम्.
अथसूर्यकालानलचक्र. १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९ २५ अथचन्द्रकालानलचक्रं. कर्कोटकेनप्रविधायदत्तस्मिंश्चपूर्वापरयाभ्यसौम्यैः ॥रत्ताहहिस चलिते विधेयेरेवात्रिलाश्वतदनकेषु॥६॥कोणश्यरेखादितियेनसाध्या पूर्वत्रिशलेकिलमध्यसंस्थम् । चान्द्रलिखेन्दंतदनुक्रमेण सव्येनधिष्णा निबहिस्तदंने ॥२॥ कालानेलंचकमिदंहिचान्द्रेरणप्रयाणादिषुजन्म भनत्रिशूलं संस्थानिधनायनूनंयंतबहिः स्यंत्वशुभप्रदहि॥३॥ अथचन्द्रकालानलचक्रम्. २७ २३ २४ २५ ૨૨ E १९ २० १० १७ १३ RIS (२३२) हिमांशोले जेसुरगुरुरिपोराहुरनुजेऽब्धिगो- मन्दःपुण्यशिखियुरॅशनास्तैऽवनि सुतः । रोख- स्थेसौम्येशिवभवनगेमासिमधुके सिनेमध्यान्हे भूघुवरजनिर्विश्वसुखदाँ॥१॥ श्लोक- भाद्वैमासिसितेतरवसुनियोब्राह्मेपे - विधी. लग्नस्थेसशनौरोसहजगेम्वुस्थैरवीसेन्दुजे। राहीपंचमगेगोरिपुगतेसोमनपस्थेवजेला. मेरात्रिदलेबवकमलाधीशावतारोवुधे ।।२।। इतिकृष्णचन्द्रजन्मलग्नम्. । उभयोर्जन्मलग्न॥ कृष्णा ६रा. . HA क श ७श WER रा.६ ८ AON ट ११ -- ॥ इति उक्षयोजन्म लग्नम् ॥ २ (२२५ योगिनीदशाक्रम. जन्मनक्षत्रजीहीय उस्में ३ क युक्त करके सेनागदेनाशेन पयंक १।२।३।४।५।६।७० तक रहेगातवक्रमले मंगला-पिंगला-धा न्या प्लामरी-मद्रिका-उल्का-सिदा-संकटापहयोगिनीकेनाम जानना और उनकी कमसे १२।३।०५/६७८ यहवर्षसंरव्याजानना.और जन्मनसत्रके भुक्तयोगघटीप्रमाणजन्मकालिक दशावर्षसंख्या से अष्टोत्तरीमें लिखेप्रमाण मुक्त भोग्य दशा वनावना. अंतर्दशाक्रमः दशावर्पसंख्याक दिनकरकेउस्को३६से मार्गक भागाकारआवेसो दिवससर्वदशामेमंगला चोगिनीकी अंतर्दशाहोनी है. अनंतरवहीं मान गाकारक्रमसे २६३।४५६७८ इस्सेरणेतो पिगलादियोगिनीइनकेयर तिर्दशादिवसहोते है.इहादशाधिपति और दशाअंतर्दशाकेनामउनकेव- दिसंख्याइस्कैजुदेजुटेकोष्ठकागेलिखे हैं. यहयोगिनीदशाक्रम ३६वर्षकासो भोगनेके न्यनंतरसुन यही लेना. मंगलामध्येच्यंतरम्। पिगलामध्येअंतर्दशाचक्रम्. मंपि-धास्वाभाउसि-संगपिताधा-नाउसिनमा २३/४ 2 ० look°° १ १० २ 07I 200000 २० ....sol २० ० २० 11008.0 . वान्यामध्ये अंतर्दशाचक्रम्.ात्रामरीदशामध्येअंतर्दशाच. घानात्ताउनसिसिंगमपिताम-सि-स-मंपियचा. माद्रिकामध्येतर्दशाचा उल्कामध्ये अंतर्दशाचक. साउसिसमापिघावा.उ.सिनसमापिाधाना जा aso.. 1000014 -1000 Jon'... 4000 .:... सिडादशामध्येअंतर्दशाचक्रासंकटामध्ये अंतर्दशा चक्रम् सिसं मंतिधान्या उ.सं.मं.प.