Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Patan Chaity-paripati
Front matter
ચંદ્રાચાર્ય જેન સભા
પુસ્તકાલય
પાટણ.
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
શાંતમૂર્તિ મુનિરાજ શ્રી હંસવિજયજી મહારાજ
જન્મ:–વડોદરા. મુનિપદ–અંબાલા-પંજાબ)
સં. ૧૯૧૪ અશાડ વદી ૩૦ સં. ૧૯૩૫ માહ વદી ૧૧.
જs
श्रीसविजयी जैन फ्री लायरी अंधमाला न. २८ पाटण चैत्य-परिपाटी. संपादक- मुनिराज श्रीकल्याणविजयजी. प्रकाशक- सेक्रेटरी जेशंगभाइ छोटालाल सुतरीआ. श्रीहंसविजयजी जैन फ्री लायन्नेरी लुणसावाडा मोटी पोळ-अमदावाद आवृति पहेली] थी. सं. २४५२ [आ. सं. ३० प्रत २००० वि. सं. १९८२ मूल्य छ आना
धी सूर्यप्रकाश प्रीन्टींग प्रेसरंकशाळ-अमदावाद
प्रटेल मुळचंदभाई श्रीकमलाले छापी.
शा. हीमतलाल वाडीलालनी धर्मपत्नी जासुद तरफथी भेट.
. नयर. १ २:४,७:२६ ८ T पुस्तकनुं नाम कीमत. नीतिदर्पण ०-४-० प्राणीपांकार भेट हंसविनोद ०-१२-० स्नाप्रपूजा नयतत्त्व संक्षिप्तसार नर्मदासुंदरी कथा भेट शोलयतो कथा तिथि तप माणिक्यमाटा गहुँली संग्रह श्रीनेमिनाथनी १०८ प्रकारीपूजा ०-२-० विविधपूजा संग्रह गिरनार गल्प हीरप्रश्न अष्टापद पूजा भट शुफराज कथा (म.) धर्मदत्त यथा धर्मविधि सिरप्रकर चन्य परिपारी यात्रा पाटण चत्य परिपारी होरप्रश्नावली. देशाटन ०-१.० प्रश्नोत्तर पुष्पमाला मातिन्यान- श्रीसविजयजी जैन फ्री लायब्रेरी, . २० " ૨૪ ।२४ . - -- किंचिद् वक्तव्य. सुज्ञ वाचक बंधुओ! प्राचीन गुजराती भाषान परिशीलन करनार साहित्य- प्रेमी इतिहासगवेपी सजनोने परम आनंद थो के २७ नक्ष- जोनी मालासमान अथवा साधुओना २७ गुणो जेवी २७ ग्रंय- पुप्पोनी माला समर्पग कर्या पछी आजे अम्हे 'पाटण चैत्य- परिपाटी' नामनु २८ मुं ग्रंथपुष्प आपना कर-कमलमा सादर मूकवा शक्तिमान् धया छीए. गूजरातनी प्राचीन राजधानी अणहिल्लबाड पाटणमा रहेला विक्रमना १७-१८मा संकानां जिन चैत्यो-मंदिरोनी परिस्थितिनो परिचय करावनार आ'पाटण चैत्य परिपाटिने अम्हे तेनी माचीन भापामा विकृति कर्याविना प्रकाशित करवा वनतुं लक्ष्य आप्यु छे. छतां आ पुस्तकमां आपली वे परिपाटियो- मांधी वि.सं. १६४८मां पूर्णिमागच्छीय ललितप्रभमूरिए रवेली परिपाटिनी प्राचीनप्रति जेवी परिशिष्टमा भुकेली (वि.. १. ग्रंथोर्नु लिस्ट प्रयम पेजमा आप्युं छे; लायब्रेरीना परिचय माटे सं. १९६६ थी सं. १९७५ सुधीनो रिपोर्ट वांची. AM ३ सं. २७२९मां तपागच्छीय हर्पविजयजी रचित) परिपाटिनी प्राचीन शुद्धपति न मळवावी ते अंशमों तेम बनी शवयु नयी एम अम्हारे आ स्थळे खिन्न अंत:करणे जणावयु जोइए. वि.सं. १९५९मा प्रवर्तकजी श्री कांतिविजयजी. महाराजनी प्रेरणाथी पं. हीरालाले रचेली पाटणनां वर्तमान जिनालयोने भूचवती सं. जिनालयस्तुतिने परिशिष्टमा मृकी वर्तमान जिन- मन्दिरोनुं सूचन करवा अम्हे बनतो प्रयास कों ..., साक्षररत्न मुनिराज श्रीकल्याणविजयजी महाराजे अतिपरिश्रम लइ विचक्षणताथी गवेषणापूर्वक लखेल प्रस्तावना अने परिपाटिसारथी आ ग्रंथ विशेष विभूपित-अधिक उप- योगी थइ शक्यो छे, ए वाचको स्वयं समजी शके नेम छे. अत एव अम्हारे ए संबंधमां विशेष वक्तव्य प्रकट करवान अवशिष्ट रहेतुं नथी, किंतु अम्हारी कृतज्ञता दर्शाया तोश्रीनो अंत:करणपूर्वक आभार मानवानुं अम्हे समुचित समजीए छीए. आ ग्रंथना संशोधनकार्यमा पूज्य मुनिराज श्रीहंसवि- जयजी महाराजश्री तथा पन्यासजी संपविजयजी महा- राजश्रीनी मेरणाथी मुनिराज श्रीपुग्यविजयजी महाराजे तया मुनिराज श्रीशंभुविजयजी महाराजे तथा पं. लाल- चन्द्र भगवानदास गांधीए करेली सहायनाधी अम्हे अम्हारा कार्यमा सफल थया लीए-उपकृत यया छोएप प्रकट करवानी अम्हारी फरज विचारीग छीए. अम्हारा आ ग्रंथप्रकाशन कार्यमां पाटणना झवेरी मणीलाल छगनलालनी धर्म परिन केसरवाइ, मुरतना शा. अनोपचंद नगीनदास स्वनाम धन्य स्वर्गवासी लाला टाकु- रदासजो खानगाम डोगरा ( पंजाब ) वाले के स.पुत्र श्री- मान लाला प्रभदवालजी दुगड लाहोर ( पंजाब ) बालेने पोतानी लक्ष्मीनो सद्व्यय करी अम्हने प्रोत्साहित करवा साथै अन्य धनाढ्योने अनुकरणीय कर्तव्यमार्ग दर्शयो छ, तेमनो उपकार मानवाने अम्हे आ स्थळे भूली शकता नथी. आ ग्रंथमा मतिमंदताथी, प्रमादयी या दृष्टिदोपथी रही गयेली खलनाओ सज्जनो मुधारी वांचशे अने अम्हने मूचक्वा तस्दी लेशे तो पुनरावृत्ति-प्रसंगे साभार सुधारवा प्रयत्न थशे. शासनदेवनी कृपाथी विशेष प्रगति करी साहित्यसेवा- पूर्वक अधिक शासनसेवा बजाववा अम्हे भाग्यशाली थहए एवी हार्दिक भव्य भावना प्रकट करी अत्र विरमीशुं. वीरम. २४५२ ऑ. से. 'श्रीहंसविजयजी जैन फ्री पार्थप्रभु-जन्मतिथि, प्रकाशक- लायब्रेरी-अमदावाद प्रस्तावना. स्यभाययोज भारतयर्पना प्राचीन विद्वानोर इतिहास लखया तरफ थोडं लक्ष्य आपेलुं छे. अने जे कंद लखायु इतुं तेनो पण घणो सरो भाग राज्यविलयोना दुःसमयमा नाश पामी गयो छे, मात्र व्याख्यानिक साहित्यमा उप. योगी थतो केटलोक जैन ऐतिहासिक साहित्यनो अंश व्या. रूपानरसिक जैन साधुओना प्रताप यचधा पाम्पो छे; पण तेमां इतिहास करतां उपदेशतस्यने मुख्य स्थान आपेलु होपायो तेया चरित्र प्रयन्धादि ग्रन्यो पैशीना घी भाग औपदेशिक साहित्य ज गणो शझाय, मात्र केरलाक रासा- ओ अने प्रपन्धी उपरांन शिलालेस्रो प्रशस्तिो चत्यपरि. थाहीओ तया तीर्थमालाओज माधुनिक दृष्टिए प्राचीन तिहासिक साहित्यमा गणया योग्य छे. ऐतिहासिक साहित्यमा चैत्यपरिवाटोओर्नु स्थान. जो के घेत्यपरिवाही या तीर्यमालाओ तरफ घणा थोडा विद्वानोनुं लक्ष्य गयुं छे अने पैतिहासिक थिए तेनी सरी कीमत आंशनारा माक्षरो तो तेयो ये थोड़ी संख्यामां नीक- लशे; पटलु छनां पण इतिहासको दृटिप चैत्यपरिवादी ए घणं कीमती मादित्य छे, एना उंडणमा रहेला तात्कालिक धार्मिक इतिहासको प्रशाश, धर्मनी रुचि तया प्रवृत्तिर्नु वर्शन अने गृहस्थोनी समृद्ध दशान चिन इत्यादि अनेक २ इतिहासना कीमती अंशो चैत्य परिपाटिओना गर्भमांयी जन्मे छे के जेनी कीमत थाय तेम नथी. चैत्यपरिवाडीओनो उत्पत्तिकाल. चैत्यपरिवाडीओ क्यारथोरवाया मांडी तेनो निश्चित निर्णय आपी शकाय तेम नथी. चैत्य परिवाडीओ, तीर्थमालाओ अ- थया एयाज अर्यने जणावनारा रासाओ घणा जुना वखती लखाता आव्या छे एमां शक नयी, पण एवा भाषासाहित्यनी उत्पत्तिना प्रारंभकालनो निर्णय हजी अंधारामा छ, कारण के आ विषयमा आज पर्यन्त कोइ पग विद्वाने ऊहापोह तक कों नथी, छतां जैन साहित्य ना अवलोकनयी एटलं तो निश्चित कही शकाय के जैनोमा चैत्य वा तीर्थयात्राओ.. करवानो अने तेनां वर्णनोलखवानो रीधाज घगो ज प्राचीन छे. तीर्थयात्राओ करवानो रिवाज विक्रमनी पूर्व चोथी सदीमा प्रचलित हतो एम इतिहास जणावे छे, ज्यारे तेनां वर्णनो लखवानी शरुआत पण विक्रमनी पहेली वा बीजी सदी पछीनी तो न ज होइ शके; ए विषयनो विशेष खुलासो नीचेना विवेचनथी था शकशे- जैन साहित्यमां सर्वथी प्राचीन सूत्र आचारांगनी नियु- क्तिमा तात्कालिक केटलांक जैन तीर्थोनो नोध अने तेने नमस्कार करवामां आव्यो छे.' निशीथ चूर्णिमां धर्मचक्र, अट्ठावर उजिते गयग्गपए य धम्म चके य । पासरहावत्तनगं चमरुपायं च वन्दामि ॥" गजानपदे-दशार्णकटवर्तिनि । तथा तक्षशिलायां धर्म चक्रे तथा ३ देवनिर्मित स्तृप जीवितस्वामिप्रतिमा, कल्याणमूमि आदि तीर्थानी नोध करवामां भाषी छ.। छेदसूमोना भाष्य अने टीकाकारो लख छे के अष्टमी चतुर्दशी आदि पर्य दिवसोमां सर्व जैन देरासरोनी यंदना करथी जोइये, भले ते चैत्य संघर्नु दोय के अमुक गच्छनी मालिफोर्नु होय तो पण तेनो यात्रा करवी, यम्मत पहोचतो होय तो सर्व ठेकाणे संपूर्ण चैत्यवंदन-विधि करयो जोइये अने घसत न.पोचतो होय तो मेक बेक स्तुति या नमः स्कार ज करयो पण गामना सर्य त्योनी यात्रा करवी.२ व्यवहार बना भाग्य भने चूर्णिमा लख्यु डे के अहिच्यायो पार्थनाथस्य धरगेन्द्रमहिमास्थाने ।' -आचारांगानयुझि पत्र ११८ । १ "उत्तरावहे धम्मचक, मथुराए देवगिन्मियो थमी, कोस- लाप नियंनसानिपरिमा, नित्थंकराग या अम्मभूमिओ । -निशीथ यूगि पत्र २५३-२ । २ निस्तकामानम्मको घर मध्यहि धुई तिनि । चलंय हागि व नाई इकिकिआ वा वि ॥ गाय ३ अट्ठमी-पउहसी चइय मचाणि माहुगी मम्वे । परेयचा निषमा अवपेम-निहींमु जहमति ।। पामु र भट्ठमीमादीगु घड़याई माहुणी या ज अगाए पमहीप ठिभा में म वंदति मामलहु । -प्यवहारमाय ने गिं.
M आठम चौदश आदि पर्व-तिथिदिनोमां गामनां सर्व देह- राओमा रहेली जिनप्रतिमाओ अने पोताना तथा वीजा उपाश्रयोमा रहेला सर्व साधुओने पर्यायलघु साधुओझे वंदन करवू जोइये, जो न करे तो ते साधु प्रायश्चित्तनो भागी थाय. महानिशोथ सूत्रमाथी .पण चैत्य तीर्थ अने तीर्थोमां भराता मेलाओनी सूचना मले छे.' आ सर्व जोतां अलुं तो निश्चित छे के जैनोमा तीर्थयात्रा अने प्रतिमापूजानो रिवाज घणो ज जूनो पुराणो छ, तीर्थ तरीके प्रसिद्ध थयेल स्थानोर्मा भाविक जैनो घणा दूर दूरना देशो थको संघो लेइ जता अने तीर्थाटन करी पो. तानी धार्मिक श्रद्धाने सफल करता, पोताना गाम नगरोना चैत्योने ते हमेशां भेटता, चैत्यो अधिक वा समय आछो मलतां नगरनां सर्व चैत्योनी यात्रा नित्य न थती तो छेवटे आठम चउदश जेवा खास धार्मिक दिवसोमां तो पूर्वोक्त यात्रा अवश्य करता ज, कालान्तरे आ प्रवृत्तिमा पण मंदता न पेसो जाय अटला माटे श्रुतधर पूज्य आचार्यो नियम घड्यो के आठम चउदशे तो तब चैत्योनो वंदना करवी ज, अने जो साधु के व्रती गृहस्थ आ नियम प्रमाणे न अहन्नया गोयमा ते साहुणो तं आयरियं भगति जहा णं जह भयवं तुम आणावहि ता णं अम्हेहि तित्ययत्तं करि(र)या चंदप्पहसामियं बंदि(द)या धम्मचकं गंतूगमागच्छामो । -महानिशीथ ५-४३५ । १
५
,
चर्सशे ता ते दंदनी भागी थशे. आ प्रमाणे नगर
या गामनां सर्य चत्योनी यात्रा ते ' चेअपरिया.
टोजता' (त्य गरिपाटियामा) देवानी. अने से
प्रवृति विशेष प्रचलित यतां उनाघलने लीये' यात्रा
शाद निकटो जाने चैत्यपरिपाटि
शादज प्राथमिक
मूल
अपने जणाययामां रूह यइ गयो. घसत जतां
चैत्यपरिपाटी-त्यपरियारी-चैत्पप्रधाडी-घनमयाही इ
श्यादि भनेक प्रकारना चिमरियाडोजत्ता'ना स्थाने
संस्कृत, प्राकृत अने अपग्रंश शब्दोगद थपा जे आज पर्यन्त
ने अर्थने जणाधी पाई.
उपरना यिचनपी यात स्पष्ट था के चायपरि.
पाडो' नाम फारनी यात्रानु छ, भने उपचारथी
तेपो यात्रानु पर्जन : थियेचन करनार प्रयन्ध या स्तपनी
पग पेयपरवाडी' नामयी ओमाया लाग्यां के
जे पना साझियमार्गमां एक स्यामायिक घटना रे
नीधमाला अने चित्पपरिवाडियोनो वास्तविक मेद.
यपि तीर्थमाला या तीर्थमालास्तयनो अनेचरपरि-
यारी या पत्यपरिपाटी स्तयोमा सामाग्य रीत भेद नपी
गणवामा आपसो नयापि नां माम अने स्वक्षणो तपासतां
मेगा प्रसारमी तिनो पाशविक मेरसुलती जगाइ आये रहे.
तीर्यमाला मायनोनु लक्षण पदोय फे पोते भेटेलां
पागांमत मे. शाम्रोमा पाटी मामी नामी तीयांना
जैग या प्रतिमाभोर्नु वर्णन, तेनो मापी या कल्पित इति.
शाम सेनो महिमा भने ने गांधी योजी सायनोर्नु पर्गग
ना
६ करवा पूर्वक तेनी स्तुति वा प्रशंसा करवी. आचारांगनिः युक्ति अने निशीथचूर्णिमां थवेली तीर्थोनी नोंध ते आज- कालही तीर्थमालाओ अने तीर्थकल्पोर्नु मूल बीजक समः जवु जोइये.सिद्धलेनसूरिनु सकल तीर्थ स्तोत्र, महेन्द्रसूरिनु तीर्थमालास्तवन,२ जिनप्रभसूरिनी शाश्वताशाश्वत- चैत्यमाला, विविधतीर्थकल्प४ विगेरे संस्कृत प्राकृत अप- आ संस्कृत स्तोत्र पाटगमा संघवीनी शेरीना तारपत्रोना पुस्तक भंडारमा छे. एना कर्ती सिद्धसेन मारे क्यारे थया तेनों निश्चय नथी; छतां संभव प्रमागे तेरमी सदीना पूर्वार्धमां थइ गयेला. सिद्धसेन ज पुना कर्ती होवा जोइये. आ प्राकृत स्तवन पग़ तेरमी सदीमा ज बनेलं संभवे छे. महेन्द्रसूरि नामना बे आवार्य थया छे-१ ला पूर्णतल्लगच्छीय प्रसिद्ध आचार्य हेमचंद्रजीना शिष्य जे १२१४ मां विद्यमान हता.. २ जा नाणकीयगच्छीय जे सं. १२२२ मां विद्यमान हता, आ स्तवनना की आ बेमाथी कया तेनो निश्चय थतो नथी. ३ आ चैत्यमाला अपभ्रंश भापामां छे, एना की जिन-- प्रभसूरि जे ११ मी सदीमां थइ गया छे, जेमगे अनेक चरित्री अने रासो अपभ्रंशमां लखेला छे, जेटली अपभ्रंशनी कविता पाटग-. ना भंडारोमा एमनी मळे छे, तेटली वीजा कोइ पग कविनी नथी मळती. ४. संस्कृत अने प्राकृतमां वनेला आ तीर्थकल्पो प्रसिद्ध छे.. एना कर्ता जिनप्रभसूरि खरतरगच्छनी लघुशाखामा थइ गया छे.. तेमगे ‘आ तीर्थकल्पसंग्रह विक्रमनी १४ मी सदीना . उत्तरार्धमा बनाव्यो छे.
उपर ग्रंश अने लोकभाषामां लखायेला उपयुक्त लक्षणवाला स्तष- नोनी कौटिना अनेक प्रयन्धो आजे दृष्टिगोचर थाय छे. चैत्यपरिपाटी स्तवनोनुं लक्षण ए थया करे छे के कोइ पण गाम के नगरनां यात्राना समयमा क्रमधार आ- यतां देदरासरोना नाम, ते ते यासानां नाम, तेमा रहेली जिनप्रतिमाओनी संख्या विगैरे जणायवा पूर्वक महिमा वर्णन करयुं भने तेनी स्तुति करवी. विजयसेन. मूरिनो रेवगिरिरासो, हेमहंसगणिनी गिरिनारचै- त्यपरियाडी, सिद्धपुर चैत्य परिवाटी,३ नगागणिनी जा. दोरचत्यपरियाडीविगेरे संख्यावन्ध चैत्यपरियाडिमा जगायेक लक्षणयाली आजे विद्यमानता घराये , आ रासो प्राचीन गृजराती भापामां लगवायेलो छे, एना कती विजयमनमूरि नागेन्द्रगच्छमा प्रसिद्ध मंत्री वस्नुपालना समय- मा अर्थात् विक्रमनी तरमो मदीना उत्तरार्धमा थइ गया छे. वस्तु- पालना संघ माथे गिरनारनी यात्राय गया त समय तमगे आ राम यनाप्यो हतो. २. हमहंसगांग प्रसिद्ध आचार्य मुनिसुंदरमृरिना शिष्य हता, भी मोळमी सदीना प्रथम घरगमा विद्यमान हना, आरंभानिधि- यार्तिक, न्यायमजूया विगरे अनेक विद्वत्तापूर्ण ग्रन्या एमगे बना- ज्या . आ चैत्यपारेवाडी तमगे क्पारे यनावी ते जगाव्यु नधी, पग माळमी सदीनी शआतमा ज यनावी होवानी संभव है. ३ आ चैत्यपरिवाहीना कत्तों के समयनो पची लाग्यो नधी, परिवानी जूनी होवाना संभव छे. आ घेत्यपरिवाही' सं. १६५, ना भाद्रवा वाद ३ ने " छ। प्रस्तुत 'पाटण त्यपरिपाटी' पण प ज पीजी कोटिनोनि- बन्ध डे, आटला विवेचन उपरथी समजायुं दशे के तीर्थ चैत्य- यात्राओ अने नगर चैत्ययात्राओ करयानी रिवाज जैनोमां घणाज प्राचीन कालथी चाल्यो आवे छे. आरिवाजोनी ची- नता ओच्छामां आच्छी घे हजार वर्षनी होगी जोये एम पूर्व सूचवेल शाखयाक्योथी सिद्ध थाय छे, अने ए उपरथी तीर्थमालास्तवना अने चैत्यपरिपाटीस्तनो लखवानी सदि पण घणी प्राचीन दोषी जोइये ए वात सहेजे समजी श. काय तेवी छे, छतां पण एटलं तो सखेद जणावू पडे छ के आ प्रवृत्तिनी प्राचीनताना प्रमाणमां तेना वर्णनग्रन्यो, ती. थमालास्तवनो अने चैत्यपरिपाटी स्तवनो सेटलां प्राचीन आजे मलतां नथी. दिने जालोरमां बनी हती, एना की नगा वा नगपिंगाग आचार्य श्रीहीरविजयमृरिना शिष्य कुशलबर्धनगगिना शिष्य हता. स्व० आचार्य श्रीविजयधर्मसूरिजोए संपादन करीने भाव- नगरनी श्रीयशोविजय जैन ग्रन्थमाला द्वारा 'प्राचीन तीर्थमाला संग्रह नो प्रथम भाग बहार पाड्यो छे. जेमां जुदा जुदा फविओनी करेली चैत्यपरिवाडिओ, तीर्थमालाओ अने तीर्थस्तवनो मळीने २५ प्रबन्धो छे. ए सिवाय पग संख्याबंध तीर्थमालाओ अने चैत्यपरिवाडीओ जैन भारोमा अस्तित्व धरावे छे.
पाटण. प्रस्तुत परिवाडो मेना नाम साथे बंधायेली छे, ते पारण नगरनी आ स्यले संक्षेपमा परिचय आपयो उपयोगी गणाशे. 'पाटण' ए गुजरातदेशनी राजधानी-हिन्दुस्थानना मा. चीन अने प्रसिद्ध शहरोमांचें एक छे, पर्नु वास्तुस्थापन जैन मंत्रोथी थयु हतुं. एनो घसावनार 'वनराज' नामनो चावहावंशनो एक याहोश शुरघोर राजपुत्र हतो, ते नागे. गच्छना जैन आचार्य शील गुणसूरिनो परम भक्त जैन उ- पासक हतो'. धनराज पोते, तेना राजकारमारियो मंडल अने तेनी प्रजानी अधिक भाग जैनधर्मो होइ पाटण शहेर ए ते घख- तमा गुजरातमा जैनोना धार्मिक साम्राज्यनी राजधानी धनी १ यनराजन याल्यकालमा जं उक्त गोलगुगमूरिए आसरो दोधी हतो, तेथी कृतज्ञ प्रकातना वनराजे पाटळथी पति राजा थता जैनधर्मनी कीमती सेवा बजावी हती, एटलं ज नाहि बन्लके पाटगमा नामी जैन मंदिर बनावराची पोतानी कीर्तिने विशेष अमर करी हती. वनराजनुं यनायेलु आ 'वनराजविहार' नामर्नु चैन्य सं. १३०१ मां विद्यमान हर्नु पवात नीचना शिलालेय उपरथी जगाशेः- "संवत् १३०१ वर्षे वंशाप शुदि ९ शुक्रे पूर्वमण्डलिवास्तव्य मोढजातीय नागेन्द्रा.........मुत श्रे० जाल्हणपुग श्रे० राजकाक्ष-
१०
गयु हतुं. जैनोमा चालताते समयना. सर्व गच्छ अने मतोतुं
अस्तित्व पाटणमांजणाइ आवतुं धनु.धर्मवीर अने युन्नवीर जै.
नोनी व्यवस्था अने आबादीथी पाटण एक वखत पूरी जाही.
जलाली भोगवतुं थयुं हतुं. विक्रम संवत् ८०२ ना वर्षमा
पहेल प्रथम अणहिलवाड' वा 'अणहिलपारण'ए नामयो
पाटण वस्युं अने दिवसे दियसे उन्नति करतुं चायडाबंशना
राजाओनी राजधानी तरीके प्रसिद्ध धयु.
चावडा वंशना कुल ७ सात राजाओए । राज्य कर्या
बाद पाटणनी राज्य लगाम चौलुक्य वंशना राजाओना
हाथमा गई, आ वखते पण पाटण पूरी जादोजलालीमां तुं
तथा च
प्रतिष्टिता........