धा-वाकासि क १० ००००० 00:00 (२२६ 'जन्मपत्रिका लिखनेका क्रम. प्रथम मंगलश्लोक पाशिर्वादश्लोक रक्षार्थश्रीरामचन्द्रजन्म कुंडली तथारुष्णचन्द्र जन्मकुंडलीअनंतर संवन् शकत्यनऋतु मासपक्षातिथिवारनक्षत्रयोगकरण दिनमान रात्रिमान इष्काल घटीपर इसप्रकारसेजन्मसमय लिखना.अनंतर मध्यमादिस्पष्टग्रह और ललिखना.अनंतरजन्मकुंडलींग्रहन्यासपूर्वक लिखके संवन सरादि फललिखना अनंतरचंन्द्रराशिकुंडली लिखकै फललिखना. नन्वादिदाशनावसंधिसहित लिखके ग्रहोंकाक्षयचय फललिरवनाः भाव कुंडली लिखके भावगतग्रहफल और भावस्वामीगतफलन्नौरभाव लग्नफलौरलग्नस्वामीफललिखना.सप्तवर्गचक्रफलसहित लिखना ग्रहोंकी परस्परदृष्टीऔर भावोपरग्रहदृष्टी लिखना अंनंतरपड़र्गकुंडली ग्रहसहितलिखना नैसर्गिक तात्कालिक पंचामैत्री लिखना औरंग्रह भावससवर्गचक्र औरग्रहोंके स्थानदिक काल निसर्गचेष्टा हम्बली र भावबलमीलिखना तन्वादिहादशमोव विचारफल औरग्रहदृष्टी फलऔररिष्टारिष्ट गराजयोग राजयोगसंगादिसुन फायनफादुरधरा के मद्रुमनाभसयोगादिसंप्तव्योगफल और सर्वतोभद्रचंकसूर्यकाला- नल चन्द्रकालानल अष्टवर्गादिचक्र.औरयमदंशाचक. औरफलयौ ररामिफल और दीप्तादि औरबालादिजागृतादि ग्रहोंकीअवस्थाफ लसहित औरइष्टकलादिऔर इष्टकष्टदृष्टीमोर इष्टकष्टबलीरह दिष्टकष्ट और यायुदयिदशाविभागफल सहित औरदशामें अंतर्दशा औरविदशाौपदशा फलसहिनालिखना अनंतरविंशोत्तरीदशान फलसहितालिवके अंतर प्रत्यंतर फलसहितलिखना पोरयोगिनीदशा अंतर्दशालिरक्के फललिखना अष्टोत्तरी देशालिरवना. समाप्तोयं ग्रंथा जगत्पूर्वेणईशेननारनौलनिवासिना ॥. नृगिराकेशवीरुत्वा कशवायापिनामुदा ।।४।। कविवंश प्रशंसास्त्रग्धराछन्दः: पादोब्रह्मानतोदिग्विजनिकर भवाब्राह्मणागौडवर्या स्तन्दारद्वाजगोत्रेमथित उणगणः सुन्दरोलालयुक्तः।। मासीत्तस्यापिपुनीनकटसमुदयावासंतुलब्धकीर्ती, पच्छीशील्यादियुक्तं शुभगुणनिचयन रिलोकागृणन्तिा। अर्थशापा:-(अबकविके वंशकीप्रशंसाकहीजातीहे साधंराउंदसे) (२२७ ) श्लोक पहिलेब्रह्माजीयेतिनसेदशप्रकारके ब्राह्मणायेतिनमेंगीडदिजनन यितिनकेशुभतारद्वाजंगोत्रमेविख्यातगुणगुणवान्सुंदरलालजी जयेन्योर तिनके सुत्रजी,प्रकटितप्ताग्योदयबाले ओरलब्धकीर्तिवान् जिनकेसुशी लपन व्यादिसे युक्त शुभगुणोंका बहुतसेलोग गान कर रहे हैं. १ शिवदयालुयुकाशवःसहायवान्सुतावुशोत्तदीय- पुत्रतांगतोसुयुग्मकौतुपंछितौ महद्रीयगौरनों कालवाचकावुप्पोसमापनुर्नरेन्द्रसिंहराज्यतोऽधिक यशः२ अर्थमाषा: ऐसे शिवदयालुजीशिसहायजी दोनोपुननिनके पुत्रयु. मकजोडीवाले पंडित प्रसिद्ध भये-जो महामारी गोरखवान् औरविका लक्क्ताज्योतिर्वित् जिन्होंने पवालयाधीशप्रीमन्नरेन्द्रसिंह महाराजके राज्यसेवहुत यशकीर्तिनया महान् आजीवनोदय पाया. २ दुप्रिंसाश्वत्थाभवानीसहायएतौमहदाप्तकामौ। श्लोक जैनाभिरामौनृपतिप्रधानोज्योतिर्विदावासतुराप्तमानो॥३॥ अर्थमापा-सो दुर्गा प्रसाद और भवानीसहाययेदानी परिपूर्णकामप्त येजोजनोंको अभिराम यानंददेनेवालेजोराज्यमें प्रधान मुख्यजोनिन पीप्राप्तमानसन्मान अर्थात् नारीप्रतिष्ठित नये. अथोशिवसहायस्यसुतावतीमहामती ॥ ...लक्ष्मीनारायणश्चाय ज्योतिर्विज्जगदीशकः ॥४॥ अर्थभाषा: फिरनिनशिवसहाजीके महान् बुद्धिवान् लक्ष्मीनारा- यण औरज्योतिर्वित् जगदीशशर्मा पुत्र हैं। श्लोक- ... ज्योतिर्विज्जूगदीशोसोजगदीशप्रतोषदम् ।। केशवायांर्पयत्कृत्वा केशवीजातकंस्फुटम् ॥५॥ अर्थशापा:- ज्योतिर्वित्जगदीशप्रसादशर्मानजगदीश नारायणको तुधिप्रसन्नता देनेवाले इसकेशवीजातकको स्फुट अर्थात् प्रकटमनुष्या भापासे विभूषित करके कैशवप्मगवानके अर्थसमर्पण किया अथवा केशवदेवज्ञवर्यकी पूजा अर्पण किया यहझीश्लेप है. त्रिपंचाकेन्दुवसदैक्रमीयेनास्सिते ॥ गिरोदाह निःपूर्णापूर्णिमायारवेर्दिन।६॥ अर्थमापा-संवत् १९५३ श्रावण शुक्ल पूर्णिमारविचारकोशुजभारत मि मण्डलांतर्गत प्रसिद्ध इन्द्र प्रस्थनगरसे पश्रिमकोणस्यमार्चिको लनलपति नन्दग्रामनिवासी मारहाजगोत्र उपाध्यायकुलोन्दवज्योतिपित जगदीशप्रसादका बनाया यहनव्यउदाहरणसोमनुष्य भापसि विपिन समाप्त भयाः सोसवको सदासदासुरवादि देवो. मंगलंलेवकानांचपाटकानांचमंगलं। मंगलंसईलो- लोक कानाभूयोमूयोस्तुमंगलं॥शामंगलं भगवान विष्णुमंगलं. गरुडध्यमिंगलपुण्डरीकाक्षीमंगलायतना हरिला श्लोक mod लोको (२२८) अथसूर्यसेलग्नसेइष्टकालकरनेकीरीति अर्कभोग्यस्तनोर्मुक्तकालन्वितो युक्त श्लोक मध्योदयोमीष्ट कालोसवेत् ॥१॥ अर्थभाषा. स्पष्टसूर्यमें अयनांशायुक्त करके उस्को राशिविना अंशमें कमकरके जो राशीअरहोय उस्के प्रमाणस्वदेशीयलग्न मानचे गुणा किभोग्यपल करना और लग्नमें अयनांशायुक्त करके उस्के ऊपर जोराशी होय उस्के प्रमाणसे मुक्त पलकरके फिर लगकीराशीसे सायनसूर्यकी राशीतक लग्नमान स्वदेशीयकाऐक्यकरके उस्में मुक्त और माग्ययलयुक्त करके ६ से मागदेनांतो इसकाल घटी पलस्पष्ट होताहै. टिप्पणी जोसायन सूर्य की राशीसेसायन लग्नकी राशीतक स्वदेशीय लन्नका ऐक्य करे जबसूधालग्नलेना औरसायनलग्नकी राशी- से औरसायन सूर्य्यकीराशीतकलनकाऐक्यकरे जब उलटालन लेना. उदाहरणः स्पषसूर्य०।