समुद्भवेन ट० आसाकेन संसारार............योपार्जितवित्तन अस्मिन्
महाराजश्रीवनराजविहारे निजकीर्तिवलीविस्तार.........विस्तारितः।
आसाकस्य मूत्तिरियं सुतटः आरोसिंहेन कारिता
....सम्बन्धं गच्छे पंचासरातीर्थ श्रीशीलगुणमरिसंताने
शिष्य श्री......देववन्द्रनारेभिः ॥ मंगलं महाश्रीः ॥
( पाटगमां पंचासरापार्श्वनाथना मंदिरमा रहेली 'वनराज 'नी
मूर्ति पासेनी 3० आसाकनी मूर्तिनो शिलालेख )
पाटगनी राजगादी उपर नीचेना आठ चावहावंशी
राजाओ थया छे:-
१
१ वनराज २ योगराज ३ रत्नादित्य ४ वरिसिंह ५
क्षेमराजः ६ चामुंडराज ७ राह ८ सामंतसिंह ।
पटलुज नहिं पण पाटणना चौलुक्य राजाओए आसपासना देशो जीती पोतानी राजसत्तानो विशेष यधारी करवा मांड्यो जे कुमारपाल सुधी चालु रयो,कुमारपाल जे चुस्त जैनधर्मी हती, तेणे पोते पण अनेक लडाइओ करी उत्तर भारपाड, कोकण विगेरे अनेक देशोना राजाआने जीतीने गुजरातना महाराजाधिराज तरीके पोतानी सत्ता सर्वोत्कृष्ट वनावी हती, परंतु गुजरातनी उन्नतिनी आ छेल्ली हद हती, ए पछीना गुजरातना राजाओए पोतानो सत्ता वधारी होय एम इतिहास जणावतो नथी. आ तो राज्यमत्तानी यात थइ पण गुजरातमां अने खास करीने पाटणमां जैनधर्मनी प्रबलता पण ओछी न हती, चापडाबंशना तमाम राजाओ जैनधर्मना पालनारा नहिं तो उपासक तो अवश्य हता, मंत्रिमंडल अने वीजा राजकर्मचारियो पण प्रायः जनो होइ प्रजानो अन्यधर्मी वर्ग पण जैनधर्मने पूज्य दृष्टिथी जोतो, आ स्थिति चौलुक्य पहेला भीम सुधी चालती रही, भीमना वखतमा तेना चीर दंडनायक विमल अने राजा यचं वैमनस्य उत्पन्न थतां पाटणनी जैन प्रजाने फंडक धको पहोंच्यो होय तो यनया जोग छे. पम कहेवाय छे के दंडनायक विमलने विपे राजा भीमना मनमां कंइक विपरीत भाव उत्पन्न थयो, चतुर अने मानी विमलने राजाना मननी स्थितिनुं ज्ञान थतां दिल- गोरी अने दयानुं पात्र न बनतां ते गुप्तपणे पाटणनो त्याग करी चाली निकल्यो, अने तेणे आवुना दक्षिण कटिभागमा यसेली चंद्रावती नगरीमा आवीने निवास को, चंद्रायतीनो १२ प्रथमनो राजा १ विमलना आगमनथी डरी जइ भागी जतां विमल त्यांनो राजा थइने रह्यो. २ राजानी नाराजगीथी जैन समाजनो मान्य पुरुष विमल पाटण छोडीने चाल्यो गयो, ए वात जाहेर थतां पाटणनो आ राजानुं नाम क्यांइ जगाव्यु नथी, कोइ परमार बंशीय राजा हतो, धारनो धंधुक तो न होय ? २ विमल चन्द्रावतीनो राजा थयानी हकीकत विमल प्रबन्धमा जणावली छे. ३ कुमारपालना समकालीन हरिभद्रसूरि मन्त्रीश्वर पृथ्वी- पालनी प्रार्थनाथी. रवेल चन्द्रप्रभस्वामिचरित(प्रा.) नी प्रश- स्तिमां जगावे छ के विमल दण्डनायक भीमदेवं राजाना व वनथी सकल शत्रुना वैभवने ग्रहग करी प्रभुप्रसादथी प्राप्त थयेल वडावली ( चन्द्रावती) विषयने भोगवतो हतो. जुओ ते उल्लेखः- " सिरिभीमएवरज्जे नेढो त्ति महामई पढमो ॥ बीओ उ सरयससहनिम्मलगुणरयगमंदिरमुदारं । निययप्पहापरियतरणी विमलो त्ति दंडवई ॥ अह भीमएवनरवइचयगेग गहीयसयलरिउविहवो । वडावल्लीविलय स पहुवलद्धं ति भुजंतो ॥ - वि. सं. १२२३ मा लखायेली पाटगना संघवीना पाडाना जैनभंडारनी ताडपत्र प्रति ). आ अभिप्रायने अनुसरता मलाधरी १ जैन संघ राजा उपर मारे गुस्से गयो,एटलं ज नहि,पण सेंकडो जैन कुटुंबो विमलनु अनुसरण करी पाटण छोडो चंद्रावतीमा लइने वस्यांजो उपरनी हकीकत साचा इतिहासमांखपती होय तो कहेयु जोइये के पहेला भीमदेयना वखतमां पारणनी जैन वसतिमां कंइक भंगाण पड्यु दशे ज, परंतु आ यनाव साचो होय तो पण तेनी विशेष स्थायी असर थइ जणाती नथो, कारण के ते पछीना चौलुक्य राजा कर्णदेव, सिद्धराम, कुमारपाल विगेरेना राज्यकालमा पण लगभग तमाम राज्य. कारभार जैन मंदिओना दायमा ज इतो, एरलं ज नहिं पण सिद्धराज के जे शेवधर्मी दतो छतां जैनधर्म भने जैनध. र्मी आने घणुं ज मान देनारो अने जैन विद्वानोने पूजनारो हतो ए उपरथी समजाय छे के पाटणमा जैनधर्मनी प्रव- लता घणा लांघा काल सुथी टकी रही इती. कद्देवाय है के एक समये प्रसिद्ध आचार्य श्रीदेमचन्द्रसूरिनु पाटणमा आगमन थयु त्यारे २८०० अढारसो कोरिषज शेठिाओ राजशेखरसूरि वि. सं. १४०५मां रवेला प्रवन्धकोषा- वस्तुपालमयन्धा-प्राग्वाटवंशे श्रीविमलो दण्डनायकोऽभवत् । स चिरमवुदाधिपरयमगुना यूर्जरेश्वरमसत्तेः अर्थात् 'गूर्जरेश्वर (भीमदेव) नी प्रसन्नतापी विमले लांबा समय मूधी आबू उपर आधिपत्य भोगव्यु हत.' एम जगाये छे. मा उलेख जीता विमलने भीमदेव साथै वैमनस्य पचाना वृतान्त माटे सन्देह राखयो पले, -ला. म. गांधी 1 तेमना नगरप्रवेश महोत्सवमा एकठा थया इता. आ एकज दाखला उपरथी पाटणना जैनोनी संख्यानो अने तेमनो समृद्धि- नो ख्याल आवी जशे. कुमारपाल पछी पाटणनी राज्यगादीप आवेला अजयपालना वखतयी पाटणना जैनोनी अने साथ ज राज्यनी अवनतिनो पायोनंखाणो. अजयपाले घणा खरा जुना जैन मंत्रिओने पदभ्रष्ट कर्या अने केटलाकोने भयंकर शिक्षाओ फरी. खास करीने कुमारपालना मरजीदान मनुष्योने अज. यपाले भारे त्रास आप्यो,२ कुमारपालनां पुण्यकार्योनो तेणे बन्यु तेटलो नाश कर्यो, पण आशं अधर कामो घणा काल सुधी करवाने ते जन्म्यो न हतो, राज्याभिषेकने पीजे ज व अजयपालनुं तेना एक नोकरना हाथे खून थयु अने त्यार पछी धार्मिक विप्लव बंध थयो, राज्यकारभार पण पाछी नियमित थइ गयो पण सिद्धराजः अने कुमारपाले जे गुज- रातना राज्यनी हद वधारी चौलुक्य राजाओनी साभी सत्ता स्थापन करी हती, ते लांबो काल रकी शको नहिः जे क्रमथी पाटण अने तेना राजाओनी सता दिवसे दिवते वधी हती तेज क्रमथी बटवा लागी, अजयपालना वखतयों हकीकत हिन्दी कुमारफाल चरितनी प्रस्ताव- नामां जोवी. २ हेम वन्द्रमूरिना शिप्य रामवन्द्र, मंत्री कपर्दी आदि हेम- चन्द्र अने कुमारपालना मानीता पुल्पोने अजयपाले केवी भयंकर शिक्षाओ करी हती ते प्रबन्ध चिन्तामणिमां चौलुक्य राजाओनो इतिहास जोवाधी जणाशे.
पाटणना राज्यकारभारमाथी जैन गृहस्योनो हाय निकलधा
लाग्यो हतो, प्रसिद्ध पोरवाल वीर जैन मंत्री वस्तुपाल अने
तेजपालना समयमां थोडाक घखतने माटे गुजरातनी झाली
पडेली फीति पाछी उज्ज्वल बनी हती. जो के अजयपालना
बखतथी गुजरातनी राज्यसत्ता मंद थवा मांडी हती तो
पण पाघेला चौलुक्य सारंगदेव पर्यन्त गुजरात देश अने
तेना राजाओए पोतार्नु महत्त्य ठीक ठीक टकावी राख्यु
हनु, पण छेल्ला राजा करणवाघेलाना समयमां पाटण अने
गुजरातना उपर हमेशाने माटे पराधीनतानो दंड पड्यो. १
धनराजयी उगेल, सिद्धराज भने कुमारपालयी उन्नतिनी
हेल्ली ददे पहोचेल पारणनी कीर्तिवल्ली करण वाघेलाना
यखतमांसदाकालने माटे करमाई गई.
मा प्रमाणे यनराज, भीमदेव, सिद्धराज, कुमारपाल
जया युद्धवीरोना पराक्रमोथी, जांवक, चंपक, विमल, शांतु,
पाटगनी राजगादी उपर चौलुक्य अने एज वंशनी
चाघेला शासाना राजाओ नीचेना क्रम प्रमाणे थया चालुक्य,
राजाभो:-१ मूलराज (1) २ चामुंडराज ३ वल्लभराज
दुर्लभराज ५ भीमदेव (3) ६ कर्मदेव (1) ७ जयसिंहदेव .
(सिद्रराज) ८ कुमारपाल
१० मूलराज (२)
११ भीमदेव (२) १२ त्रिभुवनपाल ।
वाघेला राजाओ-१ धघल
२ अगीराज
३ लवगप्रमाद
१ वीरधवल ५ वामदेव ६ अर्जुनदेव
७ सारंगदेव. ८
कर्णदेव ।
९.अजयपाल
.
उदयन, वाहड, संपत्कर, वस्तुपाल, तेजपाल जेवा बाहोश
मुसहोओनी कार्यकुशलताथी उन्नतिना शिखरे चढेलु पाटण
-गुजरातनुं राज्य कर्णवाघेलानी खीलंपटता अने माधव अने
केशव जेवा झेरीली प्रकृतिना नागर कारभारियोना पापे
एकवेला स्वर्गीय नगर बनेलु पाटण संवत् १३५६ ना वर्षमा
अलाउद्दीनना सेनापति मलिक काफुरना हाथे जमीनदोस्त
थयु,एक वेला जे स्थले हजारो कोटिध्वज श्रेष्ठियोनी हवेलीओ
शोभी रही हती, ते प्राचीन पाटणना स्थानमा आजे एक
वे कुआ वावडी के वे चार प्राचीन मकानौना खंडहरो
सिवाय जंगली झाड अने घास उगेला नजरे पडे छ, जे
स्थान लाखो मनुष्योनी वसतिथी रळीयामगुं हतुं ते आजे
मियाळ अने बरु जेवां जंगली जानवरोनी लोलाभूमि बनी
रा छे!
नवू पाटण.
१
मुसलमानोना हाथे नष्ट भ्रट ययेलं पारण फरिथी
क्यारे आवाद थयु तेनो चोकस समय क्यांइ मलतो नथो.
प्राचीन पाटगना अवशेपो तरीके आजे
अने 'दामोदर कुओ ए वे मुख्य गगाय छे, एना संबंधमां लोको-
मां कहेवत छ के-'राणकी वाव ने दामोदर कुओ, जोयो
नहि ते जीवतो मूओ.' ए सिवाय एक मोटुं मकाननू खंडेर
रागकी वाव
1
हवा केटलाक बनावो. उपरथी मम कही शंकाय के वर्तमान
पाटण विक्रम संघ१३६०अने १३७२नी वञ्चे बसेलु हो जाये.'
पाटणनी जैन मंदिरापली'नी प्रस्तावनामां तेनालेख जणावेलु
के के-"अलाउद्दीनना बखतमा प्राचीन पाटणनो नाश थतां
सं० १९२५ ना वर्षमा आ वर्तमान पाटण फरियो पस्यु छ.!
पण आमां जणावेली साल खरी होघामा शंका छे.
संवत् १३५६ मां नाश पामेल नगर वे पांच वर्षमा पाईन
पसतां लगभग अर्धसदीधी पण अधिक समय पछी बसे ।
वात साची मानषामा जग संदेह रहे छे. जोप्राचीन नगर
सर्वथा नाश पामी गयु होय अने नवेसर षसवा जैषी
स्थिति उभी था होय त्यारे तो ते तरत ज वसवू
खोइये..भने जो मुसलमानोना हाथे पटलं वधु नुकशान न
थयु होय के जैयो फरिने शहर नई वसावh "टे तो स्यार.
बाद साठ सित्तर वर्षमा ज प शुं कारण आधी पायु दशे
के मुसलमानोना हाये जोनमायेल पाटणमा ६० वर्ष पर्यन्त
रहीने फरिथी नागरिकोने न पाटण यसावg पत्यु होय?
अमारा अनुमान प्रमाणे तो आधुनिक पारण सं०१४२५
मां नहिं पण १३७० नो आसपासमा बसेल हो जोइये,',
कारण केपाटण भंगना पाथी पाट मां बनता जैनमंदिरों
ची पहान पर आवेर्नुछे, लोको तन 'राजमहल' कहे ..
पीजी पग प्रभुरग निशानीभो यो सेकसी मले.
वि.सं. १३० मा शयुंजयतीर्धना उद्धारक संघपाते देसल भने
समरा साह पाटवसना इना, पटले तेममये पाटण यात हत::
-ला, म..गांधी
.
१८. अने प्रतिमानी प्रतिष्टाओ एकदम बंध पडे हे अने ते सं० १३७९ ना वर्षमा पाडी. शर थती देखा दे छे अने ते पछीना वसतमां ते प्रवृति दिवसे दिवसे वधती जती जणाय छे, संवत् १३७२ अने १३८१ नी सालमां खरतरगच्छ संवन्धी शान्तिनाथ विधिचैत्यमां जिनकुशळसूरिना दाये अनेक जिन बिम्बो अने आचार्यमूर्तिनी प्रतिष्ठाओ थाय छे, आ शांतिनाथ विधिवैत्य आजे पण खराखोटडीना पाडामा सुधरेल दशामां विद्यमान छे. संवत् १४१७, १४२० अने २४२२ ना वर्षमां पण पाटणमा प्रतिष्ठाओ थयाना लेखो त्यांनी मूर्तिओ उपरथी मली आवे छे, तेथी आ वात निश्रित थाय छे के प्राचीन पाटणना भंग पछी संवत् १३७९ ना वर्ष पहेलाना कोइ पण वर्षमा आधुनिक पाटण बसी गर्म्यु होवू जोइये. उपर प्रमाणे चौदमी सदीना छेल्ला चरणमा फरिथी बसेल नूतन पाटणे पण दिवसे दिवसे उन्नति करया मांडी अने वखत जता ते पोतानी प्राचीन कीर्ति ने जालवी राख- याने योग्य थइ गयु, अल्लाउद्दीनना जुल्मयी घास पामेला, मुसलमानोना नामथी पण भडकता हिन्दुओनां हृदयो तुग- लक फिरोजशाहनी सरदारीना वखतमां कंडक शांत पड्यां, मुसलमानोना भयनी शंकायो नवीन देहरासरो बनावामां संकोचाता हिन्दुओ फिरोजशाहना बखतमा निर्भय थया अने फरिथी नवीन चैत्यो बनाववामां प्रवृत्त थया, आपणा आ पाटणमां पण आ खतथी मांडीनेज नवां देहरा अने नवी प्रतिमाओ. विशेष प्रमाणमां बनवा लागी. जे प्रवृत्ति - गमन सत्तरमी सदीना छैडा पर्यन्त चालू रही, मा लंग- भग: प्रणमो धर्ग जेटला लांदा गालार्मा प्रस्तुत नवीन पाटणमा सेकडो देहरा अने हजारो प्रतिमाओ बनी चुकी हती, लीलु साह प्रचण्ड पबनना झपाटायी पडी जतां तेनाज सूहमांयी फूटेला फगगा कालान्तरे मूलवृक्षतुं रूप धारण करे छे, तंज रीते प्राचीन पाटण अलाउद्दीनना अन्यायनो भीग था पडतां तेना ज मीमाप्रदेशमा नर्बु यमेनु पाटण कालान्तरे.एक समृद्ध नगर बनी पोतानी पूर्व ख्यातिने ताजी रामधा समर्थ थयु. प्रस्तुत चैत्यपरियाडी ते आ बीजा पाटणनी समृद्ध दशाना समयमां बनेली ताम्कालिक जैनदिरोनी नोंघ घा 'डीरेक्टरी' समान छ. कर्ता अने समय-निर्देश. भा चत्यपरियाहीना कर्ता कोण छ अने तेमणे आ निशाने.क्यारे बनायी इत्यादि हकीकत तेमणे पोरेज समाप्तिलेखमा जणाया दोधी छे, जेनो सारा प्रमाणे है- 'पूनमिया गच्छनी चन्द्र(प्रधान) छापामां मुपनप्रभ- मूरि थया, तेमनी पाटे कमलनमसूरि अने कमलप्रमनी पार्ट आचार्य धोपुण्यप्रभसूरि यया, पुण्यप्रभना पट्टधर विद्याप्रम- मूरि थया, विद्याप्रमरिना' पट्टधर शिष्य श्रीललितप्रभ.. सूरि थया, तं ललितप्रभसूरिए विकास मंवत् १६४८.ना, आसोज पदि अने रविवारने दिवसे अगदिल पारगमा मा पाटणनी त्यपरियाही यमायी. . मं. १६७ ना कार्तिक मुंदि ० ने शुक्रवारने दिवसे पाटग-.. मा आप्याय श्रीधर्ममागरजीने मंवयहार करनार जुटा जता गोना १२ मामार्योर्मा भा विधाप्रमभूरि पग मामेल हता।
. २० उपरनी नोध सिवाय परिवाडोकार ललितप्रभरिना संबन्धमा विशेष हकीकत जाणवामां आधी नयी:१ तेमनी कृति उपरथी तेओ सारा विद्वान् होयानो क्षयो करी शकता नथो, परंतु आ प्रस्तुत कृति तेमनी संग्रहशीलतानो सारो परिचय आपे छे, ग्रंयकार पोते पूनमगच्छना आचार्य होर ढंढेरवाडामा रहेता हता,२ अने तेथीज प्रस्तुत परि- याडीनी शरुआत तेमणे दंडेरवाडाना चैत्योथोज करेली जणाय छे, तेमना पछी लगभग ८० वर्ष बनेली वीजी पाटण- चैत्यपरिवाडीनी शरुआत पंवासराना चैत्योथी थाय छे, कारणके तेना कर्ता हर्षविजय तपागच्छीय यति हता अने.. तपागच्छना यतियोनुं मुख्य आश्रयस्थान पंचासरामां हतुं. आ प्रमाणे जुदा जुदा कर्ताओनी परिवाडीओ जुदा जुदा स्थानोथी शरु यतां वातोना अनुक्रममां घणो घोटालो यह जाय छे, अने तेम थतां एकनी साथे बीजी चैत्यपरिवाडी- मेलान करवामां केटली मुश्केलीओ नडे छे, तेनो ठीक ठीक अनुभव आ प्रस्तावनाना लेखकने थयो छे. ५ ग्रस्तुत ललितग्रभरिए वि.सं. १६५१ मा प्रतिष्टित पंच- तीर्थी (सम्भवनाथ बिम्वनी मुस्यतावाली) धातुप्रतिमा चाणसमा गांममां जिनमन्दिरमा विद्यमान . . ( जूओ जैनधातुप्रनिमालेख- संग्रह भा० १, १०१) ललितप्रभमृरिए वि. सं. १६५५ मां अणहिलपाटणमां दंढेर- वाडाना उपाश्रयमांज श्री वंदकेवलि चरित(रास) पण रच्यो छे, -ला. भ. .गांधी. २ आजे पण इंडेरावाडामा, पूनमगच्छनोः उपाश्रय मौजुद छे. :
परिवाडीनो परिचय प्रस्तुत चैत्य परियाडी कविता-साहित्यको टिप-विशेष उपयोगी न होया उतां पुरातत्वनी दृष्टिए घणी उपयोगी छ, परिवाडीकारते समयनां पाटणनां तमाम जनमंदिरीनां नाम, तेमा रहेलो प्रतिमाओनो संख्या, तेना वनावनारानां नाम, जै जै पासोमां ने मे चैत्यो आवेला छेते ते यासोनो नामनिर्देश इत्यादि हकीकतो जणावधानो जे महान् परि- श्रम उठाव्यो छे ते आपणे माटे घणी उपयोगी निघडयो छे, आजयी सया प्रणतो घर्ष उपर पाटणमा केटला देहरा इता, ते सर्पमा केटली प्रतिमाओ हती, देवरा यमायनारा शेठिआओनां शां शां नामो हता, ते घेलाना पाटणना भाविक जैन गृहस्थोमां धर्मश्रद्धा केधी होशी जोइये,माथे ज तेमनी पासे द्रव्य पल पण केलं होवु जोइये इत्यादि अनेक वातीनां साचा अनुमानो करधान आ चत्यपरिचाही उप. रथी पनी शके तेम छे. चैत्यपरित्राटी-यात्रानो साचे माचो हंग लेवफै आ परियादीमा गोठभ्यो छ, जाणे के पति मंधनी साथे नग- रनी चत्ययात्रा करया निकल्या हे अने समधार बच्चे आयतां तमाम देवराआने यांदता जाय छ, मंध जे बासमा जाय छ ते पास नाम पोते प्रथम सूचवे छ, पछी तेमा कंटलां देवरा तैनी मंख्या जपाये छ, पछी मूलनायकोनां नाम अने छल्ले तेमांनी प्रतिमाभोनी मख्या, आ दंग लेखके गमग आसी परिधाडीमा जालयो राख्यो छे, पण २२ . प्रतिमाओनी संख्या जणाययामां जरा घोटालो करी दोधी छे, ते एवी रीते के केटलेक ठेकाणे तो पोते मूलनायकनुं 'नाम लखी अवर प्रतिमा अवर जिनवर" इत्यादि उल्लेखोनी साथे विधानी संख्या जणाये छे के जेनी अर्थ. मृलनायक सिवायनी प्रतिमाओनी संख्या जणावनारी थाय छ, ब्यारे धणे ठेकाणे "अबर" के "अन्य कंइ पण शरद- प्रयोग का वगर प्रतिमासंख्या लखी दोये हे तेथी तेचा स्थलोमा शंका रही जाय छे के आ संख्या मूलनायक संहितनी जाणवी के मुलनायक सिवायनी प्रतिमाओगी? आनो खुलासो मूलनायक सहित गणतां थती नथी, तेम मूलनायक सिवायनी प्रतिमाओनी संख्या गणतां पण थती नथी,कारण के मांथी कोइ पण रोते गणतां आखरी विम्ब- सख्याना सरवालो मलतो नथी. एथी ए वात सहेजे जणा आवे छे के ग्रन्यारे जणावेली ते ते चैत्योनी प्रतिमा- संख्या केटलेक ठेकाणे तो मूलनायक सहितनी छे अने केटलेक स्थले ते सिवायनी छे, पण सहितनी क्या अने रहितनी क्यां तेनो खुलासो थवो अशक्य छे. ग्रन्थकारे जेम प्रत्येक वासनां देहराओनी संख्या अने तेनी प्रतिमासंख्या जणावी छे, तेम आखा नगरनां सर्व देहराओनो आंकडो अने सर्व प्रतिमाओनी संख्यानो आं- कडो पण तेमणे जणावी. दीधा छे. . परिवाडीकार प्रतिमासंख्या जणावतां पहेलां देहरा- ओने बे विभागमां वहेंची दिये छे, म्होटां जिनमंदिरोने पोते 'त्य' भने 'देहरा' कहे छे अने तेनी संख्या १०५ एकसो ने एक जणाये छे, छोटां या घरमंदिरीने 'देहरासर नामयी उल्लेख छ. अने तेनी संख्या ९९ नवाणुं होगा. कहे छे, पहेला दर्जानां चैत्योनी प्रतिमासंख्या ५४९७ पांच हजार चारसी ने सत्ताणुंनो जणावे छे, वीजा प्रकारनां जिनमंदिरो-घरमंदिरोनी कुल प्रतिमासंख्या २८६८ घे हजार आठसो ने अइसठ पटली जणावे छे. एज प्रसंगे प्रतिमाओनी नोध करतां परिवाहीकार लग्वे छे के पाटणमा प्रतिमा विद्रुम-प्रषालानी छ, २ सी. पनी अने ३८ अडत्रीश रत्ननी प्रतिमाओ , ४ च्यार गौतम स्वामीनां विय छ भने ४च्यार चतुर्विशतिपट्टको छे. आरटुं विवेचन कर्या बाद परिवाढीकार बन्ने प्रका. रना चैत्योनी प्रतिमामोनी कुलसंख्यानो ८३९४ प आंकडो जणाधे हे,पण पूर्व जणान्या प्रमाणे अन पण संख्यानोसर- वालो मलतो नथी, बन्ने प्रकारनां चैत्योनी प्रतिमाओनो , बीजा पैश्यपरिवाहीकारोए पण म्होरा मंदिर वा जिनप्रा- सादाने माटे देहर' अने छोटो घरमंदिरोने माटे 'देरासर' शब्द वापर्यो , जुभी-"देरासर तिहां देहरा सरखें" (हविजयकृत पाटग न्यपरिवादी) "जिनजी पंचाणुन माझने श्रीजिनपर- प्रासाद हो xxx देवरासर श्रवगे मुण्या पंच सया सुग्घकार हो" (हपवि०पा००परि०) "मृरतमाहे पण भूयरा देवरां दश श्रीकार 'दीय सय पणतीस छे देहरासर मनोहार "(लाधा- शाहकन मृातचैत्यपरिवाडी-प्राचीन तीर्थमालासंग्रह भा०1०६७) . .२४ सरवालो ५४९७२२८६८-८३६५ आठ हजार घणसोने पांस- उनो थाय छे, अने जो रत्नादिनी प्रतिमानो जुदी मनीने तेनी ११ ए संख्या आमां उमेरीए. तो सरवालो ८४०६. ए आवे छे, पण परिवाडीकारे आपेल टोटल मलतुं नथी, एर्नु कारण तेमनो गफलत नहिं, पण तेमनी मानमिक अपेक्षा छ. एटले के आपेली छेल्लो संख्या पूर्वोक्त वे संख्या मोनो मात्र सरवालोज नहिं पण ते संख्यामां केटलीक परचुरण संख्या वधारीने जणावेली संख्या छे, पण आ अपेक्षा निब- न्धकारे शब्दद्वारा व्यक्त करी नथी.' पाटण शहेरनी चैत्यपरिवासी पूरी करीने तेने लगती .ज पाटणनी आसपासनां न्हानां म्होटां लगभग १२ गामा- ओनी चैत्यपरिवाडी पण आ साथे जोडी दीधी छे. आ १२ बार गामोना चैत्योनी संख्या२५ अने प्रतिमा- संख्या १२०७ जेटली थाय छे, आ संख्या पूर्वोक्त पाटणनी प्रतिमासंख्यामा जोडीने परिवाडीकारे आप्रमाणे संख्या जणावेली छे-९५९८नव हजार पांचसो ने अठाणुं. आ संख्यामा पण ३ नो फरक आवे छे. परिवाडीकारनी जणावेली पाटणनी विवसंख्याना ८३९९ ए आंकडो अने बहारगामनां चैत्योनी विबोनी में- ख्यानो आंक जे १२०७ नो . थाय छे: ए वेने भेगा करतां ८३९४+१२०७-९६०१ नव हजार छ सो ने एक थाय छे, ज्यारे परिवाडीकारे आपेली संख्या ९.९८ छे. ए ज-रीते आपणे प्रत्येक महोल्लाना चैत्योनी प्रतिमा- पीपरगन्तीय मानदिर, जयपुर आनी संख्या तारखीने तेनी जोड देतां जे संख्या आवे छ, तेनो साथे परिवाडीकारे जणावेली पाटणनी प्रतिमासंख्या मलती नयी. तेनुं कारण पण लेखकनी संख्याप्रतिपादक 'पद्धतिर्नु अनिचिनपगुंज होह शके,वली घे चैत्योनी प्रतिमा. मरूया परिवाडोकारे मुहल जणाधी नथी, तेथी पण तेमनी संख्या मापणी तारवेली संख्या साथे नहिं मलती होय तो बनवा जोग छ. परिवाडीना परिशिष्टरूप जणावेली १२ गामोनी चैत्यपरि- वाहीमा रूपपुरनी चैत्यसंख्या ध्यान खेचनारी छ, तैमा कुले १० जिनमंदिर अने ३६७ जेटली प्रतिमा जणावी छे. रूपपुर पूर्व केवडे म्हीटुं होवू जोइये ते वात आ वर्णन उपरथी जणा आये छे. जे बेला रूपपुरनी ए दशा हती, ते घखते चाणतमामा मात्र एक मंदिर अने ३४ प्रतिमाओ हती. आजे संपपुरमा मात्र एक मंदिर २९ प्रतिमा छे भने श्राप कोनां ३-४ प्रणच्यार घर छे, ज्यारे चाणसमामा ८-१० मंदिर पहुं विशाल चैत्य छ, अने अनेक प्रतिमाओ हे, जैनवसति पण घणी छे. एम लागे छे के रूपपुरनी घसति तूटवायी ज घाणसमानी विशेष आवादी यइ हशे, काला- न्तरे शहेरनां गाम भने गामनां शहेर केयो रोते बने थे, तेनो आ प्रत्यक्ष पूरावो छ. परिघाडीफारे को ठेकाणे ५ यातनी खुलासा नथी कों के पोत ले प्रतिमासंख्या जणाय छै ते केवल पाषाण- मय प्रतिमाओनी छ के धातु, पाषाण अने रत्न विगेरे २६ सर्व प्रकारनी प्रतिमाओनी ?, परंतु परिवाडीकारना आ मोननो खुलासो परिवाडीना परिशिष्टना एक उल्लेख उपर- थी स्वयं थइ जाय ठे-'कुमरगिर' ना बीजा चैत्यनी संख्या जणाबीने ते पीतल पडिमा चारसे वली, छन्न उपरि मनहरु।" आयो एक नबो उल्लेख करे है,यद्यपि ए उल्लेखनी अर्थ एवो पण लेइ शकाय के 'चैत्यनी प्रतिमा-मख्या गणाच्या बाद आ पीतलमय प्रतिमाओनो संख्या गणवावी बोजे सर्व स्थले वतावली सामान्य प्रतिमासंख्या पाषाणनी प्रतिमाओनी ज होवो जोइप, परंतु ग्रन्थकारना अभिप्रा- यनो विचार करतां आ कल्पना को शकती नथी,ए वात सरी छ के ग्रन्थकारे कोई ठेकाणे पीतलनो के धातुनी प्रतिमाओनो जुदो उल्लेख कों नथी, मात्र आ एक ज स्थले कयों छे अने ते पण जुदो, छतां ते संख्या तेमणे प्रतिमाओनी कुल संख्यामा सामेल करी छे, जो पाटणनां २०० वसो देहराओनी धातुमय प्रतिमाओने गणनामां न लीधी होय तो कुमरगिरना एक ज देहरानी पीतलनी प्रति. माओने भेली गणवायूँ कोई कारण न हतुं. ए उपरथी खुल्लं समजाय छे के परिवाडीकारे दरेक चैत्यनी जे प्रतिमा संख्या बतायी छे. तेमां धातुनी प्रतिमाओ पण सामेल समजवानी छे, दरेक ठेकाणे तेनो जुदो उल्लेख न कर- वार्नु कारण. विस्तार थइ जवानो भय हतो, अने कुमरगि- रमा जुदो उल्लेख करवानुं कारण · धातुप्रतिमाओनी बहु- लता बताववी एज होइ शके.
.२७ किया पासमा केटलां देहरां अने कंटली प्रतिमामो छ, ते प्रत्येकनी तेमज सर्वनी संख्या परिवाडीना सारमा ते ते स्यले जणाधी दीधी है. पटलं छतां पण वासोना नामनी साये चैत्य अने प्रतिमासंख्यान कोष्टक आ नीचे आपयामां आवे छ. एनी नीचे सं. १७२९ ना वर्षमा बनेली चैत्यपरिवाडीमा जगाघेल यास, चैत्य अने पियनी संख्यान काटक अने ते पछो यर्तमान समयना पाटणना धात अने चैत्यमख्या जणावना कोरक आपवामां आयशे, जे उप- रथी सं. १६४८ मां पाटणनी शो दशा हती, १७२९ मां तेमा केटलो फेर पढ्यो अने वर्तमानमा पाटशना चैत्योनी केटती संख्या ठे-ए सर्व जाणवा घणुं सुगम थर पडशे. च० प्र० सं. १६४८ मां बनेली प्रस्तुत चैत्यपरिवाडीने अनुसार श्रीपाटण-चैत्य-प्रतिमा-कोष्टकं १ न० धासमाम नं० वासनाम च०.प्र० २ टेरवाडो ७ नागमद २ कोफानो पाडी ३२६६ ८पंचासर ३ खेतरपालनो पाडोर, १६७ ९उंची शेरी ૨ રરૂ ४ जगुपारेखनो पाडो२३५१. ओशयाल महोलो ३ ३१ ५पहेली खारी वाय, ११ पीपलानो पाहो १ ६ बीजी खारी पाच ११३ । १२ चिंतामणिनो पाडो३ ९५ . १ २८ च० प्र० नं० वासनाम चै० प्र० न० वासनाम २३ खराकोटडी। २७ सगरकुई २४ त्रांगडोआपाडो १३७५ २८ हेवतपुर २५ मणिहट्टिपाडोर २ १८ २९ मोढेरनो पाडो २६ मांका महेतानो. ३० नारंगापाडी ૨ ૭૨ पाडो १ २१ ३. सोनारवाडो २ १७ कुंभारीयापाडो २ ४२ ३२ फोफलीआवाडो ११ २९५ १८ तंबोलीवाडो ६ ३५२ ३३ जोगीवाडो १९ खेजडानो पाहो १. ९ ३४ मफलीपुर २० वडापाडो १ ३५ मालोवाडो १ २२ -२१ वडी पोसालनो ३६ मांडणनो पाटो ३. ८९ उपाडो ५ ७५३७ गदा वदानो पाडो३ ९० २२ साहनीपाडो २ १५७ / ३८ मल्लिनाथनो पाडो१ १७६ २३ कंसारबाडो. ५ ७६ ३९ भाणानो पाडो २४ भलावैद्यनो पाडा ? ४. समुद्र फडोओ २५ भंसातवाडो १ ३६/११ चोखावटीनो पाडो२ १८ २६ सहावांडो २६९७ ४२ बलीयानो पाडो १ ११ ३ २ ܕ खराकोटडी' नो अर्थ' खरतरगच्छवालाओनी वेठक' अवो संभव छे, कारग के त्यां खरतरगच्छवालाओनो जत्यो हतो, आजे पण त्यांना रहेवासीयोमांना केटलाक पोताने खरतरगच्छीय तरीके ओलखावे छे. २ आजे में बाल मणियाती पाडो' कहेवाय छे. ३ हालनो 'झवेरीवाडो' ए ज वडीपोसालनो पाडो छे.
२९ चै० प्र० न. वासनाम नं. वा० ४३ अवनी महेताना ५. दोशीयाने पाडो ૨ ५९ शांतिनाथनोपादो५ १२८ ४४ कुसुंभीया पाडी ४ ६८ | ६० कटकोमा चाडो २ ६९ २२ नाकर मोशनो ६१ आनावाडो पाडो ४ १९६६२ सालयोवाडो- १६ माल संघवीचें. घसेरीओ स्थान ३ ३३ ६३ कुरसीवाडो १७ लटकणनो पाडो १ १२ | ६५ कइआषाडो १८ भंडारीनो पाही १ ५। ६२. कल्दारयाडो ४९ भाभानो पाडो ११५७/६६ दणायगवाडो ५० बोंबडीनो पाडो ३ ४२ ६७ धांधुली पाडो ५१ करणशाहनो ६८ ऊंचो पाहो १ ૨. पाडो ९२८० ६९ मागवाडी २२बामणवाडो ८ ८३ ७० पुग्नागवाडो ५३ खेतलषसही १२४७ ७१ गोल्हयाड ५१ लटकणनो पाडो ५२०० ७२. धोली परव ५५ कुंपादोशीनो पाडोर ३०/७३ गोदडनो पाडो ५६ घीसाधाडा ७४ नाथाशाहनो पाडो ६ ३६९ ५७ सरदीआवाही १ २३ । ७५ महेतानो पाडो १ आ वासना ये चरयोमाना एकनी प्रतिमा मस्या जगाधी नी. २ हाला ए बाम 'कनाशानो पारी' कहेवाय . ३ आज काल प स्थान मंतरवरहीं' ए नामथी प्रसिद्ध छे. अहिंना शांतिनाथनो देहरामा केटली प्रतिमा हती ते जणायु नयी. ४ १२२ ४२३१ २ २३ परिशिष्ट १० १ २ २ ? वाडीपुर २ दोलतपुर ३ कुमरगिर दबावही ५. पडली ६ नगीनो ७ नयाँ नगीनार १ ८ कनपुरा ९ रुपपुर" १८१० चापसमा ११ कंगाई १२ मुंजपुर १ २ ३१ ore 5 नंबर , २, ३, ६, ७ ग गामांनी पार गनी नमी- कमां पता नयी. २ पाटगधी दाक्षिगमा ३ गाउने टे यानाडी हामो न्या दह नथी. ३ पाटगधी पश्रिम नग कोगने पडली नाम ४ पाटगंधी दक्षिणमा २ को रुपपुर पासे कत पुरा आवर ... ५ रूपपुर अने चाणसमा पाट गधी दक्षिण पूर्व ६, ७ कोश उपर छे. ६ कयोई २ ये छे, १ ली सोलंकीनी कंयाड पूर्व दक्षिगमा २ जी काकोचीनी कंबोई पत्रिम दक्षिगना यूगा नरमः ६ उपर छे.
च प्र. संवत् १७२९ ना वर्षमा रचायेली चैत्यपरिवाटीना अनुसारे श्रीपाटण-चैत्यमतिमा-कोष्टक २. नं. वा नं० याक 1 पंचासर १९ मगर फूई २ उंची शेरी १ २० पलियारवाडो १. ३ पोपलानो पाडो २ १६८२१ जोगीयाडो २ 2 चिंतामणिपाडो २ २९२ | २२ मल्लिनायनो पाहो २ ३२८ ५ सगालकोटडी १ ३/२३ लसीयारवाडो खराखोरडी २४ न्यायशेठनी पाडोर ७प्रांगडीआयाडो १ १०४ २५ चोखायटीनापाहो? ८ कंसारयाडो २ १०१ | २६ बलीया पाडो ९ साहनी पाडो २७ अवजी महे- २० घडीपोसालनो तानी पाही १९ पाडो ३ ६३८ २८ कमुंबियावाडो २ ३१ भेडावाहो १ ५९१ २९ वायुदेयनो पाडो १ १०१ :१२ तंबोलीवाहो ३० चाचरीयो १३ कुंभागीयावाहो ३१ पदमापारेखनी १४ मांझा मदेतानो पोल १ पाटो १ १६ | ३२ सोनारयाहो ४ १५ मणीयाहो १ ११ ३३ खेजडानो पाडो ११३८ :१६ पखाली (घाडो?) १ १ फोफलीयापाडो ३ ४६८ २७ सावाटी ૨ ૬૦% ३५ खजुरोनो पाडो ११५८ :१८ भंसातवारी १ ६७ | ३६ भाभानो पाटो १ १०१ .
३२ नं. था पं० ५० ३७ लींबदीनो पाडो ३.७/५० जगुपारेसनो पारी ३५ ३८ करणसानो पाटो३ ९५३ ५६ कियावहोरानी ३९ संघधोपोल पारो १ १० खेताटयसादी २ ३७९ ॥ ५२ क्षेत्रपालनो पाडो २९१ ४१ अजुवसापाहो । ५३. कोकानो पारो २ ३९५ ४२ कुंपादोशोना पाडो १६.५४ ददेण्यारो १३ यमामाडो १ २२८ ५५ मांडताना पाडो २ ३६५ ४४ टोमीवाडो ५६ यरवारको पाटो २ ५७ गोदनो पाटो १ १५ आयादोसीनो पाडोर २६ ५८ प्रसैरीऔ १६ पंचोटडी १ १२० ५९ कलारवाटो १ १० बीयापाडो २ १३६/६० दणायगवाडो १८ फटकीओ ११०७ ६. धोधोल २१ घोलीपरय ४३६२ सारी वाथ आ बीजी चैत्यपरिवाडोना लेखक विजय पाटणनां कुल छोटा महोटी चत्यो अने तेमांनी प्रतिमाओनी संख्या नीचे प्रमाणे जणात्री द्र- "जिनजी पंचागुनइ माशने श्रीजिनवर प्रासाद हो । जिनजीभाव धी मस्त के वंदीए मुकी मन विखवाद हो|जिला जिनजी जिनपिवनी संख्या सुणो माझने तेर बजार हो । जिनजी पांचले बहोतर वंदीप सुख संपत्ति दातार हो । जिननी देहरासर श्रवणे सुण्या पंचसया सुखकार हो । जिनजी तिहां प्रतिमा रलीयामणी माझने तेर हजार हो।" १ .२३ उपर जणावेलां.९५ जिनप्रासाद नाम ठामनी. साये परिघाडीमा जणाधी दीयां छे, बोजां घरमंदिरो जेने. घणा खरा परिघाडीकारो देहरासर' ए नामथी ओरखावे के तेनी संख्या ५०० पांचसोनी जणावी ने तेमा १३००० तेर हजार प्रतिमाओ होषानु जणावे छे. प्रथम १३५७३ प संख्या पण जणाघेली छे. परिवाहीकारना कहेवाना आशय पको होय के 'पाटणमा ९५ म्होटां अने ५०० न्हानां जिनमंदिरो हतां अने तेमां अनुक्रमे १३५७३ भने १३००० प्रतिमाभी हती.' परंतु आयो अर्थ करया जता विचार ए आवे छे के सं. १६४८ मां पाटणमां न्हानां म्होटां २०० मंदिरो अने ८३६५ प्रतिमाओ ती तेना स्थाना सं. १७२९ मां५९५ मंदिरो अने २६५७३ प्रतिमाओतुं छोवू मन कबूल करतुं नथी, ८० वर्षमा उपर प्रमाणे वधारो थयो शक्य हाय तेम लागतुं नथी, कदाच एम होइ शके के प्रथमनी ज १३५७३ प संख्या बीजी वेला सामान्यपणे तेर हजार तरीके लखी होय अने देरासरानी ५०० ए संख्या पूर्व जणाघेल ९५ त्यो अने घरमंदिरो सर्घ भेलां गणीने जणावी होय तो बनवा लोग छ, अने तेमज होवू जोये, कारणके परिवाडी- कारे पोते पण सर्थ घरमंदिरो गण्यां नथी पण तेमणे 'श्रवणे सुण्यां' छ, मतलब के घरमंदिरोनी संख्या चोकस नथी, छतां पटलं तो नक्की छे के १६९८ पछी पाटणमां घर- मंदिरो भने प्रतिमामोनो खासोमलो पधारो थयो तो. सं. १७२९ थी मांढीने सं. १९६७ ना वर्षपर्यन्त पारण- . 3 ट २ भी स्थिति केटली इंदे नबली पडी अनें देहरांनी खास करीने घरदेदरासरोधी संख्या केटली यधी ओछी था गह तनो ख्याल आ नीचना कोटक उपरथी आधी जशे. सं. १९६७ मा प्रगट ययेली पाटणनां जिनमंदिरोनी मंदिरावली प्रमाणे पाटण-चैत्यसंख्या कोष्टक ३. नं० वा० प्र० नं० वा १ पंचासर १३ १८ तरसेरीआनो पारो २ कोटायालानी धर्मशाला १ १६ कटकीयावाडी ३ कोकानो पाडो २ ६७ घीयानी पाहो २ खेतरपालनो पाडी १८ धागालनी पारी ५ पडीगुंदीनो पाडे १ १९ पंचोटीनो पाडो ६ ढंटेरंवाडो २० वसावाडी ७ मारफतिया महेतानो २१ अदुवसानो पाडो पाडो २२ खेतरवसोनो पाडी ८ खारनो-पारो २३ ग्राह्मणवाडो ९ गोदडनो पाडा २४ कनासानो पाडो २. महालक्ष्मीनो पाडो २५ लांबडीनो पाडो. ११ गोलवानी शेरी २६ भाभानो पाडो १२ नारणजीनो पाडी १.२७ खजुरीनो पाडे १३ धांधल १ २८ यासुपूज्यनी लडकी १४ कलारवाडी १२९ संघीनो पाडो १ आ 'मंदिरावली' श्री पाटण जैन श्वेताग्यर संघालुनी सरमरा करनारी कमीटी तरफर्थी बहारं पाढवामा भावी छे. ३ २ २ ७ २ १ 2 २ १ २ ३ २ वा० धा प्रा २ २ २ नं. ३० फमुंबीयावाडी ४३ कुंभारीयापाडो ३२ अबजी महेतानी पाडी तपोलीधाही बलीया पाँडो ४५ कपुरमतानो पाडो ३३ चोखावरीमानी पाडा ३४६ खेजडानी पाही ३ केशुशेटनो पाने १ रमेहीवाडी ३६ निशालनी पाहा १४ असातवाडी ३६ लेखीयारवादी टेर शाहबाडो " मल्यातनी पाही ५. सानो पाडी ३८ जागीयाडा ३९ फोफलीमावाडी ६१ वडीपासालनी पाडो ६ ४० सोनीवाडो ५९ टांगडीमावाडी ४. मणीमाती पाहो ३ ५३ खराखोटडीनी पाओ ४२ ईक महेताना पाडा २५४ मापदजीनी खडकी ४ उपरना कोष्टक उपरथी जणांश के पर्तमान समयमा पाटणनी ४ चोपन घासामा कुल १२९ नी संख्यामा जन. मदिरी विद्यमान छै. जेमा मुख्य मंदिरो पा देहराओनी मंख्या ८५ पंचाशीनी छ अने चाकीनां १४ आधित त्या वा देहरासरी, के जेमा घणे भागे घरमंदिरोनो पण समावेश या आय छ, आ उपरथी घरदेरासरो कलां वधा उठी गया है तैमा ख्याल आयो जशे. आ घोडानां प्रण कारणो मानी शिकाय. जनसमाज- मां धर्मग्रन्दा भने देवपूजा-भक्तिन कमी प्यु, २ श्राकोनी , ૨૬ घसतिनो घाडी, ३-श्रावकोनुं विशेपे करीने परदेशीमा रहे. उपर जणावेलां सं. १६४८, सं. २७२९ अने सं. १९६७ नी सालमा विद्यमान चैत्योनी संख्यानां धणे कोष्टका उपरथी पाटणनी चडती पडतीनां अनुमानी थइ शकशे. यद्यपि आजे पण पाटण एक भव्य शहेर गणाय छे, हजारोनी संख्यामां अस्तित्व धरायता प्राचीन ग्रन्योना संग्रहो-भंडारोना दर्शन निमित्ते अनेक भारतीय अने यूरोपीय विद्वानोनुं ध्यान पाटण पोतानी तरफ खेची रा छे, श्रीमंत अने धनिष्ठ जैनधर्मी मनुष्योनी लगभग ५-६ हजार जेवडी म्होटी संख्याथी पाटण दजी पण पोतार्नु “जैनधर्मनी राज- धानी" ए प्राचीन मानतु नाम केटलेक मंशे निभावी रह्यं छे, एटल छतां पण पाटणनी ते प्राचीन श्रेष्टता, प्राचीन भव्यता, प्राचीन समृद्धि आजना पाटणमा रही नथी,ते श्रेष्ठताओ आजे तेनी प्राचीन स्मृतिमांज नजरे पडे छे; कृतिमां नहिं. उपरना संक्षिप्त विवेचनथी प्रस्तुत परिवाडीनी अति. हासिक उपयोगिता वांचकगणना ध्यानमां आव्यो वगर रहेशे नहि. आ प्रस्तुत परिवाडीनो शब्दानुवाद न करता तेनो सारांशमात्र तारवीने शरुआतमा आपी दीधो के जे उपरथी परिवाडीनी सर्व ज्ञातव्य बातो जाणी शफाशे, भने आशा छे के एक वार ए 'सार' वांच्या पछी परिवाडी यांच- नारने तेमां न समजाय तेवी. कंइ पण बाबत जणाशे नहि. .
आ प्रस्तुत चैत्यपरिवाडी तेना लेखके कुल २३ दालो,
एक चौपाई भने २०४ गाथाओमां पूरी करी छे.
जे प्रति उपरथी एनी प्रेस-कॉपी करवामां आवी छे,
प्रनि सं. १६४८ ना पोप यदि १ ना दियसे लखेल
छे. पटले के रचाया वाद मात्र प्रण महिनानी अंदरज लखेल
.होइ परियाडी पोताना मूल रूपमा जलवाइ रही छे. प्राचीन
गूर्जर साहित्यना ममालोचकोने तेनुं खरं स्वरूप जणाइ आवे
'पटला माटे तेमां कंड पण भाषाफेर न करता तेने
पोताना मूल स्वरूपाज कायम राखी प्रकट परवा उचित
थाय छे.
कदरदान पाचगण पटन-पाटन द्वारा आ चैत्यपरि-
याहीथी लाभ हांसिल फरी लेखक अने प्रकाशकाना उद्देशने
सफल करो एवी शुभाकांक्षा माथे विरमीप छोए.
-मुनि कल्याणविजय.