१३।१०।४२ इस्मै अयनांशा २२१४४।३ युक्त करके ११५।५४॥४५ इस्को ३० अंशमें कमकरके १।२४।५।१५।। स्से ऊपरके कहे प्रमाण भोग्य साधना कियातो१८५ लाबलग्ना ६.९४२॥२६ इस्में अयनांशा २२.४४१३ युक्त करके २।२६ १२९ इस्से भुक्तपल साधन कियातो २८ अवसायनसूर्य रष राशीका है इसवास्ते मिथुनकालग्न ३०० कर्कका ३४६ सिंह- का ३५५ कन्याका ३४८ तुलका ३४८ इनका ऐक्य १६८७ इसौं शुक्त मोग्य पल मुक्त करीतो इस्के ६० का भाग दियातो लब्ध३२ शेप यह पलपूर्वतुल्य इष्टभया इसीप्रमाणसेसूर्या लग्नसेइष्टकाल करना. जोसायनसूर्य्यौरसायनलग्नएकराशीमें होयतोइनकात्री तरकरके उस्कोसायनसूर्य के उदयसे गुण ३० सभागदेनाजोन मागाकार आदेसो पलालक अनीष्ट काल होताहेजोसायनसूर्य के अपक्षासापनलनकमती होयतोपूर्व प्रमाण साधन किया जो तो मेंसे कम करनातो इए काल होता है.
[En3 5 บ 3 وهو ميه | | | وه د باومان و و وکن F ۰۰۰۰ میلاد | | | و همه و کلام اون ته مه 1 با هدمه k| مدونه او د ل مه 8 مع ماكو It as وه هه مهكر | | در دره مه || وه وجه کالا# میوه ای ۲۵ مه लग्नस्याटवकाः४८ f शुक्रस्याष्ट वर्गाकाः ३२ | #3 5 0 % و و و و اج دارد که همه . اید بره .۹ میں بالاده و وده يمه ناكه || |kers6 svg و و ابی اصل سه ฟบ ۰۰۰۰ و یا همه و هم ده چه با و بدنه و تجواد ديده || د شمیم کیو ایم من دلم مه | | ، بچه ها بهمن ۷ تا ۲۵ مه دکمه ی و ورود به کان : کلام اور बुधस्याष्ट वर्गाकाः ५४ [40: - =r. 50g: = = = = 5. भीमस्याष्ट वर्गाकाः ३ و يوم 1 حمل وه ک | و من دا | بعدها كمي || ., ,चन्द्रस्याष्ट वर्गाका-४ ( 339 अथरवेरष्टवर्गाकाः४८ و هم | 23v; وه. ا و م مه || 3 k शनेरष्ट वगीकाः ३२ هو هو ته | | مع كي | هومة ومدم و میوه با وهمه k| .. k 8 गुरोरष्ट वर्गाकाः ५६ همه با و دم مه| جمع و ۲ مه و و و من معلم ظ 5 و { { و ks بل ๒๔๖๖ บ บ els kr هووووو ك م || همه با .9 ۲۵ مه هه و معلوم | | نه. به به ودمه اظ ا له . لمسه 1296 अथसर्वतोभद्रचक्र अथातः संप्रवक्ष्यामिचक्र त्रैलोक्यदीपकमविख्यातंसर्वतोभद्रंसद्यः प्रत्ययकारकम् ॥१॥ याम्योत्तराःप्रागपराश्यकोष्टानवात्रचक्रेसुधियाविधे. या स्वरविर्णादिकमत्रलेख्यंप्रसिद्धभावाचमयानिरुक्तम् ॥२॥ नमोन सन्देऽक्षरजेचहानिर्वाधिस्त्वरेनीतियोनिरुक्ता राशीचधेसतिविघ्नमे वजंतुकथंजीवतिपंचविदे॥३॥