प्रस्तुत पाटण चैत्यपरिपाटीनो सार. १ (चोपाई) २ ढंढरवाडो- ते समयमा ढंडेरवाडामां ऋण म्होटो अने आठ घर देरासर मली कुल ११ अग्यार देहरां हां, म्होटो३ देहराओमा १ सामला पार्श्वनाथनु,२ महावीरनुं अने ३ पार्श्वनाथर्नु. आठ वरमंदिरोमां-१ गोवाल झवेरीनु, २ पन्नादोसीन, रायमलनु,४ शा.धनाजीनु,५ मेला वीसानु,६ वीसा- भीमान, ७ राजु दोसी, अने ८ रतन संघवीतुं. हंडेरवाडानां आ सर्व देहरांनी सर्व मली ५५६ पांच सो छप्पन्न जिनप्रतिमाओ हती. ढंढरवाडाथी आपणो आ संघ कोकाना पाडा भणी जाय छे. १ पाटण चैत्यपरिवाडीना कर्ता आचार्य श्रीललिव- प्रभसूरि पूनमियागच्छना होइ पोताना उपाश्रयवाला याप्त- ढंढेरवाढाथी चैत्यपरिवासी यात्रा शह करे छे. २ आ घरमंदिरो मूलनायकना नामथी न जणावतां तेना करावनार गृहस्थना नामथीज जणायां छे, आगे पण केटलेक ठेकाणे आ प्रमाणेज समजवान छे.
, (दाल १ ली) २ कोकानो पाडो- त्यां प्रथम कीका पारेखने देहरे ऋषभदेव विगैरेने वां- दीने कोकापार्श्वनाथने भेटे छे, अने त्यार पछी श्रीवंत दोसीने घरे वासुपूज्य स्वामीने वादे छे, कोकाना पाडानां उपर्युक्त ३ देगसरोमा ५+१३९+६२-२६६ बसो छासठ प्रतिमाओ जुहारी संघ खेतरपालने पाडे गयो. ३ खेतरपालनो पाडो- आ पाहामा एकज देहरुं हतुं जेमा भगवान् शीतल- नाथनी मतिमा १६७ एकसोने सडसठ जिनविश्नी साये विराजमान हती; तेने वांदीने संघ जगुपारेखने पाडे गयो. ४ जगुपारेखनो पाडो- आ वासमा भगवान् नेमिनाथनुं अने शांतिनाथन एम वे देहरा हतां, प्रथममां नेमिनायजी विगैरे३ प्रविमाभो इती, ज्यारे बीनामां-के जे जयवंत शेठना देहरा वरीके प्रसिद्ध हतुं तेमां-शांतिनाथ अने वीजी अग्यार मली कुल १२ पति- २ परिवाडीना कर्नाए पाहानु नाम लख्यु नथी, उतां 'कोकापार्श्वनाथ उपरथी अमोए मा वासने 'कोकानोपाडो' कहीने ओलखाव्यो है. --लेखक.
ܘܰ , माओ हती, ते वांदीने संघ खारीवाव उपर गयो. ५ पहेली खारी वाव- पहेली खारीवावे ऋषभदेवने चेहरे ४ प्रतिमाओनां दर्शन करी संघ वीजी खारीवावे गयो. ६ बीजी खारीवाव- त्यां जइ महावीर प्रभुने भेट्या, अहीं १३ तेर जिन- प्रतिमा अने बे गौतम स्वामिनां विव हतां, ए सर्वने बांदी संघ नागपढे आव्यो. (ढाल २ जी), ७ नाजमढ- ज्यां भगवान् नेमिनाथ देहरु अने ९ नव जिनप्रति- माओ हती तेने वंदन कर्यु अने त्यारवाद संघ पंचासराना पाडामां गयो. ८ पंचासरानो पाडो-- पंचासराना पाडामां आ वखते कुल ५ पांच जिनमंदिर हतां. १ महावीर- २ वासुपूज्यनु ३ पंचासरा पार्श्व- नाथन ४ ऋषभदेवतुं अने ५ नवधरानु पार्श्वनाथनु. आ पांचे देहरासरोमां सर्व मली ९+२७+८+१०(?) ४३९७ सत्ताणु वा तेथी पण अधिक प्रतिमाओ हती. पंचासरथी संघ ची शेरी भणी गयो.
४१ . - ९उंची शेरी- उंची शेरीमां शांतिनाथर्नु देहरु हतु जे 'भणशा- लीन देह' ए नामयी प्रसिद्ध इतुं, त्यां कुल २३ जिन- मतिमाओ इतो. अहीयी आगे संघ ओशवासना महोल्लामा गयो. १० ओशवाल महोल्लो- .. ओशवालोना महोल्लामा ३ त्रण देहरा इत्तां, १ शांति- नाथन, २ भोलडीया चन्द्रप्रभनु अने ३ श्रावका पार्श्व- नाथन. आ णे जिनमंदिरोमां सच मली प्रतिमाओ +१+ २३३१ एकत्रीश इती. ए पछी संघ पीपलाने पाडे गयो. (हाल ३ जी) ११ पीपलानो पाडो- अहिं शांतिनाथ- देवरु हतुं अने शांतिनाय उपरांत चीजी च्यार प्रतिमाओ हतो, तेने चांदी संघ चिंतामणिने पाई गयो. १२चतामणिनो पाडो-- अत्र शा. वळुने देहरे अजितनाथ विगैरे सान जिन- मतिमाओने बांदी संब शांतिनाथने देहरे थइ चिंतामणि पाधिनाधने देहरे गयो, चिन्तामणिना पाडामा कुल ३ દર देहरा अने +२१+६७=१५ पंचाणु प्रतिमाओ हती, अहींथी संय खराखोटडीमा आव्यो. १३ खराखोटडी- अत्रे अनेक जिनमंदिरो अने प्रतिमाओ हती. १ आ- सधीर ठाकरने देहरे चन्द्रप्रभ अने पीजी वे प्रतिमा. २ सदय बछ ठाकरने देहरे पार्श्वनाथ अने बीजी वे प्रतिमा. ३ अष्टापदावतार नामर्नु देहरु (आमांनी विवसंख्या ज- णावी नथी, प्राय २४ विव हो) अने ४ चन्द्रप्रभवें देहरु- ज्यां ओगणसाट जिनप्रतिमाओ हती, जेमा एक रत्नमयी हती. ५ खरतरगच्छनी निश्रावालं शांतिनाथर्नु बावन जिनालयवालुं (विधिचैत्य) अने ६ ऋषभदेवनुं देहरु, आ वन्ने देहरांनी मळी २७२ वसो वहोंतेर प्रतिमाओ हती, अने तीर्थकरोनां माता-पितानी मूर्तिओ पण अत्र हती. ७ सोनी तेजपालनु पार्श्वनाथवाल घरमंदिर अने ८ टोकर सोनीनुं सुमतिनाथनु घरमंदिर. आवेमां अनुक्रमे २९५४ प्रतिमाओ हती. आ प्रमाणे खराखोटडीमां कुल ८ मंदिर अने ३+३+२४+५९१२७२+२९+४=३८४ प्रणसो चोराशी प्र- तिमाओ हती. ए सर्वने जुहारी आपणा यात्रिको प्रांगडी- आपाडे आव्या.
-
(दाल ४ यी)
१४ त्रांगडीआपाडो-
आ पाहामां ऋपभदेवर्नु एक म्होटु देहरु इतुं, मां
३७५ त्रणसो पंचोत्तेर प्रतिमाओ विराजमान हवी. अहाथी
संघ मणिहटि पाडे भान्यो.
१५ मणिहट्टि पाडो-
आ पाडामां वे जिनमंदिरो हतां १ महावीरनुं अने २
देवदत्तनुं आ बनेमा प्रतिमाओ अनुक्रमे ५+१३ हती. मणि-
याती पाहामांथी संघ माका महेताने पाडे गयो.
१६ माका महेतानो पाडो-
ज्या भगवान् शांविनायर्नु एक देहरु हतुं, अने मूलनायक
सिवाय वीस प्रतिमाओ त्यां विराजमान इती, अहीं वंदन
करी संघ कुंभारोये पाडे पहोंच्यो.
२७ कुंभारीया पाडो-
अत्र २ वे देहरा इतां, १ अमीचंद सोनीन अने २ वछ
जवेरीनु. पहेलामां भूलनायक शांतिनाथ उपरांत १७ सत्तर
जिनप्रतिमाओ इत्ती, बीजामा चोवीस तीर्थफरोनी पविमापी
इची तेने बांदीने आपणो यात्रालु संघ तंबोलीवाडे गयो,
१२
(ढाल ५ मी)
१८ तंबोली वाडो-
अहिं कुल ६ देहरा हता. जेमा १ सुपार्श्वनाथर्नु हतुं
ज्यां ७३ जिनविंव हता, २ वीजा मंदिरमा ७ विव हतां,
३ रूपा वहोरानुं आदिनाथनु, ४ मेघा पारेखनुं चन्द्रप्रभy,
५ घूसी, ६ शा.सीराजनुं संभवनाथन छेल्लां ४ देहरामोगां
जिनविंच अनुक्रमे १०+५+२+२५५ हुतां. सर्व मंदिरोनी
प्रतिमासंख्या ७३+७+१०+५+२+२५५=त्रणसो वावन हती.
तंबोली वाडाथी संघ खेजडाने पाडे गयो.
१९ खेजडानो पाडो-
ज्या 'सारंगजें देहरु 'करीने एक जिनमंदिर इतं, तेमां
नव प्रतिमाओ हती तेने जुहारी संघ वडावाडे गयो.
२० नवडा वाडो-
वडा (तरभेडा) वाडामां जइ शांतिनाथने वांद्या,
अत्रेनें देहरु घणुं रमणीय होइ ९९ नवाणु जिनविंवोधी
अलंकृत हतुं, त्यांथी दर्शन करी संघ वडी पोसालना पा-
डामां आव्यो.
२१ वडीपोसालनो पाडो-
आ पांडामा कुल ५ मंदिरो अने ३४+४+६+१४+१३
-
=७५ मतिमाओ हती. देहरामोमा १ सोमा शेठनुं ऋपभ- देवर्नु, २ भुजबल शेठनु श्रीश्रेयांसनायर्नु, ३ वाटीपुरमंडन पार्धनायर्नु, ४ सहसा पारेखनुं श्रीपार्धनायर्नु अने ऋषभ- देवन. आ पांचे देहरा जुहारी संघ शाहने पाडे गयो. (ढाल ६ ठी) २२ शाहनो पाडो-- 'शाहना पाटामा २ देहरां हवां. १ आदीश्वरनु अने २ रायसिंघने घरे शांतिनायनु. मयममा ८७ सत्याशी मति- माओ हती, ज्यारे वीजामा ७० हती. ए पछी संघ फंसार वाडे गयो. २३ कंसारवाडो-- अत्र १ देहरुं शीतलनाथन आन्यु, ज्यां १२ जिनमति- माओ हती. २ शांतिनाथना देहरामा २२ प्रतिमाओ वांदी ३ शा. चांपाने देहरे जइ १६ सोल प्रतिमाओ वांदी त्यांची ४ चौथा शाहने घरे ये रत्नमयी प्रतिमाओनां दर्शन करी५ पार्श्वनाथने देहरे चोवीस जिनमतिमाओने नमन कयु, आ रीते कंसारवाडामा कुल ५ मंदिर अने १२+२२+१६+ २+२४७६ जिनप्रतिमाओ चांदी संघ भलावैधने पाड़े गयो. २४ भलावैद्यनो पाडो- - ४६ ज्यां चन्द्रमभन देहरु अने वेत्रण प्रतिमा हती. वैद्यना पाडाथी यात्रालु संघ भंसातवाडे पहाच्यो. २५ भंसातवाडो- (अत्र शांतिनाथ आदि ३६ छत्रीस जिनमूर्तिओ हती,) एक गौतमगणधरनी प्रतिमा पण विराजमान इती, भंसान- वाडाथी संघ सहावाडे आव्यो. ( हाल ७ मी) २६ सहावाडो- ज्या सुपार्श्वनाथ अने पार्श्वनाथनां वे देहरा जुहायाँ, अहीं ८५+६१२८६९७ छसो सत्ताणु प्रतिमाओ इती. हवे संघ सगरकुई आव्यो. २७ संगरकुई- अत्रे त्रण देहरी हता-१ पार्श्वनाथन २ पुजाशेठने घरे ऋषभदेवर्नु अने ३ जयचंद शेठवाल शांतिनाथ, आ मंदि- रोमा २०+३०+२८३ प्रतिमाओ हती तेने बांदी संब हेवतपुरे गयो. २८ हेबतपुर-- - ज्या १०५ एकसो पांच जिनर्विव वादी संघ मोढेरना 'पाडा भणी गयो. .
२९ मोडेरनो पाडो-- मोढेरना पाडामा ४ च्यार प्रतिमाओ वादी आपणो आ भाविक संघ नारंगे पाढे आव्यो. (ढाल ८ मी) ३० नारंगापाडो--- आ पांडामां नारंगा पार्धनायर्नु अने 'शोभीवें । एमचे मंदिरी हती, बनेनी मंळी ४२+२३०२७२ मंतिमाओं हती, तेने वांदी संघ सोनारवाडे यइ फोफलीआवाडे गयो. ३१ सोनारवाडो- सोनारवाडामा बे देवरा हता-२ शांतिनीयन अने २ महावीरनु. बन्नेमा प्रतिमा १४+१=१५ ईवी. ३२ फोफलीआवाडो- फोफलीआवाडौ आजनी माफक पूर्व पण यणो विशालहतो, त्यां वासमंदिर अने घरमंदिर मली कुल १२ अपार जिन- मंदिरो हनां; जे नीचे प्रमाणेना नामोथी औलखाता ऋषम- देवर्नु, २ शांतिनापर्नु, ईरानाशेर्नु-संभत्रनायन, ४ काछ- कौन-मुनिमुव्रतर्नु, ५ वीरजी शेउनु-पार्श्वनायन ६ थावर- पारेखनु,७ महुलाशेटनु-मुनिमुत्रनु, ८ कोठन-पावनायर्नु, ९ राजाशेउनु-नेमिनायनु, १० बछा दोसीन-पार्थनाथनं ४८ अने ११ पार्श्वनाथन. आ सर्व देहराओमा प्रतिमा नीचे प्रमाणे हती-७८+२५+२०+१२+४+४६+१५+३४+३६+ १५+१०२९५, फोफलीआ वाडायी संघ जोगीवाडे गयो- (ढाल ९ मी). ३३ जोगीवाडो- आ महोल्लामा ३ त्रण जिनमंदिर हतां. १ पार्श्वनाथर्नु, २ विद्याधर शेठन अने ३ भोजादोशी--पार्श्वनाथ. आत्रणे मंदिरोमां प्रतिमा २०+३४+१०-६४ चोसठ हती, अहींथो संघ मफलीपुरे गयो.. ३४ मफलीपुर-- ज्या पार्श्वनाथना मंदिरमा १२ वार जिनचिंच वांयां, त्यांथी संघ मालोवाडे गयो. ३५ मालीवाडो--- ज्यां श्रीजीरावला पार्श्वनाथ अने २४ चोवीस जिन- प्रतिमा वांदी संघ मांडणने पाडे आव्यो. ३६ मांडणनो पाडो- मांडणने पाडे ऋण जिनमंदिरो हता-१, संभवनाथ, २ धनराज -पार्श्वनाथन, अने ३ शेठ कमलशीनु शांतिनाथन. आ देहराओमां सर्व मली ९+४४+३६८९ नव्याशी जिन- प्रतिमाओ हती, जे चांदी संघ गदावदाने पाडे गयो, (ढाल १० मी) ३७ गदावदानो पाडो- आ पाहामा १ शांतिनाथन, २ गला जिनदत्तनु-शांति- नाथन अने ३ धूपाधृलान: एप त्रण देश हतां जेमा प्रतिमा ५८+२५+७=९० नेचु इती. अश्थी संघ मलिनायना पाडामा गयो. ३८ मल्लिनाथनो पाडो- मलिनायना पाटामां मल्लिनाथ विगैरे १७६ एफसो छहो- तेर जिनप्रतिमा वादी संघ भाणाने पाडे गयो. ३९ भाणानो पाद- भाणाना पाटामा पार्श्वनायर्नु एफ देहरु तुं, मां ९८ अटाणु जिन विध विराजमान हता,ते वांधी संघे समुद्रफटीमा तरफ प्रयाण फयु. ४. समुद्रफडीओ- समुद्रफडीआमां शांतिमय- एक देह अने कुले १९ मतिमाओ इती. त्यांची संघ नानावटीने पाडे आव्यो..
- ४१ चोखावटीनो पाडो- अहीं शांतिनाथ आदि दश जिनप्रतिमा जुहारी साणे- सरा ऋपभदेवजीने देहरे जइ आठ जिनप्रतिमाओ वादी संघ- समुदाय वलीयाने पाडे गयो. ४२ बलीयानो पाडो- वलीयानापाडामां भगवान ऋषभदेव विगेरे अग्यार जिन- विवोनी यात्रा करी संघ अवजी महेताने पाडे आव्यो. ४३ अवजी महेताना पाडो- आ पाडामां वे देहरा हतां, १ शीतलनाथन अने २ शांतिनाथन. पहला देहरामा ७ जिनपतिमाओ इती; ज्यारे वीजा देहरानी प्रतिमा संख्या परिपाटीकारे जणावी नयी. इवे संघ कुसुंभीमा पाडामां आव्यो. ( ढाल ११ मी) ४४ कुसुंभीआ पाडा- ज्यां कुल ४ देहरा हता-१शीतलनाथन, २ पार्श्वनाथन, ३ जगपाल, ४ वाछा दोसीने त्यां मोहनपार्श्वनाथन. आ ४ देहराओमां सर्व प्रतिमा १९+१२+२०+१७-६८ हती,ते चांदी संघ नाकर मोदीने पाडे गयो. - ४५ नाकस्मोदीनो पाशे- आ पाडामां पण ४ देहां हनां जेना, नाम-१ पार्श्वनाथन २ नानजी पारेखने घरे वासुपूज्यनु ३ घरमसीने पर शांति-'. नायर्नु ४ सोहा पारेखनुं श्रीपार्श्वनाथन. आ सर्वमा प्रति- माओ ११२+१७५३१+३६=१९६ हती. जेमा एक प्रतिमा रत्ननी जने एक सीपनी हनी. हवे संघ मालू संघबीने पाडे आव्यो. (हाल १२ मी) ४६ मालू संघचीनो पाडो- अत्रआवी १मनमोहन पार्थनाय जुहार्या, ए उपरांत रहेम- राजने देहरे मुमतिनाथ अने.३ रानयर संचवीने देहरे विमल- नाथने वांद्या. आत्रणे देहगमा प्रतिमा २६१२५=३३ हती, ते बांदी संघ लटकणने पांडे आव्यो भने त्यांयी भंडारीने पाहे थइ संघ भाभाने पाहे गयो. ४७ लटकणनो पाडो- लटकणने पाडे शांतिनाथन देहरं अने १२ भनिमाओहती. ४८ भंडारीनो पाडो-- मंडारीना पाडामां पार्थनापर्नु देहर्ग अने कुल ५ प्रनि- माओ इती.
४९भाभानो पाडो-
भाभाने पाडे १ श्रीपार्श्वनाथन, २ तेजपाल शेठ
धर्मनाथ, ३ सहसकिरणने घरे सुमतिनाथर्नु, ४ पंचायणने
घरे शांतिनाथनु, एम कुले ४ देहरा हता.जेमा प्रतिमा ५१+
१७५२५+६४-६५७ हती. हवे संघ लींबडीने पाडे आव्यो.
६० लींबडीनो पाडो--
आ पाटामा ३ त्रण देहरा हतां-१ सारंगदोसीने घरे
सातफणा पार्श्वनाथनु, २ रायचंद दोसीने बरे शांतिनाथर्नु,
अने शांतिनाथर्नु नवु देहरुं. आत्रणेमा प्रतिमा १२+१६+
१४४२ हती, तेने वांदी संघ करणासाहने पाडे गयो.
( ढाल १३ मी)
५१ करणासाहनो पाडो-
करणासाहनो पाडो जे आजे 'कनासानो पाडो,
ए
नामथी ओलवाय छे, ते घणो महोटो होइ ९ देहराओथी
मुशोभित हतो. देहराओनो अनुक्रम नीचे प्रमाणे हतो-
१ शीतलनाथy, २ वीरा दोसीन-श्रेयांसनाथर्नु, ३ वीरपाल
दोसीनु-ऋषभदेवर्नु, ४ समरथ महेताने घरे पार्श्वनाथन, ५
हरिचंदने घरे कुंथुनाथ, ६ धरमसीनु-चन्द्रप्रभY, ७ शवजी.
५३ संघवीन-नेमिनाथन, ८ सारंगपारखनु-शांतिनाथनु, ९ कमा शाहने घरे शांतिनाथनं आ सर्व देहराओमां ६७+१४+१८ +१८+७+४७+१४+४८+४७-२८० बसो अशी प्रतिमामो इती. जेमां रतननी अने १ रूपानी इती, ए सिवाय २ थट्टक हवा. करणासाहुना पाडाथी संधे वांमणवाडा भणी भयाण कयु. (दाल १५ मी) २२ यांभणवाडो- बांभणवारा-बा ब्राह्मणवाडामा लगभग ८ जिनमंदिरो नीचे जगावेला हतां-१ वहोरा चीरदासने घरे वासुपूज्यन, २ हीरा वीसाने धरै शांतिनायर्नु,३ सहेमु संघबीने घरे शांति- नायर्नु, ४ महावीरनु, ५ हीरनीने घरे शांतिनाथन, ६ शां- विनायर्नु, ७ विमलसी शेटन, ८ पुंआ पारेखने घरे ऋषभ- देवन. आ सर्व मंदिरोमां प्रतिमा २४+१३+७+५+१०++ ८+११८८३ हती, जेमा ६ मनिमा रत्नमयी हवी. ब्राह्मणवाडानी यात्रा करी संघ खेनलयमही गयो.' ५६ खेतलवसही- न्यां पार्थनाथन एक देहरं इंतु अने नेमां २४७ जिन- - प्रत्तिमाओ हती, अहीं वंदन करी आपणा यात्रालुओ लर- कणने पाडे गया. (ढाल १५ मी) ५४ लटकणनो पाडो- आ पाटामां१ गपूदोसीने घरे अजितनाथनु, २ शा वासाने घरे चन्द्रमभनु, ३ लालजीने घरे संभवनाथर्नु, ४ शांतिनाथन अने ५ वीरजीने घरे शांतिनाथन एम कुल ५ देहरा हता. जेमां प्रतिमा १२+५१+९३+२२+२२२०० बसो हती, तेमां ६ विच रत्नमय हतां, अहोंथी संघ कुंमा दोसीने पाडे गयो. ५५ कुंपादोसीनो पा- कुंपादोसीना पाडामा २ देहरां हतां-१ ऋषभदेव , २ गणीआदोसीने घरे पार्श्वनाथन. वन्नेमां प्रतिमा ८+२२= ३० हनी, अहोथी संघ वीसावाडे गयो. (ढाल १६ मी) ५६ वीसावा- वीसावाडामां १ पुजा शेठने घरे पार्श्वनाथन, २ अमरदत्त सोनीने घरेधर्मनाथन.३ वीसाविमृनु-पार्श्वनाथन, ४ अमरपा- लनु-अजितनाथनु, ५ अने शांतिनाथन, एम पांच देहरा हतां.
मां प्रतिण १७+११+१९१४१५०-१०१ हती, तेमा २
प्रतिमा रत्नमयी हवी.ए पछी संघ सरहोआवाडे आव्यो.
५७ सरहीआवाही-
ज्यां ऋषभदेव आदि बीश जिनपतिमा वांदी संघ
त्यांची दोसीवाडे गयो.
५८ दोसीवाटो----
दोसीवाडे हटना पर रेहरासरमा भगवान् शांतिनायने
भेटी संघ शामिनाथने पाढे गयो.
५९ शांतिनाधनो पाहा--
आ पाहामा १ लक्ष्मीदासनादेहरासरमांशांविनाय विगैरे
अने २ संघरानना देहरामां पार्थनाय प्रमुखने वादी संघ हेमा
सरहीभाने घरे आयो, त्यां पार्थनाय अने वीजीउनालीर
प्रतिमाओबांदी ४ शांगिनायने देहरे गयो, ज्यां४७ मनिमाओ
बांदी त्यांची ५ कचौड़या पार्श्वनाथने देहरं जा पार्श्वनाथ आदि
सात निनप्रतिमाओना दान कर्या, आ प्रमाणे शांतिनाथने
पाढे ५ देहरे १२+१५५४७५४७+७=१२८ प्रनिमामो
हती. त्यांची यात्रालुसंघ कटकीआवादा भणी चाल्यो.
६० कटकीआवादी-
आ महोल्टामा १ ऋपभदेवर्नु अने २ शेठ विमलदासने
बरे अजितनाथन एम वे देहतं हता, बग्नेयां प्रतिमा ५५+
१४-६९ ओगणसित्तेर हती. ने वांदी संघ आनावाडे गयो.
६१ आनावाडी-
ज्यां नेमिनायतुं देहरं अने ३४ प्रतिमाओ हती ते जु-
हारी संघ सालवीवाडे गयो.
(हाल १७ मी)
६२ सालवीवाडा-
सालवीवाडाना त्रसेरीआमां १ भगवान् नेमिनाथ अने २
मल्लिनाथनां देहराओमा ८७+७५-१६२ जिनवित्र वांदी संय
कुरसीवाडे शांतिनाथने देहरे आव्यो.
६३ कुरसीवाही-
ज्यां शांतिनाथ विगेरे ७४ प्रतिमाओ हती तेने वांदीने
संघ. कइआवाडे आव्यों.
६४ का आवाडा-
काआवाडामा १ महावीरने देहरे अने २ रायचंद संघवी ने
स्यां वासुपूज्यने देहरे अनुक्रमे ५+१४:१९ जिन वांचा
अने त्यांथी संघ कल्हारवाडे गयो.
६५ कल्हारवाहा-
कल्हारवाडामां शांतिनाथ आदि ५५ पंचावन जिनर्विक
जुहारीने संघ दणायगवाडे गयो.
६६ दणायगवाडा-
दणायगवाडे ऋषभदेव आदि ७० जिनविंच वांदी संघ
धाधुलीपाडे गयो.
६७ धांधुलीपा-
धाधुलीपाडे मुविधिनाथ आदि ७१ जिन प्रतिमाभोने वं-
दन कयु अने त्यांची उंचे पाडे गयो.
२८हुंचो पाझे-
'.. उंचे पाडे पार्थनाय आदि त्रण मतिमा जुहारीने संघ
सबागवाहा तरफ चाल्यो.
६९ सत्रागवाटा-
सत्रागवाटे पाचनाय आदि दध जिनवियनां दर्शन करी
संये पुन्नागवाडे प्रयाण कयु.
७० पुन्नागवाडो- पुन्नागवाडे पार्श्वनाथ आदि १० जिनविच वांदी संघ गोल्वाडे गयो. ७१ गोल्हवाड- गोल्हवाडमा देहरां हता-१ पार्श्वनायचं, २ पाना- यर्नु, ३ ठाकर शाहने घरे रत्नप्रतिमावालं पार्श्वनाथन - गेमा प्रतिमा ५+११९+१=१६५ हती ते वांदीने संघ पोली- परवे गयो. ( दाल १८ मी) ७२ घोली परव- घोली परवे ४ देहरा हता-१ मुनिमुद्रतर्नु, २ ढा पारे- खने बरे शांतिनाथन, ३ देवदत्त दोसोने घरे चंद्रमभस्वामीनू, ४ रामा सोनीने घरे पार्श्वनाथनु, एम धोली परवे ४ देहरां अने ५२+५+४+१८१२२ एकसो बाबीस प्रतिमाओ हती जेमां एक रत्नमयी प्रतिमा हती, ते उपरांत बे पट्ट हता. अहींची संघ गोदडने पाडे गयो, ७३ गोदडनो पाडा- .." अहीं ४ देहरां हता-१ ऋषभदेवन, २ वीसा थावरने घरे ऋषभदेवनु, ३ हीरजी दोसीने त्या पार्श्वनाथन अने ४ उदयकरणने घरे ऋपभदेवन, एमां अनुक्रमे १७२+१४+१+ +५२०२३९ प्रतिमाओ इत्ती, ते वांदी संघ नाथाशाहने पाडे गयो. (दाल १९ मी) ७४ नाथाशाहनो पाडो- ज्या ६ छ देहरा हता-१ शांतिनाथर्नु, २ वादोसीने घरे चंद्रमभनु, ३ प शेटने घरे चंद्रप्रभ, ४ सूरजो शेउनु, ५ रामा दोसीन अने ६ रहीआ दोसीन, आ देहराओमाँ मतिमा १९०५७०+१३+१५५४९२२९-३६९ हती, जेर्मा एक प्रतिमा सीपनी हती. ए वांदी संघ महेताने पाडे आव्यो, ७५ मतानो पाडो- ग्या मुनिसबत अने बाछा शाहने घरे पार्श्वनाधर्नु एम वे देहरी हवा अने तेमा २०३२३. प्रनिमामो हती जे आ- पणा आ संये हर्षभेर भेटी. (ढाल २० मी) आ प्रमाणे पाटणमा १०१ एकसोने एक जिनचैत्य ए- " रले म्होटा जिनप्रासादो हना अने नवाणु देहरासर अर्थात् छोटां जिनमंदिरो इता. उपर जणावेल १०१ महोटां देहरांओमां ५४९७ पांच हजार च्यारसोने सत्तागुं जिनप्रतिमाओ इती, ज्यारे छोटा ९९ देहरासशेमा २८६८ चे हजार आठसोने अडसठ जिन- प्रतिमाओ हतो. ए सर्वमां एक विद्रुम(प्रवालरत्न )नी, वे सीपनी अने आडत्रीश रत्ननी इती. उपर जणावेल वंने प्रकारनां देहराओनी अने वीजी कुले मळी ८३९४ आठ हजार त्रणसो अने चोराणुं प्रतिमा हती, ते उपरांत ४ च्यार मूर्तिओ गौतमस्वामीनी अने च्यार पट्टको हता. पाटणना सर्व महोल्लाओनां नाम ग्रहणपूर्वक सर्व देहरा अने विष संख्या जणावी हवे चैत्यपरिवाडीकार आचार्य ललितप्रभमरि पाटण शहेरनी पासेना केटलांक गाम नगरना चैत्योनी परिपाटी पण आ परिवाडीना पेटामा ज लखी जणावे छे. .
-- परिशिष्ट. (दाल २१ मी) १ वाडीपुर- के जे पाटणनी नजीकमां एक गाम हनुं ज्या अमीझरा पार्श्वनायर्नु देहरु हतं जेमा १ पार्श्वनाथनी अने एक वीजी एम ये प्रतिमाओ हवी. २ दोलतपुर-एमां एक जिनमतिमा हनी. ३ कुमरगिरि- कुमगिरिमा २ जिनमंदिरो शांतिनाथनां इतां-१ खर- तरगच्छनु ना गंभारामां ये मतिमाओ हती अने भमतीमा ५० पचास जिनयिर हतां. २ जु चैत्य त्यांनी पोसालमा हतुं जेना गंभारामां शांतेनाय अने वीजी छत्रीश प्रतिमाओ मळी कुले ३७ प्रतिमाओ हती अने तेन चैत्यमा ४९६ च्या- रसो छन्नु पीतलना जिनधियो हतां. ४ वावडो- एमां शांतिनाथ, देहरु अने १८ अहार प्रतिमाओ हती, ५ वडली- अहिं खरतरतुं शांतिनाथन देहरु अने ४० च्यालीस प्रतिमाओ हती, एक मृत्ति जिनदत्तमुग्निी पण त्या हती, त्यांज बीजु देहरु महावीरनु हतुं जेमा घणीज मुंदर प्रतिमा 'विराजमान हती. ३ नगीनो- एमां पार्थनायतुं देवरं हतुं जेमा ७ सात प्रतिमाओं हनी. ७ नवो नगीनो- एमां पण श्री शांतिनाथन रेहरु अने पिस्तालीश प्रति- माओ हती, वीजुं बहोत्तेर जिनालय जिनमंदिर नवा नगी- नामां इतुं जेमा कुले ७५ पंचोत्तेर प्रतिमाओ हनी. (हाल २२ मी) ८ कतपुरा- कतपुरामा बे मंदिरो हतां-१ शांतिनाथर्नु अने २ समय- सरणवालुं ऋषभदेव- वन्नेमा प्रतिमा १+७=८ इती. ९रूपपुर- आ नगरमा १० दश देहरा हता-१ पार्श्वनाथन, २ ऋषभदेवन, ३ डंगर महेताने त्यां अजितनायन, ४ बोधा शेठने घरे चोवीस तीर्थकरोनु, ५ गणराज शेठन, ६ वस्ता शेठने घरे शांतिनाथर्नु, ७ जगु शेटनु,८सांडा बहोरानु पार्श्व- नाथनु, ९ रंगा कोठारीने घरे शांतिनाथन अने १० कुंअ- रंजी शेठने त्यां शांतिनाथन. आ दशे देहरांओमा प्रतिमा - , अनुक्रमे १००+२++६६+२४+६३+११+३४+३+१४५ १४-३६७ त्रणसो सडसठ इती. २० चाणसमा- आ गाममां श्रीभट्टेवापार्धनायन मंदिर इतुं अने तेमां कुल ३४ चोत्रीश प्रतिमाओ हती. ११ कंयोई- अत्रे पाधिनायन देहरुं इतुं ज्यां गंभारामा ५ अने भम- मीमां १६, सर्व मली २१ मतिमाओ इत्ती. १२ मुंजपुर- अहिं एक देहरु अने त्रण प्रतिमाओ इती. आ प्रमाणे परिवाडीकार पाटण अने तेनी नजीकना गामोनां देहरामोनी हकीकत लखी छेवटे शंखेश्वर पाना- यना गुण वर्णवे हे. (दाल २३ मी.) शंखेश्वर तीर्थमा केटली मतिमामो छे. अने तेनी ऐति- तिहासिक स्थिति केवी छे ते यावतमा परिवाडीकार कंड पण जणावता नथी. शाखेश्वरनु पर्गन करी छेवटे ग्रंथकार नीचे प्रमाणे पोवानी गुरुपरंपरानो उल्लेख करवापूर्वक पोतानी ओलखाण पापी प्रस्तुत नैत्यपरिवाडीनी समाप्ति करे. .
प्रशस्ति अने उपसंहार. पून मिया गच्छनी चंद्रशाखामां श्री भुवनप्रभमूरिनामे गुणी आचार्य थया. भुवनमममूरिनी पाटे कमलप्रभमूरि अने तेमनी पाटे पुण्य- मभरि नामे आचार्य यया. पुण्यप्रभमरिनी पाटे श्रीविद्याममूरि थया जे पोताना सम- यमा एक गुणी पुरुप तरीके प्रसिद्ध हता. ते विद्यापममूरिना शिप्य ललितमममूरि धया के जेमणे विक्रम संवत १६४८ ना आसोज यदि ४ चोथ बने रविवारने दिवसे आ पाटण-चैत्य-परिवाडी' बनावी हे. आ परिवाडोमां पाटण अने यासपासना गामडाओनां सर्व मलीने ९५९८ नव हजार पांच सोने अठाणु जिनविधोने परिवाडीकारे नमस्कार कर्यो छे. अंतमा फरिने ग्रन्थकारे पोताना इष्टदेव शंखेश्वर पार्च- नाथ अने पोताना गुर ने याद करीने पाटण-चैत्यपरिपाटीने. पूर्ण करी छे. मुनि.कल्याणविजय. . , श्रीललितप्रभसरि--विराचता पाटण चैत्य-परिपाटी.' ॥ चउपई॥ सयल जिणेसरमणमी पाय । सरमति सहगुरु हईडइ ध्याइ । पाटण-चैत्यपरिवादी कहुं । जिनवि नमतां पुण्य ज लहुं ॥१॥ पहिलं हंडेरवाडइ नामि । सामला पास ऊरुं प्रणाम । जिमणइ पासइ कलिकुंड पास । मनवंछित सवि पूरइ आसं॥२॥ इकतीस प्रतिमा वीजी होइ। वीजइ देहरइ वीरजिन जोइ । त्रिसला नंदन मेव्या सही । संघ सहू आव्या गहगही ॥ ३॥ डावइ पासइ चंद्रप्रभ स्वामि । जिमगइ पासइ लघु वीर ठाम । विसई सात्रीस करूं जुहार । गौतम विंव एक छइ सार ॥४॥ गोवाल जवाहिरी देहरासरि । सात मविमानई ऊलट भरि। वंदी प्रतिमा रत्नमइ एक। दोसी पन्ना परि सुविया ॥५॥ १ आ परिपाटी ' नी प्राचीन प्रति ललितप्रभसूरिमा कोइ शिष्यनी लखेली जणाय छ, तेनी आदिमां 'ॐ नमः सिद्धं । पुज्य श्री गच्छाधिराज भट्टारक श्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्री ललितप्रभसूरि सद्गुरुभ्यो नमः जिनाय ।' आषो उल्लेख कयों छे. ५
T
चौद प्रतिमा तिहां वंदी करी । रायमल देहरासर हईइ धरी ।
ऋपभादिकं जिन छत्रीस तिहां । एक रत्नमय वली छइ जिहाद
त्रीजइ देहरइ आन्या जाम। पास जिणेसर भेट्या ताम।
अंजनगिरि कइ मेरु सुधीर । जाणे उन्नत जलघर खीरा॥७
सतर भेद पूजा सुविशाल । कीजइ भावई रंग रशाल।
ऋपभादिक जिन इतालीस । भगतई भावई नाम शीसादा
सहा धनजी देहरासर दीठ । नयणे अमीय रसायण पईट ।
ऋषभादिक प्रतिमा इग्यार । चुवीसवटु छइ एक उदारा।९।।
मेलाविसा देहरासरि आवि । ऋपभादिक वासठि नमुंभावित
विसा भीमा देहरासर सार । ऋपभादिकजिन त्रीस विचारि
दोसी राजू देहरासर देपि । अठावीस जिनवर हरपाइं पेपि ।
रतन संघवी देहरासरि जिणंद । पंचवीस जिन दीठई आ-
‘णंद ॥ ११ ॥
॥ वस्तु छंद्॥ सकल जिनवर २ पाय पणमेवि। सरसति
सामिणि मनि धरी । सुगुरुपाय पणमेवि भत्तिई। चैत्यपरिवाडी
पत्तनह करुं कवित नवनवी जुत्तिई। ढंढेरवाडइ जुहारीआ
सकल जिणेसर देव। पंच सया छपन्नया तिहुअण सारइ
सेव २॥१२॥
६७
.
वीर-जिणेसरचरज०. ए. ढाल ॥१॥
कीका-पारपि देहरासरि ए। आन्पा मनरंगिई। :
चंदी प्रतिमा पंच तिहां ऋपभादिक चंगइ,
देहरइकोका पासनाइ । भेट्या जिन होइ ।
शत ऊपरि सात्रीस तिहाँ । काउसमीआ दोइ ॥ १३ ॥
'दोसी श्रीवंत घरि अछइ एं। वासुपूज्यं जिणंद
इकसठि जिन चीजो अङइ ए । दीपइ दिणंद ।
पाटक खेत्रपालनइ ए । जिन शीतलनाय ।
सतसठि शत अपरि वली ए । भेटई सनाथ !॥ १४ ॥
पारिपि जगू पाडलइए । नेमिपतिमा जाण।
वे विव अवर अछइ ए । भवी पनि आणउ।
जयवंतसेठि-देहरासरि ए। शांति पडिमा जोई।
अणमंतां ते हृदयहेजि । सवहाँ सुख होई ॥ १५ ॥
एकादश छइ अवर वित्र । रयणमय इक सार ।
पारी वावई ऋपभजी ए। जिन पडिमा च्यारि ।
गौतम ग़णहर दोइ .वित्र । वीजी पारीवावि ।
सिद्धत्यनंदन. भेटीआ ए ।तेर प्रतिमा भावि ॥ १६ ॥
॥ तउचडीउ घणमाण:ए दाल ॥२॥
नागमढई हर्षि आवीआ ए। दीठा नेमि जिणंद तु ।
'प्रतिमा नव तिहां दीपती ए। अभिनव जाणि दिगंद तु॥१७॥
૨૮
पंचासरइ पाटकि अछइ ए । धुरि वीर जिनवर सारत् ।
नव प्रतिमा वंदी करी ए । वासुपूज्य जुहारि तु ॥ १८ ।।
सतावीस विच तिहां नमी ए। पंचासरु प्रभु पास तु ।
अवर सात जिनवर नमुंए । वंछित पूरइ आस तु ॥१९॥
ऋपम देहरइ हिवई जिन नमु ए । दश वलि भमती होइ तु।
नवइ घरै छइ पास जिन । त्रिहतालीस विव जोइ तु ॥२०॥
ऊंची सेरी शांति जिन । भणसालीनई नामि तु ।
अरिहंत त्रेवीस हुँ नमुंए । उसवालानइ ठामि तु ॥ २१ ॥
सोलम जिन छ विवस्यु ए । नमतां हुइ प्रेमि तु ।
चंद्रप्रभ भीलडीतणा ए। इक नमता हुइ पेम तु ॥ २२ ॥
सावकु पासजिन पूजतां ए। इईडइ हरिप अपार तु। .
अवर वावीसइ जिन नमुंए । पामउ मुख अपार तु ॥२३॥
॥ ढाल गउडीन॥३॥
पाटक पीपला नामि । शांति जिणेसर च्यारि प्रतिमा अवर
नमुंए।
अजितादिक जिन सात । चिंतामणि ए साह व देहरासर
नमुं ए॥ २४॥
विश्वसेन कुलमांहि चंद। नंद अनोपम अचिरा राणी तेह तणुए।
अवर वीस जिण पूजी। आव्या वीजइ ए पास चिंतामणि
ए भणु ए॥ २५ ॥
सतसठि जिनवर होई। मणमी आवीइ पराकोटडी जिहां
अछइए।
आसधीर ठाकर देहरइ । चंद्रप्रभ जिनवर वि प्रतिमा पूजी
अछइ ए॥ २६॥
सदयवछ कर देहरइ । पास जिणेसर वि प्रतिमास्यू पर-
वर्याए । अष्टापद-अवतार।
देवी हरप्या ए चंद्रमभनिन शुणि भर्या ए ॥ २७ ॥
ओगणसठि जिनर्विव । थंभ अनोपम बिच स्यणमय इक
भ[ए।
परतरनउँ बली चैत्य । सोलम जिनवर शवननिणालं तेह तणु
ए॥ २८॥
जुहारी आध्या बीनरामयम जिणेसर(अदभुत मूरति पेखिलाए।
चैत्य विना मेली । विसइ विहुत्तरि मातपिता जिन निरपीला
ए॥२९॥
सोनी तेजपाल परि । पास जिणेसर उगणत्रीस प्रतिमा
जुहारीइ ए.
टोकर सोनीगेहि सुमति निणंदजी मतिमा च्यारि उद्धाराइ
ए॥३०॥
७० - ॥ ढाल सामेरी ॥४॥ आव्या पाटकि ब्रांगडीह रे। ऋपभनइ देहरइ चडीइ । जिहां पाप अढारइ नडीइ रे। पुण्यरयणे तिहां वली जडीइ जिमणइ पद्ममभ स्वामी रे । पास पूरइ वंछित कामी। त्रणि सई पंच्योत्तरि प्रतिमा रे । निरूपम जेहनउ महिमा।।३२॥ मणिहट्टीनइ देहरइ रे । वीरजिनमहिमा मेर इ । प्रतिमा पंच ते जाणउं रे। देवदत्त चैत्य वखाणां ॥३३॥ तेर जिणेसर भावी रे । मांका महितानइ पाटकि आवी। मृगलंछन जिन रंगइ रे । अवर. वीस जिन चंगई ॥ ३४ ॥ पाटकि कुंभारीइ पेपी रे । सोनी अमीचंद घरि जिन निरपी। शांतिजिन हईइ धरिउ रे । सतर जिनस्यु परिवरीउ ॥३५॥ वछ जवहिरी घरि दीठा रे । चुवीस जिनवर बइठा । जिनपूजा भावई कीजइ रे । समकित लाहउ लीजइ ॥ ३६ ॥ ॥ढाल जलहीन ॥५॥ त्रिणि पल्योम भोगवी ए ढाला! तंबोलीवाडइ आवीआ भावीआ देव सुपास । प्रतिमा दीपइ बहुत्तरि पूरइ जन-मन आस । वीजइ देहरइजिनवर सात नमउ ते सार । बुहरा स्पा मंदिरि आदि जिणंद उदार ॥ ३७॥ प्रतिमा दश छइ मनोहर मुर नर सारइ सेव ।
७१
मेघा पारपि धरि अछड़ चंद्रप्रभ जिन देव ।
पांच ज मतिमा प्रणमीअ आव्या धूसीनइ गेह ।
दोई जिणेसर वंदीम कीघा निरमल देह ॥ ३८॥
सहासीराज देहरासरि संभव जिनवर होइ ।
प्रतिमा विसई पंचावन भवियणभावई जोइ ।
पेजडानह पाटकि सारंग देहरासर तेह ।
नव प्रतिमा नमी करी वडावाडउ जेह ॥ ३९ ॥
विश्वसेन-नंदन निरपीआ परपीआ नवाण देव ।
मंडप रचना चउकीभ ईईई हरिप्यु ए हेव ।
वडी पोसालनइ पाटकि सेटिं सोमानइ गेह।.
ऋपभादिक जिन चउत्रीस दीपइ मुंदर देह ॥ ४०॥
भुजवल सेठि देहरासरि विंव श्रेयांसस्वामी ।
पंचइ पडिमा रयणमइ अणि अवर जिन पामी॥
वाढीम पुरवरमंडण नयणे निरप्या आज ।
वीजा जिनवर पंच ए सारइ पंछित फाज ॥४१॥
सहसा पारपि घरि नम पास जिणेसर भावि ।
तेर प्रतिमा अवर अछइ ऋपभनइ देहरई ए आदि ।
तेर निणंद तिहां निरपीआ हम्पीआ मानव मन ।
भावई पूजा.ले रचइ नेहना जनम ए धन्न।॥ ४२ ॥
.७२ ॥ दाल ऊलालानः ॥६॥ पारकि सहानद ए आयी। आदि निणंद निहां भावी सत्यासी पडिमा ए देपी। रायसिंघ घरि शांति निरपी ।। ४३ ॥ सत्तरि कंदी विच तिहां वंदी। पाप अहारइ निकंदी। कंसार वाइह ए दीठा । शीतल जिनवर ईटा ॥४४॥ द्वादश विच ए नमीआ । आठ महाभय ए शमीया। वीजइ शांतिजिन पूज्या। बावीस पडिमार वृझ्या ॥४५॥ सहा चांपानइ घरि । विव सोल देहरासरि । रयणमइविंव बइ ठवीआं । चउथा सहा परि नमी॥४६॥ वंद्या पास जिणंद । चउवीस दीपइ दिणंद । भला वैद्यनइ पाटकि । चंद्रप्रभ दीपइ हार्दीक ॥४७॥ प्रतिमा बइ नमी भावि । भइंसातवाडइ ए आवि । शांति जिनादिक छत्रीस । गोयमस्वामि मुणी ॥४८॥ ॥ ढाल फागनउ ॥७॥ सहावाडइ हिवई आवीइ भावीइ देव सुपास । पंच्यासी पडिमा नमी आबीइ देहरइ पास । सप्तफणामणिशोभित ओपित देह उदार । छसइ बारोत्तर भेटीइ मेटीइ पाप अहार ॥ ४२ ॥ .
सगरकूड हवई जुहारीइ सारीइ पूजा पास ।
पडिमा वीस वंदी करी सेठि पुंजानइ बासि ।
ऋपभादिक जिन त्रीसइ ए दीसइ महिमानिधान ।
'जयचंदसेविनई मंदिरि सुंदर शांति प्रधान ॥५०॥
तेत्रीस जिनवर निरपीआ हरपीआ भविअण सार।
हिवदपुरइ हवई जाईइ गाईशित्त उदार ।
उपरि पंच सोहइ वली मेलो सयल जिणेश ।
पाटक मोढ २नइ ए साइइ च्यारि दिणेश ॥५१॥
|| कनक कमल पगलां ए ढाल ॥८॥
पाटक नारंगह आवीआ ए । भावीआ पास जिणंद ।
नारिंग प्रभु भेटीइ ए । भेटइं मंगल होइ । नारिंग प्रभु भेटी।
चंद्रवदन तुह्म देषतां ए । हूउ हृदय उल्हास । नारिंग०॥५३॥
सुरिज कोडि थकी घणउं ए। दीपइ तेज प्रकाश नारिंग०५४॥
पूजई पदमा पामीइ ए । नामई आठइ सिद्धि नारिंग०॥५॥
घड्याळीस पदिमा परगडीए । आव्या शोमी गेहि ।
नारिंग०॥५६॥
त्रीस ऊपरि वह सइंवली ए । जुहारी मननइ भावि ।
नारिंग ॥२७॥
सोनारवाडइ शांति नमु ए । पडिमा चऊद उदार ।
नारिंग ॥५८ ॥
७१
वीजइ देहरइ वीरजिन ए ! पोही पडिमा एक । नारिंग०॥९९||
फोफलिआवाडइ पदम जिन अट्टोत्तर जिन विधानाः ॥६०॥
वीजें देहरुं शांतिन ए । पडिमा पंचवीस होइ । ना० ॥ ६१ ॥
देहरइ राजा सेठिनइ एवंदर संभवं देवं । ना० ॥६॥
पडिमावीस तिहां दीपती ए ! काठेलानइ चैत्य । ना०॥६||
मुनिमुवत जिन पूजीइ ए । पडिमा बार विचारि । ना०॥६४॥
सेठि वीरजी देहरासरि ए। पूजउ पास जिणंद । ना०॥६५॥
पडिमा च्यारि ज सोहतीए । थावर पारपि गेह । ना०॥६६॥
छयालीस पडिमा दीपती ए । सेठि महुला घरि आवि ।।
ना० ॥ ६७ ॥
मुनिसुव्रत जिन वंदीआ ए । प्रतिमा पनर सार । ना०॥६॥
सेठि का देहरासरू ए । च उत्रीस पडिमा पास । ना०॥६९॥
सेठि राजा देहरासरू ए | छत्रीस विंचन नेमि | ना॥७॥
दोसी वछा घरि आवीआ ए। पूनीआ पास जिणंद ।
ना० ॥ ७१ ॥
पन्नर पडिमा वंदीइ ए । पंचमइ देहरइ पास । ना०॥ ७२ ॥
प्रतिमा दस तिहां दीपनीए । वंदी आणी भाव | ना० ॥७३॥
। ढाल ॥ वइरसेनराइं व्रत ली ए० ॥९॥
जोगीवाडइ आवीआ ए । प्रभु पासनिणेसर भावीआ ए
पडिमा वीस तिहां वंदीइ ए। सयल पाप निकंदीइ ए॥७४॥
७५ सेठि विद्याधर परि भणी ए।उत्रीसइ पडिमा जिनतणीए। दोसी भोजा परि भणउंए।श्रीपास जिणेसर हुँघुण ए।।७५ दस पडिमा तिहां सोहती ए । रयणमइ एक न मोहती ए. मफलीपुरि वामातन ए बारइ प्रतिमा धन धनू ए॥७६॥ मालीचाडइ दीठडा ए। पास जीराउल पइटहा ए। वित्र चवीसइ जिनतणां ए। पूरइ वंछित कामणा ए॥७॥ पारक मांडण महितला ए। संभव जिनवर दीउला ए। नव पडिमा तिहां गुणि भरी ए। सयल लोकनइ जयकरी ए७८ धनराज देहरासर लही ए । पासमतिमा वली तिहां कही ए। चिआलीस पडिमा मिली ए । रयणमइ एक ज विहां वली ए ॥७९॥ सेठि कमलसी देहरासरू ए शांति जिनेसर मनहरू ए । छत्रीस पडिमा सुंदरू ए भविभण जननइ सुखकरू ए 1000 ॥ इंद्राणी जिन पुंपीआ ए ढाल ॥१०॥ गदावदो पाटकि आवीआ ए। भेटीआ शांति जिगंद ह। धनधन जिनवरू ए । पेपतइ परमानंद तु । भविअण जयकरू ए॥८॥ अठावन जिनवर वंदीआ ए। गला जिणदत गेहि तु । धन २॥जि० ॥२॥ .