भयकारोरपसंचनंदां भद्रांतकारंश्रवण विशाखाम् तुलांचविदेदनलक्षसंस्थोग्रहोक्तचक्रेगदितस्वरः॥४॥वका रभौकारमुकारदास्तेस्वातीरकारमियुनंचकन्यामू तथाभिजित्संज्ञक चवूिडेब्रह्मसंस्थोहिन नायरेन्द्रः ॥५॥ कर्कककारंच हरिपकारचित्री चपौणंचूतथालकारंप्रकारकं वैभमत्रवि दुलंनभामंडलगोमृगस्थः ॥६॥ एवंवेधः सर्वतोभद्रचक्रेसर्वाभ्यः चिन्तनीयः सुधीतिः ॥ दद्यान दूधःसरूलं सौम्यजातोत्यंतंकष्टंदुष्टवेधः करोति ॥७॥यस्मिरलेसं: स्थितोवेधक पापरखेटासोऽत्ययातियास्मिन् ॥ काले तस्मिन्मंगल) पीडितानांप्रोक्तं सन्दिर्नान्यथास्यात्कदाचित् ॥८॥ सर्वतोभदचक्रम्. bullis १२ रव. ज. या मृत ग्रा मा व ह. ड. म. २ पू उपाने रिन प. ज. र. श. ग. तास्वा. य दि. इ. मू ज्या. अथसूर्यकालानलचक्र. सूर्यकालानलंचक्रस्वरशास्त्रोदिहियत् नहुँविशदंवक्ष्येचमत्कृतिकरपरंमा त्रिशलकामामलादतिला फिलोयरेवा परिकल्पनीयाारेरवात्रयी मध्यगतबहेदेच्कोणोपरिगे विधेये॥२॥ त्रिशूलकोणांतरगान्यरेखानदा प्रयरंगपुना विधेयम् ! मध्यत्रिशूलस्यंचदंडमूलात्सय्येन पर्फमतो तिजियः॥॥रचनामसंमगतंचतन्त्रप्रकल्पनीयसद्सत्फलंहि वितकमेणाचिन्तावषयमनिबंधनानि ॥१॥शंगड्यरुश्चने लेयुमूलंपरिकसनीयमू शेपेाधिष्णपुजयश्वलामोडमोटार्थसिद्धि पानराणाम ॥५॥श्रीसूर्पकॉलानलचकमैतदेचवादे चरणेप्रयोग गनपलपूर्वननुचिन्ननीय पूरातनानांवचन प्रमाणम् ॥६॥ इतिसूर्यकालानल चक्रम्.
अथसूर्यकालानलचक्र. १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९ २५ अथचन्द्रकालानलचक्रं. कर्कोटकेनप्रविधायदत्तस्मिंश्चपूर्वापरयाभ्यसौम्यैः ॥रत्ताहहिस चलिते विधेयेरेवात्रिलाश्वतदनकेषु॥६॥कोणश्यरेखादितियेनसाध्या पूर्वत्रिशलेकिलमध्यसंस्थम् । चान्द्रलिखेन्दंतदनुक्रमेण सव्येनधिष्णा निबहिस्तदंने ॥२॥ कालानेलंचकमिदंहिचान्द्रेरणप्रयाणादिषुजन्म भनत्रिशूलं संस्थानिधनायनूनंयंतबहिः स्यंत्वशुभप्रदहि॥३॥ अथचन्द्रकालानलचक्रम्. २७ २३ २४ २५ ૨૨ E १९ २० १० १७ १३ RIS (२३२ 'हिमांशो ने जेसुरगुरुरिपौराहुरनुजेऽब्धिगो- मन्दःपुण्यशिखियुउशनास्तेऽवनि सुतः।ारचौख- स्थेसौम्येशिवभवनगेमासिमधुके सिनेमध्यान्हे भूद्रघुवरजनिर्विश्वसुखदा॥१॥ श्लोक- भाद्रेमासिसितेतवसुनियोब्राह्मेपेजे विधी- लग्नस्थेसशनौगुरौसहजगेम्वुस्थैरवौसेन्दुजे॥ राहीपंचमगेगोरियुगतेनीमेनपस्थेवजेला. मेरात्रिदलेबवकमलाधीशावतारोवुवे ।।२।। इतिकृष्णचन्द्रजन्मलग्नम्. ॥ उभयोर्जन्मलग्न॥ रुष्णा कु स श ७श रा.६ १० ८ AN रे ११ -- ॥ इति उन्नयोर्जन्म लग्नम् ।। .