७६ अचिरानंदन निरपीआए। पडिमा पंचवीस जोइ तु । धन २ ॥ जि०॥८३॥ धुपा धला परि हवई आवीइ ए । परपीआ सात जिणंद तु । धन २॥ जि० ॥ ८४॥ 'पाटकि मल्लिनाथ वंदीआ ए । एक सउ छिउत्तरि देव तु । धन २ ॥ जि० ।। ८५॥ पाटक भाणानइ आवीआ ए ।सेवीआ पास जिन स्वामितु । धन २॥ जि० ॥ ८६ ॥ अठाणुं जिनवर मुंदरू ए । समुद्र फडीआनइ ठामि तु । धन० २॥ ८७॥ विश्वसेननंदन वंदीआ ए । पडिमा अवर अढार तु । धन० २॥८८ ॥ 'पाटक चोषावटी आवीआ ए । शांति ज जिनवर भावि तु । धन २॥ जि० ।। ८९॥ दसजिनवर पूजीआ ए । साणेसर वंदिवा आवि तु ! धन २ ॥ जि० ॥९० ॥ ऋषभादिक आठ जिन पेपीआ ए। पाटकि चलिआनइ भावितु । धन २ जि० ॥ ९ ॥ रिसह जिनवर पूजीआए । इग्यारनइ प्रमाणि तु । धन २॥ जि० ॥ ९२ ।।
७७ महिता अबजी पाटकि जाणीइ ए । शीतल जिनवर देव तु । धन २॥ जि०॥ ९३।। जिनवर सात तिहां अरचीआ ए। लहु देहरइ जिन शांति तु। धन २॥ जि०॥९४॥ ।। ढाल ॥ बाहुबलि राणानी० ॥११॥ कुसुंभीआ पाटकि हिवई । दीठला शीतल देव रे । उगणीस पडिमा तिहां जुहारीइ । वारीइ दुरगति देव रे ॥१५॥ पेपउ २ श्रीजिनचंद्रमा । पामः २ सुक्ख उदार रे । भविमचकोर जिणइ दीठडइ । उल्हसइ हईइ अपार रे। पेषु २ श्रीजिन० आंचली। वीजइ देहरइ हिवई बंदीइ ! पासजिनप्रतिमा चार रे । जगपाल देहरासरि नमी । पडिया वीस ज सार रेपिपु०९।। वाछा दोसी घरि हिवइ पूजीइ । मोहनपास जिनदेव रे । सोल ज विच अवर नमुं । कीनइ २ भगवई सेव रेपिपु०॥९७॥ नाकरमोदीनइ पाटकई । पूजउ २ पास जिन स्वामि रे । प्रतिमा शत वली बार भणुं । पहुचइ २ वैछित काम रोपिपु०९८ नानजी पारपि घरि वली। पूजु २ वासुपूज्य जिनदेव रे । मतिम सोल अवर अ छइ ।धर्मसी घरि शांति देव ॥पेपु०९९ एकत्रीस जिनवि भाव सोउं । चंदीइ हरषि उल्हासि रे। सांडा पारपि देहरासरई। बंदउर श्रीजिन पास रेपेपु०१०० ७८ तेत्रीस प्रतिमा अवर भणी । रत्नमय छइ वली एक रे । सोपर्नु विव वलीजुहारीइ । अरचीइ पुफि विवेक रेपेषु०॥१॥ । तस्तलि नरपति लाहडी ए ढाल ॥ १२ ॥ मोहन पास जुहारीइ जी। गाल संघवी ठामि । छवीस पडिमा वंदी करी जी। कीजइ जनम मुकाम ॥ २ ॥ सुगुणनर भेटर श्री जिनराय । हईडलइ भाव धरी घण जी। आंचली ॥ [पूजा त्रिभुवनराय ।। हेमराज देहरासरि भणुं जी । मुमति जिणेसर देव । इक पडिमा वली तिहां अछइ जी । त्रिभुवन सारइ सेव ॥३॥मु० राजधर संघवी घरि थुगुं जी । विमल जिणेसरस्वामि । च्यारि प्रतिमास्युं सोहती जी । जईइ लटकण ठामि ॥४॥मु० शांति जिणंद तिहां पेपीआ जी । वार प्रतिमा वली होइ । भंडारी पाटकि हुं नमुंजी । पास पडिमा तिहां जोइ ।।५॥ मु० च्यारि प्रतिमा वली तिहां कही जी।पाटक भाभानि पास। इकावन पडिमा पूजीइ जी। पूरइ वंछित आस ॥ ६॥ सु० तेजपाल सेठि देहरासरि जी । धर्म जिणेसर स्वामि। सतर पडिमा पूजतां जी। सीझइ वंछित काम ॥ ७॥ सु० सहसकिरण घरि निरपीआ जी । सुमति श्रीजिनराय । 'पंचवीस पडिमा अरचीइ जी। पंचायण घरि आइ॥ ८॥सु० - शांतिमृरति निरपी करी जी। जिनवर इसठि जेह । लीबडी पाटकि आवीइ जी । सारंगदोसी गेह ॥९॥सु० सप्तफणामणि पासजो रे। वार जिणेसर देषि । रायचंद दोसी परि वली जीशांवि जिणेसर पेपि॥१०॥मु. सोल प्रतिमा अवर अछइ नी । रयणमयी पडिमा दोइ । शांति देहरइ हिवइ आवीइ जी।सोलम जिणेसरजोइ।।१।।मु० चौद प्रतिमा तिहां वंदीइ जी। लीजइ पूजी लाह । 'नवउ प्रासाद सोहामणउ जी दीठउ मननइ उछाह ||१२||मु० ॥ वीर जिणेसर दीए देसना दाल ॥१३॥ करणा साहा पाकि अछइ ए । शीतल जिनवर देव तुं पेपिला ऊलट अति घणंइ ए 1 सनसठि जिनवर सेव तु ॥१३॥ पूजीजइ शीतल मुंदरू ए। मुंदरमुख जीसिउ चंद तु। तेजि दीपद दिनकरू ए ॥ आंकणी ।।.. दोसी वीरा देहरासरू ए । श्रेयांस जिनवर सार तु । तेर प्रतिमा अवर नमुं ए-भेटू शेठेज-अवतार तु॥१४॥०॥ दोसी वीरपाल घरि भण ए.! ऋषभदयाल जिनदेव तु । विच अदार अरचीइ ए । महिता समरय घरि हेव तु॥१५॥पू० तिहां नहुँ वामानंदनू ए !.सतर वित्र चली जुहारि तु । हरिचंद घरि कुंधु जिणेसरूए । सात पडिमा-मनोहारित॥.. ॥ १६ ॥ पू०॥
८० सहा धर्मसी देहरासरि थुगुं ए। चंद्रप्रभाजिनवर स्वामि तु । सतालीस पडिमा वंदीइ ए। शवजी संघवी ठामि तु॥१७॥पू० शिवादेवी नंदन चरचीइ ए। पडिमा झैद उदार तु । स्यणमय पडिमा च्यारिभणीइ ए। तेजतणउ नही पार ता१८पू० पारषि सारंग शांतिजिन ए । अठतालीस विंव ज होइ तु । सहा कमाघरि आवीइ ए । शांति जिणेसर जोड़ तु ॥१९॥पू० सतालीस पडिमा जुहारीइ ए । पट वि तिहां विचारितु । रयणमय पडिमा च्यारि कही ए।रूप्पमय एक ज सार ता॥२०पू० ॥ नाचड़ इंद्र आणंदस्युं ढाल ॥ १४ ॥ चंभणवाडइ आवीइ । चुहरा वीरदासनइ गेह रे । वासुपूज्य जिन पूजीइ। जिन चउवीस मुदेहरे ॥२१॥ गावउ २ जिनवर गुणि भरया । पामउ २ सुक्ख विशाल रे। मनमोहन जिन दीठडइ ! हईडइ हरिप रशाल रै ॥ आंकणी ॥ रयणमय पडिमा इक नमी । हीरा विसा परि जेह रे शांतिजिणेत्तर दस वली। दीठइ निरमल देह रे ॥२॥गात्रु०॥ सहित संघवी घरि भण। मृगलंछन जिनराय रे। छ जिनवर अवर नम्या । हस्ती चित्र मुठाय रे ।।२।गावु०॥ वीर जिणेसर देहरइ । पूज्या त्रिसला पूत्र रे। च्यारि पडिमा अवर नमी । हीरजी घरि पहृत रे॥२४गावु०॥
अचिरानंदन जिहां अछइ । दस जिणंद उदार रे । शांति देहरइ ते जुहारीइ । सात विव छइ सार रे॥२५ गावृ०॥ विमलसी सेठिनई परि वली। आठ विंच मन मोहइ रे । रयणमय जिनवर विंध तिहा। तेजई अतिवणुसोदइ ।२६गा० पारपि पुंआ घरि भणजे । अपभजिनंद दयाल रे। रजतमय विवन च्यारिअछइ । इग्यार जिन मयाल रे॥२७गा० येतलवसहीपासजिन् । दीपइ पूनिमचंद रे। चिसय सतालीसविध नमुपेखिला परमानंद रे ॥२८॥गाबु०॥ पूजा कीजइ भावसिउं । जिनवर अंगि सुचंग रे। सूरीआभइ निम पूजीआ। सोहमइ मनरंगि रे॥ २९॥ गावु०॥ ॥ धनर साधु जे पनि रहइ ए ढाल ॥ १५॥.. पाटक लटकण आत्रीआ ! दोसी गपू परि। अजित इग्यार पडिमा बली। अरचु पूजु सुपरि ॥ ३०॥ मुणि २ भविषण प्राणीआ । लाघउ जिनधर्म । पूजा भावना भावीइए कहीउ मर्म || आंकणी ॥ सहा वाछा परि हुँ भणुं। चंद्रमम स्वामी। एकापन जिनवर निरपीआ । छ स्यणमय पामो ॥३१ मु०॥ लालजी धरि मुंदरू | संभवजिन देव । . बाण विव तिहां दीठला । कीनई जिनसेव ॥ ३२ मु०॥ . - r ८२ - . देहरइ शांतिजिन निरपीआ । वावीसइ पंती। वीरजी घरि सोलम जिन् । बाबोसइ पंनी ॥ ३३ सु० ॥ कुंपा दोसी पाटकि आवीआ। रिसह जिन भावउ । आठ प्रतिमा तिहां बंदीइ । भावना भावउ ॥ ३४॥मु० ॥ दोसी गणीआ घरि हवइ । पास पडिमा होइ । या वीस जिनवर परपीआ। पंडित जन जोइ ।। ३५ मु०॥ सतर भेद जिन पूजीइ । ज्ञातासूत्रइ भाषी। जिनवचन हुईडइ धरी । द्रूपदी सापी ॥३६ मु०॥ ॥ राग मेवाड़ ए ढाल ॥ १६ ॥ विसावाडइ पुंजा सेटि घरई। पासजिन निरप्यारे आज। सोल प्रतिमा रयणमय इक वली। दीठइ.सरी रे काना३७ मूरति निरपु रे जिननी भावसिडं। ते नर नारी धन्न । जे निजभावई पूजा आचरइ । ते नर लहइ बहुपुन्य ।। आंचली। सेानी अमर दत घरि धर्मजिन । पडिमा इग्यार जेहा विसा विमूनइ देहरासरि । जिन त्रेवीसमु वली तेह॥३८ मा अवर अढारइ जिन तिहां वंदीइ । रत्नमय एक ज सार । अमरपाल देहरासर भणउं । अजितह रयण उदार ॥३९॥मू० प्रतिमा अणि वली जिहां अछइ । देहरइ पुहुता रे जाम । सोलम जिनवर निरष्या भावसि पंचास पडिमा रे ठाम४०० सरहीआ वाडइ ऋषभजिणेसरू । वीस जिनवर जुहार । दोसी वाडई हट्नइ घरि । शांतिजिन दीठ रे सार॥४१०॥ शांतिनाथनह पाटकि। लिपमीदास देहरासरि जिनशांति। प्रतिमा वारइ पूजइ भावस्युं । टालइ भवनी भ्रांति ॥ ४२ मू० ॥ संघराजनइ घरि वामानंदन । पन्नर पडिमारं तांहि । हेमासरहीआधरि हिवइ आवीदाबीसमउ जिन ध्याइ४३मू० छयालीसपडिमा अवर जुहारी । लीजइ भवनु रे लाह । शांतिमृरति सयालीस वली अछइ । टालइ भवनु रे दाह॥४४० पास कंबोईउ ते वलि जुहारीइ । सात ज पडिमा रे सार । कटकीआवाडइ रिसहज पूजीइ । पंचावन जिन उदार॥४५० सेटि विमलदास बरि अजितजिणेसरू । चौदह जिन धन धना निरपु जिनजी हुईइ इरिपस्यं । वसु वली बार इवन्न ॥४६ मू० आनाबाउइ रंगई आवीइ । दीउला श्रीजिन नेमि । प्रतिमा चुत्रीस भावई पूजीइ । जिम पामउ सवि पेम ।।४७मृ०॥ ॥ पापभ घरि आवइ छइ ए दाल ॥ १७ ॥ आए मालवीवाडइ आवीइ । सेरीआ वली मांहि । नेपि जिन जुहारउनी । राणीरायमइ बहु । जीवदया प्रतिपाल || नेमिः ४८ आंचली।सत्यासी जिन पूजीइ। देहरइ श्रीजिनमलिनेमि०४९
-
पंच्योत्तरि बिंब निरपोआं । कृरसीवाडइ आविराने मि०५०॥
शांतिजिन तिहां परपीआ।अवर विच तिहाँ ते ॥ नेमि०५||
कईआवाडइ वीरजी । प्रनिमा पंच उदार । नेमि० ॥५२॥
रायचंद संघवी वासुपूज्य । विय चौद विचारिसानेमि०॥५३॥
कल्हारवाडइ शांतिजी । विंच पंचावन होई ॥नेमि०॥५४॥
दणायगवाडइ पटम जिण । सत्तरि जिनवर जोड़। नेमि०५५
घांधुलि पाटकि मुविधि जिन । एकोनरि जिनसागाने मि५६
ऊंचइ पाटकि पासजी। जिन नमुत्रपाइ ताहि। नेमि०५७ ।।
सत्रागवाडइ जुहारी। विध नव तिहां पास। नेमि०॥५॥
घुनागवाडइ आवीइ । दस विच पासस्युं होई ।। नेमि०६०॥
गोल्हवाडइ श्री पासजी। पडिमा पंच तिहां दीठ नेमि०६१
वीजइ देहरइ वीसमु । पडिमा शत उगणीस निमि०॥६२ ॥
रयणमय पडिमा एक चली। ठाकरसाहन गेहि । नेमि०६३
पास जिणंद तिहां दीठहा। पूगी मननी आस । नेमि० ॥६॥
॥ ढाल माई धन्न सुपन० ॥१८॥
पेपउ धउली परवई । मुनिसुव्रत जिन देव ।
वाचन जिनपडिमा । सुर नर सारड़ सेव ।
दूदा पारपि धरि छड्। शांति जिणेसर राय ।
पंचइ जिन नमतां । मुख संपद सवि थाइ ॥ ६५ ॥
.
दोसी देवदत्त घरि छइ । चंद्रप्रभ जिन स्वामि ।
सततालीस जिनवर । पूजतां शिव टाम ।
सोनी रामा परि छइ । पास जिणंद जुहारउ ।
अढाइ जिनवर पूजी। भवभय वारउ ॥ ६६ ॥
विच रयणमइ वंदु । तिहां छइ एक ज सार ।
वइ पट्ट अनोपम । दीठइ सवि मुखकार ।
गोदडनइ पाटकि । पूजउ ऋपभ दयाळ ।
जिन सरिपा वरणई । पेपर रंग रशाल ॥ ६७ ॥
एकसउ चिऊत्तरि । प्रणमंता हुइ प्रेप !
विसा थावर घरि छइ । रिपभ करइ ते पेम।
चौदह जिण पूज्या । विहां निज उत्तम भावि ।
दोसी हीरजी देहरासरि । ईडइ हरपई आवि ॥६८।।
पासह जिण निरध्या। तिहां वली ऊलट आणि ।
उदयकरणनइ परि । ऋपभ जिन अमृत वाणि ।
शवन छइ जिनवर । पूजउ हरपि अशर ।
जिनवर गुण गातां । मुख पामर बहु पार ॥ ६९ ॥
॥ कुंकुम तिलक ए ढाल ॥ १९ ॥
पाटकि नाथा सहानइ आवउ । शांति जिणेसर भावउ ।
एकस नवागई देव । हरपिउ हड्ड देव ॥ ७० ॥
८६ दोसी बछानइ बरि । चंद्रप्रभ देहरासरि । सत्तरि जिनविय नमीइ । संसारमाहई न भमीइ ॥ ७१ ॥ सेटि पचू देहरासरि। चंद्रप्रभ जिन मुखकर । साल विव तिहां सोहर । सीपमड़ इक मन मोहइ ॥ ७२ ॥ सरजी सेठि घरि आध्या। पन्नर जिनविंद भाव्या । दोसी रामानइ परि। ऑगणपंचास जिनवर ॥ ७३ ॥ दोसी रहीआधरि देव । ओगणत्रीस कीजइ सेव । महितापाटकि निरपउ । मुनिमुत्रत जिन परपउ ।। ७४ ।। वीस जिणंद तिहां जुहारउ । पूजी समकिन धारउ । सहा वछा घरि पास । त्रणि जिन पूरइ ए आस ||७|| जिन सरिपां विंव जाणउ । पेपी भाव मनि आणउ । नियम व्रत मूबई ए पाल । समकित रयण अङ्गालउ ॥६॥ ॥ ढाल भमारली ॥ २० ॥ जिन चैत्य इम जुहारीइ तु रिभमारूली। एक सउ एक वपाणि तु! अणहल पाटणि एतला तु रि भमारूली। देहरासर वली जाणि तु ॥ ७७॥ नवाणं ते अडातु रि भमारूली। प्रणमउ भगतई सोइ तु । पाप अढारइ छ्टीइ तु रि भमारुली ।सुख संपद सवि होइ तु।।७८ विद्रुममय बिंच एक भणउं तु रि भमारूली। सीपमय बिंब वे होइ तु।
रयणमय जिन पडिमा युगुं तु रि भमारुली । अनीस
ते वली जोइतु ॥ ७९ ॥
'देहरा विच जुहारीइतु रि भमारूली। सहस पंच विचारित।
शतच्यारि ऊपरि चली तु रि भमारूली ।मत्ताण वली
सार तु ।। ८० ॥
देहरासरजिन पूजीइ तुरिभमारुली सहस विजिनस्वामितु।
शत आठ अधिक भण्या तु रि भमास्ली। अठसटि
पूरह काम तु॥८॥
आठ सहस अणि शत वली तरि भमारूली॥ चउराj
जिन जे.इ तु ।
गौतमविच्यारि नहुं तु रि भ०च्यारिज पहज होइ तु ८२
॥ दाल विर जिलेसर चंदीग ॥२१॥
चाडीपुरवर-मंडणउ ए । प्रणमीय २ अमीझरउ पास तु ।
आस पूरइ सयलतणी ए । पूजीइ २ आणी भाव तु ।।
॥ वाडीपुरवर-मंडणउ ए । चूटक।
वाडी-मंडण वामानंदन । सयलभुवनइ दीप ए ।
नमइ अमर नरिंद आवी । सयल दुरजन जोपए ।
अवर विवह एक नमतां । भगतशंकट चूरए।
दुलतपुरि जिन एक नमतां । सयल बंछिन पूरए ॥३॥
८८ कुमरगिरि जिन शांति नमु ए । महिमा ए२ जिनतणरहोइ तु । वाणीइ अमृतसम भणी ए परतर २ चैत्य विशालत। ॥ कुमर गिरि जिन शांति नमुंए । त्रूटक । नमुं शांति नवइ जिनवर । भमतीई पंचास शुणउं । पोसालमांहि चैत्य निरूपम शांतिजिणवर तिहां भणउं । छत्रीस विंव अवर नमीइ । गभारइ ते मुख करू । पीतल-पडिमा च्यारि सई वली । छउपरि मनहरू ||८४॥ सोलम जिनवर वंदीइ ए । वावडी २ जिनवर सार तु । अढारइ पडिमा सुंदरू ए । वडलीय र परतरचैत्य तु । ॥ सोलम जिनवर वंदीए. ए॥ त्रूटक ॥ वंदीइ ते सोलग जिनवर । च्यालीस पडिमा जाणी। श्री जिनदत्तसरी महिमा पूरइ । जगत्रमांहि वपाणीइ । श्री वीरचैत्य, वंदर नित्यई । मूरति अतिसोहामणी । नगीनानइ चैत्य आवी । पार्श्वजिन सात ज भणी ॥ ८५ ॥ नवइ नगीनइ आवीइ ए । पेपीइ २ श्री जिनशांति तु । पंचतालीस म्रति पूजीइ ए। पूजतां २ आणंद होइ तु ।। नवइ नगीनइ आवीइ ए॥टक ॥ नगीनइ ते नवइ आवी । बहुत्तरि जिणालुं निरंपोइ । त्रण मूरति अवर पेखी । सूधउ समकित परपीइ ।
अवर ठामे जेह देहरा । देहरासर पार ज नहीं । भगतिभावई ऊलट आणी । आदर करि वंदउ सही।।८६॥ ॥ गुरुजी रे वडामण ए ढाल ॥ २२ ॥ कतपुरि देहरइ दीठडा तु । शांतिजिणेसर भावइ रे। एक जिनवर तिहां बंदीआ तु । समोसरण हिवइ आविरे।८७ जिननी रे तुम्ह गुण घणा तु । गातां नावड़ पार रे । चंद्र फिरण जिम निरमला तु । मुगताफल जिम सार रे । ॥आंचली। पहम जिणेसर पूजीइ तु । सात जिणेसर चंगइ रे। रूपपुरि रंगई आवी तु । पास भेटघा मनरंगई रे ।।८८जिनः छिउत्तरि निणंद पूजीआ तु । भमतीई जिन चवीस रे। बीजइ देहरइ ऋषभनिन तु। वइ पडिमा नामउं शीस रे।८९जिन० महिता हुंगरि घरि भणु तु | अजितजिणेसर देव रे। छामठि जिणंद अरचीइ तु । सेठि योघा घरि हेच १०मिन चुवीस जिणंद निरपी तु । सेठि गणराज घरि आवउ रे। अइसठि जिनवर विहां अछइ । सेठि वस्ता घरि भारउ रे ॥९१ शांति जिणेसर पूजीइ तु । इग्यार जिनवर सार रे । सेटि जगू देहरासरई तु । चुत्रीस जिन उदार ९२॥मिन वुहरा सांडा देहरासरि तु । पास जिणेसर देव रे । उगणच्याली सइ जिनवरा तु । गौतम कीनई सेव रे ॥१३-१ .
रंगा कोठारी घरि भणउं त । सोलम जिणेसर स्वामी रे। चौद जिनवर तिहां भावीआ तु । सेटि कुंअरजी घरि पामी रे ॥९३ जिन० ॥२॥ विश्वसेन कुल माहइंदिनकरू तु । चौद पटिमा तिहां भावी रे। अनंत गुण छइ जिनजीना तु । क्यणे अमृत श्रावी २।९४जिनक चाणसमइ ते पूजइ तु । भटेवु श्री पास रे । चउत्रीस प्रतिमा निरपतां तु । पूगी मननी आस रे।९५जिन कंयोईइ सिरिपासजी तु । पडिमा पंच विचार रे । भमतीइ साल विव अछइ तु । मुंजपुरि त्रणिजिन सार रे ॥ ॥ ९६॥ जिन०॥ ॥ एहवउ रूअ रे नारिंगपुर ॥ए हाल ॥ २३ ॥ मई भेटिउरे संखेसर श्रीपासजी रे । ध्यायउ हुईडा मांहि । गुणसागर रे २ भविअण जननई सुखकरू रे। जस नामई रे नवनिधि घरि सवि संपजइ रे । आवइ वरण अहार वंदइ रे २ भावई धराणद पुरंदरे॥९७॥ इम स्वामी रे सविजननइ छइ हितकरु रे । जोतां आनंद होइ । मुख सोहइ रे २ निरुपम पूनिम चंद जि- || आंचली। जस महिमा रै त्रिभुवनमांहई व्यापीउ रे। नमइ अमरनरिंद । पूजइ रे २ व्यंतर ज्योतिष दिवाकरू रे। [सउरे ॥ इम
जिन ध्यातां रे मारगि शंकट सवि टलइ रे ।
दुखढा नासइ दुरि पांमइ रे २ मुखिपद सवि मुहाकरू रे ॥
॥९८ । इम० ॥
गछि पूनिम रे शाखा चंद्र वपाणीइरे। श्री भुवन मभ मूर्ति
गुण रयणे रे २ जलनिधि निम हुई गाजतु रे ।
तिम सोहइ रे कमल मभसूरी सरू रे।
तमु पाटि पुण्यप्रभ मूरि । दीपइ रे २ तेजई दिनकरराजतु रे
॥ ९९ ॥ इम० ॥
तमु पाटई रे श्री विद्यामभरी सरूरे । जेहवउ पूनिम चंद ।
नंदन रे २ गुरी माता तेह तणउ रे ।
जिम गगनई रे तारागणछेह नही रे । गंगा विलू न पार ।
गुण पूरई रे २ देहभरिओ श्रीगुस्तणउ रे ।। २०० इम० ॥
ज्ञानई रे भरी जिम हुइ जलनिधी रे ।
पम दम मद्दवसार । कीरति रे २ भूमंडलमांहि विरतरी रे।
तसु शीस ज रे ललित प्रभसूरि इम भणइ रे धन धन
प्रवाडि!
पाटणि ₹ २ मनोहर चैत्य जचिति धरी रे ॥१॥ इम०।।
संवत रे सोल वली अठतालडइ रे ।
आसो मासि विचारी । बहुल पखि रे २ चउथि तिथि
वली जाणीइ ।
चैत्य
९२ आदित रे वार अनोपम ते कहिर रे। तिणि दिन आदर आणि । भावई रे २ जिनना गुण वषा- णीइ रे ॥ इम स्वामी० ॥ जिन विव जरे जुहारऱ्या नव सहस सुंदरू रे। शत पांचइ विचारि अठाणउ रे २ ऊपरि ते वली हुं भ- ण। ए सर्व ज रे। ग्राम नगर पुर जे कया रे धरीआ संख्या.मानि। अरचूं रे २ आणंद आणी मनि घणउ रे ॥२०३ ॥ ॥ कलश ।। इम चैत्य-प्रवाडी मनि रूहाडी रची अति सोहामणी । श्रीपास पसाई चित्ति ध्याई अणहल पाटण तेहतणी। श्री सद्गुरु पामी धरउ धामी स्तवन रूपि मुहाकरो। संखेसरु श्रीपास स्वामी सयल भुवनइ जय करो ॥ २०४ ।। इति श्री भट्टारक श्री श्री ४ श्री ललित प्रभमूरि कृता समस्त चैत्य प्रपाटिका संपूर्णा' || १ संकुडिअजन्हुकुप्पर-गीषकरचरण बंधणावय वउ । अणुहवउ तुम्ह बयरी । जं लेहउ पावए मुक्खं ॥ संवत् १६४८ वर्षे पोष मासे वहुलपक्षे १ सोमे मु. गुणजी लिखितं ।। (चैत्य परिवाडीनी प्राचीन · प्रतिनी अन्त्य लेख.)
परिशिष्ट-
पंडित हर्षविजय कृता.
पाटणचैत्य-परिपाटी.
समरीय सरसती सामनोए, प्रणमी गुरुपाय ।
पाटणचैत्य प्रवाडी, स्तवन करतां मुख याय ॥ १॥
पाटण पुण्य प्रसिद्ध क्षेत्र, पुण्यनु अहीठांण ।
जिन मासाद जिहां घणा ए, मोटई मंडाण ॥२॥
मुझ मन अतिरमाइलो ए, जिनवंदन केरो।
पाटण चैत्य प्रवाही, करता हरख्यो मन मेरो ॥३॥
प्रथम पंचासरे जाइई ए, निहां मासाद च्यार ।
पंचासर जिनवर तणो ए, देखो दीदार ॥ ४ ॥
चोपन विंब विहां अतिभला ए, बली हीरविहार।
प्रतिमा त्रिण सहगुरु वणीए, मूरति मनोहार ॥५.
तिहाथी ऋषमजिणंद नमुंए । विव पनर गंभारइ।
एकसो विध अतिमलाए, भमतीए जुहारइ ।। ६॥
वासुपूज्यने देहरे ए, विव त्रण वखाणुं ।
महावीर पासे वली ए, विंव चारज जाणुं ॥७॥
उंची सेरी शान्तिनाथ, प्रतिमा पंचास । एक उपर नमतां थकां, पोहचे मन आस ॥ ८ ॥ पीपले सावको पार्थनाय, सहसट प्रतिमा सहि । सडतालीस विंच शान्तिनाथ, भवियण मन मोहे ।। १ ।। चिंतामणि पाडा मांही, शानिनाथ विराजे ! पचवीस प्रातमा तिहां भलीए, देखी दुःख प्रभाजड़ ||१०|| बीजे देहरे चन्द्रप्रम, तिहां प्रतिमा वंदं । दोसत सडसट उपरे, प्रणमी पाप निकं ॥ ११ ॥ सुगाल कोटडी प्रासाद एक, भणो पार्धनाय ।। धर्मनाथ नइ शान्तिनाथ, शिवपुरीनो साध ॥ १२ ॥ हाल ॥ १॥ देशी वाहाणनी । राग मल्हार ।। खराकोटडीमांहि प्रसाद मनोहारे । के प्रासाद मनो० । पंचमेन सम पंच के, भवियण भयहस्रे । के भवि०॥ १ ॥ अष्टापद मासादके-चंद्र भभ लहीरे। के चंद्र०) नवसन उपर सात कि, प्रतिमा तिहां कहीरे । के प्रति० ॥ चंद्रप्रभ प्रसादके, तेर जिसरुरं । के तेर० ।. पास नगीनो पट जिन ! साथे दिणेसहरं । साथै०॥ २॥ शान्तिजिणंद प्रसाद । देखी मनहरखीएरे । देखी मनः ॥ चोरासि जिन प्रतिमा विहां कणे निरखीएरे। तीहां कणे०३॥
आदिनाथ जगनाधनी । मूरति अतिभलीरे । मूरति० ॥
पंचाणु तिहां प्रतिमा । वंदो मनरुलीरे ।। वंदो० ॥ ४॥
प्रांगडिया बाडामांही । ऋषभ सोहामणा रे । ऋपभ सोग
चित्र चारसे चार के ! विहां जिनवर तणारे । तिहां जिन० ५॥
दीय प्रसाद कंसारवाडे हवे बंदीए रे । बाडे ह।
शीतल ऋपभ नमी सब। दुःख नीकंदीए रे । के दुःखनी०६॥
प्रतिमा तेर अठासी । येह देहरा तणीरे ।। के येहु०॥
जिन नमतां घरे। लखमी होय अति घणी॥के लखमी०७॥
साहना पाडामांहो । ऋपम जुहारीपरे ॥ ऋपम जु० ।
प्रतिमा दोसत चासी मन संभारीए रे ॥ के मन०८॥
चाडीपासतणो । महिमा के अति घणोरे ।। के महिमा० ।
वडी पोसालनापाडामांही अवणे मृणो रे। मांहि थ०९॥
एकसो सहतालीस । जिहां प्रतिमाय छ रे। के जिहां प्रतिः ।
घोमुख बंदी जिनराज | ऋपम नमोए पछरे।।पभ नमी०१०॥
दोसतने पणयालीस । जिन प्रतिमा तिहारे । के जिन प्रति ।।
'पंच पंधवन देहरु । लोक कहे तिहार । के लोक० ११॥
ढाल ॥ २॥ देशी हडीयानी॥
देहरासर तिहां एक, देहरासर मुविशेप ।
शेठ भुजवलतणु ए, के दिसइ सोहामणुं ए॥ १॥
९६ नारिंगपुर वर पास, जागतो महिमा जास। दोसत विंच भलाए, पणयालीस गुण निलाए ॥२॥ भेडा वाडामाही,शान्ति नमु उछांही। पंचसत जीनवरुए, एकोतरे उपरे ए॥३॥ तंबोली वाडा मझार, मुपास नमुं सुखकार ! एकसो त्रीस सदाए, प्रणमु जिन मुदाए ॥४॥ कुंभारीए आदिनाथ, प्रतिमा एकाशी साय । देहरे कोरणीए, तिहां प्रतिमा घणी ए॥५॥ सोल प्रतिमा मुखकंद, शान्तिनाथ जिणंद । मांका महिता तणे ए, पाडे सोहामणे ए ॥ ६॥ मणीयाटी महावीर, मेरुतणी परे धीर । चालीस विवसुं ए, प्रण, भावसुं ए॥७॥ तीर्थ अनोपम एह, मुज मन अधिक सनेह । दीठे उपजेए, संपदा संपजे ए ॥ ८॥ ढाल ॥३॥ पखालीए रे सेवो श्री शान्तिनाथरे। हुं वंदु रे प्रतिमा तेत्रीश' साथ रे । १ तेवीस, पवो पण पाठान्तर छे..
. सावाडे रे सामल पास सोहामणा विव पांचसे रे पासे श्राजिनवर तणा ॥१॥ जिनवर तणा ते विंव जाणुं । उपर सचावन ए। त्रेवीसमो जिनराज वंदुं । मोहिओ मुज मन्न रे । सातमो जिन मासाद बीजे । वंदीए ऊलट घरी। चालीस उपरे सात अधिकी सोहे तिहाँ प्रतिमा भली ॥२॥ सोलसमो रे शांतिजिनेसर जगजयो, भसातवाडे देखी मुझ मन मुख थयो । पांसठ जिन रे तिम वली कलिकुंड पासजी, जीराउल रे पूरे वैडित आसजी। आस पुरे गौतम स्वामी, लब्धिनी भंडार ए सगरकुइ पांत्रीस जिनवर, पाचनाय जुहारए । हवदपुरमा शुभ वर्दू जास महिमा अतियणो, एकमना जे सेव सारे पूरे मनोरथ तेह तणो ॥३॥ वलियारवाहे रे, प्रविमा सोहे सात रे। मूलनायक रे, शांति जिणंद विख्यात रे । जोगीवाडे रे, जागतो जिन प्रेवीसमो। अठावन रे, प्रतिमासु भविमण नमो ॥४॥ नमो ऋषभ जिणंद विजे, देहरे अति सुंदरु । ७ छत्रीस प्रतिमा तिहां वंदो, नमे जास पुरंदरु । बसे छासठ ' मल्लिनिनवर, मल्लिनाथपाडे मुदा । बावन जिन ने वाचन प्रतिमा, बंदीए ते सर्वदा ॥५॥ लखीयारवाहे रे मोहनपास महिमा घणो विव त्रणसे रे एकोत्तर तिहां कण गणो । सीमंघर रे स्वामी प्रासाद वासट जिना । विंव तेरसुं रे, संभव सेवो एकमना ॥ ६ ॥ एकमना सेवो सुमति जिनवर, साठ प्रतिमा सोहती। आठ उपरे न्यायसेठने पाडे, जनमन मोहती ॥ ७ ॥ चोखावटीए शांतिजिनयर, छतालीस विंव अलंकर्या । दोढसो जिन मुंबलीए पाडे, रिपभजिन जग जय वर्या ॥८॥ ॥ ढाल ॥४॥ अबजीमहेताने पाडे शीतलनाथ, प्रतिमा सडतालीस । प्रतिमा दोए शान्तिनाथ । कोसंबीयापाडे शीतलर्वित्र अहार, श्रीपासजिणेसर वीजे देहरे जुहार ॥ बासठ ! एवो पण पाठ छ.. or जुहारीए जिनवरनी प्रतिमा छासठ' मनने रंगे । सो प्रतिमा वायुदेवना'पाडामां, धर्मजिणेसर संगे। चाचरीयामा पासंजिणेसर, णसे नव तिहां प्रतिमा । पारेख पदमा पोले बीस जिन, फोफलीया नो महीमा॥१॥ सोनारवाडे मुखदायक श्रीमहावीर, छेवालीस प्रतिमा पासे गुणगंभीर । खेजडाने पाहे शांविजिनेसर पासे । एकसोने अडतीस प्रतिमा वंदु उल्लासे ॥२॥ उल्लासे वली फोफलीयामां, पास निगेसर देखु । एकवीस प्रतिमा पासे पेखी, पातिक सयल उयेवु ॥३॥ संभवनाथने देहरे, दोयसन त्राणु प्रतिमा सोहे। . शांति जिणेसर देहरे, एकसो न जिन मन मोहे ॥४॥ ॥ ढाल ॥५॥ | खजुरी मनमोहनपास, एकसो सतावन श्रीजिनपास । चांदु मन उलास तो ।। जयो० जयो०१॥ भाभो भाभामांहि विराजे, चारसे एक प्रतिमा निहां छाजे १ यासट' एवो पण पाठ छ. २. 'वासुदेयना' 'पाटां- तर) ३: पोपदशमीनो महिमा।' (पाठांतर). १. 'फरी: पंचो पण पाठ छे. .
महिमा जगमें गाजतो ॥ जयो० जयो० २ ॥ लींवडीई श्रीशांति जिणंद, त्रणसे सात विहां श्रीजिनचंद । दिठइ अति आणंद तो ॥ जयो० जयो० ३॥ करणे शीतलजिन जयकारी, प्रतिमा सत नवसो तिहां सारी। जनमन मोहनगारी तो ॥ जयो० जयो० ४॥ विव सतरसु शांति सोहावे, वीजे देहरे मुज मन भावे । दरिसणधी दुख जाय तो ॥ जयो जयो० ५॥ देहरासर तिहां देहरा सरखं, पांत्रीस प्रतिमा तिहां कण निरखं । देखी मुझ मन हरख्यु तो ॥ जयो० जयो० ६॥ संघचीपोले पास जगदिस, प्रतिमा एकसो ओगणत्रीस। पूरइ मनह जगीस तो ॥ जयो० जयो० ॥७॥ पीतलमे दोय विंच विसाल, प्रतिमा तेहनी अतिसुकमाल। दीसे झाकझमाल तो ।। जयो० जयो० ८॥ ॥ ढाल ॥६॥ भवि तुमे वंदो रे शंखेश्वर जिनराया ॥ ए देशी ॥ खेतलवसही दोय प्रासादे, पास जिणेसर भेटया । । सामला पासनी सुंदर मूरति, देखत सब दुःख मेटया रे॥१॥ भवियां भावे जिनवर वंदो। १ । एकत्रीस' एवो. पण पाठ छे..
- श्रीजिनवरने वंदन करतां, होवे अति आणंदो रे ।। भ० २॥ त्रणसे अठोत्तर जिनमतिमा, सामलपासनी पासे । श्रीमहावीर पासे व्यासी जिनवरसुं,वंदो मन उल्लासे रे।।भ०३।। देहरासर निहां दोय अनोपम, रूप सोवनमय काम । सोवन रूप रयणमे प्रतिमा, दीसे अति अभिराम भ०४॥ अजुवसा पाहामा प्रतिमा, सचोतर मुखदाइ । पीवल मे श्रीविमलजिणेसर, वंदो मन लय लाइ रे॥भ०५॥ दोसीकुंपाना पाडामांही, ऋषभ जिणेसर सोहे। मुखदायक जिन सोल हे मुगुणनर, देखी जन माहे रेशम०६॥ वसोवाडे दोय शत अठावीस, शांविजिणेसर सामी । ओगणीस जिनमुं दोसीवाहे,ऋपम नमुं सिरनामी रे॥७॥ आंबादोसीना पाडामांही, मुनिमुव्रत जिन सोल । पंचहटीए एकसोने वीस ऋपभजिणंद रंगरोल भ०८ घीयापाडामां दोय देहरा, शांतिनाथ पार्थनाय । एकसो वीस तेर मतिमा, मुगतिपुरीनो साथ ।। भ० ९ ॥ 'एकसो छन्नु रिपभजिणंदमुं, प्रतिमा कटकीये बंदी। 'धोलीपरवमां ऋपम मुनिमुव्रत छेतालीस चिर नंदीभ०१० १'नेउ जिनमु' ए पण पाठ छे. २. 'वोस' एवो "पण पाठ छे. - १०२ ॥ ढाल ॥७॥ अधिनाशीनी सजटीए रंग लाग्यो रे, ए देशी ।। पारिग्वजगुना पाडामांहि, टांकलो पास विराजे जी । प्रतिमा चोत्रीस चतुर तुम बंदो, दालिद्रं दृखने भाजे जी । महिमा जगमांहि गाजे जी ॥२॥ किया वोहराना पाडामां,शीतल प्रतिमा तीम पंचवीस जी। क्षेत्रपालना पाहामांही, शीतलनाय नमुं निसदीस जी ॥२॥ जिहां जिनवर के बसे एकाणु, तिहाथी कोके जड़ए जी। त्रणसे नेत्र प्रतिमामु कोको, पारसनाय आराधु जी ॥३॥ अभिनंदन देहरे च्यार प्रतिमा,दोय प्रासाद तिहां बांधा जी। ढंढेर सामल कलिकुंड पासजी । नमतां पाप निकंद्या जी॥४॥ एकसो व्यासी प्रतिमा रूडी, व्यासी जिन वर्धमान जी। महेताने पाहे मुनिमुत्रत, सित्तेर जिन परधान जी ॥५॥ बसे चोराणु विंव सहित, श्रीशांतिनाथ प्रासाद जी। वखारतणा पाडामां बंदु, मुकी मन विखवाद जी ।।६।। दोसत सित्तरि जिनमतिमा, वांदी में अभिराम जी। गोडपाडे रिषभने देहरे, छन्नु विव इण ठाम जी ॥ ७ ॥ ॥ ढाल ॥८॥ हवे शक्र सुघोषा वजावे ॥ ए देशो॥ सालिवाडे त्रीसेरीयामांही, नेमि मल्लि ऋपम नमुं त्यांही ।
नवपल्लव नमुं उछाही, जिणेसर ताहरा गुण गाउं॥ जिम मनपंडित मुख पाउं । जि०१॥ साठ उपर सत तिम चार । बीजे देहरे श्रीशांति जुहार । विष ओगणसाठ उदार ।। जि० २॥ कलारवा देहरां दोय, शांति विव एकावन होय । वाचन जिनालय जोय ॥ जि० ३॥ पीतलमय विचं सोहाये, विमलनाथ भविक मन भाये । घउ उत्तर चतुरा जिनगुण गावे ॥ जि० ४ ॥ तिण एकसो चोपन जिनराया, ऋपभदेवना प्रणमुं पाया। दणायवाई शिवमुखदाया । जि० ॥५॥ धंधोलीए संभवाजिन साचो, बंदि त्रेपन जिन मनमांहि माचो। तूंही.जिन जगमांहि साचो ॥६॥ गोलवाई श्रीमहावीर, सोवन वान जासं शरीर। सात प्रतिमा गुण गंभीर ॥ ७॥ जि० ॥ दोय शत दस प्रतिमा पास, श्रीशतफणो जिनपास । पूरे मन केरी आग ॥ जि० ॥ खारीवाये श्रीजिनवर्घमान, तेर प्रतिमा गुणह निधान । जिननामे कोड कल्याण ॥ जि० ॥९॥ निहांयी श्रीपंचासरो पास, वंद्या मन घरी अधिक उल्लास ।
पोहती मन केरी आस || जि०॥ १० ॥ कीधी चैत्यप्रवाडी में सार, मनमांहि घरी हर्ष अपार । जिन नमतां जयजयकार, जि०.११ ।। । हाल ॥९॥ जिनजी धन धन दिन मुज आजनो। वांद्या श्रीजिनराज हो जिनजी, काज सया सवि माहरां, पाम्युं अविचल राज हो ।जि०१॥ जिनजी पंचाणुनइ. माजने, श्रीजिनवर प्रासाद हो । जिननी भाव घरी भवि वंदीए, मुकी मन विखवाद हो।।जि०२॥ जिनजी किंवतणी संख्या मुणो, माजने तेर हजार हो । जिनजी पांचसे होतर वंदीए, मुखसंपत्ति दातार हो ।जि०३।। देहरासर श्रवणे मुण्यां, पंचसयां मुखकार हो । जिनजी तिहां प्रतिमारलीयामणी,माजने तेर हजार हो।जि०४|| संवत सतर ओगणत्रीसे, पाटण कीध चोमास हो। जिनजी वाचक सौभाग्यविजयगुरु, 'संपनी पोहती आस हो । जि० ५॥ जिनजी साहव सुआ-सुत सुंदरु । सा रामजी सुविचार हो । जिनजी सुधो समकित जेहनो। विनयवंत दातार हो । जि० ॥ ६ ॥ १वस' इति पाठान्तर. २. 'साहाज्ये · पाटान्तर १०५ निनजी घरमधुरंधर व्रतधारी, परगटमल पोरवाड हो । जिननी तेह तणे उद्यमे करी, कीधी में चत्यप्रवाड हो । जि० ॥ ७ ॥ जिनजी तव तीरथमाल घणी, कीची में अति चंग हो । जिनजी साह रामजीना आग्रहे, मन धरि अति उछरंग हो । जि० ॥ ८॥ 'जिनजी तवन तीरथमालातणु, भणे सुणे वली जेह हो । जिनजी यात्रावणुं फल ते लहे, वाधे धरमसनेह हो ॥ जि०॥९॥ जिनजी श्रीविजयदेवसूरीसना, पाट प्रभाकर मर हो । जिनजो श्रीविजयमभसरि जग जयो। दिन दिन चढते नूर हो । जिननी धन० ॥ १० ॥ जिननी श्रीविजयदेवसूरीदना, साधुविजय बुध सीस हो निनजी सेवक हरपविजयतणी, पूरो मनह जगोस हो ॥११॥ ॥ कलश ॥ इम तीरथमाला गुणविसाला, प्रवर पाटण पुर तणी। में भगति आणी लाभ जाणी, धुणी यात्राफल तणी ।। तपगच्छनायक सौस्थदायक, विजयदेवसूरीसरो। साधुविजय पंडित चरणसेवक, हर्पविजय मंगल करो ॥१॥ इनि पाटणचैत्य- भवाडी संपूर्ण Harias (२) पं. होरालालनिर्मिता श्रीपत्तनजिनालयस्तुतिः । रचना विक्रमसंवत् १९५९ नत्वाऽऽदिदेवं वृषभध्वज च, कल्याणवल्लीमवरांववाहम् । दुबै स्तुति सर्व जिनालयाना,मुक्तिमदा पटनपूःस्थितानाम||१ पाडे मार्फतियात मुनिसुवन विभुं भृमिनाथैः सुसेव्य, बंद दारकः स्तुतमवनितले मोक्षदानकदाम् । वामेय पार्थिनार्थ शठकमठगजागर्वभेदैकसिंह, नाम्ना श्रीभीडभंज मुनिगणमाहितं तीर्थनार्थ नमामि ॥२॥ वंदे देहेवाटे जगति जनगणे श्रेयसामर्पणोत्कं, पार्श्व श्रीकंकणाई प्रकटमहमय श्रेयसे ज्ञातपुत्रम् । एवं पार्थ च नौमि त्रिदशपतिगणैः सेवितं शामलाई, वि यस्यास्ति तुंग भविकजनगुणाल्हाददं भावभक्त्या ॥३॥ वयं नमामो पडिगुंदीपाडे, श्रीशीतलं तीर्थकर सुभक्त्या । सुरासुरेंद्रैः परिसेव्यमानं, मोक्षश्रियः केलिविलासगेहम् ॥४॥ संसाराग्निप्रतापप्रमथनसबलं शीतलं शीतलाख्यं; मोक्षार्थ मोक्षमार्गप्रदमहमधुना तीर्थनाथं नमामि । भक्त्या प्रासादसंस्थं सुरवरमहितं क्षेत्रपालाख्यपोले, भव्यानंदप्रदानप्रवणमथ सदा सर्वलोकैकवंधुम् ॥ ५ ॥ कोकापाडे. नमामि श्रुतवलकलितैर्भव्यलोकै सुसेव्यं,
कोकापार्थाभिधानं सकलमुरगणैः सेव्यमानक्रमाजम् ।
पोहं नोर्याधिराज भवजलतरणे यानपात्रं गुणार्थ,
भक्त्या बंदेडमिनंद जिनपतिमखिल्लमाणिसोख्यकलक्षम् ॥६॥
नमामि कोटापुरवासिधर्मशालास्थित स्थंभनपार्श्वनाथम् ।
श्यामच्छवि मेघमियात्र भव्यकलापिनों मानसमोददं च ॥७॥
चंद पंचासरं ये मुमतिजिनपर्ति ज्ञावपुत्रं च गोडी-
पार्य चितामणि चाजितजिनपतिपत्राहयौचित्ययुक्तः।
नौमि श्रीधर्मनाथ वरतरनयलक्षाभिधानं च पार्थ,
चातुर्मुच्या स्थितं चापरनरनिकरैः संन्ययान जिनेंद्रम् ॥८॥
श्रीहरिमरेजयदेवमूरेः, श्रीसनपूरैः शीलगुणपरे।
नमामि विधानि गतानि नत्र, ससारबारानिपिनौनिभानि ॥५॥
अष्टापदाख्येऽय जिनालयेऽई, सुपार्श्वनायं प्रणमामि भात्या।
नंदप्रभं चंद्रनिभं जनानां; मनोगतानंदपवादिौ ॥१०॥
खडाकोटीपाडे विमलमनितोऽहै जिनपति,
स्तवे शांति शांतिम मरनिगानांतनुभृताम् ।
सय बंदेऽहं प्रथमजिननाय नममिती,
दिपंचायग्नालयकलितजनायतनगम ॥22॥
नारंगाभिधपाचनायमनी नौमि ममोदमद,
नदरीत्यमिधानवादगमहं श्रीवासुपूज्यं तथा ।
नाभयं च नमामि सर्वजनतासंसारतापापहे,
प्रानि शनिकर तथैव जिनपं, श्रीवाडिया मित्रम् ॥१२॥
१०. शावाडे प्रणमामि भक्तिभरतो रक्तं च मुक्तिस्त्रियां, श्रीनाभेयममेयकीर्तिकलितं संसारसंतारकम् । मारी येन निवारिता जिनपति तं नौमि मुक्त्याः पति, श्रीशांति जगतां जनोपकरणप्रावीण्यबद्धस्पृहम् ॥ १३ ॥.. भक्त्यान्वितासु जनतासु नतामु नासु, कारुण्यभाक्कलितं कलित सुवोधैः । शावाडगं जिनपति प्रणमामि भवत्या, वोधैकदानवियुधं विबुधोपसेव्यम् ॥ १४॥ जिन सुपार्श्वनाथं च, पार्थ तु शामलाढयम् । भव्याजप्रकरे लोके, वांय लोकवांधवम् ।। १५ ।। वंदे शांति जिनपतिमथो शस्तभंसातवाडे, भक्त्या युक्तः कविशिशुरहं शांतिनाथ सनाथम् । नाथेन श्रीवरगणभृतां चात्र चंद्रप्रमेण, प्रासादे वै सुरनरगणैः सेवितं गौतमीये ।। १६ ॥ श्रीशांतिनाथं नरनाथसेव्य, सनायतां पाणिगणे भजतम् । स्थितं च वंदे तरभेडवाडे, संसाररोगव्यथनैकवैद्यम् ॥२७॥ वंदे जिन श्रीपतिमादिदेवं, भक्त्या युतः खेजडपाडसंस्थम् । यस्योपरिप्राज्यतरातपत्रं,रौप्यं च मुक्त्यस्तकटाक्षतुल्यम् ॥१८॥ कर्पूरमेताभिधशस्यपाडे, स्तुवे जिनेशं वृषभध्वज च । कर्मामिदाहैकजलाभिषेक, कषायवृक्षेषु दवामितुल्यम् ॥१९॥ तंबोलिवाडे प्रभुमानमामि, श्रीवर्द्धमानं च मुपार्श्वनाथम् ।
कुंभारपाडे प्रभुमादिदेवं, पार्थ भटेवाभिधमाप्तमुख्यम् ॥२०॥ शांति नौमीह भक्त्या जिनपतिममलं डकमेताइपाडे, कारिध्वंसवीर सकलजनहित टांकलापार्थनायम् । श्रीवीरं वै जिनेशं प्रथमजिनपति चात्र मण्यातिपाडे, कूटं नाम्ना सहलं वरतरनगरवेष्ठिमनिर्मितं च ॥ २१ ॥ कर्माराममहारपवरगनपनि मोक्षरामामिलाप, संसारापारवानिधिगलनविधी कुंभजातं जिनेशम् । उच्चैः पोले नमामि त्रिदशगणनतं स्वर्णकारस्य पाडे, श्रीवीरं शांतिनाथ स्तुनमवनितले नाकिनायैश्च चन्द्यम् ॥२२॥ शांतीशं चायतीभ्यां जनगणभृतफोफलियाद्दे हि वाढे, वीथ्यां चै चोधरीणां यदुकुलतिलक नेमिनाथ नमामि । पार्थ मनमोहनाख्यं तदभिधवरवीथ्यां गतं शंखपाश्च, वीथीग संभवं वखतजिव इतः सुव्रतस्वामिनं च ॥ २३ ॥ श्रीयोगीवाडेऽद्भुतकांतिमूत्तिनमामि चै श्यामलपार्धनायम् । श्रीमल्लीपाडे किल मल्लिनाथ कपायमल्लं प्रतिमल्लनाथम् ॥२४॥ नमामि भक्त्या लखीमारवाडे, पा जिनेंद्र मनमोहनाख्यम् । जिनाधिराज मुनिमुवतं च, सीमंघरस्वामिनमातमुख्यम्॥२५॥ तमजितमभिवंदे केमुनामेभ्यपाडे,मयमजिनपति चै चोखवट्टीयपाहे मुरगणनतपादेशांतिनाथ जिनेंद्र,जिनमतकजसूर्य धर्मनायं च नौमि मुमतिनिनपपीडे पाठशालारुपपाडे, ६१० वृषभविभुमपीह स्वर्णवर्णाड्यदेहम् । स्थितमभिनतलोकं पाटके वल्लियाले, भविककमलयोथे लोकबंधुं जिनेशम् ।। २७ ॥ सद्भक्त्या प्रणमामि शीतलमहं पाडेऽन्जिमेताभिवे, तीर्थेशं च कसुवियागमभितो वंदे सदा शीतलम् । गोडीपार्श्वमथो नमामि किल संबैशाख्यपाडे स्थिती, मन्मोहाभिवपार्श्वनाथ-विमलौ नैर्मल्यदानक्षमौ ॥ २८॥ भक्त्याहं वासुपूज्यं जितमदनमथो वासुपूज्याख्यवीथ्यां, खर्जरीपाटके चामरगगमहितं मोहन पार्थिनाथम् । भाभापाडे नमामि त्रिजगदधिपति पूज्यभामाख्यपार्च, शांतं श्रीशांतिनाथं शममुखसहित लोंबडीपाटके च ॥ २९ ॥ प्रासादे निर्जरेशालयनिभकलकांतो कनाशाहपाडे, नानाचित्रविचित्रैर्हतजनहृदये कल्पसौदर्यकल्पे । तीर्थशं शांतिनाथं स्फटिकमणिमये दिव्यकांत्या सनार्थ, वदे श्रीशीतलाख्यं वहमहमिकयाई जिनं देवसेव्यम् ॥३०॥ तत्रैवाहमय प्रणौमि जिन श्रीशांतिनाथाभिधं, प्रौदे जैननिकेतने स्थितमरं देवेशसंपूजितम् । पार्थ तस्य नमामि नाभितनयं संसारसंतारकं, श्रीवीरं च नमामि भक्तिभरतः कर्मानिधाराधरम् ।। ३.१ ॥ नाम्ना श्रीशांतिनाथं समुदमहसथो बामणाख्ये हि.वाडे, ..
तीर्थेशं प्राहमक्त्या सकलमुरनराधीगसेव्यं जिनेन्द्रम् ।। कर्मारामामितुल्यं जितमदनमरं सर्वलोकैकबंधु, संसारापारवारांनिधिगतजनतानारणे यानपात्रम् ।। ३२ ।। "भक्पाई क्षेत्रवस्यां जिनपतिमभिवः श्रीमहादेवपार्थ, शांति संघेशचेत्ये प्रथमजिनवरं शामलाख्यं च पार्थम् । संसारांभोधियानं स्वजित जिनपति नौमि योगींद्रनाथ, क्रोधादिप्रौढयै रिमकरविदलने शूरवीरावतंसम् ॥ ३३ ।। नौमीह शांति ववस्सिपाडे, नामेष-शांती च वसाव्यवाटे। पंचोटीपाडे जिनमादिदेव, बागोलपाढे पभं जिनं च ॥३४॥ कंयोइपाच किल घीयपाडे, शांति च तत्रंब जिनं नमामि । आदीश्वरं वै कटकीयपाडे, मोहमद मोक्षगतं जिनेशम् ॥३५॥ महालक्ष्मीपाडे मुनिमुत्रततीशमधुना, तथा कोटावामिप्रवरयनिका गारमिलितम् । जिनं शांति वंदे सकलमुरसंघातमहित, तथैवं चामेयं शठकमठसंतापहरणम् ॥ ३६॥ .. आदीश्वरं गोदस्याटकेऽहं, गणाधिनाय किल पुंडरीकम् । भाया नमापीह च नेमिनाय, चतुर्मुखं तीर्थकरेंद्रवियम् ॥३७॥ दक्षारपाडे प्रभुशांतिनार्य, चंद्रमभं वीर्थकरं नमामि । दृष्ट्वा मां वजिनमंदिरस्य चित्रं जनीयोंऽनिमिपत्वमाप।।३८॥ वंदे श्रीनेमिनाथ यदुकुहनिलकं शांति-धौ च मल्लिं, १२२. वाहेऽह, शालवीनां जिनपतिवरशांति च कालारवाडे । वार्ड नारायणे वे प्रथम जिनपति धांधले संभवं च, गोलाबाटे च पार्श्व सुरनरम हितं चंपकाख्यं च पार्थम् ॥१९॥ आदीश्वरं च किल टांगडियाख्यवाडे, शांतिं नमामि विदिताखिल लोकवोधम् । वंदेसहरफणिमंडितपार्श्वनाथ,संसारतापपरिखेदमुवारिवाहम् ४० शांति च चारुगिरिनारपटं नमामि, शत्रुजयस्य पटमत्र सहस्रकूट। विम्वं चतुर्मुखजिनस्य गिरिंच मेरु,रत्नेषु धर्ममितपादगण गणिनाम् एवं नमंति जगतीह च ये मनुष्या,जैनालयांश्च वरपट्टनस्थितांश्च नानागृहस्थगृहगांश्च तथा हनेकान् जैनालयानिह हि ते किल मुक्तिभाजः ॥ ४२ ॥ प्रौदं प्रवर्तकपदं परितो गतानां, प्राप्याशु कांतिविजयाख्यमहामुनीनाम् । आनंदमूरिपरिवारकजार्कभानामादेशमत्र किल हसमुतेन भव्यम्।। जिनेशानामेवं स्तुतिरिह मया पट्टनपुरे, गतानां चैत्येषु स्वहितकृतये संविरचिता। हिरालालाइन ग्रह-विशिख-निध्यजमिलिते, शुभे वर्षे शस्ये सपदि वसता जामनगरे ॥४४॥ इति श्रीपत्तम जिनालय-स्तुति: ]
। तीर्थराज चैत्यपरिपाटी स्तवनं ।
फर्ता. साधुचंद्र मुनि.
प्रणमिय रिसद जिणंद पुंडरिक गणहर सहिय ।।
विरचितु वैत्र प्रवाडि, संघह सरसी जिम विहिय ॥ १॥
भास
पहिलउ विधामपुर नयर, जिद्द तिरि नाभि मल्हार ॥
बीजा जिणहरि घंदिया ए, तिलप्सासुय मुविचार ॥२॥
सिरि ऊपशाह मंडणउ ए, सामिय वोर जिणंदा ।
तिमरियपुरयर सृहकरण, पाप्सनाह जगि चंद ॥ ३ ॥
भास
जोधनयर सिरि कुंयुनाथ, विद्विचाय मंडण ॥
पास संति चे चंदिया , दुद दाह विहंडण ॥ ४ ॥
गूढानयर सिरि कुंथुदेव, भवनलनिहितारण ।।
बीजा जिणहरि पूजीयह ए, सीतल सुहकारग ॥५॥
वस्तु
पास जिणवर पास जिणपरि, नयरि जालउरि,
मादीसर पहु भेटियए, सयल सुख संपत्ति कारण;
'अचिरानंदण संति जिण, मधिय लोदुहनायचदण।
हरिकुल अपर सहसकर, सामिय नेमिकुमार,
वीर जिणेसर भयणगुरु, तिहुयण तारणहार ॥ ६॥
भास
शाणापुर सिरि बद्धमाण, निभा भयवारण ।
मुणिसुव्यय पहु पूजीयह ए, गइनिज्जियवारण || ७ ||
नाराद्रह सिरि वीरनाह, भवतिमिर दिौसर ।
ओडापुर मुखमंडणउप. सिरि धीर जिणेसर ॥ ८ ॥
ढाळ
सीरोही सुरपुर अवतार, गढमढ मंदिर पालि पगार ।
कणयकलस धजदंड विसाल, दीसह देउल नयण रसाल ॥९॥
खरतर वसहिं संतिजिणंद, भविय-कमल पडिवोहदिणंद ।
बिहु चेइ सिरि आदिजिणंद अजियनाह किरि निमचंद
भास
नाभिराय-घरि सोहलउ ए, सामिय रिसह जिणंद।
मंकोडइ थिरथी रघउ ए. तिहुयण नयणाणंद ॥ ११ ॥
मंडवाडि
पहु पानजिण. · कज्जल कोमल काय ।
नीतोडइ तिरिआदिपहो, सुरनर बंदिय पाय ॥ १२ ॥ .
पोसोनई तिरि पढमजिण, विहं चेइ सिरि संति ।
पास वीर रंगि पूजीयइ ए. टालइ निज मनि भ्रंति ॥रा
मटोडइ महिमामिलाप, सोहग सुंदर पास ।
महावीरपहु आगिया प, तोडइ भवदुह पास ।। १८ !!
नयर वडाली संतिजिण. तिहुयण पणमिय सामि ।
इडर नयरइ दुन्नि जिण, रिसह पास सिवगामि ॥१५॥
चंदप्पहपहु भेटियइ ए, ओडा नयर मझारे ।
अट्ट कम्म अरि निजणीय, जो पहु गर भवपारे ॥१६॥
. वस्तु वडहनरइ घडहनरइ आदि पहु वीर, जीयतसामिय लेपमप, कणयवन्न पादुका रयण, वाला येउल मालतिय, पमुह फुलतोहर रपवि। कुंकुम धंदन मदनधिय, पूज रचाषउ भगि। मापन भाय विवहपरि, जगगुरु आगलि रंगि ॥ १७॥ . योसलनयरई आदि धीर, मणपंछिय सुरषर। महिसाणे पहु पास संति, सिरि आदि मुमतिघर ॥१८॥ जोटाणइ पहु पासनाह, सिरि सुमति मिणेसर । सुंआलइ सिरि नेमिदेव, मघमय वणकुंजर ॥ १२ ॥ धीरमगामह सुमति संति, जांबू मुनिसुव्रत । टोटरगामइ पासनाह, बहु लोयां सम्मत ॥ २० ॥ भोइकर सिरिमादिनाह, रंगपुरि पहु पासो । धंधुकर सिरिपंच संति, धंदउ बलि पासो ॥ २१ ॥ वस्तु वलहनयरि यलहनयरि संति जिणराउ, चम्मारिपुरि संतिजिण, मषियलोभ लोयण निसायर, पालिभताणइ पासपहो, विहिय सेष सुर अमुर किन्नर ॥ ललियसरोवर हरसभरि, सामिय वीर नमेश । अंग पखालि विमल अलि, पावपंक टालेसी ॥ २२ ॥ गहगहत दिव गिरि चडिय, पाजइ परमाणंद।। दह दिसि पसरिय वियह परे, सिंदपार मचकुंद ॥२३॥ कोइल फरइ रहकडा प, विहसिय सुद वणराय ।
परवइ परवइ लइसियए, सीतल वायइ वाय ॥ २४ ।। मरुदेवा गहवर चड़िय, अचिरानंदण मंति। छीपकवसहिय बंदियइ ए, अदबुद सोवन कति ॥ २५ ॥ अनुपम सरवर पेखियह ए, सरगारोहिणि चंग। वाघिणि निरखी वारणइ ए, रोमंचिय मद अंगि ॥ २६॥ वस्तु आदि जिणवर आदि जिणवरः नमिय बहु भत्ति देवासुर संथुणिय कुमयमोहमहिमा विहंडण खरतरवसहिय पढजिण, नेमिनाह गिरनार मेहण । रायणतलि हिव पूजियड, सामिआदिल-पाइ, नाग मोर वे ध्याइयइ, जे हुआ सुरकार ॥ २७ ॥ इणिपरि यात्रा विमलगिरे, कोधी मन उल्हासि । कवडजक्ष-सुपसाउलइ ए, टला विधन दुह रासि २८ पाटण पहवइ वरनयर, जिह विससेण मल्हार । अवर बिंब बहु वंदियर ए, तिदा न लाभड़ पार ॥ २२ ॥ सिरि संभवपहु वाविपुरे, लोद्राडइ सिरिसंति; फीदीवनयर सिरिवीरजिण, जनु पसाइ सुह संति ॥३०॥ तेत्रीस बच्छर विगयमच्छर ठामि ठामि जिणेसरा । निय भाव सत्तिहि विविह भत्तिइ भविय कमल दिणेसरा। बहु संघ साथइ देवराजइ बच्छराजि नमंसिया। ते देव सुहमर जावडू थिर श्रीसाधुचंद्रि प्रसंसिया ॥३॥ ॥ इति तीर्थराज चैत्यपरिपाटी स्तवनं ॥
११७ , ॥ नवकार वाली पद ॥ राग भीम पलास. भला करे फीर मुर्शदमौला, अल्ला पंढरपुरवाला-ए चाल. भला होयगा भजले माला, टल्ला भवसानेवाला-ए आंकणी नहीं लगती कुछ दमडी कवडी, रटनेमें प्रभु गुण ठाला, माला बनाले गुणको गाले, छोड कर दुनिया चाला ॥ मला०॥१॥ भूत प्रमुखकी गुंय के माला, आँकार जप ले लाला; ओंकारमें पंच परमेष्टी, हे माला गुणने वाला । मला० ॥२॥ अष्टोत्तर शत हे गुण इनके, उतने मणकै फर व्हाला, इंस कहत है मुण ये प्यारा, घटमें घर ले गुणमाला||मला०३॥ || कार्तिक पुनम महिमा गर्भित श्री सिद्धांचल- स्तवन । अवमोहे डांगरिया है जिनंदजी, ए देशी. सिद्ध गिरि शणगार, मुगुणनर सिद्धगिरि शणगार; दशकोरी अणगार, मृ०॥ ए आंफणी॥ ऋपभदेवना पुत्र पनोठा, द्रविड नाम भुपाल, जेनानामयी द्रविड देश छ,हालमां करलो ख्याल. मु०सि०॥१॥ मुख्य राजधानी के तेहनी, मिथिला अति मनोहार. मु.
११८ तेहना राजा प्रपुत्र प्रभुना द्राविडजी सुखकार. मु०॥सि॥२॥ वारीखील्य लघु बांधव तेहना, लाख गाम सिरदार. मु० राज्य ऋद्वि छोडी बन्ने भाइ, उतरवा भवपार. सु०॥सि०॥३॥ चारण मुनिवरनी शिक्षाथी, लेइ दीक्षा तत्काळ. मु० अणसण कर्यु एक मासन सुंदर, छोडी सकल जंजाल सु०सि०४ शरदपुनमथी कार्तक मुदनी, पूनम मुधीनुं सार मु० आत्मध्यान धरी मोक्ष सधाया,दश कोटी मुनिलार. मु०सि०५॥ ते कारण कार्तक पुनमनो, महिमा अपरंपार. मु० महितलमां विस्तरीयोछे बहु,मेलो भरे नरनार. मु०सि०॥६॥ वली कार्तिकी अहाइ परवरुप, देरी उपर जुवो धार. मु० पूनमनो दिन कलश स्वरुपे, सोभे मंगलकार. मु०॥सि०॥७॥ ते दिन दादा वृषभ देवनी, यात्रा करीने उदार. सु० द्राविडने बारिखील्य मुनिनी, प्रतिमा पूजो श्रीकार.सु०सि०॥८॥ शत्रुजय महातममां मुंदर, ए वृतांत रसाल. मु० मुरिधनेश्वरनु फरमाव्यु, वांचो थइ उजमाल. सु०॥सि०॥९॥ तेह धनेश्वर मूरीश्वरनी, मूर्ति स्थापन कार. इंस कहे ते मूर्ति पूजो, सिद्धगिरि पर सार, मुनासि०॥१०॥ आदि जिन मंडल पूर्णा तिथिए, पूर्ण करवा संसार. मु. प्रति पूनम दिन पूजा भणावे,जिनभुवने जयकार. मु०सि०११॥ , सु० पाटणमा वर्तमान जिनमन्दिरो. देगसर पोळ मूदनायकजी १ अष्टापदजीनी धर्मशाळा चंद्रप्रभु, अष्टापदजी, सुपार्श्वनाय आदीश्वर, पांच मेलं खडा खोटही ऋषगदेव, शांतिनाथ २ टांगडीआवाडो आदीश्वर, पद्मप्रभु, गणधर- पगलां, सिद्धाचलजी. कृट,चोमुखजी शांतिनाथ, मेक, शिखरजी २ झधेरीपाडी नारंगापार्श्वनाथ, आदीश्वर, पा. श्वनाथ, वासुपूज्यजी, बाडीपा- वनाथ २ शाहपाडो आदीश्वर, शांतिनाथ २ शादचाडो গ্ৰনাথ, মা লাখ १. भंसातपाडो शांतिनाथ, चंद्रप्रभु, गौतमस्थामी १ तरभेडाबाडो शांतिनाथ १ खीजडानो पाडो आदीश्वर १ कपूरमहेतानो पाड़ो आदीश्वर २ तंबोळीयाडो महावीरस्वामी, सुपार्श्वनाथ २ कुंभारीआपाडो ऋपमदेव भटेया पाश्वनाथ' २ इंफमदेतानो पाडो फिलापानाथ, शांतिनाथ ३ मणीआती पाही महाषीरस्थामी,आदीश्वर,सहन्नकट २ सोनीयाही महावीरस्वामी, शांतिनाथ .
६ फोफळीआघाडी M १ जोगीवाडो १ मलातनी पाडो २ लखीआरवाडी १ निशाळ पाटो २ केसुशेठनोपाटो ३ चोखावटीआनो पाडो १ बळीआ पाडो १ अवजीमेतानो पाडो २ कसुंबीभायाडो २ संघधीनो पाडो १ वासुपूज्यजीनी खडकी १ खजुरीपाटो १ भाभानो पाडो १ लींबडीपाडो १ पाणःसानो पाडो १ बामणवाडो खेतरवसी जांतिनाथ, मंखेश्वरजी, मन- मोहनजीपार्श्वनाथ,संभवनाथ, मुनिसुव्रतस्वामी, नेमीनाथ शामटा पार्श्वनाथ मल्लीनाथ सीमंधरस्वामी, मुनिसुव्रतस्थामी मनमोहन पार्श्वनाथ सुमतिनाथ अजितनाथ आदोश्वर, धर्मनाथ, शांतिनाथ आदीश्वर शीतलनाथ शीतलनाथ, गोडीपार्श्वनाथ विमलनाय, मनमोहनपार्श्वनाथ वासुपूज्य स्वामी मनमोहनपार्श्वनाथ মমঘনাথ शांतिनाथ शीतलनाथ, शांतिनाथ शांतिनाग शांतिनाथ, विमलनाथ, आदी- श्वर, अजितनाश, शामला पार्श्वनाथ . १ अदुषसानो पाटी शांतिनाय २ घसाषाडो शांतिनाय, आदिनाथ १ पंचोटीपाडो ऋषभदेव १ यागोळयाहो ऋषभदेय २ घीआ पाडो शांतिनाथ, कंबीह पानाथ १ कटकोआपाडो आदिनाथ ४ तरशेरीमो शांतिनाथ,ने मिनाथ.पाभ्यनाथ, महापोरस्वामी, १ कलारवाडी शांतिनाथ २ धांधल संमवनाथ १ नारणजीनो पाडो ऋपमदेव शालीयाडो गोलया गोडीपार्श्वनाथ,याहीपार्श्वनाथ 2 महालक्ष्मीनो पाटो मुनिसुव्रतस्यामी, सुमतिनाथ गोदडनो पाडो आदीश्वर, चंद्रप्रभु, मेमिनाय चोमुखजी, २ घखारनो पाडो चंद्रप्रभु, शांतिनाथ २ मारफतीआ मेतानो पाडो मुनिसुव्रतस्वामी, भोडभेजन- पार्श्वनाय ३ दंढेरचाहो कलिकुंड पार्श्वनाथ, शामटा, पार्श्वनाथ, महावीरस्वामी १ पडीगुदी शीतलनाथ १ वेतरपाटनी पाने शीतलनाय कोकानो पाडो फोशापविनाय, अभिनंदन- स्थामी, .
૨૨ १ कोटवाळानी धर्मशाळा १ पंचासारो स्तंभन पार्श्वनाथ पंचासरा पार्श्वनाथ, नवखंडा- पार्श्वनाथ, धर्मनाथ,महावीर- स्वामी, वे सुपाश्वनाथ, चिं- तामणिजी, अजितनाथ शां. तिनाथ, चोमुखजी, गोडोपा- र्श्वनाथ, सुमतिनाथ. श्री हे. मचंद्राचार्यजी, विजयदानसू- रीजी, विजयहीरसूरीजी, वि. जयसेनसूरीजी विगेरे पूर्वा. चार्योनी मूत्तिओ. १०० मोटां देरासर घर देरासर जुदां. . . " पृष्ट पंक्ति ९ १२३. शुद्धिपत्रक. अशुद्ध पैकोना आछो ता १ ४ १ " १२ पैकीनो ओछो तो चैत्र- ८ आठ मलयारी बखतथी जैन चैत्योनां ९५९८ पाढे ७सात मलाघरी घखतथी जन चैत्योनी ९+९८ पाडे १२ ૨૪ " २२ १५ ४४ 3D ४८ ६ठा ६ ठी मालाडे मालीवाडे गावाटमा गोल्वाडमा शखेश्वरन शंखेश्वरनु भुवनमम भुवनप्रम- श्रीविद्यापम- श्रीविद्यामभ- ललितप्रम ललितमभ- ६४ ४ " or ३ " ४ । ७९ १८ वित्र बिंब .८० चन्द्रप्रभा चंद्रप्रभ चोद चौद १२ विर वीर जीनवरुए जिनवरु ए ८ भसात- भंसात- २ विव विव क्द चंदू ९८ १५ शीतलविव शीतल विच पीतलमे पीतलमय माहे मोहे १०४ १७ साह्न सुआ साह वसुआ- १०५ चत्य- चैत्य- १०६ १३ -णनगुणा- १०७ ससार- संसार- -निधि -निधि- १०९ १२ -पाश्व जिनपति -जिनपति आ सिवाय मात्रा रेफ विगेरे खण्डित थवा संबंधी या ऊडी जवा संबंधी अने केटलीक पदच्छेद संबंधी रही गयेली स्खलनाओ मुज्ञ पाठकोए सुधारी वांचq. " ३ ७ -पाच ६
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
ચંદ્રાચાર્ય જેન સભા છે
પુસ્તકાલય
પાટણ.
લી
શાંક
વિ
Bages
છે કે નહિ તેમ સંભાળથી વાંચવા.